VIDEHA — Issue 72 / अंक ७२

Publication: VIDEHA · Issue: 72
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378 379 ISSN 2229-547X VIDEHA 'विदेह' ७२ म अंक १५ दिसम्बर २०१० (वर्ष ३ मास ३६ अंक ७२) वि  दे  ह विदेह Videha বিদেহ http://www.videha.co.in  विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका Videha Ist Maithili Fortnightly e Magazine   नव अंक देखबाक लेल पृष्ठ सभकेँ रिफ्रेश कए देखू। Always refresh the pages for viewing new issue of VIDEHA. Read in your own script Roman(Eng)Gujarati Bangla Oriya Gurmukhi Telugu Tamil Kannada Malayalam Hindi एहि अंकमे अछि:- १. संपादकीय संदेश २. गद्य २.१. किशन कारीगर- आब मानि जाउ ने। (एकटा हास्य रेडियो नाटक) २.२.रविभूषण पाठक- नाटक ‘रिहर्सल’ २.३.१.शि‍वकुमार झा टि‍ल्‍लू- मैथि‍ली नाटकक वि‍कासमे आनंद जीक योगदान २. गजेन्द्र ठाकुर- चारिटा अंग्रेजी नाटक- डॉक्टर फॉस्टस, सैमसन एगोनिस्टेस, मर्डर इन द कैथेड्रल आ स्ट्राइफ २.४.   प्रकाश चन्द्र- प्रयोग एकांकीक रंगमंचीय प्रयोग २.५.१धीरेन्‍द्र कुमार- एकांकी- जरैत मोमबत्ती २ डॉ. शेफालिका वर्मा- एकांकी-     एकटा आर महाभिनिष्क्रमण २.६.१. ज्योति सुनीत चौधरी एकांकी- केसर २. मैथिली कवियित्री श्रीमति ज्योति सुनीत चौधरीसँ मुन्नाजीक गप्प-सप्प २.७.१.सुजीत कुमार झा- बिहारोमे मैथिली—मैथिली मिथिलाक विधायक सभ मैथिलीमे सपथ लेलन्हि २. रमेश- बहस- पंकज पराशरक साहित्यिक चोरि मैथिली साहित्यक कारी अध्याय थिक ३. उमेश मंडल सुपौलक कथा गोष्‍ठी : ४ दि‍सम्‍बर २०१० २.८.१. विनीत उत्पल- दीर्घकथा- घोड़ीपर चढ़ि लेब हम डिग्री - दोसर भाग २. अकलेश मंडल-  लघुकथा- टीटनेस ३. कपि‍लेश्वर राउत- कथा- कि‍सानक पूजी ४ राम वि‍लास साहु- लघुकथा- परि‍श्रमक भीख ५.भारत भूषण झा- कथा-आत्‍मबल ३. पद्य ३.१.डॉ. नरेश कुमार ‘वि‍कल’ दूटा गजल ३.२.पंकज झा- ३टा पद्य ३.३.ज्योति सुनीत चौधरी -सैण्टाक अस्तित्व ३.४.राजेश मोहन झा- कवि‍ता- उनटा-पुनटा ३.५.नवीन कुमार आशा -दूटा पद्य ३.६.१. संजय कुमार मंडल- कवि‍ता- मीता हमरा मोन पड़ैए २. राजदेव मंडल-कवि‍ता- नेहाइपर लेखनी ३.७.१शि‍वकुमार झा टि‍ल्‍लू- कवि‍ता- साहि‍त्‍यक वि‍दूषक २ रूपेश कुमार झा 'त्योंथ'- हम छी आजुक नेता ३.८.गंगेश गुंजन- राधा- २७ म खेप ४. मिथिला कला-संगीत-१.श्वेता झा चौधरी २.ज्योति सुनीत चौधरी ३श्वेता झा (सिंगापुर) . बालानां कृते-पंकज झा (बाल कविता) माँ गई माँ . भाषापाक रचना-लेखन -[मानक मैथिली], [विदेहक मैथिली-अंग्रेजी आ अंग्रेजी मैथिली कोष (इंटरनेटपर पहिल बेर सर्च-डिक्शनरी) एम.एस. एस.क्यू.एल. सर्वर आधारित -Based on ms-sql server Maithili-English and English-Maithili Dictionary.] .VIDEHA FOR NON RESIDENTS .1.Original Poem in Maithili by Kalikant Jha "Buch" Translated into English by Jyoti Jha Chaudhary विदेह ई-पत्रिकाक सभटा पुरान अंक ( ब्रेल, तिरहुता आ देवनागरी मे ) पी.डी.एफ. डाउनलोडक लेल नीचाँक लिंकपर उपलब्ध अछि। All the old issues of Videha e journal ( in Braille, Tirhuta and Devanagari versions ) are available for pdf download at the following link. विदेह ई-पत्रिकाक सभटा पुरान अंक ब्रेल, तिरहुता आ देवनागरी रूपमे Videha e journal's all old issues in Braille Tirhuta and Devanagari versions विदेह ई-पत्रिकाक पहिल ५० अंक

विदेह ई-पत्रिकाक ५०म सँ आगाँक अंक विदेह आर.एस.एस.फीड। "विदेह" ई-पत्रिका ई-पत्रसँ प्राप्त करू। अपन मित्रकेँ विदेहक विषयमे सूचित करू। ↑ विदेह आर.एस.एस.फीड एनीमेटरकेँ अपन साइट/ ब्लॉगपर लगाऊ। ब्लॉग "लेआउट" पर "एड गाडजेट" मे "फीड" सेलेक्ट कए "फीड यू.आर.एल." मे http://www.videha.co.in/index.xml टाइप केलासँ सेहो विदेह फीड प्राप्त कए सकैत छी। गूगल रीडरमे पढ़बा लेल http://reader.google.com/ पर जा कऽ Add a  Subscription बटन क्लिक करू आ खाली स्थानमे http://www.videha.co.in/index.xml पेस्ट करू आ Add  बटन दबाऊ। मैथिली देवनागरी वा मिथिलाक्षरमे नहि देखि/ लिखि पाबि रहल छी, (cannot see/write Maithili in Devanagari/ Mithilakshara follow links below or contact at ggajendra@videha.com) तँ एहि हेतु नीचाँक लिंक सभ पर जाऊ। संगहि विदेहक स्तंभ मैथिली भाषापाक/ रचना लेखनक नव-पुरान अंक पढ़ू। http://devanaagarii.net/ http://kaulonline.com/uninagari/  (एतए बॉक्समे ऑनलाइन देवनागरी टाइप करू, बॉक्ससँ कॉपी करू आ वर्ड डॉक्युमेन्टमे पेस्ट कए वर्ड फाइलकेँ सेव करू। विशेष जानकारीक लेल ggajendra@videha.com पर सम्पर्क करू।)(Use Firefox 3.0 (from WWW.MOZILLA.COM )/ Opera/ Safari/ Internet Explorer 8.0/ Flock 2.0/ Google Chrome for best view of 'Videha' Maithili e-journal at http://www.videha.co.in/ .) Go to the link below for download of old issues of VIDEHA Maithili e magazine in .pdf format and Maithili Audio/ Video/ Book/ paintings/ photo files. विदेहक पुरान अंक आ ऑडियो/ वीडियो/ पोथी/ चित्रकला/ फोटो सभक फाइल सभ (उच्चारण, बड़ सुख सार आ दूर्वाक्षत मंत्र सहित) डाउनलोड करबाक हेतु नीचाँक लिंक पर जाऊ। VIDEHA ARCHIVE विदेह आर्काइव भारतीय डाक विभाग द्वारा जारी कवि, नाटककार आ धर्मशास्त्री विद्यापतिक स्टाम्प। भारत आ नेपालक माटिमे पसरल मिथिलाक धरती प्राचीन कालहिसँ महान पुरुष ओ महिला लोकनिक कर्मभूमि रहल अछि। मिथिलाक महान पुरुष ओ महिला लोकनिक चित्र 'मिथिला रत्न' मे देखू। गौरी-शंकरक पालवंश कालक मूर्त्ति, एहिमे मिथिलाक्षरमे (१२०० वर्ष पूर्वक) अभिलेख अंकित अछि। मिथिलाक भारत आ नेपालक माटिमे पसरल एहि तरहक अन्यान्य प्राचीन आ नव स्थापत्य, चित्र, अभिलेख आ मूर्त्तिकलाक़ हेतु देखू 'मिथिलाक खोज' मिथिला, मैथिल आ मैथिलीसँ सम्बन्धित सूचना, सम्पर्क, अन्वेषण संगहि विदेहक सर्च-इंजन आ न्यूज सर्विस आ मिथिला, मैथिल आ मैथिलीसँ सम्बन्धित वेबसाइट सभक समग्र संकलनक लेल देखू "विदेह सूचना संपर्क अन्वेषण" विदेह जालवृत्तक डिसकसन फोरमपर जाऊ। "मैथिल आर मिथिला" (मैथिलीक सभसँ लोकप्रिय जालवृत्त) पर जाऊ। १. संपादकीय मैथिली नाटकक एकटा समानान्तर दुनियाँ रामखेलावन मंडार- गाम कटघरा, प्रखण्ड- शिवाजीनगर, जिला समस्तीपुर। हिनके संग बिन्देश्वर मंडल सेहो छलाह। उठैत मैथिली कोरस आ - माँ गै माँ तूँ हमरा बंदूक मँगा दे कि हम तँ माँ सिपाही हेबै- एखनो लोककेँ मोन छन्हि। एहि मंडली द्वारा रेशमा-चूहड़, शीत-बसन्त, अल्हा-ऊदल, नटुआ दयाल ई सभ पद्य नाटिका पस्तुत कएल जाइत छल। मैथिली-बिदेसिया- पिआ देसाँतरक टीम सहरसा-सुपौल-पूर्णियाँसँ अबैत छल।

हासन-हुसन नाटिका होइत छल।

रामरक्षा चौधरी नाट्यकला परिषद, ग्राम- गायघाट, पंचायत करियन, पो. वैद्यनाथपुर, जिला- समस्तीपुर विद्यापति नाटक गोरखपुर धरि जा कऽ खेलाएल छल। एहि मंडली द्वारा प्रस्तुत अन्य नाटक अछि- लौंगिया मेरचाइ, विद्यापति, चीनीक लड्डू आ बसात। सूचना: रंगकर्मी प्रमिला झा नाट्यवृत्ति 2010- ज्योति झा- दिल्ली, किरण झा, कोलकाता आ रितु कर्ण, पटनाकेँ देल गेल अछि। मैलोरंग द्वारा घोषित पहिल ज्योतिरीश्वर सम्मान श्रीमति प्रेमलता मिश्र प्रेम केँ देबाक घोषणा भेल अछि जे स्वागत योग्य अछि। मुदा आगाँसँ मैथिली नाटकक समानान्तर दुनियाँकेँ सेहो अभिलेखित आ सम्मानित कएल जएबाक प्रयास होएबाक चाही। मैथिली-समीक्षा विशेषांक: विदेहक हाइकू, गजल, लघुकथा, बाल-किशोर विशेषांक आ नाटक-एकांकी विशेषांकक सफल आयोजनक बाद विदेहक 15 जनवरी 2011 अंक मैथिली-समीक्षाक विशेषांक रहत। एहि लेल टंकित रचना, जकर ने कोनो शब्दक बन्धन छै आ ने विषएक,  13 जनवरी 2011 धरि लेखक ई-मेलसँ पठा सकै छथि। रचनाकार अपन मौलिक आ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि) ggajendra@videha.com केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx, .rtf वा .txt फॉर्मेटमे पठा सकैत छथि। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेताह, से आशा करैत छी। रचनाक अंतमे टाइप रहय, जे ई रचना मौलिक अछि, आ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि।

