388 389 ISSN 2229-547X VIDEHA 'विदेह' ६९ म अंक ०१ नवम्बर २०१० (वर्ष ३ मास ३५ अंक ६९) वि दे ह विदेह Videha বিদেহ http://www.videha.co.in विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका Videha Ist Maithili Fortnightly e Magazine विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका नव अंक देखबाक लेल पृष्ठ सभकेँ रिफ्रेश कए देखू। Always refresh the pages for viewing new issue of VIDEHA. Read in your own scriptRoman(Eng)Gujarati Bangla Oriya Gurmukhi Telugu Tamil Kannada Malayalam Hindi एहि अंकमे अछि:- १. संपादकीय संदेश २. गद्य २.१. देवशंकर नवीन- १.एकटा विहनि (लघु) कथा -बिलाड़ि आ एकटा कथा २. मोटर साइकिल २.२.१.डा.रमानन्द झा ‘रमण’- नेपालमे मैथिली कथाक विकास ओ प्रवृत्ति २.जगदीश प्रसाद मंडल-मैथिली उपन्यास साहित्यमे ग्रामीण चित्रण ३. शिव कुमार झा ‘टिल्लू’- मैथिली उपन्यास साहित्यमे दलित पात्रक चित्रण २.३. रमाकान्त राय ‘रमा’ नव गीतक पुरोधा : महाकवि प्रवासी २.४.शिवकुमार झा ‘टिल्लू’ ‘समकालीन मैथिली कविता’क समीक्षा २.५.श्रीमती शेफालिका वर्माआखर-आखर प्रीत (पत्रात्मक आत्मकथा) २.६.रिपोर्ताज- १.ज्योति सुनीत चौधरी-इर्लिंग आर्ट ग्रुपक 95 वाॅ वार्षिक कला प्रदर्शनी २.उमेश मंडल- सगर राति श्रोता कथा-सागरमे डुबकी लगेलन्हि ३.नवेन्दु कुमार झा-मतदाता सभक उत्साह मध्य सम्पन्न भेल तीन चरणक मतदान- राजनीतिक दलक बेचैनी बढ़ौने अछि मतदाताक चुप्पी ४.सुमित आनन्द- आचार्य सुरेन्द्र झा “सुमन” जयन्ती-२०१० ५.सुजीत कुमार झा- जनकपुरमे कोजागरा महोत्सव २.७.१.ज्योति सुनीत चौधरी- विहनि कथा (लघुकथा)- पानिमे खेती २. कुमार मनोज कश्यप-विहनि कथा (लघुकथा)-उजड़ल खोंता ३. नबोनारायण मिश्र- विहनि कथा (लघुकथा)- घमंडक फल४.राम विलास साहु २.८.१.जगदीश प्रसाद मंडल- कथा- मइटूगर (गतांस सँ आगाँ) २. राजदेव मंडल- कथा-एलेक्सनक भूत ३.प्रो. वीणा ठाकुर- - कथा- परिणीता (आगाँ) ४. बेचन ठाकुर बेटीक अपमान ३. पद्य ३.१.सतीश चन्द्र झा-
नेन्ना तेतरी ३.२. राजदेव मंडलक पाँचटा पद्य ३.३.ज्योति सुनीत चौधरी-प्रजातन्त्रक खेल ३.४.१.राजेन्द्र चौधरी (१९४०- )- दूटा पद्य २. राम बिलास साहु- चौवनिया नेता ३.५.कालीकांत झा "बूच"-चारिटा पद्य ३.६.१.चन्द्रशेखर कामति- दूटा गीत २.राजेश मोहन झा- पद्य ३.किशन कारीग़र- गलचोटका बर ३.७.गंगेश गुंजन- ३ टा गजल-पद्य ३.८.डॉ राजीव कुमार वर्मा आ डॉ जया वर्मा- हमर गाम ४. मिथिला कला-संगीत-१.श्वेता झा चौधरी-काली माँ २.ज्योति सुनीत चौधरी ३श्वेता झा (सिंगापुर) 5. बालानां कृते-राजेश मोहन झा- कविता- मूड़नक भोज 6. भाषापाक रचना-लेखन -[मानक मैथिली], [विदेहक मैथिली-अंग्रेजी आ अंग्रेजी मैथिली कोष (इंटरनेटपर पहिल बेर सर्च-डिक्शनरी) एम.एस. एस.क्यू.एल. सर्वर आधारित -Based on ms-sql server Maithili-English and English-Maithili Dictionary.] 7.VIDEHA FOR NON RESIDENTS 7.1.Original Poem in Maithili by Gajendra Thakur Translated into English by Jyoti Jha Chaudhary- Fearful Souvenir 7.2.Maithili Short-story “Tashkar” by Gajendra Thakur re-written in English by the author himself. विदेह ई-पत्रिकाक सभटा पुरान अंक ( ब्रेल, तिरहुता आ देवनागरी मे ) पी.डी.एफ. डाउनलोडक लेल नीचाँक लिंकपर उपलब्ध अछि। All the old issues of Videha e journal ( in Braille, Tirhuta and Devanagari versions ) are available for pdf download at the following link. विदेह ई-पत्रिकाक सभटा पुरान अंक ब्रेल, तिरहुता आ देवनागरी रूपमे Videha e journal's all old issues in Braille Tirhuta and Devanagari versions विदेह ई-पत्रिकाक पहिल ५० अंक
विदेह ई-पत्रिकाक ५०म सँ आगाँक अंक विदेह आर.एस.एस.फीड। "विदेह" ई-पत्रिका ई-पत्रसँ प्राप्त करू। अपन मित्रकेँ विदेहक विषयमे सूचित करू। ↑ विदेह आर.एस.एस.फीड एनीमेटरकेँ अपन साइट/ ब्लॉगपर लगाऊ। ब्लॉग "लेआउट" पर "एड गाडजेट" मे "फीड" सेलेक्ट कए "फीड यू.आर.एल." मे http://www.videha.co.in/index.xml टाइप केलासँ सेहो विदेह फीड प्राप्त कए सकैत छी। गूगल रीडरमे पढ़बा लेल http://reader.google.com/ पर जा कऽ Add a Subscription बटन क्लिक करू आ खाली स्थानमे http://www.videha.co.in/index.xml पेस्ट करू आ Add बटन दबाऊ। मैथिली देवनागरी वा मिथिलाक्षरमे नहि देखि/ लिखि पाबि रहल छी, (cannot see/write Maithili in Devanagari/ Mithilakshara follow links below or contact at ggajendra@videha.com) तँ एहि हेतु नीचाँक लिंक सभ पर जाऊ। संगहि विदेहक स्तंभ मैथिली भाषापाक/ रचना लेखनक नव-पुरान अंक पढ़ू। http://devanaagarii.net/ http://kaulonline.com/uninagari/ (एतए बॉक्समे ऑनलाइन देवनागरी टाइप करू, बॉक्ससँ कॉपी करू आ वर्ड डॉक्युमेन्टमे पेस्ट कए वर्ड फाइलकेँ सेव करू। विशेष जानकारीक लेल ggajendra@videha.com पर सम्पर्क करू।)(Use Firefox 3.0 (from WWW.MOZILLA.COM )/ Opera/ Safari/ Internet Explorer 8.0/ Flock 2.0/ Google Chrome for best view of 'Videha' Maithili e-journal at http://www.videha.co.in/ .) Go to the link below for download of old issues of VIDEHA Maithili e magazine in .pdf format and Maithili Audio/ Video/ Book/ paintings/ photo files. विदेहक पुरान अंक आ ऑडियो/ वीडियो/ पोथी/ चित्रकला/ फोटो सभक फाइल सभ (उच्चारण, बड़ सुख सार आ दूर्वाक्षत मंत्र सहित) डाउनलोड करबाक हेतु नीचाँक लिंक पर जाऊ। VIDEHA ARCHIVE विदेह आर्काइव भारतीय डाक विभाग द्वारा जारी कवि, नाटककार आ धर्मशास्त्री विद्यापतिक स्टाम्प। भारत आ नेपालक माटिमे पसरल मिथिलाक धरती प्राचीन कालहिसँ महान पुरुष ओ महिला लोकनिक कर्मभूमि रहल अछि। मिथिलाक महान पुरुष ओ महिला लोकनिक चित्र 'मिथिला रत्न' मे देखू। गौरी-शंकरक पालवंश कालक मूर्त्ति, एहिमे मिथिलाक्षरमे (१२०० वर्ष पूर्वक) अभिलेख अंकित अछि। मिथिलाक भारत आ नेपालक माटिमे पसरल एहि तरहक अन्यान्य प्राचीन आ नव स्थापत्य, चित्र, अभिलेख आ मूर्त्तिकलाक़ हेतु देखू 'मिथिलाक खोज' मिथिला, मैथिल आ मैथिलीसँ सम्बन्धित सूचना, सम्पर्क, अन्वेषण संगहि विदेहक सर्च-इंजन आ न्यूज सर्विस आ मिथिला, मैथिल आ मैथिलीसँ सम्बन्धित वेबसाइट सभक समग्र संकलनक लेल देखू "विदेह सूचना संपर्क अन्वेषण" विदेह जालवृत्तक डिसकसन फोरमपर जाऊ। "मैथिल आर मिथिला" (मैथिलीक सभसँ लोकप्रिय जालवृत्त) पर जाऊ। १. संपादकीय पञ्जी-प्रबन्धमे उपलब्ध किछु आधिकारिक आ सामाजिक शब्दावली- सांधिविग्रहिक धर्माध्यक्षक चतुर्वेदाध्यायी याज्ञिक पार्णागारिक वार्तिक महामत्तक भाण्डागारिक स्थानान्तरिक राजवल्लभराजवल्लभ स्थानान्तरिक राउल, खनतरी, कापनि, फूलहर सन्धि बिग्रहिक पुरोहित कुल छेत्रोपार्यक आवस्थिक कन्टकोद्धार्कारक ज्योतिविर्वद पदांकित पण्डित राज पदांकित उपाय कारक एकान्तरिक माण्डर सँ वैदिक विश्वम्भर सिहौली माण्डरसँ पुरन्दर सुत वैदिक गोनू झा नर वलि. सँ घनश्याम सुत वैदिक गणपति मिश्र खौआलसँ कमल सुत म. गुणाकर वैदिक पिताम्बर सिंहौलि माण्डरसँ वैदिक विश्वम्भर सुत म. कुलपति म.चतुर्भुज दरिहरासँ रघुनाथ सुत म. माधव वैदिक विरेश्वर दरिहरासँ म. माधव सुत वैदिक भगीरथ दरिहरासँ कीर्तिनाथ सुत वैदिक धननाथ दरिहरासँ रामसुत वैदिक भगीरथ सकराढ़ीसँ नकटू सुत वैदिक चन्दरक्त माण्डर सँ वै. अच्छपति सुत वैदिक जीवपति सोदरपुरसँ वैदिक होरी दरिहरा सँ राम द्दौo विभाकर सुतौ वैदिक विश्वम्भर सकराढ़ीसकराढ़ी सँ हरिश्वर द्दौo वैदिक:विश्वम्भर माण्डर सँ वैदिक विश्वम्भर कमल सुतो कृष्णदेव महो गुणाकरौ (१०९//०४) वैदिक (१०९/०४) पीताम्बरा: माण्डरसँ माण्डरसँ भैरव द्दौo वैदिक विधूप्रo वैदिक युदनाथ: वैदिकवैदिक विरेश्वर वैदिकवैदिक भगीरथ वैदिक विश्नाथ वैदिक घननाथ वैदिक चन्द्रदत्त दरिहरा सँ वैदिक जीवनाथ वैदिक अच्छपति वैदिकवैदिक बलदेव दरिहरा सँ वैदिक जीवनाथ दौहित्र दौ वैदिकवैदिक कलाघर दरिहरा सँ राम सुत वैदिक भगीरथ दौ वैदिक राजा महो गोशाई वैदिक मुकुन्द बेचू सुतो वैयाकरण धरनीघर वैदिक वनखण्डीकौ वैदिक नित्यानन्द वैदिक सोनी वैदिक बद्रीनाथ वैदिकवैदिक विधु हरिअम सँ मुक्तिनाथ द्दौoवैदिक तुलानन्द वैदिक चन्द्रदत्त प्रेमदत्त सोदरपुरसोदरपुर सँ चित्रधर द्दौo वैदिक धननाथ वैदिकवैदिक अमोदयानाथ वैदिक हेमागंद वैदिक गणपति वैदिक कुलपतिको बैदिक गुणपति सुता आँखी वैदिक कलाघर अपरा वैदिक कुलमणि वैदिकवैदिक आदिनाथ वैदिक कुलपति ज्यो. वैयाकरणवैयाकरण भैरवदत्तौ वैयाकरण अमृतनाथ बुद्धिनाथ देवनाथ वैयाकरण राम: वैयाकरणवैयाकरण राधनाथ वैयाकरण परमेश्वर सरिसबसरिसब सँ झोटह द्दौoवैयाकरण नन्दीपति वैयाकरण गौरीशंकर वैयाकरणवैयाकरण रज्जे खण्डबला सँ भगीरथ द्दौ. महा वैयाकरण दिनबन्धु सुता वैया. जीवनाथ वैयाकरणवैयाकरण मतिनाथ सकुरीपाली सँ वैयाकरण श्रीदत्त सुत वै. मनभरन दौ वैयाकरण रूपनाथ वैयाकरणवैयाकरण मतिनाथा: कविकवि हेमनाथ सुता वैयाकरण महिनाथ वैयाकरण रामनाथ उँमानाथ: वैयाकरणवैयाकरण खुशिहाल वैयाकरण भवानीदत्त देवीदत्ता वैयाकरण हेमनाथ दौ वैयाकरण हरिनाथा: वैयाकरणवैयाकरण ऋद्धि छक्कनछक्कन वैयाकरण महो चण्डेश्वर सुतो वैयाकरण (२७६//०७) शिवेश्वर: खौआल सँ वैयाकरण मोदनाथ दौ वैयाकरण (२०१/०४) मोदनाथ वैयाकरण गोपाला: वैयाकरणवैयाकरण मेघनादौ वैयाकरण चंलल: वैयाकरण ईश्वरीदत्त सुतो वैयाकरणवैयाकरण हर्षनाथ दौ वैयाकरण (०४/०६) ब्रजगोपाल जयगोपाल वैयाकरण प्राध्यापक (Calcutta university Maithily Deptt.) खूद्दीका महिषी पाली सँ दिनानाथ सुत शक्तिनाथ दौ वैयाकरणवैयाकरण महावीर वैयाकरण हरिनारायणा वैयाकरण नन्दीपति वैयाकरण एकनाथ कुजौली सँ गंगादत दौ वैयाकरण रघुनाथ हरिअम सँ तुलसीदत्त द्दौ वैयाकरण खुद्दी अपरावैयाकरण सुता वैयाकरण भैये सुग्गे वैयाकरण चिन्तामनि देयाम सँ वैयाकरण मधुकर पिताम्बर सुतो वैयाकरण पद्मनाम: वैयाकरणवैयाकरण रवूदीका हरिअम सँ हिंगु द्दौ वैदिक सोनी सुता वैदिक कुलमणि वैदिक वंशमणि कमलमणि परशमणि (२८०/०१) हर्षमणिका: दरिहरा सँ वैदिक जीवनाथ दौ पाली सँ श्रीनाथ द्दौ पुरन्दर सुतो वैदिक गोनू वैदिक हेमाड्गदो वैदिक घनश्याम खौआलसँ काशीपति द्दौ वैदिक घनश्ययाम (१६०/०५) सुतो वैदिक गणपति वैदिक ब. वैदिक गणपति सुता ऑंखी वैदिक कलाधर (२६८/०९) रकनी कविभानु वैदिक वैदिक केशव वैदिक गोशाइका: वैदिकवैदिक गोशाँई सरिसब सँ चतुर्भूज द्दौo वैदिक गिरधारी आदिनाथा: ब. माण्डरसँवैदिकविश्वम्मर आगमाचार्यक मo मo उपाo (९६//०४) देवनाथ आगमाचार्यक देवनाथ एकहरा सँ आगमाचार्यक महो मुकुन्द कन्टकोद्धार्कारक मōमō मधुसूदन तर्क पत्र्चानन मo मo उपाo गोपीनाथ विरेश्वर कविशेखर इति प्रसिद्व कटाइ सँ कवि केशरी मōमō भीम माण्डर सँ कविराज शुभंकर वलियास सँ कविशेखर पदांकित चन्द्रनाथ सोदरपुरसोदरपुर सँ ढाका कवि महामहो गणपति कुजौली सँ महो कृष्ण दाशसुत कवि गंगादाश करमहा सँ कविन्द्र पदांकित रति देव दरिहरा सँ कविराज विसव करमहा सँ कविन्द्र पदांकित रतिदेव टकवाल सँ कविराज लक्ष्मीपाणि पाली सँ कविशेखर पदांकित यदुनाथ विस्फी सँ कवि भूपति पदांकित सोमेश्वर माण्डर सँ कविशेखर पदांकित महो यशोधर जगति सँ महामहोकवि रत्न पदां. होरे पाली सँ घौघे सुत कविराज कृष्णपति वलियास सँ कविशेखर पदांकित चन्द्रनाथ वलियास सँ कवि मणि पदांकित पशुपति गंगोली सँ कविराज गयन ए सुतो महामहो विद्यापति गंगोली सँ मानकुढ़ वासी कविराज गणेश्वर सोदरपुरसँ कविराज महो भानुदत्त सोदरपुरसोदरपुर सँ कवि जयराम तपोवन सँ कवि धनेश्वर अलय सँ शान्तिकरणीक रूद नरवाल सँ शान्तिकरणीक मधुकर कलिगाम सँ शान्तिकरणीक भोगीश्वर माण्डरसँ शान्तिकरणीक पाँखू दानाधिकारी मोदी हल्लेश्वर जगतिसँ मिमांशक म.म. मिरुस (मिमांशक) हरि देवधरापत्य-सिंघिया मिश्रा (मिमांशक) सुधाधरपत्य उसरौली मिश्र (मिमांशक) लाखू भूड़ी गणेश्वर-परमगढ़ मिमांशक विभू मिमांशक माधव भवेश्वर सुता मिमांशक रूद नोने सुता मिमांशक मिसरू राम सुतो मिमांशक योगदत्त: मिमांशक मेघानाथ मिमांशक मणि मिमांशक जयदेव मिमांशक धरनी मिमांशक योगदत्त: करमहा सँ मिमांशक योगदत्त जगतिसँ मिमांशक म.म. मिरुस जनार्दन सुत नैयायिक दुर्गाघर नैयायिक महौ दुर्गाधर षट्शास्त्री नैयायिक दर्शनशास्त्रज्ञ उदयकान्तो दिघो सँ देवागारिक बाटे दिघो सँ देवागारिक बटेश्वर पार्णागारिक विरेश्वर दिघोयसँ पार्णागारिक जानू दत्त पार्णा गारिक स्थितिदत्त धर्माधिकरणिक जानुदत्त पबौली सँ धर्माधिकरणिक रूद गंगोली सँ धर्माधिकरणिक जान्हव धर्माधिकरणिक महामहो नरहरि धर्माधिकरणिक गदाधर सुरगन सँ धर्माधिकरणिक भास्कर करिअमसँ म.म. धर्माधिकरणिक मरथ खौआलसँ शर्म्मा धर्माधिकरणिक म.म. उ.हरिशर्म्मा दिघोयसँ जयदत्त सुत धर्माधिकरणिक भट्टजीवे धर्माधिकरणिक म.म. (२३/०१०) नरसिंह धर्माधिकरणिक महोमहोपाध्याय गदाघर धर्माधिकरणिक वाटू नैवंधिक- नैवंधिक वीरेश्वर, नैवंधिकधीरेश्वर मुद्राहस्तक गुणीश्वर सुत म.म. आभो एसुत मुद्राहस्तक कुल छेत्रोपार्यक राउल गढ़बेलउँच सँ मुद्राहस्तक गुणीश्वर मुद्राहस्तक लक्षपति मुद्राहस्तक लक्ष्मीदत्त आर्यभट्ट वैज्ञानिक 476-550 पञ्जीमे आर्यभट्टक विवरण- (२७) (३४/०८) महिपतिय: मंगरौनी माण्डैर सै पीताम्ब र सुत दामू दौ माण्ड्र सै वीजी त्रिनयनभट्ट: ए सुतो आर्यभट्ट: ए सुतो उदयभट्ट: ए सुतो विजयभट्ट ए सुतो सुलोचनभट (सुनयनभट्ट) ए सुतो भट्ट ए सुतो धर्मजटीमिश्र ए सुतो धाराजटी मिश्र ए सुतोब्रह्मजरी मिश्र ए सुतो त्रिपुरजटी मिश्र ए सुत विघुजटी मिश्र ए सुतो अजयसिंह: ए सुतो विजयसिंह: ए सुतो ए सुतो आदिवराह: ए सुतो महोवराह: ए सुतो दुर्योधन सिंह: ए सुतो सोढ़र जयसिंहर्काचार्यास्त्रस महास्त्र विद्या पारङगत महामहोपाध्या य: नरसिंह:।। म.म.गोनू झा 1050-1150 करमहे सोनकरियाम गोनू झाक वर्णन पञ्जीमे अछि- महामहोपाध्याय धूर्तराज गोनू। पञ्जीक अनुसार पीढ़ीक गणना कएलासँ गोनूक जन्म (गोनूक सोनकरियाम करमहे-वत्समे २४म पीढ़ी चलि रहल अछि) आर्यभट्टक बाद (आर्यभट्टक माण्डर-काश्यपमे ३९ म पीढ़ी चलि रहल अछि) आ विद्यापतिक पहिने (विद्यापतिक विषएवार बिस्फी-काश्यपमे १४म पीढ़ी चलि रहल अछि) लगभग १०५० ई.मे सिद्ध होइत अछि। कारण एहि तरहेँ एक पीढ़ीकेँ ४० सँ गुणा केला सँ आर्यभट्टक जन्म लगभग ४७६ ई. आ विद्यापतिक जन्म लगभग १३५० ई. अबैत अछि जे इतिहाससम्मत अछि।गोनू झाक गाम भरौड़ाक राजकुमार, "बहुरा गोढिन नटुआ दयाल" लोककथाक मलाह कथानायक। भरौड़ामे एखनो हिनकर गहबर छन्हि। महाराज हरसिंहदेव : मिथिलाक कर्णाट वंशक। ज्योतिरीश्वर ठाकुरक वर्ण-रत्नाकरमे हरसिंहदेव नायक आकि राजा छलाह। 1294 ई. मे जन्म आ 1307 ई. मे राजसिंहासन। घियासुद्दीन तुगलकसँ 1324-25 ई. मे हारिक बाद नेपाल पलायन। मिथिलाक पञ्जी-प्रबन्धक ब्राह्मण, कायस्थ आ क्षत्रिय मध्य आधिकारिक स्थापक, मैथिल ब्राह्मणक हेतु गुणाकर झा, कर्ण कायस्थक लेल शंकरदत्त, आ क्षत्रियक हेतु विजयदत्त एहि हेतु प्रथमतया नियुक्त्त भेलाह। हरसिंहदेवक प्रेरणासँ- आ ई हरसिंहदेव नान्यदेवक वंशज छलाह, जे नान्यदेव कार्णाट वंशक १००९ शाकेमे स्थापना केने रहथि- नन्दैद शुन्यं शशि शाक वर्षे (१०१९ शाके)... मिथिलाक पण्डित लोकनि शाके १२४८ तदनुसार १३२६ ई. मे पञ्जी-प्रबन्धक वर्तमान स्वरूपक प्रारम्भक निर्णय कएलन्हि। पुनः वर्तमान स्वरूपमे थोडे बुद्धि विलासी लोकनि मिथिलेश महाराज माधव सिंहसँ १७६० ई. मे आदेश करबाए पञ्जीकारसँ शाखा पुस्तकक प्रणयन करबओलन्हि। ओकर बाद पाँजिमे (कखनो काल वर्णित १६०० शाके माने १६७८ ई. वास्तवमे माधव सिंहक बादमे १८०० ई.क आसपास) श्रोत्रिय नामक एकटा नव ब्राह्मण उपजातिक मिथिलामे उत्पत्ति भेल। मंत्री गणेश्वर: मिथिलाक कर्णाट वंशक नरेश हरसिंहदेवक मंत्री। सुगतिसोपानमे मिथिलाक सांवैधानिक इतिहासक वर्णन महाराज नान्यदेवमिथिलाक कर्णाट वंशक 1097 ई. मे स्थापना। 1147 ई. मे मृत्यु। मल्लदेव मिथिलाक कर्णाट वंशक संस्थापक नान्यदेवक पुत्र। मिथिलाक गंधवरिया राजपूत मल्लदेवकेँ अपन बीजीपुरुष मानैत छथि। मालद्वार – पंचप्रवर- करमहे नरुआर वत्सगोत्री, राजा रामलोचन चौधरी-मालद्वार- २५०० वर्ष पूर्व- राजा दुर्गा प्रसाद चौधरी- -राजा बुद्धिनाथ चौधरी(मालद्वार)-कुमार वैद्यनाथ चौधरी - छत्रनाथ चौधरी (दुर्गागंज)-टंकनाअथ चौधरी-कर्मनाथ/ शेषनाथ/ रुद्रनाथ एक छलि महारानी- डॉ. मदनेश्वर मिश्र सुरगणे लौआम- गोत्र पराशर लौआम गाम मूलतः बसैठीसँ पूर्णियाँक बीचमे- आब नहि छैक। तिलैबार मूलक शाण्डिल्य गोत्री बनैली गाम- अगरू राय- हिनकर जमाए सुरगणे लौआम मूलक प्राणपति- हिनक बालक समर झा १५७५-१६२५ (लगभग १६म शताब्दी), दिल्ली सल्तनतसँ जमीन्दारी किनलन्हि आ समर चौधरी भऽ गेलाह, महाराज भऽ गेलाह। लौआमक दू शाखा -महाराज कृष्णदेव (पहसरा बसैटी) -महाराज भगीरथ- सौरिया (कटिहार-सोनालीक बीचमे)- एकटा स्थान दण्डखोड़- एतए अपराधीकेँ सजा देल जाइत छल (सौरिया शाखा द्वारा)। पाँच वंश बाद पहसरा बसैटी- कृष्णदेव-देवनारायण-वीरनारायण-रामचन्द्र नारायण (जॉन बुकानन पूर्णियाँ गजेटियरमे हुनकर वर्णन किंग ऑफ पूर्णियाँक रूपमे कएने छथि)- इन्द्रनारायण (बिना सन्तान) रानी इन्द्रावती(सासुरक नाम- असल नाम लीलावती) हिनकर मृत्युतिथि १५-११-१८०३ मृत्युस्थान पूर्णियाँ, समए- मध्याह्ण काल, श्राद्ध खर्चक हेतु पूर्णियाँ जजसँ प्राप्ति- रु.५०००/- माँग रु.१५,६७०/-( बोर्ड ऑफ रेवेन्यु, फोर्ट विलियममे २९.११.१८०३ ई. केँ कार्यवाही)। इन्द्रनारायणक समकालीन सौरिया दिश राजा राजेन्द्रनारायण आ राजा महेन्द्रनारायण। महाराज इन्द्रनारायणक मृत्यु १७७६ ई. मे, तकर बाद २७ बर्ख धरि रानी इन्द्रावती राज कएलन्हि। राज बनैली- रामनगर/ श्रीनगर/ गढ़बनैली/ सुल्तानगंज/ चंपानगर। श्यामा मन्दिर बनारसमे संस्कृत पढ़बाक वृत्ति- रानी चन्द्रावती- कोइलख (राजा पद्मानन्द सिंह, पुतोहु-कुमार चन्द्रानन्द सिंहक पत्नी)- रामनगर। विशेश्वर झा बैगनी नवादासँ पहसरा नोकरी करबा लेल अएलाह। हिनकर बेटा दीवान देवानन्द फेर चातुर्धरिक मनसबदार परमानन्द- संध्यागायत्रीसँ लोप बनैली समर सिंहकेँ मानि लेलन्हि। दुलार चौधरी/ फेर सिंह (बनैली राज), बुकानन हिनका चौधरी कहि सम्बोधित करैत छथि, मात्र एक बेर सिंह कहै छथि। १६८०-१७०० ई.-दरभंगा राज, कन्दर्पीघाटक लड़ाई, राजा नरेन्द्र सिंह- दिल्ली सल्तनत आ जनताक बीचमे, बागमती तटपर समस्तीपुर ब्रह्महत्याक आरोपी नरेन्द्र सिंहकेँ बारि ब्राह्मण सभ पूर्णियाँ सुरगणे लौआम महाराज समर सिंह सन्तति महाराज नरनारायण, पहसरा बसैटी (कोशीक पूर्व)- फारबिसगंजसँ दण्डखोड़ा कटिहार तक बसाओल गेलाह। फेर माधव सिंहक समएमे दरभंगा आपस भेलाह। खुद्दी झा/ परमेश्वर झाकेँ आशुतोष मुखर्जीक समए दरमाहा राज बनैली देलकैक। पञ्जीमे दरभंगा राजक विरुद्- विविध विरुदावली विराजमान् मानोन्नतमान् प्रतिज्ञापदर्योधिक परशुराम समस्त प्रक्रिया विराजमान् नृपराज महोग्रप्रताप मिथिलाङ्कार महाराजाधिराज माधव सिंह बहादुर कामेश्वर सिंह। धकजरीक नवलक्षाधिपति लक्ष्मीपति मिश्र कोदरिये मूल शाण्डिल्य पाञ्जि भेटि गेलन्हि, रमेश्वर सिंहकेँ १ १/२ लाख टाकाक चन्दा देलन्हि, पिण्डारुछक चौधरी सभकेँ सेहो पाँजि भेटलन्हि (नित्यानन्द चौधरी)। गुणाकर झा –हरसिंहदेवक समकालीन ई.१३२६ ततैल ग्राम- १० खाढ़ी पाछाँ ककरौड़ गाम-जिला मधुबनी रघुदेव झा- आनन्द झा- देवानन्द प्रसिद्ध छोटी झा दरभंगा नरेश माधव सिंहक (शाखा पुस्तकक प्रणयन आदेश) समकालीन १६५० ई.क आसपास- मित्रानन्द प्रसिद्ध झोंटी झा- गोपीनाथ झा प्रसिद्ध होरिल झा- हरखानन्द प्रसिद्ध हरखी झा- एखसँ १५९ वर्ख पूर्क दिनकर टिपणी (जन्म) रसाढ़ पूर्णियाँ बनमनखी लग- श्री भोलानाथ प्रसिद्ध भिखिया झा- श्री मोदानन्द झा- पञ्जीकार विद्यानन्द झा प्रसिद्ध मोहनजी- मूल पड़ुआ(पण्डुआ) महिन्द्रपुर, गोत्र काश्यप त्रिप्रवर। खाँ- कुजिलवार उल्लू- कात्यायन गोत्र उतेढ़- सिद्धांत लिखबाक पहिने वर ओ कन्या पक्षक अधिकार ताकल जाइत छैक आ ई मात्र मूलक आधारपर बनाओल जाइत अछि आ समगोत्री विवाह नहि होअए ताहि लेल गोत्र आ प्रवर सेहो देखल जाइत अछि। मूलसँ गोत्र सामान्यतः पता चलि जाइत अछि, किछु अपवादो छैक। जेना ब्रह्मपुरा मूल- काश्यप/ गौतम/ वत्स/ वशिष्ठ (सात टा), करमहा- शाण्डिल्य (गौल शाखा)/ बाकी सभ वत्सगोत्री, दुनु करमहामे विवाह संभव। चन्दा झा- माण्डर रजौरा रामोऽवेत्ति नलोऽवेत्ति वेत्ति राजा पुरुरवा। अलर्कस्य धनं प्राप्य नान्यदेवोनृप भविष्यति॥ नान्यदेव घोड़ापर चढ़ल हकासल-पियासल अएलाह, गाछतरमे घोड़ा बान्हलन्हि, घोड़ा लेल खाद्य छीलए लगलाह तँ फन काढ़ि साँप नाग आएल, किछु लिखल जे नान्यदेव मिथिलाक भाषा नहि पढ़ि सकलाह। कामेश्वर ठाकुर जे गाममे रहथि पढ़ि बतओलन्हि जे अहाँ मिथिला राजा नान्यदेव छी। कामेश्वर ठाकुर संतति चण्डेश्वरकेँ हरसिंहदेव राज लिखितमे सौंपि पलाएन कएल। चण्डेश्वरक पाछाँ सिपाही आएल। एकरापर जल फेंकि ठाढ़ भऽ गेल, दोसर खेहारलक, ओकरापर जल फेकलन्हि ओ आन्हर भऽ गेल (अन्हरा ठाढ़ी)। वर्षकृत्य- अयलीह बिहुला देलन्हि पसारि, गेलीह सामा लेलन्हि ओसारि। पञ्जी- अधिकारक नियमावली- पञ्जी अयाची मिश्रक पौत्र ढाका कवि- ढाकामे जागीर भेटलन्हि। हल्ली झा तांत्रिक आ शिव कुमार शास्त्रीक बीच शास्त्रार्थ- प्रत्याहार वाक तंत्र द्वारा हल्ली शिवकुमार शास्त्रीक वाक् बन्न कए देलन्हि। घोड़ी चिलम पीबि ओहिपर चढ़ि निकललाह पञ्जीकार, गाम पहुँचि घोड़े परसँ पुछलथिन्ह, यौ फलना, हमर बौआकेँ जमीन किनबाक लेल कहल अछि, वापस करू। पञ्जीकार एखने नीचाँ कए देताह, से तुरत्ते घुरा देलखिन्ह आ ओ २ टाका बएन घुराए घुरि अएलाह। ७०० टाका लड़कीबलाकेँ दए बेटाक विवाह कराए पाँजि बनाओल। तस्कर केशव, मंगरौनी नरौने सुल्हनी- पराशर गोत्र माण्डर सिहौल मूलक काश्यप गोत्री खगनाथ झा- गाम जमसम। महाराज लक्ष्मीश्वर सिंह लेल लड़की निहुछल गेल, गाममे पोखरि खुनाओल, मन्दिर बनल जे राजा दोसराक मन्दिरमे कोना पूजा करताह। केशव झा लड़कीकेँ लए गाम आबि गेलाह। धोती रंगाइत छल। पता केनिहार जे आएल तकरा पकड़ि कन्यादान करबाओल। तकर बाद राजा की करताह, पञ्जीकारकेँ बजा कऽ ओकर नाममे तस्कर उपाधि लगबाओल। खगनाथ झा- श्रीकान्त झा पाँजि, तस्कर केशव श्रोत्रिय ओहिठाम विवाह कएलापर श्रोत्रिय श्रेणी विराजमान रहितन्हि। पाञ्जि आ पानि अधोगामी, पछबारि पारक प्रथम श्रेणी आब नहि अछि। शालिग्राममे छिद्र होइत अछि, कारी पाथर मात्र नर्मदामे भेटैत अछि। शाण्डिल्य- ४३ मूल, वत्स-४० मूल, काश्यप-२७ मूल, सावर्ण- ७ मूल, कात्यायन- ५ मूल, पराशर- ७ मूल, भारद्वाज- ५ मूल, गर्ग- ३ मूल सूर्य- सिंह राशिमे (१६ अगस्त सँ १६ सितम्बर), किछु सुखेबाक होअए तँ सभसँ कड़ा रौद। पाँ रघुदेव झाक लिखल माण्डर मूलक पोथी- अंकित तिथि- १७म शताब्दीक अन्तिम दशक आ १८म शताब्दीक पहिल दशक, हुनकर पौत्र पाँ छोटी प्रसिद्ध देवानन्द झाक लिखल शाखा पुस्तक १७६०-१७७६ई.। ताल पत्रपर। पाँ भिखिया झा शाखा पुस्तक क्वैलख वासी हरिअम्ब मूलक पाँ डोमाई मिश्रक लिखल । पाँ हर्षानन्द झा बला शाखा पुस्तक जे पाँ झोंटी झा प्रसिद्ध मित्रानन्द झाक लिखल अछि। पाँ. झूलानन्द झा (पाँ भिखिया झाक भ्राता) बला शाखा पुस्तक, पाँ मोदानन्द झाक शाखा पुस्तक जे हुनकर मौसा पाँ लूटन झा आ मसियौत पाँ निरसू झा बला शाखा पुस्तक जे १९२५ ई.सँ १९३५ ई. धरि सौराठमे लिखल गेल। एहि सभ शाखा पुस्तकक, गोत्र पञ्जी जाहि मध्य गोत्र ओ मूलक विवरण, पत्र पञ्जी जाहि मध्य अपत्यक ज्ञान ओ मूलग्रामक विवरण भेटैत अछि, जाहिसँ वासस्थान परिवर्तनक ज्ञान होइत अछि, दूषण पञ्जी जाहिसँ वंशमे आएल कथित दोषक- कट्टरताक विरुद्ध प्रमाण सेहो- ज्ञान होइत अछि। तत्तत पुस्तकमे वर्णित तत्कालीन प्रचलित उपाधिक ज्ञान होइत अछि। पारिभाषिक शब्दावली:- कोनो वंशक उल्लेखसँ पूर्व ओहि वंशक मूलक उल्लेख जाहि शब्दक बादसँ लागल हो ओ भेल मूल- तकर बाद व्यक्तिक नाम तखन ओहि व्यक्तिक पुंपत्यक उल्लेख- से सुतः वा सुतौ वा सुताः लिखल गेल भऽ सकैए। ओहि व्यक्तिक एकोटा पुत्र नहि परञ्च पुत्री तँ सुता वा सुताश्च लिखल भेटत- सुतः सुतौ सुताक बाद पुत्रक नाम तखन ओहि व्यक्तिक श्वसुरक मूल ग्रामक संगे मूलक उल्लेख। कतहु-कतहु मूलग्राम नहियो लिखल भेटत, पुस्तकमे आगाँ बढ़लापर मूलक संकेताक्षर बिन्दु सहित जकर आगाँ “सँ” नहि भेटत परञ्च पढ़ैत-पढ़ैत पाठक मूलसँ परिचित भऽ गेल रहताह। श्वसुरक नामक पहिने विशेष ठाम श्वसुरक पिताक नाम, कत्तहु-कत्तहु पितामहक नाम सेहो, श्वसुरक नामक बाद दौ लिखल भेटत अर्थात् अर्थ भेल जनिक नामक आगाँ दौ. लिखल अछि ताहि व्यक्तिक दौहित्र भेलाह सुतः सुतौ सुताक उल्लेखक बाद लिखल नाम अर्थात् सुतादिक मातामह भेलाह दौ. लिखलसँ पूर्व नाम- तदुपरान्त श्वसुरक उल्लेख मूल सहित भेटत आ नामक बाद शब्द भेटत दौहित्र दौहित्र जे संकेताक्षरमे द्दौ. रहत, परञ्च ई बुझब आवश्यक जे शाखा पुस्तकक कोनो पृथक विषय सूची नहि रहि विषय-अनुक्रमणिका संगे रहै छै। सूचना १: अन्तराष्ट्रिय मैथिली सम्मेलन काठमाण्डौ मे २२ आ २३ दिसम्बर २०१० केँ श्री रामभरोस कापड़ि "भ्रमर"क संयोजकत्वमे आयोजित भऽ रहल अछि। श्री कापड़ि नेपाल प्रज्ञा संस्थानमे मैथिलीक प्रतिनिधित्व कऽ रहल छथि आ ई साहित्य क्षेत्रमे नेपालक सभसँ पैघ प्रतिष्ठाबल पद अछि ओहिना जेना भारतमे "साहित्य अकादमीक फेलो" होइत अछि। २२ दिसम्बर २०१० केँ ई आयोजन नेपाल प्रज्ञा प्रतिष्ठान, कमलादी, काठमाण्डौ आ २३ दिसम्बर २०१० केँ अग्रवाल सेवा केन्द्र, कमल पोखरी, काठमाण्डौमे आयोजित होएत। दुनू दिन आवस आ भोजनक व्यवस्था ग्रवाल सेवा केन्द्र, कमल पोखरी, काठमाण्डौमे रहत। सूचना:२: मैलोरंग वर्ष 2010 सँ रंगशीर्ष ज्योतिरीश्वर जीक नाम पर "ज्योतिरीश्वर रंगकर्मी सम्मान" कोनो एकटा सुपरिचित युवा रंगकर्मी के प्रदान करत । एहि सम्मान मे सम्मानित रंगकर्मी केँ 5100/- टाका आ स्मृति चिह्न संग सम्मान पत्र सेहो प्रदान कयल जेतनि । ई सम्मान समारोह वर्षक अंतिम महीना मे आयोजित करबाक योजना अछि । बाल-किशोर विशेषांक/ नाटक-एकांकी विशेषांक/ मैथिली-समीक्षा विशेषांक: विदेहक हाइकू, गजल आ लघुकथा अंकक बाद विदेहक 15 नवम्बर 2010 अंक बाल-किशोर विशेषांक, 15 दिसम्बर 2010 अंक नाटक-एकांकी विशेषांक आ 15 जनवरी 2011 अंक मैथिली-समीक्षा विशेषांक रहत। एहि लेल लेखक टंकित रचना, जकर ने कोनो शब्दक बन्धन छै आ ने विषएक, 13 नवम्बर 2010 धरि बाल-किशोर विशेषांक लेल; 13 दिसम्बर 2010 धरि नाटक-एकांकी विशेषांक लेल आ 13 जनवरी 2011 धरि मैथिली-समीक्षा विशेषांक लेल ई-मेलसँ पठा सकै छथि। रचनाकार अपन मौलिक आ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि) ggajendra@videha.com केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx, .rtf वा .txt फॉर्मेटमे पठा सकैत छथि। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेताह, से आशा करैत छी। रचनाक अंतमे टाइप रहय, जे ई रचना मौलिक अछि, आ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि।
(विदेह ई पत्रिकाकेँ ५ जुलाइ २००४ सँ एखन धरि १०७ देशक १,५७१ ठामसँ ५१,०७७ गोटे द्वारा विभिन्न आइ.एस.पी. सँ २,७२,०८२ बेर देखल गेल अछि; धन्यवाद पाठकगण। - गूगल एनेलेटिक्स डेटा।) गजेन्द्र ठाकुर ggajendra@videha.com २. गद्य २.१. देवशंकर नवीन- १.एकटा विहनि (लघु) कथा -बिलाड़ि आ एकटा कथा २. मोटर साइकिल २.२.१.डा.रमानन्द झा ‘रमण’- नेपालमे मैथिली कथाक विकास ओ प्रवृत्ति २.जगदीश प्रसाद मंडल-मैथिली उपन्यास साहित्यमे ग्रामीण चित्रण ३. शिव कुमार झा ‘टिल्लू’- मैथिली उपन्यास साहित्यमे दलित पात्रक चित्रण २.३. रमाकान्त राय ‘रमा’ नव गीतक पुरोधा : महाकवि प्रवासी २.४.शिवकुमार झा ‘टिल्लू’ ‘समकालीन मैथिली कविता’क समीक्षा २.५.श्रीमती शेफालिका वर्माआखर-आखर प्रीत (पत्रात्मक आत्मकथा) २.६.रिपोर्ताज- १.ज्योति सुनीत चौधरी-इर्लिंग आर्ट ग्रुपक 95 वाॅ वार्षिक कला प्रदर्शनी २.उमेश मंडल- सगर राति श्रोता कथा-सागरमे डुबकी लगेलन्हि ३.नवेन्दु कुमार झा-मतदाता सभक उत्साह मध्य सम्पन्न भेल तीन चरणक मतदान- राजनीतिक दलक बेचैनी बढ़ौने अछि मतदाताक चुप्पी ४.सुमित आनन्द- आचार्य सुरेन्द्र झा “सुमन” जयन्ती-२०१० ५.सुजीत कुमार झा- जनकपुरमे कोजागरा महोत्सव २.७.१.ज्योति सुनीत चौधरी- विहनि कथा (लघुकथा)- पानिमे खेती २. कुमार मनोज कश्यप-विहनि कथा (लघुकथा)-उजड़ल खोंता ३. नबोनारायण मिश्र- विहनि कथा (लघुकथा)- घमंडक फल४.राम विलास साहु विहनि कथा (लघुकथा)-परिश्रमक भीख २.८.१.जगदीश प्रसाद मंडल- कथा- मइटूगर (गतांस सँ आगाँ) २. राजदेव मंडल- कथा-एलेक्सनक भूत ३.प्रो. वीणा ठाकुर- - कथा- परिणीता (आगाँ) ४. बेचन ठाकुर बेटीक अपमान देवशंकर नवीन- १.एकटा विहनि (लघु) कथा -बिलाड़ि आ एकटा कथा २. मोटर साइकिल देवशंकर नवीन 1962- ओ ना मा सी (गद्य-पद्य मिश्रित हिन्दी-मैथिलीक प्रारम्भिक सर्जना), चानन-काजर (मैथिली कविता संग्रह), आधुनिक (मैथिली) साहित्यक परिदृश्य, गीतिकाव्य के रूप में विद्यापति पदावली, राजकमल चौधरी का रचनाकर्म (आलोचना), जमाना बदल गया, सोना बाबू का यार, पहचान (हिन्दी कहानी), अभिधा (हिन्दी कविता-संग्रह), हाथी चलए बजार (कथा-संग्रह)। १ बिलाड़ि हम जइ घरमे सुतै छी, तकर पछिला देबालमे बड़ी टा खिड़की अछि। ताहिसँ बाहर एक टा छहरदेवाली। ओइ छहरदेवाली पर कैक टा मैना एक संगे क्रिक्-क्रिक् करैत चहचहा उठल। हम गाढ़ नीनसँ सूतल रही। एक टा अत्यन्त मनोहर सपना देखैत रही। नीन टूटि गेल। सपना भखरि गेल। हमर नीन बड़ दुलारू अछि। बहुत रास मान-मनौवलि केला पर अबैत अछि। तें ककरहु कोनो आचरणसँ काँच नीन टुटै’ए, तँ ओकरा पर बड़ तामस होइ’ए। नीन टूटि गेल, सपना टूटि गेल। ओइ भोर बड़ जोर तामस चढ़ल। नीन नँइ टुटितए त’ एखन आधेक घण्टा आओर सुतितौं। नीनों पूर भ’ जइतए, आ सपनो पूर भ’ जइतए। ई जनितो, जे सपना, सपने होइ छै, वास्तविकतासँ ओकरा कोनो सरोकार नँइ रहै छै, अहू वयसमे हमरा सपनासँ तरुणाइए जकाँ आकर्षण रहैत अछि। वास्तविक जीवनमे तँ वस्तुतः लोक विपत्तिक पहाड़ उघैत रहै’ए। सत्य पूछी तँ ओ विपत्ति मनुष्यक स्वप्नलोक धरि पर राज कर’ च’ल अबैत अछि। एहेन विकराल समयमे मनोहर सपना देखब कोनो उपलब्धिसँ थोड़ कहाँ होइत अछि!... से कहैत रही नीन टूटि गेल। सपना टूटि गेल। मैना-मैनी किलोलह मचा कए नीन तोड़ि देलक, सपना छीन लेलक। बड़ जोर रंज चढ़ल। मुदा ककरा पर तमसबितहुँ? मैनाकें की कहितिऐ? ओकरा हमर, आकि हमर नीन टूटि जेबाक कोनो खबरिओ कहाँ रहल हेतै? हमर रंजसँ ओकरा कोनो भय कहाँ होइत हेतै? क्रिक्-क्रिक्...के ताबड़तोड़ ध्वनिसँ धड़फड़ा क’ उठलहुँ। आँखि मीड़ि क’ खिड़कीक ओइ पार देखलहुँ। अचानक तामस निजा गेल, आ दृश्य नीक लागए लागल। कैक टा मैना रहै। हठात चहचही बन्द भ’ गेलै। सबटा मैना एकाएकी ओतएसँ सहटि गेल। मात्रा दू टा रहि गेल। दुनूक आवाज क्रमे-क्रमे मधुर होअए लगलै। दुनू अपन-अपन लोलसँ एक दोसरकें गुदगुदी लगबए लगलै। पक्षी-विज्ञानी त’ नँइ छी, तें सामान्यतया पक्षीमे न’र-मादाक ज्ञान हमरा नँइ होइत रहै’ए, मुदा एक टा भ्रम हमरा सदति काल बनल रहै’ए, जे मनुष्यक अलावा समस्त जीवमे, सोहनगर आ मोहक बगए-बानि प्रायः न’रे के होइ छै। पता नँइ, हमारा ई भ्रम किऐ होइ’ए।...ओहू दिन अही भ्रमक आधार पर बुझाएल छल जे अइ दुनूमे सँ एक टा न’र थिक, एक टा मादा। दुनू प्रेमी-प्रेमिका थिक भरिसक। प्रेम क’ रहल’ए। बेरा-बेरी दुनू एक दोसरकें गुदगुदी लगबैक अवसर द’ रहल छलै। एक के गुदगुदीसँ दोसर हँसैत-हँसैत कनेक दूर धरि कुदकि कए पड़ा जाए; फेर दोसर सोह लगा क’ आबए आ पहिलकें गुदगुदी लगाबए। विलक्षण दृश्य लगै छल।... कतेक उन्मुक्त होइत अछि पक्षी। जखन चाहैत अछि, जतए चाहैत अछि, प्रेम क’ लैत अछि! कते नीक होइत अछि पक्षी समाज, जखन दू टा पक्षीकें प्रेम करैत देखलक, बाकी सब आस्ते-आस्ते टहलि गेल। अइ दुनूकें नीरव एकान्त द’ क’ स्वच्छन्द प्रेम करबाक अवसर द’ देलक। मुदा केहन होइत अछि मनुक्खक समाज, दू गोटए प्रेम करै’ए, तेसरकें खौंत बाड़ए लगै छै; कुल-मर्यादा, मान-सम्मानक नाम पर, जाति-धर्मक नाम पर ओकर हत्या क’ दै’ए। पहिलुका जमाना जकाँ आजुक मनुक्ख इच्छा रूपधारी होइतए, तँ अवस्से ओ प्रेम करबा लए क्रौंच-क्रौंची बनि जइतए, आ अही मैना-मैनी जकाँ रमण करितए। क्रौंच-क्रौंचीकंे तँ नँइ देखने छी। मुदा अइ दुनूक रासलीला देखि कए लगै’ए ओहो अहिना करैत रहल होएत, आ दोसर दिशसँ व्याधा आबि गेल होएतै। दुनूक अनुराग लगातार बढ़ल जा रहल छलै। आब दुनू गुदगुदीक खेल, मखौल, हास-परिहास छोड़ि कए निकट भ’ गेल छल। साँस रोकि कए हम एकटक देख’ लागल रही। दुनू एक दोसरसँ गरदनि मिला रहल छल...प्रायः दुनूक उत्तेजना तीव्र होइत जा रहल छलै... छपाक्...! ज्जाः! रंगमे भंग भ’ गेलै! अचानक बगलबला मकानक छज्जीसँ एक टा बिलाड़ि झपट्टा मारलक। मुदा ओइ दुष्ट बिलाड़िक दुष्टता पूर्ण नँइ भेलै। एकटा प्रेमकथाकें देखबाक हमर तल्लीनता अइ वज्राघातसँ टूटि कए बिखरि गेल छल; मुदा मैना-मैनीक सतर्कतासँ अत्यन्त प्रसन्नता भेल। ओही प्रसन्नताक कसोहमे हम अपन सपनामे घुरि आबए चाहैत रही। मुदा सपना देख’ लेल तँ फेरसँ नीन चाही, से तँ अछिए नँइ...! मैना-मैनीक प्रेमकें लाख-लाख शुभकामना, ओइ बिलाड़िकें परम धिक्कार!... ------------------------------- २
मोटर साइकिल
पहिले बेर जहिया भौजीकें देखलिअनि, हमर आँखिक आकार ओही दिनसँ बढ़ि गेल। ओइसँ पहिने एते सुन्नरि स्त्री हम कोनो फोटोओमे नँइ देखने रही। तकिते रहि गेल रही थोड़े काल धरि--बाप रे! ई सौन्दर्य! ई नाक-नक्श, एहन केश, एहन भौंह, एहन आँखि, एहन ठोर, एहन बाँहि, एहन अँगुरी! छूबि क’ देखतिअइ कने!... मुदा एहि तरहें अखियासि कए देखबाक हमर करतबकें भौजी लक्ष्य क’ गेल रहथि, से हम ग’र केने रही। कोनो हाट-बजार रहितै तँ थोड़े काल भरिसक आओर हम देखैत रहि जैतौं। मुदा हम तँ अपन बरिष्ठ सहकर्मीक घ’रमे बैसल छलहुँ, आ हुनकर पत्नीकें देखि रहल छलहुँ। सन्तृप्त सौन्दर्यसँ तराशल भौजीक रूप-राशि भूख-पियास हरण करैबला छल। प्रसन्न होइथ त’ सिंगरहारक फूल बरसए, बिहुँसथि त’ बिजलौका चमकि जाए, हँसथि त’ जलतंरगक रागिनी पसरि जाए, सन्तूरक ध्वनि उमरि उठए, चलल आबथि त’ लागए जेना दुनियामे कोनो शुभ मुहूर्त्तक प्रवेश भ’ रहल अछि। लगमे ठाठ होथि, त’ लागए जेना कोनो अनन्त सुखक झमटगर छाहरिमे बैसल छी, आँखि उठा क’ ताकि देथि त’ ओइमे डूबि क’ कलमच सूति रहबाक इच्छा करए। तपस्वी, मनस्वीक समाधि हिला देब’वला देह सौष्ठव, आ कान्तिमय मुखमण्डल गढ़’मे विधाताकें कते समय लागल हेतनि! विधाता भरिसक बड़े मनोयोगसँ फुरसतिक क्षणमे हिनकर रचना केने हेताह। बाघ-सिंह सन खूँखार जानवर धरि हिनकर सौन्दर्य आ हिनकर व्यक्तित्वक सम्मोहनसँ वशीभूत भ’ जा सकैत अछि। एहने सौन्दर्य आ एहने व्यक्तित्वक सुकामा स्त्रीकें एक बेर पटनामे गाँधी मैदान बस स्टैण्ड पर देखने रही। वियोगीक संगें हम सहरसा जाइवला बसमे चढ़ल रही। एकटा स्त्री आबि कए हमर अगिला सीट पर बैसल। दुइए पल बाद ओ उठि गेल, बससँ उतरि गेल। हम कोनो जादूक अधीन बिना किछु बजने ओकर पाछू लागि गेलौं। वियोगी हमर अनुशरण केलक। बादमे वियोगी सबटा खेरहा सुनौलक। ओइ काल ओ हमरा बाधित नँइ करए चाहै छल। ओ स्त्री राँची जाइबला बसमे बैसि गेल। हम बगल बला सीट पर बैसि कए ओहि स्त्रीकें एकटक निहारैत रहलहुँ। मन्त्रमुग्ध भेल। पता नँइ ओइ स्त्रीकें देखि की की सोचैत रहलहुँ। बस स्टार्ट भेल, राँची दिश विदा भ’ गेल। वियोगी हाथ पकड़ि क’ घिचैत बाजल--ओकरा संगें राँची जाइ के छौ?... हमर भक्क टूटल। लजा गेलहुँ, फेर दुनू गोटए हँसैत पानक दोकान दिश गेलहुँ। कतोक दिन धरि वियोगी चौल करैत रहल...। सोचै छी, ओ स्त्री भैजिए त’ ने रहथि...! हिनको नैहर राँचीयेमे छनि। भौजीक मतलब हमर कोनो सहोदर अथवा अन्य पारम्परिक सम्बन्धें जेठ भाइक पत्नी नँइ! तइ अर्थें देखी त’ हम परम अभागल। सौंसे कुल-खानदानमे अपना पीढ़ीमे सबसँ जेठ हमही छी। कोनो पितियौत, पिसियौत, मसियौत, ममियौत हमरासँ जेठ नँइ छथि। तें हमरा जीवनमे अइसँ पहिने दीयर-भाउजक सम्बन्धक रंग ओतबे छल, जतबा अनुमान कएल जा सकै छल, अथवा यारी-दोस्तीमे लोकक मुँहें सुनल छल। एतए आबि क’ हमरा लेल भौजीक अर्थ बड्ड विराट भ’ गेल। भौजीक मतलब भौतिक विज्ञानक परम यशस्वी अध्यापक प्रोफेसर तापस चक्रवर्तीक सुकामा, नयनयभिरामा पत्नी सुवर्णा। प्रोफेसर तापस चक्रवर्ती विलक्षण लोक छथि, जेहने सुयोग्य अध्यापक, तेहने श्रेष्ठ मनुष्य। कर्मनिष्ठ एहेन जे आइ धरि कोनो छात्रकें हुनकासँ कोनो शिकाइत नँइ भेलनि। धुरझार ट्यूशन चलै छनि, मुदा तें शहरमे कियो ई नँइ कहताह जे ट्यूशनक कारणें कॉलेजमे गैरहाजिर रहै छथि, अथवा क्लासमे पढ़बै काल कोताही करै छथि। वयसमे हमरासँ दसेक बर्ख पैघ हेताह, मुदा से कहिओ बोध नँइ होअए देलनि। कोनो तरहक अहंकार हुनका स्पर्श धरि नँइ क’ सकल छल। सर्वदा, आ सर्वथा प्रसन्नचित रहै बला लोक। सौंसे कॉलेजक अध्यापक वर्ग हुनका दादा कहनि। हम शुरुह-शुरूमे स’र कहैत रहिअनि। बादमे आन लोकक तर्ज पर हमहूँ कौखन दादा कह’ लगलिअनि। सम्पर्क बढ़ल त’ बूझि सकलहुँ जे हुनकर समस्या हमरासँ विपरीत छलनि, हुनका जेठ हेबाक अपार सेहन्ता छलनि। बहुत अनुरागसँ एक दिन कहने रहथि--देब! अहाँसँ सम्पर्क भेलाक बाद हमरा होअ’ लागल अछि, जेना पछिला जनममे हमरा लोकनि सहोदर भाइ रहल होइ। एकदमसँ हमर अनुज जकाँ लगैत रहै छी अहाँ! हम हुनकर अनुरागक आदर करैत कहलिअनि--सर! नेह-प्रेम लेल कोनो पारम्परिक, वैधानिक अथवा रक्त सम्बन्धक अनिवार्य प्रयोजन थोड़े पड़ै छै! नेह लेल तँ मोनक मिलानी चाही, खानदानक मिलानीसँ प्रेमक अनिवार्य संगति कहाँ सम्भव होइ छै! ई त’ हमर सौभाग्य थिक जे अहाँ सन जेठ भाइक उदात्त स्नेह हमरा एते सहजतासँ भेटि गेल अछि। प्रोफेसर तापस चक्रवर्ती कहलनि--त’ तय रहल जे आइ दिनसँ अहाँ हमरा ‘सर’ नँइ कहब? तापस दा’ कहब? हम कहलिअनि--तय रहल! ताबत ओम्हरसँ प्रोफेसर साहेबक पत्नी चाह नेने, आ प्रसन्नताक अम्बार नेने उपस्थित भेलीह--तखन तँ हमरहु अहाँ आइ दिनसँ मैडम नँइ कहब? नोकरी ज्वाइन करिते देरी अइ कॉलेजक जते अध्यापक लोकनिसँ पहिल किस्तमे परिचय भेल, ताहिमे प्रोफेसर तापस चक्रवर्ती प्रमुख छथि। धीरे-धीरे ओ हमर शिक्षा-दीक्षाक पृष्ठभूमि जान’ लगलाह। पता लगलनि जे हम अगबे मैथिली नँइ, शुरुआती दौरमे साइन्सक छात्र रही, फलस्वरूप आपकता बढ़’ लगलनि। साँझ क’ संगें टहल’-बुल’ चलबाक नोत देब’ लगलाह। कॉलेज परिसरक सरोकार डेरा धरि आबि गेल। पहिल दिन, जहिया हुनकर डेरा पर चाह पीलौं, मोन गद्गद भ’ उठल। अलबत्त चाह बनबै छलीह हुनकर गृहिणी। भव्य व्यक्तित्व, अनिन्द्य सौन्दर्यक स्वामिनी, आ अपूर्व अनुरागमयी तँ ओ रहबे करथि, सम्पूर्ण पाक कलामे सेहो दक्ष रहथि। एहेन डेरामे बरमहल अबरजात राखब, हमरा सन पेटू आ चटोर लोक लेल कोनो अनकुरबी बात नँइ छल। बादमे तँ हम अपनहँु प्रयासें चाह, जलखै लेल ओम्हर टघरि जाइ, भनसा घ’रक अही प्रशंसाक दौरमे तापस दा’क पत्नीसँ परिचय बढ़ल, क्रमे-क्रमे हमहूँ हुनका संगे सहज होअ’ लागल रही। दुइए-तीन भेंटमे ओ हमर जनम-कुुण्डलीक सम्पूर्ण जानकारी जुटा लेलनि। कतए घ’र छी, घ’रमे के-के छथि, कोना पढ़ाइ-लिखाइ केलहुँ, कोना नेनपन बीतल, कोना किशोरावस्था, स’ख-सेहन्ता-स्वादक सीमा की अछि, केहन पुरुष पसिन पड़ै छथि, केहन स्त्री नीक लगै छथि, की पढ़बामे बेसी रुचिशील रहै छी, जीवनक की उद्देश्य अछि...