VIDEHA — Issue 73 / अंक ७३

Publication: VIDEHA · Issue: 73
Open original PDF at Internet Archive

474 473 ISSN 2229-547X VIDEHA 'विदेह' ७३ म अंक ०१ जनवरी २०११ (वर्ष ४ मास ३७ अंक ७३) वि  दे  ह विदेह Videha বিদেহ http://www.videha.co.in  विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका Videha Ist Maithili Fortnightly e Magazine   नव अंक देखबाक लेल पृष्ठ सभकेँ रिफ्रेश कए देखू। Always refresh the pages for viewing new issue of VIDEHA. Read in your own script Roman(Eng)Gujarati Bangla Oriya Gurmukhi Telugu Tamil Kannada Malayalam Hindi एहि अंकमे अछि:- १. संपादकीय संदेश २. गद्य २.१. जगदीश प्रसाद मंडल- एकटा दीर्घकथा मइटुग्‍गर आ एकटा एकांकी समझौता २.२.१. बेचन ठाकुर- नाटक- बेटीक अपमानक गतांशसँ आगाँ २.रमाकान्‍त राय 'रमा'- मैथि‍ल पत्र-पत्रि‍का : समस्‍या ओ समाधान : आचार्य दि‍व्‍यचक्षु २.३.१.प्रदीप बिहारीक दू गोट विहनि कथा-सत्संगी- थापड़ २. लक्ष्‍मी दास- विहनि कथा- बूड़ि‍बकक बूड़ि‍बक ३.डॉ. कैलाश कुमार मि‍श्र- यायावरी- मलि‍क भाय केर फुटपाथी चिंतन ४.बिपिन झा- की नब साल की पुरान साल..! ५.मुन्नाजी- रिपोर्ताज- ६. नवेन्दु कुमार झा १.रेल लाइनसँ जुड़त भारत आ नेपाल २. भारतीय सामाजिक व्यवस्थामे आइयो जीवन्त अछि जाति व्यवस्था- प्रो. शर्मा  ३.प्रदेशमे लागत चौदहटा नव उद्योग समूह, असोचैम कएलक एहि दिस पहल- मिथिलांचलमे सेहो लागत नव उद्योग २.४.हम पुछैत छी -मुन्नाजी- १.जगदीश प्रसाद मंडल, २.राजदेव मंडल, ३. कुमार शैलेन्द्र आ ४.अमरनाथ सँ मुन्नाजी पुछैत छथि ढेर रास गप..... २.५.१. भारत भूषण झा- कथा- आत्‍मबल कथाक शेषांश २.शि‍व कुमार झा "टि‍ल्‍लू" विहनि कथा-लेबर पेन ३.मनोज कुमार मंडल- कथा- बेमेल वि‍आह ४.ज्योति- विहनि कथा- मैथिल बियाह ५.मि‍थि‍लेश मंडल- कथा- वि‍देशी बाबू २.६.१.डा० अभयधारी सिंह- अभिनव वर्ष २.जगदीश प्रसाद मंडल- मैथि‍ली उपन्‍यास साहि‍त्‍यमे ग्रामीण चि‍त्रण २.७.१.रमेश- गद्य कविता- डॉ. काञ्चीनाथ झा ‘किरण’क नामक अद्वैत मीमांसा २. जितेन्‍द्र झा- उपटैत गाम बसाओत बाबा ३. सुजीतकुमार झा- नेपालक राष्‍ट्रपतिक नेपाली प्रेम २.८.१. विनीत उत्पल- दीर्घकथा- घोड़ीपर चढ़ि लेब हम डिग्री -आगाँ २. शंभु नाथ झा ‘वत्स’ ३. पद्य ३.१.१.आरसीप्रसाद सिंह- गुलाबी गजल २. डॉ. नरेश कुमार ‘वि‍कल’- दूटा आर गजल ३.मुन्नाजी- दूटा गजल ३.२. रवि भूषण पाठक- एहि बेर छठि मे ३.३.१.राजदेव मंडल -झगड़लगौना पि‍शाच/  गाछक बलि‍दान /  हेराएल २.जगदीश प्रसाद मंडल २ टा गीत- बीतल बर्खक वि‍दाइ/ फनकी ३.४.राजेश मोहन झा- कवि‍ता-  सुगर फ्री ३.५.१.नवीन कुमार "आशा"- हमरा भेटल २.शंभु नाथ झा ‘वत्स’उग्रवादी बनि जाए। ३.६.१. अजित मिश्र- नब वर्ष/ सुन्दर मनगर पर्व महान २. डॉ. शेफालिका वर्मा- नव वर्ष ३. सतीश चन्द्र झा- नव वर्ष ४.सुबोध ठाकुर- प्रतीक्षा ३.७.१.किशन कारीग़र- आबि गेल नव वर्ष २.  राम वि‍लास साहु -कवि‍ता- कोइली कूहकै आमक डारि‍ ३.८.गंगेश गुंजन- राधा- २८ म खेप ४. मिथिला कला-संगीत-१.श्वेता झा चौधरी २.ज्योति सुनीत चौधरी ३श्वेता झा (सिंगापुर) बालानां कृते-१. गजेन्द्र ठाकुर- बड़द करैए दाउन ने यौ २. नवीन कुमार “आशा”- याद अबैए बाबाक लावा भाषापाक रचना-लेखन -[मानक मैथिली], [विदेहक मैथिली-अंग्रेजी आ अंग्रेजी मैथिली कोष (इंटरनेटपर पहिल बेर सर्च-डिक्शनरी) एम.एस. एस.क्यू.एल. सर्वर आधारित -Based on ms-sql server Maithili-English and English-Maithili Dictionary.] VIDEHA FOR NON RESIDENTS Original Poem in Maithili by Kalikant Jha "Buch" Translated into English by Jyoti Jha Chaudhary विदेह ई-पत्रिकाक सभटा पुरान अंक ( ब्रेल, तिरहुता आ देवनागरी मे ) पी.डी.एफ. डाउनलोडक लेल नीचाँक लिंकपर उपलब्ध अछि। All the old issues of Videha e journal ( in Braille, Tirhuta and Devanagari versions ) are available for pdf download at the following link. विदेह ई-पत्रिकाक सभटा पुरान अंक ब्रेल, तिरहुता आ देवनागरी रूपमे Videha e journal's all old issues in Braille Tirhuta and Devanagari versions विदेह ई-पत्रिकाक पहिल ५० अंक

विदेह ई-पत्रिकाक ५०म सँ आगाँक अंक विदेह आर.एस.एस.फीड। "विदेह" ई-पत्रिका ई-पत्रसँ प्राप्त करू। अपन मित्रकेँ विदेहक विषयमे सूचित करू। ↑ विदेह आर.एस.एस.फीड एनीमेटरकेँ अपन साइट/ ब्लॉगपर लगाऊ। ब्लॉग "लेआउट" पर "एड गाडजेट" मे "फीड" सेलेक्ट कए "फीड यू.आर.एल." मे http://www.videha.co.in/index.xml टाइप केलासँ सेहो विदेह फीड प्राप्त कए सकैत छी। गूगल रीडरमे पढ़बा लेल http://reader.google.com/ पर जा कऽ Add a  Subscription बटन क्लिक करू आ खाली स्थानमे http://www.videha.co.in/index.xml पेस्ट करू आ Add  बटन दबाऊ। मैथिली देवनागरी वा मिथिलाक्षरमे नहि देखि/ लिखि पाबि रहल छी, (cannot see/write Maithili in Devanagari/ Mithilakshara follow links below or contact at ggajendra@videha.com) तँ एहि हेतु नीचाँक लिंक सभ पर जाऊ। संगहि विदेहक स्तंभ मैथिली भाषापाक/ रचना लेखनक नव-पुरान अंक पढ़ू। http://devanaagarii.net/ http://kaulonline.com/uninagari/  (एतए बॉक्समे ऑनलाइन देवनागरी टाइप करू, बॉक्ससँ कॉपी करू आ वर्ड डॉक्युमेन्टमे पेस्ट कए वर्ड फाइलकेँ सेव करू। विशेष जानकारीक लेल ggajendra@videha.com पर सम्पर्क करू।)(Use Firefox 3.0 (from WWW.MOZILLA.COM )/ Opera/ Safari/ Internet Explorer 8.0/ Flock 2.0/ Google Chrome for best view of 'Videha' Maithili e-journal at http://www.videha.co.in/ .) Go to the link below for download of old issues of VIDEHA Maithili e magazine in .pdf format and Maithili Audio/ Video/ Book/ paintings/ photo files. विदेहक पुरान अंक आ ऑडियो/ वीडियो/ पोथी/ चित्रकला/ फोटो सभक फाइल सभ (उच्चारण, बड़ सुख सार आ दूर्वाक्षत मंत्र सहित) डाउनलोड करबाक हेतु नीचाँक लिंक पर जाऊ। VIDEHA ARCHIVE विदेह आर्काइव भारतीय डाक विभाग द्वारा जारी कवि, नाटककार आ धर्मशास्त्री विद्यापतिक स्टाम्प। भारत आ नेपालक माटिमे पसरल मिथिलाक धरती प्राचीन कालहिसँ महान पुरुष ओ महिला लोकनिक कर्मभूमि रहल अछि। मिथिलाक महान पुरुष ओ महिला लोकनिक चित्र 'मिथिला रत्न' मे देखू। गौरी-शंकरक पालवंश कालक मूर्त्ति, एहिमे मिथिलाक्षरमे (१२०० वर्ष पूर्वक) अभिलेख अंकित अछि। मिथिलाक भारत आ नेपालक माटिमे पसरल एहि तरहक अन्यान्य प्राचीन आ नव स्थापत्य, चित्र, अभिलेख आ मूर्त्तिकलाक़ हेतु देखू 'मिथिलाक खोज' मिथिला, मैथिल आ मैथिलीसँ सम्बन्धित सूचना, सम्पर्क, अन्वेषण संगहि विदेहक सर्च-इंजन आ न्यूज सर्विस आ मिथिला, मैथिल आ मैथिलीसँ सम्बन्धित वेबसाइट सभक समग्र संकलनक लेल देखू "विदेह सूचना संपर्क अन्वेषण" विदेह जालवृत्तक डिसकसन फोरमपर जाऊ। "मैथिल आर मिथिला" (मैथिलीक सभसँ लोकप्रिय जालवृत्त) पर जाऊ। १. संपादकीय दरभंगाक दोकानमे मैट्रिकक सिलेबसक गाइडक अतिरिक्त कोनो मैथिली पोथी नै भेटै छलै, कोनो एक साहित्यकारक मुँहसँ दोसराक प्रति आदर वचन नै निकलै छलै, कियो अतिथि सम्पादक बनि अहाँक रचनाक चोरि केलक तँ ओकरा अहाँ पकड़ी तँ ताहिपर एकमत नै होइ जाइ छलाह उन्टे दोषीकेँ पीठ ठोकै जाइ छलाह, शब्दशः चोरि आ आक्रान्त वा प्रभावित भेल रचनाक अन्तर ककरा नै बुझल छैक आ ओहि आरिमे शब्दशः चोरि केनिहारक पीठ ठोकब! विदेहक आगमनक बाद एहि सभमे परिवर्तन आएल, एकरा के नकारि सकत। गजलशास्त्र- आगाँ आब एक धक्का फेरसँ  मैथिलीक उच्चारण निर्देश आ ह्रस्व-दीर्घ विचारपर आउ। शास्त्रमे प्रयुक्त ‘गुरु’ आ ‘लघु’ छंदक परिचय प्राप्त करू।

तेरह टा स्वर वर्णमे अ,इ,उ,ऋ,लृ - ह्र्स्व आर आ,ई,ऊ,ऋ,ए.ऐ,ओ,औ- दीर्घ स्वर अछि।

ई स्वर वर्ण जखन व्यंजन वर्णक संग जुड़ि जाइत अछि तँ ओकरासँ ‘गुणिताक्षर’ बनैत अछि।

क्+अ= क,

क्+आ=का ।

एक स्वर मात्रा आकि एक गुणिताक्षरकेँ एक ‘अक्षर’ कहल जाइत अछि। कोनो व्यंजन मात्रकेँ अक्षर नहि मानल जाइत अछि- जेना ‘अवाक्’ शब्दमे दू टा अक्षर अछि, अ, वा ।

१. सभटा ह्रस्व स्वर आ ह्रस्व युक्त गुणिताक्षर ‘लघु’ मानल जाइत अछि। एकरा ऊपर U लिखि एकर संकेत देल जाइत अछि।

२. सभटा दीर्घ स्वर आर दीर्घ स्वर युक्त गुणिताक्षर ‘गुरु’ मानल जाइत अछि, आ एकर संकेत अछि, ऊपरमे एकटा छोट -।

३. अनुस्वार किंवा विसर्गयुक्त सभ अक्षर गुरू मानल जाइत अछि।

४. कोनो अक्षरक बाद संयुक्ताक्षर किंवा व्यंजन मात्र रहलासँ ओहि अक्षरकेँ गुरु मानल जाइत अछि। जेना- अच्, सत्य। एहिमे अ आ स दुनू गुरु अछि। जेना कहल गेल अछि जे अनुस्वार आ विसर्गयुक्त भेलासँ दीर्घ होएत तहिना आब कहल जा रहल अछि जे चन्द्रबिन्दु आ ह्रस्वक मेल ह्रस्व होएत। माने चन्द्रबिन्दु+ह्रस्व स्वर= एक मात्रा संयुक्ताक्षर: एतए मात्रा गानल जाएत एहि तरहेँ:- क्ति= क् + त् + इ = ०+०+१= १ क्ती= क् + त् + ई = ०+०+२= २ क्ष= क् + ष= ०+१ त्र= त् + र= ०+१ ज्ञ= ज् + ञ= ०+१ श्र= श् + र= ०+१ स्र= स् +र= ०+१ शृ =श् +ऋ= ०+१ त्व= त् +व= ०+१ त्त्व= त् + त् + व= ० + ० + १ ह्रस्व + ऽ = १ + ० अ वा दीर्घक बाद बिकारीक प्रयोग नहि होइत अछि जेना दिअऽ आऽ ओऽ (दोषपूर्ण प्रयोग)। हँ व्यंजन+अ गुणिताक्षरक बाद बिकारी दऽ सकै छी। ह्रस्व + चन्द्रबिन्दु= १+० दीर्घ+ चन्द्रबिन्दु= २+० जेना हँसल= १+१+१ साँस= २+१ बिकारी आ चन्द्रबिन्दुक गणना शून्य होएत। जा कऽ = २+१ क् =० क= क् +अ= ०+१ किएक तँ क केँ क् पढ़बाक प्रवृत्ति मैथिलीमे आबि गेल तेँ बिकारी देबाक आवश्यकता पड़ल, दीर्घ स्वरमे एहन आवश्यकता नहि अछि। U- ह्रस्वक चेन्ह ।- दीर्घक चेन्ह १ बहरे मुतकारिब मुतकारिब आठ–रुक्न फ ऊ लुन (U।।) – चारि बेर अनेरे धुनेरे जतेको ठकेलौं बकैतो ढ़कैतो सुझेलौं घनेरौं बजेने अबैए घुरेने अबैए सुझै छै बहुत्ते बजै छै अनेरौं कुकूरो बजैए बिलाड़ीक भाषा मुदा ई सियारो अजीबे कहेलौं अहा की सुनेलौं कथा आ पिहानी सखीयो सुनैले अबैए सरिपौं २ बहरे मुतदारिक मुतदारिक आठ–रुक्न फा इ लुन (।U।) – चारि बेर बीकि गेलै तँ की जोतबै खेतमे झीकि लेतै तँ की बोलतै बेरमे जानि गेलै तँ बातोसँ काटौ कने जान एतै तँ देहोसँ जे टेब ने आरि धेने जँ जाए तँ ठीक छै भेष धेने जँ से सोझाँ कि नीक-ए बेर भेलै अबेरेसँ ओ ठाढ़ छै बात भेने घुरेतै कि विश्वास-ए ३ बहरे कामिल कामिल आठ–रुक्न मु त फा इ लुन (UU।U।) – चारि बेर इनसान जे कहबैत छै सकुचा कऽ छै जँ ठकैल यौ बहरा कऽ जे कहतै जँ नै सहिते तँ छै कमजोर यौ मरखाह जे छी हम छी तँ छी कहबै उमेरक छै कमी बुढ़हा बकैत तँ की कहौ करतै समेत बकैत यौ हरबाह जे हम छी कहैत सभे समेटि सकैत छी चरबाह जे हम छी हँटैत तँ से झमाड़ि सकैत यौ अकबारमे निकलैत छै कहबैत छै जँ सएह यौ बिसबासमे सहटैत ओ हटबैत छै बिसबास यौ ४ बहरे वाफिर वाफिर आठ–रुक्न म फा इ ल तुन (U।UU।) – चारि बेर अबै अछि ओ सुनै अछि ओ जँ जाइत छै बसै अछि ओ कहै अछि जे सुनै अछि ओ जँ खाइत छै ढकै अछि ओ बनै अछि आब नै गढ़ि जे जँ से अछि नै बनै अछि की बनै अछि ओ गढ़ै अछि ओ जँ पाबि कऽ नै करै अछि ओ हकैम कऽ छी हमेँ बनि गेल अलैस कऽ नै धएल कनी करै अछि ओ धरै अछि ओ जँ पाबि कऽ नै कतेक ई ओ हकासल छी पियासल छी निरासल छी अभागल छी करै अछि ओ नमै अछि ओ जँ जाति कऽ ऐ पियासलो ओ ५ बहरे रमल रमल आठ–रुक्न फा इ ला तुन (।U।।) – चारि बेर झूरझामो भेल छी से बात ने की काटने की से समेटू से लपेटू आर की की आरने छी की कहेलौं की गमेलौं की कहू की बात केलौं सूनि छी से कैकटा की बात मोने घातमे छी ऊगि गेलौं डूमि गेलौं के कहैए की कहैए से अनेरो हे अभागे लेब से तैं बाटमे छी नानिटा छै से कहै छै पैघकेँ की बात पूछी देखलौं ई कूहि काटै बात जेतै ताकिमे छी ६ बहरे रजज रजज आठ–रुक्न मुस तफ इ लुन (।।U।) – चारि बेर ऐ ओतऽ की छै केहनो आ की अते की छी अए नै छै कएलो नै सुनै छै की करै भेटैत-ए भाँमै अए लै छै अरे भेलै कने सैक्त सुझै नै छै अ अः नै छै अ अः सीधा अनै बैसै अए आनो अनै बोनो रहै साफे करै नौरीसँ यौ झाड़ी अनै बाड़ी अनै बेली अनै सूंघै अए लैतो हए ऐठाँ हए आबै हए जैठाँ हए बातो अबै झातो अबै सूनै अहौ माथोसँ ए ७ बहरे हजज हजज :-आठ–रुक्न म फा ई लुन (U।।।) – चारि बेर अबै छै नै सुनै छै नै बहीरो छै बुझै छै से नरैमे छी कटै की से जजातो छै बुझै छै से महामाला महाडाला महाभावो महा हा हा छिनै छै ओ बहै छै जे करै छै से बुझै छै से एके बेरे समेटै छै एकोटा नै बातो छै की कहै छी आ करै छी आ सभे गोटा बुझै छी से लऽ की केलौं भऽ की गेलौं समेटैमे अनेरो ओ जएबामे संगो भेटै बुझै नै ओ बुझै छी से १.आब सामिल अराकानक आठ–रुक्नक छः–रुक्न - तीन बेर/ आ चारि–रुक्न - दू बेरक प्रयोग देखब। ई सभ मुफरद बहर अछि माने रुक्नक बेर-बेर प्रयोग होइत अछि। २.एकर अतिरिक्त सामिल अराकानक १२ टा मुरक्कब बहर अछि माने दू प्रकारक अरकानक बेर-बेर अएलासँ १२ सालिम बहर, संगीतक भाषामे मिश्रित। ई तीन तरहक अछि:- ४ रुक्नक बहर, ६ रुक्नक बहर, ८ रुक्नक बहर / मुरक्कब (मिश्रित) पूर्णाक्षरी (सालिम) बहर- १२ टा –तवील, मदीद, मुनसरेह, मुक्तज़ब, मज़ारे, मुजतस, ख़फीफ, बसीत, सरीअ, जदीद, क़रीब, मुशाकिल। ३.आ तकर बाद सामिल आ मुजाहिफ अराकान दुनूक मेलपेँचसँ बनल १२ टा बहर मख्बून, अखरब, महजूफ, मक्तूअ, मक्बूज, मुज्मर, मरफू, मासूब, महजूज, मकफूफ, मश्कूल, आ अस्लम बहरक चर्च होएत। ४.आ एहिमे मात्र मुजाहिफ अराकानसँ बनल बेशी प्रयुक्त चारिटा बहर (मुक्तजब, मजारे, मुजतस आ खफीफ) क चर्च करब। १.आब सामिल अराकानक आठ–रुक्नक छः–रुक्न - तीन बेर/ आ चारि–रुक्न - दू बेरक प्रयोग देखब। ई सभ मुफरद बहर अछि माने रुक्नक बेर-बेर प्रयोग होइत अछि। बहरे मुतकारिब छः–रुक्न फ ऊ लुन (U।।) – तीन बेर एके बेरमे जे कएलौं बड़े भेर भेनेँ सुनेलौँ करिक्का रच्छसा अएलै डरे भाखणो भेलै कतेकोँ सुनैतो अरे ओ रहै छै बनै छै अनेरो सुधगाँ बड़ी टाक ई बेर बीतै कनी टाक ई छाह पीटौँ बहरे मुतकारिब चारि–रुक्न फ ऊ लुन (U।।) – दू बेर बड़ी दूर ठाढ़े कनी दूर नाचे बुझै नै कनीको बुरै छै दुलारे सखा ने सहेली लगै छै बताहे मनीषी बहूते कतेको हुलेने बहरे मुतदारिक छः–रुक्न फा इ लुन (।U।) – तीन बेर एकरे केलहा केलहीं तैं अनेरे दुर्गा भेलहीं घास फूसो सुखा गेलए मालजालो मरै देखहीं आसपासो बहूतो छलै भेल भादो हेलौं कनीं सेकलो सूखलो जे मकै रोटिका देखि छूटै हँसीं बहरे मुतदारिक चारि–रुक्न फा इ लुन (।U।) – दू बेर काहि काटी एतै बात बाँटी एतै से भने भेलहेँ नेप चूतै एतै भेल भोरे कुनो सेप घोंटी ततै आहि रे आहि रे जाइ छी की जतै बहरे हजज :- छः–रुक्न म फा ई लुन (U।।।) – तीन बेर अनेरे भऽ गेलैं ऐ लड़ैले गै तखैनो जे भऽ जेतै की गमैए गै सुनैए जे हँसैए से बुझै छी ई करैए जे बचैए से कहाँ ई गै नठैए जे लगैए से चलाको की लबारी ई बकैए की बुझेलौ गै बलू ई जे ढकै छै हेँ देखौ ओ छै सभा भारी सभामध्ये झुकेलौं गै बहरे हजज :- चारि–रुक्न म फा ई लुन (U।।।) – दू बेर कने बेगार बेमारी कते की बात सुनाबी घटै छै बाध कतेको बेढ़ै छै गाम नोथारी चलै छी ओहि सेनामे जतै भेलौं स-संहारी चलू बीसो अनेको छै सहै छी ई भले हो की बहरे रजज़ छः–रुक्न मुस तफ इ लुन (।।U।) – तीन बेर ई जे धरा देखैसँ छै हेतै तँ नै ई जे घटा घूमैसँ घूमै ने तँ नै जैठाम छी से नै रही ने से कने ई बात छै ई घात छै ने से हेतै नै छै कनेको राति बाँचै भाँति ई के सूनि के की सूतलै ई माटि यै नै प्रेम नै छै आइ एत्तै संसदोमे आ छै कने की प्रेम जे भेटै कने यै बहरे रजज़ चारि–रुक्न मुस तफ इ लुन (।।U।) – दू बेर भोरे अएलै कोन गै सोझे न एलै फोन गै बहरे रमल  छः–रुक्न फा इ ला तुन (।U।।)– तीन बेर की गरीबो की धनीको तैँ सभे छी की समीपो की कतेको जे घुमै छी बहरे रमल  चारि–रुक्न फा इ ला तुन (।U।।)– दू बेर की कतेको बात भेलै की जतेको लात खेलै बहरे वाफ़िर  छः–रुक्न म फा इ ल तुन (U।UU।) – तीन बेर कने ककरा कहेबइ आ बतेबइ की जते सुनबै तते कहता बतेबइ की बहरे वाफ़िर  चारि–रुक्न म फा इ ल तुन (U।UU।)– दू बेर करेजक बात छै कतबो करेजक हाल ई नञि हो बहरे कामिल  छः–रुक्न मु त फा इ लुन (UU।U।) – तीन बेर अनका कतौ कहबै कने सुनतै कहाँ सुनि ओ बजौ करतै कने जितबै जहाँ बहरे कामिल  चारि–रुक्न मु त फा इ लुन (UU।U।) – दू बेर पहिले अनै तखने सुनै कहबै कते कखनो करै २.एकर अतिरिक्त सामिल अराकानक १२ टा मुरक्कब बहर अछि माने दू प्रकारक अरकानक बेर-बेर अएलासँ १२ सालिम बहर, संगीतक भाषामे मिश्रित। ई तीन तरहक अछि:- ४ रुक्नक बहर, ६ रुक्नक बहर, ८ रुक्नक बहर / मुरक्कब (मिश्रित) पूर्णाक्षरी (सालिम) बहर- १२ टा –तवील, मदीद, मुनसरेह, मुक्तज़ब, मज़ारे, मुजतस, ख़फीफ, बसीत, सरीअ, जदीद, क़रीब, मुशाकिल। बहरे तवील फ–ऊ–लुन U।। मफा–ई–लुन U।।। कहेबै सुनेबै की मुदा जे कहेतै से सुनेतै उकारो की मुदा जे बजेतै से बहरे मदीद फा–इ–ला–तुन ।U।। फा–इ–लुन।U। सूनि बाजू मूँहमे कैकटा छै बातमे बूझि बाजूमीत यौ कैकटा छै घातमे बहरे मुनसरेह मुस–तफ–इ–लुन ।।U। मफ–ऊ–ला–तु ।।।U की की रहै की की भेल कोनो भला कोनो सैह माँ माँ करी पैघो भेल सेहो जरौ सेहो जैह बहरे मुक्तजब मफ–ऊ–ला–तु ।।।U मुस–तफ–इ–लुन ।।U। रामोनाम सेहो उठा रामोनाम सेहो जरा रामोनाम मोहो लए रामोनाम बातो करा बहरे मजारे मफा–ई–लुन U।।। फा–इ–ला–तुन ।U।। अरे की छी सैह नै की अरे छी छी वैह ने छी बिसारी की उघारी की अरे की की देब ने की बहरे मुजतस मुस–तफ–इ–लुन ।।U। फा–इ–ला–तुन ।U।। नै छै रमा नै रहीमो नै छै मरा नै मरीजो नै ई कनेको मृतो छै नै ई कनेको जियै ओ बहरे खफीफ फा–इ–ला–तुन ।U।। मुस–तफ–इ–लुन ।।U। फा–इ–ला–तुन ।U।। रेख राखू फेकू तँ नै देख लेलौं सूनि राखू बेरो तँ नै बीति गेलौं बहरे बसीत मुस–तफ–इ–लुन ।।U। फा–इ–लुन।U। की की रहै की भऽ गै की की छलै की भऽ नै रीतो बितै ने कऽ गै गीतो बितै गाबि नै बहरे सरीअ मुस–तफ–इ–लुन ।।U। मुस–तफ–इ–लुन ।।U। मफ–ऊ–ला–तु ।।।U सेहो कने छै ने अते की केहैत लेरो चुबै छै ने अते की केहैत बहरे जदीद फा–इ–ला–तुन ।U।। फा–इ–ला–तुन ।U।। मुस–तफ–इ–लुन ।।U। लेलहेँ ई बेगुणो आ भेलै भने बेलगो ई नैहरो आ गेलै भने बहरे करीब मफा–ई–लुन U।।। मफा–ई–लुन U।।। फा–इ–ला–तुन ।U।। चलै छै ई कने बाटो जाइ छै नै गतातोमे भने कोनो बात छै नै बहरे मुशाकिल फा–इ–ला–तुन ।U।। मफा–ई–लुन U।।। मफा–ई–लुन U।।। मोदमानी अहोभागी कनी छै की क्रोध जानी प्रणो खाली बनै छै की ३.आ तकर बाद सामिल आ मुजाहिफ अराकान दुनूक मेलपेँचसँ बनल १२ टा बहर मख्बून, अखरब, महजूफ, मक्तूअ, मक्बूज, मुज्मर, मरफू, मासूब, महजूज, मकफूफ, मश्कूल, आ अस्लम बहरक चर्च होएत। मख्बून: बहरे रमल मुसद्दस मख्बून फा–इ–ला–तुन ।U।। फ–इ–ला–लुन UU।। फ–इ–ला–लुन UU।। खेल खेला असली ऐ अगबे नै मिलमिला अँखिगौरो बतहा नै अखरब: बहरे हजज मुरब्बा अखरब मफ–ऊ–लु ।।U मफा–ई–लुन U।।। की भेल लटू बूड़ू के गेल अत्ते जोड़ू महजूफ: बहरे रमल मुसम्मन महजूफ फा–इ–ला–तुन ।U।। फा–इ–ला–तुन ।U।। फा–इ–ला–तुन ।U।। फा इ लुन । U । एनमेनो भेल गेलौ आश आगाँ बीतलौ सूनि गेलौं नै भगेलौं नाश नारा गीत यौ मक्तूअ: बहरे मुतदारिक मुसद्दस मक्तूअ फा–इ–लुन।U। फा–इ–लुन।U। फै–लुन ।। कीसँ की भेल छी बाबू कीसँ की कैल छी आगू मक्बूज: बहरे मुतकारिब मुसम्मन मक्बूज (एहिमे सभटा मुज़ाहिफ अरकान) फ ऊ लुन U । । फ ऊ लुन U । । फ ऊ लुन U । । फ–ऊ–लु U।U अरे रे अहाँ जे कहेलौं सिनेह अरे रे अहाँ जे बजेलौं सिनेह मुज्मर: बहरे कामिल मुसद्दस मुज्मर (एहिमे सभटा अरकान सामिल) मु–त–फा–इ–लुन UU।U। मु–त–फा–इ–लुन UU।U। मुस–तफ–इ–लुन ।।U। अनठयने रहबै रहबै हरे हे रोमबै अनठयने रहबै रहबै अरे हे घूरिऐ मरफू: बहरे मुक्तजिब मुसद्दस मरफू मफ–ऊ–ला–तु ।।।U मफ–ऊ–ला–तु ।।।U मफ–ऊ–लु ।।U की की रेह की की सैह निंघेस की की रेह की की यैह निंघेस मासूब – बहरे वाफिर मुसद्दस (एहिमे सभटा अरकान सामिल) मफा–इ–ल–तुन U।UU। मफा–इ–ल–तुन U।UU। मफा–ई–लुन U।।। अरे अनलौं सुहागिन यै अनेरो की अरे अनलौं मुहोथरिमे जनेरो की महजूज: बहरे मुतदारिक मुसम्मन महजूज (एहिमे सभटा मुज़ाहिफ अरकान) फा इ लुन । U । फा इ लुन । U । फा इ लुन । U । फा । के रहै सूनि यै ई अहाँकेँ के रहै कूदि यै ई अहाँकेँ मकफूफ: बहरे हजज मुसम्मन मकफूफ मफा–ई–लुन U।।। मफा–ई–लुन U।।। मफा–ई–लुन U।।। म–फा–ई–लु U।।U अनेरे की अनेरे की धुनेरे की कहेलौं हँ अनेरे की अनेरे की धुनेरे की कहेलौं हँ मश्कूल: बहरे रमल मुसम्मन मश्कूल फा–इ–ला–तुन ।U।। फा–इ–ला–तुन ।U।। फा–इ–ला–तुन ।U।। मफ–ऊ–लु ।।U सूनि सुन्झा केलियै ने कोन पापी छोड़ाइ सूनि सुन्झा केलियै ने कोन पापी छोड़ाइ अस्लम: बहरे मुतकारिब मुसद्दस अस्लम फ–ऊ–लुन U।। फ–ऊ–लुन U।। फ–अल् U। अरे की अरे की अहाँ अरे की अरे की अहाँ ४.आ एहिमे मात्र मुजाहिफ अराकानसँ बनल बेशी प्रयुक्त चारिटा बहर (मुक्तजब, मजारे, मुजतस आ खफीफ) क चर्च करब। बहरे मुक्तजब (मुजाहिफ रूप) (अपूर्णाक्षरी आठ रुक्न):फ ऊ लु U । U फै लुन U । फ ऊ लु U।U फै लुन। । कतेक गपो कतेक सप्पो कतेक मिलै रहैत छै ओ बहरे मज़ारे (मुजाहिफ रूप) (अपूर्णाक्षरी आठ रुक्न):मफ ऊ लु । । U फा इ ला तु । U । U म फा ई लु U । । U फा इ लुन। U । / फा इ ला न। U । U ने छैक नै इनाम कते कोन छानि गै ने छैक नै नकाम कते कोन काज गै बहरे मुजतस (मुजाहिफ रूप) (अपूर्णाक्षरी आठ–रुक्न):म फा इ लुन U । U । फ इ ला तुन U U । । म फा इ लुन U । U । फै लुन। ।/ फ–इ–लुन UU। भने भले करतै की भने भले भेटौ कते कते जरतै ई कते कने देखौ बहरे ख़फीफ़ (मुजाहिफ रूप) (अपूर्णाक्षरी छः रुक्न):फा इ ला तुन । U । । म फा इ लुन U । U । फै लुन। । / फ इ लुन U U । देख लेलौं दिवारसँ बेचै कखनो बेख देखै गछारसँ हेतै निक ओ गजल द्वारा किछु संदेश, किछु भावनात्मक अभिव्यक्ति, किछु जीवन दर्शन, सौन्दर्य आकि प्रेम ओ विरहक सौन्दर्य प्रदर्शित रहबाक चाही। किछु एहेन जे सायास नै अनायास होअए। तेँ गजल आन पद्य-कविता जेना- कहल जएबाक चाही, लिखल नै। लिखल तँ चित्र जाइत अछि- मिथिला चित्रकला लिखिया द्वारा लिखल जाइत अछि, संस्कृतमे हम कहै छिऐ- अहं चित्रं लिखामि। गजलक विषय अलग होइत अछि, गजलशास्त्रक अधारपर भजन लिख देलासँ ओ गजल नै भऽ जाएत। अरबीमे तँ गजलक अर्थे होइ छै स्त्रीसँ वार्तालाप। गजल प्रेम विरहक बादो, नै पौलाक बादो, लोकापवाद आ तथाकथित अवैध रहलाक उत्तरो प्रेमक रस लैत अछि। ई प्रेम भगवान आ भक्तक बीच सेहो भऽ सकैत अछि, शारीरिक आ आध्यात्मिक भऽ सकैत अछि। ई राधाक प्रेम भऽ सकैत अछि तँ मीराक सेहो। ई प्रेम दुनू दिससँ हो सेहो जरूरी नै। भावनाक उद्रेक आ संगमे गजल कहि कऽ आत्मतुष्टिक लेल गजलकार भावनाक उद्रेककेँ क्षणिक नै वास्तविक आ स्थायी बनाबथि तखने नीक गजल लिखि सकै छथि। बहर आ छन्दक मिलानी वर्ण छन्दमे तीन-तीन अक्षरक समूहकेँ एक गण कहल जाइत अछि। ई आठ टा अछि- यगण  U।। रगण ।U। तगण ।। U भगण । U U जगण U। U सगण U U । मगण ।।। नगण U U U एहि आठक अतिरिक्त दूटा आर गण अछि- ग / ल ग- गण एकल दीर्घ । ल- गण एकल ह्रस्व U एक सूत्र- आठो गणकेँ मोन रखबा लेल:- यमाताराजभानसलगम् आब एहि सूत्रकेँ तोड़ू- यमाता U।। = यगण मातारा  ।।। = मगण ताराज ।। U = तगण राजभा ।U। = रगण जभान U। U = जगण भानस । U U = भगण नसल U U U = नगण सलगम् U U । = सगण बहरे मुतकारिब मुतकारिब आठ–रुक्न फ ऊ लुन (U।।) – चारि बेर वर्णवृत्त भुजंगप्रयात  : प्रति चरण यगण (U।।) – चारि बेर। बारह वर्ण। पहिल, चारिम, सातम आ दसम ह्रस्व, शेष दीर्घ। छअम आ आखिरी वर्णक बाद अर्द्ध-विराम। बहरे मुतकारिब चारि–रुक्न फ ऊ लुन (U।।) – दू बेर वर्ण वृत्त सोमराजी यगण (U।।) – दू बेर। छह वर्ण। पहिल आ चारिम ह्रस्व, शेष दीर्घ। दोसर आ अन्तिम वर्णक बाद अर्द्ध-विराम। मात्रिक रूप- प्रति चरण बीस मात्रा। पहिल, छअम, एगारहम आ सोलहम मात्रा ह्रस्व। बहरे मुतदारिक मुतदारिक आठ–रुक्न फा इ लुन (।U।) – चारि बेर वर्ण वृत्त स्रग्विणी रगण (।U।) – चारि बेर। बारह वर्ण। दोसर, पाँचम, आठम आ एगारहम ह्रस्व आ शेष दीर्घ। छअम आ आखिरी वर्णक बाद अर्द्ध-विराम। मात्रिक रूप- प्रति चरण बीस मात्रा। तेसर, आठम, तेरहम आ अठ्ठारहम मात्रा ह्रस्व। महजूफ: बहरे रमल मुसम्मन महजूफ फा–इ–ला–तुन ।U।। फा–इ–ला–तुन ।U।। फा–इ–ला–तुन ।U।। फा इ लुन । U । मात्रिक छंद गीतिका -प्रति चरण २६  मात्रा। तेसर, दसम, सत्रहम आ चौबीसम मात्रा ह्रस्व। गीतिका-वर्णवृत्त २० वर्ण एकटा सगण, दूटा जगण, एकटा भगण, एकटा रगण, एकटा सगण, एकटा लगण आ एकटा गगण। तेसर, पाँचम, आठम, दसम, तेरहम, पन्द्रहम, अठारहम आ बीसम वर्ण दीर्घ आ शेष ह्रस्व। पाँचम, बारहम आ अन्तिम वर्णक बाद अर्द्ध-विराम। महजूज: बहरे मुतदारिक मुसम्मन महजूज (एहिमे सभटा मुज़ाहिफ अरकान) फा इ लुन । U । फा इ लुन । U । फा इ लुन । U । फा । वर्ण वृत्त बाला-१० वर्ण। प्रति चरण रगण । U । तीन बेर आ फेर एकटा दीर्घ । मात्रिक रूप- प्रति चरण सत्रह मात्रा। तेसर, आठम, तेरहम मात्रा ह्रस्व आ आखिरीमे एक दीर्घ । आकि दूटा ह्रस्व U सोमदेवकेँ प्रबोध साहित्य सम्मान २०११ देल जाएत।

सोमदेव 1934- उपन्यासकार ओ कवि । साहित्य अकादेमी पुरस्कारसँ सम्मानित । प्रकाशित कृति: चानोदाइ, होटल अनारकली (उपन्यास), काल ध्वनि (कविता संग्रह), चरैवेति (गीति नाट्य) सोम सतसइ (दोहा)।२००२- सोमदेव (सहस्रमुखी चौक पर, पद्य) लेल साहित्य अकादमी पुरस्कार। २००१ ई. - श्री सोमदेव, दरभंगा;यात्री-चेतना पुरस्कार, प्रबोध साहित्य सम्मान २०११।

साहित्य अकादेमी  फेलो- भारत देशक सर्वोच्च साहित्य पुरस्कार (मैथिली)

१९९४- नागार्जुन (स्व. श्री वैद्यनाथ मिश्र “यात्री” १९११-१९९८ ) , हिन्दी आ मैथिली कवि। २०१०- चन्द्रनाथ मिश्र अमर (१९२५- )- मैथिली साहित्य लेल।

साहित्य अकादेमी भाषा सम्मान ( क्लासिकल आ मध्यकालीन साहित्य आ गएर मान्यताप्राप्त भाषा लेल)            

२००७- पं. डॉ. शशिनाथ झा (क्लासिकल आ मध्यकालीन साहित्य लेल।)             पं. श्री उमारमण मिश्र साहित्य अकादेमी पुरस्कार- मैथिली १९६६- यशोधर झा (मिथिला वैभव, दर्शन) १९६८- यात्री (पत्रहीन नग्न गाछ, पद्य) १९६९- उपेन्द्रनाथ झा “व्यास” (दू पत्र, उपन्यास) १९७०- काशीकान्त मिश्र “मधुप” (राधा विरह, महाकाव्य) १९७१- सुरेन्द्र झा “सुमन” (पयस्विनी, पद्य) १९७३- ब्रजकिशोर वर्मा “मणिपद्म” (नैका बनिजारा, उपन्यास) १९७५- गिरीन्द्र मोहन मिश्र (किछु देखल किछु सुनल, संस्मरण) १९७६- वैद्यनाथ मल्लिक “विधु” (सीतायन, महाकाव्य) १९७७- राजेश्वर झा (अवहट्ठ: उद्भव ओ विकास, समालोचना) १९७८- उपेन्द्र ठाकुर “मोहन” (बाजि उठल मुरली, पद्य) १९७९- तन्त्रनाथ झा (कृष्ण चरित, महाकाव्य) १९८०- सुधांशु शेखर चौधरी (ई बतहा संसार, उपन्यास) १९८१- मार्कण्डेय प्रवासी (अगस्त्यायिनी, महाकाव्य) १९८२- लिली रे (मरीचिका, उपन्यास) १९८३- चन्द्रनाथ मिश्र “अमर” (मैथिली पत्रकारिताक इतिहास) १९८४- आरसी प्रसाद सिंह (सूर्यमुखी, पद्य) १९८५- हरिमोहन झा (जीवन यात्रा, आत्मकथा) १९८६- सुभद्र झा (नातिक पत्रक उत्तर, निबन्ध) १९८७- उमानाथ झा (अतीत, कथा) १९८८- मायानन्द मिश्र (मंत्रपुत्र, उपन्यास) १९८९- काञ्चीनाथ झा “किरण” (पराशर, महाकाव्य) १९९०- प्रभास कुमार चौधरी (प्रभासक कथा, कथा) १९९१- रामदेव झा (पसिझैत पाथर, एकांकी) १९९२- भीमनाथ झा (विविधा, निबन्ध) १९९३- गोविन्द झा (सामाक पौती, कथा) १९९४- गंगेश गुंजन (उचितवक्ता, कथा) १९९५- जयमन्त मिश्र (कविता कुसुमांजलि, पद्य) १९९६- राजमोहन झा (आइ काल्हि परसू, कथा संग्रह) १९९७- कीर्ति नारायण मिश्र (ध्वस्त होइत शान्तिस्तूप, पद्य) १९९८- जीवकान्त (तकै अछि चिड़ै, पद्य) १९९९- साकेतानन्द (गणनायक, कथा) २०००- रमानन्द रेणु (कतेक रास बात, पद्य) २००१- बबुआजी झा “अज्ञात” (प्रतिज्ञा पाण्डव, महाकाव्य) २००२- सोमदेव (सहस्रमुखी चौक पर, पद्य) २००३- नीरजा रेणु (ऋतम्भरा, कथा) २००४- चन्द्रभानु सिंह (शकुन्तला, महाकाव्य) २००५- विवेकानन्द ठाकुर (चानन घन गछिया, पद्य) २००६- विभूति आनन्द (काठ, कथा) २००७- प्रदीप बिहारी (सरोकार, कथा २००८- मत्रेश्वर झा (कतेक डारि पर, आत्मकथा) २००९- स्व.मनमोहन झा (गंगापुत्र, कथासंग्रह) साहित्य अकादेमी मैथिली अनुवाद पुरस्कार १९९२- शैलेन्द्र मोहन झा (शरतचन्द्र व्यक्ति आ कलाकार-सुबोधचन्द्र सेन, अंग्रेजी) १९९३- गोविन्द झा (नेपाली साहित्यक इतिहास- कुमार प्रधान, अंग्रेजी) १९९४- रामदेव झा (सगाइ- राजिन्दर सिंह बेदी, उर्दू) १९९५- सुरेन्द्र झा “सुमन” (रवीन्द्र नाटकावली- रवीन्द्रनाथ टैगोर, बांग्ला) १९९६- फजलुर रहमान हासमी (अबुलकलाम आजाद- अब्दुलकवी देसनवी, उर्दू) १९९७- नवीन चौधरी (माटि मंगल- शिवराम कारंत, कन्नड़) १९९८- चन्द्रनाथ मिश्र “अमर” (परशुरामक बीछल बेरायल कथा- राजशेखर बसु, बांग्ला) १९९९- मुरारी मधुसूदन ठाकुर (आरोग्य निकेतन- ताराशंकर बंदोपाध्याय, बांग्ला) २०००- डॉ. अमरेश पाठक, (तमस- भीष्म साहनी, हिन्दी) २००१- सुरेश्वर झा (अन्तरिक्षमे विस्फोट- जयन्त विष्णु नार्लीकर, मराठी) २००२- डॉ. प्रबोध नारायण सिंह (पतझड़क स्वर- कुर्तुल ऐन हैदर, उर्दू) २००३- उपेन्द दोषी (कथा कहिनी- मनोज दास, उड़िया) २००४- डॉ. प्रफुल्ल कुमार सिंह “मौन” (प्रेमचन्द की कहानी-प्रेमचन्द, हिन्दी) २००५- डॉ. योगानन्द झा (बिहारक लोककथा- पी.सी.राय चौधरी, अंग्रेजी) २००६- राजनन्द झा (कालबेला- समरेश मजुमदार, बांग्ला) २००७- अनन्त बिहारी लाल दास “इन्दु” (युद्ध आ योद्धा-अगम सिंह गिरि, नेपाली) २००८- ताराकान्त झा (संरचनावाद उत्तर-संरचनावाद एवं प्राच्य काव्यशास्त्र-गोपीचन्द नारंग, उर्दू) २००९- भालचन्द्र झा (बीछल बेरायल मराठी एकाँकी-  सम्पादक सुधा जोशी आ रत्नाकर मतकरी, मराठी) साहित्य अकादेमी मैथिली बाल साहित्य पुरस्कार २०१०-तारानन्द वियोगीकेँ पोथी "ई भेटल तँ की भेटल"  लेल प्रबोध सम्मान प्रबोध सम्मान 2004- श्रीमति लिली रे (1933- ) प्रबोध सम्मान 2005- श्री महेन्द्र मलंगिया (1946- ) प्रबोध सम्मान 2006- श्री गोविन्द झा (1923- ) प्रबोध सम्मान 2007- श्री मायानन्द मिश्र (1934- ) प्रबोध सम्मान 2008- श्री मोहन भारद्वाज (1943- ) प्रबोध सम्मान 2009- श्री राजमोहन झा (1934- ) प्रबोध सम्मान 2010- श्री जीवकान्त (1936- ) प्रबोध सम्मान 2011- श्री सोमदेव (1934- ) यात्री-चेतना पुरस्कार २००० ई.- पं.सुरेन्द्र झा “सुमन”, दरभंगा; २००१ ई. - श्री सोमदेव, दरभंगा; २००२ ई.- श्री महेन्द्र मलंगिया, मलंगिया; २००३ ई.- श्री हंसराज, दरभंगा; २००४ ई.- डॉ. श्रीमती शेफालिका वर्मा, पटना; २००५ ई.-श्री उदय चन्द्र झा “विनोद”, रहिका, मधुबनी; २००६ ई.-श्री गोपालजी झा गोपेश, मेंहथ, मधुबनी; २००७ ई.-श्री आनन्द मोहन झा, भारद्वाज, नवानी, मधुबनी; २००८ ई.-श्री मंत्रेश्वर झा, लालगंज,मधुबनी २००९ ई.-श्री प्रेमशंकर सिंह, जोगियारा, दरभंगा २०१० ई.- डॉ. तारानन्द वियोगी, महिषी, सहरसा कीर्तिनारायण मिश्र साहित्य सम्मान २००८ ई. - श्री हरेकृष्ण झा (कविता संग्रह “एना त नहि जे”) २००९ ई.-श्री उदय नारायण सिंह “नचिकेता” (नाटक नो एण्ट्री: मा प्रविश) २०१० ई.- श्री महाप्रकाश (कविता संग्रह “संग समय के”) मैथिली-समीक्षा विशेषांक: विदेहक हाइकू, गजल, लघुकथा, बाल-किशोर विशेषांक आ नाटक-एकांकी विशेषांकक सफल आयोजनक बाद विदेहक 15 जनवरी 2011 अंक मैथिली-समीक्षाक विशेषांक रहत। एहि लेल टंकित रचना, जकर ने कोनो शब्दक बन्धन छै आ ने विषएक,  13 जनवरी 2011 धरि लेखक ई-मेलसँ पठा सकै छथि। रचनाकार अपन मौलिक आ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि) ggajendra@videha.com केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx, .rtf वा .txt फॉर्मेटमे पठा सकैत छथि। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेताह, से आशा करैत छी। रचनाक अंतमे टाइप रहय, जे ई रचना मौलिक अछि, आ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि।

