VIDEHA — Issue 74 / अंक ७४

Publication: VIDEHA · Issue: 74
Open original PDF at Internet Archive

582 583 ISSN 2229-547X VIDEHA 'विदेह' ७४ म अंक १५ जनवरी २०११ (वर्ष ४ मास ३७ अंक ७४) वि  दे  ह विदेह Videha বিদেহ http://www.videha.co.in  विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका Videha Ist Maithili Fortnightly e Magazine   नव अंक देखबाक लेल पृष्ठ सभकेँ रिफ्रेश कए देखू। Always refresh the pages for viewing new issue of VIDEHA. Read in your own script Roman(Eng)Gujarati Bangla Oriya Gurmukhi Telugu Tamil Kannada Malayalam Hindi एहि अंकमे अछि:- १. संपादकीय संदेश २. गद्य २.१.१.शि‍व कुमार झा ‘टि‍ल्‍लू’ समीक्षा- मैथि‍ली कवि‍ता संचयन- (संपादक- गंगेश गुंजन), कुरूक्षेत्रम अन्‍तर्मनक, गोनू झा आ आन मैथि‍ली चि‍त्रकथा, बि‍न वाती दीप जरय, तरेगन, अरि‍पन (कवि‍ता संकलन) २.डॉ. कैलाश कुमार मि‍श्र- पोथी समीक्षा-जीवन संघर्ष २.२.१.रमेश- प्रो. मायानन्द मिश्रक रमनगर कथामे लागल “मुदा”...२.मंत्रेश्वर झा- चरि‍त्र चि‍त्रणक वाजीगर- जगदीश प्रसाद मंडल ३.विनीत उत्पल- दीर्घकथा- घोड़ीपर चढ़ि लेब हम डिग्री – आगाँ २.३.१.हम पुछैत छी- मुन्नाजीक शब्‍दक जादूगर मैथि‍ली समीक्षाक प्रखर दृष्‍टि‍दर्शी एवं फरि‍छाएल कथाकार श्री दुर्गानन्‍द मंडलजी सँ भेँटवार्ता २.वीणा ठाकुर- गोनू झा आ आन मैथिली चित्रकथा २.४.१.योगानन्‍द झा - आस्‍था, जि‍जीवि‍षा ओ संघर्षक प्रवाह-“गामक जि‍नगी‍”, आदर्शक उपस्‍थापन : मौलाइल गाछक फूल २.आशीष अनचि‍न्‍हार-गजलक साक्ष्‍य ३.प्रो. वीणा ठाकुर- जि‍नगीक जीत उपन्‍यासक समीक्षा- प्रो. वीणा ठाकुर ४.शि‍व कुमार झा ‘टि‍ल्‍लू’- समीक्षा- हम पुछैत छी- कवि‍ता संग्रह‍ (वि‍नि‍त उत्‍पल), मैथि‍लीक वि‍कासमे बाल कवि‍ताक योगदान, मैथि‍ली उपन्‍यास साहि‍त्‍यमे दलि‍त पात्रक चि‍त्रण, भावांजलि‍, भफाइत चाहक जि‍नगी, भफाइत चाहक जि‍नगी, रमाजीक काव्‍य यात्रा ५. धीरेन्द्र कुमार- श्रीमती प्रीति‍ ठाकुरक दुनू चि‍त्रकथापर धीरेन्‍द्र कुमार एक नजरि‍ ६.जगदीश प्रसाद मंडल- कथा- कतौ नै ७.रमाकान्‍त राय “रमा‍”, गामक जि‍नगी- कथा संग्रह- जगदीश प्रसाद मंडल, आरसी बाबूक व्‍यक्‍ति‍त्‍व एवं कृति‍त्‍वपर द्वि‍दि‍वसीय राष्‍ट्रीय सेमि‍नार- दू दर्जन वि‍द्वानक सहभागि‍ता : आचार्य दि‍व्‍यचक्षु ८.रामकृष्‍ण मंडल 'छोटू'- कथा- बाप ९.शैल झा’ सागर"- किस्त-किस्त जीवन २.५.१. रवि भूषण पाठक- विद्यापति २.डॉ0 मेघन प्रसाद- मैथिलीमे अनुवाद-कलाक शास्त्रीयकरणक इतिहास २.६.१.जीवकान्‍त- जगदीश प्रसाद मंडलक ‘जिनगीक जीत’ उपन्‍यासपर २. डा. रमण झा- मैथिली चित्रकथा ३. सुजित कुमार झा- जनकपुरमे पागे पाग, ४. बिपिन झा- यान्त्रिक अनुवाद आ Polysemy ५. सुमित आनन्द- संवाद ६.ज्योति सुनीत चौधरी- विहनि कथा- हिमदूत २.७.१मुन्नाजी- अझुको क्षणकेँ अंगीकार करैछ “क्षणिका” २. धनाकर ठाकुर- जगदीश प्रसाद मंडलक “ गामक जि‍नगी‍” ३.उमेश मंडल मैथि‍ली उपन्‍यास साहि‍त्‍यमे संवेदनाक स्‍वर २.८.१.डाँ कैलाश कुमार मिश्र यायावरी २.राजदेव मंडल-उपन्‍यास- हमर टोल ३.धीरेन्‍द्र कुमार-नो एंट्री : मा प्रवि‍श ४. डा. रमानन्द झा ‘रमण’-शब्द विभक्ति सम्वाद ५. मुन्नाजीक दूटा विहनि कथा ६.डाॅ. योगानन्‍द झा- वनदेवी आ नारी अस्‍मि‍ताक गाथा ३. पद्य ३.१.गंगेश गुंजन- राधा- २९ म खेप ३.२.ज्योति सुनीत चौधरी- दलमा ३.३.उमेश मंडल- कवि‍ता- नोर ३.४.राजेश मोहन झा- कवि‍ता-  मि‍झाइत दीप ३.५.नवीन कुमार "आशा"- हमरा भेटल ३.६. राम वि‍लास साहु- कवि‍ता- महगाइ ३.७.१.किशन कारीग़र- दौगल चलि जाएब गाम ३.८.गजेन्द्र ठाकुर- कटिहारी ४. मिथिला कला-संगीत-१.श्वेता झा चौधरी २.ज्योति सुनीत चौधरी ३श्वेता झा (सिंगापुर) ५. गद्य-पद्य भारती: मोहनदास: (दीर्घकथा):लेखक :  उदय प्रकाश (मूल हिन्दीसँ मैथिलीमे अनुवाद विनीत उत्पल) ६. बालानां कृते-१. गजेन्द्र ठाकुर-  २. राजदेव मंडल- दूटा बाल कविता ३.नवीन कुमार “आशा”- मच्छर मच्छर ७. भाषापाक रचना-लेखन -[मानक मैथिली], [विदेहक मैथिली-अंग्रेजी आ अंग्रेजी मैथिली कोष (इंटरनेटपर पहिल बेर सर्च-डिक्शनरी) एम.एस. एस.क्यू.एल. सर्वर आधारित -Based on ms-sql server Maithili-English and English-Maithili Dictionary.] 8.VIDEHA FOR NON RESIDENTS 8.1.Original Poem in Maithili by Kalikant Jha "Buch" Translated into English by Jyoti Jha Chaudhary विदेह ई-पत्रिकाक सभटा पुरान अंक ( ब्रेल, तिरहुता आ देवनागरी मे ) पी.डी.एफ. डाउनलोडक लेल नीचाँक लिंकपर उपलब्ध अछि। All the old issues of Videha e journal ( in Braille, Tirhuta and Devanagari versions ) are available for pdf download at the following link. विदेह ई-पत्रिकाक सभटा पुरान अंक ब्रेल, तिरहुता आ देवनागरी रूपमे Videha e journal's all old issues in Braille Tirhuta and Devanagari versions विदेह ई-पत्रिकाक पहिल ५० अंक

विदेह ई-पत्रिकाक ५०म सँ आगाँक अंक विदेह आर.एस.एस.फीड। "विदेह" ई-पत्रिका ई-पत्रसँ प्राप्त करू। अपन मित्रकेँ विदेहक विषयमे सूचित करू। ↑ विदेह आर.एस.एस.फीड एनीमेटरकेँ अपन साइट/ ब्लॉगपर लगाऊ। ब्लॉग "लेआउट" पर "एड गाडजेट" मे "फीड" सेलेक्ट कए "फीड यू.आर.एल." मे http://www.videha.co.in/index.xml टाइप केलासँ सेहो विदेह फीड प्राप्त कए सकैत छी। गूगल रीडरमे पढ़बा लेल http://reader.google.com/ पर जा कऽ Add a  Subscription बटन क्लिक करू आ खाली स्थानमे http://www.videha.co.in/index.xml पेस्ट करू आ Add  बटन दबाऊ। मैथिली देवनागरी वा मिथिलाक्षरमे नहि देखि/ लिखि पाबि रहल छी, (cannot see/write Maithili in Devanagari/ Mithilakshara follow links below or contact at ggajendra@videha.com) तँ एहि हेतु नीचाँक लिंक सभ पर जाऊ। संगहि विदेहक स्तंभ मैथिली भाषापाक/ रचना लेखनक नव-पुरान अंक पढ़ू। http://devanaagarii.net/ http://kaulonline.com/uninagari/  (एतए बॉक्समे ऑनलाइन देवनागरी टाइप करू, बॉक्ससँ कॉपी करू आ वर्ड डॉक्युमेन्टमे पेस्ट कए वर्ड फाइलकेँ सेव करू। विशेष जानकारीक लेल ggajendra@videha.com पर सम्पर्क करू।)(Use Firefox 3.0 (from WWW.MOZILLA.COM )/ Opera/ Safari/ Internet Explorer 8.0/ Flock 2.0/ Google Chrome for best view of 'Videha' Maithili e-journal at http://www.videha.co.in/ .) Go to the link below for download of old issues of VIDEHA Maithili e magazine in .pdf format and Maithili Audio/ Video/ Book/ paintings/ photo files. विदेहक पुरान अंक आ ऑडियो/ वीडियो/ पोथी/ चित्रकला/ फोटो सभक फाइल सभ (उच्चारण, बड़ सुख सार आ दूर्वाक्षत मंत्र सहित) डाउनलोड करबाक हेतु नीचाँक लिंक पर जाऊ। VIDEHA ARCHIVE विदेह आर्काइव भारतीय डाक विभाग द्वारा जारी कवि, नाटककार आ धर्मशास्त्री विद्यापतिक स्टाम्प। भारत आ नेपालक माटिमे पसरल मिथिलाक धरती प्राचीन कालहिसँ महान पुरुष ओ महिला लोकनिक कर्मभूमि रहल अछि। मिथिलाक महान पुरुष ओ महिला लोकनिक चित्र 'मिथिला रत्न' मे देखू। गौरी-शंकरक पालवंश कालक मूर्त्ति, एहिमे मिथिलाक्षरमे (१२०० वर्ष पूर्वक) अभिलेख अंकित अछि। मिथिलाक भारत आ नेपालक माटिमे पसरल एहि तरहक अन्यान्य प्राचीन आ नव स्थापत्य, चित्र, अभिलेख आ मूर्त्तिकलाक़ हेतु देखू 'मिथिलाक खोज' मिथिला, मैथिल आ मैथिलीसँ सम्बन्धित सूचना, सम्पर्क, अन्वेषण संगहि विदेहक सर्च-इंजन आ न्यूज सर्विस आ मिथिला, मैथिल आ मैथिलीसँ सम्बन्धित वेबसाइट सभक समग्र संकलनक लेल देखू "विदेह सूचना संपर्क अन्वेषण" विदेह जालवृत्तक डिसकसन फोरमपर जाऊ। "मैथिल आर मिथिला" (मैथिलीक सभसँ लोकप्रिय जालवृत्त) पर जाऊ। १. संपादकीय गजेन्द्र ठाकुर मैथिली लेल समीक्षाशास्त्रक सिद्धांत कला- एहि लेल कोनो सैद्धांतिक प्रयोजन होएबाक चाही ? साहित्यक विभिन्न विधा जेना पद्य, प्रबन्ध, निबन्ध, समालोचना, कथा-गल्प, उपन्यास, पत्रात्मक साहित्य, यात्रा-संस्मरण, रिपोर्ताज, नाटक आ एकांकी मनोरंजनक लेल सुनल-सुनाओल-पढ़ल जाइत अछि वा मंचित कएल जाइत अछि। ई उद्देश्यपूर्ण भऽ सकैत अछि वा एहिमे निरुद्देश्यता-एबसडिटी सेहो रहि सकै छै- कारण जिनगीक उत्थल-धक्कामे निरुद्देश्यपूर्ण साहित्य सेहो मनोरंजन प्रदान करैत अछि। प्राचीन कालमे कला, साहित्य आ संगीत एक खाढ़ीसँ दोसर खाढ़ी मध्य हस्तांतरित होइत छल। पदपाठ, क्रमपाठ, जटा पाठ, शिखापाठ, घनपाठ आदि स्मृतिक वैज्ञानिक पद्धति छल। घर, वेदी आ आन कलाकृतिक बनेबाक विधिक यजुर्वेदमे वर्णन छल जे भाष्य सभमे आर विस्तृत भेल आ पुरातत्वक प्राचीनतम आधार सिद्ध भेल। संगीतक पद्धति सामवेदकेँ विशिष्ट बनेलक। ऐ तरहेँ साहित्य, कला आ संगीतकेँ बान्हबाक प्रयत्न भेल, जइसँ ई विधा दोसरो गोटे द्वारा ओही तरहेँ अनुकृत भऽ सकए। आ ऐ क्रममे कला, साहित्य आ संगीतक समीक्षा वा ओकर गुणक विश्लेषण प्रारम्भ भेल। कला, साहित्य आ संगीतक समाज लेल कोन प्रयोजन, एकर नैतिक मानदण्ड की हुअए, ऐ दिस सेहो प्राच्य आ पाश्चात्य विचारक अपन विचार राखलन्हि। प्लेटो कहै छथि जे कोनो कला नीक नै भऽ सकैए किएक तँ ई सभटा असत्य आ अवास्तविक अछि। मुदा कला, संगीत आ साहित्य कखनो काल स्वान्तः सुखाय सेहो होइत अछि, एकरा पढ़ला, सुनला, देखला आ अनुभव केलासँ प्रसन्नता होइत छै, मानसिक शान्ति भेटै छै तँ कखनो काल ई उद्वेलित सेहो करैत छै। एरिस्टोटल मुदा कहै छथि जे कलाकार ज्ञानसँ युक्त होइ छथि आ विश्वकेँ बुझबामे सहयोग करै छथि। ऋक १,११५,२ मे उषाकालक सूर्योदयक बिम्ब सुन्दरीक पाछाँ जाइत युवकसँ भेल अछि। ऋक १,१२४,११ मे अरुणोदयमे लाल आभा आ बिलाइत अन्हारक संग, चूल्हिमे आगि वर्णन अछि आ बिम्ब अछि- गामक तरुणी रक्त वर्णक गाएकेँ चरबाक लेल छोड़ैत छथि। अथर्ववेद ४,१५,६ मे सामूहिक नाराक वर्णन अछि। यजुर्वेद ४०,१६ मे वर्णन अछि- सूर्यमण्डल सुवर्णपात्र अछि जे सूर्यकेँ आवृत्त कएने अछि। यजुर्वेद १७,३८-४१ मे संग्राम लेल बाजा संग जाइत देवसेना आ यजुर्वेद १७,४९ मे कवचक मर्मर ध्वनि वर्णित अछि। ऋगवेद १,१६४,२ आ यास्क ४,२७ मे संवत्सर, चक्रक वर्णन अछि। वृहदारण्यक उपनिषद २,२,३ मे सोमरसक उत्सक वर्णन अछि। वृहदारण्यक उपनिषद २,२,४ ओकर तटपरसात ऋषि आँखि, कान आदि अछि। अथर्ववेद १०,२,३१ मे शरीरकेँ अयोध्या कहल गेल अछि, गीता ५,१३ मे शरीरकेँ पुर कहल गेल अछि। शब्दोचारण आ कला निर्माणक बाद बोध्य बौस्तुक उत्पत्ति होइ छै। शब्द आ ध्वनि, रूप, रस, राग, छन्द, आ अलंकारसँ ओकर औचित्य सिद्ध होइत छै। जगतक सौन्दर्यीकृत प्रस्तुति अछि कला। सौंदर्यक कला उपयोगिताक संग। कलापूर्णताक कलाक जीवन दर्शन- संप्रदाय संग। भावनात्मक वातावरण- सत्यक आ कलाक कार्यक सौंदर्यीकृत अवलोकन, सुन्दर-मूर्त, अमूर्त। मानसिक क्रिया- मनुष्य़ सोचैबला प्राणी, मानसिक आ भौतिक दुनूक अनुभूति करएबला प्राणी। विरोधाभास वा छद्म आभास- अस्पष्टता। मार्क्सवाद उपन्यासक सामाजिक यथार्थक ओकालति करैत अछि। फ्रायड सभ मनुक्खकेँ रहस्यमयी मानैत छथि। ओ साहित्यिक कृतिकेँ साहित्यकारक विश्लेषण लेल चुनैत छथि तँ नव फ्रायडवाद जैविकक बदला सांस्कृतिक तत्वक प्रधानतापर जोर दैत देखबामे अबैत छथि। नव-समीक्षावाद कृतिक विस्तृत विवरणपर आधारित अछि। उत्तर आधुनिक, अस्तित्ववादी, मानवतावादी, ई सभ विचारधारा दर्शनशास्त्रक विचारधारा थिक। पहिने दर्शनमे विज्ञान, इतिहास, समाज-राजनीति, अर्थशास्त्र, कला-विज्ञान आ भाषा सम्मिलित रहैत छल। मुदा जेना-जेना विज्ञान आ कलाक शाखा सभ विशिष्टता प्राप्त करैत गेल, विशेष कए विज्ञान, तँ दर्शनमे गणित आ विज्ञान मैथेमेटिकल लॉजिक धरि सीमित रहि गेल। दार्शनिक आगमन आ निगमनक अध्ययन प्रणाली, विश्लेषणात्मक प्रणाली दिस बढ़ल। मार्क्स जे दुनिया भरिक गरीबक लेल एकटा दैवीय हस्तक्षेपक समान छलाह, द्वन्दात्मक प्रणालीकेँ अपन व्याख्याक आधार बनओलन्हि। आइ-काल्हिक “डिसकसन” वा द्वन्द जाहिमे पक्ष-विपक्ष, दुनू सम्मिलित अछि, दर्शनक (विशेष कए षडदर्शनक- माधवाचार्यक सर्वदर्शन संग्रह-द्रष्टव्य) खण्डन-मण्डन प्रणालीमे पहिनहिसँ विद्यमान छल। से इतिहासक अन्तक घोषणा कएनिहार फ्रांसिस फुकियामा -जे कम्युनिस्ट शासनक समाप्तिपर ई घोषणा कएने छलाह- किछु दिन पहिने एहिसँ पलटि गेलाह। उत्तर-आधुनिकतावाद सेहो अपन प्रारम्भिक उत्साहक बाद ठमकि गेल अछि। अस्तित्ववाद, मानवतावाद, प्रगतिवाद, रोमेन्टिसिज्म, समाजशास्त्रीय विश्लेषण ई सभ संश्लेषणात्मक समीक्षा प्रणालीमे सम्मिलित भए अपन अस्तित्व बचेने अछि। साइको-एनेलिसिस वैज्ञानिकतापर आधारित रहबाक कारण द्वन्दात्मक प्रणाली जेकाँ अपन अस्तित्व बचेने रहत। कोनो कथाक आधार मनोविज्ञान सेहो होइत अछि। कथाक उद्देश्य समाजक आवश्यकताक अनुसार आ कथा यात्रामे परिवर्तन समाजमे भेल आ होइत परिवर्तनक अनुरूपे होएबाक चाही। मुदा संगमे ओहि समाजक संस्कृतिसँ ई कथा स्वयमेव नियन्त्रित होइत अछि। आ एहिमे ओहि समाजक ऐतिहासिक अस्तित्व सोझाँ अबैत अछि। जे हम वैदिक आख्यानक गप करी तँ ओ राष्ट्रक संग प्रेमकेँ सोझाँ अनैत अछि। आ समाजक संग मिलि कए रहनाइ सिखबैत अछि। जातक कथा लोक-भाषाक प्रसारक संग बौद्ध-धर्म प्रसारक इच्छा सेहो रखैत अछि। मुस्लिम जगतक कथा जेना रूमीक “मसनवी” फारसी साहित्यक विशिष्ट ग्रन्थ अछि जे ज्ञानक महत्व आ राज्यक उन्नतिक शिक्षा दैत अछि।  आजुक कथा एहि सभ वस्तुकेँ समेटैत अछि आ एकटा प्रबुद्ध आ मानवीय समाजक निर्माणक दिस आगाँ बढ़ैत अछि। कम्यूनिज्मक समाप्तिक बाद लागल जे इतिहास, जे दूटा विचारधाराक संघर्ष अछि, एकटा विचारधाराक खतम भेलाक बाद समाप्त भ’ गेल। फ्रांसिस फुकियामा घोषित कएलन्हि जे विचारधाराक आपसी झगड़ासँ सृजित इतिहासक ई समाप्ति अछि आ आब मानवक हितक विचारधारा मात्र आगाँ बढ़त। मुदा किछु दिन पहिनहि ओ  कहलन्हि जे समाजक भीतर आ राष्ट्रीयताक मध्य एखनो बहुत रास भिन्न विचारधारा बाँचल अछि। उत्तर आधुनिकतावादी दृष्टिकोण-विज्ञानक ज्ञानक सम्पूर्णतापर टीका , सत्य-असत्य, सभक अपन-अपन दृष्टिकोणसँ तकर वर्णन , आत्म-केन्द्रित हास्यपूर्ण आ नीक-खराबक भावनाक रहि-रहि खतम होएब, सत्य कखन असत्य भए जएत तकर कोनो ठेकान नहि, सतही चिन्तन, आशावादिता तँ नहिए अछि मुदा निराशावादिता सेहो नहि , जे अछि तँ से अछि बतहपनी, कोनो चीज एक तरहेँ नहि कैक तरहेँ सोचल जा सकैत अछि- ई दृष्टिकोण , कारण, नियन्त्रण आ योजनाक उत्तर परिणामपर विश्वास नहि, वरन संयोगक उत्तर परिणामपर बेशी विश्वास, गणतांत्रिक आ नारीवादी दृष्टिकोण आ लाल झंडा आदिक विचारधाराक संगे प्रतीकक रूपमे हास-परिहास, भूमंडलीकरणक कारणसँ मुख्यधारसँ अलग भेल कतेक समुदायक आ नारीक प्रश्नकेँ उत्तर आधुनिकता सोझाँ अनलक। विचारधारा आ सार्वभौमिक लक्ष्यक विरोध कएलक मुदा कोनो उत्तर नै दऽ सकल। तहिना उत्तर आधुनिकतावादी विचारक जैक्स देरीदा भाषाकेँ विखण्डित कए ई सिद्ध कएलन्हि जे विखण्डित भाग ढेर रास विभिन्न आधारपर आश्रित अछि आ बिना ओकरा बुझने भाषाक अर्थ हम नहि लगा सकैत छी। आ संवादक पुनर्स्थापना लेल कथाकारमे विश्वास होएबाक चाही- तर्क-परक विश्वास आ अनुभवपरक विश्वास । प्रत्यक्षवादक विश्लेषणात्मक दर्शन वस्तुक नहि, भाषिक कथन आ अवधारणाक विश्लेषण करैत अछि । विश्लेषणात्मक अथवा तार्किक प्रत्यक्षवाद आ अस्तित्ववादक जन्म विज्ञानक प्रति प्रतिक्रियाक रूपमे भेल। एहिसँ विज्ञानक द्विअर्थी विचारकेँ स्पष्ट कएल गेल। प्रघटनाशास्त्रमे चेतनाक प्रदत्तक प्रदत्त रूपमे अध्ययन होइत अछि। अनुभूति विशिष्ट मानसिक क्रियाक तथ्यक निरीक्षण अछि। वस्तुकेँ निरपेक्ष आ विशुद्ध रूपमे देखबाक ई माध्यम अछि। अस्तित्ववादमे मनुष्य-अहि मात्र मनुष्य अछि। ओ जे किछु निर्माण करैत अछि ओहिसँ पृथक ओ किछु नहि अछि, स्वतंत्र होएबा लेल अभिशप्त अछि (सार्त्र)। हेगेलक डायलेक्टिक्स द्वारा विश्लेषण आ संश्लेषणक अंतहीन अंतस्संबंध द्वारा प्रक्रियाक गुण निर्णय आ अस्तित्व निर्णय करबापर जोर देलन्हि। मूलतत्व जतेक गहींर होएत ओतेक स्वरूपसँ दूर रहत आ वास्तविकतासँ लग। क्वान्टम सिद्धान्त आ अनसरटेन्टी प्रिन्सिपल सेहो आधुनिक चिन्तनकेँ प्रभावित कएने अछि। देखाइ पड़एबला वास्तविकता सँ दूर भीतरक आ बाहरक प्रक्रिया सभ शक्ति-ऊर्जाक छोट तत्वक आदान-प्रदानसँ सम्भव होइत अछि। अनिश्चितताक सिद्धान्त द्वारा स्थिति आ स्वरूप, अन्दाजसँ निश्चित करए पड़ैत अछि। तीनसँ बेशी डाइमेन्सनक विश्वक परिकल्पना आ स्टीफन हॉकिन्सक “अ ब्रिफ हिस्ट्री ऑफ टाइम” सोझे-सोझी भगवानक अस्तित्वकेँ खतम कए रहल अछि कारण एहिसँ भगवानक मृत्युक अवधारणा सेहो सोझाँ आएल अछि, जे शुरू भेल अछि से खतम होएत भलहि ओकर आयु बेशी हो। जेना वर्चुअल रिअलिटी वास्तविकता केँ कृत्रिम रूपेँ सोझाँ आनि चेतनाकेँ ओकरा संग एकाकार करैत अछि तहिना बिना तीनसँ बेशी बीमक परिकल्पनाक हम प्रकाशक गतिसँ जे सिन्धुघाटी सभ्यतासँ चली तँ तइयो ब्रह्माण्डक पार आइ धरि नहि पहुँचि सकब। साहित्यक समक्ष ई सभ वैज्ञानिक आ दार्शनिक तथ्य चुनौतीक रूपमे आएल अछि। होलिस्टिक आकि सम्पूर्णताक समन्वय करए पड़त ! ई दर्शन दार्शनिक सँ वास्तविक तखने बनत। पोस्टस्ट्रक्चरल मेथोडोलोजी भाषाक अर्थ, शब्द, तकर अर्थ, व्याकरणक निअम सँ नहि वरन् अर्थ निर्माण प्रक्रियासँ लगबैत अछि। सभ तरहक व्यक्ति, समूह लेल ई विभिन्न अर्थ धारण करैत अछि। भाषा आ विश्वमे कोनो अन्तिम सम्बन्ध नहि होइत अछि। शब्द आ ओकर पाठ केर अन्तिम अर्थ वा अपन विशिष्ट अर्थ नहि होइत अछि। आधुनिक आ उत्तर आधुनिक तर्क, वास्तविकता, सम्वाद आ विचारक आदान-प्रदानसँ आधुनिकताक जन्म भेल । मुदा फेर नव-वामपंथी आन्दोलन फ्रांसमे आएल आ सर्वनाशवाद आ अराजकतावाद आन्दोलन सन विचारधारा सेहो आएल। ई सभ आधुनिक विचार-प्रक्रिया प्रणाली ओकर आस्था-अवधारणासँ बहार भेल अविश्वासपर आधारित छल। पाठमे नुकाएल अर्थक स्थान-काल संदर्भक परिप्रेक्ष्यमे व्याख्या शुरू भेल आ भाषाकेँ खेलक माध्यम बनाओल गेल- लंगुएज गेम। आ एहि सभ सत्ताक आ वैधता आ ओकर स्तरीकरणक आलोचनाक रूपमे आएल पोस्टमॉडर्निज्म। कंप्युटर आ सूचना क्रान्ति जाहिमे कोनो तंत्रांशक निर्माता ओकर निर्माण कए ओकरा विश्वव्यापी अन्तर्जालपर राखि दैत छथि आ ओ तंत्रांश अपन निर्मातासँ स्वतंत्र अपन काज करैत रहैत अछि, किछु ओहनो कार्य जे एकर निर्माता ओकरा लेल निर्मित नहि कएने छथि। आ किछु हस्तक्षेप-तंत्रांश जेना वायरस, एकरा मार्गसँ हटाबैत अछि, विध्वंसक बनबैत अछि तँ एहि वायरसक एंटी वायरस सेहो एकटा तंत्रांश अछि, जे ओकरा ठीक करैत अछि आ जे ओकरो सँ ठीक नहि होइत अछि तखन कम्प्युटरक बैकप लए ओकरा फॉर्मेट कए देल जाइत अछि- क्लीन स्लेट ! पूँजीवादक जनम भेल औद्योगिक क्रान्तिसँ आ आब पोस्ट इन्डस्ट्रियल समाजमे उत्पादनक बदला सूचना आ संचारक महत्व बढ़ि गेल अछि, संगणकक भूमिका समाजमे बढ़ि गेल अछि। मोबाइल, क्रेडिट-कार्ड आ सभ एहन वस्तु चिप्स आधारित अछि। डी कन्सट्रक्शन आ री कन्सट्रक्शन विचार रचना प्रक्रियाक पुनर्गठन केँ देखबैत अछि जे उत्तर औद्योगिक कालमे चेतनाक निर्माण नव रूपमे भऽ रहल अछि। इतिहास तँ नहि मुदा परम्परागत इतिहासक अन्त भऽ गेल अछि। राज्य, वर्ग, राष्ट्र, दल, समाज, परिवार, नैतिकता, विवाह सभ फेरसँ परिभाषित कएल जा रहल अछि। मारते रास परिवर्तनक परिणामसँ, विखंडित भए सन्दर्भहीन भऽ गेल अछि कतेक संस्था। इन्फॉरमेशन सोसाइटी किंवा सूचना-आधारित-समाज एकटा ओहेन समाज अछि जाहिमे सूचनाक निर्माण, वितरण, प्रसार, उपयोग, एकीकरण आ संशोधन, एकटा महत्त्वपूर्ण आर्थिक, राजनीतिक आ सांस्कृतिक क्रिया होइत अछि। आ एहि समाजक भाग होएबामे समर्थ लोक अंकीय वा डिजिटल नागरिक कहल जाइत छथि। एहि उत्तर औद्योगिक समाजमे सूचना-प्रौद्योगिकी उत्पादन, अर्थव्यवस्था आ समाजकेँ निर्धारित करैत अछि। उत्तर-आधुनिक समाज, उत्तर औद्योगिक समाज आदि संकल्पना सँ ई निकट अछि। अर्थशास्त्री फ्रिट्ज मैचलप एकर संकल्पना देने छलाह। हुनकर ज्ञान-उद्योगक धारणा शिक्षा, शोध आ विकास, मीडिआ, सूचना प्रौद्योगिकी आ सूचना सेवाक पाँचटा अंगपर आधारित छल। प्रौद्योगिकी आ सूचनाक समाजपर भेल प्रभाव एतए दर्शित होइत अछि। अंकीय वा डिजिटल विभाजन एकटा ज्ञानक विभाजन, सामाजिक विभाजन आ आर्थिक विभाजन देखबैत अछि आ बिना भेदभावक एकटा सूचना समाजक निर्माण आवश्यकता देखाबैत अछि जाहिसँ सूचना प्रौद्योगिकीपर विकासशील देशमे सार्वभौम अधिकार रहए। मानवाधिकार आ सूचना प्रौद्योगिकीक मध्य व्यक्तिक एकान्तक अधिकार सेहो साम्मिलित अछि। विद्वान, मानवाधिकार कार्यकर्ता आ आन सभ व्यक्तिक अभिव्यक्तिक स्वतंत्रता, सूचनाक अधिकार, एकान्त, भेदभाव, स्त्री-समानता, प्रज्ञात्मक संपत्ति, राजनीतिक भागीदारी आ संगठनक मेलक संदर्भमे सूचना आ जनसंचार प्रौद्योगिकीक सन्दर्भमे एहि गपपर चरचा शुरू भेल अछि जे सूचना समाज मानवाधिकारकेँ बल देत आकि ओकरा हानि पहुँचाओत। ऑनलाइन पत्राचारक गोपनीयताक अधिकार, अन्तर्जालक सामग्रीक सांस्कृतिक आ भाषायी विविधता आ मीडिया शिक्षा। सूचना समाजक तकनीकी अओजार ओकर अधिकार आ स्वतंत्रतासँ लाभान्वित होइत अछि आ समाजक समग्र विकास, अधिकार आ स्वतंत्रताक सार्वभौमता, अधिकारक आपसी मतभिन्नता, स्वतंत्रता आ मूल्य निरूपणमे सहभागी होइत अछि। एहिसँ सूचना, ज्ञान आ संस्कृतिमे सरल पइठक वातावरण बनैत अछि आ ई उपयोगकर्ताकेँ वैश्विक सूचना समाजक अभिनेताक रूपमे परिणत करैत अछि। कारण ई उपयोगकर्ताकेँ पहिनेसँ बेशी अभिव्यक्तिक स्वतंत्रता आ नव सामग्री आ नव सामाजिक न्तर्जाल-तंत्र निर्माण करबाक सामर्थ्य दैत अछि। एहिसँ एकटा नव विधि, आर्थिक आ सामाजिक मॉडेलक आवश्यकता सेहो अनूभूत कएल जा रहल अछि जाहि मे साझी कर्तव्य, ज्ञान आ समझ आधार बनत। बच्चाक हित एकटा आर चिन्ता अछि जे पैघक हितसँ सर्वदा ऊपर रखबाक चाही। आधुनिक समाजक आर्थिक, सामाजिक आ सांस्कृतिक धनक एकत्र करबाक प्रवृत्ति सूचना समाजमे बढ़ल अछि आ प्रौद्योगिकी एकटा आधारभूत बेरोजगारी अनलक अछि। गरीबी, मजदूरक अधिकार आ कल्याणकारी राज्यक संकल्पना लाभ-हानिक आगाँ कतहु पाछाँ छूटल जा रहल अछि। आब मात्र किछुए अभिनेता चाही, प्रकाशक लोकनि सेहो मात्र किछु बेशी बिकएबला पोथीक लेखकक प्रचार करैत छथि। यैह स्थिति रंगमंच, पेंटिंग , सिनेमा आ आन-आन क्षेत्रमे सेहो दृष्टिगोचर भऽ रहल अछि। मुदा सूचना सर्वदा लाभकारी नहि होइत अछि। ई मात्र कला, ग्रंथ धरि सीमित नहि अछि वरन सट्टा बाजार आ प्रायोजित सर्वेक्षण रपट सेहो एहिमे सम्मिलित अछि। समय आ स्थानक बीचक दूरीकेँ ई कम करैत अछि आ दुनूक बीचमे एकटा सन्तुलन बनबैत अछि। मानवक गरिमा मानवक जन्म आधारित सामाजिक स्थानसँ हटि कऽ मानवक गरिमाक अधिकारपर बल दैत अछि। मुक्ति आ स्त्री-मुक्ति आन्दोलन एहि दिशाक प्रयास अछि। दुनू विश्वयुद्ध आ फासिज्मक चुनौतीक बाद १० दिसम्बर १९४८ केँ संयुक्त राष्ट्रसंघक महासभा द्वारा मानवाधिकारक सार्वभौम घोषणाक उद्घोषणा कएल गेल आ एकरा अंगीकार कएल गेल। ई घोषणा राजनीतिक, आर्थिक, सांस्कृतिक आ धार्मिक भेदभावरहित एकटा सामान्य मानदण्ड प्रस्तुत करैत अछि जे सभ जन-समाज आ सभ राष्ट्र लेल अछि। सूचनाक स्वतंत्र उपयोग सीमित अछि, लोकक एकान्त खतम भऽ रहल अछि। बिल गेट्ससँ जखन हुनकर भारत यात्राक क्रममे पूछल गेल छलन्हि जे माइक्रोसॉफ्टक एक्स-बॉक्स भारतमे पाइरेसीक डरसँ देरीसँ उतारल गेल तँ ओ कहने रहथि जे माइक्रोसॉफ्ट कहियो कोनो उत्पाद पाइरेसीक डरसँ देरीसँ नहि आनलक। स्पैम आ पाइरेसीक डर खतम होएबाक चाही। सूचना समाज वैह समाज छी जकर बीचमे हम सभ रहि रहल छी। लोकतंत्र आ मानवाधिकारक सम्मान सूचना-समाज आ उत्तर सूचना-समाजमे होइत रहत। अभिव्यक्तिक स्वतंत्रता, एकान्तक अधिकार, सूचना साझी करबाक अधिकार आ सूचना धरि पहुँचक अधिकार जे सूचनाक संचारसँ सम्बन्धित अछि, ई सभ राज्य द्वारा आ सूचना-समाजक बाजारवादी झुकावक कारण खतराक अनुभूतिसँ त्रस्त अछि। अन्तर्जाल लोकक मीडिआ अछि आ एकटा एहन प्रणाली अछि जे लोकक बीच सम्वाद स्थापित करैत अछि। एहिसँ संचार-माध्यमक मठाधीश लोकनिक गढ़ टुटैत अछि। अन्तर्जालमे कोनो सम्पादक सामान्य रूपसँ नहि होइत छथि। एतए लोक विषयक आ सामग्रीक निर्माण कए स्वयं ओकर संचार करैत छथि। एहिसँ कतेक रास सामाजिक सम्वादक प्रारम्भ होइत अछि। मुदा कतेक रास समाज-विरोधी सामग्री सेहो अबैत अछि। तँ की ओहिपर प्रतिबन्ध होएबाक चाही। मुदा जे सॉफ्टवेयरक माध्यमसँ मशीनकेँ सामग्रीपर प्रतिबन्ध लगेबाक अधिकार देब तखन ई अभिव्यक्तिक स्वतंत्रतापर पैघ आघात होएत। बौद्धिक सम्पदाक अधिकार लेखककेँ मृत्युक ६० बरख बादो प्रकाशन आ वितरणक अधिकार दैत अछि। अन्तर्जालमे सेहो पाइरेसीकेँ प्रतिबन्धित करए पड़त आ कमसँ कम लेखकक मृत्युक २० बरख बाद धरि लेखकक अधिकार ओकर सामग्रीपर रहए, से व्यवस्था करए पड़त। मुदा पेटेन्टक बेशी प्रयोग विकाशसील देशक सूचना अभिगमनमे बाधक होएत आ प्रौद्योगिकीक विकासमे सेहो बाधा पहुँचाओत। कॉपीराइटसँ सांस्कृतिक विकास मुदा होएत, जेना संगीत, फिल्म, आ चित्र-शृंखला(कॉमिक्स)क विकास। डिजिटल वातावरणमे प्रतिकृतिक बिना अहाँ अन्तर्जालपर सेहो सामग्री नहि देखि सकब, से ऑफ-लाइन कॉपीराइट आ ऑनलाइन कॉपीराइट दुनू मे थोड़बेक अन्तर अछि। ऑनलाइन कॉपीराइट प्रतिकृतिकेँ सेहो प्रतिबन्धित करैत अछि। आ प्रतिकृति कएल सामग्रीकेँ दोसर वस्तुमे जोड़ब वा संशोधित करब सेहो बड्ड सरल अछि। से नाम आ चित्र बिना ओकर निर्माताक अनुमतिक नहि प्रयोग होअए, दोसराक व्यक्तिगत वार्तालाप-चैटिंग-मे हस्तक्षेप नहि होअए आ दोसराक विरुद्ध कोनो एहन बयानबाजी नहि होअए जाहिसँ कोनो व्यक्तिक विरुद्ध गलत धारणा बनए।तहिना नौकरी-प्रदाता द्वारा कोनो प्रकारक इलेक्ट्रॉनिक उपकरण अपन कर्मचारीक नियन्त्रण लेल लगबैत अछि तँ से अन्तर्राष्ट्रीय श्रम संघक दिशा-निर्देशक अनुरूप होएबाक चाही। ई-पत्रमे अनपेक्षित सन्देश आ चिकित्सकीय रिपोर्टक अनपेक्षित संग्रह आ उपयोग सेहो मानवाधिकारक हनन अछि। अन्तर्जालक उपयोग मुदा सीमित अछि कारण बहुत रास सामग्री आ तंत्रांश मंगनीमे उपलब्ध नहि अछि आ महग अछि, डिजिटल विभाजन शिक्षाक स्तरकेँ आर बेशी देखार करैत अछि। शारीरिक श्रमक बदलामे मानसिक श्रमक एतए बेशी उपयोग होइत अछि, से ई आशा रहए जे स्त्री-असमानता सूचना-समाजमे घटत मुदा सर्वेक्षण देखबैत अछि जे महिलाक पइठ सूचना प्रौद्योगिकीमे कम छन्हि। इलेक्ट्रॉनिक लाइब्रेरी आ ब्रेल-इनेबल कएल/ ध्वनि-इनेबल कएल कम्प्यूटर स्क्रीन/ इलेक्ट्रॉनिक लाइब्रेरी विकलांग आ अन्ध विकलांग लेल घर पर रहि ई-वाणिज्य करबामे सहायता दैत। मुदा एहि क्षेत्रमे कएल शोध आ ओकर परिणाम महग रहबाक कारणसँ ओतेक लाभ नहि दऽ सकल अछि। बाल, वृद्ध, विकलांग, स्त्री, कामगार, प्रवासी-कामगार आ दोसर सामाजिक रूपसँ अब्बल वर्ग सूचना समाजमे सेहो अपनाकेँ अब्बल अनुभव करैत छथि। नीक साहित्य/कला त्वरित उपस्थापनक आधारपर नै वरन ओहिमे तीक्ष्णतासँ उपस्थापित मानव-मूल्य, सामाजिक समरसताक तत्व आ समानता-न्याय आधारित सामाजिक मान्यताक सिद्धान्त आधार बनत। समाज ओहि आधारपर कोना आगू बढ़ए से संदेश तीक्ष्णतासँ आबैए वा नै से देखए पड़त। पाठकक मनसि बन्धनसँ मुक्त होइत अछि वा नै, ओहिमे दोसराक नेतृत्व करबाक क्षमता आ आत्मबल अबै छै वा नै, ओकर चारित्रिक निर्माणक आ श्रमक प्रति सम्मानक प्रति सन्देह दूर होइ छै वा नै- ई सभटा तथ्य लघुकथाक मानदंड बनत। कात-करोटमे रहनिहार तेहन काज कऽ जाथि जे सुविधासम्पन्न बुते नै सम्भव अछि, आ से कात-करोटमे रहनिहारक आत्मबल बढ़लेसँ होएत। हीन भावनासँ ग्रस्त साहित्य कल्याणकारी कोना भऽ सकत? बदलैत सामाजिक-आर्थिक-राजनैतिक-धार्मिक समीकरणक परिप्रेक्ष्यमे एकभग्गू प्रस्तुतिक रेखांकन, कथाकार-कविक व्यक्तिगत जिनगीक अदृढ़ता, चाहे ओ वादक प्रति होअए वा जाति-धर्मक प्रति, साहित्यमे देखार भइए जाइत छैक, शोषक द्वारा शोषितपर कएल उपकार वा अपराधबोधक अन्तर्गत लिखल जाएबला कथामे जे पैघत्वक (जे हीन भावनाक एकटा रूप अछि) भावना होइ छै, तकरा चिन्हित कएल जाए। मेडियोक्रिटी चिन्हित करू- तकिया कलाम आ चालू ब्रेकिंग न्यूज- आधुनिकताक नामपर। युगक प्रमेयकेँ माटि देबाक विचार एहिमे नहि भेटत, आधुनिकीकरण, लोकतंत्रीकरण, राष्ट्र-राज्य संकल्पक कार्यान्वयन, प्रशासनिक-वैधानिक विकास, जन सहभागितामे वृद्धि, स्थायित्व आ क्रमबद्ध परिवर्तनक क्षमता,  सत्ताक गतिशीलता,  उद्योगीकरण,  स्वतंत्रता प्राप्तिक बाद नवीन राज्य राजनैतिक-सामाजिक-आर्थिक-सांस्कृतिक समस्या-परिवर्तन आ एकीकरणक प्रक्रिया, कखनो काल परस्पर विरोधी। सामुदायिकताक विकास, मनोवैज्ञानिक आ शैक्षिक प्रक्रिया। आदिवासी- सतार, गिदरमारा आदि विविधता आ विकासक स्तरकेँ प्रतिबिम्बित करैत अछि। प्रकृतिसँ लग, प्रकृति-पूजा, सरलता, निश्छलता, कृतज्ञता। व्यक्तिक प्रतिष्ठा स्थान-जाति आधारित। किछु प्रतिष्ठा आ विशेषाधिकार प्राप्त जाति। किछुकेँ तिरस्कार आ हुनकर जीवन कठिन। महिला आ बाल-विकास- महिलाकेँ अधिकार, शिक्षा-प्रणालीकेँ सक्रिय करब, पाठ्यक्रममे महिला अध्ययन, महिलाक व्यावसायिक आ तकनीकी शिक्षामे प्रतिशत बढ़ाओल जाए।स्त्री-स्वातंत्र्यवाद, महिला आन्दोलन।धर्मनिरपेक्ष- राजनैतिक संस्था संपूर्ण समुदायक आर्थिक आ सामाजिक हितपर आधारित- धर्म-नस्ल-पंथ भेद रहित। विकास आर्थिकसँ पहिने जे शैक्षिक हुअए तँ जनसामान्य ओहि विकासमे साझी भऽ सकैए। एहिसँ सर्जन क्षमता बढ़ैत अछि आ लोकमे उत्तरदायित्वक बोध होइत अछि। विज्ञान आ प्रौद्योगिकी विकसित आ अविकसित राष्ट्रक बीचक अंतरक कारण मानवीय समस्या, बीमारी, अज्ञानता, असुरक्षाक समाधान- आकांक्षा, आशा सुविधाक असीमित विस्तार आ आधार। विधि-व्यवस्थाक निर्धन आ पिछड़ल वर्गकेँ न्याय दिअएबामे प्रयोग होएबाक चाही। नागरिक स्वतंत्रता- मानवक लोकतांत्रिक अधिकार, मानवक स्वतंत्र चिन्तन क्षमतापूर्ण समाजक सृष्टि, प्रतिबन्ध आ दबाबसँ मुक्ति। प्रेस- शासक आ शासितक ई कड़ी- सामाजिक-आर्थिक-राजनैतिक जीवनमे भूमिका, मुदा आब प्रभावशाली विज्ञापन एजेंसी जनमतकेँ प्रभावित कएनिहार। नव संस्थाक निर्माण वा वर्तमानमे सुधार, सामन्तवादी, जनजातीय, जातीय आ पंथगत निष्ठाक विरुद्ध, लोकतंत्र, उदारवाद, गणतंत्रवाद, संविधानवाद, समाजवाद, समतावाद, सांवैधानिक अधिकारक अस्तित्व, समएबद्ध जनप्रिय चुनाव, जन-संप्रभुता, संघीय शक्ति विभाजन, जनमतक महत्व, लोक-प्रशासनिक प्रक्रिया-अभिक्रम, दलीय हित-समूहीकरण, सर्वोच्च व्यवस्थापिका, उत्तरदायी कार्यपालिका आ स्वतंत्र न्यायपालिका। जल थल वायु आ आकाश- भौतिक रासायनिक जैविक गुणमे हानिकारक परिवर्तन कए प्रदूषण, प्रकृति असंतुलन। कला- एहि लेल कोनो सैद्धांतिक प्रयोजन होएबाक चाही ? मिकेल फोकौल्ट- ज्ञान आ सत्य बनाओल जाइत अछि। डेलीयूज आ गुटारी कहै छथि जे हम सभ इच्छा ऐ द्वारे करै छी कारण हम सभ इच्छा मशीन छी। मिकाहिल बखतिन भाषाकेँ सामाजिक क्रियाक रूपमे लै छथि आ हुनकर कार्य उपन्यासपर अछि। रूसक रूपवादी साहित्यकेँ मात्र भाषाक विशिष्ट प्रयोग मानै छथि। जीन फ्रान्कोइस लियोटार्ड-सत्यक आ इतिहासक सत्यता मात्र आभासी अछि। बौड्रीलार्ड- विज्ञापन आ दूरदर्शन सत्य आ आभासीक बीच भेद मेटा देने अछि। दुनू उत्तर आधुनिकताक मुख्य विचारक छथि। लाकानक विशेषता छन्हि जे ओ फ्रायडक पद्धतिक भाषिकी अनुप्रयोग केलन्हि अछि। ओ कहै छथि जे अचेतनताक संरचना भाषा सन छै। जखन बच्चा भाषा सीखैए तखन ओकरा एकटा चेन्ह लेल एकटा शब्द सिखाओल जाइत छै। इच्छा, त्रुटि आ आन ई तीनटा तथ्य लाकान नीक जकाँ राखै छथि। इच्छा आवश्यकता आ माँगनाइ दुनू अछि मुदा एकरा ऐ दू रूपमे विखंडित नै कएल जा सकैत अछि। आनक वर्णनमे त्रुटि आ रिक्तता अबैत अछि। विषय अर्थक क्षणिक प्रभाव अछि आ ई आन सन होएत जखन ई आभासी होएत आ त्रुटिक कारण बनत, जइसँ इच्छाक उदय होएत। उत्तर उपनिवेशवादक तीन विचारक छथि- होमी भाभा(फोकौल्ट आ लाकानसँ लग), गायत्री स्पीवाक (फोकौल्ट आ डेरीडासँ लग) आ एडवर्ड सईद(फोकौल्टसँ लग) जे उपनिवेशवादीक पूर्वक धूर्तताक, शिथिलता आदिक धारणाक लेल कएल गेल कार्य आ सिद्धांतीकरणक व्याख्या करै छथि। रेमण्ड विलियम्सक संस्कृतिक अध्ययन साहित्यक आर्थिक स्थितिसँ सम्बन्ध देखबैत अछि। नव इतिहासवाद इतिहासक शब्दशास्त्र आ शब्दशास्त्रक ऐतिहासिकताक तुलना करैत अछि। इलाइन शोआल्टर महिला लेखनक मानसिक, जैविक आ भाषायी विशेषताकेँ चिन्हित करै छथि। सिमोन डी. बेवोइर नारीक नारीक प्रति प्रतिबद्धतामे वर्ग आ जातिकेँ (जकर बादक नारीवादी सिद्धांत विरोध केलक) बाधक मानै छथि। वर्जीनिया वुल्फ नारी लेखक लेल आर्थिक स्वतंत्रता आ निजताकेँ आवश्यक मानै छथि। हिनकर विचारकेँ क्रान्तिकारी नै मानल गेल। मेरी वोल्स्टोनक्राफ्ट नारी शिक्षामे क्रान्ति आ औचित्यक शिक्षाकेँ सम्मिलित करबापर जोर देलनि। नव समीक्षा- इलिएट कवितामे भावनाक प्रधानताक विरोध कएल आ एकरा गएर वैयक्तिक बनेबाक आग्रह केलनि। समीक्षकक काज लोकक रुचिमे सुधार करब सेहो अछि। विमसैट आ वर्डस्ले कहलनि जे कविक उद्देश्य वा ऐतिहासिक अध्ययनपर समीक्षा आधारित नै रहत। ई पाठकपर पड़ल भावनात्मक प्रभावपर सेहो आधारित नै रहत कारण से सापेक्ष अछि। ओ आधारित रहत वास्तविक शब्दशास्त्रपर। फिलिप सिडनीसँ अंग्रेजी समीक्षाक प्रारम्भ देखि सकै छी- ओ कविताकेँ सौन्दर्य, अर्थ आ मानवीय हितमे देखलन्हि। जॉन ड्राइडन- प्राचीन साहित्यमे नैतिक प्रवचनपर आ एकर लाभहानिपर विचार केलनि। सैमुअल जॉनसन सेक्सपिअरक नाटकमे हास्य आ दुखद तत्वपर लिखलन्हि। रूसोक रोमांशवाद मनुक्खक नीक होएबापर शंका नै करैए (क्लासिकल समीक्षक शंका करै छथि मुदा नव-क्लैसिकल कहै छथि जे मानव स्वभावसँ दूषित अछि मुदा संस्था ओकरा नीक बना सकैए) मुदा संगे ई कहैए जे संस्था सभ दूषित अछि आ मात्र दूषित लोकक मदति करैए। रोमांशवाद कविताक व्यक्तिगत अनुभव होएबाक कहैए। आधुनिक स्थितिवाद (साहित्यक अवस्थितिपर कोनो प्रश्न चिन्ह नै) पर संरचनावाद प्रहार केलक आ तकराबाद लेखक स्वयं लिखल टेकस्टक विश्लेषण करबाक अधिकार गमेलक। उत्तर संरचनावाद कहलक जे साहित्य ओइसँ आगाँक वस्तु अछि जे संरचनावाद बुझै अछि। उत्तर-संरचनावादक एकटा प्रकार अछि उत्तर आधुनिकता।  उत्तर संरचनावाद कहलक जे साहित्यमे संरचना संस्कृति आ सिद्धान्त मध्य कार्य करैत अछि जत्तऽ किछु भाव आ सोच वंचित अछि जे निरन्तरताक विरोध करैए। विखण्डनवाद आ उत्तर आधुनिकता उत्तर संरचनावादक बाद आएल। उत्तर उपनिवेशवाद उपनिवेशक नव रूपकेँ नै मानैए आ अव्यवस्थाक सिद्धांत जेना असफल उद्देश्यकेँ उचित परिणाम नै भेटबाक कारण मानैए। संरचनावाद दमित करैबला पाश्चात्य व्यवस्था आ समाजपर चोट करैए आ ऐ सँ मार्क्सवादकेँ बल भेटलै (अलथूजर)। आधुनिकतावादी-स्थिवादी, नव समीक्षा, संरचनावाद आ उत्तर संरचनावादक बाद विखण्डनवाद आ उत्तर आधुनिकतावाद आएल जकरा विलम्बित पूँजीवाद कहल गेल (फ्रेडरिक जेनसन)। अठारहम शताब्दीमे आधुनिक माने छल जड़विहीन मुदा बीसम शताब्दीक प्रारम्भमे एकर अर्थ प्रगतिवादी भऽ गेल। १९७० ई.क बाद आधुनिक शब्द एकटा सिद्धांतक रूप लऽ लेलक से उत्तर-आधुनिक शब्द पारिभाषिक भेल जकर नजरिमे लौकिक महत्वपूर्ण नै रहल। आधुनिक काल धरिक सभ जीवन आ इतिहास अमहत्वपूर्ण भेल आ खतम भेल। ई सिद्धांत भेल इतिहासोत्तर, विकासोत्तर आ कारणोत्तर। सत्य आ आपसी जुड़ावक महत्व खतम भऽ गेल। जादुइ वास्तविकतावाद जइमे वास्तविक स्थितिमे जादुइ वस्तुजात घोसिआओल जाइत अछि। स्पेनिश उपन्यासकार गैब्रिअल गार्सिया मार्क्विसक “वन हंड्रेड ईयर्स ऑफ सोलीट्यूड” आ सलमान रुस्डीक “मिडनाइट्स चिल्ड्रेन” ऐ तरहक उपन्यास अछि। रचनाकार ऐ तरहक प्रयोग क’ वास्तविकताकेँ नीक जकाँ बुझबाक प्रयास करै छथि। जोसेफ कोनरेड उपन्यासकेँ इतिहास कहै छथि। जोसेफ कोनरेड पोलिश भाषी रहथि मुदा अंग्रेजीक प्रसिद्ध उपन्यासकार छथि जे धाराप्रवाह अंग्रेजी नै बजैत रहथि। रोलेंड बार्थेज कहै छथि जे उपन्यास इतिहास सेहो छी आ उपन्यास इतिहासक विरोध सेहो करैए। रोलेंड बार्थेज फ्रांसक साहित्यिक सिद्धांकार रहथि आ हिनकर लेखनीक प्रभाव संरचनावाद, मार्क्सवादी आ उत्तर संरचनावादी साहित्यिक सिद्धांतपर पड़ल। उत्तर आधुनिक पाश्चात्य बुर्जुआ दृश्य-श्रव्य मीडियाक प्रयोक कऽ असमता, अन्याय आ वंचितक अवधारणाकेँ मात्र शब्द कहै छथि जे समता, प्राप्ति आ न्यायक लगक शब्द अछि। गरीबी जे पाश्चात्यमे समस्या नै अछि से आइ भारतमे पैघ समस्या अछि। उत्तर आधुनिकता नारीवादक आ मार्क्सवादक विरोधमे अछि आ एकर नारीवाद आ मार्क्सवाद  विरोध केलक अछि। जेना ऐतिहासिक विश्लेषणक पक्षमे मार्क्सवाद अछि आ ओइसँ ओ अपन सिद्धांत फेरसँ सशक्त केलक अछि, संरचनावाद-उत्तर-संरचनावा आ उत्तर आधुनिकतावादक परिप्रेक्ष्यमे। मार्क्सवाद लौकिक पक्षपर जोर दैत अछि मुदा तेँ ई उपयोगितावाद आ चार्वक दर्शनक लग नै अछि, कारण उपयोगितावाद आ चार्वकवाद मात्र शारीरिक आवश्यकताकेँ ध्यानमे रखैत अछि। नारीवादी दृष्टिकोण सेहो उत्तर आधुनिकतावादक यथास्थिवादक विरोध केलक अछि कारण यावत से खतम नै होएत ताधरि नारीक स्थितिमे सुधार नै आओत। मोहनजोदड़ो सभ्यतासँ प्राप्त कांस्य प्रतिमा नृत्यक मुद्राक संकेत दैत अछि, वर्तमान कथक नृत्यक ठाठ मुद्रा सदृश। दहिन हाथ ४५ डिग्रीक कोण बनेने आ वाम हाथ वाम छाबापर। संगहि वाम पएर किछु मोरने। ऋगवेदक शांखायन ब्राह्मणक अनुसार गीत, वाद्य आ नृत्य तीनूक संगे-संग प्रयोगक वर्णन अछि, ऐतरेय ब्राह्मणमे ऐ तीनूक गणना दैवी शिल्पमे अछि। ऋगवेद १०.७६.६ मे उषाक स्वर्णिम आभा कविकेँ सुसज्जित ऋषिक स्मरण करबैत छन्हि। ऋगवेदमे लोक नृत्यक (प्रान्चो अगाम नृतये) सेहो उल्लेख अछि। महाव्रत नाम्ना सोमयागमे दासी सभक (३-६ दासीक) सामूहिक नृत्यक वर्णन अछि। शांखायन १.११.५ मे वर्णन अछि जे विवाहमे ४-८ सुहागिनकेँ सुरा पियाओल जाइत छ्ल आ चतुर्वार नृत्य लेल प्रेरित कएल जाइत छल। वैदिक साहित्यमे विवाह विधिमे पत्नीक गायनक उल्लेख अछि। सीमन्तोन्नयन विधिमे पति वीणावादकसँ सोमदेवक वादयुक्त गान करबाक अनुरोध करैत छथि। अथर्ववेदमे वसा नाम्ना देवताक नृत्य ऋक्, साम आ गाथासँ सम्बन्धित होएबाक गप आएल अछि, सोमपानयुक्त ऐ नृत्यमे गन्धर्व सेहो होइत छलाह, से वर्णित अछि। अथर्ववेद १२.१.४१ मे गीत, वादन आ नृत्यक सामूहिक ध्वनिक वर्णन अछि। वैदिक कालमे साम संगीतक अलाबे गाथा आ नाराशंसी नाम्ना लौकिक संगीतक सेहो प्रचलन छल। महिला- ऋगवेदमे अपाला,घोषा, श्रद्धा, शची, सार्पराज्ञी, यमी, वैवस्वती, देव जामय, इन्द्राणी, शश्वती, रोमशा, गोधा, उर्वशी, सूर्या, अदिति, नदी, लोपामुद्रा, विश्ववारा, वाक् जुहू, सरमा आ यमी ऐ २१ टा ऋषिकाक वर्णन अछि। देवता माने प्रतिपाद्य विषय नै कि गॉड (जेना ग्रिफिथ केने छथि।) मन्त्रार्थमे महर्षि पतञ्जलिक वैज्ञानिक मन्तव्य “यच्छब्द आह तदस्माकं प्रमाणम्” माने जे शब्द आकि मंत्रक पद कहैत अछि सएह हमरा लेल प्रमाण अछि- एकर अर्थ बादमे वेदे प्रमाण अछि- गलत रूपेँ भेल। प्लेटो- प्लेटो कहै छथि जे कोनो कला नीक नै भऽ सकैए किएक तँ ई सभटा असत्य आ अवास्तविक अछि। प्लेटोक ई विचार स्पार्टासँ एथेंसक सैन्य संगठनक न्यूनताकेँ देखैत देल विचारक रूपमे सेहो देखल जएबाक चाही।  