402 403 ISSN 2229-547X VIDEHA 'विदेह' ७१ म अंक ०१ दिसम्बर २०१० (वर्ष ३ मास ३६ अंक ७१) वि दे ह विदेह Videha বিদেহ http://www.videha.co.in विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका Videha Ist Maithili Fortnightly e Magazine विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका नव अंक देखबाक लेल पृष्ठ सभकेँ रिफ्रेश कए देखू। Always refresh the pages for viewing new issue of VIDEHA. Read in your own scriptRoman(Eng)Gujarati Bangla Oriya Gurmukhi Telugu Tamil Kannada Malayalam Hindi एहि अंकमे अछि:- १. संपादकीय संदेश २. गद्य २.१.श्रीमती शेफालिका वर्मा- आखर-आखर प्रीत (पत्रात्मक आत्मकथा)- आगाँ २.२.१. विनीत उत्पल- दीर्घकथा- घोड़ीपर चढ़ि लेब हम डिग्री २.रामकृष्ण मंडल 'छोटू'- कथा- बाप ३.नन्द विलाश राय- कथा अइना २.३.सुजीतकुमार झा- संस्मरण-चुनचुन मिश्र २.४.१.जगदीश प्रसाद मंडल- विहनि कथा- कौआक मैनजन २. अनमोल झा- चारिटा विहनि कथा ३.ज्योति- एकटा विहनि कथा-ध्वनि-प्रतिध्वनि २.५.बिपिन कुमार झा- प्रदेश केर विकास : एक चिन्तन- (बिहार-विकास सन्दर्भ मे आलोचनात्मक अभिव्यक्ति) २.६.विरेन्द्र कुमार यादव- कथा- नाह आओर जिनगी २.७.जितेन्द्र झा- महाकवि विद्यापति अक्षयकोष २.८.बेचन ठाकुर- नाटक- बेटीक अपमान ३. पद्य ३.१.१.डॉ. नरेश कुमार ‘विकल’२. संस्कृति-कतऽ जाइ....३. गंगेश गुंजन- आउ हनुमान ३.२.राजदेव मंडलक किछु कविता ३.३.ज्योति सुनीत चौधरी-मिथिला चित्रकला ३.४.१.उमेश मंडल किछु कविता २. राजेश मोहन झा- कविता- घुरना मोन पड़ैए ३.५.१.शिव कुमार झा-शिवकुमार झा टिल्लू २.मुन्नाजी-हाइकू ३.किशन कारीग़र ३.६.१.सतीश चन्द्र झा- सौंसे बिहार एखनो बेहाल २.रामविलास साहु- कविता-कोशीमे समाएल जिनगी ३.७.कालीकान्त झा बूच- अंतिम- कविता- कहिया धरि उदासी ३.८.गंगेश गुंजन- राधा- २६ म खेप ४. मिथिला कला-संगीत-१.ज्योति सुनीत चौधरी ३श्वेता झा (सिंगापुर) भाषापाक रचना-लेखन -[मानक मैथिली], [विदेहक मैथिली-अंग्रेजी आ अंग्रेजी मैथिली कोष (इंटरनेटपर पहिल बेर सर्च-डिक्शनरी) एम.एस. एस.क्यू.एल. सर्वर आधारित -Based on ms-sql server Maithili-English and English-Maithili Dictionary.] .VIDEHA FOR NON RESIDENTS .1.1.NEVER SET- - SHEFALIKA VERMA- translated by self 2.Original Poem in Maithili by Kalikant Jha "Buch" Translated into English by Jyoti Jha Chaudhary3.Original Poem in Maithili by Gajendra Thakur Translated into English by Jyoti Jha Chaudhary .2.1.Son of Soil- Dr. Shefalika Verma Translated by : Sanjeev Kumar Varma-2.Maithili Short-story “shabdashastram” by Gajendra Thakur re-written in English by the author himself. विदेह ई-पत्रिकाक सभटा पुरान अंक ( ब्रेल, तिरहुता आ देवनागरी मे ) पी.डी.एफ. डाउनलोडक लेल नीचाँक लिंकपर उपलब्ध अछि। All the old issues of Videha e journal ( in Braille, Tirhuta and Devanagari versions ) are available for pdf download at the following link. विदेह ई-पत्रिकाक सभटा पुरान अंक ब्रेल, तिरहुता आ देवनागरी रूपमे Videha e journal's all old issues in Braille Tirhuta and Devanagari versions विदेह ई-पत्रिकाक पहिल ५० अंक
विदेह ई-पत्रिकाक ५०म सँ आगाँक अंक विदेह आर.एस.एस.फीड। "विदेह" ई-पत्रिका ई-पत्रसँ प्राप्त करू। अपन मित्रकेँ विदेहक विषयमे सूचित करू। ↑ विदेह आर.एस.एस.फीड एनीमेटरकेँ अपन साइट/ ब्लॉगपर लगाऊ। ब्लॉग "लेआउट" पर "एड गाडजेट" मे "फीड" सेलेक्ट कए "फीड यू.आर.एल." मे http://www.videha.co.in/index.xml टाइप केलासँ सेहो विदेह फीड प्राप्त कए सकैत छी। गूगल रीडरमे पढ़बा लेल http://reader.google.com/ पर जा कऽ Add a Subscription बटन क्लिक करू आ खाली स्थानमे http://www.videha.co.in/index.xml पेस्ट करू आ Add बटन दबाऊ। मैथिली देवनागरी वा मिथिलाक्षरमे नहि देखि/ लिखि पाबि रहल छी, (cannot see/write Maithili in Devanagari/ Mithilakshara follow links below or contact at ggajendra@videha.com) तँ एहि हेतु नीचाँक लिंक सभ पर जाऊ। संगहि विदेहक स्तंभ मैथिली भाषापाक/ रचना लेखनक नव-पुरान अंक पढ़ू। http://devanaagarii.net/ http://kaulonline.com/uninagari/ (एतए बॉक्समे ऑनलाइन देवनागरी टाइप करू, बॉक्ससँ कॉपी करू आ वर्ड डॉक्युमेन्टमे पेस्ट कए वर्ड फाइलकेँ सेव करू। विशेष जानकारीक लेल ggajendra@videha.com पर सम्पर्क करू।)(Use Firefox 3.0 (from WWW.MOZILLA.COM )/ Opera/ Safari/ Internet Explorer 8.0/ Flock 2.0/ Google Chrome for best view of 'Videha' Maithili e-journal at http://www.videha.co.in/ .) Go to the link below for download of old issues of VIDEHA Maithili e magazine in .pdf format and Maithili Audio/ Video/ Book/ paintings/ photo files. विदेहक पुरान अंक आ ऑडियो/ वीडियो/ पोथी/ चित्रकला/ फोटो सभक फाइल सभ (उच्चारण, बड़ सुख सार आ दूर्वाक्षत मंत्र सहित) डाउनलोड करबाक हेतु नीचाँक लिंक पर जाऊ। VIDEHA ARCHIVE विदेह आर्काइव भारतीय डाक विभाग द्वारा जारी कवि, नाटककार आ धर्मशास्त्री विद्यापतिक स्टाम्प। भारत आ नेपालक माटिमे पसरल मिथिलाक धरती प्राचीन कालहिसँ महान पुरुष ओ महिला लोकनिक कर्मभूमि रहल अछि। मिथिलाक महान पुरुष ओ महिला लोकनिक चित्र 'मिथिला रत्न' मे देखू। गौरी-शंकरक पालवंश कालक मूर्त्ति, एहिमे मिथिलाक्षरमे (१२०० वर्ष पूर्वक) अभिलेख अंकित अछि। मिथिलाक भारत आ नेपालक माटिमे पसरल एहि तरहक अन्यान्य प्राचीन आ नव स्थापत्य, चित्र, अभिलेख आ मूर्त्तिकलाक़ हेतु देखू 'मिथिलाक खोज' मिथिला, मैथिल आ मैथिलीसँ सम्बन्धित सूचना, सम्पर्क, अन्वेषण संगहि विदेहक सर्च-इंजन आ न्यूज सर्विस आ मिथिला, मैथिल आ मैथिलीसँ सम्बन्धित वेबसाइट सभक समग्र संकलनक लेल देखू "विदेह सूचना संपर्क अन्वेषण" विदेह जालवृत्तक डिसकसन फोरमपर जाऊ। "मैथिल आर मिथिला" (मैथिलीक सभसँ लोकप्रिय जालवृत्त) पर जाऊ। १. संपादकीय स्वर्गीय जयकान्त मिश्रक सुपुत्र श्री कशिक मिश्र सूचित केलल्हि अछि जे हुनकर पिताजीक समस्त मैथिली पुस्तकालय मैथिली विभाग, ल. ना. मि. वि.वि. दरभंगाकेँ दऽ देल गेल अछि जाहिमे २५०० सँ बेशी पोथी-पत्रिका छै। मैथिलीक विद्यार्थी-शोधार्थी ओकर उपयोग कऽ सकै छथि। सूचना: अन्तराष्ट्रिय मैथिली सम्मेलन काठमाण्डौ मे २२ आ २३ दिसम्बर २०१० केँ श्री रामभरोस कापड़ि "भ्रमर"क संयोजकत्वमे आयोजित भऽ रहल अछि। श्री कापड़ि नेपाल प्रज्ञा संस्थानमे मैथिलीक प्रतिनिधित्व कऽ रहल छथि आ ई साहित्य क्षेत्रमे नेपालक सभसँ पैघ प्रतिष्ठाबल पद अछि ओहिना जेना भारतमे "साहित्य अकादमीक फेलो" होइत अछि। २२ दिसम्बर २०१० केँ ई आयोजन नेपाल प्रज्ञा प्रतिष्ठान, कमलादी, काठमाण्डौ आ २३ दिसम्बर २०१० केँ अग्रवाल सेवा केन्द्र, कमल पोखरी, काठमाण्डौमे आयोजित होएत। दुनू दिन आवस आ भोजनक व्यवस्था ग्रवाल सेवा केन्द्र, कमल पोखरी, काठमाण्डौमे रहत। नाटक-एकांकी विशेषांक/ मैथिली-समीक्षा विशेषांक: विदेहक हाइकू, गजल, लघुकथा आ बाल-किशोर विशेषांकक बाद विदेहक 15 दिसम्बर 2010 अंक नाटक-एकांकी विशेषांक आ 15 जनवरी 2011 अंक मैथिली-समीक्षा विशेषांक रहत। एहि लेल टंकित रचना, जकर ने कोनो शब्दक बन्धन छै आ ने विषएक, 13 दिसम्बर 2010 धरि नाटक-एकांकी विशेषांक लेल आ 13 जनवरी 2011 धरि मैथिली-समीक्षा विशेषांक लेल लेखक ई-मेलसँ पठा सकै छथि। रचनाकार अपन मौलिक आ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि) ggajendra@videha.com केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx, .rtf वा .txt फॉर्मेटमे पठा सकैत छथि। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेताह, से आशा करैत छी। रचनाक अंतमे टाइप रहय, जे ई रचना मौलिक अछि, आ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि।
(विदेह ई पत्रिकाकेँ ५ जुलाइ २००४ सँ एखन धरि १०७ देशक १,६११ ठामसँ ५२,६४७ गोटे द्वारा विभिन्न आइ.एस.पी. सँ २,७७, ९५२ बेर देखल गेल अछि; धन्यवाद पाठकगण। - गूगल एनेलेटिक्स डेटा।) गजेन्द्र ठाकुर ggajendra@videha.com २. गद्य २.१.श्रीमती शेफालिका वर्मा- आखर-आखर प्रीत (पत्रात्मक आत्मकथा)- आगाँ २.२.१. विनीत उत्पल- दीर्घकथा- घोड़ीपर चढ़ि लेब हम डिग्री २.रामकृष्ण मंडल 'छोटू'- कथा- बाप ३.नन्द विलाश राय- कथा अइना २.३.सुजीतकुमार झा- संस्मरण-चुनचुन मिश्र २.४.१.जगदीश प्रसाद मंडल- विहनि कथा- कौआक मैनजन २. अनमोल झा- चारिटा विहनि कथा ३.ज्योति- एकटा विहनि कथा-ध्वनि-प्रतिध्वनि २.५.बिपिन कुमार झा- प्रदेश केर विकास : एक चिन्तन- (बिहार-विकास सन्दर्भ मे आलोचनात्मक अभिव्यक्ति) २.६.विरेन्द्र कुमार यादव- कथा- नाह आओर जिनगी २.७.जितेन्द्र झा- महाकवि विद्यापति अक्षयकोष २.८.बेचन ठाकुर- नाटक- बेटीक अपमान श्रीमती शेफालिका वर्मा- आखर-आखर प्रीत (पत्रात्मक आत्मकथा)- आगाँ जन्म:९ अगस्त, १९४३, जन्म स्थान : बंगाली टोला, भागलपुर । शिक्षा: एम.ए., पी.एच.डी. (पटना विश्वविद्यालय),ए. एन. कालेज, पटनामे हिन्दीक प्राध्यापिका (अवकाशप्राप्त)। नारी मनक ग्रन्थिकेँ खोलि करुण रससँ भरल अधिकतर रचना। प्रकाशित रचना: झहरैत नोर, बिजुकैत ठोर, विप्रलब्धा कविता संग्रह, स्मृति रेखा संस्मरण संग्रह, एकटा आकाश कथा संग्रह, यायावरी यात्रावृत्तान्त, भावाञ्जलि काव्यप्रगीत, किस्त-किस्त जीवन (आत्मकथा)। ठहरे हुए पल हिन्दीसंग्रह। २००४ई. मे यात्री-चेतना पुरस्कार। शेफालिकाजी पत्राचारकेँ संजोगि कऽ "आखर-आखर प्रीत" बनेने छथि। विदेह गौरवान्वित अछि हुनकर एहि संकलनकेँ धारावाहिक रूपेँ प्रकाशित कऽ। - सम्पादक ....... सस्नेह- केदारनाथ लाभ, राजेन्द्र कॉलेज, छपरा। एखन धरि हुनका सँ हमरा भेंट नहि भेल छल। ई पत्र हमरा ओ सहरसाक पतासँ देलनि-हम डुमरा मे छलौं। प्रिय रजनी मेरे स्नेह । राखी का त्योहार आने के बहुत पहले से तुम्हारी स्नेहिल स्मृतियाँ घनीभूत होने लगती हैं और मैं राखी की तुम्हारी राखी की प्रतीक्षा करने लगता हँू । और हर वर्ष की भाँति इस वर्ष भी सही समय पर तुम्हारी राखी-तुम्हारी स्नेह-सुगंध से महमहाती - आ गयी । हृदय जुड़ा गया मन-प्राण आप्यापित हो उठे आँखे हर्ष-उल्लास से फैल गयी । सलोनी पूर्णिमा को वह राखी मेरी कलाई मे बाँधकर मानो दो प्राणों को जोड़ गयी । यह सलोनी पूर्णिमा भी क्या गजब का दिन है। भाई-बहनों को स्नेह-सूत्र मे बाँधकर आनन्द की ज्योत्सना उड़ेल देती है उस दिन की हर घड़ी । राखी के सूखे धागे मे स्नेह का काव्य-रस छलक उठता है छूट उठती है किसी दूर से आनेवाले संगीत की मादक स्वर लहरी नाच उठता है प्रसन्नता से मन का मयूर और राखी भेजनेवाली बहन को मेरा हृदय अशीषने लगता है। तुम्हारा जीवन सुख शान्ति और समृद्धियों के संगीत से गूँजता रहे, तुम शतायु होकर अपनी साहित्य-साधना से लोक मंगल करती रहो - यही इस भाई की अशेष कामना है। विश्वास है तुम सबके सब सानन्द हो । वर्मा जी को मेरा स्नेह निवेदित हैं। शुभकामनाओं सहित। तुम्हारा भाई केदार नाथ लाभ भारत छोड़ो स्वर्ण जयंती 9 अगस्त 93 आदरणीया शेफालिका जी यथोचित भाई नीरज से और आपके पत्र से भी यह विश्वास जगा कि आप जैसी सशक्त लेखिकाओं के मन-मस्तिष्क मे भी निशांत के प्रति किसी न किसी अनुपात मे जगह हैं । बस इसी समर्थन भाव के बल पर ही तो निशांत धारा के प्रतिकूल जूझता हुआ अपने महान उद्देश्यों की प्राप्ति की ओर बढ़ रहा है। अतः आपलोगों का यह समर्थन हमारे लिए काफी बहुमूल्य है। और इस समर्थन भाव के प्रति आप जैसी महानुभावों का निशांत सदा ऋणी रहेगा । पत्र-पत्रिकाओं के जरिये शायद पता चला हो कि पिछले महिने 19 जनवरी 1960 को महान साहित्यकार व चिन्तक माननीय आनन्द शंकर माधवन जी के संरक्षकत्व तथा श्री रामाधिकारी शर्मा की अध्यक्षता मे लेखकों के हितों की रक्षा एवं उनके मूलभूत उद्देश्यों की पूर्ति के उद्देश्य से भारतीय राष्ट्रीय लेखक संघ को स्थापना की गई है। राष्ट्रीय स्तर के इस संघ का विभिन्न राज्यों तथा जिलों मे शाखाएँ तेजी से खोली जा रहीं है। बिहार के बतीसो जिलों मे से अधिकांश मे तथा कुछ राज्यों मे यथाशीघ्र इसकी शाखाएँ खोलकर एक जबर्दस्त अधिवेशन आहूत करने की घोषणा है। आप भी संभवतः इस बात से सहमत हों कि वर्त्तमान समय मे बिना एकजुट हुए लेखक अपने अस्तिव की रक्षा नहीं कर सकते । इन्हीं सब महत्त्वपूर्ण उदेश्यों की पुर्त्ति के लिए 'writers club' की स्थापना की गई है। जिसमे आप जैसे सशक्त और समृद्ध लेखिकाओं का योगदान अपेक्षणीय है। चाहता हँू आप भारतीय राष्ट्रीय लेखक संघ के संयोजन का भार स्वीकार कर सहरसा मे इसकी जिला शाखा खोलकर अपना महत्पूर्ण योगदान दें । निश्चय ही आपका ऐसा समर्थन हमारे लिए एक गौरव की बात होगी । आप इस सम्बन्ध् मे वहाँ के अन्य लेखक-लेखिकाओं से संपर्क साध कर हमे सूचित करें । फिर मैं आपको विवरण सहित संयोजक मनोनयन पत्र डाक से भेज दूँगा । कार्यकारिणी गठन के पश्चात आपके सुविधानुसार भा॰आनन्द शंकर माधवन जी के द्वारा इसका उद्घाटन समारोह भी सम्पन्न कराया जा सकता है। जिससे भारतीय राष्ट्रीय लेखक संघ के सम्पूर्ण उद्देश्यों की जानकारी वहाँ के लेखकों तथा बुद्विजीवियों को मिल जायेगी । हमलोगों को भी आपसे मिलकर प्रसन्नता होगी । तत्काल मैं परीक्षा मे व्यस्त हँू फिर भी आपको इस सम्बन्ध मे पत्र लिखते हुए रा ले सं की शाखाएँ खुल चुकी है आशा करता हँू आपका भी हमे भरपूर सहयोग समर्थन प्राप्त होगा। इन्हीं आशाओं के साथ । शुभकामनाओं सहित विकास पाण्डेय मंत्री भारतीय राष्ट्रीय लेखक संघ भागलपुर 25 7 79 मान्यवर शेफालिका जी बिहार विश्वविद्यालय मुजफ्फरपुर से हम अभयुक्ति मैथिली गीतिकाव्य मे प्रगतिशील चेतना पर शोध क रहल छी। प्रगतिशील एवं मैथिली गीतक संदर्भ मे हमरा अपने सँ किछु जिज्ञासा अछि। अपने सन प्रसिद्ध साहित्यकार विद्वान आ महान लेखिका हमर जिज्ञासा केँ सिद्ध क सकथि। इएह सोचि किछु प्रश्नावली अपनेक सेवा मे प्रस्तुत क रहल छी कृपया पन्द्रह दिनक अनन्तर एकर उत्तर लिखिक कृतार्थ कएल जाए। हमरा आशा नहि पूर्ण विश्वास अछि जे अपने हमर कार्य सिद्धिक श्रेय अवश्य लेब। अपनेक पूनम कुमार बर्मा द्वारा डा शान्ति सुमन मिठनपुरा मुजफ्फरपुर महोदया शेफालिका जी फगुआ आबि रहल अछि। फगुआ मे तीत मीठक अनुभव लेने होयब। किछु घटना एहनो भेल होयत जे फगुआ के नामे सुनला सँ मानस पटल पर नाचऽ लगैत होयत। किछु मनलगगु होयत तँ किछु अनसोहांत आ किछु तँ निठ्ठाहे जोगरक एहने सन किछु अविस्मरणीय घटना मिहिरक पाठककें सुनाबी से आग्रह भवदीय दिलीप कुमार सिंह झा मिथिला मिहिर 7 2 89 ई पत्र पढ़ि मोन पड़ि जाइत अछि डुमरा बाबू जी संग केओ होली नहि खेलि सकैत छल लेकिन सूकू बाबूजीक मुँह मे अबीर आ देह मे रंग दय खूब थपड़ी पारैत छली। पाछा पाछा पींकी लीली-दादाजी हम्मु-बाबूजी खिलखिलाके हँसैत छलाह। ब्याहक बाद एक बेर फगुआ मे वर्मा जी अपन जिगरी दोस्त कहु वा कि लंगोटिया यार बच्ची बाबूक संग भांगक लोटा लय पहुँचि गेलैथ रंग अबीरक नशा मे मातल - हमरा सँ भांग पीबाक आग्रह केलन्हि। आय धरि कहियो हम वर्मा जी के भांग पीबैत नहि देखने छलौं। भरि दिन सीरा आगुक पूआ पकवान बनवैत गौआं संग रंग खेलैत हम एकदम थाकि गेल रही! आब अबीर खेलय बलाक टोली देओर ननदि सभ बाँचले छल! चूँकि ब्याहक तीन चारि बरीस बाद होली मे रहबाक अवसर भेटल छल! पढ़ैत छलौं तँ होलीक छुट्टी एक हफ्ताक मात्रा होइत छल-पटना सँ डुमरा काशी जकाँ त्रिशूल पर छल! साँझ भऽ गेल छल! जल्दी जल्दी गोसाँय कें साँझ देलौं। समस्त वातावरण सिनुरिया भऽ गेल छल! सभ अलमस्त ताहि पर बेर-बेर हिनक आग्रह भाँग पीबाक! तामस बड़जोर छल जकरा पान बीड़ी सिगरेट सुपारी चाह काफी पीबाक हिस्सक नहि छल ओ एकदम सँ सीधे भांग पर उतरि गेल छलाह। अनटोटल कथा सुनिते बिथा- हमरा हिनक जिद बड़ विचित्र लागि रहल छल- पता नहि भांग पीबाक बाद हमर की दुर्गत होयत हम निहोरा करैत बाजलौं- हम सासुर मे छी पटना मे नहि कोनो उच्छृंखलता भऽ जाइत तँ अन्हेर भऽ जाइत। और मुँह फुलाय कोना मे बैसि गेलाह- सोचैत रही हमहुँ रूसि सकितहुँ मुदा तुर्रा तँ ई छल गलतीयो वएह करैत छलाह आ मनाब हमरे पड़ैत छल। ओ तँ तामसे कबाब जकाँ जरल जरल रहैत छलाह। नहि जानि ई पति नामधारी जीव किएक अपन पत्नी पर एतेक रोब झाड़ैत छथि जेना हुनक जन्मसिद्ध अधिकार होय- आ आइ फगुआक राति ई अप्रसन्न भऽ जेताह तँ हमही अपन प्रसन्नता लय की करब, हमर प्रतिष्ठा आब अहाँक हाथ अछि। जँ बाबूजी जानि जेताह तँ नहि जानि कोन अनर्थ भऽ जाइत। हम हिनका समक्ष विवश भऽ गेलौं, एक दिसि बाबूजीक धियान अबैत छल जे अपना जमानाक प्रभुत्व सम्पन्न जमींदार मुखिया आ हिमालय सन व्यक्तित्वक स्वामी छलाह जिनका सँ बात करबाक अपन बेटा सभकें साहस नहि होयत छल दोसर दिसि ललित लवंग लतापरिशीलन सन अपन सुन्दर पति देवताक निर्दोष प्रेममय पहिलुक आग्रह- जीत हुनक भऽ गेल! हमरा एक गिलास दूध सँ भरल शरबत पीआय एकटा विजयिनी मुस्कीक संगे यार दोस्तक टोली मे कचहरी पर चलि गेलाह। सासुर मे पर्दाप्रथा तँ कठोर रूपें लागू छल। हवेली सँ बाहर नहि निकलि सकैत छलौं। दलान पर नहि बैसि सकैत छलौं। गामक इजोरिया पूर्णिमाक इजोरिया अंगनाक कोन कोन मे पसरि गेल छल मदमस्त भऽ। गामक टोली पर टोली ढोल झाल मृदंग हरमुनिया लऽ कऽ फाग गबैत निसाँ मे चूर अबैत छल-जल कैसे रे भरी जमुना गहरी-नामी नामी केसिया भुंइयाँ मे लोटै हे पिया परदेश मोरा दीयरा लुभेलक गीतक समवेत स्वर लहरी पर आसमान झूमि रहल छल धरती नाचि रहल छल-चान निमिमेष ताकि रहल छल- अचक्के हमर कान मे सन्न-सन्न स्वर अबय लागल! जेना कतेको माईकक स्वर कतेको घड़ी घंटक स्वर गूँजित भ रहल होय। हमर माथ घूम लागल आ अचक्के लागल जे हम एकमद हल्लुक भऽ गेल छी। हम अपना के जाँचवा लेल उठि के ठाड़ भऽ गेलौं। एक डेग धरती पर राखलौं कि हम धरती पर छी वा कि हवा मे! फेर दोसर डेग आस्ते सँ राखलौं- डेगा डेगी नपैत हम किछ दूर चलैत रहलौं आ लागल जेना हवा सँ हल्लुक हम भऽ गेल छी- हम अन्तरिक्ष मे परी जकाँ उड़ि रहल छी। चारू कात निस्तब्धता पसरल छल। रात्रि तीति भीजि अलसाय सूतल छल इजोरियाक कोरमे। नहि जानि कोन ज्वार उठल हम एहिना डेगा डेगी दैत उड़ैत दलान पर पहुँचि गेलौं जे पुतौह सभ लेल वर्जित स्थान छल! हमर आँचर अस्त व्यस्त दलान एकदम सून्न इजोरियाक शुभ्र वसन समूचा प्रकृति कें धवल बना देने छल। ओसाराक पाया पकड़ि हम खूब हँसय लागलौं। हमर अचेतन मे ई भाव स्पष्ट छल जे हम अनुचित कऽ रहल छी मुदा चेतन मे अपना कें संभारि नहि पबैत रही। अचानक बाबूजी गाम दिस सँ घूमैत दलान पर आबि गेलाह। हमरा ओहि अवस्था मे देखि निश्चित रूप सँ ओ अचंभित भऽ गेल हेताह। हमरा लागल जे दूर सँ आँखि फाड़ि-फाड़ि देखि रहल छलाह जे ई कनिये थीकिह ने हम तँ भांगक मस्ती मे छलौं। हुनका देखि आर जोर सँ ठहाका लगबए लगलौं। मुदा हम जानि रहल छलौं जे हम गलत काज कय रहल छी। तावत बाबूजीक पाछा पाछा ई अपने आबि गेलैथ। दलान पर हमरा एसगरे देखि बताहि जकाँ ठहाका लगबैत देखि हिनका बहुत जोर तामस उठि गेलैक ताहि पर बाबूजीकें ठाड़ देखि- अचक्के हिनका अपन करनीक धियान एलैक त भागि कें अंगना चलि एलैथ- पाछू पाछू बाबूजी धीर गंभीर चालि सँ चलि गेलैथ। राति कछमछी मे हिनकर बीति गेल- अहाँ हमर करनी सभ कें तँ नइ कहि देलीयैक हम आय धरि सोचि रहल छी - बाबूजी अपना मने की सोचैत हेथीन- किएक ककरो लग एकर जिज्ञासा नहि केलखिन- कहीं बाबूजी सेहो तँ नहि भाँग सँ मातल रहथीन- मुदा ई सत्य छैक जे हमरा मे एखनो ई घटना एकटा अपराध बोध जगा जाइत अछि- सेवा मे चिर सौभाग्यवती श्रीमती शेफालिका जी अशेष आशीष । अहाँक पत्र भेटल । श्री गोपी बाबू अहाँक सम्बन्ध मे वड़ आकुल छथि । स्थिति सँ अवगत भेलहु । अहांक जे व्यवधान से किन्नहु नहि रहत माँ भगवती श्री 108 उग्रतारा माइ अहांक समस्त व्याकुलता के हरण कै लेती । हम दिसम्बर कें वनगामक हेतु चलब आ 3 दिसम्बर के वनगाम पहँुचि जायब । अहाँ कृप्या 2 से 3 दिसम्बर धरि वनगाम हमरा से सम्पर्क करी । 2 कै सम्पर्क करी ते सर्वश्रेष्ठ । हम अहाँ क ल क उग्रतारा माईक शरण मे जायब संग मे ओकिल साहेब रहथि तै आर नीक । कृपया एकटा श्वेत शंख एकटा रूद्राक्ष आ नौ टा मूंगाक प्रबन्ध कै के राखव। एकटा आर अनुरोध। कृप्या कोनो प्रकारक भोजनक आग्रह नहि करव । मात्रा हम चायटा पीयव । अहि प्रक्रिया लेल आवश्यक छैक । त अहाँ गुगल लौहवान जटामसी सड़ड़ चन्दन कर्पूरक मिश्रण से अपना घर मे साँझ भोर धूप देव । भगवती अहाँक कल्याण करथि । कोनो तरहक चिन्ता नहि करब । माय चिन्तामणि छथि । सस्नेह मणिपद्यम बहेड़ा 5 11 82 (क्रमशः) १. विनीत उत्पल- दीर्घकथा- घोड़ीपर चढ़ि लेब हम डिग्री २.रामकृष्ण मंडल 'छोटू'- कथा- बाप ३.नन्द विलाश राय- कथा अइना १ विनीत उत्पल दीर्घकथा घोड़ीपर चढ़ि लेब हम डिग्री विनीत उत्पल जे कथाकार नहि हुअए ओ कोन आ केहन कथा लिखत, एकर ठेकान तँ कियो नहि कऽ सकैत अछि। मुदा युवा पीढ़ीकेँ देखि कऽ कोनो कथा लिखब संभव नहि अछि आजुक कालमे। तकर बादो कियो हुनका लऽ कऽ लिखैत अछि तँ कहि सकैत छी जे ओ सभटा फूइस लिखि रहल अछि। एकरा मादे हमर ई तर्क अछि, जे युवा अछि ओ केना बुझता जे ओ सतमे युवा छथि या नहि। जखन एहि भारत मे 80 बरखक बुढ़ जे.पी. युवाक नेतृत्व कऽ सकैत अछि, जीवनक आखिर कालमे देशमे संपूर्ण क्रांतिक बिगूलि फूकि सकैत अछि, तखन युवाक उम्रक की सीमा मानैत अछि कियो। नेनामे जखन स्कूल जाइत अछि तखन सभ सोचैत अछि जे कॉलेजमे खूब उछल-धक्का करब। कॉलेजमे गेलापर लागैत अछि जे करियर बना लेब तकर बाद तँ अपन जिनगी अछि आओर जखन करियर बनि गेल, ब्याह भऽ गेल तकरा बाद दुनिया सूझै लागैत अछि। जखन जिनगीक ई परिभाषा अछि तखन युवाक कोन कथा लोक सभकेँ सुनाओल जाइत अछि। मां-बापक सपना, भाइ-बहिनक इच्छाक आगू अप्पन सपना तँ अधूरे रहि जाइत अछि। यएह हाल तँ आलोकक छल। हुनकर नजरिसँ देखियौ तँ ओ कहियो युवा भेल या नहि स्वयं नहि जानैत अछि। एकटा आओर गप, एहि कथाक शीर्षकपर एखन नहि जाऊ। अहाँ तँ जानतै छी जे ब्याह करहि लेल लड़का घोड़ीपर बैसि कऽ बाराती जाइत अछि। मुदा आब हमरा ई नहि कहबै, ‘आंय हो, हमरामे तँ लड़का घोड़ीपर बैसि कऽ बराती नहि जाइत अछि। ई कोन गप अहाँ कऽ रहल छी’। एहि गपमे हम एतेबे टा कहब जे अहाँक बिरादरीमे ई विधि नहि होइत अछि, एकरामे हम कत्तौसँ दोषी नहि छी। किएक तँ जिनकर जाति, वंशमे जे भेल आयल अछि, आ॓हि विधिकेँ हटायब 21म शताब्दीमे बड़ कठिन गप अछि। फेर ईहो गप अहाँ हमरा नहि कहि सकैत छी जे कत्तौ घोड़ी पर चढ़ि कऽ डिग्री लेल जाइत अछि। तँ सुनू ई, जे गप छैक, ‘घोड़ी पर चढ़ि लेब हम डिग्री’, ई हमर नहि अछि। ई गप आलोक बाबू हमेशा कहैत छला। आलोककेँ अहों तँ नहि जानैत छी। ओ, ओ आलोक नहि अछि जकर अर्थ रोशनी होइत अछि। ओ, ओ आलोक अछि जे माँ, पिता, बहिनक कारण अप्पन सपनाकेँ घूरिमे जरा कऽ आस्ट्रेलियाक ब्रिसबनमे रहैत अछि। पिछला तीन बरखसँ ओ अप्पन देश नहि आयल अछि। ओतय तीन शिफ्टमे काज करैत अछि। हुनका नीन नहि होइत अछि। लागैत अछि जे हुनका नहि सुतबाक बीमारी भऽ गेल छनि। मुदा आलोक बाबू एकटा जिंदा मशीन अछि जे अप्पन सपनाकेँ मारि कऽ लोकक सपनाकेँ यथार्थमे बदलहि लेल काज करि रहल अछि। हुनकर जिनगीक कथा मझधारक एहन नावक कथा अछि जकरा कोनो दिशा नहि देल जाइत अछि। मां-पिता हुनकर जिनगीक खेवनिहार अछि, जेना ओ चाहता, ओहिना हुनकर दिशा भऽ जाएत। छत्तीसगढ़क राजधानी अछि रायपुर। ओहि शहरमे एकटा मोहल्ला अछि शंकरनगर। एतय पिता बड़ मनोयोगसँ एक-एक पाइ जोड़ि कऽ घर बनौने रहथिन। आलोकक पैतृक घर तँ भिंड-मुरैना लग रहनि। जतौका जंगलमे कहियो डकैतक राज चलैत रहै। पिता, के.जी.कुशवाह, फूड कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया मे काज करैत रहथि। हुनकर ब्याह भोपाल भेल छल। दूटा बच्चा छल। पहिलुक आलोक आ दोसर बेटी किनू। दुनू पढ़ैमे खूब तेज। मुदा रायपुरमे रहैक कारण हिन्दी माध्यममे पढ़ाइ भेल छलनि। तहिसँ हुनकर अंग्रेजी कमजोर छल। मां-पिताक सपना छल जे हुनकर बेटा खूब पढ़ि-लिखि कऽ बड़का आदमी बनि जाए । इंटर केनहि कालमे माँ सोचथिन जे हमर बेटा सी.ए. बनि कऽ नाम कमाबै। ताहिसँ हुनकर एडमिशन बी.कॉममे कएबा लेल जिद पकड़ि लेलखिन। एकटा बेटा ओहिनो माँकेँ बेसी दुलारु होइत अछि। आखिरकार माँक जिद मानल गेल आओर आलोक बी.कॉम मे एडमिशन लऽ लेलक। बी.कॉम मे नीक मार्क्स अएलै आओर सी.ए. क तैयारी लेल आलोक दिल्ली आबि गेलाह. दिल्लीक पूर्वी इलाका लक्ष्मीनगर सी.ए. क गढ़ मानल जाइत अछि। एतय कतेक सी.ए. केँ तैयारी करबैक लेल कोचिंग संस्थान अछि, अंगुरीपर गिनलो नहि जा सकैत अछि। आलोक एकटा नीक कोचिंग संस्थानमे एडमिशन लेलक। कामर्स तँ नीक लागैत छल हुनका मुदा सी.ए. बनैक कोनो चार्म नहि छल। कोचिंग करैत, एक-दू बेर ओ परीक्षा देलक मुदा ढ़ाकक तीन पात रहल। ओहिनो हर बरख पाँच पर्सेंट तँ सी.ए.क रिजल्ट होइत अछि। करीब तीन साल तक दिल्लीमे रहलाक बाद रायपुर घुरि आयल। मायक सपना अपूर्ण रहि गेलनि। सी.ए. बनैक कोशिश रंग नहि आयल। एकटा आलोक छल जे कखनो मां-पिताक आगू अप्पन सपनाक गप नहि बतैलखिन। जहिना जे गप दुनू प्राणि कहैत छल, तहिना आ॓ मानैत छल। किछु दिन डिप्रेशनमे रहलाह आलोक। मुदा माय तँ माइये होइत अछि। नया सपना देखैमे कोनो दोषो नहि अछि। किछु दिन बीतल तँ घरमे कलह हुअए लागल जे आलोक आबि कऽ की करताह? घरमे अनुशासन एतेक कड़ा जेकर गप कहलो नहि जाय। दुनू भाइ-बहिनकेँ माँ-पिता जे कहतियै, से ओ सभ करै। अहिमे एक दिन मांक मनमे आयल जे बेटा सी.ए. नहि बनल तँ की भेल, ओ वकील बनताह। हुनका कियो सुझाव देलनि जे वकील तँ गांधीजी सेहो छल, जवाहरलाल नेहरू सेहो, जखन ओ प्रधानमंत्री बनि सकैत अछि तखन अहाँक बेटा तँ ओकरोसँ तेज अछि। आलोककेँ कहियौ जे ओ एल.एल.बी. मे एडमिशन करा लेताह आओर शहरमे कॉलेज अछि। खूब मन लगाकऽ पढ़ताह आ रायपुर राजधानी भऽ गेल अछि, खूब केस-मुकदमा हेबे करत, ताहिसँ हुनकर वकालतक धंधा खूब चलत। आखिरकार जहिना माँ क मन बदलल आलोकक करियरक राह सेहो बदलि गेल। आब ओ बैरिस्टरीक पढ़ाइ लेल एडमिशनमे जुटि गेल। हुनकर मेहनत आओर माँक आशीर्वाद रंग आनलक। कॉलेज तँ कॉलेज। ओहियो मे लॉ कॉलेज। पढ़ाइ की होएत। नहियो गेलाक बाद एटेंडेंस बनि जाइत छल। बस प्रोफेसर के आगा-पाछां करैत रहू, एटेंडेंस बनि जाइत। फार्म भरू, गेस पेपर से पढ़ि लियौ आओर परीक्षा के एकाध हफता पहिलै टीचर से ‘सजेशन’ लऽ लियौ। अहियो स नहि संतुषि्ट हुए तँ पिछला पांच सालक क्वैचश्न पेपर देखिकर खास-खास सवाल कऽ रटि जाऊ। ओकरो से नहि हुए तँ जे अहांक रूम मे गार्डिंग कऽ रहल अछि, हुनका सेट कऽ दिओ कि ओ परीक्षा हॉल मे एक कोना धरि के पूरे काल उंघैत रहै। बस फेर की। गेस पेपर छबे करल नहि तँ ‘सर’ के बनाओल नोट्स कोन दिन काज आयत। ओकरा बिथायर कऽ सभटा सवालक जवाब लिखैत जाऊ। एतबैयो साहस नहि अछि तँ परीक्षा के एक दिन पहिलुका राति मे छोट-छोट पुरजा बना लियै आओर मोजा, कॉलरक पाछां नहि तँ अंगाक आस्तीन मोरि कऽ ओकरा मे नुका लियो ओ पुरजा कऽ। जब देसक एहन शिक्षा होएत तखन शिक्षा प्राप्त करहि बला केहन। अनुमान लगा लियौ। आखिर जे सभ शिक्षक बनल अछि ओ की कोनो पूरा कोर्से पढ़िकै बनल अछि। जे हुनि आदर्शक गप करत। चोरी तँ चोरी होएत अछि। चाहे अहां दू टा पाई चोरि करू या फेर परीक्षा मे ‘चीटिंग’। यहि कारण छल जे बाप बेटा कऽ कहैत छलाह जे कोर्स खत्म नहि भेल अछि तँ कोना चीटिंग कऽ लिओ। ओहिनो हमर सभक मतलब मैथिल मे दैत छी गप लिओ लपालप चलतै अछि। आओर मारि कम बपराहैट बेसी अहि लेल तँ कहल जाइत छल। पूरा साल तँ उछल-धक्का करै सं फुरसत नहि, मुदा परीक्षा नहि पास करहि सकलहुं तँ माय-बाप सं लऽ कऽ सभ कियो कहैत रहताह, ‘हेयौ जानैत छिये। अहि बेर बड़ कठिन सवाल आयल छल। हमरो टीचर से कहैत छलाह।’ और तँ और, अपन मौनक जोगर टीचर से कहा लेत, ‘दस टा मे से पांच टा कोश्चन तँ सिलेबस से बाहर के रहैत, तँ कोनो कियो सवालक जवाब लिखतै।’ आओर कानाफूसी ईहो होएत, ‘अहि बेर खूब टाइट परीक्षा भेल। ओ दरोगा मंडल,जे आयल छल, बड़ बदमास अछि। हिलै तक नहि देलक।’ ई तँ भेल परीक्षाक गप। जखन परीक्षा भऽ जाइत अछि। तखन कॉपी कतय जचां रहल अछि, ओकर पता लगाबै लेल दिनराति बौआ रहल अछि। मिथिला मे ते जानते छी, बेटा-बेटी मे की फर्क होएत अछि। बेटा जे जखन चाहत ओ मिलै ओकरा। मुदा बेटी तँ ऑन घर जाइत। ओकरा खिया-पिया के की होएत। बेटी के पेट तँ नून रोटी खायक भरि जाइत मुदा बेटा कऽ तँ दूध-भात चाहि। बेटा अंग्रेजी मीडियम मे पढ़त, मुदा बेटी ते सरकारी स्कूल मे जाइत अछि, ई की कम अछि। यहि हाल छत्तीसगढ़ के छल। जे कहियो आलोक बाबू के घर आओर जे समाज मे ओ रहैत छल, ओहिने छल। आलोक बाबू लॉ कॉलेज मे एडमिशन लेलाह तँ जरूर मुदा पढ़ैक जरूरत की छल। शुरू मे एकाध दिन कॉलेज गेलाह, जखन दोस्त-मुहिम बनि गेलाह, टीचर चिनहै लगलाह तखन फेर बाते की। घर से रोज टाइमे पर निकलैत छलाह, मुदा लॉ पढ़ैत छलाह या किछु आओर, से आलोक बाबू टा जानैत छल। मुदा सांझ मित्झर भेला पर घर जरूर टाइम से घुरि जाइत छल। घर मे सभ कियो बुझैत छल जे ओ तँ क्लास कऽ कऽ आबि रहल अछि। कहियो हाथ मे दू टा लॉ के किताब झूलाबैत घुरैत छलाह, तँ कहियो कोनो हाथ मे केकरो नोट्स लऽ कऽ। मुदा नीक गप हो या अधलाह, नुकायल तँ नहि रहैत अछि। आलोक बाबूक किरदानी लोकक आगू आबै लागल। शहर मे हुनकर नीक दोस्त छल तँ बदमाशो दोस्त ओतबै छल। हुनकर कॉलेज मे 25 साल से एकटा परंपरा छल, जे क्लास के बदमाश लड़का सभ आगूक बैंच पर बैसैत छलाह। मुदा आलोक बाबू जखन एडमिशन लेलक तँ हुनकर दोस्त किछु अहिनो छल। ताहि से ओ अगलका बेंच पर बैसऽ लगलाह। चूंकि हुनकर पिता के शहर मे एकटा इज्जत छल। ताहि सं लोक मानैत छल जे आलोक बाबू नीक होएत। मुदा लोक ई नहि बुझैत छल जे यदि अहांक खानदान नीक अछि, एकर मने ई नहि भेल जे अहों नीक होयब। लेकिन ई गप की बुझैता लोक-बेद कऽ। एखनो देखियो नै, ई जाति, गोत्र, मूल, मूलक ग्राम की होएत अछि। ओहि काल मे जे ऋषि भेल हुनकर हम सभ वंशज अछि। एकर मने ई तँ नहि भेल जे हमहूं ऋषि भऽ गेलहुं। हाथक पांच आंगुर की बराबर अछि। घर मे चारि भाई अछि, सभक अलग-अलग विचार आओर आदत अछि। तखन हम कोना कहि सकैत अछि जे खानदान से लोकक आदत, संस्कारक निर्धारण होएत अछि। की राजेंद्र प्रसाद के खानदान की राष्ट्रपतिये छलाह। ललित नारायण मिश्र कतेक बड़का नेता भेलाह, मुदा खानदान मे कियो क्या नहि भेल। जगन्नाथ मिश्रक नाम चारा घोटाला मे आयल। लालू यादवक खानदान चरवाहा के अछि। मुदा ओ बिहार पर एतेक दिन शासन करलाह जे एखैन धरि कियो नहि करलाह छल आओर आगू के करताह कहल नहि जाई सकैत छी। तखन आलोक बाबू तँ आलोक बाबू छल। पढ़हि मे नीक छल ताहि से नीक स्टूडेंट हुनका सं दोस्ती करते छलाह, मुदा अधलाहो सोचैत छलाह जे हुनका संग रहि के किछु तँ नीक गप आ पढ़ैक लेल जानकारी भेटत। अहि बीच एक दिन हुनकर मन मे आयल जे अंग्रेजी नीक नहि होएत तँ जिनगी मे किछु नहि कऽ सकब। फेर की छल। ओ पूरा शहर ताकि गेलाह जतय अंग्रेजी बाजै लेल आओर ग्रामर कियो सिखा दिया। मुदा रायपुर तँ रायपुर छल। ओहि काल ओतय एडवांस नहि भेल छल जे अंग्रेजी पढ़ाबैक लेल कियो भेटतियै। ओ निराश भऽ गेल छलाह। मुदा एक दिन हुनका पता चलल जे शहर के बीचोबीच जे ‘होटल निहार’ अछि ओतय किछु भेट सकैत अछि। रायपुर मे जतय कॉलेज अछि ओकरा मे पढै बला नीक सभ छात्र सभ शुक्रवार के आबैत छलाह। शहर के जे छात्र बैंक क्लर्क, पीआ॓, एसएससी, एमबीए के परीक्षाक तैयारी करैत छलाह, ओ ओतय सांझ मे आबैत छल। बैनर छल रोट्रेक्ट क्लब। रोटरी के यूथ विंग। एकर बैनर तल सभ मिलि कए खूब ग्रुप डिस्कशन करैत छल। जेनरल नॉलेज एक-दोसरा से पूछैत छलाह। एक्सटेंपरी मे सेहो भाग लैत छल। लड़का-लड़की मे कोनो भेद नहि होएत छल। एतय लागैत छल जे किछु सार्थक काज भऽ रहल अछि। रायपुरक रोट्रेक्ट क्लबक इतिहास रहल अछि जे ओतेक बेसी सदस्य देशक कोनो परीक्षा हुए सभमे खूब नीक करलक छल। आबि आलोक बाबू के जिनकी बदलि गेल छल। ओ सभ शुक्र कऽ रोज होटल निहार जाय लगलाह। आपस मे अंग्रेजी बाजैत छलाह। शुरू मे दिक्कतो भेल, मुदा धीरे-धीरे बाजहि लगलाह। एकाएक आलोकक बात-व्यवहार सभटा सेहो बदलहि लागल। एक दिन क्लब मे फिल्म कऽ लऽ कऽ गप शुरू भो गेल। आखिरकार गपशप मे ई गप पर जोर देल गेल जे सभ कियो अप्पन-अप्पन वृतांत सुनाओल जाए जे हुनकर फिल्म देखबात आतुरता आओर फिल्म संस्कार कोना भेटल। जतेक गोटा रहैत ओतय, सभ अप्पन-अप्पन गप सुनाबहि लागल। कियो कहलक, पापा के पॉकेट से पैसा चुराकऽ देखलहि रहि फिल्म। कियो कहलक जे माम के साथ गेल रहि तँ किओ कहलक स्कूल से भागि के गेल रहुं फिल्म देखने। आप जखन आलोक बाबू के पारि आयल फेर की छल। हुना संग तँ गपक खजाना आओर अनुभव के विस्तर छल। ओहिनो अहां जानैत हेबै जे मुकि्तबोध कहने छलाह जे जिनका संग जतबे अनुभव हेता हुनकर रचनात्मक क्षमता ततबेक बेसी हेता। ई गप आलोक बाबू पर बेसी बैसल रहै। फेर की छल, शुरू भऽ गेलाह आलोक बाबू। ओहि दिन जे ओ ओतय भाषण देलैन से महीना भरि सभक मुंह पर छल। जे जतय मिलतियै ओ ओतय आलोक बाबूक फिल्म देखहिके किस्सा बाजैत छल। आहि बैठकक गप क्लब के पत्रिका मे सेहो छपल छल। फिल्मक लाऽ कऽ कहने की छल, लोक कऽ आनंद विभोर कऽ देलक। ओ लिखने छलाह, फिल्म, फ़िल्म और फ़िल्म। ,ई शब्द छल कि आओर कुछु। एकरा सं परिचय कोनो भे, क्या भेल, एकर मैन तँ अछि। दिवाल पर चिपकल पोस्टर, अखबार मे छपल फोटो, गली-मोहल्ला मे लाउडस्पीकर मे बाजैत गाना आओर डायलॉग या रेडियो मे प्रसारित होए बला गाना मन-मस्तिष्क कऽ खटाखटा कऽ राखि दैत छल। शादी-ब्याहक काल माहौल कऽ मदमस्त करैत फिल्मी गाना हुए या जनवरी आ अगस्त मे बजै बला देशभक्तिक तराना, नेना मे अठखेली के संग कौतुहलक विषय छल। ओ एहन काल छल जखन फिल्मी पोस्टर देखहि कऽ मन होएत छल जे हमहूं स्मार्ट बनि जाय आैर ओहिने फैशन करैत रहि। एकटा समय रहिक जखन फिल्म कऽ लऽ कऽ किछु नहि जानैत रहि आओर सभटा हीरोइन एक्के जना लागैत छल। मन ही मन सोचैत रहि जे गाना बजैत कोना अछि, डायलॉग कोना बाजैत अछि, हीरो मैटि से उपर उठि कऽ परदा पर कोना आबैत अछि। की पोस्टर पर जे स्टंट होएत अछि ओ सच्चे मे होएत अछि की नहि। आगू लिखने छल, 'मां कहैत अछि। कोनो अहिनो काल छल, जखन हम सभ सभटा शनि दिन फिल्म देखैने जाइत छलहुं। अहि दिन घरक सभ लोक फिल्म देखहि लेल जाइत छलहुं। ई ओहि कालक गप अछि, जखन हम जन्म नहि लेलहुं छलहुं। मां के मन मे एखनो घुमरैत रहि अछि ओ दिन।" जखन हम होश संभालनौ तँ घर मे ओ रेडियो कऽ बाजैत देखलहुं जे पापा कऽ शादी मे भेटल छल। घर के जे सभ फुर्सत मे रहताह ओ आकाशवाणी से प्रसारित होहुं बला गाना सुनैत रहैक, एफएम ते ओहि काल मे रहबे नहि करै। जकर एहन घर रहताह, ते नेना से गाना सुनहि के आदत केकरा नहि लागत। ओनो बाबा खूब गाना सुनैत छल आ गाबैतो छल। एकटा गप तँ छल। आलोक बाबू के मुंह में सरस्वती बैसेत छलि, क्याकि जखन ओ बाजब शुरू करैत छल, तँ लोक बेद सभ काजि छोड़िकऽ हुनकर गप सुनैहि मे लागि जाइत छल। वैह भेल ओहि दिन। रायपुर के लोक कहैत अछि जे ओ दिन शहर के लिए अलगे दिन छल। भरि राति हुनकर भाषण चलल रहल। क्लब मे जे सभ छल ओ ओहि राति घर नहि गेल छल। तीन बजे भोर धरि फिल्मक संस्कारक गप ओ कैने छलाह। घर मे मां-पापा सभकियो हुनका लेल तंग भऽ गेल छल जे ओ राति मे नहि आयल छल। मुदा सभ कियो जानैत छल जे आलोक बाबू कतो हेता तँ नीके से हेता आओर कोनो काजक कारणे घर नहि आयल छल। हुनकर संगी नीलेंद्र बाजैत छल जे ओ एक गिलाह पानि पिब के फेर बाजब शुरू करने छल। घर मे रेडियो से जानल छलौंह जे गाना की होएत अछि। लाउडस्पीकर मे बाजैत आ गाम मे होय बला नाटक से जानलौंह जे कोन शहंशाह के डायलॉग अछि आओर कोन गब्बर सिंहक। आहि काल मे टेलीविजनो देखलहुं। इंदिरा गांधी आओर राजीव गांधीक अंतिम संस्कार के टीवी पर देखने रहि। मन चंचल आओर स्वभाव अछि जिद्दी। रविक सांझ मे फीचर फिल्म देखैने दोसरा कतए जाइत रहि। बुध आओर शुक्र के सेहो चित्रहार देखैत रहि। मुदा फिल्म तँ इंटरवले तक देखैत रहि क्याकि ओहि काल साढ़े आठ बजे राति बड़का राति भो जाइत छल। आलोक बाबू कहैत छल जे हम ओ उम्र के ओ पड़ाव से गुजैर रहल रहि जखन हमर संगी-साथी नुका कऽ बीड़ी-सिगरेट पिबैत छलाह, फिल्म देखैले जाइत छल, सेक्स कऽ गप करैत छलाह आओर एतय तक कि मारपीट सेहो। मुदा हमर सोच ओहियो काल आओर आजु उल्टा छल। हमर कहब छल जे सभटा लोक काज करैत अछि ओ काज हम नहि कर। यहि कारण छल जे हमर दोस्तक ग्रुप नहि बनल। दोस्तक देखौंश में सिगरेट के मुंह तँ लगैलो मुदा नुका कऽ काज नहि नीग लागैत छल ताहि से नहि पिबलहुं। शाकाहारी तँ नेने से छी। फिल्म देखैक मन भेल तँ लागल जे तीन घंटा धरि भूखिहि रहै पड़त। घरक लोग फिल्म देखहि लेल नहि जाइत छल तखर हमर अकेले जाइत कोनो सवाल नहि रहैक। आलोक बाबू तँ पूरे किस्सागो छल। एक-एक शब्द सोचि-समझि आओर कऽ कहैत जा रहल छल। एक-एकटा गप ख्याल पारि कऽ कहैत रहि आओर लोक सुनैत छल। कहैत अछि स्कूल मे गर्मी आैर दशहरा के नब्हर छुट्टी होएत छल। सभकियो गाम जाइत छलौंह। गामक लोक फिल्म देखहि कऽ लऽ कऽ खूब गप करैत छल। सभटा गप हम चुपचुाप सुनैत रहि। गाम मे जिनकर ब्याह होएत छल, ओ अपन कतनया के फिल्म देखाबैक लेल लऽ जाइत छल। हमहुं सोचैत छलहुं जे सच्चे फिल्म देखबाक कतेक रोमांचक होएत हेता। किछु नहि किछु मन लागै बला जरूर देखाबैक अछि जे गामक लोक ब्याह के बाद फिल्म देखहि लेल जाइत अछि। हमूहि मन मे प्लानिंग बनबैत रहि जे ब्याह हैत तँ सबसे पहिलुक काज करब जे कनिया कऽ लऽ कऽ फिल्म देखहि लेल जायब। जारी २ रामकृष्ण मंडल 'छोटू' कथा- बाप हबलदार गोरचंदक ऐठाम आइ फेर गुमशुमक माहौल बनल छै। आइ हुनकर एकलौता बेटा बलदेवक इंटरक रिजल्ट निकलैबला अछि। कनीदेरक बाद बलदेव मुँह लटकेने हाथमे रिजल्ट लऽ कऽ प्रवेश केलक। बलदेवकेँ एते हिम्मत नहि जे बाबू जीसँ आँखिमे आँखि मिलाबैत। एकठाम बलदेब मुँह लटकेने ठाढ़ अछि। जेना कोनो पत्थरक मुरूत। आ एनहर गोरचंदक आँखि लाल-लाल जेना बुझाइत दुगो आइगक गोला ओकरा चेहरापर अछि। बलदेवक माए श्यामबती, स्थितिकेँ भािप पतिक गुस्सा याद करैत सिहरि उठै छथि। उ तुरन्ते बलदेव लग जा बलदेव हाथसँ रिजल्ट लऽ चहैक उठल, आैर पति दिशन ताकि बाजलि- “यौ-यौ देखिओ, अपन बलदेव सकेण्ड किलाससँ पास भेल।” गोरचंद रिजल्ट छिन बाजल- “हम जानै छी, ई आवारा, बकलेल हम्मर नाक कटौत, हम्मर सभ अरमानपर पानि फेर देत। हम सोचने रहौं ई हम्मर नाम रौशन करत। तब हमहुँ गर्वसँ सीना फुलाए कहितिऐ कि हमरो बेटा दोसरक बेटा जना इंजिनियर, डॉक्टर, दरौगा अछि। मगर-मगर ई कहाँ.... नसीब हमरा।” कहैत-कहैत कानए लगल गोरचंद। जेना-तेना बलदेवक एडमिशन शहरक एगो कॉलेजमे भेल। उ कॉलेजमे बी.ए. इतिहाससँ पढ़ाइ करए लगल। हँसैत, हँसैत साल बित गेलै। मगर बलदेवमे कोनो परिवर्त्तन नइ भेल। उ ओनाहिऐ रहल। मुदा पढ़ाइक समए बीत गेल। पार्ट-वनक परीक्षा भेल। ऐबेर जेना-तेना परिक्षामे देकसी मारैत पास तँ भऽ गेल। घरपर बापक डाॅट-फटकारसँ ओकरा कानपर तँ जूऔ ने टिकै। समए फेर बीतैत गेल। आब बलदेव पार्ट-टूक विद्याथी भेल। ऐबेर कॉलेजक कुछ विद्याथी आगरा ताज महल देखै वास्ते जाइके प्रोग्राम बनेलक। जैमे बलदेव अपनो नाम लिखौलक। सभ विद्याथीकेँ एक-एक हजार रूपैआ जमा करए पड़त। बलदेव अपन बाबुजीकेँ कहलक मुदा उ साफे मना कैर देलखिन। माएकेँ बहुते कहि बलदेव अपन बाबूजीकेँ मनेलक। उ दिन आबि गेल। आइ दुबजिया गड़िसँ यात्रा कएल जेतै। एमहर गोरचंद अपन बलदेवसँ कहलक कि उ बारह बजे ओकरा एक हजार रूपैआ कतौसँ, केनाहिओ व्यवस्था कैर कऽ दऽ देतै। पर ई कि बारह बजि गेलै, अखैन तक गोरचंद थानासँ आपस नइ आएल। घरपर बलदेव गुस्सासँ अपन बापक बहुत भला-बुरा कहए लगल। माए श्यामबती जवान बेटाक मुँहसँ, अपन भगवान जकाँ दुल्हाक बारेमे जली-कुट्टी सुनि आँखिसँ मोती जकाँ नोर गिरबए लगलि। तखने बलदेवक जोरदार अवाज- “माए-माए, देखलिही बाबूक करतुत हम्मर बेइज्जत करा देलक, पुरे कॉलेजमे। आव... आव हम कोना कॉलेजमे..... ?” गुस्सामे बलदेव अपन साइकिल निकाइल चलि पड़ल थाना तरफ। थाना पहुँचैत बलदेव देखै छै। ओकर बाबूजी एगो दरोगाक गोर दाबैत छै। तखनि बलदेवक बाबू कहलक- “हुजुर-हुजुर भऽ सकै तँ पानसौ रूपैआ पैंचा द िदअ। आ हुजुर आइ हमरा कनी जलदीए घर जेबाक अछि। हम्मर बेटा आइ दुबजिया गरिसँ आगरा जयछै।” दरोगा गोरखनाथ अपन रौब झाड़ैत- “चुप सार, बढ़ियासँ जातैले आबै नै छौ आ बेटाकेँ आगरा घुमैले भेजै छेँ। आ ई की जखैन देखू तखैन बेटाले पैसा मांगे लगै छी। कहियो ओकर एडमिशनले तँ कहियो कपड़ाले कहियो साइकिलले ई- ई कि छिऔ। एत्त तोहर बापक खजाना नै छौ बड़ा मेहनतसँ और बड़ा रिक्सपर घूसक पैसा आबै छै, हराममे नाइ। चल सिकरेट जड़ा।” गोरचंद फफैक-फफैक कानए लगल- “हुजुर एक्के घंटा बचल छै हम्मर बेटा....।” “चुप चल सिकरेट जड़ा। भाड़मे जाउ तोहर बेटा। हूं, बड़ा भाएल आगरा घुमैबला। चल-चल जांत आ सुन, ई ले एकसौ रूपैआ। जौ बाजारसँ कुछेक सब्जी किन हम्मरा घर पहुँचा आ और कनि हम्मर बेटा गोलुआकेँ स्कूलसँ लाइब लिहैं।” कनि देर रूकि कऽ फेर बाजल- “तब देखबै सांझमे कुछ पैसा बेबस्था करबौ। जो-जो भाग....।” एते सुनि बलदेवक भोँह फरैक उठल ओकर सभ बाप परक गुस्सा, दरोगापर आबि गेल। मन मानि होइ ओकरा बगलक बंदूक उठाए धाँइ-धाँइ गोली दरोगाक भेजामे उतारि देत। पर बेचारा कि करि सकैत। चुपचाप घरक ओर विदा भेल आ कसम खा लेलक। आइसँ पढ़ब आ सिर्फ पढ़ब। अपन बापकेँ ई अपमानक बदला हम कलक्टर बनि कऽ लेब। आब ने जानि बलदेवमे कोन शक्ति आबि गेलै, सबकुछ छोड़ि सभसँ नाता तोड़ि सिर्फ किताबसँ नाता जोड़ि लेलक। ३ नन्द विलाश राय कथा अइना हम अपन सारक बेटाक विआहमे गेल छलौंहेँ। हमर सारक बेटा रेलवेमे इंजीनियर अछि। ओ अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालसँ इंजीनियरिंगक डिग्री लेने अछि। हमर सारक बेटाक नाम ललन थीक। ओ देखवा-सुनवामे वड्ड सुन्नर अछि। गोर वर्ण, पॉंच हाथक जवान। दोहरा कद-काठी। जेहने ओ सुन्नर अछि तेहने ओ पढ़ैओ-लिखैयोमे तेज छल। ललनक विआह पॉंच लाख टाकामे बेरमा गामक वुच्चन ठाकुरक बेटीसँ तँइ भेल छल। बुच्चन ठाकुर मध्य विद्यालकमे शिक्षक छथिन्ह। अपना बेटीकेँ इन्टर पास करौएने छथिन्ह। हमर सार महेशकेँ लड़की पसन्द भेल आ ओ ललनक विआह बुच्चन ठाकुरक बेटीसँ पक्का कए लेलक। बुच्चन ठाकुरक चारि लाख टका तँ हमर सार महेशकेँ दए देलक मुदा एक लाख टका वॉंकी रहि गेल। बुच्चन ठाकुर कहलखिन- “जेतेक टाका वॉंकी अछि विआहक दू दिन पहिने भेट जाएत” मुदा, विआह दिन जखन टका नहि पहुँचल तँ हमर सार हमरासँ कहलनि- “पाहुन टका तँ बुच्चन बावू अखन तक नहि भेजलक हेँ। कि कएल जाए?” हम कहलअनि- “आइ वियाह थीक। आव की कएल जाए सकैत अछि। विआह तँ हेवे करत। भऽ सकैत अछि जे बुच्चन बावूकेँ कोनो मजवूरी भऽ गेल होएतनि। चलू शुभ-शुभ कऽ विआह करेवाक लेल।” हमसब दुल्हा आ वरातीकेँ लऽ सात वजे सॉंझमे बैरमा गाम पहुँच गेलौं। वरातीकेँ सवेरे पहुँचलापर बैरमा गामक समाज आ बुच्चन बावूक सर-कुटुम सभ बड्ड प्रसन्न्ा भेलाह। बुच्चन बावू हमर सार महेशकेँ कातमे लऽ गेलाह संगमे हमहूँ छलहुँ। कहलखिन- “हम समएपर टका नहि भेज सकलहुँ ताहि लेल अपने सभ लग लज्जित छी। मुदा वादा करैत छी, कनियॉं विदागरीसँ पहिने अहॉंक टका दऽ देव।” हमर सार किछु नहि बजलाह। हम कहलयनि- “ठीक छैक अहॉं अपना वादापर कायम रहव आ विदागरीसँ पहिने टका महेश बावूकेँ दए देवनि।” बुच्चन बावू बजलाह- “अवश्य-अवश्य।” अवश्य-अवश्य बजैत ओ आंगन चलि गेलाह आ हमसब वासा पर आवि बैसलौं। जलखै-नाश्ता, चाह-पान आदि सभ चलए लगल। संगहि तिलकक ओरिओन हुअए लगलैक। बरातीक स्वागत बड्ड नीक जकॉं भेल। खान-पानमे कोनो कमी नहि भेल। शुभ-शुभ कऽ विआहो सम्पन्न भेल। मुदा बुच्चन बावू अपन वादाक मुताविक कनियॉं विदागरीसँ पहिने वकियौताबला एक लाख नहि दऽ सकलाह। हमर सार महेशकेँ बड्ड दुख भऽ गेलैक। ओ बाजल तँ किछु नहि मुदा अबैतखान समधी मिलन नहि केलक। हमरा ई गप्प नहि पसीन भेल। हम समझेवाक प्रयास केलौं मुदा, ओ हमरा गप्प नहि मानि फटफटियापर बैसि कऽ चल गेलाह। हम कनियॉंकेँ विदागरी करा कऽ अपन सासुर मैलाम पहुँचलौं। हमरा अपना सारपर बड्ड तामस छल। हम हुनाका दरबज्जापर जाइते अपन संतुलन नहि राखि सकलौं आ महेशकेँ देखिते कहलियै- “......” जे अहाँकेँ कनियो मानवता नहि अछि। अहाँ अव्यवहारिक लोक छी। एके लाख टकाले अपन परिचए दए देलिऐ। कि कहैत अछि बेरमा गामक लोक आ बुच्चन ठाकुरक सर-कुटुम सेहो सोचलिऐ? जखन विआह भए गेल तखन समधी मिलन नहि केलासँ कि फेदा भेल। आरो बहुत किछु कहि देलिएनि। महेश कहलाह- “यौ पाहुन सभ एक-दोसरकेँ उपदेश दैत छैक। अपन मुँह कनेक्शन ऐनामे तँ देखौ।” हम निरूत्तर भऽ गेलौं। आ हमरा सामने हमर बेटा गणेशक विआहक दृश्य नाचऽ लागल। हमर बेटा गणेश मैट्रिकमे दू-बेर फेल कएने छल। तेसर बेरमे मैट्रिक पास कएलक। कॉलेजमे पढ़वाक लेल कहलिऐ तँ दिल्ली भागि गेल। दिल्लीसँ तीन वर्षक वाद गाम अाएल। पता चलल जे सेल्समैनक काज करैैत अछि। तीन वर्षक वाद एलाक उपरान्तो एकोटा टाका हमरा आ अपना माएकेँ नहि देलक। हमर पत्नी कहलक- “गणेशक कतौ नीक लड़की देख कऽ विआह कए दियौक। भऽ सकैत अछि विआहक बाद सुधैर जाए।” तैपर हम कहलिएनि- “एहेन अवण्ड लड़कासँ के अपना बेटीक विआह करत। करबो करत तँ किछु नहि देत।” गणेशक माए बाजलि- “किछु देत नहि देत तँ कि होएतै हमरा गणेशक विआह करवाक अछि। हमरा पुतोहू आनि दिअऽ।” हम गणेशक कथा लेल दू-चारि गोटेक लग चर्चा केलौं तँ हमर सार महेशक प्रयाससँ कैथिनियाँ गाममे टुनटुन बाबूक बेटी संग दू लाख टाकामे कथा पक्का भेल। टुनटुन बाबू साधारण गृहस्थ छथि। ओ एक लाख टाका विआहक पन्द्रह दिन पहिने दए गेलथि। मुदा एक लाख टका विआहक तीन दिन पहिने भेज देवाक लेल वादा केलनि। मुदा विआहक तीन दिन पहिने जखन टाका नहि भेजलाह तखन हम मोवाइलसँ सुचित कऽ देलिएनि। जे काल्हि वारह बजे दिन धरि हमरा टाका नहि पहुँचत तँ हम बराती लऽ कऽ नहि अाएब। भोरे टुनटुन बाबू आ हुनकर मित्र अएलाह आ पच्चास हजार टाका हमरा गिनलाह। हम कहलिएनि- “वाकी पचास हजार कखन देव।” टुनटुन बाबू बजलाह- “बड्ड परियासे ई टाकाक प्रबन्ध कएलौंहेँ। आब जे वाकी रहल ओ द्विरागमनमे देव।” हम स्पष्ट कहलिएनि- “विआहसँ पहिने हमरा टाका नहि देब तँ विआह नहि होएत। काल्हि भिनसरे आठ बजे तक बकियौता टाका नहि दऽ जाएब तँ बरात लऽ कऽ नहि आएब।” टुनटुन बाबू आ हुनक मित्र लाख निहोरा करैत रहलाह मुदा हम नहि मानलएनि। अन्तमे टुनटुन बाबूक मित्र कहलखिन ठीक अछि अहाँकेँ काल्हि भाेर आठ बजे पचास हजार टाका पठा देब अहाँ विआहक तैयारी करू। एक बीघा खेत भरना राखि टुनटुन बाबू पचास हजार टाका हमरा भेजलक तखन हम गणेशक बराती लऽ कऽ कैथिनियाँ पहुँचलौं। आइ हमरा आँखिक आगाँ सभ पुरनका दृश्य नाचि रहल अछि। हमरा अपने-आपपर ग्लानि होइत अछि। सुजीतकुमार झा संस्मरण-चुनचुन मिश्र हमर तऽ ओ मैथिली विटक समाचारदाता छलाह फेसबुकमे किछदिन पूर्व एकटा समाचार पढलौ ओहिमे लिखल छल चुनचुन मिश्र नहि रहला । इ खबर पढिते शरीरमे करेन्ट जँका लागल कनिकाल लेल तऽ बुझाएल हमरो शरीर सँ प्राण निकलि गेल । चुनचुन बाबुसँ बड घनिष्टता छल से नहि मुदा ओ मैथिलीकेँ बहुत बडका आन्दोलनी भेलाक कारण हमरा हुनकाप्रति बहुत श्रद्धा छल । हम हुनकर नाम कोनो समाचारमे देखैत छलौह की पुरान समाचार किया नहि हुए अपन रेडियोमे बजा दैत छलौ । कएँ दिन तऽ रेडियो मिथिलामे अपन नाम समाचारमे सुनलाक बाद ओ रहिका सँ टेलिफोन कऽकऽ धन्यबाद दैत छलाह । बिहारक मात्र नहि भारतक कतेको स्थानपर मैथिली सँ जुडल कोनो कार्यक्रम होइत छल तऽ ओ अपने समाचार टिपा दैत छलाह । एक बेर तऽ एहन भेल रहैक जे नेपालक राजविराजमे विद्यापति पर्व समारोह भेल छल हमर रेडियो सँ ओकर समाचार कोनो कारण बस नहि बाजल । ओ हमर मोबाइलमे टेलिफोन कऽ उपराग देलन्हि । जखन की चुनचुन बाबु ओ कार्यक्रममे गेलो नहि छलाह । हमर रेडियोक लेल ओ अपन पैसा लगा कऽ काज करैत रहथि । मधुवनी, वासोपट्टी, जयनगर, बेनीपट्टी, सहितक स्थानपर हमर सभक समाचारदाता भेलाकबादो मैथिली विटक समाचार प्राय ओहे करैत छलथि । हमर सभक समाचारदाताकेँ बुझल छल जे मैथिलीक समाचार चुनचुने बाबु कइए दैत छथि तएँ ओ सभ सेहो चुनचुने बाबुकेँ लेल मैथिली समाचार छोडि दैत छलथि । हुनकासभकेँ बढिया जँका बुझल छलन्हि मैथिली विटक समाचारदाता तऽ चुनचुन बाबु छथि । हुनका समाचार पठाबयमे बहुत खर्च होइत छन्हि हमरा लगैत छल कए दिन कहि दैत छलियन्हि कथिलाय एतेक सहयोग करैत छी । चुनचुन बाबु हमरा बेर बेर कहथि हम तोरा थोरहे सहयोग करैत छियह मिथिला मैथिलीकेँ लेल काज करैत छी । अहिमे जतेक सन्तुष्टि भेटैत अछि ओतेक दोसरमे नहि । मिथिला मैथिलीक लेल निस्वार्थ भाव सँ काज करयवला चुनचुन बाबु बाहेक हम अपन जीवनमे दोसर किनको नहि देखने छी । चुनचुन बाबु सँ हमरा जीवनमे दू बेर मात्र प्रत्यक्ष भेट भेल अछि । मुदा पहिल भेटमे जे हुनकाप्रति छाप बनल से अखनो कायमे अछि । नेपालक राष्ट्रिय अखबार स्पेशटाइम दैनिकमे हम काज करैत छलौ ओ पत्रिका सौराठ सभापर विशेष रिपोर्टिङ्गक लेल सौराठ जायकेँ लेल हमरा अढौने छल । ९ वर्ष पहिने ओतय पहुँचलौह तऽ सभ सँ पहिल भेट चुनचुन बाबु सँ भेल छल । चुनचुन बाबु संगे सौराठ सभापर बेस चर्चा परिचर्चा कएलौह फेर हुनकेँ संगे सौराठ गाम घुमलौह । पञ्जिकार जी सहित बिभिन्न विद्वानसभ संग बात कएलौह । ओहि दिन पानि पडल रहैक, कनी कनी थालो भऽगेल रहैक एकर बाबजुद ओ हमरा संगे घण्टो घुमलाह । हुनकर व्यवहार हमरा भितरतक प्रभावित कएलक । कनिके कालक भेट हमरासभकेँ बहुत निकटता आनि देलक । चुनचुन बाबुक मूल परिचय हमरा मैथिलीक अष्टम अनुसूचिक लेल भारतमे भेल आन्दोनक समाचार सँ भेल । ताहि दिन जनकपुर क्षेत्रमे कान्तिपुर एफएमक हेल्लो मिथिला विशेष रुपस्ाँ सुनल जाइत छलैक ओहिमे आदरणीय धीरेन्द्र प्रेमर्षि प्रत्येक हप्ता बैजु बाबु आ चुनचुन बाबुक विशेष चर्चा करैत छलथि । बैजु बाबु मैथिलीक लेल ई कएला चुनचुन बाबु ओ कएला समाचार सुनैत छलौह । एकरबाद पता चलल हमरा सौराठमे भेटल रहथि ओ महाशय एतेक बडका लोक छथि । चुनचुन बाबु संगेक दोसर भेट जनकपुरमे एफ एम रेडियो खुजलाक बाद भेल छल । हम रेडियो मिथिलाक समाचार प्रमूख भेलौह तऽ ओ ओना बधाई देबय जनकपुर आएल रहथि मुदा ओ जे कहलथि ताहि सँ लागल बधाई कम मिथिला आ मैथिलीक लेल हमर की दायित्व अछि तेकरा मन्त्र देबय बेसी । ओ जाइत जाइत कहलथि मिथिला आ मैथिलीक लेल प्रतिष्ठा नहि देखय लगीह अपना बुते जे लागय से करीह । हम रेडियो मिथिलामे हुनकर किछ महत्वपूर्ण इन्टरभ्यू सेहो लेलौ । आई हमरासभ लग चुनचुन बाबु नहि छथि कतेको गोटे बातचितक क्रममे कहलन्हि चुनचुन बाबु गेला सँ अभिभावक बिहिन भऽगेलौ मुदा हमरा तऽ ओ दोसरे बिहिन बनाकऽ चलि गेल छथि । हमरा तऽ चिन्ता लागल अछि रेडियो मिथिला आ मिथिला डटकमक मिथिला विटक समाचारदाता केँ बनत । एतेक निस्वार्थ भाब दोसरमे कतय सँ भऽसकैत अछि । सहीमे चुनचुन बाबु महान छलाह । १.जगदीश प्रसाद मंडल- विहनि कथा- कौआक मैनजन २. अनमोल झा- चारिटा विहनि कथा ३.ज्योति- एकटा विहनि कथा-ध्वनि-प्रतिध्वनि १ जगदीश प्रसाद मंडल विहनि कथा कौआक मैनजन जहिना अखन आरक्षणक माध्यमसँ बेसियो उम्रबला शिक्षक बनि गेला तहिना राजशाहीमे मैनजन सबहक बहाली भेल छलनि। कुरसी पबिते जहिना पावर नचए लगैत तहिना कौओ-मेना, हरिणो-सुगर आ कुकुड़ो बिलाइक मैनजनकेँ पावर टिकपर चढ़ि गेल। गाम महराजकेँ बाँटि करए बखो हुअए लगल। मैनजनीक पावर पाबि बिलाइ गोरस पट टक-धियान लगबए लगल। जेहन उक नहि तेहन फूक भारी। जे ने बड़द जकाँ हर बहि सकैए आ ने खस्सी-बकरी जकाँ खाएल जा सकैए मुदा नजरि सदति काल दूधे-छालहीपर। जहिना अपन बेरादरीमे हरिण-सुगर, कुकुड़-बिलाइ करैत तहिना कौओ उक फेड़ए लगल। दोसराक जुआन कनियाँ देखि उनट-फेरी कऽ अपना घर अनए लगल। मन मसोसि सभ बरदास करैत। अपन कनियाँकेँ बलजोरी घरसँ लए जाइत देखि बदलू कौआक हृदए दहकि गेलै। किछु बजैक आ करैक (प्रतिरोध) साहसे ने होय। मुदा मन दलमलित हुअए लगलै। सोचैत-िवचारैत अपन दुखनामा कानि-कानि सभकेँ कहलक। बेरादरीमे बेसी ओहन जे परोछमे उचित बजैत मुदा सोझामे (मैनजनक) सरस्वतीये हरा जाइत। बदलू चालाकी केलक। मन दहकले रहै, बुढ़वा सभकेँ छोड़ि समरथका (कौआ) सबहक जेर बना कहलक- “भाय, जेहन दशा (गति) हमर भेल तेहने तँ सभकेँ हेतह?” काँव-काँव करैत सभ बाजल- “एहेन अन्याय सभकेँ जाबे रोकब नहि ताबे एका-एकी सभकेँ हएत।” जेरक संग बदलू मैनजन ऐठाम विदा भेल। जेर देख मैनजन डोलि गेल, घवड़ा गेल। तहि काल जइ कौआकेँ छीनि लऽ गेल रहै ओ अंगनेमे मैनजनक विऔहती कनियाँकेँ झोंट पकड़ि लिड़ी-बिड़ी करए लगल। मैनजन भगैक ओरियान करए लगल। तहि बीच गट्टा पकड़ि बदलू पुछलक- “कतऽ पड़ाइक ओरियान करै छेँ?” थरथर कपैत मैनजन बाजल- “भैया, अपन कनियाँ नेने जा। पएर पकड़ै छिअह जे जान छोड़ि दाय।” कलपैत मैनजनक बात सुनि बदलूक मन ठमकि गेल। जहिना धधकैत आगिमे पानि पड़लासँ मिझा जाइत मुदा गरमी (ताव) रहवे करैत तहिना बदलूओकेँ भेल। रसे-रसे गरमी कमिते रहै कि तहि बीच अपन कनियाँ मुस्की दैत दरबज्जापर आएल। बदलू मैनजनकेँ पुछलक- “एहेन काज फेर ने ते करबह?” “नइँ।” बदलूक पत्नी बाजलि- “जहिना सीता महरानी लंकामे रहितो पवित्र रहली तहिना हमहूँ छी।” दोसर कौआ बदलूकेँ कहलक- “दिन भरिक हराएल जँ साॅझू पहर घुरि कऽ घर आबि जाए तँ ओ हराएल नहि बुझल जाइत। तहिना....।” २ अनमोल झा चारिटा विहनि कथा तंग सम्पर्कक बैसारमे जाइत-जाइत हमरा देरी भऽ गेल छलए। संध्या पाँच बजे सम्पर्कमे रचना पाठ आ ओहिपर आलोचना-समालोचना शुरू भऽ जाइत छलै। दरअसल हमरा डेरेसँ निकलैमे थोड़े देरी भऽ गेल छल। ठीक निकलै कालमे एकटा आप्त लोक डेरापर आबि गेल रहथि आ हुनका संग गप्प-सप्प करैत, चाह-पान होइत थोड़े समय लागि गेल छल। आ छुट्टी दिन रहलासँ बसो सभ कम रहैत छैक। जे से जाहि द्वारे हो, हमरा देरी भऽ गेल छल ओतए पहुँचैमे। हम बससँ उतरि चोट्टहि सम्पर्क जतए होइत छलै तेम्हर नम्हर-नम्हर डेग दैत झटकारि कऽ चल जाइत रही। ठीक हमर उनटा दिससँ तीन-चारि गोटा गप्प करैत आबि रहल छला। गप्प प्रायः ओकरा सभक पहिनेसँ होइत आबि रहल छलै। दुनू गोटा जखन थोड़े लगमे एलौं तँ ओ सभ जे अपनामे बात करै छलै ताहिमे कहलकै जे हम आब तबाह भऽ गेल छी। ओकर ई बात सुनि हमर डेग जे तुफान एक्सप्रेस सन छल से पसिन्जर ट्रेन भऽ गेल आ हम बिसरि गेलौं सम्पर्कक बैसार तखन। हमरा बुझा गेल जे एकरा निश्चय भाए-भैयारीबला झंझट छैक आ ओ ताहिसँ तंग भऽ गेल अछि। मुदा कियो पुछलकै जे ककरासँ तंग भऽ गेलौं से ओकरा मुँहे जबाब सुनि हम अवाक् भऽ गेलौं। ओ कहलकै- हम जमाइसँ तंग भऽ गेल छी। हमरा मोनमे भेल जे निश्चय ऐ ससुर जमाइक तंगीक कारण ई महानगर छी, जतए कोनो रिलेशन नै थीर रहि पबैत छैक। सभ अपन-अपन ड्यूटी आ पाइमे लागल रहैत अछि आ फेर डेग झटकारि कऽ चल गेल रही सम्पर्कमे हम...! डेरायल हम एम.