VIDEHA — Issue 70 / अंक ७०

Publication: VIDEHA · Issue: 70
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320 321 ISSN 2229-547X VIDEHA 'विदेह' ७० म अंक १५ नवम्बर २०१० (वर्ष ३ मास ३५ अंक ७०) वि  दे  ह विदेह Videha বিদেহ http://www.videha.co.in  विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका Videha Ist Maithili Fortnightly e Magazine  विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका नव अंक देखबाक लेल पृष्ठ सभकेँ रिफ्रेश कए देखू। Always refresh the pages for viewing new issue of VIDEHA. Read in your own scriptRoman(Eng)Gujarati Bangla Oriya Gurmukhi Telugu Tamil Kannada Malayalam Hindi एहि अंकमे अछि:- १. संपादकीय संदेश २. गद्य २.१.देवांशु वत्स- - प्रगतिक रहस्य-चित्रकथा २.२.१.शेफालिका वर्मा-१४ नवम्बर२.भावना नवीन- हमर प्रिये नेना भुटका ३. शबनम श्री-कंप्यूटरक खेल २.३.१.विनीत उत्पल-  कतय गेल फिल्मक बाल कलाकार २प्रोफेसर प्रेमशंकर सिंह- मैथिली बाल काव्यधारा २.४.१.तारानन्द वियोगीक संग अनिल गौतमक वार्तालाप २. साहित्य अकादेमीक विशेष समारोह (१५.११.१०) मे तारानन्द वियोगीक वक्तव्य २.५.-जगदीश प्रसाद मंडल-कथा- दोहरी मारि‍ २.६.१.बिपिन कुमार झा-मिथिलांचल आ बिहार चुनाव २.सुमित आनन्द- भारत-नेपालक मिथिला हस्तशिल्प कलामे असीम सम्भावना २.७.ज्योति सुनीत चौधरी-नानीक खिस्सा: २.८.१.शि‍वकुमार झा ‘टि‍ल्‍लू’३टा बाल कथा २.मुन्नाजी- पथ दर्शन ३.अनमोल झा- किछु बालकथा ३. पद्य ३.१.१.जीवकान्‍त-बबलू बनबय छक्का-सत्ता २.अहाँ आबु ३.२.१.राजदेव मंडलक दूटा बाल कवि‍ता २.गजेन्द्र ठाकुर-दूटा बाल कवि‍ता ३.३.ज्योति सुनीत चौधरी-प्रयास वा पलायन ३.४.किशन कारीग़र एकटा तऽ ओ छलीह। ३.५.अनमोल झा-दूटा बाल कविता ३.६.राजेश मोहन झा- चुट्टी ३.७.१.रमाकान्‍त राय रमा-बाल कवि‍ता-उल्‍लूक शि‍कारी २.मिथिलेश कुमार झा-बाबाक रोपल गाछ सिनुरिया ३.महाकान्त ठाकुर- किछु बाल कविता ३.८.डॉ जया वर्मा-बेटी ४. मिथिला कला-संगीत-१.श्वेता झा चौधरी-पनिभरनी २.ज्योति सुनीत चौधरी ३श्वेता झा (सिंगापुर) ५. गद्य-पद्य भारती: डॉ. मिथिलेश कुमारी मिश्रक दुइ गोट लघुकथा-  लेखिकाक संस्कृत लघुकथा संग्रह “लघ्वी”सँ मैथिली रूपान्तर: डॉ. योगानन्द झा ६. बालानां कृते-तुनिशा प्रियम- किछु चित्र ७. भाषापाक रचना-लेखन -[मानक मैथिली], [विदेहक मैथिली-अंग्रेजी आ अंग्रेजी मैथिली कोष (इंटरनेटपर पहिल बेर सर्च-डिक्शनरी) एम.एस. एस.क्यू.एल. सर्वर आधारित -Based on ms-sql server Maithili-English and English-Maithili Dictionary.] 8.VIDEHA FOR NON RESIDENTS 8.1.१.Original Poem in Maithili by Kalikant Jha "Buch" Translated into English by Jyoti Jha Chaudhary२.Original Poem in Maithili by Gajendra Thakur Translated into English by Jyoti Jha Chaudhary 8.2.Maithili Short-story “shabdashastram” by Gajendra Thakur re-written in English by the author himself. 9. VIDEHA MAITHILI SAMSKRIT EDUCATION (contd.) विदेह ई-पत्रिकाक सभटा पुरान अंक ( ब्रेल, तिरहुता आ देवनागरी मे ) पी.डी.एफ. डाउनलोडक लेल नीचाँक लिंकपर उपलब्ध अछि। All the old issues of Videha e journal ( in Braille, Tirhuta and Devanagari versions ) are available for pdf download at the following link. विदेह ई-पत्रिकाक सभटा पुरान अंक ब्रेल, तिरहुता आ देवनागरी रूपमे Videha e journal's all old issues in Braille Tirhuta and Devanagari versions विदेह ई-पत्रिकाक पहिल ५० अंक

विदेह ई-पत्रिकाक ५०म सँ आगाँक अंक विदेह आर.एस.एस.फीड। "विदेह" ई-पत्रिका ई-पत्रसँ प्राप्त करू। अपन मित्रकेँ विदेहक विषयमे सूचित करू। ↑ विदेह आर.एस.एस.फीड एनीमेटरकेँ अपन साइट/ ब्लॉगपर लगाऊ। ब्लॉग "लेआउट" पर "एड गाडजेट" मे "फीड" सेलेक्ट कए "फीड यू.आर.एल." मे http://www.videha.co.in/index.xml टाइप केलासँ सेहो विदेह फीड प्राप्त कए सकैत छी। गूगल रीडरमे पढ़बा लेल http://reader.google.com/ पर जा कऽ Add a  Subscription बटन क्लिक करू आ खाली स्थानमे http://www.videha.co.in/index.xml पेस्ट करू आ Add  बटन दबाऊ। मैथिली देवनागरी वा मिथिलाक्षरमे नहि देखि/ लिखि पाबि रहल छी, (cannot see/write Maithili in Devanagari/ Mithilakshara follow links below or contact at ggajendra@videha.com) तँ एहि हेतु नीचाँक लिंक सभ पर जाऊ। संगहि विदेहक स्तंभ मैथिली भाषापाक/ रचना लेखनक नव-पुरान अंक पढ़ू। http://devanaagarii.net/ http://kaulonline.com/uninagari/  (एतए बॉक्समे ऑनलाइन देवनागरी टाइप करू, बॉक्ससँ कॉपी करू आ वर्ड डॉक्युमेन्टमे पेस्ट कए वर्ड फाइलकेँ सेव करू। विशेष जानकारीक लेल ggajendra@videha.com पर सम्पर्क करू।)(Use Firefox 3.0 (from WWW.MOZILLA.COM )/ Opera/ Safari/ Internet Explorer 8.0/ Flock 2.0/ Google Chrome for best view of 'Videha' Maithili e-journal at http://www.videha.co.in/ .) Go to the link below for download of old issues of VIDEHA Maithili e magazine in .pdf format and Maithili Audio/ Video/ Book/ paintings/ photo files. विदेहक पुरान अंक आ ऑडियो/ वीडियो/ पोथी/ चित्रकला/ फोटो सभक फाइल सभ (उच्चारण, बड़ सुख सार आ दूर्वाक्षत मंत्र सहित) डाउनलोड करबाक हेतु नीचाँक लिंक पर जाऊ। VIDEHA ARCHIVE विदेह आर्काइव भारतीय डाक विभाग द्वारा जारी कवि, नाटककार आ धर्मशास्त्री विद्यापतिक स्टाम्प। भारत आ नेपालक माटिमे पसरल मिथिलाक धरती प्राचीन कालहिसँ महान पुरुष ओ महिला लोकनिक कर्मभूमि रहल अछि। मिथिलाक महान पुरुष ओ महिला लोकनिक चित्र 'मिथिला रत्न' मे देखू। गौरी-शंकरक पालवंश कालक मूर्त्ति, एहिमे मिथिलाक्षरमे (१२०० वर्ष पूर्वक) अभिलेख अंकित अछि। मिथिलाक भारत आ नेपालक माटिमे पसरल एहि तरहक अन्यान्य प्राचीन आ नव स्थापत्य, चित्र, अभिलेख आ मूर्त्तिकलाक़ हेतु देखू 'मिथिलाक खोज' मिथिला, मैथिल आ मैथिलीसँ सम्बन्धित सूचना, सम्पर्क, अन्वेषण संगहि विदेहक सर्च-इंजन आ न्यूज सर्विस आ मिथिला, मैथिल आ मैथिलीसँ सम्बन्धित वेबसाइट सभक समग्र संकलनक लेल देखू "विदेह सूचना संपर्क अन्वेषण" विदेह जालवृत्तक डिसकसन फोरमपर जाऊ। "मैथिल आर मिथिला" (मैथिलीक सभसँ लोकप्रिय जालवृत्त) पर जाऊ। १. संपादकीय मैथिलीक सन्दर्भमे बाल साहित्य- बाल साहित्य लेखकसँ अनुरोध जे ङ आ ञ क प्रयोग करथि जाहिसँ बच्चाकेँ सुविधा होएत। नञि आ नै दुनू बाल साहित्यमे लिखल जा सकैए। भाङ लिखल जएबाक चाही, भांग नै। फेर छनि केँ बच्चा छनी पढ़ैए, वर्कशापमे एहन देखल गेल से छन्हि, कहलन्हि आदि प्रयोग करू। ई तीन टा मात्र उदाहरण अछि जे मैथिली बाल साहित्यक लेखनमे संयुक्ताक्षर, ञ, आ ङ क प्रयोग भाषाक विशिष्टता काएम रखबामे सहायक होएत। तहिना सरल शब्द मुदा खाँटी मैथिली शब्द जेना अकादारुण आदिक प्रयोग करू। बाल साहित्यमे गद्य आ पद्य दुनू महत्वपूर्ण अछि जँ कही तँ पद्य कने बेशिये। गद्यमे कथामे आन विषयक समावेश जेना विज्ञान, समाज विज्ञान आदि देलासँ मनोरंजन आ शिक्षाक मध्य तालमेल भऽ सकत। कीर्तिनारायण मिश्र साहित्य सम्मान २०१०ई.- श्री महाप्रकाशकेँ कवि कीर्तिनारायण मिश्रक परिवारक सदस्य द्वारा चेतना समितिक नामे जमा निश्चित राशिपर ब्याजसँ २००८ ई.सँ मैथिलीमे प्रकाशित आधुनिक बोधक उत्कृष्ट मौलिक कृतिपर कीर्तिनारायण मिश्र साहित्य सम्मान २००८ सँ प्रारम्भ भेल अछि। एकर अन्तर्गत ११,००० टाका देल जाइत अछि। कीर्तिनारायण मिश्र साहित्य सम्मान २०१० ई. लेल श्री महाप्रकाशकेँ हुनकर कविता संग्रह “संग समय के” लेल देल जाएत।

कीर्तिनारायण मिश्र साहित्य सम्मान २००८ ई. - श्री हरेकृष्ण झा (कविता संग्रह “एना त नहि जे”) २००९ ई.-श्री उदय नारायण सिंह “नचिकेता” (नाटक नो एण्ट्री: मा प्रविश) २०१० ई.- श्री महाप्रकाश (कविता संग्रह “संग समय के”) सूचना १: अन्तराष्ट्रिय मैथिली सम्मेलन काठमाण्डौ मे २२ आ २३ दिसम्बर २०१० केँ श्री रामभरोस कापड़ि "भ्रमर"क संयोजकत्वमे आयोजित भऽ रहल अछि। श्री कापड़ि नेपाल प्रज्ञा संस्थानमे मैथिलीक प्रतिनिधित्व कऽ रहल छथि आ ई साहित्य क्षेत्रमे नेपालक सभसँ पैघ प्रतिष्ठाबल पद अछि ओहिना जेना भारतमे "साहित्य अकादमीक फेलो" होइत अछि। २२ दिसम्बर २०१० केँ ई आयोजन नेपाल प्रज्ञा प्रतिष्ठान, कमलादी, काठमाण्डौ आ २३ दिसम्बर २०१० केँ अग्रवाल सेवा केन्द्र, कमल पोखरी, काठमाण्डौमे आयोजित होएत। दुनू दिन आवस आ भोजनक व्यवस्था ग्रवाल सेवा केन्द्र, कमल पोखरी, काठमाण्डौमे रहत। सूचना:२: सगर राति‍ दीप जरय'क 72म आयोजन व्‍यपार संघ भवन सुपौलमे 4 दि‍सम्‍बर 2010केँ होएत अपने सभ सादर आमंत्रि‍त छी। संयोजक- अरवि‍न्‍द ठाकुर व्‍यवस्‍थापक-  वि‍प्‍लव फाउण्‍डेसन आ प्रगति‍शील लेखक संघ सुपौल। नाटक-एकांकी विशेषांक/ मैथिली-समीक्षा विशेषांक: विदेहक हाइकू, गजल, लघुकथा आ बाल-किशोर विशेषांकक बाद विदेहक 15 दिसम्बर 2010 अंक नाटक-एकांकी विशेषांक आ 15 जनवरी 2011 अंक मैथिली-समीक्षा विशेषांक रहत। एहि लेल टंकित रचना, जकर ने कोनो शब्दक बन्धन छै आ ने विषएक, 13 दिसम्बर 2010 धरि नाटक-एकांकी विशेषांक लेल आ 13 जनवरी 2011 धरि मैथिली-समीक्षा विशेषांक लेल लेखक ई-मेलसँ पठा सकै छथि। रचनाकार अपन मौलिक आ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि) ggajendra@videha.com केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx, .rtf वा .txt फॉर्मेटमे पठा सकैत छथि। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेताह, से आशा करैत छी। रचनाक अंतमे टाइप रहय, जे ई रचना मौलिक अछि, आ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि।