स’ब प्रश्नक उत्तर ओ हमरासँ पूछि लेलनि। ह’म मुदा किछु नँइ पूछि सकिअनि। मात्र हुनकर प्रश्नक जवाब दिअनि, आ निरन्तर हुनका आ हुनकर व्यवहार-अनुरागकें देखी, ग’मी। हुनका सन स्त्रीसँ प्रश्न करब ने उचित छल, ने सम्भव। आँखि उठा क’ ताकि देथि त’ सब टा प्रश्न हेरा जाइ छल। तें हम कोनो प्रश्न नँइ करिअनि। हुनकर परम सौम्य आ सभ्य व्यक्तित्वक अछैत हुनका लग खुजै’मे हमरा थोड़े समय लागि गेल छल। से, एहेन स्त्री जँ एकटा अन्यार्थक सम्बोधन त्यागि क’ भौजी कह’ लेल प्रेरित करथि, त’ के एहेन अभागल हएत, जे मना करत! हम तत्काल उत्तर देलिअनि--आब तापस दा’ त’ स्पष्टे क’ देलनि! ओहुना अहाँकें मैडम कहैत हमरा नीक नँइ लगै छल। आइ दिनसँ अहाँ हमर भौजी भेलहुँ! तापस दा’ प्रसन्नतापूर्वक भौजीकें कनखी मारैत कहलखिन--लिअ’ एहेन सुरेबगर दीयर भेटलाह अछि, तैयो छुच्छे चाह! किछु नीक-निकुइत होइ एकरा संग! भौजी बजलीह--अहाँ हमर पावरकें चुनौती द’ रहल छी? -नँइ यै! हम कोनो बताह छी? अहाँ सन स्त्रीक पावरकें हम जनै नँइ छी की! -जनैत रहितहुँ, बाते किछु आओर रहितए! पति-पत्नीक ई षट्राग आगू नँइ बढ़ल। भौजी भनसा घ’र गेलीह, आ जल्दिए थोड़े रास मिठाइ-निमकीक संग आपस आबि गेलीह। पति दिश कनेक विजयी भावसँ तकैत हमरा दिस तकलनि--देव! अहाँ त’ एखन अपन भाइ संगे उपदेशक जकाँ ग’प करैत रही! -नँइ भौजी! दादाकें हमरा सन प्रोबेशनर उपदेश की देतनि! साहित्यक अध्येता छी, पढ़ैत-लिखैत इएह अनुभव होइत रहै’ए जे सम्बन्धक मूल आधार मोन हेबाक चाही; जाति, धर्म, वंश, परम्परा, धन-दौलत, पद-प्रतिष्ठा, देश आदि किछु नँइ! आजुक समयमे हमरा लोकनि जाहि सामाजिक संरचनामे जीबए लागल छी, ताहिमे सम्बन्धक कोनो न’ब व्याकरण तय हेबाक चाही। सम्बन्धक प्राचीन व्याख्या आब निरर्थक भ’ गेल अछि। अहीं देखिऔ ने, अपना ओतए पहिने बियाह होइ छै, तखन प्रेम! माने? ओही व्यक्तिसँ प्रेम करबा लेल आब ओ विवश अछि। ब’र-कनियाँकें कहियो भेंट नँइ, एकट्ठे दुनू पति-पत्नी भ’ गेल! हद्द अछि! -से नँइ कहियौ देब! हमरा सभक बियाह तेना नँइ भेल अछि। बकायदा हमर फोटो देखा क’ हिनकर इच्छा पूछल गेल छलनि। ई हाँ कहलखिन, तखनहि बात आगू बढ़लै--तापस दा’ बजलाह। -दादा, अहाँक फोटोमे अहाँक चालि-चलन, शील-स्वभावक उल्लेख नँइ रहल हेतै! ओ त’ अहाँ दुनू गोटए भागमन्त रही जे एहेन जोड़ी बनि गेल। भौजी बजलीह--हमरा सभक भाग्यकें एखन छोड़ू! ई कहू, जे अहाँक भाग्य एखन कोन मन्दिरमे अहाँ लेल साधना क’ रहल छथि? अचानक हमर आवेश पर रोक लागि गेल, हम लजा गेलहुँ। कहलिअनि--एखन चलै छी। देरी भ’ रहल अछि। भौजी बजलीह--एखन लाज भ’ गेल त’ जाउ, मुदा काल्हि कहि देब! हमरा कोनो हड़बड़ी नँइ अछि! अइ ठामसँ सम्बन्ध गाढ़ होअए लागल। ओइ डेरा पर स’हे-स’हे हमर आबाजाही बढ़’ लागल। कौखन तीनू गोटए, कौखन हम आ तापस दा’ गप-शपमे लीन होअए लगलहुँ। भौजी भनसा घर चल जाइथ, चाह जलखै बनबै’ लेल। कौखन हम आ भौजी बैसि जाइ टाइम पास कर’मे आ तापस दा’ ट्यूशन पढ़बै’मे व्यस्त भ’ जाइथ। भौजी संग शतरंज खेलएबामे सेहो खूब सोहनगर लागए। ओना बेसी काल जीतथि भौजिए। बादमे बुझाए लागल जे हमरा प्रसन्न कर’ लेल कखनहुँ-कखनहुँ ओ अरबधि कए हारि जाइथ। अर्थशास्त्रमे ओ एम.ए. केने छथि, मुदा इतिहास, राजनीति, सामाजिक आन्दोलन आ साहित्य सम्बन्धी मान्यता पर तर्कपूर्ण बहस करै छथि। तापस दा’कें तँ मिनटे-मिनटे धोबिया पछाड़ दै छथिन। मुदा ताहि सँ तापस दा’क पुरुषवादी अहं अनेरे आहत नँइ होइ छनि। ओ अपन अपढ़पन सहजतासँ स्वीकारि लै छथि। कहै छथि--भाइ, हम त’ फिजिक्ससँ बाहर कहिओ भेलहुँ नँइ। फिजिक्स पढ़लहुँ आ सिनेमा देखलहुँ। आ आब फिजिक्स पढ़बै छी, आ उपन्यास पढ़ि कए मनोरंजन करै छी। आब अइ सब बहस लेल त’ अहाँकें एकटा पाटनर ताकिए देलहुँ अछि, हिनकहिसँ बहस कएल करू! कान्ही मिलान हएत। हम अइ मामिलामे अजोह लोक छी। तापस दा’ उपन्यास खूब पढै़ छथि, मुदा सस्तौआ, फुटपाथी। भौजी कहलनि--अहाँक भाइ साहेब पाथर छथि! उपन्यास पढ़ै छथि, किऐ पढ़ै छथि, नँइ बुझल छनि। जाहि पोथीकें पढ़लाक बाद पाठक स्वयंकें न’व नँइ बुझ’ लागए, ओकर आन्तरिक भव्यता विकसित नँइ होइ, पोथी ओकर विचार शृंखलामे न’व फुनगी नँइ जोड़ए, ओइ पोथीकें पढ़ि कए लोक की करत? टाइम पास लेल लोक किऐ पढ़त? ओइसँ बेसी नीक तँ बाड़ी-झाड़ीमे फूल-पत्ती लगाउ, लत्ती-फत्ती लगाउ! फूल फुलाएत, खीरा-सजमनि फड़त, त’ आँखि जुड़ाएत, मोन हर्षित होएत! रूप-रंगसँ बाइस बर्खक युवती लगनिहारि भौजीक वयस हमर बराबरीक अथवा हमरासँ दू-चारि बर्ख बेसी अवश्य हेतनि, ई अन्दाज लगाएब अइ लेल सम्भव अछि, जे ओ हमरासँ दशक भरि पैघ पुरुखक पत्नी छथि, आ एम.ए. पास क’ चुकल छथि! अन्यथा असम्भव छल। मुदा सांसारिक ज्ञान आ तर्कमे हमरासँ दशक भरि पैघ छथि। जीवन जीवाक कतोक रास बात हमरा ओएह सिखौने छथि। पाप-पुण्यक परिभाषा ओ कोनो शास्त्रीय फारमूलासँ नँइ जीवन-संग्राममे अरजल तर्कक आधार पर दै छथि। मान्यतादिक कतोक बन्धनसँ हमरा ओएह मुक्त करौने छथि। असलमे भौजी सन जीवन्त आ रसवन्ती स्त्रीक संगति बनि गेलनि तापस दा’ सन भौतिक विज्ञानक प्रोफेसरसँ। तापस दा’ सौंसे कॉलेजक विलक्षण अध्यापक मानल जाइ छथि। बेहिसाब ट्यूशन चलै छनि। कॉलेजक क्लास पूरा क’ कए अबै छथि, आ ट्यूशन पढ़बए बैसि जाइ छथि। बैच पर बैच खतम होइ छानि, त’ ओएह सस्तौआ उपन्यास ल’ कए बैसि जाइ छथि। भौजी लेल समय बचिते नँइ छनि। साँझक बेला’मे हमरा संग थोड़े काल सड़क पर घुमै-फिरै छथि। चौक पर हमरा पान खुआ कए, अपने सिगरेट पीबि कए घुरि अबै छथि। फेर ट्यूशनियाँ चेला सब प्रतीक्षा करैत रहै छनि। ओ हमरा बैसबाक आग्रह करैत, पत्नीकें चाहक आदेश दैत ट्यूशनमे लीन भ’ जाइ छथि। भौजीसँ हमर निकटता बढ़ैत जेबाक स्रोत इएह चाह छल, जे क्रमे-क्रमे जलखै, भोजन, आ शतरंजक बिसात धरिमे परिणत भ’ गेल, भौजी धीरे-धीरे तापस दा’क संगें हमर डेरो पर आबए लगलीह। बादमे तँ कहिओ-काल एसगरो आबए लगलीह। बेर-कुबेर तँ भौजी हमर अल्हड़पन पर डाँट-डपट सेहो करए लागल छलीह--समय पर नहाएल करू, समय पर खाएल करू, बेसी चाह नँइ पीबू, जर्दा खाएब पुरुख लेल नीक बात नँइ थिक, केस किऐ उजरल-पुजरल रहै’ए...हम सम्मान भावसँ सबटा बात सुनैत घसकि जाइत रही। तापस दा’ मधुर परिहास करैत कहथि--आइ बढ़ियाँ धुनाइ भेल अछि देब! नीन बढ़ियाँ आओत!...आ जोरसँ ठहाका मारथि...। पढ़बा लेल किताबक चयन पर भौजीक एहन प्रतिक्रिया प्रशंसनीय छल। मुदा तें तापस दा’क निन्दा कोना सूनि लितहुँ! हम कहलिअनि--भौजी! रातिमे कोनो खट-पट भेल अछि की? खौंझाएल देखै छी! भौजी दाँत किचैत, बनावटी तामस करैत, हमरा पर आँखि गुरारैत बजलीह--रहसू नँइ! रसगर लोक छी अहाँ से त’ हमरा पहिले दिन बुझा गेल छल! अबिते देरी अहाँ जाहि तरहें अटकर लगा क’ हमरा देख’ लागल रही...! खेला रहल छी शतरंज, आ ध्यान अछि रंग-रभस पर। सम्हरि क’ चलू! जीवनो एक टा शतरंजे होइ छै देब! प्रतिपक्षक चालि के मर्मकें बुझबाक प्रयास करैक चाही! हम फेरसँ लजा उठलहुँ, अपन ओइ दिनक आचरण पर अफसोच होअ’ लागल छल। हम लजाइत कहलिअनि--भौजी! ओ तँ एक टा अपरिचित व्यक्तिक नजरि छल! ओइ घटनाकें बिसरि जाउ ने! खेलमे तँ बुझले अछि, जे अहाँकें पछारब हमरा लेल आसान नँइ होएत! मुदा अहाँ दादाक मादे जे कहै छिअनि, से उचित नँइ थिक। -ओइ घटना आ ओइ नजरिकें त’ हम जीवन भरि नँइ बिसरि सकब! खेलोमे पराजित हेबाक प्रतीक्षा हम क’ रहल छी। हमर पराजये हमर असली विजय हएत देब! मुदा हम देखि रहल छी जे अहूँकें हुनकर हवा लागल जा रहल अछि। ओ तँ वस्तुतः सूखल काठ भ’ गेलाह अछि। काठकें पोनका क’ हरियरी आनब कठिन अछि। अभिज्ञान शाकुन्तलम, अनामदास का पोथा, गोदान, कर्मभूमि...सब तरहक पोथी हुनका द’ कए देखि लेलहुँ; ओ खून भरी माँग, अन्धकार की चीख... सन-सन किताबसँ बहराइ बला नँइ छथि! भौजीक वाक्य-खण्ड ‘जीवन भरि नँइ बिसरि सकब!’ हमरा भयभीत क’ देने छल। ग्लानि होइ छल अपन ओइ आचरण पर। अपन आचरणकें लगातार पवित्र करैत अपन छवि सुधारबाक छल। दोसर दिश हुनका दुनू प्राणीक बीच लास्यमय आ जीवन्त सम्बन्ध देखल छल। मुदा, भौजी सन बुधियारि, सुन्नरि आ व्यावहारिक स्त्री अपना मुँहें पतिक सम्बन्धमे एहेन कठोर वचन बाजि रहल छथि, बजबा काल भौजीक मुखमण्डल पसरल खौंझ सेहो स्पष्ट रूपें रेखांकित छल। अचरज लागल छल। सोच’ लगलहुँ--वस्तुतः भौजी प्रसन्नताक फुलवारी नँइ छथि, फूजल किताब नँइ छथि, चानक शीतल इजोते टा नँइ छथि, झमटगर गाछक छाहरिए टा नँइ छथि, भौजी बिहारि अनबाक मोखा छथि, बिहारिसँ पहिनेक चुप्प वातावरण छथि, चुपचाप सुनगैत दावानल छथि। हम भौजीक खौंझक कारण तकबाक प्रयास करए लगलहुँ। आ भौजीकें कहलिअनि--भौजी! हमरा पन्द्रह दिनक समय दिअ’। दादा ट्यूशन पढ़ाएब छोड़ताह, से त’ हमरा कठिन लगैत अछि, मुदा सस्तौआ उपन्यास छोड़ि क’ अहाँक मनोनुकूल पोथी पढ़ए लगताह से हम वचन दै छी। पढ़बाक आदति जँ रहए, तँ व्याक्ति खराब चीजसँ नीक चीज पढ़ए लगैत अछि। दू सप्ताह बाद भौजीकें सूचना देलिअनि--देखू भौजी, आइ हम हुनका तेसर किताब द’ रहल छिअनि, श्रीलाल शुक्लक रागदरबारी। -पहिल दुनू किताब कोन छल? -पहिल छल भगवती चरण वर्माक चित्रलेखा, आ दोसर फेर हुनके रेखा! -ई दुनू पोथी हम नँइ पढ़ने छी। देब पढै़ लेल? आइए दिअ’ ने! हमरा लग पर्याप्त समय रहै’ए। अहाँक भाइ साहेबकें नेनपनमे पाइक अभाव ततेक सतेलकनि, जे पाइए टा कमाएब हुनकर जीवनक परम-चरम उद्देश्य भ’ गेल छनि। -भौजी! पाइ कमेबा लेल भाइ साहेब कोनो अवैध काज नँइ करै छथि, कॉलेजमे फाँकी नँइ मारै छथि। मेहनति, आ पवित्र रस्तासँ पाइ कमबै छथि, ताहिसँ अहाँकें गौरव नँइ होइए? -हाँ, पवित्रतासँ पाइ कमाएब नीक बात थिक, मुदा, मनुष्यकें कते पाइ चाही? पाइ कथी लेल चाही? जीवनक सुख सौरभ लेल ने! जीवनक एक-एक साँस पाइ जुटेबामे लगा देब त’ जीवनक की करब!...जाए दिऔ, हम त’ आब अही जीवनकें अवधारि नेने छी। भरि दिन मशीन जकाँ अपन ऊर्जा ट्यूशनमे लगबै छथि, साँझमे काटल गाछ जकाँ निस्पन्द भेल ओछाओन पर खसि पड़ै छथि। हमहूँ करौछ, छोलनी, टी.वी. अखबार संगे दिन काटि लै छी! एसकरे घ’रमे पड़ल रहै छी। अहूँ बेर-कुबेर आएब, से नँइ होइए। शतरंज खेला कए थोड़ेक समय बिता लेब! -अहाँ सन तेजस्विनी स्त्री संगे शतरंज की खेलाएब? हरदम तँ पछाड़िए दै छी। -मौगी जातिसँ हारब अधलाह लगै’ए? मौगी तँ पुरुष जातिसँ हारि जेबा लेल मोन प्राण ओछौने रहैत अछि। हम त’ बिसात ओछा कए पछाड़ खेबा लेल सदति काल तत्पर रहै छी! किऐ नँइ पछाड़ै छी? ‘शह’ के पहचान समय पर किऐ नँइ होइए? एतेक बोधगर लोक त’ छी अहाँ! -भौजी! हमर बोध अहाँक तेजस्विता लग पछड़ि जाइ’ए। आन ठाम त’ जीत जाइ छी। अहाँकें पछाड़ब सम्भव नँइ होइ’ए। -देब! हम अपन हरेक चालि अहाँसँ पछाड़े खेबा लेल चलै छी। मुदा हमर अभाग, जे अहाँ मैदान छोड़ि दै छी। देखी, कहिया अहाँ हमरा पछाड़ै छी। लगै’ए अहाँकें विशेष ट्रेनिंग देब’ पड़त। चित्रलेखा, आ रेखा पढ़लाक बाद एक दिन भौजी कहलनि--देब! की हाल अछि अहाँक भाइ साहेबक? चित्रलेखा, अथवा, रेखाक किछु असर भेलनि कि नँइ? -हाँ भौजी! भेलनि अछि, आब त’ ओ गोदान, सुनीता, मछली मरी हुई धरि पढ़ि गेल छथि। नदी के द्वीप पढ़ि रहलाह अछि। -मुदा हम कहब, जे ओ किछु नँइ पढ़ि सकलाह अछि। पढ़नाइ कोनो यान्त्रिक क्रिया नँइ होइत अछि। अध्ययनशीलता मनुष्यकें भिजाबए नँइ, त’ ओ अध्ययन नँइ भेल। या त’ अध्ययनक उद्देश्यमे दोष अछि, या फेर अध्येताक मूल बनावट दोखावह अछि। सुखाएल गाछमे पानि ढारलासँ ओ हरियर नँइ होएत। सुखाएल गाछकें पोनकबाक आशा हम त्यागि देने छी। हरियर गाछकें भकरार आ विकासोन्मुख हेबाक प्रतीक्षा करै छी। भौजी पढ़लि-लिखल स्त्री छथि। मुदा हुनकर एहन दार्शनिक बात सब सोझ रस्तें हमरा समझमे नँइ अबै छल। भौजी किछु संकेत त’ ने द’ रहल छथि! फेर होअए--नँइ, एहेन पापिष्ठ बात नँइ सोचबाक चाही। तापस दा’ सन पतिक रहैत, ओ एना कोना सोचतीह? मुदा किऐ नँइ सोचतीह, ओएह त’ कहलनि, जे साँझ क’ ओछाओन पर काटल गाछ जकाँ खसि पड़ै छथि। अर्थात् भौजी हमरासँ किछु आओर चाहै छथि। ओ हमरा बड़ मानै छथि। किऐ मानै छथि? की कारण?...नँइ, एना नँइ सोचबाक चाही। ई पाप थिक। विश्वासघात थिक। सम्बन्धक पवित्रता आ नैसर्गिकताक हत्या थिक। मुदा भौजी ओइ दिन पाप, पुण्यक बहसमे मारिते रास उदाहरण देने छलीह। कहने छलीह, सबसँ पैघ पाप थिक मनुष्यक जीवनी शक्तिमे अवरोध लगाएब। छिड़हड़ा खेलाएब भने व्यभिचार हो, मुदा यौन-लिप्साकें दाबन देब पैघ पाप थिक, यौन-लिप्सासँ निर्लिप्त हएब अशक्य व्यक्ति लेल आसान होइत अछि। पुंशत्वपूर्ण पुरुख आ स्त्रीत्व धारण केनिहारि स्त्री एहिसँ मुक्त नँइ भ’ सकैत अछि!...त’ की भौजी हमरा नोत द’ रहली’ए। की भौजी व्याभिचारिणी छथि? कथमपि नँइ। से रहितथि त’ अइ दुनियामे पुरुखक कमी छै?... भौजी की छथि? की चाहै छथि? ओ फूजल किताब जकाँ हमरा सोझाँ पसरल छथि, हम किऐ नँइ पढ़ि पाबै छी। एहेन विलक्षण, एहेन सुन्नरि, एहेन कलावती, एहेन वाग्विदग्ध स्त्रीकें चिन्हबामे हमरा किऐ तरद्दुत भ’ रहल अछि? एक बेर भौजी कहने छलीह--मनुक्खक कैक टा रूप होइ छै देब! सब रूपमे ओकर अलग पहचान होइ छै। अहाँक भौजी हेबासँ पहिने हम एकटा सम्पूर्ण स्त्री छी। जेना पुंशत्वक बिना कोनो पुरुष निरर्थक, तहिना स्त्रीत्वविहीन स्त्री सेहो निरर्थके होइछ! मोन कोनादन करए लगैए। अइ निर्णयक संग सूति रहै छी जे काल्हि भौजीकें स्पष्ट पुछबनि, हमरा कोन ट्रेनिंग देबए चाहै छी अहाँ, आ कहिआसँ देब? अगिला दिन तापस दा’ कॉलेजमे भेटलाह, कहलनि--अहाँक भाउज हमरा आदेश देलनि अछि, जे खाइक समयमे हम अहाँकें संग नेने डेरा घुरी। आइ ओ अहाँक पसिन के किछु भोजन बना रहल छथि। एकटा क्लास समाप्त क’ कए अबै छी, तखन चलब! ठीक ने? हम की कहितिअनि? काल्हि भौजी तेहन-तेहन गप केने छलीह, जे कैक तरहक आशंकासँ मोन तबाह छल! भौजीक ओइ बात, आ भोजनक निमन्त्रणमे ताल-मेल नँइ बैसै छल। तथापि कहलिअनि--मुदा अहाँ तँ घर पहुँचैत देरी चटिया सभमे लागि जाएब! ओ मुस्किआइत बजलाह--ई न्यायपूर्ण बात नँइ भेल। अहाँ एतबहि दिनमे भाउजक गुलाम बनि गेल छी। हुनकहि जकाँ अहाँ हमरा पर निशाना तनने रहै छी। क्लास समाप्त भेलाक बाद हमरा लोकनि डेरा पहुँचलहुँ। डाइनिंग टेबुल पर भोजन लगाओल गेल। थाड़ीमे परसल सोहारीमे चोपरल घी देखि तापस दा’ स्पष्ट लक्ष्य केलनि। बजलाह--देखिऔ देब, अहाँ अपन भाउजक न्याय! अहाँक सोहारीमे घी चोपरल अछि, आ हमर सोहारीमे औंसल अछि! अचक्केमे हम सकदम्म भ’ गेलहुँ। की-की ने आशंका मोनमे उपजए लागल। भौजी मुदा परम सुजान। ओ कनेक दोमि कए बजलीह--देखिअनु! लाज-धाख उठा कए पीबि गेल छथि। पेट लदरल जाइ छनि, आ घी खाइ लेल लेर चुबै छनि। तापस दा’ बजलाह--अरे हम त’ अहाँक प्रशंसा शुरुहे केने रही, अहाँ बीचेमे टपकि गेलहुँ। हम सएह त’ कहैत रही, जे अइ सिकिया पहलमानकें अहाँ तन्दुरुस्त बनबए चाहै छिअनि। अहाँकें तँ प्रशंसो सुनबाक धैर्य नँइ रहैत अछि। -हाँ से बात तँ सत्य थिक। छओ फिट्टा जवान छथि। छब्बीसक वयस छनि। पचास किलो ओजन छनि। स्वास्थ्यक प्रति सावधान तँ रहबाके चाही। कहै छिअनि घरनी आनि लिअ’ त’ से नँइ करताह। स्वच्छन्दता एतेक प्रिय छनि जे भोजन धरिक अभेला करै छथि। -आ तै स्वास्थ्य पर अहाँ कहै छिअनि बुलेट मोटर साइकिल चलबै लए! हम चौंक उठलहुँ। ई कोन सुर लागि गेल। हँसुआक बियाहमे खुरपाक गीत! बेरा-बेरी दुनू प्राणीक मुँह ताकए लगलहुँ। सोचए लगलहुँ--सब किछु त’ सामन्ये छल। एना थाड़ी पर बैसा कए दुनू प्राणी कोन गोत्राध्यायमे लागि गेल छथि। की बात थिकै आखिर! कोनो सूत्र तकबाक ब्यांेतमे हम तापस दा’ दिश तकलहुँ। तापस दा’ बजलाह--देब! हमर कथनकें अन्यथा नँइ मानब। हम अहाँकें अपन सहोदर छोट भाइसँ कनेको कम नँइ बुझै छी। सुवर्णा लेल सेहो अहाँ परम प्रिय दीयर छिअनि। बेकूफीमे हमरासँ ई मोटर साइकिल किना गेल। हमरा बुतें ई निके नाँ चला नँइ होइए। हम निर्णय लैत रही जे एकरा बेच दी। अहाँक भाउजक आदेश भेल अछि, जे जेठ भाइक समस्त बखरामे छोटक अधिकार होइ छै। अहाँ पछिला किछु दिनसँ मोटर साइकिल कीनए चाहैत रही। अहाँकें अधलाह नँइ लागए तँ ई अहाँ ल’ जाउ। न’बे छै, से तँ अहाँ जनिते छी! -मुदा दादा! हम सोचैत त’ अवश्य रही। किन्तु हमरा एखन पाइ कहाँ अछि? -ओह्! तकर चिन्ता अहाँ छोड़ू! पाइ लगबे कते करतै! ऑनरशिप ट्रान्सफर करै’मे ततेक खर्च नँइ होइ छै। हम छी ने! अहाँकें तँ भगवान सुवर्णा सन लछमीपात्र भाउज देने छथि! अहाँकें कोन कमी अछि?--फेर पत्नी दिश तकैत बजलाह--की यै! ऑनरशिप ट्रान्सफरक खर्च अहाँ गछै छिअनि कि नँइ? आब भौजी बजलीह--मुदा तकर आवश्यकता की? अहाँक अनुजकें अहाँ पर एतबो विश्वास नँइ छनि, जे अहाँ मोटरसाइकिल आपस नँइ मँगबनि? आ कि अहाँकें अपन अनुज पर विश्वास नँइ अछि जे ओ अहाँक चीज-वस्तु ओ सम्हारि क’ राखि सकताह! ई ऑनरशिपक बखेरामे किऐ पड़ल छी? तापस दा’ फेर परिहास मिश्रित रंज केलनि--अहाँ तँ गजब स्त्री छी। सदति काल हमरा पर सींघमे माटि लगौने रहै छी! अहाँक दीअर जे कहलनि, हम तकर रस्ता निकालि देलहुँ। आब हम कतए दोषी छी? -से कोन हम साँढ़ छी, जे सिंघमे माटि लागएब! -नँइ, अहाँ गाय छी। मुदा सिंघ त’ गाइयो क’ होइ छै! -मतलब हम झगराही छी? -अरे बाबा, अहाँ परम सुशील छी। मुदा मूल बात सँ किऐ भटकि रहल छी। अहींक प्रस्ताव छल ने, जे मोटरसाइकिल जुनि बेचू। देबकें किनबाक छनि, से किनता किऐ, मूल काज त’ चढ़बाक छै! से चढ़थु अही पर! त’ बुझाउ ने अपन स्वाभिमानी दीयरकें, हमरासँ कथी लए ढूसि लै छी? -से हम कहलहुँ तँ कोन बेजाए केलहुँ। हमर त’ विश्वास अछि जे अहाँक चीज-वस्तुक सम्मान देब निके नाँ करताह। हुनका सुख-भोग करैत देखि अहूँकें नीक लागत, आ हमरहु आत्मा तृप्त होएत। हमरा आब बाज’ पड़ल--दादा! हम ऑनरशिप ट्रान्सफरक गप नँइ करैत रही। हम त’ मोटरसाइकिलक दामक गप करैत रही! तापस दा’क आँखिमे व्यथा उपजलनि...नम्हर सन साँस घिचैत बजलाह--अहाँ ई कोना सोचलहुँ देब? भौजी बजलीह--देब! जेठ भाइक सम्पतिक दाम नँइ लगाओल जाइ छै। दाम लगौला पर ओ पड़ोसिया भ’ जाइ छै। ई वस्तु नँइ थिकै देब! ई ममता थिकै, अनुराग थिकै! तापस दा’ बजलाह--सुवर्णा! हम हिनका बुट्टी-बुट्टी चिन्है छिअनि! हम ई बात जनै छलहुँ। तें कहने रही, जे अहाँक सोझाँमे गप करब। हमर विद्यार्थी सब बैसल अछि। हम हाथ धो कए आब चलै छी पढ़बै लए। अहाँ हिनका भोजन कराउ, आ हिनकर माथमे बैसल भूतकें भगाउ। देखी आइ अहाँक चतुराइ! तापस दा’ हाथ धो क’ ट्यूशन पढ़बै लेल सीढ़ी चढ़’ लगला। समूचा घ’र आब तीन घण्टा लेल निस्पन्द रहत। भौजीकें सिपुर्द रहत। भौजी रहतीह, आ हुनकर चारू कात निःशब्द वातावरण रहत। तापस दा’ गदह बेर धरि ट्यूशनमे लागल रहताह। भौजी थोड़े आओर खाइ लेल आग्रह केलनि। हमरा माथमे घुरिआइत आशंका सब समाप्त भ’ चुकल छल। सुभस्त होइत कहलिअनि--भौजी! अहाँ त’ अन्ने-तीमनमे ततेक स्नेह मिला देने रहै छिऐ, जे हाथ चाटैक मोन करए लगै छै, आग्रहक गुंजाइश बचल कहाँ रहै छै! -ककर हाथ, अपन, कि बनेनिहारिक? हम फेर गुम्म भ’ गेलहुँ। भौजीक बात पर निरुत्तर हेबाक हमरा लेल ई कोनो पहिल घटना नँइ छल। हाजिर जबाबी, आ बोल्डनेशमे भौजीक कोनो जवाब नँइ छल। केहनो बात केहनो परिवेशमे कहि देबाक हुनकर चतुराइ, आ हुनकर साहस विलक्षण छल। बोल्ड त’ हमहूँ कम नँइ रहल छी, मुदा पता नँइ किऐ, हुनका सोझाँ हमर सम्पूर्ण बोल्डनेस बिला जाइ छल। कहि नहि ई हुनकर व्यक्तित्वक प्रभाव छल, कि हुनकर आभामय रूप-सौन्दर्यक, आ कि दीयर भाउजक सम्बन्धक, हुनका सोझाँ पड़िते जेना हम हुनकर अधीनस्थ भ’ जाइ छलहुँ। अपन कोमल हाथक दसो अँगुरीसँ हमर दुनू गालकें चुटकियबैत भौजी बड़े अह्लादसँ बजलीह--अहाँ त’ मौगी जकाँ लजाइ छी देब! पुरुखकें कतौ एते लाज हो! उठू हाथ धोउ! हाथ धोअ’ गेलहुँ, त’ बेसिनमे हाथ धोइते रहि गेलहुँ। सोचए लगलहुँ--भौजी सत्ते बड़ मानै छथि हमरा। कते भागमन्त छी हम! अइ दुनियामे जकरा भाउज नँइ छै, से जीवनमे कते तरहक नेहसँ वंचित रहि जाइ’ए।...मुदा इएह भौजी एते दिनसँ प्रेम करै छथि, कहियो एना कहाँ बुझाइ छल हमरा! आइ एना किऐ लागि रहल आछि! बेर-बेर अपन दुनू गाल छूबै छी, लगै’ए जेना ओतए चम्पा-बेली फुला गेल हो! एना किऐ लागि रहल अछि!... भौजी आबि क’ बगलमे ठाढ़ि भेलीह, बामा हाथें टैप बन्द केलनि, दहिना बाँहि हमरा कन्हा पर आर-पार रखैत बामा हाथें आँचरसँ हमर हाथ पोछलनि, आ कान लग मुँह अनैत कहलनि, मोनमे किछु होअ’ त’ नँइ लागल अछि?...आ खिलखिला कए हँसए लगलीह। खिलखिलाहटिसँ छूटल हुनकर गर्म साँस हमर कनपट्टीसँ कन्हा पर आएल, आ कमीजक त’र बाटें पीठ आ छाती दिश पिछड़ि गेल। सौंसे देहमे झुनझुनी उठि गेल। भौजीक दहिना हाथक चूड़ी हमर दहिना कानमे गर’ लागल छल। मुदा बाँहिक ओ ऊष्मा आ चूड़ीक ओ प्रहार नीक लागि रहल छल। हम भौजीक छाहरि दिश सहटि जाए चाहै छलहुँ, मुदा संकोच भेल।...भौजी फेर धोपलनि--फेर लाज! मन्दबुद्धि! चलू, मोटर साइकिल निकालू। डेरा पहुँचा दै छी! मोटरसाइकिलसँ डेरा विदा भेलहँु। बैचलर डेरा। भौजीक की सत्कार करिअनि! खा-पीबि क’ त’ तुरन्ते आएले छी। पुछलिअनि--भौजी, की सत्कार करू अहाँक? पानि पियाबी? भौजी कहलनि--पिआसल त’ छीहे! पिआ सकब? ... थोड़े काल बाद भौजी बजलीह--हमरा पहुँचा दिअ’ बौआ! -पहुँचा दिअ’? -राखियो त’ नँइ सकब? हम मोटर साइकिल नँइ छी ने? सजीव आ निर्जीवमे इएह अन्तर होइ छै देब! १.डा.रमानन्द झा ‘रमण’- नेपालमे मैथिली कथाक विकास ओ प्रवृत्ति २.जगदीश प्रसाद मंडल-मैथिली उपन्यास साहित्यमे ग्रामीण चित्रण ३. शिव कुमार झा ‘टिल्लू’- मैथिली उपन्यास साहित्यमे दलित पात्रक चित्रण १ डा.रमानन्द झा ‘रमण’ जन्म: 02 जनबरी,1949, शिक्षा-एम.ए., पीएच.डी., आजीविका-भारतीय रिजर्व बैंक, पटना (सेवा निवृत्त)। प्रकाशन: 1. नवीन मैथिली कविता,1982, 2. मैथिली नऽव कविता,1993, 3. मैथिली साहित्य ओ राजनीति, 1994, 4. अखियासल, 1995, 5. बेसाहल,2003, 6. भजारल, 2005., 7. निर्यात कैसे शुरू करें? हिन्दी- रिजर्व बैंक, पटनाक प्रकाशन सम्पादित 8. मैथिलीक आरम्भिक कथा, 1978 समीक्षा, 9. श्यामानन्द रचनावली, 1981, 10. जनार्दन झा जनसीदन कृत निर्दयीसासु (1914) आ पुनर्विवाह (1926), 1984, 11. चेतनाथझाकृत श्रीजगन्नाथपुरी यात्रा (1910), 1994, 12. तेजनाथ झाकृत सुरराजविजय नाटक (1919), 1994, 13. रासबिहारीलाल दासकृत सुमति (1918), 1996, 14. जीबछ मिश्रकृत रामेश्वर (1916), 1996, 15. भेटघॉंट (भेटवार्ता), 1998, 16. रूचय तँ सत्य ने तँ फूसि, 1998, 17. पुण्यानन्द झाकृत मिथिला दर्पण (1925), 2003, 18. यदुवर रचनावली (1888-1934) 2003, 19. श्रीवल्लभ झा (1905-1940) कृत विद्यापति विवरण, 2005, 20. मैथिली उपन्यासमे चित्रित समाज, 2003, 21. पण्डित गोविन्द झाः अर्चा ओ चर्चा, 1997 प्रबन्ध सम्पादक, 22. कवीश्वर चेतना, 2008, चेतना समिति, पटना अनुवाद आदि। नेपालमे मैथिली कथाक विकास ओ प्रवृत्ति
साहित्यके ँदेशक आधर पर विभाजित कए विश्लेषित करबाक अनेक कारण अछि। पहिल अछि राजनीतिक -सामाजिक-सांस्कृतिक पार्थक्य। ई पार्थक्य लोकक विचारधरा एवं जीवन-मूल्यके ँप्रभावित करैत अछि। देशक राजनीतिक स्थितिसँ निवासीक रहन-सहन एवं विचारधरा प्रभावित होइत अछि। लेखन-प्रकाशन प्रभावित होइत अछि। एहि लेल राजनीतिक शासन-व्यवस्थाक आधर पर भाषा विशेषक साहित्यिक प्रवृत्तिक विवेचनक प्रयोजन होइत छैक। दोसर कारण अछि राजनीतिक स्वायत्तताक प्रदर्शनक हेतु क्षेत्राीय आधार पर साहित्यक विकास आ’ ओहिमे अभिव्यत्तफ प्रवृत्तिक अनुसन्धन लेल उपयोगी होएब। मैथिली भाषा, मैथिल संस्कृति आ’ मैथिलीक साहित्यकार दू स्वतन्त्रा सार्वभौम राष्ट्रक भौगोलिक सीमामे निवास करितहु भावात्मक रूपसँ ततेक सन्निकट छथि जे राजनीतिक पाया आत्मीय तरलताक प्रवाहके ँ छेकि रखबामे सर्वथा अससर्थ होइत रहल अछि। तथापि, जेना बिना आरि ध्ूरक प्रवाहित जल राशिके ँ चिन्हेबा लेल देश अथवा भू-खण्डक नाम जोड़ि देल जाइत अछि, ओहिना दू देशक भौगालिक सीमामे रचल जाइत साहित्यक भौगोलिक नामकरण स्वीकार कएल जाएब अप्रीतिकर नहि कहल जाएत। प्रायः एहनहि मानसिकताक कारणेे ँ ‘नेपालीय मैथिली साहित्य’ नामकरण भेल होएत। ई ओहिना स्वीकार कएल जाए सकैत अछि जेना अमेरिकरन अघरेेजी, भारतीय अघरेेजी आदि। पंरच, ई ध्रि निर्विवाद जे एहि नामकरणमे साहित्यिकसँ बेसी पृथक व्यत्तिफत्व-स्थापनाक मानसिकता प्रतिध्वनि अछि। ‘नेपालीय मैथिली’ एक नवजात नामकरण थिक। पहिने नेपालमे रचित मैथिली नाटक, मैथिली कथा आदि लिखाइत छल। आब किछु गोटे ‘नेपालीय मैथिली नाटक, नेपालीय मैथिली कविता, नेपालीय मैथिली कथा आदि लिखैत छथि। ध्ूमकेतु1 सांस्कृतिक शु(ता, अशु(ताक आधर पर मैथिली भाषी क्षेत्रा तथा भाषा-साहित्यके ँ दू खण्डमे बांटल अछि ;नेपालक मैथिली स्वतन्त्रा रूपसँ विकसित भए रहल अछिµभेटकर्ता डा. रेवती रमण लाल।द्ध ओ थिक मोगलानक मिथिला ;भारतीय क्षेत्राद्ध आ’ शु( मिथिला ;नेपालक क्षेत्राद्ध। ‘मोगलानक’ शब्द सांस्कृतिक-धर्मिक अशु(ताक बोध् करबैत अछि। ई ऐतिहासिक घटनाक ओहि अवस्थाके ँ स्पष्ट करैत अछि जखन विजातीय र्ध्मक प्रति अस्पृश्यताक भाव घनीभूत रहैत छल। एहि हेतु ध्ूमकेतुक ई विभाजन सांस्कृतिक, धर्मिक आधर पर सत्य होइतहु, अतीत गानक द्वारा उद्बोध्ति करबाक अभिप्रायसँ विशेष प्रयोजन-सि( नहि करैत अछि। इतिहासक जाहि कालखण्डमे मोगलान मिथिला सन विभाजन भेल होएत, तकर आब आधार नेपालहुमे नहि रहलैक। तथापि एहन विभाजन वा नामकरण मात्रा धर्मिक मान्यताक आधर पर श्रेष्ठता स्थापन कए अपन परिचित लेल भए सकैत अछि। प्रायः एही परिचय स्थापना लेल रामभरोस कापड़ि ‘भ्रमर’ प्रश्न ठाढ़ कएलनि2 ‘की नेपालक मैथिली साहित्यमे पायापारक कथा लिखाइत अछि?’ ओ एहन बात ओहि प्रकारक व्यक्ति द्वारा बाजल जाएब मानल अछि जकरा नेपालक मैथिली साहित्यक सम्बन्ध्मे किछुओ ज्ञान नहि छैक एवं एखनो ध्रि ओहन लोक परान्मुखी चरित्राक अछि। ओ ने किछु पढ़ने अछि आ’ ने किछु ने देखने अछि। ‘पायापार’ शब्दक प्रयोग अनचोखमे नहि भेल अछि। आ’ ने संकेतक प्रति कोनो भ्रम उत्पन्न करैत अछि। एहि सम्बन्ध्मे अत्यल्पहु शंकाक समाधान गामघर3 मे प्रकाशित निम्न समाचारसँ निर्मूल भए जाइत अछि। समाचार अछि -‘बैसारमे एक दू प्राध्यापक लोकनि नेपालीय मैथिली साहित्यक अपन मूल ज्ञानक परिचय दैत भारतीयक तीन-चारि दशक पूर्वक लेखक सभक पुरने रचना सभके ँ पेफर-पेफर पाठ्यक्रममे रखबाक षड्यन्त्रामे संलग्न रहलाह अछि। मानसिक स्तरसँ सेहो सीमापारक लेखकवृन्दसँ अपन स्वार्थवश लगाबक काज कए रहल छैक।’ एहिना प्रो. राजेन्द्र विमल4 अपन लेख ‘नेपालक आध्ुनिक मैथिली कथा साहित्य’ मे ‘गुरांस’ आ’ क्रोटनक चर्चा कएने छथि। ओ मानैन छथि जे जावत ध्रि क्रोटनक डारि तोड़ि के ँ मैथिली साहित्य आनठामसँ आनि एहि माटिमे रोपल रहत ता’ ध्रि नेपालमे मैथिलीक पूर्ण विकास असम्भव। मैथिलीक विकास लेल मैथिलीके ँ गुराँसक गाछ जकाँ एहिठाम माटि-पानिमे जनमि, बढ़ि, खाँटी नेपालीय सौरभक प्रसार करए पड़तैक। एहिसँ पूर्व प्रकाशित अपन एक लेख ;नेपालमे मैथिलीद्ध- प्रो. विमल5 ई स्थापित कएने छथि जे 2007 सालक बाद नेपालमे दू टा ‘स्कूल’ द्वारा मैथिली साहित्यक विकास भेल। पहिल थिक शिल्प एवं भावबोध्क दृष्टिसँ ‘आध्ुनिक स्कूल’, जकरा ‘डा. ध्ीरेन्द्रक स्कूल’ कहल जाइत अछि। एहि दूनू ‘स्कूलक’ प्रधनक कार्य-क्षेत्रा, भाव-क्षेत्रा, अनुराग-क्षेत्रा आ’ जँ एक शब्दमे कही, सक्रियताक समस्त क्षेत्रा नेपालहि रहल अछि। साहित्यिक गुराँसक अंकुरण हेतु अनुकूल भावभूमिक सृजनकर्ता तथा हुनक कृतिके ँ क्रोटनक संज्ञासँ अभिहित करब, हमरा जनैत नेपालक राजतन्त्राीय युगक मानसिकता थिक। ‘पाया पारक कथा’ अथवा ‘गुराँस’क आशय नेपालमे लिखल जाइत मैथिली कथा पर विदेशी साहित्य ;भारतीयद्धक प्रभावसँ अछि। अथवा ओहि ढंगक कथासँ अछि, जाहिमे नेपाली जन-जीवनक अनुगंज नहि अछि। एकरहु सम्भावना अछि जे नेपालमे मैथिली साहित्यक द्रुत गतिसँ भए रहल विकाससँ आतंकित किछु लोकक ई चक्रचालि रहल हेा। मुदा, एकटा महत्त्वपूर्ण प्रश्न ई अछि, की कोनो भाषा-साहित्यक विकासके ँ ‘पाया’ मे बान्हि राखल जा सकैत अछि? की कालिदास, विद्यापति, शेक्सपीयर, गोर्की, चेखब, भानुभक्तक साहित्यके ँ हुनक देशक शासक अपन सीमासँ बाहर जएबासँ रोकि सकलाह अछि? जाहि जमानामे आवागमनक पूर्ण असुविधा छलैक, मार्ग दुर्गम छलैक, ओ महान साहित्य सभ लोक ध्रि पहुँचि गेलैक। आब तँ सहजहिं उन्मुक्त आकाशक नीचा सभ केओ आबि गेल अछि। वास्तविकता तँ ई अछि जे एक देशक राजनीतिक सीमामे जनमल दार्शनिक, समाजशास्त्राी आ’ मानवशास्त्राी द्वारा कएल गेल सत्यक प्रत्यक्षीकरण विश्वचेतनाके ँ प्रभावित करैत आएल अछि। एक कृत्रिम उपग्रहक क्षमताक समक्ष जेना देश-देशक भौगोलिक सीमा पोता जाइत अछि, ओहिना विश्वक एक कोणक मानवतावादी दृष्टि, मानव स्वान्तत्रय आ’ मानवाध्किारक चेतनाके ँ सहस्रो चीनक देबाल छेकि रखबामे असमर्थ भए जाइत अछि। आजुक लोकक पहिल चिन्ता उपभोक्ता आ’ उपयोगिता पर रहैत छैक। एहि संस्कृतिक विशेषता थिक प्रदर्शन-प्रभाव ;क्मउवदेजतंजपवद मििमबजद्ध। विकास आ’ विस्तारक सम्प्रति ई प्रमुख घटक थिक। ई प्रदर्शन प्रभाव लोकक जीवन प्रणालीके ँ प्रभावित करैत देशक अर्थतन्त्राके ँ प्रभावित कए दैत अछि। ई तँ एक स्थूल उदाहरण भेल। साहित्यकारक चेतनाक एंटीना उत्यन्त संवेदनशील आ’ वधर््िष्णु होइत अछि। सुदूर प्रान्तहुक पीड़ित मानवक आर्तनाद अकानि उद्वेलित भए उठैत अछि। रंग-भेद नीतिक आधर पर अंटकल शासकक बज्र कपाटमे छटपटाइत लोकके ँ ओ देखि लैत अछि। ओहि व्यक्तिक मुक्तिक आकांक्षा आ’ संघर्षक गतिके ँ तीव्रता प्रदान करबाक हेतु शब्द-सन्धन करैत अछि। अर्थात् ज्ञानक क्षेत्रा, संवेदनाक क्षेत्रा, सहानुभूतिक क्षेत्रा, वैचारिक मंथनक क्षेत्रा, कोनो सीमा नहि मानैत अछि। क्षेत्रा-विशेषक लोकक सुखमय जीवनक कामना, शोषण आ’ अत्याचारसँ मुक्तिक उत्कण्ठा, वर्णभेद जातिभेद आदिक आधर पर विभाजन ओ अत्याचारक विरोध, अभिव्यतिक स्वतन्त्राता पर प्रतिबन्ध्, प्रजातन्त्राीय मूल्यक गला टीपबाक प्रशासनिक षड्यन्त्रा आदिक विरोध्मे उठैत धहके ँ कोनो ‘पाया’ आजुक युगमे बेसी कालध्रि अवरु( कए नहि राखि सकैत अछि। मानवता पर होइत अत्याचारक घटनाक प्रभावके ँ यदि एक देशक शासक तहिआ सकैत छल तँ दक्षिण अप्रिफकाक रंगभेदी गोरा सरकारक विरु( विश्व जनमत एकमत नहि होइत। एहि हेतु अभिव्यक्तिक माध्यम भलहि भिÂ-भि रहौक, साहित्यक अभिप्रेतके ँ देशक पायाक भीतर पकड़ि राखब साहित्यके ँ मानव-मुक्तिक सक्षम माध्यम बनबासँ रोकब होएत। एकर तात्पर्य इहो नहि जे भाषा-भाषाक साहित्यमे कोनो अन्तर नहि रहैक। एकार्णव भए जाइक। देश, काल आ’ पात्राक महत्त्व समाप्त भए जाइक। एहि सभक महत्त्व स्थानीय अथवा क्षेत्राीय विशेषताके ँ बूझबा लेल सभ दिन महत्त्वपूर्ण रहत। क्षेत्रा विशेषक लोकक जीवन-दृष्टि ओ हृदयक ध्ुकध्ुकीके ँ अकानवा लेल आवश्यके नहि, अनिवार्य सेहो अछि। रचनाकार अपन व्यक्तित्व तथा रचनागत वैशिष्ठ्यक आधर पर विभि भाषा साहित्यक बीच अपन परिचय स्थापित करैत अछि। रचनाकारक संवदेनशील व्यक्तित्व पर सबसँ बेसी प्रभाव पड़ैत छैक, ओकर परिवेशक। परिवेशक घटक थिक देशक राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक आदि स्थिति। ओहिसँ लोकके ँ भेटैत सुविध-असुविधा एवं जनताक आशा-आकांक्षाक प्रति प्रशासकीय दृष्टि। प्रशासन अपन मनमोहिनी आँखि आ’ हाथमे दानवीय दण्डक आधर पर चाहैत अछि रचनाकारके ँ अपन अनुकूल बनाके ँ राखब। से एहि हेतु जे प्रशासनके ँ सबसँ बेसी खतरा संवेदनशील आ’ निर्भीक रचनाकारे सँ रहैत छैक। एहनहि प्रतिकूल स्थितिमे रचनाकारक रचनात्मक दायित्वक वास्तविक परिचय तत्काल वा कालान्तरमे होइत अछि। की ओ व्यवस्थाक मोहिनी मन्त्रा आ’ दानवीय दण्डसँ भयांकित भए सुरमे सुर मिलबैत प्रशासनक जनसम्पर्क विभागक प्रवक्ता बनि प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष सुविधा भोगैत अछि अथवा दीन-दुखी, अभावग्रसत, पीड़ित आ’ स्वाधीनताकामी जनताक हृदयक धुकधकीके ँ अकानैत एक जाग्रत प्रतिपक्षीक रूपमे अपनाके ँ ठाढ़ करैत अछि। नेपालमे लिखाइत मैथिली कथाक शिल्प-विधनक प्रसंग रामभरोस कापड़ि ‘भ्रमर’6 लिखल अछि जे नेपालक मैथिली कथाके ँ आन कोनो ठामक कथाकारक मध्य बेछप रूपे ँ चिन्हल जा सकैछ, बूझल जा सकैछ, एकर स्थानीय बिम्ब प्रयोग, दृश्य-योजना आ’ भाषाक प्रयोगक कारणे ँ। अनेको कथामे नेपाली शब्दक सुन्दर प्रयोग नेपालीय मैथिली रचनाक महत्त्वपूर्ण विशेषता कहल जा सकैछ। परिवेशजन्य चित्राण नेपालीयताक स्पष्ट छाप छोड़ैत बूझि पड़त।’ एहि कथनक अनुसार, जेना नेपाली टोपीसँ नेपाली संस्कृतिक बोध् होइछ, ओहिना कथामे नेपाली शब्द आ’ नेपालक स्थल सभक नामसँ नेपालमे लिखाएल मैथिली कथाक परिचय भए जाएत। परंच, एकटा प्रश्न उठैत अछि। नेपालीपनाक वास्तविक परिचय बाह्य आवरण थिक आ कि ओहि भू-भागक निवासीक आभ्यान्तरिक गुणर्ध्म। जनकपुर अंचल, विराटनगर अंचल अथवा काठमाण्डूक मध्यम प्रकाशमे धन-कुबेरक रंगरभस ओ जीवन दृष्टिमे नेपालीपना ताकल जाए कि जनपद विशेषक आशा-निराशा, हर्ष-विषाद, भूख-पियास, शोषण-प्रताड़न, प्रशासनिक भ्रष्टाचार, सांस्कृतिक अवमूल्यन तथा राजनीतिक दाव-पेंचके ँ चुपचाप सहि लेब नेपालीपना थिक। आ कि ओकर बीचसँ जन्म लैत संघर्षमयी चेतना, ध्ैर्य, साहस आ’ जीवनक विकृत्ति एवं विडम्बनाके ँ सहैत मानवक अभ्युत्थानक प्रति अपन आस्थाके ँ अक्षुण्ण रखबाक चिन्ता नेपालीपना थिक। निश्चित रूपे विवेचनीय विषय थिक। ‘नेपालीय मैथिली’ नामकरण हो, नेपालीपना हो, अथवा गुराँसक चर्चा µ ई सभ थिक स्वतन्त्रा अस्तित्वक स्थापनाक प्रयास। देशक साहित्यकार आ’ जनताक मनमे बढ़ैत आत्म-विश्वासके ँ ई नामकरण प्रकाशित करैत अछि। आत्मविश्वाससँ आत्मनिर्भरता दिस नेपाली जन-जीवनक बढ़ि रहल डेगक प्रतिध्वनि एहिमे गुंजित अछि। परंच, एहो ध्यान रखबाक थिक जे राजनीतिक दाव-पेंच तात्कालिक लाभक सदिखन अपेक्षा रखैत अछि। दू देशक बीच चल अबैत सांस्कृतिक समन्वय एवं भावात्मक एकताक लुहलुहान गाछके ँ छकरबा दैत अछि। एहि हेतु एक भाषाक दू देशक सीमामे रहैत साहित्यकारक दायित्व कतेको गुणा बढ़ि जाइत अछि। ठीके आब डा. विमल मिथिलाक संस्कृतिमे सह-अस्तित्वक चेतनाक महत्त्व प्रतिपादन कएल अछि।7 ई ऐतिहासिक सत्य थिक जे नेपाल सन् 1950 ई. ;2007 सालद्ध मे अपन निकटतम दक्षिणी पड़ोसी देशक सहयोगे राणाशाहीक क्रूरपाशासँ मुक्ति पओलक तथा राजतन्त्राीय व्यवस्थाक अन्तर्गतहि प्रजातन्त्राीय मूल्य आ’ सि(ान्तक अनुसार शासन-व्यवस्था स्थापित भेलैक। राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक आदि क्षेत्रामे नव विहानक सूर्य करिआ मेघके ँ पफाड़ि आबए लागल। विश्व संस्थामे नेपाल एक स्वतन्त्रा राष्ट्रक रूपमे मान्यता पओलक। कतेको देशक संगे दौत्य सम्बन्ध् स्थापित भेलैक। राष्ट्र समूहक बीच प्रतिष्ठा बढ़लैक। दूनू देशक बीच भेल ‘2007 सालक मैत्राी संध्’ि क अनुसार नेपालक प्रजाके ँ भारतमे भारतहिक नागरिक जकाँ जीविका प्राप्त करबाक सुविधा भेटलैक। किन्तु प्रजातन्त्राीय मूल्य आ’ परम्पराक जड़ि ध्रतीमे नीक जकाँ जमबासँ पूर्वहि 2017 सालमे एक शाहीघोषणा द्वारा जड़ि पकड़ैत लोकतन्त्राक गाछके ँ एकहि छटकामे उखाड़ि देल गेलैक। पंचायत भंग भेल। प्रधनमन्त्राी बन्दी भेलाह। नेपाली प्रजा अभिव्यक्तिक स्वतन्त्राता आ’ अध्किारक मुहध्रि पहुँचैत-पहुँचैत, ओहिसँ वंचित भए गेल। थोपल गेल दलविहीन पंचायती व्यवस्था जाहिमे प्रजाक अध्किार अत्यन्त सीमित भए गेलैक। सामान्य लोकक स्थिति दिन प्रतिदिन दयनीय होइत रहल। निश्चित प्रकारक लोकोपकारी शासन-व्यवस्था लेल सिहाइत नेपाली प्रजाक बीच संघर्षक चिनगी कहिओ-कहिओ ध्ध्कैत रहल। एहिसँ संविधनमे संशोध्नक प्रयोजन होइत रहलैक। एहि क्रममे 2038 सालमे बालिग मताध्किारक आधर पर दलविहीन पंचायत लेल पहिल आमनिर्वाचन भेल। नेपालक प्रजाके ँ प्रजातन्त्राीय मूल्य एवं मताधिकारक लाभक अत्यल्प रसानुभूतिक अवसर भेटलैक। एहि सँ नेपालक नव युवक वर्ग शासन-व्यवस्थामे व्यापक स्तर पर अध्किारक प्राप्तिक प्रति मानसिक रूपे ँ उद्वेलित भए उठल। व्यापक संघर्षक लेल मोन बनबैत गेल जकर कतेको वर्षक संघर्षक बाद परिणाम हालहिमे समक्ष आएल अछि। राणाशाहीक समाप्ति पर आध्ुनिक शिक्षा प्रचार-प्रसार दिस ध्यान देल गेल छैक। स्कूल-कालेज खूजल। त्रिभुवन विश्वविद्यालयक स्थापना भेल। ‘कोलम्बो योजना’, ‘इंण्डिया एड मीशन, आ ‘इण्डिया को आपरेशन मीशन’क अन्तर्गत भारतसँ विभि विषयक विशेषज्ञ, अभियन्ता एवं प्राध्यापक शिक्षाके ँ आध्ुनिक स्तर ध्रि अनबाक हेतु नेपाल पठाओल गेलाह। एहिसँ कतेको विषयक उच्च शिक्षा लेल भारत पर निर्भरता क्रमशः कमय लागल। शिक्षाक विकासक संग शिक्षित नवयुवकक संख्या सेहो बढ़ैत गेल। जीविकार्थीक संख्या बढ़ल। श्रमक पलायन शुरू भेल। ई पलायन एक दिशाह नहि छल। नेपालमे राजमार्गक निर्माण भेला पर पर्यटकक संख्या बढ़ल। विश्वक कतेको देशक संग दौत्य सम्बन्ध् भेला पर विभि सभ्यता आ’ संस्कृतिक बहरिया लोकक अबर-जात क्रमशः बढ़ैत गेल। पर्यटन एक लाभकारी उद्योगक रूपमे विकसित भए गेलैक। संगहिं पाश्चात्य जगतक रहन-सहन आहार-विहारक अन्धनुकरण सेहो होअए लागल। औद्योगिक रूपे ँ समृ( देश तथा केन्द्रक प्रति नेपालक आकर्षण बढ़ल। एहि आकर्षणक कारणे ँ सामाजिक जीवनमे युग-युगसँ व्याप्त अपनत्व आ’ निश्छलताक स्थान पर असामाजिकता बढ़य लागल। लोकमे अर्थाकांक्षा बढ़ल। आनक नजरिमे अपन ओहदाके ँ उफपर उठल देखेबाक आकांक्षासँ सामाजिकता कमैत गेल। सत्ताक केन्द्रीकरण छले, ओहि केन्द्रक प्रभामंडलक हाथमे सम्पत्ति आ’ सुख-सुविधक सभ साध्न सम्पुटित होइत रहल। नेपालमे विभिन्न प्रजातिक लोक निवास करैत अछि तथा सम्पूर्ण देश दू प्रकारक भौगोलिक क्षेत्रामे विभाजित अछि। विभिÂतामे एकता स्थापित करबाक प्रयासक बदलामे एहि प्रजातीय आ’ भौगोलिक विविध्ताके ँ विभेदक प्रचारित कए, पारस्परिक विद्वेषक स्थितिके ँ बना के ँ राखब प्रशासन-तन्त्रा अपना लेल लाभप्रद बूझलक। एहि सभसँ सामाजिकताक गति अधेमुख भए गेल। सामाजिक मूल्यक विघटनक प्रक्रिया तीव्र भए गेल। प्रजातन्त्राीय शासन-व्यवस्थाक लाभसँ परिचित नेपालक जनता अपन देशक शासन-व्यवस्थामे अपना के ँ सहभागी अनुभव नहि कएलक। अपनहि घरमे अपनाके ँ असहाय पओलक। अपन अध्किारके ँ अत्यन्त सीमित भेल देखलक। ओहि पर अभिव्यक्तिक स्वतन्त्राता पर प्रतिबन्ध, लेखन-भाषण पर प्रतिबन्ध्, उठब-बैसब पर प्रतिबन्ध्, अर्थात् सभ प्रकारक प्रतिबन्ध्ति क्षेत्रामे राखल पीजरामे बन्द नेपालक जनमानस भोर-साँझ ‘राम नाम’ रटैत रहल। तिलकोराक लाल-लाल पफड़ देखि कौखन-कौखन पाँखि पफड़पफड़बैत रहल। नेपालमे मैथिली साहित्यक सर्जनाक सुदीर्घ परम्पराक अछैतो राणाशाहीक शासन-कालमे राजनीतिक उठा-पटक साहित्यिक सर्जनाक ड्डोतके ँ सोंखि लेने छल। लोकक ध्यान साहित्य आ’ कला पर कम रहलैक। मुदा, ओहि व्यवस्थाक समाप्ति पर साहित्य, संस्कृति आ’ कलाक विकासक दिस लोकक ध्यान गेल। जागरण आएल। जागरणक राजनीतिक कारण छल। राणाशाहीक समाप्ति पर, सम्भावित खतरासँ ‘हनुमानढ़ोका’क सुरक्षा लेल भारतीय सेनाके ँ रखबाक आनुबन्ध्कि व्यवस्था छलैक जे असुरक्षात्मक स्थितिक समाप्ति पर एक स्वतन्त्रा राष्ट्रक आत्मसम्मान लेल अखरए बाला छल। आर्थिक आ’ विकासात्मक योजनामे मदतिक लेल बनल ‘इण्डिया एड मिशन’क ‘इण्डिया को-आपरेशन मिशन’क रूपमे नामान्तर ओही पृष्टभूमिमे भेल छलैक। क्रान्तिक समय नेपालमे भारतीय नेताक प्रभाव छल। एहि संग हिन्दीक प्रभाव सेहो बढ़ल। ई प्रभाव बादमे नेपाली भाषा आ’ साहित्यके ँ आच्छ कएने जाइत छल। स्थानीय भाषा आ’ साहित्यक विकास प्रभावित भेल।8 । ई सूलपफाक टीस जकाँ पीड़ादायक छल। एही अवध्मिे नेपालक राजनीति पर देशक उत्तरी पाया पारक ;चीनकद्ध प्रभाव सुआदल गेल। उत्तरी पाया पारक बढ़ल प्रभाव तथा दक्षिणी पाया पारक ;भारतकद्ध प्रभावके ँ कम करबा लेल निर्दलीय पंचायती व्यवस्थामे ‘एक राष्ट्र एक भाषा’क सि(ान्तक आधर पर नेपालीके ँ राष्ट्रभाषाक रूपमे विकास करबाक निर्णय लेल गेल। हिन्दीक प्रभाव ओ प्रचारके ँ कम करबाक लेल स्थानीय भाषाक विकास पर ध्यान देव नेपाली शासन-तन्त्राक राजीनतिक विवशता भए गेलैक। राष्ट्रीय जनगणनामे मैथिली भाषी दोसर स्थान पर छलाह, ते ँ मैथिलीक विकास आ’ पठन-पाठनक बाट अनायास खूजि गेल। राजकीय सुदृष्टिसँ मैथिली संस्थाक संघटन आ’ पत्रा-पत्रिकाक प्रकाशन लेल मैथिली-भाषी प्रेरित भेलाह। हमरा जनैत ‘नेपालीय मैथिली’क प्रयोग ओही जागरणक परिचायक थिक। मैथिली पत्रा पत्रिकाक प्रकाशन भारतसँ हो अथवा नेपालसँ ग्रहण लगैत रहलैक अछि। तथापि जखन-जखन अपन भाषा-साहित्यक प्रति सचेत वर्ग आएल अछि, अपन जीवन्तताके ँ स्थापित करबा लेल पत्रा-पत्रिकाक प्रकाशन कएल अछि। एहि सक्रियताक पहिल उदाहरण थिक ‘नव-जागरण’ ;1957 ई.