ए. फाइनलक परीक्षा दऽ रहल छलौं। मैथिली आ हिन्दी दुनू विभागक छात्र-छात्राक एकहिटा विशाल घरमे एक बेन्चपर एकटा कऽ विद्यार्थी बैसा कऽ परीक्षा लेल जाइत छलै। परीक्षा खुब कड़ासँ लेल जा रहल छलै। हमरा सभ लिखैमे व्यस्त रही, पूब-पश्चिम की होइत छैक से नै बुझाइत रहए किछु। विश्वविद्यालय द्वारा नियुक्त कएल गेल गाइडक अतिरिक्त प्रशासनिक अधिकारी सभ बीच-बीचमे आबि कऽ पूरा घरे-घर बौआ कऽ देखैत रहै। एकर अलाबा लाल बत्ती लागल गाड़ीसँ प्रशासनिक पदाधिकारी सेहो सभ आबि सभकेँ चेक करै आ कएक गोटाक पकड़ेलापर एक्सपेल कऽ दैत छलै। पहिले दिनक परीक्षाक दू घंटाक बाद एकटा सर्कुलर एलै आ सभ घरे-घर पढ़ि कऽ सुनाएल गेलै जे काल्हि जे परीक्षा देमए अबै जाए से एडमिट कार्डक लेमिनेशन कएल रहक चाही। कारण पता केलापर बुझलिऐ जे कोनो विद्यार्थी पेन्सिलसँ ओहिपर चिट कऽ कए अनने रहए लिख कऽ। दोसर दिन सभक एडमिट कार्ड लेमिनेशन भऽ गेल रहै। छः-सात पेपर जखन परीक्षा भऽ गेलै तँ एक दिन गार्ड कहलकै जे आब बाथरूममे केमरा लगबा देबै। छौंड़ा सभ बेसी काल कहै बाथरूम जाएब, ताहिपर ओ ई बात कहलकै। कहक समएमे ओ ध्यान नै देने रहै जे परीक्षार्थीमे छात्रा सेहो बहुत गोटा छैक। ओकरा जखन ओ बात ध्यानमे एलै तँ कहै छैक जे लड़काबला बाथरूममे। ई सुनैत देरी हम जे उत्तर लिख रहल छलहुँ ताहि दिससँ ध्यान हटि ओहि गार्ड दिस चल गेल रहए। आ लागल रहए जे परीक्षार्थीये जकाँ डेरायल छल, जे ई की बजा गेल। मुदा सभ छात्र-छात्रा लिखैमे व्यस्त छल। आ मोने मोन कहै छल, लगाबऽ ने कैमरा जतऽ लगेबाक छह। जखन अपने कन्फीडेन्ट भऽ परीक्षा दैत छी तखन डर कथीक? पिछड़ल राज्य बी.ए.मे फस्ट क्लास आ साढ़े पैंसठि प्रतिशत मार्कसँ पास भेल रहए ओ। किछु आगाँ पढ़क जोगारसँ ओ गामसँ महानगरमे आएल रहए। नाइट कॉलेजमे नाम लिखा, एकटा प्राइभेट फार्ममे नोकरीक जोगारमे गेल रहए। डायरेक्टरक आमना-सामनी बैसल रहए ओ। डायरेक्टर ओकर बायोडाटा देख रहल छलै। आब मार्कसीट देखलकै। जन्म कुण्डली सन नाम चाकर मार्कसीट आ तकर नीचाँमे लिखल मूल्य बीस रुपये। डायरेक्टर कहलकै – आपके विश्वविद्यालय में यह बीस रुपया में मिलता है क्या? ओकर मोन छोट भऽ गेल अहै आ अपन यू.जी.सी. एफेलिएटेड विश्वविद्यालयक मादे सोचए लागल रहए, सुआइत हमरा सभक राज्यकेँ लोक पिछड़ल राज्य कहैत अछि....! एटेचमेन्ट विवाहक कएक बर्ख बादो तक एना नै होइत रहै। माने जामे तक दरमाहा उठा कऽ पूरा लिफाफ बाबूक हाथमे धरा दैत छलै, अपना जे दू-चारि सए लगैत छलै से फेर माँगि कऽ माए-बाबूसँ लैत रहै, तावत् तक सभ ठीक- एकदम ठीक। परिवार संगमे रहब, बाल-बच्चाक पढ़ब-लिखब खर्चे-खर्चा। से जहियासँ लिफाफ देब बन्द भऽ गेलै तहियासँ माए-बाप, बहिन-बहिनोइ, भाइ-भाउज सभक बैरी भऽ गेल रहए ई सभ। नाक-दम कऽ देल गेल रहै एकरा सभक। गाम कहियो जाए तँ अलग खाइले टा कहलकै। ने चुल्हा, ने बर्तन, ने भनसा घर आ चाउर दालिकेँ के पूछै, किछु ने देलकै। ऊपरसँ गारि-फज्झति सुनए आ ऊपरसँ दोसर बेटाकेँ सभटा लिख देबै सभ सम्पति घर-घरारी, तकर धमकीपर धमकी। बापक पी.एफ.क आ रिटायामेन्टक पाइ सेहो भाइक खातापर ट्रान्सफर कऽ देने रहै बाबू। कोनहुना समए बितल जाइत रहै। स्थिति तेहन भेल जाइत रहै जे होइ कोनो दिन आत्महत्या कऽ ली। झमेला समाप्त। मुदा पत्नी आ बच्चा सभक मूह देखि गम खा जाए जे हमरा रहैत एते करै छैक, पाछाँ की करै जेतै ओ सभ...। आइ रातिमे एकटा सपना देखलक जे एकटा बबाजी, अघोरी बबा एकरा लग एलैहेँ। आ एकटा मुण्ड छापल लॉकेट एकरा देलकैहेँ आ कहलकै जे ई लॉकेट माए-बाप लग जा कऽ एकटा सरबामे कनी पाइन लऽ कऽ ओहिमे भिजा कऽ तीन बेर अपन कपारमे भिरबैत मंत्र पढ़ै लेल जे माए-बाबू चलि जाउ, माए-बाबू चलि जाउ, माए-बाबू चलि जाउ। ई करिते माए-बाबू गामसँ पड़ा जेतौ आ मरिये जेतौ। तोरा सभक झमेला समाप्त। रस्ता साफ। ओ लॉकेट लऽ माए-बाबू लग सरबामे पानि राखि तीन बेर कपारमे भिरेलक। मुदा ओ मंत्र जे कहने रहै पढ़य- माए-बाबू चलि जाउ से नै पढ़ि सकल ओ...! आब खूनक टान हो बा कोनो एटेचमेण्ट से नै बुझि सकल रहए! ३. ज्योति ध्वनि-प्रतिध्वनि ध्वनि आ प्रतिध्वनि नामक दू टा जुड़वाँ बहिन छली जे कि पहाड़ी इलाकामे रहै छली। ध्वनि स्वभाव सऽ बड्ड शान्त आ निर्मल छलैथ जखन कि प्रतिध्वनि हुनकर विपरीत बहुत चञ्चल आ उपद्रवी छलैथ।ध्वनि हमेशा घरमे अपन माय के काज मे मददि करै छलैथ।प्रतिध्वनि पहाड़ीमे एम्हर उम्हर भागैत रहैत छलैथ।एकदिन प्रतिध्वनि बाहर घुमैत छली तऽ हुन्का एकटा राजकुमार देखेलैन। आे राजकुमार हुन्का बड्ड नीक लगलैन।प्रतिध्वनि आेहि राजकुमार सऽ खूब दाेस्ती केली आ आेकरा घुमाबऽ फिराबऽ लगली कारण आे राजकुमार आेहिठाम ककराे अतिथि बनि कऽ आयल छला।राजकुमार हुन्का सऽ बड्ड प्रसन्न छलाह। दिन बीतल आ प्रतिध्वनि आेहि राजकुमार सऽ विवाहक माेन बनाबय लगली मुदा एकदिन जखन आे घर गेली तऽ देखली जे आे राजकुमार हुनकर बहिन के विवाहक प्रयाेजन सऽ देख लेल आयल छलैन।राजकुमार हुनकर बहिन ध्वनिके पसन्द कय विवाह कऽ लेला।प्रतिध्वनि के बहुत पैघ आघात पहुॅंचल छलैन।हुन्का बहुत क्षाेभ भेलैन जे लाेक हुनकर दुःख नहिं बुझलकैन।आे पहाड़ी सऽ कूदि कऽ अपन प्राण त्यागि देली।मुदा हुनकर आत्माके मुक्ति नहिं भेटलैन।हुनकर आत्मा पहाड़क खाइर् में अखनाे भटकैत रहै छैन।अखनाे जॅं कियाे पहाड़क खाइर्मे किछु जाेर सऽ बाजैत अछि तऽ प्रतिध्वनि आेहि आवाज के बेर्रबेर बाजै छैथ। बिपिन कुमार झा प्रदेश केर विकास : एक चिन्तन (बिहार-विकास सन्दर्भ मे आलोचनात्मक अभिव्यक्ति) Ph. D , IIT Mumbai बिहार विधान सभा चुनाव सम्पन्न भेल। नितीश सरकार ’हाथ’ ओ ’लालटेन’ कें अपन कर्मक समुचित फल हेतु पाछू छोरैत पुनः एक बेर अपन अस्तित्व मे आयल। कलियुग कर्मयुग छैक। ओ अतीतक गप्प करी अथवा वर्तमानक, भारत सनहक गणतन्त्र राष्ट्र मे कर्मक फल जनता द्वारा जनता कें अवश्य भेटैत रहल अछि। आब प्रश्न ई उठैत अछि जे बिहार केर विकास निरन्तर हो एहि हेतु ई केकर उत्तरदायित्त्व अछि? निश्चित रूप सँ उत्तर होयत नितीश सरकारक। जहाँ तक हमर मन्तव्य अछि ’ई उत्तर एकांगी अछि’ कियाक त { 92,257.51 sq. Kms ग्रामीण क्षेत्र, 095.49 sq. Kms शहरी क्षेत्र, (कुल 94,163.00 sq. Km), कुल जिला-38, कुल आवादी- 8,28,78,796 अधिकतम साक्षरता पटना- 63.82%, कुल विश्वविद्याल- 13, इंजीनियरिंग कालेज-08, प्रबन्धन संस्थान 06, मेडीकल कालेज 08, शोध संस्थान 06, ला कालेज 10, आयुर्वेद महाविद्यालय 05, वेटनरी कालेज- 02, कृषि महाविद्यालय 04, फाइन आर्ट्स महाविद्यालय 02, शोधकेन्द्र 04, अन्य शैक्षिक संस्थान 14)} एहि वृहत क्षेत्र बला राज्य केर विकास क उत्तरदायित्त्व मात्र अस्थायी प्रशासक के ऊपर छोडि पल्ला झाडनाई कतय तक समुचित अछि ई अपन विवेक सँ तय कयल जाय। विकास केर उत्तरदायित्त्व एहि प्रकार सँ निर्धारित कयल जा सकैत अछि। · प्रशासक (विकासकर्ता कहब विशेष उचित) o स्थायी § सिविल सेवारत पदाधिकारीगण § अन्य सहयोगी पदाधिकारीगण § जनता स्वयं · निवासी · प्रवासी o अस्थायी § चुनाव मे जीतल जनताक प्रतिनिधि एतय विभाजन किछु विशेष दृष्टि सँ कयल गेल अछि जाहि सँ बिहार अथवा कोनो प्रान्तक विकास केर गप्प केनाई समुचित होयत। सिविल सेवारत पदाधिकारी केर आचरण यद्यपि निर्दुष्ट मानल जा सकैत अछि मुदा वर्तमान समय मे ई बात कदाचित अप्रासंगिक भय गेल अस्तु एहि तरहक पदाधिकारी सँ एतबा कहब उचित जे राष्ट्र अस्मिता, एकता एवं उत्कर्ष समुचित नीतिनिर्माण सँ संभव छैक जेकर कर्णधार सिविलसेवके होइत छथि, आ यदि ओ अपन उत्तरदायित्व प्रलोभन अथवा भयवश बिसरि जेता तऽ भविष्य की होयत ई सहज बुझल जा सकैत अछि। जहाँ तक अन्य सहयोगी पदाधिकारी तथा पुलिस प्रशासनक गप्प अछि, यदि अनुचित नहिं मानल जाय तऽ ई कहब अनुचित नहि होयत जे सबहक कर्ता आ हर्ता ई होइत छथि। यदि पुलिस प्रशासन आ कर्मचारी वर्ग ठानि लथि तऽ भ्रष्टाचार 90% धरि समाप्त भय सकत, शिक्षा तथा अन्य सेवा पंगु नै रहत, यात्री पटना स्टेशन सँऽ बस स्टेशन राति मे जायब अनुचित नै बुझत। एकटा उचित काज हेतु हरियर पत्ती नै देखबय पडत, बिना लाइसेंस अथवा कागज के हजारो गाडी सडक पर नै दौडत, डी० एम० सी० एच० मे चिकित्सा मे लापरवाही नै होयत, लोक के अन्यत्र भटकय नै पडत काज लेल। बहुतो एहेन गप्प छैक जेकरा ई पुलिस, कर्मचारी, चिकित्सक सदृश अधिकारी दूर कय सकति छथि। आब जनता जे मूल निवासी छथि हिनक गप्प। हम नहिं सुधरब ई शपथ खा के कदाचित बैसल छथि। ई अपन हाल नीक जँका बुझैत छथि तैय्यो प्रमाद, प्रलोभन अथवा भयवश अपन कर्तव्य नहिं करता बस अधिकारक गप्प लिअ। दोसर कें चुटकी लेब, टाँग खीचब, ईर्ष्या करब आहा हा परमानन्द दैत छन्हि। आई कोनो तरहें बीत जाय काल्हुक के देखलक? ई हिनकर सोच छन्हि। विकास आ देशक गप्प नै करू ओ त सरकारक काज छियै न!! कतहु क्रिकेट भेल तऽ कान पथता, अपने कोनो खेल मे आगू एता अथवा अपन बच्चा के कोनो क्षेत्र विशेष मे आगू अनता ई तऽ... “की कहू एहेन राज मे हम छी न किछु सम्भव नै अछि”। हँ, ध्यान आयल “पढि लिखि के की हेतै? कोनो नौकरी भेटतै?” ई हिनक सोच छन्हि। गामक चौक पर गाजा आ भांग खायत से बड्ड नीक। कतेक गप्प कहू। हिनको स बस एतबा आग्रह जे अपन कर्तव्य जे छन्हि यथासम्भव ओकर पालन करथु। हमरा सदृश प्रवासी नागरिक तऽ बेचारे पटना धरि गाम जेबाक जोश रखैत छथि ओकर बाद बिहार नहिं सुधरी वाक्य बजैत छथि। की ई उचित अछि? अपना लेल उत्तर देब सदा मुश्किल होइत अछि। किन्तु ई किछु हिनकर कर्तव्य सेहो छन्हि न? गाम जेबा मे होयब समस्या देखाइत छन्हि मुदा घर मे बच्चा के मूँह सँ मैथिली सुनबा मे बज्रपात होइत छन्हि!! बिहार किं वा मिथिला लेल अहाँ की कयल? अपन पेट तऽ कुकुरो पोसैत अछि। आय NBT मे एकटा समाचार देखल नोएडा केर कम्पनी ल्यूना इरगोनोमिक्स केर मुख्य कार्यकारी अधिकारी मेजर अभिजीत भट्टाचार्य ’पाणिनि’ नामक साफ्टवेयर केर जानकारी देलथि जाहि द्वारा 11 भाषा मे SMS पठा सकैत छी। ई न्यूज एहि दृष्टि सँ महत्त्वपूर्ण जे अपन धरोहर केर रक्षण करबाक सोच जुडल अछि। एहि तरहें गजेन्द्र जी सदृश कतिपय व्यक्ति सराहनीय कार्य कय रहल छथि जे प्रवासी होइतो मिथिला/बिहार केर विकास मे योगदान स्वरूप अछि। आब बात नितीश सरकारक...। एहि मे कोनो सन्देह नहिं जे नितीश सरकार लालटेन के मडियल रोशनी सँऽ बिहार के जेनरेटर युग मे अनलक (एकर चर्चा आगू करब)। बिहारक विकास गाथा बिहार सरकार केर साइट पर देखल जा सकैत अछि। RTI Doc. जे ओहि साइट पर अछि, जानकारी के बुझबा मे सहायक होयत। 5 वर्षक भीतर 47000 सँ अधिक अपराधी के सजा भेटब, केन्द्रीय योजना क अतिरिक्त ४० से अधिक योजना केर कार्यान्वयन होयब, सडक केर जाल प्रस्तुत होयब, पलायनक दर कम होयब, बिहार विशेष न्यायालय अधिनियम-2009, 2008-09 मे वार्षिक विकास दर प्रचलित मूल्य पर 24.33% होयब, राज्यक कर राजस्व 2004-05 केर तुलना मे 2009-10 मे 3347 करोड सँ 8130 करोड होयब आदि किछु शुभसंकेत अछि। टीका-टिप्पणी तऽ चलबे करत मुदा एहि बातक प्रतिषेध करब की बिहार विकासक पथ पर अछि, आत्मघाती होयत। लेकिन...! नितीश सरकार अखनहुँ किछु बात लय कें आलोचना के पात्र अछि जेकरा बिन्दुबार तऽ नहि कयल जा सकैत अछि मुदा सुधार हेतु किछु गप्प जरूर कयल जा सकैत अछि। त आगू सुनू- अखनहुँ बिहार जे समस्या सँ त्रस्त अछि ओकर समाधान हेतु निम्न बिन्दुगत क्षेत्रक समाधान अपेक्षित अछि- · शिक्षा- अखनहुँ गुणवत्ता क दृष्टि सँऽ शिक्षा सन्तोषजनक नहि अछि। सुधार अवश्य भेल मुदा अखनहु जरूरत अछि जे शिक्षा मे व्यापक सुधार हो। ताकि विद्यार्थी के अन्य प्रदेश हेतु रुख नहिं करय पडय। शिक्षा मे पारदर्शिता के अभाव अछि। गुणवत्ता के स्थिति एहि बात सँ लगा सकैत छी जे डाक्टरेट के डिग्री ओतय सहजता सँ प्राप्त कय सकैत छी। संस्कृत विश्वविद्यालय सँ स्वर्णपदक प्राप्त व्यक्ति एक पंक्ति संकृत नहिं बाजि सकैत छथि। संस्कृत विद्यालय जाहि हेतु सरकार करोडो खर्च कय रहल अछि ओकर भवन मात्र अछि बाकी सब कागज पर। हरिजन छात्रावास अछि सौ स अधिक कमरा के किन्तु एकहु टा हरिजन आई धरि ओतय नहिं देखल गेल। बहुत रास उदाहरण अछि सबटा नहिं देल जा सकैत अछि। · सुरक्षा- एहि क्षेत्र मे नितीश सरकारक कदम सराहनीय अछि मुदा अखनि धरि अन्य क्षेत्रक गप्प छोडू राजधानी सुरक्षित नहिं अनुभव कयल जाइत अछि। एहि पर विशेष ध्यानक आवश्यकता अछि। · संसाधन – o विद्युत – हम सभ लालटेन युग सँ निवृत्ति लय जेनरेटर युग मे त आबि गेलहु किन्तु बिजली हेतु आइयो दुनिया अन्हार अछि। भगजोगनी आ अतिथि रूपी बिजली रानी के विकास मार्ग मे बाधा हेतु सबसँ पैघ कारक कहल जा सकैत अछि। बिजली केर दुखद स्थितिक उदाहरण हम एना दय सकैत छी- हम अपन प्रथ त्रैमासिक संकृत ई जर्नल जाह्नवी (jahnavisanskritejournal.com) केर तृतीय अंकक लोकार्पण मिथिला मे प्रख्यात साहित्य्क विद्वान प्रो० रामजी ठाकुर सं करायब निश्चित कयल। अस्तु लैप टाप आ इण्टर्नेट सेवा हेतु अपन मोबाइल गाम लय गेलहुं। ओतय बिजली रानी हमरो सँ पैघ अतिथि छली। अन्ततः एक व्यक्ति कें आग्रह कय जेनरेटर पर कोनो तरहें चार्ज कयलहुं आ कार्य सम्पन्न करायल। यदि बिजली व्यवस्था सम्यक हो तऽ गाम आ शहर के चक्कर नहिं रहत। रोजगारक सृजन सेहो होयत। o यातायात- यातायात केर समस्या अखनो धरि अछि। वाहन संचालक केर अनियमितता ओ भाडा, समय, यात्री क सं बदसलूकी, गाडीक कागज अथवा लाइसेंस लय के हो, प्रशासन अधिकांश समय मौने नहि रहैत अछि अपितु हरियर पती गनबा मे व्यस्त रहैत अछि। o रोजगार- रोजगार एकटा एहेन बिन्दु अछि जे लोक कें परदेश जेबाक हेतु विवश कयदैत अछि। समाजिकता के नष्ट कय रहल अछि। व्यक्ति अपन भावना मात्र सं सरोकार रखबाक हेतु विवश अछि। अस्तु रोजगार सृजन अत्यावश्यक अछि। आवश्यकता अछि जे टेण्डर आदि केर दलाल सँ दूर स्वच्छ वातावरण मे रोजगारक अवसर जनता के देल जाय। जनता सतत नीक के संग दैत छैक अन्तःकरण सँ मुदा रोजी क चक्कर मे अनुचित काज सेहो करबाक हेतु विवश होइत अछि। o जागरुकता- अन्त मे नितीश सरकार सँ अपेक्षा जे जनता मे जागरुकता के संचार हो एकर प्रयास कयल जाय। बहुत किछु जनता नहिं बुझबाक कारण अनुचित करैत अछि। किन्तु यदि जागरुकता बढायल जाय तऽ जनता भ्रष्टाचार के संग नहि देत, विविध कार्यक्रम विशेष रूप सँ सफल होयत। अन्त मे निष्कर्षतः हमर वक्तव्य होयत जे बिहारक उत्कर्ष समग्र सहयोग सँऽ संभव अछि नकि केकरहु पर दोषारोपण सँऽ मानवमात्र मे कमी आ गुण दुनू छैक। अस्तु गुणक आलम्बन कय अपन संविधान एवं संस्कृतिक अनुकूल कर्तव्य कय प्रत्येक व्यक्ति आ संस्था समग्ररूप सँऽ राष्ट्रक उत्कर्ष मे योगदान दी ई सादर निवेदन। (लेखक IIT मुम्बई कें शोधछात्र छथि। लेख मे निष्पक्ष लेखिनी केर प्रयोग कयल गेल अछि। कोई कोनो आशय के वैयक्तिक तौर पर नहिं ली। प्रस्तुत कतिपय आँकडा बिहार राज्यक साइट सँऽ लेल गेल अछि। लेख सन्दर्भित टिप्पणी kumarvipin.jha@gmail.com पर सादर आमन्त्रित अछि) विरेन्द्र कुमार यादव कथा नाह आओर जिनगी ग्यारह अगस्त 2010क कोलाहल भरल साँझ। रूदन आ क्रन्दनक आवाज कमल किशाेरक अंगनासँ शुरू भेल आ कम समएमे ई दर्दनाक आ मर्माहतक दृश्य सौंसे गाम पसरि गेल। कियो ककरो ढाढ़स बान्हएबला नहि बचल। सबहक आँखिसँ गंगा-यमुनाक धार जकाँ जल बहए लागल। रधिया छाती पीट-पीट कऽ बाजैत- “जवान बेटीक बिआह कोना होएत? आब असगरे हम की करब? बुढ़ ससुरक गुजर कोना कराएब? हमर हीरा हमरा खोंइछासँ हेराए गेल।” दिनहिसँ धीया-पुताक मन हर्षित छल जे सांझमे भोज खएबाक लेल जाएब। चारि बजितहि कोशीक कछेर कुआटोल गामक लोक सभ अपन-अपन धीया-पुताकेँ संग कए खएबाक लेल ितलजुगा धारमे ब्रह्मोत्तर घाटपर नाहपर चढ़य लागल। भोज खएबाक उत्साहमे ई सुधि नहि रहल जे छोट नाहपर बेसी गोटे नहि चढ़ि। भोज खएनिहारक लाटमे सँ एक गोटे नाह खेबए लगल। बीच धारमे नाहमे पानि फुलए लागल। लोक सभमे भगदड़ मचि गेल। नाह डुबि गेल। तिलयुगा धार राकस जकाँ मुँहबौने लोक सभकेँ अपना पेटमे समबए लगलीह। आगि जकाँ ई खबर चारू भर पसरि गेल। चारू भरसँ झोल अन्हारिमे लोक सभ दोड़ए लगलाह आ क्षणहिमे हँसैत मनुक्खक लहास पानिसँ लोक सभ छानए लागल। भरि राति लोकसभ लहास छानिते रहि गेल। भोर होइतहि नगरक लोक, पत्रकार, सरकारक अमला-झमला घटना स्थलपर पहुँचए लागल। सौंसे गाम रूदन-क्रन्दन आवाजसँ भरल छल। कतहु सियान, कतहुँ बच्चा, बचीयाक लहास पकड़ि लोक सभ कानैत छल। कमल किशोरक जवान बेटी मुनियाँ माए रधियासँ कहलथिन्ह- “अहाँ धीरज बान्हु, जिनगीक ठेकान थोड़बे अछि जे के कखन आ कोन विधि मरताह। जनमक संगहि मरण लागल अछि। हमरा सभकेँ यएह लिखल छल। बाबू जीक संग एतबए दिनक छल। एहि दुनियाँमे सभ गोटे अपन-अपन भाग-तकदरीर लए आएल अछि।” क्रमश: जितेन्द्र झा महाकवि विद्यापति अक्षयकोष नेपालमे मैथिली भाषा, संस्कृतिक संरक्षण, सम्बर्द्धनमे सरकार कतेक उदासिनताक नमूना बनल अछि महाकवि विद्यापति अक्षयकोष । एहिकोषक दयनीय अबस्था बयान कऽरहल अछि जे सरकारी संयन्त्र कतेक संवेदनशील अछि नेपालमे सभसं बेशी बाजल जाएबला दोसर भाषा मैथिलीक लेल । नेपाल सरकारे गत आर्थिक वर्ष व़ि स़ ०६६/०६७ क बजेटमे १ करोड टका अलग कएलक विद्यापति अक्षयकोषलेल । जकर उद्देश्य छल अक्षयकोषक स्थापना आ मैथिली भाषाक विकासमे योगदान कएनिहारके पुरस्कृत करब । नेपाल सरकार पहिल बेर बजेट भाषण मार्फत विद्यापतिक सम्मानमे एहि तरहक कोष स्थापनाक घोषणा कएने छल । मूदा बजेट भाषणक १७ महिना बितिगेलाकबादो अक्षयकोषक स्थापना नईं होब सकल अछि । संस्कृति मन्त्रालय अक्षय कोषक भार टारऽ लेल १ करोड राशि बृहत्तर जनकपुर क्षेत्र विकास परिषद्क जिम्मा लगा देने अछि । बृहत्तर जनकपुर क्षेत्र विकास परिषद् संस्कृति मन्त्रालय अन्तर्गतके एकटा कार्यालय अछि जे धनुषा आ महोत्तरी जिलाक धार्मिक तथा ऐतिहासिक सम्पदा संरक्षण करबाक उद्देश्यसं स्थापित अछि । संस्कृति मन्त्रालय अक्षयकोषक काज बृहत्तर जनकपुर क्षेत्र विकास परिषद् करत से कहैत कानमे रुइतेल धऽ कऽ सूतिरहल अछि । भाषा संस्कृतिक विकासक सरकारी ठेकेदार संस्कृति मन्त्रालयक अकर्मन्यतासं अक्षयकोष स्वरुप नईं ल सकल अछि । संगीत तथा नाट्य प्रज्ञा प्रतिष्ठानक प्राज्ञ रमेश रञ्जन कहैत छथि र्अक्षयकोषक राशि फ्रिज होएवाक अबस्थामे पहुंचलाकवाद मन्त्रालय बृहत्तर जनकपुर परिषद्क खातामे पाई पठओलक । एखन बृहत्तर जनकपुर क्षेत्र विकास परिषद् आ संस्कृति मन्त्रालयक सझिया खातामे कोषक राशि राखल अछि । सिमित दायरा रहल जनकपुर क्षेत्र विकास परिषद्मे कोषक राशि पठाओल जएबाक आलोचना सेहो भऽ रहल अछि । परिषद् समग्र मैथिली भाषीक प्रतिनिधित्व नहि करैत अछि कहैत छथि कोषक पूर्व अध्यक्ष रामचन्द्र झा । झा कहैत छथि परिषद् सभक भावनाके नहि समेटि सकैत अछि । विद्यापति अक्षयकोषक उद्देश्य मैथिली भाषामे योगदान कएनिहारके पुरस्कृत करबाक अछि । बृहत्तर दू जिलामे लक्षित कार्यक्रम करैत अछि, एहनमे बृहत्तरके अक्षयकोष स्थापनाक जिम्मा देनाइ औचित्यहीन रहल भाषा संस्कृतिविद्सभ कहैत छथि । परिषद् भ्रष्टाचारमे डुबिगेल आरोप लागि रहल समयमे कोष मूर्त रुप लऽ सकत या नहि कहब कठिन अछि । कोष आकार ग्रहण करए ताहिके लेल संस्कृति मन्त्रालयके कार्यविधि बनाबऽ पडतै, जाहिलेल एखनधरि कोनो काज शुरु नहि भेल अछि । कोषक कार्यविधि आ निर्देशिका नईं भेलाक कारणें कोषक पाई सरकारी खाताक शोभा मात्र बढा रहल अछि । कोषक १ करोड राशि बैंकमे रखैत काल बेशी ब्याज देनिहार बैंकके नहि चुनल गेल कहैत छथि प्राज्ञ रञ्जन । बैंकसभमे पाइके अभाव रहल अबस्थामे बेशी ब्याज लेल बार्गेनिंग हएबाक चाही छल, मुदा मन्त्रालय मनमौजी काठमाण्डू स्थित एक निजी बैंकके शाखामे पाइ राखिदेलक । संस्कृति मन्त्रालयक सचिव मोदराज डोटेल कोषक राशि बैंकमे सुरक्षित रहल प्रतिक्रिया देलनि । अक्षयकोषलेल कार्यविधि बनबाक प्रकृया शुरु भऽ गेल डोटेल जनतब देलनि । मैथिली भाषाक महाकवि विद्यापति नेपालक राष्ट्रिय विभूति भेलाकबादो हूनक परिचय स्थापित नहि होब सकल अछि । मैथिली भाषा आ संस्कृति लेल बजेटक अभाव रहल समयमे विद्यापति कोष सेहो अनिर्णयके बन्दी भऽ गेल अछि । विद्यापति स्मृति पर्वपर मैथिली भाषा संस्कृति उत्थानक भाषण त बहुत देल करैत छथि कथित बौद्धिक वर्ग । एहिबेरके स्मृति पर्व सेहो ओहने भाषणसभसं बितिगेल । महोत्तरी जिलाक बनौलीमे बर्षोसं निर्माणाधीन विद्यापतिद्वार एखनोधरि टकटकी लगौने ठाढ अछि । विद्यापति स्मृति दिवसमे जनकपुरक विदापति चौकपर रहल विद्यापति स्मारकमे घडी रखवाक भाषण सबनेता देलकरैत अछि ,मुदा दशो वर्षक अन्तरालमे घडी लगेवाक कुवत किनको नईं भेलन्हि अछि । भोटक समयमें मैथिली भाषा संस्कृतिक रक्षा एवं विकासक वाचा केनिहार नेतासब मात्र नइभ विद्यापतिक नामपर पेट पोसनिहार सेहो दोषी अछि एहिमे । विद्यापति स्म्ृत्ति पर्व पिण्डदानक पर्व मात्र बनिक रहिगेल अछि । बेचन ठाकुर नाटक- बेटीक अपमान (अंक तेसर, दृश्य पहिल) (स्थान- दीपक चौधरीक घर। दीपक रोगग्रस्त अवस्थामे माथपर हाथ लेने बैस कऽ खांसि रहल छथि।) दीपक : (खासैत) आह! ओह! दुनियाँमे कियो ककरो नहि कियो देखनिहार। जा धरि पैरूख छल, ताधरि झूठ-फूस, एम्हर ओम्हर कए बेटा बियाहलहुँ। मुदा आब कतौ कियो नहि। (खांसैत छथि) (महेन्द्र पंडितक प्रवेश) महेन्द्र : दोस, बड गड़बड़ स्थितिमे देखि रहल छी अहाँकेँ। एना किएक? की भए रहल गेल? दीपक : की हएत दोस? कप्पारमे जे धँसल अछि। सएह ने होएत। (खांसैत छथि) महेन्द्र : बड खाेंखी होइत अछि। दीपक : की कहु दोस, दम्मा जोर कए देलक। एक्को रत्ती सक्क नहि लगैत अछि। ताहिपर सँ भनसा-भात अपने केनाइ। महेन्द्र : (आश्चर्यसँ) से किएक? आ पुतौह? दीपक : पुतौह गेलीह डिल्ली। बेटा नहि मानलक हमर बात। महेन्द्र : कहु दुनियाँ केहेन छैक? बेटा-बेटी जनमाबैत अदि लोक सुख लए आ आगू दिन लए। दीपक : मुदा हमर बेटा स्वार्थमे लीन छथि। आब हम ओकर के? दुश्मने ने। महेन्द्र : एगो गप्प कहु दाेस। दीपक : अवस्स कहुँ। महेन्द्र : झांपि-तोपि कऽ दोसर बियाह कए लिअ। दीपक : मोन तँ होइत अछि दोस। मुदा आब एहि उमरमे लोक की कहत? महेन्द्र : लोक की कहत? कियो एक्को सांझ भनसा बनाए देतीह की? दीपक : ई तँ सपनोमे नहि देखि सकैत छी। अपन जनमल तँ अपन होइते नहि अछि आ दोसरक कोन आशा? महेन्द्र : छोड़ू ई सभ लटारम। दोसर बियाह कए लिअ सभ अपना-अपना लेल हरान अछि। दीपक : (मुँह चटपटबैत आ खांसैत) दोस, मोन तँ बड्ड होइत अिछ। मुदा नहि, बाबाजी थिकहुँ। लोक की कहत? हम सरस्वती माताक समक्ष सत्त कएने रही। सत्तकेँ हम तोड़िओ सकैत छी। मुदा नहि नहि नहि। महेन्द्र : नहि तँ दोसर बेटेकेँ बियाहि लिअ। दीपक : हँ, ई भए सकैत अछि। मोहना तँ गेल आब सोहना जे करए। अहाँक नजरिमे दोस, कोनो लैड़की अछि? महेन्द्र : एखन नहि अछि। ओना लैड़कीक बड्ड अभावो भए गेल अछि। जदि नजरिमे आबि जाएत तँ अवस्स कहब। एखन जए रहल छी अपन समधीयौर। समधीनकेँ शंकरजी जनम लेलथिन। दीपक : बेस, तहन जाउ, शंकर जीकेँ दरशन करू गे। (महेन्द्रक प्रस्थान। दीपक खांसैत-खांसैत बेदम भए जाइत छथि।) पटाक्षेप दृश्य- दोसर (स्थान- दिल्ली। मोहन ओ मंजू बिछौनपर आराम करैत छथि। मुर्गाक बाङ सुनि मंजू उठि कऽ अपन पतिक सेवा कए रहल छथि आ किछु गप-सप्प सेहो कए रहल छथि।) मंजू : (चिट्ठी निकालि कऽ दैत) स्वामी जी, पिताजीक चिट्ठी काल्हि सांक्षमे अएल छल। लिअ। मोहन : कने पढ़ियौक ने, की लिखलन्हि अछि। मंजू : (चिट्ठी पढ़ैत छथि) चिरंजीवी बौआ मोहन, शुभ आशीर्वाद। हमरा बेटा जनमा कऽ की भेल? दम्मासँ तबाह छी। कियो पूछैबला नहि। सोहना ओ गोपला सदिखन नरहेर जकाँ एम्हर-ओम्हर करैत रहैत अछि। तोरा बियाहि कऽ हमरा की भेटल। हँ, एकटा चीज अवस्स भेटल, चिन्ता। खाइर कतउ रहू, नीके रहु। मोहन : (मंजूसँ चिट्ठी लऽ कऽ फंेकैत) जेहेन करनी तेहन भरनी। देखैत छेलिएनि जे भरि दिनमे एक-एक मुट्ठा बीड़ी पीबि जाइत छथि। तहिपर सँ गांजा सेहो धुकैत छथि। एकर फल हुनका नहि भेटतनि तँ ककरा भेटतनि। मंजू : स्वीमी, मुदा छथिन्ह तँ ओ जनम दाता। की कहबैन आब हुनका। बुढ़े जकाँ छथि। तहुपर सँ दम्माक तबाही। स्वामीजी, हमर विचार अछि जे दुइ-चारि दिन लेल गाम चलू आ पिता जीकेँ देखि आबी। हुनको मोनमे संतोष हेतन्हि। मोहन : भोरहि भोर हमरा मोन नहि खिसीआउ। गाम जेबामे माल-पानी खरचा होइत छैक की नहि। बापबला रखने छी तँ चलू। मंजू : (शांत भऽ) जे कहलहुँ से गलती कएलहुँ। मोहन : एखन गाम नहि जाएब। एक्के बेर सोहनक बियाहमे। मंजू : जे मोन हुअए, सहए करू स्वामी। (संजू कुमारीक प्रवेश। संजू अपन पाहुन ओ बहिनकेँ पएर छुबि प्रणाम करैत छथि। दुनू माथपर हाथ दए आशीर्वाद दैत दथिन्हि) मोहन : (संजूसँ) आइ शीताहल नढ़िया जकाँ अहाँ? कोना एतए धरि अहाँ पहुँच पाओलहुँ संजू? संजू : किएक पाहुन, हमरा अहाँ बुरबक बुझैत छी की? अहुँसँ हम काबिल छी, से बुझि लिअ। मोहन : हँ हँ, से तँ अहाँ छी। कहु असगरे कोना-कोना एलहुँ? संजू : गामपर बस धएलहुँ पटना अएलहुँ आ पटनामे राजधानी मकड़ि दिल्ली अएलहुँ। दिल्लीमे टेक्सी पकड़ि अहाँ लग अएलहुँ। नम्बर-पता अहाँ हमरा देनहि रही। मोहन : खाइर एतेक अचानक अहाँक अएबाक कारण? संजू : 26 जनवरी नजदीक छैक। ओहिमे परेड देखए हेतु प्रोग्राम अचानक बनि गेल। मंजू : एहि बीिच लाल किला, इंडिया गेट, ताजमहल, लोटस टेम्पल, चिड़िया घर इत्यादि पाहुन सेहो देखाए आनथुन्ह। आब बुच्ची अहाँ कहिया आएब कहिया नहि। मोहन : संजू, आब अहाँ बड़ीटा भए गेलहुँ। बियाहमे कनिएटा रही। संजू : अहाँक विचारसँ हम सभ िदन कनिएटा रही? मोहन : हँ हँ सएह बुझु। नमहर भेलासँ अहुँकेँ दीदी जकाँ बियाह करए पड़त। बाप-माएकेँ बड्ड खरचा करए पड़त। तैयो बाप-माएकेँ छोड़ि परघर चलि जाएब। नहि तँ हमरे लग सभ दिन रहि जाउ ने संजू। संजू : एगोमे सुखए कऽ संठी भए गेलहुँ आ दोसरकेँ राखैत छी। डाँरमे दम अछि पहिने? केहेन-केहेन गेल्ला तँ मोंछबला एल्ला। एक्के ठुस्सी मारब तँ मुँह भसकि कऽ पेटमे चलि जाएत। मंजू : छोड़ू बुच्ची मजाक-तजाक। काल्हि अहाँ पाहुन संगे घुमै लए चलि जाएब। पटाक्षेप दृश्य- तेसर (स्थान- दीपक चौधरीक घर। दीपक खांसी करैत आ हकमैत बैसल छथि।) दीपक : बेटा, बड़का बेटा चिट्ठीक कोनो जबाबो नहि पठेलन्हि। हमर आब कोनो ठेकान नहि। कखन छी, कखन नहि। बेमारी बड जोर कएने जा रहल अछि। (खांसी करैत-करैत बेदम भए जाइ छथि फेर ओ बीड़ी पीबैत छथि।) सोचने रही जे मझिला बेटाक बियाह कए ली जीबतहि। मुदा हएत की नहि, से कहब कठिन। (प्रदीप कुमार ठाकुरक प्रवेश) प्रदीप : दीपक बाबू, अहाँक हालत बड खराब देखै छी। दीपक : (कलपि कऽ) सर परणाम। प्रदीप : प्रणाम-प्रणाम। दीपक : सर, हम सोचैत रही जे अपना जीबैत बेटा सभकेँ बियाहि ली। मुदा लगैत अछि जे हएत नहि। प्रदीप : से किएक नहि होएत? हिम्मत जुनि हारू। दीपक : हिम्मत की हारब सर। अहु अवस्थामे लड़िकी लेल घुमैत-घुमैत, बौआइत-बौआइत, छिछिआइत-छिछिआइत नवका जूताक शोल खिआ गेल जत्तऽ जाउ बेटो, जत्तऽ जाउ बेटे। प्रदीप : हँ, ई तँ बड़का समस्या अछि लड़िका तँ लड़िकासँ बियाह नहि करत आ लड़िकी भेटैत नहि अछि। दीपक बाबू, बुझैत छिऐक ई किएक भए रहल अछि? दहेज करणे। दहेज दुिनयाक संतुलनकेँ बिगारि देलक आ बिगारि देत। जुग अल्ट्रासाउण्डक भए गेलैए लोक अल्ट्रासाउण्ड करा कऽ बेटीकेँ जेना-तेना नष्ट कऽ दैत छथि। तहन बेटी वा लड़िकी कत्तसँ कत्तसँ आओत? की लड़िकी बरखामे खसत? दीपक : सर, हमहुँ ओहि अल्ट्रासाउण्डक मारल छी। कोनो लड़िकी अहाँक नजरिमे नहि अछि। प्रदीप : हँ यौ। दीपक : जय भगवान, जाय भगवती। कहु कत्त? प्रदीप : (मोन पाड़ैत) यौ बेलौकमे एक दिन कियो कहने रहथि जे एगो हमरा बियाहैवाली बेटी अछि। (नाक छुबैत) हँ हँ, आब मोन पड़ि गेल। ओ छलाह- हरिश्चन्द्र चौधरी। हुनका एक्केटा बेटीए छनि, बेटा-तेटा नहि। दीपक : सर, तहन जल्दी बुझिऔक ने। सर, तहन तँ ओ माल-पानी बढ़िया खरच करताह। प्रदीप : अहाँ बड लोभी छी। सदिखन माल-पानीक जुगारमे रहैत छी। पहिने हमरा बुझऽ दिअ जे लड़िकी छन्हिेँ वा उठि गेलीह। अच्छा रूकु हम घर जाकऽ झामलाल महतोकेँ हुनका ओहिठाम पठबैत छी। हँ की नहि, से हुनके दिया समाद पठा दैत छी। अहाँ असथिर रहु। (प्रदीपक प्रस्थान दीपक खूब खांसैत-खासैत परेशान