(विदेह ई पत्रिकाकेँ ५ जुलाइ २००४ सँ एखन धरि १०७ देशक १,५९४ ठामसँ ५१,८६१ गोटे द्वारा विभिन्न आइ.एस.पी. सँ २,७४,६८६ बेर देखल गेल अछि; धन्यवाद पाठकगण। - गूगल एनेलेटिक्स डेटा।) गजेन्द्र ठाकुर ggajendra@videha.com २. गद्य २.१.देवांशु वत्स- - प्रगतिक रहस्य-चित्रकथा २.२.१.शेफालिका वर्मा-१४ नवम्बर२.भावना नवीन- हमर प्रिये नेना भुटका ३. शबनम श्री-कंप्यूटरक खेल २.३.१.विनीत उत्पल-  कतय गेल फिल्मक बाल कलाकार २प्रोफेसर प्रेमशंकर सिंह- मैथिली बाल काव्यधारा २.४.१.तारानन्द वियोगीक संग अनिल गौतमक वार्तालाप २. साहित्य अकादेमीक विशेष समारोह (१५.११.१०) मे तारानन्द वियोगीक वक्तव्य २.५.-जगदीश प्रसाद मंडल-कथा- दोहरी मारि‍ २.६.१.बिपिन कुमार झा-मिथिलांचल आ बिहार चुनाव २.सुमित आनन्द- भारत-नेपालक मिथिला हस्तशिल्प कलामे असीम सम्भावना २.७.ज्योति सुनीत चौधरी-नानीक खिस्सा: २.८.१.शि‍वकुमार झा ‘टि‍ल्‍लू’३टा बाल कथा २.मुन्नाजी- पथ दर्शन ३.अनमोल झा- किछु बालकथा देवांशु वत्स प्रगतिक रहस्य-चित्रकथा (फोटो सभकें क्लिक करू।) १.शेफालिका वर्मा-१४ नवम्बर२.भावना नवीन- हमर प्रिये नेना भुटका ३. शबनम श्री-कंप्यूटरक खेल १ शेफालिका वर्मा प्रत्येक साल हम सभ १४ नवम्बरकेँ बाल  दिवसक नामसँ मनवैत छी. एहिमे कोनो संदेह नै जे अहाँ सभ जनैत छी जे चाचा नेहरुक जन्म दिवसकेँ ई नाम देल गेल. पंडित जवाहर लाल नेहरु  हमर स्वतंत्र राष्ट्र केर प्रथम प्रधान मंत्री छलाह ;  नेना सभसँ एतेक प्रेम  छलनि जे बच्चा सभ हुनका  चाचा नेहरु कहऽ लगलाह .ओ कहैत छलाह " नेना गन , हमरा अहाँ सभसँ गप करवामे , अहाँ सभ संग खेलवामे नीक  लागैत अछि, कनि काल लेल हम बिसरि जाइत छी  जे हम वृद्ध भऽ गेल छी , हमर वाल्यकाल हमरासँ हजारो , लाखो कोस दूर चलि गेल अछि . बुढ पुरान केँ देखैत छी जे नवतुरिया केँ सीख देवामे  , हुनका पर अपन सलाह लादवा क अभ्यस्त भऽ जाइत छथि. हमहूँ जखन नेना छलों तेँ ई सभ उपदेश कनिको नीक नै लागैत छल. मुदा, आब सोचैत छी तँ हुनक कहल कतेक गप, जे तखन अन्सोहांत लागैत छल, आइ अनजानहि हमर संस्कार बनि गेल ......." बाल्यकालेसँ नेहरु जीकेँ विज्ञानमे बड़ रूचि छलनि. जखन ओ स्कूलमे पढैत छलाह तखनेसँ हुनका विज्ञानक प्रति  बहुत अभिरुचि छलनि. एक बेर ओ टेलिस्कोपक विषयमे कत्तो पढने छलाह . हुनक मोनमे जिज्ञासा उठलनि. आखिर कोना बनैत अछि ई ? ओ अपन घरेमे दूरबीन  बनेवाक प्रयत्न करऽ लागलथि. मुदा बिना केकरो मदतिक अथाह बुझि पडैत छलनि. बड सोच विचार कयलाक उपरांत नेहरु अपन शिक्षक मिस्टर ब्रुक्ससँ सलाह केलन्हि. अहाँकेँ  दूरबीनक कोन  आवश्यकता पड़ि गेल..?--------अचंभित भऽ ब्रुक पुछलन्हि--अहाँ तँ स्कुलोमे एकर उपयोग कऽ सकैत छी ? सर , हम अपना लेल स्वयं अपन टेलिस्कोप बनाबऽ चाहैत छी. हम अपन घरसँ समस्त ब्रह्माण्ड देखऽ  चाहैत छी. ---------जवाहरक मोनमे बहुत उत्साह छल. ब्रुक नेहरुक रूचि विज्ञानमे देखि बहुत हर्षित भऽ गेलाह . ओ सभ समानक जुगाड़ करए लागलथि. सभ समान जखन जमा भऽ गेल तँ  नेहरु ख़ुशीसँ हुमचई  छलाह. --------सर, आब तँ सभटा जोगाड़ भऽ गेल. आब काज शुरू करी..? हँ, हँ ..किएक ने ...आ तकर बाद गुरु शिष्यक सहयोगसँ दूरबीन तैयार भऽ गेल. जे शिष्यकेँ जाहि दिसि रूचि रहैत छैक   गुरु निश्चय रुपे ओकरा आगू बढ़वै छथि. जवान बालक अपन बनाओल दूरबीनसँ सौँसे ब्रह्माण्डकेँ अपना  लग देखि ख़ुशीसँ भरि उठलै. विज्ञानक प्रति हुनक रूचि दिनों-दिन बढैत गेल,  जखन ओ भारतक प्रधान मंत्री बनलाह तँ कहलथि----खाली वैज्ञानिक तरीकासँ हम सभ भारत केर  विकास कऽ सकैत छी.   ओ सभ दिन विज्ञान आ टेक्नोलोजीकेँ प्रोत्साहित करैत रहलाह. विज्ञानक प्रति हुनक स्पष्ट विचार देशवासीक सम्मुख खुजि गेल .एही विषयक पढ़ाइ देशक कोन कोन  केँ उत्साहित कऽ देलक. हुनक कहब छल, --विज्ञान हमरा सभकेँ अन्धविश्वास सँ दूर लऽ जाइत अछि. प्रत्येक कार्यक  प्रयोजन देखबैत अछि. बिना कारण कोनो काज नहि  होइत छैक .  मुदा ओ चाहैत छलाह जे विज्ञान ध्वंसक कारण नै बनए वरन, नव निर्माणक नवल सूरज बनै ..तैं कोनो तरहक तोड़ फोड़ कए अपन देशक छविकेँ हम सभ धुमिल नै करी .कोनो राष्ट्र  मात्र नदी-नाला , वन पर्वत ,अरण्यसँ सुन्दर नहि बनैत छैक , मुदा देशकेँ सुन्दर बनेवा लेल एहेन नागरिक केर आवश्यकता होइत अछि जे परस्पर स्नेह, समता आ सौहार्द्रमे पलल होइ .. २.भावना नवीन- हमर प्रिये नेना भुटका हमर प्रिये नेना भुटका जय मैथिली आइ बाल दिवसक शुभ अवसरपर अहाँ सभकेँ बधाइ. हम आइ किछु कहवा लेल चाहैत छी. हमर सबहक मातृभाषा मैथिली छी आ राष्ट्र भाषा हिंदी छी, ई हम सभ जनैत छी. माय आ मातृभाषासँ बढ़ि संसारमे किछु नै. तखन अहाँ सभ मैथिली किएक नै बजैत छी;  CHARITY BEGINS AT HOME .. .अहाँ नै सोचैत छी जे हम किएक ने  मैथिली बजैत छी ? की हमरा लाज लागैत अछि, की  हमर  व्यक्तित्वकेँ ई छोट कऽ दैत अछि? .... अहाँ सोचु, जे अंग्रेजी, फ्रेंच,रसियन  आदि भाषा जानवा लेल हम कतेक पाइ खर्च करैत छी. किन्तु जे हमर माताक भाषा थीक ओकरे हम उपेक्षा कऽ दैत छी, जे हम दूधक संग घोंटआइत छी ....अपन भाषा बजवामे जे मज़ा छैक ओ कोनो आन बस्तुमे नै..अहाँ दस टा अंग्रेज बच्चाक सामने  आपसमे मैथिलीमे बाजब तँ ओकरा सभकेँ अवचंक लागि जेतैक अरे, ई कोन भाषा थीक, हिंदी तँ बूझैत छलों ,मुदा ई कोन भाषा थीक, अहाँ ओकरा सभकेँ विस्मित  देखि आर खुश भऽ बाजै लगब.. अहाँ जनैत छी, अपने देशमे बंगाल अछि, ओहि ठामक बच्चासँ लऽ वृद्ध जन तक बड़का बड़का विदेशीसँ बंगलेमे बात करत. अपन भाषा बजवामे ओकरा  शान लागैत छैक. कत्तो हीनताक भाव नै अबैत छैक. अहाँक माता पिता यदि हिंदीमे गप करैत छथि, तँ अहाँ हुनका बुझाबू .अपन मातृभाषामे गप करैत..अपन भाषा सभ जग मिठ्ठा ... पहिने अपन देशमे उर्दुक प्रचलन छल. हिन्दीक स्थानपर उर्दू पढ़ओल जाइत  छल.  उर्दूमे पानि  के 'आब' कहल जाइत अछि. अंग्रेजी जकाँ ओहि समय उर्दु लोकक माथपर चढ़ल छल . ८- ९   बरिसक एकटा स्कूली नेनाकेँ बोखार लागि गेलैक. घरमे वृद्ध माय बाप. बोखारक  तीव्रतामे ओ अड़-बड़ बकि रहल छल. माय बाप कान दऽ सुनलक, की बाजि रहल अछि बच्चा ..ओ खाली आब-आब सुनथि. सोचैत रहल आब की ..आब की हेतैक..किएक आब आब कऽ रहल अछि? बच्चा बेहोश भऽ गेल. दुनू गोटे छाती पीटैत डाक्टरकेँ बजेलक...तावत बच्चाक मृत्यु भऽ गेल. डाक्टर साहेब ओ बोखारमे खाली आब आब  बजैत छल...डाक्टर चकित भऽ गेल....ओ तँ पानि  मंगैत छल..... फेर  तँ माँ पिता दुनू छाती पीटि-पीटि कानऽ लागल......आब  आब  कय रहलौं  पुत्ता, खटिया तर छल  पानि ; एहेन फारसी पढ़लौं पुत्ता अपने सिर  बिसानी तैं कहैत छी, सबहक माता पिता बेसी तर मैथिली  जनैत छथि ,मुदा  विदेशी भाषा कम्मे सम्मे...एहेन कोनो काज नै करी जे अपने माथ विसा   जाय......हम बेसी किछु नै बाजब , अहाँ सभ अपने बुझनुक छी, किएक तँ हम जनैत छी आइ काल्हिक बच्चा कंप्यूटर, रोकेटकेँ मात करैत अछि.  तैं तँ वोर्ड्सवोर्थ कहने छथि....child is the father  of  the man .....आइ बाल दिवस केर एहि शुभ अवसरपर अहाँ सभ सप्पत खाऊ जे हम अपन मातृभाषाक माथ कहियो नै झुकऽ देब....अपन संगी सभसँ, परिवारसँ अवश्य मैथिली बजवाक आ पढ़वाक अनुरोध करब.......... ३ शबनम श्री *कंप्यूटर क खेल **............* * ** *हम सब अपन कोनो पाठ यादि करैत  छी तँ अपन पोथीसँ आकि कोपीसँ . गणित, विज्ञान, अंग्रेजी आदि सभ विषयकेँ बुझवा लेल शिक्षकसँ बुझऽ पड़ैत अछि . किन्तु समय बदलि गेल, विज्ञानक चमत्कारसँ आब कंप्यूटर सभ काज करैत अछि. बहुत शैक्षणिक प्रोग्राम कंप्यूटरमे अछि जे ओहिमे रन करैत अछि, जकरा हम देखि सकैत छी, पढ़ि सकैत छी आ सुनियों सकैत छी. जेना अंग्रेजी विषय केर हम कतेक शब्दावली यादि कऽ सकैत छी, सौंसे व्याकरण पढ़ि सकैत छी. नव नव कथा पढ़ि सकैत छी. गणितमे गुणा भाग आदि प्रत्येक हिसाब नीक जकाँ खेल खेल मे सिखि जाइत छी. विज्ञानमे भौतिकी, रसायन, जीव विज्ञान सबहक़ interesting  problem  सभ हल कऽ सकैत छी. कतेक तरहक सी. डी. rom  भेटैत अछि जाहिमे सभ विषय केर program  रहैत छै. सी. डी. रोम एकटा चमकैत डिस्क जे प्लास्टिक  केर होइत छै , ओहिमे विभिन्न प्रकारक पाठ आ सूचना नुकायल रहैत अछि. एहेन बहुत प्रकारक सी. डी. सँ बाजार पाटल अछि यदि अहाँ चाही तँ स्कूलक उपरांत अपन कंप्यूटरपर बैसि हँसैत खेलैत कतेक टास्क सीखि लेब. साँच तँ ई अछि जे एहिमे मजो आबि जाइत छैक..जेना प्रेमशंकर पंचतंत्र केर कथा जानै लेल चाहैत छल. ओ खट्ट दऽ कंप्यूटरमे पंचतंत्र केर सी. डी. लगा देलक.  तखन बहुत उत्साहसँ ओ एक एक कथाक मज़ा लेबऽ लागल, ओना अहाँ जनैत छी ,पंचतन्त्रक खिस्सा मानवक जीवन निर्माणमे बड़का सहायक होइत अछि. अहाँ जरुर एकरा देखब , नै पढने  देखने ओहिनो कोनो चीजक ज्ञान लेल कंप्यूटरक स्क्रीनपर फोटो, गीत संगीत, कथानक, animation क संग अबै लागैत अछि. अहाँकेँ खूब मोन लागत, अहाँ पैर झुलावैत, गुनगुनावैत सिखैत रहब. गणित एहेन नीरस विषयकेँ हँसैत हँसैत सीखि लेब. दू दोस्त एक साथ मिलि गणितक सी. डी. मे devide एंड conquer मे सीखि लेब. दुनू मिलि खेलैत अछि, कम्यूटर ओकरा सही कऽ दैत अछि. सही  गलत भऽ जाइत छै तँ कंप्यूटर फेरो सीखबऽ लागैत छैक. आ सभसँ पैघ बात छैक जे  कंप्यूटर कोनो शिक्षक जकाँ  मारैत नै अछि. एहि बहाने try अगेनक समाद कम्पूटर दैत रहैत अछि, बच्चा सभमे सिखबाक हिस्सक लगबैत अछि. जाधरि अहाँ right  नै होयब  ताधरि अहाँ हारि नै मानू. जीवनमे एहिसँ एकटा बड़का संकल्प लेवाक हिस्सक बनि जाइत छैक. चाचा नेहरुकेँ विज्ञानसँ बहुत प्रेम छलनि. विज्ञानमे निहित शक्तिसँ देशक विकासक संभावना हुनका देखा पडैत छलनि..आ तैं आइ हम सभ कंप्यूटर, रोकेट आदिक जमानामे जीवि रहल छी..... १.विनीत उत्पल-  कतय गेल फिल्मक बाल कलाकार २प्रोफेसर प्रेमशंकर सिंह- मैथिली बाल काव्यधारा २ विनीत उत्पल कतय गेल फिल्मक बाल कलाकार कहियो समय रहै जे बाल कलाकार आओर बाल गीत हिन्दी सिनेमा देखै बला लोकक मनमे उतरि जाइत छल। मुदा आजुक समयमे नहि तँ एहन बाल कलाकार अछि आओर नहि ओहन डायरेक्टर अछि जे बच्चाकेँ लऽ कऽ फिल्म बनौलथि जे दिल कऽ छू लय। 1954 मे एकटा फिल्म रिलीज भेल छल 'जागृति"। कहल जाइत अछि जे ई फिल्म पहिल फिल्म छल जहि मे बच्चाकेँ लऽ कऽ नीक गीत छल। गीत कवि प्रदीप लिखलैन । 'आओ बच्चो, तुम्हें दिखाएं, झांकी हिन्दुस्तान की" एखनो लोक सभ गाबैत अछि। अहि फिल्मक एकटा गीत आओर अछि जे मोहम्मद रफीक गायल छल 'हम लाए हैं तूफान से कश्ती निकाल के...।" समय बदलैत गेल, कएक टा गीत लिखल गेल। 'बूट पालिस" मे 'नन्हे मुन्ने बच्चे तेरी मुटठी मे क्या है", 'श्री 420" मे 'इचक दाना बिचक दाना",'धूल का फूल" मे 'तू हिन्दु बनेगा न मुसलमान बनेगा", 'गंगा जमुना" मे 'इंसाफ की डगर पे बच्चो दिखाओ चल के", 'सन ऑफ इंडिया" मे 'नन्हा मुन्ना राही हूं', 'ब्रह्मचारी" मे 'चक्के पे चक्का", 'दो कलियां" मे 'बच्चे मन के सच्चे" सभटा गीत बच्चा सभकेँ खूब नीक लागल। आओर तँ आओर, फिल्म अराधनाक गीत 'चंदा है तू मेरा सूरज है तू' आइ धरि लोक अप्पन सोना बेटाकेँ सुताबैक कालमे गाबैत अछि, जखन खेलाबै लागत तखन आशीर्वाद फिल्मक गीत "रेलगाड़ी, रेलगाड़ी...' गाबैत छल जकरा अशोक कुमार गयने छल। जखन घरमे मामा आबै छथिन या राति मे आंगन मे सुतल लोरी जना लोग सुनाबैत अछि 'चंदा मामा दूर के.." गीत सुनहि मे खूब नीक लागैत अछि। ओहिनो फिल्म अपना देशक गीत 'रोना कभी नहीं रोना", कालीचरणक गीत 'एक बटा दो", मिस्टर नटवरलालक गीत 'आओ बच्चों मैं तुम्हें कहानी सुनाता हूं", अंधाकानूनक गीत 'रोते-रोते हंसना सीखो" खूब सुनल आओर गाओल जाइत अछि। मासूम फिल्मक गीत 'छोटा बच्चा जानकर" कोनो काल मे सभक मुंह मे रहैत छल। हिन्दी फिल्मी दुनिया मे एहनो काल छल जहिया बेबी तबस्सुम, बेबी गायत्री, मास्टर रतन, हनी इरानी, पल्लवी जोशी, नीतू सिंह, मास्टर मयूर केँ  देखहि लेल लोक सिनेमा हॉल जाइत छल। मुदा अहि गपसँ इनकार नहि कएल जा सकैत अछि जे आब फिल्म मे अलग तरहक स्वादक लेल बाल कलाकारक अभिनय देखल जाइत अछि। कहियो दू टा प्रेमीक मिलाबैक लेल बाल कलाकारकेँ फिल्म मे लेल जाइत छल जे आबक फिल्म मे नहि अछि। किएकि मोबाइल, इंटरनेटक दुनिया आबि गेलासं नहि कबूतर, तोता अछि आओर नहि कोनो बच्चा, जकरा सं प्रेमपत्र भेजबा मे मजा आबैत छल। एकटा फिल्म आयल छल 'ब्लैक"। ओ संजय लीला भंसाली बनौने छल। आयशा कपूर एहिमे अभिनय केने छल जाहि सं खूब फिल्म देखल गेल आ सर्वश्रेष्ठ फिल्म बनि गेल छल। अमोल गुप्तेक तारीफ कएल जा सकैत अछि, किएकि आमिर खानक संग डिसलेक्सियासँ पीड़ित बच्चा  पर 'तारे जमीं पर" बनौलनि। खूब नीक अभिनय करैक लेल दर्शील सफारी केँ घर-घर मे लोक चिन्है लागल। अहि मे अमिताभ बच्चन कोना ककरो से पाछाँ रहितथि। भूतनाथ मे अभिनय कऽ लोकक दिल जीत लेलखिन। अमन सिद्दकी एकरामे बंकूक भूमिका केलनि। २ प्रोफेसर प्रेमशंकर सिंह मैथिली बाल काव्यधारा कविता सकल जीवनकेँ अपनामे समाहित करैत चमत्कारे नहि, प्रत्युत सत्योद्घाटन आ आत्मान्वेषण सेहो थिक। मैथिली काव्यधाराक सुदीर्घ परम्पराक अवगाहनोपरान्त प्रतिभाषित होइत अछि जे बाल काव्य-धारासँ कविताकार सर्वदा विमुख रहलाह। बाल-काव्य-धाराक इतिहास कतेक प्राचीन अछि ताहि विषयपर विवाद भऽ सकैत अछि, किन्तु सत्यता ई अछि जे ई एक नूतन विधाक रूपमे विकसित भेल जकर इतिहास विगत शताब्दीसँ प्रारम्भ होइछ, कारण एहिसँ पूर्व बाल साहित्यकेँ गम्भीरतासँ नहि अंगीकार कयल जाइत छल आ ई बुझल जाइत छल जे बाल-साहित्यक रचनाकार ओतेक प्रबुद्ध नहि होइत छथि, जतेक अन्य विधाक रचनाकार। किन्तु शनैः-शनैः ई धारणा अघोषित रूपसँ पोषित-पल्लवित कयनिहारकेँ पाछाँ हटय पड़लनि। समय ई सिद्ध कऽ देलक अछि जे बाल साहित्यक सृजनिहारकेँ साहित्यक अन्य विधाक तुलनामे अधिक मौलिकता अपेक्षित अछि। एतबे नहि शिशुक मनोविज्ञानकेँ जनबाक-बुझबाक क्षमता सेहो परमावश्यक अछि। बाल साहित्यान्तर्गत विशेष रूपसँ बाल-काव्य-धाराक प्रसंगमे कहल गेल धारणादिकेँ तोड़ि देलक आ एहि विधामे कविताकार अधिक उन्मुख भेलाह। मैथिलीमे नव जागरणक सूत्रपात भेल बीसम शताब्दीमे जकरा स्वर्णयुगक नामे उद्घोषित कयल गेल आ बाल-काव्यधाराक दिशामे अन्वेषण आ अनुसन्धान स्वातंत्र्योत्तर कालमे सर्वाधिक कविताकार एक स्वस्थ वातावरणमे सृजनरत भेलाह। एही कालावधिमे साहित्य-चिन्तक लोकनि नूतन भावनासँ उत्प्रेरित भऽ मिथिलांचल एवं प्रवासी मैथिल जनसमुदाय बाल पत्रिकाक प्रकाशनक शुभारम्भ कयलनि। बाल पत्रिकाक प्रकाशनोपरान्त बाल साहित्यान्तर्गत बाल-काव्यधाराक प्रस्फुटन भेलैक जे मात्र पृथक विधोक रूपमे नहि प्रतिष्ठित भेल, प्रत्युत पूर्णतः शिशु काव्यक सृजनक परम्पराक सूत्रपात भेलैक तथा एकर नेओकेँ मजगूत करबाक दिशामे ओहि कविताकारकेँ उपेक्षाक दृष्टिएँ नहि देखल जा सकैछ। वस्तुतः ई श्रेय आ प्रेय छैक स्वातन्त्र्योत्तर युगकेँ जखन बाल-पत्रिकामे “शिशु” (१९४९), “बटुक” (१९४९), “धीयापूता” (१९५७), “नेना भुटका” (१९९६) आ “बाल मिथिला” (१९९८) क प्रकाशनक शुभारम्भ भेलैक। उपर्युक्त पत्रिकादिक माध्यमे आरम्भिक युगक सम्भावना प्रारम्भ भेल। बाल पत्रिकाक अतिरिक्त अन्यान्य पत्रिकादिमे सेहो कविताकार उभरलाह जे शिशुक लेल शाश्वत काव्यक सृजन कयलनि। उपयुक्त पत्रिकादिमे शताधिक कविताकारक शताधिक काव्यधारा प्रवाहित भेल, किन्तु दुर्योगक विषय थिक जे कोनो काव्य-संग्रह प्रकाशमे नहि आबि सकल। पटनासँ प्रकाशित “मिथिला मिहिर” (१९६०) मे शिशुकेँ आकर्षित करबाक लेल तथा काव्य-यात्राकेँ प्रोत्साहित करबाक उद्देश्यसँ “नेना भुटकाक चौपाड़ि” नामे दुइ पृष्ठ अवश्य सुरक्षित कयलक, किन्तु ओहिमे बुझौअलि एवं चुटुक्काक संगहि संग यदाकदा कविता सेहो प्रकाशित भेल जे काव्य-यात्राकेँ आगाँ बढ़यबामे सहायक सिद्ध भेल। हँ, एतबा सत्य अछि जे बाल दिवसक अवसरपर ११ नवम्बर १९७९ क अंक एहि प्रवृत्तिक काव्य-धाराकेँ प्रोत्साहित करबाक दिशामे सफल प्रयासक शुभारम्भ कयलक। मैथिली बाल-काव्य-धाराक शुभारम्भ जे मिथिलांचलक शिशुक मानसिक आ भावनात्मक पोषण कयलक; ओकर मुक्त हँसी, उमंग आ मिठगर खिलखिलाहटि काव्यमे प्रवेश पौलक। बाल गोपालक कल्पना आ जिज्ञासाक क्षितिजक विस्तार शनैः-शनैः होमय लागल आ ओकरा सहृदय व्यक्ति आ उत्तमोत्तम नागरिक बनबाक दिशामे जबर्दस्त नेओ देलक। मैथिलीमे उपलब्ध बाल काव्यधाराकेँ दुइ श्रेणीमे विभाजित कऽ कए ओकर शृंखलाबद्ध इतिहासक लेखा-जोखा कयल जा सकैछ- १.मौलिक काव्ययात्रा २.अनूदित काव्ययात्रा मौलिक काव्य-धाराक इतिहासमे विगत शताब्दीक नवम दशकमे दस्तक देलनि उपेन्द्र झा “व्यास” (१९१७-२००२)। हुनकर “अक्षर परिचय” (सत्येन्द्रनाथ झा, श्रीभवन, बोरिंग रोड, पटना, १९८४) प्रकाशमे आयल जाहिमे शैशवावस्थाक आँखिकेँ खोलबाक ओ उपक्रम कयलनि। एहिमे “अ” सँ “ज्ञ” धरि प्रत्येक वर्णपर सरल-सुबोध बाल-काव्यक सृजन कऽ ओ एकर विकास यात्रामे नव आयामक सृष्टि कयलनि। एहिमे कवि स्वदेश प्रेम, उपदेश, चेतावनी, आत्मरक्षा, मातृभाषा प्रेम, पाप-पुण्य आ जीवनक विविध रूपकेँ उद्घाटित कयलनि यथा- जलमे बहुतो जीव रहैछ झट दऽ करब नीक नहि होइछ टटका जलसँ खूब नहाउ ठकक संगमे ने पड़ी बाउ डमरू डिमडिम बजाबी आनि ढढ़क-ढढ़क नहि पीबी पानि (अक्षर परिचय, पृष्ठ-३) मैथिली बाल-काव्ययात्राक परिप्रेक्ष्यमे एकैसम शताब्दी विशेष उपजाऊ भूमि कहल जा सकैछ। एहि कालावधिमे बाल काव्यधाराक अभूतपूर्व विकास भेलैक आ कतिपय कविताकार एहि दिशामे उन्मुख भेलाह जे एकरा सम्वर्द्धित करबाक दिशामे प्रयास करब प्रारम्भ कयलनि। वर्तमान शताब्दीक प्रथम दशकमे लीक तोड़ि कऽ स्वतः बाल-काव्यधाराक अन्तर्गत सशक्त हस्ताक्षर कयलनि जनकवि जीवकान्त (१९३६) जनिक चारि बाल काव्य संग्रह गाछ झूल झूल (चतुरंग प्रकाशन, बेगूसराय, २००४), छाह सोहाओन (शेखर प्रकाशन, पटना (२००६), खीखिरिक बीअरि (किसुन संकल्प लोक, सुपौल, २००७) एवं हमर अठन्नी खसलइ वनमे (जखन-तखन, दरभंगा, २००९) प्रकाशमे आयल अछि जाहिमे कुल मिलाकऽ डेढ़ सयक लगधक कविता संकलित अछि। उपर्युक्त संग्रहादिक कवितादि बाल-काव्यधाराक समुचित प्रतिनिधित्व करैत अछि जाहिमे कवि बालमनक भावनाकेँ देखबाक प्रयास कयलनि अछि। उपर्युक्त कवितादि हृदयकेँ स्पर्श कयनिहार थिक जे शनै:-शनैः बाल मनकेँ हृदयस्पर्शी भऽ आगाँ बढ़ि जाइछ तथा पाठक ओकरा ताधरि देखैत रहैछ जाधरि ओ मानव चक्षुसँ अदृश्य नहि भऽ जाइछ। कवि पहिने स्वयंकेँ डुबौलनि अछि आ बाल मनकेँ डूबबाक हेतु विवश करैत छथि। हिनक बाल-काव्य यात्राकेँ चारि भागमे विभाजित कयल जा सकैछ, १.वात्सल्य भावमय २.वात्सल्यक समय ३.शिशु बोध ४.शिशु कल्पना। हिनक बाल-काव्यक सर्वगम्यता आ सहज संवेद्यता सोझ अभिव्यक्तिक कारणेँ नहि, प्रत्युत जीवन प्रसंगक भूमिकामे कोनो एक भावक्षणकेँ उपस्थित करबाक कारणेँ ओहिमे ओ गुण उत्पन्न भेल अछि, जकरा हम सहज मानवीयता कहि सकैत छी। जीवनक विविध यथार्थ प्रसंगसँ सम्बन्धित संवेदनात्मक प्रतिक्रिया हिनक बाल-काव्यक मूलाधार हैबाक संगहि संग हुनक व्यक्तित्वक विशेषतादिपर हमर दृष्टि केन्द्रित भऽ जाइत अछि। स्थल-स्थलपर एहन अनुभव होइत अछि जेना ओ अपन भावकेँ वैक्यूममे राखि कऽ पुनः ओहिपर काव्य सृजन नहि कयलनि, प्रत्युत टटका सम्वेदनात्मक प्रतिक्रियाकेँ सहज रूपेँ पद्यबद्ध कयलनि। सम्भवतः एहने टटका सम्वेदनात्मक प्रतिक्रियादिकेँ सहज रूपसँ काव्यमे महत्व दऽ कए पद्य-बद्ध कऽ प्रक्रियामे ओ बाल-काव्य-यात्रा अन्तर्गत हस्ताक्षर कयलनि। हिनक बाल कवितादिमे खेलकूद, पढ़ाइ-लिखाइ, प्राकृतिक सुषमाक विविध स्वरूप, विविध जीवनोपयोगी सामग्री, बाध-वन, सर-सम्बन्धी, जीव-जन्तु, इतिहासोद्भव महापुरुषक जीवन वृत्तान्त आ आपसी लड़ाइ-झगड़ा सब हुनका सोझाँ होइत छनि आ अपन आनन्दी स्वभावक कारणेँ हुनका एहि सबमे रस-बोध भेलनि। जीवकान्तक साहित्यिकता अपन सभ्यता-संस्कृति आ भाषाक संग अपनत्वक संगहि काव्यात्मक अनुभव तथा भाषाक रचनात्मक प्रयोग थिक। इएह कारण अछि जे हुनक अपन पृथक् रंग, पृथक् पहचान तँ छनिहे जे ओ परम्परागत व्यञ्जनाक संग नव बात कहबाक उपक्रम कयलनि। ओ अनुभव सत्यकेँ सार्थक एवं रचनात्मक आयाममे बाल-काव्य यात्रा कयलनि। ओ अपन सोचकेँ, काव्य-यात्राकेँ एक नव क्षितिजक अन्वेषण करैत, यथार्थसँ सरोकार रखैत, विसंगति आ विद्रूपताक बीच रस्ता बनबैत सार्थक जीवन मूल्यकेँ स्थापित करबाक अनवरत प्रयासमे लागल छथि। हिनक बाल-काव्य-यात्राक प्रक्रियाक केन्द्र थिक बाल-मन जाहिमे कवि परिश्रमक महत्ताकेँ प्रतिपादित करैत ओकर मनकेँ एहि दिस आकर्षित कयलनि अछि, देअए जीवन उत्सव तत्व जीवन थिक बड़का टा उत्सव खटने सभ सुख पाबी खटबे थिक देशक आजादी खटिकए स्वर्ग बसाबी (हमर अठन्नी खसलइ वनमे, पृष्ठ-३४) जीवकान्तक बाल-काव्य-यात्राक अनुशीलन आ मननसँ स्पष्ट अछि जे लोकसाहित्यान्तर्गत शिशुसँ सम्बन्धित लोक प्रचलित कहबी अछि, ताहिसँ ओ पर्याप्त अनुप्राणित छथि यथा गाछ झूल-झूल मे पीपर, बिरिछ तर, झोंकी हवामे, जामु, बाघक मौसी इत्यादि उपर्युक्त परिवेशमे रचित अछि। बच्चा सब कहैत अछि: मैनाक बच्चा सिलौरीया रे दू गो जामुन गिरा दे उपर्युक्त भावसँ अनुप्राणित भऽ ओ बाल-काव्य सृजन कयलनि: जुमा-जुमा कए ढेपा मारहि जामु गिरा दे, बबलू भैया कारी-कारी जामु खसाबहि गाछ झखा दे, बबलू भैया (गाछ झूल-झूल, पृष्ठ-२८) मैथिलीक विपुल लोकोक्तिक प्रभाव हिनक काव्य-यात्रामे दृष्टिगत होइछ यथा: जाड़ बड़ जाड़, गोसाइँ बड़ पापी तपते खिचड़ि खुआ दे गे काकी (मैथिली लोकोक्ति कोश, पृष्ठ-३१०) उपर्युक्त लोकोक्तिसँ अनुप्राणित भऽ ओ बाल काव्य-यात्राक श्रीगणेश कयलनि यथा: टटका पानि झाँपि कए राखी फटकि बना कए चाउर बेराबी पीरा-पीरा दाल दरड़ि ली अल्लू-कोबी काटि मिलाबी चूल्हि पजारि धरी टोकनीमे सभ सामिग्री मद्धिम धाह पानि टभकाबी हरदि जोग दए पियर बना दे अटकरसँ किछु नोन खसाबी जीर-तेलकेँ धाह देखा कए, सोन्ह बनबिहेँ छौंकि-सानि कए मझनी हमरा लेल परसि दे खिच्चड़ि खा गरमयलहुँ, से हम नहिए कापी तपते खिच्चड़िसँ, टनकओलनि ललकी काकी (गाछ झूल-झूल, पृष्ठ-५५) वस्तुतः शिशु काव्य-धारामे यथार्थतः वैह कवि प्रविष्ट कऽ सकैत छथि, जनिका भाषापर अद्भुत् अधिकार छनि आ वैह सफल भऽ सकैत छथि जे बाल सुलभ चंचलताक संगहि शब्दाडम्बर विहीन भाषाक प्रयोगमे सिद्धहस्त छथि। वस्तुतः कवितामे भाषा नहि, प्रत्युत शब्द होइत अछि। शब्द-अर्थ आ अन्तर्निहित ध्वन्यात्मक लयकेँ जीवकान्त सूक्ष्मताक संग चिन्हलनि आ ओकर सहज अभिव्यक्तिक सादगीमे बदलबाक क्षमता रखैत ओ बाल-काव्यकला रूपकेँ प्रभावित कयलनि। जीवकान्तक बाल-काव्य-धारा समकालीन काव्य-धारासँ सर्वथा पृथक् अछि। दैनंदिन जीवनक छोटसँ छोट घटनादि आ जीवन स्थितिक हल्लुक निजी स्पर्श पाबि कऽ स्वयं कविताक शक्ल धारण कऽ लेलक अछि। हुनक दृष्टिकोण स्पष्ट अछि आ बिनु कोनो रूढ़िकेँ अपन गढ़ल मुहाबरासँ ओ अपन बात बाल-काव्यमे कहलनि अछि। हिनक बाल-काव्य पारिवारिक आ आत्मीय ऊष्माक काव्य थिक। हिनक काव्यमे जीवन्त व्यक्तिक बोली-चालीक छवि प्रस्तुत करैत अछि। हुनक एहि प्रवृत्तिक काव्य भाषा आ मुहाबराक एहन हिस्सा बनि गेल अछि जे समकालीन काव्य-भाषाक अनुपम उदाहरण अछि। स्वाभाविक रूपसँ हिनक बाल-कवितामे रोजमर्राक, हमर दिनचर्या आ घरौआ जीवनक वस्तुजात सदैव उपस्थित रहल अछि। जतय धरि उपमादि आ रूपकमे उपर्युक्त वस्तुक प्राथमिकता अछि जेना देहरी, जुत्ता-चप्पल, डोलमडोल, किकिआइ, झक्कड़, मुहदूबर, सुटकल, विलायल, छिच्चा, छिछरी, भरोस, नोछरा-नोछरी, सकचुन्नी, रोइयाँ, मछरी, फाँक, कटारी, पछारी, खत्ता, ठेलमठेला, उछाह, अगुताइ, रकटल, बेरबाद, लिबलिब, लसकल, फनकइ, पथार, गाछ-बिरीछ, अनघोल, फलिया, गाय, बकरी, बनैया, नेसइ, खोंटब, औंघी, सुटुकि, वेथा, घाम, घमौरी, भीड़-भरक्का, पतनुकान इत्यादिक उपस्थिति बालोचित सिद्ध करैत अछि। हिनक बाल-काव्यमे एक रहस्यपूर्ण, नैसर्गिक गीतमयता अछि जे स्वयं बिम्ब, कथ्य, रूपक शब्द चयन आ कथनक भंगिमा अत्यन्त चमत्कारी रहितहुँ सरल आ हृदयस्पर्शी अछि। जीवनक छोट-छोट अनुभव, प्राकृतिक दृश्य हुनक कवितामे एक नव स्फुरणक संग मुखरित भेल अछि। एहि काव्यमे हिनक आत्मा, मनःस्थिति आ मानसिक व्यथा इत्यादिक वैयक्तिक कल्पना-प्रधानता उपलब्ध होइत अछि। हिनक बाल-काव्य-धारामे मिथिलांचलक आडम्बरहीन हरियर कचोर ग्रामीण परिवेशक अद्भुत् सामंजस्य अछि जतय ओ जीवन व्यतीत कऽ रहल छथि। जीवकान्तक बाल कविताक वैशिष्ट्य थिक जे ओहिमे बच्चा सदृश टटका सम्वेदना, ओकर चंचलता तथा चिदानन्द भावक प्राचूर्य अछि। एहि दृष्टिएँ अनुशीलनोपरान्त ई स्वीकार करय पड़ैछ जे मैथिलीमे हिनक बाल-काव्य-धारा अनुपम धरोहर थिक। वर्तमान दशकमे मैथिली बाल-काव्यधारामे बहुविधावादी प्रतिभासम्पन्न युवा कवि सशक्त हस्ताक्षर कयलनि ओ थिकाह गजेन्द्र ठाकुर (१९७१) जे प्रवासी रहितहुँ मातृभाषानुरागसँ उत्प्रेरित भऽ एहि क्षेत्रमे अपन उपस्थिति दर्ज करौलनि जनिक शताधिक बाल कवितादि “कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक” (२००९) मे संकलित अछि। एहिमे संग्रहित समस्त कवितादिक विषय-वैविध्यकेँ उद्घाटित करैत कवि बालमनक मनोवैज्ञानिक विश्लेषण, ओकर नानाविध औत्सुक्य, प्रसन्नता, टीस, वेदना, प्राकृतिक सुषमा, बालोचित चांचल्य, वर्षा, रौद-बसात, खेलकूद, बाल श्रमिकक वेदना,  किंडर गार्टेन स्कूलक क्रिया-कलाप, अवकाश भेलापर प्रसन्नता, खूजल रहलापर अप्रसन्नता तथा स्कूल जयबामे हनछिन करब आदि-आदि भावक विश्लेषण कवि अत्यन्त सूक्ष्मताक संग विलक्षण ढंगे कयलनि अछि। शिशुकेँ पितामह आ मातामहक अधिक स्नेह भेटैछ, जाहि कारणेँ हुनका सभक लग रहबाक ओ बेसी आकांक्षी रहैछ, कारण ओ दुलार-मलार ओकरा समयाभावक कारणेँ पारिवारिक परिवेशमे अन्य सदस्यसँ नहि भेटि पबैछ। ओकर विविध जिज्ञासाक यथोचित उत्तर ओकरा ओतहि भेटैछ, जाहि कारणेँ ओ सतत हुनका सभक समीप रहब पसिन्न करैछ। बालमन एतेक बेसी सेनसेटिभ होइछ जे सामाजिक परिवेशकेँ देखि ओकरा आत्मबोध भऽ जाइछ सम्पन्नताक आ विपन्नताक। तकर यथार्थ स्थितिक चित्रण निम्नांकित पंक्तिमे कवि कयलनि अछि यथा- गत्र-गत्र अछि पाँजर सन हड्डी निकलल बाहर भेल भात धानक नहि भेटय तँ गद्दरियोक किए नहि देल औ बाबू गहूमक नहि पूछू अछि ओकर दाम बेशी भेल गेल ओ जमाना बड़का बात गप्पक नहि खेलत खेल (कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक, पृ. ७.१३७) बालमनक प्रसन्नताक भाव कवि व्यक्त कयलनि अछि जखन ओकरा स्कूल जयबासँ छुट्टी भेटि जाइछ, तकर दिग्दर्शन तँ करू: आइ छुट्टी काल्हि छुट्टी घूमब-फिरब जाएब गाम नाना-नानी मामा-मामी चिड़ै-चुनमुनी सभसँ मिलान बरखा बुन्नी आएल मेघ दहोदिस भागल कारी मेघ उज्जर मेघ घटा पसरल चिड़ै-चुनमुनी आएल (कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक, पृ. ७.८५) हाथीकेँ जखन शिशु प्रथमे प्रथम देखैछ तँ ओ आश्चर्यित भऽ अकस्मात प्रफुल्लित भऽ जाइछ ओ सहसा बाजि उठैछ, हाथीक सूप सन कान” (कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक, पृ. ७.८४) आ “हाथीक मुँहमे लागल पाइप” (कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक, पृ. ७.७१) । बाल श्रमिकक व्यथा सेहो सोझाँ आएल अछि। जेना- फेर आएल जाड़ कड़कराइत अछि हार बिहारी!! लागए-ये भेल भोर गारिसँ फेर शुरू भेल प्रात बिनु तैय्यारी (कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक, पृ. ७.९०) जतेक दूर धरि भाषा प्रयोगक प्रश्न अछि एहिमे युवा कवि अपन उदार प्रवृत्तिक परिचय देलनि। भूमण्डलीकरणक फलस्वरूप भिन्न-भिन्न भाषादिक बहुप्रचलित हल्लुक शब्दादि मैथिलीमे धुड़झाड़ प्रयोग भऽ रहल अछि तकरा शिशु कोना आत्मसात कऽ अन्तर्राष्ट्रीय भाषा सीखि जाइछ, तकर कतिपय उदाहरण एहि कवितादिमे यत्र-तत्र उपलब्ध होइत अछि। शिशु अपन तोतराइत बोलीमे एहन-एहन शब्दकेँ अनुकरण करबाक प्रयास करैछ जकर फलस्वरूप ओकर भाषा ज्ञानक विस्तार अनायासे भऽ जाइछ तकर कतिपय उदाहरण एहिमे भेटि जाइछ, यथा: ट्रेन गाड़ी धारक कातमे आएल स्टेशन छुटल बातमे ट्रेन चलल दौगल भरि राति सुतल गाछ बृच्छ भेल परात (कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक, पृ. ७.६३) अत्याधुनिक परिवेशमे शिशुकेँ अत्यधिक लगाव खेल-कूदमे भऽ गेलैक अछि जे ओ अपन पुश्तैनी खेल सर्वथा बिसरि गेल अछि आ पाश्चात्य खेलक प्रति आकर्षित भऽ गेल अछि। कवि बालकक एहि चंचलताक विश्लेषण एहि प्रकारेँ कयलनि अछि: हम बाबा करू की पहिने बॉलिंग आकि बैटिंग बॉलिंग कय हम जायब थाकि बैटिंग करि हम खायब मारि? पहिले दिन तूँ भाँसि गेलह से सूनह ई बात बौआ बैटिंग बॉलिंग छोड़ि छाड़ि पहिने करह गऽ फील्डिंग हथौआ (कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक, पृ. ७.१२१) हिनक काव्य भाषा अत्यन्त विस्तृत आ व्यापक अछि जकर प्रयोग ओ कयलनि अछि। महानगरीय परिवेशमे रहितहुँ मैथिलीक ठेंठसँ ठेंठ शब्दादिक प्रयोग ओ अत्यन्त निपुणताक संग कयलनि अछि यथा गाछ-पात, भोरे-सकाल, झहराउ, हियाउ, फुसिये, लुक्खी, खिखीर, पीचल, सुन्न, ढहनाइत, झलफल, सूप, इयार, चाली, छागर, बुरबक, खगता, जलखै, बोन, घटक, गरिपढ़ुआ, थलथल, औंटब, मसौसि, पुरखा, अधखिजू, कोपर, सटका, खौंझाइ, लजकोटर, मुहचुरु, कथूक, दीयाबाती, घटकैती, झड़कलि, धमगिज्जर, चोरुक्का आदि-आदि। युवा कविक गतिशीलताकेँ देखि लगैछ जे भविष्यमे हिनक कवित्व शक्ति आर अधिक विकसित होयतनि, कारण ओ एखन पुष्पक कली सदृश मैथिली बाल-काव्यक संगहि संग वयस्कोक हेतु पर्याप्त मात्रामे काव्य सृजन कयलनि अछि जे आलोकमय थिक। अनूदित बाल-काव्य-धारा मैथिलीमे बाल काव्य-धाराक द्वितीय पड़ावक नव अध्यायक सूत्रपात भेल अनूदित काव्य-धारासँ। सहज आ सम्प्रेषणीय अनुवाद मूल लेखनसँ कठिन काज थिक आ ताहूमे कविताक अनुवाद तँ औरो कठिन थिक। पूर्वांचलीय आर्य भाषामे बाङला आ मैथिली एकहि परिवारक भाषा हैबाक कारणेँ एकर समग्र विशेषतादिक संगहि अपन निजी वैशिष्ट्य रखैत अछि। यद्यपि दुनूक संस्कृतिमे समानता रहितहुँ किछु सांस्कृतिक वैषम्य अछि जाहि कारणेँ शब्दाडम्बरक भिन्नता अछि। बाल-काव्य यात्रान्तर्गत एक नव जागरणक उद्भावना भेल जे समीपवर्ती बाङला भाषा आ साहित्यक विश्वकवि रवीन्द्रनाथ ठाकुर (१८६१-१९४१) क अर्द्धशतक काव्य एवं गीत “रवीन्द्रनाथक बाल साहित्य” (साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली, १९९७) प्रकाशमे आयल जकर अनुवादक छथि उदयनारायण सिंह “नचिकेता” (१९५१)। विश्व सृष्टिक नवकर्म सहयोगी एहन कवि बाङला साहित्यक हजार वर्षक इतिहासमे आविर्भूत भेलाह जे एक प्रान्तीय भाषामे बाल-काव्य-धारा प्रवाहित कयलनि जे समस्त भारतीय बाल-काव्य-धारामे सर्वकालिक बालोचित आनन्द, चिन्ता आ जिज्ञासा मे सम्पूर्ण भारतीय भाषा-भाषीक वाणीमे समाहित भऽ गेलाह। मैथिलीमे अनूदित हिनक बाल कविता एहि विषयक साक्षी थिक जे ओ समग्र भारतीय भाषाक कविक रूपमे प्रतिष्ठित भऽ गेलाह जे समस्त देशक सब कालक संग आनन्द-चिन्ताक भाव हुनक बाल-काव्य-धाराक प्रमुख बिन्दु थिक। रवीन्द्रनाथ जीवनक सभ स्तरक कवि, ऋगवेदक भाषामे ओ “कविनामं कवितमः” रूपेँ प्रख्यात भऽ गेलाह। रवीन्द्रकेँ शिशुक प्रति अगाध प्रेम छलनि। ओ शिशुक संग प्रेमे नहि करैत रहथि, प्रत्युत ओकरापर अगाध विश्वास सेहो करैत, समानरूपेँ आदर करैत रहथि, तकर कारण छल जे ओ शैशवावस्थामे मातृप्रेमसँ विमुख रहलाह। इएह कारण थिक जे ओ शिशु-काव्य-धाराक अन्तर्गत एहि भावनाकेँ व्यक्त करबामे कनियो कुंठित नहि भेलाह। हुनक मान्यता छलनि जे शिशु नादान, अबोध, मूर्ख नहि, प्रत्युत बुझनुक होइत अछि। हुनका एहि विषयक विश्वास छलनि जे गम्भीरसँ गम्भीर विषयकेँ सरल बना कऽ बुझाओल जाय तँ कठिनसँ कठिन विषयकेँ ओ सुगमतापूर्वक आत्मसात कऽ सकैछ। शिशुक संग शिशु बनि कऽ ओकरा सभक संग खेलायल जाय वा वार्तालाप कयल जाय तँ ओकरा सभक वास्तविक गुणक विकास सहजतापूर्वक भऽ सकैछ। मूल बाङला बाल-काव्य एवं गीत संग्रहसँ मैथिलीमे “चैताली” (१८९६), “कणिका” (१८९९), “कथा ओ कहिनी” (१९००), “नैवेद्य” (१९०१), “शिशु” (१९०३), “उत्सर्ग” (१९१४), “शिशु भोलानाथ” (१९२२), “चित्र-विचित्र” (१९३३), “खाप छाड़ा” (१९३७), “गीत वितान” (१९४१-४२) एवं “सहजपाठ भाग एक एवं दू” सँ बीछल बेरायल अनूदित रूप प्रकाशमे आयल अछि। वर्षासँ सम्बन्धित रवीन्द्र प्रथमे प्रथम शिशु काव्यक सृजन कयलनि यथा: विस्टि पड़े टापर टुपुर नदे एलो वान। शिव ठाकुरेर विये हवे तिन कन्यादान॥ उपर्युक्त काव्यांशक अनुवाद मैथिलीमे नहि भेल अछि। मैथिलीमे वर्षासँ सम्बन्धित “मेघ बरखा टिपिर टिपिर टप” अनूदित भेल अछि तकर मूल रूप निम्नस्थ अछि: दिनेर आलो निमे एलो सुज्जि डोवे डोवे। आकाश जुड़े मेघ जुटे छे चाँदेर लोभे लोभे। मेघेरे उपर मेघ कोरेछे रङ्गोर उपर अङ्ग। मन्दिरे ते काँसार घण्टा बाजलो ढङ्ग ढङ्ग। उपयुक्त काव्यांशक अनूदित रूप निम्नस्थ अछि: बुझल इजोत दिवस केर सूरज एखनहि डूबल हाय मेघ जुटल अछि चानक लोभें व्योम लोक धरि जाय मेघक ऊपर मेघ धरल अछि रंगक ऊपर रंग मंदिर मध्यक काँसा घण्टा मंद्रित शब्द-तरंग। उपर्युक्त काव्यांशक अन्तिम पंक्तिक अनुवाद अनुवादक सही नहि कऽ पौलनि। “मंद्रित शब्द-तरंग”क बदलामे “काँसा घण्टा- बाजल ढन-ढन” उपयुक्त होइत। रवीन्द्रक बहुचर्चित आ बहु प्रशंसित काव्य थिक “पुरातन भृत्य” जकर प्रारम्भिक मूल बाङला रूप निम्नस्थ अछि: भूतेर मतन चेहरा जे मन, निर्बोध अति घोर। जे किछु हाराय गिन्नी बलेन, केष्टा बेरा चोर। उठिते बसिते करिपान्तो शुनओ ना शुने काने। कत पाय बेंत ना पाय वेतन, तबुना चेतन माने। उपर्युक्त काव्यांशक मैथिलीमे अनूदित रूप निम्नस्थ अछि: भूत जकाँ चेहरा ओकर, निर्बोध अतिघोर। जे किछु हेराय कोसथि घरनी “किसुने निश्चये चोर”। उठइत सुतइत गारिक बरखा, नहि दइ छइ ओ काने। खाइ छइ बेंत ने पाबै वेतन, तहुँ नइ चेतन मानै। अनूदित अंशक किछु शब्द एहन अछि जाहिपर सहसा आपत्ति होइत अछि। जेना “निश्चये”क स्थानपर “बेरहि”, “सुतइत”क स्थानपर “बैसइत”, बरखाक स्थानपर “दैत छी”, “नहि दइ छइ ओ काने”क स्थानपर “तइयो ने सुने”, “खाइ छी”क स्थानपर “मारै छी”, “ने पबे वेतन”क स्थानपर “ने दै छी वेतन” तथा “तहु नइ चेतन” क स्थानपर “तइयो नइ चेते” उपयुक्त होइत। रवीन्द्रक शिशुसँ सम्बन्धित काव्य-यात्रामे मानवताक सम्भवतः सबसँ आदिम आ असंदिग्ध रूप मौलिक भाव वात्सल्यक अज्ञात गाम्भीर्यकेँ उद्घाटित करैत अछि। धियापूताक दुग्रह्यि चारुतत्व, ओकर अनुमेय व्यवहार ओ प्रसन्नतादायक चंचलता, ओकर तर्कातीत कल्पना आ ओकर अमूर्त्त कारुणिकता एहि सबमे कविकेँ विश्वक सर्जनात्मक जीवनक स्पन्दनक अनुभव भेल छनि। वैष्णव पद सबमे बालकक प्रति स्नेह आ श्लाघाकेँ काव्यात्मक स्वीकृति भेटल छलैक। परन्तु ओहि ठामक बालक सामान्य बालक नहि भऽ ईश्वरक अवतार अछि मानव शिशुक ऊपरमे। टैगोरक काव्यमे कोनो प्रकारक देवत्वारोपण नहि छैक, प्रत्युत शाश्वत रूपेँ निर्गत जीवनक चेतनाक रूपमे मानव शिशुक साधारणीकरण अछि। शिशु सम्बन्धी कतोक कवितादि नेना-भुटकाक हेतु उपयुक्त अछि। वस्तुतः ओहिमे किछु रचना हुनक मातृहीन पुत्र-पुत्रीक हेतु रचल गेल छल। हिनक शिशु काव्यक वैशिष्ट्य थिक जे ओहिमे फराक-फराक भाव स्थितिक चित्रण भेल अछि जे कविक अन्तरक बाल मनकेँ उद्घाटित करैत अछि। कवि विश्वकेँ एहन उदास बालकक आँखिए लालसापूर्वक देखैत छथि जकरा ओकर इच्छाक अनुरूप घुमबा-फिरबाक अनुमति नहि हो। बाल गीत शैलीमे ओ छोट-छोट कवितादि सेहो लिखलनि जकर विशेषता थिक जे ओ वयस्को द्वारा समान रूपेँ आस्वाद्य अछि। बाल काव्यान्तर्गत ओ विस्तारपूर्वक नाटकीय शैलीमे खिस्सा कहलनि, जकर कथ्य सामान्यतः ग्राह्य अछि। रवीन्द्र बौद्ध साहित्यमे संगृहीत दन्त कथाक माहात्म्य आ नाटकीय मूल्यक प्रति ध्यानाकर्षित कयलनि। एकरा माध्यमे कवि भारतक शानदार चित्रक कल्पना कयलनि जे अज्ञात आ अकर्मण्यताक व्यामोहसँ जागि रहल अछि। ओ शिशु काव्यमे काव्यात्मक कल्पनाक रुझानक संगहि शिशुक विविध प्रसंगकेँ उद्घाटित कयलनि अछि। “गीत वितान”सँ जतेक गीत एवं काव्यक अनूदित रूप पाठकक समक्ष अछि से ओ मुख्यतः गीताञ्जलि (१९१०), गीतमाल्य (१९१४) एवं गीतालि सँ लेल गेल अछि। एकर वैशिष्ट्य अछि जे ओ जतबे मात्रामे कविता अछि ओ ततबे मात्रामे गीत सेहो। वस्तुतः हिनक काव्यमे प्रायः प्रगीत आ गीतक बीचमे कोनो विभाजन रेखा नहि खीचल जा सकैछ। अपन अद्भुत सांगीतिक प्रतिभासँ ओ अपन किछु विस्तृत आ कठिन कवितादिकेँ सफलतापूर्वक संगीतमे बान्हि देने रहथि। एहिमे हुनक भावनात्मक लालसा मुखर आ स्थायी अछि, छन्द अधिक सहज अछि आ बिम्ब विधान उत्कृष्ट। बाङला भाषा भाषी शिशुकेँ शिक्षित करबाक भावनासँ उत्प्रेरित भऽ ईश्वरचन्द्र विद्यासागर (१८२०-१८९१) बाल पाठक शृंखला प्रारम्भ कयने रहथि तकरा अग्रसर करबाक उद्देश्यसँ रवीन्द्र शिशुक मानसिकताक संगहि आकर्षक ढंगसँ दुइ खण्डमे सहजपाठक रचना कयलनि। एहिमे सहज सुबोध वर्णमालाक परिचय अछि जे बच्चा सभक लेल पाठ अछि जे संयुक्ताक्षर विहीन आ संयुक्ताक्षर सहित अछि। रवीन्द्रक उपलब्ध काव्य-धाराक प्रभाव परवर्ती काव्यधारापर अवश्य पड़ल जकर फलस्वरूप अन्यान्य भाषाक शिशु कविता मैथिलीमे अनूदित भेल। किन्तु एहि तथ्यकेँ स्वीकार करबामे कोनो तारतम्य नहि होइछ जे रवीन्द्र जाहि भावधारा, भाषा आ छन्द विन्यास कयलनि ओहि सबपर सम्यक रूपेँ विचार कयलासँ प्रतिभाषित होइछ जे अनुवादक यथार्थतः ओकर मर्मकेँ स्पर्श नहि कऽ पौलनि। अतएव समग्ररूपेँ अनुशीलनोपरान्त कतिपय एहन स्थल अछि जतय अनुवादककेँ मैथिलीक उपयुक्त शब्दावली नहि उपलब्ध भऽ पौलनि ततय ओ एहन-एहन शब्दादिक प्रयोग कयलनि जे ने तँ मैथिलीक थिक आ ने तँ बाङलाक। रवीन्द्र बाल-काव्य एहि विषयक साक्षी थिक जे देशकेँ सबल राष्ट्र बनयबाक उद्देश्यसँ शान्तिनिकेतनक स्थापना कयलनि। मैथिली बाल-काव्य-धाराक मौलिक एवं अनूदित स्वरूपपर विचार कयलापर ई कहल जा सकैछ जे ई एखन शैशवावस्थामे अछि। एहि विधाकेँ एक सुनिश्चित स्वरूप प्रदान करबाक निमित्त वर्तमान सन्दर्भमे प्रयोजनीय अछि जे कविताकार लोकनिकेँ एहि विधाकेँ शैशवावस्थासँ प्रौढ़ावस्थामे अनबाक दिशामे सबल आ सुदृढ़ बनयबाक दिशामे सयत्न प्रयास करबाक प्रयोजन अछि जे ई साहित्यक अन्यान्य विधादिक समकक्ष आबि टक्कर लऽ सकत। एतबा सत्य अछि जे बाल-काव्य शिक्षाप्रद आ साहित्यक प्रति ममत्व जागृत करबाक दिशामे अहं भूमिकाक निर्माण कऽ सकैछ से हमर विश्वास अछि। १.तारानन्द वियोगीक संग अनिल गौतमक वार्तालाप २. साहित्य अकादेमीक विशेष समारोह (१५.११.१०) मे तारानन्द वियोगीक वक्तव्य १ सार्थक बाल साहित्यक प्रसार सं मैथिली कें नवजीवन भेटत तारानन्द वियोगीक संग अनिल गौतमक वार्तालाप अनिल--बाल साहित्यक लेल साहित्य अकादेमी पुरस्कारक लेल अहां कें बधाइ भाइ। हमरा सभक लेल ई बहुत                     खुशीक बात थिक। घोषणा सुनि क' अहां कें केहन लागल? ता.न.वि.--धन्यवाद भाइ। हमरो नीक लागल अछि। एहि तरहें चयन भेने ई आस्था बनल अछि जे हमरा भाषाक नेतृत्वकर्ता लोकनि मे, निर्णायक लोकनि मे गुणग्राहकता अवश्य छनि। ओना तं कही जे हमर साहित्य-लेखनक जे लक्ष्य अछि से बहुत दूरगामी अछि आ पुरस्कार भेटने वा नहि भेटने कोनो बात बनैत वा बिगडैत हो, से बात एकदम्मे नहि अछि। तखन होइ की छै जे अहां अटट्ट दुपहरी मे सोर-फोर कतहु जा रहल होइ आ रस्ता मे कोनो ठाम छांहदार गाछक शीतलता भेटि जाय वा एक लोटा ठंढा जल भेटि जाय, तं नीक तं लागबे करत। दोसर बात ई होइ छै जे बाहर अहांक भने बहुत सम्मान हो मुदा एकटा विडम्बना जरूर बाहरक लोक कें सालैत रहैत छै जे हिनका घरक लोक सब कतेक हृदयहीन छथिन। जे किछु। नीक तं हमरो लागल अछि। अनिल-- अहां कहलियै जे दूरगामी लक्ष्य अछि। की अछि अहांक दूरगामी लक्ष्य? ता.न.वि.--देखू भाइ, कोनो लेखकक जीवन के चरम सार्थकता की थिक? यैह जे ओ अपन भाषा, जाहि मे लेखन करैत अछि, के तागत बढाबए। एहि-एहि प्रकारक नवीन अनुभूति आ अभिव्यक्ति अपन भाषा मे लाबए, जाहि लेल कदाचित ओकर भाषा एखन धरि अक्षम छल, बेगरतूत छल। आ से कोनो तात्कालिकताक हिसाबें नहि। भाषा-साहित्यक अविरल इतिहासक हिसाबें। से भेल मूल बात। दोसर दिस पुरस्कारे कें जं लिय' तं अनेक एहन पुरस्कार अछि जाहि मे अहांक लेखन कें सम्पूर्ण भारतीय भाषा वा सम्पूर्ण विश्वक भाषाक प्रतिस्पर्धा मे राखल जाइत अछि। जेना ज्ञानपीठ वा बुकर आदि। काल्हि धरि मैथिली मे लिखि क' अहां एतए धरि सोचियो नहि सकैत रही। आइ सोचि सकै छी। मुदा, एहि लेल तं असाधारण कोटिक साधना आ अभ्यास चाही कि ने। अनिल--मुदा मैथिली मे की अहां ताहि तरहक माहौल देखै छियै? एतए तं कहांदन डेग-डेग पर गुटबाजी छै। ता.न.वि.--माहौल कें देखबाक हमरा फुरसति हो, तखन ने? हमरा तं अपन काजे सं फुरसति नहि भेटैत अछि। अहां कें प्रायः बूझल हो जे हम नियमित रूप सं तीन-चारि घंटा रोज लेखन करै छी। दोसर दिस, नोकरी एहन अछि, जाहि मे ने तं अल्ली-टल्ली मारि सकै छी, ने एहन हमर प्रवृत्तिये अछि। एखनहु, एहू जुग मे किताब आ पत्रिके पढब हमर मनोरंजनक साधन अछि। साहित्ये सं जीवन भेटैए, साहित्ये सं मनोरंजन। कहि लिय' जे 'उसी से ठंढा, उसी से गरम'। एहना हालति मे, की हम गुट बनाएब आ की हम गुट सभक गतिविधि बूझब। एकटा समय छल, जखन मैथिली मे जखन किछु गलत होइ तं बड जोर सं रिएक्ट करी। ओहुनो हाइपर सेन्सेटिव टाइप के हम आदमी छी। आब मुदा, हम सोचै छी जे गलत के प्रति रिएक्ट केने अहां बहुत किछु नहि क' सकै छी। सही बात ई भेलै जे अहां सही लाइन परअपन काज केने चलू। ओहुना, जं अहां वास्तविक अर्थ मे एक लेखक छी तं अहांक काज सही लाइन पर लेखने करब हेबाक चाही, गलत लेखनक प्रति रिएक्ट करब मात्र नहि। यौ भाइ, अपन लिखलके अन्ततः काज अबै छै। हम तं अपना गाम-घरक परिसर मे सामाजिक-सांस्कृतिक एक्टिविटी मे सेहो लागल रहलहुं अछि। लेकिन, मानै छी जे लेखनक कोनो विकल्प नहि होइ छै। गुटबाजी के जहां धरि बात अछि, तं एहि सम्बन्ध मे हमर विचार सर्वथा भिन्न अछि। गुटबाजी कें हम किन्नहु अधलाह नहि मानै छी। गुट माने की? दू-चारि गोटे एकठाम जुटलहुं-जुडलहुं, सैह ने? एहि लेल तं लाइक माइंड हएब सर्वथा जरूरी छै। एम्हर, अपना ओतक परंपरित संस्कृति की थिक?  हम सब, प्रत्येक व्यक्ति अपने कें सब सं महान, सब सं काबिल मानै छी। एकोऽहम् द्वितीयो नास्ति। एहना स्थिति मे जं दू-चारि गोटे एकठाम बैसथि, विचार-विमर्श करथि आ समाज कें तकर किछुओ आउटपुट भेटैत देखार पडैत हो तं ई तं बहुत नीक बात भेलै। हमरा जं परिभाषा करए कहब तं हम तं गुटबाजीक यैह परिभाषा करब। मुदा, एहि तरहक गुटबाजी कतहु होइत हो मैथिली-परिसर मे, से तं हमरा देखार नहि पडैत अछि। तखन बचल बात-- खिधांस आ कुटिचालि के,तं तकर तं कोनो व्याकरण नहि हो। की एसगर आ की झुंड बना क"। तकर उद्देश्य की तं सृजनात्मक काजक विरोध करब। हम हिनका सभक परबाहि नहि करैत छी। जं परबाहि करितहुं तं आइ महिषी गाम मे हरबाही करैत रहितहुं। अहूं सब कें कहै छी जे हिनका सभक परबाहि नहि करी। अपन भाषा मे किछु वरेण्य साहित्यकार सब भेलाह अछि, जनिकर सान्ध्य-गोष्ठी बहुत नामी अछि आ बहुत फलप्रद भेल अछि। जेना सुमन जीक सान्ध्य-गोष्ठी। एखनहु जं कतहु एहन होइत हो, एहि सं रचनात्मक, सार्थक आउटपुट बहराइत हो,एहि सं समाज मे मिलि-बैसि क' किछु सोचबाक-करबाक (सह वीर्यं करवावहै) उत्साह भेटैत हो, तं हम तकर स्वागत करै छी। अनिल-- अहां कें बाल साहित्यकारक रूप मे पुरस्कृत कएल गेल, जखन कि अहां मूलतः बाल साहित्यकार नहि, एक गंभीर सृजनात्मक लेखक छी। अहां कें तं साहित्य अकादेमी पुरस्कार भेटबाक चाहैत छल। ई बात अहां कें नहि अखडल? ता.न.वि.-- यौ भाइ, हम बाल साहित्यकार छी, एहि बात सं सदैव अपना कें गौरवान्वित अनुभव करैत छी। सार्थक बाल साहित्यक सृजन एक असाधारण बात थिक, से कृपया मोन राखू। (हंसैत) ओना तं हम बहुत किछु छी। एकटा खिस्सा कहै छी। एक कार्यक्रम मे रांची गेल रही। ओतए डा० धनाकर ठाकुर सं परिचय भेल। पहिले भेंट छल। ठाकुर जी हमर नाम पुछलनि। हम कहलियनि--तारानन्द वियोगी। ओ कहए लगलाह--'यौ, मैथिली मे तं कहांदन कैक टा तारानन्द वियोगी छथि। एकटा छथि जे मिथिलाक धरोहर सब पर काज करै छथि। एकटा आर छथि जे सदरि काल 'दलित-दलित' करैत रहै छथि।  आ  एकटा छथि जे बड सुन्दर कविता-कथा-आलोचना सब लिखै छथि। एहि मे सं अहां कोन तारनन्द वियोगी छी?' तं, से सैह बात। बात पुछलहुं अखडै के। किए अखडत? हम साफ करै छी जे अखडैत नहि अछि। तकर कारण अछि। अहां भने कतबो नीक लेखन करैत होइ, ओकर परखबाक जखन बात अबै छै तं ओहि मे रुचि-भिन्नता एक महत्वपूर्ण कारक बनैत अछि। अहां कें जं हमर लेखन पसिन्न नहि पडल, तं एकर मतलब छै जे ओ अहांक लेल नहि लिखल गेल अछि। रुचि-भिन्नताक कारण ओ अहां कें नहि पसिन्न पडल। मुदा, तै दुआरे हम दुखी होइ वा हमरा अखडए, तकर हम कोनो कारण नहि देखै छी। हमर तं सोच अछि जे लेखक कें एतबा इमान्दार हेबाक चाही जे जं ओकरा बेइंसाफीक संग वा साहित्येतर कारण सं पुरस्कृत कएल जा रहल हो, तं ओकरा पुरस्कार कें ठुकरा देबाक चाही। अहां कें प्रायः बूझल हो जे चेतना समिति, पटना जखन हमरा 'महेश पुरस्कार' देने छल, तं समुचित रूप सं तकर कारण बतबैत हम ओहि पुरस्कार कें स्वीकार करबा सं इनकार क' देने छलियनि। अनिल- मुदा भाइ, सुनबा मे आएल अछि जे फाइनल राउन्ड मे प्रसिद्ध लेखक लोकनिक मोट-मोट किताब सब प्रतिस्पर्धा मे छलै। तकरा सभक बदला अहांक एक पातर-सन पोथी कें पुरस्कारक लेल चुनि लेल गेल। ई बात जरूर जे निर्णय सर्वसम्मति सं भेलै। मुदा की एकरा अहां बेइंसाफी नहि मानै छियै? ता.न.वि.- क्षमा करब भाइ। जं अहां मोट-मोट पोथी आ छोट-छीन-पातर पोथीक आधार पर बाल साहित्य कें बुझबाक दाबी करै छियै तं हम साफ कहब जे बाल साहित्य कें अहां साफे नहि बुझै छियै। ओ बच्चाक लेल लिखल गेलैए ने यौ। सेहो कोन बच्चाक लेल? मिडिल स्कूल मे पढनिहार छठा-सतमाक बच्चाक लेल। सुनियोजित ओकर फारमेट छै। ओकर अपन टारगेट ग्रुप छै। एक दिस अहां कहै छियै जे बच्चाक स्कूल बैग कें हल्लुक करब अपना सभक राष्ट्रीय आवश्यकता छै, आ दोसर दिस, ओकर मनोरंजन आ प्रेरण लेल मोट-मोट पोथीक जरूरति देखैत छिऐक, तं ई तं उचित बात नहि भेलै। मुदा तैयो, अहांक जानकारी लेल कहि दी जे बाल साहित्य-कृतिक लेल जे अन्तर्राष्ट्रीय मानदंड छै, ताहि पर ई पोथी दुरुस्त उतरल अछि। मैथिली मे आई.एस.बी.एन. नंबरक संग कम पोथी छपल अछि। सेहो नंबर एकरा भेटल छै। असल मे, मोट-पातरक आधार पर बाल साहित्यक मूल्यांकने नहि कएल जा सकैए। मूल बात छै जे ओकर विषय-वस्तु, आजुक बच्चा लेल, आजुक जुगक चैलेंज के सन्दर्भ मे, कतेक उपयोगी छै। कतेक प्रासंगिक छै। दोसर जे ओकर भाषा आ शिल्प टारगेट ग्रुपक बच्चाक लेल कतेक सम्प्रेषणीय छै। ई नहि ने हेतै जे अहां लिखबै बच्चाक लेल, आ बिम्ब आ प्रतीक आ कथन-भंगिमा राखबै निज अप्पन। परकाया-प्रवेश तं अहां कें करैए पडत। अनिल- मुदा अहां उपनिषद-कथा पर लिखलियै-ए। की एकरा प्रासंगिक कहल जेतै? की ई मौलिक कृति भेलै? ता.न.वि.--मौलिक कृति तं  ई १००  प्रतिशत भेल। कारण, उपनिषदक कोनो कथाक ई अनुवाद नहि थिक। अहां एक सय आठ उपनिषद उनटा लिय'। कत्तहु एक ठाम ई कथा अहां कें अविकल नहि भेटत।  असल मे ई शब्द द्वारा ओहि युगक पुनर्सृजन थिक। उद्देश्य अछि- सकारात्मक जीवन-प्रणाली कें बच्चाक सामने उद्घाटित करब। ओहि युगक लोक कोन तरहें सोचै-बिचारै छला, केहन हुनकर जीवन-प्रणाली छलनि, आपसी सम्बन्ध आ पर्यावरणक प्रति हुनकर कतेक सकारात्मक नजरिया छलनि, जीवन मे प्राथमिकताक निर्धारण कोन तरहें करी एहि सम्बन्ध हुनका लोकनिक तरीका छलनि, आदि-आदि अनेको विन्दु सभक पुनर्सृजन ई कथा-पुस्तक थिक। मजेदार बात ई छै जे एहि पोथीक जे प्रेरण-तत्त्व छै से एकर बाल-पाठक कें अलग सं कतहु देखारे नहि पडत। दोसर बात छे जे एहि समस्त कथा-वस्तु कें अत्यन्त मनलग्गू ढंग सं गूथल गेलै-ए। एहि किताबक योजना हम एना कए बनौने रही जे हमर अधिकांश बाल पाठक एकरा दू-तीन सिटिंग मे पढि जाथि। मुदा, बाद मे पता लागल जे बेसी पाठक तं एक्के सिटिंग मे पढि गेलाह अछि। प्रासंगिकताक जहां धरि सवाल अछि, हम तं देखै छी जे आजुक एहि उपभोक्तावादी व्यक्तिवादी कठमुल्लावादी समय मे एहि तरहक सोच राख' बला कृतिक बहुते महत्व छै। ततबे बेसी प्रासंगिकता छै। असल मे, अपना ओतए, मिथिला मे, शुरुहे सं ई चलन रहलै-ए जे उपजीव्य ग्रन्थ तकबाक हो तं रामायण मे ढुकू अथवा महाभारत मे। बड बेसी भेल तं भागवत मे। हम बेबाक भ' क' कह' चाहै छी जे आजुक युगक चुनौती सभक सन्दर्भ मे उपनिषद, जातक-कथा, त्रिपिटक साहित्य आदि बेसी उपयोगी आ प्रासंगिक  अछि। महाभारत  मे वन कें जराओल जाइ छै जखन कि उपनिषद मे वनक संग मैत्री कएल जाइ छै। अहां कें की चाही? अहांक युगक बच्चा वनक प्रति की रुख अपनाबय? की ओकरा संस्कार मे अहां देब' चाहै छियै? सोचियौ। अनिल-- बहुत अनमोल बात कहलियै भाइ। एही तरहें सोचबाक चाही। बाल साहित्य कें ल' क' आगुओ अहांक कोनो योजना अछि? ता.न.वि.--बहुतो योजना अछि। असल मे, बाल साहित्य पर हम सांस्थानिक ढंग सं काज करए चाहै छी। हमरा स्पष्ट लगैत अछि जे आगू जे मैथिली जीयत आ बढत तं ताहि मे बाल साहित्यक बहुत पैघ भूमिका हेतै।एकर प्रसार मैथिली मे नवजीवन भरि देत। मधुबनी मे जखन हमर पोस्टिंग छल तं अनेक तेजस्वी युवा लोकनिक संग हमर मित्रता भेल। एहि मे वशिष्ठ  (ऋषि वशिष्ठ) छला महाकान्त ठाकुर आ प्रकाश झा छला। किशोरनाथ, सुधीर कुमार मिश्र,  राकेश कुमार मिश्र, रघुनाथ मुखिया--ई सब गोटे हमरा टीम मे रहथि। हम सब एक सुचिन्तित योजनाक तहत बाल साहित्यक लेखन, प्रकाशन आ वितरणक काज एकदम संस्थागत तरीका सं करब शुरू केलहुं। एक हजार प्रति किताबक संस्करण छपए। टीमक सदस्य लोकनि एकरा स्कूले स्कूल जा क' बेचि आबथि। सही हाथ धरि पोथी पहुंचि जाए। एक बच्चा जं पोथी कीनए तं ओकर परिवारक सदस्य आ अडोसिया-पडोसिया मिला क' पन्द्रह-बीस पाठक हमरा लोकनि कें भेटि जाथि। हम युवक मित्र लोकनि कें लेखन मे आगां केने छलियनि। हम तं बुझू पाछू लागल लिख' लगलहुं। एखनहु वशिष्ठ महाकान्त आ हुनक टीमक सदस्य लोकनि एहि काज कें आगू बढा रहल छथि। हम अपनहु एहि योजना कें जारी रखबाक लेल प्रतिश्रुत छी। लेखन अपन ठाम पर अछि,तकर महत्व सर्वोपरि छै,मुदा एक्टीविज्म के सेहो बहुत बेगरता छै। हम जकरा लेल लिखी तकरा धरि जं पहुंचय, तं एहि सं बढि क' आनन्द नहि हो। अनिल-- हम प्रश्न करए चाहैत रही जे लेखन कें ल' क' की सब योजना अछि? ता.न.वि.-- एकटा तं हमर योजना अछि जे 'मिथिला' सं बच्चाक आत्मीय परिचयक लेल एक पुस्तक-माला तैयार करी। उद्देश्य जे भावी पीढीक भीतर अपन देस-कोसक प्रति अनुराग जाग्रत करए। मिथिलाक गौरवशाली इतिहास, एकर नायक, एकर सांस्कृतिक सौरभ, एकर जीवन-पद्धति---एहि समस्त चीज पर। खास बात ई जे सब टा प्रकरण कथात्मक हेतै आ से तते मनलग्गू जे हमर बालपाठक ओकरा दू-तीन सिटिंग मे पूरा पढि जाथि। उद्देश्य एकैसम शताब्दीक सुपुरुष मैथिल तैयार करब। मात्र अतीत-गान नहि, ओहि मे सकारात्मक तत्वक खोज, आडेन्टिटीक खोज---जे आब' बला युग मे हुनका जीवनक काज आबि सकए। एकटा पोथी हम, एम्हर तैयार केलहुं-ए गोनू झा पर। छुच्छ हंसी-ठट्ठाक लेल गोनू झाक खिस्सा के अनेक पोथी पहिनहि सं प्रकाशित छै। मुदा, ओहि सब मे गोनू झाक कोनो व्यक्तित्व ठाढ करबाक कोशिश नहि भेल अछि, मिथिलाक एहि नायकक चरित्र नहि गढल जा सकल अछि। असल बात छै जे हमरा समक्ष कोनो चीज स्पष्ट रहत तखने ने हम अपन साहित्य द्वारा ओकरा पुनर्सृजित करबाक चेष्टा करब। एहि तरहक एक पोथी हम गोनू झा पर लिखनहु छी, जे नेशनल बुक ट्रस्ट सं प्रकाशित छै। मुदा, ओहि सं हम सन्तुष्ट नहि छी। उदात्त मैथिल मानुसक रूप गोनू झाक व्यक्तित्व ठाढ करबाक लेल जे औपन्यासिक कलेवर चाही, से अहां कें हमर अगिला किताब मे भेटत। तहिना, लोक साहित्य, संस्कृत वाङ्मय,त्रिपिटक साहित्य--एहि सब मे अनेक मजेदार आ अति प्रासंगिक वाकया सब आएल अछि। इच्छा अछि जे तकरा सब कें बच्चाक लेल प्रस्तुत करी। एहि समस्त योजना सभक मूल्यगत उद्देश्य यैह जे अपन बाल पाठक मे हम विज्ञान-बुद्धि, लोकतांत्रिक संस्कृति,  पर्यावरणक प्रति संवेदनशीलता, आ अपन आइडेन्टिटीक प्रति आत्मतोष देखए चाहै छी। अनिल-- एहन बहुमूल्य वार्तालापक लेल भाइ, अहां कें धन्यवाद। ता.न.वि.-- अहूं कें धन्यवाद। २. तारानन्द वियोगी सन्दर्भ : साहित्य अकादेमीक बाल साहित्य पुरस्कार साहित्य अकादेमीक विशेष समारोह (१५.११.१०) मे तारानन्द वियोगीक वक्तव्य आदरणीय अध्यक्ष महोदय आ मित्र लोकनि, साहित्य अकादेमीक एहि विशेष समारोह मे हम सब गोटे आइ, एतए एकत्र भेलहुं अछि। भारतीय साहित्यक जीवन्त-जागन्त उपवन एतए मौजूद अछि, जाहि मे किसिम-किसिम के, रंग-बिरंग के फूल फुलाएल अछि। गुरुदेव रवीन्द्रनाथ कहल करथि जे हमर भारत माता बीसो-पचीसो भाषा मे बजैत छथि। से ठीके, ओहि भारत माता कें एतए जीवन्त अनुभव कएल जा सकैत अछि। एहन महत्वशाली अवसर पर हम अपना कें एतए, अहां सभक बीच पाबि क' गौरवान्वित अनुभव क' रहल छी। हम साहित्य अकादेमी कें, हमर मैथिली भाषाक प्रतिनिधि कें, हुनकर सहयोगी लोकनि कें हृदय सं धन्यवाद दैत छियनि। हमरा सं अनुरोध कएल गेल अछि जे एहि अवसर पर हम अपन किछु अनुभव, किछु चिन्ता अपने लोकनिक बीच शेयर करी। ई जरूरियो बहुत अछि। हमरा लोकनिक भारतीय साहित्य आइ जाहि दौर सं गुजरि रहल अछि, जे संकट आ चुनौती आइ एकरा सामने विद्यमान छै, तकरा अकानैत तं ई आरो बेसी जरूरी अछि। बन्धु, हम कोशी क्षेत्रक बसिन्दा छी। अहां सब कें साइत बूझल हो जे कोशी बहुत विकराल, बहुत मनमौजी नदी छैक। ठाम-ठाम एहि नदी पर बान्ह बान्हल गेल छै। अक्सरहां एहन होइ छै जे नदी बान्ह तोडि दैत अछि। पानिक भयावह रेला बहि चलैत अछि। लोक जहां-तहां फंसि जाइत छथि। सरकारी-गैर सरकारी एजेन्सी सब तं बाद मे पहुंचैए, पहिने तं ई होइ छै जे लोक आपस मे मिलि-जुलि क' अपन मदद करै छथि, एक दोसरक जान बचबैत छथि। कोशीक विकराल रेती मे जं क्यो एसकर पडि जाय तं ओकर जान बचब कठिन होइत छैक। एहना स्थिति मे लोक की करै छथि जे एक-दोसरक हाथ मे हाथ ध' क' मानव-शृंखला बना लैत छथि, टेकक लेल दोसर हाथ मे लाठी ल' लैत छथि, आ एहि तरहें सुरक्षित स्थान धरि पहुंचि जाइत छथि। सब गोटे साइत अनुभव करैत हएब जे आइ हमहूं सब क्यो एहने परिस्थिति सं गुजरि रहल छी। भूमण्डलीकरणक एहि दौर मे छोट-छोट भाषा सभक नित्तह मृत्यु भ' रहल छै। साहित्य कें निरन्तर अप्रासंगिक करार देल जा रहल अछि। भावाभिव्यक्ति मे एक जाहिल प्रकारक उथ्थरपनी चारू दिस देखार पडि रहल छै। एत्तेक तेजी सं दुनियां रोज-रोज बदलि रहल अछि जे युग आ काल सं सम्बन्धित हमरा सभक परंपरित अवधारणा कतोक बेर धोखा करैत प्रतीत होइत अछि। ई तं भेल मुदा एक पहलू। दोसर दिस हम सब इहो  पाबि रहल छी जे हमर जे पीढी युवा भ' क' आइ दुनियांक मुकाबला करैक लेल तैयार भ' रहल अछि,  ताहि पीढी मे अपन आइडेन्टिटी, अपन अस्मिता कें ल' क' एक सात्विक तडप सेहो साफे देखाइत अछि। एक व्यापक आ परिपूर्ण भारतीयताक समझ ओकर सभक आत्माक मांग बनि रहल छै। तं, एहि तरहें, ई एक एहन समय थिक जे बूझि लिय'--थोडे खट्टो अछि, थोडे मिट्ठो अछि। चुनौती हमरा सभक सामने ई अछि जे एहना परिस्थिति मे हम सब, आ हमरा सभक साहित्य एहि पीढीक, आब' बला पीढीक कोन काज आबि सकैत अछि? एकटा जबाना रहए कि जहिया बडका-बडका लोक छोट-छोट बच्चाक लेल लिखब गौरवक बात बूझथि। सेहो जबाना आब बीति चुकल अछि। एहन हाल मे, एक तं हम बुझै छी जे संग-संग मिलि-जुलि क' लगातार काज करबाक  प्रयोजन छै, दोसर युग के चुनौती कें एहि तरहें स्वीकार करब सेहो जरूरी छै जे आगू आब' बला पीढी हमरा सब पर ई दोख नहि लगाबए जे जखन रोम जरि रहल छल तं नीरो बंसुरी बजा रहल छल। भाइ लोकनि, अहां अधला नहि मानब, एहि तरहें हम सोचै छी तं घटाटोप अन्हार राति मे बिजलौकाक चमक सन जे चीज हमरा देखाब दैत अछि, से थिक--बाल साहित्य। सार्थक ढंग सं लिखल बाल साहित्ये ई काज क' सकैत अछि जे आब' बला पीढीक लेल साहित्यो एक प्रासंगिक चीज, ओकरा सभक जीवनक काज आब' बला चीज बनि क' रहि सकय। आब' बला युगक अनुभूति-संस्कार कें ई परिमार्जित क' सकैत अछि। भावाभिव्यक्तिक उथ्थरपनीक बदला एक स्थैर्य, एक गहराइ कें ओकर जीवन-शैलीक अंग बना सकैत अछि। भूमंडीक एहि बजारक जीवन-पद्धति अछि--द्विआयामी, जाहि मे बस वस्तु अछि आ क्रिया अछि।  त्रिआयामी जीवन-पद्धति, जाहि मे वस्तु आ क्रियाक संग-संग चिन्तन सेहो हो, तकर विकास बाल साहित्य क' सकैत अछि। हमरा तं लगैत अछि जे ठीक ढंग सं लिखल गेल बाल साहित्यक प्रसार छोट-छोट भाषा सभक मृत्यु-दर कें कम क' सकैत अछि आ हमरा सभक उखडैत पएर कें एक ताजगी-भरल मजगूती प्रदान क' सकैत अछि। जे चिन्ता आइ हमर अछि, हमर ख्याल अछि जे ई अहूं सभक चिन्ता अछि, सौंसे देशक, सौंसे दुनियांक चिन्ता अछि। एहना मे हम बहुत आभारक संग साहित्य अकादेमी कें आ संस्कृति मंत्रालय कें धन्यवाद दैत छी जे भारतीय भाषा सभ मे बाल साहित्यक विकास हेतु ओ लोकनि नव तरहें सोचब शुरू केने छथि। लगधग चारि साल भेल, जे एही चिन्ता सब सं जूझैत हम, अपन भाषा मैथिली मे, एहि दिशा मे किछु काज करबाक शुरुआत केने रही।  मैथिली मे बाल साहित्यक स्थिति अत्यन्त दुर्बल अछि। दोसर बात इहो छै जे हमरा ओतय, मैथिली-प्रकाशनक सम्बन्ध मे ई कहबी बहुत प्रचलित छै जे लेखकक छपाओल किताब बिकैत नहि अछि आ पाठक कें ओकर पसन्दक किताब भैटैत नहि अछि। हम सब किछु नव तरहें समाधान तकबाक कोसिस केलहुं। युवा लेखक आ साहित्य-कर्मी लोकनिक हम सब टीम बनेलहुं। बाल साहित्य पर गम्भीरताक संग काज शुरू कएल। सतमा-अठमा क्लासक बच्चा कें हम सब टारगेट केलहुं। विषय एहन-एहन चुनलहुं जे एकैसम सदी मे वयस्क होब' बला हमर बालपाठकक जीवनक काज आबि सकय। उपजीव्यो ग्रन्थ जं चुनबाक हो, तैयो हम सब लीक सं हंटि क' चलबाक मन बनाओल। हमरा ओतय दुइये टा उपजीव्य मुख्यतः चलन मे रहल अछि--रामायण आ महाभारत। हम सब उपनिषद कें पकडलहुं, जातक कथा कें पकडलहुं। मिथिला मे लोककथा, लोकगाथा आ लोक-किम्वदन्ती सभक विशाल भंडार एखनो श्रुति-परम्परा मे विद्यमान अछि। हम सब ओकरा पकडलहुं। अहां देखबै जे महाभारत मे जंगल कें जराओल जाइ छै, जखन कि उपनिषद मे जंगल-संग दोस्ती कएल जाइ छै। प्रश्न अछि जे आइ हमरा की चाही? आ, किताब कें फारमेट सेहो हम सब किछु अलग तरीका सं केलहुं।  भाषा, अभिव्यक्ति-शैली,कथन-भंगिमा--एहि सभक प्रति सेहो हम सब बहुत सजग रहलहुं।  लोक-किम्वदन्तिये सभक पुनर्सृजन करैत हमर महाकवि विद्यापति कहियो 'सुपुरुष' के अवधारणा प्रस्तुत केने छला। हमरा सभक लक्ष्य भेल--'सु-मानुस', जाहि मे सुपुरुषक संग-संग 'सु-नारी' सेहो सम्मिलित अछि।हमरा सभक ई 'सु-मानुस' एक्कहि संग जतबा मैथिल छथि, ततबे भारतीय आ ठीक-ठीक ततबे वैश्विक। मुदा, हम सब इहो अनुभव केलहुं जे ई काज जं भ' सकैए तं अपन मातृभाषाहिक माध्यमें। जाहि भाषा मे बच्चा अपन माय-संग गप करैए, अपन दादी-नानी सं खिस्सा-कहानी सुनैए, ठीक ताही भाषाक माध्यमें ओकरा दुनियां-जहान मे प्रवेश करए देबाक चाही। साहित्यक द्वारा 'सु-मानुस' के विकासक साइत ई अनिवार्य प्रक्रिया थिक। हमरा बच्चाक लेल ओकर सर्वश्रेष्ठ साहित्य अनिवार्यतः ओकरा मातृभाषे मे लिखल जा सकैत अछि। ई सब करबाक कोसिस हमरा लोकनि कएल। हमरा टीमक युवा साहित्य-कर्मी लोकनि मिड्ल स्कूल, हाइ स्कूल मे पहुंचथि आ सस्त संस्करण बला ई पोथी सब प्रत्यक्षतः अपन पाठक सब कें सौंपि आबथि। जाहि घर मे पोथीक एक प्रति पहुंचय, परिवारी-जन आ अडोसी-पडोसी मिला क' औसतन पन्द्रह-बीस पाठक हमरा सब कें भेटि जाथि। बन्धुगण, अहां सब कें लागि रहल हएत जे हम विषयान्तर भ' रहल छी। अहां कहि सकै छी जे साहित्यकारक काज लिखब थिक। एतेक तूर धुनब साहित्यकारक क्षेत्र सं बाहरक बात थिक। ई तं शुद्ध एक्टीविज्म भेल। मुदा, विश्वास करू। हमहूं मूलतः एक साहित्यकारे छी। सृजन करबाक लेल सघन एकान्त हमरो चाहबे करी। किन्तु, अपन अनुभवक बात कहै छी--साहित्यक संग निरन्तर जीबैत कहियो एहनो स्थिति बनै छै जे अहां कें टीम बनेबाक खगता होइए। ओना तं अहां अदृश्य पाठकक लेल लिखै छी मुदा कहियो एहन मोड आबै छै जखन अहां कें अपन पाठक कें दृश्यमान करबाक बेगरता होइए। हमरा लागल अछि जे एहन मोड पर 'साहित्यकार' आ 'साहित्य-कर्मी' के फरक मेटा जाइ छै। मित्र लोकनि, हमरा सभक विडम्बना तं अथाह अछि। उत्तर आधुनिकताक एहि दौर मे आइ जखन हमरा सभक मध्यवर्गीय लोक अपन अस्मिताक प्रति साकांक्ष भेलाह अछि, तं अपन जडि सं, अपन भाषा सं जुड' चाहैत छथि। एम्हर संकट ई अछि जे दुनियां भरि के बात हुनका बूझल छनि, मुदा अपन मातृभाषा पढब नहि जनैत छथि। एक दौर छल, जखन मातृभाषा कें अयोग्य मानि क' ई लोकनि ओकर उपेक्षा केलनि। हिनका सभक सोचब रहनि जे मातृभाषा कें पकडि क' रहब विकास-विरोधी थिक। मोन पाडू जे एही तरहक मनोवृत्ति बला लोक सब, दुनियां भरि मे, अपन-अपन मातृभाषा कें उजाडलनि। मुदा, आइ ई लोकनि आइडेन्टिटी तकैत छथि आ अपन मातृभाषा-संग जुड' चाहैत छथि। हम सब जे लिखै छी से तं असल मे हिनका सभक धियापुताक लेल लिखै छी। मुदा, बच्चाक लेल लिखल ई पोथी सब जखन हमर ई बन्धु लोकनि पढैत छथि तं अपनो मातृभाषा पढबाक हुनर सिखैत छथि। हमरा सब कें तं बुझू दुगूना खुशी भेटैए। भविष्य कें ठीक करबाक प्रयास मे वर्तमानो ठीक होइत जाइए। ई बाल साहित्य क' रहल अछि। बाल साहित्ये ई कइयो सकैत अछि। एखने हम कहने छलहुं जे मैथिली मे बाल साहित्यक स्थिति दुर्बल अछि। मुदा हम साफ करए चाहब जे ई दुर्बलता निज आजुक समयक यथार्थ थिक। अतीत मे ई हालति नहि रहए। साठिक दशकक समय, ओ काल छल, जखन हमर बडका-बडका साहित्यकार लोकनि छोट-छोट बच्चाक लेल लिखलनि। यात्री नागार्जुन लिखलनि। राजकमल चौधरी लिखलनि। मैथिली मे सब सं सुन्दर बालकथा सब जकरा कहबै, से ओही पीढीक लिली रेक लिखल छनि। ओहि दिन मे बडका घरानाक पत्रिका 'मिथिला मिहिर' मे तं बाल साहित्यक लेल स्थायी स्तम्भ होइते छल, बच्चा सभक लेल अलग सं पत्रिका सेहो प्रकाशित होइत रहए। 'बटुक, आ 'धियापुता'क अपन उज्ज्वल इतिहास छैक।  मुदा, ई सब तहियाक बात थिक, जहिया मिथिला-क्षेत्रक साक्षरता-दर मात्र एकैस प्रतिशत रहैक। आइ साक्षरता अडतालिस प्रतिशत अछि। साक्षरताक ई बढल प्रतिशत ओहि परिवार सभक कथा सेहो कहैत अछि, जकरा खान्दान मे पहिल बेर अक्षरक इजोत जरल, पहिल बच्चा जन्म लेलक जे 'अ आ क ख' लिखब-पढब सिखलक। लोक साथ अबैत गेला, कारवां बनैत गेलैक। मुदा, बच्चाक लेल लिखै बला लोक सब अलोपित भ' गेला। बच्चा सभक पत्रिका बन्द भ' गेलै। आन पत्रिका सब मे सं बाल साहित्यक कालम हंटा देल गेलै। गाम-घर मे टी.