काव्य/ नाटकक ऐ रूपेँ विरोध केलन्हि जे सम्वादकेँ रटि कऽ बाजैसँ लोक एकटा कृत्रिम जीवन दिस आकर्षित होएत। अरिस्टोटल कविताकेँ मात्र अनुकृति नै मानै छथि, ओ ऐ मे दर्शन आ सार्वभौम सत्य सेहो देखै छथि। ओ नाटकक दुखान्तकेँ आ अनुकृतिकेँ निसास छोड़ैबला कहै छथि जे आनन्द, दया आ भयक बाद अबैत अछि। सम्वाद दू तरेहेँ भऽ सकैए- अभिभाषण वा गप द्वारा। गपमे दार्शनिक तत्व कम रहत। प्राचीन गीसमे कविता भगवानक सनेस बूझल जाइत छल। एरिस्टोफिनीस नीक आ अधला ऐ दू तरहक कविता देखै छथि तँ थियोफ्रेस्टस कठोर, उत्कृष्ट आ भव्य ऐ तीन तरहेँ कविताकेँ देखै छथि। कविता आ संगीत अभिन्न अछि। मुदा यूरोपक सिम्फोनी जइमे ढेर रास वादन एके संगे विभिन्न लयमे होइत अछि, सिद्धांतमे अन्तर अनलक। यएह सभ किछु नाटकक स्टेज लेल सेहो लागू भेल। डेरीडाक विखण्डन पद्धति ऊँच स्थान प्राप्त रचना/ लेखक केँ नीचाँ लऽ अनैत अछि आ निचुलकाकेँ ऊपर। रोलेण्ड बार्थेस लिखै छथि जे जखन कृति रचनाकारसँ पृथक भऽ जाइए आ ओकर विश्लेषण स्वतंत्र रूपेँ होमए लगै छै तखन कृति महत्वपूर्ण भऽ जाइए जकरा ओ रचनाकारक मृत होएब कहै छथि। उत्तर-संरचनावाद संरचनावादक सम्पूर्ण आ सुगठित हेबाक अवधारणाकेँ माटि देलक। सौसरक भाषा सिद्धान्त- बाजब/ लिखब, वास्तविक समएक साहित्य वा ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्यक शब्दशास्त्र, महत्वपूर्ण कोनो कृति वा मनुक्ख अछि/ महत्ता एकटा भाव अछि, वास्तविक समएमे भाषा वा एकर ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य; मुदा एकरा सेहो डेरीडाक विखण्डन सिद्धान्त उल्टा-पल्टा करए लागल। लिंग एकटा जैव वैज्ञानिक तथ्य अछि मुदा महिला/ पुरुषक सिद्धान्त सामाजिकताक प्रतिफल अछि। महिला सापेक्ष साहित्य कला पुरुष द्वारा निर्मित अछि आ पुरुखक नजरिसँ महिलाकेँ देखैत अछि। साहित्यक नारीवादी सिद्धान्त ऐ समस्याक तहमे जाइए। मिथिलाक सन्दर्भमे महिलाक स्थिति ओतेक खराप नै छै मुदा मैथिली साहित्यक एकभगाह प्रवृत्तिक कारण उच्च वर्गक नारीक खराप स्थिति साहित्यमे आएल। आधुनिकीकरण तथाकथित सामाजिक रूपसँ निचुलका जाति सभमे सेहो नारीक स्थितिमे अवनति अनलक अछि। दोसर एकटा आर गप अछि जे जाति आ धर्म नारीक अधिकारकेँ कैक हीसमे बाँटि देने अछि। नारीवादी दृष्टिकोण सेहो कहैए जे सभटा सिद्धांत पुरुष द्वारा बनाओल गेल से ओ पूर्ण व्याख्या नै कऽ सकैए। सरल मानवतावाद सिद्धांतक विरुद्ध आएल मुदा ई सेहो एकटा सिद्धांत बनि गेल। सार्थक साहित्यक निर्माण एकर अन्तर्गत भेल। पोथी समीक्षामे अत्यधिक आलोचनासँ बचबाक चाही। समीक्षककेँ अपन विद्वत्ता प्रदर्शनसँ बचबाक चाही। अत्यधिक आलोचनाक क्रममे लोक अपन विद्वता देखबऽ लगै छथि। आलोचनाक क्रममे संयम रखबाक चाही, खराप शब्दावलीक प्रयोग समीक्षकक खराप लालन-पालन देखबैत अछि। पोथीक बिना पढ़ने समीक्षा अनैतिक अछि। उदाहरणस्वरूप कर्मधारयमे धूमकेतुक विषयमे तारानन्द वियोगी लिखै छथि- मिथिलाक संस्कृतिमे युग-युगसँ प्रतिष्ठापित साम्प्रदायिक सौहार्दकेँ रेखांकित करैत हिनक कथा “नमाजे शुकराना” बहुत महत्वपूर्ण थिक। (कर्मधारय, पृ. १२७) (!) कथाक शीर्ष देखि कऽ ऐ तरहक समीक्षा भेल अछि कारण ऐ कथामे हाजी सैहेबक नमाजक समएमे पिंजराक सुग्गा “सीता...राम...।” बजैए आ सुग्गाक पिंजराकेँ हाजी सैहेब ताधरि महजिदक देबालपर पटकै छथि जाधरि सूगा मरि नै जाइए। सईदा कानऽ लगैए आ कथा खतम भऽ जाइए। आ ई कथा समीक्षकक मतमे साम्प्रदायिक सौहार्दकेँ रेखांकित करैए! समीक्षककेँ अति प्रशंसासँ सेहो बचबाक चाही। पोथीक समीक्षामे ई देखाओल जएबाक चाही जे ऐ विषयपर लिखल आन पोथीसँ ई पोथी कोन रूपेँ भिन्न अछि, कोना ई पोथी रिक्त स्थलक पूर्ति करैए, पोथीमे की-की छै आ ओइ विषयपर लिखल आन पोथीसँ एकर तुलना हेबाक चाही।  पोथीक विस्तारकेँ ध्यानमे राखि समीक्षा हजारसँ दू हजार शब्दमे हेबाक चाही।  समीक्षा सम्बन्धित पोथीक हेबाक चाही लेखकक नै। लेखकक दोसर रचनाक विश्लेषणसँ समीक्षाकेँ भरब नीक समीक्षा नै, जे ऐ सभ पोथीसँ समीक्षित पोथीक कोनो सोझ सम्बन्ध हो तखने ओकर प्रयोग करू। मिथिलाक विविध संस्कृति आ इतिहासकेँ देखैत –मैथिली साहित्यक एकभगाह स्थिति विशेष रूपमे- व्यक्तिगत आक्षेपक आ जिला-जबारकेँ ध्यानमे रखबाक सेहो परम्परा रहल अछि। जाति-धर्म आ क्षेत्रीय मैथिली भाषा समीक्षामे कम्मे अबैए मुदा जिला-जवारक/ दोस-महीमक-पड़ोसक आधारपर नीक वा अधलाह समीक्षाक प्रवृत्ति वा आग्रहक भयंकर प्रभाव समीक्षकक मध्य छन्हि। कोनो खास समीक्षासँ ओइ पोथीपर प्रकाश पड़ैए वा नै से देखू। ई तँ नै अछि जे ओ समीक्षा लेखकपर टिप्पणी कऽ रहल अछि वा लेखकक आन रचनापर- गहींरमे जाएब तँ बूझि जाएब जे समीक्षा पोथी पढ़ि लिखल गेल छै आकि नै। आलंकारिक भाषाक दिल गेल, शब्दक सटीक प्रयोग करू, अनावश्यक शब्द आ पाँतीकेँ निकालू। आत्मकथात्मक पोथीक समीक्षा लेल लेखकक जिनगीपर प्रकाश दऽ सकै छी। पोथीक रूप, रंग आ आवरणक फोटोक समीक्षासँ आगाँ बढ़ू आ पोथीक समीक्षा करू। पोथीमे महिला विरोधी वा जाति-क्षेत्रक बन्हनसँ बान्हल मानसिकताकेँ दूर राखू। पोथी लेखकक नामक वा आवरणक चित्रक अनावश्यक न्यून विश्लेषणसँ अपनाकेँ दूर राखू। उपन्यासक अंग अछि वातावरणक निर्माण जइमे लेखक कथा कहैत अछि, ओकर पात्र सभक विवरण, कथाक प्रारूप आ तकरा लेल लोकक आ परिस्थितिक वर्णन। ऐ मेसँ कोनो एक टा पक्ष लऽ कऽ अहाँ कथा लिख सकै छी। नाटकमे भावनापूर्ण सम्वाद आ क्रियाकलापक योग रहत। पद्यमे शब्दक प्रयोगसँ चित्रक निर्माण करए पड़त आ लोकक भावनाकेँ उद्वेलित करबा योग्य बनबए पड़त, ऐ लेल कविक वातावरणमे हस्तक्षेपयुक्त सलाहक औचित्य आ ध्वनि-विज्ञानक योग सेहो चाही। कोनो कृति कोना उत्कृष्ट अछि आ ओइमे की छुटि गेल अछि से समीक्षककेँ देखबाक चाही। ओकर मूल्यांकन एकभगाह नै हेबाक चाही, ओइ रचनामे की संदेश नुकाएल छै, लेखक कोन दिस निर्देशित कऽ रहल अछि से समीक्षककेँ बुझबाक आ लिखबाक चाही। आब प्रश्न उठैए जे समीक्षाक पोथीक समीक्षा कोन हुअए। ऐ मे समीक्षककेँ ओइ पोथीक मुख्य धाराकेँ चिन्हित करबाक चाही। जे समीक्षा/ निबन्धक पोथीमे कएक तरहक निबन्ध/ समीक्षा अछि आ मारते रास लेखकक रचना संकलित अछि तँ से सोद्देश्य अछि वा निरुद्देश्य से समीक्षककेँ देखबाक चाही। समीक्षित पोथीक अतिरिक्त ओइ विषयपर आन पोथीक सेहो जत्तऽ धरि सम्भव हो चर्चा होएबाक चाही। अपन विचारधाराकेँ समीक्षित पोथीपर आरोपण नै होएबाक चाही। ओइ पोथीक आजुक समयक सन्दर्भमे की आवश्यकता अछि से देखाऊ। ओइ पोथीक महत्ता कोन रोपमे अछि से देखाऊ, ओकर मुख्य तत्व चिन्हित करू। लेखकक जीवन दर्शन, वास्तविक, काल्पनिक आ आदर्शक सम्बन्धमे ओकर दृष्टि, संदेहकेँ चिन्हित करू। लेखकक लेखनशैलीक कलात्मक पक्ष, ओकर गप कहबाक क्षमता, रचनाक ढाँचा आ ओकर विभिन्न भागकेँ जोड़बाक कलाक चर्चा करू, जेना नीक कमार ठोस आ कलात्मक पलंग बनबैत अछि, तँ दोसर कमारक जोर मात्र ठोस हेबापर होइ छै आ तेसरक कलात्मकतापर, तहिना। सिद्धान्तक आवश्यकता की छै? सरल मानवतावाद कहैए जे साहित्यक सिद्धान्तक बदलामे रचनाक की मानवीय दृष्टिकोण छै, ओइमे सार्थकता छै आकि नै से सामान्य बुद्धिसँ कएल जा सकैए। अपन बुद्धिक प्रयोग कऽ रचनाक गुणवत्ता अहाँ देखि सकै छी, कोनो साहित्यिक सिद्धान्तक आवश्यकता समीक्षा लेल नै छै। मुदा सरल मानवतावाद स्वयं एकटा सिद्धांत बनि गेल। उषाकिरण खानकेँ मैथिली लेल साहित्य अकादमी पुरस्कार 2010  भामती उपन्यास लेल देल जाएत।

उषाकिरण खान 1945- जन्म:२४ अक्टूबर १९४५,कथा एवं उपन्यास लेखनमे प्रख्यात । मैथिली तथा हिन्दी दूनू भाषाक चर्चित लेखिका । प्रकाशित कृति:अनुंत्तरित प्रश्न, दूर्वाक्षत, हसीना मंज़िल, भामती (उपन्यास) । साहित्य अकादेमी  फेलो- भारत देशक सर्वोच्च साहित्य पुरस्कार (मैथिली)

१९९४-नागार्जुन (स्व. श्री वैद्यनाथ मिश्र “यात्री” १९११-१९९८ ) , हिन्दी आ मैथिली कवि। २०१०- चन्द्रनाथ मिश्र अमर (१९२५- )- मैथिली साहित्य लेल।

साहित्य अकादेमी भाषा सम्मान ( क्लासिकल आ मध्यकालीन साहित्य आ गएर मान्यताप्राप्त भाषा लेल)            

२००७- पं. डॉ. शशिनाथ झा (क्लासिकल आ मध्यकालीन साहित्य लेल।)        पं. श्री उमारमण मिश्र साहित्य अकादेमी पुरस्कार- मैथिली १९६६- यशोधर झा (मिथिला वैभव, दर्शन) १९६८- यात्री (पत्रहीन नग्न गाछ, पद्य) १९६९- उपेन्द्रनाथ झा “व्यास” (दू पत्र, उपन्यास) १९७०- काशीकान्त मिश्र “मधुप” (राधा विरह, महाकाव्य) १९७१- सुरेन्द्र झा “सुमन” (पयस्विनी, पद्य) १९७३- ब्रजकिशोर वर्मा “मणिपद्म” (नैका बनिजारा, उपन्यास) १९७५- गिरीन्द्र मोहन मिश्र (किछु देखल किछु सुनल, संस्मरण) १९७६- वैद्यनाथ मल्लिक “विधु” (सीतायन, महाकाव्य) १९७७- राजेश्वर झा (अवहट्ठ: उद्भव ओ विकास, समालोचना) १९७८- उपेन्द्र ठाकुर “मोहन” (बाजि उठल मुरली, पद्य) १९७९- तन्त्रनाथ झा (कृष्ण चरित, महाकाव्य) १९८०- सुधांशु शेखर चौधरी (ई बतहा संसार, उपन्यास) १९८१- मार्कण्डेय प्रवासी (अगस्त्यायिनी, महाकाव्य) १९८२- लिली रे (मरीचिका, उपन्यास) १९८३- चन्द्रनाथ मिश्र “अमर” (मैथिली पत्रकारिताक इतिहास) १९८४- आरसी प्रसाद सिंह (सूर्यमुखी, पद्य) १९८५- हरिमोहन झा (जीवन यात्रा, आत्मकथा) १९८६- सुभद्र झा (नातिक पत्रक उत्तर, निबन्ध) १९८७- उमानाथ झा (अतीत, कथा) १९८८- मायानन्द मिश्र (मंत्रपुत्र, उपन्यास) १९८९- काञ्चीनाथ झा “किरण” (पराशर, महाकाव्य) १९९०- प्रभास कुमार चौधरी (प्रभासक कथा, कथा) १९९१- रामदेव झा (पसिझैत पाथर, एकांकी) १९९२- भीमनाथ झा (विविधा, निबन्ध) १९९३- गोविन्द झा (सामाक पौती, कथा) १९९४- गंगेश गुंजन (उचितवक्ता, कथा) १९९५- जयमन्त मिश्र (कविता कुसुमांजलि, पद्य) १९९६- राजमोहन झा (आइ काल्हि परसू, कथा संग्रह) १९९७- कीर्ति नारायण मिश्र (ध्वस्त होइत शान्तिस्तूप, पद्य) १९९८- जीवकान्त (तकै अछि चिड़ै, पद्य) १९९९- साकेतानन्द (गणनायक, कथा) २०००- रमानन्द रेणु (कतेक रास बात, पद्य) २००१- बबुआजी झा “अज्ञात” (प्रतिज्ञा पाण्डव, महाकाव्य) २००२- सोमदेव (सहस्रमुखी चौक पर, पद्य) २००३- नीरजा रेणु (ऋतम्भरा, कथा) २००४- चन्द्रभानु सिंह (शकुन्तला, महाकाव्य) २००५- विवेकानन्द ठाकुर (चानन घन गछिया, पद्य) २००६- विभूति आनन्द (काठ, कथा) २००७- प्रदीप बिहारी (सरोकार, कथा २००८- मत्रेश्वर झा (कतेक डारि पर, आत्मकथा) २००९- स्व.मनमोहन झा (गंगापुत्र, कथासंग्रह) २०१०-श्रीमति उषाकिरण खान (भामती, उपन्यास) साहित्य अकादेमी मैथिली अनुवाद पुरस्कार १९९२- शैलेन्द्र मोहन झा (शरतचन्द्र व्यक्ति आ कलाकार-सुबोधचन्द्र सेन, अंग्रेजी) १९९३- गोविन्द झा (नेपाली साहित्यक इतिहास- कुमार प्रधान, अंग्रेजी) १९९४- रामदेव झा (सगाइ- राजिन्दर सिंह बेदी, उर्दू) १९९५- सुरेन्द्र झा “सुमन” (रवीन्द्र नाटकावली- रवीन्द्रनाथ टैगोर, बांग्ला) १९९६- फजलुर रहमान हासमी (अबुलकलाम आजाद- अब्दुलकवी देसनवी, उर्दू) १९९७- नवीन चौधरी (माटि मंगल- शिवराम कारंत, कन्नड़) १९९८- चन्द्रनाथ मिश्र “अमर” (परशुरामक बीछल बेरायल कथा- राजशेखर बसु, बांग्ला) १९९९- मुरारी मधुसूदन ठाकुर (आरोग्य निकेतन- ताराशंकर बंदोपाध्याय, बांग्ला) २०००- डॉ. अमरेश पाठक, (तमस- भीष्म साहनी, हिन्दी) २००१- सुरेश्वर झा (अन्तरिक्षमे विस्फोट- जयन्त विष्णु नार्लीकर, मराठी) २००२- डॉ. प्रबोध नारायण सिंह (पतझड़क स्वर- कुर्तुल ऐन हैदर, उर्दू) २००३- उपेन्द दोषी (कथा कहिनी- मनोज दास, उड़िया) २००४- डॉ. प्रफुल्ल कुमार सिंह “मौन” (प्रेमचन्द की कहानी-प्रेमचन्द, हिन्दी) २००५- डॉ. योगानन्द झा (बिहारक लोककथा- पी.सी.राय चौधरी, अंग्रेजी) २००६- राजनन्द झा (कालबेला- समरेश मजुमदार, बांग्ला) २००७- अनन्त बिहारी लाल दास “इन्दु” (युद्ध आ योद्धा-अगम सिंह गिरि, नेपाली) २००८- ताराकान्त झा (संरचनावाद उत्तर-संरचनावाद एवं प्राच्य काव्यशास्त्र-गोपीचन्द नारंग, उर्दू) २००९- भालचन्द्र झा (बीछल बेरायल मराठी एकाँकी-  सम्पादक सुधा जोशी आ रत्नाकर मतकरी, मराठी) साहित्य अकादेमी मैथिली बाल साहित्य पुरस्कार २०१०-तारानन्द वियोगीकेँ पोथी "ई भेटल तँ की भेटल"  लेल प्रबोध सम्मान प्रबोध सम्मान 2004- श्रीमति लिली रे (1933- ) प्रबोध सम्मान 2005- श्री महेन्द्र मलंगिया (1946- ) प्रबोध सम्मान 2006- श्री गोविन्द झा (1923- ) प्रबोध सम्मान 2007- श्री मायानन्द मिश्र (1934- ) प्रबोध सम्मान 2008- श्री मोहन भारद्वाज (1943- ) प्रबोध सम्मान 2009- श्री राजमोहन झा (1934- ) प्रबोध सम्मान 2010- श्री जीवकान्त (1936- ) प्रबोध सम्मान 2011- श्री सोमदेव (1934- ) यात्री-चेतना पुरस्कार २००० ई.- पं.सुरेन्द्र झा “सुमन”, दरभंगा; २००१ ई. - श्री सोमदेव, दरभंगा; २००२ ई.- श्री महेन्द्र मलंगिया, मलंगिया; २००३ ई.- श्री हंसराज, दरभंगा; २००४ ई.- डॉ. श्रीमती शेफालिका वर्मा, पटना; २००५ ई.-श्री उदय चन्द्र झा “विनोद”, रहिका, मधुबनी; २००६ ई.-श्री गोपालजी झा गोपेश, मेंहथ, मधुबनी; २००७ ई.-श्री आनन्द मोहन झा, भारद्वाज, नवानी, मधुबनी; २००८ ई.-श्री मंत्रेश्वर झा, लालगंज,मधुबनी २००९ ई.-श्री प्रेमशंकर सिंह, जोगियारा, दरभंगा २०१० ई.- डॉ. तारानन्द वियोगी, महिषी, सहरसा कीर्तिनारायण मिश्र साहित्य सम्मान २००८ ई. - श्री हरेकृष्ण झा (कविता संग्रह “एना त नहि जे”) २००९ ई.-श्री उदय नारायण सिंह “नचिकेता” (नाटक नो एण्ट्री: मा प्रविश) २०१० ई.- श्री महाप्रकाश (कविता संग्रह “संग समय के”) सूचना: विदेहक ०१ मार्च २०११ अंक महिला अंक आ १५ मार्च २०११ अंक होली विशेषांक रहत। ०१ मार्च २०११ अंक लेल महिला लेखक लोकनिसँ गद्य-पद्य रचना  २६ फरबरी २०११ धरि आमंत्रित अछि, रचनाक ने विषयक सीमा छै आ नै शब्दक। आनो लेखक महिला केन्द्रित गद्य-पद्य २६ फरबरी २०११ धरि पठा सकै छथि। होली विशेषांक लेल हास्य विधाक गद्य-पद्य रचना अहाँ १३ मार्च २०११ धरि पठा सकै छी। रचना मेल अटैचमेण्टक रूपमे  .doc, .docx, .rtf वा .txt फॉर्मेटमे पठाओल जाए। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ अपन स्कैन कएल फोटो पठेताह, से आशा करैत छी। रचनाक अंतमे टाइप रहए जे ई रचना मौलिक अछि आ पहिल प्रकाशनक लेल विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि।

( विदेह ई पत्रिकाकेँ ५ जुलाइ २००४ सँ एखन धरि १०७ देशक १,६५९ ठामसँ ५४, ६२५ गोटे द्वारा विभिन्न आइ.एस.पी. सँ २,८४,८२२ बेर देखल गेल अछि; धन्यवाद पाठकगण। - गूगल एनेलेटिक्स डेटा। ) गजेन्द्र ठाकुर ggajendra@videha.com http://www.maithililekhaksangh.com/2010/07/blog-post_3709.html ‍ २. गद्य २.१.१.शि‍व कुमार झा ‘टि‍ल्‍लू’ समीक्षा- मैथि‍ली कवि‍ता संचयन- (संपादक- गंगेश गुंजन), कुरूक्षेत्रम अन्‍तर्मनक, गोनू झा आ आन मैथि‍ली चि‍त्रकथा, बि‍न वाती दीप जरय, तरेगन, अरि‍पन (कवि‍ता संकलन) २.डॉ. कैलाश कुमार मि‍श्र- पोथी समीक्षा-जीवन संघर्ष २.२.१.रमेश- प्रो. मायानन्द मिश्रक रमनगर कथामे लागल “मुदा”...२.मंत्रेश्वर झा- चरि‍त्र चि‍त्रणक वाजीगर- जगदीश प्रसाद मंडल ३.विनीत उत्पल- दीर्घकथा- घोड़ीपर चढ़ि लेब हम डिग्री – आगाँ ... २.३.१.हम पुछैत छी- मुन्नाजीक शब्‍दक जादूगर मैथि‍ली समीक्षाक प्रखर दृष्‍टि‍दर्शी एवं फरि‍छाएल कथाकार श्री दुर्गानन्‍द मंडलजी सँ भेँटवार्ता २.वीणा ठाकुर- गोनू झा आ आन मैथिली चित्रकथा २.४.१.योगानन्‍द झा - आस्‍था, जि‍जीवि‍षा ओ संघर्षक प्रवाह-“गामक जि‍नगी‍”, आदर्शक उपस्‍थापन : मौलाइल गाछक फूल २.आशीष अनचि‍न्‍हार-गजलक साक्ष्‍य ३.प्रो. वीणा ठाकुर- जि‍नगीक जीत उपन्‍यासक समीक्षा- प्रो. वीणा ठाकुर ४.शि‍व कुमार झा ‘टि‍ल्‍लू’- समीक्षा- हम पुछैत छी- कवि‍ता संग्रह‍ (वि‍नि‍त उत्‍पल), मैथि‍लीक वि‍कासमे बाल कवि‍ताक योगदान, मैथि‍ली उपन्‍यास साहि‍त्‍यमे दलि‍त पात्रक चि‍त्रण, भावांजलि‍, भफाइत चाहक जि‍नगी, भफाइत चाहक जि‍नगी, रमाजीक काव्‍य यात्रा ५. धीरेन्द्र कुमार- श्रीमती प्रीति‍ ठाकुरक दुनू चि‍त्रकथापर धीरेन्‍द्र कुमार एक नजरि‍ ६.जगदीश प्रसाद मंडल- कथा- कतौ नै ७.रमाकान्‍त राय “रमा‍”, गामक जि‍नगी- कथा संग्रह- जगदीश प्रसाद मंडल, आरसी बाबूक व्‍यक्‍ति‍त्‍व एवं कृति‍त्‍वपर द्वि‍दि‍वसीय राष्‍ट्रीय सेमि‍नार- दू दर्जन वि‍द्वानक सहभागि‍ता : आचार्य दि‍व्‍यचक्षु ८.रामकृष्‍ण मंडल 'छोटू'- कथा- बाप ९.शैल झा’ सागर"- किस्त-किस्त जीवन २.५.१. रवि भूषण पाठक- विद्यापति २.डॉ0 मेघन प्रसाद- मैथिलीमे अनुवाद-कलाक शास्त्रीयकरणक इतिहास २.६.१.जीवकान्‍त- जगदीश प्रसाद मंडलक ‘जिनगीक जीत’ उपन्‍यासपर २. डा. रमण झा- मैथिली चित्रकथा ३. सुजित कुमार झा- जनकपुरमे पागे पाग, ४. बिपिन झा- यान्त्रिक अनुवाद आ Polysemy ५. सुमित आनन्द- संवाद ६.ज्योति सुनीत चौधरी- विहनि कथा- हिमदूत २.७.१मुन्नाजी- अझुको क्षणकेँ अंगीकार करैछ “क्षणिका” २. धनाकर ठाकुर- जगदीश प्रसाद मंडलक “ गामक जि‍नगी‍” ३.उमेश मंडल मैथि‍ली उपन्‍यास साहि‍त्‍यमे संवेदनाक स्‍वर २.८.१.डाँ कैलाश कुमार मिश्र यायावरी २.राजदेव मंडल-उपन्‍यास- हमर टोल ३.धीरेन्‍द्र कुमार-नो एंट्री : मा प्रवि‍श ४. डा. रमानन्द झा ‘रमण’-शब्द विभक्ति सम्वाद ५. मुन्नाजीक दूटा विहनि कथा ६.डाॅ. योगानन्‍द झा- वनदेवी आ नारी अस्‍मि‍ताक गाथा .शि‍व कुमार झा ‘टि‍ल्‍लू’ समीक्षा- मैथि‍ली कवि‍ता संचयन- (संपादक- गंगेश गुंजन), कुरूक्षेत्रम अन्‍तर्मनक, गोनू झा आ आन मैथि‍ली चि‍त्रकथा, बि‍न वाती दीप जरय, तरेगन, अरि‍पन (कवि‍ता संकलन) २.डॉ. कैलाश कुमार मि‍श्र- पोथी समीक्षा-जीवन संघर्ष १ शि‍व कुमार झा ‘टि‍ल्‍लू’ १ मैथि‍ली कवि‍ता संचयन- (संपादक- गंगेश गुंजन) स्‍वतंत्रतासँ पूर्व जन्‍म नेनि‍हार साहि‍त्‍यकारक समूहमे एकटा नाओ अद्भुत मानल जा सकैत अछि‍, जनि‍क लेखनी सरस्‍वतीक वरद् पुत्र जकाँ एखनो मैथि‍ली साहि‍त्‍यकेँ अपन अर्चिससँ प्रकाशि‍त कऽ रहल अछि‍। ओ छथि‍ साहि‍त्‍यक सभ वि‍धाक पारखी रचनाकार- श्री गंगेश गुंजन। अरसैठम बरखमे अपन कोसक पाथर सदृश कृर्ति ‘राधा’सँ वि‍देहक संग-संग मि‍थि‍ला-मैथि‍लीक ध्‍वजकेँ आरोहि‍त करवाक हि‍नक प्रयाससँ एकैसम शताब्‍दीक प्रथम दशांश गमकैत वि‍दा लऽ रहल छथि‍। समग्र साहि‍त्‍यि‍क क्षेत्रकेँ ज्‍योर्तिमय बनएवाक संग-संग गुंजन जी संपादकक काज सेहो कएलनि‍। हि‍नक संपादकत्‍वमे नेशनल बुक ट्रस्‍ट, इंडि‍याक सौजन्‍यसँ एकटा पोथी  2005ई.मे बहार भेल- ‘मैथि‍ली कवि‍ता संचयन’। महाकवि‍ वि‍द्यापति‍सँ लऽ कऽ तारानंद वि‍योगी धरि‍क सर्वकालीन कवि‍-कवयि‍त्रीक रचनाकेँ एहि‍ पोथीमे संकलि‍त कएल गेल अछि‍। भूमि‍कामे गुंजन जी कवीश्‍वर चंदा झासँ लऽ कऽ संजय कुंदन धरि‍क चर्च कएने छथि‍, मुदा संजय कुंदन जीक रचना एहि‍ पोथीमे प्रयागराजक सरस्‍वती नदी जकाँ वि‍लोकि‍त अछि‍, प्रत्‍यक्ष दर्शनीय नहि‍। जहि‍ना आदि‍ पुरूषक मात्र चरण स्‍पर्श कएल जा सकैछ, माॅथपर पाग नहि‍ देल जा सकैत अछि‍, ठीक ओहि‍ना महाकवि‍ वि‍द्यापति‍क रचनापर कोनो प्रकारक प्रश्‍न चि‍न्ह ठाढ़ करव उचि‍त नहि‍। हुनक फुलवारीमे सभटा फूल सुन्नर आ सुगंधि‍त अछि‍। कोनो रचना एक-दोसरसँ कमजोर नहि‍। गुंजन जी जाहि‍ रचना पुष्‍प सभकेँ चुनलनि‍ ओ बड़ नीक लागल। एक दि‍श प्रथम रचनामे भावक संगम तँ दोसर ‘वसंत चुमाओन’मे प्रकृति‍ वर्णनक बि‍‍म्‍बक मध्‍य राजधर्म आ देवक तुलना अनमोल लागल। ‘रूपक वर्णन’मे श्रैंगारि‍क धवल चि‍त्रण कएल गेल अछि‍। अभि‍सारमे वि‍रह समागमक झलकि‍ मनोहारी तँ शांति‍ पदमे वि‍चार मूलक स्‍पष्‍ट परि‍दृश्‍य वातावरणकेँ भक्‍ति‍मयी बना दैत अछि‍। महाकवि‍क पश्‍चात् गोवि‍न्‍ददासक स्‍थान जेना मैथि‍ली साहि‍त्‍यमे वि‍लक्षण अछि‍, ओहि‍ना एहि‍ पोथीमे हुनक छ: गोट कवि‍ताक चयन संपादक जीक प्रति‍भाक संग-संग चयनक अद्वैत दृष्‍टि‍केँ पारदर्शी बना देलक। मनबोधक एकमात्र कवि‍ता ‘शि‍शु’ मैथि‍ली साहि‍त्‍यमे बाल साहि‍त्‍यक न्‍यूनताकेँ कि‍छु दूर तक भरवाक प्रयास कऽ रहल अछि‍। कवीश्‍वर चंदा झाक तीनपद भक्‍ति‍सँ संबंधि‍त मानल जा सकैत अछि‍। आशु कवि‍त्‍वमे चंदा झाक स्‍थान मैथि‍ली साहि‍त्‍यमे सूर-तुलसी जकाँ प्रांजल, तँए तीनू पद गेय। शि‍व राग आ महेशवाणीमे भक्‍ति‍क आवाहन कएल गेल। ‘राधा ि‍वरह’ भक्‍ति‍क आड़ि‍मे वेदनाक भाव सरि‍तासँ नयनकेँ सरावोरि‍ करवाक लेल पर्याप्‍त बुझना जाइत अछि‍। कवि‍वर सीताराम झाक पद्य सभमे झंकार अनायास भेट जाइत अछि‍। कवि‍ चूड़ामणि‍ काशीकांत मि‍श्र ‘मधुप’केँ जौं मैथि‍ली साहि‍त्‍यक आदि‍ लोकगीतकार कहल जाए तँ कोनो अति‍शयोक्‍ति‍ नहि‍। वि‍द्यापति‍ जीक पश्‍चात् पद्य वि‍धामे मधुप जी सभसँ जनप्रि‍य कवि‍ मानल जाइत छथि‍। हुनक ‘पति‍त पीक’ आ ‘छुतहर’ कवि‍ताक संकलन एहि‍ पोथीमे कएल गेल अछि‍। दुनू पद्यमे बि‍म्‍बक चयन आ वि‍श्‍लेषण सरल मुदा अर्थपूर्ण लागल। कांचीनाथ झा ‘कि‍रण’ जीक ‘मि‍थि‍लाक वसंत’ अपन माटि‍-पानि‍क तात्‍वि‍क वि‍वेचन करैत अि‍छ। साहि‍त्‍य सरोज बाबू भुवनेश्‍वर सि‍ंह भुवन, सरस कवि‍ ईशनाथ झा, सुमन जी सबहक कवि‍ता सभक चयनमे संपादक जीक दीर्घ इच्‍छा शक्‍ति‍क संग-संग अध्‍ययनशीलताक दृष्‍टि‍कोण नीक मानल जा सकैछ। यात्री जी सर्वकालीन मैथि‍ली कवि‍मे अपन अलग स्‍थान रखैत छथि‍। हुनक लि‍खल पद्य सभ चि‍त्रामे हुअए वा पत्रहीन नग्‍न गाछमे- सभटा एकपर एक अछि‍। संभवत: हुनक श्रेष्‍ठ छ: गोट कवि‍ताक चयनमे गुंजन जी कि‍ंकर्तव्‍यवि‍मूढ़ भऽ गेल हेताह। मुदा जे पद्य सभ चुनल गेल सभ प्रासंगि‍क लागल। कनेक कमी यएह जे ‘मैथि‍ले’ शीर्षक कवि‍ताक मात्र छ: पॉति‍ देल गेल जखन की अखि‍ल भारतीय मैथि‍ली साहि‍त्‍य परि‍षद् प्रयाससँ वहराएल ‘चि‍त्रा’ पोथीक आधारपर ‘मि‍थि‍ले’ शीर्षक कवि‍ता वि‍यालि‍स पॉति‍क अछि‍। हमरा मतेँ कोनो रचनाकारक अपूर्ण रचना संकलि‍त करब उचि‍त नहि‍। आरसी बावूक दुनू कवि‍ताक चयन शांति‍भावसँ कएल गेल। आरसी बावू स्‍वयं अपन रचना ‘शेफालि‍का’केँ अपन सर्वश्रेष्‍ठ कवि‍ता मानैत छलाह। तेँ एहि‍ कवि‍ताकेँ संकलि‍त करबाक लेल गुंजन जी धन्‍यवादक पात्र छथि‍। साहि‍त्‍य अकादमी द्वारा प्रकाशि‍त ‘समकालीन मैथि‍ली कवि‍ता’मे संपादक द्वय डॉ. ब्रज कि‍शोर वर्मा मणि‍पद्मकेँ बि‍सरि‍ गेल छलाह, मुदा एहि‍ पोथीमे हुनका ‘मृग मयूर आ कोकिल मन हे’ रूपमे स्‍मरण कएल गेल अछि‍। वास्‍तवमे मणि‍पद्म जी आधुनि‍क मैथि‍ल साहि‍त्‍यक पद्मनाभ छथि‍। गोवि‍न्‍द झा, रामकृष्‍ण झा कि‍सुन आ अमर जीक पद्यक चयन एहि‍ पोथीकेँ नूतनता प्रदान कएलक। राजकमल चौधरी मूलत: कथाकार छथि‍। पद्यवि‍धामे सेहो हि‍नक रचना नीक होइत अछि‍, तँए सर्वकालीन कवि‍गणमे हि‍नक स्‍थानपर कोनो संदेह नहि‍। संगहि‍ एकटा गप्‍प खटकि‍ गेल जे राजकमल जीक आठ गोट कवि‍ताकेँ एहि‍ पोथीमे समाबि‍ष्‍ट एकल गेल आ समकालीन कवि‍ गोपाल जी झा गोपेशक कतहु चर्च नहि‍। राजकमल जीक कवि‍ताक गणना कम कऽ गोपेश जीकेँ एहि‍ पोथीमे जौं स्‍थान देल गेल रहि‍तए तँ आर वि‍लक्षण भऽ सकैत छल। मायाबाबू, सोमदेव, धीरेन्‍द्र हंसराज, रामदेव झा, गुंजन जी, धूमकेतु, कीर्ति नारायण मि‍श्र, जीवकान्‍त, रेणु जी, प्रवासी जी, मंत्रेश्‍वर झा, कुलानंद जी, वि‍नोद जी, उपेन्‍द्र दोषी, रामलोचन ठाकुर, भीमनाथ झा, नचिकेता, महाप्रकाश, ललि‍तेश मि‍त्र, वि‍भूति‍ आनंद, केदार कानन, ज्‍योत्‍सना चंद्रम, देवशंकर नवीन, सुस्‍मि‍ता पाठक जीक प्रति‍भापर कनेको संदेह नहि‍‍। रामानुग्रह झा, सुकान्‍त सोम, पूर्णेन्‍दु चौधरी, महेन्‍द्र, रमेश, अग्‍नि‍पुष्‍प, हरेकृष्‍ण झा आ नारायण जी सन रचनाकारक रचना जखन एहि‍मे देल गेल तँ तंत्रनाथ झा, उपेन्‍द्र ठाकुर मोहन, उपेन्‍द्र नाथ झा व्‍यास, राधवाचार्य, अणुजी, रमाकरजी, श्रीमति‍श्‍यामा देवी, इन्‍द्रकान्‍त झा, हासमीजी, डॉ. शेफालि‍का वर्मा, रवीन्‍द्र नाथ ठाकुर, सि‍याराम झा ‘सरस’, इलारानी सि‍ंह, डॉ. लाभ, डॉ. बुद्धि‍नाथ मि‍श्र, नवल जी सन रचनाकारकेँ गुंजन जी कोना वि‍सरि‍ गेलनि‍। भऽ सकैत अछि‍ जे हुनक तर्क हुअए जे स्‍थापि‍त रचनाकारक संग-संग कि‍छु वि‍स्‍मृत आ नवतुरि‍या रचनाकारकेँ सेहो स्‍थान देल जाए। जौं एहेन गप्‍प तैयो स्‍तरीय संपादन नहि‍ मानल जा सकैत अछि‍। वि‍स्‍मृत आ नवतुरि‍यो रचनाकार वर्गक कि‍छु रचनाकार एहि‍ पोथीमे छूटल छथि‍ जनि‍क रचना एहि‍मे संकलि‍त कि‍छु रचनासँ वेशी महत्‍व रखैत अछि‍। श्री चन्‍द्रभानु सि‍ंह जीक कवि‍ताक कि‍छु पॉति‍ एकर प्रमाण स्‍वरूप देखल जा सकैत अछि‍- तोरे स्‍वरक टघार सहारे रटय पपि‍हरा पी-पी ककरा ने ई छैक सेहन्‍ता तोहर बाजव टी-पी बेसुराह मनुखक समाजसँ तोहर फराके टोल छौ की कहि‍यौ गे करि‍की तोहर बाजव बड़ अनमोल छौ। (कोइली शीर्षक कवि‍तासँ) एहि‍ कवि‍ताक उत्तर देनि‍हार कवि‍ प्रो. नरेश कुमार वि‍कल जीक रचना सेहो एहि‍ पोथीमे नहि‍ देल गेल अछि‍- युग-गुग सँ चलि‍ आवि‍ रहल छौ वाजव मि‍सरीक घोल सन हमरा आव लगैए कोइली बाजव तोहर ओल सन.....। ई कवि‍ता ‘कोइली’ शीर्षक नाअोसँ वि‍कल जीक कवि‍ता संग्रह ‘अरि‍पन’मे सन 1995ई.मे प्रकाशि‍त भेल अछि‍। वि‍लट पासवान वि‍हंगम, रमाकांत राय ‘रमा’ कवि‍ चंद्रेश जि‍याउर रहमान जाफरी सन आधुनि‍क कवि‍क रचना एहि‍ पोथीमे समावि‍ष्‍ट कएल नहि‍ गेल। आशु गीतमे काली कान्‍त झा ‘बूच’क रचनाकेँ समीक्षक वा संपादक वि‍सरि‍ सकैत छथि‍, मुदा जे पाठक पढ़लनि‍ ओ कहि‍यो नहि‍ वि‍सरताह। हुनक जागरण गान, माला, एक्केगीत, तोहर ठोर, उदासी, परि‍चय पात सन सभ वि‍धासँ युक्‍त कवि‍ता मि‍थि‍ला मि‍हि‍रमे प्रकाशि‍त भेल छल। भूमि‍कामे गुंजन जी स्‍पष्‍ट कएने छथि‍ जे एहि‍मे संकलि‍त 51 गोट कवि‍क संग-संग आर कवि‍ छथि‍। हुनक रचना नहि‍ देवाक पक्षमे पोथीक सीमि‍त आकार आ कवि‍पय रचनाकारक सहयोगक प्रति‍ उदासीनताक तर्क देल गेल अछि‍। हमरा मतेँ एहि‍ तर्कमे वास्‍तवि‍कताक कमी बुझना गेल। पहि‍ने मि‍थि‍ला-मैथि‍लीक साहि‍त्‍यकारक रचनाक प्रकाशन स्‍त्रोत मात्र कि‍छु पत्र पत्रि‍का छल। गुंजन जीक रचना सभ सेहो नि‍श्‍चि‍त एहि‍मे छपैत छलनि‍, तखन असहयोगक गप्‍प कतऽ सँ आएल? वि‍कल जी, बूच जी, शेफालि‍का जी, हासमी जी, चन्‍द्रभानु सि‍ंह, चन्‍द्रेश सन कवि‍ सत्तरि‍सँ अस्‍सी दशकमे मि‍थि‍ला मि‍हि‍रक बहुत रास अंकमे कवि‍क रूपेँ उपस्‍थि‍त छलाह। हमर कहव ई नहि‍ जे रमेश जी आ नारायण जी सन रचनाकारक रचना एहि‍ पोथीमे कि‍एक देल गेल? कहवाक तात्‍पर्य जे जनि‍क कवि‍ता वेसी देल गेल अछि‍ हुनक कवि‍ताक गणना कि‍छु कम कऽ छूटल कवि‍केँ सम्‍मलि‍त कएल जा सकैत छल। महाकवि‍ वि‍द्यापति‍, गोवि‍न्‍द दास, यात्री, राजकमल, कीर्ति नारायण मि‍श्र कोनो परि‍चयक मोहताज नहि‍ छथि‍ हुनक कवि‍ता जौं एक-एक टा कम्‍मे रहि‍तए तँ कोनो हुनका लोकनि‍क प्रति‍ष्‍ठा कम नहि‍ भऽ जेतनि‍ छल? मुदा कोनो वि‍षय वस्‍तुक मात्र नकारात्‍मक स्‍वर नहि‍ देखवाक चाही। मैथि‍ली साहि‍त्‍यमे सर्वकालीन कवि‍ता सभक संकलन अत्‍यल्‍प अि‍छ, तेँ गुंजन जीक प्रयास सराहनीय लागल। पूर्णता कतहु नहि‍ भऽ सकैत अछि‍। प्राचीन कवि‍क रचना सभक चयनमे कोनो पूर्वाग्रह वा पक्षपात नहि‍ देखएमे आएल। मात्र आधुनि‍क कालक कि‍छु रचनाकारक महत्‍वपूर्ण रचना एहि‍ पोथीमे नहि‍ देल गेल। गुंजन जी धन्‍यवादक पात्र छथि‍ जे असगरे अंशत: कुशल संपादन कएलनि‍। एहि‍ तरहक अर्न्‍तद्वन्‍द्वसँ बचवाक लेल कोनो पोथीक संपादन एक व्‍यक्‍ति‍सँ नहि‍ करवा कऽ तीन-चारि‍ व्‍यक्‍ति‍क संपादक मंडल द्वारा करएवाक चाही। जौं एहि‍ तरहक प्रयास कएल जाए तँ त्रुटि‍क संभावना क्षीण भऽ सकैत अछि‍। अंतमे स्‍वर्गीय रचनाकार सभकेँ पुष्‍पांजलि‍ जीवि‍त रचनाकार सभकेँ नमन संग-संग नेशनल वुक ट्रस्‍ट आ गंगेश गंुजन जीककेँ साधुवाद। पोथीक नाओ- मैथि‍ली कवि‍ता संचयन संपादक- गंगेश गंुजन प्रकाशक- नेशनल वुक ट्रस्‍ट इंडि‍या प्रकाशन वर्ष- 2005 मूल्‍य- एक सय टका मात्र २ कुरूक्षेत्रम् अर्न्‍तमनक- (समीक्षा) कि‍छु लोकक ई प्रवृति‍ होइत अछि‍ जे सदि‍खन अपन चल जीवनमे नव-नव प्रकारक प्रयोग करैत रहैत अछि‍। एहि‍ नव प्रयोगक कारण जहानमे अपवर्गक वि‍हान देखएमे अबैत अछि‍। प्रयोग धर्मिता व्‍यक्‍ति‍क इच्‍छासँ नहि‍ जन्‍म लऽ सकैछ, ई तँ नैसर्गिक प्रति‍भाक परि‍णाम थि‍क। मैथि‍ली साहि‍त्‍यमे प्रयोग धर्मी सरस्‍वती पुत्रक अभाव नहि‍ परंच वर्तमान कालमे एकटा एहेन प्रयोगधर्मी मि‍थि‍ला पुत्रकेँ मॉ मि‍थि‍ले अपन ऑचरमे सक्रि‍य कएलनि‍, जे तत्‍कालि‍क मैथि‍लीक दशा वदलवाक प्रयास कऽ रहल छथि‍। क्रांति‍वादी आ सम्‍यक वि‍चार धाराक सम्‍पोषक ओ व्‍यक्‍ति‍ केओ अनचि‍न्‍हार नहि‍- मैथि‍ली साहि‍त्‍यक प्रथम अंतर्जाल पाक्षि‍क पत्रि‍का वि‍देहक सम्‍पादक- श्री गजेन्‍द्र ठाकुर छथि‍। भऽ सकैत अछि‍ जे कि‍छु लोक मैथि‍ली साहि‍त्‍यकेँ अन्‍तर्जालसँ जोड़वाक प्रयास कए रहल हएताह परंच एकटा मूर्त्त रूप दऽ ६४ अंक धरि‍ पहुँचेवाक कार्य गजेन्‍द्रे जी कएलन्‍हि‍। साहि‍त्‍यक नव-नव वि‍धा आ समाजक वेमात्र वर्गकेँ मैथि‍लीक आलि‍ंगनमे आवद्ध कऽ साम्‍यवाद आ समाजवादकेँ वैदेहीक माटि‍पर आनि‍ हमरा सबहक माथपर लागल अनसोहांत कलंककेँ धो देलनि‍। मात्र ६४ अंकमे जे कार्य भेल अछि‍ ओ कतऽ-कतऽ पहि‍ने भेल छल, आत्‍म अवलोकन करवाक पश्‍चात् जानल जा सकैत अछि‍। समाजक फूजल, बेछप्‍प आ उदासीन वर्गकेँ अपन वयनाक मानस पटलपर आच्‍छादि‍त करवाक लेल साहस सभ केओ नहि‍ जुटा सकैत अछि‍। मात्र भॉज पुरयवाक लेल मानस पुत्र एहेन कार्य नहि‍ कएलनि‍, ओहि‍ उपेक्षि‍त वर्गक रचना कारक रचनामे वि‍षए-वस्‍तुक गति‍शीलता आ तादात्‍म्‍य वोध ककरोसँ कम नहि‍ अछि‍। प्रयोगधर्मी गजेन्‍द्र जीक कर्मक दोसर आमुख थि‍क हि‍नक लेखनीक धारसँ नि‍कलल इन्‍द्रधनुषक सतरंगी गुलालसँ भरल भावक आत्‍मउदवोधन- “‍कुरूक्षेत्रम अन्‍तर्मनक” एहि‍ पोथीकेँ की कहल जाए उपन्‍यास, गल्‍प, बाल साहि‍त्‍य, समालोचना, प्रवंध वा काव्‍य? साहि‍त्‍यक सभ वि‍धाक अमि‍र रसकेँ घोरि‍ वंगोपखाड़ी वना देलनि‍ जतए ई कहव असंभव अछि‍ जे गंगा, कोशी, यमुना वा हुगली ककर नीर कतए अछि‍? शीर्षक देखि‍ अकचका गेल छलहुँ, ई महाभारत मचौता की! मुदा अपन हृदएसँ सोचल जाए प्रत्‍येक मानवक हृदएक दूटा रूप होइत अछि‍, मुदा अन्‍तर्मन सदि‍खन सत्‍य बजैत अछि‍ ओहि‍ठॉ मि‍थ्‍याक स्‍थान नहि‍। कुरूक्षेत्र रणभूमि‍ अवश्‍य छल परंच ओहि‍ठॉ सत्‍यक वि‍जयक लेल युद्ध भेल। ओहि‍ठॉ धर्मसंस्‍थापनार्थ वि‍नाश लीला मचल छल। हमरा सभकेँ अपन अन्‍तर्आत्‍मामे कुरूक्षेत्रक दर्शन करएवाक लेल दि‍शा नि‍र्देशन कऽ रहल छथि‍ गजेन्‍द्र जी। मैथि‍ली साहि‍त्‍यक कोन असत्‍यकेँ त्‍याग करवाक चाही? कि‍अए सुमधुर वयनाक एहेन दशा भेल? नव पथक नि‍र्माण नवल दृष्‍टि‍कोणसँ हएत। हमरा बुझने एहि‍ पोथीमे साहि‍त्‍य समागमक लेल दृष्‍टि‍कोणकेँ प्राथमि‍कता देल गेल अछि‍। एहेन वि‍लक्षण साहि‍त्‍यपर आलेख लि‍खव हमरा लेल आसान नहि‍ अछि‍- मुदा दु:साहस कऽ रहल छी- भऽ रहल वर्ण-वर्ण नि‍:शेष शब्‍दसँ प्रकटल नहि‍ उधेश्‍य मोनमे रहल मनक सभ वात अछि‍ंजलसँ सध: स्‍नात सात खण्‍डमे वि‍भक्‍त एहि‍ पोथीकेँ सम्‍पूर्ण परि‍वारक लेल सनेश कहि‍ सकैत छी। प्रवंध-नि‍वंध-समालोचना:- एहि‍ खण्‍डक आदि‍ लोकगाथापर आधारि‍त कथा सीत-वसंतसँ कएल गेल अछि‍। उत्तर मध्‍यकालीन इति‍हासमे अल्‍हा-ऊदल, शीत वसंत सन कतेक कथा प्रचलि‍त छल, जकर मंचन पद्यक रूपमे वर्तमानकालमे वि‍हारक गाम-गाममे भऽ रहल अछि‍। एक राज परि‍वारक वि‍षय-वस्‍तुक चि‍त्रण करैत लेखक सतमाएक ि‍सनेहपर प्रश्‍न चि‍न्‍ह लगैवाक प्रयास कएलनि‍ अछि‍? कथाक आरंभसँ इति‍ धरि‍ मर्मस्‍पर्शक अनुभव होइत अछि‍। कथाक अंतमे वि‍माताकेँ ओहि‍ पुत्रक छाया भेटलनि‍ जकर पराभव ओ कऽ देने छलीह। श्री मायानन्‍द मि‍श्र मैथि‍ली साहि‍त्‍यक सभ वि‍धाक मांजल साहि‍त्‍य कार मानल जाइत छथि‍। हुनक इति‍हास वोधक चारू प्रमुख स्‍तंभ प्रथमं शैलपुत्री च, मंत्रपुत्र, पुरोहि‍त आ स्‍त्रीधनपर सम्‍यक आलेख प्रस्‍तुत कऽ गजेन्‍द्र जी पूर्वमे लि‍खल गेल प्रबंधक दृष्‍टकोणकेँ चुनौती दऽ रहल छथि‍। ऋृग्‍वैदि‍क कालीन इति‍हासपर आधारि‍त मंत्रपुत्र मायानन्‍द जीक प्रमुख कृति‍ मानल जाइत अछि‍। एहि‍ पोथीक लेल माया जीकेँ साहि‍त्‍य अकादेमी पुरस्‍कार भेटल अछि‍। मंत्रपुत्र पाश्‍चात्‍य इति‍हाससँ प्रभावि‍त अछि‍। मंत्रपुत्रक संग-संग पुरोहि‍तमे सेहो पाश्‍चात्‍य संस्‍कृि‍तक झलकि‍ देखए अबैत अछि‍। अपन समालोचनाकेँ गजेन्‍द्र जी अक्षरश: प्रमाणि‍त कऽ देने छथि‍, मुदा मायाबावूक रचना संसारपर कोनो तरह प्रश्‍न चि‍न्‍ह नहि‍ ठाढ़ कएलनि‍। समीक्षाक रूप एहने होएवाक चाही। समीक्षककेँ प्ूर्वाग्रह रहि‍त रहलासँ साहि‍त्‍यि‍क कृति‍क मर्यादा भंग नहि‍ होइत अछि‍। केदारनाथ चौधरी जीक दू गोट उपन्‍यास ‘चमेली रानी’ आ ‘माहुर’पर गजेन्‍द्र जीक समीक्षा पूर्णत: सत्‍य मानल जा सकैत अछि‍। मैथि‍ली साहि‍त्‍यमे बहुत रास रचनाक वि‍क्री सम्‍पूर्ण मैथि‍ल समाजमे जतेक नहि‍ भऽ सकल, ‘चमेली रानी’क ओतेक वि‍क्री मात्र जनकपुरमे भेल। एहि‍सँ एहि‍ साहि‍त्‍यक प्रति‍ पाठकक श्रद्धाकेँ देखल जा सकैत अछि‍। ‘माहुर’ मैथि‍ली साहि‍त्‍यक लेल क्रांति‍कारी उपन्‍यास थि‍क। अरवि‍न्‍द अडि‍गक कृति‍क चरि‍त्रसँ एहि‍ उपन्‍यासक एक पात्रक तुलना लेखकक भाषायी समृद्धताकेँ प्रदर्शित करैत अिछ। वि‍देह-सदेहक सौजन्‍यसँ श्रुति‍ प्रकाशन द्वारा नचि‍केता जीक एकटा नाटक ‘नो एण्‍ट्री मा प्रवि‍श’ प्रकाशि‍त भेल अछि‍। एहि‍ नाटकक लेखनपर नचि‍केता जीकेँ कीर्ति नारायण मि‍श्र सम्‍मान देल गेल अछि‍। नाटकक चारू कल्‍लोलक तर्क पूर्ण वि‍श्‍लेषण कऽ गजेन्‍द्र जी समीक्षाक रूप बदलवाक प्रयास कएलनि‍ अछि‍। एहि‍ नाटकमे तार्किकता आ आधुनि‍कताक वि‍षय वस्‍तु नि‍ष्‍ठताकेँ ठाम-ठाम नकारल गेल अछि‍। रचना लि‍खवासँ पहि‍ने अध्‍यायमे गजेन्‍द्र जी मैथि‍ली साहि‍त्‍यमे भाषा सम्‍पादनपर वि‍शेष ध्‍यान देवाक प्रयास कएलनि‍। अपन साहि‍त्‍यमे भाषायी त्रुटि‍पर पूर्णरूपसँ ध्‍यान नहि‍ देल जा रहल अछि‍। कवि‍शेखर ज्‍योति‍रीश्‍वर, वि‍द्यापति‍ शब्‍दावली, रसमय कवि‍ चर्तुभूज शब्‍दावली आ बद्रीनाथ शब्‍दावली द्वारा मि‍थि‍ला-मैथि‍लीक सर्वकालीन शब्‍द वि‍न्‍यासक आ शब्‍द भंडारक वि‍स्‍तृत वर्णन कएल गेल अछि‍। एहि‍सँ नि‍श्‍चय भाषा सम्‍पादनमे सहायता भेटल। कतेक रास एहेन शब्‍द अछि‍ जकर वि‍षयमे हम की साहि‍त्‍यक पैघ-पैघ वेत्ता पहि‍ने नहि‍ जनैत होएताह। नि‍श्‍चि‍त रूपसँ ई अध्‍याय पाठकक संग-संग साहि‍त्‍यकार आ असैनि‍क सेवाक ओहि‍ प्रति‍योगीक लेल उपयोगी हएत जे मैथि‍लीकेँ मुख्‍य वि‍षयक रूपे प्रति‍योगि‍तामे सम्‍मि‍लि‍त होएवाक लेल प्रयत्‍नशील छथि‍। समीक्षक हमरा सबहक मध्‍य एकटा नव पद्य वि‍धाक चर्च कऽ रहल छथि‍- हाइकू। एहि‍ वि‍धापर मैथि‍लीमे पहि‍नहुँ रचना होइत छल जेना- “‍ई अरदराक मेघ नहि‍ मानता रहत बरसि‍केँ। मुदा एहि‍ विधाकेँ क्षणि‍का नाअोसँ जानल जाइत छल। जापानी साहि‍त्‍यक द्वारा सृजि‍त एहि‍ पद्य रूपक वास्‍तवि‍क चि‍त्रण मैथि‍ली साहि‍त्‍यमे गजेन्‍द्र जी आ ज्‍योति‍ झा चौधरी कएलनि‍ अछि‍। मि‍थि‍लाक लेल प्रलय कहल जाए वा वि‍भीषि‍का- ‘बाढ़ि‍’ ई शब्‍द सुनि‍तहि‍ कोशी, कमला, बलान, गंडकी, बागमती आ करेहक आंतसँ ओझराएल लोक सभ कॉपि‍ जाइत छथि‍। एहि‍ समस्‍याक स्‍थि‍ति‍, सरकारी प्रयासक गति‍ आ दि‍शाक संग-संग बचवाक उपाएपर लेखकक दृष्‍टि‍कोण नीक बुझना जाइत अछि‍। कोनो ठाम आ कोनो आन धाममे जौं हमरा लोकनि‍क वि‍षयमे पता चलए-की मैथि‍ल छथि‍, लोकक दृष्‍टकोण स्‍पष्‍ट भऽ जाइत अछि‍- हम सभ मछगि‍द्धा छी। एकर कारण जे धारक कातमे रहनि‍हार जीवक जीवन जलचरे जकाँ होइत अछि‍। जलीय जीवक भक्षण अधि‍कांश व्‍यक्‍ति‍ करैत छथि‍। तेँ ने हमरा सभकेँ मॉछ आ मखानक प्रेमी बुझल जाइत अछि‍, आ वास्‍तवमे हम सभ मॉछक प्रेमी छी। अधि‍कांश मैथि‍ल ब्राह्मण परि‍वारमे सोइरीसँ श्राद्ध धरि‍ माॅछक भक्षण अनि‍वार्य अछि‍। अान जाति‍मे अनि‍वार्य तँ नहि‍ अछि‍, मुदा ओहु वर्गक अधि‍कांश लोक मॉछक प्रेमी छथि‍। लेखक एहि‍ लोकक भक्षण धारकेँ ध्‍यान धरैत कृषि‍ मत्‍स्‍य शब्‍दावली लि‍खलन्‍हि‍ अछि‍। एहि‍मे सभ प्रकार मॉछक आकार, रंग, रूपक वि‍श्‍लेषण कएल गेल अछि‍। कृषि‍कार्यक लेल जोड़ा वरदक संग हर पालो इत्‍यादि‍क ज्‍वलन्‍त व्‍यवस्‍थापर लेखकक वि‍चार नीक मानल जा सकैत अछि‍। करैल, तारवूज आ खीराक वि‍वि‍ध प्रकारक नाओ सुनि‍ गामक जि‍नगी स्‍मरण आवि‍ जाइत अछि‍। एहि‍ खण्‍डक सभसँ नीक वि‍षय जे हमरा अन्‍तर्मनकेँ हि‍लकोरि‍ देलक ओ अि‍छ वि‍स्‍मृति‍ कवि‍- पंडि‍त राम जी चौधरीक रचना संसारपर प्रवाहमय आ वि‍स्‍तृत प्रस्‍तुति‍। हमरा सबहक भाखाक संग ि‍कछु वि‍षमता रहल जे एहि‍मे कतेक रास एहेन रचनाकार भेल छथि‍ जे अपने संग अपन रचनाकेँ गेंठ बन्‍हने वि‍दा भऽ गेलाह। एकर कारण एहि‍मे सँ कि‍छु रचनाकारक रचनाक संकलन नहि‍ भऽ सकल वा भेवो कएल तँ पाठक धरि‍ नहि‍ पहुँचल। एहि‍ लेल ककरा दोष देल जाए रचनाकारकेँ आ हमरा सबहक भाषाक तत्‍कालीन रक्षक लोकनि‍केँ? एहि‍ भीड़मे राम जी चौधरीक नाओ सेहो अछि‍। मैथि‍ली साहि‍त्‍यमे रागपर लि‍खल रचनामे राम जी बावूक रचना सेहो अछि‍। भक्‍ति‍मय राग वि‍नय वि‍हाग, महेशवाणी, ठुमरी ति‍रहुता, ध्रुपद, चैती आ समदाओनक रूपमे हुनक लेखनीसँ नि‍कलैत गीत सभ अलम्‍य अछि‍। शास्‍त्रीय शैलीक मैथि‍ली गायनमे वर्तमान पि‍रहीक लेल अत्‍यन्‍त उपयोगी रचना सभकेँ प्रकाशमे आनि‍ गजेन्‍द्र जी मि‍थि‍ला, मैथि‍ली आ मैथि‍लपर पैघ उपकार कएलनि‍ अछि‍। सत्‍यकेँ स्‍वीकार करवाक सामर्थ्‍य मात्र कि‍छुए लोकमे होइत अछि‍। गजेन्‍द्र जी ओहि‍ लोकक पातरि‍मे ठाढ़ एक व्‍यक्‍ति‍ छथि‍ परि‍णामत: मैथि‍ली साहि‍त्‍य भोजपुरीसँ आगाँ मानल जाइत अछि‍ मुदा गुणवताक दृष्‍टि‍ए भोजपुरी रास परि‍मार्जि‍त अछि‍। भोजपुरी साहि‍त्‍यक काल पुरूष भि‍खारी ठाकुरक मर्म स्‍पर्शी वि‍देशि‍या एहि‍ भाषाक अलग पहि‍चान भेटल। मैथि‍ली भाषामे वि‍देशि‍याक कमीक मुख्‍य कारण रहल-प्रवासक प्रति‍ उदासीनता। जौं लि‍खलो गेल तँ महाकाव्‍यक रूप दऽ देल गेल। वि‍देशि‍या पद्य आ वि‍धापति‍क लि‍खल? हमरो वि‍श्‍वास नहि‍ भेल छल। वि‍द्यापति‍केँ मुख्‍यत: श्रैंगारि‍क कवि‍ मानल जाइत अछि‍। ओना हुनक रचनाकेँ भक्‍ति‍ रससँ सेहो जोड़ल जाइत अछि‍। कुरूक्षेत्रम अन्‍तर्मनक पोथी पढ़लासँ नव सोच मोनमे आवि‍ गेल। जकरा भोजपुरी साहि‍त्‍यमे वि‍देशि‍या कहल गेल वास्‍तवमे मैथि‍लीमे ओ अछि‍- पि‍या देशान्‍तर। वि‍द्यापति‍क नेपाल पदावलीमे एहि‍ प्रकार रचना सभ संकलि‍त अछि‍, मुदा कहि‍यो एहि‍ रूपे महि‍मा मंडि‍त नहि‍ कएल गेल। कारण स्‍पष्‍ट अछि‍ पि‍या देशान्‍तरक नाटय रूप मि‍थि‍लाक पि‍छड़ल जाति‍क मध्‍य प्रदर्शित कएल जाइत अछि‍। तेँ अग्रसोची लोकनि‍ एकरासँ दूरे रहव उचि‍त बुझैत छथि‍। एहि‍सँ मैथि‍लीक दशा-दि‍शाकेँ नव गति‍ कोना भेटि‍ सकैत अछि‍। मैथि‍ली लोकभाषा अछि‍, लोक संस्‍कृति‍केँ बढ़यवाक प्रयास करवाक चाही। गजेन्‍द्र जीक सोझ दृष्‍टि‍कोणकेँ वि‍म्‍वि‍त करवाक चाही। “एतहि‍ जानि‍अ सखि‍ प्रि‍यतम व्‍यथा‍” –श्रैंगारि‍क-वि‍रह व्‍यथाक वर्णन मुदा अछि‍ तँ पि‍या देशान्‍तर। श्री सुभाष चन्‍द्र यादव जीक कथा संग्रह ‘बनैत-वि‍गड़ैत’पर गजेन्‍द्र जीक समीक्षा अपूर्व अछि‍। प्रवेशि‍कामे हुनक कथा ‘काठक बनल लोक’ पढ़ने छलहुँ। काठक बनल लोकक नायक वदरि‍याक मर्म देखि‍ पाथरो पि‍घलि‍ जा सकैत अछि‍। वास्‍तवमे सुभाष जी मैथि‍ली साहि‍त्‍यक फनीश्‍वर नाथ रेणु छथि‍। महि‍मा मंडनक कालमे मात्र भाँज पुरएवाक लेल हि‍नक कथा पाठ्यक्रममे दऽ देल जाइत अछि‍। आंचलि‍क रचनाकेँ कहि‍या धरि‍ उपहासक पथि‍यामे झाॅपि‍ कऽ राखल जाएत? एक नहि‍ एक दि‍न छीप उधि‍या जएत आ सत्‍यक सामना करए पड़त। लोक धर्मी साहि‍त्‍यकार चाहे ओ धूमकेतु, कुमार पवन कमला चौधरी, सुभाष चन्‍द्र यादव, जगदीश प्रसाद मंडल वा कोनो आन होथु- हुनका सबहक रचनाक उपेक्षा नहि‍ होएवाक चाही। सुभाष जीक कथा कनि‍या-पुतरा, बनैत-वि‍गड़ैत आ दृष्‍टि‍क समीक्षा देखि‍ समए-कालक दशाक अवि‍रल द्वन्‍द्व उपस्‍थि‍त भऽ जाइत अछि‍। ऋृणी छी जे गजेन्‍द्र बावू एहि‍ पोथीपर समीक्षा लि‍खलन्‍हि‍। इंटरनेटक लेल अन्‍तर्जाल प्रयोग, नीक लागल। वेवसाइट बनएवाक तकनीकसँ गजेन्‍द्र जीक उद्वोधन आ नि‍यमन नहि‍ बुझि‍ सकलहुँ। तीन वेरि‍ पढ़लहुँ मुदा जेठक तेज वि‍हारि‍ जकाँ मॉथपरसँ उड़ि‍ गेल। नव-नव नेना भुटका बुझि‍ जएताह। तकनीकी युगक नेनाक स्‍मरण शक्‍ति‍क आॅगन पैघ होइत छथि‍ तेँ हुनके सबहक लेल एहि‍ अध्‍यायकेँ छोड़ि‍ देलहुँ। लोरि‍क गाथा समाजक उपेक्षि‍त वर्गक संस्‍कृति‍पर आधारि‍त अछि‍। सहरसा-सुपौलक वीर आदि‍ पुरूष लोकि‍कक परि‍चए-पातमे पौराणि‍क मैथि‍ल संस्‍कृति‍क दर्शन होइत अछि‍। मि‍थि‍लाक खोजमे जनकपुर, सुग्‍गा धनुषा सन नेपालक स्‍थलसँ लऽ कऽ मधुबनी जि‍लाक कतेको उत्तर मैथि‍ल गामसँ दक्षि‍णमे जयमंगलागढ़ (वेगूसराय)क चर्च कएल गेल अछि‍। पूवमे पूर्णिया कि‍शन गंजक कतेक स्‍थलसँ लऽ पश्‍चि‍ममे चामुण्‍डा (मुजफ्फरपुर)क मॉ दुर्गाक मंदि‍रक चर्च कएल गेल अछि‍। मि‍थि‍लाक ि‍कछु स्‍थानक वर्णन एहि‍ सुचीमे नहि‍ भेटल जेना- सती स्‍थान (गाम-शासन प्रखंड-हसनपुर जि‍ला- समस्‍तीपुर) आ उदयनाचार्यक जन्‍म स्‍थली (गाम-करि‍यन जि‍ला- समस्‍तीपुर)। एहि‍ लेल लेखककेँ दोष नहि‍ देल जा सकैत अछि‍, कि‍एक तँ मि‍थि‍लाक खोज वि‍देहसँ लेल गेल अछि‍, जाहि‍मे गजेन्‍द्र जी अवाहन कएने छथि‍, जे जि‍नका लग कोनो प्रसि‍द्ध स्‍थलक वि‍षएमे जानकारी हुअए जे एहि‍मे सम्‍मि‍लि‍त नहि‍ अछि‍ तँ ओकर छाया चि‍त्रक संग सूचना पठाओल जाए। कि‍छु स्‍थल आर छूटल भऽ सकैत अछि‍, प्रवुद्ध पाठक एहि‍ वि‍षएपर कार्य कऽ सकैत छी। सहस्‍त्रवाढ़नि‍ उपन्‍यास :- सहस्‍त्रवाढ़नि‍ एकटा आकाशीय पि‍ण्‍ड होइत अछि‍, जकर दर्शन आर्यक धार्मिक दृष्‍टि‍कोणमे अछोप बुझना जाइत अछि‍, मुदा उपन्‍यासकार एक अछोप पि‍ण्‍डकेँ आत्‍मसात् करैत एकरा सावि‍त्री बना देलनि‍। सावि‍त्री अपन पाति‍ब्रत्‍य आ दृढ़ नि‍श्‍चयसँ सत्‍यवानक प्राण यमराजसँ छीनि‍ लेने छलीह। एहि‍ उपन्‍यासक दृष्‍टि‍कोण तँ एहन नहि‍ अछि‍ परंच उपन्‍यासक नायक आरूणि‍क मृत्‍युपर वि‍जयमे सहस्‍त्रवाढ़नि‍क उत्‍प्रेरणक उद्वोधन कएल गेल अि‍छ। कुरूक्षेत्रम अन्‍तर्मनक मूल पृष्‍ठपर सहस्‍त्रवाढ़नि‍क चि‍त्र देल गेल अछि‍। एहि‍सँ प्रमाणि‍त होइत अछि‍ रचनाकारक दृष्‍टि‍मे सम्‍पूर्ण पोथीक सातो खण्‍डमे एहि‍ उपन्‍यासक वि‍शेष महत्‍व अछि‍। सहस्‍त्रवाढ़नि‍क अध्‍ययन कएलापर उन्नैसम शताब्‍दीक उतरांशसँ वर्तमानकाल धरि‍क वर्णन कएल गेल अछि‍। एक परि‍वारक एक सए पंद्रह बरखक कथाक वर्णनकेँ कल्‍प कथा मानव नि‍श्‍चि‍त रूपसँ रचनाकारक भावनापर कुठाराघात मानल जाएत। सध: ई कथा रचनाकारक पॉजड़ि‍क कथा अछि‍। जौं एकरा गेजेन्‍द्र बावूक आत्‍मकथा मानल जाए तँ संभवत: अति‍ शयोक्‍ति‍ नहि‍ हएत। उपन्‍यासक आदि‍ पुरूष झि‍ंगुर बावू एकटा कि‍सान छथि‍। जनि‍क घरमे भारतीय राष्‍ट्रीय कांग्रेसक स्‍थापना बर्ख सन् १८८५ई.