(विदेह ई पत्रिकाकेँ ५ जुलाइ २००४ सँ एखन धरि १०७ देशक १,६२७ ठामसँ ५३, १८३ गोटे द्वारा विभिन्न आइ.एस.पी. सँ २,८०,०३२ बेर देखल गेल अछि; धन्यवाद पाठकगण। - गूगल एनेलेटिक्स डेटा।) गजेन्द्र ठाकुर ggajendra@videha.com २. गद्य २.१. किशन कारीगर- आब मानि जाउ ने। (एकटा हास्य रेडियो नाटक) २.२.रविभूषण पाठक- नाटक ‘रिहर्सल’ २.३.१.शि‍वकुमार झा टि‍ल्‍लू- मैथि‍ली नाटकक वि‍कासमे आनंद जीक योगदान २. गजेन्द्र ठाकुर- चारिटा अंग्रेजी नाटक- डॉक्टर फॉस्टस, सैमसन एगोनिस्टेस, मर्डर इन द कैथेड्रल आ स्ट्राइफ २.४.   प्रकाश चन्द्र- प्रयोग एकांकीक रंगमंचीय प्रयोग २.५.१धीरेन्‍द्र कुमार- एकांकी- जरैत मोमबत्ती २ डॉ. शेफालिका वर्मा- एकांकी-     एकटा आर महाभिनिष्क्रमण २.६.१. ज्योति सुनीत चौधरी एकांकी- केसर २. मैथिली कवियित्री श्रीमति ज्योति सुनीत चौधरीसँ मुन्नाजीक गप्प-सप्प २.७.१.सुजीत कुमार झा- बिहारोमे मैथिली—मैथिली मिथिलाक विधायक सभ मैथिलीमे सपथ लेलन्हि २. रमेश- बहस- पंकज पराशरक साहित्यिक चोरि मैथिली साहित्यक कारी अध्याय थिक ३. उमेश मंडल सुपौलक कथा गोष्‍ठी : ४ दि‍सम्‍बर २०१० २.८.१. विनीत उत्पल- दीर्घकथा- घोड़ीपर चढ़ि लेब हम डिग्री - दोसर भाग २. अकलेश मंडल-  लघुकथा- टीटनेस ३. कपि‍लेश्वर राउत- कथा- कि‍सानक पूजी ४ राम वि‍लास साहु- लघुकथा- परि‍श्रमक भीख ५.भारत भूषण झा- कथा-आत्‍मबल किशन कारीगर आब मानि जाउ ने। (एकटा हास्य रेडियो नाटक) परिचय पात:- 1      राजेश - नायक। 2      कमला - नायिका-राजेशक पत्नी उर्फ पाही वाली। 3      मनोहर - राजेशक लंगोटिया दोस्त। 4      विमला - मनोहरक पत्नी उर्फ ठारही वाली। 5      नीलू - विमलाक सहेली। 6      सोनी - नीलूक सहेली। 7      मदन - दोस्त । नोट:-भारतीय कॉपीराइट अधिनियम के तहत सर्वाधिकार लेखक कें अधिन सुरक्षित। लेखकक लिखित अनुमतिक बिना नाटकक कोनो अंशक प्रसारण व प्रकाशन नहि केल जा सकैत अछि। । प्रथम दृश्य। ध्वनि संगीत कमलाः- (कनेक तमसाएल भाव में) मारे मुहॅ धकेए आब बाट तकैत-तकैत मोन अकछा गेल। हिनका किछू अनबाक लेल नहिं कहलियैन कि एकटा आफद मोल लए लेलहॅू। तखने राजेशक प्रवेश। राजेश:- (दारूक निशा में बरबराइत) हे यै पाही वाली कतए छी यै एम्हर आउ ने यै पाही वाली। कमला:- (खूम खिसियाएल भाव मे) लगैत अछि जेना पूरा अन्धरा बजारे खरीदने आबि रहल छथि। तहि द्वारे अन्हराएल छथि। राजेशः- हे यै पाही वाली अहॉ जूनी खिसियाउ एकबेर हमर गप सुनू ने। कमलाः- हम कि खाक सुनू अहॉ के तए हमर कोनो फिकिरे नहि रहैए। राजेशः-( निशा में मातल गबैत अछि)  भिजल ठोर अहॉके। कमलाः- हे दैब रै दैब अहॉक एहेन अवस्था देखि तए हमर ठोर मुहॅ सुखा गेल आ अहॅा कहैत छी जे भिजल अछि। राजेशः- अहॉ फुसियाहीं के खंउजा रहल छी गीत सुनू ने। प्यासल दिल ल..ल हमर। कमलाः-( खउंजा के)  हे भगवान एतेक पीबलाक बादो अहॉके पियास लगले अछि तए हैए लिअ घैला मेहक ठंढ़ा पानि। राजेशः- (हॅंसैत बरबराएत अछि) अहॅू कमाले कए रहल छी पहिने गीत सुनि लियए ने। राजेशः- कियो हमरा संगे भिंसर तक रहतै तकरा हम करबै खूम प्यार ओ...हो...ओ हो...हो...ओ..हो...हो। कमलाः- आब कि खाक प्यार करब । आब एक पहर बाद भिंसरो भए जेतैए। राजेशः- (गीत गबैत गबैत सूतबाक प्रयास) आ सिटी बजा रहल अछि। कमला:- हे महादेव एहेन गबैया के नींद दए दिऔय। राजेशः- आब हयिए हम नानी गाम गेलहॅू आ अहॉ अपना गाम सॅ जलखै नेने आउ। कमला:- अच्छा आब बूझनूक बच्चा जेंका चुपेचाप कले-बले सूति रहू ने। राजेश:- ठीक छै पाही वाली जॅं अहॉं कहैत छी तऽ हम सूति रहैत छी मुदा जलखै बेर मे हमरा उठा देब। राजेश सूति रहैत अछि। ।दृश्य समाप्त। दृश्य-2 प्रारंभ। चिड़ैय चुनमून के चूं...चूं कें ध्वनी कमला:- (राजेश के उठबैत) हे यै आब उठि जाउ ने भिंसर भए गेलैए। राजेश:- पाही वाली अहॉं ठीके कहैत छी की? कमला:- ठीके नहिं तऽ की झूठ कनेक अपने ऑंखि सॅ देखू भिंसर भऽ गेलै। राजेशः- हॅं यै ठीके मे भिंसर भऽ गेलैए अच्छा तऽ आब हम मॉर्निंग वॉक माने घूमि फिरी कऽ अबैत छी। कमला:- अच्छा ठीक छै त जाउ मुदा जल्दीए घूमी क चली आएब। ताबैत हम चाह बना के रखने रहैत छी। राजेशः- बेस तऽ आब हम घूमने अबैत छी। ओ के बाई-बाई। राजेशक घर सॅं प्रस्थान। पार्क में बातचीत करबाक ध्वनी प्रभाव। मनोहर:- (दौगि रहल अछि आ हॉफि लैत) भाई आई काल्हि राजेश लंगोटिया देखबा मे नहि आबि रहल अछि। मदन:- (खैनी चुनेबाक पटपट)  से तऽ ठीके मे भाई हमरा तऽ बूझना जाइए जे ओ तऽ सासुर मे मंगनीक तरूआ तोड़ी रहल अछि। मनोहर:- से जे करैत हुए मुदा भेंट तऽ करबाक चाहि। मदन:- (हरबड़ाइत)  हई ए ए ई लियअ नाम लैत देरी राजेश सेहो आबिए गेल। दौगल अबैत राजेशक प्रवेश। मनोहर:- (राजेश के देखैत) ओई-होई हमर दोस कि हाल चाल छौ। राजेशः- हम तऽ ठीके छी भाई तू अपन कह कि समाचार। मदन:- राम राम यौ लंगोटिया भाई। राजेशः- (हॅसैत) आहा हा हा राम राम यौ चिकनौटिया भाई। मदन:- राजेशक हाल तऽ हमरा सॅं पूछू बेचारा चिंता सॅं सनठी जेंकॉं सूखा गेल। राजेश:- कि भेलैए एकरा से कहब ने कोनो दुख तकलीफ आफद विपैत। मदन:- (राजेश स)ॅ हमरा सॅ त निक जे राजेश भाई  अपने कहिए दहक तखन इहो बकलेल छौड़ा बूझिए जेतैए। मनोहर:-( उदास भऽ कें) भाई कि कहियौअ जहिया सॅ ठारही वाली रूसि कें अपना नैहर चैल गेलैए हमरा तऽ एक्को कनमा निक्के नहि लगैत अछि। राजेश:- किएक तूं भाउजि के मनेलही नहि? मनोहर:- हं रौ भाई कतबो मनेलियैए मुदा ओ नहि मानलकै। राजेशः- से किएक एहेन कि भऽ गेलैए जे भाउजी मुहॅ फूलौने ठारही चलि गेलौह। मनोहरः- हमरा दारू पीबाक हिसक छल एहि द्वारे हमर ठारही वाली सपत देलक मुदा हमर हिसक छूटल ने। राजेशः-( किछू सोचैत) हमरो पाही वाली हमरा सॅ रूसल रहैत अछि किएक तऽ ओकर फरमाईश जे पूरा नहि केलियै। मदनः- (खैनी चूनेबाक पटपट अवाज) हें हें हा हा हम तऽ कहैत छी दूनू गोटे अपना-अपना कनियॉ ंके मना लियअ आ झगरे खतम। मनोहरः- अहॉ ठीके कहलहूॅं मदन भाई। आब हम अपना ठारही वाली के मनाएब। मदन:- हर हर महादेव तऽ झट सॅं निकालू हमर सवा रूपैया दक्षिणा। मनोहरः- ओकरा सामने सपत खाएब जे आब हम दारू के मुहॅं नहि लगाएब। राजेशः- तऽ देरि किएक? चल ने ठारही वाली भाउजी के मनेबाक लेल अंधराठारही चलैत छी। मनोहरः- ठीके रौ भाई चल। मुदा जाइ सॅ पहिने तूं अपना पाही वाली के फोन कऽ दहि ने। राजेश:- तूं ठीके कहि रहल छें हम एखने फोन लगबैत छी। मोबाइल सॅं फोन लगेबाक ध्वनी प्रभाव स्वर:- महिलाक अवाज़ हेल्लो । राजेश:- हम आई घर नहिं आएब। किएक तऽ हम मनोहर संगे ओकर सासुर जा रहल छी। स्वरः- अहॉं के तऽ एक्को रति हमर फरमाईश मोन नहि रहैए। राजेशः- पाहि वाली अहॉ जूनि रूसि हम अहॉ लेल किछू ने किछू नेने आएब। स्वर:-ठीक छै तऽ जाउ मुदा जल्दीए चलि आएब। बाई- बाई। राजेशः- बेस त बाई-बाई। फोन कटबाक ध्वनी। राजेशः- पाही वाली तऽ मानि गेलैए चल आब ठारही वाली के मनबैत छी। मनोहरः- हॉफैत हं हॅं हं किएक नहि? जल्दी दौगल चल। मदनः- भ भ भाई हमर द द दक्षिणा। हॅसैत हॅसैत मनोहर आ राजेशक प्रस्थान। मदन:- (हॅसि क) ई दूनू गोटे त सासुर चलि गेल त आब हमहू जाइत छी बाबूबरही अपना पंडिताइन के भेंट कए आबि। हें हें हें। दृश्य -3 लड़की के जोर सॅं हॅसबाक अवाज़ (नीलू आ सोनी दूनू गोटे गीत गाबि हॅसी मजाक करै मे लागल अछि) नीलूः- गीत गबैत आबि जाउ एके बेर आबि जाउ। सोनीः- केकरा बजा रहल छीहि गे आ आ आबि जाउ। नीलू-( मुस्कि मारैत) केकरो नहि तोरा ओझा के। सोनी:-(गीत गबैत) तऽ कहि ने सोझहा आबि जाउ एक बेर आबि जाउ। ताबैत मनोहर आ राजेशक प्रवेश। नीलूः- दूनू गोटे के देखी क) दूल्हा बाबू आबि जाउ एक बेर आबि जाउ। मनोहर:- अहॉ बजेलहूूॅं आ हम हाजिर। कहू समाचार। सोनीः- ठीके मे गै बहिना देखही गे एहेन धरफड़िया दूल्हा देखल ने। नीलूः- प्रणाम यौ पाहुन। रस्ता मे कोनो दिक्कस तऽ नहि भेल ने? मनोहरः- दिक्कस कि खरंजा आ टूटलाहा पिच पर साइकिल चलबैत काल हार पांजर एक भऽ गेल। सोनी:- त आब मजा आबि रहल अछि। राजेशः- मजा तऽ आबि रहल अछि मुदा हमरा भाउजी सॅं भेट करा दितहॅू तए ठीक्के मे मजा आबि जेतैए। नीलू:- अहॉं के नहिं चिन्हलहूॅं यौ हरबड़िया पाहुन। राजेशः- हॅंसि क हा हा हा हमरा नहि चिन्हलहूॅ हम अहॉ पाहुनक लंगोटिया दोस राजेश छी। (सभ गोटे ठहक्का लगबैत) सोनीः- अहॉं कतेक नीक बजैत छी। चलू ने घूमैए लेल। नीलूः- हॅ यौ पाहुन चलू चलू गाछी कलम आ खेत पथार सभ देखने अबैत छी। राजेशः- हॅं हॅं किएक नहि चलू ने तीनू गोटे घूमने अबैत छी। ठहक्का लगबैत तीनू गोटेक प्रस्थान। मनोहर:- वाह रे किस्मत। सासुर हमर मुदा मान-दान एक्कर। हाई रे किस्मत के खेल। तखन गीत गबैत विमलाक प्रवेश। (गीतक ध्वनी- पिया परदेश सॅ पजेब नेने एब यौ पिया) विमलाः- आश्चर्य भाव सॅं अ अ अहॉं। मनोहरः- हॅ अहॉ बजेलहूॅ आ हम हाजिर छी। कहू कुशल समाचार। विमलाः- (रूसि क बजैत) अहॉं के बजेलक के? जाउ हम अहॉ सॅ नहि बाजब। मनोहरः- अहूॅं त कमाले करैत छी। देखू तऽ हम अहॉक लेल कि सभ अनने छी। विमलाः- (आश्चर्य भाव सॅ) क क कि अनने छी हमरा लेले?? मनोहरः- (प्यार सॅ) ट...ट...ट टॉफी। विमला:- अहॉ के टॉफी छोरी आरो किछू बजार मे नहि भेटल की? मनोहरः- जिलेबी सिंहारा तऽ किनने छलहॅू अॅहिंक लेल मुदा रस्ते मे भूख लागि गेल तऽ अपने खा लेलहॅू। विमलाः- (उदास भऽ के) अहॉं के तऽ एक्को रति हमर चिंते नहिं रहैयए। मनोहरः- चिंता रहैयए तहि द्वारे तऽ आब हम दारू पिअब छोड़ि देलहूॅ। विमलाः-( अकचका के) ठीके मे मनोहरः- हॅं हॅं हम सपत खेने छी की आब हम दारू कहियो ने पिअब। विमलाः- ई त बड्ड निक गप। आब हम किछू फरमाईश करी त? मनोहरः- (हॅसैत) अहॉं फरमाईश त करू हम पूरा अंधरा बजारे घर उठौने चलि आएब। तखने निलू सोनी आ राजेशक प्रवेश। नीलू:- दीदी-दीदी चल ने आई पाहुन संगे बजार घूमने अबैत छी। मनोहरः- हं हं चलू-चलू देरि भए जाएत आई अहॉं सभ कें अंधरा बजार घूमा दैत छी। ठहक्का लगबैत सभहक प्रस्थान। दृश्य-4 बजारक दृश्य बिक्रेता सभ के विभिन्न अवाज़। बिक्रेताः- घड़ी लऽ लियअ, रेडियो लऽ लियअ। बिक्रेता:- (डूगडूगी बजबैत)  हे धिया पूता लेल डूगडूगी ल लियअ डूग-डूग। राजेशः- भाई हमरा एकटा रेडियो किनबाक रहै। बिक्रेताः- हईए लियअ ने एहि ठाम भेटत कम दाम मे निक रेडियो। मनोहरः- लगैए तोहर दिमाग कतौह हरा गेलौ। घर मे टी वि छौ तइओ? राजेशः-( अफसोस करैत) तोरा केना कहियौ की। विमलाः- कहू तऽ सी. डि. टी. वि. के युग में कहू तऽ कियो आब रेडियो किनतैए। राजेशः- (हॅसि क) इ हमरा पाही वाली के पसीन तऽ छियै तहि द्वारे त किनि रहल छियै। मनोहर:- तखन तऽ एखने खरीद ले। राजेशः- हे भाई एकटा बढ़िया क्वालिटी के रेडियो दिहअ। बिक्रेताः- ई लियअ भाई साहेब। राजेश:- हईए ई लियअ पाई। पाई देबाक ध्वनी प्रभाव। मनोहर:- तऽ चल आब चलैत छी अपना गाम तोरा पाही वाली के मनेबाक लेल। नीलूः- यौ पाहुन आ हम सभ। राजेश:- अहॅू सभ चलू ने हमर गाम घर देखि क आपिस चलि आएब। सोनीः- नहि यौ पाहुन पहिने हमरा सभ के घर तक छोडि दियअ। फेर कहियो अहॉ गाम मेला देखै लेल हम दूनू बहिन आएब। मनोहरः- ठीक छै तऽ चलू अहॅा सभ कें गाम पर दए अबैत छी तकरा बाद हम सभ अपना गाम चल जाएब। विमला:- ई भेल ने बुझनुक मनुक्ख वला गप। ठहक्का लगबैत सभहक प्रस्थान। दृश्य-5 रसोई घरक दृश्य। कमला गीत गुनगुना रहल अछि। तखने राजेश मनोहर विमलाक प्रवेश। राजेश:- सुनू ने सुनू ने सुन लियअ ने.हमर पाही वाली सुनू ..ने। कमला:- हमरा अहॉक कोनो गप नहि सूनबाक अछि। राजेशः- हे यै जूनि रूसू सुनू ने.....सुनू ने। कमला:- कहलहूॅ तऽ नहि सूनैत छियैअ। राजेशः- अहिं के सुनबाक लेल त बजार सॅं अनलहॅू। देख तऽ लियअ। कमला:- (खिसियाअ के)  हम कि कोनो अहॉं जंेका बहिर छी?? राजेश:- (अफसोस करैत)   पाही वाली के हम केना बुझबई जे इ कोनो फरमाईश केने रहैए। विमला आओर मनोहर एक दोसर सॅ कनफूसकीं कऽ गप करैत। मनोहर - (विमला सॅं) लगैए कमला के किछू बूझहेबाक चाहि। विमला - कमला बहिन एतेक खिसियाएल किएक छी। हमरा त कैह सकैत छी। कमला - हिनका की कहियैन बहिन। पहिल सालगीरह के दिन हिनका सॅ किछू फरमाईश केने रहियैन मुदा हिनका तऽ कोनो धियाने नहिं रहैत छनि? विमला - कहू तऽ एतबाक लेल एहेन खिसियाएब। पहिने देखियौ तऽ सही ओ अहां लेल कथी अनने छथि। कमला - कथी इहे ने अंधरा बजारक मेथी। विमला - नहि यै बहिन अहॉ एक बेर देखियौ त सही। कमला - (आश्चर्य भाव सॅं) हे भगवान ठीके मे कमला- राजेश सॅं हमरा लेल कथी अनने छी से देखाउ ने। राजेश - हे भगवान आई अहॉ बचा लेलहॅू नहिं त...त आई फेर सॅ। कमला - की भेल अहॉ के? राजेश - (हरबराईत बजैत अछि) अहॉ बैग खोलि क क देखू ने हम कथि नेने एलहॅू अहॉ लेल स्पेशल मे। बैग खोलबाक ध्वनी प्रभाव। कमला- (हॅसि क) र...र....रेडियो। आब त हम मजा सॅं कांतिपूर एफ.एम जनकपूर एफ.एम. दरभंगा विविध भारती रेडियो सुनैत रहब। राजेश- अहॉक मोन जे सुनबाक अछि से सुनैत रहू मुदा आब मानि जाउ ने। कमला - (रूसि कें) रेडियो त अनलहॅू मुदा झुमका किएक नहि अनलहूॅं? मनोहर- हे भगवान फेर सॅ एकटा नबका मुसिबत तूहिं बचबिहअ। राजेश - हे यै पाही वाली हम अहॉं लेल बरेलीवला झूमका सेहो अनने छी। आब मानि जाउ ने। सभ गोटे ठहक्का लगबैत। हॅसबाक ध्वनी प्रभाव। मनोहर - वाह-भाई मानि गेलहॅू । रूसल कनियॉं कें मनाएब तऽ कियो राजेश सॅं सीखेए। सभ गोटे एक संगे ठहक्का लगबैत हा...हा...। ।समाप्त। रविभूषण पाठक नाटक ‘रिहर्सल’ ‘रिहर्सल’ नाटक मिथिला मे व्याप्त सांस्कृतिक संकट क’ एकटा छोट रूपक अछि ।मिथिला मे जाति बदलल मुदा जाति क’चालि नहि बदलल ।जाति अपन बदरंग भूमिका क’ साथ जीवित अछि । जाति ,धर्म,राजनीति आ साहित्य क’ कॉकटेल एकटा गेन्हायल आ कुत्सित दृश्य उपस्थित करैत अछि।’रिहर्सल’ नाटक एहि दृश्य के ने ग्लेमराइज करैत अछि ने रूपांतरित करैत छैक ।एहि ठाम टी एस एलियट क’ओहि विचार के महत्वपूर्ण नहि मानल गेल अछि कि भोक्ता आ रचयिता क’ बीच मे दूरी रचनात्मकता क’ लेल अनिवार्य अछि ।गाम मे मंचन क’ समय एहि विकट तथ्य सॅ अवगत भेलहूॅ कि नाटकीय अभिरूचि क’ परिष्कार एखनहु अपरिहार्य अछि ।गाम में नवतुरिया छौराछपाठी सॅ जे सहयोग भेटल ,ओ गदगद क’ देलक ।नाटक मे संशोधन-परिवर्धन क’ तमाम गुंजाइश के बावजूद ई अपन मूल रूप मे अछि ।उदयनाचार्य मिथिला पुस्तकालय क’ प्रथम वर्षाब्दी क’ अवसर पर आयोजित कार्यक्रम क’ लेल एकर लेखन दू-तीन दिन मे संपन्न भेल छल ।ई नाटक शुरूए सॅ कचकूह रहि गेल ।मुदा कचरस क’ अपन आनन्द होइत छैक । ई हमर लेखन सॅ बेशी अहॉ क’ धैर्य क’ परीक्षा छी ।मिथिला क’ रंग परम्परा क’शत-शत नमन।प्रथम मंचन क’सब कलाकार आ दर्शक के सहयोग क’ लेल धन्यवाद ।नाटक केर एकटा प्रतिभाशाली अभिनेता क’ अनुपस्थिति हरदम खलत ।ओ अपन पारिवारिक तनाव क’ चलते एहि दुनिया क’ रंगमंच सॅ विदा भ’गेलाह ।मात्र पचीस वर्ष क उम्र मे आत्महत्या क’चयन सॅ हुनकर मानसिक तनाव व व्यथा क’अनुमान लगायल जा सकैत अछि । नाटक मे जाति सब क नाम काल्पनिक लिखल गेल अछि । मुदा नाटक मे तथाकथित छोटका आ बड़का के संघर्ष सॅ समाज क’ संरचना आ प्रवृत्ति स्पष्ट अछि । प्रथम अंक प्रथम दृश्य ;एकता सम्भ्रंात व्यक्ति क’घर ।चारिटा कुरसी राखल ।बिछावन लागल ,दीवाल पर विद्यापति , रवीन्द्र नाथ ,निराला ,प्रसाद ,मोहन राकेश ,हरिमोहन झा आ यात्री क’ फोटो । चौकी पर एकटा सूतल व्यक्ति रेडियो सॅं भैरवी गीत क’ प्रसारण। व्यक्ति परमेश बैसि के झूमि रहल छथि । गीत बन्द आ केओ किवाड़ खट -खटा रहल अछि । परमेश हड़बड़ाइत छथि आ ओढ़ना ओढ़ि लैत छथि ) नेपथ्य सॅ आवाज -(हेमचन्द्र क आवाज ) परमेश बाबू छी अओ....... परमेश बाबू कत’ चलि गेलाह ....... परमेश बाबु छी अओ । केवाड़ मे धक्का मारैत छथि आ केवाड़ खुलि जाइत अछि। हेम चन्द्र - परमेश बाबू सूतल किएक छी ? परमेश - (मंॅुह पर सॅ ओढ़ना हटबैत) हमर तबियत खराब अछि, बुखार अछि । हेमचन्द्र - चलु डाक्टर सॅ देखवा लिय’। आइ सॉझ मे नाटक अछि, स्वस्थ नहि रहब त’ मंचन कोना हेतइ। परमेश - हम मंचन योग्य नहि छी, हमर भूमिका दोसर के द’ दियऊ। हेमचन्द्र - बहुत नीक ! आइ नाटक क’ दिन अहॉ ई बात कहि रहल छी ,बुझि पडै़छ बात दोसर अछि....... साफ साफ बाजू ने कि बात ? (खवास दू गिलास शरबत आ एक हत्था केरा क’ संग प्रवेश करैत अछि। परमेश पहिले केरा खाइत छथि फेर शरबत पी के ढ़करैत छथि । हेमचन्द्र - हद कएलहॅु परमेश बाबु । कहैत छी जी बुखार अछि आ एक हत्था केरा गीलि गेलहु । परमेश - देखू हेम चन्द्र बाबू हम अहॅा संग दस वरिस सॅ काज क’ रहल छी ‘‘रंग चेतना मंच ‘‘ क’ क्रिया कलाप में आब देख रहत छी जे आन लोक क’ भागीदारी बड्ड बेसी बढि गेल। पुरान लोक सब नेपथ्य मे जा रहल छथि आ चोर- चुहार सब के मलाईदार रोल मिलि रहल अछि । हेमचन्द्र - जे दस क’ संस्था अछि, ओहि मे एहिना कमी बेसी होइत छैक, एकरा मून सॅ निकालू परमेश बाबू। परमेश - कोना निकालू मोन सॅ, ई जे रामप्रवेश अछि से हमर बराबरी कर’ चाहैत अछि। विसार जाति के एतेक हिम्मत । ओ आब कालीदास आ विद्यापति क’ रोल करत। हेमचन्द्र - मतलब ? परमेश - देबा क’ छल त’ कोनो खबास वला रोल द’ देतिअइ । बड्ड बेसी त’ उगना क रोल द’ दियओ, एना जे लीड रोल राम प्रवेश के देबइ त हम ,,,,,,,,,,,,,,, हेमचन्द्र - औ परमेश बाबू । नाटक मे ई सब बात घुसेबए त’ कोना काज चलत।  ठीक छैक हम देखैत छी ,,,,,,,,, (हेम चन्द जी जाइत छथि आ प्रकाश मद्ध्रिम होइत अछि। ) अंक  - प्रथम दृश्य - द्वितीय (राम प्रवेश क’ घर ।दीवाल पर तुलसी, कबीर, मार्क्स, नागार्जुन क’ फोटो ।किछु राजनीतिक दल क’ पोस्टर सेहो एक टा कोन मे दू टा लाठी । जमीन पर दरी बिछाओल । राम प्रवेश आ हुनकर दू टा साथी हरमुनिया ढोलक झालि क’ संग उपस्थित ।कोनो धुन बाजि रहल अछि। (हेमचन्द्र क’ प्रवेश) हेमचन्द्र - राम प्रवेश जी छी अओ? बड्ड टॉसगर धुन बाजि रहल अछि । राम प्रवेश -- आबू कक्का जी बैसू । ओ नथिया वाली क प्रेम में नाक हमर कटि गेल........... (हेम चन्द्र जी । किछु कह’ चाहैत छथि ) हेमचन्द्र -  राम प्रवेश जी आइए नाटक अछि । हम त’ बुझलहुॅ अहॉ संवाद यादि करति होएब । रामप्रवेश - आब त’ दस वरिस भ’ गेल इएह सब क’ रहल छी आबहु संवादे रटाएब ? हेमचन्द्र - संवाद रटनए कोनो कुकार्य त’ नहि अछि । रामप्रवेश -  हम सब वरिष्ठ कलाकार भेलहुॅ। आब एते अनुभव त’ अछिए जे कतहु अटकब त मोनो सॅ जोड़ि़ सकैत छी । (पुनः गाबैत छथि ‘‘हमर नेता जी बड़ निम्मन लगै छथि कुरता आ टोपी सुरेबगर लगै अछि ‘‘) हेमचन्द्र अपन मूड़ी नीचा केने बैसल छथि रामप्रवेश - बात ई जे चुनाव नजदीक आबि गेल ।एहि बेर हम विधायक जी क’ तरफ सॅ प्रचार करब ।बूझू जे हम, महेन्द , देवनाथ आ बौआझा मतलब कि पूरा मंडली । (प्रसन्न मुद्रा़ मे गरदनि हिला हिला क’ बाजि रहल छथि ) ‘‘हमर नेता देवदूत ओ छथि मिथिला के पूत हमर नेता के ़़़़़़............. जिताबियौ ओ लोक सब जिताबियौ ओ लोक सब ........ (हेमचन्द्र क’ चेहरा पर क्रोध आबि रहल छन्हि) हेमचन्द्र - राम प्रवेश अहॉ हमरा बेइज्जत क’ रहल छी । हम अहॅा क’ दुआरि पर दू घंटा सॅ बैसल छी आ अहॅा तेसरे राग अलापने छी ।राति मे नाटक कोना हेतए एकर अहॅा के कोनो चिन्ता नहि । रामप्रवेश - हम चिन्ता क’ के कि करब ?जखन चिन्ता क’ के हम अप्पन ईच्छा पूरा नहि क’ सकइ छी त’ दोसर के चिन्ता क’ के कि द’ देबए । हेमचन्द्र - कि मतलब ? रामप्रवेश क’ साथी - गायक जी असंतुष्ट छथि । हिनका वौसिओन्ह । रामप्रवेश - अहॅा चुप रहू । देखियौ कक्का जी हमर व्यक्तिगत समस्या त’ व्यक्तिगते अछि ,ओहि क’ लेल हमरा ककरो सॅ शिकायत किएक रहत? मुदा, जहॉ तक नाटक क’ बात छैक ,,,,, (दू सेकेण्ड चुप भ’ के बाजैत छथि ) अहॉ त’ जानैत छी जे हमर की स्तर अछि आ’ परमेश क’ की ? ई गलती त देवता सॅ भेलेन्ह जे ओ हमरा बीकू जाति मे जन्म नहि देलाह ।धर्म आ समाज त’ पहिले गीलि गेलाह आब साहित्य आ नाटको के गीलि के बैसताह । सब प्रमुख भूमिका त’ बीकूए सब डकारि रहल अछि। प्रथम अंक दृश्य - तीन (हेमचन्द्र क’ घर, विद्यापति,शेक्सपीयर ,कालिदास ,जयशंकर प्रसाद, नार्गाजुन क’ फोटो दीवाल पर टांगल अछि । दीवाले पर किछु विशिष्ट पोशाक,मुखौटा सेहो राखल अछि । हेमचन्द्र माथ पर हाथ राखि बैसल छथि ) धीरेन्द्र क प्रवेश । धीरेन्द्र - कक्का गोड़ लगैत छी,बीस किलो राहड़ि क दालि भेजि देलहुॅ । खबास आनलक कि नहि? हेमचन्द्र -- दालि के मॉगने छल ? धीरेन्द्र -- मॅगबा क की प्रयोजन ?हमर घर अहॉ क’ घर । हेमचन्द्र -- घर त’ ठामे अछि । सत सत बाजू राहड़ि भेजलहुॅ ,कोनो रोल करवा क’ अछि की? धीरेन्द्र -- हें हे ह...... देतिअई त’ नीके छल । हेमचन्द्र - कोन रोल चाहैत छी ? धीरेन्द्र -- हें हे हें विद्यापति बला रहतए रे तखन........ हेमचन्द्र -- लाज धरम उठा क’ पी गेलऊॅ? अपन राहड़ि अपने संग राखू आ भागू एहि ठाम सॅ उठू़..... उठू । धीरेन्द्र -- (कनैत)-  कक्का जी गोड़ पकड़ैत छी । एक बेर विद्यापति बला रोल द दिअओ । अहॉ क पुतहू के सेहो कहि देलिएन्ह। दरभंगा वाली त’ आइ राति मे देखवा क’ लेल अओतीह । हेमचन्द्र -- कनिया के कहि देलिएन्ह ,,,,,से ककरो सॅ पुछलिअइ? धीरेन्द्र --रातु क’ बात छलइ यौ कक्का जी । आब जे नहि देबइ रोल त नाक कटि जायत । (नेपथ्य सॅ महिला आवाज - हेमचन्द्र जी क पत्नी मानिनि) मानिनि -- धीरेन्द्र बाबू छथि । हुनका रोकब, एकटा सूइया लेवा क’ अछि । हेमचन्द्र --कोन सूइया क’ बात करैत छथि (धीरैन्द्र सॅ) धीरेन्द्र -- काल्हि माथ मे दर्द छलन्हि । एकटा सूइया त काल्हिए द’ देने छलियइ दोसर आइ देबइ । हेमचन्द्र -- ई सूया कहिया सॅ द’ रहल छी । धीरेन्द्र -- एक हपता भ’ गेल । काकीए सॅ बोहिनी कएलहुॅ । दिन मे दू-तीन टा सूइया ककरो ने ककरो जरुरे घोपि दैत छिअइ। हेमचन्द्र -- ( धीरेन्द्र के डेनियाबैत ) हमरा कनिया क तू सूइया भोकबहक त’ तोरा हम भाला भोकि देब’ । चल’ निकल’ एहि ठाम सॅ । (नेपथ्य सॅ - हेमचन्द जी छी अओ) हेमचन्द्र -- आबू - आबू महेश जी । महेश -- नाटक क’ व्यवस्था त’ सब भ’ गेल होयत । हेमचन्द्र -- औखन तक किछु नहि भेल अछि आ असंभव लागि रहल अछि जे किछु होयत । महेश -- चलू बाहर चलू सब व्यवस्था भ’ जेतइ । (दूनू प्रस्थान करैत छथि, रस्ता मे दिगम्बर सॅ भेंट भ’ जाइत छैक) हेमचन्द्र -- दिगम्बर जी हम आदमी के  भेजि रहल छी तीन - चारि टा चौकी भेजि देबइ । दिगम्बर - एहि बेर चौकी नहि देब ।हमरा ओहि ठाम पाहुन आबि रहल छथि । हेमचन्द्र -- पाहुन त’ चारि दिन बाद अओताह। दिगम्बर - तैयो एहि बेर नहि देब । (पुनः आगू बढैत छटि) महेश - ई बिसार जति क’ आदमी सभ नाटक कि बूझत  असभ्य !नीच !देखियौ कोनो बीकू जाति क’ आदमी भेटत आ काज भ’ जायत ।देखियौ पीताम्बर कक्का आबि रहल छथि (पीताम्बर सॅ ) कक्का सुनब..... ई - तीन टा छौरा -छपाठी जा रहल अछि चौकी द’ देबए । पीताम्बर - अओ बाबू । सभ चीज त’ बड्ड नीक मुदा चौकी टूिट जायत तखन ? । एहने नाटक करैत छी अहॉ सब । सब पात्र दुर्बासा आ विश्वामित्र जॅका कूदैत रहैत अछि । पछिला बेर चौकी क’ पच्चड़ टूटि गेल छल। ( हेमचन्द्र आ महेश प्रस्थान करैत छथि) हेमचन्द्र -- देखलिअइ बीकू जाति क’ क्रिया कर्म । चौकी नहि देताह । पच्चड़ टूटि गेलेन्ह... । राखह चौकी अपना,,,,, ओहि में । महेश -- लागैत अछि एहि बेर जात्रा खराब भ’ गेल । सुनु ने ,,,,, चलू हनुमान जी क’ प्रणाम क’ के पहिने चन्दा वला काज शुरु क’ दैत छी । ( दूनू प्रस्थान करैत छथि ) अंक - प्रथम दृश्य चारि मन्दिर क’ प्रॉगन। ओहि मे पॉच सात आदमी बैसि के तास खेला रहल छथि । चारि टा मुख्य खिलाड़ी आ प्रत्येक के पाछू मे तीन तीन आ चारि चारि टा आदमी बैसल अछि । भदेश एकता पत्ती दैत अछि एहि पर दू टा जोड़ सॅ हॅसि पड़ैत आछि ) भदेश - नहि नहि हम ई नहि दिय’ चाहैत छलहूॅ ,ई गलती सॅ गिर पड़ल । कलेश -- अहॅा बड्ड चालू छी । बीबी लागि गेल त’ गलती सॅ गिरि पड़ल ।(कुद्ध भ’ के ) एना पत्ता उठाएब त हाथ तोडि देब। भदेश -- रौ बहि !चुप रह, काल्हि तीन तीन बेर बीबी लगेने छलियउ।यादि छओ कि नहि ,आई फेर लगेबओ। ‘बीबी को लगाया जाएगा’ ।(सस्वर) कलेश -- ‘फॅासी पर चढाया जाएगा’ । (सस्वर ) भदेस-- बीबी को लगाया जाएगा । हेमचन्द्र -- कि अओ बाबू सब । एना जे एक दोसर बीबी लगबैत रहबए त’ शेष काज कोना हेतए। (कलेश भदेस क’ दिसि ताकैत छथि,दुनू बेशर्म जॅका मुसकिया दैत छैक ) कलेश -- अओ भदेस जी ताबत एक बेर चूने-तमाकू चल दिअओ । हेमचन्द्र जी सेहो अएलाह, कनेक हिनको बात सुनि लेल जाओ । महेश - आई नाटक अछि । आ बात ई जे रुपया के व्यवस्था एकदमे नहि अछि से हमसब सोचलहूॅ जे गाम सॅ किछु चन्दा चुटकी भ जाए । भदेश -- एखन त हमसब एतहि छी । खेल बड्ड क्रिटिकल स्टेज मे अछि । औखन नहि जाएब। कलेश जी के पानि छोड़एवा क’ अछि । सॉझ मे अहॉ सॅ भेट क’ लेब । कलेश - ई कि पनि छोड़एताह? । औखन त’ एके बेर लगेलिएन्ह ,,,,,,,,,,,बेस अहॉ हमरो साथी द’ दिअओ । नाटक क’ बाद हम मिलि लेब । हेमचन्द्र -- ठीक छैक अहॉ सॅ हम बाद मे ल’ लेब मुदा आओर व्यवस्था सब कोना हेतए । आई छोडू तास-वास । आउ चलू मंचे क’ पास । कलेस - हमसब सॉझ मे ओहि ठाम पहुॅच जायब । अॅहा सब चलै-चलू। ( ठोर मे तम्बाकू राखैत छी ) ( हेमचन्द्र आ महेश विदा होइत छथि । रास्ता मे एकटा शराबी - सुदर्शन सॅ भेंट होइत अछि, सुदर्शन लट पटा क बाजि रहल अछि। सुदर्शन -- हयौ हेमचन्द्र बाबू । चलि जाउ घर बैसू। आब के नाटक करत आ के नाटक देखत । जाउ  चलि  जाउ .......।सभ अपन अपन काज मे मगन अछि आ अहॉ नाटक लेल फिफिया रहल छी । जाउ चलि जाऊ। महेश - चलू कक्का जी चलू। हेमचन्द्र -- ओ एकदम सत्त कहि रहल अछि । (हेमचन्द्र आ महेश प्रस्थान करैत छथि । किछु आगॉ बढला पर दू टा युवक मजीत आ मदन मिलैत अछि । मजीत मुॅह लटकेने एकात भ’ गेल अछि आ मदन नजदीक भ’ जाइत अछि। मदन -- चचा बात ई जे मजीत कहलक जे हम रोल नही करब। हेमचन्द्र -- किएक ने करत ओ रोल ?। मदन -- ओ कहैत अछि जाबत एक बोतल क’ व्यवस्था नहि हेतइ । हमर कंसेंट्रेशन नहि बनत । हेमचन्द्र -- बनइ वा नहि बनए। बोतल त’ नहिए एतए। महेश -- अरे रुकू चचा जी । सुनह मदन ,एमहर आब’ । मजीत कें कहि दहक जे सॉझ मे व्यवस्था भ जेतइ। (हेमचन्द्र ओहि ठाम सॅ प्रस्थन करैत छथि ) महेश - आर कि दिक्कत छैक बताबह । मदन -- यदि दू टा बाई जी भ’ जेतइ तखन आर बेसी आनन्द...... । बेसी मजा..... अहॉ बूझिते छी । महेश -- बाई जी आब एहिखन कत’ सॅ आएत । मदन -- अहॉ पैसा दिअ हम आ मजीत बखरी चलि जाएब । चारि घंटा क’ अन्दर दू टा टंच बाइ जी क’ व्यवस्था भ’ जायत। महेश -- हमरा मून होइत अछि हमहॅू चली। मदन -- एकदम चलू । आहूॅ अपन पसन्द बताएब । (महेश,मदन आ मजीत जाइत छथि ) हेमचन्द्र(स्वगत)-ई कोन नाटक भ’ रहल अछि हमरा गाम मे । एहि नाटक सॅ दूरे-दूर रहल जाए ।क्षमा करथु विद्यापति आ उगना । आब स्थिति हमरा नियंत्रण मे नहि अछि । अंक - द्वितीय प्रथम दृश्य (बखरी बजार क’ रौनक । दू टा पान वला घूमि घूमि पान बेचि रहल अछि तीन टा शराबी बैसि के कानि रहल अछि।) दलाल --  कैसा चाहिए बताईए ? पंजाबी, सिन्धी ,बंगाली बिहारी, गुजराती ,यूपी वाली बताईए ,,,,बताईए ,,,,,,,शर्माइए नही । महेश -रौ बहि ई कि भ’ रहल छैक ? हमरा त’ डर भ’ रहल अछि । मदना -- डरबा क’ कोन बात । हम सॅंग छी ने, हम एहि ठाम चारि साल सॅ आबि रहल छी । महेश -- वाह भतीजा वाह । दलाल -- अरे बताब’ भइ । शरम काहे लें हो जेहन पैसा ओहन मजा । फुल मजा ,फ्री मजा । मदन -- चलू ने देखैत छिऐक । महेश -- तू जाह । हम एतइ छि । हमरा आबि कॅे बताबह। ( मदन अन्दर जाइत अछि आ महेश अन्दर दिस कान आ ऑखि गड़इबा क प्रयास करैत छथि) मदन -- आर केओ नहि अछि की? दलाल -- अरे इस पीक टाइम में जो मिल रहा है बस बुक कर लीजिए और फिर हमारी जानों में क्या कमी है। कमर देखिए.......  देखिए (बाहर ई सुनि महेश उछलि पडै़त अछि) मदन -- अहॉ क’ नाम ? नर्तकी प्रथम -- मेमामालिनी । (बाहर महेश खूब प्रसन्न होइत छवि ) मदन -- अहॉ क’ की नाम ? नर्तकी द्वितीय -मेश्वर्या राय (बाहर मे महेश उछलि पडैत अछि) मदन -- अहॉ क नर्तकी तृतीय-- नीना कुमारी । मदन - अच्छा हम बाहर जा रहल छी । पूछि के बताएब । दलाल -- सुन’ एडवांस द’ के बाहर निकल’ नहि  त’फेर हमर दोष नहि । मदन -- ठीक छैक ई लिय’ । (मदन बाहर आवैत अछि ) महेश -- ओ सभ कत’ रूकि गेलीह। मदन -- तैयार भ’ रहल छथि। महेश - आर सभ ठीक ने । मदन-मतलब ? महेश-मतलब ई जे -----(बजबा में लटपटाइत छथि ) मदन -- हॉ ठीके अछि । मुदा मेश्वर्या राय क’ ऑखि कने कमजोर छन्हि । मेमामालिनी के बच्चे मे लकवा मारि देलकन्हि, तेॅ ओ नाचि नहि पाबैत छथि । महेश -- आ नीना कुमारी ? मदन -- हुनका लेल स्पेशल रुमाल चाही । ओ बात -बात मे कान’ लागैत छथि । कानैत - कानैत पोटा बह’ लागैत छैक । महेश-जखन ई नाचवे नहि करतीह,तखन ओहिठाम कथी ल’ जेतीह । दलाल- अरे भाई । एतना देखिएगा तब तो हो गया । हमसेे कोपरेट करिए हम भी आपसे कोपरेेट करेंगे । जो चाहिएगा हम भी पीछे नही हटेंगें । (तीनू नर्तकी: एकटा हारमोनियम वला , एकटा ढोलक बला,  बडकी पेटी क साथ बाहर निकलैत अछि) मेमामालिनी - ( महेश के कनखी मारैत ) न’ न’ नियौ।(नकियाबैत) सब का समान उठा लीजिए। (तीनू ग्रमीण तीनू नर्तकी क समान उठबैत अछि ) अंक -द्वितीय दृश्य-द्वितीय उद्घोषक -- आइ ‘चीनी क लड्ड’ू नाटक मंचित होमए वला छल। आइ लड्डू रसगुल्ला में बदलि गेल अछि । आशा अछि रस कनि कनि अहॉ सब के मुॅह मे जायत । मदन - कि नाटक भैरवी गीत सॅ शूरु कएल जाए? मजीत -- अरे आइ त’ तीन - तीन टा भैरवी आइल छथि ।  आइ भैरवी गीत क’ कोन काज । महेश -- एना करबहक त’ गाम क’ लोक सब बिगड़ि जएथुन्ह ।  तखन फेर चन्दा चुटकी कोना हेतए ? मदन -- ठीक छैक । धीरेन्द्र सॅ कहियौ जल्दी सॅ ओ भैरवी गीत समाप्त करए । ( धीरेन्द्र गावैत छथि । भैरवी गीत क’ बाद मेमामालिनी मेश्वर्या राय आ नीना कुमारी आबैत छथि आ बेतरतीब नाच आ गाना गाब’ लागैत छथि ।नाच मे अश्लील मुद्रा क’ खास विनियोग ।) हेमचन्द्र -- दैखियौ त’ महेश हमरा गाम मे केहन नर्तकी के उठा आनलक ।ताल -मात्रा सॅ एकरा कहियो भेंट नहि छैक । कलहेस -- एना नहि कहियौ हेमचन्द्र जी । मेमामालिनी क’ ऑखि क’ चंचलता बेजोड़ अछि । भदेस -- मेश्वर्या राय हमरा ह्रदय मे विक्षोभ उत्पन्न क’ रहल छथि। लागैत अछि जे ओ हमरे लेल नाचि रहल छथि, ओ हमरा बजा रहल छथि । मदन -- कि कक्का ? ठीक रहल नें ,खूब डोलि रहल छी । भदेस -- हॅ बौआ मस्त क देलहुॅ। मदन -- किछू ईनामो - बकसीस भ’ जाइ। भदेस -- ई लिय’ एक सौ एक । ( हेमचन्द्र तमतमा क’ उठि जाइत छथि ) डदृघोषक - एहन कुशल नृत्यांगना क नृत्य देखि कलेस जी भाव - विभोर भ’ गेल छथि आ भदेस जी आह्लाद सॅ बेहोश । बेहोशी सॅ पहिलेे ओ एक सौ एक टका द’ गेल छलाह । कलेस जी आ भदेस जी के नृत्यबोध क’ अभिनंदन - बन्दन । रंजिश करो जो हमसे भी गुलाब को ना मायूस करो हम उठते गिरते रहते हैं ये दो दिन में मुरझाते हैैं। (दर्शक में से एकटा उठि के नीना कुमारी क’ उठा के भाग’ चाहैत अछि । म्ंाच पर अव्यवस्था क’ माहौल । उद्घोषक -- दर्शक क’ उत्साह उफान पर अछि आ दर्शक सेंट परसेंट प्रतिक्रिया द’ रहल छथि । अर्थ ई जे गुलाब के मायूस हेबा क जरुरी नहि छैक । मीना कुमारी कें मंच पर सॅ बाहर ल’जाए वला  उत्साही दर्शक क’ पहचान भ’ गेल अछि । घबराउ जूनि, नाटक एहिना चलति रहत । ) दलाल उद्धोषक सॅ - देखिए सर हमको कोपरेट करिए ,हम भी पूरा - पूरा करेंगें । आपको जो चाहिए हम पूरा देंगें । उद्घोषक -- हमरा अहॉ सॅ किछु नहि चाही । अहॉ अपन काज करु आ हम त कए रहल छी । (तावते मंच दिस तीन टा मोंट - डॉट युवक क प्रवेश । पीके ,खाके, जाके गाम क’ तीन टा उद्दण्ड युवक) मजीत -- कि माई ? पी के -- गॉव में ई नया -नया बात विचार सभ शुरु भ’ गेल आ हमरा जानकाारिये नहि । मजीत-- भाई अचानक वयवस्था भ’ गेल । खाके -- बन्द कर ई ताम -झाम आ उतार हरमजादी सब के। गॉव के रण्डी -खाना बना के राखि देलक। मजीत -- सुनु जाके भाई हिनका सभ के ल जाउ।काल्हि सब बात - व्यवस्था भ’ जेतई।हिनका सब के दू दिन राखल जेतइ (तीनू कान मे किछु बतियाइत अछि) (ओमहर सॅ धीरेन्द्र क’ प्रवेश) धीरेन्द्र--महेश जी वाह । बड्ड नीक व्यवस्था । हेमचन्द्र जी की करताह वयवस्था । अहॉ क व्यवस्था मे जे झंकार अछि से पहिले एहि गॉव  क मंच पर कहियो नहि रहल। महेश-- अहॉ कोन रोल करब ? धीरेन्द्र -- जे खूब  टॉसगर होइ सएह देब । अहॉ क’ भाबहु सेहो देख’ आएल छथि । आ दू किलो घी हम काल्हि भेज देब । उद्धोषक -- आब मंच पर रंग चेतना मंच क प्रसिद्ध गायक हरिशचन्द्र जी आबि रहल छथि । (हरिशचन्द्र जी गीत गाबि रहल छथि । हुनका सॅ मनीत ,महेश आ मदन धक्का-मुक्की करैत छथि । ) अंक- द्वितीय दृश्य-तृतीय ( नर्तकी सब के ठहराबए वला घर । अव्यवस्थित बिछावन सब । बिछावने पर हरमुनिया  ढोलक राखल अछि । तीनू नर्तकी निकास क’ लेल जेबा क’ तैयार छथि । हुनका संग लोटा ल’के जेबा क’ लेल तीनू किशोर मे संघर्ष होइत छैक) अग्रेश -- हम पहिने लोटा पकड़लहुॅ तें हम ल’ जायब । धरमेश -- तीनू के हमरे पपा आनलाह तें हमही ल’ जायब । रत्नेश -- हमर बाबू सभ सॅ बेसी चन्दा देने छथि तें हमर सोलिड हक । दलाल - देखिये भाइयों आप लोग लड़िए मत एक - एक ठो तीनो के साथ चले जाइए । आखिर आप के मॉ के उमर की है तीनांे । तीनों एक साथ - कि बाजलें रे हरामखोर (दलाल दिसि झपटैत अछि ) तीनू नर्तकी तीनू किशोर क’ सामने आबि जाइत अछि आ गाल - केश पर हाथ दैत अछि । तीनू किशोर शांत भ जाइत छथि आ एक -एक टा लोटा उठा विदा भ’ जाइत छथि । ओहि ढाम महेश आवैत छथि आ व्यग्रता सॅ घूमि रहल छथि ) महेश -- कत’ चलि गेलीह। ( ओमहर सॅ मदन आ मजीत सेहो आवैत छथि ।) महेश -- अरे मदन अहॉ कि कर’ आयल छी । अहॉ हमर भतीजा भेलहुॅ । जाउ एत सॅ । जखन हम छी त अहॉ क’ कोन काज । मदन -- अहॉ क दू-तीन बेर देखलहुॅ अछि भतीजा -भतीजा  करति । जी सम्हारि क’ बाजू। महेश -- अहॉ त व्यर्थे नाराज भ’ रहल छी रहल छी । अहॉ क बाबा हमर कक्का लागैत छथि । मंज्ीत - सुनु महेश जी ई कक्का -भतीजा फरियाएब: जखन मदन कें वियाह हेतेन्ह ।औखन हम सब पार्टनर छी , तीन - चारि दिन शांते रहू । एखन हम सभ एक छी । मदन -- बूझू त बखरी में कंठ सॅ बकार नहि खुलैत छलन्हि एत’ कक्का बनि बैसल छथि । मजीत -- अहुॅ चुप रहू मदन । ठीक छैक अहॉ केेेेेे जे बतियेबा क’ अछि से बतिया लिय’ महेश जी । हमसब दस मिनट बाद आबैत छी । (तीनू नर्तकी आ तीनू किशोर आवैत छथि । महेश जी मुसकियाबैत छथि । ) महेश -- ठीक रहलए ने । कोनो दिक नहि ने मेल । बौआ सब अहॉ सब जाउ । धरमेश-- आ अहॉ कि करब ? महेश --हमरा एकटा काज अछि । तीनू -- ठीक छैक अहॉ काज करु, हम बाद मे करब ।,,,,,,नहि नहि बाद मे आयब । ( तीनू जाइत छथि ) महेश -- सुनू हेमा जी । अहॉ के हमही आनने छी । अगिलो बेर आनब । ई मदनबा आ मजीत क बात मे नहि आयब ।,,,,, गॉव मे सबसे बेसी जमीन हमरे......तीन टा हाथी आ बारह टा घोड़ा अलगे..... ( नेपथ्य सॅ - रे महेशबा, रे महेशबा केवार खोल । पीके,खाके आ जाके क’ प्रवेश । तीनहूॅ आबिते महेश पर टूटि पड़ैत अछि,नर्तकी भगबा क’ प्रयास करैत अछि )  । खाके - हमरा सॅ बिना पूछने तू एहि ठाम किएक बैसल छें । पीके -- आजुक व्यवस्था जल्दी कर । जाके -- जल्दी सॅ भाग नहि त’ हड्डी तोडि देबओ । महेश -- भाई बिसरि गेलियइ ,हमहूॅ आही संगे बैद्यनाथपुर हाईस्कूल में पढ़ने छलियइ एक बेर ,,,, खाके -- चुप बेहूदा । बात सॅ तौं नहि मानवें । मेमामालिनी -- अच्छा महेश जी आप बाद में आइएगा। अंक-तृतीय प्रथम  -दृश्य (राम प्रवेश क’ घर। ओहि ठाम हरिश्चन्द्र सेहो वैसल छथि ) राम प्रवेश - जखन बूझले छल जे लुच्चा - लफंगा सब रण्डी नचा रहल अछि तखन अहॉ क जेबा क चाही ? हरिश्चन्द्र -- अपन गॉव छल सोचलहुॅ जे हमरा के बजाओत। अपन घर छी ,अपन मंच छी । राम प्रवेश - किएक ने बिसार, हिमार, बकबल, समरल सब जाति क’ संघ बना के   एकटा संस्था बनाओल जाए । हरिश्चन्द्र - संस्था कि करत ? राम प्रवेष -- ओ सब दुर्गा पुजा करैत छथि, किएक ने हमसब काली पूजा करी । हरिश्चन्द्र -- बीकू आ छीकू के एकदम छॉटि देबइ ? रामप्रवेश -- एखन बजेबइ ;तैयो नहि आयत ( नेपथ्य सॅ -- रामप्रवेश चा छी यौ ) राम प्रवेश -- हॅ हॅ मनोज आवह । मनोज -- गोड़ लागैत छी । पंजाब जा रहल छी, सोचलहुॅ जें भेट करैत जाउ । आब माए - बाबू कें देखनिहार आहीं सब ने छी राम प्रवेश -- ग्राम सॅ जा रहल छी । जाउ । जे धरती पेट भरए ओएह मॉ थिक । हमसब त’ सौचैत रही एकता संस्था बनबी जाहि में अहॉ क’ प्रमुख भूमिका रहए । मुदा अहॉ त जा रहल छी । ( मनोज प्रस्थान करैत अछि ) राम प्रवेश -- जनार क’ भजन आ कठघोड़वा नाच मे मनोजवा क’ जोड़क कलाकार एहि परोपट्टा मे नहि छैक । मनोज क’ बाद  रामेसर क’ स्थान छैक । हरिचन्द्र -- रामेसर सेहो जा रहल छवि । रामप्रवेश -- हे मॉ मिथिले । अपन धिया- पुता के कहिया घरि बिलमाबैत रहब । हरिश्चन्द्र -- समस्या त’ अछिए । ( चारि - पॉच टा युवक क’ लाठी डंडा क’ साथ प्रवेश ) राम प्रवेश -- कि हौ मुक्खन , कथी क’  तैयारी छैक ? मुक्खन -- हमसब चाहैत छी जे अपन सब जाति मिलि के एकटा यूनियन बनाबी । हमसब काली पूजा करी जे हमरा काली जी दिसि देखत, ओकर ऑखि निकाल लेवए ।  राम प्रवेश -- हओ मुक्खन एखन ऑखि - कान निकलवा क’ जरुरी नहि छैक । (अन्य युवक सब मुक्खन जिन्दाबाद क’ नारा लगब’ लागैत अछि । रामप्रवेश अपन मॅुह नीचा क लैत छथि) मुक्खन -- दीपावली दिन हमसब शोले नाटक करब । हम पात्र क’ चुनाव क’ रहल छी । हरिश्चन्द्र -- शोले कोने नाटक भेल । विद्यापति नाटक राखू । मुक्खन -- विद्यापति खेलत बीकू सब । विद्यापति के हमसब नहि जानी । अंक-तृतीय दृश्य -द्वितीय ( मुक्खन क’ घर ओहि ठाम पात्र - परिचय आ रिहर्सल भ रहल अछि ) मुक्खन -- गब्बर सिह क’ रोल हिमेश तोरा दैत छियओ । रमेश -- हॅ हॅ बकवल जाति क’ लोक सब आब गबबर क’ रोल करत । हिमेश-- मॅुह सम्हारि क बाज । कि बिसारि जाति क औरत सब कलाकारे जनमाबैत अछि । ( रमेश आ हिमेश गुत्थमगुत्थी भ’ जाइत छथि । बड्ड मुश्किल सॅ हुनका हटाओल जाइत अछि ) परेश -- मुक्खन जी कक्का एकता चिट्ठी देने छथि । ( मुक्खन चिट्ठी पढ़ि रहल अछि ) मुक्खन -- तों कतें चन्दा देबहक ? परेश -- बाबू एक सौ एकावन देने छथि । मुक्खन -- तौं यदि दू सौ एक देबहक त’ हम तोरे गब्बर क’ रोल देब’ । ( धीरे सॅ कान मे ) परेश -- ठीक छैक हम द’ देब । मुक्खन -- रे मतरु , बसन्ती क’ रोल तू कर । रमेश -- हॅ हॅ  हिमार जति क छोरा सब रण्डी क’ रोल में बड फिट बैसैत दैक । मतरु -- रइ रमेशबा मुॅह सम्हारि क’ बाज तूॅ त’ अपने गॉया छें । थियेटर क’ हरमुनिया मास्टर तोरा राखने रहओ । सब जनैत छैक ........ ( रमेश आ मतरु हाथम - हाथा क’ रहल छथि तखने धीरेन्द्र क’ प्रवेश ) धीरेन्द्र -- बीस किलो राहड़ि क’ दालि नेने आयल छी । नीचा मे राखल अछि ( मुक्खन क कान मे ) मुक्खन --  कोन रोल लेब ?। धीरेन्द्र -- हम जय बनब । मुक्खन -- जाउ जय बनू आ विजय करु । ( एकटा और व्यक्ति प्रवेश करैत छथि ।) ओ मुक्खन के ईशारा सॅ बजबैत अछि । समरेश -- कक्का  कहलनि जे ठाकुर क’ रोल हमरा दिय’ । एकटा चिट्ठी भेजने छथि । ( मुक्खन चिट्ठी ल’ के पढ’ लागैत छथि ) प्रिय मुक्खन ! शुभाशीष । समरेश के भेजि रहल छी । आगॉ चुनाव आबि रहल अछि ओहि मे अहॉ क लेल समरेश खूब काज करताह । सब छीकू जाति क’ बोट अहीं के मिलत । छीकू हजारों साल सॅ युद्वप्रिय जाति रहल अछि । आशा अछि समरेश के व्यक्तित्व क’ अनुकूल रोल अहॉ देबइ । हमरा विचार सॅ ओ ठाकुर क’ रोल में फिट रहत । अहॉ कें धन्येश म्ुाक्खन -- ठीक अछि समरेश बाबू अहॉ के हम ठाकुर क’ रोल देलहॅु । (अन्य कलाकार सॅ) -- ठीक छैक रिहर्सल कएल जाओ । ( पहिने ठाकुर आ गब्बर आबैत छथि ) अपन - अपन संवाद यादि क’ लिय’ दूनू -- संवाद त’ यादे अछि । गब्बर -- हम बूझिते रही ,तों जरूर एबही.......तू कि तोहर बापो अइतओ  । ठाकुर-तू बूझैत छें ने हम किएक आएल छी,हम तोरा बाप सॅ भेंट करेबओ । गब्बर -- फड़फड़ा जूनि ठाकुर । सब फरफरी एके लाति मे तोरा निकालि देबओ । ठाकुर -- रौ बहि ! समरल जाति क’ कलाकार हमर फरफरी निकालत । (दूनू एक - दोसर कें पकड़ि लैत छैक आ मुक्कम - मुक्की शुरु भ’ जाइत  छैक ) मुख्खन -- कि भेल समरेश ?एना किस्क किएक क्रोध में आबि गेलहुॅ । समरेश -- ई हमरा स्कुले सॅ परेशान क’ रहल अछि । स्कूल मे कहैत छल फड़फड़ा जूनि ठाकुर । मुख्खन -- ठीक छैक रिहर्सल क’ कोनो काज नहि । हम पर्दा क’ पाछू सॅ बाजब आ अहॉ सब ओकर नकल करब । अंक -तृतीय दृश्य- तृतीय ( हेमचन्द्र  क’ घर । ओहि ठाम परमेश वैसल छथि । तखने मदन आ महेश प्रवेश करैत छथि ) महेश -- कक्का गोड़ लगैत छी । हेमचन्द्र -- भगवान ़अॅहा के सदबुद्वि देहि । महेश --  कक्का सुनलियई कि नइ , काल्हि सब ओ सब मिलि के शोले खेलि रहल अछि । परमेश -- त’ कोन अनर्थ भेल ? मदन -- बूझू त’ एहि  विद्वान क’ गाम मे जकरा जे मून होइत छैक से क’ रहल अछि । हेमचन्द्र -- अहॉ क’ रण्डी सब अनर्थ नइ केने छल ? महेश -- मुदा नाटक त’ विद्यापति भेल छलए ने । ओ त’ बीच बीच में कनेक मोन बहलेवा क’ लेल छल । परमेश -- दोसर लोक सब मून बहला रहल अछि त’ अहॅा किएक परेशान छी ( एहि बीच में खाके ,पीक,े जाके आवैत छथि ) खाके -- अहॉ सब चूड़ी पहिरने रहू ,मुदा हम ई नहि होमए देबए । परमेश -- कि करबए अहॉ ? जेके -- हम मंच के रक्त रंजित क देबए । हेमचन्द्र -- जकरा अहॉ रक्त रंजित करबए से अहॉ के छोड़त ? जाके -- चलू भाइ ओतइ चलू । देखैत छियइ के माई क’ लाल स्टेज गाड़ई क लेल आवैत अछि ( कलेश आ भदेस प्रवेश करैत छथि ) कलेश -- बूझलहूॅ हेमचन्द्र बाबू ई बकवल सब भरि राति नाच करत आ सेर - सेर भरि मूतत। भदेश -- बूझू जे जखन जखन पूवरिया हवा बहत ने, ई भरि अगहन तक महकैत रहत । हमरो इएह विचार जे नाटक नहि होई । प्रमेश -- अहॉ क’ कि विचार जे कसकव्ता सॅ रण्ड़ी आवए? कलेस -- हॅ नजदीको सॅ काज चलत । हेमचन्द्र -- चुप रहू । बारहो महीना ताश खेलि के पखेरी - पसेरी भरि भूतैत छी केओ टोकलक अहॉ के ? भदेश -- हओ ! कलेश जी चलू ई सब हारि मानि लेलाह । चलू जे भ’ रहल छैक ओहिए मे किछु जुगाड़ पानी कएल जाए। (कनि दूर हटला क’ बाद कलेश -भदेश बतियाति छैक ) कलेश -- चलू ने मुक्खने के कहबए । जे करब से कर , मुदा आन तीन-चारि टा भगजोगनी के । भदेेश -- आर की ? कम सॅ कम बखरी वला त’ निश्चिते आबए क’ चाही । अन्हरी ,बहिरी सब चलतय ।जतेक चन्दा चुटकी हेतए हम सब द’ देब । अंक -तृतीय दृश्य-चारि रामप्रवेश क’ घर । अकेले मे किछु गुनगुना रहल छथि । डूबल भॅवर मे नैया सम्हारु मॉ केओ नजर नहि आबए सम्हारु मॉ राति विकट अछि बाट न सूझए आबू दीप देखाबू सम्हारु  मॉ,,,,,,,,,,, ( हेमचन्द्रक’ प्रवेश ) हेमचन्द्र - के सम्हारताह । जगत जननी त’ मिथिला के बिसरि गेलखिन्ह । गरीबी त’ पहिनहु छल मुदा एहन सांस्कृतिक हैजा कहियो नहि  फैलल । रामप्रवेश -- कक्का क्षमा करु । ककरा पता छल जे कनि कनि टा बात एते विषबेल बनत । हेमचन्द्र  अहॉ जागि गेलहुॅ, तखन हमरा के रोकत ? रामप्रवेश -- कक्का आब जे आदेश देबए से हम करब । (परमेश प्रवेश करैत छथि ) परमेश -- रामप्रवेश छी अओ ? रामप्रवेश ‘-- परमेश आबह । आइ चारि साल बाद तों हमरा दलान पर अइलह। तोरा देखि हम फेर जबान भ’ गेलहुॅ । परमेश -- पुरनका बात सब बिसरु । हमरो ध्यान नहि रहल आ अमुख्य चीज मुख्य बनइत चलि गेल हेमचन्द्र -- छोड़ू पछिला बात सब । आब ई बाजू  जे कोन नाटक खेलल जाइ । रामप्रवेश -- ‘‘उदयनाचार्य’’ नाटक खेलल जाइ । हेमचन्द्र -- अहॉ कोन रोल लेब । रामप्रवेश -- हमरा जे देब से हम करब , ओना आचार्य क’ भूमिका मे परमेश फिट छथि, हमरा सारंग बला रोल द’ दिय । बड़ तेजस्वी बौद्ध भिक्षु अछि । परमेश -- आब हमरो रोल क मोह नहि अछि । सब सॅ बेसी महत्वपूर्ण अछि ओकरा जीनए । (रामप्रवेश  उठि के परमेश के गला लगबैत छथि हेमचन्द्र उठि के दूनू मे मिलि जाइत छथि । ओमहर धीरेन्द्र हॉफैत आबैत छथि ।) धीरेन्द्र -- कक्का - कक्का मुक्खन आ खाके मे जबरदस्त मारिपीट भ  रहल अछि । हेमचन्द्र-- होमए दियओ । रामप्रवेश -- मर’ दियओ सब के । परमेश-- धीरेन्द्र जी जनचेतना मंच फेरि जीवित भ गेल अछि । खूब तैयारी करु । धीरेन्द्र -- हमरो तैयारी पूरा अछि । एहि बेर राहडि  खूब फरल अछि । एक मून राहड़ि भेज देब । (तीनू हॅसि दैत छथि । रामप्रवेश गीत गावैत छथि आ प्रकाश धीरे धीरे क्षीण होइत अछि।) १.शि‍वकुमार झा टि‍ल्‍लू- मैथि‍ली नाटकक वि‍कासमे आनंद जीक योगदान २. गजेन्द्र ठाकुर- चारिटा अंग्रेजी नाटक- डॉक्टर फॉस्टस, सैमसन एगोनिस्टेस, मर्डर इन द कैथेड्रल आ स्ट्राइफ १ शि‍वकुमार झा टि‍ल्‍लू मैथि‍ली नाटकक वि‍कासमे आनंद जीक योगदान जखन-जखन मैि‍थली भाषा साहि‍त्‍यमे नाट्य वि‍धाक चर्च होइत अछि‍ तँ हठात् पंडि‍त जीवन झासँ लऽ कऽ झि‍झि‍रकोना आ तालमुट्ठी सन नाटकक नाटककार अरवि‍न्‍द कुमार अक्‍कू जीक वि‍वेचन स्‍वभावि‍क भऽ जाइछ। एहि‍ एक सय छ: बरखक नाट्य रचनमे बहुत रास नाटककार वि‍वि‍ध शैलीक साहि‍त्‍यि‍क नाटकक संग-संग लोकप्रि‍यताक लेल चलन्‍त आ ओछ नाटक सेहो लि‍खलनि‍। कि‍छु रचनाकार तँ नाटककारेक रूपेँ वेस चर्चित छथि‍  संग-संग हुनका सभकेँ पुरस्‍कृत सेहो कएल गेल अछि‍। उदाहरणस्‍वरूप श्री महेन्‍द्र मलंगि‍या मैथि‍ली साहि‍त्‍यक प्रति‍ष्‍ठि‍त सम्‍मान प्रबोध सम्‍मानसँ सम्‍मानि‍त कएल गेल छथि‍। मलंगि‍या जी बहुत रास नाटक लि‍खलनि‍- लक्ष्‍मण रेखा : खण्‍डि‍त, जुअाएल कनकनी, एक कमल नोरमे, ओकरा अॉगनक बारहमासा, कमलाकातक राम, लक्ष्‍मण ओ सीता आर काठक लोक। एहि‍ नाटक सभमे 'एक कमल नोरमे' साहि‍त्‍यक समग्र बि‍न्‍दुकेँ वि‍म्‍बि‍त करएबला नीक नाटक मानल जाइत अछि‍। मुदा 'काठक लोक' पढ़लासँ पाठक स्‍वयं ि‍नर्णय सुनाबथि‍ जे कतए धरि‍ एकरा 'मैथि‍ली नाटक' मानल जाए। बि‍म्‍व लोकगाथा आ वि‍वेचन मैथि‍लीसँ बेसी हि‍न्‍दीमे। ओना सभ साहि‍त्‍यि‍क कृति‍मे आन भाषाक प्रयोग ठाम-ठाम कएल जाइत अछि‍ मुदा मात्र पात्रक दशा आ परि‍स्‍थि‍ति‍मे तारतम्‍य स्‍थापि‍त करबाक लेल। मलंगि‍याजी एहि‍ पोथीमे हि‍न्‍दीक प्रयोग कोन रूपेँ कएने छथि‍ ई गप्‍प झारखंडक अंत:स्‍थ कक्षाक (मैथि‍ली भाषी जौ उपलब्‍ध होथि‍) छात्र-छात्रासँ पुछल जा सकैत अछि‍ कि‍एक तँ 'काठक लोक' झारखण्‍ड अधि‍वि‍द्य परि‍षद्क मैि‍थली पाठयक्रममे सम्‍मि‍लि‍त अछि‍। मैि‍थलीक संग दुर्भाग्‍य मानल जाए वा वि‍डम्‍वना कि‍छु कथाकथि‍त साहि‍त्‍यकार आ समीक्षकक दलपुंज भाषापर अपन अधि‍कार चमौकनि‍ जकाँ जमौने छथि‍। 'अहाँक सोहर हम गाएब आ हमर डहकन अहाँ बि‍दबि‍दाउ' एहि‍ परि‍पेक्ष्‍यमे कि‍छु प्रति‍भा झॉपले रहि‍ गेल, कतहु कोनो चर्च नहि‍। एहि‍ बज्र पातक टटका शि‍कार छथि‍ आधुनि‍क पिरहीक सनसनाइत युगान्‍कारी नाटककार- 'श्री आनंद कुमार झा' आनंद जीक एखन धरि‍ पॉच गोट नाटक प्रकाशि‍त भेल अछि‍ 'टाकाक मोल (2000), 'कलह (2001), 'बदलैत समाज (2002), धधाइत नवकी कनि‍याँक लहास (2003) आ हठात् परि‍वर्त्तन 2005ई.मे। एहि‍ नाटकक संग-संग आनंदजीक अप्रकाशि‍त नाटकक गणना दू अंक धरि‍ पहुँचि‍ गेल अछि‍। आनंद जीक जन्‍म 1977ई.मे मि‍थि‍लाक सांस्‍कृति‍क सेहंति‍त भूखण्‍ड 'मधुबनी जि‍ला'क मेंहथ गाममे भेल। जौं समस्‍तीपुर खगड़ि‍या आ बेगूसराय जि‍लाक लाल रहि‍तथि‍ तँ उपेक्षाक दंश स्‍वाभावि‍क छल मुदा ठामक वासी उपेक्षि‍त भेलाह कनेक संत्रास जकाँ लगैछ। गाम-गामसँ लऽ कऽ कोलकाता शहर धरि‍ मंचि‍त एहि‍ नाटकक कोनो समीक्षा नहि‍ भेल, ई सभ मात्र मैथि‍ली भाषामे संभव छैक। जौं बि‍म्‍वक उपयोगि‍ताकेँ केन्‍द्र बि‍न्‍दु मानल जाए तँ मैथि‍ली साहि‍त्‍यक प्रवीण नाटक कारक समूहमे आनंद जीक स्‍थान नि‍श्‍चि‍त अछि‍। टाटाक मोल : आर्य भूमि‍क एकटा पैघ व्‍याधि‍ काटर प्रथाक दु:स्‍थि‍ति‍पर केन्‍द्रि‍त एहि‍ नाटकमे मि‍थि‍ला संस्‍कृतिक‍ कोढ़ि‍क चि‍त्रण नीक ढंगसँ कएल गेल अछि‍। कन्‍याक पि‍ता नाओ गरीवनाथ संग-संग दरि‍द्र सेहो। अपन धर्मपत्नी सुमि‍त्राक आश पूर्ण करवाक लेल 'पुत्र कामनार्थ' पॉच गोट कन्‍याकेँ जन्‍म देलनि‍। पहि‍ल बेटीक वि‍वाहमे डॉड़ टुटि‍ गेलनि‍ सभटा खेत बि‍का गेलनि‍। दोसर बेटीक कन्‍यादानक लेल आतुर छथि‍ मात्र बारह कट्ठा जमीन बॉचल छन्‍हि‍। बेटी प्रभा कॉलेजमे पढ़ैत छथि‍, वि‍वाह अपना मोने नहि‍ करए चाहैत छथि‍- मात्र समाजक हेय दृष्‍टि‍सँ बचवाक लेल बेटीक वि‍आह एहि‍ शुद्धमे करवाक लेल परेशान छथि‍। हमरा सबहक समाजक कतेक कलुष रूप अछि‍ अप्‍पन टेटर नहि‍ देखि‍ कऽ लोक सभ दोसरक फुसरीपर काग-दृष्‍टि‍ लगौने रहैत छथि‍। कुमारि‍ बेटी छन्‍हि‍ गरीब झाक घरमे आ परेशान छथि‍ समाजक लोक। एहि‍ लेल नहि‍ जे मि‍थि‍लाक बेेटीक उद्धार कएल जाए मात्र बारह कट्ठा जमीन लि‍खएबाक लोभमे। प्रभा अपन बहि‍नक देअर प्रभाकरसँ सि‍नेह करैत छथि‍ लेकि‍न आंडबरधर्मी समाज एहि‍ सि‍नेहक मंजूरी नहि‍ देत तँए चुप्‍प। गरीव झा दलाल काकासँ संपर्क करैत छथि‍। जेहन नाअो तेहने कार्य। हुनक चेला कक्कासँ बेसी पारखी। दुनूक जोड़ी शुभ्‍म नि‍सुम्‍भ जकाँ दुष्‍ट आ धृष्‍ठतासँ भरल। हर्षदमेहताक दलाली हि‍नका लग ओछ पड़ि‍ जाइत। बालकक पि‍ता लीलाम्‍बर बाबू वास्‍तवमे लीलाधारी छथि‍। भाति‍ज सभसँ कम कैंचा पुत्रक वि‍आहमे कोना लेतथि‍ तँए पचहत्तरि‍ हजारसँ कम टाका नहि‍ चाही। दलाल काकाक मोहि‍नी मंत्रक जादूमे आबि‍ पैंसठ हजारमे वि‍आह करबाक ि‍नर्णय सुनौलनि‍। शर्त्त छनि‍ जे समाजमे पचहत्तरि‍ हजारक उद्धोष कएल जाए। दलाल काकाक कलि‍जुगी उगना एहि‍ उद्धोषणक लाभ लेवाक प्रयासमे सफल भेलनि‍। दलालीक दस हजार कमीशन दुनू चेला गुरूक पेटमे। गरीब झा अपन वॉचल जमीन 50 हजारमे बेि‍च लेलनि‍। मि‍त्र गुणानंद जीसँ दस हजार टाकाक मदति‍ भेटलनि‍, शेष प्रश्‍न ओझराएल पंद्रह हजार आव कोना हएत? येन केन प्रकारेन वरि‍याती दलान लागल। फेर धमगि‍ज्‍जड़ि‍। माथक पाग खसि‍ पड़लनि‍ मुदा वरि‍याती आपि‍स। अंतमे प्रभाकरक संग प्रभाक वि‍आह होइत अछि‍। लीलांवर जी काटरक टाका पचास हजार कन्‍यागतकेँ आपि‍स कएलनि‍। मुदा नाटककार ई स्‍पष्‍ट नहि‍ कऽ सकलनि‍ जे दलाल काका दलालीक दस हजार कन्‍यागतकेँ देलनि‍ वा नहि‍। कथानकक कि‍छु तथ्‍य वास्‍तवि‍कता नहि‍ भऽ कऽ कल्‍पना मात्र लागल। गरीब नाथक बेटी प्रभा काॅलेजमे पढ़ैत छथि‍ आ छोट मांगल-चांगल भाए महीस चरबैत छन्‍हि‍। ओना तँ पुत्रक आकांक्षामे पॉच गोट पुत्रीक जन्‍म देमएबला माए-बापक अर्थव्‍यवस्‍था अव्‍यवस्‍थि‍त हएव स्‍वाभावि‍क अछि‍। परंच मैथि‍ल संस्‍कृति‍क ग्रामीण व्‍यवस्‍थामे रहनि‍हार माता-पि‍ताक जीवनमे संतानक रूपेँ पुत्रसँ पुत्रीक बेसी महत्‍व देव कल्‍पना मात्र छैक, वास्‍तवमे तँ बेटी जन्‍महि‍सँ आनक धरोहरि‍ मानल जाइत अछि‍ तँए बेटा महीस चराबथि‍ आ बेटी कॉलेजमे पढ़तीह, आश्‍चर्य जनक लागल। कथानकक बीच-बीचमे अंग्रेजी शब्‍दक प्रयोग कऽ नाटककार आधुनि‍कता लेपन करवाक प्रयास कएलनि‍ ई उचि‍त अछि‍ वा नहि‍, पाठकपर छोड़ि‍ देवाक चाही। एकटा अनसोहॉत अवश्‍य लागल जे मैथि‍लीमे 'चुकल' शब्‍दक प्रयोग कहि‍या धरि‍ रहत। नि‍ष्‍कर्षत: ई नाटक मंचनक योग्‍य अछि‍। कलह : कलह आनंदजी लि‍खि‍त दोसर नाटक थि‍क। समाजमे जीवन्‍त धटना सभकेँ एक सूत्रमे जोड़ि‍ कऽ एहि‍ नाटकक सृजन कएल गेल। आकाश एकटा बेरोजगार नौजवान छथि‍। टाकाक लोभमे पि‍ता सुरेश्‍वर हि‍नक वि‍आह करा दैत छथि‍न्‍ह। आकाश सुरेश्‍वर बाबूक पहि‍ल पत्नीक संतान छथि‍ तँए वि‍माता सुमि‍त्राक दृष्‍टि‍मे हि‍नक कोनो स्‍थान नहि‍। सुमि‍त्रा तँ अपन कोखि‍सँ जनमल पुत्र राजीव आ ओकर कनि‍याँ कोमलक लेल ज्‍येष्‍ठ पुत्रक संग यातनाक सभटा बान्‍ह लॉधि‍ देलनि‍। प्रौढ़ पि‍ता मूक प‍रि‍स्‍थि‍ति‍क मारल मात्र दर्शक बनि‍ कऽ रहि‍ गेलाह। कालक मारि‍सँ भटकैत-भटकैत दुनू परानीक ि‍नर्मम अंत होइत अछि‍। एकटा अबोध नेनाक जन्‍म भेल जे आकाशक अंतरंग मि‍त्र योगेशक कोरमे कथाक अंत धरि‍.....। नाटककार एहि‍ नाटकक रचना भऽ सकैत अछि‍ जे कथानकमे संत्रास भरबाक संग-संग दर्शकक मध्‍य लोकप्रि‍य बनएवाक लेल केने होथि‍ मुदा एहि‍ सभसँ नाटकक प्रासंगि‍कतापर प्रश्‍न चि‍न्ह नहि‍ लगाओल जा सकैत अछि‍। कतहु-कतहु बि‍म्‍व वि‍श्‍लेषण चलंत आ हि‍न्‍दी भाषाक व्‍यवसायि‍क चलचि‍त्र जकाँ लागल मुदा मैथि‍लीमे नवल प्रयोगकेँ कि‍ओ झॉपि‍ नहि‍ सकैत छथि‍, जतए-जतए एहि‍ नाटकक ि‍चत्रण होएत अवश्‍य छाप छोड़त। बदलैत समाज : बदलैत समाज नाटकक आरंभ एकटा ब्‍लड कैंसर पीड़ि‍त बालकक अपन पत्नीक संग वार्तालापक संग होइत अछि‍। कर्जसँ मुक्‍ति‍क लेल घूरन जी अपन बीमार पुत्रक वि‍आह करा दैत छथि‍। हुनका ओना बूझल नहि‍ छलनि‍ जे पुत्र अवधेश ब्‍लड-कैंसरसँ पीड़ि‍त अछि‍। भजेन्‍द्र मुखि‍याक पुत्र दीपक अवधेशक बाल संगी छथि‍। ओ पहि‍नेसँ जनैत छलाह जे अवधेशक मृत्‍युक दि‍वस नजदीक छन्‍हि‍। तथाि‍प ओ खुलि‍ कऽ नहि‍ बजलनि‍ कि‍एक तँ घूरन बाबू स्‍वयं बूढ़ लोक छथि‍। एकटा पि‍ता अपन कान्‍हपर पुत्रक लाशक कल्‍पना मात्रसँ सि‍हरि‍ सकैत छथि‍, वास्‍तवि‍कता.........।। वि‍वि‍ध घटनाक्रममे अवधेशक मृत्‍युक भऽ गेलनि‍। समाज हुनक वि‍धवा शोभापर चरि‍त्रदोष सेहो लगौलक। समाज की जाहि‍ अवलापर ओकर सासुक वि‍श्‍वास नहि‍ हुअए ओकरापर आन के वि‍श्‍वास करत। नाटकक अंतमे सबहक भ्रम टुटैत अछि‍ जखन शोभा दीपककेँ 'भैया' कहि‍ कऽ अश्रुलाप करैत छथि‍। अंतमे वि‍धवा शोभाक एकटा सच्‍चरि‍त्र युवक वीजेन्‍द्रसँ पुर्नवि‍वाहक कल्‍पना कएल गेल। ओना तँ एहि‍ नाटकमे जात-पाति‍क कोनो चर्च नहि‍ मुदा प्रसंगसँ स्‍पष्‍ट होइत अछि‍ जे सवर्ण परि‍वारक पृष्‍ठभूमि‍मे नाटक केन्‍द्रि‍त अछि‍। नाटककारक ई कल्‍पना नीक लागल जे सवर्ण घरक वि‍धवा युवतीक पुनर्विवाह भऽ सकैत अछि‍। नाटकक संवादमे ठाम-ठाम अलंकार आ लोकोक्‍ति‍क लेपन नीक लागल। 'सम्‍भावनाक आधारपर मनुष्‍य कल्‍पना करैत अछि‍। मुदा प्रकृति‍क शास्‍वत नि‍यमकेँ कि‍ओ नहि‍ बदलि‍ सकैत अछि‍' एहि‍ संवादक माध्‍यमसँ अवधेश अपन मृत्‍युक संकेतकेँ बूझि‍ रहल छथि‍। हुनक दोसर संवादमे- 'हम मृत्‍युसँ भयभीत नहि‍ छी। भय अछि‍ ओइ नि‍स्‍सहाय अवला नारीक असीम दु:ख, पीड़ा आ वेदनासँ। भय अछि‍ अनजानमे हमरासँ भेल गलतीसँ।' श्रंृगारक प्रवल लालसा रहि‍तहुँ परि‍स्‍थि‍ति‍ मनुक्‍खकेँ वैरागी बना दैछ। जनतंत्रक कुटि‍ल व्‍यवस्‍थापर सेहो एहि‍ नाटकमे कटाक्ष कएल गेल। भजेन्‍द्रजी सन कुटि‍ल गामक मुखि‍या छथि‍ तँ वि‍पक्ष हुनकोसँ बेसी कुटि‍ल। तँए ने फुराइतो छन्‍हि‍ हुनका 'ओ बनि‍याँ बुड़ि‍वक होइत अछि‍ जे पलड़ापर बटखड़ा रखलासँ पहि‍ने समान चढ़ा दैत अछि‍।'' आनंदजीक चारि‍म नाटक धधाइत नवकी कनि‍याॅक लहास :  कोनो काटक प्रथाक नाटक नहि‍। मात्र कि‍छु गहनाक खाति‍र शि‍खाक आत्‍महत्‍याक प्रयास अजीव कहल जा सकैछ। हठात् परि‍वर्त्तन : देशभक्‍ति‍ मूलक नाटक थि‍क। नि‍ष्‍कर्षत: ई कहल जा सकैत छथि‍ जे आनंद जीक नाटक शैलीमे गोवि‍न्‍द झाक हास्‍य समागम, ईशनाथ झाक अलंकार, जगदीश प्रसाद मंडल जीक साम्‍यवाद, अक्कूजीक आधुनि‍कता, लल्‍लन ठाकुर जीक मंचन शैली आ शेखर जीक जनभाषा कलकल अछि‍। २ गजेन्द्र ठाकुर चारिटा अंग्रेजी नाटक- डॉक्टर फॉस्टस, सैमसन एगोनिस्टेस, मर्डर इन द कैथेड्रल आ स्ट्राइफ एहि निबन्धक आधार अछि परशुराम झाक “डाइमेन्शन्स ऑफ पीस इन इंग्लिश ड्रामा- स्टडीज इन डॉक्टर फॉस्टस, सैमसन अगोनिस्टेस, मर्डर इन द कैथेड्रल एण्ड स्ट्राइफ”। परशुराम झा १९३८- गाम- मेंहथ (मधुबनी), कृति- डाइमेन्शन्स ऑफ पीस इन इन्गलिश ड्रामा,क्रिश्चियन पोएटिक ड्रामा। परशुराम झा अंग्रेजी साहित्यक आजीवन अध्यापन केने छथि। डॉक्टर फॉस्टस एलिजाबेथ युगक, सैमसन एगोनिस्टेस एज ऑफ रीजनक, मर्डर इन द कैथेड्रल आधुनिक युगक नाटक अछि। ई तीनू मुख्यतः धार्मिक नाटक अछि। स्ट्राइफ आधुनिक धर्मनिरपेक्ष नाटक अछि, ई सिद्ध करैत अछि जे धर्मनिरपेक्षता धर्मसँ निकलल अछि, कमसँ कम धर्मक नैतिक सन्दर्भसँ। डॉक्टर फॉस्टस (द ट्रैजिकल हिस्ट्री ऑफ द लाइफ एण्ड डेथ ऑफ डॉक्टर फॉस्टस) क्रिस्टोफर मारलोवे (१५६४-१५९३) लिखित अछि। क्रिस्टोफर मारलोवे सेक्सपियर(१५६४-१६१६) क समकालीन छलाह। क्रिस्टोफर मारलोवेकेँ कोनो आपत्तिजनक पाण्डुलिपि लेल प्रिवी काउन्सिल द्वारा वारन्ट जारी कऽ बजाओल गेल आ तकर दस दिन बाद हुनकर चक्कू मारि हत्या कऽ देल गेल, जखन ओ मात्र २९ बर्खक छलाह। ओ जँ अपन सम्पूर्ण जिनगी जिबितथि तँ सेक्सपियरसँ पैघ नाटककार होइतथि वा नै से इतिहासक गर्भमे नुकाएल रहि गेल। ई नाटक ब्लैंक वर्स आ गद्य मिश्रित अछि। ब्लैंक वर्समे मीटर रहै छै मुदा लय नै। मारलोवेक जीवन कालमे एकर मंचन भेल मुदा एकर प्रकाशन हुनकर मृत्युक एगारह बर्खक बाद भेल। सैमसन अगोनिस्टेस (सैमसन, प्रतियोगी-योद्धा)जॉन मिल्टन (१६०८-१६७४) लिखित दुखान्त क्लोजेट पद्य-नाटक अछि। क्लोजेट नाटक तकरा कहल जाइत छै जे मंचन लेल नै वरन असगर पढ़बा लेल लिखल जाइ छै वा किछु गोटे संगे जोर-जोरसँ पढ़ि कऽ सुनबा-सुनेबा लेल। मर्डर इन द कैथेड्रल टी.एस. इलियट (१५६४-१५९३) लिखित पद्य-नाटक अछि। स्ट्राइफ(कटु संघर्ष)  जॉन गाल्सवर्दी (१८६७-१९३३) लिखित नाटक अछि। डॉक्टर फॉस्टस - क्रिस्टोफर मारलोवे १५९२ ई. मे “इंग्लिश फाउस्ट बुक”मे किछु घटोत्तरी-बढ़ोत्तरी कऽ “डॉक्टर फाउस्टस” नाटक रचित भेल, जे ओहि युगक वास्तविकताकेँ देखबैत अछि। डॉक्टर फॉस्टस “मेडिएवल मिस्ट्री प्ले”, मोरेलिटी प्ले” आ “इन्टरल्यूड”सँ सम्बन्धित अछि- कथ्य आ रूप दुनूमे। फेर फॉस्टसक “असीमित ज्ञान”, “लौकिक आनन्द” आ “शक्ति”क लेल अदम्य लालसा एहि नाटककेँ पुनर्जागरणक आत्माक निकट लऽ जाइत अछि। फॉस्टसक पहिल प्रवेश ओकरा लेल दूटा विकल्प लऽ अबैत अछि। ओकरा आध्यात्मिक जीवन चुनबाक छै आकि लौकिक। ओकरा नै खतम होअएबला आनन्द चाही आकि आध्यात्मिक अंधकूप आ मुत्यु। ओकरा अपन इच्छाक पालन करबाक छै आकि भगवानक। ओ ज्ञानी अछि, एरिस्टोटलक तर्क चिन्तन ओ पढ़ने अछि, रोग-व्याधि दूर करैबला चिकित्साशास्त्र ओ जनैत अछि। ओ धर्मशास्त्रमे डॉक्टरेट अछि। मुदा ई सभ ज्ञान ओकरा शान्ति आ आनन्द नै दै छै। मुदा ओ चुनैए जादू आ लौकिक इच्छाक तृप्तिक रस्ता। एहि जादूक चयन कऽ ओ “भरोस”पर भरोस छोड़ि दैए। फॉस्टसक लौकिक इच्छा छै वेस्ट इंडीजक आ अमेरिकाक (जे मारलोवेक समएमे इंडिया कहल जाइ छल) सोना, पूर्वक मोती, नीक फल। ओकर इच्छाक लेल जादूगर वाल्डेस आ कॉरनेलियस छै। नाटकक बादक भागमे मेफिस्टोफिलिसक आगमन होइ छै- फॉस्टस ओकरासँ कहैत अछि जे ओ लूसीफरकेँ सूचित करए जे फॉस्टस अपन आत्माक बदलेन लौकिक भोग लेल करबाक लेल तैयार अछि। “नीक दूत”क फॉस्टसकेँ सुझाव जे ओ स्वर्ग आ स्वर्गीय वस्तुक विषयमे सोचए, फॉस्टस “खराप दूत”क सलाह मानि धनक इच्छा करैए। अपन आत्माक निलामीक बंधकपत्र अपन खूनसँ लिखैत अछि फॉस्टस। लूसीफरकेँ अपन आत्मा समर्पित कऽ दैत अछि ओ। मेफिस्टोफिलिस ओकरा नर्कक विषयमे कहैत अछि मुदा ओ ओहिपर ध्यान नै दऽ “सुतनाइ”, “खेनाइ” आ “चलनाइ”पर ध्यान दैत अछि। बहस केनाइ, ज्ञानक संचय, खगोलशास्त्र आ वनस्पतिशास्त्रक ज्ञान आ सौन्दर्यशास्त्र ई सभ मेफिस्टोफिलिसक सहयोगसँ फॉस्टस प्राप्त करैत अछि। फॉस्टसक लैंगिक इच्छाक पूर्तिक पहिने मेफिस्टोफिलिस ओकरा बुझबैत अछि मुदा फेर एकटा “खराप आत्मा”केँ स्त्री बना फॉस्टसक पत्नीक रूप दैत अछि। “खराप आत्मा” कोनो मृत व्यक्तिक अनुकरण कऽ सकैए मुदा स्वयं जीवित नै भऽ सकैए। से तकर परिणाम ई भेल जे ओकर ठोढ़ फॉस्टसक आत्माकेँ चूसि लैत छै। “खराप आत्मा”सँ संसर्गक पाप फॉस्टस करैए आ परिणाम छै ओकर आध्यात्मिक मृत्यु। ओ भगवानसँ दूर भऽ जाइए आ ओ “खराप आत्मा” संगे चौबीस बर्ख बितेबाक लेल रस-रंगमे डूमि जाइए। मुदा जखन ओकर मृत्युक बॉन्डक समए निकट अबै छै, ओ कहैए- “हम जे जिबितौं एकरा सभक संग तँ स्थिर जीवन जिबितौं मुदा आब मरब तँ सदा लेल मरि जाएब”। आ ओकर अन्तिम क्षण- जखन ओकर मृत्यु होएबाक छैक तकर पूर्व- बारह बजेक घड़ीक टिकटिक। ओ दुखी भऽ कहैए- “ओकर आत्मा अखनो जीबए नर्कमे रहबाक लेल” मुदा... ओ विद्वान् सभकेँ कहैए- ओ साँप जे ईवकेँ प्रलोभित केलक से बचि सकैए मुदा फॉस्टस नै। ओ पश्चातापो नै कऽ सकैए, ओकरा क्षमा नै कएल जा सकै छै, पवित्र नै कएल जा सकै छै। ओ स्वीकार करैए जे ओ भगवानकेँ अपमानित केने अछि। सैमसन एगोनिस्टेस- जॉन मिल्टन नाटकक प्रारम्भमे सैमसनकेँ आन्हर कऽ गाजाक जेलमे श्रम मजदूरी लेल होएबाक आ एक गोटे द्वारा जेलक सोझाँक चमकैत किनारपर लऽ जएबाक दृश्य अछि। ई एकटा छुट्टीक दिन छल, कारण छल फिलिस्तीनक भगवान डेगोनक, जे अदहा मनुक्ख आ अदहा माँछ छथि, भोज छै। बसात लगलासँ सैमसन अपनामे ऊर्जाक संचार पबैए। ओकरामे स्वर्गसँ भेटल शक्ति छै जे फिलिस्तीनक परतंत्रतासँ इस्रायलकेँ मुक्ति दिएबा लेल छै। मुदा तखने ओकरा लगै छै जे भगवान ओकरा जतेक शक्ति देलन्हि ततेक बुद्धि नै देलन्हि, नै तँ ओ ओतेक जल्दी अपन शक्तिक रहस्य डेलिलाकेँ नै बतबितै। मुदा भगवानक बुद्धिपर ओ कोनो बहस कोना कऽ सकैए, जे की इच्छा छै ओकर। ओकर पिता मनोआ सैमसनकेँ जेलसँ बाहर निकालबाक एकटा योजना लऽ अबैत अछि। ओकर योजना जे फिलिस्तीनक सामन्तकेँ पाइ दऽ सैमसनकेँ छोड़बाबी, ई सैमसनकेँ नीक नै लगै छै, नै मानै अछि ओ। मनोआ ओकरा कहै छै जे फिलिस्तीन सभ भोजक क्रममे डेगनक प्रशंसा करत आ इस्रायलक भगवानक अपमान। ई सुनि सैमसन दुखी भऽ जाइए। ओ मनोआकेँ कहै अछि जे ओकरा कोनो आशंका नै छै जे इस्रायलक भगवान डेगोनपर विजय करत। मनोआक गेलापर ओ कोरसमे मुदा ई कहैए जे मुदा ओ कोना भगवान लेल काज कऽ सकत? डेलीला अबैए आ सैमसनकेँ कहैत अछि जे ओ फिलिस्तीनी सामन्तकेँ कहि ओकरा छोड़बाओत मुदा सैमसन ओकरा रहस्यकेँ खोलैवाली कहैए। हराफा सैमसनकेँ कहैत अछि जे भगवान सैमसनकेँ छोड़ि देने छथि। अधिकारी अबैत अछि आ ओ फिलिस्तीनक सामन्तक आदेश अनैत अछि जे सैमसनकेँ अपन करतब डेगनक  भोजक अवसरपर देखेबाक छै। पहिने ओ मना करैए फेर किछु सोचि कऽ मानि जाइए। मिल्टन फिलिस्तीनीकेँ लौकिक आनन्दमे खसल आ डेगनकेँ ओहि लौकिक आनन्दक देवताक रूपमे देखबैत छथि। सैमसन दूटा खाम्हक बीचमे जाइत अछि, प्रार्थना करैत अछि आ भवनकेँ खसा दैत अछि। दूतक एहि वर्णनसँ सैमसनक पितामे शान्त प्रतिक्रिया होइत अछि। ओ कहैत छथि- दुखी होएबाक समए नै अछि। ओ अपन मुत्युसँ इस्रायल लेल सम्मान आ स्वतंत्रता अनने छथि। मर्डर इन द कैथेड्रल- टी.एस. इलियट मर्डर इन द कैथेड्रल कैंटरबरीक महिलाक कोरस स्वरसँ प्रारम्भ होइत अछि जाहिमे प्रकृतिक स्वरूपक हितकारी नै होएब आ सुरेब नै होएब वर्णित अछि। दूत आर्कबिशपक इंग्लैंड आगमनक  सूचना दैत अछि। बेकेट फ्रांसमे सात बर्ख रहलाक बाद कैंटरबरी घुरैत छथि। एतए हुनका लेल बाहरी आ आन्तरिक दुनू स्तरपर संघर्ष छै। राज्यक आ धर्मक, राजा आ आर्कबिशपक संघर्ष तँ छैहे, आन्तरिक संघर्ष सेहो छै जे भीतरक इच्छा छै। ओ अपन भूतकालकेँ, जाहिमे बैरन सभक मित्रता आ चान्सलरशिप अबैत अछि, केँ “छाह” कहै छथि, एहिसँ सेहो हुनका संघर्ष करबाक छन्हि। बेकेटक बाहरी शत्रु चारिटा “नाइट” तरुआरि भँजैत अबैत छथि। बेकेट तावत अपन आन्तरिक शत्रुपर विजय प्राप्त कऽ लेने छथि आ ओ शान्तिसँ “नाइट” सभकेँ कहै छथि- “अहाँ सभक स्वागत अछि, चाहे अहाँक उद्देश्य जे हो”। ओ कहै छथि जे हुनका कहियो इच्छा नै भेलन्हि जे ओ राजाक पुत्रक मुकुट छीनि लेथि। नाइटक राजाक आदेश सुनेलापर जे ओ देश छोड़ि देथि, बेकेट कहै छथि जे आब नै, सात साल ओ अपन लोकसँ दूर रहलाह। ओ अपन हत्या कएल जएबासँ पूर्व नाइट सभसँ कहै छथि- “हमर अहाँ जे चाही करू मुदा हमर लोक अहाँकेँ छूबो नै करताह”। पुरोहित सभ हुनका इच्छाक विरुद्ध हुनका जबरदस्ती कैथेड्रलक भीतर लऽ जाइ छथि आ चर्च बन्द कऽ दै छथि। मुदा बेकेट कहै छथि- “चर्च सर्वदा खुजल रहबाक चाही, शत्रुक लेल सेहो”। जखने चर्चक दरबज्जा खुजैत अछि मातल “नाइट” सभ बेकेटक हत्याक उद्देश्यसँ पैसि जाइ छथि। बेकेटक हत्या भऽ जाइ छन्हि, पुरहित सभ भगवानकेँ धन्यवाद दै छथि जे ओ कैंटरबरीमे एकटा आर सन्त देलन्हि। स्ट्राइफ- जॉन गाल्सवर्दी ट्रेनार्था टिन प्लेट वर्क्समे एकटा औद्योगिक विवादक कारण अक्टूबरसँ श्रमिकक हड़ताल प्रारम्भ भेल। चारि मासक बाद ७ फरबरीकेँ एकटा विशेष बोर्ड मीटिंग एहिपर भेल, मैनेजर फ्रांसिस अंडरवुडक, जे कम्पनीक चेयरमेन जॉन एन्थोनीक जमाए छथि, डाइनिंग रूममे। एहि मीटिंगमे डाइरेक्टर फ्रेडरिक एच. वाइल्डर, विलियम स्कैंटलबरी, ओलीवर वैंकलिन आ एंथोनीक छोट पुत्र एडगर सेहो छथि। एडगर श्रमिकक दशासँ आहत छथि। मुदा वाइल्डर उग्र छथि कम्पनीक शेयर नीचाँ गेलासँ आ पचास हजारसँ बेशी घाटासँ ओ चिन्तित छथि। स्कैंटलबरी अहिंसाक पथिक छथि तँ वैंकलिन मध्यमार्गी छथि। एंथोनी मुदा श्रमिकक लेल कोनो सहानुभूतिक विरुद्ध छथि। वाइल्डर सुझाव दै छथि जे सेंट्रल यूनियनक हारनेसकेँ विवाद दूर करबा लेल कहल जाए मुदा एंथोनी मना करै छथि। वर्कमेन कमेटीक आन सदस्यक संग छथि रॉबर्ट्स, ओ एंथोनीक विरोध करै छथि। हारनेसक विपरीत ओहो उग्र छथि। एंथोनीक पुत्री एनिड पिताक वर्गान्तरक विरुद्ध छथि। हुनकर खबासनी एनी रोबर्ट्ससँ बियाहल छनि, एनीक सहायता एनिड करऽ चाहै छथि। एनिडक भेँट रॉबर्ट्ससँ ओकर झोपड़ीपर होइ छन्हि। ओ ओकरा समझौता लेल कहै छथि मुदा ओ एंथोनीकेँ आततायी कहै छथि। कहै छथि जे एंथोनी मरैत रहत आ रॉबर्ट्सक हाथ उठेलासँ जे ओकर जान बचि जेतै तँ रॉबर्ट्स अपन कंगुरिया आँगुरो नै उठाओत। श्रमिक मीटिंगमे रॉबर्ट्सक समर्थक इवान्स आ जॉन बलगिनमे झगड़ा भऽ जाइत छै। हेनरी थॉमस आगू अबैए आ कहैए – “लाज होइए तोहर ’स्ट्राइफ’पर”। बेरू पहरक मीटिंगमे ओ श्रीमती रॉबर्ट्सक मुत्युक सूचना दैत अपन सदस्यतासँ इस्तीफा देबाक गप करैत अछि। मुदा एंथोनी कहैए- युद्ध तँ युद्ध होइ छै। रॉबर्ट्स बोर्ड मीटिंगमे कनेक देरीसँ अबैए, ओकरा पता लगै छै जे ओकर श्रमिक सभ ओकरा हटा देलकै। आ एंथोनीकेँ सेहो निदेशक सभ हटा देलकै। हारनेसक नेतृत्वमे समझौताक गप आगाँ बढ़ैत छै। हेनरी टेक, कंपनीक सचिव संतुष्ट छथि। प्रकाश चन्द्र प्रयोग एकांकीक रंगमंचीय प्रयोग फरवरी 2010के 14 तारिख क’ दरभंगाक ललितनारायण मिथिला विश्वविद्यालयक नाटक एवं संगीत विभागक प्रेक्षागृहमे सांझक 4 बजे स’ आयोजित छल प्रबोध साहित्य सम्मान – 2010 । एहि आयोजनमे स्वस्ति फाउण्डेशन द्वारा कुणाल जीक निर्देशनमे नचिकेता जीक लिखल प्रयोग एकांकीक मंचन सेहो राखल गेल छलैक । संयोग स’ हमहू मधुबनीमे रही तेँ एहि सूअवसर केँ लाभ उठयबाक हेतु एहि आयोजनमे उपस्थित भेनाइ जरूरी लागल । एक संग कतेको लाभ छल । एहि स’ पहिने सेहो कुणालजी प्रयोग के मंचित क’ चुकल छ्लाह । ई हुनकर दोसर प्रस्तुति छल, तेँ कनि आरो महत्वपूर्ण । कहल जाइत अछि जे कोनो नाटक बेर बेर मंचित भेलाक बाद आरो निखरैत अछि संगहि ओ अपन कथ्य आ मंचनमे परिपक्वता सेहो ग्रहण करैत अछि । सात बजे साँझमे प्रयोग एकांकीक मंचन शुरू भेल । लगभग 45 मिनटक एहि एकांकीक शुरुआत अन्हार स’ छल जाहिमे कोनो महिलाक आवाजमे काव्य पाठ भ’ रहल छल । धीरे धीरे प्रकाश अबैत अछि आ मंचपर एकटा लकड़ीक गेट देखाइत छै । नाटककार एकरा फ्रेम कहलथि अछि मुदा मंचपर हमरा ई गेटक अनुभूति देलक । ई गेट कनी उँचाई ग्रहण केने अछि आ ओहि तक पहुँचबाक लेल तीन-चारिटा स्टेप बनल अछि जाहि स’ ई कोनो कोठरीक प्रेवेश द्वार प्रतीत होएत छैक । मुदा, नाटककार एहि स्टेपके सीढ़ी कहने छथि । आब ई कहनाइ कनी कठिन अछि जे नाटककार नचिकेता जीक सीढ़ी आ निर्देशक कुणाल जीक ई स्टेपमे कतेक समानता छनि । मुदा नाटककारक फ्रेम आ निर्देशकक गेट त’ जरूरे भिन्न अछि । नाटकक अनुसारे सीढ़ी आ फ्रेममे कोनो संबंध नहि देखाओल गेल अछि । मुदा, एहि ठाम स्टेप आ फ्रेमके एना संयोजित कयल गेल अछि जे ई कोनो कोठरीक प्रवेश द्वार बुझना जाइत छैक । एही स्टेपपर ठाढ़ रहैत छथि नाटकक मुख्य कलाकार नवीन मिश्र । मंचक बामा कात (दर्शक दिस स’) एकटा कुर्सी अछि जे दर्शक दिस पीठ क’ क’ राखल रहैछ । संगहि एकटा बक्सा सेहो एकर बगलमे राखल गेल अछि । हाँ, नाटकक अनुसार ई लकड़ीक अछि आ उलटा राखल गेल अछि मुदा एखन मंचपर ई चदराक आ ओहिना राखल अछि जेना कोनो ब्लॉक राखल जाइत अछि । दाहिना कात  (दर्शक दिस स’) एकटा गाछक किछु डारि देखार परैत अछि । कुर्सीक बेसी उपयोग अमृत करैत छथि आ गाछक डारिक तरमे प्राय: नाटकक एक मात्र महिला पात्र श्रुति रहैत छथि । बस । हाँ ! ई कहि दी जे ई मंच विन्यास एहि नाटकक निर्देशक कुणाल जीक मानल जेबाक चाही । कारण, प्रयोग नाटकमे एकर लेखक नचिकेताजी स्वयं मंच विन्यासक निर्देश देने छथि, जकरा थोड़ बहुत बदलल गेल अछि । आजुक एहि मंचनक लेल तैयार मंच विन्यास कनि कंफ्यूज करैत अछि । कुर्सी आ बक्सा स’ लगैत अछि जे ई कोनो नाट्य संस्थाक पूर्वाभ्यासक कक्ष अछि मुदा गाछक डारि आ गेटक आगू बनाओल गेल स्टेप स’ लगैत अछि जे ई कोनो कोठरीक आगूक भाग थिक । तेँ एहि तरहक मंच विन्यासपर गंभीरता स’ विचार करबाक आवश्यकता छल नाटकक कथ्यके स्थापित करबाक लेल । आब नाटकमे अभिनेताक वस्त्र विन्यास दिस सेहो ध्यान देल जाय । मुख्य अभिनेता नवीन मिश्रकेँ निर्देशक रूपमे टोपी, सीटी, कुर्ता, पेंट आ पैरमे जूता ठीक अछि मुदा बाकी दुनू पात्र खाली पैरे छथि से कियेक ? पैरक पहिरनमे भिन्नता भ’ सकैत अछि मुदा कियो पहिरने आ कियो खाली पैरे कनि त्रुटि पूर्ण लगैत अछि । श्रुतिके सेहो साड़ी स’ बेसी नीक हुनका सलबार फ्राक होइतनि जाहि स’ ओ अभिनय करबा काल मूवमेंट करबामे फ्री महसूस करितथि । नाटकमे सेहो ई नहि पता चलैत अछि जे श्रुति विवाहल छथि वा कुमारि । एहना स्थितिमे हुनका कुमारि मानल जेबाक चाही छल । हुनका कांख तर लटकल पर्स नीक अनुभूत दैत अछि । मुदा प्रियंका नीक जेना अपन अभिनयमे पर्सक उपयोग नहि क’ सकलीह । अमृतक ड्रेस सेहो कोनो बेसी आकर्षक नहि मानल जयबाक चाही । कारण, मंच पर कतेको तरहक प्रकाश अबैत जाएत रहैत छै आ तेँ प्राय: कारी आ उज्जर रंगक उपयोग कोनो विशेषे परिस्थितिमे करबाक चाही । एहि ठाम अमृत नामक कलाकार कारी पेंट आ उज्जर शर्ट पहिरने छथि । कारी पेंट होबाक कारण अमृत जखन ओहि स्टेपपर बैसैत छथि कि स्टेप पर परल सभटा गर्दा हुनका पेंटमे लागि जाइत छनि जे नीक नहि लगैत अछि । हाँ ! एहन स्थितिक जँ माँग करैत अछि नाटकक कथ्य तखन त’ नीक, मुदा प्रयोगक संदर्भमे ई कहनाइ उचित नहि होयत । एहि तरहें मात्र नवीन मिश्र जीक वस्त्र सज्जा नाटकक तदनुरूप मानल जायत । एहि प्रस्तुतिमे प्रकाश व्यवस्थाके नीक मानल जयबाक चाही । प्रकाश परिकल्पना चन्द्रभूषण झाक छनि आ संचालनो स्वयं क’रहल छथि । नाटकक शुरुआत अन्हारमे होइत अछि आ धीरे धीरे प्रकाश नवीन मिश्रपर परैत छनि । एहि प्रेक्षागृहमे कोनो तरहक सूनियोजित प्रकाश व्यवस्था नहि अछि,  तैयो प्रकाशक एतेक विभिन्न सेड उत्पन्न केनाई प्रशंसनीय अछि । हाँ ! कलाकार आ प्रकाशपुँज दुनूक बीच तदात्मक अभाव देखाइत अछि । कखनो कखनो कलाकार प्रकाश स’ दूर भ’ जाइत छथि त’ कखनो कखनो प्रकाश कनि देरी स’ प्रकट होइत अछि । मंच छोट हेबाक कारण प्रकाश बिम्बमे ऑभरलेपिंग भेनाइ निश्चित छल से भेबे कयल । अंतिम दृश्यक प्रकाश संयोजन अति सुन्दर बनल अछि । एहि दृश्यमे नाटकक कथ्यक अनुसार दृश्य आ ओकरा उभारैत प्रकाश संयोजन जबरदस्त बनल अछि । अभिनेताक मुख्य सज्जा पूर्ण रूपेण यथार्थवादी राखल गेल छैक । कोनो तरहक बदलाव नहि । नाटकक अनुरूपे ई बेसी नीक । मेक-अप मात्र मंचक अनुसार कयल गेल अछि । मिथिलाक कोनो एहन प्रेक्षागृह नहि अछि जाहिमे ध्वनि व्यवस्था रंगमंचक अनुरूप हो । मिथिले कियेक बिहारमे आरा स्थित रेनेशांक प्रेक्षागृह छोड़ि कोनो प्रेक्षागृह एहन नहि अछि । तेँ सभ प्रस्तुतिकर्ताके स्वयं ध्वनि व्यवस्था क’र’ पड़ैत छनि । एहू ठाम एहने व्यवस्था छल । मुदा, मंच पर ततेक नीक जेना माइक संयोजन कयल गेल जे अभिनेता कोनो कोन स’ बजथि हुनकर आवाज सम्पूर्ण प्रेक्षागृहमे नीक जेना सुनाइ पड़ैत छलनि । नाटकमे संगीत सेहो पर्याप्त राखल गेल अछि ओहो पहिने स’ रिकार्डिंगके रूपमे । संगीतक संयोजन सीताराम सिंह जीक छन्हि ।  संगीतक संग अनेको तरह ध्वनिक प्रयोग सेहो कयल गेल अछि । संगीत प्राय: सभटा अत्याधुनिक अछि । ओना नाटकमे एहि तरहक संगीतक प्रयोग निर्देशकक अप्पन छनि । ई संगीत नाटकके प्रभावी बनेबामे सहयोग करैत अछि । संगीत संचालन संजीव पांडेक’ रहल छलाह, मुदा संगीतक संचालन कनी आर पूर्वाभ्यास माँगैत अछि । प्रयोग एकांकीक मुख्य अभिनेता छथि नवीन मिश्र । एहि पात्रके कुमार गगन जीव रहल छथि । कुमार गगन बहुत साल स’ मैथिली रंगमंच पर छथि ।  शुरूए स’ भंगिमा, पटना स’ जुड़ल छथि । कुणाल जीक निर्देशनमे कतेको नाटकमे अभिनय क’ चुकलाह अछि आ कुणालजी द्वारा पहिल बेर निर्देशित प्रयोग नाटकमे सेहो गगनजी एहि भूमिकाके क’ चुकल छथि । एहि प्रस्तुतिमे गगनजी नवीन जीक रूपमे अपन सोलो लॉगी संग अबैत छथि । मुदा पूराके पूरा वक्तव्यमे कोनो विशेष आकर्षण नहि छोड़ि पबैत छथि । मंचपर नवीन मिश्र कम आ गगनजी बेसी देखाइत छथि । सम्पूर्ण प्रस्तुतिक अंत तक जाइत जाइत गगनजी एकटा पारसी रंगमंचक कलाकारक रूपमे अपन प्रभाव बना पबैत छथि । संवादक बीच उतार चढ़ाव, शब्दक संप्रेषण स्वाभाविक नहि बनि परल अछि । संगहि हिनकर मंच पर गति आ बैसबाक स्थान सेहो उचित नहि । कियेक त’ जखन जखन ई मंचपर अपन अभिनेताके आदेश दैत छथि प्रयोग करबाक लेल आ पाछू जा क’ बैसैत छथि त’ श्रुति स’ झँपा जाइत छथि तेँ प्रेक्षक हिनकर अभिव्यक्ति देखबा स’ बंचित रहि जाइत छथि । अपन दुनू अभिनेताके प्रयोग करबाक आदेश देलाक बाद कखनोक’ हुनका दुनू के अपन दुनू हाथस’ एकटा फ्रेम बनाक’ देखनाइ अत्यंत अनर्गल मुद्रा मानल जायत । कारण, ई नवीन मिश्र एकटा नाटक मंडलीक निर्देशक छथि नै कि कोनो फिल्म कम्पनीक निर्देशक । गगनजी मैथिली रंगमंचक वरीष्ठ अभिनेता छथि आ अनुभवी सेहो तेँ हिनका स’अपेक्षो हमरा सभकेँ कनी बेसी अछि । कनी आरो पूर्वाभ्यास आ विमर्श कयल गेल रहितै त’ बेसी नीक परिणाम अबैत । श्रुति नामक भूमिका निभेनिहारि प्रियंका सेहो आब मैथिली रंगमंचक परिचित अभिनेत्री भ’ चुकल छथि । प्रियंका नीक अभिनेत्री छथि तकर प्रमाण ओ पिछला कतेको प्रस्तुतिमे द’ चुकल छथि । इहो भंगिमा, पटना स’ जूड़ल छथि आ वरीष्ठ रंग निर्देशक कुणाल जीक संग कतेको नाटक केलीह अछि । एहि प्रयोग प्रस्तुतिमे हिनकर आत्मविश्वास अति प्रसंसनीय अछि । मंचपर हिनकर गति आ अपन स्थानक लेल सचेतताक संग दर्शक आ अपन सहयोगी अभिनेताक बीच आँखिक मिलान (आइ कंटेक्ट) नीक प्रभाव देलक अछि । मुदा प्रियंकाके सेहो अपन मुखाभिनय (फेस एक्टिंग) पर कनी आरो काज क’र’ पड़तनि । एहि नाटकमे हिनका द्वारा कयल गेल संवाद अदायगी खासक’ जे कविताक अंश अछि ओहिमे दू शब्दक बीच काफी समय लेल गेल अछि जकरा निर्देशकके कनि कम क’र’ पड़तनि । ई कहबामे कनियो संदेह नहि जे एहि तीनू अभिनेतामे प्रियंका सब स’ बेसी प्रभाव छोड़लीह अपन अभिनयमे । अमृत नामक पात्रके अभिनय क’ रहल छलाह आशुतोष अनभिज्ञ  । आशुतोष मैथिली रंगमंच स’ अनभिज्ञ नहि छथि । मुदा, अभिनय दृष्टिए हिनका अखन काफी मेहनत करबाक आवश्यकता छनि । हिनक कोनो अभिव्यक्ति पात्रक अनुरूप नहि छनि । हिनका पर प्रियंका काफी भारी परि रहल छथि । हिनकर अभिनयमे एखन हेजिटेशन बहुत अधिक छनि । प्रस्तुतिक अति महत्वपूर्ण अंग थिक मंच । एहि प्रेक्षागृहक मंच कोनो कोण स’ एहि नाटकक अनुरूप नहि अछि । अभिनेता, मंच संयोजन, प्रकाश संयोजन, ध्वनि संयोजन, प्रेक्षकक बैसबाक स्थिति आदि सभमे समझौता क’र’ पड़ल अछिसे ओहिना देखार होइत छै । प्रेक्षागृहमे दर्शक अति प्रबुद्ध वर्गक छलाह । मुदा, नाटक देखबाक लेल जे अनुशासन दर्शकमे होबाक चाहियनि से अत्यंत कम छल । बिना मतलबे थोपड़ी पीटब, मोबाइल मौन करब त’ दूर, बीच नाटकमे मोबाइल पर गप्प करब, नाटकक ऑनलाइन समीक्षा देब, बीच बीचमे जोर स’ आपसी गप्प क’ लेब, बीच बीचमे उठिक’ बाहर भीतर करब आदि कार्यकलाप स’ बंचित नहि छल प्रेक्षागृह । एहि कारण नीक प्रेक्षक के अत्यंत परेशानी भेल हेतनि एहन कठिन नाटकके देखबामे से निश्चित । हमर दर्शक वर्ग के ई बूझक चाहियनि जे नाटकक दर्शक भेनाई कोनो दोसर विधाक दर्शक स’ अत्यंत फराक होइत अछि । हम प्रयोग पढ़ने छी । एक बेर नहि कतेको बेर । एहि पर हमर आलेख “प्रयोग एकांकीक रंगमंचीय दृष्टि” सेहो प्रकाशित अछि विदेह ई पत्रिकाक अंक 51 (01 फरवरी 2010 ; पृष्ट सं. 112)मे । तेँ हमरा एकर मंचन देखब अति महत्वपूर्ण छल । मुदा पढ़लाक बाद जे कोनो बिम्ब हमरा दिमागमे उचरैत अछि एहि प्रस्तुतिके ल’क’ तकर लगभग पच्चीस प्रतिशत मात्र एहि प्रस्तुतिमे हमरा भेटल । एहि प्रस्तुतिक अंतिम दृश्यक अंतिम भाग नीक परिकल्पित भेल अछि जे बेर बेर हमरा दिमागमे आबि जाइत अछि । कुणालजी हमर सभहक श्रेष्ठ निर्देशक छथि । सीतायन, कुसमा सलहेस, पारिजात हरण आदि प्रस्तुति हुनकर नाम लैत देरी मोनमे घुमर’ लगैत अछि । हुनका स’ हमरा सभके हरदम किछु विशेषक अपेक्षा अछि । संगहि ओ अपन प्रस्तुतिमे नव नव प्रयोगक लेल विख्यात सेहो छथि । हुनक एहि प्रस्तुतिमे पूर्वाभ्यासक अभाव नीक जेना खटकैत छल आ कोनो तरहक निर्देशकीय कुशलताक प्रयोग सेहो नहि देखायल । आदरणीय कुणालजी आजुक समयमे हम सभ रंगकर्मीक लेल पथ प्रदर्शक व्यक्तित्व छथि आब हुनका स’ एहन अपरिपक्व प्रोजेक्टक आशा नहि अछि । -         प्रकाश चन्द्र ; नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा ; भगवान दास रोड, नई दिल्ली – 110001 prakash.pikkoo@gmail.com १धीरेन्‍द्र कुमार- एकांकी- जरैत मोमबत्ती २ डॉ. शेफालिका वर्मा- एकांकी-     एकटा आर महाभिनिष्क्रमण १ धीरेन्‍द्र कुमार एकांकी जरैत मोमबत्ती (मंचपर बादक नाटकक शुरू होएबाक पूर्वक वाद्य-यंत्र बजा रहल अछि‍। बंठा दर्शक दि‍सि‍ पीठि‍ केने गुड्डी उड़ा रहल अछि‍। वादक दीर्घा दि‍सि‍ हल्‍ला होइत छैक।) गांधी :       हे यौ नाटक कि‍एक नहि‍ शुरू होइत छै। बटेसर :      यौ नटकि‍या सभ गांजा पीबैत हेतै। रंजि‍त :      सि‍नेमा देखऽ चलि‍ गेल हेतै। बटेसर :      अच्‍छा, ओ सभ नहि‍ छै तँ कि‍ भेलै, कि‍यो तँ शुरू करू। गांधी :       पि‍आरे गणमान्‍य लोकनि‍। अहाँ सभ ध्‍यान लगा कऽ बैसल छी नाटक देखैले। मुदा नाटक ओहि‍ना थोड़े भऽ जाइत छैक। पहि‍नेसँ मोन बनाउ, योजना बनाऊ षडयंत्र करू तखने नाटक होइत अछि‍। अहाँ सभ तँ नाटक हरेक समए देखतै रहैत छी। हालेमे बि‍हार वि‍धान सभमे नाटक भेलै अभूतपूर्ण नाटक- जूता टूटलै, चप्‍पल टूटलै गमला टूटलै आ टूटलै ओ प्रति‍ज्ञा जे वि‍हार वि‍धान सभाक सदस्‍यता ग्रहण करए लेल लेने रहथि‍। आइ-काल्हि‍ सपत्तक कोनो महत्‍व थोड़े रहि‍ गेल अछि‍। लि‍अऽ आब हमहीं नाटक शुरू करैत छी आ हम बनि‍ जाइत छी गांधीजी। (मंचेपर गांधी आँखि‍पर चश्‍मा रखैत अछि‍। पहि‍नेसँ पहि‍रने घोतीकेँ गांधी स्‍टाइलमे राखि‍ हाथमे लाठी लऽ मूर्तिवत ठाढ़ भऽ जाइत अछि‍। गुड्डी उड़बैत-उड़बैत बंठा पाछू मुहेँ भगैत अछि‍ आ गांधीसँ टकरा कऽ खसैत अछि‍, डराइत अछि‍ आ मूर्तिवत गांधी जीक स्‍पर्श करैत अछि‍) बंठा :        अहाँकेँ थि‍कहुँ? गांधी :       बच्‍चा हम गांधी जी छी। महात्‍मा गांधी। मोहनदास करमचंद गांधी। बंठा :        के महात्‍मा गांधी। अहाँ सनक लोक तँ भीख मंगैत अछि‍। मुदा हमरा लग। पाइ नै अछि‍। गांधी :       हम भीख नै मंगैत छी। आइ तों जाहि‍ देशमे जीबि‍ रहल छह ओकरा आजादी देनि‍हार हम छी। बंठा :        आजादी की होइत छै। कोन दोकानमे भेटैत छै। हमरा तँ नै भेटल आजादी? गांधी :       बच्‍चा आजादी कोनो बस्‍तु नै छै। भारत अंग्रेजक गुलाम छल ओकर अपन नि‍यम, कानून रहए जाहि‍सँ हम सभ बान्‍हल रही। हम अपन इच्‍छासँ कि‍छु नै कऽ सकैत रही। हमर सभ अधि‍कार अंग्रेज छीनि‍ लेने रहए। ओ हमरापर अत्‍याचार करैत रहए हमर शोषण करैत रहए। बंठा :        नि‍यम, कानून, अत्याचार तँ आइओ भऽ रहल अछि‍। इंदि‍रा आवासमे पाँच हजार टाका, वृद्धा पेंशनमे दू सए टाका, कागजपर सड़क बनैत अछि‍। मकान पुल तैयार होमएसँ पहि‍ने खसि‍ पड़ैत अछि‍। ई सभ तँ अखवार पढ़एबला लोक बुझैत अछि‍। गांधी :       यएह काज अंग्रेज करैत छल। अपन मोन नि‍यमसँ हमर शोषण करैत छल। अंग्रेजक अनुज छथि‍ ई सभ। जनताकेँ जागरूक होमए पड़तै, गलतकेँ वि‍रोध करए पड़तै। सभकेँ शि‍क्षि‍त होमए पड़तै, सत्‍य बाजए पड़तै, चाेरि‍ नै करए पड़तै। दया-भाव-करूणाकेँ अपनाबए पड़तै तखने हम कृत्रि‍म गुलामीसँ बॉचि‍ सकैत छी। (दू पात्र, सि‍द्धांत, अधि‍कारी आ नि‍यमनक प्रवेश) हम अंग्रेजक खि‍लाफत केलहुँ, अहि‍ंसात्‍मक आंदोलन चलेलहुँ। समस्‍त भारत वर्षमे स्‍वराज अलख जगेलहुँ, सुभाष चंद्र बोस, खुदीराम, भगत सि‍ंह, चंद्रशेखर आजाद सन सैकड़ो लोक अंग्रेजसँ लड़ाइ लड़लाह, तखन बड़ मोसकि‍लसँ हमरा आजादी भेटल। हम अपन देशसँ खुश नै छी। स्‍वर्ग-नरक दुनूमे स्‍वतंत्रता दि‍वसपर ई खबरि‍ धौलाइए ने भारतक पतन भऽ रहल अछि‍। तँए एक घंटाक छुट्टी लऽ आएल छी। आऊ हम अपने संदेश एहि‍ गीतक माध्‍यमसँ सुना दैत छी- बच्‍चा सभ अहूँ सभ हमरा संगे गाऊ “‍हम लाऍ हैं तूफान से कि‍श्‍ती नि‍काल के इस देश को रखना मेरे बचचे संभाल के तुम ही भवि‍ष्‍य हो भारत वि‍शाल के इस देश को रखना मेरे बच्‍चो संभाल के देखो कही बर्वाद न हो वाग बगीचा उसको हृदय के खून से बापू ने है सींचा जलाए हैं चि‍राग शहीदो ने बार के इस देश को रखना मेरे बच्‍चो संभाल के।” गांधी :       बच्‍चा तोहर की नाम छह। सि‍द्धंत :      सि‍द्धांत। गांधी :       तों की करैत छह। सि‍द्धांत :      (बीड़ी बहार करैत) हम चोरी करैत छी। गांधी :       आ तों (नि‍यमनसँ) नि‍यमन :      जतेक अपहरण होइत छै ओकर जासूस छी। टेलीफोनसँ खबरि‍ करैत छि‍ऐक, के कतऽसँ कतेक पाइ लऽ कऽ जा रहल अछि‍। के कतऽ अछि‍। आ ऑफि‍सर सभकेँ दारू पहुँचबैत छी। मुि‍खया सरपंचकेँ जी-हजूरी करैत छी। गांधी :       हे राम। एतेक छोट बच्‍चा सभ एहन काज करैए, पता नै समर्थ लोक सभ की करैत हेताह। नि‍यमन :      बाबा, अहाँ सनक लोककेँ पुलि‍स आतंकवादी, चार, उचक्कामे पकड़ि‍ लैत छैक। अहूँकेँ पकड़ि‍ लेत। पड़ा जाऊ एतऽसँ। गांधी :       बच्‍चा आब बूझि‍ पड़ैए हमरासँ ई हि‍न्‍दुस्‍तान नै सुनत। अंग्रेजी भगा देलहुँ आब अपने बेटा सभ ई काज करैए। आब हमरो आरामे करऽ दएह। सि‍द्धांत :      बाबा, अहाँ बजैत छी जे अहाँक नाम गांधी अछि‍। गांधी शब्‍दक प्रयोग गाड़ि‍ रूपमे प्रयोग होइत अछि‍। जेना बाप बजैत छैक बेटा-बड़का गांधी भऽ गेलहेँ। जाऊ बाबा, पड़ा जाऊ। (गांधी नमहर डेग उठबैत अछि‍। तीनू पात्र हॅसैत अछि‍-) गेल, भागल बतहा। नि‍यमन :      रौ बाप हमर दि‍माग गरम भऽ गेलो हि‍नकर गप्‍प सुनैत-सुनैत। सि‍द्धांत :      हमर माथ टनटनाए  लगलौ। ला एकटा ि‍सगरेट ला। बंठा :        ले गांजा भर। चऽल एकटा गाना गबैत छि‍ओ सभ डान्‍स कऽर। मुन्नी बदनाम हुयी डार्लिग तेरे लि‍ए....। (नाच समाप्‍त होइत अछि‍। सभ हपसैत अछि‍। अधि‍कारीक प्रवेश) अधि‍कारी :    की रौ नाचि‍ लेलेँ ने। कहू तँ ई देश कोना सुधरत। मंदि‍रमे टि‍कट कटाऊ तँ भगवानक दर्शन होएत। अहाँकेँ पाइ नै अछि‍- लाइनमे लागल रहू। अहाँकेँ उचि‍त काज अछि‍ दक्षि‍णा दि‍ओ। मृत्‍यु प्रमाण चाही तँ टाका ि‍दओ। अहाँ जीवि‍ते छी सरकारी रेकर्डमे मरल छी। भोंट मागए औत तँ हम सभ टाका लेबइ। ठीकेदार सड़क बनाओत तँ हम ओकरासँ रंगदारी मंगबै। सड़कक ईंटासँ अपन घर जोड़ब, सड़क नहि‍ राखब। सरकारी मकानक गि‍ट्टीसँ नादि‍ बनाएब। सामुदायि‍क भवनकेँ मुखि‍याजी दलान बनौताह। बेटीकेँ वि‍आह करब तँ बेटाबलाकेँ पाइ दि‍औ। गरीब छी, दुख अछि‍, जहर कीनब, खएब सुतब भाेरे जीवि‍ते रहब। डॉक्‍टर बेहोशीक सुइया देत, पेट चीरए लागत तँ बाप-बाप करब। सभ ि‍कछु नकली। कतए जएब की करब? राष्‍ट्रीय त्‍योहार दि‍न झंडा फहराएब, राष्‍ट्रीय गीत गाएब। लालकि‍लासँ भाषण सुनब। हमर उत्तरदायि‍त्‍व समाप्‍ति‍ भऽ जाइ जाएत। दरी-जाजि‍म झाड़ब आ वि‍दा भऽ जएब। अपन गाम आ लागि‍ जएब सड़ककेँ भाेकसैमे, अलकतरा पीबैमे। स्‍पैक्‍ट्रमकेँ पेटमे रखैमे। ठीके छै, हम सभ कोनो देशक ठीकेदारी नै नेने छी। नि‍यमन :      रौ सारा तों नेता भऽ गेलेँ। सि‍द्धांत :      एकरो रोग लागि‍ गेल छै, मलेरि‍या, लबेरि‍या, नेतगेरि‍या। नि‍यमन :      पागलखाना जाएत। सि‍द्धांत :      पागलक कोनो छै, ओतहु नो एंट्रीक बोर्ड टांगल छैक। बंठा :        पकड़ सारकेँ आ लऽ चल। नि‍यमन :      पकड़ पकड़ नै तँ पुलि‍स गि‍रफ्तार लऽ लेतौ। (सभ कि‍यो पकड़ि‍ कऽ मंचसँ बाहर लऽ जाइत अछि‍। भारत माताक प्रवेश। हाथमे ति‍रंगा। अस्‍त-व्‍यस्‍त हालत। हँसैत पालग सदृश। हम जर्जर भऽ चूकल छी। एक समए रहए जखन सैकड़ो सपूत अपन कुर्वानी दए हमरा आजाद करौलक। आजुक तों सभ कपूत छँह। हमरे आंचरकेँ तों सभ कलंकि‍त कए रहल छँह। हमर जग हँसाइ भऽ रहल अछि‍। की तोहर सभकेँ यएह कर्तव्‍य छौह। तों सभ ज्ञानक लेल नै पढ़ै लि‍खै छँह तोरा धन चाही। रूपैये तोहर माए-बाप भऽ गेल अछि‍। (बजैत-बजैत हि‍चुकि‍-हि‍चुकि‍ कनैत बजैत अछि‍।) की भऽ गेलह तोरा सभकेँ। आब माइयक अभि‍मानकेँ नष्‍ट नै करऽ, नै करऽ। ((हि‍ंदीक गीत हमर मूल रचना नै छी। कथ्‍यक संप्रेषणमे एकर आवश्‍यकता छल। आजुक पीढ़ीक स्‍वभाव यएह अछि‍, तँए गीतक रचयि‍तासँ आभार प्रकट करैत छी।)) २ डॉ. शेफालिका वर्मा एकांकी एकटा आर महाभिनिष्क्रमण (सान्झुक बेर.मंद समीरण वातावरण के उन्मादित क रहल छल . पलंग पर बैसल प्रकृति चुप  चाप कोनो विस्मृति में डूबल छलीह .ओकर चेहरा पर अतीत आबी बैसी गेल छल. किम्हर दन स वोकर वाल्य- सखी राखी आबि प्रकृतिक सोच के तार तार क देलक ) राखी --अहाँ की सोचैत रहैत छी ,सखी ?जाहि दिन स अहाँ दार्जीलिंग स घुरल छी ,लगैत अछ अहाँ एखनो ओहि घाटी सब में भटकि रहल छी प्रकृति एकटा उसांस भरि  निमिष मात्र ले राखी  दिसि तकैत अछ फेर बजैत अछ प्रकृति--सांचे बजैत छी राखी ,हम एखनहु ओहि घाटी सब में भोतिया रहल छी . कत्तो कत्तो बाट क दुनू दिस कमल -कुसुम  के देखि रबीन्द्रनाथ टैगोर क पाती मोन पड़ी जायत छल 'एय शरद आलोर कमल बने ,वाहिर होय विहार करे जे छिले मोर  मोने मोने .  ..'  अकास में जल भरल मेघ खंड देखि बुझा पडैत छल जेना ओ सागरक लहरि होय ,राखी  एहि मोहक सुषमा क संसार में हम हेरा गेल छलों ( प्रकृतिक आंखि डबडबा जैत छैक. मुड़ी नुघरा लैत अछ  .राखी बड सिनेह स ओकर चेहरा उठ्वैत अछ ) राखी--प्रकृति , अहाँ बड कोमल छी , बड निश्छल ..... बीचे में बात कटैत प्रकृति बजैत अछ --हँ हँ उहो इयैह कहैत छल राखी ' निश्छल, कोमल '.....ओ जखन हँसैत छल त शत जलतरंग जकां हमर मोन मानस कांपि जायत छल ... ( बजैत बजैत प्रकृतिक डबडबायल नोर धार बनि जायत अछ. अधीर भ राखी बजैत अछ ) ---प्रकृति, हम अहांक वाल्य संगिनी छी. तैयो अहाँ हमरा से कतेक बात नुका लैत छी . अहांक ह्रदय पर जे असह्य बोझ अछ ओकरा हमर सामने फेक दिय . अहांक दारुण व्यथाक राज हम जाने चाहैत छी प्रकृति  ( राखी आवेग आ आवेश स भरि जायत अछ ) --बाजु प्रकृति बाजु ( तावत किम्हर दन स एकटा छोट नेना दौडल अबैत अछ आ धप्प दे प्रकृतिक कोर में बैसी जायत अछ . प्रकृति ओकरा अपन करेज स सटाई लैत छैक . ) माँ माँ ,अहाँ कत छलों ?कतेक काल स अहाँ के खोजी रहल छलों की बात छैक प्रसून ,बाजु बेटा ----नेना के दुलरावैत प्रकृति बजैत अछ. माँ, केओ संगी नै आयल आय. अहीं कोनो खिस्सा सुना दिय राखी उत्साहित भ बजैत अछ ..हँ हँ प्रसून, हमहूँ त अहाँक माँ के इयैह कहैत छलों आब प्रसून क ध्यान राखी दिसि जायत अछ ,ओ चोंकि जायत अछ --अरे मौसी ! अहाँ एहिठाम छी. , अहं खिस्सा सुनब ने मौसी..   थपडी पडैत प्रसून बजैत अछ --माँ ,  आब ते अहांके खिस्सा सुनाबे पडत ..आब अहांक खिस्सा सुनब ,माँ मुदा परि वाला खिस्सा , राक्षस से हमरा भय होयत अछ. प्रसुनक माथ पर हाथ फेरैत प्रकृति बजैत अछ ---बेटा, राक्षस स भय होयत ते अहाँ मर्द कोना कहायब ? मायक बात सुनि प्रसून बजैत अछ..--ठीक छै, तखन एहेन खिस्सा कहू जाहि में परी होई, देवता होय ,राक्षसों होय , कोनो बात नै... प्रसून क गप सुनि प्रकृति आ राखी दुनू हँसैत अछ. राखी जिद्द पकड़ी लैत अछ --आब ते अहाँ के अपन कथा कहये पडत सखी प्रकृतिक आंखि सुदूर अतीत में भटकि  जायत अछ , आँखिक कोर में ओ दिन सब मखमली सपना जका छलक लगैत अछ हँ , एकटा परी छल ,बड सुन्नरी, सुन्नर ? नै नै ओकर अंतर बड निश्छल छल , एतेक सरल छलीह जे संसारक छल कपट आदिक नमो नै जनैत छलीह. परी के हरदम लागेक जे ओ कोनो आन लोकक प्राणी छी जे भूलल भटकल कोनो श्राप वश एहि धरती पर आबि गेल हो ....प्रसून एकटक माय के तकैत रहैत अछ .....ओ परी एकटा राजकुमार के देखलक आ देखिते रही गेल..निश्छल शिशु सन रजत हास  ओकर चेहरा पर पसरल छल .परीक अंतर  से अवाज आयल ' एकरे लेल कतेक युग स ,कतेको कल्प स हमर आत्मा भटकि रहल छल '  राजकुमारों क ह्रदय कांच जकां निरभ्र छल .ओकर ह्रदय में विश्व प्रेम क अपूर्व रागिनी बजैत छल. ओ कोनो दिव्य आत्मा छल , महान चरित्र छल जे भोतिआइत एहि ठाम आबि गेल छल माँ माँ , ओ राजकुमार बड सुन्दर होयत ने --प्रसून मुग्ध भ  सुनि रहल छल - प्रकृतिक तन्द्रा भंग भ जायत अछ-हँ बेटा, सुन्दर त अपूर्व छल,मुदा अद्भुद व्यक्तित्व सेहो , ओहि परीक आंखि ओकर सुन्दरता पर नै ओकर निर्मल अंतर पर गेल छल  आ प्रकृति पुनः भावाविष्ट भ जायत अछ --बेटा , ओ परी ओहि राजकुमार स बड प्यार कर लगलीह , राज्कुमार क सिनेह देखि परी के मोन में होम लागल .इयाह राजकुमार एहि मर्त्य भुवन स हमर उद्धहार करत ...दुनू सदिखन कल्पना डूबी    अकासक गप करैत छल . एक दिन ओहि परी के किछ चोट लगलैक ,ओ पूछी बैसल ओहि राजकुमार स .' हम अहांक आंखि में उपेक्षाक छाहरी देख्लों , किएक ,  आखिर किएक ? राजकुमार बाजल - अहाँ कतेक सरल छी , कतेक अबोध ,अहाँ हमर आंखि में अपन छाहरी नै देखि उपेक्षाक छाहरी देख्लों . आंखि में त सबहक परछाहीं रहैत छैक ,मुदा, अनमोल निधि धरती में गाडी के राखल जायत छैक. अहं के हम अपन हृदयक अतलता में नुका के रखने छी. आ परी ओकर मोहक गपक स्वप्निल सागर में हेलैत रहल ..--अहाँ हमरा सबदिन एहिना मानब ने ? बताही छी अहाँ, स्वयं पर अविश्वास करू ते करू मुदा, हमरा पर अविश्वास क नरक केर भागी नै बनू. ....आ परी जेना सब किछ पाबि लेलक ओ राजकुमार ओस-तीतल गुलाब सन कमनीय , सुकुमार शब्द क चितेरा बनि कविता करैत रहल, परीक मोन भिजैत रहल ' ओह अपन राजकुमार क प्रेरणा छी हम 'एहि भाव में डूबैत रहलीह ओकर निश्छल अंतर अकास में खिलल  सिंगराहारी तारा जका प्रमुदित होइत रहल..... खिस्सा कहैत कहैत प्रक्रितिकं  आंखि स दुई बुन्न आहत भ पियासल कपोल पर खसि पडैत अछ . राखि एतेक देर स मूक श्रोता बनि चुपचाप ओकर कथा के आत्मसात क रहल छलीह.  (प्रसून ओकर करेज स लागल नै जनि कखन सुति गेल छल ओहि नेनाक अबोध अंतर में परी आ राजकुमार गंभीर गाथा कोना समायत ? )अरे ई त सुतिगेल. (चोंकि बजैत अछ प्रकृति , आस्ते स ओकरा बिछोन पर सुता दैत अछ.) आगू की भेलैक प्रकृति राखि क प्रश्न पर प्रकृति चौंकी जायत अछ ...छोड़ू...  बाहीं पकड़ी लैत अछ राखी..बाजु सखी, आय सब किछ बजे पडत ...(कतेक देर धरि प्रकृति चुप रहैत अछ जेना वेदना अपन संगीत ओकर अधर पर राखि देने हो .. राखी कतेक काल धरि ओकर ई स्थिति देखैत रहल फेर) बजैत अछ  -चुप किएक भ गेलों प्रकृति बाजु ...आगू बढ़ू ओह हँ ...हँ  हँ ते ...जेना शब्द गर में छटपटा रहल होय ---एक दिन ओकरा ज्ञात मुदा चहला स की भेलैक जे ओहि ओस तीतल गुलाब क खेतीक आत्मा ओ नै केओ आर अछ --केओ आन अछ.  परीक आत्मा कुहरय लागल  , रोम रोम सिसकी भर लागल ....मुदा, ओ राजकुमार निर्विकार रहल. ओ पहिनुके जका रोज एकटा ओअस तीतल गुलाब ओकरा सुन्वैत छल आ परीक अंतर सिसकी उठैत छल काश, एहि गुलाबक खेतीक कारन हम बनि सकतों !मुदा मात्र चाहला स की .? एकदिन ओ बाजल..हम चाहैत छलों ओकरा क्षितिज क क़ात में ठाढ़ क दी आ बाजि 'जखन अन्हार सघन भ जाय त अहाँ आकाशदीप   ल हमर    पथ प्रदर्शन करब. ' मुदा ओ की जनैत छल जे हम पहिनही किनार में ठाढ़ भ गेल छलों ,आकाशदीप सेहो बारि नेने छलों मुदा ओ राजकुमार ओहि बाटे एवे नहि केलक. ओ गुलाब क खेती सँ भोर क पहिल किरण तोड़ी ओकरा चिर प्रदीप्त करवा लेल चाहैत छल ,  परी सोचैत छल भोर क नै ,कम से कम सान्झुक प्रहरक कोनो भटकैत रश्मि रेख ओकर जीवनक सौभाग्य बनि जाय.किन्तु, ओ परीक लेल नोरक खेती कर लागल . परी ओहि नोर के पिवैत जिवैत जायत छलीह .ओ रोज ओहि राजकुमार क नाम एकटा चिठ्ठी लिखैत छल आ फेर स्वयं पढैत छल.ओकर आंगुर राजकुमार के आखर,शब्द आ पंक्ति  में बान्हि दैत छल आ फेर निर्निमेष ओहि में राजकुमार क रूप के खोजैत छलीह उषा क आँचर स अनुरागिमा झडवाक संगे  ओ ओहि पत्र के दुई खंड क दैत छलीह , ओ परी स्वयं अपना के दुई खंड क देने छलीह , एकटा खंड ओ स्वयं छलीह जे पत्र लिखैत छलीह ,दोसर खंड ओ स्वयं राजकुमार बनि  ओकरा पढैत छलीह . ( एकटा नमहर साँस लैत प्रकृति कनि काल मौन भ जायत अछ. राखी एकटक ओकरा देखैत अछ उत्सुक आ करुण नयन सँ  , )..कतेक भाग्यवान हेतीह ओ जे अहांक प्रेरणा छथि ... ओ की भाग्यवान हेती भाग्यवान ते अहाँ छी --ओ हमर लिखित काव्यक प्रेरणा थिकीह ,अहाँ हमर अलिखित काव्यक प्रेरणा छी, बाजु ते अहाँ कतेक महान छी.....ओ परी चुप रहैत छली .शब्दक एहि अभिधा व्यंजनाक झाडी में ओझरा स्वयं के नितांत असहाय बूझैत छलीह., हम किछ नै जनैत छी ,किछ नै,,अहीं ते कहने छलों अहाँ के हम ह्रदय क अटल गहीर में नुका के रखने छी ... हँ, सांचे बजने छलों . हमरा मानव-जाति स प्रेम अछ ,अहाँ एहि पर अपन सर्वाधिकार सुरक्षित बुझि लेलों ई ते अक्षय कोष थीक  जतेक बांटू ओतेक बढत ( प्रकृति क आंखि  स नोरक टघार निकल लागल..) राखी--फेर की भेल. ओही परिक ?? ओ राजकुमार एतेक कठोर ,एतेक निर्दय कोना छल ? प्रकृति- नै सखी , ओकरा निर्दय नै कहू. मुदा, छोडू, खिस्सा पिहानी जखन जीवनक संग घटित होम लागैत अछ त बड वेदनामय भ जायत अछ, राखी--नै सखी आय हम कहनी अनकहनी सब टा सुनब ओ राजकुमार एतेक निर्मम किएक छल ? नै सखी, राजकुमार परीक आत्म्घुटन, एकान्तिक प्रेम क विषय में कल्पनो नै क सकैत छल. प्रकृति--ओकरा बेर बेर निर्मम नै बाजु. हमहू एक बेर ओकरा निर्मम कहलों ते जनैत छी ओ हमरा की कहलक राखीक  आंखि में हजारो प्रश्न हेल लागैत अछ आ प्रकृति अपन तरंग में ..ओ बाजल नारियर ऊपर स कतेक कठोर  होयत छैक, भीतर स कतेक कोमल, कतेक सरस... हूँ हूँ बुझि गेलों किन्तु, कहियो कहियो ओकर गप नेना जका होयत छल. अहाँ एक बेर उन्मुक्त हंसी हंसी दिय जाही स हजारो सिंगरहार झहरी जाय, या नै ते एक बेर कानि दिय ,अहाँक रुदन के हम आत्मसात क लेब. ओ परी ओकर बात के ओकर गप के सुनैत रहैत छलीह, गुनैत रहैत छलीह . ओ अपन वाक्य स, अपन शब्द स ओही परी के एतेक दुलरावैत रहैत छल जे परी निहाल भ जायत छलीह.एक बेर ओ बड निश्छल भाव स पुछलक -अहाँ हमरा स एतेक सिनेह किएक करैत छी   ? उत्तर में परीक नयन अश्रुप्लावित भ उठल ओकर वाणी अवरुध्ह भ गेल ,ओ मूक, निष्पंद ,निर्वाक बैसल रहलीह राजकुमार बाजल छल -हमरो ह्रदय अहीं जका निश्छल रहितैक , हमरो आंखि में अहीं जकां नोर आबि जेतियैक जखन ओहि परी स एतेक प्रेम करत छल तं ओ परी किएक बुझलक जे ओ परी स प्रेम नै करैत छैक -बीचे में राखी बजैत अछ ,,नै राखी, ओ परी स प्रेम करैत छल ह्रदय क सम्पूर्ण गहिरता क संग, भावना क सम्पूर्ण सत्यता क संग.मुदा, ओ बेर बेर ओकरा आहत सेहो करैत छल , बेर बेर क्षत करैत छल ..एक दिन ओ परी आकुल व्याकुल सन ओहि  राजकुमार लग गेल छलीह त गपे गप में एकटा एहेन बात कहि गेलजे अग्निशलाका जकां ओहि परीक आत्मा के विद्ध क गेल.'अहाँ के हम ओहि रूप में कहियो नै देखलों.परी वेदना स विकल भ उठलीह मुदा, राजकुमार अपना में मस्त रहल. एक दृष्टि इ देखवाक प्रयासों नै केलक जे ओकर एहि एकटा बात से परी के कतेक मर्मान्तक पीड़ा भेटलैक जलकण स भरल आंखि  आ कंपित पैर स घुरी आयल.समस्त संसार स ओकर आस्था टूटी गेलैक. ओकरा भगवन क अस्तित्व फुसि लग लगलैक समस्त भावना पर अन्हार क साम्राज्य खसि पडल . केकरो भावना के स्वीकार करब अपनेनाय त नै थीक. ओ कतेक डरी गेल छल .आ परीक मोने एकटा ज्वार उठल आ ओ राजकुमार के एकटा अभिधा द देलक, एकटा संबोधन राखी ( एकटा निसांस भरैत )- मुदा एहि से की फरक पडल ? ( निसांस क  दर्द के भोगैत) प्रकृति--ई अहाँ नै बुझि सकब , राखी जखन हम ओकरा ओहि संबोधन स अभिहित केलों त ओ एकटा स्वतन्त्रता क सांस लेलक जेना कोनो मृगछौना के बंधन-मुक्त क देलों ..ओ परी ओकर ख़ुशी देखि खुश भ गेल ..अहाँ खुश राज, हमहूँ खुश.. एतवे नै बाद में ओ बज लागल 'हम ते अहाँ के बंधवा लेल नै कहने छलों अहाँ स्वयं बान्हि देलों ..आ सखी, ओहि परीक अंतर घाह घाह भ गेल.कतेक पैघ प्रवंचना ओकरा छली गेल ...ओ त 'अषाढ़क एक दिन' क 'मल्लिका' बनि जीवन क सभ सुख आत्मसात क लेतियैक मुदा राजकुमार सब टा ऋतू के उनटा पुन्टा देलक कहियो घाह बेसी दुखित छल ते कहियो दवाय.किन्तु, ओ अपन भाव सुमन स परी के एतेक दुलार करैत छल जे ओकर दर्द रहि रहि कुहर लागेक .... बहिन ! -( राखी क  खोजपूर्ण दृष्टि  प्रकृतिक चेहरा पर पडल छल )- की संबोधन देने मात्र से अहांक प्रेम बदली गेल.. प्रकृति--इयाह  ते ट्रेजेडी छैक ,यदि शब्द मात्र स भाव  बदलि जेतियैकप्रेम अपन रूप स्वरुप पाबि लेतियैक त संसार क सब स सुखि प्राणी ओ परी रहितैक . मुदा, ओ भीतर भीतर तीतल जारनि सन पजरैत रहल  ,घुटैत रहल. मुदा एतवे नै , जखन कोनो शारीरिक व्याधि हमरा घेरि लैत छल ते बेर बेर आब कोना छी, केहेन छी  आ हम सोच लगैत छलों देह क कनिक कष्ट लेल एतेक चिंता, एतेक आकुलता मुदा, एकर भीतर जे एकटा कामना घुटन एवं कुंठा स मुक्त हेवा लेल छटपट  करैत छल ,व्यथा विगलित छल, एकर चिंता ओकरा नै छल , नै नै हेबो किएक करतियैक.ओकर अपन मोन छल,अपन ह्रदय छल ,अपन भावना..मनुख अपन मोन के ते बूझिये नहि सकैत अछ, आन क कोन कथा..( (प्रकृतिक आंखि स्वप्न बनि जायत अछ , अधर ओकर भाषा) प्रकृति--ओहि कोठरी के देखैत छी राखी, ओहि में आबि ओ बैसैत छल, अपन प्यारक भाषा स कतेक हमरा दुलरावैत छल , ओ चलि जायत छल ते ओकर नाम के परी निह्स्वन बज्वैत छल . मोन नै भरैत छल ते जोर स स्वरित बज्वैत छल    ओ नाम सखी, ओहि कोठरी में टांगल नै वरन कोन कोन में प्रसृत भ गेल ,ओ विलय नै भेल मुदा, ओकर अनुगूँज घुरि घुरि ओहि परी के दुलरा जायत छल  ...ओकर नाम क ध्वनि एतेक मीठ लागैक्जे बेर बेर अपन अधर पर ओकर नाम आनि एकटा स्पर्शजन्य सूखक अनुभूति ओकरा होयत छल जहिना अगरबत्ती स समस्त घर सुरभित भ जायत अछ ओहिना ओकर नाम स ओ  कोठरी सुरभिमय भ गेल. ओहि नामक सहारे ओकर अशरीरी उपस्थितिक आह्वान क अपन घर के मंदिर बना लेलों ( राखी बेचैन भ जायत अछ )-की राजकुमार किछ नै बूझैत छल ओहि परीक एकान्तिक प्रेमक विषय में ? प्रकृति--नै बहिन नै, ओ ते परीक एहि एकान्तिक प्रेम क कल्पनो नै क सकैत छल.ओ ते संबोधन के सम्बन्ध बुझि नेने छल. राखी--एकटा बात पूछी सखी ? आत्मा स आत्मा के प्रकाश भेटैत छैक, फेर ओहि परीक निश्छल प्रेम ओकर ह्रदय के नै छुवलक?इ कोन विडम्बना थीक ? प्रकृति- हँ, विडंबने त थीक जे ओकरा स्पर्श तक नै केलक .राजकुमार क कोठरी में जखन ओ गेल छल ते अपन किछ छाप छोड़ी गेल  की नै ई ते परी नै बुझलक,मुदा ,ओकर कोठरी क छाप परीक अंतर पर छपि गेल छल., अस्तु, अपन ' निज' के ओहिठाम छोड़ी नै वरन ,कतेक कुछ ल क ओहिठाम स चलि आयल छल. सखी, अपन सबहक 'चाहना' कागजक नाह थीक,जे यात्री लक नै , इच्छा ,कामना स लदल ,आन आन लोक क कल्पना के स्पर्शानुभुती देवा लेल पहुंची जायत अछ.भनहि, ओकर प्रतिदान ओकरा भेटय या नहि . ओ प्रेम की जे प्रतिदन माँगे ?ओकर ख़ुशी लेल जीवन भरि कालिदास क मल्लिका बनल,व्यथा वेदना भोगैत रही गेलीह.( राखी  अस्फुट स्वरे बाजि उठैत अछ  -सांचे ओ बड निर्मम छल) बेर बेर ओकरा निर्मम कहि ओकर अपमान नै करू सखी,ओ बड महान अछ ओकर भावना बड उदात्त अछ ओ महान विभूति क महाप्राण स अभिसिंचित छैथ,ओ एक दिन विश्व क सर्वश्रेष्ठ प्राण ,जन जन के हृदय गगन क प्रदीप्त आलोक राशि  बनताह ( राखी दुखी स्वरे बजैत  अछ ) -छोड़ू,जखन ओ अहांक प्रेम भरल हृदय के आलोकित नै क सकलाह तखन जन जन क , हुनक प्रेम में एतेक सामर्थ्य नै छल....हम इ सब बड़का बात नै बूझैत छी,हमर बुध्ही क्षुद्र अछ,मुदा एतवा अवस्य कहब  ... ( बीचे में बात कटैत प्रकृति बजैत अछ )-चुप चुप बहिन, ओ हमरा स अगिला जनम लेल वचन देने छैथ,अगिला जनम में हम हुनक,प्रेरणा,सहचरी,प्रेमिका सब किछ बनब..(प्रकृतिक आंखि में कतेको स्वप्न सम्मोहन नर्तित भ उठैत अछ.). ( हा हा हा..राखी सखिक निश्छलता पर जोर से हँसैत बजैत अछ )..बड दीब,बड बेस,एहि जनम में हुनक प्रेमक माला जपु ,ओकर नामक संग मरू,जिबू आ अगिला जनम अहांक प्रेम के स्वीकार करत ,,,ओह प्रकृति, जे अदृश्य अछ अस्पर्श्य अछ ओहि पर एतेक भरोस ,सौंसे जिनगी अहांक आगू पडल अछ.. प्रकृति भावाविष्ट भ --अहाँ नै बुझब सखी, सिंगरहारक झहरैत सुन्नर मुकुल क कल्पना करू,  आस्ते आस्ते लयात्मक गति स झरनाय,शाख  स विलग हेवाक कल्पने ओकरा में वेदनाक गान भरि दैत छैक..अपन विनष्टियो में समष्टि सुख क अनुभूति ,इ समर्पण कतेक दुर्भेद्य अछ,कतेक अगम ,अथाह . बस ओकरा निहारैत रही ,एहि स हमरा मुक्ति भेट जायत ..... अहाँ बताही भ गेल छी,--बीचे में बात कटैत राखी बजैत अछ --भरि जिनगी की एहि वेदना में जीवन बिता देब अहाँ -- मुदा, प्रकृति अपन सोह में बजैत रहैत अछ--जनैत छी,काल्हि हम एकटा सपना देखलों..लाल लाल नुआ में हम अपना आप के दर्पण में देखैत छी हमर ठोर स रितेश निकली गेल ,ओहि ध्वनी स हमर सर्वांग रितेशमय भ उठल ,हम विक्षिप्त जका सिहरि उठलों ,धीर गंभीर पैर स चलि गेलों रितेश क घर ...रितेश हमरा अपन बाँहि में भरि पाँज पकड़ी प्रेमक अनमोल वरदान द दैत अछ..हम कतेक काल धरि बेसुध रहलों ..आह ..सखी ओ क्षण सपने रही गेल.  हम आय धरि रितेश के चीन्ही नै सक्लों ,,हम अपन हृदय पुस्तक  जका खोली ओकर समक्ष राखी दैत छी. मुदा, ओकर ह्रदय में कतेक तह भरल अछ,तह पर तह..हमर सपना सुनि ओ बजल छल......इ नादानी नीक नै..सरिपो, हम त नादाने रहलों ,एहि नादानिये में त अपन मोन के गवांय बैसलों ..हूँ,कहियो काल ई इच्छा जरुर करोट लैत अछ..काश ! एक बेर..हमर प्रेमक किछ ते निशानी हमरा भेटि जेतियैक. प्रकृति अनवरत बजैत जायत अछ -----हमर जीवन पथ क परम पाथेय भेट गेल ..हमर प्रसून ,हमर बेटा..रितेश विवाह केलक रैना स . ,अतीव सुन्नरी ,नंदनवन क कलिका ,जेकर रूपराशि पर कतेको रति लजा जायत छल. ओकर सलज्ज मुस्की पर पजेब्क ध्वनी गूंज लगैत छल कनक सन देह पर पूनम नहवैत छल,अलस अंगेठी स ऋतू बदली जायत छल ...साँच बजैत छी सखी,रितेश्क एहि पसिन्न पर हमरा कनिको इर्षिया नहि भेल ओकर खुशिक संसार देखि हम दुरही स  खुश रह लगलों,इ साँच अछ जे हम रितेश के आय धरी बुझि नै स्कलों , केकरो जानवा लेल बुद्धि ,ज्ञान सभक सहारे जनि सकैत छी. ,मुदा,कोनो चीज के बुझ्व्लेल,चिनवा लेल एकर सभक आवश्यकता नहि,,हम अहियो ठाम धोखा खा ग्र्लों ,जकरा चिन्ह्वाक दावा केलों ओ मात्र एकदिन पहिचानल मात्र रही गेल, मुठी स रेत जकां ससरी गेल , साँच कहि राखी,रितेश्क संग बिताओल समय लगैत अछ जेना कोनो ;मोर्निंग वाक़; में बितोल एकटा पल छल ,किछ स्थूल,किछ सूक्ष्म,किछ भाव किछ अनुभाव क आदानप्रदान भेल  आ फेर ओ अपन बाट हम अपन बाट ......समय क  अदृश्य पक्षी उडैत गेल.....,ओना त प्रत्येक ह्रदय में एकटा ' बुद्ध' रहैत अछ मुदा, दिशा नै भेटैत छैक तैं सब क्यों 'बुद्ध' नै भ सकैत अछ, ( चूँकि प्रकृति आब  राजकुमार स अपना आ रितेश्क नाम परआबि  गेल छलीह, तै राखी एको बेर बीच में नै टोकैत छलीह ,ओकरा होयत छल आय प्रकृति सब किछ निकाली दैक )...... जनैत छी सखी एक दिन रैना कोर में प्रसून के नेने,हकास्ल पिआसल भीत हिरनी जका भयभीत हमरा लग एलीह--दीदी दीदी,--हम चोंकि उठल छलों रैना..अहांक इ हाल..? रितेश ?रैना भरल बसंत में पतझार बनल छलीह--दीदी, हम एकटा सपना देखने छलों ,हमर मोन कांपी गेल ,रितेश के सुनाय देलों आ ओ घटित क देलक.ओ सपनाक स्यात एयाह महत्व छल, किछ घटित हेवाक असंभावित संभावना , जन जन क करुण स्वर ओकर कर्ण कुहर में गूंजी रहल छल.समस्त मानवताक व्यथा -कथा क उपकृति ओ बनि गेल..पैर पर खसि पडलों -हमर की होयत , बजलाह,यशोधरा कहियो बाधा नै बनली ,हूँ, एतवा अवस्य बजलाह --ओ जे सामने कुटिया देखैत छी हमर जीवन तटी ओ थीक.कहियो हम लहरि जका ओकरा लग जायत छलों,कहियो ओ अंतरीप जकां हमरा लग आबि जायत छलीह .जीवन भरि ओ सभक दुःख ओढने रहलीह ,ओकर दुःख केओ नै ओढ़ी सकल प्रेमक ओहि अखंड साधिका लग जाऊ ....... राखी, हमर समस्त साधना के जेना फल भेटि गेल. मुदा,तुरते मानसिक मूर्छा स आत्मविस्मृत हम सजग भ गेलों ---रैना क  चिर कोमल निःशक्त काया ,आँखिक विह्वलता ,निस्तब्ध,निर्वाक आंखि में कतेको प्रश्नचिन्ह,,कोनो प्रताड़ित नेना जका चुप चुप ..करेजा  में एकटा हुक उठल.आखिर रैना के कोना दुखक उपनगर में धकेली गेल ओ निर्मम हम दुनू हाथ पसारि देलों.. ओहि मास भरिक राहुल के हमर हाथ में द अचेत खसि पडली रैना .ओकर जीवन प्रदीप ओहि दुर्ग-दीप सन  अचक्के मिझाय गेल जे  युग युग स स्वत आलोक पसारि रहल हो.... जैत जैत ओ एहि एकाकी शून्य जीवन के सुस्मित स्वप्नक उत्तरदायित्व सौंपी गेल ..आय धरि    ओहि 'बुद्ध 'के अयवाक बाट  जोहि रहल छी ,ओकर सम्पति के करेज  स लगोने.... (प्रकृतिक नेत्र स झर झर अश्रु कण झहरी रहल छल , राखी क आंखि सावन भादो बनल छल , कोना समय अन्हार इजोत बनैत रहल . केओ नै बुझि सकल  ) १. ज्योति सुनीत चौधरी एकांकी- केसर २. मैथिली कवियित्री श्रीमति ज्योति सुनीत चौधरीसँ मुन्नाजीक गप्प-सप्प १ ज्योति सुनीत चौधरी एकांकी केसर पात्र सूत्रधार वा पार्श्वध्वनि- (ई महिला वा पुरुख कोनो स्वर भऽ सकैए, महिला स्वर रहए तँ बेशी नीक) पुरुष पात्र: पिता महिला पात्र : कैश (माने केसर) वृद्धा विदेशी मूलक सैम्युएला माने सैम नवयुवती ग्राहक (घरक दृश्य, दूटा कुर्सी लगेलासँ सेहो काज चलि जाएत। पार्श्वसँ रेडियो वा टी.वी.क अबाज सन अबाज कऽ दियौ वा दू चारिटा बासन ढनमना दियौ तँ सेहो ठीक रहत।) पार्श्वध्वनि::  केसर एक मध्यम वर्गीय परिवारक उच्च महत्वाकांक्षी। ओहि हजारक हजार प्रवासी भारतीय किशोरीमे सँ एक छथि जे बड्ड अभिलाषासँ सीमा टपै छथि। खाली देशक नहि वरन भारतीय हिन्दू वैवाहिक संस्थाक नामपर जे हुनका सभकेँ सामाजिक बन्धन रूपी पिछड़ापन लागै छनि, ताहि मानसिकताक सेहो। बहुत प्रतीक्षाक बाद स्टुडेण्ट वीसा आ स्कॉलरशिप भेटलनि। माता-पिता जखन अपन चिन्ता व्यक्त करै छलखिन, जखन ओ सभ अपन परामर्श दैत रहै छलखिन तखन केसर अपन स्वप्नक उड़ान भरैत रहै छली। पिता: – भारतमे एकसँ बढ़िकऽ एक संस्थान छै, तखन विदेश लेल अतेक किएक मोन लागल अछि? भारतक पढ़ल लोक सभकेँ विदेशी कम्पनी सभ प्राथमिकतासँ बहाली करैत छै, सेहो चिक्कन वेतन संगे। तखन अहॉंकेँ विदेशमे पढ़ै लेल एतेक किएक मोन लागल अछि ? कैश:  हम जाहि विषयमे शोध करब तकर बढ़िया संस्थान विदेशेमे छै आ जखन हमरा खर्चा भेटि रहल अछि तखन अहॉं सभकेँ कोन परेशानी अछि? माँ: मात्र खर्चे महत्वपूर्ण नहि छै।अतेक दूर आन देशमे असगर कोना रहबें? कैश:   अरे मॉं, सभ साल कतेको विद्यार्थी बाहर जाइ छै। बहुत भागसँ एहेन अवसर भेटैत छै। हम एहि अवसरकेँ बेकार नहि होमए देब। माँ:  तोहर तुरिया सभक बियाहो भऽ गेलै। कतेकोकेँ बच्चो भऽ गेलै। कैश:  अरे मॉं, यएह तँ अहॉं सभ नहि बूझि रहल छिऐ। हम अपन जिन्दगी खेनाइ पकेनाइ, पति, सासु, ससुरक सेवा, बच्चा पोसनाइ एहि सभमे नहि व्यर्थ करए चाहैत छी। हमरा आर्थिक रूपसँ स्वाबलम्बन चाही। हम अपन अस्तित्व बनाबए चाहैत छी। (पुनश्च पार्श्वध्वनि: शुरू होएत। एकर उपयोग माँ आ पिताजीक प्रस्थानसँ कऽ सकैत छी। माँ-पिताजीक पार्ट खेलिनिहार कुर्सी सहित प्रस्थान करथु।) पार्श्वध्वनि: बेटीक एहि महत्वाकांक्षाक सोझाँ माता पिता नतमस्तक भऽ गेला। अन्ततः विदेशक एक महाविद्यालयमे  शोधकार्य लेल नामांकन भऽ गेलनि। एकटा सम्बन्धी सेहो रहनि ओहि ठाम जे आग्रह केने रहनि पेइंग गेस्ट बनि कऽ रहै लेल। मुदा हिनका अपन स्वाधीनता बेसी प्रिय छलनि जे ओहि सम्बन्धियोकेँ बेसी सुविधाजनक लगलै शाइत। केसरसँ कैश तँ ओ भारतेमे भऽ गेल छलथि, एतौ मानसिक रूपसँ पूर्णतः पढ़ाइपर ध्यान दै लेल एक डिपार्टमेण्टल स्टोरक काउण्टरपर पार्ट टाइम कैशियरक काज पकड़ने छलथि। विद्यालयसँ भागैत-भागैत काज लेल पहुँचैत छलीह। रस्तामे सभ दिन एकटा वृद्धा भेटैत छलखिन। कनी वार्तालाप सेहो भऽ जाइन। कैश:  नमस्कार, केहेन छी? वृद्धा:– बढ़िया। धन्यवाद अहॉं अपन कहू। कैश: हमहुँ ठीक छी। धन्यवाद। अहॉंकेँ बहुत दिनसँ देखैत छी। अहॉं असगर घुमैत रहैत छी। परिवार कतए अछि? वृद्धा:– पतिक देहान्त भऽ गेल अछि आ बॉंकी परिवारमे बेटा, पुतहु, बेटी, जमाय, नाती, पोता सभ अछि। सभ अपन-अपन घरमे रहैत अछि। कैश: कतेक दुःखक बात छै जे अहॉंकेँ असगर रहए पड़ैत अछि। वृद्धा:–   नै, ई हमर अपन निर्णय अछि। जहिना हुनका सभकेँ अपन निजी जिन्दगीक गोपनीयता पसन्द छनि तहिना हमरा अपन स्वाधीनता पसन्द अछि। फेर जरूरत पड़लापर सभ एक दोसरकेँ देखिते छिऐ। (केसर अपनेसँ आब बजतीह, ताहि बीच बूढ़ीक प्रस्थान होएत।एकटा दोकानक दृश्य आओत, मॉल सन चहल-पहल। नै हुअए तँ पर्दापर एहन चित्र बना कऽ वा प्रोजेक्टर द्वारा ई प्रभाव उत्पन्न कऽ सकै छी। पाश्वध्वनिसँ दोकानक दृश्य सेहो उत्पन्न भऽ सकैत अछि, दोकानक काउन्टर एकटा टेबुल राखि भऽ सकैए जे विदेशी मूलक सैम्युएला वा सैम लऽ आबि सकै छथि, संगमे दूटा बार-कोड स्कैनर/ रीडर सेहो चाही। नै हुअए तँ दूटा कारी लोहाक छोट रौडसँ काज चलाऊ। स्कैन करबाक स्वांग करू आ पार्श्वसँ  क्लिक-क्लिकक ध्वनि करू।) केसर (स्वगत): हमर नानी-दादी सभ तँ अपन समस्त जिनगी परिवारक नामे कऽ देने छली। परिवारक पसिन्नक खेनाइ पकौनाइ, परिवार लेल पूजापाठ, बच्चा सभक ध्यान राखनाइ, आजीवन परिवार लेल खटैत रहनाइ यएह सभ हुनकर जिनगी छलनि। हुनका सभकेँ तँ अपन स्वतंत्रता एतेक प्रिय नहि छलनि। मुदा हुनकर सबहक एहि गुण लेल सभ हुनकासँ एतेक स्नेह करैत छलनि। (दोकानक काउण्टर पर पहुँचैत देरी केसर अपन काज पूरा तत्परतासँ करए लगली आ संगमे अपन सहकर्मी विदेशी मूलक सैम्युएलासँ बात सेहो करैत छली।) कैश:  नमस्कार सैम, केहेन छी ? (कैश ई पूछि बार-कोड रीडरसँ समान स्कैन करए लगली।) सैम: बहुत नीक कैश, हमर बच्चाकेँ नर्सरीमे मंगनीमे जगह भेट गेल। कैश: वाह, एतेक दिन बड्ड तकलीफ छल अहॉंकेँ। बच्चाकेँ संगी सभ लग निहौरा कऽ राखए पड़ै छल। सैम: ओतबे नहि, संगियोकेँ बच्चा सभकेँ कखनो कऽ देखए पड़ै छल हमरा। सप्ताहान्तमे सेहो बुझु तँ हम काज करैत छलहुँ। कैश: चलु से नीक भेल, आब आगॉं की? सैम:   हम अपन पुरूष मित्रसँ रिश्ता तोड़ि रहल छी। कैश:  ओह, तँ बच्चा ककरा लग रहत? सैम:  हमरा लग। कैश: अहॉं तँ पढ़ाइक खर्चेसँ परेशान छलहुँ आब बच्चाक पालन पोषण केना करब? सैम: ओहो कोन कमाइ छल, ओ तँ संगे पढ़ने छलहुँ तैं दोस्ती छल। बच्चाक नामपर सरकारी सहायता भेटत, फेर एकटा कुक्कुर सेहो पोसने छी तकरो लेल सरकारसँ मदति भेटत। (कैश कनी काल चुप्प भऽ गेली फेर कनिये देर बाद बजली।) कैश: कहिया धरि अहॉंक पढ़ाइ पूरा भऽ जाएत? सैम: अगिला छह मासमे, तकर बाद ट्रेनीक कार्य भेटत जाहिमे दरमाहा सेहो भेटत। कैश: चलू तखन ई सभ तँ सम्हरि गेल। बस अहॉंक निजी जिनगी कनी गड़बड़ा गेल। सैम: नहि-नहि, हम एक जगह बात कऽ रहल छी। अगिला सप्ताह तक ओकर नोकरी पक्का भऽ जेतै, तकर बाद डेटपर जाइक इरादा अछि। (कैश दोसर बेर कने काल लेल चुप भेलथि।) कैश:  ओह, बढ़िया, शुभकामना। सैम:   धन्यवाद। (तखने एकटा नवयुवती ग्राहक अबै छथि। कैशक ध्यान अपन नवयुवती ग्राहक पर गेलनि जे हुनकर सबहक बात सुनैत छलनि। ओ भारतीय मूलक छल से रूप रंगसँ बुझाइत छल मुदा जनमल आ पढ़ल लीखल विदेशक छल से बोलीसँ बुझाइत छल। ओकर समानमे वाइनक बोतल छल। कैश: (नवयुवती ग्राहककेँ ऑंखि माड़ैत) मजा करू। नवयुवती ग्राहक: ई हमर बॉस लेल अछि। सैम: किए अहॉं नहि लै छी की ? नवयुवती ग्राहक: नहि, हमर माता-पिता एकर अनुमति नहि देने छथि। कैश: तँ अहॉं नौकरी करै छी? जँ खराब नहि मानी तँ हम बूझए चाहब जे अहॉंक पुरूष मित्र अछि आकि अहाँ व्याहता छी? नवयुवती ग्राहक: पुरूष मित्र अछि, व्याहता नहि छी। कैश:   (मुस्कुराइत). ओहो। नवयुवती ग्राहक: एहिमे आश्चर्य की? मित्रता तँ भारतीय संस्कृतिक सुन्दरता अछि। कियो मित्र जे पुरूष अछि से पुरूष मित्र भेल ने। कैश: नहि हमर इशारा एतुक्का चलन दऽ छल। नवयुवती ग्राहक: भारत कोनो आब एहि चलनसँ दूर अछि की ? लागैए एतुक्का चलन तँ अहॉंकेँ एकदम नहि बूझल अछि। एतए हम सभ दू पीढ़ी पहिनेसँ बसल छी मुदा कोनो पाबनि नहि बिसरै छी। यथासम्भव अपन पारम्परिक परिधान सेहो पहिरै छी। अपन मातृभाषा सेहो नहि बिसरल छी। विवाह सेहो माता-पिताक इच्छासँ करबाक इच्छा राखै छी। एतुक्का भारतीय समाज तँ अपन संस्कृतिकेँ जीवन्त राखैले पूरा प्रयास करैत अछि मुदा जे नवतुरिया सभ भारतसँ आबैत छथि सएह कलंकित करै छथि। कैश: अहॉं एतुक्का बसल सम्पन्न परिवारसँ छी तैं विदेशोमे रहि कऽ अपन रीति रेवाज मानैकऽ साहस अछि आ स्वयंकेँ सभ्य बनाकऽ रखने छी। बेसी सुविधा ककरा ने आकर्षित करैत छै। जे नवतुरिया आबै छथि से जौं एतुक्का सुविधामे रहऽ चाहती तँ हुनका किछु समझौता तँ करए पड़तनि। जे एतुक्का निवासीसँ बियाह करती, एतए अपन बच्चाकेँ जन्म देती तँ हुनका सरकारसँ सभ सुविधा भेटतनि आ कहियो हुनका आ हुनकर बच्चाकेँ अशिक्षा, अकुशलता आ बेरोजगारीक दुःख नहि बर्दाश्त करए पड़तनि। नवयुवती ग्राहक: सरकारी निअम तँऽ अहॉं अपन देशमे सेहो परिष्कृत कऽ सकैत छी, आखिर प्रजातन्त्र छै ओतए। हमरा सभकेँ अपन देशक उन्नति लेल योगदान देबाक चाही, ओहिसँ पड़ेबाक नहि चाही। हम प्रशिक्षण विभागमे कार्य करैत छी आ यदा कदा समए निकालि भारतीय संस्था लेल सेहो अवैतनिक काज करैत छी। आवश्यकताक अन्त नै छै। तखन तँ निर्णय अहॉंकेँ लेबाक अछि जे अहॉं कैश बनए चाहैत छी आकि केसर। २ मिथिलासँ दूर आ अंग्रेजी माध्यमे शिक्षित मैथिली अनुरागी आ जगजियार होइत मैथिली कवियित्री श्रीमति ज्योति सुनीत चौधरीसँ मुन्नाजी द्वारा भेल अंतरंग गप्प-सप्पक बानगी अहाँ सभक सोझाँ राखल जा रहल अछि। मुन्नाजी: ज्योतिजी, अहाँक शिक्षा-दीक्षा अंग्रेजी माध्यमे भेल। संस्कारगत सम्भ्रान्त वा आधुनिकतामे पलि-बढ़ि कऽ अहाँकेँ मैथिली भाषाक प्रति एतेक अनुराग कोना जनमल? ज्योति सुनीत चौधरी: सभसँ पहिने नमस्कार मुन्नाजी। असलमे मैथिलसँ दूर हम कखनो नहि रहलहुँ।जमशेदपुरमे मैथिल सबहक अपन बड़का टोली छनि आ बड्ड शानसँ ओ सभ विद्यापति समारोह मनाबैत छथि। हमर परिवारमे जे कियो बेसी नजदीकी छलथि सभ मैथिल छलथि। फेर सालमे एकबेर गाम अवश्य जाइत छलहुँ। ओतए पितियौत-पिसियौत भाइ-बहिन सबहक पुस्तक पढ़ै छलहुँ। से मैथिली भाषासँ अनुराग बच्चेसँ अछि। भाग्यसँ सासुरो खॉंटी मैथिल भेटल अछि। हँ, मैथिलक विकासक विचार हमरामे हमर स्वर्गीय बाबासँ आएल अछि। हमर पितामह जखन मरणासन्न रहथि तखन करीब एक मास हम हुनका लग अस्पतालमे दिनमे अटेण्डरक रूपमे रहेैत रही। हम अपन कॉस्टिंगक तेसर स्टेज ओहि अस्पतालमे पढ़ि कऽ पास केने छी। ओहि बीच हुनकासँ बहुत बात भेल आ मिथिलाक विकासक बात सभ मस्तिष्कमे आएल। मुन्नाजी: मैथिलीमे लेखन प्रारम्भक प्रेरणा कतऽसँ वा कोना भेटल। पहिलुक बेर अहाँ की लिखलहुँ आ की/ कतऽ छपल। ज्योति सुनीत चौधरी:  यद्यपि हम पहिल मैथिली कविता विद्यालयकालमे भारतवर्ष पर लिखने रही जे बड़हाराबला मामाजी (चाचीजीक भाय) केँ देने रहियनि आ किछु कारणवश ओ प्रकाशित नहि भेल। परन्तु मूल रूपसँ मैथिलीमे लेखनक प्रेरणा सम्पादक महोदय गजेन्द्रजी सँ भेटल। बादमे ज्ञात भेलजे गजेन्द्रजी बहुतो लेखकक खोज केलन्हि आ बहुतोसँ मैथिलीमे लिखबा लेलन्हि। हमहुँ ओहिमे सँ एक छी। हमर पहिल कविता ‘हिमपात’ अछि जे विदेह डॉट कॉम क पॉंचम अंकमे १ मार्च २००८ केँ प्रकाशित भेल। मुन्नाजी: कविता तँ लोकक स्वाभाविक जीवनधारासँ प्रस्फुटित होइत रहैत छैक आ चिन्तनशील लोक ओकरा लयवद्ध वा अक्षरवद्ध कऽ लैए। अहाँक पद्य-संग्रह अर्चिस् मे कविताक संग अहाँक हाइकू देखि आह्लादित भेलहुँ। हाइकू लिखबाक सोच कोना/ कतऽसँ बहराएल। ज्योति सुनीत चौधरी:  बहुत-बहुत धन्यवाद जे अहॉंकेँ हमर हाइकु नीक लागल। पहिने पोइट्री डॉट कॉम मे सभ दिन एकटा प्रााकृतिक दृश्यक फोटो देल जाइत छलै आ ओहि फोटोसँ प्रेरित भऽ हाइकू लिखक प्रतियोगिता होइत छल। अहुना हमरा प्राकृतिक सुन्दरतापर लिखनाइ पसिन छल से भोरे अपन घरक काज समाप्त कऽ जखन हम कॉफी लेल बैसै छलहुँ तँ मेल चेक करैकाल हम ओहि साइटपर जाइ छलहुँ आ सभ दिन एकटा हाइकू लिखैत छलहुँ। ओहि क्रममे चारि मासमे सएटा हाइकू जमा भऽ गेल जे विदेहक बारहम अंक (१५ जून २००८), जे हाइकू विशेषांक छल, मे छपल। मुन्नाजी: मिथिले नै भारतसँ दूर लंदनमे मैथिली पढ़बा-लिखबाक जिज्ञासा कोना बनल रहैए। अहाँ गृहणी रहैत- घर द्वार सम्हारैत कोना रचनाशील रहैत छी? ज्योति सुनीत चौधरी:  एक गृहिणी लेल स्वतंत्र लेखिकासँ बढ़िया आर कोन काज भऽ सकैत छै आर विदेहमे कखनो हमरापर कोनो विषय विशेषपर लिखए लेल वा समयक बन्धनक दवाब नहि छल। फेर ई तँ सौभाग्य अछि जे अन्तर्जालपर मैथिलीक प्रवेशसँ आब विदेशोमे रहिकऽ अपन भाषा साहित्यसँ नजदीकी बनल रहैत अछि। ईश्वरक आशीर्वादसँ बच्चा आब पैघ भऽ गेल अछि आ विद्यालय जाइत अछि। सासुर दिससँ कोनो जिम्मेदारी नहि अछि। पतिदेव सेहो घरक कार्यमे सहयोग दैत छथि तैं गृहिणी भेनाइ लेखन कार्यमे अवरोधक नहि बनैत अछि। मुन्नाजी: मैथिल संस्कृतिक तुलनामे अंग्रेजक संस्कृतिक बीच अपनाकेँ कतऽ पबै छी। दुनूक संस्कृतिक की समानता वा विभिन्नता अनुभव करैत छी? ज्योति सुनीत चौधरी:  दुनूमे किछु नीक आ किछु खराबी अछि। विदेशमे व्यवहारमे बेसी खुलापन छै मुदा हम अकरा विकसित रूप नहि मानैत छी। हम बच्चामे महात्मा गॉंधीजी द्वारा रचित एकटा हिन्दी-कथा पढ़ने रही “जब मैं पढ़ता था”, गान्धीजी इन लण्डन सँ प्रेरित; बहुत सत्य लागल ओ कथा जखन हम विदेशी सभ्यताकेँ बुझैक प्रयास केलहुँ। अपन संस्कृति बहुत धनी, तर्कसंगत आ मौलिक -original- अछि। बस हम सभ आर्थिक रूपेँ पिछड़ल छी, जकर नैतिक समाधान शिक्षाक विकास अछि। हमर इच्छा अछि जे भने मिथिलाक विकासमे कनी समय लागए मुदा अपन कला, संस्कृति, पाबनि, गीतनाद आदि सभ मलिन नहि होअए। हँ कतहु-कतहु सामाजिक कुरीति जेना दहेज, विधवाक जीवनशैली, स्त्री-शिक्षा आदिमे बदलाव चाही। अहि सभ समस्यामे दहेज समस्या बड्ड बड़का कैंसर अछि जे शिक्षित वर्गकेँ सेहो धेने अछि अन्यथा बॉंकि समस्या शिक्षाक विकासक संगे विलीन भऽ रहल अछि। मुन्नाजी: मैथिलीसँ इतर अहाँकेँ अंग्रेजीमे पोएट्री डॉट कॉम सँ एडीटर्स चॉएस अवार्ड (अंग्रेजी पद्य लेल) भेटल अछि। की अंग्रेजीमे पोएट्री लेखनक निरन्तरता बनौने छी। ज्योति सुनीत चौधरी:  नहि। हम जहियासँ विदेहमे लिखए लगलहुँ तहियासँ अंग्रेजीमे लिखबाक समय नहि निकलि रहल अछि। इहो कहल जा सकैत छै जे हमरा मैथिलीमे बेसी रूचि अछि अन्यथा “where there is will there is a way” अर्थात् जतए चाह ततए राह। मुन्नाजी: अहाँक नजरिमे मैथिली पद्य विधा आ अंग्रेजी पद्य विधामे की फराक तत्व अछि। दुनू एक दोसरासँ कोन बिन्दुपर ठाढ़ अछि? ज्योति सुनीत चौधरी:  अंग्रेजी पद्य विधा बहुत समृद्ध अछि कारण ओ विश्वव्यापी भाषा अछि। मैथिली पद्य विधा विशेषतः गीतक सेहो अपन अद्भुत आ अनेक रूप अछि जेना कि खिलौना, नचारी, सोहर, गोसाउनि, भगवति, ब्राह्मण, समदाओन, होरी, चुमाउन, छठि आदिक लेल विशेष पद्धति छै। मुदा एहि सभकेँ ढ़ंगसँ परिभाषित कऽ व्यवस्थित रूपे संग्रहित राखैक अभाव अछि। मुन्नाजी: ज्योतिजी, अहाँक माध्यमे मैथिली रचनाकारक किछु रचना सभक अंग्रेजी अनुवाद आ प्रकाशन भेल अछि। किए नै व्यापक स्तरपर मैथिलीकेँ अंग्रेजी पत्र-पत्रिकाक माध्यमसँ वैश्विक पटलपर अनबाक प्रयास करै छी? ज्योति सुनीत चौधरी:   हमरो ई इच्छा अछि। हम लन्दनक एक अंग्रेजी कवि समुदायसँ जुड़ल छलहुँ जे बाङ्ग्लादेशी आ डच समुदायक छथि मुदा हुनकर सबहक अत्याधुनिक  रहन-सहन (पबमे मीटिंग़-ड्रिंक्स) हमरा ओतेक नीक नहि लागल। तैयो हम एक व्यक्तिसँ मेल आ फेसबुकक माध्यमसँ सम्पर्कमे छी। जौं कुनो सुझाव अछि तँ दिअ हम यथासम्भव अपन योगदान देब। ओना इंगलैण्डमे बहुत मैथिल डाक्टर आ आई.टी. क लोक छथि, ओ सभ जरूर पुस्तक किनता। आ बॉलीवुडमे प्रकाश झा जी तँ छथिये। कहियौन हुनका किछु चलचित्र बनाबए मिथिला संस्कृति पर, मिथिला कलाकृतिपर। गामक हाल चाल तँ बहुत देखाओल गेल अछि। कनी बाहरक मैथिलपर सेहो काज करथि जाहिसँ जे धनी मैथिल सभ बाहर बैसल छथि से अपन संस्कृति दिस आकर्षित हेता। कहियौन जे अपन फिल्ममे मिथिला पेण्टिंग प्रदर्शित करथि। मुन्नाजी: अहाँ साहित्यक संग मिथिला चित्रकला आ ललितकलामे निष्णात छी। अहाँ साहित्य आ कला दुनूक बीच की फाँट देखैत छी। दुनूमे केहेन ककर अस्तित्व देखा पड़ैछ? ज्योति सुनीत चौधरी:   धन्यवाद। हम मास्टर तँ नहि छी, हँ हम अभिलाषी छी एकर उन्नतिक। साहित्यकेँ बहुत नीक मंच भेट गेल अछि मुदा कला लेल अखनो संकलित आ विश्व स्तरीय ठोस भूमिक आवश्यकता अछि। हम एक बिजनेस प्लैन बनेने छी मुदा ओहि लेल बढ़िया निवेशक आ विपणन कर्ताक आवश्यकता अछि। हम अहॉंके अटैचमेण्ट पठा रहल छी ओहि बिजनेस प्लैनक। कतहु गुंजाइश होअए तँ कृपा कऽ उपयोग करू।(नीचाँमे देल अछि) मुन्नाजी: अहाँ आइ.सी.डब्लू.ए.आइ.डिग्रीधारी छी, अहाँक नजरिमे राष्ट्रीय आ अन्तर्राष्ट्रीय फलकपर मिथिलाक वित्तीय स्थिति की अछि? एकर दशा कोना सुधारल जा सकैछ, एहि हेतु कोनो दिशा निर्देश? ज्योति सुनीत चौधरी:   अकर जवाब हम बहुत विस्तृत रूपमे देब। अहॉंकेँ धैर्यसँ सुनए पड़त। भारतमे  विकासशीलताक दोसर स्थानपर अछि बिहार राज्य। आइसँ १०-१५ साल पहिने बाहर रहैवला बिहारीकेँ लाज होइत छलै। एक अशिक्षित आ बेरोजगारीक बहुलतावला राज्यकेँ विकासक लेल एक शिक्षित आ उन्नत सोचबला मुख्यमंत्री चाही। चलू बिहार तँ रस्ता पकड़लक मुदा मिथिलाञ्चलक विकास ओहि रूपे नहि देखाइत अछि। विश्वबैंकसँ जे कोसी लेल कर्ज भेटल छै तकर जौं सदुपयोग भऽ जाए तँ मिथिलाक पचास प्रतिशत प्रााकृतिक समस्याक समाधान भऽ जेतै। बिहारमे नितिश जी एक निअम बना रहल छथि जाहि अन्तर्गत सरकारी कर्मचारी जौं निश्चित समयमे कार्य नहि करता तँ जनता हुनकर शिकाइत दर्ज कऽ सकैत छथि। अहि तरहक रूपान्तरण किछु आशाक किरण जरूर दऽ रहल अछि। मिथिलाक औद्योगिक विकासक लेल सरकारी सहयोगक आवश्यकता अछि। किछु बेसिक इन्फ्रास्ट्रक्चरक विकास जेना सड़क निर्माण, बॉंध निर्माण, पुल निर्माण आदि चाही जे सरकारकेँ करए पड़तनि, तकर बादे बाहरी लाभिच्छुक निवेशक सभ अपन पाइ लगेता। भारी उद्योगक सम्भावना कम अछि। अहिठाम सर्विस सेक्टर, कृषि उद्योग़, वस्त्र उद्योग, फैब्रीक इण्डस्ट्री, खाद्य सामग्री, प्रोसेस्ड फुड आदिक बड्ड सम्भावना अछि। अड़िकोंचक मिठ रूप मराठी स्टायलक़ समोसा, कचोरी, खीर, फिरनी आदि विदेशक बजारमे भड़ल अछि, तखन मिथिलाक व्यञ्जन किऐक नहि। किऐक नहि हम सभ मिथिलाक अड़िकोंचक तरकारी, मखानक खीर, अपन दिसका माछक मसाला सभकेँ विकसित कऽ एक्सपोर्ट करैत छी। गुजरातक मोदक विश्वप्रसिद्ध अछि, अपन सबहक बगिया किऐक नहि। तकर बाद आम, लीची, केरा, तारकून, कुसियार, खजूर आदिक विभिन्न ड्रिंक बना कऽ बेचल जा सकैत अछि। मधुबनी पेण्टिंगक व्यवसायिक उपयोग करू। अहि पैटर्नकेँ आधुनिक आ पारम्परिक दुनु तरहक परिधानमे बना कऽ फैशन शो करू। घरक क्रॉकरी, फर्नीचरसँ लऽ कऽ कम्प्यूटरक वालपेपर  आ लैपटॉपक कवरपर मिथिला पेण्टिंग छापू। घरक वाल पेपर, मोजाइक, मार्बल सभपर मिथिला पेण्टिंगक समावेश करू। पेंटिंगक किट बनाऊ जेना सैण्ड पेंटिंग, इम्बॉस पेण्टिङ्ग आदिक किट बजारमे उपलब्ध अछि। अनन्त सम्भावना छै। मिथिलांचलक उन्नतिक पथपर एकटा बाधा छै जकरा फानै लेल सरकारी कोष आ सरकारक ईमानदारीक आवश्यकता छै। एकबेर ई बाधा फना जाइ तँ मिथिलांचलकेँ स्वर्णिम रूप पाबैसँ कियो नहि रोकि सकैत अछि। मुन्नाजी: अहाँ लंदनमे रहि अपन नवका पीढ़ी (विशेष कऽ अपन पुत्रकेँ) मिथिला-मैथिलीसँ जोड़ि कऽ रखनाइ पसिन्न करब आकि एकरा अछूत सन बुझबाक शिक्षा देबै? ज्योति सुनीत चौधरी:    हम अपन नबका पीढ़ीकेँ अपन संस्कृतिसँ जोड़ि कऽ राखऽ चाहब। लन्दनमे विद्यार्थी ताकि रहल छी, मधुबनी पेटिंग सिखाबै लेल। हम अपन पुत्रकेँ मैथिलक सभ विशेषतासँ ज्ञात राखए चाहैत छी, संगमे ईहो चाहैत छी जे ओ अहि सभ्यताकेँ स्वेच्छासँ स्वीकार करथि। अछूत व्यवहारक तँ प्रश्ने नहि छै। भने ओ अहि संस्कृतिकेँ अंगीकृत करथि वा नहि मुदा सम्मान तँ देबहे पड़तनि। मुन्नाजी: मिथिला-मैथिलीक प्रति अनुरागकेँ अहाँक पति सुनीत चौधरीजी कोन रूपेँ देखै छथि, अहाँकेँ एहि कार्यकलापक प्रति प्रेरित कऽ वा बाधित कऽ? ज्योति सुनीत चौधरी:    हमर पति हमर काजमे दखल नहि दैत छथि आ कुनो तरहक दवाब नहि रहैत अछि जे हम की लीखू आ की नहि। घरक काजमे बहुत योगदान दैत छथि आ बाधित कखनो नहि करैत छथि ओना हमहुँ हुनकर इच्छाकेँ प्रााथमिकता दैत छियनि। प्रेरणा हम अपन मॉं, बहिन आ भौजीसँ लैत छी। हम हुनका सभसँ अपन सभ बात करैत छी। मुन्नाजी: ज्योतिजी अहाँ अपन नजरिये अंग्रेजी साहित्यक मध्य मैथिली साहित्यकेँ कतऽ पबै छी आ किएक? ज्योति सुनीत चौधरी:    हम अंग्रेजी साहित्यकेँ सागर मानैत छी आ मैथिली साहित्यकेँ मानसरोवर। अंग्रेजी साहित्यकेँ विश्वभरिमे काफी पहिने मान्यता भेटल छै तैं ओ बहुत समृद्ध अछि। सागर रूपी अंग्रेजी साहित्य अपन परिपूर्णतापर अछि मुदा मैथिली साहित्य प्रााचीन रहितो अखन उत्पत्तिक परमशुद्धि बिन्दुपर अछि आ ओकर सिंचन आ संरक्षणक भार सम्प्रति आ भावी लेखकगणपर छनि। मुन्नाजी: अहाँ अपन समक्ष समकालीन नवतुरिया रचनाकारकेँ कोनो संदेश देनाइ पसिन्न करब? ज्योति सुनीत चौधरी:  हम हुनका सभसँ कहए चाहबनि जे कृप्या सामने आऊ आ लेखकक रूपमे समाजक प्रति अपन जिम्मेदारीकेँ निमाहैत मैथिली साहित्यकेँ सुकृतिसँ सम्पन्न करू। मुन्नाजी: बहुत-बहुत धन्यवाद ज्योतिजी। ज्योति सुनीत चौधरी:  बहुत-बहुत धन्यवाद हमरा अहि योग्य बुझए लेल। हम एक बिजनेस प्लैन बनेने छी मुदा ओहिलेल बढ़िया निवेशक आ विपणन कर्ताक आवश्यकता अछि। हम अहॉंके अटैचमेण्ट पठा रहल छी ओहि बिजनेस प्लैनक। कतहु गुंजाइश होअए तँ कृपा कऽ उपयोग करू।- ज्योति सुनीत चौधरी Mithila Painting Nature of Business Selling printout and original MadhubaniPaintings on paper, fabric, tiles, ceramic and other media. Purpose: Expanding scope of MadhubaniPaintings without losing its originality. Sources (Purchases): Original artworks on paper and other media and digital copies Supplier: Artists and media resources for tiles, wallpapers etc. Sales: Online sales. Customers: Art lovers, Restaurants, Saloons, Interior desighners, fabric Designers, book printers for cover page design, card printers, Stationary printers etc. Cost required: Web designing cost Site subscription cost Collborationwith banks and other payment modes Purchasing art works from the artists Preparing good digital copies Postage (post sales cost)For web designingMain category MadhubaniPaintings •Mythological •Scenes of Ramayana •Scenes of Mahabharata •Stories of Puran •Gods and Goddesses •Festivals and Sanskara: •Kohbar •Vivah •Chhathihar •Muran •Upanayan •Kojagara •Barsait •Madhushravani •Diwali •Holi •Bhagwaanpuja •AkharhiPuja •Village Life : scencesof day to day works, cattle etc. •Wild Life: Different birds and animals, scenes of forest, desert •Story based: Based on popular stories •Flora and Fauna : Different flowers portrayed in madhubanipainting style •Contemporary : Based on city life, new experiments. •Natural scenes १.सुजीत कुमार झा- बिहारोमे मैथिली—मैथिली मिथिलाक विधायक सभ मैथिलीमे सपथ लेलन्हि २. रमेश- बहस- पंकज पराशरक साहित्यिक चोरि मैथिली साहित्यक कारी अध्याय थिक ३. उमेश मंडल सुपौलक कथा गोष्‍ठी : ४ दि‍सम्‍बर २०१० सुजीत कुमार झा बिहारोमे मैथिली—मैथिली मिथिलाक विधायक सभ मैथिलीमे सपथ लेलन्हि १५अम बिहार विधान सभाक पहिल दिन मिथिलाक विधायकसभ मैथिली भाषामे सपथ लेलन्हि अछि । बिहार विधान सभामे अहि सँ पहिनहुँ विधायक सभ सपथ लेने छलथि मुदा एतेक संंख्यामे पहिल बेर विधायक सभ सपथ लेलन्हि अछि । ग्रामीण विकास मन्त्री नितिश मिश्र , विनोद नारायण झा, अरुणशंकर प्रसाद , रामदेव महतो, रामलखन राम रमण सहित मधुवनी आ दरभंगाक अधिकांश विधायक मैथिलीमे सपथ लेलन्हि । अहिबेर विहार विधान सभामे मैथिलीक अतिरिक्त हिन्दी, उर्दु आ अंग्रेजीमे सपथ लेबाक व्यवस्था सेहो कएल गेल छल । ग्रामीण विकास मन्त्री नितिश मिश्र बातचित करैत कहलन्हि — ‘हम सभ मैथिल छी एकर बात विधानसभामे सेहो गुंजों अहि दुआरे मैथिलीमे सपथ लेलौं ।’ मैथिली भाषामे अहि सँ बहुत विकास हेतैक से नहि मुदा मिथिलाक सभ विधायक सपथकेँ माध्यम सँ मिथिला आ मैथिलीकेँ विकास करब से बचन सेहो अहिमे छिपल अछि, हुनक कथन छल । मधुवनी सँ विधायक बनल भाजपा नेता रामदेव महतो मैथिलीकेँ विकासमे भारतीय जनता पार्टी सभ दिन लागल अछि आ रहत कहलन्हि । मैथिलीमे सपथ लेलाक बाद बातचित करैत इहो स्मरण कराबय नहि बिसरलथि जे भारतक अष्टम अनुसूचिमे मैथिलीकेँ स्थान अटल विहारी वाजपेयी नेतृत्वक सरकार दियौने छल । अहि बेर विधायक गोपाल जी ठाकुर मैथिलीमे मात्र सपथ नहि लेलन्हि कुर्ता, धोती, गमछा, पाग पहिर विधानसभामे पहुँचल रहथि । हुनक पोशाक देख कऽ पत्रकार सभ घण्टो हुनक फोटो सेशन कएने छल । मैथिली आन्दोलन सँ लम्बा समय सँ जुड़ल एवं विद्यापति सेवा समिति दरभंगाक महासचिव बैद्यनाथ चौधरी बैजु कहैत छथि– ‘मैथिली भाषमे एतेक संख्यामे एतेक विधायक सभ सपथ लेब प्रसन्नताक बात अछि मुदा एतबे सँ काज नहि चलत ।’ ओ कनी फरिछा कऽ कहैत छथि— ‘मैथिली भाषाक विकासक लेल विहार सरकारकेँ एकटा बृहत्त योजना आनय परत ओहिमे भाषा, कला, साहित्य, संस्कृतिक विकास कएल जाए । अहिकेँ लेल शुरुए सँ दबाव देवाक लेल विद्यायक सभ सँ बैजु आग्रह कएलन्हि । किछ वर्ष पूर्व भारतक संसदमे दरभंगा सँ संसद रहल कृति अजाद धोती, कुर्ता, पाग, दोपट्टा पहिर कऽ पहिल दिन पहुँचल रहथि तऽ मैथिली भाषामे सपथ सेहो लेलन्हि । भारतक संसदमे भाकपा नेता चतुरानन्द मिश्र सेहो मैथिलीमे सपथ लेने रहथि ।