वी. पहुंचल आ हमर एहि होनहार सब कें इल्मी-फिल्मी लुच्चा सब हथिया लेलक। एकर कारण सब निकाल' लगबै तं बहुतो कारण निकलतै। मुदा, एतबा तं साफ अछि जे हमरा लोकनि छोडि देलियै तं क्यो आन हथियौलक। आइ जखन आरो अधिक लोकक जरूरति रहै, आरो बेसी तत्परताक संग काज करबाक खगता रहै, बाल साहित्यक मैदान खाली अछि। हम बडका-बडका लेखक लोकनि बडका-बडका बात लिखै छी आ दुखी होइत रहै छी जे हमर बात क्यो नहि सुनैए। के सुनत? जे सुनत, तकर निर्माणक वास्ते हम की क' रहल छी? आ, सांच पूछी तं हमरा सभक टारगेट  एही परिवारक बच्चा थिक भाइ, जाहि मे अक्षरक इजोत पहिल बेर बरलैए। बन्धुगण, एतेक बात एही लेल कहलहुं जे अपना सभक सुख आ दुख दुनू साझी अछि आ अहां सब कें सामने पाबि सुख-दुख बतियेबाक एक अवसर हमरा भेटल। एहि अवसरक लेल पुनः धन्यवाद। हमर अपन भाषाक कर्णधार लोकनि कें, अपन टीमक युवा साहित्य-कर्मी लोकनि कें सेहो धन्यवाद। आ, एतेक ध्यानपूर्वक अहां सब हमरा सुनलहुं, ताहि लेल तं बहुते धन्यवाद। जगदीश प्रसाद मंडल कथा- दोहरी मारि‍ दस सालसँ डायवीटीज आ साढ़े-सात सालसँ ब्‍लड-पेसरक शि‍कार सरसठि‍म सालक प्रोफेसर गुलाब पाँच साल पहि‍ने कओलेजसँ सेवा-नि‍वृत भेल छलाह। सूर्यास्‍तक समए, सोफापर आेंगठि‍ पाँचो आलमारीक पोथीमे नजरि‍ खि‍ड़बैत रहथि‍। पत्‍नी -लालमनि‍- चाह नेने कोठरीक मुँह टपि‍ते छलीह कि‍ भुख दऽ मड़कड़ी बरि‍ उठल। ओना अन्‍हारक आक्रमण तहि‍ रूपे नहि‍ भेल छलैक मुदा कीड़ी-फतींगि‍क आवाहन बाहरसँ घर (कोठरी) दि‍स हुअए लगल छलैक। टूटल अगि‍ला दाँतक मुँहसँ मुस्‍की दैत लालमनि‍ पति‍ दि‍स बढ़ि‍ कप बढ़बैत बजलीह- “कॉफी सठि‍ गेल छलै। पहि‍लुके चाह पत्ती घरमे छलै सएह बनेलहुँ। मुदा चाहक गंध कोनादन लागल।‍” पत्‍नीक बात सुनि‍ गुलाबक मन अमता गेलनि‍। मुदा जहि‍ना पाकल अमतीक खट-मधुर सुआद होइत तहि‍ना प्रोफेसर गुलाब अपन चौहुक टूटल मुँहसँ मुस्‍कि‍आ देलनि‍। मुदा मन कलपि‍ उठलनि‍। एहेन समए भऽ गेल जे एक कप चाहो पर.....। ठीके बूढ़-बुढ़ाहनुसक कहब छनि‍- “करनी देखब मरनी बेर।‍” पत्‍नीक हाथसँ कप पकड़ि‍ मुँहमे लगौलनि‍। मुँहमे चाह अवि‍तहि‍ ठोर बि‍जैक गेलनि‍। हाँइ-हाँइ कऽ चाह तँ घोटि‍ गेलाह मुदा जाकरी पत्तीक सुआद मनकेँ हौड़ि‍ देलकनि‍। चाहक कप टेबुलपर रखि‍ उठि‍ कऽ ठाढ़ होइते रहथि‍ कि‍ आकि बुझि‍ पड़लनि‍ जे उल्‍टी हएत। दुनू हाथसँ छाती दाबि‍ पुन: सोफापर बैसि‍ गेलाह। चौसठि‍ बर्षीय लालमनि‍ गैस्‍टि‍कसँ आक्रान्‍त। पेटक गैससँ मन अस-बि‍स करैत। जोरसँ ढकार भेलनि‍। मन हल्‍लुक होइते पति‍क पीठ ससारए लगलीह। रसे-रसे प्रोफेसर गुलाबक मन खनहन हुअए लगलनि‍। मन खनहन होइते पत्‍नीकेँ पुछलखि‍न- “मन बेसी गड़बड़ ते ने अछि‍।‍” दुनि‍याँक रागसँ ऊपर उठि‍ लालमनि‍ चहकि‍ उठलीह- “की गड़बड़ आ कि‍ नीक, कोनो कि‍ तेहैया बोखार छी जे तीन दि‍न जाइते चलि‍ जाएत। नि‍रकटौबलि‍ भऽ कऽ छुटि‍ जाएत। गोटीक चाह करै-ए। जाइ छी एकटा गोटी खा लेब, ठीक भऽ जाएत।‍” कहि‍ लालमनि‍ दोसर काठरीक रास्‍ता धेलनि‍। प्रोफेसर गुलाबक नजरि‍ चाहक कपपर गेलनि‍। मुदा चाहक कपपर नजरि‍ नहि‍ अटकि‍ पोथीक आलमाड़ीपर पहुँच गेलनि‍। अखनक जे जि‍नगी अछि‍ ओ आइधरि‍ कि‍अए ने बुझलौं? जँ अपने नहि‍ बुझलौं तँ जि‍नगी भरि‍ पढ़ौलि‍ऐ की? आकि‍ दि‍मक बनि‍ पोथीकेँ माटि‍ बनौलि‍ऐ? तहि‍ बीच ब्‍लड पेसरक जोर पबि‍तहि‍ गरजलाह- “एकटा गोटी खाइमे कते देरी लगै-ए।‍” पति‍क बात सुनि‍ लालमनि‍ बुझि‍ गेलीह जे ब्‍लड पेसरक झोंक छि‍अनि‍। धड़फड़ाइते कोठरीमे आबि‍ मुस्‍की दैत आलमारीसँ गोटी नि‍कालए बढ़लीह। गोटी नि‍कालि‍, गि‍लासमे जगसँ पानि‍ लऽ पति‍क हाथकेँ दइते रहथि‍ आकि‍ सि‍रमाक बगलमे मोबाइल टनटनाएल। हाँइ-हाँइ कऽ गोटी मुँहमे दैत पानि‍ गुलगुलबैत मोबाइलपर हाथ बढ़ौलनि‍। मोबाइल उठा नम्‍बर देखलनि‍। लीलाकान्‍तक (बेटाक) देखि‍ पत्‍नी दि‍स मोबाइल बढ़बैत बजलाह- “ननुगर बेटाक फोन छी। लि‍अ....।‍” कहि‍ प्रोफेसर गुलाब अपनाकेँ बेटा रूपमे देखलनि‍। मन पड़लनि‍ माए-बाप। कि‍ जि‍नगी छल कि‍ आइ अछि‍। जाधरि‍ पि‍ता जीबैत छलाह परोपट्टाक कि‍सानक समाज रूपी समुद्रमे बसल छलाह। माल-जालसँ लऽ कऽ बीआ-बालि‍ धरि‍क कारोवार छलनि‍। लेब-देब छलनि‍। सोझे लेब-लेब नहि‍ छलनि‍। लेब-लेबसँ बेसी देब-देब छलनि‍। खीरा-झि‍ंगुनी आकि‍ नव कोनो अन्न-फल-फलहरी होय, बीआक मूल्‍य कहाँ लइ छेलखि‍न। मुदा हमरा कोन दुरमति‍या चढ़ि‍ गेल जे एक तँ कओलेजक नोकरी भेटल तइपर सँ पि‍ताक देल घर-घरारी धरि‍ उजाड़ि‍ देलहुँ। कि‍ हम दरमाहाक पाइसँ जीवन नहि‍ चला सकै छलौं। तरे-तर अपन पैछला वि‍चारपर सेवा-नि‍वृति‍ प्रोफेसर गुलाब गरमा गेलाह। मुदा जहि‍ना खढ़-पातक धधरा धुधुआ कऽ उठैत आ लगले पझा कऽ ओहन छाउर बनि‍ जाइत जेकरा हवाक सि‍हकि‍यो उड़ि‍या दैत, तहि‍ना लगले मन खढ़क झोली जकाँ ठंढ़ा गेलनि‍। मन घुरलनि‍, कि‍छु मजबूरि‍यो भेल। एक तँ परोपट्टामे बहरबैया जमीनपर लड़ाइ सुनगि‍ गेल, दोसर अपन पि‍ति‍औत कारी भायकेँ बटाइ खेत करए कहलि‍एनि‍ तँ कहलनि‍ जे एक बाबाक अरजल सम्‍पत्ति‍ (जमीन) छी, सेहो कीनल नहि‍ दान देल, ताहि‍ जमीनक उपजा बाँटि‍ बटेदार बनब। अहाँ कि‍यो आन छी जहि‍ना सभ दि‍नसँ एक परि‍वार बनल रहल अछि‍ तहि‍ना रहत। जखने हम बाँटि‍ कऽ देब तखने बटेदार भऽ जाएब। कि‍सान जँ बटेदार भऽ जाए तँ ओकर प्रति‍ष्‍ठा बँचले कोना? पावनि‍-ति‍हारसँ लऽ कऽ काज-उद्यम (परि‍वारि‍क यज्ञ काज) धरि‍ जहि‍या गाममे रहब अपन परि‍वारक समांग जकाँ रहब। मौका-मुसीबत (कोट-कचहरी, काओलेज, अस्‍पताल)मे दरभंगा जाएब तँ अपन घर जकाँ हमहूँ रहब। कहलनि‍ तँ वि‍चारणीय बात मुदा से उचि‍त भेल? बजारक चमक-दमक देखि‍ अपनो मन उधि‍याएल। महग बुझि‍ घरारि‍यो बेचि‍ मकान बना बैंकमे रखि‍ लेलौं। फेरि‍ मन घुरलनि‍, कि‍ आजुक बजारवादक नींव हमहीं सभ ने तँ देलौं। आइ कि‍ देखै छी, भरि‍ मन चाहो नहि‍ पीवि‍ सकलौं। हुनके (पत्‍नि‍ये) कि दोख देवनि‍, तीन दि‍नसँ बजारमे करफू लागल अछि‍। दोकान-दौरी, चट्टी-बट्टी सभ बन्न अछि‍। सौंसे बजार भकोभन लगैए। बंदूकधारी पुलि‍स आ पुलि‍सक गाड़ी छोड़ि‍ सड़कपर अछि‍ कि‍? पनरहे दि‍न मेहतरक हड़ताल भेल, गंदगीसँ बजार भरि‍ गेल। बीमारीक प्रकोप बढ़ि‍ गेल। तहि‍ना पानि‍क अछि‍। ताड़ी-दारू, चोरी-डकैती, लूट-पाट, अपहरण तँ आम भऽ गेल अछि‍। एक दि‍स गाम छोड़लौं, दोसर दि‍स बेटा-पुतोहू राँि‍चयेमे सभ व्‍यवस्‍था कऽ लेलक। दुनू परानी रोगसँ अथबल बनल छी, कोना दि‍न कटत? कि‍ अछैते औरूदे परान त्‍यागि‍ ली? हे भगवान जनि‍हह तूँ? जहि‍ना पूसक ओस सदति‍ काल प्रकृति‍केँ ठंढ़ बनौने रहैए तहि‍ना हृदय शीतल भऽ गेलनि‍। पत्‍नी दि‍स आँखि‍ उठा कऽ देखलनि‍ तँ बुझि‍ पड़लनि‍ जे जहि‍ना हमर मन जि‍नगीसँ नि‍राश भऽ कानि‍ रहल अछि‍ तहि‍ना हुनकर (पत्‍नीक) मन बेटाक फोन सुनैले कोढ़ी सदृश्‍य बि‍हँुसि‍ रहल छनि‍। मन आरो व्‍यथि‍त भऽ गेलनि‍। जहि‍ना असमसानक बरि‍आतीक मन खाएब-पीबि‍सँ हटि‍ मृत्‍युक घाटपर बैसि‍ गंगा (नदी, सरोवर) मे डूब दऽ पवि‍त्र होएवा लेल कछमछाइत तहि‍ना प्रोफेसर गुलाब बावूक मन जि‍नगीक घाटपर वौआ गेलनि‍। पुष्‍कर (राजस्‍थान) जकाँ अनेको घाट। उन्‍मत्त मन आलमारीक पोथी दि‍स पड़लनि‍। सत्तहवीं शताब्‍दी धरि‍ अर्थशास्‍त्र-राजनीति‍शास्‍त्र सझि‍या भाए छल। संगे-संग जीवन-यापन करैत छल। जे भीन भऽ गेल। हम सभ खुट्टा गाड़ि‍ राजनीति‍शास्‍त्रकेँ धेलहुँ। गामसँ लऽ कऽ दुि‍नयाँ भरि‍केँ अधि‍कार कर्तव्‍य सि‍खबै छि‍ऐ मुदा जाहि‍ अवस्‍थामे अखन दुनू परानी जीवि‍ रहल छी ओ कोन अधि‍कार-कर्तव्‍य छी? कि‍ बारह बजे राति‍मे डॉक्‍टर ऐठाम जा सकै छी? जँ से नहि‍ हएत तँ ि‍क रोग (बीमारी) हमरा मुकदमाक तारीक जकाँ भरि‍ राति‍क मोहल्‍लत दऽ देत? जि‍नगीक काँट-कुश फानि‍ लालमनि‍ मोवाइल कानमे सटौने पति‍सँ फुट भऽ सुनैक वि‍चार केलनि‍। मुदा मुँहसँ नि‍कलि‍ गेलनि‍- “वौआ, नूनू।‍” “हँ, हँ। पाँचम दि‍न वौआ- कल्‍पनाथक मूड़न छी।” टावर हटने लाइन कटि‍ गेलनि‍। मुदा लालमनि‍ से नहि‍ बुझलीह। बुझि‍ पड़नि‍ जे कम जोरसँ बजने नहि‍ सुनैत अछि‍। छातीसँ जोर लगा-लगा जोर-जोरसँ बाजए लगली- “सभ प्राणी नीके छह कि‍ ने?‍” प्राणीक नाओ सुनि‍ कोठीक चाउर जकाँ गुलाब बावूक मान गुमसरए लगलनि‍। जहि‍ना सड़ल आ नीकक बीच अपन-अपन सेनाक बीच रणभूमि‍क दृश्‍य होइत तहि‍ना गुलाबो बावूकेँ भेलनि‍। मुदा जहि‍ना बेटा-पुतोहूपर खौंझ उठल तहि‍ना पत्‍नीक अनभि‍ज्ञता (मोबाइल नहि‍ बुझव) पर हँसी लगलनि‍। पत्‍नीक हॅसी दौड़ल आबि‍ हृदएकेँ सुतल आदमी जकाँ डोलबऽ लगलनि‍। मुँहसँ नि‍कललनि‍- “सभ प्राणीक कुशलमे अपनो लगा कऽ कहलि‍एनि‍ कि‍ अपन छोड़ि‍ कऽ।‍”‍ बाजि‍ तँ गेलाह मुदा लगले मन धि‍क्कारए लगलनि‍। पत्‍नी अज्ञानी रहि‍ गेलीह, तइमे अपन (हमर) कोनो दोख नहि‍? दि‍नमे डेरासँ बाहर रहै छी मुदा बाकी समए....। अपने कएल लोककेँ काज अबै छै। जते अपना दि‍स देखति‍ तते ओझरी लगए लगलनि‍। एक कालखंडक पढ़ल-लि‍खल कर्ता (परि‍वारसँ लऽ कऽ समाज धरि‍) रहि‍तहुँ कि‍ आइ धरि‍ एकरा (एहि‍ वि‍षयकेँ) बुझैक कोन बात जे मनोमे नहि‍ उठल। मन कानए लगलनि‍। अपने रोपल गाछी भुताहि‍ भऽ गेल। दलकैत मनमे उठलनि‍ गाछी तँ फूल-फलसँ लऽ कऽ बगुर धरि‍क होइत मुदा कहबैत तँ सभ गाछि‍ये। तहि‍ना तँ जि‍नगि‍यो अछि‍। भदबरि‍या अन्‍हार जकाँ इजोत कतौ देखबे ने करैत। तहि‍ बीच पत्‍नी मोबाइल बढ़बैत कहलकनि‍- “देखि‍यौ ते, कि‍ भऽ गेलै। बजवे ने करै-ए।‍” पत्‍नीक बात सुि‍न पुन: गुलाब बावूक मनमे आशा जगलनि‍। हाथमे मोबाइल लऽ कहलखि‍न- “टाबर चलि‍ गेल। तँए नइ अवाज अबै-ए। फेर टाबर आओत ते अवाजो आओत।‍” लालमनि‍ टाबर बुझवे ने करैत। बजलीह तँ कि‍छु नहि‍ मुदा जहि‍ना दोकानसँ कोनो वस्‍तु झोरामे अनैत काल, झोरा मसकि‍ गेलासँ वस्‍तु गि‍रए लगैत तहि‍ना मनसँ पति‍पर आक्रोस गि‍रए लगलनि‍। गुलाब बावूक मनमे उठलनि‍, पाँचम दि‍न पोता- कल्‍पनाथक मूड़न छी। मूड़न कि‍ छी संस्‍कार छी। संस्‍कार तँ समाजमे भेटैत छैक (देल जाइ छै)। राँची समाज आ मि‍थि‍ला समाज तँ एक नहि‍ छी। तहूमे बजारक समाज तँ आरो गजपट भऽ गेल अछि‍। पुन: मोबाइलमे रि‍ंग भेल। रि‍ंग होइते पत्‍नीकेँ कहलखि‍न- “आबि‍ गेल टाबर। लि‍अ।‍” “पाँचम दि‍न कल्‍पनाथक मूड़न वैष्‍णो देवी स्‍थान (कश्‍मीर)मे छी। अहाँ दुनू गोटे (माता-पि‍ता) भोरूके गाड़ी पकड़ि‍ चलि‍ आउ। परसुका टि‍कट बनवा नेने छी।‍” बेटाक फोन सुनि‍ प्रोफेसर गुलाबक छाती छहोछि‍त भऽ गेलनि‍। मुँह मलि‍न, नोरसँ ढबकल आँखि‍, देहक (शरीरक) पानि‍ उतड़ल, मन्‍हुआएल स्‍वरमे लालमनि‍केँ कहलखि‍न- “कनी मोबाइल लाउ।‍” मोबाइल दइसँ पहि‍ने लालमनि‍ बेटाकेँ कहलनि‍- “बाउ, बावूसँ गप्‍प करह।‍” “बौआ।‍” “हँ बावू। अपने असि‍रवाद देबै.....।‍” पोताक असि‍रवाद सुनि‍ गुलाब बावूक वकार नहि‍ फुटलनि‍। हि‍चुकि‍क अबाज सुनि‍ लीलाधर पुछलकनि‍- “अपने कनै.......।‍” खखसैत गुलाब बावू बजलाह- “मोबाइल छोड़ि‍ असि‍रवादो कोना दऽ सकब। तीन दि‍नसँ‍ बजारमे करफू लागल अछि‍। सि‍पाहीसँ सड़क भरल अछि‍। एहेन स्‍थि‍ति‍मे घरसँ कोना नि‍कलब।” “कओलेजोमे छुट्टी लऽ नेने छी। टि‍कटो कटा नेने छी तहन.....?‍” १.बिपिन कुमार झा, मिथिलांचल आ बिहार चुनाव २.सुमित आनन्द भारत-नेपालक मिथिला हस्तशिल्प कलामे असीम सम्भावना १ बिपिन कुमार झा ,IIT Bombay मिथिलांचल आ बिहार चुनाव एक बेर पुनः अपन मिथिलांचल चुनावी रंगक चादर ओढि एहि महोत्सव मँ जुटल अछि। प्रत्येक बेरक भांति अहू बेर जनसभा, भाषणवाजी, आरोप-प्रत्यारोप केर संग स्वप्नक सौदागर जनता जनार्दन के सेवा मे तत्त्पर भय स्वप्न देखि रहल छथि। मिथिलाक गौरवमयी भूमि ज्ञान-विज्ञानक तपस्थली छी। संगहि गुणवान, विद्वान आओर महात्मा क जन्मस्थली छी मुदा आइ अपन मिथिलांचल अफ्रीका क कालाहाण्डी श्रेणि सम दरिद्रस्थली सेहो बनि गेल अछि जतय दरिद्रता अशिक्षा आ पिछडापन कारुणिक रूप सँ विद्यमान अछि। एहि स्थितिक उत्तरदायी शासकप्रशासकवर्गक संग समाजक बुद्धजीवीवर्ग सेहो छथि। एहि मे कोनो सन्देह नहिं। कतिपय भ्रष्ट राजनितिज्ञ प्रशासक आ भ्रष्ट बुद्धिजीवी वर्ग मिथिलांचल के ओहि स्थिति मे आनिलेलक जतय स्वर्ग स सुन्दर मिथिलाधाम नरक स बदतर मिथिला गाम मे बदलि गेल। चुनाव मे एहि बेर विकासक मुद्दा जोर पकडि लेलक ई सुनि अत्यन्त प्रसन्न्ता केर अनुभूति भेल मुदा चुनवक दिन सवर्ण, पिछडा, दलित गुट्वन्दी आ वोट्बैंकवाजी देखि सवटा वास्तविकता सामने आबि गेल। अस्तु अत्यन्त निराशा केर वातावरण देखि पडल। बुद्धि जीवी वर्गक हृदय एहि कारुणिक स्थिति मे विलाप कय रहल अछि- बाबा आबहु जागू हो मिथिला में अन्याय मचैया बाबा आबहु जागू हो ई प्रार्थना मात्र ईश्वर स नहि अपितु समस्त प्रबुद्ध वर्ग सँ अछि। आब अति भय गेल जागू अपन मिथिला क उत्कर्ष हेतु आब जागू। अपन मिथिलाक उत्कर्ष हेतु कोन शासक आवश्यक अछि ई कोना प्राप्त होयत। एहि प्रश्नक उत्तर सम्पूर्ण बुद्धिजीवी वर्ग लग अछि। एहि पर चर्चा निरर्थक। आब एहि बातक चिन्तन हो कि मातृभूमिक प्रतिष्ठा क रक्षण कोन तरहें हो। आशा अछि जे मिथिला में विद्यमान आ संगहि मिथिला स दूर विद्यमान समस्त बुद्धिजीवी वर्ग अपन अपन भूमिकाक निर्वहन करताह किं वा हुनका कर्तव्यक आत्मबोध हेतन्हि आ एकबेर पुनः अपन मिथिलांचल न केवल सभक निर्णय के प्रतिष्ठान होयत अपितु एहि विश्वक समक्ष एक आदर्श स्वरूप प्रस्तुत कय सकत। (लेखकक मन्तव्य मात्र मिथिला में विद्यमान चुनावगत समस्याक समाधान आ मिथिलाक उन्नति हेतु प्रशासक आ बुद्धजीवी वर्ग के जगायब छन्हि, कोनो शब्दक वैयक्तिक अर्थ नहिं लेल जाय। टिप्पणी सादर स्वीकार्य अछि- kumarvipin.jha@gmail.com) २. सुमित आनन्द भारत-नेपालक मिथिला हस्तशिल्प कलामे असीम सम्भावना भारत-नेपालक मिथिला हस्तशिल्प कलामे असीम सम्भावनापर संगोष्ठी बी.पी.कोइराला नेपाल-भारत प्रतिष्ठान, नेपाल राजदूतावास, नई दिल्लीक तत्वावधानमे मधुबनी नगर भवनमे भेल। आलेख वाचन सत्र १८.०९.१० केँ आयोजित भेल। उद्घाटन सत्रक प्रारम्भ १८.०९.१० केँ मधुबनीक जिलाधिकारी श्री संजीव हंस (आइ.ए.एस.) द्वारा दीप प्रज्वलितक संग भेल। श्री जयप्रकाश नारायण पाठक, नयन कुमार मांझी, मेधा कुमारी, आरती मिश्रा आ ज्योति द्वारा मंगलाचरण तथा ओडिसी नृत्य प्रस्तुत कयल गेल। अतिथि गण सभक सम्मान एवं स्वागत भाषण अध्यक्ष, विश्वविद्यालय संगीत एवं नाट्य विभाग डॉ. पुष्पम नारायण द्वारा कयल गेल। अंजली श्वेता आ तुलसी द्वारा स्वागतगान गाओल गेल। मंच संचालक डॉ. अमरनाथ सिंह बीजभाषण लेल विश्वविद्यालय इतिहास विभागक अवकाशप्राप्त विभागाध्यक्ष डॉ. रत्नेश्वर मिश्रकेँ आमंत्रित कयलनि। उद्घाटन भाषण जिलाधिकारी श्री संजीव हंस कयलनि। एहि कार्यक्रममे दुनू देशक कलाकारगण उपस्थित छलाह। मुख्य अतिथिक रूपमे श्री उमाकान्त पाराजुली, सांस्कृतिक परामर्शदाता, नेपाल राजदूतावास, नई दिल्ली छलाह। मुख्य अतिथि अधीक्षण पुरातत्वविद् डॉ. संजय कुमार मंजुल छलाह। अध्यक्षीय उद्बोधन विश्वविद्यालय हिन्दी विभागक अवकाश प्राप्त विभागाध्यक्ष डॉ. अजीत कुमार वर्मा कयलनि। कार्यक्रमक संचालन डॉ. अमरनाथ सिंह, अंग्रेजी विभाग, कुंवर सिंह महाविद्यालय, दरभंगा कयलनि। धन्यवाद ज्ञापन डॉ. शम्भू कुमार साहू, अध्यक्ष, भूगोल विभाग, जे.एम.डी.पी.एल., महिला कॉलेज, मधुबनी कयलनि। प्रथम सत्र आलेख वाचन सत्रक शुभारम्भ अपराह्ण ०४.३० बजे भेल। कार्यक्रमक संयोजिका डॉ. पुष्पम नारायण पाग एवं चादरिसँ विद्वान आलेख वाचक एवं मंचस्थ अतिथि लोकनिक स्वागत कयलनि। एहि सत्रक अध्यक्षता श्री उमाकान्त पाराजुली कयलनि। एहि सत्रक आलेख वाचक लोकनि छलाह- श्री महेन्द्र मलंगिया, श्री कृष्ण कुमार कश्यप, श्रीमति मंजू ठाकुर, श्रीमति रानी झा, डॉ. सुरेन्द्र प्रसाद साहा एवं डॉ. कमलानन्द झा। हिनका लोकनिक व्याख्यानक विषय क्रमसँ छलनि: -भारत की मिथिला हस्तशिल्प कला की प्राचीनता एवं आज का स्वरूप -मिथिला हस्तशिल्प कला में बाजारीकरण की सम्भावना -मिथिला हस्तशिल्प और महिला रोजगार- नेपाल के सम्बन्ध में -मिथिला हस्तशिल्प कला और महिला रोजगार- भारत के सम्बन्ध में - मिथिला हस्तशिल्प कला की कठिनाइयाँ - मिथिला हस्तशिल्प कला में ह्रास- एक चिन्तन सांस्कृतिक कार्यक्रम सत्र १८.०९.१० सांस्कृतिक कार्यक्रमक अन्तर्गत डोमकछ आ पमरियाक प्रस्तुति कलाकार द्वारा कयल गेल। एहि सत्रक संचालक रंगकर्मी डॉ. सुनील कुमार ठाकुरजी रामचरित मानसक प्रथम श्लोकसँ वाणी आ विनायकक आराधना कयलनि। कार्यक्रमक अन्तमे डॉ. सुनील कुमार ठाकुर सत्रावसान “जय हिन्द, जय नेपाल” कहि कऽ कयलनि। द्वितीय सत्र १९.०९.२०१० केँ १०.३० बजे डॉ. नरेन्द्र नारायण सिंह निराला जीक अध्यक्षता तथा श्री सुनील मंजुल एवं श्रीमति रानी झा क मंच संचालनसँ सत्र प्रारम्भ भेल। एहि सत्रमे मुख्य अतिथिक रूपमे नेपाल राजदूतावासक सांस्कृतिक परामर्शदाता श्री उमाकान्त पाराजुली एवं श्रीमति शशिकला देवी छलथिन। हस्तशिल्प एवं वस्त्र मन्त्रालय, भारत सरकारक प्रतिनिधि विपन कुमार दास, चित्रकार कृष्ण कुमार कश्यप, रमेश झा (भारतीय स्टेट बैंक), प्रो. अरुण कुमार मिश्र, प्रो. ब्रज किशोर भंडारी, स्वैच्छिक संस्थाक सुनील कुमार चौधरी, महेन्द्र लाल कर्ण एवं प्रो. गंगा राम झा प्रश्न, समस्या एवं सुझाव प्राप्त कयलनि। ज्योति सुनीत चौधरी जन्म तिथि -३० दिसम्बर १९७८; जन्म स्थान -बेल्हवार, मधुबनी ; शिक्षा- स्वामी विवेकानन्द मि‌डिल स्कूल़ टिस्को साकची गर्ल्स हाई स्कूल़, मिसेज के एम पी एम इन्टर कालेज़, इन्दिरा गान्धी ओपन यूनिवर्सिटी, आइ सी डबल्यू ए आइ (कॉस्ट एकाउण्टेन्सी); निवास स्थान- लन्दन, यू.के.; पिता- श्री शुभंकर झा, ज़मशेदपुर; माता- श्रीमती सुधा झा, शिवीपट्टी। ज्योतिकेँwww.poetry.comसँ संपादकक चॉयस अवार्ड (अंग्रेजी पद्यक हेतु) भेटल छन्हि। हुनकर अंग्रेजी पद्य किछु दिन धरि www.poetrysoup.com केर मुख्य पृष्ठ पर सेहो रहल अछि। ज्योति मिथिला चित्रकलामे सेहो पारंगत छथि आ हिनकर मिथिला चित्रकलाक प्रदर्शनी ईलिंग आर्ट ग्रुप केर अंतर्गत ईलिंग ब्रॊडवे, लंडनमे प्रदर्शित कएल गेल अछि। कविता संग्रह ’अर्चिस्’ प्रकाशित। नानीक खिस्सा: हम जखन चारि पाँच वर्षक रही तखनसँ मोन अछि जे ई खिस्सा नानी सुनाबै छलथि। व्याहक बाद बहुत दिन हुनकासँ भेंट नहि भेल। बादमे जखन भेटली तँ हम फेर कहलियनि खिस्सा सुनाबऽ तँ हुनका खूब हॅंसी लगलनि। कहलन्हि जे आब तँ बाऊ हइ तूँ अपन बच्चाकेँ सुनेबहीं। हम बिसरि गेल रही मुदा़ नब्बेसँ बेसी वर्षक अवस्था भेलाक बादो हुनका सभटा खिस्सा मोने छलनि। हम बस कोशिश कऽ रहल छी हुनके जकाँ कहैक। 1 भलुनिया मौसी: सुखनी आ दुखनी नाम कऽ दू बहिन छली। नामक अनुरूपे सुखनीक बियाह खूब सम्पन्न घरमे भेलनि आ दुखनीक गरीब घरमे। सुखनीक स्वभाव घमण्डी आ टेढ़ छलनि आ दुखनीक बड्ड शालीन आ मृदुल। सुखनीकेँ अपन बहिनक प्रति कखनो दया नहि आबैत छलनि। बहिनक बच्चा सभ जखन कखनो किछु माँगै लेल आबैत छलनि तँ दुत्‍कारि कऽ भगा दै छलखिन। एक दिन दुखनी फर-फूल ताकै लेल बोन दिस चलि गेली। जाइत-जाइत एकटा घर देखेलनि। खिड़कीसँ भीतर तकली तँ एक टा दुर्गन्ध गन्धाइत भलुनिया केँ सूतल देखलनि। ओतएसँ पड़ाइते छली आकि ओ भलुनिया देख लेलकनि आ अपन कर्कश बोलीमे पुछलकनि “के छैं गै”। आब सुखनी डेरा तँ खूब गेल रहथि मुदा कोनो रस्ता नहि छलनि। तुरन्त हॅंसय लगली आ बड्ड आपकतासँ जवाब देलनि- “ नहि चिन्हलैं गइ मौसी़, हम दुखनी। बड्ड मोन लागल छल तोरा देखै लेल।” भलुनिया फेर कहलकनि “हम तँ ठीके नहि चिन्हलियौ। एतँ की करै छलैं”। “हम देखै छलहुँ तोहर घर, कतेक नीक कोठा छौ। मोन होइत अछि तोहर खूब सेवा करियौ। अतेक दिन बाद भेटलैं। कहै ने, की काज कऽ दियौ।" दुखनी जवाब देलखिन। अतेक नीक बोलीसँ भलुनिया खुश भऽ गेल। दुखनीकेँ अपन घर घुसेलक । अन्दर खूब बड़का घर छल। एक कोठली सोना़ चाँदी़ हीरा़ असर्फीसँ भरल छल तँ एक कोठली कपड़ा लत्ताक ढ़ेर छल। भन्सा घर तरह-तरहक पकवाऩ फल आदिसँ भरल छल। दुखनी पूरा घर नीप कऽ साफ कऽ देलखिन। तकर बाद भलुनियाक सेवा करऽ लगली। तेलसँ मालिस कऽ खूब जाँति देलखिन। भलुनिया बड्ड प्रसन्न भेल आ दुखनीकेँ खूब समान पाती संगे विदा केलक। पूरा ठेला गाड़ी सोना-असर्फी़ कपड़ा-लत्ता आ पूरी-पकवानसँ भरि कऽ दुखनी घर पहुँचली। बच्चा सभकेँ पहिल बेर भरि पेट भोजन करेलथि। फेर अपन बेटीकेँ कहलखिन जे मौसीसँ तराजू लेने आ। सिखा देलखिन जे भलुनिया दऽ किछु नहि कहियैन। दुखनीक बेटी जखन सुखनी लग तराजू माँगऽ गेल तँ सुखनीकेँ आशंका भेलनि। ओ तराजूक पलड़ाक नीचाँ गोंद लगा देलखिन। दुखनी पूरा सोना-असर्फी सभ तौल कऽ तराजू लौटबा देलखिन। एकटा असर्फी आ किछु सोना तराजूमे सटि कऽ सुखनि लग पहुँचि गेलनि। आब तँ सुखनी दौगल गेली बहिन लग। बड्ड निहौरा करै लगलखिन तँ दुखनी सभटा बता देलखिन। लोभी सुखनी सेहो गेली बोनमे भलुनिया लग। फेर ओहिना भलुनिया देख लेलकनि आ पुछलकनि तँ ई कहलखिन जे हम दुखनी छी। भलुनिया तुरत अन्दर बजा लेलकनि। सुखनी भीतर गेली आ सभसँ पहिने ठेलामे घर लऽ जाइ लेल समान पाती बान्हि लेलनि। फेर भलुनिया लग एली तँ ओकर महकैत शरीर नहि बर्दाश्त भेलनि से बाजऽ लगली -“गए मौसी गए मौसी़ तोहर देह केहेन महकै छौ गए़। घर केहेन घिना कऽ रखने छैं गए़, एनामे केना रहल होइत छौ।” एतेक सुनक छलै आकि भलुनियाकेँ तामस उठलै। ओ उठल आ सुखनीकेँ कण्ठ मरोड़ि कऽ मारि कऽ खा गेल। 2 सिन्नुरक पुल : एकटा ब्राह्‍मण छलथि जे भीख माँगिकऽ अपन दिन काटैत छलथि। एक घर भीख माँगैत छलथि तैयो एक सेर चाऊर होइत छलनि आ चालीस घर माँगैत छलथि तैयो एके सेर होइत छलनि। हुनकर संगे एक टा कुक्‍कुर आ एक टा बिलाड़ि सेहो रहैत छलनि। कुक्‍कुरमे आसपासक खतरा देखैक शक्‍ति छलै आ बिलाड़िमे भविष्य देखबाक दिव्यदृष्टि छलै। एक दिन ब्राह्‍मण भीख लऽ कऽ लौटि रहल छलथि तँ बिलाड़ि कहलकनि जे मालिक अहाँकेँ काल्हि बड धन सम्पत्ति भेटत़ ताबे कुक्‍कुड़ भौंकऽ लागल। मुड़ि कऽ देखलनि तँ एकटा नाग साँप कादोबला खत्तामे  खसि पड़ल छलै। ब्राह्‍मण ओहि नागकेँ एकटा डारिक सहारे बाहर निकालि देलखिन। ओ नाग साधारण सर्प नहि छल। ओ ब्राह्‍मणकेँ एकटा मणिबला अंगूठी देलकनि आ कहलकनि जे अहाँ भोरेमे नहाकऽ ठाँवकऽ पूब मुँहे बैसि कऽ अहि अंगूठीक पूजा करब तकर बाद जे मांगब से भेटत। ब्राह्‍मणके विश्वास तँ नहि भेलनि तैयो ओ लऽ कऽ विदा भेला। भोरे जखन ब्राह्‍मणक नींद खुजलनि तँ मोन भेलनि जे अंगूठीके जाँचल जाय। सभटा बताएल तरीकासँ पूजा कऽ ओ अपना लेल एकटा सुन्दर महल आ खूब धन सम्पत्ती मंगलनि। सभटा पूरा भऽ गेलनि। तकर बादसँ ब्राह्‍मणक दिन बदलि गेलनि। जखन जे जरूरत से माँगि लैत छलथि। एक दिन किछु लोक ढिंढोरा पीट आएल जे जमीन्दार साहब कहलखिन हेँ जे हुनका अपन सुन्दरी बेटी लेल एकटा वर चाहियनि। जे जमींदारक घरसँ शुरू कए अपन घर तक सिन्नूर पुल बनाओत तकरासँ ओ अपन बेटीक ब्याह करेथिन। गछलाक बाद नहि बनेलासँ सजा भेटत। ई ब्राह्‍मण गछि लेलखिन। विदा भेला सेवक सभ संगे। कुक्‍कुर कहलकनि अंगूठी हम अपन मुँहमे लऽ कऽ जाएब। ब्राह्‍मण मानि गेलखिन। बिलाड़िकेँ किछु अनर्थ होइक आशंका भेलै से ओहो संगे लागि गेल। रस्तामे एकटा पोखरिक कात सभ विश्राम लेल रूकला। कुक्‍कुरकेँ पोखरिमे अपन प्रतिबिम्ब देखेलै। ओ ओकरा अपन संगी बूझि उत्तेजित भऽ कऽ भौंकऽ लागल। एनामे अंगूठी पोखरिमे खसि पड़लै। आब ब्राह्‍मण बहुत दुखी भऽ गेला। सेवककेँ कहलखिन जे आब हमरासँ नहि हएत पुल बनाओल। सेवक सभ हुनका कैद कऽ लेलकनि आ जमींदार लग विदा भेल। बिलाड़ि ओतै रूकि गेल। कुक्‍कुर कारण पुछलकै तँ कहलक जे काल्हि एतय माछ मारल जाएत। अंगूठी एकटा माछ गीर गेल अछि। जखन मल्लाह सभ माछक भोंटि फेकत तँ हम ओहिमे सँ अंगूठी निकालि लेब। कुक्‍कुर सेहो रूकि गेल। भोरे सभटा ओहिना भेलै जेना बिलाड़ि कहने रहै। बिलाड़िकेँ इम्हर उम्हर घूमैत देख मल्लाह सभटा मांछक भोंटि ओकरा दिस फेक देलकै। कुक्‍कुर बिलाड़ि दुनु सभटा भोंटि चबाबय लागल। आखिर एकटामे अंगूठी भेटलै। दुनु अंगूठी लऽ कऽ जमीन्दारक कोठा दिस विदा भेल। ओतए ब्राह्‍मण कारावासमे बन्द छलथि। बिलाड़ि घुसियाकऽ गेल आ अंगूठी देलकनि। ब्राह्‍मणक जानमे जान एलनि। तुरन्त सेवक सभक द्वारा जमींदारकेँ खबरि देलखिन। जमींदार सेवक सभकेँ बढ़ियासँ ठाँव करै लेल कहलखिन। भोरे ब्राह्‍मण नहाकऽ पूब दिस बैसि कऽ अंगूठीक पूजा केलन्हि आ फेर सिन्नुरक पुलक मांग केलखिन । पुल तुरत बनि गेल। जमींदार प्रसन्न भेला आ अपन बेटीसँ ओहि ब्राह्‍मणक विवाह करा देलखिन। फेर ब्राह्‍मण अपन पत्‍नी आ कुक्‍कुर-बिलाड़ि लऽ कऽ सिन्नुरक पुले बाटे अपन महल आबि गेला आ खुशी-खुशी रहए लगला। 3 एक राजाक सात मेहरी : एकटा राजा रहथि जिनकर सात टा रानी रहनि। राजाक छोटकी रानी अपन सरल स्वभाव द्वारे सभसँ बेसी प्रिय रहनि जाहि कारणे बाँकी छौओ रानीकेँ ओकरासँ बड्ड डाह होइत छलै। राजाकेँ एकोटा संतान नहि छलनि तैं संतान प्राप्‍ति लेल यज्ञ केलनि। साधु कहलकनि जे अहाँ आमक गाछ़मे बाम हाथे झट्ठा फेकू आर दहिना हाथे आम लोकू़ तखन ओहि आमकेँ सातो रानीकेँ कहियनु खाइ लेल। एना केलासँ अहाँकेँ शीघ्र पुत्र प्राप्‍ति हएत। राजा सएह केला आ लोकल आमकेँ बड़की रानीकेँ देलखिन आ कहलखिन जे सभ बाँटिकऽ खा लिअ। बड़कीरानी छोटकी रानीकेँ नहि देलखिन आ सभटा आम छहो रानी मिलि कय खाय गेली आ आंठी खोंइचा छाउरक ढ़ेर पर फेक एली। जखन छोटकी रानीकेँ पता लगलनि तँ ओ छाउरक ढ़ेर पर सँ आंठी खोंइचा आनि कऽ ओकरा धो कऽ चाटि गेली। समय बीतल, छहो रानीकेँ किछु नहि भेलनि आ छोटकी रानी गर्भवती भऽ गेली। राजाकेँ ज्ञात भेलनि तँ ओ तुरन्त सभ सेविका सभकेँ छोटकी रानीक बेसी ध्यान राखैक निर्देश दऽ देलखिन। एहिसँ आन रानी सभ आरो तमसा गेली। जखन छोटकी रानीकेँ प्रसव भेलनि तँ बड़की रानी हुनकर नवजात बेटाकेँ छाउरक ढ़ेरपर फेकवा देलखिन आ कान खापैड़ देखा कऽ कहलखिन जे छोटकी रानीकेँ यएह संतान भेलनि। छोटकी रानी खूब कानय लगली। राजा सेहो बड्ड निराश भेला। उम्हर एकटा सियारिऩ जे राहड़िक खेतमे रहै छल़ रोज राजमहलक पछुआड़मे छाउरक ढ़ेरमे खाना ताकै आबै छल। ओ जखन ओहि बच्चाकेँ देखलक तँ सभ बात बूझि गेल। ओ सियारिन ओहि बच्चाकेँ अपन खोहिमे लऽ गेल आर अपन दूध पिया कऽ पालय लागल। राजमहल सँ चोरा चोरा ओकर पूरा पहिरन ओढ़न राजकुमार जकाँ राखने छल। एकटा सेविकाकेँ ई बात ज्ञात भऽ गेल। ओ बड़की रानीक पाइक लोभमे सभटा कहि देलक। बड़की रानीकेँ भेलनि जे सियारकेँ मरबा देब तँ बच्चा फेर अनाथ भऽ जाएत आ कुनो जानवर ओकरा खाऽ जेतै। ओ तुरन्त बिमार होयके भग्गल कऽ लेलन्हि। राजा पुछलखिन जे की भेल तँ कहलखिन जे हम बड्ड बिमार छी। हमरा राहरिक खेतबला सियारक कलेजी तरि कऽ खाय पड़त नहि तँ हम मरि जायब। राजा तुरन्त अपन सैनिककेँ कहलखिन जे ओहि सियारकेँ मारिकऽ आनू। सैनिक सभ सियारकेँ मारिकऽ बड़की रानी लग हाजिर केलकनि, रानी फेर प्रसन्न आ स्वस्थ भऽ गेली। ओहि बच्चाक अड़ुदा अखन बाँकी छलै। एकटा चिल्होड़ि जे नदीक कातक गाछपर घर बना कऽ रहैत छल़ से ओ बच्चाकेँ रहड़िक खेत सँ उठा अपन घोंसलामे आनि कऽ पोषण करै लगलै। ओकर पहिरन देखि कऽ ओ चिन्हि गेलै जे ई राजकुमार अछि। ओहि घाटपर राजमहलक कपड़ा सभ धुआइत छल। चिल्होड़ि सेहो उम्हरसँ कपड़ाकेँ चोराकऽ बच्चाकेँ पहिराबय लागल। जगह-जगहसँ खाना लुझि कऽ बच्चाकेँ आनि कऽ दैत छलै। आब बच्चा कनी ठेकनगर भऽ गेल छल। तँ चिल्होड़ि ओहि बच्चाकेँ एकटा फकड़ा सिखेलकै आ कहलकै जे ई गाबि-गाबि कऽ तूँ लोक सभसँ भीख माँग। बच्चा से करय लागल। जखन ई गीत राजमंत्रीक कानमे गेलनि तँ ओ राजाकेँ कहलकनि जे राजा ई गीत तँ अहींक खिस्सा लागैत अछि। अहाँक छोटकी रानीकेँ बच्चा भेल रहनि। सभ कहलक कान खापड़ भेलनि से लागैत अछि झूठ अछि। राजा बच्चाकेँ राजमहल बजेलनि। कहलखिन जे अपन गीत गाबै। बच्चा गौलक- “एक राजा के सात मेहरी, छोटकी मेहरी मोर महतरिया,  रहड़िक खेतमे फेक देली, चिल्होरि ने पाओलिय,  हम समचरिया़, भिक्षा दे मैया।” राजाक माथा ठनकलनि। ओ सेविका सभकेँ डराकऽ सभ बात ज्ञात केलनि। रहड़िक खेत तकक खिस्सा सेविका कहलकनि आ बाँकी के ओ चिल्होड़क सिखायल गीतसँ बुझा गेलनि। बिना देर केने राजा छौहो रानीकेँ मृत्‍युदण्ड देलखिन आ चिल्होड़िकेँ इनाम देलखिन। अपने छोटकी रानी आर राजकुमार संगे महलमे खुशी खुशी रहऽ लगला। 4 पन्साया कुम्मरि : एकदिन एकटा राजा शिकार पर गेला। जाइत-जाइत ओ एक जगह पहुँचला जतए एकटा विशाल सुन्दर पानक पात छल। राजा जैने ओ पात तोडै़ लगला आकि ओ पात एकटा सुन्दर राजकुमारीमे बदलि गेल। राजा मोहित भऽ गेला। ओहि राजकुमारीक नाम पन्साया कुम्मरि छल। राजा पन्साया कुम्मरिसँ ब्याह कऽ हुनका अपन महलमे आनि लेलनि आ खुशीसँ रहय लगला। किछु दिनक बाद राजा फेर शिकार पर गेला। फेर जाइत-जाइत ओ थाकि गेला तँ एकटा महल देखेलनि। राजा ओहि महलमे प्रवेश केलनि तँ ओकर वैभव देखि चकित भऽ गेला। अन्दर जाइते नौकर चाकर हुनकर सत्‍कारमे लागि गेल। राजा बहुत प्रसन्न भेला। तखन एकटा राजकुमारी एलखिन आ कहलखिन जे जॅं अहाँकेँ हमर सत्‍कार नीक लागल तँ हमरासँ ब्याह करू। राजा फॅंसि गेला। ओहि राजकुमारीक नाम छल पहुनाइ। राजा पहुनाइ सऽ ब्याह कऽ ओहि महल मे रहय लगला। समय बीतल। राजा घर नहि घुरला से पन्साया कुम्मरि चिन्तित रहय लगली। ओ सैनिक पठेली चारू दिस राजाक खोजमे। सैनिक सभ खबरि आनि कऽ देलकनि। पन्साया कुम्मरि एकटा पत्र राजाक नामे पठेलखिन जाहिमे राजासँ घर लौटक आग्रह केने रहथि। पत्र महल तँ पहुँचल मुदा  राजासँ पहिने पहुनाइक हाथ लागल। पहुनाइ जवाब पठौलखिऩ- “जरथु मरथु पन्साया कुम्मऱि दय बसहु पहुनाइ। जाहि देस रहत पन्साया कुम्मरि ताहि देस पिया घुरि नहि जाय।। ” जवाब पढ़ि पन्साया कुम्मरि तमसा गेली। अपन सेवककेँ कहलखिन हमरा एक पेटी मूस आ एक पेटी झिंगुर दिअ। जुल्हा सँ काँच रंगमे रंगल खूब चटकदार साड़ी मंगेली। चटकदार साड़ी पहिन पेटी लऽ विदा भेली पहुनाइक महल दिस। पहुनाइक महल लग रूकि कऽ नाचय लगली। पहुनाइक नजरि हुनकर साड़ी पर गेलनि। राजासँ जिद्द करय लगली जे हमरा वैह साड़ी चाही। राजा बड्ड बुझेलखिन जे हम अहूसँ नीक आनि देब मुदा ओ जिद्द पर अड़ि गेली। हारिकऽ  पन्साया कुम्मरिकेँ बजाओल गेल। पन्साया कुम्मरि राजासँ कहलखिऩ  “ हम एकेटा शर्त पर अपन साड़ी देब। काल्हि भोरमे अहाँ हम्मर साड़ी जेहेन अखन अहि तहिना लौटायब। नहि तँ अहाँकेँ हमरा संगे चलय पड़त।” राजा शर्त मानि गेलखिन। रातिमे जखन पहुनाइ ओ साड़ी पहिन कऽ सुतली तँ पन्साया कुम्मरि हुनकर कोठलीक खिड़की बाटे भरि पेटी मूस आ भरि पेटी झिंगुर अन्दर दऽ देलखिन। राति भरिमे मूस साड़ीकेँ जतय ततय काटि देलकनि आ झिंगुर सभटा रंग चाटि गेलनि। भोरे पहुनाइ जखन ऊठली तँ साड़ीक दुर्दशा देखि कानय लगली। मुदा राजा एकटा नहि सुनलखिन। अपन वचनबद्धताक कारण पन्साया कुम्मरि संगे विदा भऽ गेला। 5 सुहान बोन : एकटा राजाकेँ सात टा रानी रहनि। सभ मिलजुलि कऽ नीकसँ रहैत रहथि। किछु दिनका बाद छोटकी रानी गर्भवती भेलखिन। राजा खूब प्रसन्न भेला। एक दिन ओ शिकारपर गेला। जाइत-जाइत ओ सुहान बोन पहुँच गेला जतय एकटा राक्षसीक राज रहै। राक्षसीक एकटा बेटी रहै जकर नाम सुहान रहै। राक्षसी जखन राजाकेँ देखलक तँ अपन बेटीकेँ खूब सुन्दर रूप दऽ कऽ राजाक रस्तामे बैसा देलक। राजा ओकर रूपपर मोहित भऽ ओकरासँ विवाह कऽ लेला। आब सुहान सेहो सातो रानी संगे महलमे रहऽ लागल। अपन राक्षसी प्रवृतिक अनुसार ओ सभकेँ खूब तंग करऽ लागल। राजाकेँ जखन अकर आभास भेलनि ओ सुहान पर सँ ध्यान हटाबऽ लगला। सुहानकेँ से बर्दाश्त नहि भेलै  आ ओ सातो रानीक आँखि निकालि कऽ जंगल दिस बैला देलक। सातो रानीक चौदह टा आँखिकेँ ओ अपन मायकेँ दय देलक। ओकर माय ओहिकेँ सीक पर कऽ टाँगि कऽ राखि लेलक। जखन राजा पुछलखिन सुहानकेँ जे बाँकि रानी सभ कतय छथि तँ सुहान कहलकनि जे ओ सभ महल छोड़ि कय भागि गेली। राजाकेँ बड्ड क्षोभ भेलनि। एम्हर सातो रानी फल-फूल खा कऽ गाछक नीचाँ जीवन काटै लगली। एहनेमे छोटकी रानीकेँ बेटा भेलनि। दिन बीतैत गेल आ ओ बेटा पैघ भेल। एक दिन ओ जंगलसँ जाड़नि जमाकऽ शहरमे बेचलक आ जे पाइ भेलै ताहिसँ सभ लेल भोजन कपड़ा आदि किनने आयल। अतेक दिनका बाद अन्न खा कऽ सभ माय ओ बच्चाकेँ खूब आशीर्वाद देलखिन। धीरे-धीरे ओ बच्चा एकटा झोपड़ी सेहो बना लेलक। अहिना एकदिन ओ बच्चा जाड़ैन ताकैत रहय तँ ओकरा फूलक ढ़ेर देखेलइ। लग गेल तँ ओ एकटा पूजाक स्थल रहय। ओ तुरन्त सभ निर्मालकेँ बहा कऽ जगहकेँ नीप पोइछ कऽ ठीक कऽ लेलक आ नुकाकऽ ताकऽ लागल जे अतऽ के पूजा करैत अछि। कनिक कालक बाद एकटा साधुबाबा एला। जगह साफ देखिकऽ बड खुश भेला। ओ आवाज देला जे जे कियो ई केलहुँ हेँ से सामने आऊ। बच्चा सामने गेल तँ साधु बाबा कहलखिन जे अहाँ वरदान माँगू तँ बच्चा कहलकनि जे हमर माय सभकेँ सभटा पहिनेबला सुख आँखिक रौशनी़ राजमहल आदि भेट जाय। साधु कहलखिन जे सभटा भेटत मुदा अहाँकेँ अपने प्रयास करऽ पड़त। साधु अपन दिव्य दृष्टिसँ देख कऽ सुहानक मायक घरक रस्ता पता केलनि। फेर एकटा उड़ैबला घोडा बनेला। तखन कहलखिऩ “अहाँ सुहान बोनमे सुहानक नइहर जाउ । घोड़ाकेँ बाड़ीमे नुकाय कऽ ठाढ़ कय लेब आ अपने कौआ बनिकऽ चारपर बैसकऽ ई फकरा गायब ‘बुढ़िया मैया नात़ि सुहान मैया पूत़ लवा खाँऊ खाँऊ खाँऊ।’ ई सुनि कऽ ओ राक्षसनी बूझत जे अहाँ ओकर नाति आ सुहानक बेटा छी। अहाँके असौरा पर बैसाकऽ कहत जे माछी मारि-मारि कऽ फाँकू। हम रोपणी आ कटनी केने आबै छी। ओ बारहो मास धान रोपै छै आ बारहो मास काटै छै। जखने ओ खेत दिस जायत अहाँ मनुखक रूप धऽ सीक पर सँ आँखिक कोहा ऊठाकऽ घोड़ापर चढ़ि भागि जायब।” ओ बच्चा सभटा तहिना केलक जेना साधु बाबा सिखेने रहथिन। मुदा जखन ओ भागै छल तँ सुहानक माय पाछाँ-पाछाँ भागय लगलै आ कहऽ लगलै़  “रे मुड़ि़ घुरि ताक रे मुड़ि़ घुरि ताक।” ओ बच्चा जैने पाछाँ तकलक की बच्चा आ घोड़ा जरि कऽ भष्म भऽ गेल। सुहानक माय फेर सँ सबटा आँखि सीक पर टाँगि लेलक। साधु बाबा कहनाइ बिसरि गेल रहथिन जे पाछाँ घुरिकऽ नहि ताकब। समय बीतल। आन्हर माय सभकेँ भेलनि जे बच्चाकेँ कुनो जानवर खा गेल। साधु बाबाकेँ सेहो कनी दिन बाद ध्यान एलैन जे ओ बच्चाक हाल बुझियै। जैने दिव्य दृष्टि दौगेला तैं अपन गलतीक ज्ञान भेलनि। तुरन्त अमृत छींटकऽ बच्चा आ घोड़ाकेँ जियेला। एकटा काज आर केला जे सुहानक मायकेँ अहि घटनाक स्मृति हरि लेलखिन। फेरसँ बच्चा ओहिना सुहानक माय लग गेल, सभटा ओहिना भेलै मुदा अहि बेर बच्चा पाछाँ घुरि कऽ नहि ताकलक। अहि बेर ओ सुरक्षित आँखि लऽ कऽ आबि गेल छल। आब सभटा आँखि ओ माय सभकेँ लगा देलक। सातो रानीकेँ सूझय लगलनि। सभ बड्ड प्रसन्न भेली। सभ साधुबाबाकेँ खूब धन्यवाद देलखिन आ बेटाकेँ खूब आशिष। साधु सहित सभ कियो मिलि कऽ राजमहल गेला। राजाकेँ सभ बात कहलखिन। राजा सुहान आ ओकर मायकेँ मृत्‍युदण्ड देलखिन आ बाँकी सभसँ माफी मॅंगला। फेर सभ कियो संगे खुशीसँ रहय लगला। १.शि‍वकुमार झा ‘टि‍ल्‍लू’ ३ टा बाल कथा २.मुन्नाजी- पथ दर्शन ३ अनमोल झा- किछु बालकथा १ शि‍वकुमार झा ‘टि‍ल्‍लू’ ३ टा बाल कथा- नारि‍यर- गाछ बाबूजी सरायरंजन प्रखण्‍डमे कार्यरत छलाह। गामसँ दूर रहबाक कारण शनि‍ दि‍नकेँ अबैत छलाह, फेरि‍ सोमन भि‍नुसरबेमे गामसँ वि‍दा...। बुझू जे आन पाँच दि‍न हमरा सबहक लेल पि‍कनि‍क जकाँ छल। हम आ हमर पि‍सि‍औत शंभू एकतुरि‍या छलहुँ। भोरसँ सॉझ धरि‍ धमगि‍ज्‍जड़ि‍, ककरोसँ डर नहि‍। बाबा बूढ़, खाट धएने छलथि‍। हुनक जुआनीक खि‍स्‍सा सुनि‍ देह सि‍हरि‍ जाइत छल। बड़ अनुशासि‍त शि‍क्षक छलाह मुदा आब हमरा सबहक मास्‍टरीक आगाँ चुप्‍प भऽ जाइत छथि‍। रवि‍ दि‍न भाेरे बाबा, बाबूजीकेँ उपराग देलनि‍- “‍टि‍ल्‍लूकेँ कतेक दि‍नसँ कहैत छी, प्रयाग बाबूक ओहि‍ठाॅ सँ नारि‍यरक गाछ आनैले मुदा हमर के सुनय।” हमरा दि‍स बाबूजीक आँखि‍ पड़ल डऽरसँ औना गेलहुँ। वि‍नय भायकेँ संग कऽ प्रयाग बाबूक टोल बंडि‍हा चलि‍ देलहुँ। प्रयाग बाबू समाजक लेल कोनो अपरि‍चि‍त नाओ नहि‍। जाति‍क वि‍षम समाजमे रहि‍तहुँ कोनो ब्रह्मण वा अन्‍य जाति‍क लोकसँ बाबू छोड़ि‍ कोनो दोसर नाओ नहि‍ हुनका लेल सुनने छलहुँ। करि‍यन गामक पूर्व मुखि‍या आ प्रसि‍द्ध बैध प्रयाग बाबू ककरोसँ इलाज करबाक क्रममे फीस नहि‍ लैत छलाह। एकर परि‍णाम कनेक-कनेक मोन अछि‍ जे सन 1977ई.मे रोसड़ा वि‍धान सभाक नि‍र्दलीय वि‍धायकक रूपमे नि‍र्वाचि‍त भेल छलाह। फेर दोसर बेर चुनाव नहि‍ लड़लनि‍, पहि‍ले चुनावक खर्चमे कि‍छु जमीन वि‍का गेल छलनि‍। समाजमे एतेक सम्‍मान ‘न भूतो न भवि‍ष्‍यति‍’। दलानक प्रांगणमे पहुँचैत देरी खूब सम्‍मान पूर्वक आवाहन कएल गेल- “बौआ हम तँ मास्‍टर साहेबकेँ पंद्रह दि‍न पहि‍ने नारि‍यरक गाछ लेल कहने छलहुँ आ अहाँ सभ एखन आबि‍ रहल छी।‍” प्रयाग बाबूक एहि‍ प्रश्‍नपर हम दुनू भाँइ मौन सद्वमति‍ देलहुँ। फेर खुरपीसँ नारि‍यरक थल्‍ला कोरि‍ एकटा गाछ हमरा हाथमे थमहा देलनि‍। हुनक बालक वसन्‍त बाबू दलानपर बैसल छलाह। बैद्यजी हुनका बजा कऽ कुट्टी काटएबला कत्ता मंगौलनि‍। क्‍यारीमे 15-16गोट आओर नारि‍यरक गाछ रोपल छल। सभटा गाछकेँ एक नि‍शामे वि‍धायक जी उखारि‍ कऽ लकड़ीक गाड़ल कुट्टी कटबाक लेल साङग लग लऽ जा कऽ अष्‍टमीक वलि‍प्रदान जकाँ नाि‍रयर गाछक बलि‍ चढ़वए लगलनि‍। हम अजगुतमे पड़ि‍ गेलहुँ। कोन अपराधक दंड एहि‍ गाछ सभकेँ भेट रहल अछि‍। अपन हाथमे लेल छोट नारि‍यर गाछकेँ ठामहि‍ं माटि‍पर राखि‍ अपन टोल दि‍स दौड़ि‍ गेलहुँ। वि‍नय भाय सेहो पाछाँ....। दलानपर अाबि‍ बाबाकेँ सभ कथा सुनवए लगलहुँ नहि‍ की बाबूजी कानपर जोरसँ एक थप्‍पर जड़ि‍ देलनि‍। हमरा पकड़ि‍ कऽ प्रयाग बाबूक दलानपर बाबूजी अनलनि‍। डॉक्‍टर साहेवसँ बाबूजी हमर अपराधक जि‍ज्ञासा कएलनि‍ तँ प्रयाग बाबू कहलथि‍न- “नहि‍-नहि‍ एहि‍ नेनाक कोनो अपराध नहि‍। एखन धरि‍ हम पचास गोट नारि‍यरक गाछ वॉटि‍ देने छी। समाजक लोकक ‍लागल अछि‍। ककरा देब ककरा नहि‍....। एहि‍सँ बढ़ि‍या नहि‍ रहतै वाॅस आ नहि‍ बजतै बॅसरी, तेँ सभटा गाछकेँ काटि‍ देलहुँ। बड़ सऽख सँ बि‍चड़ा खसौने छलहुँ हमरो दलानपर शोभा बढ़त आ कि‍छु समाजक लोकेँ सेहो देब, मुदा....। अहाँक नेनाक गाछ देवालक कातमे राखल अछि‍ अपने लऽ जा सकैत छी।” बाबूजी गाछ लऽ कऽ चलि‍ देलनि‍ की सोचैत वि‍दा भेलथि‍ ई हम कहि‍यो नहि‍ पुछ सकलहुँ। तरेगन देखाय हय बाल लघुकथा- सन सतासीक बाढ़ि‍मे सम्‍पूर्ण मि‍थि‍लांचल छि‍न्न-भि‍न्न भऽ गेल। स्‍वाभावि‍क छल हमरो गाम कोना बचैत? जि‍रात सभमे खाधि‍ फूटि‍ गेल छल। पानि‍क माेंका सभ कि‍सानकेँ बुड़ि‍बक बना देलक। भदैयाक कोन गप्‍प जे रब्‍बी सेहो कोसी, बागमती आ करेजक लीलासँ नहि‍ पनकि‍ सकल। “रौ काल्हि‍ सम्‍मत छै, कि‍छु नार-पुआर तँ नहि‍ उपजलौ, आक धतूरोक संठीक जोगार तँ करबेँ।‍” बावूजीक एहि‍ जि‍ज्ञासापर हमरा सबहक नेना टोलीक नेता रंजीतमे जोश आबि‍ गेल। ओ पंकज, लाला, प्रदीप, हेमन्‍त, बबलू आ हमरा संग कऽ चलि‍ देलक होलि‍काकेँ जड़एबाक लेल व्‍यवस्‍थामे.....। कतहु कि‍छु नहि‍ भेटल। शस्‍य श्‍यामला करि‍यनक वसुन्‍धरा मरूस्‍थलि‍ भऽ गेल छथि‍। की करू कि‍छु नै फुराइत अछि‍? सोचैत बढ़ैत छलहुँ की ललबा बाजल- “रौ टि‍ल्‍लू एकटा उपाए छौ।‍” रामलोचन यादवक भि‍राठमे पािन नै लागल छलै, ओ साग तरकारी लगेने छथि‍। हम ओकर ति‍तम्‍भासँ खि‍न्न भऽ गेलहुँ- “एक दूटा भाटा तोड़ि‍ ओहि‍मे होलि‍का सन मा ‍उगि‍ कऽ कोना जड़बेँ?” नहि‍-नहि‍ रामलोचन जीक खोपड़ी उखाड़ि‍ कऽ लऽ जाएव। चलने एखन ओरि‍आन कऽ लैत छी राति‍मे खोपड़ी....। सभ छौंड़ा खोपड़ी लग गेलहुँ। ओहि‍ठाम केओ नहि‍ छल। सभटा खुट्टाक जड़ि‍केँ कोरि‍ बगलमे गाड़ल चापाकलसँ पानि‍ लऽ कऽ जड़ि‍केँ फुलाओल गेल। सुक्‍खल माटि‍सँ फेर ओहि‍ खुट्टाक जड़ि‍केँ ललवा झॉपि‍ देलक। ओ हमरा दलक न्‍यूटन छल। एतेक ध्‍यान जौं पढ़वामे लगबिते तँ आइ कि‍छु आर रहि‍ताए। हम पुछलहुँ- “एना कि‍ए कएलेँ?” ओ ठामहि‍ं बाजल- “एखन सूर्यास्‍तो नहि‍ भेलै खोपड़ी लऽ कऽ चलबेँ तँ केओ देखि‍ लेतौ फेर आगाँ की हएत से तँ बुझले छौ।‍ परूकॉं साल हाकि‍मक गहूमक बोझ सम्‍मतमे जड़एवाक लेल चोरि‍ करैत पकड़ा गेल छलहुँ। ओ दादाकेँ परचारि‍ देलनि‍। ततेक मारि‍ खएलहुँ जे, जौं एखनो पुरबा बसात बहैत अछि‍ तँ पीठमे दर्द हाेमए लगैत अछि‍।‍” ठीक राति‍ नौ बजे हम सभ फेर लक्ष्‍य भेदनक लेल खोपड़ी लग आबि‍ गेलहुँ। खोपड़ीक भीतर एकटा खाटपर रामलोचन बाबा अधसर सॉप जकाँ दीर्घश्‍वास लैत छलाह। बगलमे हुनक पॉच बरखक पोता सूतल छल। राति‍मे ओ साग तरकारीक ओगरबाही करैत छलाह। ई गप्‍प ललबाकेँ बूझल छल। तेँ खोपड़ीक खुट्टा लगक माटि‍केँ पानि‍सँ गि‍ल्‍ल कऽ देने छल। ई गप्‍प हम आब बुझलहुँ। जय लंकेशक मंदध्‍वनि‍सँ हम सभ खोपड़ी उखाड़ि‍ चलि‍ देलहुँ। पोखरि‍क दछि‍नबरि‍या मोहारपर सम्‍मतक स्‍थान छल। ओतऽ पहुँचैत देरी दूरसँ गाड़ि‍क ध्‍वनि‍ सुनलहुँ। जि‍रात पोखरि‍क उत्तर कातमे छल। हम सभ बूझि‍ गेलहुँ। सम्‍मतक मुहूर्त तँ चारि‍ बजे भोरमे अछि‍। आव की करवें? आगि‍ तँ वएह लगाओत जकर बाप मरल हुअए। हम सभसँ पि‍तृयुक्‍त छी। हमर एहि‍ टि‍प्‍पणीपर ललवा बगलक कंसारसँ आगि‍ खोड़ि‍ कऽ आनि‍ सम्‍मतपर धऽ देलक। खोपड़ी कुरू-कुरू स्‍वाहा। राति‍मे पंचैती लागल। सरपंच श्री रामप्रकाश यादव जी लोचन बाबासँ पुछलनि‍- “अहाँ कोना बुझलहुँ जे खोपड़ीक चोरि‍ भेल?‍” “‍हमर पोता डोला कऽ उठौलक। बाबा हौ बाबा, तोरी बाहि‍ं तरेगन देखाय हाय। हम अकचका कऽ उठलहुँ, खोपड़ीक चारमे तरेगन....।कोना उगल? उठि‍ कऽ देखलहुँ चारक कोन कथा, खुट्टा सेहो गोल अछि‍।” सभ पंच ठोहि‍ पारि‍ कऽ हॉसि‍। हम सभ मॉफी मांगि‍ लेलहुँ। काज तँ समाजक लेल कएने छलहुँ तेँ रामलोचन बाबा माफ कऽ देलनि‍। बाबाक पोता आब जवान भऽ गेल छथि‍। एखनो जौं केओ ओकरा ‘तरेगन देखाय हय’ कहैत अछि‍ तँ ओ मंद-मंद मुस्‍की मारि‍ फेर अपन स्‍वर्गीय बाबाक स्‍मरणमे शांत भऽ जाइत अछि‍.....। पि‍तृयुक्‍त ललवा सम्‍मतमे आगि‍ लगौलक, अठासीक कोन कथा ओकर पि‍ता एखन धरि‍ स्‍वस्‍थ छथि‍। भगवान हुनका एहि‍ना लहलहाइत राखथु। दहीक ठोप राति‍मे शि‍वनगर कुर्मी टोल रामखेलावनक वि‍देशि‍या नाच देखैले चलि‍ गेल छलहुँ। बाबाक हुरपेटलाक वाद भोरे देरीसँ नीन फूजल। भोरूका स्‍कूल छल। झटपट स्‍नान कऽ बसि‍का रोटी आ पलॉकी साग हूरि‍ वस्‍ता समेटलहुँ। हमर लङौटि‍या संगी सभ जेना रवि‍, धनश्‍याम पहि‍ने वि‍द्यालयक लेल वि‍दा भऽ गेल छल। एकसेर झटकल चलि‍ देलहुँ। बाटमे उत्वाकल चांडालचौखरी भेटल। सभ सहपाठि‍ए छल, मुदा वि‍द्यासँ ओकरा सबहक कोनो संबंध नहि‍। सभ दि‍न गुरूजी सँ धुनाइत छल, मुदा कोनो प्रभाव नहि‍। नहि‍ चाहि‍तहुँ संग लागि‍ गेलहुँ। ककर रोहि‍नि‍याँ आम तोड़त, कतए की उजाड़त पता नहि‍। गामसँ कोस भरि‍ दूरमे बैद्यनाथपुर उच्‍च वि‍द्यालयमे पढ़ैत छलहुँ। आइ लगै छै कि‍छु नै फबतै, हलधर ठाकुर अपने आमक जड़ि‍केँ पजि‍औने छै। जि‍तबाक एहि‍ हि‍लकोरकेँ सुनि‍ करेज कॉपय लागल। एतबामे उत्‍क्षूंखल संघक नेता आशुतोष चि‍चि‍आएल- “रौ हि‍रबा दौड़ आगाँ भरि‍या जा रहल छै....। भार छीनि‍ कऽ दही चाखब।‍” सभ दौड़ल नहुॅ-नहुॅ भरि‍या लग आबि‍ गेल छलहुँ। भरि‍या प्रलयक संकेत बूझि‍ ठाढ़ भऽ गेल। “हौ ककरा ओहि‍ ठाम भार लऽ कऽ जाइ छहक?‍” आशुतोष बाजल। तोरा ओइसँ की मतलब, बेसी टभ-टभ करवेँ तँ उठा कऽ पटकि‍ देबौ?” भरि‍या बि‍गड़ि‍ कऽ बाजल। सरि‍पहुँ ओ नेना सबहक उद्येश्‍य बूझि‍ गेल छल। हम आशुतोषसँ वि‍नती कएलहुँ, छोड़ि‍ दहीं गऽ कोनो अहि‍वाती बहि‍नक भार छै। आशुतोष हमरा दि‍श ऑखि‍ गुररैत बाजल- “रौ हरि‍श्‍चन्‍द्रक नाति‍ तोँ भाग एहि‍ ठामसँ हम सभ दही अवश्‍य खाएव।‍” हमर नि‍वेदनपर दलमे फूटि‍ पड़ि‍ गेल। हमरा संग-संग कि‍छु छौंड़ा आगाँ बढ़ए लागल। जि‍तबा बड़ पारखी छल, ओ ई गप्‍प बूझि‍ गेल, उद्धोषण कएलक- जे छौंड़ा एहि‍ दहीसँ अपन माथमे चानन ठोप नहि‍ करत ओकर बाप तीन दि‍नक भीतर मरि‍ जाएत। ई कहैत पहि‍ने ओ दहीमे भूर कऽ अपन मॉथमे ठोप कएलक। हमर वि‍रोध असफल भऽ गेल अपन डेग पाछॉ करैत पि‍तृमोहक दुआरे हमहूँ राजति‍लक लगएलहुँ। देखि‍ते-देखैत दहीक पाति‍लमे अकाशक तरेगन जकाँ सहस्‍त्र छि‍द्र भऽ गेल। भरि‍या भारकेँ छोड़ि‍ ठामहि‍ं गायघाट गाम दि‍शि‍ गाड़ि‍ पढ़ैत भागल। सभ छौंड़ा ओहि‍ दहीसँ पारन कएलक। हम मूकदर्शक छलहुँ। वि‍द्यालय पहुँचैत देरी महेन्‍द्र बाबू मास्‍टर साहेबक सटक्कासँ रक्‍त रंजि‍त भऽ गेलहुँ। ओ सभ खा कऽ धुनाएल आ हम बि‍नु अपराध कएने। सोचऽ लगलहुँ हमर कोन दोख हम तँ पि‍तृमोहमे फॅसि‍ गेलहुँ। २ मुन्नाजी पथ दर्शन अहाँकेँ एतेक मना केलौं, परञ्च नहिये मानब अहाँ, तऽ जाऊ। मुदा रौद बड़ करगर छै, बचिये के रहब। भइया आइ विभिन्न प्रकारक सांस्कृतिक कार्यक्रम छै स्कूलमे। हँ, उद्घाटन सत्र तँ बेजोड़ हेतै, की कहू एगदम धमगिजर, अहूँ एबै ने भइया? हम मौन रहि गेल रही। मुदा लाउडीस्पीकरक अवाज, ओहिपर विभिन्न वाद्ययंत्रक पेँ...पोँ...आ शिक्षा मंत्रीक भाषण, हमर सबुरक बान्ह तोड़ि देलक। विदा भेलौं स्कुल दिस...। विद्यालयक प्राङ्गणमे पएर रखिते हमर शरीर थरथरा उठल। कानमे परल नेना सभक समवेत स्वरसँ...आवारा हूँ...आवारा हूँ। चोट्टहि घुरि एलौं घर। मोनमे उकस पाकस होमय लागल- “कि, इएह थिकैक आइ-काल्हिक स्कूली सांस्कृतिक कार्यक्रम। आ गुरुजी दैत छथिन्ह एहने शिक्षा?” वाह रे भविष्य। दोसर दिन गुरुजीकेँ शिकायत केलापर उतारा भेटल- जे बच्चा जेहेन धरनदार छै तेहने तैयारियो रहैत छैक। आ अहाँ सब की करै छीयै? “हम सब तँ मात्र रस्ता देखबैत छियैक आगाँ बढ़बाक लेल”। ३ अनमोल झा 1970- गाम नरुआर, जिला मधुबनी। एक दर्जनसँ बेशी कथा, लगभग सए लघुकथा, तीन दर्जनसँ बेशी कविता, किछु गीत, बाल गीत आ रिपोर्ताज आदि विभिन्न पत्रिका, स्मारिका आ विभिन्न संग्रह यथा- “कथा-दिशा”-महाविशेषांक, “श्वेतपत्र”, आ “एक्कैसम शताब्दीक घोषणापत्र” (दुनू संग्रह कथागोष्ठीमे पठित कथाक संग्रह), “प्रभात”-अंक २ (विराटनगरसँ प्रकाशित कथा विशेषांक) आदिमे संग्रहित। भण्डाफोर ओ कहबी नहि छैक जे बूढ़ भेने लोक दूरि जाइत अछि, सैह बात। ओना गाम बाबा संगे से बात नहि छलनि। बूढ़ तँ छलाहे बेचारा मुदा लोककेँ लगै जे थोड़े ई नाटको करै छथि। जखन कियो आबनि दलानपर आ कहनि गोर लगै छी बाबा, चिन्हलौं हमाअ? तँ कहि उठथिन- परिचय देब तखन ने चिन्हब। माने ओ जेना कम देखैत होथि आ आगन्तुक अपन परिचय दैत छल तखन ओ चिन्हैत छलखिन। एहिना एक दिन ईंटाक भट्ठाक मालिक पाइक तगेदामे हिनका ओतय आयल आ कहलकनि- बबा प्रणाम। चिन्हलौं हमरा। तँ कहलखिन- नहि तँ। हम सियाराम, ईंटा भट्ठाबला। एतबे कहिते गाम बाबा बमकि उठलाह- ऐँ हौ, हमरा सभटा दू नम्बरक ईंटा दऽ देलह। तोरा ठकै लेल हमहीं भेटलियह की? आ मार-मार कऽ उठलाह बाबा ओकरा। सियाराम कहलनि- बाबा हम सात फीटक जवान छी से अहाँ सामनेमे ठाढ़ छलौं, बिना परिचयक अहाँ चिन्हबे नहि केलौं आ सात इंचक ईंटा छैहो नहि से अहाँ एक नम्बर आ दू नम्बर चिन्ह गेलियै...!! चिन्ता लोआ नसईक बच्चा इसकूलसँ जखन एलै तँ मायकेँ कहलकै- मम्मी-मम्मी हमरा सब इसकुलमे पढ़ै कालमे जखन टीचर नहि रहैत छैक तँ मूड़ी झुकाकऽ पायलकेँ अथी देखै छीयै घघराक नीचाँ। मायक मोन चेहा गेलै। कहलकै कथी रौ, कथी देखै छहिन। बच्चा कहलकै- अथी गै, कछिया, उजरा कछिया। माय कहलकै- गन्दा बात। ई गन्दा बात भेलै। ई नहि करक चाही। आ फेर पुछैत छैक- ओ की देखै छहिन। ओ देखिकऽ की होइत छौ। बच्चा कहने रहै- नीक लगैए गै। देखैत नीक लगैए। मायक चिन्ता बढ़ि गेल अहै...! बुद्धि केकबला दोकानपर बाप-बेटा दुनू जा कऽ ऑडा दऽ देने रहय। अतुलक पाँचम जन्म दिन छलै। दोकानदार कहलकै जे केकपा अतुल लिख देबै सैह ने? ओ बच्चा बाजल नहि। केकमे अतुल चौधरी लिखि कऽ दिअ। हमरा पारा(मोहल्ला)मे चारिटा अतुल छैक। कोन अतुलक जन्म दिन छैक से लोक कोना बुझतै? दोकानदार आ अतुलक पपा दुनू एक दोसराक मुँह देखय लागल रहय। दोकानदाअ एकटा नीक केक दोकानसँ निकालि कऽ अतुलक हाथमे मँगनिये खाइ लेल देलकै आ कहलकै- ठीक छैक बेटा, अतुल चौधरीये लिखल रहत अहाँक केकमे...। कंट्रोल हम रिभियाकेँ इशारा देलियै आ ओ एम्हर ओम्हर ताकि हमरा लग आबि गेल छल। कान लग ओ मुँह सटा कऽ कहलक- तूँ बढ़ कलम, हम अबैत छियौ। एखन माय-बाबू दुनू गोटा अंगनेमे छथि। कनी देरियो हेतै तैयो हम एबे करबौ, तूँ खोपड़ीक मचानपर रहिहेँ! हम ओतऽ सँ की कहाँ सोचैत खेतक आइ आ एक पेरिया रस्ता धेने चल गेल रही कलममे। हम खोपड़ीमे पहुँचलहुँ तँ कियो कतौ नहि छल। हम ओहिपर जा कऽ बैसि रहलहुँ। आमक मास अनेरे बड़ नीक लगैत छैक, से हम गाछ सभकेँ निहारऽ लागल रही। बड़ी कालक बाद रिभिया आयल। मचानपर चढ़ि रबरबला पेन्टकेँ फलका ओहिमेसँ अपना खाय लेल जे माय लीची देने छलै से ओहिमे सँ निकालि दूटा हमरा देलक आ दूटा अपनो खेलक। आ तकरा बाद हमाअ सब नीचाँ उतरि सतघराक धुचि कोड़ल जगह लग आबि दुनू गोटा दुनू भाग बैसि सतघरा खेलाय लागल रही। से ताहि दिनमे जानथि भगवान, हम किछु नहि बुझैत रही। जखन ओ गुलाब कली सँ फूल भऽ फूटल तँ कियो आबि ओकरा तोड़ि कऽ चलि गेल। हम आब जखन ओ समय आ बात सब मोन पाड़ै छी तँ अपना आपकेँ कंट्रोल नहि कऽ पबैत छी! एखनो हम सपनामे ओकरे देखैत छी। पता नहि ओ हमरा देखैत अछि की नहि...! चिन्तन -हे कनी ऋणो-पैंच कऽ कऽ कोनो छोटो-छीन शहरमे एकटा कनियो टाक घर बान्हैक जोगार करू ने। -गाम सन वातावरण कतऽ पायब ओतऽ यै। पाल्युशनसँ भरल, ककरोसँ ककरो कोनो मतलब नहि। सब अपने लए बेहाल। - से जे रहय। धीया-पुताक पढ़ाइ-लिखाइ डाक्टर-वैद्य आदिक सुविधा तँ रहत ने ओतय। आ ई चीज जतय छैक ततय मनुक्खकेँ आगाँ बढ़ैत समय नहि लगैत छैक, से बुझल अछि ने..अहाँकेँ... बोध ऑफिस लेल बैग टांगि बिदा भेल ओ। मेन गेटसँ निकलि गेटक छिटकिन्नी लग तीन-चारि डेग आगाँ बढ़ल आकि पाछाँसँ गेट खोलि तीन सालक प्रियांशु दौगिकऽ आबि पाछाँसँ बैग पकड़ि घिचलक। कहलकै- पपा हमरा चॉकलेट कीनि दिअ। पपा कोरामे उठा कहलकै- नै बेटा, चॉकलेट नै खाइ। -तँ कैडबेरिये कीनि दिअ। -नै बाबू। ई सभ खेलासँ दाँतमे पिल्लू लागि जाइत छैक। -तँ पाँचटा चुम्मा लिअ हमरा, तखने जाए देब अहाँकेँ ऑफिस । पपा ओकरा करेजमे साटि हँसय लागल रहय। आ दुनू गालपर दू-दू टा कऽ चुम्मा लऽ कहलकै- जाउ बेटा, आब चलि जाउ, हमरा अबेर होइत अछि। प्रियांशु कहने अहै, नै पपा, पाँचटा चुम्मा कहाँ भेल। एकटा लोलपर लिअ ने। पपा लोलोपर एकटा चुम्मा लेलकै। आब ओ अपने कोरासँ उतरि गेटक भीतर टाटा-बाइ-बाइ करैत आबि गेल रहय... ३. पद्य ३.१.१.जीवकान्‍त-बबलू बनबय छक्का-सत्ता २.अहाँ आबु ३.२.१.राजदेव मंडलक दूटा बाल कवि‍ता २.गजेन्द्र ठाकुर-दूटा बाल कवि‍ता ३.३.ज्योति सुनीत चौधरी-प्रयास वा पलायन ३.४.किशन कारीग़र एकटा तऽ ओ छलीह। ३.५.अनमोल झा-दूटा बाल कविता ३.६.राजेश मोहन झा- चुट्टी ३.७.१.रमाकान्‍त राय रमा-बाल कवि‍ता-उल्‍लूक शि‍कारी २.मिथिलेश कुमार झा-बाबाक रोपल गाछ सिनुरिया ३.महाकान्त ठाकुर- किछु बाल कविता ३.८.डॉ जया वर्मा-बेटी १.जीवकान्‍त-बबलू बनबय छक्का-सत्ता २.अहाँ आबु १ जीवकान्‍त बाल साहि‍त्‍य/ कवि‍ता बबलू बनबय छक्का-सत्ता एक टोलमे बबलू अकलू दू नेना छल समतुरि‍या छल बबलूकेँ छल बन्‍ति‍क खुट्टी आमक तख्‍ता केर ‘पि‍टना’ छल ओहि‍ ‘पि‍टना’सँ रबड़ गेनकेँ ओ पि‍टैत छल ’रन’ बनबै छल अपनहि‍ ‘रन’केँ गनि‍-गनि‍ लै छल गनि‍ कऽ जोर-जोरसँ बाजय अकलूकेँ ‘एस्‍कोर’ सुनाबय एक गली छल टोल कातमे ताही ठाम ‘क्रि‍केट’ चलै’ छल ...   ...   ...   ... एक दि‍वस बेरि‍याँमे बबलू ’बौल’ ‘बैट’ लेने बहराएल अकलूकेँ ओ ताकि‍ नि‍कालल जगह देखि‍ कऽ ईंटा रखलक बल्‍ला लऽ कऽ भेल ठाढ़ ओ दोसर दि‍स देलक इटकोरी ’बौल’ करह कोर जगह बनौलक अकलूकेँ ओ मना-मना कऽ ‘बौल’ फेकबाक भारा देलक बबलू पीटय गेन, उड़ाबय दुग्‍गी-ति‍ग्‍गी ‘रन’ बनैत छल बहुत जुमा कऽ गेन उड़ाबय चौका-छक्काकेँ गनैत छल अकलू बे-परवाह लगै छल गेन पकड़ि‍ कऽ लऽ अनैत छल आ फेकैत छल कते भेल ‘रन’ से सुनैत छल सुनि‍-सुनि‍ कऽ ओ दुख ने मानय अथवा कोनो सुख नहि‍ पाबय एक ‘शौट’ तेन्ना कऽ लगलै गेन सरंग-गोलि‍या भऽ गेलै उड़ि‍ कऽ ओ अँगना चल गेलै गेन तकै ले अकलू भागल अँगना पैसल ओ अँगना छल, अकलुक अँगना माय एक दसटकही देलकै, आर कहलकै- “सुन रे अकलू देखही जे दोकान फुजल छै ओइ दोकानसँ पत्ती ला गय चाहक पत्ती बहुत जरूरी पानि‍ गरम छै डि‍ब्‍बा पूरा खाली छै, रे! जल्‍दी चाही, ला दे जल्‍दी...।‍” ओ कहलक जे गेन तकै अछि‍ माए कहलकै- “पछि‍ला बाटेँ तोँ बहरा जेा सोझे जा दोकानमे ढुलि‍हेँ पत्ती लीहेँ दौगल अबि‍हेँ‍।” अकलू भागल पछि‍ला रस्‍तासँ बहराएल ....   ....   ....   .... इमहर बबलू दौगि‍ रहल अछि‍ ’रन’ गनैत अछि‍ चारि‍ भेलै, तँ छब्‍बो भेलै से भेलैक, तँ छब्‍बो पुरलै दौड़य बबलू, ‘रन’केँ जोड़य लगले उन्‍तीस-तीस पुरौलक पुरलै लगले एक पचासा हकमि‍ रहल अछि‍ बबलू भैया दौड़ि‍ रहल अछि‍ आ बनबै अछि‍ साठि‍ बनै छै ’’’ बनल जाइ छै घाम-पसेना बहल जाइ छै। २ संस्कृति  वर्मा , क्लास ४था  , क्विन मेरी स्कूल , मॉडल टाउन , दिल्ली अहाँ आबु नेहरु चाचा , अहाँ कतऽ चलि गेलौं. देख लिअ अहाँ  नेना सभकेँ की कऽ गेलौं.. हमर पीठपर भारी बस्ता ओहिमे किताब कोपीक ठेलम ठेल देखू हमर उमिर मात्र आठ  बरिस हमर पीठ आ कान्हक हाल देखू. चाचा, केओ नै देखऽवाला हमरा सभकेँ केओ नै बुझऽवाला हमरा सभकेँ दुर्दिन आबि गेल हमर सबहक अपन राजक हाल देखू. कतेक पढ़ब कतेक लिखब सभ विषय एखने पढ़ि लेब तँ इंजीनियर डाक्टर एखने बनाबू.. कखनो खेलक नै हिसाब देखू अहाँ गुल्ली-डंडा, कबड्डीक गप कहलौं हम क्रिकेटले बेहाल ,  देखू. एक बेर अहाँ फेरो आबू, अपन नौनिहालकेँ अहाँ बचाबू. हम नीक नागरिक बनब देशक नाम ऊँच करब एहि बोझसँ मुक्ति अहाँ दियाबू... चाचा नेहरु अहाँ आबू .............. ज्योति सुनीत चौधरी जन्म तिथि -३० दिसम्बर १९७८; जन्म स्थान -बेल्हवार, मधुबनी ; शिक्षा- स्वामी विवेकानन्द मि‌डिल स्कूल़ टिस्को साकची गर्ल्स हाई स्कूल़, मिसेज के एम पी एम इन्टर कालेज़, इन्दिरा गान्धी ओपन यूनिवर्सिटी, आइ सी डबल्यू ए आइ (कॉस्ट एकाउण्टेन्सी); निवास स्थान- लन्दन, यू.के.; पिता- श्री शुभंकर झा, ज़मशेदपुर; माता- श्रीमती सुधा झा, शिवीपट्टी। ज्योतिकेँwww.poetry.comसँ संपादकक चॉयस अवार्ड (अंग्रेजी पद्यक हेतु) भेटल छन्हि। हुनकर अंग्रेजी पद्य किछु दिन धरि www.poetrysoup.com केर मुख्य पृष्ठ पर सेहो रहल अछि। ज्योति मिथिला चित्रकलामे सेहो पारंगत छथि आ हिनकर मिथिला चित्रकलाक प्रदर्शनी ईलिंग आर्ट ग्रुप केर अंतर्गत ईलिंग ब्रॊडवे, लंडनमे प्रदर्शित कएल गेल अछि। कविता संग्रह ’अर्चिस्’ प्रकाशित। प्रयास वा पलायन अपन साक्षात्कारक प्रयत्न केलहुँ स्वयं आत्म निरीक्षण करैत बीतल समय के समीक्षा लेल।। कायरताके विद्वता बुझलहुँ सत्यक कटुता सऽ नुकाइत जतय सऽ मोन पलायित भेल।। स्वयंके दागहीन रखलहुँ नितदिन नब सिद्धान्त रचैत आदर्श बहुत सम्मानित भेल।। प्रिस्थितिक जोर जैने चिन्हलहुँ भुक्तभोगीके हालत बुझैत गहन आत्मग्लानि भेल।। जतय रूकिकय संघर्ष केलहुँ जय पराजय तुच्छ बनैत अपन योग्यता परिलक्षित भेल।। किशन कारीग़र परिचय:-जन्म- 1983ई0 कलकता मे मूल नाम-कृष्ण कुमार राय किशन’। पिताक नाम- श्री सीतानन्द राय नन्दू’माताक नाम- श्रीमती अनुपमा देबी। मूल निवासी- ग्राम-मंगरौना भाया-अंधराठाढ़ी जिला-मधुबनी बिहार। हिंदी मे किशन नादान आओर मैथिली मे किशन कारीग़र के नाम सॅं लिखैत छी। हिंदी आ मैथिली मे लिखल नाटक आकाशवाणी सॅं प्रसारित एवं दर्जनों लघु कथा कविता राजनीतिक लेख प्रकाशित भेल अछि। वर्तमान मे आकशवाणी दिल्ली मे संवाददाता सह समाचार वाचक पद पर कार्यरत छी। शिक्षाः- एम फिल पत्रकारिता एवं बी एड कुरूक्षे़त्र विश्वविद्यालय कुरूक्षेत्र सॅं। एकटा तऽ ओ छलीह। कनैत छलहुँ माए गे माए-बाप रौ बाप हे रौ नंगट छौंरा रह ने चुपचाप नूनू बाबू कऽ ओ हमरा चुप करा दैत छलीह एकटा तऽ ओ छलीह। बापे-पूते के कनैत छलहुँ कखनो तऽ ओ हमरा दूध-भात खुआ दैत छलीह बौआक मूहॅं मे घुटूर-घुटूर कहि ओ अपन ऑंखिक नोर पोछि हमरा हॅसबैत छलीह। खूम कनैत-कनैत केखनो हम बजैत छलहुँ माए गे हम कोइली बनि जेबउ नहि रे बौआ निक मनुक्ख बनि जो ने आओर कोइली सन बोल सभ के सुनो ने। केखनो किछू फुरायत छल केखनो किछू नाटक मे जोकर बनि बजैत छलहुँ बुरहिया फूसि मुदा तइयो ओ हॅंसि कऽ बजैत छलीह किछू नव सीखबाक प्रयास आओर बेसी करी। रूसि कऽ मुहॅं फुला लैत छलहुँ तऽ ओ हमरा नेहोरा कऽ मनबैत छलीह कतो रही रे बाबू मुदा मातृभाषा मे बजैत रही अपना कोरा मे बैसा ओ एतबाक तऽ सीखबैथि छलीह। मातृभाषाक प्रति अपार स्नेह गाम आबि नान्हि टा मे हुनके सॅं हम सिखलहुँ गाम छोड़ि परदेश मे बसि गेलहुँ मुदा मैथिलीक मिठगर गप नहि बिसरलहुँ। अवस्था भेलाक बाद ओ तऽ चलि गेलीह ओतए जतए सॅं कहियो ओ घूमि कऽ नहि औतीह मुदा माएक फोटो देखि बाप-बाप कनैत छी मोन मे एकटा आस लगेने जे कहियो तऽ बुरहिया औतीह। समाजक लोक बुझौलनि नहि नोर बहाउ औ बौआ बुरहिया छेबे नहि करैथि एहि दुनियॉं मे तऽ कि आब ओ अपना नैहर सॅं घूरि कऽ औतीह मरैयो बेर मे बुरहिया अहॉं कें मनुक्ख बना दए गेलीह। बुरहियाक मूइलाक बाद आब मइटूगर भए गेल किशन’ ओई बुरहिया के हम करैत छी नमन अपन विपैत केकरा सॅं कहू औ बौआ कियो आन नहि ओ बुरहिया तऽ हमर माए छलीह। अनमोल झा 1970- दूटा बाल कविता गाम नरुआर, जिला मधुबनी। एक दर्जनसँ बेशी कथा, लगभग सए लघुकथा, तीन दर्जनसँ बेशी कविता, किछु गीत, बाल गीत आ रिपोर्ताज आदि विभिन्न पत्रिका, स्मारिका आ विभिन्न संग्रह यथा- “कथा-दिशा”-महाविशेषांक, “श्वेतपत्र”, आ “एक्कैसम शताब्दीक घोषणापत्र” (दुनू संग्रह कथागोष्ठीमे पठित कथाक संग्रह), “प्रभात”-अंक २ (विराटनगरसँ प्रकाशित कथा विशेषांक) आदिमे संग्रहित। अपन गाम बौआ जेतै अपन गाम ओतऽ सँ अनतै बहुते आम एकटा आम दीदीकेँ देतै एकटा आम अपने खेतै एकटा आम काँचे बौआक मामी नाचै। बौआक पापा छै बड़ कसाइ मारलकहेँ बौआक गाल फोड़ि आइ अबै छै बाबूजी देतै घरसँ बैलाइ बाबूक राखि लेब कैडवरी खुआइ। बौआक माइ सेहो कसाइ मारलक हे बौआक पीठ फोड़ि आइ बजबै छी रिक्शा, देब नैहरा बैलाइ बाबूक पोसि लेब दूध-भत्ता खोआइ। मास्टरबो टटीबा सब छै बड़ कसाइ फोड़ि देलक बौआक गत्र-गत्र आइ फिरथु जनपीटा देबनि रस्ता भुलाइ पढ़ौनी ने लिखौनी शिक्षा मित्रक कमाइ। बुच्चीक पपा छै बड़ कसाइ मारलक बुच्चीकेँ लोल फोड़ि आइ अबै छै बबा, काइत पापाक धोलाइ पढ़ि-लिखि बुच्ची भऽ जेतइ बुधियारि। बुच्चीक माइ छै बड़ कसाइ मारलक हे बुच्चीकेँ झोंट तीर आइ अबै छै फल्लमा, देतै नैहरा बैलाइ बुच्ची रानीकेँ राखि लेब छाती लगाइ। मामा गाम बौआ जेतै मामा गाम ओतऽ सँ अनतै पाकल लताम एकटा लताम काँचे बौआक नानी नाचै। बौआक मामा गाममे श्यामजी भाइ जेतै बिदेसर अनतै लाइ खेतै सब मिल लाइ-मिठाइ बाँटि-खुटि खाइ राजा घर जाइ असगर खाइ डोमा घर जाइ। बुच्चीक मामा गाममे बंटी दाइ जेतै मेला, लेतै पाइ किनतै गुड़िया, नचतै आइ खेतै जिलेबी, अनतै लाइ मैयाँ तै ले बीतल जाइ। मामा गाममे पूजा दाइ दू बहिन आ असगर भाइ सब मिल खेलय-पढ़ितो जाइ एलै परीक्षा गद्-गद् भाइ पढ़ै-लिखै मे सभक भलाइ। बौआक मामा गाममे ओम भाइजी आ आस्था दाइ रहै जाइ छै दिल्लीमे, एतै आइ मामा-मामीक गाड़ी पर घुरतै आइ, खेतै मिठाइ। पटना बाली मामी बड़ होसिआरि बौआ मामाकेँ बना देतनि फेहम गे दाइ सोनू दीदी गाम जखन एतै गै माइ बौआ सब मामा गाम जेतै गै दाइ खेलेतै खूब, खेतै मिठाइ। बौआक बड़का मामा-मामी केहन कसाइ अपने खाइ छै रस मलाइ खाइते रहै छै कखनो ने अघाइ नाना-नानीकेँ दै छै नून-मरचाइ नाना-नानी चाहै छै तइयो भलाइ। सब एक दिन बुढ़ हेमे गे दाइ बुढ़बा-बुढ़ियाक कष्ट हुअए ने भाइ सब दिन एक समय रहय ने दाइ समयसँ जे पढ़त से बड़ होसिआरि नै पढ़ने कोना हैब बुधिआरि? राजेश मोहन झा 1981- उपनाम- गुंजन, जन्मस्थान- गाम+पत्रालय- करियन, जिला- समस्तीपुर, हास्य कविताक माध्यमसँ समाजक विगलित दशाक वर्णन। बाल साहित्यमे विशेष रुचि। बाल वि‍शेषांक लेल राजेश मोहन झा कवि‍ता चुट्टी दाइ गे दाइ तोँ बड़ हरजाइ भागेँ ओहि‍ दि‍शि‍ देखेँ जत्ताहि ढेपा गुड़क गुड़कल जाए तोहर चालि‍पर नेना सभ जानथि‍ माय रखलथि‍न कतऽ मि‍ठाइ काया छोट काज छौ मोट बास बनौलेँ केवाड़क ओट जौं काटें बपलहरि‍ छोड़ाबें जहि‍ना मुँहमे पड़ल मि‍रचाइ गणेशक लड़डू महादेवक भंग सि‍नेह तोरा छौ सबहक संग ितल संक्रांति‍ तोरे लेल बनलौ नाचि‍-नाचि‍ कऽ खा लै छेँ लाइ पॉति‍सॅ जाइ छैं पाति‍मे आबेँ नि‍यम गणनाक खूब बुझावे होइछ हल्‍ला उद्यम पटका जौं कोनो नेना एकरा देथि‍ वि‍सराइ। १.रमाकान्‍त राय रमा-बाल कवि‍ता-उल्‍लूक शि‍कारी २.मिथिलेश कुमार झा-बाबाक रोपल गाछ सिनुरिया ३.महाकान्त ठाकुर- किछु बाल कविता १ रमाकान्‍त राय रमा बाल कवि‍ता उल्‍लूक शि‍कारी नन्‍हेँ भाय खेलए चललनि‍ हाथ लेने बन्‍दूक लगलनि‍ दनदन ‘फायर’ करऽ ओ पक्षी देखि‍ उलूक नव लोक, नव चालि‍-चलन नवे-नव बन्‍दूक जानथि‍ नहि‍ ओ गोली दागब गेलनि‍ लक्ष्‍यसँ चूकि‍ उड़ि‍ गेल पक्षी, नन्‍हेँ भाय तँ मुँह लटकौने अएलाह लल्‍लूक पक्षीक शि‍कारी जे उल्‍लूए बनि‍ घुरि‍ अएलाह। २ मिथिलेश कुमार झा 1970- पिता- श्री विश्वनाथ झा, जन्म-12-01-1970 केँ मनपौर(मातृक) मे पैतृक-ग्राम-जगति, पो*-बेनीपट्टी,जिला-मधुबनी, मिथिला, पिन*- 847223 शिक्षा :प्राथमिक धरि- गामहिक विद्यालय मे। मध्य विद्यालय धरि- मध्य विद्यालय, बेनीपट्टी सँ। माध्यमिक धरि- श्री लीलाधर उच्च विद्यालय,बेनीपट्टीसँ इतिहास-प्रतिष्ठाक संग स्नातक-कालिदास विद्यापति साइंस काँलेज उच्चैठ सँ, पत्रकारिता मे डिप्लोमा-पत्रकारिता महाविद्यालय(पत्राचार माध्यम) दिल्ली सँ, कम्प्युटर मे डी.टी.पी ओ बेसिक ज्ञान। रचना: हिन्दी ओ मैथिली मे कविता, गजल, बाल कविता, बाल कथा,साहित्यिक ओ गैर-साहित्यिक निबंध, ललित निबंध, साक्षात्कार, रिपोर्ताज, फीचर आदि। बाबाक रोपल गाछ सिनुरिया पातसँ बेसी लुधकय आम। देखैत हियसगर खूब सुअदगर रसगर गुदगर मिठगर आम। आमिल, अमोट, अँचार-कसौँझी हुअय साल भरिक ओरियान। बहुते दूरमे चतरल-पसरल रखने पुरना गाछिक मान। परसथि बाबी टोला-पड़ोसा भार चङेरा आनहु गाम। जन-बोनिहार उमठि जाइत अछि खा-खा हमर सिनुरिया आम। बाट-बटोही अघा जाइत अछि कोनो साल जाइ ने बाम। सौँसे गाछिक राजा अछि ई बाबा वला सिनुरिया आम। ३ महाकान्त ठाकुर किछु बाल कविता स्नेहक सरगम प्रेमक भाषा प्रेमक आशा सभ करैए प्रेम करब नहि सोझ बोझ बनि लोक रहैए, चाहि रहल सभ पड़ले भेटओ लुब्धल-लुब्धल हमरे भेटओ हमरे भेटओ सभ तकैए। नीक मनुख सुख सभ लय ताकय सदिखन आगू अपन आन संग स्नेहक सरगम खूब बंटैए। अपना सँ पैघक आदर मे सदिखन तत्पर, छोटको भाइ बहीनक सदिखन ध्यान रखैए। खगता भगतसिंहक पढ़ि-पढ़ि बनिहें एहन सिपाही सभतरि लोक करौ वाहवाही एहन संतानक अलगे धाही खगता छैक भगतसिंह चाही। आजादी नहि लोक देखलकै अधिकारक नहि स्वाद चिखलकै पसरल देश मे भ्रष्टाचारी खगता छैक भगतसिंह चाही। पहिने छलै विदेशीक शासन आबक शासक झाड़ै भाषण साँढ़े जकाँ लगाबै ढाही खगता छैक भगत सिंह चाही। अपन भूमि आम गाम मे गाछी छल, दूध दुहैक छै बाछी चल शहरक जिनगी भागम-भाग, गाम अपन लऽ लाठी चल थाल पानि संग लीची जामुन, पान-मखान लऽ माटी चल जन्म भूमि स्वगो सँ सुन्दर, कहलनि बाबा खाँटी चल। भरि पोख कोइली मिठ-मिठ गीत गबैए कौआक देखसी कहाँ काइए। बौआक ठोर बँटैए सभटा, हँसि-हँसि सभ सँ मेल करैए। खन रूसय खन बात बनाबय, झूला-झूलक भाँज पुरैए सोचैछ चाँद तरेगन पकड़ब बाजैछ माँ गै भूख लगैए। भेद-भाव नहि अन्तर जानय, स्नेह दुलारक भाव बँटैए। कोरा कन्हा चढ़ि-चढ़ि घूमय काका-बाबाक पीठ चढ़ैए। स्नेहक भाषा सबहक आदर, लेब-देब भरपूर करैए। ज्ञान दीप विद्यालय मे ज्ञान भेटै छै बौआ-बुच्ची पढ़ि-पढ़ि आउ, की की सिखलौं, की की पढ़लौं, माँ बाबू के रोज सुनाउ। आँखि सँ देखल चीज सँ आगू ज्ञान सँ देखब ब्योंत धराउ, मोनमे गुड़कय बहुतो लड्डू बुद्धि-विवेक संग खाउ खेलाउ। जे चमकैछ सभ सोना नहि अछि, ठोकि बजा कऽ निकहा लाउ, हीरा-मोती सभ नहि चिन्हैछ, विद्याधन लऽ आगू आउ। दुःखक मोटरी माथ दुखाबय, सुख चाही शिक्षित संग पाउ, जत्तहि छैक अविद्या पसरल, ज्ञानक दीपक बार कऽ आउ। डॉ जया वर्मा 1964- जन्म १६.०२.१९६४. एसोसिएट प्रोफेसर, इतिहास, दिल्ली वि.वि.। “महाकाव्य आ पुराणमे नारी” आ “जेन्डर स्टडीज”पर विशेष अध्ययन। श्रीमति शेफालिका वर्माक उपन्यास “नागफाँस”क अंग्रेजी अनुवाद (विदेह ई-पत्रिकामे धारावाहिक रूपे)। बेटी