मे एकटा बालक जन्‍म लेलन्‍हि‍- कलि‍त। कलि‍तक नेनपनसँ एहि‍ उपन्‍यासक श्री गणेश कएल गेल। कलि‍तकेँ ओहि‍ कालमे वंगाली शि‍क्षकसँ अंग्रेजीक शि‍क्षण व्‍यवस्‍था दरि‍भंगामे कएल गेल। एहि‍सँ दू प्रकारक भावक वोध होइत अछि‍। पहि‍ल जे झि‍ंगुर बावू समृद्ध लोक छलाह। ओहि‍ कालमे अवहट्ठक शि‍क्षा सेहो गनल गुथल परि‍वारमे देल जाइत छल, अंग्रेजीक कथा तँ अति‍ वि‍रल छल। देासर जे वंगाली लोक हमरा सभसँ शि‍क्षाक दृष्‍टि‍मे आगाँ छलाह। वंगाली जाति‍क अंग्रेजी शि‍क्षक, हम सभ कतेक पाछाँ छलहुँ जे हमरा सबहक संस्‍कृति‍क राजधानी दरि‍भंगामे कोनो मैथि‍ल अंग्रेजी शि‍क्षक झि‍ंगुर बावूकेँ नहि‍ भेटलन्‍हि‍। सौराठ आ ससौलाक सभा गाछीक चर्च तँ बेरि‍-बेरि‍ कएल जाइत अछि‍, मुदा एहि‍ पोथीमे वि‍लुप्‍त सभा बलान कातक गाम परतापुरक सभा गाछीसँ कथाकेँ जोड़वाक दृष्‍टि‍कोण अलग मुदा नीक बुझना जाइत अछि‍। कलि‍तक वि‍वाहमे वर महफामे, बूढ़ वरि‍याती कटही गाड़ीमे आ जवान लोकक पैदल जाएव वर्तमान पीढ़ीक लेल अजगुत लागत मुदा अपन पुरातन संस्‍कृति‍सँ नेना-भुटकाकेँ आत्‍मसात कराएव आवश्‍यक अछि‍। कलि‍तक मृत्‍युक पश्‍चातक कथा हुनक छोट पुत्र- नंद-क परि‍धि‍मे धूमए लागल। नंदक पारदर्शी सोच, अपन कनि‍यासँ प्रत्‍यक्षत: गप्‍प करव, तृतीय पुरूषक रूपे संवोधन नहि‍। मि‍थि‍लामे वर-कनि‍या, सासु-पुतोहु, साहु जमाएक गप्‍पमे तृतीय पुरूषक संवोधन अनिवार्य होइत अछि‍। एहि‍ प्रकारक व्‍यवस्‍थाक वि‍रूद्ध नंदजी अपन नवल सोचकेँ केन्‍द्रि‍त कएलन्‍हि‍। वर-कनि‍याँक संवंध स्‍वाभावि‍क रूपेँ तँ समझौता मात्र होइत अछि‍ परंच संसारक व्‍यवस्‍थामे सभसँ पवि‍त्र आ अपूर्व संबंध यएह होइत अछि‍। जीवन भरि‍ नि‍र्वहन कोनो एक जनक संग छूटलापर दोसरमे व्‍यथा..... अकथ्‍य व्‍यथा। तेँ एहि‍ संबंधमे प्रत्‍यक्ष संवोधन होएवाक चाही। हमर दृष्‍टि‍कोण ई नहि‍ जे अपन संस्‍कृति‍ पराभव कऽ देवाक चाही, मुदा संस्‍कृति‍ आ व्‍यवस्‍थाकेँ सेहो कालक गति‍मे परि‍वर्तनक अनि‍वार्यता प्रतीत होइत अछि‍। आर्यावर्त्त न्‍याय, कर्म, मीमांसा सन प्रांजल दर्शनक अार्विभाव भूमि‍ मानल जाइत अछि‍। एहि‍ खण्‍डमे एकटा नव दर्शनसँ मि‍थि‍लाक भूमि‍केँ वैशि‍ष्‍ट्ता प्रदान कएल गेल ओ अछि‍- इमान आ मर्मक वि‍म्‍बमे संबंधक मर्यादा। नंद बावू इंजीनि‍यर छलाह। जौं अपन धर्मकेँ कि‍छु ढील कऽ दैतथि‍ तँ भौति‍कताक बाढ़ि‍सँ परि‍वार ओत-प्रोत भऽ सकैत छल। मुदा एना नहि‍ कऽ सतत अपन कर्मकेँ साकार सत्‍यसँ बान्‍हि‍ लेलन्‍हि‍। स्‍वाभावि‍क अछि‍ अर्थयुगमे इमानक प्रासंगि‍कता बड़ ओछ भऽ जाइत अछि‍। असमए मृत्‍युक पश्‍चात् परि‍वारक दशाक वि‍वेचन मर्मस्‍पर्शी लागल। हुनक सत् कर्मक प्रभाव यएह भेल जे संतान सभ वि‍शेषत: आरूणि‍ भौति‍क रूपसँ रास संपन्न तँ नहि‍ भऽ सकलाह मुदा पि‍ताक छत्र-छायाक आंगनमे मनुक्‍ख भऽ गेलाह। कर्मक गति‍सँ लोक राज भोगकेँ प्राप्‍त तँ कए सकैत अछि‍, मुदा मनुक्‍ख बनवाक लेल नैसर्गिक संस्‍कार वेशी महत्‍वपूर्ण होइत अछि‍। तेँ कहलो गेल अछि‍- “बढ़ए पूत पि‍ताक धर्मे।‍” कतहु-कतहु नीच वि‍चारक मानवक संतान मनुसंतान भऽ जाइत अछि‍, एहि‍मे दैहि‍क संस्‍कार आ प्रकृति‍क लीला होइत अछि‍। आरूणि‍क दृढ़ वि‍श्‍वासपर केन्‍द्रि‍त एहि‍ उपन्‍यासक कथामे सतत प्रवाहक गंगधारा खहखह आ शीतल बुझना गेल। जँ कथाकेँ आत्‍मसात् कएल जाए तँ कोनो अर्थमे एकरा काल्‍पनि‍क नहि‍ मानल जा सकैछ। आत्‍मकथा स्‍पष्‍टत: नहि‍ मानि‍ सकैत छी, कि‍एक तँ उपन्‍यासकार कोनो रूपेँ एकर उद्वबोधन नहि‍ कएलनि‍ अछि‍। भऽ सकैत अछि‍ समाजक अगल-बगलक रेखाचि‍त्र हो, मुदा हमरा मतेँ ई कल्‍पना नहि‍, सत्‍य घटनापर आधारि‍त अछि‍। उपन्‍यासमे एकटा कमी सेहो देखलहुँ। अंग्रेजी आखरक ठाम-ठाम प्रयोग कएल गेल जेना- एनेश्‍थेशि‍या, ओपि‍नि‍यन, इम्‍प्रेशन आदि‍। एहि‍ सभ शब्‍दक स्‍थानपर अपन शब्‍दक प्रयोग कएल जा सकैत छल, मुदा नहि‍ कएल गेल। हमरा बुझने हम दोसर भाखाक ओहि‍ शब्‍द सभकेँ मात्र आत्‍मसात करी जकर स्‍थानपर हमर अपन भाखामे शब्‍दक अभाव अछि‍। सहस्‍त्राब्‍दीक चौपड़पर :- कुरूक्षेत्रम अन्‍तर्मनकक तेसर खण्‍ड कवि‍ता संग्रहक रूपमे अछि‍, जकर शीर्षक ‘सहस्‍त्राब्‍दीक चौपड़पर’ देल गेल। मात्र तैंतालीस गोट कवि‍ताक सम्‍मि‍लनमे श्रंृगार, वि‍रह हैकू, वि‍चार मूलक कवि‍ताक संग-संग एकटा ध्‍वज गीत सेहो अछि‍। इन्‍द्रधनुषक आसमानी रंग जकाँ प्रथम कवि‍ता ‘शामि‍ल वाजाक दुन्‍दभी वादक’मे क्षणि‍क प्रकृति‍क आवरणमे स्‍वर-सरगमक भान होइत अछि‍, मुदा अन्‍तरक अवलोकनक पश्‍चात् दशा पूर्णत: वि‍लग। राजस्‍थानक वाद्य संस्‍कृति‍मे एकटा दर्शक वाद्य यंत्रक प्रासंगि‍कताक केन्‍द्रनमे कवि‍क भाव अस्‍पष्‍ट लागल। सहज अछि‍ ‘जतऽ‘ नहि‍ पहुँचथि‍, अेातऽ गएलनि‍ कवि‍’। कवि‍ स्‍वयं दुन्‍दभी वादक छथि‍ तेँ स्‍पष्‍ट दर्शन कोना हएत। हि‍न्‍दी साहि‍त्‍यमे एकटा कवि‍ता पढ़ने छलहुँ ‘गोरैयो की मजलि‍समे कोयल है मुजरि‍म’। संभवत: समाजक पथ प्रदर्शकक मूक दृष्‍टकोणकेँ कवि‍ताक केन्‍द्र वि‍न्‍दु बनाओल गेल अछि‍। बहुआयामी व्‍यक्‍ति‍त्‍वक धनी व्‍यक्‍ति‍ सेहो जीवनक गति‍मे दबावक अनुभव करैत कतहु-कतहु अपन संवेदनाकेँ दवा कऽ दुन्‍दभी बनवाक नाटक करैत छथि‍। केओ-केओ दोसरकेँ संतुष्‍ट करबाक लेल अपन वि‍चारधारा वाह्य मनसँ बदैल दैत छथि‍। संतुष्‍टीकरण प्रवृति‍ वा कोनो प्रकारक मजवूरी हो हमरा सभकेँ परि‍स्‍थि‍ति‍सँ सामंजस करबाक बहाने अपन सम्‍यक वि‍चारकेँ माटि‍क तरमे नहि‍ झॅपवाक चाही। समाज जौं एकरा पूर्वाग्रह मानए तँ अपन पक्षक वि‍वेचन कएल जाए, मुदा अनर्गल प्रलापकेँ मूक समर्थक नहि‍ देवाक चाही। मोनक रंगक अदृश्‍य देवालमे परि‍स्‍थि‍ति‍जन्‍य वि‍षमताक वि‍षय वस्‍तुक दर्शन आशातीत अछि‍। मन्‍दाकि‍नी.... आ पक्का जाठि‍ शीर्षक कवि‍तामे प्रकृति‍ आ समाजक स्‍थि‍ति‍क मध्‍य वि‍गलि‍त मानवतापर मूक प्रहारमे कवि‍क नैसर्गिक मुदा अदृश्‍य सोच हमरा सन साधारण समीक्षक लेल अनुबूझ पहेली जकाँ अछि‍। अपन पुरातन इति‍हासक ओहि‍ दि‍वसकेँ लोक स्‍मरण नहि‍ करए चाहैत छथि‍, जाहि‍सँ अतुल पीड़ाक अनुभव होइत अछि‍। त्रेता युगक घटना, कलि‍युग धरि‍ पाछाँ धेने अछि‍। सीता जीक वि‍याह अगहन शुक्‍ल पक्ष पंचमीकेँ भेलनि‍, परि‍णाम सोझा अि‍छ। तखन शतानंद पुरोहि‍त जी खरड़ख वाली काकीक वि‍आह ओहि‍ ति‍थि‍मे कि‍एक करौलन्‍हि‍? भऽ सकैत अछि‍ हुनक भाग्‍यमे सीताजी जकाँ गृहस्‍थ सुख नहि‍ लि‍खल दुख मुदा कलंक तँ ‘वि‍याह पंचमी’ ति‍थि‍केँ देल गेल। एहि‍ कवि‍तामे कवि‍क दृष्‍टकोण तँ वि‍धवा वि‍आहक समर्थन करवाक अछि‍, मुदा सवर्ण मैथि‍ल नहि‍ स्‍वीकार कऽ रहल छथि‍। अपन पुरान सॉगह लऽ कऽ हम सभ हवड़ाक पुल बनाएवक कल्‍पनामे कहि‍या धरि‍ ओझराएल रहव? एहि‍ कवि‍ता संग्रहमे जे नव वि‍षय बुझना गेल ओ अछि‍ ‘बारह टा हैकू’। गि‍दरक नि‍रैठ, राकश थान, शाहीक मौस आ बि‍धक लेल शब्‍द-शब्‍द बजैत अछि‍। हैकूक सार्थक अर्थ लगाएव अत्‍यन्‍त कठि‍न होइत अछि‍, मुदा हमरा बुझने जौं एहेन हैकू लि‍खल जाए तँ नेनो सभ जे मैथि‍लीमे माए परि‍वार कुटुम्‍वक संग बजैत छथि‍ अवश्‍य बूझि‍ जएताह। मि‍थि‍लाक ध्‍वज गीतमे मातृभूमि‍सँ कर्मक सार्थक गति‍ मांगल गेल अछि‍। जेना गायत्री परि‍वारक प्रार्थना वह शक्‍ति‍ हमे दो दयानि‍धि‍ मे गाओत जाइत अछि‍। मातृ वंदनाकेँ कवि‍ता संग्रहमे देवाक हि‍नक दृष्‍टि‍कोण रचनाक्रममे उपयुक्‍त हो मुदा हमरा मते एकरा कुरूक्षेत्रम अन्‍तर्मनक प्रथम पृष्‍ठपर वंदनाक रूपमे देल गेल रहि‍ते तँ बेसी सुन्नर होइतए। ‘बड़का सड़क छह लेन बला’मे मि‍थि‍लाक वि‍कासक क्रमि‍त स्‍थि‍ति‍क वर्णन कएल गेल अछि‍। सम्‍पूर्ण कवि‍ता संग्रहक अवलोकनक वाद कोनो पद्य अकच्‍छ करैबला नहि‍ लागल। ‘पुत्र प्राप्‍ति‍’ शीर्षक कवि‍तामे लुधि‍यानामे हमरा सबहक समूहक एकटा पंडि‍तक ठकपचीसीक चर्च कएल गेल अछि‍। एहने ठकक कारण ‘वि‍हारी’ व्‍यक्‍ति‍केँ आठ ठाम लोक शंकाक दृष्‍टि‍सँ देखैत छथि‍। मुदा गजेन्‍द्रजी सँ हमर आग्रह जे एहि‍ कवि‍ताक पंजावी भाषामे अनुवादक अनुमति‍ नहि‍ देल जाए नहि‍ तँ कतेको भलमानुष बनल मैथि‍ल घुरि‍ कऽ गाम आवि‍ जएताह आ हमरा सबहक समाजमे कुचक्र आरो बढ़ि‍ जाएत। गल्‍प गुच्‍छ  ::  २३ गोट कथा-लघुकथाक सम्‍मि‍लन कऽ गल्‍प गुच्‍छक नाओ देल गेल। चौंसठि‍ पृष्‍ठक एहि‍ खण्‍डमे समए-सालक सभ रूपकेँ बि‍म्‍वि‍त करैत कथाकार साि‍हत्‍यक समग्र वि‍धापर लेखनक प्रयास कएलनि‍ अछि‍। सर समाज कथामे अर्थनीति‍क मौन प्रस्‍तुति‍ नीक लागल मुदा कलात्‍मक शैलीक अभाव बुझना गेल। घरक मरम्‍मति‍क बि‍म्‍वि‍त खि‍स्‍सामे कनेक रस-प्रवाह रहि‍तए तँ कथा आर नीक भऽ सकैत छल। हम नहि‍ जाएव वि‍देशमे पलायनवादक वि‍रोध कएल गेल अछि‍ बि‍म्‍व तँ नीक अछि‍ मुदा वि‍श्‍लेषणमे अलंकारक तादात्‍म्‍य नहि‍ भेटल। एहेन मार्मिक वि‍षय-वस्‍तुक कथा तँ ओहि‍ प्रकारक होएवाक चाही जाहि‍सँ हि‍यमे हि‍लकोरि‍ उत्‍पन्न भऽ जाए। राग भैरवी छोट मुदा संस्‍कृति‍केँ छूबैत अछि‍। काल स्‍थान वि‍स्‍थापन आ वैशाखीपर जि‍नगीकेँ औसत मानल जा सकैत छैक। कोनो साहि‍त्‍यकेँ ता धरि‍ पूर्ण नहि‍ मानल जा सकैछ जा धरि‍ समाजक अंति‍म व्‍यक्‍ति‍सँ संबंधत भाषा साहि‍त्‍यकेँ जोड़ल नहि‍ गेल हुअए। “सर्व शि‍क्षा अभि‍यान‍” कथाकेँ पढ़़लाक वाद मैथि‍ली साहि‍त्‍यमे दलि‍त, पि‍छड़ा आदि‍ वर्गक प्रति‍ सरकारी योजनाक ि‍नष्‍फल होएबाक कारण केर स्‍पष्‍टीकरण वास्‍तवि‍क लगैत अछि‍। पेटमे अन्नक फक्का नहि‍ हो आ पोथी मुफ्तमे भेटए, एहेन शि‍क्षाक स्‍थि‍ति‍पर प्रश्‍न चि‍न्ह ठाढ़ करव स्‍वाभावि‍क अछि‍। साम्‍यवादी सोच राखएबला कथाकार कथाक बहाने स्‍पष्‍ट करए चाहैत छथि‍ जे गरीबक मध्‍य जाति‍क आधारपर वि‍भाजन हमरा सबहक समाजक कलुष रूप थि‍क। छोट उद्येश्‍यपूर्ण कवि‍ताकेँ क्षणि‍का वा हाइकूक नाओ देल गेल मुदा लघुकथाकेँ की कहल जाए? लघुकथामे बि‍म्‍वक वि‍श्‍लेषण अति‍ क्‍लि‍ष्‍ट होइत अछि‍ मुदा “जाति‍वादी मराठी‍”मे मैथि‍ली भाषाक अस्‍ति‍त्‍वपर लागल जाति‍क कलंकक प्रस्‍तुति‍ सराहनीय अछि‍। थेथर मनुक्‍ख, बहुपत्‍नी वि‍वाह आ ि‍हजड़ा, स्‍त्री-बेटी वि‍आह आ गोरलगाइ, प्रति‍भा, अनुकम्‍पाक नौकरीक सभक वि‍षय-वस्‍तु छोट-छीन परंच सारगर्भित लागल। जेना हि‍न्‍दी साहि‍त्‍यक पत्र-पत्रि‍कामे चर्चित लेखक खुशबन्‍त सि‍ंह मात्र दू पॉति‍मे बहुत-रास गप्‍प लि‍खि‍ जाइत छथि‍ ठीक ओहि‍ना एहि‍ सभ लघुकथाकेँ पढ़ि‍ बुझना गेल। जाति‍-पाति‍ लघुकथा तँ पूर्णत: बेच्‍छप लागल। एकटा डोम जाति‍क आइ.पी.एस. परि‍वीक्षाधीन अधि‍कारीमे जाति‍क गरानि‍ कोनो आत्‍मीय मनुक्‍खकेँ मर्माहि‍त कऽ सकैत अछि‍। मृत्‍युदंड आ वाणवीरक सामाजि‍क बि‍म्‍वक संग-संग सामन्‍तवादी, मीडि‍यासँ संबंधि‍त कथा सभकेँ वेजोड़ तँ नहि‍ मुदा मैिथली साहि‍त्‍यक लेल नूतन-धाराकेँ स्‍पर्श करैबला कथा जौं मानल जाए तँ कोनो दोख नहि‍। आव प्रश्‍न उठैत अछि‍ जे गल्‍प-गुच्‍छकेँ कोन रूपक मानल जाए। हमरा सबहक भाषाक संग दुर्भाग्‍य रहल जे कथाक वि‍षय वस्‍तुसँ वेशी भाषा वि‍ज्ञान, बि‍म्‍वक वि‍श्‍लेसन आ शब्‍द वि‍न्‍यासक कलाकारीपर वि‍शेष ध्‍यान देल जाइत अछि‍। साहि‍त्‍यक अधि‍कांश अधि‍ष्‍ठाता एकटा गप्‍पपर नहि‍ ध्‍यान देबए चाहैत छथि‍ जे रचनासँ समाजक परि‍दृश्‍यमे सम्‍यक जीवनक सनेश जाएत वा नहि‍। जाति‍क संग-संग संतुष्‍टीकरण केर छद्मसँ ऊपर उठव अनि‍वार्य अछि‍ नहि‍ तँ मैथि‍लीक अस्‍ति‍त्‍वपर प्रश्‍न चि‍न्‍ह ठाढ़ भऽ जएत। भौगोलि‍कीकरणक परि‍धि‍मे मैथि‍ली सभसँ बेसी प्रभावि‍त भेल छथि‍। सौति‍न भाषाक संग-संग पाश्‍चात्‍य संस्‍कृति‍क प्रभावसँ वैदेही टि‍म टि‍मा गेली। एहि‍ भाषामे नवल अर्चिस जड़एबाक लेल वर्ग संघर्षक स्‍थि‍ति‍सँ ऊपर उठि‍ कऽ कार्य करवाक चाही। पागक अभि‍प्राय जौं मैथि‍ल ब्राह्मण आ कर्ण कायस्‍थक संग-संग बहुल झॉपल मुदा जनभाषाक संरक्षक वर्ग धरि‍ पहुँचवाक प्रयास कएल जाए तँ मैथि‍लीक दशामे फेरि‍ चारि‍ नहि‍ आठ गोट चान लागि‍ जाएत। एहि‍ कथा सबहक कथाकार कथाक शैली ओ वि‍वेचन जे हुअए एकर निर्णए पाठकपर छोड़ि‍ देवाक चाही मुदा रचनाक उद्येश्‍य स्‍पष्‍ट अछि‍। गजेन्‍द्र जी नि‍श्‍चि‍त रूपेँ एहि‍ कथा संग्रहक माध्‍यमसँ समाजमे अपन संस्‍कृति‍क रक्षा करैत नूतन सम्‍यक ज्‍येाति‍ जड़ाबए चाहैत छथि‍, जतऽ डोम, चमार, ब्राह्मण, राजपूत, मुसलमान ओ कायस्‍थ नहि‍ मात्र “मैथि‍ल‍” शब्‍दक व्‍योमक परि‍धि‍मे मि‍थि‍लाक चर्च कएल जाए। दुर्भाग्‍य अछि‍ जे मैथि‍ली पोथीक समीक्षा करवामे आलोचना-प्रत्‍यालोचनाकेँ मूल बि‍म्‍व मानल जाइत छैक जखन की आन भाषामे रचनाकारक मनोवृति‍ आ दृष्‍टि‍कोणपर ध्‍यान देल जाइत अछि‍। नाटक- संकर्षण मात्र १६ पृष्‍ठक नाटक, सुनबामे कनेक अनसोहाँत जकाँ लगैत अछि‍ मुदा जौं तन्‍मय भऽ कऽ पढ़ल जाए तँ स्‍पष्‍ट भऽ जाइत जे हि‍न्‍दी साहि‍त्‍यमे मात्र कि‍छु कथाक कथाकार श्री चन्‍द्रधर शर्मा गुलेरी जीकेँ कोना आ कि‍ए आत्‍मसात् कऽ लेल गेल? संकर्षण सन अभि‍नेता जाहि‍ नाटकमे हुअए ओहि‍मे ि‍वशेष भावक उपस्‍थि‍ति‍ स्‍वाभावि‍क अछि‍। अभि‍नेताक कोनो गुण नहि‍ मुदा गजेन्‍द्र जी एकरा प्रधान नायक बना देलनि‍। समाजक कुहरैत अवस्‍थाक यएह सत्‍य रूप थि‍क एक ि‍दश महीसक चरवाह आ दोसर दि‍शि‍ कलक्‍टरक चाटुकार। मि‍थि‍लाक समाजि‍क बि‍म्‍वकेँ स्‍पर्श करैत छोट नाटक संकर्षणमे नुक्कड़ नाटकक रूप अछि‍। “हौ गोनर! पानि‍ कोना लागए देबैक एकरा। पएरक चमड़ा सड़त तँ फेर नवका आबि‍ जाएत। मुदा ई सड़ि‍ जाएत तखन कतएसँ अएत।‍” कहवाक तात्‍पर्य जे जाहि‍ व्‍यक्‍ति‍केँ शरीरसँ बेसी कि‍छु कैंचाक जुत्ता वि‍शेष महत्‍वपूर्ण लगैत हुअए ओहि‍ व्‍यक्‍ति‍मे जीवनक तादात्‍म्‍यक कोन प्रयोजन? धर्मनीति‍सँ अर्थनीति‍ वेसी महत्‍वपूर्ण अछि‍। कालक बदलैत स्‍वरूपक ि‍चन्‍तन करवाक योग्‍य- संभवत: एहि‍ नाटकक यएह उद्येश्‍य थि‍क। मंचन करवाक लेल एकरा कोनो अर्थमे उपयुक्‍त नहि‍ मानल जा सकैछ। कि‍एक तँ पर्दा उठत आ आधा धंटामे नाटक समाप्‍त। मुदा जीवनक नाटकमंडलीकेँ केन्‍द्रि‍त करए बला संकर्षण चि‍न्‍तन करवाक योग्‍य अवश्‍य लागल। सभटा नाटकमे कोनो ने कोनो रूपेँ हास्‍य आ श्रंृगारक सम्‍मि‍लन होइत अछि‍ मुदा एहि‍ ठॉ अभाव कि‍एक तँ समाजक मनोवृत्ति‍केँ छुबैत एिह नाटककेँ पढ़ि‍ कोनो कवि‍क एकटा कवि‍ताक एक पाॅति‍ मोन पड़ि‍ गेल- “ठोप-ठोप चारक चुआठकेँ आॅगुरसँ उपछैत रहल छी‍” गजेन्‍द्र जीक प्रयास छोट परंच अनुकरणीय लागल। त्‍वन्चाहन्‍च आ असंजाति‍ मन- जेना की नाअोसँ स्‍पष्‍ट भऽ जाइत अछि‍ जे दुनू काव्‍य ऐति‍हासि‍क धटनाकेँ बि‍म्‍वि‍त कऽ लि‍खल गेल। धर्म आ कर्मक्षेत्रक परि‍धि‍मे आर्य संस्‍कृति‍क वि‍वेचन नीक लागल। एहि‍ महाकाव्‍यक वि‍षयमे मात्र यएह कहल जा सकैत अछि‍ जे सुरेन्‍द्र झा सुमन, वैधनाथ मल्‍लि‍क वि‍धु आ मार्कण्‍डेय प्रवासी जीक काव्‍य लेखन परम्‍पराकेँ जीवंत रखवाक प्रयास कएल गेल। बालमंडली आ कि‍शोर जगत- हम सभ गौरवान्‍वि‍त छी जे मैथि‍ली भाषा समग्र आर्य परि‍वारक भाषा समूहमे सभसँ सरस भाषा मानल जाइत अछि‍। साहि‍त्‍य चि‍न्‍तन सेहो पाठकक गणनाकेँ देखैत ककरोसँ कम नहि‍। मुदा एकटा पक्ष जे सभसँ कमजोर रहल ओ ि‍थक मैथि‍ली भाषा साहि‍त्‍यमे “बाल साहि‍त्‍यक दरि‍द्रता।‍” कहबाक लेल तँ बहुत रास लेखक वा कवि‍ अपनाकेँ बाल साहि‍त्‍यसँ जोड़वाक सतत् वाक् पटुता देखबैत छथि‍ मुदा जौं पूर्ण रूपसँ बाल साहि‍त्‍यक रचनाक गणना कएल जाए तँ जीवकांत जी सन मात्र कि‍छु साहि‍त्‍यकार छथि‍ जि‍नक लेखनी एहि‍ दि‍शामे क्रि‍याशील रहल। जखन की बाल साहि‍त्‍य जौं परि‍मार्जित नहि‍ हएत तँ ि‍नकट भवि‍ष्‍यमे मातृभाषाक स्‍वरूप वि‍गलि‍त भऽ सकैत अछि‍। एहि‍ दि‍शामे गजेन्‍द्र जीक प्रयाससँ कृतज्ञ होएबाक चाही जे कुरूक्षेत्रम अन्‍तर्मनक सातो खण्‍डमे सभसँ नीक खण्‍ड बाल मंडली। कि‍शोर जगतपर अपन लेखनीकेँ हाथसँ नहि‍ हृदयसँ लि‍खलन्‍हि‍। एहि‍ खण्‍डमे दू गोट बाल नाटक तैइस गोट बाल कथा, वर्णमाला शि‍क्षा आ एक सएसँ ऊपर बाल कवि‍ता देल गेल अछि‍। सभ बि‍म्‍वकेँ केन्‍द्रि‍त करैत लि‍खल गेल रचना सभक भाषा अत्‍यन्‍त सरल अछि‍। नेना-भुटकाकेँ एहने रचना चाही। जौं तत्‍सम मे बाल साहि‍त्‍य लि‍खल जाए तँ ओकर कोन प्रयोजन? कवि‍ता सभ तँ खूब नीक मानल जा सकैत अछि‍- आइ छुट्टी काल्हि‍ छुट्टी घूमब फि‍रब जाएब गाम......। बाल बोधक लेल अलंकारसँ बेसी मनक चंचलता उपयोगी होइत छैक तँए एहि‍ खण्‍डकेँ आलोचनात्‍मक स्‍वरूपसँ देखब उचि‍त नहि‍। नि‍ष्‍कर्ष-  सात खण्‍डमे वि‍भक्‍त एहि‍ पोथीमे साहि‍त्‍यक समग्र रसक स्‍वादन करएबाक प्रयास कएल गेल। मुदा एकर सभसँ पैघ नकारात्‍मक स्‍वरूप जे एकरा की मानल जाए? भऽ सकैत अछि‍ सभ धाराकेँ छूबि‍ गजेन्‍द्र जी मैथि‍ली साहि‍त्‍यमे एकटा नव रूपक धारा केन्‍द्रि‍त करए चाहैत होथि‍। एकटा पोथीमे प्रबन्‍ध, समालोचना, उपन्‍यास, गल्‍प, कवि‍ता संग्रह, महाकाव्‍यक संग-संग बाल साहि‍त्‍य पोथीकेँ वि‍शाल बना देलक। भऽ सकैत अछि‍ समीक्षक लोकनि‍क संग-संग ि‍कछु पाठककेँ नीक नहि‍ लागनि‍ मुदा हम एहि‍ प्रकारक प्रयोगक स्‍वागत करब उचि‍त बूझैत छी। ओना पाठकक सुवि‍धाक लेल अलग-अलग सेहो प्रकाशि‍त कएल गेल अछि‍। सभसँ बेसी प्रकाशक धन्‍यवादक पात्र छथि‍ जे एतेक वि‍शाल पोथीक नीक रूपेँ आ सम्‍यक् मूल्‍यमे प्रकाशन कएलन्‍हि‍। भाषा सम्‍पादन सेहो नीक लागल, शाब्‍दि‍क आ व्‍याकरणीय अशुद्धता अत्‍यन्‍त न्‍यून अछि‍। पाेथीक नाओ- कुरूक्षेत्रम् अन्‍तर्मनक लेखक- गजेन्‍द्र ठाकुर ३ समीक्षा गोनू झा आ आन मैथि‍ली चि‍त्रकथा कि‍छु अर्थमे सन् 2008-2009केँ मैथि‍ली साहि‍त्‍यक वि‍कासक लेल क्रांति‍काल मानल जा सकैत अछि‍। सन् 2008ई.मे मैथि‍ली साहि‍त्‍यमे एक गोट बाल साहि‍त्‍यक रचना मैथि‍लीक प्रवीण समीक्षक श्री तारानंद वि‍योगी जी कएलनि‍ पोथि‍क नाओ- ई भेटल तँ की भेटल। साहि‍त्‍य अकादमी द्वारा नव सृजि‍त बाल साहि‍त्‍य पुरस्‍कारसँ एहि‍ पोथीकेँ पुरस्‍कृत कएल गेल अछि‍। जौं कि‍छु बर्ख पूर्वमे साहि‍त्‍य अकादमी एहि‍ पुरस्‍कारकेँ स्‍थापि‍त करि‍तए तँ भऽ सकैत छल जे मैथि‍लीक स्‍थान रि‍क्‍त रहि‍ताए कि‍एक तँ कोनो-कोनो वर्षमे मैथि‍ली साहि‍त्‍यमे बाल साहि‍त्‍यक रचना भेले नहि‍ छल। सन 2009ई.मे मैथि‍लीमे कोनो महि‍ला रचनाकार द्वारा पहि‍ल नाटक लि‍खल गेल। रचनाकार छथि‍ मैथि‍लीक प्रसि‍द्ध साहि‍त्‍यकार श्रीमती वि‍भा रानी आ नाटकक नाओ- भाग रौ आ बलचन्‍दा। हर्खक गप्‍प जे एहि‍ नाटकमे बाल आ नारी मनोवि‍ज्ञानकेँ बि‍म्‍वि‍त कएल गेल अछि‍। ओना तँ श्रीमती इलारानी सि‍ंह सेहो नाटक लि‍खने छथि‍ मुदा ओ सृजनात्‍मक नहि‍ भऽ कऽ अनुदि‍त अछि‍। तँए श्रीमती वि‍भारानीकेँ मैथि‍ली साहि‍त्‍यक पहि‍ल महि‍ला नाटककार मानल जा सकैत अछि‍। ओना श्रीमती उषा कि‍रण खान लि‍खि‍त भुसकौल वाला पहि‍ने छपल। क्रांति‍क दीप कोनो योजना बना कऽ नहि‍ जाराओल सकैत अछि‍। एकर प्रत्‍यक्ष प्रमाण मैथि‍लीमे पहि‍ल चि‍त्रकथा- गोनू झा आ आन मैथि‍ली चि‍त्रकथा प्रस्‍तुत करैत अछि‍। एहि‍ चि‍त्रकथाक सृजन श्रीमती प्रीति‍ ठाकुर कएलनि‍। प्रीति‍ जीक नाओ एहि‍ चि‍त्रकथाक लेखनसँ पूर्व कोनो साहि‍त्‍य वा चि‍त्रांकनमे झॉपल जकाँ छल। पहि‍लुक रचना आ ओहो मैथि‍ली साहि‍त्‍यक लेल आदि‍ वि‍षय मूलक। भारतीय संवि‍धानक आठम अनुसूचीमे रहि‍तहुँ हम सभ कतहु-कतहु गुम्‍म छलहुँ। प्रवर भाषा समूहक भाषा मैथि‍लीमे कि‍छु रचनाक वर्ग अछूत छल। आश्‍चर्य लागल संगे वि‍स्‍मि‍त भेलहुँ जे हमरा समाजक एकटा महि‍ला एहि‍ नवल वि‍षयपर कोना केन्‍द्रि‍त भऽ गेली? एहि‍ चि‍त्रकथामे सम्‍पूर्ण मि‍थि‍लाक संस्‍कृति‍केँ बि‍म्‍वि‍त करैत जनश्रुि‍त आ ऐति‍हासि‍क कथाक 16गोट खंडपर चि‍त्रकथा प्रस्‍तुत कएल गेल। पहि‍ल नौ गोट कथा गोनू झाक करनीपर लि‍खल गेल अछि‍। गोनू झा कोनो अनचि‍नहार नाअेा नहि‍। मुगल दरवारमे जे स्‍थान वीरबलकेँ भेटल अछि‍ मि‍थि‍लाक बाक्-पटुमे ओ स्‍थान गोनू झाकेँ देल गेल। गोनू वि‍दूषक छलाह मुदा ककरो महि‍मामंडि‍त मात्र करए बला वि‍दूषक नहि‍। अपन बुद्धि‍ आ चातुर्यसँ ककरो ि‍वस्‍मि‍त करबाक कारणेँ हि‍नक कोनो जोड़ नहि‍। दुर्भाग्‍य जे गोनू मैथि‍ल छलाह जौं अंग्रेज वा कोनो आन पाश्‍चात्‍य देशक रहि‍तथि‍ तँ वीरबलसँ हि‍नक तुलना नहि‍ भऽ कऽ बीरवलक तुलना हि‍नकासँ कएल जाइत। हि‍नक ई दुर्भाग्‍य हमरा सबहक लेल सौभाग्‍य भेल जे एहि‍ मि‍थि‍लाक भूमि‍पर महाकवि‍ वि‍द्यापति‍, गोनू आ राजा सलहेस सन महामानवसँ हमरा सभकेँ आन लोक जनैत अछि‍। एहि‍ पोथीमे संकलि‍त पहि‍ल चि‍त्रकथा गोनूझा आ मॉ दुर्गाजीसँ गोनू झाक बौद्धि‍क साक्षात्‍कारक चर्च कएल गेल अि‍छ। एहि‍ कथाकेँ तँ ऐति‍हासि‍क मान्‍यता नहि‍ देल जा सकैत अछि‍ कि‍एक तँ इति‍हास आ वि‍ज्ञानमे भगवान मात्र प्रकृति‍स्‍थ होइत छथि‍, कोनो वैधानि‍क नहि‍। मुदा जौं भावक शतदलक संग देखल जाए तँ नेना-भुटका लेल ई प्रश्‍नसँ भरल कथा जि‍ज्ञासा अवश्‍य उत्‍पन्न कराएत जाहि‍सँ अंतत: मैथि‍ली साहि‍त्‍य आ भाखाक लेल लाभ स्‍वाभावि‍क मानल जा सकैछ। चि‍त्रक स्‍तर तँ नीक, रंग-नीक प्रदर्शन नीक मुदा सि‍ंहक चि‍त्र वि‍लाड़ि‍ जकाँ लागल। कोनो राजदरबार हुअए वा कोनो पि‍तृ आ देव कर्मक स्‍थल, ब्राह्मणक संग-संग ठाकुर अर्थात हजामक भूमि‍का आन लोकसँ बेसी मानल जाइत अि‍छ। “गोनू झा आ स्‍वर्गकथा‍”मे एकटा ठाकुर गोनूकेँ पछाड़ए चाहैत छथि‍ मुदा स्‍वयं चि‍त्त। छोट चि‍त्रकथामे नीक चुटुक्का जकाँ प्रस्‍तुति‍। गोनू झासँ संबंधि‍त आन सात गोट कथा सेहो चोहटगर देल गेल अछि‍। जनश्रुति‍क आधारपर लि‍खल गेल कथा सभ मात्र बालमनोवि‍ज्ञानक सेहंति‍त छायाचि‍त्र प्रस्‍तुत करैत अछि‍ कि‍एक तँ लि‍खलो मात्र नेना भुटकाक लेल गेल अि‍छ। रेशमा चूहड़मल कथा ऐति‍हासि‍क कथा थि‍क। भऽ सकैत अछि‍ आर्यावर्त्तक इति‍हासकार एकरा मान्‍यता नहि‍ देथु मुदा मि‍थि‍लाक गाम-गाममे चर्चित अछि‍। दूधवंशी जाति‍सँ यदुवंशक तादात्‍म्‍य होइत छैक मुदा एहि‍ साहि‍त्‍यक चूहड़मल दुग्‍धवंशी दुसाध छथि‍ आ नायि‍का रेशमा भूमि‍हार ब्राह्मण। नीक लागल जे मोकामाघाटक कथाक सृजन करवामे पूर्णियाक वणि‍ता आ मधुबनीक पुत्रवधूकेँ कोनो संकोच नहि‍ भेलनि‍। सि‍नेहकेँ समाजक जातीय व्‍यवस्‍थामे पददलि‍त करवाक दृष्‍टि‍कोणकेँ एहि‍ चि‍त्रकथामे तोड़ल गेल अि‍छ। नैका बनि‍जारा कथापर डॉ. मणि‍पद्म जीक लेखनी मैथि‍लीमे सन 1973ई.मे फुजि‍ गेल अछि‍ तँए एहि‍ कथासँ लोकजन सभ नि‍श्‍चि‍त परि‍चि‍त छथि‍। प्रवेशि‍का स्‍तरपर मणि‍पद्म जीक ई कथा मैथि‍लीमे देल गेल छल। एहि‍ पोथीमे सरल भाषा आ बालोनुरागी चि‍त्रांकन नीक लगैत अछि‍। भगता जोगि‍न पॅजि‍यारक चि‍त्रांकन सेहो नीक रूपेँ बि‍म्‍वि‍त कएल गेल अछि‍। प्राचीन जनश्रुति‍क लुप्‍त कथा महुआ घटवारि‍न आ छेछन महाराज पढ़ि‍ आ एकर चि‍त्रांकन देखि‍ नवका पि‍रहीक नेना भुटका सभ नि‍श्‍चि‍त रूपसँ मि‍थि‍लाक संस्‍कृति‍क कोखि‍मे प्रवेश करवाक प्रयास करतथि‍। राजा सलहेस सन चराचर चर्चित वि‍षय वस्‍तुक छायांकन आ कालि‍दासकेँ मि‍थि‍लाक संस्‍कारसँ संबंधक प्रदर्शन मनोवांक्षि‍त लागल। नि‍ष्‍कर्षत: प्रीति‍ जीक नव प्रयास नवल सोच आ बहुआयामी वि‍षय वस्‍तुक प्रस्‍तुति‍ सराहनीय अछि‍। मैैथि‍ली साहि‍त्‍यमे नव प्रकारक रचना थि‍क गोनू आ आन चि‍त्रकथा तँए सम्‍यक समीक्षा करब हम उचि‍त बुझैत छी। श्रुति‍ प्रकाशनक समग्र दल धन्‍यवादक पात्र छथि‍ जे मैि‍थलीमे जौं पहि‍ल चि‍त्रकथाक नाअो- गोनू आ आन मैथि‍ली चि‍त्रकथा अछि‍ तँ प्रकाशक श्रुति‍ प्रकाशन। ४ समीक्षा बि‍न वाती दीप जरय साहि‍त्‍यक वि‍कास तँ काव्‍यक वि‍वि‍ध श्रेणीक संग-संग गद्यक कांति‍सँ होइत अछि‍ मुदा भाषाक वि‍कास तखने संभव भऽ सकैछ जखन ओहि‍मे रसक सेहंति‍त सुगंध हुअए। रसास्‍वादनक लेल वैरागी साहि‍त्‍यकार सेहो कखनो-कखनो गीत लि‍खए लगैत छथि‍ कि‍एक तँ गीत मानवकेँ पारि‍वारि‍क जीवनमे समाहि‍त वि‍वि‍ध समस्‍यासँ क्षणि‍क मुक्‍ति‍क लेल ति‍लकोर नहि‍ तँ चटनीक काज अवश्‍य करैत अछि‍। मैथि‍ली साहि‍त्‍यमे कि‍छु गीतकार एहेन भेल छथि‍ जनि‍क लेखन कलाक समुचि‍त वि‍वेचन नहि‍ भऽ सकल, कि‍एक तँ ओ सभ गीतकार संग-संग गायक वा मंच उद्धोषक सेहो रहलाह तँए समीक्षक लोकनि‍क दृष्‍टि‍मे हुनक प्रति‍भा मात्र गबैया जकाँ रहि‍ गेल। जखन की जे श्रोता वा पाठक हुनका सबहक गीतक आनंद उठौने छथि‍, वएह व्‍याख्‍या कऽ सकैत छथि‍ जे हि‍नका लोकनि‍क गीतसँ मि‍थि‍ला-मैथि‍लीकेँ की-की भेटल? एहि‍ गीत गगनक चन्‍द्र-तरेगनक समूहमे रवीन्‍द्र नाथ ठाकुर, नवलजी, सि‍याराम झा सरस, चन्‍द्रभानु सि‍ंह, कमलाकांत, कालीकान्‍त झा बूच'क संग-संग डॉ. नरेश कुमार वि‍कल जीक नाओ देल जा सकैत अछि‍। आन ऊपर लि‍खि‍त गीतकार जकाँ वि‍कल जीक गीतमे कतहु फूहड़ वा अभद्र भाषाक प्रयोग नहि‍। श्रंृगार, वि‍रह, हास्‍य, अर्थनीति‍, बाल साहि‍त्‍य आ गजल सन बहुआयामी गीतक वि‍धामे वि‍कल जी सि‍द्धस्‍त छथि‍। शुद्ध देशज वा देसि‍ल वयनामे लोकधुनकेँ स्‍पर्श करैत हि‍नक गीत संग्रह- बि‍न वाती दीप जरय- सन् 2001ई.मे प्रकाशन संस्‍थान नई दि‍ल्‍लीसँ प्रकाशि‍त भेल। ओना तँ एहि‍ पोथीक आमुखमे डॉ. हरि‍वंश तरूण जी एकरा काव्‍य कृति‍ लिखने छथि‍ मुदा वास्‍तवमे ई गीत संग्रह थि‍क। सभ प्रकारक सुवासि‍त गंधक संग-संग करूणा, वेदना, समाजक वि‍षय दशाकेँ गीतक बि‍म्‍वमे सरि‍या कऽ वि‍कल जी 51गोट गीतकेँ पोथीक रूप देने छथि‍। प्रथमं ग्रासे मक्षि‍का पात्रम' सभसँ पहि‍लुक गीत वेदनासँ ओत-प्रोत नीक लागल। पहि‍ल पद्य 'चुमलहुँ सभ दि‍नकाँट'क बि‍म्‍व वि‍चार मूलक अछि‍, छंद आरोही आ धुन लोक धुन संग-संग गेय। संग्रहक अंति‍म पद्य वसंंत मुदा पहि‍ल वेदना। भऽ सकैत अछि‍ अपन व्‍यथि‍त रूपकेँ प्रथमत: ज्‍वलि‍त कऽ शनै-शनै: रसक क्षीर सागरमे पाठककेँ सरोबरि‍ करवाक हि‍नक योजना हुअए मुदा हमरा मतेँ एहि‍ गीत संग्रहक पहि‍ल गीत आनंदि‍त करैबला होएवाक चाही। दोसर गीत- सूखल स्‍नेहक स्‍त्रोत' सेहो करूण रससँ भल अछि‍। अन्‍तर्मन अतृप्‍त ज्‍वार सभ सरि‍त स्‍त्रोत केर बात कहाँ श्‍याम सघन घन घुमड़ि‍ रहल थि‍क, होइछ मुदा बरसात कहाँ! गीतकार कोन पीड़ासँ उद्वेलि‍त मुदा गुम्‍म छथि‍? पद्यसँ स्‍पष्‍ट होइत अछि‍ जे ओ अत्‍यन्‍त भावुक छथि‍। कहलो गेल अछि‍ गद्यकार अपन जीवनक रूपकेँ झॉि‍प सकैत छथि‍ मुदा कवि‍ नहि‍। कवि‍क कवि‍ता हुअए वा गीत प्रबुद्ध पाठक कवि‍क मन उद्वेग आ हृदय जुआरि‍केँ हुनक पद्यमे स्‍पष्‍ट ध्‍वनि‍त सुनि‍ सकैत छथि‍। झरकि‍ रहल मन' आ उसठल फागमे सेहो वेदनाक ध्‍वनि‍ मार्मिक अछि‍ मुदा कलुषि‍त नहि‍। दोहा गीत'मे गीतकारक वेदना स्‍वयंसँ उपटि‍कऽ समाजक आ देशक कालगति‍क आड़ि‍मे परि‍वर्तित मानसि‍कताकेँ स्‍पष्‍ट करैत अछि‍- उड़न खटोला खाट बनि‍, रहल भूमि‍पर सूति‍। सत्ते कहय जे कालपर, चलयने ककरो जूति‍। 'उनटा वसात' शीर्षक पद्यमे बि‍म्‍व वि‍श्‍लेषण तँ नीक बुझना जाइछ मुदा शीर्षक कनेक अनसोहांत लागल। बसात कखनहुँ उनटा नहि‍ बहैत अछि‍, मनुक्‍खक व्‍यक्‍ति‍गत जीवनमे सुख: दुखक उद्भव आ इति‍श्री इहलौकि‍क होइछ मुदा बसात तँ शास्‍वत छथि‍ तँए अपन व्‍यैक्‍ति‍क दु:खक दोष प्रकृति‍पर नहि‍ देवाक चाही मुदा कविक मन मार्मिक आ चंचल होइछ आ संग-संग वि‍कल जी आशु कवि‍ छथि‍ तँए हि‍नक दोषारोपणक भाव क्षम्‍य। एहि‍ पद्यक पाॅति‍-पॉति‍मे स्‍वातीक बूनक आशमे ि‍सतुआक टकटकी तृप्‍ति‍क ज्‍वार बड़ नीक लागल- पुरैनक पातपर छी ओंघराएल ने तन सुगबुगायल ने मन उजबुजाएल। 'अगि‍आयल सख सेहन्‍ता, मोनक पीर नीर बनि‍ आएल, नोर सनल जि‍नगी सबहक बि‍म्‍व सामान्‍य लागल। अोना तँ गीत-गजलमे बि‍म्‍वक प्रधानता नहि‍ होइत अछि‍ कि‍एक तँ ध्‍वनि‍, राग आ छन्‍दक समंजनमे रचनाकार बान्‍हल रहैत छथि‍ तँए सुधि‍ प्रभंजि‍त होएबाक संभावना अधि‍क। एहि‍ संग्रहमे दूटा बसंत गीत देल गेल मुदा दुनू नीक मानल जा सकैत अछि‍। पहि‍ल बसंत गीतमे व्‍यथाक पराभवसँ सि‍नेह नि‍कसैत अछि‍ तँ दोसरमे सुखक दुग्‍धमे अमृतक बून्न स्‍वत: टपकि‍ रहल। वास्‍तवमे पद्यक रूप एहि‍ प्रकारक होएबाक चाही। एहि‍ संग्रहमे जे सभसँ नीक गीत देल गेल अछि‍ ओ थि‍क- प्रोषि‍त पति‍का'। दू तीन बेरि‍ समस्‍तीपुरमे वि‍वि‍ध काव्‍य संध्‍यामे वि‍कलजीक मुखसँ एहि‍ गीतक गायन सुनने छलहुँ। सन 2001ई.मे समस्‍तीपुरमे साहि‍त्‍य अकादेमी द्वारा आयोजि‍त- काव्‍यसंध्‍या'मे ई गीत बड़ लोकप्रि‍य भेल छल- पहुना कहुना कऽ चलि‍ आउ अपन गाम। आव ने रहि‍ गेलै तेहन आसाम। एहि‍ गीतक माध्‍यमसँ गीतकार पलायनवादक प्रबल वि‍रोध करैत छथि‍। अप्‍पन घरक नोन-रोटी आन ठामक मलपूआसँ बेसी नीक कि‍एक तँ आन लोक हमरा सबहक व्‍यथाकेँ नहि‍ बूझैत छथि‍। जाहि‍ कालमे वि‍कल जी एहि‍ गीतक रचना कएने छलाह ओहि‍ काल आसाममे बि‍हारी लोक सभकेँ बहुत पीड़ि‍त कएल जाइत छल। ओना तँ एखनो स्‍थि‍ति‍ वएह आब तँ महाराष्‍ट्रमे सहो स्‍थि‍ति‍ भयावह भऽ गेल अछि‍। तँए एहि‍ प्रसंगमे 'प्रोषि‍त पति‍का' गीतक महत्‍वकेँ नजरअंदाज नहि‍ कएल जा सकैत अछि‍। समाजमे पसरल व्‍यभि‍चार, भ्रष्‍टाचारपर आशुगीतकारक लेखनी अनायास नहि‍ टपकल, सहैत-सहैत देशकालक दशापर अंतत: 'छद्मबेशी' शीर्षक कवि‍ता लि‍खि‍ अपन गीतकेँ नवल सोचसँ पुलकि‍त कऽ देलनि‍- असल रूप परदा केर भीतर सभ परदा रंगीन छै देखबामे अछि‍ चि‍क्कन चुनमुन करनी नम्‍वर तीन छै। देशकालक घोघटकेँ उघारैत समाजक कलुषि‍त रूपपर कि‍छु पद्य जेना अपन गणतंत्र, लतरि‍ रहल वि‍द्रोहक लत्ती, नव प्रभात, राखूबचा हि‍मालय, दि‍ल्‍ली कने सुनू आ न्‍यूनतम मजदुरी पद्यक बि‍म्‍व आ वि‍वेचन दुनू नीक मानल जा सकैछ। समाजक दशापर कवि‍ता लि‍खल जा सकैत अछि‍ गीतक बि‍म्‍व दुष्‍कर तँए एहि‍ सभ पद्यकेँ पूर्णत: गीत नहि‍ मानल जाए। मुदा छंदक मात्रा संतुलि‍त तँए गेय भऽ सकैछ। एहि‍ पोथीमे चारि‍ गोट गजल सेहो देल गेल अछि‍। मैथि‍ली पद्य वि‍धामे हैकू आ गजल लेखनक अभाव जकाँ अछि‍। तँए एहि‍ सभ गजल केर महत्‍वकेँ नकारि‍ नहि‍ सकैत छी- पसारल छैक परतीमे हमर पथार सन जि‍नगी, कहू हम लऽ कऽ की करवै एहन उधार सन जि‍नगी... उपर्युक्‍त गजलक संग-संग आन दूटा गजलकेँ नीक कहल जा सकैछ। गजलक पॉति‍-पॉति‍मे अलग-अलग बि‍म्‍व होइत अछि‍ तँए एकरा शीर्षकसँ आबद्ध करव असंभव आ अनुपयुक्‍त। एकटा गजल मूलत: गीत मानल जा सकैत अछि‍ कि‍एक तँ एक्के पॉति‍क बेर-बेरि‍ प्रयोग कएल गेल। एकरा गजल नहि‍ मानल जाए। ि‍वकल जी गायक सेहो छथि‍, एहेन चूकि‍ कोनो भऽ गेलनि‍। तन भि‍जा कऽ मन जराबय, आबि‍ गेल साओन केर दि‍न वि‍रह वेदन तान गाबय, ‍        आबि‍ गेल साअोन केर दि‍न खोलि‍ कऽ बरसात अप्‍पन वस्‍त्र फेंकल सूर्यपर चानकेँ सेहो लजाबय, आबि‍ गेल साओन केर दि‍न....।। उपर्युक गीतकेँ गजलक रूप देबाक प्रयास कएल गेल मुदा सीमाक उल्‍लंघन कएल गेल तँए ई गीत अछि‍ गजल नहि‍। 'व्‍यथि‍त हृदय' पद्य, पोथीक शीर्षककेँ स्‍पर्श करैत अछि‍- बाती नेहक जरि‍ ने पावय, खाहे ति‍ल-ति‍ल देह जरय व्‍यथा वेदना उर अंतरमे, दय उपकार करय। एहि‍ प्रकारे सभटा पद्यक अपन-अपन महत्‍व अछि‍। कतहु-कतहु त्रुटि‍ सेहो भेटल। गीतकेँ बि‍म्‍व आ स्‍वरसँ आबद्ध करवाक क्रममे एहेन त्रुटि‍ स्‍वाभावि‍क होइत अछि‍। अपन तरूण जीवनकालसँ वि‍कल जी गीत, कवि‍ताक रचना करैत छथि‍। धन्‍यवादक पात्र छथि‍ जे एखन धरि‍ नीति‍क संग-संग श्रंृगार आ छोहसँ भीजल रचना पाठक धरि‍ पसारैत रहलाह। पूर्ण तँ केओ नहि‍ भऽ सकैत अछि‍, जखन पूनमक चानमे सेहो दाग तँ त्रुटि‍ ककरोमे भऽ सकैत अछि‍। रचनाक बि‍म्‍वमे कतहु-कतहु कमी भेटल मुदा रचनाकार अपन भावकेँ मैथि‍लीक प्रति‍ श्रद्धेय रखलनि‍ तँए एहि‍ त्रुटि‍क व्‍यापक वि‍वेचन करब प्रासंगि‍क नहि‍। नि‍श्‍चि‍त रूपसँ एहि‍ पद्य संग्रहमे मि‍थि‍ला मैथि‍ली संस्‍कृति‍क ध्‍वनि‍क संग-संग लोकधुन दष्‍टव्‍य मानल जाए। पद्य संग्रहक शीर्षक- वि‍नु वाती दीप जरय'मे रीति‍कालक पद्यक रूप झलकैत अछि‍। वास्‍तवमे जेना ि‍नर्वातमे ध्‍वनि‍क गमन संभव नहि‍ तहि‍ना बि‍नु वातीक दीपकक कल्‍पनो अवांछि‍त मुदा कवि‍क दृष्‍टकोण रीति‍क प्रयोगात्‍मक अवलम्‍वन तँए एना संभव भऽ सकल। पोथीक नाओ- वि‍नु वाती दीप जरय रचनाकार- डॉ. नरेश कुमार वि‍कल प्रकाशक- प्रकाशन संस्‍थान नई दि‍ल्‍ली मूल्‍य- 80टाका मात्र प्रकाशन वर्ष- ५ समीक्षा तरेगन वर्त्तमान युगक मानव-जीवन “अर्थनीति‍‍”क उक्‍खड़ि‍मे तेना कऽ पि‍सा रहल अछि‍ जे गॉधी आ लेलि‍नक सि‍द्धान्‍त मटि‍यामेट भऽ गेल। नीि‍त आ धर्मक गप्‍प केनि‍हार लोक अति‍वादी आ कर्महीन मानल जाइत छथि‍। एहि‍ भागमभाग भरल जीवनमे “साहि‍त्‍य‍” सन शब्‍द हास्‍यास्‍पद जकाँ बुझा रहल। स्‍वाभावि‍के छैक, बि‍नु दाम सभ सुन्न! एहि‍ परि‍स्‍थि‍ति‍मे साहि‍त्‍यि‍क अवधारणा सेहो बदलि‍ रहल अछि‍। आब महाकाव्‍य पढ़नि‍हार लोक बड़ अल्‍प छथि‍ कि‍एक तँ सबहक जीवनमे समयाभाव छैक। हमहूँ एहि‍ गप्‍पकेँ मध्‍यकालि‍क राति‍मे लि‍ख रहल छी, कि‍एक तँ दि‍नमे लि‍खब तँ खाएव की? एहि‍ सभ कारणसँ लघुकथा आ लघुकवि‍ताक अनि‍वार्यता प्रतीत भऽ रहल। साहि‍त्‍य समागममे लघुकथाक स्‍थान बड़ महत्‍वपूर्ण मानल जाइछ। मैथि‍लीमे एखन धरि‍ परंपरा जकाँ रहल जे छोट कथा चाहे ओ वि‍म्‍वि‍त हुअए वा नहि‍ “लघुकथा‍” थि‍क। कि‍छु साहि‍त्‍यकार मात्र एहि‍ दि‍शामे संकलन कऽ सकलाह। जाहि‍मे मनमोहन झा अग्रगन्‍य छथि‍। तारानंद वि‍योगी जीक लघुकथा संग्रह “शि‍लालेख‍” आ अमरनाथ रचि‍त “क्षणि‍का‍” उत्तम श्रेणीक मैथि‍ली लघुकथा संग्रह अछि‍। मुदा जौं साहि‍त्‍यक सकल अवधारणा वा वि‍धाक वि‍म्‍वि‍त छायाक चर्च कएल जाए तँ श्री जगदीश प्रसाद मंडल लि‍खि‍त लघुकथा संग्रह “तरेगन‍” मैथि‍ली साहि‍त्‍यक प्रथम सम्‍पूर्ण लघुकथा मानल जाएत। एहि‍ पोथीमे एक सय दस लघुकथा देल अछि‍। छोट-छोट ताराकेँ मैथि‍लीमे “तरेगन‍” कहल जाइत अछि‍। राति‍मे चि‍त भऽ कऽ वसुन्‍धरापर लेटि‍ स्‍वतंत्र गगनकेँ दि‍व्‍यदर्शन कएलापर तरेगनक समूह सबहक मध्‍य स्‍थापि‍त संबंधकेँ देखल जा सकैत छैक। लगैत अछि‍ जे एक तरेगन दोसर तारासँ सटल छैक मुदा वि‍ज्ञानक अनुसंधानसँ ई स्‍पष्‍ट भऽ सकल जे अकाशक तरेगनक समूहक बीचक दूरी पृथ्‍वी आ अाकाशक बीचक दूरीसँ बेसी छै। ओहि‍ना एहि‍ कथा संग्रहमे लि‍खि‍त सभटा कथा एक दोसरसँ सटल रहि‍तहुँ एक-दोसरसँ बहुत दूर अछि‍। न्‍याय, कर्म, मीमांसा नीति‍ आ वाल मनोविज्ञान सन बि‍म्‍वकेँ अनचोकेमे जगदीशजी एक संग बान्‍हि‍ देलनि‍। मैथि‍लीमे नैति‍क शि‍क्षाक अभावकेँ तरेगन बहुत हद धरि‍ पूर्ण करवाक प्रयास कएलक। मूल रूपसँ ई संग्रह नेना सबहक लेल लि‍खल गेल अछि‍ मुदा बयसो जौं एहि‍ सि‍द्धान्‍तक अनुपालन करथि‍ तँ समाजक वि‍गलि‍त मनोवृत्ति‍क रूपमे परि‍वर्त्तन अवश्‍यांभावि‍त अछि‍। कोनो पोथीक समीक्षात्‍मक वि‍वरणमे सम्‍पूर्ण रचनाक चि‍त्रण करव अनि‍वार्य नहि‍ मुदा रचनाक समाजमे प्रभावक दर्शन कराएब वांछि‍त होइत छैक। सम्‍पूर्ण पोथीक अवलोकन कएलापर एकरा मात्र नेना-भुटकाक कथा संग्रह नहि‍ मानल जा सकैछ। पहि‍ल कथा -उत्‍थान पतन-मे नीति‍ शि‍क्षा नेना भुटकाक संग-संग गृहस्‍थ धर्मी लोकक लेल प्रेरणादायी लागल। संयम जीवन जीबाक कलासँ धर्म, अर्थ, काम आ मोक्षक अवलंबन सहज होइत अछि‍। -प्रति‍भा- लघुकथामे डॉ. राममनोहर लोहि‍याक माध्‍यमसँ जगदीश जी ज्ञान आ समयक मध्‍य तारतम्‍य स्‍थापि‍त करवाक प्रयास कएलनि‍। एहि‍ कथाकेँ मौलि‍क रचना (Creative writing) नहि‍ मानल जा सकैत अछि‍, कि‍एत तँ कोनो महापुरूषक जीवन शैलीक चर्च कोनो पोथी पढ़ि‍ कऽ कएल गेल अछि‍। मुदा नीक लागल जे जगदीश बावू साम्‍यवादी प्रवृत्ति‍क मनुक्‍ख छथि‍ आ लोहि‍या समाजवादी छलाह। ओना तँ समाजवादेसँ साम्‍यवादी धाराक परि‍कल्‍पना कएल जा सकैछ, परंच सैद्धान्‍ति‍क रूपसँ भारत वर्षमे दुहू राजनैति‍क धारामे वि‍लग नीति‍ अछि‍। अपन अध्‍ययनशीलतासँ सम्‍पूर्ण मानव जाति‍केँ एकसूत्रमे बँधवाक जगदीश जी प्रयास कऽ रहल छथि‍। मर्म‍ कथाक बि‍म्‍व पढ़लासँ स्‍वामी वि‍वेकानंदक सरल राजयोगक सि‍द्धान्‍तक दर्शन होइत अछि‍। हेलैक कलासँ सांसारि‍क जीवन जीवाक तुलना, वैभवक कुप्रावक छोट मुदा वि‍शेषार्थ प्रस्‍तुति‍ नीति‍ अनुपालनमे सफल प्रयास कहल जाए। अज्ञ नीक नहि‍ तँ खराब सेहो नहि‍, सर्वज्ञ कि‍ओ नहि‍ भऽ सकैत अछि‍ बहुज्ञ समाजक पथ प्रदर्शक परंच अल्‍पज्ञ जकरा देसि‍ल वयनामे “अधखड़ुआ‍” कहल जाइत अछि‍ ओ समाजक वि‍कासमे वाधक होइत छथि‍। अंग्रेजी साहि‍त्‍यक प्रखर हास्‍य रचनाकार सर एलेक्‍जेंडर पोप सेहो कहने छथि‍- little knowledge is a dangerous thing. अर्थात अर्द्धज्ञान बड़ खतरनाक वस्‍तु होइत छैक। -पहि‍ने तप तखन ढलि‍हेँ- शीर्षक लघुकथामे कुम्‍हारक आचार्य रूपक आ माटि‍केँ शि‍ष्‍य मानि‍ नैति‍क वि‍श्‍लेषण नीक लागल। नीति‍-धर्म आ शैक्षणि‍क दर्शनसँ भरल दोहासँ एहि‍ कथाक तुलना अपेक्षि‍त भऽ सकैछ- गुरूवार कुम्‍हार शि‍श कुम्‍ह है, गढ़ि‍-गढ़ि‍ काढ़े खोट अंतर हाथ सहार दे, बाहर मारे चोट। एहि‍ प्रसंगमे ज्ञानपीठ पुरस्‍कारसँ पुरस्‍कृत हि‍न्‍दी साहि‍त्‍यक प्रांजल कवि‍ श्री नरेश मेहताक कवि‍ता -मृत्ति‍का-क चर्च करव अनुकूल लागल। नरेश जीक रचनाक अनुसार माटि‍ कहैत छथि‍- हम तँ मात्र माटि‍ छी, जखन अहाँ अपन चरणसँ पददलि‍त करैत छी आ हऽरक फाढ़सँ चीड़ दैत छी तखन हमरामे मातृत्‍वक वोध होइत अछि‍ आ मातृत्‍वक प्रेरणा आ संसर्गसँ शस्‍य श्‍यामला धन धान्‍य अन्न हरि‍यरीक रूपेँ संसारकेँ जीवन प्रदान करैत अछि‍।' कर्मपथपर क्रि‍याशील मनुक्‍खक लेल कालक आ प्रहरक कोनो बान्‍ह नहि‍ होइत छैक। -जखने जागी तखने परात- शीर्षक लघुकथामे डॉ. क्रोनि‍नक जीवन दर्शनक माध्‍यमसँ रचनाकार नेना-भुटकामे काकचेष्‍टा आ श्‍वान नि‍द्राक झॉपल दर्शन करएवाक लेल आतुर छथि‍। जे व्‍यक्‍ति‍ सत्‍य कर्मी होइत छथि‍ ओ सदि‍खन सत्‍यकेँ जि‍तएबाक लेल प्रयास करैत छथि‍। महाभारतक कथाक गर्भसँ एहेन कालजयी बि‍म्‍वकेँ नि‍कालि‍ कऽ -उग्रधारा- कथाक रूप देवाक कलासँ जगदीश जीकेँ हंस मानल जा सकैत अछि‍। जेना हंस नीर दुग्‍ध मि‍श्रणमे सँ क्षीरकेँ सोंटि‍ लैत अछि‍ आ नीर पात्रेमे रहि‍ जाइछ ठीक ओहि‍ना महा भारतक सम्‍पूर्ण कथा बि‍म्‍वकेँ नीर, अमि‍य आ मधु मानल नहि‍ जा सकैत अछि‍। अर्जुनकेँ वि‍जयी बनएवाक लेल श्रीकृष्‍ण अपन पांजरपर हनुमानक अगम देह भारकेँ रोकि‍ “भारत‍”केँ वि‍जयी बनौलनि‍। ई कथा छात्रक संग-संग शि‍क्षकक लेल अनुकरणीय अछि‍। व्‍यवहारि‍क, समर्पण, देवता, पाप आ पुण्‍य शीर्षक कथामे उदयनाचार्यक न्‍याय कुसुमांजलि‍क क्षणि‍क स्‍पर्शक अनुभव बुझना गेल। अढ़ाइ आखरक शब्‍द प्रेमक रूप वास्‍तवि‍क जीवनमे अर्थनीति‍क आहि‍मे अप्रासंगि‍क भऽ गेल हुअए मुदा रचनामे एखन धरि‍ जीवि‍त अछि‍। हि‍न्‍दी साहि‍त्‍यमे प्रेमचन्‍द्र रचि‍त कथा ईदगाह, नागार्जुन रचि‍त कवि‍ता गुलाबी चूड़ि‍याँ आ माखनलाल चतुर्वेदी रचि‍त कवि‍ता प्रेमकेँ पढ़ि‍ कऽ ति‍रपि‍त होइत तँ छलहुँ परंच हरि‍वंश राय बच्‍चन जीक 'आ रहि‍ रवि‍ की सवारी' अंति‍म पद्य मोन पड़ि‍ते क्षणहि‍ंमे अकुला जाइत छलहुँ जे हि‍न्‍दी वि‍जयी भऽ रहल छथि‍ सूर्यक समान मुदा मैथि‍ली उषाकालक चन्‍द्रमा सन झॅपा रहलीह। जगदीश जीक 'प्रेम' पढ़ि‍ गुमानक अनुभव भऽ रहल अछि‍ जे हमरा सभक भाषामे एहि‍ बि‍म्‍वपर जे कथा लि‍खल गेल अछि‍ ओ कतऽ कतऽ आन भाषामे भेटत, हेरबाक चाही? ओना ई कथा मौलि‍क रचना नहि‍ भऽ कऽ अंग्रजीक प्रख्‍यात लेखक ओ.