नेपालोमे सपथ नेपालमे मैथिली दोसर सभ सँ बेशी बाजय बला भाषा रहल अछि । कहियो काठमाण्डू उपत्यकाक राज्य भाषा मैथिली छल । ओतयकेँ राजासभ मैथिलीमे साहित्य लेखन सेहो करैत छलथि । मल्ल कालमे कएटा राजा एहन भेलथि । जिनकर एकटा साहित्यकारक रुपमे एखनो आदरकेँ साथ नाम लेल जाइत अछि । मुदा सपथकेँ इतिहास बहुत लम्बा नहि अछि । नेपालक संसदक तथ्याङ्क अनुसार डा. बंशीधर मिश्र नेपालक संसदमे पहिल बेर मैथिली भाषामे सपथ लेलन्हि । नेपाल कम्युनिष्ट पार्टी (एकीकृत माक्र्सवादी लेलिनवादी)क नेता रहल डा. मिश्र २०५१ सालमे सपथ लेने रहथि । जहिया ओ मैथिली भाषामे सपथ लेलथि तहिया मैथिलीकेँ बात करब अपराध मानल जाइत छल, एहन स्थितिमे सपथ लेने रहथि । आब तऽ मिथिलाञ्चलक अधिकाँश नेता मैथिलीमे सपथ लैत छथि । हिन्दी भाषाकेँ गुणगान करयबला मधेशी जनअधिकार फोरमक सह अध्यक्ष जय प्रकाश प्रसाद गुप्ता सनक व्यक्ति सेहो मैथिलीमे सपथ लेने छलथि । अहि बेरक संविधान सभाक चुनावमे एकीकृत नेकपा माओवादी तऽ अपन सभासदसभ केँ अपन अपन मातृ भाषामे सपथ लेबाक लेल ह्विप जारी कएने छल । मैथिलीक चर्चित युवा साहित्यकार धीरेन्द्र प्रेमर्षिक शब्दमे मैथिली आन्दोलन सही दिसामे जा रहल अछि । तकर संकेत अहि बेरक संविधानसभाक सपथ देखलाक बाद लगैत छल । मन्त्रीक रुपमे पहिल बेर एकीकृत नेकपा माओवादीक तत्कालिन नेता मात्रिका प्रसाद यादव सपथ लेने रहथि । उपराष्ट्रपति परमानन्द झा सेहो मैथिली भाषामे सपथ लेलन्हि । शुरुमे ओ हिन्दी भाषामे सपथ लेलन्हि मुदा बहुत विवाद भेलाक बाद मैथिली भाषामे सपथ लेने रहथि । २ रमेश बहस- पंकज पराशरक साहित्यिक चोरि मैथिली साहित्यक कारी अध्याय थिक विदेह-सदेह २ (२००९-१०) सँ पंकज पराशरक साहित्यिक चोरि आ साइबर अपराधक पापक घैलक महा-विस्फोट भेल अछि। ई पैघ श्रेय पत्रिकाक सम्पादक श्री गजेन्द्र ठाकुरकेँ जाइत छनि। हुनकर अपराध पकड़बाक चेतना केर जतेक प्रशंसा कयल जाय, कम होयत। “विदेह”क मैथिली प्रबन्ध-समालोचना- अंक, अइ पोल-खोल लेल कएक युग धरि विलम्बित भऽ कऽ निबद्ध रहत, से “समय केँ अकानैत” कहब कठिन अछि। साहित्योमे चौर्यकलाक उदाहरण पहिनहुँ अबैत रहल अछि गोटपगरा। मुदा एक बेरक चोरि पकड़ा गेलाक बाद प्रायः चोरिक आरोपी साहित्यकार मौन-व्रत धारण करैत रहलाह अछि आ मामिला ठंढ़ाइत रहल अछि। मुदा ताहि परम्पराक विपरीत अइ बेरक चोर ’सिन्हा चोर’ निकलल अछि आ विगत एक दशकसँ निरन्तर चोरि करैत जा रहल अछि- सेन्ह काटिकऽ। आ तेहेन महाचोरकेँ मैथिलीक साहित्यकार आ संस्था सभ तरहत्थीपर उठा-उठा कऽ पुरस्कृत केलक अछि आ समीक्षाक चासनीमे चोरायल कविता सबकेँ बोरि देल गेल अछि। विदेह-सदेह-२ प्रमाण-पुरस्सर अभियोगे टा नहि लगौलक, अपितु एहेन महत्वाकांक्षी असामाजिक तत्वक विरुद्ध साहित्यिक दण्ड आरोपित कऽ अपन “बोल्डनेस” सेहो प्रदर्शित केलक अछि। एक दशकमे तीन बेर पकड़ायल चोर प्रायः “डेयर डेभिल” होइत अछि आ अपन अनुचित। सीमाहीन महत्वाकांक्षाक पूर्ति लेल अपन वरीय संवर्गीय व्यक्तिकेँ सीढ़ीक रूपमे उपयोग करैत अछि आ स्वार्थ-सिद्धिक उपरान्त अपन पयर सँ ओही सीढ़ीकेँ निचाँ खसा दैत अछि। फेर ओकरा अपन ट्विटर-फेसबुक-नेट वा पत्रिकामे गारिक निकृष्टतम स्तरपर उतरऽ मे कनियों देरी नहि होइत छै। ओ नाम बदलि-बदलि कऽ गारि पढ़ैत अछि आ अपन प्रशंसामे जे.एन.यू.क छात्र-छात्राक पोस्टकार्ड लिखेबामे अपस्याँत भऽ जाइत अछि। ओ हिन्दीक कोनो बड़का साहित्यकारक बेटीक संग अपन नाम जोड़ि विवाहक वा प्रेम-प्रसंगक खिस्सा रस लऽ लऽ कऽ प्रचारित करैत अछि। एहेन प्रवृत्ति कएटा आओर तिकड़मबाजमे देखल गेल अछि जे हिन्दीक  पैघ-पैघ नामक माला जपि कऽ मठोमाठ होअय चाहैत अछि। वस्तुतः ई चिन्ताजनक तथ्य थिक जे मैथिलीक नव-तूरकेँ हिन्दीक पैघ-पैघ नामक वैशाखीक एतेक जरुरति किऐक होइत छनि? “विदेहक” “इनक्वायरीक विवरण” पढ़ि कऽ रोइयाँ ठाढ़ भऽ जाइत अछि। पहल-८६ आ आरम्भ-२३ मे जे पोल खूजल छल, अइ तथाकथित साहित्यकारक, तकरा बादे मैथिली साहित्यसँ बारि देल जेवाक चाहैत छल। मुदा विडम्बना देखू जे चेतना समिति सम्मानित कऽ देलक। “मैथिल ब्राह्मण समाज”, रहिका (मधुबनी) सन अँखिगर संस्थाकेँ चकचोन्ही लागि गेल, जखनकि संस्थामे विख्यात साहित्यकार उदयचन्द्र झा “विनोद” आ पढ़ाकू प्रोफेसरगण छथि। ई संशयविहीन अछि जे पुरस्कृत करेबामे विनोदजीक महत्वपूर्ण भूमिका रहल हैत। “विदेह” द्वारा रहस्योद्घाटन केलाक बावजूद एखन धरि चेतना समिति अथवा मैथिल ब्राह्मण समाज, रहिकाकेँ अपन पुरस्कार आपस करेवाक वा आने कोनोटा कार्रवाई करवाक बेगरता नहि बुझा रहल छै आ सर्द गुम्मी लधने अछि। एहेन “जड़-संस्था” सभ मैथिली साहित्यक उपकार करैत अछि वा अपकार? ई केना मानल जाय जे पहल-८६ वा आरम्भ-२३ अइ दुनू संस्थाक कोनो अधिकारी वा साहित्यकारकेँ पढ़ल नहि छलनि? ई आश्चर्यजनक सत्य थिक जे मैथिलीक कएटा पैघ साहित्यकार पंकज पराशरक कृत्रिम काव्य आ आयातित शब्दावलीमे फँसि गेलाह अछि। “विलम्बित कएक युग मे निबद्ध” क भूमिकामे अनेरो विदेशी साहित्यकारगणक तीस-चालिस टा नाम ओहिना नहि गनाओल गेल अछि, अपन कविता केँ विश्वस्तरीय प्रमाणित करबाक लेल अँखिगर चोरे एना कऽ सकैत अछि। सम्भावना बनैत अछि जे डगलस केलनर जकाँ ओहू सभ कविक रचनाक भावभूमिक वा शब्दावलीक चोरिक प्रमाण एही काव्य-पोथीमे भेटि जाय। अंततः मि. हाइडक कोन ठेकान? मैथिलीमे तँ लोक विश्व-साहित्य कम पढ़ैत अछि। तकर नाजायज फायदा कोनो ब्लैकमेलर किऐक नहि उठाओत? आखिर टेक्नो-पोलिटिक्स की थिक- टेकनिकल पोलिटिक्स थिक, सैह किने? एकरा बदौलत झाँसा दऽ कऽ पाकिस्तानोक यात्रा कयल जा सकैत अछि। “टेक्नो-पोलिटिक्सक” बदौलत किरण-यात्री पुरस्कार, वैदेही-माहेश्वरी सिंह “महेश” पुरस्कार, एतेक धरि जे विदितजीक अकादमीयोक पुरस्कार लेल जा सकैत अछि। प्रदीप बिहारीक सुपुत्रक भातिज-कका सम्बन्धक मर्यादाक अतिक्रमण कयल जा सकैत अछि। प्रो. अरुण कमलक “नये इलाके में” सेंधमारी कऽ कऽ “समय केँ अकानल” जा सकैत अछि। आर तँ आर, अइ टेकनिकल पॉलिटिक्सक बदौलत जीवकान्तजी सन महारथी साहित्यकारसँ “विलम्बित कएक युग...” पोथीक समीक्षा लिखबा कऽ “मिथिला दर्शन” (५) सन पत्रिकामे छपवा कऽ स्थापित आ अमर भेल जा सकैत चछि। मैथिली साहित्यक सभसँ पैघ सफल औजार थिक “टेक्नो पोलिटिक्स”! ई मानल जा सकैत अछि जे मिथिला दर्शनक सम्पादककेँ आरम्भ-२३ आ पहल-८६ कोलकातामे नहि भेटल होइन्हि। मुदा जीवकान्तजी नहि पढ़ने हेताह से मानबामे असौकर्य भऽ रहल अछि। जीवकान्त जी तँ प्रयाग शुक्लक “चन्द्रभागा में सूर्योदय” आ एही शीर्षकक नारायणजीक कविता (चन्द्रभागामे सूर्योदय) सेहो पढ़ने हेताह जे छपल अछि मैथिलीमे। तखन पंकज पराशरक समुद्रसँ असंख्य प्रश्न पूछऽवला कविताक भावार्थ किऐक नहि लगलनि जे समीक्षामे कलम तोड़ि प्रशंसा करऽ पड़लनि वा करा गेलनि? एकरा “प्रायोजित समीक्षा” किऐक नहि मानल जाय? की प्रयाग शुक्ल वा नारायणजीक समुद्र विषयक कवितासँ वेशी मौलिकता पंकज पराशरक कवितामे भेटलनि जीवकान्तजीकेँ? ओइ सभ कविताक कनियोँ “छाया”क शंको नहि भेलनि समीक्षककेँ? “सभ्यताक सभटा मर्मान्तक पुकार”क नोटिस लेबऽवला समीक्षककेँ साहित्यिक चोरि असभ्य आ मर्मान्तक पीड़ादायक नहि लगलनि? आब जीवकान्तजी सन समीक्षकक “पोजीशन फॉल्स” भऽ जेतनि से अन्दाज तँ मिथिला दर्शनक सम्पादककेँ नहियें रहनि, उदय चन्द्र झा “विनोद” केँ सेहो नहि रहनि। ई अभिज्ञान तँ पंकजे पराशर टाकेँ रहल हेतनि? बेचारे “पराशर” मुनिक आत्मा स्वर्गमे कनैत हेतनि आ पंकसँ जनमल जतेक कमल अछि सब अविश्वसनीय यथार्थक सामना करैत हेताह। पराशर गोत्री भऽ कऽ तीन बेर चोरि केनाइ “पराशर” महाकाव्यक रचयिता स्व. किरणजीकेँ सेहो कनबैत हेतनि। आखिर जीवकान्तजी साहित्यिक चोरिक नोटिस किए ने लेलनि, जखनकि हुनका विचारेँ “मैथिलीक समीक्षक प्रायः मूर्खता पीबिकऽ विषवमन करैत अछि”(विदेह-सदेह-२-२००९-१०)/ विनीत उत्पल-साक्षात्कार आ जीवकान्तजी स्वयं पंकज पराशरक चोरिवला कविता-पोथीक समीक्षक छथि, अपितु चौर्यकला प्रवीण कविक घोर प्रशंसक छथि। तखन अइ समीक्षा-आलेखमे अन्तर्निहित असीम-प्रशंसा साकांक्ष-पाठककेँ “विष-वमन” कोना ने लगौक? हुनका सन “पढ़ाकू” समीक्षक-पाठककेँ “फॉल्स पोजीशन”मे अननिहार “एक्सपर्ट आ हैबिचुएटेड” साहित्य-चोरसँ प्रशंसा आ पुरस्कार दुनू पाबि जाय तँ मैथिली-काव्यक ई उत्कर्ष थिक वा दुर्भाग्य? अंततः विदेह-सदेह टा किऐक निन्दा केलक एहि घटनाक? आन कोनो पत्रिका किऐक नहि केलक? डॉ. रमानन्द झा “रमण” इन्टरनेटपर निन्दा करैत छथि तँ घर-बाहर पत्रिकामे किऐक नहि जकर ओ सम्पादक छथि? चेतना समिति, पटना सम्मानित करैत अछि एहने-एहने साहित्यकारकेँ तखन अपने पत्रिकामे कोना निन्दा करत, जखनकि पुरस्कार आपसो नहि लैत अछि, जानकारी भेलाक वा साकांक्ष साहित्यकारक अनुरोध प्राप्त भेलाक बादो? नचिकेताजी नेटपर निन्दा करताह आ “विदेह”मे छपत तँ “मिथिला दर्शन”मे किऐक नहि निन्दा वा सूचना छपल? कारण स्पष्ट अछि- जीवकान्तक समीक्षा पंकज पराशरक काव्य-पोथीपर छपत, तखन ओही पोथीक चोरि कयल कविताक निन्दा कोना छपत? चारु भाग साहित्यिक आदर्श, मर्यादा आ नैतिकताक धज्जी उड़ि रहल अछि- पितामह आ आचार्यगणक समक्ष आ (अनजाने मे सही) हुनको लोकनिक द्वारा। मैथिल ब्राह्मण समाज, रहिका; चेतना समिति, पटना आ साहित्य अकादेमी, नई दिल्लीमे अन्ततः कोन अन्तर अछि वा रहल? एहेन नामी पुरस्कारक संचालन आ चयनकर्ता महारथी सभकेँ नव लोककेँ पढ़बाक बेगरता किऐक नहि बुझाइत छनि? बिना पढ़ने पुरस्कारक निर्णय वा समीक्षाक निर्णय कतेक उचित, जखन कि ई चोरि तेसर बेरक चोरि थिक आ से छपि-कऽ भण्डाफोड़ भेल अछि। एकरा वरेण्य आ वरीय साहित्यकारगण द्वारा काव्य-चोरि, आलेख-चोरिकेँ प्रश्रय देल जायब किऐक नहि मानल जाय, जखनकि आरम्भ, मैथिल-जन, पहल आ विदेह-सदेह पहिनहि छापि चुकल छल? की साहित्यिक चोरिकेँ प्रश्रय देब, दलाल वर्गकेँ प्रश्रय देब नहि थिक? एहेन सम्भावनायुक्त नव कविकेँ प्रश्रय देब मैथिली साहित्य लेल घातक अछि वा कल्याणकारी, जकरा मौलिकतापर तीन बेर प्रश्न चेन्ह लागल होइक? की पोथीक आकर्षक गत्ता देखि वा विदेशी कविगणक नामावली (भूमिकामे) पढ़ि कऽ समीक्षा लिखल जाइत अछि वा पुरस्कारक निर्णय लेल जाइत अछि? जँ से भेल हो तँ सब किछु “ठिक्के छै भाइ”? अइ सबसँ तँ जीवकान्तजीक बात सत्य बुझाइत अछि जे समीक्षकगण दारू पीबि कऽ वा पैसा पीबि कऽ वा मूर्खता पीबि कऽ समीक्षा लिखैत छथि। डगलस केलनरक “टेक्नोपोलिटिक्स” तँ छपि गेल “पहल”मे चोरा कऽ। आब जीवकान्तजी, ज्ञान रंजनजी अथवा हिन्दी जगतक आन साहित्यकार-सम्पादकसँ पूछथु जे नोम चोम्स्कीवला रचना कतय गेल, की भेल, कोन नामें छपल? पंकज पराशरक नामें कि पदीप बिहारीजीक सुपुत्रक नामेँ (अनुवाद रूपमे)। ई रिसर्च एखन नहि भेल तँ भविष्यमे पुनः एकटा साहित्यिक चोरिक पोल खूजत? अंततः एकटा माँछकेँ कएटा पोखरिकेँ प्रदूषित करए देल जाय आ से कए बेर? उदय-कान्त बनि कऽ गारि पढ़वाक आदति तँ पुरान छनि डॉ. महाचोर केँ। ककरो “सरीसृप” कहि सकैत छथि (मैथिल-जन) आ कोनो परिवारमे घोंसिया कऽ विष वमन कऽ सकैत छथि। ऑक्टोपसक सभ गुणसँ परिपूर्ण डॉ. पॉल बाबाकेँ चोरिक भविष्यवाणी करवाक बड़का गुण छनि तेँ हिनका नामी फुटबॉल टीम द्वारा पोसल जाइत अछि, जाहिसँ “विश्व-कप”केँ दौरान अइ “अमोघ अस्त्रक” उपयोग अपना हिसाबेँ कयल जा सकय। सहरसा-कथागोष्ठीमे पठित हिनकर पहिल कथाक शीर्षक छल- हम पागल नहि छी। ई उद्घोषणा करवाक की बेगरता रहैक- से आइ लोककेँ बुझा रहल छैक। अविनाश आ पंकज पराशरक मामाजी तहिया हिनकर कथाकेँ “टिप्पणीक”क्रममे मैथिली-कथाक “टर्निंग प्वाइन्ट” मानने छलाह। आइ ओ “टर्निंग प्वाइन्ट” ठीके एक हिसाबेँ “टर्निंग प्वाइन्ट” प्रमाणित भेल, कारण कथाक ओहि शीर्षकमे सँ “नहि” हटि गेल अछि, हिनकर तेबारा चोरिसँ। हिनकर पहिल चोरि (अरुण कमलक कविता- नए इलाके में) क निन्दा प्रस्तावमे “मामाजी” आ डॉ. महेन्द्रकेँ छोड़ि, सहरसाक शेष सभ साहित्यकार हस्ताक्षर कऽ “आरम्भ”केँ पठौने छलाह। आइ ओ हस्ताक्षर नहि केनिहार सभ कन्छी काटि कऽ वाम-दहिन ताक-झाँक करवाक लेल बाध्य छथि। द्वैध-चरित्र आ दोहरा मानदण्डक परिणाम सैह होइत अछि। अविनाश तखन तँ देखार भऽ जाइत छथि जखन ओ विदेह-सदेह-२ मे लिखैत छथि जे “एकरा सार्वजनिक नहि करबै”। नुका कऽ सूचना देवाक कोन बेगरता? पंकज पराशरसँ सम्बन्ध खराब हेवाक डर वा कोनो “टेक्नोपोलिटिक्स”(?) केर चिन्ता? विदेह-सदेह-२ क पाठकक संदेश तँ कएटा साहित्यकारकेँ देखार कऽ दैत अछि। जतय राजीव कुमार वर्मा, श्रीधरम, सुनील मल्लिक, श्यामानन्द चौधरी, गंगेश गुंजन, पी.के.चौधरी, सुभाष चन्द्र यादव, शम्भु कुमार सिंह, विजयदेव झा, भालचन्द झा, अजित मिश्र, के.एन.झा, प्रो.नचिकेता, बुद्धिनाथ मिश्र, शिव कुमार झा, प्रकाश चन्द्र झा, कामिनी, मनोज पाठक आदि अपन मुखर भाषामे प्रखरतापूर्वक निन्दनीय घटनाक निन्दा केलनि अछि, ततहि अविनाश, डॉ. रमानन्द झा “रमण”, विभारानीक झाँपल-तोपल शब्द आश्चर्य-भावक उद्रेक करैत अछि। मुदा संतोषक बात ई अछि जे पाठकक “प्रबल भाव-भंगिमा” साहित्यकारोक “मेंहायल आवाज”क कोनो चिन्ता नहि करैत अछि। विभारानी तँ कमाले कऽ देलनि। एहि ठाम मैथिली भाषा-साहित्यक एक सय समस्या गनेवाक उचित स्थान नहि छल। ई ओनाठ काल खोनाठ आ महादेवक विवाह कालक लगनी भऽ गेल। कोनो चोर बेर-बेर अपन कु-कृत्यक परिचय दऽ रहल अछि आ हुनका समय नष्ट करब बुझा रहल छनि आ चोरकेँ देखार केलासँ दुःख भऽ रहल छनि? ओ अपन प्रतिक्रियामे कतेक आत्म श्लाघा आ हीन-भावना व्यक्त केलनि अछि से अपने पत्र अपने ठंढ़ा भऽ कऽ पढ़ि कऽ बूझि सकैत छथि। हिन्दीयोमे एहिना भऽ रहल अछि, तेँ मैथिलीमे माफ कऽ देल जाय? आब हिन्दीसँ पूछि-पूछि कऽ मैथिलीमे कोनो काज होयत? विभारानी ज्योत्सना चन्द्रमकेँ ज्योत्सना मिलन केना कहैत छथि? हुनकर उपेक्षा कोना मानल जाय? ओ सभ साहित्यिक कार्यक्रममे नोतल जाइत छथि, सम्मान आ पुरस्कार पबैत छथि, पाठक द्वारा पठित आ चर्चित होइत छथि। समीक्षाक शिकाइत की उच्चवर्णीय (?) साहित्यकारकेँ मैथिलीमे नहि छनि? समीक्षाक दुःस्थिति सभ जातिक मैथिली साहित्यकार लेल एके रंग विषम अछि। ओइ मे जातिगत विभेद एना भेलए जे ब्राह्मण-समीक्षक, आरक्षणक दृष्टिकोणेँ निम्न जाति (?)क साहित्यकारक किछु बेशीए समीक्षा (सेहो सकारात्मक रूपेँ) केलनि अछि। समीक्षा आ आलोचनाक विषम स्थितिक कारणें जँ नैराश्यक शिकार भऽ जाय लेखक, तँ लेखकीय प्रतिबद्धताक की अर्थ रहि जायत? विभाजीकेँ बुझले नहि छनि जे हुनका लोकनिक बाद मैथिली महिला लेखनमे कामिनी, नूतन चन्द्र झा, वन्दना झा, माला झा आदि अपन तेवरक संग पदार्पण कऽ चुकल छथि। हुनका ने कामिनीक कविता संग्रह पढ़ल छनि आ ने “इजोड़ियाक अङैठी मोड़”। हुनका अपन गुरुदेवक बात मानि हिन्दीमे जाइसँ के कहिया रोकलकनि? ओ गेलो छथि हिन्दीमे। मातृभाषाक प्रेरणा अद्वितीय होइत छै। मैथिलीक जड़ संस्था अथवा समीक्षक सभपर प्रहार करबामे हमरा कोनो आपत्ति नहि, मुदा अर्थालाभ तँ एतय नगण्य अछिए। सामाजिक सम्मान विभाजीकेँ अवश्य भेटलनि अछि। समाजमे “जड़”लोक छै तँ “चेतन” लोक सेहो छैक। हुनकासँ मैथिली भाषा-साहित्य आ मिथिला-समाजकेँ पैघ आशा छै, हीनभाव वा आत्मश्लाघासँ ऊपर उठि काज करवाक बेगरता छैक। सक्षम छथि ओ। हुनका श्रेय लेवाक होड़सँ बँचवाक चाही। अन्यथा साहित्य अकादेमी प्रतिनिधि, दिवालियापन केर शिकार जूरीगण आ मैथिलीक सक्षम साहित्यकारमे की की अन्तर रहि जायत? विभारानीक विचलनक दिशा हमरा चिन्तित आ व्यथित करैत अछि। ओ दमगर लेखिका छथि, सशक्त रचना केलनि अछि, आइ ने काल्हि समीक्षकगण कलम उठेबापर बाध्य हेबे करताह। समीक्षकक कर्तव्यहीनतासँ कतौ लेखक निराश हो? पंकज पराशरक श्रृंखलाबद्ध साहित्यिक चोरिपर सार्थक प्रतिक्रिया देब कोनो साहित्यकार लेल अनुचित नहि अछि कतहुसँ। साहित्यकार लेल साहित्यिक मूल्यक प्रति ओकर प्रतिबद्धता मुख्य कारक होइत अछि आ हेवाको चाही आ तकरा देखार करवाक “बोल्डनेसो” हेवाक चाही। “चाही”वला पक्ष साहित्यमे बेशीए होइत अछि। एहेन-एहेन गम्भीर विषयपर साहित्य आ समाजक “चुप्पी” एहेन घटनाकेँ प्रोत्साहित करैत अछि आ जबदाह जड़ताकेँ बढ़बैत अछि, भाषा-साहित्यकेँ बदनाम तँ करिते अछि। जाधरि पंकज पराशरक चोरि-काव्यक समीक्षा लिखल जाइत रहत, विभारानीक मूल-रचनाक समीक्षा के लिखत? ककरा जरूरी बुझेतैक? विभारानी अपने तँ समीक्षा प्रायोजित नहि करओती? सक्षम लेखकक व्यवहारोक अपन स्तर होइत छै। तेँ संगठित भऽ चोरिक भर्त्सना हेवाक चाही। ३ उमेश मंडल सुपौलक कथा गोष्‍ठी : ४ दि‍सम्‍बर २०१० व्‍यापार संघ भवन सुपौलमे दि‍नांक ४.१२.२०१०केँ सगर राति‍ दीप जरय'क ७२म कथा गोष्‍ठी श्री अरवि‍न्‍द कुमार ठाकुरक संयोजकत्‍वमे बि‍पल्‍व फाउण्‍डेसन आ प्रगति‍शील लेखक संघ द्वारा आयोजि‍त कएल गेल। सांझ ६ बजे प्रो. सचि‍न्‍द्र महतोजी दीप प्रज्‍वलन सह उद्घाटन केलनि‍। मंच संचालन श्री अजीत झा आजादजी केलनि‍ आ गोष्‍ठीक अध्‍यक्षता श्री रमानन्‍द झा रमणजी केलनि‍। एहि‍ अवसरपर जीवकान्‍त जीक पोथी 'एकहि‍ पच्‍छ इजोर'क लोकार्पण अजीत आजादक माध्‍यमसँ अरवि‍न्‍द ठाकुर जीक द्वारा भेल। कुल २१गोट नव-पुरान कथाकार अपन-अपन नूतन कथा वा लघुकथाक पाठ केलनि‍। जे एहि‍ तरहेँ अछि‍- रंजीत कुमार खाँ राही- (फाेंक), रजनीश कुमार ति‍वारी- (गप्‍पी), अरवि‍न्‍द कुमार ठाकुर- (युटोपि‍या), अजीत आजाद- (रोग), पंकज सत्‍यम्- (तर्दनकृवा घुमैत पि‍बैत), महाकान्‍त ठाकुर- (शि‍क्षाक प्रयोजन), चौधरी जयंत तुलसी- (धीपल फाढ़), आशीष चमन- (नि‍ष्‍कर्ष), राजाराम सि‍ंह राठौर- (राखीक रंग फीका), वि‍जय महापात्रा- (मोन कि‍एक पाड़लेँ), जगदीश प्रसाद मंडल- (दोहरी मारि‍), दुर्गानन्‍द मंडल- (लबकी कनि‍याँ), कपि‍लेश्वर राउत- (कि‍सानक पुजी), मनोज कुमार मंडल- (बेमेल वि‍‍आह), रामबि‍लास साहु- (गामक गाछी), बेचन ठाकुर- (अनैति‍क वि‍आह), संजय कुमार मंडल- (सि‍नेह), अकलेश मंडल- (टि‍टनेस), मुकेश मंडल- (लोभक फल), लक्ष्‍मी दास- (बुड़ि‍बकक बुड़ि‍बक) आ उमेश मंडल- (युगक खेल आ आधा भगवान)क पाठ केलनि‍। प्रो. सचि‍न्‍द्र महतो, शैलेन्‍द्र शैली, महेन्‍द्र, कि‍शलय कृष्‍ण, अरवि‍न्‍द्र ठाकुर पठि‍त कथापर समीक्षा केलनि‍। ओना तुलसी जयंत चौधरी, राजाराम सि‍ंह राठौर, जगदीश प्रसाद मंडल, महाकान्‍त ठाकुर, दुर्गानन्‍द मंडल, आशीष चमन, वि‍जय महापात्रा इत्‍यादि सेहो‍ कि‍छु कथापर अपन टि‍प्‍पणी केलनि‍। श्री अजीत कुमार झा आजाद मंच संचालनक संग-संग पठि‍त कथा सभपर आ कएल समीक्षापर अपन कि‍छु वि‍चार माने टि‍प्‍पणी करैत रहला, तहि‍ना संयोजक श्री अरवि‍न्‍द ठाकुरजी सेहो वि‍शेष बात रखलनि‍ जेकर कछु वि‍चारणीय अंश नि‍म्‍नांकि‍त अछि‍- भोजनक वादक समए छल। उमेश मंडल, कपि‍लेश्वर राउत, अकलेश मंडल, दुर्गानन्द मंडल, लक्ष्‍मी दास, रामवि‍लास साहु, मनोज कुमार मंडल, बेचन ठाकुरक कथा पाठ भऽ गेल छल। प्राय: एकसँ दू पालीमे। समीक्षक लोकनि‍ हि‍नकर सबहक कथापर बाजि‍ चूकल छलाह। जाहि‍मे उमेश मंडलक अाधा भगवान कथापर श्री शैलेन्‍द्र शैल, अरवि‍न्‍द ठाकुर राजाराम सि‍ंह राठौर आ तुलसी जयंत चौधरी, कर्मवादी कथाक रूपमे समीक्षा केलनि‍। जेकर पुन: एकबेर दोहरबैत संचालक श्री अजीत आजाद जी बजै छथि‍- “उमेश मंडलक कथा आधा भगवान भाग्‍यवादीसँ कर्मवादी दि‍शि‍ लऽ जाइत अछि‍। वास्‍तवमे ई कथा कि‍सानी जि‍नगीक लेल नीक प्रयास मानल।”‍ अकलेश मंडलक कथा टि‍टनेस आ दुर्गानन्‍द मंडलक कथा लबकी कनि‍याँ'पर श्री अरवि‍न्‍द ठाकुर बजै छथि‍- “लबकी कनि‍याँ कथा मंडलजी बला सुनलहुँ ठीके शैलेन्‍द्र शैलजी कहलथि‍हेँ जे ई कथा वि‍षए-वस्‍तु‍क खि‍यालसँ ओहि‍ना लगैत अछि‍ जेना राजश्री प्रोजेक्‍टक सि‍नेमा चलि‍ रहल हुअए। अकलेश मंडलक कथा टि‍टनेसपर हम एतबए कहब जे ई कोनाे हेल्थ मेग्‍जि‍नमे छपैत तँ उत्तम। हमरा लगैए जे आइ मैथि‍ली साहि‍त्‍यक चौराहापर कि‍छु ओहन आदमीक उपस्‍थि‍ति‍ भऽ रहल अछि‍ जे देखबा, सुनबा आ वि‍चार करबा योग्य अछि‍। आइ बेरमा कथा गोष्‍ठीकेँ लेल जाए। जेकर संयोजक जगदीश प्रसाद मंडल, मंच संचालक अशोक कुमार मेहता आ अध्‍यक्ष तारानन्‍द वि‍योगी रहथि‍। तँ हम कहलौं जे ई जे पौतीमे बन्‍द मैथि‍लीक दुर्दशा छल ओ आब फूटि‍ बहराएलहेँ। एकरा अहाँ कि‍ कहि‍ सकै छि‍ऐ? आइ साहि‍त्‍यि‍क मंचपर टाल ठाेकि‍ कऽ ओ सभ चुनौती बुझू दऽ रहला छथि‍ जे कहि‍यो खबास होइत छलाह। एकरा अन्‍यथा नहि‍ लेल जाए। जे सत्‍य छै ओ सोझाँ राखलौं अछि‍। जगदीश प्रसाद मंडल जीक कथा-उपन्‍यास जखन हमरा सभ पढ़ै छी तँ जेना लगैए जे एकटा नव दुनि‍याँमे प्रवेश पौलहुँ अछि‍। एकदमसँ ओहेन दुनि‍याँ जै दुनि‍याँक कल्‍पनो ने बुझू भेल छल। जहि‍ना वि‍षए-वस्‍तु तहि‍ना शब्‍द-संयोजन तहि‍ना दृष्‍टि‍कोण....। तँ आब अहाँ सभ ई बुझि‍यौ जे जगदीश मंडलजी एकटा एहेन रेखा खि‍ंचि‍ देलनि‍। जेकरा धि‍यानमे राखि‍ कऽ अहाँ कथा लि‍खी तँ उत्तम। आइ जै वर्गसँ अहाँ सभ आबि‍ रहल छी ओइ वर्गमे माने कि‍सानी जि‍नगीक अनेकानेक वि‍षए-वस्‍तुक चर्च मंडलजी केलनि‍ अछि‍। ओकरा धि‍यानमे राखि‍ अहाँ सभ आगाँ लि‍खी।” अरवि‍न्‍द ठाकुरजीक वक्तव्यक बाद माइक लैत अजीत आजादजी बजै छथि‍- “अरवि‍न्‍द‍ बाबू ठि‍के कहै छथि‍। हि‍नका बातकेँ हम समर्थन करैत छि‍अनि‍। अहुँ सभ कथा गोष्‍ठीमे अबै छी पहि‍ने तँ जगदीश मंडल एलथि‍ बादमे अहाँ सभकेँ सेहो अनलाह आ अबै छी। जगदीश मंडल आ उमेश मंडलजीकेँ आब हम सभ दूरेसँ चि‍न्‍है छि‍अनि‍। लेकि‍न अहाँ सभ ऐ बातकेँ बुझि‍यौ जे कथा कोना लि‍खा रहलैहेँ। अबै छी, कथा पढ़ै छी, जाइ छी। बड़ नीक मुदा ई बुझि‍यौ जे जै वर्गक अहाँ सभ लोक छी मतलब कि‍सान वर्ग जे आधार भेलै। कृषि‍ आधार छि‍ऐ कि‍ नहि‍ छि‍ऐ? तँ ओइमे जे बात सभ छै, जटीलता सभ छै ओकरा अहाँ सभ नै लि‍खबै तँ के लि‍खताह...? तँ ई कहलौं जे एम्‍हर-ओम्‍हर नै लि‍खि‍ ओ सभ लि‍खल जाए। जैमे एकटा बड़का रेखा, कहबे केलथि‍हेँ अरवि‍न्‍द बाबू जे जगदीश मंडल द्वारा खिचि‍ देल गेलहेँ। जँ एकरा नै धि‍यान राखब तँ गोष्‍ठि‍मे एनाइ-गेनाइ बुझू नीक नहि‍। ओना ऐ गोष्‍ठि‍सँ बाहरो नि‍कालल जाइ छै।” ई गप्‍प अध्‍यक्ष महोदय दि‍शि‍ तकैत आ मुड़ी डोलबैत अजीत जी अगाँ बजै छथि‍- “आब एकटा खि‍स्‍सा सुनबै छी- यंत्रनाथ मि‍श्रकेँ गोष्‍ठीसँ नि‍कालल गेलन्‍हि‍, की यौ.....? आश्‍चर्य लागत जे गेट आउट कहि‍ देल गेलन्‍हि‍ माने गेटसँ बाहर कऽ देल गेलन्‍हि‍।‍” वातावरणमे खटमिट्ठी बुझू पसरि‍ गेल। एत्ते बात बजबाक प्रयोजनपर सभकेँ सब तरहक चि‍न्‍तन-मनन हुअए लागल। दू-चारि‍ मि‍नटक लेल शान्‍त...। एकदम्‍म शान्‍ति‍, सन्नाटा। कि‍छु लोक एक-दोसराक मुँह दि‍शि‍ तकैत। आ कि‍छु लोक गोष्‍ठि‍क गार्जियन श्री रमानन्‍द झा रमणजी दि‍शि‍ गोरसपट टकधि‍यान लगेने। मुदा जे कि‍छु....। आगाँ उमेश मंडल (माने हम) हमर नामक चर्च संचालक महोदय पहि‍नहि‍ उद्वोधि‍त कऽ चूकल छलाह जे एहि‍ पालीक पठि‍त कथापर हमहुँ कि‍छु टि‍प्‍पणी करबै। हम प्राय: छुब्‍ध रही जे ई कोन समीक्षा भेल। एहि‍ तरहक समीक्षासँ नवाङकुरपर आखिर की‍ प्रभाव पड़तनि‍। खएर जे से हम आगू जा माइक हाथमे लैत बजलहुँ- “जहि‍ना पठित पालीपर समीक्षाक ‍बहाने अन्‍यान्न वि‍षए-वस्तुपर गप-सप्‍प राखल तहि‍ना हमहुँ कि‍छु बात राखि‍ रहल छी। सभसँ पहि‍ने हम ओइ कथाकार सभकेँ कहि‍ देबऽ चाहैत छि‍यनि‍ जे पहि‍ल या दोसर कथा लऽ कऽ उपस्‍थि‍त भेलहुँ आ कथा पाठ केलौं। सबहक कथामे यथार्थ अछि, सुन्नर अछि‍, कथ्‍य, शि‍ल्‍प, भाषा, शैली सभ कि‍छु उत्तम। एक्को पैसा उदास हेबाक प्रयोजन नहि‍। दोसर गप्‍प जे अपने सभ एहि‍ बातकेँ बुझल जाए जे जहि‍ना भोजक पाँति‍मे बैसल पंचक आगाँ पहि‍ल खेपमे परसल व्‍यंजनपर कोनो तरहक टि‍का-ति‍रस्‍कारक व्‍यवहार नहि‍ कएल जाइत हँ, दोसर-तेसर बेर माने परसन लेबाकाल ई जरूर धि‍यान राखल जाइत जे की नीक आ की बेजाए....। तेसर बात अपने सभक द्वारा नव लोककेँ कहल गेलन्‍हि‍हेँ जे एना नै ओना आकि‍ ओना नै एना लि‍खू। कृषि‍ वि‍कासक बात लि‍खू आ से ई के लि‍खता अहीं सभ ने लि‍खबै। ठीक बात मुदा इंजि‍नि‍यर डाॅक्‍टरक पढ़ाइ करैबलाक भरमार लागल अछि‍ आनो-आन क्षेत्रमे जि‍नका पढ़ाइ-लि‍खाइक सुवि‍धा पर्याप्‍त छन्‍हि‍ नम्‍बर लगौने छथि‍। लेकि‍न कृषि-‍कार्यक पढ़ाइ हेतू कि‍एक ओ सभ विमुख भेल छथि‍। ई गप्‍प आ समस्‍याकेँ के लि‍खताह? ऐ पर कथा कि‍एक नै लि‍खल जाइत अछि‍। ऐ पर अहुँ सभ वि‍चार करू।” अपन बातपर वि‍राम लगा हम माइक संचालक महोदयकेँ हाथमे दैत यथास्‍थान जा बैस रहलहुँ। गोष्‍ठि‍मे बैसल सभ कथाकार आ समीक्षकक मनमे जेना समीक्षाक नव-नव बि‍म्‍व नॉचए लगलनि‍। अध्‍यक्ष महोदय सेहो उठि कऽ बैस रहला। अध्‍यक्ष महोदय दि‍शि‍ देखैत संचालक एक बेर पुन: अपन बात स्‍पष्‍ट करैत बजलाह- “देखियौ हमर कहब छल जे अहाँ सभ एत्ते दूरसँ एलौं जेबा-एबामे बड़ कठि‍नाइ होइ छै। हमर कहबाक भाव रहए जे जहि‍ना जगदीश बाबू लि‍खै छथि‍ ओ जे रेखा खि‍चलन्‍हि‍हेँ ओकरा धि‍यानमे राखि‍.....। अहाँसँ साहि‍त्‍यमे कि‍ लाभ भेलै। मतलब कि‍ देलि‍ऐ। से जौं नइ तखन तँ.....।‍” ऐ बातपर हम पुन: बाजलहुँ- “‍अजीत बाबू अपने साहि‍त्‍यि‍क लाभक बात एहि‍ नव लोकमे तकै छी। मुदा एकबेर अपना दि‍शि‍ देखल जाए जे स्‍वयं थोड़ेखन पहि‍ने बजलाैंहेँ‍ जे सत्तरह सालसँ लगातार अहाँ सभ कथा गोष्‍ठि‍मे भाग लेलहुँ। आइसँ नै सत्तरह सालसँ। मुदा कएकटा कथा संग्रह देलि‍ऐहेँ?” अजीत आजाद- “अहीं जकाँ हमरा प्रकाशन नै ने भेट गेल जे......।‍ अक्‍खैन कि‍यो भार लेथि‍ हम परसू तक तीनटा कथा संग्रह थम्‍हा दैत छि‍यनि‍। लेकि‍न ओहोसँ पैघ बात जे कै स्‍तरक कथा सभ हमर वि‍भि‍न्न पत्र-पत्रि‍कामे छपि‍ चूकल अछि‍ आ कहि‍यासँ तेकरो तँ देखबै।” अगल-बगलसँ पाँच-छह गोटा एक्केबेर- हँ, से तँ ठीके बात। हँ से तँ ठीके बात। बजैत अागाँ‍क कथा पाठ लेल अग्रसरक वि‍चार प्रकट केलाह। माहौलमे परि‍वर्त्तन भेल। लगभग चारि‍टा कथापाठ फेर भेल आ तेकर संक्षि‍प्‍त समीक्षा सेहो कएल गेल। तात् भि‍नसर ६बाजि‍ गेल। श्री रमानन्‍द झा रमण अपन अध्‍यक्षीय उद्वोधनमे उपरोक्‍त झजमझ (मतांतर)पर एक्को शब्‍द नै बजलाह। अगि‍ला कथा गोष्‍ठि‍क आयोजन श्री वि‍जय महापात्रा जीक संयोजकत्‍वमे हुनके मातृभूमि‍ महिषी मे कएल जाएत ताहि‍ लेल सुपौलक संयोजक श्री अरवि‍न्‍द ठाकुरजीक द्वारा दीप आ उपस्‍थि‍ति‍ पुस्‍ति‍का भावी संयोजककेँ समर्पित करैत गोष्‍ठि‍क समापन कएल गेल। १. विनीत उत्पल- दीर्घकथा- घोड़ीपर चढ़ि लेब हम डिग्री - दोसर भाग २. अकलेश मंडल-  लघुकथा- टीटनेस ३. कपि‍लेश्वर राउत- कथा- कि‍सानक पूजी ४ राम वि‍लास साहु- लघुकथा- परि‍श्रमक भीख ५.भारत भूषण झा- कथा-आत्‍मबल १ विनीत उत्पल- दीर्घकथा- घोड़ीपर चढ़ि लेब हम डिग्री - दोसर भाग आलोक बाबू ओहि सांझ पूरे मूड में छल। मुदा राति बेसी भऽ गेल छल। सभक आंखि मे नीन आबैत छल। कियो देवार से सटि के उंघय लागल तऽ केकरो सुनैत-सुनैत झपकियो लियै लागल। भुजाक संग दालमोट आओर कतेक देर चलतियै। सभक पेट मे चूहा कूदै लागल। प्यासो लागल छल। जतेक पैन के बिसलरी के बोतल छल, सभ खत्म भऽ गेल छल। आबि एतेक राति भऽ गेल छल जे कोनो दोकानो नहि खुजैत रहल, जाहि सं किछु खाय-पीबै बला समान आबतियैथ। उमढ़, स्टेज पर आलोक बाबू छल, जिनका जिह्रा पर सरस्वती बैसल छल। हुनकर खिस्सा सुनाबै मे ब्रोक नहि लागल छल। हुनकी मीठ बोल आओर खिस्सा कहैक स्टाइल छोड़ि कऽ कियो जाइलै नहि चाहैत छल। अपन श्रोताक भाव-मुद्रा जे कथाकार चिह्न लिये, ओ होशियार होयत अछि। आलोक बाबू तऽ होशियार छेबे करल। ओ लोकक मुद्रा के पढ़ि लेलैन आओर घोषणा करलैन जे आब बेसी राति भऽ गेल अछि, ताहि से आजुक कथा एतय बंद करैत छी। आब अगला बैठकी मे समूचे खिस्सा अहां सभकऽ सुनायब। ई सुनैत सभ सुनहि बला कऽ लागल जे पेटक भूख पेट में रहि गेल। कियैकि पेटक भूखक आगू मानसिक भूख भारि पडि़ जाइत अछि। एक हफ्ता लोक सभक कोना बीतल कियो नहि कहि सकैत अछि। मुदा, एक गप भेल जे आलोक बाबूक फिल्मक खिस्सा पूरे रायपुर मे कानाफूसी जना बाजल जायत छल। आय ओ सभागार मे शहर के आओर लोक आबि गेल छल, आलोक बाबूक सुनैक लेल। ठाढ़ रहैक जगह नहि छल। लोक कऽ जतय जगह भेटल ताहि ठां नीचे मे बैसि गेल। जहिला रोट्रेक्ट क्लब के अध्यक्ष राजेश चौधरी बजलाह जे आब अहां सभ शांत भऽ कऽ बैसि जाऊ, आब आलोक बाबू अपन फिल्म देखहि के खिस्सा सुनायैत। पूरे हॉल मे 'पिन ड्राप साइलेंट" भऽ गेल। आलोक बाबू तऽ आलोक बाबू छलाह। आव नहि देखलक ताव, शुरू भऽ गेल खिस्सा सुनाबैय लेल। एकटा हाथ डांड़ पर धरि, दोसर हाथ से खिस्सा कऽ लऽ कऽ हवा मे लपटाबैत कहलाह, 'हमर सौभाग्य अछि जे हमरा रास्ता देखाबै बला हमर पापा अछि। कोनो पाय कऽ लऽ कऽ गप होयत या दुनिया जहानक। खेलक मैदान सं लऽ कऽ फिल्मी दुनियाक गप, राजनीतिक रपटीली डेगक गप सं लऽ कऽ कोनो बीमारी सं छुटकारा पाबैक नुक्सा, पापा अलराउंडर अछि। हमरा लागैत अछि जेना फिल्मोक गप हम पापा से जानल छी। एखन धरि जिनगीक बेसी काल मामा लग नहि रहि कऽ पापा संग रहल छी। नीक काज करैत रहि तऽ ओ खुश होयत छल नहि तऽ खूब मारि खाइत रहि। पापा के मुह से सुनल छलौंंह जे अमिताभ बच्चन हीरो अछि आओर हुनकर पिता हरिवंशराय बच्चन एकटा कविक संग प्रोफेसर सेहो छल।" आलोक बाबू अपन पापा कऽ लऽ कऽ कहै लगलाह जे ओ कहैत अछि जे फिल्म देखहि मे पाय आैर टाइम बरबाद होयत अछि। तीन घंटा मे जे नेना कोर्सक पोथी पढ़ि लियै या कोनो खेल खेलय तऽ ओ क्लास में नीक करत या ओकर देह नीक भऽ जाइत। ओ पढ़ाई कऽ लऽ कऽ कोनो सामंजस्व बैसाबैक विरूद्ध खड़ा भऽ जाइत छल। मुदा हमरा बेर ओ आपन वसूल बदलि लेलखिन। हमहूं फिल्म देखहि लेल जाइत रहि मुदा की दैखैत रहि, बुझैत मे नहि आबैत छल। रविक सांझ मे दूरदर्शन मे फीचर फिल्म देखाओल जाइत छल, जकरा दैखैत लेल हम जाइ रहि दोसर के घर। मुदा एकरा लेल बड़का साध्य करै पड़ैत छल। भोरि भऽ कऽ सबसे पहिले जागैत रहि। तकर बाद दिन भरि खूब मन लगा कऽ पढ़ैत रहि। एतेक पढ़ैत रहि जे पापा सांझ तक खुश भऽ जाय। पापा खुश तऽ फिल्म देखि सकैत रहि मुदा हुनकर कोनो सवालक जवाब नहि दऽ सकलौंह तऽ सभटा प्लान धरि की धरि रहि के डर बनल रहैत छल। पापा के सीधे कहबाक रहि जे क्लास मे नीक करैक संग टास्क पूरा होयत तखने अहांक गप मानल जाइत। नहि ते जे हम कहैत छी, ओ अहां मानू। नेने से मन मे एकटा विद्रोह स्वाभाव रहल अछि। जे हम जे कहि, से दुनिया मानै। हम किया केकरो गप मानब, हमर गप किया नहि कियो मानैत। नेने से अपन सपना के हकीकत मे बदलहि लेल एके टा रास्ता रहि जे खूब मन लगाकर पढ़ि। पापा आओर हमर बीच ई हरदमे चलैत छल जे के कखैन जीतत। कखनो पापा जीतैत छल तऽ कखनो हम। लागैत छल जे पापा अपने बेटा सं हारिक खुश भऽ जाइत छल। हेतै किया नहि, ई तऽ सभ बापक होबाक चाहि। बेटा आगू बढ़ै, एकरा सं नीक की होयत। हम जखैन जीतैत रहि तऽ पापा हंसि कऽ हमरा अपना तरहे जिनगी जियबाक लेल छूट दैत छल। हम जखन हारैत रहि तऽ कनिक काल तऽ झल्ला जाइत रहि। मुदा, सोचैत रहि जे आगू से जे भी हेता, हम नहि हारब। खूब मन लगाकऽ पढ़। अहिना तरहे हम अमर अकबर एंटोनी, नागिन, कालीचरण, शोले, रोटी कपड़ा आैर मकान, सीता आैर गीता, राम आैर श्याम, हाथी मेरा साथी, सत्यम शिवम सुंदरम, क्रांति एहन फिल्म देखलहुं। मुदा ई सभ फिल्म इंटरवल धरि। आब बाजैत-बाजैत आलोक बाबूक कंठ सूखि गेल छल। ओ टेबल सं पैन के गिलास उठा कऽ दू घंूट पानि पीबि कऽ फेर सं बाजब शुरू करलखिन। तखन आठवां क्लास में पढ़ैत रहि जखन सिनेमा घर मे जाइकै फिल्म देखल रहि। घर मे दादाजीक बटुआ से साढ़े तीन टका चुराइल रहि। तीन टका मे दू टा टिकट आयल छल आओर एक अठन्नीक सिक्का मे झालमुढ़ी खायल रहि। फिल्म छल जंगबाज, जहि मे हीरो छल गोविंदा आओर राजकुमार। गेल तऽ रहि फिल्म देखहि लेल मुदा घरक लोकक डर सं हॉल मे फिल्म कम हॉलक सीन बेसी देखैत रहि। डर लागैत छल जे किसी चिन्है बला एतय देखि लेत तऽ घर मे खबर भऽ जाइत। फेर बिना पूछि के फिल्म देखहि कऽ सजा भेट जाइत। जकरा संगे फिल्म देखहि लेल आइल छलौंह हुनका पहिने कहि देने रहि जे ककरो सं ई गपक चर्चा करब तऽ हम टिकट के पाई अहां के नहि दे। हम अपन मिशन मे कामयाब रहल रहि। आलोक बाबू के मुख मुद्रा एहन रहि जे लोग हुनकर मुंह से निकलल एक-एकटा बोल कऽ गांठि बना कऽ सुनैत छलाह। ओ सत्तर आओर अस्सी के दशक मे अपना कऽ लऽ गेलखिन। कहै लगलाह। ओहि काल रायपुर बड़ छोट शहर रहैक। एतेक गली मे हमर नेना बीतल। एकेटा सिनेमा हॉल छल, कल्पना टॉकिज। आब तऽ ओ छेबो नहि करल। अहि टॉकिज में पंद्रह अगस्त आओर छब्बीस जनवरी के टिकट ब्लैक मे बिकायत छल। जखन अहां एक बेर कोनो काज कऽ लऽ सकैत छी तखन अहांक मन बढ़ि जाइत अछि। ये हमरा संग सेहो भेल। दोसर बेर हम 'एक फूल दो माली" देखहि लेल सिनेमा हॉल गेलहुं। फिल्म नीक लागल। मुदा एखन धरि रायपुर मे यै टा दू टा फिल्म देखने छी। अगां के खिस्सा तऽ अहां सभ जानैत छी। ई कहि के मुंह पर आयल पसीना के आलोक बाबू जेबी से रूमाल निकालि के पोछलक आओर अपन ठाम पर बैस गेल। सभ लोग गदगद छल। आलोक बाबू कऽ सभ वाहवाही करै लागल। एहि दिन एतिहासिक छल रायपुरक इतिहास मे। जे सभ नहि जानैत छल आलोक बाबू के सेहो जानय लागल। शहर के लड़की सभक बीच आलोक बाबू खूब पोपुलर भऽ गेल। कॉलेज जाई बाली लड़की सोचैत छल जे कोना आलोक बाबू से गप करि। मुदा, आलोक बाबू कऽ अहां जानैत छी। नहि केकरो से बाजब, जे काज अछि, बस काजि कऽ घर आबि गेलहुं। ओ जमाना मोबाइल के नहि छल। लैंडलाइन के छल। आलोक बाबूक घर मे सेहो लैंडलाइनलागल रहैक। मुदा, ओ केकरो अपन घरक नंबर नहि दैत छल। कियै कि केकरो फोन आयत आओर पापा उठा लेत, तऽ बिगैड़ लागत। आजुक दुनिया मे कोनो चीज कतेक दिन धरि अहां नुका सकैत छी। सेह आलोक बाबूक भेल। लोक-बेद के हुनकर घरक लैंडलाइन फोनक जानकारी भऽ गेल। जेकरा जरूरत होयत ओ आलोक बाबू कऽ कखनो फोन कऽ दैत छल। आहि काल लॉ कॉलेज मे पढ़ैत आलोक बाबू एतेक पोपुलर भऽ गेल छल जे लड़की सभ हुनकर कोनो-कोनो दोस्त कऽ अप्पन फोन नंबर दैत छल जे हुनका कहबै जे ओ फोन करताह। मुदा, आलोक बाबू कहियो कोनो लड़की के किया फोन करताह। ओ दिन एक जनवरी छल। भोरि उठि के आलोक बाबू नहाय-नास्ता कऽ पढ़ैत छलाह। तखने फोनक घंटी बाजल। मां फोन उठैलखिन आओर बाजलखिन, 'हैलो" 'जी, आलोक बाबू अछि" दोसर दिस से कोनो लड़की के आवाज छल। 'हां, अछि, अहां के" मां कहलखिन। 'जी, हम आलोक बाबूक दोस्त।" एतबै कहैत आे लड़की के सांस फूलि गेल आओर ओ फोन राखि देलक। आब मां तऽ मां होयत अछि। आन मां जना आलोक बाबूक मां छल। ओ चिंतित भऽ गेलि जे कोन लड़कीक फोन आलोक बाबू लेल आयल। मुदा कोनो आईडी कॉलर ते लागल नहि छल जे कियो जानि सकैतियै जे कोन नंबर से फोन आयल। फेर दूपहरिया मे फोन आयल। तखन हुनकर बहिन फोन उठैलक। फेर ओहिने घटना भेल। आब घरक  सभक मन मे हुयए लागल जे की गप अछि, जे ओ फोन करहि बला लड़की गप नहि करैत अछि। फेर सांझ भेल पर सै गप भेल। अहि बेर आलोक बाबू अपने सं फोन उठैलखिन। मुदा सामने बला नहि तऽ हुनकर आवाज चिह्नलखिन आओर नहि ओ। जारी... २ अकलेश मंडल-  लघुकथा- टीटनेस वर्ग- अन्‍तर स्‍नातक (प्रथम साल) जनता महावि‍द्यालय, झंझारपुर। टीटनेस इजोरि‍या झलफलाइत रहए। कोइली कुचड़ए लगल कि‍ बुधनीक नीन टूटल। इजोरि‍या झलफलाइत देखि‍ बुधनीकेँ भेल जे आइ उठैमे अबेर भऽ गेल। मुदा तैयो धरफड़ाएल उठि‍ कऽ वि‍छान समेटि‍ अलगनीपर राखए लगलि‍ आकि‍ कपड़ा लागि‍ गेलि‍ चारमे खोंसल हॅसुआ बुधनीक माथेपर लटपटाइत गि‍रल हाँसू भोँका गेल। बुधनीक माथासँ फूच्चूका मारि‍ खून बहए लगल। बुधनी बुदबुदाएल- “हे भगवान, कोन हमरासँ गलती भेल जे एतेक बरका दुख बुढ़ारीमे देलौं। मरब की जीयब आब घा जल्‍दी छूटत।‍” खूनसँ साड़ी भि‍जए लगल। मोनमे एले जे आब बि‍देशर (बेटा)केँ उठा दै छि‍ऐ। नै तँ कि‍नसाइत होतसँ होतांग भऽ जेत्ते। बुधनी बि‍देशरकेँ हाक दि‍अऽ लगलि‍- “रौ बौआ, बि‍देशर उठ।‍” दुनू परानी एक्के हाकमे अकचकाइत उठल। घरेसँ बाजलि‍- “कि‍ भेलौ माए?‍” “‍कनी एम्‍हर आ हॅसुआ भोका गेल।” बुधनी कहलक। दुनू परानी करू तेल लैऐ कऽ आएल सोचलक जे चोट बेसी लागल हेतै तँ ससारि‍ देबे। मुदा बि‍देशर देखलक खूनसँ ओसरा पटल। माइयक साड़ी सेहो भीजल। मोनमे ऐलै जे माएकेँ बेसी हालत खराव अछि‍। से नै तँ डाक्‍टरकेँ बजौने अबै छी। बि‍देशर पत्नीकेँ कहलक- “ताबे अहाँ माएकेँ देखभाल करू। हम डाक्‍डर बजौने अबै छी।‍” कहि‍ बि‍देशर डाक्‍टर लग वि‍दा भेल। डाक्‍टर बजौने आएल। बुधनीक घाउ देख डाक्‍टर बजलाह- “बुढ़ीक दि‍मागी जखन बेसी अछि‍। कोना भेल।‍” बि‍देशर तमसाइत बाजल- “बुढ़ि‍याकेँ भोरे उठैक आदत अछि‍। बि‍छान समेटि‍ अलगनीपर राखए लगल आकि‍ हाँसू माथेपर खसल।‍” गमैया डाक्‍टर मलहम-पट्टी कऽ देलक टि‍टनेसक सूइयो नै देलक। मुदा ि‍बदेशरकेँ कहलक- “घा छुटैमे बीस-पच्‍चीस दि‍न लागत। बॉतर-खोंतर कि‍छ नै देबनि‍ खाइले। नै तँ ऊनसँ दून भऽ जाएत।‍” बुधनी डॉक्‍टरक बात सुनि‍ पथ-परहेजक करए लागलि‍। बुधनीक घाउक जखम देखि‍ बि‍देशर कखनो काल तमशाइयो जाइ आ बजै- “‍कोन जरूरी रहै छलौ भोरे उठै कऽ।” मुदा कखनो काल आँखि‍मे नोर चलि‍ अबै कहुना छी तँ माए छी। तहुमे बुधनीक घाउ कखनो ब्‍लड प्रेशर जकाँ ठीस मारे लगए। बि‍देशर माइयक तबाही देख भरि‍-भरि‍ राति‍ जगले रहै छलए। सात-आठ दि‍न भऽ गेल। बुधनीक घाउ दि‍नो-दि‍न बढ़ले चलि‍ गेल। दुखेनाइ नै कम भेल। जहि‍ना मनुक्‍खक संग मनुक्‍खक चालि‍ नै छोड़ैत तहि‍ना बुधनीक संग कखनो दुखैनाइ नै छोड़ैत। बुधनी दसम दि‍नक बाद खेनाइ-पि‍नाइ पुरा ति‍यागि‍ देलक। बि‍देशर कलहन्‍त होइत पहुँचल डॉक्‍टर लग। कहलक डॉक्‍टरकेँ- “‍डाॅक्‍टर सहाएब माएक घाउ बढ़ले जा रहल अछि‍। दुखैनाइ कहि‍यो कमे नै होइत छै। आब खेनाइ-पि‍नाइ सभटा ति‍यागि‍ देलक।” डॉक्‍टर फेर पहुँचलथि‍ बुधनी लग। घाउकेँ बि‍स्‍तार भेल देख डॉक्‍टर बाजलाह- “भोकेलहा हाँसू कनी देखाऊ।‍” बि‍देशर दौड़ल भनसा घरसँ हाँसू आनि‍ कऽ देलक। हाँसू देख डॉक्‍टर बजलाह- “बुढ़ीकेँ टि‍टनेस भऽ गेलनि‍।‍” बि‍देशर बाजल- “डॉक्‍टर सहाएब हँसूआ देख कऽ केना बुझि‍ गेलि‍ऐ। जे टि‍टनेस भऽ गेलै। हँसूआ कोनो मशीन छि‍ऐ।‍” “नै बि‍देशर हँसूआ मशीन नै छि‍ऐ मुदा एहि‍मे बीझ लागल अछि‍ तँए टि‍टनेस पकड़ने अछि‍।‍” 72म सगर राति‍ दीप जरय- सुपौल, कथा गोष्‍ठीमे पठि‍त। ३ कपि‍लेश्वर राउत कथा कि‍सानक पूजी मंगल भोरे धान काटए गेल से दूपहरि‍यामे घरपर अएल। घरपर अवि‍ते रौदेलहा धानक दौनी लेल खोंह छि‍टि‍ तैयारीमे मोस्‍तैज भऽ गेल। जहि‍ना सरकार लेल मार्च महि‍ना हि‍साव-कि‍ताव आ आमद-खर्चक होइत छै तहि‍ना वनि‍या लेल दि‍वाली, पंडि‍त-पुरोहि‍त लेल यज्ञ आ दूर्गापूजा तहि‍ना गृहस्‍तक लेल अगहन। खन धान काटू तँ खन धान तैयार करू, खन गहूमक खेत जोत-कोर करू तँ खन गाए-भैंस-बरदकेँ सानी-कुट्टी लगाऊ। चन तरहक काज रहने मंगल परेसान रहैत छला। साझू पहर मंगल जोगि‍न्‍दरक ओहि‍ठाम अागि‍ तपैले गेल। गप-सप्‍प होमए लगलै। मंगल बाजल- “हौ जोगि‍न्‍दर भाय गप-सप्‍प कि‍ करब, काजे ततेक ऐछ जे परेशान-परेशान रहैत छी। झरो फि‍रेक फुरसत नै रहैत अछि‍। ताहूमे अगहनमे।‍” जोगि‍न्‍दर बाजल- “एतेक परेशान होइक कोन काज छै आब तँ धान खेतक जेाताइसँ लऽ कऽ दौनी तकक लेल थ्रेसर, ट्रेक्‍टर, गहूम बाउग करैले मशीन चन तरहक‍ मशीन सभ भऽ गेलैहेँ। तँए परेशान हेबाक कोनो जरूरत नै छै। एकटा कहबी छै जे पूत परदेश गेल देव पि‍तर सभसँ गेल। से नै ने करऽ दि‍मागसँ काज लएह। आ सभ दि‍स नजरि‍ राखह।” मंगल बाजल- “से तँ ठीके कहै छहक। एकटा परेशानी रहए तब ने। लऽ दऽ कऽ एकटा बेटा ऐछ छोड़ा अवण्‍ड भऽ गेल ऐछ। केतनो कहै छि‍ऐ जे मन लगा कऽ पढ़-ि‍लख जे दू अक्षरक बोध हेतो तँ अपने काज देतो से करि‍ते ने ऐछ। एकटा मोवाइल कि‍न लेलकहेँ आ हरदम गीत-नादक पाछाँ अपसि‍यात रहैत अछि‍। कि‍ कहब गहूमक बि‍आ 80 कि‍लो एकटा कोठीमे रखने रही से की केलक तँ कखैन ने कखैन सभटा बीआ बेच लेलक आ एकटा मोवाइल कीन लेलक। तुहीं कहऽ आब खेती केना करब छौड़ा बदमास भऽ गेल।‍” जोगि‍न्‍दर बाजल- “ई तँ बड़ खराब काज भेलै। जहन पूजि‍ये चोरा कऽ बेच लेत तँ कोनो परि‍वारकेँ गुजर-वसर आकि‍ उनैत केना हेतै। एक कोठी अनाज तँ पूजी नै ने होएत छै, पूजी तँ बीआक लेल जे राखल जाइत छै सएह ने होइत छै। जैसँ अधि‍क उपजा आकि‍ आमदनी होइ सएह ने पूजी भेल। जँ पूजीये कि‍यो खा गेल तँ सभटा बस्‍तु खा गेल।‍” मंगल खैनी झारैत आगू बाजल- “एक तँ रौदीक मारल छी दू बीघामे धान छल, उपरका खेतक धान तँ मारल गेल, नि‍चला खेतक धान कि‍छु भेल। तैपरसँ छोड़ा बि‍ए बेच लेलक। आब बीआ खरि‍दू कि‍ खाध खरि‍दू कि‍ खेत जोताऊ। अही सबहक सोचमे परल छी।‍” जोगि‍न्‍दर बाजल- “खएर परेशान हेबाक जरूरत नै छै। एकटा कहबी छै जे चि‍न्‍तासँ चतुराइ घटे शोकसँ घटे शरीर, पापसँ लक्ष्‍मी घटे कह गये दास कवीर। तँए हमरा लगमे गहूमक बीआ ऐछ परूकेँ साल उन्नत कि‍समक बीआसँ खेती केने छलौं। एक साल तकमे बीआ नै ने खराव होइत छै। तँए जे बीआक जरूरत हेतह से हम दऽ देबह। जँ अपना लग नै टाका हूअए तँ हम कहबऽ जे उन्नत कि‍समक बीआसँ खेती करह। खेतमे जँ हाल नै होइ तँ पटा कऽ खेती करि‍हह। नहि‍ तँ धानोक खेती मारल गेल आ गहूमोक चलि‍ जेतह। एकटा बात कहह जे तरकारी-फरकारीओ सबहक खेती केने छह कि‍ नै?‍” “हँ, हौ भाय तरकारीमे आल्‍लू, मुरै आ फरकारीमे कोबी, भाटा, टमाटरो सबहक खेती केने छी।‍” जोगि‍न्‍दर- “से तँ नीक बात छ, नै तँ एहि‍ बेरूका सन खराब समएमे लोक बौआइऐ कऽ ने मरैत। कि‍सानक तँ यएह सभ ने पूजी होइत छैक। समए-साल, आगाँ-पाछाँ देख कऽ खेती-बारी करक चाही। जाहि‍सँ कखनो मुँह मलीन नै हएत। तँए जे कहबि‍ओ छैक मन हरखि‍त तँ गाबी गीत।‍” ४ राम वि‍लास साहु लघुकथा परि‍श्रमक भीख सोमना बोनि‍हार अपन परि‍श्रमसँ परि‍वारक भरण-पोषण करैत छल। सभ दि‍न अपन मजदूरि‍क बोनि‍सँ खाइत-पीबैत जि‍नगी बि‍तबैत छल। सोमना जेतबे परि‍श्रमी ओतबे इमानदार सेहो छल। सोमनाकेँ जइ दि‍न काज नहि‍ भेटैत छल माने बैसारी रहि‍ जाइत छल ओहि‍ दि‍न बीना भोजने पत्‍नी आ बाल-बच्‍चा पानि‍ पीबि‍ अपन टुटली मरैयामे सुति‍ रहै छल। एक दि‍न एहि‍ना भेल राति‍मे सभ परानी पाि‍न पीबि‍ सुि‍त रहल। भोर भेलापर काज खोजलक मुदा कोनो काज नहि‍ भेटल। सेामना भुखक मारल थाि‍क कऽ दलानपर बैसि‍ छल। पत्‍नी आ बच्‍चाकेँ भूखसँ पेट-पीठ एक भऽ गेल। सोमना सभ परानी आँखि‍सँ नोर बहबैत भगवानसँ याचना करैत कहलक- “हम एत्ते गरीब छी मुदा काजो नहि‍ भेटैत अछि‍ जे परानो बचत। आब हम सभ भूखे परान ति‍यागि‍ देब।‍” सोमना माथपर हाथ रखने बैसल छल। तखने एकटा हट्ठा-कट्ठा भि‍खारी आबि कऽ भीख मँगलक। सोमनाकेँ भीख देबाले कि‍छु बँचल नहि‍ छल। सोमना कहलक- “भीख तँ हम नहि‍ दऽ सकै छी, हम दऽ सकै छी परि‍श्रम।‍” भि‍खारी मने-मन सोचमे डुबि‍ गेल ओ सोचलक जे हम शरीरसँ ठीक छी तँ कि‍एक ने हमहुँ परि‍श्रम करब तँ भीखारीक जीबनसँ छुटकारा पाबि‍ जाएब। भीखारी खुश भऽ बाजल- “आब हमहुँ, भीख नहि‍ मॉंगव अहाँक बचन सुनि‍ हमरो लागल जे आखि‍र परि‍श्रमसँ तँ धन भऽ सकैत अछि‍। बेकार हम भीखक फेरि‍मे परल छी। आब हम परि‍श्रमेसँ अपन पेट भरब।‍” ५ भारत भूषण झा कथा- आत्‍मबल चुनावक सर्गर्मीक चुस्‍की लेलाक वाद ललि‍त चौकसँ घरपर एलाह। घरपर हुनक पत्नी रेणू तामसे आगि‍ भेल बजैत- “‍अहाँकेँ कि‍ होइए जि‍नगी तँ नरके बना देलौं आ वौआकेँ पढ़ाएब-लि‍खाएब। ओकर जि‍नगी अहाँ जकाँ नइ हुअए देबै। दोसराक कनि‍या जे पढ़ल-लि‍खल नहि‍ छै ओकर घरबला डि‍ग्री कि‍नि‍ कऽ नौकरी करबा देलकै आ एतए हम एम.ए. पास घरोमे कोनो मोजर नहि‍ एते करै छी ककराले। वौआकेँ फार्म भरबाएब से एकटा पाइयो नहि‍।” ललि‍त एक टकसँ रेणु दि‍स तकैत चुप भऽ ओकर बात सुनैत मने-मने सोचैत जे ई कोन पैघ बात छै बाबू जीसँ मांगि‍ एकर फार्म भरबा देवइ। अपने जन-मजदूर जकाँ खटै छी खेतसँ खरि‍हान धरि आ‍ पत्नी नौकरानी जकाँ अांगना-घरमे खटैत अछि‍। बाबूजी कि‍एक नहि‍ देथि‍न्‍ह। ललि‍त धुराएले पएरे बाबूजी लग पहुँच बाजल- “बाबूजी हो दू साए टाका दहक तँ बौआकेँ काल्हि‍ फॉर्म भरतै।‍” बाबूजी केँ ब्‍लड प्रेशर हाइ। बजलथि‍- “कतएसँ कमा कऽ मनि‍ऑडर एलहहेँ जे मंगै छह। हमरा बुत्ते एकोटा पाइ नहि‍ हेतइ।‍” सुनते ललि‍त सन्न भऽ गेल। आँखि‍क आगाँ अन्‍हार भऽ गेलै। ललि‍त मने-मन सोचैत- जतेक एतए खटै छी अगर दोसराक खेतमे खटि‍तौं तँ मजदूरियो भेटताए आ हाथमे कि‍छु पाइयो रहि‍ताए। यएह बात सभ सोचैत मुँह खसल अपन घरमे आबि‍ चुपचाप पलंगपर बैस गेल दोसर दि‍स रेणुकेँ तेवर चढ़ले बाजलि‍- “कि‍ भेल कना पढ़त अहाँक बेटा?‍” ललि‍तकेँ चारू दि‍स अन्‍हारे-अन्‍हार लगै। रेणु फेर बाजलि‍- “कि‍अए बौक भेल चुप छी, हमरा लग हौसली अए‍ लऽ जाउ सोनरा दोकानमे बेचि‍ कऽ बौआकेँ फाॅर्म भरा दि‍औ। लेकि‍न एक शर्त हम भुखले रहब मुदा आइ भि‍न होएव।‍” रेणुक बात सुि‍न ललि‍तक हालत और गंभीर भऽ गेलै। जे आइ हमरा लग एकटा पाइ नहि‍ अछि।‍ ३. पद्य ३.१.डॉ. नरेश कुमार ‘वि‍कल’ दूटा गजल ३.२.पंकज झा- ३टा पद्य ३.३.ज्योति सुनीत चौधरी -सैण्टाक अस्तित्व ३.४.राजेश मोहन झा- कवि‍ता- उनटा-पुनटा ३.५.नवीन कुमार आशा -दूटा पद्य ३.६.१. संजय कुमार मंडल- कवि‍ता- मीता हमरा मोन पड़ैए २. राजदेव मंडल-कवि‍ता- नेहाइपर लेखनी ३.७.१शि‍वकुमार झा टि‍ल्‍लू- कवि‍ता- साहि‍त्‍यक वि‍दूषक २ रूपेश कुमार झा 'त्योंथ'- हम छी आजुक नेता ३.८.गंगेश गुंजन- राधा- २७ म खेप डॉ. नरेश कुमार ‘वि‍कल’ दूटा गजल- (1) नयन केर नीन्न पड़ाएल की छीनि‍ लेल कोनो मोन केर बात मोनमे रहि‍ गेल कोनो उन्‍हरि‍या राति‍ ई गुज-गुज एना कत्ते दि‍न धरि‍ रहत कम्‍बल कएक काजर केर तानि‍ देल कोनो काँटक झार राखल छै चौकठि‍ केर दुनू दि‍स तैयो अयाचि‍त डेग नापि‍ देल कोनो छाहरि‍ ने झरक लागय हमरा नीम गाछीमे बसातक संग बि‍रड़ो फेर आनि‍ देल कोनो हमर खटक सि‍रमामे करैए नाग सभ सह-सह काँचक घरमे पाथर राखि‍ देल कोनो बि‍हुँसल ठोर ने खुजतै कोनो कामि‍नी आगाँ प्रीतक सींथमे भुम्‍हूर राखि‍ देल कोनो (2) पसारल छैक परतीमे हमर पथार सन जि‍नगी। कहू हम लऽ कऽ की करबै एहन उधार सन जि‍नगी।। पड़ल छै लुल्ह-नाङर सन कोनो मंदि‍र केर चौकठि‍पर। माँगय भीख जि‍नगी केर हमर लाचार सन जि‍नगी।। साटल छैक फाटल सन कोनो देवालपर परचा। केओ पढ़बा लेल चाहय ने हमर बीमार सन जि‍नगी। बाटक कातमे रोपल जेना छी गाछ असगरूआ। ने फड़ैए-फुलाबैए हमर बेकार-सन जि‍नगी।। कतबा ि‍दनसँ हैंगरमे छी कोनो कोट-सन टाँगल। कुहरैत कोनमे पड़ल ई ति‍रस्‍कार-सन जि‍नगी।। ई ि‍जनगीकेँ कोनो ि‍जनगी जकाँ हम जि‍नगि‍ये बूझी। ने जि‍नगी देल जि‍नगीमे जि‍नगी सन हमर जि‍नगी।। .. पंकज झा, ३टा पद्य पिता-श्री महेंद्र मोहन झा, माता-श्रीमती अम्बी देवी झा : माड़र, जितबारपुर, मधुबनी, बिहार ८४७२११ पंकज जी एच.सी.एल.मे सोफ्टवेयर इंजिनीयर छथि। १ उद्वोधन कहियो पूर्णिमा सन आलोकित, मैथिल, मिथिला आ मैथिली, आइ घोर अन्हरियामे हराओल अइ, किछ दूर टिमटिमाइत तारा सन, किछ मिटैल पगडण्डी, आरि-धुरिमे ओझराएल अइ, सभ्यातक सूर्य, कहिया परिचयकेँ बदलि देलक, किछ आभासो नै भेल, मुदा ! जहन-जहन पाछू तकैत छी, ह्रदयमे किछु उथल-पुथल, बहराइ लेल व्याकुल अइ, मुदा ! भीतरे-भीतर घुटि जाइत अइ, स्वच्छन्दता- स्वतंत्रता नै अइ, अपन अहंग, सैहबी डोरीमे बन्हाएल, जाबी लगौने, बरद जकाँ ऑफिसक दाउनमे लागल छी, अपन सहजता-सरलतासँ डेराइत, जे पाछू नै भऽ जाइ , अपन परिचयसँ भगैत, नव परिचय बनाबैमे लागल छी, मुदा ! ओ स्वर्णिम गौरव गाथा, कोना लिखब, माता-पिता आ पूर्वजक प्रति श्रद्धा बिनु, भाषाक प्रेम सिनेह बिनु, कोन रंगसँ रंगब अपन कैनवासकेँ….. कोन गीतसँ सजैब अपन जीवनकेँ …… मुदा ! हम सुतल नै छी, मरल नै छी, जागल छी, हमर अल्हड़ता, हमर सहजता, हमर नम्रता हमर परिचय अइ, सभ्यातक आलोकसँ आलोकित, आइ आब हम समर्थवान छी, तँ किएक ने अपन समृद्धिसँ, अपन परिचयकेँ सींची, अतीत तँ स्वर्णिम छल, आब आइ आ आबैबला काल्हि, केँ सेहो स्वर्णिम बनाबी, सभ गोटे मिली कऽ, एक दोसरकेँ मैथिलीक रसपान कराबी. २ रीढ़ विहीन पुरुष पुरूषक पुरुषार्थ कतय हेरायल अइ, नइ बुझना जाइत अइ, दहेजक बैशाखी पकड़ी, अमरलत्ती जकाँ, रीढ़ विहीन, परिचय..... सुनैत छलौं, स्त्रीक नोरक समुद्रमे, पुरषार्थक नाव हेलैत छैक, मुदा! जँ नावमे भूर भऽ गेल, तँ ओ पुरुष आ समाज दुनूकेँ डुमा दैत छैक, मुदा! रीढ़ विहीन पुरषार्थक नावे की, जेकर कोनो पतबारे नै अइ, दिशा हीन, ऊर्जा विहीन, दोसरक धनसँ सिंचित भऽ, अपन स्वाभिमान बनाबऽमे लागल अइ, बिना सुगंध, कृत्रिम फूल जकाँ, सोझे सजाबट लेल....... सृजनात्मकतासँ दूर, प्रकृतसँ बिमुख, सिनेमाक रील जकाँ, अपन जीवन बीतबैत अइ, हे बिधाता ! अहीं तँ रचने छी, पुरुष पहाड़-पर्वतकेँ छाती चीरि, स्त्री नदी श्रीजनक सुन्दर संसार रचैत छथि, तँ किएक ने आइ , दहेजक दाबानलमे, पुरूषक रीढ़ बिहीन पुरषार्थकेँ जरा कऽ, ओकर समूल बिनाश कऽ, पुनः मेघक घोर गर्जनमे, शिवक तांडवसँ, पुरूषक पुरषार्थकेँ ठाढ़ करी, आ झर-झर बुन्नी बसातमे, नव कोपलक संग, मधुर गीतक गुंजनमे, स्वाभिमानी रीढ़युक्त समाजक परिचय बनी. ३ सहजता ज्ञान आ विज्ञान, अनुसंधाने सँ बढ़ै  छै। साहित्यक सृजन, मंथनेसँ होइ छै। चाहे रूप गढ़ू, आकि रंग घोरू, प्रेम करू, वा नोर बहाऊ, मोनक उद्वेग, संयमेसँ रुकै छै। पीड़ा ह्रदयक, सहजतेसँ कमै छै। ज्योति सुनीत चौधरी जन्म तिथि -३० दिसम्बर १९७८; जन्म स्थान -बेल्हवार, मधुबनी ; शिक्षा- स्वामी विवेकानन्द मि‌डिल स्कूल़ टिस्को साकची गर्ल्स हाई स्कूल़, मिसेज के एम पी एम इन्टर कालेज़, इन्दिरा गान्धी ओपन यूनिवर्सिटी, आइ सी डबल्यू ए आइ (कॉस्ट एकाउण्टेन्सी); निवास स्थान- लन्दन, यू.के.; पिता- श्री शुभंकर झा, ज़मशेदपुर; माता- श्रीमती सुधा झा, शिवीपट्टी। ज्योतिकेँwww.poetry.comसँ संपादकक चॉयस अवार्ड (अंग्रेजी पद्यक हेतु) भेटल छन्हि। हुनकर अंग्रेजी पद्य किछु दिन धरि www.poetrysoup.com केर मुख्य पृष्ठ पर सेहो रहल अछि। ज्योति मिथिला चित्रकलामे सेहो पारंगत छथि आ हिनकर मिथिला चित्रकलाक प्रदर्शनी ईलिंग आर्ट ग्रुप केर अंतर्गत ईलिंग ब्रॊडवे, लंडनमे प्रदर्शित कएल गेल अछि। कविता संग्रह ’अर्चिस्’ प्रकाशित। सैण्टाक अस्तित्व सैण्टाक अस्तित्व आ मिथ्या खिस्सा सभकेँ सत मानि कऽ पैघ भेल बच्चा जखन सत्तक तथ्य सामने आयल नव-जन्मल युवाक मोन भेल घायल बादमे हतास करैत छल सब लोककेँ मोन भेल जे खतम करू अहि लोभकेँ ने कुनो बौआ सैण्टाक आस लगेता ने पैघ भऽ अहि नाटकीयतापर पछतेता फेर भेल जे कोना चन्दाकेँ मामा कही देखि-देखि बच्चामे खाना खाइत रही फेर बादमे पढ़लहुँ जे ई मात्र उपग्रह थिक गोल परिक्रमा करैत रहैत अछि पृथ्विक जहिया बौआ अपने ठेकनगर हेता खेलौना बॉंटि-बॉंटि स्वयं सैण्टा भय जेता अपना सब जकॉं नहिं जे पहिने बच्चामे सुनलहुँ सब खिस्सा भगवानक नामे जेना-जेना बढ़लहुँ बुद्धिमत्ता दिस केलहुँ ईश्वर पर शक़ भेलहुँ नास्तिक। राजेश मोहन झा- कवि‍ता- उनटा-पुनटा कोइली काली बगुला गोर हे भगवान ई केहेन अन्‍होर ताड़ खजूरक मान बढ़ल छै पीपर आमक प्राण उड़ल छै। कलयुग एकरे कहल जाइत छै उनटा-पुनटा सभ सटल जाइत छै सोन बनल छै टलहा चानी प्रजा भुक्‍खल नेता खाथि‍ वि‍रयानी। छूटल सॉस टूटल आश छै सभ ठाढ़ि‍पर उल्‍लूक वास छै फगुआ बनल जेठक दुपहरि‍या अनाहूत उपेक्षि‍त मधुमास छै। कंठी माला माथे चानन अपने आइना अपने आनन हाथमे पोथी देखि‍ रहल छी दुहू जेबी भरल ताश छै। धर्म-अधर्मक अंतर गाएब जतेक लगाएब ओतेक पाएब बि‍नु ढौआक फाइल छै रूकल प्रजातंत्रमे कतेक विश्‍वास छै। नवीन कुमार आशा (१९८७- ) दूटा पद्य पिता श्री गंगानाथ झा, माता श्रीमति विनीता झा। गाम- धानेरामपुर, पोस्ट- लोहना रोड, जिला- दरभंगा। १ अंतरकलह आ विचार जुनि पुछू हमर हाल हम छी भय गेल बेहाल देखि ई समाजक कुरीति मन भय जाय आगि बनैत ई कीड़ाक खाधि बना कय आचार। बनल अछि ई चर्चा छपल अछि जगमे पर्चा भगलए यौ फेर एकटा बेटी फेर ककरो संग यौ एहिमे नहि लियल मजा ई तँ अछि एकटा सजा जँ भागल दोसरक बेटी ओकरो बुझियौ अपन सुता। बदलू ऐ कुरीतिकेँ बेटा होथि वा बेटी दियौन्ह हुनका ज्ञान जुनि बनु अज्ञान आइ जँ लेब मजा फेर बनत ओ सजा। ई अछि जगक रीति निक काजमे नहि देत संग अधला लेल आओत आगु जखन करब अहाँ किछु अधला बनि जायत ओ पिछला फेर नहि देत संग भय जायत अपनेमे मग्न बना लेत ओकरा चर्या कय देत अहाँक पुर्जा-पुर्जा। कोना बदलत ई समाज जकर होइ अछि नाश निक गप्प नहि करए क्यो अधला लेल सदैव तैयार। की भेल जाइत छै एहि समाजकेँ अपन सभ्यता सब क्यो बिसरए पश्चिमी होए हावी की होएत भावी समाजकेँ चिन्तित मन सोचै अछि। आजुक धिया-पुता नहि बुझए ओकरा आरो किछु नहि सुझए नहि सोचए घरक मान ओकरा बस अछि अपन ध्यान सजा कए माइ-बापक अर्थी बनि जाए ओ स्वार्थी नहि सोचए हुनका बारेमे जे हुनकर करथि पालन। देखि समाजक ई कुरीति मोन भय जाइ अछि पागल जा धरि नहि मिलत समाज नहि अछि तावए इलाज। कोना बदलत ई परिभाषा कोना बदलत ई समाज जकर करै नव पीढ़ी नाश लाबए पड़तै हुनका सड़कपर कहए पड़तै हुनका बेधड़क जुनि करू पूर्वजक अपमान हुनकर तँ राखू मान। २ बैसल-बैसल सोची मनमे बैसल-बैसल सोची मनमे मुदा नहि लत्ता तनपर आगि बड़ैत एहि गर्मीमे बैसल हम उघार आंगनमे सूर्यक तपिस न झेलल जाय न अधलाह किछु देखल जाय जा धरि नहि उठायब डंडा नहि भेटत मनकेँ ठंढ़ा आब ओ गेलै जमाना जाहिमे होइ तराना सभ दिस अछि दू मुँहा रस्ता ई जीवन नहि अछि सस्ता सभ दिस अछि एकटा मोल जँ अछि पाइ तँ अहाँ अनमोल बदलल जाए प्रेमक परिभाषा अछि जँ क्षमता तँ करू आशा भ्रष्टाचार अछि पयर पसारैत शिष्टाचार गेलै कहाँदन आब नहि अछि बेटा बापक हाथमे किछु दिन बाद होएत ई बेटाक आगाँ बाप झुकायत माथ बेटा बैसत कुर्सीपर बाप डोलायत पंखा देखी जे ई फड़ैत विष सोची मनमे हरदम कोना होएत ऐ समाजक विकास कतहु ने एकटा आस सभ दिस होइक निन्दा एहिसँ होअय शर्मिन्दा बैसल बैसल सोची मनमे। १. संजय कुमार मंडल- कवि‍ता- मीता हमरा मोन पड़ैए २. राजदेव मंडल-कवि‍ता- नेहाइपर लेखनी १ संजय कुमार मंडल कवि‍ता मीता हमरा मोन पड़ैए मीता हमरा मोन पड़ैए जखन नेना रही माएक कोरामे नुकाइत रही पापा बाबाकेँ घोड़ा बना घोरसवारी करैत रही। रूसैत रही, फुलैत रही टॉफी वि‍स्‍कुट नहि‍ भेटलापर भूइयाँमे ओंघराइत रही। जखन पहि‍ल बेर स्‍कूल गेलौं खूब उछल-कूद धूम मचेलौं टि‍फि‍नक वेलामे ति‍तली केर पांछाँ दौड़ पड़लहुँ जन्‍म दि‍वसक हर अवसरपर ढेर सारा उपहार हम पएलहुँ। ओहो दि‍न मोन पड़ैए जखन मैट्रीक परीक्षामे फेल केलापर भागि‍ पड़ा हम ि‍दल्‍ली गेलहुँ फैक्‍ट्रीमे मजदूर सबहक संग ओवरटाइम कऽ खूब कमेलहुँ। गाम एलापर वि‍आह कएलहुँ साले भरि‍मे बाप बनि‍ गेलहुँ आब कनि‍याँ नोन तेल लैले सदि‍खन हमरा गाड़ि‍ पढ़ैए मीता हमरा मोन मड़ैए। बपटुअर रहबे करी, माए सेहो मि‍र गेलि‍ जाहि‍ बेटा लेल खूब कमेलहुँ जमीन खरीद मकान बना देल सोचने रही बुढ़पा केर सहारा बनत सेवा सुश्रुषा करत ओहो बाप-माएकेँ छोड़ि‍ दि‍ल्‍ली चलि‍ गेल। प्‍लास्‍टि‍क फैक्‍ट्रीमे खटैत-खटैत हमरा टी.बी. बेमारी भए गेल हम मजबूर भऽ नोकरी छोड़ि‍ देल पथो-पानि‍ले हमरा करजा करए पड़ैए छौड़ा दि‍ल्‍लीमे दारू मुर्गा कचरैए मीता हमरा मोन पड़ैए। तीन माससँ वि‍छौन धेने छी एक घोंट पानियोले दोसराक मुँह तकै छी रोटी-भात के पुछैए, आब दवाइयो नहि‍ए घोटाइए मीता हमरा मोन पड़ैए। तकलीफ खूब होइए-प्राणो नहि‍ नि‍कलैए दुर्भाषा कोना कहि‍ये- सोचैत छी आखि‍र तँ बेटे छी। ओहो दि‍न यादि‍ अबैए हम पत्‍नीक इंतजारमे छी ओ हमर माएक पएर जतैए हमर बेटा-पुतोहू, सांझे बि‍लैया ठोकि‍ समदाउन गबैए मीता हमरा मोन पड़ैए। जीवन भरि‍ बाहरे बि‍तेलौं सर-समाजसँ दूर रहलौं आइ वएह समाज उठा-बैसा दैए हमर दुर्दसापर दुखी होइए। एक दि‍न प्राण छुटि‍ गेल सौंसे टोल जमा भऽ गेल अर्थीपर हमरा सुता देल गेल समाजक चारि‍ गोट कान्‍हा देल बरि‍याती सभ राम-नाम सत् बजैए बेटा कोहामे आगि‍ लए आगू चलैए भने बुढ़बा मरि‍ गेल सोचि‍ रहल अछि‍ झुठे-फुसे घड़याली नोर बहबैए नि‍पुत्रो समाजे बीच रहैए हँसी-खुशी सभ बांटि‍ जीबैए दु:ख-सुखमे एक दोसराकेँ काज अबैए बेकार मनुक्‍ख अपना-अपनीले बाप-बाप करैए मीता हमरा मोन पड़ैए। आब ई एहसास करै छी जीवन कर्तव्‍य केर पथ छी जि‍म्‍मेवारीक रथ छी नि‍रन्‍तरताक सड़क छी। जौं फेर मनुक्‍ख जीवन पाएव समाजक उपकार जरूर चुकाएब सोझहेमे हमर चि‍ता जरैए मीता हमरा मोन पड़ैए मीता हमरा मोन पड़ैए।। २ राजदेव मंडल कवि‍ता नेहाइपर लेखनी कान्हपर अॅगोछा लए ठमकल छी कजरी लागल एहि‍ चबूतरा घाटपर सम्‍मुख अछि‍ पीड़ा जल प्रसार। सहरि‍-सहरि‍ जोंक जाहि‍मे कऽ रहल अछि‍ अन्‍मुक्‍त जल बि‍हार। एहि‍ पीड़ा जलसँ नहि‍ जानि‍ कहि‍या भेटत मुक्‍ति‍ कहि‍या धुआएत गातक तहि‍याएल मलीनता जाधरि‍ ई रहत जमल गन्‍हाइत पीड़ा-जल खण्‍डि‍त नहि‍ भऽ सकत जोंकक जल बि‍हार छी डेराएल अंग-अंगपर जोंक दंश अनुभव कए परन्‍च ई तँ अछि‍ भीरूपन आत्‍मघाती जड़ता। तोड़ए पड़त आब भूतहा कूल ओ मोहारकेँ कोड़ए पड़त आब जल नि‍कास बहाबऽ पड़त एहि‍ गन्‍हाइत जलकेँ भरए लेल पोखरि‍केँ नव वर्षाक जीवनसँ जोंक वि‍हीन अमृतसँ तखैने भऽ सकत-पुण्‍य-स्‍नान ताहि‍ कारणे आइ हम लेखनीकेँ राखि‍ देलहुँ ि‍नर्मम नेहाइपर बनाबऽ लेल असि‍, तीक्ष्‍ण कोदारि‍ काटऽ लेल भूतहा मोहारकेँ करऽ लेल स्‍वर्गिक स्‍नान। १शि‍वकुमार झा टि‍ल्‍लू- कवि‍ता- साहि‍त्‍यक वि‍दूषक २ रूपेश कुमार झा 'त्योंथ'- हम छी आजुक नेता १ शि‍वकुमार झा टि‍ल्‍लू कवि‍ता साहि‍त्‍यक वि‍दूषक कि‍ए हमरा कहै छी वि‍दूषक। की हम केलहुँ अहाँसँ खटपट।। शैशव अप्‍पन गाममे बि‍तएलहुँ सभ ठाम देसि‍ल गीत सुनएलहुँ मूड़न हो वा महुअक। मात्र वि‍देहसँ रखलहुँ आशा सभ दि‍न पढ़लहुँ मैथि‍ली भाषा व्‍यारव्‍याता बनि‍ भेलहुँ चकमक। श्रृंगार पहरमे कवि‍ता लि‍खै छी, छी गृहस्‍थ मुदा बैराग सि‍खै छी हमर जीवन दरससँ ओ भेलि‍ भक्। कहि‍या धरि‍ बॉटव जागरणक परचा कतहुँ नहि‍ देखलहुँ अप्‍पन चरचा दक्षि‍ण नयन भेल फकफक। दि‍नचार्य लि‍खि‍ कवि‍ बनि‍ गेला आन्‍हर गुरू संग बताह चेला उल्‍लू लग कोकि‍ल ठकमक। कतेक दि‍न भरत वि‍लाप सुनाएव फोका डबडब परि‍चय प्रसूनक। आउ-आउ दीर्घ सूत्री भेद मेटा दि‍अ हमहूँ मैथि‍ल गऽर लगा लि‍अ बनाउ मि‍थि‍लाकेँ सम्‍यक। २ रूपेश कुमार झा 'त्योंथ'- हम छी आजुक नेता रूपेश कुमार झा, पिता : श्री नवकांत झा पितामह : स्व हरेकृष्ण झा, साहित्यिक नाम : रूपेश कुमार झा 'त्योंथ' (मैथिली कविता) ओ नवकृष्ण ऐहिक (आलेख/व्यंग्य) साहित्यिक प्रकाशन : मैथिलीक विभिन्न पत्र-पत्रिका मे दर्जनो कविता ओ मैथिली दैनिक मिथिला समाद मे 'खुरचन भाइक कछ्मच्छी' स्तम्भ केर अंतर्गत, तीन सय सं बेसी व्यंग्य लेखन-प्रकाशन शिक्षा : स्नातक (कंप्यूटर अप्लिकेशन) कार्य : पूर्व मे विभिन्न दैनिक पत्र मे कार्य-अनुभव, मैथिली साप्ताहिक झलक मिथिला केर संपादन,वर्त्तमान मे कोलकाताक एक प्रतिष्ठित उच्च शैक्षणिक प्रकाशनक शोध ओ संपादन विभाग मे कार्यरत स्थायी पता: ग्राम+पत्रालय : त्योंथागढ़ , भाया : खिरहर, जिला: मधुबनी (मिथिला) हम छी आजुक नेता हम छी आजुक नेता, नहि नीक हमर नेत फूसिक खाद प्रपंचक पानि सं, हरियाइछ हमर खेत बेचि रहल छी निज आदर्श, लग जोर केs लेत निःशब्द भेल लोक ताकि रहल, छी चला रहल हम बेंत शोणित पियासल शेर हम, लs फिरै छी मुंह मे घास नव-नव खुराफातिक तिकड़म, अछि हमरा लग बहुते रास निज स्वार्थक लेल सदा अनेरे, खसा सकै छी लाश चाही हमरा सत्ता मात्र, खाहे दशक भs जाय नाश करिखा सन कारी मोन हमर, पहिरै छी अंगा उजरा भांति-भांति केर सुविधा संग, चाही व्यंजन, दारू ओ मुजरा छी ठानि लेने नहि मानब हम, मारब जन-जन कें हुकरा मुदा बोल बजै छी मिठगर, जेना जिलेबिक टुकड़ा चालि चलय मे माहिर हम, जं खेल हो पोलिटिक्स कनखी-मटकी संग देखा कs करतब, जीत करै छी फिक्स भजै छी बल्ला आंखि मुनि, होइए नो बाल पर सिक्स मजा अबइए जखन विरोधियो, हमरा संग होइए मिक्स दूध-माछ दुनू खयबा मे, नहि अछि हमरा हर्ज़ भाषण टा देब हम जनै छी, से थिक हमर मर्ज तूर-तेल धs कान मे, सुतब अछि हमर फ़र्ज़ गरियाबय क्यो वा गाबय फकरा, लगा कs कोनो तर्ज़ देखि अहांक भरल पेटी, अफरैछ हमर पेट कहू कतय कखन ककर, कत्बक अछि घेंट चाभी हमरा हाथ मे, बन्न पडल विकासक गेट जखन चाही हमरा कीनी, लगा उचित रेट दान करू मत केर अहाँ सभ, थिक लोकक ई अधिकार सत्ता लेल सौदा करब हमर, भs गेल अछि व्यापार घपला केर मुंगरी सं एहिना, फोदैत रहब देशक कप्पार आंखि चीर कs देखू फेरो, हमहीं पहिरब पुष्प-हार हमर शैतानी चालि सं, डूबि जाओ लोकतंत्रक नैया हाहाकार आ क्रंदन सुनि, नाचब हम ता-ता-थैया भ्रम भेल होयत अहाँ कें किन्तु, हम नहि छी खेवैया कहब ने हमरा जखन अहाँ, करब दैब रौ-दैया नहि कोनो हमरा फिकिर, हिलि जाओ देशक चौहद्दी आगि लगौ खसौ बज्जर, मुदा हिलय ने हमर गद्दी आब तs बुझि गेल होयब अहाँ, छी हम कतेक अहद्दी हमर किरदानिक पोथा नहि, छल तs मात्र रद्दी गंगेश गुंजन राधा- २७ म खेप "फसिलक गाछ विकसवाक अहो दिवस मर्मांतक प्रतीक्षा...ओम्हर जन्म सँ पहिनहि कोखि कें रिक्त करैत काल-गति, ई एहन हमरे टा किएक कर्माहत हमरे टा किएक वर्तमान ! आकि भोगि रहलए एहने आ यैह व्यथा आनो आन ?' सोचैत राधा छोड़लनि नमहर श्वाँस..। जानि ने कखन-कोना लागि गेल रहनि राधा कें आँखि। नहि जानि कखन बैसले बैसलि ओंघड़ा गेलीह ओ पटिया पर।" दऽकऽ ....(एत' धरि अपने पढ़ि चुकल छी) .आब आगाँ ---