( विदेह ई पत्रिकाकेँ ५ जुलाइ २००४ सँ एखन धरि १०७ देशक १,६४३ ठामसँ ५३, ९३१ गोटे द्वारा विभिन्न आइ.एस.पी. सँ २,८२,६७८ बेर देखल गेल अछि; धन्यवाद पाठकगण। - गूगल एनेलेटिक्स डेटा। ) गजेन्द्र ठाकुर ggajendra@videha.com २. गद्य २.१. जगदीश प्रसाद मंडल- एकटा दीर्घकथा मइटुग्‍गर आ एकटा एकांकी समझौता २.२.१. बेचन ठाकुर- नाटक- बेटीक अपमानक गतांशसँ आगाँ २.रमाकान्‍त राय 'रमा'- मैथि‍ल पत्र-पत्रि‍का : समस्‍या ओ समाधान : आचार्य दि‍व्‍यचक्षु २.३.१.प्रदीप बिहारीक दू गोट विहनि कथा-सत्संगी- थापड़ २. लक्ष्‍मी दास- विहनि कथा- बूड़ि‍बकक बूड़ि‍बक ३.डॉ. कैलाश कुमार मि‍श्र- यायावरी- मलि‍क भाय केर फुटपाथी चिंतन ४.बिपिन झा- की नब साल की पुरान साल..! ५.मुन्नाजी- रिपोर्ताज- ६. नवेन्दु कुमार झा १.रेल लाइनसँ जुड़त भारत आ नेपाल २. भारतीय सामाजिक व्यवस्थामे आइयो जीवन्त अछि जाति व्यवस्था- प्रो. शर्मा  ३.प्रदेशमे लागत चौदहटा नव उद्योग समूह, असोचैम कएलक एहि दिस पहल- मिथिलांचलमे सेहो लागत नव उद्योग २.४.हम पुछैत छी -मुन्नाजी- १.जगदीश प्रसाद मंडल, २.राजदेव मंडल, ३. कुमार शैलेन्द्र आ ४.अमरनाथ सँ मुन्नाजी पुछैत छथि ढेर रास गप..... २.५.१. भारत भूषण झा- कथा- आत्‍मबल कथाक शेषांश २.शि‍व कुमार झा "टि‍ल्‍लू" विहनि कथा-लेबर पेन ३.मनोज कुमार मंडल- कथा- बेमेल वि‍आह ४.ज्योति- विहनि कथा- मैथिल बियाह ५.मि‍थि‍लेश मंडल- कथा- वि‍देशी बाबू २.६.१.डा० अभयधारी सिंह- अभिनव वर्ष २.जगदीश प्रसाद मंडल- मैथि‍ली उपन्‍यास साहि‍त्‍यमे ग्रामीण चि‍त्रण २.७.१.रमेश- गद्य कविता- डॉ. काञ्चीनाथ झा ‘किरण’क नामक अद्वैत मीमांसा २. जितेन्‍द्र झा- उपटैत गाम बसाओत बाबा ३. सुजीतकुमार झा- नेपालक राष्‍ट्रपतिक नेपाली प्रेम २.८.१. विनीत उत्पल- दीर्घकथा- घोड़ीपर चढ़ि लेब हम डिग्री -आगाँ २. शंभु नाथ झा ‘वत्स’ जगदीश प्रसाद मंडल गाम-बेरमा, तमुरिया, जिला-मधुबनी। एम.ए.।कथाकार (गामक जिनगी-कथा संग्रह आ तरेगण- बाल-प्रेरक लघुकथा संग्रह), नाटककार(मिथिलाक बेटी-नाटक), उपन्यासकार(मौलाइल गाछक फूल, जीवन संघर्ष, जीवन मरण, उत्थान-पतन, जिनगीक जीत- उपन्यास)। मार्क्सवादक गहन अध्ययन। हिनकर कथामे गामक लोकक जिजीविषाक वर्णन आ नव दृष्टिकोण दृष्टिगोचर होइत अछि। एकटा दीर्घकथा मइटुग्‍गर आ एकटा एकांकी समझौता १ दीर्घकथा- मइटुग्‍गर जहि‍ना सरयुग नदीमे नहा भक्‍त मंदि‍रमे प्रवेश करि‍ते‍‍ भगवान रामक दर्शन करैत तहि‍ना तपेसर अंगनाक मेहमे आेंगठि‍ समाजकेँ भोज खुअबैक ओरि‍यान देख रहल छथि‍। पोखरि‍क पानि‍ जकाँ शीतल, शान्‍त समतल मन अंगनाक सुगंधमे मस्‍त छन्‍हि‍। तै बीच बेटी घुरनी चमकैत स्‍टीलक छि‍पलीमे पनरह-बीसटा सुखल बरी एकटा बर आ पानि‍ भरल गि‍लास आगूमे रखि‍ कहलकनि‍- “कनी चीख कऽ देखि‍यौ जे नीक भेल आकि‍ नै‍?‍” मुस्‍कुराइत बेटी आ छि‍पलीमे सजल बर-बरी देख तपेसर हेरा गेलाह। मन पड़लनि‍ मइटुग्‍गर। मुदा चुल्हि‍पर चढ़ल लोहि‍या छोड़ि‍ अँटकब उचि‍त नै‍ बुझि‍ घुरनी चुल्हि‍ लग पहुँच गेली। कमलक फड़ सन एकटा बरी मुँहमे लैते मन पड़लनि‍ परि‍वारमे अपन कएल काज। साओन मास। भोरहरबामे मेघ फटि‍ बरखो भेल आ अधरति‍येसँ जे पूर्वा उठल उठले रहि‍ गेल। कखनो काल झकसि‍यो अबि‍ते रहल। जेना-जेना दि‍न उठैत गेल तेना-तेना पूरबाक लपेट सेहो बढ़ि‍ते गेल। प्रसवक दर्दक आगम सुशीला सासुकेँ कहलनि‍। पुतोहूक बात सुनि‍ सुनयना बेटा तपेसरकेँ पलहनि‍ बजबए कहलखि‍न। ओसारक ओछाइनपर आेंघराएल सुशीलाक मनमे लड़ाइ पसरि‍ गेलनि‍। एक दि‍स प्रसवक पीड़ा अपन दल-बलक संग अंगक पोर-पोरमे चढ़ाइ करैत तँ दोसर दि‍स जि‍नगीक कठि‍न दुर्गमे फॅॅसल मन खुशीक लहड़ि‍मे झि‍लहोरि‍ खेलाइत। नारी जि‍नगीक श्रेष्‍ठतम काज। जेहने भरि‍गर काज तेहने मुँहमंगा मातृत्‍वक उपहार। पूर्वाक लपेट देख सुनयनाकेँ ठकमूड़ी लगल रहनि‍। आइ धरि‍ प्रसव गठुलामे होइत रहल ऐछ‍। जहि‍ घरक टाट हवाक झोंककेँ नै‍ रोकैत। आश्रमक घर जकाँ टाटमे लेब नै‍ पड़ैत। मुदा बोनक बच्‍चाकेँ कोन घर रक्‍छा करैत ऐछ‍! गठुला छोड़ि‍ मालक घरमे ओछाइन ओछा देलखि‍न। ओछाइन ओछा हि‍यासए लगलीह जे अगि‍यासी भइये गेल, फाट-पुरान लइये अनलौं। मालक घरसँ हुलकी मारि‍ पुतोहू दि‍स देखलनि‍ तँ चैन बुझि‍ पड़लनि‍। मन असथि‍र भेलनि‍। पहलनि‍ ऐठाम जाइत तपेसरक मनमे अपन काजक भार उठलनि‍। एहेन भारी काजमे पुरूखक काज की ऐछ‍? डेग भरि‍ हटल पलहनि‍क घर ऐछ‍ तेकर बाद? मचकीपर झुलैत झुलनि‍हार जकाँ तपेसर झुलैत पलहनि‍ ऐठाम पहुँच जनतब देलखि‍न। अपन उगैत लछमीकेँ देख मुस्‍की दैत पलहनि‍ कहलकनि‍- “अहाँ आगू बढ़ू गाइयक थैर बनौने पीठेपर दौड़ल अबै छी।‍” पाँचो मि‍नट पलहनि‍केँ पहुँचला नै‍ भेल आकि‍ बेटाक जन्‍म भेल। धरतीपर बेटाकेँ पदार्पण करि‍ते‍ बि‍जलोका जकाँ परि‍वारमे खुशी पसरि‍ गेल। देह पोछैत पलहनि‍क मन चालीस तम्‍मा नि‍छौर, तै परसँ नि‍पनौन, लाढ़ि‍-पुरनि‍ कटाइक संग उपहार, पसारी छी तँए मंगवोक अधि‍कार एेछ‍ये जाइकाल एकटा सजमनि‍यो मांगि‍ लेब। सि‍दहा तँ देबे करतीह। हि‍साबमे मन बौआ गेलनि‍। समाजमे भगवान ककरो सनतान दै छथि‍न तैमे सझि‍या कऽ दैत छथि‍ ने। बच्‍चाक जि‍नगी हमरा हाथमे ऐछ‍, तहि‍ना ने अपनो जि‍नगी दोसराक हाथमे ऐछ‍। तरे-तर मन खुशी भऽ गेलनि‍। मुस्‍की दैत सुनयनाकेँ टोनलनि‍- “काकी, पहि‍ल पोता छि‍अनि‍, रेशमी पटोर पहीरि‍बनि‍?‍” धारक बेगमे दहलाइत दादीक मन, मूड़ी डोलबैत बजलीह- “एकटाकेँ के कहै सातटा पहि‍रेबह।‍” पलहनि‍- “बच्‍चा मुँह, एन-मेन तपेसरे बौआ जकाँ छै।‍” पलहनि‍क बात सुनि‍ ओछाइनपर पड़ल सुशीलाक दर्द भरल देहक मनमे अपन सतीत्‍वक आभास भेल। मुदा अवसरकेँ हाथसँ नै‍ जाए दि‍अए चाहि‍ बुदबुदाएल- “केहेन सपरतीभ जकाँ बजै-ए।‍” मुदा पलहनि‍ सुनलक नै‍। जहि‍सँ आगू कि‍छु नै‍ बाजलि‍। झीलक पानि‍ जकाँ तपेसरक मन असथि‍र। सामान्‍य परि‍स्‍थि‍ति‍ तँए सामान्‍य मनक वि‍चार। जहि‍ना कठि‍नसँ कठि‍न, उकड़ूसँ उकड़ू काजपर लूरि‍ डटल रहैत तहि‍ना जि‍नगी काजपर नजरि‍ दौड़ैत मन डटल। मन कहैत बीस-एक्कैस बर्खक उम्रो छेबे करनि‍, रोगो व्‍याधि‍क छुति‍ देहमे नहि‍ये छन्‍हि‍। बेटापर नजरि‍ पहुँचते पुत्र सन सम्‍पत्ति‍क आगमनसँ मन फुला गेलनि‍। जहि‍ना लगौल गाछमे पहि‍ल फूल वा फड़ लगलापर बेर‍-बेर‍ देखैक इच्‍छा होइत तहि‍ना तपेसरक मनमे उठैत। बर्जित जगह बुझि‍ परहेज केने रहथि‍। मुदा तैयो जहि‍ना डॉट टुटल कमल हवाक संग पोखरि‍मे दहलाइत तहि‍ना खुशीक हि‍लकोरमे तपेसरक मन तड़-ऊपर करैत। मनमे उठलनि‍, पुरूष-नारी बीचक संबंधमे बच्‍चो पैघ शर्त्त छी। परि‍वारमे (संबंधमे) वि‍खंडनक संभावना बनल रहैत ऐछ‍। लगले मन अपनासँ आगू उड़ि‍ माए-बापपर गेलनि‍। हृदए वि‍हुँसि‍ गेलनि‍। जहि‍ना मातृत्‍व प्राप्‍त केलापर नारीक सौन्‍दर्य बढ़ि‍ जाइत तहि‍ना ने पि‍तृत्‍व प्राप्‍त केलापर पुरूषोकेँ होइत। लगले सि‍नेमा रील जकाँ बेटाक जन्‍मसँ अंति‍म समए धरि‍क जि‍नगी नाचि‍ उठलनि‍। कि‍छुए समए बाद सुशीलाकेँ पुन: दर्द शुरू भेलनि‍। समएक संग दर्दो बढ़ए लगलनि‍। दुखक संग छटपटाएव शुरू भेलनि‍। सुशीलाक छटपटाहटि‍ देख सुनयना पलहनि‍केँ कहलखि‍न- “कनि‍याँ, अहाँ देखि‍अनु ता बच्‍चा सम्‍हारि‍ दै छी।‍” पेटपर हाथ दैते पलहनि‍ बुझि‍ गेली जे दोसर बच्‍चा हेतनि‍। बजलीह- “काकी, एकटा बच्‍चा आरो हेतनि‍?‍” पलहनि‍क बात सुि‍न, जहि‍ना मेघ तड़कैत तहि‍ना सुनयनाकेँ भेलनि‍। जोरसँ तपेसरकेँ कहलखि‍न- “बौआ, बौआ।‍” अकचका कऽ तपेसर बाजल- “हँ, माए।‍” “हँ, अंगनेमे रहह।‍” करीब बीस मि‍नट पछाति‍ बेटीक जन्‍म भेलनि‍। अखन धरि‍ जहि‍ना खुशीक सुगंध अंगनामे पसरल छल एकाएक ठमकि‍ गेल। बच्‍चाक जन्‍म होइतहि‍ सुशीलाक देह लर-तांगर भऽ गेलनि‍। पलहनि‍ सुनयनाकेँ कहलनि‍- “काकी, पुरबा लपटै छै। अगि‍यासी नीक-नहाँति‍ जगा देथुन ओना तँ सभ भगवानक हाथमे छन्‍हि‍‍ मुदा जहाँ तलि‍क पार लागत से तँ करबे करबनि‍। जानि‍ये कऽ तँ भगवान दुख बढ़ा देलखि‍नहेँ। ऐ (पहि‍ल)‍ बच्‍चापर इ नजि‍र राखथु ऐपर हम रखै छी।” कहि‍ बच्‍चाक पोछ-पाछ करए लगली। साँस मन्‍द देख मुँहमे मुँह सटा फूकि‍ साँसक गति‍ ठीक केलनि‍। बच्‍चाक लक्षण देख पलहनि‍क मन बाजि‍ उठल। जरूर दुनू बच्‍चा ठहरबे करत। नजरि‍ पैछला काजपर पड़ल। एहेन की‍ पहि‍ल-पहि‍ल बेर‍ भेल। कतेकोकेँ भेलनि‍। कि‍छु गोटेक दुनू बँचलनि‍, कि‍छु गोटेक एकटा बँचलनि‍ आ कि‍छु गोटे बच्‍चाक संग चलि‍ गेलीह। ओना काज तँ अनि‍श्‍चि‍त ऐछ‍ मुदा अपना भरि‍ तँ ति‍या-पछा करवे करबनि‍। सुशीलाकेँ सुनयना पुछलखि‍न- “कनि‍याँ मन केहन लगै-ए?‍” अर्ध-चेत अवस्‍थामे सुशीला अपन टूटैत जि‍नगी हाथक इशारासँ कहलकनि‍। मुँहक सुरखी कहैत जे नै बँचब। सुशीलाक इशारासँ सुनयना बुझलनि‍ जे तपेसर भारी वि‍पत्ति‍मे पड़ि‍ गेल। भगवानपर खींझ उठलनि‍। बेचारा फट्टो-फनमे पड़ि‍ जाएत। हम बूढ़े भेलौं, जएह कएल हएत सएह ने सम्‍हारि‍ देबै। मुदा वि‍पत्ति‍ तँ ततबेटा नै ने छै। खेती-पथारी, माल-जाल, कुटुम-परि‍वार छै तै परसँ दू-दूटा चि‍ल्‍का भेलइ। कना सम्‍हारि‍ पाओत। ने स्‍त्री बँचतै आ ने एक्कोटा बच्‍चा। हमहूँ कते दि‍न जीब। सभ ि‍कछु बेचाराकेँ हरा जेतै। हे भगवान, तोरा केहन दुरमति‍या चढ़लह जे एहेन गनजन बेचाराकेँ केलहक। आंगनमे बैसल तपेसरक मनमे उठैत जे जतेटा मोटरी माथपर उठत ततबे ने उठाएब। नमहर मोटरी कते काल क्‍यो माथपर सम्‍हारि‍ कऽ रखि‍ सकैए। मुदा तँए की? जीत्ता जि‍नगी हारि‍यो मानि‍ लेब उचि‍त नै‍। करैत-करैत-लड़ैत-लड़ैत जे हेतै से देखल जेतै। जहि‍ना रणभूमि‍मे दू दलक बीच लड़ाइ अंति‍म दौड़मे अबि‍ते दुनू दलक मन मानि‍ लैत जे के जीतत के हारत। मुदा हरलोहोक बीच कते रंगक वि‍चार उठैत। कि‍छु गोटे रणभूमि‍सँ भागए चाहैत तँ कि‍छु गोटे अढ़ भजि‍या नुकाए जाहैत। मुदा कि‍छु एहनो होइत जे अपन बलि‍ देख स्‍वेच्‍छासँ अंति‍म समए धरि‍ हथि‍यार उठौने रहैत ऐछ‍। कन्ना नै‍ उठाओत? अपन जि‍नगीक संगी, जे कौआ-कुकुड़क पेट भरि‍ अपन मनोरथ पूरा करत, आ हम गुलाम बनि‍ दुश्‍मनक जहलमे सड़ब। अपन अंति‍म बात सुशीला पलहनि‍यो, सासुओ आ पति‍योकेँ कहलक- “हम नै बँचव। दुनि‍याँक सभसँ पैघ पापी छी जे अपनो रक्‍छा नै कऽ सकलौं। दुनू बच्‍चाकेँ अहाँ सभ देखबै।‍” कहि‍ते आँखि‍ बन्न भऽ गेलनि‍। प्राण तँ बँचल रहनि‍ मुदा चेतन-शुन्‍य भऽ गेलीह। सुशीलाक बात सुि‍न पलहनि‍ चमकि‍ उठल। बापरे! सभसँ बेसी भार अपने ऊपर आबि‍ गेल। जन्‍मक पालनक भार....। अखन धरि‍ जते ठीन काज केलौं, एहेन काजसँ भेँट कहाँ भेल! बुझल बात कम आ अनभुआर बेसी बजरत। जते अपना दि‍स तकैत जाइत तते चि‍न्‍ता बढ़ल जाइत। बच्‍चाकेँ दूध पि‍आएब जरूरी भऽ गेल। माइक तँ यएह गति‍ छन्‍हि‍। हे भगवान कोनो उपाय धड़ाबह। मन पड़लै अपन बच्‍चा। अपनो तँ दूध होइते ऐछ‍ तखन एते घबड़ेवाक कि‍ जरूरत ऐछ‍। मुदा अपन दूध तँ छह‍ मासक बकेन ऐछ‍। गजुरा तँ नै‍। एत्ते वि‍चार करब तँ बच्‍चे मरि‍ जाएत। हे भगवान जानि‍हह तूँ। मने मन कहि‍ दुनू बच्‍चाकेँ दुनू छाती लगा दूध पि‍अबए लगली। बच्‍चाक चोभ देख पलहनि‍क मन खुशीसँ नाचि‍ उठलनि‍। ठानि‍ लेलनि‍‍ जे बच्‍चाकेँ मरऽ नै‍ देब। आइये बकरी दूधक ओरि‍यान करैले सेहो कहि‍ दैत छि‍अनि‍ आ टेम-कुटेम अपनो चटा देबै। मुदा अपनो बच्‍चा तँ चारि‍ये मासक ऐछ‍। सात माससँ पहि‍ने कना दालि‍क पानि‍ चटेबै। फेर मातृत्‍व जगि‍ते बुदबुदेलीह- ‘ऐसँ पैघ काज ऐ धरतीपर हमरा लि‍ये की ऐछ‍? जँ दुनि‍याँ देखऽ बच्‍चा आएल हएत तँ जरूर देखत। पुतोहूक बात सुि‍न सुनयना चेतनहीन हुअए लगलीह। कासक फूल जकाँ मन उड़ि‍-उड़ि‍ बौराए लगलनि‍। बच्‍चाक मुँहपर नजरि‍ पड़ि‍ते उपराग दैत भगवानकेँ मने-मन कहलनि‍- “‍कोन जनमक कनारि‍ ऐ बच्‍चासँ असुल रहल छह। ऐ नि‍मू-धनक कोन दोख भेलै। जँ तोरा नै सोहेलह तँ पेटेमे कि‍अए ने कनारि‍ चुका लेलह। एहन बच्‍चाक एहन गंजन तोरे सन बुते हेतह।‍” चहकैत करेजसँ द्रवि‍त भऽ कुहरि‍ उठलीह। एक तँ वेचारीक (पुतोहूक) उपर केहन डाँग पड़ल जे अमूल्‍य कोखि‍ उसरन भऽ गेलै, तै संग बच्‍चा लटुआएल ऐछ‍। मुदा अपनो वंश तँ उसरने भऽ रहल ऐछ‍। थाकल-ठहि‍आएल जकाँ छातीपर पथरो रखि‍ आँखि‍ तकब मुदा तपेसर तँ से नै‍ ऐछ‍। जुआन-जहान ऐछ‍, हो न हो‍ कहीं बौर ने जाए। ककरा के देखत? जहि‍ना धारक बहैत धारामे माथक मोटरी खुललासँ मोटरीक वस्‍तु छि‍ड़ि‍या पानि‍क संग भाँसऽ लगैत जहि‍सँ कि‍छु बि‍छेबो करैत आ कि‍छु भँसि‍यो जाइत तहि‍ना सुनयनाक वि‍चार कि‍छु उड़ि‍आइत कि‍छु ठमकल छाती दहलाइत। ओसारक खूँटा लगा बैसल तपेसरक मन मानि‍ गेल जे चूक हमरोसँ भेल। आइ धरि‍ जे देखैत एलौं वएह मनमे बैस गेल। की रेडि‍यो-अखबारक समाचार झुठे रहैत ऐछ‍ जे दू-तीन-चारि‍ धरि‍ बच्‍चा मनुष्‍यकेँ होइत छै। जहि‍ना परम्‍परासँ अबैत व्‍यवहारकेँ बि‍नु सोच-वि‍चार केनहुँ सभ लकीरक फकीर बनि‍ लहास ढोइत ऐछ‍ तहि‍ना तँ केलहुँ। मुदा हाथक डोरा टुटने जहि‍ना गुड्डी अकासमे उधि‍या जाइत तहि‍ना ने तँ उधि‍या गेलहुँ। सोचैक, बुझैक बात छल जे एक बच्‍चाक लेल कते सेवाक जरूरत होएत, दू बच्‍चाक लेल कते....। से नै‍ बुझि‍ सकलहुँ। आइ जँ वुझल रहैत तँ एहेन दि‍न देखैक अवसर नै‍ भेटैत। परि‍वार उजड़ि‍ जाएत। वंश वि‍लटि‍ जाएत। मुदा जे चुकि‍ गेलहुँ ओकर उपाइये कि‍? जहि‍ना थाकल अड़ि‍कंचनमे सुन्‍दर सुकोमल पेंपी नि‍कलैत तहि‍ना तपेसरक मनमे आशाक पेंपी उगल। धारक धाराक सि‍क्‍त मनमे उठलनि‍, जहि‍ना एक दि‍स परि‍वार, वंशकेँ उजड़ैत-उपटैत देखै छी तहि‍ना तँ भूत, वर्तमान आ भवि‍ष्‍य सेहो आँखि‍क सोझमे लहलहा रहल ऐछ‍। लहलहाइत परि‍वारकेँ देख तपेसरक हृदय उफनि‍ गेलनि‍। जहि‍ना धारक धारा माने बेगमे टपै काल ओरि‍या कऽ पाएर रखि‍तहुँ थरथराएल पाएर पि‍छड़ैत रहैत तहि‍ना तपेसरक मन सेहो असथि‍र नै‍ भऽ पि‍छड़ए लगलनि‍। मुदा जी-जाँति‍ कऽ माटि‍पर पाएर रोपि‍ते मनमे उठलनि‍, माइयो जीवि‍ते छथि‍, अपनो छी, तैपरसँ दूटा दूधमुहाँ बच्‍चा सेहो एेछ‍ये। तखन परि‍वार कि‍अए उपटत? हँ, ई बात जरूर जे पुरूष-नारीक बीच बच्‍चाक लेल माए भोजनक पहि‍ल बखारी होइ छथि‍। मुदा युग धर्मो तँ कहैत ऐछ‍ जे आजुक बच्‍चाक नसीबसँ माइक्रोसॉफ्ट दूध कटि‍ रहल ऐछ‍। तैयो तँ बच्‍चा जीवि‍ये जाइत ऐछ‍। तखन ई बच्‍चा कि‍एक ने जीति‍? सोगाएल तपेसरक मुँह देख माए (सुनायना) बोल-भरोस देबा लए घरसँ नि‍कलि‍ आबि‍ बजलीह- “बच्‍चा, गाड़ीये पहि‍या जहाँति‍ जीते जि‍नगी सुख-दुख अबैत रहैए। तइले सोगे केने‍ की हेतह? भगवानक लीले अगम छन्‍हि‍। अखनी हम जीवि‍ते छी। हमरा अछैत तोरा कथीक दुख होइ-छह।‍” सि‍मसल आँखि‍ उठा तपेसर माएक मुँहपर देलनि‍। हवामे थरथराइत दीपक बाती जकाँ सुनयनाक छाती डाेलैत। मुदा जहि‍ना हवाक झोंककेँ सहन करैत दीप प्रज्‍वलि‍त रहैत तहि‍ना धैर्यक लौ सुनयनाक बोलसँ टपकल वि‍चार सुनि‍ तपेसरक मनक डोलैत जमीन थीर हुअए लगल। मनमे उठलनि‍, यएह माए पुरूख जानि‍ अपन सहारा बुझैत छथि‍ आ अखन सहारा बनि‍ ठाढ़ छथि‍। कोढ़ीसँ (कलीसँ) फुलाइत फूल जकाँ तपेसरक मन फुलाए लगल‍। तहीकाल पलहनि‍ मुँह उठा कऽ बाजलि‍- “काकी, एतै‍ आबथु।‍” पलहनि‍क बात सुि‍न सुनयना तपेसरपर नजरि‍ दौड़ा सोइरीघर दि‍स बढ़लीह। मनमे एलनि‍, ओना अन्‍हारघर साँपे-साँप रहैत मुदा हथोरि‍यो थाहि‍ कऽ तँ लोक अन्‍हारोमे जीवि‍ते ऐछ‍। सभ मि‍लि‍ जँ लगि‍ जाएव तँ बच्‍चा जरूर उठि‍ कऽ ठाढ़ हेबे करत। तपेसरक मनमे उठल, ‘जाधरि‍ साँस ता धरि‍ आस।’ अपना सभ बुते काज नै‍ सम्हरत। डॉक्‍टरकेँ बजेबनि‍। मुदा लगमे तँ ओहो नहि‍ये छथि‍। जँ रोगि‍येकेँ लऽ जाए चाहब सेहो भारि‍ये ऐछ‍। एक तँ तेहेन सवारी सुबि‍धा‍ नै‍ दोसर तीन-तीनि‍ गोरेकेँ लए जाएब। ओतबे नै, अपनो सभकेँ जाइये पड़त। एक दि‍स अब-तबक ि‍स्‍थति‍ दोसर दि‍स सवारीक ओरि‍यान आ डाॅक्‍टर ऐठाम पहुँचैत-पहुँचैत बँचती आकि‍ नै‍। जहि‍ना अमती काँट एक दि‍स छोड़बैत-छोड़बैत दोसर दि‍स पकड़ि‍ लैत तहि‍ना तपेसरक मन ओझरा गेल। कोनो सोझ बाट आँखि‍क सोझामे पड़बे नै‍ करैत। बेकल मने उठि‍ कऽ सोइरी घर पहुँच माएकेँ कहलक- “माए....।‍” माएक पछाति‍ कोनो शब्‍द मुँहसँ नै‍ नि‍कलल। तपेसरक बेकल मन देख पलहनि‍ बाजलि‍- “बौआ, एना मन छोट नै करू। जे करतूत ऐछ‍ सएह ने अपना सभ करब। ककरो जान ते नै ने दऽ देबै। जखैनसँ दुनू बच्‍चाकेँ छाती चटौलि‍ऐ तखैन से कल‍ परल ऐछ‍। सबसे पहि‍ने दूधक ओरि‍यान करू। अखन महीसि‍-गाइक दूध पचबैवला नै ऐछ‍, कतौसँ बकरी कीन‍ आनू। ताबे ककरो बकरी दुहि‍ कऽ लऽ आनू। एक तँ बकरि‍यो सब तेहन ऐछ‍ जे अपनो बच्‍चा पालैक दूध नै होइ छै, मुदा जकरा एकटा बच्‍चा हेतै ओहन कीन‍ लि‍अ।” सुशीलाक बात सुि‍न पलहनि‍ चमकि‍ उठल। बारे रे, सभसँ बेसी भार अपने ऊपर आबि‍ गेल। जन्‍मक पालनक भार....। अखन धरि‍ जते ठीन काज केलौं, एहेन काजसँ भेँट कहाँ भेल! बुझल बात कम आ अनभुआर बेसी बजरत। जते अपना दि‍स तकैत जाथि‍ तते चि‍न्‍ता बढ़ल जाइत। बच्‍चाकेँ दूध पि‍आएब जरूरी भऽ गेल। माइक तँ यएह गति‍ छन्‍हि‍। हे भगवान कोनो उपाय धड़ावह। मन पड़लै अपन बच्‍चा। अपनो तँ दूध होइते ऐछ‍ तखन एते घबड़ेवाक कि‍ जरूरत ऐछ‍। मुदा अपन दूध तँ चारि‍ मासक बकेन ऐछ‍। गजुरा तँ नै‍। एत्ते वि‍चार करब तँ बच्‍चे दम तोड़ि‍ देत। हे भगवान जानि‍हह तूँ। मने मन कहि‍ दुनू बच्‍चाकेँ दुनू छाती लगा दूध पि‍अबए लगली। बच्‍चाक चोभ देख पलहनि‍क मन खुशीसँ बि‍खैर गेलनि‍। संकल्‍प लेलनि‍ जे बच्‍चाकेँ मरऽ नै‍ देब। आइये बकरी दूधक ओरि‍यान करैले सेहो कहि‍ दैत छि‍अनि‍ आ टेम-कुटेम अपनो चटा देबै। मुदा अपनो बच्‍चा तँ चारि‍ये मासक ऐछ‍। छह माससँ पहि‍ने कना दालि‍क पानि‍ चटेबै। फेर मातृत्‍व जगि‍ते बुदबुदेलीह- ‘ऐसँ पैघ काज ऐ धरतीपर हमरा लि‍ए की ऐछ‍? जँ दुनि‍याँ देखऽ पच्‍चा आएल हएत तँ जरूर देखत। पुतोहूक बात सुि‍न सुनयना चेतनहीन हुअए लगलीह। कास-कुसक फूल जकाँ मन उड़ि‍-उड़ि‍ बौराए लगलनि‍। बच्‍चाक मुँहपर नजरि‍ पड़ि‍ते उपराग दैत भगवानकेँ मने-मन कहलनि‍- “‍कोन जनमक कनारि‍ ऐ बच्‍चासँ असुल रहल छह। ऐ नि‍मू-धनक कोन दोख भेलै। जँ तोरा नै सोहेलह तँ पेटेमे कि‍अए ने कनारि‍ चुका लेलह। एहन बच्‍चाक एहन गंजन तोरे सन बुते हेतह।‍” चहकैत करेजसँ द्रवि‍त भऽ कुहरि‍ उठलीह। एक तँ वेचारीक (पुतोहूक) उपर केहन डाँग पड़ल जे अमूल्‍य कोखि‍ उसरन भऽ गेलै, तै संग बच्‍चा लटुआएल ऐछ‍। मुदा अपनो वंश तँ उसरने भऽ रहल ऐछ‍। थाकल-ठहि‍आएल छी छातीपर पथरो रखि‍ आँखि‍ तकब मुदा तपेसर तँ से नै‍ ऐछ‍। जुआन-जहान ऐछ‍, हो न हो बताह बनि‍ कहीं बौर ने जाए। ककरा के देखत? जहि‍ना धारक बहैत धारामे माथक मोटरी खुललासँ मोटरीक वस्‍तु छि‍ड़ि‍या पानि‍क संग भाँसऽ लगैत जहि‍सँ कि‍छु बि‍छेबो करैत आ कि‍छु भँसि‍यो जाइत तहि‍ना सुनयनाक वि‍चार कि‍छु उड़ि‍आइत कि‍छु ठमकल छाती दहलाइत। अशौच दुआरे दुनू जौआँ भाए-बहीनि‍क -धीरज आ घुरनीक- छठि‍यार नै‍ भेल। ने कि‍यो सोइरी सठनि‍हारि‍ आ ने ककरो मन कखनो थीर होइत जे नीक-अधलाक वि‍चार करैत। ओना तीनूक- पलहनि‍, सुनयनया आ तपसीक- मन सदति‍काल बच्‍चेपर रहैत छलनि‍ मुदा कखनो काल नेकरमसँ अकछि‍ मने-मन सोचैत जे दुनूकेँ ऋृण असुलए भगवान पठौलनि‍। जते ओकर ऋृण बाकी छै ओते तँ असुले कऽ जान छोड़त। मुदा लगले मन घुरि‍ जाइत जे वि‍धातो भाग-तकदीरकेँ नै‍ बदलि‍ सकैत छथि‍। जँ दुनू बच्‍चा एहि‍ धरतीक सुख भोगऽ आएल हएत तँ नहि‍यो सेवा-बरदासि‍ करबै तैयो पानि‍क पाथर जकाँ जीवे करत। मुदा बच्‍चाक छोड़ि‍ तीनूक -पलहनि‍, सुनयना आ तपसीक- अपन-अपन जि‍नगी आ दुनि‍याँ सेहो छलनि‍। पलहनि‍ये बेचारी कि‍ करि‍तथि‍? एक तँ दस-दुआरी दोसर अपनो बाल-बच्‍चेदार परि‍वार तै परसँ तड़ि‍पीबा घरबला। धन्‍यवाद बूढ़ी सासुकेँ दि‍आनि‍ जे सुखाएलो-टटाएल हड्डीपर ने कखनो हाथ-पाएर कामै होइत आ ने मुँह सापुट लैत। अखनो वएह रूआव जे कते दि‍न जीवि‍ तेकर कोन ठेकान। हजार कि‍ लाख आ कि‍ नहि‍ये मरब तेकर कोन ठीक। मुदा साँपक मंत्र जकाँ भरि‍ दि‍न सुगि‍या (पलहनि‍) सासुक नीक-अधला बात सुनैत रहैत मुदा कोनो बातक उतारा नै‍ दैत। अपन सभ कि‍छु बुझि‍ सासु -झि‍ंगुरी- मालि‍क जकाँ काजक समीक्षा सदति‍काल करैत रहैत जे कोन-काज केहन उताहुल ऐछ‍। जेहन जे काज उताहुल तै काजकेँ दोसर काज छोड़ि करए लगैत तँए सुगि‍या सासुक बातो कथा सुनि‍ चुप्‍पे रहैत। तँए कि‍ झि‍ंगुरी सदति‍काल पुतोहूपर गरमाइले रहैत छलीह। कन्ना रहि‍तथि‍, जखन सुि‍गया कोनो अंगनाक पवनौट, काेनो तीमन-तरकारी वा सि‍दहा आनि‍ आगूमे दथि‍ वा बैसलोमे टाँग पसारि‍ जँतऽ लगैत तखन वएह सासु ने असि‍रवाद दै छलखि‍न जे हमरो औरूदा भगवान तोरे देथुन। यएह ने परि‍वार छी जे सदति‍काल सुख-दुख, नीक-अधला, हँसैत-कनैत मस्‍तीमे चैनसँ चलैत रहए। झि‍ंगुरि‍योक जि‍नगीमे तहि‍ना भेल। एक्के सन्‍तानक -बेटा- पछाति‍ वि‍धवा भऽ गेलीह। अपना खेत-पथार तँ नै‍ मुदा अधा गाम (भैयारीक हि‍स्‍सा) तँ खानदानी सम्‍पति‍ छलैक। जाहि‍सँ खाइ-पीवैक कोन बात जे दू पाइ बेटोकेँ खाइ-पीबैले दैत रहलीह। भलेहीं बेटा नसेरी कि‍अए ने भऽ गेलनि‍। कि‍ अखनो धरि‍ बेटाकेँ कहि‍यो एकटा खढ़ उसकबै नै‍ कहलनि‍। जँ माए-बाप अछैत बेटा सुख नै केलक तँ माए-बापक मोले की? एहि‍ बातकेँ गीरह बान्‍हि‍ झि‍ंगुरी कहि‍यो बेटाकेँ कोनो भार अखन धरि‍ नै‍ देने। भलहि‍ं बेटा सहलोले कि‍अए ने भऽ जाए मुदा सि‍द्धान्‍तो तँ सि‍द्धान्‍त छी। ओकरो अपन महत्‍व छैक। भलहि‍ं करी वा नै‍ करी। जँ से महत्‍व नै‍ छैक तँ बुद्धि‍यार लोकक बेटा बूड़ि‍बक कन्ना भऽ जाइत छैक। दसदुआरी रहने सुगि‍याकेँ घरसँ बाहर एते काज करए पड़ैत जे दि‍न-राति‍ रेजानि‍स-रेजानि‍स रहैत छलीह। साँझ-भोर, राति‍-दि‍न काज। कि‍म्‍हरो जँत्ते-पीचैक समए तँ कि‍म्‍हरो बि‍आउ करैक ताक। धन्‍यवाद सुगि‍येकेँ दी जे घि‍रनी जकाँ सदति‍काल नाचि‍ काज सम्‍हारैत। तहूमे मइटुग्‍गर धीरज आ घुरनीक तँ सहजहि‍ माइये छी। दूध पि‍औनाइसँ लऽ कऽ जाँति‍-पीचि‍ देह-हाथ सोझ करऽ पड़ैत। दसदुआरी रहने दस दि‍स सेहो आँखि‍-कान ठाढ़ रखै पड़ैत। जि‍नगीक काज सुगि‍याकेँ एहि‍ रूपे पकड़ि‍ नेने जे दोसर दि‍स तकै नै‍ दैत। मन कहैत जेकरा अपन माए जीवैत छैक ओरत होइक नाते अपन चि‍लकाकेँ अपनो सम्‍हारि‍ सकैए मुदा ऐ दुनू -धीरज आ घुरनी- केँ दुनि‍याँमे के देखि‍नि‍हार छैक? हमरा हाथे जन्‍म भेल छै, जँ पैतपाल नै करवै ते एकर प्रति‍वाए ककरा हेतै। भगवानक घरमे दोखी के हेतै। वेचारी दादी सुनयना छथि‍न मुदा ऐ उमेरमे दूध तँ नै‍ छन्‍हि‍। सोलाहो आना बकरि‍ये दूधपर तँ दूधकट्टू भइये जाएत। जे बच्‍चा दूधकट्टू भऽ जाएत ओकर छाती कहि‍यो सक्कत हेतै। खेने-बि‍नु खेने सुगि‍या भरि‍ दि‍न ओइ‍ जंगली जानवर जकाँ नचैत जे बच्‍चाकेँ दूध पीया, गर लगा सुता चरौर करए जाइत, तहि‍ना। अधवयसू सुनयना अपन राजा बेटा तपसीक दुखक बोझ देख दि‍न-राति‍ ओइ‍ बोझकेँ हल्‍लुक बनबैक लेल एकबट्ट करैत रहैछ। जहि‍ना युद्धभूमि‍मे अपन राजापर दुश्‍मनक अबैत तीर देख सेनापति‍ उपयुक्‍त तीर तरकससँ नि‍कालि‍ दुश्‍मनक तीरकेँ रोकैक प्रयास अंति‍म साँस धरि‍ करैत तहि‍ना सुनयना तपसीपर अबैत तीर- ‘भगवान केहन डाँग मारलखि‍न जे जे जाहि‍ काजक लूरि‍ पुरूषक हि‍स्‍सामे देबे ने केलखि‍न ओइ फाँकमे फँसा देलखि‍न। कोशि‍कन्‍हाक खेत जकाँ आि‍ड़-धूर मेटा बालुसँ भरि‍ देलखि‍न। स्‍त्रीगण होइत हमहूँ तँ स्‍त्रीगणक सभ काज (बच्‍चाकेँ दूध पि‍याएब) नहि‍ये सम्‍हारि‍ सकब। जँ एहेन फाँसे लगवैक छलनि‍ तँ आरो नमहर लगा दुनू बच्‍चोकेँ माइये  संगे नेने जइतथि‍। पुरूखक (बेटा) देह तँ खाली रहि‍तै। मन होइतै चि‍ड़ैक खोंता जकाँ परि‍वार बना रहैत नै मन होइतै लौका-तुम्‍मा लऽ दुनि‍याँमे घूमि‍-फीड़ि‍ जीबैत। जाधरि‍ हम जीबै छी ताधरि‍ माएक ममता पकड़ि‍ रखि‍तै। मुदा तहू बीच जँ पत्‍नीक सि‍नेह बेटा-बेटीक सोह जगि‍तै तखनो तँ मन बौरेबे करि‍तै! अनायास सुनायनाक मनमे उठलनि‍ माया-मोहक लत्ती जते दूर धरि‍ चतरै-ए ओते दूर धरि‍ मनुख तँ नै‍ चतरत। मनुखक तँ बाढ़ि‍ छैक। तै बीच हम तपसि‍याक माए भेलि‍ऐ, जते धरि‍ कएल हएत ततबे ने करबै। आकि‍ ओकरा दुखसँ दुखी भऽ अथबल बनि‍ बैस कऽ कानब। माएक काज जते दूर धरि‍ छै ओइमे कलछप्‍पन नै करबै। परि‍वारे ककर छी ककरो नै छी? तखन तँ मनुख रहत घरेमे। खाएत अन्ने, पीति‍ पानि‍ये। जाबे जीबै छी ताबे बुझै छी जे सभ कि‍छु छी आँखि‍ मूनि‍ देबै अन्‍हारमे हरा जाएब। फेर मन घुरलनि‍ हमरा अछैत बेटाक आँखि‍क नोर देखब हाड़-चामक मनुखकेँ सहल जाएत? ओ तँ पाथरक नै‍ छी जे कतौ पड़ल रहत। मनुखकेँ तँ चलै-फि‍रै, सोचै-वि‍चारै, बुझै-सुझैक बखारी छै ओ तँ देखि‍ये-सुनि‍ कऽ चलत। दुनि‍याँ बेइमान भऽ जाएत भऽ जाए मुदा जहि‍ना तपसीक माए छि‍ऐ तहि‍ना तपसी देखत। ओकरा मनमे कहि‍यो ई नै उपकए देबै जे दुनि‍याँक संग माइयो पएर पाछू केलक। ताधरि‍ तपसीक परि‍वारकेँ पकड़ि‍ सम्‍हारने रहबै जाधरि‍ बेकावू नै भऽ जाएत। भगवान केलखि‍न आ दुनू पि‍लुआ उठि‍ कऽ ठाढ़ भेल तँ जरूर परि‍वार फड़त-फुलाएत। अखन बेकावू कहाँ भेलहेँ? अखन तँ सम्‍हारैबला ऐछ‍। माटि‍क तरमे सजमनि‍ झि‍ंगुनीक बीआ गारि‍ दै छि‍ऐ, समए पावि‍ जहि‍ना ओ जनमि‍ कऽ ऊपर आबि‍ धरतीसँ आसमान धरि‍ लतरि‍ जाइत ऐछ‍ मुदा ई  तँ (दुनू बच्‍चा) माटि‍क ऊपर ऐछ‍। जँ समुचि‍त सेवा भऽ जाए तँ जरूर कलैश कऽ गाछ बनत। आशा-नि‍राशाक बीच सुनयनाक मन वृन्‍दावनक कदमक गाछपर झुलैत राधा-कृष्‍ण जकाँ झुलए लगलनि‍। ने अक चलनि‍ ने बक। आँखि‍ नि‍हारि‍ दुनि‍याँ दि‍शि‍ देखए लगलीह। दू-पत्ती, चारि‍-पत्ती सजमनि‍-झि‍ंगुनीक गाछक, जे लत्तीक आशा अपनाकेँ ठाढ़ रखैत, चारू भाग जहि‍ना छोट-छोट कड़चीक टुकड़ी गारि‍ ओकर रक्षा लगौनि‍हार करैत तहि‍ना सुनयना फुड़फुड़ा कऽ उठि‍ बड़बड़ेलीह- “अनेर गाएक धरम रखबार।‍” मुँहसँ अनायास हँसी नि‍कललनि‍। पि‍तृ-प्रमुख परि‍वारमे पि‍ताक परोछ भेलापर ताधरि‍ मातृ-प्रधान परि‍वार बनल रहैत जाधरि‍ पुत्र पि‍तातुल्‍य नै‍ बनि‍ जाइत। ओहुना कि‍छु काजमे मातृत्‍वे प्रमुख परि‍वार रहैछ। एक तँ ओहि‍ना बच्‍चाक पालन मातृ पक्षक काज वुझल जाइत तहि‍पर सँ अखन धरि‍ तपसी माइयेक आदेशक पालन करैत अबैत, तँए धैन-सन। मुदा तैयो टूटैत परि‍वार आ नव उलझन देख मन ओझराए लगलनि‍। एते दि‍न खेती-पथारी करै छलौं, दि‍न-राति‍ ओहीमे लागल रहै छलौं। आब तँ से नै‍ हएत। एक तँ दि‍नोदि‍न माएक हूबा सेहो घटत दोसर बच्‍चा सभले बकरीसँ गाए धरि‍ पोसए पड़त। ओहि‍ना थोड़े हएत। कहुना करबै तँ खुएनाइ-पीएनाइ, दुहनाइ-गारनाइसँ लऽ कऽ अोगरवाहि‍ धरि‍ करए पड़त। खूँटापर छोड़ि‍ कऽ कतौ जाएबो मसकि‍ल हएत। कुत्ता-बि‍लाइसँ लऽ कऽ साँढ़-बत्तू धरि‍ उपद्रव करत। ओह से नै तँ खेत बटाइ लगा देब। जँ से नै करब तँ नै सम्‍हरत। छह मासमे छह दि‍न कम। बच्‍चाकेँ जँतै-पीचैक समए होइते पहलनि‍ (सुगि‍या) हाँइ-हाँइ गाएक नाइदमे सानी-कुट्टी लगा वि‍दा भेली। डेढ़ि‍या टपि‍ते वामा भागसँ दहि‍ना भाग बि‍लाइकेँ टपैत देखलनि‍। मनमे सगुन अपसगुन गललनि‍। जँ दहि‍नासँ वामा भाग जाइत तखन ने अपसगुन होइत मुदा से तँ नै वामासँ दहि‍ना टपल। सगुन बुझि‍ते खुशी उपकलनि‍। मुदा लगले फेर तर्कक संग ि‍वर्तक, अति‍तर्क, अति‍वि‍तर्क हुअए लगलनि‍। मन औनाए गेलनि‍। पुरूखक कहब ने छि‍अनि‍ जे वामसँ दहि‍न टपने सगुन होइत मुदा पुरूखक दहि‍न स्‍त्रीगणक वाम होइत आ वाम दहि‍न। प्रश्‍नक उत्तर नै पाबि‍ मन ठमकि‍ गेलनि‍। मुदा लगले सोचलनि‍- अनजान-सुनजान महाकल्‍याण। जे पूत हरबाही गेल, देव-पि‍तर सभसँ गेल। अनेरे कोन ओझरीमे ओझराएल छी। जानि‍ कऽ रोग बेसाहि‍ लेब तँ दोख ककर हएत। मन हल्‍लुक भेलनि‍। मन हल्‍लुक होइतै दुनू बच्‍चा धीरज आ घुरनीपर नजरि‍ बढ़लनि‍। दुनूक जन्‍मक दि‍न गनए लगलीह। वरस्‍पति‍ दि‍न आसीन मास। आंगुरपर गनैत-गनैत पाँच मास चौबीस दि‍न पुरलनि‍। छह मासमे छह दि‍न कम। हि‍साब जोड़ि‍ते मन मधुआ गेलनि‍। अकास-पतालक बीच हृदए नॉचए-गाबए लगलनि‍। एक दि‍न बीतने तँ उनतीस माघ हरा जाइत आ छह मासमे तँ छबे दि‍न कम रहलहेँ। सकताइत-सकताइत बच्‍चा छहमसुआ भऽ गेल। माइयोक पेटमे जे छह माससँ कम रहैए ओकर आँखि‍ नै फुटैत ऐछ मुदा छह मास पुरलापर जे जनमैत ऐछ ओ तँ भगवतीक बेलक आँखि‍ सन आँखि‍ नेनहि‍ अबैत ऐछ। छबे दि‍न ने कम छै आँखि‍क गुणक सि‍रखार तँ आबि‍ये गेल हेतै। कोढ़ी (कली) फूल जकाँ पत्ती सभ जरूर नि‍कलि‍ गेल हेतै। अधखि‍ल्‍लू फूल जकाँ सुगि‍याक मन हर्ष-वि‍षादक बीच पड़ि‍ गेलनि‍। पीपरक पात जकाँ सदति‍काल डोलैबला नै बड़क पात जकाँ भऽ गेलनि‍। ऐ दुनू बच्‍चाक माए तँ हमहीं भेलि‍ऐ कि‍ने। अपन दादी (सुनयना) तँ पकले आम जकाँ छथि‍न। मुदा तैयो धैनवाद हुनके दि‍अनि‍ जे घर-अंगनाक काजक संग दुनू बच्‍चोकेँ सम्‍हारैत छथि‍। ओना भाइयो (तपेसरो) अपन पुरूखपना काज (खेती-पथारी) छोड़ि‍ अंगने-घरक काजमे भरि‍ दि‍न लगल रहै छथि‍। ई तँ ओही बेचारेकेँ धैनवाद दि‍अनि‍ जे एहेन दूधमुहाँ बच्‍चाकेँ पोसि‍-पालि‍ रहल छथि‍। दस दुआरी रहि‍तो की कम करै छि‍अनि‍। मन शान्‍त भऽ गेलनि‍। नजरि‍ भगवान दि‍स बढ़लनि‍। भगवान दि‍स नजरि‍ बढ़ि‍ते तामस लहरए लगलनि‍। कहैले भगवान छथि‍। सभपर एक्के रंग नजरि‍ रखै छथि‍ मुदा वएह कहथु जे ककरो-ककरो तते दै छथि‍न जे तौला-कराही घि‍नाइ छै आ ककरो-ककरो चुट्टि‍याह बँसबाड़ि‍ जकाँ ओधि‍ धरि‍ कोकैन कऽ उपटि‍ जाइ छै। जुगो तेहेन भऽ गेल जे जेहने पुरूखक कि‍रदानी देखै छी तेहने मौगीक। जीबैयोबला बेटा-बेटीकेँ कि‍यो मोड़ीमे फेकैए तँ कि‍यो नून चटबैए। फेर लगले मन अपना परि‍वार दि‍स घुरि‍ नसेरी पति‍पर पड़लनि‍। पति‍पर नजरि‍ पड़ि‍ते सासु-ससुरपर खौंज उठलनि‍। बुदबुदेली- “बेटाकेँ बि‍गाड़ैमे जहि‍ना बुढ़ि‍याक (सासु) कि‍रदानी भेलनि‍ तहि‍ना बुढ़वाक। गाजाक गुल सुनगबैत-सुनगबैत बेटो अपने जकाँ गजेरी भऽ गेलनि‍। असकरे की करब? घरसँ लऽ कऽ बहार धरि‍ खटैत-खटैत देह अकड़ि‍ जाइए।” तपेसर ऐठाम पहुँचते सुनयनाकेँ बच्‍चा लग बैसल देखलनि‍। बाटक सभ बात बि‍सरि‍ मुस्‍कुराइत बजली- “काकी, छअ मास पुरैमे छबे दि‍न कम छन्‍हि‍। आब दुनू दुनि‍याँ देखबे करतनि‍।‍” पलहनि‍क बात सुनि‍ जहि‍ना सुनयना अपन सभ कि‍छु बि‍सरि‍ बच्‍चाकेँ हृदएमे समा लेलनि‍ तहि‍ना तपेसर रोपल गाछीक फड़ देख वि‍स्‍मि‍त भऽ गेला। मनमे आनन्‍दक हि‍लोर उठि‍ गेलनि‍। दुनूक (सुनयनो आ तपेसरो)‍ मनमे सबुरक गाछ जनमि‍ गेलनि‍। अखन धरि‍ सुनयना पलहनि‍पर जते ओंगठल छलीह ओइमे कमी करैक एहसास भेलनि‍। छह मसुआ बच्‍चा भऽ गेल। दूधक संग अन्नो चाटत। दालि‍क झोर बना खुआएब। मुदा लगले मनमे उठलनि‍ जे दालि‍यो तँ कते रंगक होइ छै। सभ एक्के रंग थोड़े होइ छै। कोनो गलनमा (सुपाच्‍य) होइ छै तँ कोनो गरि‍ष्‍ट। सबहक अपन-अपन चालि‍-ढालि‍ (गुन-धर्म) होइ छै। मन औना गेलनि‍। औनाइत-औनाइत मन खेरही दालि‍पर गेलनि‍। जेहने आकार तेहने गलनमा। अखन की कोनो रोटीपर लठगर खुआएब। पलहनि‍केँ कहलखि‍न- “कनि‍याँ, सभसँ नीक खेरहि‍ये दालि‍ हएत?‍” “हँ।‍ जेना-जेना देह सकताइत जेतै तेना-तेना खोराको बढ़बैत जैहऽथि‍न। आब अपनोसँ ओरि‍या-ओरि‍या जतबो-पि‍चबो करि‍हथि‍न आ तेलौ-कूर दि‍हऽथि‍न।” पलहनि‍क सभ बात सुनायना सुनबो नै केलनि‍ आकि‍ बीचहि‍मे मन उड़ि‍ कऽ तपेसरक जि‍नगीपर चलि‍ गेलनि‍। बेचाराकेँ दुनि‍याँक कोनो सुख नै भेल। पाँचो बर्ख कनि‍याँ संग नै रहल। कोन जनमक पाप बि‍सेलै से नै जानि‍। फेर मन उनटि‍ अपनो दुनू परानीपर गेलनि‍। माइयौ-बापक कएल नीक-अधला काजक फल बेटा-बेटीकेँ पड़ैत छैक। जेना-जेना वि‍चार उठनि‍ तेना-तेना मुँहक सुर्खी क्षीण (उदास) होइत जानि‍। कहीं हमरे सबहक (माए-बापक) कएल पाप ने तँ बेचाराक ऊपर डि‍रि‍आइ छै। फेर मन आगू बढ़ि‍ समाज दि‍स बढ़लनि‍। एहेन बेर-बि‍पति‍ की तपेसरेपर पड़ल ऐछ आ कि‍ आनो-आनकेँ पड़लै। सोगमे पड़ल तपेसरक मन अपन गि‍रैत परि‍वारपर अँटकल। जते उपजा-बाड़ी होइ छलाए बटाइ लगौने दूधक डारही होइए। एक तँ समयक कोनो ठेकान नै तैपर लोढ़ा-बि‍च्‍छ कऽ सेहो लइये जाइत ऐछ। मगर खरचा तँ बढ़ि‍ये गेल। अपनो काज उद्यम छोड़ि‍ भरि‍ दि‍न अंगने-घरक काजमे लटपटाइत रहै छी। छोड़ि‍यो कन्ना देबै? कोनो कि‍ भेड़ी-बकरीक बच्‍चा छी जे पेटसँ नि‍कलल आ कुदए-फानए लगल। मनुक्‍खक बच्‍चा तँ ताड़क गाछ जकाँ होइत ऐछ। जकर जड़ि‍ये बन्‍हैमे कतेक समए लगैत ऐछ। ई भि‍न्न बात जे बोनमे जइठाम ताड़क गाछ ने दोसरकेँ रोकैत ऐछ तइठाम आ ने अपने रूकैत ऐछ। भक्क टुटि‍ते सुनयना पहलनि‍केँ पुछलनि‍- “कनि‍याँ, की कहलि‍ऐ से नै बुझलौं?‍” पहलनि‍- “यएह कहलि‍एनि‍ जे आब अपनो सभ काज सम्‍हारि‍ सकै छथि‍।‍” सभ काज सुनि‍ सुनयनाक मनकेँ परि‍वार नाचि‍ उठलनि‍। सोचए लगलीह जे जखन परि‍वारमे लोकेक बाढ़ि‍ ठमकि‍ गेल तखन धने-सम्‍पति‍ लऽ कऽ की हएत? पुन: वि‍चार घुरलनि‍। जँ भगवान दुनूक औरूदा देथि‍न तँ धन-सम्‍पति‍ कमा लेत। कमाइक बात मनमे उठि‍ते अपन काज दि‍स नजरि‍ बढ़लनि‍। विसवास जगलनि‍ जे जखन पि‍लुआ सन दुनू छल तखन तँ पालि‍ लेलौं। आब तँ सहजे छअ मसुआ भऽ गेल। हमरा अछैते बेटा (तपेसर) कानै ई केहेन हएत। पुन: मनमे उठलनि‍, अपने पुरना साड़ीक वि‍सटी पोताकेँ बना देब आ पोतीकेँ घघरि‍यो सीब देब। उमेरे बेसी भऽ गेल तँए की। जाबे देहमे हूबा ऐछ ताबे तँ खटबे करब जहन हूबा टुटि‍ जाएत तहन बुझल जेतै। तँए की बेटाकेँ कानए देब। दुनि‍याँमे कि‍यो ओकर नोर पोछैबला नै छै? जँ नै छै तँ सुगि‍ये (पलहनि‍ये) कि‍अए एते करै छै। ओकरा हमरा परि‍वारसँ कोन मतलब छै। मुदा छै। जकरामे प्रेम छै ओकरे दुनि‍याँमे सभ छै। दुनू बच्‍चाकेँ जाँति‍ पलहनि‍ बाजलि‍- “आब जँ बकरीक दूध नहि‍यो हेतनि‍ तँ गाइयोक दूधसँ काज चलि‍ जेतनि‍। आब ओछाइनपर बच्‍चा अपनो उनटै-पुनटैले जोर करतनि‍। आस्‍तेसँ कर घुमा दि‍हऽथि‍न‍ ओना बेर-कुबेर हमहूँ अबि‍ते रहब। भैयाकेँ कहि‍ दथुन जे काल्हि‍ पटोर पहीि‍र अंगनासँ नि‍कलबनि‍।।” चि‍न्‍तामे डूबल तपेसर अपनो सोचै आ दुनू गोटेक (माए आ पलहनि‍) गपो-सप्‍प सुनै। ओना कि‍सानी वुद्धि‍ तपेसरकेँ तँए जत्ते मन काज दि‍स दौड़ैत ओते गप-सप्‍प दि‍स नै। अखन धरि‍क जि‍नगी रहलनि‍ आेइमे एकाएक मोड़ एलनि‍। १०८दानाक तुलसीमालाक जप जकाँ तपेसरक दि‍न-राति‍ अपन घर-गि‍रहस्‍तीक काजक बीच बीत जाइत। ओना जहि‍ना मनक वि‍सवासकेँ आँखि‍ नै झुठला सकैत तहि‍ना तपेसरक हृदएमे माए आ पलहनि‍ चौपड़ि‍ मारि‍ बैसलि‍। तँए चि‍न्‍ता ओते नै जते हेबाक चाहि‍एनि‍। दुनू बच्‍चाकेँ जाँति‍ पलहनि‍ हाथ-पएर सोझ कऽ टाँग पकड़ि‍ उल्‍टा झुला चानि‍मे काजरक टीक्का लगा मुस्‍की दैत सुनयनाकेँ कहलखि‍न- “काकी, भैयाकेँ वि‍आह करा दि‍अनु?‍” वि‍आह सुनि‍ सुनयना सुख-दुखक (नीक-अधलाक) बीचक सरोवरमे पैसि‍ सोचए लगलीह। हमरे आशा कते दि‍न हेतै। चौथापनमे पहुँच गेल छी, जते दि‍न जीबै छी जीबै छी। मुदा ओकर (तपेसरक) जि‍नगी तँ से नै छै। अखन ओकरा की भेलहेँ। बच्‍चाक कोन ठेकान ऐछ। जुआनो-जहान चलि‍ जाइए। एक तँ मनुक्‍खे माटि‍क काँच बरतन छी तैपर ओ (दुनू बच्‍चा) तँ आरो गि‍लगर माटि‍ जकाँ ऐछ। नीक जकाँ सुखबो ने कएल ऐछ। एक रती कोनो चीजक टोना लगतै टन दे चलि‍ जएत। मुदा परि‍वार तँ पुरूख-नारीक संयोगसँ चलैत ऐछ। जाबे दुनूक संयोग नै हएत ताबे दुनि‍याँ (सृष्‍टि‍) आगू मुँहे कन्ना ससरत? बातकेँ टारैत सुनयना बजलीह- “कनि‍याँ, कहलौं तँ नीके बात मुदा साल भरि‍क बीच कन्ना एहेन गप करब।‍” सुगि‍याक बात तपेसरो सुनने। तरे-तर मन बजैले ओढ़ मारैत मुदा बुद्धि‍ रोकैत। कतबो बुद्धि‍ रोकलक तैयो बजा गेलै- “कनि‍याँ, अहुँ नीकेले कहलौं, कटै नै छी मुदा जँ दुनू बच्‍चा उठि‍ कऽ ठाढ़ हएत आ दुनि‍याँ दि‍स डेग बढ़ौत तखने, एक तँ ओकरा मइटुग्‍गर बुझि‍ कि‍यो अपन बेटा-बेटीकेँ ऐ घर आबै ने दैत तैपर जँ दोसर वि‍आह कऽ लेब तखन तँ आरो कि‍यो अपना बेटा-बेटीकेँ सतमाए लग आबए नै दि‍अए चाहत।‍” तपेसरक बात सुि‍न पलहनि‍ बजलीह- “भैया, हि‍नका सन-सन समाजमे कते पुरूख छथि‍। समाजाे तँ एकरा अधला नै बुझि‍ उठा लेने ऐछ। रास्‍ता बना देने ऐछ तखन कि‍अए एना बजै छथि‍।‍” सुगि‍याक बात सुि‍न जहि‍ना तपेसरक मुँह बन्न भऽ गेलनि‍ तहि‍ना सुनयनाक। मने-मन सुनयना सोचए लगली, कोनो नवकनि‍याँ (जकरा दुि‍नयाँ दारीक थोड़ ज्ञान छै) परि‍वारमे सासु-ससुर, पति‍, भैसुर-दि‍ओर, ननदि‍क बीच अबैत। अोकरा काँच कड़ची जकाँ जै रूपे लीबा कऽ बनौल जाइत ओइ रूपक बनत। कि‍अए लोक सतमाएकेँ दोख लगबैए। ओहो तँ मनुक्‍खे छी। जँ ओकरा मनुक्‍खक रास्‍ता छोड़ा देब तँ ओ मनुक्‍ख बनत कन्ना? मुदा कि‍छु मनुक्‍खो तँ ओहन होइत जे जेरमे रहए नै चाहैत? हँ मुदा ओहन सतमाइये टा तँ नै होइए, आनो-आन होइए।” सुनयनाक मन ओझरा गेलनि‍, तँए चुप भऽ गेली। तपेसरक मनमे उठलनि‍ जि‍नगी की? जँ जीबैले जि‍नगी तँ जीबैक लेल अनेको तरहक साधनक जरूरत सेहो होइत। परि‍वारि‍क जि‍नगीक लेल पुरूष-नारी दुनूक जरूरत होइत ऐछ। जँ से नै हएत तँ परि‍वार कते दि‍न परि‍वारक रूपमे ठाढ़ रहत। अखन बूढ़ि‍ माइक आशापर दुनू बच्‍चा जीब रहल ऐछ जखनकि‍ हुनको (माइयो) भानस-भात करए, सेवा-टहल करए लेल टहलूक जरूरत छन्‍हि‍। जँ ओहो मरि‍ जेती तखन अपनो-सभकेँ के भानस कऽ खुऔत। अपने खाइक ओरि‍यान करब आकि‍ भानस करब। जँ भानसे नै हएत तँ खाएब कोना? जँ खाएब नै तँ जीब कोना? जँ मनुक्‍खे नै जीवि‍त रहत तँ परि‍वार कोना बनल रहत? मुदा मनुष्‍यो तँ अजीव होइत ऐछ। कि‍यो अपन घरमे लागल आगि‍ मि‍झबै पाछु अपनो जरि‍-पकि‍ जाइत तँ कि‍यो हँसि‍-हँसि‍ घरमे आगि‍ लगबैत ऐछ। मुदा अपना ऐठाम तँ से नै ऐछ। अनजानमे भलहि‍ं जे भऽ गेल हुअए मुदा जानि‍ कऽ तँ कि‍छु नै भेल। पलहनि‍क वि‍चार तँ अधला नहि‍ये छन्‍हि‍। ओहो बेचारी दुनू बच्‍चाक मुँहे देख बजलीह। अपन जानि‍ बजलीह। हुनको मनमे कहाँ छलनि‍ जे दोसर स्‍त्री कुल्‍टे हेतनि‍। सुपात्रो भऽ सकैए। खाएर जे हौ, मुदा परि‍वारमे जरूरत तँ जरूर ऐछ। भलहि‍ं अखन माए सम्‍हारि‍ रहली ऐछ मुदा परोछ भेलापर (मुइलापर) तँ जरूरत हेबे करत। फेर मनमे उठलनि‍ जँ कहीं माइयक सोझेमे बेटी भानस-भास करै जोकर भऽ जाएत तखन......। वि‍आह भेलापर ओहो सासुर जाएत। ताधरि‍ पुातेहूओ तँ हएत। साल लगि‍ गेल। अइबेर अदरा पावनि‍ रीब-रीबेमे रहि‍ गेल। माघमे तेहन मारूख हवा चलल रहै जे एकोटा आमक गाछ मोजरबे ने कएल। धि‍या-पूताक कोन गप जे सि‍यानो सभ आमक मास बुझबे ने केलक। जहि‍ना बि‍ना बरक बरि‍याती नै होइत तहि‍ना बि‍ना आमक आद्रा पावनि‍ये की? पुरूखे रहने ने मौगी गि‍रथानि‍ बनैत, बि‍ना पुरूखे तँ राँड़-मसोमात कहबैत। अंति‍म जेठमे मौनसुनी तँ नै बि‍हड़ि‍या बरखा भेल। बरखा भेने धरतीक रंगे बदलि‍ गेल। आन साल जकाँ ने बेसी गरमी पड़ल आ ने बाध-बोनक रूप बि‍गड़ल। हरि‍यर घाससँ बाध सुग्‍गा पाँखि‍क साड़ी पहि‍रल जकाँ सुन्‍दर लगैत। अगता हाल भेने पूवरि‍या घरक पछुआरक दाबापरक गेनहारी सागक गाछ सुनयनाक जनमि‍ गेलनि‍। बीसे दि‍नमे आंगुर भरि‍-भरि‍क भऽ गेल। कनौजरि‍ छोड़े जोग भऽ गेल। काल्हि‍ये बीरार देख सुनयना वि‍चारि‍ लेलनि‍ जे काल्हि‍ एकरा (सागकेँ) रोपि‍ लेब। अखन रोपलासँ पाँच दि‍न पछुएबे ने करत मुदा कनौजरि‍ तँ ठीक रहत। तहूमे पछबा थोड़े बहैत ऐछ जे रोपलापर एकोटा लटुआएत। दुनू साँझ पानि‍ देबै लगले लगि‍ जाएत। कनी-मनी रौदमे अलि‍साएत तँ सेहो राति‍क ठंढमे उठि‍ कऽ ठाढ़ भऽ जाएत। जँ अखन नै रोपि‍ लेब तँ भदवारि‍मे तीमनक दि‍क्कत हएत। फेर मनमे उठलनि‍ भदवारि‍क साग! तत्-मत् करि‍ते रहथि‍ आकि‍ मनमे उठलनि‍ पोरो-पटुआ साग ने भदवारि‍मे कफाह होइ छै सभ साग थोड़े होइ छै। जहि‍ना जाड़मे सेरसो-तोड़ी झँसगर होइए, चैत-बैसाखमे पोरो-पटुआ तहि‍ना ने भदवारि‍मे गेनहारी-ठढ़ि‍या होइए। मनमे खुशी भेलनि‍। मनमे चमकलनि‍ गेनहारीक रूप। हरि‍यर साड़ीसँ सज्‍जि‍त पात, तहि‍क बीच लाल डाॅटक पाढ़ि‍, धरतीपर ओलरि‍ मस्‍तीक आँखि‍सँ दुनि‍याँ दि‍स देखैत। अपन जि‍नगी दोसराक सेवाले अरोपि‍ बेर-बेर मूड़ी कटला बादो पुन: मूड़ी पैदा कऽ सेवाले इशारा करैत। जहि‍ना मुरगी चूजाक संग खोपसँ नि‍कलि‍ ओचाओन बाड़ी-झाड़ीमे चराओर करैत, बोलि‍यो सीखैत आ दुनि‍याे देखए जाइत तहि‍ना दुनू बच्‍चा धीरज-घुरनीक संग सुनयना लोटामे पानि‍ नेने पछुआर दि‍स वि‍दा भेली। दावा लग पहुँच ठाढ़ भऽ गेनहारीक बीरार देखि‍ते मन पड़लनि‍ भीतमे साटि‍ कऽ राखल गुरमीक बीआ। आँखि‍ उठा कऽ देखलनि‍ तँ चक-चक करैत बीआ। बीआ देख मन पड़लनि‍ जे गुरमि‍यो रोपैक समए आबि‍ गेल। मारे बीआ ऐछ, एते थोड़े अपने रोपब। अनको देबै। गुरमी मनमे रहबे करनि‍ आकि‍ दुनू बच्‍चा दि‍स तकलनि‍। गुरमीक कोमलता मनमे अबि‍ते मुँहसँ अनायास नि‍कललनि‍- “बौआ, आइ साग रोपि‍ दै छी काल्हि‍ गुरमि‍यो रोपि‍ देब।” दादीक बात सुि‍न धीरज बाजल- “कोन गुलमी?‍” भीतमे साटल गुरमीक बीआ आंगुरसँ देखबैत सुनयना बजलीह- “ओ बीआ गुरमीक छी। जहि‍ना अहाँ दुनू भाए-वहीनि‍ बच्‍चा छी तहि‍ना तहि‍ना ओहो बीआ छी। ओकरा खुरपीसँ माटि‍केँ खुनि‍ रोपि‍ देबै। पाँच-छह दि‍नमे गाछ जनमि‍ जाएत। जहि‍ना अहाँ दुनू गोरे हमरा एतेटा हएब तहि‍ना ओहो बढ़ि‍ कऽ फड़ए लगत।‍” दादीक बात सुि‍न घुरनी ठुनकैत बाजलि‍- “गुरमी लेब। गुरमी लेब।‍” घुरनीक ठुनकबपर धि‍यान नै दऽ सुनयना लोटाक पानि‍ सागक गाछपर छीटि‍लनि‍। पानि‍ छीटैत देख घुरनि‍यो चुप भऽ गेल‍। लोटा रखि‍ गाछ नि‍हारि‍ कऽ देखलनि‍ तँ बुझि‍ पड़लनि‍ जे एक दि‍ससँ उखाड़ैबला सभ गाछ नै एेछ। से नै तँ छोटकाकेँ बराए बड़का उखारब। चारि‍ दि‍नक बाद छोटको रोपाउ भऽ जाएत। फेर मन पड़लनि‍ जे एक डेढ़ धुर करीबमे रोपब। चारि‍-पाँच डेग पूबे-पछि‍मे आ चारि‍-पाँच डेग उत्तरे-दछि‍ने। एक-एक बीतपर रोपब। मने-मन हि‍साब जोड़ि‍ बीआपर नजरि‍ दैते बुझि‍ पड़लनि‍ जे चारि‍ओ हि‍ससँ कम्मे लागत। खाएर, भगवान सभ चीज एहि‍ना देथुन जे अपनो खाए आ दोसरोेकेँ दै। नि‍हुरि‍ कऽ सागक गाछ उखाड़ए लगली। तै बीच दुनू भाए-वहीन (धीरज-घुरनी) एक्के गाछपर हाथ दऽ उखाड़ए चाहलक। एक-दोसराक हाथ-हटबैक कोशि‍श दुनू करए चाहलक। हाथ पकड़ि‍ दुनू कटाओज करए लगल। दुनूक कटाओज नै छोड़ा सुनयना हाँइ-हाँइ छेँटगरहा गाछ उखाड़ि‍ कहलखि‍न- “‍चलै चलू। भऽ गेल।” आगू-आगू दुनू बच्‍चा आ पाछु-पाछु सुनयना अांगन एली। आंगन आबि‍ बाटीक पानि‍मे गाछक जड़ि‍ धोय आइ बाटि‍येमे रखि‍ देलखि‍न। रोपाउ जगहपर जनमल घासकेँ उखाड़ि‍ कातमे फेक ओसारक चारसँ खुरपी उताड़ि‍ बीत-बीत भरि‍पर छअ मारि‍-मारि‍ दड़ी बनबए लगली। गोर दसेक दड़ी बनैबते दुनू भाए-वहीन हाथसँ खुरपी छीनए लगलनि। काजकेँ बाधि‍क होइत देख सुनयना दुनू बच्‍चाक हाथ छोड़ा, बीच आंगनमे खुरपी फेक देलनि‍। शंका रहनि‍ जे खुरपी ने लागि‍ जाइ। दुनू बच्‍चा खुरपी आनए दौड़ल तै बीच ओ बाटीसँ गाछ नि‍कालि‍ हाँइ-हाँइ रोपए लगली। दुनू बच्‍चा खुरपी पकड़ि‍ फेर छीना-छीनी करए लगल। हाथमे खुरपी लगैक डर फेर भेलनि‍। दसो दड़ी रोपि‍ बाल्‍टी लऽ पानि‍ आनए कल दि‍स वि‍दा भेली। दुनू बच्‍चा खुरपी छोड़ि‍ पाछु-पाछु दौड़लनि‍। पानि‍ आनि‍ लोटासँ रोपलाहा गाछमे पानि‍ दि‍अए लगली। फेर दुनू लोटा छीनए लगलनि‍। हाँइ-हाँइ पटा लोटा दऽ देलखनि‍। फेर दुनू लोटा छीना-छीनी करए लगल। तै बीच खुरपी आनि‍ फेर दड़ी खुनए लगली। दुनू बच्‍चा बौआऽ गेल। खुरपी लऽ दड़ी खुनब कि‍ रोपब आि‍क पटाएब।‍ अढ़ाइ बर्ख बीत गेल। दुनू भाए-वहीन दादि‍यो आ पि‍तोसँ बाजब सीख लेलक। दुनूक बोलो फरि‍छा गेल। सुपुट बोल नि‍कलए लगल। पि‍यास लगलापर पानि‍ आ भूख लगलापर भात-रोटी बजए लगल। बजरूआ बच्‍चा जकाँ मोवाइलसँ गप, छुड़ी, पि‍स्‍तौलक खेलौना, आ छुड़छुड़ी फटाका फोड़ब नै बुझैत मुदा तैयो गमैआ बच्‍चाक जि‍नगी जरूर जीबऽ लगल। गाम-घरमे जे गति‍ वि‍धवाक, नि‍स्‍सहायक होइत से गति‍ मइटुग्‍गर धीरज आ घुरनीक परि‍वारमे नै छलैक। गाम-घरमे गरीब मइटुग्‍गर, बपटुग्‍गरक प्रति‍ सि‍यानोक नजरि‍ वि‍षैला होइत। वि‍धवाकेँ डाइनक संग अशुभ बुझल जाइत तहि‍ना दुखताहसँ घृणा आ मइटुग्‍गर-बपटुग्‍गरसँ सेहो कएल जाइत ऐछ। पानि‍क बाल्‍टीन नेनहि‍ सुनयना कलपर पि‍छड़ि‍ खसि‍ पड़लीह। ओना देहमे चोट लगलनि‍ मुदा माथ उठले रहि‍ गेलनि‍। ईंटा चोटसँ दहि‍ना गट्टा टुटि‍ गेलनि‍। तत्‍काल चोट तँ तेहन नै बुझि‍ पड़लनि‍ मुदा गट्टा फुलब शुरू भऽ गेलनि‍। तपेसर बाँसक पात आनए गेल रहए। ओसारपर ओछाइन खसा एक्के हाथे सुनयना ओछा पड़ि‍ रहली। ओछाइनेपर दुनू बच्‍चा बगलमे बैसल। पात लऽ कऽ अबि‍ते माएकेँ सुतल देख तपेसर पुछल- “माए, सुतल कि‍अए....?‍” नोर पोछि‍ सुनयना उत्तर देलनि‍- “बौआ, कलपर खसि‍ पड़लौं।‍” खसैक नाओं सुनि‍ तपेसर चमकि‍ कऽ बाजल- “चोटो-तोटो लगलौ?‍” “ईंटापर कनी चोट लगि‍ गेल।‍” लग आबि‍ तपेसर गट्टाकेँ फुलल देख गुम भऽ गेल। फुलबक हि‍साबसँ भरि‍सक टूटि‍ गेलइ। मन चनकि‍ करेज दरकि‍ गेलनि‍। मनकेँ थीर करैत बाजल- “डॉक्‍टरकेँ बजौने अबै छि‍अनि‍। दवाइ देथुन नीक भऽ जेमे।‍” कहि‍ कलपर पहुँच हाथ-पएर धोय, अंगा पहीरि‍ तपेसर वि‍दा भेल। आंगनसँ नि‍कलि‍ते मनमे उठलनि‍ जहाँ धरि‍ पार लागत तहाँ धरि‍ तँ करबे करबनि‍। जखन जि‍नगि‍येक कोनो ठेकान नै ऐछ, कखन कि‍ भऽ जाएत तेकर कोन ठीक। अपने बाँसपर चढ़ै छी जँ ओतैसँ खसि‍ पड़ी तखन कि‍ हएत? चि‍न्‍ता बढ़ए लगलनि‍। डॉक्‍टर संग आबि‍ तपेसर माएकेँ कहलनि‍- “‍माए, जना जे भेल से सभटा बात डाॅक्‍टर सहाएबकेँ कहुन।” सुनयनाक बात सुनि‍ डॉक्‍टर पलस्‍तर कऽ देलखि‍न। फीस लऽ चलि‍ गेलाह। गाएकेँ पानि‍ पीआ तपेसर बाँसक पात टोनि‍अबए लगल। मनमे उठलनि‍ काजक बोझ। एक तँ ओहि‍ना दि‍न-राति‍मे एक्को छन नि‍चेन नै होइ छी तैपर माइक गट्टा टूटब तँ आरो काज बढ़ा देलक। छोड़ैबला कोन ऐछ। गाएकेँ खुएनाइ-पीएनाइ, घर-बहार केनाइ छोड़ि‍ देब से नै बनत। एक तँ लछमी दुआरपर कल्‍पती दोसर बच्‍चाक माए तँ वएह छी। अखन की भेल दू-अढ़ाइ बर्खक ऐछ, जँ ओकरा कनि‍यो कऽ दूध नै हेतै तँ सक्कतक छाती कन्ना बनतै। अपने नै हएत तँ नै हएत। माइयो तँ तहि‍ना भऽ गेलि‍। एक तँ बुढ़ारी तैपर जँ पावो भरि‍ दूध नै हेतै तँ बुढ़ारीक हाड़ कन्ना जुटतै। एते दि‍न दुनू बच्‍चेक ताक-हेर करए पड़ैत छल आब माइयोक तँ करए पड़त। उपजा-बाड़ी तँ तेहेन होइए जे पार लागब मोसकि‍ल भऽ गेल ऐछ। रौदी भेने अइबेर आरो संकट बढ़ि‍ गेल। पैछले माससँ बेसाह लगि‍ गेल। पाइ-कौड़ीक कोनो दोसर उपाए नै। हे भगवान कोन जन्‍ममे चूक भेल जे चर्मरोग जकाँ सौंसे देह एकबट्ट भेल ऐछ। मुदा कि‍ चि‍न्‍ता केने दुख भागि‍ जाएत? पत्ता टोनि‍ कुट्टी काटए लगल। मन पड़लनि‍ बाँसक पातक कुट्टी। एक तँ लगहैर गाएकेँ बाँसक पात खुअबै छी। मुदा उपाये की? जँ दू मुट्ठी हरि‍यरी नै हेतै तँ नारक कुट्टी कन्ना खाएत। अपने घास आनए जाएब से ओते पलखैत रहैए। गाइक नादि‍मे कुट्टी लगा माए लग आबि‍ बाजल- “माए, चि‍न्‍ता-फि‍कि‍र नै कर। दि‍नक दोख छलै, भेलै। तोरा कोन चीजक कमी छौ। हमरा सन बेटा, दूटा पोता-पोती लगेमे छौ तखन तोरा कथीक दुख।‍” भरभराएल स्‍वरमे सुनयना बाजलि‍- “बौआ, आँखि‍क सोझमे तोहर दुख देख छाती छटपटाइए। जेहो कोनो काजमे संग-साथ दै छेलि‍यह सेहो आब हएत।‍” माइक बात सुनि‍ तपेसर अवाक भऽ गेल। बोल बन्न भऽ गेलै। मनमे उठलै रौतुका सि‍दहा। बेर टगि‍ गेल। कोना राति‍ चुल्हि‍ चढ़त। बि‍नु खेने ककरो नीन हेतै। जे कनी-मनी हाथमे छलाए सेहो दवाइये-दारूे चलि‍ गेल। एना भऽ कऽ कहि‍यो हाथ खाली नै भेल छलाए। ने तँ पचासे रूपैरूा दुआरे डाॅक्‍टर सहाएबकेँ एना कहि‍ति‍अनि‍। तरे-तर छाती डोलए लगलनि‍। आगू नाथ ने पाछु पगहा। माएकेँ कहलनि‍- “माए, खेत बेचने बि‍ना एक्को दि‍न पार लागब कठि‍न भऽ गेल। से....।‍” बेटाक बात सुनि‍ सुनयना चुपे रहलीह। मनमे उठए लगलनि‍ घर-परि‍वार तँ ओकरे छि‍ऐ। कोना हँ आकि‍ नै कहबै। हमरा बुते कि‍ हेतै। धारक बेग जहि‍ना भौर लैत तहि‍ना सुनयनाक मन भौर लि‍अए लगलनि‍। एक-एक पाइ कम भेने घर खसैत आ एक-एक पाइ जमा भेने उठैत ऐछ। एक-एक कट्ठा जँ बि‍काइत गेल तँ नि‍रभूमि‍ होइमे कते दि‍न लागत। एक दि‍स परि‍वारक खर्च दोसर दि‍स समएक मारि‍ तैपर जते सम्‍पति‍ कमत ओते तँ कमे होइत जाएत। माएकेँ चुप देख तपेसर बाजल- “जाइ छी, चौरी खेत बेचैक गप-सप्‍प करए।‍” खेत बेचैक बात करए तपेसर वि‍दा भेल। आंगनसँ नि‍कलि‍ते मनमे उठलनि‍ सुपतोसँ कम दाम देत। जहि‍ना गरामे उत्तरीबलाकेँ कौआसँ खैर लुटाओल जाइत तहि‍ना ने हएत। मुदा लगले मन सकताएल बाजल- “तोहर कोन दोख। मन-पेट काटि‍ लोक घर बनबैए आ बि‍हाड़ि‍मे उड़ि‍ जाइ छै तैमे बनौनि‍हारक कोन दोख।‍” सबुर भेलै डेग आगू बढ़ौलक। दुनि‍याँ बड़ीटा छै। जँ भगवान हाथ-पएर दुरूस रखने रहताह तँ कहुना नै कहुना ि‍जनगी गुदस कैये लेब। मुदा आइक जे परि‍स्‍थि‍ति‍ ऐछ ओकरा छोड़ि‍यो कऽ भागव? भागव तँ कायरता हएत। कोन मुँह लोककेँ देखाएब। हमरा सन-सन ढेरो लोक ऐछ। लगले मन उनटि‍ गेलै। जहि‍ना गाममे कतेको वृत्ति‍क लोक होइत ऐछ तहि‍ना गामोक अनेक रूप होइत। एक्के गाम ककरो लेखे वि‍द्वानक होइत तँ ककरो लेखे मुरूखक। ककरो लेखे शराबी-जुआरीक होइत तँ ककरो लेखे बइमान-शैतानक। तँए की‍ आमक गाछमे तेतरि‍ फड़ि‍ जाएत आ तेतरीक गाछमे आम। सभकेँ अपन-अपन गुण-स्‍वभाव आ चलैक रास्‍ता होइ छै। कि‍यो फटेहाल जि‍नगी पाबि‍ जीबैत ऐछ आ कि‍यो सुभि‍तगरसँ जीबैत ऐछ। एकर माने ई नै जे फटेहाल जि‍नगी जीनि‍हार पति‍ते भऽ जाए। हँ, होइतो ऐछ। मुदा जेकर जेहन वि‍चार तड़गर रहैत ऐछ ओ अोहन जि‍नगी बना जीबैमे आनन्‍द प्राप्‍त करैत ऐछ। आनन्‍दे प्राप्‍त करब तँ उद्देश्‍य होइत ऐछ। कि‍यो तत्‍व-चि‍न्‍तनमे समए लगबैत तँ कि‍यो दि‍न-राति‍ लुचपन्नी केने घुरैत। एहनो-एहनो तत्‍व चि‍न्‍तक ऐ धरतीपर भेल छथि‍ जे दोहरा-तेहरा कऽ जि‍नगी मांगि‍ तत्‍व-चि‍न्‍तन करैत रहलाह। ऐ असीमि‍त भूमाकेँ, कठि‍न मेहनतेसँ जानल आ ताकल जा सकैत ऐछ। टोलक अंति‍म छोड़पर पहुँचते तपेसरकेँ कलकत्तासँ आएल खुशीलाल पुछलकनि‍- “भाय कत्तऽ जाइ छी?‍” खुशीलालक बात सुि‍न तपेसर ठमकि‍ गेला। जहि‍ना खुशी मनमे मधुआएल बोल पनपैत तहि‍ना दुखी मनमे सि‍नेहक बोल कनीकाल चि‍कुरि‍आएल ठोर, थरथराइत पि‍पनी रूपमे ठाढ़ भऽ मि‍रमि‍राइत तपेसर कहलक- “बौआ, वि‍पत्ति‍मे पड़ल छी। माएक हाड़ टूटि‍ गेलनि‍। पलस्‍तर तँ करा देलएनि‍। मास दि‍नक पछाति‍ पलस्‍तर कटतनि‍। तै बीच पथ-पानि‍क संग-संग दवाइ दारू सेहो चलतनि‍। कते कहबह?‍” “भैया, हमहूँ अही समाजक बेटा छी। जते शक्ति‍ ऐछ ओते मदति‍ करब। साल भरि‍पर चारि‍-पाँच हजार रूपैआ लऽ कऽ कलकत्तासँ आएल छी। अखन जत्ते पाइक काज ऐछ लि‍अ छह मासमे बि‍ना सूदि‍क घुमा देब। अखन अहूँक काज चलि‍ जाएत आ कन्‍ी दि‍के कि‍ सि‍के अपनो चला लेब।‍” बि‍नु सूदि‍क रूपैआ सनि‍ तपेसरक मनमे खुशी आएल। मुदा लगले मनमे भेलनि‍ जे व्‍यथा सुनि‍ ओ औगुता कऽ बाजल। जहि‍ना ओ बाजल तहि‍ना की हमहूँ करब। जहि‍ना देहमे रोग सन्‍हि‍आइते रसे-रसे पसरए लगैत तहि‍ना तँ अखन अपनो ऐछ। छह मासक समए दैए मुदा अोरि‍यान हएत। दि‍न-दि‍न खरचो बढ़बे करत जखनकि‍ आमदनीक कोनो जोगार नै देखै छी। तखन कोना लेब? बाजल- “बौआ, दू कट्ठा खेते लऽ लाए।‍” खेतक नाओं सुनि‍ खुशीलाल सहमि‍ गेल। एक तँ बेचारे वि‍पत्ति‍क मारल छथि‍। तैपर सँ खेत लेब। करेज थीर रहतनि‍। जखन करेजे थीर नै रहतनि‍ तखन तँ आरो सोग बढ़तनि‍ की‍ नै। बाजल- “भ.... इ..... अ.....।‍” बजैत-बजैत आँखि‍मे नोर आबि‍ गेलै। पुन: बाजल- “छह मासक बदला दू-चारि‍ मास पछाइते देब।‍” बि‍नु सूदि‍क रूपैआ तपेसरक मनकेँ तड़का देलकनि‍। मनमे चमकलनि‍ सूदि‍ प्रथा। जैपर दुनि‍याँक बैंक ठाढ़ भऽ नंगटे नचैत धनीकक शासनक (सत्ताक) फुलवाड़ीक शोभा बढ़ौने ऐछ। जैसँ देशक उन्नति‍ (मनुष्‍यक कल्‍याण) मुँहक बोल मात्र रहि‍ गेल ऐछ। तइठाम समाजमे......। जै समाजकेँ सूदि‍ दू भागमे बाँटि‍ देने ऐछ- सूदि‍खौक आ सूदि‍दार। बैंकक सूदि‍ कम होइ छै मुदा छबे मासमे मूल धन बनि‍ सूदि‍ पैदा करए लगैत छै। वि‍याजक बंश दुनि‍याँमे पसरि‍ गेल ऐछ। जखनकि‍ समाजक सूदि‍ एकहरफी चलै छै। भलहि‍ं महाजनक बही गीता-रामायणि‍क थाकमे रहि‍ पारस मणि‍ जकाँ बोहि‍‍यो गीता-रामायण बनि‍ जाए। देल-लेलक सीमा-सरहद तोड़ि‍ गीता-रामायणपर हाथ रखैत खौदुकाक घरारीक रजि‍ष्‍ट्रीक समए बना लैत। लगले मन घुरि‍ अपन समस्‍यापर एलनि‍। छोट भाए जकाँ खुशीलालकेँ कहलकनि‍- “बौआ, लोकक लागि‍मे लोक अही दुआरे बसैत ऐछ जे सुख-दुख संग मि‍ल जीबी। टूटल सीढ़ी जकाँ अखन परि‍वारक स्‍थि‍ति‍ बनि‍ गेल ऐछ। कोहुना कऽ एकटा पएर रौपे छी तँ दोसर टूटि‍ जाइए। एक्को डेग ससरब कठि‍न भऽ गेल ऐछ। जना बुझि‍ पड़ैए जे पानि‍-बि‍हाड़ि‍, पाथर, ठनका सभ संगे आबि‍ गेल ऐछ। जि‍नगीक कोनो ठेकान नै देख रहल छी। जहि‍ना पानमे नाव खेबनि‍हारक लग्‍गी थाह नै लैत तहि‍ना भऽ गेल ऐछ।” खुशीलाल- “भैया, लोकेक काज लोककेँ होइ छै।‍” तपेसर- “बेस कहलह। मुदा लोकोक बीच खाढ़ी बनल ऐछ। तोरासँ सात कछे बेसी सम्‍पति‍ ऐछ। जखन दुखेक जि‍नगी भगवान देलनि‍ तखन ओइसँ कते पड़ाएब। जीता-जि‍नगी आँखि‍ कोना मूनि‍ लेब। मुदा तोड़ा पाबि‍ छाती सूप सन भऽ गेल। जहि‍ना पानि‍मे डूबैत चुट्टीकेँ खढ़क आशा होइत तहि‍ना भेल। एकटा संगी भेटल। मुदा दुखो असान नै ऐछ। समैया नै बरहमसि‍या ऐछ। तोरो कहबह जे जखन एते मि‍हनत‍ कऽ कमाइ छह तँ पाइकेँ राइ-छि‍त्ती नै करि‍हह। अखन जे खेत बेचै छी लऽ लाए। फेर जँ बेचब तँ तोरे देबह। मरि‍यो जाएब तैयो तोहर बेटा-पाेता बाजत जे फल्‍लांबला खेत छी। बेचारा माइयक सेवामे बेचलक।” तपेसरक बात सुनि‍ खुशीलालक हृदए पसीज गेल। चुप-चाप घरसँ एटैची नि‍कालि‍ अनलक। चाभीसँ खोलि‍ पाँचो हजार रूपैया ि‍नकालि‍ तपेसरक आगूमे रखि‍ बाजल- “भैया, अखन धरि‍ ने ककरो कोनो चीज ठकलि‍ऐ आ ने चोरा कऽ एकोटा खढ़ उठौलि‍ऐ। दुनू हाथ भगवानसँ कहै छि‍अनि‍ जे जहि‍ना अखन धरि‍ नि‍माहलौं तहि‍ना आगूओ पार लगाएब।‍” गंगाजल जकाँ खुशीलालक वि‍चार सुनि‍ तपेसरक मनक बखारीक मुँह खुजि‍ गेलनि‍। बाजला- “बौआ, सभ बुझैत छथि‍ जे जमीन जाल सदृश्‍य होइत। जाल बनाओले जाइत ऐछ फँसबैले। तोहर हृदए सौदा कागज जकाँ छह। ऐपर प्रेमोकथा लि‍खल जा सकैत ऐछ आ आपराधि‍क सेहो। मुदा हम नै चाहब जे तोरा मनमे कनि‍यो गंदा आबह। देखहक जमीनेक चलैत झूठ-फूसि‍सँ लऽ कऽ बेइमानी-शैतानी, मारि‍-पीट, केश-मोकदमा सभ होइत ऐछ। कि‍यो जबुरि‍या लि‍खा बेइमानी करैत ऐछ तँ कि‍यो महदा लि‍खा। कि‍यो दोसरसँ नि‍शान लऽ दोसराक हड़पैत ऐछ तँ कि‍यो बलजोरी अाड़ि‍ तोड़ि‍ अपनामे मि‍ला लैत ऐछ। कते कहबह?‍” तपेसरक मुँहसँ नव बात सुनि‍, जहि‍ना तैयार खेतमे बाओग कएल फसल अकुि‍र धरतीसँ ऊपर अबैत तहि‍ना खुशीलालक मनमे जि‍नगीक नव-नव अंकुर जनमऽ लगल। नव अंकुर देख जहि‍ना धरतीकेँ अपन नि‍रोग कोखि‍क एहसास होइत तहि‍ना खुशीलालक हृदएमे भेल। वि‍ह्वल होइत बाजल- “भैया, दुनि‍याँ कि‍छु हौ आगि‍ लगौ, पाथर खसौ मुदा मनुष्‍य अपने जि‍नगीक जबाबदेह होइत। एक्के गाछक एक डारि‍मे बाॅझी लगलासँ बॅझि‍या जाइत तँ दोसर चुट्टि‍आ जाइत। मुदा एकर माने ई नै ने जे ओकरामे फड़ैक शक्‍ति‍ नै छै। फड़बो करैत ऐछ। कि‍यो कि‍छु करैए करह, जहि‍ना अखन धरि‍, ओना जि‍नगीमे कोनो लेन-देन नै भेल छल, भाए-भैयारी जकाँ रहलौं तहि‍ना जीता जि‍नगी रहब। अहाँ जेठ भाय तुल्‍य छी जे कहब करैले तैयार छी।‍” खुशीलालक बात सुि‍न तपेसरोक हृदय परसाएल आम जकाँ पल-पल करए लगलनि‍। बजला- “बौआ, अपना गाममे चारि‍ मेलक जमीन ऐछ। बाड़ी-घरारी, भीठ, मध्‍यम धनहर आ चौर। एक गामक रहि‍तो चारि‍ तरहक दाम छै। कारणो छैक अपजा आ उपयोगक। घरारीक जमीन ऊँचगर होइए जैसँ घर बनबैक काजमे अबैत ऐछ। भीठ सीमापर ऐछ। घरो बनाओल जा सकैत मुदा घर नै बनेन उपजो-बाड़ी होइत आ बागो-बगीचा लगाओल जाइत। मध्‍यम धनहरमे ि‍सर्फ अन्ने उपजैत। जखनकि‍ नीच जमीन भेने चौरीक महत्‍व सभसँ कम होइ छै। कारण छैक जे बेसी बरखा भेने वा बाढ़ि‍ एने दहा-भसि‍या जाइत। ने पानि‍क उपज होइत आ ने उपराड़ि‍क। जँ ओकरा मुँह-कान बना पानि‍क बस्‍तु उपजाओल जाए तँ ओहो ओहने मूल्‍यवान हएत जेहन दोसर होइत। ओना ओहो धरति‍ये छी बनौलापर सभ तरहक बनि‍ सकैए। मुदा कते कहबह? बड़ीखान घरसँ नि‍कललौं, अखन जाइ छी।‍” तपेसरक दुनू बाँहि‍ पकड़ि‍ खुशीलाल बैसबैत कहलक- “भैया, अहाँ पाबि‍ बहुत पेलौं। आइ बुझि‍ पड़ैए जे हमहूँ समाजक लोक छी। सोझे गामक सीमानमे धर बान्हि‍ रहने तँ नै होइत होइत तँ तखन जखन सबहक सुख-दुख मि‍ल जाए। जैसँ सभ एकबट्ट भऽ जि‍नगी बि‍ताओत। खाली हाथे कोना जाएब?‍ जँए एत्ते समए बीतल तँए कनी आरो बीतह। अहूँक एकटा काज भेल रहत।” तपेसर- “बौआ, खेत कोनो अन्न-पानि‍ छी जे नाि‍प-खोखि‍ मूल्‍य बनत। एकर मूल्‍य आड़ि-पाटि‍क चुगलसँ होइत। सभ तरहक जमीनक लेन-देन समाजमे चलि‍ते रहैत ऐछ। अपना गामक चौरी खेत डेढ़ हजार रूपैये कट्टा वि‍काइत ऐछ दू कट्ठा खेत देबह तीन हजार रूपैआ दाए।‍” तीनू हजार रूपैआ गनि‍ खुशीलाल तपेसरकेँ देलक। रूपैआ नेने वि‍दा भेला। बाटमे हि‍साब बैसबए लगलथि‍ जे सभसँ बेसी जरूरी बुतातक ऐछ। मास भरि‍क बुतात कीन लेब। बाकी जे बचत हाथ-मुट्ठीमे राखब। जखन घरमे आगि‍ लगले ऐछ तखन कोन लुत्ती कि‍महर उठत तेकर कोनो ठीक छै। मास दि‍न बीतलापर सुनयनाक हाथक पलस्‍तर काटि‍ डॉक्‍टर कहलखि‍न- “भारी काज नै करब। ओना बूढ़क हड्डी छी तँए बच्‍चा जकाँ नहि‍ये जुटत मुदा तैयो बचा कऽ रहब तँ नीके रहत।‍” डॉक्‍टरक बात सुनि‍ सुनयनाकेँ भलनि‍ जे जँ भारी काज नै करब तँ जि‍नगी भारी कोना बनत। जि‍नगीमे हल्‍लुक-भारी सभ रंगक काज अबैए। मुदा जीते-जि‍नगी ने दुनि‍याँ देखै छी, आँखि‍ मुनब सभ हरा जाएत। कहुना भेलौं तँ बुढ़े भेलौं मुदा जाबे पोता-पोती अपने जीबै जोकर हएत ताबतो जँ जीब जाएब तैयो नीके हएत। शरीरसँ शरीरी धरि‍ सुनयनाक सोगसँ सुकुड़ए लगलनि‍। एक दि‍स बेटाक व्‍यथासँ व्‍यथि‍त दोसर दि‍स मइटुग्‍गर पोता-पोतीक जि‍नगी देख झकैत, तँ तेसर दि‍स जि‍नगी भरि‍ पालल-पोसल (छाउर-गोबर) खेतकेँ बोहाइत देखैत तँ चारि‍म दि‍स अपन देहक दुखसँ दुखी। ओना जीबैक आशा मनमे उत्‍साह जगबनि‍ मुदा जेना डि‍बि‍याक इजोतकेँ घनगर अन्‍हार घेरैत-घेरैत छोट (कम प्रकाशि‍त) बना दैत तहि‍ना सुनयनाकेँ भऽ गेलनि‍। अन्‍हार छोड़ि‍ दुनि‍याँमे कि‍छु देखबे ने करैत छलीह। जना खसैत जि‍नगी उठैत जि‍नगीकेँ दाबि‍ सवारी बना लेलकनि‍। जैसँ ओछाइन धऽ लेली। कतबो हूबा उठैक करथि‍ मुदा उठि‍ कऽ बेसी काल बैसल नै होइन। वि‍छानपर पड़ल-पड़ल पहि‍लुक कएल काज भरि‍ दि‍न पढ़ैत रहथि‍। जखन कखनो कि‍म्‍हरोसँ आबि‍ तपेसर पूछनि‍ जे माए, मन केहन लगैए। तँ जहि‍ना कोनो फल वा तरकारीमे गुण तँ रहैत मुदा कोनो रसक सुआद नै रहैत तहि‍ना सुनयनाक मन बेरस हुअए लगलनि‍। बेरस होइत-होइत मरि‍ गेली। फगुआक तीन दि‍न उत्तर चैती बरखा भेल। ओना कुमासक बरखा भेल मुदा मौसमक रंग ओरो हरि‍या गेल। कनी-मनी जे तापसँ दुपहरमे पसेनाक आगमन हुअए लगल, एकाएक रूकि‍ गेल। घुरक ओरि‍यान जे बन्न हुअए लगल छल फेर दोबरा गेल। घरक राखल कम्‍मल, सीरक, सलगी, फेर नि‍कलि‍ गेल। पहि‍ल बरखा भेने सबहक घर चुबल। शीतसँ भीजैत आएल चार रौद पड़ने पएरक बेमाए जकाँ चि‍ड़ी-चाेंंत भऽ फटि‍ गेल। जैसँ बरखामे बखूबी चुबल। चुबैक आरो कारण छलैक। चारमे फड़ल गराड़केँ तकैत-तकैत चि‍ड़ै सभ तना-खोदि‍या देने जना चौरी खेतमे धि‍या-पूता अनेरूआ केशौर उखाड़ैमे खुनैत। जैसँ छप्‍पर सभमे खाधि‍ बनि‍ गेल। मुदा पहि‍ल बरखा होइक कारणे ककरो मुँह मलि‍न नै भेल। पहि‍ल बरखामे एहि‍ना होइत आएल ऐछ, जे सभकेँ बुझल। मुदा जहि‍ना चैत माससँ साल शुरू होइत तहि‍ना बरखाक शुरूआत सेहो चैतेसँ भेल। पहि‍ल पानि‍ भेलापर सबहक मनमे उठल जे जखने अँटि‍येलहा नार-खढ़ सुखत आकि‍ घर छड़ा लेब। से भेल कहाँ? पहि‍ल बरखाक दोसरे दि‍न दोहरा गेल। दोहरेबे नै कएल जे दोहरबि‍ते रहि‍ गेल। गोटे ि‍दन दोहरा कऽ, गोटे दि‍न नागा हुअए लगल। पूस-माघ-फागुनमे जे नार वा खढ़ चैत-बैशाख-जेठमे छाड़ैक उद्देश्‍यसँ अँटि‍आएल गेल ओ जाँकेमे भीज-भीज सड़ए लगल। जहि‍ना एक बेर धारक नासी बाढ़ि‍ सभमे बहैत-बहैत सनमुख धार बनि‍ जाइत तहि‍ना चुबैत-चुबैत सबहक घर चुबाठ घर बनि‍ गेल। चारक खढ़ो आ बत्ति‍यो-कोरो सड़ि‍ खसए लगल। तहि‍ना भीतक माटि‍ धोखड़ि‍-धोखड़ि‍ खसए लगल। थाल-कादोक घर बनि‍ गेल। बरखा हुअए लगै आकि‍ कि‍यो छि‍पली-बाटीसँ घरक पानि‍ उपछैत कि‍यो कोदारि‍सँ काटि‍-काटि‍ भीतक खसल माटि‍ हटबैत। खाएल अन्न पचब कठि‍न भऽ गेल। अपन घरक दशा आ अपना परि‍वारकेँ अवग्रहमे फॅसल देख तपेसर भगवानकेँ समरि‍-सुमरि‍ कहनि हे भगवान अपना देश लऽ चलू। कि‍अए नर्कमे घि‍सि‍यौर कटबै छी। मुदा खाली कहनहि‍टा सँ नै होइत लइयो गेि‍नहार ने चाही। अपन आगूक रास्‍ता बन्न देख तपेसर पाछु घुरि‍ देखैत तँ कनैत मन चि‍कड़ि‍-चकड़ि‍ बजैत जे साल जनमक पाप लोककेँ बि‍साइत छै मुदा पैछलो जनमक पाप मन नै पड़ैत ऐछ। हारि‍-थाकि‍ बेचारा अन्‍हारमे चलैत बटोही जकाँ आँखि‍ मूनि‍ थाहि‍-थाहि‍ आगू डेग बढ़बए लगला। साल बीतल, सबहक जान तँ बचल मुदा रहैकक घर रहैबला नै रहल। धारक पानि‍ जकाँ समए ससरल। दुनू भाए-वहीन धीरज पाँच बर्खक भऽ गेल। घरक छोट-छोट काजो आ खेतसँ बथुआ सागो तोड़ि‍-तोड़ि‍ दुनू भाए-वहीन आनए लगल। आमक मासमे चटनीले गाछीसँ आमो बीछ-बीछ आनए लगल। जहि‍ना गहूम-बदामक औंकुराकेँ कौआ उखाड़ि‍-उखाड़ि‍ खइत, से डर आब तपेसरकेँ दुनू बच्‍चाक प्रति‍ नै रहलनि‍। गील माटि‍क बनल वर्तन वा मूरती जहि‍ना रौद पाबि‍ सकता जाइत तहि‍ना दुनू भाए-वहीनक सकताइत शरीर देख तपेसरक मनमे खुशी भेलनि‍। नहि‍यो माए छै तैयो दुनू उठि‍ कऽ ठाढ़ भेल। आब तँ ककरो गाइयो-महीस चरा गुजर कऽ सकैए। कहुना जीवि‍ये लेत। दुनि‍याँ देखबे करत। जँ मइटुग्‍गरो कलंक लगल छै तँ की वि‍आह दान नै हेतै। जरूर हेतै। जहि‍ना हमर बेटा-बेटी मइटुग्‍गर ऐछ तहि‍ना कतेकोकेँ हेतै। अपन कमैत भार देख तपेसरक मन दुनूक (बेटा-बेटी) जि‍नगीपर पड़लनि‍ स्‍कूल जाइ जोकर भऽ गेल। जुग-जमाना बदलि‍ रहल ऐछ। तेहन समए आबि‍ रहल ऐछ जे बि‍नु पढ़ल-लि‍खल लोककेँ के पुछत? से नै तँ दुनूक नाओं स्‍कूलमे जरूर लि‍खा देब। स्‍कूल मनमे उठि‍ते लत्ता-कपड़ा, सि‍लेट-पेन्‍सि‍लपर पड़लनि‍। खएर जे होउ बरस्‍पति‍ दि‍न जरूर नाओं लि‍खा देब। आंगुरपर दि‍न गनि‍ते तेसरे दि‍न वृहस्‍पति‍ भेटलनि‍। परसू तँ नाउए लि‍खाएब तै बीच लत्तो-कपड़ा आ सि‍लेटो-पेन्‍सि‍ल कीन देबै। दोसर दि‍न भोरे तपेसर रोटी सन्ना बनौलनि‍। तीनू गोटे खा बजार वि‍दा भेला। दुइये कोस बजार उठैत-बैसैत साँझ तक घुरि‍ आएब अपना डेगे नै ओकरे सबहक डेगे चलब। कहुना ऐछ तँ धि‍या-पूताक नवका पएर छि‍ऐ कि‍ने, कुदि‍ते-फनि‍ते चलि‍ जाएत। भूख लगतै तँ मूढ़ी कचड़ी कीन देबै। दू फक्का अपनो खा लेब। एकटा काज तँ भऽ जाएत कि‍ने। बजार पहुँच दुनू भाए-वहीनकेँ एक-एक जोड़ पेन्‍ट, एक-एक गंजी, एक-एक अंगाक संग एक-एक सि‍लेट कीन डि‍ब्‍बो भरि‍ (एक दर्जन) पेन्‍सि‍ल कीन तीनू गोटे घुमि‍ गेला। सूर्योदयसँ पहि‍नहि‍ तपेसर उठि‍ जलखैक ओरि‍यान केलनि‍। भि‍नसुरका स्‍कूल। बेरू पहर नाओं लि‍खाएब ओते नीक नै। अखन जे नाओं लि‍खा देबै तँ बेरसँ पढ़ैयोले जाए लगत। टेल्हूक बेटा-बेटी भेने तपेसरक जान हल्‍लुक भेलनि‍। आंगन बहारब, चुल्हि‍ चि‍नमान नीपब, थारी-लोटा घुरनी घुअए लगल। अंगनाक काज पतराइत देखि‍ तपेसर सोचलनि‍ जे खेती आने करब। मुदा समए बदलने खेतीमे नव-नव ओजार आएल। जै‍सँ उपजो-बाड़ी बढ़ल आ हल्‍लुको भेल। जइठाम तीन-तन, चरि‍-चरि‍ गार करीन लगा लोक छह कट्ठा आठ कट्ठा खेत भरि‍ दि‍नमे पटबै छल तइठाम दमकल बोरि‍ंगसँ चारि‍ कट्ठा घंटा भरि‍मे पटैत ऐछ। तहि‍ना ट्रेक्‍टरसँ खेत जोतब, थ्रेशरसँ गहूम-धान दौन करब सेहो असान भऽ जाइत ऐछ। एक चौथाइसँ बेसी खेत तपेसरक बीक गेल। मुदा जे बँचल ऐछ ओकरे जँ आधुनि‍क ढंगसँ खेती करब तँ पहि‍नेसँ कते गुणा बेसी उपजा हएत। जहि‍ना नव-नव औजार बनल तहि‍ना नव-नव कि‍स्‍मक बीआ सेहो बनल। जे धान आधा मनसँ लऽ कऽ कट्ठा मन उपजैत छल से क्‍वीन्‍अल कट्ठा उपजए लगल। जते आगू दि‍स नजरि‍ तपेसर बढ़वैत छला तते आशाक प्रखर ज्‍योति‍ आँखि‍क सोझमे अबए लगलनि‍। मुदा समस्‍यो तँ झमटगर ऐछ। बाध सभमे छि‍ड़ि‍आएल खेत, नीच-ऊँच साइज माल-जालसँ लऽ कऽ बोनैआ जानवर, चि‍ड़ै-चुनमुनीक संग मूसक उपद्रव, चोरा कऽ जजात कटैसँ लऽ कऽ गाए-महींससँ चोरा कऽ चरबै धरि‍क उपद्रव इत्‍यादि‍। ओझरी देख तपेसरक मन ठमकि‍ गेलनि‍। जहि‍ना सघन बोनमे लोक हरा जाइत, कि‍म्‍हरो बढ़ैक साहसे ने होइत मुदा बि‍ना नि‍कलने जानो बँचैक संभावना नै रहैत तहि‍ना तपेसरोकेँ भेलनि‍। ओझराएल मन संगी-सहयोगी तकए लगलनि‍। संगी तँ जरूर ऐछ मुदा संगी दू तरहक भेटैत ऐछ। पहि‍ल, ओहन संगी जे जीवनक एक रास्‍ता बुझि‍ अपनो कल्‍याण बुझैत आ दोसर, दोसराक कान्‍हपर बन्‍दूक रखि‍ चलबए चाहैत। सोचैत-वि‍चारैत तपेसरक नजरि‍पर तीनटा संगी पड़लनि‍ पहि‍ल समाजक (गौआँक) सहयोग, दोसर बैंक तेसर सरकारी। समाजमे जाति‍-समप्रदाय एे रूपे पसरि‍ गेल ऐछ जैमे ककरो कल्‍याण होएब कठि‍न एेछ। सभ अपने ताले बेताल ऐद। ने एक दोसरकेँ सोहाइत आ ने नीक देखए चाहैत। तहि‍ना बैंकोक ऐछ। उचि‍त सूदि‍पर कर्ज लैमे दौड़-बरहा आ खर्च एते पड़ि‍ जाइत ऐछ जैसँ लोकक मन टूटि‍ जाइत ऐछ। सरकारी मदति‍ (अनुदान) मात्र दि‍खाबा ऐछ। जहि‍ना कनैत धि‍या-पूताकेँ माए-बाप रासि‍-रासि‍क लोभ देखा चुप करैत तहि‍ना सरकारि‍यो अनुदानक ऐछ। फेर तपेसर ओझरा गेला। प्रश्‍न उठलनि‍- की कएल जाए? अपनो तँ पूँजी ऐछ। पूँजी दू रंगक पहि‍ल- श्रम दोसर धन। नगद नै ऐछ। मुदा खेत तँ ऐछ। जहि‍ना खेत बेच माइयक सेवा आ दुनू बच्‍चाकेँ पाललौं-पोसलौं तहि‍ना आरो बेच लेब। जँ कि‍छु जमीन कमबो करत तँ ओते उपजो बढ़त गामक स्‍कूलसँ धीरजो आ घुरनि‍यो पास कऽ नि‍कलि‍ गेल। दस बर्खक भेने दुनू घर-अंगनाक काजसँ पि‍तोक काममे हाथ बटबऽ लगल। आगू पढ़ैक आशा ऐ लेल नै रहै जे लोअर प्राइमरी स्‍कूल तँ गाममे रहए मगर मि‍ड्लसँ उपरक स्‍कूल दू कोस गामसँ हटल रहए। सभ दि‍न चारि‍ कोस चलि‍ पढ़ब कठि‍न रहै तँए पढ़ाइ छोड़ि‍ देलक। होस्‍टलक खर्च जुटा नै पबैत। अखन धरि‍ तपेसर गि‍रहस्‍तीक रूपे-रेखा बदलि‍ लेलनि‍। बाधे-बाध छि‍ड़ि‍आएल खेतक घट्टो लगा-लगा एकठाम कऽ लेलनि‍। खेते बेच कऽ बोरि‍ंग-दमकल बड़द सेहो कीन लेलनि‍। अपना हाथमे पानि‍ एने सालो भरि‍ खेती करए लगला। ओना चारि‍ये मास (बरसात) केँ कि‍सान खेतीक रीढ़ बुझैत। जँ बेसी बरखा भेल, बाढ़ि‍ आएल तँ दहार भेल। नै जँ कम बरखा भेल तँ रौदी भेल। दस बजेक समए। चारि‍टा मकैक बालि‍ खेतसँ नेने तपेसर डेढ़ि‍यापर सँ बेटीकेँ सोर पाड़ि‍ कहलखि‍न- “बुच्‍ची, चारू बालि‍ ओराहि‍ दूटा अहूँ दुनू भाए-वहीन लऽ लेब आ दूटा दलानपर नेने आउ।‍” हँसैत घुरनी धीरजकेँ कहलक- “भाय, देखि‍यो केहन मकै ऐछ।‍ ऐहने मकैक मि‍ठाइयो बनैए।” मकैक बालि‍ घुरनीकेँ दए तपेसर दरबज्‍जाक ओसारक खूटा लगा ओङठि‍ कऽ बैस अपन जि‍नगीक संबंधमे सोचए लगला। पेटक उपाए भऽ गेल। मुदा पेटे जकाँ घरो ऐछ। ओना अखन परि‍वारो नमहर नहि‍ये ऐछ। मुदा तैयो रहैले तँ घरे चाही। तहूमे ि‍गरहस्‍तक परि‍वार छी। बोरि‍ंग ने खेतमे गारल ऐछ मुदा दमकल रखैले तँ घरे चाही। जँ से नै करब तँ बरसातमे बीझा जाएत। जैसँ कते पार्ट-पुरजा बि‍गड़ि‍ जाएत। संगे बाहरमे रखने चोरो चोरा लेत। आब कि‍ कोनो पहि‍लुका चोर रहल जे ऊखरि‍-समाठ चोराओत। आब तँ यएह सभ- दमकल, ट्रेक्‍टर, थ्रेशर इत्‍यादि‍- चोराओत। तहि‍ना बड़दोले घर चाही। बेटो-बेटी ढेरबा भेल। काज केनि‍हार घरमे बढ़ने काजो बढ़बए पड़त। खेतसँ जोड़ल जे-जे काज ऐछ। वएह बढ़ाएब ने नीक हएत। अखन दुइयेटा गाए कीनब। पहि‍लुका तँ बूढ़ भऽ गेल। आब ओ थोड़े पाल खाएत। अन्नेक खेती नै तीमनो-तरकारी आ फलो-फलहरीक खेती करब। कोन चीज सस्‍ता ऐछ। जि‍ति‍यामे पचास रूपैये मड़ुआ चि‍क्कस आ नरक नि‍वारण चतुर्दशी दि‍न चालीस रूपैये अल्हुआ-सुथनी बि‍कैत ऐछ। बोरि‍ंग लग सेहो इंजनबला पानि‍ खसैत ऐछ से जैसँ कट्ठा भरि‍मे कोनो उपजा नै होइए। ओना जँ मोथी रोपि‍ दि‍अए तँ सेहो हएत मुदा आब की लोक मोथीक बि‍छानपर सुतैए। आब तँ पलास्‍टि‍क जि‍नगी ओहन प्रेमी बनि‍ गेल ऐछ जे दि‍न-राति‍ संगे रहैए। तैसँ नीक जे कट्ठो भरि‍ खुनि‍ माछे पोसब। नै बेचै जोकर हएत, खाइयो जोकर तँ हेबे करत। जखन एते मि‍हनत करै छी तँ नीक खेनाइ आ नीक घर बना नै रहब तँ धने लऽ कऽ की करब। आँखि‍ मुनि‍ तपेसर अपन अगि‍ला जि‍नगीक संग पाछु दि‍स सोचए लगलाह। तखने घुरनी दुनू ओराहल मकैक बालि‍ नेने आबि‍ कहलकनि‍- “बाबू, बाबू.....।‍” चौंकेत आँखि‍ खोलि‍ तपेसर बजलाह- “हँ।‍” मकैक बालि‍ हाथमे देख बजला- “‍नोन-तेल औंस देने छहक ि‍कने?” “हँ।‍” तहीकाल उत्तरसँ दछि‍न मुँहेँ जाइत चेतनाथ दरबज्‍जा सेझे आबि‍ ठाढ़ भऽ गेला। हाथमे बालि‍ लऽ नि‍हारि‍-नि‍हारि‍ तपेसर देखते रहथि‍ आकि‍ आँखि‍ बढ़ि‍ चेतानाथपर गेलनि‍। चेतनाथकेँ ठाढ़ देख कहलखि‍न- “कि‍अए ठाढ़ छी। कि‍नकासँ काज ऐछ?‍” तपेसरक बात सुनि‍ चेतनाथ बजलाह कि‍छु नै, ससरि दरबज्‍जा दि‍स बढ़लाह। लग अबैत देख तपेसर दुनू बालि‍ हाथमे नेनहि‍ उठि‍ कऽ ठाढ़ होइत वामा हाथक आंगुरसँ आँखि‍ पोछि‍ देखि‍ते सि‍हरि‍ गेला। माथक सोन-सन केश दाढ़ी मोंछ झबड़ल। देहक हड्डी झक-झक करैत, दाँत वि‍हीन मुँह, मैलसँ कारी खट-खट देहक वस्‍त्र। अनायास तपेसरक मुँहसँ नि‍कललनि‍- “कने एक घोंट पानि‍ पीवि‍ लि‍अ?‍” पानि‍ सुनि‍ चेतनाथक मनमे उठलनि‍। जि‍नगी भरि‍ परमात्‍माक सेवा केलौं, अंति‍म अवस्‍थामे बि‍नु सेवाक फल कोना खाएब-पीब? भूखसँ जरैत वायु (पेटक) हुमरि‍-हुमरि‍ शान्‍त करैले कहनि‍। मुदा जि‍नगी भरि‍क तपल मन मानैले तैयार नै होनि‍। चेतनाथ बजलाह- “पि‍रवारमे के सभ छथि?‍” चेतनाथक प्रश्‍न सुनि‍ तपेसरक मन ठमकि‍ गेलनि‍। ठमकल देख चेतनाथ दोहरबैत कहलखि‍न- “चुप कि‍अए भेलौं?” जहि‍ना पतझारक समए गाछमे कोनो-कोनो कलशक मूड़ी जहि‍ना सुख-दुखक बीच अपन अस्‍ति‍त्‍व जीवि‍त रखए चाहैत तहि‍ना तपेसरक मनमे भेलनि‍ मि‍र‍मि‍रा कऽ बजलाह- “‍माइयो-बाप आ पत्नि‍यो मरि‍ गेली। अपने छी आ दूटा बच्‍चा ऐछ।”‍ घुरनी लगेमे ठाढ़ रहनि‍। धीरज आंगनमे मकै खाइत रहए। चेतनाथ- “दुनू बच्‍चाकेँ सोर पाड़ि‍ओ?‍” घुरनीकेँ देखबैत तपेसर कहलखि‍न- “एकटा यएह छी दोसर अांगनमे ऐछ।” कहि‍ धीरजकेँ सोर पाड़लखि‍न।‍ दुनू बच्‍चाकेँ देख चेतनाथ कहलखि‍न- “एक शर्त्तपर पानि‍ पीब सकै छी?‍” “की?‍” “जँ दुनू बच्‍चाकेँ पढ़बैक (संगीत कला) काज दी।” जि‍नगी भरि‍ कमा कऽ खेलौं मरैकाल एहेन अधर्म नै करब। अपन मनक वि‍चार पाबि‍ तपेसर खुशी भेला। अह्लादसँ हृदए ओलड़ि‍ गेलनि‍। पेटमे गुद-गुदी लगए लगलनि‍। ठहाका मारि‍ हँसैत कहलखि‍न- “अपनेक शर्त्त सहर्ष स्‍वीकार ऐछ। पहि‍ने पानि‍ पीब लेल जाउ।‍” अपन झड़ैत जि‍नगीमे आशाक कि‍रि‍ण उगैत देख मुस्‍की दैत चेतनाथ बजलाह- “हँ, आब पानि‍ये नै भोजनो करब।‍” दुनू गोटे एक-एक मकैक ओरहा खा पानि‍ पीब, गप-सप्‍प करए लगलाह। चेतनाथ- “आइयेसँ दुनू बच्‍चाकेँ पढ़ाएब शुरू करब।‍” तपेसर- “आइ छोड़ि‍ दि‍औ दसम बर्खक अंति‍म दि‍न आइ छी। काल्हि‍ एगारहम चढ़त। एगारहम जन्‍म दि‍नक अवसरपर दसटा समाजोकेँ भोजन करेबनि‍ आ दुनू बच्‍चाकेँ पढ़ाइयो शुरू करब।‍ तै बीच अपने अपन जि‍नगीक कि‍छु बात कहि‍औक।” तपेसरक बात सुनि‍ चेतनाथ वि‍स्‍मि‍त भऽ गेला। आइ धरि‍ जे प्रश्‍न कि‍यो ने पूछने छलाह ओइ प्रश्‍नक उत्तर दि‍अए पड़त। एक क्षण चुप भऽ सौंसे जि‍नगी देख बजए लगलाह- “माता-पि‍ता बहुत पहि‍ने मरि‍ गेलाह। पत्नि‍यो मरि‍ गेली सखा-सन्‍तान नै भेल। असकरे छी। पाँच बर्ख पूर्व धरि‍ कहि‍यो असकरूआ नै बुझि‍ पड़ल। मुदा पाँच बर्खक बीत जे गति‍ भेल ओ बजै जोकर नै ऐछ।‍” तपेसर- “से, की?‍” चेतनाथ- “जहि‍यासँ होश भेल तै दि‍नसँ कहै छी- चारि‍ भाए-वहीनक बीच सभसँ छोट छलौं। माएक बड़ दुलारू। आठे-नअ बर्खक रही तहि‍येसँ नाच-तमाशा, कीर्तन भजन दि‍स मन लगए लगल। गाममे नाचो पार्टी रहै आ भजनि‍यो पार्टी। सभ मंगल दि‍नकेँ महाबीरजी स्‍थानमे साँझू पहरमे कीर्तन होय। अपना गामक संग-संग आनो गाममे अष्‍टजामो आ नाचो करए पार्टी जाए। भाँज लगा-लगा हमहूँ जाय। ओतैसँ गोटे-गोटे पाँति‍ सीखने आबी। जेकरा भरि‍ दि‍न गाबी। खजुरी बनबैक फुरल। फुटल घैलक कान हाँसूसँ काटि‍ बेलक लस्‍सा लगा कागज साटि‍ खजुरी बनेलाैं।” हँसैत धीरज पुछलकनि‍- “कागजक खजुरी फुटबो करए?‍” धीरजक बात सुनि‍ चेतनाथकेँ क्रोध नै उठलनि‍। वात्‍सल्‍यक बाढ़ि‍मे बहए लगलाह। बजलाह- “खूब फुटे। मुदा काजो बड़ भारी नहि‍ये रहए जहि‍ना अनेरूआ बेल भेटए तहि‍ना दोकानक पुड़ि‍याँक कागज। लगले फेर बना ली। गबैत-बजबैत साजपर हाथो बैस गेल आ बोलि‍यो सर्रास भेल। गाममे रामलीला आएल। आंगनमे खाऽ ली आ भरि‍ दि‍न-राति‍ ओकरे सभ लग रही। जखन जाए लगल हमहूँ संग पकड़ि‍ लेलौं। साजो बजाएब सीख लेलौं आ पार्टो खेलए लगलौं। जेहने आवाज सुरि‍ला रहए तेहने हरि‍मुनि‍याँपर हाथ। एक दि‍न ठीका दास देखलनि‍। ओ राजक गबैया छलाह। संगे लऽ गेला। हमहूँ राजक गबैया भऽ गेलौं जखन राजशाही टूटलै तखन उनटि‍ कऽ गाम चलि‍ एलौं। कि‍छु दि‍न गामे-गाम उत्‍सव सभमे जाए लगलौं। ओहो कमि‍ गेल। तै दि‍नसँ दि‍नो-दि‍न दशा बि‍ग‍ड़ि‍ते गेल।‍” ‍ २. एकांकी समझौता पात्र परि‍चए श्‍याम (इंजीनि‍यर) सुकान्‍त (इंजीनि‍यर) फुलेसर (मध्‍यम कि‍सान) कुसेसर मुनेसर रौदी अनुप झोली (पाँचो- बटेदार) रूपन (कुसेसरक पत्नी) रेखा (श्‍यामक पत्नी) पहि‍ल दृश्‍य- (कुसेसरक आंगन) रूपीनी        : कोन लोभमे लटकल छी। गाममे देखै छी जे जेकरो ने कि‍छु छलै ओहो सभ पजेबा घर बना लेलक। कल गड़ा लेलक। नीक-नि‍कुत खाइए। चि‍क्कन-चि‍क्कन कपड़ा पहि‍रैए। अहाँ गाम-गामक रट लगौने छी। कुसेसर       : कहलौं तँ ठीके मुदा गामक लूरि‍ छोड़ि‍ लूरि‍ कोन अिछ जे शहर बजार जा करब। ने गाड़ी चलबैक लूरि‍ अछि‍ आ ने करखानाक काजक। तखन जा कऽ की करब। खर्चा कऽ कऽ जएव आ बूलि‍-टहैल कऽ चलि‍ आएव। तखन तँ आरो कर्जा लदा जएत। रूपनी        : लूरि‍ कि‍ कोनो लोक पेटेसँ सीखि‍ कऽ अबैए। काज करैत-करैत लूरि‍ होइ छै। सुखदेवाकेँ कोन लूरि‍ छलै। ढहलेल-बकलेल जकाँ गाममे रहै छलै। मति‍ बदललै, ममि‍औत भाए सेने कलकत्ता गेल। कुसेसर       : सुनै छी जे आब कलकत्तामे नइँ रहैए। गाम ऐवो कएल तँ भेँटे ने भेल। रूपनी        : अहाँकेँ ने नइँ भेँट भेल। हम तँ भेँट केलि‍ऐ। अंगनामे कुरसीपर चाह पीबैत रहए। जखने देखलक कि‍ कुरसि‍येपर चाहक कप रखि‍ आबि‍ कऽ दुनू हाथे पकड़ि‍ दोसर कुरसीपर बैइसैले कहलक। कुसेसर       : (मुस्‍की दैत) तब तँ अहाँ बड़का लोक भऽ गेलौं? रूपनी        : से कि‍ कुरसीपर बैसलौं। ओसारपर शतरंजी ओछाएल रहै ओइपर बैसलौं। मुदा धैनवाद ओकरा दुनू परानीक वि‍चारकेँ दिऐ। अपने लगमे बैस चाहो-पीबै आ रूदपुरवालीकेँ चाह-वि‍स्‍कुट नेने अबैले कहलक। कुसेसर       :  की सभ गप भेल? रूपनी        : कोनो कि‍ एकेटा गप भेल। अपने खि‍स्‍सा सभ कहए लगल। कुसेसर       : अखैन कते कमाइए? रूपनी        : तेकर ठेकान छै। कहलक जे मालि‍क तते वि‍सवास करैए। करखानाक मनेजरी दऽ देने अछि‍। ओइठीनक एक रूपैया अपना सबहक सत्तरि‍ रूपैया होइ छै। मि‍हनतो करैए ते सुखो होइ छै। अपना सभ जकाँ थोड़े अछि‍ जे पेट साधि‍ खटू आ सुखक बेरमे टुटरूम-टुम। कुसेसर       : की करबै। ओकरा भागमे वएह लि‍खल छै अपना सबहक भागमे यएह लि‍खल अछि‍। रूपनी        : ककरो भाग-तकदीरमे कि‍छु लि‍खल रहै छै। जँ से रहि‍तै तँ धन ठेरी रहै छै आ बेटा हेबे ने करै छै। जँ लि‍खल रहि‍तै तँ सभ कुछ ओकरे होइतै। कुसेसर       : तब की करब? रूपनी        : इंजीनि‍यर (श्‍याम) सहाएवकेँ समाद दऽ दि‍अनु जे हम खेत-तेत नइँ करब। हुनकर ि‍क कोनो खेत दहा जाइ छनि‍ आकि‍ रौदीमे जरि‍ जाइ छनि‍। जजात जरैए आ दहाइए बटेदारक। ऋृण पैंच लऽ कऽ खेती करू आ उपजाक कोन बात जे लगतो चलि‍ जाइए। कुसेसर       : कहलौं तँ ठीके मुदा......। रूपनी        : मुदा-तुदा कि‍छु ने। नइँ समाद पठेवनि‍ तँ नइँ पठबि‍अनु। मुदा खेतक आड़ि‍पर जएव छोड़ि‍ दि‍औ। जोत-कोड़ छोड़ि‍ दि‍औ। जखन गाम औता आ पुछता ते कहि‍ देवनि‍। कुसेसर       : आशा तँ वएह खेत अछि‍? रूपनी        : की अछि‍? ओते महगक खाद कीनै छी, बीआ कीनै छी, खटै छी। तैपर अधा बॉटि‍ दैत छि‍अनि‍। की लाभ होइए। दूध महक डारही होइए। खटनी कम लगै छै। ओते जे बोइनपर खटब तँ ओइसँ वेसी हएत। कुसेसर       : एकठाम दस सेर भऽ जाइए। वोइनो करब से सभ दि‍न काजो थोड़े लगैए? रूपनी        : अपनो काज ठाढ़ कऽ लेब। जइ दि‍न बोइन नै लागत तै दि‍न अपने काज करब। कुसेसर       : से कना हएत। जँ माले पोसब तँ सभ दि‍न ने ओकरा चरबए-बझबए पड़त। घास-भूसा करए पड़त। जै दि‍न काज करए जएव तै दि‍न अपन काज कना चलत। रूपनी        : तँ की गोला-बड़दक सेबनेसँ, जीवि‍? (मुनेसरक प्रवेश) मुनेसर        : कुसेसर, हौ कुसेसर। कुसेसर       : हँ, हँ भैया, अबै छी। मुनेसर        : सोहराइवाली कि‍अए रँगल छथुन्‍ह? (कुसेसर छुप्‍पे रहैत) रूपनी        : भैया, हम की कोनो अधला बात बजै छी? कुसेसर       : हँ भैया, अपनो मन कखनो-कखनो मानि‍ लइए। मुनेसर        : से की? कुसेसर       : सोहराइयेवालीक सुइत (हँसुली) बन्‍हकी लगा कऽ खेती केने छलौं। देखते छहक जे अपना बड़दो नइँ अछि‍। हरो जनेपर लइ छी। तैपर सँ खटवो करै छी आ पूँजि‍यो लगैए। रौदी भऽ गेल। एक्को कनमाक आशा रहल। रूपनी        : (तरंगि‍ कऽ) हि‍नका जे कहबनि‍ भैया से की हि‍नका नइँ होइ छनि‍। जेहने बटेदार हम तेहने तँ इहो छथि‍। मुनेसर        : कहलौं तँ एक-लाखक बात मुदा की उपाए? रूपनी        : छै उपाए भैया? मुनेसर        : की? रूपनी        : इंजीनि‍यर सहाएबक खेत छि‍अनि‍। दहाउ कि‍ रौदि‍आउ हुनकर खेत थोड़े चलि‍ जेतनि‍। मुदा हमरा सबहक तँ लगता चलि‍ जाइए। मुनेसर        : कनि‍याँ, दू सेरक अशो तँ अछि‍। रूपनी        : एहेन आशाकेँ मुँह मारौथ। अना जे चुपेचाप खेत छोड़ि‍ देथि‍न तँ दोखी हेता। हुनका गाम बजा कऽ सभ बात कहबनि‍। कहाँदन बड़का हाकि‍म छथीन। बुझता तँ बड़बढ़ि‍या नइँ तँ हम सभ बि‍ना पूँजि‍ये काहि‍ काटब ओ अछैते पूँजि‍ये काहि‍ कटताह। मुनेसर        : कुसेसर, कनि‍याँक वि‍चार हमरो जँचैए। दुनू गोटे बुथपर चल। मि‍लि‍ये कऽ कहबनि‍। (दोसर दृश्‍य) (श्‍याम इंजीनि‍यरक डेरा) श्‍याम         : (चाह पीबैत) कौल्हुके टि‍कट अछि‍। दस बजे गाड़ी अछि‍। तँए सभ कुछ सम्हारि‍ लीअ। रेखा         : (तमसाइत) की सम्‍हारब आ की नइँ सम्‍हारब। हजारो दि‍न कहलौं जे गामक खेत बेच ि‍लअ, तँ जी गारल अछि‍। श्‍याम         : कोनो की खगैए जे बेच कऽ गुजर करब। बाप-पुरखाक अरजल छि‍अनि‍, जाधरि‍ रहतनि‍ ताधरि‍ ने लोक नाम लेतनि‍ जे फल्‍लांक छि‍अनि‍। ततवे नइँ अपन लगि‍ते कि‍ अछि‍ मुदा साल भरि‍क बुतात (चाउर-दालि‍) तँ चलि‍ते अछि‍। रेखा         : भरि‍ दि‍न तँ हि‍सावे जोड़ै छी कने जोड़ि‍ कऽ देखलि‍ऐ जे कते पूँजीसँ कते आमदनी होइए। श्‍याम         : सभठाम हि‍सावे जोड़ने थोड़े काज होइए। इलाकाक-इलाकामे रौदी भऽ जाइ छै, दहार भऽ जाइ छै। अरबो-खरबोक पूँजीसँ एको-पाइ आमदनी नहि‍ होइ छै, से लोक बरदास करि‍ते छथि‍ आ हम......। रेखा         : जि‍नका दोसर रास्‍ता नहि‍ छन्‍हि‍ ओकि‍ करताह। मुदा अपना तँ अछि‍। श्‍याम         : मि‍थि‍लाकेँ दि‍नयाँ देवलोक बुझैए। तइठाम हम छोड़ि‍ कऽ पड़ा जाउँ। रेखा         : हमर बात कहि‍या सुनलौं जे आइ सुनब। श्‍याम         : कहि‍या नहि‍ सुनलौं? रेखा         : कहि‍या सुनलौं? श्‍याम         : जँ नहि‍ सुनलौं तँ आन दि‍न कहाँ कहि‍यो ई बात कहलौं। (सुकान्‍तक प्रवेश) सुकान्‍त       : भजार छी यौ? श्‍याम         : हँ, हँ भजार, आउ-आउ। बहुत दि‍न अहाँ जीवि‍? सुकान्‍त       : वि‍चारे कऽ रहल छलौं जे अहाँसँ भेँट करी। काल्हि‍ गाम जएव। सुकान्‍त       : कि‍अए? श्‍याम         : बटेदार सभ अबैले कहलक अछि‍। रेखा         : कहै छि‍अनि‍ जे कोन लपौड़ीमे पड़ल छी। गामक सभ खेत बेच कऽ अहीठाम मकान बना लि‍अ। पूँजी ने पूँजी बनवैत अछि‍। जते सम्‍पति‍ गाममे अछि‍ ओ जँ ऐठाम आनि‍ चलाएव तँ ओहि‍सँ कते बर आमदनी हएत। (रेखाक बात सुि‍न सुकान्‍त मूड़ी डोलबैत। मुदा कि‍छु बजैत नहि‍।) श्‍याम         : भजार, गुम्‍म कि‍अए छी? सुकान्‍त       : ई प्रश्‍न अपनो संग उठल अछि‍। मुदा.....? श्‍याम         : मुदा की? सुकान्‍त       : जे बात कहि‍ रहल छथि‍ ओ अपनो छल। मुदा रूकि‍ गेलौं। श्‍याम         : रूकि‍ कि‍अए गेलौं? सुकान्‍त       : ठीके कहब छैक जे जते लोक तते वि‍चार। मुदा नीक अधलाक वि‍चार तँ करै पड़त। श्‍याम         : समाजक पढ़ल-लि‍खल (वुद्धि‍जीवी वर्ग) लोक तँ अपने सभ छी, अगर अपने सभ आँखि‍ मूनि‍ काज करब तँ जे कम पढ़ल-लि‍खल वा नहि‍ पढ़ल अछि‍ ओ कि‍ करत? तँए ने अहाँसँ पूछैक प्रयोजन। सुकान्‍त       : की करब अहाँ से तँ हमरा कहने नइँ करब। मुदा अपन कएल काज कहै छी। श्‍याम         : हँ, सएह कहू। सुकान्‍त       : पत्नी लग बजलौं जे गामक खेत बेच एतै आनि‍ खेत कीनि‍ घर बना भाड़ापर लगा देब। कोनो कारोवार जे करए जाहब से तँ नइँ भऽ सकैए। नोकरि‍योक ड्यूटी एहेन अछि‍ जे चूर-चूर भऽ जाइ छी। श्‍याम         : की केलौं? सुकान्‍त       : पत्नी कहलनि‍ जे खेत-पथार अहाँक कीनल तँ नहि‍ छी तखन बेचब कि‍अए। स्‍त्रीगणक स्‍वभाव हम बुझै छी। अखन भलेहीं बेच कऽ लऽ आनू मुदा जे स्‍त्रीगणक गाममे अाब औती ओ कि‍ बजती? रेखा         : की बाजत? ककरो बजने कि‍ हेतइ? श्‍याम         : की बजती? सुकान्‍त       : अपने नइँ बुझै छलौं मदुा पत्नी कहलनि‍ जे कि‍छुए दि‍नक पछाति‍ घरारी घरारि‍ये रहत से बात नहि‍। बाड़ी-चौमास भऽ जाएत। जे कीनत ओ भट्टा उपजाओत कि‍ परती बनाएत तेकर कोनो ठीन छै। श्‍याम         : हँ, से तँ नहि‍ये छै। सुकान्‍त       : ककरो कि‍यो मुँहमे ताला लगौत। बाजत जे कुकर्मीक घरारी छि‍ऐ तँए नढ़ि‍यो भुकै छै वा भट्टा उपजाओल जाइ छै। श्‍याम         : (नमहर साँस छोड़ैत) फेर की केलि‍ऐ? सुकान्‍त       : मन औना गेल। पुछलि‍एनि‍ तँ कहलनि‍ जे पनरहो बीघा जमीन गौआँक बीत दए दि‍अनु। ओ सभ अदलि‍-बदलि‍ एकठाम कऽ हाइ स्‍कूल बना लेता। अहाँ तँ नोकरी करि‍ते छी। जाधरि‍ जीवि‍ ताधरि‍ भार तँ सरकार नेनहि‍ अछि‍। श्‍याम         : अहाँक काज हमरो जँचैए। रेखा         : कौआसँ खैर लुटाएब कोन कवि‍लती भेल? सुकान्‍त       : एक्के काजकेँ लोक, अपन-अपन वि‍चारे कते रंगक बुझैए। अपन कएल काज कहलौं। अहाँकेँ मीठ लगए वा तीत ई तँ अहाँक जि‍ह्वा कहत। रेखा         : जि‍ह्वा तँ सबहक एक्के रंग होइ छै? सुकान्‍त       : देखैमे भलेहीं एक रंग होइ मुदा सुआद फुट-फुट होइ छै। जँ से नइँ होइतै तँ सभकेँ सभ जीज एक्के रंग लगि‍तै। (तृतीय दृश्‍य) (गाम। कुसेसर, मुनेसर, फुलेदेब, श्‍याम आ तीन-चारि‍टा आरो बटेदार) फुलदेव       : श्‍याम भाय, गाममे हमरा सभकेँ जीवि‍ कठि‍न भऽ गेल अछि‍। हरीयरी अहाँ सभकेँ अछि‍। श्‍याम         : नोकरीमे कि‍ कोनो लज्‍जति‍ रहल। समए छल जखन लोक हकि‍मानी करैत छल आ अपना जकाँ खाइत छल। आब तँ नि‍च्‍चाँ-ऊपर मालि‍के-मालि‍क। फुलदेव       : (हँसैत) एहेन उटपटाँग बात ि‍कअए कहलौं? श्‍याम         : ि‍सर्फ दरमाहापर आश्रि‍त छी। ओना दरमेहे तते अछि‍ जे नहि‍ कि‍छु बुझि‍ पड़ैए। लोन लऽ कऽ घर बनेलौं। फुलदेव       : कते लोन अछि‍? श्‍याम         : पैछला मास सठि‍ गेल। ऐल-फैल घर अछि‍ चारि‍टा कोठरी भड़ो लगौने छी। जहि‍सँ परि‍वारक खर्च नि‍कलि‍ जाइए। फुलदेव       : तब तँ दरमाहा बँचवे करत। श्‍याम         : हँ। फुलदेव       : भगवान करथि‍ कतौ रही चैनसँ रही। श्‍याम         : बच्‍चा सभकेँ पढ़बैमे बड़ खर्च होइए। फुलदेव       : खर्च करै छी कि‍ अपन भार उतारै छी। आब गप आगू बढ़ाउ, कुसेसर। कुसेसर       : फुलदेव भाय, अहूँ कि‍सान छी। दस बीघा खेत जोतै छी। खेतीक सभ भाँज बुझै छी। कते लगता खेतीमे लगै छै से अहाँसँ छि‍पल अछि‍। फुलदेव       : झाँपि‍-तोपि‍ कऽ नइँ बाजू। खोलि‍ कऽ साफ-साफ बाजू। मुनेसर        : फुलदेव बौआ, कुसेसर बजैमे धकाइए। हम कहै छी। इंजीनि‍यर सहाएव पाँचटा बटेदार छी। अखैन धरि‍ अधा-अधी उपजा बँटैत एलि‍एनि‍। मुदा बेर-बेर रौदी दाही होइए। हि‍नकर (श्‍यामक) तँ कि‍छु नहि‍। बि‍गड़ैत छनि‍। उपजा नइँ होइ छनि‍। खेत तँ बँचले रहै छनि‍। मुदा हमरा सबहक तँ सभ कुछ चलि‍ जाइए। श्‍याम         : अहाँ सभ अधा बाँटि‍ कऽ की हमरेटा दै छी। आकि‍ सभकेँ-सभ दैत छै। जे अदौसँ अछि‍। फुलदेव       : जे समए बीति‍ गेल ओ तँ बीति‍ गेल। पुन: घुरत नहि‍। मुदा आँखि‍यो मुनि‍ कऽ जीवि‍ उचि‍त नहि‍। मुनेसर        : ओते चि‍क्कारीमे गप करैक कोन जरूरी अछि‍। सोझ-साझ बात सुनू। सभ दि‍नसँ बटाइ करैत एलौं। जे नीक की अधला भेल, भेल। बि‍ना कहने छोड़ि‍ दैति‍एनि‍ से नीक नइँ होइत तँए सोझामे कहै छि‍यनि‍ जे हम सभ बटाइ नइँ करब। फुलदेव       : एना औगुता कऽ कि‍अए बजै छी। कोनाे रोग दवाइ केने छुटैए। हँ, समाजमे ई रोग भारी अछि‍। भने सभ बैसले छी कि‍अए ने वि‍चारि‍ कऽ रास्‍ता नि‍कालि‍ लेब। गामक जमीन गामेक लोक उपजाओत। श्‍याम         : फुलदेव, पत्नीक वि‍चार छनि‍ जे बेच लि‍अ। मुदा एकटा दोस्‍त छथि‍ ओ कहलनि‍ जे अपन जमीन समाजकेँ सुमझा देलि‍एनि‍। बातो सत्‍य जे जे गाममे रहताह गाम हुनकर छि‍यनि‍। तँए खेतीक बात बुझै नहि‍ छी अहाँ सभ उि‍चत रास्‍ता नि‍कालि‍ कहू, मानि‍ लेब। फुलदेव       : कते गोटे स्‍कूल बनवैत छथि‍, कते गोटे अस्‍पताल। समाजमे एकरो जरूरत अछि‍। मुदा सभसँ प्रमुख जरूरी अछि‍ जे गामक सम्‍पति‍ (जमीन) केँ समुचि‍त उपाए कए उपजा बढ़ाओल जाए। श्‍याम         : उपजा कोना बढ़त? फुलदेव       : बारह मासक सालमे ि‍सर्फ वर्षे मौसम एहेन अछि‍ जे सालो भरि‍केँ प्रभावि‍त करैत अछि‍। खूब बरखा भेल दहार भेल। नइँ बरखा भेल रौदी भेल। सालो भरि‍ खेति‍हर त्राहि‍-कृष्‍ण करैत रहह। मुनेसर        : फुलदेव बौआ, अहाँ देखते छी जे दूटा हाथ-पएर छोड़ि‍ कि‍छु अछि‍ नइँ। तँए कि‍ हमसब ऐ गामक नइँ कहाएव से बात तँ नइँ अछि‍। इंजीनियर सहाएव, सभ तरहेँ सम्‍पन्न छथि‍ मुदा छि‍आह तँ अही गामक। तँए......। श्‍याम         : तँए कि‍? फुलदेव       : श्‍याम बावू, अहाँ ि‍सर्फ माटि‍ बटेदारकेँ देने छि‍ऐ। मुदा माि‍टसँ उपजा कोना हएत? ऐ बातपर वि‍चार करए पड़त। श्‍याम         : जहाँ धरि‍ संभव हएत, करैले तैयार छी। फुलदेव       : बीस बीघा जमीन अछि‍। दूटा बोंरि‍ग आ एकटा दमकल कीनि‍ बटेदारकेँ दए दि‍औक। जखन पानि‍ हाथमे आबि‍ जएत तखन बाढ़ि‍-रौदीक संकट कमि‍ जाएत। आठ मासक वि‍सवासू खेती आ चारि‍ मास अधा भऽ जएत। दहार नहि‍ रोकि‍ सकब तँ रौदीसँ बचाओल जा सकैत अछि‍। श्‍याम         : बड़बढ़ि‍याँ। बटेदार        : एतवेटा सँ नहि‍ हएत। मोटा-मोटी यएह बुझू जे अहाँ सबहक (बटेदार सबहक) शरीर आ इंजीनियर सहाएवक पूँजी रहतनि‍। तँए आरो कि‍छु पूँजी लगबैक जरूरत छनि‍। श्‍याम         : से की? फुलदेव       : खेत जोतैले बड़द, नीक बीआ आ खादक ओरि‍यान सेहो कऽ दि‍यौ। श्‍याम         : बड़बढ़ि‍याँ। मुदा हमरा वापसी कि‍ हएत? फुलदेव       : खेतसँ लऽ कऽ दमकल-बोरि‍ंग, बरद, खाद-बीआ लगा सभ पूँजी भेल। बैंकक जे सूद छै ओकरा धि‍यानमे राखि‍ वावसी हएत। मुनेसर        : कि‍ इंजीनियर सहाएव, मंजूर अछि‍? श्‍याम         : अहाँ सभ कहू। कुसेसर       : ए-मस्‍त। फुलेसर       : जँ स्‍वीकार भेल तँ सभ थोपड़ी बजा....। (सभ थोपड़ी बजा ि‍नर्णएकेँ स्‍वीकार केलनि‍।) (समाप्‍त) १. बेचन ठाकुर- नाटक- बेटीक अपमानक गतांशसँ आगाँ २.रमाकान्‍त राय 'रमा'- मैथि‍ल पत्र-पत्रि‍का : समस्‍या ओ समाधान : आचार्य दि‍व्‍यचक्षु १ बेचन ठाकुर नाटक बेटीक अपमानक गतांशसँ आगाँ दृश्‍य छठम (स्‍थान- दीपक चौधरीक घर। दीपक चौधरी दलानपर मोन मारने माथपर हाथ लऽ कऽ बैसल छथि‍। खोंखी करैत-करैत बेदम भऽ जाइत छथि‍। काफी हकमैत छथि‍। बगलमे कोनो बरतनमे राखल छौरपर कफ फेंकैत छथि‍।) दीपक :    हे भगवान, हे भगवती, हे सरस्‍वती महरानी आब हमरा ऐ दुनि‍यासँ लऽ चलु। (खोंखी करैत) बेमारी हमर चरम सीमापर पहुँचि‍ गेल ऐछ। कि‍यो देखनि‍हार नै ऐछ। जै बेटाले अपन परम पि‍यारीक जान गमेलहुँ। ओ बेटा कोनो काज जोकर नै। सात बेटा रामके एक्कोगो नै कामकेँ। (खोंखी करैत-करैत बेदम भऽ जाइत छथि‍। सुरेश कामतक प्रवेश) सुरेश :     भागि‍न बड़ तबाह देख रहल छी। दीपक :    हँ मामा। एक तँ बेमारी चरम सीमापर ऐछ आओर दोसर बि‍आहक कर्जा माथपर अछि‍। सुरेश :     बेटा सभ ि‍कछु नै सम्‍हरैत छथुन्‍ह? दीपक :    सभ अपना लेल हरान छथि‍। सभ भाग-बि‍लासमे लागल छथि‍। बेटा लेल सभटा कमाएल, धरल-उसारल अल्‍ट्रासाण्‍डमे आ पत्नीक दवाइमे बुि‍क देलौं। सेहो पानि‍मे चलि‍ गेल। (खोंखी करैत-करैत बेदम भऽ जाइत छथि‍।) सुरेश :     भागि‍न, अहाँक स्‍थि‍ति‍ आब बड़ खराब देख रहल छी। आब जीता-जि‍नगीमे छोटका बेटा केर बि‍आह कतौ जल्‍दी कऽ लि‍अ। करजा-बरजा सधबे करत। बेटा सभकेँ सबहक करजा कहि‍ दि‍यौन्‍ह। ओ सभ जेना-तेना, बेचो-बि‍कि‍न कऽ करजा अदाए करत। दीपक :    हमहुँ बैस कऽ सएह झखैत छी। कोनो लड़ि‍कीक सुर-पता ऐछ अहाँकेँ? कएक गोटेकेँ कहलि‍यन्‍हि‍। मुदा कि‍यो कहैत छथि‍ जे आब बेटी कत्त? सभ बेटीकेँ लोक अल्‍ट्रासाउण्‍ड कराए-कराए कऽ भगवानपुर पठाए देलखि‍न्‍ह। आब बेटाक बि‍आह बड़ मुश्‍कि‍ल ऐछ बड़ मुश्‍कि‍ल। हमरा सभटा दहेजक लोभ घुसरि‍ रहल ऐछ। ऐसँ चि‍क्कन हमरा भगवान मौत दैतथि‍। सुरेश :     भागीन हरबड़ाउ नै। भगवानपर भरोसा राखू। भगवानक घर देर ऐछ अंधेर नै। लड़ि‍कीक तँ बड़ अभाव ठीके ऐछ। एे परोपट्टामे एक्के गोट लड़ि‍की ऐछ। दीपक :    मामाश्री, ओ कि‍नक बेटी छथि‍न्‍ह? सुरेश :     ओ छथि‍न्‍ह बलवीर चौधरी अहाँक समधि‍ केर छोटकी बेटी। तैपर भरि‍ दि‍नमे हजारो लड़ि‍काबला अबैत-जाइत छथि‍। बड़की पुतौहूवाला गप्‍प नै बुझि‍औ। मझि‍लीयोसँ भरि‍गर बुझाएत अहाँकेँ। बड़ करगर फीस छन्‍हि‍ बलवीर चौधरीक? दीपक :    कत्ते लगभग? सुरेश :     बलवीर चौधरीकेँ कमसँ कम पाँच लाख टाका नगद आओर सभ श्रमजान चाही लड़ि‍की-लड़ि‍काक मनोरथ वास्‍ते। (सुनि‍ते दीपककेँ चौन्‍ह आबि‍ जाइ छन्‍हि‍। सुरेश गमछासँ हौंकि‍ कऽ शांत करै छथि‍। सुरेश अन्‍दरसँ पानि‍ आनि‍ कऽ दीपककेँ मुँह-हाथ धोइले दैत छथि‍न्‍ह। दीपक कुर्रा कऽ मुँह-हाथ धोइ कऽ फेर मामा श्रीसँ गप्‍प करैत छथि‍।) दीपक :    मामाश्री, समधि‍ एतेक पैघ धराह बनि‍ गेलाह मास्‍टर भऽ कऽ? सुरेश :     भागि‍न, समए बलवान होइ छै। एक दि‍न गाड़ीपर नाव तँ एक दि‍न नावए पर गाड़ी। सदा साहि‍बी कि‍नको रहलैए? कहबी ऐछ सभ दि‍न होत न एक समाना। दीपक :    मामाश्री, समधि‍ हमरो कि‍छु कम करताह की नै? सुरेश :     आखि‍र ओ अहाँक समधि‍ छथि‍। कि‍छु कम अवस्‍य करबाक चाही। दीपक :    तहन चलू मामाश्री काल्हि‍। जदि‍ पटि‍-सटि‍ गेल तहन छोटको बेटाकेँ कऽ लेब। हमरा मूइला बाद हमरा बेटाकेँ बि‍आह के करौताह? दर-दि‍याद केकरा के होइत छैक? सुरेश :     भागि‍न, काल्हि‍ भोरे समधि‍ ओइठाम चलू। काल्हि‍ धरि‍ लड़कि‍केँ कोनो फैनल नै भेल छल, से हमरा पूर्ण पता ऐछ। दीपक :    सबेरे जाएब तहन ने काज बनत। नै तँ समधि‍ कि‍नको जुबान दऽ देलखि‍न्‍ह तहन भेल आफद। सुरेश :     भागि‍न, काल्हि‍ भोरसँ भोर अहाँ हमरा ऐठाम चलि‍ आएब। ता हम चलैत छी। (दीपक सुरेशकेँ पएर छुबि‍ प्रणाम करैत छथि‍। सुरेशक प्रस्‍थान) दीपक :    (खोंखी करैत-करैत बेदम भऽ जाइत छथि‍।) लागि‍ रहल ऐछ जे ई बि‍आह हम देखब की नै। आगू माँ सरस्‍वतीक कि‍रपा। पटाक्षेप दृश्‍य सातम आगाँक अंकमे- २ रमाकान्‍त राय 'रमा' मैथि‍ल पत्र-पत्रि‍का : समस्‍या ओ समाधान : आचार्य दि‍व्‍यचक्षु “‍देशक स्‍वतंत्रताक 62-63 वर्षक बादो मैथि‍लीक माध्‍यमे प्राथमि‍क शि‍क्षाक व्‍यवस्‍था नै रहबाक कारणे मैथि‍ली भाषा-भाषी अपन मातृभाषाक पत्र-पत्रि‍कासँ नै जुड़ि‍ पबैत छथि‍, मैथि‍ली पत्र-पत्रि‍का आ पुस्‍तक नै पढ़ि‍ सकैत छथि‍। तँए यत्र-कुत्र मैथि‍ली पत्र-पत्रि‍का देखि‍यो कऽ ने तँ ओ कीबा लेल उत्‍सुक होइत छथि‍ आने पढ़बा लेल। ई मैथि‍ली पत्र-पत्रि‍का प्रकाशन सभसँ प्रमुख समस्‍या अछि‍।” ई वि‍चार प्रो. शि‍वाकान्‍त पाठक गत 2अगस्‍तकेँ 'दूरदर्शन'क मुजफ्फरपुर केन्‍द्रसँ प्रसारि‍त मैथि‍ली दैनि‍क समाचार पत्र-पत्रि‍का : समस्‍या ओ समाधान' वि‍षएपर आयोजि‍त कएटा परि‍चर्यामे व्‍यक्‍त कएलनि‍। कार्यक्रमक संचालन करैत साहि‍त्‍यकार श्री रमाकान्‍त राय 'रमा' कहलनि‍ जे यावत् मैथि‍ली पत्र-पत्रि‍काकेँ व्‍यवसायि‍क दृष्‍टि‍कोणसँ सम्‍पादन, व्‍यवस्‍थापन, वि‍तरण आ संयोजनक फराक-फराक कऽ एेपर एक समान ध्‍यान नै देल जाएत तावत् मैथि‍ली पत्र-पत्रि‍का दीर्घायु नै भऽ सकैछ। वर्तमान समएमे प्रकाशि‍त पूर्वोत्तर मैथि‍ली, मि‍थि‍ला दर्शन, मि‍थि‍ला दर्पण आदि‍ पत्र-पत्रि‍काक चर्च करैत कहलनि‍ जे ऐ सभ पत्रि‍काक रचना, वि‍ज्ञापन आ वि‍तरणक नीक समन्‍वय रहैत अछि‍ जे नीक संयोजन-व्‍यवस्‍थापनक कारणे भऽ पबैत अछि‍ आ पत्रि‍का दीर्घजीवी ऐछ आ रहत से वि‍श्‍वास कएल जा सकैत अछि‍। मुजफ्फरपुर दूरदर्शन केन्‍द्र'क 'सृजन' कार्यक्रममे आयोजि‍त ऐ मैथि‍ली परि‍चार्यमे प्रो. शि‍वाकान्‍त पाठक, डॉ. नरेश कुमार 'वि‍कल' आ डा. नारायण प्रति‍भागी छलाह। कार्यक्रमक संचालन श्री रमाकान्‍त राय 'रमा' कऽ रहल छलाह। डॉ. नरेश कुमार 'वि‍कल' मैैथि‍ली पत्र-पत्रि‍काक त्रुटि‍पूर्ण वि‍तरण व्‍यवस्‍था आ ओकर आर्थिक आधारकेँ सुदृढ़ करबापर जोर दैत कहलनि‍ जे यावत् मि‍थि‍लाक लक्ष्‍मीवान नीक पंूजी लगा कऽ सम्‍पूर्ण मि‍थि‍लांचलमे साइकिलपर घूमि‍-घूमि‍ कऽ अखबार बेचनि‍हार भेंडरक साइकिलपर नै टहलौताह तावत् मैथि‍ली पत्र-पत्रि‍काकेँ अल्‍पायुए होएबाक सम्‍भावना अछि‍। आधा घंटाक ऐ परि‍चर्याक प्रस्‍तुति‍ सहायक छलाह 'सृजन' कार्यक्रमक प्रभारी अधि‍कारी श्री मुकेश कुमार। परि‍चर्यामे अपन महत्‍वपूर्ण सहभागि‍ता देखबैत डा. नारायण झा ई स्‍पष्‍ट कएलनि‍ जे वि‍ज्ञापन आ वि‍तरण ऐ दुनूमे अन्‍योन्‍याश्रय सम्‍बन्‍ध ऐछ। जँ मैथि‍ली भाषा-भाषी अधि‍काधि‍क समाचार पत्र कीनताह पढ़ताह तँ लोक अपन सामग्रीक प्रचार-प्रसार हेतु आखबामे वि‍ज्ञापन देबे करताह। आ जँ पत्र-पत्रि‍काकेँ वि‍ज्ञापन भेटतैक तँ ओकर आधार अवश्‍य मजगूत होएतैक, जे ओकर दीर्घायु आधार होएतैक। नारायण बाबू एकटा आर महत्‍वपूर्ण गप्‍प कहलनि‍ जे पाठकक रूचि‍क पाठ्य-सामग्री एवं रोचक-प्रेरक समाचारक संकलन ि‍नश्‍चय समाचार पत्र आ पत्रि‍काकेँ लोक प्रि‍य बनेबाक सामर्थ्‍य रखैत ऐछ। एे क्रममे डॉ. वि‍कल जोड़लनि‍- “समसामयि‍क परि‍वेशकेँ प्रश्रय देब एवं नव लोकक लेखन-सम्‍पादनसँ जोड़ब सेहो मैथि‍ली पत्र-पत्रि‍काकेँ गति‍शील बनाओत। शि‍वाकान्‍त बाबू पूर्वमे प्रकाशि‍त ‍अपन पत्रि‍का 'वागमतीक' अनुभवक आधारपर कहलनि‍ जे हम जतेक दि‍न मासि‍क 'वागमती' पत्रि‍का सम्‍पादि‍त प्रकाशि‍त कएलहुँ हमरा ओहि‍सँ आर्थिक हाि‍न नै भेल। मुदा वि‍तरण व्‍यवस्‍थाक त्रुटि‍ ओहो स्‍वीकार कएलनि‍। नारायण आ पत्रि‍का सभक फराक-फराक वर्तनीकेँ मैथि‍ली भाषाक लेल घातक बतौलनि‍। वर्तनीक एकरूपता सम्‍पादक एवं भाषा विशेषज्ञकेँ ध्‍यान देबाक आह्वान कएलनि‍। रमाकान्‍त राय 'रमा' चारि‍ बेर तीन ठामसँ तीनटा मैथि‍ली दैनि‍क पत्राचार पत्रक प्रकाशन करैत जोड़लनि‍ जे स्‍वदेश, मि‍थि‍ला मि‍हि‍र आ मि‍थि‍ला समादमे एखन मात्र एकटा दैनि‍क मि‍थि‍ला समाद प्रकाशन चारि‍ कोटि‍ लोक दैनि‍क ऐछ। जे मैथि‍ली भाषाक पाठकक दारि‍द्रय द्योतक ऐछ। परि‍चर्याक समापन करैत संचालक श्री रमाकान्‍त राय 'रमा' सभ प्रति‍भागीकेँ हुनक पहत्‍वपूर्ण एवं मौखि‍क वि‍चारक अभि‍व्‍यक्‍ति‍ लेल धन्‍यवाद दैत कहलनि‍ जे समग्रत: कहल जा सकैत अछि‍ जे मैथि‍ली माध्‍यमे प्राथमि‍क शि‍क्षा, सुदृढ़ आर्थिक आधार, समसामयि‍क प्रभावेत्‍पादक रचना, रोचक-प्रेरक समाचार, मानक मैथि‍ली भाषाक वर्तन, वि‍ज्ञानपन जुटयबाक सर्थक प्रयास, सम्‍पादन, वि‍तरण एवं व्‍यवस्‍था- पनक फराक-फराक नीक व्‍यवस्‍था इत्‍यादि‍ प्रमुख बि‍न्‍दुपर जँ ध्‍यान देल जाय तँ मैथि‍ली दैनि‍क समाचार पत्र ओ पत्रि‍का सभ नि‍श्‍चि‍त रूपसँ दीर्घायु होएत आ पाठक गणक संतुष्‍टक मि‍थि‍लाक जन-जन धरि‍ पहुँचत। १.प्रदीप बिहारीक दू गोट विहनि कथा-सत्संगी- थापड़ २. लक्ष्‍मी दास- विहनि कथा- बूड़ि‍बकक बूड़ि‍बक ३.डॉ. कैलाश कुमार मि‍श्र- यायावरी- मलि‍क भाय केर फुटपाथी चिंतन ४.बिपिन झा- की नब साल की पुरान साल..! ५.मुन्नाजी- रिपोर्ताज- ६. नवेन्दु कुमार झा १.रेल लाइनसँ जुड़त भारत आ नेपाल २. भारतीय सामाजिक व्यवस्थामे आइयो जीवन्त अछि जाति व्यवस्था- प्रो. शर्मा  ३.प्रदेशमे लागत चौदहटा नव उद्योग समूह, असोचैम कएलक एहि दिस पहल- मिथिलांचलमे सेहो लागत नव उद्योग १ प्रदीप बिहारीक दू गोट विहनि कथा-सत्संगी- थापड़ सत्संगी