हेनरीक एकटा कथापर आधारि‍त अछि‍। श्रमक सम्‍मान तखन भऽ सकैत अछि‍ जखन श्रमजीवी सम्‍मानि‍त कएल जाइथ। वंश, ति‍याग, सद्वि‍चार, साहस, वरदास्‍त, भूल, धैर्य, मनुष्‍यक मूल्‍य, मेहनतक दरद सन भाववाचक संज्ञाक दर्शन मात्र दार्शनि‍के कऽ सकैत छथि‍ मुदा एहि‍ पोथीमे पाठक सेहो देखि‍ सकैत छथि‍। एकाग्रता छात्र जीवनक धरोहरि‍ होइत अछि‍। भाषण तँ सभ केओ दऽ सकैत छथि‍ मुदा पाॅच पॉति‍ लि‍खबाक कला कतेक लोकमे छनि‍। हमरा वि‍श्‍वास अछि‍ जे 'एकाग्रचि‍त' बि‍म्‍वकेँ रचनाकार पढ़थु मति‍भ्रम दूर भऽ जेतनि‍। अनुभव, सौन्‍दर्य, धर्म आत्‍मबल सन मौन वि‍षयकेँ कथाक रूपमे बि‍म्‍वि‍त करब असंभव तँ नहि‍ मुदा अाश्‍चर्यजनक। समाजमे क्रांति‍क दीप प्रज्‍वलि‍त करवाक लेल नेना-भुटकामे क्रांति‍दीप जराएब आवश्‍यक अछि‍। एहि‍ लेल समाजक कुप्रथाक गर्भावलोकन करएवाक प्रयास प्रासंगि‍क मुदा कतेक रचनाकार मैथि‍ली साहि‍त्‍यमे ई काज कएलनि‍। वि‍धवा वि‍वाह, देश सेवाक ब्रत, नारीक सम्‍मान, सादा जीवन, पत्नीक अधि‍कार, जाति‍ नहि‍ पानि‍ शीर्षक कथा सभकेँ वाल मनोवि‍ज्ञानक मौलि‍क कथा मानल जाए। नि‍ष्‍कर्षत: जीवनकेँ जीवन्‍त बनएवाक लेल जतेक प्रकारक तारत्‍म्‍य होएबाक चाही जगदीश जी ओहि‍ सभ बि‍म्‍वकेँ बि‍म्‍वि‍त कएलनि‍। एहि‍ पोथीमे दर्शनक सभ वि‍धाक सरल भाषामे चि‍त्रण केलनि‍। खटकल तँ मात्र एक अर्थमे जे वाल मनोवि‍ज्ञानक वि‍कास करवाक लेल जे सरस विश्‍लेषण होएवाक चाही ओ एहि‍ पोथीमे नहि‍ देल गेल। गरीबक दीनतामे हास्‍यक समागम सेहो होइत अछि‍। वाल साहि‍त्‍यमे दर्शनक वि‍श्‍लेषणमे कतहु कतहु  रीति‍ आ प्रीति‍केँ हास्‍य रससँ बोरबाक चाही। पंडि‍त हरि‍मोहन झा तँ लघुकथा नहि‍ लि‍खलनि‍ मुदा हुनक जे गद्य साहि‍त्‍य उपलब्‍ध अछि‍ ओहि‍ सभमे दर्शनक बि‍म्‍वपर हास्‍य आ श्रंृगारक माखन चढ़ल भेटैत अछि‍ जगदीश जीक रचना तँ अनुशासि‍त होइत छन्‍हि‍‍ मुदा 'तरेगन'मे वाल मनोवि‍ज्ञानक सरल प्रस्‍तुति‍ करि‍तहुँ कनेक चूकि‍ गेल छथि‍। एक अर्थमे ई पोथी मैथि‍ली साहि‍त्‍यक लेल पथ प्रदर्शक पोथी अछि‍, तँए जगदीश बावू प्रशंसाक पात्र छथि‍। सम्‍पूर्ण पोथीक अर्न्‍तदर्शनक लेल योग्‍य आचार्यक जि‍नकामे अनुशासनक संग-संग संतुलि‍त अनुशीलन हुअए अनि‍वार्यता प्रतीत होइत अछि‍। नि‍ष्‍कर्ष रूपेँ मैथि‍ली भाषा-साहि‍त्‍यमे 'तरेगन'केँ बेछप्‍प नैति‍क शि‍क्षाप्रद रचना मानल जाए। वालकथाक वास्‍तवि‍क रूप अछि‍ जे रचनाकारकेँ प्रश्‍नसँ वेसी समाधानपर ध्‍यान देबाक चाही। एहि‍ पोथीमे सभसँ नीक लागल जे रचनाकार प्रश्‍न ठाढ़े नहि‍ कएलनि‍। पोथीक नाओ- तरेगन वि‍धा- बाल प्रेरक कथा संग्रह रचनाकार- जगदीश प्रसाद मंडल प्रकाशक- श्रुति‍ प्रकाशन, दि‍ल्‍ली पाेथी प्रप्‍ति‍ स्‍थान- पल्‍लवी डि‍स्‍ट्रीब्‍यूटर्स, ि‍नर्मली (सुपौल) प्रकाशन वर्ष- 2010 दाम- 100टाका मात्र ६ समीक्षा- अरि‍पन (कवि‍ता संकलन) मैथि‍ली भाषा साहि‍त्‍यमे कि‍छु एहेन रचनाकारक पदार्पण भेल अछि‍ जनि‍क रचना सभमे बि‍म्‍बक धरातल तँ हरि‍यरीसँ पाटल अछि‍ मुदा हुनक नाओ मि‍थि‍लाक साहि‍त्‍यि‍क पृष्‍ठभूमि‍सँ कात लागल रहल। एहेन रचनाकारक समूहमे सँ एकटा नाअो डॉ. नरेश कुमार ‘वि‍कल’ केर सेहो लेल जा सकैछ। वि‍कल जीक शि‍क्षाक क्षेत्र मैथि‍ली आ राष्‍ट्रभाषा हि‍न्‍दी, रहल मैथि‍लीक प्राध्‍यापक छथि‍, तँए रज-कणमे मातृभाषाक प्रति‍ सि‍नेह स्‍वाभावि‍क। सन पचासमे जन्‍म नेनि‍हार वि‍कल जी अपन गामसँ लऽ कऽ सम्‍पूर्ण समस्‍तीपुर जि‍लामे मि‍थि‍ला मैथि‍लीक लेल संघर्षरत छथि‍। मंच उद्धोषक आ गायक रहबाक संग-संग आशु गीतकार बनि‍ छात्र जीवनसँ लगातार लि‍ख रहल छथि‍। सन् सत्तर-अस्‍सीक मध्‍य मि‍थि‍ला मि‍हि‍रमे हि‍नक कतेक रास कवि‍ता प्रकाशि‍त भेल अछि‍। हि‍नक लि‍खबाक कलाक सभसँ पैघ वि‍शेषता रहल जे मि‍थि‍लाक माटि‍-पानि‍सँ संबंधि‍त रचनाक संग-संग बाल साहि‍त्‍यपर अपन लेखनीक खुलि‍ कऽ प्रयोग कएलनि‍। ओना तँ मैथि‍लीक संग हि‍न्‍दीमे हि‍नक बहुत रास पोथीक प्रकाशन भेल अछि‍, मुदा 'अरि‍पन' हि‍नक प्रथम चर्चित काव्‍य संकलन थि‍क जाहि‍मे 1983ई.सँ पूर्व धरि‍क लि‍खल हि‍नक 45गोट पद्य संकलि‍त अछि‍। एहि‍ पोथीक प्रथम पद्य 'अर्चना'मे एकटा बालकक अपन मातृक प्रति‍ सि‍नेहकेँ बि‍म्‍ब बनाओल गेल अछि‍। 'नि‍ष्‍ठुर करेज तोहर हमहुँ जनै छी'मे अवोधकेँ अपन माएसँ आक्रोश अछि‍। बिम्‍बक वि‍श्‍लेषण सामान्‍य जनभाषामे कएल गेल। 'अपन पान आ मखान' कवि‍तामे पाश्‍चात्‍य संस्‍कृति‍सँ अपन गामक तुलना नीक बुझना जाइत अछि‍। 'वसल मि‍थि‍ला छै सीताक परानमे' काव्‍यक वि‍नोदी प्रवृति‍ की अपन वास्‍तवि‍क अवस्‍थाकेँ झॉपि‍ सकत? एक दि‍श एहि‍ कवि‍तामे मातृभूमि‍केँ सभसँ ऊँच देखएबाक प्रयास तँ दोसर दि‍श 'वसन्‍त उपहार कतऽ अछि‍'मे हृदयमे पछबाक तप्‍त वायुक समावेशमे बसन्‍तक प्रयोजनमे मर्मक दर्शन भेल। एक्के व्‍यक्‍ति‍मे क्षणहि‍ंमे सि‍नेह आ क्षणहि‍ंमे छोह? वास्‍तवि‍क जीवनमे हुअए वा नहि‍ परंच कवि‍क चंचल मनमे एना सभ भऽ सकैत अछि‍। 'नहलापर अछि‍ दहला' शीर्षक कवि‍ता बाल साहि‍त्‍य आ बाल मनोवि‍ज्ञानक मनोहारी दृश्‍य प्रस्‍तुत करैत अछि‍। एहि‍ कवि‍ताक आखर-आखरमे झाॅपल बि‍म्‍बकेँ नेना-भुटका बूझि‍ सकैत छथि‍, कि‍एक तँ भाषा अत्‍यन्‍त सरल। मुदा एहि‍ कवि‍तामे आशुत्‍वक प्रवेशक प्रयास आ स्‍वर सरगमकेँ साक्ष्‍य बनएबाक लेल बि‍म्‍बकेँ वि‍स्‍मि‍त कएल गेल अछि‍। जाहि‍सँ कवि‍ताक स्‍तर कमजोर भऽ गेल। संकलनमे एकटा देल गेल 'गजल' बड़ नीक लागल। गजलकेँ शीर्षकसँ नहि‍ बान्‍हल जा सकैत। मुदा एहि‍ गजलक वि‍शेष मनोरम बि‍न्‍दु अछि‍ जे कवि‍ एकरा एक्के बि‍म्‍बमे बन्‍हबाक सफल प्रयास कएलनि‍। 'संग रहि‍ कऽ ने अहाँ बजै छी कि‍ऐ प्राण वीणाकेँ तारे तोड़ै छी कि‍ऐ? मैथि‍लीमे ओहि‍ काल धरि‍ एहि‍ प्रकारक गजलक अभाव जकाँ छल। देशज भाषामे लि‍खल गेल गजल खूब नीक लागल। 'तोरा लेल' शीर्षक गीतकेँ बाल साहि‍त्‍यपर सामान्‍य प्रस्‍तुति‍ मानल जा सकैत अछि‍ कि‍एक तँ स्‍वर आबद्घ करबाक क्रममे कवि‍ बि‍म्‍बसँ भटकि‍ गेल छथि‍। 'भागि‍ गेल मि‍थि‍लासँ....' शीर्षक कवि‍तामे अपन संस्‍कृति‍पर पाश्‍चात्‍य सभ्‍यताक प्रभावक वर्णन कएल गेल अछि‍ ओ नीक मानल जा सकैछ। ' चि‍हँुकल मन' सपनामे वि‍रह वेदनाकेँ दर्शाबैत अछि‍। एहि‍ संकलनमे देल गेल कवि‍तामे सभसँ नीक कवि‍ता 'कोइली' शीर्षक कवि‍ताकेँ मानल जा सकैछ। ओना तँ 'कोइली'क मधुर स्‍वर कवि‍केँ कटाह लगैत छन्‍हि‍‍, मुदा वास्‍तवमे कोइलीक स्‍वर मि‍थि‍ला-मैथि‍लीक दयनीय दशाक वि‍वेचन मात्र थि‍क। सभ दि‍न सुखमे संग दैत छेँ दु:खमे खाली डोल सन हमरा आब लगैए कोइली बाजव तोहर ओल सन। 'बाजि‍ उठल कंगना'मे श्रंृगारक सेज सुक्‍खल जकाँ बुझना गेल। 'धरतीपर उतरल चान'मे कवि‍ चूड़ामणि‍ मधुपक शब्‍दक झंकार स्‍पष्‍ट देखऽ मे अाएल। 'मलार' शीर्षक गीत मूलत: लोकगीक रूपक बुझना गेल। अभि‍सार पथपर कुपि‍त वालाक पीड़ा हृदयकेँ झकझोरि‍ दैत अछि‍- रूसलहुँ मलान मुँह भऽ गेलै चानकेँ पाथरसँ फोड़ू नहि‍ फोंका मखानकेँ कोहबरक दृश्‍य प्रणय लीलाक द्योतक होइत अछि‍ मुदा एहि‍ संकलनमे समाहि‍त कोवरक बि‍म्‍बपर लि‍खल दुनू कवि‍ता मर्मस्‍पर्शी अछि‍। ककरोसँ भेटल पीड़ामे कवि‍ तपल छथि‍ वा आनक व्‍यथाक उद्बोधन करैत छथि‍, ई स्‍पष्‍ट नहि‍ भऽ सकैछ। एवं प्रकारे वि‍कल जी एहि‍ पोथीमे गीत गगनक सभ उल्‍का, सहस्‍त्रबाढ़नि‍ आ तरेगनकेँ स्‍पर्श करवाक प्रयास कएलनि‍। जीवनक वि‍वि‍ध वि‍धामे पद्य लि‍खि‍ कऽ गीतक रूप देबाक हि‍नक प्रयास बहुत हद धरि‍ सफल मानल जा सकैत अछि‍। मैथि‍ली साहि‍त्‍यमे सभसँ बेसी दरि‍द्र वि‍षय थि‍क बाल साहि‍त्‍यक सृजनशीलता। ओना तँ बहुत रास कवि‍ एहि‍ वि‍षयपर कवि‍ता लि‍खलनि‍, मुदा भाषा क्‍लि‍ष्‍ट तॅँए बाल पद्य रहि‍तहुँ नेना भुटकासँ दूर रहल। एहि‍ पोथीमे जे बाल रचना देल गेल ओ सभ सरल आ सुगम्‍य अछि‍। तँए हि‍नक प्रयासकेँ सार्थक बुझबाक चाही। अपन संस्‍कृति‍, श्रंृगार आ कि‍छु भक्‍ति‍ पद्य सेहो नीक लागल। ओना तँ एहि‍ संकलनकेँ वि‍कल जी 'काव्‍य संकलन' घोषि‍त कएने छथि‍, मुदा कवि‍ता कम आ गीत बेशी तँए 'गीत संग्रह' मानव प्रासंगि‍क हएत। राग आ लयमे आबद्घ करवाक प्रयासमे कतहु-कतहु बि‍म्‍बक समुचि‍त वि‍श्‍लेषण नहि‍ भऽ सकल। गीतमे एना होइते अछि‍, ओना ई सभ गीत एक-कालक नहि‍ भऽ कऽ वि‍वि‍ध कालमे लि‍खल कवि‍क रचनाक संकलन मात्र थि‍क तँए एकर महत्‍वकेँ कम नहि‍ बूझवाक चाही। हि‍नक रचनाक वैशि‍ष्‍ठ्यता अछि‍ भाषा सम्‍पादनक आड़ि‍मे देशज शब्‍दकेँ अवरोहि‍त नहि‍ कएल गेल। अधि‍कांश कवि‍तामे मातृभाषाक लहरि‍ जगमगाइत भेटल, जेना- पि‍यास मि‍झा ने सकै छी ककरो सुखल सोतीक धारा छी नजरि‍ उठा केओ देखि‍ सकय नहि‍ सांझक एकसर तारा छी' एहि‍ प्रकारक रचनासँ साहि‍त्‍यक सम्‍यक समृद्धि‍ हुअए वा नहि‍ मुदा भाषाक वि‍कासमे एहि‍ प्रकारक पोथीक महत्‍व अवश्‍य अछि‍। एहेन रचनासँ पाठक आ श्रोता नव रूपमे भेटत तँए एकरा प्रासंगि‍क मानल जा सकैछ। पोथीक नाओ- अरि‍पन रचनाकार- डॉ. नरेश कुमार वि‍कल प्रकाशक- मि‍थि‍ला भारती भगवानपुर देसुआ समस्‍तीपुर प्रकाशन वर्ष- 1994 दाम- 16 टका मात्र २ डॉ. कैलाश कुमार मि‍श्र पोथी समीक्षा- जीवन संघर्ष श्री जगदीश प्रसाद मण्‍डलक उपन्‍यास ‍जीवन संघर्ष एक नीक रचना थीक। एहेन रचना अगर मैथि‍ली साहि‍त्‍यमे लगातार हो आ अहि‍ तरहक रचनाक प्रचार-प्रसार नीकसँ कुनो जाति-पाति‍, वर्ग, सम्‍प्रदाय, स्‍थानीयता आदि‍क दुर्भावनासँ दूर भऽ कएल जाए तँ मैथि‍ली साहि‍त्‍य महि‍मा-मण्‍डि‍त भऽ एक गौरवशाली परम्‍पराकेँ प्रारम्‍भ कऽ सकैत अछि‍। हम शि‍क्षा, व्‍यवसाय आ स्‍वभावसँ मंथरगति‍क पाठक छी। नीकसँ नीक पोथी चाहे ओ कोनो वि‍षएसँ सम्‍बन्‍धि‍त कि‍याएक नहि‍ हो, हम एक बैसारमे पच्‍चीस पन्नासँ अधि‍क नहि पढ़ि‍ सकैत छी। एक दि‍न अनायास कमप्‍युटरपर बैसबासँ पूर्व इच्‍छा भेल जे जगदीश प्रसाद मण्‍डल जीक अहि‍ रचनाकेँ ऊपर-झापर देखि‍ ली। यएह सोचि‍ पढ़ए लगलहुँ। आ जखन पढ़ए लगलहुँ तँ अतेक मग्‍न भऽ गेलहुँ जे एकहि‍ बैसारमे १०९ पन्नाक एहि‍ पोथीकेँ आदि‍सँ अन्‍त तक पढ़ि‍ गेलहुँ। बुझना गेल जेना कुनो समाजशास्‍त्र किंवा मानवशास्‍त्रक घोर अवलोकनार्थी अपन वि‍धाक ट्रेनिंग लए एक समाजमे रहि‍ सघन सहभागी अवलोकन करैत ओहि‍ समाजक एथनोग्रॉफी लि‍ख रहल होथि‍। अतवे नहि‍ ओ स्‍वयं समाजक सदस्‍य होमाक मादे अगर कुनो समस्‍याकेँ उजागर करैत छथि‍ तँ ओकर समाधानक हेतु इन्‍टरवेन्‍सन सेहो करैमे नहि‍ सकुचाइत छथि‍। आब जखन कि‍ जीवन संघर्ष पोथीकेँ अद्योपान्‍त पढ़ि‍ चूकल छी तँ अनेक तरहक वि‍चार मोनमे हिलोड़ लऽ रहल अछि‍। होइत अछि‍ अगर कुनो कुशार्ग-बुद्धि‍बला शोध वि‍द्याथी भेटत तँ ओकरा उत्‍साहि‍त करबैक जे जगदीश प्रसाद मण्‍डलकेँ रचनाशैली, जीवन-क्रम आ व्‍यक्‍ति‍गत इति‍हास तीनूकेँ समेटैत मैथि‍ली समाजक सन्‍दर्भमे एक समाजशास्‍त्रीय अध्‍ययन करए। हम अहि‍ बातकेँ नीक जकाँ बुझैत छी जे हमर एहि‍ तरहक टि‍प्‍पणीसँ कि‍छु आलोचक आ मैथि‍ली साहि‍त्‍य केर सुयोग्‍य वि‍द्वान लोकनि‍ वि‍फरि‍ जेताह आ हम्‍मरा इम्‍मेचीओर आ कि‍छु आनो तरहक उपमासँ बजेताह। मुदा हम ई बात बि‍ना कारणे नहि‍ कहि‍ रहल छी। मण्‍डलजी अहि‍ उपन्‍यासक प्रारंभ बँसपुरा गामक परि‍प्रेक्ष्‍यसँ करैत छथि‍। बॅसपुरा गामक एक नव वि‍आहल अट्ठारह-बीस बर्खक लड़की जे मात्र तीनि‍ये मास सासुरसँ बसल छलि‍ गामसँ एक कोस दूर बसल सि‍सौनीमे दुर्गापूजाक मेला देखए गेल छलि‍। ओतए ओहि‍ लड़कीकेँ पूजा कमि‍टीक तीन गोटे फुसला कऽ भंडार घर लऽ गेल। मेला- गनगनाइत। नाच-तमाशाक लाउड-स्‍पीकर चरि‍ कोसीक नीन उड़ौने। तीनू गोटे ओहि‍ लड़कीक संग दुरबेवहार केलक। बेवस भऽ ओ लड़की सभ कि‍छु बरदास केलक। चारि‍ बजे भोर ओकरा सभ छोड़ि‍ देलक। मेला भरि‍ ओ कि‍छु नहि‍ बाजलि‍। मुँह-कान झाँपि‍ मेलासँ नि‍कलि‍ सोझे गामक रस्‍ता धेलक। गामक सीमापर पहुँचतहि‍ छाती चहकि‍ गेलइ। छाती चहकि‍तहि‍ हबो-ढकार भऽ कानए लागलि‍। भि‍नसुरका कानब सुनि‍ एक्के-दुइये गामक लोक घर-आंगनसँ नि‍कलि‍ रास्‍तापर आबि‍-आबि‍ देखए लगल। टोल प्रवेश करि‍तहि‍ एका-एकी लोक पूछए लगलै। कानि‍-कानि‍ अपन बीतल घटना सुनबए लागलि‍। बि‍ना कि‍छु पुछनहि‍ माए, बेटीकेँ कनैत देखि‍, छाती पीटि‍-पीटि‍ कनवो करए आ दुनू हाथे पँजि‍या कऽ पुछलक- “की भेलौ, हम माए छि‍यौ, हमरा ने कहमे ते केकरा कहवीही।‍” जेना-जेना माए बेटीक मुँहक बात सुनैत तेना-तेना देहमे आगि‍ सुनगए लगलै। सुनैत-सुनैत बमकि‍ कऽ पति‍केँ कहलक - “जहि‍ना हमर बेटीक इज्‍जत सि‍सौनीबला लुटलक तहि‍ना सि‍सौनीक दुर्गास्‍थानमे मनुक्‍खक बलि‍ पड़त।‍” फेर की छल! समस्‍त बॅसपुराक लोकमे प्रति‍शोधक ज्‍वाला धधकए लागल। सि‍सौनी गाममे आक्रमण कए कचरमवद्ध करबाक प्‍लान बनए लागल। मुदा उपन्‍यासकारक सोझरल मोन देखू। जखन समस्‍त गामक लोक कचरमबध करबाक योजनाकेँ लगभग ध्‍वनि‍मतसँ स्‍वीकृति‍ दऽ देने छल ताहि‍ काल गाममे एक-आध एहेन व्‍यक्‍ति‍क प्रवेश होइत अछि‍ जे दुनू गामक बीच सामंजस्‍य स्‍थापि‍त करैत छथि‍। गामक सभसँ बुजुर्ग- मनधन बाबाक प्रवेश लोकक भीड़केँ एक दोसर दि‍शामे लऽ जाइत छैक। परम्‍परागत मि‍थि‍ला समाजमे आइयोक समएमे बुढ़-पुरान आ अनुभवी लोकक बड्ड सम्‍मान छैक। एकर प्रमाण अहि‍ सन्‍दर्भसँ भेटैत अछि‍ जे जखन मनधन बाबा लोककेँ दुनू गाममे झगड़ा नहि‍ करबाक अपन वि‍चार दैत छथि‍न्‍ह ताहि‍खन बेटीक इज्‍जतक बदला लेबाक लेल बदलाक आगि‍मे जड़ैत ओहि‍ लड़कीक माए पवि‍त्री सेहो मानि‍ जाइत अछि‍। पवि‍त्री बोम फाड़ि‍ कानैत कहैत छैक- “बाबा, ई तँ गामक मेह छथि‍न तँए हि‍नकर बात मानि‍ लेलि‍एनि‍। नै तँ आइ सि‍सौनीमे आगि‍ लगौने बि‍ना छोड़ि‍ति‍ऐ। जखैनसँ बेटी आइलि‍ तखैनसँ एक्को बेरि‍ मुँह उठा नइ तकैए। कनैत-कनैत दुनू आँखि‍ डोका जकाँ भऽ गेलै। सदि‍खन एक्केटा रट लगौने अछि‍ जे जीवि‍ये कऽ की हएत? जखन इज्‍जत चलि‍ये गेल तखैन कोन मुँह समाजकेँ देखाएब।‍” कल्‍पना करू एक माए केर आवेश आ वेदनाकेँ ! आ ओहि‍ समाज आ गामकेँ जकर ब्‍याहल जवान लड़कीक इज्‍जतक संग कुनो पड़ोसी गामक लफन्‍दर सभ मि‍लि‍ खेलबार केने होइक!! सभ लड़-मरऽक लेल अमादा!! मुदा एक अनुभवी बुजुर्गक प्रति‍ गामक लोकक आश्‍चर्यजनक सम्‍मान। जकरा कारण अपन खूनक घूँघट पीबि‍ सभ शान्‍त भऽ जाइत अछि‍। एक नव वातावरणक संचार होमए लगैत अछि‍। लेखक अहि‍ कार्यकेँ एक मांजल साहि‍त्‍यकार जकाँ उत्तम ढंगसँ करैत छथि‍। उपन्‍यासक समस्‍त क्रि‍या-कलाप बॅसपुरा गामक इर्द-गीर्द घुमैत समस्‍त मि‍थि‍ला समाजक समस्‍याक चि‍त्रण करए लगैत अछि‍- लोकक पलायण केर समस्‍या, सरकारी मदति‍ आ कार्यक्रमकेँ ठीकसँ नहि‍ पहुँचबाक समस्‍या, मल्‍लाह-पोखरि‍ (जलकर) आ सोसाइटीक समस्‍या, कि‍सान बोनि‍हारक समस्‍या, कोशीक कहरक समस्‍या, एक वि‍धवा जकर पति‍ कमे वएसमे मरि‍ जाइत छैक, बेटी ब्‍याहलि‍ छैक आ बेटा नौकरी करए लेल जे प्रदेश गेलै से तीन बरख धरि‍ गाम नहि‍ अएलैक, तकर समस्‍या, मि‍थि‍लाक वि‍धवा सबहि‍क समस्‍या आ वि‍धवा सबहि‍क सामाजि‍क वैज्ञानि‍क जकाँ वि‍भि‍न्न श्रेणीमे वि‍भक्‍त कए ओहि‍ श्रेणी सबहक समस्‍या, कोशी नदीकेँ कटाब कोना बॅसपुरा गामक लोककेँ मातृभूमि‍ केर परि‍भाषासँ दूर करैत अछि‍ तकर समस्‍या, एक कुमहार आ ओकर सपनाकेँ सही अर्थमे साकार करबाक समस्‍या, दू-गामक लोकक बीच उपद्रवी तत्‍व द्वारा समस्‍या उत्‍पन्न करब आ गामक समझदार लेल अथक प्रयास करबाक समस्‍या, आदि‍-आदि‍। एना बुझाएत जे बॅसपुरा गाम उपन्‍यासकार, जगदीश प्रसाद मण्‍डल जीक प्रयास द्वारा एकटा मि‍नि‍एचर मि‍थि‍ला बनि‍ गेल अछि‍। पोथीक एक-एक पांति‍-पोथि‍क नामकरण – जीबन संघर्ष – केँ  सटीक प्रमाणि‍त करैत आगाँ बढ़ैत अछि‍। पाठक उपन्‍यासक संग जीवनसँ संघर्ष करए लागैत अछि‍ : हँसैत, बाजैत, जुझैत, कानैत आ फेर उपन्‍यासकारक प्रयाससँ नव उत्‍साह आ नव चेतना पाबि‍ जीवनकेँ पुन: सार्थक सि‍द्ध करबाक योजनामे संलग्‍न होमऽ लगैत अछि‍। मण्‍डलजी भेरचाल चलऽ बला उपन्‍यासकार आ साहि‍त्‍यकारसँ हटि‍ अपन स्‍वतन्‍त्र अस्‍ति‍त्‍व बनबैत एक दि‍स तँ समस्‍याक वर्णन करैत छथि‍ आ दोसर दि‍स समस्‍यासँ घबराइत नहि‍ छथि‍। कुनो वैमनस्‍यता किंवा बदलाक भावनासँ ग्रसि‍त नहि‍ छथि‍। समस्‍याक नि‍दान जे कि‍ यथार्थवादी नि‍दान सेहो प्रस्‍तुत करैत छथि‍। आ उपन्‍यास बि‍ना कुनो अवरोधकेँ आगाँ बढ़ल जाइत अछि‍। रमेसरा दि‍ल्‍लीसँ वापस आबि‍ आब गामेमे अनेक तरहक समानक दोकान खोलने अछि‍। समानमे लोहा आ लकड़ी दुनू वस्‍तु छैक : “‍हँसुआ, खुरपी, टेंगारी, पगहरि‍या, कुड़हड़ि‍, खनती, चक्कू, सरौत, छोलनीक संग चकला, बेलना, कत्ता, रेही, दाइब, खराम.......।” दि‍ल्‍लीमे जे लोक जत्‍थाक जत्‍थामे मजदूरी करए अबैत अछि‍ तकरा बारेमे ओकर वि‍चार बड़ा सटीक छैक : “‍ि‍दल्‍ली सेट सभकेँ फुलपेंट, चकचकौआ शर्ट, घड़ी, रेडि‍यो, उनटा बावरी देखि‍ हमरो मन खुरछाही कटए लगल। गामपर ककरो कहवो ने केलि‍ऐ आ पड़ा कऽ चलि‍ गेलौं। अपने जाति‍क-बरही ऐठाम नौकरी भऽ गेल। तीन हजार रूपया महि‍ना दरमाहा आ खाइले दि‍अए। मुदा तते खटबे जे ओते जँ अपने गाममे खटी तँ कतेक बेसी होइए। घुरि‍ कऽ चलि‍ एलौं। जहि‍या सुनलि‍ऐ जे अपनो गाममे काली-पूजाक मेला हएत तहि‍यासँ एते समान बनौने छी। कहुना-कहुना तँ चारि‍-पाँच हजारक समान अछि‍। कोनो की सड़ै-पचैबला छी जे सड़ि‍ जाएत। तोरा सभकेँ ने बुझि‍ पड़ै छौ जे दि‍ल्‍लीमे हुन्‍डी गारल अछि‍। हम एक्के मासमे बुझि‍ गेलि‍ऐ। जखन अपना चीज-बौस बनबैक लूरि‍ अछि‍ तखन अनकर तबेदारी कि‍अए करब। अपन मेहनतसँ मालि‍क बनि‍ कऽ कि‍अए ने रहब। तू सभ ने अनेक कोठा आ सम्‍पत्ति‍केँ अपन बुझै छीही। मुदा ई बुझै छीही जे धनि‍कहा सभ तोरे मेहनत लुटि‍ कऽ मौज करैए। अखैन जो, कनी दोकान लगबै छी।” माटि‍सँ जुड़ल उपन्‍यासकार मण्‍डलजी रमेसराक माध्‍यमसँ मि‍थि‍लासँ पलायन करैत लोककेँ मि‍थि‍लेमे रहि‍ अल्‍टरनेटि‍व धन्‍धाक उक्ति‍ बता रहल छथि‍। उपन्‍यास आगाँ बढ़ैत अछि‍। डोमक धंधा आ ओकर क्रि‍या-कलापक सजीव वर्णन एहेन जे सोझे गाम चलि‍ जएब। बि‍ना कोनो नोन-मि‍रचाइ लगौने, सहज आ स्‍वभावि‍क। मण्‍डलजी जनसामान्‍यक बात आ परि‍स्‍थि‍ति‍क वर्णन जनवाणीमे करैत छथि‍। समस्‍त उपन्‍यासमे कुनो एहेन शब्‍द नहि‍ भेटत जकर अर्थ एक साक्षर मात्रोकेँ बुझएमे दि‍क्कत हो। एक दि‍स यात्रीजी मि‍थि‍लाक परि‍स्‍थि‍ति‍सँ परेशान होइत जतऽ दि‍ल्‍ली अथवा आनठाम पलायन करबाक वि‍चार दैत स्‍वयं दि‍ल्‍ली चलि‍ जाइत छथि‍ : “आब जँ तू अतए रहवैं/ कहतौ लोक बताह/ तँए हम्‍मर बात मान आ सोझे दि‍ल्‍ली जाह/” कहै छथि‍ ठीक एकर वि‍परीत मण्‍डलजी परि‍स्‍थि‍ति‍सँ सामना करबाक लेल अपन पात्रककेँ ब्‍यौंत बुझबै छथि‍। चाहे ओ मि‍ठाइ बनाबैबला हो, लोहार हो, कुम्‍हार हो, अथवा कि‍यो आर हो। मण्‍डलजी कथनी आ करनीमे सामंजस्‍य रखै छथि‍ आ स्‍वयं गामेपर रहै छथि‍। कहि‍यो चाकरीक खोजमे मि‍थि‍लासँ बाहर नहि‍ गेलाह। उपन्‍यास आगाँ बढ़ैत अछि‍। भगता जहल कि‍एक गेल रहै तकर वर्णन शायद समाजक अन्‍ध व्‍यवस्‍थापर प्रहार थीक। केना ओ एकटा कलकतामे नोकरी करनि‍हारक घरबालीक संग मध्यरात्रिमे गलत कार्य करबाक कोशि‍श केलक आ भण्‍डा-फोरी भऽ गेलै, तकर नीक वर्णन पोथीमे भेटैत अछि‍। पोथीमे जखन जोगि‍नदर अपन ग्रह ठीक करबाक लेल वि‍वि‍ध रूपेँ दान पूण्‍य करबाक वि‍चार करैत अछि‍ तँ मंगलसँ बात करैत मसोमात सभकेँ मदति‍ करबाक हेतु तैयार भऽ जाइत अछि‍। अतय सेहो मण्‍डलजी सरकारी सुवि‍धा आ मसोमातपर मंगलक मुँहसँ समाजि‍क परि‍स्‍थि‍ति‍पर प्रहार करैत लि‍खैत छथि‍- “अपना ऐठाम दू तरहक मसोमात अछि‍, एक तरहक सरकारी अछि‍ आ दोसर तरहक समाजक अछि‍। सरकारी मसोमात ओ छी जे सरकारक देल सभ सुवि‍धा पबैत अछि‍। आ समाजि‍क वि‍धवा ओ छी जेकरा ने सरकार जनै छै आ ने ओ सरकारकेँ जनैत अछि‍। कि‍छु गनल सरकारी मसोमात अछि‍ जे ओकर पोसुआ छी। जे कोनो सरकारी सुवि‍धा मसोमात सबहक लेल औत ओ ओकरे भेटतैक। अजीब खेल सरकारो आ मसोमातोक अछि‍। ओहि‍ पोसुआ मसोमातकेँ इन्‍दि‍रो आवासक घरो छै आ बाढ़ि‍-बरखामे घरखस्‍सीक रूपैआ सेहो भेटतै आ बाढ़ि‍सँ क्षति‍ फसलक क्षति‍पूर्तिक रूपैआ सेहो ओकरे भेटतै। ततबे नहि‍, वृद्धावस्‍था पेंशन सेहो ओकरे भेटतै आ रोजगार चलबैक नामपर सबसीडी सेहो भेटतै। तेँ सरकारी मसोमात छोड़ि‍ जे नि‍रीह समाजक मसोमात अछि‍, जँ ओकरा जीबैक उपाए भऽ जाए तँ उपाय केनि‍हारकेँ अइसँ बेसी दान-पुनक फल कतऽ भेटतै। धन्‍यवाद ओहि‍ माए-दादीकेँ दी जे सत्तर-अस्‍सी बर्खक बि‍तौलाक बादो जेठक दुपहरि‍या, भादवक झाँट आ माघक शीतलहरीमे, जी-जानसँ मेहनत करैत अछि‍। धन्‍यवाद ओहि‍ अस्‍सी बर्खक मैयाकें दी जे माथपर धान, गहूम, मकैक बोझ लऽ कऽ दुलकी चालि‍मे गीत गुनगुनाइत खेतसँ खरि‍हान अबैत छथि‍।..... तँए पहि‍ने जा कऽ ओहि‍ मैया सभकेँ गोड़ लागि‍ कहि‍हक बाबी, समाजरूपी परि‍वारक अहूँ छी आ हमहूँ छी, तँए कमाइबलाक ई दायि‍त्‍व बनि‍ जाइत अछि‍ जे परि‍वारमे बृद्ध आ बच्‍चाक सेवा इमानदारीसँ होय। हम अहाँकेँ मदति‍ सेवाक रूपमे दऽ रहल छी। तखन ओ वेचारी हँसि‍ कऽ असि‍रवाद देथुन।‍” साहि‍त्‍यकेँ समाजक दर्पण कहल जाइत अछि‍। दर्पण तखन जखन साहि‍त्‍यकार पारखी होथि‍। समाजक संग चलथि‍। सामाजि‍क व्‍यवस्‍थाकेँ समएक संग वि‍वेचना करैथ। साहि‍त्‍य सृजनक धर्मकेँ बुझथि‍। मण्‍डलजी एहि‍ कार्यकेँ इमानदारीपूर्वक केलन्‍हि‍ अछि‍। एहि‍ उपन्‍यासकेँ हि‍न्‍दी, अंग्रेजी इत्‍यादि‍ भाषामे अनुवादि‍त कए प्रचार-प्रसार होमाक चाही। ई रचना समाजक दर्पण अछि‍। एक नि‍श्‍चल आ आशावान वि‍चारधाराकेँ प्रतिपादित करैत अछि‍। जगदीश प्रसाद मण्‍डल अपन कृति‍मे Native intelligence केर अभूतपूर्व प्रमाण दैत छथि‍। पुस्‍तक केर साज सज्‍जा, आवरण इत्‍यादि‍ नीक अछि‍। प्रकाशक सेहो धन्‍यवादक पात्र छथि‍। १.रमेश- प्रो. मायानन्द मिश्रक रमनगर कथामे लागल “मुदा”...२.मंत्रेश्वर झा- चरि‍त्र चि‍त्रणक वाजीगर- जगदीश प्रसाद मंडल ३.विनीत उत्पल- दीर्घकथा- घोड़ीपर चढ़ि लेब हम डिग्री – आगाँ १ रमेश प्रो. मायानन्द मिश्रक रमनगर कथामे लागल “मुदा”... माया बाबूक कथा-संसारक फलक व्यापक अछि। ओ कथाक “प्लॉट” क चयनमे माहिर आ आधुनिक छथि। ओ पैघ आ छोट सभ आकारक कथा लिखलनि अछि। कथा लेखनक क्रममे ओ पैघ कालखण्ड देखलनि आ भोगलनि अछि। ओ कएटा प्रसिद्ध कथाक यशभागी बनलाह अछि। ओ कए पीढ़ीक जीवनकेँ देखलनि आ लिखलनि अछि। हुनकर लेखनमे लक्षित वर्ग थिक मध्य वर्ग आ निम्न-मध्य वर्ग आ कौखन कऽ राजनीतिक आ पूँजीपति-वर्ग सेहो। ओ नव पीढ़ीक “अंडा प्रेम”, आधुनिकताक प्रति अति-उत्साह आ पुरान पीढ़ी (पिता)क पुरातनपंथी-नक-घोंकची, दुनूपर व्यंग्य केलनि अछि आ अपना हिसाबे देखार करबाक कोशिश केलनि अछि। दुनू पीढ़ीक सोचमे विकृतिकेँ बीछि-बीछि कऽ देखार करितो, प्राचीन शिक्षक पिताक प्रति सहानुभूति रखितो, नव पीढ़ीक दिक्कत बुझितो, आधुनिक आ प्रगतिशील सोचकेँ आत्मसात नै कऽ सकलाह अछि। बेटाक नोकरीक लिलसामे मंत्रीक “अभिनन्दन” लिखएबला प्रोफेसरक दुर्दशाक खिस्सा मायानन्द मिश्रेटा लिखि सकैत छलाह। लक्ष्मीक आगू सरस्वतीक नतमस्तक हैब आ राजनीतिक समक्ष योग्यता, कला-संस्कृतिक पराजयक बोध माया बाबू करौलनि। मुदा प्रोफेसरक विवशताक आगूक च्रण छल- प्रोफेसरक विद्रोह- भाव आ संघर्षशीलता जे गुरु भइयो कऽ शिष्यक समक्ष प्रदर्शित नै कऽ पबैत छथि। पाठककेँ ई कथाकारोक वैचारिक सीमा बुझा सकैत अछि। अपन “भैरव” कथामे एकटा युवा कविकेँ एकटा एम.एल.ए.क “उप-ग्रह” (ओकर नारा सर्जकक रूपमे) चित्रित केलनि अछि माया बाबू आ ओकरा विकृत यथार्थक स्थितिमे, ओही रूपमे छोड़ि, दुनूकेँ देखार करितो, यथास्थितिवाद लग ठमकि जाइत छथि। यएह “भैरव” “माध्यम” नामक कथामे “बीडिओक भैरव” (महादेवक भैरव) बनि कऽ अबैत अछि। “भैरव”मे युवा-कवि “माध्यम” बनि कऽ अबैत अछि आ “माध्यम”मे बीडिओ सैहेबक चम्मच (भैरव) बनि कऽ अबैत अछि।  दुनू कथा, खलनायकगण (मुख्य, गौण आ बिचौलिया)केँ देखार करितो “जनहितमे उपयोगी नै भऽ कऽ मात्र “साहित्य-हित”मे उपयोगी भऽ पबैत अछि, जे कला, मात्र कलाक लेल भऽ कऽ रहि जाइत अछि। कथाक उद्देश्य मात्र विकृतिक वा संस्कृतिक चित्रण टा नै होइत अछि। चित्रणकेँ समाधान-संकेतक चासनीसँ बोरबाक कला चाही। जै कथाकेँ कथाकार जनमानसक संग जोड़ि पबैत अछि, से कथा चिरायु भऽ पबैत अछि। “नमकहराम” (जे कि “निमकहराम” हेबाक चाहैत छल)मे चौठियाकेँ “अगुरवान” बना कऽ सफलतापूर्वक परसल गेल अछि। माया बाबूक शिल्प-शैली तँ कमाले अछि। ओ व्यंग्यात्मक शीर्षक चुनैत छथि आ ताही भाषा-शैलीक उपयोग करैत छथि। व्यापारी वर्ग द्वारा आम जनताक प्रति कएल गेल निमकहरामीक चित्रण नीक जकाँ करैत सभ प्रकारक दुरभिसन्धिकेँ देखार करैत छथि। ई व्यापार तकनीक, व्यापार-समझौता, कालाबजारीक बीजमंत्र पाठक “भये प्रकट कृपाला”मे खूबे पढ़ैत अछि। बोगलाजीक मृत्यु-महत्ताक सजीव वर्णन करितो कथाकार बोगलाजीक शार्टकट रस्तासँ महा-उत्थानक जे अन्तर्कथा कहैत छथि- सएह कथाक प्राण थिक। व्यंग्यात्मक टोन पाठककेँ “बोर” हेबासँ बचबैत अछि। तहिना “दीन दयाला” राजनैतिक कुचक्र, मंत्री-मुख्यमंत्री, एम.एल.ए.-हाकिमक दुरभि संधि, भ्रष्टाचार-आवरण, योजना, ड्राइंग रूम मैनेजमेंट, पी.ए. टाइप लोकक पी.ए. गीरी आदि नव मुदा घृणित दुनियाँसँ मैथिली साहित्यकेँ परिचित करबितो, ओइ दुनियाँक प्रखर विरोध कथाकारसँ नै भऽ पबैत अछि। फेर “कौशल्या हितकारी” बनितो स्वास्थ्य-मंत्रीक “इस्तीफा” मात्र मूक-विरोध संकेतित कऽ पबैत अछि आ एकटा पलायन-भावक प्रदर्शन कथान्तमे होइत अछि। कौशल्याक शील-हरण स्थायी-विद्रोहक सृष्टि नै कऽ पबैत अछि आ कएटा गर्भपाती क्रान्ति जकाँ शिथिल इतिहास दोहरा जाइत अछि। उपर्युक्त कथा सबहक प्रकाशन-कालो आ आइयो, संक्रान्तियेकाल थिक। भारतीय सामाजिक आ राजनैतिक-व्यवस्था विकृतिक पराकाष्ठापर अछि आ समाज लहालोट भऽ रहल अछि। मुदा संगहि-संग विकृत-चेतना, सु-संस्कृत चेतना, विकृतिक प्रति जनमानसमे घृणा-भाव आ चेतन-लोकमे विद्रोह-भाव, सभ किछु एकहि संग अस्तित्वमे अछि आ विचारधाराक संघर्षक श्रृंखला सु-स्पष्ट अछि। एहना स्थितिमे कला-चातुर्यसँ परिपूर्ण सक्षम कथाकारक दायित्व थिक जे यथास्थितिपर आनि कऽ कथा, पात्र वा पाठककेँ नै छोड़थि। हुनका नकारात्मक विकृतिक चित्रणमे अपन ऊर्जा नै खपा कऽ सकारात्मक बाट, नकारात्मक विकृतिक लहासक बीचसँ निकालबाक इमानदार आ श्रमपूर्ण प्रयास करबाक छलनि। सकारात्मक चेतनाकेँ ऑक्सीजन देबाक काज साहित्यकारे टा करैत छथि। शेष संवर्गकेँ विधात्मक सीमा होइत छनि। माया बाबूकेँ समस्त सामाजिक आ राजनैतिक विकृति बूझल छनि। हुनका पैघ दुनियासँ परिचय छनि। ओ अपना-आपकेँ मैथिली कथा-साहित्यक “त्रिपुण्डक” एकटा “पुण्ड” मानलनि अछि। मुदा ललित-राजकमलक विद्रोह-चेतना वा समकालीन सोचक टन-टन आवाज हिनका कथा साहित्यसँ लुप्तप्राय अछि। से आश्चर्यजनक आ सत्य सेहो अछि। अपन कथा सभमे प्लॉटक स्तरपर नव आ आधुनिक लगितो, कथ्य (थीम)क स्तरपर माया बाबू कोनो तेहेन सन आगू नै जा पबैत छथि। मनोरम शिल्प, सुन्दर “ट्रीटमेन्ट” आ भाषाधिकार, कथा-कलाक मेंही-मेंही तत्वसँ सराबोर माया बाबूक आकर्षक कथा-संसार, मिथिलाक नव पीढ़ीकेँ मात्र सुधारवादी-संशोधनवादी संदेश दऽ पबैत अछि आ कोनो नव रस्ता नै देखा पबैत अछि, जखनकि समकालीन वैचारिक मुख्यधारा मायाबाबूक पाठक आ नव-पीढ़ीकेँ पहिनहिसँ बूझल छैक। माया बाबूक कथामे तथाकथित “हरिजन नेता” वा एमेले, बड़जन-मुख्यमंत्रीक नाङरि बनि कऽ पाछू-पाछू चलैत अछि- “हा हुसैनक” मुद्रामे। ई बिहारक कांग्रेसी मंत्रीमण्डलमे होइते छल। डॉ. जगन्नाथ मिश्र अपना मंत्रीमण्डलमे कोनो-ने-कोनो बिलट पासवानकेँ रखिते छलाह।माया बाबूक कथा-संसारमे नारी आ दलित-वर्गक मात्र दुर्दशेटा आएल अछि, से ओइ दिनक समय आ मायाबाबू दुनूक सीमा थिक। सेहो दुर्दशा-वर्णन गरिमायुक्त भऽ कऽ नै आएल अछि। माया बाबूक कथा-कला प्रभासेजी जकाँ “धनीक” अछि। सेहो राजमोहन झाक “नागर-भाषा”मे नै, अपितु खाँटी “भाखा”मे। हिनकर कथा-लोक रमणीक आ रसगर चित्रणसँ भरल-पुरल अछि। वर्णन कखनो उस्सठ नै होइत अछि हिनकर। मिथिलाक पारिवारिक आ सामाजिक सम्बन्धक हिनका गहींर अवधारणा छनि- से कएटा कथा साबित करैत अछि। उपन्यासोमे से आएल अछि। हिनकर बहुआयामी व्यक्तित्व मिथिला-मैथिलीकेँ अत्यंत समृद्ध केलक अछि आ मैथिली-कथामे हिनकर अवदानकेँ कमजोर केलक अछि। हिनकर मंचीय व्यक्तित्व, गरिमाक प्रति तृष्णा, भोगक प्रति लालसा- हिनक कथाक प्रति परिश्रम, समर्पण आ अन्ततः कथाक धारकेँ भोथ केलक अछि। मैथिली आन्दोलनमे हिनकर संघर्षशीलता जेहेन रहल तेहेन संघर्षशीलता कथा लेखनमे द्रष्टव्य नै अछि, यद्यपि जै कालखण्डमे ई कथा सभ लिखल गेल छल, “नवीन” मानल गेल छल। मुदा आइ नवीन तत्व सभक परीक्षण केलापर कथा सभ “रमणीक” बुझाइतो ततेक नव आ धरगर नै बुझाइत अछि। तहिना अभिव्यंजनाक काव्य-श्रृंखलाक कविता सभ खूबे “नवीन” मानल गेल छल।  मुदा आधुनिकताक टन-टनाटन ध्वनि जे यात्री-राजकमलक काव्यमे आएल- से हिनक काव्यमे विलुप्तप्राये रहल। कथे जकाँ हिनकर उपन्यासोमे आधुनिकता आ पात्रक संघर्षशीलता कोनो तेहन जगजियार नै भऽ सकल। फेर हिनकर गीत, गीतल आ मंच-संचालनमे खूबे रस आ नवीनता अछि, मुदा सेहो मात्र शिल्प आ प्रयोगेक स्तरपर। वस्तुतः संघर्षशीलता आ जिजीविषा प्रायः सभ विधामे विलुप्तप्राय अछि। मायाबाबू अपना जीवनमे खूब सार्थक काज सभ केलनि अछि। हिनकर जीवनक उपलब्धिक प्रशंसनीय पथार लागल अछि। मुदा अपना समयक सीमाकेँ उपन्यास-कथा अथवा कवितोमे नै तोड़ि सकल छथि। ऐतिहासिक उपन्यासकेँ प्राचीने राष्ट्रवादी-गौरववादी दृष्टिकोणसँ लिखलनि अछि। कोनो आधुनिक संदर्भमे वैज्ञानिक मार्क्सवादी दृष्टिकोणसँ नहिए लिखि सकल छथि। मंत्रपुत्र, स्त्रीधन वा पुरोहितमे प्राचीन इतिहासक पुराने व्याख्या प्रस्तुत केलनिहेँ। प्राचीन भारत, प्राचीन समाज, पुरातन आ सनातन-व्यवस्थाक प्रति हिनकर “नजरिया” पारम्परिक राष्ट्रवादी-गौरववादी-स्कूल जकाँ अछि, जै स्कूलक यू.एन. घोषाल, के.पी.जायसवाल, आर.सी. मजूमदार, हेमचन्द्र रायचौधुरी, के.के.दत्त, राधाकृष्ण चौधरी, बाल गंगाधर तिलक आदि छलाह। ई लोकनि प्राचीन भारतक गौरव-बोधसँ ब्रिटिश साम्राज्यवादकेँ चकचोन्ही लगा कऽ निचैनसँ सूति रहैत छलाह आ इतिहासकेँ वैज्ञानिक पद्धतिसँ दूर कऽ मात्र “ब्रिटिश विरोधक औजार” मानैत छलाह। तकर बाद ऐतिहासिक यथार्थ सभ उपेक्षित भऽ जाइत छल। राजसत्ता आ प्राचीन-व्यवस्थाक यशोगानक अलावे प्रजाक दुःख-दर्द इतिहास-लेखनक ऐ तंत्रमे नै छल। एहने पुनरुत्थानवादी जीर्ण-शीर्ण अवधारणा, जकरा रामचैतन्य धीरज “वैज्ञानिक ब्राह्मणवाद कहैत छथि, जकाँ, जँ उपन्यास-कथा लेखन हो तँ प्राचीन समाजकेँ नव सन्दर्भमे देखब असम्भव जकाँ भऽ जाइत अछि। इतिहासक घटना सबहक अध्ययन वा पात्र आ परिवेशक मनोरम चित्रण एक बात थिक आ वैज्ञानिक इतिहास दृष्टिसँ निष्कर्ष बहार कऽ समाजकेँ चेतना-सम्पृक्त करब दोसर बात थिक। इतिहास दृष्टिक विकास पाछू मुँहे नै होइत अछि आ ने हेबाक चाही। आगू मुँहे विकास ओ थिक जे रोमिला थापर, राम शरण शर्मा, डी.डी. कोशाम्बी, इरफान हबीब, डी.एन.झा, सतीश चन्द्रा, आदि इतिहासकारगण अपन-अपन कृति सभमे केलनि अछि। ओ लोकनि राजसत्ताक गौरव गाथाक उपेक्षा कऽ तत्कालीन समाजक अभगदशाकेँ देखार कऽ नव, जनवादी दृष्टिसँ ऐतिहासिक तथ्य सबहक परीक्षण आ तर्कसंगत व्याख्या केलनि आ प्राचीन इतिहासकेँ निस्सन वैज्ञानिकताक आधार देलनि। हिन्दी साहित्यमे इतिहास दृष्टि आधारित उपन्यास सभ बहुत प्रासंगिक बनल मुदा मैथिलीक ऐतिहासिक चेतना-सम्पृक्त उपन्यास पछुआएल विचारधारा आधारित भऽ गेल। ऐतिहासिक घटना सबहक नीक संयोजन, तथ्य, पात्र, संस्कृति-तत्व सभसँ परिपूर्ण रहितो, उपन्यास-तत्व आ कला-चातुर्यसँ धनीक रहितो, वैचारिक स्तरपर प्रगतिशील नै हेबाक कारणेँ “मंत्रपुत्र” अपन महत्वकेँ घटा लैत अछि, जखनकि एस.ए. डांगे “साधु समाजवाद”केँ तत्कालीन समाजक एक “यथार्थ” मानने छथि। ओना ई तथ्य माया बाबूक पक्षमे जाइत अछि जे ऐतिहासिक उपन्यासक मामिलामे दरिद्र मैथिलीक भण्डारक श्रीवृद्धि ई उपन्यास करैत अछि। आब आगरिमो हमरा कोनो आशा नै अछि जे प्राचीन इतिहास आधारित अपन अन्य उपन्यासमे माया बाबूक पात्र सभ प्राचीन व्यवस्था विद्रोह धर्मक निर्वाह करत। आ ऐ बातक ग्लानि तँ अछिए जे “पुरोहित” आ “स्त्रीधन” मैथिलीक भण्डारसँ बाहरे रहल। वैदिक कालीन दासत्वपर मणिपद्मजी “आदिम गुलाम” ले लेखकीय नजरिया आ माटिक प्रति प्रतिबद्धता प्रस्तुत केलक, से मंत्रपुत्रक “शास्त्रीय-एप्रोच” प्रस्तुत नै कऽ सकल। माया बाबूक अपन कथा सभमे ऊपरी स्तरमे जे आधुनिक बुझाइत छथि, तेहेन वैचारिकताक स्तरपर प्रगतिकामी नै बुझाइत छथि। हुनकर वैचारिकता जहिना उपन्यासमे रहल तहिना कथोमे रहल, से स्वाभाविके छल। कोनो रचनाकार दू विधामे अलग-अलग विचारक हो, से ने तँ संभव अछि आ ने उचिते। व्यक्ति अपन जीवन, साहित्य आ सभ क्षेत्रमे प्रायः एकहि विचारधाराक रहए, सएह नीक आ सएह रहितो अछि। आ से नै रहलापर पकड़ाइयो जाइत अछि। मायाबाबू जे छथि से सभठाँ छथि- एक्के रंग। जीवनोमे रसगर, मंचोपर रसगर, उपन्यास-कथा-गीत-काव्य, सभठाँ “रसगर”। सभठाँ रमनगर वर्णन, सभ विधामे शिल्प-शैलीमे महारत प्राप्त। कला-चातुरी-युक्त सक्षम खेलाड़ी। सफलता प्राप्त करबाक बीज मंत्रक विशेषज्ञ। मुदा जीवनदर्शन आ वैचारिकतामे मयूरक पएर जकाँ सुखाएल। पुरान वैचारिकता, नृत्य-कौशल-प्रेमी दर्शककेँ, मयूरक पैर देखिते झूड़-झमान बना दैत अछि। माया बाबू यात्री-राजकमल-ललित-किसुनजीकेँ देखने-पढ़ने छलाह। किरणजीक परम्परा हुनका बूझल छलनि। तेँ किछु बेशी अहू बिनू पर छल। हिनका “सोनाक नैया” रचए अबैत छलनि। “माटिक लोक”क सेहो हिनका परिचय छलनि। तेँ माटिपर ठाढ़ लोकक जनवादी आ प्रगतिशील आँखिकेँ चीन्हि कऽ पात्र आ परिवेशक रचना करब अपेक्षित छल। कोनो साहित्यकारसँ आजुक लोक, समाज आ समय- ई आशा रखैत अछि। मुदा सर्वतोभावेन साहित्यिक सक्षमताक बावजूद “दरभंगिया इसकूलक” तेजगर छात्र बनबाक “दुर्घटना” हिनको संग भइये टा गेल। से मात्र वैचारिकताक कारणेँ। अन्यथा, “दड़िभंगा”क कएटा “गुरु-घंटाल”सँ कतओक आगू जएबाक प्रतिभा हिनकामे छल। मात्र अहीटा बातकेँ छोड़ि कऽ माया बाबू अपना कालखण्डक एकटा अत्यंत सक्षम बहुआयामी साहित्यकार छथि आ अपन समयक मिथिला-मैथिल-मैथिलीकेँ अपन असंख्य योगदानसँ परिपूरित केलनि अछि आ कऽ रहल छथि। हुनकर ऊर्जा स्तुत्य अछि। मुदा ऊर्जाक “आउटपुट” कलाक चरमोत्कर्षपर होइतो, वैचारिक रूपेँ आलोच्य अछि। ‍    २ मंत्रेश्वर झा चरि‍त्र चि‍त्रणक वाजीगर जगदीश प्रसाद मंडल पछि‍ला कि‍छु वर्षमे मैथि‍ली साहि‍त्‍यक इति‍हासमे जगदीश प्रसाद मंडल धूमकेतु जकाँ उगल आ चमकल छथि‍। संप्रति‍ हुनकर दू उपन्‍यास जि‍नगीक जीत आ मौलाइल गाछक फूल हमरा समक्ष अछि‍। दुनू उपन्‍यासकेँ मनोयोगसँ पढ़ि‍ चुकल छी। रोचक भाषा आ शैलीमे लि‍खल हि‍नकर दुनू उपन्‍यास ग्रामीण जीवनक चि‍न्‍तन आ ऊहापोहकेँ सजीव चि‍त्रण करैत अछि‍। जै‍ गाम घरक कथा सभ मंडलजी उठाए ओकरा परि‍णति‍ तक पहुँचओने छथि‍ तै गाम घरक एतेक सूक्ष्‍म आ वि‍स्‍तृत वि‍वरण मैथि‍ली साहि‍त्‍यमे ऐसँ पूर्व कमे भेल अछि‍। जि‍नगीक जीत उपन्‍यासमे कतेको एहन चरि‍त्र उभरल अछि‍ जे कोनो पाठककेँ प्रभावि‍त केने बि‍ना नै रहत। उदाहरण स्‍वरूप बचेलाल आ सुमि‍त्राक चरि‍त्र देखल जाए, “शि‍वकुमारकेँ नोकरी होइते बचेलाल इस्‍कूलमे त्‍याग-पत्र दऽ देलक। बचेलालक त्‍यागपत्रसँ सौंसे गाम टि‍का-टि‍प्‍पणी चलए लागल। कि‍छु गोटेकेँ दुख एहि‍‍ दुआरे होइत जे बेर-बेगरतामे पाइसँ मदति‍ भऽ जाइत। कि‍छु गोटेकेँ खुशि‍यो होइत कि‍एक तँ भने आमदनी बन्न भऽ गेलनि‍। मुदा सुमि‍त्राकेँ ने हरख आ ने वि‍स्‍मय। कि‍एक तँ ओ नीक नहाँति‍ बुझैत जे जत्ते मनुक्‍खक भीतर कमाइक शक्‍ति‍ होइत छै, ओते तँ नोकरीमे नहि‍ये होइत छैक।