छथि।) दीपक : बड़का बेटामे तँ सोलहन्नी ठकाए गेलहुँ। मुदा मझिलामे सुधि-मुरि ओसुलि लेब। आखिर एक्केटा बेटी छनि आ बेटा छन्हिें नहि हुनका। हुनक सभटा संपत्ति हमरे होएबाक चाही। (खांसैत-खांसैत परेशान) (झामलालक प्रवेश) झामलाल : दीपक बाबू, प्रदीप भैया हमरा हिरश्चन्द्रक ओहिठाम लड़िकीक संबंधमे पठौने रहथि। हरिश्चन्द्र बाबूक एखन धरि कुमारिए छथि। मुदा हरिश्चन्द्र बाबूक मोन बड्ड अगघाएल देखलियन्हि। पाँचटा कुटुमकेँ गप-सप्प करैत सेहो देखलिएन्हि। ओ हमरा कहलनि जे हुनका जरूरी हेतनि तँ ओ हमरहि एहिठाम आबि गप-सप्प करताह। हमरा भरि सएओ कुटुम आबैत छथि। हमरा पानि छोड़ि कऽ किछु नहि लगैत अछि। सभटा कुटुमे लेने आबैत छथि। दीपक : एहेन बात कहलनि ओ? झामलाल : हँ यौ दीपक बाबू, हम अहाँकेँ फुसि किएक कहब? हमरा ओहिसँ की फेदा? अन्तमे ओ कहलनि जे पियासल इनार लग जाइत अछि, इनार पियासल लग नहि। दीपक : हारल नटुआ झुटका बिछए। काल्हि हमरा लोकनि हुनका ओहिठाम जाएब। नऽ छऽ कएने आएब। कम्मो-सम्मोमे पटटैक तँ हमरा केनाइ परम आवश्यक अछि। पटाक्षेप दृश्य- चारिम (स्थान- हरिश्चन्द्रक चौधरीक घर। हरिश्चन्द्र चौधरी ओ रमण कुमार दलानपर कुर्सीपर बैसि शालिनीक बयाहक संबंधमे गप-सप्प करैत छथि। रमण कुमार हरिश्चन्द्रक मुखिया छथि।) हरिश्चन्द्रक : मुखिया जी, शालिनीक बियाह हेतु लड़िकाबला सभ हमरा नाकोदम कए देने छथि। एखन धरि सैकड़ौ लड़िकाबला हमरा एहिठाम आबि कऽ गेलाह। मुदा हँ किनको नहि कहलियन्हि। रमण- हरिश्चन्द्र जी, सभ दिन होत न एक समाना। कोनो समए छल जाहिमे लड़ककीबला लड़िकाबलाकेँ खुशामद करैत छलाह। मुदा आब एहेन समए आबि गेल अछि जाहिमे लड़िकाबला लड़िकीबलाकेॅँ खुशामद करैत छथि। आ एखन किछु नहि भेल। आगु देखब की-की होइत अछि? (दीपक चाधरी, प्रदीप कुमार ठाकुर, सुरेश कामत, महेन्द्र पंडित अो झामलाल महतोक प्रवेश। हरिश्चन्द्र ओ रमण ठाढ़ भऽ कऽ हिनका लोकनिकेँ बैसाबैत छथि। दुनू पक्षसँ नमस्कार पाती होइत छनि। सभ िकयो बैस कऽ गप-सप्प करैत छथि।) रमण : (प्रदीपसँ) प्रदीप बाबू, कहु की हाल-चाल? प्रदीप : सरस्वती माताक कृपासँ बड़-बढ़िया हाल-चाल अछि आओर अपनेक हाल-चाल? रमण : सभ आनन्द अछि। प्रदीप बाबू, लड़िकाक बाप के छथि? प्रदीप : (दीपक दिशि इशारा करैत) ओ छथि, दीपक चौधरी। दीपक : हम छी सरकार, नमस्कार। रमण : नमस्कार, नमस्कार। दीपक बाबू, अहाँकेँ लड़िकी पसीन छथि? दीपक : हँ, हम एगो विश्वसनीय सूत्रसँ बुझि लड़िकीसँ संतुष्ट छी। रमण : हरिशचन्द्रजी, अपनेकेँ लड़िका पसीन छथि? हरिश्चन्द्र : हँ, हमरो बेलॉकमे प्रदीपे बाबू कहने छलाह जे दीपक बाबूकेँ लड़िका बड नीक छथि। हम हिनकेपर पूर्ण विश्वास राखि लड़िकाकेँ बड नीक मानलहुँ। रमण : यानी दुनू तरफसँ लड़िका-लड़िकी पसीन छथि। तहन दीपक बाबू, बाजू केना की बियाह-दान करब। बेचारा हरिश्चन्द्र बड गरीब छथि। कौहना कऽ ई बेटीकेँ पढ़ौलनि। सुरेश : तैयो किछु बजताह ने हरिश्चनद्र बाबू जे की केना ख्रच करब? हरिश्चन्द्र : हम किछु नहि बाजब। बजताह मुखिए जी। हमरा संबंधमे हुनका सभ किछु बुझल छन्हि। रमण : हरिश्चन्द्र बाबू खरच करताह। जदि अपने लोकनि ई बुझि कऽ आएल छी तहन अपने सभकेँ ई गरीबक कुटमैती नहि भेल। दीपक बाबू, अपन बेटाक बियाहमे की केना खरच करताह से बाजथु। सुरेश: दीपक बाबू की बजताह? ओ तँ अपने सबहक सवाल सुनि दंग छथि। महेन्द्र : यौ सुरेश बाबू, हरिश्चन्द्र बाबू छिरहारा खेलाइ छथि। डुबि कऽ पानि पीबै छथि। हरिश्चन्द्र : हरिश्चन्द्र बाबू डुबि कऽ पानि की पीताह? रहए तँ छपाए नहि, नहि रहए तँ बिकाइ नहि। महेन्द्र : नहि रहए तँ बेटी बियाहए लेल किएक चललहुँ। झामलाल : महेन्द्र बाबू ठीक कहैत छथि। बेटीक बियाह टिटकारीसँ नहि होइत अछि। डाँर मजगूत चाही। हरिश्चन्द्र : जदि अहींक डाँर मजगूत अछि तँ बेटा बियाहि लिअ आनठाम। (बिगरि कऽ) प्रदीप : अपने सभ शांत रहु। हल्ला-गुल्ला जुनि करू। मुखियाजी, अपने किछु साकारात्मक बात बाजू। रमण : हमरा समएक बड अभाव अछि। हम एक बेर बाजि दैत छी- जदि दीपक बाबू गोटेक लाख टका खरच करताह तहन ई लड़की हिनका होएतन्हि। नहि तँ असंभव। एहि अल्ट्रासाउण्डक जुगमे बेटीक बड बेसी अभाव अछि आ बेटाक कोनो अभाव नहि अछि। प्रदीप : मुखियाजी, हमरा लोकनि एक मिनटमे विचारि कऽ कहि दैत छी। (प्रदीप, दीपक ओ सुरेश अन्दरमे जा कऽ गप-सप्प करैत छथि।) सुरेश : आब ओ जमाना नहि रहि गेल जहिमे बेटीबलाकेँ बेटाबला दहेजमे कुहरा दैत छलाह। अल्ट्रासाउण्डक युगमे बेटीक बड अभाव भऽ गेल अछि आओर बेटाबलाकेँ बिआहनाइ मजबूरी अछि तेँ भागीन, हरिश्चन्द्र बाबू कमसँ कम एकाबन हजार टाका तोरासँ लेबे करथुन। प्रदीप : दीपक बाबू, मामाश्री ठीके कहैत छथि। एकाबनमे ई कुटमैती फाइनल कऽ लिअ। दीपक : सर, अपने सभ जे जेना कहबैक से हमरा मान्य होएत। चलु फाइनल कऽ लिअ। (प्रदीप, दीपक, ओ सुरेशक प्रवेश।) रमण : बाजल जाउ प्रदीप बाबू, की केना विचर भेलैक।द्य प्रदीप : दीपक बाबूक ओतेक बढ़िया नहि अछि। ओ मात्र अहाँकेँ एकतीस हजार टाका देताह। रमण : तहन ई कुटमैती अपने सभकेँ नहि भेल। जदि एकावन हजार टाका अपने सभ दऽ सकबनि हतन कुटमैती होएत नहि तँ जय रामजी की। सुरेश : बेस हमरा लोकनि मािन लेलहुँ। रमण : मानि लेलहुँ तँ एखन लड़िकीकेँ चढेबैक की बादमे? सुरेश : बियाहेमे चढ़ए लेब। रमण : दीपक बाबू, बात पक्का। दीकप : हँ यौ मुखियाजी पक्का नहि तँ कच्चा। रमण : प्रदीप बाबू गाइरेन्टर अहींक होमए पड़त। प्रदीप : बेस, हम तँ छिहे। रमण : तहन हरिश्चन्द्र बाबू, चाय-पान-नास्ताक ओरिआन जल्दी करू। (हरिश्चन्द्र अन्दरसँ चाय-पान-नास्ता अनैत छथि। सभ कियो नास्ता, चाय, पान करैत छथि। फेर हाथ मुँह धोइ कऽ सभ कियो अंतीम गप-सप्प करै छथि।) बियाह कहिया करब दीपक बाबू? दीपक : जल्दीए राखू। फेर टकोक इन्तजाम करए पड़त ने? दू-चारि दिनमे राखु। आब मुखियाजी चलबाक आज्ञा देल जाउ। रमण : किएक, समधीन अहाँक प्रतीक्षा करैत हेतीह? दीपक : ओ हमरा सनक हजारोकेँ प्रतिदिन प्रतीक्षा करैत छथिन। तहन जय रामजी की, मुखियाजी। रमण : जय रामजी की। (प्रदीप, सुरेश आ दीपकक प्रस्थान नवस्कार-पातीक पश्चात) पटाक्षेप दृश्य- पाँचिम (स्थान- हरिश्चन्द्र चौधरीक घर। शालिनीक बियाहक पूर्ण तैयारी अछि। जयमालाक मंच सजल अछि। मंचपर बाल्टीनमे जल-लोटा राखल अछि। हरिश्चन्द्रक भाए सुरेन्द्र चौधरी असगरे कुरसीपर बैसि कऽ ओङहाइत छथि आ खैनी खा कऽ छीकैत छथि। मुँहसँ खैनी निकलि जाइत अछि। फेर खैनी खा कऽ नोइस लऽ छीकैत छथि।) महेन्द्र : आ ऽ ऽ ऽ छी। धूर सार खैनी। बड़ खच्चर छेँ। बाप लागल छौक। आ ऽ ऽ ऽ छीं। कोन खैनी अछि कोन नहि। शायद बापक जनमल खैनी नहि अछि, मएक जनमल अछि। आऽ ऽ ऽ छीं। हमरा किएक तङ करैत छेँ, बौहकेँ कर गे। एखनहि हमर मुँह नानीए दादीएकेँ उकटि देतौक। आऽ ऽ ऽ छीं। बुझि पड़ैत अछि बरियाती दुआरे एना करैत छें। सार खैनी नहितन। बापक बियाह पितीयाक सगाइ देखेबौक। आऽ ऽ ऽ छीं। लागि रहल अछि जे लड़िकाक माए चलितर बुढवाक संग उरहैर गेल। हम तेरा खेबौक नहि सार। मुदा नहि खेबौक तँ तों कानबें तहन। आऽ ऽ ऽ छीं। खैनीक पितीआइननहि तन। माएसँ बियाह कऽ लेबौक। नहि तँ अपन चालि छोड। आऽ ऽ ऽ छीं। सार खैनी मुँहे दाबि देबौक आ गरदनिमे फँसरी लगाए देबौक। मरलें तँ नॉङ साथी, जीलें तँ नाॅङ साथी। आऽ ऽ ऽ ऽ छीं। हे हे गोर लगैत छिऔक सार पाएर पकड़ैत छऔक सार आब एना करिहें। बेज्जैत भए जाएब। बरयाती आबैत होएत। आऽ ऽ ऽ छीं। हे हे, एक्के बेर छिऔक ने। अन्तिमे ने। हे हे, एकटा पौआ देबौक आइ। गांंजा देबौक। लुङिया मिरचाइ देबौक। कनियाले सुति देबौक। इज्जत बचाह। प्रतिष्ठा राख। तोरा बगैर हम नहि रहि सकैत छी। हे सार खैनी, तोरा बगैर हमर कनियां एक्को क्षण नहि रहि सकैत छथि। हँ, आब सार मानलक। कतेक कौबला-पाती कएलाक बाद। सार खैनी बड बुधियार अछि। मुदा बापसँ भेँट आइ भेलैक। एतेक दिन बापक साँएसँ होइत छेलैक। (भटक्का आबाज करैत छथि। बरयाती सभ अन्दरमे। ई अबाज सुनि महेन्द्र तीन-तीन हाथ छरपैत छथि। डरसँ कोने-कोन नुकाइत छथि। बाप रऔ, माए गै करैत छथि। बाल्टीन माथपर राखैत छथि। एहि तरहेँ बरियातीक प्रवेश होइत छनि। सभकेँ बाप रअौ, माए गै करैत पाएर छुबि प्रणाम करैत छथि। बरयातीमे छथिन्ह- दीपक चौधरी, प्रदीप कुमार ठाकुर, झाामलाल महतो, सुरेश चौधरी, सोहन चौधरी, मोहन चौधरी आओर गोपल चौधरी। चाय-पान-नास्ताक बाद शिघ्र जयमालाक तैयारी होइत अछि। सुरेश : (सुरेन्द्रसँ) सरकार, जय माला शिघ्र करू। महेन्द्र : सरकार, हम सरकार नहि थिकहुँ सरकार सभ अन्दर छथि। मोहन : सरकार सभकेँ बजाए अनियौन्हि। सुरेन्द्र : बेस, बजाए अनैत छिअनि। (अन्दर जा कऽ आबि।) सभ कियो आबि रहला अछि। (हरिश्चन्द्र चौधरी ओ रमण कुमारक प्रवेश। दुनू पक्षसँ नमस्कार पाती भेलनि।) मोहन : (मुखियाजी सँ) मुखियाजी, जय-मालामे किएक बिलंब भए रहल अछि? रमण : हमरा लोकनिक कोनो बिलंब नहि। अहीं सभकेँ बिलंब अछथ्। मोहन : की बिलंब? रमण : यएह जे दीपक बाबू एखन धरि एकावन हजार टाका हरिश्चन्द्र बाबूकेँ नहि देलथिन्ह। दीपक : हइए लिअ एकावन हजार टाका। (प्रदीप दीपकसँ एकावन हजार टाका गिनि कऽ मुखिया जीक हाथमे दऽ दैत छथिन्ह।) रमण : हँ, आब वादा पूर्ण भेल। आब जय-माला अतिशिघ्र होएत। (हरिश्चन्द्र आ रमण अंदर जाइत अछि। पुन: अन्दरसँ जनानी सभ जय-माला कराबए अबैत छथि। समूहमे शालिनी कुमारी, राधा देवी आओर चारि-पाँच गोट अन्य जनानी छथि। ओ सभ परिछन कऽ जय-माला करौलन्हि। शालिनी, सोहनकेँ पाएर छुबि प्रणाम केलनि। सभ जनानी अन्दर जाइत छथि। तहन सुरेन्द्र चौधरीक प्रवेश।) सुरेन्द्र : बरयाती सभ, आऽ ऽ ऽ छीं। (खैनी खा कऽ) सार फेरो आबि गेल। सार निरलज आऽ ऽ ऽ छीं। पतित आऽ ऽ छीं। हे सार, कुटुम स्ीा हँसैत होएत। हे सार प्रतिष्ठा आऽ ऽ ऽ छीं। बचा बचा आऽ ऽ ऽ छीं। हे हे गोर लागऽ दैत छिऔक। हे हे आइ राति नवकी समधीन लग लऽ जेबौक। बात मान। (छींक रूकि जाइत अछि।) हँ सार समधीनक लोभमे बात मानलक। बरियाती सभ भोजन सराए रहल अछि। चलै चलू भोजनमे। (सबहक प्रस्थान) पटाक्षेप क्रमश: ३. पद्य ३.१.१.डॉ. नरेश कुमार ‘विकल’२. संस्कृति-कतऽ जाइ....३. गंगेश गुंजन- आउ हनुमान ३.२.राजदेव मंडलक किछु कविता ३.३.ज्योति सुनीत चौधरी-मिथिला चित्रकला ३.४.१.उमेश मंडल किछु कविता २. राजेश मोहन झा- कविता- घुरना मोन पड़ैए ३.५.१.शिव कुमार झा-शिवकुमार झा टिल्लू २.मुन्नाजी-हाइकू ३.किशन कारीग़र ३.६.१.सतीश चन्द्र झा- सौंसे बिहार एखनो बेहाल २.रामविलास साहु- कविता-कोशीमे समाएल जिनगी ३.७.कालीकान्त झा बूच- अंतिम- कविता- कहिया धरि उदासी ३.८.गंगेश गुंजन- राधा- २६ म खेप १.डॉ. नरेश कुमार ‘विकल’२. संस्कृति-कतऽ जाइ....३. गंगेश गुंजन- आउ हनुमान डॉ. नरेश कुमार ‘विकल’ बाल गीत अहींसँ गंगा-जमुना बहथिन अहींसँ कमला धारा। अहीं सुरूज ओ चान जरावी अहींटा एक सहारा आइ हिमालय देख रहल अछि फेर अहींकेँ बौआ! बाॅझ रहथु धरती बरू पर उपज ने पाबए झौआ कतेक दु:शासन खींचि रहल अछि आइ द्रोपदीक चीर! कनिको जीमे प्राण रहए तँ रहब ने कनिको थीर! बना कलम करूआरि अहाँ छोड़ू वीणा केर तार! रहू सदति तैयार अहाँ यौ गरमी हो वा जाड़!! (2) सुनू बौआ मोर कानमे बाजू बौआ जाएब ककरा कोर आब ने भेटत बौआ तिरहुतमे तिलकोर कतऽ गेलै करमी आ पटुआक झोर साग आ पाग ने कोकटीक तौनी डालाक भार आ ने सीकीक मौनी महफाक ओहार उड़ल देखू कनियाँ गोर स्नो आ पाउडरसँ करियो भेलै गोर पण्डौलमे पाव रोटी भेटत चहुँ ओर सौराठक सैण्डविच कएने अछि जोर कपिलेश्वरमे कटलेट भेटत टटुआरमे टोस्ट बुझि ने पड़त बौआकेँ गेस्ट आ होस्ट लोहनाक लिपिस्टिकसँ रङल छैक ठोर हाइ हिलक चप्पलमे नाचै चारू पोर नेहरामे झकझक नायलान कएने अछि जोर जार्जेट जनकपुरमे कतऽ अछि पटोर? माय गेली मम्मी अएली टप-टप खसै नोर डैडी ओ डार्लिंगकेँ भेटत ओर ने छोर। २ संस्कृति वर्मा , क्लास ४था , क्विन मेरी स्कूल , मॉडल टाउन , दिल्ली कतऽ जाइ.... हम करी तँ की किछु ने फुरैत अछि. हमहूँ बेदरा छी मोन नहि पड़ैत अछि ! एक टा फ्लैटमे बन्द रहैत छी ओहि कोठरीसँ ओहि कोठरी धरि घुमैत रहैत छी. टीवी खोलैत छी , केहेन केहेन दृश्य आबि जाइत अछि हमरो लाज लागि जाइत अछि. कंप्यूटरपर जाइत छी , नेट पर किछु कहाँ आबि जाइत छैक लागले डैड सेहो पहुँचि जाइत छथि ई की देखि रहल छेँ डैड , हम की करी ,कते खेली आ आ डैड न्यूज खोलि बैसि जाइत छथि. न्यूज़ पर किछु सीन आबि जाइत छैक आँखि गुरारि हमरा कोठरीसँ बाहर निकालि दैत छथि ,जाऊ होम वर्क करू ............ एकटा डिब्बामे बन्न भऽ बससँ स्कूल जाइत छी अबैत छी .................. नीचा नै जाऊ , जमाना ख़राप छैक छत पर नै जाऊ नेनाकेँ उठा कऽ लऽ जाइत छैक आब अहीं कहू हम बच्चा सभ कतऽ जाऊ अवलम्ब पाऊ..........??? ३.गंगेश गुंजन आउ हनुमान माथे पर मैना चटक केलक हाथे पर लुधकल बगड़ा टाटे पर लुटकुन गेलाह पोखरिक घाट धोअ' अंगरखा दहिना हाथ । चितङ खसल दोस्त बाटे पर पोथी भेटल घरे मे कौपी भेटत हाटे पर टुनमुन कहल संगी के संग च’ल त कनिएं हाट से नहि गेल तं लेलनि ढौआ चलला असकरे हाट गोला कुकुर भेटल बीच बाट जए कि कहलखिन- आऽ तू आऽ त ऽऽ अएलनि लग ध' लेलकनि संग संगे संगे चलल दोकान कौपीक बदला कीनल मखान . खुशी सँ कुकुर उठौलक तान टोकल टुनटुन रह भ' चैन तोहर बस्तु सुअदगर लाइ आइ नहि किनबौ देबौ काल्हि पाइ खतम छौ घुरि चल आइ घुरती भेटल जिलेबी छनैत ठामहि तै लए ओ अड़ि गेल टुनटुन ओकरा फेर बुझाएल कुकूर लेब' उधार जिदिआएल बुझबैत कहलक टुनटुन बात- सौदा नै ली कखनो उधार नगदीएक राखी वेबहार काल्हिए तं कहलनि बाबा, भैया के सोझाँ क' ठाढ़ चरफर दोस्त कुकुर चलल टुनमुन ओकर माथ चूमल तखन दुनू फेर टोल घुरल कौपीक बदला कीनि मखान तइ गलती पर भाय कन्हुआएल करबौलक उठकी-बैसकी अपनो गलतीक टुनटुन फेर मललक झिटुके अपने कान मोने रहतै इहो दोकान कौपीक बदला किनब-मखान ओकरे देखसी करैत कुकूर अपने चाँगुरे पकड़लक कान । राजदेव मंडलक किछु कविता (1) गाछक हिस्सा बिरिछपर कुड़हरि दन-दना रहल अछि दुनू भाँइ भन-भना रहल अछि यएह गाछ छिऐ झगड़ाक जड़ि एकरा देबै आइये काटि सभ किछ भए गेल भिन्ने तँ एकरो लेबै आइये बाँटि लगमे पहुँचल संच-मंच बुझबए लगल गामक सरपंच बैसू हकरू दुनू भाय नहि हएत झगड़ा अछि उपाय गाछमे छै दूटा फेंर नहि लाबए पड़त तरजू-सेर हिस्सामे भेल एक-एकटा मोटका डारि भायक परेममे किएक पाड़ै छी दरारि एकोटा गाछ रोपल भेल किएक करै छी एहेन अधलाह खेल जाहिपर जिनगीक आस चलैत अछि साँस तकरा कऽ रहल छी विनाश जएह देने अछि कपारपर छाँह तकरे कटै छी वाह-वाह ई करम अहाँसँ भऽ रहल अनुचित जे दऽ रहल जिनगी तकरे सँगे एहेन अहित करबै गाछक सेवा भेटत सुन्दर मेवा भेटत सुन्दर फल एहिसँ बढ़त शरीर आ मनक बल पंचक गप्प सुनि दुनू भाँइ कहलक घर चल। (2) लाल ज्योति गन्तव्य दिश अग्रसर होइत धप्प दऽ– हम खसि पड़लहुँ अनभुआर कुपमे जे अछि बरिसों पुरान, सुखल जलक नामपर फाटल दरारि राक्षसक मुँह सन सधन-तमसँ भल छी भयभीत अएबाक हेतु-ऊपर कऽ रहल छी- यत्न पर यत्न किन्तु सर्प सन ससरि ससरि खसैत छी पुन: ओहिठाम मकड़ाक जाल सभ लटपटा रहल अछि- माथमे आवेश वश फेंकि रहल छी माँटिक ढेपा परन्तु ओहो लगैत अछि ठाँहि दऽ अपनहि कपारपर हथोड़ि रहल छी-नव राह तखनहि तीक्ष्ण लाल प्रकाशमे चौन्हिया जाइत अछि-चक्षु कियो सहृदय साहस कऽ देखा रहल अछि- मार्ग बढ़ि रहल छी आब शनै: शनै: ओहि बिन्दु दिश। (3) बीखक घैल कतेको बरख पुरान एहि बीखक घैलमे तृण भरि छेद मात्र बून-बून चुबैत बीखसँ भऽ रहल अछि विषाक्त वसुन्धरा भष्म भऽ गेल मनवोचित गुण तइयो तीब्र गतिसँ आप्लावित करैत खोजि रहल अछि नव-नव आहार प्राणी सभ अछि पड़ा रहल सुड्डाह करैत अछि बढ़ि रहल बीखक बाढ़ि सभ अछि सशंक खोजि रहल अछि निर्विध्न स्थान पड़ाइत-पड़ाइत भेल अपस्याँत किन्तु आब नहि होएत घात बढ़ि रहल दूटा सशक्त हाथ अहर्निश ओहि कुम्भ दिश। (4) पत्रोत्तर अहाँक उपरागसँ बेधल अछि गतर-गतर तैं दऽ रहल छी पत्रोत्तर कतेक कएलहुँ परिश्रम बनलहुँ निरलज टूटल धरम तब बनेलहुँ सोनाक घर सबकुछ सधि गेल भेलहुँ फक्कड़ मनोरथ तँ पूरा भेल किन्तु यएह आइ जहल भऽ गेल अहाँ लगसँ एतऽ धरि जेना लगल अछि कोनो अदृश्य कड़ी हवाक सँग अहाँक गन्ध आबि रहल अछि से स्वर संगीत बनि गाबि रहल अछि अहाँ अन्त: सँ सोर पाड़ै छी हम अपना हृदयकेँ तरे-तर मारै छी बीतैत अछि साल बीतैत मास एहि जेलसँ निकलैक कऽ रहल छी प्रयास आबैए जाड़ तँ अहाँ बिनु लगैए अन्हाड़ देहपर पड़ैए बून याद पाड़ैए अहाँक गुन-गुन हवा बहै जब गरम लागै फूटल हमर करम अबै जब बसन्त हमर हृदय करैत अछि हन्त तइओ हम केहेन छी कंत अहाँक बिसरि बनल छी संत खोज कएलहुँ हम असली आब बनल ओ नकली असल परेम मुँह फेरि नहि सकैत अछि ओकरा कियो धेर नहि सकैत अछि नहि जानलहुँ तँ जानब आब नहि हम मानब एक-एक ईंटाकेँ फोड़ब एहि स्वर्ण जेलकेँ तोड़ब अन्तरमे मिलन पियास करै अनघोल स्वर्णक होइत अछि बहुत मोल पर परेमक मोल अमोल। (5) अन्हारक खेल ओहिठाम भऽ रहल छलै एकटा हास्यास्पद खेल एकत्रित दर्शकमे छलै तत्कालीन बड्ड मेल एकबेर आँखि मटकेलहुँ कनेक धियान भटकेलहुँ खेलाड़ी खेल आब की करता देखैत छी ओहिठाम ठाढ़ छै भाषणकर्ता भाषण झाड़ि रहल अछि अमृत वाणी ढारि रहल अछि छलिया भाषण नहि दैत छलै राशन लोग पीबै छलै अश्वासन नहि सुनै गेल देखै लेल गेल छलै लाेग सेहो भेल अभोग करऽ लगल आपसी रगड़ा थप्पर-मुक्का आ झगड़ा पुछए चाहलक भाषणक अता-पत्ता आकि ओहो भऽ गेल निपत्ता ओहि जगहपर भेल ठाढ़ सौंसे मनुक्खक हाड़ जहिमे सँ निकलि रहल छूछे अन्हार डूबि गेल सभ ओहिमे कानए जार-जार औनाए कऽ खसए बारम्बार ओ अन्हार सबहक देहकेँ बना देलक हाड़े-हाड़ एक दोसराकेँ देखि सभ भऽ रहल भयभीत बढ़बऽ पड़त एकताक गीत मारऽ पड़त छड़पनियाँ काटऽ पड़त गुड़कुनियाँ आगूमे छै इजोत जे दऽ रहल छै नोत लगबऽ पड़त कोनो ब्योंत। (6) नाचक बिखाद लोग मनहि मन करै छल जाँच हम करै छलहुँ नाँगटे नाच आँखि देखैत छल मुँह हँसैत छल जखैन लोग केलक दुर छी-दुर छी धियान गेल तब अपना दिश अपने नाँगट देह देखि मोनमे आबि गेल रिश कहैत छी आब-लाउ कोनो नुआँ होइत अछि लाज बजैत अछि समाज- “अलगे रहू अहाँसँ नहि अछि कोनो काज” एहूसँ बेसी घिना जाएत स्वजन-परिजन जब सोझा आएत गप्प चारूभर गिन-गिना जाएत हेओ कएलहुँ जेना नहि करब एना नाचैत-नाचैत कखनहुँ काल नहि रहै छै सुधि-बुधि बिगैड़ जाइछै चाल एहो तँ छिऐ एकटा नवका ताल किछ लोक तँ कहै छै एकरो कमाल ओमहर लोगकेँ भले लगो नीक ई नाच एहिठाम नहि सोहाइत छै ई गप्प अछि साँच एतुक्का लेल नहि छै अनुकूल ई नाच हे यौ भाय करू कोनो उपाय। (7) आँखिक प्रतीक्षा बन्न अछि अहाँक आँखि जेना नान्हिटा चिड़इ पसारने पाँखि आगुमे दुनू ठेहुनकेँ मोड़ने संगहि दुनू हाथ जोड़ने हम टक-टकी लगा कऽ रहल छी ताकि कखैन खुगत अहाँक आँखि एकबेर जाहिमे लेब हम झाँकि हमरासँ की भेल भूल चढ़ा रहल छी मनक फूल अधरतिया भऽ गेल साइत शरद पूर्णिमाक ई राति प्रकृतिपर झहरैत अछि चानी मधुर रस घोरैत कोइलीक वाणी मन्द-मन्द सिहकैत बसात केना रहब अहाँसँ भऽ कात एकोबेर तँ बोलू आबो आँखि खोलू निकलए नेह वा धिक्कार हमरा दुनू अछि स्वीकार देखबाक अछि उत्कट इच्छा हम करैत रहब जिनगी भरि प्रतीक्षा। ज्योति सुनीत चौधरी जन्म तिथि -३० दिसम्बर १९७८; जन्म स्थान -बेल्हवार, मधुबनी ; शिक्षा- स्वामी विवेकानन्द मिडिल स्कूल़ टिस्को साकची गर्ल्स हाई स्कूल़, मिसेज के एम पी एम इन्टर कालेज़, इन्दिरा गान्धी ओपन यूनिवर्सिटी, आइ सी डबल्यू ए आइ (कॉस्ट एकाउण्टेन्सी); निवास स्थान- लन्दन, यू.के.; पिता- श्री शुभंकर झा, ज़मशेदपुर; माता- श्रीमती सुधा झा, शिवीपट्टी। ज्योतिकेँwww.poetry.comसँ संपादकक चॉयस अवार्ड (अंग्रेजी पद्यक हेतु) भेटल छन्हि। हुनकर अंग्रेजी पद्य किछु दिन धरि www.poetrysoup.com केर मुख्य पृष्ठ पर सेहो रहल अछि। ज्योति मिथिला चित्रकलामे सेहो पारंगत छथि आ हिनकर मिथिला चित्रकलाक प्रदर्शनी ईलिंग आर्ट ग्रुप केर अंतर्गत ईलिंग ब्रॊडवे, लंडनमे प्रदर्शित कएल गेल अछि। कविता संग्रह ’अर्चिस्’ प्रकाशित। मिथिला चित्रकला एकटा कैनवास पड़ल उज्जर रिक्त ताकैत छल मुँह बड्ड जिज्ञासा सऽ तूलिका उठेलहुँ रंग सऽ कऽ सिक्त घाेर मनन करय लगलहुँ तल्लीन भऽ अनकर पन्ना सेहाे केलहुँ अंगीकृत प्रेरणा लऽ नीक करक अभिलाषा सऽ।। लियोनादो बढ़िया कलाकारी गढ़ि गेला मो नालिसा के प्रसिद्ध रहस्यमयी मुखाकृति तर्क वितर्क करैत रहल छबिकारक मेला इतिहास के ललकार बनल ओ कलाकृति ईश्वरक कृति बच्चाक निश्छल मुस्कान देखल ओ हि सऽ अद्भुत आर कोन अभिव्यक्ति।। ध्यान आयल एब्सट्रैक्ट के नब पैटर्नक मो न भेल किछु करी आधुनिक ढ़ंगमे भेटल अमूर्त एब्सटै्रक्ट रूप चित्रक उड़ैत भागैत रंग बिरंग तितलीक पंखमे विचार आयल जखन विधा फैशनक शानदार सज्जा छल सीप आ शंखमे।। किछु नवीन करक इच्छा रूकि जाइ छल जखन देखै छलहुँ अपन चारू कात ईश्वरक बनाआेल अहि दुनिया मे भेटल सब तरहक उपलब्ध छल सर्वश्रेष्ठ करामात स्वयं ईश्वरक विवाहमे जे सजायल रहल साेचलहुँ मिथिला कला के करी आत्मसात। १.उमेश मंडल किछु कविता २. राजेश मोहन झा- कविता- घुरना मोन पड़ैए १.उमेश मंडल किछु कविता हँसैत लहास लहास माने मुइल मुइल माने लहास ई के नहि बुझत हठात् गुम-सुम भेल छल जँए ओ बुझाइत छल लहास तँए ओ मुदा, आब ओ बाजत बजैत-बजैत हँसत अहाँक कृतिपर बनल संस्कृतिपर। कविता हम नइ बिसरब अपन सनातन आ संस्कार नहि बिसरक चाही अहुँकेँ अपन आचार दोस बनब वा दियाद-बेहाल आकि करब खाली हाल-चाल तैयार भए गेल अछि सबालक महाल अहाँ नै बुझै छिऐ बनि जाउ दियाद अहाँ करू किछु रियाज पाँति राखू चारि याद यौ दोस अहाँ आनू अपन होश कए लिअ स्वीकार हे यौ दियाद हिया गुनि भरल दियाद सुनि पड़ल फाँट बीचमे आबि धूनि पड़ल हट, हट, हट नै तँ घसक फाँट करए उद्घोस दुनू अपन ठाम बेहोश मुदा, तैयार भेल सोर-पोर कल्याणले नहि जोर अपन फाँटले ताबरतोड़। बाधा- विदा भेल मंगला पूभर कान्हपर टँगने अछि साइकिल बाउलपर कहुना कऽ लगिचेलक लटपटाइत पहुँचल धारक कछेरमे बिनु पानिक अछि धार चक-चक करैत अछि बाउल चारूकात नाउ नहि बाउल देखि भेलै मंगलाकेँ थोड़े होश एलै अपन छूछ जेबीपर भरोस भेलै आब टपैमे कोनो नइ हएत बाधा पहुँचबे करब सरायगढ़क ओइपार मुदा, मंगला लसैक गेल घाटपर नजरि दौड़ौलक अपन कोनो लाटपर अपन जेबीमे देने हाथ तकैए चारू कात आब की करबै हौ बाप ई तँ लेबे करतै घाटी जेना लगैए एकरा उठल छै आँति सुखलौ घाटक लेतै खेबाइ नै देबै तँ देत ई रेबाड़ि सहए भेल मंगला घुरि गेल पछिमे मुरि गेल। भोगी नाच कराए बानर चाउर खाए बबाजी बीचमे तँए अछि सरोकारी विकासक नाओपर भऽ रहल अछि नाच मानसिकता, मानसिकता, मानसिकता पसरल अछि चारूकात नीक बात किएक नै हुअए विकास बिक रहल अछि चारूकात ब्लड प्रेशर आ डायबिटीजक गोली संगे-संग तैयो बबे बनल छथि तियागी भरि जीवन भोजन केलनि बैसारी ऊपरसँ दवाइयोकेँ बढ़ौलनि बेपारी भोग करैत-करैत भेल छथि अघोर तइपरसँ रटना लगेने छथि ताबड़तोर स्वर्ग जाए चाहैत छथि सोरपोर हमरा बीचमे हुअए कोनो नै बाधा हम सबदिन रहलौं मधुशाला बनलै तँ अछि विचारशाला जइमे लटकल अछि बड़का ताला। छठि पोखैरक चारूकात बनौलक गौआँ घाट भरल पथिया लऽ धेलक सभ बाट पहुँचल सभ हाली सजेलथि अपन-अपन डाली जरबाक लेल तैयार भेल दिआरी हाथिओ केलक अपन तैयारी जरैत कुरनीपर दीप धेलक माथपर अछि आथी बैसल आइ घाटपर टौकना, खमरूआ, सुथनी, हरदी, आदी सभ पुराओत अपन-अपन फर्ज चुकाबए चाहैत अछि अपन कर्ज सूर्यकेँ देत सभ अर्घ। फंदा जखने करब नखरा सभ कहबे करत हमर दऽ दिअ बखरा जँ अहाँ रहब शांतचित भेटत अपन सभ परचित करब अहाँ कल्याणक काज सभकेँ हेतै अपने-आपपर लाज लाज सिखबैत अछि काज आ मुँहो मोड़ैत अछि हठात् भऽ जाइत अछि कोनादन धऽ लैत अछि अमती काँटसन। धर्मात्मा धर्मात्मा होइ छथि तियागी तियागी कहल केकरा जाए यौ भैयारी वएह ने जे केलनि तियाग आकि ओ जे भाेग केलनि वेसुमार। मजदूर, हरबाह भिनसरसँ साँझ धरि सभ देह धुनैए उचित बोनि मात्र दू सेर पबैए एक सेर बेच लऽ दोकान जाइए नोन, तेल, हरदी, गोटी किनैए बचलाहा एक सेरसँ सभो परानी पेट चलबैए भरि दिन तँ ओहो खटबे करैए अहीं कहू, ई केहेन मशीन एले हिसाब जोड़ैकाल ऊपरे-ऊपर नजरि दौड़ौलकै एकर तियागपर नजरि नै खिड़ैलकै भागीकेँ धर्मात्मा कहि गेलै। खास खास जगहक खास आदमी खास जिनगीमे खास बात देशक नामपर भऽ रहल अछि ई खास मुदा जखने देश एक परिवार सभकेँ चाही रोजगार खुशी चाही सबहक घर-द्वार आकि इहोमे करबै बेपार गुजरि गेल मध्यकाल आ भक्तिकाल मुदा पाछु मुँहे लुढ़कल किएक जाइ छी यौ महराज। लघु कविता- प्रकाश ज्ञानक परकाश जाइत अछि ओत्त तक जत्त कियो नहि जा सकत हठात् मुदा ज्ञानो भऽ जाइत अछि गुलाम सांकृत्यायन पड़ै छथि मोन घराम। (2) हनहनाइत, भनभनाइत ओइ स्वरकेँ सुनैले नहि छथि कियो तैयार जाहिमे मात्र ओ मात्र गाओल जाइत अछि सनातन गीत कियो नहि बनए चाहैत छथि मीत करए जे पड़तनि हुनक दर्दसँ प्रीति। (3) भकोभन ओइ अन्हार कोठरीमे जइमे काजर सन कारी राति दिनो कऽ बुझाइत अहीं कहु यौ भाय तखन शीशामे कोना देखाएत ओकर चित्र कोना अएत? श्रोता भागवत वाचन शुरू भेल श्रोता सभ आबि-आबि जगह लेल चारि तरहक श्रोता बैसल छथि अपन-अपन काज-ध्यानमे मग्न छथि बाचको आ श्रोतो एक तरहक श्रोता भागवत सुनि नीकक प्रचार करै छथि दोसरोकेँ नव गप्पसँ अवगत करबै छथि मुदा दोसर दोसर श्रोता अंगीकार करै छथि मुदा बजै नहि छथि बिना पुछने तेसर श्रोताक देखियो बैसल छथि भागवत प्रबचनमे मुदा ध्यान छन्हि व्यापार मंडलमे घुरिआइत-नुरिआइत स्पष्ट अिछ जे किछु नै पेला ई प्रसादटा खेला ई चारिम श्रोतापर करू विचार ई छथि मुदा सदाचार सुनितो छथि आ गबितो छथि अपन जिनगीक क्रियासँ मिलैबतो छथि ओतबे नहि डेन पकड़ि पछुएलहाकेँ खिचितो छथि आ ठमकलहाकेँ धक्का सेहो लगबैत छथि। कल्याणी कल्याणी नाओसँ लगैत अछि जेना केने हेती ई किछु एहेन काज जहिसँ भेल हएत कल्याण वा हेतै कल्याण मुदा से भेल आकि नहि भेल एत्ते धरि जरूर भेल भाग्य-तकदीर सभसँ पैघ होइत अछि से कहि जरूर गेलि। देश हमर देश किछु लोक खेल रहल छथि धुरखेल खुट्टीसँ आगाँ पड़ल बड़का देवाल देवालक भीतरे लागल अछि मड़कड़ी चारूकात इजोत चकचकाइत अछि दिने जकाँ राइतो बुझाइत अछि चुट्टी-पिपड़ी छोड़ि सभ किछु देखाइत अछि मुदा देवालक अंतिम खुट्टीसँ ओम्हरे भऽ रहल अछि मनोरंजन हेबक सेहो चाही जरूरतसँ ऊपर उठि गेलापर स्वभाविक अछि मुदा देवालसँ इम्हर बोन-झार सदृश्य मनुक्खक जरल रूपक खेखनैत स्वर कियो सुनैबला नहि चारि तरहक नाओ रचैबला लोक देशक भीतरेमे बड़का देवाल ठाढ़ करैमे अपनो उड़ैलनि होश कऽ रहल छथि किलोल हमर देश अछि अनमोल एक्कैसमी शदीमे चलि रहल अछि ताबड़तोर आश्चर्य चहारदेवालीक भीतर मात्र ई गनगनाइत अछि बोल भऽ रहल अछि भोजक बदला भोज मात्र ओम्हरे अछि ई गरदमगोल माने चहारदेवालीक ओहि पार पुंगबैत अछि अपनाकेँ मनोरंजन योग परती-पराँतमे रहएबला दिनकट्टू जनमे काल भेल छल मइटूगर छेँटगर होएबासँ पहिने ई कहबैत छल दूधकट्टू आइ दुनू हाथ जोड़ि दू साए फीट एन.एच. सड़कक कातमे हजारक-हजार कहबैत अछि दिनकट्टू पएरमे चट्टी नहि छै पहिरैले चलऽ मुदा पड़तै पक्की सड़कपर शीशा-काँटी पसरल सड़कपर खाइ-पीबैक नहि छै जोगार एकरा आ नै छै कोनो रोजगार चारूभरसँ खाली सुनै छै - जल्दी जोड़ि लैह सरोकार तूँ एक्केस्मी सदीक समाज तूँ। भाषा भेद हमरा सबहक माथपर पसरल अछि मरलत्ती जकाँ किछु कियो सुचिंतक नहि जे चिंतन करता एहिपर ई कथी लतड़ल अछि सभपर मुदा दुर्भाग्य एहिमे छिपल अछि किछु बात जाहिमे अछि नहि एक्कोटा पात सबहक कहब छन्हि “ई आगाँ चलि कऽ करत प्रदूसन साफ जीबैक लेल स्वच्छ हवा-बसातक अछि जहिना खगता करत ई दूर सबहक बेगरता।” देखा चाही ई दूर करत प्रदूसन आकि करत सभकेँ निपत्ता। २ राजेश मोहन झा 1981- उपनाम- गुंजन, जन्मस्थान- गाम+पत्रालय- करियन, जिला- समस्तीपुर, हास्य कविताक माध्यमसँ समाजक विगलित दशाक वर्णन। बाल साहित्यमे विशेष रुचि। कविता घुरना मोन पड़ैए घुरना मोन पड़ैए रौ उगना मोन पड़ैए। भागल बौरहबा खेत-पथार दिश, नहि देखलक हमर अश्रुधार दिश, कंठ पियासे सूखि रहल अछि केओ दरस नहि दैए कतऽ पड़ा गेलैं रौ बतहा आनि कऽ कुरता पहिरा दे एखनहिं समाद पठौलनि खलीफा भांगक आश लगैए रौ घुरना हमर बात तोँ माने दौड़ चङेरी चूड़ा भरि आने कहेँ झटहीकेँ भूजि देथि भूखक आभास लगैए राति भेल जुिन होउ निपत्ता बुन्न झड़ै अछि आनू छत्ता नहिं छूटत हथियाक ई झपसी सभटा धान डूबैए।। १.