तीन मासक बाद घरमे एकटा टहला अयलैक। पहिलुक टहलाकें गेेलाक बाद मोसकिल भऽ गेल रहैक। दुनू दियादिनी खटैत-खटैत अपस्याँत भऽ जाइत छलीह। जेठकी अपन पतिक संग सत्संगमे जाइत छलीह- सप्ताहमे दू दिन। ओहि दुनू दिन छोटकी पर काजक बोझ बेसी पड़ि जाइत छलनि। ओ अपन नैहर फोन करैत छलीह। पहिलुक टहला सेहो हुनके नैहरसँ आयल छलनि। ओम्हर भेटि जाइत छैक काज कयनिहार। छोटकीक बहिन सभक ओहिठाम नैहरेसँ गेल छनि टहला। जेठकी दुनू प्राणी किछु सामाजिक काज सभसँ सेहो जुड़ल छथि तें टहलाक नहि भेने बेसी मोसकिल भऽ जाइत छनि। संयुक्त परिवारक मनोविज्ञान सेहो बुझऽ पड़ैत छनि। एक्कहि गोटें पर बेसी भार देब उचित नहि। बाढ़िक विभीषिका समाप्त भेल रहैक। छोटकीक नैहरसँ फोन अयलनि, ‘‘बाढ़ि सटकि गेलैए। कने रूक्ख होमऽ दहक। काज कयनिहार भेटिए जेतह कोनो।’’ फोनक किछुए दिनक बाद छोटकीक भाय एकटा टहला अनलनि। खिआयल सनक नओ-दस बर्खक छौंड़ा। बड़की बजलीह, ‘‘ई तँ कुपोषणक शिकार अछि। काज की करत?’’ ‘‘पोसऽ पड़त दीदी।’’ ‘‘यैह तँ विडम्बना छै। ई सभ नमहर होमऽ धरि कतहु रहत। पोसा-पला जायत आ तकर बाद भागत दिल्ली-लुधियाना।’’ जेठकी बजलीह। ‘‘ई नहि जायत। अपने जऽनक बेटा अछि।’’ ओहि राति साढ़े नओ बजे सत्संगसँ घुरल रहथि बड़की दुनू प्राणी। टेप रेकॉर्डर पर गीत बजैत रहैक, ‘‘वैष्णव जन तो तेने कहिए, पीर परायी जाने रे....।’’ पति पुछलखिन ओहि छौंड़ासँ, ‘अएँ रे मनसुक्खा! तों कोन जाति छही?’’ ‘‘दुसाध।’’ लगलैक जेना घरमे ठनका खसल होइक। तामसे माहुर भऽ गेलाह सत्संगी। ओहि शांत वातावरणमे हुनक एकमात्र स्वर सुनल जाइत छल, ‘‘हम सभ दिन कहलहुँ। परम झुट्ठा अछि परतापुर बला सभ। कोना कहने छल जे मंडल अछि ई। आब तँ बहुत किछु बचा कऽ राखऽ पड़त मनसुक्खासँ।’’ ú

थापड़

ओ छौंड़ा पेट्रोल पम्प पर माला बेचैत अछि। पहिने पॉलिथिन बैगमे रखैत छल, मुदा आब मूजक चंगेरीमे रखैत अछि। खोराक लेबऽ आबऽ बला वाहन सभकें माला अर्पित करबा लेल उताहुल रहैत अछि। हमहूँ अपन स्कूटरक खोराक ओही पेट्रोल पम्प पर लैत छी। एकटा साँझखन हम पेट्रोल लेबऽ पम्प पर गेल रही। ओ छौंड़ा दौगल आएल आ हमरा स्कूटरक माथ बाटें माला पहिराबऽ लागल। हम मना कएलियैक। छौंड़ा बाजल, ‘‘सर! आइ बोहनियो ने भेलै हन। एक्के रूपा के तऽ बात छिकै।’’ छौंड़ाक आकृति परक दयनीय भावसँ हम द्रवित भऽ गेलहुँ। जेबीमे हाथ घोसिएलहुँ। आँगुरसँ खुदरा पाइ गनलहुँ। मात्र साठिटा पाइ छल। कहलियैक, ‘‘खुदरा नहि छौक।’’ ‘‘कोन नोट छिकै? दियौक ने सर! पम्प बला नमरियो के खुदरा कए दै छै।’’ एक टकाक माला। हमरा जेबीमे दसटकही। भजाएब उचित नहि लागल। के चानचुन राखत जेबीमे? मुदा छौंड़ाक आग्रह। कने काल इथ-उथ मे रहि गेलहुँ। मुदा खनहि जेबीसँ साठि पाइ बहार कऽ छौंड़ाकें दैत कहलियैक, ‘‘ई साठि पाइ ले आ माला सेहो राखि ले।’’ छौंड़ा पाइ नहि लेलक। माला अपन चंगेरीमे रखैत बाजल, ‘‘हमे हथउठाइ नइं लै छिकियै साहेब!’’ आब हमर लिलसाक बादो ओ छौंड़ा हमरा स्कूटरकें माला पहिराबऽ नहि अबैत अछि।