‍” एे उपन्‍यासमे महन्‍थी कोनो चलैत अछि‍, महन्‍थ कोन-कोन कारनामा करैत अछि‍ तकरो अद्भुत चि‍त्रण भेल अछि‍। “‍ऊपरका हन्नामे आठ गो कोठली छै। आठो कोठली असगरे रखने अछि‍।... पूताक बाद सभ अपन-अपन ठरपर चल जाइए। तकर बाद लीला शुरू होइ छै। मुदा बेसी नइ कहबह।” ऐ प्रकारे बेसी नै कहबह कहि‍ कऽ महन्‍थक चरि‍त्रक पूरा वर्णन स्‍पष्‍ट भऽ जाइत अछि‍। दू-तीन दशक पूर्व उच्‍चतम न्‍यायालय पटना उच्‍च न्‍यायालयक कोनो भ्रष्‍ट आदेशकेँ नि‍रस्‍त करैत बारंबार यएह टि‍प्‍पणी केने छल, “We say no more‍”। मौलाइल गाछक फूल उपन्‍यास सेहो ओहि‍ना उद्देश्‍यपूर्ण अछि‍ जेना जि‍नगीक जीत। मुदा ऐ उपन्‍यासमे आदर्शवाद कने बेसी प्रकट भेल अछि‍। रमाकान्‍तक जे चरि‍त्र प्रस्‍तुत भेल अछि‍ तकर उदाहरण भेटब ओतेक सुलभ नै‍। चाह पीब रमाकान्‍त कहलखि‍न, “दूखू हम अप्‍पन सभ खेत समाजकेँ दऽ देलि‍ऐक। आब हमरा कोनो मतलब ओहि‍ खेतसँ नहि‍ अछि‍।” दोसर दि‍स सुबुधक चरि‍त्र अछि‍ जे नोकरी छोड़ि‍ गामक छोट-पैघ सबहक धीयापूताकेँ पढ़ेबा लेल त्‍यागक आदर्श प्रस्‍तुत करैत अछि‍। एहेन चरि‍त्र सभ नि‍स्‍संदेह गामकेँ पुनर्जीवि‍त आ पुनर्गठि‍त करबामे प्रेरणाक काज करत। दुनू उपन्‍यास सभ दृष्‍टि‍यें उत्‍कृष्‍ठ अछि‍ आ मैथि‍ली उपन्‍यास लेखनमे नव आयाम गढ़ैत अछि‍। मंडल जीक कथा संग्रह गामक जि‍नगी आओरो बेसी श्रेष्‍ठ रचना अछि‍। ऐ संग्रहमे कुल उनैस कथा संकलि‍त अछि‍। ऐ संग्रहक लगभग सभ कथा प्रकाशनसँ पूर्व मंडलजी हमरा पठौने रहथि‍। तहि‍या हम ि‍दल्‍लीमे रही। हुनकर आग्रह रहनि‍ जे हम कथाक पांडुलि‍पि‍केँ शुद्ध कऽ के हुनका पठा दि‍अनि‍। हमरा आश्‍चर्य भेल छल जे हमरा कोना ओ ऐ लेल उपयुक्‍त बुझलनि‍। मंडल जीक कथा सभ पढ़ि‍ हम ततेक प्रभावि‍त भेल रही जे हमरा पांड़लि‍पि‍मे कतहुँ कोनो चेन्‍ह लगाएब उपयुक्‍त नै लागल। हम दूरभाषपर जगदीश मंडलजी आ हुनक सुपुत्र उमेश मंडलकेँ कहलि‍एनि‍ जे जखन हम पटना आपस आएब तखन स्‍वयं हुनकासँ भेँट कए अपन सुक्षाव देबनि‍। कोनो रचनात्‍मक लेखनकेँ आलोचना तँ भऽ सकैत अछि‍, ओकर गुण-दोषकेँ वि‍वेचन तँ भऽ सकैत अछि‍, ओकर हठात् काटल-छाँटल नै जा सकैत अछि‍। से कएलो नै जेबाक चाही। संयोगसँ ऐ बीच गजेन्‍द्र ठाकुर जीकेँ मंडल जीक पांड़लि‍पि‍ प्राप्‍त भेलनि‍ आ ओ सफल जौहरी जकाँ मंडल जीक कथा, उपन्‍यास, नाटक आदि‍ कतोक वि‍धाक रचनाकेँ वि‍वि‍ध रूपमे प्रकाशमे अनलखि‍न। ऐ लेल ओ अशेष धन्‍यवादक पात्र छथि‍। गामक जि‍नगीक सभ कथा ग्राम्‍य जीवनकेँ कि‍छु अनटुअल प्रसंगकेँ मार्मिक चि‍त्रण करैत अछि‍। भैंटक लावा, बि‍साँढ़, अनेरूआ बेटा, डीहक बटबारा, घरदेखि‍या, बाबी, ठेलाबला, बोनि‍हारि‍न मरनी, इत्‍यादि‍ ऐ संग्रहक उत्‍कृष्‍ठ कथा सभ छन्‍हि‍। अपन उपन्‍यासे जकाँ मंडल जीक कथा सभ जि‍जीवि‍षा आ व्‍यावहारि‍क आदर्शक उत्‍कंठासँ भरल अछि‍। मंडलजी जै तरहे नि‍रंतरतामे वि‍वि‍ध वि‍धाक रचना कऽ रहल छथि‍ से भवि‍ष्‍यमे हुनकर वि‍शेष अवदान लेल वि‍श्‍वास जगबैत अछि‍। ३ विनीत उत्पल दीर्घकथा- घोड़ीपर चढ़ि लेब हम डिग्री – आगाँ भारतीय भवन मे एडमिशन भेलाह के बाद आलोक मे आत्मविश्वास बढ़ि गेल। अहि बीच हुनकर एडमिशन जामिया मिल्लिया इस्लामिया मे सेहो भऽ गेल। जतय हमरा से भेंट भेल। हम माने गोविंद। माने आलोक बाबू के सबसे निकट रहै बला। आई धरि आलोक बाबू से सभटा काज करने छल आैर कऽ रहै छल, सभक गवाह हम छी। ई गप भऽ सकैत अछि जे किछु उन्नीस या बीस बाजै मे भऽ सकैत अछि, मुदा, डडीर से एक्को बीत आगू-पाछू नहि होयत। हम फूसक घर मे बैसल छी आओर हमर हाथ मे कलम यै। ब्राह्म बबाक ठामक कसम खाइत छी जे कहब सत कहबू फूइस नहि। पहिलुक दिन आलोक बाबू से भेंट हमरा 507 नंबर बला बस मे भेल छल। ओ एडमिशन लऽ कऽ घुरैत छल। हमहूं घुरैत रहि संगे। देखहि मे ते टटैल छल मुदा दिमाग तऽ हुनका गोसार्इंयै देने छल। बाजै-भूकै मे होहन लोक सं हमरा आय धरि नहि भेंट छल। आओर दक्षिणी दिल्लीक बेरसराय मे रहैत छल आओर हर खानपुर मे। हम ते दू दोस्त साथ मे रहैत रहि मुदा आलोक असगरे। बेरसराय पुरान जेएनयू कैंपस के आगू अछि आओर ओकर पांछा आईआईटी के कैंपस अछि। ओतय मंदिर वाली गलि मे दिलपत पवारक मकान मे आलोक बाबू रहैत छल। कमरा नंबर-28, जकरा लेल कहैत जाइत रहै जे ओहि कमरा मे पत्रकारक आत्मा वास करैत अछि। कारण जे पिछला पांच साल से ओहि कमरा मे कोनो-नै-कोनो पत्रकार रहैत छलाह। ठामे आईआईएमसी अछि जे एशिया के बड़का संस्थान अछि आओर ओतय बड़का-बड़का पत्रकार निकलि के सभटा टीवी आओर अखबार मे भड़ल अछि। दिल्ली मे अइलहि के बाद आलोक बाबूक व्यस्तता बढ़ि गेल। ओ केवल सुतहि लेल कमरा पर आबैत छल। दिन-राति भटकैत रहैत छल। लोक हुनकर नाम राखि देने छल 'भटकैत आत्मा"। कियैकि हुनकर एक काल एकटा पाइर एक ठाम रहैत छल दोसर काल हुनकर दोसर पाइर दोसर ठाम। दूपहरिया मे दो बजे से लऽ कऽ पांच बजे तक ओ जामिया आओर एक घंटा मे मंडी हाउस आबि के पैदल भारतीय भवन पहुंचैत छल। ओतय सांझ छह बजे से आठ बजै धरि क्लास कऽ ओ राति नौ बजे धरि डेरा आबैत छलाह। फेर ग्यारह-बारह बजे धरि पढैत छल। खाइ के कोनो चिंता नहि छल, कियैकि रातिक खाना लेल ओ टिफिन मंगाबैत छल। भोरि भेलाह पर शर्माजीक चाहक दुकान पर जाइत छल जतय ओ ब्रोड-पकौड़ा खाइत छल। ओ शर्माजीक दुकान कऽ लऽ कऽ एकटा लेख 'शर्माजी टी स्टाल, ब्रोड पकौडे नान स्टाप" सेहो लिखने छल। ओ भूख मिटाहि लेल आ समय के बचत करहि लेल एतय ब्रोड पकौड़ा खाइत छल जे हुनकर मिता सब हुनकर नाम 'ब्रोड पकौड़ा" राखि देने छल। लेख एतबेक नीक छल जे मन हैयै जे अहोंक सुनाबी। ई एकटा पत्रिका मे छपल छल। आलोक बाबूक भाषा मे सुनबै तखन अहां के लागत जे हुनकर कलम मे सरस्वती बास करैत अछि। ते सुनू,  'दक्खिण दिल्लीक पौश इलाका। एक दिस जेएनयू के ओल्ड कैम्पस ते दोसर कात आईआईटी कैम्पस। अहि बीच अछि बेर सराय, जतय इंजीनियरिंग से लऽ कऽ सिविल सर्विसक तैयारी करहि बला गाम-घर से दूर रहिके खून-पसीना एक करैत अछि। नहि हुनका खाइके फिक्र होइत अछि आओर नहि सुतहि के। पढ़ै के आओर तैयारक टेंशन एहन होइत अछि जे ओ चाह बनाबै सं लऽ कऽ खाना बनाबहि मे ओ परहेज करैत अछि। बस एकहि टा धुन रहैत अछि हुनका मेहनत आओर सफलता। जखन धुन होयत जे किछु करबाक अछि तखन जानले गप अचि जे कोनो काज मे मन ते नहि लागत। मुदा  राति बीतले आओर भिनसर भेला पर चाह आओर नास्ताक तलब अहि इलाका मे रहै बला छात्र के शर्माजी के टी-स्टॉल पर जाहि लेल मजबूर कऽ दैत अछि। करीब 15 साल से एतय के छोट गली में ओ दुकान लगाबैत अछि आओर ओ फुर्सत संगे पेटक बीच तारतम्य बनाबैत अछि। भिनसरे पांच बजे खुलहि बला ई चाहक स्टाल देर रात एक बजे तक खुलल रहैत अछि। अप्पन चटनीक लेल नामी शर्माजीक दुकानक चटनी ब्रोड-पकौड़ाक संग खाहि बला कतेक लोग आईएएस बनि गेल तऽ कतेक आईआईटी मे एडमिशन लऽ कऽ देश मे नहि विदेशो मे बसि गेल अछि। मुदा, शर्माजीक दुकानक समोसा, ब्रोड पकौड़ा आओर कचौड़ीक स्वाद नहि बिसुरने अछि। सेल्फ सर्विस आओर अपने से वाजिब पाय दैक एतय आबै बला लोकक फितरत अछि। आलोक बाबू आगू लिखने अछि जे दुकानक मालिक अप्पन पुरैनका गप मन मे आनहि के कहैत अछि जे जम्मू के सरकारी नौकरी करैत रहि मुदा ओतय से गुवाहाटी ट्रांसफर भऽ गेल। हमर बेटा के पाइर खराब छल आओर एकर इलाज कराबैक छल। हम गुवाहाटी नहि जाइके इलाजक लेल दिल्ली आबि गेलहुं। अप्पन बेटाक आओर परिवारक लेल सरकारी नौकरी के छोड़ि देलहुं। हमरा पूंजीक अभाव छल। घर जम्मू-कश्मीरक उधमपुर जिलाक एकटा छोटा गाम मे छल, जतय आतंकवाद के कारणे हम घुरि नहि सकैत रहि। बस मजबूरी छल ताहि सं हम अप्पन दुकान खोलहि देलहुं। शर्माजी खुश भऽ कऽ कहैत अछि जे हरका चटनी बनाबै लेल हम नेने से जानैत रहि आओ किछु नव काज ओकरा मे करैत रहैत छी। ताहि सं हम जखन दुकान खोलहुं तऽ लोक सभ के हमर चटनी बड़ नीक लागहि लागल। हमरो नीक लागल आओर एकरा से उत्साह बढ़ल। किछु काल बीतल तऽ जकरा भूख लागैत छल ओ हमरा मन पाड़हि लागल। शर्माजी कहैत अछि जे ओ जखन दुकान खोनने छल तखन एतय एकको टा जलखहि करैक दुकान नहि छल, मुदा आब तऽ देखियौ कतेक दुकान खुजल अछि। एतौय सं रहि के कंपीटिशन मे पास करहि बला कतेक लोक कहैत अछि, जे बेरसराय मे एक बेर रहि गेल ओ कोना शर्माजीक चाह आ ब्रोड-पकौड़ा के बिसुरि सकैत अछि।" ई लेख लिखी के आलोक बाबू बेरसराय मे नाम कमाय लेलक। जे कियो लोक दुकान पर जाइत छल, शर्माजी हुनका लेख देखाबैक छल मुदा पढ़ैक लेल कहैत छल। जखन आलोक बाबू आबैत छलाह तखन ओ पांचक बदला मे दूए टा पाय लैत छल। एक ठाम जतय भारतीय भवन मे अंग्रेजी मे पत्रकारिताक पढ़ाई करैत छलाह ओहि ठाम जामिया मेे हिन्दी मे पढ़ैत रहैत। बेरसराय मे रहैत काल आलोक बाबूक जानपहचान आईआईएमसी मे पढैक बला छात्र आओर पढाबैक बला प्रोफेसर से सेहो भऽ गेल। आईआईएमसी के प्रोफेसर राजेंद्र जोशी से हुनका खूब पटैत छल आओर जखन हुनका नहि मन लागैत छल तखन हुनके संग बैसैत छल। जोशी के कारणे आलोक बाबू आईआईएमसीक लाइब्रोरी भेटहि गेल जतय कतेक किताब छल आओर आलोक बाबू खूब पढैत छल। अहि बीच एकटा एहन गप भेल जे आलोक बाबूक जिनगीक सीख दऽ देलक। जारी.......... १.हम पुछैत छी- मुन्नाजीक शब्‍दक जादूगर मैथि‍ली समीक्षाक प्रखर दृष्‍टि‍दर्शी एवं फरि‍छाएल कथाकार श्री दुर्गानन्‍द मंडलजी सँ भेँटवार्ता २.वीणा ठाकुर- गोनू झा आ आन मैथिली चित्रकथा १ हम पुछैत छी- मुन्नाजी शब्‍दक जादूगर मैथि‍ली समीक्षाक प्रखर दृष्‍टि‍दर्शी एवं फरि‍छाएल कथाकार श्री दुर्गानन्‍द मंडलजी सँ युवा लघुकथाकार मुन्नाजीसँ भेँटवर्ताक सारांश अहाँ सबहक आगाँ राखल जा रहल अछि- मुन्ना जी-       अहाँ मैथि‍लीक रचना कोना आ कहि‍या प्रारंम्‍भ केलौं, एतेक दि‍न धरि‍ हेराएल वा नुकाएल कि‍ए रहलौं? दुर्गानन्‍द मंडल-   जी हम मैथि‍लीक रचना श्री जगदीश प्रसाद मंडल जीक स्‍नेहाशील अजस प्रेरणाक बले 2009मे शुरू कएलहुँ। जहाँतक नुकाएल वा हेराएलक भाव अछि तँ हम कहए चाहब जे हम नै तँ नुकाएल रही आ ने हेराएल रही, हँ तखन अल्हुआ जकाँ झपाएल जरूर रही। मुन्ना जी-       अहाँक कथाक गढ़नि‍ बड्ड ठोस होइछ जेना सोनारक एक-एक गॉथल मोती जकाँ अहाँ एहेन शब्‍द प्रयोग कोना कऽ पबै छी, स्‍वभावि‍क रूपेँ वा शब्‍द संगोर मात्र कऽ रचना करै छी? दुर्गानन्‍द मंडल-   कथाक गढ़नि‍ प्रयुक्त शब्‍द स्‍वभावि‍क रूपेँ रहैत अछि। संगोरसँ ततबेक दूर जते की गदहाक माथमे सींग। मुन्ना जी-       अहाँ कथा पाठ करबाकाल सेहो एक-एक शब्‍दकेँ फरि‍छा श्रोताक सेझाँ राखि‍ ओकर अस्‍ति‍त्‍वकेँ फरि‍छा दैत छी एकर की ध्‍येय? दुर्गानन्‍द मंडल-   कथा पाठ करबाकाल एक-एक शब्‍द श्रोता बन्‍धूक सोंझा राखब ओकरा अस्‍ति‍त्‍केँ फरि‍छा देब, कथाकेँ सोझरा दैत अछि। कथा श्रवणीए भऽ जाइत अछि आ श्रोता बन्‍धू श्रवण करैमे सेहो आनन्‍दक अनूभव नि‍श्‍चि‍त रूपेँ होइत छन्‍हि‍। जे एकटा फरि‍छाएल कथाकारक कथाक सार्थकता थि‍क। मुन्ना जी-      गैर बाभन वर्गसँ कति‍एल रचनाकारक कति‍येवाक वा नुकएल रहवाक की कारण अपन रचनाक सामर्थ्‍यहीनता वा आर कोनो वि‍शेष कारण? दुर्गानन्‍द मंडल- गएर बाभन वर्गक कति‍आएल रचनाकारक कति‍येबाक वा नुकाएल रहबाक कोनो एक-आधटा कारण नै अछि‍। जँ वि‍स्‍तृत रूपसँ चर्च कएल जाए तँ मैथि‍ली साहि‍त्‍यक क्षेत्र वा ओकर वि‍स्‍तार मात्र एकटा जाति‍ वा वर्ग वि‍शेषसँ देखल जाइत रहल। जेकरा ओ लोकनि‍ अपन पूर्वजक धरोहरि‍क रूपमे अमानति‍ बुझैत रहलाह। मुदा आइ मैथि‍ली साहि‍त्‍यक वि‍स्‍तार ओ अपन सभ परि‍सि‍मनसँ बहरेबाक लेल औना रहल छलीह। मुदा वर्ग वि‍शेषक खि‍ंचल एकटा सीमा-रेखा जेकरा लांघि‍ कऽ बाहर भऽ जाएब बड्ड कठीन छल। ने ि‍सर्फ छल आइयो अछि‍। जेना जँ कोनो गएर-ब्रह्मण-कर्ण-कायस्‍थ वर्गक लोककेँ साहि‍त्‍यसँ अनुराग होइ तँ सभसँ पहि‍ने अपन मातृभाषाक प्रति‍ हेबाक चाही। मुदा जखन ओ मातृभाषा (मैथि‍ली)मे लि‍खए लेल कलम उठबैत छथि‍ तँ बैरि‍अर जकाँ ओहन-ओहन शब्‍द सभ आबि‍ ठाढ़ भऽ जाइत अछि‍ जे ओ अपना जीवनमे तँ अपने नहि‍ये बाजल छलाह अपि‍तु कि‍नको मुँहेँ कखनो-कहि‍यो सुननहुँ नै छलाह। तँ हमर कहबाक भाव मुन्नाजी अपने करीब-करीब बुझि‍ गेल हएब। एतबे नै समए-कुसमए मैथि‍ली साहि‍त्‍य लेखनमे नीकसँ नीक कथाकारक पदार्पण भेल मुदा ओइ कथाकार लोकनिमे सँ अधि‍कांशकेँ वर्ग-वि‍शेष पर्दाक पाछाँ रखलनि‍। मात्र कि‍छु गि‍नल-चुनल कथाकार लोकनि‍केँ पर्दापर आनल गेल। जे वर्ग-वि‍शेषक कोनो ने कोनो रूपमे पछि‍लग्‍गु वा मुँहलग्‍गु बनि‍ हुनकहि‍ शब्‍द आ बोलीकेँ (जे मात्र लि‍खल जाइत, बाजल नै) प्रश्रय दैत रहला। ओना ई अलग बात जे आजुक परि‍स्‍थि‍ति‍ थोड़ैक बदलल सन बुझाइत अछि‍। तहु लेल हमर कहब हएत जे बदलैत परि‍स्‍थि‍ति‍केँ देख गएर ब्राह्मण वा जि‍नका दऽ अपने कहऽ चाहै छी ओ सभ आगाँ आबि‍ रहला अछि‍। आ आरो एता से वि‍श्‍वास अछि‍। मुन्ना जी-      अहाँ समीक्षा सेहो लि‍खै छी, समीक्षाक प्रमुख आधार की रखै छी, रचनाकारक व्‍यक्‍ति‍त्‍व वि‍श्‍लेषण वा कृति‍त्‍व वि‍वेचन? दुर्गानन्‍द मंडल- मुन्नाजी, ओना हम कोनो समीक्ष नै छी। आ ने समीक्षा करबाक हमरा सामर्थ्‍य अछि‍। समीक्षा जगतमे एकसँ एक, पैघ समीक्षक सभसँ अपनेक भेँट-घाँट भेल हएत। जे प्रखर समीक्षकक रूपमे जानल जाइत रहलाहेँ। तखन समए पाबि‍ जे कि‍छु एक-आधटा लि‍खलौं। तैसँ हमरा समीक्षक नै मानल जाए। तखन, अपनेक प्रश्‍न- समीक्षामे व्‍यक्‍ति‍त्‍व वि‍श्‍लेषण वा कृति‍त्‍व वि‍वेचन- तँ वि‍चारनीय अछि‍। समीक्षाक प्रमुख आधार कोनो एकटाकेँ नै मानि दुनूकेँ आधार बनाओल जाए।‍ कि‍एक तँ कथाकारक कोनो कथाक समीक्षाक आधार जतबए हुनकर व्‍यक्‍ति‍त्‍व वि‍श्‍लेशन रहै छन्‍हि‍ ततबाए कृति‍त्‍व वि‍वेचन सेहो। तखन खगता ऐ बातक अछि‍, जे कि‍छु ओ कथाक मादे पाठककेँ देमए चाहै छथि‍न ओकरा ओ अपना जीवनमे कतेक अनुशरण करै छथि‍? मुन्ना जी-      अहाँक कथाक मुख्‍य वि‍न्‍दु की होइछ, कोनो कथाक कथानक कतए केन्‍द्रि‍त रहैछ? दुर्गानन्‍द मंडल- कथाक मुख्‍य बि‍न्‍दु गाम-घर, सर-समाजसँ जुड़ल समस्‍या आ नि‍दानक संग अपन सभ्‍यता-संस्‍कृति‍केँ यथावत रखनाइ। आ से सभ बि‍न्‍दुपर। मुन्ना जी-       गैरबाभन रचनाकारक उपस्‍थि‍ति‍क भवि‍ष्‍य अहाँ केहेन देखै छी, बाभन वा जमल रचनाकारसँ उखरि‍ हेरा जाएब वा अपन फरि‍छएल दृष्‍टि‍ऍ ओइसँ आगु डेग बढ़ा स्‍थापि‍त हएब सन? दुर्गानन्‍द मंडल-  हि‍नकर सबहक भवि‍ष्‍य एकदम सवर्णि‍म अछि‍। कारण अहाँ नीकसँ जनै छी जे अपन समाजमे अखनो वैदि‍क व्‍यवहार-चालि‍-चलन ि‍वद्यमान अछि‍ आ से हुनके सबहक बीच अहाँ देखब। नि‍श्‍चि‍त रूपेँ अपने ऐपर वि‍श्‍वास करी जे जँ ओ इमानदारी पूर्वक रचना करता तँ सत्‍यक समीप रहैक कारणे ओ कि‍नकोसँ फरि‍छाएल दूष्‍टि‍ऍं सोझा औताह। तखन खगता ऐ बातक अछि‍ जे ऐ कर्मकेँ अो अपन तपस्‍या बुझथि‍। पूर्ण नि‍ष्‍ठा आ लगनसँ लेखनीकेँ अनवरत रूपेँ साधथि‍। मुन्ना जी-       अहाँक कथेपर केन्‍द्रि‍त रचनाक मूल उद्देश्‍य की अछि, एकर अति‍रि‍क्‍त आर की सभ रचना करैत छी? दुर्गानन्‍द मंडल-   कथापर केन्‍द्रि‍त रचनाक मूल उद्देश्‍य पाठक बन्‍धुकेँ पूर्ण मनोरंजनक संग समाज बीच व्‍याप्‍त आराजक्‍ता, अंधवि‍श्‍वास, जाति‍-पाति‍ आदि‍केँ दूर करैत एकटा मानवीय मूल्‍यकेँ स्‍थापि‍त करब। जहाँधरि‍ आर-आर रचनाक प्रश्‍न अछि‍। मुन्ना बाबू तै सम्‍बन्‍धमे हम ई कहब जे शुरूहेँसँ अर्थात् जहि‍यासँ पाटीपर लि‍खब छोड़लहुँ पोथीक अध्‍ययन करब शुरू केलहुॅँ तहि‍येसँ साहि‍त्‍यक वि‍धा- कथा, उपन्‍यास, कवि‍ता आदि‍सँ बड्ड सि‍नेह रहल। कहि‍यो काल लघुकथा, कवि‍ता सेहो लि‍खैत रहलौं। वि‍श्‍वास अछि‍ जे आगाँ और लि‍खब। वि‍देह पत्रि‍काक सम्‍पादक श्री गजेन्‍द्र ठाकुर जीक सि‍नेहसँ हमरा अपनामे सृजनात्‍मक शक्‍ति‍क संचार भेल। बहुत रास एहेन शब्‍द सभ जे मैथि‍ली साहि‍त्‍यमे अप्रयुक्‍त छल। जेकरा ठेंठ कहल जाइ छलै ओ जखन ठाकुर जीक लि‍खल पोथी कुरूक्षेत्रम अन्‍तर्मनक पढ़ि‍ देलखहुँ आ जनलहुँ तँ आरो वि‍श्‍वास भऽ गेल। मुन्ना जी-       भवि‍ष्‍यमे अपन जाति‍-बि‍रादरी (पि‍छड़ल कोनो जाति‍क) लोकक उपस्‍थि‍ति‍क नि‍रन्‍तरता बनेने रहबाले अहाँ कोनो डेग उठाएब वा एकरा अनठि‍या देब उचि‍त बुझब? दुर्गानन्‍द मंडल-  भवि‍ष्‍यमे अपन जाति‍-बि‍रादरी (पि‍छड़ल जाति‍क) उपस्‍थि‍ति‍क नि‍रन्‍तरता बनौने रहबा लेल एकरा अनठि‍या देब उचि‍न नै अपि‍तु समए-समएपर नवसँ लऽ कऽ पुरान कथाकार लोकनि‍क बीच ठाम-ठाम चर्चा, परि‍चर्चा, पाँच-दस कथाकार मि‍ल कथा गोष्‍ठि‍क आयोजन, कथा-पाठ आदि‍पर उचि‍त समीक्षादि‍ करब। जइठाम मैथि‍ली पत्र-पत्रि‍काक अनुपलब्‍धता अछि‍ ओइठाम दस-बीस पाठक बना पत्र-पत्रि‍का वा पोथी आदि‍ मंगाएब। ओकरा अपनहुँ पढ़ि‍ दोसरोकेँ पढ़़बाक आग्रह करब। कि‍छु लि‍खबा-पढ़बाक प्रेरणा देब हम उचि‍त बूझब। मुन्नाजी अपने हमरा...... बुझलहुँ। ऐ लेल धन्‍यवाद। हम दुर्गानन्‍द मंडल। 2 वीणा ठाकुर अध्यक्ष, मैथिली विभाग, ल.ना.मिथिला विश्वविद्यालय, दरभंगा गोनू झा आ आन मैथिली चित्रकथा प्रीति ठाकुर रचित “गोनू झा आ आन मैथिली चित्रकथा” पढ़बाक आ देखबाक सुयोग भेल। देखबाक ऐ लेल जे ई पोथी चित्रकथा थिक अर्थात चित्रक माध्यमे संकलित सोलह कथाक चित्रण लेखिका कएने छथि। सोलह कथामे नौ कथाक नायक छथि गोनू झा आ शेषमे रेशमा चूहड़मल, नैका-बनिजारा, भगता ज्योति पँजियार, महुआ घटवारिन, राजा सलहेस, छेछन महराज आ कालिदास। सभ पात्र मिथिलाक संस्कृतिक प्रतिनिधित्व करैत। वस्तुतः संस्कृति शब्द अत्यन्त व्यापक अछि, दोसर शब्दमे कहल जा सकैत अछि जे एहन व्यवहार जे परम्परासँ प्राप्त होइत अछि, संस्कृति कहबैत अछि। एकरा सामाजिक प्रथाक पर्याय सेहो कहल जा सकैत अछि। प्रेम, त्याग, दया, करुणा, सहानुभूति आदि समस्त गुण संस्कृतिक अन्तर्गत समाहित होइत अछि। संगहि कलाक उद्देश्य जौँ सौन्दर्यक अनुसंधान एवं रसानुभूति होइत अछि तँ कलाक संबंध लोक संस्कृतिसँ रहब आवश्यक भऽ जाइत अछि। गोनू झाक कथा मिथिलाक घर-घरमे जनकण्ठमे व्याप्त अछि प्रायः प्रत्येक मिथिला निवासी अपन बुजुर्गसँ गोनू झाक कथा सुनने होएत आ पश्चात अपन बाल-बच्चा संगी-साथीकेँ सुनौने होएत। तहिना नैका बनिजारा, सलहेस, छेछन महराज, भगता ज्योति पँजियार- अपन शर्य, वीरता, पराक्रम आ उदात्त व्यक्तित्वक कारणेँ कहियो जौँ लोकनायक छलाह तँ पाछाँ लोकदेवता रूपमे पूजित होमए लगलाह। तहिना कालिदास अपना विद्वता एवं पाण्डित्यसँ भारतीय संस्कृतिमे अपन महत्वपूर्ण स्थान निर्धारित कऽ लेने छथि। महुआ घटवारिनक आदर्श प्रेम कथाएहुठाँ आदर्श रूपमे चित्रित होइत अमर भऽ गेल अछि। पोथीमे संकलित प्रत्येक पात्र एवं कथा मिथिलाक संस्कृतिक प्रतिनिधित्व कऽ रहल अछि। संस्कृति लोक जीवनसँ सम्बद्ध रहैत अछि। समाज आ संस्कृतिमे अभिन्न सम्बन्ध अछि किएक तँ संस्कृतिक निर्माण काल सापेक्ष होइत अछि, जेना समाजमे नीक कृत्यक अनुकरण होइत अछि। किछु अवधि पश्चात ओ समाजक प्रकृति भऽ जाइत अछि। कालान्तरमे ईएह प्रकृति संस्कृतिक रूप धारण कऽ लैत अछि। एवं प्रकारे कृति, प्रकृति आ संस्कृतिक क्रम चलैत रहैत अछि। ईएह कारण अछि जे संस्कृतिक निर्माण आ विनाशमे समय लगैत अछि जखनकि सभ्यतामे परिवर्तन क्रम समयमे होइत अछि। पोथीमे संकलित प्रत्येक पात्र अपन-अपन समयक प्रतिनिधित्व करैत मिथिलाक संस्कृतिक प्रतीक छथि। कलाकार, लेखिका प्रीति ठाकुरजी रेखा आ रंगक माध्यमसँ चित्रकथाक रचना कएने छथि। प्रत्येक चित्र किछु संकेतकेँ प्रकट कऽ रहल अछि। अकारण वा अनायास किछु नै बनाओल जा सकैत अछि। प्रत्येक चित्र तथ्यात्मक अछि, प्रत्येक रेखा एकटा कथाक निर्माण कऽ रहल अछि । मिथिलाक जन-जीवनक अभिव्यक्ति ऐ चित्र कथाक माध्यमसँ भेल अछि। वस्तुतः लोक चित्र कला तत्कालीन लोक जीवनक चित्रण करैत अछि जेना लोकगीत, लोकनृत्य, लोकभाषा आदिमाध्यमसँ तत्कालीन समाजक स्वरूपक ज्ञान होइत अछि। फूलक सुगंध सदृश संस्कृति अलक्ष्य होइत अछि मुदा वातावरणकेँ अपन सौरभसँ सतत सुवासित करैत रहैत अछि। ई आन्तरिक गुण थिक जकर मात्र अनुभव कएल जा सकैत अछि। एकर स्थान हृदयमे रहैत अछि, बाह्य आचरण ओकर मात्र प्रतिफल थिक। ऐ संस्कृतिक अभिव्यक्तिक माध्यम कला होइत अछि जेना नृत्य कला, संगीत कला, चित्र कला। चित्रकला मूक होइत अछि जकर भाषा रंग आ रेखा चित्र होइत अछि।कलाकार प्रीति ठाकुरजी मिथिलाक ऐ संस्कृतिकेँ नै मात्र रंग रेखाक माध्यमसँ चित्रित कएने छथि अपितु शब्दक माध्यमसँ चित्रित करैत अपन कलाकृतिक सौन्दर्य द्विगुणित कऽ लेने छथि। वस्तुतः हिनक ई प्रयास सर्वथा प्रशंसनीय छन्हि। कला मानव संस्कृतिक उपज थिक, कला आ मनुष्यक सम्बन्ध अविभाज्य अछि। मानव द्वारा कलाक प्रतिष्ठा भेल अछि आ कला द्वारा मानव आत्मगौरव आ आत्मचैतन्य प्राप्त कएने अछि। कलाक माध्यमे सँ मानव जीवनमे माधुर्य आ सौन्दर्यशीलताक जन्म भेल आ कर्म मधुर आ सुन्दर बनि गेल। वस्तुतः सौन्दर्यक मूलभूत प्रेरणा कलाक उद्घम स्थल थिक आ सौन्दर्याभिरुचिक प्रमाण। मनुष्यक अनुकरण प्रवृत्ति थिक। आदियेकालसँ प्राकृतिक दृश्य मानव मोनकेँ आनन्दित करैत रहल आ ऐ दृश्यक निर्माण करबाक इच्छा मोनमे जागृत भेल आ ईएह इच्छा जन्मक प्रेरक भेल। प्रीति ठाकुर जीक आत्मगौरव एवं आत्मचैतन्य ऐ चित्र कथाक रचना लेल प्रेरक भेलनि, आत्मगौरव मिथिलाक संस्कृतिक प्रति एवं आत्मचैतन्य सौन्दर्यशीलताक कारणेँ आ जकर प्रतिफल भेल विभिन्न कालक मिथिलाक लोकनायकक चित्रकथाक माध्यमसँ निरूपण करबाक। प्रिन्ट मीडिया आ इलेक्ट्रानिक मीडियाक कारणेँ जखन सम्पूर्ण विश्वक ग्लोबलाइजेशन भऽ गेल अछि, मिथिलाक चित्रकलामे अन्य कलाक विधा सदृश सेहो पारम्परिक स्वरूपमे परिवर्तन भेल अछि। परिवर्तनेक दोसर नाम तँ विकास थिक। लेखिका मिथिला चित्रकलाक पारम्परिक स्वरूपमे परिवर्तन तँ कएने छथि मुदा लोक चित्रकथाक माध्यमसँ एकर सार्थकता आ प्रासंगिकतामे सफल भेल छथि। किएक तँ मिथिलाक चित्रकला मूल्यग्राही अथवा कोमल हृदय कलाकारक मात्र हॉबी थिक अपितु परम्परावद्ध समाजक एकटा अभिन्न जीवन-दर्शन थिक, संगहि मैथिल संस्कृतिक जीवनक एक अविच्छिन्न अंग सेहो। समाजक परिवर्तनक प्रभाव कला आ साहित्यपर पड़ब स्वाभाविक अछि संगहि कला आ साहित्य समाजक प्रतिबिम्ब सेहो थिक। वस्तुतः साहित्य युगक प्रवृत्ति एवं प्रयोजनक उपेक्षा नै कऽ सकैत अछि। कला जीवनसँ निरपेक्ष नै रहि सकैत अछि कारण एकर आधार मानव जीवन थिक। एकर पोषण जीवनसँ होइत छैक, एकर प्रभाव मानव जीवनपर पड़ैत छैक, तेँ कलाकार जीवनक प्रति अपन उत्तरदायित्वक उपेक्षा नै कऽ सकैत अछि। आ ईएह कारण अछि जे कलाक स्वरूपमे परिवर्तन होइत रहैत अछि। ऐ वैश्विक प्रतियोगिताक युगमे मिथिलाक चित्रकला जइमे मात्र कोहबर, डाला, अष्टदल, अरिपन, मंडप, वेदी आदिक चित्र निर्माणक परिधिमे ओझरायल अछि, आवश्यक अछि जे मिथिला चित्रकलाक विषयवस्तुमे विस्तार कएल जाए। लेखिकाक ई सर्वथा नूतन प्रयास छन्हि। प्रीति ठाकुरजी परम्परागत विषय वस्तुसँ आगाँ बढ़ि मिथिलाक लोककथाकेँ चित्रकथाक माध्यमे चित्रित करैत मैथिली साहित्य मध्य सर्वथा नूतन शैलीक रचना कएलनि अछि। निश्चित रूपसँ मैथिली साहित्यक भंडारमे श्रीवृद्धि तँ भेल अछिये, ई नव शैली, नव विषय वस्तु एक शब्दमे नव स्टाइल सर्वथा प्रशंसनीय अछि। समय परिवर्तनशील होइत अछि, ऐ बदलैत समयक संग जे अपनामे परिवर्तन नै आनैत अछि से विकासक धारासँ बाहर भऽ जाइत अछि। तेँ समयक यथार्थक चित्रण कलाक माध्यमसँ होएब आवश्यक अछि, तखने कला अपन प्रासंगिकता सिद्ध कऽ सकैत अछि। वर्तमान बदलैत आधुनिक समाजक आवश्यकताक अनुरूप लेखिका ऐ पोथीक रचना कएलनि, ई प्रासंगिक तँ अछिये संगहि लोकोपयोगी सेहो अछि। संगहि एकटा तथ्य आर महत्वपूर्ण अछि। मैथिली लोक साहित्यक संरक्षिका मिथिलाक महिला लोकनि छथि, किएक तँ हिनकहि कण्ठमे लोकगीत आ लोकनृत्य आ हिनकहिं हाथे लोकचित्रकला जीवित अछि। त्याग आ तपस्यासँ युक्त हिनका लोकनिक सांस्कृतिक चेतनासँ लोककला जीवित अछि तथा हिनकहि लोकनिक कोमल तूलिकाक प्रसादात मिथिलाक चित्रकला जीवित, संरक्षित एवं विकसित भऽ रहल अछि। आ ई पोथी “गोनू झा आ आन मैथिली चित्रकथा”क रचयिता सेहो महिला छथि। ई सर्वथा स्तुत्य थिक। १.योगानन्‍द झा - आस्‍था, जि‍जीवि‍षा ओ संघर्षक प्रवाह-“गामक जि‍नगी‍”, आदर्शक उपस्‍थापन : मौलाइल गाछक फूल २.आशीष अनचि‍न्‍हार-गजलक साक्ष्‍य ३. ३. प्रो. वीणा ठाकुर- जि‍नगीक जीत उपन्‍यासक समीक्षा- प्रो. वीणा ठाकुर ४.शि‍व कुमार झा ‘टि‍ल्‍लू’ समीक्षा- हम पुछैत छी- कवि‍ता संग्रह‍ (वि‍नि‍त उत्‍पल), मैथि‍लीक वि‍कासमे बाल कवि‍ताक योगदान, मैथि‍ली उपन्‍यास साहि‍त्‍यमे दलि‍त पात्रक चि‍त्रण, भावांजलि‍, भफाइत चाहक जि‍नगी, भफाइत चाहक जि‍नगी, रमाजीक काव्‍य यात्रा ५. धीरेन्द्र कुमार- श्रीमती प्रीति‍ ठाकुरक दुनू चि‍त्रकथापर धीरेन्‍द्र कुमार एक नजरि‍ ६.जगदीश प्रसाद मंडल- कथा- कतौ नै ७. रमाकान्‍त राय “रमा‍”, गामक जि‍नगी- कथा संग्रह- जगदीश प्रसाद मंडल, आरसी बाबूक व्‍यक्‍ति‍त्‍व एवं कृति‍त्‍वपर द्वि‍दि‍वसीय राष्‍ट्रीय सेमि‍नार- दू दर्जन वि‍द्वानक सहभागि‍ता : आचार्य दि‍व्‍यचक्षु ८. रामकृष्‍ण मंडल 'छोटू'- कथा- बाप ९.शैल झा’ सागर"- किस्त-किस्त जीवन १ योगानन्‍द झा १ आस्‍था, जि‍जीवि‍षा ओ संघर्षक प्रवाह श्री जगदीश प्रसाद मंडल कृत “गामक जि‍नगी‍” हि‍नक उन्नैस गोट कथाक संग्रह थि‍क। एहि‍ कथा सभमे मि‍थि‍लाक ग्राम्‍य जीवनक मौलि‍क ओ अकृत्रि‍म छवि‍ अभि‍व्‍यक्त भेल अछि‍। आजुक संक्रमणशील युगमे मि‍थि‍लाक गाम कोन तरहेँ अपन परम्‍परि‍त जीवन पद्यति‍, आस्‍था ओ वि‍श्‍वासक संग प्रबल जि‍जीवि‍षाक बलेँ नि‍रन्‍तर संघर्ष पथपर आरूढ़ संग रूपायि‍त कएल गेल अछि‍। संग्रहक तीन गोट कथा क्रमश: ‘भैँटक लावा’, ‘बि‍साँढ़’ ओ ‘पीराड़क फड़’ मि‍थि‍लामे उपलब्‍ध प्राकृति‍क उपादानक उपयोगि‍तापर वि‍मर्श प्रस्‍तुत करैत अछि‍। बाढ़ि‍ आ सुखारसँ पीड़ि‍त मि‍थि‍लाक जनसमुदाय अपन जीवन रक्षाक हेतु कोन तरहेँ भैँट, वि‍साँढ़, पीरार आदि‍केँ अपन मेहनति‍क बलेँ साद्य पदार्थक रूपमे ग्रहन करैत रहल अछि‍ तथा एहि‍ठामक प्राकृति‍क संसाधनक उपयोग द्वारा कोना मि‍थि‍लाक भूखमरी ओ बेरोजगारीकेँ दूर कएल जा सकैछ, एकर आर्थिक वि‍कास कएल जा सकैछ तकर चि‍त्र एहि‍ तीनू कथामे भेटैत अछि‍। श्रमपर वश्‍वास, इमानदार प्रयास, कर्मण्‍यता ओ चातुर्यक संबलसँ वि‍पन्नतापर वि‍जयक ई गाथा सभ मि‍थि‍लाक लोकजीवनमे व्‍याप्‍त उत्‍साह ओ संघर्षक मर्मस्‍पर्शी चि‍त्र प्रस्‍तुत करैत अछि‍। संग्रहक अन्‍यान्‍य कथा सभमे वि‍भि‍न्न प्रकारक समस्‍या सभपर वि‍मर्श प्रस्‍तुत भेल अछि‍ आ एक गोट आदर्श ग्राम्‍य समाजक परि‍कल्‍पना प्रस्‍तुत भेल अछि‍। दहेजक सामाजि‍क समस्‍याक उन्‍मूलनक दृष्‍टि‍ए ‘घरदेखि‍या’ कथा अत्‍यन्‍त हृदयस्‍पर्शी अछि‍। मि‍थि‍लाक उच्‍चवर्गीय समाजमे धनलोलुपताक कारणे उत्‍पन्न एहि‍ समस्‍याक कुफल नारी प्रताड़नाक अति‍रेकक रूपमे अत्‍यन्‍त गर्हित स्‍थि‍ति‍ प्राप्‍त कएने अछि‍ जकर कारणे कन्‍याक वि‍वाह एकटा पैघ समस्‍या बनल रहल अछि‍ आ एकर कोनो ठोस समाधान अद्यावधि‍ समक्ष नहि‍ आबि‍ सकल अछि‍। मण्‍डलजी एहि‍ समस्‍याक समाधान लोकजीवनक वैचारि‍क परि‍वर्त्तनकेँ मानैत छथि‍ आ सर्वहारा वर्गक अति‍शय दीन पात्र लुखि‍यासँ कहबैत छथि‍- “नै। हम ककरो बेटीकेँ पाइ लऽ कऽ अपना घर नै आनब।‍” लुखि‍याक एही वाक्‍यमे दहेज समस्‍याक प्रति‍ समाधानक दि‍शा-बोध होइत अछि‍। आजुक युग तकनीकक युग थि‍कैक। नि‍त्‍य नूतन तकनीकक वि‍कासक कारणेँ जे केओ अपन तकनीकी ज्ञानमे अद्यतन बनल नहि‍ रहि‍ सकत, ओ जीवन-सघर्षमे पाछाँ धकेलि‍ देल जाएत। एहि‍ तथ्‍यसँ अवगत करएबाक उद्देश्‍य मण्‍डलजीक दुनू गोट कथा- ‘दूटा पाइ’ आ ‘हारि‍-जीत’मे अभि‍व्‍यक्‍त भेल अछि‍। ‘दूटा पाइ’क फेकुआ नूतन फैशनक अनुरूप सि‍आइक काज सि‍खबामे असमर्थ रहैत अछि‍ तेँ ओकरा शहरो छोड़ए पड़ैत छैक आ जीवि‍कासँ हाथो धो लैत अछि‍ जखन कि‍ ‘हारि‍-जीत’ कथाक रामदत्त कुम्‍हारक व्‍यवसायमे होइत नि‍त्‍य परि‍वर्त्तनक अनुरूप अपन व्‍यवसायोमे परि‍वर्त्तन कऽ मूत्ति‍कार बनि‍ जीवि‍कोपार्जनमे समर्थ बनल रहि‍ पबैत अछि‍। ओकरा जीवि‍कापर एहि‍ परि‍वर्त्तनक कोनो असरि‍ नहि‍ पड़ि‍ पबैत छैक जे घरैया बासनमे माटि‍क बदला धातुक प्रयोग होमए लगैत छैक आ खपराक घरक स्‍थान एस्‍बेस्‍ट्स शीटक मकान लऽ लैत छैक। एहि‍ तरहेँ ई दुनू कथा युग-परि‍वर्त्तनक संग चलबाक शि‍क्षा प्रदान करैत अछि‍। उपयोगि‍तापर आधारि‍त व्‍यवहारपरक एहि‍ युगमे लोक स्‍वार्थ मात्र दि‍स ततेक झुकि‍ गेल अछि‍ जे वृद्ध माता-पि‍ताक प्रति‍ कुभेला एकटा सामान्‍य बात भऽ गेल अि‍छ। आइ ‘मातृ देवो भव’, पि‍तृ देवो भव, लोक संस्‍कारसँ वि‍लुप्‍त भेल जा रहल छैक। श्रवण कुमारक आदर्शसँ लोक बान्‍हल नहि‍ रहि‍ सकल अछि‍। जाहि‍ भारतमे कृतज्ञता वशात् लोक गाछ पर्यन्‍तक पूजक अछि‍, ततहि‍ पालि‍-पोसि‍, पढ़ा-लि‍खा कऽ समर्थ बनौरि‍हार माताे-पि‍तोक प्रति‍ कृतज्ञ रहबामे संकोच भऽ रहल छैक। समाजमे आएल एहि‍ परि‍वर्त्तनकेँ रेखांकि‍त कऽ मंडलजी दू गोट कथामे एहि‍पर वि‍मर्श प्रस्‍तुत कएलनि‍ अछि‍ जकर नाम अछि‍ क्रमश: ‘भैयारी’ आ ‘बहि‍न’। ‘भैयारी’क कुसुमलाल अपन जेठ भाय दीनानाथक परि‍श्रमक बलपर उपार्जित पाइसँ जखन पढ़ि‍-लि‍खि‍ कऽ नोकरी करए लगैत अछि‍ तँ गामक अपन हि‍स्‍साक सम्‍पत्ति‍ बेचि‍ शहरी जीवन व्‍यतीत करए लगैत अछि‍। ओकरा अपन लकवाग्रस्‍त पि‍ता आ वृद्धा माताक कोनो ध्‍यान नहि‍ रहैत छैक। तेँ जखन ओ दारूक सेवनक कारणेँ असमय कालकवलि‍त होएबापर वृत्त भऽ जाइत अछि‍  आ माएकेँ ई समाद भेटैत छनि‍ जे ओ ओकर अन्‍ति‍म दर्शन कऽ लेथि‍ तँ माएक एहि‍ उक्‍ति‍मे वृद्धा माता-पि‍ताक वैकल्‍य अभि‍शापक रूपमे प्रकट होइत अछि‍- “कुसुमा हमर बेटा थोड़े छी जे मुँह देखबै। उ तँ ओही दि‍न मरि‍ गेल जइ दि‍न हमरा दुनू परानीकेँ छोड़ि‍ चलि‍ गेल। आइ बीस बर्खसँ अइ हाथ-पाएरक बलेँ बीमार पति‍केँ जीवि‍त राखि‍ अपन चूड़ी आ सि‍नूरक मान रखने छी।‍” ‘बहीन’ कथामे सरोजनी नामक वृद्धाक कथा अछि‍ जनि‍क मृत्‍युक अवसरपर बजौलो उत्तर हुनक पुत्री रीता हुनक अन्‍ति‍म दर्शनक हेतु नहि‍ अबैत छथि‍ आ व्‍यस्‍त होएबाक लाथ लगा दैत छथि‍ जखन कि‍ परजाति‍क मुसलमानि‍ बहि‍ना शबाना हुनका देखबाक हेतु अबैत छथि‍न। राधेश्‍यामक एहि‍ चि‍न्‍तनमे सम्‍बन्‍ध-बन्‍धक वास्‍तवि‍कताकेँ उद्घाटि‍त करैत कहल गेल अछि‍- “दुनि‍याँमे बहि‍नि‍क कमी नहि‍ अछि‍। लोक अनेरे अप्‍पन आ वीरान बुझैत अछि‍। ई सभ मनक खेल थि‍क। हँसी-खुशीसँ जीवन बित‍बैमे जे संग रहए वएह अप्‍पन।‍” माता-पि‍ताक प्रति‍ धि‍यापुताक कुभेलाक संगहि‍ एहि‍ कथामे मानवतावादक प्रति‍पादन मंडल जीक लक्ष्‍य बुझना जाइत अछि‍। उच्‍च शि‍क्षा प्राप्‍त वर्गमे सम्‍प्रति‍ वि‍देश गमनक लि‍लसा प्रबल देखल जाइत अछि‍। एहि‍ प्रवृत्ति‍क कारणे ओ लोकनि‍ स्‍वदेश सेवासँ तँ वंचि‍त एहि‍ये जाइत अछि‍, अपनो जीवनक परि‍वेश संकुचि‍त बना लैत छथि‍। ‘पछतावा’ कथा शि‍क्षि‍त वर्गक एही अध:पतनक कथा थि‍क। एकर प्रमुख पात्र रघुनाथक एहि‍ पश्‍चात्तापपूर्ण उक्‍ति‍मे एहन लोकक मानसि‍कताक अभि‍व्‍यक्‍ति‍ कएल गेल अछि‍- “हमरासँ सइओ गुना ओ नीक छथि‍ जे अपना माथपर पानि‍क घैल उठा मातृभूमि‍क फुलवारीक फूलक गाछ सीचि‍ रहल छथि‍‍। अपन माए-बाप, समाजक संग जि‍नगी बि‍ता रहल छथि‍। जि‍नगीक अन्‍ति‍म पड़ावमे पहुँचि‍ आइ बुझि‍ रहल छी जे ने हमरा अपन परि‍वार चि‍न्‍हैक बुद्धि‍ भेल आ ने गाम-समाजक।” एही तरहेँ ‘बोनि‍हारि‍न मरनी’मे सर्वहाराक प्रति‍ करूणा, ठेलाबलामे सर्वहाराक संघर्ष, ‘जीि‍वका’मे जनवि‍तरण प्रणालीमे व्‍याप्‍त भ्रष्‍टाचार, ‘रि‍क्‍शाबला’मे सर्वहाराक उन्‍मुक्‍त जीबन आ सम्‍पत्ति‍शाली वर्गक नारीक कुंठा, ‘चूनवाली’मे सर्वहारावर्गक स्‍नेह-सम्‍बन्‍ध आदि‍केँ आधार बना कऽ कथा गढ़ल गेल अछि‍ जे अत्‍यन्‍त रोचक भेल अछि‍। ‘अनेरूआ बेटा’ लोकजगतमे शि‍क्षाक आवश्‍यकतापर बल दैत अछि‍ तँ ‘डाक्‍टर हेमन्‍त’ सुदूर देहातमे स्‍वास्‍थ्‍य सुवि‍धाक व्‍यवस्‍थाकेँ रेखांकि‍त करैत अछि‍। ‘बाबी’ कथाक माध्‍यमे मंडलजी हि‍न्‍दू-मुस्‍लि‍म एकताकेँ छठि‍ पाबनि‍क आधारपर दृढ़ता प्रदान करबाक राष्‍ट्रीय दायि‍त्‍वक प्रतीक्षा सतर्कता दर्शौलनि‍ अछि‍। ‘डीहक बॅटबारा’ भ्रष्‍टाचार पूर्वक धन अर्जन कएनि‍हार समाजक अधोगति‍क चि‍त्रांकन करैछ। मंडलजीक अधि‍कांश कथा वर्णनात्‍मक शैलीमे लि‍खल गेल अछि‍। एहि‍ शैलीक कारणें हि‍नक कथा सभमे उपन्‍यासि‍क आनन्‍द भेटैत अछि‍ मुदा एके कथामे अनेक उपकथा सभक सम्‍मि‍श्रणक कारणें बहुधा लघुकथाक क्षि‍प्रता ओ सघनता बाधि‍त देखि‍ पड़ैत अछि‍। हि‍नक वर्णनमे अवश्‍ये चारूताक दर्शन होइत अछि‍ आ पाठक समक्ष समग्र चि‍त्र रूपायि‍त भऽ जाइत अछि‍ यथा- “पछि‍ला चारि‍ सालक रौदी भेने गामक सुरखि‍ये बेदरंग भऽ गेल। जे गाम हरि‍यर-हरि‍यर गाछ-बि‍रीछ, अन्नसँ लहलहाइत खेत, पानि‍सँ भरल इनार-पोखरि‍, सैकड़ो रंगक चि‍ड़ै-चुनमुनी, हजारो रंगक कीट-पतंगसँ लऽ कऽ गाए, महींस आ बकरीसँ भल रहैत छल ओ मरणासन्न भऽ गेल। सुन्न-मसान जेकाँ। वीरान। सबहक मनमे एक्केटा वि‍चार अबैत जे आब ई गाम नै रहत। जँ रहबो करत तँ माटि‍येटा। कि‍एक तँ जाहि‍ गाममे खाइक लेल अन्न नहि‍ उपजत, पीबैक लेल पानि‍ नहि‍ रहत, ताहि‍ गामक लोक की हवा पीबि‍ कऽ रहत।‍” इत्‍यादि‍। मंडलजीक हृदयमे ग्राम्‍य जीवनक प्रति‍ अगाध नि‍ष्‍ठा छनि‍ आ मि‍थि‍ला ओ भारतक आदर्श ग्रामक परि‍कल्‍पना छन्‍हि‍। तेँ ओ ओहि‍ सभटा परि‍स्‍थि‍ति‍ दि‍स नजरि‍ खि‍रबैत देखि‍ पड़ैत छथि‍ जे ग्राम्‍य जीवनक सौन्‍दर्यक हेतु बाधक बनल अछि‍। एकटा पात्रक माध्‍यमे ओ कहैत छथि‍- “गाममे ने पानि‍ पीबैक ओरि‍यान छै, ने खाइक लेल सभकेँ संतुलि‍त भोजन भेटै छै, ने भरि‍ देह कपड़ा भेटै छै, ने रहैक लेल घर छै, ओहि‍ देशकेँ मरल नै कहबै तँ की कहबै। एखनो लोक सड़ल पानि‍ पीबैत अछि‍, कहुना कऽ कि‍छु खा दि‍न कटैत अछि‍, गाछक नि‍च्‍चांमे आगि‍ तापि‍ समए बि‍तबैत अछि‍, हजारो रंगक रोग-व्‍याधि‍सँ घेरल अछि‍, ओहि‍ देशकेँ की कहबै? हजारो वर्षक मनुक्‍खक इति‍हासमे एखनो धरि‍ सरस्‍वतीक आगमन सभ मनुक्‍ख धरि‍ नै भेल अछि‍, ओहि‍ देशकेँ की कहबै? आदि‍। अवश्‍ये हुनक आदर्श गामक परि‍कल्‍पना सर्वथा सुवि‍धासम्‍पन्न, आर्थिक रूपेँ सबल आ सुशि‍क्षि‍त गामक छनि‍। जकर चर्चा बेर-बेर हुनक कथा सभमे अनायास आएल अछि‍।‍” अपन कथा सभमे मंडलजी कतहु कृत्रि‍मताक प्रवेश नहि‍ होमय देलनि‍ अछि‍। स्‍वभावत: हि‍नक भाषा, संवाद, वर्णन, वस्‍तु, चरि‍त्र आदि‍ समरत्त उपादानमे सहजताक दर्शन होइत अछि‍। हि‍नक अधि‍कांश कथा ग्राम्‍य जीवनसँ सम्‍बद्ध अछि‍ तेँ ई पात्रक नामावली सेहो ओही जीवनसँ लेने छथि‍ यथा- फुलि‍या, दुखनी, बेचन, सुगि‍या, धनि‍या, पि‍चकुन, पि‍हुआ, भुलि‍या, फेकुआ, लुखि‍या, सोमन, मरनी, रघुनी, बुचाइ, बचनू आदि‍, मुदा जखन ई नागर पात्रकेँ अपन कथामे प्रवेश दैत छथि‍ तँ वर्गीय नामोक प्रयोग करैत छथि‍ यथा- मुकुन्‍द, शि‍वनाथ, रूक्‍मि‍णी, शोभाकान्‍त, रागि‍नी, सुनयना आदि‍। पात्रक रंखाचि‍त्र पाठकक मानसमे उतारि‍ देबाक हि‍नक झमता मरनीक एहि‍ रूवरूप-वर्णनमे अत्‍यन्‍त उत्‍कृष्‍ट देखि‍ पड़ैछ- “कारी झामर एकहड्डा देह, ताड़-खजूरपर बनाओल चि‍ड़ैक खोंता जेकाँ केश, आंगुर भरि‍-भरि‍क पीअर दाँत, फुटल घैलि‍क कनखा जेकाँ नाक, गाइयक आँखि‍ जेकाँ बड़का-बड़का आँखि‍, साइयो चेफड़ी लागल साड़ी, दुरगमनि‍या आँगि‍ फटलाक बाद कहि‍यो देहमे आंगीक नसीब नहि‍ भेल, बि‍ना साया-डेढ़ि‍याक साड़ी पहि‍रने। यएह छी मरनी।‍” मात्र ई वर्णन मरनीक प्रति‍ करूणा उत्‍पन्न करबामे सक्षम सि‍द्ध अछि‍। ग्राम्‍य जीवनक वर्णन करैत काल ओकर श्‍याम पक्षकेँ सेहो मंडलजी यथावत् राखि‍ कथाक सहजताकेँ अक्षुण्‍ण रखलनि‍ अछि‍। ग्राम्‍य जीवनमे ताड़ी-दारू, गाँजा-भांग, बीड़ी-सलाइ आदि‍क प्रयोगकेँ ई वि‍भि‍न्न कथामे सहजताक सृजनक हेतु प्रयुक्‍त कएलनि‍ अछि‍। आस्‍था आ वि‍श्‍वास ग्राम्‍य जीवनक अंग थि‍क। मंडल जीक कथा सभमे अनेक ठाम लोक जीवनक जीवन्‍त आस्‍थाक चि‍त्रण भेल अछि‍ यथा- “इन्‍द्र भगवानकेँ कोनो चीजक दुख भऽ गेल हेतनि‍। तेँ हुनका बौसब जरूरी अछि‍।” यएह सोचि‍ कि‍यो भूखल-दुखलकेँ अन्नदान तँ कि‍यो कीर्तन-अष्‍टयाम-नवाह, तँ कि‍यो यज्ञ-जप चंडी, वि‍ष्‍णु तँ कि‍यो महादेव पूजा लि‍ंग इत्‍यादि‍ अनेको रंगक बौस’क ओरि‍यान शुरू केलक। जनि‍जाति‍ सभ कमला-कोशीकेँ छागर-पाठी कबुला सेहो करए लगलीह। इत्‍यादि‍।‍      ग्राम्‍य जीवन लाख अभाव-अभि‍योगक अछैतो जाि‍ह उत्‍साह ओ उमंगकेँ अङेजने रहैत अछि‍, से एकर अपार जि‍जीवि‍षाक प्रतीक थि‍क। मण्‍डल जीक कथा सभमे पात्रक चरि‍त्रमे कुंठा ओ संत्रास पर जि‍जीवि‍षाक वि‍जय देखाओल गेल अछि‍ जािहसँ हि‍नक कथा सभ नव आशाक संचार कय लोक जीवनक सोनहुल भवि‍ष्‍यक प्रति‍ आश्‍वस्‍त करैत अछि‍। द्रष्‍टव्‍य अछि‍ कि‍छु पाँती- - “अपन धन हएत, तइपर सँ मेहनत करब तँ कोन दरीदराहा दुख आबि‍ कऽ हम्‍मर सुख छीनि‍ लेत।‍” -    “एक्केटा बाढ़ि‍मे एत्ते चि‍न्‍ता‍ करै छथि‍ काका, कनी नीक की कनी अधलाह, दि‍न तँ बि‍तबे करतनि‍।” -    “‍जकरा खाइ-पीबैक ओि‍रयान बूझल छैक ओ कथीक चि‍न्‍ता करत। इत्‍यादि‍।” एतवता मण्‍डल जीक ‘गामक जि‍नगी’ कथा संग्रहमे ग्राम्‍य शब्‍दावलीक माध्‍यमे ग्राम्‍य जीवनक सौन्‍दर्य ओ समस्‍या तथा तकरा सबहक वि‍वेकपूर्ण नि‍दान दि‍स इंगि‍त करबाक प्रयास भेल अछि‍ जे मैथि‍ली कथा वि‍धामे अन्‍यतम याेगदानक रूपमे चर्चित-अर्चित होएबाक सार्मथ्‍य रखैत अछि‍। पोथीक नाम- गामक जीनगी वि‍धा- कथा संग्रह रचनाकार- जगदीश प्रसाद मंडल काँपी राइट- उमेश मंडल प्रकाशक- श्रुति‍ प्रकाशन राजेन्‍द्र नगर दि‍ल्‍ली मूल्‍य- २०० टाका मात्र प्रकाशन वर्ष- सन् २००९ पोथी पाप्‍ति‍क स्‍थान- पल्‍लवी डि‍स्‍ट्रीब्‍यूटर्स, वार्ड न.