मुदा ई भेलनि बोध जेना देह भ' गेल डेंगी नाव! पटिया बनि क' यमुना मे हुनका कराब' लगलनि-झिलहरि बड़ी काल...एकसरि झिलहरि खेलाय मे रहली मस्त- बड़ी काल ! तखन होअ' लगलनि अगिले क्षण मोन विरक्त । आखिर यत्न क' नाव के घाट लगौलनि , भेलीह-संतुष्ट जे पहिल बेर नहि लेब' पड़ल श्रीकृष्णक सहयोग, आ खेपि सकलहुँ नाव, उतरि गेलौं पार ! अपन सुख लेल किएक करी केकरो नेहोरा ? भने कृष्णे किएक नहि होथि। एकहि मोन मे तुरन्त उपस्थित भ गेलनि-ग्लानि, छिया, कृष्ण पर निर्भरता तँ हमर नियति आ प्रारब्ध। कोना आयल मोन मे एहन बात ? धिक्कार मोन -धिक्कार... मुदा ई की ? घाट पर साक्षात् कृष्ण महराज ठाढ़ ! वैह खौंझबै वला बिहुँसैत, बढ़ा चुकल नाव सँ गमग उतरि रहलि राधा दिस अपन दहिना हाथ। सस्नेह, सार्द्र दैत अपन हाथ राधा भेलीह बिकल । मिला नहि सकलीह हुनका सँ आँखि । -' भरिसक मन मे हमरा बिनु यमुना मे नाव चला लेबाक छौक मन पर भार । अपन सुखक अपनहि कर्म-निर्भरताक सेहो छौक आत्म दीप्त विश्वास...राधा, तों केहन लागि रहल छें एहि अलौकिक क्षण , तोरो ने बूझल छौक। हमरो तँ थिक जीवनक ई प्रथमहि दुर्लभ दृश्य ! हम केना योगा क' राखी ई आनन्द राधा, कोन बिधि, तोंही देखा दे उपाय।' -' जाउ-जाउ, एत्तहु खौंझबैये लए हमरा आएल छी अहाँ । हम कएलए स्त्रीगन भ' क' अगरजितपना आ छी ताही मोने बेचैन, अहाँ के सुझैए विनोद एखन ।' राधा किन्चित स्नेह-क्रोधित भ' कहलखिन तँ कृष्ण भेलाह गंभीर। -' नहि राधा, हम तँ छी परम हर्षित-संतुष्ट। यैह त हमर कामना छल, तों बनि जायं-स्वयं आत्म निर्भर । नहि रह' पड़ौ तोरा हमरा पर निर्भर । तों कएलेंहें हमरे काज। हम तँ तें छी प्रसन्न।' -'किएक नहि, आब आओर रहब निश्चिन्त, मरओ राधा कि जीबओ, नहि राख' पड़त फिकिर ।' नाव सँ उतरि क' दरबनिया द' क' पड़यबाक छलनि विचार, मुदा ई तँ सर्वथा नवे परिस्थिति कएने छथि कृष्णजी ठाढ़ ! जानि ने एतबा काल एहि बीच की हएत आँगनक हाल। जे हो ... आब एहि क्षण तँ माधव-मायाजाल मे छी बाझलि हमहूँ । आगाँ देखी कोन नाटकक केहन दृश्य प्रस्तुत करय वला छथि-नटवर नागर...सकल गुण आगर ! बूलि क' राधा आँगन अयलीह तं आश्चर्ये ठकमूड़ी लागि गेलनि। बीच आँगन मे कृष्ण ठाढ़, सद्यः। हुनकर स.बोधनक कोनो टा ने जबाब दैत चलि गेलीह भीतर अपना कोठली दिस। धीरे-धीरे कृष्ण सेहो लागि क' पाछाँ राधाक पीठे पर पहुँचलखिन। एतनी काल मे पहुँचि जएथिन कृष्ण तकर नहि छलनि कनियों अनुमान। सरियाइयो कहाँ सकलीह आँचर पर्यन्त ...दुष्ट केहन जे पैसि गेलाक बाद कोठली मे खखसलनि कर्तव्य, कएलनि-राधा के साकांक्ष । अप्रत्याशित एहि कृष्ण-कृत्य पर भ' गेलीह क्रोधित । जेना तेना सरियबैत आँचर, तथापि घुरलीह पाछाँ दिस फेरलनि मुँह..कुटिल शृंगारोदीप्त भुवन मोहिनी बिहुँसी पसारने ठाढ़-श्रीकृष्ण । लग आबि क' खौंझाएल पोसुआ बिलाड़ि जकाँ राधा ! छड़पैत सन क्रमे ल'ग पहुँचि कृष्णक पीताम्बरी झीकैत’ 'हरण कर' लगलखिन.. . –‘'ई की, ई की करैत छें राधा । हमरा किएक करैत छें एना उघार ? देखत लोक हमर की रहत इज्जतिक हाल ! आखिर पुरुखोक होइत छैक इज्जति, मर्यादा लज्जा, पुरुखोक चीर हरण होइत छैक यदि नहि रहै पुरुषत्व...।' किन्तु हँसी-ठठा सँ राधा कनियों ने ठंढयलीह। कृष्णो बूझि ने सकलाह, राधा बजलीह किछु बा कनलीह..। स्नेहांक मे बन्हबाक हुनक मृदु प्रयास कें ताग जकाँ खुट द’ तोड़लनि। खौंझायलि ओ एतबा जे कृष्णक केश के पकड़ि घीच' लगलीह। ओ रहथि नहि प्रस्तुत, राधाक हेतनि एहेन स्नेहाघात। केश तिराइत मन छटपटबैत कननमुँह भ' गेलाह। मुदा राधा तँ जेना छलीह बताहि भेलि अपन तामस सँ। बूझल कृष्ण धैर्य सँ । सक्कत-बाँहि स्नेह सँ बन्हैत बुझब' लगलाह- -‘'भेलौ कि तोरा, की बात, की भेलौए बाज त किछुओ, हमरे सप्पत तोरा, भेलौए की से तँ कहै बताहि !... हमरो मन धधकैये कतेक दिन, मास-बरख सँ, कहाँ भेटैए शीतल स्नेहक छाहरि हमरो । तइ पर सँ तोरो यदि होउ एहिना हाल तँ हमर जीवन कोना चलत, कहिया धरि, कतबा दूर से तोंही क'ह कने ।...आखिर की भेलनिहें हमर बुधियारि राधिका जी कें , बुझियै त। से दोख जे भेलय हमरे बुते ? कोना-की। हिचुकैत राधिका कें करेज सँ साटि बड़ी काल कृष्ण अपनहुँ हिचकैत रहलाह निरन्तर ओतबा काल । दुहुक हिचुकब क्रमशः एकमेक बनल चलि गेलनि । राधा कें ई की भेलनि आ कृष्णहु कें ? दुनूक भाव आवेग एकात्म भ' चुपचाप बहिते गेल...जानि नहि एहि करुण चुप्पी मे जीवनक कतेक युग बीति गेल ! स्थिति मे एक ध्यान प्राण सेहो एक। -' निन्न भ' गेलौ राधा, सूति गेलें तों की ? ' कृ्ष्णक एहि पुछैत स्वर पर चिहुँकि उठलीह राधा । उठितहि भान भेलनि जेना होथि ओ श्रीकृष्णक आलिंगन मे माँझ आँगन मे ठाढ़ि । चारू कात सँ देखैत लोक, सर-संबन्धिक- सखि बहिनपा...। आकि लाज सँ व्याकुल एकहि बेर मे श्रीकृष्णक बाँहि सँ झकझोरि छोड़बैत स्वयं कें चिकरि उठलीह, पड़यलीह- लत्त॓-फत्त॓, निछोह... निन्न एतहि टुटि गेलनि । साँस फुलैत भेलीह बेसम्हार। जेना लोहारक भाँथी हो, ओहिना ताप जरैत उसाँसक भाँथी हो ई देह। आब भग्न स्वप्नक कर' बैसलीह भाग्यदशा विश्लेषण। पछताइत-पछताइत मन भेलनि अस्तम्व्यस्त । केहन दुर्लभ सुन्दर स्वप्नक क' देलियैक अपने दुर्दशा। कि अछि एतबो नहि लिखल , केहन भाग्य से कहि नहि, स्वप्नो जेना सुड़ाह होइत अछि, सोचथि राधा । मुदा ने जानि जखनि अबैत अछि किएक आधा , सौंस स्वप्न केहन दुर्लभ यदि हो मनोरथक । ओना तँ विकट भयावह स्वप्नक अंत नहि, व्यर्थक भरि- भरि राति बौआइत बन-झाँखुर मे बाधे बोने भरि संसार विकल भयभीत एकसर अनन्त मे लोक जेना पाछाँ सँ खेहारले जाइत कोनो राक्षसी सन असकर अब्बल नारीक पाछाँ लेने बर्छी-भाला कोनो डेग पर गाँथि सकैत अछि पीठहि दिस सँ त्रस्त जिजीविषा ग्रस्त प्राण छटपट दौड़ैत अनवरत जानि ने चल जाइत अछि कतोक योजन कतबा आगाँ आ कि ओही अपस्यांत दशा मे जत' धरैत अछि सुस्तयबा लेल एकटा डेग किंचित निश्चिन्त जे राक्षसी पाछाँ बहुत पाछहि छुटि गेलए, हम पहुचल छी आबि सुरक्षित अपन गामेक इलाका तें एक पल ल' ली दम । साँस करी स्थिर आश्वस्त, आकि जेना अवतार जेकाँ आगाँ मे आबि क' ठाढ़ कोनो भ' जाय विचित्र बिकराल भयावह हिंसक पशु मात्र एकटा ओकरा काया मे समाएल हो जेना कतोक बाघ-सिंह-हाथी-ऊँट आदि, सभ एकहि ठाम एक संग मुँह बाबि क' ठाढ़ जेना हो बड़का महलक सिंहद्वार केर फाटक जाहि मे एक संग पैसैत अछि सहस्रो सैनिक, अपन घोड़ा-हाथी रथ समेत से खुंखार जानवर सब केहन हँसैत लगैत अछि, जेना कि ओ गीड़य नहि, अहंक अएला पर अति प्रसन्न स्वागत करैत अछि केहन लगैत अछि एहन विशाल जानवर ई कोन थिक, ई जीव, जानि ने पहिले पहिल देखै छी- आगाँ एकटा डेग बढ़ौलक तँ सोझाँक धरती डोलैत बुझाएल, दोसर डेग पर देह-प्राण सौंसे संज्ञा जेना हेरायल, कोनो नहि बाँचल विकल्प कतहु पड़यबाक, सब दिशा मे हो जेना ओकरे पसरल पंजा,हाथ-पैर ओना तँ विकट भयावह स्वप्नक अंत नहि, व्यर्थक भरि- भरि राति बौआइत बन-झाँखुर मे बाधे बोने भरि संसार विकल भयभीत एकसर अनन्त मे लोक जेना पाछाँ सँ खेहारले जाइत कोनो राक्षसी सँ असकर अब्बल नारीक पाछाँ लेने बर्छी-भाला कोनो डेग पर गाँथि सकैत अछि पीठहि दिस सँ त्रस्त जिजीविषा ग्रस्त प्राण छटपट दौड़ैत अनवरत जानि ने चल जाइत अछि कतोक योजन कतबा आगाँ आ कि ओही अपस्यांत दशा मे जत' धरैत अछि सुस्तयबा लेल एकटा डेग किंचित निश्चिन्त जे राक्षसी पाछाँ बहुत पाछहि छुटि गेलए, हम पहुचल छी आबि सुरक्षित अपन गामेक इलाका तें एक पल ल' ली दम साँस करी स्थिर आश्वस्त, आकि जेना अवतार जेकाँ आगाँ मे आबि क' ठाढ़ कोनो भ' जाय विचित्र बिकराल भयावह हिंसक पशु मात्र एकटा ओकरा काया मे समाएल हो जेना कतोक बाघ-सिंह-हाथी-ऊँट आदि, सभ एकहि ठाम एक संग मुँह बाबि क' ठाढ़ जेना हो बड़का महलक सिंहद्वार केर फाटक जाहि मे एक संग पैसैत अछि सहस्रो सैनिक, अपन घोड़ा-हाथी रथ समेत से खुंखार जानवर सब केहन हँसैत लगैत अछि, जेना कि ओ गीड़य नहि, अहंक अएला पर अति प्रसन्न स्वागत करैत अछि केहन लगैत अछि एहन विशाल जानवर ई कोन थिक, ई जीव, जानि ने पहिले पहिल देखै छी- आगाँ एकटा डेग बढ़ौलक तँ सोझाँक धरती डोलैत बुझाएल, दोसर डेग पर देह-प्राण सौंसे सज्ञा जेना हेरायल, कोनो नहि बाँचल विकल्प कतहु पड़यबाक, सब दिशा मे हो जेना ओकरे पसरल पंजा, हाथ-पैर प्राण जेना चीत्कार क' उठय भय सँ आर्त्त अपन रक्षार्थ जोर ठहक्का पड़ल जेना ब्रह्माण्डे बिजलौका सं एक संग कड़कल चमकल आ सृष्टि भरिक मेघक समूह एकबेर गरजल, डरे भेल पसेना सं तरबतर थरथराइत सर्वांग बुझा रहलए जे जाइत होइ जेना ओहि जन्तुक बड़का फाटक सन खुजल कल्ला बाटे ओकर पोखरि सन पेटक सत्ते तखने उठल कंठ मोकल घिरघिरी भरल, आर्त्त पुकार मुदा के सुनय, सुनय के ? सुननहारक अपने भय-व्याकुल असकर ई वर्त्तमान स्वयं अपने ई प्रिय एकान्त, केहन असुरक्षित आ अशांत ! कोन जीव थिक आखिर एहन बिकराल आओर खुंखार सपनहुँ देखल तँ होयतै अवश्य अस्तित्व एकर पुछबनि हुनके, जँ भेटता तँ, कोन थीक ई जीव ? आइधरि देखल आ ने सुनल छल, माधव ! कोनो गतिमान पहाड़ कि सत्ये कोनो जीवे छल हुनका तँ हेबे टा करतनि एकरो बूझल परिचय। की नहि अछि हुनका एहि सृष्टिक जे किछु कोनो विषय अछि जानि ने कत्तेक ज्ञान कोना एतबहि बयसें पौने छथि सबटा ओ बूझैत छथि हुनका सबकिछुए सुझै छनि घ'न अन्हरिया मे पर्यन्त सबकिछु देखाइत छनि... कोना हमर खसि पड़ल कनपासा यमुना कातक घासक बन मे ओहन अन्हरिया राति मे से ओ ताकल एक्कहि क्षण मे कोन आँखि छनि केहन ताहि मे ज्योति विराजित दिव्य जत' जत' पड़ि जाइछ स्वतः भ' जाइछ ओत' इजोत ! हुनका सोझाँ तें अतिशय सम्हार' पड़इछ आँचर से सब सखि केर अनुभव वस्तुक भीतर वस्तु देखि लेबक अद्भुत कौशल छनि बिनु देखनहुँ श्रीमान जानि ने की की देखि ल' जाइत छथि सोचि स्मरण करैत लजयली एकान्तहु मे राधा... एखन कत' छथि कृष्ण ? समय स्वयं सिरमा मे रखने जलक खाली बासन, अछि पियास सँ बिकल मुदा सबटा इनार आ पोखरि कोना जानि ने बिसरि गेल अछि तकर प्रयोग आ रक्षा प्रकृत जन्म भेल इच्छाक नहि क' रहलए लोक निबाह अचि समुद्र मे माछ जकाँ पर तृप्त ने छैक पियास केहन परिस्थिति केहन बुद्धि केर की बनलछि बिडंबना केकरो बुझबा मे नहि आबय ई नव युग केर रचना कि सब कोना कोन कोन विधियें पसरि रहलए घर-घर सलिलक स्वतः धार बहइत जे छल बहैत सब जीवन ठमकल ठमकल दुःक्ख मे भारी डेग-डेग पर क्षण-क्षण बिनु थकनीयें बैसि जाइत अछि सोच मे पड़ जाइत अछि बिलकुल्ले पसरल जाइत ई नबका मोनक रंग ढंग बिना युद्ध केर प्रतिदिन प्रति घर भ' रहलए जे हताहत घोर अशान्ति भरल बेशी मन चिन्तें अछि उद्विग्न-उन्मन कारण तेहन नुकाएल गोपन बूझि ने पाबि रहल लोक अधबयसे मे युगक ताल देखि भोगि नचारी गबइत लोक समय बनल जाइत अछि दिन-दिन स्वयं मूर्त्ति लाचारीक सभ शरीर सँ प्राण जेना सूखल जाइत अछि पल-पल अधिक लोक जेना बनि चुकलए बौक, कतोक बहीर शेष जीवनक नब ढर्रा सँ आतंकित आ अधीर आब परस्पर गौआँ-गौआँक रहि ने गेल आप्तता सब जेना सब सँ नुकाएल ताकय बचबा केर रस्ता तें अनेर मे आओर अकारण पसरि रहल अछि दूरी ककरो पर ककरो ने जेना बाँचल अछि आब विश्वास बहुत लोक गुम्म, बेशी दुखिया आरो बहुत उदास ई कोन युगक प्रवेश भेल अछि ओहन शान्त जीवन मे कर्मतृप्त मनुखक समाज मे केहन अशुभ से होएब बेशी हाथ कपार धेने चिन्तित बड़ ब्याकुल-ब्याकुल प्रत्यक्षें तँ शान्त जेना किछु भेले नहि हो किछुओ किन्तु लोक जीवनक अंतः उद्वेलित आगि जरैत'छि सब सहिये रहलए लेकिन व्यथा अपन ने कहैत'छि देह मोन आ प्राणक मध्य मे की अछि जीवन केर सू्त्र अछि दर्शन,आस्था बा युग सँ कहल-सुनल अनुबन्ध नहि बूझल होइछ बेशी क्षण एखन उठाएब प्रश्न देह विकलता मे अपना द' अनमन अपने सन मारि ठहक्का हँसय प्राण चकित चुपायल मोन सभ अछि सबमे तैयो अपना अज्ञाने लाचार जुड़य सभक अस्तित्व एकहि मे एक तंत्र संचार बोधक भिन्न स्थिति रहितहुँ अछि एक बिन्दु पर सम पूर्व गान केर हेतु जेना स्वर-शब्द लयक हो नियम बिना प्रयासे स्वतस्फूर्तित ओना होइछ सब क्रिया किन्तु आइ काल्हि ताहू मे होअय लागल व्यतिक्रम देह-मन आ प्राणक मध्य घटि रहल जेना हो समन्वय पहिने छल सब क्रिया बोध आ निष्पादनक सहजता आइ जेना टुटि गेल सूत्र हो आपसक तत्परता एक देह-मन-प्राणक सृष्टिक सुन्दर एहन महल मे आब जेना क' रहल वास हो तीनू एकसर एकसर तीनू ताकि लेने हो जेना अप्पन निष्क्रिय एकान्त तीनू मे बाजा भूकी नहि तीनू निपट अशान्त।