२ लक्ष्‍मी दास विहनि कथा बूड़ि‍बकक बूड़ि‍बक जेठ मासक तीन बजे दुनू बापूत गरमा धान रोपैले खेत पटा कऽ आएल रही। गरमीसँ मन तबधल रहए। मैट्रीकक बेटा कहलक- “बाबू नहाइले जाएब से साबून नैए।‍” एक तँ जेबीक पचस टकहीक गरमी दोसर तबधल मन। कहलि‍ऐ- “जेबीमे छै लऽ लाए गऽ।” हमरा मनमे भेल जे पँच टकही लाइफबुआ लेत। बाँकी पाइसँ खाद लऽ आनब। छौड़ा चालीस रूपैआबला पीयर्स साबून आनि‍ नि‍चेनसँ नहाएल। हम जखन नहाइले वि‍दा भेलौं तँ बौआकेँ पुछलि‍ऐ-“कतेक पाइ बचलह?” कहलक- “दस रूपैआ।” सुनि‍ते मन जरि‍ गेल। मुदा अपन हारल ककरा कहि‍ति‍ये। एक तँ बुड़ि‍बक ओ जे हमर दुख नै बुझलक। दोसर अपनो तँ अहूसँ टपि‍ गेलौं जे ओकरा कहि‍ नै देलि‍ऐ। ३ डॉ. कैलाश कुमार मि‍श्र यायावरी मलि‍क भाय केर फुटपाथी चिंतन मलि‍क भाय हमरा बड्ड प्रि‍य छथि‍। पि‍ण्‍डश्‍याम वर्ण, लगभग 48-50 केर आयु, मोट नाक मुदा नीक आ सुडौल काया। सदरिकाल गंभीर बनल। कपड़ा-जूत्ता पहि‍रबाक नीक शैली। खानदानी मुसलमान छथि‍। हि‍नकर पि‍ताजी अलीगढ़ मुस्‍लि‍म वि‍श्‍ववि‍द्यालयमे इति‍हासक प्रख्‍यात प्रोफेसर छलथि‍न्‍ह। आब अवकाश प्राप्‍त जीवन जीबैत छथि‍न्‍ह। मलि‍क भायक नाम  मुर्त्तज़ा  मलिक ‍छन्‍हि‍। हि‍नकर परि‍वार शि‍क्षि‍त आ उदारवादी परि‍वार छन्‍हि‍। मलि‍क भाय डाक्‍यूमेन्‍टरी फि‍ल्‍म बनबैत छथि‍। पहि‍ने बहुत दि‍न धरि‍ रंगमंचसँ जुड़ल छलाह। हबीब तनवीर केर संग नाटक केलन्‍हि‍। नौटंकीमे नीक अभि‍रूचि‍ छन्‍हि‍। वि‍शेष रूपसँ कानपुर, हाथरस आ मथुराक नौटंकी परम्‍पराक प्रति‍ हि‍नकर लगाव अद्भुत छन्‍हि‍। ओहि‍ शैलीकेँ पुर्नजीवि‍त करबाक लेल सदरिकाल तत्‍पर रहैत छथि‍। मुसलमान समाजक बुद्धि‍जीवि‍, आइ.ए.एस., आइ.एफ.एस., आइ.पी.एस., रंगकर्मी, साहि‍त्‍यकार, महि‍ला इन्‍टर प्रेन्‍युअर इत्‍यादि‍क बीच ई अपन ठोस पकड़ बनौने छथि‍। मुसलमान राजनेता चाहे कुनो पार्टीक कि‍एक ने होथि‍, मलीक भायकेँ सम्‍मान करैत छथि‍न्‍ह। जखन अब्‍दुल कलाम राष्‍ट्रपति‍ छलाह तँ मलि‍क भाय सदरिकाल राष्‍ट्रपति‍ भवन केर चक्कर लगबैत रहैत छलाह। मुदा बि‍ना बजौने कहि‍यो नहि‍ गेलन्‍हि‍। तखने जाइत छलन्‍हि‍ जखन बजाहट अबैत छलन्‍हि‍। वर्तमान उपराष्‍ट्रपति‍ डॉ. अंसारी लग सेहो हि‍नकर बड्ड नीक पहुँच छन्‍हि‍। अंसारी महोदयकेँ बड्ड करीबी मानल जाइत छथि‍ मलि‍क भाय। एन.डी.ए. केर शासन कालमे मलि‍क भाय राष्‍ट्रीय स्‍वयंसेवक संघ, भारतीय जनतापार्टी एवं एन.डी.ए. केर घटक दलक नेता सभसँ बड्ड समि‍पक नाता रखैत छलाह। मलि‍क भायसँ प्रथम परि‍चए हमरा एन.डी.ए. केर शासन कालमे नेशनल म्‍युजि‍यम संस्‍थान केर एक होनहार शोधार्थी श्री आनन्‍दवर्धन जे आइ-काल्हि‍ Delhi Institute of Heritage and Research Managemenet   मे सि‍नि‍यर लेक्‍चरॉर छथि‍, भारतीय जनतापार्टी केर मुख्‍यालयमे करोलन्‍हि‍। अहि‍ बातकेँ लगभग नौ वर्ष भऽ गेल। आनन्‍दवर्धन हमरा कहलन्‍हि‍- “‍भैया, ई छथि‍ मलि‍क भाय। बड्ड नीक लोक। Documentary film बनबैत छथि‍। राष्‍ट्रीय स्‍वयंसेवक संघ आ संस्‍कार भारती सं बड्ड नीक सम्‍बन्‍ध छन्‍हि‍। भारतीय परम्‍परासँ सि‍नेह छन्‍हि‍। भारतीय परम्‍परा केर संरक्षण आ सम्‍बर्धनमे सदरिकाल लागल रहैत छथि‍। उदारवादी प्रवृति‍ केर मुसलमान छथि‍। अयोध्‍यामे राम मन्‍दि‍र बनए, तकर पक्षधर छथि‍। पाकि‍स्‍तानक घोर वि‍रोधी छथि‍। हि‍न्‍दु-मुसलमान एकताक समर्थक छथि‍...।" इत्‍यादि‍-इत्‍यादि‍। आनन्‍दवर्धन केर अहि‍ परि‍चएपर मलि‍क भाय बि‍ना कि‍छु बजने आँखि‍मे धूपबला कीमती चश्‍मा लगौने बड़ा गम्‍भीर अहँकार-हीन भावना सं हमरा लग आबि‍ गर्मजोशी सँ हमरासँ हाथ मि‍लौलन्‍हि‍। आनन्‍दवर्धनजी मलि‍क भायकेँ सेहो हमर बड़ा वि‍स्‍तारपूर्वक परि‍चए देलथि‍न्‍ह। नहि‍ तँ आनन्‍दवर्धनजी हमरा मलि‍क भायक पूर्ण नाम बतौलन्‍हि‍। आ नहि‍ये हम जनबाक प्रयास केलहुँ। मुदा तकरबाद मलि‍क भायसँ दि‍न-प्रति‍दि‍न सम्‍बन्‍धक प्रगाढ़ता बढ़ैत गेल। मलि‍क भायसँ जतेक नजदि‍की अबैत गलहुँ ततेक हि‍नका प्रति‍ हमर सि‍नेह आ सम्‍मान बढ़ैत गेल। एक दि‍न मोनमे आएल- आहि‍ रे बा! मलि‍क भाय केर नाम तँ हमरा पते नहि‍ अछि‍। कहीं कहि‍यो कि‍यो पूछलक जे मलि‍क भाय अर्थात के, तँ की उत्तर देबैक? मुदा प्रगाढ़ता अतेक बढ़ि‍ गेल छल जे हमरा मलि‍क भायसँ हुनकर नाम पुछबाक हि‍म्‍मत नहि‍ भेल। जखन आनन्‍दजी भेँट भेलाह तँ पुछलि‍एनि‍- “मलि‍क भाय केर नाम की छन्‍हि‍?‍” आनन्‍द जवाब देलन्‍हि‍- “हमरो ज्ञात नहि‍ अछि‍। हमहूँ हि‍नका मलि‍क भाय केर नामसँ जनैत छयन्‍हि‍।‍” एक दि‍न मलि‍क भाय हमरा इमेल भेजलन्‍हि‍। ओहि‍ इमेल आइ.डी.मे इमेल भेजएबलाक नाम मुर्त्तज़ा मलि‍क रहैक। एकहि‍ क्षणमे ई इमेल हमर समस्‍याक समाधान कऽ देलक। जखन राम जन्‍मभूमि‍ आ बाबरी मस्‍जि‍द केर बि‍बादपर इलाहावाद हाइकोर्ट (लखनऊ बेन्‍च)क निर्णय अएलैक तँ झट दनि‍ मलि‍क भाय हमरा ई एस.एम.एस. केलन्‍हि‍- “Congrats now me can build temple‍” कनिकालक बाद मलि‍क भाय फोन सेहो केलन्‍हि‍। कहए लगलाह- “कैलाश भाय, भारतक मुसलमान आब शान्‍ति‍ चाहैत अछि‍। हमरा लोकनि‍ हि‍न्‍दु-समाजक संग मिलि कऽ रहए चाहैत छी। आब अतए केर मुसलमान कुनो नेता आ मुल्‍लाक मायाजालमे नहि‍ ओझराए चाहैत अछि‍। मुसलमान समाजक युवावर्ग आब वि‍कासमुखी भऽ गेल अछि‍। आब एहि‍ तरहक बात लऽ कऽ हमरा लोकनि‍ खून खराबा नहि‍ कऽ सकैत छी। बहुत भेल आब कुनो नेता किंवा कठमुल्‍लाक झपासामे देशक मुसलमान नहि‍ आबएबला अछि‍। हमरा लोकनि‍ तँ बल्कि ई सोचि‍ रहल छी जे देशक मुसलमान सभकेँ वि‍भन्न भौगोलि‍क क्षेत्रसँ बजा अयोध्‍या लऽ जाइ आ हि‍न्‍दु लोकनि‍क संग मि‍ल कऽ एक भव्‍य आ पैघ राम-मन्‍दि‍र केर निर्माणक कार्य प्रारम्‍भ करी। अगर एहेन भऽ गेल तँ  समस्‍त वि‍श्‍वमे एकटा बात पहुँचत जे भारत सरि‍पहुँमे अनेकतामे एकता, आपसी सामंजस्‍य तथा वैवि‍ध्‍य संस्‍कृति‍क समागम स्‍थल अछि‍। एहेन प्रमाण अन्‍यत्र संभव नहि‍।‍” मलि‍क भाय केर एहि‍ तरहक वि‍चार सुनि‍ मोनमे एक बेर फेर हुनका प्रति‍ अपार सि‍नेह आ सम्मान जागि‍ गेल। मोन भेल जे मलि‍क भायकेँ हृदएसँ लगा ली। तैय्यार सेहो भेलहुँ। मुदा कहि‍ नहि‍ कि‍एक एकै झटकामे अपने-आपकेँ रोकि लेलहुँ। भेल मलि‍क भाय सोचताह- “राम-मन्‍दि‍र लेल कैलाश भाय अतेक चि‍न्‍ति‍त छथि‍ मुदा मुसलमानक भावना केर चि‍न्‍ता कहाँ छनि‍। कैलाश भाय कते मतलबी लोक छथि‍!” करीब दू बरख पूर्व मलि‍क भाय पुनीता शर्मा नामक एक पि‍ण्‍डश्‍याम मुदा आकर्षक नाक-नक्‍शावाली बालाक संग हमरा लग अएलाह। पुनीता शर्माक सम्‍बन्‍धमे मलि‍क भायसँ हमरा ई ज्ञात भेल जे पुनीता शर्मा कत्‍थक नृत्‍यांगना छथि‍। ओ अपन संस्‍थाक माध्‍यमसँ सांस्‍कृति‍क कार्यक्रमक आयोजन  करैत रहथि‍ छथि‍। पुनीता शर्मा बि‍हारसँ थिकीह। नृत्‍य संग-संग नृत्‍य-नाटि‍काक सेहो मंचन एक उभरैत कलाकारक रूपमे करैत छथि‍। पुनीता शर्माक संग एक आरो श्‍यामे वर्ण, छटगर मुदा आकर्षक आ मुँहक पानि‍मे पुनीता शर्मासँ कनी अठारह, एक नायि‍का हमरा लग आएल छलीह। एहि‍ नायि‍का केर नाम छलन्‍हि‍ अनु चौधरी। बार्तालापक क्रममे पता चलल जे अनु चौधरी मुलत: मि‍थि‍लासँ छथि‍। हि‍नकर पि‍ता कुनो संस्‍कृत वि‍द्यालयमे गणि‍त केर शि‍क्षक छथि‍न्‍ह आ दि‍ल्‍ली महानगरीक पश्‍चि‍मी कछेरमे बसल नजफगढ़मे अपन घर-द्वार बना रहि‍ रहल छथि‍। अनुक जन्‍म, पालन-पोषण एवं शि‍क्षा इत्‍यादि‍ सेहो दि‍ल्‍लीए मे भेल छन्‍हि‍। अनु हि‍न्‍दीसँ एम.ए. केलाक बाद  दि‍ल्‍ली वि‍श्‍ववि‍द्यालयसँ पी.एच.डी. कऽ रहलि‍ छलीह। आब पी.एच.डी. लगभग लगि‍चाए गेल छन्‍हि‍। मुदा अनु पुनीताक तुलनामे कनी गंभीर बुझना गेलीह। जखन अनुकेँ हमरा बारेमे ज्ञात भेलन्‍हि‍ जे हम मैथि‍ल छी तँ ओ हमरासँ हि‍ल-मि‍ल गेलीह आ खाँटी मैथि‍लीमे वार्तालाप करए लगलीह। “राग-वि‍राग‍” संस्‍थासँ अनु सेहो जुड़ल छलीह। पुनीता शर्मा आ अनु चौधरी दुनूकेँ बि‍हारक संस्‍कृति‍ आ संस्‍कारसँ घोर लगाव बुझना गेल हमरा। ई दुनू मि‍ल अपन संस्‍था- राग-बि‍रागक माध्‍यमसँ हम्‍मर ताहि‍ समएक संस्‍था- इन्‍दि‍रा गान्‍धी राष्‍ट्रीय कला केन्‍द्र केर प्रांगणमे “बि‍हार उत्‍सव‍” मनबए चाहैत छलीह। ओहि‍ सांस्‍कृति‍क कार्यक्रममे प्रदर्शनी, लोक तथा शास्‍त्रीय नृत्‍य आ संगीतक मंचन, बि‍हारक सांस्‍कृति‍क वि‍रासत तथा बि‍हारमे वि‍कासक संभावनापर एक दू-दि‍नक संगोष्‍ठी इत्‍यादि‍ करबाक वि‍चार छलन्‍हि‍। यद्यपि‍ बि‍हारक प्रति‍ हुनका हृदएमे अगाध प्रेम छन्‍हि‍। जखन ई दुनू नायि‍का मलि‍क भायसँ बि‍हार उत्‍सव करबाक इच्‍छा व्‍यक्‍त केलखि‍न तँ मलि‍क भाय हुनका लोकनि‍क संग मि‍ल एहि‍ सपनाकेँ साकार करवाक लेल लागि‍ गेलाह। मुदा स्‍पॉन्‍सर भेटबाक लेल एक परि‍योजना तथा एकटा आधार लेख जरूरी। ओही परि‍योजना तथा आधारक निर्माण, संगहि‍-संग इन्‍दि‍रा गान्‍धी राष्‍ट्रीय कला केन्‍द्र केर प्रांगणमे कार्यक्रम करबाक अनुमति‍ केर लेल मलि‍क भाय एहि‍ दुनू नायि‍काकेँ लए हमरा लग आबि‍ गेलाह। हम मलि‍क भाय केर बि‍हारक प्रति‍ प्रेम एवं पुनीता तथा अनुक इच्‍छाकेँ सम्‍मान करैत परि‍योजना तैय्यार कऽ देलयन्‍हि‍। संगहि‍ अपन तात्‍कालीन सदस्‍य सचि‍व डॉ. कल्‍याण कुमार चक्रवर्तीसँ नि‍वेदन कए पूरा कला केन्‍द्रक प्रांगण हि‍नका लोकनि‍केँ बि‍हार उत्‍सव केर आयोजन करबाक हेतु दि‍या देलयन्‍हि‍। आब मलि‍क भाय प्रसन्न भऽ पुनीता आ अनुक संग बि‍हार उत्‍सव केर तैय्यारीमे जमि‍ कऽ लागि‍ गेलाह। स्‍पॉन्‍शरशीप केर लेल सेहो जतय-जतय दौड़-धूप करए लगलाह। हमहुँ उत्‍साहि‍त रही। मुदा एकाएक कोसी अपन बि‍कराल रूपसँ सहरसा, पुरणि‍यामे सर्वनाश कऽ देलक। जान-मालक जबरदस्‍त हानि‍ भेलैक। समस्‍त देश कोसीक वि‍भि‍षि‍कासँ काँपि‍ गेल। अहि‍ बि‍करालताकेँ देखैत हमरा लोकनि‍ ई  निर्णय सर्वसम्‍मति‍सँ लेलहुँ जे कार्यक्रमकेँ कि‍छु दि‍न लेल स्‍थगि‍त कऽ देल जाए। एहि‍ घटनाक एक प्रभाव ई भेल जे हम मलि‍क भायकेँ आरो समीप आबि‍ गेलहुँ। जतेक बेर भेटथि‍ मलि‍क भाय ततेक नजदि‍क अबैत गेलहुँ हम हुनका संग। हालहि‍मे एक दिन हम मलि‍क भायसँ नौटंकी परम्‍पराक सम्‍बन्‍धमे एक शोध परि‍योजनापर दि‍ल्‍लीक मंडी हाउसमे श्रीराम सेन्‍टर केर केफेटेरि‍यामे बैसल  गप्‍प-सप्‍प करैत रही। मलि‍क भाय नौटंकी परम्‍पराकेँ पुन: प्रति‍ष्‍ठापि‍त करबाक लेल बड्ड चिंतित बुझना गेलाह। जखन ओ नौटंकी केर बात करैत छथि‍ तँ हुनकर भाव-भंगि‍मासँ एना लागत जेना कलाकारक टीस बाहर भऽ रहल हो आ एक शोधर्थी केर उत्‍कंठा। बहुत तरहक आ नौटंकीक वि‍वि‍ध आयामपर मलि‍क भाय केर सोच देख मोन हरि‍यर भऽ जाइत अछि‍। वि‍चार-पर-वि‍चार होइत गेल। सोचक श्रंृखला बढ़ैत गेल। मलि‍क भय कॉफी पीबाक एक तरहसँ एडि‍क्‍ट छथि‍। ओना हमरा कॉफीसँ कुनो सि‍नेह नहि‍ अछि‍ मुदा एकरसता समाप्‍त करबाक लेल तथा वि‍चारधारामे नव-नव बुलबुला अनबाक लेल हमहुँ कॉफी-पर-काॅफी पीबैत रहलहुँ। मलि‍क भायक साथ दैत रहलि‍एनि‍। बात खि‍चाइत रहल सोच बढ़ैत रहल। परि‍योजना अपन स्‍वरूप पकड़ने गेल। लगभग परि‍योजनाक बाहरी आवरण बनि‍ गेल छल। एकाएक मलि‍क भाय कहलन्‍हि‍- “कैलाश भाय, हमरा लोकनि‍ तीन घंटासँ नौटंकीपर चर्चा कऽ रहल छी। बि‍ना कुनो अवरोधक। बि‍ना कुनो वि‍रामक। कनी काल आब‍ हमरा लोकनि‍केँ मोन फ्रेश करक चाही। चलू धूमि‍ कऽ 15-20 मि‍नटमे वापस आबि‍ पुन: नौटंकीबला कार्यकेँ समाप्‍त करब।” ई कहि‍ मलि‍क भाय उठि‍ गेलाह। हम्‍मर हाथ पकड़ि‍ केफेटेरि‍यासँ बाहर वि‍दा भेलाह। हमहुँ एक आज्ञाकारी शि‍ष्‍य जकाँ मलि‍क भाय संग बाहर धुमबाक हेतु वि‍दा भेलहुँ। मोनमे भेल- चलू कनी मोनमे नव संचार उत्‍पन्न कऽ ली। जखन बाहरमे घुमैत रही तँ एकाएक राजनीति‍, राजनीि‍तमे भ्रष्‍टाचार आदि‍ वि‍षएपर गप्‍प होमए लागल। गप्‍प ए.राजा आ 2जी. स्पेक्ट्रुम केर भयंकर धोटालासँ प्रारंभ होइत नीतीश कुमार केर डेबलपमेन्‍ट प्‍लान आ जीत आ पुन: गुजरातक मुख्‍यमंत्री नरेन्‍द्र मोदीक वि‍चारधारा धरि‍ होइत रहल। हम उपनि‍षदक अज्ञानी चेला जकाँ अपन जि‍ज्ञासा एक-दू वाक्‍यमे रखैत गेलहुँ, आ मलि‍क भाय उपनि‍षद केर धोर तपस्‍वी आ मर्मज्ञ जकाँ हमर जि‍ज्ञासाक समाधान वि‍स्‍तारसँ करैत गेलाह। मलि‍क भाय जेना हम्‍मर उधेर-बुनकेँ बि‍ना पुछने बुझि‍ लेने होथि‍। ओ बजैत गेलाह बेवाक। कुनो मर्मज्ञ राजनैति‍क वि‍श्‍लेषक जकाँ। 15मि‍नट समए कोना डेढ़ घंटामे बदलि‍ गेल से पते नहि‍ चलल। भ्रष्‍टाचार आ धोटालापर मलि‍क भाय कहलन्‍हि‍- “कैलाश भाय, भ्रष्‍टाचार आ घोटाला नेता नहि‍ बड़का बाबू अर्थात् आइ.ए.एस. ऑफि‍सर सबहक लॉबी करैत अछि‍। ओ सभ नेता आ मि‍नि‍स्‍टर सभकेँ अपना हाथक खेलौना बनेने रहैत अछि‍। कार्य ओ सभ अतेक दक्षताक संग करैत अछि‍ जे अपने तँ कहि‍यो नहि‍ फॅसत मुदा बदनाम नेता कि‍ंवा मंत्री भऽ जएत। I.A.S. केर अर्थ होइत छैक- Im Always   Safe .  मंत्रीके  बड़का बाबू एक तरहेँ वि‍वश कऽ दैत छैक जे ओ जाहि ‍ कागतपर कहै ताहि‍पर हस्‍ताक्षर लऽ लै।‍” मलि‍क भाय बजैत रहलाह आ हम जि‍ज्ञासासँ आँखि‍ फाड़ने आ कान खोलने हुनकर बातकेँ सुनैत गेलहुँ। मलि‍क भाय कहलन्‍हि‍- “जनै छी कैलाश भाय, एहि‍ पौने दू लाख‍ हजार कड़ोरक घोटालामे चारि‍ओ अना हि‍स्‍सा  ए  राजा के  नहि‍ भेटल हेतैक। दससँ बारह अना हि‍स्‍सा तँ बड़का बाबू सभ गट दनि‍ पचा लेने हेतैक आ छौसँ चारि‍ अनामे अपना पार्टिक मुखि‍या, देशक सभसँ पैघ पार्टीक मुखि‍या आ अन्‍तत: अपन लगुआ-भगुआ सभमे बाटए परल हेतैक। मुदा बड़का बाबू सभ कागजकेँ तेना ओझरेने हेतैक जे तमाम प्रक्रि‍यासँ लऽ लऽ सी.बी.आइ. केर जाँच धरि‍ अगर कि‍यो फॅसत तँ मंत्री। पत्रकार सेहो बड़का बाबूपर चुप रहत आ नेता आ मंत्रीकेँ देषी बनेवामे अपन दि‍माग आ खोजी पत्रकारि‍ताक तमाम टीप्‍सकेँ लगौने रहत। मंत्रीक स्‍वरूप कि‍छुए दि‍नमे नायकसँ खलनायक बनि‍ आओत।” हम मलि‍क भायकेँ पुछलएनि‍- “अहाँक जनैत की कारण छैक जे अहि‍ बेरक बि‍हार वि‍धानसभा केर चुनावमे काँग्रेस, लालू यादव आ रामवि‍लास पासवान, तीनूकेँ नीतीश कुमार खड़ड़ा लऽ कऽ खड़ड़ि‍ देलन्‍हि‍। एहेन कि‍एक भेलैक?‍” मलि‍क भाय कहलन्‍हि‍- “‍देखू, लोक आब नेहरू-गान्‍धी परि‍वारक वंशनुगत राजनीति‍सँ तंग आबि‍ गेल अछि‍। लालू यादवक जाति‍क राजनीति‍ प्रारम्‍भमे छोटका जाति‍ सभकेँ नीक लगलैक, कि‍एक तँ पहि‍ल बेर ओ सभ चुनावमे हि‍स्‍सा लेलक, अप्‍पन बातकेँ बि‍ना कुनो डर आ आतंककेँ बाजल। लोककेँ बुझेलैक जे प्रजातंत्रो कुन चीज होइ छैक। मुसलमानकेँ कॉग्रेजसँ मोह भंग होमए लगलैक। 1991 केर बाबरी मस्‍जि‍द ध्‍वस्‍त भेलाक बाद मुसलमान सभ बुझि‍ गेल जे काँग्रेस आ भारतीय जनता पार्टीमे कुनो विशेष अन्‍तर नहि‍ अछि‍। बि‍हारमे मुसलमान सभकेँ सभसँ ज्‍यादे भय गुआर सं रहलै। कखनहुँ कुनो सम्‍प्रदायि‍क उन्‍माद होइक तँ मुसलमान सबहि‍क जानमालक छति‍ सभसँ ज्‍यादे गुआरे सभ करैक। ताहि‍ मुसलमान विकल्पहीन भऽ गेल। मुसलमान सभ लाचार भऽ लालू यादव केर साथ भऽ गेल। मुदा बादमे मुसलमानो सभकेँ ई बुझएमे आबि‍ गेलैक जे लालू यादव केवल बातक धनीक छथि‍ आ कर्मक छोट। जखन कि‍ ठीक एकर वि‍परीत नीतीश कुमारजी एक मात्र वि‍कासक अपन आधार बनौलन्‍हि‍। बि‍ना कुनो कन्‍ट्रोवर्सीमे गेने वि‍कासक कार्य करैत रहलाह। महि‍ला सभकेँ नौकरी भेटलैक शि‍क्षामि‍त्र बनल, ग्राम पंचायतसँ जि‍ला पंचायत धरि‍ साझेदारी बढ़लैक, बहुत महि‍ला सभ शि‍क्षि‍का बनलि‍, ए.एन.एम. बनलि‍, बालि‍का सभकेँ स्‍कूली वर्दी, मुफ्त साइकिल, वि‍द्यालयमे भोजन भेटलैक। फेर की छल- की छोट आ की पैघ- सभ कि‍यो अपन लड़की सभकेँ इसकूल भेजनाइ प्रारंभ केलक। लालू जी समएक तमाक गुण्‍डा आ लफन्‍दर सभ जे कि‍ डाका डालैत छल, लोककेँ अपहरण करैत छल, छीना-छपटी करैत छल आतंकक माहौल बना समस्‍त भारतमे बि‍हारकेँ बदनाम बनौने छल, तकरा सभकेँ पकड़ि‍-पकड़ि‍ नीति‍शजी जहलमे ध देलन्‍हि‍। मातहत पुलि‍स सभकेँ स्‍पष्‍टीि‍नर्देष देलखि‍न्‍हि‍ जे एहि‍ उपद्रवी तत्‍वकेँ एहेन इलाज करए जाए जे फेरो जीवनमे ई सभ एहेन कार्य करब तँ दूर सोचबो नहि‍ करए। एकर प्रभाव बड्ड नीक रहलैक। शनै: शनै: लेाक भय-मुक्‍त होमय लागल।” मलि‍क भाय बजैत रहलाह- “नीति‍शजी इहो बुझलन्‍हि‍ जे बि‍हारक सड़क कंडम भऽ गेल अि‍छ। ताहि‍ सड़ककेँ मरम्‍मत तथा नव सड़कक ि‍नर्माणक कार्यकेँ तीब्रताक संग-संग दक्षतासँ करबाक ि‍नर्देश देलथि‍न्‍ह। हुनका पता चललन्‍हि‍ जे ठेकेदार सभ कनी-मनी कार्य कय सभटा पाइ पंत्री, आॅफीसर आ अपने-अापमे बाँटि‍ लैत अछि‍। फेर की छल। नीतीशजी इहो ि‍नर्देश देलथि‍न्‍ह, कि‍ जे कि‍यो ठेकेदार सड़कक जीर्णोद्धार  या ि‍नर्माणक ठिका लेत सएह एक ि‍नश्‍चि‍त अवधि‍ माने पाँच या दस वर्ष धरि‍ ओहि‍ सड़कक रखरखाव सेहो करत। अगर कुनो तरहक कमी भेलैक तँ ठेकेदारक जि‍म्मेदारी हेतैक आ आेकरा ठीक कराबए पड़तैक। एहि‍ ि‍नर्देशक बड्ड उत्तम प्रभाव परलैक। बि‍हारक जनता सड़क बनबासँ आ सड़कक उद्धार होमासँ गद-गद भऽ गेल। मुदा सामान्‍य जनताक बीच एखनहुँ लालू जीक गुण्‍डा सबहक डर छलैक जकरासँ ओ मुक्‍ति‍ पाबए चाहैत छल। आ ई मुक्‍ति‍ चुनावमे लालू जीक पार्टीकेँ हरा कऽ देल जा सकैत छल।‍” “रामवि‍लास पासवान अपन इमेज एकटा अवसरवादी नेताक रूपमे बना लेने छथि‍ पहि‍ने एन.डी.ए. मे मंत्री रहलन्‍हि‍, फेर  एन.डी.ए. छोड़ि‍ उ. प अ. में आबि‍ झट दनि‍ मंत्रीक कुर्सीपर बैस रहलाह। हमेशा लालू यादवक धाेर वि‍रोध केलन्‍हि‍ मुदा अवसरवादि‍तासँ अतेक ग्रसि‍त भऽ गेलाह जे हुनके संगे राजनैति‍क गठबन्‍धन क‍ऽ लेलन्‍हि‍। बि‍हारक अति‍ पि‍छड़ा वर्ग, वि‍शेष रूपेँ हरि‍जन सभपर अपन अधि‍कार बुझए लगलन्‍हि‍। नीतीशजी सर्वप्रथम दलि‍तकेँ दू भाग- दलि‍त आ महा-दलि‍तमे बॉटि‍ रामवि‍लास पासवानक आधारकेँ शनै: शनै: अतेक तोड़ि‍ देलथि‍न्‍ह जे गि‍नि‍ज बूक ऑफ बर्ल्‍ड रि‍कॉर्डमे सभसँ ज्‍यादा मत लए जीतक रेकॉर्ड बनबएबला रामवि‍लास पासवान स्‍वयं एम.पी. केर चुनाव हाि‍र गेलाह। धन्‍यवाद दी लालू यादवकेँ जे हि‍नका राज्‍यसभामे आि‍न देलथि‍न्‍ह। अन्‍यथा आइ सड़कपर रहि‍तथि‍। इमहर कुर्मी, कोइरी, धानूक मल्‍लाह, मुसहर आदि‍ लालू यादवसँ अलग आबि‍ अपना-अपने-आपकेँ नीतीश लग सुरक्षि‍त बुझए लगलाह।” मलि‍क भाय हमरा दि‍स देखलन्‍हि‍। हमर जि‍ज्ञासा भावकेँ बि‍ना कहने बुझि‍ गेलाह आ अपन कथ्‍यकेँ आगाँ बढ़बैत बजलाह- “रहल बात मुसलमानक। तँ नीतीशजी एहि‍ बन्‍दुपर अपन कौटि‍ल्‍य नीति‍ केर सर्वोत्तम उदाहरण प्रस्‍तुत केलन्‍हि‍। एक दि‍स तँ भारतीय जनता पार्टीक अपन घटक दल बनौने रहलाह मुदा दोसर दि‍स कॉमन मि‍नि‍मम प्रोग्रामक धोषणा केलन्‍हि‍ जाहि‍मे मंदि‍र बनेबाक इशू शामील नहि‍ रहैक। संगहि‍ गुजरातक मुख्‍यमंत्री मुख्‍यमंत्री नरेन्द्र  मोदीकेँ अपन कुनो कार्यक्रममे जानि‍-बुझि‍ कऽ नहि‍ आबए देलथि‍न्‍ह। नीतीश कुमारक एहि‍ ि‍नर्णएसँ भारतीय जनता पार्टीक नेता सभ बि‍फरि‍ गेलाह। मुदा नीतीशजी अपन ि‍नर्णएसँ टससँ मस नहि‍ भेलाह । आर-तँ-आर ओ बी.जे.पी.केँ साफ कहि‍ देलथि‍न्‍ह जे नरेन्द्र मोदी बि‍हार-वि‍धान सभा २०१० केर आम चुनावमे पार्टीक प्रचारक हेतु बि‍हार नहि‍ अबथि‍। ई ि‍नर्णए भारतीय जनता पार्टीक लेल बड्ड पैघ धक्का छलैक। मुदा गठबंधन केर धर्मकेँ स्‍वीकारैत तथा नीतीश जीक बढ़ैत कदकेँ देखैत बी.जे.पी.केर श्रेष्‍ठ नेता सभ चुप्‍प रहि‍ ि‍नर्णए स्‍वीकारि‍ लेलन्‍हि‍। बेगर Beggar cannot be chooser.” हम अहि‍पर मलि‍क भायकेँ वि‍चारक श्रंखला तोड़ैत कहलि‍यन्‍हि‍- “मलि‍क भाय, अगर मोदी अतेक खराव छथि‍ आ मि‍डि‍यासँ लए कऽ तमाम वि‍पक्षी दल हुनकर धोर वि‍रोध कऽ रहल अछि‍ तँ फेर बेर-बेर गुजरात सनहक पैघ राज्‍यमे ओ जीतैत कि‍एक छथि‍?‍” मलि‍क भाय कहलन्‍हि‍- “देखू कैलाश भाय, मोदी हि‍न्‍दु वि‍चारधाराक बदौलक ि‍कंवा गोधरा आ आन ठमहक नरसंहारक कारणे नहि‍ जीतैत छथि‍। मोदी जीतमे हीरा जवाहरातक कारोबार करएबला व्‍यापारीक हाथ छैक। पहि‍ने एहि‍ कार्यमे चाहे कीमती पत्‍थरकेँ कटाइ-छटाइ हो, पॉलीसींग हो, धसाइ हो या खानसँ उपलब्‍धता या पुन: आयात-ि‍नर्यात, तमाम प्रक्रि‍यामे मुसलमान सभ डोमि‍नेट करैत छल। एकाएक वि‍श्‍व-बाजारमे जखन कीमती पत्‍थर तथा हीरा जवाहरात दि‍स इजराइल केर यहुदी व्‍यापारीक हष्‍टि‍ गेलैक तँ शनै:-शनै: ओ सभ अहि‍ धंधामे एकाधि‍कार स्‍थापि‍त कए लेलक। फेर गुजरातक हि‍न्‍दु-व्‍यापारी सभकेँ सेहो अपना दि‍स आकर्षित कए मुसलमान सभसँ पृथक करक प्रयास करए लागल। स्‍थानि‍य आ अप्रत्‍याशि‍त लाभकेँ ध्‍यानमे रखैत गुजरातक हि‍न्‍दु व्‍यापारी सभ हीरा-जवाहरात तथा तमाम वेश कीमती पत्‍थरपर अपन आधि‍पत्‍य बनेबाक युक्‍ति‍पर वि‍चार करए लागल। आ एहि‍ तरहक एकाधि‍पत्‍य बि‍ना राजनैति‍क सहयोग एवं हस्‍तक्षेपसँ संभव नहि‍ अछि‍। अहि‍ तरहक सहयोग जखन मोदी प्रथम बेर मुख्‍यमंत्री भेलाह तँ देनाइ प्रारम्‍भ कऽ देलथि‍न्‍ह। फेर की छल हि‍न्‍दु व्‍यापारी सभ हुनका समर्थन करए लगलन्‍हि‍ आ हुनकर चुनावमे आर्थिक एवं अन्‍य तरहक मदति‍ करए लगलन्‍हि‍। अन्‍तरराष्‍ट्रीय स्‍तरपर इजरायल तँ मदति‍ कैयो रहल छन्‍हि‍। संगहि‍ गुजरातक आदि‍वासी तथा कहरपंथी हि‍न्‍दु वर्ग हि‍न्‍दु अस्‍मिताक नामपर हि‍नकर संग छन्‍हि‍।‍” मलि‍क भाय गंभीर रहलाह आ बजैत रहलाह- “गुजरातमे मुसलमान समुदाय केर साथ खून-खरापा उच्‍च वर्ग हि‍न्‍दु अथवा व्‍यापारी इत्‍यादि‍ नहि‍ केलक। एहि‍ लेल ठेकेदार सभ आदि‍वासी लोकनि‍केँ पटोलक . ओकरा सबहक मोनमे मुसलमान समुदायक प्रति‍ धृणा आ वैमनस्‍य उत्‍पन्न केलक। आहाँकेँ की कहु कैलाश भाय, हालहि‍मे हम गुजरातक कि‍छु आदि‍वासी बहुल क्षेत्रमे पत्रकारक टीम संगे यात्रा केने रही। जखन एक आदि‍वासी गाममे गेलहुँ आ पुछलि‍ऐक जे बगलबला गाँव जाहि‍मे मुसलमान सभ रहैत अछि‍ तकर सबहक की हालत छैक? हमर जि‍ज्ञासापर आदि‍वासी सभ तमतमाइत कहलक- श्रीमान्, अहाँ मुसलमान सबहक बात नहि‍ करू। ओ सभ गद्दार अछि‍। ओ सभ कि‍छु अंट-संट जारि‍ सेहो बाजल आ अन्‍तमे कहलक- जनैत छी, हमरा लोकनि‍ गुजरातक दंगाक समएमे मुसलमान सभकेँ खुब मारलहुँ। सभटा बदला लऽ लेलऐक। पूरा देशमे जे भारतीय जनता पार्टी 2004केर चुनाव हारल तकर कारण कुतुबुहीन अन्‍सारीक बान्‍हल आ वि‍वशतामे हाथ जोड़ैत फोटो। ओ भीड़क उन्‍मादमे मातल लोक सभसँ हाथ जोड़ने अपन प्राणक भीख मांगैत छल। ई फोटो मात्र समस्‍त भारतमे भारतीय जनता पार्टीक प्रति‍ लोकक मोनमे घृणा अत्‍पन्न कऽ देलकैक आ एहि‍ बातकेँ बी.जे.पी.केर नेता नहि‍ बुझि‍ सकलाह। परि‍णाम बहुत नीक जकाँ सरकार चलेबाक बादो भारतीय जनता पार्टी एवं घटक दल सत्तामे नहि‍ आबि‍ सकल। आ सम्‍पूर्ण परि‍पेक्ष्‍यमे नरेन्‍द्र मोदीकेँ एकर सूत्रधार मानल गेलैक। एका-एक पूरा देशक मुसलमान मोदी वि‍रोधी भऽ गेल। मुसलमान डरे हरकम्‍प काँपए लागल। अपने-आपकेँ घोर असुरक्षि‍त बुझए लागल। जानैत छी कैलाश भाय, हम तँ मुसलमान समाज आ ि‍वशेष रूपसँ बुद्धि‍जीवी सभ लग बैसैत छी। मुसलमान समाजमे ई चर्चा भऽ रहल छैक जे घोर राष्‍ट्रवादक नामपर भारतमे मुसलमान सभकेँ जान-मालक अपार छथि‍ हेतैक। कि‍छु वर्ष अर्थात 30-40 वर्षक बाद मुसलमान सभ अपन नाम हि‍न्‍दु नाममे परि‍वर्तित कऽ लेत। इजरायल अपन प्रभुत्‍व भारतमे घोर राष्‍ट्रवादी संग मि‍ल मुसलमानकेँ परेश्‍‍ाान कऽ कऽ देखाओत। भारतक अगल-बगल केर छोट-छीन देश सभ भारतमे मि‍ल जएत। मुदा मुसलमान सभ इहो सोचैत अछि‍ जे चीन जाहि‍ तरहसँ अपने-आपकेँ हर दृष्‍टकोणसँ मजबूत कऽ रहल अछि‍- एक दि‍न लगभग डेढ़-दू साए वर्षक बाद ई स्‍थि‍ति‍ हेतैक जे चीन भारतकेँ छि‍न्न-भि‍न्न करएमे सफल भऽ जाए। हलांकि‍ चीनक लेल चि‍न्‍ताक वि‍षए छैक तीब्र गति‍सँ ओतए केर जनताकेँ इसाइ धर्ममे परि‍वार्तन।” एकरा बाद पुन: मलि‍क भाय बि‍हारक सन्‍दर्भमे बाजए लगलाह कहलन्‍हि‍- “बि‍हारक मुसलमान नीतीश जीक अहि‍ ि‍नर्णएसँ संतुष्‍ट छल जे चलू ओ नरेन्‍द्र मोदीकेँ बिहार  नहि‍ आबए देलाह। उच्‍च वर्ग सभ पहि‍ल बेर एक भेल आ अपन मत नीतीश कुमारक पार्टी एवं भारतीय जनता पार्टीक उम्‍मीदवार सभकेँ आँखि‍ मूनि‍ कऽ देलक। अहि‍ तरहेँ नीतीशकेँ महा-दलि‍त आ दलि‍त, मुसलमान, महि‍ला, युवक, बेरोजगार आ वि‍कास पसि‍न्न करएबला जनताक आधार भेटलन्‍हि‍। लालू जीक पक्षमे यादव एवं अन्‍य हुनकर परम्‍परागत लोक सभ एखनहुँ छल। मुदा सेन लगलन्‍हि‍ तँ मुसलमान, उच्‍चवर्ग एवं दलि‍त समुदायमे जकरा कारणे ओ भयंकर हार देखलन्‍हि‍। रामवि‍लास मांटि‍मे सेंहि‍या गेलाह। काँग्रेस ध्‍वस्‍त भऽ गेल। राहुल गान्‍धी सोनीया गान्‍धी आ प्रधानमंत्री जीक दौरा बि‍हारक जनताकेँ नहि‍ पसि‍न्न कऽ सकल। नीतीशजी बि‍जयी भेलाह। आब वि‍कास पुरूषक मोहर लागि‍ गेल छन्‍हि‍। आगाँ आरो आत्‍म वि‍श्‍वाससँ कार्य करताह। बि‍हार आब शीघ्रहि‍ एक आदर्श राज्‍यक दर्जा प्राप्‍त करत।” एकर बाद घड़ी देखैत मलि‍क भाय हमरा कहलन्‍हि‍- “कैलाश भाय, हमरा लोकनि‍ 15मि‍नटक लेल बाहर नि‍कलल रही आब डेढ़ घन्‍टा भऽ गेल। चलु अपन नौटंकीक परि‍योजनापर चर्चा करी।‍” हम एक आज्ञाकारी शि‍ष्‍य जकाँ हुनका संग एक बेर पुन: श्रीराम सेन्‍टर केर केफेटेरि‍यामे नौटंकीपर वि‍मर्शमे व्‍यस्‍त भऽ गेलहुँ। आब सोचैत छी, मलि‍क भाय केर फुटपाथी गप्‍प कहीं यथार्थक वर्णन तँ नहि‍ अछि‍! सोचल एहि‍ बातकेँ बि‍ना कुनो भेद-भावकेँ पाठक संग यायावरीक माध्‍यमसँ बाँटी। ४ बिपिन झा की नब साल की पुरान साल..! {हम सभ अभिनव वर्षक स्वागत हेतु तैयार छी मुदा राष्ट्र मे व्याप्त समस्या यथावत अछि। जाहि सँऽ सामान्य नागरिक सदिखन त्रस्त अछि। एकरे उजागर करवाक आ संभव समाधान प्रस्तुत करब एहि लेख केर लक्ष्य अछि ताकि नव वर्षक स्वागत नूतनसंकल्प केर संग कय सकी। लेखक बिपिन कुमार झा IIT Mumbai मे शोधछात्र छथि। लेख मे अभिव्यक्त कोनो श्ब्दक कोइ वैयक्तिक अभिप्राय नहिं ली।} कहल गेल अछि  साहित्य समाज केर उत्थान मे सदिखन योगदान करैत अछि। प्राचीन काल सँऽ काव्य आदि केर माध्यम सँऽ सुनैत आयल छी ओतहि दृश्य काव्य   अर्थात एकांकी नाटक आदि केर महत्त्व सर्वथा महनीय अछि। समसामयिक सन्दर्भ मे  ओ महनीय कार्य  कतिपय सिनेमा केर माध्यम सँ कयल जाइत अछि। हँऽ एहि मे कोनो सन्देह नहिं जे बहुतो फिल्म आ धारावाहिक समाज कें गर्त मे लय जेबाक हेतु पर्याप्त अछि। एहि बीच एकटा फिल्म देखल जाहि मे भारतवर्ष मे व्याप्त Black money saving आ घूसखोरी केर चर्चा आ निदानक उपाय प्रदर्शित कयल गेल अछि।एहि सदृश फिल्म निश्चय भ्रष्टाचार निवारण करबा मे योग देत। एहि तरहक बहुतो विषमता अछि जाहि सँऽ हम सभ अभिमुख होइत छी किन्तु ओकर प्रतिरोध करबाक सामर्थ्य नहिं। एहेन दशा मे विकीलीक्स सदृश अन्तर्जाल आ सूचनाऽधिकार सदृश व्यवस्था केर महती आवश्यकता अछि। सामान्यतया बहुत बात एहेन अछि जे जनता अथवा अधिकारीवर्ग भय अथवा लोभवश जनता अथवा उपयुक्त अधिकारी केर सम्मुख नहिं आनय चाहैत छथि जे उक्त अन्तर्जाल सदृश माध्यम सँऽ जनसामान्य तक पहुँचा सकैत छथि। यद्यपि सरकार सूचनाऽधिकार केर माध्यम सँऽ पारदर्शिता के आदर कयलक मुदा अखनहुं कतेक अधिकारीगण साया मे नुकेबा क काज करैत अछि जे सर्वथा हास्यास्पद। एतय ई कहब उचित नहिं जे सब अधिकारी भ्रष्टे नै होइत छथि अपितु किछु कें भ्रष्ट बनेबाक तथाकथित ट्रेनिंग देल जाइत अछि तऽ किछु कें जनताजनार्दन भ्रष्ट बनबैत छथिन्ह। बहुत कम एहेन छथि जे जन्मना भ्रष्ट हो। भारत तृतीय आर्थिक महाशक्ति बनबाक हेतु तैयार अछि मुदा भारतवर्षक ई हाल अछि जे चोरी, भीखारी, डकैती, घूसखोरी कदाचिते कतहु नहिं भेटत। सरकार नेता आ जनताजनार्दन सभ एके सीढी पर छैथ। कोई अवसर नहिं चूंकय चाहैत छथि। आब यदि सांस्कृतिक दृष्ट्या नब पीढी तऽ देखैत छी जे ओ अन्ध भय दौडि रहल अछि। नब खूनक आगू दोसर कें के देखैत अछि? समाज, संस्कृति, माय बाप....ई सभ तऽ अट्ठारहम शताब्दी केर गप्प भय गेल। पैसा आ अपन इच्छापूर्ति केर अतिरिक्त किछु नहिं बुझैत छथि ई। नब पीढी महिला सशक्तीकरण, जातिवाद विरोध एवं एहेन बहुतो सन्दर्भ मे वकालत करैत भेट जेता मुदा व्यवहार मे ई वकालत अपन स्वार्थ केर अनुरूप परिवर्तित होइत छथि। ई हाल युवावर्गे टा कऽ नहि बुजुर्गो एकरे शिक्षा दैत छथिन्ह। वास्तविक तऽ ई अछि बुजुर्ग राष्ट्र के जे युवावर्ग भेटस्वरूप दैत छथि ओहि एहेन संस्कार रूपी खाद दैत छथि जे भ्रष्टाचार के क्रमिक विकसित करैत अछि आ ई युवा पुनः नव पीढी के अहू सँ भ्रष्टतम राष्ट्र बनेबा मे योगदान दैत छथि। यद्यपि  ओ एकरा विकास के पथ रूपी तके दय लोक के चुप करथु मुदा वास्तविकता की अछि से अहूं बुझैत छी हमहू बुझैत छी । एहेन स्थिति मे की नब साल आ की पुरान साल? नव वर्ष तऽ ओहि दिन शुरू होयत जाहि दिन समाज मे व्याप्त पुरान पाप विविध कानूनक व्यावहारिकता सँ धूमिल होयत आ बुजुर्ग सभ नब पीढी के ओहेन संस्कार देथीन्ह जाहि सँ विविधता मे एकता सँ अलंकृत  राष्ट्र के प्रति हम सभ गौरव कय सकब। ५ मुन्नाजी रिपोर्ताज ४ दिसम्बर २०१० (शनि दिन) मिथिला सेवा संघ, जैतपुर (बदरपुर, नई दिल्ली) द्वारा भव्यरूपेँ विद्यापति पर्व समारोहक सफल आयोजन कएल गेल। उक्त आयोजनक अध्यक्षता केलनि मैथिली/ हिन्दीक वरिष्ठ साहित्यकार श्री गंगेश गुंजन आ विशिष्ट अतिथि रहथि युवा पत्रकार ओ बहुविध रचनाकार श्री गजेन्द्र ठाकुर। अध्यक्षीय भाषणक नमहर कड़ीमे श्री गंगेश गुंजन आग्रह जतौलनि जे ऐ आयोजनमे कविगोष्ठीक आयोजन आ महिलाक अनुपस्थितिकेँ भरल जाए। आतिथ्य भाषणमे श्री गजेन्द्र ठाकुर एक मात्र पाँतीमे गएरबाभनक उपस्थितिकेँ सेहो निश्चित करबाक विचार देलनि। विजय मिश्र आ गंगेश गुंजन द्वारा दीप प्रज्वलनक पछाति मैथिलीक चर्चित-परिचित कलाकार द्वारा धमगिज्जर गीतनाद प्रस्तुत कएल गेल जे भोर धरि दर्शककेँ नै उठबाक लेल बन्हने रहल। श्रोता/ दर्शकक उपस्थिति सेहो अपेक्षासँ बेशी छल जे प्रशंसनीय अछि। ६ नवेन्दु कुमार झा १.रेल लाइनसँ जुड़त भारत आ नेपाल २. भारतीय सामाजिक व्यवस्थामे आइयो जीवन्त अछि जाति व्यवस्था- प्रो. शर्मा  ३.प्रदेशमे लागत चौदहटा नव उद्योग समूह, असोचैम कएलक एहि दिस पहल- मिथिलांचलमे सेहो लागत नव उद्योग १ रेल लाइनसँ जुड़त भारत आ नेपाल पड़ोसी देश नेपालक संग दोस्तीकेँ आर मजगूत करबाक लेल भारतीय रेल नेपालमे रेल लाइन बनाओत। एक दोसराक संग सहयोग बढ़ेबाक उद्देश्यसँ बनएबला ई रेल लाइन भारतमे मधुबनीक जयनगरसँ नेपालक बरदीवासक मध्य बनाओल जाएत। ई नव रेल लाइन सत्तरि किलोमीटरक होएत, जकर स्वीकृति रेल मंत्रालय दऽ देलक अछि। एहि नव रेल लाइन बनबऽ मे गोटेक चारि सौ सत्तरि करोड़ टाका खर्च होएबाक अनुमान अछि। एकर काज प्रारम्भ करबाक लेल मंत्रालय दस करोड़ टाका दऽ देलक अछि आ वित्तीय वर्ष २०११-१२ मे एकर काज प्रारम्भ भऽ जाएत। ई रेल लाइन दू चरणमे पूरा होएत। पहिल चरणमे जयनगर आ जनकपुरक मध्य तीस किलोमीटर छोटी लाइनक आमान परिवर्तन होएत आ दोसर चरणमे जनकपुरसँ बरदीवास धरि नव रेल लाइन बनेबाक काज प्रारम्भ होएत। नव रेल लाइनक वास्ते जमीन अधिग्रहणक काज जल्दीए प्रारम्भ होएत। २ भारतीय सामाजिक व्यवस्थामे आइयो जीवन्त अछि जाति व्यवस्था- प्रो. शर्मा दरभंगा स्थित ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालयमे महाराजाधिराज कामेश्वर सिंह स्मारक व्याख्यानमाला सम्पन्न भेल। एहि व्याख्यानमालाक मुख्य वक्ता राजस्थानक प्रतिष्ठित नेशनल ओपन यूनिवर्सिटीक कुलपति आ जानल-मानल समाजशास्त्री प्रो. के.एल.शर्मा कहलनि जे भारतीय सामाजिक व्यवस्थामे जाति व्यवस्था नियंत्रण बल अछि। श्री शर्मा कहलनि जे सामाजिक व्यवस्थामे आइयो जाति व्यवस्था प्रत्यक्ष आ जीवन्त अछि आ एकटा व्यवस्थाक रूपमे बदलाब अनबाक प्रयास करैत अछि। ओ कहलनि जे देशक राजनीतिक व्यवस्था सेहो जाति व्यवस्थाकेँ जीवन्त रखबामे महत्वपूर्ण भूमिकाक निर्वाह कएलक अछि। वर्ष १८९१ सँ १९३१ धरि सरकारी स्तरपर जाति व्यवस्थाक श्रेणीकरणक काज कएल गेल। स्वतंत्रता प्राप्तिक बाद १९५१ जनगणनामे जातिकेँ छोड़ि देल गेल मुदा एक बेर फेर राजनीतिक उद्देश्य आकि विवशताक अन्तर्गत जाति गणना करेबापर सहमति बनल अछि। ओ कहलनि जे सामाजिक परिवर्तनक संग-संग अहूमे बदलाव आएल अछि मुदा एकर बावजूद आइयो एकर सातत्व कायम अछि। व्याख्यानमालाक अध्यक्षता भारतीय प्रशासनिक सेवाक सेवानिवृत्त अधिकारी एस.एन.सिन्हा कएलनि। ३ प्रदेशमे लागत चौदहटा नव उद्योग समूह, असोचैम कएलक एहि दिस पहल- मिथिलांचलमे सेहो लागत नव उद्योग बिहारमे मुख्यमंत्री नीतीश कुमारक नेतृत्वबला राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधनक दोबारा आपसीक संगहि देशक उद्योग जगतक नजरि बिहारपर पड़ल अछि। देशक औद्योगिक संगठन “एसोचैम”प्रदेशमे अगिला तीन वर्षमे तीनटा “बिजनेस मार्ट”क माध्यमसँ चारि लाख टाकाक निवेशक योजना बनौलक अछि। एसोचैम बिहार चेम्बर ऑफ कामर्स (बी.सी.सी.) आ बिहार इन्डस्ट्रीज एसोसिएशनक सहयोगसँ ई बिजनेस मार्ट आयोजित करत। पहिल बिजनेस मार्ट अप्रील २०११ मे होएत जाहिमे पचास हजार करोड़ टाकाक निवेशक लक्ष्य राखल गेल अछि, जखनकि २०१३ मे आयोजित होमएबला दोसर मार्टमे एक लाख पचीस हजार करोड़ टाका आ वर्ष २०१५ मे आयोजित होमएबला तेसर मार्टक माध्यमसँ पचहत्तरि करोड़ टाकाक निवेशक लक्ष्य राखल गेल अछि। ई संगठन चेम्बर ऑफ कामर्स आ इन्डस्ट्रीज एसोसिएशनक सहयोगसँ चौदह टा नव उद्योग समूह दरभंगा, मुजफ्फरपुर, मधुबनी, बरौनी, कटिहार, भागलपुर, मुंगेर, सुपौल, हाजीपुर, पटना, नवादा, गया आ भोजपुरमे स्थापित करत, जाहिमे सभ उद्योग समूहमे अठारह सौसँ दू हजार नव औद्योगिक इकाइ रहत। एहिसँ सरकारकेँ गोटेक बारह प्रतिशत राजस्व भेटत। गोटेक चरि सौ पचास करोड़ टाकाक निवेशबला सभ प्रस्तावित उद्योग समूह गोटेक छह लाख लोककेँ परोक्ष अथवा अपरोक्ष रूपसँ रोजगार उपलब्ध कराओत। एसोचैम सरकारसँ प्रदेशमे “क्लस्टर्स डेवेलपमेन्ट अथोरिटी”क स्थापनाक मांग सेहो कएलक अछि। हम पुछैत छी -मुन्नाजी १.जगदीश प्रसाद मंडल, २.राजदेव मंडल, ३. कुमार शैलेन्द्र आ ४.अमरनाथ सँ मुन्नाजी पुछैत छथि ढेर रास गप..... १ दुर दृष्‍टि‍संपन्न गमैया संसाधनसँ दूर होइत गामक लोकक मन:स्‍थि‍ति‍केँ गहींरताक संग सोझाँ अननि‍हार श्री जगदीश प्रसाद मंडलजी हुनक समस्‍त साहि‍त्‍यि‍क क्रि‍या-कलापक मादे मुन्नाजी द्वारा कएल गेल गप्‍प-सप्‍पकेँ अहाँक सोझाँ प्रस्‍तुत कएल जा रहल अछि‍- मुन्नाजी- जगदीश बावू शि‍क्षाक पूर्ण डि‍ग्रीधारी भऽ अहाँकेँ एतेक देरीसँ मैथि‍ली लेखनक प्रवृति‍क की कारण? जगदीश प्रसाद मंडल- अपनेक प्रश्‍नक उत्तर दैइसँ पहि‍ने मुन्नाजी कि‍छु अपन बात कहि‍ दैत छी। केजरीवाल हायर सेकेण्‍ड्री स्‍कूल झंझारपुरमे स्‍पेशल नाइन्‍थसँ लऽ कऽ स्‍पेशल एलेबुन धरि‍ एक सय नम्‍वरक एक वि‍षय मैथि‍ली पढ़ने छी। मुदा कओलेजमे नहि‍ पढ़लौं। हि‍न्दी पढ़लौं। साहि‍त्‍यसँ सि‍नेह सभ दि‍न रहल। लि‍खै दि‍स दू हजार ईस्‍वीक बादे बढ़लौं। ऐठाम ि‍सर्फ एतबे कहब जे जमीनी संघर्षक उपरान्‍त वैचारि‍क संघर्ष जोर पकड़ैत अछि‍ तँए लि‍खब अनि‍वार्य भऽ गेल। जहि‍सँ जीवनमे आरो मजबूती अएल। सभकेँ माने हर मनुष्‍यकेँ अपने लगसँ जि‍नगी शुरू करक चाहि‍एनि‍। कर्मक क्षेत्र अपन गाम रहल जहि‍ठामक भाषा मैथि‍ली छी तँए हि‍न्‍दीक वि‍द्यार्थी रहि‍तहुँ मैथि‍लीमे लि‍खै छी। देरीसँ लि‍खैक कारण इहो भेल जे १९६७ई.मे जखन बी.ए.क वि‍द्यार्थी रही, वामपंथी राजनीति‍मे जुड़लौं। काजसँ जते समए बँचए ओ सेवामे लगबए लगलौं। बी.ए. धरि‍ जनता कओलेज झंझारपुरमे आ आगू सी.एम. कओलेज दरभंगामे पढ़लौं। ओना लि‍खैक आरो कारण अछि‍ जे उम्रक संग शरीरक शक्ति‍यो कमए लगल। मुन्नाजी- एतेक डि‍ग्रीक (एम.ए.क) पछाति‍ तँ अहाँ समएमे नोकरी भेटव बेशी असोकर्ज नै छलै। नोकरी नै कऽ खेती-बारीक ि‍नर्णय अहाँक कोन मानसि‍कताक द्योतक ऐछ? ज.प्र.मं.- आजुक दृष्‍टि‍ये जरूर बुझि‍ पड़ैत हएत जे ओहि‍ समए नोकरी सस्‍ता छलैक मुदा से बात नहि‍। एहि‍ परि‍पेक्ष्‍यमे कि‍छु कहि‍ ि‍दअए चाहै छी। झारखंड लगा बि‍हार राज्‍य छल। अखन जते जि‍ला, सवडि‍वीजन आ ब्‍लौक आइ खंडि‍त बि‍हारमे देखै छि‍ऐ ओते पूर्ण (सौंसे) बि‍हारमे नहि‍ छल। संग-संग जते काजक वि‍वि‍धता अखन धछि‍, सेहो नहि‍ छल। अखन छत्तीस-सैंतीसटा जि‍ला खंडि‍त बि‍हारमे अछि‍ जखन कि‍ ओहि‍ समए ि‍सर्फ सत्तरहटा जि‍ला छल। जहि‍ मधुबनीमे पाँचटा सवडि‍वीजन अछि‍ ओ अपने सवडि‍वीजन छल। तहि‍ना शि‍क्षो वि‍भागमे छल। गनल-गूथल कओलेज आ हाइ-स्‍कूल रहए। आइक मधुबनी (प्रोपर)मे चारि‍टा कओलेज- झंझारपुर, सरसो, पंडौल आ बाबूबरहीमे खुजल। बाबूवरहीक कओलेज (जे.एन.) मधुबनी चलि‍ गेल। ओहि‍सँ पूर्व आर.के. काओलेज आ भरि‍सक एकटा आरो छल। बाकी सभ बादक छी। जखन जनता कओलेज झंझारपुर खुजल, ओहि‍ समए अधासँ अधि‍क शि‍क्षक (प्रोफेसर) आने-आन जि‍लाक छलाह। तँए कि‍ एहि‍ क्षेत्रमे पढ़ल-लि‍खल लोक नहि‍ छलाह से बात नहि‍। बैंकक शाखा जते आइ देखै छि‍ऐ ओते नहि‍ छल। भरि‍सक मधुबनीमे एकटा रहए बाकी नहि‍ये जकाँ छल। तहि‍ना ब्‍लौकोक छल। एक तँ संख्‍या कम दोसर एकटा बी.डी.ओ. रहैत छलाह। जखन कि‍ बी.डी.ओ; सी.ओ. आ पी.ओ. तीनि‍टा अखन छथि‍। कल-कारखाना नाओपर एकटा चीनी मि‍ल (लोहट) ओ गोटि‍ पङरा चाउरक मि‍ल छल। ओना आरो बहुत बात अछि‍ मुदा मोटा-मोटी कहलौं। आब अहीं कहु जे नोकरी कत्त छल। ओहि‍ अनुपातमे अखन बेसी अछि‍। खेती करैक कारण- जखन हम तीनि‍ये बर्खक रही पि‍ता मरि‍ गेलाह। हमरासँ तीन बर्ख पैघ भाय छलाह। ओना परि‍वारमे दूटा पि‍सि‍औत भाय रहैत छलाह। हुनका रहैक कारण छल हुनकर घर फुलपरास वि‍धानसभा क्षेत्रक घोघरडि‍हा ब्‍लौकक अमही पंचायतक हरि‍नाही गाम छनि‍। जखन कोसी पश्‍चि‍म मुँहे जोर केलक तँ गाम उपटि‍ गेल। सभ कि‍यो बेरमा चलि‍ एलाह। जे घटना १९३५-४०क बीचक छी। फेर जखन कोसी पूव मुँहे ससरल तखन १९६०ई.मे पुन: ओ दुनू भाँइ चलि‍ गेलाह। हुनका सबहक गेने गि‍रहस्‍तीक संग-संग पढ़वो करी। तहि‍येसँ खेतीसँ जुड़ाव भऽ गेल। जे जीवि‍काक साधन रहल। मुन्नाजी- प्रारम्‍भमे अहाँ अपनाकेँ साम्‍यवादी कहि‍ सामंतवादक वि‍रूद्ध हो-हल्ला मारि‍-झगड़ामे सक्रि‍य रहलौं बादमे अइसँ वि‍मोह कि‍एक? एे सँ की फायदा वा नोकसान उठएल? ज.प्र.मं. - जहि‍ना छलौं तहि‍ना छी। मुदा परि‍स्‍थि‍ति‍केँ ऑकि‍ देखए पड़त। सामंतवादमे मनुष्‍यक बुनाबटि‍ जाहि‍ रूपक रहै छै ओ सामंतवादपर चोट पड़लासँ बदलैत छैक। खि‍स्‍सा-पि‍हानी आ नाटकक स्‍टेज सामाजि‍क वि‍कास आ सामाजि‍क जीवन नहि‍ होइत छैक। नाटकक स्‍टेज होइत छैक- तीन घंटामे रामक जन्‍म, जनकपुरक धनुषयज्ञ, बनमे सीताक हरण आ रावणक मृत्‍युक उपरान्‍त वि‍सर्जन। तहि‍ना खि‍स्‍सा पि‍हानीमे सेहो होइत छैक। मुदा समाजक मंच बहुत जटि‍ल होइत छैक। जहि‍क लेल समयो लगै छै आ संघर्षो होइत छैक। तहूँसँ जवर्दस्‍त वैचारि‍क संघर्ष सेहो होइत छैक। संक्षेपमे- आर्थिक वि‍कासक क्रममे खेतीक लेल जखन नवका माने उन्नति‍ कि‍स्‍मक बीआ आएल तँ सामंती सोचक लोक वि‍रोध केलनि‍। हुनकर आरोप छलनि‍ (१) वस्‍तुमे सुआद नहि‍ होइत छैक, (२) पावनि‍-ति‍हारक दृष्‍टि‍ये अशुद्ध होइत अछि‍, (३) स्‍वास्‍थ्‍यक दृष्‍टि‍सँ खाद देल अहि‍तकर होइत अछि‍ जहि‍सँ बीमारी बढ़त। तहि‍ना दरभंगा अस्‍पताल खुललापर सेहो वि‍रोध भेल। गाम-घरमे एलोपैथक वि‍रोध भेल। आरोप छलैक- गाइयक खूनक इन्‍जेक्‍शन आ सुगरक मांसक बनल दवाइ। साधारण इनारक जगह पानि‍क कल भेने सेहो वि‍रोध भेल। आरोप लगैत छल जे कलक वासर चमड़ाक होइ छै, तहि‍सँ पूजा कोना हएत आ अशुद्ध पानि‍ लोक पीति‍ कोना? कते कहब। एहि‍ परि‍स्‍थि‍ति‍केँ संक्रमण काल कहल जाइ छै। सामंतवाद टुटलाक बाद पूँजीवादी आ समाजवादी दि‍शा अबैत छैक। हमरा गामक नब्‍बे प्रति‍शत जमीन बहरवैयाक छलनि‍। ओना तीनि‍टा जमीनदार छलाह वाकी दूटा मास छलाह। जनवादी लड़ाइ शुरू होइते दूटा मालि‍क (जमीनदार) अपन जमीन बेच लेलनि‍। एक गोटेक संग जवर्दस्‍त लड़ाइ भेल। जमीन्‍दारक संग सूदखाेर महाजन सेहो छलाह। हुनको संग लड़ाइ भेल। अखन ने कि‍यो बाहर जमीन्‍दार छथि आ ने महाजन। गाममे कि‍नको अधि‍क जमीन नहि‍ भेलनि‍। ऊपर दस बीघा आ वाकी नि‍च्‍चाँ छथि‍। एहि‍ दौरमे करीब तीस बर्ख लड़ाइ गाममे चलल। सत्तरि‍-एकहत्तरि‍क उठल तूफान शान्‍त होइत-होइत ५.५.२००५ई.केँ अंति‍म मुकदमाक अन्‍त भेल। वि‍कासोक प्रक्रि‍या छैक। आइक भारी मशीन (कमप्‍यूटर) देखि‍ नव पीढ़ीक लोककेँ सहजहि‍ वि‍श्‍वास नहि‍ हेतनि‍। मुदा हाथक काज हाथसँ चलैबला औजारक संग लघु मशीनमे बदलल। लघुमशीन परि‍मार्जित होइत भारी आ तेज मशीन बनि‍ ठाढ़ अछि‍। मुन्नाजी- कहल जाइछ जे अहाँक साम्‍यवादीक वि‍द्रोह छवि‍ तखन दवि‍ गेल जखन की अहाँ सामंती द्वारा देल प्रलोभनकेँ स्‍वीकारि‍ लेलौं की सत्‍य अछि‍? ज.प्र.मं. - चारि‍म प्रश्‍नक उत्तर भेट गेल हएत मुन्नाजी। जँ से नहि‍ तँ अनठेकानी गोला फेकब हएत। मुन्नाजी- उग्रवादीसँ रचनावादी प्रवृति‍ कोना जागल कोनो एहेन वि‍शेष घटना जे अहाँक रचनात्‍मक सोचकेँ प्रेरि‍त केने हुअए? ज.प्र.मं. - पाँचम प्रश्‍नक उत्तर सेहो आबि‍ गेल अछि‍। दुनि‍याँक नक्‍शामे जकरा शीतयुद्ध (cold war) कहल गेल अछि‍ वएह वैचारि‍क संघर्ष छी। जकरा लेल साहि‍त्‍य प्रमुख अस्‍त्र छी। मुन्नाजी- मैथि‍ली रचनाकारक प्रवृति‍ अछि‍ जे एक-दु रचना कऽ अपनाकेँ मैथि‍लीधारामे जोड़वामे जुटि‍ जाइछ मुदा अहाँ एकर उलट चि‍न्‍तनशील आ रचनाशील रहि‍ नुकएल सन रहलाैं? ज.प्र.मं.- छठम प्रश्‍नक संबंधमे स्‍पष्‍ट समझ अछि‍ जे जहि‍ना उत्तरबरि‍या पहाड़सँ नि‍कलल छोट-छीन धारा सभ दछि‍न मुँहे टघरैत नदी-नालामे मि‍लैत आगू बढ़ैत गंगामे पहुँच समुद्रमे समाहि‍त भऽ जाइत अछि‍ तहि‍ना जँ साहि‍त्‍यक (रचनाक) दशा-दि‍शा नीक रहत तँ साहि‍त्‍यक धारा बनवे करत। ई वि‍सवास अछि‍। जना आन-आन गोटे शुरूहेँसँ रचना दि‍स बढ़लाह से नहि‍ भेल। कारण ऊपर आबि‍ गेल अछि‍। मुन्नाजी- वि‍योगीजी अहाँ कि‍तावक आमुखमे अहाँकेँ २०गोट कथा, ५गोट उपन्‍यासक पाण्‍डुलि‍पि‍ लऽ भेँट करवाक क्रममे अहाँक दृष्‍टि‍ फरीछ दू साल बाद पुन: भेँटमे हेबाक बात कहलनि‍हेँ ऐपर अहाँक की वि‍चार? ज.प्र.मं.- मैथि‍ली साहि‍त्‍य जगतक वि‍योगीजी पहि‍ल साहि‍त्‍यकार छथि‍ जि‍नकासँ पहि‍ल भेँट छी। ओना एक-दू बेर फोनपर गप भेला बाद उमेश मंडल पटना गेल रहथि‍ तँ भेँट केलकनि‍। कि‍छु रचना सभ लऽ कऽ सेहो गेल रहथि‍। दू-चारि‍ पन्ना पढ़ि‍ कऽ सुनेवो केलकनि‍। मुदा डेढ़-दू घंटाक बात चीतमे जाने-पहचानक बात बेसी भेलनि‍। हुनकासँ हमर पहि‍ल भेँट मधुबनीमे छी जखन ओ मधुबनी अएलाह। ओही क्रममे रहुआ कथा-गोष्‍ठीक जानकारि‍यो देलनि‍ आ चलैइयोले कहलनि‍। हुनक सम्‍पादनमे देशज पत्रि‍का २००३ई.मे ि‍नर्मलीक कि‍तावक दोकानमे भेटल। जाहि‍मे यात्रीजी आ कि‍रणजीक संग गप-सप्‍प सेहो नि‍कलल। वि‍चारक दृष्‍टि‍सँ यात्रीजी सँ वि‍द्यार्थीये जीवनसँ प्रभाि‍वत छलौं। पत्रि‍का पावि‍ आरो प्रभावि‍त भेलौं आ वि‍योगी जीक संग आकर्षण सेहो बढ़ल। तहि‍ना कि‍रण जीक जि‍नगीसँ सेहो बहुत प्रभावि‍त कओलेजे जीवनसँ छलहुँ। लगसँ हुनका देखने रहि‍एनि‍। जखन हम सी.एम. काओलेजमे पढ़ैत रही तखन ओ प्रोफेसर छलाह। गप-सप्‍पक क्रममे ओ बजलाह जे जहि‍ना बजै छी तहि‍ना ि‍लखब मैथि‍ली छी। हुनकर ई वि‍चार तहि‍ये नहि‍ अखनो रग-रगमे समाएल अछि‍। मुन्नाजी- उपरोक्त आमुखमे ओ कहने छथि‍ जे अहाँ हुनकर (वि‍योगीजीक) एहेन अंधभक्त छी जे हुनकर कि‍ताबकेँ ताकि‍-ताकि‍ कऽ पढ़ैत रही एकटा कि‍ताबकेँ तकबाक क्रममे पटना धरि‍ गेलौं मैथि‍ली साहि‍त्‍यक पाठक शुन्‍यता (कीनि‍ कऽ पढ़ैबला)मे जँ ई सत्‍य छै तँ एकर की कारण? ज.प्र.मं.- अहू प्रश्‍नक उत्तर आबि‍ गेल अछि‍। ई बात हुनकामे जरूर छन्‍हि‍ जे उपकरि‍-उपकरि‍ कतेक कि‍ताब देलनि‍। भक्‍त आ भगवान साम्‍प्रदायि‍क भाषा छी। कि‍यो अपन कर्मसँ बढ़ैत-घटैत अछि‍ मुदा आगूसँ अधला सोचब आ करबकेँ अधला बुझै छी। मुन्नाजी- कि‍छुए समयान्‍तरलमे वि‍वि‍ध वि‍धापर अहाँक ८गोट पोथीक प्रकाशनसँ केहेन अनुभूति‍ भऽ रहल ऐछ अगि‍ला लक्ष्‍य की ऐछ? ज.प्र.मं.- पोथी प्रकाशि‍त भेलापर जहि‍ना आन गोटेकेँ अनुभूति‍ होइत छन्‍हि‍ तहि‍ना भेल। लक्ष्‍यक जहाँ धरि‍ प्रश्‍न अछि‍ तँ प्रसादजीक पाँति‍ मन पड़ैत अछि‍- “जीवन का उद्देश्‍य नहि‍ है शान्‍त भवनमे टि‍क जाना और पहुँचना उन राहो पर जि‍नके आगे राह नहि‍।‍” मुन्नाजी- एतेक पोथी प्रकाशनक पछाति‍यो अहाँक ठोस मूल्‍यांकन वा पुरस्‍कारक हेतु चयन नै भेलासँ अप्‍पन परिश्रम नि‍रर्थक सन तँ नै लगैए। ज.प्र.मं.- कोनो रचनाक मूल्‍यांकन समए करैत अछि‍। समयानुकूल रचना छी वा नहि‍ ई समए आँकि‍ कएल जा सकैत अछि‍। रहल पुरस्‍कारक बात? प्रेमचन्‍द सन उपन्‍यास सम्राट आ कलमक जादूगरकेँ कोन पुरस्‍कार भेटलनि‍। मुदा ओ अपना श्रमकेँ नि‍रर्थक कहाँ बुझलनि‍। अंति‍म साँस धरि‍ सेवा करैत रहलाह। अपन पचहत्तरि‍म जन्‍म दि‍नक अवसरपर नामबर भाय (डॉ. नामबर सि‍ंह) बाजल छलाह- “जते काज अखन धरि‍ केलहुँ ओते पाँच बर्खमे करब।‍” हुनकर कते सेवा छन्‍हि‍ सर्ववि‍दि‍त अछि‍। जखन पचहत्तरि‍ बर्खक बूढ़क एहेन वक्‍तव्‍य छनि‍ तखन तँ हम अपनाकेँ जवान वुझै छी। मुन्नाजी- मैथि‍लीमे प्रारम्‍भेसँ बनल जाति‍-पॉति‍क फाॅटकेँ अहाँ कोन दृष्‍टि‍ए देखै छी। आ स्‍वयं अहाँ ओइ बीच अपनाकेँ कतऽ पबै छी। ज.प्र.मं.- शुरूहेसँ वर्ण नहि‍ वर्गमे वि‍श्‍वास अछि‍। जहि‍ आधारपर काज करैत एलौं आ करि‍तो छी। समाजमे जे जाति‍-धर्मक (सम्‍प्रदायक) खेल चलैत अछि‍ ओ राजनीति‍ केनि‍हारक चालि‍ छी। मुन्नाजी- पि‍छड़ावर्गसँ आगाँ (रचनात्‍मक रूपेँ) अबैत लोकक अहाँ उपर उठेवा लेल कोनो सहयोगी बनव पसि‍न्न करब? हुनका सबहक लेल कोनो संदेश? ज.प्र.मं.- जाहि‍ठाम व्‍यवस्‍था बदलैक प्रश्‍न अछि‍ ओ ने एक दि‍नमे हएत आ ने एक गोटे बुते हएत। सबहक कल्‍याण हएत आ सभकेँ करए पड़त। तँए सभकेँ कहैत छि‍अनि‍ जे जागू, उठि‍ कऽ ठाढ़ होउ। आगू बढ़ू। मि‍थि‍ला सबहक मातृभूमि‍ आ मैथि‍ली सबहक भाषा छी तँए अपन बुझि‍ सेवामे लागि‍ जाउ। २ मैथि‍ली आ हि‍न्‍दीमे सझि‍या आ धुरझार लेखनसँ परिपक्‍व। मैथि‍लीमे एकटा ठोस वि‍चार आ   दुर दृष्‍टि‍ लऽ स्‍थाि‍पत होइत कवि‍ श्री राजदेव मंडलजी सँ हुनक लेखनीपर गहींर रूपे मैथि‍लीक सशक्‍त युवा लघुकथाकार आ समालोचक मुन्नाजीक बीच भेल गप-सप्‍पक अंश प्रस्‍तुत ऐछ- मुन्नाजी- अहाँ खाँटी मि‍थि‍लाभुमि‍क पानि‍ माटि‍मे रचल बसल रहि‍ हि‍न्‍दीमे उन्‍मुख रहलौं। मैथि‍लीमे कि‍एक नै? राजदेव मं. -  देश-दुनि‍याँ/ चाहे जतेक बदलि‍ जाए/ अपन भाषा अपन माए/ कहुँ बि‍सरल जाए/। माएक द्वारा सि‍खाओल भाषा के बि‍सरत? रचनाक प्रारम्‍भ मैथि‍लीमे कएलहुँ। कि‍न्‍तु प्रकाशनक अभाव आ प्रकाशक, सम्‍पादक लग कोनो पहुँच नै। अर्थसँ की नै होइत छै। हम अर्थाभावमे रही। मैथि‍लीक कोनो रचना प्रकाशि‍त नै भेल। फुलाइत मन मुरझा गेल। ओइ‍‍ समएमे हि‍न्‍दीसँ एम.ए.क तैयारीमे जुटल छलहुँ। हि‍न्‍दीमे लि‍खनाइ सुवि‍धाजनक सन लगल। लि‍खब आ छपेबाक उत्‍कट इच्‍छााक कारणे हि‍न्‍दी दि‍स कनछी काटए पड़ल। मुन्नाजी- मैथि‍ली लेखनीक प्रारम्‍भ कहि‍या कोनो कएलहुँ? एखन धरि‍ मैथि‍लीमे हेराएल वा वेराएल सन रहवाक की कारण? राजदेव मं. -  मैथि‍लीसँ एम.ए. केलाक उपरान्‍त १९८६ई.क कोनो राति‍, नीक जकाँ स्‍मरण नै ऐछ- ओ तारीख। ओइ‍ राति‍ मानसि‍क स्‍तरसँ बड्ड दुखी रही। एतेक दुखी जे सुतएकालसँ पूर्व कतेको बेर मुँहसँ नि‍कलल रहए- हे भगवान हमरा धरसीसँ उठा लि‍अ। हमरा मृत्‍यु चाही। हम मरऽ चाहै छी। ई वाक्‍य सभकेँ दोहराबैत निन्नमे डूबि‍ गेल रही। अधरति‍यामे जखन नि‍न्न टूटल तँ मन कि‍छु हल्‍लुक सन बुझाएल। ओसारपर मि‍झाइत दीयाकेँ बड़ी काल धरि‍ एकटक देखैत रहलहुँ। कतेक काल धरि‍ से स्‍मरण नै ऐछ। कि‍न्‍तु ओ मि‍झाइत दीया प्रथम मैथि‍ली कवि‍ता बनि‍ गेल। जे संग्रह अम्‍बरा'मे संकलि‍त ऐछ। भऽ सकैत ऐछ ऐ‍‍सँ पूर्व मैथि‍लीमे अपूर्ण रचना सभ हएत। आब सवाल हेराएल आ बेराएल ऐछ। हेराएल ओ रहैत ऐछ जे अनचि‍न्‍हारक बीच रहैत ऐछ आ अनजान स्‍थानपर रहैत ऐछ। हम तँ अपनहि‍ जन्‍म स्‍थानपर छी आर चि‍न्‍हार लोकक बीच छी। ओकरा की कहबै जे चि‍न्‍हार लोकक बीच अनचि‍न्‍हार बनल हेराएल ऐछ। ओ बेराएल जाइत ऐछ जेकरा द्वारा अधलाह काज भेल हुअए। हम अपना जनैत नीक काज करैत अहाँक लगमे ठाढ़ छी। तइयो बेराएल सन। तँ एकर कारण की कहब? मुन्नाजी- अहाँक कवि‍ता गाम समाजक लोकक प्रति‍ अहाँक वि‍चार मि‍थि‍लाक पारम्‍परि‍कताकेँ संजोगने बुझाइत ऐछ। जखन कि‍ वर्त्तमानमे तकनीकी वि‍कासे लोकक जीवन आधुनि‍क सोचमे डुबि‍ रहल ऐछ। अहाँ अपनाकेँ सँ दूर कोना रखने छी? राजदेव मं. -  हम कोनहुँ पारम्‍परि‍कताकेँ संजोगने नै छी आ नै आधुनि‍क जीवन सोचसँ अपनाकेँ दूर रखने छी। हँ कि‍छु सरस शब्‍दकेँ जोड़बाक प्रयास कएलहुँ जाहि‍सँ रमणीय अर्थ नि‍कलि‍ सकए। की छुटल आ की जुड़ल ऐछ। नीक वा अधलाह भेल तेकर ि‍नर्णए तँ अहीं सभ करब। मुन्नाजी- एखन धरि‍ अहाँक मैथि‍ली लेखनीमे कवि‍ते टा जगजि‍यार भेल ऐछ की, अहाँ कोनाे आनो वि‍धामे लि‍खैत छी? राजदेव मं. -  कि‍छु कथा लि‍खने छी। एकटा उपन्‍यास लि‍ख रहल छी। मुन्नाजी- अहाँ हि‍न्‍दी भाषामे कतेको पोथीक सर्जक छी, जे छपि‍ कऽ सोझाँ आबि‍ चूकल ऐछ। मैथि‍लीमे एतेक पाछाँ कि‍एक छी कि‍एक छी एकर कोनो वि‍शेष कारण तँ नै ऐछ? राजदेव मं. -  हि‍न्‍दीमे तीनटा उपन्‍यास प्रकाशि‍त भऽ चूकल ऐछ। जि‍न्‍दगी और नाव, पि‍ंजरे के पंछी, दरका हुआ दरपन। मैथि‍लीमे लि‍खैत छलहुँ कि‍न्‍तु प्रकाशि‍त नै भेलाक कारणे पाछाँ छलहुँ। उमेश मंडल आ गजेन्‍द्र ठाकुर जीसँ सम्‍पर्क भेलाक उपरान्‍त मैथि‍ली ई पत्रि‍का वि‍देहमे प्रकाशि‍त हुअए लगल। श्रुति‍ प्रकाशन द्वारा वि‍देह मैथि‍ली पद्य २००९-१०मे सेहो प्रकाशि‍त भेल। वास्‍तवमे ओ सभ धन्‍यवादक पात्र छथि‍। एकर उपरान्‍त अंति‍का आ मि‍थि‍ला दर्शनमे सेहो कि‍छु कवि‍ता सभ अाएल। मुन्नाजी- मैथि‍ली भाषाकेँ अप्‍पन कि‍छु मैथि‍ल सभ बाभन मात्रक भाषा कहि‍ गैर बाभन लोक सर्जक वि‍चार वा भाव रखि‍तो अपनाकेँ कति‍या लैत छथि‍। अहाँ एकरा कै परि‍पेक्ष्‍यमे देखै छी? राजदेव मं. -  भाषाकेँ कोनो बन्‍धनमे बान्‍हि‍ कऽ नै राखल जा सकैत ऐछ। जाति‍क बन्‍धन तँ आओर खराब। भाषा तँ सबहक होइत ऐछ। तँए सभ जाति‍ आ वर्गक लोककेँ अपना भाषा उत्‍थानक लेल प्रयास करबाक चाही। सहयोगक भावना सेहो हेबाक चाही। प्रारम्‍भमे कि‍छु बाधा होइते ऐछ। तै कारणे कति‍या जाएब से नीक नै। मुन्नाजी- बाभनसँ इतर अहाँक समकक्ष सर्जक श्री जगदीश प्रसाद मंडलजी जे अपन लेखनीए कतेको स्‍थापि‍त रचनाकारकेँ पाछाँ छोड़ि‍ अल्‍प समएमे शीर्षपर अबैत देखाइत छथि‍। ऐ माध्‍यमे छोटका-बड़का जाति‍क फाॅटकेँ अहाँ कोना परि‍भाषि‍त करब? राजदेव मं. -  ऐ‍‍मे छोटका आ बड़का जाति‍क फाँट की कएल जाए। कि‍छु रचनाकार द्रुतगति‍सँ लि‍खैत छथि‍। जेना श्री जगदीश प्रसाद मंडल। स्‍वभावि‍क ऐछ जे ओ अल्‍पकालहि‍मे बेसी लि‍खताह। कि‍यो मन्‍थर गति‍सँ रचना करै छथि‍। लि‍खबाक अपन-अपन शैली आ गति‍ होइत ऐछ। ओहि‍ना शीर्ष दि‍स बढ़बाक गति‍ होइत ऐछ। मुन्नाजी- अपन मैथि‍ली लेखनयात्राक क्रममे कहि‍याे अपनाकेँ गैर बाभन हेवाक कारणेँ अनसोहाँत वा उपेक्षि‍तक अनुभव तँ नै पौलहुँ? राजदेव मं. - सवेंदनशीलकेँ तँ उपेक्षाक अनुभव होएबे करतैक। समाज आ परि‍वारकेँ प्रत्‍यक्ष रूपेँ कि‍छु नै दैत छि‍ए। ओ सभ उपेक्षाक भाव राखबे करता। अपनासँ आगू कोनो जाति‍केँ देख‍ इर्ष्‍या होएबे करत। ई तँ मनुक्‍खक गुण ऐछ। भऽ सकैत ऐछ जे हमरोसँ पाछाँबलाकेँ कि‍छु एहने अनुभव होइत हेतै। ऐ‍‍ गप्‍पपर अपने लि‍खल पॉति‍ यादि‍ अबैत ऐछ- “उपेक्षाक दंश/ हमरहि‍ अंश/ नै ऐछ चि‍न्‍ता/ नै छी त्रस्‍त/ भेल छी अभ्‍यस्‍त.../‍” मुन्नाजी- मैथि‍ली समीक्षक लोकनि‍ रचनाकारक कोन मन:स्‍थि‍ति‍केँ समीक्षाक रूपेँ परि‍भाषि‍त करैत छथि‍? की ओइमे जाति‍वादि‍ताक नजरि‍या सेहो परि‍लक्षि‍त होइत ऐछ? राजदेव मं. - समीक्षाक बहुत अधि‍क पुस्‍तक हम नै पढ़ने छी। ऐ‍ तरहक गप्‍प सोक्षा नै अाएल ऐछ। ओना समीक्षाक कार्य बहुत दायि‍त्‍वपूर्ण होइते ऐछ। रचनाकार आ पाठकक मध्‍य मि‍लनबि‍न्‍दूपर समीक्षक रहैत छथि‍। ओ कोनो रचनाकेँ दोष-गुणक अन्‍वेषण करैत छथि‍। जँ हुनक नजरि‍या जाति‍वादी हेतैक। तँ ऐ‍‍सँ भाषाक क्षति‍ हेतैक। मुन्नाजी- अहाँ समीक्षा सेहो करै छी अपन समीक्षाक माध्‍यमे अहाँ रचनाकारक व्‍यक्‍ति‍त्‍वकेँ परि‍लक्षि‍त करैत छी, वा रचनाकारक कृति‍त्‍वकेँ सोझाँ अनवाक प्रयास करै छी की जाति‍क फाँटकेँ भरि‍ रचनाकारक देखार करब उचि‍त बुझै छी? राजदेव मं. -  समीक्षा तँ होइत ऐछ रचनाकेँ। तँए व्‍यक्‍ति‍त्‍व आ कृति‍त्‍वकेँ अलग-अलग राखल जएबाक चाही। समीक्षाक कार्यमे तँ तटस्‍थ भऽ रचनाक दोष गुणक चर्चा न्‍याय-संगत ढंगसँ हेबाक चाही। हँ, कि‍छु साहि‍त्‍यकारक सर्वोत्‍कृष्‍ट कार्य देख धन्‍यवाद देबाक लेल बेवश होमए पड़ैत ऐछ। ऐ‍‍ कार्यमे जाति‍क फाँट केनाइ नि‍तान्‍त अनुचि‍त गप्‍प थि‍क। मुन्नाजी- अन्‍तमे अहाँ गैर बाभनक मैथि‍लीमे अनुपस्‍थि‍ति‍केँ कोन तरहेँ अनुभव करै छी। ऐ‍‍मे गैर बाभन वर्गक सर्जककेँ वेशीसँ बेशी उपस्‍थि‍ति‍क लेल कोन संदेश वा वि‍चार देब। राजदेव मं-  पूर्णरूपेण भाषाक वि‍कासक लेल सभ जाति‍ आ वर्गक रचनासँ भाषाकेँ परि‍पूर्ण होएबाक चाही। तँए जे पाछाँ छथि‍ हुनका सभकेँ अध्‍ययन, मनन आ अभ्‍यास करबाक चाही। बेसीसँ बेसी रचना करबाक चाही। सहयोगक भावना रहक चाही। अधि‍कार प्राप्‍त करबाक लेल तँ आगू बढ़ै पड़त। ३ बहुआयामी व्यक्तित्वक व्यक्ति एवं सौभाग्य मिथिला चैनलक कार्यक्रम प्रभारी कुमार शैलेन्द्रसँ प्रतिनिधि युवा लघुकथाकार एवं समालोचक मुन्नाजीसँ भेल गपशपक अंश अहाँक सोझाँ राखल जा रहल अछि।– मुन्नाजी: पहिल बेर मैथिलीमे कोन विधासँ वा कोना प्रवेश भेल आ ओकर की कारण छल? कुमार शैलेन्द्र: सन १९६४ ई. मे राजेन्द्र नगर पटनामे हमर जन्म भेल। हमर पिता शिवकान्त झा ओइ समए हिन्दी दैनिक आर्यावर्तमे समाचार सम्पादक रहथि। घरमे कएकटा अखबार, मैथिली पत्रिका शुरूहेसँ पढ़बा लेल भेटल। ओइ समएमे पटनामे ठाम ठीम विद्यापति पर्व समारोह हुअए, मैथिलीक रुचि हमरा ओतएसँ जागल। तकर बाद जखन हम कॉलेजमे पहुँचलहुँ तँ हरिमोहन झाक साहित्य पढ़ि हमरा आभास भेल जे मैथिली साहित्य बड्ड समृद्ध अछि। तकर परिणाम भेल जे हम इण्टरमीडिएटमे अनिवार्य भाषा (१०० अंकक) हिन्दीक बदलबा कऽ मैथिली राखि लेलौं। तकर पछाति हम मैथिलीयेमे ऑनर्स आ एम.