शिव कुमार झा-शिवकुमार झा टिल्लू २.मुन्नाजी-हाइकू ३.किशन कारीग़र १. शिव कुमार झा-शिवकुमार झा टिल्लू स्निग्ध-स्वाती झिहिर-झिहिर ना हे पिया, झिहिर-झिहिर ना! झहरय स्निग्ध स्वातीमे बदरा, झिहिर-झिहिर ना...! परम सुहावन मास विरह िहय, टपकए नेहक बुन्न ललित पवनमे ठिठुरि रहल छी, जीवन भऽ गेल सुन्न टपकए विरहक अश्रुलाप ई, झिहिर-झिहिर ना... तृप्ति-तपित सितुआक कल्पना, उपटल अर्णब तट मोती अहाँ बहएलहुँ निरस जीवनमे, किए अगम दु:ख सोती? मिलनक आश कानए पैजनियाँ, झुनुर-झुनुर ना.... कांति श्रवित माणिक्य बनल, मदमत्त भेल गजराज मुग्ध जहानक रम्य प्रहरमे, फफकि गेलहुँ हे ताज! तोड़ू वेदनाक डोरि ई, झमड़ि-झमड़ि ना.....।। (2) घटा बसन्ती कूकू केर मादक स्वर सुनिते, िसनेहातुर मन चहकि उठल उबडुब आनन हरियर कानन, “घटा वसन्ती” धार बहल। तितली रूनझुन नीरज रससँ कएलक झंकृत सकल जहान अपन मनोरथ सिद्धि करऽ लेल प्रेयसी कएल त्रृतुराजक गान। उमड़ि रहल नव तरूणी यौबन रसस्नात भेलि चंचला-गात पुष्प सेजपर मिलन सम्मोहक चभटि गेल अछि दुनू पात। जर्जर वृद्धा आ सुखल वृद्धमे धुरि आएल पुनि कामुक जान भागि गेलनि धर्मराज देखि कऽ ऋृतुराजक ई अनुपम शान। हॅसी-खुशीसँ चल-अचल जीवन, ताकि रहल होरी केर वाट जड़-चेतनक सुरभित कांति देखि कऽ कएलक गान हृदयसँ भाट। रंग-विरंगक अवीर गुलाल संग नाचि रहल उन्मादित होरी सृष्टि मनोहर चक-चक तरूवर मॉतल चह-चह चहुँदिशि जोड़ी। चैतावरक आेंघाएल कलरब अग्निदेव केर जुआरि बढ़ल एकल जहानमे कलकल जीवन मादकता स्वर्गोकेँ जीतल।। २. मुन्नाजी हाइकू- १ नाम बदलि साइबर क्राइम पकड़ा गेला २ गहींर दोस्ती जग कैल विध्वंश खुशी भेल ३ बाढ़ि आयल मुख्यमंत्री धनिक चुड़ा बटल ४ अइंठ धो कऽ कोठा कोठामे भेल प्रतिष्ठा पैघ ५ मुसक बिल सत्तामे भागीदारी वास साँपक ६ निसाँ चढ़ल सब सत्य कहलनि लोक सभ्य ७ छुच्छे प्रचार जातिक फुटौव्वल मिथिला राज्य ८ अल्लाक देन पेट भरै लए मारि सड़क छाप ९ गारि गञ्जन पेट भरैए एतै कान मुनै छी १० जतन भरि पोसि पालि रखलौं निभरोस छी ११ एहेन पढ़ दु टा बरु समाज बचौ घर १२ अंग्रेजी असर मैथिली बिसरल चाही मिथिला १३ नवका पीढ़ी तकनीकीक जोर संस्कारहीन १४ आक्रान्त शहर सरकार उदास असगरे छी १५ घटल जग्गह बनै बीस मंजिला लोक बढ़ल १६ पूत कमाऊ बढ़बैए इज्जत शेष बेकार १७ बढ़लै मन मंगल पर लात नीचाँ प्रदूषण १८ सुख सुविधा बढ़बैए बीमारी गमैये नीक १९ पाइक जोर वासमति चर्चित भाते भूखल २० तुम्मा फेरी सटक सीताराम नाम गायब ३. किशन कारीग़र परिचय:-जन्म- 1983ई0 कलकता मे मूल नाम-कृष्ण कुमार राय किशन’। पिताक नाम- श्री सीतानन्द राय नन्दू’माताक नाम- श्रीमती अनुपमा देबी। मूल निवासी- ग्राम-मंगरौना भाया-अंधराठाढ़ी जिला-मधुबनी बिहार। हिंदी मे किशन नादान आओर मैथिली मे किशन कारीग़र के नाम सॅं लिखैत छी। हिंदी आ मैथिली मे लिखल नाटक आकाशवाणी सॅं प्रसारित एवं दर्जनों लघु कथा कविता राजनीतिक लेख प्रकाशित भेल अछि। वर्तमान मे आकशवाणी दिल्ली मे संवाददाता सह समाचार वाचक पद पर कार्यरत छी। शिक्षाः- एम फिल पत्रकारिता एवं बी एड कुरूक्षे़त्र विश्वविद्यालय कुरूक्षेत्र सॅं। बँटवारा कियो धर्मक नाम पर कियो जातिक नाम पर कियो पैघक नाम पर कियो छोटक नाम पर एहि समाजक किछू भलमानुस लोक अपने मे कऽ लेने छथि बँटवारा। हे यौ समाजक कर्ता-धर्ता लोकनि किएक करेलहुॅं अपने मे बटवारा आई धरि की भेटल एतबाक ने छोट पैघक नाम पर अपने मे मैथिलक बॅंटवारा। आई धरि शोक संतापे टा भेटल आबो तऽ बंद करू एहेन बँटवारा नहि तऽ फेर अलोपित भ जाएत मिथिलांचलक एकटा ओ मैथिल धु्रवतारा। हे यौ मिथिला केर मैथिल जूनि करू अपने मे बँटवारा ई मिथिला धाम सबहक थिक एक दोसर केर सम्मान करू ई बड्ड निक। हम कहैत छी मैथिलक कोनो जाति नहि सभ गोटे एक्के छथि मिथिलाक धु्रवतारा नहि कियो पैघ नहि कियो छोट आई सभ मिलि लगाउ एकटा नारा। कहबैत छी बुझनुक मनुक्ख मुदा बँटवारा कऽ तकैत छी अपने टा सूख एक बेर सामाजिक एकता लेल तऽ सोचू गोत्र सगोत्रक फरिछौट मे आबो तऽ ओझराएब छोरू। हम छी मिथिला केर मैथिल हमर ने कोनो जाति अछि सभ मिली मिथिला केर मान बढ़ाएब आई सभ सॅं "किशन" एतबाक नेहोरा करैत अछि। एक्कईसम शताब्दी नवका एकटा ई सोच नहि कोनो भेदभाव नहि कोनो जाति-पाति सभ मिली हॅसी खुशी सॅं करब एकटा भोज एक्के छी सभ मैथिल गीत गाउ आई भोरे-भोर। सबहक देहक खून एक्के रंग लाल अछि मुदा तइयो जातिक नाम पर बँटवारा भऽ गेल अछि सपत खाउ आ सभ मिली लगाउ एकटा नारा आब नहि करब धर्म जातिक नाम पर हिंदुस्तानक बँटवारा। १.सतीश चन्द्र झा- सौंसे बिहार एखनो बेहाल। २.रामविलास साहु कविता-कोशीमे समाएल जिनगी १. सतीश चन्द्र झा सौंसे बिहार एखनो बेहाल।
दुख व्यथा बिहारक बाँटि सकय ओ जन्म कहाँ ल’ सकल लाल। सौंसे बिहार एखनो बेहाल। सौंसे बिहार एखनो बेहाल।
बीतल चुनाव सरकार बनल मत पड़ल विकासक आशा मे। जातिक टूटल सभ समीकरण डूबल प्रतिपक्ष निराशा मे।
उतरल नभ मे नव आशा के जागल प्रभात नव किरिण लाल। सौंसे बिहार एखनो बेहाल।
अछि भाग्यहीन सत्ते बिहार नहि बदलि सकल तकदीर एकर। रौदी अकाल बाढ़िक प्रकोप दाहर सुखार तस्वीर एकर।
नहि जानि विधाता छथि लिखने की ल’ बिहार के वक्र भाल। सौंसे बिहार एखनो बेहाल।
नक्सल बादी के बंदुक सँ पसरल अछि सगरो केहन आगि। छै राजनीति के खेल बेल नहि त’ ई जइतै कतौ भागि।
जौं नहि रोकत सरकार आब रक्तिम भ’ उठतै नदी ताल। सौंसे बिहार एखनो बेहाल।
उतरत उद्योग एतय कहिया बिजली कहिया चमकत सगरो। मजदूर जाएत नहि दूर देश रोजगार एतय भेटत सगरो।
भूखल दूखल के जीवन मे कहिया लौटत सगरो सुकाल। सौंसे बिहार एखनो बेहाल।
साहित्य हमर मरि रहल आइ अछि कहाँ सृजनता ओ पहिलुक। सम्मान लेल छथि लीखि रहल अधिकांश लोक व्यर्थे एखनुक।
अप्पन भाषा के मान लेल कहिया जागब बाँटब गुलाल। सौंसे बिहार एखनो बेहाल। २ रामविलास साहु कविता- कोशीमे समाएल जिनगी बाउलक ढेरपर हमर गाम समाएल कोशी पेटमे हम छी बिलाएल कड़ोरो दिलक बनेने अछि फटेहाल मैथिली छी हमर भाषा कऽ पहचान मुदा, कोशी बनल अछि विकाशक बाधा मैथिलीक पोथी अछि कोशीमे समाएल पढ़वाक नहि अछि मौका कोशी देत धोखा जिनगी बनल अछि हमर कंगाल झौआ, पटेर, काश खगरा हमरासँ करैए रगड़ा बाल बच्चाक जिनगी बाउलमे समाएल की खाएब की पीयब सोचेत छी पचताइत जखन खाएब पीयब नीक तखन सोचबो करब नीक अखन तँ नहि अछि गाम घरक ठेकान जान पहचानसँ दूर रहे छी ई कोशी हमर बनल अछि जंजाल हमर भविष्य बाउलपर बनल अछि बेकार तैओ नहि अछि कोशीकेँ दया बाढ़ि-पानि अछि हमरा करैत हानि गाम घरक ने कोनो ठेकान कोशीमे घुमैत हमर जिनगी बनल अछि घुमन्तु हिंसक जीब-जन्तु बीच बनल रहै छी रमनतु हमर नहि कोइ बाटैए दु:ख सरकारो बनल अछि बेमुख हम छी बेसहारा कोनो नहि अछि सहारा हम बाल-बच्चा संग बनल छी बेचारा। कालीकान्त झा बूच अंतिम- कविता कहिया धरि उदासी हम प्रिय परदेश वासी कोना ई मधुमास काटब निरस काटब पकड़ि पासी रमस बहसल वाटिका अछि भ्रमर बहसल रंगसँ सखि हम तँ दहसलि अपन मोनक उठल सुप्त तरंगसँ सखि जे छलि सुअंग स्वामिनि से भेली अनंग दासी नव वसंग उमंग आएल पूरल सबहक कामना सखि शूलसँ घेरल मुकुलवत हमर तँ अराधना सखि चलि रहत चलिते रहल नहि जानि “कहिया धरि उदासी।” गंगेश गुंजन राधा- २६ म खेप समय स्वयं सिरमा मे रखने जलक खाली बासन, अछि पियास सँ बिकल मुदा सबटा इनार आ पोखरि कोना जानि ने बिसरि गेल अछि तकर प्रयोग आ रक्षा प्रकृत जन्म भेल इच्छाक नहि क' रहलए लोक निबाह अछि समुद्र मे माछ जकाँ पर तृप्त ने छैक पियास केहन परिस्थिति केहन बुद्धि केर की बनलछि बिडंबना केकरो बुझबा मे नहि आबय ई नव युग केर रचना कि सब कोना कोन कोन विधियें पसरि रहलए घर-घर सलिलक स्वतः धार बहइत जे छल बहैत सब जीवन ठमकल ठमकल दुःक्ख मे भारी डेग-डेग पर क्षण-क्षण बिनु थकनीयें बैसि जाइत अछि सोच मे पड़ जाइत अछि बिलकुल्ले पसरल जाइत ई नबका मोनक रंग ढंग बिना युद्ध केर प्रतिदिन प्रति घर भ' रहलए जे हताहत घोर अशान्ति भरल बेशी मन चिन्तें अछि उद्विग्न-उन्मन कारण तेहन नुकाएल गोपन बूझि ने पाबि रहल लोक अधबयसे मे युगक ताल देखि भोगि नचारी गबइत लोक समय बनल जाइत अछि दिन-दिन स्वयं मूर्त्ति लाचारीक सभ शरीर सँ प्राण जेना सूखल जाइत अछि पल-पल अधिक लोक जेना बनि चुकलए बौक, कतोक बहीर शेष जीवनक नब ढर्रा सँ आतंकित आ अधीर आब परस्पर गौआँ-गौआँक रहि ने गेल आप्तता सब जेना सब सँ नुकाएल ताकय बचबा केर रस्ता तें अनेर मे आओर अकारण पसरि रहल अछि दूरी ककरो पर ककरो ने जेना बाँचल अछि आब विश्वास बहुत लोक गुम्म, बेशी दुखिया आरो बहुत उदास ई कोन युगक प्रवेश भेल अछि ओहन शान्त जीवन मे कर्मतृप्त मनुखक समाज मे केहन अशुभ से होएब बेशी हाथ कपार धेने चिन्तित बड़ ब्याकुल-ब्याकुल प्रत्यक्षें तँ शान्त जेना किछु भेले नहि हो किछुओ किन्तु लोक जीवनक अंतः उद्वेलित आगि जरैत'छि सब सहिये रहलए लेकिन व्यथा अपन ने कहैत'छि देह मोन आ प्राणक मध्य मे की अछि जीवन केर सू्त्र अछि दर्शन,आस्था बा युग सँ कहल-सुनल अनुबन्ध नहि बूझल होइछ बेशी क्षण एखन उठाएब प्रश्न देह विकलता मे अपना द' अनमन अपने सन मारि ठहक्का हँसय प्राण चकित चुपायल मोन सभ अछि सबमे तैयो अपना अज्ञाने लाचार जुड़य सभक अस्तित्व एकहि मे एक तंत्र संचार बोधक भिन्न स्थिति रहितहुँ अछि एक बिन्दु पर सम पूर्व गान केर हेतु जेना स्वर-शब्द लयक हो नियम बिना प्रयासे स्वतस्फूर्तित ओना होइछ सब क्रिया किन्तु आइ काल्हि ताहू मे होअय लागल व्यतिक्रम देह-मन आ प्राणक मध्य घटि रहल जेना हो समन्वय पहिने छल सब क्रिया बोध आ निष्पादनक सहजता आइ जेना टुटि गेल सूत्र हो आपसक तत्परता एक देह-मन-प्राणक सृष्टिक सुन्दर एहन महल मे आब जेना क' रहल वास हो तीनू एकसर एकसर तीनू ताकि लेने हो जेना अप्पन निष्क्रिय एकान्त तीनू मे बाजा भूकी नहि तीनू निपट अशान्त। ई अनुभव कि खसल एकाएक कोनो मेघ सँ पानि जकाँ ई अनुभव कि जीवन मे आएल नोतल कोनो नोथारी ई अनुभव कि आयल कोनो बनि समधियान केर भार मे ई अनुभव कि आबि रहलए कीनि क' हाट-बजार सँ ई अपनहि देह-मन-प्राण मे एतेक समाद हीनता सोझाँक सहज प्राप्त सुख पर्यन्त बनल जाइत अछि दुर्लभ कारण किछु प्रत्यक्ष कहाँ अछि कहाँ साफ किछु लक्षण मात्र अदृश्य संदेहक छाया सँ असुरक्षित आँगन दूरी बढ़ल जाइत अपना मे, बिन बातहिक परस्पर टूटल संबंधक स्थिति सम आँगन मे घर घर चौंकलि राधा, दुब्बरि गता उठलि चललि डगमग डग ई अनुभव आएल अवश्ये.बड़ बुधियारी बाटे। हँ बुझबा मे अबैत अछि आब ई आ'ल हाटे- हाटे इ आएल हाटे- हाटे। हाट बनल नब बाट जेना जीबाक सब तरहे। सभ बाट पर आब जनमि रहलए बन-झाँखुर। लोक लाचार । असमंजस मे - की करी, की नहि, कोन बाट चली एहि दुःख-दुविधा मे जे एक तँ ओहनहुँ छलैक कहाँ किछु विशेष हाथ आब तँ जेहो छलैक अपन अधीन, अपना योग्य, सभ भेल जा रहल छैक बेहाथ। किछु तं अपनहि घरक नवताक अन्हर-बिहाड़ि मे आ किछु भरि समाजक बदलि रहल दृष्टि आ व्यवहारो मे। यद्यपि कि सभक दुःख-दुविधा छैक रंग-रूप एक्के। मुदा से नहि बूझि पबैये लोक एकरा एना भ' क 'एहि रंग मे जे भ' रहलए सब किछु अंग-भंग। जीवन यापनक पारंपरिक बाट पर चलैत, सहैत जाइत सबटा नबका-नबका आघात जे प्रत्यक्ष मे तं छैक बड़ गंहीर स्नेहक स्पर्श, मुदा प्राण के थकुचि रहल छैक एक एक पल। कत' सँ ई कोन रोगाह वायु बहैत आयल छैक सभक बुद्धि बौआयल सभक हृदय घायल छैक। ताहू मे बेशी तं बनल छैक विडंबना ई, एहि सबक जड़ि छैक आन नहि, अपनहि सब ई यथा-पुत्र,पुत्रबधू, आ संगी-साथी सब। बहि रहल एहि बसात संग बेश गदगद अछि, बिनु बुझने एकर असरि। काल्हुक भविष्य पर अधिसंख्य नब लोक अपन-अपन फूकि रहलए घर। के बुझबय ? बूझक सेतु पुरना लोक सबकें राखल जा रहल अछि कतिया क'। नबके लोक सम्हारि रहल अछि नब युगक रासि। बढ़ा रहल गाड़ी के हाँकि क' एहि तरहें जेना कोनो दुपहियाक गाड़ी नहि, समस्त पृथ्वीये होथि गुड़का रहल, अपना सामर्थ्ये,अपनहि बुद्धि-ब्योंत सँ-आगाँ। समाज, बयसक पुरान ठकमूड़ी लगौने बैसल छथि चुपचाप, सबटा देखैत! तँ कि ई प्राण जे थकुचल जाइत बुझाइत अछि दिन राति से नहि थिक एकमात्र हमर?लोकोक बहुत छैक आन अपन। तँ कि छैक व्याकुल हमरा सँ पृथक किछु लोक, तँ कि ई संसार, समाज बनल छैक ओतहु आन? छोड़ि सर-संबन्धी कि ओतहु कएने छै असकर अपनहि दुःखक ज्वाला मे कि जरैत अछि आनो घर एहन विपत्ति नव प्रकारक आ पहिले पहिल स्वभावक, तँ कि अछि प्रारंभ ई अनुभव केर नबका आवक-जावक? चीन्हि ने पाबी हम यद्यपि एकरा कोनो आँखिक विचार सँ द्विविधे दुविधा अछि प्रति पल प्रश्न सोझ सन्सार सँ अछि एही मे शुरू मनुक्खक कोमल संवेदन सब मौलाएब, टूटि खसब गाछ सँ पात जेना सुखायल क्रमशः पातक संगहि डारि, ध'र आ पूरा गाछ, सुन्न कएल जाइत जीवन रस सँ धराशायी भ’ जाइछ गाछ तँ तथापि मरि-सुखा क' रहि जाइत अछि उपयोगी जाड़नि बनि जरि चूल्हि बनाबय, आबाल बृद्धक भोजन, जड़काला- हाड़कंपौआ ऋतु मे धधकि क' दिअय जीवनक ताप, मुदा मनुख-जीवन, ई देह- समस्त बिलक्षण, प्रकृतिक अनुपम सृष्टि पृथ्वी पर अनुपम जीवित सेहो एहन निरर्थक बनल अकार्यक देहक जीवन हो अंत तखन पर्यन्त लिअय फेरो समाज,परिवार,प्रकृति सँ काँच-सुखायल गाछ जे होइछ काठ, देह कें अंतिम परिणति धरि पहुँचाबय मे,शरीर-मृत मनुक्ख शरीर डाहै मे करबा लैत अछि खर्च जाइतो-जाइतो। -'हम-हम नहि राधा, तों..की सब सोचैत छें ...पुछैत राधा, कहैत राधा,सुनैत राधा..एखनहि केहन छल आत्म मुखर सक्रिय स्पन्दित ! मिझा गेल डिबिया जकाँ रहलए केना धुँआइत, प्रश्नक कोनो टा उत्तर नहि, कोनो टा ने बात-संवाद मात्र दीर्घ निश्वास-दीर्घ निश्वास-'कोना छी अहाँ कृष्ण, कहाँ छी, किएक छी ? एहन समय हमरे जीवन मे किएक एतेक रास जेहो नहि लेने ऋण तकरो भरि रहल छी सूदि, मूर धएल जसक तस अदृश्य कोनो बणिकक हमर पल, दिन, मास बर्ख चुकबैत अपन एक-एक साँस । एहन स्थान किएक बनि गेलय इएह हमर ई मन? भरि संसारक बस्तु, व्यक्ति, व्यक्तिक सब कार्यकलाप, क्रीड़ा आ सब कर्मक बनि गेल अछि सुलभ आँगन। जेकरा जखन सुभीता आबय क' लिअय व्यवहार। हमही आँगन हम मुदा ठकमूड़ी लेने ठाढ़ । कहि ने सकी केकरो निजताक बोझ, एकर संताप, बुझा सकी ने अपन एहि वर्तमानक कुटिल यथार्थ , हमर अर्थ छिड़ियाएल जेना कृषकक बीयाक छितनी-पथिया हो, बागु कर' खेत जाइत काल बाटे मे गेल हो हेराय, जतबा जे बिछि-समेटि सकलौं, हँसोथि-हँसोथि, खिन्न मन कर्माहत देहें यथोपलब्ध बीया कयलौं बागु ! घुरल हो ओहि प्रचण्ड रौद कें दैत ललकार घर आ बनल तथापि जीवन क्रम मे गाम मे स्थिर आशान्वित, फसिलक भावी उपलब्धिक दिस आश्वस्त, मुदा पुनि जतबो बीया छीटल गेल हो, घामे-पसेने खेत जोति तैयार कएल गेल मे तकरो सब कें चुनि क' ल' चल गेल हो चिड़ैक महा हेंज, एम्हर एक दिस निश्चिन्तता मे गबैत मनक भवितव्य, ओम्हर दोसर दिस सुन्न कएल बनि गेल हो खेतक गर्भ ! एम्हर निरन्तर बीया मे अंकुरयबाक , माटि के फोड़ि जन्मबाक-बढ़बाक, बढ़ि क' फसिलक गाछ विकसवाक अहो दिवस मर्मांतक प्रतीक्षा...ओम्हर जन्म सँ पहिनहि कोखि कें रिक्त करैत काल-गति, ई एहन हमरे टा किएक कर्माहत हमरे टा किएक वर्तमान ! आकि बोगि रहलए एहने आ यैह व्यथा आनो आन ?' सोचैत राधा छोड़लनि नमहर श्वाँस..। जानि ने कखन-कोना लागि गेल रहनि राधा कें आँखि। नहि जानि कखन बैसले बैसलि ओंघड़ा गेलीह ओ पटिया पर। ....जारी मिथिला कला संगीत ज्योति सुनीत चौधरी जन्म तिथि -३० दिसम्बर १९७८; जन्म स्थान -बेल्हवार, मधुबनी ; शिक्षा- स्वामी विवेकानन्द मिडिल स्कूल़ टिस्को साकची गर्ल्स हाई स्कूल़, मिसेज के एम पी एम इन्टर कालेज़, इन्दिरा गान्धी ओपन यूनिवर्सिटी, आइ सी डबल्यू ए आइ (कॉस्ट एकाउण्टेन्सी); निवास स्थान- लन्दन, यू.के.; पिता- श्री शुभंकर झा, ज़मशेदपुर; माता- श्रीमती सुधा झा, शिवीपट्टी। ज्योतिकेँwww.poetry.comसँ संपादकक चॉयस अवार्ड (अंग्रेजी पद्यक हेतु) भेटल छन्हि। हुनकर अंग्रेजी पद्य किछु दिन धरि www.poetrysoup.com केर मुख्य पृष्ठ पर सेहो रहल अछि। ज्योति मिथिला चित्रकलामे सेहो पारंगत छथि आ हिनकर मिथिला चित्रकलाक प्रदर्शनी ईलिंग आर्ट ग्रुप केर अंतर्गत ईलिंग ब्रॊडवे, लंडनमे प्रदर्शित कएल गेल अछि। कविता संग्रह ’अर्चिस्’ प्रकाशित। ३.श्वेता झा (सिंगापुर) बालानां कृते बच्चा लोकनि द्वारा स्मरणीय श्लोक १.प्रातः काल ब्रह्ममुहूर्त्त (सूर्योदयक एक घंटा पहिने) सर्वप्रथम अपन दुनू हाथ देखबाक चाही, आ’ ई श्लोक बजबाक चाही। कराग्रे वसते लक्ष्मीः करमध्ये सरस्वती। करमूले स्थितो ब्रह्मा प्रभाते करदर्शनम्॥ करक आगाँ लक्ष्मी बसैत छथि, करक मध्यमे सरस्वती, करक मूलमे ब्रह्मा स्थित छथि। भोरमे ताहि द्वारे करक दर्शन करबाक थीक। २.संध्या काल दीप लेसबाक काल- दीपमूले स्थितो ब्रह्मा दीपमध्ये जनार्दनः। दीपाग्रे शङ्करः प्रोक्त्तः सन्ध्याज्योतिर्नमोऽस्तुते॥ दीपक मूल भागमे ब्रह्मा, दीपक मध्यभागमे जनार्दन (विष्णु) आऽ दीपक अग्र भागमे शङ्कर स्थित छथि। हे संध्याज्योति! अहाँकेँ नमस्कार। ३.सुतबाक काल- रामं स्कन्दं हनूमन्तं वैनतेयं वृकोदरम्। शयने यः स्मरेन्नित्यं दुःस्वप्नस्तस्य नश्यति॥ जे सभ दिन सुतबासँ पहिने राम, कुमारस्वामी, हनूमान्, गरुड़ आऽ भीमक स्मरण करैत छथि, हुनकर दुःस्वप्न नष्ट भऽ जाइत छन्हि। ४. नहेबाक समय- गङ्गे च यमुने चैव गोदावरि सरस्वति। नर्मदे सिन्धु कावेरि जलेऽस्मिन् सन्निधिं कुरू॥ हे गंगा, यमुना, गोदावरी, सरस्वती, नर्मदा, सिन्धु आऽ कावेरी धार। एहि जलमे अपन सान्निध्य दिअ। ५.उत्तरं यत्समुद्रस्य हिमाद्रेश्चैव दक्षिणम्। वर्षं तत् भारतं नाम भारती यत्र सन्ततिः॥ समुद्रक उत्तरमे आऽ हिमालयक दक्षिणमे भारत अछि आऽ ओतुका सन्तति भारती कहबैत छथि। ६.अहल्या द्रौपदी सीता तारा मण्डोदरी तथा। पञ्चकं ना स्मरेन्नित्यं महापातकनाशकम्॥ जे सभ दिन अहल्या, द्रौपदी, सीता, तारा आऽ मण्दोदरी, एहि पाँच साध्वी-स्त्रीक स्मरण करैत छथि, हुनकर सभ पाप नष्ट भऽ जाइत छन्हि। ७.अश्वत्थामा बलिर्व्यासो हनूमांश्च विभीषणः। कृपः परशुरामश्च सप्तैते चिरञ्जीविनः॥ अश्वत्थामा, बलि, व्यास, हनूमान्, विभीषण, कृपाचार्य आऽ परशुराम- ई सात टा चिरञ्जीवी कहबैत छथि। ८.साते भवतु सुप्रीता देवी शिखर वासिनी उग्रेन तपसा लब्धो यया पशुपतिः पतिः। सिद्धिः साध्ये सतामस्तु प्रसादान्तस्य धूर्जटेः जाह्नवीफेनलेखेव यन्यूधि शशिनः कला॥ ९. बालोऽहं जगदानन्द न मे बाला सरस्वती। अपूर्णे पंचमे वर्षे वर्णयामि जगत्त्रयम् ॥ १०. दूर्वाक्षत मंत्र(शुक्ल यजुर्वेद अध्याय २२, मंत्र २२) आ ब्रह्मन्नित्यस्य प्रजापतिर्ॠषिः। लिंभोक्त्ता देवताः। स्वराडुत्कृतिश्छन्दः। षड्जः स्वरः॥ आ ब्रह्म॑न् ब्राह्म॒णो ब्र॑ह्मवर्च॒सी जा॑यता॒मा रा॒ष्ट्रे रा॑ज॒न्यः शुरे॑ऽइषव्यो॒ऽतिव्या॒धी म॑हार॒थो जा॑यतां॒ दोग्ध्रीं धे॒नुर्वोढा॑न॒ड्वाना॒शुः सप्तिः॒ पुर॑न्धि॒र्योवा॑ जि॒ष्णू र॑थे॒ष्ठाः स॒भेयो॒ युवास्य यज॑मानस्य वी॒रो जा॒यतां निका॒मे-नि॑कामे नः प॒र्जन्यों वर्षतु॒ फल॑वत्यो न॒ऽओष॑धयः पच्यन्तां योगेक्ष॒मो नः॑ कल्पताम्॥२२॥ मन्त्रार्थाः सिद्धयः सन्तु पूर्णाः सन्तु मनोरथाः। शत्रूणां बुद्धिनाशोऽस्तु मित्राणामुदयस्तव। ॐ दीर्घायुर्भव। ॐ सौभाग्यवती भव। हे भगवान्। अपन देशमे सुयोग्य आ’ सर्वज्ञ विद्यार्थी उत्पन्न होथि, आ’ शुत्रुकेँ नाश कएनिहार सैनिक उत्पन्न होथि। अपन देशक गाय खूब दूध दय बाली, बरद भार वहन करएमे सक्षम होथि आ’ घोड़ा त्वरित रूपेँ दौगय बला होए। स्त्रीगण नगरक नेतृत्व करबामे सक्षम होथि आ’ युवक सभामे ओजपूर्ण भाषण देबयबला आ’ नेतृत्व देबामे सक्षम होथि। अपन देशमे जखन आवश्यक होय वर्षा होए आ’ औषधिक-बूटी सर्वदा परिपक्व होइत रहए। एवं क्रमे सभ तरहेँ हमरा सभक कल्याण होए। शत्रुक बुद्धिक नाश होए आ’ मित्रक उदय होए॥ मनुष्यकें कोन वस्तुक इच्छा करबाक चाही तकर वर्णन एहि मंत्रमे कएल गेल अछि। एहिमे वाचकलुप्तोपमालड़्कार अछि। अन्वय- ब्रह्म॑न् - विद्या आदि गुणसँ परिपूर्ण ब्रह्म रा॒ष्ट्रे - देशमे ब्र॑ह्मवर्च॒सी-ब्रह्म विद्याक तेजसँ युक्त्त आ जा॑यतां॒- उत्पन्न होए रा॑ज॒न्यः-राजा शुरे॑ऽ–बिना डर बला इषव्यो॒- बाण चलेबामे निपुण ऽतिव्या॒धी-शत्रुकेँ तारण दय बला म॑हार॒थो-पैघ रथ बला वीर दोग्ध्रीं-कामना(दूध पूर्ण करए बाली) धे॒नुर्वोढा॑न॒ड्वाना॒शुः धे॒नु-गौ वा वाणी र्वोढा॑न॒ड्वा- पैघ बरद ना॒शुः-आशुः-त्वरित सप्तिः॒-घोड़ा पुर॑न्धि॒र्योवा॑- पुर॑न्धि॒- व्यवहारकेँ धारण करए बाली र्योवा॑-स्त्री जि॒ष्णू-शत्रुकेँ जीतए बला र॑थे॒ष्ठाः-रथ पर स्थिर स॒भेयो॒-उत्तम सभामे युवास्य-युवा जेहन यज॑मानस्य-राजाक राज्यमे वी॒रो-शत्रुकेँ पराजित करएबला निका॒मे-नि॑कामे-निश्चययुक्त्त कार्यमे नः-हमर सभक प॒र्जन्यों-मेघ वर्षतु॒-वर्षा होए फल॑वत्यो-उत्तम फल बला ओष॑धयः-औषधिः पच्यन्तां- पाकए योगेक्ष॒मो-अलभ्य लभ्य करेबाक हेतु कएल गेल योगक रक्षा नः॑-हमरा सभक हेतु कल्पताम्-समर्थ होए ग्रिफिथक अनुवाद- हे ब्रह्मण, हमर राज्यमे ब्राह्मण नीक धार्मिक विद्या बला, राजन्य-वीर,तीरंदाज, दूध दए बाली गाय, दौगय बला जन्तु, उद्यमी नारी होथि। पार्जन्य आवश्यकता पड़ला पर वर्षा देथि, फल देय बला गाछ पाकए, हम सभ संपत्ति अर्जित/संरक्षित करी। 8.VIDEHA FOR NON RESIDENTS 8.VIDEHA FOR NON RESIDENTS 8.1.1.NEVER SET- - SHEFALIKA VERMA- translated by self 2.Original Poem in Maithili by Kalikant Jha "Buch" Translated into English by Jyoti Jha Chaudhary3.Original Poem in Maithili by Gajendra Thakur Translated into English by Jyoti Jha Chaudhary 8.2.1.Son of Soil- Dr. Shefalika Verma Translated by : Sanjeev Kumar Varma-2.Maithili Short-story “shabdashastram” by Gajendra Thakur re-written in English by the author himself. 1.NEVER SET- - SHEFALIKA VERMA- translated by self 2.Original Poem in Maithili by Kalikant Jha "Buch" Translated into English by Jyoti Jha Chaudhary3.Original Poem in Maithili by Gajendra Thakur Translated into English by Jyoti Jha Chaudhary 1. NEVER SET DR. SHEFALIKA VERMA O, Ziradai Divine ! A Son of your soil Bestowed on you The Status of shrine !! How can one forget "The Rajendra Prasad Who has never stood second." How do we forget The Sacrifice, The Simpicity Which is lost at present ? Ah, the deplorable trend Most prevalent today We all hanker for riches Whole day, every day ! Rare is the principle of Rajendra "Simple living, High Thinking' Nurtured at Ziradai. With a devout heart and a polite bow Recalling the sevices of Rajendra Babu Adorns our hearts with pride and glow ! Friends, wipe your tears, Sweep aside your fears For the day shall come Today or Tommorrow When the sacrifices he tendered Will herald a dawn of blissful glory Followed by the sun of Rajendra's splendour Which shall not set, NEVER SET ! translated by self 2
Kalikant Jha "Buch" 1934-2009, Birth place- village Karian, District- Samastipur (Karian is birth place of famous Indian Nyaiyyayik philosopher Udayanacharya), Father Late Pt. Rajkishor Jha was first headmaster of village middle school. Mother Late Kala Devi was housewife. After completing Intermediate education started job block office of Govt. of Bihar.published in Mithila Mihir, Mati-pani, Bhakha, and Maithili Akademi magazine. Jyoti Jha Chaudhary, Date of Birth: December 30 1978,Place of Birth- Belhvar (Madhubani District), Education: Swami Vivekananda Middle School, Tisco Sakchi Girls High School, Mrs KMPM Inter College, IGNOU, ICWAI (COST ACCOUNTANCY); Residence- LONDON, UK; Father- Sh. Shubhankar Jha, Jamshedpur; Mother- Smt. Sudha Jha- Shivipatti. Jyoti received editor's choice award from www.poetry.comand her poems were featured in front page of www.poetrysoup.com for some period.She learnt Mithila Painting under Ms. Shveta Jha, Basera Institute, Jamshedpur and Fine Arts from Toolika, Sakchi, Jamshedpur (India). Her Mithila Paintings have been displayed by Ealing Art Group at Ealing Broadway, London. The Change Of Era The bird of mind starts flying inside the egg Gonu is speechless, Maunu (dumb) speaks Boys staying at home, girls working outside Oh dear, oh brother, what a ridiculous thing happening The bride is insipid and faded Mother in law is like juicy red mango The son is sitting idle at the village The father is struggling in Khagaria I feel shame, but I have to say, I have to bear unbearable The young just having mustache are quarters of sher (lighter) People having grey hair are full sher (heavier) Oh dear, oh brother, what a ridiculous thing happening One who has only one dhoti to wear That man says The current leaders wear Underpants under the Khadis The swagger exists even on one foot Both riding on one rickshaw Going to watch movie having silver coins Oh dear, oh brother, what a ridiculous thing happening All actors and dramatist are silent The audiences dance a lot Ph. D. Holders are hearing quietly Fools are doing thesis The kids of Dom’s( lower caste) house wearing kanthi Panditji is going to Pasikhana Old woman takes Magh bath and youngs have cold in Jeth Oh dear, oh brother, what a ridiculous thing happening The husband-wife are paua paasi Got only bed bugs in return Or by virtue of God’s grace Got tens-twenties of Khar-Dushan Some troubling mother Some troubling father The things are dumped like it’s done in Sakri station Oh dear, oh brother, what a ridiculous thing happening. 3 Original Poem in Maithili by Gajendra Thakur Translated into English by Jyoti Jha Chaudhary
Jyoti Jha Chaudhary, Date of Birth: December 30 1978,Place of Birth- Belhvar (Madhubani District), Education: Swami Vivekananda Middle School, Tisco Sakchi Girls High School, Mrs KMPM Inter College, IGNOU, ICWAI (COST ACCOUNTANCY); Residence- LONDON, UK; Father- Sh. Shubhankar Jha, Jamshedpur; Mother- Smt. Sudha Jha- Shivipatti. Jyoti received editor's choice award from www.poetry.comand her poems were featured in front page of www.poetrysoup.com for some period.She learnt Mithila Painting under Ms. Shveta Jha, Basera Institute, Jamshedpur and Fine Arts from Toolika, Sakchi, Jamshedpur (India). Her Mithila Paintings have been displayed by Ealing Art Group at Ealing Broadway, London.