६, नि‍र्मली, सुपौल, मोवाइल २ आदर्शक उपस्‍थापन : मौलाइल गाछक फूल श्री जगदीश प्रसाद मण्‍डल बहुआयामी रचनाकार छथि‍। कथा, उपन्‍यास, नाटक आदि‍ वि‍भि‍न्न वि‍धामे प्रभूत रचना द्वारा ई आधुनि‍क मैथि‍ली साहि‍त्‍यमे बेछप स्‍थान बना चुकल छथि‍। ‘मौलाइल गाछक फूल’ हि‍नक औपन्‍यासि‍क कृति‍ थि‍कनि‍। आदर्शवादी वि‍चारधारासँ ओतप्रोत हि‍नक एहि‍ उपन्‍यासमे मण्‍डलजीक उदात्त सामाजि‍क चि‍न्‍तनक प्रक्षेपण भेल अछि‍। एहि‍ उपन्‍यासक अधि‍कांश चरि‍त्र उदार ओ सज्‍जन प्रकृति‍क छथि‍। हुनका लोकनि‍क हृदय पवि‍त्र छनि‍ आ स्‍वार्थ ओ वासनासँ फराक रहि‍ समाज उत्‍थानक हेतु चि‍न्‍तन करैत देखि‍ पड़ैत छथि‍। स्‍वभावत: एहन चरि‍त्र सबहक अनुगुम्‍फनसँ ई उपन्‍यास एक गोट पि‍रष्‍कृत सामाजि‍क चि‍न्‍तनक मार्ग प्रशस्‍त करैत देखि‍ पड़ैत अछि‍। एहि‍ उपन्‍यासक केन्‍द्रीय पात्र छथि‍ रमाकान्‍त। उपन्‍यासक अधि‍कांश घटना हि‍नके परि‍त: आघूर्णित होइत अछि‍। ई जमीन्‍दार छथि‍ आ सुभ्‍यस्‍त सेहो। उदार वि‍चार, इमानमे गंभीरता, मनुक्‍खक प्रति‍ सि‍नेह हि‍नक चारि‍त्रि‍क वि‍शि‍ष्‍टता छनि‍। हि‍नकामे ने सूदि‍खोर महाजनक चालि‍ छनि‍ ने धन जमा कएनि‍हार लोकक अमानवीय व्‍यवहारे छनि‍। नीक समाजमे जेना धनकेँ जि‍नगी नहि‍ अपि‍तु जि‍नगीक साधन बुझल जाइत अछि‍, सएह रमाकान्‍तोक परि‍वारमे छनि‍। उपन्‍यासक आरम्‍भहि‍मे हि‍नक उदात्त चरि‍त्रक परि‍चए भेटि‍ जाइत अछि‍। गाममे अकाल पड़ि‍ जाइत छैक। आ लोक सभ अन्न बेत्रेक मरब शुरू कऽ दैत अछि‍। मुदा रमाकान्‍त लग बखारीक बखारी अन्न पड़ल छनि‍। लोकक प्रति‍ सहानुभूति‍सँ द्रवि‍त भऽ रमाकान्‍त अपन बखार फोलि‍ दैत छथि‍ आ काजक बदला अनाज कार्यक्रम शुरू कऽ अपन पोखड़ि‍केँ उरहबा लैत छथि‍। एहि‍सँ एक दि‍स जँ लोककेँ अकर्मण्‍यतापूर्वक खराती अन्न लेबासँ परहेज करबैत छथि‍ तँ दोसर दि‍स अन्नाभावमे लोककेँ मरबासँ बचबैत छथि‍। रमाकान्‍तक ई अवधारणा छनि‍ जे संसारक यावन्‍तो मनुक्‍ख अछि‍ सभकेँ जीबाक अधि‍कार छैक। सभकेँ सभसँ सि‍नेह होएवाक चाहि‍ऐक। मुदा जाहि‍ परि‍वेशमे हमरालोकनि‍ जीवि‍ रहल छी, जाहि‍ठाम व्‍यक्‍ति‍गत सम्‍पत्ति‍ आ जबाबदेहीक बीच मनुक्‍ख चलि‍ रहल अछि‍, ओहि‍ठाम सि‍नेह खंडि‍त होएबे करतैक आ सि‍नेह खंडि‍त भेने पारस्‍परि‍क द्वेष ओ लड़ाइ-दंगाकेँ कोनो शक्‍ति‍ रोकि‍ नहि‍ सकैत छैक। तेँ नूतन समाजक नि‍र्माणक हेतु, सामाजि‍क समरसता हेतु त्‍याग भावनाक आवश्‍यकता छैक आ छैक पारस्‍परि‍क सहयोग भावनाक वि‍स्‍तारक आवश्‍यकता। तेँ ओ अपन दू सए बीघा जमीन गामक भूमि‍हीन परि‍वार सबहक बीच वि‍तरणक नि‍र्णए लैत छथि‍ जाहि‍सँ गामक सभ व्‍यक्‍ति‍ सुखी आ सम्‍पन्न भऽ सकथि‍। यद्यपि‍ रमाकान्‍तक एहि‍ प्रकारक अति‍शय उदारता जमीन्‍दारक प्रवृत्ति‍ ओ समसामयि‍क यथार्थक दृष्‍टि‍ये सर्वथा अवि‍श्‍वसनीय प्रतीत होइत अछि‍, तथापि‍ ई उदात्त लेखकि‍य कल्‍पना उपन्‍यासकारक एहि‍ उद्देश्‍यकेँ प्रति‍पादि‍त करैत अछि‍ जे यावत् समाजमे एक दि‍स अति‍ वि‍पन्न आ दोसर दि‍स अति‍ सम्‍पन्न लोकक वास रहत, ताधरि‍ सामाजि‍क समरसताक बात स्‍वप्‍ने बनल रहत। रमाकान्‍त उदारताक अति‍रंजि‍त वर्णन उपन्‍यासमे अनेक स्‍थलमे देखि‍ पड़ैत अछि‍ यथा ओ शशि‍शेखर नामक युवकक उच्‍च शि‍क्षाक हेतु सहायता प्रदान करैत छथि‍, गाममे स्‍कूल स्‍थापि‍त होएबा काल शि‍क्षकक भोजनादि‍क व्‍यवस्‍थाक भार अपना ऊपर लऽ लैत छथि‍, टमटमबलाक दु:खि‍ताहि‍ घरवालीक ईलाजक हेतु ओकरा पर्याप्‍त टाका दऽ सहायता करैत छथि‍, आदि‍। एहि‍ उपन्‍यासमे मण्‍डलजी मि‍थि‍लाक ग्राम्‍य जीवनमे पसरल धर्मभीरूताक समस्‍याक यथार्थवादी चि‍त्रण कएलनि‍ अछि‍। एहि‍ समस्‍याक चि‍त्रण हेतु ओ सोनेलाल नामक पात्रक अवतारणा करैत छथि‍। सोनेलालक पत्‍नी दु:खि‍त पड़ि‍ जाइत छथि‍न। ओ ओकरा अस्‍पतालमे देखएबाक हेतु अपन जमीन भरनापर दऽ दैत छथि‍। उपचार भेलापर हुनक पत्‍नी स्‍वस्‍थ भऽ जाइत छथि‍न। मुदा ताही क्रममे ओ साधु भण्‍डाराक कबुला कऽ लैत छथि‍। एहि‍ कबुलाकेँ पूर करबाक हेतु साधुक दूटा दल नि‍मंत्रि‍त कएल जाइत छथि‍। हि‍नकालोकनि‍क हेतु सोनेलाल पर्याप्‍त भोज्‍य पदार्थ जुटबैत छथि‍। मुदा साधुक दुनू दलमे एकटा वैष्‍णव सम्‍प्रदायक तथा दोसर कबीरपन्‍थी सम्‍प्रदायक रहैत अछि‍ आ दुनू दल अपन-अपन साम्‍प्रदायि‍क अभि‍वमानसँ ग्रस्‍त रहैत अछि‍ जकर कारणे भण्‍डारामे अनेक वि‍संगति‍ उत्‍पन्न होइ छैक। मुदा सर्वाधि‍क कष्‍टकर स्‍थि‍ति‍ तखन बनैत छैक जखन वैष्‍णव सम्‍प्रदायक महन्‍थ भण्‍डाराक बाद स्‍थानक हेतु एक सए एक, अपना हेतु एक सए एक, भजनि‍या सभक हेतु एकावन-एकावन आ भनसीयाक हेतु एकासी-एकासी टाका दक्षि‍णाक मांग कऽ बैसैत छथि‍। मराभवमे पड़ि‍तहुँ धर्मभीरू सोनेलालकेँ ओ रकम चुकता कऽ देबऽ पड़ैत छनि‍। तत:पर दोसर दल सेहो हुनका ओतबे दक्षि‍णा देबाक हेतु दबाब दैत छनि‍ आ सेहो हुनका चुकता करऽ पड़ैत छनि‍। एहि‍ तरहेँ धर्मभीरू लोक पाखंडी साधु समाज द्वारा कोना लूटल जाइत छथि‍, तकर वर्णन कए उपन्‍यासकार एहि‍ समस्‍याक प्रति‍ लोकदृष्‍टि‍केँ सचेत करबाक उपदेश दैत छथि‍। अवश्‍ये दोसर मंडली द्वारा दक्षि‍णाक रकम घुरा देलासँ सोनेलालकेँ थोड़ैक राहत भेटैत छनि‍ आ ओहि‍ मंडलीक प्रति‍ लोक जगतमे सहानुभूति‍ जगैत छैक। मि‍थि‍लाक अनेक लोकव्‍यवहार सेहो लोकजीवनक अभ्‍युन्नति‍मे बाधक रहल अछि‍, ताहू दि‍स मण्‍डलजी संकेत कएलनि‍ अछि‍। एहि‍ हेतु ई शशि‍शेखर नामक पात्रक अवतारणा कएलनि‍ अछि‍। शशि‍शेखर कृषि‍ कओलेजमे प्रवेश पाबि‍ जाइत अछि‍। ओ एहि‍ प्रवेशसँ अपन भावी सुखी जीवनक परि‍कल्‍पना कऽ अत्‍यन्‍त आनन्‍दि‍त होइत अछि‍। ओकर पि‍ता सेहो खेत बेचि‍यो कऽ ओकर पढ़ाइ पूरा करएबाक संकल्‍प लैत छथि‍। मुदा कि‍छु दि‍नक बाद पि‍ता बीमार पड़ि‍ जाइत छथि‍न। शशि‍शेखर खेत बेचि‍यो कऽ हुनक इलाज करबैत छनि‍ मुदा ओ कालकवलि‍त भऽ जाइत छथि‍न। तत:पर अपन बूढ़ि‍ माताक सेवा करैत शशि‍शेखर अपन आगूक पढ़ाइ कोना जारी राखि‍ सकत ताहि‍पर बि‍न्‍दु वि‍चार कएने खेते बेि‍च कऽ पि‍ताक श्राद्धो कऽ लैत अछि‍। परि‍णामत: ओकरा कओलेज छोड़बाक बाध्‍यता होइत छैक। एहि‍ तरहेँ मण्‍डलजी लोकजगतमे व्‍याप्‍त अन्‍धवि‍श्‍वास ओ लोकव्‍यवहारसँ बचले उत्तर समाजक कल्‍याणक दि‍शानि‍र्देश करबैत देखि‍ पड़ैत छथि‍। अन्‍तत: रमाकान्‍तक सहायतासँ शशि‍शेखरकेँ अपन पढ़ाइ पूर करबाक संबल भेटि‍ जाइत छैक मुदा श्राद्धादि‍त लोकव्‍यवहारक समस्‍याक प्रति‍ जुगुप्‍साक भाव अवश्‍य उत्‍पन्न भऽ जाइत छैक। अशि‍क्षा ग्राम्‍यजीवनक दैन्‍यक अन्‍यतम कारण अछि‍ एखनो मि‍थि‍लाक नि‍म्‍नवर्गीय समाजमे शि‍क्षाक सर्वथा अभाव छैक जकर कारणे सामाजि‍क अन्नति‍ बाधि‍क छैक। मुदा अहू समस्‍याक समाधान सामाजि‍क लोकनि‍क जागरूकतासँ संभव छैक। मसोमातक दान कएल जमीनपर वि‍द्यालयक स्‍थापना, हीरानन्‍द द्वारा बौएलाल ओ बौएलाल द्वारा सुमि‍त्राकेँ शि‍क्षि‍त कऽ ओकरा सबहक स्‍तरीय जीवनक चि‍त्रण ‘मौलाइल गाछक फूल’ उपन्‍यासक एही उद्धेश्‍यपरक दृष्‍टि‍कोणक परि‍चायक थि‍क। आजुक ग्राम्‍य समाजक ई वि‍डम्‍बना छैक जे पढ़ल-लि‍खल धि‍यापुता पाइ कमएबाक अन्‍ध दौड़मे शामि‍ल भऽ गेल छैक। तेँ ओ सभ अपन गाम-समाजकेँ छोड़ि‍ हजारो मीलक दूरीपर नोकरी करऽ चलि‍ जाइत छैक। परि‍णामत: बूढ़ माता-पि‍ताक परि‍चर्या कएनि‍हार केओ रहि‍ नहि‍ पबैत छैक। पारि‍वारि‍क वि‍घटनक फलस्‍वरूप सामाजि‍क जगतमे पसरल एहि‍ वि‍संगति‍क कथा रमाकान्‍त ओ हुनक डाक्‍टर पुत्र सबहक कथामे भेटैत अछि‍। मण्‍डलजी एहू वि‍डम्‍बनासँ समाजकेँ बचबाक संकेत एहि‍ उपन्‍यासक माध्‍यमे कएलनि‍ अछि‍। हुनक भावना सुबुधक एहि‍ उक्‍ति‍मे साकार भेल अछि‍- ‘आइक जे एकांगी परि‍वार अछि‍ ओ कुम्‍हारक घराड़ी जकाँ बनि‍ गेल अछि‍। बाप-माए कत्तौ, बेटा-पुतोहु कत्तौ आ धि‍या-पुता कत्तौ रहऽ लागल अछि‍। मानवीय सि‍नेह नष्‍ट भऽ रहल अछि‍।’ यद्यपि‍ ई भावना कृषक युगीन होएबाक कारणे साम्‍प्रति‍क यथार्थक दृष्‍टि‍ जे पुरातन पद्धति‍क अछि‍ तथापि‍ एकटा वैचारि‍क द्वन्‍द्वकेँ ठाढ़ करैत अछि‍। मण्‍डलजी रमाकान्‍तक दुनू डाक्‍टर पुत्रक मद्रासमे नोकरी करबाक लाथे कि‍छु ग्रामेतर समस्‍या सबहक चि‍त्रण सेहो कएलनि‍ अछि‍। एहि‍मे सर्वाधि‍क प्रमुख अछि‍ धनलि‍प्‍सामे व्‍यस्‍त समाजक बेचैनी। महेन्‍द्रक एहि‍ कथनसँ ई प्रति‍भासि‍त होइत अछि‍ जे ग्रामेतर समाजमे अत्‍यधि‍क सुवि‍धा सम्‍पन्न लोकोक जीवन असामान्‍य भऽ गेल छैक- ‘अपनो सोचै छी जे एते कमाइ छी, मुदा िदन राति‍ खटैत-खटैत चैन नहि‍ भऽ पबैत अछि‍। कोन सुखक पाछू बेहाल छी से बुझि‍ये ने रहल छी। टी.भी. घरमे अछि‍, मुदा देखैक समये ने भेटैत अछि‍। खाइले बैसै छी तँ चि‍ड़ै जकाँ दू-चारि‍ कौर खाइत-खाइत मन उड़ि‍ जाइत अछि‍ जे फल्‍लांकेँ समए देने छि‍ऐक, नहि‍ जाएब तँ आमदनी कमि‍ जाएत। तहि‍ना सुतइयोमे होइत अछि‍। मुदा एते फ्रीसानीक लाभ की भेटैत अछि‍? सि‍र्फ पाइ। की पाइये जि‍नगी छि‍ऐक?’ एतावता मौलाइल गाछक फूलमे लोकजीवनक वि‍वि‍ध समस्‍या ओ तकर समाधानक मार्ग तकबाक प्रयत्‍न भेल अछि‍। ‘अपन जि‍नगीकेँ जि‍नगी देखैत परि‍वार, समाजक जि‍नगी देखब जि‍नगी थि‍क।’ मण्‍डल जीक आदर्शवादी चि‍न्‍तनक रूपमे प्रति‍फलि‍त भेल अछि‍। प्राय: एही तथ्‍यकेँ ध्‍यानमे रखैत महेन्‍द्र द्वारा गामहि‍मे स्‍वास्‍थ्‍य केन्‍द्र स्‍थापना कऽ वि‍चार अभि‍व्‍यक्‍त कराओल गेल अछि‍ जतऽ ओकर परि‍वारक एकटा डाक्‍टर नि‍त्‍य मरीजक सेवा, ग्रामवासीक सेवाक हेतु उपलब्‍ध रहि‍तैक। सामाजि‍क समन्‍वयक प्रति‍ पक्षधरता एहि‍ उपन्‍यासमे भजुआक कथामे भेटैत अछि‍। जाति‍-पाति‍मे बँटल ग्राम्‍य समाजमे छूताछूत, ऊँच नीचक वि‍चार अदौसँ रहलैक अछि‍। गाँधीजीक स्‍वतंत्रता आन्‍दोलनक समए अछूतोद्धारक प्रति‍ हुनक चेष्‍टा ओ स्‍वातंत्र्योत्तर कालमे समाजक बदलैत रीति‍-नीति‍क कारणे यद्यपि‍ ग्रामो समाजमे अस्‍पृश्‍यताक प्रति‍ भाव बदललैक अछि‍ तथापि‍ सहभोजनक दृष्‍टि‍ये अखनो जाति‍-पाति‍क बीच दूरी बनले छैक। रमाकान्‍त द्वारा डोम भजुआक ओहि‍ठाम जाए भोजन करबाक कथाक माध्‍यमे मण्‍डलजी समाजक एहि‍ समस्‍याक आदर्शपूर्ण समाधान देखौलनि‍ अछि‍। अवश्‍ये एहि‍मे इहो संकेत देल गेल अछि‍ जे समरसताक बाधक तथाकथि‍त अस्‍पृश्‍य लोकनि‍क शुचि‍ताक प्रति‍ प्रतबद्धताक अभाव रहलनि‍ अछि‍। जे अशि‍क्षाजन्‍य अछि‍ तथा शि‍क्षा द्वारा ओकरो बदलल जा सकैत छैक। मण्‍डलजीक एहि उपन्‍यासमे नारी वि‍षयक चि‍न्‍तनमे प्राचीन भारतीय नारीलोकनि‍क आदर्शेक उपस्‍थापन भेल अछि‍। हि‍नक अधि‍कांश नारी पात्र यथा रधि‍या, श्‍यामा, सुगि‍या, सोनेलालक बहि‍न आदि‍मे पति‍परायणा भारतीय नारीक चि‍त्रांकन भेल अछि‍। नारी-शि‍क्षाक प्रति‍बद्धता सेहो मण्‍डलजीक एहि‍ उपन्‍यासमे सुमि‍त्राक माध्‍यमे अभि‍व्‍यक्र भेल अछि‍ जे पढ़ि‍-लि‍खि‍ कऽ नीक परि‍चारि‍काक रूपमे गामक हेतु एकटा सम्‍पत्ति‍ बनि‍ जाइत अछि‍। सुजाता सेहो एहने नारी पात्र छथि‍ जे श्रमि‍क परि‍वारमे जन्‍म लेलाक बादो महेन्‍द्रक सहायता पाबि‍ डाक्‍टरनी बनि‍ जाइत छथि‍ आ महेन्‍द्रक भावहु सेहो भऽ जाइत छथि‍। मुदा शि‍क्षि‍ताक संगहि‍ मंडलजी जाहि‍ नारीस्‍वरूपक परि‍कल्‍पना एहि‍ उपन्‍यासमे रूपायि‍त कएलनि‍ अछि‍, से थि‍क नारीक सबला रूप। नारीक एहि‍ स्‍वरूपक चि‍त्रांकन सि‍ति‍याक चरि‍त्रमे भेल अछि‍। ओ नहि‍ केवल अपन इज्‍जति‍पर हाथ उठौनि‍हार ललबाकेँ थूरि‍ कऽ राखि‍ दैत अछि‍ अपि‍तु जखन ललबाक गामक लोक ओकरा गामपर आक्रमण कऽ दैत छैक, तँ नारीलोकनि‍क सेनानायि‍का बनि‍ ओकरो सभकेँ परास्‍त कऽ दैत अछि‍। स्‍वातंत्र्योत्तर भारतमे भ्रष्‍टाचार एक गोट कोढ़क रूपमे देखि‍ पड़ैत अछि‍ जे राष्‍ट्रीय जीवनकेँ कुण्‍ठि‍त जीवन जीबाक बाध्‍यता होइत छैक। मास्‍टरक बहालीमे हीरानन्‍दक आक्रोशक माध्‍यमे मण्‍डलजी सरकारी स्‍तरपर होइत भ्रष्‍टाचारक यथार्थकेँ अभि‍व्‍यक्‍ति‍ प्रदान कएलनि‍ अछि‍। मि‍थि‍लाक आर्थिक समृद्धि‍क हेतु एहि‍ठाम जलकरक सदुपयोग करबाक चि‍न्‍तन सेहो एहि‍ उपन्‍यासमे अभि‍व्‍यक्त भेल अछि‍। मौलाइल गाछक फूक’क भाषा अत्‍यन्‍त सरल, सहज ओ गमैया मैथि‍ली थि‍क। मण्‍डलजी अपन कल्‍पि‍त संसारकेँ मूर्त्त, वि‍श्‍वसनीय ओ सजीव रूपमे प्रस्‍तुत करबाक हेतु लेखनक अनेक प्रवि‍धि‍केँ एहि‍ उपन्‍यासमे समाहि‍त कएने देखि‍ पड़ैत छथि‍। अनेक ठाम हि‍नक नाटकीय भाषा प्रयोग अत्‍यन्‍त तीब्रता ओ सहजताक संग भेल अछि‍, यथा- ‘की कहैले ऐहल?’ ‘नत दैले एलौं।’ ‘कोन काज छि‍अह?’ ‘काज-ताज नै कोनो छी। ओहि‍ना अहाँ चारू गोरेकेँ खुअबैक वि‍चार भेल’ इत्‍यादि‍। अनेकठाम ई संस्‍मरणात्‍मक भाषाक सुष्‍ठु प्रयोग कएने छथि‍ यथा- ‘एहि‍ गाममे पहि‍ने हम्‍मर जाति‍ नै रहए। मुदा डोमक काज तँ सभ गामेमे जनमसँ मरन धरि‍ रहै छै। हमरा पुरखाक घर गोनबा रहै। पूभरसँ कोशी अबैत-अबैत हमरो गाम लग चलि‍ आएल। अखार चढ़ि‍ते कोसी फुलेलै। पहि‍लुके उझूममे तेहेन बाढ़ि‍ चलि‍ आएल जे बाधक कोन गप्‍प जे घरो सभमे पानि‍ ढूकि‍ गेल। तीन-दि‍न तक ने मालजाल घरसँ बहराएल आ ने लोके। पीह-पाह करैत सभ समए बि‍तौलक। मगर पहि‍लुका बाढ़ि‍ रहै, तेसरे दि‍न सटकि‍ गेल।’ इत्‍यादि‍। परि‍वेश ओ वातावरणक नि‍र्माणक हेतु मण्‍डलजी अभि‍धा शक्‍ति‍सँ संपुष्‍ट भाषाक प्रयोग द्वारा सटीक ओ वि‍श्‍वसनीय बि‍म्‍ब ठाढ़ करबामे समर्थ देखि‍ पड़ैत छथि‍ यथा- ‘दू साल रौदीक उपरान्‍त अखाढ़। गारमीसँ जेहने दि‍न ओहने राति‍। भरि‍-भरि‍ राति‍ बीअनि‍ हौँकि‍-हौँकि‍ लोक सभ बि‍तबैत। सुतली राति‍मे उठि‍-उठि‍ पानि‍ पीबए पड़ैत। भोर होइते घाम उग्र रूप पकड़ि‍ लैत। जहि‍ना कि‍यो ककरो मारैले लग पहुँचि‍ जाइत, तहि‍ना सुरूजो लग आबि‍ गेलाह। रस्‍ता-पेराक माटि‍ सि‍मेंट जकाँ सक्कत भऽ गेल अछि‍।’ इत्‍यादि‍। पात्रक परि‍चय दैत काल मण्‍डलजी ओकर रूपरेखा, वेश भूषा, आयु आदि‍क वर्णन अनेक ठाम ओहि‍ पात्रक ठोस व्‍यक्‍ति‍त्‍वकेँ अभि‍व्‍यक्त करबाक हेतु कएलनि‍ अछि‍। मुदा एहि‍ प्रकारक वर्णनक प्रति‍ हुनका प्रति‍बद्धता नहि‍ देखि‍ पड़ैछ। तथापि‍ जतऽ कतहु ओ पात्रक मनोभावक वर्णन कएने छथि‍ ओहि‍ठाम हुनक भाषा वि‍श्‍लेषणात्‍मक प्रकृति‍क देखि‍ पड़ैत अछि‍ जाहि‍सँ पात्रक हृदयगत भावक प्रति‍ पाठककेँ सुनि‍श्‍चि‍त आकलनक अवसर भेटि‍ जाइत छनि‍, यथा- ‘ब्रह्मचारी जीक बात सुनि‍ रमाकान्‍तकेँ धनक प्रति‍ मोहभंग हुअए लगलनि‍। सोचए लगलाह जे हमरो दू सए बीघा जमीन अछि‍, ओते जमीनक कोन प्रयोजन अछि‍। जँ ओहि‍ जमीनकेँ नि‍र्भूमि‍क बीच बाँटि‍ दि‍ऐक तँ कते परि‍वार आ कत्ते लोक सुख-चैनसँ जि‍नगी जीबै लागत। जकरा लेल जमीन रखने छी ओ तँ अपने तते कमाइ छथि‍ जे ढेरि‍औने छथि‍। अदौसँ मि‍थि‍लाक ति‍यागी महापुरूषक राज रहल, कि‍एक ने हमहूँ ओहि‍ परम्‍पराकेँ अपना, परम्‍पराकेँ पुन:र्जीवि‍त कऽ दि‍ऐक।’ एहि‍ तरहेँ ‘मौलाइल गाछक फूल’मे भाषाक कुशल ओ रचनात्‍मक प्रयोग भेल अछि‍ जाहि‍सँ वर्णनमे सटीकता, सहजता, बि‍म्‍बधर्मिता, स्‍पष्‍टता ओ मनोवैज्ञानि‍क वि‍श्‍लेषणक क्षमता प्रदर्शित होइत अछि‍। अपन गुणक कारणेँ मण्‍डलजीक कथासंसारमे वि‍श्‍वसनीयता देखि‍ पड़ैत अछि‍ आ ओ अपन प्रौढ़ वि‍चार ओ अनुभूति‍केँ पाठकीय मानसमे स्‍थानान्‍तरि‍त करबामे सफल भेल छथि‍। अन्‍तत: महेन्‍द्रक उक्‍ति‍- ‘समाज रूपी गाछ मौला गेल अछि‍, ओहि‍मे तामि‍, कोड़ि‍, पटा नव जि‍नगी देबाक अछि‍ जाहि‍सँ ओहि‍मे फूल लागत आ अनवरत फुलाइत रहत’मे उपन्‍यासक उद्धेश्‍य स्‍फुट भेल अछि‍। स्‍वभावत: मण्‍डलजी एहि‍ कृति‍क माध्‍यमे ग्राम ओ ग्रामेतर जीवनक संगहि‍ व्‍यक्‍ति‍, परि‍वार, समाज ओ राष्‍ट्रक अभ्‍युन्‍नति‍क हेतु एकर प्रत्‍येक इकाइकेँ त्‍याग ओ त्‍याग ओ समर्पणक भावनासँ ओत प्रोत रहबाक आदर्श जीवन पद्धति‍ अपनयबाक संदेश देलनि‍ अछि‍। हि‍नक ई संदेश ‘सर्वे भवन्‍तु सुखि‍न: सर्वे सन्‍तु नि‍रामया:, सर्वे भद्राणि‍ पश्‍यन्‍तु मा कश्‍चि‍द् दु:खभाग भवेत्’क भावनाक पुन: उपस्‍थापन थि‍क। २ आशीष अनचि‍न्‍हार समालोचना गजलक साक्ष्‍य हमरा आगूमे पसरल अछि “अपन युद्धक साक्ष्‍य‍” तारानंद ि‍वयोगीक गजल संग्रह। चालीस गोट गजलकेँ समेटने। लोककेँ छगुन्‍ता लागि‍ सकैत छैक जे मैथि‍लीमे गजलक आलोचना कहि‍आसँ शुरू भए गेलैक। ऐ छगुन्‍ताक कारण मुख्‍यत: हम दू रूपेँ देखैत छी पहि‍ल तँ ई जे गजल कहि‍ओ मैथि‍ली साहि‍त्‍यक मुख्‍यधारामे नै आएल दोसर-मैथि‍ल-जन एखनो गजलक समान्‍य नि‍अम आ ओकर बनोत्तरीसँ परि‍चि‍त नै छथि‍। समान्‍ये कि‍एक अपने-आपकेँ गजल बुझनि‍हारक सेहो हाल एहने छन्‍हि‍। बेसी दूर नै जाए पड़त। “‍घर-बाहर” जुलाइ-सि‍तम्‍बर 2008ई.मे प्रकाशि‍त अजि‍त आजादक लेल “कलानंद भट्टक बहन्ने मैथि‍ली गजलपर चर्च‍” पढ़ि‍ लि‍अ मामि‍ला बुझबामे आबि‍ जाएत। जँ वि‍ष्‍यान्‍तर नै बुझाए तँ थोड़ेक देरले तारानंद वि‍योगीक पोथीसँ हटि‍ अजाद जीक लेखक चर्च करी। ऐ लेखक पहि‍ले पाँति‍ थि‍क- मैथि‍लीमे गजल लि‍खबाक सुदीर्ध परम्‍परा रहल अछि.....। मुदा कतेक सुर्ढीध तकर कोनो ठेकाना अजादजी नै देने छथि‍न्‍ह। फेर एही लेखक दोसर पैरामे अजि‍त जी दूमरजामे फँसल छथि‍। ओ मैथि‍ल द्वारा समान्‍य गप-सप्‍पमे गजलक पाँति‍ नै जोड़बाक प्रथम कारण मानैत छथि‍। जे मैथि‍लीमे शेर एकदम्‍मे नै लि‍खल गेल। आब पाठकगण कने घि‍यान देल जाए। लेखक पहि‍ल पाँति‍ तँ अपनेकेँ धि‍यान हेबोटा करत जे मैथि‍लीमे गजलक सुर्दीध....।” सभसँ पहि‍ल गप्‍प जे गजल कि‍छु शेरक संग्रह होइत छैक आ दोसर गप्‍प ई जे जँ अजाद जीक मोताबि‍क शेर लि‍खले नै गेलैक तँ फेर कोन प्रकारक सुर्दीध परंपराकेँ मोन पाड़ि‍ रहल छथि‍ अजादजी। एेठाम गलती अजाद जीक नै मैथि‍लीक ओहि‍ गजलकार सभक छन्‍हि‍ जे गजल तँ लि‍खैत छथि‍ मुदा पाठककेँ ओकर परि‍चए, गठन, नि‍अम आदि‍ देबासँ परहेज करैत छथि‍। ओना प्रसंगवश ई कहबामे कोनो संकोच नै जे गजल कखनो लि‍खल नै जाइत छैक। मुदा मैथि‍लीक धुरंधर सभ गजल लि‍खैत छथि‍। मूल रूपसँ अरबी-फारसी-उर्दूमे गजल कहल जाइत छैक लि‍खल नै। पाठकगण गजलक ई नि‍अम भेल। आब फेरो अजि‍त जीक लेखकेँ आगू पठू आ अपन कपार पीट अपनाकेँ खुने-खूनामे कए लि‍अ। अजि‍त जी अपन संपूर्ण लेखमे जै शेर सभ मक्‍ता कहलखि‍न्‍ह अछि वस्‍तुत: ओ मक्‍ता छैके नै। पाठकगण मोन राखू, मक्‍ता गजलक ओहि‍ अंति‍म शेरकेँ कहल जाइत छैक जैमे गजलकार (एकरा बाद हम शाइर शब्‍द प्रयुक्त करब, अहूठाम मोन राखू शायर गलत उच्‍चारण थि‍क।) अपन नाम वा उपनामक प्रयोग करैत छथि‍। (अहूठाम मोन राखू हरेक गजलमे नाम वा उपनामक समान प्रयोग होएबाक चाही ई नै जे एकरा गजलक मक्‍ता तारानंदसँ होअए आ दोसर गजलक मक्‍ता वि‍योगीक नामसँ नामसँ।) मुदा आश्‍चर्य रूपेण अजादजी जै शेर सभकेँ मक्‍ता कहलखि‍न्‍ह अछि ओइमे कोनो शाइरक नाम- उपनाम नै भेटत। ओना अजि‍तजी हि‍न्‍दीक सुप्रसि‍द्ध शाइर छथि‍ तकर प्रमाण ओ लेखक प्रारंभेमे दए देने छथि‍। हँ तँ ऐ लेखक संक्षि‍प्‍त अवलोकनक पछाति‍ फेरसँ वि‍योगी जीक गजल संग्रहपर चली। तँ शुरूआत करी स्‍पष्‍टीकरणसँ, हमर नै वि‍योगी जीक। सभसँ पहि‍ने ई जे अन्‍य मैथि‍ली शाइर जकाँ वि‍योगीओ जी मानैत छथि‍ जे गजल लि‍खल जाइत छैक। देासर गप्‍प जे वि‍योगीजी द्वारा देल अपन भाषा संबंधी वि‍चारसँ लगैत अछि जे भनहि‍ं ि‍वयोगी जी उर्दु सीख उर्दूक पोथी पढ़ैत हेताह मुदा गजल तँ कि‍न्नहुँ नै लि‍खैत हेताह, कारण, पाठकगण धि‍यान देल जाए। अरबी-फारसी-उर्दू तीनू भाषाक छंद शास्‍त्र एकमतसँ कहैए जे दोसर भाषाकेँ तँ छोड़ू अपनो भाषाक कठि‍न शब्‍दक प्रयोग गजलमे नै हेबाक चाही। ठीक उपरोक्‍त भाषाक नि‍अम जकाँ मैथि‍लीओ मे नि‍अम छैक। तँए महाकवि‍ वि‍द्यापति‍ अपन कोनहुँ गीतमे कृष्‍ण, वि‍ष्‍णु आदि‍क प्रयोग नै केने छथि‍। मुदा वि‍योगी जी अपन पोथीक नाम रखने छथि‍ “अपन युद्धक साक्ष्‍य‍”। जनसमान्‍य युद्ध तँ कहुना बुझि‍ जेतैक मुदा साक्ष्‍य....। ऐठाम प्रसंगवश ई कहब बेजाए नै जे वि‍योगीजी अपनाकेँ अभि‍जात शब्‍दक प्रयोग मानैत छथि‍। आब हमरा लोकनि‍ ऐ पाेथीमे प्रस्‍तुत चालीसो गजलक चर्च करी। पहि‍ले भाषाकेँ देखी। ओना वि‍योगीजी भाषा संबंधी गलती जानि‍ बूझि‍ कए लौल-वश ततेक ने कएल गेल छैक जकरा अनठा कए आँगा बढ़ब संभब नै। एकर कि‍छु उदाहरण प्रस्‍तुत अछि- दोसर गजलक मतलाक दोसर पाँति‍मे दुखक बदला यातना। अही गजलक दोसर शेरक पहि‍ल पाँति‍मे नाराक बदला जुमला। तेसर गजलक दोसर गजलक दोसर शेरक दोसर पाँति‍ धधराक बदला ज्‍वलन। अही गजलक अंति‍म शेरमे प्रयुक्‍त तन्‍वंग, आब एकर अर्थ जनताकेँ बुझबि‍औ। फेर आगू गजलक दोसर शेरमे नजरि‍ केर बदला दृष्‍टि‍, दसम गजलक दोसर शेरमे उन्‍यक जगह वि‍परीत। एगारहम गजलक मतलामे दुबि‍धाक जगह द्धैध। तेरहम गजलक तेसर शेरमे नेकदि‍ली आ बदीक प्रयोग। तइसम गजलक अंति‍म शेरमे भटरंगक बदला बदरंग। पचीसम गजलक तेसर शेरमे इजोरि‍आक बदला ज्‍योतसना। चौतीसम गजलक मतलामे दुख केर बदलामे पीड़-इत्‍यादि‍। ओना ऐ उदाहरणक अति‍रि‍क्‍त हरेक गजलमे हि‍न्‍दी, उर्दू, संस्‍कृत आदि‍ भाषाक तत्‍सम बहुल शब्‍दक ततेक ने प्रयोग भेल छैक जे गजलक मूल स्‍वर, भाव-भंगि‍मा, रसकेँ भरि‍गर बना देने छैक। तैपर वि‍योगीजी गर्व पूर्वक घोषण केने छथि‍ जे ओ ओइ परि‍वारक नै छथि‍ जि‍नका संस्‍कारमे अभि‍जात शब्‍द भेटल हो। बि‍डंबना छोड़ि‍ एकरा कि‍छु नै कहल जा सकैए। जँए चालीसो गजलक भाषाकेँ धि‍यानसँ देखल जाए तँ हमरा हि‍साबें वि‍योगीजी ऐ गजल सबहक मैथि‍ली अनुवाद कए देथि‍न्‍ह तँ वेसी नीक हेतैक। भाषासँ उतरि‍ आब गजलक वि‍चारपर आएल जाए। बेसी दूर नै जाए पड़त-तेसर गजलक अंति‍म शेरसँ मामि‍ला बुझबामे आबि‍ जाएत। सोझे-सोझ ई शेर कहैए जे- लोककेँ अपन जयघोष करबामे देरी नै करबाक चाही आ काज केहनो करी चान-सुरूजक पाँति‍मे अएबाक जोगाड़ बैसाबी। ओना हम एतए अवश्‍य कहब जे ई कोनो राजनीति‍क वि‍चार नै छैक जकर स्‍पष्‍टीकरण दए-वि‍योगीजी अपन पति‍आ छोड़ा लेताह। ई वि‍शुद्ध रूपे समाजि‍क वि‍चार छैक आ ऐ वि‍चारसँ समाजपर की नकारात्‍मक प्रभाव पड़लैक वा पड़तैक तकर अध्‍ययन अवश्‍य कएल जेबाक चाही। मुदा एहन नकारत्‍मक वि‍चार ऐ संग्रहमे कम्‍मे अछि। संग्रहक कि‍छु सकारात्‍मक ि‍वचार प्रस्‍तुत अछि। दसम गजल केर अवलोकन कएल जाउ। नि‍श्‍चि‍त रूपसँ वि‍याेगीजी एकरा परि‍र्वतनीय वि‍चार रखलाह अछि ई कहि‍ जे- देस हमर जागत अच्रक एना चलि‍ ने सकत हारि‍ लि‍खब झण्‍डा के आदमीक जीत लि‍खब। पाठकगण आजुक समएमे झण्‍डाक वि‍परीत गेनाइ सहज गप्‍प नै। तहि‍ना चारि‍म गजलक तेसर शेरक पहि‍ल पाँति‍- राम राज्‍यक स्‍थापना लेल भरत-लक्ष्‍मण झगड़ि‍ रहला। कतेक सटीक व्‍यंग अछि से सभ गोटे बुझैत हेबैक। ओतै आजुक भ्रमोत्‍पादक सरकारपर तै दि‍नमे लि‍खल अड़तीसम गजलक मतलाक पहि‍ल पाँति‍ देखू- राजनीति‍ भटकल तँ डूबल मझधार जकाँ। वि‍चार संबंधी प्रस्‍तुत उदाहरणसँ स्‍पष्‍ट अछि जे सकारात्‍मक वि‍चार बेसी अछि। मुदा कहबी तँ सुननहि‍ हेबैक अपने जे एकैटा सड़ल माछ.....। अस्‍तु आब ऐ गजल संग्रहक व्‍याकरण पक्षकेँ देखल जाए। ऐठाम ई स्‍पष्‍ट करब आवश्‍यक जे मैथि‍ली गजल अखनो फरि‍च्‍छ भए कए नै आएल अछि जैसँ हम बहर (छंद) आदि‍पर वि‍चार करब। तँए ऐठाम हम मात्र रदीफ आ काफि‍याक प्रयोगपर वि‍चार करब। पाठकगण गजलमे रदीफ ओइ शब्‍द अथवा शब्‍द समूहकेँ कहल जाइ छैक जे गजलक मतलाक (गजलक पहि‍ल शेरकेँ मतला कहल जाइत छैक।) दुनू पाँति‍मे समान रूपसँ आबए आ तकरा बाद हरेक शेरक अंति‍म पाँति‍मे सेहो समान यपे रहए। तहि‍ना काफि‍या ओइ वर्ण अथवा मात्राकेँ कहल जाइत जे रदीफसँ तुरंत पहि‍ने आबैत हो जेना एकटा उदाहरण देखू- दूटा शब्‍द लि‍अ, पहि‍ल भेल अनचि‍न्‍हार ओ दोसरमे अन्‍हार। आब मानि‍ लि‍अ जे ई दुनू शब्‍द कोनो गजलक मतलामे रदीफक तुरंत बादमे अछि। आब जँ गौरसँ देखबै तँ भेटत जे दुनू शब्‍दक तुकान्‍त “र‍” छैक। तँ एकर मतलब जे “र‍” भेल काफि‍या (काफि‍या मतलब तुकान्‍त बूझू) तेनाहि‍ते मात्राक काफि‍या सेहो होइतैक जेनाकि‍- राधा आ बाधा दुनू शब्‍द आ'क मात्रासँ खत्‍म होइत अछि तँए ऐमे आ'क मात्रा काफि‍या अछि। “एहि‍‍” आ “रहि‍‍” दुनूमे इ‍'क मात्राक काफि‍या अछि। अन्‍य मात्राक हाल एहने सन बूझू। तँ फेर चली ऐ संग्रहक व्‍याकरण पक्षपर- एे संग्रहक कि‍छु गजलमे काफि‍याक गलत प्रयोग भेल छैक- उदाहरण लेल सातम गजलकेँ देखू। मतलाक शेरमे काफि‍या अछि “न‍” (भगवान आ सन्‍तान)। मुदा वि‍योगीजी आगू देासर शेरमे काफि‍या “म‍” (गुमनाम) केँ लेलखि‍न्‍ह अछि जे सर्वथा अनुचि‍त। तेनाहि‍ते सताइसम गजलक उपरोक्त “म‍” काफि‍या बदलामे “न‍” काफि‍याक प्रयोग। कुल मि‍ला कए ई गजल संग्रह ओतेक प्रभावी नै अछि जतेक की शाइर कहैत छथि‍। हँ एतेक स्‍वीकार करबामे हमरा कोनो संकोच नै जे ई गजल संग्रह ओइ समएमे आएल जै समएमे गजलक मात्रा कम्‍मे छल। आ शाइर आ गजल संग्रह सेहो कम्‍मे जकाँ छल। ३. प्रो. वीणा ठाकुर अध्‍यक्ष, मैथि‍ली वि‍भाग ल.ना.मि‍.ि‍वश्‍व वि‍द्यालय दरभंगा। जि‍नगीक जीत उपन्‍यासक समीक्षा- प्रो. वीणा ठाकुर श्री जगदीश प्रसाद मंडलक उपन्‍यास ‘जि‍नगीक जीत’ पढ़वाक अवसर भेटल। उपन्‍यास पढ़ि‍ बुझाएल जे ई उपन्‍यास तँ वास्‍तवमे मि‍थि‍लाक संस्‍कृति‍क जीत थि‍क, जीवनक जीत थि‍क, संस्‍कारक जीत थि‍क। जौं एक शब्‍दमे कहल जाए तँ यएह कहल जा सकैत अछि‍ जे ई ‘लोक’क जीत थि‍क। जखनहि‍ लोकक जीत थि‍क तँ स्‍वभावि‍क अछि‍ जे एहि‍ उपन्‍यासक मध्‍य लोक साहि‍त्‍यक सुगन्‍ध चतुर्दिक पसरल हएत। उपन्‍यासक कथा मि‍थि‍लाक एकटा गाम कल्‍याणपुरक थि‍क, जतए जीवि‍काक मुख्‍य साधन थि‍क कृषि‍, जतए आधुनि‍क वैज्ञानि‍क युगक प्रकाश नहि‍ पहुँचल अछि‍। जतए उच्‍चतम शि‍क्षाक लक्ष्‍य थि‍क बी.ए. पास करब आओर जतए एकैसम शताब्‍दी एखन धरि‍ नहि‍ आएल अछि‍ आओर नहि‍ आएल अछि‍ शाइनि‍ंग इंडि‍याक प्रकाश। उपन्‍यासकार प्रमुख पात्र छथि‍ नायक बचेलाल, नायि‍का रूमा, मुख्‍य पात्र छथि‍ बचेलालक माए सुमि‍त्रा, अछेलाल, अछेलालक पत्‍नी मखनी इत्‍यादि‍। कथा अछि‍ बचेलालक द्वन्‍द्व एवं द्वन्‍द्वसँ उपजल अवसादक एवं जीवन संघर्षक, सुमि‍त्राक मि‍थि‍लाक नारीक गरि‍माक अछेलालक कर्त्तव्‍य नि‍ष्‍ठताक, संगहि‍ मानवीय संघर्षक, द्वन्‍द्वक आओर भवि‍ष्‍यक आशा-आकांक्षाक। नायकक मानसि‍क द्वन्‍द्व जौं जीवनक सार्थकता लेल अछि‍ तँ नायकक माए सुमि‍ताक दृष्‍टि‍ स्‍पष्‍ट मानवीय गरि‍मासँ युक्‍त अछि‍। नायकसँ एक डेग आगाँ बढ़ि‍ द्वन्‍द्वसँ मुक्‍ति‍क वाद देखबैत प्रकाश पुंज मध्‍य अछि‍। नायकक पत्‍नी रूमाक चरि‍त्रपर प्रकाश नहि‍ देल गेल अछि‍, ताहि‍ कारणे रूमा उपन्‍यास मध्‍य गौण पात्र भऽ गेल छथि‍। कोनहुँ समाजक जातीय मनीषा, सामुदायि‍क चेतना, जातीय बोध मानवीय मूल्‍य आओर जीवन दर्शनक वि‍वि‍ध पक्षमे अवगत होएवा लेल ओकर लोककेँ बुझब आवश्‍यक। उपन्‍यासकार एहि‍ उपन्‍यास मध्‍य अत्‍यन्‍त इमानदारी पूर्वक अपन समाज, मि‍थि‍लाक समाज, रहन-सहन, आशा-आकांक्षा एवं समयक सत्‍य लि‍खने छथि‍। समाजक नि‍म्‍न वगर्क, कृषक वर्गक जीवनक चि‍त्रण अत्‍यन्‍त इमानदारी पूर्वक कएने छथि‍। उपन्‍यासकार मि‍थि‍लाक वास्‍तवि‍क चि‍त्रण करवामे सफल भेल छथि‍, मि‍थि‍लाक तात्‍कालीन दशाक चि‍त्रण कएने छथि‍ तँ मात्र और मात्र अपन भाषा, देश एवं सामाि‍जक दायि‍त्‍व समाजक प्रति‍ प्रेम एवं प्रति‍बद्धताक कारणे हि‍नकासँ ई उपन्‍यास लि‍खवा लेने अछि‍। यद्यपि‍ कथाक प्रवाह अवरूद्ध अछि‍ तथापि‍ कथा अपन अंकमे देश-समाज, मानव, प्रकृति‍, संस्‍कृति‍, वि‍कृति‍ आदि‍केँ समेटि‍ अपन लक्ष्‍यपर पहुँचवामे सफल भऽ गेल छथि‍। हि‍नक उपन्‍यासमे हि‍नक व्‍यक्‍ति‍त्‍व पाठकक समक्ष स्‍पष्‍ट प्रतीत भेल अछि‍। जीवन दर्शन आओर आध्‍यात्‍मसँ लऽ कऽ मनुष्‍यक समस्‍त राग-वि‍राग ‘लोक’मे वि‍द्यमान अछि‍। मि‍थि‍लाक लोक संस्‍कृति‍ संवाहक उपन्‍यास ‘जि‍नगीक जीत’मे उपन्‍यासकार जीवनक ओहि‍ सत्‍यकेँ आत्‍मसात् करबाक प्रयास कएने छथि‍ जाहि‍मे जीवनक समस्‍त ‘सार’ नुकाएल अछि‍। उपन्‍यासक मध्‍यमे उपन्‍यासकार मनुष्‍य जीवनक समस्‍त राग-वि‍राग, आशा-आकांक्षा, दीनता-हीनता, उत्‍कर्ष-अपकर्षक चि‍त्रि‍त करैत वस्‍तुत: जीवनक शाश्‍वत तथ्‍य- जीवाक इच्‍छाकेँ उजागर करवामे सफल भेल छथि‍। वस्‍तुत: ई उपन्‍यास ई उपन्‍यास भाषा अथवा वोलीमे जातीय स्‍मृति‍क आ साहि‍त्‍यि‍क रूप थि‍क जे हमर जातीय चेतना अथवा जातीय वोधकेँ सुरक्षि‍त राखने अछि‍। मि‍थि‍लाक सूच्‍चा चि‍त्र अंकि‍त करैत उपन्‍यासकार अपन जीवनानुभवसँ संचि‍त कएल ‘सार’ आओर ‘सत्‍य’केँ अभि‍व्‍यक्‍त कएने छथि‍। वस्‍तुत: ई उपन्‍यास मि‍थि‍लाक संस्‍कृति‍क प्रतीक थि‍क आओर एकर सार थि‍क शाश्‍वत। उपन्‍यास मध्‍य प्रकृति‍, परि‍वेश, आध्‍यात्‍म, समरसता आओर समन्‍वयक छवि‍ आओर छटा सर्वत्र दृष्‍टि‍गोचर होइत अछि‍। वर्तमान साहि‍त्‍यमे ई प्रवृति‍ प्रमुख अछि‍- एक समाजोन्‍मुख दोसर व्‍यक्‍ति‍ नि‍ष्‍ठा तथा आत्‍म केन्‍द्रि‍त। उपन्‍यासकारक प्रवृति‍ समाजोन्‍मुख अछि‍। सम्‍पूर्ण उपन्‍यास मध्‍य मि‍थि‍लाक गामक लोकक रहन-सहन, अचार-वि‍चारक चि‍त्रण एतेक सजीव अछि‍ जे पाठककेँ ओहि‍ लोकमे लऽ जाइत अछि‍, जि‍नका गाम छुटि‍ गेल छन्‍हि‍। उपन्‍यास मध्‍य मि‍थि‍लाक समाजक चि‍त्र एतेक वास्‍तवि‍क रूपमे चि‍त्रि‍त्र भेल अछि‍ जे मि‍थि‍लाक माि‍ट-पानि‍क सुगन्‍धसँ पाठकक हृदय सहजहि‍ आहलादि‍त भऽ जाइत अछि‍। वर्तमान समएमे गामक लोकक पलायन शहर दि‍शि‍ भऽ गेल अछि‍, गाम पाछाँ छूटल जा रहल अछि‍। मुदा पाठक उपन्‍यास पढ़ि‍ पुन: गाम घुि‍र जाइत अछि‍, गामक स्‍मृति‍सँ पाठक बान्‍हल रहि‍ जाइत अछि‍। सामाजि‍क प्रश्‍नक प्रती सजग उपन्‍यासकार अपन एहि‍ रचनामे सामाजि‍क जीवनक अर्न्‍तवि‍रोध, वि‍संगति‍ एवं परि‍वेशक चि‍त्रण करैत, सामाजि‍क प्रश्‍नक नि‍दान मूलत: व्‍यक्‍ति‍मे ताकवामे सफल भऽ गेल छथि‍। मि‍थि‍लाक ग्रामीण समाजक, नि‍म्‍न वर्गक एवं कृषक समुदायक मान्‍यता एवं परम्‍पराकेँ प्रस्‍तुत करैत उपन्‍यासकार उपन्‍यासकेँ अत्‍यन्‍त संवेदय बना देने छथि‍ संगहि‍ एकटा नव संदेश- आशाक संदेश, भवि‍ष्‍य नि‍र्माणक संदेश देवाक सेहो प्रयास कएने छथि‍। एहि‍ संदेशकेँ उपन्‍यासकार लोकक भाषामे व्‍यक्‍त करैत संकीर्ण एवं अव्‍यवहारि‍क पक्षकेँ मानवीय सरोकारसँ जोड़ैत कल्‍पनाशीलता एवं संवेदन शीलताकेँ केन्‍द्रमे राखि‍ अपन उदेश्‍यकेँ चि‍त्रि‍त करवामे सफल भऽ गेल छथि‍। ‘बहुजन हि‍ताय बहुजन सुखाय’क ध्‍वनि‍ बुलंद करैत उपन्‍यासकार दया, ममता, आस्‍था, त्‍याग, परोपकार सदृश मानवीय गुणक पक्षधर प्रतीत होइत छथि‍। दोसर दि‍शि‍ एहि‍ गुणकेँ प्राप्‍ति‍क दि‍श नि‍र्देश सेहो कएने छथि‍। आधुनि‍क बुद्धि‍जीवी मानवक कार्य, ज्ञान आओर इच्‍छाक बीच तालमेलक अभाव आधुनि‍क जीवनक वि‍डम्‍बना थि‍क। मुदा उपन्‍यासकार मि‍थि‍लाक सरल, नि‍श्‍छल एवं सहज लोकक चि‍त्रण करैत वस्‍तुत: मि‍थि‍ला शुद्ध, पवि‍त्र एवं सत्‍यस्‍वायनक चि‍त्रण कएने छथि‍। उपन्‍यासक सभसँ पैघ वि‍शेषता थि‍क समाजक नि‍म्‍नवर्गक बोलचालक भाषा, लोक संवाद एवं लोकोक्‍ति‍क प्रयोगक संग समाजक वि‍षमता एवं वि‍संगति‍पर प्रहार करव। अपन जीवनानुभवकेँ अलग शैली एवं शि‍ल्‍पक माध्‍यमसँ नि‍रूपि‍त करवामे उपन्‍यासकार सफल भऽ गेल छथि‍। संगहि‍ इहो सत्‍य जे उपन्‍यासकारक अर्न्‍तमन अत्‍यन्‍त कोमन तन्‍तुसँ नि‍र्मित छन्‍हि‍ तेँ हि‍नक उपन्‍यास मध्‍य ‘रि‍सेप्‍टीवि‍टीक’ स्‍तर बहुत गाढ़ भऽ गेल छन्‍हि‍। उपन्‍यासकार प्रमाणि‍त कऽ देने छथि‍ जे सहज लोक भाषाक माध्‍यमसँ नहि‍ मात्र अपन अन्‍तर्परि‍ष्‍करण सम्‍भव अछि‍ अपि‍तु प्रकारान्‍तरसँ मानवीय दायि‍त्‍वक नि‍र्वहन सेहो। संवंधक अभावमे मनुष्‍य सुखा जाइत अछि‍। मनुष्‍य अपनामे वंद होएवा लेल नहि‍ बनल अछि‍। मनुष्‍यमे जतेक जे अछि‍, सभ ओकरा अन्‍यसँ माने दोसरसँ जोड़ैत अछि‍ आ प्रसन्‍नताकेँ बाँटैत अछि‍। सम्‍भत: यएह उपन्‍यासकारक इष्‍ट छन्‍हि‍। हम हि‍नक मंगलमय भवि‍ष्‍यक कामना करैत अंतमे मैथि‍ली साहि‍त्‍यक भंडारकेँ समृद्ध करवा हेतु साधुवाद दैत छि‍यन्‍हि‍। पोथीक नाम- जि‍नगीक जीत (उपन्‍यास) उपन्‍यासकार- जगदीश प्रसाद मंडल प्रकाशक- श्रुति‍ प्रकाशन, राजेन्‍द्र नगर दि‍ल्‍ली। मूल्‍य- २५० टाका मात्र। प्रकाशन वर्ष- सन् २००९ पोथी पाप्‍ति‍क स्‍थान- पल्‍लवी डि‍स्‍ट्रीब्‍यूटर्स, वार्ड न.६, नि‍र्मली, सुपौल, मोवाइल न. ९५७२४५०४०५ ४ शि‍व कुमार झा ‘टि‍ल्‍लू’ समीक्षा- १ हम पुछैत छी कवि‍ता संग्रह‍ (वि‍नि‍त उत्‍पल) एक्ैसम शताब्‍दीक दशांशक परि‍समाप्‍ति‍क अवलोकन कएलापर परि‍णाम भेटल जे ऐ अवधि‍मे कि‍छु एहेन तरूण रचनाकारक पदार्पण मैथि‍ली साहि‍त्‍यमे भेल जनि‍क रचना सभसँ हमर साहि‍त्‍य पुलकि‍त भऽ रहल अछि‍। श्री गजेन्‍द्र ठाकुर ऐ अत्‍याधुनि‍क पि‍रहीक लेल पथ प्रदर्शक छथि‍, जनि‍क कुशल नेतृत्‍वमे श्री वि‍नीत उत्‍पल, श्री उमेश मंडल, श्रीमती ज्‍योति‍ सुनीत चौधरी, श्रीमती प्रीति‍ झा ठाकुर सन रचनाकारक मंडली मैथि‍लीकेँ नवल ज्‍योति‍ प्रदान कऽ रहल। सन 2009ई.मे वि‍नीत उत्‍पल जीक पहि‍ल कवि‍ता संग्रह “हम पुछैत छी‍” श्रुति‍ प्रकाशनक सौजन्‍यसँ प्रकाशि‍त भेल। वि‍नीत जीक जन्‍म मधेपुरा जि‍लाक आनंदपुरा गाममे भेल। प्रारंभि‍क शि‍क्षा दीक्षा मुंगेर आ स्‍नातक भागलपुरमे। व्‍यावसायि‍क पाठ्यक्रम नई लि‍ल्‍लीसँ प्राप्‍त कऽ सम्‍प्रति‍ राष्‍ट्रीय सहारा नोएठामे वरि‍ष्‍ठ उपसंपादक छथि‍। मैथि‍ली-मि‍थि‍लाक सांस्‍कृति‍क गति‍ वि‍धि‍ आ अभि‍व्‍यक्‍ति‍क समायोजनक आधारपर दरभंगा आ सहरसाकेँ मुख्‍य केन्‍द्र भमि‍ मानल जाइत अछि‍। दरभंगा जि‍लासँ वि‍भक्‍त भेलापर उपेक्षाक जे दंश समस्‍तीपुर जि‍ला वासीकेँ भेटलनि‍, वएह दंश मधेपुराक लोक सेहो अनुभव कऽ रहल छथि‍। कवि‍क जन्‍म मधेपुरामे आ प्रारंभि‍क शि‍क्षा अंग प्रदेशमे, परंच कवि‍ता सभ खॉटी मैथि‍लीमे, अजगुत तँ अवश्‍य लागल मुदा वि‍नीत जीक मातृभाषानुरागसँ तीत-भीज गेलहुँ। ऐ कवि‍ता संग्रहक भूमि‍का सि‍द्धहस्‍त साहि‍त्‍यकार श्री गंजेश गुंजनजी “कवि‍क आत्‍मोक्‍ति‍‍ : कवि‍ताक अएना” शीर्षक दऽ लि‍खने छथि‍। गुंजन जीक व्‍यक्‍ति‍त्‍व आ कृति‍त्‍व मैथि‍ली साहि‍त्‍यक लेल कालजयी मुदा कवि‍क आत्‍मोक्‍ति‍क वि‍वेचनमे श्री गुंजनक लेखनी कनेक्शन कंजूस बनि‍ कऽ रहि‍ गेल। हमरा मतेँ कोनो नवतुि‍रया रचनाकारकेँ हृदएसँ प्रोत्‍साहि‍त करबाक चाही। ओहूमे जै भाषामे पाठकक संख्‍या लगातार घटि‍ रहल हुअए। पचास कवि‍ताक संग्रहमे पहि‍ल कवि‍ता “ककर गलती‍” वि‍धवाक अवस्‍थापर व्‍यथि‍त कवि‍क लेखनी मैथि‍ली वर्गक कथाकथि‍त आगाँक जाति‍क मध्‍य प्रश्‍न ठाढ़ करैत अछि‍। ठोप, चानन आ पाग मैथि‍लक सवर्ण समाजमे पुरूष कतेको बेर धारण कऽ सकैत छथि‍ मुदा स्‍त्री तँ अवला....। वि‍वाहक क्षणहि‍ंमे जौं पति‍क मृत्‍यु भऽ जाए तँ जीवन भरि‍ सतीत्‍वक दंश झेलए पड़तनि‍। लार्ड वि‍लि‍यम बटि‍क केर सुधारवादी आन्‍दोलनमे बंगालक प्रह्मण सुधरि‍ गेलाह मुदा मैथि‍ल ब्राह्मण अपन सनातन संस्‍कृति‍क रक्षक छथि‍, अवलाकेँ सबला बनेबामे धर्म नष्‍ट भऽ जेतनि‍। नाओं गौरी दाइ मुदा समाजक लेल डाकि‍नी भऽ गेली- की करती गौरी दाइ कि‍ओ हुनका देवी कहतन्‍हि‍ तँ डाइन जोगि‍न कहवासँ लोक वेद पाछुओ नहि‍ रहतन्‍हि‍। कहबाक लेल तँ हमरा सबहक संस्‍कृति‍मे शक्‍ति‍क उपासना प्रासंगि‍क अछि‍ मुदा हम सभ अपने घरक शक्‍ति‍केँ अपमानि‍त आ मर्दि‍त कऽ रहल छी। “मनुक्‍खो नहि‍ भेल‍” शीर्षक कवि‍तामे भौति‍कता आ बौद्धि‍कताक आड़ि‍मे जीवन अवस्‍थाक अव्‍यवस्‍थि‍त रूपक प्रदर्शन नीक लागल- राति‍ मे घर मे नहि‍ रहैत छी जखन कि‍ चि‍ड़ै चुनमुनी सेहो साँझ पड़ैत घर घुरैत अछि‍ “की फर्क पड़ैत अछि‍‍” शीर्षक कवि‍ता बौद्ध संस्‍कृति‍क केन्‍द्र वैशालीसँ तथागतक संदर्भमे लि‍खल गेल। वि‍म्‍ब तँ नीक मुदा वि‍श्‍लेषण स्‍पष्‍ट नहि‍ भऽ सकल। सभ पाठक तँ इति‍हास वि‍द् आ दार्शनि‍क नहि‍ छथि‍ तँए कवि‍ताकेँ उपयुक्‍त आ पूर्ण नहि‍ मानल जा सकैछ। ि‍वनीत जीकेँ कनेक फरि‍छा कऽ लि‍खबाक चाही छल। पहि‍ने समाज दाणवीर कर्णकेँ सुतपुत्र मानैत छल जखन महाबली भऽ गेलाह तँ सूर्यपुत्र मानल गेलाह। वास्‍तवि‍कता जे हुअए मुदा अंग प्रदेशकेँ कर्णक कर्मभूमि‍ मानल जाइत अछि‍। कवि‍क प्रारंभि‍क शि‍क्षा मुंगेरमे भेलनि‍ तँ अपन कर्मभूमि‍क वर्तमान अवस्‍तासँ मर्माि‍हत छथि‍- दल मलि‍त होइ अछि‍ अंग प्रदेशक आत्‍मा आ बजबैत अछि‍ तारणहार केँ...। अपन संस्‍कृति‍क रक्षाक तादात्‍म्‍यमे हम सभ अनसोहांत काज सेहो करैत छी। धार्मि‍क आडंम्‍बर एकटा प्रमाण अछि‍- मधुश्रावणी। कहबाक लेल तँ ऐ पर्वकेँ मि‍थि‍लाक संस्‍कार पर्व मानल जाइत अछि‍ मुदा वास्‍तवमे मैथि‍ल ब्राह्मण आ मैथि‍ल कर्ण कायस्‍थक मध्‍य मधुश्रावणी पर्व मनाओल जाइत अछि‍। “परीक्षा‍” शीर्षक कवि‍ताक माध्‍यमसँ कवि‍ ऐ पावनि‍मे पति‍ब्रताक प्रमाणपत्र- टेमी प्रथापर‍ प्रहार केलनि‍। पुरूष भेलक पश्‍चात् सेहो कवि‍ परीक्षासँ डेराइत छथि‍ तखन नारीकेँ अहि‍ल्‍या जकाँ बेर-बेर परीक्षा कि‍ए लेल जाइत अछि‍। “गाम डूबि‍ गेल‍” शीर्षक कवि‍ता बाढ़ि‍क वि‍नाश लीलाक औसत प्रदर्शन मात्र मानल जा सकैछ। संग्रहक सभसँ कलात्‍मक आ प्रासंगि‍क कवि‍ता- हम पुछैत छी‍केँ मानल जाए। वास्‍तवि‍क सेहो जे जै कवि‍ताक शीर्षककेँ कवि‍ता संग्रहक शीर्षक दऽ देल गेल ओइ कवि‍तामे कवि‍क आंतरि‍क जुआरि‍ अवश्‍य हेतनि‍। ऐ कवि‍ताक माध्‍यमसँ कवि‍ समाजक समीक्षाक लेल दद्यत छथि‍। समाजक सभटा व्‍याधि‍पर कवि‍क लेखनी स्‍वच्‍छन्‍द भऽ वि‍चरण केलक। सरि‍पहुँ वि‍नीत जी पत्रकार छथि‍ देशकालक दशाक वि‍वेचन नि‍त्‍य करैत छथि‍ तखन रचना झाँपल कोना रहत। “मनुख आ माल‍” एवं “समाजक ई रूप‍” वर्तमान मनुक्‍खक ओझराएल मानसि‍कताकेँ देखबैत अछि‍। अर्थनीति‍ वि‍लोकि‍त भऽ गेल, भौति‍कता समाजकेँ बॉटि‍ रहल अछि‍, अधि‍क प्राप्‍ति‍क आशमे ककर्म बढ़ि‍ रहल अछि‍। एवं प्रकारे ऐ दुनू कवि‍ताक दृष्‍टि‍कोण नीक लागल। “मारलाक बाद‍” शीर्षक कवि‍ता दर्शनशास्‍त्रक अनुभूि‍त केलक। पुष्‍कर कवि‍तामे भारतीय इति‍हास आ अपन संस्‍कृति‍ शीतल वातसँ गौरवान्‍वि‍त भेलहुँ। ऐ कवि‍ता संग्रहक सबल पक्ष अछि‍ वि‍म्‍बक चयन आ ि‍वश्‍लेषण। भाषा सेहो सरल आ मैथि‍लीक खाॅटी शब्‍दसँ ओत प्रोत अछि‍। मुदा दुर्बल पक्ष्‍ज्ञ भेटल प्रवाहक कमीक रूपमे। कवि‍ता आशु कवि‍ता हुअए वा अतुकांत- छंदक लेपन आवश्‍यक होइत छैक। ऐ कवि‍ता संग्रहमे छंदक समायोजन समुचि‍त रूपेँ नै कएल गेल कोनो-कोनो कवि‍ता तँ गद्य जकाँ बुझना गेल। कवि‍केँ आगाँ एे वि‍न्‍दुपर ध्‍याान राखए पड़तनि‍। नि‍ष्‍कर्षत: तरूण कवि‍क प्रांजल प्रस्‍तुति‍, वि‍नीत जीकेँ कोटि‍-कोटि‍ साधुवाद.....। पोथीक नाओं- हम पुछैत छी प्रकाशक- श्रुति‍ प्रकाशन मूल्‍य- 160 टाका मात्र वर्ष- 2009 २ मैथि‍लीक वि‍कासमे बाल कवि‍ताक योगदान वाल्‍यावस्‍था जीवन रूपी नाटकक प्रथमांक होइत अछि‍। जौं कोनो नाटकक प्रथम अंक व्‍यवस्‍थि‍त आ सरल हुअए तँ स्‍वत: आकर्षणक केन्‍द्र बनि‍ जाइछ। कहलो गेल अछि “‍Morning shows the day”‍ प्रभातसँ दि‍वसक पूर्व आभास स्‍वभावि‍क होइत छैक। हमरा सबहक लेल सौभाग्‍यक कथा जे मैथि‍ली सत्‍व, तम आ रजो गुणसँ आेत प्रोत सरस भाषा मानल जाइत छथि‍। जीवनक प्रथम पाठशालाक छात्रमे एहि‍ गुणक समावेश आवश्‍यक अछि‍। तँए एहेन पद्यक रचना अनि‍वार्य जे शैशवसँ नेनपनमे प्रवेश करएबला नेना-भुटकाकेँ मातृ सि‍नेहसँ तृप्‍ति‍ कऽ दि‍ए। नेना भुटकाक जीवनमे महाकाव्‍य, प्रवंधकाव्‍य वा उपन्‍यासक कोन प्रयोजन? ओ सभ तँ वि‍नु अन्‍तर्मस्‍ति‍ष्‍कपर दाब देने अपन संसारकेँ जीवन्‍त राखए चाहैत छथि‍। वर्त्तमान समएमे सभ्‍यता आ संस्‍कृति‍क भूमंडलीकरणसँ आर्य परि‍वारक कि‍छु भाषाक अस्‍ति‍त्‍व संकटमे पड़ि‍ गेल अछि‍। संभवत: एहि‍ प्रभावसँ सभसँ वेसी मैथि‍ली प्रभावि‍त छथि‍। हमरा सबहक समाजक रूप ततेक इन्‍द्रजासँ आबद्घ भऽ गेल अछि‍ जे दू गोट भाषाक प्रासंगि‍कतामे ओझरा रहल छी। गैर हि‍न्‍दी भाषा क्षेत्रक लोक तँ अपन मातृभाषाक संग-संग अंग्रेजीकेँ आत्‍मसात् कऽ रहल छथि‍। हमरा लोकनि‍ कि‍ंकर्त्तव्‍यवि‍मूढ़ छी जे अंग्रेजी तँ स्‍वीकार करैए पड़त मुदा हि‍न्‍दीकेँ छोड़ि‍ मैथि‍ली कोना पढ़ी? वर्तमान पीढ़ी तँ कि‍छु-कि‍छु मैथि‍लीक लाज रखने छथि‍ मुदा एहि‍ पि‍रहीक प्रांजल साहि‍त्‍यकारक लोकनि‍ अपन करेजपर हाथ राखि‍ कऽ कहथु जे अपन-परि‍वारक नेना-भुटकामे देसि‍ल वयनाक प्रति‍ नि‍ष्‍ठासँ ज्‍योति‍ प्रज्‍जवि‍त करैत छथि‍? जखन साहि‍त्‍यकारक परि‍वारक ई स्‍थि‍ति‍ तँ आम मैथि‍लीक स्‍थि‍ति‍ कोना कहव? दशा ततेक मर्मस्‍पर्शी भऽ गेल जे‍ कि‍छु पि‍रहीक बाद नेना-भुटका पूछत मैथि‍लीकेँ‍ छलि‍? हमरा हि‍न्‍दीसँ कोनो पीड़ा नहि‍। बेर-बेर प्रश्‍न उठैत अछि‍ आ उत्तर सेहो स्‍वत:स्‍फूर्त जे हि‍न्‍दी राजभाषा छथि‍ मुदा मातृभाषा नहि‍। तखन मातृभाषक रूपमे एकर प्रयोग कि‍ए कएल जा रहल अछि‍। एहि‍ दशाक लेल जौं अभि‍भावक सभ दोषी छथि‍ तँ साहि‍त्‍यकार सेहो कोनो कम नहि‍। मैथि‍ली साहि‍त्‍यमे बाल मनोवि‍ज्ञानकेँ स्‍पर्श करएबला रचना अत्‍यन्‍त न्‍यून। जौं नेना भुटका लेल साहि‍त्‍य नहि‍ तँ ओ साहि‍त्‍यक मर्मकेँ कोना बूझथि? कहबाक लेल तँ एहि‍ बि‍म्‍वपर बहुत रास कवि‍ कवि‍ताक रचना कएने छथि‍ मुदा प्रथमत: तत्‍सम् शब्‍दक रूपेँ बि‍म्‍व वि‍श्‍लेषण। सभ नेना-भुटका तँ अयाची मि‍श्रक पुत्र शंकर नहि‍ भऽ सकैत छथि‍ जे बालोहं जगदानंद......