ए. केलहुँ। हम कॉलेजमे रही तखने उत्सुकता रंगमंच दिस भेल। हमरा मोन पड़ैछ रवीन्द्रनाथ ठाकुर, जिनका द्वारा पटनामे मैथिलीक पहिल रंगमंचक गठन भेल, “रंगलोक” जे ओहि समएमे एकटा नाटक मंचन केलक जकर समीक्षा लिखि हम आयावर्तमे देलिऐ। ओहि समय गोकुलनाथ झा आ भीमनाथ झा कहलनि, समीक्षा हमर रिपोर्टर लिखत, अहाँक समीक्षा नै हएत। फेर गोकुल बाबू कहलनि, समीक्षा नीक अछि, लिखैत रहू। ओ हमर पहिल समीक्षा छल, नै छपल मुदा तकर बाद समीक्षा लिखैत रहलौं आ छपैत रहलौं। हमरा पता चलल जे कौशल किशोर दास पटनामे एहेन युवक सभकेँ ताकि रहल छथि जिनका रंगमंचमे रुचि होइन। कौशलजी आइसँ पहिने कलकत्तामे रंगमंचसँ जुड़ि सफल रहल छलाह आ आब पटना आबि गेल रहथि। हम हुनकासँ भेंट केलौं आ तकर पछाति सबहक विचारे १८ फरबरी १९८२ ई. केँ एकटा मीटिंग राखल गेलै जाहिमे हम, कौशल किशोर दास, प्रमोद भाइजी, अरुण कुमार झा आ गोकुलनाथ दास कुल पाँच गोटे, ओइ मीटिंगमे उपस्थित भेल रही। हमरा प्रस्तावे “अरिपन” नामक संस्थापर सहमति बनल २८ फरबरी १९८२ केँ। मैथिलीक प्रतीक “अरिपन” क रूपमे एकर प्रस्ताव रखलौं। कौशलजी एकर समर्थन केलनि। तकर बाद विचार भेलै नाटक मंचनक। बहुत रास मैथिली नाटकक किताब जमा भेल जैपर कौशलदास सहमत नै भेला। हमरा कहलनि- पु.ल. देशपाण्डे लिखित मराठी नाटक- बेचारा भगवान चर्चित आ पुरस्कृत एवं लोकप्रिय अछि। अहाँ मैथिली जनै छी ओकरा हिन्दीसँ मैथिलीमे अनुवाद करू। ईएह मैथिली अनुवाद ओही नामे “अरिपन”मे पहिल बेर मंचित भेल। तकर पछाति हमर भातिज अरुण कुमार झा कहलनि जे अशोकनाथ “अश्क” मैथिलीमे नाटक लिखने छथि। ओ ओहि समएमे छात्र रहथि आ हुनक लिखल नाटक “विद्रोह” हमरा सभकेँ पसिन्न पड़ल, ई “अरिपन”क दोसर पुष्प छल। हम सभ “अरिपन”क अध्यक्षक लेल बहुत वरिष्ठ गोटे लग गेलौं, कियो अध्यक्षता लेल तैयार तँ नहिये भेला जे कहलनि- अहाँ सभ बेकार फिरिसान होइ छी, मैथिली रंगमंच कहियो अस्तित्वमे नै आबि पाओत। ओही क्रममे हम सभ जटाशंकर दासजी सँ भेंट कएल, ओ एकमात्र व्यक्ति हमरा सभकेँ सभ तरहेँ संग देलनि, अध्यक्षता केला। शेष बुजुर्ग सभ बादमे अरिपनक छोट-छोट पदाधिकारी धरि भेला, हम आब नाम नै लेबऽ चाहब, हुनका सभकेँ अपमान बुझेतनि। दू वर्षक क्रियाकलापकेँ सभ कियो सराहऽ लगलाह आ शेष सभ गोटेकेँ मैथिली रंगमंचक भविष्य देखाए लगलनि। तेसर वर्ष ओही संस्थाक अध्यक्ष भेलाह श्री मंत्रेश्वर झाजी आ क्रमे हमरा सभकेँ विलगा देल गेल। मुन्नाजी: अहाँ प्रारम्भमे मैथिलीमे नाटकक योगदाने आगाँ एलौं मुदा फेर पत्रकारिता दिस उन्मुख भऽ गेलौं, नाटकसँ कोनो असोकर्ज तँ नै बुझना गेल? कुमार शैलेन्द्र: पत्रकारितामे- अहाँकेँ कहलौं जे पिताजी पहिनेसँ ऐ काजमे लागल छलाह। तँ हमरो रुचि छले। उदयचन्द्र झा “विनोद” आ विभूति आनन्द दुनू गोटे माटि-पानि नामक पत्रिका बहार करैत छलाह। विनोदजी तँ जॉबमे छलाहे समयाभाव छलनि, विभूतिजीकेँ सेहो मिथिला मिहिरमे नोकरी लागि गेलनि। तखन माटिपानिक ८० प्रतिशत काज -यथा मुरलीधर प्रेसमे जा टाइप सेटिंग कराबी, प्रूफरीडिंग कॉपी एडिट आदि-आदि काज करी- फाइनल टच विभूतिजी आबि कऽ दैथि। हमर नाम नै रहै छल, हँ अन्तिम दू अंकमे सहयोगी शैलेन्द्र कुमार झा जोड़ल गेल। तकर पछाति ओ बन्न भऽ गेलै, जेना आन मैथिली पत्रिकाक दशा होइत छैक। पत्रकारिता तँ हमर पारिवारिक कारोबार वा रोजगार बनि गेल छल। हमर पिताजी सेवानिवृत्त भऽ गेल रहथि। हमरा आर्यावर्तमे प्रशिक्षु संवाददाताक रूपमे नोकरी भेल। हम सभ कोनो डिप्लोमा डिग्री लेनाइ तँ दूर सुननेहो नै रही, विशेष कऽ पटनामे जे पत्रकारितामे कोनो डिप्लोमा डिग्री होइत छैक। हँ, जँ हमरा पहिने बुझल रहैत जे नाटकक लेल एन.एस.डी. (राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय) प्रशिक्षण दैत अछि तँ हम जरूर प्रयास करितौं, मुदा पटनामे ऐ तरहक कोनो माहौल नै छलै। हमर पिताजी आर्यावर्त ज्वाइन करबासँ पहिने पुणेमे पेशेवर रंगकर्मीक रूपेँ जुड़ल रहथि। १९५५ मे आकाशवाणी पटनासँ जुड़लाह आ तहियेसँ मैथिली नाटकमे अपन स्वर दैत रहलाह। ई क्रम १९८५ धरि चलल। हमरा जनैत ओ पहिल व्यक्ति छथि जे अनवरत एतेक दिन धरि मैथिली नाटकसँ जुड़ल रहलाह। १९७०-७२ क बाद प्रेमलता मिश्र “प्रेम”, बटुक भाइ सभ जुड़लाह, नीक योगदान देलनि, मुदा हमर पिता शिवकान्त झाजी, आनन्द मिश्र, मायानन्द मिश्रक समकक्ष रहलाह। नाटकमे हमरा रुचि ओतैसँ जागल। ओइ इलाकामे (हनुमाननगर, मधुबनी)मे हुनकर मंचीय काजकेँ एकटा किंवदन्तीक रूपमे जानल जाइए। मुन्नाजी: अहाँक अन्तिम नाटक उगना हॉल्टक मंचन मिथिलांगन (दिल्ली) द्वारा २००९ मे भेल, जे पूर्णतः आजुक परिप्रेक्ष्यमे प्रासंगिक आ मनोरंजक छल। एहिसँ पूर्व अहाँक कोन-कोन आ कोन तरहक नाटक सोझाँ आबि गेल अछि? लेखन आ मंचन दुनू दृष्टिएँ? कुमार शैलेन्द्र: पहिल बेर हम मंचपर एलौं मराठीक अनूदित नाटक- बेचारा भगवान लऽ कऽ। तकर बाद बहुत रास नीक नाटकक अनुवाद केलौं। हमर पहिल मैथिली नाटक अछि- मोर मन मोर मन नै पतिआइ-ए। दोसर ३१-१२-१९९६ केँ उत्तरायण हास्य व्यंग्यपरक नाटक अछि, एकर बाद लोरिकायन, अग्निपथक सामा (चेतना समितिसँ प्रकाशित), ई मैथिलीक पहिल नाटक छल जकरा बिहारक सभसँ पैघ श्री कृष्ण मेमोरियल हॉलमे मंचित कएल गेल ०४.०८.२००१ केँ। गीतात्मक देसिल बयना २००७ मे, मिथिलांगन (दिल्ली)क आग्रहपर नैकाबनिजाराक गीतात्मक नाट्यरूपान्तरण केलौं जाहिमे १०टा गीत छै, जकर मंचन २००७ ई. मे व्रजकिशोर वर्मा “मणिपद्म” जयन्तीपर मिथिलांगन द्वारा संजय चौधरीक निर्देशनमे मंचित कएल गेल। २००८ ई. मे मिथिलांगन द्वारा आजुक प्रसंगमे लिखल हास्य व्यंग्य नाटक “उगना हॉल्ट”क मंचन भेल। मुन्नाजी: अहाँक नाट्य मंचन मूलतः गमैया नाटकसँ प्रारम्भ भेल छल, आजुक परिप्रेक्ष्यमे गमैया नाटक कतऽ अछि। गमैया आ थियेटरमे मंचित नाटकक तुलनात्मक स्थिति की अछि? कुमार शैलेन्द्र: गमैया नाटक जतऽसँ शुरू भेल छल आइयो ओतै अछि आ ऐसँ ऊपर उठबाक आशा सेहो नै देखा पड़ैत अछि। थियेटर नाटक आधुनिक साज-सज्जा ओ प्रकाश व्यवस्थासँ संतुलित रहैत अछि। मुदा गमैया नाटक जेना अछि ओहिसँ सुधरि नै सकैत अछि जकर मूल कमी अछि बिजली वितरणक अभाव। गाममे एखनो नाटक पेट्रोमेक्सक इजोतमे होइत अछि, जतऽ जेनेरेटरक व्यवस्था होइत छै, ओहो समुचित नै कहल जा सकैछ, किएक तँ ओतौ डिमरक प्रयोग नै भऽ सकैत अछि। थियेटरमे आयोजित नाटक प्रारम्भसँ अंत धरि नाटकक क्रमिक दृश्य देखाइछ। मुदा गमैया मंचपर एखनो दृश्य परिवर्तनक बीच कॉमिक वा नाच देख सकैत छी। गाममे ताधरि स्थिति खराब रहत जाधरि दृश्य परिवर्तन उठौआ परदासँ हेतै। गामक मेकपमे एखनो मुर्दा शंखक उपयोग होइत छै। गामक नाटक कहियो ऊपर नै उठि सकैत अछि। कहियो थियेटरक नाटकक बरोबरि नै भऽ सकैए, किन्नो नै भऽ सकैए। मुन्नाजी: हमरा जनतबे आइयो नाटकक लेल दर्शकक अभाव नै छै, हँ समयाभाव जरूर भऽ गेलैए, ताहि हेतु एकांकी सभकेँ मंचित करब शुरू भेल अछि। अहाँक नजरिये एकांकीक रुखि केहेन अछि, एकर भविष्य केहेन बुझना जाइत अछि। कुमार शैलेन्द्र: आधुनिक रंगमंचपर भलहिं एकांकीक प्रचलन बढ़लैए मुदा एकांकीक आधार वा सम्भावना नै छैक से मैथिलीये नै अन्यान्य भाषाक एकांकी संग सेहो छैक। अखन जे नाटक लेखन भऽ रहल अछि ओइमे साहित्यिक नाटक कम अछि। नाटक ऐ रूपक प्रारम्भ सुधांशु शेखर चौधरीक नाटक सभसँ भेल। नाटक अपन परम्परामे आबि अलग अलग शिल्पक प्रयोगे लिखल जा रहल अछि। प्राचीन जे प्रदर्शन कला छलै तकरासँ जोड़ि कऽ आधुनिक प्रदर्शन कलाक प्रस्तुति कएल जा रहल अछि। मुन्नाजी, एकांकीक अस्तित्व मैथिली सहित सभ भाषामे खसि गेलैक अछि। भविष्य कोनो नीक नै बुझना जाइछ। मुन्नाजी: वर्तमानमे किछु बीछल कथाकेँ एकांकी रूपेँ प्रस्तुत कएल जाए लागल अछि, की कथाक मूल एकांकीमे समाहित भऽ पबैए वा नै? आ कथाक एकांकी रूपान्तरण कतेक उचित वा अनुचित अछि? कुमार शैलेन्द्र: कथाक नाट्य रूपान्तरणक प्रारम्भ केलनि हिन्दीमे देवेन्द्रराज अंकुर। कथा मंचनक सभ भाषामे अयोजन कएल जा रहल अछि। कथाकेँ नाट्य रूप दिऐ तखने ओ सार्थक भऽ सकैछ, मुदा से अछि कठिन। हम धूमकेतुक कथा “अगुरवान”क नाट्यरूपान्तरण कएने रही तँ ओइमे कथाक मूल स्वरूपकेँ यथावत रखने रही। ओना तँ ताहि हेतु कठिन परिश्रम करऽ पड़ल छल। आगू म. मनुज ओइ अगुरवानक रूपान्तरण काफी लिफ्ट लैत केलनि तँ ओकर मूल आत्मे मरि सन गेलै। किएक तँ ओइ नाटकमे बहुत रास दृश्य एहेन जोड़ल गेल छैक जे कथामे छहिये नै। कथा मंचन हेबाक चाही, ओकर प्रतिरूप नै जेना हमर नैका बनिजारा छल। ओतेकटा पोथीकेँ डेढ़ घंटाक कलेवरमे समेटि देनाइ बड कठिन छल। मुदा हम ओइमे सफल भेलौं। कथाक मंचन तँ सही छैक मुदा जखन नव आयाम जोड़ल जाइ छै तखन कथाक आत्मा आहत होइत छैक। देवेन्द्रराज अंकुर जेना कथाक नाट्यरूपान्तरणमे कथाक मूल रूपकेँ प्रस्तुत कऽ पबै छथि तहिना मैथिलीयोमे कएल जाए तँ नीक बात अन्यथा लौल करब व्यर्थ अछि। मुन्नाजी: अहाँ लेखनक अतिरिक्त अभिनयसँ सेहो जुड़ल रहलौं। हम सभ फिल्म सिन्दुरदानमे अहाँक सुन्दर अभिनय देखने छी। ऐसँ पूर्व अहाँ कोन-कोन फिल्म वा धारावाहिकमे अभिनय केने छी आ एकर केहेन अनुभव केलहुँ? कुमार शैलेन्द्र: जँ अहाँ कही छोटकी परदा हम ओकरा कहै छी- नन्हकी परदा आ सिनेमाकेँ कहै छी बड़की परदा। बड़की परदाक बात करी तँ “सिन्दुरदान” हमर दोसर फिल्म अछि। पहिल फिल्म अछि रवीन्द्रनाथ ठाकुर द्वारा निर्मित आ निर्देशित हिन्दी फिल्म “आयुर्वेद की अमर कहानी”- ऐमे हम अभिनय केने रही, ललितेश ऐमे हीरो रहथि आ संगमे रहथि दिलीप झा। राँटी, मधुबनीमे एकर सूटिंग भेल रहै। हमरे सन चारि-पाँच गोटे आरो प्रतिभावान कलाकार रहथि। सिन्दुरदानमे १६-१७ बर्खक पछाति चरित्र अभिनेताक रूपमे आएल रही, आब तँ हमर चेहरो बदलि गेलहेँ। ऐमे हमर भूमिका नायिकाक पिताक रूपमे छल। एकर बाद सौभाग्य मिथिला मैथिली चैनलक लेल बनाओल मुख्य धारावाहिक “दियर-भाउज”क डेढ़ सए कड़ीसँ बेसीमे षडयंत्री ककाक भूमिकामे काज कएलौं। तकर अतिरिक्त रविन्द्रनाथ ठाकुर नन्हकी परदापर एकटा काउन्टडाउन शो केने रहथि, जैमे कविक भूमिकामे एकटा प्रस्तोताक रूपमे हम अभिनय केने रही। ईएह हमर नन्हकी-बड़की परदाक अभिनय यात्रा अछि जे एकटा प्रसन्न करैबला अनुभव रहल। मुन्नाजी: अहाँ बहुत दिन धरि मैथिली पत्रकारिता विशेषकऽ आकाशवाणीसँ जुड़ल रहलौं, की भविष्य छै एकर? एकरा छोड़ि अहाँ दूरदर्शनसँ किएक जुड़लहुँ? कुमार शैलेन्द्र: हमर रोजगार यात्रा पत्रकारितेसँ शुरू भेल, विशेष कऽ प्रिन्ट मीडिअमसँ। ओइ संग आकाशवाणीसँ सेहो जुड़ल रहलौं। आकाशवाणी पटनासँ प्रसारित किछु नाटकमे काज केलौं। आ एतऽसँ प्रसारित चौपालमे “बम-बम”भाइक भूमिकाक निबहता करैत रहलौं। तकरा संग-संग नौ साल धरि आकाशवाणी पटनासँ शैलेन्द्र कुमार झाक नामे समाचार वाचन करैत रहलौं। एकर अतिरिक्त नै जानि कतेको रेडियो नाटिकामे अपन स्वर देलौं। एकटा महत्वपूर्ण काज छल ओतऽसँ प्रसारित “सिंहासन बत्तीसी” धारावाहिकक- चौंतीसम कड़ी धरि राजा भोजक भूमिकामे रही जे महत्वपूर्ण काज छल। तकर बाद ई.टी.वी. हैदराबादमे छः घण्टाक लिखित आ दू घंटाक मौखिक परीक्षाक पछाति हमर चयन भेल। हम ओतऽ एक सप्ताह मात्र काज केलौं। ओहीमे हमर वरिष्ठ रहथि गुंजन सिन्हाजी जे एखन मौर्या टी.वी. पटनामे वरिष्ठ पदाधिकारी छथि। हमरा ओतऽ मोन नै लागल वा मोन नै मानलक। हाम आपस चल एलौं। तकर बहुत पछाति “सौभाग्य मिथिला” मैथिली चैनलसँ जुड़लौं, जैमे समस्त कार्यक्रमक निर्माण देखैत रहलौं। छोड़बासँ पहिने समाचार संपादक रूपमे कार्यरत रही। सौभाग्यसँ जहिया जुड़लौं तँ हम पहिल मैथिल व्यक्ति रही ओ सौभाग्य नामक एकटा डिवोशनल चैनल छल आ ओइमे सभ हिन्दीभाषी कार्यरत छलाह। मुन्नाजी: अहाँक नाटक पत्रकारिताक अतिरिक्त एकटा सकल मंच संचालकक रूप सेहो सोझाँ आएल। अहाँ ओहूमे खूब जमलौं।की मैथिलीमे स्वतंत्र संचालकक अस्तित्व आ भविष्य देखा पड़ि रहल अछि? कुमार शैलेन्द्र: मंच संचालन हमर महत्वपूर्ण लोकप्रिय विधा रहल अछि। पटनाक चेतना समितिक मंचसँ विद्यापति समारोहमे बहुत दिन धरि मंच संचालन करैत रहलौं। सत्य पूछी तँ ओइमे आनन्द अबैत छल, किएक तँ ओ जे भीड़ होइ छलै एक लाख डेढ़ लाख लोकक आ शालीनतापूर्वक सभ सुनैत रहै छल। तकर पछाति कतेको मंचपर बजाएल जाए लगलौं। मैथिलीमे मंच संचालकक वा उद्घोषकक कोनो पेशेवर रूप टिकाऊ नै भऽ सकैछ। एखन एकर कोनो सम्भावना नै छैक। हँ हमर जे समिति सबहक उद्घोषक भेलाह हुनक रूप बदलि गेल छनि, माने ओ आब एकटा कन्ट्रैक्टर वा एरेन्जरक रूपमे छथि। समस्त कलाकारक व्यवस्था ओ करथि आ ओही व्यवस्थापर कार्यक्रम आयोजित होइत अछि। ओना एहेन जे उद्घोषक सेहो सिजनल भऽ सकैत छथि। हम जखन उद्घोषक रही तँ ई बात पहिने सोझाँ आबए जे जँ विद्यापति पर्व समारोह अछि तँ ओइमे विद्यापति आ मिथिलाक सांस्कृतिक आधारकेँ केन्द्रित कऽ कार्य कएल जाए। आब गीत-संगीतमे फूहड़ता एलैए तँ कैक ठाम संचालकक स्तर खसि रहल छैक। मुन्नाजी: मैथिलीक पहिल चैनल “सौभाग्य मिथिला”सँ पूर्ण रूपेँ जुड़ि अपन सर्वस्व ऊर्जा ऐमे खर्च कऽ रहल छलौं। मुदा एखनो बहुत रास कमी अछि जेना डी.टी.एच.पर ऐ चैनलक प्रसारण नै हएब? ठोस वा मनोरंजक कार्यक्रमक अभाव किएक? कुमार शैलेन्द्र: निश्चित रूपे मुन्नाजी अहाँक जे सवाल अछि तैसँ हम सहमत छी। हम जहिया जुड़लौं ऐसँ तँ असगर मैथिल छलौं। एकर सभ कार्यक्रम चैनल आइ.डी.सँ लऽ समस्त कार्यक्रमक आधारभूत संरचना तैयार केलौं। हमर बाद जे किछु लोक जुड़ल से सभ चैनल माध्यमे चिन्हल गेल मुदा हम पहिनेसँ मिथिलाक सभ क्रियाकलाप कला संस्कुति आदि सँ सर्वथा जुड़ल रहलौं। हमरा प्रारम्भमे कहल गेल जे ऐमे दू घंटाक मैथिली कार्यक्रम हएत मुदा कालक्रमे २४*७ क प्रसारण -यानी चौबीसो घंटा आ सातो दिन- होमऽ लागल। हम एकरा कहल बुद्धिवाद, जे ई जोगाड़ डॉट कॉम पर टिकल रहल, किएक तँ एकरा फाइनेन्सरक पूर्णतः अभाव रहलै। मुन्नाजी: ऐ चैनलक बहुत रास कमी एहेन अन्यान्य भाषाक चैनलक समक्ष एकरा ठाढ़ नै होमऽ दऽ रहल छै। एनामे एकर अस्तित्व समाप्त तँ नै भऽ जाएत। कुमार शैलेन्द्र: एकरा लग प्रतिभा, लोक, अभिनेता, गीत-संगीत गौनिहारक कमी नै छै। साहित्य-संस्कृतिक कमी नै छै। योग्यताक अभाव नै छै। कमी छै तँ धनक, चैनलक मार्केटिंग केनिहार लोकक। अभाव छै तँ जे सभ मालिक वा पार्टनर छथि हुनकामे, जे कोना बजारसँ धन उगाहिकेँ आनल जाए। से सभ जहिया भऽ जाएत तहिया ऐ चैनलसँ स्तरीय कार्यक्रम सभ प्रस्तुत होमऽ लागत आ ई सभ तरहेँ आन भाषाक चैनलक समक्ष ठाढ़ भऽ जाएत। चैनलसँ आब जे जुड़ल छथि, जहिया हमहूँ सभ जुड़ल रही प्रोग्रामसँ, जे जुड़ल लोक अछि तकरा प्रोग्रामक भार रहै आ मालिक लोकनि एकर व्यापार प्रभागक संचालन करथि। ई भेद कऽ के काज हेतै तखन ई जरूर सफल हएत। नै मालिके सभटा काज करता तखन स्थिति दुःस्थितिये बनल अहत। मुन्नाजी: ऐ सभक अतिरिक्त मैथिली गजलक उपयोग अहाँ सेहो करैत रहलौं अछि। मैथिलीमे गजलक की स्थिति छैक आ एकर केहेन सम्भावना देखा पड़ैत छैक? कुमार शैलेन्द्र: मैथिली गजल अपन लोकप्रियता बहुत पहिने हासिल कऽ लेने अछि, कलानन्द भट्ट, बुद्धिनाथ मिश्र, रविन्द्रनाथ ठाकुर आदि श्रेष्ठ गजलकार छथि। मायानन्द मिश्र सेहो अही श्रेणीमे गानल जाइत छथि। हुनकर “रूप एक रंग अनेक” नामक संग्रह चर्चित रहल छनि। ओ ऐ सभ गजलकेँ गीतल कहै छथि। एम्हर आबि कऽ पत्रिका सभमे गजलक अभाव पाओल जाइत अछि। देखियौ मुन्नाजी, एकटा खास बात छै जे गजल एहेन विधा छै जे कोनो भाषामे लिखल जाए अपन जमीन तैयार कऽ लैत अछि। मैथिलीयोमे राम चैतन्य धीरज, तारानन्द वियोगी, रमेश आदि आ सरसजी गीत आ गजलमे नव-प्रयोग केलनि। कविताक जे प्रकार छै तैमे मैथिली गजलक सेहो अस्तित्व छैक आ भविष्य सेहो। गजल जतऽ जै भाषामे जाइ छै ओहीमे समाहित भऽ जाइ छै। गजलमे गेय तत्व छै जे ओकरा लोकप्रिय बना देने छै। मुन्नाजी: शैलेन्द्रजी, एकटा सवाल व्यक्तिगत जिनगीसँ जुड़ल। अहाँ अपन एकल जिनगी जीबाक प्रयास कऽ रहलौं अछि- माने अविवाहित रहि- एकर कारण रोजगारपरक व्यावसायिक अवरुद्धता अछि वा कोनो व्यक्तिगत विशेष कारण। अहाँकेँ नै लगैछ जे एहन जीवन अधूरा वा व्यर्थ भऽ जाइत अछि? कुमार शैलेन्द्र: देखियौ, ई अहाँक हमरासँ जुड़ल वैयक्तिक, पूर्ण व्यक्तिगत प्रश्न अछि। मुदा हम एकर उतारा देबासँ परहेज नै करब। वरन एगदम सहज आ स्वाभाविक उतारा देब। हम जखन यंग रही तखन पिताजी चाहैत रहथि जे हम बियाह कऽ ली, मुदा हम आर्थिक रूपेँ सक्षम नै बुझी अपनाकेँ। किएक तँ आर्यावर्तमे काज करैत रही, ओ ओही समएमे बन्न भऽ गेलै। हम बेरोजगार भऽ गेलौं आ बियाह नै करबाक मूल कारण छल हमर अर्थ विपन्नता। हम परिवार चलेबा लेल जतेक अर्थक प्रयोजन बुझलौं ततेक हम कहियो नै कऽ सकलौं। लोकक अपन-अपन रहबीपर निर्भर छै। ककरो लगै छै जे हम पाँच हजारमे गुजारा कऽ ली। हमरा लगैछ जे बीस हजार खर्च भऽ सकैछ। हम आइयो ओहिना छी जे अपना अर्थे विपन्न बुझै छी। हमरा मैक्सिम गोर्कीसँ जीवन्त प्रेरणा भेटैत रहल अछि। ओना हम मानै छी जे गोर्कीकेँ जीवनमे जतेक कष्ट सहऽ पड़लनि ऐसँ बहुत कम कष्ट हम उठेलहुँ अछि। हम जखन संकटमे अबै छी तँ हमरा गोर्की मोन पड़ै छथि आ हुनके प्रेरणासँ हम अपनाकेँ सम्हारि लैत छी। हँ, हम ईमानदारीपूर्वक कहब जे एतेक साहस कहियो नै आएल वा हमरा कियो भेटबो नै कएल। जे अपना ओइठाम जे पारम्परिक विवाह छै तैमे हमरा विश्वास नै रहल अछि। जँ हम ओना बियाह कऽ ली आ तेहेन कोनो जोड़ीदार आबि जाए जे अहाँक जीवनकेँ नर्क बना दिअए तँ हमरा कोनो शिकाइत नै अछि जे हम एकसर छी। हम विवाह नै केलौं तैं हेतु कतौ कोनो लोक, एम्प्लॉयरसँ कहियो कोनो कम्प्रोमाइज नै करऽ पड़ल। हमरा जतऽ जहिया जेना मोन भेल काज करैत रहलौं। हमर जे संगी नोकरिहारा, तकरा लेल लड़ैत रहलौं। आ तैँ हमर एम्प्लायर डरैत रहल अछि। ओ मानैए जे हम यूनियनबाजी करै छी, जखनकि सत्य अछि आइ धरि कोनो यूनियनसँ कोनो सम्बद्धता नै रहल अछि। असगरूआ रहब हमर सम्बल रहल अछि। काल्हि की हेतै एकरो गारंटी हम नै दऽ रहलौंहेँ। कतेको गोटे कहैए, आब अहाँ बूढ़ भऽ गेलौं, आब बियाह कऽ की हएत? मुदा हमरा अखनो वा आगूओ जँ अपन सोचक कियो भेटि जेती तँ हम बियाह कऽ सकैत छी। मुन्नाजी: भाइ, एतबा बहुमूल्य समए दऽ अपन विचार देबा लेल धन्यवाद। ४ कथा साहित्यक स्थापित रचनाकार एवं साहित्य अकादमीक (मैथिली परामर्शदातृ समिति) सदस्य माननीय अमरनाथ जीसँ मैथिलीक प्रतिनिधि लघुकथाकार एवं समालोचक मुन्नाजी द्वारा भेल गप्पसप्पक अंश प्रस्तुत अछि:- मुन्नाजी: अहाँक मोनमे मैथिलीक रचनात्मक विचार कोना प्रस्फुटित भेल, पहिल रचना (लिखल) आ पहिल प्रकाशित रचना कोन अछि, आ कतऽ कहिया छपल? अमरनाथ: हमर जन्म एक एहन परिवारमे भेल, जतय अनेक तरहक विविधता छलैक। किछु घोर कर्मकाण्डी रहथि, तँ किछु शास्त्र-पुराणक विपरीत आचरण करथि खाद्य-अखाद्यमे विचार नहि करथि। भारत-चीनक युद्ध आ युद्धक चर्चा सँ आहत बाल मन आ १९६२ मे ज्यौतिषी द्वारा खण्ड प्रलय भूकम्प अथवा विनाशक भविष्यवाणीक कारणे घरक बाहर छोट-छोट शेडमे रहबाक विवशता मनकेँ उत्सुक बनौने रहए। तत्कालीन समाजमे अधिकांश तथाकथित समाज लोककेँ सोंगरपर ठाढ़ देखियनि। अर्थात् एकटा नौकर आ टहलू चाहियनि। आश्चर्य ई लागय जे जखन सभ मनुक्खे, तखन सम्बोधनमे यौ, हौ, रौ, हरौ अछि किएक? जे घाम चुबबैत अछि से न्यून किएक? एहन विडम्बनापूर्ण परिस्थितिमे हमर रचनात्मक विचार प्रस्फुटित भेल रहए।मिथिला शोध संस्थान, दरभंगा सँ मैथिलीक लेखिका राजलक्ष्मीपर आधारित पुस्तक प्रकाशित भेल छल जाहिमे हुनक लिखल पोथीपर मुख्यतया अभिमत संकलित छल। ओहि पोथीमे आचार्य रमानाथ झा आदिक विचार छपल अछि। हमर अभिमत कवितामे छपल अछि, हमर वैह पहिल छपल रचना थिक। मुन्नाजी: अहाँ सभक रचनाक प्रारम्भिक कालमे मैथिली साहित्यक स्थिति की छल? अहाँक रचनात्मक प्रभाव केहेन रहल? अमरनाथ: १९७४ ई. मे पटनासँ प्रकाशित ‘मिथिला मिहिर’क फगुआ अंकमे हमर पहिल हास्य व्यंग्य कथा ‘स्वर्ण युग’ छपल रहए। १९७५ ई. मे ‘क्षणिका’ लघुकथा संग्रह छपल, आचार्य सुरेन्द्र झा ’सुमन’ ओहि पोथीक भूमिका लिखने छथि जाहिमे लघुकथाक औचित्यपर प्रकाश देने छथि। किरण जी, अमर जी, श्रीश जीक विचार छपल छनि। पछाति जयकांत मिश्र लिखलनि जे एहि संग्रहक प्रकाशन सँ मैथिली साहित्यक विकास भेल अछि। ‘मिथिला मिहिर’, ‘द इण्डियन नेशन’, ‘आर्यावर्त्त’, ‘मैथिली प्रकाश’ (कोलकाता) मे ‘क्षणिका’क समीक्षा छपल रहए। ताहिसँ ई अनुभूति भेल रहए जे कथाकारक रूपमे हमरा स्वीकार कऽ लेल गेल अछि। १९७४ ई. मे ‘चाही एकटा द्रोपदी’ (कथा संग्रह) तथा १९७५ ई. मे ई ‘क्षणिका’ (लघु कथा संग्रह) छपल रहए। हमरा अधिकांश श्रेष्ठ लेखक यथा रमानाथ झा, हरिमोहन बाबू, यात्री जी, किरण जी, सुमन जी आदिक सानिध्य आ स्नेह प्राप्त भेल रहए। मुदा हम बेशी हरिमोहन बाबूक लग रही आ तकर कारण रहए जे हम दर्शन शास्त्रक अध्ययन करैत रही आ मैथिलीमे लेखन दिस उन्मुख भेल रही। हरिमोहन बाबू संग बीतल क्षण हमर साहित्यिक जीवनकेँ गति प्रदान करबामे अत्यंत सहायक भेल छल। मुन्नाजी: छठ्ठम/सातम दशकमे किछु रचनाकार मैथिलीमे साम्यवादी विचारक हो-हल्ला केलनि। अहाँक नजरिमे सत्यतः मैथिलीमे एहेन कोनो विचारधारा बनलै? अहाँपर एकर केहेन प्रभाव पड़ल? अमरनाथ: एकटा समय आयल रहैक जाहिमे संसारक जन समुदाय साम्यवादी विचार धारा दिस आकर्षित भेल रहए। सम्पूर्ण विश्वमे पक्ष-विपक्षमे बहस प्रारम्भ भेल रहैक। कतहु-कतहु क्रांतियो भेलैक, क्रांति सफलो भेलैक। मुदा मैथिली साहित्यिक परिप्रेक्ष्यमे अहाँ ठीके कहलहुँ जे ‘हो-हल्ला’ भेलैक। हमहुँ मानैत छी जे मैथिली साहित्यमे साम्यवादी विचारधाराक जड़ि नहि जमि सकलैक। मैथिलीमे जे केओ अपनाकेँ साम्यवादी कहि कऽ प्रचारित करैत छथि से पाखंडी छथि। ई बात कने कटु अछि मुदा सत्य अछि कारण हुनक जीवनक सूक्ष्म निरीक्षणसँ परिलक्षित होएत जे ओ जातीय अहंकारसँ मुक्त नहि भेल छथि आ परम्परागत संस्कारमे लिप्त छथि। जनिकामे साम्यवादी चिंतन धारामे अग्रसर होएबाक अर्हते नहि छनि से भला वर्ग-संघर्ष, सर्वहारा, मैनिफेस्टो आ दास कैपिटल धरि कोना पहुँचताह। हँ, मैथिली साहित्यमे साम्यवादकेँ संगठित प्रचारक लेल आ आत्म-विज्ञापनक लेल हथकंडाक रूपमे इस्तेमाल कयल गेल अछि। मैथिली साहित्यमे हमरा जनैत कोनो ठोस विचार धारा नहि पनपि सकलैक आ तकरा कारण ई भेलैक जे बीसम शताब्दीक महत्वपूर्ण लेखक लोकनिपर, संस्कृत अथवा बांग्ला साहित्यक प्रभाव पड़ल रहनि। किछु लेखकपर अंग्रेजी साहित्यक प्रभाव सेहो पड़ल रहनि। स्वतंत्रताक पश्चात् मैथिली साहित्य बहुलांशमे हिन्दी साहित्यक छत्र छायामे चलि आएल। मैथिलीक साहित्यकार नामवर सिंह आ मैनेजर पांडेय दिस देखय लगलाह। ई दु:खद स्थिति अछि, मुदा सत्य यैह अछि। मात्र तीन गोट साहित्यकार हरिमोहन झा, यात्री आ राजकमल विचार धाराक दृष्टियेँ टिकल रहलाह। यात्री समतामूलक समाजक स्थापना लेल अग्रसर भेलाह आ ‘परम सत्य’ धरि पहुँचि अस्तित्ववादी भऽ गेलाह। मानववाद हुनक कवितामे अंतर्निहित छनि। यात्री लिखैत छथि- सत्य थिक संसार सत्य थिक मानव समाजक क्रमिक उन्नति क्रमिक वृद्धि-विकास सत्य थिक संघर्षरत जनताक ई इतिहास सत्य धरती, सत्य थिक आकाश परम सत्य मनुक्ख अपनहि थिक तहिना राजकमल साहित्य वर्जनाकेँ तोड़ैत तथाकथित ‘धर्मात्मा’ आ ‘पाखंडी’ सभक प्रताड़नासँ कुहरैत, नोरसँ भीजल मिथिलाक नारीक जीवंत चित्रण केलनि। एही सन्दर्भमे हरिमोहन झाक नाम उल्लेखनीय अछि। ‘खट्टर कका’क तरंग बुद्धिवादी चिंतन धाराक लेल ‘गीता’ सदृश अछि। सभसँ महत्वपूर्ण बात ई अछि जे हरिमोहन झा, यात्री जी आ राजकमलक मोसि कमला-गंडकी-वाग्मती-कोसीक पानिसँ बनल छलनि तेँ हुनकर साहित्यमे मिथिलाक सोहनगर माटिक सुगंधिक अनुभव होइत अछि। बीसम शताब्दीक वृहत्रयीमे यैह तीन साहित्यकार हरिमोहन झा, यात्री जी आ राजकमल छथि जे कालजयी छथि। हमरापर कोन विचार धाराक प्रभाव पड़ल तकर विवेचन आ मूल्यांकनक दायित्व अहाँ सन युवा रचनाकारपर छोड़ि दैत छी। मुन्नाजी: अहाँ अपन रचनाकालक प्रारम्भसँ एखन धरि लेखनक निरंतरता बनौने छी, मुदा आइ धरि ककरो द्वारा कोनो ठोस मूल्यांकन आ पुरस्कृत नञि भेलासँ केहेन अनुभव करैत छी? अमरनाथ: मुन्ना जी, मैथिलीमे मूल्यांकन होइ नहि छै, करबऽ पड़ैत छै। ओहि लेल मैनेजमैंट चाही। ई मैनेजमैंट ने करय अबैत अछि आ ने हम सीखय चाहै छी। रहल गप्प पुरस्कारक। एकर अपन गणित छै। मैट्रिक धरि गणित आ विज्ञान रहए। प्रथम श्रेणी भेटल रहए। मुदा दर्शनशास्त्र प्रिय लागल। गणित छोड़ि देलिऐ। फेरसँ सीखल होएत? तखन अहीँ कहूँ, पुरस्कार कोना भेटत? मुन्ना जी, हम कहि सकैत छी जे देशक विभिन्न भागसँ हमरा पाठकक स्नेह भेटल अछि। ई की पुरस्कार नहि भेलै? हमर पोथीक तीन-तीन संस्करण भेल अछि। चारिम संस्करण प्रेसमे अछि। मैथिली लेखकक लेल ई की कम भेलै? मुन्नाजी: कथा साहित्यमे अहाँ द्वारा लघुकथापर जमि कऽ लेखन भेल। मैथिलीक पहिल लघुकथा संग्रह ‘क्षणिका’ देलाक बाबजूद अहाँ लघुकथाकारक रूपमे हेराएल आ बेराएल रहलौं, एकरा पाछू समूहवाजी आ आर किछु कारण अछि? अमरनाथ: एहिमे हमर अपन दोष अछि। १९७५ ई. मे ‘क्षणिका’ छपल रहए। हाथो हाथ बिका गेल। एहि घटनाक पैंतीस वर्ष भेलैक। हमरा दोसर संस्करण करएबाक चाहै छल। से नहि भेलैक। मैथिली पुस्तकक हेतु कोनो नीक पुस्तकालय नहि छैक। जखन पोथी नहि उपलब्ध होएतैक, तखन कोन आधारपर चर्चा लोक करतैक? तथापि जे नीक समालोचक होइत छथि से अंवेषण करैत छथि, पोथी उपलब्ध करैत छथि आ तखन मूल्याकंन करैत छथि। से कयलनि मैथिलीक सुप्रसिद्ध साहित्यकार डॉ. रामदेव झा, पटना विश्वविद्यालय द्वारा यू.जी.सी.क सौजन्यसँ आयोजित सेमिनारमे। अपन आलेखमे ‘क्षणिका’क सम्बन्धमे स्पष्ट विचार रखलनि। मुदा मैथिलीमे कतेक रामदेव झा छथि। मुन्नाजी: अहाँक प्रारम्भिक रचनाकालमे मूलतः कथा कविता लेखन पर ध्यान देल जाइत छल। अहाँक ओइसँ इतर लघुकथा लेखनक प्रति उत्सुकता आ रचनाशीलता कोना आएल। अमरनाथ: हम १९७३ ई.क गर्मीमे एक मास औद्योगिक नगरी बोकारो रहि बितौने रही। ओतए हम पहिल बेर लगसँ मशीनक घरघड़ाहटिकेँ सुनने रहियैक, लोककेँ दोगैत देखने रहियैक। हमरा लागल रहए जे आब जे समय आबि रहल अछि, ताहिमे मनुष्यकेँ समयक प्रबन्धन करए पड़तैक। कहि सकैत छी जे ‘समय’ लोकक वैह अत्यंत महत्वपूर्ण भऽ जयतैक। एहन स्थितिमे महाकाव्य अथवा दीर्घ कथा/ उपन्यास पढ़ऽ लेल समय नहि रहतैक। मुदा तथापि लोक साहित्य पढ़ऽ चाहत। आ तैँ पैघसँ पैघ बात कहबा लेल हम छोट-छोट कथा लिखय लगलहुँ। पछाति सकल ‘क्षणिका’ ‘लघु कथा’ संग्रहक रूपमे प्रकाशित भेल। मुन्नाजी: अहाँ चारि दशक पहिने लघुकथाक प्रति एतेक क्रियाशील रहिऐ, आइयो ई निरंतरता बनौने छी। तहन अहाँक अकादमीमे स्थान पौलाक पछाति लघुकथापर कोनो काज किएक नञि भेल, अकादमीक स्तर पर उदासीनता किए? आगामी समयमे लघुकथाक लेल अकादमी द्वारा कोनो स्वतंत्र क्रियाकलापक (यथा-लघुकथा संग्रहक प्रकाशन/कोनो कार्यशालाक आयोजन) योजना अछि आ समायोजन करबाक विचार अछि? अमरनाथ: एकरा उदासीनता नहि, प्राथमिकता कहबाक चाही। अकादमी द्वारा कतेक कार्य भेल अछि, भऽ रहल अछि। अगिला परामर्शदातृ समितिक बैसकमे लघुकथापर विशेष ध्यान देल जाएत। लघुकथाक सन्दर्भमे विमर्श, पुस्तक आदिक प्रकाशनपर विचार होएत, आ से एहि द्वारे नहि जे हम स्वयं लघुकथा लिखैत छी। ई आवश्यक एहि हेतु अछि जे एहिपर एखन धरि विचार नहि भेल अछि। मुन्नाजी: मैथिलीक क्षेत्र छोट छै। तैयो रचनाकारक समूहबाजी एकरा गरोसने जा रहल अछि। ई एखनो सार्वभौमिक नञि अछि। आ से चीज पुरस्कारक हेतु चयन आ वितरणमे सेहो देखार होइत अछि। अहाँ एहिसँ कतेक धरि सहमत वा असहमत छी? अमरनाथ: मुन्ना जी, हमहुँ अहीँ जकाँ लेखक छी। जे केओ समूहमे नहि छी, स्वतंत्र लेखक छी, स्वाभिमानक संगे लिखि रहल छी, एहि यंत्रणाक दंशकेँ सहि रहल छी। मुदा मैथिलीक संसार आब छोट नहि। श्री ‘गजेन्द्र ठाकुर’जी मैथिलीकेँ “विदेह” पत्रिका द्वारा सम्पूर्ण संसारमे पहुँचा देलनि। ‘मिथिला दर्शन’ मैथिलीक भविष्य बाँचि रहल अछि, आ अहाँ सन संघर्षशील युवा रचनाकारक हाथमे मशाल अछि। आब अहीँ कहूँ, ‘कूप-मंडुक’क आवाज कते दूर धरि जाएत? मुन्नाजी: साहित्य अकादमी द्वारा बड्ड रास पुरस्कार (विभिन्न विधा पर) देबाक घोषणा कएल गेल अछि, मुदा ओहि सभ विधा आ स्तरपर उत्कृष्ट रचना आ रचनाकारक अभाव सन अछि तथापि पुरस्कार दऽ देल जाइत अछि। तकर पछाति एहि निर्णयपर पक्षपातक आरोप लगैत रहल अछि किएक? अमरनाथ: अहाँक पीड़ा हम बुझैत छी। वैह पीड़ा हमरो मनमे अछि। एहन-एहन पुरस्कृत पोथी जँ आन-आन भाषामे अनूदित होएत तँ लोक हँसत हमरा सभपर, मैथिली साहित्यपर। तेँ हमर स्पष्ट मंतव्य अछि जे उत्कृष्ट पोथी नहि रहैक तँ उचित थिक जे ओहि वर्ष मैथिलीकेँ पुरस्कार नहि भेटैक। मुन्नाजी: साहित्य अकादमी पुरस्कारक चयनक आधार की अछि, व्यक्तित्व आ कृतित्व आकि भाय-भैय्यारीमे लिप्त भऽ एकरा परोसि/ बाँटि देल जाइत अछि। अमरनाथ: बहुलांशमे जे होइत रहलैक अछि, सैह अहाँ कहलहुँ अछि। परंतु से ने उचित अछि आ ने मैथिलीक हितमे अछि। निश्चित रूपसँ लेखकक कृतिपर पुरस्कार भेटबाक चाही। ई ध्यान राखब आवश्यक अछि जे अकादमीक पुरस्कार पुस्तकपर भेटैत छैक। अकादमी ने तँ ‘लाइफ टाइम एचीवमेंट’ पुरस्कार दैत छै आ ने सांत्वना पुरस्कार। एहि सम्बन्धमे साहित्य अकादमीमे मैथिलीक प्रतिनिधि डॉ. विद्यानाथ झा ‘विदित’केँ विशेष साकांक्ष रहबाक चाहियनि। मुन्नाजी: आ अमरनाथ बाबू अंतमे अपने सँ साहित्य आ अकादमी दुनू अनुभवक आधार पर नवरचनाकारक वास्ते कोनो संदेश चाहब जाहिसँ आगू निश्शन रचना आ रचनाकारे मैथिलीमे उपलब्ध हुअए। अमरनाथ: अकादमीक अनुभव कोनो नीक नहि अछि। मैथिलीक विकासक सुनियोजित योजनाक प्रारूप नहि बनि सकलैक। तखन संघर्ष करैत छी, ठठै छी, मान-अपमानपर ध्यान नहि दैत छी। तकर परिणाम अछि जे मैथिलीक व्यापक हितमे किछु काज भेल अछि आ किछु काज भविष्यमे होएत। मैथिलीक प्रतिनिधि डॉ. विद्यानाथ झा ‘विदित’क नेतृत्वमे एतबा भेल अछि जे ई आब मुट्ठी भरि लोकक परिक्रमा नहि कऽ विशाल जनसमुदाय आ लेखक बीच ई पहुँचल अछि। साहित्यिक जीवनक अनुभवसँ हम उत्साहित होइत रहलहुँ अछि। तकर कारण अछि जे पाठकक स्नेह हमर मनकेँ लिखबा लेल प्रेरित करैत रहल अछि। तखन सन्देश! युवा लेखकक प्रति हम आस्थावान छी। आलोचककेँ ध्यानमे राखि कऽ साहित्य नहि लिखबाक चाही आ ने आन भाषा-साहित्यक अनुकरण होएबाक चाही। युवा लेखककेँ विभिन्न भाषाक महत्वपूर्ण ग्रंथ पढ़बाक चाहियनि, विश्वमे आबि रहल साहित्यक विभिन्न धारासँ परिचित होइत रहबाक चाहियनि आ बीच-बीचमे पर्यटन-परिभ्रमण करैत रहबाक चाहियनि। मुन्ना जी, जे किछु लिखैत छी तकरा आत्मसात कऽ लिखबाक चाही। कथा, कविता, उपन्यास, नाटक अथवा कोनो आन विधाक रचना कल्पित नहि होइत छैक आ ने गढ़ले जाइत छैक। लेखन सेहो ईमानदारी मंगैत छै। क्षमा करब मुन्ना जी, हम उपदेशक नहि बनय चाहै छी, मुदा अहाँक प्रश्ने तेहन छल! १. भारत भूषण झा- कथा- आत्‍मबल कथाक शेषांश २.शि‍व कुमार झा "टि‍ल्‍लू" विहनि कथा-लेबर पेन ३.मनोज कुमार मंडल- कथा- बेमेल वि‍आह ४.ज्योति- विहनि कथा- मैथिल बियाह ५.मि‍थि‍लेश मंडल- कथा- वि‍देशी बाबू १ भारत भूषण झा कथा- आत्‍मबल कथाक शेषांश रेणुक बात सुि‍न ललि‍तक हालत और गंभीर भऽ गेलै। जे आइ हमरा लग एकटा पाइ नहि‍ अछि‍ आ ई भि‍नक बात कऽ रहल छथि‍। दोसर दि‍स बाबू जीक बात खूनकेँ खौलौने ललि‍त कहलकै- “ठीक छै जे मर्जी आब अहींक बात करब।” हौसली बेच बौआकेँ फार्म भरल गेल।‍ ललि‍त घरसँ भि‍न भऽ गेल। बाबू जीक रूप ओहने तेबर- “‍रे हमरा तूँ धौस देखबै छेँ हम अपना जीबैत एक धूर जमीन हि‍स्‍सा नै देबौ। जो कमा गऽ खो गऽ।” घरमे दू साए मोन चाउर। मुदा ललि‍त कि‍नि‍ कऽ खाए। दोकानदारो उधारी दै लेल तैयार नै। कारण ई देत कतएसँ। बौआ जे अगहनमे खेतसँ ऑटी आनने रहए वएह धानक चाउर ललि‍त कुटेलक। 25 कि‍लो मुदा ओ चाउर कत्ते दि‍न। जना तना दि‍न कटैत गेल एक दि‍न एकटा रजि‍स्‍ट्री रेणु पति‍ ललि‍त नामक, डाकि‍या लऽ कऽ डाकघरसँ आएल। मुदा ककरो वि‍श्‍वास नै जे ई ललि‍तबाक छि‍ऐ लेकि‍न नाम तँ ओकरे रहै पढ़ुआ काका ललि‍तकेँ पुछलकै- “‍जे देकही तँ ई रजि‍स्‍ट्री तोरे छि‍औ।‍” रेणु तँ हमरो पुतौहूकेँ नाम छै मुदा पति‍मे तोरे नाम छै। ललि‍तकेँ आश्‍चर्य भेलै। जे हमर कनि‍याँकेँ रजि‍स्‍ट्री कतएसँ आएल हेतै। कहलि‍यन्‍हि‍- “जँ हमर नाम छै तहन ते हमरे हेतै। देखए दि‍अ।‍” मुदा हमरा दैसँ पहि‍ने पढ़ुआ काका पढ़लनि‍ आ कहलनि‍- “ई तँ सेन्‍ट्रल गोभर्नमेन्‍टक ज्‍वाइनि‍ंग लेटर छि‍औ।‍” ई सुनि‍ ललि‍तकेँ लागल जे कक्को हमरासँ मजाके करै छथि‍। मुदा पढ़ुआ काका मजाक नै कऽ सकैत छथि‍। हम हँसैत, वि‍हुसैत रजि‍स्‍ट्री लऽ कऽ अंगना पहुँचलहुँ। रेणुसँ पुछलयन्‍हि‍- “देखि‍ओ अहाँकेँ तँ नौकरीबला चि‍ट्ठी आबि‍ गेल। ई कोना भेलै।‍” सुनि‍ते रेणुक आँखि‍मे नोर भरि‍ गेलै। आ रूदन स्‍वरमे बाजए लागलि‍- “‍ओ तँ फुदन बौआ, जि‍नका हम पेपड़मे पढ़लाक वाद कहलयन्‍हि‍ जे बौआ एकटा हमर काज कऽ देब। ओ कहला कोन काज हम कहलयन्‍हि‍ जे एकटा पेपड़मे फार्म नि‍कलल छै से हमरा आनि‍ दैतहुँ। ओ आनि‍ देलाह आ ओकरा रजि‍स्‍ट्री करबा देलथि‍।‍” चि‍ट्ठी लऽ रेणु ज्‍वाइन करए गेलि‍। ओतहुओ हुनका घुसक तगेदा। बेचारा ललि‍त मायुस भऽ डी.एम.केँ अपन सभ दुखरा सुना देलकै। डी.एम. भावुक भऽ ओकर ज्‍वाइनि‍ंगकेँ स्‍पेशल ऑडर नि‍कालि‍ ओकर योगदान करबा देलक। आब रेणु ललि‍तकेँ संपति‍क अम्‍बार बौआकेँ वि‍आहक चर्च होमए लागल। एकटा गामक घटक आएल ललि‍त कहलकै- “‍जे हमरा एक्को करोड़ देब तँ हम अहाँकेँ गाममे कुटमैती नहि‍ करब।” ललि‍त कोनो काजसँ बाहर गेल रहथि‍। ओहि‍ बि‍च लड़कीक पि‍ता ललि‍तक बाबाकेँ मना लेलक आ हुनका बौआक वि‍आहक लेल कि‍छु पाइ सेहो थम्‍हा देलक। जखन ललि‍त आएल तँ हुनक बाबूजी कहलकनि‍- “ललि‍त हौ, हम बौआक वि‍आह ठीक कऽ देलि‍अहेँ। आ हमरा ओ वयना सेहो दऽ देलकऽ हेन।‍” ई सुनि‍ते ललि‍तकेँ पाड़ा गरम भऽ गेलै। बाजल- “बाबूजी आबो तँ हमरा अहाँ छोड़ि‍ दि‍अ। ने हम अहाँक सतरह बि‍गहामे सँ एक धूर जमीन लेलहुँ आ ने एक्को रूपैआ। जेना तेना अपन जि‍नगी जीब आ स्‍थि‍र भऽ रहल छी। तँ अहाँ हमरा बेचैनीमे डालि‍ रहल छी‍” जे नै से सभ कहि‍ देलकन्‍हि‍। बाबूजी लजाएले ललि‍तकेँ कहलकनि‍- “हमरासँ गलती भेल हम ओकर टाका आपस कऽ देबै।‍” ललि‍त बाजल- “नि‍श्‍चि‍ते नै तँ तूँ जानह।‍” कहैत अपन घरमे प्रवेश केलक। ई सभ गप्‍प रेणु सुनैत रहथि‍। एक गि‍लास पानि‍ ललि‍तकेँ दैत बाजलि‍- “जे पहि‍ने पानि‍ पीबू ठंढ़ाऊ। तहन सभ कि‍छु हेतै। बाबूजी जहन वचन हारि‍ गेल छथि‍न्‍ह। तहन अहाँ एतेक आमि‍ल कि‍एक पि‍ने छी। ओहो अहाँक पि‍ते छथि‍। जेना अहाँ बौआक। हुनकर वेइज्‍जतीमे अहाँक वेइज्‍जती नै ऐछ। तँए हमर मानू आ बाबू जीसँ माफी मांगू जा कऽ।‍” ललि‍तकेँ रेणुक बात सुनि‍ कऽ आओर टेंसन भेल जाए। बाजल- “ठीक छै तहन पीठ सक्कत कऽ लेब। ओइ गामक बेटी सभ जै गाम जाइ छै ओतए अपन नाम साउसकेँ पि‍टैएमे करैए। हमर मानू बाबूजी फेर कोनो चालि‍ चलि‍ रहल छथि‍। अपना सभकेँ उन्नति‍केँ देख।‍” रेणु बाजलि‍- “अरे! जहन बाबूजीकेँ एहने सोच हेतन्‍हि‍ तँ हम अहाँ की करबै। हमरा सभकेँ अपन बाबू जीक‍ इज्‍जतक खातीर सभ मंजूर ऐछ।” ललि‍त बात मानि‍ गेल। बौआक वि‍आह ओहि‍ गाममे भेल आ ललि‍त रेणुक पुतोहू तँ साक्षात लक्ष्‍मी। गामक आदर्श। रेणु ललि‍तकेँ कहलकनि‍- “देखि‍ओ, बाबू जीक आशीर्वादसँ अपना सभकेँ सभ कि‍छु पाप्‍ति‍ भऽ गेल। एकटा पुतोहूवो भगवान देलथि‍ सेहो लक्ष्‍मीये।‍” २ शि‍व कुमार झा "टि‍ल्‍लू" 1973- शिव कुमार झा ‘‘टिल्लू‘‘,पिताक नामः स्व. काली कान्त झा ‘‘बूच‘‘, माताक नामः स्व. चन्द्रकला देवी,जन्म तिथिः 11-12-1973,शिक्षाः स्नातक (प्रतिष्ठा),जन्म स्थानः मातृक- मालीपुर मोड़तर, जि. - बेगूसराय, मूलग्रामः ग्राम-पत्रालय - करियन, जिला - समस्तीपुर, पिन: 848101,संप्रतिः प्रबंधक, संग्रहण,जे. एम. ए. स्टोर्स लि.,मेन रोड, बिस्टुपुर जमशेदपुर - 831 001, अन्य गतिविधिः वर्ष 1996 सँ वर्ष 2002 धरि विद्यापति परिषद समस्तीपुरक सांस्कृतिक ,गतिवधि एवं मैथिलीक प्रचार-प्रसार हेतु डॉ. नरेश कुमार विकल आ श्री उदय नारायण चौधरी (राष्ट्रपति पुरस्कार प्राप्त शिक्षक) क नेतृत्वमे संलग्न। विहनि कथा- लेबर पेन सालक पहि‍ल दि‍न। कवि‍जी भाेरेसँ नव वर्ष मनएबाक प्रकि‍यामे लागल छलाह। चौपाड़ि‍पर सँ सि‍या झाक प्रसि‍द्ध पेड़ा एक पसेरी आनल गेल। सुधीर कामति‍ नन्‍दन बाबाक जि‍रातमे फुलकोबी लगौने छलाह। ओहि‍ खेतक टटका फुलकोबी तीन सेर कीन लेलनि‍। गामक कि‍छु इष्‍ट-मि‍त्र सबहक चाह पार्टीक आयोजन करबाक छलनि‍। कवि‍ जीक नव रूपसँ अर्द्धांगि‍नी परेशान भऽ कऽ पुछलनि‍- “पहि‍ने तँ नव वर्षक वि‍रोध करैत छलहुँ, हमरा सबहक लेल नवका साल शक् संवत आ होरी थि‍क आब की भऽ गेल?‍” “‍चन्‍द्रकला, एना नै अकचकाऊ, समएक संग हमरो चलऽ पड़त। जखन सभ लोक पहि‍ल जनवरीकेँ स्‍वीकार कऽ लेलक तँ हम पाछाँ कोना रहब। समएसँ आगाँ नहि‍ जलबाक चाही मुदा बेसी पाछाँ रहब सेहो ठीक नै।” कवि‍ जीक तर्कक आगाँ श्रीमती गुम्‍म। दलानपर लोकक जुटान होमय लागल। पेड़ा, पकौड़ीक संग-संग मकयवाड़ी लीफक चाह। रमाश्रय जी, लक्ष्‍मी चौधरी, बैजू भाय, राधाबाबू, नागो बाबा, भोला साहुजी सन कवि‍ जीक इष्‍ट-मि‍त्रक संग-संग नवतुरि‍या पि‍रही आ कि‍छु समाजक पछाति‍क लोक सभ सेहो टी पार्टीक आनंद लऽ रहल छलाह। गामक डाॅक्‍टर यशोदा पाठक दलानक आगाँसँ झटकल जाइत छलाह। कवि‍जी हाक देलनि‍- “यशोदा भाय, कनेक्शन जलपान कऽ‍ लि‍अ।” डॉक्‍टर साहेब कहलनि‍- “भैया, हम घुुरि‍ कऽ अबैत छी। हरि‍जन टोलमे सुकेशर मोचीक पुतोहूकेँ लेबर पेन भऽ रहल छन्‍हि‍, कनेक्शन जल्‍दीमे छी।‍” लेबर पेनक नाओं सुनि‍ते राधाबाबू वि‍स्‍मि‍त होइत बजलाह- “कवि‍जी, ई लेबर पेन तँ बुझैत छी जे प्रसव पीड़ाकेँ कहल जाइछ मुदा लेबरक अर्थ होइत ऐछ मजदूर तखन मातृसुखक अनुभूति‍-पीड़ाकेँ लेबर पेन कि‍अए कहल जाइत ऐछ?‍” कवि‍जी फॅसि‍ गेलाह, गुम्‍म! लक्ष्‍मी चौधरी बीच-बचाव करैत बजलाह‍- “घबराउ नै राधकक्का, कोनो एहेन प्रश्‍न बनबे नै कएल जकर उत्तर कवि‍ जी नहि‍ दऽ सकैत छथि‍।‍” चाहक चुस्‍की लैत कवि‍जी बजलाह- “अर्थयुगक आधारपर समाजक पाँच गोट वर्ग होइत ऐछ- कुलीन वा सामन्‍त जैमे समाजक अगि‍ला पॉति‍ रहैत छथि‍ जेना राजनेता, पैघ-पैघ व्‍यापारी, अधि‍कारी आदि‍। दोसर वर्ग श्रमपोषी छैक जैमे कर्मचारी, सीमान्‍त खेति‍हर आदि‍ राखल जा सकैछ। तेसर वर्ग भेल श्रमजीबी- जनि‍क योजना मात्र एक दि‍वसीय होइत ऐछ। आजुक दि‍न कमाएब आ आइ खाएब ओ नै‍ तँ भूत देखैत छथि‍ आ ने भवि‍ष्‍य।‍ चारि‍म वर्ग होइत ऐछ चाटुकार आ कोढ़ि‍याक। ऐ‍‍ वर्गमे पहि‍ल लोकक चमचाक संग-संग शरीरसँ दुरूस्‍त भि‍खमंगाकेँ सेहो राखल जाए। पाचम वर्ग हेाइत ऐछ मजबूर वर्ग। ऐ‍‍ वर्गमे साधन-वि‍हि‍न अस्‍वस्‍थ अपंग आ शि‍क्षासँ दूर यायावर लोकनि‍ छथि‍। एे संसारमे व्‍यथि‍त जीवन मात्र दू वर्गक होइत छन्‍हि‍। श्रमजीवी आ मजबूर वर्गक। मजबूर वर्ग तँ कोनो रूपेँ अपन जीवनसँ संतुष्‍ट रहैत छथि‍, कि‍एक तँ कोनो वि‍शेष चाह नै छन्‍हि‍ मुदा श्रमजीवीक जीवन अत्‍यन्‍त दु:खमय। जँ कोनो दि‍न बीमार पड़ि जेताह तँ अगि‍ला दि‍न परि‍वारमे उपवास। अपने दुनू परानी एकादशी मानि‍ मात्र जल ग्रहन कऽ कहुनो रैन काटि‍ सकैत छथि‍ मुदा नेनाक लेल.... कोनो साधन नै।‍” “अंग्रेज बड़ बुद्धि‍जीवी जाति‍ होइत ऐछ। भारत वर्ष सन गरीब राष्‍ट्रमे राज केलक। एक समए छल जे ब्रीटि‍श गन्‍ध लागब स्‍वाभावि‍क। श्रमजीवीक व्‍यथा देख क्रूर अंग्रेजी आत्‍मा निश्‍चि‍त पधि‍ल गेल हेतैक। तँए संसारक सभसँ पैघ दर्द प्रसव पीड़ाकेँ श्रमजीवीक पीड़ासँ जोड़ी अंग्रेज 'लेबर पेन'क आवि‍ष्‍कार केलक। प्रसव वेदना संभवत: सभसँ बेसी क्‍लि‍ष्‍ट वेदना थि‍क। संभवत: ऐ‍‍ दुआरे कि‍एक तँ हमहू पुरूष छी। ठीक ओहि‍ना श्रमजीवीक पीड़ा मार्मिक होइत ऐछ। जीवन भरि‍ अगि‍ला दि‍नक आशमे रैन बि‍ता लैत छथि‍- श्रमजीवी।‍ ऐ‍ दुनू व्‍यथामे अनुभूति‍ समाने होइत ऐछ‍। अन्‍तर ऐछ। तँ समए कालक। मातृत्‍व वेदना मात्र क्षणि‍क मुदा श्रमजीवीक वेदना जीवन पर्यन्‍त।‍” सभ लोक गुम्‍म मुदा कवि‍जी बजैत-बजैत भाव वि‍भोर भऽ गेलाह। हमहूँ ब्रि‍टि‍श नीति‍क वि‍रोधी छी, हमरा सबहक देशकेँ ओ बर्वाद कऽ देलक मुदा कि‍छु एहेन उपहार सेहो देने गेल जे देश कालक लेल अनि‍वार्य होइत छैक ओहि‍मे सँ एक अछि‍- जीवन यापनक कला।, तँए ने हमरा सन स्‍वदेशी लोक सोहो सालक पहि‍ल दि‍नकेँ आइ आत्‍मसात कऽ लेलहुँ। राधा बाबू अहाँ एहि‍ जन्‍ममे लेवर पेनक आनंद नहि‍ लऽ सकैत छी, कि‍एक तँ अहाँ नहि‍ श्रमजीवी छी आ ने नारी। तँए आग्रह जे अंग्रेजे जकाँ लेवर पेन अर्थात श्रमजीवीक व्‍यथाक पर ध्‍यान राखल जाए नहि‍ तँ मि‍थि‍लाक गाम-गामसँ रोटीक आशामे श्रमक पूर्ण पलायन अवश्‍यंभावी अछि‍। कदाचि‍त जौं एना भऽ गेल तँ प्रसव वेदनाकेँ अपन गाओं समाजमे कोनो आन नाओं ताकए पड़त। एकटा कवि‍ता तँ अपने हमरा मुखसँ पहि‍नहुँ सुनने हएब- श्रमक कोन मानि‍ जतऽ बुद्धि‍क वि‍लास छै, पेड़ा दलाल गाल श्रमक पेट घास छै।। नागो बाबा जोरसँ ठहक्का मारैत बाजि‍ उठलाह- “कवि‍ जी पेड़ा खुआ कऽ सूदि‍ सहि‍त असूलि‍ लेलनि‍।‍” सभ आगंतुक लोकनि‍ एक स्‍वरसँ कवि‍ जीक तर्ककेँ मानि‍ चाहक दोसर खेपक आनंद उठबए लगलाह। ३ मनोज कुमार मंडल कथा- बेमेल वि‍आह जाड़क मास छल। चारि‍-पाँच दि‍नसँ सूरज नि‍पत्ता भऽ गेल रहए। आइ मेघ कने फरि‍च्‍छ भेल। पह फटने सूरज अप्‍पन उपस्‍थि‍ति‍ दर्ज करौलन्‍हि‍। बुझनुक काका एकटा चटकुनी बि‍छा दरबज्‍जाक आगू बैसल छलाह आ अखबार पढ़ैत छलाह। कएक बेर नै कएक बेर अखबारकेँ उल्‍टा-पुल्‍टा कऽ पढ़लाह। अखबार पढ़ैत-पढ़ैत मन जेना उचटि‍ गेल रहनि‍। चश्‍मा खोलि‍ खोलीमे रखलन्‍हि‍। आब बुझनुक काका वि‍चारक दुनि‍याँमे डुबि‍ गेलाह। मनक बेग तँ बहुत तेज होइत अछि‍। कनि‍ये कालमे नाना प्रकारक वि‍चार हुनका मनमे सि‍नेमाक रि‍ल जकाँ अबैत आ वि‍लुप्‍त भऽ जनि‍। संजोगसँ मुनल आँखि‍ खूजलन्‍हि‍। हुनक नजरि‍ जमुनापर पड़लनि‍। जमुना फूल तोड़ए अप्‍पन हाथ बढ़ौलन्‍हि‍। पहि‍ने ओ गुलाब तोड़लनि‍ तखन चम्‍पा, चमेली बेली, कनैल तीरा सभ फूल तोड़ि‍ अप्‍पन पि‍तरि‍या फूलडाली भरि‍ बेलक गाछ दि‍स चललि‍। बुझनुक काकाक नजरि‍ जमुनाक कोमल उज्‍जर धप-धप हाथ आ गुलाब फूलपर टि‍कलन्‍हि‍। एक बेर जमुनाक उज्‍जर माँग आ उज्‍जर साड़ीमे शि‍ष्‍ट नारी शरीरक लि‍प्‍टल काया देखलन्‍हि‍। जमुना आगू बढ़ि‍ गेलीह। कि‍तु बुझनुक काका एकटकी लगा हुनका दि‍स तकैते रहि‍ गेलाह। कि‍छु कालक बाद हुनक धि‍यान टूटल। ओ सोचए लगलाह। आइ बुझनुक काकाक अप्‍पन अतीत मुन पड़ल लगलन्‍हि‍। बुझनुक काका उपहार स्‍वरूप जमुनाकेँ गुलाब देने रहथि‍न। जमुना मुस्‍कुरा गुलाब तँ लऽ लगलन्‍हि‍ कि‍ंतु उत्तरमे कि‍छु नै कहने रहि‍एनि‍। बुझनुक काका जमुनाक ऐ व्‍यवहारसँ खि‍न्न रहए लागल छलाह। एक दि‍न जमुनाकेँ संस्‍कृतक पाठशालासँ घूमैतकाल भालसरीक गाछ तर बुझनुक काका भेँट भेल रहनि‍। ओ बुझनुक काकाक आगू ठाढ़ भऽ भावुक भऽ कहलि‍- “नारी तँ नि‍मुधन छी। माए-बाप जै खुट्टासँ बान्‍हि‍ दैत ओ भरि‍ जीवन बान्‍हल रहत। हम्‍मर आग्रह जे कायाक सुन्‍दरताकेँ छोड़ि‍ अप्‍पन बैचारि‍क सुन्‍दरताक आशाकेँ जगाबी।” बुझनुक काका तैकते रहि‍ गेल छलाह कि‍ंतु जमुना आगू बढ़ि‍ गेल छलीह। क्रमश: ‍ ४ ज्योति जन्म तिथि -३० दिसम्बर १९७८; जन्म स्थान -बेल्हवार, मधुबनी ; शिक्षा- स्वामी विवेकानन्द मि‌डिल स्कूल़ टिस्को साकची गर्ल्स हाई स्कूल़, मिसेज के एम पी एम इन्टर कालेज़, इन्दिरा गान्धी ओपन यूनिवर्सिटी, आइ सी डबल्यू ए आइ (कॉस्ट एकाउण्टेन्सी); निवास स्थान- लन्दन, यू.के.; पिता- श्री शुभंकर झा, ज़मशेदपुर; माता- श्रीमती सुधा झा, शिवीपट्टी। ज्योतिकेँwww.poetry.comसँ संपादकक चॉयस अवार्ड (अंग्रेजी पद्यक हेतु) भेटल छन्हि। हुनकर अंग्रेजी पद्य किछु दिन धरि www.poetrysoup.com केर मुख्य पृष्ठ पर सेहो रहल अछि। ज्योति मिथिला चित्रकलामे सेहो पारंगत छथि आ हिनकर मिथिला चित्रकलाक प्रदर्शनी ईलिंग आर्ट ग्रुप केर अंतर्गत ईलिंग ब्रॊडवे, लंडनमे प्रदर्शित कएल गेल अछि। कविता संग्रह ’अर्चिस्’ प्रकाशित। विहनि कथा मैथिल बियाह : रित्सिका जीक परिवारके अमेरिका मे एक समृद्ध मैथिल परिवारमे गिनती छलैन ।मुख्य शहर सऽ कनिये दूर पर सबअबर्स्स ईलाका मे अपन बड़का टा मकान लेने छली। घरमे पति आ दू टा बच्चा छलैन। पड़ोसमे विश्वक सबदिसका लोक छलैन जाहिमे सबसऽ बेसी सम्पर्क बगलके अमेरिकी परिवार सऽ छलैन। रित्सिका जीके घर परिवारक देखरेख के बाद जे समय भेटै छलैन ताहिमे इवेण्ट मैनेजमेंटक के काज करैत छलैथ।ओ मुख्य रूपे मैथिर्ल उपनयन. विवाह. कोजगरा आदि के प््राबन्ध कराबैत छलैथ मुदा कखनो कऽअमेरिकन बियाह सेहो सम्हारैत छलैथ। अच्छा. त हुन्कर गोरकी अमेरिकन पड़ोसी कार्ला।कार्ला कुनो तरहे रित्सिकाके पिछड़ल साबित करैमे लागल रहैत छलैथ।मुदा रित्सिका तेहेन मुँहफट छलखिन जे मुँह चुप करा दैत छलखिन। कार्लाके पति के किछु मैथिल संगी सेहो रहनि। एकदिन कार्ला एकटा मैथिल ब्याहक भोज मे गेली।ओतय हुन्का रित्सिका भेटेलखिन।ओ परिहास करैत बजलीह. “की कहू. ब्याह के नामपर अतय तऽ मानू कोनो पूजा पाठ होय।आ भोज मे कनिया बर सऽ बेसी तऽ आन सब आह्लादित छथि। आने आन नाचिगाबि रहल अछि ।कनिया बर की मजा लेता?” रित्सिका बजली. “किये. अहॉं सबमे ब्याह मौन रूपमे मनाओल जायत अछि? अहूँ सब विवाह मे धार्मिक स्थल चर्चमे अथवा पादरी के उपस्थिति मे करैत छी।अहँू सबमे विवाह मे पार्टी होयत अछि. परिवारक जुटान होयत अछि।बल्कि अहॉं सबमे तऽ बेसीतर पार्टीयो के तैयारी कनिया बर अपन मोने करैत छथि। एनामे ओ सब कोन अपन ब्याहमे बेसी मजा लैत हेता।पूरा ब्याहमे यैह चिन्ता रहैत हेतैन जे विवाहक समारोह ठीक सऽ सम्पन्न भऽ जाय।अपन सार्जसज्जा के ध्यान आ आत्मविश्वास जतेक मैथिल आ दक्षिणी एशियन महिला मे अछि तेहेन तऽ आन सबमे दूर्र दूर तक नहिं अछि।हमरा सबमे बियाहमे पूरा परिवार सऽ सम्बन्ध जोरल जायत अछि।ई एक पारिवारिक समारोह होयत अछि।कन्यादान एक पुण्य कार्य मानल जायत छहि। बियाहक साल भरि पाबैन होयत अछि जाहिमे पूरा परिवार सम्मिलित होयत अछि आ कनिया बर के सेहो मनोरंजन होयत छैन।” कार्र्ला “आर कनिया बर के अपन हेलमेल बढ़ाबयके कुनो अवसर नहिं भेटै छैन।” रित्सिर्का “बियाह दुरागमन मिलाक सब पाबैन मे मुश्किल सऽ एक महीना जायत अछि। अहि के अतिरिक्त पूरा समय अपना लेल रहैत अछि।” कार्र्ला “अञ्चिन्हार लोक सब कोना बियाह कऽ लैत छथि” रित्सिर्का “अंचिन्हार सऽ कहियो ब्याह नहिं होयत छहि।हँ. पहचान परिवारक माध्यम सऽ होयत छहि।परिवार आ समाज के मान दैत अपन निजी खुशी देखनाइये मैथिल ब्याह अछि।” कार्ला ठीके देखने छलीजे कोना बुजुर्ग सऽ पूर्छि पूछि बियाहक विधि पूरा कैयल गेल छल।भोजमे सेहो की पुरूष आ की महिला. सब सुसज्जित छलथि।आन सिंगार संगे पारम्परिक परिधान. बिन्दी. चूड़ि . गहना आदि के सज्जा मे महिला सब चमकि रहल छलैथ। फेर हााथक मेंहदी आ केशक सज्जा आर अद्भुत छल। ओहि तुलनामे हुन्कर महग डिज़ायनर ड्रेस बड फीका लागैत छलैन। खसैत आत्मविश्वास के सम्हारैत कार्ला अपन जिद्दी स्वभाव के कारण बजली. “हम कनिया के अपमान नहिं करय चाहैत छलहुँ तैं हुन्कासऽ बेसी सुन्दर नहिं लागय चाहै छलहुँ।” रित्सिर्का “तऽ अहॉं मैथिल सुन्दरता के ललकारि रहल छी जतय सीता देवीेक ब्याह लेल बड़का स्वयंवर रचल गेल रहैन। अहुना भारतीय मॉडेल सब विश्वसुन्दरी के खिताब जीति रहल छथि।” कार्ला अपन मोबाएल कॉल रिसिव करयके बहन्ने कात आबि गेली। ५ मि‍थि‍लेश मंडल कथा- वि‍देशी बाबू अमेरि‍कासँ चलला वि‍देशी बाबू। बाटमे सोचैत रहथि‍‍- मि‍थि‍ला केहेन ऐछ घुमि‍ कऽ देख ली। सत्तर-पचहत्तर सालक भऽ गेलौं पाकल आम जकाँ छी कखन छी कखन नै छी तेकर कोनो ठीन नै। मधुबनी पहुँचला ताबतमे कनि‍याँ फोन केलकनि‍- “यौ हमर छोटकी वहीन मधुबनीयेमे रहैए।‍” पता करैत हुनका घरपर पहुँचला। हुनकर सारि‍ घरपर छलि‍ मुदा सारहु नै। परि‍चए दैत बैसला तखन सारहू दऽ साि‍रकेँ पुछलखि‍न- “सारहू कतए गेलाहेँ।‍” चाह हाथमे दैत सारि‍ बजलि‍- “‍ताबे अहाँ चाह पीबू हम बजौने अबै छि‍एनि‍।” तखने पैखाना तरफसँ सारहू अबि‍ते छलाह पत्नीकेँ देख पुछलखि‍न- “की बात?‍” “बड़का पाहुन ऐलाहेँ चलू।‍” “घरेपर तँ जाइ छी। ताबे अहाँ बहरू अबै छी।‍” घरपर ऐला सारहूमे सारहू कुशल-छेम भेल। हाथमहक लोटा देख बड़का सारहू कहलकनि‍- “पहि‍ने लोटा मटि‍या लि‍अ।‍” ई गप्‍प सुनि‍ते कलपर जा लोटा मटि‍येला। हाथ-पएर धोय लगमे आबि‍ बैसला। फेरसँ चाहक आग्रह केलनि‍ आ वि‍शेष कुशल समाचार हेतू पुछलखि‍न- “केमहर सुरूज उगले यौ सारहू जे अपने हमरा ऐठाम.....।‍” बड़का सारहू बजला- “यौ सारहू हमरा मोन भेल जे मि‍थि‍ला घुमि‍ कऽ ली।‍ सत्तर-पचहत्तर बरख भऽ गेल। कखैन छी कखैन नै। कन्नी अहाँ संग दि‍अ घुमैमे।” छोटका सारहू अपन परेसानीपर सोचैत बजला- “यौ सारहू अहाँ‍केँ मि‍थि‍ला घुमाएब तँ हमर फर्ज भऽ जाइत ऐछ। मुदा अहाँ तँ करोड़पति‍ छी आ हम रोज बोनि‍ करै छी आ रोज खाइ छी। मुदा चलू जहाँ धरि‍ होइए चलै छी। मि‍थि‍ला तँ बहु दि‍न लगत घुमैमे।” छोटका सारहूक गप्‍पक भावकेँ जेना बुझि‍तो धि‍यान नै देलखि‍न सटाक दन कहि‍ देलखि‍न- “चलू, चलू।‍” एकसँ दू गाम घुमला तखन करीब दू बजैत रहए। बड़का सारहू सोचला जे चारि‍ घंटाक वाद तँ साँझ पड़ि‍ जाएत। कत्त रहब। मने-मन सोचतो रहथि‍ आ चलि‍तो रहथि‍। एते धरि‍ सोचि‍ लेलथि‍ जे कतौ नीक ठीम रहब। ताबे धनुक टोली पार करैत रहथि‍। मुदा एक्कोटा मकान नै देख सोचैत रहाि‍थ जे अगि‍ला टोलमे रहब कोनो मकानबला घरमे। ताबे दक्षि‍णवारि‍ टोल पहुँच गेला जै टोलमे खाली मकाने-मकान रहए। मकान देख तँ खुश होथि‍ मुदा सभ मकानमे कदीमा लटकल रहए। जे देख हि‍नक मन नै भाबनि‍। अगि‍ला घर माने गामक अंतीम भागमे एकटा फुसक घर रहै जै चारपर सीमक लत्ती पसरल आ घौदे-घौदे सीम फरल। छोटका सारहू कहलकनि‍- “आब साँझ पड़ि‍ गेल अगि‍ला गाम चलब आकि‍ कतौ रहि‍ जाएब?‍” बड़का सारहू बजला- “सहए तकतान करै छी हमहूँ जे कतए रहब। हमर मोन कहैए जे अही घरवारी ऐठाम रहू।‍” “‍ई घर छि‍ऐ छि‍तन मल्‍लीकक, ऐठाम कन्ना रहब। कहि‍तौं तँ पाछूए रहि‍ जेतौं। एत्त हम कि‍न्नहुँ नै रहब।” १.डा० अभयधारी सिंह- अभिनव वर्ष २.जगदीश प्रसाद मंडल- मैथि‍ली उपन्‍यास साहि‍त्‍यमे ग्रामीण चि‍त्रण १ डा० अभयधारी सिंह सम्पादक- जाह्नवी संस्कृत ई जर्नल पता- इतिहास विभाग, निर्मल्ली कालेज, निर्मल्ली, बिहार अभिनव वर्ष अभिनव वर्ष केर स्वागत करबाक हेतु जोर-शोर सँऽ तैयारी चलि रहल अछि। कोई अपन छुट्टी लय अपन परिवारक संग मनपसन्द पर्यटनस्थल कऽ लेल रुख कय रहल अछि तऽ कोई मित्रमण्डली क संग कार्यक्रम तय कय रहल अछि तऽ ओतहि कोई घरे मे भोजन आ मनोरंजन केर साधन जुटा रहल अछि। एतय एकटा जिज्ञासा होइत अछि जे एहि नूतन वर्ष केर इतिहास की अछि? 1 जनवरिए कें ई कियाक मनाओल जाइत अछि? की ई भारतीय वैशिष्ट्य के परिलक्षित करैत अछि? एहने बहुतो जिज्ञासा केर प्रशमन हेतु ई लेख प्रस्तुत अछि। भारतवर्ष मे इस्वी संवत केर प्रचलन अंग्रेज शासक  द्वारा वर्ष १७५२ मे शुरू कयल गेल। एकर संबन्ध ईसा मसीह सँऽ अछि जे रोम केर सम्राट जूलियस सीजर द्वारा ईसा के जन्म केर तीन वर्ष बादक कालावधि सँ जोडि प्रचलन मे आनल गेल। भारतवर्ष मे स्वतन्त्रता केर उपरान्त १९५२ मे वैज्ञानिक आ औद्योगिक परिषद द्वारा पंचांग सुधार समिती कऽ गठन भेल जे अपन रिपोर्ट १९५५ मे दैत विक्रमी संवत के स्वीकार करबाक सिफारिश कयलक। मुदा तत्कालीन प्रधानमन्त्री नेहरू केर आग्रह पर ग्रेगेरियन कलेण्डरे सरकारी कार्य निमित्त स्वीकृत भय सकल। ई २२ मार्च १९५७ सँ ई राष्ट्रीय कैलेण्डर केर रूप लेलक। की एकर राष्ट्रीय कैलेण्डर केर रूप लेब समुचित अछि?         प्राचीनता- एकर उत्तर देबा सँ पूर्व अन्य कैलेण्डर केर प्राचीनता देख ली-         ग्रेगेरियन-                लगभग २००० वर्ष पुरान         यूनानक काल गणना -     लगभग ३५७९ वर्ष पुरान         रोमक काल गणना -       लगभग २७५६ वर्ष पुरान         यहूदीक काल गणना -            लगभग ५७६७ वर्ष पुरान         मिस्त्रक काल गणना -      लगभग २८६७० वर्ष पुरान         पारसी काल गणना -       लगभग १९८८७४ वर्ष पुरान         चीनक काल गणना -       लगभग ९६००२३०४ वर्ष पुरान          भारतक काल गणना -            लगभग १ अरब ९७ करोड ४९ लाख १०९ वर्ष पुरान (पृथ्वी केर आयु) जेकर नामकरण चक्रवर्ती राजा विक्रम केर नाम पर धर्मकेर दृष्टि सँ-         ईस्वी संवत- ईसाइ         हिजरी संवत- मुसलमान         विक्रमी संवत- कोनो धर्मविशेष से नहीं अपितु प्रकृति एवं खगोल सिद्धन्त से सम्बद्ध उक्त परिप्रेक्ष्य मे ई कहल जा सकैत अछि जे  ईस्वी संवत भारतवर्ष हेतु उपयुक्त कैलेण्डर नहिं। एकरे पृष्ठभूमि मे ई तर्क देल जा सकैत अछि-         सांविधानिक दृष्ट्या भारत पंथनिरपेक्ष राष्ट्र अछि एतय कोनो धर्मविशेष सँऽ सम्बद्ध कैलेण्डर केर स्थान पर पंथनिरपेक्ष कैलेण्डर होयब विधिसम्मत।         प्राचीनता केर दृष्टि सँऽ सेहो भारतीय गणना उपयुक्त         अनेक भारतीय परम्परा सँऽ जुडल तथ्य भारतीय काल गणना सँऽ जुडल अछि।         प्राकृतिक दृष्टि सँ भारतीय गणना उपयुक्त अछि कियाक तऽ एहि मे वर्षक प्रारंभ चैत्र (वसन्त) होइत अछि। बहुत रास तथ्य एहि सँऽ जुडल अछि जे राष्ट्रक प्रति गौरव केर अनुभूति करवैत अछि। अस्तु नूतनवर्ष के रूप मे भारतीय सांस्कृतिक विरासत विक्रम संवत के अनुगम सर्वथा उपयुक्त। २ जगदीश प्रसाद मंडल 1947- गाम-बेरमा, तमुरिया, जिला-मधुबनी। एम.ए.।