नेहरु कोनो व्यक्ति नहि एकटा भाव छथि स्वतंत्रता समानता शक्तिक संभार छथि

चाचा नेहरुक कोट लागल गुलाब नेनाक प्रतीक अछि ऊपर सँ कोमल सुगंधि पसारैत मुदा भीतर सँ जे निर्भय आ निडर अछि

नेहरुक नेना इंदिरा प्रियदर्शिनी सन देशक शान अछि बेटी बेटी कें दुलार करू दुतकारू नहि बेटी अर्चना अछि पूजा करू

जाड़क रौद सन बेटी गरमीक  छाहरि  सन बेटी जीवनक गीत संगीत बसैत अछि ओहिमे नहि तँ रसहीन अछि जिनगी

फूल मे मुस्काइत सावनक बरसात सन बेटी झरना सन चंचल आ गतिशील थाकल मोनक चैन अछि बेटी

बाड़ीक लहलहावैत हरियरी अछि बेटी मौन सागरक लहरि मे बजैत संगीत सन बेटी

ईश्वर ओकर रक्षा करू केकरो नजर नहि लागैक माएक प्यार दुलार अछि बेटी

जग केँ आलोकित करवा लेल दीयाक लौ सन चमकैत बेटी अकास मे सूरज सन दीप्त बेटी

बेटी शक्ति दुर्गा सन क्षमा सीताक श्रद्धा राधा सन लक्ष्मीबाइक शौर्य सँ भरल बेटी

बेटी बेड़ी नहि स्वच्छंद बयार अछि  नहि बान्हु कोनो सीमा मे अनंत आकासक सीमा स्वयं बनाओत  बेटी

छठि पोखरिक  गीत पाँच पुत्तर अन्न - धन लक्ष्मी धियवा मंगबो जरुर

नेहरुक बाल दिवसक सन्देश बेटा बेटी सभ बराबर सभ एके ईश्वरक संतान फेर किएक करैत अछि फर्क नादान इंसान मिथिला कला संगीत १.श्वेता झा चौधरी २.श्वेता झा (सिंगापुर) १ श्वेता झा चौधरी गाम सरिसव-पाही, ललित कला आ गृहविज्ञानमे स्नातक। मिथिला चित्रकलामे सर्टिफिकेट कोर्स। कला प्रदर्शिनी: एक्स.एल.आर.आइ., जमशेदपुरक सांस्कृतिक कार्यक्रम, ग्राम-श्री मेला जमशेदपुर, कला मन्दिर जमशेदपुर ( एक्जीवीशन आ वर्कशॉप)। कला सम्बन्धी कार्य: एन.आइ.टी. जमशेदपुरमे कला प्रतियोगितामे निर्णायकक रूपमे सहभागिता, २००२-०७ धरि बसेरा, जमशेदपुरमे कला-शिक्षक (मिथिला चित्रकला), वूमेन कॉलेज पुस्तकालय आ हॉटेल बूलेवार्ड लेल वाल-पेंटिंग। प्रतिष्ठित स्पॉन्सर: कॉरपोरेट कम्युनिकेशन्स, टिस्को; टी.एस.आर.डी.एस, टिस्को; ए.आइ.ए.डी.ए., स्टेट बैंक ऑफ इण्डिया, जमशेदपुर; विभिन्न व्यक्ति, हॉटेल, संगठन आ व्यक्तिगत कला संग्राहक। हॉबी: मिथिला चित्रकला, ललित कला, संगीत आ भानस-भात। पनिभरनी २.श्वेता झा (सिंगापुर) बालानां कृते तुनिशा प्रियम, माँक नाम- स्व. निभा रानी, पिता- डॉ. रमेश कुमार राय, नाना- प्रो. शिवनाथ मंडार, विभागाध्यक्ष भूगोल, बलिराम भगत कॉलेज, समस्तीपुर। नानी- श्रीमति निरुपमा पटेल, प्रधानाध्यापिका, म.वि.गाँधीपार्क, समस्तीपुर। जन्मतिथि- २०-१०-१९९८ पैतृक गाम- मँझौलिया, प्रखण्ड- बोचहा, जिला मुजफ्फरपुर, मातृक- ग्राम-धोबियाही, पोस्ट- बहेड़ी, जिला-समस्तीपुर। छात्रा- कक्षा- सप्तम “अ”, डी.ए.वी. स्कूल, समस्तेपुर। आदर्श- नानाजी। आवास, आशियाना भवन, रोड नं.०२, आदर्शनगर, समस्तीपुर। किछु चित्र बच्चा लोकनि द्वारा स्मरणीय श्लोक १.प्रातः काल ब्रह्ममुहूर्त्त (सूर्योदयक एक घंटा पहिने) सर्वप्रथम अपन दुनू हाथ देखबाक चाही, आ’ ई श्लोक बजबाक चाही। कराग्रे वसते लक्ष्मीः करमध्ये सरस्वती। करमूले स्थितो ब्रह्मा प्रभाते करदर्शनम्॥ करक आगाँ लक्ष्मी बसैत छथि, करक मध्यमे सरस्वती, करक मूलमे ब्रह्मा स्थित छथि। भोरमे ताहि द्वारे करक दर्शन करबाक थीक। २.संध्या काल दीप लेसबाक काल- दीपमूले स्थितो ब्रह्मा दीपमध्ये जनार्दनः। दीपाग्रे शङ्करः प्रोक्त्तः सन्ध्याज्योतिर्नमोऽस्तुते॥ दीपक मूल भागमे ब्रह्मा, दीपक मध्यभागमे जनार्दन (विष्णु) आऽ दीपक अग्र भागमे शङ्कर स्थित छथि। हे संध्याज्योति! अहाँकेँ नमस्कार। ३.सुतबाक काल- रामं स्कन्दं हनूमन्तं वैनतेयं वृकोदरम्। शयने यः स्मरेन्नित्यं दुःस्वप्नस्तस्य नश्यति॥ जे सभ दिन सुतबासँ पहिने राम, कुमारस्वामी, हनूमान्, गरुड़ आऽ भीमक स्मरण करैत छथि, हुनकर दुःस्वप्न नष्ट भऽ जाइत छन्हि। ४. नहेबाक समय- गङ्गे च यमुने चैव गोदावरि सरस्वति। नर्मदे सिन्धु कावेरि जलेऽस्मिन् सन्निधिं कुरू॥ हे गंगा, यमुना, गोदावरी, सरस्वती, नर्मदा, सिन्धु आऽ कावेरी  धार। एहि जलमे अपन सान्निध्य दिअ। ५.उत्तरं यत्समुद्रस्य हिमाद्रेश्चैव दक्षिणम्। वर्षं तत् भारतं नाम भारती यत्र सन्ततिः॥ समुद्रक उत्तरमे आऽ हिमालयक दक्षिणमे भारत अछि आऽ ओतुका सन्तति भारती कहबैत छथि। ६.अहल्या द्रौपदी सीता तारा मण्डोदरी तथा। पञ्चकं ना स्मरेन्नित्यं महापातकनाशकम्॥ जे सभ दिन अहल्या, द्रौपदी, सीता, तारा आऽ मण्दोदरी, एहि पाँच साध्वी-स्त्रीक स्मरण करैत छथि, हुनकर सभ पाप नष्ट भऽ जाइत छन्हि। ७.अश्वत्थामा बलिर्व्यासो हनूमांश्च विभीषणः। कृपः परशुरामश्च सप्तैते चिरञ्जीविनः॥ अश्वत्थामा, बलि, व्यास, हनूमान्, विभीषण, कृपाचार्य आऽ परशुराम- ई सात टा चिरञ्जीवी कहबैत छथि। ८.साते भवतु सुप्रीता देवी शिखर वासिनी उग्रेन तपसा लब्धो यया पशुपतिः पतिः। सिद्धिः साध्ये सतामस्तु प्रसादान्तस्य धूर्जटेः जाह्नवीफेनलेखेव यन्यूधि शशिनः कला॥ ९. बालोऽहं जगदानन्द न मे बाला सरस्वती। अपूर्णे पंचमे वर्षे वर्णयामि जगत्त्रयम् ॥ १०. दूर्वाक्षत मंत्र(शुक्ल यजुर्वेद अध्याय २२, मंत्र २२) आ ब्रह्मन्नित्यस्य प्रजापतिर्ॠषिः। लिंभोक्त्ता देवताः। स्वराडुत्कृतिश्छन्दः। षड्जः स्वरः॥ आ ब्रह्म॑न् ब्राह्म॒णो ब्र॑ह्मवर्च॒सी जा॑यता॒मा रा॒ष्ट्रे रा॑ज॒न्यः शुरे॑ऽइषव्यो॒ऽतिव्या॒धी म॑हार॒थो जा॑यतां॒ दोग्ध्रीं धे॒नुर्वोढा॑न॒ड्वाना॒शुः सप्तिः॒ पुर॑न्धि॒र्योवा॑ जि॒ष्णू र॑थे॒ष्ठाः स॒भेयो॒ युवास्य यज॑मानस्य वी॒रो जा॒यतां निका॒मे-नि॑कामे नः प॒र्जन्यों वर्षतु॒ फल॑वत्यो न॒ऽओष॑धयः पच्यन्तां योगेक्ष॒मो नः॑ कल्पताम्॥२२॥ मन्त्रार्थाः सिद्धयः सन्तु पूर्णाः सन्तु मनोरथाः। शत्रूणां बुद्धिनाशोऽस्तु मित्राणामुदयस्तव। ॐ दीर्घायुर्भव। ॐ सौभाग्यवती भव। हे भगवान्। अपन देशमे सुयोग्य आ’ सर्वज्ञ विद्यार्थी उत्पन्न होथि, आ’ शुत्रुकेँ नाश कएनिहार सैनिक उत्पन्न होथि। अपन देशक गाय खूब दूध दय बाली, बरद भार वहन करएमे सक्षम होथि आ’ घोड़ा त्वरित रूपेँ दौगय बला होए। स्त्रीगण नगरक नेतृत्व करबामे सक्षम होथि आ’ युवक सभामे ओजपूर्ण भाषण देबयबला आ’ नेतृत्व देबामे सक्षम होथि। अपन देशमे जखन आवश्यक होय वर्षा होए आ’ औषधिक-बूटी सर्वदा परिपक्व होइत रहए। एवं क्रमे सभ तरहेँ हमरा सभक कल्याण होए। शत्रुक बुद्धिक नाश होए आ’ मित्रक उदय होए॥ मनुष्यकें कोन वस्तुक इच्छा करबाक चाही तकर वर्णन एहि मंत्रमे कएल गेल अछि। एहिमे वाचकलुप्तोपमालड़्कार अछि। अन्वय- ब्रह्म॑न् - विद्या आदि गुणसँ परिपूर्ण ब्रह्म रा॒ष्ट्रे - देशमे ब्र॑ह्मवर्च॒सी-ब्रह्म विद्याक तेजसँ युक्त्त आ जा॑यतां॒- उत्पन्न होए रा॑ज॒न्यः-राजा शुरे॑ऽ–बिना डर बला इषव्यो॒- बाण चलेबामे निपुण ऽतिव्या॒धी-शत्रुकेँ तारण दय बला म॑हार॒थो-पैघ रथ बला वीर दोग्ध्रीं-कामना(दूध पूर्ण करए बाली) धे॒नुर्वोढा॑न॒ड्वाना॒शुः धे॒नु-गौ वा वाणी र्वोढा॑न॒ड्वा- पैघ बरद ना॒शुः-आशुः-त्वरित सप्तिः॒-घोड़ा पुर॑न्धि॒र्योवा॑- पुर॑न्धि॒- व्यवहारकेँ धारण करए बाली र्योवा॑-स्त्री जि॒ष्णू-शत्रुकेँ जीतए बला र॑थे॒ष्ठाः-रथ पर स्थिर स॒भेयो॒-उत्तम सभामे युवास्य-युवा जेहन यज॑मानस्य-राजाक राज्यमे वी॒रो-शत्रुकेँ पराजित करएबला निका॒मे-नि॑कामे-निश्चययुक्त्त कार्यमे नः-हमर सभक प॒र्जन्यों-मेघ वर्षतु॒-वर्षा होए फल॑वत्यो-उत्तम फल बला ओष॑धयः-औषधिः पच्यन्तां- पाकए योगेक्ष॒मो-अलभ्य लभ्य करेबाक हेतु कएल गेल योगक रक्षा नः॑-हमरा सभक हेतु कल्पताम्-समर्थ होए ग्रिफिथक अनुवाद- हे ब्रह्मण, हमर राज्यमे ब्राह्मण नीक धार्मिक विद्या बला, राजन्य-वीर,तीरंदाज, दूध दए बाली गाय, दौगय बला जन्तु, उद्यमी नारी होथि। पार्जन्य आवश्यकता पड़ला पर वर्षा देथि, फल देय बला गाछ पाकए, हम सभ संपत्ति अर्जित/संरक्षित करी। 8.VIDEHA FOR NON RESIDENTS 8.1.Original Poem in Maithili by Gajendra Thakur Translated into English by Jyoti Jha Chaudhary- Fearful Souvenir 8.2.Maithili Short-story “Tashkar” by Gajendra Thakur re-written in English by the author himself. Original Poem in Maithili by Gajendra Thakur Translated into English by Jyoti Jha Chaudhary

Jyoti Jha Chaudhary, Date of Birth: December 30 1978,Place of Birth- Belhvar (Madhubani District), Education: Swami Vivekananda Middle School, Tisco Sakchi Girls High School, Mrs KMPM Inter College, IGNOU, ICWAI (COST ACCOUNTANCY); Residence- LONDON, UK; Father- Sh. Shubhankar Jha, Jamshedpur; Mother- Smt. Sudha Jha- Shivipatti. Jyoti received editor's choice award from www.poetry.comand her poems were featured in front page of www.poetrysoup.com for some period.She learnt Mithila Painting under Ms. Shveta Jha, Basera Institute, Jamshedpur and Fine Arts from Toolika, Sakchi, Jamshedpur (India). Her Mithila Paintings have been displayed by Ealing Art Group at Ealing Broadway, London.

Gajendra Thakur (b. 1971) is the editor of Maithili ejournal “Videha” that can be viewed at http://www.videha.co.in/ . His poem, story, novel, research articles, epic – all in Maithili language are lying scattered and is in print in single volume by the title “KurukShetram.” He can be reached at his email: ggajendra@airtelmail.in

Fearful Souvenir (Part-2) Eshitva or Vashitva The eight divine accomplishments of the Saptarshi (seven stars) Finding nine celestial treasures Lotus, Kuber’s White Lotus, Conch, a sea monster (Kamdev, God of love) Tortoise, Mukund (Vishnu), Jasmine, Blue Sapphire, A large number of one million; Basis of  dashavataar (ten incarnations of the Lord Vishnu) The Matsyavataar (incarnation in fish) saved the Vedas of Saptarshi And the family of Manu The tortoise form of Lord Vishnu saved the mountain of Mandaar And Vasuki’s body churned the sea to get nectar of immortality The boar incarnation brought the earth Out of the tough four loops of Ambunidhi After killing Hiranyaksh The God Narsinha saved Prahlaad By killing Hiranyakashyap Vaman killed the Baali By covering the Earth in two steps And the Demon king in the third Parashuraam, Ram and Krishna Had slain the demons And Buddha changed that concept What was surprising if His statue, Was dropped down by the children of Devadatta Alas! Nobody can save Bamyan Neither Kalki nor Maitreyi Come soon riding the White Sea To bring revolution In fourteen Bhuvans and thirteen Worlds Within the noises of this world The childhood is frightened But now the science interrupted in mind This is the theory of aging Dashavataar is the actual New theory of development Fish, Tortoise then Boar Then Narsimh then Vaman Interrelated development of human face That was being searched Giving the name of Dashavataar Was that Bharat, who had stopped the way of scientific concepts? The link was broken in finding Kalki (the tenth incarnation) Oh !  Had Maitreyi come to disclose that link? It seems I found the edge of the loop I was unnecessarily scared to get sixteen remedies Ved, Puran, Ramayan, Mahabharat, Economics, Those knowledge of Leelavati- Bhamati by Aryabhatt Characteristics of Political Sceince, Mathematics, Physics The lesson of action Was blown away by the superstitions Where Philosophy has become unanswered And Science has given some solutions Then I will hold the end of this, dear master! That vanished puzzles Not far away The circumference is of course small I will increase its circumference The contractor of the Philosophy will again change The Philosophy into the Religion and The Religion into the definitions of different heavens and hells The Physics and Astronomy have made Astrology The Science is turned into superstitions When answers will be manipulated Then let the question be unanswered Everyone has forwarded but Bharat-Tanay is behind Also in Lilawati as well as in Bhanumati How will he find the difference of caste system The essay of Vyaasji in admiration of Eklavya But none had perpetuated the work The gap of millennium created casteism Science and Art Hunger and food All have turned racist, how will they be free I recalled the differentiated rows in the feast The repeated offerings of Khaja-Laddu in the first row But was served once in the second row Stopping the way of Bhagirathi of Art and Science Getting obstacle of Rahu I recall the funeral of my Father The day long victimization by the Kantaha Brahmin And the exhausting Gadur Puran in the evening The changes in celestial positions And the darkness of the eclipse Have become unholy to get money The defence lesson of Ramayana When had it taught the lesson of violent spirituality The lessons of  Vyaas, Karna, Eklavya, Krishna About social equality Are still alive Not yet vanished The liberal thoughts from before two millenniums Why had they dried up As deficient as the flow of Saraswati No sooner when the Goddess of Knowledge had left She dried up without water  without intellect Will she come back, in disguise, To our country of Bharat? Will this awful discussion ever end? Or, leaving the lesson of Eklavya, Karna, Krishna, We will start learning ekka-dukka-panja-chhakka Same as Yudhisthir and Shakuni Shakuni will change kachcha baarah to pakka baarah And will win with pau-baarah How can fate be directed by The three dices and four coloured pawns The four nests of Chaupad and twenty four positions in each nest Will it destruct the Indian homes? If I had met Yudhisthir, I would be telling him You should have played the Chaupad of four players Where rules are easier You complicated the entertaining game of two You hadn’t played the game rather You had played with the country and the women That is why this complaint You had committed the crime bigger than Shakuni had He, whose name is Laalchadi Is the Satghariya Tee Tee I used to play during Mango season I also played dices with my wife After Dwiragman till Bharfori Oh Yudhisthirs of descendants of  Bharat Don’t play this game day-night And teach every one this Complementing the music Notes removing the fearful souvenir Give me the boon of good thoughts So that I can sing the prayers The Kali depicts dark This is not the full truth The voice of yours is white That will be the new change Eliminating the cloud, fear has gone The sky thundered to raise The fire Keeping deep in the heart Brain stopped, ash is poured Chank trumpet announces braveness Remover of fear With the stick of dreams of memories I will break I will churn the world With my mighty hands, at the gate The taste of feast of two rows in the village I will release wisdom and prudence Rundmalmasani I will break the discrimination of two rows Or I will run away to the city Village will remain village Or will be sunk in the Bhagirathi One who will stop the flow of storm like Bhagirathi Will be sunk and will sink the village of discriminated two rows Because of own misdeeds The pleasant grounds of forests The smiling jungles The perplexed flower surrounded by spines Philosophy is engaged in finding Brahmins Scattered earth The Ganges- narrowed and exhausted Not flawless The delicate facts about Science and Maths Were misfortune of Tapini The city of Buddha will be established The God, the heaven – all a matter of humour The people of village Peerless views New songs In the village One who has given me exile in the village Because of his own thoughts I will give him breathes In return For sake of own views Who played the games in two millenniums His village is like a forest Buddha’s place, which was made a spine Will be adorned with flowers In the game of two, For the views, I will throw extra dices In the four eras of the Chaupad of the millennium I will discover even those which are unknown But what is known Let me justify those first God’s existence without any limits or bonds Then at what basis did he make the houses And if he didn’t have right to choose the basis Then, what rules did he make for the universe Does this mean that with the end of the sun, the moon and the stars That creator will also die according to the rule And if this is also not true Then what reason did the God have For creating this universe The self created universe The God of the universe And mind of the Master of that God What thoughts are going on in that mind? The universe filled with sapphires and lotuses, And in the middle of this Our sun is a simple star We are living creatures of merely a small planet In its dynasty I am thinking to destroy this creation with a weapon. Maithili Short-story “Tashkar” by Gajendra Thakur re-written in English by the author himself. Gajendra Thakur (b. 1971) is the editor of Maithili ejournal “Videha” that can be viewed at http://www.videha.co.in/ . His poem, story, novel, research articles, epic – all in Maithili language are lying scattered and is in print in single volume by the title “KurukShetram.” He can be reached at his email: ggajendra@airtelmail.in The Robber 1 Inside Shaligram-stone a hole exists, the black shaligram stone is found in Narmada River. In Jamsam village everything has changed, from Dihbar-worship place of village deity to everything, but something or other symbolic things are present. But any symbolic existence of my love-tale is not present here. The plantation and land-jungle, everything has thinned. One hundred years. That mango orchard of self-grown mango seeds was full of underground passage-holes of animals. It was full of different kinds of birds and small-big animals. I was child. From Jyestha month to Agahan month I and Malati used to gossip around the khurchania-creeper. If I went there in phalgun-chaitra month then we used to talk endlessly near lavanglata bush. Malkoka, Kumud, Bhent, Kamalgatta-root, reddish-Bisadh, we were in search of these; wandering in mud and muddy-water. Bare-footed, we hopped around thorny places and played game of seven houses in mango orchard. I and Malati used to secure our imaginary home with karbir-bush. Malati whole year used to preserve the seeds of flowers- one-leaf flower, two-leaf flower and one having big woven hair muscle-leaf flower. Malati was also of my age. My mother informed me that Malati was six month’s older than me, but my father used to tell that Malati was six month’s younger than me. And why he used to tell this, I came to know later on. During the whole mango season, I and Malati guarded the mango-orchard. But before the onset of night my maternal-uncle Bachhru and Malati’s father Khagnathji would come to orchard for guarding it during night. But here also there is no symbolic presence of our love-tale. Our means- of Keshav and of Malati. But there at pucca village-deity place I am looking for black shaligram-stone. The Shaligram stone- have holed inside. I placed the stone stealthily here somewhere. The villagers had spent a lot for making the dome of this village-deity place. Earlier here there was nothing. The stairways of pond had been constructed by the king and beside that the pucca temple- only these two. But the poor king could not worship here. Out of shame he did not come to this village. 2 I, Keshav, from village Mangarauni, of Naraune Sulhane root, gotra- Parashar, son of poet Madhurapati. Malati was the daughter of Khagnath Jha of Mandar Sihaul root, Kashyap Gotra of village Jamsam. Khagnathji and my maternal uncle Bachhru were tied with friendship-band. Jamsam was the village of my maternal uncle. The maternal-uncle was well-to-do, we were poor. So one month during summer vacation and fifteen days from Durga Pooja till Chhath Pooja; I used to stay at maternal-uncle’s village. During summer vacation I used to guard mango orchard; from ripening of white-mango variety till ripening of Kalkatia mango variety. And during the Durga Pooja we enjoyed the pooja from sixth date till the immersion ceremony. Again during Deepawali festival, inflamed the leaves of bamboo and returned to my village during Chhath festival. And in between I occasionally visited my maternal-uncle’s village. With Malati I often quarreled, I was in fourth class perhaps. During summer festival I had been to my maternal uncle’s mango orchard. On some topic I had stopped talking to Malati, as I was angry. However I was softened by Malati and she softened me in an unusual way. -I am sorry for that.. - For what? -For that over which we quarreled. But that topic was neither remembered by me nor by her. And I never quarreled with Malati on any topic. She, however, often used to be angry, then I asked her that on which matter she has stopped talking to me. And if that matter is not remembered then why this quarrel all about? After summer vacationcame Durga Pooja and after Durga Pooja vacation I waited for summer vacation. And from when this wait began I did not remember. 3 Father did share-cropping in village. After middle school there was no school for higher education in vicinity. All the Samskrit schools had closed. So there was no vacation for me. Yearlong, either it was work or vacation. My mother’s parents were alive. My mother was respectfully brought to her father’s place now and then. I also used to visit my maternal uncle’s village in two to four months. There were many problems at village. Not knowing what the basic concept was, I often heard the talk of preservation of Panji from the mouth of my father. And this preservation was only possible if I would be married to Malati, which also I heard from him. Malati was my friend. But we distanced after the preservation of Panji topic began. The ease with which we met suddenly started to vanish. While seeing her I started seeing the face of a wife, that should had gone in her mind also. 4 Bachhru Mama had come to my village. Madhurapati- Bachhru, in your hands now is all my respect. The daughter of Khagnath is simply appropriate for Keshav. She is beautiful and good-natured, but our Keshav is also magnificent. Both are of same age but Malati is younger by some days. Oh. You do know that my father gave seven hundred rupees to the bride’s father and then my marriage was solemnized and my father had Panji. But we do not have land now. Yesterday Panjikar came on mare, mare intoxicated with hubble-bubble. He told at once that only Khagnath’s daughter is available, while he prepared the list of probables. And if that does not happen, I would be debared from east-coast Shrotriya’s group. Bachhru- I am asking to Khagnath. He is my friend, but what is inside his mind that only he will tell. And I did not know why my heart had filled with love. I had accompanied my maternal-uncle. 5 Malati- Keshav. If you are married to somebody else then how we would meet. Keshav- If you are married to somebody else then how you would ask these meaningless questions? Malati- But you understood one thing? Yesterday your maternal-uncle was talking to my father regarding marriage of ours! Keshav- Then? Malati- No, all was well but then a messenger from the King of Darbhanga came and told that there was a message from the King. Keshav- What was the message from the king? Malati- I do not know. But the messenger told my father not to finalise my marriage for sometime. Keshav- You are so beautiful. King must have seen some boy for you. Malati- I do not know… 6 The caravan of the minister of the King in front of Khagnathji’s house! What change was brought in these two days? That messenger passed on some message perhaps. So Khagnathji is in such a hurry now, for the marriage of his daughter! See the swiftness. People in large numbers, all are engaged in the welcome-ceremony. And I too was observing everything. By evening my father had also come. There went the minister’s caravan and my father’s hand touched the forehead. And he went into silence. Khagnath was also silent. King has sent the proposal of his maaiage with Malati. King Bireshwar Singh. What a shame! He must have been over forty years of age and the proposal of marriage with this thirteen-fourteen years old girl? What was tha status of Khagnathji, how he can oppose the proposal? My father was anxious; the Panji would not be preserved? On that day in the evening I met Malati near the corner of her house. Her big eyes, like Karjani, were swollen, like these had wept without console for hours. What I talked to her, I do not remember. Yes, but in the end I had told her that everything would be alright. 7 In Jamsam village the girl was solemnized for King Bireshwar Singh. In Jamsam village a pond was digged. Beside the pond a temple was constructed, how the king would worship in any other’s temple? But I, Keshav, was the son of Poet Madhurapati! The marriage date came nearer. There was no other marriage date during that season. And on that evening I had already talked everything to Malati. On wooden cart the front press; and backside is unstable. The press on front is good because if it does not happen then the backside would be unstable and the cart would tumble. But I balanced the backside. I waited for Malati near the bamboo trees. She came and sat on the cart. Whoever saw me on the road did not talk to me for fear that the cart would tumble. She saw a colourful Patrangi bird and nearly exclaimed- I put my fingers on her lips. I brought Malati to my village. The dhoti was being coloured. Somebody came from Malati’s village to enquire about Malati. I captured and kept that person. “And who would perform the ceremony of Kanyadan from bride’s side”- when this question arose, he was brought in front. “He is from bride’s village so he would perform kanyadaan”. I put down the leather Salamshahi shoe, wore dhoti and performed the marriage rites. The vermillon-ceremony, putting vermillon on the head of Malati was written to be performed only with my hand. 8 Now what King Bireshwar Singh would do? He called the Panjikar and ordered ordered to put the derogatory title “Tashkar”- the robber- before my name in Panji. But Madhurapati was full with pride for his son. Tiger’s son again a tiger! Panji and water both go downward. But after Tashkar Keshav marries Khagnath Jha of Srikant Jha Panji’s daughter, Madhurapati’s shrotriya category would remain existent. And after one hundred years a play is going to be performed in this village; Sultana- the robber! And I, Tashkar Keshav, from root Mangrauni Naraune Sulhani of Parashar Gotra, son of Poet Madhurapati, am looking for any symbol of my love-tale in this village Jamsam. But only king Bireshwar Singh’s that pond and now dilapidated temple could be seen. Poor guy, he did not come to this village out of shame. This pond and that dilapidated temple are the remains of our love. Input: (कोष्ठकमे देवनागरी, मिथिलाक्षर किंवा फोनेटिक-रोमनमे टाइप करू। Input in Devanagari, Mithilakshara or Phonetic-Roman.) Output: (परिणाम देवनागरी, मिथिलाक्षर आ फोनेटिक-रोमन/ रोमनमे। Result in Devanagari, Mithilakshara and Phonetic-Roman/ Roman.) English to Maithili Maithili to English इंग्लिश-मैथिली-कोष / मैथिली-इंग्लिश-कोष  प्रोजेक्टकेँ आगू बढ़ाऊ, अपन सुझाव आ योगदान ई-मेल द्वारा ggajendra@videha.com पर पठाऊ। Top of Form विदेहक मैथिली-अंग्रेजी आ अंग्रेजी मैथिली कोष (इंटरनेटपर पहिल बेर सर्च-डिक्शनरी) एम.एस. एस.क्यू.एल. सर्वर आधारित -Based on ms-sql server Maithili-English and English-Maithili Dictionary. १.भारत आ नेपालक मैथिली भाषा-वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक शैली आ २.मैथिलीमे भाषा सम्पादन पाठ्यक्रम १.नेपाल आ भारतक मैथिली भाषा-वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक शैली