द्ध। ओकर बाद ‘पूफलपात’, ;1970द्ध ‘इजोत’ ;1972द्ध, ‘मैथिली’ ;1972द्ध, ‘अर्चना’ ;1974द्ध, ‘सनेस’ ;1984द्ध, ‘वाणी’ ;1984द्ध, ‘हिलकोर’ ;1986द्ध आदि प्रकाशित भेल। एहि पत्रिकाक माध्यमे नव-नव हस्ताक्षर समक्ष अबैत गेलाह। एहि पत्रिका सभमे ‘अर्चना’क प्रवेशांकमे प्रकाशनक उद्देश्यके ँ स्पष्ट करैत लिखल अछि- ‘एकर ;अर्चनाकद्ध प्रमुख उद्देश्य स्वस्थ साहित्यके ँ जन-समक्ष पहुँचाएब रहतैक।’ जेना ‘मिथिला मिहिर’क माध्यमसँ मैथिली साहित्यकारक कतेको पीढ़ी समक्ष आएल तथा अपन उत्कृष्ट रचनासँ मैथिली साहित्यक श्रीवृ(ि कएल अछि, ओहिना नेपालमे मैथिली साहित्यक सर्जनात्मक सक्रियताके ँ ‘अर्चना’ पुष्ट कएलक अछि। किन्तु ‘गामघरक’ प्रकाशन ध्रि राजतन्त्राीय व्यवस्था नेपालक जन-जीवनके ँ संत्रास्त कए देलक। ‘अर्चना’क प्रकाशनक उद्देश्य जतय साहित्यिक छल, ‘गामघरक’ ध्रि अबैत-अबैत ओही सम्पादकक पत्रिका प्रकाशनक उद्देश्य साहित्यिक पायाके ँ पर कए राजनीतिक क्षेत्रामे प्रवेश कए जाइत अछि। ‘गामघर’क प्रकाशनक उद्देश्य भए जाइछµ‘राष्ट्र, राजमुकुट एवं व्यवस्थाक प्रति वपफादार रहब।’ राष्ट्र आ’ राजमुकुटक प्रति कोनो पत्रिकाक वपफादारी करब तँ बुझबामे आबि सकैत अछि, मुदा व्यवस्थाक प्रति वपफादारीक निर्वाहक शपथ लेब रचनाकारके ँ सुविधाभोगी वर्गक पक्षध्रक पाँतीमे ठाढ़ कए दैत अछि। सन् 1947 ई. अथवा 2007 सालक किहु एम्हर-ओम्हर जनमल मैथिलीक कथाकार ने तँ परतन्त्राताक पीड़ा भोगने छथि आ ने स्वाध्ीनता लेल आत्मोसर्ग करैत राष्ट्रभक्तक विहुँसबे देखने छथि। ओ ने तँ राणाशाहीक क्रूर शासन-तन्त्रामे पीसाएल अछि आ’ ने प्रजातन्त्राीय अध्किारक प्राप्तिक लेल भेल उथल-पुथलक ध्ुक-ध्ुकी सुनने अछि। किन्तु, गत शताब्दीक आठम दशक ध्रि अबैत-अबैत देश-विदेशक स्थिति बुझबाक बोध् अवश्य भए गेल छलैक। अपन पूर्व पीढ़ीक संघर्ष-गाथा आ’ त्यागक अनुपातमे आशा-आकांक्षाक पूर्तिक समीक्षाक विवेक अवश्य अर्जित कए लेनें छल। राजनीतिक एवं प्रशासनिक भ्रष्टाचार तथा समाजक किछु व्यक्तिक हाथमे सत्ता आ’ सम्पत्तिक केन्द्रीकरणसँ बढ़ैत अभाव, भूख, रोग-शोक, आ’ महगीसँ त्रास्त जनसाधरणक स्थितिके ँ बूझय लागल। एहि प्रकारे ँ कोनो व्यवस्थाक विरोध्मे उध्वा उठेबा लेल जाहि-जाहि परिस्थितिक प्रयोजन होइत अछि, ओहिमे सँ अध्किांश नेपालक समाजमे विद्यमान छल। नवयुवक वर्गमे अपन अनुभूतिके ँ स्वर देबाक आतुरता सेहो छलैक। मुदा, अभिव्यक्तिक स्वतन्त्राता पर प्रतिबन्ध् एवं तदनुरूप राजनीतिक चेतनाक अभावसँ, राज्यादेश कतबो जनविरोध्ी हो, उल्लंघनक साहस कमले रहल। कहि सकैत दी, कोपभाजन बनि यातना पएबाक साहस नव युवक वर्ग नहि जुटा सकल छल । एहि प्रकारक प्रतिबन्ध्क स्थितिमे रचनात्मक अनुभूतिक अभिव्यक्ति दू टा बाट ध्ए लैत अछि - लोक विरोध्ी शासनादेशक विरोध्मे प्रतीकात्मक शैली अपनलाए लोकके ँ प्रेरित करब तथा अपन कारयित्राी प्रतिभाके ँ सर्वथा निरापद क्षेत्रा दिस मोड़ि देब। भारतमे आपात कालक समय जखन अभिव्यक्तिक स्वतन्त्राताक अपहरण भए गेल छलैक, कतेको साहित्यकार प्रतीकात्मक शैलीमे व्यवस्थाक विरोध् करैत रहलाह। किछु पत्रा-पत्रिका सम्पादकीयक स्थानके ँ रिक्त छोड़ि दैत छल। दोसरो स्थितिक पर्याप्त उदाहरण मैथिली साहित्यमे अछि। भारतक स्वतन्त्राता संग्रामक समय जखन राष्ट्रपिता महात्मा गाँधीक आह्नानक अनुगुंज गाम-गाममे सुनाइत छल, विभि भाषा साहित्यक गतिविध्सिँ नीक जकाँ परिचित मैथिलीक कतेको रचनाकार सासु-ननदि अथवा वैवाहिक समस्या दिस अपन लेखनीके ँ घूमा के ँ सर्वथा निरापद क्षेत्रामे रहैत छलाह। नेपालक मैथिली कथाकार अथवा हुनक रचना द्वितीय स्थितिमे अबैत अछि। एहि अवध्मिे एही तूरक भारतीय क्षेत्राक मैथिली कथाकारमे गड़ारके ँ ताकि-ताकि खण्डित करबाक प्रवृत्ति भेटैत अछि। मुदा राजनीति आ’ शासन-व्यवस्थाक भि पृष्ठभूमिक कारणे ँ नेपाली क्षेत्राक एही तूरक मैथिली कथाकारमे ओहि प्रवृत्तिक अभाव अछि। नेपालमे मैथिली कथा लेखनक प्रथम उदाहरण मानल जाइछ वासुदेव ठाकुरक ‘सप्तव्याध’। ओहो ‘पण्डित जीवनाथ झा स्कूलक’ रचनाकार छथि। एहि स्कूलक प्रवृत्ति शास्त्राीय विशेष छल, प्रगतिशील कम, ते ँ लसकि गेल। ‘डा. ध्ीरेन्द्रक स्कूल’ उर्जा सम्पन्न छल। अपन परिवेश आ’ युग-जीवनक प्रति संवेदनशील छल। अतः नव-नव रचनाकारक सक्रियता अभिव्यक्त होइत गेल। यद्यपि ध्ूमकेतुक अध्किांश कथा नेपालहिक प्रवासमे लिखाएल अछि। मुदा ओहिसँ नवयुवक वर्ग प्रभावित भए कथा लेखन दिस प्रवृत्त भेल तकर सम्भावना क्षीण अछि। डा. ध्ीरेन्द्रक कथा नेपालक जनजीवनके ँ समेटने अछि, ओतय ध्ूमकेतुक कथा मनुष्यक ओहि सत्यके ँ उद्घाटित कएल, जे एक क्षेत्रा आ’ भाषाक वस्तु नहि थिक। नेपालमे मैथिली कथाक विकासक क्रममे डा. ध्ीरेन्द्रक अवदानक प्रसंग रामभरोस कापड़ि ‘भ्रमर’क विचार तथ्यपूर्ण अछि जे साठि इस्बीक बाद नेपालीय मैथिली साहित्यमे आएल जड़ता टूटल आ’ ओ ;डा. ध्ीरेन्द्रद्ध नव रचनाकारक एकटा पैघ जमाति ठाढ़ कएलनि, प्रेरणा-उद्बोध्नक संग। मानव जीवनक वृहत्तर पफलकके ँ अपन कथाक विषय-वस्तु बनाए पात्राक जीवनसँ सोझे-सोझ जोड़ि ओकर व्यथा-कथाक जीवन्त प्रस्तुति डा. ध्ीरेन्द्रक कथाक विशेषता रहलनि अछि। ई एकटा गाइड लाइन भेलैक एतुक्का ;नेपालकद्ध कथाकार लोकनिक हेतु, जे आगाँ बढ़ि अपन रचनामे, माटि-पानिक गन्ध्के ँ लएबाक प्रयास कएलनि’।9 एहि प्रकारे ँ गत शताब्दीक सातम दशकक प्रारम्भेमे नेपालक धरती पर मैथिली कथाक बनल किआरी आठम दशक अबैत-अबैत चतरि गेल। कथाकारक नवतूरक बाट प्रशस्त भए गेलैक तथा अध्किांश पत्रा-पत्रिकाक प्रकाशन एही तूरक प्रयासे भेल अछि। नेपालमे लिखाएल मैथिली कथाक प्राप्तिक दू टा ड्डोत अछि। पहिल ड्डोत थिक भारत आ’ नेपालसँ प्रकाशित मैथिलीक पत्रा-पत्रिका। अध्किांश कथा, एही ड्डोतमे छिड़िआएल अछि। दोसर ड्डोत थिक संग्रह। दू टा संग्रहक प्रकाशन भेल अछि। ‘नेपालक प्रतिनिध् िगल्प-;सं-डा. ध्ीरेन्द्र,1981द्ध तथा ‘नेपालीय मैथिली गल्प’ ;स. सुरेन्द्र लाभ, 1989द्ध। पहिल संग्रह मे 17 टा तथा दोसर संग्रह मे 10 टा कथा संगृहीत अछि। एहि दूनू संग्रहमे डा. ध्ीरेन्द्रक अतिरिक्त राजेन्द्र किशोर, विजय, रामभद्र, रेवती रमण लाल, रामभरोस कापड़ि, ‘भ्रमर’, राजेन्द्र प्रसाद विमल, उपाध्याय भूषण, लोकेश्वर व्यथित, भुवनेश्वर पाथेय, महेनद्र मलंगिया, अयोध्यानाथ चौध्री, राम नारायण सुधकर, ब्रज किशोर ठाकुर, डा. अरुणा कुमार झा, जीतेन्द्र जीत, योगेन्द्र नेपाली, मीनाक्षी ठाकुर, कुबेर घिमिरे, आ’ सुरेन्द्र लाभक कथा संगृहीत अछि। एहि कथाकारमे सँ मात्रा रामभरोस कापड़ि ‘भ्रमर’ ;तोरा संगे जयबौ रे कुजबा, मैथिली अकादमी, पटनाद्ध तथा रेवती रमण लाल ;माध्व नहि अएला मधुपुरसँद्धक व्यक्तिगत संग्रह प्रकाशित अछि। शेष कथाकारक कथा पत्रा-पत्रिकामे छिड़िआएल अछि। एहिमे सँ अध्किांश कथाकारक प्रकाशित कथाक संख्या दू दर्जनसँ वेशी होएबाक सम्भावना नहि अंिछ। ओना महत्त्व छैक गुणात्मकताक, परंच कथाक संख्या कथाकारक सर्जनात्मक सक्रियताक निरन्तरताके ँ अवश्य द्योतित करैत विविध्ताक बाट प्रशस्त करैत अछि। साहित्यमे व्यापकता अनैत अछि। भाषाके ँ समृ( करैत विकासक चेतनाके ँ प्रखर करैत अछि। कथाक प्रवृत्ति: नेपालमे लिखाएल मैथिली कथामे राजनीतिक चेतनाक अभाव अछि। राजनीतिक दाव-पेंच आ’ ओहिसँ प्रभावित लोकक दयनीय स्थितिक चित्राण, ओहि स्थितिसँ उवरबाक अकुलाहटि अथवा अन्याय, अत्याचार, शोषण, प्रताड़ण आ’ अध्किारक हननक विरोध्क मानसिकताक कथा अपवाद स्वरूपहि भेटत। ‘ध्ध्कैत भविष्य’ ;राजेन्द्र प्रसाद विमलद्ध कथामे चुनाव प्रचारक स्थिति, जाति, र्ध्म आदिक आधर पर लोकके ँ बांटब, युग-युगसँ पीड़ित, अभावग्रस्तक एक जुट भए प्रतिपक्षीक रूपमे ठाढ़ होएब, आदि वर्णित अछि। किन्तु निर्णयक स्थितिसँ पूर्वहि ओहि वर्गक उर्जासम्प आ’ नेतृत्व प्रदान करबामे सक्षम नव युवकक हत्या कराए, ओकर पिताके ँ कीनि, सुविध सम्प वर्गक चुनाव जुलूसक नेतृत्व कराए देल जाइछ। अभावग्रस्त, भूखल आ’ नाघटक लेल पाइक महत्त्व निर्विवाद अछि। परंच, जाहि प्रकारे ँ शोषित-प्रताड़ित वर्गक एक नव युवकक हत्याक बदलामे पिताके ँ पुत्रा मृत्युक हर्जाना लेल मनाओल जाइत अछि, दलित-शोषितके ँ अध्किार प्राप्तिक चेतनासँ वंचित कए, शोषक, प्रताड़क आ’ सुविध सम्प वर्गक भीति-नीतिक परिचायक थिक। एकहि ठाम रहैत पानि पड़बाक गप्प कहबा लेल मालिकक आघन दौगि जाएब, मालिकक दरद थिक, माटिक दरद नहि ;‘माटिक दरद’-रामभरोस कापड़ि भ्रमर’द्ध अछि। ब्रज किशोर ठाकुरक कथा ‘घिना गेल लतामक गाछ’10 मे घराड़ी छल छप्र सँ हथिआ लेल जाइछ। मुदा, प्रतिकारक स्थान पर चारि गोट मनुष्यक एक गोट कापिफला गामसँ बाहर जा रहल छल। कोन ठेकान कतए, पाछाँ-पाछाँ चलैत एकटा छौंड़ा वेर-वेर उँचकि बाड़ीक लतामक गाछ दिस ताकए आ’ पफेर मुह घुमा लिअए। रतिचरक खाएल लतामके ँ दू टा नेना द्वारा उठा लेब, एहि पर रखबार द्वारा पीटल जाएब, प्रतिकारमे लतामक गाछ रोपब, पटाएब, लताम बाँटि आह्लादित होएब आदि स्थिति तथा मानसिकताक स्पष्ट चित्रा अछि। मुदा बच्चा बाबू द्वारा पफर्जी केवाला पर उपटि जाएब, बिना एको शब्द बजने गामसँ पलायन कए जाएब, संघर्षमयी चेतनाक अभावक परिचायक थिक। नेपालक शासन व्यवस्थामे जेना-जेना परिवर्तन आएल, मैथिली कथाक धरमे सेहो परिवर्तन होइत रहल। पंचायतक समय अभिव्यक्तिक स्वतन्त्राताक अभाव छलैक। परंच, बहुदलीय शासन व्यवस्थामे पूर्व जकाँ प्रशासनक आतंक नहि रहल। एकर अनुगुंज राम भरोस कापड़ि ‘भ्रमर’क कथा, कामरेड11 मे अछि। सुखिया बजैत अछि-‘सेहे, राणा कालमे जिमदार सभ हुकुम चलवै। वेगारी खटबै। पंचायतमे गिरहत सभ मनमानी करैत छल। बड़का ध्निक सभक राज चलै छल। आब तँ हमरा सभक युग अएलै है। आब तँ हमरो सबके बात के ँ मोजर देतै सब। तब एना कए बिना देखने-सुनले पीट देनाइ नीक बात ने भेलै।’ रामचन्द्र झाक कथा ‘चिनगी सुनगि रहल छौ’12 मे कथा नायकक कहब जे आँखि उठा कए नइ तकइ छल से सब मुह लागल बजै है-देशक राजनीतिक परिवेशमे आएल परिवर्तनक द्योतक थिक। नेपालक मैथिली कथामे समाज आ’ परिवारक विखण्डन प्रतिध्वनि अछि। शिक्षाक विकास, पाश्चात्य संस्कृति एवं सभ्यताक व्यक्तिवादी प्रवृत्तिक प्रति आकर्षण, गिरिवन, प्रान्तरक लोकक कष्ट आ’ अभावमय जीवनके ँछोड़ि, नगर-उपनगरक सुविधपूर्ण जीवनाकांक्षा एवं चकमक इजोतक लोभ, नेपालीय समाजमे युग-युगसँ प्रवाहित आत्मीयताक रसके ँ सोंखने जा रहल अछि। माए बापक बीच सम्बन्ध्, भाए भाएक बीच सम्बन्ध्, व्यक्ति आ’ समाजक बीच स्नेहिल सम्बन्ध्, पुरान वस्त्रा जकाँ मसकि रहल अछि। बढ़ैत सम्बन्ध्हीनता एक ओहन समाजक छवि प्रस्तुत करैत अछि, जतय माए-बापक समस्त आशा-आकांक्षा पुत्राक लेल कोनो मूल्य नहि रखैत अछि। व्यक्गित लाभक चिन्ताक समक्ष सामाजिक दायित्व-पालन निरर्थक भए जाइत अछि। जाहि घरमे ओ जन्म लैत अछि, जे समाज ओकर विकास आ’ शिक्षाक व्यवस्था करैत छैक, ओकरहि ओ खोभाड़13 कहि घृणा करैत अछि। रक्तक सम्बन्ध् शिथिल भए जाइत अछि। अपनहि गामघरमे परिचय हेरा जाइत छैक ;‘हेराएल परिचय’-सुरेन्द्र लाभ-नेपालीय मैथिली गल्पद्ध। गाम उजड़ि रहल अछि। गामक आत्मीय वातावरणसँ लोक शहरक स्पन्दनहीन सम्बन्ध्क बन्हनमे बान्हल रहबाक चेष्टा करैत अछि ‘छुट्टीक दिन’ ;रा. ना. सुधकरद्ध। माए-बाप साध्नहीन पुत्राक कर्तव्यपरायणताके ँ बिसरि दुराचारी छोट पुत्राक सुख समृ(िक प्रकाशमे ओकरहि असली श्रवण कुमार मानि लेत अछि। ;‘रामे छापक श्रवण कुमार’-विमलद्ध। एहि प्रकारे ँ नेपालक मैथिली कथामे ग्राम विमुखता, नगर-महानगरक प्रति आकर्षण, अर्थाश्रित सम्बन्ध्, व्यक्तिगत सुख-सुविधाक प्रति व्यामोह तथा समूहो मे एकसरूआ भए जाएब ;उधरक कथा’-गंगा प्रसाद अकेलाद्ध आदि स्थितिक अभिव्यक्ति होअए लागल अछि। नेपालक मैथिली कथामे मनुष्यक जैविक विवशताक अभिव्यक्ति भेटैत अछि। अन्य भाषा साहित्य जकाँ ओ र्ध्म-अर्ध्म, पाप-पुण्य, आचार-अनाचारक सीमाके ँ तोड़ि शु( जैविक विवशताक रूपमे अभिव्यक्त भेल अछि। अध्किांश कथामे अतृप्त पत्नी डेग उठबैत अछि। एहि दृष्टिसँ रा. ना. सुधकरक कथा ‘चान असोथकित अछि ;मिथिला सौरभद्ध, ‘नुकाचोरी’ ;मिथिला सौरभद्ध, ‘चिल्होरि उड़ि रहल अछि’14, ‘चोलियामे चोर बसै गोरी’15 ‘खुट्टी पर टाघल ब्रा’16 , रेवती रमण लालक कथा ‘कुहेसक बीच’ तथा ‘दरारि’, ‘भुवनेश्वर पाथेयक’ खाली क्षितिज’17, रामभरोस कापड़ि ‘भ्रमर’क ‘मनः स्थितिक दंश’ आदि। ‘मनः स्थितिक दंश’ मे ससुर पुत्राक रातुक ओवरटाइमक अवध्मिे बहुरियाक पफटकी खोलि प्रवेश करैत अछि तँ ‘खुट्टी पर टाघल ब्रा’ मे जैविक विवशता लम्पटताक सीमाध्रि बढ़ि गेल अछि। वेशी कथामे पत्नी पतिसँ चोरा कए अपन जैविक विवशताक तृप्तिक बाट तकैत अछि। ओतय ‘चान असोथकित अछि’ मे पति सब किछु जनितहुँ प्रतिवादक स्थितिमे नहि अछि। नेपालक मैथिली अध्किांश कथा स्त्राी-पुरुष सम्बन्ध्, विशेषतः दाम्पत्य जीवनक आधर पर अछि। ई दाम्पत्य जीवन शिक्षा, नागरिक जीवनक जटिलता आ’ नारी स्वावलम्बनसँ जीवनमे अबैत तनातनी आदि सँ अप्रभावित अछि। कहि सकैत छी एक पक्षीय अछि। पत्नी पतिसँ नाना प्रकारक यातना पबैत अछि, घरसँ निष्कासित भए अभाव आ’ अमर्यादक जीवन जीवा लेल वाध्य होइत अछि। नारी चरित्रामे प्रतिकारक हेतु आत्मबलक अभाव छैक। निराश आ’ असहाय भए आत्महत्या मात्रा उपाय बचैत छैक। नारी पात्राक एक दोसर वर्ग अछि। ओ महत्त्वाकांक्षी अछि। पतिक सीमित आयक सीमामे असहज भए अपन आचरण आ’ शब्द-वाणसँ पतिके ँ आहत करैत रहब अपन स्वभाव बना लैत अछि। ‘चोर’, ;राजेन्द्र किशोरद्ध, ‘मनःस्थितिक दंश’ ;भ्रमरद्ध, ‘चिल्होरि उड़ि रहल अछि’ ;रा.ना.सुधकरद्ध आदि एही मूलगोत्राक कथा थिक। पुफलिया ;बिरड़ो-भ्रमरद्ध निर्दोष अछि। आत्मसम्मानक समस्त प्रयास बेकार भए जाइत छैक। जखन बोल-भरोस आ’ सहानुभूतिक आवश्यकता छलैक, अत्याचारक घटना सुनि, पति शहर घूमि जाइत छैक। नेपालक समाजने नारीक होइत अवहेलना दिस संकेत करैत अछि कुवेर घिमिरेक कथा ‘बिनु हाटक बिक्री’। पुत्राीके ँ बेचव आ’ प्रतिकूल लोकक संग पंचायतक अनुमति लए विवाह कराए विदा करा देब, नेपाली समाजक एहि विकृतिक उद्घाटन एहि कथामे भेल अछि। माल जालक हाट बाजार लगैत अछि, मुदा बिना हाटक बेटी बेचब निश्चित रूपे ँ सामाजिक मूल्यक अवमूल्यनक परिचायक थिक। नेपालक मैथिलीक बड़ कम कथामे पत्नीक व्यक्तित्व गढ़ल गेल अछि। ओ कनिको लोभ-लाभ पर वंचकता पर आतुर भए जाएत। एकर अपवाद अछि जीतेन्द्र जीतक कथा ‘प्रश्नचिर्’िं18। मित्राक पत्नीक प्रति लोभित शैलेन्द्रके ँ मित्राक शिक्षिता पत्नी आत्मबोध् कराए दैत छनि। पतिक शारीरिक यातनाक प्रतिकार दोसर पत्नी शारीरिक स्तर पर करैत अछि ;‘दरुपिबा’-रेवती रमण लालद्ध। नेपालक मैथिली कथामे नारीक स्थान अत्यन्त गौण अछि। ओ अशिक्षिता अछि, श्रमक महत्त्वसँ अपरिचित अछि। यातना आ’ अत्याचार सहबा लेल वाध्य अछि। प्रेम नहि वंचलता छैक। तथापि एक आध् एहनो कथा अछि जाहिमे प्रेम-समर्पण परिवारक प्रति दायित्वबोध् आदि व्यक्त भेल अछि। एहि दृष्टिसँ रेवती रमण लालक ‘चतुर्थो’ ‘धेकराक मारि’, ‘माध्व नहि अएला मध्ुपुरसँ’, ‘भुवनेश्वर पाथेयक जीवन वृत्त’19 आ ‘पूफटल चूड़ी’ रा. ना. सुधकरक ‘सन्ध्’ि ;प्रभातद्ध, राजेश कुमार वर्माक ‘पागल माय’ ;प्रभात-2द्ध आदिक नामोल्लेख कएल जा सकैछ। नैहरसँ चीज-वस्तु नहि आएब, पर्याप्त विदाइ नहि भेटब आदिक कारणे ँ पुतहुक यातना तँ प्रायः समाजक सामान्य विषय भए गेल अछि। एकर आधर पर नारी उत्पीड़नक कतेको कथा लिखल गेल अछि। मुदा, सासुरमे जमायक उत्पीड़नक कथा अपवाद स्वरूपहि भेटत। एहि प्रकारक कथा थिक जीतेन्द्र जीतक ‘सासुर’20 विवाहमे कनियाँ लेल किछु नहि अनबाक कारण कन्या-पक्षक लोक द्वारा वरक उपेक्षा तथा व्यंग्यवाणसँ आहत भेला पर बनल मानसिकताक विलक्षण उपस्थापन ‘सासुर’ कथामे भेल अछि। कनियाँक माएक आक्रोशके ँ सहदैत दोसर स्त्राी बजैत अछिµ‘ठीके तँ कहै छथिन, हिनकर सब खर्च कएल व्यर्थे मे चल गेलनि। विवाहक दिनसँ ई वर एक्को टा विध्मिे किछुओ देलकै? ‘चतुर्थीक राति रूनियाक माए अपन नवविवाहिता बेटीके ँ पतिक निकट पठेबाक बदलामे अपन कोठलीमे बन्द कए लैछ तथा लांछित-अपमानित जमायक आँखिक नोरके ँ बिछोहक नोर मानि लेल जाइत अछि। व्यवस्थाक असामाजिक नीतिक प्रत्यक्ष विरोध् अथवा एहन वातावरणक निर्माण करब जाहिसँ जनमानस प्रशासनक विरोध्मे मानसिकता बना लेबा लेल तत्पर भए जाए, नेपालक मैथिली कथामे साधरणतया नहि भेटैत अछि। पुफलिया ;बिरड़ो, भ्रमरद्ध शान्ति व्यवस्थाक रक्षक थानासँ अपन रक्षाक अनुरोध् करैत अछि। परंच, ओतय तँ ओ औरा अरक्षित भए जाइत अछि। एहिसँ शासन-व्यवस्थाक प्रति आक्रोशक सुगबुगी होइत अछि, जे गुणात्मक आ’ सार्वजनिक भेला पर प्रभावी भए सकैत छल, मुदा देशक राजनीतिक परिदृश्य जे छलैक, से नहि होअए देलकैक। बदरी नारायण वर्माक कथा ‘सुनगैत गाम’ ;प्रभात-2द्ध मे बहुदलीय शासन व्यवस्थाक बाद युग-युगसँ प्रताड़ित वर्गमे आएल चेतनाक स्वर अछि। एहि क्रममे रा. ना. सुधकरक कथा ‘थकुचल मांसुक बुट्टी’ ;आंजुरद्ध नेपालमे एखन धरि प्रकाशित समस्त मैथिली कथासँ भि कथ्य वर्गक अछि। बहिनिक अपहरण आ’ हत्या तथा पिताक हत्या एक मेधवी आ’ निधर््न छात्राके ँ असहाय बना दैत अछि। ओ वर्तमान व्यवस्थामे अपना के ँ पूर्णतः अरक्षित आ’ आतंकित अनुभव करैत अछि। किन्तु, क्रमशः अपन असहायता पर विजय पाबि साहसक बटोर-सघोर करैत अछि। ओ एहि निर्णय पर पहुँचैत अछि जे वर्तमान अत्याचारी शासन-व्यवस्थाक अन्तक एकमात्रा उपाय थिक गुरिल्लावार। भ्रष्ट व्यवस्था, समाजक तथाकथित संभ्रान्त व्यक्तिक दुराचार, धन-सम्पत्तिक मदमे सभ किछु अपना अनुकूल बना लेबाक व्यूह-रचना आदि पर प्रायः प्रथमहि बेर अतेक मुक्तरूपे ँ प्रहार कएल गेल अछि। कथाकार द्वारा कथा-चयन आ प्राप्त सामग्रीक उपयोग रचनात्मक दृष्टि पर निर्भर करैत अछि। जतए ध्रि नेपालक मैथिली कथाकार द्वारा कथा-चयनक प्रश्न अछि कथाक विषय-वस्तु समाजक निम्न आ’ मध्यम निम्नवर्गक अछि। ओकर निधर््ना भूख पियास अछि। प्रशासनक दुष्चक्रमे पीसाआइत जीवन-यापन अछि। श्रमक पलायनसँ टुटैत सामाजिक-पारिवारिक जीवन अछि। शिक्षित-अशिक्षित नवयुवकक बेकारी बैसारीजन्य मानसिकता अछि। कथाक ई विषय-वस्तु आ’ चित्रित परिवेश नेपालक सामाजिक जीवनक बिम्ब प्रस्तुत करबामे सपफल प्रतीत होइत अछि। परंच, त्रासद राजनीतिक आ’ सामाजिक जीवनक बीचसँ निःसृत होइत संघर्षक जे वेगवती धर स्वतः पुफटि जएबाक चाही, ओहन स्थिति अथवा पात्राक सर्जना नहि भेल भेटैत अछि। अत्याचारी शासन-व्यवस्था, डेेग-डेग पर व्याप्त भ्रष्टाचार आ’ कुटिलताक विरोध्मे ठाढ़ होएबाक लेल मानसिकरूपे ँ तैआर करैत हो, ओहन वैचारिक संघर्ष कथाक अभाव अछि। नेपालक मैथिली कथाक एक सहज समानता अछि पात्राक कानब। जेना सभ समस्याक निदान नोरे हो। बात-बात पर कानब परिस्थितिक प्रति पात्राक भावुकता आ’ आत्मीयता अवश्य द्योतित करैत अछि। परंच, संघर्ष आ’ निर्भीकताक एहन भावुक स्थितिमे पिछड़ि जाइत अछि। सम्प्रति, समाज जाहि द्रुतगतिसँ बदलि रहल अछि, सामाजिक आ’ पारिवारिक मूल्यक अवमूल्यन जाहि गतिसँ भए रहल अछि, नोरके ँ पीबि संघर्ष लेल ठाढ़ होएब श्रेयस्कर अछि। नेपालसँ पत्रा-पत्रिकाक नियमित प्रकाशन आ’ बदलल राजनीतिक स्थितिक कारणे ँ नेपालक मैथिली कथाक प्रवृत्ति विभि दिशामे अभिव्यक्त भए रहल अछि। एहिसँ विषय-वस्तुमे व्यापकता आएल अछि। परिवेश, स्थिति, सामयिक घटना कथाक विषय वस्तु बनबाक हेतु कथाकारके ँ प्रेरित करैत अछि। देशक राजनीतिक परिस्थितिसँ समाजक सांस्कृतिक मानसिकतामे आएल अन्तर कथामे अछि। एहि तथ्यके ँ भारत आ’ नेपालक बीच किछु वर्ष पूर्व नियति आयतक ट्रांजिट बिन्दुक कारणे ँ भेल मतान्तरसँ दूनू देशक जनताके ँ दैनिक जीवनमे जे अपार कष्ट भेलैक ओहि पृष्ठभूमिमे रा. ना. सुधकर कथा ‘सन्ध्’ि अछि। माए बापक तनातनीसँ ध्ीया पूता प्रभावित होइत अछि आ’ पति, पत्नीमे मिलान होइतहि पारिवारिक जीवनमे महमही आबि जाइत छैक। सएह स्थिति सन्ध्कि बाद दूनू कातक लोकक भेलैक। कहबाक तात्पर्य जे विषय वस्तुक व्यापकता आ’ राजनीतिक व्यवस्थामे आएल परिवर्तनसँ नेपालक मैथिली कथामे प्रगतिशील ओ युग-जीवनसँ परिपूर्ण कथा दृष्टिक परिचय होइत अछि। निश्चित रूप ई शुभ लक्षण थिक। गगगग गगगग गगगग एहि शुभ संकेतक आकलन हम आइसँ लगभग दू दशक पहिने ;1992 ई.द्ध कएने छलहुँ। एहि दू दशकमे नेपालक राजनीतिक परिदृश्य पूर्णतः बदलि गेल। जनताक सम्मिलित आकांक्षाक समक्ष राजतन्त्रा इतिहासक वस्तु बनल। असल राजा भेल जनता। ओकरहि हाथमे अपन नेताक निर्वाचनक चयनक शक्ति अएलैक। जनताक आशा-आकांक्षाक अनुरूप देशक संविधन निर्माणक प्रक्रिया निर्णायक स्वरूप ग्रहण करबा पर अछि। अपन भाषा-साहित्य एवं संस्कृतिक संग अपन क्षेत्राक विकासक प्रति सतर्कता कतेको गुणा बढ़ि गेल अछि। समाजो पहिने सँ बेसी टुटल अछि। व्यक्तिवदिता बढ़ल अछि। गाम उजड़ल अछि। शहरमे जाए बसबाक आकांक्षा द्विगुणित भ्ेालैक अछि। संगहि, अपन सांस्कृतिक अस्मिताक रक्षाक प्रति सामान्य लोकक चेतना बलवती भेल अछि। एहि बलवती चेतनाक अभिव्यक्ति एलेक्ट्रोनिक आ’ प्रिन्ट- दूनू प्रकारक प्रचार माध्यमसँ भए रहल अछि। जनकपुरधममे मिथिला महोत्सवक नियमित आयोजन वा आने प्रकारक साहित्यिक - सांस्कृतिक कार्यक्रमक नियमित आयोजन - एही चेतनाक रूपान्तरण थिक। ‘नैमिकानन’, ‘सयपत्राी’ एवं ‘आघन’ सहित ‘विद्यापति टाइम्स’, ‘मिथिला डाट कम’ आदि पत्रा-पत्रिका एहि चेतनाक सबलता आ’ निरन्तरतामे पर्याप्त सहायक भेल अछि। एहि बीच कतेको उल्लेखनीय व्यक्तिगत कथा संग्रह, जेना, ‘ई हमरे कथा थिक’;डा. राजेन्द्र विमलद्ध, ‘कथा-यात्रा’;डा. सुरेन्द्र लाभद्ध, ‘हुगली उपर बहैत गंगा’;रामभरोस कापड़ि ‘भ्रमर’द्ध, ‘एकटा हेरायल सम्बोधन’;अयोध्यानाथ चौध्रीद्ध,;वृषेश चन्द्र लालद्ध आदि आएल अछि। ओहिना किछु संग्रह, जेना ‘कथायात्रा’ ;सम्पादक रमेश रंजन एवं अशोक दत्त - संकलित कथाकार- डा.राजेन्द्र विमल, डा.रेवती रमण लाल, अयोध्यानाथ चौध्री, डा.सुरेन्द्र लाभ, श्यामसुन्दर शशि, रमेश रंजन, ध्ीरेन्द्र प्रेमर्षि, जे. एन. जिज्ञासु, परमेश्वर कापड़ि, रामनारायण देव, रूपा ध्ीरू आ’ सुजीतकुमार झाद्ध तथा ‘नैमिकानन मैथिली कथा संग्रह’;सम्पादक डा.रेवती रमण लाल, संकलित कथाकार-सुन्दर झा शास्त्राी, डा.ध्ीरेन्द्र, राजेन्द्र किशोर, डा.राजेन्द्र विमल, डा.हरिश्चन्द्र झा, उपाध्याय भूषण, भुवनेश्वर पाथेय, बदरीनारायण वर्मा, अयोध्यानाथ चौध्री, रा.ना.सुधकर, जीतेन्द्र जीत, डा. सुरेन्द्र लाभ, जयनारायण झा ‘जिज्ञासु’, रमेश रंजन तथा ध्ीरेन्द्र प्रेमर्षिद्ध प्रकाशित भेल अछि। बहुतो कथाकारक रचना असंकलित अछि। नेपालमे राजतन्त्राक समयमे जे ‘मोगलान मिथिला’ कहाइत छल, से ‘दक्षिण मिथिला’ सम्बोध्ति होइत सुनलहुँ अछि। सम्पर्क - म् उंपस रू . तदरींतंउंद/ीवजउंपसण्बवउ . तदरींतंउंद/हउंपसण्बवउ सन्दर्भ: - 1. रामभरोस कापड़ि ‘भ्रमर’ ;सं.द्धआंजुर, वर्ष-1 अंक-3 2. रामभरोस कापड़ि ‘भ्रमर’;सं.द्ध, गामघर,जनकपुर 14 मार्च 1985 ई. 3. रामभरोस कापड़ि ‘भ्रमर’;सं.द्ध, गामघर, जनकपुर, 7 जून 1988 4. रामभरोस कापड़ि ‘भ्रमर’;सं.द्ध आंजुर, वर्ष-1 अंक-1,जनकपुर एवं भाखा, पटना 5. रामभरोस कापड़ि ‘भ्रमर’;सं.द्ध अर्चना’, अंक-5, तथा गामघर-6.12.1984 6. वैदेही विशेषांक, दरभंगा, 1989 7. घर बाहर, पटना, जुलाइ सितम्बर, 2010 8. कुमार अभिनदन -मैथिली भाषा, साहित्य सांस्कृतिक पच्चीस वर्ष, गामघर, पूस 2043 9. कापड़ि-नेपालक मैथिली कथामे माटि पानिक गन्ध्’-वैदेही विशेषांक, 1989 10. जनक, वर्ष-8, अंक-1, वैशाख 2047 11. पूर्वा×चल, नई दिल्ली, अंक-2, दिसम्बर 1991 12. मिथिला वाणी, आसिन 2050 13. खोभाड़’-सुरेन्द्र लाभ, मिथिला मिहिर, 28.1.1976 14. मिथिला मिहिर. 11.12.1979 15. माटिपानि 1984 16. माटि पानि,1984 17. सोनामाटि, नवम्बर-दिसम्बर, 1970 18. आंजुर, 2047 साल 19. वैदेही, दिसम्बर 1989 20. प्रभात-1, विराटनगर सितम्बर,1990 २ जगदीश प्रसाद मंडल, बेरमा, मधुबनी, विहार, ५ मई २०१० प्रकाशित-कथा संग्रह- गामक जीनगी, वाल प्रेरक कथा संग्रह- तरेगन।, नाट्क- मिथिलाक बेटी। उपन्यास- मौलाइल गाछक फूल, उत्थान-पतन, जिनगीक जीत, जीवन मरण, जीबन संघर्ष। मैथिली उपन्यास साहित्यमे ग्रामीण चित्रण साहित्यक आधार मनुष्यक जिनगी होइछ। मनुष्येक जिनगीक नींवपर भाषा साहित्य ठाढ़ आ सुदृढ़ बनैत अछि। जे मनुष्यकेँ जीवैक कला सिखबैत अछि। गद्य-साहित्यक विधामे उपन्यासो छी। जाहि नींवपर साहित्यक भवन ठाढ़ रहैत अछि ओ माटिक निच्चाँ दाबल रहैत अछि। जीवन परमात्माक सृष्टि छी तेँ अनन्त-अगम्य अछि। जहन कि साहित्य मनुष्यक सृष्टि होइत तँए सुबोध-सुगम आ मर्यादित होइत अछि। एहि जगतमे मनुष्य जे किछु सत्य आ सुन्दर पौलक आ पाबियो रहल अछि वहए साहित्य छी। ओना साहित्य समाजक दर्पण कहल जाइत अछि मुदा, मनुष्यक अएना आ प्राकृतिक अएनामे अन्तर अछि। प्राकृतिक अएना वस्तुक बाहरी रूप देखवैत जहन कि मनुष्यक अएनाकेँ दोहरी रूप होइत अछि। जाहिसँ बाहरी आ भीतरी दुनू रूप देखैत अछि। एहिठामक (मिथिलाक) चिन्तनधारामे, प्रचलित दार्शनिक चिन्तनधारासँ भिन्न किछु एहेन विशेषता सन्निहित अछि जे अपन अलग पहचान बनौने अछि। जाहि आधारपर साहित्यकेँ दीप (ज्योति) कहब अधिक उपयुक्त हएत। उच्च कोटिक साहित्यिक सृजन लेल यथार्थ आ आदर्शक समावेश आवश्यक अछि। जकरा आदर्शोन्मुख-यथार्थवाद कहल जा सकैछ। अगर यथार्थवाद आँखि खोलैत अछि तँ आदर्शवाद उठा कऽ मनोरम स्थानपर पहुँचबैत अछि। चरित्रकेँ उत्कृष्ट आ आदर्श बनेबा लेल जरूरी नहि जे ओ निरदोसे हुअए। एहि जटिल संसारमे, जाहिमे छोटसँ छोट आ पैघसँ पैघ समस्या लधलो अछि आ दिन प्रति दिन जन्मो लैत अछि। ताहिठाम निरदोस चित्रणक निर्माण कठिन अछि। महानसँ महान पुरूषमे किछु नहि किछु कमजोरी रहितहि छन्हि, जेकरा निखारब आगूक लेल महत्वपूर्ण अछि, तँए अनुचित नहि। वएह कमजोरीक सुधार मनुष्य बनवैत अछि। जे उपन्यासक मुख्य बन्दु छी। साहित्यक मुख्य अंग आदर्श छी जाहिसँ रचना कलाक पूर्ति होइत अछि। आदिकाले सँ आदिवासिक रूपमे पनपैत मिथिलाक समाज आइक विकसित समाजक सीढ़ी धरि पहुँचल अछि। जंगली जीवनसँ लऽ कऽ सुसभ्य जिनगी धरिक इतिहास मिथिलाक भूमिमे चंदनक गाछ सदृश्य दुनियाँक वातावरणमे अपन महमही बिलहैत रहल आ अखनो बिलहैक सामर्थ रखैत अछि। जे हमरा सबहक धरोहर छी तँए बचा कऽ राखब सभसँ पैघ दायित्व बनैत अछि। जिनगीक आवश्यकता आ उत्पादन करैक जते शक्ति छलनि ओहि अनुकूल जिनगी बना सामंजस्यसँ सभ मिलि-जुलि अखन धरि रहला अछि। आगू बढ़ाएव आइक आवश्यकता छी। जाहि समाजमे अखनो बरहवरना (बारह-वर्ण) भोज, बरहवरना बरियाती (विवाहमे) बरहवरना कठिआरीक (जिनगीक अंतिम क्रिया) चलैन अछि, कि ओहि समाजकेँ तोड़ि सासु-पुतोहू, पिता-पुत्रक संबंधकेँ माटिक बरतन जकाँ फोड़ि-फाड़ि िदअए। जाहि समाजक बीच सभ संग मिलि पावनि-तिहार, धार्मिक स्थानक निर्माण केलनि, िक ओकरा नेस्त-नाबूद कऽ दिअए? ओना मिथिलाक दुर्भाग्य कही आकि देशक दुर्भाग्य, साठि बर्ख पूर्वसँ लऽ कऽ हजारो बर्ख पूर्व धरि परतंत्र रहल। परतंत्रताक जिनगी केहन होइ छै, कहब जरूरी नहि। ओना जाहि रूपक विदेशी प्रभाव आन-आन क्षेत्रमे पड़ल ओहिसँ भिन्न मिथिलांचल प्रभावित भेल। अदौसँ अबैत वैदिक ढाँचामे सजल समाज अखनो धरि, एते दिनक गुलामीक उपरान्तो सजल अछि। मुदा भूमण्डलीकरणक प्रभाव जते तेजीसँ प्रभावित कऽ रहल अछि ओहिसँ बँचैक लेल गंभीर सोचक जरूरत अछि। जँ से नहि हएत तँ मिथिलाक बदसुरत दृश्य सामने नचए लगत। मिथिलाक संबंध जते पूरबी प्रान्त बंगाल (पछिम बंगाल सहित बंगलादेश) आसाम (मेघालय सहित आसाम) आ नेपालक तराइ इलाकासँ रहल ओते पछिमी आ दछिनी प्रान्तसँ नहि रहल। घनगर अबादी होइबला इलाका रहने मिथिलाक बोनिहार (श्रमिक) बोइन करए नेपाल, आसाम आ बंगाल जाइत रहल अछि। पटुआ काटब, धोअब आ धान रोपब-काटब मुख्य काज रहल। जाहिसँ संग-संग रहैक, खाइ-पीवैक, नचै-गबैक अवसर भेटल। कला-संस्कृतिमे मिश्रण भेल। जाहिसँ एक-दोसराक जिनगी मिलैत-जुलैत रहल अछि। आजुक संस्थागत शिक्षण व्यवस्थाक सदृश्य तँ संस्था कम छल मुदा पूर्वहिसँ गुरूकूल शिक्षण व्यवस्थाक चलैन आबि रहल छल। विदेशी शासकक संग भाषा-साहित्य सेहो आएल। सामाजिक व्यवस्थाक मजबूतीक चलैत ओ ओते तेजीसँ आगू नहि बढ़ि सकल जते तेजीसँ बढ़क चाहिऐक। ओना राज-काजमे अपन स्थान बना लेलक। जनसंख्याक (मिथिलाक) अनुपातमे पढ़ै-लिखैक व्यवस्था नगण्य छल। कारण छल अखुनका जकाँ ने पढ़ै-लिखैक एते साधन छल आ ने पढ़ैक आवश्यकता बुझैत छल जीवैक लूरि सीखि लेब प्रमुख्य छल। जे परिवार (माए-बाप) सँ भेटि जाइत छलैक। किछु एहनो काज (लूरि) छलैक जे समाजोसँ भेटैत छलैक। जाहिसँ स्पष्ट रूपे दू भागमे विभाजित छल। पढ़ल-लिखल लोकक समाज आ बिनु पढ़ल-लिखल उत्पादक समाज। मुदा समाज हुनके (पढ़ल-लिखल) सबहक देखाओल रास्तासँ चलैत रहल। पढ़ल-लिखल लोकक बीच संस्कृत आ बिनु पढ़ल-लिखल लोकक बीच अपन बोली (जे वादमे भाषा बनल) चलैत छल। नव-नव शब्दक जन्म सेहो होइत छल। वैदिक संस्कृत सेहो जनभाषाक नगीचे छल मुदा धीरे-धीरे परिनिष्ठित बनैत-बनैत दूर हटैत गेल। जाहिसँ विशाल जन-समूह संस्कृतसँ दूर भऽ गेल। जेकर प्रभाव जन-मानसक जीवनक अानो-आनो अंगपर पड़ल। कला-संस्कृतपर सेहो पड़ल। जाहिसँ लोक संस्कृत सेहो पनपल। संस्कृत समाजोन्मुखी नहि भऽ परिवारोन्मुखी हुअए लगल। समाजक बीच पालि (प्राकृत) भाषाक जन्म भेल। समाज-सुधारक आ धार्मिक सम्प्रदायिक जनमानसक बीच पालि भाषाक प्रयोग केलनि। एहि रूपे संस्कृतसँ पािल, अपभ्रंश होइत आगू मुँहे ससरल। अपभ्रंशसँ मागधी आ मागधीसँ बिहारी, उड़िया, बंग्ला आ असमिया भाषाक विकास भेल। बिहारी भाषाक अन्तर्गत भोजपुरी, मगही आ मैथिलीक विकास भेल। बिहारक मैिथली भाषा क्षेकसँ पछिम उत्तर-प्रदेशक पूवरिया भाग धरि भोजपुरी भाषा बढ़ल। दछिन बिहार (गंगासँ दछिन) मगही आ गंगासँ उत्तर नेपालक तराइ धरि मैथिलीक विकास भेल। ओना भाषाक संबंधमे कहल गेल अिछ जे- “चारि कोसपर पानी बदले आठ कोसपर बाणी।” बिहारक तीनू भाषा क्षेत्रक अन्तर्गत क्षेत्रीय बोली सेहो पनपैत रहल अछि। गंगा-ब्रह्मपुत्र मैदानक बीच बसल िबहार, बंगाल आ आसामक बीच माटि-पानि आ जलवायुक (किछु विषमता छोड़ि) समता सेहो अछि। समतल भूमि आ एकरंगाह जलवायु रहने खेती-पथारी, उपजा-बाड़ीमे सेहो समता अछि। धान सन प्रमुख अन्न तीनू राज्यक मुख्य उपज छी। एक रंगाह उपजा-बाड़ी आ खेतीक लूरिसँ खेतिहरक एकरंगाह जिनगी बनल। खान-पान, आचार-विचार चालि-ढालि, कला-संस्कृतमे एकरूपता आएल। मुदा प्राकृतिक प्रकोप आ व्यापारिक अनुकूल भेने बंगाल आ मिथिलाक दूरी बढ़ौलक। जाहिठाम मिथिला क्षेत्र पोखरिक पानि जकाँ असथिर (कहियो काल पैघ भूमकम आ अन्हर-तुफान होइत) बनल रहल ताहिठाम बंगाल प्राकृतिक प्रकोपसँ अधिक प्रभावित होइत रहल अछि। व्यापारिक अनुकूलता (समुद्री मार्गसँ) सँ वेदेशीक प्रभाव सेहो बढ़ल। कोनो भाषा-साहित्य ओहिठामक जिनगीसँ प्रभावित होइत। एहि दृष्टिसँ जेहन उर्वर भूमि बंगला साहित्यकेँ भेटल ओ मैथिलीकेँ नहि भेटल। विदेशी कला-संस्कृतक प्रभाव जते बंगालपर पड़ल ओते बिहारपर नहि पड़ल। ओना मिथिलांचलक प्राकृतिक प्रकोप आ विदेशी शासनसँ ओते प्रभावित नहि भेल जते बंगाल भेल। मुदा अनुकूल जलवायु रहने मिथिलांचलमे मनुष्यक बाढ़ि सभ दिनसँ रहल। जाहिसँ जनसंख्याक भार सभ दिन रहल। सामंतीक कुव्यवस्था आ जनसंख्याक भारसँ मिथिलांचल गरीबीक जालमे सभ दिन फँसल रहल। जाहिसँ कला साहित्य, संस्कृति सभ किछु प्रभावित होइत रहल। समाजक स्थितिकेँ आरो भयावह बनबैमे जातीय आ साम्प्रदायिक योगदान भरपूर रहल। टुकड़ी-टुकड़ीमे समाज विभाजित भऽ गेल। जेकर प्रभाव कला-संस्कृतपर सेहो नीक-नहाँति पड़ल अछि। अर्द्ध-मागधीसँ निकलल मैथिली तेरहवीं-चौदहवीं शताब्दीमे ज्योतिरीश्वर आ किछु पछाति विद्यापतिक रचनासँ प्रारंभ भेल। लोकक कंठ-कंठमे विद्यापति समाए अखनो गाबि रहला अछि। ओना विद्यापति संस्कृत भाषाक राजपंडित छलाह मुदा समाजक जनभाषा सेहो जनैत छलाह। जाहिसँ संस्कृत-मैथिलीक संग अवहट्ठ (जनभाषा)मे ‘कीर्तिलता आ कीर्तिपताका’ सेहो लिखि कहलनि- “सक्कय वाणी बहुअन भावय” उन्नैसवीं शताब्दीसँ पूर्व धरि साहित्य सृजन कवितेमे होइत आवि रहल छल। आने-आने भाषा जकाँ मैथिली गद्यक विकास सेहो पछाति भेल। साहित्य सृजन मूलत: गद्य आ पद्यमे होइत। गद्यक चरम उपन्यास छी तहिना पद्यक महाकाव्य। साहित्यक आने विधा जकाँ उपन्यासो छी। सामाजिक परिस्थितिक दृष्टिसँ मैथिली उपन्यासकेँ १९६०ई.सँ पूर्व आ साठिक पछातिकेँ दू भागमे विभाजित कए आगू बढ़ैत छी। साठिक विभाजन रेखाक पाछु देशक आजादी, ढहैत राजा-रजवाड़ आ भूमि-आन्दोलन प्रमुख कारण रहल अछि। साठि ईस्वीसँ पूर्व मैथिलीमे निम्न-लिखित उपन्यासक सृजन भऽ चुकल छल। ‘िनर्दयी सासु’ (१९१४), शशिकला (१९१५), पूर्ण विवाह (१९२६) दुरागमन रहस्य (१९४६), कलयुगी सन्यासी (१९२१) रामेश्वर (१९१५), सुमति (१९१८), मनुष्यक मोल (१९२४) चन्द्रग्रहन (१९३३) कन्यादान (१९३३), सोन्दयोपासनक पुरस्कार (१९३८), सुशीला (१९४३) असहाया जाया (१९४५), जैबार (१९४६) पारो (१९४६) नवतुरिया (१९५६), कुमार (१९४६), भलमानुस (१९४७), कला (१९४६), विकास (१९४६), चन्द्रकला (१९५०), प्रतिमा (१९५०), मधुश्रावनी (१९५६) वीरकन्या (१९५०), विदागरी (१९५०), अनलपथ (१९५४), विद्यापति (१९६०), कृष्णहत्या (१९५७), रत्नहार (१९५७), आन्दोलन (१९५८), दुर्वाक्षत (१९५८), आदिकथा (१९५८), चानोदय (१९५९), बिहाड़िपात-पाथर (१९६०), दुरागमन (१९४५), चामुन्डा (१९३३), मालती-माधव (१९३५) आजुक उपन्यास कलाक दृष्टिसँ भलेहीं उपरलिखित सभ उपन्यासकेँ सफले नहि कहब मुदा एहि बातसँ इनकारो करब जे ओहि उपन्यासकार सबहक संगे जेहन सामाजिक परिस्थिति छलनि ओहि अनुकूल नहि अछि। हमरा सभकेँ एहि बातक सदति ध्यान राखए पड़त जे मैथिली भाषा मिथिला भूमिसँ जन्म नेने अछि आ अखनो जीवित अछि। पुरान भाषा मैथिली रहितहुँ आइ धरि राजभाषाक रूपमे राज-दरवार नहि पहुँचल, जे अवसर आइ भेटल, ओ प्रमाणित करैत अछि जे हम जीवित भाषा छी। दुनियाँ अनेको एहेन राजभाषा अछि जे मिथिला क्षेत्र आ मैथिली भाषासँ छोट अछि। बीसवीं शताब्दीक पूर्वाद्धसँ आरंभ भेल उपन्यास साहित्य कखनो कुदैत तँ कखनो ठमकि-ठमकि चलि अखनो चलि रहल अछि। जे माटि-पानि बंगला, असामी आ उड़िया भाषा-साहित्यकेँ भेटिलै से मैथिलीकेँ नहि भेटि सकलै तँए जँ ओहि सभ साहित्यसँ पछुआएल तँ एहिमे आश्चर्य की? ओना साठिक दशकमे मिथिलो समाजमे मोड़ आएल मुदा साहित्य ठमकले रहि गेल। उपन्यास साहित्यक विषए-वस्तुमे बढ़ाेत्तरी अवश्य भेल मुदा जाहि रूपे होएवाक चाही से नहि भेल। जिनगीक मुख्य समस्या साहित्यक गौण रूपमे आ गौण समस्या मुख्य रूपमे बनल रहल। मुदा सौभाग्यक बात छी जे नव-नव उपन्यासकार मिथिलाक सर्वांगीण रूपकेँ दृष्टिमे राखि लिखि रहलाह अछि। ओना मिथिलाक जे वास्तविक रूप अछि ओ अत्यन्त दयनीय अछि। जाहि बीच रहि साहित्य सृजन अत्यन्त कष्टकर अछि। मुदा मिथिला तँ वएह धरती छी जाहिठाम एकसँ एक ऋृषि-मुनि साधना कए अपन दृष्टि देलनि जे दुनियाँक सभसँ ऊपर अछि। ग्रामीण चित्रण- ग्रामीण शब्दक दू अर्थ दू जगहपर होइत अछि। समग्र दृष्टिसँ ग्रामीण शब्दक अर्थ क्षेत्र-विशेषक सभ किछुसँ होइछ आ ग्रामीण परिधिमे (गामक सीमाक भीतर) ग्रामीण शब्द सिर्फ ग्राममे रहनिहार मनुष्यसँ होइछ। प्रश्न उठैत ग्राम संग ग्रामीण आकि अगबे ग्रामीण? ग्राम संग ग्रामीणक संबंध ओतबे नहि होइत जे हम अमुख ग्राम रहै छी। ग्राम ओहि रूपे ससरैत आगू बढ़ै जाहि रूपे दुनियाँ ससरि रहल अछि। जँ से नहि हएत तँ लोक भागि-पड़ा ओहिठाम पहुँचत जाहिठाम सुगमतासँ सुभ्यस्त जिनगी भेटितै। ग्रामक उत्पादित पूँजी माटि-पानि, गाछ-विरीछ, नदी-नाला इत्यादि मनुष्यक संग पूरैबला आर्थिक आधार छी। कोनो जुग अवौ आ जाओ, मनुष्यक जे मूल-समस्या अछि ओ अनवरत रहवे करत। भलेहीं उन्नति भेलापर सुगमता आओत, नहि भेलापर जटिलता आओत। आजुक समयक मांग अछि जे हमरा सबहक आर्थिक आधार ओहन बनए जे एक्कैसवीं शताव्दीक मनुष्य कहबैक अधिकारी बनी। अंतमे, जहिना पैघ गहवरमे सैकड़ो जगह पूजा ढारि गोसाँइ खेलल जाइत तहिना आइक समाजक मांग साहित्यक अछि। ३ शिव कुमार झा ‘टिल्लू’ मैथिली उपन्यास साहित्यमे दलित पात्रक चित्रण उपन्यास कोनो गद्य साहित्य रूपी व्यष्टिक आत्मा मानल जाइत अछि। मैथिली साहित्यमे लगभग सए वर्ख पूर्व धरि उपन्यास विधाक रचना लगभग शून्य छल। एहि कारण ओहि अवधि धरि मैथिलीकेँ पूर्ण साहित्यिक भाषा नहि मानल जाइत छल। जनसीदन जी एहि भाषा साहित्यक पहिल मान्य उपन्यासकार छथि। हिनक पाँच गोट उपन्यासक पश्चात् एखन धरि देसिल वयनामे साहित्यक समग्र विधाक चित्रण करैत बहुत रास उपन्यास पाठक धरि पहुँचल अछि। परंच एहि साहित्यक संग सभसँ पैघ बिडम्वना रहल जे पछातिक समाज जकरा सामाजिक शब्दमे दलित कहल जाइत अछि, ओकर महिमामंडनक गप्प तँ दूर प्राय: एहि साहित्यमे अकस्मात् अवांछित अभ्यागत्तक रूपमे क्षणप्रभा जकाँ कतहु-कतहु चर्चित अछि। दलित वर्ग तँ सामाजिक, सांस्कृतिक आ शैक्षणिक रूपेँ सम्पूर्ण आर्यावर्त्तमे पिछड़ल छथि, मुदा मिथिला-मैथिलीमे हिनक स्थानक विवेचन हिनका सबहक जाति जकाँ अछोप अछि। एकर प्रमुख कारण मिथिलामे धर्मसुधार आन्दोलन, विधवा विवाहक सकारात्मक दृष्टकोण प्राय: मृतप्राय रहि गेल। दार्शनिक उदयानाचार्य, भारती-मंडन, आयाचीक एहि भूमिपर सनातन संस्कृतिक पुनरूद्वार तँ भेल, मुदा एहि पुनरूद्वारपर आडंवर धर्मी व्यवस्थाक अमरतत्ती मूल संस्कृतिक विम्वकेँ सुखा देलक। समाजक साम्यवादी सोच भगजोगिनी बनि सवर्ण-दलितक मध्य भिन्न सामाजिक दशाक मध्य मात्र टिमटिमाइत रहल। एहि कारण सम्यक दृष्टिकोण रहितहुँ मैथिली भाषाक स्थापित रचनाकारक लेखनी व्यथित आ शोषित दलितक मर्मस्पर्शी जीवन गाथाकेँ प्रकाशित नहि कऽ सकल। कथा-कविता आ गल्पमे तँ दलितक चित्रण भेटैत अिछ, मुदा उपन्यासमे अत्यल्प। अपन व्यथाक विवेचन दलित वर्गक साहित्यकार सेहो नहि कऽ सकलाह, किएक तँ हिनक संख्या एखन धरि नगन्य अछि। संभवत: दलित रचनाकारक उपन्यास अपन वयनामे मैथिलीकेँ एखन धरि नहि भेटलनि। सभसँ जनप्रिय उपन्यासकार हरिमोहन झाक साहित्यमे दलित वर्ग अनुपस्थित जकाँ छथि। यात्रीक बलचनमा ओना एहि वर्ग दिस संकेत करैत अछि ओहिना जेना ललितक पृथ्वीपूत्र, धूमकेतुक मोड़ पर आ रमानंद रेणुक दूध-फूल। यात्रीक पारो आ नवतुरिया विषयक चयनक कारण दलित वर्ग दिस ध्यान नहि दऽ सकल। धीरेश्वर झा ‘धीरेन्द्र’क ‘कादो ओ कोयला’ छोट लोकक विरनीक कथा कहैत अछि तँ हुनकर ‘ठुमकि बहू कमला’मे दलित वर्गक संघर्षक कथा ठीठर आ रामकिसुनक माध्यमसँ कहल गेल अछि। मणिपद्ममक उपन्यासक राजा सहलेस दलित दुसाधक नायक सहलेसक कथा कहैत अछि तँ ‘लोरिक विजय’ उपन्यासक नायक तँ यादव छथि मुदा हुनका मित्र वर्गमे बंठा चमार, वारू पासवान, राजल धोबी, ई सभ दलित वर्गक छथि- लोरिकक किछु विरोधी सेहो दलित वर्गक शासक छथि- मोचलि- गजभीमलि, हरवा आदि बंठाक संहार परिस्थितिवश करैत छथि आ ताहिसँ लोरिक विजयमे दलित कथाक ढेर रास प्रसंग आएल अछि। नैका बनिजारामे सेहो नैकाक पत्नी फुलेश्वरीकेँ किनवाक वर्णन अछि। हुनकर फुटपाथ भिखमंगा सबहक कथा कहैत अछि तँ लिलीरेक पटाक्षेप भूमिहीनक नक्सलवाड़ी आन्दोलनक कथा कहैत अछि। आधुनिक कालक प्रसिद्ध उपन्यासकार विद्यानाथ झा ‘विदित’जी एहि विषयपर अपन लेखनीकेँ कोशीक भदैया धार जकाँ झमाड़ि कऽ प्रयोग कएलनि। ओना तँ विदित जी एखन धरि आठ-नौ गोट उपन्यासक रचना कएलनि अछि, परंच हिनक तीन गोट उपन्यासमे दलितक दशाक चित्रण मैथिली साहित्यक लेल अपूर्व निधि मानल जा सकैछ। हिनक विप्लवी बेसराक कथामे आदिवासीक कथा धौना, टेकू सुफल, बांसुरी, मोहरीलाल, गौरी, मारसक संग सफलता पूर्वक कहल गेल अछि। ‘कौसिलिया’ उपन्यासमे तँ फुलिया चमैनक पात्रताक चित्रण अनुपमेय अछि। विदित जीक तेसर उपन्यास ‘मानव कल्प’मे मिथिला, अंग आ झारखंडक ऑचरमे बसल लगभग सम्पूर्ण दलित समाजक विवेचन कएल गेल। ओना तँ श्रीमती शेफालिका वर्मा जी मानव धर्मी रचनाकार छथि। हिनक समग्र साहित्यिक कृतिमे ‘जाति’ शब्द भूमंडलीकृत अछि। ‘नाग फांस’ उपन्यासमे जातिवादी व्यवस्थासँ शेफालिका जी बचबाक प्रयास कएलनि, परंच एहि उपन्यासक एकटा पात्र आकाशक पत्नी तरंगक प्रकृतिसँ बुझना जाइत अछि, जे ओ दलित छथि। कहबाक लेल तँ सभ साहित्यकार अपनाकेँ साम्यवादी कहैत छथि मुदा साम्यवादी जीवन शैलीक जौं चर्च कएल जाए तँ संभवत: मैथिलीक सर्वकालीन साहित्यमे ध्रुवताराक स्थान श्री जगदीश प्रसाद मंडल जीकेँ भेटबाक चाही। हिनक सभ उपन्यास (मौलाइल गाछक फूल, जिनगीक जीत, जीवन-मरण, जीवन-संघर्ष, उत्थान-पतन)मे दलितक चित्रण अनायास भेटि जाइत अछि। लिखवाक शैली ओ विम्वक चयन ततेक पारदर्शी जे सवर्ण- दलितक मध्य कोनो खाधि नहि। सम्पूर्ण समाजमे सकारात्मक तारतम्य स्थापित करवाक जगदीश जीक स्वप्न मात्र उपन्यासमे नहि रहत, एहिसँ मिथिलाक समाजिक परिस्थितिमे भविष्यमे ‘सर्वे भवन्तु सुखिन:....। सिद्धान्तक स्थापना अवश्य हएत। हिनक अविरल मर्मस्पर्शी आ प्रयोगधर्मी कृति ‘मौलाइल गाछक फूल’मे दलित समाजक महादलित मुसहर जातिक रोगही, बेंगवा, कबुतरीक मनोदशा आ नित्यकर्मसँ समाजमे शांतिक ज्योति जगएबाक कल्पना अनमोल अछि। दड़िभंगाक प्लेटफार्मपर सँ भंगी डोमक मानवीय भावनाक मारीचिका एकठॉ भक्क दऽ उगि जाइत अछि। भजुआ, झोलिया आ कुसेसरी सभ सेहो डोम जातिक छथि जिनकर सहायता सम्यक सोचबला ब्राह्मण रमाकान्त जी करैत छथि। एहि कृतिक सभसँ अजगुत पात्र छथि रमाकान्त जी। हिनक छोट पुत्र कालक डाँगसँ अधमरू वनिता सुजाता जे धोविन छथि तिनकासँ विवाह कऽ लैत छथि। विवाहे टा नहि विवाहसँ शिक्षा ग्रहन करवाक लेल प्रेरणा आ अर्थ सेहो सुजाताकेँ भेटलनि जाहिसँ ओ डाॅ. सुजाता बनि गेली। गाममे रहनिहार आ अपन मातृभूमिक प्रति असीम श्रद्धा रखनिहार रमाकान्त बाबूकेँ अपन पुत्र महेन्द्रक एहि निर्णएसँ कोनो पीड़ा नहि भेलनि। हिनक सम्पूर्ण परिवार एहि निर्णएकेँ सहृदय स्वीकार कऽ लेलकनि। जगदीश बाबूक दोसर उपन्यास ‘जीवन-मरण’मे हेलन-गुदरी डोम दम्पतिक चर्च कएल गेल अछि। जीबछ, छीतन, रंगलाल चमार जातिसँ सम्बन्ध रखैत छथि। जिनगीक जीत उपन्यासमे पलहनिक नेपथ्यक पात्रता दर्शित अछि। गजेन्द्र ठाकुरक ‘सहस्त्रबाढ़नि’मे दम्माक जड़ी एकटा आदिवासी द्वारा आनव आ िकछु वर्ख वाद ओ जड़ी जंगलमे नै भेटब वोन कम होएवा दिस संकेत करैत अछि तँ हुनकर ‘सहस्त्रशीर्षा’ मिथिलाक लगभग सभ दलित जातिक विष्तृत विवेचना करैत अछि। तीनटा घरक रहलोपर धोविया टोली एकटा टोल बनि गेल अछि। झंझारपुर धरि मारवाड़ीक कपड़ा एतए साफ कएल जाइत अछि। महिसवार ब्रह्मण सभ जे बरियातीमे बेलवटम झाड़ि कऽ सीटि-सीटि कऽ निकलैत छथि से कोनो अपन कपड़ा पहिरि कऽ। बैह मंगनिया कपड़ा, महगौआ मारवाड़ी सभक। मारवाड़ी सभक ई कपड़ा रजक भाय दू दिन लेल भाड़ापर हिनका सभकेँ दैत छथिन्ह। कोरैल बुधन आ डोमी साफी, धोवि। डोमी साफी आब डोमी दास छथि, कारण कबीरपंथी जोतै छथि। फेर एकटा आर टोल, चमरटोली अछि। चमार- मुखदेब राम आ कपिलदेव राम। पहिने गामसँ बाहर रहए, बसबिट्टीक बाद। मुदा आब तँ सभ बाॅस काटि कऽ उपटाए देने अछि आ लोकक वसोबास बढ़ैत-बढ़ैत एहि चमरटोली धरि आबि गेल अछि। घरहट आ ईंटा-पजेबा सभ अगल-बगलमे खसिते रहैत अछि। ढोलहो देबासँ लऽ कऽ सिंगा बजेबा धरिमे हिनकर सबहक सहयोग अपेक्षित। गाए-माल मरलाक बाद जा धरि ई सभ उठा कऽ नहि लऽ जाइत छथि लोकक घरमे छुतका लागले रहैत अछि। भोला पासवान आ मुकेश पासवान, दुसाध। गेना हजारीक निचुलका खाड़ीक संबंधी। वएह गेना हजारी जे कुशेश्वर स्थानमे एकटा कुशपर गाए द्वरा आबि कऽ दूध दैत देखने रहथि तँ ओहि स्थानकेँ कोड़ए लगलाह, महादेव नीचाँ होइत गेलाह, सीतापुत्र कुश द्वारा स्थापित ई महादेव गेना हजारीक ताकल। मुकेश पासवानक बेटी मालती बैंक अधिकारी छथिन्ह आ जमाए मथुरानंद डी.