क अर्थ बूझि‍ जएताह। जौं तत्‍सम् नहि‍ओ तँ एहेन रचना जे कवि‍ स्‍वयं बुझताह, समीक्षक दि‍ग्भ्रमि‍त भऽ जाइत छथि‍ तँ नेना ओहि‍ रस सरि‍तामे वि‍चरण करथि‍ प्रश्‍नवाचक अछि‍। मैथि‍लीमे बाल साहि‍त्‍यक रचनाक न्‍यूनताकेँ भरवाक लेल समीक्षक वा साहि‍त्‍यक अधि‍ष्‍ठाता लोकनि‍ नीति‍ सम्‍वन्‍धी पद्य आ वंदना सभकेँ बाल साहि‍त्‍यसँ जोड़ि‍ दैत छथि‍। हम एहि‍ दृष्‍टि‍कोणकेँ उचि‍त नहि‍ मानैत छी। बाल कवि‍ता तँ एहेन होएवाक चाही जाहि‍मे मि‍थि‍ला-मैथि‍लीक खॉटी शब्‍दकेँ बि‍म्‍वि‍त कएल गेल हुअए। कोनो आवश्‍यक नहि‍ जे बि‍म्‍व साहि‍त्‍य रसकेँ छूबैत तात्‍वि‍क हो, जखन बाल मन चंचल तँ नीति‍ आ वैराग्‍यक समावेश अनि‍वार्य नहि‍। एहि‍ तरहक रचनामे बाल श्रंृगार अवश्‍यांभावी छैक। जेना कोनो कवि‍क कवि‍ताक कि‍छु पॉति‍- “आम छू अमरौरा छू/ बाबा गाछीक औड़ा छू/ नेनपन बीति‍ गेलै/ ककरा कानमे कहबै कू/‍” वा “सूति‍ रहेँ नूनू बि‍लैया एलौ/ रहू माछ लऽ तोहर भैया एलौ/‍” हमरा बुझने ई थि‍क बाल कवि‍ताक वास्‍तवि‍क रूप मुदा एखन धरि‍ कतए-कतए की-की लि‍खल गेल अोकर चर्च सेहो आवश्‍यक अछि‍। हमर अध्‍ययनशीलता व्‍यापक नहि‍, एखन धरि‍ मैथि‍ली कवि‍ वा कवयि‍त्री लोकनि‍क रचना सभ बहुत रास नहि‍ पढ़ने छी तँए हमर वि‍वेचनकेँ अन्‍यथा नहि‍ लेल जाए। हम वएह कवि‍ वा कवयि‍त्री सबहक चर्च करब जनि‍क रचनासँ अवगत भेल छी। नीति‍ संवंधी बाल साहि‍त्‍यक अन्‍तर्गत कवि‍वर सीता रामझाक शि‍क्षासुधा, जनसीदनजीक नीति‍ पदावली, पंडि‍त वेदानंद झाक रत्‍नवटुआ अछि‍ प्रमुख अछि‍। शि‍क्षा प्रधान बाल साहि‍त्‍यमे श्री गोवि‍न्‍दक पाकल आम आ श्री कांचीनाथ झा कि‍रण जीक “प्रभात‍” कवि‍ता महत्‍वपूर्ण अछि‍। ओना तँ सुमन जी बाल साहि‍त्‍यमे कि‍छु छि‍टफुट तत्‍सम मि‍श्रि‍त कवि‍ताक रचना कएलनि‍ मुदा शि‍शु मासि‍क पत्रि‍काक प्रकाशनमे हुनक उल्‍लेखनीय योगदान अछि‍ जाहि‍मे तन्‍त्रनाथ झाक वानर आ ईशनाथ झाक “वन्‍दना‍” कवि‍ता छपल छल। ओना तँ तन्‍त्रनाथ झा रचि‍त “मुसरी झा‍” कवि‍ता तरूण पाठकक लेल लि‍खल गेल मुदा एहि‍सँ शि‍क्षाक मध्‍य पएर पसारैत नेना सेहो प्रभावि‍त भेल छथि‍। कवि‍ चूड़ामणि‍ मधुप तँ श्रंृगार आ वि‍चारमूलक भावनासँ भरल गीतक रचनाकार छथि‍ मुदा हि‍नक कि‍छु गीत बाल बि‍म्‍वसँ ओत-प्रोत नहि‍ रहि‍तहुँ ततेक लोकप्रि‍य भेल अछि‍ जे मि‍थि‍लाक नेना-भुटका चाहे ओ शि‍क्षि‍त परि‍वारसँ संबंध राखथु वा नहि‍ स्‍वत: गबैत अपन कर्मपथपर मि‍थि‍लाक गाम-गाममे गति‍मान एखनो रहैत छथि‍। “बटुक आ धीयापूता‍” सन पत्र-पत्रि‍का बाल साहि‍त्यकेँ प्रोत्‍साहि‍त अवश्‍य कएलक अछि‍ जाहि‍मे सरस कवि‍ ईशनाथ झा, सुमन, कि‍रण, मणि‍पद्म, यात्री बुद्धि‍धारी सि‍ंह रमाकर, चन्‍द्रनाथ मि‍श्र अमर, श्री धीरेन्‍द्र सन कवि‍क कवि‍ता छपैत छल। मि‍थि‍ला मि‍हि‍र नि‍श्‍चि‍त रूपेँ मैथि‍लीमे बाल साहि‍त्यक धाराकेँ नवल गति‍ देलक। एहि‍ पत्रि‍काक पैघ वि‍शेषता छल जे नवतुरि‍या कवि‍ वा कवयि‍त्री सभकेँ सेहो एहि‍ पत्रि‍कामे स्‍थान देल गेल। मि‍थि‍लाक गाम-गाममे एहि‍ पत्रि‍काक वि‍तरण व्‍यवस्‍था छल जाहि‍सँ एहि‍मे छपल रचनाक व्‍यापक प्रचार-प्रसार भेल। राज दरभंगा द्वारा स्‍थापि‍त एवं संरक्षि‍त रहवाक कारणेँ रचनाकारकेँ उपहार वा पारि‍श्रमि‍क रूपेँ कि‍छु कैंचा सेहो भेट जाइत छल जाहि‍सँ बाल साहि‍त्‍यक कोन कथा मैथि‍ली साहि‍त्‍यक सभ वि‍धाक वि‍कासमे मि‍थि‍ला-मि‍हि‍रक योगदान अवि‍स्‍मरणीय अछि‍। बाल स्‍तंभमे अनेकानेक वालोपयोगी कवि‍ता संग्रहक दृष्‍टि‍ऍ डॉ. श्रीकृष्‍ण मि‍श्रि‍त अग्रदूत उल्‍लेखनीय अछि‍। मैथि‍ली साहि‍त्‍य मंजरी, मैथि‍ली साहि‍त्‍य बोध आदि‍ साहि‍त्‍यक पाठ्यपुस्‍तकमे सुमनजी, तंत्रनाथ झा, ईशनाथ झा, हरि‍मोहन झा, आरसी बाबू आ गोवि‍न्‍द झा सन कवि‍क बालोपयोगी रचना देल गेल अछि‍। बाल साहि‍त्यमे व्‍यापक कवि‍त्‍वक प्रदर्शन आधुनि‍क कालक कवि‍ आ कवयि‍त्री पूर्वकालक रचनाकारसँ वेसी कएलनि‍ अछि‍। एहि‍मे जीवकान्‍तजी प्रमुख छथि‍। जीवकान्‍त जीक तीन गोट वाल कवि‍ता संग्रह छपल अछि‍ जाहि‍मे गाछ झूल-झूल आ छॉव सोहावनि‍ प्रमुख अछि‍। हि‍नक पश्‍चात् जे कवि‍ एहि‍ दि‍शामे क्रि‍याशील भेल छथि‍- ओहि‍मे श्रीचन्‍द्रभानु सि‍ंह, मार्कण्‍डेय प्रवासी, डॉ. बुद्धि‍नाथ मि‍श्र, रवीन्‍द्रनाथ ठाकुर, सि‍याराम झा सरस, मंत्रेश्‍वर झा, हंसराज, मायानंद ि‍मश्र, रामलोचन ठाकुर, भीमनाथ झा, कालीकान्‍त झा बूच, गोपालजी झा गोपेश, डॉ. नरेश कुमार वि‍कल, डॉ. केदारनाथ लाभ, डॉ. इन्‍द्रकांत झा, रमाकान्‍त राय रमा, उपेन्‍द्र ठाकुर मोहन सन स्‍थापि‍त कवि‍क नाओ प्रमुख अछि‍। दुर्भाग्‍य अछि‍ जे एहि‍ कवि‍ लोकनि‍क बाल साहि‍त्‍यपर कोनो संकलि‍त कवि‍ता संग्रह नहि‍ भऽ कऽ मात्र कि‍छु छि‍ट-फुट कवि‍ता वा गीत नेना भुटका लग परसल गेल अछि‍। कवयि‍त्रीमे “शि‍शुकलकत्ता‍” शीर्षक कवि‍ताक रचनाकार इलारानी सि‍ंह, डॉ. शेफालि‍का वर्मा, वाणी मि‍श्र, रोटी शीर्षक कवि‍ताक कवयि‍त्री कामि‍नी, वि‍भारानी, एकटा भीजल बगरा शीर्षकक कवयि‍त्री ज्‍योति‍ सुनीत चौधरी आदि‍क नाओ प्रमुख अछि‍ मुदा हि‍नको लोकनि‍क वएह हाल कोनो संकलि‍त कवि‍ता संग्रह नहि‍ मात्र छि‍ट-फुट कवि‍ता। सन् 2008ई.मे वि‍देह पत्रि‍काक आगमनक संग-संग बाल साहि‍त्‍यमे क्रांति‍ आबि‍ गेल। एहि‍ पत्रि‍काक संपादक श्री गजेन्‍द्र ठाकुर बाल साहि‍त्‍यक उत्‍प्रेरणक लेल उद्यत छथि‍। हुनक सप्‍त वि‍धामे लि‍खल रचना संग्रह कुरूक्षेत्रम अन्‍तर्मनक सातम खण्‍ड “बाल मंडली आ कि‍शोर जगत‍” नेना भुटकाक लेल समर्पित अछि‍। एहि‍ खण्‍डमे एक सयसँ ऊपर कवि‍ता देल गेल अछि‍। कवि‍ता सभ पढ़लाक बाद बाल साहि‍त्यक तादात्‍मयकेँ नि‍श्‍चि‍त रूपेँ बूझल जा सकैत अछि‍। एहि‍ संकलनमे वातानुकूलि‍त महलमे रहनि‍हार नेना भुटकासँ लऽ कऽ गामक सोती-नदीक कातमे घोंघा बि‍छनि‍हार बाल-वालि‍काक मनोदशाक वि‍वेचन कएल गेल अछि‍। मैथि‍लीक संग ई वि‍डम्‍बना रहल जे एहि‍मे अर्थनीति‍ आ सामाजि‍क समरसताकेँ व्‍यापक रूपेँ बिम्‍वत नहि‍ कएल गेल। सामंतवादी प्रवृति‍क लोकसभ चाहे ओ कोनो जाति‍क होथु हुनके मानसि‍कताकेँ समाजक मानसि‍कता मानि‍ लेल गेल। जगतजननी सीताक लेाकगााथापर तँ केओ बॉचि‍ सकैत छथि‍ मुदा सलहेस, बहुरा गोढ़ि‍न आ नटुआ दलालक संग-संग मोती दाइक व्‍यथा ककरा मुखसँ सुनैत छी? यएह दशा बाल साहि‍त्यमे सेहो भेल। हि‍न्‍दी भाषा साहि‍त्‍यमे राष्‍ट्र कवि‍ दि‍नकर “बच्‍चो का दूध‍” शीर्षक कवि‍तामे समाजक अंति‍म पॉति‍क नेनाक भूखसँ कल्हाइत मर्मस्‍पर्शी दशाक चि‍त्रण कएलनि‍ मुदा मैथि‍लीमे एहि‍ प्रकारक रचनाक अभाव खटकि‍ रहल छल, कि‍छु लि‍खलो गेल तँ ओकरा साहि‍त्यि‍क मान्‍यता नहि‍ भेटल। गजेन्‍द्र जी एहि‍ भ्रमकेँ तोड़वाक प्रयास कएलनि‍ अछि‍, जाहि‍ लेल धन्‍यवादक पात्र छथि‍। गजेन्‍द्र जीक संग-संग बहुत रास तरूण कवि‍ कवयि‍त्री सबहक बाल रचना वि‍देहमे छपल अछि‍। वर्तमानकालक बाल रचनाकार कवि‍, कवयि‍त्रीमे चन्‍द्रशेखर कामति‍, अनमोल झा, श्रीमति‍ मृदुला प्रधान, डॉ. जया वर्मा, राजदेव मंडल, कुमार मनोज कश्‍यप, डॉ. शंभू कुमार सि‍ंग, कामि‍नी कामयि‍नी, उपेन्‍द्र भगत नागवंशी, मनोज कुमार कर्ण उर्फ मुन्नाजी, धीरेन्‍द्र प्रेमर्षि, रूपा धीरू, हि‍मांशु चौधरी, रूपेश कुमार झा त्‍योंथ, वि‍नीत उत्‍पल, श्रीमती कुसुम ठाकुर, अशोक दत्त, राजेश मोहन झा गुंजन, कि‍शन कारीगर आ उमेश मंडल सन नव साहि‍त्‍यकार प्रमुख छथि‍। ओना वर्तमान कालक परि‍धिमे कि‍छु स्‍थापि‍त रचनाकार जेना गंगेश गुंजन, वि‍भूति‍ आनंद, ज्‍योत्‍सना चंद्रम, जयप्रकाश जनक, रामसेवक ठाकुर, कमलाकान्‍त, अरवि‍न्‍द अक्कू, परमानंद प्रभाकर, रामपुनीत ठाकुर तरूण, प्रो. रवीन्‍द्र कुमार चौधरी सन रचनाकारक लेखनी ऊपर वर्णित सभ रचनाकारक संग-संग एहि‍ वि‍धामे क्रि‍याशील अछि‍। सभसँ आश्‍चर्यक गप्‍प जे मात्र नौ गोट वसंत देखलि‍ बालि‍का सुश्री संस्‍कृति‍ वर्माक लेखनी प्रथमत: बाल साहि‍त्‍येकेँ स्‍पर्श कएलक अछि‍। एहि‍ प्रसंगमे कि‍छु एहेन रचनाक उल्‍लेख करब आवश्‍यक बूझैत छी जे छेहा मैथि‍लीमे मात्र नेना-भुटका लेल लि‍खल गेल हुअए- (क) “खेत टी खरि‍हान टी/ आंगन टी दलान टी/ बाबा आब अहींक कानमे/ टि‍टही टहकय टी-टी-टी../‍” (ख) “‍बापे तोहर बनलौ परदेशी/ चि‍ट्ठी ने एलौ भेलौ दि‍नवेसी/ मॉक नि‍नायल व्‍यथा जगबै छौ/ सुनही रौ तोरे कुचरि‍ सुनबै छौ/‍” (काली कांत झा बूच रचि‍त- पोताक अट्ठास आ दि‍नक नेना कवि‍तासँ) (क) “साले-साल कि‍अए अबै छी/ झणे-झण अबैत रहू/ हर क्षण हर मनकेँ/ अमृतसँ भरैत रहू/ क्षणे-क्षण.../ नव शक्‍ति‍क नव उत्‍साह दऽ/ सृजन शक्‍ति‍ भरैत रहू/ कर्म-ज्ञानकेँ घोड़ि‍-घोड़ि/ ‍सि‍नेहसँ सि‍नेह सटैत रहू/ क्षणे-क्षन.../ जे हूसल से हम्‍मर हूसल/ तइले कि‍अए छी कलहन्‍त/ सभ जागैए सभ सुतैए/ एक दि‍न हेतै सबहक अंत/ नजरि‍-उठा देखैत रहू/ क्षणे-क्षण.../ देवी अहाँ, मैया अहाँ/ भेदि‍ कतौ अछि‍ कहाँ/ जोड़ल आँखि‍ उठा-उठा/ पले-पल देखैत रहू/ क्षणे-क्षण अबैत रहू।” (ख) “‍आँखि‍ पुछलक/ दीदी, सभ कि‍छु देखि‍तो/ कि‍छु ने देखै छी/ कलपैत मन देखि/ ‍भरि‍-भरि‍ दि‍न कनै छी/ नजरि‍क उत्तर/ सगतरि‍ तँ फूल छि‍टाएल-ए/ गुणसँ भरल-पुरल/ रस चुसैक ज्‍योति‍ बनाउ/ भेटत तखने मीठका फल।/ (जगदीश प्रसाद मंडल, “‍सरस्‍वती बंदना” आ “‍नजरि‍” कवि‍तासँ) “‍बड़ जे जतनसँ हम पोसली पुताकेँ/ भुखे सुतली अपन घर मर ओकरा सुतौली खुआकेँ/ अपने हम मुरूख मुदा बौआकेँ पढ़ौली/ काटि‍ कष्‍ट पोथी लेल ढौआ जुटौली/‍” (रूपेश कुमार झा त्‍योंथ) (क) “चारि‍टा छाैंड़ा छल गाछ तर फनैत/ जि‍द लगौने डरि‍केँ गनैत/ पहुँचल पाँचम- हे रौ की गनै छेँ/ ई कथीक गाछ ि‍छएे से जनै छेँ?। सभ भेल अवाक/ अपन जमौलक धाक। सुनने रहि‍ ई गाछ ि‍छऐ। अनचि‍न्‍हार......।/ (ख) “बच्‍चा जनमि‍ गेल/ बेटा भेल/ सुनतहि‍ घर खुशीसँ भरि‍ गेल/ सौंसे टोल खबरि‍ पसरि‍ गेल। बढ़ए लगल उछाह। कहलक लोग-वाह-वाह। मुनि‍याँ अछि‍ लछमि‍नि‍याँ/ तब ने एकरापर सँ जनमल छौंड़ा....। (राजदेव मंडल, कथीक गाछ अा मुनि‍याँक चि‍न्‍ता शीर्षक कवि‍तासँ) “छुनछुन-छुनछुन बौवा हम्‍मर/ फुदकैत फुदही जकाँ रहैए/ कखनो मुस्‍की कखनो मटकी/ कखनो दि‍दीकेँ चुप्‍पी कहैए/‍” (अशोक दत्त) टुन्‍ना गेंग पसारै यै/ मुन्ना दॉत चि‍याड़ै यै/ गुड्डू-टि‍ंकू-बबलू-सबलू/ मुइयो मोंछ उखारै यै/ आब की कहू भाय/ हुरपेट्टे लगै यै/ बाजै छी कोना....।/ (चन्‍द्रशेखर कामति‍) “‍एक दू तीन/ बौआ गेल सुनि‍/ चारि‍ पॉच छह/ सुनि‍ भेल भयावह..../” (गजेन्‍द्र ठाकुर) “नहला पर अछि‍ दहला/ बौआ बाबू हमरा कहला/ पढ़ू जोरसँ..../‍” (डॉ. नरेश कुमार वि‍कल) “‍कोन दि‍शासँ उतरि‍ पपि‍हरा/ घैल पदक ढरकाबै छेँ/ बि‍जुवन केर पंछी तों हमरे/ जरल जि‍आ तरसावै छेँ..../” (चन्‍द्रभानु सि‍ंह) “‍पोथी पढ़ि‍ कि‍छु हैत नहि‍/ तोड़ऽ चाही रोट/ जोड़ू नोट बकोि‍ट कऽ/ भोट बटोरू मोट...../” (आरसी प्रसाद सि‍ंह) “एकर चोरौलक ओकर हेरौलक/ बापो माइक नाम बुड़ौलक/ पोथी फाड़य थोथी झाड़य/ एकरा ओकरा झगड़ा लाड़य.../‍”  (उदयनाथ झा अशोक) “चलू ति‍रंगा कने उड़ा ली हर्जे की/ आजादी केर रश्‍म पुरा ली हर्जे की..../‍”  (रामलोचन ठाकुर) “देव पि‍तर पातरि‍-खरना कहि‍या धरि‍?/ बैसल खैबें रे रमचरना कहि‍या धरि‍?/ पोथी पतरा गामक गाम उपासल अछि‍/ प्रवल धारमे बड़का-बड़का भासल अछि‍/‍”  (डॉ. बुद्धि‍नाथ मि‍श्र) “मातृभूमि‍ केर करी बंदना/ ऋतुरानी गुनगान करी/ जननी जन्‍मभूमि‍ केर खाति‍र/ अर्पण अप्‍पन प्राण करी.../‍” (अर्जुन लाल कर्ण) “तू लोरी गा हम सूति‍ जाएव/ माए लोरी गा हम सूति‍ जाएव..../‍”  (डॉ. शंभू कुमार सि‍ंह) “नेहरू चाचा, अहाँ कतऽ चलि‍ गेलौं/ देख‍ लि‍अ अहाॅ नेना सभकेँ की कऽ गेलौं/ हमर पीठ पर भारी बस्‍ता/ ओहि‍ मे कि‍ताब कॉपीक ठेलमठेल देखू..../‍”  (सुश्री संस्‍कृति‍ वर्मा, वएस नौ बरख) “एक टोलमे बबलू अकलू/ दू नेना छल/ समतुरि‍या छल/ बबलूकेँ छल बन्‍ति‍क खुट्टी/ आमक तख्‍ता केर पि‍टना छल..../‍”  (जीवकान्‍त) “नन्‍हें भाय खेलए चललनि‍/ हाथ नेने बंदूक/ लगलनि‍ दनदन फायर करए/ ओ पक्षी देखि‍ उलूक.../‍” (रमाकान्‍त राय रमा) “जाड़क रौदी सन वेटी/ गरमीक छाहरि‍ सन वेटी/ जीवनक गीत‍-संगीत बसैत अछि‍/ ओहि‍मे/ नहि‍ तँ रसहीन अछि‍ जि‍नगी/‍”  (डाॅ. जया वर्मा) “राम छू रहमान छू/ गीता आर कुरान छू/ मोल वि‍कयबेँ नहि‍ बजारमे/ पहि‍ने बौआ कान छू..../‍” (डॉ. ब्रजकि‍शोर वर्मा मणि‍पद्म) “हे भाय हमरा जुनि‍ मारह/ हम छी तोरे भ्राता/ अग्रज वा अवरज..../‍”  (फजलुर रहमान हरसमी) “बालुक करेजपर बसा लेलहुँ गाम/ बेरि‍-बेरि‍ ऑगुरसँ लि‍खलहुँ जे नाम..../‍”  (वि‍लट पासवान वि‍हंगम) “कोंचा लेटाइत छनि‍ केश फहराइत छनि‍/ मोछो हुनक कलकत्ते/ ईहो पुरूष अलबत्ते.../‍”  (रवीन्‍द्र नाथ ठाकुर) “‍खेल खेल खेल/ खेल बौउआ खेल/ चोरा-नुकी खेल/ अज्ञानक अन्‍हारमे/ नुकाएल चोरबा/ ज्ञानक कि‍रनसँ/ पकड़ल गेल/ खेल खेल खेल/ खेल दाय खेल/ कनि‍याँ-पुतरा खेल/ बेइमानक नगरीसँ/ नकलल बहुरि‍या/ शैतानक माफापर/ बैठा देल गेल/ इमानक चौबटि‍यापर.../”  (मनोज कुमार मंडल) “जगदंब अहीं अवलम्‍व हमर/ हे माय अहाँ बि‍नु आश ककर..../‍”  (प्रदीप मैथि‍ली पुत्र) “पढ़ि‍-लि‍ख बनि‍हेँ एहन सि‍पाही/ सभ तरि‍ लोक करौ वाहवाही/ एहन संतानक अलगे धाही/ खगता छै भगत सि‍ंह चाही...../‍”  (महाकांत ठाकुर) “माँ गै माँ/ घरक ऊपर/ चारक तर/ बगरा बनेलकऊ/ एकटा घर/ माँ गै माँ/ घरक पाछू/ बारीक बिच/ सुगा अनलकऊ/ एकटा फर/  माँ गै माँ/ गामक भीतर/ टोलाक बिच/ नटुआ नचलऊ/ एकटा नाच/ माँ गै माँ/ गामक बाहर/ पोखरिक बिच/ पुरैनिक पातपर/ झिलमिल जल/ माँ गै माँ/ आँगन कात/ ढेकी लग/ बिहरिमे छौ/ गहुमन साँप/ माँ गै माँ/ बस्तुनिया लय/ हम कहलियौ/ सब हाल-चाल/ जल्दीसँ दऽ दहीं/ बस्तुनिया हमर/ हम चललियऊ/ खेलय लेल.../   (पंकज कुमार झा) “दाइ गे दाइ तोँ बड़ हरजाइ/ भागेँ ओहि‍ दिस देखए जत्तहि‍/ ढेपा गुड़क गुड़कल जाए...../‍‍”  (राजेश मोहन झा गुंजन) ई लि‍खबाक हमर उद्देश्‍य अछि‍ बाल कवि‍ताक कि‍छु रूपक दर्शन मात्र। एहि‍सँ इतर सेहो अनेकानेक बालगीत आ कवि‍ता मि‍थि‍ला गाम-गाममे लोरी आ रीति‍ गीतक रूपमे चर्चित अछि‍। मैथि‍ली साहि‍त्‍यमे तँ साहि‍त्‍यक कृति‍क वि‍वि‍ध वि‍धाक संपादन वा चि‍त्रण पहि‍नेसँ वेसी भऽ अछि‍ मुदा मर्मस्‍पर्शी कथा जे पाठकक गणनामे लगातार कमी आबि‍ रहल अछि‍। गोलमेज सम्‍मेलन कऽ कऽ तँ हम मैथि‍ल अपन पाठक लोकनि‍क गणना चारि‍ करोड़ धरि‍ पहुँचा दैत छी मुदा सभ गोट मैथि‍ल जौं मात्र अपन परि‍वारेक अवलोकन करथु तँ सत्‍यतासँ अवगत भऽ सकैत छथि‍ मात्र माता-ि‍पतासँ वैदेहीक अस्‍ति‍त्‍व नहि‍ बॉचत तँ....। जौं बाल भावनाकेँ देसि‍ल वयनामे प्रचार-प्रसार नहि‍ हएत तँ भऽ सकैत अछि‍ जे कवि‍ कालीकान्‍त झा बूच जीक कवि‍ता देसि‍ल वयनाक अस्‍ति‍त्‍वक बि‍म्‍व सत्‍य प्रमाणि‍त भऽ जाए। एकर कि‍छु पॉति‍- “‍चन्‍दा-सुमन-यात्री-मधुपक/ जुनि‍ करू भावना पर आधात/ दि‍वस नि‍कट ओ आवि‍ रहल अछि‍/ हेती मैथि‍ली सभसँ कात..../” नेना-भुटकामे देसि‍ल वयनाक प्रति‍ सि‍नेह जगाएव आवश्‍यक अछि‍। एहि‍ लेल वाल साहि‍त्‍यकेँ प्राथमि‍कता देब अति‍ आवश्‍यक अछि‍। वि‍शेष कऽ कऽ वर्त्तमान पि‍रहीक साहि‍त्‍यकारकेँ एहि‍ दि‍शामे सजग रहए पड़त। ३ मैथि‍ली उपन्‍यास साहि‍त्‍यमे दलि‍त पात्रक चि‍त्रण उपन्‍यास कोनो गद्य साहि‍त्‍य रूपी व्‍यष्‍टि‍क आत्‍मा मानल जाइत अछि‍। मैथि‍ली साहि‍त्‍यमे लगभग सए वर्ख पूर्व धरि‍ उपन्‍यास वि‍धाक रचना लगभग शून्‍य छल। एहि‍ कारण ओहि‍ अवधि‍ धरि‍ मैथि‍लीकेँ पूर्ण साहि‍त्‍यि‍क भाषा नहि‍ मानल जाइत छल। जनसीदन जी एहि‍ भाषा साहि‍त्‍यक पहि‍ल मान्‍य उपन्‍यासकार छथि‍। हि‍नक पाँच गोट उपन्‍यासक पश्‍चात् एखन धरि‍ देसि‍ल वयनामे साहि‍त्‍यक समग्र वि‍धाक चि‍त्रण करैत बहुत रास उपन्‍यास पाठक धरि‍ पहुँचल अछि‍। परंच एहि‍ साहि‍त्‍यक संग सभसँ पैघ बि‍डम्‍वना रहल जे पछाति‍क समाज जकरा सामाजि‍क शब्‍दमे दलि‍त कहल जाइत अछि‍, ओकर महि‍मामंडनक गप्‍प तँ दूर प्राय: एहि‍ साहि‍त्‍यमे अकस्‍मात् अवांछि‍त अभ्‍यागत्तक रूपमे क्षणप्रभा जकाँ कतहु-कतहु चर्चित अछि‍। दलि‍त वर्ग तँ सामाजि‍क, सांस्‍कृति‍क आ शैक्षणि‍क रूपेँ सम्‍पूर्ण आर्यावर्त्तमे पि‍छड़ल छथि‍, मुदा मि‍थि‍ला-मैथि‍लीमे हि‍नक स्‍थानक वि‍वेचन हि‍नका सबहक जाति‍ जकाँ अछोप अछि‍। एकर प्रमुख कारण मि‍थि‍लामे धर्मसुधार आन्‍दोलन, वि‍धवा वि‍वाहक सकारात्‍मक दृष्‍टकोण प्राय: मृतप्राय रहि‍ गेल। दार्शनि‍क उदयानाचार्य, भारती-मंडन, आयाचीक एहि‍ भूमि‍पर सनातन संस्‍कृति‍क पुनरूद्वार तँ भेल, मुदा एहि‍ पुनरूद्वारपर आडंवर धर्मी व्‍यवस्‍थाक अमरतत्ती मूल संस्‍कृति‍क वि‍म्‍वकेँ सुखा देलक। समाजक साम्‍यवादी सोच भगजोगि‍नी बनि‍ सवर्ण-दलि‍तक मध्‍य भि‍न्न सामाजि‍क दशाक मध्‍य मात्र टि‍मटि‍माइत रहल। एहि‍ कारण सम्‍यक दृष्‍टि‍कोण रहि‍तहुँ मैथि‍ली भाषाक स्‍थापि‍त रचनाकारक लेखनी व्‍यथि‍त आ शोषि‍त दलि‍तक मर्मस्‍पर्शी जीवन गाथाकेँ प्रकाशि‍त नहि‍ कऽ सकल। कथा-कवि‍ता आ गल्‍पमे तँ दलि‍तक चि‍त्रण भेटैत अि‍छ, मुदा उपन्‍यासमे अत्‍यल्‍प। अपन व्‍यथाक वि‍वेचन दलि‍त वर्गक साहि‍त्‍यकार सेहो नहि‍ कऽ सकलाह, कि‍एक तँ हि‍नक संख्‍या एखन धरि‍ नगन्‍य अछि‍। संभवत: दलि‍त रचनाकारक उपन्‍यास अपन वयनामे मैथि‍लीकेँ एखन धरि‍ नहि‍ भेटलनि‍। सभसँ जनप्रि‍य उपन्‍यासकार हरि‍मोहन झाक साहि‍त्‍यमे दलि‍त वर्ग अनुपस्‍थि‍त जकाँ छथि। यात्रीक बलचनमा ओना एहि‍ वर्ग दि‍स संकेत करैत अछि‍ ओहि‍ना जेना ललि‍तक पृथ्‍वीपूत्र, धूमकेतुक मोड़ पर आ रमानंद रेणुक दूध-फूल। यात्रीक पारो आ नवतुरि‍या वि‍षयक चयनक कारण दलि‍त वर्ग दि‍स ध्‍यान नहि‍ दऽ सकल। धीरेश्‍वर झा ‘धीरेन्‍द्र’क ‘कादो ओ कोयला’ छोट लोकक वि‍रनीक कथा कहैत अछि‍ तँ हुनकर ‘ठुमकि‍ बहू कमला’मे दलि‍त वर्गक संघर्षक कथा ठीठर आ रामकि‍सुनक माध्‍यमसँ कहल गेल अछि‍। मणि‍पद्ममक उपन्‍यासक राजा सहलेस दलि‍त दुसाधक नायक सहलेसक कथा कहैत अछि‍ तँ ‘लोरि‍क वि‍जय’ उपन्‍यासक नायक तँ यादव छथि‍ मुदा हुनका मि‍त्र वर्गमे बंठा चमार, वारू पासवान, राजल धोबी, ई सभ दलि‍त वर्गक छथि‍- लोरि‍कक कि‍छु वि‍रोधी सेहो दलि‍त वर्गक शासक छथि‍- मोचलि‍- गजभीमलि‍, हरवा आदि‍ बंठाक संहार परि‍स्‍थि‍ति‍वश करैत छथि‍ आ ताहि‍सँ लोरि‍क वि‍जयमे दलि‍त कथाक ढेर रास प्रसंग आएल अछि‍। नैका बनि‍जारामे सेहो नैकाक पत्‍नी फुलेश्‍वरीकेँ कि‍नवाक वर्णन अछि‍। हुनकर फुटपाथ भि‍खमंगा सबहक कथा कहैत अछि‍ तँ लि‍लीरेक पटाक्षेप भूमि‍हीनक नक्‍सलवाड़ी आन्‍दोलनक कथा कहैत अछि‍। आधुनि‍क कालक प्रसि‍द्ध उपन्‍यासकार वि‍द्यानाथ झा ‘वि‍दि‍त’जी एहि‍ वि‍षयपर अपन लेखनीकेँ कोशीक भदैया धार जकाँ झमाड़ि‍ कऽ प्रयोग कएलनि‍। ओना तँ वि‍दि‍त जी एखन धरि‍ आठ-नौ गोट उपन्‍यासक रचना कएलनि‍ अछि‍, परंच हि‍नक तीन गोट उपन्‍यासमे दलि‍तक दशाक चि‍त्रण मैथि‍ली साहि‍त्‍यक लेल अपूर्व नि‍धि‍ मानल जा सकैछ। हि‍नक वि‍प्‍लवी बेसराक कथामे आदि‍वासीक कथा धौना, टेकू सुफल, बांसुरी, मोहरीलाल, गौरी, मारसक संग सफलता पूर्वक कहल गेल अछि‍। ‘कौसि‍लि‍या’ उपन्‍यासमे तँ फुलि‍या चमैनक पात्रताक चि‍त्रण अनुपमेय अछि‍। वि‍दि‍त जीक तेसर उपन्‍यास ‘मानव कल्‍प’मे मि‍थि‍ला, अंग आ झारखंडक ऑचरमे बसल लगभग सम्‍पूर्ण दलि‍त समाजक वि‍वेचन कएल गेल। ओना तँ श्रीमती शेफालि‍का वर्मा जी मानव धर्मी रचनाकार छथि‍। हि‍नक समग्र साहि‍त्‍यि‍क कृति‍मे ‘जाति‍’ शब्‍द भूमंडलीकृत अछि‍। ‘नाग फांस’ उपन्‍यासमे जाति‍वादी व्‍यवस्‍थासँ शेफालि‍का जी बचबाक प्रयास कएलनि‍, परंच एहि‍ उपन्‍यासक एकटा पात्र आकाशक पत्‍नी तरंगक प्रकृति‍सँ बुझना जाइत अछि‍, जे ओ दलि‍त छथि‍। कहबाक लेल तँ सभ साहि‍त्‍यकार अपनाकेँ साम्‍यवादी कहैत छथि‍ मुदा साम्‍यवादी जीवन शैलीक जौं चर्च कएल जाए तँ संभवत: मैथि‍लीक सर्वकालीन साहि‍त्‍यमे ध्रुवताराक स्‍थान श्री जगदीश प्रसाद मंडल जीकेँ भेटबाक चाही। हि‍नक सभ उपन्‍यास (मौलाइल गाछक फूल, जि‍नगीक जीत, जीवन-मरण, जीवन-संघर्ष, उत्‍थान-पतन)मे दलि‍तक चि‍त्रण अनायास भेटि‍ जाइत अछि‍। लि‍खवाक शैली ओ वि‍म्‍वक चयन ततेक पारदर्शी जे सवर्ण- दलि‍तक मध्‍य कोनो खाधि‍ नहि‍। सम्‍पूर्ण समाजमे सकारात्‍मक तारतम्‍य स्‍थापि‍त करवाक जगदीश जीक स्‍वप्‍न मात्र उपन्‍यासमे नहि‍ रहत, एहि‍सँ मि‍थि‍लाक समाजि‍क परि‍स्‍थि‍ति‍मे भवि‍ष्‍यमे ‘सर्वे भवन्‍तु सुखि‍न:....। सि‍द्धान्‍तक स्‍थापना अवश्‍य हएत। हि‍नक अवि‍रल मर्मस्‍पर्शी आ प्रयोगधर्मी कृति‍ ‘मौलाइल गाछक फूल’मे दलि‍त समाजक महादलि‍त मुसहर जाति‍क रोगही, बेंगवा, कबुतरीक मनोदशा आ नि‍त्‍यकर्मसँ समाजमे शांति‍क ज्‍योति‍ जगएबाक कल्‍पना अनमोल अछि‍। दड़ि‍भंगाक प्‍लेटफार्मपर सँ भंगी डोमक मानवीय भावनाक मारीचि‍का एकठॉ भक्क दऽ उगि‍ जाइत अछि‍। भजुआ, झोलि‍या आ कुसेसरी सभ सेहो डोम जाति‍क छथि‍ जि‍नकर सहायता सम्‍यक सोचबला ब्राह्मण रमाकान्‍त जी करैत छथि‍। एहि‍ कृति‍क सभसँ अजगुत पात्र छथि‍ रमाकान्‍त जी। हि‍नक छोट पुत्र कालक डाँगसँ अधमरू वनि‍ता सुजाता जे धोवि‍न छथि‍ ति‍नकासँ वि‍वाह कऽ लैत छथि‍। वि‍वाहे टा नहि‍ वि‍वाहसँ शि‍क्षा ग्रहन करवाक लेल प्रेरणा आ अर्थ सेहो सुजाताकेँ भेटलनि‍ जाहि‍सँ ओ डाॅ. सुजाता बनि‍ गेली। गाममे रहनि‍हार आ अपन मातृभूमि‍क प्रति‍ असीम श्रद्धा रखनि‍हार रमाकान्‍त बाबूकेँ अपन पुत्र महेन्‍द्रक एहि‍ नि‍र्णएसँ कोनो पीड़ा नहि‍ भेलनि‍। हि‍नक सम्‍पूर्ण परि‍वार एहि‍ नि‍र्णएकेँ सहृदय स्‍वीकार कऽ लेलकनि‍। जगदीश बाबूक दोसर उपन्‍यास ‘जीवन-मरण’मे हेलन-गुदरी डोम दम्‍पति‍क चर्च कएल गेल अछि‍। जीबछ, छीतन, रंगलाल चमार जाति‍सँ सम्‍बन्‍ध रखैत छथि‍। जि‍नगीक जीत उपन्‍यासमे पलहनि‍क नेपथ्‍यक पात्रता दर्शित अछि‍। गजेन्‍द्र ठाकुरक ‘सहस्‍त्रबाढ़नि‍’मे दम्‍माक जड़ी एकटा आदि‍वासी द्वारा आनव आ ि‍कछु वर्ख वाद ओ जड़ी जंगलमे नै भेटब वोन कम होएवा दि‍स संकेत करैत अछि‍ तँ हुनकर ‘सहस्‍त्रशीर्षा’ मि‍थि‍लाक लगभग सभ दलि‍त जाति‍क वि‍ष्‍तृत वि‍वेचना करैत अछि‍। तीनटा घरक रहलोपर धोवि‍या टोली एकटा टोल बनि‍ गेल अछि‍। झंझारपुर धरि‍ मारवाड़ीक कपड़ा एतए साफ कएल जाइत अछि‍। महि‍सवार ब्रह्मण सभ जे बरि‍यातीमे बेलवटम झाड़ि‍ कऽ सीटि‍-सीटि‍ कऽ नि‍कलैत छथि‍ से कोनो अपन कपड़ा पहि‍रि कऽ। बैह मंगनि‍या कपड़ा, महगौआ मारवाड़ी सभक। मारवाड़ी सभक ई कपड़ा रजक भाय दू दि‍न लेल भाड़ापर हि‍नका सभकेँ दैत छथि‍न्‍ह। कोरैल बुधन आ डोमी साफी, धोवि‍। डोमी साफी आब डोमी दास छथि‍, कारण कबीरपंथी जोतै छथि‍। फेर एकटा आर टोल, चमरटोली अछि‍। चमार- मुखदेब राम आ कपि‍लदेव राम। पहि‍ने गामसँ बाहर रहए, बसबि‍ट्टीक बाद। मुदा आब तँ सभ बाॅस काटि‍ कऽ उपटाए देने अछि‍ आ लोकक वसोबास बढ़ैत-बढ़ैत एहि‍ चमरटोली धरि‍ आबि‍ गेल अछि‍। घरहट आ ईंटा-पजेबा सभ अगल-बगलमे खसि‍ते रहैत अछि‍। ढोलहो देबासँ लऽ कऽ सि‍ंगा बजेबा धरि‍मे हि‍नकर सबहक सहयोग अपेक्षि‍त। गाए-माल मरलाक बाद जा धरि‍ ई सभ उठा कऽ नहि‍ लऽ जाइत छथि‍ लोकक घरमे छुतका लागले रहैत अछि‍। भोला पासवान आ मुकेश पासवान, दुसाध। गेना हजारीक नि‍चुलका खाड़ीक संबंधी। वएह गेना हजारी जे कुशेश्‍वर स्‍थानमे एकटा कुशपर गाए द्वरा आबि‍ कऽ दूध दैत देखने रहथि‍ तँ ओहि‍ स्‍थानकेँ कोड़ए लगलाह, महादेव नीचाँ होइत गेलाह, सीतापुत्र कुश द्वारा स्‍थापि‍त ई महादेव गेना हजारीक ताकल। मुकेश पासवानक बेटी मालती बैंक अधि‍कारी छथि‍न्‍ह आ जमाए मथुरानंद डी.पी.एस. स्‍कूलक प्रचार्य छथि‍, वसंत-कुंज लग फार्म हाउसमे रहै जाइ छथि‍। भोला पासवान आ मुकेश पासवान गामेमे रहै जाइ छथि‍। 1967ई.क अकालमे जखन सभटा पोखरि‍, गड़खै सुखा गेल मुदा डकही पोखरि‍ नहि‍ सुखाएल प्रधानमंत्री आएल रहथि‍ तँ हुनका देखेने रहन्‍हि‍ सभ जे कोना एतए सँ बि‍सॉढ़ कोड़ि‍ कऽ मुसहर सभ खाइत छथि‍। चर्मकार मुखदेव रामक बेटा उमेश सेहो ओहि‍ मुक्‍ताकाश सैलूनक बगलमे अपन असला-खसला खसा लेने अछि‍, रहैए मुदा कि‍शनगढ़मे। चप्‍पल, जुताक मरो-म्‍मति‍क अलावे तालाक डुप्‍लीकेट चाभी बनेबाक हुनर सेहो सीखि‍ लेने अछि‍। कुंजी अछि‍ तँ ओकर डुप्‍लीकेट पंद्रह टाकामे। कुंजी हेरा गेल अछि‍ तँ तकर डुप्‍लीकेट सए टाकामे। आ जे घर लऽ जएवन्‍हि‍ तँ तकर फीस दू सए टाका अति‍रि‍क्‍त। मुसहर बि‍चकुन सदायक बेटा रघुवीर ड्राइवरी सीखि‍ लेने अछि‍। वसंत कुंजक एकटा व्‍यवसायीक ओहि‍ठाम ड्राइवरी करैए आ रहैत अछि‍ कि‍सनगढ़मे। डोमटोलीक बौधा मल्‍लि‍क बेटा श्रीमंत सेक्‍टरक मेन्‍टेन्‍सक ठेका लेने छथि‍। हुनका लग दू सए गोटे छन्‍हि‍ जे सभ क्‍वार्टरक कूड़ा सभ दि‍न भोरमे उठेवाक संग रोड आ पार्किगक भोरे-भोर सफाइ करै छथि‍। एहि‍मे सँ कि‍छु गोटे वि‍शेष कऽ नेपालक भोरे-भोर लोकक शीसा महि‍नवारी दू सए टाकामे पोछै छथि‍ आ अखबारक हॉकर बनल छथि‍। रहै छथि‍ कि‍शनगढ़मे मुदा अपन मकानमे- मुसहर बि‍चकुन सदाय। दलि‍त संस्‍कृति‍क प्रति‍ उदासीनताक मुख्‍य कारण अछि‍ समाजमे पसरल छूति‍ व्‍यवस्‍था। ओना तँ एहि‍ प्रकारक अवस्‍था प्राय: सम्‍पूर्ण आर्यावर्त्तमे रहल अछि‍, परंच आन ठामक जनभाषासँ दोसर धर्मक लोकक हृदयगत स्‍पर्शक कारण दलि‍त संस्‍कारक चि‍त्रण आन भाषामे मैथि‍लीसँ वेसी भेटैत अछि‍। मि‍थि‍लामे तँ इस्‍लाम धर्मी छथि‍, परंच मातृभाषा मैथि‍ली रहलाक वादो हुनका सबहक मध्‍य साहि‍त्‍यक सृजनशीलता उदासीन रहल। एकरा मैथि‍लीक दुर्भाग्‍य मानल जा सकैत अछि‍ जे एखन धरि‍ एहि‍ भाषामे दलि‍त वर्गसँ उपजल साहि‍त्‍यकार उपन्‍यास नहि‍ लि‍खि‍ सकलनि‍। प्राय: यएह स्‍थि‍ति‍ इस्‍लाम धर्मी साहि‍त्‍यकारक संग सेहो अछि‍। फजलुर रहमान हासमी, मंजर सुलेमान सन साहि‍त्‍यकार तँ मैथि‍लीकेँ आत्‍मसात कएलनि‍ परंच उपन्‍यासकार नहि‍ बनि‍ सकलाहेँ। ई लि‍खबाक तात्‍पर्य जे इस्‍लाममे जाति‍वादी व्‍यवस्‍था सनातन सांस्‍कृति‍क अपेक्षाकृत न्‍यून अछि‍। दलि‍त वर्गक संख्‍या मि‍थि‍लामे लगभग आठ आना अछि‍, संपूर्ण समाजक मातृभाषा मैथि‍ली, मुदा शि‍क्षा-चेतनाक अभावक कारण एहि‍ वर्गमे मैथि‍ली साहि‍त्‍यक प्रति‍ सृजनात्‍मक दृष्‍टि‍कोण नहि‍ पनपि‍ सकल। आगॉक जाति‍मे सम्‍यक् ि‍वचारक अभाव रहल अछि‍, कि‍छु साहि‍त्‍यकार एहि‍ परि‍धि‍सँ तँ बाहर छथि‍ परंच वर्गक बीचक खाधि‍ लक्ष्‍मण रेखा बनि‍ हुनको सभमे जनभाषा वाचकक प्रति‍ सि‍नेह नहि‍ आबए देलक। संभवत: मैथि‍ली आर्यभाषा समूहक पहि‍ल जनभाषा थि‍क जकरापर जाति‍वादी कलंक लागल अछि‍। संस्‍कृतक संग यएह वि‍डंवना रहल परंच ओ कहि‍ओ जनभाषा नहि‍ रहल। जखन कि‍ मैथि‍ली वर्तमान कालमे सवर्णसँ बेसी दलि‍त-पछाति‍क मातृभाषा अछि‍। पलायन तँ सभ जाति‍ समूहमे भऽ रहल अछि‍ परंच मजदूरी केनि‍हार दलि‍त प्रवासमे सेहो मैथि‍लीकेँ आत्‍मसात कएने छथि‍। एकर वि‍परीत मि‍थि‍लामे रहनि‍हार सवर्ण परि‍वारक आधुनि‍क पि‍रहीक नेना वर्गमे मातृभाषाक स्‍थान हि‍न्‍दी लऽ रहल अछि‍। ‘ज्‍योति‍क-कोखि‍ अन्‍हार’ जकाँ मातृभाषाक वास्‍तवि‍क संरक्षकक वि‍वेचन एहि‍ साहि‍त्‍यक उन्नयनक नहि‍ कऽ रहल छथि‍। उतर वि‍हारक बेस रास स्‍थानमे पसरल मैथि‍ली तँ कखनो-कखनो मात्र मधुबनी दड़ि‍भंगाक मातृभाषा प्रमाणि‍त कएल जाइत अछि‍। रचनाकारक दृष्‍टि‍कोण रचनामे कि‍छु आर आ वास्‍तवि‍क जीवनमे कि‍छु आर रहल। साम्‍यवादी व्‍यवस्‍थापर सि‍याहीक प्रयोग केनि‍हार उपन्‍यासकारमे वास्‍तवि‍कता जौं रूढ़ि‍वादी रहत तँ सम्‍यक समाजक कल्‍पनो करब असंभव। व्‍यथा वएह बूझि‍ सकैत ‍अछि‍ जकरामे जीवन्‍त अवि‍रल हृदय हो वा स्‍वयं व्‍यथि‍त हुअए। नि‍ष्‍कर्षत: आशक संग-संग विश्‍वास अछि‍ जे वर्तमान युगक साहि‍त्‍यकार समाजक कात लागल वर्गक प्रति‍ सि‍नेही बनि‍ मैथि‍ली साहि‍त्‍यकेँ गरि‍मामयी बनाबथु। पूर्वाग्रहकेँ अनुगृहीत करबाक पश्‍चात एहेन कल्‍पना-वास्‍तवि‍क भऽ सकैत अछि‍। जौं अपमानि‍त अछोपकेँ सम्‍मानि‍त कएल जाए तँ मि‍थि‍ला पुनि‍ ओहि‍ मि‍थि‍लामे परि‍णत भऽ सकैत अछि‍ जतए राजा जनक परि‍वार, समाज आ राज्‍यहि‍तमे धर्मक पालनक हेतु राजासँ हरबाह बनि‍ गेलनि‍। ‍ ४ पोथी- समीक्षा भावांजलि‍- नैसर्गिक आ आत्‍मि‍क भावसँ नि‍कसैत कवि‍ताकेँ आशु कवि‍ता कहल जाइत अछि‍। एहि‍ भावक सृष्‍टि‍ आशुकवि‍ वा आशु कवयि‍त्री मानल जाइत छथि‍। आशु कवि‍तामे मैथि‍ली साहि‍त्‍यक स्‍थान एकात परंच वि‍लक्षण। कवि‍ कोकि‍ल वि‍द्यापति‍, कवि‍शेखर बदरीनाथ झा, कवि‍वर सीताराम झा, सरस कवि‍ ईशनाथ झा, कवीश्‍वर चन्‍दा झा, कवि‍ चूड़ामणि‍ मधुप, कवि‍ सरोज भुवन, यात्री, आरसी, अणु, गोपेश, श्रीमति‍ श्‍यामा देवी, चन्‍द्रनाथ मि‍श्र ‘अमर’, रवीन्‍द्र, सरस, नवल, श्रीमति‍ इलारानी, सुरेश सि‍ंह स्‍नेही, प्रवासी, वि‍भूति‍ आनंद, प्रदीप मैथि‍ली पुत्र, मणि‍पद्म, नचि‍केता, डाॅ. बुद्धि‍नाथ मि‍श्र, राजदेव मंडल, श्रीमति‍ ज्‍योति‍ सुनीत चौधरी, वि‍लट पासवान वि‍हंगम, हासमी जी, मंत्रेश्‍वर झा, राजकमल, अशोक दत्त, रूपेश कुमार त्‍योंथ, जगदीश प्रसाद मंडल, चन्‍द्रशेखर कामति‍, उमेश मंडल, कीर्ति नारायण मि‍श्र, मायानंद मि‍श्र, कुमार पवन, डाॅ. शंभु कुमार सि‍ंह, श्रीमती मृदुला प्रधान, श्रीमती कुसुम ठाकुर, वि‍वेकानंद ठाकुर, चन्‍द्रभानु सि‍ंह, कालीकान्‍त झा ‘बूच’, रमाकान्‍त राय रमा, डॉ. केदारनाथ लाभ, जय प्रकाश जनक, डॉ. नरेश कुमार वि‍कल, गजेन्‍द्र ठाकुर प्रभृत आशु कवि‍ आ कवयि‍त्री सभसँ जगमगाइत मैथि‍ली साहि‍त्‍य सरि‍तामे एकटा चंचला मुदा अर्न्‍तमुखी नक्षत्रक उदय मैथि‍ली साहि‍त्‍यकेँ घृतगंधा बनौने अछि‍- ओ छथि‍ डॉ. शेफालि‍का वर्मा। हि‍नक तृण-तृणमे काव्‍य धारा अवि‍रल गति‍सँ गति‍मान अछि‍। ओना तँ वि‍प्रलब्‍धा आ मधुगंधी बसात सन कवि‍ता संग्रहक रचना कऽ अपन विशेष स्‍थान बनौने छथि‍ शेफालि‍का जी। मुदा हि‍नका एकटा गद्य गीत संग्रह ‘भावंजलि‍’ मैथि‍ली भाषा साहि‍त्‍यमे कवि‍वर रवीन्‍द्रनाथ टैगोरक स्‍थान शून्‍यताकेँ भरबाक लेल पूर्णत: नहि‍ तँ आंशि‍क रूपेँ अवश्‍य प्रतीत हएत। जीवनक वास्‍तवि‍क संरचना, एति‍, उदेश्‍य, दुख-दुख, आश-छोहसँ एहि‍ रचनाक कोनो संबंध नहि‍। ककरा प्रतीक्षा अनचि‍न्‍ह सि‍नेह, अकथ्‍य मर्मक अकुलाएल अनुभूति‍केँ एहि‍ गद्य-गीतमे प्रदर्शित कएल गेल अछि‍- ई संभवत: त्रि‍वेणीक वाक् धारा जकाँ मात्र अनुभूति‍ एकल जा सकैछ, प्रत्‍यक्ष दर्शन नहि‍। स्‍वभावि‍क अछि‍ पुष्‍प, नीर, क्षीर आ अमि‍य-गुग्‍गुलक अंजलि‍ तँ देखबाक योग्‍य होइत अछि‍, ‘भावांजलि‍’केँ कोना देखल जाए? हि‍न्‍दी काव्‍य गगनक आत्‍मा- ‘एक भारतीय आत्‍मा’क प्रेमक वि‍वेचन असंभव तँ नहि‍ मुदा अति‍ क्‍लि‍ष्‍ट- है कौन सा वह तत्‍व जो सारे भुवनमे व्‍याप्‍त है, ब्रह्माण्‍ड पूरा भी नहीं जि‍सके लि‍ए पर्याप्‍त है? कवयि‍त्रीक हंसि‍नी मोन वि‍रहक शंकामे जरैत अछि‍ तँ दोसर दि‍शि‍ मि‍लनक उन्‍मादसँ दीि‍पत अछि‍। सि‍नेहि‍ल स्‍पर्शक आश तँ करैत छथि‍, मुदा स्‍पर्शनक कल्‍पना मात्रसँ सि‍हरि‍ जाइत छथि‍। समस्‍त तन सि‍तारक तार जकाँ झंकृत भऽ जाइत छनि‍‍। एहि‍ सि‍नेहक वि‍म्‍व तँ अनमोल मुदा ककरासँ सि‍नेह? कतहु नाथक रूपेँ भगवान बुझना जाइत छथि‍ तँ कतहु कंतक भान। कतहु स्‍पर्शनसँ वैराग्‍य भावक प्रदर्शन तँ कतहु स्‍पर्शनक आशमे नैका वनि‍जाराक नायि‍का जकाँ- ‘उत्ताप प्रेम ति‍ल सुनगि‍ रहल नहि‍ आब ई यौवन अछि‍ वशमे’ मात्र एकावन पृष्‍ठक पोथीमे राजा भर्तृहरि‍क नीति‍, श्रंृगार आ वैराग्‍य तीनू गोट शतकक दर्शन एहि‍ गद्य गीतकेँ वि‍लक्षण बना देलक। मृत्‍युसँ वएह प्रेम कऽ सकैत अछि‍ जे जीवनसँ उवि‍ गेल हो वा जीवनक पूर्णताकेँ देखि‍ नेने हुअए। जाहि‍ कालमे शेफालि‍का जी एहि‍ पोथीक रचना कएलनि‍ ओहि‍ काल जीवनमे शून्‍यता तँ नहि‍ छल। पूर्णता एहि‍ दुआरे नहि‍ कहि‍ सकैत छी जे ओहि‍ समएकेँ छोड़ल जाए हि‍नक लेखनी एखन धरि‍ गति‍शील अछि‍। आब प्रश्‍न उठैत अछि‍ जे जीवनक गति‍ आ नि‍यति‍मे जीवंत नारीक जीवनक कोन अकथ्‍य व्‍यथाक चि‍त्रण एहि‍ पोथीमे कएल गेल जे मृत्‍युक अवाहन कऽ लेली। एहि‍ठाम तीर्थस्‍थानक बि‍म्‍बक वि‍श्‍लेषणमे गृहस्‍थ जीवनकेँ परम तीर्थ स्‍थल बना देल गेल। कवयि‍त्रीक लघुआत्‍मामे सभ देव-देवी समाएल अछि‍। अंितम पद्यमे संभवत: अपन पति‍केँ अपन इष्‍टदेवक संग-संग प्रेरणा स्‍त्रोत, रक्षक, पि‍ता भाय सभ रूपमे मानने छथि‍। तखन अदृश्‍य मृगमारीचि‍का कतऽ सँ आएल? रचनाक सभटा पक्ष तँ बड़ नीक अछि‍ मुदा दुर्बल पक्ष अछि‍ अनुत्तरि‍त प्रश्‍न पाठक धरि‍ कोना परसल गेल? ई सत्‍य अछि‍ जे आदि‍त्‍यक अंशु सेहो कवि‍ताकेँ इजोरि‍या नहि‍ दऽ सकैत अछि‍, मुदा एहेन कवि‍त्‍वक प्रदर्शन समीचीन नहि‍ लागल। भऽ सकैत अछि‍ जे आशु कवि‍ताक नवल धारा कवयि‍त्रीक गातसँ स्‍वत: स्‍फूर्त रूपेँ अंकुरि‍त भेल हुअए। भौति‍कता आ बौद्धि‍कतापर सि‍नेह भारी बुझना गेल। सि‍नेहक प्रकार भि‍न्न-अकथ्‍य सि‍नेह। स्‍व. मनमोहन झा’क ‘यात्राक स्‍मृति‍’क नायकक दृष्‍टि‍सँ सुमि‍त्राक प्रति‍ उपटल सि‍नेहो एहि‍ काव्‍य गीतक आगाँ ओछ पड़ि‍ जाइत अछि‍। अपराध कएलापर अपराधबोध प्रासंगि‍क, मुदा बि‍नु अपराध कएने अपराधक लेल क्षमायाचना, ककरासँ क्षमायाचना इहो स्‍पष्‍ट नहि‍। सम्‍पूर्ण रचनामे प्रश्‍न- नव-नव प्रश्‍न मुदा ककरो दोसर लेल प्रश्‍न नहि‍ कवयि‍त्री तँ अपन जीवनसँ प्रश्‍न पुछैत छथि‍। हमरा मतेँ देसि‍ल वयनामे ‘भावांजलि‍’ नव प्रकारक रचना थि‍क। अपन आत्‍मासँ साक्षात्‍कार, नि‍र्विकार ब्रह्माण्‍डसँ साक्षात्‍कार......। पोथीक नाओ- भावांजलि कवयि‍त्री- डॉ. शेफालि‍का वर्मा प्रकाशन वर्ष- 1996 ‍ ६ भफाइत चाहक जि‍नगी समीक्षा संपूर्ण मैथि‍ली भाषामे नाटक वि‍धाक प्रारंभ पंडि‍त जीवन झा कृत नाटक ‘सुन्‍दर संयोग’सँ सन् १९०४ई मे भेल। एहि‍सँ पूर्व मैथि‍लीमे उमापति‍, रामदास नन्‍दीपति‍ आदि‍ सेहो नाटकक रचना कएलन्‍हि‍, मुदा ओ सभ पूर्ण मैथि‍लीमे नहि‍ लि‍खल गेल। सुन्‍दर संयोग’सँ लऽ कऽ श्री नचि‍केता रचि‍त ‘नो एन्‍ट्री मा प्रवि‍श’, श्रीमती वि‍भारानी कृत ‘भार रौ आ बलचंदा’ आओर श्री जगदीश प्रसाद मंडल कृत ‘मि‍थि‍लाक बेटी’ धरि‍ मैथि‍ली साहि‍त्‍यमे वि‍वि‍ध वि‍धाक नाटकक रास संग्रह उपलब्‍ध अछि‍। ओहि‍ समग्र नाटकक मध्‍य कि‍छु नाटक बड़ लाेकप्रि‍य भेल अछि‍ ओहि‍मे- श्री ईशनाथ झा रचि‍त ‘चीनीक लड्डू’ पंडि‍त गोवि‍न्‍द झा लि‍खि‍त ‘बसात’ श्री मणि‍पद्म रचि‍त झुमकी श्री ललन ठाकुर लि‍खि‍त ‘लौंगि‍या मि‍रचाई’ प्रो. राधा कृष्‍ण चौधरी लि‍खि‍त ‘राज्‍याभि‍षेक’ श्री सुरेन्‍द्र प्र. सि‍न्‍हा रचि‍त ‘वीरचक्र’ श्री महेन्‍द्र मलंगि‍या रचि‍त ‘एक कमल नोरमे’ श्री वि‍न्‍देश्‍वरी मंडल रचि‍त ‘क्षमादान’ श्री उत्तम लाल मंडल रचि‍त ‘इजोत’ आ श्री गौरीकान्‍त चौधरी ‘कांत’ (मुखि‍या जी) रचि‍त ‘वरदान’क संग-संग मैथि‍लीक मूर्द्धन्‍य साहि‍त्‍यकार पंडि‍त सुधांशु शेखर चौधरी रचि‍त ‘भफाइत चाहक जि‍नगी’ प्रमुख अछि‍। स्‍व सुधांशु जी मूलत: मैथि‍ली साहि‍त्‍यक उपन्‍यासकारक रूपमे प्रसि‍द्ध छथि‍। अर्थनीति‍केँ आधार बना कऽ लि‍खबाक शैलीक कारण मैथि‍लीमे हि‍नक एकटा अलग स्‍थान अछि‍, एकटा कलाकार जौं अपन कलाक प्रदर्शन नाट्य रूपमे करए तँ कोनो अजगुत नहि‍। हि‍न्‍दीमे हि‍नक लि‍खल नाटक सभ लोकप्रि‍य भेल, तेँ अपन मातृभाषामे सेहो नाटक लि‍खए लगलाह। भफाइत चाहक जि‍नगी’मे समाजक सामान्‍य बि‍म्‍बकेँ वि‍लक्षण रूपसँ वि‍म्‍बि‍त कऽ हास्‍य आ मर्मक सम्‍यक् तारतम्‍य स्‍थापि‍त कएलन्‍हि‍। चाहक जि‍नगी कतेक क्षणक होइत अछि‍, भाफ उपटलासँ एकर अस्‍ति‍त्‍व लुप्‍त भऽ जाइछ, मुदा जौं भनसि‍यामे आत्‍म वि‍श्‍वास हो तँ ओहि‍ अस्‍ति‍त्‍ववि‍हीन चाहमे नीर-क्षीर मि‍श्रि‍त कऽ ओकर फेरसँ सुस्‍वादु बनाओल जा सकैत अछि‍। नाटकक नायक महेशक जि‍नगी भफाइत चाहक जि‍नगी जकाँ अछि‍। एकटा सुशि‍क्षि‍त व्‍यक्‍ति‍ कर्मक प्रति‍स्‍पर्धाक गति‍‍मे सफल नहि‍ भेलापर समाजक अधलाह मानल गेल कर्मकेँ अपन जीवनक डोरि‍ बना कऽ ततेक आत्‍मबलसँ जीवैत अछि‍ जे दीर्घसूत्री दृष्‍टि‍कोणक लोक सेहो एकरा लग नतमस्‍तक भऽ गेल। नाटकक कथा चेतना समि‍ति‍ पटनाक कार्यक्रमक मध्‍य धुरैत अछि‍। महेश चाहक स्‍थायी वि‍क्रेता छथि‍, मुदा अधि‍क वि‍क्रीक आशक संग मि‍थि‍ला-मैथि‍लीसँ सि‍नेहक दुआरे त्रि‍दि‍वसीय कार्यक्रममे अपन दोकान लगौलनि‍। हुनक दोकानक पांजड़ि‍मे गेना जीक पानक दोकान, मात्र मैथि‍लीक पावनि‍ धरि‍क लेल। सम्‍पूर्ण नाटक एहि‍ दू दोकानक दृश्‍यमे वि‍म्‍वि‍त अि‍छ। चेतना समि‍ति‍क कार्यक्रमक प्रदर्शन मात्र नेपथ्‍यसँ कएल गेल। महेश-गेनाक शीत वसंतक वसातक संयोग जकाँ वार्तालापक क्रममे कार्यक्रमक कार्यकर्त्ता गोपालक प्रवेश। हि‍नक उद्येश्‍य चाह पीबाक संग कार्यक्रममे चाह पहुँचएवाक सेहो अछि‍। पान मंचपर अवश्‍य चाही, कि‍एक तँ ई मैथि‍ल संस्‍कृति‍क प्रतीक अछि‍। गोपालक संग दि‍गम्‍वरक गप्‍प-सप्‍पमे अनसोहॉत कटाक्ष शैलीक वि‍वेचन नीक वुझना जाइत अछि‍। अध्‍ययन सम्‍पन्‍न कऽ लेलाक पश्‍चात् दि‍गम्‍बर बावूकेँ नौकरी नहि‍ भेटलन्‍हि‍। पटनामे दस दुआरि‍ बनि‍ पेट पोसि‍ रहल छथि‍ परंच महेशक चाह बेचवासँ ओ संतुष्‍ट नहि‍, हुनका गामक महेश चाहक दोकान खोलि‍ गामक नाक कटा रहल अछि‍। वाह-रे मैथि‍ल! भीख मांगि‍ कऽ खाएव नीक, ठकि‍ कऽ जीएव नीक मुदा छोट कर्म नहि‍ करव। महेश तँ चाह बेि‍च कऽ अपन परि‍वारक प्रति‍पाल करैत छथि‍, दू गोट बारह बरखक नेनाकेँ रोजगार देने छथि‍, मुदा दि‍गम्‍वर बावूकेँ अपन यायावरी जीवन नीक लगैत छन्‍हि‍। मुँहगर जे स्‍वयं अकर्मण्‍य हो ओ गोंग कर्मक पुरूषकेँ दूसय तँ की कहल जाए? महेश चुप्‍प नहि‍ रहलाह, अपन कर्मक गति‍क आड़ि‍मे दि‍गमबरकेँ सत्‍यसँ परि‍चए करा देलनि‍। ओना ई दोसर गप्‍प जे महेशो अपन पि‍तासँ असत्‍य बजने छथि‍। हुनक पि‍ताकेँ ई वूझल छन्‍हि‍ जे महेश पटनामे नौकरी करैत अछि‍। महेश मि‍थ्‍या बजलनि‍ मात्र अपन पि‍ताक मानसि‍क संतुष्‍टि‍क लेल, कि‍एक तँ पुरना सोचक लोक अपन ठोप-चाननेटा पर वि‍श्‍वास करैत छथि‍, वरू भुक्‍खे मरि‍ जाएव मुदा वि‍जातीय ओछ कर्म नहि‍ करव। नाटकक देासर प्रमुख पात्र छथि‍ उमानाथ आ चन्‍द्रमा, एकटा अकाश आ दोसर धरि‍त्री। उमानाथ अभि‍यंता छथि‍, नाओ टा लेल मैि‍थल, कार्यक्रम देखवाक लेल नहि‍ अएलनि‍, मात्र अपन ंसगी सभसँ भेँट करवाक दुआरे चेतना समि‍ति‍क दर्शक दीर्घा मे अशोकर्य लऽ कऽ पैसलनि‍। अपन कनि‍याँ चन्‍द्रमा टा सँ मैथि‍लीमे गप्‍प करैत छथि‍। की मजाल केओ देासर हुनका संग मैि‍थलीमे गप्‍प करवाक दु:साहस करए, ओकरा अपन सामर्थ्‍य देखा देताह। दुनू परानी चाह पीवाक क्रममे महेशक दोकानपर अबैत छथि‍, चाह बनल नहि‍ की उमानाथ जीकेँ कोनो संगीपर नजरि‍ पड़ि‍ गेलनि‍। कनि‍याकेँ महेशक दोकानपर छोड़ि‍ ठामे पड़ा गेलाह। यथाक्रममे मंचसँ महेश जीकेँ कवि‍ता पाठ करवाक आग्रह आएल। चन्‍द्रमा जीकेँ बि‍नु दामे दोकानक ओरवाही दऽ ओ मंचस्‍थ भऽ गेलाह। चन्‍द्रमा अजगुतमे पड़ि‍ गेलीह, चाहक वि‍क्रेता आ कवि‍? कालक लीला वि‍चि‍त्र लगलनि‍। दोकानपर गाहकि‍ सभ आवए लागल, चन्‍द्रमा भावावेशमे पड़ि‍ चाह बनावए लगलीह। गंगानाथ आ दयानंद सन गाहकि‍केँ चाह वि‍क्रेता कवि‍ पचि‍ नहि‍ रहल छल। समि‍ति‍क मंच हुनका लोकनि‍क मतेँ गनहा गेल। हरि‍कान्‍त बावूकेँ आधुनि‍क रूपक कार्यक्रम नीक नहि‍ लागि‍ रहल छनि‍, तँ शि‍वानंदकेँ पुरातन संस्‍कृति‍सँ कोनो मोह वा छोह नहि‍। एहि‍ मध्‍य उमानाथ बावू चन्‍द्रमाकेँ तकैत दोकानपर अएलाह। अपन कनि‍याकेँ चाह बनवैत देखि‍ते माहुर भऽ गेलथि‍। छोड़बाक जि‍द्द कएलनि‍ मुदा मैथि‍ल नारी अपन उतरदायि‍त्‍वसँ कोना भटकि‍ सकैत अछि‍? एक खीरा तीन फॉक! बि‍गड़ि‍ कऽ फेर पड़ा गेलाह। मोने-मोन महेशपर अगि‍नवान बरि‍सबैत छलथि‍। चन्‍द्रमा सेहो संकटक अवाहानमे सशंकि‍त मुदा की करतीह? एक दि‍श भाव आ दोसर दि‍श कर्त्तव्‍य वोध, “आँखि‍क तीरक वि‍ख पानि‍ नोर बनि‍ झहड़ल हृदय झमान भेल।‍” कथाक अंति‍म वनि‍ता सरि‍ताक कंठ चाहक लेल सुखए लागल तेँ अपन नोकर आ छोट नेनाक संग महेशक दोकानपर अबैत छथि‍। कवि‍काठी महेश कवि‍ता पाठ कऽ फेर अपन जीवनकेँ गुनि‍ रहल छथि‍। सरि‍ताकेँ देखि‍ते स्‍वयंमे नुकएवाक असहज प्रयास करए लगलनि‍। वएह सरि‍ता जे कहि‍यो महेशक सह पाठि‍नी छलीह, आव एकटा आइ.ए.एस. अधि‍कारीक अर्द्धांगि‍नी छथि‍। सरि‍ता महेशसँ साक्षात्‍कार करबाक प्रयास कऽ रहलीहेँ। महेश अपन भूतकालकेँ झॉपए चाहैत छथि‍ मुदा सरि‍ता घोघट कालक वऽर जकाँ ओकरा उधारि‍ रहल छलीह। हुनक उद्येश्‍य सि‍नेहि‍ल अछि‍ तेँ महेश टूटि‍ गेलाह। सरि‍ता अश्रुधारसँ सि‍चि‍ंत, जकर नोट्स पढ़ि‍ अध्‍ययन पथपर बढ़ैत रहलीह ओ एहेन दशामे पहुँच गेल। चन्‍द्रमा सरि‍ताक मोहमे वि‍चरण करए लगलीह। एहि‍ मर्मस्‍पर्शी क्षणक अंत भेल नहि‍ की उमानाथ आवि‍ महेशक गट्टा पकड़ि‍ वास्‍तवि‍क जीवनकेँ दर्शन कराबए लगलाह। चन्‍द्रमा एहि‍ क्षण महेशक संग दऽ रहल छलीह। मैथि‍ली साहि‍त्‍यक लेल सभसँ वि‍लग नूतन वि‍षय वस्‍तुक मार्मिक वि‍श्‍लेषणमे शेखर जीक अतुल्‍य प्रति‍भाक झलक अनमोल अछि‍। पूर्ण रूपसँ एकरा नाटक नहि‍ कहल जा सकैछ, कि‍एक तँ दीर्ध एकांकीक रूपमे लि‍खल गेल अछि‍। कथाक चि‍त्रण मात्र दू दोकानक परि‍धि‍मे भेल अछि‍ तेँ दृश्‍य समायोजनमे कोनो प्रकारक वि‍ध्‍नक स्‍थि‍ति‍ नहि‍, सरि‍पहुँ एकरा शेखर जी नाटकक रूपमे प्रदर्शित कएलनि‍। महेश सन चरि‍त्र हमरा सबहक समाजमे छथि, मुदा कर्त्तव्‍यबोधक एहेन पुरूष जौं मि‍थि‍लामे सभ ठाम होथि‍ तँ हम सभ साधन वि‍ि‍हन रहि‍तहुँ सम्‍यक जीवनक रचना कऽ सकैत छी। चन्‍द्रमा सन दीर्घसोची नारीक वि‍वरणमे वास्‍तवि‍कतासँ वेशी कल्‍पनाक आभास होइत अछि‍। नाटकक आत्‍मकथ्‍यमे शेखर जीक आत्‍मवि‍श्‍वाससँ वेशी अहंकारक दर्शन भेल। ‘नाटकक क्षेत्रमे हमर कि‍छु मोजर अछि‍’ सन उक्‍ति‍क संग बटुक भाय आ गजेन्‍द्र ना. चौधरीक प्रति कृतज्ञता ज्ञापनमे महि‍मा मंडनक भान श्‍ोशर जीक संस्‍कारपर‍ बुझना जाइछ। केओ ककरो प्रेरणासँ रचनाकार नहि‍ भऽ सकैत अछि‍, ई तँ नैसर्गिक प्रति‍भाक परि‍णाम थि‍क। मुदा एहि‍सँ ‘भफाइत चाहक जि‍नगी’क मर्यादाकेँ क्षीण नहि‍ बुझना जा सकैत अछि‍। मात्र छोट-छोट ३९ पृष्‍ठक नाटक (ओहुमे सँ आठ पृष्‍ठ वि‍षय वस्‍तुसँ बाहरक) मैथि‍ली साहि‍त्‍यक लेल मरूभूमि‍मे नीरक सदृश बनल दृष्‍टि‍कोणकेँ परि‍लक्षि‍त करैत अछि‍। एि‍ह प्रकारक बि‍म्‍बक सृजन शेखर जी सन मांजल रचनाकारेसँ संभव भऽ सकैछ। नि‍ष्‍कर्षत: मि‍थि‍लाक संस्‍कृति‍क मध्‍य कर्म प्रधान युगक आचमनि‍सँ नाटक ओत-प्रोत अछि‍। मात्र साहि‍त्‍यक नहि‍, मंचनक लेल पूर्णत: उपयुक्‍त लागल। नाटक- भफाइत चाहक ि‍जनगी रचनाकार- पं. सुधांशु शेखर चौधरी प्रथम संस्‍करण- नवम्‍वर १९७५ ७ शि‍वकुमार झा टि‍ल्‍लू रमाजीक काव्‍य यात्रा मैथि‍ली साहि‍त्‍यक काव्‍य धरातलपर कि‍छु एहेन कवि‍क पदार्पण भेल अछि‍ जनि‍क समर्पण आगाँ साक्षा्त सरस्‍वती मूक भेल छथि‍ ओइ साहि‍त्‍यि‍कारक समूहमे श्री रमाकान्‍त राय रमा'क नाओं सम्‍मानसँ लेल जाइत छन्‍हि‍। 