अ.नेपालक मैथिली भाषा वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक  उच्चारण आ लेखन शैली (भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक धारणाकेँ पूर्ण रूपसँ सङ्ग लऽ निर्धारित) मैथिलीमे उच्चारण तथा लेखन १.पञ्चमाक्षर आ अनुस्वार: पञ्चमाक्षरान्तर्गत ङ, ञ, ण, न एवं म अबैत अछि। संस्कृत भाषाक अनुसार शब्दक अन्तमे जाहि वर्गक अक्षर रहैत अछि ओही वर्गक पञ्चमाक्षर अबैत अछि। जेना- अङ्क (क वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ङ् आएल अछि।) पञ्च (च वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ञ् आएल अछि।) खण्ड (ट वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ण् आएल अछि।) सन्धि (त वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे न् आएल अछि।) खम्भ (प वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे म् आएल अछि।) उपर्युक्त बात मैथिलीमे कम देखल जाइत अछि। पञ्चमाक्षरक बदलामे अधिकांश जगहपर अनुस्वारक प्रयोग देखल जाइछ। जेना- अंक, पंच, खंड, संधि, खंभ आदि। व्याकरणविद पण्डित गोविन्द झाक कहब छनि जे कवर्ग, चवर्ग आ टवर्गसँ पूर्व अनुस्वार लिखल जाए तथा तवर्ग आ पवर्गसँ पूर्व पञ्चमाक्षरे लिखल जाए। जेना- अंक, चंचल, अंडा, अन्त तथा कम्पन। मुदा हिन्दीक निकट रहल आधुनिक लेखक एहि बातकेँ नहि मानैत छथि। ओ लोकनि अन्त आ कम्पनक जगहपर सेहो अंत आ कंपन लिखैत देखल जाइत छथि। नवीन पद्धति किछु सुविधाजनक अवश्य छैक। किएक तँ एहिमे समय आ स्थानक बचत होइत छैक। मुदा कतोक बेर हस्तलेखन वा मुद्रणमे अनुस्वारक छोट सन बिन्दु स्पष्ट नहि भेलासँ अर्थक अनर्थ होइत सेहो देखल जाइत अछि। अनुस्वारक प्रयोगमे उच्चारण-दोषक सम्भावना सेहो ततबए देखल जाइत अछि। एतदर्थ कसँ लऽ कऽ पवर्ग धरि पञ्चमाक्षरेक प्रयोग करब उचित अछि। यसँ लऽ कऽ ज्ञ धरिक अक्षरक सङ्ग अनुस्वारक प्रयोग करबामे कतहु कोनो विवाद नहि देखल जाइछ। २.ढ आ ढ़ : ढ़क उच्चारण “र् ह”जकाँ होइत अछि। अतः जतऽ “र् ह”क उच्चारण हो ओतऽ मात्र ढ़ लिखल जाए। आन ठाम खाली ढ लिखल जएबाक चाही। जेना- ढ = ढाकी, ढेकी, ढीठ, ढेउआ, ढङ्ग, ढेरी, ढाकनि, ढाठ आदि। ढ़ = पढ़ाइ, बढ़ब, गढ़ब, मढ़ब, बुढ़बा, साँढ़, गाढ़, रीढ़, चाँढ़, सीढ़ी, पीढ़ी आदि। उपर्युक्त शब्द सभकेँ देखलासँ ई स्पष्ट होइत अछि जे साधारणतया शब्दक शुरूमे ढ आ मध्य तथा अन्तमे ढ़ अबैत अछि। इएह नियम ड आ ड़क सन्दर्भ सेहो लागू होइत अछि। ३.व आ ब : मैथिलीमे “व”क उच्चारण ब कएल जाइत अछि, मुदा ओकरा ब रूपमे नहि लिखल जएबाक चाही। जेना- उच्चारण : बैद्यनाथ, बिद्या, नब, देबता, बिष्णु, बंश, बन्दना आदि। एहि सभक स्थानपर क्रमशः वैद्यनाथ, विद्या, नव, देवता, विष्णु, वंश, वन्दना लिखबाक चाही। सामान्यतया व उच्चारणक लेल ओ प्रयोग कएल जाइत अछि। जेना- ओकील, ओजह आदि। ४.य आ ज : कतहु-कतहु “य”क उच्चारण “ज”जकाँ करैत देखल जाइत अछि, मुदा ओकरा ज नहि लिखबाक चाही। उच्चारणमे यज्ञ, जदि, जमुना, जुग, जाबत, जोगी, जदु, जम आदि कहल जाएबला शब्द सभकेँ क्रमशः यज्ञ, यदि, यमुना, युग, यावत, योगी, यदु, यम लिखबाक चाही। ५.ए आ य : मैथिलीक वर्तनीमे ए आ य दुनू लिखल जाइत अछि। प्राचीन वर्तनी- कएल, जाए, होएत, माए, भाए, गाए आदि। नवीन वर्तनी- कयल, जाय, होयत, माय, भाय, गाय आदि। सामान्यतया शब्दक शुरूमे ए मात्र अबैत अछि। जेना एहि, एना, एकर, एहन आदि। एहि शब्द सभक स्थानपर यहि, यना, यकर, यहन आदिक प्रयोग नहि करबाक चाही। यद्यपि मैथिलीभाषी थारू सहित किछु जातिमे शब्दक आरम्भोमे “ए”केँ य कहि उच्चारण कएल जाइत अछि। ए आ “य”क प्रयोगक सन्दर्भमे प्राचीने पद्धतिक अनुसरण करब उपयुक्त मानि एहि पुस्तकमे ओकरे प्रयोग कएल गेल अछि। किएक तँ दुनूक लेखनमे कोनो सहजता आ दुरूहताक बात नहि अछि। आ मैथिलीक सर्वसाधारणक उच्चारण-शैली यक अपेक्षा एसँ बेसी निकट छैक। खास कऽ कएल, हएब आदि कतिपय शब्दकेँ कैल, हैब आदि रूपमे कतहु-कतहु लिखल जाएब सेहो “ए”क प्रयोगकेँ बेसी समीचीन प्रमाणित करैत अछि। ६.हि, हु तथा एकार, ओकार : मैथिलीक प्राचीन लेखन-परम्परामे कोनो बातपर बल दैत काल शब्दक पाछाँ हि, हु लगाओल जाइत छैक। जेना- हुनकहि, अपनहु, ओकरहु, तत्कालहि, चोट्टहि, आनहु आदि। मुदा आधुनिक लेखनमे हिक स्थानपर एकार एवं हुक स्थानपर ओकारक प्रयोग करैत देखल जाइत अछि। जेना- हुनके, अपनो, तत्काले, चोट्टे, आनो आदि। ७.ष तथा ख : मैथिली भाषामे अधिकांशतः षक उच्चारण ख होइत अछि। जेना- षड्यन्त्र (खड़यन्त्र), षोडशी (खोड़शी), षट्कोण (खटकोण), वृषेश (वृखेश), सन्तोष (सन्तोख) आदि। ८.ध्वनि-लोप : निम्नलिखित अवस्थामे शब्दसँ ध्वनि-लोप भऽ जाइत अछि: (क) क्रियान्वयी प्रत्यय अयमे य वा ए लुप्त भऽ जाइत अछि। ओहिमे सँ पहिने अक उच्चारण दीर्घ भऽ जाइत अछि। ओकर आगाँ लोप-सूचक चिह्न वा विकारी (’ / ऽ) लगाओल जाइछ। जेना- पूर्ण रूप : पढ़ए (पढ़य) गेलाह, कए (कय) लेल, उठए (उठय) पड़तौक। अपूर्ण रूप : पढ़’ गेलाह, क’ लेल, उठ’ पड़तौक। पढ़ऽ गेलाह, कऽ लेल, उठऽ पड़तौक। (ख) पूर्वकालिक कृत आय (आए) प्रत्ययमे य (ए) लुप्त भऽ जाइछ, मुदा लोप-सूचक विकारी नहि लगाओल जाइछ। जेना- पूर्ण रूप : खाए (य) गेल, पठाय (ए) देब, नहाए (य) अएलाह। अपूर्ण रूप : खा गेल, पठा देब, नहा अएलाह। (ग) स्त्री प्रत्यय इक उच्चारण क्रियापद, संज्ञा, ओ विशेषण तीनूमे लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना- पूर्ण रूप : दोसरि मालिनि चलि गेलि। अपूर्ण रूप : दोसर मालिन चलि गेल। (घ) वर्तमान कृदन्तक अन्तिम त लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना- पूर्ण रूप : पढ़ैत अछि, बजैत अछि, गबैत अछि। अपूर्ण रूप : पढ़ै अछि, बजै अछि, गबै अछि। (ङ) क्रियापदक अवसान इक, उक, ऐक तथा हीकमे लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना- पूर्ण रूप: छियौक, छियैक, छहीक, छौक, छैक, अबितैक, होइक। अपूर्ण रूप : छियौ, छियै, छही, छौ, छै, अबितै, होइ। (च) क्रियापदीय प्रत्यय न्ह, हु तथा हकारक लोप भऽ जाइछ। जेना- पूर्ण रूप : छन्हि, कहलन्हि, कहलहुँ, गेलह, नहि। अपूर्ण रूप : छनि, कहलनि, कहलौँ, गेलऽ, नइ, नञि, नै। ९.ध्वनि स्थानान्तरण : कोनो-कोनो स्वर-ध्वनि अपना जगहसँ हटि कऽ दोसर ठाम चलि जाइत अछि। खास कऽ ह्रस्व इ आ उक सम्बन्धमे ई बात लागू होइत अछि। मैथिलीकरण भऽ गेल शब्दक मध्य वा अन्तमे जँ ह्रस्व इ वा उ आबए तँ ओकर ध्वनि स्थानान्तरित भऽ एक अक्षर आगाँ आबि जाइत अछि। जेना- शनि (शइन), पानि (पाइन), दालि ( दाइल), माटि (माइट), काछु (काउछ), मासु (माउस) आदि। मुदा तत्सम शब्द सभमे ई निअम लागू नहि होइत अछि। जेना- रश्मिकेँ रइश्म आ सुधांशुकेँ सुधाउंस नहि कहल जा सकैत अछि। १०.हलन्त(्)क प्रयोग : मैथिली भाषामे सामान्यतया हलन्त (्)क आवश्यकता नहि होइत अछि। कारण जे शब्दक अन्तमे अ उच्चारण नहि होइत अछि। मुदा संस्कृत भाषासँ जहिनाक तहिना मैथिलीमे आएल (तत्सम) शब्द सभमे हलन्त प्रयोग कएल जाइत अछि। एहि पोथीमे सामान्यतया सम्पूर्ण शब्दकेँ मैथिली भाषा सम्बन्धी निअम अनुसार हलन्तविहीन राखल गेल अछि। मुदा व्याकरण सम्बन्धी प्रयोजनक लेल अत्यावश्यक स्थानपर कतहु-कतहु हलन्त देल गेल अछि। प्रस्तुत पोथीमे मथिली लेखनक प्राचीन आ नवीन दुनू शैलीक सरल आ समीचीन पक्ष सभकेँ समेटि कऽ वर्ण-विन्यास कएल गेल अछि। स्थान आ समयमे बचतक सङ्गहि हस्त-लेखन तथा तकनीकी दृष्टिसँ सेहो सरल होबऽबला हिसाबसँ वर्ण-विन्यास मिलाओल गेल अछि। वर्तमान समयमे मैथिली मातृभाषी पर्यन्तकेँ आन भाषाक माध्यमसँ मैथिलीक ज्ञान लेबऽ पड़ि रहल परिप्रेक्ष्यमे लेखनमे सहजता तथा एकरूपतापर ध्यान देल गेल अछि। तखन मैथिली भाषाक मूल विशेषता सभ कुण्ठित नहि होइक, ताहू दिस लेखक-मण्डल सचेत अछि। प्रसिद्ध भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक कहब छनि जे सरलताक अनुसन्धानमे एहन अवस्था किन्नहु ने आबऽ देबाक चाही जे भाषाक विशेषता छाँहमे पडि जाए। -(भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक धारणाकेँ पूर्ण रूपसँ सङ्ग लऽ निर्धारित) आ. मैथिली अकादमी, पटना द्वारा निर्धारित मैथिली लेखन-शैली

१. जे शब्द मैथिली-साहित्यक प्राचीन कालसँ आइ धरि जाहि वर्त्तनीमे प्रचलित अछि, से सामान्यतः ताहि वर्त्तनीमे लिखल जाय- उदाहरणार्थ-

ग्राह्य

एखन ठाम जकर, तकर तनिकर अछि

अग्राह्य अखन, अखनि, एखेन, अखनी ठिमा, ठिना, ठमा जेकर, तेकर तिनकर। (वैकल्पिक रूपेँ ग्राह्य) ऐछ, अहि, ए।

२. निम्नलिखित तीन प्रकारक रूप वैकल्पिकतया अपनाओल जाय: भऽ गेल, भय गेल वा भए गेल। जा रहल अछि, जाय रहल अछि, जाए रहल अछि। कर’ गेलाह, वा करय गेलाह वा करए गेलाह।

३. प्राचीन मैथिलीक ‘न्ह’ ध्वनिक स्थानमे ‘न’ लिखल जाय सकैत अछि यथा कहलनि वा कहलन्हि।

४. ‘ऐ’ तथा ‘औ’ ततय लिखल जाय जत’ स्पष्टतः ‘अइ’ तथा ‘अउ’ सदृश उच्चारण इष्ट हो। यथा- देखैत, छलैक, बौआ, छौक इत्यादि।

५. मैथिलीक निम्नलिखित शब्द एहि रूपे प्रयुक्त होयत: जैह, सैह, इएह, ओऐह, लैह तथा दैह।

६. ह्र्स्व इकारांत शब्दमे ‘इ’ के लुप्त करब सामान्यतः अग्राह्य थिक। यथा- ग्राह्य देखि आबह, मालिनि गेलि (मनुष्य मात्रमे)।

७. स्वतंत्र ह्रस्व ‘ए’ वा ‘य’ प्राचीन मैथिलीक उद्धरण आदिमे तँ यथावत राखल जाय, किंतु आधुनिक प्रयोगमे वैकल्पिक रूपेँ ‘ए’ वा ‘य’ लिखल जाय। यथा:- कयल वा कएल, अयलाह वा अएलाह, जाय वा जाए इत्यादि।

८. उच्चारणमे दू स्वरक बीच जे ‘य’ ध्वनि स्वतः आबि जाइत अछि तकरा लेखमे स्थान वैकल्पिक रूपेँ देल जाय। यथा- धीआ, अढ़ैआ, विआह, वा धीया, अढ़ैया, बियाह।

९. सानुनासिक स्वतंत्र स्वरक स्थान यथासंभव ‘ञ’ लिखल जाय वा सानुनासिक स्वर। यथा:- मैञा, कनिञा, किरतनिञा वा मैआँ, कनिआँ, किरतनिआँ।

१०. कारकक विभक्त्तिक निम्नलिखित रूप ग्राह्य:- हाथकेँ, हाथसँ, हाथेँ, हाथक, हाथमे। ’मे’ मे अनुस्वार सर्वथा त्याज्य थिक। ‘क’ क वैकल्पिक रूप ‘केर’ राखल जा सकैत अछि।

११. पूर्वकालिक क्रियापदक बाद ‘कय’ वा ‘कए’ अव्यय वैकल्पिक रूपेँ लगाओल जा सकैत अछि। यथा:- देखि कय वा देखि कए।

१२. माँग, भाँग आदिक स्थानमे माङ, भाङ इत्यादि लिखल जाय।

१३. अर्द्ध ‘न’ ओ अर्द्ध ‘म’ क बदला अनुसार नहि लिखल जाय, किंतु छापाक सुविधार्थ अर्द्ध ‘ङ’ , ‘ञ’, तथा ‘ण’ क बदला अनुस्वारो लिखल जा सकैत अछि। यथा:- अङ्क, वा अंक, अञ्चल वा अंचल, कण्ठ वा कंठ।

१४. हलंत चिह्न निअमतः लगाओल जाय, किंतु विभक्तिक संग अकारांत प्रयोग कएल जाय। यथा:- श्रीमान्, किंतु श्रीमानक।

१५. सभ एकल कारक चिह्न शब्दमे सटा क’ लिखल जाय, हटा क’ नहि, संयुक्त विभक्तिक हेतु फराक लिखल जाय, यथा घर परक।

१६. अनुनासिककेँ चन्द्रबिन्दु द्वारा व्यक्त कयल जाय। परंतु मुद्रणक सुविधार्थ हि समान जटिल मात्रापर अनुस्वारक प्रयोग चन्द्रबिन्दुक बदला कयल जा सकैत अछि। यथा- हिँ केर बदला हिं।

१७. पूर्ण विराम पासीसँ ( । ) सूचित कयल जाय।

१८. समस्त पद सटा क’ लिखल जाय, वा हाइफेनसँ जोड़ि क’ ,  हटा क’ नहि।

१९. लिअ तथा दिअ शब्दमे बिकारी (ऽ) नहि लगाओल जाय।

२०. अंक देवनागरी रूपमे राखल जाय।

२१.किछु ध्वनिक लेल नवीन चिन्ह बनबाओल जाय। जा' ई नहि बनल अछि ताबत एहि दुनू ध्वनिक बदला पूर्ववत् अय/ आय/ अए/ आए/ आओ/ अओ लिखल जाय। आकि ऎ वा ऒ सँ व्यक्त कएल जाय।

ह./- गोविन्द झा ११/८/७६ श्रीकान्त ठाकुर ११/८/७६ सुरेन्द्र झा "सुमन" ११/०८/७६ २.मैथिलीमे भाषा सम्पादन पाठ्यक्रम नीचाँक सूचीमे देल विकल्पमेसँ लैंगुएज एडीटर द्वारा कोन रूप चुनल जएबाक चाही: वर्ड फाइलमे बोल्ड कएल रूप: १.होयबला/ होबयबला/ होमयबला/ हेब’बला, हेम’बला/ होयबाक/होबएबला /होएबाक २. आ’/आऽ आ ३. क’ लेने/कऽ लेने/कए लेने/कय लेने/ल’/लऽ/लय/लए ४. भ’ गेल/भऽ गेल/भय गेल/भए गेल ५. कर’ गेलाह/करऽ गेलह/करए गेलाह/करय गेलाह ६. लिअ/दिअ लिय’,दिय’,लिअ’,दिय’/ ७. कर’ बला/करऽ बला/ करय बला करै बला/क’र’ बला / करए बला ८. बला वला ९. आङ्ल आंग्ल १०. प्रायः प्रायह ११. दुःख दुख १२. चलि गेल चल गेल/चैल गेल १३. देलखिन्ह देलकिन्ह, देलखिन १४. देखलन्हि देखलनि/ देखलैन्ह १५. छथिन्ह/ छलन्हि छथिन/ छलैन/ छलनि १६. चलैत/दैत चलति/दैति १७. एखनो अखनो १८. बढ़न्हि बढन्हि १९. ओ’/ओऽ(सर्वनाम) ओ २०. ओ (संयोजक) ओ’/ओऽ २१. फाँगि/फाङ्गि फाइंग/फाइङ २२. जे जे’/जेऽ २३. ना-नुकुर ना-नुकर २४. केलन्हि/कएलन्हि/कयलन्हि २५. तखन तँ/ तखन तँ २६. जा’ रहल/जाय रहल/जाए रहल २७. निकलय/निकलए लागल बहराय/ बहराए लागल निकल’/बहरै लागल २८. ओतय/जतय जत’/ओत’/ जतए/ ओतए २९. की फूरल जे कि फूरल जे ३०. जे जे’/जेऽ ३१. कूदि/यादि(मोन पारब) कूइद/याइद/कूद/याद/ यादि (मोन) ३२. इहो/ ओहो ३३. हँसए/ हँसय हँसऽ ३४. नौ आकि दस/नौ किंवा दस/ नौ वा दस ३५. सासु-ससुर सास-ससुर ३६. छह/ सात छ/छः/सात ३७. की की’/कीऽ (दीर्घीकारान्तमे ऽ वर्जित) ३८. जबाब जवाब ३९. करएताह/ करयताह करेताह ४०. दलान दिशि दलान दिश/दलान दिस ४१. गेलाह गएलाह/गयलाह ४२. किछु आर/ किछु और ४३. जाइत छल जाति छल/जैत छल ४४. पहुँचि/ भेटि जाइत छल पहुँच/भेट जाइत छल ४५. जबान (युवा)/ जवान(फौजी) ४६. लय/लए क’/कऽ/लए कए/ लऽ कऽ/ लऽ कए ४७. ल’/लऽ कय/ कए ४८. एखन/अखने अखन/एखने ४९. अहींकेँ अहीँकेँ ५०. गहींर गहीँर ५१. धार पार केनाइ धार पार केनाय/केनाए ५२. जेकाँ जेँकाँ/ जकाँ ५३. तहिना तेहिना ५४. एकर अकर ५५. बहिनउ बहनोइ ५६. बहिन बहिनि ५७. बहिन-बहिनोइ बहिन-बहनउ ५८. नहि/ नै ५९. करबा / करबाय/ करबाए ६०. तँ/ त ऽ तय/तए ६१. भाय भै/भाए ६२. भाँय ६३. यावत जावत ६४. माय मै / माए ६५. देन्हि/दएन्हि/ दयन्हि दन्हि/ दैन्हि ६६. द’/ दऽ/ दए ६७. ओ (संयोजक) ओऽ (सर्वनाम) ६८. तका कए तकाय तकाए ६९. पैरे (on foot) पएरे ७०. ताहुमे ताहूमे

७१. पुत्रीक ७२. बजा कय/ कए ७३. बननाय/बननाइ ७४. कोला ७५. दिनुका दिनका ७६. ततहिसँ ७७. गरबओलन्हि  गरबेलन्हि ७८. बालु बालू ७९. चेन्ह चिन्ह(अशुद्ध) ८०. जे जे’ ८१. से/ के से’/के’ ८२. एखुनका अखनुका ८३. भुमिहार भूमिहार ८४. सुगर सूगर ८५. झठहाक झटहाक ८६. छूबि ८७. करइयो/ओ करैयो/करिऔ-करइयौ ८८. पुबारि पुबाइ ८९. झगड़ा-झाँटी झगड़ा-झाँटि ९०. पएरे-पएरे पैरे-पैरे ९१. खेलएबाक ९२. खेलेबाक ९३. लगा ९४. होए- हो ९५. बुझल बूझल ९६. बूझल (संबोधन अर्थमे) ९७. यैह यएह / इएह ९८. तातिल ९९. अयनाय- अयनाइ/ अएनाइ १००. निन्न- निन्द १०१. बिनु बिन १०२. जाए जाइ १०३. जाइ (in different sense)-last word of sentence १०४. छत पर आबि जाइ १०५. ने १०६. खेलाए (play) –खेलाइ १०७. शिकाइत- शिकायत १०८. ढप- ढ़प १०९. पढ़- पढ ११०. कनिए/ कनिये कनिञे १११. राकस- राकश ११२. होए/ होय होइ ११३. अउरदा- औरदा ११४. बुझेलन्हि (different meaning- got understand) ११५. बुझएलन्हि/ बुझयलन्हि (understood himself) ११६. चलि- चल ११७. खधाइ- खधाय ११८. मोन पाड़लखिन्ह मोन पारलखिन्ह ११९. कैक- कएक- कइएक १२०. लग ल’ग  १२१. जरेनाइ १२२. जरओनाइ- जरएनाइ/जरयनाइ १२३. होइत १२४. गरबेलन्हि/ गरबओलन्हि १२५. चिखैत- (to test)चिखइत १२६. करइयो (willing to do) करैयो १२७. जेकरा- जकरा १२८. तकरा- तेकरा १२९. बिदेसर स्थानेमे/ बिदेसरे स्थानमे १३०. करबयलहुँ/ करबएलहुँ/ करबेलहुँ १३१. हारिक (उच्चारण हाइरक) १३२. ओजन वजन १३३. आधे भाग/ आध-भागे १३४. पिचा / पिचाय/पिचाए १३५. नञ/ ने १३६. बच्चा नञ (ने) पिचा जाय १३७. तखन ने (नञ) कहैत अछि। १३८. कतेक गोटे/ कताक गोटे १३९. कमाइ- धमाइ कमाई- धमाई १४०. लग ल’ग १४१. खेलाइ (for playing) १४२. छथिन्ह छथिन १४३. होइत होइ १४४. क्यो कियो / केओ १४५. केश (hair) १४६. केस (court-case) १४७. बननाइ/ बननाय/ बननाए १४८. जरेनाइ १४९. कुरसी कुर्सी १५०. चरचा चर्चा १५१. कर्म करम १५२. डुबाबए/ डुमाबय/ डुमाबए १५३. एखुनका/ अखुनका १५४. लय (वाक्यक अतिम शब्द)- लऽ १५५. कएलक केलक १५६. गरमी गर्मी १५७. बरदी वर्दी १५८. सुना गेलाह सुना’/सुनाऽ १५९. एनाइ-गेनाइ १६०. तेना ने घेरलन्हि १६१. नञि १६२. डरो ड’रो १६३. कतहु- कहीं १६४. उमरिगर- उमरगर १६५. भरिगर १६६. धोल/धोअल धोएल १६७. गप/गप्प १६८. के के’ १६९. दरबज्जा/ दरबजा १७०. ठाम १७१. धरि तक १७२. घूरि लौटि १७३. थोरबेक १७४. बड्ड १७५. तोँ/ तूँ १७६. तोँहि( पद्यमे ग्राह्य) १७७. तोँही / तोँहि १७८. करबाइए करबाइये १७९. एकेटा १८०. करितथि करतथि

१८१. पहुँचि पहुँच १८२. राखलन्हि रखलन्हि १८३. लगलन्हि लागलन्हि १८४. सुनि (उच्चारण सुइन) १८५. अछि (उच्चारण अइछ) १८६. एलथि गेलथि १८७. बितओने बितेने १८८. करबओलन्हि/ करेलखिन्ह १८९. करएलन्हि १९०. आकि कि १९१. पहुँचि पहुँच १९२. जराय/ जराए जरा (आगि लगा) १९३. से से’ १९४. हाँ मे हाँ (हाँमे हाँ विभक्त्तिमे हटा कए) १९५. फेल फैल १९६. फइल(spacious) फैल १९७. होयतन्हि/ होएतन्हि हेतन्हि १९८. हाथ मटिआयब/ हाथ मटियाबय/हाथ मटिआएब १९९. फेका फेंका २००. देखाए देखा २०१. देखाबए २०२. सत्तरि सत्तर २०३. साहेब साहब २०४.गेलैन्ह/ गेलन्हि २०५.हेबाक/ होएबाक २०६.केलो/ कएलहुँ २०७. किछु न किछु/ किछु ने किछु २०८.घुमेलहुँ/ घुमओलहुँ २०९. एलाक/ अएलाक २१०. अः/ अह २११.लय/ लए (अर्थ-परिवर्त्तन) २१२.कनीक/ कनेक २१३.सबहक/ सभक २१४.मिलाऽ/ मिला २१५.कऽ/ क २१६.जाऽ/ जा २१७.आऽ/ आ २१८.भऽ/भ’ (’ फॉन्टक कमीक द्योतक) २१९.निअम/ नियम २२०.हेक्टेअर/ हेक्टेयर २२१.पहिल अक्षर ढ/ बादक/बीचक ढ़ २२२.तहिं/तहिँ/ तञि/ तैं २२३.कहिं/ कहीं २२४.तँइ/ तइँ २२५.नँइ/ नइँ/  नञि/ नहि २२६.है/ हए २२७.छञि/ छै/ छैक/छइ २२८.दृष्टिएँ/ दृष्टियेँ २२९.आ (come)/ आऽ(conjunction) २३०. आ (conjunction)/ आऽ(come) २३१.कुनो/ कोनो २३२.गेलैन्ह-गेलन्हि २३३.हेबाक- होएबाक २३४.केलौँ- कएलौँ- कएलहुँ २३५.किछु न किछ- किछु ने किछु २३६.केहेन- केहन २३७.आऽ (come)-आ (conjunction-and)/आ २३८. हएत-हैत २३९.घुमेलहुँ-घुमएलहुँ २४०.एलाक- अएलाक २४१.होनि- होइन/होन्हि २४२.ओ-राम ओ श्यामक बीच(conjunction), ओऽ कहलक (he said)/ओ २४३.की हए/ कोसी अएली हए/ की है। की हइ २४४.दृष्टिएँ/ दृष्टियेँ २४५.शामिल/ सामेल २४६.तैँ / तँए/ तञि/ तहिं २४७.जौँ/ ज्योँ २४८.सभ/ सब २४९.सभक/ सबहक २५०.कहिं/ कहीं २५१.कुनो/ कोनो २५२.फारकती भऽ गेल/ भए गेल/ भय गेल २५३.कुनो/ कोनो २५४.अः/ अह २५५.जनै/ जनञ २५६.गेलन्हि/ गेलाह (अर्थ परिवर्तन) २५७.केलन्हि/ कएलन्हि २५८.लय/ लए (अर्थ परिवर्तन) २५९.कनीक/ कनेक २६०.पठेलन्हि/ पठओलन्हि २६१.निअम/ नियम २६२.हेक्टेअर/ हेक्टेयर २६३.पहिल अक्षर रहने ढ/ बीचमे रहने ढ़ २६४.आकारान्तमे बिकारीक प्रयोग उचित नहि/ अपोस्ट्रोफीक प्रयोग फान्टक तकनीकी न्यूनताक परिचायक ओकर बदला अवग्रह (बिकारी) क प्रयोग उचित २६५.केर/-क/ कऽ/ के २६६.छैन्हि- छन्हि २६७.लगैए/ लगैये २६८.होएत/ हएत २६९.जाएत/ जएत २७०.आएत/ अएत/ आओत २७१.खाएत/ खएत/ खैत २७२.पिअएबाक/ पिएबाक २७३.शुरु/ शुरुह २७४.शुरुहे/ शुरुए २७५.अएताह/अओताह/ एताह २७६.जाहि/ जाइ/ जै २७७.जाइत/ जैतए/ जइतए २७८.आएल/ अएल २७९.कैक/ कएक २८०.आयल/ अएल/ आएल २८१. जाए/ जै/ जए २८२. नुकएल/ नुकाएल २८३. कठुआएल/ कठुअएल २८४. ताहि/ तै २८५. गायब/ गाएब/ गएब २८६. सकै/ सकए/ सकय २८७.सेरा/सरा/ सराए (भात सेरा गेल) २८८.कहैत रही/देखैत रही/ कहैत छलहुँ/ कहै छलहुँ- एहिना चलैत/ पढ़ैत (पढ़ै-पढ़ैत अर्थ कखनो काल परिवर्तित)-आर बुझै/ बुझैत (बुझै/ बुझैत छी, मुदा बुझैत-बुझैत)/ सकैत/ सकै। करैत/ करै। दै/ दैत। छैक/ छै। बचलै/ बचलैक। रखबा/ रखबाक । बिनु/ बिन। रातिक/ रातुक २८९. दुआरे/ द्वारे २९०.भेटि/ भेट २९१. खन/ खुना (भोर खन/ भोर खुना) २९२.तक/ धरि २९३.गऽ/गै (meaning different-जनबै गऽ) २९४.सऽ/ सँ (मुदा दऽ, लऽ) २९५.त्त्व,(तीन अक्षरक मेल बदला पुनरुक्तिक एक आ एकटा दोसरक उपयोग) आदिक बदला त्व आदि। महत्त्व/ महत्व/ कर्ता/ कर्त्ता आदिमे त्त संयुक्तक कोनो आवश्यकता मैथिलीमे नहि अछि। वक्तव्य २९६.बेसी/ बेशी २९७.बाला/वाला बला/ वला (रहैबला) २९८.वाली/ (बदलएवाली) २९९.वार्त्ता/ वार्ता ३००. अन्तर्राष्ट्रिय/ अन्तर्राष्ट्रीय ३०१. लेमए/ लेबए ३०२.लमछुरका, नमछुरका ३०२.लागै/ लगै (भेटैत/ भेटै) ३०३.लागल/ लगल ३०४.हबा/ हवा ३०५.राखलक/ रखलक ३०६.आ (come)/ आ (and) ३०७. पश्चाताप/ पश्चात्ताप ३०८. ऽ केर व्यवहार शब्दक अन्तमे मात्र, यथासंभव बीचमे नहि। ३०९.कहैत/ कहै ३१०. रहए (छल)/ रहै (छलै) (meaning different) ३११.तागति/ ताकति ३१२.खराप/ खराब ३१३.बोइन/ बोनि/ बोइनि ३१४.जाठि/ जाइठ ३१५.कागज/ कागच ३१६.गिरै (meaning different- swallow)/ गिरए (खसए) ३१७.राष्ट्रिय/ राष्ट्रीय उच्चारण निर्देश: दन्त न क उच्चारणमे दाँतमे जीह सटत- जेना बाजू नाम , मुदा ण क उच्चारणमे जीह मूर्धामे सटत (नहि सटैए तँ उच्चारण दोष अछि)- जेना बाजू गणेश। तालव्य शमे जीह तालुसँ , षमे मूर्धासँ आ दन्त समे दाँतसँ सटत। निशाँ, सभ आ शोषण बाजि कऽ देखू। मैथिलीमे ष केँ वैदिक संस्कृत जेकाँ ख सेहो उच्चरित कएल जाइत अछि, जेना वर्षा, दोष। य अनेको स्थानपर ज जेकाँ उच्चरित होइत अछि आ ण ड़ जेकाँ (यथा संयोग आ गणेश संजोग आ गड़ेस उच्चरित होइत अछि)। मैथिलीमे व क उच्चारण ब, श क उच्चारण स आ य क उच्चारण ज सेहो होइत अछि। ओहिना ह्रस्व इ बेशीकाल मैथिलीमे पहिने बाजल जाइत अछि कारण देवनागरीमे आ मिथिलाक्षरमे ह्रस्व इ अक्षरक पहिने लिखलो जाइत आ बाजलो जएबाक चाही। कारण जे हिन्दीमे एकर दोषपूर्ण उच्चारण होइत अछि (लिखल तँ पहिने जाइत अछि मुदा बाजल बादमे जाइत अछि), से शिक्षा पद्धतिक दोषक कारण हम सभ ओकर उच्चारण दोषपूर्ण ढंगसँ कऽ रहल छी। अछि- अ इ छ  ऐछ छथि- छ इ थ  – छैथ पहुँचि- प हुँ इ च आब अ आ इ ई ए ऐ ओ औ अं अः ऋ एहि सभ लेल मात्रा सेहो अछि, मुदा एहिमे ई ऐ ओ औ अं अः ऋ केँ संयुक्ताक्षर रूपमे गलत रूपमे प्रयुक्त आ उच्चरित कएल जाइत अछि। जेना ऋ केँ री  रूपमे उच्चरित करब। आ देखियौ- एहि लेल देखिऔ क प्रयोग अनुचित। मुदा देखिऐ लेल देखियै अनुचित। क् सँ ह् धरि अ सम्मिलित भेलासँ क सँ ह बनैत अछि, मुदा उच्चारण काल हलन्त युक्त शब्दक अन्तक उच्चारणक प्रवृत्ति बढ़ल अछि, मुदा हम जखन मनोजमे ज् अन्तमे बजैत छी, तखनो पुरनका लोककेँ बजैत सुनबन्हि- मनोजऽ, वास्तवमे ओ अ युक्त ज् = ज बजै छथि। फेर ज्ञ अछि ज् आ ञ क संयुक्त मुदा गलत उच्चारण होइत अछि- ग्य। ओहिना क्ष अछि क् आ ष क संयुक्त मुदा उच्चारण होइत अछि छ। फेर श् आ र क संयुक्त अछि श्र ( जेना श्रमिक) आ स् आ र क संयुक्त अछि स्र (जेना मिस्र)। त्र भेल त+र । उच्चारणक ऑडियो फाइल विदेह आर्काइव  http://www.videha.co.in/ पर उपलब्ध अछि। फेर केँ / सँ / पर पूर्व अक्षरसँ सटा कऽ लिखू मुदा तँ/ के/ कऽ हटा कऽ। एहिमे सँ मे पहिल सटा कऽ लिखू आ बादबला हटा कऽ। अंकक बाद टा लिखू सटा कऽ मुदा अन्य ठाम टा लिखू हटा कऽ– जेना छहटा मुदा सभ टा। फेर ६अ म सातम लिखू- छठम सातम नहि। घरबलामे बला मुदा घरवालीमे वाली प्रयुक्त करू। रहए- रहै मुदा सकैए (उच्चारण सकै-ए)। मुदा कखनो काल रहए आ रहै मे अर्थ भिन्नता सेहो, जेना से कम्मो जगहमे पार्किंग करबाक अभ्यास रहै ओकरा। पुछलापर पता लागल जे ढुनढुन नाम्ना ई ड्राइवर कनाट प्लेसक पार्किंगमे काज करैत रहए। छलै, छलए मे सेहो एहि तरहक भेल। छलए क उच्चारण छल-ए सेहो। संयोगने- (उच्चारण संजोगने) केँ/ के / कऽ केर- क (केर क प्रयोग नहि करू ) क (जेना रामक) –रामक आ संगे (उच्चारण राम के /  राम कऽ सेहो) सँ- सऽ चन्द्रबिन्दु आ अनुस्वार- अनुस्वारमे कंठ धरिक प्रयोग होइत अछि मुदा चन्द्रबिन्दुमे नहि। चन्द्रबिन्दुमे कनेक एकारक सेहो उच्चारण होइत अछि- जेना रामसँ- (उच्चारण राम सऽ)  रामकेँ- (उच्चारण राम कऽ/ राम के सेहो)। केँ जेना रामकेँ भेल हिन्दीक को (राम को)- राम को= रामकेँ क जेना रामक भेल हिन्दीक का ( राम का) राम का= रामक कऽ जेना जा कऽ भेल हिन्दीक कर ( जा कर) जा कर= जा कऽ सँ भेल हिन्दीक से (राम से) राम से= रामसँ सऽ तऽ त केर एहि सभक प्रयोग अवांछित। के दोसर अर्थेँ प्रयुक्त भऽ सकैए- जेना के कहलक? नञि, नहि, नै, नइ, नँइ, नइँ एहि सभक उच्चारण- नै त्त्व क बदलामे त्व जेना महत्वपूर्ण (महत्त्वपूर्ण नहि) जतए अर्थ बदलि जाए ओतहि मात्र तीन अक्षरक संयुक्ताक्षरक प्रयोग उचित। सम्पति- उच्चारण स म्प इ त (सम्पत्ति नहि- कारण सही उच्चारण आसानीसँ सम्भव नहि)। मुदा सर्वोत्तम (सर्वोतम नहि)। राष्ट्रिय (राष्ट्रीय नहि) सकैए/ सकै (अर्थ परिवर्तन) पोछैले/ पोछैए/ पोछए/ (अर्थ परिवर्तन) पोछए/ पोछै ओ लोकनि ( हटा कऽ, ओ मे बिकारी नहि) ओइ/ ओहि ओहिले/ ओहि लेल जएबेँ/ बैसबेँ पँचभइयाँ देखियौक (देखिऔक बहि- तहिना अ मे ह्रस्व आ दीर्घक मात्राक प्रयोग अनुचित) जकाँ/ जेकाँ तँइ/ तैँ होएत/ हएत नञि/ नहि/ नँइ/ नइँ सौँसे बड़/ बड़ी (झोराओल) गाए (गाइ नहि) रहलेँ/ पहिरतैँ हमहीं/ अहीं सब - सभ सबहक - सभहक धरि - तक गप- बात बूझब - समझब बुझलहुँ - समझलहुँ हमरा आर - हम सभ आकि- आ कि सकैछ/ करैछ (गद्यमे प्रयोगक आवश्यकता नहि) मे केँ सँ पर (शब्दसँ सटा कऽ) तँ कऽ धऽ दऽ (शब्दसँ हटा कऽ) मुदा दूटा वा बेशी विभक्ति संग रहलापर पहिल विभक्ति टाकेँ सटाऊ। एकटा दूटा (मुदा कैक टा) बिकारीक प्रयोग शब्दक अन्तमे, बीचमे अनावश्यक रूपेँ नहि। आकारान्त आ अन्तमे अ क बाद बिकारीक प्रयोग नहि (जेना दिअ, आ ) अपोस्ट्रोफीक प्रयोग बिकारीक बदलामे करब अनुचित आ मात्र फॉन्टक तकनीकी न्यूनताक परिचायक)- ओना बिकारीक संस्कृत रूप ऽ अवग्रह कहल जाइत अछि आ वर्तनी आ उच्चारण दुनू ठाम एकर लोप रहैत अछि/ रहि सकैत अछि (उच्चारणमे लोप रहिते अछि)। मुदा अपोस्ट्रोफी सेहो अंग्रेजीमे पसेसिव केसमे होइत अछि आ फ्रेंचमे शब्दमे जतए एकर प्रयोग होइत अछि जेना raison d’etre एतए सेहो एकर उच्चारण रैजौन डेटर होइत अछि, माने अपोस्ट्रॉफी अवकाश नहि दैत अछि वरन जोड़ैत अछि, से एकर प्रयोग बिकारीक बदला देनाइ तकनीकी रूपेँ सेहो अनुचित)। अइमे, एहिमे जइमे, जाहिमे एखन/ अखन/ अइखन केँ (के नहि) मे (अनुस्वार रहित) भऽ मे दऽ तँ (तऽ त नहि) सँ ( सऽ स नहि) गाछ तर गाछ लग साँझ खन जो (जो go, करै जो do) Festivals of Mithila DATE-LIST (year- 2010-11) (१४१८ साल) Marriage Days: Nov.2010- 19 Dec.2010- 3,8 January 2011- 17, 21, 23, 24, 26, 27, 28 31 Feb.2011- 3, 4, 7, 9, 18, 20, 24, 25, 27, 28 March 2011- 2, 7 May 2011- 11, 12, 13, 18, 19, 20, 22, 23, 29, 30 June 2011- 1, 2, 3, 8, 9, 10, 12, 13, 19, 20, 26, 29 Upanayana Days: February 2011- 8 March 2011- 7 May 2011- 12, 13 June 2011- 6, 12 Dviragaman Din: November 2010- 19, 22, 25, 26 December 2010- 6, 8, 9, 10, 12 February 2011- 20, 21 March 2011- 6, 7, 9, 13 April 2011- 17, 18, 22 May 2011- 5, 6, 8, 13 Mundan Din: November 2010- 24, 26 December 2010- 10, 17 February 2011- 4, 16, 21 March 2011- 7, 9 April 2011- 22 May 2011- 6, 9, 19 June 2011- 3, 6, 10, 20 FESTIVALS OF MITHILA Mauna Panchami-31 July Somavati Amavasya Vrat- 1 August Madhushravani-12 August Nag Panchami- 14 August Raksha Bandhan- 24 Aug Krishnastami- 01 September Kushi Amavasya- 08 September Hartalika Teej- 11 September ChauthChandra-11 September Vishwakarma Pooja- 17 September Karma Dharma Ekadashi-19 September Indra Pooja Aarambh- 20 September Anant Caturdashi- 22 Sep Agastyarghadaan- 23 Sep Pitri Paksha begins- 24 Sep Jimootavahan Vrata/ Jitia-30 Sep Matri Navami- 02 October Kalashsthapan- 08 October Belnauti- 13 October Patrika Pravesh- 14 October Mahastami- 15 October Maha Navami - 16-17 October Vijaya Dashami- 18 October Kojagara- 22 Oct Dhanteras- 3 November Diyabati, shyama pooja- 5 November Annakoota/ Govardhana Pooja-07 November Bhratridwitiya/ Chitragupta Pooja-08 November Chhathi- -12 November Akshyay Navami- 15 November Devotthan Ekadashi- 17 November Kartik Poornima/ Sama Bisarjan- 21 Nov Shaa. ravivratarambh- 21 November Navanna parvan- 24 -26 November Vivaha Panchmi- 10 December Naraknivaran chaturdashi- 01 February Makara/ Teela Sankranti-15 Jan Basant Panchami/ Saraswati Pooja- 08 Februaqry Achla Saptmi- 10 February Mahashivaratri-03 March Holikadahan-Fagua-19 March Holi-20 Mar Varuni Yoga- 31 March va.navaratrarambh- 4 April vaa. Chhathi vrata- 9 April Ram Navami- 12 April Mesha Sankranti-Satuani-14 April Jurishital-15 April Somavati Amavasya Vrata- 02 May Ravi Brat Ant- 08 May Akshaya Tritiya-06 May Janaki Navami- 12 May Vat Savitri-barasait- 01 June Ganga Dashhara-11 June Jagannath Rath Yatra- 3 July Hari Sayan Ekadashi- 11 Jul Aashadhi Guru Poornima-15 Jul VIDEHA ARCHIVE १.विदेह ई-पत्रिकाक सभटा पुरान अंक ब्रेल, तिरहुता आ देवनागरी रूपमे Videha e journal's all old issues in Braille Tirhuta and Devanagari versions विदेह ई-पत्रिकाक पहिल ५० अंक