पी.एस. स्कूलक प्रचार्य छथि, वसंत-कुंज लग फार्म हाउसमे रहै जाइ छथि। भोला पासवान आ मुकेश पासवान गामेमे रहै जाइ छथि। 1967ई.क अकालमे जखन सभटा पोखरि, गड़खै सुखा गेल मुदा डकही पोखरि नहि सुखाएल प्रधानमंत्री आएल रहथि तँ हुनका देखेने रहन्हि सभ जे कोना एतए सँ बिसॉढ़ कोड़ि कऽ मुसहर सभ खाइत छथि। चर्मकार मुखदेव रामक बेटा उमेश सेहो ओहि मुक्ताकाश सैलूनक बगलमे अपन असला-खसला खसा लेने अछि, रहैए मुदा किशनगढ़मे। चप्पल, जुताक मरो-म्मतिक अलावे तालाक डुप्लीकेट चाभी बनेबाक हुनर सेहो सीखि लेने अछि। कुंजी अछि तँ ओकर डुप्लीकेट पंद्रह टाकामे। कुंजी हेरा गेल अछि तँ तकर डुप्लीकेट सए टाकामे। आ जे घर लऽ जएवन्हि तँ तकर फीस दू सए टाका अतिरिक्त। मुसहर बिचकुन सदायक बेटा रघुवीर ड्राइवरी सीखि लेने अछि। वसंत कुंजक एकटा व्यवसायीक ओहिठाम ड्राइवरी करैए आ रहैत अछि किसनगढ़मे। डोमटोलीक बौधा मल्लिक बेटा श्रीमंत सेक्टरक मेन्टेन्सक ठेका लेने छथि। हुनका लग दू सए गोटे छन्हि जे सभ क्वार्टरक कूड़ा सभ दिन भोरमे उठेवाक संग रोड आ पार्किगक भोरे-भोर सफाइ करै छथि। एहिमे सँ किछु गोटे विशेष कऽ नेपालक भोरे-भोर लोकक शीसा महिनवारी दू सए टाकामे पोछै छथि आ अखबारक हॉकर बनल छथि। रहै छथि किशनगढ़मे मुदा अपन मकानमे- मुसहर बिचकुन सदाय। दलित संस्कृतिक प्रति उदासीनताक मुख्य कारण अछि समाजमे पसरल छूति व्यवस्था। ओना तँ एहि प्रकारक अवस्था प्राय: सम्पूर्ण आर्यावर्त्तमे रहल अछि, परंच आन ठामक जनभाषासँ दोसर धर्मक लोकक हृदयगत स्पर्शक कारण दलित संस्कारक चित्रण आन भाषामे मैथिलीसँ वेसी भेटैत अछि। मिथिलामे तँ इस्लाम धर्मी छथि, परंच मातृभाषा मैथिली रहलाक वादो हुनका सबहक मध्य साहित्यक सृजनशीलता उदासीन रहल। एकरा मैथिलीक दुर्भाग्य मानल जा सकैत अछि जे एखन धरि एहि भाषामे दलित वर्गसँ उपजल साहित्यकार उपन्यास नहि लिखि सकलनि। प्राय: यएह स्थिति इस्लाम धर्मी साहित्यकारक संग सेहो अछि। फजलुर रहमान हासमी, मंजर सुलेमान सन साहित्यकार तँ मैथिलीकेँ आत्मसात कएलनि परंच उपन्यासकार नहि बनि सकलाहेँ। ई लिखबाक तात्पर्य जे इस्लाममे जातिवादी व्यवस्था सनातन सांस्कृतिक अपेक्षाकृत न्यून अछि। दलित वर्गक संख्या मिथिलामे लगभग आठ आना अछि, संपूर्ण समाजक मातृभाषा मैथिली, मुदा शिक्षा-चेतनाक अभावक कारण एहि वर्गमे मैथिली साहित्यक प्रति सृजनात्मक दृष्टिकोण नहि पनपि सकल। आगॉक जातिमे सम्यक् िवचारक अभाव रहल अछि, किछु साहित्यकार एहि परिधिसँ तँ बाहर छथि परंच वर्गक बीचक खाधि लक्ष्मण रेखा बनि हुनको सभमे जनभाषा वाचकक प्रति सिनेह नहि आबए देलक। संभवत: मैथिली आर्यभाषा समूहक पहिल जनभाषा थिक जकरापर जातिवादी कलंक लागल अछि। संस्कृतक संग यएह विडंवना रहल परंच ओ कहिओ जनभाषा नहि रहल। जखन कि मैथिली वर्तमान कालमे सवर्णसँ बेसी दलित-पछातिक मातृभाषा अछि। पलायन तँ सभ जाति समूहमे भऽ रहल अछि परंच मजदूरी केनिहार दलित प्रवासमे सेहो मैथिलीकेँ आत्मसात कएने छथि। एकर विपरीत मिथिलामे रहनिहार सवर्ण परिवारक आधुनिक पिरहीक नेना वर्गमे मातृभाषाक स्थान हिन्दी लऽ रहल अछि। ‘ज्योतिक-कोखि अन्हार’ जकाँ मातृभाषाक वास्तविक संरक्षकक विवेचन एहि साहित्यक उन्नयनक नहि कऽ रहल छथि। उतर विहारक बेस रास स्थानमे पसरल मैथिली तँ कखनो-कखनो मात्र मधुबनी दड़िभंगाक मातृभाषा प्रमाणित कएल जाइत अछि। रचनाकारक दृष्टिकोण रचनामे किछु आर आ वास्तविक जीवनमे किछु आर रहल। साम्यवादी व्यवस्थापर सियाहीक प्रयोग केनिहार उपन्यासकारमे वास्तविकता जौं रूढ़िवादी रहत तँ सम्यक समाजक कल्पनो करब असंभव। व्यथा वएह बूझि सकैत अछि जकरामे जीवन्त अविरल हृदय हो वा स्वयं व्यथित हुअए। निष्कर्षत: आशक संग-संग विश्वास अछि जे वर्तमान युगक साहित्यकार समाजक कात लागल वर्गक प्रति सिनेही बनि मैथिली साहित्यकेँ गरिमामयी बनाबथु। पूर्वाग्रहकेँ अनुगृहीत करबाक पश्चात एहेन कल्पना-वास्तविक भऽ सकैत अछि। जौं अपमानित अछोपकेँ सम्मानित कएल जाए तँ मिथिला पुनि ओहि मिथिलामे परिणत भऽ सकैत अछि जतए राजा जनक परिवार, समाज आ राज्यहितमे धर्मक पालनक हेतु राजासँ हरबाह बनि गेलनि। गाम,पोस्ट- करियन भाया- इलमासपुर जिला- समस्तीपुर रमाकान्त राय ‘रमा’ नव गीतक पुरोधा : महाकवि प्रवासी महाकवि मार्कण्डेय प्रवासी (01-07-1942—13-06-2010) पछिला शताब्दीक सातम दशकक प्राय: दोसर-तेसर वर्षसँ साहित्य जगतमे प्रवेश कएलनि। पहिने ओ राष्ट्रभाषा हिन्दीमे लिखैत छलाह। वादमे मातृभाषा मैथिली दिस उन्मुख भेलाह। हुनक प्रकाशित पहिल काव्य ग्रंथ ‘शंखध्वनि’ हिन्दीए कविताक संकलन अछि। जखन ओ आजीविका हेतु पटनासँ प्रकाशित सुप्रतिष्ठित दैनिक पत्र ‘आर्यावर्त’मे उपसंपादकक रूपमे सुव्यवस्थित भऽ गेलाह, तखन हुनक लेखनमे गत्वरता आ प्रौढ़ता आएल। स्फुट रचनाक अतिरिक्त ओ मैथिली अकादेमी, द्वारा देल गेल अनुबंधक अनुरूप अत्यल्प अवधिमे ‘अगस्त्यायनी’ महाकाव्य लिखि अपन अप्रतिम-प्रतिभाक प्रदर्शन कएने छलाह। महाकाव्यक लेखन लेल प्रौढ़ावस्था आ अधिक समएक अपेक्षा होइत छैक, जखन लोक जीवन उतार-चढ़ाव, हानि-लाभ, अिहत-हित, शभु-मित्र इत्यादिक संग-संग दुनियादारीक सभटा अनुभव प्राप्त कऽ चुकल रहैत अछि। मुदा प्रवासी जी मात्र 36-37क अल्प वएसमे ‘अगस्त्यायनी’ लिखि कऽ एकटा नव मान दण्ड स्थापित कएलनि जे एखन धरि विरले कोनो भाषामे भेल होएत! कालान्तरमे ई महाकाव्य भारतक राष्ट्रीय साहित्यिक संस्था साहित्य अकादेमी, नई दिल्लीसँ 1981ई.मे पुरस्कृत भेल। एहूठाम हिनक संग एकटा अजगूत भेल। साहित्य अकादेमी द्वारा बाइसटा भारतीय भाषाक सर्वश्रेष्ठ रचनाकेँ पुरस्कृत कएल जाइत अछि। सन् 1981ई.धरि अकादेमीक इतिहासमे प्रवासीजी पहिल पुरस्कृत साहित्यकार छलाह जे मात्र 39वर्षक अवस्थामे ई सम्मान प्राप्त कएने छलाह। प्रवासी जीमे अप्रतिम प्रतिभा छलनि। ओ गद्य, पद्य, कथा एवं निबंध सभ विधापर अपन लेखनीक तीर चलौलनि आ लक्ष्य बेधि कऽ लोककेँ चमत्कृत करैत रहलाह। ओ अभियान शीर्षक उपन्यास लिखलनि जे धारावाहिक रूपेँ साप्ताहिक ‘मिथिला मिहिर’मे छपलनि। एहि उपन्यासमे वर्तमान कालक देश आ राज्यक ज्वलंच समस्या भ्रष्टाचारकेँ जाहि कुशलताक संग उठा कऽ ओकर सर्वमान्य समाधान कएलनि अछि ओ उल्लेखनीय तँ अछिए, क्षण-प्रतिक्षण बदलैत परिवेशमे एहि प्रकारक रचनाक महत्व सेहो असंदिग्ध रूपेँ सिद्ध कएलनि। ‘हम कालिदास’ हुनक उत्तम पुरूषमे लिखल एकटा महत्वपूर्ण उपन्यास अछि इहो उपन्यास धारावाहिक रूपेँ ‘मिथिला मिहिर’मे छपल छलनि। एकटा महाकवि अपन अतिवृद्ध अग्रजक मन: स्थितिक नीक जकाँ अङेजि कऽ ओकर शब्दमे बान्हि जे मूर्तरूप देने छथि से तँ अछिए, मुदा एहि मध्यक समए-साल, स्थिति-परिस्थिति, शासन-प्रशासन, प्रकृति-पुरूष, रीति-रेवाज आदिक जे एकटा पैघ अंतराल प्रवासीजी आ कालिदासक मध्य रहल अछि, एकरा ओ जाहि मनोयोगसँ सूक्ष्मसँ अतिसूक्ष्म अनुभूतिक माध्यमे अभिव्यक्त कएने छथि जे लोककेँ दुनू महाकविक मध्य एहन कोनो अंतराल दृष्ट्रिगोचर नहि भऽ पबैछ। ओ दैनिक ‘आर्यावर्त’मे बहुत दिन धरि ‘चुटकुलानन्दजी की चिट्ठी’ आलेखमाला लिखलनि जे अत्यन्त लोक प्रिय होइत छल। हास्य-व्यंग्य प्रधान एहि आलेखक मध्यसँ ओ देश-विदेशक विभिन्न समस्यापर जे प्रहार करैत छलाह से पाठकक मोन-प्राणकेँ आह्लादित कऽ दैत छल। महाकवि मार्कण्डेय प्रवासीक अन्तिम प्रकाशित पुस्तक थिक- ‘हम भेँटब’ एकर प्रकाशन आइसँ 5-6वर्ष पूर्व 2004ई.मे भेल छल ‘अगस्त्यायनी’ आ एहि काव्य पोथीक प्रकाशन मध्य प्राय: 20-22वर्षक अवधिमे प्रवासीजी प्रणीत प्रमुख गीतमे ‘अगस्त्यायनी’ जकाँ जीवन अनुभूव सत्यक नीक जकाँ आरेखन भेल अछि। आ किएेक ने होऊक? प्रवासीजीक सन्यासी मन अपन रचना सभकेँ एकठाम लिपिबद्ध करब तथा उतारि कऽ सुरक्षित रखब सेहो छोड़ि देलक आ एकटा कठिन प्रयोग करैत रहल जे हमर कृति अपन सामर्थ्यक बलपर जीबैछ की अकाल मृत्युक शिकार भऽ जाइछ। (हम भेटब : भूमिका पृ.7) कोनो नव कवि, कलाकार जड़ि पकड़बा, स्थापित होएबासँ किछु पूर्व इतस्तत: करैत छथि। प्रवासीजी सेहो एकर अपवाद नहि छलाह। ओ किछु दिन धरि ‘तदर्थवाद’क कविक रूपमे अपनाक स्थापित करबाक प्रयत्न अवश्य कएने छलाह, मुदा अंतत: ओ अपनाकेँ गीतकार, नव गीतकारक रूपमे सुस्थापित कएलनि- ‘मिथिलामे आइयो कविक अर्थे होइछ गीतकार।’ (तभैव) एतबे नहि, ओ तँ कहैत छथि- ‘गीतेटा भारतीय काव्यक मूल प्रवृत्ति अछि। गीतक साफ अर्थ होइछ गेय कविता। अर्थात् श्रुित स्मृति योग्य कविता किंवा ऋचा। (तभैव) महाकवि प्रवासी जीक अपन एकटा आर नव आ मौलिक मान्यता छलनि। जे अरबी-फारसी उर्दूक गजलपर विद्यापतिक गीतक स्पष्ट प्रभाव परिलक्षित होइत अछि। हुनक दृढ़ विश्वास छलनि जे ‘ओ दिन शीघ्रे अयबाक चाही जहि या कोनो विश्वविद्यालयक मैथिली विभाव अरबी-फारसी-उर्दूक गजल छन्दपर विद्यापतिक गीतक प्रभाव विषयपर शोधकार्य पी.एच.डी. अथवा डी.लिट् केर उपाधिहेतु कराओत। (तभैव) प्रवासीजी सतत गीत काव्यक उन्नयन-संवर्द्धन हेतु तत्पर रहलाह अछि। ओ अपन महाकाव्य ‘अगस्त्यायनी’मे सेहो गीतकाव्यक मर्यादा सतत रक्षा कएलनि अछि। प्रवासी जीक गीत सभमे जीवनक विभिन्न आयामक एकटा नव रूप, नव छवि-छटा भेटैत अछि। जतऽ फूलक रूप-लावण्य सम्पूर्ण दुनियाँकेँ मोहित -आकर्षित- एवं मदमत्त करैत अछि ओतहिं ओ काँटोक चुभनमे पुष्प सुरभिक अनुभव करैत छथि- ‘सभठाँ छै कांट, खजूरबन्ना छै सभठाँ। तैयो हो चान, कतहु बिलम आ बैसऽ। (तभैव) नामपर अहाँक, बसातो किछु ठमकै छल। फूल तँ, काॅटो किछु गमकै छल।। (तभैव) मार्कण्डेय प्रवासी माने एहन गीतकार जे आपाद मस्तकेँ नहि, आधरती-आकाश गीतकार छलाह। गीते हुनक चास-बास, घर-दुआरि दशा-दिशा, स्थिति-परिस्थिति सभ किछु छलनि। तेँ निर्धोख भऽ घोषणा कएने छथि- ‘गीते अछि बासभूमि, चास भूमि हमर। शेष किछु अछिए नहि, लाथ की करब।। (तभैव) एम्हर आबि कऽ हुनका सम्पूर्ण संसारसँ वितृष्णा भऽ गेल छलनि। पग-पगपर अविश्वास, स्वार्थलिप्सा, मिथ्या भाषण इत्यादिसँ ओ त्रस्त छलाह। हुनका बुझाइत छलनि जेना कूपेमे भांग घोरा गेल होइक, दुनियाँक सम्पूर्ण वातावरण प्रदूषित भऽ गेल होइक। एहने कुसमयकेँ अकानि ओ अपनाकेँ अपने धरि सीमित राखऽ चाहैत छथि। मुदा जे सभ दिन दीन-दुनियाँकेँ अपन गीत लहरीसँ आप्लावित करैत रहलाह ओ चुप कोना रहि सकैत छथि। तेँ कुंठित भऽ कहैत छथि-‘की बाजू।’ ‘सौंसे गाम बताह लगैए की बाजू। ओझा-बैद कटाह लगैए की बाजू।। भऽ रहलैए अछि कदाचार सगरो बिजयी- हरल सन उत्साह लगैए की बाजू।। (तभैव) मुदा हुनकामे अदम्य जिजीविषा छलनि। हुनका अपन आत्मबल आ पौरूषपर दृढ़ विश्वास छलनि। हुनका दृढ़ आस्था छलनि अपन कर्मपर आ तेँ आत्म घट लबालब अमृतसँ भरल बुझाइत छलनि। आ तेँ ओ मृत्युओकेँ टिटकारी दैत खहेरि दैत छथि- ‘प्राण घटमे अछि अमृत रस शेष- मृत्यु। दूर-सुदूर रहिहेँ रे।। (तभैव) मुदा हा, हन्त! हन्त।। क्रुर काल हुनका आत्मविश्वासकेँ धोखा देलकनि। हुनक नियारल कर्म-धर्मक चास पूर्ण नहि होमऽ देलकनि।। 13मई 2010केँ ओ अकालहिंमे कालकवलित भऽ गेलाह।। मुदा नहि, नहि! ओ तँ स्वयं कहि गेल छथि- हम भेटब! मुदा ओ कतऽ भेटताह से के कहत? जे आजीवन प्रवासी रहलाह, हुनक पता ठेकान कोना ज्ञात होएत? आन के कहि सकैत अछि हुनका भेटबाक स्थान? तेँ ने ईसा मसीह जकाँ ओ पहिनहि टीपि गेल छथि- ‘हम भेटब तिलकोर जकाँ चतरल साहित्यक टाटपर! जे जिनगी भरि साहित्यक चास-बासकेँ तामैत-कोरैत रहलाह, अपन शोनितसँ गीतक फसिलकेँ पटबैत रहलाह, ओ आन ठाम कतऽ भेटताह।। ओ वर थोड़ शब्दमे अंतहीन व्यथाक अभिव्यक्ति दैत कहैत छथि- ‘जहिया-जहिया हृदयहीनता। खटकत मोलक बातपर।। हम भेटब इतिहास नदी केर- चिक्कन चुनमुन घाटपर।।’ महाकवि मार्कण्डेय प्रवासी आइ ‘इतिहास’ भऽ गेल छथि। तेँ ओ आब ओ नदी केर चिक्कन-चुनमुन घाटपर’क वासी छथि।। सादर श्रद्धाँजलि!! श्री रमा निवास, मानाराय टोल, पो. नरहन जिला- समस्तीपुर-848211 शिवकुमार झा ‘टिल्लू’ ‘समकालीन मैथिली कविता’क समीक्षा सािहत्य अकादमी द्वारा सन् 1961सँ लऽ कऽ 1980 धरि प्रकाशित मैथिली कविताक बीछल संकलनक प्रकाशन सन् 1988ई.मे भेल अछि, एकर शीर्षक देल गेल ‘समकालीन मैथिली कविता’। सन् 1909मे मिथिलाक मािटपर जन्म लेल साहित्यकार स्व. तंत्रनाथ झासँ लऽ कऽ आधुनिक पिरहीक कवि श्री सुकान्त सोम सहित 21 गोट कविक 68 गोट कविताक संग्रहक संपादक द्व छथि- श्री भीमनाथ झा आ श्री मोहन भारद्वाज। ‘त्रिधारा’ आ ‘वीणा’ सन चर्चित कविता संग्रहक रचयिता भीमनाथ जी मूलत: कवि छथि आ श्री मोहन जी मैिथलीक चर्चित समीक्षक मानल जाइत छथि। संग, विचार मूलक, श्रैंगारिक विरह, वाल साहित्य आ देशकालक दशापर आधारित रचनाकेँ प्राथमिकता देल गेल। प्रस्तावनामे उल्लेख कएल गेल जे पहिने मात्र पंद्रह गोट कविक रचना संकलन करवाक छल, मुदा विछवामे कठिनता कारणेँ एकरा 21 धरि कऽ देल गेल। आव प्रश्न उठैत अछि जे कविक संख्या 21 आ कविताक गणना 68। वीस खर्खक जे परिधि बनाओल गेल ओहिमे बहुत रास एहेन रचनाकार छूटल छथि जनिक रचना सभ एहि पोथीमे छपल किछु रचनासँ वेसी विम्वित मानल जा सकैछ। जौं ‘समकालीन मैथिली कवि’ शीर्षक रहितए तँ प्रासंगिक मानल जा सकैत छल, परंच कविता-समकालीन लिखल गेल आ किछु चर्चित कविताकेँ कात कऽ देल गेल ई सर्वथा भ्रामक। संपादक मंडल कविताक गणना बढ़ा सकैत छलाह, किएक तँ किछु कविक चारि-चारि रचना छपल अछि मायाबावूक तँ पाँच गोट कविता देल गेल। मायाबावूक रचनासँ कोनो गतिरोध नहि मुदा जौं किछु चर्चित कविता छुटि गेल छल तँ मायाबावूक संग-संग अन्य रचनाकारक छपल कविताक गणना कम कएल जा सकैत छल। मैथिली भाषाक दुर्भाग्य मानल जाए कि एहि संग्रहमे समाजक मुख्य धारसँ कात लागल रचनाकारक संग-संग कवयित्री सबहक एकोटा रचना नहि देल गेल। मैथिलीक चर्चित कवयित्री डाॅ शेफालिका वर्मा जीक कविता संग्रह विप्रलब्धा 1974ई.मे प्रकाशीत भेल। हुनक पहिल कविता ‘पावस प्रतीक्षा’ 1965ई.मे मिथिला मििहरमे छपल छल। श्रीमती सुभद्रा सिंह ‘पाध्या’ 1970 दशकमे मैिथलीक चर्चित कवयित्री छलीह। श्रमती श्यामा देवी, श्रीमती इलारानी सिंह सन् मॉजल कवयित्रीकेँ विसरब आश्चर्य जनक अछि। ‘समय रूपी दर्पणमे’ कविताक कवि गोपेशजी, हे भाई’ कविताक कवि फजलुर रहमान हाशमी जी, ‘कोइली’ शीर्षक कविताक कवि श्री चन्द्रभानु सिंह जी, बालुक करेजपर गीतक रचनाकार श्री विलट पासवान विहंगम, जागरण गान, माला कवि स्व. काली कान्त झा बूच सन रचनाकारक कविता सबहक प्रासंगिकतापर प्रश्नचिन्ह लगाएव उचित नहि। श्री भीमनाथ बावू आ भारद्वाज जी सन पारखी लोक एहि रचनाकेँ कोना विसरि गेलनि! भऽ सकैत अछि कोनो अपरिहार्य परिस्थिति भेल होनि। एहि लेल संपादक मंडलक पूर्वाग्रह नहि मानल जा सकैत अछि, किएक तँ भीमनाथ बाबू प्रायश्चित स्वरूप अपन लिखल कविता सेहो एहि संकलनमे नहि देलनि, जखन कि ओ मैथिलीक प्रांजल कवि छथि। कविताक श्री गणेश तंत्रनाथ जी लिखित कविता ‘प्रायणालाप’ शीर्षक कवितासँ कएल गेल अछि। स्मृति रेखांकनक विषय वस्तुमे एकातक वेदना हृदय स्पर्शी अछि। जीवन संग्रामक रणभूमिमे कवि एकसरि ठाढ़ छथि, सभ किछु अछि, मुदा आत्माक सगरो स्थान रिक्त, ककरो स्मृतिक शेष-अशेष व्यथामे तीजि-भिजि गेल छनि। श्रैंगारिक वेलाक अवसान भेलापर विरह मर्मस्पर्शी होइत अछि, मुदा ई तँ जीवनक गति थिक। निष्कर्षत: ई कविता तृण-तृणकेँ छुबैत अछि। सुमन जी मैथिलीक तत्सम् मिश्रित काव्यधाराक उन्नयक कवि छथि। प्रकृति पूजनक विषय वस्तुक परिपेक्ष्यमे वसुन्धराक महिमाक गुणगान ‘पूजन-उपादान’ शीर्षक कवितामे कएल गेल अछि। संसारक अस्तित्व धरतीक विनु अकल्पनीय अछि। अपन हृदयकेँ रवि तापसँ जाड़ि भाफ उत्पन्न कऽ मॉ धरित्री संसारकेँ जल बून प्रदान करैत छथि। ’परमारथकेँ कारणे साधुन बना शरीर’ जकाँ पृथ्वी मात्र दोसरक लेल अपन अस्तित्वकेँ जीवन्त कएने छथि। ‘भीक्षा-पात्र शीर्षक कवितामे सुमन जी नीति मूलक विचारसँ समाजकेँ डबडब करवाक प्रयास कऽ रहल छथि। व्यष्टिसँ समष्टिक निर्माण होइत अछि, व्यक्तिसँ समाजक निर्माण होइत अछि। समाजक विना व्यक्तिक अस्तित्व क्षीण ठीक ओहिना व्यक्तिक बिनु समाजक कल्पनो टा नहि कएल जा सकैत अछि। दिवस-रात्रि, नव-पुरातन, सनातन-नूतनता, सुख-दुख ई सभटा जीवन मूलक अवस्था थिक, एक बिनु दोसर अस्तित्व विहीन। हिन्दी साहित्यमे अविस्मरणीय कविता स्व. आरसी बावूक लिखल ‘जीवन का झरना’ शीर्षक कवितासँ एहि भिक्षा-पात्रक विषय वस्तु मिलैत-जुलैत अछि, परंच विश्लेषण विलग अछि। ‘जा रहल छी’ कविता सुमन जीक कविताक पुष्पवाटिकामे खिलोओल एकटा महत्वपूर्ण कविता अछि। अपन प्राचीन सभ्यता ओ संस्कृतिक महत्वपूर्ण अध्यायसँ वर्त्तमान अवस्थाक तुलना नीक वुझना जाइत अछि। हमर इतिहास विलक्षण अछि। श्री कृष्ण सत्यक रक्षाक लेल पार्थक सारथी बनि गीताक उपदेश देलनि। व्यक्तित्व मान नहि बचि सकैत अछि जा धरि राष्ट्रमानक भावना जन-जनमे जागृत नहि हएत। वर्तमान समाजमे महाराणा प्रताप सन समर्पित व्यक्तिक अभाव अछि तेँ मानसिंह सन मानव अपन कुकर्मक शंखनाद कऽ रहल अछि। बुद्धि कौशलसँ परिपूर्ण हमर भूमि बुद्धिहीन भऽ गेल। समाजमे चाेरि बजार व्याप्त अछि। कवि एहिसँ हतोत्साहित नहि छथि। समाजमे क्रांतिक शंखनाद कऽ अधर्मी तत्व सभकेँ चेता रहल छथि। एहि कविताकेँ ‘योग धर्मक क्रांति गीत’ मानल जा सकैत अछि। मैथिली साहित्यक काव्य रूपी नौकाक पतवारि जौं ‘यात्री’क हाथमे मानल जाए तँ कोनो अतिशयोक्ति नहि हएत। कवि चूड़ामणि मधुपक पश्चात् मैथिली साहित्यमे यात्री सभसँ वेसी जनप्रिय कवि मानल जाइत अछि। एकर सभसँ महत्वपूर्ण कारण अछि हुनक ‘विषय वस्तुक चयन’। 1968ई.मे हुनक कविता संग्रह ‘पत्रहीन नग्न गाछक’ लेल हुनक साहित्य अकादमी पुरस्कार देल गेल। ओना ‘चित्रा हुनक सभसँ प्रसिद्ध कविता संग्रह मानल जा सकैछ जकर प्रकाशन बहुत पहिने भेल छल। प्रस्तुत संकलनमे यात्री जीक पाँच गोट कविता देल गेल अछि। ‘पिता-पुत्र संवाद’ कविता पत्रहीन नग्न गाछसँ लेल गेल अछि। कविताक भूमिका गणपति आ श्री शिवक संवादक रूपेँ लेल गेल मुदा परिपेक्ष्य अति गूढ़ संगहि प्रासंगिक। शंकर गजाननसँ कुण्ठा, त्रास आ मृत्युवोधक लीलाक विषयमे पूछैत छथि तँ लम्बोदरक उत्तर छन्हि जे स्वयं एहि परिधिसँ दूर रमणीय स्थानपर बैसल हो ओ कोना बूझि सकैत अछि? व्यथा वएह बूझत जे स्वयं व्यथित भेल हुए वा वर्त्तमानमे अिछ। माए चुप करएवाक प्रयास करैत छथि। यात्री जी साम्यवादी विचारधाराकेँ आत्मामे समाहित कएने छथि। तेँ अधमक व्यथाकेँ कतहु ने कतहुँ नीतिसँ जोड़ि दैत छथि। मैथिली भाषाक संग ई विडंबना रहल अछि जे शब्द विन्यास महिमा मंडित होइत अछि विषय-वस्तु दिश पाठक वा समीक्षक विशेष ध्यान नहि दैत छथि। यात्री जी कविता सबहक शब्द-शब्दमे संत्रास अनायास भेट जाइत अछि। ‘भोरे-भोर’ कवितामे प्रकृतिक मनोरम रूपक बहाने यात्रीजी शस्य-श्यामला भूमिक महिमाक गुणगान करैत छथि। ‘भोरे भोर आएल छी धाङि पथारक मोती’क तात्पर्य अछि जे हमर भूमि हरियर अन्नसँ भरल अछि। माघ मास घास, पात, अन्न, साग, तरकारीसँ खेत पथार सजल रहैत अछि। कविक दृष्टि आदित्यक रश्मिसँ तीक्ष्ण होइत अछि। एकर प्रमाण यात्री जीकेँ ‘कंकाले-कंकाल’ शीर्षक कवितामे भेटैत अछि। कंकालक आरिमे कवि की कहऽ चाहैत छथि एकर विश्लेषण करव साधारण नहि। विषय वस्तुसँ यएह बुझना जाइत अछि जे समाजमे लोक अपन स्वार्थकेँ विद्ध करवाक लेल दोसरक नाश तक कऽ दैत छथि। बाल, वृद्ध, रोगी, निरोग ककरोसँ कोनो श्रद्धा वा दया नहि। अपन देश कृषि प्रधान अछि तेँ पावस-प्रतीक्षा सभकेँ रहैत अछि। ‘साओन’ शीर्षक कवितामे कवि पावस ऋृतुक आगमन मास साओनक वरखाक संग-संग सहलेस पूजा आ नागपंचमीक वर्णन करैत छथि। ई मास प्रणयक विहंगम मास सेहो मानल जाइत अछि। यात्री जी सन वैरागी सेहो एहि मासक माधुर्यसँ नहि बचि सकलाह। राधाक उतापक वहाने स्वयं नन्द किशोर बनि गेलनि। ‘सरिता-सर निर्मल जल सोहा’ – वरखाक पश्चात् शरदक अवाहन कवि यात्री ‘ह’ आब भेल वर्षा शिर्षक कविताक माध्यमसँ करैत छथि। विषय वस्तु सामान्य मुदा विश्लेषण अंशत: नीक बुझना जाइत अछि। माटिक दीप, पूजाक फूल, सूर्यमुखी सभटा पोथीमे जीवनक गति वा नियतिक प्रासंगिकता प्रवाहमयी अछि। एहि संकलनमे ‘जीवन’ कविताक विम्व हुनक हिन्दी साहित्यमे लिखल कविता ‘जीवन का झरना’ सँ मिलैत अछि। जन्म-मृत्यु जीबनक सरिताक ई किनार थिक, मुदा एकर शक्ति अपराजेय मानल जा सकैछ। फूलमे काॅट, अन्नमे भुस्सी जीवन सुखक मध्य अवांछित तत्वक वोध करावैत अछि। दूधकेँ महि कऽ घृत बनाओल जाइछ, ठीक ओहिना जीवनमे समग्र तत्वकेँ महि लेवाक चाही। एहिसँ जन्म-मृत्युक मध्य वेदनाक अनुभव नहि भऽ सकत। ओ मानव, मानव नहि जकरा मातृभूमिक प्रति श्रद्धा नहि हो। राष्ट्रभक्ति शीर्षक विम्वमे मैथिली साहित्यमे बहुत गीत लिखल गेल अछि, मुदा आरसी बाबू रचित ‘राष्ट्रगीत’मे मातृभूमिक प्रति श्रद्धाक संग-संग वर्तमान परिस्थितिक अधम दशापर सेहो प्रहार कएल गेल अछि। जखन कंठसँ ध्वनि नहि फूटि सकैत अछि तखन शंखक कोन प्रयोजन? पुरानक लेल भ्रमर अनजान वनि गेल, मनमे संताप आ वाहर गीतक गान भऽ रहल अछि ई व्याथाक उद्वोधन कऽ रहल अछि। समाजक विलगति मानसिकतासँ कवि क्षुब्ध छथि। व्यास जीक कविता स्तरीय होइत अछि, मुदा एहि संकलनमे देल गेल कविताक ‘मेहक बड़द जेकाँ’क विम्वमे वैराग्य भावक बोध होइत अछि। वास्तमे मेहक बड़द अपन कर्मगतिसँ मानव जीवनकेँ तृष्णासँ मुक्ति दैत अछि, परंच अपन कविताक माध्यमसँ व्यासजी कर्मक परिणाम व्याथित रूपेँ प्रकट कएलनि। भऽ सकैछ जीवनक कोनो क्लेशक विवेचन होथि, मुदा एहि प्रकारक कवितासँ समाजकेँ की भेटत, ई अवलोकन करवाक योग्य अछि। व्यासजीक दोसर कविता ‘मृदु मयंक हंस शिशु’मे छायावादक प्रयोग नीक रूपेँ कएल गेल अछि। किसुन जीक दुनू कविता ‘पत्रोतर’ आ वश्लेषण मिथिला मिहिरसँ लेल गेल अछि। पत्रोत्तर कवितामे पीड़ा भरल मोनमे पत्र प्राप्तिक पश्चात पसरल उद्धीपनक विवेचन नीक लगैत अछि। रेलक काट माल डिब्बासँ लऽ कऽ अभिमन्युक बलिदान धरिक तुलनामे छोहक अद्भुत स्पर्शण झकझोरि दैत अछि। अमर जी मैथिली साहित्यक क्रांतिवादी कवि छथि। हास्य हो वा विचारमूलक कविता, सभठॉ हुनक क्रांतिवादी स्वरसँ कविताक विषय वस्तु ओत प्रोत रहैत अछि। ‘युद्ध-एक समाधान’ शीर्षक कवितामे कवि दिनकर जीक ‘शक्ति और क्षमा’ कविता स्वरूप झलकैत अछि। ‘अभियान’ कवितामे हिमालयक गुणगानसँ लऽ कऽ योगक बलवंत स्वरूपक विश्लेषणमे कविक विशाल अध्ययनशीलताक झॉकी देखऽमे अबैछ। राजकमल जी मैथिलीक चर्चित रचनाकार छथि। मैथिली हुअए वा हिन्दी राजकमल जी कथाकारक रूपेँ वेसी चर्चित भेल छथि। मैथिलीमे ‘स्वरगंधा’ कविता संग्रहक संग-संग विविध पत्र पत्रिकामे 57गोट कविता सेहो प्रकाशीत भेल अछि। प्रयोगकेँ वादक धरातलपर प्रतिष्ठित करबाक श्रेय मैथिली साहित्यमे हुनके देल जाइत अछि। प्रस्तुत संग्रहमे हुनक चारि गोट कविता देल गेल अछि। ‘अथतंत्रक चक्रव्यूह’मे कवि की कहए चाहैत छथि ई बूझव क्लिष्ट अछि। कोनो रचनाकारकेँ अनुत्तरित प्रश्न छोड़ि कऽ नहि जएबाक चाही। एहिसँ पाठकक मध्य भ्रमक स्थिति उत्पन्न भऽ जाइत अछि। ‘वासन्ती परकिया विलास’ सर्वथा समीचीन कविता मानल जा सकैत अछि। समकालीन मैथिली कवितामे एहि कविताक स्थान निश्चित रूपेँ स्वर्णिम अछि। प्रकृतिक संग-संग जीवनक दर्शन आ श्रंृगारपर आधारित कवितामे भावक उद्वोधन नीक जकाँ कएल गेल अछि। ‘मेहावन’ कविता सेहो नीक लगैत अछि। सत्य आ नैतिकताक विम्बक मध्य हेराएल स्वपनपर आधारित कवितामे हृदयगत जुआरि प्रदर्षित कएल गेल। ’पत्नी पत्नी कथा’ शीर्षक कविताकेँ सर्वकालीन कविताक श्रेणीमे राखब उचित नहि। एकटा महान कविक साधारण रचना एहि कविताकेँ मानल जा सकैत अछि। सोमदेव जी मूल रूपेँ उपन्यासकार छथि, मुदा एकटा कविता संग्रह ‘कालध्वनि’ सेहो प्रकाशीत भेल अछि। प्रस्तुत संग्रहमे हुनक लिखल चारू कविता खाली आकाश, स्थायी प्रभातक उद्येश्येँ, एकटा अदना सिपाही आ मोह शीर्षक कवितासँ प्रमाणित होइत अछि जे ओ युगान्तरकारी कवि छथि। धीरेन्द्र जी उपन्यासकार छथि, मुदा किछु स्फुट कविता आ गीतक रचना सेहो कएलनि अछि। ‘हैंगरमे टॉगल कोट’ हुनक स्फुट कविता अछि जकर प्रथम प्रकाशन मिथिला मिहिरमे भेल। एहि कवितामे चेतनाक दर्शन स्वरूप नीक मानल जा सकैछ। मुदा अन्य तीनू कविता बुल बुल गीत, लक्ष्य हम्मर दूर आ भोरक आशापर कोनो अर्थे सकमालीन श्रेष्ठ कविताक श्रेणीमे नहि मानल जा सकैत अछि। विम्वक रूपकेँ जौं सम्यक मानल जाए तैयो विवेचन सामान्य लगैत अछि। मैथिली कवितामे नव कवितावादक प्रणेता मायानंद मिश्र जीकेँ मानल जाइत अछि। हुनक कविता संग्रह ‘दिशांतर’ 1965ई.मे प्रकाशीत भेल अछि। एकर अतिरिक्त विविध पत्र पत्रिकामे ओ कविता आ गीतक सेहो प्रकाशीत होइत रहल अछि। प्रस्तुत संग्रहमे हुनक लिखल चारि गोट कविता देल गेल अछि। एकटा नखशिख: एकटा दृश्य, साम्राज्यवाद, मानवता आ लालटेन ई सभ लघुकविता थिक। विषय वस्तुक संयोजन नीक मुदा विवेचन अस्पष्ट अछि। बिरड़ो छोट मुदा प्रासंगिक कविता लागल। जीवकांत जीक कविता संसार बड़ विस्तृत अछि मुदा सभटा अतुकांत। हिनका आशुकवि नहि मानल जा सकैछ। ओना तँ एहि संकलनमे िहनक चारि गोट कविता देल गेल अछि, मुदा मात्र ‘पापक भाेग’ कविताकेँ प्रासंगिक आ समकालीन मैथिली कविताक श्रेणीमे मानल जा सकैछ। ई कविता हुनक कविता संग्रह ‘नाचू हे पृथ्वी’सँ लेल गेल अछि। ‘आकाश पपियाह नहि अछि’ सँ शून्यवादमे आत्मीयताक दर्शन होइत अछि। चिन्तनशील कविताक रचनामे कीर्ति नारायण मिश्र जीक नाओ सादर लेल जा सकैछ। ‘सीमान्त’ कविता संग्रहक द्वारा कीर्ति जी प्रयोग वादकेँ राजकमल जीक पश्चात नव रूप देलनि। एिह संकलनमे प्रकाशीत हिनक चारू कविताक विषय वस्तु नीक, विवेचन उपयुक्त आ भाषा सरल अछि। हिनक जन्म शोकहारा बरौनीमे भेलनि। वर्तमान विहारमे औधोगिकीकरणक सभसँ बेसी प्रभाव एहि ठाम भेल। अपन प्राचीन रूपक गामक िस्थतिक तुलना वर्तमान विकाशील गामसँ करैत ‘कतेक वर्षक वाद’ कविताक रचना कएलनि। हंसराज जीक चारि गोट कविता एहि संकलनमे देल गेल अछि। पहिल कविता ‘गंध’ हुनक कालजयी कविता िथक, प्रवेशिका स्तरक पूर्व पाठ्यक्रममे ई सेहो छल। प्रस्तावनामे एहि कविताकेँ श्रमशील लोकक चामक गंधकेँ ममतासँ जोड़ल गेल, मुदा ई प्रश्न उठैत अछि जे श्रमशील लोकक मध्य ‘गंध’ कतऽ सँ अाएत ओ तँ कर्मसँ वातावरण आ समाजमे सुगंध पसारैत छथि। जौं चर्म उद्योगक श्रमजीवीकेँ चामक गंध लागल तँ ओहि चामकेँ मूर्त्त रूप नहि देल जा सकैछ, जौं कृषककेँ घामक गंध लागल तँ वसुन्धराक कोखि शस्य श्यामला नहि भऽ सकत। ‘कलंक लिप्सा’ कविता सुमधुर आ प्रवाहमयी लागल। चानकेँ साक्षी मानि कऽ लिखल गेल कविता नारीक मान आ पुरूषक स्वाभिमानक विवेचन तथ्यपरक बुझना गेल। ‘नारी’ शीर्षक कवितामे नारी जीवनक व्यथाक मार्मिक चित्रण असहज अछि। साधन विहीन नारीक जीवन चूल्हिक संग प्रारंभ आ इति भऽ जाइत अछि। ‘हम तँ’ नोरेसँ चिक्कस सनैत छी’मे दीनहीन नारीक मनोदशा विवेचन हृदयकेँ झकझोरि दैत अछि। कुलानंद मिश्र जीक कविता ‘स्पष्टीकरण’मे अपन मनोदशाकेँ कवि नुका लेलनि। ‘जड़कालाक साँझ’ कवितामे विम्बक मूल्यन आ निष्कर्ष प्रासंगिक अछि। मिला-जुला कऽ हुनक तीनू कविताकेँ नीक मानल जा सकैत अछि। प्रवासी जीकेँ मैथिली साहित्यक निराला मानल जाए तँ कोनो अतिशयोक्ति नहि। ‘सम्हरि कऽ चलिहेँ’ शीर्षक कवितामे जीबनक गतिकेँ नव आयामसँ कवि निर्दोशित कऽ रहल छथि। परिवर्तन, वसन्त, अनभुआर तीनू कविता लघुकविताक रूपमे लिखल गेल अछि, परंच विम्बक परिधिक रूप व्यापक अछि। गंगेश गुंजन, विनोद जी, मंत्रेश्वर झा आ नचिकेता जीक कविता सभमे दृष्टकोणक व्यापक उद्वोधन स्वत: भऽ जाइछ तेँ एहि कवि सबहक कवितापर प्रश्नचिन्ह ठाढ़ करब प्रासंगिक नहि। सुकान्त सेाम जीक तीनू कविता स्वत: स्फूर्त नहि मानल जा सकैत अछि, कतहु-कतहु लागल जे गद्य रूपमे लिखि कऽ पद्यक रूपेँ परिवर्तित कएल गेल। निष्कर्षत: ‘समकालीन मैथिली कविता’ नीक कविताक संकलन थिक, मुदा समए कालक जाहि परिधिक िनर्धारण कएल गेल अछि ओहिमे किछु चर्चित कविता सबहक तिरस्कार कएल गेल। परिस्थिति की छल? ई तँ नहि कहल जा सकैत अछि, मुदा मैथिली कविता समूहक संग पूर्ण न्याय नहि कएल गेल जकरा कोनो अर्थे उचित नहि मानल जाएत। श्रीमती शेफालिका वर्मा- आखर-आखर प्रीत (पत्रात्मक आत्मकथा) जन्म:९ अगस्त, १९४३, जन्म स्थान : बंगाली टोला, भागलपुर । शिक्षा: एम., पी-एच.डी. (पटना विश्वविद्यालय),ए. एन. कालेज, पटनामे हिन्दीक प्राध्यापिका, अवकाशप्राप्त। नारी मनक ग्रन्थिकेँ खोलि करुण रससँ भरल अधिकतर रचना। प्रकाशित रचना: झहरैत नोर, बिजुकैत ठोर, विप्रलब्धा कविता संग्रह, स्मृति रेखा संस्मरण संग्रह, एकटा आकाश कथा संग्रह, यायावरी यात्रावृत्तान्त, भावाञ्जलि काव्यप्रगीत, किस्त-किस्त जीवन (आत्मकथा)। ठहरे हुए पल हिन्दीसंग्रह। २००४ई. मे यात्री-चेतना पुरस्कार। शेफालिकाजी पत्राचारकेँ संजोगि कऽ "आखर-आखर प्रीत" बनेने छथि। विदेह गौरवान्वित अछि हुनकर एहि संकलनकेँ धारावाहिक रूपेँ प्रकाशित कऽ। - सम्पादक आखर-आखर प्रीत (पत्रात्मक आत्मकथा) डॉ केदारनाथ लाभक एकटा टिप्पणी अपन कविताक विषय मे कोनो पत्रिका मे पढ़ने छलौं-हमरा बड़ नीक लागल। फलतः अपन प्रथम कविता संग्रह विप्रलब्धाक पांडुलिपि भूमिका लिखवा लेल हुनका पठा देलौं-आ हृदयक एकटा संबंध हुनका सँ भ गेल आ हमर ज्येष्ठ भाईक रूप मे हमर जीवन मे अपन स्थान ल लेलथि- प्रिय रजनी मेरे स्नेह तुम्हे अर्पित सौरभ के मेह तुम्हें / सचमुच कितने दिन बीत गये/ क्षण के कितने घट रीत गये ।/ पर तुम्हें पत्र लिख पा न सका/ जब-तब ऐसा हो जाता है/ मन का ध्न ही खो जाता है।/ जो लिखना चाहो लिखना सको/ ज्यों दिखना चाहो दिख न सको।/ उन्मन-उन्मन-उन्मन जीवन/ अम्बर मे केवल ध्न ही ध्न।/ बिजलियाँ कौंध् कर सो जाती/ केवल वि“वलता बो जाती।/ आकाश देखता रह जाता/ चुपके-चुपके सब सह जाता।/ कहने की कोई बात नहीं/ इस मरु मे है बरसात नहीं।/ चंदन-वन का मध्ुबात नहीं/ तट पर तरंग का घात नहीं।/ केसर वन सा मध्ु प्रात नहीं/ कस्तुरी वाली रात नहीं/ कोयल की प्रीति पुकार नहीं।/ कोई नर्तन झंकार नहीं।/ मध्ुगंध्ी मृदु वातास नहीं।/ बादल बिजली आकाश नहीं।/ मंजरी न कोई न पानी/ झुक लता न कोई छू पानी।/ प्यासा पंछी अकुलाता है/ उड़ने को पर पफैलाता है।/ लेकिन मिलती रसधर नहीं/ शीतल सावनी पफुहार नहीं।/ ऐसे मे चुप हो जाता हँू।/ बाहर से मूँदे हुए नयन/ पढ़ने लगता हँू अपना मन।/ एकान्त सहेली बन जाता/ जोड़ता मौन से मध्ु नाता।/ कोई वीणा बजने लगती/ कोई पायल सजने लगती।/ संगीत गँूजने लगता है/ मन स्वयं झूमने लगता है।/ चेतना तरंगित हो जाती है/ अन्तर की कलिका मुस्काती।/ नव सूर्योदय हो जाता है/ आलोक नया अँगड़ाता है।/ कोई सुगंध् भर जाती है। शेफाली-सी झर जाती है।/ मन स्वयं मुग्ध् हो जाता है/ शिशु सा सहसा सो जाता है।/ लेकिन पिफर कोई एक शाम/ ले-लेकर मेरा सरल नाम।/ सोये से मुझे जगा जाती/ पिफर गीत वही दुहरा जाती।/ पिफर स्वयं कहीं छिप जाती है/ मुझको उदास कर जाती है।/ जुड़-जुड़ कर ऐसा टूट गया/ ज्यों फल डाली से छूट गया। अपना कोई आधर नहीं/ खिलता खुलता संसार नहीं।/ लगता है यही नियति मेरी/ टेढ़ी-मेढ़ी संसृति मेरी।/ इसलिए मौन हो जाता हँू/ अपने मे यूँ खो जाता हँू।/ लेकिन इन बातों को छोड़ो/ खुद को जीवन-जग से जोड़ो/ तुम ग्राम्य-प्रकृति मे नहा गयी/ शोभा मे सुस्मिति बहा गयी।/ भर गयी तुषार - तरंगों से/ रंग गयी उषा के रंगों से।/ अनुपम उमंग से झूम उठी/ उल्लसित ध्रा को चूम उठी।/ सचमुच नैसर्गिक सम्मोहन/ भर देता है रस से जीवन।/ अपनी ही सुध् िखो जाती है/ कल्पना पंख पफैलाती है।/ नूतन सपने जग जाते हैं/ कितने लालस अँगड़ाते हैं।/ दुनिया ही नयी-नयी लगती/ आध्ी सोती आधी जगती।/ कुछ ऐसा ही हो जाता है/ अहरह अन्तर अकुलाता है।/ ऐसा ही जीवन हास भरा/ वासंती बिभा हुलास भरा।/ रजनी ! यदि सबका हो जाये/ जग कितना सुन्दर हो जाये।/ तुम बनी रहो चिर हासमयी/ मधुमासमयी उल्लासमयी / अपने जीवन मे राग भरो/ रस गंध् भरो अनुराग करो।/ जीवन को जीवन रहने दो/ इसमे मध्ु धरा बहने दो।/ पिफर देखोगी क्या है जीवन/ सुख का पुलकित नूतन उपवन।/ जीवन विराट का दर्पण है/ शोभा सुषमा का मध्ुवन है।/ आनन्द भरा कैलास-लोक/ है जहाँ न कोई रोग-सोक।/ केवल शिव-गौरी का नर्तन/ ऐसा-ऐसा ही है जीवन।/ लो कितना तुमको बोर किया।/ बिन बरसे गर्जन घोर किया।/ कहते-कहते कह गया बहुत/ भावों मे ही बह गया बहुत।/ अब और न मुझको बकना है/ यह व्यर्थ थकाना-थकना है।/ यह पत्र न है बकवास मात्रा/ भाई का है यह हास मात्रा। / अन्तर तरंग - उल्लास मात्रा/ समझो है शब्द-विलास मात्रा।/ देखो अब दुखने लगा हाथ/ सस्नेह- लाभ केदार नाथ राजेन्द्र कॉलेज छपरा। आगाँ अगिला अंकमे.... रिपोर्ताज- १.ज्योति सुनीत चौधरी-इर्लिंग आर्ट ग्रुपक 95 वाॅ वार्षिक कला प्रदर्शनी २.उमेश मंडल- सगर राति श्रोता कथा-सागरमे डुबकी लगेलन्हि ३.नवेन्दु कुमार झा-मतदाता सभक उत्साह मध्य सम्पन्न भेल तीन चरणक मतदान- राजनीतिक दलक बेचैनी बढ़ौने अछि मतदाताक चुप्पी ४.सुमित आनन्द- आचार्य सुरेन्द्र झा “सुमन” जयन्ती-२०१० ५.सुजीत कुमार झा- जनकपुरमे कोजागरा महोत्सव १ इर्लिंग आर्ट ग्रुपक 95 वाॅ वार्षिक कला प्रदर्शनी इर्लिंग आर्ट ग्रुप के अन्तर्गत जे 95वाॅ वार्षिक कला प्रदर्शनी लागल छल ताहिमे हमर तीन टा मधुबनी पेण्टिग सेहाे प्रदर्शित छल। ई कला तऽ अहुना विश्व भरिमे अपन पहचान बना चुकल अछि। अहु प्रदर्शनीमे अहि कलाके उच्च स्थान भेटल छल।सब बेर बढ़िया कलाके द्वार पर जगह भेटैत छल से अहि बेर मधुबनी वा मिथिला चित्रकलाके प्रवेश द्वार लग जगह भेटल छल।प्रदर्शनी हाॅलमे प्रवेश करैत देरी बामा कात सबसऽ पहिने काेहवर आ अन्य दू टा चित्रकला नजरि आबैत छल। कैटेलाॅगमे सेहाे हमर नाम दाेसर स्थान पर आ हमर पेण्टिग के नाम तेसर चारिम आ पाॅचम स्थान पर छल।जे कलाकार पहिल स्थान पर रहैथ तिनकर दू टा आॅयल पेण्टिग प्रवेश द्वारपर दहिना कात विराजमान छलैन।पहिल दिनक प्राइवेट व्यू वला दिन कम सऽ कम 100 लाेकक भीर लागल छल।अहि सफल प्रदर्शनी मे मिथिला चित्रकलाके जे सम्मानजनक स्थान भेटल छल से वास्तवमे प्राेत्साहक अछि। २ उमेश मंडल सगर राति श्रोता कथा-सागरमे डुबकी लगेलन्हि- मधुबनी जिलाक लखनौर प्रखण्डक बेरमा गामक मध्य विद्यालय परिसरमे २ अक्टूबर २०१०केँ मैथिली कथा आन्दोलनकेँ समर्पित ‘सगर राति दीप जरय’क ७१म आयोजन श्री जगदीश प्रसाद मंडलक संयोजकत्वमे कएल गेल। दीप प्रज्वलन सह उद्घाटन श्री उग्र नारायण मिश्र ‘कनक’ संध्या ६:३० बजे केलनि। तत्पश्चात डॉ. रमानन्द झा रमण, बेरमाक स्व. विजय नाथ ठाकुर (चेतना समितिसँ जुड़ल रहथि।) चर्चा करैत गामक (बेरमाक) साहित्यक इतिहासक चर्चा केलनि। गोष्ठिक सुभारम्भ स्वागत गीतसँ, सपत्नी संजीव कुमार ‘समा’, अजय कुमार कर्ण, बेचन ठाकुर, आ जागेश्वर प्रसाद राउत जीक द्वारा भेल। तत्पश्चात ‘मंगला चरण’क उच्चारण शिवकुमार मिश्र जी केलनि। गोष्ठिक अध्यक्षता डॉ. तारानन्द वियोगी आ संचालन श्री अशोक कुमार मेहता जी केलनि। कार्यक्रमकेँ आगाँ बढ़ाओल गेल पोथीक लोकार्पणसँ जेकर सूचि एहि तरहेँ अछि- १ प्रलय रहस्य (कविता संग्रह) लेखक- तारानन्द वियोगी, लोकार्पणकर्ता- डॉ. रमानन्द झा रमण, २ जीबन-मरण (उपन्यास) ले. जगदीश प्रसाद मंडल, लो.- श्री कुमार सहाएब आ श्री रमाकान्त राय ‘रमा’, ३ तरेगन (बाल प्रेरक कथा संग्रह) ले. जगदीश प्रसाद मंडल, लो.- डॉ. रमानन्द झा ‘रमण’ आ डॉ. फूलचन्द्र मिश्र ‘रमण’, ४ जीवन-संघर्ष (उपन्यास) ले. जगदीश प्रसाद मंडल, लो.- श्री अशोक (पटना) आ श्री उग्रनारायण मिश्र ‘कनक’, ५ सी.डी. तिरहुत्ता (विदेह ई पत्रिका, ६०म अंक धरि) संपादक गजेन्द्र ठाकुर, लो.- डॉ. योगानन्द झा, श्री उग्रनारायण मिश्र ‘कनक’ आ श्री नारायण जी, ६ सी.डी. देवनागरी (विदेह ई पत्रिका, ६०म अंक धरि) सं. गजेन्द्र ठाकुर, लो.- डॉ. तारानन्द वियोगी, डॉ. मंजर सुलेमान आ श्री अजीत आजाद, ७ निबंध-तरंग (निबंध-संग्रह) ले. श्रीपति सिंह, लो.- डॉ. रमानन्द झा ‘रमण’ ८ अलका (कथा संग्रह) ले. कमलकान्त झा, लो.- डॉ. धनाकर ठाकुर आ डॉ. खुशीलाल झा। छह गोट पोथी आ दू गोट सी.डी.