ई अनुभव कि खसल एकाएक कोनो मेघ सँ पानि जकाँ ई अनुभव कि जीवन मे आएल नोतल कोनो नोथारी ई अनुभव कि आयल कोनो बनि समधियान केर भार मे ई अनुभव कि आबि रहलए कीनि क' हाट-बजार सँ ई अपनहि देह-मन-प्राण मे एतेक समाद हीनता सोझाँक सहज प्राप्त सुख पर्यन्त बनल जाइत अछि दुर्लभ कारण किछु प्रत्यक्ष कहाँ अछि कहाँ साफ किछु लक्षण मात्र अदृश्य संदेहक छाया सँ असुरक्षित आँगन दूरी बढ़ल जाइत अपना मे, बिन बातहिक परस्पर टूटल संबंधक स्थिति सम आँगन मे घर घर चौंकलि राधा, दुब्बरि गता उठलि चललि डगमग डग ई अनुभव आएल अवश्ये.बड़ बुधियारी बाटे। हँ बुझबा मे अबैत अछि आब ई आ'ल हाटे- हाटे इ आएल हाटे- हाटे। हाट बनल नब बाट जेना जीबाक सब तरहे। सभ बाट पर आब जनमि रहलए बन-झाँखुर। लोक लाचार । असमंजस मे - की करी, की नहि, कोन बाट चली एहि दुःख-दुविधा मे जे एक तँ ओहनहुँ छलैक कहाँ किछु विशेष हाथ आब तँ जेहो छलैक अपन अधीन, अपना योग्य, सभ भेल जा रहल छैक बेहाथ। किछु तं अपनहि घरक नवताक अन्हर-बिहाड़ि मे आ किछु भरि समाजक बदलि रहल दृष्टि आ व्यवहारो मे। यद्यपि कि सभक दुःख-दुविधा छैक रंग-रूप एक्के। मुदा से नहि बूझि पबैये लोक एकरा एना भ' क 'एहि रंग मे जे भ' रहलए सब किछु अंग-भंग। जीवन यापनक पारंपरिक बाट पर चलैत, सहैत जाइत सबटा नबका-नबका आघात जे प्रत्यक्ष मे तं छैक बड़ गंहीर स्नेहक स्पर्श, मुदा प्राण के थकुचि रहल छैक एक एक पल। कत' सँ ई कोन रोगाह वायु बहैत आयल छैक सभक बुद्धि बौआयल सभक हृदय घायल छैक। ताहू मे बेशी तं बनल छैक विडंबना ई, एहि सबक जड़ि छैक आन नहि, अपनहि सब ई यथा-पुत्र,पुत्रबधू, आ संगी-साथी सब। बहि रहल एहि बसात संग बेश गदगद अछि, बिनु बुझने एकर असरि। काल्हुक भविष्य पर अधिसंख्य नब लोक अपन-अपन फूकि रहलए घर। के बुझबय ? बूझक सेतु पुरना लोक सबकें राखल जा रहल अछि कतिया क'। नबके लोक सम्हारि रहल अछि नब युगक रासि। बढ़ा रहल गाड़ी के हाँकि क' एहि तरहें जेना कोनो दुपहियाक गाड़ी नहि, समस्त पृथ्वीये होथि गुड़का रहल, अपना सामर्थ्ये,अपनहि बुद्धि-ब्योंत सँ-आगाँ। समाज, बयसक पुरान ठकमूड़ी लगौने बैसल छथि चुपचाप, सबटा देखैत! तँ कि ई प्राण जे थकुचल जाइत बुझाइत अछि दिन राति से नहि थिक एकमात्र हमर?लोकोक बहुत छैक आन अपन। तँ कि छैक व्याकुल हमरा सँ पृथक किछु लोक, तँ कि ई संसार, समाज बनल छैक ओतहु आन? छोड़ि सर-संबन्धी कि ओतहु कएने छै असकर अपनहि दुःखक ज्वाला मे कि जरैत अछि आनो घर एहन विपत्ति नव प्रकारक आ पहिले पहिल स्वभावक, तँ कि अछि प्रारंभ ई अनुभव केर नबका आवक-जावक? चीन्हि ने पाबी हम यद्यपि एकरा कोनो आँखिक विचार सँ द्विविधे दुविधा अछि प्रति पल प्रश्न सोझ सन्सार सँ अछि एही मे शुरू मनुक्खक कोमल संवेदन सब मौलाएब, टूटि खसब गाछ सँ पात जेना सुखायल क्रमशः पातक संगहि डारि, ध'र आ पूरा गाछ, सुन्न कएल जाइत जीवन रस सँ धराशायी भ’ जाइछ गाछ तँ तथापि मरि-सुखा क' रहि जाइत अछि उपयोगी जाड़नि बनि जरि चूल्हि बनाबय, आबाल बृद्धक भोजन, जड़काला- हाड़कंपौआ ऋतु मे धधकि क' दिअय जीवनक ताप, मुदा मनुख-जीवन, ई देह- समस्त बिलक्षण, प्रकृतिक अनुपम सृष्टि पृथ्वी पर अनुपम जीवित सेहो एहन निरर्थक बनल अकार्यक देहक जीवन हो अंत तखन पर्यन्त लिअय फेरो समाज,परिवार,प्रकृति सँ काँच-सुखायल गाछ जे होइछ काठ, देह कें अंतिम परिणति धरि पहुँचाबय मे,शरीर-मृत मनुक्ख शरीर डाहै मे करबा लैत अछि खर्च जाइतो-जाइतो। -'हम-हम नहि राधा, तों..की सब सोचैत छें ...पुछैत राधा, कहैत राधा,सुनैत राधा..एखनहि केहन छल आत्म मुखर सक्रिय स्पन्दित ! मिझा गेल डिबिया जकाँ रहलए केना धुँआइत, प्रश्नक कोनो टा उत्तर नहि, कोनो टा ने बात-संवाद मात्र दीर्घ निश्वास-दीर्घ निश्वास-'कोना छी अहाँ कृष्ण, कहाँ छी, किएक छी ? एहन समय हमरे जीवन मे किएक एतेक रास जेहो नहि लेने ऋण तकरो भरि रहल छी सूदि, मूर धएल जसक तस अदृश्य कोनो बणिकक हमर पल, दिन, मास बर्ख चुकबैत अपन एक-एक साँस । एहन स्थान किएक बनि गेलय इएह हमर ई मन? भरि संसारक बस्तु, व्यक्ति, व्यक्तिक सब कार्यकलाप, क्रीड़ा आ सब कर्मक बनि गेल अछि सुलभ आँगन। जेकरा जखन सुभीता आबय क' लिअय व्यवहार। हमही आँगन हम मुदा ठकमूड़ी लेने ठाढ़ । कहि ने सकी केकरो निजताक बोझ, एकर संताप, बुझा सकी ने अपन एहि वर्तमानक कुटिल यथार्थ , हमर अर्थ छिड़ियाएल जेना कृषकक बीयाक छितनी-पथिया हो, बागु कर' खेत जाइत काल बाटे मे गेल हो हेराय, जतबा जे बिछि-समेटि सकलौं, हँसोथि-हँसोथि, खिन्न मन कर्माहत देहें यथोपलब्ध बीया कयलौं बागु ! घुरल हो ओहि प्रचण्ड रौद कें दैत ललकार घर आ बनल तथापि जीवन क्रम मे गाम मे स्थिर आशान्वित, फसिलक भावी उपलब्धिक दिस आश्वस्त, मुदा पुनि जतबो बीया छीटल गेल हो, घामे-पसेने खेत जोति तैयार कएल गेल मे तकरो सब कें चुनि क' ल' चल गेल हो चिड़ैक महा हेंज, एम्हर एक दिस निश्चिन्तता मे गबैत मनक भवितव्य, ओम्हर दोसर दिस सुन्न कएल बनि गेल हो खेतक गर्भ ! एम्हर निरन्तर बीया मे अंकुरयबाक , माटि के फोड़ि जन्मबाक-बढ़बाक, बढ़ि क' फसिलक गाछ विकसवाक अहो दिवस मर्मांतक प्रतीक्षा...ओम्हर जन्म सँ पहिनहि कोखि कें रिक्त करैत काल-गति, ई एहन हमरे टा किएक कर्माहत हमरे टा किएक वर्तमान ! आकि बोगि रहलए एहने आ यैह व्यथा आनो आन ?' सोचैत राधा छोड़लनि नमहर श्वाँस..। जानि ने कखन-कोना लागि गेल रहनि राधा कें आँखि। नहि जानि कखन बैसले बैसलि ओंघड़ा गेलीह ओ पटिया पर। मुदा ई भेलनि बोध जेना देह भ' गेल डेंगी नाव! पटिया बनि क' यमुना मे हुनका कराब' लगलनि-झिलहरि बड़ी काल...एकसरि झिलहरि खेलाय मे रहली मस्त- बड़ी काल ! तखन होअ' लगलनि अगिले क्षण मोन विरक्त । आखिर यत्न क' नाव के घाट लगौलनि , भेलीह-संतुष्ट जे पहिल बेर नहि लेब' पड़ल श्रीकृष्णक सहयोग, आ खेपि सकलहुँ नाव, उतरि गेलौं पार ! अपन सुख लेल किएक करी केकरो नेहोरा ? भने कृष्णे किएक नहि होथि। एकहि मोन मे तुरन्त उपस्थित भ गेलनि-ग्लानि, छिया, कृष्ण पर निर्भरता तँ हमर नियति आ प्रारब्ध। कोना आयल मोन मे एहन बात ? धिक्कार मोन -धिक्कार... मुदा ई की ? घाट पर साक्षात् कृष्ण महराज ठाढ़ ! वैह खौंझबै वला बिहुँसैत, बढ़ा चुकल नाव सँ गमग उतरि रहलि राधा दिस अपन दहिना हाथ। सस्नेह, सार्द्र दैत अपन हाथ राधा भेलीह बिकल । मिला नहि सकलीह हुनका सँ आँखि । -' भरिसक मन मे हमरा बिनु यमुना मे नाव चला लेबाक छौक मन पर भार । अपन सुखक अपनहि कर्म-निर्भरताक सेहो छौक आत्म दीप्त विश्वास...राधा, तों केहन लागि रहल छें एहि अलौकिक क्षण , तोरो ने बूझल छौक। हमरो तँ थिक जीवनक ई प्रथमहि दुर्लभ दृश्य ! हम केना योगा क' राखी ई आनन्द राधा, कोन बिधि, तोंही देखा दे उपाय।' -' जाउ-जाउ, एत्तहु खौंझबैये लए हमरा आएल छी अहाँ । हम कएलए स्त्रीगन भ' क' अगरजितपना आ छी ताही मोने बेचैन, अहाँ के सुझैए विनोद एखन ।' राधा किन्चित स्नेह-क्रोधित भ' कहलखिन तँ कृष्ण भेलाह गंभीर। -' नहि राधा, हम तँ छी परम हर्षित-संतुष्ट। यैह त हमर कामना छल, तों बनि जायं-स्वयं आत्म निर्भर । नहि रह' पड़ौ तोरा हमरा पर निर्भर । तों कएलेंहें हमरे काज। हम तँ तें छी प्रसन्न।' -'किएक नहि, आब आओर रहब निश्चिन्त, मरओ राधा कि जीबओ, नहि राख' पड़त फिकिर ।' नाव सँ उतरि क' दरबनिया द' क' पड़यबाक छलनि विचार, मुदा ई तँ सर्वथा नवे परिस्थिति कएने छथि कृष्णजी ठाढ़ ! जानि ने एतबा काल एहि बीच की हएत आँगनक हाल। जे हो ... आब एहि क्षण तँ माधव-मायाजाल मे छी बाझलि हमहूँ । आगाँ देखी कोन नाटकक केहन दृश्य प्रस्तुत करय वला छथि-नटवर नागर...सकल गुण आगर ! बूलि क' राधा आँगन अयलीह तं आश्चर्ये ठकमूड़ी लागि गेलनि। बीच आँगन मे कृष्ण ठाढ़, सद्यः। हुनकर स.बोधनक कोनो टा ने जबाब दैत चलि गेलीह भीतर अपना कोठली दिस। धीरे-धीरे कृष्ण सेहो लागि क' पाछाँ राधाक पीठे पर पहुँचलखिन। एतनी काल मे पहुँचि जएथिन कृष्ण तकर नहि छलनि कनियों अनुमान। सरियाइयो कहाँ सकलीह आँचर पर्यन्त ...दुष्ट केहन जे पैसि गेलाक बाद कोठली मे खखसलनि कर्तव्य, कएलनि-राधा के साकांक्ष । अप्रत्याशित एहि कृष्ण-कृत्य पर भ' गेलीह क्रोधित । जेना तेना सरियबैत आँचर, तथापि घुरलीह पाछाँ दिस फेरलनि मुँह..कुटिल शृंगारोदीप्त भुवन मोहिनी बिहुँसी पसारने ठाढ़-श्रीकृष्ण । लग आबि क' खौंझाएल पोसुआ बिलाड़ि जकाँ राधा ! छड़पैत सन क्रमे ल'ग पहुँचि कृष्णक पीताम्बरी झीकैत’ 'हरण कर' लगलखिन.. . –‘'ई की, ई की करैत छें राधा । हमरा किएक करैत छें एना उघार ? देखत लोक हमर की रहत इज्जतिक हाल ! आखिर पुरुखोक होइत छैक इज्जति, मर्यादा लज्जा, पुरुखोक चीर हरण होइत छैक यदि नहि रहै पुरुषत्व...।' किन्तु हँसी-ठठा सँ राधा कनियों ने ठंढयलीह। कृष्णो बूझि ने सकलाह, राधा बजलीह किछु बा कनलीह..। स्नेहांक मे बन्हबाक हुनक मृदु प्रयास कें ताग जकाँ खुट द’ तोड़लनि। खौंझायलि ओ एतबा जे कृष्णक केश के पकड़ि घीच' लगलीह। ओ रहथि नहि प्रस्तुत, राधाक हेतनि एहेन स्नेहाघात। केश तिराइत मन छटपटबैत कननमुँह भ' गेलाह। मुदा राधा तँ जेना छलीह बताहि भेलि अपन तामस सँ। बूझल कृष्ण धैर्य सँ । सक्कत-बाँहि स्नेह सँ बन्हैत बुझब' लगलाह- -‘'भेलौ कि तोरा, की बात, की भेलौए बाज त किछुओ, हमरे सप्पत तोरा, भेलौए की से तँ कहै बताहि !... हमरो मन धधकैये कतेक दिन, मास-बरख सँ, कहाँ भेटैए शीतल स्नेहक छाहरि हमरो । तइ पर सँ तोरो यदि होउ एहिना हाल तँ हमर जीवन कोना चलत, कहिया धरि, कतबा दूर से तोंही क'ह कने ।...आखिर की भेलनिहें हमर बुधियारि राधिका जी कें , बुझियै त। से दोख जे भेलय हमरे बुते ? कोना-की। हिचुकैत राधिका कें करेज सँ साटि बड़ी काल कृष्ण अपनहुँ हिचकैत रहलाह निरन्तर ओतबा काल । दुहुक हिचुकब क्रमशः एकमेक बनल चलि गेलनि । राधा कें ई की भेलनि आ कृष्णहु कें ? दुनूक भाव आवेग एकात्म भ' चुपचाप बहिते गेल...जानि नहि एहि करुण चुप्पी मे जीवनक कतेक युग बीति गेल ! स्थिति मे एक ध्यान प्राण सेहो एक। -' निन्न भ' गेलौ राधा, सूति गेलें तों की ? ' कृ्ष्णक एहि पुछैत स्वर पर चिहुँकि उठलीह राधा । उठितहि भान भेलनि जेना होथि ओ श्रीकृष्णक आलिंगन मे माँझ आँगन मे ठाढ़ि । चारू कात सँ देखैत लोक, सर-संबन्धिक- सखि बहिनपा...। आकि लाज सँ व्याकुल एकहि बेर मे श्रीकृष्णक बाँहि सँ झकझोरि छोड़बैत स्वयं कें चिकरि उठलीह, पड़यलीह- लत्त॓-फत्त॓, निछोह... निन्न एतहि टुटि गेलनि । साँस फुलैत भेलीह बेसम्हार। जेना लोहारक भाँथी हो, ओहिना ताप जरैत उसाँसक भाँथी हो ई देह। आब भग्न स्वप्नक कर' बैसलीह भाग्यदशा विश्लेषण। पछताइत-पछताइत मन भेलनि अस्तम्व्यस्त । केहन दुर्लभ सुन्दर स्वप्नक क' देलियैक अपने दुर्दशा। कि अछि एतबो नहि लिखल , केहन भाग्य से कहि नहि, स्वप्नो जेना सुड़ाह होइत अछि, सोचथि राधा । मुदा ने जानि जखनि अबैत अछि किएक आधा , सौंस स्वप्न केहन दुर्लभ यदि हो मनोरथक । ओना तँ विकट भयावह स्वप्नक अंत नहि, व्यर्थक भरि- भरि राति बौआइत बन-झाँखुर मे बाधे बोने भरि संसार विकल भयभीत एकसर अनन्त मे लोक जेना पाछाँ सँ खेहारले जाइत कोनो राक्षसी सन असकर अब्बल नारीक पाछाँ लेने बर्छी-भाला कोनो डेग पर गाँथि सकैत अछि पीठहि दिस सँ त्रस्त जिजीविषा ग्रस्त प्राण छटपट दौड़ैत अनवरत जानि ने चल जाइत अछि कतोक योजन कतबा आगाँ आ कि ओही अपस्यांत दशा मे जत' धरैत अछि सुस्तयबा लेल एकटा डेग किंचित निश्चिन्त जे राक्षसी पाछाँ बहुत पाछहि छुटि गेलए, हम पहुचल छी आबि सुरक्षित अपन गामेक इलाका तें एक पल ल' ली दम । साँस करी स्थिर आश्वस्त, आकि जेना अवतार जेकाँ आगाँ मे आबि क' ठाढ़ कोनो भ' जाय विचित्र बिकराल भयावह हिंसक पशु मात्र एकटा ओकरा काया मे समाएल हो जेना कतोक बाघ-सिंह-हाथी-ऊँट आदि, सभ एकहि ठाम एक संग मुँह बाबि क' ठाढ़ जेना हो बड़का महलक सिंहद्वार केर फाटक जाहि मे एक संग पैसैत अछि सहस्रो सैनिक, अपन घोड़ा-हाथी रथ समेत से खुंखार जानवर सब केहन हँसैत लगैत अछि, जेना कि ओ गीड़य नहि, अहंक अएला पर अति प्रसन्न स्वागत करैत अछि केहन लगैत अछि एहन विशाल जानवर ई कोन थिक, ई जीव, जानि ने पहिले पहिल देखै छी- आगाँ एकटा डेग बढ़ौलक तँ सोझाँक धरती डोलैत बुझाएल, दोसर डेग पर देह-प्राण सौंसे संज्ञा जेना हेरायल, कोनो नहि बाँचल विकल्प कतहु पड़यबाक, सब दिशा मे हो जेना ओकरे पसरल पंजा,हाथ-पैर ओना तँ विकट भयावह स्वप्नक अंत नहि, व्यर्थक भरि- भरि राति बौआइत बन-झाँखुर मे बाधे बोने भरि संसार विकल भयभीत एकसर अनन्त मे लोक जेना पाछाँ सँ खेहारले जाइत कोनो राक्षसी सँ असकर अब्बल नारीक पाछाँ लेने बर्छी-भाला कोनो डेग पर गाँथि सकैत अछि पीठहि दिस सँ त्रस्त जिजीविषा ग्रस्त प्राण छटपट दौड़ैत अनवरत जानि ने चल जाइत अछि कतोक योजन कतबा आगाँ आ कि ओही अपस्यांत दशा मे जत' धरैत अछि सुस्तयबा लेल एकटा डेग किंचित निश्चिन्त जे राक्षसी पाछाँ बहुत पाछहि छुटि गेलए, हम पहुचल छी आबि सुरक्षित अपन गामेक इलाका तें एक पल ल' ली दम साँस करी स्थिर आश्वस्त, आकि जेना अवतार जेकाँ आगाँ मे आबि क' ठाढ़ कोनो भ' जाय विचित्र बिकराल भयावह हिंसक पशु मात्र एकटा ओकरा काया मे समाएल हो जेना कतोक बाघ-सिंह-हाथी-ऊँट आदि, सभ एकहि ठाम एक संग मुँह बाबि क' ठाढ़ जेना हो बड़का महलक सिंहद्वार केर फाटक जाहि मे एक संग पैसैत अछि सहस्रो सैनिक, अपन घोड़ा-हाथी रथ समेत से खुंखार जानवर सब केहन हँसैत लगैत अछि, जेना कि ओ गीड़य नहि, अहंक अएला पर अति प्रसन्न स्वागत करैत अछि केहन लगैत अछि एहन विशाल जानवर ई कोन थिक, ई जीव, जानि ने पहिले पहिल देखै छी- आगाँ एकटा डेग बढ़ौलक तँ सोझाँक धरती डोलैत बुझाएल, दोसर डेग पर देह-प्राण सौंसे सज्ञा जेना हेरायल, कोनो नहि बाँचल विकल्प कतहु पड़यबाक, सब दिशा मे हो जेना ओकरे पसरल पंजा, हाथ-पैर प्राण जेना चीत्कार क' उठय भय सँ आर्त्त अपन रक्षार्थ जोर ठहक्का पड़ल जेना ब्रह्माण्डे बिजलौका सं एक संग कड़कल चमकल आ सृष्टि भरिक मेघक समूह एकबेर गरजल, डरे भेल पसेना सं तरबतर थरथराइत सर्वांग बुझा रहलए जे जाइत होइ जेना ओहि जन्तुक बड़का फाटक सन खुजल कल्ला बाटे ओकर पोखरि सन पेटक सत्ते तखने उठल कंठ मोकल घिरघिरी भरल, आर्त्त पुकार मुदा के सुनय, सुनय के ? सुननहारक अपने भय-व्याकुल असकर ई वर्त्तमान स्वयं अपने ई प्रिय एकान्त, केहन असुरक्षित आ अशांत ! कोन जीव थिक आखिर एहन बिकराल आओर खुंखार सपनहुँ देखल तँ होयतै अवश्य अस्तित्व एकर पुछबनि हुनके, जँ भेटता तँ, कोन थीक ई जीव ? आइधरि देखल आ ने सुनल छल, माधव ! कोनो गतिमान पहाड़ कि सत्ये कोनो जीवे छल हुनका तँ हेबे टा करतनि एकरो बूझल परिचय। की नहि अछि हुनका एहि सृष्टिक जे किछु कोनो विषय अछि जानि ने कत्तेक ज्ञान कोना एतबहि बयसें पौने छथि सबटा ओ बूझैत छथि हुनका सबकिछुए सुझै छनि घ'न अन्हरिया मे पर्यन्त सबकिछु देखाइत छनि... कोना हमर खसि पड़ल कनपासा यमुना कातक घासक बन मे ओहन अन्हरिया राति मे से ओ ताकल एक्कहि क्षण मे कोन आँखि छनि केहन ताहि मे ज्योति विराजित दिव्य जत' जत' पड़ि जाइछ स्वतः भ' जाइछ ओत' इजोत ! हुनका सोझाँ तें अतिशय सम्हार' पड़इछ आँचर से सब सखि केर अनुभव वस्तुक भीतर वस्तु देखि लेबक अद्भुत कौशल छनि बिनु देखनहुँ श्रीमान जानि ने की की देखि ल' जाइत छथि सोचि स्मरण करैत लजयली एकान्तहु मे राधा... एखन कत' छथि कृष्ण ? ....जारी विदेह नूतन अंक मिथिला कला संगीत १.श्वेता झा चौधरी २.ज्योति सुनीत चौधरी ३.श्वेता झा (सिंगापुर) १ श्वेता झा चौधरी गाम सरिसव-पाही, ललित कला आ गृहविज्ञानमे स्नातक। मिथिला चित्रकलामे सर्टिफिकेट कोर्स। कला प्रदर्शिनी: एक्स.एल.आर.आइ., जमशेदपुरक सांस्कृतिक कार्यक्रम, ग्राम-श्री मेला जमशेदपुर, कला मन्दिर जमशेदपुर ( एक्जीवीशन आ वर्कशॉप)। कला सम्बन्धी कार्य: एन.आइ.टी. जमशेदपुरमे कला प्रतियोगितामे निर्णायकक रूपमे सहभागिता, २००२-०७ धरि बसेरा, जमशेदपुरमे कला-शिक्षक (मिथिला चित्रकला), वूमेन कॉलेज पुस्तकालय आ हॉटेल बूलेवार्ड लेल वाल-पेंटिंग। प्रतिष्ठित स्पॉन्सर: कॉरपोरेट कम्युनिकेशन्स, टिस्को; टी.एस.आर.डी.एस, टिस्को; ए.आइ.ए.डी.ए., स्टेट बैंक ऑफ इण्डिया, जमशेदपुर; विभिन्न व्यक्ति, हॉटेल, संगठन आ व्यक्तिगत कला संग्राहक। हॉबी: मिथिला चित्रकला, ललित कला, संगीत आ भानस-भात। २. ज्योति सुनीत चौधरी जन्म तिथि -३० दिसम्बर १९७८; जन्म स्थान -बेल्हवार, मधुबनी ; शिक्षा- स्वामी विवेकानन्द मि‌डिल स्कूल़ टिस्को साकची गर्ल्स हाई स्कूल़, मिसेज के एम पी एम इन्टर कालेज़, इन्दिरा गान्धी ओपन यूनिवर्सिटी, आइ सी डबल्यू ए आइ (कॉस्ट एकाउण्टेन्सी); निवास स्थान- लन्दन, यू.के.; पिता- श्री शुभंकर झा, ज़मशेदपुर; माता- श्रीमती सुधा झा, शिवीपट्टी। ज्योतिकेँwww.poetry.comसँ संपादकक चॉयस अवार्ड (अंग्रेजी पद्यक हेतु) भेटल छन्हि। हुनकर अंग्रेजी पद्य किछु दिन धरि www.poetrysoup.com केर मुख्य पृष्ठ पर सेहो रहल अछि। ज्योति मिथिला चित्रकलामे सेहो पारंगत छथि आ हिनकर मिथिला चित्रकलाक प्रदर्शनी ईलिंग आर्ट ग्रुप केर अंतर्गत ईलिंग ब्रॊडवे, लंडनमे प्रदर्शित कएल गेल अछि। कविता संग्रह ’अर्चिस्’ प्रकाशित। ३.श्वेता झा (सिंगापुर) बालानां कृते पंकज झा, पिता-श्री महेंद्र मोहन झा, माता-श्रीमती अम्बी देवी झा : माड़र, जितबारपुर, मधुबनी, बिहार ८४७२११ पंकज जी एच.सी.एल.मे सोफ्टवेयर इंजिनीयर छथि। (बाल कविता) माँ गई माँ माँ गै माँ, घरक ऊपर, चारक तर, बगरा बनेलकऊ, एकटा घर माँ गै माँ, घरक पाछू, बारीक बिच, सुगा अनलकऊ, एकटा फर माँ गै माँ, गामक भीतर, टोलाक बिच, नटुआ नचलऊ, एकटा नाच माँ गै माँ, गामक बाहर, पोखरिक बिच, पुरैनिक पातपर, झिलमिल जल माँ गै माँ, आँगन कात, ढेकी लग, बिहरिमे छौ, गहुमन साँप माँ गै माँ, बस्तुनिया लय, हम कहलियौ, सब हाल-चाल, जल्दीसँ दऽ दहीं, बस्तुनिया हमर, हम चललियऊ, खेलय लेल, नै देबहीं, बस्तुनिया हमर माँ गई माँ, चिकरैत रहबौ, माँ गै माँ, चिकरैत रहबौ। बच्चा लोकनि द्वारा स्मरणीय श्लोक १.प्रातः काल ब्रह्ममुहूर्त्त (सूर्योदयक एक घंटा पहिने) सर्वप्रथम अपन दुनू हाथ देखबाक चाही, आ’ ई श्लोक बजबाक चाही। कराग्रे वसते लक्ष्मीः करमध्ये सरस्वती। करमूले स्थितो ब्रह्मा प्रभाते करदर्शनम्॥ करक आगाँ लक्ष्मी बसैत छथि, करक मध्यमे सरस्वती, करक मूलमे ब्रह्मा स्थित छथि। भोरमे ताहि द्वारे करक दर्शन करबाक थीक। २.संध्या काल दीप लेसबाक काल- दीपमूले स्थितो ब्रह्मा दीपमध्ये जनार्दनः। दीपाग्रे शङ्करः प्रोक्त्तः सन्ध्याज्योतिर्नमोऽस्तुते॥ दीपक मूल भागमे ब्रह्मा, दीपक मध्यभागमे जनार्दन (विष्णु) आऽ दीपक अग्र भागमे शङ्कर स्थित छथि। हे संध्याज्योति! अहाँकेँ नमस्कार। ३.सुतबाक काल- रामं स्कन्दं हनूमन्तं वैनतेयं वृकोदरम्। शयने यः स्मरेन्नित्यं दुःस्वप्नस्तस्य नश्यति॥ जे सभ दिन सुतबासँ पहिने राम, कुमारस्वामी, हनूमान्, गरुड़ आऽ भीमक स्मरण करैत छथि, हुनकर दुःस्वप्न नष्ट भऽ जाइत छन्हि। ४. नहेबाक समय- गङ्गे च यमुने चैव गोदावरि सरस्वति। नर्मदे सिन्धु कावेरि जलेऽस्मिन् सन्निधिं कुरू॥ हे गंगा, यमुना, गोदावरी, सरस्वती, नर्मदा, सिन्धु आऽ कावेरी  धार। एहि जलमे अपन सान्निध्य दिअ। ५.उत्तरं यत्समुद्रस्य हिमाद्रेश्चैव दक्षिणम्। वर्षं तत् भारतं नाम भारती यत्र सन्ततिः॥ समुद्रक उत्तरमे आऽ हिमालयक दक्षिणमे भारत अछि आऽ ओतुका सन्तति भारती कहबैत छथि। ६.अहल्या द्रौपदी सीता तारा मण्डोदरी तथा। पञ्चकं ना स्मरेन्नित्यं महापातकनाशकम्॥ जे सभ दिन अहल्या, द्रौपदी, सीता, तारा आऽ मण्दोदरी, एहि पाँच साध्वी-स्त्रीक स्मरण करैत छथि, हुनकर सभ पाप नष्ट भऽ जाइत छन्हि। ७.अश्वत्थामा बलिर्व्यासो हनूमांश्च विभीषणः। कृपः परशुरामश्च सप्तैते चिरञ्जीविनः॥ अश्वत्थामा, बलि, व्यास, हनूमान्, विभीषण, कृपाचार्य आऽ परशुराम- ई सात टा चिरञ्जीवी कहबैत छथि। ८.साते भवतु सुप्रीता देवी शिखर वासिनी उग्रेन तपसा लब्धो यया पशुपतिः पतिः। सिद्धिः साध्ये सतामस्तु प्रसादान्तस्य धूर्जटेः जाह्नवीफेनलेखेव यन्यूधि शशिनः कला॥ ९. बालोऽहं जगदानन्द न मे बाला सरस्वती। अपूर्णे पंचमे वर्षे वर्णयामि जगत्त्रयम् ॥ १०. दूर्वाक्षत मंत्र(शुक्ल यजुर्वेद अध्याय २२, मंत्र २२) आ ब्रह्मन्नित्यस्य प्रजापतिर्ॠषिः। लिंभोक्त्ता देवताः। स्वराडुत्कृतिश्छन्दः। षड्जः स्वरः॥ आ ब्रह्म॑न् ब्राह्म॒णो ब्र॑ह्मवर्च॒सी जा॑यता॒मा रा॒ष्ट्रे रा॑ज॒न्यः शुरे॑ऽइषव्यो॒ऽतिव्या॒धी म॑हार॒थो जा॑यतां॒ दोग्ध्रीं धे॒नुर्वोढा॑न॒ड्वाना॒शुः सप्तिः॒ पुर॑न्धि॒र्योवा॑ जि॒ष्णू र॑थे॒ष्ठाः स॒भेयो॒ युवास्य यज॑मानस्य वी॒रो जा॒यतां निका॒मे-नि॑कामे नः प॒र्जन्यों वर्षतु॒ फल॑वत्यो न॒ऽओष॑धयः पच्यन्तां योगेक्ष॒मो नः॑ कल्पताम्॥२२॥ मन्त्रार्थाः सिद्धयः सन्तु पूर्णाः सन्तु मनोरथाः। शत्रूणां बुद्धिनाशोऽस्तु मित्राणामुदयस्तव। ॐ दीर्घायुर्भव। ॐ सौभाग्यवती भव। हे भगवान्। अपन देशमे सुयोग्य आ’ सर्वज्ञ विद्यार्थी उत्पन्न होथि, आ’ शुत्रुकेँ नाश कएनिहार सैनिक उत्पन्न होथि। अपन देशक गाय खूब दूध दय बाली, बरद भार वहन करएमे सक्षम होथि आ’ घोड़ा त्वरित रूपेँ दौगय बला होए। स्त्रीगण नगरक नेतृत्व करबामे सक्षम होथि आ’ युवक सभामे ओजपूर्ण भाषण देबयबला आ’ नेतृत्व देबामे सक्षम होथि। अपन देशमे जखन आवश्यक होय वर्षा होए आ’ औषधिक-बूटी सर्वदा परिपक्व होइत रहए। एवं क्रमे सभ तरहेँ हमरा सभक कल्याण होए। शत्रुक बुद्धिक नाश होए आ’ मित्रक उदय होए॥ मनुष्यकें कोन वस्तुक इच्छा करबाक चाही तकर वर्णन एहि मंत्रमे कएल गेल अछि। एहिमे वाचकलुप्तोपमालड़्कार अछि। अन्वय- ब्रह्म॑न् - विद्या आदि गुणसँ परिपूर्ण ब्रह्म रा॒ष्ट्रे - देशमे ब्र॑ह्मवर्च॒सी-ब्रह्म विद्याक तेजसँ युक्त्त आ जा॑यतां॒- उत्पन्न होए रा॑ज॒न्यः-राजा शुरे॑ऽ–बिना डर बला इषव्यो॒- बाण चलेबामे निपुण ऽतिव्या॒धी-शत्रुकेँ तारण दय बला म॑हार॒थो-पैघ रथ बला वीर दोग्ध्रीं-कामना(दूध पूर्ण करए बाली) धे॒नुर्वोढा॑न॒ड्वाना॒शुः धे॒नु-गौ वा वाणी र्वोढा॑न॒ड्वा- पैघ बरद ना॒शुः-आशुः-त्वरित सप्तिः॒-घोड़ा पुर॑न्धि॒र्योवा॑- पुर॑न्धि॒- व्यवहारकेँ धारण करए बाली र्योवा॑-स्त्री जि॒ष्णू-शत्रुकेँ जीतए बला र॑थे॒ष्ठाः-रथ पर स्थिर स॒भेयो॒-उत्तम सभामे युवास्य-युवा जेहन यज॑मानस्य-राजाक राज्यमे वी॒रो-शत्रुकेँ पराजित करएबला निका॒मे-नि॑कामे-निश्चययुक्त्त कार्यमे नः-हमर सभक प॒र्जन्यों-मेघ वर्षतु॒-वर्षा होए फल॑वत्यो-उत्तम फल बला ओष॑धयः-औषधिः पच्यन्तां- पाकए योगेक्ष॒मो-अलभ्य लभ्य करेबाक हेतु कएल गेल योगक रक्षा नः॑-हमरा सभक हेतु कल्पताम्-समर्थ होए ग्रिफिथक अनुवाद- हे ब्रह्मण, हमर राज्यमे ब्राह्मण नीक धार्मिक विद्या बला, राजन्य-वीर,तीरंदाज, दूध दए बाली गाय, दौगय बला जन्तु, उद्यमी नारी होथि। पार्जन्य आवश्यकता पड़ला पर वर्षा देथि, फल देय बला गाछ पाकए, हम सभ संपत्ति अर्जित/संरक्षित करी। 8.VIDEHA FOR NON RESIDENTS 8.1.Original Poem in Maithili by Kalikant Jha "Buch" Translated into English by Jyoti Jha Chaudhary Original Poem in Maithili by Kalikant Jha "Buch" Translated into English by Jyoti Jha Chaudhary Kalikant Jha "Buch" 1934-2009, Birth place- village Karian, District- Samastipur (Karian is birth place of famous Indian Nyaiyyayik philosopher Udayanacharya), Father Late Pt. Rajkishor Jha was first headmaster of village middle school. Mother Late Kala Devi was housewife. After completing Intermediate education started job block office of Govt. of Bihar.published in Mithila Mihir, Mati-pani, Bhakha, and Maithili Akademi magazine. Jyoti Jha Chaudhary, Date of Birth: December 30 1978,Place of Birth- Belhvar (Madhubani District), Education: Swami Vivekananda Middle School, Tisco Sakchi Girls High School, Mrs KMPM Inter College, IGNOU, ICWAI (COST ACCOUNTANCY); Residence- LONDON, UK; Father- Sh. Shubhankar Jha, Jamshedpur; Mother- Smt. Sudha Jha- Shivipatti. Jyoti received editor's choice award from www.poetry.comand her poems were featured in front page of www.poetrysoup.com for some period.She learnt Mithila Painting under Ms. Shveta Jha, Basera Institute, Jamshedpur and Fine Arts from Toolika, Sakchi, Jamshedpur (India). Her Mithila Paintings have been displayed by Ealing Art Group at Ealing Broadway, London. Result Of Dowry Is the money of dowry going to last long! Varnish your status for now You also have four girls You will learn lesson somehow Your son and wife wouldn’t help you Angry daughter-in-laws would take revenge You would have to drink tea with chilli Varnish your status for now You also have four girls You will learn lesson somehow When you would be unable to get up from bed Your grand sons would scold you actively They would give you soil in place of Lai Varnish your status for now You also have four girls You will learn lesson somehow You would be offered pebbles being considered as an orphan dog You would not be given even oil at bottom and salt at top Oh brother, you would be begging till you die Varnish your status for now You also have four girls You will learn lesson somehow Your sons are sold, who will give you pind And if they would do that, you would not get that You would be wandering as a bad spirit Varnish your status for now You also have four girls You will learn lesson somehow Only your youngest son is left, wake up now You will loose your both worlds otherwise Have loving relation with son’s in-laws Varnish your status for now You also have four girls You will learn lesson somehow Input: (कोष्ठकमे देवनागरी, मिथिलाक्षर किंवा फोनेटिक-रोमनमे टाइप करू। Input in Devanagari, Mithilakshara or Phonetic-Roman.) Output: (परिणाम देवनागरी, मिथिलाक्षर आ फोनेटिक-रोमन/ रोमनमे। Result in Devanagari, Mithilakshara and Phonetic-Roman/ Roman.) English to Maithili Maithili to English इंग्लिश-मैथिली-कोष / मैथिली-इंग्लिश-कोष  प्रोजेक्टकेँ आगू बढ़ाऊ, अपन सुझाव आ योगदान ई-मेल द्वारा ggajendra@videha.com पर पठाऊ। Top of Form विदेहक मैथिली-अंग्रेजी आ अंग्रेजी मैथिली कोष (इंटरनेटपर पहिल बेर सर्च-डिक्शनरी) एम.एस. एस.क्यू.एल. सर्वर आधारित -Based on ms-sql server Maithili-English and English-Maithili Dictionary. १.भारत आ नेपालक मैथिली भाषा-वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक शैली आ २.मैथिलीमे भाषा सम्पादन पाठ्यक्रम १.नेपाल आ भारतक मैथिली भाषा-वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक शैली