Gajendra Thakur (b. 1971) is the editor of Maithili ejournal “Videha” that can be viewed at http://www.videha.co.in/ . His poem, story, novel, research articles, epic – all in Maithili language are lying scattered and is in print in single volume by the title “KurukShetram.” He can be reached at his email: ggajendra@airtelmail.in I Don’t Know Whether I Will Return Or...... I don’t know whether I will return Or I will die here Being vanished Sweeping the house and courtyard In the village I used to come home After giving grasses to the cow And arranging fire to warm the cattle’s house In Punjab afterwards How good the taste of the tea was! I was not fagging After working whole day though Now I hear that drugs were added in that tea And then, when the nest of Emmet fell off In front of the child The village is recalled Let’s return, our village is calling us The smell of soil of Mithila The month of mangoes has come The leaves of the trees must be falling off The lazbizzi must have spread Around the base of the tree I have neither made the root of the tree Not have I made the pier of the pond The grasses and spines must have grown On the foot path of the village The stars are not seen The pollution is so high here That has abandoned the moon From being reflected even in the plate People call me here something with Bihari Someone take me to the village My heart don’t feel happy here When the tin utensils of mother were bought How much we brothers were happy then We were eating in that plate by rotating turns In this city of Delhi The plate is made up of steel But taste of that food in tin plate What I had eaten by enjoying taste I don’t know whether I will return Or I will die here Being vanished The living place of the goat Raking the dry leaves Spines of acacia White and poisonous But not more poisonous than The white people of Delhi Such a venomous tongue. And the hatred eyes are even worse Among the sounds of Bihari! Bihari! I sell comb, papad and messager The nigh of winter Trembling tree The wind is also equally cruel The tree in front is hewed The blood is flowing from it Reddish white But turned into marshy solid gum later on Dried in winter Burnt in summer These trees Teach us living alone and at one place Without being bored Year after year The grandmother, who used to give offering of water to the Sun God She was dropping water on the backyard The child i.e. me I used to jump on the water I don’t know whether I will return Or I will die here Being vanished Recalling Unable to remember Trying to recall Practicing handwriting with the pen made up of bamboo stick Writing by tying thread to the nib of the fountain pain To make the handwriting thicker thereafter Master Sahib used to be confused I had harmed myself easily My handwriting is not yet beautiful I also remember I used to wander during midday In the mango orchards to search banjhi sticks I was named as fool When I had broken another stem/branch I couldn’t even understand If flower-panicles were grown Then I would be eating mangoes next year Banjhi sticks hadn’t have hope They were only useful in heating I also remember Picking the castor oil seeds Getting oil by extracting in mill The taste of tilkoda fried in that oil ! Knocking the chef of Raajdhani down The taste of the stinky Kabai fish The false praise by saying, “What a taste!” The usage of half kilo of oil in a month Was giving sorrow of one kilo No misery..... I also recall the rice paddy farms Jhilli and kachori (name of snacks) Picking the leftover rice paddy stems after harvest Buying laalchadi in exchange of that picked rice-paddies Playing ‘He whose name is Laalchhadi’ and Satgarhiya The Mango jabi Fishing with tackles Peeling raw mangoes with shells The sweet taste of raw mangoes after mixing with edible lime The big dalaan (passageway, open living hall) The Daaun (process of separating rice paddy from the paddy plant with bullocks trampling on them) The submerged crops in flood Being destroyed The kujarnai (women labour) catching while mixing bad crops with the good paddies The taste of unripe plums from the ‘Bhairav Sthan’ (worshipping place) Do you know the story of Bidesar on Sundays? The Bidesar was worshipped with flower and water pot Chuda (processed rice flakes) were taken along from the home Returning home after eating after buying curd and jalebi there The old tree of Indian gooseberries In the groove of Indian black berries and betel nuts He was clever Who could bring the straight sticks Of Sahar tree for brushing teeth Kids playing the game of titti And the game of gulli-danda and kancha Used to be a long-lasting activity The bamboo made kansupati of hukka-loli Dipping fabric in the kerosin oil thereafter We use to set fire on that Displaying fire-works in the morning of Chhath Playing a lot in the Judishital Flood and famine had attacked I left the village, oh dear friend! Unable to remember Trying to recall By sitting, sitting and sitting. The Highway Having Six Lanes Mother! Oh mother, near the rice farms A highway is made Of six lane First three to go and other three to return There only What a nice red coloured car Whose glasses were not open Were closed I saw that today When I was selling birds One child became stub-born Made the glasses opened and Had bought all my birds There was water on child’s face No sooner the window was opened The cold air came out From the AC car The car which was red Mother! Oh mother, near the rice farms A highway is made Of six lane First three to go and other three to return Mother! These are roads of our village, aren’t they? But all people of our village went out To Delhi and Panjab for earning The soil made houses in the village Having roof of straws and tiles But near the rice farms The wide roads which is made Solid The roads, smooth and even better than the houses I saw that there only Mother! I have heard that this is made So solid and sleek By the fund of The World Bank Having six lanes As shiny as glass ! Mother! The concrete house of uncle Which was made in the last year With the different clay And had fallen off within a few days Was also made by the government’s fund! That was not as shiny as glass, was that? People was also living there with fear That was better collapsing down But that must also be made up of fraudulent fund I saw the luxury of that car Made with the fund of the World Bank I saw that on the six lane highway of our village. Mother! This World Bank Fund seems to be a good fund! Aren’t houses made with this fund? If this good fund would avail food and employment Then why people would go to Delhi and Punjab Why would they tolerate abuse by Raj Thakre Why would they go to be killed in Assam I have heard that people abuse Biharis Mother! With this good fund of the World Bank If our homes were made Those would not be like the houses made up of clay Those would be glassy smooth and solid Like the six lane highway by the rice fields And if employment were provided by that fund Then people would stay at home The houses in village would not be deserted like this is now Life would be sparkling in our village too. And then our village would have the status worth seeing And the six lane roads would also have the status worth seeing If our bodies were also carrying the dresses Like that dress Which was worn by the child sitting in that red car! Mother! I have the feeling The road of our village Is closer to us than the red imported car of the red foreigner is Both appear foreigners It was felt today That the air of that car was also not own It was felt that the car and the air coming from the car Both were contaminated by my touch Our village is like a peacock The six lane road is its feathers And we are feet of that peacock Even if the road is in our village, seems foreigner Mother! While taking goats for grazing everyday I stay on watching the splendour of the road of our village Which is having six lanes ! 1.Son of Soil- Dr. Shefalika Verma Translated by : Sanjeev Kumar Varma-2.Maithili Short-story “shabdashastram” by Gajendra Thakur re-written in English by the author himself. 1. Son of Soil- Dr. Shefalika Verma Translated by : Sanjeev Kumar Varma- Sanjeev Kumar Varma is an Advocate in Supreme Court, Delhi & an Environmentalist. His several articles in Hindi & English on Environment and Human Rights have been published in many News Papers & Magazines like, Times of India, Hindi Hindustan, DISHA from Assam, CEE Journal, RGVN Journal etc. His published book ' WONDERS OF ENVIRONMENT' is a unique book. His book on Human Rights is also yet to be published. Son of Soil Dr. Shefalika Verma Translated by : Sanjeev Kumar Varma Environmentalist, Advocate “Lives of great men, all remind us We can make our life sublime And departing leave behind us Foot prints on the sands of time.” These words of a English Poet are true in letter and spirit in the case of Dr. Rajendra Prasad when we pay tributes to him. He was really one of the most brilliant luminaries of the world in the twentieth Century. He led India to freedom. His sacrifices for our Motherland will be remembered by all generations. He was the mastermind behind the framing of Indian Constitution. His simplicity, politeness and winning demeanour endeared him to every body. There is yet no parallel of Rajendra babu in this Century so far as his photographic memory is concerned. It was he about whom the examiner wrote “The Examinee is better than the Examiner”. Even as the President of India he remained at heart an Indian farmer. The story goes that when he was on a tour of countryside as President, a farmer offered him a glass of sugarcane juice. Right when he was going to drink it, his security stopped him from doing so. It might have been harmful to him. Tears rolled down his cheeks evidencing the restraints he had to endure for being the President. Once I was returning to Saharsa by road in a car alongwith my husband Sh. Lalan Kumar Verma, after getting Darshan and blessings of Deoraha Baba on February 8, 1982. When we reached Ziradai, native village of Rajendra Babu Sri Verma expressed his desire to see the residential house of Rajendra babu. We took a turn towards right from Lalit Chowk on the main road. The house was at a very short distance from there. We saw a forlorn pucca house containing one palang and a table in the room, which was once used by Rajendra babu. The furniture was full of dust. Even the house was ill maintained. Other rooms were full of straws and dirt. No boy was there to take care of such a strongly built pucca house except a person who claimed himself to be caretaker. We could not find any memorial in the name of Dr. Rajendra Prasad there. Even the Chowk on the main road from where we took a turn was not named after him. I had been to Delhi in 1985. I went to Tinmurti House, Prime Minister’s residence of Pandit Jawahar Lal Nehru. It had been converted into Nehru Museum. I saw several photographs of Pandit Nehru with all the important personalities, who took part in freedom struggle. But, I failed to find any prominent photograph of Rajendra babu there even after a hectic search. After retirement from Presidentship of India Dr. Rajendra Prasad chose to live in Sadaquat Ashram at Patna and serve people from there. I remember the day when he died in Sadaquat Ashram. All came to attend his funeral procession. I was trying to have a glimpse of Prime Minister Nehru in the funeral procession from the roof of a house on the route. When I failed to trace him out, I made a query from a lady standing by my side. She said that Pandit Nehru could not come, as he was busy otherwise. There is nobody in India, who can discount the contributions of Dr. Rajendra Prasad in the freedom struggle or can ignore his contributions in the post-independence era of India. Recently, I had been to Madras. I saw the beautiful structures on samadhis of late M.G. Ramchandran and late C.N. Annadurai. I was amazed to see the respect given by Tamilnadu Government to these personalities on marina Beach. But when one turns his eyes to Bans Ghat, the funeral place of Rajendra Babu, he simply laments not finding any such structure (Samadhi) there in commemoration. Rajendra babu lived a saintly life and to whomsoever who went to meet him with any problem which he could not solve he quoted: “HARIYE NA HIMMAT, BISARIYE NA HARINAM, TAHI BIDHI RAHIYE JAHI BIDHI RAKHE RAM” (Don’t be discouraged, Don’t forget God’s name, Live in the manner he keeps you) I greet the trustees of Rajendra Memorial Trust, Madras specially Shri Shobhakant Das, who took a leading part in the construction of Rajendra Bhawan at Madras in the memory of Rajendra Babu, which is destined to be a Research Centre. I also thank the people of Madras who have given their cordial co-operation. Will people of Bihar also do so at Patna where he spent his last days? 2 Gajendra Thakur (b. 1971) is the editor of Maithili ejournal “Videha” that can be viewed at http://www.videha.co.in/ . His poem, story, novel, research articles, epic – all in Maithili language are lying scattered and is in print in single volume by the title “KurukShetram.” He can be reached at his email: ggajendra@airtelmail.in The science of Words (ShabdaShastram) The Sun is in the fifth sign of zodiac, normally between sixteenth of August to Sixteenth of September of a year. If you want to dry something then it is the best time to do so as during this period most intense light and heat of Sun falls on earth. During this fifth sign of the zodiac the palm-leaves of Milu’s father remain placed under Sun, annual preservation plan, that instills life in these palm-leaves. Ananda did preservation work of these palm leaves paying full attention. She places these palm leaves under the intense light and heat of Sun, Milu remembers vividly. Ananda’s life spent with Milu. But before the onset of this year’s fifth sign of Leo of the sun-zodiac Ananda had departed… And now when she is not present, then how the preservation of life would be possible, the life of Milu’s and of these palm-leaf inscriptions… Fallacy, the fallacy of words, we ascribe our personal meaning to words. And after that confusion begins. In the courtyard of Lukesari there is a tree of sandalwood Beneath that the cuckoos clamour I will cut the sandalwood tree and will encircle the courtyard Cuckoo, your clamouring will end The cuckoo of the jungle began crying The cuckoos clamour stopped Oh cuckoo, cuckoo of youthfulness, do not cry Clamour cuckoo, clamour Whichever jungle you would go Your marks would remain there Tear; do not come out of eyes I will wrap both your wings with gold, o cuckoo I will wrap both your lips with silver O my cuckoo dear, whichever jungle you would go The maks of ‘garland of blood’ would remain Some voice seemed to come from the village quarter of tanners…the voice of Ananda. But Ananda has departed, only some hours before Bachlu has seen her dead body. After informing Milu he just returned to the village quarter of scavengers... And Ananda has died when she was quite old. Then this voice of young Ananda; it may be a fallacy, fallacy of words. The father of Milu, Srikar Mimamsak, often told many things on the science of words. We ascribe meaning to the words and then the confusion begins. I The Science of Words There was a tumult. The turmoil began. In the river Balan one corpse was floating. Beside the washerman’s quay the corpse has edged. From where it has come nobody knows. It is deadbody of some old age woman. But the washerwoman recognizes it. She tells the name and address of her to the villager, to the villager Bachlu of village quarter of scavengers. The family of the woman has been informed. One old man lives in that house…house of Milu. Milu’s village quarter people have brought the dead body to the village. Milu performed the last rites. In village this incident became topic of discussion. The old Bachlu knows something more. He knows the women of that corpse. The new generation does not know many things. The dead body of Ananda was there in the flames… -Ananda was kind natured, she understood things quickly. Her daughters were married in well to do families. Her son was also learned. Milu, husband of Ananda, was also highly educated…son of Srikar Mimamsak. Never Milu or Ananda has asked anything from anybody, even in times of need. Bachlu has also come of age. In this village only Milu is older than him. The people call these two as “old man”. And this old man Bachlu knows many things. …… Discussion between Milu and Srikar were more common. Something I understood and something I did not. -Milu, in the book Bhamati Vachaspati tells that the base of ignorance living being which becomes its subject. You will accept which method for self-introspection. How untruth can be the cause for something? The existence of something, how can this fact prove something as true and how it can prove its existence in three ages? That which is neither true nor false and which is also not both, only that is unspeakable. Without any subject and the knower of that subject, how the concept of zero can be explained. -Milu, Kumaril says that Atman is a living inertia. During awakened stage it is knowledgeable and during sleep stage it is without knowledge. -Milu, Vachaspati says in Bhamati that a person expert in a science that is without self-introspection behaves with society in the same way as an animal behaves. He fleds on seeing a person coming holding a stick and if he sees someone coming with grass basket then he goes near to him. It means that he fears fear. “A person expert in a science that is without self-introspection behaves with society in the same way as an animal behaves. He fleds on seeing a person coming holding a stick and if he sees someone coming with grass basket then he goes near to him.” This topic, however, I understood fully. ……………… It was season of Mango fruits. Monkeys and Nilagayas trampled cultivated land and the bison trampled vegetables grown in land behind the residences in the village. “All have been destroyed Bachlu. Monkeys do not see during night. I will go to the orchard in morning. Nilagayas have already grazed all crops now these monkeys are after mango fruits.” I did remember that during mango season Monkeys and Nilagayas had arrived that year. It was the season of Mangoes. So Milu will have to begin guard of mango orchad. The mangoes are to be guarded; the flowers are turning into fruits. Milu has to construct a loft. I was also with him. We were returning after cutting the bamboos. We were coming beside the small pond. It was morning time. The red line of the sky seemed yellowish. -Come through the pathway Bachlu. I began to come forward through the pathway in midfield. Then I saw some blood. I became nervous after seeing the blood. But I got elaxed soon. The sharp leaves of bamboo bruised hand and mouth of a girl. The girl had tears in her eyes. Milu swept the blood and put some damp soil onto her bruises. -What are you doing? -The flow of blood would stop, it would not come out now. The girl has run over the midfield pathway. -What is your name? -Ananda. -From which village you are from? -From this village. -From this village? We both exclaimed. Yes, Ananda was her name. And it was the first meeting of Milu with her. ……………… The loft in mango orchard got constructed. But Ananda did not surface after that. Milu often asked about her. -From which quarter of village she is from? She is neither from the quarter of Mishras nor from the quarter of Westerners or Thakurs. -If she had been from the quarter of scavengers then I would have known her. -Then how she is from our village. And if she is from our village then why till date we have not met her? But in between these events coherence appeared. In the quarter of Milu an investiture ceremony of the son of brother Phude got occasioned. On the auspicious day of cutting of bamboo related to the ceremony I had gone outside the village at tanner’s quarter, to call the pipers. -Hiru brother, O Hirua brother. -He is coming. A lady voice came out. The voice seemed familiar to me. -who are you? -I am daughter of Hiru. What you want? -Your father did not reach at the ceremony of bamboo cutting; the voice of his pipe is missing there. I have come here to call him. -He is preparing for that occasion. -What is your name? At that very moment a girl came outside pushing aside creepers hanging from the house enclosure made of bamboo. -I am Ananda. I recognized you. What is your name? I was feeling cold. But I had to answer. -Bachlu. -And your friends name? -Milu, son of Pandit Srikara. I told milu’s father’s name to Ananda, although she did not ask it. Not knowing why…I told this to her. At that moment Hirua came with his pipe. I accompanied him to the quarter of Milu. While coming I asked to Hirua- Ananda is your daughter but I had never seen her. -She lived at her maternal uncle’s place, most of the time. But now she has come of age. So I brought her to village. -When she will now go to her maternal uncle’s place? -No. Now she is of marriageable age. Now she would remain with us. Milu, son of Panditji; he was my friend. What he would feel after listening to this news. From some time he is asking for her. I wished that Ananda should go to her maternal uncle’s village and I would be free Milu’s epeated questioning. But now Ananda would remain in village and Pandit Srikar’s son Milu, what will he do? Oh…I, myself, am thinking out of context. Milu has asked about Ananda in a natural way. That does not mean that…but if means it then? The son of a Brahmin and the daughter of a tanner… Pandit Srikar will approve this relationship? The village people will approve this relationship? Oh…I am again thinking out of context. The pipe started blowing. Men and women moved forward towards the bamboo plantation, through midfield pathway. I and Milu accompanied them. On the way I tried to locate that place. The place of first meeting of Milu and Ananda…some voice seemed to come…voice of pure music…no vocal sound. The boy whose investiture ceremony was occasioned had marked the bamboos that were to be cut. The bamboos started falling. The lifting of sacred loft in the courtyard was to be done on toaday’s auspicious day. After the labour and sweat only my mind got some peace. After lifting bamboo I and Milu had moved on that…that midfield pathway. But Milu had started asking me. Because no work that had been assigned to me got so much delayed result. He was my Lord Rama and I was his fan Hanuman. Sitting on loft in the orchard I said Milu one day- -Milu. Please forget her. Why you are bent upon giving bad name to her. Ananda is Hirua’s daughter. Although she asked only your name I told her both your and your father’s name. -She asked for my name? -No, but… -Then why you told her my father’s name? -One day she would have come to know this… -That day I would have faced…now she would ignore me…now I have to put some extra effort. -What effort? You are Brahmin Srikar’s son and she is the daughter of Hirua tanner. Why you are bent upon giving her a bad name? -I will marry her, why I would give her a bad name? -Who you are deceiving? -I am deceiving nobody dear. Milu took decisions in a sudden manner. He was son of Srikar, the knower of Mimamsa school of Indian philosophy. I witnessed the palm-leaf inscriptions lying everywhere in his house. So I was not believing him. -In village I had never seen her. -You never stay in village for long. From the school of your teacher you returned only last year. -But you had also not sen her. -She lived at her maternal uncle’s village. -Would she go to her maternal uncle’s village again? -No, I asked regarding this. She would now remain in village. Lasy year Milu’s mother died in village. Srikar Mimamsak became almost crazy, in this way the fellow village-quarter discussed about him. How there would be preservation of palm leaves in this year’s Leo zodiac of sun? Srikar was grappling with this anxiety and so he had become almost crazy…in this way it was being discussed by the people of his quarter of village. ….. Hirr…hirr…hirr… From my quarter of village, Domasi, I and Milu were voicing hirr…hirr sound and were following the pigs. We reached the tanner’s quarter of the village. Ananda, however, met us midway. Alongwith the pigs I moved forward. After a while I turned my head around to overhear the talk between Ananda and Milu. Hirr…hirr… This time Ananda voiced hirr sound and I smiled and moved further forward alongwith pigs. This incident got repeated many times and took several rounds. Hiru came to me several times. Hiru was agitated all the time. Hiru’s wife began praying for her daughter. How distant is the temple of Goddess How distant is the temple of Lukesari Many miles I went for appeal Goddess, look unto me. Many miles I went for appeal Goddess, look unto me. Four miles is the temple of Goddess Eight miles is the temple of Lukesari Ten miles I went for appeal Goddess, look unto me Ten miles I went for appeal Goddess, look unto me Which flower for the temple of Goddess? Which flower for the temple of Goddess Bandi? Which flower for my chosen appeal? Goddess, look unto me Which flower for my chosen appeal? Goddess, look unto me This flower for the temple of Goddess That jasmine flower for the temple of Lukesari Marigold flower I chose for appeal Goddess, look unto me Marigold flower I chose for appeal Goddess, look unto me ….. Hiru used to come to Domasi, the village quarter of the scavenger class). -What will happen? How it will happen? -False… I promised him that I would accompany him to Srikar Pandit. And I accompanied him one day to Srikar Mimamsak. Srikar’s wife died soon after the Leo zodiac of sun. And after that Hiru Mimamsak became crazy…people say. Who people? Those people who were from his quarter of the village. The people of village, the learned people of the area gave respect to him. I am telling that I had seen with my eyes… “Come Bachlu. Hiru, come and sit down…”- Srikar relapsed into silence. After the death of his wife he became like this. He seemed normal but suddenly used to relapse into silence. “Uncle, the courtyard of your house sounds the voice of emptiness. How long it would remain so? Why not you get married your son Milu?” “Milu has already taken decision about his marriage.” “When and where?” I became agitated and asked. Hiru seemed to look towards me with relieved eyes. “He has decided to marry Ananda. Her father has come with you.” Oh...And Srikar Pandit was of that type. And Milu was of that type. He has already hypnotized his father. But a person from Srikar’s quarter of vthe village overheard this talk. We all were seated and then that person came to the lobby of Srikar’s house, accompanied with some other persons. An argument ensued among Srikar Pandit and these people. The opposite argument, word for word, ensued. “Srikar, which demeanour you are doing?” “Which type of demeanour?” “You did not have sense of distinguishing great and mean Mimamsak?” “Dear learned folks! What is this great and mean differentiation? After hearing these words the meaning of those has entered your head in one or the other way. You have created a sentence out of these words and have mixed your selfishness in it...” “That means that great and mean are only meanings of words? And the analysis that we have done after making it a sentence is selfishness.” “If you do not believe then surrender the selfish content from the sentence. All fallacy would be falsified.” “Meaning you are hell bent upon carrying out marriage of Milu with Ananda.” “Dear Learned folks! You confuse snake for rope because both of these have separate existence. If you squeeze your eyes then you would see two moons; then you place moons in two real places of sky. The reason for fallacy is not the subject but the attachment, although both purpose and and result are true. And here also the knowledge of all subjects cannot give knowledge of the self. One’s nature is described by knowledge of self through the concept of self. Self is subject and object both of knowledge. The knowledge of self is both subject and object. The meaning of substance is obtained through attachment. The meaning of a word is near its inference after we hear a word. -You are creating fallacy of words. We all see in this your desire of marriage between Milu and Ananda. -Desire is a resolve and if desire does not get fulfilled then it is envy. -The all these we are saying is out of envy? You do not give value to caste? -See, Ananda is full with all qualities and mine caste and her caste is the same; and that is pro-active and known to all. She will be able to preserve my legacy that I believe. And that is my decision. “And that is my decision”- these words did not enter in my and Hiru’s ears simultaneously. I had known Srikar and Milu, the type of sudden decisions I was accustomed to. But Hiru had heard echo of these words after some time. His amazed eyes turned and looked towards me. Then Srikar Mimamsak pointed a finger towards one person, an astrologer. -Jyotishji, you select one auspicious day. In this season this holy marriage should be occasioned. The leo zodiac of the sun is arriving, before that. Anyone of you has any objection?” All stood on their feet with bowed head. Who would stand opposite to Srikar Mimamsak? “All of us came here to discuss. But if you had already taken a decision then there remains nothing to oppose.” Mimamsak’s hand got raised and all became silent. I and Hiru moved from there. Hiru took a deep breath that I felt. ….. It was not that any other obstruction did not come. But that crazy Srikar Mimamsak was scholar of repute. And Ananda became his daughter-in-law. And her touched water was acceptable not only to Milu’s quarter of village but among all the scholars in the vicinity. ….. In the house of Ananda’s father the marriage ceremony was organized. I had heard the songs, full of life, I still remember- The black bee that slept over the hill Gardener-daughter sleeping in garden Get up gardener-daughter keep the garland The black bee that slept over the hill Gardener-daughter slept in the garden Get up gardener-daughter keep the garland. With what flower I would cover Goddess Lukesari With what I would make her clothes With what flower I will knot to make it an ornament Get up gardener-daughter, place the garland With Arabian jasmine flower I will cover Bandi With Spanish jasmine I will clothe her China rose would be the ornament of Lukesari Get up gardener-daughter, thread the garland Get up gardener-daughter, thread the garland ….. Srikar Mimamsak became composed after assigning the task of preservation of palm leaf inscriptions, to Ananda. After the death of his wife the poor man was