कथाकार (गामक जिनगी-कथा संग्रह आ तरेगण- बाल-प्रेरक लघुकथा संग्रह), नाटककार(मिथिलाक बेटी-नाटक), उपन्यासकार(मौलाइल गाछक फूल, जीवन संघर्ष, जीवन मरण, उत्थान-पतन, जिनगीक जीत- उपन्यास)। मार्क्सवादक गहन अध्ययन। हिनकर कथामे गामक लोकक जिजीविषाक वर्णन आ नव दृष्टिकोण दृष्टिगोचर होइत अछि। मैथि‍ली उपन्‍यास साहि‍त्‍यमे ग्रामीण चि‍त्रण- साहि‍त्‍यक आधार मनुष्‍यक जि‍नगी होइछ। मनुष्‍येक जि‍नगीक ‍नींवपर भाषा साहि‍त्‍य ठाढ़ आ सुदृढ़ बनैत अछि‍। जे मनुष्‍यकेँ जीवैक कला सि‍खबैत अछि‍। गद्य-साहि‍त्‍यक वि‍धामे उपन्‍यासो छी। जाहि‍ नींवपर साहि‍त्‍यक भवन ठाढ़ रहैत अछि‍ ओ माटि‍क नि‍च्‍चाँ दाबल रहैत अछि‍। जीवन परमात्‍माक सृष्‍टि‍ छी तेँ अनन्‍त-अगम्‍य अछि‍। जहन कि‍ साहि‍त्‍य मनुष्‍यक सृष्‍टि‍ होइत तँए सुबोध-सुगम आ मर्यादि‍त होइत अछि‍। एहि‍ जगतमे मनुष्‍य जे कि‍छु सत्‍य आ सुन्‍दर पौलक आ पाबि‍यो रहल अछि‍ वहए साहि‍त्‍य छी। ओना साहि‍त्‍य समाजक दर्पण कहल जाइत अछि‍ मुदा, मनुष्‍यक अएना आ प्राकृति‍क अएनामे अन्‍तर अछि‍। प्राकृति‍क अएना वस्‍तुक बाहरी रूप देखवैत जहन कि‍ मनुष्‍यक अएनाकेँ दोहरी रूप होइत अछि‍। जाहि‍सँ बाहरी आ भीतरी दुनू रूप देखैत अछि‍। एहि‍ठामक (मि‍थि‍लाक) चि‍न्‍तनधारामे, प्रचलि‍त दार्शनि‍क चि‍न्‍तनधारासँ भि‍न्न कि‍छु एहेन वि‍शेषता सन्नि‍हि‍त अछि‍ जे अपन अलग पहचान बनौने अछि‍। जाहि‍ आधारपर साहि‍त्‍यकेँ दीप (ज्‍योति‍) कहब अधि‍क उपयुक्‍त हएत। उच्‍च कोटि‍क साहि‍त्‍यि‍क सृजन लेल यथार्थ आ आदर्शक समावेश आवश्‍यक अछि‍। जकरा आदर्शोन्‍मुख-यथार्थवाद कहल जा सकैछ। अगर यथार्थवाद आँखि‍ खोलैत अछि‍ तँ आदर्शवाद उठा कऽ मनोरम स्‍थानपर पहुँचबैत अछि‍। चरि‍त्रकेँ उत्‍कृष्‍ट आ आदर्श बनेबा लेल जरूरी नहि‍ जे ओ नि‍रदोसे हुअए। एहि‍ जटि‍ल संसारमे, जाहि‍मे छोटसँ छोट आ पैघसँ पैघ समस्‍या लधलो अछि‍ आ दि‍न प्रति‍ दि‍न जन्‍मो लैत अछि‍। ताहि‍ठाम नि‍रदोस चि‍त्रणक नि‍र्माण कठि‍न अछि‍। महानसँ महान पुरूषमे कि‍छु नहि‍ कि‍छु कमजोरी रहि‍तहि‍ छन्‍हि‍, जेकरा नि‍खारब आगूक लेल महत्‍वपूर्ण अछि‍, तँए अनुचि‍त नहि‍। वएह कमजोरीक सुधार मनुष्‍य बनवैत अछि‍। जे उपन्‍यासक मुख्‍य बन्‍दु छी। साहि‍त्‍यक मुख्‍य अंग आदर्श छी जाहि‍सँ रचना कलाक पूर्ति होइत अछि‍। आदि‍काले सँ आदि‍वासि‍क रूपमे पनपैत मि‍थि‍लाक समाज आइक वि‍कसि‍त समाजक सीढ़ी धरि‍ पहुँचल अछि‍। जंगली जीवनसँ लऽ कऽ सुसभ्‍य जि‍नगी धरि‍क इति‍हास मि‍थि‍लाक भूमि‍मे चंदनक गाछ सदृश्‍य दुनि‍याँक वातावरणमे अपन महमही बि‍लहैत रहल आ अखनो बि‍लहैक सामर्थ रखैत अछि‍। जे हमरा सबहक धरोहर छी तँए बचा कऽ राखब सभसँ पैघ दायि‍त्‍व बनैत अछि‍। जि‍नगीक आवश्‍यकता आ उत्‍पादन करैक जते शक्‍ति‍ छलनि‍ ओहि‍ अनुकूल जि‍नगी बना सामंजस्‍यसँ सभ मि‍लि‍-जुलि‍ अखन धरि‍ रहला अछि‍। आगू बढ़ाएव आइक आवश्‍यकता छी। जाहि‍ समाजमे अखनो बरहवरना (बारह-वर्ण) भोज, बरहवरना बरियाती (वि‍वाहमे) बरहवरना कठि‍आरीक (जि‍नगीक अंति‍म क्रि‍या) चलैन अछि‍, कि‍ ओहि‍ समाजकेँ तोड़ि‍ सासु-पुतोहू, पि‍ता-पुत्रक संबंधकेँ माटि‍क बरतन जकाँ फोड़ि‍-फाड़ि‍ ि‍दअए। जाहि‍ समाजक बीच सभ संग मि‍लि‍ पावनि‍-ति‍हार, धार्मिक स्‍थानक नि‍र्माण केलनि‍, ि‍क ओकरा नेस्‍त-नाबूद कऽ दि‍अए? ओना मि‍थि‍लाक दुर्भाग्‍य कही आकि‍ देशक दुर्भाग्‍य, साठि‍ बर्ख पूर्वसँ लऽ कऽ हजारो बर्ख पूर्व धरि‍ परतंत्र रहल। परतंत्रताक जि‍नगी केहन होइ छै, कहब जरूरी नहि‍। ओना जाहि‍ रूपक वि‍देशी प्रभाव आन-आन क्षेत्रमे पड़ल ओहि‍सँ भि‍न्न मि‍थि‍लांचल प्रभावि‍त भेल। अदौसँ अबैत वैदि‍क ढाँचामे सजल समाज अखनो धरि‍, एते दि‍नक गुलामीक उपरान्‍तो सजल अछि‍। मुदा भूमण्‍डलीकरणक प्रभाव जते तेजीसँ प्रभावि‍त कऽ रहल अछि‍ ओहि‍सँ बँचैक लेल गंभीर सोचक जरूरत अछि‍। जँ से नहि‍ हएत तँ मि‍थि‍लाक बदसुरत दृश्‍य सामने नचए लगत। मि‍थि‍लाक संबंध जते पूरबी प्रान्‍त बंगाल (पछि‍म बंगाल सहि‍त बंगलादेश) आसाम (मेघालय सहि‍त आसाम) आ नेपालक तराइ इलाकासँ रहल ओते पछि‍मी आ दछि‍नी प्रान्‍तसँ नहि‍ रहल। घनगर अबादी होइबला इलाका रहने मि‍थि‍लाक बोनि‍हार (श्रमि‍क) बोइन करए नेपाल, आसाम आ बंगाल जाइत रहल अछि‍। पटुआ काटब, धोअब आ धान रोपब-काटब मुख्‍य काज रहल। जाहि‍सँ संग-संग रहैक, खाइ-पीवैक, नचै-गबैक अवसर भेटल। कला-संस्‍कृति‍मे मि‍श्रण भेल। जाहि‍सँ एक-दोसराक जि‍नगी मि‍लैत-जुलैत रहल अछि‍। आजुक संस्‍थागत शि‍क्षण व्‍यवस्‍थाक सदृश्‍य तँ संस्‍था कम छल मुदा पूर्वहि‍सँ गुरूकूल शि‍क्षण व्‍यवस्‍थाक चलैन आबि‍ रहल छल। वि‍देशी शासकक संग भाषा-साहि‍त्‍य सेहो आएल। सामाजि‍क व्‍यवस्‍थाक मजबूतीक चलैत ओ ओते तेजीसँ आगू नहि‍ बढ़ि‍ सकल जते तेजीसँ बढ़क चाहि‍ऐक। ओना राज-काजमे अपन स्‍थान बना लेलक। जनसंख्‍याक (मि‍थि‍लाक) अनुपातमे पढ़ै-लि‍खैक व्‍यवस्‍था नगण्‍य छल। कारण छल अखुनका जकाँ ने पढ़ै-लि‍खैक एते साधन छल आ ने पढ़ैक आवश्‍यकता बुझैत छल जीवैक लूरि‍ सीखि‍ लेब प्रमुख्‍य छल। जे परि‍वार (माए-बाप) सँ भेटि‍ जाइत छलैक। कि‍छु एहनो काज (लूरि‍) छलैक जे समाजोसँ भेटैत छलैक। जाहि‍सँ स्‍पष्‍ट रूपे दू भागमे वि‍भाजि‍त छल। पढ़ल-लि‍खल लोकक समाज आ बि‍नु पढ़ल-लि‍खल उत्‍पादक समाज। मुदा समाज हुनके (पढ़ल-लि‍खल) सबहक देखाओल रास्‍तासँ चलैत रहल। पढ़ल-लि‍खल लोकक बीच संस्‍कृत आ बि‍नु पढ़ल-लि‍खल लोकक बीच अपन बोली (जे वादमे भाषा बनल) चलैत छल। नव-नव शब्‍दक जन्‍म सेहो होइत छल। वैदि‍क संस्‍कृत सेहो जनभाषाक नगीचे छल मुदा धीरे-धीरे परि‍नि‍ष्‍ठि‍त बनैत-बनैत दूर हटैत गेल। जाहि‍सँ वि‍शाल जन-समूह संस्‍कृतसँ दूर भऽ गेल। जेकर प्रभाव जन-मानसक जीवनक अानो-आनो अंगपर पड़ल। कला-संस्‍कृतपर सेहो पड़ल। जाहि‍सँ लोक संस्‍कृत सेहो पनपल। संस्‍कृत समाजोन्‍मुखी नहि‍ भऽ परि‍वारोन्‍मुखी हुअए लगल। समाजक बीच पालि‍ (प्राकृत) भाषाक जन्‍म भेल। समाज-सुधारक आ धार्मिक सम्‍प्रदायि‍क जनमानसक बीच पालि‍ भाषाक प्रयोग केलनि‍। एहि‍ रूपे संस्‍कृतसँ पाि‍ल, अपभ्रंश होइत आगू मुँहे ससरल। अपभ्रंशसँ मागधी आ मागधीसँ बि‍हारी, उड़ि‍या, बंग्‍ला आ असमि‍या भाषाक वि‍कास भेल। बि‍हारी भाषाक अन्‍तर्गत भोजपुरी, मगही आ मैथि‍लीक वि‍कास भेल। बि‍हारक मैिथली भाषा क्षेकसँ पछि‍म उत्तर-प्रदेशक पूवरि‍या भाग धरि‍ भोजपुरी भाषा बढ़ल। दछि‍न बि‍हार (गंगासँ दछि‍न) मगही आ गंगासँ उत्तर नेपालक तराइ धरि‍ मैथि‍लीक वि‍कास भेल। ओना भाषाक संबंधमे कहल गेल अिछ जे- “चारि‍ कोसपर पानी बदले आठ कोसपर बाणी।‍” बि‍हारक तीनू भाषा क्षेत्रक अन्‍तर्गत क्षेत्रीय बोली सेहो पनपैत रहल अछि‍। गंगा-ब्रह्मपुत्र मैदानक बीच बसल ि‍बहार, बंगाल आ आसामक बीच माटि‍-पानि‍ आ जलवायुक (कि‍छु वि‍षमता छोड़ि‍) समता सेहो अछि‍। समतल भूमि‍ आ एकरंगाह जलवायु रहने खेती-पथारी, उपजा-बाड़ीमे सेहो समता अछि‍। धान सन प्रमुख अन्न तीनू राज्‍यक मुख्‍य उपज छी। एक रंगाह उपजा-बाड़ी आ खेतीक लूरि‍सँ खेति‍हरक एकरंगाह जि‍नगी बनल। खान-पान, आचार-वि‍चार चालि‍-ढालि‍, कला-संस्‍कृतमे एकरूपता आएल। मुदा प्राकृति‍क प्रकोप आ व्‍यापारि‍क अनुकूल भेने बंगाल आ मि‍थि‍लाक दूरी बढ़ौलक। जाहि‍ठाम मि‍थि‍ला क्षेत्र पोखरि‍क पानि‍ जकाँ असथि‍र (कहि‍यो काल पैघ भूमकम आ अन्‍हर-तुफान होइत) बनल रहल ताहि‍ठाम बंगाल प्राकृति‍क प्रकोपसँ अधि‍क प्रभावि‍त होइत रहल अछि‍। व्‍यापारि‍क अनुकूलता (समुद्री मार्गसँ) सँ वेदेशीक प्रभाव सेहो बढ़ल। कोनो भाषा-साहि‍त्‍य ओहि‍ठामक जि‍नगीसँ प्रभावि‍त होइत। एहि‍ दृष्‍टि‍सँ जेहन उर्वर भूमि‍ बंगला साहि‍त्‍यकेँ भेटल ओ मैथि‍लीकेँ नहि‍ भेटल। वि‍देशी कला-संस्‍कृतक प्रभाव जते बंगालपर पड़ल ओते बि‍हारपर नहि‍ पड़ल। ओना मि‍थि‍लांचलक प्राकृति‍क प्रकोप आ वि‍देशी शासनसँ ओते प्रभावि‍त नहि‍ भेल जते बंगाल भेल। मुदा अनुकूल जलवायु रहने मि‍थि‍लांचलमे मनुष्‍यक बाढ़ि‍ सभ दि‍नसँ रहल। जाहि‍सँ जनसंख्‍याक भार सभ दि‍न रहल। सामंतीक कुव्‍यवस्‍था आ जनसंख्‍याक भारसँ मि‍थि‍लांचल गरीबीक जालमे सभ दि‍न फँसल रहल। जाहि‍सँ कला साहि‍त्‍य, संस्‍कृति‍ सभ कि‍छु प्रभावि‍त होइत रहल। समाजक स्‍थि‍ति‍केँ आरो भयावह बनबैमे जातीय आ साम्‍प्रदायि‍क योगदान भरपूर रहल। टुकड़ी-टुकड़ीमे समाज वि‍भाजि‍त भऽ गेल। जेकर प्रभाव कला-संस्‍कृतपर सेहो नीक-नहाँति‍ पड़ल अछि‍। अर्द्ध-मागधीसँ नि‍कलल मैथि‍ली तेरहवीं-चौदहवीं शताब्‍दीमे ज्‍योति‍रीश्‍वर आ कि‍छु पछाति‍ वि‍द्यापति‍क रचनासँ प्रारंभ भेल। लोकक कंठ-कंठमे वि‍द्यापति‍ समाए अखनो गाबि‍ रहला अछि‍। ओना वि‍द्यापति‍ संस्‍कृत भाषाक राजपंडि‍त छलाह मुदा समाजक जनभाषा सेहो जनैत छलाह। जाहि‍सँ संस्‍कृत-मैथि‍लीक संग अवहट्ठ (जनभाषा)मे ‘कीर्तिलता आ कीर्तिपताका’ सेहो लि‍खि‍ कहलनि‍- “सक्कय वाणी बहुअन भावय‍” उन्नैसवीं शताब्‍दीसँ पूर्व धरि‍ साहि‍त्‍य सृजन कवि‍तेमे होइत आवि‍ रहल छल। आने-आने भाषा जकाँ मैथि‍ली गद्यक वि‍कास सेहो पछाति‍ भेल। साहि‍त्‍य सृजन मूलत: गद्य आ पद्यमे होइत। गद्यक चरम उपन्‍यास छी तहि‍ना पद्यक महाकाव्‍य। साहि‍त्‍यक आने वि‍धा जकाँ उपन्‍यासो छी। सामाजि‍क परि‍स्‍थि‍ति‍क दृष्‍टि‍सँ मैथि‍ली उपन्‍यासकेँ १९६०ई.सँ पूर्व आ साठि‍क पछाति‍केँ दू भागमे वि‍भाजि‍त कए आगू बढ़ैत छी। साठि‍क वि‍भाजन रेखाक पाछु देशक आजादी, ढहैत राजा-रजवाड़ आ भूमि‍-आन्‍दोलन प्रमुख कारण रहल अछि‍। साठि‍ ईस्‍वीसँ पूर्व मैथि‍लीमे नि‍म्न-लि‍खि‍त उपन्‍यासक सृजन भऽ चुकल छल। ‘ि‍नर्दयी सासु’ (१९१४), शशि‍कला (१९१५), पूर्ण वि‍वाह (१९२६) दुरागमन रहस्‍य (१९४६), कलयुगी सन्‍यासी (१९२१) रामेश्‍वर (१९१५), सुमति‍ (१९१८), मनुष्‍यक मोल (१९२४) चन्‍द्रग्रहन (१९३३) कन्‍यादान (१९३३), सोन्‍दयोपासनक पुरस्‍कार (१९३८), सुशीला (१९४३) असहाया जाया (१९४५), जैबार (१९४६) पारो (१९४६) नवतुरि‍या (१९५६), कुमार (१९४६), भलमानुस (१९४७), कला (१९४६), वि‍कास (१९४६), चन्‍द्रकला (१९५०), प्रति‍मा (१९५०), मधुश्रावनी (१९५६) वीरकन्‍या (१९५०), वि‍दागरी (१९५०), अनलपथ (१९५४), वि‍द्यापति‍ (१९६०), कृष्‍णहत्‍या (१९५७), रत्‍नहार (१९५७), आन्‍दोलन (१९५८), दुर्वाक्षत (१९५८), आदि‍कथा (१९५८), चानोदय (१९५९), बि‍हाड़ि‍पात-पाथर (१९६०), दुरागमन (१९४५), चामुन्‍डा (१९३३), मालती-माधव (१९३५) आजुक उपन्‍यास कलाक दृष्‍टि‍सँ भलेहीं उपरलि‍खि‍त सभ उपन्‍यासकेँ सफले नहि‍ कहब मुदा एहि‍ बातसँ इनकारो करब जे ओहि‍ उपन्‍यासकार सबहक संगे जेहन सामाजि‍क परि‍स्‍थि‍ति‍ छलनि‍ ओहि‍ अनुकूल नहि‍ अछि‍। हमरा सभकेँ एहि‍ बातक सदति‍ ध्‍यान राखए पड़त जे मैथि‍ली भाषा मि‍थि‍ला भूमि‍सँ जन्‍म नेने अछि‍ आ अखनो जीवि‍त अछि‍। पुरान भाषा मैथि‍ली रहि‍तहुँ आइ धरि‍ राजभाषाक रूपमे राज-दरवार नहि‍ पहुँचल, जे अवसर आइ भेटल, ओ प्रमाणि‍त करैत अछि‍ जे हम जीवि‍त भाषा छी। दुनि‍याँ अनेको एहेन राजभाषा अछि‍ जे मि‍थि‍ला क्षेत्र आ मैथि‍ली भाषासँ छोट अछि‍। बीसवीं शताब्‍दीक पूर्वाद्धसँ आरंभ भेल उपन्‍यास साहि‍त्‍य कखनो कुदैत तँ कखनो ठमकि‍-ठमकि‍ चलि‍ अखनो चलि‍ रहल अछि‍। जे माटि‍-पानि‍ बंगला, असामी आ उड़ि‍या भाषा-साहि‍त्‍यकेँ भेटि‍लै से मैथि‍लीकेँ नहि‍ भेटि‍ सकलै तँए जँ ओहि‍ सभ साहि‍त्‍यसँ पछुआएल तँ एहि‍मे आश्‍चर्य की? ओना साठि‍क दशकमे मि‍थि‍लो समाजमे मोड़ आएल मुदा साहि‍त्‍य ठमकले रहि‍ गेल। उपन्‍यास साहि‍त्‍यक वि‍षए-वस्‍तुमे बढ़ाेत्तरी अवश्‍य भेल मुदा जाहि‍ रूपे होएवाक चाही से नहि‍ भेल। जि‍नगीक मुख्‍य समस्‍या साहि‍त्‍यक गौण रूपमे आ गौण समस्‍या मुख्‍य रूपमे बनल रहल। मुदा सौभाग्‍यक बात छी जे नव-नव उपन्‍यासकार मि‍थि‍लाक सर्वांगीण रूपकेँ दृष्‍टि‍मे राखि‍ लि‍खि‍ रहलाह अछि‍। ओना मि‍थि‍लाक जे वास्‍तवि‍क रूप अछि‍ ओ अत्‍यन्‍त दयनीय अछि‍। जाहि‍ बीच रहि‍ साहि‍त्‍य सृजन अत्‍यन्‍त कष्‍टकर अछि‍। मुदा मि‍थि‍ला तँ वएह धरती छी जाहि‍ठाम एकसँ एक ऋृषि‍-मुनि‍ साधना कए अपन दृष्‍टि‍ देलनि‍ जे दुनि‍याँक सभसँ ऊपर अछि‍। ग्रामीण चि‍त्रण- ग्रामीण शब्‍दक दू अर्थ दू जगहपर होइत अछि‍। समग्र दृष्‍टि‍सँ ग्रामीण शब्‍दक अर्थ क्षेत्र-वि‍शेषक सभ कि‍छुसँ होइछ आ ग्रामीण परि‍धि‍मे (गामक सीमाक भीतर) ग्रामीण शब्‍द सि‍र्फ ग्राममे रहनि‍हार मनुष्‍यसँ होइछ। प्रश्‍न उठैत ग्राम संग ग्रामीण आकि‍ अगबे ग्रामीण? ग्राम संग ग्रामीणक संबंध ओतबे नहि‍ होइत जे हम अमुख ग्राम रहै छी। ग्राम ओहि‍ रूपे ससरैत आगू बढ़ै जाहि‍ रूपे दुनि‍याँ ससरि‍ रहल अछि‍। जँ से नहि‍ हएत तँ लोक भागि‍-पड़ा ओहि‍ठाम पहुँचत जाहि‍ठाम सुगमतासँ सुभ्‍यस्‍त जि‍नगी भेटि‍तै। ग्रामक उत्‍पादि‍त पूँजी माटि‍-पानि‍, गाछ-वि‍रीछ, नदी-नाला इत्‍यादि‍ मनुष्‍यक संग पूरैबला आर्थिक आधार छी। कोनो जुग अवौ आ जाओ, मनुष्‍यक जे मूल-समस्‍या अछि‍ ओ अनवरत रहवे करत। भलेहीं उन्नति‍ भेलापर सुगमता आओत, नहि‍ भेलापर जटि‍लता आओत। आजुक समयक मांग अछि‍ जे हमरा सबहक आर्थिक आधार ओहन बनए जे एक्कैसवीं शताव्‍दीक मनुष्‍य कहबैक अधि‍कारी बनी। अंतमे, जहि‍ना पैघ गहवरमे सैकड़ो जगह पूजा ढारि‍ गोसाँइ खेलल जाइत तहि‍ना आइक समाजक मांग साहि‍त्‍यक अछि‍। १.रमेश- गद्य कविता- डॉ. काञ्चीनाथ झा ‘किरण’क नामक अद्वैत मीमांसा २. जितेन्‍द्र झा- उपटैत गाम बसाओत बाबा ३. सुजीतकुमार झा- नेपालक राष्‍ट्रपतिक नेपाली प्रेम १ रमेश 1961- जन्म स्थान मेंहथ, मधुबनी, बिहार। चर्चित कथाकार ओ कवि । प्रकाशित कृति: समांग, समानांतर, दखल (कथा संग्रह), नागफेनी (गजल संग्रह), संगोर, समवेत स्वरक आगू, कोसी धारक सभ्यता, पाथर पर दूभि (काव्य संग्रह), प्रतिक्रिया (आलोचनात्मक निबंध)। गद्य कविता डॉ. काञ्चीनाथ झा ‘किरण’क नामक अद्वैत मीमांसा अहाँ स्वभिमानी छी, तँ किरण जी छी। जनमानसक पक्षमे सामाजिक छी, तँ किरणजी छी। अहाँ किरणजी छी, तँ मह-महाइत मिथिला छी। अहाँ मह-महाइत मिथिला छी, तँ निश्चिते कह-कह भुन्हूर सन किरणजी छी। अहाँ मानसिकता आ मोहविरा मे ‘सोइत’ छी, तँ किरणजी नहि छी। मोहविरा मे पञ्जी-प्रबन्धक ‘बाबू साहेब’ छी, तँ किरणजी नहिए टा छी। अहाँ वास्तव मे ‘जयवार’ छी, तँ चलू कहुना कऽ किरणजी छी। जँ ब्राह्मण-वर्गीकरण मे कत्तहु टा नहि छी अहाँ, तँ जरूर किरणजी छी। आ जँ दसो दिकपालमे सँ क्यो अहाँक पैरवीकार नहि छथि, तँ ध्रुव सत्य मानू, अहाँ आर क्यो नहि, किरणेजी टा छी। अहाँक मन-बन्ध सुमनजी-अमर जी सँ हो, तँ भऽ सकैए, संज्ञा रूपें अथवा मोहविरामे अहाँ साहित्यिक आ धार्मिक ब्राह्मण भऽ जाइ। अहाँक मन-बन्ध मधुपजी सँ हो, तँ निश्छल भक्त-हृदय मैथिल जीवनक लोकगायक अहाँकेँ मानबामे कोनो असौकर्य नहि। जँ मणिपद्ध जी सँ मन-बन्ध हो, तँ, अपना केँ मिथिलाक लोक-संस्कृति-चेताक उदात्त उदाहरण बूझि सकैत छी। आ जँ अहाँक मन-बन्ध किरणेजी टा सँ हो, तँ सय प्रतिशत मनुक्खक अलावा अहाँ आर किच्छु भैय्ये नहि सकैत छी। कविवर सीताराम झाक अन्योक्ति-वक्रोक्ति आइयो मिथिलाक जड़ता-जटिलतापर मुङरी पटकि रहल अछि। अपन मुक्तिक प्रसंग तकैत आइयो राजकमल मिथिलाक ‘महावन’ मे अहुरिया काटि रहल छथि। बाबा बैद्यनाथकेँ पाथर कहैत आइयो किरण-शिष्य यात्रीक अनवरत ब्रह्माण्ड-विलाप जारी अछि। धूमकेतु ‘मनुक्खक देवत्वे’पर एखनो ‘रिसर्च’ कऽ रहल छथि। मुदा साक्षात् किरणजी आइयो मनुखताक उपेक्षापर गुम्हरैत। पुरातनपंथीकेँ कान पकड़ैत/ माटिक महादेवकेँ छोड़ि मनुक्ख-पूजनक-सुस्पष्ट  उद्घोषणा कऽ रहल छथि। अहाँ खट्टर कका छी, तँ, माङुरक झोड़सँ चरणामृत लऽ सकैत छी। मुदा किरणजी जकाँ माङुरक ओही झोड़सँ सर्वहारा वर्गक अरूदा बढ़ेवाक बैदगिरी नहि कऽ सकैत छी। अहाँ कञ्चन-जंघासँ कूच-विहार धरिक यात्रा कऽ सकैत छी, मुदा डोमटोलीसँ मुसहरी धरिक नहि। अहाँ समाजिक सरोकारमे सुधारवादी भऽ सकैत छी, मुदा, किसान-आन्दोलन केँ मिथिलाक जमीनपर उतारि परिवर्त्तनकामी नहि। अहाँ भाङ पीबि वसंतक स्वागत करब, तँ, अहाँ केँ, बताह कहबामे हुनकर संघर्ष-गीतक भास कनियो बे-उरेब हेबाक प्रश्ने कहाँ अछि? जहिना रूसोक पष्ठभूमि बिना फ्रांसीसी क्रांति संभव नहि छल, तहिना ‘मधुरमनि’क पृष्ठभूमि बिना ‘जोड़ा-मन्दिर’क अस्तित्व संभव कहाँ छल? ‘जगतारानि’ नहि तँ ‘बाँसक ओधि’ की? माटिक अभ्यर्थना नहि आ जनोन्मुखी सोचक सर्जना नहि तँ, आलोचनाक राज हंसक धोधि की? ओ प्राचीन गीतक ‘लाउड-स्पीकर’ बनि सकैत छलाह, नवीन गीतक सी.डी.क उद्गाता नहि। ओ राज-सरोवरक हंस बनि नीर-क्षीर-विवेक(?) सँ आभिजात्य मीमांसाक पथार लगा कऽ साहित्यालोचनक खुट्टा गाड़ि सकैत छलाह। मुदा नव-चेतनाक प्रगति-शील गीतक गाता आ ज्ञाता नहि। ओ किरणजीकेँ काव्योपेक्षाक दंश दऽ सकैत छलाह, मुदा हुनका काल-निर्णय आ आगत-पीढ़ीक ‘मूड’ अज्ञात छल। ओ वस्तुतः ‘शास्त्रीय’ छलाह, आ किरणजी ‘तृणमूल’क कार्यकर्त्ता। ओ ‘उरोज’ केँ सरोजक उपमान बना श्रृंगार-काव्यक प्राचीन परंपराकेँ सम्पुष्ट कऽ सकैत छलाह। मुदा धानक उरोजमे दूध भरबाक सामर्थ्य हुनका कतय? ओ हुनकर जीवनक जड़त्व आ साहित्यक सीमा छल। आँहाँ भासा-मंचपर लोक-चेतनाक सर्जक छी-तँ किरणजी छी। साहित्यिक-मंचपर सामाजिक-चेतनाक पोषक छी-तँ किरणजी छी। संस्कृतिक मंचपर जन-संस्कृतिक गायक छी- तँ किरणजी छी। राजनीतिक मंचपर दिशाहारा-वर्गक पुष्टिवर्द्धन मे ‘महराइ’ गबैत छी-तँ किरणजी छी। विद्यापतिक-मंचपर जनवादी गीत-संस्कृतिक उद्घाटक छी-तँ किरणजी छी। अहाँक जीवन-दर्शन सुचिंतित ऊर्ध्वगामी अछि-तँ किरणजी छी। जीवन आ साहित्य मे समरूप दृष्टिकोण हो-तँ अहाँ किरणेजी टा भऽ सकैत छी। २ जितेन्‍द्र झा उपटैत गाम बसाओत बाबा सुखी सम्‍पन्‍न जीवन बितएबाक ललसा लऽ कऽ लोक अपन गाम छोडि परारहल अछि शहर दिस । वैश्‍वीकरणक अन्‍हर विहाडिमे ओ अपन जन्‍मस्‍थानके महत्‍व नहि बुझऽ चाहैत अछि या कही बुझियोकऽ आंखि मुनि लैत अछि । गामक परती ओकरा विरान लागऽ लगैत छै , ओतुक्‍का फुलबारीमे ओ काँट मात्रे देखैछ अछि । गमैया जीवनसं जनमल एहने वितृष्‍णा देखएबाक प्रयास कएल गेल अछि मैथिली टेलि श्रृंखला बाबामे । बाबाक लेखक निर्देशक रमेश रञ्‍जन कहैत छथि मिथिलाक गाम उपटि रहल अछि । बाबा नेपाल टेलिभिजनसँ शनिदिन भोरमे ९ः३० बजे आ रविदिन १ः३० बजे प्रसारण भऽ रहल अछि । ग्रामीण जीवनक नीक बेजाय पक्ष आ बाबा श्रृंखलासं सम्‍बन्‍धित रमेश रञ्‍जनसँ कएएल गेल बातचीतक संक्षेप । बाबाक कथानक की छै ? मिथिलाक वर्तमान अबस्‍था एकर मूल विषयवस्‍तु छै । मिथिलाक ग्राम्‍यजीवनमे दूटा पीढी बीचमे दूरी देखल गेल अछि । दू रंगक सोच छै । पीढीगत अन्‍तर छै । एकटा पीढी छै जकरा गाम बड नीक लगैत छै, ओतुक्‍का जनजीवन प्रिय लगैत छै, संस्‍कार संस्‍कृति नीक लगैत लगैत छै । गाममे ओ सहज अनूभव करैत छै । एकटा पीढी एहन बनि रहल छै जकरामे गाम प्रतिक विकर्षण छै । ओत्तऽके जीवन जटिल लगैत छ, श्रम करबाक तरिका बहुत बेजाय लगैत छै । ओइठामक स्‍थायी सम्‍पत्ति बेकार लगैत छै । एकटा नान्‍हिटा गामक विकट जीवनके ओझराकऽ राखऽके औचित्‍य नइैं बुझैत छै । इएह द्वन्‍द्व नाटकमे केन्‍द्रिय अन्‍तरवस्‍तु छै । मिथिलाक ग्राम्‍यजीवन आ बाबाक विषयवस्‍तुमे कतेक समानता छै ? मैथिली भाषा एकटा माध्‍यम मात्र छै । बाबा सिरियलके स्‍थान चयन, ग्राम्‍य सौन्‍दर्यता, आम आदमीक संघर्ष आदि पीडाक बात छै ओत्तऽ । आम खादमीक हास्‍य विनोद, ओ कखन खुशी होइत छै, कखन दुःखी होइछै । सामाजिक संरचनासं निःशृत जे बात छै से कथानकमे बुझाइत छै । पात्रके बाजब, चलब, भेषभूषा, आभूषण सभमे मिथिलाक झलक भेटैत छै । तें ई पूर्णरुपें मैथिली सिरियल छै । नेपालक लाखो मजदुर विदेशमे श्रम बेचबालेल बाध्‍य अछि, देशमे अवसर नहि छैक । की ओहने पलायनके देखएबाक प्रयास भेल अछि ? एकर कथाक ओ अंश मात्र छै । ओ आवश्‍यक छै या नहि से बहसके विषय हेतै । लेकिन एकटा बात निश्‍चित छै जे कोनो देशके श्रमिक बाहर जाकऽ श्रम करए से नीक  नहि मानल जा सकैत छै । मिथिलाक धर्ती उर्वर छै आ ओत्तऽके सपूतसभ उंट, भेडा चरबैछै । ओ मिथिलामात्रे नहि नेपालोक लेल नीक नहि भऽ सकैत छै । मुदा मुख्‍य बात ई जे सम्‍पूर्ण रुपमे ग्रामीण जीवनक वैशिष्‍टय अप्रिय लागऽ लागल छै एहि पीढीके । आ फरक ढंगके स्‍वप्‍नील संसारदिस आकर्षित भऽ रहल अछि । गाममे जीवीका चलाएब कठीन नहि छै । दूटा गाय पोसिकऽ, पाँचटा बकरी पोसिकऽ, हर चलाकऽ, अनकर आरिपर घास काटिकऽ आ खेत बटैया कऽ कऽ ओ जीवीका चला सकैत अछि । सामान्‍य आदमीक लेल बहुत रास साधन छै गाममे । मुदा शहरमे सामर्थ्‍यवानक लेल मात्र साधन छै । ओहि आकर्षणमे भोतियाकऽ सभ किछु बिसरि गेल अछि । गाम किया ने नीक लगैत छै तकर  विश्‍लेषण नहि करैत छै बस भागऽकेे कोशिस करैत छै । ओ श्रमके लेल मात्रे भागि रहल छै एहन बात नहि । ओत्तऽ उत्‍पादनक सम्‍भावना केहन छै ? ओत्तऽके सम्‍भावना ओ नहि देखैत छै । ग्राम्‍यजीवनमे शिक्षा, स्‍वास्‍थ्‍य, रोजगारी आदिक अवसर नहि छैक, एहनमे पलायनके स्‍वभाविक मानल जा सकैत अछि या नहि ? समस्‍या बहुत रास छै, मुदा समाधान की जे गाम छोडिकऽ भागि जाइ । कत्तऽ जायब, गामसं जनकपुर, जनकपुरसं काठमाण्‍डू आ ओत्तऽसँ न्‍यूयोर्क आ वाशिंगटन ़़तैके बाद ? विकल्‍पके अन्‍त कत्तऽ छै । गाम उपटि रहल छै । मिथिलामे शहर छइहे नहि, एकर आधारे गाम छै । एहिके मतलब मिथिला उपटि रहल छै । हम तै रुपमे ओकरा देखबाक प्रयास कएने छी । एखनुक मैथिली सिरियल जनशक्ति आ तकनीकी दुनू दृष्‍टिएँ कमजोर देखल गेल अछि । बाबा सिरियल ओकरे निरन्‍तरता त नहि ? बाबा सिरियल नेपाल टेलिभिजनक लेल बनाओल गेल अछि । एहिमे नेपाल टेलिभिजनक प्राविधिक सहयोग लेल गेल अछि । मैथिली क्षेत्रक चर्चित कलाकारसभ एहि सिरियलमे सहभागी छथि । मिथिला नाट्य कला परिषद्क कलाकार रंगकर्ममे बेस चर्चित अछि । तें एहि सिरियलमे ओतुका कलाकारके समावेश कएल गेल अछि । सुनिल मिश्र, राम नारायण ठाकुर, मदन ठाकुर, घनश्‍याम मिश्र, रविन्‍द्र झा, रञ्‍जु झा, परमेश झा, राम कैलास ठाकुर सहितके कलाकार एहिमे अभिनय कएने छथि । कथा, पटकथा, संवाद आ निर्देशन हम स्‍वयं कएने छी । ३ सुजीतकुमार झा नेपालक राष्‍ट्रपतिक नेपाली प्रेम लोककें किया नहि पचि रहल ! काठमाण्‍डूमे सम्‍पन्‍न अन्‍तर्राष्‍ट्रीय मैथिली सम्‍मेलनमे नेपालक राष्‍ट्रपति डा. रामवरण यादवकेँ भाषण फेरसँ विवादमे आएल अछि । राष्‍ट्रपति डा. रामवरण यादवकेँ अपन सम्‍बोधन नेपालीमे देलाक बाद मैथिल सभबीच कड़ा आलोचना भऽ रहल अछि । साहित्‍यकार डा. रेवतीरमण लाल कहैत छथि–मैथिलीमे बजला सँ डा. रामवरण यादवजीकेँ राष्‍ट्रपति पद नहि छिन्‍ना जइतैन्‍हि जे डर भऽ गेलन्‍हि । अखनो नेपालमे बड़का लोक सभ लग नेपाली बाहेककेँ महत्‍व नहि अछि एकर छोट उदाहरण राष्‍ट्रपतिक भाषण सँ लेल जा सकैत अछि ओ कहलन्‍हि । फेसबुक पर चारि दर्जन सँ बेसी व्‍यक्ति राष्‍ट्रपति यादवकेँ नेपाली भाषा प्रेमकेँ कडा आलोचना कएलन्‍हि अछि । सुरज यादव नामक एक व्‍यक्ति अपन फेसबुकमे लिखैत छथि — नेपालमे एखनो राजा जिवैत छथि तेकर गन्‍ध राष्‍ट्रपतिक भाषणमे भेटल । ओ आगा लिखैत छथि–नेपालक गणतान्‍त्रिक राष्‍ट्रपति सँ लोककेँ  अपेक्षा छैक जे सम्‍पूर्ण देशक लोक बनय, सभ जाति, धर्म, भेष भुसा सँ प्रेम करय मुदा डा. रामवरण यादवकेँ कार्यकालमे शायद पुरा नहि हैत लगैत अछि । राष्‍ट्रपति डा. यादव धोती कुर्तामे सजि कऽ कार्यक्रम अवितथि हुनका कोनो कानून नहि रोकैत । फेर मैथिलीमे भाषण करितथि तऽ तइयो नहि कोनो कानून रोकैत कानूनक जानकारसभ कहैत छथि । अन्‍तर्राष्‍ट्रीय सम्‍मेलनमे सहभागी रहल प्राध्‍यापक विजय दत्त कहैत छथि–नेपालक संस्‍कृति मन्‍त्री मिनेन्‍द्र रिजाल अपन भाषण शुरु करय सँ पहिने बाजल छलथि –हमरा मैथिली नहि बाजय अवैत अछि तएँ नेपालीमे बजैत छी अहुना राष्‍ट्रपति कएने रहितैथ तऽ संतोष होइत मुदा सच्‍चा मैथिल भेलाक बादो ओ नेपालीमे भाषण कएलन्‍हि लोककेँ पचि नहि रहल अछि । राष्‍ट्रपति होवय सँ पहिने ओ प्रायः कुर्ता पाइजामा आ गमछा लगौने रहैत छलथि मुदा राष्‍ट्रपति भेलाक बाद दौरा सुरुवाल आ ढाका टोपी हुनकर पहिरन बनि गेल अछि । कहियो काल पाग आ अन्‍य टोपी पहिरहो परैत छन्‍हि तऽ टोपीए परसँ लगा लैत छथि जे टोपी हटि गेल तऽ हुनक राष्‍ट्रपति पद कहि नहि हटि जएतन्‍हि । अमेरिकी राष्‍ट्रपति बराक ओवामा किछुए दिन पूर्व भारत आएल छलथि । भारत भ्रमणक क्रममे हुनका जतय भाषण देवय परलन्‍हि कनिको नहि कनिको हिन्‍दी वजवे करैत छलथि । भारतमे हिन्‍दीमे वजला सँ हुनक पगरी तऽ नहिए छिन्‍यलन्‍हि संगहि पूरे भारत वासीके हृदय जीत लेलन्‍हि । कनी अमेरिकी राष्‍ट्रपति सँ इम्‍हरके नेतासभ सिखथि ? अहि ठाम तऽ लोक अपने भाषा विसरि जाइत अछि । महाराज महेश ठाकुर कँालेज दरभंगाक प्राध्‍यापक एवं साहित्‍यकार चन्‍द्र मोहन झा ‘पडवा’ कहैत छथि— नेपालक राष्‍ट्रपतिक मैथिली सम्‍मेलनमे नेपाली भाषामे भाषण करवाक की वाध्‍यता छलन्‍हि हमरा नहि वुझल अछि यदि नेपालक कानूनमे राष्‍ट्रपति सभ भाषामे वाजि सकैत अछि इ वुझलहु तऽ वहुत निराशा भेल । राष्‍ट्रपति होवय सँ पूर्व कतेको वेर डा. रामवरण यादवकेँ भाषण मैथिलीमे सुन्‍ने छी ओ जानकारी देलन्‍हि । राष्‍ट्रपति यादवकेँ एहनो रुप राष्‍ट्रपति डा. यादव एक दिस मैथिली कार्यक्रममे धोती कुर्ताक स्‍थानपर नेपाली पोशाक दौरा सुरुवाल पहिर कऽ पहुचलथि आ नेपाली भाषामे भाषण कएलन्‍हि तऽ एक दिस मैथिलीसभमे व्‍यापक आलोचना भऽ रहल अछि । राष्‍ट्रपति यादवकेँ राष्‍ट्रपति होवय सँ पूर्व मैथिली आन्‍दोलनीक भूमिका सेहो रहल अछि । नेपालमे मैथिलीकेँ कात कऽ हिन्‍दी भाषाके वढावा देने वातकेँ ओ कडा विरोधी छलथि । अहिकेँ लेल जगह जगह ओ वजैत छलथि । राष्‍ट्रपति भेलाकवादो अपन गृह नगर जनकपुरमे एलाकवाद कोनो कार्यक्रममे सहभागि होइत छलथि तऽ मैथिलीएमे भाषण कएने छथि । काठमाण्‍डू स्‍थित हुनक निवासमे जलपानक व्‍यवस्‍था चुरा दही चिनी आचार कएलगेल अछि । एकरो पाछु  हुनकाद्वारा अपनाके मैथिल वुझव रहल जानकारसभ कहैत छथि । मैथिल सभक प्रियगर जलपान रहल चुरादही राष्‍ट्रपति निवासमे पहुँचयवला हरेक व्‍यक्तिके देल जाइत अछि । नेपालक सभासद एवं सार्वजनिक लेखा समितिक सभापति रामकृष्‍ण यादव कहैत छथि— राष्‍ट्रपतिक आदेश पर ३ सय ६५ ओ दिन राष्‍ट्रपति निवासमे चुरा दहीक व्‍यवस्‍था कएलगेल अछि । राष्‍ट्रपति यादवके पसन्‍दीदा जलपान चुरादही छन्‍हि आ ओ वहुत मन सँ लोककेँ जलपान सेहो करवैत छथि । १. विनीत उत्पल- दीर्घकथा- घोड़ीपर चढ़ि लेब हम डिग्री -आगाँ २. शंभु नाथ झा ‘वत्स’ १ विनीत उत्पल- दीर्घकथा- घोड़ीपर चढ़ि लेब हम डिग्री - तेसर भाग ई जरूर फस्र्ट जनवरीक गप छल। मुदा, जहिना-जहिना आलोक बाबूक नाम होयत जाहि छल, ताहिना-ताहिना कतेको लड़की के फोन आबहि लगलाह। घर के सभ गोटे तंग रहैत छल जे आलोक बाबू दिन भर की करैत अछि। समय-काल बीतैत जाइत छल। लॉ के सेकेंड ईयरक परीक्षा भऽ गेल आआैर कॉलेज मे सबसे नीक नम्बर आलोक बाबू के आयल। थर्ड पार्टक क्लास शुरू भऽ गेल छल। मुदा आबै बला समयक देखैत क्षमता तऽ हुनका मे नहियै छल। एक रात दू बजैत रहै। घरक सभ कियो सुतल छल। आलोक बाबू एक बजे राति धरि पढ़ि के बिछौन पर गेने छल आओर किछु सोचैत-बिचारैत नींद के बजबैत छलाह। तखने दरवाजा के कियो खटकटायल। दू बजे राति मे ओहिनो कियो धक्का दियै तऽ लोक-बेद ते यैह नहि बुझता जे चोर-उचक्का किछु कऽ रहल अछि। मुदा, ओतय मिली ठार छल। किवाड़ी आलोक बाबू खोल लक। मिली कहलक हमर घर मे पार्टी छल आओर अहां से कतेक दिन से भेंट नहि भेल छल, ताहि से हम सोचलहुं जे अहां से भेंट कऽ आबि। अहां के देखि लेलहुं, आब हम जाइत छी। ई गप कहि के मिली तऽ चलि गेल मुदा घर मे तूफान आनि देलक। मिली चारि घर बाद रहि बला चंद्रभूषण बाबूक बेटी छल। ओ लॉ मे पढ़ैत छल। आलोक बाबू से जूनियर रहैत कॉलेज मे। मिथिला मे ते जानते छियै। ककरो बेटी ओहिनो कोनो लड़का से गप कऽ लैत अछि, ते की ओयत अछि। तखन ई राति मे कियो मिलहि लेल आबि तऽ की होयत, सोचहि सकैत अछि। पूरा मोहल्ला जानि गेल जे आलोक बाबू से मिली राति मे भेंट करहि लेल आयल छल। जानतै छियै कहल जाइत अछि दीवारो कऽ कान होयत अछि। आस-पड़ोसक लोग-बेद पुछैत छल आओर कानफुसकी करैत छल, जे मिली के आबैक प्रयोजन की छल। घरक लोक तऽ ई गप जानतै छल। हुनको कान मे गेल जे आसपड़ोसक लोक बाजैत छलाह। आलोक बाबूक मां के अहां चिह्नतै छियै। हुनकर तरबा के लहर मगज पर रोज चढहि लागल। रोज दूटा अनटेटल गप आलोक बाबू के सुना दैत छल। ओहि काम हुनकर मां सुनलक जे लॉ करने से आलोक बाबू वकील तऽ बनि जायत मुदा, जखन कोनो केस आयत तखैन नहि ओ वकालत करताह। अहि काज से तऽ नीक पत्रकार होयत। जहिना कियो किछु अनटेटल करैत, ओ अखबार मे छापि दैत। तखन लोक के मालूम होयत जे इज्जत बनाबै मे केकरो जिंदगी बीति जाइत अछि, ओकरा माटि मे मिलाबै मे कोनो टाइम नहि लागैत अछि। आब घर मे दोसर गप होय लागल। आलोक बाबू के पत्रकार बनहि लेल पत्रकारिता के कोर्स करैक गप होय लागल। कियो कहैत छल जे रायपुरक कोनो संस्थान मे हुनकर नाम लिखा दियो। कियो कहैत छल जे भोपालक माखनलाख चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय नीक अछि। कियो राय दैत छल जे दिल्ली पत्रकारिता के गढ़ अछि, आलोक बाबू के ओतय पठा दियो। मां ते मां अछि। हुनका लागल जे हमर सभटा लऽर जऽर बाहरे पढ़ैत अछि आओर हुनकर मां-बाप खूब गप्प दैत अछि। ताहि सं हम आलोक कऽ दिल्ली भेज दैत छी आओर ओतय ई पढ़ताह। आखिरकार एक दिन एहन आयल, जे आलोक बाबू बड़ मनसुआ लऽ कऽ बिलासपुर एक्प्रेस से दिल्ली उतरलाह। कियो चिन्हार तऽ नहि छल दिल्ली मे, से रेलवे स्टेशन से उतरि के पहाड़गंजक साइड के होटल मे टहरलाह। रायपुर से दिल्ली के किछु पत्रकारिता संस्थानक पता आओर फोन नंबर संगे लेलहि आयल छल। दोसरे दिन से सब ठाम घुरहि लगलाह। कनाट प्लेसक कस्तूरबा गांधी रोड पर अछि भारतीय विद्या भवन। ओतहि गेला पर मालूम भेल जे ओतय एडमिशन लैके तारीख अछि जे दू दिन बात खत्म भऽ रहल अछि। ओ आव नहि देखलक ताव, चार सौ टका मे फार्म कीन कै भरि देलैक। पंद्रह दिन बाद ओकर इंट्रेस परीक्षा अछि। ओहो अंग्रेजी मे। दिल्ली विश्वविद्यालय के साउथ कैंपस सेहो गेलाह। ओतोको फॉर्म भरि देलक। माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय के सेहो एकटा सेंटर नोएडा में छल, ओतौको फार्म भरहि लेल आलोक बाबू नहि बिसरल। ता धरि जामिया मिल्लिया इस्लामिया से पत्रकारिता लेल फार्म नहि भेटैत छल। अहि बीच ओ अप्पन डेरा ताकि लेलक। होटल मे कतेक दिन रहतियैथ। दक्षिण दिल्ली मे एकटा गाम अछि, बेरसराय। पुरैनका जेएनयू कैंपसक आगू आओर आईआईटी के बीच ई गाम अछि। ओतय डेरा लेलखिन। किराया छल 16 सौ टका महीना। आलोक बाबू की करतियैथ। डेरा की छल। एकटा कमरा बस। तीन मंजिल के बिल्डिंग छल। ओहि मे कम से कम नहि तऽ 40 टा कमरा रहैक। सभमे बिहार, बंगाल, झारखंड, उत्तरप्रदेश से दिल्ली आयल लड़का सभ रहैत छल। सभक सपना छल जे दिल्ली से जायब तऽ किछु बनि के जायब। ओहि बिल्डिंग के एक-एक फ्लोर पर दू टा शौचालय आैर स्नानघर बनल छल। सभ कियो बारी-बारी से ओहि मे जाइ के नित्यक्रिया से निवृत होयत छल। सभठाम के फार्म भरि के आलोक बाबू तैयारी करै मे जुटल। खूब जीके याद करैत छल। अंग्रेजी में कॉमिल बुल्के से सभटा मीनिंग याद कऽ लेलक। नहि हुनका राति पता चलैत छल आओर नहि दिन। बस एक्के टा धुन छल जे पत्रकार बनैक अछि ते हम बनबे करब। कोनो-कोनो विषय पर लिखहि के खूब प्रैक्टिस सेहो करैत छल। कनि-कनि अंग्रेजी बाजैक कोशिश सेहो आलोक बाबू करैत छलाह। आखिर भारतीय विद्या भवन में परीक्षा देलहि लेल गेल। लागल सभटा सवाल ते जानैत छियै। मुदा, हुनका मे से अंग्रेजीक लऽ कऽ एकटा झिझक रहैक, ताहि से ओ सोचैत छल जे इंट्रेस परीक्षा मे पास करै के कोनो सवाले नहि अछि। मुदा, बगल बला रूम मे रहै बला राजीव कहलक, 'ओ आलोक बाबू, मानि लियौ जे अहां इंट्रेस टेस्ट पास नहि करने छी, मुदा एक बेर नोटिस बोर्ड पर अपन नाम आ रोल नंबर देखहि मे की जाइत अछि।" 'ना, हम ओते अंग्रेजी नहि जानैत छी, जे अंग्रेजी दिल्ली के लोक बाजैत अछि।" 'हौ, अहां बूर छी, आंय यो दिल्ली बला के कोन अंग्रेजी आबैत अछि। अहांके के कहि देलक।" 'नहि हौ, परीक्षा देने गेल रहौं ते ओतय ते सभ कियो हिन्दी मे बाजैत छल।" 'अहां ध्यान से सुनने रहि", राजीव पूछलाह। 'नहि, मुदा ओ सभ अंग्रेजी में बाजैत रहि" 'ते सुनू, दिल्ली बला के फोकस छाड़हि लेल खूब आबैत अछि। ई सभटा जे अंग्रेजी बाजैत अछि, ओ कोनो अंग्रेजी बाजैत अछि। टिपिर-टिपिर करैत अछि, मुदा सभटा गलते बाजैत अछि। केकरो ग्रामर अहां से नीक होयत ते अहां हमर नाम पर कुकुड़ पोसि लेब।" राजीवक गप सुनहि के आलोक बाबू के लागल जे हुनकर गप मे दम अछि। 'जानैत छियै आलोक बाबू, हिन्दी के पैघ पत्रकार आआर साहित्यकार अछि कमलेश्वर, ओ कहैत अछि जे दिल्ली बला के अंग्रेजी डेढ़ मिनट के होयत अछि। डेढ़ मिनट के बाद हुनकर भाषा हिन्दी भऽ जाइत अछि। ताहि से दिल्ली के अंग्रेजी से नहि घबराऊ", राजीव ई कहि के एकटा सवाल आगू कऽ देलक। 'अहां कतेक सवाल लिखने रहि।" 'सभटा, मुदा दू टा आब्जेक्टिव सवाल गलत भऽ गेल छल।" 'तब अहां कियै घबराइत अछि", राजीव बजलाह। 'अहां जरूर पास करल होयब।" ता धरि आओर रूमक स्टूडेंट बाहर आबि गेल आओर आलोक बाबू के कहि लागल जे अहां रिजल्ट देखहि लेल जाऊ। अहांक जरूर सलेक्शन भेल होयत। आलोक बाबू के एकरा बादो साहस नहि भेल जे ओ अकेले भारतीय विद्या भवन जाइके अप्पन रिजल्ट देखतियै। हुनकर चेष्टा देखहि के राजीव संग भऽ गेल जे दूनू गोटे रिजल्ट देखहि लेल जायब। बेरसराय से 615 नंबरक बस पकड़ि के कनाट प्लेस अइलाह आओर फेर ओतय स भारतीय विद्या भवन। फिल्म 'थ्री इडियट्स" मे जैसे राजू रस्तोगी आैर फरहान अख्तर अपना नाम रिजल्ट के आखिर मे देखैत अछि, ताहिना आलोक बाबू देखहि लगलाह। चारि पन्ना मे रिजल्ट चस्पा छल। आखिर के तीन पन्ना मे रिजल्ट देखहि के राजीव से आलोक बाबू कहला, 'यौ हम कहैत रहि ने जे हम पास न कऽ सकब। देखियो अहि लिस्ट मे नहि तऽ हमर नाम अछि आओर नहि कतो हमर रोल नंबर अछि।" 'अहां पूरा लिस्ट देखलियै", राजीव पूछलाह। 'जी" 'अहां लिस्टक तीन पन्ना मे रोल नंबर तऽ देखलियै, मुदा शुरू बला पन्ना नहि देखलियै। अहांक नाम तऽ पहिलुक पन्ना मे अछि आओर अहांक पोजिशन पांचवां अछि।" ई सुनि के आलोक बाबू ठामे ठार रहि गेल। ओ सोचहि लगलाह जे की ओ एतेक काबिल अछि जे सैकड़ो स्टूडेंट के पछाड़ कऽ पांचवां स्थान पर रहब, ओहि मे जे परीक्षा अंग्रेजी मे भेल छल। जारी... २ शंभु नाथ झा ‘वत्स’ अतीतक घटना/ सपना/ कोशीक प्रलंकारी बाढ़िमे भाँसल एकटा लड़कीक सत्य कथा मनोरमा आइ उठैमे देर कऽ देलक। आइ आँखि खुजिए नै रहल छलैक। देबारक घड़ीपर नजरि गेलै। साढ़े छ बजि गेल। हड़बड़ाइत मनोरमा नल लग जाए आँख़िमे पानिक छिटा मारलक। झटसँ पेस्ट आ ब्रश लऽ कए मुँह धोअए लागल। तावत रजनीशक अवाज सुनाए पड़लैक- मनोरमा, चाह...। आँए। रजनीश पहिनहिए उठि गेल छल। फेर रजनीशक आवाज होइ छैक। -हे एहिठाम टेबुलपर चाह धरि देलहुँ हेँ। मनोरमा मुँह-हाथ धोए कुरूड़ कऽ कमरामे प्रवेश करै छथि आकि रजनीश तैयार भऽ कऽ बाहर निकलि कऽ कहलक- हम जा रहल छी। हमर बस छूटि जाएत। अहाँ उठैमे देर कए देलौं- रजनीश बाजल। -नाश्ता कऽ लिअ, बना दैत छी।मनोरमा बजलीह। - हम नास्ता बना कऽ खा लेलौं। अहूँ लेल धऽ देने छी। रजनीश बाजिते-बाजिते बाहर भऽ गेल। मनोरमा सकपका गेलीह। आइ हमरा की भऽ गेल छल। आँखिए नहि खुजि रहल छल। रजनीश कखन उठि कऽ सभ काजसँ निवृत भऽ गेल। आ अपनहि सँ चाह सेहो बना लेलक आ नाश्ता सेहो? हमरा नहि उठौलक। कत्तौ मोनमे दुःख तँ नहि भऽ गेलैए। नहि दुःख तँ आइ धरि नहि केलक। हमहुँ रजनीशकेँ खुश करबा लेल कोनो कसर नहि राखलौं। मुदा आइ की भऽ गेल छल जे उठैमे देरी भऽ गेल। हँ रातिमे सपना देखलहुँ। सपना भोरे-भोर धरि देखलहुँ। तँ उठबामे देर भऽ गेल। रजनीशक स्कूल दूर पड़ैत छैक। तँ रोज साढ़े पाँच बजे उठि जाइ छैक। हमरो निन्न साढ़े पाँचसँ पहिने टूटि जाइत छल। मुदा आइ हमरा की भऽ गेल छल जे आँखिए नहि खुजल। रजनीश हमरा उठएबो नहि केलक। मनोरमा रातुक सपनाक स्मरण कऽ अतीतमे चलि गेलीह। महाकाल रात्रि छल। कुशहा बान्ह टूटि गेलैक। कोशी माए रोद्र रूप धारण कऽ भयानक गर्जन करैत गामक-गाम अपना उदरमे समाबए लगलीह। कतौक नारी-पुरूषक सुतलेमे प्राण पखेरू उड़ि गेलैक। बच्चा-माल-मवेशी मरल भाँसि-भाँसि कऽ बहै लागल, सुपौल, मधेपुरा, सहरसाक किछु भाग आ पूर्णियाँ आ अररिया जिलाक पश्चिम भाग सेहो डूबि गेल। दू मंजिला मकान सभ तँ कतोके उलटि गेल। फूस घरक कथे कोन। त्रिवेणीगंज बाजार, मुरलीगंज बाजार तँ बर्बाद भऽ गेलैक। महाप्रलयकालीन धारा भऽ जखन कोशीक धारा दक्खिन दिस बढ़ल तँ गाम-घर, बाग-बगान सभटा नष्ट भ्रष्ट भऽ गेलै। विशाल-विशाल गाछ-बिरीछ सभ धराशायी भऽ गेलै। चारू दिस पानि-पानि नजरि आबए। कतौ-कतौ बाँस भरि पानि। पक्काक मकानपर बचल-खुचल आदमी सभ आश्रय लेलक। मनुक्खो मे जे राक्षसी प्रवृतिक मनुक्ख छल, सहायताक ढ़ोंग रचि-रचि धन लोभ सँ ग्रस्त भऽ महा-अनर्थ कार्य केलक। जाहि गाममे पानि पहुँचैमे देर भेलैक तै गामक लोक सभ एहि आशामे जे आब पानि घटि जेतै, ऐ लोभ सँ गाम नहि छोड़लक। मुदा आओर पानि बढ़िए गेलैक। जिनका सभकेँ पक्काक मकान छलैक से सभ अपन-अपन टाका गहना जेवर लऽ कऽ मकानक छतपर पहुँचि गेल। तीन-चारि दिन बीति गेलै। भोजनक समस्या। बच्चा सभक प्राण निकलए लागल। सभटा अनाज, चूल्हा-चौका, जारनि आदि तँ नीचेमे छलैक। सभटा जलमग्न छलैक, जिनका हाथमे मोबाइल फोन छलैक ओ अपन सर-कुटुमकेँ सूचना दऽ देलक। मुदा सरो-कुटुमकेँ किछु नहि फुरन्हि। बल-कल तेज धारमे किनको हेलए केर साहस नहि होइन्हि। एम्हर लूटे खसोटे केर मोन बला सभ नाह लऽ कऽ बचाबए केर स्वांग रचि नाह पर चढ़ा कऽ माँझ धारमे आबि सभटा माल-पत्तर गहना जेवर छीनि कए पानिमे धकेल दैत छलए। केन्द्र सरकार आ राज्य सरकारकेँ त्राहिमाम् संदेश जखन भेटलए तखन जा कऽ फौज केर नाह आएल। ऊपर सँ हेलीकॉप्टर सँ बिस्कुट आ भोजन सामग्री पहुँचायल गेल। सहायता शिविर स्थापित भेल। ई काल रात्रि 18 अगस्त 2008 केँ आएल छल। मनोरमा सेहो अपन परिवारक संग अपन मकान केर छतपर छल। कतेक दिन बीति गेल छल। चारो तरफ पानिए पानि। कत्तो भागए केर रास्ता नहि। ऊपर सऽ झमाझम बरखा सेहो बरसए छल। भूख प्यास सँ बाँचब कठिन भऽ गेल छलैक। तावत एकटा नाह लऽ कऽ तीन-चारि आदमी आबि नाहपर चढ़ा लेलक। किंतु माँझ धारमे जाए सभटा गहना जेवर टाका छीनि कऽ सभकेँ लाठीसँ मारि पानिमे धकिया देलक। मनोरमा सेहो धक्का खाए पानिमे खसि ऊब-डूब करए लगलीह। ओ बेहोश भऽ भाँसैत-भाँसैत एक किनार लागि गेलीह। मनोरमाक आँखि खुजलै- होश मे अएलीह तँ अपनाकेँ राहत शिविरमे पओलीह। राहत शिविरमे अन्यान्यो सभक डॉक्टरक उपचार भऽ रहल छलैक। मनोरमा जखन दूइ चारि दिनक बाद स्वस्थ भेलीह तँ डॉक्टर आ राहत शिविरक व्यवस्थापक मनोरमाक निर्देशसँ ममहर भेजवा देलकै। मनोरमाक पिता अवकाश प्राप्त प्रधानाध्यापक छलाह। मनोरमाक जेठ भाए युगेश कृष्णाष्टमी पूजामे गाम आएल छलैक। युगेश कलकत्तामे मेडिकल पढ़ि रहल छलैक। मनोरमाक वियाहक कथा लागि गेल छलैक युगेशेक साथी धर्मानन्दसँ। अगला माघ-फागुन मासमे बियाह होमए बला छलैक। मनोरमा सेहो बी.ए. छलीह। दरवज्जेपर कृष्णाष्टमी पूजा धूम-धामसँ हरेक साल मनाएल जाएत छलैक। सभ भगवानक मूर्त्ति सभ बनि कऽ तैयार छलैक। पूजाक व्यवस्था जोर-शोर सँ भऽ रहल छलैक तावते ई महाप्रलयक घटना घटित भऽ गेल। माम एक छोट छिन शहर मे शिक्षकक नोकरी करए छलन्हि। मनोरमाक सातम आठम दिन ममहरमे रहब भेल छलैक। मामीक व्यवहार मनोरमाकेँ नीक नहि बुझा रहल छलैक। मामी एकांतमे मामसँ कहथिन- एकरा माथपर किए बैसा लेलिऐ। आगाँ किछू सोचबो करै छिऐ। एकर बियाहो करबै पड़त। एक दिन मनोरमा मामीक मुँहसँ माम सँ कहैत सुनि लेलक। मनोरमा चिंतित भऽ गेलीह। बेर-बेर मामीक तानासँ अकच्छ भऽ गेल छलीह। मनोरमा शहरक मोहल्लामे घुमि कऽ सम्पर्क कऽ कऽ छोट-छोट नेना सभक ट्यूशन करए लगलीह। मामो ओतए पूर्वसँ आवागमन रहबे करै तेँ मुहल्लाक लोग सभ मनोरमाकेँ चिन्हते रहए। तँ ट्यूशन भेटैमे भाङ्गठ नञि भेलैक। एक दिन रघुवीर जे सम्बन्ध मे ममियौत छलैक मनोरमासँ कहलखिन्ह- बहिन कोनो कान्वेन्ट धऽ लैतिऐ तँ बड्ड नीक होइतौ। मनोरमा बजलीह- भाए। हमर सार्टिफिकेट तँ घरेमे पानिमे नष्ट भऽ गेल। अहाँ भाए मददि कऽ दिअ। सहरसा कॉलेजसँ प्रींसिपल साहेबसँ आवेदन अग्रसारित कराए मधेपुरा यूनिवर्सीटीसँ द्वितीयक लब्धांक पत्र सभ मंगा दिअ। हे भाए हमर सन अभागल केर किछु मददि कऽ दिअ। हमरा किछु नहि सूझि रहल अछि। हम अनाथ छी।-  कहि कऽ मनोरमा फफकि-फफकि कानए लगलीह। रघुवीर सान्त्वना दऽ चुप करौलक। रजनीशकेँ हाल-फिलहालमे सेंट्रल स्कूलमे नोकरी भेटल छलैक। ओ छुट्टीमे अपन शहर आएल छल। रघुवीरक संग एक दिन रजनीश बाजार करएले जा रहल छल। मनोरमा सेहो किछु सहेली संग बाजार घूमि रहल छलीह। रजनीश केर नजरि जखन मनोरमापर पड़ल तँ रूप-लावण्य देखि भाव विह्वल भऽ गेल। ओ रघुवीर सँ प्रश्न कएलक- रघुवीर ई नवयुवती के थिक? नजरि हटिए नहि रहल छलैक। -हमरे पिसियौत बहिन थिकीह। बाढ़ि मे सभ किछु बर्बाद भऽ गेलए। भाए, माए, पिताजी केर कोनो पता नहि छैक।- रघुवीर सकल वृतांत कहि सुनौलक। रजनीश एहि दुर्घटनाकेँ सुनि व्यथित भऽ गेल। ओ मोने-मोन विचारै लागल जे एकर बियाह नीक घरमे होयबाक चाही। एहन शिक्षित सुन्दरि जे घर जयतीह, ओ घर स्वर्ग भऽ जयतै। प्राकृतिक विपदा सँ एहन उत्तम कुल शील वाली कन्या अनाथ भऽ गेल अछि। रजनीश विचार मग्न रघुवीरक संग आगाँ बढल जा रहल छल। तावत पाँछा सँ मधुर शब्द सुनाए पड़लैक -रघुवीर भाए। ई देखू विद्या विहार कान्वेन्ट मे एकटा महिला शिक्षक केर विज्ञापन छैक। मनोरमा एकटा न्यूज पेपर देखाइत बजलीह। -बड्ड नीक। आवेदन कऽ दियौक।- रघुवीर बाजल -कतेक योग्यता अछि।- रजनीश हठाते पूछि देलक। -बी.ए. संस्कृत आनर्स फर्स्ट क्लास।- मनोरमा सकपकाइत बजलीह। -अहा हा! तखन तँ अहाँ कऽ निश्चिते भऽ जाएत।-रजनीश बाजल। एहि तरहे गप्प सप्प करैत घर घुरि सभ आबि गेल। रजनीश केर मोन मे मनोरमा बसि गेल। रजनीश एक दिन प्रसंग मे माए सँ कहि देलक। माए हम कमाबैत छी, एहि लेल हम आदर्श बियाह करब आ एहेन लड़की सँ जे कुलीन होए आ परिवार जनक सेवा कऽ सकैत छल। सभ परिवार जनकेँ मनोरमा पसिन्न भऽ गेलीह। खास कऽ रजनीशक मोन राखए लेल। विवाह कए रजनीश मनोरमाकेँ लऽ कऽ शहर आबि गेल। गर्मीक समए अप्रैल-मइ मास। रजनीशकेँ सबेरे तैयार भऽ नाश्ता कऽ स्कूल जाए पड़ैत छलैक। बियाह कऽ शहर आएब पन्द्रह-बीसे दिन लगधग भेल छलैक। दुनोक बीच अगाध प्रेम छलैक। मनोरमा नितभिनसरे साढ़े चारिये बजे उठि कऽ चाह बनाबैत- दूनू गोटे संगहि पीबै छल। आ नास्ता बनाए रजनीश केर खुआ प्रेमसँ बिदा करए छलीह। मुदा आइ अतीतक घटनाक सपना देखैत भोर मे आँखिए नहि खुजलैक। ताहि लेल रजनीश अपनहि सँ सभ काम कऽ लेलक आ फेर अपन स्कूल चलि गेल।‍ ‍ ३. पद्य ३.१.१.आरसीप्रसाद सिंह- गुलाबी गजल २. डॉ. नरेश कुमार ‘वि‍कल’- दूटा आर गजल ३.मुन्नाजी- दूटा गजल ३.२. रवि भूषण पाठक- एहि बेर छठि मे ३.३.१.राजदेव मंडल -झगड़लगौना पि‍शाच/  गाछक बलि‍दान /  हेराएल २.जगदीश प्रसाद मंडल २ टा गीत- बीतल बर्खक वि‍दाइ/ फनकी ३.४.राजेश मोहन झा- कवि‍ता-  सुगर फ्री ३.५.१.नवीन कुमार "आशा"- हमरा भेटल २.शंभु नाथ झा ‘वत्स’उग्रवादी बनि जाए। ३.६.१. अजित मिश्र- नब वर्ष/ सुन्दर मनगर पर्व महान २. डॉ. शेफालिका वर्मा- नव वर्ष ३. सतीश चन्द्र झा- नव वर्ष ४.सुबोध ठाकुर- प्रतीक्षा ३.७.१.किशन कारीग़र- आबि गेल नव वर्ष २.  राम वि‍लास साहु -कवि‍ता- कोइली कूहकै आमक डारि‍ ३.८.गंगेश गुंजन- राधा- २८ म खेप १.आरसीप्रसाद सिंह- गुलाबी गजल २. डॉ. नरेश कुमार ‘वि‍कल’- दूटा आर गजल ३.मुन्नाजी- दूटा गजल १ आरसीप्रसाद सिंह 1911-1996 जन्म: ग्राम-एरौत, जिला-समस्तीपुर । प्रकाशित कृति: माटिक दीप, पूजाक फूल, सूर्यमुखी (कविता-संग्रह), मेघदूत (अनुवाद), आरसी, नन्ददास, संजीवनी (हिन्दी काव्य संग्रह)। ’सूर्यमुखी’ लेल १९८४ मे साहित्य अकादेमी पुरस्कार प्राप्त । गुलाबी गजल अहाँक आइ कोनो आने रंग देखइ छी। बगए अपूर्व कि‍छु वि‍शेष ढंग देखइ छी। चमत्‍कार कहू, आइ कोन भेलऽ छि‍ जग मे? कोनो वि‍लक्षणे ऊर्जा-उमंग देखइ छी।। बसात लागि‍ कतहु की वसन्‍तक गेलऽ ि‍छ, फुलल गुलाब जकाँ अंग-अंग देखइ छी।। फराके आन दि‍नसँ चालि‍ मे अछि‍ मस्‍ती, मि‍जाजि‍ दंग, की बजैत जेँ मृंदग देखइ छी।। कमान-तीर चढ़ल, आओर कान धरि‍ तानल, नजरि‍ पड़ैत ई घायल, वि‍हंग देखइ छी।। नि‍सा सवार भऽ जाइछ बि‍ना कि‍छु पीने, अहाँक आँखि‍मे हम रंग भंग देखइ छी।। मयूर प्राण हमर पाँखि‍ फुला कऽ नाचय, बनल वि‍ऽजुलता घटाक संग देखइ छी।। लगैछ रूप केहन लहलह करैत आजुक, जेना कि‍ फण बढ़ौने भुजंग देखइ छी। उदार पयर पड़त अहाँक कोना एहि‍ ठाँ? वि‍शाल भाग्‍य मुदा, धऽरे तंग देखइ छी।। कतहु ने जाउ, रहू भरि‍ फागुन तेँ सोझे। अनंग आगि‍ लगो, हम अनंग देखइ छी।। २ डॉ. नरेश कुमार ‘वि‍कल’ दूटा आर गजल- गजल-1 तन भि‍ंजा कए मन जराबए आबि‍ गेल साओन केर दि‍न। वि‍रह-वेदन तान गाबए आबि‍ गेल साओन केर दि‍न। खेलि‍ कऽ बरसात अप्‍पन वस्‍त्र फेंकल सूर्यपर चानकेँ सेहो लजाबए आबि‍ गेल साओन केर दि‍न। मधुर फूही भरल अमृत सँ प्‍लावि‍त ई धरा पान महारकेँ कराबए आबि‍ गेल साओन केर दि‍न। ई बसातक बात की हो अनल-कन-रंजि‍त बहए मोनकेँ पाथर बनाबए आबि‍ गेल साअोन केर दि‍न। खोहमे खोंताक खूजल द्वारि‍पर वि‍धुआएल सन वि‍रहि‍णीकेँ बस डराबए आबि‍ गेल साअोन केर दि‍न। बाध हरि‍यर, बोन हरि‍यर हरि‍यरे चहुँ दि‍स छै धूरसँ आङन सुखाबए आबि‍ गेल साअोन केर दि‍न। बांसुरीपर टेरि‍ रहलै के एहन रस-रोग राग भेल भुम्‍हूरकेँ पजारए आबि‍ गेल साअोन केर दि‍न। सि‍मसि‍माहे नूआ-सन झपसीमे लागए सहज-मन सतलकेँ आओरो सताबए आबि‍ गेल साअोन केर दि‍न। गजल- 2 शेषांशपर रोदन करू वा गीत उदि‍त भानपर। कि‍न्‍तु आफत अाबि‍ पहुँचल मान और सम्‍मानपर। दीप जम्‍बूद्वीप केर नि‍त्त अकम्‍पि‍त भए जरए यएह सोचब ि‍थक कठि‍न अनीति‍ केर दोकानपर। भेल वृद्धि‍ ज्ञानमे, वि‍ज्ञानमे, संधानमे जन्‍म दर केर बात की वृद्धि‍ उत्‍थानपर। कि‍न्‍तु नैति‍कताक अवनति‍ आचरण, सम भावमे देश हि‍त केर बात तँ चलि‍ गेल कोठीक कान्‍हपर। देश गांधी, बुद्ध केर रहि‍ गेल ने सुभाष केर देश ई नाचए सदति‍ घोटाला सबहक तानपर। आब वि‍चरण कए रहल नरभक्षी दोसर वेशमे छैक कनि‍को ने दया एे नेना केर मुसकानपर। ३ मुन्नाजी दूटा गजल १ परम्परा भऽ गेल अछि अछैत आधुनिकताक फेरमे पहिने दुसै छल नाङ्गटकेँ जे आब चलै-ए हँजेरमे बिसरि जाइ अस्तित्व अपन बनि जाइछ पिछलगुआ उतरि जाइए निचला सीढ़ी धरि ओहो पाइक फेरमे फूस घरो नै छलै आ तकै-ए पक्का अराम तलबी लेल मुदा बेरोजगार लोक काटि लै-ए राति बालुओ ढेरमे कहियो लोक मरय लागल छल पर लोकक डाहिसँ आइ निजकेँ करैए निजगुत माँझ आनि कऽ कछेरमे घेरल जिनगीक सीमासँ दूर भऽ कऽ लोक आब चाहैए जीतऽ चाहै-ए बैसारीमे घीचि कऽ टांग दोसराक बेरमे अखनो बाँचल छै संवेदना कोनो लोकक बीच कतहु लोक मूनि लै-ए आँखि दोसराक संग होइत अन्हेरमे बढ़ि गेलैए भागा-दौड़ी तेँ मनोज कऽ लै-ए चौरी कनेक तेँ लोक आब मरय लागल अछि उमरक अधेरमे २ झूकि जाइत छल पहिने माथ कोनो छोट काजपर बदलि रुखि नीच काज बिन पाइ उड़ै जहाजपर विषमता दूर भेल जातिक भऽ जीवै-ए रह-रहाम चुप अपना बेर टिकै नै छै मोन सर-समाजपर अपना अपनीकेँ समेट जीबैए आब सभ लोक तेँ देखै टुकुर मुँह बन्न रखै काज अनसहाजपर लोक लोककेँ चिन्है छलैए देखवै छल मनुक्खता यौ बिसरि समाज टिकल रहै मोन केवल व्याजपर दुनूक खाधिकेँ मनोज पाइक बलेँ पाटऽ जे चाहै-ए अप्पन हानि सँ दुखी नै आँखि छै दियादक लाभपर रवि भूषण पाठक एहि बेर छठि मे एहि बेर छठि मे पहिले छठि मे सूर्यदेव उगति छलाह या त‘ खुटेरी बाबू क‘ गाछी क‘ पाछू या निसहरा पोखरि क‘ पाछू कोनो-कोनो बेर शशि बाबू क‘ गाछी क‘ बीच सँ आ कोनो बेर मझिला कक्का क‘ बँसबीट्टी क‘ पाछू एहन बात त‘ कहियो नहि भेलए कि ओ टेलीफोन टावर क‘ पाछू सँ उगथि या डाक्टर साहेब क‘ दूमहला क‘ पाछू एहि बेर स्कूल क‘ मोटका हेडमास्टर आश्वस्त छथि मध्याहन भोजन क‘ पहिल क‘र भगवान खाइथ छथि हमरे घर क‘ पाछू किएक ने उगताह ? मुक्खन के जोतखी जी कहने छथिन्ह भगवान अहँा के छोड़ि के कत‘ जेताह ? भुटकुन बाबू आ मुंशी जी डराएल छथि कि भगवान रस्ता बिसरि जेताह ? बच्चा बाबू एकटक लगेने छथि सबसँ पहिले ओ भगवान के देखि के खूब जोर सँ चिकरताह देखियौ देखियौ भगवान त‘ एहि बेर मन्दिर क‘ पाछू सँ निकललाह । जुआएल कुहेसा आ भपाइत पोखरि मे सब भक- चक छथि तखने बटोरन बाजल भगवान त‘ एहि बेर दुसधटोली क‘ पाछू सँ उगि रहल छथि मुक्खन मुखिया,डाक्टर आ मास्टर साहेब दुसधटोली दिसि देखि रहल छथि सूर्यदेव उगए वला छथि दुसधटोली क‘ पाछू आकाश टकाटक लाल छलए........... १.राजदेव मंडल -झगड़लगौना पि‍शाच/  गाछक बलि‍दान /  हेराएल २.जगदीश प्रसाद मंडल २ टा गीत- बीतल बर्खक वि‍दाइ/ फनकी १ राजदेव मंडल (1) झगड़लगौना पि‍शाच ई झगड़लगौना पि‍शाच नै आबए देलक अपनापर आँच रखने सभसँ मेल खेलैत रहल झाँपल खेल जेकरा संगे करै ई कनफुसकी तेकरा मुखसँ उड़ि‍ जाइत मुसकी ओ करै छल रगड़ा ताकऽ लगै छल झगड़ा एको घर नै छोड़े छल लड़ैया बोखार एकटा रोकनाइ भऽ गेल छल बेसम्‍हार फैला रहल छल दोग-दोग भऽ गेल हो जेना संक्रमक रोग घर-घर छीटै छल झगड़ाक बीया झगड़ाक बाद फटै सबहक हीया नव शक्‍ति‍ नि‍त रोज करए लागल बेमारीक खोज धरा गेल सीपपर आइ भगै केर नै‍ रहल कोनो उपाए “एना नै करि‍ओ छान-बान्‍ह एतेक नै करि‍ओ अपमान‍” कि‍छ हँसैत कि‍छ रहल कानि‍ मुँह लटकौने पि‍शाच सभकुछ जानि‍ कानि‍-कानि‍ पएर लेलक छानि‍। (2) गाछक बलि‍दान गाछसँ घेरल चारूभर मध्‍यमे छल दूटा घर चारूभरक गाछ झड़कि‍ गेल तैयो आगि‍ नै‍ बहरा भेल ईश्‍वर केहेन रचना रचि‍ गेल दूटा घर जरल सौंसे गाम बचि‍ गेल तोरेटा घर भेलह बरबाद भगवानकेँ दहक धन्‍यवाद केकर कऽ रहल छी यशोगान पहि‍ले दि‍औ गाछक मान तब करब ईश्‍वरक सम्‍मान‍ तँए बचल कतेकोक धन आ जान गाछ नै भेल पाछ नै तँ सौंसे गाममे आगि‍ करैत नाँच यएह गप्‍प छै साँच हमहूँ नै हएब पाछ फेर रोपब दू-चारि‍ गाछ। (3) हेराएल हे यौ, हम हेरा गेल छी अन्‍हारमे घेरा गेल छी कोनो बाट नै भेटैत ऐछ बौअए गेल छी औअए गेल छी ऐ गामक की नाम छि‍ऐ यौ घुरि‍या रहल छी चारूभर कोन घर छि‍ऐ हमर भटकि‍ रहल छी दर-दर नै भेट रहल ऐछ घर हे यौ कोन दुआरि‍ ऐछ हमर सुनै छी फटकार भरल स्‍वर भीतर काँपि‍ उठल थर-थर “बड्ड बजै छह चर-चर की नाम छि‍अ तोहर‍” बि‍सरल छलहुँ गाम आब तँ बि‍सरि‍ गेलहुॅँ नाम कहए पड़त हम के छी स्‍वयं जानए पड़त हम जे छी नै तँ जीनगी भऽ जाएत अकारथ नै भेटत परमारथ। २ जगदीश प्रसाद मंडल २ टा गीत- बीतल बर्खक वि‍दाइ अंति‍म सत्‍कार सुनू शि‍कारी अंति‍म दि‍न कहै छी अंति‍म बात सुना-सुना अंति‍म सत्‍कार करै छी हँसैत रहू सदति‍ अहाँ हमरो तँ जीबए दि‍अ सभ कि‍छु तँ लैइये लेलौं एतबो तँ बाजए ि‍दअ नोर पीब हृदए अहाँक शीतल सदति‍ रहैए मनक ताप झहड़ि‍-झहड़ि‍ सगतरि‍ तँ कहैए। कवि‍ता- फनकी फनकी बना फसा शि‍कारी फसौलक सौंसे जंगलकेँ बगरा-बुगरीक चर्चे कते नथलक बाघ, गेंड़ा- घोड़ाकेँ खढ़-पातक बना-बना बुनलक सक्कत जाल घुमा फेकैत भीड़ो कहाँ बनि‍ गेल तऽरे तऽर महजाल खढ़क फनकी लगल बगड़ाकेँ तैंइतमे फसि‍ गेल सि‍यार डोराक फनकी लगल साँपकेँ भ्रमक फनकी फसल बुद्धि‍यार।। राजेश मोहन झा- कवि‍ता- राजेश मोहन झा 'गुंजन' कवि‍ता सुगर फ्री सुगर फ्री सभ सुगर फ्री आब चीनी सेहो सुगर फ्री संवतक पूआ गेल पनि‍आएल गनि‍ कऽ हूरथि‍ श्रीमती आ श्री। आॅखि‍ ऑखि‍पर गि‍लास गार्ड छै, भरि‍ गेल मधुमेह वार्ड छै चूड़ा-दही संग टेबलेटक डि‍ब्‍बा खाइत रहू वन-टू-थ्री 'ि‍नरामया' भेल जीवनक मील मुँहक चक्कीमे टीश उठल छै जमैन सोंफ संग देखू पान-बीड़ी देहक पलंगमे उड़ीया भरल छै जोड़क झटका धीरे लगथि‍ लस्‍सी पुष्‍प रससँ नेना सभ भागथि‍ बर्गर-चि‍प्‍सक एलै जमाना बढ़ि‍ रहल चाउमीनक बि‍क्री गाम धरमे डॉ. भरल नाली बन्‍द पाॅलीथीन सभ पड़ल दूधमे सोतीक पानि‍ लबालब सोमरस मदि‍रा सभ टेक्‍स फ्री आंग्‍ल वाणी श्रृंगार बनल छै मातृभूमि‍केँ बि‍सरि‍ रहल छै अपन मैथि‍ली अछि‍ मधुराएल ई नहि‍ बूझब सुगर फ्री १.नवीन कुमार "आशा"- हमरा भेटल २.शंभु नाथ झा ‘वत्स’उग्रवादी बनि जाए। १ नवीन कुमार "आशा" (१९८७- ) पिता श्री गंगानाथ झा, माता श्रीमति विनीता झा। गाम- धानेरामपुर, पोस्ट- लोहना रोड, जिला- दरभंगा। हमरा भेटल हमरा भेटल एकटा विषय ओइ लेल भेटल किछु समए कहल गेल हमरासँ मीत लिखू युवा वर्ग लेल गीत फेर माँगल किछु समए आ युवा मंचमे पैसल हम देखि हुनकर स्फूर्ति मन भऽ जाय प्रसन्न ई देखि कही मनसँ ई छथि देशक भविष्य ऐ सँ नै कियो अनजान एतए सोचि बढ़ल मन फेर आएल दममे दम फेर कलम आगू बढ़ल आब केलक किछु लिखैक मोन युवाक मन हम जानी हुनकर दुख-दर्दकेँ जानी कि होए हुनकर अभिलाषा जँ युवा आगू बढ़ता तँ समाजक सम्मान बढ़त फेर राज आओत युवा वर्गक ऐ मे नै संदेह रहत हमरा भेटल...। २ शंभु नाथ झा ‘वत्स’ उग्रवादी बनि जाए। की कहब यौ लल्लू बाबू, देश-गाम केर हाल। कतओ बाढ़ि कतओ अछि सूखल, मजूर गृहस्थ बेहाल॥ महँगीक मारि-हारि जीवनसँ, कृषक तजै अछि प्राण। तेओ नारा बुलंद करै छी, हम्मर देश महान॥ जेकर वोट सँ राज करै अछि, तेकर फाटल लत्ता। सांसद सदन मे छोड़ि समस्या, बढ़बए वेतन भत्ता॥ जेकर श्रम सँ देश पालित अछि, तेकर जियब अछि धनि सन। अपराधी जँ सदन पहुँचि गेल, तेकर आजीवन पेंशन॥ नेता सभ केर करनी देखि कए, किछु नहि फुरए उपाय। मोन होइये जे कलम छोड़ि केँ, उग्रवादी बनि जाए॥ १. अजित मिश्र- नब वर्ष/ सुन्दर मनगर पर्व महान २. डॉ. शेफालिका वर्मा- नव वर्ष ३. सतीश चन्द्र झा- नव वर्ष ४.सुबोध ठाकुर- प्रतीक्षा १ अजित मिश्र १ नब वर्ष शुभ-शुभकेँ नब वर्ष तुलाएल भगवति वन्दन दृष्टि समाएल होएत चहु दिस नीक धमाल नबता रुपमे करब कमाल बनि जाएब सभ मालोमाल वर्ष एगारहकेँ मणिमाल एम्हर-ओम्हर सभ खुशहाल गाएब मन भरि मचे धमाल रहब ने केओ कतहु पमाल हमर मनोरथ पूरए ई साल।। २ सुन्दर मनगर पर्व महान सुन्दर मनगर पर्व महान खाजा मुंगबा भरे जहान l सुनगल उकक करे भसान कण-कणमे जत नब उठान राजा- रंकसभ एक समान तीत-मीठ आ बिसरि गुमान l दिआबाती पर्व महान आन-अपन, एक जुटान बाटए चहु, ई मुसकान तीरथ सुख भरे- जहान २ डॉ. शेफालिका वर्मा नव वर्ष अंक कें बदलि गेनाय बरिस कें बदलि गेनाय नव वर्ष थीक की ? एकटा कैलेण्डर हँटेत  अछि दोसर लैग जायत अछि आ बरस बदलि जायत अछि .......... मोन क तह में डूबल शब्द क रस में तितल राति वैह ,दिन वैह कैक्टस में खिलल फूल जकां बरस बदलि जायत  अछि ............... चारु दिस  भीड़ भरल , सब किछ  ऐन्ठायल चेहरा पर चेहरा ओढने लोग कोना जिवैत अछि की मोन नहि हुनक कचोटैत अछि ? सब टा खाली खाली लगैत अछि बरस बदलि जायत अछि ..................... दिन पर दिन बीती रहल नहि बीती रहल छी हम बाट भागी रहल ,नहि भागि पवैत छी हम कखनो बाट हमर  ,कखनो बाट हमही बनि जायत छी ख़त्म नहि होयत साँस हमर बाट ख़तम भ जायत अछि बरस बदलि जायत अछि .................... नहि कोनो कामना नहि कल्पना एकटा बस 'एहसास 'अछि छौर  जकां ठोर स लागल एकटा आर साल उदास  अछि कांट में बिहुँसल जेना  गुलाब अछि ..... ... ३ सतीश चन्द्र झा नव वर्ष आयल नव वर्षक नव प्रभात आँगन -आँगन उतरल उमंग। सभकें शुभ मंगल करथु देव नहि उतरय दुख के अशुभ रंग।