अ.नेपालक मैथिली भाषा वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक  उच्चारण आ लेखन शैली (भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक धारणाकेँ पूर्ण रूपसँ सङ्ग लऽ निर्धारित) मैथिलीमे उच्चारण तथा लेखन १.पञ्चमाक्षर आ अनुस्वार: पञ्चमाक्षरान्तर्गत ङ, ञ, ण, न एवं म अबैत अछि। संस्कृत भाषाक अनुसार शब्दक अन्तमे जाहि वर्गक अक्षर रहैत अछि ओही वर्गक पञ्चमाक्षर अबैत अछि। जेना- अङ्क (क वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ङ् आएल अछि।) पञ्च (च वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ञ् आएल अछि।) खण्ड (ट वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ण् आएल अछि।) सन्धि (त वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे न् आएल अछि।) खम्भ (प वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे म् आएल अछि।) उपर्युक्त बात मैथिलीमे कम देखल जाइत अछि। पञ्चमाक्षरक बदलामे अधिकांश जगहपर अनुस्वारक प्रयोग देखल जाइछ। जेना- अंक, पंच, खंड, संधि, खंभ आदि। व्याकरणविद पण्डित गोविन्द झाक कहब छनि जे कवर्ग, चवर्ग आ टवर्गसँ पूर्व अनुस्वार लिखल जाए तथा तवर्ग आ पवर्गसँ पूर्व पञ्चमाक्षरे लिखल जाए। जेना- अंक, चंचल, अंडा, अन्त तथा कम्पन। मुदा हिन्दीक निकट रहल आधुनिक लेखक एहि बातकेँ नहि मानैत छथि। ओ लोकनि अन्त आ कम्पनक जगहपर सेहो अंत आ कंपन लिखैत देखल जाइत छथि। नवीन पद्धति किछु सुविधाजनक अवश्य छैक। किएक तँ एहिमे समय आ स्थानक बचत होइत छैक। मुदा कतोक बेर हस्तलेखन वा मुद्रणमे अनुस्वारक छोट सन बिन्दु स्पष्ट नहि भेलासँ अर्थक अनर्थ होइत सेहो देखल जाइत अछि। अनुस्वारक प्रयोगमे उच्चारण-दोषक सम्भावना सेहो ततबए देखल जाइत अछि। एतदर्थ कसँ लऽ कऽ पवर्ग धरि पञ्चमाक्षरेक प्रयोग करब उचित अछि। यसँ लऽ कऽ ज्ञ धरिक अक्षरक सङ्ग अनुस्वारक प्रयोग करबामे कतहु कोनो विवाद नहि देखल जाइछ। २.ढ आ ढ़ : ढ़क उच्चारण “र् ह”जकाँ होइत अछि। अतः जतऽ “र् ह”क उच्चारण हो ओतऽ मात्र ढ़ लिखल जाए। आन ठाम खाली ढ लिखल जएबाक चाही। जेना- ढ = ढाकी, ढेकी, ढीठ, ढेउआ, ढङ्ग, ढेरी, ढाकनि, ढाठ आदि। ढ़ = पढ़ाइ, बढ़ब, गढ़ब, मढ़ब, बुढ़बा, साँढ़, गाढ़, रीढ़, चाँढ़, सीढ़ी, पीढ़ी आदि। उपर्युक्त शब्द सभकेँ देखलासँ ई स्पष्ट होइत अछि जे साधारणतया शब्दक शुरूमे ढ आ मध्य तथा अन्तमे ढ़ अबैत अछि। इएह नियम ड आ ड़क सन्दर्भ सेहो लागू होइत अछि। ३.व आ ब : मैथिलीमे “व”क उच्चारण ब कएल जाइत अछि, मुदा ओकरा ब रूपमे नहि लिखल जएबाक चाही। जेना- उच्चारण : बैद्यनाथ, बिद्या, नब, देबता, बिष्णु, बंश, बन्दना आदि। एहि सभक स्थानपर क्रमशः वैद्यनाथ, विद्या, नव, देवता, विष्णु, वंश, वन्दना लिखबाक चाही। सामान्यतया व उच्चारणक लेल ओ प्रयोग कएल जाइत अछि। जेना- ओकील, ओजह आदि। ४.य आ ज : कतहु-कतहु “य”क उच्चारण “ज”जकाँ करैत देखल जाइत अछि, मुदा ओकरा ज नहि लिखबाक चाही। उच्चारणमे यज्ञ, जदि, जमुना, जुग, जाबत, जोगी, जदु, जम आदि कहल जाएबला शब्द सभकेँ क्रमशः यज्ञ, यदि, यमुना, युग, यावत, योगी, यदु, यम लिखबाक चाही। ५.ए आ य : मैथिलीक वर्तनीमे ए आ य दुनू लिखल जाइत अछि। प्राचीन वर्तनी- कएल, जाए, होएत, माए, भाए, गाए आदि। नवीन वर्तनी- कयल, जाय, होयत, माय, भाय, गाय आदि। सामान्यतया शब्दक शुरूमे ए मात्र अबैत अछि। जेना एहि, एना, एकर, एहन आदि। एहि शब्द सभक स्थानपर यहि, यना, यकर, यहन आदिक प्रयोग नहि करबाक चाही। यद्यपि मैथिलीभाषी थारू सहित किछु जातिमे शब्दक आरम्भोमे “ए”केँ य कहि उच्चारण कएल जाइत अछि। ए आ “य”क प्रयोगक सन्दर्भमे प्राचीने पद्धतिक अनुसरण करब उपयुक्त मानि एहि पुस्तकमे ओकरे प्रयोग कएल गेल अछि। किएक तँ दुनूक लेखनमे कोनो सहजता आ दुरूहताक बात नहि अछि। आ मैथिलीक सर्वसाधारणक उच्चारण-शैली यक अपेक्षा एसँ बेसी निकट छैक। खास कऽ कएल, हएब आदि कतिपय शब्दकेँ कैल, हैब आदि रूपमे कतहु-कतहु लिखल जाएब सेहो “ए”क प्रयोगकेँ बेसी समीचीन प्रमाणित करैत अछि। ६.हि, हु तथा एकार, ओकार : मैथिलीक प्राचीन लेखन-परम्परामे कोनो बातपर बल दैत काल शब्दक पाछाँ हि, हु लगाओल जाइत छैक। जेना- हुनकहि, अपनहु, ओकरहु, तत्कालहि, चोट्टहि, आनहु आदि। मुदा आधुनिक लेखनमे हिक स्थानपर एकार एवं हुक स्थानपर ओकारक प्रयोग करैत देखल जाइत अछि। जेना- हुनके, अपनो, तत्काले, चोट्टे, आनो आदि। ७.ष तथा ख : मैथिली भाषामे अधिकांशतः षक उच्चारण ख होइत अछि। जेना- षड्यन्त्र (खड़यन्त्र), षोडशी (खोड़शी), षट्कोण (खटकोण), वृषेश (वृखेश), सन्तोष (सन्तोख) आदि। ८.ध्वनि-लोप : निम्नलिखित अवस्थामे शब्दसँ ध्वनि-लोप भऽ जाइत अछि: (क) क्रियान्वयी प्रत्यय अयमे य वा ए लुप्त भऽ जाइत अछि। ओहिमे सँ पहिने अक उच्चारण दीर्घ भऽ जाइत अछि। ओकर आगाँ लोप-सूचक चिह्न वा विकारी (’ / ऽ) लगाओल जाइछ। जेना- पूर्ण रूप : पढ़ए (पढ़य) गेलाह, कए (कय) लेल, उठए (उठय) पड़तौक। अपूर्ण रूप : पढ़’ गेलाह, क’ लेल, उठ’ पड़तौक। पढ़ऽ गेलाह, कऽ लेल, उठऽ पड़तौक। (ख) पूर्वकालिक कृत आय (आए) प्रत्ययमे य (ए) लुप्त भऽ जाइछ, मुदा लोप-सूचक विकारी नहि लगाओल जाइछ। जेना- पूर्ण रूप : खाए (य) गेल, पठाय (ए) देब, नहाए (य) अएलाह। अपूर्ण रूप : खा गेल, पठा देब, नहा अएलाह। (ग) स्त्री प्रत्यय इक उच्चारण क्रियापद, संज्ञा, ओ विशेषण तीनूमे लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना- पूर्ण रूप : दोसरि मालिनि चलि गेलि। अपूर्ण रूप : दोसर मालिन चलि गेल। (घ) वर्तमान कृदन्तक अन्तिम त लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना- पूर्ण रूप : पढ़ैत अछि, बजैत अछि, गबैत अछि। अपूर्ण रूप : पढ़ै अछि, बजै अछि, गबै अछि। (ङ) क्रियापदक अवसान इक, उक, ऐक तथा हीकमे लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना- पूर्ण रूप: छियौक, छियैक, छहीक, छौक, छैक, अबितैक, होइक। अपूर्ण रूप : छियौ, छियै, छही, छौ, छै, अबितै, होइ। (च) क्रियापदीय प्रत्यय न्ह, हु तथा हकारक लोप भऽ जाइछ। जेना- पूर्ण रूप : छन्हि, कहलन्हि, कहलहुँ, गेलह, नहि। अपूर्ण रूप : छनि, कहलनि, कहलौँ, गेलऽ, नइ, नञि, नै। ९.ध्वनि स्थानान्तरण : कोनो-कोनो स्वर-ध्वनि अपना जगहसँ हटि कऽ दोसर ठाम चलि जाइत अछि। खास कऽ ह्रस्व इ आ उक सम्बन्धमे ई बात लागू होइत अछि। मैथिलीकरण भऽ गेल शब्दक मध्य वा अन्तमे जँ ह्रस्व इ वा उ आबए तँ ओकर ध्वनि स्थानान्तरित भऽ एक अक्षर आगाँ आबि जाइत अछि। जेना- शनि (शइन), पानि (पाइन), दालि ( दाइल), माटि (माइट), काछु (काउछ), मासु (माउस) आदि। मुदा तत्सम शब्द सभमे ई निअम लागू नहि होइत अछि। जेना- रश्मिकेँ रइश्म आ सुधांशुकेँ सुधाउंस नहि कहल जा सकैत अछि। १०.हलन्त(्)क प्रयोग : मैथिली भाषामे सामान्यतया हलन्त (्)क आवश्यकता नहि होइत अछि। कारण जे शब्दक अन्तमे अ उच्चारण नहि होइत अछि। मुदा संस्कृत भाषासँ जहिनाक तहिना मैथिलीमे आएल (तत्सम) शब्द सभमे हलन्त प्रयोग कएल जाइत अछि। एहि पोथीमे सामान्यतया सम्पूर्ण शब्दकेँ मैथिली भाषा सम्बन्धी निअम अनुसार हलन्तविहीन राखल गेल अछि। मुदा व्याकरण सम्बन्धी प्रयोजनक लेल अत्यावश्यक स्थानपर कतहु-कतहु हलन्त देल गेल अछि। प्रस्तुत पोथीमे मथिली लेखनक प्राचीन आ नवीन दुनू शैलीक सरल आ समीचीन पक्ष सभकेँ समेटि कऽ वर्ण-विन्यास कएल गेल अछि। स्थान आ समयमे बचतक सङ्गहि हस्त-लेखन तथा तकनीकी दृष्टिसँ सेहो सरल होबऽबला हिसाबसँ वर्ण-विन्यास मिलाओल गेल अछि। वर्तमान समयमे मैथिली मातृभाषी पर्यन्तकेँ आन भाषाक माध्यमसँ मैथिलीक ज्ञान लेबऽ पड़ि रहल परिप्रेक्ष्यमे लेखनमे सहजता तथा एकरूपतापर ध्यान देल गेल अछि। तखन मैथिली भाषाक मूल विशेषता सभ कुण्ठित नहि होइक, ताहू दिस लेखक-मण्डल सचेत अछि। प्रसिद्ध भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक कहब छनि जे सरलताक अनुसन्धानमे एहन अवस्था किन्नहु ने आबऽ देबाक चाही जे भाषाक विशेषता छाँहमे पडि जाए। -(भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक धारणाकेँ पूर्ण रूपसँ सङ्ग लऽ निर्धारित) आ. मैथिली अकादमी, पटना द्वारा निर्धारित मैथिली लेखन-शैली