in apprehension. Divine interference, Ananda seemed to have come to preserve these palm leaves. In a sudden turn of events… Milu told me how he convinced Srikar Pandit about this marriage. The daughter of a Brahmin would be busy in cleaning utensils and Pooja materials; would be busy in making earthen Lord Shiva; and the palm leaves would get damaged. He would not allow these palm leaves to be destroyed; Ananda would come to his home. Srikar Mimamsak had decided. For life Milu had been grateful to his own decision. Srikar’s age seemed to have increased. The talk between Srikar and Ananda always continued in house. Ananda talked and singed- When twelve yeas passed and thirteenth arrived When twelve years passed the thirteenth arrived Folks, my mother-in-law call me tigress She would banish tigress from her house. Folks, my mother-in-law call me tigress She would banish tigress from her house. Outside the courtyard of yours is standing the moneylender Folks, give me Madar and Thorn-apple, I will grind and will drink it Folks, give me Madar and Thorn-apple, I will grind and will drink it The beloved has come from outside and sat on bedstead The beloved has come from outside and sat on bedstead Folks, tell the thoughts of your heart; after that I will drink poison Folks, tell the thoughts of your heart; after that I will drink poison When twelve years passed and thirteenth arrived Folks, mother-in-law calls me tigress I will banish tigress from home. My mother-in-law beats me, my sister-in-law beats me My mother-in-law beats me, my sister-in-law beats me Folks, these will go and all the wealth would be mine Folks, these will go and all the wealth would be mine Keep silence; keep silence proud women you are great, proud women Keep silence; keep silence proud women you are great, proud women Poud women, I will perform holy-basil-plant oblation and will squander all my wealth Folks; I will perform pond oblation and will squander all my wealth. Srikar Mimamsak would jokingly ask- Ananda, you do not had mother-in-law, the how she would be calling you tigress? -Therefore I am singing, everything I have, but… While speaking this Ananda’s eyes were full of tears. I still remember this. -I caused you pain by telling this. -What pain; I do not have mother-in-law but I do have father-in-law. Looking at happy Srikar, Milu always felt satisfaction. ….. Even after death of Srikar Mimamsak Ananda continued instill life in these palm-leaves. In due course Milu had two daughters, Vallabha and Medha. I had seen the joy on the face of Ananda. She had gone to her mothe’s place. There she gave birt to twins- You Red Fairy. O. Pink fairy. You Red Fairy. O. Pink fairy. O. Over the sky would dance the Indra Fairy. O . On the rose would dance the Indra Fairy. And in due course he had son. When son Megha grew he sent him to Benaas for study. And days passed by, daughters grew and both Medha and Vallabha were Married and Milu had inner satisfaction. His son’s upbringing and marriage was also going on side by side. Megha began teaching in Benaas. Megha, Medha and Vallabha all three came to village at least once a year. People forgot many things about them. II The stage of Bhamati Ananda is preserving the palm-leaves of Milu’s father; that intense heat, Milu still remember. Ananda’s life passed with Milu and when she is not present then how Milu’s life would be preserved… Milu gets lost in thought in between the elucidation. The elucidation is going on. Milu would not hear the holy Garu Purana. Milu would like Mandan’s Brahmsidhi, Vachaspati’s Bhamati, if he would decide to hear something. If the daughters are insisting then he would hear Kumaril’s philosophy on the subject os Self. And that elucidation is going on. The fallacy; the fallacy caused by words. Srikar often spoke many things about the science of words and on the philosophical stage of Bhamati. We ascribe meaning to words and then begin the confusion. -Teacher; after death of my wife I am in distress. What is this life? Where would be Ananda? -Milu; be composed. This lesson of Brahmasidhi will remove all your illusion. In Brahmsidhi there are four divisions- Brahma, Logic, Command and Accomplishment. In Brahma division the discussion is on forms of Brahma, in Logic division it is on proof, in Command division it is on the liberation of living being and in Accomplishment part there is discussion on the proof of Upanishadic thoughts. -Milu, there is no subject apart from liberated knowledge. Liberation is knowledge itself. Mandan gives value to the mean knowledge of Man’s intellect. He values work. But these alone are not enough for liberation. The sound-word was given a meaning through explosion that Mandan saw. So he is different from Shankar in a way that he identifies this explosion and gives identity to it; but Shankar does not believe in any identity less than that of Brahma. So Mandan is purer non-dualist as compared to Shankar. -Milu, Mandan does not believe in able and not able as mutually opposed. This sometime means action based difference; but that difference will not become an original element. So that Bahma would remain in all differences and still would do every work. -Look, the thought at the Bhamati stage of Vachaspati and the philosophy of Mandan, they ae in coherence. On Brahmsidhi of Mandan Mishra Vachaspati has written an elucidation called Epistemology Critique. Although that work is now not available. -Then how the matter of epistemology critique came forward? -In Bhamati of Vachaspati there is discussion about it. -But before knowing thoughts of Mandan I feel that when he lost discussion with Shankaachaya then how one would benefit from his defeated theories and would get peace. -See, Mandan was defeated; the evidence of this is not available in the writings of Mandan. Mandan was supporter of the theory of explosion, but Shankaracharya denied it. Mandan was supporter of opposite fame of Kumaril Bhatt; but Shankaracharya’s pupil Sureshvaracharya, whom people often identify with Mandan Mishra, opposes opposite fame theory. -That is right. If Mandan had lost he would have followed Shankaracharya. -Now tell me, the Sureshvaracharya, who was appointed as head of Sringeri Math by Shankaracharya, says that ignorance is not of two types; but Mandan mentions two types of ignorance in Brahmsidhi as non-acceptance and wrong-acceptance. Mandan tells living one’s as abode of ignorance but Sureshvaracharya disagree with it here. Mandan opposes Shankarachaya but Sureshvaracharya follows him. ….. Mankey and Nilagaya are trampling the cultivated lands and the male-buffalow is trampling the cultivated village lands behind the dwelling houses. Now for my sake the village people would not stop buffalo rearing. Monkey and Nilagaya are damaging the village agriculture. “Four monkeys are in the orchard and are damaging the mangoes. I had gone there. After evening all monkeys had gone on top of the trees. Till evening we, father and son duo, have guarded cthe orchard and monkeys fled when we threw wooden missiles; but then they went towards your orchard.” - I am saying to Milu. “All has been damaged Milu. In night they are not able to see. In the morning I will go to orchard. The Nilagaya grazed all the crop now, and now these monkeys are after mangoes. Let them damage when…” “The Nilagaya were completely non-existent in our area for some time. How they have resurfaced again? In the nearby illiterate-village there had been some religious oblation. From there these animals crossed the river in night, to this side.” “That is not true. These Nilagayas have come from Nepal side in flood water. Let them come when…” “I told you about the monkeys.” “That would be done.” “All right brother, then I am going.” I remember the year, when Ananda and Milu had met for the first time, when during the month of Mangoes monkeys and Nilagayas suddenly disappeared. And now when Ananda has departed these monkeys and nilagayas have resurfaced again from nowhere. Not even fifteen days have passed since Ananda died… ….. Bachlu left the place and on Milu’s forehead thick line of anxiety began moving, one towards the another like waves do, interfering mutually, the old waves turning into new waves and moving forward. He calls his daughters, his voice aiming towads the courtyard. “Daughters! Jayakar and Vishwanath had gone to orchard today. Both had returned or not? I head that monkeys are doing mischief there. From tommorow Jayakar and Vishwanath would not go to the orchard, tell them. Today monkeys came to the orchard; you did not tell me this. What I would do after hearing this when…” “I did tell you father but these days you remain in your own thoughts. When I got tired after repeated call I stopped.” Yes, Milu is now a days in his own world. These mangoes have begun ripening soon after the death of Ananda. And after so many years these monkeys and nilagayas have again resurfaced to remind us of something! ….. Vallabha, the mother of Jayakar and Medha, the mother of Vishwanath; both sisters have come to their mother’s place after so many days. They have met after so many days. The daughter’s and son-in-laws of Ananda have come; Visho, the husband of Vallabha and Kanh, the husband of Medha. Megh has also come with his wife and children. Milu is calling his wife…Ananda…Ananda. Then he remembers where she could be found now. The he began calling…where is Vallabha...Where are you Medha? Where are you Jayakar and Vishwanath? Vallabha and Medha both come and Milu begins singing. The song often sung by Ananda; the songs that Ananda sung for Vallabha and Medha. Red fairy. O . The Pink fairy Red fairy. O . The Pink fairy O. Over sky would dance the Indra fairy The Goddess of the garland of red-blood is standing on door, the devotee has become poor O after she became poor she is standing near the door of the blood-garland goddess Mother we would have to give money to the poor Mother we would have given money to the poor Mother we had given money to the poor Red fairy o pink fairy Mother, O after she became blind she is standing near the door of the blood-garland goddess Mother O, give eye to the blind immediately Mother O, give eye to the blind immediately The father and both daughters began crying. ….. -Milu the death of Ananda has arrived like a disaster for you. You are from Brahmin caste and Ananda is from tanner caste. But the love between you is incomparable. Do not be unhappy over her death. Brahma is without sorrow. The fanciful type of Brahma is pure joy. Thereafter your unhappiness over Ananda is inappropriate. Brahma is he who oversees. The visible ones are changeable that does not has any relation with the overseer. This world is not simply a fallacy but it does have an existence. But this practical existence is not true. -Milu, there is difference between conscious and unconscious; but that is not absolutely true. The living beings are of many types and ignorance is also of many kinds. Ignorance is one vice but the reference of it cannot be Brahma, it cannot be a complete soul. Its reference can only be an incomplete soul. Ignorance then is not true but it is not a major untruth either. -Milu; please remove this ignorance and that is called liberation, that liberation which Ananda has achieved. And on the face of Milu complete peace could be seen. ….. As if Milu is going to meet someone. He remembers the discussion he had with Ananda. -Ananda, when I am talking to you again and again I am grappled with a fear. The weakest weakness of my father is in respect of his possessiveness for palm leaf inscriptions. So please remember all this. When my father asks you how these pal leaves would be preserved then your reply should be- by protecting the books from water, oil and loose binding, by drying these under shadow. These books are of five hundred to six hundred leaves. I will bring some of those books for you to see. One leaf is one hand-length long and around four finger-lengths broad. These remains covered with wooden frame on top and bottom. On the left side there remains a hole through which a rope passes thereby binding the leaves. -Your father would agree? -He will have to agree. He does not have means to bring a Bahmin bride. I once gave a farmer two rupees in advance for buying some land. But my father brought the advance back. He is saving rupees. He will have to spend seven hundred rupees so that his son is married in a good Brahmin family and his superior geneology is preserved. And that Brahmin bride would come and preserve his palm leaf inscriptions? After the death of Milu’s mother Srikar became almost crazy; the people of his quarter of village often say like this. Then in the village the plague did damage. Two quarters of his village, those of Mishras and those of the westernes, almost got extincted. How many people in surrounding areas died, nobody could count. Milu got an opportunity so that his father could meet Ananda. Srikar saw in Ananda much more, besides the quality of palm leaf preservation techniques. Milu became victorious. Milu of Nyaya school of Philosophy won over Srikar of Mimamsa School of philosophy. And marriage of Ananda and Milu got solemnized. He remembers his love talks with Ananda. Milu, it seems, is going to meet her. Ananda has died. She slipped into Balan River. The marks of foot slipping into the iver are quite visible. Milu sees that mark and his heart fills with joy, he slips into the wave of emotion… Ananda and Milu’s meetings began to increase in cultivated lands, orchards, grazing grounds, beside the river- at all these places. And both of them slipped together in cultivated lands, orchards, grazing places and also beside the river. Milu did not jump into the iver. This slope has become slippery, thanks to the boys of today. The place has its beginning with Milu. He often sat over it and in speed he moved into the river, cutting the waves in forward direction. -Hey, please perform without this slip. -That is not a big deal. -perform first, then only I would believe. Ananda tried carefully but hey… He could not stop her, neither in cultivated land or in orchards or at grazing places and also not beside the river. And for what she came here…that she slipped…and got drowned. She might have come to remember something. Yes. Ananda has arrived Bachlu, look, hear this song. Behind the house is the tree of china-rose flower It is laden with fruits and flowers A parrot came from the northern state The parrot sat on the china-rose tree The parrot eats neither fruit nor flower It is destroying branches and leaves The parrot eats neither flower nor seed It has destroyed branches and leaves Beside the house there lives a jackal O Jackal, please capture this parrot sitting over the tree Once tried Twice tried Third time the parrot flies Neither this parrot is a mystic Nor is the partridge It is like a conveyance for hen-sparrow. -Brother, are you not able to hear this song? -Brother, I am hearing and seeing. Ananda sister-in-law is singing. I also heard this song the day she died; it was she, singing- In the courtyard of Goddess Lukesari there is a tree of sandalwood Beneath that the cuckoos clamour. -It was not fallacy of words. Next day after the ritual of fish and meat and after the Pooja of Lord Satyanarayan; Ananda neither cut the sandalwood tree nor encircled her courtyard. On next day beneath that tree of sandalwood the village people saw two dead bodies in tanner’s quarter of the village. The voice of Ananda echoed in sky, all the village folks heard this. Whichever jungle you would go dear lovable cuckoo A mark of garland of blood would be left It was not fallacy of words. Input: (कोष्ठकमे देवनागरी, मिथिलाक्षर किंवा फोनेटिक-रोमनमे टाइप करू। Input in Devanagari, Mithilakshara or Phonetic-Roman.) Output: (परिणाम देवनागरी, मिथिलाक्षर आ फोनेटिक-रोमन/ रोमनमे। Result in Devanagari, Mithilakshara and Phonetic-Roman/ Roman.) English to Maithili Maithili to English इंग्लिश-मैथिली-कोष / मैथिली-इंग्लिश-कोष प्रोजेक्टकेँ आगू बढ़ाऊ, अपन सुझाव आ योगदान ई-मेल द्वारा ggajendra@videha.com पर पठाऊ। Top of Form विदेहक मैथिली-अंग्रेजी आ अंग्रेजी मैथिली कोष (इंटरनेटपर पहिल बेर सर्च-डिक्शनरी) एम.एस. एस.क्यू.एल. सर्वर आधारित -Based on ms-sql server Maithili-English and English-Maithili Dictionary. १.भारत आ नेपालक मैथिली भाषा-वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक शैली आ २.मैथिलीमे भाषा सम्पादन पाठ्यक्रम १.नेपाल आ भारतक मैथिली भाषा-वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक शैली
अ.नेपालक मैथिली भाषा वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक उच्चारण आ लेखन शैली (भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक धारणाकेँ पूर्ण रूपसँ सङ्ग लऽ निर्धारित) मैथिलीमे उच्चारण तथा लेखन १.पञ्चमाक्षर आ अनुस्वार: पञ्चमाक्षरान्तर्गत ङ, ञ, ण, न एवं म अबैत अछि। संस्कृत भाषाक अनुसार शब्दक अन्तमे जाहि वर्गक अक्षर रहैत अछि ओही वर्गक पञ्चमाक्षर अबैत अछि। जेना- अङ्क (क वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ङ् आएल अछि।) पञ्च (च वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ञ् आएल अछि।) खण्ड (ट वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ण् आएल अछि।) सन्धि (त वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे न् आएल अछि।) खम्भ (प वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे म् आएल अछि।) उपर्युक्त बात मैथिलीमे कम देखल जाइत अछि। पञ्चमाक्षरक बदलामे अधिकांश जगहपर अनुस्वारक प्रयोग देखल जाइछ। जेना- अंक, पंच, खंड, संधि, खंभ आदि। व्याकरणविद पण्डित गोविन्द झाक कहब छनि जे कवर्ग, चवर्ग आ टवर्गसँ पूर्व अनुस्वार लिखल जाए तथा तवर्ग आ पवर्गसँ पूर्व पञ्चमाक्षरे लिखल जाए। जेना- अंक, चंचल, अंडा, अन्त तथा कम्पन। मुदा हिन्दीक निकट रहल आधुनिक लेखक एहि बातकेँ नहि मानैत छथि। ओ लोकनि अन्त आ कम्पनक जगहपर सेहो अंत आ कंपन लिखैत देखल जाइत छथि। नवीन पद्धति किछु सुविधाजनक अवश्य छैक। किएक तँ एहिमे समय आ स्थानक बचत होइत छैक। मुदा कतोक बेर हस्तलेखन वा मुद्रणमे अनुस्वारक छोट सन बिन्दु स्पष्ट नहि भेलासँ अर्थक अनर्थ होइत सेहो देखल जाइत अछि। अनुस्वारक प्रयोगमे उच्चारण-दोषक सम्भावना सेहो ततबए देखल जाइत अछि। एतदर्थ कसँ लऽ कऽ पवर्ग धरि पञ्चमाक्षरेक प्रयोग करब उचित अछि। यसँ लऽ कऽ ज्ञ धरिक अक्षरक सङ्ग अनुस्वारक प्रयोग करबामे कतहु कोनो विवाद नहि देखल जाइछ। २.ढ आ ढ़ : ढ़क उच्चारण “र् ह”जकाँ होइत अछि। अतः जतऽ “र् ह”क उच्चारण हो ओतऽ मात्र ढ़ लिखल जाए। आन ठाम खाली ढ लिखल जएबाक चाही। जेना- ढ = ढाकी, ढेकी, ढीठ, ढेउआ, ढङ्ग, ढेरी, ढाकनि, ढाठ आदि। ढ़ = पढ़ाइ, बढ़ब, गढ़ब, मढ़ब, बुढ़बा, साँढ़, गाढ़, रीढ़, चाँढ़, सीढ़ी, पीढ़ी आदि। उपर्युक्त शब्द सभकेँ देखलासँ ई स्पष्ट होइत अछि जे साधारणतया शब्दक शुरूमे ढ आ मध्य तथा अन्तमे ढ़ अबैत अछि। इएह नियम ड आ ड़क सन्दर्भ सेहो लागू होइत अछि। ३.व आ ब : मैथिलीमे “व”क उच्चारण ब कएल जाइत अछि, मुदा ओकरा ब रूपमे नहि लिखल जएबाक चाही। जेना- उच्चारण : बैद्यनाथ, बिद्या, नब, देबता, बिष्णु, बंश, बन्दना आदि। एहि सभक स्थानपर क्रमशः वैद्यनाथ, विद्या, नव, देवता, विष्णु, वंश, वन्दना लिखबाक चाही। सामान्यतया व उच्चारणक लेल ओ प्रयोग कएल जाइत अछि। जेना- ओकील, ओजह आदि। ४.य आ ज : कतहु-कतहु “य”क उच्चारण “ज”जकाँ करैत देखल जाइत अछि, मुदा ओकरा ज नहि लिखबाक चाही। उच्चारणमे यज्ञ, जदि, जमुना, जुग, जाबत, जोगी, जदु, जम आदि कहल जाएबला शब्द सभकेँ क्रमशः यज्ञ, यदि, यमुना, युग, यावत, योगी, यदु, यम लिखबाक चाही। ५.ए आ य : मैथिलीक वर्तनीमे ए आ य दुनू लिखल जाइत अछि। प्राचीन वर्तनी- कएल, जाए, होएत, माए, भाए, गाए आदि। नवीन वर्तनी- कयल, जाय, होयत, माय, भाय, गाय आदि। सामान्यतया शब्दक शुरूमे ए मात्र अबैत अछि। जेना एहि, एना, एकर, एहन आदि। एहि शब्द सभक स्थानपर यहि, यना, यकर, यहन आदिक प्रयोग नहि करबाक चाही। यद्यपि मैथिलीभाषी थारू सहित किछु जातिमे शब्दक आरम्भोमे “ए”केँ य कहि उच्चारण कएल जाइत अछि। ए आ “य”क प्रयोगक सन्दर्भमे प्राचीने पद्धतिक अनुसरण करब उपयुक्त मानि एहि पुस्तकमे ओकरे प्रयोग कएल गेल अछि। किएक तँ दुनूक लेखनमे कोनो सहजता आ दुरूहताक बात नहि अछि। आ मैथिलीक सर्वसाधारणक उच्चारण-शैली यक अपेक्षा एसँ बेसी निकट छैक। खास कऽ कएल, हएब आदि कतिपय शब्दकेँ कैल, हैब आदि रूपमे कतहु-कतहु लिखल जाएब सेहो “ए”क प्रयोगकेँ बेसी समीचीन प्रमाणित करैत अछि। ६.हि, हु तथा एकार, ओकार : मैथिलीक प्राचीन लेखन-परम्परामे कोनो बातपर बल दैत काल शब्दक पाछाँ हि, हु लगाओल जाइत छैक। जेना- हुनकहि, अपनहु, ओकरहु, तत्कालहि, चोट्टहि, आनहु आदि। मुदा आधुनिक लेखनमे हिक स्थानपर एकार एवं हुक स्थानपर ओकारक प्रयोग करैत देखल जाइत अछि। जेना- हुनके, अपनो, तत्काले, चोट्टे, आनो आदि। ७.ष तथा ख : मैथिली भाषामे अधिकांशतः षक उच्चारण ख होइत अछि। जेना- षड्यन्त्र (खड़यन्त्र), षोडशी (खोड़शी), षट्कोण (खटकोण), वृषेश (वृखेश), सन्तोष (सन्तोख) आदि। ८.ध्वनि-लोप : निम्नलिखित अवस्थामे शब्दसँ ध्वनि-लोप भऽ जाइत अछि: (क) क्रियान्वयी प्रत्यय अयमे य वा ए लुप्त भऽ जाइत अछि। ओहिमे सँ पहिने अक उच्चारण दीर्घ भऽ जाइत अछि। ओकर आगाँ लोप-सूचक चिह्न वा विकारी (’ / ऽ) लगाओल जाइछ। जेना- पूर्ण रूप : पढ़ए (पढ़य) गेलाह, कए (कय) लेल, उठए (उठय) पड़तौक। अपूर्ण रूप : पढ़’ गेलाह, क’ लेल, उठ’ पड़तौक। पढ़ऽ गेलाह, कऽ लेल, उठऽ पड़तौक। (ख) पूर्वकालिक कृत आय (आए) प्रत्ययमे य (ए) लुप्त भऽ जाइछ, मुदा लोप-सूचक विकारी नहि लगाओल जाइछ। जेना- पूर्ण रूप : खाए (य) गेल, पठाय (ए) देब, नहाए (य) अएलाह। अपूर्ण रूप : खा गेल, पठा देब, नहा अएलाह। (ग) स्त्री प्रत्यय इक उच्चारण क्रियापद, संज्ञा, ओ विशेषण तीनूमे लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना- पूर्ण रूप : दोसरि मालिनि चलि गेलि। अपूर्ण रूप : दोसर मालिन चलि गेल। (घ) वर्तमान कृदन्तक अन्तिम त लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना- पूर्ण रूप : पढ़ैत अछि, बजैत अछि, गबैत अछि। अपूर्ण रूप : पढ़ै अछि, बजै अछि, गबै अछि। (ङ) क्रियापदक अवसान इक, उक, ऐक तथा हीकमे लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना- पूर्ण रूप: छियौक, छियैक, छहीक, छौक, छैक, अबितैक, होइक। अपूर्ण रूप : छियौ, छियै, छही, छौ, छै, अबितै, होइ। (च) क्रियापदीय प्रत्यय न्ह, हु तथा हकारक लोप भऽ जाइछ। जेना- पूर्ण रूप : छन्हि, कहलन्हि, कहलहुँ, गेलह, नहि। अपूर्ण रूप : छनि, कहलनि, कहलौँ, गेलऽ, नइ, नञि, नै। ९.ध्वनि स्थानान्तरण : कोनो-कोनो स्वर-ध्वनि अपना जगहसँ हटि कऽ दोसर ठाम चलि जाइत अछि। खास कऽ ह्रस्व इ आ उक सम्बन्धमे ई बात लागू होइत अछि। मैथिलीकरण भऽ गेल शब्दक मध्य वा अन्तमे जँ ह्रस्व इ वा उ आबए तँ ओकर ध्वनि स्थानान्तरित भऽ एक अक्षर आगाँ आबि जाइत अछि। जेना- शनि (शइन), पानि (पाइन), दालि ( दाइल), माटि (माइट), काछु (काउछ), मासु (माउस) आदि। मुदा तत्सम शब्द सभमे ई निअम लागू नहि होइत अछि। जेना- रश्मिकेँ रइश्म आ सुधांशुकेँ सुधाउंस नहि कहल जा सकैत अछि। १०.हलन्त(्)क प्रयोग : मैथिली भाषामे सामान्यतया हलन्त (्)क आवश्यकता नहि होइत अछि। कारण जे शब्दक अन्तमे अ उच्चारण नहि होइत अछि। मुदा संस्कृत भाषासँ जहिनाक तहिना मैथिलीमे आएल (तत्सम) शब्द सभमे हलन्त प्रयोग कएल जाइत अछि। एहि पोथीमे सामान्यतया सम्पूर्ण शब्दकेँ मैथिली भाषा सम्बन्धी निअम अनुसार हलन्तविहीन राखल गेल अछि। मुदा व्याकरण सम्बन्धी प्रयोजनक लेल अत्यावश्यक स्थानपर कतहु-कतहु हलन्त देल गेल अछि। प्रस्तुत पोथीमे मथिली लेखनक प्राचीन आ नवीन दुनू शैलीक सरल आ समीचीन पक्ष सभकेँ समेटि कऽ वर्ण-विन्यास कएल गेल अछि। स्थान आ समयमे बचतक सङ्गहि हस्त-लेखन तथा तकनीकी दृष्टिसँ सेहो सरल होबऽबला हिसाबसँ वर्ण-विन्यास मिलाओल गेल अछि। वर्तमान समयमे मैथिली मातृभाषी पर्यन्तकेँ आन भाषाक माध्यमसँ मैथिलीक ज्ञान लेबऽ पड़ि रहल परिप्रेक्ष्यमे लेखनमे सहजता तथा एकरूपतापर ध्यान देल गेल अछि। तखन मैथिली भाषाक मूल विशेषता सभ कुण्ठित नहि होइक, ताहू दिस लेखक-मण्डल सचेत अछि। प्रसिद्ध भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक कहब छनि जे सरलताक अनुसन्धानमे एहन अवस्था किन्नहु ने आबऽ देबाक चाही जे भाषाक विशेषता छाँहमे पडि जाए। -(भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक धारणाकेँ पूर्ण रूपसँ सङ्ग लऽ निर्धारित) आ. मैथिली अकादमी, पटना द्वारा निर्धारित मैथिली लेखन-शैली
१. जे शब्द मैथिली-साहित्यक प्राचीन कालसँ आइ धरि जाहि वर्त्तनीमे प्रचलित अछि, से सामान्यतः ताहि वर्त्तनीमे लिखल जाय- उदाहरणार्थ-
ग्राह्य
एखन ठाम जकर, तकर तनिकर अछि
अग्राह्य अखन, अखनि, एखेन, अखनी ठिमा, ठिना, ठमा जेकर, तेकर तिनकर। (वैकल्पिक रूपेँ ग्राह्य) ऐछ, अहि, ए।
२. निम्नलिखित तीन प्रकारक रूप वैकल्पिकतया अपनाओल जाय: भऽ गेल, भय गेल वा भए गेल। जा रहल अछि, जाय रहल अछि, जाए रहल अछि। कर’ गेलाह, वा करय गेलाह वा करए गेलाह।
३. प्राचीन मैथिलीक ‘न्ह’ ध्वनिक स्थानमे ‘न’ लिखल जाय सकैत अछि यथा कहलनि वा कहलन्हि।
४. ‘ऐ’ तथा ‘औ’ ततय लिखल जाय जत’ स्पष्टतः ‘अइ’ तथा ‘अउ’ सदृश उच्चारण इष्ट हो। यथा- देखैत, छलैक, बौआ, छौक इत्यादि।
५. मैथिलीक निम्नलिखित शब्द एहि रूपे प्रयुक्त होयत: जैह, सैह, इएह, ओऐह, लैह तथा दैह।
६. ह्र्स्व इकारांत शब्दमे ‘इ’ के लुप्त करब सामान्यतः अग्राह्य थिक। यथा- ग्राह्य देखि आबह, मालिनि गेलि (मनुष्य मात्रमे)।
७. स्वतंत्र ह्रस्व ‘ए’ वा ‘य’ प्राचीन मैथिलीक उद्धरण आदिमे तँ यथावत राखल जाय, किंतु आधुनिक प्रयोगमे वैकल्पिक रूपेँ ‘ए’ वा ‘य’ लिखल जाय। यथा:- कयल वा कएल, अयलाह वा अएलाह, जाय वा जाए इत्यादि।
८. उच्चारणमे दू स्वरक बीच जे ‘य’ ध्वनि स्वतः आबि जाइत अछि तकरा लेखमे स्थान वैकल्पिक रूपेँ देल जाय। यथा- धीआ, अढ़ैआ, विआह, वा धीया, अढ़ैया, बियाह।
९. सानुनासिक स्वतंत्र स्वरक स्थान यथासंभव ‘ञ’ लिखल जाय वा सानुनासिक स्वर। यथा:- मैञा, कनिञा, किरतनिञा वा मैआँ, कनिआँ, किरतनिआँ।
१०. कारकक विभक्त्तिक निम्नलिखित रूप ग्राह्य:- हाथकेँ, हाथसँ, हाथेँ, हाथक, हाथमे। ’मे’ मे अनुस्वार सर्वथा त्याज्य थिक। ‘क’ क वैकल्पिक रूप ‘केर’ राखल जा सकैत अछि।
११. पूर्वकालिक क्रियापदक बाद ‘कय’ वा ‘कए’ अव्यय वैकल्पिक रूपेँ लगाओल जा सकैत अछि। यथा:- देखि कय वा देखि कए।
१२. माँग, भाँग आदिक स्थानमे माङ, भाङ इत्यादि लिखल जाय।
१३. अर्द्ध ‘न’ ओ अर्द्ध ‘म’ क बदला अनुसार नहि लिखल जाय, किंतु छापाक सुविधार्थ अर्द्ध ‘ङ’ , ‘ञ’, तथा ‘ण’ क बदला अनुस्वारो लिखल जा सकैत अछि। यथा:- अङ्क, वा अंक, अञ्चल वा अंचल, कण्ठ वा कंठ।
१४. हलंत चिह्न निअमतः लगाओल जाय, किंतु विभक्तिक संग अकारांत प्रयोग कएल जाय। यथा:- श्रीमान्, किंतु श्रीमानक।
१५. सभ एकल कारक चिह्न शब्दमे सटा क’ लिखल जाय, हटा क’ नहि, संयुक्त विभक्तिक हेतु फराक लिखल जाय, यथा घर परक।
१६. अनुनासिककेँ चन्द्रबिन्दु द्वारा व्यक्त कयल जाय। परंतु मुद्रणक सुविधार्थ हि समान जटिल मात्रापर अनुस्वारक प्रयोग चन्द्रबिन्दुक बदला कयल जा सकैत अछि। यथा- हिँ केर बदला हिं।
१७. पूर्ण विराम पासीसँ ( । ) सूचित कयल जाय।
१८. समस्त पद सटा क’ लिखल जाय, वा हाइफेनसँ जोड़ि क’ , हटा क’ नहि।
१९. लिअ तथा दिअ शब्दमे बिकारी (ऽ) नहि लगाओल जाय।
२०. अंक देवनागरी रूपमे राखल जाय।
२१.किछु ध्वनिक लेल नवीन चिन्ह बनबाओल जाय। जा' ई नहि बनल अछि ताबत एहि दुनू ध्वनिक बदला पूर्ववत् अय/ आय/ अए/ आए/ आओ/ अओ लिखल जाय। आकि ऎ वा ऒ सँ व्यक्त कएल जाय।
ह./- गोविन्द झा ११/८/७६ श्रीकान्त ठाकुर ११/८/७६ सुरेन्द्र झा "सुमन" ११/०८/७६ २.मैथिलीमे भाषा सम्पादन पाठ्यक्रम नीचाँक सूचीमे देल विकल्पमेसँ लैंगुएज एडीटर द्वारा कोन रूप चुनल जएबाक चाही: वर्ड फाइलमे बोल्ड कएल रूप: १.होयबला/ होबयबला/ होमयबला/ हेब’बला, हेम’बला/ होयबाक/होबएबला /होएबाक २. आ’/आऽ आ ३. क’ लेने/कऽ लेने/कए लेने/कय लेने/ल’/लऽ/लय/लए ४. भ’ गेल/भऽ गेल/भय गेल/भए गेल ५. कर’ गेलाह/करऽ गेलह/करए गेलाह/करय गेलाह ६. लिअ/दिअ लिय’,दिय’,लिअ’,दिय’/ ७. कर’ बला/करऽ बला/ करय बला करै बला/क’र’ बला / करए बला ८. बला वला ९. आङ्ल आंग्ल १०. प्रायः प्रायह ११. दुःख दुख १२. चलि गेल चल गेल/चैल गेल १३. देलखिन्ह देलकिन्ह, देलखिन १४. देखलन्हि देखलनि/ देखलैन्ह १५. छथिन्ह/ छलन्हि छथिन/ छलैन/ छलनि १६. चलैत/दैत चलति/दैति १७. एखनो अखनो १८. बढ़न्हि बढन्हि १९. ओ’/ओऽ(सर्वनाम) ओ २०. ओ (संयोजक) ओ’/ओऽ २१. फाँगि/फाङ्गि फाइंग/फाइङ २२. जे जे’/जेऽ २३. ना-नुकुर ना-नुकर २४. केलन्हि/कएलन्हि/कयलन्हि २५. तखन तँ/ तखन तँ २६. जा’ रहल/जाय रहल/जाए रहल २७. निकलय/निकलए लागल बहराय/ बहराए लागल निकल’/बहरै लागल २८. ओतय/जतय जत’/ओत’/ जतए/ ओतए २९. की फूरल जे कि फूरल जे ३०. जे जे’/जेऽ ३१. कूदि/यादि(मोन पारब) कूइद/याइद/कूद/याद/ यादि (मोन) ३२. इहो/ ओहो ३३. हँसए/ हँसय हँसऽ ३४. नौ आकि दस/नौ किंवा दस/ नौ वा दस ३५. सासु-ससुर सास-ससुर ३६. छह/ सात छ/छः/सात ३७. की की’/कीऽ (दीर्घीकारान्तमे ऽ वर्जित) ३८. जबाब जवाब ३९. करएताह/ करयताह करेताह ४०. दलान दिशि दलान दिश/दलान दिस ४१. गेलाह गएलाह/गयलाह ४२. किछु आर/ किछु और ४३. जाइत छल जाति छल/जैत छल ४४. पहुँचि/ भेटि जाइत छल पहुँच/भेट जाइत छल ४५. जबान (युवा)/ जवान(फौजी) ४६. लय/लए क’/कऽ/लए कए/ लऽ कऽ/ लऽ कए ४७. ल’/लऽ कय/ कए ४८. एखन/अखने अखन/एखने ४९. अहींकेँ अहीँकेँ ५०. गहींर गहीँर ५१. धार पार केनाइ धार पार केनाय/केनाए ५२. जेकाँ जेँकाँ/ जकाँ ५३. तहिना तेहिना ५४. एकर अकर ५५. बहिनउ बहनोइ ५६. बहिन बहिनि ५७. बहिन-बहिनोइ बहिन-बहनउ ५८. नहि/ नै ५९. करबा / करबाय/ करबाए ६०. तँ/ त ऽ तय/तए ६१. भाय भै/भाए ६२. भाँय ६३. यावत जावत ६४. माय मै / माए ६५. देन्हि/दएन्हि/ दयन्हि दन्हि/ दैन्हि ६६. द’/ दऽ/ दए ६७. ओ (संयोजक) ओऽ (सर्वनाम) ६८. तका कए तकाय तकाए ६९. पैरे (on foot) पएरे ७०. ताहुमे ताहूमे
७१. पुत्रीक ७२. बजा कय/ कए ७३. बननाय/बननाइ ७४. कोला ७५. दिनुका दिनका ७६. ततहिसँ ७७. गरबओलन्हि गरबेलन्हि ७८. बालु बालू ७९. चेन्ह चिन्ह(अशुद्ध) ८०. जे जे’ ८१. से/ के से’/के’ ८२. एखुनका अखनुका ८३. भुमिहार भूमिहार ८४. सुगर सूगर ८५. झठहाक झटहाक ८६. छूबि ८७. करइयो/ओ करैयो/करिऔ-करइयौ ८८. पुबारि पुबाइ ८९. झगड़ा-झाँटी झगड़ा-झाँटि ९०. पएरे-पएरे पैरे-पैरे ९१. खेलएबाक ९२. खेलेबाक ९३. लगा ९४. होए- हो ९५. बुझल बूझल ९६. बूझल (संबोधन अर्थमे) ९७. यैह यएह / इएह ९८. तातिल ९९. अयनाय- अयनाइ/ अएनाइ १००. निन्न- निन्द १०१. बिनु बिन १०२. जाए जाइ १०३. जाइ (in different sense)-last word of sentence १०४. छत पर आबि जाइ १०५. ने १०६. खेलाए (play) –खेलाइ १०७. शिकाइत- शिकायत १०८. ढप- ढ़प १०९. पढ़- पढ ११०. कनिए/ कनिये कनिञे १११. राकस- राकश ११२. होए/ होय होइ ११३. अउरदा- औरदा ११४. बुझेलन्हि (different meaning- got understand) ११५. बुझएलन्हि/ बुझयलन्हि (understood himself) ११६. चलि- चल ११७. खधाइ- खधाय ११८. मोन पाड़लखिन्ह मोन पारलखिन्ह ११९. कैक- कएक- कइएक १२०. लग ल’ग १२१. जरेनाइ १२२. जरओनाइ- जरएनाइ/जरयनाइ १२३. होइत १२४. गरबेलन्हि/ गरबओलन्हि १२५. चिखैत- (to test)चिखइत १२६. करइयो (willing to do) करैयो १२७. जेकरा- जकरा १२८. तकरा- तेकरा १२९. बिदेसर स्थानेमे/ बिदेसरे स्थानमे १३०. करबयलहुँ/ करबएलहुँ/ करबेलहुँ १३१. हारिक (उच्चारण हाइरक) १३२. ओजन वजन १३३. आधे भाग/ आध-भागे १३४. पिचा / पिचाय/पिचाए १३५. नञ/ ने १३६. बच्चा नञ (ने) पिचा जाय १३७. तखन ने (नञ) कहैत अछि। १३८. कतेक गोटे/ कताक गोटे १३९. कमाइ- धमाइ कमाई- धमाई १४०. लग ल’ग १४१. खेलाइ (for playing) १४२. छथिन्ह छथिन १४३. होइत होइ १४४. क्यो कियो / केओ १४५. केश (hair) १४६. केस (court-case) १४७. बननाइ/ बननाय/ बननाए १४८. जरेनाइ १४९. कुरसी कुर्सी १५०. चरचा चर्चा १५१. कर्म करम १५२. डुबाबए/ डुमाबय/ डुमाबए १५३. एखुनका/ अखुनका १५४. लय (वाक्यक अतिम शब्द)- लऽ १५५. कएलक केलक १५६. गरमी गर्मी १५७. बरदी वर्दी १५८. सुना गेलाह सुना’/सुनाऽ १५९. एनाइ-गेनाइ १६०. तेना ने घेरलन्हि १६१. नञि १६२. डरो ड’रो १६३. कतहु- कहीं १६४. उमरिगर- उमरगर १६५. भरिगर १६६. धोल/धोअल धोएल १६७. गप/गप्प १६८. के के’ १६९. दरबज्जा/ दरबजा १७०. ठाम १७१. धरि तक १७२. घूरि लौटि १७३. थोरबेक १७४. बड्ड १७५. तोँ/ तूँ १७६. तोँहि( पद्यमे ग्राह्य) १७७. तोँही / तोँहि १७८. करबाइए करबाइये १७९. एकेटा १८०. करितथि करतथि