क लोकार्पणक पश्चात कथा पाठ आ तेकर समीक्षा/समालोचना प्रारम्भ भेल। चारि-पाँच कथा/लघुकथाक पाठ आ तेकर समीक्षा चारि-पाँच समीक्षकक एक पालीमे होइत रहल। एहि तरहेँ भरि रातिमे सात पालीक सुन्दर प्रदर्शन भेल। नव पुरान कथाकारक अलावे बाल-कथाकार सेहो अपन नूतन कथाक पाठ केलनि। कथा आ कथाक समीक्षा संपूर्ण श्रोताकेँ आकर्षित कएलकनि। ताहिपर श्रोताक टिप्पणी सेहो आएल। नव-कथाकारकेँ श्री अशोक, डॉ. फूलचन्द्र मिश्र रमण आ डाँ रमानन्द झा रमणक संग-संग आरो समीक्षक आपन खुशी व्यक्त केलनि आ दिशा निर्देश सेहो देलनि। अध्यक्षीय भाषणमे डाँ तारानन्द वियोगी सेहो बेरमाक नव-कथाकारक संग-संग नव दृष्टिकोणक कथाकारक कथापर साकारात्मक विचार रखलनि। श्रोताक मनोयोग श्रवणसँ प्रभावित भऽ कथाकार लोकनिक उत्साह भरि राति बनल रहल। उपरोक्त वर्णित कथाकार आ समीक्षकक अलावे कमलेश झा, उमेश नारायण कर्ण, शंकर झा, बुचरू पासवान, महेन्द्र नारायण राम, विनय विश्व वन्धु, रघुनाथ मुखिया, आशीष चमन, पंकज सत्यम्, ऋृषि बशिष्ठ, राजदेव मंडल, िवनय मोहन ‘जगदीश’ इत्यादिक गरिमाय उपस्थित छल रहए। दर्जनोसँ ऊपर श्रोताक टिप्पणीमे- रमण किशोर झा, शशिकान्त झा, विरेन्द्र यादव, लाल कुमार राय, घुरन राम, मो. इब्राहिम, दीपक कुमार झा, राम विलास साहु आ राम प्रवेश मंडलक महत्वपूर्ण रहल। श्रोताक अनेको विषए-वस्तुपर टिप्पणीक संग-संग एकटा महत्वपूर्ण टिप्पणी कपिलेश्वर राउत जीक द्वारा- ‘दर्जनक-दर्जन कथा पाठ भेल नीक लागल मुदा हम सभ किसान छी किसानी जिनगीक (खेती-बाड़ी) बात-चीत/विषए-वस्तुक चर्च कथामे नहि भऽ पावि रहल अछि।’ एहि टिप्पणीपर श्री अशोक अपन विचार व्यक्त करैत कहलनि- ‘खेती-बाड़ी, किसानी जिनगी आ गाम-घरक चर्चा वास्तवमे कम कएल गेल अछि, ने सिर्फ मैथिली साहित्यमे वरण् हिन्दी साहित्यमे सेहो एकर अभाव माने जतेक अबैक चाही ओते नहि आएल अछि। भिनसर छह बजे एहि ७१ गोष्ठीकेँ अन्त करैत श्री अरविन्द ठाकुर (सुपौल) अग्रिम कथा गोष्ठी ७२म आयोजन हेतु दीप आ उपस्थिति पुस्तिका लेलनि। स्पष्ट अछि जे अगिला कथा गोष्ठी दिसम्बर मासमे सुपौलमे आयोजित हएत। ३ नवेन्दु कुमार झा मतदाता सभक उत्साह मध्य सम्पन्न भेल तीन चरणक मतदान- राजनीतिक दलक बेचैनी बढ़ौने अछि मतदाताक चुप्पी बिहार विधान सभाक छह चरणमे होमएबला मतदानक लेल तीन चरण मतदानक काज समाप्त भऽ गेल। तीन चरणमे भेल मतदानमे१३० विधान सभा क्षेत्रमे २०३९ उम्मीदवारक भविष्य मतदाता इलेक्ट्रानिक वोटिंग मशीन (ई.वी.एम.) मे बन्द कऽ देलनि अछि। कड़गर सुरक्षा व्यवस्थाक मध्य किछु छिटपुट घटनाकेँ छोड़ि मतदान शान्तिपूर्वक सम्पन्न भेल। एहि बेरक चुनावमे मतदाता सभमे सेहो उत्साह देखल गेल। पाबनि-तिहारक मध्य सम्पन्न भेल मतदानमे पहिल चरणमे ५४.३१ प्रतिशत, दोसर चरणमे ५२.५५ प्रतिशत आ तेसर चरणमे ५३.६६ प्रतिशत मतदाता अपन मताधिकारक प्रयोग केलनि। एहि मध्य चारि चरणक लेल १ नवम्बरकेँ होमएबला मतदानक लेल चुनाव प्रचारक काज सम्पन्न भऽ गेल अछि तँ पाँचम चरणमे ९ नवम्बरकेँ होमएबला मतदानक लेल सभ दल आ उम्मेदवार प्रचारमे अपन पूरा ताकत लगौने छथि तँ छठम आ अन्तिम चरणक मतदानक लेल नामांकन लेल नामांकन पत्र भरबाक काज चलि रहल अछि। अंतिम चरणमे २० नवम्बरकेँ मतदान भेलाक बाद २४ नवम्बरकेँ मतगणनाक संगहि बिहारमे नव सरकारक स्थिति स्पष्ट होएत। एहि बेरक चुनावमे मुख्य मोकाबला सत्तारूढ़ जद-यू भाजपाक राष्ट्रीय गठबंधन आ राजद-लोजपा गठबंधनक मध्य अछि आ गोटेक दू दशकक बाद असगर सभ २४३ सीटपर चुनाव लड़ि रहल कांग्रेस एकरा त्रिकोणीय बनेबाक लेल प्रयास कऽ रहल अछि। तीनू चरणक मतदानमे मतदाता जाहि तरहेँ मौन राखि मतदान कएलनि अछि ओहिसँ सभ राजनीतिक दल आ उम्मीदवारक होश उड़ल अछि। पहिल चरणमे आठ जिलाक ४७ विधानसभा क्षेत्रमे, दोसर चरणमे छह जिलाक ४५ विधानसभा क्षेत्र आ तेसर चरणमे छह जिलाक ४८ विधानसभा क्षेत्रमे मतदान कराओल गेल अछि तँ चारिम चरणमे आठ जिलाक ४२ विधानसभा क्षेत्रमे १ नवम्बर, पाँचम चरणमे आठ जिलाक ३५ विधानसभा क्षेत्रमे ९ नवम्बर आ छठम चरणमे पाँच जिलाक २६ विधानसभा क्षेत्रमे २० नवम्बरकेँ मतदान काअओल जाएत। तीन चरणक मतदान- एक नजरिमे पहिल चरण दोसर चरण तेसर चरण कुल जिला ८ ६ ६ विधानसभा क्षेत्र ४७(८ सुरक्षित) ४५(६ सुरक्षित) ४८(७ सुरक्षित) कुल मतदाता १०७००७९७ ९८४४९८१ १०३७६०२२ मतदानक प्रतिशत ५४.३१ ५२.५५ ५३.६६ उम्मीदवारक संख्या ६३१ (५२ महिला) ६२३ (४६ महिला) ७८५ (६५ महिला) कुल मतदान बूथ १०८६८ (४१४ अतिरिक्त) १०३१५ ८४२६ कुल मतदान केन्द्र ८८६८ ९९५२ १०८१४ कुल बैलेट यूनिट १३७६० १३६७४ १६६७१ तीन चरणमे दलीय उम्मीदवारक संख्या पहिल चरण दोसर चरण तेसर चरण भारतीय जनता पार्टी २१ १७ २४ जनता दल यूनाइटेड २६ २८ २४ राष्ट्रीय जनता दल ३१ ३४ ३५ लोक जनशक्ति पार्टी १६ ११ १३ राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी ३३ ३१ ३८ बहुजन समाज पार्टी ४५ ४५ ४८ भाकपा ११ ०८ १० माकपा ०७ ०८ ०५ भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ४७ ४५ ४८ निर्दलीय २३८ २२८ ३५४ आन दल १५६ १६८ १८६ बिहारमे मतदानक प्रतिशत (विधानसभा) १९५२-४२.०५ १९५७-४१.७२ १९६२-४६.९७ १९६७-५१.४९ १९६९-६२.७८ १९७२-५२.७९ १९७७-४९.७२ १९८०-५७.३३ १९८५-५४.३९ १९९०-६२.०४ १९९५-६१.७९ २०००-६७.५७ २००५ फरवरी- ४६.२५ २००५ नवम्बर- ४७.०३ २०१० (पहिल तीन चरणमे)-५३.३६ ४. सुमित आनन्द आचार्य सुरेन्द्र झा “सुमन” जयन्ती-२०१० आचार्य सुरेन्द्र झा “सुमन” जयन्ती १२ अक्टूबर २०१० केँ सुमन स्मृति समिति, दरभंगा द्वारा स्थानीय एम.एल.एस.एम. कॉलेज दरभंगामे अपराह्ण ३ बजे आयोजित भेल। एहि कार्यक्रमक उद्घाटनकर्ता साहित्यकार प्रो. शिवकान्त पाठक कहलनि जे आचार्य सुमन परिवर्तनकारी छलाह आ परम्पराक संगहि संग आधुनिकताकेँ स्वीकार करबामे हुनका कोनो झिझक नहि होइत छलनि। एम.आर.एम. कॉलेजक प्रधानाचार्य डॉ. कामेश्वर झाक अध्यक्षतामे आयोजित एहि कार्यक्रममे विशिष्ट अतिथिक रूपमे एम.एल.एस.एम. कॉलेजक प्रधानाचार्य डॉ. विद्यानाथ झा कहलनि जे आचार्य सुमनक दृष्टि व्यापक छलनि आ हुनक साहित्यमे सभटा पक्षकेँ स्थान छैक। समितिक अध्यक्ष सह मैथिली अकादमीक अध्यक्ष श्री कमलाकांत झा मंच संचालनक क्रम मे कहलनि जे आचार्य सुमनक समग्र व्यक्तित्वे अनुकरणीय अछि। श्री फूलचन्द्र झा ‘प्रवीण’क द्वारा आचार्य ‘सुमन’ रचित शिवपंक्षारक गायन सँ प्रारंभ भेल कार्यक्रममे स्वागत गीत शिखा कुमारी द्वारा गओल गेल। आगत अतिथि गणक स्वागत समितिक उपाध्यक्ष विनोद कुमार द्वारा कयल गेल। एहि अवसर पर संस्कृत साहित्य मे अवदानक हेतु डॉ. शशिनाथ झा केँ, हिन्दी हेतु, डॉ. अजीत कुमार वर्मा केँ तथा मैथिली हेतु डॉ. श्री शंकर झा केँ ‘सुमन’ स्मृति सम्मान सँ सम्मानित कयल गेलैन। समारोह मे आयोजित कवि सम्मेलन मे डॉ. विद्याधर मिश्र, हरिश्चन्द्र ‘हरित’ एवं अशोक कुमार मेहता द्वारा काव्य पाठ कयल गेल। एहि अवसर पर विधायक संजय सरावगी, डॉ. भीमनाथ झा, डॉ. गणपति मिश्र, डॉ. रमण झा, डॉ. उपेन्द्र झा, श्री मुनीन्द्र झा, श्री महानंद ठाकुर, श्री जगदीश साह, श्री भोला चौधरी, श्री गणेशकांत झा सहित दर्जनों साहित्यकार उपस्थित छलाह। धन्यवाद ज्ञापन समितिक सचिव श्री चन्द्रशेखर झा ‘बूढ़ा भाइ’ कयलनि। ५ सुजीत कुमार झा जनकपुरमे कोजागरा महोत्सव महोत्सव केँ आइ काल्हि फैशन चलि आएल अछि । लोककेँ आकर्षित करवाक लेल महोत्सव शब्द बेर–बेर प्रयोग होइत आएल अछि । जनकपुरमे मात्र वर्षमे मिथिला महोत्सव, होली महोत्सव, जुड़शीतल महोत्सव, झुलन महोत्सव, विवाह पञ्चमी महोत्सव, कोजागरा महोत्सव, कि कि महोत्सव होइत अछि । दर्शक तनवाक लेल किया नहि होउ महोत्सव नाम जोड़ला सँ एकटा आकर्षण अवश्य बढल अछि इलेक्ट्रोनिक मिडिया सँ आबद्ध पत्रकार रामअशिष यादव कहैत छथि । कोजागरा महोत्सव कोजागरा समान्यतया नव विवाहितकेँ घरमे होइत अछि । जाहि साल विवाह भेल ओहि साल मात्र बरक घरमे कोजागरा होइत अछि । मुदा अहिठाम तऽ बरक घरमे जे होइत अछि से हेबे करेत अछि मुदा प्रसिद्ध धार्मिक स्थल जानकी मन्दिरमे जे होइत अछि से देखय लाइक रहैत अछि । कोजागराक अवसरपर जानकी मन्दिरमे मखान, खाजा, लड्डुक भार अबैत अछि आ फेर भगवानकेँ चुमाओन होइत अछि । चुमाओन देखवाक लेल मन्दिर प्राङ्गणमे हजारो केँ भीड़ रहैत अछि । जानकी मन्दिरक महन्थ रामतपेश्वर दास वैष्णवक अनुसार चुमाओनक दृश्य देखवाक लेल आगामे बैसवाक लेल लोक दिनमे मन्दिरमे पहुँच जाइत अछि । ओहि ठाम महिलासभ घण्टो गीत गबैत छथि फेर हास परिहासक कार्यक्रम सेहो होइत अछि । जानकी मन्दिरक महन्थ दास कहैत छथि – लोकक घरमे कहाँ एतेक हास परिहास होइत अछि । विधक बाद तऽ हमरा स्नानो करय परैत अछि । ततेक लोक दही लगा दैत अछि । कोजागरा दिन मखान चढावयबलाकेँ सेहो अबेर रातिधरि मन्दिरमे भीड़ लागल रहैत अछि । भारक परम्परा सय वर्ष सँ बेसी पुरान जानकी मन्दिरमे भारक परम्परा एक सय सात वर्ष सँ निरन्तर चलैत आवि रहल अछि । महोत्तरीक रतौली गामक ब्रह्मदेव ठाकुरक घर सँ १ सय १ टा भार प्रत्येक वर्ष अबैत अछि । ओ सभ दशमी शुरु होइते कोजागराक भार साठयकेँ लेल तैयारी शुरु कऽ दैत छथि । ठाकुुर कहैत छथि– भार संगे छोट सँ लऽ कऽ बड़काधरि घरक सभ सदस्य पहुँचैत छी । घरक कोनो सदस्य बाहरो कमाई छथि ओहोसभ कोजागरा महोत्सवमे सहभागि होवयकेँ लेल चलि अबैत छथि । फेर भार पुरे परम्परागत शैलीमे मन्दिरमे पठाओल जाइत अछि । भरियाक परम्परा क्रमशः मिथिलामे हटय लागल समयमे सेहो दर्जनो भरियाकेँ कोजागरामे जानकी मन्दिरमे लऽ जायत देखल जा सकैत अछि । ब्रह्मदेव ठाकुर कहैत छथि–अन्य काल एकोटा भरिया तैयारी नहि होएत मुदा जानकी मन्दिरमे जायकेँ लेल तऽ मारि करय लैत अछि । घरोकेँ कोजागरामे कम आकर्षण नहि मन्दिरमे कोजागरा महोत्सव होइत अछि तऽ घरमे होवयबला कोजागराक आकर्षण समाप्त भऽजाइत हैत से नहि घरोसभमे सेहो ओतवे उत्साह संग कोजागरा होइत अछि । जनकपुरक पण्डित विद्यानन्द झा कहैत छथि–जाहिना मन्दिरक कोजागरामे भव्यता आएल अछि तहिना घरक कोजागरामे । लोक मखान बटैत अछि, भोज करैत अछि कि कि होइत अछि कि कि नहि । आब तऽ गाम–गाममे अहि अवसरपर नाटक सभ सेहो होवय लागल अछि । १.ज्योति सुनीत चौधरी- विहनि कथा (लघुकथा)- पानिमे खेती २. कुमार मनोज कश्यप-विहनि कथा (लघुकथा)-उजड़ल खोंता ३. नबोनारायण मिश्र- विहनि कथा (लघुकथा)- घमंडक फल ४.राम विलास साहु विहनि कथा (लघुकथा)-परिश्रमक भीख १ ज्योति सुनीत चौधरी जन्म तिथि -३० दिसम्बर १९७८; जन्म स्थान -बेल्हवार, मधुबनी ; शिक्षा- स्वामी विवेकानन्द मिडिल स्कूल़ टिस्को साकची गर्ल्स हाई स्कूल़, मिसेज के एम पी एम इन्टर कालेज़, इन्दिरा गान्धी ओपन यूनिवर्सिटी, आइ सी डबल्यू ए आइ (कॉस्ट एकाउण्टेन्सी); निवास स्थान- लन्दन, यू.के.; पिता- श्री शुभंकर झा, ज़मशेदपुर; माता- श्रीमती सुधा झा, शिवीपट्टी। ज्योतिकेँwww.poetry.comसँ संपादकक चॉयस अवार्ड (अंग्रेजी पद्यक हेतु) भेटल छन्हि। हुनकर अंग्रेजी पद्य किछु दिन धरि www.poetrysoup.com केर मुख्य पृष्ठ पर सेहो रहल अछि। ज्योति मिथिला चित्रकलामे सेहो पारंगत छथि आ हिनकर मिथिला चित्रकलाक प्रदर्शनी ईलिंग आर्ट ग्रुप केर अंतर्गत ईलिंग ब्रॊडवे, लंडनमे प्रदर्शित कएल गेल अछि। कविता संग्रह ’अर्चिस्’ प्रकाशित। विहनि कथा (लघुकथा)- पानिमे खेती पानिमे खेती ः विवेक बाबू एक ग्रामीण कृषक परिवार सऽ छथि।बच्चे सऽ राेपण़ि पटाइऱ् कटनी़ दाउन यैह सब देखि कऽ पैघ भेलैथ।बहुत तरहक विवाद के ओ बड्ड नजदीक सऽ सामना केने छथि।दमकल लगेलक कियाे आ कियाे आर बिना पुछने आढ़ि काटि कऽ अपन खेत मे पानि भरिलेलकऌ पाेखरिमे जीरा पड़ल की नहिं बच्चा सबहक बंसी खेलेनाई शुरू आढ़ि ़ बान्ह बनाबै काल ककराे दिसका जमीन बेसी नहिं चलि जाया ताहि लेल कलहऌ ई सब छाेटमाेट हलचल तऽ ओतक दिनचर्यामे सामिल छल। अहि सबसऽ हाेयत विवेक काॅलेज पहुॅच गेला।जखन गामक लाेकके ज्ञात भेलैनजे ओ कृषिविज्ञानके अध्ययन कऽ रहल छथि तऽ आश्चर्य भेलैन।सबके भेलैन जे अहि विषयमे हमरालाेकनिके पढ़ाइर्क कियैक आवश्यकता।फेर सबके भेलैन जे विवेक बाबू नर्बनब प्रजाति के बीया़ नर्बनब तरहक खाद़ काेन माटिमे काेन तरहक उपजा बारी नीक आदि के विषयमे खूब बतियाैता।सबबेर जखन छुट्टीमे विवेक बाबू गाम आबैत छलैथ लाेकक कानमे बात जाय ताहिसऽ पहिने घूरि जाई छलैथ।अन्ततः अहिबेर ओ सबके भेटेलैथ।संगी़ कक्का़ बाबा सब कियाे घेर लेलखिन हुनका। अपन विषयमे बाजैमे विवेकबाबूके सेहाे काेनाे असमंजस नहिं छलैन।मुदा हुन्का लग जे ज्ञान रहैन से लाेक सबहक आशा सऽ काेसाे हटिकऽ छलैन।असलमे विवेक बाबू हाइड्राेपाेनिक कल्टीवेसन ह्यपानिमे खेतीहृ के पढ़ाई पढ़ि रहल छलैथ। विवेक बजलाह़ “आब एहेन तकनीकक विकास भऽ गेल अछि जे मात्र पानिमे खेती भऽ सकैत अछि।” सब पुछलखिऩ “मात्र पानिमे । माटिक काेनाे आवश्यकता नहिं ।” “नहिं माटिक काेनाे आवश्यकता नहिं।” “तऽ गाछ ठाढ़ काेना रहैत छहि ।” “पाइप मे भूर कऽ गाछके ठाढ़ कैल जायत छहि।पाइप मे बहैत पानिमे सब आवश्यक तत्व मिला देल जाइत छहि जाहि लेल गाछ पहिने माटि आ खाद पर आश्रित छल।जड़ि पाइप के अन्दर बहैत पानि सऽ सब पाैष्टिक तत्व ग्रहण कऽ लैत छहि।गाछक शेष भाग पाइपके भूर बाटे बाहर रहैत छहि।काेनाे काेनाे गाछके ओकर आकारक अनुसार बाउल आ छाेटकी पाथर के सहारे सेहाे राखल जाइत छहि।” “आमक कलम लागि सकैत छहि कि एनामे ।” “अखन तक तऽ नहिं छहि मुदा जॅं विशेष संकर आ अल्पाकार प्रजाति विकसित हाेय तऽ सेहाे भऽ सकैत छहि”। कनिक कालक चुप्पीक बाद कृषिविज्ञानक ई संगाेष्ठी समाप्त भेल। लाैटैत काल सब के ज्ञात रहैन जे अहि व्यवस्थाक खर्चा पुछनाई बिसरि गेला मुदा अफसाेस नहिं रहैन। कारण जतय सब किछु प्रकृति पर आश्रित अछ़ि जे सुविधा उपलब्ध अछि तकराे प्राप्ति नहिं अछ़ि ओतय एहेन चमत्कारक संकल्पना एक असंभव स्वप्न सन छल।बेर्रबेर सरकार के दाेस ताकि र् ताकि सब थाकि गेल रहैथ।अहि ज्ञान पर तऽ विवेक बाबूके बाहरेे राेजगार लगतैन।गामक एकटा आर प्रतिभा अनका अर्पित भेल। २ कुमार मनोज कश्यप जन्म मधुबनी जिलांतर्गत सलेमपुर गाम मे। बाल्य काले सँ लेखन मे आभरुचि। कैक गोट रचना आकाशवानी सँ प्रसारित आ विभिन्न पत्र-पत्रिका मे प्रकाशित। सम्प्रति केंद्रीय सचिवालय मे अनुभाग आधकारी पद पर पदस्थापित। विहनि कथा (लघुकथा)-उज़डल खोंता गोनमा कोना विसरत ओ दिऩ़ कोना विसरत असक्क, अवाह बापक बेवस , मौलायल चेहरा ; मायक भरि दिनक कुटाऊन-पिसाऊन कऽ कऽ आनल किछु मुट्ठी चाऊर किवा आटा जाहि सँ पूरा परिवारक पेट भरवाक असफल प्रयास ; छोट गदेल भाय-बहीनक भूखल, कृशकाय, अर्धनग्न शरीऱ़। कोना विसरत ओ दिल्ली एबा काल मायक कनैत-कनैत क़ंडजोनी सन भेल आँखि सँ बहैत नोर के नुआँक खूंट सँ बेर-बेर पोछब, बापक बेचारगी भरल सुन्न चेहरा, भाय-बहिनक वुᆬतूहल़़। ओकरा सभ पर विपत्तीक पहाड़ तऽ ओहि दिन टुटि पड़लै जहिया नवका जोड़ल देवाल लऽ दऽ कऽ ओकर बापक देह पर खसि पड़लै । जान तऽ कहुना बाँचि गेलैक ; मुदा दुनू पैर बेकाम भऽ गेलैक । आब ओ भरि दिन ओसारा पर पड़ल टुकुर-टुकुर तकैत रहैत छै़क़ कैयो कि सकैत छै । माईयो कि करतै ? भरि दिन लोकक अंगने-अंगने कुटाऊन- पिसाऊन करैत छै ; तखन जा कऽ केयो आध सेर - एक सेर अनाज दैत छैक । ओकरे कुड़ी जकाँ बाँटि दैत छैक सभ प्राणीक बीच मे़क़ंहुना प्राण रक्षा तऽ करहि पड़तै । कहल जाईत छैक जेठ संतान समय आ परिस्थिति के कारण समय सँ पहिनहि वयस्कं भऽ जायल करैत छैक । से गोनमो पर चरितार्थ भेलै । एक दिन ओ माय लग सहटि कऽ बैसि कऽ डराईत-डराईत कहलकै - ' माय गे, एगो बात कहियौ?' 'की ?' माय हाथ पर मड़ुआक रोटी ठोकैत पुछलकै । ' अपना गामक भोलवा, बदरिया, विलसा सभ दिल्ली जाई हई़क़ंमाई लै । हमरो मोन होईहै हमहुँ जयतौं । ओ सभ कहलक जे काज तुरते भेट जेतै। दू पाई कमईतौं तऽ घरक हालतो सुधरितै ।' - कहि कऽ गोनमा उत्तरक प्रतिक्षा मे मायक मुँह निहारऽ लगलै। मायक हाथक रोटी हाथे मे रहि गेलै । अकचकाईत ओ कहलकै -'तों एखन कोन जोकरक भेलैं जे कमाई लेल जेबैं ? तोरा के नोकरी रखतौ एखन ?' 'हम ओकरा सभ सँ पहिने पुछि लेलियै । सभ कहलक जे नोकरी भेटई मे कोनो भाँगठ नहि छै । शुरू मे काज सिखबाक समय मे कम पाई दैत छैक । बाद मे काज सिख जाऊ तऽ मोट दरमाहा भेटैत छैक । तों बस कतहु सँ हमरा किराया लेल चारि सय रूपैया जोगाड़ कऽ दे।' कोन माय चाहतै जे ओकर संतान ओकरा सँ दूर जाय ; ताहु मे खेलै-खाई के उम्र मे। मुदा परिस्थितिक आगु मे गोनमा माय के झुकहि पड़लै। मलिकानि कतेक दँत-खिष्ठी केलाक बाद आना-दर सूदि पर साढ़े चारि सय रूपैया देने छलखिन ओकरा । चारि सय रूपैया तऽ किराये के भेलै । परदेश जाई छै; तऽ किछु रूपैया तऽ संगो मे रहक चाही बेर-मोसीबत लेल । दिल्ली मे गोनमा के एकटा ज़डी-युनिट मे काज भेटलै। पहिने तऽ ओकरा ज़डीक काज सीखऽ पड़तै । खेनाई-पीनाई आ उपर सँ डेढ़ सय रूपैया सप्ताह मे भेटतै । डेढ़ो सय सप्ताहिक कि कम छैक !छः सय रुपैया महिना के भेलै । आँगुर पर हिसाब लगेलक गोनमा । एके महिना मे मलिकानि के सूदि सहित पाई आपस कऽ देतै । तकरा बाद माय के अँगने-अँगने काज केनाई ओ छोड़ा देत । जखन महिने -महिने माय के मनिआर्डर भेटतै ; तऽ कतेक खुश हेतै माय-बाबू ! जखन काज सीख जेतै आ बेसी पाई भेटऽ लगतै तऽ ओ अपना लेल एकटा जिंस-पैंट आ जूता कीनत । बड़ सौख छई एकर । माय के लेल साड़ी-साया-ब्लाउज, बाबू लेल धोआ धोती आ वुᆬर्ता आओर सभ भाय-बहिन के लेल रंग-विरंगक कपड़ा़। भाय-बहिन सभ के ओ स्वूᆬल मे नाम लिखबा देत । अपने नहि पढ़लक ताहि सँ कीभाय-बहिन पढ़ि-लिखि कऽ बड़का बनै से सपना छै ओकर । भविष्यक रंगीन सपना बुनैत गोनमा खूब मोन सँ काज सिखऽ लागल । ओस्ताद सेहो बड़ मानैत छै छौंड़ा वे ᆬ। की चिक्कंन कसीदा काढ़ैत छै़ज़ेना पहिनहि सँ सिखने हो । ओहि दिन ओस्ताद खुश भऽ कऽ चाय मँगेलाक बाद बँाचल खुदरा पाई ओकरे लग छोड़ि देने छलै। पेᆬर ओकर माथ हँसोथि कऽ कहने छलई ओ- 'ई एक दिन हमरो ओस्ताद निकलत । ' मालिको बड़ मनैत छई छौंड़ा के । ओहि दिन गोनमा किछु बुझि पबितै ओहि सँ पहिनहि ओकर खोंता उजड़ि गेलै। अवाक भऽ ओ देखैत रहि गेल छल ओकर देवता समान मालिक के पुलिस हथक़ंडी लगौने नेने जा रहल छलै। पेᆬर गोनमा सहित सभ काज सिखनाहर सभ बच्चा के दोसर जीप मे बैसा देल गेलै। लोकक गप्प सँ गोनमा के बुझना गेलै जे बाल-मजदूरी करेबा के जुर्म मे मालिक के पुलिस पकड़ि लेलकै । आब गोनमा सहित सभ बच्चा के आपस अपन-अपन गाम पठा देल जेतै जतऽ ओकरा सभ के स्कूल मे नाम लिखा कऽ पढ़ाई के व्यवस्था कैल जेतै । बदहवाश भऽ गेल छल गोनमा । ओकर सपनाक शिशा चूर-चूर भऽ कऽ ओकरा आगू मे पसरि गेल छलै। ओहि फुटल शिशा मे ओकरा नजरि आबि रहल छलै़मायक चिप्पी लागल धिंगी-धिंगी भेल नुआँ सँ लाज झँपबाक असफल कोशिश बाबूक निरीह, बेवस, मौलायल चेहरा़भूख सँ बिलबिलाईत छोट भाई-बहिऩ़सुदि पर उठाओल रूपैया़। कोन मुक्ति भेटलै ओकरा से नहि बुझि पौलक गोनमा । ३ नबोनारायण मिश्र- विहनि कथा (लघुकथा)- घमंडक फल बद्रीबाबूकेँ काबिलक बड़ दाबा छलन्हि। चारि भैयारी मूर्खक बीच एकमात्र पढ़ल लिखल रहबाक कारणे परिवारमे वर्चस्व भेनाइ स्वाभाविके आ एहि वर्चस्वक प्रतिफल जे आश्रम साझी नञि रहि सकल। पैतृक सम्पत्तिक अतिरिक्तो किछु जमीन अर्जित केने छलाह। सरकारी नौकरीमे रहबाक कारणे आमदनीक स्रोत बढ़ियाँ छलन्हि तैं शानसँ कहथिन्ह जे गाममे हमरासँ पैघ के अछि? खर्चोक नामपर एकमात्र कन्यादान छलन्हि जे सस्तेमे सुतरि गेलन्हि। तीनटा बालकमे दूटा छोट-छीन, एकमात्र ज्येष्ठ बालक कौलेजमे पढ़ैत छलन्हि। समाजमे बदी बाबूक घमंडक चर्चा जोर पकरने छल कारण जे साधारणो बातमे लोककेँ कहि दैत छलखिन्ह जे तोरा हम गामसँ उजाड़ि देबह। गामक लोक अवसरक प्रतीक्षामे छल। आमक गाछ लेल झगड़ा बढ़लैक अपना पटीदारीमे आ लोक दुनूकेँ पीठ ठोकि कऽ केस मोकदमामे फँसौलक। बद्रीबाबूसँ लोककेँ बदला लेबाक एहिसँ नीक आर कोन अवसर भेटितैक? गाममे बद्रीबाबूकेँ एकहुटा गवाही नञि भेटलन्हि तैं सिविल कोर्टसँ हाइकोर्ट धरि केस हारिते गेलाह। केस मोकदमामे फँसि गेलाक कारणे आर्थिक स्थिति जर्जर भऽ गेलन्हि। अनका गामसँ उजारैत-उजारैत अपनहि उजरबाक बाट धऽ लेलन्हि आ मुँहमे स्वतः लगाम लागि गेलन्हि। ४. राम विलास साहु विहनि कथा (लघुकथा)- परिश्रमक भीख सोमना बोनिहार अपन परिश्रमसँ परिवारक भरण-पोषण करैत छल। सभ दिन अपन मजदूरिक बोनिसँ खाइत-पीबैत जिनगी बितबैत छल। सोमना जेतबे परिश्रमी ओतबे इमानदार सेहो छल। सोमनाकेँ जइ दिन काज नहि भेटैत छल माने बैसारी रहि जाइत छल ओहि दिन बीना भोजने पत्नी आ बाल-बच्चा पानि पीबि अपन टुटली मरैयामे सुति रहै छल। एक दिन एहिना भेल रातिमे सभ परानी पािन पीबि सुित रहल। भोर भेलापर काज खोजलक मुदा कोनो काज नहि भेटल। सेामना भुखक मारल थािक कऽ दलानपर बैसि छल। पत्नी आ बच्चाकेँ भूखसँ पेट-पीठ एक भऽ गेल। सोमना सभ परानी आँखिसँ नोर बहबैत भगवानसँ याचना करैत कहलक- “हम एत्ते गरीब छी मुदा काजो नहि भेटैत अछि जे परानो बचत। आब हम सभ भूखे परान तियागि देब।” सोमना माथपर हाथ रखने बैसल छल। तखने एकटा हट्ठा-कट्ठा भिखारी आबि कऽ भीख मँगलक। सोमनाकेँ भीख देबाले किछु बँचल नहि छल। सोमना कहलक- “भीख तँ हम नहि दऽ सकै छी, हम दऽ सकै छी परिश्रम।” भिखारी मने-मन सोचमे डुबि गेल ओ सोचलक जे हम शरीरसँ ठीक छी तँ किएक ने हमहुँ परिश्रम करब तँ भीखारीक जीबनसँ छुटकारा पाबि जाएब। भीखारी खुश भऽ बाजल- “आब हमहुँ, भीख नहि मॉंगव अहाँक बचन सुनि हमरो लागल जे आखिर परिश्रमसँ तँ धन भऽ सकैत अछि। बेकार हम भीखक फेरिमे परल छी। आब हम परिश्रमेसँ अपन पेट भरब।” घर- लक्ष्मिनियाँ पोस्ट- छजना भाया- नरहिया जिला- मधुबनी १.जगदीश प्रसाद मंडल- कथा- मइटूगर (गतांस सँ आगाँ) २. राजदेव मंडल- कथा-एलेक्सनक भूत ३.प्रो. वीणा ठाकुर- - कथा- परिणीता (आगाँ) ४. बेचन ठाकुर बेटीक अपमान १ जगदीश प्रसाद मंडल कथा- मइटूगर (गतांस सँ आगाँ) अशौच दुआरे दुनू जोँआ भाए-बहीनिक -धीरज आ घुरनीक- छठियार नहि भेल। ने कियो सोइरी सठनिहारि आ ने ककरो मन कखनो थीर होइत जे नीक-अधलाक विचार करैत। ओना तीनूक- पलहनि, सुनयनया आ तपसीक- मन सदतिकाल बच्चेपर रहैत छलनि मुदा कखनो काल नेकरमसँ अकछि मने-मन सोचैत जे दुनूकेँ ऋृण असुलए भगवान पठौलनि। जते ओकर ऋृण बाकी छै ओते तँ असुले कऽ जान छोड़त। मुदा लगले मन घुरि जाइत जे ब्रह्मो भाग-तकदीरकेँ नहि बदलि सकैत छथि। जँ दुनू बच्चा एहि धरतीक सुख भोगऽ आएल हएत तँ नहियो सेवा-बरदासि करबै तइयो पानिक पाथर जकाँ जीवे करत। मुदा बच्चाक छोड़ि तीनूक -पलहनि, सुनयना आ तपसीक- अपन-अपन जिनगी आ दुनियाँ सेहो छलनि। पलहनिये बेचारी कि करितथि? एक तँ दस-दुआरी दोसर अपनो बाल-बच्चेदार परिवार तइपर सँ तड़िपीवा घरबला। धन्यवाद बूढ़ी सासुकेँ दिआनि जे सुखाएलो-टटाएल हड्डीपर ने कखनो हाथ-पाएर कामै होइत आ ने मुँह सापुट लैत। अखनो वएह रूआव जे कते दिन जीवि तेकर कोन ठेकान। हजार कि लाख आ कि नहिये मरब तेकर कोन ठीक। मुदा साँपक मंत्र जकाँ भरि दिन सुगिया (पलहनि) सासुक नीक-अधला बात सुनैत रहैत मुदा कोनो बातक उतारा नहि दैत। अपन सभ किछु बुझि सासु -झिंगुरी- मालिक जकाँ काजक समीक्षा सदतिकाल करैत रहैत जे कोन-काज केहन उताहुल अछि। जेहन जे काज उताहुल तइ काजकेँ दोसर काज छोड़ि करए लगैत तँए सुगिया सासुक बातो कथा सुनि चुप्पे रहैत। तँए कि झिंगुरी सदतिकाल पुतोहूपर गरमाइले रहैत छलीह। कोना नइ रहितथि, जखन सुिगया कोनो अंगनाक पवनौट, काेनो तीमन-तरकारी वा सिदहा आनि आगूमे दथि वा बैसलोमे टाँग पसारि जँतऽ लगैत तखन वएह सासु ने असिरवाद दै छलखिन जे हमरो औरूदा भगवान तोरे देथुन। यएह ने परिवार छी जे सदतिकाल सुख-दुख, नीक-अधला, हँसैत-कनैत मस्तीमे चैनसँ चलैत रहए। झिंगुरियोक जिनगीमे तहिना भेल। एक्के सन्तानक -बेटा- पछाति विधवा भऽ गेलीह। अपना खेत-पथार तँ नहि मुदा अधा गाम (भैयारीक हिस्सा) तँ खानदानी सम्पति छलैक। जाहिसँ खाइ-पीवैक कोन बात जे दू पाइ बेटोकेँ खाइ-पीबैले दैत रहलीह। भलेहीं बेटा ताड़ी पीआक किअए ने भऽ गेलनि। कि अखनो धरि बेटाकेँ कहियो एकटा खढ़ उसकबै नहि कहलनि। जँ माए-बाप अछैत बेटा केलक तँ माए-बापक मोले की? एहि बातकेँ गीरह बान्हि झिंगुरी कहियो बेटाकेँ कोनो भार अखन धरि नहि देने। भलेहीं बेटा सहलोले किअए ने भऽ जाए मुदा सिद्धान्तो तँ सिद्धान्त छी। ओकरो अपन महत्व छैक। भलेहीं करी वा नहि करी। जँ से महत्व नहि छैक तँ काबिल लोकक बेटा बूड़िबक कोना भऽ जाइत छैक। दसदुआरी रहने सुगियाकेँ घरसँ बाहरे एते काज करै पड़ैत जे दिन-राति रेजानिस-रेजानिस रहैत छलीह। साँझ-भोर, राति-दिन काज। किम्हरो जँत्ते-पीचैक समए तँ किम्हरो बिआउ करैक ताक। धन्यवाद सुगियेकेँ दी जे घिरनी जकाँ सदतिकाल नाचि काज सम्हारैत। तहूमे मइटूगर धीरज आ घुरनीक तँ सहजहि माइये छी। दूध पिऔनाइसँ लऽ कऽ जाँति-पीचि देह-हाथ सोझ करऽ पड़ैत। दसदुआरी रहने दस दिस सेहो आँखि-कान ठाढ़ रखै पड़ैत। जिनगीक काज सुगियाकेँ एहि रूपे पकड़ि नेने जे दोसर दिस तकै नहि दैत। मन कहैत जेकरा अपन माए जीवैत छैक ओरत होइक नाते अपन चिलकाकेँ अपनो सम्हारि सकैए मुदा अइ दुनू -धीरज आ घुरनी- केँ दुनियाँमे के देखिनिहार छैक? हमरा हाथे जन्म भेल छै, जँ पैतपाल नै करवै ते एकर प्रतिवाए ककरा हेतइ। भगवानक घरमे दोखी के हेतइ। वेचारी दादी सुनयना छथिन मुदा अहि उमेरमे दूध तँ नहि छन्हि। सोलाहो आना बकरिये दूधपर तँ दूधकट्टू भइये जाएत। जे बच्चा दूधकट्टू भऽ जाएत ओकर छाती कहियो सक्कत होतइ। खेने-बिनु खेने सुगिया भरि दिन ओहि जंगली जानवर जकाँ नचैत जे बच्चाकेँ दूध पीया, गर लगा सुता चरौर करए जाइत, तहिना। अधवयसू सुनयना अपन राजा बेटा तपसीक दुखक बोझ देखि दिन-राति ओहि बेझकेँ हल्लुक बनवैक लेल एकबट्ट करैत रहैछ। जहिना युद्धभूमिमे अपन राजापर दुश्मनक अबैत तीर देखि सेनापति उपयुक्त तीर तरकससँ निकालि दुश्मनक तीरकेँ रोकैक प्रयास अंतिम साँस धरि करैत तहिना सुनयना तपसीपर अबैत तीर- ‘भगवान केहन डाँग मारलखिन जे जे जाहि काजक लूरि पुरूषक हिस्सामे देबे ने केलखिन ओहि फाँकमे फँसा देलखिन। कोशिकन्हाक खेत जकाँ आिड़-धूर मेटा बालुसँ भरि देलखिन। स्त्रीगण होइत हमहूँ तँ स्त्रीगणक सभ काज (बच्चाकेँ दूध पियाएब) नहिये सम्हारि सकब। जँ एहेन फाँसे लगवैक छलनि तँ आरो नमहर लगा दुनू बच्चोकेँ माइये संगे नेने जइतथि। पुरूखक (बेटा) देह तँ खाली रहितै। मन होइतै चिड़ैक खोंता जकाँ परिवार बना रहैत नै मन होइतै लौका-तम्मा लऽ दुनियाँमे घूमि-फीड़ि जीबैत। जाधरि हम जीबै छी ताधरि माएक ममता पकड़ि रखितै। मुदा तहू बीच जँ पत्नीक सिनेह बेटा-बेटीक सोह जगितै तखनो तँ मन बौरेबे करितै! अनायास सुनायनाक मनमे उठलनि माया-मोहक लत्ती जते दूर धरि चतरै-ए ओते दूर धरि मनुख तँ नहि चतरत। मनुखक तँ बाढ़ि छैक। तहि बीच हम तपसियाक माए भेलिऐ, जते धरि कएल हएत ततबे ने करबै। आकि ओकरा दुखसँ दुखी भऽ अथबल बनि बैसि कऽ कानब। माएक काज जते दूर धरि छै ओइमे कलछप्पन नै करबै। परिवारे ककर छी ककरो नै छी? तखन तँ मनुख रहत घरेमे। खाएत अन्ने, पीति पानिये। जाबे जीबै छी ताबे बुझै छी जे सभ किछु छी आँखि मूनि देबइ अन्हारमे हरा जाएब। फेरि मन घुरलनि हमरा अछैत बेटाक आँखिक नोर देखब हाड़-चामक मनुखकेँ सहल जाएत? ओ तँ पाथरक नहि छी जे कतौ पड़ल रहत। मनुखकेँ तँ चलै-फिरै, सोचै-विचारै, बुझै-सुझैक बखारी छै ओ तँ देखिये-सुनि कऽ चलत। दुनियाँ बेइमान भऽ जाएत भऽ जाए मुदा जहिना तपसीक माए छिऐ तहिना तपसी देखत। ओकरा मनमे कहियो ई नै उपकए देवइ जे दुनियाँक संग माइयो पएर पाछू केलक। ताधरि तपसीक परिवारकेँ पकड़ि सम्हारने रहबै जाधरि बेकावू नइ भऽ जाएत। भगवान केलखिन आ दुनू पिलुआ उठि कऽ ठाढ़ भेल तँ जरूर परिवार फड़त-फुलाएत। अखन बेकावू कहाँ भेलहेँ? अखन तँ सम्हारैबला अछि। माटिक तरमे सजमनि झिंगुनीक बीआ गारि दै छिऐ, समए पावि जहिना ओ जनमि कऽ ऊपर आबि धरतीसँ आसमान धरि लतरि जाइत अछि, मुदा ई तँ (दुनू बच्चा) माटिक ऊपर अछि। जँ समुचित सेवा भऽ जाए तँ जरूर कलैश कऽ गाछ बनत। आशा-निराशाक बीच सुनयनाक मन वृन्दावनक कदमक गाछपर झुलैत राधा-कृष्ण जकाँ झुलए लगलनि। ने अक चलनि ने बक। आँखि निहारि दुनियाँ दिशि देखए लगलीह। दू-पत्ती, चारि-पत्ती सजमनि-झिंगुनीक गाछक, जे लत्तीक आशा अपनाकेँ ठाढ़ रखैत, चारू भाग जहिना छोट-छोट कड़चीक टुकड़ी गारि ओकर रक्षा लगौनिहार करैत तहिना सुनयना फुड़फुड़ा कऽ उठि बड़बड़ेलीह- “अनेर गाएक धरम रखबार।” मुँहसँ अनायास हँसी निकललनि। पितृ प्रमुख परिवारमे पिताक परोछ भेलापर ताधरि मातृ प्रधान परिवार बनल रहैत जाधरि पुत्र पितातुल्य नहि बनि जाइत। ओहुना किछु काजमे मातृत्वे प्रमुख परिवार रहैछ। एक तँ ओहिना बच्चाक पालन मातृ पक्षक काज वुझल जाइत तहिपर सँ अखन धरि तपसी माइयेक आदेशक पालन करैत अबैत, तँए धैन-सन। मुदा तइओ टूटैत परिवार आ नव उलझन देखि मन ओझराए लगलनि। एते दिन खेती-पथारी करै छलौं, दिन-राति ओहिमे लागल रहै छलौं। आब तँ से नहि हएत। एक तँ दिनोदिन माएक हूबा सेहो घटत दोसर बच्चा सभले बकरीसँ गाए धरि पोसए पड़त। ओहिना थोड़े हएत। कहुना करबै तँ खुएनाइ-पीएनाइ, दुहनाइ-गारनाइसँ लऽ कऽ अोगरवाहि धरि करए पड़त। खूँटापर छोड़ि कऽ कतौ जाएबो मसकिल हएत। कुत्ता-बिलाइसँ लऽ कऽ साँढ़ बत्तू धरि उपद्रव करत। ओह से नइ तँ खेत बटाइ लगा देब। जँ से नइ करब तँ नइ सम्हरत। क्रमश: .... २ राजदेव मंडल कथा- एलेक्सनक भूत निन्नक निशामे मातल सुतल छी आ सपना देखि रहल छी। जुलूस जा रहल अछि। इनक्लाब जिन्दाबाद.....। राजनीतिक पार्टी आ पाटीक तरफसँ ठाढ़ नेताक लेल वोट माँगएबला जुलूस। आगूमे नेताक बदला प्लाईवुडक आदमकद फोटो। दुनू जाँघक बीच मोटका लाठी धोंसिया कऽ फोटोकेँ ऊपर उठौने। गर्दमिसान करैत भीड़ निकट आबि रहल अछि। “जीतबे करता-जीतबे करता हमर नेता जीतबे करता। नेताजीक मारि कऽ गोली, बन्न नइ कऽ सकत हमर बोली।” भीड़मे एक दोसरासँ पूछैत अछि- “नेता जीकेँ गोली लगि गेलै की?” “हँ भाय, साँझमे। गोली तँ अजमा कऽ छातीमे मारलकै। लेकिन हुसि गेलै। टाँगमे गोली लगलैक। होसपिटलमे पड़ल छथि। इलाज चलि रहल छै। तहि दुआरे नेता जीक फोटो लऽ कऽ प्रचार कऽ रहल छिऐक।” “सबटा एण्टी पाटीक किरदानी हेतै।” हमर धियान आदमकद फोटोपर अछि। आरे तोरीकेँ, ई फोटो तँ हमरे छी। हू बहू। लगल जेना हम उछलि कऽ फोटोमे ढुकि गेलहुँ। फोटोक बदलामे हमहीं ठाढ़ छी। आ ऊ अगत्ती छौड़ा लाठीपर टँगने हमरा ऊपर नीचा कऽ रहल अछि। दरदक अनुभव होइत अछि। बेसुमार दरद। हम िचचिया रहल छी- “हे रौ, हमरा नीचा राख। एना किएक नाहकमे जान लैत छँ।” भीड़केँ कोनो आँखि-कान होइत छै। के सुनत हमर कानब? मूड़ी उठेलहुँ। आगूमे देखै छी जे एण्टी पाटीक किछु लफंगा सभ घुरिया रहल अछि। किछु लोकक हाथमे झण्डा आ डण्टा अछि। आ रे तोरीकेँ ई सभ तँ डाँड़सँ पेस्तौल निकालि रहल अछि। केयो बम पटकि पड़ाएल। “धुम... धुम... धड़ाम।” सभ भागल जहिंपटार। हमरा लाठी सहित गन्हकैत नालीमे फेंकि देलक। ओहि भभकैत नालीमे हम लसकल छी, नाक मूनने। हल्ला कऽ कहि रहल छिऐ- “हओ, ठाढ़ हुअ। हमरो संग नेने चलह।” किन्तु के सुनत? संकटकालमे तँ लोक केहनो प्रिय बेकतीकेँ संग छोड़ि दैत छैक। आ हम तँ नेता छी....। तेँ हम तँ सबहक प्रिय। किन्तु कियो नहि अबैत अछि। महकैत नालीमे धँसल जा रहल छी। ‘हे देव, डूबै छी। तँ हाथ पाएर मारह।’ नालीसँ निकलबाक लेल हाथ-पाएर जोर-जोर चलेलहुँ। स्त्रीकेँ झकझोरबसँ निन्न टूटि गेल। तामससँ थरथराइत पत्नी बाजि रहल अछि- “दिन कऽ गारि आ रातिमे मारि। हमरा ई जिअ नहि दैत। हम आब रहि नहि सकैत छी।” “देखू एना नहि बाजू। पड़ोसिया सुनत तँ की कहत। हमरा तँ मोने नहि रहल जे घरमे अहाँ लग सुतल छी। हम तँ सपनामे कतऽ सँ कतऽ बौआ रहल छलहुँ। आब अहाँ जे कही।” “अच्छा, अच्छा बुझलहुँ। भोर भऽ गेल छै। दुआरपर सँ कियो सोर पाड़ि रहल अछि। उठू, देखियौक।” “की देखबैक। वएह सभ हेताह।” “के सभ?” “आइ तँ नमनेशन देबाक लेल जाइक छै ने। सँगे-सँग जइबला संगी-साथी सभ।” “ठीके तँ अछि। अहूँ नहा-सोना कऽ तैयार भऽ जाउ। चलि जाउ सवेरे।” “धुर, हमरा राजनेति करनाय ठीक नहि लगैत अछि। ई कोनो नीक करम नहि अछि।” “हेओ, अहाँ सपनामे धसना खसैत तँ नहि देखलिऐक। आकि एलेक्सनक भूत चॉंपि देलक। काल्हि तक जाहि राजनेतिक गुण-गान करैत छलिऐक। आइ ओकरा अधलाह कहैत छिऐ।” स्वरकेँ अकानैत फेर बजली- “अच्छा जाइयौ, दुआरिपर सँ सोर पाड़ैत अछि।” हाथ-मुँह धो कऽ हम दुआरिपर पहुँचलहुँ। देखैत छी- गौआँ-धरूआ, सँगी-साथी किछु नव सिखुआ नेता सभ एका-एकी दुआरिपर जमा भऽ रहल अछि। एकटा छोटका भीड़ सन। भीड़सँ स्वर निकलि रहल अछि- “अँए यौ, अखनी तक अहाँ तैयार नहि भेलहुँ। कागज-पत्तर लिअ। आ जल्दी चलू। सभसँ पहिले।” “हॉं-हाँ सभसँ पहिलुक नमनेशन अपने सभकेँ दाखिल हेबाक चाही।” क्रमश: ३ प्रो. वीणा ठाकुर कथा परिणीता (आगाँ) आइ डोमेस्टिक एयर पोर्ट दिल्लीमे श्यामाक भेँट नीलसँ भेल छलन्हि। श्यामा थोड़ेक काल धरि हतप्रभ रहि गेल छलीह। नील-नील कहि मोनक कोनो कोनमे हहाकारक लहरि उठि गेल छल। एतेक वर्ष बीत गेल। नील एखनहुँ ओहने छथि, कोनो परिवर्त्तन नहि भेल छन्हि। आकर्षक नील, हँसमुख नील, पुर्ण पुरूष नील, उच्च पदस्थ नील, नील-नील। श्यामा कहियो नीलकेँ बिसरि नहि सकल छलीह। सभटा प्रयासश्यामाक विफल भऽ गेल छल। नील सदिखन छाया सदृश्य श्यामाक संग लागले रहलथि। नील कतेक दूर भऽ गेल छथि, श्यामा आब चाहियो कऽ नीलकेँ स्पर्श नहि कऽ सकैत छथि, ओहिना जेना छाया संग रहितहुँ स्पर्श नहि कएल जा सकैत अछि, मनुष्यक संग छायाक अस्तित्व तँ सदिखन रहैत छैक, मुदा ओकर आकार तँ सदिखन नहि रहैत छैक। श्यामाक जिनगी नील, श्यामाक सोच नील, श्यामाक सभ िकछु नील। श्यामाक तन्द्रा भंग भऽ गेल छल, नीलक चिर परिचित हँसि सुनि, नील आश्चर्यचकित होइत प्रसन्न भऽ कहने छलाह- “श्यामा, माइ डियर फ्रेंड हमरा विश्वास होइत अछि, अहाँ फेर भेँट हएत। श्यामा अहाँ एखनहुँ ओहिना सुन्दर छी, यु आर टु मच ब्युटिफुल यार, आइ कैन नॉट विलिभ।” और पुन: ठहाका मारि हँसने छलाह। नील संगक युवतीसँ श्यामाक परिचए करबैत कहने छलाह- “श्यामा, मीट माइ वाइफ नीलिमा, ओना हमर नीलू- नीलू माइ वेस्ट फ्रेंड श्यामा।” नीलू बहुत शालीनतासँ श्यामाक अभिवादन करैत कहने छलीह- “गुड मॉनिंग मैम।” और नील हँसेत बाजि गेल छलाह- “देखू हम आइयो अहाँक पसन्दक ब्लू पैंट शर्ट पहिरने छी।” किछु आॅपचारिक गप्प भेल छल। एयरपोर्टपर एनाउन्समेंट भऽ रहल छल, संभवत: नीलक फ्लाइटक समए भऽ गेल छल। श्यामा पाछासँ नील और श्यामाक जोड़ी निहारैत रहि गेल छलीह। कतेक सुन्दर जोड़ी अछि- राधा-कृष्ण सदृश्य। नीलिमा कतेक सुन्दर छथि, एकदमसँ नील जोगड़क। लगैत अछि जेना ब्रह्मा फुर्सतमे नीलिमाकेँ गढ़ने होएथिन्ह। सुन्दर, सुडॉल शरीर, श्वेत वर्ण, सुन्दर लम्बाइ, उमंग और उत्साहसँ पूर्ण नीलिमा। नीलिमाक प्रत्येक हाव-भाव सुसंस्कृत होएवाक परिचायक अछि। श्यामा अपलक देखैत रहि गेल छलीह। तावत धरि जावत दुनू श्यामाक आँखिसँ ओझल नहि भऽ गेल छलथि। घर अएलाक पश्चात् बिनु किछु सोचने आएना लग आबि अपनाकेँ देखय लागल छलीह। केशक एकटा लटमे किछु श्वेत केश देखि श्यामाकेँ आश्चर्य भेल छलन्हि जे एखन धरि हुनक नजरि एहिपर नहि पड़ल छल। फेर जेना श्यामाकेँ संकोच भेल छलन्हि जे अबैत देरी आखिर अएनामे की देख रहल छथि। भरिसक नीलक प्रशंसा एखनहुँ श्यामाकेँ ओहिना आह्लादित कऽ गेल छल। ई तँ किछु वर्ष पहिने होइत छल। आब तँ प्राय: श्यामा नीलकेँ, नीलक संग बितायल क्षणकेँ बिसरवाक प्रयास कऽ रहल छथि। आखिर नील एखन धरि श्यामाक मस्तिष्कपर ओहिना आच्छादित छथि। समएक अन्तराल किछु मिटा नहि सकल। मिटा देलक तँ श्यामाक जिनगी, श्यामाक खुशी। श्यामाक जिनगी भग्न खण्डहर बनि कऽ रहि गेल, जाहिमे नील आइ हुलकी दऽ गेल छलाह। की नील एखन धरि श्यामाकेँ बिसरने नहि छथि? श्यामाक पसन्द एखनहुँ मोन छन्हि? श्यामाक महत्व एखनहुँ बॉंचल अछि? नहि तँ नील एना नहि बजितथि। चारू-कात देखलनि, ओछाओनसँ लऽ कऽ टेबुल धरि किताब छिड़ियाएल छल। मोन थोड़ेक खौंझा गेल छलन्हि, एहन अस्त-व्यस्त घरक हालत देखि। तथापि किताब एक कात कऽ श्यामा अशोथकित भऽ ओछाओनपर पड़ि रहल छलीह। मोन एकदम थाकि गेल छल, मुदा दिमाग सोचनाइ नहि छोड़ि रहल छल। श्यामा अपन आदत अनुसार डायरी लिखैले बैसि गेल छलीह। आजुक पन्ना-नीलक नाम- नील, आजुक पन्ना अहाँक नाम अछि। हमरा बुझल अछि, आब नहि तँ हमर डायरी कहियो जबरदस्ती पढ़ब, नहि हमरा पढ़ब। नील पाँच वर्ष अहाँक संग बिताएल अवधि हमर जीवनक संचित पूँजी थिक, एहि पूँजीकेँ बड़ नुका कऽ मोनक कोनमे राखने छलहुँ। कतहु एहि अमूल्य निधिकेँ बॉटवाक इच्छा नहि छल, कागजक पन्नोपर नहि। मुदा आइ एतेक पैघ अन्तरालक पश्चात, अहाँकेँ देखि मोन अपना वशमे नहि रहल। मोन की हमरा वशमे अछि। अहाँक संग रहि हम तँ दिन-दुनियाँ बिसरि गेल छलहुँ, कहियो किछु कहबाक इच्छा होएबो कएल तँ अहाँ सुनए लेल तैयार नहि भेलहुँ। अहाँ सतत् कहैत रहलहुँ- “हमरा अहाँक मध्य नहि कहियो तेसर मनुष आएत और नहि कोनो व्यर्थक गप्प, बस मात्र हम और अहाँ, और किछु नहि।” हम मन्त्र मुग्ध भऽ अहाँक गप्प सुनैत सभ किछु बिसरि गेल छलहुँ। मुदा आइ सभ किछु बदलि गेल। आइ जँ सभ किछु लिख अहाँकेँ समर्पित नहि कऽ देब तँ मोन और बेचैन भऽ जाएत। अहाँ हमरासँ दूर भऽ गेल छी, तथापि आइ सभ किछु, जे नहि कहि सकल छलहुँ, हम डायरीमे लिख रहल छी। जखन हम अपनाकेँ अहाँकेँ समर्पित कऽ देलहुँ, तखन किछु बचा कऽ राखब उचित नहि। हमर पिता उच्च विद्यालयमे शिक्षक छलाह, नाम छलन्हि पं. दिवाकर झा। हम दु बहिन एक भाए छी, हम सभसँ पैघ, बहिन श्वेता और भाए विकास। हमर वर्ण किछु कम छल, ताहि कारणे बाबूजी आवेशमे हमर नाम रखलन्हि श्यामा। बाबूजी हरदम कहैत छलाह- “ई हमर बेटी नहि बेटा छथि, हमर जीवनक गौरव छथि श्यामा।” छोट बहिनक नाम श्वेता अछि, श्वेता गौर वर्णक छथि, तेँ माए श्वेता नाम राखने छलथिन्ह। मैट्रिकमे हमरा फर्स्ट डिविजन भेल तँ बाबूजी कतेक प्रसन्न भेल छलाह। महावीर जीकेँ लड्डु चढ़ौने छलाह। सौंसे महल्ला अपनहिसँ प्रसादक लड्डु बॉंटने छलाह। हमरा जिद्दसँ कॉलेजमे हमर नाम लिखओल गेल छल। माए तँ विरोध कएने छलीह। जखन हम बी.ए. पास कऽ गेलहुँ, तँ हमर वियाहक चिन्ता बाबू जीकेँ होमए लागल छलन्हि। एकठाम वियाह ठीक भेल तँ बड़क माए-बहिन हमरा देखय लेल आएल छलथि, मुदा श्वेताकेँ पसिन्न करैत अपन निर्णए सुना देने छलथिन्ह जे अपन बेटाक विआह श्वेतासँ करब। बाबूजी कतेक दुविधामे पड़ि गेल छलाह। पैघ बहिनसँ पहिने छोटक विआह कोना संभव अछि। मुदा माए बाबूजीकेँ बुझाबैत कहने छलथिन्ह-“जे काज भऽ जाइत छैक से भऽ जाइत छैक। विआह तँ लिखलाहा होइत छैक।” नील शास्त्रक कथन अछि-माए बापक असिरवाद फलित होइत छैक। जँ असिरवाद फलित होइत छैक तँ माए बापक निर्णए सन्तानक भाग्यक निर्धारण सेहो करैत हेतैक। भरिसक माएक निर्णए हमर भविष्य भऽ गेल। श्वेताक विआह ओहि वरसँ भऽ गेलनि। अर्थशास्त्रक एम.ए. कएलाक पश्चात विश्वविद्यालयक पी.