१. जे शब्द मैथिली-साहित्यक प्राचीन कालसँ आइ धरि जाहि वर्त्तनीमे प्रचलित अछि, से सामान्यतः ताहि वर्त्तनीमे लिखल जाय- उदाहरणार्थ-

ग्राह्य

एखन ठाम जकर, तकर तनिकर अछि

अग्राह्य अखन, अखनि, एखेन, अखनी ठिमा, ठिना, ठमा जेकर, तेकर तिनकर। (वैकल्पिक रूपेँ ग्राह्य) ऐछ, अहि, ए।

२. निम्नलिखित तीन प्रकारक रूप वैकल्पिकतया अपनाओल जाय: भऽ गेल, भय गेल वा भए गेल। जा रहल अछि, जाय रहल अछि, जाए रहल अछि। कर’ गेलाह, वा करय गेलाह वा करए गेलाह।

३. प्राचीन मैथिलीक ‘न्ह’ ध्वनिक स्थानमे ‘न’ लिखल जाय सकैत अछि यथा कहलनि वा कहलन्हि।

४. ‘ऐ’ तथा ‘औ’ ततय लिखल जाय जत’ स्पष्टतः ‘अइ’ तथा ‘अउ’ सदृश उच्चारण इष्ट हो। यथा- देखैत, छलैक, बौआ, छौक इत्यादि।

५. मैथिलीक निम्नलिखित शब्द एहि रूपे प्रयुक्त होयत: जैह, सैह, इएह, ओऐह, लैह तथा दैह।

६. ह्र्स्व इकारांत शब्दमे ‘इ’ के लुप्त करब सामान्यतः अग्राह्य थिक। यथा- ग्राह्य देखि आबह, मालिनि गेलि (मनुष्य मात्रमे)।

७. स्वतंत्र ह्रस्व ‘ए’ वा ‘य’ प्राचीन मैथिलीक उद्धरण आदिमे तँ यथावत राखल जाय, किंतु आधुनिक प्रयोगमे वैकल्पिक रूपेँ ‘ए’ वा ‘य’ लिखल जाय। यथा:- कयल वा कएल, अयलाह वा अएलाह, जाय वा जाए इत्यादि।

८. उच्चारणमे दू स्वरक बीच जे ‘य’ ध्वनि स्वतः आबि जाइत अछि तकरा लेखमे स्थान वैकल्पिक रूपेँ देल जाय। यथा- धीआ, अढ़ैआ, विआह, वा धीया, अढ़ैया, बियाह।

९. सानुनासिक स्वतंत्र स्वरक स्थान यथासंभव ‘ञ’ लिखल जाय वा सानुनासिक स्वर। यथा:- मैञा, कनिञा, किरतनिञा वा मैआँ, कनिआँ, किरतनिआँ।

१०. कारकक विभक्त्तिक निम्नलिखित रूप ग्राह्य:- हाथकेँ, हाथसँ, हाथेँ, हाथक, हाथमे। ’मे’ मे अनुस्वार सर्वथा त्याज्य थिक। ‘क’ क वैकल्पिक रूप ‘केर’ राखल जा सकैत अछि।

११. पूर्वकालिक क्रियापदक बाद ‘कय’ वा ‘कए’ अव्यय वैकल्पिक रूपेँ लगाओल जा सकैत अछि। यथा:- देखि कय वा देखि कए।

१२. माँग, भाँग आदिक स्थानमे माङ, भाङ इत्यादि लिखल जाय।

१३. अर्द्ध ‘न’ ओ अर्द्ध ‘म’ क बदला अनुसार नहि लिखल जाय, किंतु छापाक सुविधार्थ अर्द्ध ‘ङ’ , ‘ञ’, तथा ‘ण’ क बदला अनुस्वारो लिखल जा सकैत अछि। यथा:- अङ्क, वा अंक, अञ्चल वा अंचल, कण्ठ वा कंठ।

१४. हलंत चिह्न निअमतः लगाओल जाय, किंतु विभक्तिक संग अकारांत प्रयोग कएल जाय। यथा:- श्रीमान्, किंतु श्रीमानक।

१५. सभ एकल कारक चिह्न शब्दमे सटा क’ लिखल जाय, हटा क’ नहि, संयुक्त विभक्तिक हेतु फराक लिखल जाय, यथा घर परक।

१६. अनुनासिककेँ चन्द्रबिन्दु द्वारा व्यक्त कयल जाय। परंतु मुद्रणक सुविधार्थ हि समान जटिल मात्रापर अनुस्वारक प्रयोग चन्द्रबिन्दुक बदला कयल जा सकैत अछि। यथा- हिँ केर बदला हिं।

१७. पूर्ण विराम पासीसँ ( । ) सूचित कयल जाय।

१८. समस्त पद सटा क’ लिखल जाय, वा हाइफेनसँ जोड़ि क’ ,  हटा क’ नहि।

१९. लिअ तथा दिअ शब्दमे बिकारी (ऽ) नहि लगाओल जाय।

२०. अंक देवनागरी रूपमे राखल जाय।

२१.किछु ध्वनिक लेल नवीन चिन्ह बनबाओल जाय। जा' ई नहि बनल अछि ताबत एहि दुनू ध्वनिक बदला पूर्ववत् अय/ आय/ अए/ आए/ आओ/ अओ लिखल जाय। आकि ऎ वा ऒ सँ व्यक्त कएल जाय।

ह./- गोविन्द झा ११/८/७६ श्रीकान्त ठाकुर ११/८/७६ सुरेन्द्र झा "सुमन" ११/०८/७६ २.मैथिलीमे भाषा सम्पादन पाठ्यक्रम नीचाँक सूचीमे देल विकल्पमेसँ लैंगुएज एडीटर द्वारा कोन रूप चुनल जएबाक चाही: वर्ड फाइलमे बोल्ड कएल रूप: १.होयबला/ होबयबला/ होमयबला/ हेब’बला, हेम’बला/ होयबाक/होबएबला /होएबाक २. आ’/आऽ आ ३. क’ लेने/कऽ लेने/कए लेने/कय लेने/ल’/लऽ/लय/लए ४. भ’ गेल/भऽ गेल/भय गेल/भए गेल ५. कर’ गेलाह/करऽ गेलह/करए गेलाह/करय गेलाह ६. लिअ/दिअ लिय’,दिय’,लिअ’,दिय’/ ७. कर’ बला/करऽ बला/ करय बला करै बला/क’र’ बला / करए बला ८. बला वला ९. आङ्ल आंग्ल १०. प्रायः प्रायह ११. दुःख दुख १२. चलि गेल चल गेल/चैल गेल १३. देलखिन्ह देलकिन्ह, देलखिन १४. देखलन्हि देखलनि/ देखलैन्ह १५. छथिन्ह/ छलन्हि छथिन/ छलैन/ छलनि १६. चलैत/दैत चलति/दैति १७. एखनो अखनो १८. बढ़न्हि बढन्हि १९. ओ’/ओऽ(सर्वनाम) ओ २०. ओ (संयोजक) ओ’/ओऽ २१. फाँगि/फाङ्गि फाइंग/फाइङ २२. जे जे’/जेऽ २३. ना-नुकुर ना-नुकर २४. केलन्हि/कएलन्हि/कयलन्हि २५. तखन तँ/ तखन तँ २६. जा’ रहल/जाय रहल/जाए रहल २७. निकलय/निकलए लागल बहराय/ बहराए लागल निकल’/बहरै लागल २८. ओतय/जतय जत’/ओत’/ जतए/ ओतए २९. की फूरल जे कि फूरल जे ३०. जे जे’/जेऽ ३१. कूदि/यादि(मोन पारब) कूइद/याइद/कूद/याद/ यादि (मोन) ३२. इहो/ ओहो ३३. हँसए/ हँसय हँसऽ ३४. नौ आकि दस/नौ किंवा दस/ नौ वा दस ३५. सासु-ससुर सास-ससुर ३६. छह/ सात छ/छः/सात ३७. की की’/कीऽ (दीर्घीकारान्तमे ऽ वर्जित) ३८. जबाब जवाब ३९. करएताह/ करयताह करेताह ४०. दलान दिशि दलान दिश/दलान दिस ४१. गेलाह गएलाह/गयलाह ४२. किछु आर/ किछु और ४३. जाइत छल जाति छल/जैत छल ४४. पहुँचि/ भेटि जाइत छल पहुँच/भेट जाइत छल ४५. जबान (युवा)/ जवान(फौजी) ४६. लय/लए क’/कऽ/लए कए/ लऽ कऽ/ लऽ कए ४७. ल’/लऽ कय/ कए ४८. एखन/अखने अखन/एखने ४९. अहींकेँ अहीँकेँ ५०. गहींर गहीँर ५१. धार पार केनाइ धार पार केनाय/केनाए ५२. जेकाँ जेँकाँ/ जकाँ ५३. तहिना तेहिना ५४. एकर अकर ५५. बहिनउ बहनोइ ५६. बहिन बहिनि ५७. बहिन-बहिनोइ बहिन-बहनउ ५८. नहि/ नै ५९. करबा / करबाय/ करबाए ६०. तँ/ त ऽ तय/तए ६१. भाय भै/भाए ६२. भाँय ६३. यावत जावत ६४. माय मै / माए ६५. देन्हि/दएन्हि/ दयन्हि दन्हि/ दैन्हि ६६. द’/ दऽ/ दए ६७. ओ (संयोजक) ओऽ (सर्वनाम) ६८. तका कए तकाय तकाए ६९. पैरे (on foot) पएरे ७०. ताहुमे ताहूमे