१८१. पहुँचि पहुँच १८२. राखलन्हि रखलन्हि १८३. लगलन्हि लागलन्हि १८४. सुनि (उच्चारण सुइन) १८५. अछि (उच्चारण अइछ) १८६. एलथि गेलथि १८७. बितओने बितेने १८८. करबओलन्हि/ करेलखिन्ह १८९. करएलन्हि १९०. आकि कि १९१. पहुँचि पहुँच १९२. जराय/ जराए जरा (आगि लगा) १९३. से से’ १९४. हाँ मे हाँ (हाँमे हाँ विभक्त्तिमे हटा कए) १९५. फेल फैल १९६. फइल(spacious) फैल १९७. होयतन्हि/ होएतन्हि हेतन्हि १९८. हाथ मटिआयब/ हाथ मटियाबय/हाथ मटिआएब १९९. फेका फेंका २००. देखाए देखा २०१. देखाबए २०२. सत्तरि सत्तर २०३. साहेब साहब २०४.गेलैन्ह/ गेलन्हि २०५.हेबाक/ होएबाक २०६.केलो/ कएलहुँ २०७. किछु न किछु/ किछु ने किछु २०८.घुमेलहुँ/ घुमओलहुँ २०९. एलाक/ अएलाक २१०. अः/ अह २११.लय/ लए (अर्थ-परिवर्त्तन) २१२.कनीक/ कनेक २१३.सबहक/ सभक २१४.मिलाऽ/ मिला २१५.कऽ/ क २१६.जाऽ/ जा २१७.आऽ/ आ २१८.भऽ/भ’ (’ फॉन्टक कमीक द्योतक) २१९.निअम/ नियम २२०.हेक्टेअर/ हेक्टेयर २२१.पहिल अक्षर ढ/ बादक/बीचक ढ़ २२२.तहिं/तहिँ/ तञि/ तैं २२३.कहिं/ कहीं २२४.तँइ/ तइँ २२५.नँइ/ नइँ/ नञि/ नहि २२६.है/ हए २२७.छञि/ छै/ छैक/छइ २२८.दृष्टिएँ/ दृष्टियेँ २२९.आ (come)/ आऽ(conjunction) २३०. आ (conjunction)/ आऽ(come) २३१.कुनो/ कोनो २३२.गेलैन्ह-गेलन्हि २३३.हेबाक- होएबाक २३४.केलौँ- कएलौँ- कएलहुँ २३५.किछु न किछ- किछु ने किछु २३६.केहेन- केहन २३७.आऽ (come)-आ (conjunction-and)/आ २३८. हएत-हैत २३९.घुमेलहुँ-घुमएलहुँ २४०.एलाक- अएलाक २४१.होनि- होइन/होन्हि २४२.ओ-राम ओ श्यामक बीच(conjunction), ओऽ कहलक (he said)/ओ २४३.की हए/ कोसी अएली हए/ की है। की हइ २४४.दृष्टिएँ/ दृष्टियेँ २४५.शामिल/ सामेल २४६.तैँ / तँए/ तञि/ तहिं २४७.जौँ/ ज्योँ २४८.सभ/ सब २४९.सभक/ सबहक २५०.कहिं/ कहीं २५१.कुनो/ कोनो २५२.फारकती भऽ गेल/ भए गेल/ भय गेल २५३.कुनो/ कोनो २५४.अः/ अह २५५.जनै/ जनञ २५६.गेलन्हि/ गेलाह (अर्थ परिवर्तन) २५७.केलन्हि/ कएलन्हि २५८.लय/ लए (अर्थ परिवर्तन) २५९.कनीक/ कनेक २६०.पठेलन्हि/ पठओलन्हि २६१.निअम/ नियम २६२.हेक्टेअर/ हेक्टेयर २६३.पहिल अक्षर रहने ढ/ बीचमे रहने ढ़ २६४.आकारान्तमे बिकारीक प्रयोग उचित नहि/ अपोस्ट्रोफीक प्रयोग फान्टक तकनीकी न्यूनताक परिचायक ओकर बदला अवग्रह (बिकारी) क प्रयोग उचित २६५.केर/-क/ कऽ/ के २६६.छैन्हि- छन्हि २६७.लगैए/ लगैये २६८.होएत/ हएत २६९.जाएत/ जएत २७०.आएत/ अएत/ आओत २७१.खाएत/ खएत/ खैत २७२.पिअएबाक/ पिएबाक २७३.शुरु/ शुरुह २७४.शुरुहे/ शुरुए २७५.अएताह/अओताह/ एताह २७६.जाहि/ जाइ/ जै २७७.जाइत/ जैतए/ जइतए २७८.आएल/ अएल २७९.कैक/ कएक २८०.आयल/ अएल/ आएल २८१. जाए/ जै/ जए २८२. नुकएल/ नुकाएल २८३. कठुआएल/ कठुअएल २८४. ताहि/ तै २८५. गायब/ गाएब/ गएब २८६. सकै/ सकए/ सकय २८७.सेरा/सरा/ सराए (भात सेरा गेल) २८८.कहैत रही/देखैत रही/ कहैत छलहुँ/ कहै छलहुँ- एहिना चलैत/ पढ़ैत (पढ़ै-पढ़ैत अर्थ कखनो काल परिवर्तित)-आर बुझै/ बुझैत (बुझै/ बुझैत छी, मुदा बुझैत-बुझैत)/ सकैत/ सकै। करैत/ करै। दै/ दैत। छैक/ छै। बचलै/ बचलैक। रखबा/ रखबाक । बिनु/ बिन। रातिक/ रातुक २८९. दुआरे/ द्वारे २९०.भेटि/ भेट २९१. खन/ खुना (भोर खन/ भोर खुना) २९२.तक/ धरि २९३.गऽ/गै (meaning different-जनबै गऽ) २९४.सऽ/ सँ (मुदा दऽ, लऽ) २९५.त्त्व,(तीन अक्षरक मेल बदला पुनरुक्तिक एक आ एकटा दोसरक उपयोग) आदिक बदला त्व आदि। महत्त्व/ महत्व/ कर्ता/ कर्त्ता आदिमे त्त संयुक्तक कोनो आवश्यकता मैथिलीमे नहि अछि। वक्तव्य २९६.बेसी/ बेशी २९७.बाला/वाला बला/ वला (रहैबला) २९८.वाली/ (बदलएवाली) २९९.वार्त्ता/ वार्ता ३००. अन्तर्राष्ट्रिय/ अन्तर्राष्ट्रीय ३०१. लेमए/ लेबए ३०२.लमछुरका, नमछुरका ३०२.लागै/ लगै (भेटैत/ भेटै) ३०३.लागल/ लगल ३०४.हबा/ हवा ३०५.राखलक/ रखलक ३०६.आ (come)/ आ (and) ३०७. पश्चाताप/ पश्चात्ताप ३०८. ऽ केर व्यवहार शब्दक अन्तमे मात्र, यथासंभव बीचमे नहि। ३०९.कहैत/ कहै ३१०. रहए (छल)/ रहै (छलै) (meaning different) ३११.तागति/ ताकति ३१२.खराप/ खराब ३१३.बोइन/ बोनि/ बोइनि ३१४.जाठि/ जाइठ ३१५.कागज/ कागच ३१६.गिरै (meaning different- swallow)/ गिरए (खसए) ३१७.राष्ट्रिय/ राष्ट्रीय उच्चारण निर्देश: दन्त न क उच्चारणमे दाँतमे जीह सटत- जेना बाजू नाम , मुदा ण क उच्चारणमे जीह मूर्धामे सटत (नहि सटैए तँ उच्चारण दोष अछि)- जेना बाजू गणेश। तालव्य शमे जीह तालुसँ , षमे मूर्धासँ आ दन्त समे दाँतसँ सटत। निशाँ, सभ आ शोषण बाजि कऽ देखू। मैथिलीमे ष केँ वैदिक संस्कृत जेकाँ ख सेहो उच्चरित कएल जाइत अछि, जेना वर्षा, दोष। य अनेको स्थानपर ज जेकाँ उच्चरित होइत अछि आ ण ड़ जेकाँ (यथा संयोग आ गणेश संजोग आ गड़ेस उच्चरित होइत अछि)। मैथिलीमे व क उच्चारण ब, श क उच्चारण स आ य क उच्चारण ज सेहो होइत अछि। ओहिना ह्रस्व इ बेशीकाल मैथिलीमे पहिने बाजल जाइत अछि कारण देवनागरीमे आ मिथिलाक्षरमे ह्रस्व इ अक्षरक पहिने लिखलो जाइत आ बाजलो जएबाक चाही। कारण जे हिन्दीमे एकर दोषपूर्ण उच्चारण होइत अछि (लिखल तँ पहिने जाइत अछि मुदा बाजल बादमे जाइत अछि), से शिक्षा पद्धतिक दोषक कारण हम सभ ओकर उच्चारण दोषपूर्ण ढंगसँ कऽ रहल छी। अछि- अ इ छ ऐछ छथि- छ इ थ – छैथ पहुँचि- प हुँ इ च आब अ आ इ ई ए ऐ ओ औ अं अः ऋ एहि सभ लेल मात्रा सेहो अछि, मुदा एहिमे ई ऐ ओ औ अं अः ऋ केँ संयुक्ताक्षर रूपमे गलत रूपमे प्रयुक्त आ उच्चरित कएल जाइत अछि। जेना ऋ केँ री रूपमे उच्चरित करब। आ देखियौ- एहि लेल देखिऔ क प्रयोग अनुचित। मुदा देखिऐ लेल देखियै अनुचित। क् सँ ह् धरि अ सम्मिलित भेलासँ क सँ ह बनैत अछि, मुदा उच्चारण काल हलन्त युक्त शब्दक अन्तक उच्चारणक प्रवृत्ति बढ़ल अछि, मुदा हम जखन मनोजमे ज् अन्तमे बजैत छी, तखनो पुरनका लोककेँ बजैत सुनबन्हि- मनोजऽ, वास्तवमे ओ अ युक्त ज् = ज बजै छथि। फेर ज्ञ अछि ज् आ ञ क संयुक्त मुदा गलत उच्चारण होइत अछि- ग्य। ओहिना क्ष अछि क् आ ष क संयुक्त मुदा उच्चारण होइत अछि छ। फेर श् आ र क संयुक्त अछि श्र ( जेना श्रमिक) आ स् आ र क संयुक्त अछि स्र (जेना मिस्र)। त्र भेल त+र । उच्चारणक ऑडियो फाइल विदेह आर्काइव http://www.videha.co.in/ पर उपलब्ध अछि। फेर केँ / सँ / पर पूर्व अक्षरसँ सटा कऽ लिखू मुदा तँ/ के/ कऽ हटा कऽ। एहिमे सँ मे पहिल सटा कऽ लिखू आ बादबला हटा कऽ। अंकक बाद टा लिखू सटा कऽ मुदा अन्य ठाम टा लिखू हटा कऽ– जेना छहटा मुदा सभ टा। फेर ६अ म सातम लिखू- छठम सातम नहि। घरबलामे बला मुदा घरवालीमे वाली प्रयुक्त करू। रहए- रहै मुदा सकैए (उच्चारण सकै-ए)। मुदा कखनो काल रहए आ रहै मे अर्थ भिन्नता सेहो, जेना से कम्मो जगहमे पार्किंग करबाक अभ्यास रहै ओकरा। पुछलापर पता लागल जे ढुनढुन नाम्ना ई ड्राइवर कनाट प्लेसक पार्किंगमे काज करैत रहए। छलै, छलए मे सेहो एहि तरहक भेल। छलए क उच्चारण छल-ए सेहो। संयोगने- (उच्चारण संजोगने) केँ/ के / कऽ केर- क (केर क प्रयोग नहि करू ) क (जेना रामक) –रामक आ संगे (उच्चारण राम के / राम कऽ सेहो) सँ- सऽ चन्द्रबिन्दु आ अनुस्वार- अनुस्वारमे कंठ धरिक प्रयोग होइत अछि मुदा चन्द्रबिन्दुमे नहि। चन्द्रबिन्दुमे कनेक एकारक सेहो उच्चारण होइत अछि- जेना रामसँ- (उच्चारण राम सऽ) रामकेँ- (उच्चारण राम कऽ/ राम के सेहो)। केँ जेना रामकेँ भेल हिन्दीक को (राम को)- राम को= रामकेँ क जेना रामक भेल हिन्दीक का ( राम का) राम का= रामक कऽ जेना जा कऽ भेल हिन्दीक कर ( जा कर) जा कर= जा कऽ सँ भेल हिन्दीक से (राम से) राम से= रामसँ सऽ तऽ त केर एहि सभक प्रयोग अवांछित। के दोसर अर्थेँ प्रयुक्त भऽ सकैए- जेना के कहलक? नञि, नहि, नै, नइ, नँइ, नइँ एहि सभक उच्चारण- नै त्त्व क बदलामे त्व जेना महत्वपूर्ण (महत्त्वपूर्ण नहि) जतए अर्थ बदलि जाए ओतहि मात्र तीन अक्षरक संयुक्ताक्षरक प्रयोग उचित। सम्पति- उच्चारण स म्प इ त (सम्पत्ति नहि- कारण सही उच्चारण आसानीसँ सम्भव नहि)। मुदा सर्वोत्तम (सर्वोतम नहि)। राष्ट्रिय (राष्ट्रीय नहि) सकैए/ सकै (अर्थ परिवर्तन) पोछैले/ पोछैए/ पोछए/ (अर्थ परिवर्तन) पोछए/ पोछै ओ लोकनि ( हटा कऽ, ओ मे बिकारी नहि) ओइ/ ओहि ओहिले/ ओहि लेल जएबेँ/ बैसबेँ पँचभइयाँ देखियौक (देखिऔक बहि- तहिना अ मे ह्रस्व आ दीर्घक मात्राक प्रयोग अनुचित) जकाँ/ जेकाँ तँइ/ तैँ होएत/ हएत नञि/ नहि/ नँइ/ नइँ सौँसे बड़/ बड़ी (झोराओल) गाए (गाइ नहि) रहलेँ/ पहिरतैँ हमहीं/ अहीं सब - सभ सबहक - सभहक धरि - तक गप- बात बूझब - समझब बुझलहुँ - समझलहुँ हमरा आर - हम सभ आकि- आ कि सकैछ/ करैछ (गद्यमे प्रयोगक आवश्यकता नहि) मे केँ सँ पर (शब्दसँ सटा कऽ) तँ कऽ धऽ दऽ (शब्दसँ हटा कऽ) मुदा दूटा वा बेशी विभक्ति संग रहलापर पहिल विभक्ति टाकेँ सटाऊ। एकटा दूटा (मुदा कैक टा) बिकारीक प्रयोग शब्दक अन्तमे, बीचमे अनावश्यक रूपेँ नहि। आकारान्त आ अन्तमे अ क बाद बिकारीक प्रयोग नहि (जेना दिअ, आ ) अपोस्ट्रोफीक प्रयोग बिकारीक बदलामे करब अनुचित आ मात्र फॉन्टक तकनीकी न्यूनताक परिचायक)- ओना बिकारीक संस्कृत रूप ऽ अवग्रह कहल जाइत अछि आ वर्तनी आ उच्चारण दुनू ठाम एकर लोप रहैत अछि/ रहि सकैत अछि (उच्चारणमे लोप रहिते अछि)। मुदा अपोस्ट्रोफी सेहो अंग्रेजीमे पसेसिव केसमे होइत अछि आ फ्रेंचमे शब्दमे जतए एकर प्रयोग होइत अछि जेना raison d’etre एतए सेहो एकर उच्चारण रैजौन डेटर होइत अछि, माने अपोस्ट्रॉफी अवकाश नहि दैत अछि वरन जोड़ैत अछि, से एकर प्रयोग बिकारीक बदला देनाइ तकनीकी रूपेँ सेहो अनुचित)। अइमे, एहिमे जइमे, जाहिमे एखन/ अखन/ अइखन केँ (के नहि) मे (अनुस्वार रहित) भऽ मे दऽ तँ (तऽ त नहि) सँ ( सऽ स नहि) गाछ तर गाछ लग साँझ खन जो (जो go, करै जो do) Festivals of Mithila DATE-LIST (year- 2010-11) (१४१८ साल) Marriage Days: Nov.2010- 19 Dec.2010- 3,8 January 2011- 17, 21, 23, 24, 26, 27, 28 31 Feb.2011- 3, 4, 7, 9, 18, 20, 24, 25, 27, 28 March 2011- 2, 7 May 2011- 11, 12, 13, 18, 19, 20, 22, 23, 29, 30 June 2011- 1, 2, 3, 8, 9, 10, 12, 13, 19, 20, 26, 29 Upanayana Days: February 2011- 8 March 2011- 7 May 2011- 12, 13 June 2011- 6, 12 Dviragaman Din: November 2010- 19, 22, 25, 26 December 2010- 6, 8, 9, 10, 12 February 2011- 20, 21 March 2011- 6, 7, 9, 13 April 2011- 17, 18, 22 May 2011- 5, 6, 8, 13 Mundan Din: November 2010- 24, 26 December 2010- 10, 17 February 2011- 4, 16, 21 March 2011- 7, 9 April 2011- 22 May 2011- 6, 9, 19 June 2011- 3, 6, 10, 20 FESTIVALS OF MITHILA Mauna Panchami-31 July Somavati Amavasya Vrat- 1 August Madhushravani-12 August Nag Panchami- 14 August Raksha Bandhan- 24 Aug Krishnastami- 01 September Kushi Amavasya- 08 September Hartalika Teej- 11 September ChauthChandra-11 September Vishwakarma Pooja- 17 September Karma Dharma Ekadashi-19 September Indra Pooja Aarambh- 20 September Anant Caturdashi- 22 Sep Agastyarghadaan- 23 Sep Pitri Paksha begins- 24 Sep Jimootavahan Vrata/ Jitia-30 Sep Matri Navami- 02 October Kalashsthapan- 08 October Belnauti- 13 October Patrika Pravesh- 14 October Mahastami- 15 October Maha Navami - 16-17 October Vijaya Dashami- 18 October Kojagara- 22 Oct Dhanteras- 3 November Diyabati, shyama pooja- 5 November Annakoota/ Govardhana Pooja-07 November Bhratridwitiya/ Chitragupta Pooja-08 November Chhathi- -12 November Akshyay Navami- 15 November Devotthan Ekadashi- 17 November Kartik Poornima/ Sama Bisarjan- 21 Nov Shaa. ravivratarambh- 21 November Navanna parvan- 24 -26 November Vivaha Panchmi- 10 December Naraknivaran chaturdashi- 01 February Makara/ Teela Sankranti-15 Jan Basant Panchami/ Saraswati Pooja- 08 Februaqry Achla Saptmi- 10 February Mahashivaratri-03 March Holikadahan-Fagua-19 March Holi-20 Mar Varuni Yoga- 31 March va.navaratrarambh- 4 April vaa. Chhathi vrata- 9 April Ram Navami- 12 April Mesha Sankranti-Satuani-14 April Jurishital-15 April Somavati Amavasya Vrata- 02 May Ravi Brat Ant- 08 May Akshaya Tritiya-06 May Janaki Navami- 12 May Vat Savitri-barasait- 01 June Ganga Dashhara-11 June Jagannath Rath Yatra- 3 July Hari Sayan Ekadashi- 11 Jul Aashadhi Guru Poornima-15 Jul VIDEHA ARCHIVE १.विदेह ई-पत्रिकाक सभटा पुरान अंक ब्रेल, तिरहुता आ देवनागरी रूपमे Videha e journal's all old issues in Braille Tirhuta and Devanagari versions विदेह ई-पत्रिकाक पहिल ५० अंक
विदेह ई-पत्रिकाक ५०म सँ आगाँक अंक २.मैथिली पोथी डाउनलोड Maithili Books Download ३.मैथिली ऑडियो संकलन Maithili Audio Downloads ४.मैथिली वीडियोक संकलन Maithili Videos ५.मिथिला चित्रकला/ आधुनिक चित्रकला आ चित्र Mithila Painting/ Modern Art and Photos "विदेह"क एहि सभ सहयोगी लिंकपर सेहो एक बेर जाऊ। ६.विदेह मैथिली क्विज : http://videhaquiz.blogspot.com/ ७.विदेह मैथिली जालवृत्त एग्रीगेटर : http://videha-aggregator.blogspot.com/ ८.विदेह मैथिली साहित्य अंग्रेजीमे अनूदित http://madhubani-art.blogspot.com/ ९.विदेहक पूर्व-रूप "भालसरिक गाछ" : http://gajendrathakur.blogspot.com/ १०.विदेह इंडेक्स : http://videha123.blogspot.com/ ११.विदेह फाइल : http://videha123.wordpress.com/ १२. विदेह: सदेह : पहिल तिरहुता (मिथिला़क्षर) जालवृत्त (ब्लॉग) http://videha-sadeha.blogspot.com/ १३. विदेह:ब्रेल: मैथिली ब्रेलमे: पहिल बेर विदेह द्वारा http://videha-braille.blogspot.com/ १४.VIDEHA IST MAITHILI FORTNIGHTLY EJOURNAL ARCHIVE http://videha-archive.blogspot.com/ १५. विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका मैथिली पोथीक आर्काइव http://videha-pothi.blogspot.com/ १६. विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका ऑडियो आर्काइव http://videha-audio.blogspot.com/ १७. विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका वीडियो आर्काइव http://videha-video.blogspot.com/ १८. विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका मिथिला चित्रकला, आधुनिक कला आ चित्रकला http://videha-paintings-photos.blogspot.com/ १९. मैथिल आर मिथिला (मैथिलीक सभसँ लोकप्रिय जालवृत्त) http://maithilaurmithila.blogspot.com/ २०.श्रुति प्रकाशन http://www.shruti-publication.com/ २१.http://groups.google.com/group/videha VIDEHA केर सदस्यता लिअ Top of Form Bottom of Form ईमेल : एहि समूहपर जाऊ २२.http://groups.yahoo.com/group/VIDEHA/ Top of Form Subscribe to VIDEHA Powered by us.groups.yahoo.com Bottom of Form २३.गजेन्द्र ठाकुर इडेक्स http://gajendrathakur123.blogspot.com २४.विदेह रेडियो:मैथिली कथा-कविता आदिक पहिल पोडकास्ट साइट http://videha123radio.wordpress.com/ २५. नेना भुटका http://mangan-khabas.blogspot.com/ महत्त्वपूर्ण सूचना:(१) 'विदेह' द्वारा धारावाहिक रूपे ई-प्रकाशित कएल गेल गजेन्द्र ठाकुरक निबन्ध-प्रबन्ध-समीक्षा, उपन्यास (सहस्रबाढ़नि) , पद्य-संग्रह (सहस्राब्दीक चौपड़पर), कथा-गल्प (गल्प-गुच्छ), नाटक(संकर्षण), महाकाव्य (त्वञ्चाहञ्च आ असञ्जाति मन) आ बाल-किशोर साहित्य विदेहमे संपूर्ण ई-प्रकाशनक बाद प्रिंट फॉर्ममे। कुरुक्षेत्रम्–अन्तर्मनक खण्ड-१ सँ ७ Combined ISBN No.978-81-907729-7-6 विवरण एहि पृष्ठपर नीचाँमे आ प्रकाशकक साइट http://www.shruti-publication.com/ पर । महत्त्वपूर्ण सूचना (२):सूचना: विदेहक मैथिली-अंग्रेजी आ अंग्रेजी मैथिली कोष (इंटरनेटपर पहिल बेर सर्च-डिक्शनरी) एम.एस. एस.क्यू.एल. सर्वर आधारित -Based on ms-sql server Maithili-English and English-Maithili Dictionary. विदेहक भाषापाक- रचनालेखन स्तंभमे। कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक- गजेन्द्र ठाकुर गजेन्द्र ठाकुरक निबन्ध-प्रबन्ध-समीक्षा, उपन्यास (सहस्रबाढ़नि) , पद्य-संग्रह (सहस्राब्दीक चौपड़पर), कथा-गल्प (गल्प गुच्छ), नाटक(संकर्षण), महाकाव्य (त्वञ्चाहञ्च आ असञ्जाति मन) आ बालमंडली-किशोरजगत विदेहमे संपूर्ण ई-प्रकाशनक बाद प्रिंट फॉर्ममे। कुरुक्षेत्रम्–अन्तर्मनक, खण्ड-१ सँ ७ Ist edition 2009 of Gajendra Thakur’s KuruKshetram-Antarmanak (Vol. I to VII)- essay-paper-criticism, novel, poems, story, play, epics and Children-grown-ups literature in single binding: Language:Maithili ६९२ पृष्ठ : मूल्य भा. रु. 100/-(for individual buyers inside india) (add courier charges Rs.50/-per copy for Delhi/NCR and Rs.100/- per copy for outside Delhi)
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Details for purchase available at print-version publishers's site website: http://www.shruti-publication.com/ or you may write to e-mail:shruti.publication@shruti-publication.com विदेह: सदेह : १: २: ३: ४ तिरहुता : देवनागरी "विदेह" क, प्रिंट संस्करण :विदेह-ई-पत्रिका (http://www.videha.co.in/) क चुनल रचना सम्मिलित। विदेह:सदेह:१: २: ३: ४ सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। Details for purchase available at print-version publishers's site http://www.shruti-publication.com or you may write to shruti.publication@shruti-publication.com २. संदेश- [ विदेह ई-पत्रिका, विदेह:सदेह मिथिलाक्षर आ देवनागरी आ गजेन्द्र ठाकुरक सात खण्डक- निबन्ध-प्रबन्ध-समीक्षा,उपन्यास (सहस्रबाढ़नि) , पद्य-संग्रह (सहस्राब्दीक चौपड़पर), कथा-गल्प (गल्प गुच्छ), नाटक (संकर्षण), महाकाव्य (त्वञ्चाहञ्च आ असञ्जाति मन) आ बाल-मंडली-किशोर जगत- संग्रह कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक मादेँ। ] १.श्री गोविन्द झा- विदेहकेँ तरंगजालपर उतारि विश्वभरिमे मातृभाषा मैथिलीक लहरि जगाओल, खेद जे अपनेक एहि महाभियानमे हम एखन धरि संग नहि दए सकलहुँ। सुनैत छी अपनेकेँ सुझाओ आ रचनात्मक आलोचना प्रिय लगैत अछि तेँ किछु लिखक मोन भेल। हमर सहायता आ सहयोग अपनेकेँ सदा उपलब्ध रहत। २.श्री रमानन्द रेणु- मैथिलीमे ई-पत्रिका पाक्षिक रूपेँ चला कऽ जे अपन मातृभाषाक प्रचार कऽ रहल छी, से धन्यवाद । आगाँ अपनेक समस्त मैथिलीक कार्यक हेतु हम हृदयसँ शुभकामना दऽ रहल छी। ३.श्री विद्यानाथ झा "विदित"- संचार आ प्रौद्योगिकीक एहि प्रतिस्पर्धी ग्लोबल युगमे अपन महिमामय "विदेह"केँ अपना देहमे प्रकट देखि जतबा प्रसन्नता आ संतोष भेल, तकरा कोनो उपलब्ध "मीटर"सँ नहि नापल जा सकैछ? ..एकर ऐतिहासिक मूल्यांकन आ सांस्कृतिक प्रतिफलन एहि शताब्दीक अंत धरि लोकक नजरिमे आश्चर्यजनक रूपसँ प्रकट हैत। ४. प्रो. उदय नारायण सिंह "नचिकेता"- जे काज अहाँ कए रहल छी तकर चरचा एक दिन मैथिली भाषाक इतिहासमे होएत। आनन्द भए रहल अछि, ई जानि कए जे एतेक गोट मैथिल "विदेह" ई जर्नलकेँ पढ़ि रहल छथि।...विदेहक चालीसम अंक पुरबाक लेल अभिनन्दन। ५. डॉ. गंगेश गुंजन- एहि विदेह-कर्ममे लागि रहल अहाँक सम्वेदनशील मन, मैथिलीक प्रति समर्पित मेहनतिक अमृत रंग, इतिहास मे एक टा विशिष्ट फराक अध्याय आरंभ करत, हमरा विश्वास अछि। अशेष शुभकामना आ बधाइक सङ्ग, सस्नेह...अहाँक पोथी कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक प्रथम दृष्टया बहुत भव्य तथा उपयोगी बुझाइछ। मैथिलीमे तँ अपना स्वरूपक प्रायः ई पहिले एहन भव्य अवतारक पोथी थिक। हर्षपूर्ण हमर हार्दिक बधाई स्वीकार करी। ६. श्री रामाश्रय झा "रामरंग"(आब स्वर्गीय)- "अपना" मिथिलासँ संबंधित...विषय वस्तुसँ अवगत भेलहुँ।...शेष सभ कुशल अछि। ७. श्री ब्रजेन्द्र त्रिपाठी- साहित्य अकादमी- इंटरनेट पर प्रथम मैथिली पाक्षिक पत्रिका "विदेह" केर लेल बधाई आ शुभकामना स्वीकार करू। ८. श्री प्रफुल्लकुमार सिंह "मौन"- प्रथम मैथिली पाक्षिक पत्रिका "विदेह" क प्रकाशनक समाचार जानि कनेक चकित मुदा बेसी आह्लादित भेलहुँ। कालचक्रकेँ पकड़ि जाहि दूरदृष्टिक परिचय देलहुँ, ओहि लेल हमर मंगलकामना। ९.डॉ. शिवप्रसाद यादव- ई जानि अपार हर्ष भए रहल अछि, जे नव सूचना-क्रान्तिक क्षेत्रमे मैथिली पत्रकारिताकेँ प्रवेश दिअएबाक साहसिक कदम उठाओल अछि। पत्रकारितामे एहि प्रकारक नव प्रयोगक हम स्वागत करैत छी, संगहि "विदेह"क सफलताक शुभकामना। १०. श्री आद्याचरण झा- कोनो पत्र-पत्रिकाक प्रकाशन- ताहूमे मैथिली पत्रिकाक प्रकाशनमे के कतेक सहयोग करताह- ई तऽ भविष्य कहत। ई हमर ८८ वर्षमे ७५ वर्षक अनुभव रहल। एतेक पैघ महान यज्ञमे हमर श्रद्धापूर्ण आहुति प्राप्त होयत- यावत ठीक-ठाक छी/ रहब। ११. श्री विजय ठाकुर- मिशिगन विश्वविद्यालय- "विदेह" पत्रिकाक अंक देखलहुँ, सम्पूर्ण टीम बधाईक पात्र अछि। पत्रिकाक मंगल भविष्य हेतु हमर शुभकामना स्वीकार कएल जाओ। १२. श्री सुभाषचन्द्र यादव- ई-पत्रिका "विदेह" क बारेमे जानि प्रसन्नता भेल। ’विदेह’ निरन्तर पल्लवित-पुष्पित हो आ चतुर्दिक अपन सुगंध पसारय से कामना अछि। १३. श्री मैथिलीपुत्र प्रदीप- ई-पत्रिका "विदेह" केर सफलताक भगवतीसँ कामना। हमर पूर्ण सहयोग रहत। १४. डॉ. श्री भीमनाथ झा- "विदेह" इन्टरनेट पर अछि तेँ "विदेह" नाम उचित आर कतेक रूपेँ एकर विवरण भए सकैत अछि। आइ-काल्हि मोनमे उद्वेग रहैत अछि, मुदा शीघ्र पूर्ण सहयोग देब।कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक देखि अति प्रसन्नता भेल। मैथिलीक लेल ई घटना छी। १५. श्री रामभरोस कापड़ि "भ्रमर"- जनकपुरधाम- "विदेह" ऑनलाइन देखि रहल छी। मैथिलीकेँ अन्तर्राष्ट्रीय जगतमे पहुँचेलहुँ तकरा लेल हार्दिक बधाई। मिथिला रत्न सभक संकलन अपूर्व। नेपालोक सहयोग भेटत, से विश्वास करी। १६. श्री राजनन्दन लालदास- "विदेह" ई-पत्रिकाक माध्यमसँ बड़ नीक काज कए रहल छी, नातिक अहिठाम देखलहुँ। एकर वार्षिक अंक जखन प्रिंट निकालब तँ हमरा पठायब। कलकत्तामे बहुत गोटेकेँ हम साइटक पता लिखाए देने छियन्हि। मोन तँ होइत अछि जे दिल्ली आबि कए आशीर्वाद दैतहुँ, मुदा उमर आब बेशी भए गेल। शुभकामना देश-विदेशक मैथिलकेँ जोड़बाक लेल।.. उत्कृष्ट प्रकाशन कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक लेल बधाइ। अद्भुत काज कएल अछि, नीक प्रस्तुति अछि सात खण्डमे। मुदा अहाँक सेवा आ से निःस्वार्थ तखन बूझल जाइत जँ अहाँ द्वारा प्रकाशित पोथी सभपर दाम लिखल नहि रहितैक। ओहिना सभकेँ विलहि देल जइतैक। (स्पष्टीकरण- श्रीमान्, अहाँक सूचनार्थ विदेह द्वारा ई-प्रकाशित कएल सभटा सामग्री आर्काइवमे https://sites.google.com/a/videha.com/videha-pothi/ पर बिना मूल्यक डाउनलोड लेल उपलब्ध छै आ भविष्यमे सेहो रहतैक। एहि आर्काइवकेँ जे कियो प्रकाशक अनुमति लऽ कऽ प्रिंट रूपमे प्रकाशित कएने छथि आ तकर ओ दाम रखने छथि ताहिपर हमर कोनो नियंत्रण नहि अछि।- गजेन्द्र ठाकुर)... अहाँक प्रति अशेष शुभकामनाक संग। १७. डॉ. प्रेमशंकर सिंह- अहाँ मैथिलीमे इंटरनेटपर पहिल पत्रिका "विदेह" प्रकाशित कए अपन अद्भुत मातृभाषानुरागक परिचय देल अछि, अहाँक निःस्वार्थ मातृभाषानुरागसँ प्रेरित छी, एकर निमित्त जे हमर सेवाक प्रयोजन हो, तँ सूचित करी। इंटरनेटपर आद्योपांत पत्रिका देखल, मन प्रफुल्लित भऽ गेल। १८.श्रीमती शेफालिका वर्मा- विदेह ई-पत्रिका देखि मोन उल्लाससँ भरि गेल। विज्ञान कतेक प्रगति कऽ रहल अछि...अहाँ सभ अनन्त आकाशकेँ भेदि दियौ, समस्त विस्तारक रहस्यकेँ तार-तार कऽ दियौक...। अपनेक अद्भुत पुस्तक कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक विषयवस्तुक दृष्टिसँ गागरमे सागर अछि। बधाई। १९.श्री हेतुकर झा, पटना-जाहि समर्पण भावसँ अपने मिथिला-मैथिलीक सेवामे तत्पर छी से स्तुत्य अछि। देशक राजधानीसँ भय रहल मैथिलीक शंखनाद मिथिलाक गाम-गाममे मैथिली चेतनाक विकास अवश्य करत। २०. श्री योगानन्द झा, कबिलपुर, लहेरियासराय- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पोथीकेँ निकटसँ देखबाक अवसर भेटल अछि आ मैथिली जगतक एकटा उद्भट ओ समसामयिक दृष्टिसम्पन्न हस्ताक्षरक कलमबन्द परिचयसँ आह्लादित छी। "विदेह"क देवनागरी सँस्करण पटनामे रु. 80/- मे उपलब्ध भऽ सकल जे विभिन्न लेखक लोकनिक छायाचित्र, परिचय पत्रक ओ रचनावलीक सम्यक प्रकाशनसँ ऐतिहासिक कहल जा सकैछ। २१. श्री किशोरीकान्त मिश्र- कोलकाता- जय मैथिली, विदेहमे बहुत रास कविता, कथा, रिपोर्ट आदिक सचित्र संग्रह देखि आ आर अधिक प्रसन्नता मिथिलाक्षर देखि- बधाई स्वीकार कएल जाओ। २२.श्री जीवकान्त- विदेहक मुद्रित अंक पढ़ल- अद्भुत मेहनति। चाबस-चाबस। किछु समालोचना मरखाह..मुदा सत्य। २३. श्री भालचन्द्र झा- अपनेक कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक देखि बुझाएल जेना हम अपने छपलहुँ अछि। एकर विशालकाय आकृति अपनेक सर्वसमावेशताक परिचायक अछि। अपनेक रचना सामर्थ्यमे उत्तरोत्तर वृद्धि हो, एहि शुभकामनाक संग हार्दिक बधाई। २४.श्रीमती डॉ नीता झा- अहाँक कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़लहुँ। ज्योतिरीश्वर शब्दावली, कृषि मत्स्य शब्दावली आ सीत बसन्त आ सभ कथा, कविता, उपन्यास, बाल-किशोर साहित्य सभ उत्तम छल। मैथिलीक उत्तरोत्तर विकासक लक्ष्य दृष्टिगोचर होइत अछि। २५.श्री मायानन्द मिश्र- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक मे हमर उपन्यास स्त्रीधनक जे विरोध कएल गेल अछि तकर हम विरोध करैत छी।... कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पोथीक लेल शुभकामना।(श्रीमान् समालोचनाकेँ विरोधक रूपमे नहि लेल जाए।-गजेन्द्र ठाकुर) २६.श्री महेन्द्र हजारी- सम्पादक श्रीमिथिला- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़ि मोन हर्षित भऽ गेल..एखन पूरा पढ़यमे बहुत समय लागत, मुदा जतेक पढ़लहुँ से आह्लादित कएलक। २७.श्री केदारनाथ चौधरी- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक अद्भुत लागल, मैथिली साहित्य लेल ई पोथी एकटा प्रतिमान बनत। २८.श्री सत्यानन्द पाठक- विदेहक हम नियमित पाठक छी। ओकर स्वरूपक प्रशंसक छलहुँ। एम्हर अहाँक लिखल - कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक देखलहुँ। मोन आह्लादित भऽ उठल। कोनो रचना तरा-उपरी। २९.श्रीमती रमा झा-सम्पादक मिथिला दर्पण। कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक प्रिंट फॉर्म पढ़ि आ एकर गुणवत्ता देखि मोन प्रसन्न भऽ गेल, अद्भुत शब्द एकरा लेल प्रयुक्त कऽ रहल छी। विदेहक उत्तरोत्तर प्रगतिक शुभकामना। ३०.श्री नरेन्द्र झा, पटना- विदेह नियमित देखैत रहैत छी। मैथिली लेल अद्भुत काज कऽ रहल छी। ३१.श्री रामलोचन ठाकुर- कोलकाता- मिथिलाक्षर विदेह देखि मोन प्रसन्नतासँ भरि उठल, अंकक विशाल परिदृश्य आस्वस्तकारी अछि। ३२.श्री तारानन्द वियोगी- विदेह आ कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक देखि चकबिदोर लागि गेल। आश्चर्य। शुभकामना आ बधाई। ३३.श्रीमती प्रेमलता मिश्र “प्रेम”- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़लहुँ। सभ रचना उच्चकोटिक लागल। बधाई। ३४.श्री कीर्तिनारायण मिश्र- बेगूसराय- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक बड्ड नीक लागल, आगांक सभ काज लेल बधाई। ३५.श्री महाप्रकाश-सहरसा- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक नीक लागल, विशालकाय संगहि उत्तमकोटिक। ३६.श्री अग्निपुष्प- मिथिलाक्षर आ देवाक्षर विदेह पढ़ल..ई प्रथम तँ अछि एकरा प्रशंसामे मुदा हम एकरा दुस्साहसिक कहब। मिथिला चित्रकलाक स्तम्भकेँ मुदा अगिला अंकमे आर विस्तृत बनाऊ। ३७.श्री मंजर सुलेमान-दरभंगा- विदेहक जतेक प्रशंसा कएल जाए कम होएत। सभ चीज उत्तम। ३८.श्रीमती प्रोफेसर वीणा ठाकुर- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक उत्तम, पठनीय, विचारनीय। जे क्यो देखैत छथि पोथी प्राप्त करबाक उपाय पुछैत छथि। शुभकामना। ३९.श्री छत्रानन्द सिंह झा- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़लहुँ, बड्ड नीक सभ तरहेँ। ४०.श्री ताराकान्त झा- सम्पादक मैथिली दैनिक मिथिला समाद- विदेह तँ कन्टेन्ट प्रोवाइडरक काज कऽ रहल अछि। कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक अद्भुत लागल। ४१.डॉ रवीन्द्र कुमार चौधरी- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक बहुत नीक, बहुत मेहनतिक परिणाम। बधाई। ४२.श्री अमरनाथ- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक आ विदेह दुनू स्मरणीय घटना अछि, मैथिली साहित्य मध्य। ४३.श्री पंचानन मिश्र- विदेहक वैविध्य आ निरन्तरता प्रभावित करैत अछि, शुभकामना। ४४.श्री केदार कानन- कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक लेल अनेक धन्यवाद, शुभकामना आ बधाइ स्वीकार करी। आ नचिकेताक भूमिका पढ़लहुँ। शुरूमे तँ लागल जेना कोनो उपन्यास अहाँ द्वारा सृजित भेल अछि मुदा पोथी उनटौला पर ज्ञात भेल जे एहिमे तँ सभ विधा समाहित अछि। ४५.श्री धनाकर ठाकुर- अहाँ नीक काज कऽ रहल छी। फोटो गैलरीमे चित्र एहि शताब्दीक जन्मतिथिक अनुसार रहैत तऽ नीक। ४६.श्री आशीष झा- अहाँक पुस्तकक संबंधमे एतबा लिखबा सँ अपना कए नहि रोकि सकलहुँ जे ई किताब मात्र किताब नहि थीक, ई एकटा उम्मीद छी जे मैथिली अहाँ सन पुत्रक सेवा सँ निरंतर समृद्ध होइत चिरजीवन कए प्राप्त करत। ४७.श्री शम्भु कुमार सिंह- विदेहक तत्परता आ क्रियाशीलता देखि आह्लादित भऽ रहल छी। निश्चितरूपेण कहल जा सकैछ जे समकालीन मैथिली पत्रिकाक इतिहासमे विदेहक नाम स्वर्णाक्षरमे लिखल जाएत। ओहि कुरुक्षेत्रक घटना सभ तँ अठारहे दिनमे खतम भऽ गेल रहए मुदा अहाँक कुरुक्षेत्रम् तँ अशेष अछि। ४८.डॉ. अजीत मिश्र- अपनेक प्रयासक कतबो प्रशंसा कएल जाए कमे होएतैक। मैथिली साहित्यमे अहाँ द्वारा कएल गेल काज युग-युगान्तर धरि पूजनीय रहत। ४९.श्री बीरेन्द्र मल्लिक- अहाँक कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक आ विदेह:सदेह पढ़ि अति प्रसन्नता भेल। अहाँक स्वास्थ्य ठीक रहए आ उत्साह बनल रहए से कामना। ५०.श्री कुमार राधारमण- अहाँक दिशा-निर्देशमे विदेह पहिल मैथिली ई-जर्नल देखि अति प्रसन्नता भेल। हमर शुभकामना। ५१.श्री फूलचन्द्र झा प्रवीण-विदेह:सदेह पढ़ने रही मुदा कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक देखि बढ़ाई देबा लेल बाध्य भऽ गेलहुँ। आब विश्वास भऽ गेल जे मैथिली नहि मरत। अशेष शुभकामना। ५२.श्री विभूति आनन्द- विदेह:सदेह देखि, ओकर विस्तार देखि अति प्रसन्नता भेल। ५३.श्री मानेश्वर मनुज-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक एकर भव्यता देखि अति प्रसन्नता भेल, एतेक विशाल ग्रन्थ मैथिलीमे आइ धरि नहि देखने रही। एहिना भविष्यमे काज करैत रही, शुभकामना। ५४.श्री विद्यानन्द झा- आइ.आइ.एम.कोलकाता- कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक विस्तार, छपाईक संग गुणवत्ता देखि अति प्रसन्नता भेल। ५५.श्री अरविन्द ठाकुर-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक मैथिली साहित्यमे कएल गेल एहि तरहक पहिल प्रयोग अछि, शुभकामना। ५६.श्री कुमार पवन-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक पढ़ि रहल छी। किछु लघुकथा पढ़ल अछि, बहुत मार्मिक छल। ५७. श्री प्रदीप बिहारी-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक देखल, बधाई। ५८.डॉ मणिकान्त ठाकुर-कैलिफोर्निया- अपन विलक्षण नियमित सेवासँ हमरा लोकनिक हृदयमे विदेह सदेह भऽ गेल अछि। ५९.श्री धीरेन्द्र प्रेमर्षि- अहाँक समस्त प्रयास सराहनीय। दुख होइत अछि जखन अहाँक प्रयासमे अपेक्षित सहयोग नहि कऽ पबैत छी। ६०.श्री देवशंकर नवीन- विदेहक निरन्तरता आ विशाल स्वरूप- विशाल पाठक वर्ग, एकरा ऐतिहासिक बनबैत अछि। ६१.श्री मोहन भारद्वाज- अहाँक समस्त कार्य देखल, बहुत नीक। एखन किछु परेशानीमे छी, मुदा शीघ्र सहयोग देब। ६२.श्री फजलुर रहमान हाशमी-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक मे एतेक मेहनतक लेल अहाँ साधुवादक अधिकारी छी। ६३.श्री लक्ष्मण झा "सागर"- मैथिलीमे चमत्कारिक रूपेँ अहाँक प्रवेश आह्लादकारी अछि।..अहाँकेँ एखन आर..दूर..बहुत दूरधरि जेबाक अछि। स्वस्थ आ प्रसन्न रही। ६४.श्री जगदीश प्रसाद मंडल-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक पढ़लहुँ । कथा सभ आ उपन्यास सहस्रबाढ़नि पूर्णरूपेँ पढ़ि गेल छी। गाम-घरक भौगोलिक विवरणक जे सूक्ष्म वर्णन सहस्रबाढ़निमे अछि, से चकित कएलक, एहि संग्रहक कथा-उपन्यास मैथिली लेखनमे विविधता अनलक अछि। समालोचना शास्त्रमे अहाँक दृष्टि वैयक्तिक नहि वरन् सामाजिक आ कल्याणकारी अछि, से प्रशंसनीय। ६५.श्री अशोक झा-अध्यक्ष मिथिला विकास परिषद- कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक लेल बधाई आ आगाँ लेल शुभकामना। ६६.श्री ठाकुर प्रसाद मुर्मु- अद्भुत प्रयास। धन्यवादक संग प्रार्थना जे अपन माटि-पानिकेँ ध्यानमे राखि अंकक समायोजन कएल जाए। नव अंक धरि प्रयास सराहनीय। विदेहकेँ बहुत-बहुत धन्यवाद जे एहेन सुन्दर-सुन्दर सचार (आलेख) लगा रहल छथि। सभटा ग्रहणीय- पठनीय। ६७.बुद्धिनाथ मिश्र- प्रिय गजेन्द्र जी,अहाँक सम्पादन मे प्रकाशित ‘विदेह’आ ‘कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक’ विलक्षण पत्रिका आ विलक्षण पोथी! की नहि अछि अहाँक सम्पादनमे? एहि प्रयत्न सँ मैथिली क विकास होयत,निस्संदेह। ६८.श्री बृखेश चन्द्र लाल- गजेन्द्रजी, अपनेक पुस्तक कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़ि मोन गदगद भय गेल , हृदयसँ अनुगृहित छी । हार्दिक शुभकामना । ६९.श्री परमेश्वर कापड़ि - श्री गजेन्द्र जी । कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़ि गदगद आ नेहाल भेलहुँ। ७०.श्री रवीन्द्रनाथ ठाकुर- विदेह पढ़ैत रहैत छी। धीरेन्द्र प्रेमर्षिक मैथिली गजलपर आलेख पढ़लहुँ। मैथिली गजल कत्तऽ सँ कत्तऽ चलि गेलैक आ ओ अपन आलेखमे मात्र अपन जानल-पहिचानल लोकक चर्च कएने छथि। जेना मैथिलीमे मठक परम्परा रहल अछि। (स्पष्टीकरण- श्रीमान्, प्रेमर्षि जी ओहि आलेखमे ई स्पष्ट लिखने छथि जे किनको नाम जे छुटि गेल छन्हि तँ से मात्र आलेखक लेखकक जानकारी नहि रहबाक द्वारे, एहिमे आन कोनो कारण नहि देखल जाय। अहाँसँ एहि विषयपर विस्तृत आलेख सादर आमंत्रित अछि।-सम्पादक) ७१.श्री मंत्रेश्वर झा- विदेह पढ़ल आ संगहि अहाँक मैगनम ओपस कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक सेहो, अति उत्तम। मैथिलीक लेल कएल जा रहल अहाँक समस्त कार्य अतुलनीय अछि। ७२. श्री हरेकृष्ण झा- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक मैथिलीमे अपन तरहक एकमात्र ग्रन्थ अछि, एहिमे लेखकक समग्र दृष्टि आ रचना कौशल देखबामे आएल जे लेखकक फील्डवर्कसँ जुड़ल रहबाक कारणसँ अछि। ७३.श्री सुकान्त सोम- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक मे समाजक इतिहास आ वर्तमानसँ अहाँक जुड़ाव बड्ड नीक लागल, अहाँ एहि क्षेत्रमे आर आगाँ काज करब से आशा अछि। ७४.प्रोफेसर मदन मिश्र- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक सन किताब मैथिलीमे पहिले अछि आ एतेक विशाल संग्रहपर शोध कएल जा सकैत अछि। भविष्यक लेल शुभकामना। ७५.प्रोफेसर कमला चौधरी- मैथिलीमे कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक सन पोथी आबए जे गुण आ रूप दुनूमे निस्सन होअए, से बहुत दिनसँ आकांक्षा छल, ओ आब जा कऽ पूर्ण भेल। पोथी एक हाथसँ दोसर हाथ घुमि रहल अछि, एहिना आगाँ सेहो अहाँसँ आशा अछि। ७६.श्री उदय चन्द्र झा "विनोद": गजेन्द्रजी, अहाँ जतेक काज कएलहुँ अछि से मैथिलीमे आइ धरि कियो नहि कएने छल। शुभकामना। अहाँकेँ एखन बहुत काज आर करबाक अछि। ७७.श्री कृष्ण कुमार कश्यप: गजेन्द्र ठाकुरजी, अहाँसँ भेँट एकटा स्मरणीय क्षण बनि गेल। अहाँ जतेक काज एहि बएसमे कऽ गेल छी ताहिसँ हजार गुणा आर बेशीक आशा अछि। ७८.श्री मणिकान्त दास: अहाँक मैथिलीक कार्यक प्रशंसा लेल शब्द नहि भेटैत अछि। अहाँक कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक सम्पूर्ण रूपेँ पढ़ि गेलहुँ। त्वञ्चाहञ्च बड्ड नीक लागल। विदेह मैथिली साहित्य आन्दोलन (c)२००४-१०. सर्वाधिकार लेखकाधीन आ जतय लेखकक नाम नहि अछि ततय संपादकाधीन। विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। सह-सम्पादक: उमेश मंडल। सहायक सम्पादक: शिव कुमार झा आ मुन्नाजी (मनोज कुमार कर्ण)। भाषा-सम्पादन: नागेन्द्र कुमार झा आ पञ्जीकार विद्यानन्द झा। कला-सम्पादन: ज्योति सुनीत चौधरी आ रश्मि रेखा सिन्हा। सम्पादक-शोध-अन्वेषण: डॉ. जया वर्मा आ डॉ. राजीव कुमार वर्मा। रचनाकार अपन मौलिक आ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि) ggajendra@videha.com केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx, .rtf वा .txt फॉर्मेटमे पठा सकैत छथि। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेताह, से आशा करैत छी। रचनाक अंतमे टाइप रहय, जे ई रचना मौलिक अछि, आ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। मेल प्राप्त होयबाक बाद यथासंभव शीघ्र ( सात दिनक भीतर) एकर प्रकाशनक अंकक सूचना देल जायत। ’विदेह' प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका अछि आ एहिमे मैथिली, संस्कृत आ अंग्रेजीमे मिथिला आ मैथिलीसँ संबंधित रचना प्रकाशित कएल जाइत अछि। एहि ई पत्रिकाकेँ श्रीमति लक्ष्मी ठाकुर द्वारा मासक ०१ आ १५ तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि। (c) 2004-10 सर्वाधिकार सुरक्षित। विदेहमे प्रकाशित सभटा रचना आ आर्काइवक सर्वाधिकार रचनाकार आ संग्रहकर्त्ताक लगमे छन्हि। रचनाक अनुवाद आ पुनः प्रकाशन किंवा आर्काइवक उपयोगक अधिकार किनबाक हेतु ggajendra@videha.co.in पर संपर्क करू। एहि साइटकेँ प्रीति झा ठाकुर, मधूलिका चौधरी आ रश्मि प्रिया द्वारा डिजाइन कएल गेल। सिद्धिरस्तु वि दे ह विदेह Videha বিদেহ विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका Videha Ist Maithili Fortnightly e Magazine विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका 'विदेह' ७१ म अंक ०१ दिसम्बर २०१० (वर्ष ३ मास ३६ अंक ७१)http://www.videha.co.in/ मानुषीमिह संस्कृताम् ISSN 2229-547X VIDEHA वि दे ह विदेह Videha বিদেহ विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका Videha Ist Maithili Fortnightly e Magazine विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका 'विदेह' ७१ म अंक ०१ दिसम्बर २०१० (वर्ष ३ मास ३६ अंक ७१)http://www.videha.co.in/ मानुषीमिह संस्कृताम् ISSN 2229-547X VIDEHA
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