जी. डिपार्टमेन्टमे हमरा लेक्चररक नौकरी भऽ गेल। ताहि दिन हमरा बुझाएल छल, जेना जीवनक सभटा उद्देश्य पूरा भऽ गेल अछि। बुझबे नहि कएलहुँ, जे एकरा आगाँ सेहो जिनगी छैक। जावत बुझलहुँ तावत सभ समाप्त भऽ गेल छल। जखन पढ़ैत छलहुँ, महिला शिक्षिकाक पहिरब ओढ़ब, वेश-भूषा हमरा वड़ आकषिर्त करैत छल। हमरा आदर्शमे इहो समाहित भऽ गेल छल। हल्लुक रंग साड़ी पहिरब हमर शौख भऽ गेल छल, भरिसक तेँ हमर जिनगी रंग विहिन भऽ गेल। खैर, बाबुजीक प्रसन्नताक कोनो सीमा नहि छलैन्हि। किछु मासक बाद बाबुजी रिटायर भऽ गेल छलाह। स्कूलक शिक्षकक दरमाहा कम छल, बाबूजीक पेंशनसँ घरक खर्च, विकासक इन्जिनियरिंगक पढ़ाइ संभव नहि छल। हमरा पहिल बेर जहिना दरमाहा भेटल, माएक हाथमे राखि देने छलहुँ, तकरा बाद ई एकटा नियम बनि गेल छल। मुदा बाबुजीक मोनमे सतत् एकटा अपराध बोध होइत छलैन्ह। बाबुजी मुँहसँ तँ किदु नहि बजैत छलाह, मुदा हुनक आँखि सभ किछु कहि दैत छल। किछु दिनक बाद बाबुजी एकदमसँ चुप रहए लागल छलाह। माएक व्यवहारमे सेहो परिवर्त्तन भऽ गेल छलैन्ह। हमरा प्रति बाबुजी माएक सिनेह क्रमश: आदरमे परिवर्तित होअए लागल छल। शुरू-शुरूमे एहि आदरसँ हम कतेक असहज भऽ जाइत छलहुँ, पहिने छोट-छोट चीज लेल जिद्दक अधिकार छल, मुदा ई आदर तँ हमरा बहुत रास अधिकारसँ वंचित कऽ देलक। हमरा सतत् लगैत छल जे आहिस्ता-आहिस्ता कर्त्तव्य मजबूत पाशमे हम बान्हल जा रहल छी। हमर स्वतन्त्रता छोट होइत गेल और हम असमए पैघ होइत गेलहुँ। तावत धरि हम बुझवे नहि कएलहुँ जे प्रत्येक मनुष्यक व्यक्तिगत जिनगी होइत अछि, भविष्यक कल्पना होइत अछि और होइत अछि उमंग, उत्साह। बाबुजीक मृत्यु हार्ट अटैक सँ भऽ गेलनि। मृत्युकाल बाबुजीक मुँहपर आच्छादित निरीह भाव, आँखिमे पश्चाताप, ओहिना मोन अछि। बाबुजीक मुँहसँ किदु नहि कहलैथ, मुदा हुनका आँखिक कातरता सभ किदु कहि गेल। आब हम घरक मात्र बेटी नहि रहि गेल छलहुँ। हम घरक कमौआ बेटी, पालन केनिहारि गार्जियन भऽ गेल छलहुँ। विकास पढ़ैत छलाह, हुनक पढ़ाइ, विवाह सभटा हमर उत्तरदायित्व भऽ गेल। ई छोट-छीन गृहस्थी समएक अनुसार चलैत रहल। विकासक पढ़ाइ समाप्त भऽ गेल छलनि, विवाह लेल कन्यागत आवए लागल छलाह। विकाससँ हम विवाह लेल पुछलहुँ, पहिने तँ ओ तैयार नहि भेलाह, बेर-बेर कहैत रहलाह- “दीदी, जावत अहाँक विआह नहि अएत, हम विआह नहि करब।” कतेक बुझौने छलहुँ, अन्तमे हमरा कहए पड़ल जे अहाँक विआह, सेट्लमेन्ट, अहाँक घर बसाएब हमर दायित्व अछि, तखन विकास स्वीकृति देने छलाह। कतेक उत्साहसँ विकासक विवाह कएने छलहुँ। पी.एफ.सँ अधिकतम लोन लऽ कऽ सभटा खर्च कएलहुँ। एक-एक वस्तु कपड़ा, गहना माए अपना इच्छासँ कीनने छलीह। विकासक विवाह सम्भ्रान्त परिवारमे भेल, कनिया पढ़ल-लिखल सुन्दर सुशील छथि। मुदा एकटा बात अछि, सुशीलो व्यक्ति मुँहसँ कहियो एहन कटुसत्य बहरा जाइत अछि, जकर प्रहारसँ दोसरक आत्मा छिन्न-भिन्न भऽ जाइत छैक। एक बेरक घटना हमरा एखन धरि बिसरल नहि भेल अछि, होएबो नहि करत। विकासक बेटा मोनु स्कूल गेल छल, स्कूलसँ अएबामे थोड़ेक देरी भऽ रहल छलैक। विकासक कनियाँ पूजाक बेचैनी देखि हमरा रहल नहि गेल। हम पूजाकेँ भरोस दैत कहने छलहुँ- “परेशान नहि होउ, मोनु अबैत हएत, किछु कारण भऽ गेल हेतैक।” पूजा निछोह भेल बाजि गेल छलीह- “अहाँ की बुझबैक सन्तानक दर्द। एतेक सुनैत।” हम अवाक रहि गेल छलहुँ। पूजा कहलैथ तँ सत्य। मुदा ई सत्य एतेक कटु छल जे हमर आत्मा क्षत-विक्षत भऽ गेल। की हमरा मोनमे मोनु, पूजा आ विकास लेल सिनेह नहि छल। की मात्र कोखिसँ जन्म देलासँ मातृत्वक भाव अबैत छैक? की हम विकासक भविष्यक चिन्तामे अपन जीवन उत्सर्ग नहि कऽ देलहुँ? हमर एतवे महत्व। खएर पूजा नहि बुझैत छथि ताहिसँ की। विकास तँ हमरा बुझैत छथि। यएह सोचि मोनकेँ सांत्वना दैत रहलहु। मुदा मोन की सांत्वनाक भाषा बुझैत छैक। मुँहसँ तँ किछु नहि बाजि सकललहुँ। मुदा तकरा पश्चात् एकटा हीन-भाव क्रमश: हमरा मोनमे बढ़ैत गेल। आब बेधड़क मोनुकेँ दुलारो करवामे हमरा संकोच होअए लागल छल। पहिने हम जाहि अधिकारसँ पूजा मोनुक संग रहैत छलहुँ, आब संकोच होअए लागल छल। नहि जानि कोन बात पूजाकेँ अप्रिय लागि जएतनि, किछु कहैसँ पहिने अनायास सर्तक भऽ जाइत छलहुँ। किछु दिनक वाद विकासकेँ इग्लैण्डमे बढ़िया नौकरी भऽ गेल छलैन्ह। िवकास हमर सहमतिक बाद विदेशक नौकरी स्वीकार कएने छलाह। आइओ मोन अछि, जाहि दिन विकास सपरिवार विदेश गेल छलाह, ओहि राति हमरे बिछाैनपर सुतल छला। विकास कतेक कानल छलाह, हमहुँ अपनाकेँ रोकि नहि सकल छलहुँ। विकास जाइतो काल एकेटा बात कहने छलाह- “दीदी, बाब अहाँ कोना रहब, अपन ख्याल राखब।” ओना विकास छथि तँ हमरासँ छह वर्ष छोट, मुदा परिवारक परिस्थिति हुनकहुँ बुजुर्ग बना देने छल। विकास छोट छथि, ताहिसँ की। यएह उत्तरदायित्व बोध तँ पुरूषक पुरूषत्वक छिऐक, जाहिसँ ओ परिवारक गार्जियन भऽ जाइत अछि। बाबुजीक मृत्युक पश्चात विकास टुटलथि नहि, किएक तँ सहारा हम भऽ गेल छलहुँ। मुदा जावत विकास सभ तरहसँ व्यवस्थित भऽ गेलथि। हमरो उत्तरदायित्व लेवय चाहैत छलाह। खएर विकास विदेश चलि गेलथि। हमहुँ निश्चिन्त भऽ गेल छलहुँ। आव घरमे मात्र हम और माए बचि गेल छलहुँ। कोनो उत्साह नहि, समए अपनहि बितैत जाइत अछि, जिनगीओ बित रहल छल। ओहि समएमे नील वसंतक झोंक बनि अहाँ हमर जिनगीमे आएल छलहुँ। हमरा एखनहुँ ओहिना मोन अछि, हम कॉलेज जएबा लेल तैयार भऽ कऽ घरसँ निकलल छलहुँ। रिक्शा थोड़ेक दूर चौराहापर भेटैत छल। अहाँ हमरा बगलमे गाड़ी रोकि कतेक विश्वाससँ बाजल छलहुँ- “हम नील, एयर इण्डियामे पाएलट छी, अहाँक पड़ोसी, अहाँ कतए जाएब, चलू छोड़ि दैत छी।” हम निर्विकार स्वरे अहाँक अस्वीकार कऽ देने छलहुँ। अहाँ फेर बाजल छलहुँ- “हम अपना परिचए तँ दऽ देलहुँ, अहुँ तँ किछु बाजु।” हम अहाँकेँ टारवाक उद्देश्यसँ कहने छलहुँ- “हमर नाम श्यामा छी, और हम विश्वविद्यालयक पोस्ट ग्रेजुएट विभागमे अर्थशास्त्र पढ़बैत छी।” अहाँ कनेक मुस्कुराइत, हमरा दिश तकैत गाड़ीमे बैसि गेल छलहुँ। नील अहाँक मुहँक स्मित भाव, आत्मविश्वाससँ भरल स्वर, हमरा मस्तिष्कमे एहन कऽ अंकित भऽ गेल जे एतेक वर्ष बितलाक पश्चातो ओहिना सभटा मोन अछि। लगैत अछि जेना ई आजुक घटना थिक। तकरा बाद आठ दिन धरि अहाँसँ भेँट नहि भेल छल। नहि जानि किएक कोनमे नुकाएल अहाँसँ भेँटक इच्छा बलवति होअए लागल छल। तकरा बाद एक दिन जखन हम िडर्पाटमेन्टमे बैसल छलहुँ, चपरासी समाद कहने छल जे विजिटिंग रूपमे एक गोटे भेँट करवा लेल बैसल छथि, और अहाँक कार्ड हमरा देने छल। नाम पढ़ि हम कतेक उद्विग्न भऽ गेल छलहुँ और अहाँ कतेक अह्लादित होइत, मुस्कुराइत हमर स्वागत कएने छलहुँ। हमरा लागल छल जेना एहि मुस्कुराहटसँ हम कतेक परिचित छी। बिना किछु पुछने अहाँ जल्दी-जल्दी बाजल छलहुँ जे फ्लाइट लऽ कऽ अहाँ अमेरिका गेल छलहुँ, ताहि कारणे एतेक देरी भऽ गेल। किंचित अहाँक हड़बड़ी बजवाक शैली सुनि हमरा हँसि लागि गेल छल। और अहाँ आर्श्चचकित होइत बाजल छलहुँ जे- भगवानक शुक्र अिछ, अहाँ हँसलहुँ तऽ।” और कॉफि हाउसक अहाँक निमन्त्रण हम अस्वीकार नहि कऽ सकल छलहुँ। ओहि दिन अहाँसँ दाेसर बेर भेँट कॉफी आउसमे भेल छल। बिना किछु पुछने अहाँ अपन विषएमे कहने छलहुँ जे अहाँक माँ, बाबुजी दुनू डॉक्टर छथि, अहाँ बैचलर छी और माँ-बाबुजीक एक मात्र सन्तान छी, उम्र पचीस वर्ष अछि, एयर इण्डियामे पायलट छी। हम ताहिपर कहने छलहुँ जे हमर उम्र तीस वर्ष अछि। हमर बात सुनि अहाँ हँसैत कहने छलहुँ जे- “दोस्तीमे उम्र कतयसँ आबि गेल।” तकरा बाद अहाँ कहलहुँ जे पता लगा लेने छी जे आहाँ हॉस्टल सुपरिटेन्डेन्ट भऽ गेल छी और सुपरिटेन्डेन्ट क्वाटरमे शिफ्ट कऽ गेल छी। नील, हम कोना कऽ कहितहुँ जे हम अपन घर छोड़ि क्वाटरमे किएक शिफ्ट कऽ गेलहुँ। भला लाजक बात की बाजल जाइत छैक। असलमे ई भेल छल जे श्वेता हमर छोट बहिनक पतिक ट्रान्स्फर अहि शहरमे भऽ गेल छल, माएक घरपर तँ श्वेताक अधिकार सेहो छल, श्वेता अपन पति और बच्चाक संग माएक घरमे रहय लेल आबि गेल छलीह। माएकेँ बड्ड प्रसन्नता भेल छलैन्ह और माएक प्रसन्नता देखि हम चुप रहि गेल छलहुँ। नहि जानि किएक हमरा नीक नहि लागल छल, यद्यपि घरक वातावरण बदलि गेल छल मुदा हमरा श्वेताक पतिक सभ किछुमे दखल अन्दाजी नीक नहि लगैत छल। हम बेचैन रहय लागल छलहुँ। माए सेहो हमर भावनासँ अनभिज्ञ छलीह। संयोगसँ हाेस्टल सुपरिटेन्डेन्ट बनवाक हमरा अवसर भेटल और हम एहि अवसरकेँ वरदान बुझि स्वीकार कऽ लेलहुँ। एहि पद लेल हमरासँ वेशी उपयुक्त और कोनहुँ महिला शिक्षिका नहि छलीह। किएक तँ सभ शादी-सुदा छथि, सभकेँ परिवार छन्हि, गृहस्थी छन्हि और हमरा तँ नहि आगु नाथ नहि पाछु पगहा। यद्यपि संजोगि कऽ बसाएल घरसँ हमर ई पलायन छल मुदा छल उपयुक्त अवसर, हम होस्टल शिफ्ट कऽ गेलहुँ। क्रमश: ४ बेचन ठाकुर बेटीक अपमान दृश्य छठम- (स्थान-दीपक चौधरी आवास। दलानपर दीपक चिन्तित मुद्रामे बैसल छथि। ललका धोती ओ बदामी कुरता पहिरने छथि। तखनहि दीपकक एकटा पड़ोसीक प्रवेश जनिक नाम झामलाल महतो छन्हि। झामलाल- (दीपकसँ) की यौ दीपक बाबू, बड़ मनहुस देखि रहल छी। की कारण थिकैक। दीपक- नहि कोनो खास बात। झामलाल- जखन कोनो खास बात नहि अछि तखन एना चिन्तित किएक छी? हमरा लागि रहल अछि जे समधीन अहाँकेँ अपन ओजारसँ घरमे बन्द कए थुरलन्हि। दीपक- छोड़ू मजाक-तजाक। एखन हमरा अनसोहाँत नीक नहि लागैत अछि। गूड़क मारि धोकरे जानैत अछि। अपन हारल बौहक मारल छी झामलाल- समधीन रातिमे गरम दूध नहि पीएलन्हि? दीपक- किएक कप्पार खाइत छी? चुपचाप बैसू। झामलाल- चुपचाप हम किएक बैसब? हम अहीं जेकाँ बौहक मारल छी क? दीपक बाबू, चिन्ता फीकीर छोड़ू। कहु की भए गेल? (हँसि कऽ) दीपक- अहाँ नहिए मानब की? झामलाल- कोना मानब? हम किनको उदास देखैले नहि चाहैत छी। ताहुमे अहाँ पड़ोसी िथकहुँ। हरदम प्रसन्न रहू, प्रसन्न। दीपक- की प्रसन्न रहब झामलाल? मामापर पूर्ण विश्वास कए ई कुटमैटी कएलहुँ। मामा गरदनिमे फाँस लगा देलक। झामलाल- से की? दीपक- यएह जे सोन सनक बेटाकेँ टलहा सनक स्वागत नहि नगद, नहि बरतन, नहि बासन, नहि कपड़ा, नहि लत्ता, नहि लकड़ी, नहि बकरी, नहि डाली, नहि हारी, नहि बिदाइ, नहि गोर लगाइ। सभ किछुमे ठक-ठक सीताराम। झामलाल- ई तँ साफे ठकि लेलनि कुटुम। अहाँ एहेन खतम छी, से नहि बुझल छल। दीपक- देलनि कुटुम सभ किछु। मुदा जत्तऽ एक लाख होएबाक चाही ओत्तऽ सिरीफ एक सए। दूधक डारही। झामलाल- बहुते भेटल दीपक बाबू बहुते। बेचारा नवका मास्टर छथि। जे हुनका संभव भेलनि, से सभ किछु देलनि आ अहींक बेटा कोनो हाकिम-हुकुम छथि की? छेाड़ू लेन-दन, दहेज-तहेज। कहु लड़िकी केहेन भेटल? दीपक- हँ ई पुछलहुँ खल से। (प्रसन्न भए) लड़िकी तँ सौंसे गाममे एहेन सुन्नरि नहि हेतीह। हजारोमे नहि लाखमे एगो छथि। देखबनि तँ जीसँ पानि खसि पड़त। झामलाल- तहन अहाँ हारल नहि छी, जीतल छी। बाजी मारि लेने छी एहि अल्ट्रसाउण्डक जुगमे। देखब, किछु दिनक बाद बेटी बिलुप्त भए जेतीह। सौं कतउ- कतउ भेटबो करतीह तँ ओकरा बाबा डिहबार जेकाँ पूजा करए पड़त। एहि देहेजक जुगमे ओ अल्ट्रासाउण्डक जुगमे बेटी बनि जाएत पीर मियां। अोहिमे अहाँ एखन धरि छक्का मारने छी। दीपक- से तँ जे कही। मुदा दहेजक लोभमे करजा कऽ कए धुमधामसँ बेटा बियाहलहुँ। ओहिमे भेटल डपोरशंख। हम एहि चिन्तेँ मरि जाएब। झामलाल- हम तँ अहाँकेँ कहब जे भगवतीपर भरोसा राखी आ हरदम प्रसन्न रही। मुदा अपनेक जे विचार? हम जए रहल छी दीपक बाबू। हमरा पोखरि दिशि लागि गेल अछि। हमरा गोटेक सप्ताहसँ सुलबाइ भए रहल अछि। दीपक- तहन जल्दी जाउ पोखरि दिशि। (झामलाल धोती पकड़ने भागलथि) तेँ बड़ी कालसँ पहकैत छल। नाक नहि देल जाइत छल। (फेर चिन्तित मुद्रामे बैसैत छथि) एहेन बुझितहुँ तँ बेटाक बियाह नहि करितहुँ। सोचने रही जे ओ जमीन कीनि कऽ मकान बनैबतहुँ ओ करजा-बरजा झारितहुँ। मुदा आब तँ करजो सधेनाइ मुश्किल। एक तँ हम बेमार रहैत छी आ दोसर माथपर करजाक बोझ आब हम एहि बेत्थेँ मरि जाएब, लागि रहल अछि। *पटाक्षेप* अंक तेसर दृश्य पहिल- ३. पद्य ३.१.सतीश चन्द्र झा-
नेन्ना तेतरी ३.२. राजदेव मंडलक पाँचटा पद्य ३.३.ज्योति सुनीत चौधरी-प्रजातन्त्रक खेल ३.४.१.राजेन्द्र चौधरी (१९४०- )- दूटा पद्य २. राम बिलास साहु- चौवनिया नेता ३.५.कालीकांत झा "बूच"-चारिटा पद्य ३.६.१.चन्द्रशेखर कामति- दूटा गीत २.राजेश मोहन झा- पद्य ३.किशन कारीग़र- गलचोटका बर ३.७.गंगेश गुंजन- ३ टा गजल-पद्य ३.८.डॉ राजीव कुमार वर्मा आ डॉ जया वर्मा- हमर गाम सतीश चन्द्र झा
नेन्ना तेतरी
नोकर चाकर गाड़ी बंगला रोब दाब हाकिम छथि बड़का। सौ सैकड़ सँ कम नहि सेवक अछि लागल सेवा मे हिनका।
आप्त सचिव छथि ई मंत्री कें व्यस्त लोक दिनचर्या भारी। उच्च पदक अभिमान देह मे उज्जर देह मोन सँ कारी।
पोछि रहल छल ओत्तहि पक्का नेन्ना तेतरी रगड़ि-रगड़ि क’। व्यस्त छला बाबू लिखबा मे काल्हिक भाषण किछु गढ़ि-गढ़ि क’।
मंत्री के भाषण छल काल्हिये अपन क्षेत्र मे बाल दिवस पर। शिक्षा भोजन वस्त्र गरीबक बाल मजूरी -पाप विषय पर।
उड़लै किछु पन्ना बाबू के भीजल पक्का पर उधियाक’। तेतरी के द’ दोष क्रोध मे दौड़ गेला बाबू चिचियाक’। पड़लै थापर ओकर पीठ पर मायक बदला आबि गेल छल। सीखि रहल छल काज गरीबक कानि कानि क’ लाल भेल छल।
मेटा गेल छल कागत पर सँ बाल दिवस कें शब्द उखड़िक’। जीवि रहल अछि स्नेह भावना सभ कागत पर मात्र उतरिक’। राजदेव मंडलक पाँचटा पद्य 1) दिलक बोल शब्द नहि रहल दिलक बोल तेँ नहि रहल ओकर मोल औनाइत रहल ओ अपनहि खोल कतबो करब अनधाेल बजैत रहैत छी अमरीत बोल भीतर रखने बीखक घोल नाश भऽ जाएत जीनगी अनमोल जहिया टघरत बीखक घोल एकदिन खुगि जाएत सभटा पोल मुखमे राम बगलमे छुरी सभ करत तब थुड़ि-थुड़ि दिलक बोल अछि शब्दक जान दुनू मिलि देत मान सम्मान।। 2) अहिंसक वीर अहाँ कहैत छी- कायर बनबसँ नीक हिंसक भऽ जाएब से अछि ठीक लोग कहत- वाह-वाह किन्तु हमरा लगैत अछि ई अधलाह कायर मारि दैत अछि अपने आपकेँ दाबि लैत अछि अपन दुख आ तापकेँ हिंसा कऽ सकैत अछि दुरजन हिंसक नहि कऽ सकैत अछि सिरजन दुनूमे अछि अपन-अपन अवगुन आ गुन एहि दुनूसँ ऊपर अहिंसक वीर -धीर- गम्भीर दृष्टिमे हो आमजनक पीड़। 3) मनोवांछित चान दीर्घ कामनाक भऽ गेल अवसान लगमे अछि बैसल मनोवांछित चान दमकैत आ गमकैत किशलय समान किन्तु देिख ओकर मुख म्लान बिसरि गेलहुँ हम मिलन गान पसरल नोर आँखि आर मुख कहि रहल अछि एक-एक दुख भाग्यसँ भऽ गेल बाइर फेर ने हुसि जाए पाइर- शंकासँ भरल ओकर मन नव स्पर्शसँ कंपित तन तेँ राखए चाहैत अछि सम्हारि दूइ बून्न आँखिसँ नोर झड़ल हमरो तब बाजय पड़ल धीरज धरू छोड़ू पुरान आस नूतन अछि सोझा तहिपर करू विश्वास घुरि अएलहुँ अहाँ अपना घर हमरा रहैत नहि करू कोनो डर फुलाएल एक एक अंग बजैत चलल संग-संग जेकरा छोड़ि अएलहुँ सेहो छल हमरे घर नहि छी देवता अहूँ छी साधारण नर शून्य बाट अछि ताकि रहल आगूमे अछि धुँध भरल तइयो ओहिपर चलहिं पड़़ल। 4) परेमक अधिकार आँखिक भीजल कोर गिरल दूइ बून्न नोर जाहिमे देखलहुँ अहाँक रूप ओहिना स्मरण अछि दुलहिन बनल ओ रूप-अनूप कनेक तेज साँसक वेग नहु-नहु उठैत डेग नैहरसँ सासुर दिश हमरा छातीपर फाड़ैत चीस आँखि बनल भादोक झहरैत मेह सँगीसँ टूटैत नेह नहि देखि कोनो उपाए निशब्द फाटैत हमर हिरदय कतेक अहाँ सहने रही बिनु शब्दे कहने रही- “हमरा दाबने अछि माए-बाप आर समाज तेँ होइत अछि लाज किन्तु अहाँ छी पूरा डेरबुक पुरूष छी तइयो छाती धुक-धुक नहि कएलहुँ परेम जेना कएलहुँ चोरि हमरो जीनगीमे देलहुँ जहर घोरि प्रश्न उठैत बारम्बार साहस बिहीनकेँ छै प्रेम करबाक अधिकार” बैसल रहि गेलहुँ पछताइत जीनगी भऽ गेल अन्हरिया राति चलैत रहल काल उठैत रहल मनमे अहाँक सवाल आइ सुनलहुँ दूटा पाँति भोरे-भोर आँखिसँ गिरल अन्तिम दू बून्न नोर कहलहुँ अहाँ- “बीतल छन केँ आब बिसरि जाउ जीनगीकेँ दोसर ढँगे सजाउ।” 5) मधुर गीत अपनहि छातीमे छुरी मारि हम काटै छी बपराहैड़ गिर रहल अछि बून-बून धरतीपर हमर खून के मारलक एकरा छुरी ओकरो आइ तोड़ि देबै मुड़ी लोग सोचैत अछि के छल एहेन मरमी-घाती किन्तु असलमे छी हम स्वयं आत्मघाती कतऽ सँ आएत एहेन उक्ति जे देत हमरा एहिसँ मुक्ति कतऽ सँ टूटत एहिसँ नाता स्वंय छी हम एकर जन्मदाता केना प्रसन्न भऽ नाचैत अछि लोग हमरा कोन धऽ लेलक रोग सभटा भेल अभाेग समए भेल जाइत अछि गत हमरो ताकऽ पड़त ओ पथ जाहिसँ छुटए बीख भेटए अमरीत हमहूँ गाएब मधुर गीत। ज्योति सुनीत चौधरी जन्म तिथि -३० दिसम्बर १९७८; जन्म स्थान -बेल्हवार, मधुबनी ; शिक्षा- स्वामी विवेकानन्द मिडिल स्कूल़ टिस्को साकची गर्ल्स हाई स्कूल़, मिसेज के एम पी एम इन्टर कालेज़, इन्दिरा गान्धी ओपन यूनिवर्सिटी, आइ सी डबल्यू ए आइ (कॉस्ट एकाउण्टेन्सी); निवास स्थान- लन्दन, यू.के.; पिता- श्री शुभंकर झा, ज़मशेदपुर; माता- श्रीमती सुधा झा, शिवीपट्टी। ज्योतिकेँwww.poetry.comसँ संपादकक चॉयस अवार्ड (अंग्रेजी पद्यक हेतु) भेटल छन्हि। हुनकर अंग्रेजी पद्य किछु दिन धरि www.poetrysoup.com केर मुख्य पृष्ठ पर सेहो रहल अछि। ज्योति मिथिला चित्रकलामे सेहो पारंगत छथि आ हिनकर मिथिला चित्रकलाक प्रदर्शनी ईलिंग आर्ट ग्रुप केर अंतर्गत ईलिंग ब्रॊडवे, लंडनमे प्रदर्शित कएल गेल अछि। कविता संग्रह ’अर्चिस्’ प्रकाशित। प्रजातन्त्रक खेल शुरू भेल फेर प्रजातन्त्रक खेल तानाशाहीके सबतरि बिगुल बाजल अहि सऽ नीक अवसर कतय अशिक्षित के राेजगार लागल आइ ए एस बनय लेल लाेक पाेथी रटि रटि नहि थाकल आेतै देशक प्रशासन हथियाबैमे अशिक्षित मूर्ख भ रहल पागल जे आत्मविश्वास आ दृढ़ता स खूब रचि-रचि मिथ्या बाजल सबके बागडाेर सम्हारै लेल नेता बनिकऽ अछि जागल पाॅंच साल धरि सूतत जी भरि अपन तिजाेरी नीकसऽ सम्हारत नहिं तऽ बीचेमे चुनाव करा जनताक काेष फेर सऽ झारत १.राजेन्द्र चौधरी (१९४०- )- दूटा पद्य २. राम बिलास साहु- चौवनिया नेता १ श्री राजेन्द्र चौधरी, (बी.ए. आनर्स), ग्रामः- चरैया, पो. मगंलवार चरैया थानाः- भरगामा, जिलाः- अररिया, (बिहार) १ श्रीकृष्ण भजन देवकी नन्दन, यशोदाक लाल। सुदामाक संगी, राधाक प्यार॥ ऋषिक नारायण, व्रजक गोपाल। उद्धव सखा, गोपि सभक यार॥ राजेन्द्रक मुरली मनोहर, मीराक विशाल। भक्तक भगवन, दुष्टक काल॥ कोना जाऊ श्याम, तोहर नगरिया, ओढ़ि कऽ मैल चदरिया। विकल अछि मन-प्राण, तोरासँ मिलन लेल श्याम-सांवरिया। दऽ दिअ हमरा भक्ति अपन, तूँ पति रधिया। कोना जाऊ श्याम.....। हे गोविन्द हे गोपाल, आबि गेल छी तोहर द्वार। हे गोविन्द हे गोपाल, लाजक नाव तोरे हाथ, चाहे करू ओहि पार वा राखू मझधार। हे गोविन्द हे गोपाल, राजेन्द करैए पुकार, हे तारक हमरा तार, हे गोविन्द हे गोपाल.....। २ माँ ताराक भजन भव सागर करू पार हे तारा भव सागर करू पार हे तारा आयल छी हम अहींक शरणमे हमर करू उद्धार हे तारा भव सागर करू पार हे तारा बीच भंवरमे नाव फसल अछि, हमर करू उद्धार हे तारा भव सागर करू पार हे तारा.....। २ राम बिलास साहु चौवनिया नेता केश फुलकल आँखि चमकल ढाढ़ी-मोछ कारी रंगसँ रँगल मुँह सुखल होश ऊड़ल पातर लकड़ी सन देहपर बड़का झोलंगा फाटल लटकल देश-विदेशक बात करै छी चौक-चौराहापर बैसल रहै छी फाटल गमछा, फाटल अंगा जेना लगैत अछि लफंगा घरमे भूजि भांग ने पाबे... चौकक दाेकानपर भूजा पाबे गप-सप्पसँ भाँट करबैत गाम-घरमे ठकि कऽ खाबे जानितो नहि परिवारक हाल कहैत हम मचबैत छी देशमे भूचाल ठकि-ठकि खाइ छी गरीबक माल गामक लोकनिक जिनगीकेँ करै छी फटैहाल बनलौ काम बिगाड़ै छी अपनाकेँ कहै छी अधिकारी रिश्वतसँ चलबैत छी जिनगीक गाड़ी मुदा हमरा नहि अछि कोनो सवारी जइ दलमे देखलौं धन-बल ओहि दलमे केलौं चहल-पहल सत्ताक नहि हमरा आस परायाकेँ के कहे अपनोकेँ करै छी विनाश बड़का नेता करैत बड़का घटोला हम चौवनियाँ छी नेता चारिए अनाक करै छी आशा हमरा नहि सिंहासनक आशा गाम घरमे करैत छी राज। श्री कालीकान्त झा "बूच" कालीकांत झा "बूच" 1934-2009 हिनक जन्म, महान दार्शनिक उदयनाचार्यक कर्मभूमि समस्तीपुर जिलाक करियन ग्राममे 1934 ई. मे भेलनि। पिता स्व. पंडित राजकिशोर झा गामक मध्य विद्यालयक प्रथम प्रधानाध्यापक छलाह।माता स्व. कला देवी गृहिणी छलीह। अंतरस्नातक समस्तीपुर कॉलेज, समस्तीपुरसँ कयलाक पश्चात बिहार सरकारक प्रखंड कर्मचारीक रूपमे सेवा प्रारंभ कयलनि। बालहिं कालसँ कविता लेखनमे विशेष रूचि छल। मैथिली पत्रिका- मिथिला मिहिर, माटि-पानि,भाखा तथा मैथिली अकादमी पटना द्वारा प्रकाशित पत्रिकामे समय-समयपर हिनक रचना प्रकाशित होइत रहलनि। जीवनक विविध विधाकेँ अपन कविता एवं गीत प्रस्तुत कयलनि। साहित्य अकादमी दिल्ली द्वारा प्रकाशित मैथिली कथाक विकास (संपादक डा. बासुकीनाथ झा) मे हास्य कथाकारक सूचीमे डा. विद्यापति झा हिनक रचना ‘‘धर्म शास्त्राचार्य"क उल्लेख कयलनि। मैथिली अकादमी पटना एवं मिथिला मिहिर द्वारा समय-समयपर हिनका प्रशंसा पत्र भेजल जाइत छल। श्रृंगार रस एवं हास्य रसक संग-संग विचारमूलक कविताक रचना सेहो कयलनि। डा. दुर्गानाथ झा "श्रीश" संकलित मैथिली साहित्यक इतिहासमे कविक रूपमे हिनक उल्लेख कएल गेल अछि | चारिटा पद्य 1) दुर्गा वंदना सर्वेश्वरि दुर्गे, सुवुद्ध दहक सभकेँ तोँ हरहक सबहक अज्ञान, माइ हे, तोरेमे सभ भगवान।।1।। पहिने तोँ मेँटि दहक, मोनक विभेद बुद्धि भऽ जाइक तदुपरान्त सहजेमे आत्म-शुद्धि कपट-दंभ-अहंकार-स्वार्थ-दैत्यकेँ सँहारि- करहक जगक उत्थान।। माइ हे, तोरेमे सभ भगवान।।2।। शिवक तेज आनन, चतुराननसँ चरण भेल विष्णु बाँहि, सोमस्तन, इन्द्र तेज डांड़ देल यम-सुकेश, वरूण जाँघ, पृथ्वी नितम्ब भेलि वसुगणार्क अंगुलि निर्माण।। माइ हे, तोरेमे सभ भगवान।।3।। नासिका धनाधिपसँ, प्रजापतिक दंत स्वेत अग्णिसँ त्रिनेत्र, साँझ भौँह वक्रता समेत वायुदेव कान देल-एहि तरहेँ प्रगट भेल- नारि एक सूरूज समान।। माइ हे, तोरेमे सभ भगवान।।4।। हरखित भऽ शंकर निज शूलसँ त्रिशूल देल विष्णुक सुदर्शनसँ चक्र एक जनमि गेल धर्मराज दंड, वरूण पाश, प्रजापति देलनि- स्फटिकक माला महान।। माइ हे, तोरेमे सभ भगवान।।5।। सलिलदेव शंख, काल ढाल-करवाल देल ब्रह्मा कमंडलु, हुत्ताशनसँ शक्ति लेल वायु धनषवाण, सूर्यतेज, इन्द्र कऽ देलनि- घंटा आ बज्रक प्रदान।। माइ हे, तोरेमे सभ भगवान।।6।। क्षीरोदधिदिव्यवश्त्र, चूड़ामणि, स्वेतहार कुंडल-केयूर आर नूपुर सङ सभ िसङार विशकर्मा फरसा, अनेक अश्त्र शस्त्र एक- कमल-माल देल अमलांन।। माइ हे, तोरे मे सभ भगवान।।7।। नागराज मणि मंडित उरगहार दिव्य देल धनपतिसँ पूर्ण मधुक मानपात्र प्राप्त भेल हिमवानक देल सिंह वाहनपर शोभित तोँ- तोरा सनि कत्तऽ के आन? माइ हे, तोरेमे सभ भगवान।।8।। कऽ रहली, व्योमवीच रहि रहि कऽ अट्टहास गर्जनाक गुंजनसँ फाटि रहल छै, अकाश डोलल पहाड़, काँपि उठलै, समुद्र सकल- उठि गेलैक भारी तूफान।। माइ हे, तोरे सभ भगवान।।9।। डेगेमे धरती, आ पाँजेमे छह त्रिलोक सिंहवाहिनी भवानि, हरहक संततिक शोक जय हे मां दुर्गे तोँ सर्वलोक शक्तिपूंज, करहक सबहक समाधान।। माइ हे, तोरेमे सभ भगवान।।10।। 2) काली वंदना करू कृपा, करूणामयी मां, हे सुभद्रे, कालिके! भू चतुर्दश जननि, वृद्धे, हे धरित्री- वालिके? त्रिपुर-सुन्दरि, चिरयुवति मां, योगमाया जालिके? विह्वले, अनुतापिते हे, हासमय मुख मािलके! जय दिगम्वरि, व्योम व्यापिनि, खंग-खप्पड़ चालिके? रूप-रम्ये, गौरि सौम्ये, वत्सले, जनपालिके? भाल रवि-शशि, पद पताले हे अनंतक तालिके? देवि, अहँकेर ओर नहि, छी अहीं छोरक घालिके? करू कृपा करूणामयी मां, हे युभद्रे कालिके? 3) रौद्र गायिके स्वरावद्ध रव रौद्र गायिके छूम छनन छम-ताल निरत पद- नर्त्तित गति गति, बह्ममाण्ड नायिके।। स्वरा वद्ध रव रौद्र गायिके।। अखिल भुवन धहधह मसान बनि, आबि बसल गगनक गंगातट सहज सुवासित-चिता-ज्योतिसँ मोहक-मादक-रोचक मरूघट कालगालगत वकल भूतकेँ वर्त्तमान-विश्राम दायिके।। स्वरावद्ध रव रौद्र गायिके? भस्मीभूत क्षेत्र सौन्दर्यक, पदतल परसि बनल नंदनवन सुरदुर्लभ भविष्य करतलगत जागल नरकंकाल मुदितमन सुधाकलशपर चपल चरण दुहु द्रवु द्रवु मां, हय, महाकालिके! स्वरा वद्ध रव रौद्र गायिके? दिगम्वरी, केशाच्छादित कटि रंजित नयन, विकट तन कारी चकमक खंग, धहाधह खप्पड़ मुण्डक माल भयावह भारी होउ, होउ समधान महेश्वरि सहज वत्सले, प्रणत पालिके।। स्वरावद्ध ख रौद्र गायिके।। 4) श्री राम वंदना अनुग्रह करू श्री सीता राम हम प्यासल, भटकल मरूवासी अहँ लटकल घनश्याम।।1।। सहज कृपालु, सभक हितकारी, श्रमितक पूर्ण विराम प्रेम विभोर अधिक गद्गद् हम- गुनि अहाँक गुणग्राम।।2।। अनुग्रह करू श्री सीताराम।। अग्णि-परीक्षित कंचन सन तँ अछिए चरित ललाम संग-संग चानन सम गमगम- कोमन चित निष्काम।।3।। अनुग्रह करू श्री सीताराम तपोमूर्ति सौन्दर्य-पिण्डपर- पल भरि पद-विश्राम मुदा हृदयकेँ भक्ति-भीलनी कीनि लेलनि विनु दाम।।4।। अनुग्रह करू श्री सीताराम साकेतोसँ अधिक चमनगर, दिव्य अयोध्याधाम कर्मयोग लग राज भोगकेँ त्यागल ठामेठाम।।5।। अनुग्रह करू श्री सीताराम विगलित नयन, धैर्य धऽ मन, वन चललहुँ त्यागि तमाम। विकल विवश जन जनक अधरपर राखि अपन प्रिय नाम।।6।। अनुग्रह करू श्री सीताराम।। १.चन्द्रशेखर कामति- दूटा गीत २.राजेश मोहन झा- पद्य ३.किशन कारीग़र- गलचोटका बर १ चन्द्रशेखर कामति गीत आइ काल्हुक छौँड़ा सभ- बाप रौ बाप, एहि दुनियामे अन्हार भऽ गेलै नयका-नयका छौंड़ा सभ बेकार भऽ गेलै गरम भ्रष्टाचारक बजार भऽ गेलय-2 पढ़ल-लिखल बैसल-बैसल माछी मारै छै, जानय घोड़ा-घास ने से अंग्रेजी झारै छै वाज-धंधा छोंड़ि-छोड़ि कऽ छौंड़ा टल्ली मारै छै लिख लोड़हापर पत्थर बेटा दिल्ली मारय छै घरमे भुज्जी भांग नहि सरकार भऽ गेलै, नवका-नवका छौंडा सभ बेकार भऽ गेलै गरम भ्रष्टाचारक बाजार भऽ गेलैए-2 पढ़ल-लिखल बैसल-बैसल माछी मारै छै जे ने पढ़ल-लिखल से फुटानी झाड़ै छै दुइऐ दिनमे ई बेटा होशियार भऽ गेलै शूर-बूट लगौने दिलीप कुमार भऽ गेलय गरम भ्रष्टाचारक बाजार भऽ गेलै-2 बापक जेबी काटै छै सलिया देखै छै माइक्रोसॉफ्ट गहना बेचै छै माेहब्बत करै छै ढक्का-ढनमन लगबै छै फुटानी करै छै गुपचुप-गुपचुप ई छौंड़ा पिहानी करै छै घरसँ ताला तोड़ि कऽ फरार भऽ गेलै नयका-नयका छौंड़ा सभ बेकार भऽ गेलै गरम भ्रष्टाचारक बाजार भऽ गेलै-2 2) लोक गीत चऽल-चऽल- चऽल बौआ नानी गाम टीशनपर कीन देबौ थुर्री लताम बाटो ताकैत हेतौ मामा बेकल भऽ मौसी फोड़ैत हेतौ चिनियाँ बदाम चऽल-चऽल- चऽल बौआ नानी गाम टीशनपर कीन....... मामी जौं देखतह तँ मुँह बिजकेतौ कानबें तँ हारि-मारि कऽ मामो उठेतौ मौसी छुलाछनि कहर बड़पेतौ मामी तँ कऽ देतौ जीअब हराम च चऽल-चऽल- चऽल बौआ नानी गाम तहियेसँ मामाक सुधि-बुधि हेरेलौ जहियासँ मामी हुनक घर एलौ नानी-आ नानाकेँ हाथ-मुँह बन्हेलौ बेटाक बिआह कऽ गिरला धड़ाम चऽल-चऽल- चऽल बौआ नानी गाम रहतनि ने सभ दिन हुनको जुआनी एक दिन बदलि जेतै सभटा कहानी टिकलय सदरि नहि केकरो अरानी उड़लय सुगनमा जय सियाराम चऽल-चऽल- चऽल बौआ नानी गाम। २. राजेश मोहन झा कविता- थेथर नेता गुड्डी फॅसलै, गुड्डी फॅसलै देखही बौआ, नेता खसलै। जोर लगावह उठावह हिनका साहि दहुन डूबैत केर तिनका।। मोन कनैए, आँखि भरैए, हिनका कारणे प्रजा मरैए। भारी भरकम मंत्री संत्री गण, पेट भूखल आ गहूम सड़ैए।। आइ सी.सी आ एफसी आइ, कतेको आइ मे ‘यू’ निमत्ता। एक मासमे बनौता दिल्ली, तोड़ि जोड़ि मचोड़ि केर सत्ता।। हऽर घऽर आ बेट खरिहार, मंत्री रहितो ज्येातिष केर जान। कुटिल मुस्कान लए सदन चलावथि, भोजन पानि विनु गंगा स्नान।। हमर सनेश ई सभ जनता केर, मंहगी बढ़त सम्हारू धोती। लोकक गरदनिमे फॉस लगौलनि, पहिरथि अपने माला मोती।। कहथि सुदामा सुनू मुरारी, एहन थेथर नेता नहि भारी। बुद्धि हरण भेल भूखे मरै छी, दौड़ू लाऊ संग सस्ता थारी।। ३ किशन कारीग़र परिचय:-जन्म- 1983ई0 कलकता मे मूल नाम-कृष्ण कुमार राय किशन’। पिताक नाम- श्री सीतानन्द राय नन्दू’माताक नाम- श्रीमती अनुपमा देबी। मूल निवासी- ग्राम-मंगरौना भाया-अंधराठाढ़ी जिला-मधुबनी बिहार। हिंदी मे किशन नादान आओर मैथिली मे किशन कारीग़र के नाम सॅं लिखैत छी। हिंदी आ मैथिली मे लिखल नाटक आकाशवाणी सॅं प्रसारित एवं दर्जनों लघु कथा कविता राजनीतिक लेख प्रकाशित भेल अछि। वर्तमान मे आकशवाणी दिल्ली मे संवाददाता सह समाचार वाचक पद पर कार्यरत छी। शिक्षाः- एम फिल पत्रकारिता एवं बी एड कुरूक्षे़त्र विश्वविद्यालय कुरूक्षेत्र सॅं। गलचोटका बर।
(एकटा हास्य कविता)
देखू.देखू हे दाए.माए केहेन सुनर छथि गलचोटका बर। तिलकक रूपैया छनि जे बॉंकि सासुर मे खाए नहि रहल छथि एक्को कर।
अनेरे अपसियॉंत रहैत छथि अल्लूक तरूआ छनि हुनका गारा मे अटकल। खाइत छथि एक सेर तीन पसेरी मुदा देह सुखाएल छनि सनठी जॅंका छथि सटकल।
केने छथि पत्रकारिताक लिखाई.पढ़ाई दहेजक मोह मे छथि भटकल। ऑंखि पर लागल छनि बड़का.बड़का चश्मा मुहॅं कान निक तऽ चैन छनि आधा उरल।
ओ पढ़हल छथि तऽ खूम बड़ाई करू ने मुदा हमरा पढ़नाईक कोनो मोजर ने। बाबू जी के कतेक कहलियैन जे हमरो पसीन देखू मुदा डॉक्टर इंजीनियर जमाए करबाक मोह हुनका छूटल ने।
जेना डॉक्टर इंजीनियरे टा मनुख होइत छथि लेखक समाजसेवीक एको पाई मोजर ने। सोच.सोच के फर्क अछि मुदा केकरा समझाउ दूल्हाक बज़ार अछि सजल खूम रूपैया लूटाउ ने।
एहि बज़ार मे अपसियंॉत छथि लड़की के बाप इंजीनियर जमाए कए छोड़ैत छथि अपन सामाजिक छाप। एहि लेल तऽ अपसियॉंत छथि एतबाक तऽ ओ करताह बेटीक निक जिनगी लेल ओ किछू नहि सोचताह।
अहॉं बेटी केॅ निक जॅंका राखब दहेज लैत काल हमरा बाबू के ओ तऽ बड़का सपना देखौलनि। ई तऽ बाद मे बूझना गेल जे किछूएक दिनक बाद दहेजक रूपैया सॅं ओ पानक दोकान खोललैनि।
नहि यौ बाबू हम नहि पसिन करब एहेन सुनर बर एतबाक सोचिए के हमरा लगैत अछि डर। भले रहि जाएब हम कुमारी मुदा कहियो ने पसिन करबए एहेन दहेज लोभी गलचोटका बर। गंगेश गुंजन- ३ टा गजल-पद्य १ (ग़ज़ल जेकाँ किछु:मैथिली मे) हम तं लाचार घेराएल रही अहां तं अपने रही की केलौं आन तं पहिनहि से छले आन मुदा अहां केहन अप्पन भेलौं सभ दिस ताकि क’ बोआ-बौआ अहींक पता भरि जनम तकलौं जाइत तं सब अछि कोनो कारण अहां मुदा ने जाइत किछु कहलौं अहाँक अनुरोध बड़े मोन पड़य हम सतत भावना मे बहलौं ओहन समाज मे हम करितौं की बाट नहि धरितौं ई तं कत’ जैतौं सब समाचार छल समाप्त वला हम तैयो कोना जहर खैतौं हमर तं प्राण छल एहिना जएबाक ओहि मरणों मे हम कोना मरितौं जे कहियो बूझल नहि मानल नहि कोना एकरा अपन प्रारब्ध बुझितौं हम एहि बाट पर अहां ओम्हर एक संग दू दिशा मे चलि गेलौं 2 कोनो एक क्षण कोना कखन इतिहास बनैत छै बूझल भेलय आब जीवनक एहि पहर मे
सौंसे दुनिया अपन अपन आकांक्षाक अन्हड़ क’ रहलए निर्यात सोहनगर वस्तु घर घर मे
लोकगुणक, बोधक विवेक सबहक परिभाषा गढ़ल जा रहल नव संस्कृति मधु मिलि जहर मे
आब गाम सन गामो बनल धर्मक हिंसागृह सम्प्रदाय-दंगा-धर्मक छल जे बसल शहर मे
निष्ठा-प्रेम-प्रसंग भेल गेलय राजनीतिक चर्या भोरे पहरक कैल प्रतिज्ञा बिसरल बेरु पहर मे
सम्वेदना सड़ल अचार फूटल बोइयाम मे राखल सब स्वाद-रस-आस्वादन आश्रय लेलक अवसर मे
कूटनीति आ राजनीति विश्वनैतिक तेहन प्रबंधन अफसर भेटत राजनीति मे नेता सब अफसर मे
ओ छथि कतहु प्रवासी कोनो यू के-यू एसए मे जनिक भूमि ई से निष्क्रिय छपकल अपना घर मे
बुद्धि काज ने करनि गुंजन के लागल ठकमूड़ी एहि षड्यंत्रक मोशकिल काटब जाल असकर मे 3 स्वतंत्रता-दिवस २०१० गुदरी-चेथरी सीबैये बड़ दिब जनता जीबैये जेहने ई पवित्र पावनि तेहन अछिन्जल पीबैये नब मलिकाना ढब पसरल घोड़ी-घास छीलैये कखनो राजा आ महराज एखन अंगरेज सँ मीलैये जखन चलय परिवर्तन चक्र सब सं अवसर छीनैये अपन बिलासी बजटक भार जनताक कान्ह पर धरैये सुनैत छी आब अपनो देश मंगल ग्रह पर चढ़ैये भरि संसारक यूरो-युद्ध लोकक भूखें लड़ैये दाना-दानाक लोक बेहाल गहुम गोदाम मे सड़ैये फुटपाथी दोकान मे ठाढ़ पुरने बस्त्र मौलबैये देशक नायक सभा समेत ध्वजा ऊँच फहरबैये लोकगीत-नादक नामे रॉक एन रॉल करबैये गाम भरिक अनेक घर मे दीपो कहाँ आब आब जरैये सब जेना मिझाएल मुरझल दिल्ली जगमग करैये संभव छैक पटनो हो इजोत गाम बिहारक कानैये ई महान राष्ट्रक त्योहार धरती रौद सं जरैये लोक कर्ज़ मे डूबल अछि किसान लोक सब मरैये अमेरिका मे जे डॉलर फ्राँस मे यूरो फरैये हमरा गामक बाध समस्त धहधह जेना कि धधकैये ओत' उमेद आ आश्वासन बाट देखैत लोक मरैये जानि ने कहियाक चलल रिलीफ हमरो बस्ती पहुँचैये छीन लेलक से बड़ सुभ्यस्त ठाढ़ रहल भीख माँगैये शहरक सब लाल बत्ती भीखक हाथ पसारैये आजुक दिनक खोराकीक खोज साधारण जन लड़ैये देश शीर्ष पर होइत परेड चैनल सब दरसबैये एक-एक पल डेगक झाँकी दुनिया के झलकबैये ई नहि अपने देखय ओ जे किछु सबटा करैये केहन विकट द्वन्द्व आगाँ जीअय लोक ने मरैये सोझाँक शक्ति विरुद्ध अछैत तैयो किएक ने लड़ैये भरिसक नैतिक दुबिधा-द्वन्द्व सब संबंधीए लागैये तहियाक समय छलय दोसर बूझल बिदेशी छ'लैये आइ तं ई नबका अंग्रेज़ सोदर-मसियौत लगैये तें एहनो महान ई दिन आत्मा मे नै उतरैये हो जिनकर ई देश रहओ हमरा तं नै अरघैये आब लागय गुंजन सब युग मुँह देखि मुँगबा परसैये ( १५ अगस्त, २०१० ई.) डॉ राजीव कुमार वर्मा आ डॉ जया वर्मा- हमर गाम डॉ. राजीव कुमार वर्मा 1963- , डुमरा, सहरसा। जन्म २१.०७.१९६३, एसोसिएट प्रोफेसर, इतिहास, दिल्ली वि.वि.। कतेको अनुवाद खास कऽ श्रीमति शेफालिका वर्माक “बोल्डनेसक लहास”क “कोर्प्स ऑफ बोल्डनेस”-स्पैरो, मुम्बै द्वारा प्रकाशित आ श्रीमति शेफालिका वर्माक उपन्यास “नागफाँस”क अंग्रेजी अनुवाद (विदेह ई-पत्रिकामे धारावाहिक रूपे)। डॉ. जया वर्मा 1964- जन्म १६.०२.१९६४. एसोसिएट प्रोफेसर, इतिहास, दिल्ली वि.वि.। “महाकाव्य आ पुराणमे नारी” आ “जेन्डर स्टडीज”पर विशेष अध्ययन। श्रीमति शेफालिका वर्माक उपन्यास “नागफाँस”क अंग्रेजी अनुवाद (विदेह ई-पत्रिकामे धारावाहिक रूपे)। हमर गाम
हमर नाम की हमर गाम की पुच्छ्लौं अपना सँ हमर पहचान की
चान देखलौं, सूरज देखलौं तारागण सेहो देखलौं लागल गामक मुदा एतेक कोलाहल एतेक गाड़ी , एतेक प्रदुषण नहि नहि इ हमर गाम नहि छी
बड़का मैनक मखान पोखरक कवई माछ भुट्टा आ छिमीक बीच मचान ओरहा आ पियौज आ अचारक संगे चौरक रोटी सभ छुटि गेल
बरमक थानक देवता भगवान शंकरक मंदिर कनैलक फूल इनार सँ डोले डोल पानि सभ छुटि गेल
कोसी बाँधक सांझ चौठ्चानक दही सामा चकेवा उजरिया रातिक नाव पर झज्झैर सभ छुटि गेल
मंगला कुजराक केरा घूरक पकायल अल्हुआ ताशक बाजी चाह पर चाह सभ छुटि गेल
अब ते देखै छी नहरक छैठ ड्राइंगरुमक मधुबनी पेंटिंग सिनेमा हौलक पोपकोर्न बिन रंगक होली सोसाइटीक बेस्वाद दिवाली
केकरा सँ मैथिली बाजू अब ते विदेह सँ आस अछि विदेहक रचनामे गामक तलाश अछि गाम मिळत तं अपन पहिचान पाबि लेब १.श्वेता झा चौधरी २.ज्योति सुनीत चौधरी ३.श्वेता झा (सिंगापुर) १ श्वेता झा चौधरी गाम सरिसव-पाही, ललित कला आ गृहविज्ञानमे स्नातक। मिथिला चित्रकलामे सर्टिफिकेट कोर्स। कला प्रदर्शिनी: एक्स.एल.आर.आइ., जमशेदपुरक सांस्कृतिक कार्यक्रम, ग्राम-श्री मेला जमशेदपुर, कला मन्दिर जमशेदपुर ( एक्जीवीशन आ वर्कशॉप)। कला सम्बन्धी कार्य: एन.आइ.टी. जमशेदपुरमे कला प्रतियोगितामे निर्णायकक रूपमे सहभागिता, २००२-०७ धरि बसेरा, जमशेदपुरमे कला-शिक्षक (मिथिला चित्रकला), वूमेन कॉलेज पुस्तकालय आ हॉटेल बूलेवार्ड लेल वाल-पेंटिंग। प्रतिष्ठित स्पॉन्सर: कॉरपोरेट कम्युनिकेशन्स, टिस्को; टी.एस.आर.डी.एस, टिस्को; ए.आइ.ए.डी.ए., स्टेट बैंक ऑफ इण्डिया, जमशेदपुर; विभिन्न व्यक्ति, हॉटेल, संगठन आ व्यक्तिगत कला संग्राहक। हॉबी: मिथिला चित्रकला, ललित कला, संगीत आ भानस-भात। काली माँ २. ज्योति सुनीत चौधरी जन्म तिथि -३० दिसम्बर १९७८; जन्म स्थान -बेल्हवार, मधुबनी ; शिक्षा- स्वामी विवेकानन्द मिडिल स्कूल़ टिस्को साकची गर्ल्स हाई स्कूल़, मिसेज के एम पी एम इन्टर कालेज़, इन्दिरा गान्धी ओपन यूनिवर्सिटी, आइ सी डबल्यू ए आइ (कॉस्ट एकाउण्टेन्सी); निवास स्थान- लन्दन, यू.के.; पिता- श्री शुभंकर झा, ज़मशेदपुर; माता- श्रीमती सुधा झा, शिवीपट्टी। ज्योतिकेँwww.poetry.comसँ संपादकक चॉयस अवार्ड (अंग्रेजी पद्यक हेतु) भेटल छन्हि। हुनकर अंग्रेजी पद्य किछु दिन धरि www.poetrysoup.com केर मुख्य पृष्ठ पर सेहो रहल अछि। ज्योति मिथिला चित्रकलामे सेहो पारंगत छथि आ हिनकर मिथिला चित्रकलाक प्रदर्शनी ईलिंग आर्ट ग्रुप केर अंतर्गत ईलिंग ब्रॊडवे, लंडनमे प्रदर्शित कएल गेल अछि। कविता संग्रह ’अर्चिस्’ प्रकाशित। ३.श्वेता झा (सिंगापुर) बालानां कृते राजेश मोहन झा कविता- मूड़नक भोज रसगुल्लामे बिच्ची, जिलेबी काँच, गरम तरकारीपर बैसला पूरी पाँच मूड़नक भोज कएलनि इंजिनियर, हाथे लोटा बिगड़ल इंटीरियर।। जेठक दुपहरियामे भागम भाग, धांगलौं मूंग आ पालाॅकी साग। पेटमे मीठका टीस उठैए जहिना मकइया सीस झड़ैए।। हेल्थ विभाग लगौलनि अनुमान, गरजक संग बौछार समान। बाजू मोनसँ केहन लगैए, सूइया पहाड़पर कंकड़ गड़ैए।। बिरेन्द्र बचावू, मुन्ना बचावू, आब एहन नहि भोज देखाउ। इंजिनियर मास्टर केर कुचक्रमे, अन्हारे हाथे लोटा धेलहुँ।। आव एहन नहि खाएब जिलेवी, हजम चूर्ण आ जमैनक सेवी। भगवान अहाँक आमद बढ़ावथु, आगाँ बढ़ियाॅ भोज खुआबथु।। सिद्ध अन्न खाएब अहाँ घर जहिया उकरिन हएब भोज दोससँ तहिया। सुनू औ कतवो वेतन बढ़तनि, मुदा नहि खानदानी स्वभाव बदलतनि।। बच्चा लोकनि द्वारा स्मरणीय श्लोक १.प्रातः काल ब्रह्ममुहूर्त्त (सूर्योदयक एक घंटा पहिने) सर्वप्रथम अपन दुनू हाथ देखबाक चाही, आ’ ई श्लोक बजबाक चाही। कराग्रे वसते लक्ष्मीः करमध्ये सरस्वती। करमूले स्थितो ब्रह्मा प्रभाते करदर्शनम्॥ करक आगाँ लक्ष्मी बसैत छथि, करक मध्यमे सरस्वती, करक मूलमे ब्रह्मा स्थित छथि। भोरमे ताहि द्वारे करक दर्शन करबाक थीक। २.संध्या काल दीप लेसबाक काल- दीपमूले स्थितो ब्रह्मा दीपमध्ये जनार्दनः। दीपाग्रे शङ्करः प्रोक्त्तः सन्ध्याज्योतिर्नमोऽस्तुते॥ दीपक मूल भागमे ब्रह्मा, दीपक मध्यभागमे जनार्दन (विष्णु) आऽ दीपक अग्र भागमे शङ्कर स्थित छथि। हे संध्याज्योति! अहाँकेँ नमस्कार। ३.सुतबाक काल- रामं स्कन्दं हनूमन्तं वैनतेयं वृकोदरम्। शयने यः स्मरेन्नित्यं दुःस्वप्नस्तस्य नश्यति॥ जे सभ दिन सुतबासँ पहिने राम, कुमारस्वामी, हनूमान्, गरुड़ आऽ भीमक स्मरण करैत छथि, हुनकर दुःस्वप्न नष्ट भऽ जाइत छन्हि। ४. नहेबाक समय- गङ्गे च यमुने चैव गोदावरि सरस्वति। नर्मदे सिन्धु कावेरि जलेऽस्मिन् सन्निधिं कुरू॥ हे गंगा, यमुना, गोदावरी, सरस्वती, नर्मदा, सिन्धु आऽ कावेरी धार। एहि जलमे अपन सान्निध्य दिअ। ५.उत्तरं यत्समुद्रस्य हिमाद्रेश्चैव दक्षिणम्। वर्षं तत् भारतं नाम भारती यत्र सन्ततिः॥ समुद्रक उत्तरमे आऽ हिमालयक दक्षिणमे भारत अछि आऽ ओतुका सन्तति भारती कहबैत छथि। ६.अहल्या द्रौपदी सीता तारा मण्डोदरी तथा। पञ्चकं ना स्मरेन्नित्यं महापातकनाशकम्॥ जे सभ दिन अहल्या, द्रौपदी, सीता, तारा आऽ मण्दोदरी, एहि पाँच साध्वी-स्त्रीक स्मरण करैत छथि, हुनकर सभ पाप नष्ट भऽ जाइत छन्हि। ७.अश्वत्थामा बलिर्व्यासो हनूमांश्च विभीषणः। कृपः परशुरामश्च सप्तैते चिरञ्जीविनः॥ अश्वत्थामा, बलि, व्यास, हनूमान्, विभीषण, कृपाचार्य आऽ परशुराम- ई सात टा चिरञ्जीवी कहबैत छथि। ८.साते भवतु सुप्रीता देवी शिखर वासिनी उग्रेन तपसा लब्धो यया पशुपतिः पतिः। सिद्धिः साध्ये सतामस्तु प्रसादान्तस्य धूर्जटेः जाह्नवीफेनलेखेव यन्यूधि शशिनः कला॥ ९. बालोऽहं जगदानन्द न मे बाला सरस्वती। अपूर्णे पंचमे वर्षे वर्णयामि जगत्त्रयम् ॥ १०. दूर्वाक्षत मंत्र(शुक्ल यजुर्वेद अध्याय २२, मंत्र २२) आ ब्रह्मन्नित्यस्य प्रजापतिर्ॠषिः। लिंभोक्त्ता देवताः। स्वराडुत्कृतिश्छन्दः। षड्जः स्वरः॥ आ ब्रह्म॑न् ब्राह्म॒णो ब्र॑ह्मवर्च॒सी जा॑यता॒मा रा॒ष्ट्रे रा॑ज॒न्यः शुरे॑ऽइषव्यो॒ऽतिव्या॒धी म॑हार॒थो जा॑यतां॒ दोग्ध्रीं धे॒नुर्वोढा॑न॒ड्वाना॒शुः सप्तिः॒ पुर॑न्धि॒र्योवा॑ जि॒ष्णू र॑थे॒ष्ठाः स॒भेयो॒ युवास्य यज॑मानस्य वी॒रो जा॒यतां निका॒मे-नि॑कामे नः प॒र्जन्यों वर्षतु॒ फल॑वत्यो न॒ऽओष॑धयः पच्यन्तां योगेक्ष॒मो नः॑ कल्पताम्॥२२॥ मन्त्रार्थाः सिद्धयः सन्तु पूर्णाः सन्तु मनोरथाः। शत्रूणां बुद्धिनाशोऽस्तु मित्राणामुदयस्तव। ॐ दीर्घायुर्भव। ॐ सौभाग्यवती भव। हे भगवान्। अपन देशमे सुयोग्य आ’ सर्वज्ञ विद्यार्थी उत्पन्न होथि, आ’ शुत्रुकेँ नाश कएनिहार सैनिक उत्पन्न होथि। अपन देशक गाय खूब दूध दय बाली, बरद भार वहन करएमे सक्षम होथि आ’ घोड़ा त्वरित रूपेँ दौगय बला होए। स्त्रीगण नगरक नेतृत्व करबामे सक्षम होथि आ’ युवक सभामे ओजपूर्ण भाषण देबयबला आ’ नेतृत्व देबामे सक्षम होथि। अपन देशमे जखन आवश्यक होय वर्षा होए आ’ औषधिक-बूटी सर्वदा परिपक्व होइत रहए। एवं क्रमे सभ तरहेँ हमरा सभक कल्याण होए। शत्रुक बुद्धिक नाश होए आ’ मित्रक उदय होए॥ मनुष्यकें कोन वस्तुक इच्छा करबाक चाही तकर वर्णन एहि मंत्रमे कएल गेल अछि। एहिमे वाचकलुप्तोपमालड़्कार अछि। अन्वय- ब्रह्म॑न् - विद्या आदि गुणसँ परिपूर्ण ब्रह्म रा॒ष्ट्रे - देशमे ब्र॑ह्मवर्च॒सी-ब्रह्म विद्याक तेजसँ युक्त्त आ जा॑यतां॒- उत्पन्न होए रा॑ज॒न्यः-राजा शुरे॑ऽ–बिना डर बला इषव्यो॒- बाण चलेबामे निपुण ऽतिव्या॒धी-शत्रुकेँ तारण दय बला म॑हार॒थो-पैघ रथ बला वीर दोग्ध्रीं-कामना(दूध पूर्ण करए बाली) धे॒नुर्वोढा॑न॒ड्वाना॒शुः धे॒नु-गौ वा वाणी र्वोढा॑न॒ड्वा- पैघ बरद ना॒शुः-आशुः-त्वरित सप्तिः॒-घोड़ा पुर॑न्धि॒र्योवा॑- पुर॑न्धि॒- व्यवहारकेँ धारण करए बाली र्योवा॑-स्त्री जि॒ष्णू-शत्रुकेँ जीतए बला र॑थे॒ष्ठाः-रथ पर स्थिर स॒भेयो॒-उत्तम सभामे युवास्य-युवा जेहन यज॑मानस्य-राजाक राज्यमे वी॒रो-शत्रुकेँ पराजित करएबला निका॒मे-नि॑कामे-निश्चययुक्त्त कार्यमे नः-हमर सभक प॒र्जन्यों-मेघ वर्षतु॒-वर्षा होए फल॑वत्यो-उत्तम फल बला ओष॑धयः-औषधिः पच्यन्तां- पाकए योगेक्ष॒मो-अलभ्य लभ्य करेबाक हेतु कएल गेल योगक रक्षा नः॑-हमरा सभक हेतु कल्पताम्-समर्थ होए ग्रिफिथक अनुवाद- हे ब्रह्मण, हमर राज्यमे ब्राह्मण नीक धार्मिक विद्या बला, राजन्य-वीर,तीरंदाज, दूध दए बाली गाय, दौगय बला जन्तु, उद्यमी नारी होथि। पार्जन्य आवश्यकता पड़ला पर वर्षा देथि, फल देय बला गाछ पाकए, हम सभ संपत्ति अर्जित/संरक्षित करी। 8.VIDEHA FOR NON RESIDENTS 8.1.Original Poem in Maithili by Gajendra Thakur Translated into English by Jyoti Jha Chaudhary- Fearful Souvenir 8.2.Maithili Short-story “Tashkar” by Gajendra Thakur re-written in English by the author himself. Original Poem in Maithili by Gajendra Thakur Translated into English by Jyoti Jha Chaudhary