बीतल जीवन के बिसरि करब आगत के स्वागत आइ फेर। नव नव आशा विश्वास संग जीवन किछु आगाँ चलत फेर।

जीवन के बीतल दुख विपदा मदमस्त पवन ल’ उड़ि जायत। मोनक कागत के अमिट शब्द नव समय संग किछु बहि जायत।

घुमि रहल समय छै गोल-गोल विश्राम कतौ नहि कतौ अंत। प्रारंभ-अंत,निर्माण-नाश चलि रहल चक्र भव मे अनंत।

संकल्प लिअ एहि वरख फेर सभ चलब, कहत जे शुभ विवेक। हम देब संग नहि अन्यायक सत्कर्मक शुभ छै फल अनेक।

४ सुबोध ठाकुर गाम- हैंठी बाली, मधुबने सुबोध जी चार्टर्ड एकाउन्टेन्ट छथि। प्रतीक्षा भेल जखन-जखन किछु इच्छा करए पड़ल तखन-तखन प्रतीक्षा जिनगीक बाटमे सगरे भेटल चौबटिया जाएब केम्हर किछु फुराइत नहि छी एकसरे नहि संग सह-बटोहिया काटल कतेक राति गुज-गुज अन्हरिया सनक जे आएत किछु दिन उपरान्त खिल-खिलाएत, राति इजोरिया सनक जुनि पूछू हाल अखनो धरि देमए पड़य अछि परीक्षा कए रहलहुँ अछि अखनो धरि ओहि क्षणक प्रतीक्षा उठए बेर-बेर सवाल मनमे फँसै छी सदिखन अही अन्तर्द्वन्द्वमे जे केहेन निःशोख आ निर्लज्ज होइ छै इच्छा जे करए पड़ै छै जेकरा लेल प्रतीक्षा जे जोगी बनए वा बनए संत नहि छोड़ए ओकरो अही प्रतीक्षाक फन्द रहए ओकरो परम धाम पाबैक इच्छा करए पड़ै अहि लेल तप आ प्रतीक्षा जन्म बालक जे लए तँ ओकरा माइक दूधक इच्छा जे किशोर भेल ओकरा खेल आ उमंगक इच्छा जे जवान भेल ओकरा सुन्दर रमणीक इच्छा तँए कहए सुबोध दैत ई शिक्षा जँ चाह अनन्त आ अद्वितीय इच्छा तँ करए पड़त निश्चय प्रतीक्षा किएकि जिनगीक माने छिऐ प्रतीक्षा १.किशन कारीग़र- आबि गेल नव वर्ष २.  राम वि‍लास साहु -कवि‍ता- कोइली कूहकै आमक डारि‍ १ किशन कारीग़र आबि गेल नव वर्ष। प्रणाम-प्रणाम औ भाई कि भेल औ भाई हृदयक स्नेह पठा रहल छी औ भाई। आबि गेल नव वर्ष मंगलमय संसार हुए विश्व शांति लेल मंगल कामना करैत छी औ भाई।। नव वर्षऽक नएका-नएका बसंती उमंग सभ मिली बनभोज करब दोस महीमक संग। हम बजाएब ढ़म ढ़म ढ़ोल अहॉ गाउ गीत कक्का खुशी सॅं बजा रहल छथि मृदंग।। कक्का बजलाह कहू की हाल-चाल काकी बजलीह आबि गेल नवका साल। आई सभ मिली एक संगे खशी मनाएब हृदयक स्नेह हम सभ केॅं पठाएब।। नवका आंगी नवका नुऑं नवकी कनियॉं पुरी पकाबैए। बुढ़बा बाबा बड़-बड़ बाजैए धिया-पूता खूम उधम मचाबैए।। पठबैत छी किछू नव-नव सनेश ई सनेश अहॉं सहज स्वीकार करू। नव वर्षऽक अछि सादर शुभकामना सदखनि अहॉं हॅसैत मुस्कुराइत रहू।। जहिना चमकै छै चकमक चॉंद ओहिना अहॉं चमकैत रहू। एतबाक करैत छी हम कामना अपना माटि-पानि लेल किछू सार्थक काज करैत रहू।। २ राम वि‍लास साहु कवि‍ता- कोइली कूहकै आमक डारि‍ कोइली कूहकै आमक डारि‍ सुनि‍ हमर मनुआ घबराए पि‍या हमर रहि‍ताए तँ धीरज दैताए बन्‍हाइ अन्‍हरि‍या राति‍ हम बाट देखैत दुनू आँखि‍ नि‍हारि‍ इजोरि‍या राति‍ हम चान देखैत चकवा-चकोर बनि‍ जाइत चन्‍दा बादल लुक-छुप खेले पि‍या रहि‍ताए तँ हमहुँ संगे खेलतौं वहि‍ने कोइली बोलीसँ हमरा दि‍लमे लगैए गोली पि‍या रहि‍ताए तँ कि‍छु कहबो कैरतौं अनका कोना कि‍छु कहबै पि‍या परदेशि‍या बर नि‍रमोहि‍या कहि‍या बनत हमर रखबैया कोइली बोली सुनि‍ हमर देह भए जाइए बहि‍र ककरा कहबै ई दूखक बात कोइली कूहकै आमक डारि‍।। गंगेश गुंजन राधा- २८ म खेप पछिला खेप अपने पढ़ि चुकल छी-- “हुनका सोझाँ तें अतिशय सम्हार' पड़इछ आँचर से सब सखि केर अनुभव वस्तुक भीतर वस्तु देखि लेबक अद्भुत कौशल छनि बिनु देखनहुँ श्रीमान जानि ने की की देखि ल' जाइत छथि सोचि स्मरण करैत लजयली एकान्तहु मे राधा...एखन कत' छथि कृष्ण ?” आब आगाँ पढ़ू- स्वयं जेना छी बिसरि गेल हम अपन गामक नाम स्वयं जेना छी बिसरि गेल हम अपनो जन्मस्थान स्वयं जेना छी बिसरि गेल हम प्रायः सबकिछु सब बात स्वयं जेना छी बिसरि गेल हम स्वयं अपन अस्तित्व स्वयं जेना हम बिसरि गेल छी आँगन सँ यमुनाक बाट स्वयं जेना हम बिसरि गेल छी प्रिय जमुना स्नान स्वयं जेना हम बिसरि गेल छी सखि-बहिनपाक नाम स्वयं जेना हम बिसरि गेल छी अपनहि मथुरा धाम स्वयं जेना हम बिसरि गेल छी कदमक वनक छाया स्वयं जेना हम बिसरि गेल छी सबटा जीवन कर्म स्वयं जेना हम बिसरि गेल छी लोकक दुःखक मर्म स्वयं जेना हम बिसरि गेल छी अपनो प्रतियें माया स्वयं जेना हम बिसरि गेल छी देह दशा कें देखब स्वयं जेना हम बिसरि गेल छी जीवित प्राणें रहब स्वयं जेना हम बिसरि गेल छी अन्नक जलक स्वाद स्वयं जेना हम बिसरि गेल छी ककरो किछुओ कह'ब स्वयं जेना हम बिसरि गेल छी अक्षरक अभ्यास स्वयं जेना हम बिसरि गेल छी मोसि-कलम, लीखब स्वयं जेना हम बिसरि गेल छी प्रिय सँ प्रिय सम्बोधन स्वयं जेना हम बिसरि गेल छी सबटा गीतक भास स्वयं जेना हम बिसरि गेल छी जीवन केर मधुमास स्वयं जेना हम बिसरि गेल छी सबटा हास-हुलास स्वयं जेना हम बिसरि गेल छी संगी संग विलास स्वयं जेना हम बिसरि गेल छी दशो दिशा केर ज्ञान स्वयं जेना हम बिसरि गेल छी, के अप्पन अछि आन स्वयं जेना हम बिसरि गेल छी सबकिछु के अस्तित्व स्वयं जेना हम बिसरि गेल छी की थिक छोट महान स्वयं जेना हम बिसरि गेल छी अन्हरिया आ इजोरिया स्वयं जेना हम बिसरि गेल छी भेद सूर्य आ चन्द्रक स्वयं जेना हम बिसरि गेल छी स्नेहसिक्त स्मृति-संयोग स्वयं जेना हम बिसरि गेल छी जे सब किछु बिसरल छी किन्तु स्वयं यदि छी बिसरल सब तँ किएक बेचैन अछि प्राण ? पूछथि राधा विकल हृदय कियेक अबैत अछि कृष्णक ध्यान? झर झर झर झर अश्रुपात भदबारि जकाँ भ' जाइछ आरम्भ । सबटा ई मिथ्या अनुभूतिक छद्मजाल थिक सबटा ई मन कें पतिअयबाक करब प्रबोधन चित्त कहाँ स्थिर चिन्ता सँ कहाँ मुक्त अछि ई जे मोन महासंकटक ब्यूह-रचना सन कए तँ देल प्रवेश मुदा अज्ञात दिशा बीच बूझल नहि आरंभ अर्थात प्रवेश आ तहिना करी कोना क निकास द्वार सबटा बंदे बन्द एहन मनोभावक उद्दाम ज्वारि मे ई इच्छामृग डूबि-डूबि रहलय समुद्र मे जेना छोटछिन नाव एकहि क्षण मे ब्यूह मध्य जे प्राण हमर ई ऊँचे ऊँच समुद्र ज्वारि मे पड़ि जाइछ असहाय ककरा पारओ सोर होय के एहि स्थिति मे जे आबय जे सहाय संभव छथि से छथि अपने मे ध्यानस्थ हुनका कोन फिकिर ककरो, कथूक प्रकारक अपना मोनक महाशान्ति मे किएक हेतनि आन्दोलन भने स्नेह आक्रान्त बन्धु पर्यन्त मरैत हो व्याकुल किएक कोनो चिन्ता, जिज्ञासा किछुओ करब पुछारी भरिसक एहिना ,एही प्रकारे हमहूँ आब मरब जानब अपने हे माधव जानब, हम नहि आब सहब केहनो मोहिनी स्वर्गीय मधुरी वाणी अहाँ जे कहब नः अइ संसार मे आब हम नहियें टा र'हब किएक रहब,एतेकटा जीवन ऊघि-ऊघि कतबा दिन आरो ? बाजू आ किएक ककरा लेल ककर हित, मित्र ! कथी लए...? बहुत प्रतिष्ठा जीवन कें कारागृह बना दैये बहुत प्रतिष्ठा बना दैछ जीवन कें अवग्रह बहुत प्रतिष्ठा कुल-संबंध- समाज छोड़ा दैये बहुत प्रतिष्ठा जीवन कें संसार छोड़ा दैये बहुत प्रतिष्ठा कउखन तेहेन प्रतिष्ठित क' दैये बहुत प्रतिष्ठा भ'लो कें अ-लोक बना दैये बहुत प्रतिष्ठा बना राखि दय भथल इनार ....जारी विदेह नूतन अंक मिथिला कला संगीत १.श्वेता झा चौधरी २.ज्योति सुनीत चौधरी ३.श्वेता झा (सिंगापुर) १ श्वेता झा चौधरी गाम सरिसव-पाही, ललित कला आ गृहविज्ञानमे स्नातक। मिथिला चित्रकलामे सर्टिफिकेट कोर्स। कला प्रदर्शिनी: एक्स.एल.आर.आइ., जमशेदपुरक सांस्कृतिक कार्यक्रम, ग्राम-श्री मेला जमशेदपुर, कला मन्दिर जमशेदपुर ( एक्जीवीशन आ वर्कशॉप)। कला सम्बन्धी कार्य: एन.आइ.टी. जमशेदपुरमे कला प्रतियोगितामे निर्णायकक रूपमे सहभागिता, २००२-०७ धरि बसेरा, जमशेदपुरमे कला-शिक्षक (मिथिला चित्रकला), वूमेन कॉलेज पुस्तकालय आ हॉटेल बूलेवार्ड लेल वाल-पेंटिंग। प्रतिष्ठित स्पॉन्सर: कॉरपोरेट कम्युनिकेशन्स, टिस्को; टी.एस.आर.डी.एस, टिस्को; ए.आइ.ए.डी.ए., स्टेट बैंक ऑफ इण्डिया, जमशेदपुर; विभिन्न व्यक्ति, हॉटेल, संगठन आ व्यक्तिगत कला संग्राहक। हॉबी: मिथिला चित्रकला, ललित कला, संगीत आ भानस-भात। २. ज्योति सुनीत चौधरी जन्म तिथि -३० दिसम्बर १९७८; जन्म स्थान -बेल्हवार, मधुबनी ; शिक्षा- स्वामी विवेकानन्द मि‌डिल स्कूल़ टिस्को साकची गर्ल्स हाई स्कूल़, मिसेज के एम पी एम इन्टर कालेज़, इन्दिरा गान्धी ओपन यूनिवर्सिटी, आइ सी डबल्यू ए आइ (कॉस्ट एकाउण्टेन्सी); निवास स्थान- लन्दन, यू.के.; पिता- श्री शुभंकर झा, ज़मशेदपुर; माता- श्रीमती सुधा झा, शिवीपट्टी। ज्योतिकेँwww.poetry.comसँ संपादकक चॉयस अवार्ड (अंग्रेजी पद्यक हेतु) भेटल छन्हि। हुनकर अंग्रेजी पद्य किछु दिन धरि www.poetrysoup.com केर मुख्य पृष्ठ पर सेहो रहल अछि। ज्योति मिथिला चित्रकलामे सेहो पारंगत छथि आ हिनकर मिथिला चित्रकलाक प्रदर्शनी ईलिंग आर्ट ग्रुप केर अंतर्गत ईलिंग ब्रॊडवे, लंडनमे प्रदर्शित कएल गेल अछि। कविता संग्रह ’अर्चिस्’ प्रकाशित। ३.श्वेता झा (सिंगापुर) बालानां कृते १. गजेन्द्र ठाकुर- बड़द करैए दाउन ने यौ २. नवीन कुमार “आशा”- याद अबैए बाबाक लावा १ गजेन्द्र ठाकुर बड़द करैए दाउन ने यौ हाथी अगत्त, पिछू, थाइत, माइल बिरि हिर्र-हिर्र सुग्गर चलू संग घर घुरि ती-ती परबा उड़ि गेल ऊपर लिह लिह बकरी घास तूँ खो बड़द करैए दाउन ने यौ अतू कुकुड़ कुत-कुत डॉगी कैटी पिसू-पिसू आएत की? चेहै-चेहै सुनि पारा दौगल, भागी छोड़ि बाट हम ताकी अर्र बकरी घास तूँ खो बड़द करैए दाउन ने यौ ढेहै-ढेहै कऽ नहि खौंझाबू साँढ़ आओत खरिहानमे यौ आव ठामे रे हे, हौरे हौ बड़द करैए दाउन ने यौ २ नवीन कुमार “आशा” (१९८७- ) पिता श्री गंगानाथ झा, माता श्रीमति विनीता झा। गाम- धानेरामपुर, पोस्ट- लोहना रोड, जिला- दरभंगा। याद अबैए बाबाक लावा (अपन बाबा स्व. सोमनाथ झाकेँ समर्पित) मालिक मालिक मालिक भोरे ओ आवाज लगाबथि हमराले ओ आनथि सनेस चाहे रहनि कोनो भेष एक दिन ऐला बाबा हाथमे छलनि हुनका लाठी छलनि किछु मन सुस्त मुदा ओ छलथि एखनो मस्त हम पूछल हुनकासँ मीत की भेल अहाँकेँ बाबा कतए अछि हमर लाबा कहलथि हमरासँ बाबा नै अनलियौ तोरा लेल लाबा मन भेल हमर फुस नै बुझल जे कहलथि ओ फुसि फेर लगला बाबा हँसए आ देलथि ओ सनेस कहलथि ओ हमरासँ बौआ जाधरि अछि प्राण ताबे रहत तोहर ध्यान तूँ छह मालिक तूँ छह नेना नै रहू अए तूँ जेना तेना नै बुझि पाओल हुनकर कष्ट की कहला ओ स्पष्ट ओहि दिन जे गेला बाबा नै फेर अनला लाबा दोसर दिन जखन उठल नै पाओल हुनकर आवाज हाथमे लेने कटोरा पहुँचि हुनकर डेरा पाओल हुनका टघरल फेर कहल हम हुनकासँ सुनू यौ बाबा, सुनू यौ बाबा कतए अछि आजुक लावा नै कहला हमरासँ किछु नै बुझि सकलौं हम ई नै रहला ओ जगमे किछु कालमे भेल सभ इकट्ठा फेर केलक हुनका बाहर नै बुझि पाओल हम तखनहुँ नै भेटत हुनकर फेर दुलार जैमे छल नै कोनो भेद याद जखन ओ आबथि अखनो कानी हम फफखि फफखि जहिया पाबी हम अपनाकें अकेला जाइ हुनकर सारापर फेर करी किछु गप नै करी मन हप कहियनि हुनकासँ मीत बाबा याद आबैए अहाँक लावा याद आबैए अहाँक दुलार जे नै घुरि आएत फेर करथि आशा अर्पित ई रचना अपन परम पूज्य दादाजीकेँ जिनकर अछि कमी आशाक जीवनमे जखन देखथि कतहु लावा याद आबथि हुनका बाबा बच्चा लोकनि द्वारा स्मरणीय श्लोक १.प्रातः काल ब्रह्ममुहूर्त्त (सूर्योदयक एक घंटा पहिने) सर्वप्रथम अपन दुनू हाथ देखबाक चाही, आ’ ई श्लोक बजबाक चाही। कराग्रे वसते लक्ष्मीः करमध्ये सरस्वती। करमूले स्थितो ब्रह्मा प्रभाते करदर्शनम्॥ करक आगाँ लक्ष्मी बसैत छथि, करक मध्यमे सरस्वती, करक मूलमे ब्रह्मा स्थित छथि। भोरमे ताहि द्वारे करक दर्शन करबाक थीक। २.संध्या काल दीप लेसबाक काल- दीपमूले स्थितो ब्रह्मा दीपमध्ये जनार्दनः। दीपाग्रे शङ्करः प्रोक्त्तः सन्ध्याज्योतिर्नमोऽस्तुते॥ दीपक मूल भागमे ब्रह्मा, दीपक मध्यभागमे जनार्दन (विष्णु) आऽ दीपक अग्र भागमे शङ्कर स्थित छथि। हे संध्याज्योति! अहाँकेँ नमस्कार। ३.सुतबाक काल- रामं स्कन्दं हनूमन्तं वैनतेयं वृकोदरम्। शयने यः स्मरेन्नित्यं दुःस्वप्नस्तस्य नश्यति॥ जे सभ दिन सुतबासँ पहिने राम, कुमारस्वामी, हनूमान्, गरुड़ आऽ भीमक स्मरण करैत छथि, हुनकर दुःस्वप्न नष्ट भऽ जाइत छन्हि। ४. नहेबाक समय- गङ्गे च यमुने चैव गोदावरि सरस्वति। नर्मदे सिन्धु कावेरि जलेऽस्मिन् सन्निधिं कुरू॥ हे गंगा, यमुना, गोदावरी, सरस्वती, नर्मदा, सिन्धु आऽ कावेरी  धार। एहि जलमे अपन सान्निध्य दिअ। ५.उत्तरं यत्समुद्रस्य हिमाद्रेश्चैव दक्षिणम्। वर्षं तत् भारतं नाम भारती यत्र सन्ततिः॥ समुद्रक उत्तरमे आऽ हिमालयक दक्षिणमे भारत अछि आऽ ओतुका सन्तति भारती कहबैत छथि। ६.अहल्या द्रौपदी सीता तारा मण्डोदरी तथा। पञ्चकं ना स्मरेन्नित्यं महापातकनाशकम्॥ जे सभ दिन अहल्या, द्रौपदी, सीता, तारा आऽ मण्दोदरी, एहि पाँच साध्वी-स्त्रीक स्मरण करैत छथि, हुनकर सभ पाप नष्ट भऽ जाइत छन्हि। ७.अश्वत्थामा बलिर्व्यासो हनूमांश्च विभीषणः। कृपः परशुरामश्च सप्तैते चिरञ्जीविनः॥ अश्वत्थामा, बलि, व्यास, हनूमान्, विभीषण, कृपाचार्य आऽ परशुराम- ई सात टा चिरञ्जीवी कहबैत छथि। ८.साते भवतु सुप्रीता देवी शिखर वासिनी उग्रेन तपसा लब्धो यया पशुपतिः पतिः। सिद्धिः साध्ये सतामस्तु प्रसादान्तस्य धूर्जटेः जाह्नवीफेनलेखेव यन्यूधि शशिनः कला॥ ९. बालोऽहं जगदानन्द न मे बाला सरस्वती। अपूर्णे पंचमे वर्षे वर्णयामि जगत्त्रयम् ॥ १०. दूर्वाक्षत मंत्र(शुक्ल यजुर्वेद अध्याय २२, मंत्र २२) आ ब्रह्मन्नित्यस्य प्रजापतिर्ॠषिः। लिंभोक्त्ता देवताः। स्वराडुत्कृतिश्छन्दः। षड्जः स्वरः॥ आ ब्रह्म॑न् ब्राह्म॒णो ब्र॑ह्मवर्च॒सी जा॑यता॒मा रा॒ष्ट्रे रा॑ज॒न्यः शुरे॑ऽइषव्यो॒ऽतिव्या॒धी म॑हार॒थो जा॑यतां॒ दोग्ध्रीं धे॒नुर्वोढा॑न॒ड्वाना॒शुः सप्तिः॒ पुर॑न्धि॒र्योवा॑ जि॒ष्णू र॑थे॒ष्ठाः स॒भेयो॒ युवास्य यज॑मानस्य वी॒रो जा॒यतां निका॒मे-नि॑कामे नः प॒र्जन्यों वर्षतु॒ फल॑वत्यो न॒ऽओष॑धयः पच्यन्तां योगेक्ष॒मो नः॑ कल्पताम्॥२२॥ मन्त्रार्थाः सिद्धयः सन्तु पूर्णाः सन्तु मनोरथाः। शत्रूणां बुद्धिनाशोऽस्तु मित्राणामुदयस्तव। ॐ दीर्घायुर्भव। ॐ सौभाग्यवती भव। हे भगवान्। अपन देशमे सुयोग्य आ’ सर्वज्ञ विद्यार्थी उत्पन्न होथि, आ’ शुत्रुकेँ नाश कएनिहार सैनिक उत्पन्न होथि। अपन देशक गाय खूब दूध दय बाली, बरद भार वहन करएमे सक्षम होथि आ’ घोड़ा त्वरित रूपेँ दौगय बला होए। स्त्रीगण नगरक नेतृत्व करबामे सक्षम होथि आ’ युवक सभामे ओजपूर्ण भाषण देबयबला आ’ नेतृत्व देबामे सक्षम होथि। अपन देशमे जखन आवश्यक होय वर्षा होए आ’ औषधिक-बूटी सर्वदा परिपक्व होइत रहए। एवं क्रमे सभ तरहेँ हमरा सभक कल्याण होए। शत्रुक बुद्धिक नाश होए आ’ मित्रक उदय होए॥ मनुष्यकें कोन वस्तुक इच्छा करबाक चाही तकर वर्णन एहि मंत्रमे कएल गेल अछि। एहिमे वाचकलुप्तोपमालड़्कार अछि। अन्वय- ब्रह्म॑न् - विद्या आदि गुणसँ परिपूर्ण ब्रह्म रा॒ष्ट्रे - देशमे ब्र॑ह्मवर्च॒सी-ब्रह्म विद्याक तेजसँ युक्त्त आ जा॑यतां॒- उत्पन्न होए रा॑ज॒न्यः-राजा शुरे॑ऽ–बिना डर बला इषव्यो॒- बाण चलेबामे निपुण ऽतिव्या॒धी-शत्रुकेँ तारण दय बला म॑हार॒थो-पैघ रथ बला वीर दोग्ध्रीं-कामना(दूध पूर्ण करए बाली) धे॒नुर्वोढा॑न॒ड्वाना॒शुः धे॒नु-गौ वा वाणी र्वोढा॑न॒ड्वा- पैघ बरद ना॒शुः-आशुः-त्वरित सप्तिः॒-घोड़ा पुर॑न्धि॒र्योवा॑- पुर॑न्धि॒- व्यवहारकेँ धारण करए बाली र्योवा॑-स्त्री जि॒ष्णू-शत्रुकेँ जीतए बला र॑थे॒ष्ठाः-रथ पर स्थिर स॒भेयो॒-उत्तम सभामे युवास्य-युवा जेहन यज॑मानस्य-राजाक राज्यमे वी॒रो-शत्रुकेँ पराजित करएबला निका॒मे-नि॑कामे-निश्चययुक्त्त कार्यमे नः-हमर सभक प॒र्जन्यों-मेघ वर्षतु॒-वर्षा होए फल॑वत्यो-उत्तम फल बला ओष॑धयः-औषधिः पच्यन्तां- पाकए योगेक्ष॒मो-अलभ्य लभ्य करेबाक हेतु कएल गेल योगक रक्षा नः॑-हमरा सभक हेतु कल्पताम्-समर्थ होए ग्रिफिथक अनुवाद- हे ब्रह्मण, हमर राज्यमे ब्राह्मण नीक धार्मिक विद्या बला, राजन्य-वीर,तीरंदाज, दूध दए बाली गाय, दौगय बला जन्तु, उद्यमी नारी होथि। पार्जन्य आवश्यकता पड़ला पर वर्षा देथि, फल देय बला गाछ पाकए, हम सभ संपत्ति अर्जित/संरक्षित करी। 8.VIDEHA FOR NON RESIDENTS Original Poem in Maithili by Kalikant Jha "Buch" Translated into English by Jyoti Jha Chaudhary Kalikant Jha "Buch" 1934-2009, Birth place- village Karian, District- Samastipur (Karian is birth place of famous Indian Nyaiyyayik philosopher Udayanacharya), Father Late Pt. Rajkishor Jha was first headmaster of village middle school. Mother Late Kala Devi was housewife. After completing Intermediate education started job block office of Govt. of Bihar.published in Mithila Mihir, Mati-pani, Bhakha, and Maithili Akademi magazine. Jyoti Jha Chaudhary, Date of Birth: December 30 1978,Place of Birth- Belhvar (Madhubani District), Education: Swami Vivekananda Middle School, Tisco Sakchi Girls High School, Mrs KMPM Inter College, IGNOU, ICWAI (COST ACCOUNTANCY); Residence- LONDON, UK; Father- Sh. Shubhankar Jha, Jamshedpur; Mother- Smt. Sudha Jha- Shivipatti. Jyoti received editor's choice award from www.poetry.comand her poems were featured in front page of www.poetrysoup.com for some period.She learnt Mithila Painting under Ms. Shveta Jha, Basera Institute, Jamshedpur and Fine Arts from Toolika, Sakchi, Jamshedpur (India). Her Mithila Paintings have been displayed by Ealing Art Group at Ealing Broadway, London. Oh Aunt! Oh Aunt, dear aunt, you did a wonder dear aunt; My uncle is simple and dumb Having slighte body like dried pickles He made himself so social But these are still so unbearables You turned the signal red even for the broken engine. You gave names to the seven generations You abused the other world of dead ancestors too You have covered your face today While waiting in female voter queue You beguiled to be shy for telling your husband’s name Whenever you sneered showing your teeth with anger Uncle use to fell being senseless then Heaven was far away, he couldn’t even get the hell He as wandering like a dead body bearing pain The shroud of uncle was torn into handkerchiefs   by you The death of uncle in Asaam Was rumoured in the village You first ate leftover rice Hiding inside the food storage By wiping the sindoor out  you obliged uncle to you. Input: (कोष्ठकमे देवनागरी, मिथिलाक्षर किंवा फोनेटिक-रोमनमे टाइप करू। Input in Devanagari, Mithilakshara or Phonetic-Roman.) Output: (परिणाम देवनागरी, मिथिलाक्षर आ फोनेटिक-रोमन/ रोमनमे। Result in Devanagari, Mithilakshara and Phonetic-Roman/ Roman.) English to Maithili Maithili to English इंग्लिश-मैथिली-कोष / मैथिली-इंग्लिश-कोष  प्रोजेक्टकेँ आगू बढ़ाऊ, अपन सुझाव आ योगदान ई-मेल द्वारा ggajendra@videha.com पर पठाऊ। Top of Form विदेहक मैथिली-अंग्रेजी आ अंग्रेजी मैथिली कोष (इंटरनेटपर पहिल बेर सर्च-डिक्शनरी) एम.एस. एस.क्यू.एल. सर्वर आधारित -Based on ms-sql server Maithili-English and English-Maithili Dictionary. १.भारत आ नेपालक मैथिली भाषा-वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक शैली आ २.मैथिलीमे भाषा सम्पादन पाठ्यक्रम १.नेपाल आ भारतक मैथिली भाषा-वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक शैली

अ.नेपालक मैथिली भाषा वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक  उच्चारण आ लेखन शैली (भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक धारणाकेँ पूर्ण रूपसँ सङ्ग लऽ निर्धारित) मैथिलीमे उच्चारण तथा लेखन १.पञ्चमाक्षर आ अनुस्वार: पञ्चमाक्षरान्तर्गत ङ, ञ, ण, न एवं म अबैत अछि। संस्कृत भाषाक अनुसार शब्दक अन्तमे जाहि वर्गक अक्षर रहैत अछि ओही वर्गक पञ्चमाक्षर अबैत अछि। जेना- अङ्क (क वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ङ् आएल अछि।) पञ्च (च वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ञ् आएल अछि।) खण्ड (ट वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ण् आएल अछि।) सन्धि (त वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे न् आएल अछि।) खम्भ (प वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे म् आएल अछि।) उपर्युक्त बात मैथिलीमे कम देखल जाइत अछि। पञ्चमाक्षरक बदलामे अधिकांश जगहपर अनुस्वारक प्रयोग देखल जाइछ। जेना- अंक, पंच, खंड, संधि, खंभ आदि। व्याकरणविद पण्डित गोविन्द झाक कहब छनि जे कवर्ग, चवर्ग आ टवर्गसँ पूर्व अनुस्वार लिखल जाए तथा तवर्ग आ पवर्गसँ पूर्व पञ्चमाक्षरे लिखल जाए। जेना- अंक, चंचल, अंडा, अन्त तथा कम्पन। मुदा हिन्दीक निकट रहल आधुनिक लेखक एहि बातकेँ नहि मानैत छथि। ओ लोकनि अन्त आ कम्पनक जगहपर सेहो अंत आ कंपन लिखैत देखल जाइत छथि। नवीन पद्धति किछु सुविधाजनक अवश्य छैक। किएक तँ एहिमे समय आ स्थानक बचत होइत छैक। मुदा कतोक बेर हस्तलेखन वा मुद्रणमे अनुस्वारक छोट सन बिन्दु स्पष्ट नहि भेलासँ अर्थक अनर्थ होइत सेहो देखल जाइत अछि। अनुस्वारक प्रयोगमे उच्चारण-दोषक सम्भावना सेहो ततबए देखल जाइत अछि। एतदर्थ कसँ लऽ कऽ पवर्ग धरि पञ्चमाक्षरेक प्रयोग करब उचित अछि। यसँ लऽ कऽ ज्ञ धरिक अक्षरक सङ्ग अनुस्वारक प्रयोग करबामे कतहु कोनो विवाद नहि देखल जाइछ। २.ढ आ ढ़ : ढ़क उच्चारण “र् ह”जकाँ होइत अछि। अतः जतऽ “र् ह”क उच्चारण हो ओतऽ मात्र ढ़ लिखल जाए। आन ठाम खाली ढ लिखल जएबाक चाही। जेना- ढ = ढाकी, ढेकी, ढीठ, ढेउआ, ढङ्ग, ढेरी, ढाकनि, ढाठ आदि। ढ़ = पढ़ाइ, बढ़ब, गढ़ब, मढ़ब, बुढ़बा, साँढ़, गाढ़, रीढ़, चाँढ़, सीढ़ी, पीढ़ी आदि। उपर्युक्त शब्द सभकेँ देखलासँ ई स्पष्ट होइत अछि जे साधारणतया शब्दक शुरूमे ढ आ मध्य तथा अन्तमे ढ़ अबैत अछि। इएह नियम ड आ ड़क सन्दर्भ सेहो लागू होइत अछि। ३.व आ ब : मैथिलीमे “व”क उच्चारण ब कएल जाइत अछि, मुदा ओकरा ब रूपमे नहि लिखल जएबाक चाही। जेना- उच्चारण : बैद्यनाथ, बिद्या, नब, देबता, बिष्णु, बंश, बन्दना आदि। एहि सभक स्थानपर क्रमशः वैद्यनाथ, विद्या, नव, देवता, विष्णु, वंश, वन्दना लिखबाक चाही। सामान्यतया व उच्चारणक लेल ओ प्रयोग कएल जाइत अछि। जेना- ओकील, ओजह आदि। ४.य आ ज : कतहु-कतहु “य”क उच्चारण “ज”जकाँ करैत देखल जाइत अछि, मुदा ओकरा ज नहि लिखबाक चाही। उच्चारणमे यज्ञ, जदि, जमुना, जुग, जाबत, जोगी, जदु, जम आदि कहल जाएबला शब्द सभकेँ क्रमशः यज्ञ, यदि, यमुना, युग, यावत, योगी, यदु, यम लिखबाक चाही। ५.ए आ य : मैथिलीक वर्तनीमे ए आ य दुनू लिखल जाइत अछि। प्राचीन वर्तनी- कएल, जाए, होएत, माए, भाए, गाए आदि। नवीन वर्तनी- कयल, जाय, होयत, माय, भाय, गाय आदि। सामान्यतया शब्दक शुरूमे ए मात्र अबैत अछि। जेना एहि, एना, एकर, एहन आदि। एहि शब्द सभक स्थानपर यहि, यना, यकर, यहन आदिक प्रयोग नहि करबाक चाही। यद्यपि मैथिलीभाषी थारू सहित किछु जातिमे शब्दक आरम्भोमे “ए”केँ य कहि उच्चारण कएल जाइत अछि। ए आ “य”क प्रयोगक सन्दर्भमे प्राचीने पद्धतिक अनुसरण करब उपयुक्त मानि एहि पुस्तकमे ओकरे प्रयोग कएल गेल अछि। किएक तँ दुनूक लेखनमे कोनो सहजता आ दुरूहताक बात नहि अछि। आ मैथिलीक सर्वसाधारणक उच्चारण-शैली यक अपेक्षा एसँ बेसी निकट छैक। खास कऽ कएल, हएब आदि कतिपय शब्दकेँ कैल, हैब आदि रूपमे कतहु-कतहु लिखल जाएब सेहो “ए”क प्रयोगकेँ बेसी समीचीन प्रमाणित करैत अछि। ६.हि, हु तथा एकार, ओकार : मैथिलीक प्राचीन लेखन-परम्परामे कोनो बातपर बल दैत काल शब्दक पाछाँ हि, हु लगाओल जाइत छैक। जेना- हुनकहि, अपनहु, ओकरहु, तत्कालहि, चोट्टहि, आनहु आदि। मुदा आधुनिक लेखनमे हिक स्थानपर एकार एवं हुक स्थानपर ओकारक प्रयोग करैत देखल जाइत अछि। जेना- हुनके, अपनो, तत्काले, चोट्टे, आनो आदि। ७.ष तथा ख : मैथिली भाषामे अधिकांशतः षक उच्चारण ख होइत अछि। जेना- षड्यन्त्र (खड़यन्त्र), षोडशी (खोड़शी), षट्कोण (खटकोण), वृषेश (वृखेश), सन्तोष (सन्तोख) आदि। ८.ध्वनि-लोप : निम्नलिखित अवस्थामे शब्दसँ ध्वनि-लोप भऽ जाइत अछि: (क) क्रियान्वयी प्रत्यय अयमे य वा ए लुप्त भऽ जाइत अछि। ओहिमे सँ पहिने अक उच्चारण दीर्घ भऽ जाइत अछि। ओकर आगाँ लोप-सूचक चिह्न वा विकारी (’ / ऽ) लगाओल जाइछ। जेना- पूर्ण रूप : पढ़ए (पढ़य) गेलाह, कए (कय) लेल, उठए (उठय) पड़तौक। अपूर्ण रूप : पढ़’ गेलाह, क’ लेल, उठ’ पड़तौक। पढ़ऽ गेलाह, कऽ लेल, उठऽ पड़तौक। (ख) पूर्वकालिक कृत आय (आए) प्रत्ययमे य (ए) लुप्त भऽ जाइछ, मुदा लोप-सूचक विकारी नहि लगाओल जाइछ। जेना- पूर्ण रूप : खाए (य) गेल, पठाय (ए) देब, नहाए (य) अएलाह। अपूर्ण रूप : खा गेल, पठा देब, नहा अएलाह। (ग) स्त्री प्रत्यय इक उच्चारण क्रियापद, संज्ञा, ओ विशेषण तीनूमे लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना- पूर्ण रूप : दोसरि मालिनि चलि गेलि। अपूर्ण रूप : दोसर मालिन चलि गेल। (घ) वर्तमान कृदन्तक अन्तिम त लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना- पूर्ण रूप : पढ़ैत अछि, बजैत अछि, गबैत अछि। अपूर्ण रूप : पढ़ै अछि, बजै अछि, गबै अछि। (ङ) क्रियापदक अवसान इक, उक, ऐक तथा हीकमे लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना- पूर्ण रूप: छियौक, छियैक, छहीक, छौक, छैक, अबितैक, होइक। अपूर्ण रूप : छियौ, छियै, छही, छौ, छै, अबितै, होइ। (च) क्रियापदीय प्रत्यय न्ह, हु तथा हकारक लोप भऽ जाइछ। जेना- पूर्ण रूप : छन्हि, कहलन्हि, कहलहुँ, गेलह, नहि। अपूर्ण रूप : छनि, कहलनि, कहलौँ, गेलऽ, नइ, नञि, नै। ९.ध्वनि स्थानान्तरण : कोनो-कोनो स्वर-ध्वनि अपना जगहसँ हटि कऽ दोसर ठाम चलि जाइत अछि। खास कऽ ह्रस्व इ आ उक सम्बन्धमे ई बात लागू होइत अछि। मैथिलीकरण भऽ गेल शब्दक मध्य वा अन्तमे जँ ह्रस्व इ वा उ आबए तँ ओकर ध्वनि स्थानान्तरित भऽ एक अक्षर आगाँ आबि जाइत अछि। जेना- शनि (शइन), पानि (पाइन), दालि ( दाइल), माटि (माइट), काछु (काउछ), मासु (माउस) आदि। मुदा तत्सम शब्द सभमे ई निअम लागू नहि होइत अछि। जेना- रश्मिकेँ रइश्म आ सुधांशुकेँ सुधाउंस नहि कहल जा सकैत अछि। १०.हलन्त(्)क प्रयोग : मैथिली भाषामे सामान्यतया हलन्त (्)क आवश्यकता नहि होइत अछि। कारण जे शब्दक अन्तमे अ उच्चारण नहि होइत अछि। मुदा संस्कृत भाषासँ जहिनाक तहिना मैथिलीमे आएल (तत्सम) शब्द सभमे हलन्त प्रयोग कएल जाइत अछि। एहि पोथीमे सामान्यतया सम्पूर्ण शब्दकेँ मैथिली भाषा सम्बन्धी निअम अनुसार हलन्तविहीन राखल गेल अछि। मुदा व्याकरण सम्बन्धी प्रयोजनक लेल अत्यावश्यक स्थानपर कतहु-कतहु हलन्त देल गेल अछि। प्रस्तुत पोथीमे मथिली लेखनक प्राचीन आ नवीन दुनू शैलीक सरल आ समीचीन पक्ष सभकेँ समेटि कऽ वर्ण-विन्यास कएल गेल अछि। स्थान आ समयमे बचतक सङ्गहि हस्त-लेखन तथा तकनीकी दृष्टिसँ सेहो सरल होबऽबला हिसाबसँ वर्ण-विन्यास मिलाओल गेल अछि। वर्तमान समयमे मैथिली मातृभाषी पर्यन्तकेँ आन भाषाक माध्यमसँ मैथिलीक ज्ञान लेबऽ पड़ि रहल परिप्रेक्ष्यमे लेखनमे सहजता तथा एकरूपतापर ध्यान देल गेल अछि। तखन मैथिली भाषाक मूल विशेषता सभ कुण्ठित नहि होइक, ताहू दिस लेखक-मण्डल सचेत अछि। प्रसिद्ध भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक कहब छनि जे सरलताक अनुसन्धानमे एहन अवस्था किन्नहु ने आबऽ देबाक चाही जे भाषाक विशेषता छाँहमे पडि जाए। -(भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक धारणाकेँ पूर्ण रूपसँ सङ्ग लऽ निर्धारित) आ. मैथिली अकादमी, पटना द्वारा निर्धारित मैथिली लेखन-शैली

१. जे शब्द मैथिली-साहित्यक प्राचीन कालसँ आइ धरि जाहि वर्त्तनीमे प्रचलित अछि, से सामान्यतः ताहि वर्त्तनीमे लिखल जाय- उदाहरणार्थ-

ग्राह्य

एखन ठाम जकर, तकर तनिकर अछि

अग्राह्य अखन, अखनि, एखेन, अखनी ठिमा, ठिना, ठमा जेकर, तेकर तिनकर। (वैकल्पिक रूपेँ ग्राह्य) ऐछ, अहि, ए।