विदेह ई-पत्रिकाक ५०म सँ आगाँक अंक २.मैथिली पोथी डाउनलोड Maithili Books Download ३.मैथिली ऑडियो संकलन Maithili Audio Downloads ४.मैथिली वीडियोक संकलन Maithili Videos ५.मिथिला चित्रकला/ आधुनिक चित्रकला आ चित्र Mithila Painting/ Modern Art and Photos "विदेह"क एहि सभ सहयोगी लिंकपर सेहो एक बेर जाऊ। ६.विदेह मैथिली क्विज  :  http://videhaquiz.blogspot.com/ ७.विदेह मैथिली जालवृत्त एग्रीगेटर : http://videha-aggregator.blogspot.com/ ८.विदेह मैथिली साहित्य अंग्रेजीमे अनूदित http://madhubani-art.blogspot.com/ ९.विदेहक पूर्व-रूप "भालसरिक गाछ"  : http://gajendrathakur.blogspot.com/ १०.विदेह इंडेक्स  : http://videha123.blogspot.com/ ११.विदेह फाइल : http://videha123.wordpress.com/ १२. विदेह: सदेह : पहिल तिरहुता (मिथिला़क्षर) जालवृत्त (ब्लॉग) http://videha-sadeha.blogspot.com/ १३. विदेह:ब्रेल: मैथिली ब्रेलमे: पहिल बेर विदेह द्वारा http://videha-braille.blogspot.com/ १४.VIDEHA IST MAITHILI  FORTNIGHTLY EJOURNAL ARCHIVE http://videha-archive.blogspot.com/ १५. विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका मैथिली पोथीक आर्काइव http://videha-pothi.blogspot.com/ १६. विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका ऑडियो आर्काइव http://videha-audio.blogspot.com/ १७. विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका वीडियो आर्काइव http://videha-video.blogspot.com/ १८. विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका मिथिला चित्रकला, आधुनिक कला आ चित्रकला http://videha-paintings-photos.blogspot.com/ १९. मैथिल आर मिथिला (मैथिलीक सभसँ लोकप्रिय जालवृत्त) http://maithilaurmithila.blogspot.com/ २०.श्रुति प्रकाशन http://www.shruti-publication.com/ २१.http://groups.google.com/group/videha VIDEHA केर सदस्यता लिअ Top of Form Bottom of Form ईमेल : एहि समूहपर जाऊ २२.http://groups.yahoo.com/group/VIDEHA/ Top of Form Subscribe to VIDEHA Powered by us.groups.yahoo.com Bottom of Form २३.गजेन्द्र ठाकुर इ‍डेक्स http://gajendrathakur123.blogspot.com २४.विदेह रेडियो:मैथिली कथा-कविता आदिक पहिल पोडकास्ट साइट http://videha123radio.wordpress.com/ २५. नेना भुटका http://mangan-khabas.blogspot.com/ महत्त्वपूर्ण सूचना:(१) 'विदेह' द्वारा धारावाहिक रूपे ई-प्रकाशित कएल गेल गजेन्द्र ठाकुरक  निबन्ध-प्रबन्ध-समीक्षा, उपन्यास (सहस्रबाढ़नि) , पद्य-संग्रह (सहस्राब्दीक चौपड़पर), कथा-गल्प (गल्प-गुच्छ), नाटक(संकर्षण), महाकाव्य (त्वञ्चाहञ्च आ असञ्जाति मन) आ बाल-किशोर साहित्य विदेहमे संपूर्ण ई-प्रकाशनक बाद प्रिंट फॉर्ममे। कुरुक्षेत्रम्–अन्तर्मनक खण्ड-१ सँ ७ Combined ISBN No.978-81-907729-7-6 विवरण एहि पृष्ठपर नीचाँमे आ प्रकाशकक साइट http://www.shruti-publication.com/ पर । महत्त्वपूर्ण सूचना (२):सूचना: विदेहक मैथिली-अंग्रेजी आ अंग्रेजी मैथिली कोष (इंटरनेटपर पहिल बेर सर्च-डिक्शनरी) एम.एस. एस.क्यू.एल. सर्वर आधारित -Based on ms-sql server Maithili-English and English-Maithili Dictionary. विदेहक भाषापाक- रचनालेखन स्तंभमे। कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक- गजेन्द्र ठाकुर गजेन्द्र ठाकुरक निबन्ध-प्रबन्ध-समीक्षा, उपन्यास (सहस्रबाढ़नि) , पद्य-संग्रह (सहस्राब्दीक चौपड़पर), कथा-गल्प (गल्प गुच्छ), नाटक(संकर्षण), महाकाव्य (त्वञ्चाहञ्च आ असञ्जाति मन) आ बालमंडली-किशोरजगत विदेहमे संपूर्ण ई-प्रकाशनक बाद प्रिंट फॉर्ममे। कुरुक्षेत्रम्–अन्तर्मनक, खण्ड-१ सँ ७ Ist edition 2009 of Gajendra Thakur’s KuruKshetram-Antarmanak (Vol. I to VII)- essay-paper-criticism, novel, poems, story, play, epics and Children-grown-ups literature in single binding: Language:Maithili ६९२ पृष्ठ : मूल्य भा. रु. 100/-(for individual buyers inside india) (add courier charges Rs.50/-per copy for Delhi/NCR and Rs.100/- per copy for outside Delhi)

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Details for purchase available at print-version publishers's site website: http://www.shruti-publication.com/ or you may write to e-mail:shruti.publication@shruti-publication.com विदेह: सदेह : १: २: ३: ४ तिरहुता : देवनागरी "विदेह" क, प्रिंट संस्करण :विदेह-ई-पत्रिका (http://www.videha.co.in/) क चुनल रचना सम्मिलित। विदेह:सदेह:१: २: ३: ४ सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। Details for purchase available at print-version publishers's site http://www.shruti-publication.com  or you may write to shruti.publication@shruti-publication.com २. संदेश- [ विदेह ई-पत्रिका, विदेह:सदेह मिथिलाक्षर आ देवनागरी आ गजेन्द्र ठाकुरक सात खण्डक- निबन्ध-प्रबन्ध-समीक्षा,उपन्यास (सहस्रबाढ़नि) , पद्य-संग्रह (सहस्राब्दीक चौपड़पर), कथा-गल्प (गल्प गुच्छ), नाटक (संकर्षण), महाकाव्य (त्वञ्चाहञ्च आ असञ्जाति मन) आ बाल-मंडली-किशोर जगत- संग्रह कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक मादेँ। ] १.श्री गोविन्द झा- विदेहकेँ तरंगजालपर उतारि विश्वभरिमे मातृभाषा मैथिलीक लहरि जगाओल, खेद जे अपनेक एहि महाभियानमे हम एखन धरि संग नहि दए सकलहुँ। सुनैत छी अपनेकेँ सुझाओ आ रचनात्मक आलोचना प्रिय लगैत अछि तेँ किछु लिखक मोन भेल। हमर सहायता आ सहयोग अपनेकेँ सदा उपलब्ध रहत। २.श्री रमानन्द रेणु- मैथिलीमे ई-पत्रिका पाक्षिक रूपेँ चला कऽ जे अपन मातृभाषाक प्रचार कऽ रहल छी, से धन्यवाद । आगाँ अपनेक समस्त मैथिलीक कार्यक हेतु हम हृदयसँ शुभकामना दऽ रहल छी। ३.श्री विद्यानाथ झा "विदित"- संचार आ प्रौद्योगिकीक एहि प्रतिस्पर्धी ग्लोबल युगमे अपन महिमामय "विदेह"केँ अपना देहमे प्रकट देखि जतबा प्रसन्नता आ संतोष भेल, तकरा कोनो उपलब्ध "मीटर"सँ नहि नापल जा सकैछ? ..एकर ऐतिहासिक मूल्यांकन आ सांस्कृतिक प्रतिफलन एहि शताब्दीक अंत धरि लोकक नजरिमे आश्चर्यजनक रूपसँ प्रकट हैत। ४. प्रो. उदय नारायण सिंह "नचिकेता"- जे काज अहाँ कए रहल छी तकर चरचा एक दिन मैथिली भाषाक इतिहासमे होएत। आनन्द भए रहल अछि, ई जानि कए जे एतेक गोट मैथिल "विदेह" ई जर्नलकेँ पढ़ि रहल छथि।...विदेहक चालीसम अंक पुरबाक लेल अभिनन्दन। ५. डॉ. गंगेश गुंजन- एहि विदेह-कर्ममे लागि रहल अहाँक सम्वेदनशील मन, मैथिलीक प्रति समर्पित मेहनतिक अमृत रंग, इतिहास मे एक टा विशिष्ट फराक अध्याय आरंभ करत, हमरा विश्वास अछि। अशेष शुभकामना आ बधाइक सङ्ग, सस्नेह...अहाँक पोथी कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक प्रथम दृष्टया बहुत भव्य तथा उपयोगी बुझाइछ। मैथिलीमे तँ अपना स्वरूपक प्रायः ई पहिले एहन  भव्य अवतारक पोथी थिक। हर्षपूर्ण हमर हार्दिक बधाई स्वीकार करी। ६. श्री रामाश्रय झा "रामरंग"(आब स्वर्गीय)- "अपना" मिथिलासँ संबंधित...विषय वस्तुसँ अवगत भेलहुँ।...शेष सभ कुशल अछि। ७. श्री ब्रजेन्द्र त्रिपाठी- साहित्य अकादमी- इंटरनेट पर प्रथम मैथिली पाक्षिक पत्रिका "विदेह" केर लेल बधाई आ शुभकामना स्वीकार करू। ८. श्री प्रफुल्लकुमार सिंह "मौन"- प्रथम मैथिली पाक्षिक पत्रिका "विदेह" क प्रकाशनक समाचार जानि कनेक चकित मुदा बेसी आह्लादित भेलहुँ। कालचक्रकेँ पकड़ि जाहि दूरदृष्टिक परिचय देलहुँ, ओहि लेल हमर मंगलकामना। ९.डॉ. शिवप्रसाद यादव- ई जानि अपार हर्ष भए रहल अछि, जे नव सूचना-क्रान्तिक क्षेत्रमे मैथिली पत्रकारिताकेँ प्रवेश दिअएबाक साहसिक कदम उठाओल अछि। पत्रकारितामे एहि प्रकारक नव प्रयोगक हम स्वागत करैत छी, संगहि "विदेह"क सफलताक शुभकामना। १०. श्री आद्याचरण झा- कोनो पत्र-पत्रिकाक प्रकाशन- ताहूमे मैथिली पत्रिकाक प्रकाशनमे के कतेक सहयोग करताह- ई तऽ भविष्य कहत। ई हमर ८८ वर्षमे ७५ वर्षक अनुभव रहल। एतेक पैघ महान यज्ञमे हमर श्रद्धापूर्ण आहुति प्राप्त होयत- यावत ठीक-ठाक छी/ रहब। ११. श्री विजय ठाकुर- मिशिगन विश्वविद्यालय- "विदेह" पत्रिकाक अंक देखलहुँ, सम्पूर्ण टीम बधाईक पात्र अछि। पत्रिकाक मंगल भविष्य हेतु हमर शुभकामना स्वीकार कएल जाओ। १२. श्री सुभाषचन्द्र यादव- ई-पत्रिका "विदेह" क बारेमे जानि प्रसन्नता भेल। ’विदेह’ निरन्तर पल्लवित-पुष्पित हो आ चतुर्दिक अपन सुगंध पसारय से कामना अछि। १३. श्री मैथिलीपुत्र प्रदीप- ई-पत्रिका "विदेह" केर सफलताक भगवतीसँ कामना। हमर पूर्ण सहयोग रहत। १४. डॉ. श्री भीमनाथ झा- "विदेह" इन्टरनेट पर अछि तेँ "विदेह" नाम उचित आर कतेक रूपेँ एकर विवरण भए सकैत अछि। आइ-काल्हि मोनमे उद्वेग रहैत अछि, मुदा शीघ्र पूर्ण सहयोग देब।कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक देखि अति प्रसन्नता भेल। मैथिलीक लेल ई घटना छी। १५. श्री रामभरोस कापड़ि "भ्रमर"- जनकपुरधाम- "विदेह" ऑनलाइन देखि रहल छी। मैथिलीकेँ अन्तर्राष्ट्रीय जगतमे पहुँचेलहुँ तकरा लेल हार्दिक बधाई। मिथिला रत्न सभक संकलन अपूर्व। नेपालोक सहयोग भेटत, से विश्वास करी। १६. श्री राजनन्दन लालदास- "विदेह" ई-पत्रिकाक माध्यमसँ बड़ नीक काज कए रहल छी, नातिक अहिठाम देखलहुँ। एकर वार्षिक अ‍ंक जखन प्रिं‍ट निकालब तँ हमरा पठायब। कलकत्तामे बहुत गोटेकेँ हम साइटक पता लिखाए देने छियन्हि। मोन तँ होइत अछि जे दिल्ली आबि कए आशीर्वाद दैतहुँ, मुदा उमर आब बेशी भए गेल। शुभकामना देश-विदेशक मैथिलकेँ जोड़बाक लेल।.. उत्कृष्ट प्रकाशन कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक लेल बधाइ। अद्भुत काज कएल अछि, नीक प्रस्तुति अछि सात खण्डमे।  मुदा अहाँक सेवा आ से निःस्वार्थ तखन बूझल जाइत जँ अहाँ द्वारा प्रकाशित पोथी सभपर दाम लिखल नहि रहितैक। ओहिना सभकेँ विलहि देल जइतैक। (स्पष्टीकरण-  श्रीमान्, अहाँक सूचनार्थ विदेह द्वारा ई-प्रकाशित कएल सभटा सामग्री आर्काइवमे https://sites.google.com/a/videha.com/videha-pothi/ पर बिना मूल्यक डाउनलोड लेल उपलब्ध छै आ भविष्यमे सेहो रहतैक। एहि आर्काइवकेँ जे कियो प्रकाशक अनुमति लऽ कऽ प्रिंट रूपमे प्रकाशित कएने छथि आ तकर ओ दाम रखने छथि ताहिपर हमर कोनो नियंत्रण नहि अछि।- गजेन्द्र ठाकुर)...   अहाँक प्रति अशेष शुभकामनाक संग। १७. डॉ. प्रेमशंकर सिंह- अहाँ मैथिलीमे इंटरनेटपर पहिल पत्रिका "विदेह" प्रकाशित कए अपन अद्भुत मातृभाषानुरागक परिचय देल अछि, अहाँक निःस्वार्थ मातृभाषानुरागसँ प्रेरित छी, एकर निमित्त जे हमर सेवाक प्रयोजन हो, तँ सूचित करी। इंटरनेटपर आद्योपांत पत्रिका देखल, मन प्रफुल्लित भऽ गेल। १८.श्रीमती शेफालिका वर्मा- विदेह ई-पत्रिका देखि मोन उल्लाससँ भरि गेल। विज्ञान कतेक प्रगति कऽ रहल अछि...अहाँ सभ अनन्त आकाशकेँ भेदि दियौ, समस्त विस्तारक रहस्यकेँ तार-तार कऽ दियौक...। अपनेक अद्भुत पुस्तक कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक विषयवस्तुक दृष्टिसँ गागरमे सागर अछि। बधाई। १९.श्री हेतुकर झा, पटना-जाहि समर्पण भावसँ अपने मिथिला-मैथिलीक सेवामे तत्पर छी से स्तुत्य अछि। देशक राजधानीसँ भय रहल मैथिलीक शंखनाद मिथिलाक गाम-गाममे मैथिली चेतनाक विकास अवश्य करत। २०. श्री योगानन्द झा, कबिलपुर, लहेरियासराय- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पोथीकेँ निकटसँ देखबाक अवसर भेटल अछि आ मैथिली जगतक एकटा उद्भट ओ समसामयिक दृष्टिसम्पन्न हस्ताक्षरक कलमबन्द परिचयसँ आह्लादित छी। "विदेह"क देवनागरी सँस्करण पटनामे रु. 80/- मे उपलब्ध भऽ सकल जे विभिन्न लेखक लोकनिक छायाचित्र, परिचय पत्रक ओ रचनावलीक सम्यक प्रकाशनसँ ऐतिहासिक कहल जा सकैछ। २१. श्री किशोरीकान्त मिश्र- कोलकाता- जय मैथिली, विदेहमे बहुत रास कविता, कथा, रिपोर्ट आदिक सचित्र संग्रह देखि आ आर अधिक प्रसन्नता मिथिलाक्षर देखि- बधाई स्वीकार कएल जाओ। २२.श्री जीवकान्त- विदेहक मुद्रित अंक पढ़ल- अद्भुत मेहनति। चाबस-चाबस। किछु समालोचना मरखाह..मुदा सत्य। २३. श्री भालचन्द्र झा- अपनेक कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक देखि बुझाएल जेना हम अपने छपलहुँ अछि। एकर विशालकाय आकृति अपनेक सर्वसमावेशताक परिचायक अछि। अपनेक रचना सामर्थ्यमे उत्तरोत्तर वृद्धि हो, एहि शुभकामनाक संग हार्दिक बधाई। २४.श्रीमती डॉ नीता झा- अहाँक कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़लहुँ। ज्योतिरीश्वर शब्दावली, कृषि मत्स्य शब्दावली आ सीत बसन्त आ सभ कथा, कविता, उपन्यास, बाल-किशोर साहित्य सभ उत्तम छल। मैथिलीक उत्तरोत्तर विकासक लक्ष्य दृष्टिगोचर होइत अछि। २५.श्री मायानन्द मिश्र- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक मे हमर उपन्यास स्त्रीधनक जे विरोध कएल गेल अछि तकर हम विरोध करैत छी।... कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पोथीक लेल शुभकामना।(श्रीमान् समालोचनाकेँ विरोधक रूपमे नहि लेल जाए।-गजेन्द्र ठाकुर) २६.श्री महेन्द्र हजारी- सम्पादक श्रीमिथिला- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़ि मोन हर्षित भऽ गेल..एखन पूरा पढ़यमे बहुत समय लागत, मुदा जतेक पढ़लहुँ से आह्लादित कएलक। २७.श्री केदारनाथ चौधरी- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक अद्भुत लागल, मैथिली साहित्य लेल ई पोथी एकटा प्रतिमान बनत। २८.श्री सत्यानन्द पाठक- विदेहक हम नियमित पाठक छी। ओकर स्वरूपक प्रशंसक छलहुँ। एम्हर अहाँक लिखल - कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक देखलहुँ। मोन आह्लादित भऽ उठल। कोनो रचना तरा-उपरी। २९.श्रीमती रमा झा-सम्पादक मिथिला दर्पण। कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक प्रिंट फॉर्म पढ़ि आ एकर गुणवत्ता देखि मोन प्रसन्न भऽ गेल, अद्भुत शब्द एकरा लेल प्रयुक्त कऽ रहल छी। विदेहक उत्तरोत्तर प्रगतिक शुभकामना। ३०.श्री नरेन्द्र झा, पटना- विदेह नियमित देखैत रहैत छी। मैथिली लेल अद्भुत काज कऽ रहल छी। ३१.श्री रामलोचन ठाकुर- कोलकाता- मिथिलाक्षर विदेह देखि मोन प्रसन्नतासँ भरि उठल, अंकक विशाल परिदृश्य आस्वस्तकारी अछि। ३२.श्री तारानन्द वियोगी- विदेह आ कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक देखि चकबिदोर लागि गेल। आश्चर्य। शुभकामना आ बधाई। ३३.श्रीमती प्रेमलता मिश्र “प्रेम”- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़लहुँ। सभ रचना उच्चकोटिक लागल। बधाई। ३४.श्री कीर्तिनारायण मिश्र- बेगूसराय- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक बड्ड नीक लागल, आगांक सभ काज लेल बधाई। ३५.श्री महाप्रकाश-सहरसा- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक नीक लागल, विशालकाय संगहि उत्तमकोटिक। ३६.श्री अग्निपुष्प- मिथिलाक्षर आ देवाक्षर विदेह पढ़ल..ई प्रथम तँ अछि एकरा प्रशंसामे मुदा हम एकरा दुस्साहसिक कहब। मिथिला चित्रकलाक स्तम्भकेँ मुदा अगिला अंकमे आर विस्तृत बनाऊ। ३७.श्री मंजर सुलेमान-दरभंगा- विदेहक जतेक प्रशंसा कएल जाए कम होएत। सभ चीज उत्तम। ३८.श्रीमती प्रोफेसर वीणा ठाकुर- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक उत्तम, पठनीय, विचारनीय। जे क्यो देखैत छथि पोथी प्राप्त करबाक उपाय पुछैत छथि। शुभकामना। ३९.श्री छत्रानन्द सिंह झा- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़लहुँ, बड्ड नीक सभ तरहेँ। ४०.श्री ताराकान्त झा- सम्पादक मैथिली दैनिक मिथिला समाद- विदेह तँ कन्टेन्ट प्रोवाइडरक काज कऽ रहल अछि। कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक अद्भुत लागल। ४१.डॉ रवीन्द्र कुमार चौधरी- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक बहुत नीक, बहुत मेहनतिक परिणाम। बधाई। ४२.श्री अमरनाथ- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक आ विदेह दुनू स्मरणीय घटना अछि, मैथिली साहित्य मध्य। ४३.श्री पंचानन मिश्र- विदेहक वैविध्य आ निरन्तरता प्रभावित करैत अछि, शुभकामना। ४४.श्री केदार कानन- कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक लेल अनेक धन्यवाद, शुभकामना आ बधाइ स्वीकार करी। आ नचिकेताक भूमिका पढ़लहुँ। शुरूमे तँ लागल जेना कोनो उपन्यास अहाँ द्वारा सृजित भेल अछि मुदा पोथी उनटौला पर ज्ञात भेल जे एहिमे तँ सभ विधा समाहित अछि। ४५.श्री धनाकर ठाकुर- अहाँ नीक काज कऽ रहल छी। फोटो गैलरीमे चित्र एहि शताब्दीक जन्मतिथिक अनुसार रहैत तऽ नीक। ४६.श्री आशीष झा- अहाँक पुस्तकक संबंधमे एतबा लिखबा सँ अपना कए नहि रोकि सकलहुँ जे ई किताब मात्र किताब नहि थीक, ई एकटा उम्मीद छी जे मैथिली अहाँ सन पुत्रक सेवा सँ निरंतर समृद्ध होइत चिरजीवन कए प्राप्त करत। ४७.श्री शम्भु कुमार सिंह- विदेहक तत्परता आ क्रियाशीलता देखि आह्लादित भऽ रहल छी। निश्चितरूपेण कहल जा सकैछ जे समकालीन मैथिली पत्रिकाक इतिहासमे विदेहक नाम स्वर्णाक्षरमे लिखल जाएत। ओहि कुरुक्षेत्रक घटना सभ तँ अठारहे दिनमे खतम भऽ गेल रहए मुदा अहाँक कुरुक्षेत्रम् तँ अशेष अछि। ४८.डॉ. अजीत मिश्र- अपनेक प्रयासक कतबो प्रश‍ंसा कएल जाए कमे होएतैक। मैथिली साहित्यमे अहाँ द्वारा कएल गेल काज युग-युगान्तर धरि पूजनीय रहत। ४९.श्री बीरेन्द्र मल्लिक- अहाँक कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक आ विदेह:सदेह पढ़ि अति प्रसन्नता भेल। अहाँक स्वास्थ्य ठीक रहए आ उत्साह बनल रहए से कामना। ५०.श्री कुमार राधारमण- अहाँक दिशा-निर्देशमे विदेह पहिल मैथिली ई-जर्नल देखि अति प्रसन्नता भेल। हमर शुभकामना। ५१.श्री फूलचन्द्र झा प्रवीण-विदेह:सदेह पढ़ने रही मुदा कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक देखि बढ़ाई देबा लेल बाध्य भऽ गेलहुँ। आब विश्वास भऽ गेल जे मैथिली नहि मरत। अशेष शुभकामना। ५२.श्री विभूति आनन्द- विदेह:सदेह देखि, ओकर विस्तार देखि अति प्रसन्नता भेल। ५३.श्री मानेश्वर मनुज-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक एकर भव्यता देखि अति प्रसन्नता भेल, एतेक विशाल ग्रन्थ मैथिलीमे आइ धरि नहि देखने रही। एहिना भविष्यमे काज करैत रही, शुभकामना। ५४.श्री विद्यानन्द झा- आइ.आइ.एम.कोलकाता- कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक विस्तार, छपाईक संग गुणवत्ता देखि अति प्रसन्नता भेल। ५५.श्री अरविन्द ठाकुर-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक मैथिली साहित्यमे कएल गेल एहि तरहक पहिल प्रयोग अछि, शुभकामना। ५६.श्री कुमार पवन-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक पढ़ि रहल छी। किछु लघुकथा पढ़ल अछि, बहुत मार्मिक छल। ५७. श्री प्रदीप बिहारी-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक देखल, बधाई। ५८.डॉ मणिकान्त ठाकुर-कैलिफोर्निया- अपन विलक्षण नियमित सेवासँ हमरा लोकनिक हृदयमे विदेह सदेह भऽ गेल अछि। ५९.श्री धीरेन्द्र प्रेमर्षि- अहाँक समस्त प्रयास सराहनीय। दुख होइत अछि जखन अहाँक प्रयासमे अपेक्षित सहयोग नहि कऽ पबैत छी। ६०.श्री देवशंकर नवीन- विदेहक निरन्तरता आ विशाल स्वरूप- विशाल पाठक वर्ग, एकरा ऐतिहासिक बनबैत अछि। ६१.श्री मोहन भारद्वाज- अहाँक समस्त कार्य देखल, बहुत नीक। एखन किछु परेशानीमे छी, मुदा शीघ्र सहयोग देब। ६२.श्री फजलुर रहमान हाशमी-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक मे एतेक मेहनतक लेल अहाँ साधुवादक अधिकारी छी। ६३.श्री लक्ष्मण झा "सागर"- मैथिलीमे चमत्कारिक रूपेँ अहाँक प्रवेश आह्लादकारी अछि।..अहाँकेँ एखन आर..दूर..बहुत दूरधरि जेबाक अछि। स्वस्थ आ प्रसन्न रही। ६४.श्री जगदीश प्रसाद मंडल-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक पढ़लहुँ । कथा सभ आ उपन्यास सहस्रबाढ़नि पूर्णरूपेँ पढ़ि गेल छी। गाम-घरक भौगोलिक विवरणक जे सूक्ष्म वर्णन सहस्रबाढ़निमे अछि, से चकित कएलक, एहि संग्रहक कथा-उपन्यास मैथिली लेखनमे विविधता अनलक अछि। समालोचना शास्त्रमे अहाँक दृष्टि वैयक्तिक नहि वरन् सामाजिक आ कल्याणकारी अछि, से प्रशंसनीय। ६५.श्री अशोक झा-अध्यक्ष मिथिला विकास परिषद- कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक लेल बधाई आ आगाँ लेल शुभकामना। ६६.श्री ठाकुर प्रसाद मुर्मु- अद्भुत प्रयास। धन्यवादक संग प्रार्थना जे अपन माटि-पानिकेँ ध्यानमे राखि अंकक समायोजन कएल जाए। नव अंक धरि प्रयास सराहनीय। विदेहकेँ बहुत-बहुत धन्यवाद जे एहेन सुन्दर-सुन्दर सचार (आलेख) लगा रहल छथि। सभटा ग्रहणीय- पठनीय। ६७.बुद्धिनाथ मिश्र- प्रिय गजेन्द्र जी,अहाँक सम्पादन मे प्रकाशित ‘विदेह’आ ‘कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक’ विलक्षण पत्रिका आ विलक्षण पोथी! की नहि अछि अहाँक सम्पादनमे? एहि प्रयत्न सँ मैथिली क विकास होयत,निस्संदेह। ६८.श्री बृखेश चन्द्र लाल- गजेन्द्रजी, अपनेक पुस्तक कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक पढ़ि मोन गदगद भय गेल , हृदयसँ अनुगृहित छी । हार्दिक शुभकामना । ६९.श्री परमेश्वर कापड़ि - श्री गजेन्द्र जी । कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक पढ़ि गदगद आ नेहाल भेलहुँ। ७०.श्री रवीन्द्रनाथ ठाकुर- विदेह पढ़ैत रहैत छी। धीरेन्द्र प्रेमर्षिक मैथिली गजलपर आलेख पढ़लहुँ। मैथिली गजल कत्तऽ सँ कत्तऽ चलि गेलैक आ ओ अपन आलेखमे मात्र अपन जानल-पहिचानल लोकक चर्च कएने छथि। जेना मैथिलीमे मठक परम्परा रहल अछि। (स्पष्टीकरण- श्रीमान्, प्रेमर्षि जी ओहि आलेखमे ई स्पष्ट लिखने छथि जे किनको नाम जे छुटि गेल छन्हि तँ से मात्र आलेखक लेखकक जानकारी नहि रहबाक द्वारे, एहिमे आन कोनो कारण नहि देखल जाय। अहाँसँ एहि विषयपर विस्तृत आलेख सादर आमंत्रित अछि।-सम्पादक) ७१.श्री मंत्रेश्वर झा- विदेह पढ़ल आ संगहि अहाँक मैगनम ओपस कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक सेहो, अति उत्तम। मैथिलीक लेल कएल जा रहल अहाँक समस्त कार्य अतुलनीय अछि। ७२. श्री हरेकृष्ण झा- कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक मैथिलीमे अपन तरहक एकमात्र ग्रन्थ अछि, एहिमे लेखकक समग्र दृष्टि आ रचना कौशल देखबामे आएल जे लेखकक फील्डवर्कसँ जुड़ल रहबाक कारणसँ अछि। ७३.श्री सुकान्त सोम- कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक मे  समाजक इतिहास आ वर्तमानसँ अहाँक जुड़ाव बड्ड नीक लागल, अहाँ एहि क्षेत्रमे आर आगाँ काज करब से आशा अछि। ७४.प्रोफेसर मदन मिश्र- कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक सन किताब मैथिलीमे पहिले अछि आ एतेक विशाल संग्रहपर शोध कएल जा सकैत अछि। भविष्यक लेल शुभकामना। ७५.प्रोफेसर कमला चौधरी- मैथिलीमे कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक सन पोथी आबए जे गुण आ रूप दुनूमे निस्सन होअए, से बहुत दिनसँ आकांक्षा छल, ओ आब जा कऽ पूर्ण भेल। पोथी एक हाथसँ दोसर हाथ घुमि रहल अछि, एहिना आगाँ सेहो अहाँसँ आशा अछि। ७६.श्री उदय चन्द्र झा "विनोद": गजेन्द्रजी, अहाँ जतेक काज कएलहुँ अछि से मैथिलीमे आइ धरि कियो नहि कएने छल। शुभकामना। अहाँकेँ एखन बहुत काज आर करबाक अछि। ७७.श्री कृष्ण कुमार कश्यप: गजेन्द्र ठाकुरजी, अहाँसँ भेँट एकटा स्मरणीय क्षण बनि गेल। अहाँ जतेक काज एहि बएसमे कऽ गेल छी ताहिसँ हजार गुणा आर बेशीक आशा अछि। ७८.श्री मणिकान्त दास: अहाँक मैथिलीक कार्यक प्रशंसा लेल शब्द नहि भेटैत अछि। अहाँक कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक सम्पूर्ण रूपेँ पढ़ि गेलहुँ। त्वञ्चाहञ्च बड्ड नीक लागल। विदेह मैथिली साहित्य आन्दोलन (c)२००४-१०. सर्वाधिकार लेखकाधीन आ जतय लेखकक नाम नहि अछि ततय संपादकाधीन। विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। सह-सम्पादक: उमेश मंडल। सहायक सम्पादक: शिव कुमार झा आ मुन्नाजी (मनोज कुमार कर्ण)। भाषा-सम्पादन: नागेन्द्र कुमार झा आ पञ्जीकार विद्यानन्द झा। कला-सम्पादन: ज्योति सुनीत चौधरी आ रश्मि रेखा सिन्हा। सम्पादक-शोध-अन्वेषण: डॉ. जया वर्मा आ डॉ. राजीव कुमार वर्मा। रचनाकार अपन मौलिक आ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि) ggajendra@videha.com केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx, .rtf वा .txt फॉर्मेटमे पठा सकैत छथि। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेताह, से आशा करैत छी। रचनाक अंतमे टाइप रहय, जे ई रचना मौलिक अछि, आ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। मेल प्राप्त होयबाक बाद यथासंभव शीघ्र ( सात दिनक भीतर) एकर प्रकाशनक अंकक सूचना देल जायत। ’विदेह' प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका अछि आ एहिमे मैथिली, संस्कृत आ अंग्रेजीमे मिथिला आ मैथिलीसँ संबंधित रचना प्रकाशित कएल जाइत अछि। एहि ई पत्रिकाकेँ श्रीमति लक्ष्मी ठाकुर द्वारा मासक ०१ आ १५ तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि। (c) 2004-10 सर्वाधिकार सुरक्षित। विदेहमे प्रकाशित सभटा रचना आ आर्काइवक सर्वाधिकार रचनाकार आ संग्रहकर्त्ताक लगमे छन्हि। रचनाक अनुवाद आ पुनः प्रकाशन किंवा आर्काइवक उपयोगक अधिकार किनबाक हेतु ggajendra@videha.co.in पर संपर्क करू। एहि साइटकेँ प्रीति झा ठाकुर, मधूलिका चौधरी आ रश्मि प्रिया द्वारा डिजाइन कएल गेल। सिद्धिरस्तु वि दे ह विदेह Videha বিদেহ  विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका Videha Ist Maithili Fortnightly e Magazine  विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका 'विदेह' ७० म अंक १५ नवम्बर २०१० (वर्ष ३ मास ३५ अंक ७०)http://www.videha.co.in/ मानुषीमिह संस्कृताम् ISSN 2229-547X VIDEHA वि दे ह विदेह Videha বিদেহ  विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका Videha Ist Maithili Fortnightly e Magazine  विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका 'विदेह' ७० म अंक १५ नवम्बर २०१० (वर्ष ३ मास ३५ अंक ७०)http://www.videha.co.in/ मानुषीमिह संस्कृताम् ISSN 2229-547X VIDEHA

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