Jyoti Jha Chaudhary, Date of Birth: December 30 1978,Place of Birth- Belhvar (Madhubani District), Education: Swami Vivekananda Middle School, Tisco Sakchi Girls High School, Mrs KMPM Inter College, IGNOU, ICWAI (COST ACCOUNTANCY); Residence- LONDON, UK; Father- Sh. Shubhankar Jha, Jamshedpur; Mother- Smt. Sudha Jha- Shivipatti. Jyoti received editor's choice award from www.poetry.comand her poems were featured in front page of www.poetrysoup.com for some period.She learnt Mithila Painting under Ms. Shveta Jha, Basera Institute, Jamshedpur and Fine Arts from Toolika, Sakchi, Jamshedpur (India). Her Mithila Paintings have been displayed by Ealing Art Group at Ealing Broadway, London.
Gajendra Thakur (b. 1971) is the editor of Maithili ejournal “Videha” that can be viewed at http://www.videha.co.in/ . His poem, story, novel, research articles, epic – all in Maithili language are lying scattered and is in print in single volume by the title “KurukShetram.” He can be reached at his email: ggajendra@airtelmail.in
Fearful Souvenir (Part-2) Eshitva or Vashitva The eight divine accomplishments of the Saptarshi (seven stars) Finding nine celestial treasures Lotus, Kuber’s White Lotus, Conch, a sea monster (Kamdev, God of love) Tortoise, Mukund (Vishnu), Jasmine, Blue Sapphire, A large number of one million; Basis of dashavataar (ten incarnations of the Lord Vishnu) The Matsyavataar (incarnation in fish) saved the Vedas of Saptarshi And the family of Manu The tortoise form of Lord Vishnu saved the mountain of Mandaar And Vasuki’s body churned the sea to get nectar of immortality The boar incarnation brought the earth Out of the tough four loops of Ambunidhi After killing Hiranyaksh The God Narsinha saved Prahlaad By killing Hiranyakashyap Vaman killed the Baali By covering the Earth in two steps And the Demon king in the third Parashuraam, Ram and Krishna Had slain the demons And Buddha changed that concept What was surprising if His statue, Was dropped down by the children of Devadatta Alas! Nobody can save Bamyan Neither Kalki nor Maitreyi Come soon riding the White Sea To bring revolution In fourteen Bhuvans and thirteen Worlds Within the noises of this world The childhood is frightened But now the science interrupted in mind This is the theory of aging Dashavataar is the actual New theory of development Fish, Tortoise then Boar Then Narsimh then Vaman Interrelated development of human face That was being searched Giving the name of Dashavataar Was that Bharat, who had stopped the way of scientific concepts? The link was broken in finding Kalki (the tenth incarnation) Oh ! Had Maitreyi come to disclose that link? It seems I found the edge of the loop I was unnecessarily scared to get sixteen remedies Ved, Puran, Ramayan, Mahabharat, Economics, Those knowledge of Leelavati- Bhamati by Aryabhatt Characteristics of Political Sceince, Mathematics, Physics The lesson of action Was blown away by the superstitions Where Philosophy has become unanswered And Science has given some solutions Then I will hold the end of this, dear master! That vanished puzzles Not far away The circumference is of course small I will increase its circumference The contractor of the Philosophy will again change The Philosophy into the Religion and The Religion into the definitions of different heavens and hells The Physics and Astronomy have made Astrology The Science is turned into superstitions When answers will be manipulated Then let the question be unanswered Everyone has forwarded but Bharat-Tanay is behind Also in Lilawati as well as in Bhanumati How will he find the difference of caste system The essay of Vyaasji in admiration of Eklavya But none had perpetuated the work The gap of millennium created casteism Science and Art Hunger and food All have turned racist, how will they be free I recalled the differentiated rows in the feast The repeated offerings of Khaja-Laddu in the first row But was served once in the second row Stopping the way of Bhagirathi of Art and Science Getting obstacle of Rahu I recall the funeral of my Father The day long victimization by the Kantaha Brahmin And the exhausting Gadur Puran in the evening The changes in celestial positions And the darkness of the eclipse Have become unholy to get money The defence lesson of Ramayana When had it taught the lesson of violent spirituality The lessons of Vyaas, Karna, Eklavya, Krishna About social equality Are still alive Not yet vanished The liberal thoughts from before two millenniums Why had they dried up As deficient as the flow of Saraswati No sooner when the Goddess of Knowledge had left She dried up without water without intellect Will she come back, in disguise, To our country of Bharat? Will this awful discussion ever end? Or, leaving the lesson of Eklavya, Karna, Krishna, We will start learning ekka-dukka-panja-chhakka Same as Yudhisthir and Shakuni Shakuni will change kachcha baarah to pakka baarah And will win with pau-baarah How can fate be directed by The three dices and four coloured pawns The four nests of Chaupad and twenty four positions in each nest Will it destruct the Indian homes? If I had met Yudhisthir, I would be telling him You should have played the Chaupad of four players Where rules are easier You complicated the entertaining game of two You hadn’t played the game rather You had played with the country and the women That is why this complaint You had committed the crime bigger than Shakuni had He, whose name is Laalchadi Is the Satghariya Tee Tee I used to play during Mango season I also played dices with my wife After Dwiragman till Bharfori Oh Yudhisthirs of descendants of Bharat Don’t play this game day-night And teach every one this Complementing the music Notes removing the fearful souvenir Give me the boon of good thoughts So that I can sing the prayers The Kali depicts dark This is not the full truth The voice of yours is white That will be the new change Eliminating the cloud, fear has gone The sky thundered to raise The fire Keeping deep in the heart Brain stopped, ash is poured Chank trumpet announces braveness Remover of fear With the stick of dreams of memories I will break I will churn the world With my mighty hands, at the gate The taste of feast of two rows in the village I will release wisdom and prudence Rundmalmasani I will break the discrimination of two rows Or I will run away to the city Village will remain village Or will be sunk in the Bhagirathi One who will stop the flow of storm like Bhagirathi Will be sunk and will sink the village of discriminated two rows Because of own misdeeds The pleasant grounds of forests The smiling jungles The perplexed flower surrounded by spines Philosophy is engaged in finding Brahmins Scattered earth The Ganges- narrowed and exhausted Not flawless The delicate facts about Science and Maths Were misfortune of Tapini The city of Buddha will be established The God, the heaven – all a matter of humour The people of village Peerless views New songs In the village One who has given me exile in the village Because of his own thoughts I will give him breathes In return For sake of own views Who played the games in two millenniums His village is like a forest Buddha’s place, which was made a spine Will be adorned with flowers In the game of two, For the views, I will throw extra dices In the four eras of the Chaupad of the millennium I will discover even those which are unknown But what is known Let me justify those first God’s existence without any limits or bonds Then at what basis did he make the houses And if he didn’t have right to choose the basis Then, what rules did he make for the universe Does this mean that with the end of the sun, the moon and the stars That creator will also die according to the rule And if this is also not true Then what reason did the God have For creating this universe The self created universe The God of the universe And mind of the Master of that God What thoughts are going on in that mind? The universe filled with sapphires and lotuses, And in the middle of this Our sun is a simple star We are living creatures of merely a small planet In its dynasty I am thinking to destroy this creation with a weapon. Maithili Short-story “Tashkar” by Gajendra Thakur re-written in English by the author himself. Gajendra Thakur (b. 1971) is the editor of Maithili ejournal “Videha” that can be viewed at http://www.videha.co.in/ . His poem, story, novel, research articles, epic – all in Maithili language are lying scattered and is in print in single volume by the title “KurukShetram.” He can be reached at his email: ggajendra@airtelmail.in The Robber 1 Inside Shaligram-stone a hole exists, the black shaligram stone is found in Narmada River. In Jamsam village everything has changed, from Dihbar-worship place of village deity to everything, but something or other symbolic things are present. But any symbolic existence of my love-tale is not present here. The plantation and land-jungle, everything has thinned. One hundred years. That mango orchard of self-grown mango seeds was full of underground passage-holes of animals. It was full of different kinds of birds and small-big animals. I was child. From Jyestha month to Agahan month I and Malati used to gossip around the khurchania-creeper. If I went there in phalgun-chaitra month then we used to talk endlessly near lavanglata bush. Malkoka, Kumud, Bhent, Kamalgatta-root, reddish-Bisadh, we were in search of these; wandering in mud and muddy-water. Bare-footed, we hopped around thorny places and played game of seven houses in mango orchard. I and Malati used to secure our imaginary home with karbir-bush. Malati whole year used to preserve the seeds of flowers- one-leaf flower, two-leaf flower and one having big woven hair muscle-leaf flower. Malati was also of my age. My mother informed me that Malati was six month’s older than me, but my father used to tell that Malati was six month’s younger than me. And why he used to tell this, I came to know later on. During the whole mango season, I and Malati guarded the mango-orchard. But before the onset of night my maternal-uncle Bachhru and Malati’s father Khagnathji would come to orchard for guarding it during night. But here also there is no symbolic presence of our love-tale. Our means- of Keshav and of Malati. But there at pucca village-deity place I am looking for black shaligram-stone. The Shaligram stone- have holed inside. I placed the stone stealthily here somewhere. The villagers had spent a lot for making the dome of this village-deity place. Earlier here there was nothing. The stairways of pond had been constructed by the king and beside that the pucca temple- only these two. But the poor king could not worship here. Out of shame he did not come to this village. 2 I, Keshav, from village Mangarauni, of Naraune Sulhane root, gotra- Parashar, son of poet Madhurapati. Malati was the daughter of Khagnath Jha of Mandar Sihaul root, Kashyap Gotra of village Jamsam. Khagnathji and my maternal uncle Bachhru were tied with friendship-band. Jamsam was the village of my maternal uncle. The maternal-uncle was well-to-do, we were poor. So one month during summer vacation and fifteen days from Durga Pooja till Chhath Pooja; I used to stay at maternal-uncle’s village. During summer vacation I used to guard mango orchard; from ripening of white-mango variety till ripening of Kalkatia mango variety. And during the Durga Pooja we enjoyed the pooja from sixth date till the immersion ceremony. Again during Deepawali festival, inflamed the leaves of bamboo and returned to my village during Chhath festival. And in between I occasionally visited my maternal-uncle’s village. With Malati I often quarreled, I was in fourth class perhaps. During summer festival I had been to my maternal uncle’s mango orchard. On some topic I had stopped talking to Malati, as I was angry. However I was softened by Malati and she softened me in an unusual way. -I am sorry for that.. - For what? -For that over which we quarreled. But that topic was neither remembered by me nor by her. And I never quarreled with Malati on any topic. She, however, often used to be angry, then I asked her that on which matter she has stopped talking to me. And if that matter is not remembered then why this quarrel all about? After summer vacationcame Durga Pooja and after Durga Pooja vacation I waited for summer vacation. And from when this wait began I did not remember. 3 Father did share-cropping in village. After middle school there was no school for higher education in vicinity. All the Samskrit schools had closed. So there was no vacation for me. Yearlong, either it was work or vacation. My mother’s parents were alive. My mother was respectfully brought to her father’s place now and then. I also used to visit my maternal uncle’s village in two to four months. There were many problems at village. Not knowing what the basic concept was, I often heard the talk of preservation of Panji from the mouth of my father. And this preservation was only possible if I would be married to Malati, which also I heard from him. Malati was my friend. But we distanced after the preservation of Panji topic began. The ease with which we met suddenly started to vanish. While seeing her I started seeing the face of a wife, that should had gone in her mind also. 4 Bachhru Mama had come to my village. Madhurapati- Bachhru, in your hands now is all my respect. The daughter of Khagnath is simply appropriate for Keshav. She is beautiful and good-natured, but our Keshav is also magnificent. Both are of same age but Malati is younger by some days. Oh. You do know that my father gave seven hundred rupees to the bride’s father and then my marriage was solemnized and my father had Panji. But we do not have land now. Yesterday Panjikar came on mare, mare intoxicated with hubble-bubble. He told at once that only Khagnath’s daughter is available, while he prepared the list of probables. And if that does not happen, I would be debared from east-coast Shrotriya’s group. Bachhru- I am asking to Khagnath. He is my friend, but what is inside his mind that only he will tell. And I did not know why my heart had filled with love. I had accompanied my maternal-uncle. 5 Malati- Keshav. If you are married to somebody else then how we would meet. Keshav- If you are married to somebody else then how you would ask these meaningless questions? Malati- But you understood one thing? Yesterday your maternal-uncle was talking to my father regarding marriage of ours! Keshav- Then? Malati- No, all was well but then a messenger from the King of Darbhanga came and told that there was a message from the King. Keshav- What was the message from the king? Malati- I do not know. But the messenger told my father not to finalise my marriage for sometime. Keshav- You are so beautiful. King must have seen some boy for you. Malati- I do not know… 6 The caravan of the minister of the King in front of Khagnathji’s house! What change was brought in these two days? That messenger passed on some message perhaps. So Khagnathji is in such a hurry now, for the marriage of his daughter! See the swiftness. People in large numbers, all are engaged in the welcome-ceremony. And I too was observing everything. By evening my father had also come. There went the minister’s caravan and my father’s hand touched the forehead. And he went into silence. Khagnath was also silent. King has sent the proposal of his maaiage with Malati. King Bireshwar Singh. What a shame! He must have been over forty years of age and the proposal of marriage with this thirteen-fourteen years old girl? What was tha status of Khagnathji, how he can oppose the proposal? My father was anxious; the Panji would not be preserved? On that day in the evening I met Malati near the corner of her house. Her big eyes, like Karjani, were swollen, like these had wept without console for hours. What I talked to her, I do not remember. Yes, but in the end I had told her that everything would be alright. 7 In Jamsam village the girl was solemnized for King Bireshwar Singh. In Jamsam village a pond was digged. Beside the pond a temple was constructed, how the king would worship in any other’s temple? But I, Keshav, was the son of Poet Madhurapati! The marriage date came nearer. There was no other marriage date during that season. And on that evening I had already talked everything to Malati. On wooden cart the front press; and backside is unstable. The press on front is good because if it does not happen then the backside would be unstable and the cart would tumble. But I balanced the backside. I waited for Malati near the bamboo trees. She came and sat on the cart. Whoever saw me on the road did not talk to me for fear that the cart would tumble. She saw a colourful Patrangi bird and nearly exclaimed- I put my fingers on her lips. I brought Malati to my village. The dhoti was being coloured. Somebody came from Malati’s village to enquire about Malati. I captured and kept that person. “And who would perform the ceremony of Kanyadan from bride’s side”- when this question arose, he was brought in front. “He is from bride’s village so he would perform kanyadaan”. I put down the leather Salamshahi shoe, wore dhoti and performed the marriage rites. The vermillon-ceremony, putting vermillon on the head of Malati was written to be performed only with my hand. 8 Now what King Bireshwar Singh would do? He called the Panjikar and ordered ordered to put the derogatory title “Tashkar”- the robber- before my name in Panji. But Madhurapati was full with pride for his son. Tiger’s son again a tiger! Panji and water both go downward. But after Tashkar Keshav marries Khagnath Jha of Srikant Jha Panji’s daughter, Madhurapati’s shrotriya category would remain existent. And after one hundred years a play is going to be performed in this village; Sultana- the robber! And I, Tashkar Keshav, from root Mangrauni Naraune Sulhani of Parashar Gotra, son of Poet Madhurapati, am looking for any symbol of my love-tale in this village Jamsam. But only king Bireshwar Singh’s that pond and now dilapidated temple could be seen. Poor guy, he did not come to this village out of shame. This pond and that dilapidated temple are the remains of our love. Input: (कोष्ठकमे देवनागरी, मिथिलाक्षर किंवा फोनेटिक-रोमनमे टाइप करू। Input in Devanagari, Mithilakshara or Phonetic-Roman.) Output: (परिणाम देवनागरी, मिथिलाक्षर आ फोनेटिक-रोमन/ रोमनमे। Result in Devanagari, Mithilakshara and Phonetic-Roman/ Roman.) इंग्लिश-मैथिली-कोष / मैथिली-इंग्लिश-कोष प्रोजेक्टकेँ आगू बढ़ाऊ, अपन सुझाव आ योगदानई-मेल द्वारा ggajendra@videha.com पर पठाऊ। विदेहक मैथिली-अंग्रेजी आ अंग्रेजी मैथिली कोष (इंटरनेटपर पहिल बेर सर्च-डिक्शनरी) एम.एस. एस.क्यू.एल. सर्वर आधारित -Based on ms-sql server Maithili-English and English-Maithili Dictionary. मैथिलीमे भाषा सम्पादन पाठ्यक्रम नीचाँक सूचीमे देल विकल्पमेसँ लैंगुएज एडीटर द्वारा कोन रूप चुनल जएबाक चाही: वर्ड फाइलमे बोल्ड कएल रूप: 1.होयबला/ होबयबला/ होमयबला/ हेब’बला, हेम’बला/ होयबाक/होबएबला /होएबाक 2. आ’/आऽ आ 3. क’ लेने/कऽ लेने/कए लेने/कय लेने/ल’/लऽ/लय/लए 4. भ’ गेल/भऽ गेल/भय गेल/भए गेल 5. कर’ गेलाह/करऽ गेलह/करए गेलाह/करय गेलाह 6. लिअ/दिअ लिय’,दिय’,लिअ’,दिय’/ 7. कर’ बला/करऽ बला/ करय बला करै बला/क’र’ बला / करए बला 8. बला वला 9. आङ्ल आंग्ल 10. प्रायः प्रायह 11. दुःख दुख 12. चलि गेल चल गेल/चैल गेल 13. देलखिन्ह देलकिन्ह, देलखिन 14. देखलन्हि देखलनि/ देखलैन्ह 15. छथिन्ह/ छलन्हि छथिन/ छलैन/ छलनि 16. चलैत/दैत चलति/दैति 17. एखनो अखनो 18. बढ़न्हि बढन्हि 19. ओ’/ओऽ(सर्वनाम) ओ 20. ओ (संयोजक) ओ’/ओऽ 21. फाँगि/फाङ्गि फाइंग/फाइङ 22. जे जे’/जेऽ 23. ना-नुकुर ना-नुकर 24. केलन्हि/कएलन्हि/कयलन्हि 25. तखन तँ/ तखन तँ 26. जा’ रहल/जाय रहल/जाए रहल 27. निकलय/निकलए लागल बहराय/ बहराए लागल निकल’/बहरै लागल 28. ओतय/जतय जत’/ओत’/ जतए/ ओतए 29. की फूरल जे कि फूरल जे 30. जे जे’/जेऽ 31. कूदि/यादि(मोन पारब) कूइद/याइद/कूद/याद/ यादि (मोन) 32. इहो/ ओहो 33. हँसए/ हँसय हँसऽ 34. नौ आकि दस/नौ किंवा दस/ नौ वा दस 35. सासु-ससुर सास-ससुर 36. छह/ सात छ/छः/सात 37. की की’/कीऽ (दीर्घीकारान्तमे ऽ वर्जित) 38. जबाब जवाब 39. करएताह/ करयताह करेताह 40. दलान दिशि दलान दिश/दलान दिस 41. गेलाह गएलाह/गयलाह 42. किछु आर/ किछु और 43. जाइत छल जाति छल/जैत छल 44. पहुँचि/ भेटि जाइत छल पहुँच/भेट जाइत छल 45. जबान (युवा)/ जवान(फौजी) 46. लय/लए क’/कऽ/लए कए/ लऽ कऽ/ लऽ कए 47. ल’/लऽ कय/ कए 48. एखन/अखने अखन/एखने 49. अहींकेँ अहीँकेँ 50. गहींर गहीँर 51. धार पार केनाइ धार पार केनाय/केनाए 52. जेकाँ जेँकाँ/ जकाँ 53. तहिना तेहिना 54. एकर अकर 55. बहिनउ बहनोइ 56. बहिन बहिनि 57. बहिन-बहिनोइ बहिन-बहनउ 58. नहि/ नै 59. करबा / करबाय/ करबाए 60. तँ/ त ऽ तय/तए 61. भाय भै/भाए 62. भाँय 63. यावत जावत 64. माय मै / माए 65. देन्हि/दएन्हि/ दयन्हि दन्हि/ दैन्हि 66. द’/ दऽ/ दए 67. ओ (संयोजक) ओऽ (सर्वनाम) 68. तका कए तकाय तकाए 69. पैरे (on foot) पएरे 70. ताहुमे ताहूमे
71. पुत्रीक 72. बजा कय/ कए 73. बननाय/बननाइ 74. कोला 75. दिनुका दिनका 76. ततहिसँ 77. गरबओलन्हि गरबेलन्हि 78. बालु बालू 79. चेन्ह चिन्ह(अशुद्ध) 80. जे जे’ 81. से/ के से’/के’ 82. एखुनका अखनुका 83. भुमिहार भूमिहार 84. सुगर सूगर 85. झठहाक झटहाक 86. छूबि 87. करइयो/ओ करैयो/करिऔ-करइयौ 88. पुबारि पुबाइ 89. झगड़ा-झाँटी झगड़ा-झाँटि 90. पएरे-पएरे पैरे-पैरे 91. खेलएबाक 92. खेलेबाक 93. लगा 94. होए- हो 95. बुझल बूझल 96. बूझल (संबोधन अर्थमे) 97. यैह यएह / इएह 98. तातिल 99. अयनाय- अयनाइ/ अएनाइ 100. निन्न- निन्द 101. बिनु बिन 102. जाए जाइ 103. जाइ (in different sense)-last word of sentence 104. छत पर आबि जाइ 105. ने 106. खेलाए (play) –खेलाइ 107. शिकाइत- शिकायत 108. ढप- ढ़प 109. पढ़- पढ 110. कनिए/ कनिये कनिञे 111. राकस- राकश 112. होए/ होय होइ 113. अउरदा- औरदा 114. बुझेलन्हि (different meaning- got understand) 115. बुझएलन्हि/ बुझयलन्हि (understood himself) 116. चलि- चल 117. खधाइ- खधाय 118. मोन पाड़लखिन्ह मोन पारलखिन्ह 119. कैक- कएक- कइएक 120. लग ल’ग 121. जरेनाइ 122. जरओनाइ- जरएनाइ/जरयनाइ 123. होइत 124. गरबेलन्हि/ गरबओलन्हि 125. चिखैत- (to test)चिखइत 126. करइयो (willing to do) करैयो 127. जेकरा- जकरा 128. तकरा- तेकरा 129. बिदेसर स्थानेमे/ बिदेसरे स्थानमे 130. करबयलहुँ/ करबएलहुँ/ करबेलहुँ 131. हारिक (उच्चारण हाइरक) 132. ओजन वजन 133. आधे भाग/ आध-भागे 134. पिचा / पिचाय/पिचाए 135. नञ/ ने 136. बच्चा नञ (ने) पिचा जाय 137. तखन ने (नञ) कहैत अछि। 138. कतेक गोटे/ कताक गोटे 139. कमाइ- धमाइ कमाई- धमाई 140. लग ल’ग 141. खेलाइ (for playing) 142. छथिन्ह छथिन 143. होइत होइ 144. क्यो कियो / केओ 145. केश (hair) 146. केस (court-case) 147. बननाइ/ बननाय/ बननाए 148. जरेनाइ 149. कुरसी कुर्सी 150. चरचा चर्चा 151. कर्म करम 152. डुबाबए/ डुमाबय/ डुमाबए 153. एखुनका/ अखुनका 154. लय (वाक्यक अतिम शब्द)- लऽ 155. कएलक केलक 156. गरमी गर्मी 157. बरदी वर्दी 158. सुना गेलाह सुना’/सुनाऽ 159. एनाइ-गेनाइ 160. तेना ने घेरलन्हि 161. नञि 162. डरो ड’रो 163. कतहु- कहीं 164. उमरिगर- उमरगर 165. भरिगर 166. धोल/धोअल धोएल 167. गप/गप्प 168. के के’ 169. दरबज्जा/ दरबजा 170. ठाम 171. धरि तक 172. घूरि लौटि 173. थोरबेक 174. बड्ड 175. तोँ/ तूँ 176. तोँहि( पद्यमे ग्राह्य) 177. तोँही / तोँहि 178. करबाइए करबाइये 179. एकेटा 180. करितथि करतथि
181. पहुँचि पहुँच 182. राखलन्हि रखलन्हि 183. लगलन्हि लागलन्हि 184. सुनि (उच्चारण सुइन) 185. अछि (उच्चारण अइछ) 186. एलथि गेलथि 187. बितओने बितेने 188. करबओलन्हि/ करेलखिन्ह 189. करएलन्हि 190. आकि कि 191. पहुँचि पहुँच 192. जराय/ जराए जरा (आगि लगा) 193. से से’ 194. हाँ मे हाँ (हाँमे हाँ विभक्त्तिमे हटा कए) 195. फेल फैल 196. फइल(spacious) फैल 197. होयतन्हि/ होएतन्हि हेतन्हि 198. हाथ मटिआयब/ हाथ मटियाबय/हाथ मटिआएब 199. फेका फेंका 200. देखाए देखा 201. देखाबए 202. सत्तरि सत्तर 203. साहेब साहब 204.गेलैन्ह/ गेलन्हि 205.हेबाक/ होएबाक 206.केलो/ कएलहुँ 207. किछु न किछु/ किछु ने किछु 208.घुमेलहुँ/ घुमओलहुँ 209. एलाक/ अएलाक 210. अः/ अह 211.लय/ लए (अर्थ-परिवर्त्तन) 212.कनीक/ कनेक 213.सबहक/ सभक 214.मिलाऽ/ मिला 215.कऽ/ क 216.जाऽ/ जा 217.आऽ/ आ 218.भऽ/भ’ (’ फॉन्टक कमीक द्योतक) 219.निअम/ नियम 220.हेक्टेअर/ हेक्टेयर 221.पहिल अक्षर ढ/ बादक/बीचक ढ़ 222.तहिं/तहिँ/ तञि/ तैं 223.कहिं/ कहीं 224.तँइ/ तइँ 225.नँइ/ नइँ/ नञि/ नहि 226.है/ हए 227.छञि/ छै/ छैक/छइ 228.दृष्टिएँ/ दृष्टियेँ 229.आ (come)/ आऽ(conjunction) 230. आ (conjunction)/ आऽ(come) 231.कुनो/ कोनो २३२.गेलैन्ह-गेलन्हि २३३.हेबाक- होएबाक २३४.केलौँ- कएलौँ- कएलहुँ २३५.किछु न किछ- किछु ने किछु २३६.केहेन- केहन २३७.आऽ (come)-आ (conjunction-and)/आ २३८. हएत-हैत २३९.घुमेलहुँ-घुमएलहुँ २४०.एलाक- अएलाक २४१.होनि- होइन/होन्हि २४२.ओ-राम ओ श्यामक बीच(conjunction), ओऽ कहलक (he said)/ओ २४३.की हए/ कोसी अएली हए/ की है। की हइ २४४.दृष्टिएँ/ दृष्टियेँ २४५.शामिल/ सामेल २४६.तैँ / तँए/ तञि/ तहिं २४७.जौँ/ ज्योँ २४८.सभ/ सब २४९.सभक/ सबहक २५०.कहिं/ कहीं २५१.कुनो/ कोनो २५२.फारकती भऽ गेल/ भए गेल/ भय गेल २५३.कुनो/ कोनो २५४.अः/ अह २५५.जनै/ जनञ २५६.गेलन्हि/ गेलाह (अर्थ परिवर्तन) २५७.केलन्हि/ कएलन्हि २५८.लय/ लए (अर्थ परिवर्तन) २५९.कनीक/ कनेक २६०.पठेलन्हि/ पठओलन्हि २६१.निअम/ नियम २६२.हेक्टेअर/ हेक्टेयर २६३.पहिल अक्षर रहने ढ/ बीचमे रहने ढ़ २६४.आकारान्तमे बिकारीक प्रयोग उचित नहि/ अपोस्ट्रोफीक प्रयोग फान्टक तकनीकी न्यूनताक परिचायक ओकर बदला अवग्रह (बिकारी) क प्रयोग उचित २६५.केर/-क/ कऽ/ के २६६.छैन्हि- छन्हि २६७.लगैए/ लगैये २६८.होएत/ हएत २६९.जाएत/ जएत २७०.आएत/ अएत/ आओत २७१.खाएत/ खएत/ खैत २७२.पिअएबाक/ पिएबाक २७३.शुरु/ शुरुह २७४.शुरुहे/ शुरुए २७५.अएताह/अओताह/ एताह २७६.जाहि/ जाइ/ जै २७७.जाइत/ जैतए/ जइतए २७८.आएल/ अएल २७९.कैक/ कएक २८०.आयल/ अएल/ आएल २८१. जाए/ जै/ जए २८२. नुकएल/ नुकाएल २८३. कठुआएल/ कठुअएल २८४. ताहि/ तै २८५. गायब/ गाएब/ गएब २८६. सकै/ सकए/ सकय २८७.सेरा/सरा/ सराए (भात सेरा गेल) २८८.कहैत रही/देखैत रही/ कहैत छलहुँ/ कहै छलहुँ- एहिना चलैत/ पढ़ैत (पढ़ै-पढ़ैत अर्थ कखनो काल परिवर्तित)-आर बुझै/ बुझैत (बुझै/ बुझैत छी, मुदा बुझैत-बुझैत)/ सकैत/ सकै। करैत/ करै। दै/ दैत। छैक/ छै। बचलै/ बचलैक। रखबा/ रखबाक । बिनु/ बिन। रातिक/ रातुक २८९. दुआरे/ द्वारे २९०.भेटि/ भेट २९१. खन/ खुना (भोर खन/ भोर खुना) २९२.तक/ धरि २९३.गऽ/गै (meaning different-जनबै गऽ) २९४.सऽ/ सँ (मुदा दऽ, लऽ) २९५.त्त्व,(तीन अक्षरक मेल बदला पुनरुक्तिक एक आ एकटा दोसरक उपयोग) आदिक बदला त्व आदि। महत्त्व/ महत्व/ कर्ता/ कर्त्ता आदिमे त्त संयुक्तक कोनो आवश्यकता मैथिलीमे नहि अछि। वक्तव्य २९६.बेसी/ बेशी २९७.बाला/वाला बला/ वला (रहैबला) २९८.वाली/ (बदलएवाली) २९९.वार्त्ता/ वार्ता 300. अन्तर्राष्ट्रिय/ अन्तर्राष्ट्रीय ३०१. लेमए/ लेबए ३०२.लमछुरका, नमछुरका ३०२.लागै/ लगै (भेटैत/ भेटै) ३०३.लागल/ लगल ३०४.हबा/ हवा ३०५.राखलक/ रखलक ३०६.आ (come)/ आ (and) ३०७. पश्चाताप/ पश्चात्ताप ३०८. ऽ केर व्यवहार शब्दक अन्तमे मात्र, यथासंभव बीचमे नहि। ३०९.कहैत/ कहै ३१०. रहए (छल)/ रहै (छलै) (meaning different) ३११.तागति/ ताकति ३१२.खराप/ खराब ३१३.बोइन/ बोनि/ बोइनि ३१४.जाठि/ जाइठ ३१५.कागज/ कागच ३१६.गिरै (meaning different- swallow)/ गिरए (खसए) ३१७.राष्ट्रिय/ राष्ट्रीय उच्चारण निर्देश: दन्त न क उच्चारणमे दाँतमे जीह सटत- जेना बाजू नाम , मुदा ण क उच्चारणमे जीह मूर्धामे सटत (नहि सटैए तँ उच्चारण दोष अछि)- जेना बाजू गणेश। तालव्य शमे जीह तालुसँ , षमे मूर्धासँ आ दन्त समे दाँतसँ सटत। निशाँ, सभ आ शोषण बाजि कऽ देखू। मैथिलीमे ष केँ वैदिक संस्कृत जेकाँ ख सेहो उच्चरित कएल जाइत अछि, जेना वर्षा, दोष। य अनेको स्थानपर ज जेकाँ उच्चरित होइत अछि आ ण ड़ जेकाँ (यथा संयोग आ गणेश संजोग आ गड़ेस उच्चरित होइत अछि)। मैथिलीमे व क उच्चारण ब, श क उच्चारण स आ य क उच्चारण ज सेहो होइत अछि। ओहिना ह्रस्व इ बेशीकाल मैथिलीमे पहिने बाजल जाइत अछि कारण देवनागरीमे आ मिथिलाक्षरमे ह्रस्व इ अक्षरक पहिने लिखलो जाइत आ बाजलो जएबाक चाही। कारण जे हिन्दीमे एकर दोषपूर्ण उच्चारण होइत अछि (लिखल तँ पहिने जाइत अछि मुदा बाजल बादमे जाइत अछि), से शिक्षा पद्धतिक दोषक कारण हम सभ ओकर उच्चारण दोषपूर्ण ढंगसँ कऽ रहल छी। अछि- अ इ छ ऐछ छथि- छ इ थ – छैथ पहुँचि- प हुँ इ च आब अ आ इ ई ए ऐ ओ औ अं अः ऋ एहि सभ लेल मात्रा सेहो अछि, मुदा एहिमे ई ऐ ओ औ अं अः ऋ केँ संयुक्ताक्षर रूपमे गलत रूपमे प्रयुक्त आ उच्चरित कएल जाइत अछि। जेना ऋ केँ री रूपमे उच्चरित करब। आ देखियौ- एहि लेल देखिऔ क प्रयोग अनुचित। मुदा देखिऐ लेल देखियै अनुचित। क् सँ ह् धरि अ सम्मिलित भेलासँ क सँ ह बनैत अछि, मुदा उच्चारण काल हलन्त युक्त शब्दक अन्तक उच्चारणक प्रवृत्ति बढ़ल अछि, मुदा हम जखन मनोजमे ज् अन्तमे बजैत छी, तखनो पुरनका लोककेँ बजैत सुनबन्हि- मनोजऽ, वास्तवमे ओ अ युक्त ज् = ज बजै छथि। फेर ज्ञ अछि ज् आ ञ क संयुक्त मुदा गलत उच्चारण होइत अछि- ग्य। ओहिना क्ष अछि क् आ ष क संयुक्त मुदा उच्चारण होइत अछि छ। फेर श् आ र क संयुक्त अछि श्र ( जेना श्रमिक) आ स् आ र क संयुक्त अछि स्र (जेना मिस्र)। त्र भेल त+र । उच्चारणक ऑडियो फाइल विदेह आर्काइव http://www.videha.co.in/ पर उपलब्ध अछि। फेर केँ / सँ / पर पूर्व अक्षरसँ सटा कऽ लिखू मुदा तँ/ के/ कऽ हटा कऽ। एहिमे सँ मे पहिल सटा कऽ लिखू आ बादबला हटा कऽ। अंकक बाद टा लिखू सटा कऽ मुदा अन्य ठाम टा लिखू हटा कऽ– जेना छहटा मुदा सभ टा। फेर ६अ म सातम लिखू- छठम सातम नहि। घरबलामे बला मुदा घरवालीमे वाली प्रयुक्त करू। रहए- रहै मुदा सकैए (उच्चारण सकै-ए)। मुदा कखनो काल रहए आ रहै मे अर्थ भिन्नता सेहो, जेना से कम्मो जगहमे पार्किंग करबाक अभ्यास रहै ओकरा। पुछलापर पता लागल जे ढुनढुन नाम्ना ई ड्राइवर कनाट प्लेसक पार्किंगमे काज करैत रहए। छलै, छलए मे सेहो एहि तरहक भेल। छलए क उच्चारण छल-ए सेहो। संयोगने- (उच्चारण संजोगने) केँ/ के / कऽ केर- क (केर क प्रयोग नहि करू ) क (जेना रामक) –रामक आ संगे (उच्चारण राम के / राम कऽ सेहो) सँ- सऽ चन्द्रबिन्दु आ अनुस्वार- अनुस्वारमे कंठ धरिक प्रयोग होइत अछि मुदा चन्द्रबिन्दुमे नहि। चन्द्रबिन्दुमे कनेक एकारक सेहो उच्चारण होइत अछि- जेना रामसँ- (उच्चारण राम सऽ) रामकेँ- (उच्चारण राम कऽ/ राम के सेहो)। केँ जेना रामकेँ भेल हिन्दीक को (राम को)- राम को= रामकेँ क जेना रामक भेल हिन्दीक का ( राम का) राम का= रामक कऽ जेना जा कऽ भेल हिन्दीक कर ( जा कर) जा कर= जा कऽ सँ भेल हिन्दीक से (राम से) राम से= रामसँ सऽ तऽ त केर एहि सभक प्रयोग अवांछित। के दोसर अर्थेँ प्रयुक्त भऽ सकैए- जेना के कहलक? नञि, नहि, नै, नइ, नँइ, नइँ एहि सभक उच्चारण- नै त्त्व क बदलामे त्व जेना महत्वपूर्ण (महत्त्वपूर्ण नहि) जतए अर्थ बदलि जाए ओतहि मात्र तीन अक्षरक संयुक्ताक्षरक प्रयोग उचित। सम्पति- उच्चारण स म्प इ त (सम्पत्ति नहि- कारण सही उच्चारण आसानीसँ सम्भव नहि)। मुदा सर्वोत्तम (सर्वोतम नहि)। राष्ट्रिय (राष्ट्रीय नहि) सकैए/ सकै (अर्थ परिवर्तन) पोछैले/ पोछैए/ पोछए/ (अर्थ परिवर्तन) पोछए/ पोछै ओ लोकनि ( हटा कऽ, ओ मे बिकारी नहि) ओइ/ ओहि ओहिले/ ओहि लेल जएबेँ/ बैसबेँ पँचभइयाँ देखियौक (देखिऔक बहि- तहिना अ मे ह्रस्व आ दीर्घक मात्राक प्रयोग अनुचित) जकाँ/ जेकाँ तँइ/ तैँ होएत/ हएत नञि/ नहि/ नँइ/ नइँ सौँसे बड़/ बड़ी (झोराओल) गाए (गाइ नहि) रहलेँ/ पहिरतैँ हमहीं/ अहीं सब - सभ सबहक - सभहक धरि - तक गप- बात बूझब - समझब बुझलहुँ - समझलहुँ हमरा आर - हम सभ आकि- आ कि सकैछ/ करैछ (गद्यमे प्रयोगक आवश्यकता नहि) मे केँ सँ पर (शब्दसँ सटा कऽ) तँ कऽ धऽ दऽ (शब्दसँ हटा कऽ) मुदा दूटा वा बेशी विभक्ति संग रहलापर पहिल विभक्ति टाकेँ सटाऊ। एकटा दूटा (मुदा कैक टा) बिकारीक प्रयोग शब्दक अन्तमे, बीचमे अनावश्यक रूपेँ नहि। आकारान्त आ अन्तमे अ क बाद बिकारीक प्रयोग नहि (जेना दिअ, आ ) अपोस्ट्रोफीक प्रयोग बिकारीक बदलामे करब अनुचित आ मात्र फॉन्टक तकनीकी न्यूनताक परिचायक)- ओना बिकारीक संस्कृत रूप ऽ अवग्रह कहल जाइत अछि आ वर्तनी आ उच्चारण दुनू ठाम एकर लोप रहैत अछि/ रहि सकैत अछि (उच्चारणमे लोप रहिते अछि)। मुदा अपोस्ट्रोफी सेहो अंग्रेजीमे पसेसिव केसमे होइत अछि आ फ्रेंचमे शब्दमे जतए एकर प्रयोग होइत अछि जेना raison d’etre एतए सेहो एकर उच्चारण रैजौन डेटर होइत अछि, माने अपोस्ट्रॉफी अवकाश नहि दैत अछि वरन जोड़ैत अछि, से एकर प्रयोग बिकारीक बदला देनाइ तकनीकी रूपेँ सेहो अनुचित)। अइमे, एहिमे जइमे, जाहिमे एखन/ अखन/ अइखन केँ (के नहि) मे (अनुस्वार रहित) भऽ मे दऽ तँ (तऽ त नहि) सँ ( सऽ स नहि) गाछ तर गाछ लग साँझ खन जो (जो go, करै जो do) ३.नेपाल आ भारतक मैथिली भाषा-वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक शैली