२. निम्नलिखित तीन प्रकारक रूप वैकल्पिकतया अपनाओल जाय: भऽ गेल, भय गेल वा भए गेल। जा रहल अछि, जाय रहल अछि, जाए रहल अछि। कर’ गेलाह, वा करय गेलाह वा करए गेलाह।

३. प्राचीन मैथिलीक ‘न्ह’ ध्वनिक स्थानमे ‘न’ लिखल जाय सकैत अछि यथा कहलनि वा कहलन्हि।

४. ‘ऐ’ तथा ‘औ’ ततय लिखल जाय जत’ स्पष्टतः ‘अइ’ तथा ‘अउ’ सदृश उच्चारण इष्ट हो। यथा- देखैत, छलैक, बौआ, छौक इत्यादि।

५. मैथिलीक निम्नलिखित शब्द एहि रूपे प्रयुक्त होयत: जैह, सैह, इएह, ओऐह, लैह तथा दैह।

६. ह्र्स्व इकारांत शब्दमे ‘इ’ के लुप्त करब सामान्यतः अग्राह्य थिक। यथा- ग्राह्य देखि आबह, मालिनि गेलि (मनुष्य मात्रमे)।

७. स्वतंत्र ह्रस्व ‘ए’ वा ‘य’ प्राचीन मैथिलीक उद्धरण आदिमे तँ यथावत राखल जाय, किंतु आधुनिक प्रयोगमे वैकल्पिक रूपेँ ‘ए’ वा ‘य’ लिखल जाय। यथा:- कयल वा कएल, अयलाह वा अएलाह, जाय वा जाए इत्यादि।

८. उच्चारणमे दू स्वरक बीच जे ‘य’ ध्वनि स्वतः आबि जाइत अछि तकरा लेखमे स्थान वैकल्पिक रूपेँ देल जाय। यथा- धीआ, अढ़ैआ, विआह, वा धीया, अढ़ैया, बियाह।

९. सानुनासिक स्वतंत्र स्वरक स्थान यथासंभव ‘ञ’ लिखल जाय वा सानुनासिक स्वर। यथा:- मैञा, कनिञा, किरतनिञा वा मैआँ, कनिआँ, किरतनिआँ।

१०. कारकक विभक्त्तिक निम्नलिखित रूप ग्राह्य:- हाथकेँ, हाथसँ, हाथेँ, हाथक, हाथमे। ’मे’ मे अनुस्वार सर्वथा त्याज्य थिक। ‘क’ क वैकल्पिक रूप ‘केर’ राखल जा सकैत अछि।

११. पूर्वकालिक क्रियापदक बाद ‘कय’ वा ‘कए’ अव्यय वैकल्पिक रूपेँ लगाओल जा सकैत अछि। यथा:- देखि कय वा देखि कए।

१२. माँग, भाँग आदिक स्थानमे माङ, भाङ इत्यादि लिखल जाय।

१३. अर्द्ध ‘न’ ओ अर्द्ध ‘म’ क बदला अनुसार नहि लिखल जाय, किंतु छापाक सुविधार्थ अर्द्ध ‘ङ’ , ‘ञ’, तथा ‘ण’ क बदला अनुस्वारो लिखल जा सकैत अछि। यथा:- अङ्क, वा अंक, अञ्चल वा अंचल, कण्ठ वा कंठ।

१४. हलंत चिह्न निअमतः लगाओल जाय, किंतु विभक्तिक संग अकारांत प्रयोग कएल जाय। यथा:- श्रीमान्, किंतु श्रीमानक।

१५. सभ एकल कारक चिह्न शब्दमे सटा क’ लिखल जाय, हटा क’ नहि, संयुक्त विभक्तिक हेतु फराक लिखल जाय, यथा घर परक।

१६. अनुनासिककेँ चन्द्रबिन्दु द्वारा व्यक्त कयल जाय। परंतु मुद्रणक सुविधार्थ हि समान जटिल मात्रापर अनुस्वारक प्रयोग चन्द्रबिन्दुक बदला कयल जा सकैत अछि। यथा- हिँ केर बदला हिं।

१७. पूर्ण विराम पासीसँ ( । ) सूचित कयल जाय।

१८. समस्त पद सटा क’ लिखल जाय, वा हाइफेनसँ जोड़ि क’ ,  हटा क’ नहि।

१९. लिअ तथा दिअ शब्दमे बिकारी (ऽ) नहि लगाओल जाय।

२०. अंक देवनागरी रूपमे राखल जाय।

२१.किछु ध्वनिक लेल नवीन चिन्ह बनबाओल जाय। जा' ई नहि बनल अछि ताबत एहि दुनू ध्वनिक बदला पूर्ववत् अय/ आय/ अए/ आए/ आओ/ अओ लिखल जाय। आकि ऎ वा ऒ सँ व्यक्त कएल जाय।

ह./- गोविन्द झा ११/८/७६ श्रीकान्त ठाकुर ११/८/७६ सुरेन्द्र झा "सुमन" ११/०८/७६ २.मैथिलीमे भाषा सम्पादन पाठ्यक्रम नीचाँक सूचीमे देल विकल्पमेसँ लैंगुएज एडीटर द्वारा कोन रूप चुनल जएबाक चाही: वर्ड फाइलमे बोल्ड कएल रूप: १.होयबला/ होबयबला/ होमयबला/ हेब’बला, हेम’बला/ होयबाक/होबएबला /होएबाक २. आ’/आऽ आ ३. क’ लेने/कऽ लेने/कए लेने/कय लेने/ल’/लऽ/लय/लए ४. भ’ गेल/भऽ गेल/भय गेल/भए गेल ५. कर’ गेलाह/करऽ गेलह/करए गेलाह/करय गेलाह ६. लिअ/दिअ लिय’,दिय’,लिअ’,दिय’/ ७. कर’ बला/करऽ बला/ करय बला करै बला/क’र’ बला / करए बला ८. बला वला ९. आङ्ल आंग्ल १०. प्रायः प्रायह ११. दुःख दुख १२. चलि गेल चल गेल/चैल गेल १३. देलखिन्ह देलकिन्ह, देलखिन १४. देखलन्हि देखलनि/ देखलैन्ह १५. छथिन्ह/ छलन्हि छथिन/ छलैन/ छलनि १६. चलैत/दैत चलति/दैति १७. एखनो अखनो १८. बढ़न्हि बढन्हि १९. ओ’/ओऽ(सर्वनाम) ओ २०. ओ (संयोजक) ओ’/ओऽ २१. फाँगि/फाङ्गि फाइंग/फाइङ २२. जे जे’/जेऽ २३. ना-नुकुर ना-नुकर २४. केलन्हि/कएलन्हि/कयलन्हि २५. तखन तँ/ तखन तँ २६. जा’ रहल/जाय रहल/जाए रहल २७. निकलय/निकलए लागल बहराय/ बहराए लागल निकल’/बहरै लागल २८. ओतय/जतय जत’/ओत’/ जतए/ ओतए २९. की फूरल जे कि फूरल जे ३०. जे जे’/जेऽ ३१. कूदि/यादि(मोन पारब) कूइद/याइद/कूद/याद/ यादि (मोन) ३२. इहो/ ओहो ३३. हँसए/ हँसय हँसऽ ३४. नौ आकि दस/नौ किंवा दस/ नौ वा दस ३५. सासु-ससुर सास-ससुर ३६. छह/ सात छ/छः/सात ३७. की की’/कीऽ (दीर्घीकारान्तमे ऽ वर्जित) ३८. जबाब जवाब ३९. करएताह/ करयताह करेताह ४०. दलान दिशि दलान दिश/दलान दिस ४१. गेलाह गएलाह/गयलाह ४२. किछु आर/ किछु और ४३. जाइत छल जाति छल/जैत छल ४४. पहुँचि/ भेटि जाइत छल पहुँच/भेट जाइत छल ४५. जबान (युवा)/ जवान(फौजी) ४६. लय/लए क’/कऽ/लए कए/ लऽ कऽ/ लऽ कए ४७. ल’/लऽ कय/ कए ४८. एखन/अखने अखन/एखने ४९. अहींकेँ अहीँकेँ ५०. गहींर गहीँर ५१. धार पार केनाइ धार पार केनाय/केनाए ५२. जेकाँ जेँकाँ/ जकाँ ५३. तहिना तेहिना ५४. एकर अकर ५५. बहिनउ बहनोइ ५६. बहिन बहिनि ५७. बहिन-बहिनोइ बहिन-बहनउ ५८. नहि/ नै ५९. करबा / करबाय/ करबाए ६०. तँ/ त ऽ तय/तए ६१. भाय भै/भाए ६२. भाँय ६३. यावत जावत ६४. माय मै / माए ६५. देन्हि/दएन्हि/ दयन्हि दन्हि/ दैन्हि ६६. द’/ दऽ/ दए ६७. ओ (संयोजक) ओऽ (सर्वनाम) ६८. तका कए तकाय तकाए ६९. पैरे (on foot) पएरे ७०. ताहुमे ताहूमे

७१. पुत्रीक ७२. बजा कय/ कए ७३. बननाय/बननाइ ७४. कोला ७५. दिनुका दिनका ७६. ततहिसँ ७७. गरबओलन्हि  गरबेलन्हि ७८. बालु बालू ७९. चेन्ह चिन्ह(अशुद्ध) ८०. जे जे’ ८१. से/ के से’/के’ ८२. एखुनका अखनुका ८३. भुमिहार भूमिहार ८४. सुगर सूगर ८५. झठहाक झटहाक ८६. छूबि ८७. करइयो/ओ करैयो/करिऔ-करइयौ ८८. पुबारि पुबाइ ८९. झगड़ा-झाँटी झगड़ा-झाँटि ९०. पएरे-पएरे पैरे-पैरे ९१. खेलएबाक ९२. खेलेबाक ९३. लगा ९४. होए- हो ९५. बुझल बूझल ९६. बूझल (संबोधन अर्थमे) ९७. यैह यएह / इएह ९८. तातिल ९९. अयनाय- अयनाइ/ अएनाइ १००. निन्न- निन्द १०१. बिनु बिन १०२. जाए जाइ १०३. जाइ (in different sense)-last word of sentence १०४. छत पर आबि जाइ १०५. ने १०६. खेलाए (play) –खेलाइ १०७. शिकाइत- शिकायत १०८. ढप- ढ़प १०९. पढ़- पढ ११०. कनिए/ कनिये कनिञे १११. राकस- राकश ११२. होए/ होय होइ ११३. अउरदा- औरदा ११४. बुझेलन्हि (different meaning- got understand) ११५. बुझएलन्हि/ बुझयलन्हि (understood himself) ११६. चलि- चल ११७. खधाइ- खधाय ११८. मोन पाड़लखिन्ह मोन पारलखिन्ह ११९. कैक- कएक- कइएक १२०. लग ल’ग  १२१. जरेनाइ १२२. जरओनाइ- जरएनाइ/जरयनाइ १२३. होइत १२४. गरबेलन्हि/ गरबओलन्हि १२५. चिखैत- (to test)चिखइत १२६. करइयो (willing to do) करैयो १२७. जेकरा- जकरा १२८. तकरा- तेकरा १२९. बिदेसर स्थानेमे/ बिदेसरे स्थानमे १३०. करबयलहुँ/ करबएलहुँ/ करबेलहुँ १३१. हारिक (उच्चारण हाइरक) १३२. ओजन वजन १३३. आधे भाग/ आध-भागे १३४. पिचा / पिचाय/पिचाए १३५. नञ/ ने १३६. बच्चा नञ (ने) पिचा जाय १३७. तखन ने (नञ) कहैत अछि। १३८. कतेक गोटे/ कताक गोटे १३९. कमाइ- धमाइ कमाई- धमाई १४०. लग ल’ग १४१. खेलाइ (for playing) १४२. छथिन्ह छथिन १४३. होइत होइ १४४. क्यो कियो / केओ १४५. केश (hair) १४६. केस (court-case) १४७. बननाइ/ बननाय/ बननाए १४८. जरेनाइ १४९. कुरसी कुर्सी १५०. चरचा चर्चा १५१. कर्म करम १५२. डुबाबए/ डुमाबय/ डुमाबए १५३. एखुनका/ अखुनका १५४. लय (वाक्यक अतिम शब्द)- लऽ १५५. कएलक केलक १५६. गरमी गर्मी १५७. बरदी वर्दी १५८. सुना गेलाह सुना’/सुनाऽ १५९. एनाइ-गेनाइ १६०. तेना ने घेरलन्हि १६१. नञि १६२. डरो ड’रो १६३. कतहु- कहीं १६४. उमरिगर- उमरगर १६५. भरिगर १६६. धोल/धोअल धोएल १६७. गप/गप्प १६८. के के’ १६९. दरबज्जा/ दरबजा १७०. ठाम १७१. धरि तक १७२. घूरि लौटि १७३. थोरबेक १७४. बड्ड १७५. तोँ/ तूँ १७६. तोँहि( पद्यमे ग्राह्य) १७७. तोँही / तोँहि १७८. करबाइए करबाइये १७९. एकेटा १८०. करितथि करतथि

१८१. पहुँचि पहुँच १८२. राखलन्हि रखलन्हि १८३. लगलन्हि लागलन्हि १८४. सुनि (उच्चारण सुइन) १८५. अछि (उच्चारण अइछ) १८६. एलथि गेलथि १८७. बितओने बितेने १८८. करबओलन्हि/ करेलखिन्ह १८९. करएलन्हि १९०. आकि कि १९१. पहुँचि पहुँच १९२. जराय/ जराए जरा (आगि लगा) १९३. से से’ १९४. हाँ मे हाँ (हाँमे हाँ विभक्त्तिमे हटा कए) १९५. फेल फैल १९६. फइल(spacious) फैल १९७. होयतन्हि/ होएतन्हि हेतन्हि १९८. हाथ मटिआयब/ हाथ मटियाबय/हाथ मटिआएब १९९. फेका फेंका २००. देखाए देखा २०१. देखाबए २०२. सत्तरि सत्तर २०३. साहेब साहब २०४.गेलैन्ह/ गेलन्हि २०५.हेबाक/ होएबाक २०६.केलो/ कएलहुँ २०७. किछु न किछु/ किछु ने किछु २०८.घुमेलहुँ/ घुमओलहुँ २०९. एलाक/ अएलाक २१०. अः/ अह २११.लय/ लए (अर्थ-परिवर्त्तन) २१२.कनीक/ कनेक २१३.सबहक/ सभक २१४.मिलाऽ/ मिला २१५.कऽ/ क २१६.जाऽ/ जा २१७.आऽ/ आ २१८.भऽ/भ’ (’ फॉन्टक कमीक द्योतक) २१९.निअम/ नियम २२०.हेक्टेअर/ हेक्टेयर २२१.पहिल अक्षर ढ/ बादक/बीचक ढ़ २२२.तहिं/तहिँ/ तञि/ तैं २२३.कहिं/ कहीं २२४.तँइ/ तइँ २२५.नँइ/ नइँ/  नञि/ नहि २२६.है/ हए २२७.छञि/ छै/ छैक/छइ २२८.दृष्टिएँ/ दृष्टियेँ २२९.आ (come)/ आऽ(conjunction) २३०. आ (conjunction)/ आऽ(come) २३१.कुनो/ कोनो २३२.गेलैन्ह-गेलन्हि २३३.हेबाक- होएबाक २३४.केलौँ- कएलौँ- कएलहुँ २३५.किछु न किछ- किछु ने किछु २३६.केहेन- केहन २३७.आऽ (come)-आ (conjunction-and)/आ २३८. हएत-हैत २३९.घुमेलहुँ-घुमएलहुँ २४०.एलाक- अएलाक २४१.होनि- होइन/होन्हि २४२.ओ-राम ओ श्यामक बीच(conjunction), ओऽ कहलक (he said)/ओ २४३.की हए/ कोसी अएली हए/ की है। की हइ २४४.दृष्टिएँ/ दृष्टियेँ २४५.शामिल/ सामेल २४६.तैँ / तँए/ तञि/ तहिं २४७.जौँ/ ज्योँ २४८.सभ/ सब २४९.सभक/ सबहक २५०.कहिं/ कहीं २५१.कुनो/ कोनो २५२.फारकती भऽ गेल/ भए गेल/ भय गेल २५३.कुनो/ कोनो २५४.अः/ अह २५५.जनै/ जनञ २५६.गेलन्हि/ गेलाह (अर्थ परिवर्तन) २५७.केलन्हि/ कएलन्हि २५८.लय/ लए (अर्थ परिवर्तन) २५९.कनीक/ कनेक २६०.पठेलन्हि/ पठओलन्हि २६१.निअम/ नियम २६२.हेक्टेअर/ हेक्टेयर २६३.पहिल अक्षर रहने ढ/ बीचमे रहने ढ़ २६४.आकारान्तमे बिकारीक प्रयोग उचित नहि/ अपोस्ट्रोफीक प्रयोग फान्टक तकनीकी न्यूनताक परिचायक ओकर बदला अवग्रह (बिकारी) क प्रयोग उचित २६५.केर/-क/ कऽ/ के २६६.छैन्हि- छन्हि २६७.लगैए/ लगैये २६८.होएत/ हएत २६९.जाएत/ जएत २७०.आएत/ अएत/ आओत २७१.खाएत/ खएत/ खैत २७२.पिअएबाक/ पिएबाक २७३.शुरु/ शुरुह २७४.शुरुहे/ शुरुए २७५.अएताह/अओताह/ एताह २७६.जाहि/ जाइ/ जै २७७.जाइत/ जैतए/ जइतए २७८.आएल/ अएल २७९.कैक/ कएक २८०.आयल/ अएल/ आएल २८१. जाए/ जै/ जए २८२. नुकएल/ नुकाएल २८३. कठुआएल/ कठुअएल २८४. ताहि/ तै २८५. गायब/ गाएब/ गएब २८६. सकै/ सकए/ सकय २८७.सेरा/सरा/ सराए (भात सेरा गेल) २८८.कहैत रही/देखैत रही/ कहैत छलहुँ/ कहै छलहुँ- एहिना चलैत/ पढ़ैत (पढ़ै-पढ़ैत अर्थ कखनो काल परिवर्तित)-आर बुझै/ बुझैत (बुझै/ बुझैत छी, मुदा बुझैत-बुझैत)/ सकैत/ सकै। करैत/ करै। दै/ दैत। छैक/ छै। बचलै/ बचलैक। रखबा/ रखबाक । बिनु/ बिन। रातिक/ रातुक २८९. दुआरे/ द्वारे २९०.भेटि/ भेट २९१. खन/ खुना (भोर खन/ भोर खुना) २९२.तक/ धरि २९३.गऽ/गै (meaning different-जनबै गऽ) २९४.सऽ/ सँ (मुदा दऽ, लऽ) २९५.त्त्व,(तीन अक्षरक मेल बदला पुनरुक्तिक एक आ एकटा दोसरक उपयोग) आदिक बदला त्व आदि। महत्त्व/ महत्व/ कर्ता/ कर्त्ता आदिमे त्त संयुक्तक कोनो आवश्यकता मैथिलीमे नहि अछि। वक्तव्य २९६.बेसी/ बेशी २९७.बाला/वाला बला/ वला (रहैबला) २९८.वाली/ (बदलएवाली) २९९.वार्त्ता/ वार्ता ३००. अन्तर्राष्ट्रिय/ अन्तर्राष्ट्रीय ३०१. लेमए/ लेबए ३०२.लमछुरका, नमछुरका ३०२.लागै/ लगै (भेटैत/ भेटै) ३०३.लागल/ लगल ३०४.हबा/ हवा ३०५.राखलक/ रखलक ३०६.आ (come)/ आ (and) ३०७. पश्चाताप/ पश्चात्ताप ३०८. ऽ केर व्यवहार शब्दक अन्तमे मात्र, यथासंभव बीचमे नहि। ३०९.कहैत/ कहै ३१०. रहए (छल)/ रहै (छलै) (meaning different) ३११.तागति/ ताकति ३१२.खराप/ खराब ३१३.बोइन/ बोनि/ बोइनि ३१४.जाठि/ जाइठ ३१५.कागज/ कागच ३१६.गिरै (meaning different- swallow)/ गिरए (खसए) ३१७.राष्ट्रिय/ राष्ट्रीय उच्चारण निर्देश: दन्त न क उच्चारणमे दाँतमे जीह सटत- जेना बाजू नाम , मुदा ण क उच्चारणमे जीह मूर्धामे सटत (नहि सटैए तँ उच्चारण दोष अछि)- जेना बाजू गणेश। तालव्य शमे जीह तालुसँ , षमे मूर्धासँ आ दन्त समे दाँतसँ सटत। निशाँ, सभ आ शोषण बाजि कऽ देखू। मैथिलीमे ष केँ वैदिक संस्कृत जेकाँ ख सेहो उच्चरित कएल जाइत अछि, जेना वर्षा, दोष। य अनेको स्थानपर ज जेकाँ उच्चरित होइत अछि आ ण ड़ जेकाँ (यथा संयोग आ गणेश संजोग आ गड़ेस उच्चरित होइत अछि)। मैथिलीमे व क उच्चारण ब, श क उच्चारण स आ य क उच्चारण ज सेहो होइत अछि। ओहिना ह्रस्व इ बेशीकाल मैथिलीमे पहिने बाजल जाइत अछि कारण देवनागरीमे आ मिथिलाक्षरमे ह्रस्व इ अक्षरक पहिने लिखलो जाइत आ बाजलो जएबाक चाही। कारण जे हिन्दीमे एकर दोषपूर्ण उच्चारण होइत अछि (लिखल तँ पहिने जाइत अछि मुदा बाजल बादमे जाइत अछि), से शिक्षा पद्धतिक दोषक कारण हम सभ ओकर उच्चारण दोषपूर्ण ढंगसँ कऽ रहल छी। अछि- अ इ छ  ऐछ छथि- छ इ थ  – छैथ पहुँचि- प हुँ इ च आब अ आ इ ई ए ऐ ओ औ अं अः ऋ एहि सभ लेल मात्रा सेहो अछि, मुदा एहिमे ई ऐ ओ औ अं अः ऋ केँ संयुक्ताक्षर रूपमे गलत रूपमे प्रयुक्त आ उच्चरित कएल जाइत अछि। जेना ऋ केँ री  रूपमे उच्चरित करब। आ देखियौ- एहि लेल देखिऔ क प्रयोग अनुचित। मुदा देखिऐ लेल देखियै अनुचित। क् सँ ह् धरि अ सम्मिलित भेलासँ क सँ ह बनैत अछि, मुदा उच्चारण काल हलन्त युक्त शब्दक अन्तक उच्चारणक प्रवृत्ति बढ़ल अछि, मुदा हम जखन मनोजमे ज् अन्तमे बजैत छी, तखनो पुरनका लोककेँ बजैत सुनबन्हि- मनोजऽ, वास्तवमे ओ अ युक्त ज् = ज बजै छथि। फेर ज्ञ अछि ज् आ ञ क संयुक्त मुदा गलत उच्चारण होइत अछि- ग्य। ओहिना क्ष अछि क् आ ष क संयुक्त मुदा उच्चारण होइत अछि छ। फेर श् आ र क संयुक्त अछि श्र ( जेना श्रमिक) आ स् आ र क संयुक्त अछि स्र (जेना मिस्र)। त्र भेल त+र । उच्चारणक ऑडियो फाइल विदेह आर्काइव  http://www.videha.co.in/ पर उपलब्ध अछि। फेर केँ / सँ / पर पूर्व अक्षरसँ सटा कऽ लिखू मुदा तँ/ के/ कऽ हटा कऽ। एहिमे सँ मे पहिल सटा कऽ लिखू आ बादबला हटा कऽ। अंकक बाद टा लिखू सटा कऽ मुदा अन्य ठाम टा लिखू हटा कऽ– जेना छहटा मुदा सभ टा। फेर ६अ म सातम लिखू- छठम सातम नहि। घरबलामे बला मुदा घरवालीमे वाली प्रयुक्त करू। रहए- रहै मुदा सकैए (उच्चारण सकै-ए)। मुदा कखनो काल रहए आ रहै मे अर्थ भिन्नता सेहो, जेना से कम्मो जगहमे पार्किंग करबाक अभ्यास रहै ओकरा। पुछलापर पता लागल जे ढुनढुन नाम्ना ई ड्राइवर कनाट प्लेसक पार्किंगमे काज करैत रहए। छलै, छलए मे सेहो एहि तरहक भेल। छलए क उच्चारण छल-ए सेहो। संयोगने- (उच्चारण संजोगने) केँ/ के / कऽ केर- क (केर क प्रयोग नहि करू ) क (जेना रामक) –रामक आ संगे (उच्चारण राम के /  राम कऽ सेहो) सँ- सऽ चन्द्रबिन्दु आ अनुस्वार- अनुस्वारमे कंठ धरिक प्रयोग होइत अछि मुदा चन्द्रबिन्दुमे नहि। चन्द्रबिन्दुमे कनेक एकारक सेहो उच्चारण होइत अछि- जेना रामसँ- (उच्चारण राम सऽ)  रामकेँ- (उच्चारण राम कऽ/ राम के सेहो)। केँ जेना रामकेँ भेल हिन्दीक को (राम को)- राम को= रामकेँ क जेना रामक भेल हिन्दीक का ( राम का) राम का= रामक कऽ जेना जा कऽ भेल हिन्दीक कर ( जा कर) जा कर= जा कऽ सँ भेल हिन्दीक से (राम से) राम से= रामसँ सऽ तऽ त केर एहि सभक प्रयोग अवांछित। के दोसर अर्थेँ प्रयुक्त भऽ सकैए- जेना के कहलक? नञि, नहि, नै, नइ, नँइ, नइँ एहि सभक उच्चारण- नै त्त्व क बदलामे त्व जेना महत्वपूर्ण (महत्त्वपूर्ण नहि) जतए अर्थ बदलि जाए ओतहि मात्र तीन अक्षरक संयुक्ताक्षरक प्रयोग उचित। सम्पति- उच्चारण स म्प इ त (सम्पत्ति नहि- कारण सही उच्चारण आसानीसँ सम्भव नहि)। मुदा सर्वोत्तम (सर्वोतम नहि)। राष्ट्रिय (राष्ट्रीय नहि) सकैए/ सकै (अर्थ परिवर्तन) पोछैले/ पोछैए/ पोछए/ (अर्थ परिवर्तन) पोछए/ पोछै ओ लोकनि ( हटा कऽ, ओ मे बिकारी नहि) ओइ/ ओहि ओहिले/ ओहि लेल जएबेँ/ बैसबेँ पँचभइयाँ देखियौक (देखिऔक बहि- तहिना अ मे ह्रस्व आ दीर्घक मात्राक प्रयोग अनुचित) जकाँ/ जेकाँ तँइ/ तैँ होएत/ हएत नञि/ नहि/ नँइ/ नइँ सौँसे बड़/ बड़ी (झोराओल) गाए (गाइ नहि) रहलेँ/ पहिरतैँ हमहीं/ अहीं सब - सभ सबहक - सभहक धरि - तक गप- बात बूझब - समझब बुझलहुँ - समझलहुँ हमरा आर - हम सभ आकि- आ कि सकैछ/ करैछ (गद्यमे प्रयोगक आवश्यकता नहि) मे केँ सँ पर (शब्दसँ सटा कऽ) तँ कऽ धऽ दऽ (शब्दसँ हटा कऽ) मुदा दूटा वा बेशी विभक्ति संग रहलापर पहिल विभक्ति टाकेँ सटाऊ। एकटा दूटा (मुदा कैक टा) बिकारीक प्रयोग शब्दक अन्तमे, बीचमे अनावश्यक रूपेँ नहि। आकारान्त आ अन्तमे अ क बाद बिकारीक प्रयोग नहि (जेना दिअ, आ ) अपोस्ट्रोफीक प्रयोग बिकारीक बदलामे करब अनुचित आ मात्र फॉन्टक तकनीकी न्यूनताक परिचायक)- ओना बिकारीक संस्कृत रूप ऽ अवग्रह कहल जाइत अछि आ वर्तनी आ उच्चारण दुनू ठाम एकर लोप रहैत अछि/ रहि सकैत अछि (उच्चारणमे लोप रहिते अछि)। मुदा अपोस्ट्रोफी सेहो अंग्रेजीमे पसेसिव केसमे होइत अछि आ फ्रेंचमे शब्दमे जतए एकर प्रयोग होइत अछि जेना raison d’etre एतए सेहो एकर उच्चारण रैजौन डेटर होइत अछि, माने अपोस्ट्रॉफी अवकाश नहि दैत अछि वरन जोड़ैत अछि, से एकर प्रयोग बिकारीक बदला देनाइ तकनीकी रूपेँ सेहो अनुचित)। अइमे, एहिमे जइमे, जाहिमे एखन/ अखन/ अइखन केँ (के नहि) मे (अनुस्वार रहित) भऽ मे दऽ तँ (तऽ त नहि) सँ ( सऽ स नहि) गाछ तर गाछ लग साँझ खन जो (जो go, करै जो do) Festivals of Mithila DATE-LIST (year- 2010-11) (१४१८ साल) Marriage Days: Nov.2010- 19 Dec.2010- 3,8 January 2011- 17, 21, 23, 24, 26, 27, 28 31 Feb.2011- 3, 4, 7, 9, 18, 20, 24, 25, 27, 28 March 2011- 2, 7 May 2011- 11, 12, 13, 18, 19, 20, 22, 23, 29, 30 June 2011- 1, 2, 3, 8, 9, 10, 12, 13, 19, 20, 26, 29 Upanayana Days: February 2011- 8 March 2011- 7 May 2011- 12, 13 June 2011- 6, 12 Dviragaman Din: November 2010- 19, 22, 25, 26 December 2010- 6, 8, 9, 10, 12 February 2011- 20, 21 March 2011- 6, 7, 9, 13 April 2011- 17, 18, 22 May 2011- 5, 6, 8, 13 Mundan Din: November 2010- 24, 26 December 2010- 10, 17 February 2011- 4, 16, 21 March 2011- 7, 9 April 2011- 22 May 2011- 6, 9, 19 June 2011- 3, 6, 10, 20 FESTIVALS OF MITHILA Mauna Panchami-31 July Somavati Amavasya Vrat- 1 August Madhushravani-12 August Nag Panchami- 14 August Raksha Bandhan- 24 Aug Krishnastami- 01 September Kushi Amavasya- 08 September Hartalika Teej- 11 September ChauthChandra-11 September Vishwakarma Pooja- 17 September Karma Dharma Ekadashi-19 September Indra Pooja Aarambh- 20 September Anant Caturdashi- 22 Sep Agastyarghadaan- 23 Sep Pitri Paksha begins- 24 Sep Jimootavahan Vrata/ Jitia-30 Sep Matri Navami- 02 October Kalashsthapan- 08 October Belnauti- 13 October Patrika Pravesh- 14 October Mahastami- 15 October Maha Navami - 16-17 October Vijaya Dashami- 18 October Kojagara- 22 Oct Dhanteras- 3 November Diyabati, shyama pooja- 5 November Annakoota/ Govardhana Pooja-07 November Bhratridwitiya/ Chitragupta Pooja-08 November Chhathi- -12 November Akshyay Navami- 15 November Devotthan Ekadashi- 17 November Kartik Poornima/ Sama Bisarjan- 21 Nov Shaa. ravivratarambh- 21 November Navanna parvan- 24 -26 November Vivaha Panchmi- 10 December Naraknivaran chaturdashi- 01 February Makara/ Teela Sankranti-15 Jan Basant Panchami/ Saraswati Pooja- 08 Februaqry Achla Saptmi- 10 February Mahashivaratri-03 March Holikadahan-Fagua-19 March Holi-20 Mar Varuni Yoga- 31 March va.navaratrarambh- 4 April vaa. Chhathi vrata- 9 April Ram Navami- 12 April Mesha Sankranti-Satuani-14 April Jurishital-15 April Somavati Amavasya Vrata- 02 May Ravi Brat Ant- 08 May Akshaya Tritiya-06 May Janaki Navami- 12 May Vat Savitri-barasait- 01 June Ganga Dashhara-11 June Jagannath Rath Yatra- 3 July Hari Sayan Ekadashi- 11 Jul Aashadhi Guru Poornima-15 Jul VIDEHA ARCHIVE १.विदेह ई-पत्रिकाक सभटा पुरान अंक ब्रेल, तिरहुता आ देवनागरी रूपमे Videha e journal's all old issues in Braille Tirhuta and Devanagari versions विदेह ई-पत्रिकाक पहिल ५० अंक

विदेह ई-पत्रिकाक ५०म सँ आगाँक अंक २.मैथिली पोथी डाउनलोड Maithili Books Download ३.मैथिली ऑडियो संकलन Maithili Audio Downloads ४.मैथिली वीडियोक संकलन Maithili Videos ५.मिथिला चित्रकला/ आधुनिक चित्रकला आ चित्र Mithila Painting/ Modern Art and Photos "विदेह"क एहि सभ सहयोगी लिंकपर सेहो एक बेर जाऊ। ६.विदेह मैथिली क्विज  :  http://videhaquiz.blogspot.com/ ७.विदेह मैथिली जालवृत्त एग्रीगेटर : http://videha-aggregator.blogspot.com/ ८.विदेह मैथिली साहित्य अंग्रेजीमे अनूदित http://madhubani-art.blogspot.com/ ९.विदेहक पूर्व-रूप "भालसरिक गाछ"  : http://gajendrathakur.blogspot.com/ १०.विदेह इंडेक्स  : http://videha123.blogspot.com/ ११.विदेह फाइल : http://videha123.wordpress.com/ १२. विदेह: सदेह : पहिल तिरहुता (मिथिला़क्षर) जालवृत्त (ब्लॉग) http://videha-sadeha.blogspot.com/ १३. विदेह:ब्रेल: मैथिली ब्रेलमे: पहिल बेर विदेह द्वारा http://videha-braille.blogspot.com/ १४.VIDEHA IST MAITHILI  FORTNIGHTLY EJOURNAL ARCHIVE http://videha-archive.blogspot.com/ १५. विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका मैथिली पोथीक आर्काइव http://videha-pothi.blogspot.com/ १६. विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका ऑडियो आर्काइव http://videha-audio.blogspot.com/ १७. विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका वीडियो आर्काइव http://videha-video.blogspot.com/ १८. विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका मिथिला चित्रकला, आधुनिक कला आ चित्रकला http://videha-paintings-photos.blogspot.com/ १९. मैथिल आर मिथिला (मैथिलीक सभसँ लोकप्रिय जालवृत्त) http://maithilaurmithila.blogspot.com/ २०.श्रुति प्रकाशन http://www.shruti-publication.com/ २१.http://groups.google.com/group/videha VIDEHA केर सदस्यता लिअ Top of Form Bottom of Form ईमेल : एहि समूहपर जाऊ २२.http://groups.yahoo.com/group/VIDEHA/ Top of Form Subscribe to VIDEHA Powered by us.groups.yahoo.com Bottom of Form २३.गजेन्द्र ठाकुर इ‍डेक्स http://gajendrathakur123.blogspot.com २४.विदेह रेडियो:मैथिली कथा-कविता आदिक पहिल पोडकास्ट साइट http://videha123radio.wordpress.com/ २५. नेना भुटका http://mangan-khabas.blogspot.com/ महत्त्वपूर्ण सूचना:(१) 'विदेह' द्वारा धारावाहिक रूपे ई-प्रकाशित कएल गेल गजेन्द्र ठाकुरक  निबन्ध-प्रबन्ध-समीक्षा, उपन्यास (सहस्रबाढ़नि) , पद्य-संग्रह (सहस्राब्दीक चौपड़पर), कथा-गल्प (गल्प-गुच्छ), नाटक(संकर्षण), महाकाव्य (त्वञ्चाहञ्च आ असञ्जाति मन) आ बाल-किशोर साहित्य विदेहमे संपूर्ण ई-प्रकाशनक बाद प्रिंट फॉर्ममे। कुरुक्षेत्रम्–अन्तर्मनक खण्ड-१ सँ ७ Combined ISBN No.978-81-907729-7-6 विवरण एहि पृष्ठपर नीचाँमे आ प्रकाशकक साइट http://www.shruti-publication.com/ पर । महत्त्वपूर्ण सूचना (२):सूचना: विदेहक मैथिली-अंग्रेजी आ अंग्रेजी मैथिली कोष (इंटरनेटपर पहिल बेर सर्च-डिक्शनरी) एम.एस. एस.क्यू.एल. सर्वर आधारित -Based on ms-sql server Maithili-English and English-Maithili Dictionary. विदेहक भाषापाक- रचनालेखन स्तंभमे। कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक- गजेन्द्र ठाकुर गजेन्द्र ठाकुरक निबन्ध-प्रबन्ध-समीक्षा, उपन्यास (सहस्रबाढ़नि) , पद्य-संग्रह (सहस्राब्दीक चौपड़पर), कथा-गल्प (गल्प गुच्छ), नाटक(संकर्षण), महाकाव्य (त्वञ्चाहञ्च आ असञ्जाति मन) आ बालमंडली-किशोरजगत विदेहमे संपूर्ण ई-प्रकाशनक बाद प्रिंट फॉर्ममे। कुरुक्षेत्रम्–अन्तर्मनक, खण्ड-१ सँ ७ Ist edition 2009 of Gajendra Thakur’s KuruKshetram-Antarmanak (Vol. I to VII)- essay-paper-criticism, novel, poems, story, play, epics and Children-grown-ups literature in single binding: Language:Maithili ६९२ पृष्ठ : मूल्य भा. रु. 100/-(for individual buyers inside india) (add courier charges Rs.50/-per copy for Delhi/NCR and Rs.100/- per copy for outside Delhi)

For Libraries and overseas buyers $40 US (including postage)

The book is AVAILABLE FOR PDF DOWNLOAD AT

https://sites.google.com/a/videha.com/videha/

http://videha123.wordpress.com/  

Details for purchase available at print-version publishers's site website: http://www.shruti-publication.com/ or you may write to e-mail:shruti.publication@shruti-publication.com विदेह: सदेह : १: २: ३: ४ तिरहुता : देवनागरी "विदेह" क, प्रिंट संस्करण :विदेह-ई-पत्रिका (http://www.videha.co.in/) क चुनल रचना सम्मिलित। विदेह:सदेह:१: २: ३: ४ सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। Details for purchase available at print-version publishers's site http://www.shruti-publication.com  or you may write to shruti.publication@shruti-publication.com २. संदेश- [ विदेह ई-पत्रिका, विदेह:सदेह मिथिलाक्षर आ देवनागरी आ गजेन्द्र ठाकुरक सात खण्डक- निबन्ध-प्रबन्ध-समीक्षा,उपन्यास (सहस्रबाढ़नि) , पद्य-संग्रह (सहस्राब्दीक चौपड़पर), कथा-गल्प (गल्प गुच्छ), नाटक (संकर्षण), महाकाव्य (त्वञ्चाहञ्च आ असञ्जाति मन) आ बाल-मंडली-किशोर जगत- संग्रह कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक मादेँ। ] १.श्री गोविन्द झा- विदेहकेँ तरंगजालपर उतारि विश्वभरिमे मातृभाषा मैथिलीक लहरि जगाओल, खेद जे अपनेक एहि महाभियानमे हम एखन धरि संग नहि दए सकलहुँ। सुनैत छी अपनेकेँ सुझाओ आ रचनात्मक आलोचना प्रिय लगैत अछि तेँ किछु लिखक मोन भेल। हमर सहायता आ सहयोग अपनेकेँ सदा उपलब्ध रहत। २.श्री रमानन्द रेणु- मैथिलीमे ई-पत्रिका पाक्षिक रूपेँ चला कऽ जे अपन मातृभाषाक प्रचार कऽ रहल छी, से धन्यवाद । आगाँ अपनेक समस्त मैथिलीक कार्यक हेतु हम हृदयसँ शुभकामना दऽ रहल छी। ३.श्री विद्यानाथ झा "विदित"- संचार आ प्रौद्योगिकीक एहि प्रतिस्पर्धी ग्लोबल युगमे अपन महिमामय "विदेह"केँ अपना देहमे प्रकट देखि जतबा प्रसन्नता आ संतोष भेल, तकरा कोनो उपलब्ध "मीटर"सँ नहि नापल जा सकैछ? ..एकर ऐतिहासिक मूल्यांकन आ सांस्कृतिक प्रतिफलन एहि शताब्दीक अंत धरि लोकक नजरिमे आश्चर्यजनक रूपसँ प्रकट हैत। ४. प्रो. उदय नारायण सिंह "नचिकेता"- जे काज अहाँ कए रहल छी तकर चरचा एक दिन मैथिली भाषाक इतिहासमे होएत। आनन्द भए रहल अछि, ई जानि कए जे एतेक गोट मैथिल "विदेह" ई जर्नलकेँ पढ़ि रहल छथि।...विदेहक चालीसम अंक पुरबाक लेल अभिनन्दन। ५. डॉ. गंगेश गुंजन- एहि विदेह-कर्ममे लागि रहल अहाँक सम्वेदनशील मन, मैथिलीक प्रति समर्पित मेहनतिक अमृत रंग, इतिहास मे एक टा विशिष्ट फराक अध्याय आरंभ करत, हमरा विश्वास अछि। अशेष शुभकामना आ बधाइक सङ्ग, सस्नेह...अहाँक पोथी कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक प्रथम दृष्टया बहुत भव्य तथा उपयोगी बुझाइछ। मैथिलीमे तँ अपना स्वरूपक प्रायः ई पहिले एहन  भव्य अवतारक पोथी थिक। हर्षपूर्ण हमर हार्दिक बधाई स्वीकार करी। ६. श्री रामाश्रय झा "रामरंग"(आब स्वर्गीय)- "अपना" मिथिलासँ संबंधित...विषय वस्तुसँ अवगत भेलहुँ।...शेष सभ कुशल अछि। ७. श्री ब्रजेन्द्र त्रिपाठी- साहित्य अकादमी- इंटरनेट पर प्रथम मैथिली पाक्षिक पत्रिका "विदेह" केर लेल बधाई आ शुभकामना स्वीकार करू। ८. श्री प्रफुल्लकुमार सिंह "मौन"- प्रथम मैथिली पाक्षिक पत्रिका "विदेह" क प्रकाशनक समाचार जानि कनेक चकित मुदा बेसी आह्लादित भेलहुँ। कालचक्रकेँ पकड़ि जाहि दूरदृष्टिक परिचय देलहुँ, ओहि लेल हमर मंगलकामना। ९.डॉ. शिवप्रसाद यादव- ई जानि अपार हर्ष भए रहल अछि, जे नव सूचना-क्रान्तिक क्षेत्रमे मैथिली पत्रकारिताकेँ प्रवेश दिअएबाक साहसिक कदम उठाओल अछि। पत्रकारितामे एहि प्रकारक नव प्रयोगक हम स्वागत करैत छी, संगहि "विदेह"क सफलताक शुभकामना। १०. श्री आद्याचरण झा- कोनो पत्र-पत्रिकाक प्रकाशन- ताहूमे मैथिली पत्रिकाक प्रकाशनमे के कतेक सहयोग करताह- ई तऽ भविष्य कहत। ई हमर ८८ वर्षमे ७५ वर्षक अनुभव रहल। एतेक पैघ महान यज्ञमे हमर श्रद्धापूर्ण आहुति प्राप्त होयत- यावत ठीक-ठाक छी/ रहब। ११. श्री विजय ठाकुर- मिशिगन विश्वविद्यालय- "विदेह" पत्रिकाक अंक देखलहुँ, सम्पूर्ण टीम बधाईक पात्र अछि। पत्रिकाक मंगल भविष्य हेतु हमर शुभकामना स्वीकार कएल जाओ। १२. श्री सुभाषचन्द्र यादव- ई-पत्रिका "विदेह" क बारेमे जानि प्रसन्नता भेल। ’विदेह’ निरन्तर पल्लवित-पुष्पित हो आ चतुर्दिक अपन सुगंध पसारय से कामना अछि। १३. श्री मैथिलीपुत्र प्रदीप- ई-पत्रिका "विदेह" केर सफलताक भगवतीसँ कामना। हमर पूर्ण सहयोग रहत। १४. डॉ. श्री भीमनाथ झा- "विदेह" इन्टरनेट पर अछि तेँ "विदेह" नाम उचित आर कतेक रूपेँ एकर विवरण भए सकैत अछि। आइ-काल्हि मोनमे उद्वेग रहैत अछि, मुदा शीघ्र पूर्ण सहयोग देब।कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक देखि अति प्रसन्नता भेल। मैथिलीक लेल ई घटना छी। १५. श्री रामभरोस कापड़ि "भ्रमर"- जनकपुरधाम- "विदेह" ऑनलाइन देखि रहल छी। मैथिलीकेँ अन्तर्राष्ट्रीय जगतमे पहुँचेलहुँ तकरा लेल हार्दिक बधाई। मिथिला रत्न सभक संकलन अपूर्व। नेपालोक सहयोग भेटत, से विश्वास करी। १६. श्री राजनन्दन लालदास- "विदेह" ई-पत्रिकाक माध्यमसँ बड़ नीक काज कए रहल छी, नातिक अहिठाम देखलहुँ। एकर वार्षिक अ‍ंक जखन प्रिं‍ट निकालब तँ हमरा पठायब। कलकत्तामे बहुत गोटेकेँ हम साइटक पता लिखाए देने छियन्हि। मोन तँ होइत अछि जे दिल्ली आबि कए आशीर्वाद दैतहुँ, मुदा उमर आब बेशी भए गेल। शुभकामना देश-विदेशक मैथिलकेँ जोड़बाक लेल।.. उत्कृष्ट प्रकाशन कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक लेल बधाइ। अद्भुत काज कएल अछि, नीक प्रस्तुति अछि सात खण्डमे।  मुदा अहाँक सेवा आ से निःस्वार्थ तखन बूझल जाइत जँ अहाँ द्वारा प्रकाशित पोथी सभपर दाम लिखल नहि रहितैक। ओहिना सभकेँ विलहि देल जइतैक। (स्पष्टीकरण-  श्रीमान्, अहाँक सूचनार्थ विदेह द्वारा ई-प्रकाशित कएल सभटा सामग्री आर्काइवमे https://sites.google.com/a/videha.com/videha-pothi/ पर बिना मूल्यक डाउनलोड लेल उपलब्ध छै आ भविष्यमे सेहो रहतैक। एहि आर्काइवकेँ जे कियो प्रकाशक अनुमति लऽ कऽ प्रिंट रूपमे प्रकाशित कएने छथि आ तकर ओ दाम रखने छथि ताहिपर हमर कोनो नियंत्रण नहि अछि।- गजेन्द्र ठाकुर)...   अहाँक प्रति अशेष शुभकामनाक संग। १७. डॉ. प्रेमशंकर सिंह- अहाँ मैथिलीमे इंटरनेटपर पहिल पत्रिका "विदेह" प्रकाशित कए अपन अद्भुत मातृभाषानुरागक परिचय देल अछि, अहाँक निःस्वार्थ मातृभाषानुरागसँ प्रेरित छी, एकर निमित्त जे हमर सेवाक प्रयोजन हो, तँ सूचित करी। इंटरनेटपर आद्योपांत पत्रिका देखल, मन प्रफुल्लित भऽ गेल। १८.श्रीमती शेफालिका वर्मा- विदेह ई-पत्रिका देखि मोन उल्लाससँ भरि गेल। विज्ञान कतेक प्रगति कऽ रहल अछि...अहाँ सभ अनन्त आकाशकेँ भेदि दियौ, समस्त विस्तारक रहस्यकेँ तार-तार कऽ दियौक...। अपनेक अद्भुत पुस्तक कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक विषयवस्तुक दृष्टिसँ गागरमे सागर अछि। बधाई। १९.श्री हेतुकर झा, पटना-जाहि समर्पण भावसँ अपने मिथिला-मैथिलीक सेवामे तत्पर छी से स्तुत्य अछि। देशक राजधानीसँ भय रहल मैथिलीक शंखनाद मिथिलाक गाम-गाममे मैथिली चेतनाक विकास अवश्य करत। २०. श्री योगानन्द झा, कबिलपुर, लहेरियासराय- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पोथीकेँ निकटसँ देखबाक अवसर भेटल अछि आ मैथिली जगतक एकटा उद्भट ओ समसामयिक दृष्टिसम्पन्न हस्ताक्षरक कलमबन्द परिचयसँ आह्लादित छी। "विदेह"क देवनागरी सँस्करण पटनामे रु. 80/- मे उपलब्ध भऽ सकल जे विभिन्न लेखक लोकनिक छायाचित्र, परिचय पत्रक ओ रचनावलीक सम्यक प्रकाशनसँ ऐतिहासिक कहल जा सकैछ। २१. श्री किशोरीकान्त मिश्र- कोलकाता- जय मैथिली, विदेहमे बहुत रास कविता, कथा, रिपोर्ट आदिक सचित्र संग्रह देखि आ आर अधिक प्रसन्नता मिथिलाक्षर देखि- बधाई स्वीकार कएल जाओ। २२.श्री जीवकान्त- विदेहक मुद्रित अंक पढ़ल- अद्भुत मेहनति। चाबस-चाबस। किछु समालोचना मरखाह..मुदा सत्य। २३. श्री भालचन्द्र झा- अपनेक कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक देखि बुझाएल जेना हम अपने छपलहुँ अछि। एकर विशालकाय आकृति अपनेक सर्वसमावेशताक परिचायक अछि। अपनेक रचना सामर्थ्यमे उत्तरोत्तर वृद्धि हो, एहि शुभकामनाक संग हार्दिक बधाई। २४.श्रीमती डॉ नीता झा- अहाँक कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़लहुँ। ज्योतिरीश्वर शब्दावली, कृषि मत्स्य शब्दावली आ सीत बसन्त आ सभ कथा, कविता, उपन्यास, बाल-किशोर साहित्य सभ उत्तम छल। मैथिलीक उत्तरोत्तर विकासक लक्ष्य दृष्टिगोचर होइत अछि। २५.श्री मायानन्द मिश्र- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक मे हमर उपन्यास स्त्रीधनक जे विरोध कएल गेल अछि तकर हम विरोध करैत छी।... कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पोथीक लेल शुभकामना।(श्रीमान् समालोचनाकेँ विरोधक रूपमे नहि लेल जाए।-गजेन्द्र ठाकुर) २६.श्री महेन्द्र हजारी- सम्पादक श्रीमिथिला- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़ि मोन हर्षित भऽ गेल..एखन पूरा पढ़यमे बहुत समय लागत, मुदा जतेक पढ़लहुँ से आह्लादित कएलक। २७.श्री केदारनाथ चौधरी- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक अद्भुत लागल, मैथिली साहित्य लेल ई पोथी एकटा प्रतिमान बनत। २८.श्री सत्यानन्द पाठक- विदेहक हम नियमित पाठक छी। ओकर स्वरूपक प्रशंसक छलहुँ। एम्हर अहाँक लिखल - कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक देखलहुँ। मोन आह्लादित भऽ उठल। कोनो रचना तरा-उपरी। २९.श्रीमती रमा झा-सम्पादक मिथिला दर्पण। कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक प्रिंट फॉर्म पढ़ि आ एकर गुणवत्ता देखि मोन प्रसन्न भऽ गेल, अद्भुत शब्द एकरा लेल प्रयुक्त कऽ रहल छी। विदेहक उत्तरोत्तर प्रगतिक शुभकामना। ३०.श्री नरेन्द्र झा, पटना- विदेह नियमित देखैत रहैत छी। मैथिली लेल अद्भुत काज कऽ रहल छी। ३१.श्री रामलोचन ठाकुर- कोलकाता- मिथिलाक्षर विदेह देखि मोन प्रसन्नतासँ भरि उठल, अंकक विशाल परिदृश्य आस्वस्तकारी अछि। ३२.श्री तारानन्द वियोगी- विदेह आ कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक देखि चकबिदोर लागि गेल। आश्चर्य। शुभकामना आ बधाई। ३३.श्रीमती प्रेमलता मिश्र “प्रेम”- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़लहुँ। सभ रचना उच्चकोटिक लागल। बधाई। ३४.श्री कीर्तिनारायण मिश्र- बेगूसराय- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक बड्ड नीक लागल, आगांक सभ काज लेल बधाई। ३५.श्री महाप्रकाश-सहरसा- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक नीक लागल, विशालकाय संगहि उत्तमकोटिक। ३६.श्री अग्निपुष्प- मिथिलाक्षर आ देवाक्षर विदेह पढ़ल..ई प्रथम तँ अछि एकरा प्रशंसामे मुदा हम एकरा दुस्साहसिक कहब। मिथिला चित्रकलाक स्तम्भकेँ मुदा अगिला अंकमे आर विस्तृत बनाऊ। ३७.श्री मंजर सुलेमान-दरभंगा- विदेहक जतेक प्रशंसा कएल जाए कम होएत। सभ चीज उत्तम। ३८.श्रीमती प्रोफेसर वीणा ठाकुर- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक उत्तम, पठनीय, विचारनीय। जे क्यो देखैत छथि पोथी प्राप्त करबाक उपाय पुछैत छथि। शुभकामना। ३९.श्री छत्रानन्द सिंह झा- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़लहुँ, बड्ड नीक सभ तरहेँ। ४०.श्री ताराकान्त झा- सम्पादक मैथिली दैनिक मिथिला समाद- विदेह तँ कन्टेन्ट प्रोवाइडरक काज कऽ रहल अछि। कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक अद्भुत लागल। ४१.डॉ रवीन्द्र कुमार चौधरी- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक बहुत नीक, बहुत मेहनतिक परिणाम। बधाई। ४२.श्री अमरनाथ- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक आ विदेह दुनू स्मरणीय घटना अछि, मैथिली साहित्य मध्य। ४३.श्री पंचानन मिश्र- विदेहक वैविध्य आ निरन्तरता प्रभावित करैत अछि, शुभकामना। ४४.श्री केदार कानन- कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक लेल अनेक धन्यवाद, शुभकामना आ बधाइ स्वीकार करी। आ नचिकेताक भूमिका पढ़लहुँ। शुरूमे तँ लागल जेना कोनो उपन्यास अहाँ द्वारा सृजित भेल अछि मुदा पोथी उनटौला पर ज्ञात भेल जे एहिमे तँ सभ विधा समाहित अछि। ४५.श्री धनाकर ठाकुर- अहाँ नीक काज कऽ रहल छी। फोटो गैलरीमे चित्र एहि शताब्दीक जन्मतिथिक अनुसार रहैत तऽ नीक। ४६.श्री आशीष झा- अहाँक पुस्तकक संबंधमे एतबा लिखबा सँ अपना कए नहि रोकि सकलहुँ जे ई किताब मात्र किताब नहि थीक, ई एकटा उम्मीद छी जे मैथिली अहाँ सन पुत्रक सेवा सँ निरंतर समृद्ध होइत चिरजीवन कए प्राप्त करत। ४७.श्री शम्भु कुमार सिंह- विदेहक तत्परता आ क्रियाशीलता देखि आह्लादित भऽ रहल छी। निश्चितरूपेण कहल जा सकैछ जे समकालीन मैथिली पत्रिकाक इतिहासमे विदेहक नाम स्वर्णाक्षरमे लिखल जाएत। ओहि कुरुक्षेत्रक घटना सभ तँ अठारहे दिनमे खतम भऽ गेल रहए मुदा अहाँक कुरुक्षेत्रम् तँ अशेष अछि। ४८.डॉ. अजीत मिश्र- अपनेक प्रयासक कतबो प्रश‍ंसा कएल जाए कमे होएतैक। मैथिली साहित्यमे अहाँ द्वारा कएल गेल काज युग-युगान्तर धरि पूजनीय रहत। ४९.श्री बीरेन्द्र मल्लिक- अहाँक कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक आ विदेह:सदेह पढ़ि अति प्रसन्नता भेल। अहाँक स्वास्थ्य ठीक रहए आ उत्साह बनल रहए से कामना। ५०.श्री कुमार राधारमण- अहाँक दिशा-निर्देशमे विदेह पहिल मैथिली ई-जर्नल देखि अति प्रसन्नता भेल। हमर शुभकामना। ५१.श्री फूलचन्द्र झा प्रवीण-विदेह:सदेह पढ़ने रही मुदा कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक देखि बढ़ाई देबा लेल बाध्य भऽ गेलहुँ। आब विश्वास भऽ गेल जे मैथिली नहि मरत। अशेष शुभकामना। ५२.श्री विभूति आनन्द- विदेह:सदेह देखि, ओकर विस्तार देखि अति प्रसन्नता भेल। ५३.श्री मानेश्वर मनुज-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक एकर भव्यता देखि अति प्रसन्नता भेल, एतेक विशाल ग्रन्थ मैथिलीमे आइ धरि नहि देखने रही। एहिना भविष्यमे काज करैत रही, शुभकामना। ५४.श्री विद्यानन्द झा- आइ.आइ.एम.कोलकाता- कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक विस्तार, छपाईक संग गुणवत्ता देखि अति प्रसन्नता भेल। ५५.श्री अरविन्द ठाकुर-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक मैथिली साहित्यमे कएल गेल एहि तरहक पहिल प्रयोग अछि, शुभकामना। ५६.श्री कुमार पवन-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक पढ़ि रहल छी। किछु लघुकथा पढ़ल अछि, बहुत मार्मिक छल। ५७. श्री प्रदीप बिहारी-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक देखल, बधाई। ५८.डॉ मणिकान्त ठाकुर-कैलिफोर्निया- अपन विलक्षण नियमित सेवासँ हमरा लोकनिक हृदयमे विदेह सदेह भऽ गेल अछि। ५९.श्री धीरेन्द्र प्रेमर्षि- अहाँक समस्त प्रयास सराहनीय। दुख होइत अछि जखन अहाँक प्रयासमे अपेक्षित सहयोग नहि कऽ पबैत छी। ६०.श्री देवशंकर नवीन- विदेहक निरन्तरता आ विशाल स्वरूप- विशाल पाठक वर्ग, एकरा ऐतिहासिक बनबैत अछि। ६१.श्री मोहन भारद्वाज- अहाँक समस्त कार्य देखल, बहुत नीक। एखन किछु परेशानीमे छी, मुदा शीघ्र सहयोग देब। ६२.श्री फजलुर रहमान हाशमी-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक मे एतेक मेहनतक लेल अहाँ साधुवादक अधिकारी छी। ६३.श्री लक्ष्मण झा "सागर"- मैथिलीमे चमत्कारिक रूपेँ अहाँक प्रवेश आह्लादकारी अछि।..अहाँकेँ एखन आर..दूर..बहुत दूरधरि जेबाक अछि। स्वस्थ आ प्रसन्न रही। ६४.श्री जगदीश प्रसाद मंडल-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक पढ़लहुँ । कथा सभ आ उपन्यास सहस्रबाढ़नि पूर्णरूपेँ पढ़ि गेल छी। गाम-घरक भौगोलिक विवरणक जे सूक्ष्म वर्णन सहस्रबाढ़निमे अछि, से चकित कएलक, एहि संग्रहक कथा-उपन्यास मैथिली लेखनमे विविधता अनलक अछि। समालोचना शास्त्रमे अहाँक दृष्टि वैयक्तिक नहि वरन् सामाजिक आ कल्याणकारी अछि, से प्रशंसनीय। ६५.श्री अशोक झा-अध्यक्ष मिथिला विकास परिषद- कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक लेल बधाई आ आगाँ लेल शुभकामना। ६६.श्री ठाकुर प्रसाद मुर्मु- अद्भुत प्रयास। धन्यवादक संग प्रार्थना जे अपन माटि-पानिकेँ ध्यानमे राखि अंकक समायोजन कएल जाए। नव अंक धरि प्रयास सराहनीय। विदेहकेँ बहुत-बहुत धन्यवाद जे एहेन सुन्दर-सुन्दर सचार (आलेख) लगा रहल छथि। सभटा ग्रहणीय- पठनीय। ६७.बुद्धिनाथ मिश्र- प्रिय गजेन्द्र जी,अहाँक सम्पादन मे प्रकाशित ‘विदेह’आ ‘कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक’ विलक्षण पत्रिका आ विलक्षण पोथी! की नहि अछि अहाँक सम्पादनमे? एहि प्रयत्न सँ मैथिली क विकास होयत,निस्संदेह। ६८.श्री बृखेश चन्द्र लाल- गजेन्द्रजी, अपनेक पुस्तक कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक पढ़ि मोन गदगद भय गेल , हृदयसँ अनुगृहित छी । हार्दिक शुभकामना । ६९.श्री परमेश्वर कापड़ि - श्री गजेन्द्र जी । कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक पढ़ि गदगद आ नेहाल भेलहुँ। ७०.श्री रवीन्द्रनाथ ठाकुर- विदेह पढ़ैत रहैत छी। धीरेन्द्र प्रेमर्षिक मैथिली गजलपर आलेख पढ़लहुँ। मैथिली गजल कत्तऽ सँ कत्तऽ चलि गेलैक आ ओ अपन आलेखमे मात्र अपन जानल-पहिचानल लोकक चर्च कएने छथि। जेना मैथिलीमे मठक परम्परा रहल अछि। (स्पष्टीकरण- श्रीमान्, प्रेमर्षि जी ओहि आलेखमे ई स्पष्ट लिखने छथि जे किनको नाम जे छुटि गेल छन्हि तँ से मात्र आलेखक लेखकक जानकारी नहि रहबाक द्वारे, एहिमे आन कोनो कारण नहि देखल जाय। अहाँसँ एहि विषयपर विस्तृत आलेख सादर आमंत्रित अछि।-सम्पादक) ७१.श्री मंत्रेश्वर झा- विदेह पढ़ल आ संगहि अहाँक मैगनम ओपस कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक सेहो, अति उत्तम। मैथिलीक लेल कएल जा रहल अहाँक समस्त कार्य अतुलनीय अछि। ७२. श्री हरेकृष्ण झा- कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक मैथिलीमे अपन तरहक एकमात्र ग्रन्थ अछि, एहिमे लेखकक समग्र दृष्टि आ रचना कौशल देखबामे आएल जे लेखकक फील्डवर्कसँ जुड़ल रहबाक कारणसँ अछि। ७३.श्री सुकान्त सोम- कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक मे  समाजक इतिहास आ वर्तमानसँ अहाँक जुड़ाव बड्ड नीक लागल, अहाँ एहि क्षेत्रमे आर आगाँ काज करब से आशा अछि। ७४.प्रोफेसर मदन मिश्र- कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक सन किताब मैथिलीमे पहिले अछि आ एतेक विशाल संग्रहपर शोध कएल जा सकैत अछि। भविष्यक लेल शुभकामना। ७५.प्रोफेसर कमला चौधरी- मैथिलीमे कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक सन पोथी आबए जे गुण आ रूप दुनूमे निस्सन होअए, से बहुत दिनसँ आकांक्षा छल, ओ आब जा कऽ पूर्ण भेल। पोथी एक हाथसँ दोसर हाथ घुमि रहल अछि, एहिना आगाँ सेहो अहाँसँ आशा अछि। ७६.श्री उदय चन्द्र झा "विनोद": गजेन्द्रजी, अहाँ जतेक काज कएलहुँ अछि से मैथिलीमे आइ धरि कियो नहि कएने छल। शुभकामना। अहाँकेँ एखन बहुत काज आर करबाक अछि। ७७.श्री कृष्ण कुमार कश्यप: गजेन्द्र ठाकुरजी, अहाँसँ भेँट एकटा स्मरणीय क्षण बनि गेल। अहाँ जतेक काज एहि बएसमे कऽ गेल छी ताहिसँ हजार गुणा आर बेशीक आशा अछि। ७८.श्री मणिकान्त दास: अहाँक मैथिलीक कार्यक प्रशंसा लेल शब्द नहि भेटैत अछि। अहाँक कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक सम्पूर्ण रूपेँ पढ़ि गेलहुँ। त्वञ्चाहञ्च बड्ड नीक लागल। ७९. श्री हीरेन्द्र कुमार झा- विदेह ई-पत्रिकाक सभ अंक ई-पत्रसँ भेटैत रहैत अछि। मैथिलीक ई-पत्रिका छैक एहि बातक गर्व होइत अछि। अहाँ आ अहाँक सभ सहयोगीकेँ हार्दिक शुभकामना। विदेह मैथिली साहित्य आन्दोलन (c)२००४-११. सर्वाधिकार लेखकाधीन आ जतय लेखकक नाम नहि अछि ततय संपादकाधीन। विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। सह-सम्पादक: उमेश मंडल। सहायक सम्पादक: शिव कुमार झा आ मुन्नाजी (मनोज कुमार कर्ण)। भाषा-सम्पादन: नागेन्द्र कुमार झा आ पञ्जीकार विद्यानन्द झा। कला-सम्पादन: ज्योति सुनीत चौधरी आ रश्मि रेखा सिन्हा। सम्पादक-शोध-अन्वेषण: डॉ. जया वर्मा आ डॉ. राजीव कुमार वर्मा। रचनाकार अपन मौलिक आ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि) ggajendra@videha.com केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx, .rtf वा .txt फॉर्मेटमे पठा सकैत छथि। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेताह, से आशा करैत छी। रचनाक अंतमे टाइप रहय, जे ई रचना मौलिक अछि, आ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। मेल प्राप्त होयबाक बाद यथासंभव शीघ्र ( सात दिनक भीतर) एकर प्रकाशनक अंकक सूचना देल जायत। ’विदेह' प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका अछि आ एहिमे मैथिली, संस्कृत आ अंग्रेजीमे मिथिला आ मैथिलीसँ संबंधित रचना प्रकाशित कएल जाइत अछि। एहि ई पत्रिकाकेँ श्रीमति लक्ष्मी ठाकुर द्वारा मासक ०१ आ १५ तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि। (c) 2004-11 सर्वाधिकार सुरक्षित। विदेहमे प्रकाशित सभटा रचना आ आर्काइवक सर्वाधिकार रचनाकार आ संग्रहकर्त्ताक लगमे छन्हि। रचनाक अनुवाद आ पुनः प्रकाशन किंवा आर्काइवक उपयोगक अधिकार किनबाक हेतु ggajendra@videha.co.in पर संपर्क करू। एहि साइटकेँ प्रीति झा ठाकुर, मधूलिका चौधरी आ रश्मि प्रिया द्वारा डिजाइन कएल गेल। सिद्धिरस्तु वि दे ह विदेह Videha বিদেহ  विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका Videha Ist Maithili Fortnightly e Magazine  विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका 'विदेह' ७३ म अंक ०१ जनवरी २०११ (वर्ष ४ मास ३७ अंक ७३)http://www.videha.co.in/ मानुषीमिह संस्कृताम् ISSN 2229-547X VIDEHA वि दे ह विदेह Videha বিদেহ  विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका Videha Ist Maithili Fortnightly e Magazine  विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका 'विदेह' ७३ म अंक ०१ जनवरी २०११ (वर्ष ४ मास ३७ अंक ७३)http://www.videha.co.in/ मानुषीमिह संस्कृताम् ISSN 2229-547X VIDEHA

गज 4 “4 —.

LS | La i i i | a

अर Ne 3 ; कम fa

a) iv eA

KAS had ei” ale

: hy हि ‘ \ , | “oy

— जल रण सडक ये .. |! a we = न = pe > a + a हि | है pa it कै < है 7 = Sn ay As J F अर 4 3 के 4 if a i ! é i) : = ¥ ae soon fl ee n° ae 4 2 oe i] Toe "§ मर (3 हक... ] i i “ हि ; दल डी. = © alc: rT ae ._ ma Soy: . : L o % y थी हू है = vs re iy 4 , री 4 P= “hy ¥ . | = : waste.” न .. “ | f : i , है aor, Ps ; कर | : पक्के ६४ j t _ ‘ad जज |

if)

ft 4 ea i | 7. : ' a _ Bp pay वि

F _— \ x के eS yk लि भा : os A 3 a | (Km | \\ A A ; a ‘ a ; = i as ’ थे का + : a 7 i ‘| ; J m 4 \ i q *~ = be ) LJ ail #

gi Gees.” a हि i f बी 7 wpe दर - ; = é

ही | 75 गए 7 a are i | aa fi Ay) Ke SA) yx ie SA Waa. iN PAS Oe mo A \ yd A

| A it | I €.3 Sai ‘ |) Ra

—— fr) 2 | —_— rr ? = ढक अही हर [है ‘sz oat |i है. खिक... ज | | . 2 | ds a : = — , a x = जी { MO, a रॉ की है ‘ % 2 DB. ' NY n

x we दे; 5 के Dy, कि fae हूँ की way as, 4 ; LA 3 ages hms > Pb a i , & iy AY * a esa , ) ही | f > a dig कर wt i ree 2 कै कु Sad on, कं कक > : की » 4 का -. ae 5 bos i? || न EN किन, oe oy , ty, ew कक = % | a et Saks और, So" " G * | >Re ss ah El f we Lei धर के Eh A } ee | ae ete! ta ie Tr LE: j rae > : - कई ० ५३४ ir ho ait it! vat e कु eR '- ६ bo wt Ss {# Po ed SEL © on ESS? OA ae PLAT | 4 i TT a } Tit NT) Poke a! जल, ११! i Py ke ws Su et न लि गधा 4 A PARR... कै 4 ee ही. है ४ कल dey Hy t ase. < [ sii; ee ee ee : 4 ES OGRA 2००: Sam ra . Al } ? © A ay,” Aan Ngee te il aaa hy hh J Mea ie pe a pe a BY Wy may { भर } " fee. \ ae Da मे "की तक जः A | | न iid) | है a . 4 Af ib कद S |), ten के are | ‘ 2 re Ke § ney, \ i Fy or — i दब है ~” ee A - J a . \ Y y i \ 4 : Py कि... \ के आज ~~ .. ४ aS \ ८ 5 wi. कै | { 7 -— at | a aoe —— A ; oY j in ४." a ip “fF i: , 4 tat i ewes ois \ : 4 i ‘ J vie ही ड डे \ अआआ —— Ai ahaa i ‘he = 7 in, it ‘a , a= ¢ J ‘ oy उप, नए" ine ss _ पतन —_, — : Pa a - 7 | हू मय गन, “ दा Sins ve ~~ - = a ae — nae कक ore _ पक a a> a = =a = Wome. $5 hey (3 है . —— —" == माना Ti 7, \ = = = 7 — = = “5 « j c " ¢ ~ RN है a = ——————— स्यदतमा्ियि — ‘ = a0 id a LN mS : “ri a Se न LJ हु दि 7 पु Seas - P if a| [pes कै मा, | है भय ! ८ ‘ oo के festa Et aa ib tale ast ८: लक | sin, oat - : a ee : =| * ae cae ' 2 os i =! a : ya Va," j न — - : i POP A rm 4 . i - कक ee a | & के 4 Wa 7 || 3 w ee ie eee i. ; | t oe RE टन” ae SO a = — हि

न कर : , ii ae ee _— _ —— aa) oe एल: (si नर जा रत हेड ag = ; — 4 |= F के 2 “i! q at in! Z5are | ही MUL EL Maa ue vests | WHITE VE An 80% | i. <a [= 3 am co. ia = A — ta VESTS: #5) el ee — : } ; Tan . f है | ‘ ७ a ho : _ ——— ao a . . | ' » लाल iF x t A

7 i ं A न oe ‘= E _ f Se ; 4 4 ' __ [ \ a! . ton ei.

™ a + mee ei

थे rae Oe * ~~ { eng : कर थे “सका en a दि | | Poe | ¥ ‘ शा

और id 2 ||| | | | iy q vy || PB fp XY if a ad मी व i} fo के 4 4 we ; 4 - y i | sy = ie 2 re i i: ae Ji (gi, , a ने कि [| | ! ) के A, le jz a ES of Y जे. 2 ae ||| 4) किक | at A ~~ 7 { था “a कि. का E सर y ही fey) ’ , fi = कर . 4 Pet aed -* है , «é ; “ दम थ . भी j - ी

» Ww, * > id me > 4 a re Gai? (om wae वी Bu = “J | है) = ~ 5 । i = j putea ; . हर 7 f e \ i I हर so < a पक \| ; | | S . i , ~ ae 3 a: ; ड aa .. =o os he / _ . Eye , ar * Fa .F | oe 4 = \ I 4 Pe aim रे - हर * न | | il i ‘Sea’ 9) A हे डा | 7 मर = wl = =e : iba « | Reed “ ¥ j oa ah भा न. के J j Pe >| De x की कई. = is Ss a ’ ad a >. = ‘7 i. ft E हर 7 soe rg | 2 = ं j \ | \ है iF ’ E ] ] is ' i j Fy हर . Pad a a | | | : ? \ . _t ‘ Y ri 4 |. + t 4 a ol F mt oll जि i i ay % _ “ ; - r हि ig i ; i 4 J = | Yi ee Li Say Md है I , — 4 भी ee =. 3 a oe ~ ~ «5 af ’ Fi : _— ¥ : ० , है ही us FF ® \ \ A . _ ° = | ‘2 we a. _ T डा

कलर िनननटटट । Tie ee see SG — sf Me 4 Ser «OS } । [की CST . Wee i 3 Fy SCAN) ee 5 के ee 2 | ZNG/AEN ie 0 ही sf A) 0 क्र QZ \ NS Ve दर ie kG 8) | | : ‘ OM i 4 Wes OR री पटक i KA Sp MONG SF Ao) I H Pi a ae & [A See AN] A\= ~

भी ४ i a न wil » XX =) Wye Peels li Ne eh | ome eat & बिग ae: पद fees ae Kd ‘ 4 % + ८2?" a Og RS eS SERS eh en ein LNs ी * Ne. f au . cage He OF |” हक पर ad i! a शेर न र रह दर * Ly - A “heise site लि रे ASN कैद के को ! ane & y et ८0 <M) ie! Te ¥ Ong Ne stag हे (व, सकता? A 4५ डी KY x 7 ¥ a MD Os rR . ie. a * pe == अप ,' Asie. REA RAD Wa Ait Na OUT Nel galled (ie), :. 4, A ae Pe Ds angio } tie J ae ~ ee स्व लटक कुंड s Bo ee कर अंदर SA का गन ‘ Se ee | RRS ra fie Veet ee a ais | दि chet es Lt et aad = ZF me og = ie Se Sa ST Qa ~ ee, ~ We i ei) (rh oa F oe. eee न eg ia SES पर बरी Sey ole अ Mat ether 4 it aT ee : a Bee oi 4 meet Le eae ~ लि दी का «2० दी ० Res मल wwe : ing ix. ।। रे (| i yah. tes eh 3 ‘por a . ee “4 > रु a न Wwe ba Nig eels =. ee | a कक नर र्‌ \ {P< RD Ys) Magee : = : Y a cee सी XY 4 Si te er again fi F / लि So A= inte i ४ na rans te ot te . & 7% a —_ | Faas पा गे... दि पल, > - ~ ; . = Wage जज जज. न ier ck ee ’ Rs ' . N Se : an ग ie © Pe ye गा EF मर > जलन की er = is Pe ee a Se a | a iS a ) aay : r = ae > m 2) * ! er 6 —- aL ; 4 i 5 i i i 2 ® ag! Ly ae: a ; Sh al ie ; r गे j : i | \ x ) { ( = Pr i aa | a मी | jo : j q i KR i 7 १४ है | i | | = I a ३ . *) की ) | पर ‘ = | | | . है + 4 क « ; 7 ’ \ ih : 5 hoo न यह = 4 . व है के ल। व. नए om 4 दि ‘tas q पा | ae = ’ p = " a = रद ws J 5 . alee था

ae (9 2, ८ रे हि * i ics === BES we SEEPS i Ry ae) =e ~ Ss A is a ae eA s mee Pe ah नि, सर oy VA | EZ i= =e ee — = siz