७१. पुत्रीक ७२. बजा कय/ कए ७३. बननाय/बननाइ ७४. कोला ७५. दिनुका दिनका ७६. ततहिसँ ७७. गरबओलन्हि  गरबेलन्हि ७८. बालु बालू ७९. चेन्ह चिन्ह(अशुद्ध) ८०. जे जे’ ८१. से/ के से’/के’ ८२. एखुनका अखनुका ८३. भुमिहार भूमिहार ८४. सुगर सूगर ८५. झठहाक झटहाक ८६. छूबि ८७. करइयो/ओ करैयो/करिऔ-करइयौ ८८. पुबारि पुबाइ ८९. झगड़ा-झाँटी झगड़ा-झाँटि ९०. पएरे-पएरे पैरे-पैरे ९१. खेलएबाक ९२. खेलेबाक ९३. लगा ९४. होए- हो ९५. बुझल बूझल ९६. बूझल (संबोधन अर्थमे) ९७. यैह यएह / इएह ९८. तातिल ९९. अयनाय- अयनाइ/ अएनाइ १००. निन्न- निन्द १०१. बिनु बिन १०२. जाए जाइ १०३. जाइ (in different sense)-last word of sentence १०४. छत पर आबि जाइ १०५. ने १०६. खेलाए (play) –खेलाइ १०७. शिकाइत- शिकायत १०८. ढप- ढ़प १०९. पढ़- पढ ११०. कनिए/ कनिये कनिञे १११. राकस- राकश ११२. होए/ होय होइ ११३. अउरदा- औरदा ११४. बुझेलन्हि (different meaning- got understand) ११५. बुझएलन्हि/ बुझयलन्हि (understood himself) ११६. चलि- चल ११७. खधाइ- खधाय ११८. मोन पाड़लखिन्ह मोन पारलखिन्ह ११९. कैक- कएक- कइएक १२०. लग ल’ग  १२१. जरेनाइ १२२. जरओनाइ- जरएनाइ/जरयनाइ १२३. होइत १२४. गरबेलन्हि/ गरबओलन्हि १२५. चिखैत- (to test)चिखइत १२६. करइयो (willing to do) करैयो १२७. जेकरा- जकरा १२८. तकरा- तेकरा १२९. बिदेसर स्थानेमे/ बिदेसरे स्थानमे १३०. करबयलहुँ/ करबएलहुँ/ करबेलहुँ १३१. हारिक (उच्चारण हाइरक) १३२. ओजन वजन १३३. आधे भाग/ आध-भागे १३४. पिचा / पिचाय/पिचाए १३५. नञ/ ने १३६. बच्चा नञ (ने) पिचा जाय १३७. तखन ने (नञ) कहैत अछि। १३८. कतेक गोटे/ कताक गोटे १३९. कमाइ- धमाइ कमाई- धमाई १४०. लग ल’ग १४१. खेलाइ (for playing) १४२. छथिन्ह छथिन १४३. होइत होइ १४४. क्यो कियो / केओ १४५. केश (hair) १४६. केस (court-case) १४७. बननाइ/ बननाय/ बननाए १४८. जरेनाइ १४९. कुरसी कुर्सी १५०. चरचा चर्चा १५१. कर्म करम १५२. डुबाबए/ डुमाबय/ डुमाबए १५३. एखुनका/ अखुनका १५४. लय (वाक्यक अतिम शब्द)- लऽ १५५. कएलक केलक १५६. गरमी गर्मी १५७. बरदी वर्दी १५८. सुना गेलाह सुना’/सुनाऽ १५९. एनाइ-गेनाइ १६०. तेना ने घेरलन्हि १६१. नञि १६२. डरो ड’रो १६३. कतहु- कहीं १६४. उमरिगर- उमरगर १६५. भरिगर १६६. धोल/धोअल धोएल १६७. गप/गप्प १६८. के के’ १६९. दरबज्जा/ दरबजा १७०. ठाम १७१. धरि तक १७२. घूरि लौटि १७३. थोरबेक १७४. बड्ड १७५. तोँ/ तूँ १७६. तोँहि( पद्यमे ग्राह्य) १७७. तोँही / तोँहि १७८. करबाइए करबाइये १७९. एकेटा १८०. करितथि करतथि

१८१. पहुँचि पहुँच १८२. राखलन्हि रखलन्हि १८३. लगलन्हि लागलन्हि १८४. सुनि (उच्चारण सुइन) १८५. अछि (उच्चारण अइछ) १८६. एलथि गेलथि १८७. बितओने बितेने १८८. करबओलन्हि/ करेलखिन्ह १८९. करएलन्हि १९०. आकि कि १९१. पहुँचि पहुँच १९२. जराय/ जराए जरा (आगि लगा) १९३. से से’ १९४. हाँ मे हाँ (हाँमे हाँ विभक्त्तिमे हटा कए) १९५. फेल फैल १९६. फइल(spacious) फैल १९७. होयतन्हि/ होएतन्हि हेतन्हि १९८. हाथ मटिआयब/ हाथ मटियाबय/हाथ मटिआएब १९९. फेका फेंका २००. देखाए देखा २०१. देखाबए २०२. सत्तरि सत्तर २०३. साहेब साहब २०४.गेलैन्ह/ गेलन्हि २०५.हेबाक/ होएबाक २०६.केलो/ कएलहुँ २०७. किछु न किछु/ किछु ने किछु २०८.घुमेलहुँ/ घुमओलहुँ २०९. एलाक/ अएलाक २१०. अः/ अह २११.लय/ लए (अर्थ-परिवर्त्तन) २१२.कनीक/ कनेक २१३.सबहक/ सभक २१४.मिलाऽ/ मिला २१५.कऽ/ क २१६.जाऽ/ जा २१७.आऽ/ आ २१८.भऽ/भ’ (’ फॉन्टक कमीक द्योतक) २१९.निअम/ नियम २२०.हेक्टेअर/ हेक्टेयर २२१.पहिल अक्षर ढ/ बादक/बीचक ढ़ २२२.तहिं/तहिँ/ तञि/ तैं २२३.कहिं/ कहीं २२४.तँइ/ तइँ २२५.नँइ/ नइँ/  नञि/ नहि २२६.है/ हए २२७.छञि/ छै/ छैक/छइ २२८.दृष्टिएँ/ दृष्टियेँ २२९.आ (come)/ आऽ(conjunction) २३०. आ (conjunction)/ आऽ(come) २३१.कुनो/ कोनो २३२.गेलैन्ह-गेलन्हि २३३.हेबाक- होएबाक २३४.केलौँ- कएलौँ- कएलहुँ २३५.किछु न किछ- किछु ने किछु २३६.केहेन- केहन २३७.आऽ (come)-आ (conjunction-and)/आ २३८. हएत-हैत २३९.घुमेलहुँ-घुमएलहुँ २४०.एलाक- अएलाक २४१.होनि- होइन/होन्हि २४२.ओ-राम ओ श्यामक बीच(conjunction), ओऽ कहलक (he said)/ओ २४३.की हए/ कोसी अएली हए/ की है। की हइ २४४.दृष्टिएँ/ दृष्टियेँ २४५.शामिल/ सामेल २४६.तैँ / तँए/ तञि/ तहिं २४७.जौँ/ ज्योँ २४८.सभ/ सब २४९.सभक/ सबहक २५०.कहिं/ कहीं २५१.कुनो/ कोनो २५२.फारकती भऽ गेल/ भए गेल/ भय गेल २५३.कुनो/ कोनो २५४.अः/ अह २५५.जनै/ जनञ २५६.गेलन्हि/ गेलाह (अर्थ परिवर्तन) २५७.केलन्हि/ कएलन्हि २५८.लय/ लए (अर्थ परिवर्तन) २५९.कनीक/ कनेक २६०.पठेलन्हि/ पठओलन्हि २६१.निअम/ नियम २६२.हेक्टेअर/ हेक्टेयर २६३.पहिल अक्षर रहने ढ/ बीचमे रहने ढ़ २६४.आकारान्तमे बिकारीक प्रयोग उचित नहि/ अपोस्ट्रोफीक प्रयोग फान्टक तकनीकी न्यूनताक परिचायक ओकर बदला अवग्रह (बिकारी) क प्रयोग उचित २६५.केर/-क/ कऽ/ के २६६.छैन्हि- छन्हि २६७.लगैए/ लगैये २६८.होएत/ हएत २६९.जाएत/ जएत २७०.आएत/ अएत/ आओत २७१.खाएत/ खएत/ खैत २७२.पिअएबाक/ पिएबाक २७३.शुरु/ शुरुह २७४.शुरुहे/ शुरुए २७५.अएताह/अओताह/ एताह २७६.जाहि/ जाइ/ जै २७७.जाइत/ जैतए/ जइतए २७८.आएल/ अएल २७९.कैक/ कएक २८०.आयल/ अएल/ आएल २८१. जाए/ जै/ जए २८२. नुकएल/ नुकाएल २८३. कठुआएल/ कठुअएल २८४. ताहि/ तै २८५. गायब/ गाएब/ गएब २८६. सकै/ सकए/ सकय २८७.सेरा/सरा/ सराए (भात सेरा गेल) २८८.कहैत रही/देखैत रही/ कहैत छलहुँ/ कहै छलहुँ- एहिना चलैत/ पढ़ैत (पढ़ै-पढ़ैत अर्थ कखनो काल परिवर्तित)-आर बुझै/ बुझैत (बुझै/ बुझैत छी, मुदा बुझैत-बुझैत)/ सकैत/ सकै। करैत/ करै। दै/ दैत। छैक/ छै। बचलै/ बचलैक। रखबा/ रखबाक । बिनु/ बिन। रातिक/ रातुक २८९. दुआरे/ द्वारे २९०.भेटि/ भेट २९१. खन/ खुना (भोर खन/ भोर खुना) २९२.तक/ धरि २९३.गऽ/गै (meaning different-जनबै गऽ) २९४.सऽ/ सँ (मुदा दऽ, लऽ) २९५.त्त्व,(तीन अक्षरक मेल बदला पुनरुक्तिक एक आ एकटा दोसरक उपयोग) आदिक बदला त्व आदि। महत्त्व/ महत्व/ कर्ता/ कर्त्ता आदिमे त्त संयुक्तक कोनो आवश्यकता मैथिलीमे नहि अछि। वक्तव्य २९६.बेसी/ बेशी २९७.बाला/वाला बला/ वला (रहैबला) २९८.वाली/ (बदलएवाली) २९९.वार्त्ता/ वार्ता ३००. अन्तर्राष्ट्रिय/ अन्तर्राष्ट्रीय ३०१. लेमए/ लेबए ३०२.लमछुरका, नमछुरका ३०२.लागै/ लगै (भेटैत/ भेटै) ३०३.लागल/ लगल ३०४.हबा/ हवा ३०५.राखलक/ रखलक ३०६.आ (come)/ आ (and) ३०७. पश्चाताप/ पश्चात्ताप ३०८. ऽ केर व्यवहार शब्दक अन्तमे मात्र, यथासंभव बीचमे नहि। ३०९.कहैत/ कहै ३१०. रहए (छल)/ रहै (छलै) (meaning different) ३११.तागति/ ताकति ३१२.खराप/ खराब ३१३.बोइन/ बोनि/ बोइनि ३१४.जाठि/ जाइठ ३१५.कागज/ कागच ३१६.गिरै (meaning different- swallow)/ गिरए (खसए) ३१७.राष्ट्रिय/ राष्ट्रीय उच्चारण निर्देश: दन्त न क उच्चारणमे दाँतमे जीह सटत- जेना बाजू नाम , मुदा ण क उच्चारणमे जीह मूर्धामे सटत (नहि सटैए तँ उच्चारण दोष अछि)- जेना बाजू गणेश। तालव्य शमे जीह तालुसँ , षमे मूर्धासँ आ दन्त समे दाँतसँ सटत। निशाँ, सभ आ शोषण बाजि कऽ देखू। मैथिलीमे ष केँ वैदिक संस्कृत जेकाँ ख सेहो उच्चरित कएल जाइत अछि, जेना वर्षा, दोष। य अनेको स्थानपर ज जेकाँ उच्चरित होइत अछि आ ण ड़ जेकाँ (यथा संयोग आ गणेश संजोग आ गड़ेस उच्चरित होइत अछि)। मैथिलीमे व क उच्चारण ब, श क उच्चारण स आ य क उच्चारण ज सेहो होइत अछि। ओहिना ह्रस्व इ बेशीकाल मैथिलीमे पहिने बाजल जाइत अछि कारण देवनागरीमे आ मिथिलाक्षरमे ह्रस्व इ अक्षरक पहिने लिखलो जाइत आ बाजलो जएबाक चाही। कारण जे हिन्दीमे एकर दोषपूर्ण उच्चारण होइत अछि (लिखल तँ पहिने जाइत अछि मुदा बाजल बादमे जाइत अछि), से शिक्षा पद्धतिक दोषक कारण हम सभ ओकर उच्चारण दोषपूर्ण ढंगसँ कऽ रहल छी। अछि- अ इ छ  ऐछ छथि- छ इ थ  – छैथ पहुँचि- प हुँ इ च आब अ आ इ ई ए ऐ ओ औ अं अः ऋ एहि सभ लेल मात्रा सेहो अछि, मुदा एहिमे ई ऐ ओ औ अं अः ऋ केँ संयुक्ताक्षर रूपमे गलत रूपमे प्रयुक्त आ उच्चरित कएल जाइत अछि। जेना ऋ केँ री  रूपमे उच्चरित करब। आ देखियौ- एहि लेल देखिऔ क प्रयोग अनुचित। मुदा देखिऐ लेल देखियै अनुचित। क् सँ ह् धरि अ सम्मिलित भेलासँ क सँ ह बनैत अछि, मुदा उच्चारण काल हलन्त युक्त शब्दक अन्तक उच्चारणक प्रवृत्ति बढ़ल अछि, मुदा हम जखन मनोजमे ज् अन्तमे बजैत छी, तखनो पुरनका लोककेँ बजैत सुनबन्हि- मनोजऽ, वास्तवमे ओ अ युक्त ज् = ज बजै छथि। फेर ज्ञ अछि ज् आ ञ क संयुक्त मुदा गलत उच्चारण होइत अछि- ग्य। ओहिना क्ष अछि क् आ ष क संयुक्त मुदा उच्चारण होइत अछि छ। फेर श् आ र क संयुक्त अछि श्र ( जेना श्रमिक) आ स् आ र क संयुक्त अछि स्र (जेना मिस्र)। त्र भेल त+र । उच्चारणक ऑडियो फाइल विदेह आर्काइव  http://www.videha.co.in/ पर उपलब्ध अछि। फेर केँ / सँ / पर पूर्व अक्षरसँ सटा कऽ लिखू मुदा तँ/ के/ कऽ हटा कऽ। एहिमे सँ मे पहिल सटा कऽ लिखू आ बादबला हटा कऽ। अंकक बाद टा लिखू सटा कऽ मुदा अन्य ठाम टा लिखू हटा कऽ– जेना छहटा मुदा सभ टा। फेर ६अ म सातम लिखू- छठम सातम नहि। घरबलामे बला मुदा घरवालीमे वाली प्रयुक्त करू। रहए- रहै मुदा सकैए (उच्चारण सकै-ए)। मुदा कखनो काल रहए आ रहै मे अर्थ भिन्नता सेहो, जेना से कम्मो जगहमे पार्किंग करबाक अभ्यास रहै ओकरा। पुछलापर पता लागल जे ढुनढुन नाम्ना ई ड्राइवर कनाट प्लेसक पार्किंगमे काज करैत रहए। छलै, छलए मे सेहो एहि तरहक भेल। छलए क उच्चारण छल-ए सेहो। संयोगने- (उच्चारण संजोगने) केँ/ के / कऽ केर- क (केर क प्रयोग नहि करू ) क (जेना रामक) –रामक आ संगे (उच्चारण राम के /  राम कऽ सेहो) सँ- सऽ चन्द्रबिन्दु आ अनुस्वार- अनुस्वारमे कंठ धरिक प्रयोग होइत अछि मुदा चन्द्रबिन्दुमे नहि। चन्द्रबिन्दुमे कनेक एकारक सेहो उच्चारण होइत अछि- जेना रामसँ- (उच्चारण राम सऽ)  रामकेँ- (उच्चारण राम कऽ/ राम के सेहो)। केँ जेना रामकेँ भेल हिन्दीक को (राम को)- राम को= रामकेँ क जेना रामक भेल हिन्दीक का ( राम का) राम का= रामक कऽ जेना जा कऽ भेल हिन्दीक कर ( जा कर) जा कर= जा कऽ सँ भेल हिन्दीक से (राम से) राम से= रामसँ सऽ तऽ त केर एहि सभक प्रयोग अवांछित। के दोसर अर्थेँ प्रयुक्त भऽ सकैए- जेना के कहलक? नञि, नहि, नै, नइ, नँइ, नइँ एहि सभक उच्चारण- नै त्त्व क बदलामे त्व जेना महत्वपूर्ण (महत्त्वपूर्ण नहि) जतए अर्थ बदलि जाए ओतहि मात्र तीन अक्षरक संयुक्ताक्षरक प्रयोग उचित। सम्पति- उच्चारण स म्प इ त (सम्पत्ति नहि- कारण सही उच्चारण आसानीसँ सम्भव नहि)। मुदा सर्वोत्तम (सर्वोतम नहि)। राष्ट्रिय (राष्ट्रीय नहि) सकैए/ सकै (अर्थ परिवर्तन) पोछैले/ पोछैए/ पोछए/ (अर्थ परिवर्तन) पोछए/ पोछै ओ लोकनि ( हटा कऽ, ओ मे बिकारी नहि) ओइ/ ओहि ओहिले/ ओहि लेल जएबेँ/ बैसबेँ पँचभइयाँ देखियौक (देखिऔक बहि- तहिना अ मे ह्रस्व आ दीर्घक मात्राक प्रयोग अनुचित) जकाँ/ जेकाँ तँइ/ तैँ होएत/ हएत नञि/ नहि/ नँइ/ नइँ सौँसे बड़/ बड़ी (झोराओल) गाए (गाइ नहि) रहलेँ/ पहिरतैँ हमहीं/ अहीं सब - सभ सबहक - सभहक धरि - तक गप- बात बूझब - समझब बुझलहुँ - समझलहुँ हमरा आर - हम सभ आकि- आ कि सकैछ/ करैछ (गद्यमे प्रयोगक आवश्यकता नहि) मे केँ सँ पर (शब्दसँ सटा कऽ) तँ कऽ धऽ दऽ (शब्दसँ हटा कऽ) मुदा दूटा वा बेशी विभक्ति संग रहलापर पहिल विभक्ति टाकेँ सटाऊ। एकटा दूटा (मुदा कैक टा) बिकारीक प्रयोग शब्दक अन्तमे, बीचमे अनावश्यक रूपेँ नहि। आकारान्त आ अन्तमे अ क बाद बिकारीक प्रयोग नहि (जेना दिअ, आ ) अपोस्ट्रोफीक प्रयोग बिकारीक बदलामे करब अनुचित आ मात्र फॉन्टक तकनीकी न्यूनताक परिचायक)- ओना बिकारीक संस्कृत रूप ऽ अवग्रह कहल जाइत अछि आ वर्तनी आ उच्चारण दुनू ठाम एकर लोप रहैत अछि/ रहि सकैत अछि (उच्चारणमे लोप रहिते अछि)। मुदा अपोस्ट्रोफी सेहो अंग्रेजीमे पसेसिव केसमे होइत अछि आ फ्रेंचमे शब्दमे जतए एकर प्रयोग होइत अछि जेना raison d’etre एतए सेहो एकर उच्चारण रैजौन डेटर होइत अछि, माने अपोस्ट्रॉफी अवकाश नहि दैत अछि वरन जोड़ैत अछि, से एकर प्रयोग बिकारीक बदला देनाइ तकनीकी रूपेँ सेहो अनुचित)। अइमे, एहिमे जइमे, जाहिमे एखन/ अखन/ अइखन केँ (के नहि) मे (अनुस्वार रहित) भऽ मे दऽ तँ (तऽ त नहि) सँ ( सऽ स नहि) गाछ तर गाछ लग साँझ खन जो (जो go, करै जो do) Festivals of Mithila DATE-LIST (year- 2010-11) (१४१८ साल) Marriage Days: Nov.2010- 19 Dec.2010- 3,8 January 2011- 17, 21, 23, 24, 26, 27, 28 31 Feb.2011- 3, 4, 7, 9, 18, 20, 24, 25, 27, 28 March 2011- 2, 7 May 2011- 11, 12, 13, 18, 19, 20, 22, 23, 29, 30 June 2011- 1, 2, 3, 8, 9, 10, 12, 13, 19, 20, 26, 29 Upanayana Days: February 2011- 8 March 2011- 7 May 2011- 12, 13 June 2011- 6, 12 Dviragaman Din: November 2010- 19, 22, 25, 26 December 2010- 6, 8, 9, 10, 12 February 2011- 20, 21 March 2011- 6, 7, 9, 13 April 2011- 17, 18, 22 May 2011- 5, 6, 8, 13 Mundan Din: November 2010- 24, 26 December 2010- 10, 17 February 2011- 4, 16, 21 March 2011- 7, 9 April 2011- 22 May 2011- 6, 9, 19 June 2011- 3, 6, 10, 20 FESTIVALS OF MITHILA Mauna Panchami-31 July Somavati Amavasya Vrat- 1 August Madhushravani-12 August Nag Panchami- 14 August Raksha Bandhan- 24 Aug Krishnastami- 01 September Kushi Amavasya- 08 September Hartalika Teej- 11 September ChauthChandra-11 September Vishwakarma Pooja- 17 September Karma Dharma Ekadashi-19 September Indra Pooja Aarambh- 20 September Anant Caturdashi- 22 Sep Agastyarghadaan- 23 Sep Pitri Paksha begins- 24 Sep Jimootavahan Vrata/ Jitia-30 Sep Matri Navami- 02 October Kalashsthapan- 08 October Belnauti- 13 October Patrika Pravesh- 14 October Mahastami- 15 October Maha Navami - 16-17 October Vijaya Dashami- 18 October Kojagara- 22 Oct Dhanteras- 3 November Diyabati, shyama pooja- 5 November Annakoota/ Govardhana Pooja-07 November Bhratridwitiya/ Chitragupta Pooja-08 November Chhathi- -12 November Akshyay Navami- 15 November Devotthan Ekadashi- 17 November Kartik Poornima/ Sama Bisarjan- 21 Nov Shaa. ravivratarambh- 21 November Navanna parvan- 24 -26 November Vivaha Panchmi- 10 December Naraknivaran chaturdashi- 01 February Makara/ Teela Sankranti-15 Jan Basant Panchami/ Saraswati Pooja- 08 Februaqry Achla Saptmi- 10 February Mahashivaratri-03 March Holikadahan-Fagua-19 March Holi-20 Mar Varuni Yoga- 31 March va.navaratrarambh- 4 April vaa. Chhathi vrata- 9 April Ram Navami- 12 April Mesha Sankranti-Satuani-14 April Jurishital-15 April Somavati Amavasya Vrata- 02 May Ravi Brat Ant- 08 May Akshaya Tritiya-06 May Janaki Navami- 12 May Vat Savitri-barasait- 01 June Ganga Dashhara-11 June Jagannath Rath Yatra- 3 July Hari Sayan Ekadashi- 11 Jul Aashadhi Guru Poornima-15 Jul VIDEHA ARCHIVE १.विदेह ई-पत्रिकाक सभटा पुरान अंक ब्रेल, तिरहुता आ देवनागरी रूपमे Videha e journal's all old issues in Braille Tirhuta and Devanagari versions विदेह ई-पत्रिकाक पहिल ५० अंक

विदेह ई-पत्रिकाक ५०म सँ आगाँक अंक २.मैथिली पोथी डाउनलोड Maithili Books Download ३.मैथिली ऑडियो संकलन Maithili Audio Downloads ४.मैथिली वीडियोक संकलन Maithili Videos ५.मिथिला चित्रकला/ आधुनिक चित्रकला आ चित्र Mithila Painting/ Modern Art and Photos "विदेह"क एहि सभ सहयोगी लिंकपर सेहो एक बेर जाऊ। ६.विदेह मैथिली क्विज  :  http://videhaquiz.blogspot.com/ ७.विदेह मैथिली जालवृत्त एग्रीगेटर : http://videha-aggregator.blogspot.com/ ८.विदेह मैथिली साहित्य अंग्रेजीमे अनूदित http://madhubani-art.blogspot.com/ ९.विदेहक पूर्व-रूप "भालसरिक गाछ"  : http://gajendrathakur.blogspot.com/ १०.विदेह इंडेक्स  : http://videha123.blogspot.com/ ११.विदेह फाइल : http://videha123.wordpress.com/ १२. विदेह: सदेह : पहिल तिरहुता (मिथिला़क्षर) जालवृत्त (ब्लॉग) http://videha-sadeha.blogspot.com/ १३. विदेह:ब्रेल: मैथिली ब्रेलमे: पहिल बेर विदेह द्वारा http://videha-braille.blogspot.com/ १४.VIDEHA IST MAITHILI  FORTNIGHTLY EJOURNAL ARCHIVE http://videha-archive.blogspot.com/ १५. विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका मैथिली पोथीक आर्काइव http://videha-pothi.blogspot.com/ १६. विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका ऑडियो आर्काइव http://videha-audio.blogspot.com/ १७. विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका वीडियो आर्काइव http://videha-video.blogspot.com/ १८. विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका मिथिला चित्रकला, आधुनिक कला आ चित्रकला http://videha-paintings-photos.blogspot.com/ १९. मैथिल आर मिथिला (मैथिलीक सभसँ लोकप्रिय जालवृत्त) http://maithilaurmithila.blogspot.com/ २०.श्रुति प्रकाशन http://www.shruti-publication.com/ २१.http://groups.google.com/group/videha VIDEHA केर सदस्यता लिअ Top of Form Bottom of Form ईमेल : एहि समूहपर जाऊ २२.http://groups.yahoo.com/group/VIDEHA/ Top of Form Subscribe to VIDEHA Powered by us.groups.yahoo.com Bottom of Form २३.गजेन्द्र ठाकुर इ‍डेक्स http://gajendrathakur123.blogspot.com २४.विदेह रेडियो:मैथिली कथा-कविता आदिक पहिल पोडकास्ट साइट http://videha123radio.wordpress.com/ २५. नेना भुटका http://mangan-khabas.blogspot.com/ महत्त्वपूर्ण सूचना:(१) 'विदेह' द्वारा धारावाहिक रूपे ई-प्रकाशित कएल गेल गजेन्द्र ठाकुरक  निबन्ध-प्रबन्ध-समीक्षा, उपन्यास (सहस्रबाढ़नि) , पद्य-संग्रह (सहस्राब्दीक चौपड़पर), कथा-गल्प (गल्प-गुच्छ), नाटक(संकर्षण), महाकाव्य (त्वञ्चाहञ्च आ असञ्जाति मन) आ बाल-किशोर साहित्य विदेहमे संपूर्ण ई-प्रकाशनक बाद प्रिंट फॉर्ममे। कुरुक्षेत्रम्–अन्तर्मनक खण्ड-१ सँ ७ Combined ISBN No.978-81-907729-7-6 विवरण एहि पृष्ठपर नीचाँमे आ प्रकाशकक साइट http://www.shruti-publication.com/ पर । महत्त्वपूर्ण सूचना (२):सूचना: विदेहक मैथिली-अंग्रेजी आ अंग्रेजी मैथिली कोष (इंटरनेटपर पहिल बेर सर्च-डिक्शनरी) एम.एस. एस.क्यू.एल. सर्वर आधारित -Based on ms-sql server Maithili-English and English-Maithili Dictionary. विदेहक भाषापाक- रचनालेखन स्तंभमे। कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक- गजेन्द्र ठाकुर गजेन्द्र ठाकुरक निबन्ध-प्रबन्ध-समीक्षा, उपन्यास (सहस्रबाढ़नि) , पद्य-संग्रह (सहस्राब्दीक चौपड़पर), कथा-गल्प (गल्प गुच्छ), नाटक(संकर्षण), महाकाव्य (त्वञ्चाहञ्च आ असञ्जाति मन) आ बालमंडली-किशोरजगत विदेहमे संपूर्ण ई-प्रकाशनक बाद प्रिंट फॉर्ममे। कुरुक्षेत्रम्–अन्तर्मनक, खण्ड-१ सँ ७ Ist edition 2009 of Gajendra Thakur’s KuruKshetram-Antarmanak (Vol. I to VII)- essay-paper-criticism, novel, poems, story, play, epics and Children-grown-ups literature in single binding: Language:Maithili ६९२ पृष्ठ : मूल्य भा. रु. 100/-(for individual buyers inside india) (add courier charges Rs.50/-per copy for Delhi/NCR and Rs.100/- per copy for outside Delhi)

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Details for purchase available at print-version publishers's site website: http://www.shruti-publication.com/ or you may write to e-mail:shruti.publication@shruti-publication.com विदेह: सदेह : १: २: ३: ४ तिरहुता : देवनागरी "विदेह" क, प्रिंट संस्करण :विदेह-ई-पत्रिका (http://www.videha.co.in/) क चुनल रचना सम्मिलित। विदेह:सदेह:१: २: ३: ४ सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। Details for purchase available at print-version publishers's site http://www.shruti-publication.com  or you may write to shruti.publication@shruti-publication.com २. संदेश- [ विदेह ई-पत्रिका, विदेह:सदेह मिथिलाक्षर आ देवनागरी आ गजेन्द्र ठाकुरक सात खण्डक- निबन्ध-प्रबन्ध-समीक्षा,उपन्यास (सहस्रबाढ़नि) , पद्य-संग्रह (सहस्राब्दीक चौपड़पर), कथा-गल्प (गल्प गुच्छ), नाटक (संकर्षण), महाकाव्य (त्वञ्चाहञ्च आ असञ्जाति मन) आ बाल-मंडली-किशोर जगत- संग्रह कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक मादेँ। ] १.श्री गोविन्द झा- विदेहकेँ तरंगजालपर उतारि विश्वभरिमे मातृभाषा मैथिलीक लहरि जगाओल, खेद जे अपनेक एहि महाभियानमे हम एखन धरि संग नहि दए सकलहुँ। सुनैत छी अपनेकेँ सुझाओ आ रचनात्मक आलोचना प्रिय लगैत अछि तेँ किछु लिखक मोन भेल। हमर सहायता आ सहयोग अपनेकेँ सदा उपलब्ध रहत। २.श्री रमानन्द रेणु- मैथिलीमे ई-पत्रिका पाक्षिक रूपेँ चला कऽ जे अपन मातृभाषाक प्रचार कऽ रहल छी, से धन्यवाद । आगाँ अपनेक समस्त मैथिलीक कार्यक हेतु हम हृदयसँ शुभकामना दऽ रहल छी। ३.श्री विद्यानाथ झा "विदित"- संचार आ प्रौद्योगिकीक एहि प्रतिस्पर्धी ग्लोबल युगमे अपन महिमामय "विदेह"केँ अपना देहमे प्रकट देखि जतबा प्रसन्नता आ संतोष भेल, तकरा कोनो उपलब्ध "मीटर"सँ नहि नापल जा सकैछ? ..एकर ऐतिहासिक मूल्यांकन आ सांस्कृतिक प्रतिफलन एहि शताब्दीक अंत धरि लोकक नजरिमे आश्चर्यजनक रूपसँ प्रकट हैत। ४. प्रो. उदय नारायण सिंह "नचिकेता"- जे काज अहाँ कए रहल छी तकर चरचा एक दिन मैथिली भाषाक इतिहासमे होएत। आनन्द भए रहल अछि, ई जानि कए जे एतेक गोट मैथिल "विदेह" ई जर्नलकेँ पढ़ि रहल छथि।...विदेहक चालीसम अंक पुरबाक लेल अभिनन्दन। ५. डॉ. गंगेश गुंजन- एहि विदेह-कर्ममे लागि रहल अहाँक सम्वेदनशील मन, मैथिलीक प्रति समर्पित मेहनतिक अमृत रंग, इतिहास मे एक टा विशिष्ट फराक अध्याय आरंभ करत, हमरा विश्वास अछि। अशेष शुभकामना आ बधाइक सङ्ग, सस्नेह...अहाँक पोथी कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक प्रथम दृष्टया बहुत भव्य तथा उपयोगी बुझाइछ। मैथिलीमे तँ अपना स्वरूपक प्रायः ई पहिले एहन  भव्य अवतारक पोथी थिक। हर्षपूर्ण हमर हार्दिक बधाई स्वीकार करी। ६. श्री रामाश्रय झा "रामरंग"(आब स्वर्गीय)- "अपना" मिथिलासँ संबंधित...विषय वस्तुसँ अवगत भेलहुँ।...शेष सभ कुशल अछि। ७. श्री ब्रजेन्द्र त्रिपाठी- साहित्य अकादमी- इंटरनेट पर प्रथम मैथिली पाक्षिक पत्रिका "विदेह" केर लेल बधाई आ शुभकामना स्वीकार करू। ८. श्री प्रफुल्लकुमार सिंह "मौन"- प्रथम मैथिली पाक्षिक पत्रिका "विदेह" क प्रकाशनक समाचार जानि कनेक चकित मुदा बेसी आह्लादित भेलहुँ। कालचक्रकेँ पकड़ि जाहि दूरदृष्टिक परिचय देलहुँ, ओहि लेल हमर मंगलकामना। ९.डॉ. शिवप्रसाद यादव- ई जानि अपार हर्ष भए रहल अछि, जे नव सूचना-क्रान्तिक क्षेत्रमे मैथिली पत्रकारिताकेँ प्रवेश दिअएबाक साहसिक कदम उठाओल अछि। पत्रकारितामे एहि प्रकारक नव प्रयोगक हम स्वागत करैत छी, संगहि "विदेह"क सफलताक शुभकामना। १०. श्री आद्याचरण झा- कोनो पत्र-पत्रिकाक प्रकाशन- ताहूमे मैथिली पत्रिकाक प्रकाशनमे के कतेक सहयोग करताह- ई तऽ भविष्य कहत। ई हमर ८८ वर्षमे ७५ वर्षक अनुभव रहल। एतेक पैघ महान यज्ञमे हमर श्रद्धापूर्ण आहुति प्राप्त होयत- यावत ठीक-ठाक छी/ रहब। ११. श्री विजय ठाकुर- मिशिगन विश्वविद्यालय- "विदेह" पत्रिकाक अंक देखलहुँ, सम्पूर्ण टीम बधाईक पात्र अछि। पत्रिकाक मंगल भविष्य हेतु हमर शुभकामना स्वीकार कएल जाओ। १२. श्री सुभाषचन्द्र यादव- ई-पत्रिका "विदेह" क बारेमे जानि प्रसन्नता भेल। ’विदेह’ निरन्तर पल्लवित-पुष्पित हो आ चतुर्दिक अपन सुगंध पसारय से कामना अछि। १३. श्री मैथिलीपुत्र प्रदीप- ई-पत्रिका "विदेह" केर सफलताक भगवतीसँ कामना। हमर पूर्ण सहयोग रहत। १४. डॉ. श्री भीमनाथ झा- "विदेह" इन्टरनेट पर अछि तेँ "विदेह" नाम उचित आर कतेक रूपेँ एकर विवरण भए सकैत अछि। आइ-काल्हि मोनमे उद्वेग रहैत अछि, मुदा शीघ्र पूर्ण सहयोग देब।कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक देखि अति प्रसन्नता भेल। मैथिलीक लेल ई घटना छी। १५. श्री रामभरोस कापड़ि "भ्रमर"- जनकपुरधाम- "विदेह" ऑनलाइन देखि रहल छी। मैथिलीकेँ अन्तर्राष्ट्रीय जगतमे पहुँचेलहुँ तकरा लेल हार्दिक बधाई। मिथिला रत्न सभक संकलन अपूर्व। नेपालोक सहयोग भेटत, से विश्वास करी। १६. श्री राजनन्दन लालदास- "विदेह" ई-पत्रिकाक माध्यमसँ बड़ नीक काज कए रहल छी, नातिक अहिठाम देखलहुँ। एकर वार्षिक अ‍ंक जखन प्रिं‍ट निकालब तँ हमरा पठायब। कलकत्तामे बहुत गोटेकेँ हम साइटक पता लिखाए देने छियन्हि। मोन तँ होइत अछि जे दिल्ली आबि कए आशीर्वाद दैतहुँ, मुदा उमर आब बेशी भए गेल। शुभकामना देश-विदेशक मैथिलकेँ जोड़बाक लेल।.. उत्कृष्ट प्रकाशन कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक लेल बधाइ। अद्भुत काज कएल अछि, नीक प्रस्तुति अछि सात खण्डमे।  मुदा अहाँक सेवा आ से निःस्वार्थ तखन बूझल जाइत जँ अहाँ द्वारा प्रकाशित पोथी सभपर दाम लिखल नहि रहितैक। ओहिना सभकेँ विलहि देल जइतैक। (स्पष्टीकरण-  श्रीमान्, अहाँक सूचनार्थ विदेह द्वारा ई-प्रकाशित कएल सभटा सामग्री आर्काइवमे https://sites.google.com/a/videha.com/videha-pothi/ पर बिना मूल्यक डाउनलोड लेल उपलब्ध छै आ भविष्यमे सेहो रहतैक। एहि आर्काइवकेँ जे कियो प्रकाशक अनुमति लऽ कऽ प्रिंट रूपमे प्रकाशित कएने छथि आ तकर ओ दाम रखने छथि ताहिपर हमर कोनो नियंत्रण नहि अछि।- गजेन्द्र ठाकुर)...   अहाँक प्रति अशेष शुभकामनाक संग। १७. डॉ. प्रेमशंकर सिंह- अहाँ मैथिलीमे इंटरनेटपर पहिल पत्रिका "विदेह" प्रकाशित कए अपन अद्भुत मातृभाषानुरागक परिचय देल अछि, अहाँक निःस्वार्थ मातृभाषानुरागसँ प्रेरित छी, एकर निमित्त जे हमर सेवाक प्रयोजन हो, तँ सूचित करी। इंटरनेटपर आद्योपांत पत्रिका देखल, मन प्रफुल्लित भऽ गेल। १८.श्रीमती शेफालिका वर्मा- विदेह ई-पत्रिका देखि मोन उल्लाससँ भरि गेल। विज्ञान कतेक प्रगति कऽ रहल अछि...अहाँ सभ अनन्त आकाशकेँ भेदि दियौ, समस्त विस्तारक रहस्यकेँ तार-तार कऽ दियौक...। अपनेक अद्भुत पुस्तक कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक विषयवस्तुक दृष्टिसँ गागरमे सागर अछि। बधाई। १९.श्री हेतुकर झा, पटना-जाहि समर्पण भावसँ अपने मिथिला-मैथिलीक सेवामे तत्पर छी से स्तुत्य अछि। देशक राजधानीसँ भय रहल मैथिलीक शंखनाद मिथिलाक गाम-गाममे मैथिली चेतनाक विकास अवश्य करत। २०. श्री योगानन्द झा, कबिलपुर, लहेरियासराय- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पोथीकेँ निकटसँ देखबाक अवसर भेटल अछि आ मैथिली जगतक एकटा उद्भट ओ समसामयिक दृष्टिसम्पन्न हस्ताक्षरक कलमबन्द परिचयसँ आह्लादित छी। "विदेह"क देवनागरी सँस्करण पटनामे रु. 80/- मे उपलब्ध भऽ सकल जे विभिन्न लेखक लोकनिक छायाचित्र, परिचय पत्रक ओ रचनावलीक सम्यक प्रकाशनसँ ऐतिहासिक कहल जा सकैछ। २१. श्री किशोरीकान्त मिश्र- कोलकाता- जय मैथिली, विदेहमे बहुत रास कविता, कथा, रिपोर्ट आदिक सचित्र संग्रह देखि आ आर अधिक प्रसन्नता मिथिलाक्षर देखि- बधाई स्वीकार कएल जाओ। २२.श्री जीवकान्त- विदेहक मुद्रित अंक पढ़ल- अद्भुत मेहनति। चाबस-चाबस। किछु समालोचना मरखाह..मुदा सत्य। २३. श्री भालचन्द्र झा- अपनेक कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक देखि बुझाएल जेना हम अपने छपलहुँ अछि। एकर विशालकाय आकृति अपनेक सर्वसमावेशताक परिचायक अछि। अपनेक रचना सामर्थ्यमे उत्तरोत्तर वृद्धि हो, एहि शुभकामनाक संग हार्दिक बधाई। २४.श्रीमती डॉ नीता झा- अहाँक कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़लहुँ। ज्योतिरीश्वर शब्दावली, कृषि मत्स्य शब्दावली आ सीत बसन्त आ सभ कथा, कविता, उपन्यास, बाल-किशोर साहित्य सभ उत्तम छल। मैथिलीक उत्तरोत्तर विकासक लक्ष्य दृष्टिगोचर होइत अछि। २५.श्री मायानन्द मिश्र- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक मे हमर उपन्यास स्त्रीधनक जे विरोध कएल गेल अछि तकर हम विरोध करैत छी।... कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पोथीक लेल शुभकामना।(श्रीमान् समालोचनाकेँ विरोधक रूपमे नहि लेल जाए।-गजेन्द्र ठाकुर) २६.श्री महेन्द्र हजारी- सम्पादक श्रीमिथिला- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़ि मोन हर्षित भऽ गेल..एखन पूरा पढ़यमे बहुत समय लागत, मुदा जतेक पढ़लहुँ से आह्लादित कएलक। २७.श्री केदारनाथ चौधरी- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक अद्भुत लागल, मैथिली साहित्य लेल ई पोथी एकटा प्रतिमान बनत। २८.श्री सत्यानन्द पाठक- विदेहक हम नियमित पाठक छी। ओकर स्वरूपक प्रशंसक छलहुँ। एम्हर अहाँक लिखल - कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक देखलहुँ। मोन आह्लादित भऽ उठल। कोनो रचना तरा-उपरी। २९.श्रीमती रमा झा-सम्पादक मिथिला दर्पण। कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक प्रिंट फॉर्म पढ़ि आ एकर गुणवत्ता देखि मोन प्रसन्न भऽ गेल, अद्भुत शब्द एकरा लेल प्रयुक्त कऽ रहल छी। विदेहक उत्तरोत्तर प्रगतिक शुभकामना। ३०.श्री नरेन्द्र झा, पटना- विदेह नियमित देखैत रहैत छी। मैथिली लेल अद्भुत काज कऽ रहल छी। ३१.श्री रामलोचन ठाकुर- कोलकाता- मिथिलाक्षर विदेह देखि मोन प्रसन्नतासँ भरि उठल, अंकक विशाल परिदृश्य आस्वस्तकारी अछि। ३२.श्री तारानन्द वियोगी- विदेह आ कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक देखि चकबिदोर लागि गेल। आश्चर्य। शुभकामना आ बधाई। ३३.श्रीमती प्रेमलता मिश्र “प्रेम”- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़लहुँ। सभ रचना उच्चकोटिक लागल। बधाई। ३४.श्री कीर्तिनारायण मिश्र- बेगूसराय- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक बड्ड नीक लागल, आगांक सभ काज लेल बधाई। ३५.श्री महाप्रकाश-सहरसा- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक नीक लागल, विशालकाय संगहि उत्तमकोटिक। ३६.श्री अग्निपुष्प- मिथिलाक्षर आ देवाक्षर विदेह पढ़ल..ई प्रथम तँ अछि एकरा प्रशंसामे मुदा हम एकरा दुस्साहसिक कहब। मिथिला चित्रकलाक स्तम्भकेँ मुदा अगिला अंकमे आर विस्तृत बनाऊ। ३७.श्री मंजर सुलेमान-दरभंगा- विदेहक जतेक प्रशंसा कएल जाए कम होएत। सभ चीज उत्तम। ३८.श्रीमती प्रोफेसर वीणा ठाकुर- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक उत्तम, पठनीय, विचारनीय। जे क्यो देखैत छथि पोथी प्राप्त करबाक उपाय पुछैत छथि। शुभकामना। ३९.श्री छत्रानन्द सिंह झा- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़लहुँ, बड्ड नीक सभ तरहेँ। ४०.श्री ताराकान्त झा- सम्पादक मैथिली दैनिक मिथिला समाद- विदेह तँ कन्टेन्ट प्रोवाइडरक काज कऽ रहल अछि। कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक अद्भुत लागल। ४१.डॉ रवीन्द्र कुमार चौधरी- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक बहुत नीक, बहुत मेहनतिक परिणाम। बधाई। ४२.श्री अमरनाथ- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक आ विदेह दुनू स्मरणीय घटना अछि, मैथिली साहित्य मध्य। ४३.श्री पंचानन मिश्र- विदेहक वैविध्य आ निरन्तरता प्रभावित करैत अछि, शुभकामना। ४४.श्री केदार कानन- कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक लेल अनेक धन्यवाद, शुभकामना आ बधाइ स्वीकार करी। आ नचिकेताक भूमिका पढ़लहुँ। शुरूमे तँ लागल जेना कोनो उपन्यास अहाँ द्वारा सृजित भेल अछि मुदा पोथी उनटौला पर ज्ञात भेल जे एहिमे तँ सभ विधा समाहित अछि। ४५.श्री धनाकर ठाकुर- अहाँ नीक काज कऽ रहल छी। फोटो गैलरीमे चित्र एहि शताब्दीक जन्मतिथिक अनुसार रहैत तऽ नीक। ४६.श्री आशीष झा- अहाँक पुस्तकक संबंधमे एतबा लिखबा सँ अपना कए नहि रोकि सकलहुँ जे ई किताब मात्र किताब नहि थीक, ई एकटा उम्मीद छी जे मैथिली अहाँ सन पुत्रक सेवा सँ निरंतर समृद्ध होइत चिरजीवन कए प्राप्त करत। ४७.श्री शम्भु कुमार सिंह- विदेहक तत्परता आ क्रियाशीलता देखि आह्लादित भऽ रहल छी। निश्चितरूपेण कहल जा सकैछ जे समकालीन मैथिली पत्रिकाक इतिहासमे विदेहक नाम स्वर्णाक्षरमे लिखल जाएत। ओहि कुरुक्षेत्रक घटना सभ तँ अठारहे दिनमे खतम भऽ गेल रहए मुदा अहाँक कुरुक्षेत्रम् तँ अशेष अछि। ४८.डॉ. अजीत मिश्र- अपनेक प्रयासक कतबो प्रश‍ंसा कएल जाए कमे होएतैक। मैथिली साहित्यमे अहाँ द्वारा कएल गेल काज युग-युगान्तर धरि पूजनीय रहत। ४९.श्री बीरेन्द्र मल्लिक- अहाँक कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक आ विदेह:सदेह पढ़ि अति प्रसन्नता भेल। अहाँक स्वास्थ्य ठीक रहए आ उत्साह बनल रहए से कामना। ५०.श्री कुमार राधारमण- अहाँक दिशा-निर्देशमे विदेह पहिल मैथिली ई-जर्नल देखि अति प्रसन्नता भेल। हमर शुभकामना। ५१.श्री फूलचन्द्र झा प्रवीण-विदेह:सदेह पढ़ने रही मुदा कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक देखि बढ़ाई देबा लेल बाध्य भऽ गेलहुँ। आब विश्वास भऽ गेल जे मैथिली नहि मरत। अशेष शुभकामना। ५२.श्री विभूति आनन्द- विदेह:सदेह देखि, ओकर विस्तार देखि अति प्रसन्नता भेल। ५३.श्री मानेश्वर मनुज-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक एकर भव्यता देखि अति प्रसन्नता भेल, एतेक विशाल ग्रन्थ मैथिलीमे आइ धरि नहि देखने रही। एहिना भविष्यमे काज करैत रही, शुभकामना। ५४.श्री विद्यानन्द झा- आइ.आइ.एम.कोलकाता- कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक विस्तार, छपाईक संग गुणवत्ता देखि अति प्रसन्नता भेल। ५५.श्री अरविन्द ठाकुर-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक मैथिली साहित्यमे कएल गेल एहि तरहक पहिल प्रयोग अछि, शुभकामना। ५६.श्री कुमार पवन-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक पढ़ि रहल छी। किछु लघुकथा पढ़ल अछि, बहुत मार्मिक छल। ५७. श्री प्रदीप बिहारी-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक देखल, बधाई। ५८.डॉ मणिकान्त ठाकुर-कैलिफोर्निया- अपन विलक्षण नियमित सेवासँ हमरा लोकनिक हृदयमे विदेह सदेह भऽ गेल अछि। ५९.श्री धीरेन्द्र प्रेमर्षि- अहाँक समस्त प्रयास सराहनीय। दुख होइत अछि जखन अहाँक प्रयासमे अपेक्षित सहयोग नहि कऽ पबैत छी। ६०.श्री देवशंकर नवीन- विदेहक निरन्तरता आ विशाल स्वरूप- विशाल पाठक वर्ग, एकरा ऐतिहासिक बनबैत अछि। ६१.श्री मोहन भारद्वाज- अहाँक समस्त कार्य देखल, बहुत नीक। एखन किछु परेशानीमे छी, मुदा शीघ्र सहयोग देब। ६२.श्री फजलुर रहमान हाशमी-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक मे एतेक मेहनतक लेल अहाँ साधुवादक अधिकारी छी। ६३.श्री लक्ष्मण झा "सागर"- मैथिलीमे चमत्कारिक रूपेँ अहाँक प्रवेश आह्लादकारी अछि।..अहाँकेँ एखन आर..दूर..बहुत दूरधरि जेबाक अछि। स्वस्थ आ प्रसन्न रही। ६४.श्री जगदीश प्रसाद मंडल-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक पढ़लहुँ । कथा सभ आ उपन्यास सहस्रबाढ़नि पूर्णरूपेँ पढ़ि गेल छी। गाम-घरक भौगोलिक विवरणक जे सूक्ष्म वर्णन सहस्रबाढ़निमे अछि, से चकित कएलक, एहि संग्रहक कथा-उपन्यास मैथिली लेखनमे विविधता अनलक अछि। समालोचना शास्त्रमे अहाँक दृष्टि वैयक्तिक नहि वरन् सामाजिक आ कल्याणकारी अछि, से प्रशंसनीय। ६५.श्री अशोक झा-अध्यक्ष मिथिला विकास परिषद- कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक लेल बधाई आ आगाँ लेल शुभकामना। ६६.श्री ठाकुर प्रसाद मुर्मु- अद्भुत प्रयास। धन्यवादक संग प्रार्थना जे अपन माटि-पानिकेँ ध्यानमे राखि अंकक समायोजन कएल जाए। नव अंक धरि प्रयास सराहनीय। विदेहकेँ बहुत-बहुत धन्यवाद जे एहेन सुन्दर-सुन्दर सचार (आलेख) लगा रहल छथि। सभटा ग्रहणीय- पठनीय। ६७.बुद्धिनाथ मिश्र- प्रिय गजेन्द्र जी,अहाँक सम्पादन मे प्रकाशित ‘विदेह’आ ‘कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक’ विलक्षण पत्रिका आ विलक्षण पोथी! की नहि अछि अहाँक सम्पादनमे? एहि प्रयत्न सँ मैथिली क विकास होयत,निस्संदेह। ६८.श्री बृखेश चन्द्र लाल- गजेन्द्रजी, अपनेक पुस्तक कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक पढ़ि मोन गदगद भय गेल , हृदयसँ अनुगृहित छी । हार्दिक शुभकामना । ६९.श्री परमेश्वर कापड़ि - श्री गजेन्द्र जी । कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक पढ़ि गदगद आ नेहाल भेलहुँ। ७०.श्री रवीन्द्रनाथ ठाकुर- विदेह पढ़ैत रहैत छी। धीरेन्द्र प्रेमर्षिक मैथिली गजलपर आलेख पढ़लहुँ। मैथिली गजल कत्तऽ सँ कत्तऽ चलि गेलैक आ ओ अपन आलेखमे मात्र अपन जानल-पहिचानल लोकक चर्च कएने छथि। जेना मैथिलीमे मठक परम्परा रहल अछि। (स्पष्टीकरण- श्रीमान्, प्रेमर्षि जी ओहि आलेखमे ई स्पष्ट लिखने छथि जे किनको नाम जे छुटि गेल छन्हि तँ से मात्र आलेखक लेखकक जानकारी नहि रहबाक द्वारे, एहिमे आन कोनो कारण नहि देखल जाय। अहाँसँ एहि विषयपर विस्तृत आलेख सादर आमंत्रित अछि।-सम्पादक) ७१.श्री मंत्रेश्वर झा- विदेह पढ़ल आ संगहि अहाँक मैगनम ओपस कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक सेहो, अति उत्तम। मैथिलीक लेल कएल जा रहल अहाँक समस्त कार्य अतुलनीय अछि। ७२. श्री हरेकृष्ण झा- कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक मैथिलीमे अपन तरहक एकमात्र ग्रन्थ अछि, एहिमे लेखकक समग्र दृष्टि आ रचना कौशल देखबामे आएल जे लेखकक फील्डवर्कसँ जुड़ल रहबाक कारणसँ अछि। ७३.श्री सुकान्त सोम- कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक मे  समाजक इतिहास आ वर्तमानसँ अहाँक जुड़ाव बड्ड नीक लागल, अहाँ एहि क्षेत्रमे आर आगाँ काज करब से आशा अछि। ७४.प्रोफेसर मदन मिश्र- कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक सन किताब मैथिलीमे पहिले अछि आ एतेक विशाल संग्रहपर शोध कएल जा सकैत अछि। भविष्यक लेल शुभकामना। ७५.प्रोफेसर कमला चौधरी- मैथिलीमे कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक सन पोथी आबए जे गुण आ रूप दुनूमे निस्सन होअए, से बहुत दिनसँ आकांक्षा छल, ओ आब जा कऽ पूर्ण भेल। पोथी एक हाथसँ दोसर हाथ घुमि रहल अछि, एहिना आगाँ सेहो अहाँसँ आशा अछि। ७६.श्री उदय चन्द्र झा "विनोद": गजेन्द्रजी, अहाँ जतेक काज कएलहुँ अछि से मैथिलीमे आइ धरि कियो नहि कएने छल। शुभकामना। अहाँकेँ एखन बहुत काज आर करबाक अछि। ७७.श्री कृष्ण कुमार कश्यप: गजेन्द्र ठाकुरजी, अहाँसँ भेँट एकटा स्मरणीय क्षण बनि गेल। अहाँ जतेक काज एहि बएसमे कऽ गेल छी ताहिसँ हजार गुणा आर बेशीक आशा अछि। ७८.श्री मणिकान्त दास: अहाँक मैथिलीक कार्यक प्रशंसा लेल शब्द नहि भेटैत अछि। अहाँक कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक सम्पूर्ण रूपेँ पढ़ि गेलहुँ। त्वञ्चाहञ्च बड्ड नीक लागल। विदेह मैथिली साहित्य आन्दोलन (c)२००४-१०. सर्वाधिकार लेखकाधीन आ जतय लेखकक नाम नहि अछि ततय संपादकाधीन। विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। सह-सम्पादक: उमेश मंडल। सहायक सम्पादक: शिव कुमार झा आ मुन्नाजी (मनोज कुमार कर्ण)। भाषा-सम्पादन: नागेन्द्र कुमार झा आ पञ्जीकार विद्यानन्द झा। कला-सम्पादन: ज्योति सुनीत चौधरी आ रश्मि रेखा सिन्हा। सम्पादक-शोध-अन्वेषण: डॉ. जया वर्मा आ डॉ. राजीव कुमार वर्मा। रचनाकार अपन मौलिक आ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि) ggajendra@videha.com केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx, .rtf वा .txt फॉर्मेटमे पठा सकैत छथि। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेताह, से आशा करैत छी। रचनाक अंतमे टाइप रहय, जे ई रचना मौलिक अछि, आ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। मेल प्राप्त होयबाक बाद यथासंभव शीघ्र ( सात दिनक भीतर) एकर प्रकाशनक अंकक सूचना देल जायत। ’विदेह' प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका अछि आ एहिमे मैथिली, संस्कृत आ अंग्रेजीमे मिथिला आ मैथिलीसँ संबंधित रचना प्रकाशित कएल जाइत अछि। एहि ई पत्रिकाकेँ श्रीमति लक्ष्मी ठाकुर द्वारा मासक ०१ आ १५ तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि। (c) 2004-10 सर्वाधिकार सुरक्षित। विदेहमे प्रकाशित सभटा रचना आ आर्काइवक सर्वाधिकार रचनाकार आ संग्रहकर्त्ताक लगमे छन्हि। रचनाक अनुवाद आ पुनः प्रकाशन किंवा आर्काइवक उपयोगक अधिकार किनबाक हेतु ggajendra@videha.co.in पर संपर्क करू। एहि साइटकेँ प्रीति झा ठाकुर, मधूलिका चौधरी आ रश्मि प्रिया द्वारा डिजाइन कएल गेल। सिद्धिरस्तु वि दे ह विदेह Videha বিদেহ  विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका Videha Ist Maithili Fortnightly e Magazine  विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका 'विदेह' ७२ म अंक १५ दिसम्बर २०१० (वर्ष ३ मास ३६ अंक ७२)http://www.videha.co.in/ मानुषीमिह संस्कृताम् ISSN 2229-547X VIDEHA वि दे ह विदेह Videha বিদেহ  विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका Videha Ist Maithili Fortnightly e Magazine  विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका 'विदेह' ७२ म अंक १५ दिसम्बर २०१० (वर्ष ३ मास ३६ अंक ७२)http://www.videha.co.in/ मानुषीमिह संस्कृताम् ISSN 2229-547X VIDEHA

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