1.नेपालक मैथिली भाषा वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक उच्चारण आ लेखन शैली (भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक धारणाकेँ पूर्ण रूपसँ सङ्ग लऽ निर्धारित) मैथिलीमे उच्चारण तथा लेखन १.पञ्चमाक्षर आ अनुस्वार: पञ्चमाक्षरान्तर्गत ङ, ञ, ण, न एवं म अबैत अछि। संस्कृत भाषाक अनुसार शब्दक अन्तमे जाहि वर्गक अक्षर रहैत अछि ओही वर्गक पञ्चमाक्षर अबैत अछि। जेना- अङ्क (क वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ङ् आएल अछि।) पञ्च (च वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ञ् आएल अछि।) खण्ड (ट वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ण् आएल अछि।) सन्धि (त वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे न् आएल अछि।) खम्भ (प वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे म् आएल अछि।) उपर्युक्त बात मैथिलीमे कम देखल जाइत अछि। पञ्चमाक्षरक बदलामे अधिकांश जगहपर अनुस्वारक प्रयोग देखल जाइछ। जेना- अंक, पंच, खंड, संधि, खंभ आदि। व्याकरणविद पण्डित गोविन्द झाक कहब छनि जे कवर्ग, चवर्ग आ टवर्गसँ पूर्व अनुस्वार लिखल जाए तथा तवर्ग आ पवर्गसँ पूर्व पञ्चमाक्षरे लिखल जाए। जेना- अंक, चंचल, अंडा, अन्त तथा कम्पन। मुदा हिन्दीक निकट रहल आधुनिक लेखक एहि बातकेँ नहि मानैत छथि। ओ लोकनि अन्त आ कम्पनक जगहपर सेहो अंत आ कंपन लिखैत देखल जाइत छथि। नवीन पद्धति किछु सुविधाजनक अवश्य छैक। किएक तँ एहिमे समय आ स्थानक बचत होइत छैक। मुदा कतोक बेर हस्तलेखन वा मुद्रणमे अनुस्वारक छोट सन बिन्दु स्पष्ट नहि भेलासँ अर्थक अनर्थ होइत सेहो देखल जाइत अछि। अनुस्वारक प्रयोगमे उच्चारण-दोषक सम्भावना सेहो ततबए देखल जाइत अछि। एतदर्थ कसँ लऽ कऽ पवर्ग धरि पञ्चमाक्षरेक प्रयोग करब उचित अछि। यसँ लऽ कऽ ज्ञ धरिक अक्षरक सङ्ग अनुस्वारक प्रयोग करबामे कतहु कोनो विवाद नहि देखल जाइछ। २.ढ आ ढ़ : ढ़क उच्चारण “र् ह”जकाँ होइत अछि। अतः जतऽ “र् ह”क उच्चारण हो ओतऽ मात्र ढ़ लिखल जाए। आन ठाम खाली ढ लिखल जएबाक चाही। जेना- ढ = ढाकी, ढेकी, ढीठ, ढेउआ, ढङ्ग, ढेरी, ढाकनि, ढाठ आदि। ढ़ = पढ़ाइ, बढ़ब, गढ़ब, मढ़ब, बुढ़बा, साँढ़, गाढ़, रीढ़, चाँढ़, सीढ़ी, पीढ़ी आदि। उपर्युक्त शब्द सभकेँ देखलासँ ई स्पष्ट होइत अछि जे साधारणतया शब्दक शुरूमे ढ आ मध्य तथा अन्तमे ढ़ अबैत अछि। इएह नियम ड आ ड़क सन्दर्भ सेहो लागू होइत अछि। ३.व आ ब : मैथिलीमे “व”क उच्चारण ब कएल जाइत अछि, मुदा ओकरा ब रूपमे नहि लिखल जएबाक चाही। जेना- उच्चारण : बैद्यनाथ, बिद्या, नब, देबता, बिष्णु, बंश, बन्दना आदि। एहि सभक स्थानपर क्रमशः वैद्यनाथ, विद्या, नव, देवता, विष्णु, वंश, वन्दना लिखबाक चाही। सामान्यतया व उच्चारणक लेल ओ प्रयोग कएल जाइत अछि। जेना- ओकील, ओजह आदि। ४.य आ ज : कतहु-कतहु “य”क उच्चारण “ज”जकाँ करैत देखल जाइत अछि, मुदा ओकरा ज नहि लिखबाक चाही। उच्चारणमे यज्ञ, जदि, जमुना, जुग, जाबत, जोगी, जदु, जम आदि कहल जाएबला शब्द सभकेँ क्रमशः यज्ञ, यदि, यमुना, युग, यावत, योगी, यदु, यम लिखबाक चाही। ५.ए आ य : मैथिलीक वर्तनीमे ए आ य दुनू लिखल जाइत अछि। प्राचीन वर्तनी- कएल, जाए, होएत, माए, भाए, गाए आदि। नवीन वर्तनी- कयल, जाय, होयत, माय, भाय, गाय आदि। सामान्यतया शब्दक शुरूमे ए मात्र अबैत अछि। जेना एहि, एना, एकर, एहन आदि। एहि शब्द सभक स्थानपर यहि, यना, यकर, यहन आदिक प्रयोग नहि करबाक चाही। यद्यपि मैथिलीभाषी थारू सहित किछु जातिमे शब्दक आरम्भोमे “ए”केँ य कहि उच्चारण कएल जाइत अछि। ए आ “य”क प्रयोगक सन्दर्भमे प्राचीने पद्धतिक अनुसरण करब उपयुक्त मानि एहि पुस्तकमे ओकरे प्रयोग कएल गेल अछि। किएक तँ दुनूक लेखनमे कोनो सहजता आ दुरूहताक बात नहि अछि। आ मैथिलीक सर्वसाधारणक उच्चारण-शैली यक अपेक्षा एसँ बेसी निकट छैक। खास कऽ कएल, हएब आदि कतिपय शब्दकेँ कैल, हैब आदि रूपमे कतहु-कतहु लिखल जाएब सेहो “ए”क प्रयोगकेँ बेसी समीचीन प्रमाणित करैत अछि। ६.हि, हु तथा एकार, ओकार : मैथिलीक प्राचीन लेखन-परम्परामे कोनो बातपर बल दैत काल शब्दक पाछाँ हि, हु लगाओल जाइत छैक। जेना- हुनकहि, अपनहु, ओकरहु, तत्कालहि, चोट्टहि, आनहु आदि। मुदा आधुनिक लेखनमे हिक स्थानपर एकार एवं हुक स्थानपर ओकारक प्रयोग करैत देखल जाइत अछि। जेना- हुनके, अपनो, तत्काले, चोट्टे, आनो आदि। ७.ष तथा ख : मैथिली भाषामे अधिकांशतः षक उच्चारण ख होइत अछि। जेना- षड्यन्त्र (खड़यन्त्र), षोडशी (खोड़शी), षट्कोण (खटकोण), वृषेश (वृखेश), सन्तोष (सन्तोख) आदि। ८.ध्वनि-लोप : निम्नलिखित अवस्थामे शब्दसँ ध्वनि-लोप भऽ जाइत अछि: (क) क्रियान्वयी प्रत्यय अयमे य वा ए लुप्त भऽ जाइत अछि। ओहिमे सँ पहिने अक उच्चारण दीर्घ भऽ जाइत अछि। ओकर आगाँ लोप-सूचक चिह्न वा विकारी (’ / ऽ) लगाओल जाइछ। जेना- पूर्ण रूप : पढ़ए (पढ़य) गेलाह, कए (कय) लेल, उठए (उठय) पड़तौक। अपूर्ण रूप : पढ़’ गेलाह, क’ लेल, उठ’ पड़तौक। पढ़ऽ गेलाह, कऽ लेल, उठऽ पड़तौक। (ख) पूर्वकालिक कृत आय (आए) प्रत्ययमे य (ए) लुप्त भऽ जाइछ, मुदा लोप-सूचक विकारी नहि लगाओल जाइछ। जेना- पूर्ण रूप : खाए (य) गेल, पठाय (ए) देब, नहाए (य) अएलाह। अपूर्ण रूप : खा गेल, पठा देब, नहा अएलाह। (ग) स्त्री प्रत्यय इक उच्चारण क्रियापद, संज्ञा, ओ विशेषण तीनूमे लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना- पूर्ण रूप : दोसरि मालिनि चलि गेलि। अपूर्ण रूप : दोसर मालिन चलि गेल। (घ) वर्तमान कृदन्तक अन्तिम त लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना- पूर्ण रूप : पढ़ैत अछि, बजैत अछि, गबैत अछि। अपूर्ण रूप : पढ़ै अछि, बजै अछि, गबै अछि। (ङ) क्रियापदक अवसान इक, उक, ऐक तथा हीकमे लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना- पूर्ण रूप: छियौक, छियैक, छहीक, छौक, छैक, अबितैक, होइक। अपूर्ण रूप : छियौ, छियै, छही, छौ, छै, अबितै, होइ। (च) क्रियापदीय प्रत्यय न्ह, हु तथा हकारक लोप भऽ जाइछ। जेना- पूर्ण रूप : छन्हि, कहलन्हि, कहलहुँ, गेलह, नहि। अपूर्ण रूप : छनि, कहलनि, कहलौँ, गेलऽ, नइ, नञि, नै। ९.ध्वनि स्थानान्तरण : कोनो-कोनो स्वर-ध्वनि अपना जगहसँ हटि कऽ दोसर ठाम चलि जाइत अछि। खास कऽ ह्रस्व इ आ उक सम्बन्धमे ई बात लागू होइत अछि। मैथिलीकरण भऽ गेल शब्दक मध्य वा अन्तमे जँ ह्रस्व इ वा उ आबए तँ ओकर ध्वनि स्थानान्तरित भऽ एक अक्षर आगाँ आबि जाइत अछि। जेना- शनि (शइन), पानि (पाइन), दालि ( दाइल), माटि (माइट), काछु (काउछ), मासु (माउस) आदि। मुदा तत्सम शब्द सभमे ई निअम लागू नहि होइत अछि। जेना- रश्मिकेँ रइश्म आ सुधांशुकेँ सुधाउंस नहि कहल जा सकैत अछि। १०.हलन्त(्)क प्रयोग : मैथिली भाषामे सामान्यतया हलन्त (्)क आवश्यकता नहि होइत अछि। कारण जे शब्दक अन्तमे अ उच्चारण नहि होइत अछि। मुदा संस्कृत भाषासँ जहिनाक तहिना मैथिलीमे आएल (तत्सम) शब्द सभमे हलन्त प्रयोग कएल जाइत अछि। एहि पोथीमे सामान्यतया सम्पूर्ण शब्दकेँ मैथिली भाषा सम्बन्धी निअम अनुसार हलन्तविहीन राखल गेल अछि। मुदा व्याकरण सम्बन्धी प्रयोजनक लेल अत्यावश्यक स्थानपर कतहु-कतहु हलन्त देल गेल अछि। प्रस्तुत पोथीमे मथिली लेखनक प्राचीन आ नवीन दुनू शैलीक सरल आ समीचीन पक्ष सभकेँ समेटि कऽ वर्ण-विन्यास कएल गेल अछि। स्थान आ समयमे बचतक सङ्गहि हस्त-लेखन तथा तकनीकी दृष्टिसँ सेहो सरल होबऽबला हिसाबसँ वर्ण-विन्यास मिलाओल गेल अछि। वर्तमान समयमे मैथिली मातृभाषी पर्यन्तकेँ आन भाषाक माध्यमसँ मैथिलीक ज्ञान लेबऽ पड़ि रहल परिप्रेक्ष्यमे लेखनमे सहजता तथा एकरूपतापर ध्यान देल गेल अछि। तखन मैथिली भाषाक मूल विशेषता सभ कुण्ठित नहि होइक, ताहू दिस लेखक-मण्डल सचेत अछि। प्रसिद्ध भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक कहब छनि जे सरलताक अनुसन्धानमे एहन अवस्था किन्नहु ने आबऽ देबाक चाही जे भाषाक विशेषता छाँहमे पडि जाए। -(भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक धारणाकेँ पूर्ण रूपसँ सङ्ग लऽ निर्धारित) 2. मैथिली अकादमी, पटना द्वारा निर्धारित मैथिली लेखन-शैली
1. जे शब्द मैथिली-साहित्यक प्राचीन कालसँ आइ धरि जाहि वर्त्तनीमे प्रचलित अछि, से सामान्यतः ताहि वर्त्तनीमे लिखल जाय- उदाहरणार्थ-
ग्राह्य
एखन ठाम जकर, तकर तनिकर अछि
अग्राह्य अखन, अखनि, एखेन, अखनी ठिमा, ठिना, ठमा जेकर, तेकर तिनकर। (वैकल्पिक रूपेँ ग्राह्य) ऐछ, अहि, ए।
2. निम्नलिखित तीन प्रकारक रूप वैकल्पिकतया अपनाओल जाय: भऽ गेल, भय गेल वा भए गेल। जा रहल अछि, जाय रहल अछि, जाए रहल अछि। कर’ गेलाह, वा करय गेलाह वा करए गेलाह।
3. प्राचीन मैथिलीक ‘न्ह’ ध्वनिक स्थानमे ‘न’ लिखल जाय सकैत अछि यथा कहलनि वा कहलन्हि।
4. ‘ऐ’ तथा ‘औ’ ततय लिखल जाय जत’ स्पष्टतः ‘अइ’ तथा ‘अउ’ सदृश उच्चारण इष्ट हो। यथा- देखैत, छलैक, बौआ, छौक इत्यादि।
5. मैथिलीक निम्नलिखित शब्द एहि रूपे प्रयुक्त होयत: जैह, सैह, इएह, ओऐह, लैह तथा दैह।
6. ह्र्स्व इकारांत शब्दमे ‘इ’ के लुप्त करब सामान्यतः अग्राह्य थिक। यथा- ग्राह्य देखि आबह, मालिनि गेलि (मनुष्य मात्रमे)।
7. स्वतंत्र ह्रस्व ‘ए’ वा ‘य’ प्राचीन मैथिलीक उद्धरण आदिमे तँ यथावत राखल जाय, किंतु आधुनिक प्रयोगमे वैकल्पिक रूपेँ ‘ए’ वा ‘य’ लिखल जाय। यथा:- कयल वा कएल, अयलाह वा अएलाह, जाय वा जाए इत्यादि।
8. उच्चारणमे दू स्वरक बीच जे ‘य’ ध्वनि स्वतः आबि जाइत अछि तकरा लेखमे स्थान वैकल्पिक रूपेँ देल जाय। यथा- धीआ, अढ़ैआ, विआह, वा धीया, अढ़ैया, बियाह।
9. सानुनासिक स्वतंत्र स्वरक स्थान यथासंभव ‘ञ’ लिखल जाय वा सानुनासिक स्वर। यथा:- मैञा, कनिञा, किरतनिञा वा मैआँ, कनिआँ, किरतनिआँ।
10. कारकक विभक्त्तिक निम्नलिखित रूप ग्राह्य:- हाथकेँ, हाथसँ, हाथेँ, हाथक, हाथमे। ’मे’ मे अनुस्वार सर्वथा त्याज्य थिक। ‘क’ क वैकल्पिक रूप ‘केर’ राखल जा सकैत अछि।
11. पूर्वकालिक क्रियापदक बाद ‘कय’ वा ‘कए’ अव्यय वैकल्पिक रूपेँ लगाओल जा सकैत अछि। यथा:- देखि कय वा देखि कए।
12. माँग, भाँग आदिक स्थानमे माङ, भाङ इत्यादि लिखल जाय।
13. अर्द्ध ‘न’ ओ अर्द्ध ‘म’ क बदला अनुसार नहि लिखल जाय, किंतु छापाक सुविधार्थ अर्द्ध ‘ङ’ , ‘ञ’, तथा ‘ण’ क बदला अनुस्वारो लिखल जा सकैत अछि। यथा:- अङ्क, वा अंक, अञ्चल वा अंचल, कण्ठ वा कंठ।
14. हलंत चिह्न निअमतः लगाओल जाय, किंतु विभक्तिक संग अकारांत प्रयोग कएल जाय। यथा:- श्रीमान्, किंतु श्रीमानक।
15. सभ एकल कारक चिह्न शब्दमे सटा क’ लिखल जाय, हटा क’ नहि, संयुक्त विभक्तिक हेतु फराक लिखल जाय, यथा घर परक।
16. अनुनासिककेँ चन्द्रबिन्दु द्वारा व्यक्त कयल जाय। परंतु मुद्रणक सुविधार्थ हि समान जटिल मात्रापर अनुस्वारक प्रयोग चन्द्रबिन्दुक बदला कयल जा सकैत अछि। यथा- हिँ केर बदला हिं।
17. पूर्ण विराम पासीसँ ( । ) सूचित कयल जाय।
18. समस्त पद सटा क’ लिखल जाय, वा हाइफेनसँ जोड़ि क’ , हटा क’ नहि।
19. लिअ तथा दिअ शब्दमे बिकारी (ऽ) नहि लगाओल जाय।
20. अंक देवनागरी रूपमे राखल जाय।
21.किछु ध्वनिक लेल नवीन चिन्ह बनबाओल जाय। जा' ई नहि बनल अछि ताबत एहि दुनू ध्वनिक बदला पूर्ववत् अय/ आय/ अए/ आए/ आओ/ अओ लिखल जाय। आकि ऎ वा ऒ सँ व्यक्त कएल जाय।
ह./- गोविन्द झा ११/८/७६ श्रीकान्त ठाकुर ११/८/७६ सुरेन्द्र झा "सुमन" ११/०८/७६ Festivals of Mithila DATE-LIST (year- 2010-11) (१४१८ साल) Marriage Days: Nov.2010- 19 Dec.2010- 3,8 January 2011- 17, 21, 23, 24, 26, 27, 28 31 Feb.2011- 3, 4, 7, 9, 18, 20, 24, 25, 27, 28 March 2011- 2, 7 May 2011- 11, 12, 13, 18, 19, 20, 22, 23, 29, 30 June 2011- 1, 2, 3, 8, 9, 10, 12, 13, 19, 20, 26, 29 Upanayana Days: February 2011- 8 March 2011- 7 May 2011- 12, 13 June 2011- 6, 12 Dviragaman Din: November 2010- 19, 22, 25, 26 December 2010- 6, 8, 9, 10, 12 February 2011- 20, 21 March 2011- 6, 7, 9, 13 April 2011- 17, 18, 22 May 2011- 5, 6, 8, 13 Mundan Din: November 2010- 24, 26 December 2010- 10, 17 February 2011- 4, 16, 21 March 2011- 7, 9 April 2011- 22 May 2011- 6, 9, 19 June 2011- 3, 6, 10, 20 FESTIVALS OF MITHILA Mauna Panchami-31 July Somavati Amavasya Vrat- 1 August Madhushravani-12 August Nag Panchami- 14 August Raksha Bandhan- 24 Aug Krishnastami- 01 September Kushi Amavasya- 08 September Hartalika Teej- 11 September ChauthChandra-11 September Vishwakarma Pooja- 17 September Karma Dharma Ekadashi-19 September Indra Pooja Aarambh- 20 September Anant Caturdashi- 22 Sep Agastyarghadaan- 23 Sep Pitri Paksha begins- 24 Sep Jimootavahan Vrata/ Jitia-30 Sep Matri Navami- 02 October Kalashsthapan- 08 October Belnauti- 13 October Patrika Pravesh- 14 October Mahastami- 15 October Maha Navami - 16-17 October Vijaya Dashami- 18 October Kojagara- 22 Oct Dhanteras- 3 November Diyabati, shyama pooja- 5 November Annakoota/ Govardhana Pooja-07 November Bhratridwitiya/ Chitragupta Pooja-08 November Chhathi- -12 November Akshyay Navami- 15 November Devotthan Ekadashi- 17 November Kartik Poornima/ Sama Bisarjan- 21 Nov Shaa. ravivratarambh- 21 November Navanna parvan- 24 -26 November Vivaha Panchmi- 10 December Naraknivaran chaturdashi- 01 February Makara/ Teela Sankranti-15 Jan Basant Panchami/ Saraswati Pooja- 08 Februaqry Achla Saptmi- 10 February Mahashivaratri-03 March Holikadahan-Fagua-19 March Holi-20 Mar Varuni Yoga- 31 March va.navaratrarambh- 4 April vaa. Chhathi vrata- 9 April Ram Navami- 12 April Mesha Sankranti-Satuani-14 April Jurishital-15 April Somavati Amavasya Vrata- 02 May Ravi Brat Ant- 08 May Akshaya Tritiya-06 May Janaki Navami- 12 May Vat Savitri-barasait- 01 June Ganga Dashhara-11 June Jagannath Rath Yatra- 3 July Hari Sayan Ekadashi- 11 Jul Aashadhi Guru Poornima-15 Jul १.विदेह ई-पत्रिकाक सभटा पुरान अंक ब्रेल, तिरहुता आ देवनागरी रूपमे Videha e journal's all old issues in Braille Tirhuta and Devanagari versions २.मैथिली पोथी डाउनलोड Maithili Books Download, ३.मैथिली ऑडियो संकलन Maithili Audio Downloads, ४.मैथिली वीडियोक संकलन Maithili Videos ५.मिथिला चित्रकला/ आधुनिक चित्रकला आ चित्र Mithila Painting/ Modern Art and Photos "विदेह"क एहि सभ सहयोगी लिंकपर सेहो एक बेर जाऊ। ६.विदेह मैथिली क्विज : http://videhaquiz.blogspot.com/ ७.विदेह मैथिली जालवृत्त एग्रीगेटर : http://videha-aggregator.blogspot.com/ ८.विदेह मैथिली साहित्य अंग्रेजीमे अनूदित : http://madhubani-art.blogspot.com/ ९.विदेहक पूर्व-रूप "भालसरिक गाछ" : http://gajendrathakur.blogspot.com/ १०.विदेह इंडेक्स : http://videha123.blogspot.com/ ११.विदेह फाइल : http://videha123.wordpress.com/ १२. विदेह: सदेह : पहिल तिरहुता (मिथिला़क्षर) जालवृत्त (ब्लॉग) http://videha-sadeha.blogspot.com/ १३. विदेह:ब्रेल: मैथिली ब्रेलमे: पहिल बेर विदेह द्वारा http://videha-braille.blogspot.com/ १४.VIDEHA"IST MAITHILI FORTNIGHTLY EJOURNAL ARCHIVE http://videha-archive.blogspot.com/ १५. 'विदेह' प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका मैथिली पोथीक आर्काइव http://videha-pothi.blogspot.com/ १६. 'विदेह' प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका ऑडियो आर्काइव http://videha-audio.blogspot.com/ १७. 'विदेह' प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका वीडियो आर्काइव http://videha-video.blogspot.com/ १८. 'विदेह' प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका मिथिला चित्रकला, आधुनिक कला आ चित्रकला http://videha-paintings-photos.blogspot.com/ १९. मैथिल आर मिथिला (मैथिलीक सभसँ लोकप्रिय जालवृत्त) http://maithilaurmithila.blogspot.com/ २०.श्रुति प्रकाशन http://www.shruti-publication.com/ २१.http://groups.google.com/group/videha २२.http://groups.yahoo.com/group/VIDEHA/ २३.गजेन्द्र ठाकुर इडेक्स http://gajendrathakur123.blogspot.com २४.विदेह रेडियो:मैथिली कथा-कविता आदिक पहिल पोडकास्ट साइटhttp://videha123radio.wordpress.com/ २५. नेना भुटका http://mangan-khabas.blogspot.com/ महत्त्वपूर्ण सूचना:(१) 'विदेह' द्वारा धारावाहिक रूपे ई-प्रकाशित कएल गेल गजेन्द्र ठाकुरक निबन्ध-प्रबन्ध-समीक्षा, उपन्यास (सहस्रबाढ़नि) , पद्य-संग्रह (सहस्राब्दीक चौपड़पर), कथा-गल्प (गल्प-गुच्छ), नाटक(संकर्षण), महाकाव्य (त्वञ्चाहञ्च आ असञ्जाति मन) आ बाल-किशोर साहित्य विदेहमे संपूर्ण ई-प्रकाशनक बाद प्रिंट फॉर्ममे। कुरुक्षेत्रम्–अन्तर्मनक खण्ड-१ सँ ७ Combined ISBN No.978-81-907729-7-6 विवरण एहि पृष्ठपर नीचाँमे आ प्रकाशकक साइट http://www.shruti-publication.com/ पर । महत्त्वपूर्ण सूचना (२):सूचना: विदेहक मैथिली-अंग्रेजी आ अंग्रेजी मैथिली कोष (इंटरनेटपर पहिल बेर सर्च-डिक्शनरी) एम.एस. एस.क्यू.एल. सर्वर आधारित -Based on ms-sql server Maithili-English and English-Maithili Dictionary. विदेहक भाषापाक- रचनालेखन स्तंभमे। कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक- गजेन्द्र ठाकुर गजेन्द्र ठाकुरक निबन्ध-प्रबन्ध-समीक्षा, उपन्यास (सहस्रबाढ़नि) , पद्य-संग्रह (सहस्राब्दीक चौपड़पर), कथा-गल्प (गल्प गुच्छ), नाटक(संकर्षण), महाकाव्य (त्वञ्चाहञ्च आ असञ्जाति मन) आ बालमंडली-किशोरजगत विदेहमे संपूर्ण ई-प्रकाशनक बाद प्रिंट फॉर्ममे। कुरुक्षेत्रम्–अन्तर्मनक, खण्ड-१ सँ ७ Ist edition 2009 of Gajendra Thakur’s KuruKshetram-Antarmanak (Vol. I to VII)- essay-paper-criticism, novel, poems, story, play, epics and Children-grown-ups literature in single binding: Language:Maithili ६९२ पृष्ठ : मूल्य भा. रु. 100/-(for individual buyers inside india) (add courier charges Rs.50/-per copy for Delhi/NCR and Rs.100/- per copy for outside Delhi)
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Details for purchase available at print-version publishers's site website: http://www.shruti-publication.com/ or you may write to e-mail:shruti.publication@shruti-publication.com विदेह: सदेह : १: २: ३: ४ तिरहुता : देवनागरी "विदेह" क, प्रिंट संस्करण :विदेह-ई-पत्रिका (http://www.videha.co.in/) क चुनल रचना सम्मिलित। विदेह:सदेह:१: २: ३: ४ सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। Details for purchase available at print-version publishers's site http://www.shruti-publication.com or you may write to shruti.publication@shruti-publication.com २. संदेश- [ विदेह ई-पत्रिका, विदेह:सदेह मिथिलाक्षर आ देवनागरी आ गजेन्द्र ठाकुरक सात खण्डक- निबन्ध-प्रबन्ध-समीक्षा,उपन्यास (सहस्रबाढ़नि) , पद्य-संग्रह (सहस्राब्दीक चौपड़पर), कथा-गल्प (गल्प गुच्छ), नाटक (संकर्षण), महाकाव्य (त्वञ्चाहञ्च आ असञ्जाति मन) आ बाल-मंडली-किशोर जगत- संग्रह कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक मादेँ। ] १.श्री गोविन्द झा- विदेहकेँ तरंगजालपर उतारि विश्वभरिमे मातृभाषा मैथिलीक लहरि जगाओल, खेद जे अपनेक एहि महाभियानमे हम एखन धरि संग नहि दए सकलहुँ। सुनैत छी अपनेकेँ सुझाओ आ रचनात्मक आलोचना प्रिय लगैत अछि तेँ किछु लिखक मोन भेल। हमर सहायता आ सहयोग अपनेकेँ सदा उपलब्ध रहत। २.श्री रमानन्द रेणु- मैथिलीमे ई-पत्रिका पाक्षिक रूपेँ चला कऽ जे अपन मातृभाषाक प्रचार कऽ रहल छी, से धन्यवाद । आगाँ अपनेक समस्त मैथिलीक कार्यक हेतु हम हृदयसँ शुभकामना दऽ रहल छी। ३.श्री विद्यानाथ झा "विदित"- संचार आ प्रौद्योगिकीक एहि प्रतिस्पर्धी ग्लोबल युगमे अपन महिमामय "विदेह"केँ अपना देहमे प्रकट देखि जतबा प्रसन्नता आ संतोष भेल, तकरा कोनो उपलब्ध "मीटर"सँ नहि नापल जा सकैछ? ..एकर ऐतिहासिक मूल्यांकन आ सांस्कृतिक प्रतिफलन एहि शताब्दीक अंत धरि लोकक नजरिमे आश्चर्यजनक रूपसँ प्रकट हैत। ४. प्रो. उदय नारायण सिंह "नचिकेता"- जे काज अहाँ कए रहल छी तकर चरचा एक दिन मैथिली भाषाक इतिहासमे होएत। आनन्द भए रहल अछि, ई जानि कए जे एतेक गोट मैथिल "विदेह" ई जर्नलकेँ पढ़ि रहल छथि।...विदेहक चालीसम अंक पुरबाक लेल अभिनन्दन। ५. डॉ. गंगेश गुंजन- एहि विदेह-कर्ममे लागि रहल अहाँक सम्वेदनशील मन, मैथिलीक प्रति समर्पित मेहनतिक अमृत रंग, इतिहास मे एक टा विशिष्ट फराक अध्याय आरंभ करत, हमरा विश्वास अछि। अशेष शुभकामना आ बधाइक सङ्ग, सस्नेह...अहाँक पोथी कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक प्रथम दृष्टया बहुत भव्य तथा उपयोगी बुझाइछ। मैथिलीमे तँ अपना स्वरूपक प्रायः ई पहिले एहन भव्य अवतारक पोथी थिक। हर्षपूर्ण हमर हार्दिक बधाई स्वीकार करी। ६. श्री रामाश्रय झा "रामरंग"(आब स्वर्गीय)- "अपना" मिथिलासँ संबंधित...विषय वस्तुसँ अवगत भेलहुँ।...शेष सभ कुशल अछि। ७. श्री ब्रजेन्द्र त्रिपाठी- साहित्य अकादमी- इंटरनेट पर प्रथम मैथिली पाक्षिक पत्रिका "विदेह" केर लेल बधाई आ शुभकामना स्वीकार करू। ८. श्री प्रफुल्लकुमार सिंह "मौन"- प्रथम मैथिली पाक्षिक पत्रिका "विदेह" क प्रकाशनक समाचार जानि कनेक चकित मुदा बेसी आह्लादित भेलहुँ। कालचक्रकेँ पकड़ि जाहि दूरदृष्टिक परिचय देलहुँ, ओहि लेल हमर मंगलकामना। ९.डॉ. शिवप्रसाद यादव- ई जानि अपार हर्ष भए रहल अछि, जे नव सूचना-क्रान्तिक क्षेत्रमे मैथिली पत्रकारिताकेँ प्रवेश दिअएबाक साहसिक कदम उठाओल अछि। पत्रकारितामे एहि प्रकारक नव प्रयोगक हम स्वागत करैत छी, संगहि "विदेह"क सफलताक शुभकामना। १०. श्री आद्याचरण झा- कोनो पत्र-पत्रिकाक प्रकाशन- ताहूमे मैथिली पत्रिकाक प्रकाशनमे के कतेक सहयोग करताह- ई तऽ भविष्य कहत। ई हमर ८८ वर्षमे ७५ वर्षक अनुभव रहल। एतेक पैघ महान यज्ञमे हमर श्रद्धापूर्ण आहुति प्राप्त होयत- यावत ठीक-ठाक छी/ रहब। ११. श्री विजय ठाकुर- मिशिगन विश्वविद्यालय- "विदेह" पत्रिकाक अंक देखलहुँ, सम्पूर्ण टीम बधाईक पात्र अछि। पत्रिकाक मंगल भविष्य हेतु हमर शुभकामना स्वीकार कएल जाओ। १२. श्री सुभाषचन्द्र यादव- ई-पत्रिका "विदेह" क बारेमे जानि प्रसन्नता भेल। ’विदेह’ निरन्तर पल्लवित-पुष्पित हो आ चतुर्दिक अपन सुगंध पसारय से कामना अछि। १३. श्री मैथिलीपुत्र प्रदीप- ई-पत्रिका "विदेह" केर सफलताक भगवतीसँ कामना। हमर पूर्ण सहयोग रहत। १४. डॉ. श्री भीमनाथ झा- "विदेह" इन्टरनेट पर अछि तेँ "विदेह" नाम उचित आर कतेक रूपेँ एकर विवरण भए सकैत अछि। आइ-काल्हि मोनमे उद्वेग रहैत अछि, मुदा शीघ्र पूर्ण सहयोग देब।कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक देखि अति प्रसन्नता भेल। मैथिलीक लेल ई घटना छी। १५. श्री रामभरोस कापड़ि "भ्रमर"- जनकपुरधाम- "विदेह" ऑनलाइन देखि रहल छी। मैथिलीकेँ अन्तर्राष्ट्रीय जगतमे पहुँचेलहुँ तकरा लेल हार्दिक बधाई। मिथिला रत्न सभक संकलन अपूर्व। नेपालोक सहयोग भेटत, से विश्वास करी। १६. श्री राजनन्दन लालदास- "विदेह" ई-पत्रिकाक माध्यमसँ बड़ नीक काज कए रहल छी, नातिक अहिठाम देखलहुँ। एकर वार्षिक अंक जखन प्रिंट निकालब तँ हमरा पठायब। कलकत्तामे बहुत गोटेकेँ हम साइटक पता लिखाए देने छियन्हि। मोन तँ होइत अछि जे दिल्ली आबि कए आशीर्वाद दैतहुँ, मुदा उमर आब बेशी भए गेल। शुभकामना देश-विदेशक मैथिलकेँ जोड़बाक लेल।.. उत्कृष्ट प्रकाशन कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक लेल बधाइ। अद्भुत काज कएल अछि, नीक प्रस्तुति अछि सात खण्डमे। मुदा अहाँक सेवा आ से निःस्वार्थ तखन बूझल जाइत जँ अहाँ द्वारा प्रकाशित पोथी सभपर दाम लिखल नहि रहितैक। ओहिना सभकेँ विलहि देल जइतैक। (स्पष्टीकरण- श्रीमान्, अहाँक सूचनार्थ विदेह द्वारा ई-प्रकाशित कएल सभटा सामग्री आर्काइवमे https://sites.google.com/a/videha.com/videha-pothi/ पर बिना मूल्यक डाउनलोड लेल उपलब्ध छै आ भविष्यमे सेहो रहतैक। एहि आर्काइवकेँ जे कियो प्रकाशक अनुमति लऽ कऽ प्रिंट रूपमे प्रकाशित कएने छथि आ तकर ओ दाम रखने छथि ताहिपर हमर कोनो नियंत्रण नहि अछि।- गजेन्द्र ठाकुर)... अहाँक प्रति अशेष शुभकामनाक संग। १७. डॉ. प्रेमशंकर सिंह- अहाँ मैथिलीमे इंटरनेटपर पहिल पत्रिका "विदेह" प्रकाशित कए अपन अद्भुत मातृभाषानुरागक परिचय देल अछि, अहाँक निःस्वार्थ मातृभाषानुरागसँ प्रेरित छी, एकर निमित्त जे हमर सेवाक प्रयोजन हो, तँ सूचित करी। इंटरनेटपर आद्योपांत पत्रिका देखल, मन प्रफुल्लित भऽ गेल। १८.श्रीमती शेफालिका वर्मा- विदेह ई-पत्रिका देखि मोन उल्लाससँ भरि गेल। विज्ञान कतेक प्रगति कऽ रहल अछि...अहाँ सभ अनन्त आकाशकेँ भेदि दियौ, समस्त विस्तारक रहस्यकेँ तार-तार कऽ दियौक...। अपनेक अद्भुत पुस्तक कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक विषयवस्तुक दृष्टिसँ गागरमे सागर अछि। बधाई। १९.श्री हेतुकर झा, पटना-जाहि समर्पण भावसँ अपने मिथिला-मैथिलीक सेवामे तत्पर छी से स्तुत्य अछि। देशक राजधानीसँ भय रहल मैथिलीक शंखनाद मिथिलाक गाम-गाममे मैथिली चेतनाक विकास अवश्य करत। २०. श्री योगानन्द झा, कबिलपुर, लहेरियासराय- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पोथीकेँ निकटसँ देखबाक अवसर भेटल अछि आ मैथिली जगतक एकटा उद्भट ओ समसामयिक दृष्टिसम्पन्न हस्ताक्षरक कलमबन्द परिचयसँ आह्लादित छी। "विदेह"क देवनागरी सँस्करण पटनामे रु. 80/- मे उपलब्ध भऽ सकल जे विभिन्न लेखक लोकनिक छायाचित्र, परिचय पत्रक ओ रचनावलीक सम्यक प्रकाशनसँ ऐतिहासिक कहल जा सकैछ। २१. श्री किशोरीकान्त मिश्र- कोलकाता- जय मैथिली, विदेहमे बहुत रास कविता, कथा, रिपोर्ट आदिक सचित्र संग्रह देखि आ आर अधिक प्रसन्नता मिथिलाक्षर देखि- बधाई स्वीकार कएल जाओ। २२.श्री जीवकान्त- विदेहक मुद्रित अंक पढ़ल- अद्भुत मेहनति। चाबस-चाबस। किछु समालोचना मरखाह..मुदा सत्य। २३. श्री भालचन्द्र झा- अपनेक कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक देखि बुझाएल जेना हम अपने छपलहुँ अछि। एकर विशालकाय आकृति अपनेक सर्वसमावेशताक परिचायक अछि। अपनेक रचना सामर्थ्यमे उत्तरोत्तर वृद्धि हो, एहि शुभकामनाक संग हार्दिक बधाई। २४.श्रीमती डॉ नीता झा- अहाँक कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़लहुँ। ज्योतिरीश्वर शब्दावली, कृषि मत्स्य शब्दावली आ सीत बसन्त आ सभ कथा, कविता, उपन्यास, बाल-किशोर साहित्य सभ उत्तम छल। मैथिलीक उत्तरोत्तर विकासक लक्ष्य दृष्टिगोचर होइत अछि। २५.श्री मायानन्द मिश्र- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक मे हमर उपन्यास स्त्रीधनक जे विरोध कएल गेल अछि तकर हम विरोध करैत छी।... कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पोथीक लेल शुभकामना।(श्रीमान् समालोचनाकेँ विरोधक रूपमे नहि लेल जाए।-गजेन्द्र ठाकुर) २६.श्री महेन्द्र हजारी- सम्पादक श्रीमिथिला- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़ि मोन हर्षित भऽ गेल..एखन पूरा पढ़यमे बहुत समय लागत, मुदा जतेक पढ़लहुँ से आह्लादित कएलक। २७.श्री केदारनाथ चौधरी- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक अद्भुत लागल, मैथिली साहित्य लेल ई पोथी एकटा प्रतिमान बनत। २८.श्री सत्यानन्द पाठक- विदेहक हम नियमित पाठक छी। ओकर स्वरूपक प्रशंसक छलहुँ। एम्हर अहाँक लिखल - कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक देखलहुँ। मोन आह्लादित भऽ उठल। कोनो रचना तरा-उपरी। २९.श्रीमती रमा झा-सम्पादक मिथिला दर्पण। कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक प्रिंट फॉर्म पढ़ि आ एकर गुणवत्ता देखि मोन प्रसन्न भऽ गेल, अद्भुत शब्द एकरा लेल प्रयुक्त कऽ रहल छी। विदेहक उत्तरोत्तर प्रगतिक शुभकामना। ३०.श्री नरेन्द्र झा, पटना- विदेह नियमित देखैत रहैत छी। मैथिली लेल अद्भुत काज कऽ रहल छी। ३१.श्री रामलोचन ठाकुर- कोलकाता- मिथिलाक्षर विदेह देखि मोन प्रसन्नतासँ भरि उठल, अंकक विशाल परिदृश्य आस्वस्तकारी अछि। ३२.श्री तारानन्द वियोगी- विदेह आ कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक देखि चकबिदोर लागि गेल। आश्चर्य। शुभकामना आ बधाई। ३३.श्रीमती प्रेमलता मिश्र “प्रेम”- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़लहुँ। सभ रचना उच्चकोटिक लागल। बधाई। ३४.श्री कीर्तिनारायण मिश्र- बेगूसराय- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक बड्ड नीक लागल, आगांक सभ काज लेल बधाई। ३५.श्री महाप्रकाश-सहरसा- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक नीक लागल, विशालकाय संगहि उत्तमकोटिक। ३६.श्री अग्निपुष्प- मिथिलाक्षर आ देवाक्षर विदेह पढ़ल..ई प्रथम तँ अछि एकरा प्रशंसामे मुदा हम एकरा दुस्साहसिक कहब। मिथिला चित्रकलाक स्तम्भकेँ मुदा अगिला अंकमे आर विस्तृत बनाऊ। ३७.श्री मंजर सुलेमान-दरभंगा- विदेहक जतेक प्रशंसा कएल जाए कम होएत। सभ चीज उत्तम। ३८.श्रीमती प्रोफेसर वीणा ठाकुर- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक उत्तम, पठनीय, विचारनीय। जे क्यो देखैत छथि पोथी प्राप्त करबाक उपाय पुछैत छथि। शुभकामना। ३९.श्री छत्रानन्द सिंह झा- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़लहुँ, बड्ड नीक सभ तरहेँ। ४०.श्री ताराकान्त झा- सम्पादक मैथिली दैनिक मिथिला समाद- विदेह तँ कन्टेन्ट प्रोवाइडरक काज कऽ रहल अछि। कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक अद्भुत लागल। ४१.डॉ रवीन्द्र कुमार चौधरी- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक बहुत नीक, बहुत मेहनतिक परिणाम। बधाई। ४२.श्री अमरनाथ- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक आ विदेह दुनू स्मरणीय घटना अछि, मैथिली साहित्य मध्य। ४३.श्री पंचानन मिश्र- विदेहक वैविध्य आ निरन्तरता प्रभावित करैत अछि, शुभकामना। ४४.श्री केदार कानन- कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक लेल अनेक धन्यवाद, शुभकामना आ बधाइ स्वीकार करी। आ नचिकेताक भूमिका पढ़लहुँ। शुरूमे तँ लागल जेना कोनो उपन्यास अहाँ द्वारा सृजित भेल अछि मुदा पोथी उनटौला पर ज्ञात भेल जे एहिमे तँ सभ विधा समाहित अछि। ४५.श्री धनाकर ठाकुर- अहाँ नीक काज कऽ रहल छी। फोटो गैलरीमे चित्र एहि शताब्दीक जन्मतिथिक अनुसार रहैत तऽ नीक। ४६.श्री आशीष झा- अहाँक पुस्तकक संबंधमे एतबा लिखबा सँ अपना कए नहि रोकि सकलहुँ जे ई किताब मात्र किताब नहि थीक, ई एकटा उम्मीद छी जे मैथिली अहाँ सन पुत्रक सेवा सँ निरंतर समृद्ध होइत चिरजीवन कए प्राप्त करत। ४७.श्री शम्भु कुमार सिंह- विदेहक तत्परता आ क्रियाशीलता देखि आह्लादित भऽ रहल छी। निश्चितरूपेण कहल जा सकैछ जे समकालीन मैथिली पत्रिकाक इतिहासमे विदेहक नाम स्वर्णाक्षरमे लिखल जाएत। ओहि कुरुक्षेत्रक घटना सभ तँ अठारहे दिनमे खतम भऽ गेल रहए मुदा अहाँक कुरुक्षेत्रम् तँ अशेष अछि। ४८.डॉ. अजीत मिश्र- अपनेक प्रयासक कतबो प्रशंसा कएल जाए कमे होएतैक। मैथिली साहित्यमे अहाँ द्वारा कएल गेल काज युग-युगान्तर धरि पूजनीय रहत। ४९.श्री बीरेन्द्र मल्लिक- अहाँक कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक आ विदेह:सदेह पढ़ि अति प्रसन्नता भेल। अहाँक स्वास्थ्य ठीक रहए आ उत्साह बनल रहए से कामना। ५०.श्री कुमार राधारमण- अहाँक दिशा-निर्देशमे विदेह पहिल मैथिली ई-जर्नल देखि अति प्रसन्नता भेल। हमर शुभकामना। ५१.श्री फूलचन्द्र झा प्रवीण-विदेह:सदेह पढ़ने रही मुदा कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक देखि बढ़ाई देबा लेल बाध्य भऽ गेलहुँ। आब विश्वास भऽ गेल जे मैथिली नहि मरत। अशेष शुभकामना। ५२.श्री विभूति आनन्द- विदेह:सदेह देखि, ओकर विस्तार देखि अति प्रसन्नता भेल। ५३.श्री मानेश्वर मनुज-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक एकर भव्यता देखि अति प्रसन्नता भेल, एतेक विशाल ग्रन्थ मैथिलीमे आइ धरि नहि देखने रही। एहिना भविष्यमे काज करैत रही, शुभकामना। ५४.श्री विद्यानन्द झा- आइ.आइ.एम.कोलकाता- कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक विस्तार, छपाईक संग गुणवत्ता देखि अति प्रसन्नता भेल। ५५.श्री अरविन्द ठाकुर-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक मैथिली साहित्यमे कएल गेल एहि तरहक पहिल प्रयोग अछि, शुभकामना। ५६.श्री कुमार पवन-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक पढ़ि रहल छी। किछु लघुकथा पढ़ल अछि, बहुत मार्मिक छल। ५७. श्री प्रदीप बिहारी-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक देखल, बधाई। ५८.डॉ मणिकान्त ठाकुर-कैलिफोर्निया- अपन विलक्षण नियमित सेवासँ हमरा लोकनिक हृदयमे विदेह सदेह भऽ गेल अछि। ५९.श्री धीरेन्द्र प्रेमर्षि- अहाँक समस्त प्रयास सराहनीय। दुख होइत अछि जखन अहाँक प्रयासमे अपेक्षित सहयोग नहि कऽ पबैत छी। ६०.श्री देवशंकर नवीन- विदेहक निरन्तरता आ विशाल स्वरूप- विशाल पाठक वर्ग, एकरा ऐतिहासिक बनबैत अछि। ६१.श्री मोहन भारद्वाज- अहाँक समस्त कार्य देखल, बहुत नीक। एखन किछु परेशानीमे छी, मुदा शीघ्र सहयोग देब। ६२.श्री फजलुर रहमान हाशमी-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक मे एतेक मेहनतक लेल अहाँ साधुवादक अधिकारी छी। ६३.श्री लक्ष्मण झा "सागर"- मैथिलीमे चमत्कारिक रूपेँ अहाँक प्रवेश आह्लादकारी अछि।..अहाँकेँ एखन आर..दूर..बहुत दूरधरि जेबाक अछि। स्वस्थ आ प्रसन्न रही। ६४.श्री जगदीश प्रसाद मंडल-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक पढ़लहुँ । कथा सभ आ उपन्यास सहस्रबाढ़नि पूर्णरूपेँ पढ़ि गेल छी। गाम-घरक भौगोलिक विवरणक जे सूक्ष्म वर्णन सहस्रबाढ़निमे अछि, से चकित कएलक, एहि संग्रहक कथा-उपन्यास मैथिली लेखनमे विविधता अनलक अछि। समालोचना शास्त्रमे अहाँक दृष्टि वैयक्तिक नहि वरन् सामाजिक आ कल्याणकारी अछि, से प्रशंसनीय। ६५.श्री अशोक झा-अध्यक्ष मिथिला विकास परिषद- कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक लेल बधाई आ आगाँ लेल शुभकामना। ६६.श्री ठाकुर प्रसाद मुर्मु- अद्भुत प्रयास। धन्यवादक संग प्रार्थना जे अपन माटि-पानिकेँ ध्यानमे राखि अंकक समायोजन कएल जाए। नव अंक धरि प्रयास सराहनीय। विदेहकेँ बहुत-बहुत धन्यवाद जे एहेन सुन्दर-सुन्दर सचार (आलेख) लगा रहल छथि। सभटा ग्रहणीय- पठनीय। ६७.बुद्धिनाथ मिश्र- प्रिय गजेन्द्र जी,अहाँक सम्पादन मे प्रकाशित ‘विदेह’आ ‘कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक’ विलक्षण पत्रिका आ विलक्षण पोथी! की नहि अछि अहाँक सम्पादनमे? एहि प्रयत्न सँ मैथिली क विकास होयत,निस्संदेह। ६८.श्री बृखेश चन्द्र लाल- गजेन्द्रजी, अपनेक पुस्तक कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़ि मोन गदगद भय गेल , हृदयसँ अनुगृहित छी । हार्दिक शुभकामना । ६९.श्री परमेश्वर कापड़ि - श्री गजेन्द्र जी । कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़ि गदगद आ नेहाल भेलहुँ। ७०.श्री रवीन्द्रनाथ ठाकुर- विदेह पढ़ैत रहैत छी। धीरेन्द्र प्रेमर्षिक मैथिली गजलपर आलेख पढ़लहुँ। मैथिली गजल कत्तऽ सँ कत्तऽ चलि गेलैक आ ओ अपन आलेखमे मात्र अपन जानल-पहिचानल लोकक चर्च कएने छथि। जेना मैथिलीमे मठक परम्परा रहल अछि। (स्पष्टीकरण- श्रीमान्, प्रेमर्षि जी ओहि आलेखमे ई स्पष्ट लिखने छथि जे किनको नाम जे छुटि गेल छन्हि तँ से मात्र आलेखक लेखकक जानकारी नहि रहबाक द्वारे, एहिमे आन कोनो कारण नहि देखल जाय। अहाँसँ एहि विषयपर विस्तृत आलेख सादर आमंत्रित अछि।-सम्पादक) ७१.श्री मंत्रेश्वर झा- विदेह पढ़ल आ संगहि अहाँक मैगनम ओपस कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक सेहो, अति उत्तम। मैथिलीक लेल कएल जा रहल अहाँक समस्त कार्य अतुलनीय अछि। ७२. श्री हरेकृष्ण झा- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक मैथिलीमे अपन तरहक एकमात्र ग्रन्थ अछि, एहिमे लेखकक समग्र दृष्टि आ रचना कौशल देखबामे आएल जे लेखकक फील्डवर्कसँ जुड़ल रहबाक कारणसँ अछि। ७३.श्री सुकान्त सोम- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक मे समाजक इतिहास आ वर्तमानसँ अहाँक जुड़ाव बड्ड नीक लागल, अहाँ एहि क्षेत्रमे आर आगाँ काज करब से आशा अछि। ७४.प्रोफेसर मदन मिश्र- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक सन किताब मैथिलीमे पहिले अछि आ एतेक विशाल संग्रहपर शोध कएल जा सकैत अछि। भविष्यक लेल शुभकामना। ७५.प्रोफेसर कमला चौधरी- मैथिलीमे कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक सन पोथी आबए जे गुण आ रूप दुनूमे निस्सन होअए, से बहुत दिनसँ आकांक्षा छल, ओ आब जा कऽ पूर्ण भेल। पोथी एक हाथसँ दोसर हाथ घुमि रहल अछि, एहिना आगाँ सेहो अहाँसँ आशा अछि। ७६.श्री उदय चन्द्र झा "विनोद": गजेन्द्रजी, अहाँ जतेक काज कएलहुँ अछि से मैथिलीमे आइ धरि कियो नहि कएने छल। शुभकामना। अहाँकेँ एखन बहुत काज आर करबाक अछि। ७७.श्री कृष्ण कुमार कश्यप: गजेन्द्र ठाकुरजी, अहाँसँ भेँट एकटा स्मरणीय क्षण बनि गेल। अहाँ जतेक काज एहि बएसमे कऽ गेल छी ताहिसँ हजार गुणा आर बेशीक आशा अछि। ७८.श्री मणिकान्त दास: अहाँक मैथिलीक कार्यक प्रशंसा लेल शब्द नहि भेटैत अछि। अहाँक कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक सम्पूर्ण रूपेँ पढ़ि गेलहुँ। त्वञ्चाहञ्च बड्ड नीक लागल। विदेह मैथिली साहित्य आन्दोलन (c)२००४-१०. सर्वाधिकार लेखकाधीन आ जतय लेखकक नाम नहि अछि ततय संपादकाधीन। विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। सह-सम्पादक: उमेश मंडल। सहायक सम्पादक: शिव कुमार झा आ मुन्नाजी (मनोज कुमार कर्ण)। भाषा-सम्पादन: नागेन्द्र कुमार झा आ पञ्जीकार विद्यानन्द झा। कला-सम्पादन: ज्योति सुनीत चौधरी आ रश्मि रेखा सिन्हा। सम्पादक-शोध-अन्वेषण: डॉ. जया वर्मा आ डॉ. राजीव कुमार वर्मा। रचनाकार अपन मौलिक आ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि) ggajendra@videha.com केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx, .rtf वा .txt फॉर्मेटमे पठा सकैत छथि। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेताह, से आशा करैत छी। रचनाक अंतमे टाइप रहय, जे ई रचना मौलिक अछि, आ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। मेल प्राप्त होयबाक बाद यथासंभव शीघ्र ( सात दिनक भीतर) एकर प्रकाशनक अंकक सूचना देल जायत। ’विदेह' प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका अछि आ एहिमे मैथिली, संस्कृत आ अंग्रेजीमे मिथिला आ मैथिलीसँ संबंधित रचना प्रकाशित कएल जाइत अछि। एहि ई पत्रिकाकेँ श्रीमति लक्ष्मी ठाकुर द्वारा मासक ०१ आ १५ तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि। (c) 2004-10 सर्वाधिकार सुरक्षित। विदेहमे प्रकाशित सभटा रचना आ आर्काइवक सर्वाधिकार रचनाकार आ संग्रहकर्त्ताक लगमे छन्हि। रचनाक अनुवाद आ पुनः प्रकाशन किंवा आर्काइवक उपयोगक अधिकार किनबाक हेतु ggajendra@videha.co.in पर संपर्क करू। एहि साइटकेँ प्रीति झा ठाकुर, मधूलिका चौधरी आ रश्मि प्रिया द्वारा डिजाइन कएल गेल। सिद्धिरस्तु वि दे ह विदेह Videha বিদেহ विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका Videha Ist Maithili Fortnightly e Magazine विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका 'विदेह' ६९ म अंक ०१ नवम्बर २०१० (वर्ष ३ मास ३५ अंक ६९)http://www.videha.co.in/ मानुषीमिह संस्कृताम् ISSN 2229-547X VIDEHA वि दे ह विदेह Videha বিদেহ विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका Videha Ist Maithili Fortnightly e Magazine विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका 'विदेह' ६९ म अंक ०१ नवम्बर २०१० (वर्ष ३ मास ३५ अंक ६९)http://www.videha.co.in/ मानुषीमिह संस्कृताम् ISSN 2229-547X VIDEHA
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