5 जनवरी 1947 ई.केँ समस्‍तीपुर जि‍लाक वि‍भूति‍पुर प्रखण्‍डक मानाराय टोलमे रमाजीक जन्‍म भेलन्‍हि‍। म.वि‍. दलसि‍ंहसरायमे शि‍क्षकक रूपेँ प्रथमत: योगदान देलन्‍हि‍ आ अवकासग्रहण उ.वि‍. शि‍रोपट्टी खतुआहाक शि‍क्षकक रूपमे कएलनि‍। संस्‍कृत साहि‍त्‍यमे आचार्य आ वि‍शारद्सँ वि‍भूषि‍त रमाजी मैथि‍ली आ हि‍न्‍दीमे कवि‍ता अपन छात्र कालहि‍ंसँ लि‍ख रहल छथि‍। कवि‍ताक संग-संग गद्य साहि‍त्‍यमे सेहो हि‍नक कि‍छु योगदान छन्‍हि‍। एकटा कथा संग्रह कटैत पाॅखि‍ : हँसैत आॅखि‍ तीनि‍टा बबाजी (अनुदि‍त कथा)क संग संग वि‍वि‍ध पत्र-पत्रि‍कामे हि‍नक कथा, नि‍वंध आदि‍क प्रकाशन भेल। एकटा नि‍वंध संकलन कूटल-छॉटल आ एकटा नाटक घर-छोड़ू ि‍हनक अप्रकाशि‍त कृति‍ छन्‍हि‍। रमा जीक पहि‍ल कवि‍ता 1964ई.मे मि‍थि‍ला भूमि‍क प्रति‍ समर्पण भावसँ मि‍थि‍ला महान शीर्षक रूपेँ इलाहावादसँ प्रकाशि‍त बटुक पत्रि‍कामे प्रकाशि‍त भेल छल। लगभग एक सयसँ ऊपर कवि‍ता लि‍ख रमाजी एखन धरि‍ साहि‍त्‍य धारामे गोंता लगा रहल छथि‍। ऐ यात्राक क्रममे मैथि‍लीक कोपभाजन सेहो भेलाह। सन् 2007ई.मे साहि‍त्‍य अकादमी आ मैथि‍ली साहि‍त्‍य संस्‍कृति‍ वि‍कास परि‍षद् समस्‍तीपरुक संयुक्‍त तत्‍वावधानमे रमाजी अपन जन्‍मभूमि‍ मानाराय टज्ञेलमे काव्‍य संध्‍या आयोजि‍त करवाक रूोजना बना रहल छलाह। ऐ क्रममे मैथि‍ली साहि‍त्‍यक वयोवृद्ध साहि‍त्‍यकार श्री चन्‍द्रनाथ मि‍श्र अमर जीसँ भेँट करबाक लेल दरि‍भंगा जा रहल छलाह। यात्राक क्रममे अपन गृह स्‍टेशन नरहनमे रेलगाड़ीसँ पि‍छड़ि‍ गलथि‍ आ हि‍नक दहि‍ना पाएर नीचासँ कटि‍ गेलनि‍। एहेन समर्पणसँ ककर हृदए नै पि‍घलि‍ जाएत.....। अमरजी अपन आत्‍मकथा अतीत मंथन'मे ऐ घटनाक उल्‍लेख कएने छथि‍। अस्‍पतालसँ छुट्टी भेटलापर रमाबाबू चुप नै बैसलनि‍ आ हि‍नक इच्‍छा पूर्ण भेल। 8 जून 2008केँ मनारय टोलमे काव्‍य संध्‍या'क आयोजन कएल गेल। श्री चन्‍द्रभानु सि‍ंह कवि‍ सम्‍मेलनक अध्‍यक्षता कएलनि‍। उद्घाटनकर्ताक रूपमे अमरजी आ साहि‍त्‍य अकादमीक प्रति‍नि‍धि‍क रूपमे मैथि‍ली परामर्शदातृ समि‍ति‍क अध्‍यक्ष श्री वि‍द्यानाथ झा वि‍दि‍त जी उपस्‍थि‍त भेल छलाह। मात्र एतबे नै वि‍कलांग भऽ गेलाक पश्‍चात् रमा जीक इच्‍छा शक्‍ति‍ आ समर्पणमे कोनो कमी नै आएल, एखनहुँ अपन अर्द्धांगि‍नीक संग सम्‍पूर्ण मि‍थि‍ला क्षेत्रक काव्‍य गोष्‍ठी आ कथा गोष्‍ठीमे उपस्‍थि‍त होइत छथि‍। एखन धरि‍ हि‍नक दू गोट काव्‍य संकलन प्रकाशि‍त भेल अछि‍- फूल पात आ भांगक गोला। फूलपात- 1978मे पल्‍लव प्रकाशन, मानारय टोलसँ प्रकाशि‍त फूलपात'मे 15 गोट कवि‍ता संकलि‍त अछि‍। यस्‍याप्रभावमतुलं भगवानन्‍तो'क नीति‍क आधारपर पहि‍ल कवि‍ता वंदना मातृभक्‍ति‍सँ ओतप्रोत अछि‍। देशज छेहा मैथि‍लीमे आवश्‍य तत्‍सम मि‍श्रि‍त संस्‍कृतसँ बनाओल गेल। स्‍वाभावि‍क अछि‍ साहि‍त्‍यक ज्ञाताक शब्‍द तत्‍समसँ दूर कोना भऽ सकैछ? अथि‍र थि‍र नर-नारि‍ उर जे प्रणय लय सि‍रजन मि‍थ्‍ज्ञि‍ला वंदना मातृभक्‍ति‍क पश्‍चात् जन्‍मभूमि‍क प्रति‍ नि‍ष्‍ठाकेँ देखबैत अछि‍। स्‍वागत सहर्ष हे जनक देश गौलनि‍ गुण जकर रमा नि‍वेश शंकर वि‍मुग्‍ध सुनि‍ शुकक गान हे धन्‍य-धन्‍य मि‍थि‍ला महान....। 'जमकल रस सि‍ंधु' कवि‍तामे रीति‍क दर्शन तँ भेल मुदा छन्‍द आ लयक प्रवाहमे कवि‍ ई वि‍सरि‍ गेलनि‍ जे कवि‍तामे मैथि‍लीमे लि‍खने छथि‍ आकि‍ हि‍न्‍दीमे- मगन चलय मन्‍द मन्‍द मादक मधुमय मि‍लि‍न्‍द मंजु मुकुल मृदु मरन्‍द वासन्‍ती मलयानि‍ल..... स्‍वाभावि‍के अछि‍ जे मैथि‍ली साहि‍त्‍यकमे ई धारणा भऽ गेल अछि‍ जे जै पद्यक अर्थ सामान्‍य पाठक नै लगा सकैत छथि‍ ओ उत्तम पद्य मानल जाइत अछि‍, तँए संभवत: कवि‍ ऐ कवि‍ताक रचना मात्र प्रबूद्ध रचनाकारकेँ अपन लेखनीक धारासँ मुग्‍ध करबाक लेल लि‍खलनि‍, सामान्‍य पाठक लेल ऐ रचनाकेँ कोनो रूपेँ उपयुक्‍त नै मानल जाए। बाजल प्रणय वेणु कवि‍ताकेँ सरस श्रंृगार पद्य मानल जा सकैछ। बसन्‍त गीत कविताकेँ आरसी प्रसाद सि‍ंह जकाँ प्रकृति‍क मनोरम चि‍त्रण करबाक प्रयास तँ कएल गेल मुदा वि‍श्‍लेषण औसत मात्र भेटल- मलयानि‍ल नि‍त भोरे सँ बहि‍ भेल ि‍वकल जगत भरि‍ की कहि‍? सुनि‍-सुनि‍ ऑचर ससरय कुसुमि‍त कानन कण-कण वि‍हुंसय।। हम अजेय सरल क्रांति‍ गीत बुझना जाइत अछि‍। डूबैत तरेगन'मे पाक आ बांगला देशक प्रसंगक उल्‍लेख कएल गेल अछि‍। जौं ऐ बि‍म्‍वकेँ कवि‍ताक स्‍थानपर कथा रूपमे प्रदर्शित कएल गेल रहि‍ताए तँ अवश्‍य नीक भऽ सकैत छल। शरद नि‍शा' कवि‍ताक बि‍म्‍व आ वि‍श्‍लेषण दुनू प्रासंगि‍क अछि‍। मुदा एकटा बात खटकि‍ रहल अछि‍ जे जखन ऐ कवि‍ताक प्रकाशन फूूलपातमे 1978ई.मे रमा जी कएलन्‍हि‍ तँ पुन: कर्णामृत त्रैमासि‍क पत्रि‍काक नयना जोगि‍नी अंक अक्‍टूबर-दि‍संबर 2009मे ि‍कए प्रकाशन हेतु पठा देलन्‍हि‍। ऐ सँ कवि‍क अपन रचनाक प्रचार-प्रसारक प्रति‍ अवि‍श्‍वसनीयता झलकैत अछि‍। जौं एना कएलन्‍हि‍ तँ संग्रहक प्रति‍ साभार लि‍खि‍ देबाक चाही। ओनी-मानी' कवि‍ता बालमनोवि‍ज्ञानकेँ नीक जकाँ देखबैत अछि‍- अएथुन तोहर बाबू बौआ कौआ बाजय कॉव-कॉव रूसि‍ रहव जँ अखनहि‍सँ तऽ के देतन पीढ़ी खरॉव....। पीढ़ीक स्‍थानपर पि‍रही लि‍खवाक चाही छल। 'नहि‍ आयल चि‍र चोर' कवि‍ता वि‍द्यापति‍क श्रृंगार रससँ ओत-प्रोत रचना जकाँ लि‍खवाक प्रयास कएल गेल मुदा रमाजी होथु वा केेओ आन महाकवि‍ वि‍द्यावति‍क नकल करवाक प्रयास नहि‍ करबाक चाही। ग्रीष्‍म ऋृतु आ पावस गीत सेहो सामान्‍य मानल जा सकैत अछि‍। भांगक गोला- भांगक गोला रमाजी हि‍न्‍दी साहि‍त्‍यक महाकवि‍ हरि‍वंश राय वच्‍चन जीक मधुशालासँ प्रेरि‍त भऽ कऽ लि‍खने छथि‍। ऐ रचनाक प्रकाशन नवंवर 2004ई.मे भेल। चारि‍ खण्‍डक ऐ रूबाई संग्रहमे पहि‍ल खण्‍ड ओरि‍आओन, दोसर भांगक गोला तेसर धोनइ धांइन आ चारि‍म परि‍शि‍ष्‍ट अछि‍। एे प्रकारक नूतन प्रयोगकेँ कोन रूपेँ देखल जाए एकर ि‍नर्णए पाठकपर छन्‍हि‍ मुदा अन्‍तर्मनसँ कएल गेल कवि‍क प्रयासक हम सराहना करैत छी। ऐ संग्रहमे सभसँ नीक लागल अपन देसि‍ल वयनामे कवि‍क मनोवृत्ति‍क सहज प्रदर्शन- स्‍वीकार करू हम चढ़ा रहल छी अपन पहि‍ल भांगक गोला। रमा जीक दुनू काव्‍य संकलनक दृष्‍टि‍कोण आ वि‍श्‍लेषणसँ पाठककेँ की भेटल ऐसँ बेसी महत्‍वपूर्ण अछि‍ हि‍नक साहि‍त्‍य समर्पण। अपन रचनासँ पाठकक हृदएकेँ स्‍पर्श करथु वा नै मुदा साहि‍त्‍यक दधीचि‍ बनि‍ रमाजी मैथि‍ली आ मि‍थि‍लाक आत्‍मामे अवश्‍य प्रवेश कऽ गेल छथि‍। ५ धीरेन्द्र कुमार श्रीमती प्रीति‍ ठाकुरक दुनू चि‍त्रकथापर धीरेन्‍द्र कुमार एक नजरि‍- मैथि‍ली साहि‍त्‍यमे पहि‍ल बेर श्रुति‍ प्रकाशन, नई दि‍ल्‍लीसँ प्रकाशि‍त ि‍चत्रकथा उमेश जीक माध्‍यमसँ भेटल। साहि‍त्‍य पूर्ण तखने होइत अछि‍ जखन साहि‍त्‍य सभ वि‍धामे लि‍खल जाए आ रचना प्रौढ़ होइ। हमर दृष्‍टि‍मे चि‍त्रकथामे प्रीति‍ ठाकुरक रचना मैथि‍ली लोक-कथा आ गोनु झा आन मैथि‍ली ि‍चत्रकथा, सफल रचना थीक। लेखि‍का धन्‍यवादक पात्र छथि‍, एहि‍ कारणे जे मैथि‍ली दि‍सि‍ हुनक दृष्‍टि‍ गेलनि‍। दोसर कारण ई जे मैथि‍लीक वि‍रासतमे जे कथा लोकमुखमे सुरक्षि‍त अछि‍ तकरा ओ लेखनि‍क रूप प्रदान कऽ मैथि‍लीक चि‍त्रकथा वि‍धा जे नगण्‍य सन अि‍छ- ताहि‍केँ समृद्ध करक प्रयास केलनि‍ अछि‍। मैथि‍ली चि‍त्रकथामे ‘मोती दाइ, राजा सजहेस, बोधि‍-कायस्‍थ, बहुरा गोढ़ि‍न नटुआ दयाल, अमता घरेन, दीना भदरी, जालि‍म सि‍ंह, नैका बनि‍जारा, रघुनी मरड़, वि‍द्यापति‍क आयु अवसान आ गोनु झा आ आन मैथि‍ली चि‍त्रकथामे प्रकाशि‍त अछि‍ ‘गोनु झा आ माँ दुर्गा, गोनु आ स्‍वर्ग, गोनु आ स्‍वर्ण चोर, गोनु झा आ वि‍लाड़ि‍, गोनु झाक दूटा बरद, गोनु झाक महीस, गोनु झाक अशर्फी, गोनु झा आ कर अधि‍कारीक दाढ़ी, गोनु झाक माए, रेशमा चूहड़मल, नैका बनि‍जारा, भगता ज्‍योति‍ पजि‍यार, महुआ घटबारि‍न, राजा सलहेस, छेछन महराज, राजा सलहेस आ कालि‍दास। सभटा कथा मि‍थि‍लाक धरतीसँ सम्‍बद्ध अछि‍ आ एखन धरि‍ लोक मुखमे सुरक्षि‍त अछि‍। समैएक परि‍वर्तन संगे लोक रूचि‍ आ लोक संस्‍कारमे परि‍वर्त्तन सेहो होइत अछि‍। अपन देशक गप्‍प लिअऽ। आइ पोथीमे सुरक्षि‍त अछि‍ आयुर्वेद वि‍द्या, यूनानी वि‍द्या, होमयोपैथी आ कतेक रास ज्ञानसँ समर्पित वि‍द्या। जँ पोथीमे सुरक्षि‍त नहि‍ रहत तखन अगि‍ला पीढ़ी एहि‍ वि‍द्यासँ अनभि‍ज्ञ रहि‍ जाएत। तेँ हमर मि‍थि‍लामे जे कथा पसरल अछि‍ ओकरा पोथी स्‍वरूपमे प्रदान कऽ प्रीति‍ ठाकुर जी प्रशंसनीय काज केलनि‍ अछि‍। वीरवलक कथा भऽ सकै छल जे लोक वि‍सरि‍ जाइत मुदा पोथी स्‍वरूपमे रहलासँ आइ धरि‍ ओ लोक-मानसक रंजनक माध्‍यम बनल अछि‍। चि‍त्रकथाक अपन महत्‍व होइत अछि‍। वाह्य-सँप्रेषणसँ जे प्रभाव वंचि‍त रहि‍ जाइत अछि‍ ओ सँप्रेषि‍त होइत अछि‍ चि‍त्रसँ। नाटकमे अभि‍नयसँ जे सँप्रेषि‍त नहि‍ होइत अछि‍ ओ सँप्रेषि‍त अछि‍ रंग, ध्‍वनि‍ आ प्रकाशसँ तहि‍ना चि‍त्रकथामे सेहो होइत अछि‍। प्रसुत आलोच्‍य पोथीक चि‍त्र सशकृ अछि‍। वाल साहि‍त्‍य लेल ई काज प्रति‍ जीक सराहनीय छन्‍हि‍। चारि‍ वर्खक नेना जेकरा अक्षर बोध नहि‍यो छै सेहो कथाकेँ परेख सकैए। चि‍त्रक माध्‍यमसँ। वाल साहि‍त्‍यक जे अभाव अपना मैथि‍लीमे अछि‍ ताहि‍पर बड़का-बड़का वि‍द्वानक अछैत थोड़ेकवो ध्‍यान नहि‍ देल गेल छल आ खास कऽ एहि‍ तरहक। पोथी आकर्षक, रूचि‍कर आ बालमनकेँ प्रभावि‍त करैत अछि‍। एहि‍ लेल हम फेर एक वेर श्रीमती प्रीति‍ ठाकुरकेँ धन्‍यवाद दैत छि‍एनि‍। संगे आशा करब जे आगाँ सेहो एहि‍ तरहक काज करथि‍। ६ जगदीश प्रसाद मंडल कथा कतौ नै चारि‍-पाँच बर्खसँ जनकपुरक वि‍वाह पंचमी देखैक वि‍चार मनमे उठैत रहल मुदा माए कहैत- “‍अखन बाल-बोध छह कतौ हरा-तरा जेबह।” माइयक बात नीक नै लगाए। हुअए जे जहि‍ना गाम घरमे लोक नै हराइए तहि‍ना ओतौ कि‍अए हराएत? ई नै बुझि‍ये जे ओइठीन दूर-दूरक लोक देखए अबैए। जैसँ भीड़-भाड़ बढ़ि‍ जाइ छै। भीड़े-भाड़मे बालो-बोध आ चेतनो हराइत अछि‍। चौदहम बर्ख टपि‍ते पनरहम शुरूहेँमे अगहन इजोरि‍याक पंचमी आएल। गामक लोकमे मेला देखैक सुन-गुनी शुरू भेल एक्के-दुइये सौंसे गाम पसरि‍ गेल। एक गामक कोन बात सगतरि‍ भेल। हमहूँ सुनलौं। माइयक बात मन पड़ल। भलहि‍ं भोट खसबै जोकर नै भेलौं मुदा बालो मजदूर जोकर तँ नै रहलौं। हराइयो जाएब तँ की हेतै? अपन खेवा-खरचा ने तीनि‍ये दि‍नमे सधि‍ जाएत मुदा तैयो तँ कमाइत-खटाइत, खाइत पीऐत दस दि‍न पछाति‍यो तँ आबि‍ये जाएब। आशा जगल। वि‍सवास बढ़ल। माएकेँ कहलि‍एनि‍- “गामक लोक उनटि‍ कऽ जा रहल छथि‍, हुनके सभ सेने हमहूँ जाएब।‍” माए कि‍छु बजली नै। एतबे बजली- “नुआ-बस्‍तर खीच लि‍हह।‍” माएक बात सुनि‍ वि‍सवास भऽ गेल। मनमे उठल टि‍कुला बीआ जकाँ थोड़े खि‍च्‍चा छी, भलहि‍ं पाकल जकाँ सक्कत आँठी जकाँ नै भेलौं मुदा कोशाएल जकाँ तँ जरूर सकता गेल छी। अगुआएल-पछुआएल दुआरे गामक बीच यात्रीक गि‍नती नै भेल। ओना गि‍नतीक महत्‍व बुझबो ने करि‍ऐ। गामक सीमानपर पहुँचते अगि‍ला यात्री रूकि‍ कऽ पछि‍ला सभकेँ हाथक इशारासँ शोरो पाड़थि‍न आ आँखि‍ उठा-उठा देखबो करथि‍। हमहूँ पहुँचलौं। पतराइत रस्‍ता देखि‍ गि‍नती हुअए लगल। मर्द-औरत मि‍ला सत्ताइस गोरे भेलौं। गि‍नतीमे सभसँ उमेरगर सुचि‍ता दादी रहथि‍। बजलीह- “सभ कि‍यो सुनि‍ कऽ कान धड़ब। तीर्थ-वर्त करए जाइ छी तँए रस्‍ता-पेरामे ककरो कोनो चीज बौस नै छूबै, झूठ-फुस बाजि‍ ककरो ठकबै नै। भाए-बहीन जकाँ सभकेँ बुझबै आ कि‍यो अगुआ-पछुआ जाएब तँ ठाढ़ भऽ कऽ संग करैत चलब।‍” दादी गप्‍पक असरि‍ भेल। सभसँ कम उमेरक रही। बि‍ना कहने-सुनने कफलाक टहलू बनि‍ गेलौ। दादी सुचि‍ताकेँ कहलि‍एनि‍- “दादी, अपना कम्‍मे समान एक अढ़ैया चूड़ा आ कपड़ा झोरामे अछि‍, अहाँकेँ भारी लगैत हएत लाउ नेने चलै छी।” बात सुनि‍ दादी छि‍ट्टा भरि‍ असीरवाद दैत अपन मोटरी देलनि‍। मोटरीक संग दादी अपन पुरना खेरहा सभ कहैत चलए लगलीह- “बौआ, अहि‍ना कुशेसर जाइत रही। नि‍यारैत तीन बर्खसँ घरमे गाइयक घी पड़ल रहै। कन्ना चौदह कोस डेरहे दि‍नमे चलि‍ गेलौं से बुझबे ने केलि‍ऐ। तै दि‍नमे समरथाइयो रहए।‍” “कतऽ-कतऽ गेल छि‍ऐ दादी?‍” कनी काल गुम रहि‍ मन पाड़ि‍ बाजए लगली- “अपन गाम तीनू स्‍थान- दछि‍नमे कुशेसर पूवमे सि‍ंहेसर आ उत्तर-पछि‍म जनकपुरक बीचमे पड़ैए। कनि‍ये रास्‍ताक तड़पट हेतै। हँ, तँ कहए लगलि‍यह, एहि‍ना आठ-नअ गोटेक कफलामे सि‍ंहेसर स्‍थान वि‍दा भेलौं। अखैन तँ चढ़न्‍त जाड़ अछि‍ मुदा शि‍वराति‍क समए जाड़ फटऽ लगैत अछि‍। सबहक वि‍चार भेल जे घोघरडि‍हा तक टेनसँ जाएब, फेर सुपौल तक पाएरे जाएब आ सुपौलसँ बस पकड़ि‍ जाएब।” बि‍चहि‍मे पुछलि‍एनि‍- “‍कोसी धार सेहो टपए पड़ल हएत कि‍ने?”‍ “हँ, हँ। पहि‍ने टेनक बात सुि‍न लाए। जखन गाड़ीमे चढ़लौं तँ खाली सीट सभ देखलि‍ऐ। दुनू कातक सीट मि‍ला कऽ तीन-चारि‍ गोरे बैसल रहै। हमरो सभकेँ जगह भऽ‍ जाएत। मुदा तेहन ऐंठल सभ रहै जे नहि‍ये बैसए देलक। पुरूख सभसँ मुँह कन्ना लगैबतौं। सभ स्‍त्रीगणे रही।” “कि‍अए ने बैसए देलक?‍” “तेहन-तेहन छुद्दर पुरूख सभ भऽ गेल अछि‍ जे ककरोमे पुरूखपाना छइहे नै। अपना अइठीनक पुरूख अनको माए-बहीनकेँ अपन बुझैत अछि‍ ओइ इलाकाक थोड़ै बुझै छै। ठाढ़े भेल घोघडि‍हा तक गेलौं। नि‍च्‍चामे बैसबो करि‍तौं से तते सि‍करेट-बीड़ीक अधजरूआ टुकड़ी आ चीनि‍या बदामक खोंइचा रहै जे बैसैक परपन‍ नै भेल।” “मोटरी की केलि‍ऐ?‍” “मथेपर रखने गेलौं। उपरका सीटपर गेंड़ा जकाँ दूटा मुनसा सुतल रहै कि‍न्नो नै मोटरी रखए देलक। जखन कोसी धारमे नओपर चढ़लौं तखन फेर घटवारक संगे कहा-कही हुअए लगल। मुदा बाबापर सुरैत लगा कहुना पहुँच गेलौं।‍” स्‍टेशन पहुँचते गप-सप्‍प बन्न भेल। गाड़ी आएल सभ कि‍यो चढ़ि‍ गि‍नती कऽ जयनगर पहुँचलौं। जयनगर प्‍लेटफार्म यात्रीसँ भरल। ति‍ल रखैक जगह नै। मुदा एते वि‍सवास भऽ गेल जे एते दूर देखलो भइये गेल। आब तँ बालो-बोध नहि‍ये छी जे बि‍सरि‍ जाएब। जँ कहीं छुटि‍यो जाएब आकि‍ हराइयो जाएब तैयो घुरि‍ कऽ गाम चलि‍ये जाएब। नेपालक गड़ि‍यो छोट आ इंजि‍नो कमजोर मुदा तैयो नि‍च्‍चा-ऊपर लादि‍ यात्रीकेँ पहुँचाइये दैत अछि‍। गाड़ीमे चढ़ै-दुआरे कते यात्री एक स्‍टेशन पाएरे चलि‍ उनटामे चढ़ि‍ पहुँचैत छथि‍। मुदा सीमा कखन टपलौं से बुझबे ने केलौं। लोको एक्के रंग आ बोलि‍यो तहि‍ना। जनकपुर पहुँच गेलौं। यात्री देख मन उधि‍या गेल। मन मानि‍ गेल जे ऐ भीड़मे कतौ जरूर हराइये जाएब। मुदा लोकक भीड़मे लोक अपनाकेँ हराएल कोना बुझत। सभ तँ लोके छी सबहक मुँहमे बोलो अछि‍ये। सभ तीर्थे करए आएल छथि‍ तखन हराइक प्रश्‍न कत? मुदा तैयो मन थरथराइते रहए। फेर भेल जे हराएब तखन ने, आ जे नै हराइ। तैले अनेरे चि‍न्‍ता कि‍अए करै छी। खाइत-पि‍बैत एक फेरा लगबैत तीन बजि‍ गेल। वि‍वाहक प्रकरण तँ राति‍मे हएत मुदा वि‍वाह होइक कारण तँ धनुष टूटब अछि‍। तँए पहि‍ने धनुखा जाएब उचि‍त हएत। धुमैत-फि‍ड़ैत एक ठाम बैस सभ वि‍चारए लगलौं। वि‍वाह प्रकरण देखए एलौं अखन धरि‍ बरि‍आति‍यो पछुआएले अछि‍। पछुलके धरमशल्‍लामे अॅटकल अछि‍। ऐठाम अबैमे चारि‍-पाँच घंटा लागत। से नै तँ अपनो सभ ताबे धनुखासँ भऽ आबी। एक स्‍वरमे वि‍चार भेल। बसक भाँजमे वि‍दा भेलौं। सभ आगू-आगू हम आ दादी पाछू-पाछू। यात्रीकेँ देखबैत दादी बजलीह- “‍बौआ, तँू ने अखैन तक दोसर कोनो स्‍थान (तीर्थ) नै गेल छह। मुदा हम तँ बहुत ने देखने छि‍ऐ।” एते बात सुनि‍ते मनमे भेल जे दादी कोनो ठेकनगर बात कहए चाहैत छथि‍। हूँहकारी दैत कहलि‍एनि‍- “हँ से तँ ठीके। अखैन हमरा भेबे की कएलहेँ, जनमि‍ कऽ ठाढ़ भेलौंहेँ।‍” आगू दादी बजलीह- “देखहक ई स्‍थान भगवान राम आ सीताक छि‍अनि‍। अयोध्‍यावासी राम आ मि‍थि‍लाक जनकक कन्‍या सीता। दुनूक मि‍लन स्‍थल छी। तँए देखै छहक जे सभ रंग यात्रि‍यो अछि‍ आ स्‍त्रीगण-पुरूखमे बेराओल हेतह जे पुरूख बेसी अछि‍ आकि‍ स्‍त्रीगण। तहि‍ना देखै छहक जे सभ रंगक मुँह-कानबला यात्री अछि‍। ककरो मान-अपमानक बात अछि‍। मुदा आन-आन स्‍थानमे से कहाँ देखवहक। जहि‍ना एक चलि‍या लोक तहि‍ना एक चलि‍या चालि‍।‍” मैक्‍सीपर बैस सभ धनुखा वि‍दा भेलौं। घंटा भरि‍ लगैत-लगैत धनुखा पहुँच गेलौं। गाड़ीक ड्राइवर आ खलासी उतड़ि‍ देखबए वि‍दा भेल। मंदि‍रक हाताक भीतर पहुँचते ड्राइवर बाजल- “भगवान राम जे धनुष तोड़लनि‍ ओ तीन टुकड़ी भऽ गेल। एक टुकड़ी एतै खसल। सएह स्‍थान छी। देखै छि‍ऐ धनुषेक टुकड़ी छि‍ऐ कि‍ने?‍” दर्शन केलहुँ। सबहक वि‍चार भेल जे बि‍ना कि‍छु खेने-पीने आ सनेस नेने कोनो जाएब। हमहूँ चाह पीब पान खेलौं आ हनुमानी बद्धी कीन कऽ गरदनि‍मे पहि‍र लेलौं। कि‍रि‍न डुबि‍ गेल। मुदा ककरो धड़फड़ी नै। कि‍एक तँ घंटा भरि‍ जाइमे लागत आ आठ बजेमे बरि‍आती दुआर लागत। गाड़ी चलल। करीब चाि‍र माइल आगू बढ़ल आकि‍ अपने ठाढ़ भऽ गेल। पंचमीक चान, ओसेसँ घेराएल। झल-अन्‍हार। गाम-घर कतौ ने देखि‍ऐ। बीच पाँतरमे गाड़ी रूकल। ड्राइवरो आ खलासि‍यो रि‍न्‍च-हथोरी नि‍कालि‍ ठोक-ठाक शुरू केलक। हमहूँ सभ गाड़ीसँ उतड़ि‍ देखए लगलि‍ऐ। ठोकि‍-ठाकि‍ ड्राइवर गाड़ीमे बैस चलबऽ चाहे तँ चलबे ने करै। फेर उतड़ि‍ कऽ ठोकै मुदा फेर ओहि‍ना होय। समए बीतल जाए। मोवाइल देख ड्राइवर बाजल- “आठ बजल।‍” दुआर लागबक समए बुझि‍ सुचि‍ता दादी बजली- “कतऽ एलौं, ते कतौ ने?‍” मन हुअए जे कहि‍ऐ- पाइ घुमा दाय। दोसर गाड़ीसँ चलि‍ जाएब। इजोरि‍यो डूबि‍ गेल। दि‍सम्‍बरक अंति‍म समए तँए जाड़ो बढ़ैत जाए। मुदा सभकेँ ओढ़ना रहबे करै, ओढ़ि‍ लेलौं। होइत-हबाइत भोरमे गाड़ी ठीक भेल। घुमि‍ कऽ जनकपुर एलौं। ताबे वि‍वाहक सभ प्रक्रि‍या समाप्‍त भऽ गेल छल। रौतुका जगरनासँ यात्रि‍यो सभ ओंघाएल। हमहूँ सभ तहि‍ना रही। यात्री सभ ट्रेन पकड़ि‍ घुमए लगलाह। हमहूँ सभ नहा कऽ एक बेर सौंसे मेला घुमि‍, डोरि‍-सि‍न्नुर आ सनेस कीन आबि‍ खेलौं आ गाड़ी पकड़ैले वि‍दा भेलौं। भरि‍ बाट दादी रटैत रहली- “कत्तऽ एलौं, ते कत्तौ नै। कत्तऽ एलौं, ते कत्तौ नै। कत्तऽ एलौं, ते कत्तौ नै।‍” ७ गामक जि‍नगी कथा संग्रह (जगदीश प्रसाद मंडल) समीक्षा- रमाकान्‍त राय “रमा‍” भारतीय भाषा साहि‍त्‍यमे ग्राम्‍यांचलक उर्व्‍वर भूमिमे सभ कि‍छु उपजैत अछि‍- अन-धन- लक्ष्‍मी। जँ आम सन अमृत फल होइत अछि‍ तँ करैला सन तीत सोहो। जँ सभ रूपमे औषधि‍ सन धातृफल तँ सभ तरहेँ अनि‍ष्‍टकारक बरहर सेहो। कनकजीर आ तुलसी फूल स्‍वादि‍ष्‍ट चाउर हम सभ उपजाबैत छी, कऽन-साग-मरूआ आ अकटा-मि‍सि‍या सन कुअन्न सेहो समए-कुसमए लोकक क्षुधा शांति‍ कऽ गरि‍मा मण्‍डि‍त होइत अछि‍। दोसर दि‍स भादो मासमे झहरैत वर्षामे भीज कऽ थाल-कादोमे खि‍ल्‍ली छाबा डुबा कऽ जँ धान रोपैत अछि‍ तँ चैत-बैसाखक बरकैत रौदमे गहुंम काटैत अछि‍, दाउन करैत अछि‍ तथा माध मासक हारमे धुसि‍आइबला जाड़ आ जान मारूख शीतलहरीमे राति‍-राति‍ भरि‍ जागि‍ कऽ लोक रवि‍-राइक पटौनी करैत अछि‍। अइठाम काजमे जँ कनि‍को उफाँटि‍ भेल आि‍क पलमे प्रलए भऽ जाइत छै। लोकक जीवन अपटी खेतमे चलि‍ जाइत छै मुदा जँ जीवि‍त रहि‍ लोक काज सम्‍पन्न कऽ लैत अछथ्‍ तँ की की ने देखैत अछि‍- ताड़क गाछ तरेगन आ दि‍नोमे तरेगन। गाम उर्व्‍वर भूमि‍ एकसँ एक वि‍द्वान, वैज्ञानि‍क, राजनेता आदि‍केँ अपना अंकमे पोषैत आबि‍ रहल अछि‍ तँ एकसँ एक कवि‍-कलाकार-साहि‍त्‍यकारकेँ सेहो। राष्‍ट्रकवि‍ मैथि‍लीशरण गुप्‍त, रामधारी सि‍ंह “दि‍नकर‍” आ अमर कथाकार मुंशी प्रेमचंद गामेक उर्व्‍वर भूमि‍क पुत्र छलाह जे अपन-अपन क्षेत्रक शि‍खर पुरूष भेलाह। मि‍थि‍ला मूलत: मैथि‍ली भाषा भाषी ग्रामीण क्षेत्रक वि‍शाल भूभागमे पसरल अछि‍। तँए अइठाम सेहो अधि‍कांश लेखक, कवि‍, कलाकार-साहि‍त्‍यकार प्राय: गामेक मूल नि‍वासी छथि‍। मुदा एकटा बात आन भाषासँ मैथि‍लीमे भि‍न्न ई अछि‍ जे जतऽ आन भाषाक रचनाकार-कलाकार अपन कृति‍मे गामकेँ वि‍शेष जगजि‍आर करबाक चेष्‍टा केलनि‍ अछि‍ तेना मैथि‍लीमे नै। ओना राजकमल, यात्री, मायानन्‍द, ललि‍त, धीरेन्‍द्र, धूमकेतू आदि‍क रचनामे गाम आएल अछि‍ अवश्‍य मुदा ओकर मात्रा वर थोड़ अछि‍। जेना राजकमलक “ललका पाग‍” सन कथामे गामक नारीक नि‍श्‍छल प्रेमक प्रवाह अछि‍ तँ ललि‍तक “रमजानी‍” पछड़ल अल्‍पसंख्‍यकक कथा नीक जकाँ बि‍कछा कऽ कहल गेल अछि‍। जहि‍ना मायानन्‍द मि‍श्रक “खौंता आ चि‍ड़ै‍” मे उच्‍च वर्ग आ पछड़लक वर्ग संघर्षक कथा नीक जकाँ स्‍थान पओलक अछि‍ तहि‍ना यात्रीक “बलचनमा‍” मे सेहो ऐ माैलि‍कताक स्‍पष्‍ट रेखांकन भेल अछि‍। आनो-आन नव-पुरान कथाकार मि‍थि‍लाक गामक कथा लि‍खलनि‍ अछि‍ मुदा खेति‍हर-मजदूर, नि‍म्नवर्गक बोनि‍हार, एक सांझ खा कऽ दोसर सांझक जोगारमे बेकल लोकक कथाक अभावे रहल अछि‍। श्री जगदीश प्रसाद मंडलक कथा संग्रह “गामक जि‍नगी‍” एहि‍ प्रकार अभावक पूर्ति करैत अि‍छ। ऐमे ने केवल नि‍म्न-मघ्‍यवि‍त्त आ पछड़ल नि‍म्नवर्गक कथा अछि‍ प्रत्‍युत गामसँ बाहर रहि‍ अयोध धामन-गहुमन साँप सन वि‍षधरक कथा सेहो अछि‍ जे अपन जीवनक सांन्‍ध्‍य बेलामे प्रदूषण मुक्‍त गामोकेँ अपन वि‍षक धधकैत ज्‍वालमे भस्‍मसात करए चाहैत छथि‍। “गामक जि‍नगी‍” कथा संग्रहमे कुल उन्नैसटा कथा अछि‍ जे समग्रतामे मूल रूपसँ गामक कथा अछि‍। ऐ सभ कथाक कोनो ने कोनो पात्र गामक अछि‍- व्‍याधि‍ रोग-शोक, इर्ष्‍या-द्वेष, धृणा-सि‍नेहक शि‍कार कतहुँ ने कतहुँ अवश्‍य होइत अि‍छ। कि‍छु कथामे तँ एना लगैत अछि‍ जे कथा नायक वा उपनायाक जीवनसँ पूर्णत: नि‍राश भऽ अनि‍श्‍चयक भ्रमरजालमे ओझरा जाइत मुदा तखनहि‍ं आशाक सूर्यक कि‍रि‍ण हुनका जीवनमे एकटा नव उत्‍साह, उमंग भरि‍ दैत छन्‍हि‍ आ ओ पुन: वि‍श्‍वाससँ भरि‍ नव-जीवनक शुभारम्‍भ करबामे जुटि‍ जाइत छथि‍। कि‍छु कथामे एक क्षेत्रक लोककेँ दोसर क्षेत्रक भौगोलि‍क परि‍वर्तनजन्‍य कि‍छु अनेरूआ फसलक वि‍षएमे व्‍यवहारि‍क ज्ञानक अभाव रहैत अछि‍ जैसँ दैवी प्रकोपक समए नीक जकाँ जीवन-यापन कएल जा सकैत अछि‍। कथाकार जगदीश प्रसाद मंडल जीवनक उतरार्द्धमे लि‍खब प्रारम्‍भ कएलनि‍ अछि‍। ओना कि‍छु पहि‍नहुँसँ लि‍खबाक अभ्‍यास छल होएतनि‍ मुदा देखार रूपमे मात्र दू-अढ़ाइ वर्षक अवधि‍मे दर्जन भरि‍सँ अधि‍क पोथीक सृजन कऽ ई एकटा नव कीर्तिमान स्‍थापि‍त कएलनि‍ अछि‍। जैमे आधा दर्जनसँ अधि‍क पोथी प्रकाशि‍त भऽ चूकल छन्‍हि‍। मनुष्‍यक जीवनमे नि‍त्‍य अनेक घटना-दुर्घटना-संघर्षक संग हर्ष-वि‍षादक अवसर अबैत अछि‍। ओइ महँक कि‍छु सार्थक क्षणकेँ समेटि‍ कऽ मानवोचि‍त मर्यादा, दायि‍त्‍वबोध, सुरक्षा, संरक्षा, सुवि‍वेचन-रचनादि‍ द्वारा मनुष्‍यमे जि‍जि‍वीषा उत्‍पन्न कऽ पुनस्‍थापि‍त करब कथाकारक दायि‍त्‍व अछि‍। जगदीश बाबू ऐमे पूर्ण सि‍द्धस्‍त छथि‍। जँए कि‍ ई ग्रामीण अंचलमे एकटा राजनैति‍क कार्यकर्ताक रूपमे समाजकेँ खूब नीक जकाँ चि‍न्हने छथि‍, जन-जनक, गरीब-अमीरक सुख-दु:खमे सहभागी रहल छथि‍ तँए ओकर नोन-तेल-हरदि‍सँ लऽ कऽ जन्‍म-मरण धरि‍क साक्षी रहलाह अछि‍। ऐ अनुभव सभकेँ ओ नीक-जकाँ बि‍कछा-बि‍कछा कऽ अपन कथा सबहक तानी-भरनी बनौलनि‍ अछि‍। तँए हुनक रचना मैथि‍ली साहि‍त्‍यकेँ एकदम बेछप बुझि‍ पड़ैत अछि‍। डॉ. मेघन प्रसाद अपन पुस्‍तक “मैथि‍ली कथा कोश” मे कथाक प्रसंग अपन वि‍चार ऐ प्रकार व्‍यक्‍त कएलनि‍ अछि‍- “कथा, जीवनक एकटा खण्‍ड चि‍त्र अछि‍ जे सम्‍पूर्ण जीवनक व्‍याख्‍या नै कऽ ओकर मात्र एकटा घनीभूत क्षणक उद्घाटन करैत अछि‍।‍” वस्‍तुत: कथा अपन आकारगत सीमाक कारणेँ एक्केटा घटनाक प्रभाशाली चि‍त्रण कऽ सकैत अछि‍। ओइमे प्रासंगि‍क कथा अथवा वि‍वरणक बेशी स्‍थान नै होइत अछि‍। दोसर शब्‍दमे कथा गद्यक एकटा छोट अत्‍यन्‍त सुघटि‍त आओर अपनामे पूर्ण साहि‍त्‍य रूप अछि‍। (भूमि‍का पूष्‍ठ-२) जगदीश प्रसाद मंडलक कथा ऐ दृष्‍टि‍सँ कनि‍को पथ-च्‍युत नै भेल अछि‍। हँ, हि‍नक कथा सभमे कि‍छु वि‍स्‍तार अवश्‍य अधि‍क अछि‍ मुदा ओतेक वि‍स्‍तार नै जे मात्र कथाक एक्केटा रूप, लघुकथा रहि‍ जैताए जखन कि‍ ओइमे घनीभूत क्षणक उद्घाटन करबाले कि‍छु वि‍स्‍तार प्रयोजन बांछनीय होइछ। एकटा बात आर, हि‍नक कोनो कथामे प्रासंगि‍क वि‍वरण सेहो लघुरूप धारण कऽ घुसि‍आएल अवश्‍य भेटत। मुदा ओइसँ ने तँ कथाक मौलि‍कता प्रभावि‍त बुझि‍ पड़त आ ने ओकर औपन्‍यासि‍क वि‍स्‍तार बुझाएत। भने कोनो-कोनो कथाकेँ लघुक स्‍थानपर दीर्घकथा कथा कहबे श्रेयस्‍कर होएत। सुप्रसि‍द्ध कथाकार डॉ. सुभाषचन्‍द्र यादव हि‍नक कथाक वि‍शि‍ष्‍टता मादे कहैत छथि‍ जे हि‍नक कथामे औपन्‍याि‍सक वि‍स्‍तार अछि‍। वर्तमान समएमे प्रचलि‍त आ मान्‍य कथासँ हुनक कथा भि‍न्न अछि‍। हुनक कथा घटना बहुल आ ऋृजुसँ युक्‍त अछि‍। डॉ. मेघन प्रसादक वि‍चार जतऽ आम कथाक वि‍षएमे कहल गेल अछि‍ ओतहि‍ डॉ. यादवक वि‍चार मात्र श्री जगदीश प्रसाद मंडलपर केन्‍द्रि‍त अछि‍। मुदा शब्‍दक कनेक हेर-फेरसँ दुनू व्‍यक्‍ति‍क वि‍चार जै वि‍न्‍दुपर मि‍लैत अछि‍ से अछि‍ डा. यादव द्वारा प्रत्‍युत शब्‍द- “ऋृजु‍” अछि‍। ओ हि‍नका जीवन संघर्षक कथाकारक रूपमे स्‍थापि‍त करैत जि‍जीवि‍षा, मानवीयता आ आदर्शकेँ सुदृढ़ आ पुनप्रति‍ष्‍ठि‍त करबाक उद्देश्‍यसँ अनुप्रमाणि‍त मानैत छथि‍। एक्के संग अनेक नीक भावक संयोजनकेँ ऋृचा जकाँ बहुभावाभि‍व्‍यक्‍ति‍क संभावनाकेँ ऋृजु संज्ञा रूपमे डॉ. यादवक सोचक व्‍याख्‍या कएल जा सकैत अछि‍। जेना कि‍ संग्रहक नाओंसँ स्‍पष्‍ट अछि‍- ऐ पुस्‍तकमे गामक जि‍नगीक कथा कहल गेल अि‍छ। मुदा आइ-काल्हि‍ केहनो ठेठ गामक जीवनमे कतहुँ ने कतहुँ शहर आबिए जाइत अछि‍। तखन कथाकार ऐ हेतु सभठाम पूर्ण सचेष्‍ट छथि‍ जे गाम आ शहरक ऐ दुरभि‍संधि‍मे गामक मौलि‍कता भुति‍आ नै जाए, हेरा नै जाए। हि‍नक कथा सभमे जँ कतहुँ गाम आ शहर मि‍झराएलो अछि‍ तँ ओ ऐ दुनूक सूच्‍चा स्‍वरूपकेँ स्‍पष्‍ट रूपेँ रेखांकि‍त कएलनि‍ अछि‍ आ शहरक नगर जि‍नगीपर गामक जि‍नगी सभठाम प्रभावी देखाओलनि‍ अछि‍। “भैंटक लाबा, बि‍साँढ़ आ पि‍रारक फड़‍” ई तीनू कथा एक्के भूमि‍पर प्रति‍ष्‍ठि‍त अछि‍ भैंट, बि‍साँढ़ आ पि‍रारक उपयोगक वि‍षएमे जइठामक लोक नै जनैत छथि‍ हुनक पति‍ (जँ ओइठाम ओ वस्‍तु प्रयुक्‍त होइत हो) कि‍ंवा पत्नीसँ ऐ वि‍षएमे जानि‍-बुझि‍ कऽ बाढ़ि‍, सुखारक समएमे ओकर सदुपयोग कऽ ओइसँ त्राण पएबाक ई एकटा सशक्‍त साधन होइत अछि‍। मुदा समाने भाव-भूमि‍क होइतो तीनू कथाक ई वि‍शेषता अछि‍ जे बि‍साँढ़ जतऽ रौदीमे, सुखारमे गरीबक जीवन रक्षक होइत अछि‍, होतहि‍ं भैंटक लाबा बाढ़ि‍सँ बि‍लटल परि‍वारक रक्षक होइत अछि‍। मुदा पि‍रारक फड़ सामान्‍य समएहुँमे लोकक व्‍यंजनक बेगरता मेटबैत अछि‍। ऐ तीनू कथा गढ़बा काल लेखक ऐ हेतु पुर्ण साकांक्ष छथि‍ ऐ स्‍थि‍ति‍-परि‍स्‍थि‍तमे गामक गि‍रहस्‍तकेँ लेल कोन-कोनटा उपकरणक उपयोग अपेक्षि‍त अछि‍। ऐसँ ओहि‍ अव्‍यपहृत वा कम व्‍यवहृत सरंजाम-उपकरणक ध्‍यान एकबेर ओहि‍ सभ लोककेँ आबि‍ जाइत छन्‍हि‍ जे ग्राम्‍य संस्‍कृति‍सँ बहुत दिनसँ सुदूर रहि‍ रहल छथि‍। “अनेरूआ बेटा‍” केँ नि‍:संतान दम्‍पति‍ अपन बना कऽ पोसैत अछि‍। पहि‍ने चाहक दोकान कऽ कए ओ क्रमश: पढ़ब-लि‍खब सि‍खैत अछि‍। ओकर जि‍ज्ञासु मन स्‍वाध्‍यायक बलपर साहि‍त्‍य सृजन दि‍स उन्‍मुख होइत अछि‍ आ क्रमश: ओहूमे सम्‍मान जनक स्‍थान प्राप्‍त करैत अछि‍। गामक वातावरणसँ सर्वथा असंपपृक्‍त, शहरी जीवनक अभ्‍यासी एकटा वकील साहेबक नवयुवती पुत्रीकेँ ओकर साहि‍त्‍य अपना दि‍स आकृष्‍ट करैत अछि‍। ओ ओकरासँ भेँट कऽ ओकरे संग अपन जीवन व्‍यतीत करबाक स्‍वपन्न देखैत अछि‍। छह नि‍श्‍चयी अपन स्‍वभाव-प्रभावसँ माए-बापकेँ मना कऽ ने केवल ओकरासँ वि‍वाह करबामे सफल होइत अछि‍ प्रत्‍युत, गृहस्‍थ जीवनक हेतु आवश्‍यक सभटा सरंजामो पि‍तोसँ करवा लैत अछि‍। ठेला-वाला अा ि‍रक्‍साबला दुनू करेज तोड़ मेहनति‍बला लोक मुदा पहि‍ल जँ अपन कमाइसँ अपन दुनू बेटाकेँ नीक जकाँ मैट्रीक पास करबा कऽ “शि‍क्षा-भि‍न्न‍” बना कऽ उपराग जि‍नगी जीवैत अछि‍ तँ “रि‍क्‍साबला‍” जतऽ बैसारीमे रि‍क्‍शा चलबैत अछि‍ तँ शेष समए एकटा चि‍मनीक मालि‍क संग पुरैत अछि‍। एकदि‍न मालि‍कक कनि‍याँक दि‍नचार्य ओकरे मुँहसँ सुनि‍ कऽ ओकर भौति‍क जीवनक लाचारीक लाचारी आ आखि‍ महँक भूख देख कऽ अनठा कऽ अपन घर पराइत अछि‍। “‍डाॅ. हेमंत”केँ बढ़ि‍ग्रहस्‍त क्षेत्रक डयूटीपर जयबाक जे जेतेक संशय ग्रामीण वातावरण, सामन्‍यजस्‍यक समस्‍या आ ग्रामक अशि‍क्षि‍त लोकक संग रहबाक हीन ग्रन्‍थि‍ छलनि‍ सभटा ग्रामीणक सद्व्‍यवहार, सहयोग आ नि‍श्‍च्‍छल कार्यव्‍यापारसँ दूर भऽ जाइत छन्‍हि‍ आ गाममे बि‍ताओल क्षण हुनका जीवनक एकटा अनमोल स्‍मारक जकाँ मानस पटलपर अंकि‍त भऽ जाइत छन्‍हि‍। बाहर रहि‍ जीवन भरि‍ भ्रष्‍ट्राचारमे आकंठ डूबल रहि‍ दूटा पि‍ति‍औतक जीवनमे ऐ भौति‍कवादी युगक उपादानो सभसँ जखन स्‍वाभि‍मानपर चोट पहुँचैत छन्‍हि‍ तखन गामक जि‍नगीक मोह गछारैत छन्‍हि‍। मुदा गाममे पास करबासँ पहि‍नहि‍ घरारीक बटबाराक क्रममे गामक शांत जि‍नगीमे ओ दुनू भाँइ उच्‍कोच आ छल-छद्वाक बलेँ जखन कि‍छु अनुचि‍त नै करा पबैत छथि‍ तखन प्रेम चन्‍द्रक “पंचपरमेश्‍वर‍” सँ कोनो कम महत्‍पूर्ण अछि‍ नि‍श्‍च्‍छल ग्रामीण मि‍थि‍लाक ई कथा भैयारी। बोनि‍हार-मरनीक बातपर जँ ओकरासँ काम करौनि‍हार मदमस्‍त ठीकेदारक आँखि‍ नोरा जाइत अछि‍ तँ आनक कथे की? ऐ वैज्ञानि‍क युगमे श्रमक जतेक अबमूल्‍यन भेल अछि‍, भऽ रहल अछि‍ ओतेक कोनो आन वस्‍तुक नै। ऐमे ग्‍लालाइजेशनक वर पैघ हाथ छैक। नै तँ एकटा कुम्‍हार जँ एकबेर कोशीक कटावसँ गाम छोड़ि‍ परा कऽ दोसर गाममे बसैत अछि‍ तँ दोसर बेर अपन वस्‍तु जातक, श्रमसँ उत्‍पादि‍त वस्‍तुक ग्राहक अभावसँ गाम छोड़बाक नि‍श्‍चय करैत अछि‍। मुदा संयोगसँ तै समए ओकर भुति‍आएल बेटा प्रचुर टाका-पैस्‍यक संग आपस आबि‍ जाइत छैक जे आब कुम्‍हारक नै, मूर्तिकार आ चि‍त्रकारक रूपमे अपनाकेँ स्‍थापि‍त कऽ लेने छल। तँए ओइ कुम्‍हारक हारि‍ जीति‍‍मे  बदलि‍ जाइत छैक। पुस्‍तकक भाषा ठेठ ग्रामीण अछि‍ जैमे स्‍थानीय लोकोक्‍ति‍, मुहावरा आ सभसँ वेशी अप्रचलि‍त ठेठ ग्रामीण शब्‍दक बाहुल्‍य पुस्‍तककेँ अत्‍यधि‍क महत्‍वर्ण तत्‍व कहल जा सकैत अछि‍। बहुत कथामे तँ जाति‍गत पेशामे उपयोगमे आबैबला सभटा सामग्रीक नाओं एवं उपयोगक उल्‍लेख अछि‍ जे ओइ शब्‍दकेँ वि‍स्‍मृति‍क खाधि‍मे जएबासँ बचयबाक प्रयास कहल जा सकैछ। “डीहक बँटवारा‍” शीर्षक कथामे गुरूकाका गामक प्रसंग जे वि‍चार रखलनि‍ अछि‍ से द्रष्‍टव्‍य अछि‍- “गाम तँ गामे छी। शुद्ध मि‍थि‍ला। भारत। जे स्‍वर्गीसँ नीक अछि‍। मुदा सभ गामक अपन-अपन चरि‍त्र आ प्रति‍ष्‍ठा छैक। जे चरि‍त्र आ प्रति‍ष्‍ठा गामक कर्मठ, ति‍यागी लोकनि‍ बनौने छथि‍। अपन कठि‍न मेहनति‍ आ कर्तव्‍यसँ सजौने छथि‍। ओकरा जीवि‍त राखब तँ अखुनके लोकक कान्‍हपर भार अछि‍ की ने?.....‍ ई तँ नि‍ह जे गदहा गेल स्‍वर्ग तँ छान-पगहा लगले गेलै।” नि‍ट्ठठ गाममे इर्ष्‍या-द्वेष कम सि‍नेह भैयारी-यारी अधि‍क रहैत अछि‍। जतऽ अपन जन्‍मलि‍ बेटी अपने धि‍या-पुतामे व्‍यस्‍त रहि‍ माएक मृत्‍यु शय्यापर सुनि‍ कऽ देखबाले सेवा करबाले नै आबि‍ पाबैत अछि‍ ओतहि‍ वि‍जातीय-नैहरक दूरक आन आन धर्मक “बहीन‍” ने केवल देखबा लेल आबैत अछि‍ प्रत्‍युत बहीनकेँ जीवि‍त रहबा धरि‍ सेवाक करबाक उद्दात भावनसँ अभि‍भूत “हि‍न्‍दु-मुस्‍लि‍म एकटा‍” क बीहनि‍ गाममे कतेक अधि‍क गहीर अछि‍- ई सि‍द्ध करबा लेल पर्याप्‍त अछि‍। आ यएह थि‍के गामक जि‍नगीक कथाक मूल तत्‍व। कथाकार लेखक संपादक श्री गजेन्‍द्रठाकुरक अनुसार जगदीश प्रसाद मंडलक कथा मैथि‍ली साहि‍त्‍यक पुनर्जागरणक प्रमाण उपलब्‍ध करबैत अछि‍ तथा हि‍नक कथा मैथि‍ली कथा धराकेँ एक भगाह होएबासँ बचा लैत अछि‍। उदाहरणमे ओ मात्र हि‍नक एक कथा बि‍साँढ़केँ उपस्‍थापि‍त करैत कहैत छथि‍ जे १९६७ईं.क अकालमे देखाओल गेल छल जे मुसहर लोक बि‍साँढ़ खा कऽ अकालसँ लड़ि‍ रहल छथि‍ मुदा ऐपर कथा लि‍खल गेल २००९ई.मे जगदीश प्रसाद मंडलजी द्वारा। हम “गामक जि‍नगी‍” कथा संग्रहक आधारपर ई कहए चाहब जे जहि‍ना हि‍न्‍दीमे गाम्‍यांचलक कथाकारमे प्रेमचन्‍द असगरे छलाह, तहि‍ना मैथि‍ली कथाक ऐ पुनर्जागरण कालमे, मैथि‍ली साहि‍त्‍यमे जगदीश प्रसाद मंडल जीक कथा असगरे अछि‍- तोहर सरि‍स एक तोहे माधव! चर्चित पाेथी- गामक जि‍नगी प्रकाशन वर्ष- २००९ लेखक- श्री जगदीश प्रसाद मंडल प्रकाशक- श्रुति‍ प्रकाशन पृष्‍ठ- १७६ मूल्‍य- २०० टाका मात्र २ आरसी बाबूक व्‍यक्‍ति‍त्‍व एवं कृति‍त्‍वपर द्वि‍दि‍वसीय राष्‍ट्रीय सेमि‍नार दू दर्जन वि‍द्वानक सहभागि‍ता : आचार्य दि‍व्‍यचक्षु मुजफ्फरपुर। साहि‍त्‍य अकादेमी नई दि‍ल्‍लीसँ स्‍नातकोत्तर मैथि‍ली वि‍भाग, बाबा साहब भीमराव अम्‍बेदकर बि‍हार वि‍श्‍ववि‍द्यालय मुजफ्फरपुरक संयुक्‍त तत्‍वधानमे महाकवि‍ आरसी प्रसाद सि‍ंहक जन्‍म शतवार्षिकीक अवसर एकटा द्वि‍दि‍वसीय सेमि‍नारक आयोजन गत 16-17 दि‍सम्‍बर 2010केँ वि‍श्‍ववि‍द्यालयी पुस्‍तकालयक सभागारमे कएल गेल जैमे दू दि‍न धरि‍ दू दर्जनसँ अधि‍क वि‍द्वान अपन-अपन आलेखक पाठ केलनि‍। जैमे आरसीबाबूक महनीय सारस्‍वत व्‍यक्‍तत्‍वक वि‍भि‍न्न पक्षपर वि‍शद वि‍वेचन कएल गेल। 15 दि‍सम्‍बरकेँ ओयोजि‍का सह मैथि‍ली वि‍भागाध्‍यक्ष डाॅ. कमला चौधरीक अध्‍यक्षतामे उद्घाटन सत्र 10 बजे प्रारम्‍भ भेल। कार्यक्रमक आरम्‍भमे स्‍नातकोत्तर मैथि‍ली वि‍भागक छात्रागण गोसाओनि‍क गीत प्रस्‍तुत केलनि‍। वि‍श्‍ववि‍द्यालयक कुलपति‍ डॉ. राजदेव सि‍ंह आरसीबाबूक चि‍त्रपर माल्‍यार्पण एवं दीप प्रज्‍वलि‍त कऽ कार्यक्रमक उद्घाटन केलनि‍। स्‍वागत गीतक बाद साहि‍त्‍य अकादेमीमे उपसंपादक श्री देवेन्‍द्र कुमार देवेश, सभागत अति‍थि‍, प्रति‍भागी साहि‍त्‍यकार एवं समुपस्‍थि‍त श्रोतागणकेँ स्‍वागत केलनि‍। अकादेमीमे मैथि‍ली भाषाक प्रति‍नि‍धि‍ डाॅ. वि‍द्यानाथ झा वि‍दि‍त, आरसी प्रसाद सि‍ंहक वि‍राट व्‍यक्‍ति‍त्‍व, हुनक साहि‍त्‍य साधनाक वि‍स्‍तृत फलकपर वि‍द्वत्‍वर्ग द्वारा गहन वि‍चार-वि‍मर्श करबाक आह्वान केलनि‍। डॉ. नरेश कुमार वि‍कल, अपन बीज भाषणमे हुनक साहि‍त्‍य साधनाक वि‍स्‍तृत चर्च करैत हुनक राष्‍ट्रवादी, उदात एवं स्‍वाभि‍मानी चरि‍त्रक वि‍स्‍तृत चर्च करैत मैथि‍ली साहि‍त्‍यमे हुनक अवदानक सेहो चर्च केलनि‍। ऐ अवसरपर साहि‍त्‍य अकादेमी द्वारा डाॅ. वि‍व्‍येन्‍द्र पालि‍क प्रकाशि‍त एवं डॉ. देवेन्‍द्र झा द्वारा अनुदि‍त बंगला उपन्‍यासक लोकार्पण डाॅ. वि‍द्यानाथ झा वि‍दि‍त द्वारा सम्‍पन्न भेल। डॉ. मदन मि‍श्र धन्‍यवाद ज्ञानक केलनि‍‍। मध्‍याह्न 12 बजे डॉ. देवेन्‍द्र झाक अध्‍यक्षतामे दोसर सत्र आरम्‍भ भेल जैमे डॉ. नरेन्‍द्र नारायण झा ि‍नराला, आरसी बाबूक रचना ऐति‍हासि‍क परि‍प्रेक्ष्‍यपर एवं डॉ. लावण्‍य कीर्ति सि‍ंह काव्‍या आरसीक रचनामे संगीत तत्वपर अपन-अपन आलेख पाठ केलनि‍। श्रोताक वि‍शेष आग्रहपर डॉ. नरेश कुमार वि‍कल अपन बहुप्रशंसि‍त कवि‍ता कहुना कऽ चलि‍ आउ अपन गाम'क सस्‍वर पाठ केलनि‍। भोजनोपरान्‍त अपराह्न 3 बजे डॉ. पद्मनारायण झा वि‍रंचि‍'क अध्‍यक्षतामे श्री राजन सि‍ंह, डॉ. रामनरेश सि‍ंह एवं श्री श्रीमन्‍त पाठक आरसी बाबूक काव्‍यक वि‍भि‍न्न आयामपर वि‍स्‍तृत प्रकाश देलनि‍। वि‍दि‍त जीक आग्रहपर श्रीमन्‍त पाठक अपन एकटा गीत सेहो प्रस्‍तुत केलनि‍। पहि‍ल एवं तेसर सत्रक संचालन डॉ. अमरनाथ झा एवं दोसर सत्रक डॉ. सुलेमान केलनि‍। दोसर दि‍न 16 दि‍सम्‍बरकेँ डॉ. नागेश्‍वर सि‍ंह शशीन्‍द्र'क अध्‍यक्षतामे श्री रमाकान्‍त राय रमा, श्री वि‍वाकान्‍त पाठक, एवं श्रीमती सुशीला झा आरसी बाबूक रचनाशीलता जीवन दर्शन, व्‍यक्‍तत्‍व एवं आदर्शपर अपन-अपन सारगर्भित आलेखक वाचन केलनि‍। वि‍दि‍त जीक आग्रहपर श्री अमलेन्‍दु शेखर पाठक बेंगलोर'मे भेल सर्वभाषा लेखक संगोष्‍ठि‍क वि‍षएपर अपन अनुभव सुनौलनि‍ आ ओइ प्रस्‍तुत अपन रचनाक सेहो पाठ केलनि‍‍। अध्‍यक्ष डाॅ. शशीन्‍द्रजी आरसी प्रसाद सि‍ंह जीवनक वि‍भि‍न्न पक्षपर चर्च करैत जनौलनि‍ जे हुनकामे अपन भावना व्‍यक्‍त करबाक एकटा अद्भूत कला छल। ओ मैथि‍लीए नै हि‍न्‍दी भाषामे सेहो अनेक आयामक वि‍कसि‍त केलनि‍। भोजनोपरान्‍त पुन: डॉ. कमला चौधरीक अध्‍यक्षतामे समापन सत्र आरम्‍भ भेल जैमे डॉ. प्रमोद कुमार सि‍ंह डॉ. प्रफुल्‍ल कुमार सि‍ंह मौन आ डॉ. श्रीमती नीता झा अपन-अपन प्रति‍वर्दनक लऽ उपस्‍थि‍त भेलाह। प्रमोद बाबू आरसीक वि‍राट ि‍हन्‍दी साधना आ मातृभाषा मैथि‍लीक अा साधनाक तुलनात्‍मक वि‍श्‍लेषण करैत मैथि‍ली सेवा लग हि‍न्‍दी सेवाक फूस जकाँ बतौलनि‍। हि‍न्‍दीक वि‍द्वान प्रवक्‍ता एवं साहि‍त्‍यकार होइतो ओ मैथि‍लीमे धराप्रवाह बाजैत हुनक बाल साहि‍त्‍य, कि‍शोर साहि‍त्‍य एवं प्रौढ़ साहि‍त्‍यक प्रसंग वि‍स्‍तृत चर्च केलनि‍। डॉ. नीता झा सम्‍पूर्ण कार्यक्रमक पर्यवेक्षण प्रति‍वेदन प्रस्‍तुत केलनि‍ जैमे सभ-सबहक सभ वक्‍ताक सम्‍भाषण मूल तत्‍वक बीज वि‍द्यमान छल। डॉ. प्रफुल्‍ल कुमार सि‍ंह मौन अपन समापन भाषणमे मैथि‍ली साहि‍त्‍यक वर्तमान दशा-दि‍शाक चर्च करैत ऐमे आरसी बाबूक महती योगदानक चर्च केलनि‍ जे यद्यपि‍ ओ हि‍न्‍दी आ मैथि‍ली दुनूमे लि‍खि‍लनि‍ मुदा हि‍न्‍दी हुनका ओ सम्‍मान नै देलकनि‍ जकर ओ अधि‍कारी छलाह। मैथि‍ली हुनक मातृभाषा छलनि‍ जे अपन पुत्रक सम्‍मान दऽ मान बढ़ौलक। डॉ. वि‍द्यानाथ झा वि‍दि‍त मैथि‍ली भाषाक लेल साहि‍त्‍य अकादेमी, भारतीय भाषा संस्‍थान आ भारत सरकारक योजनाक प्रसंग वि‍स्‍तृत जानकारी देलनि‍। आजुक तीनू सत्रक संचालन डॉ. अमरनाथ झा केलनि‍। श्री शैलेन्‍द्र चौधरी धन्‍यवाद ज्ञापन केलनि‍। ७ रामकृष्‍ण मंडल 'छोटू' कथा- बाप हबलदार गोरचंदक ऐठाम आइ फेर गुमशुमक माहौल बनल छै। आइ हुनकर एकलौता बेटा बलदेवक इंटरक रि‍जल्‍ट नि‍कलैबला अछि‍। कनीदेरक बाद बलदेव मुँह लटकेने हाथमे रि‍जल्‍ट लऽ कऽ प्रवेश केलक। बलदेवकेँ एते हि‍म्‍मत नहि‍ जे बाबू जीसँ आँखि‍मे आँखि‍ मि‍लाबैत। एकठाम बलदेब मुँह लटकेने ठाढ़ अछि‍। जेना कोनो पत्‍थरक मुरूत। आ एनहर गोरचंदक आँखि‍ लाल-लाल जेना बुझाइत दुगो आइगक गोला ओकरा चेहरापर अछि‍। बलदेवक माए श्‍यामबती, स्‍थि‍ति‍केँ भाि‍प पति‍क गुस्‍सा याद करैत सि‍हरि‍ उठै छथि‍। उ तुरन्‍ते बलदेव लग जा बलदेव हाथसँ रि‍जल्‍ट लऽ चहैक उठल, आैर पति‍ दि‍शन ताकि‍ बाजलि‍- “यौ-यौ देखि‍ओ, अपन बलदेव सकेण्‍ड कि‍लाससँ पास भेल।‍” गोरचंद रि‍जल्‍ट छि‍न बाजल- “हम जानै छी, ई आवारा, बकलेल हम्‍मर नाक कटौत, हम्‍मर सभ अरमानपर पानि‍ फेर देत। हम सोचने रहौं ई हम्‍मर नाम रौशन करत। तब हमहुँ गर्वसँ सीना फुलाए कहि‍ति‍ऐ कि‍ हमरो बेटा दोसरक बेटा जना इंजि‍नि‍यर, डॉक्‍टर, दरौगा अछि‍। मगर-मगर ई कहाँ.... नसीब हमरा।‍” कहैत-कहैत कानए लगल गोरचंद। जेना-तेना बलदेवक एडमि‍शन शहरक एगो कॉलेजमे भेल। उ कॉलेजमे बी.ए. इति‍हाससँ पढ़ाइ करए लगल। हँसैत, हँसैत साल बि‍त गेलै। मगर बलदेवमे कोनो परि‍वर्त्तन नइ भेल। उ ओनाहि‍ऐ रहल। मुदा पढ़ाइक समए बीत गेल। पार्ट-वनक परीक्षा भेल। ऐबेर जेना-तेना परि‍क्षामे देकसी मारैत पास तँ भऽ गेल। घरपर बापक डाॅट-फटकारसँ ओकरा कानपर तँ जूऔ ने टि‍कै। समए फेर बीतैत गेल। आब बलदेव पार्ट-टूक वि‍द्याथी भेल। ऐबेर कॉलेजक कुछ वि‍द्याथी आगरा ताज महल देखै वास्‍ते जाइके प्रोग्राम बनेलक। जैमे बलदेव अपनो नाम लि‍खौलक। सभ वि‍द्याथीकेँ एक-एक हजार रूपैआ जमा करए पड़त। बलदेव अपन बाबुजीकेँ कहलक मुदा उ साफे मना कैर देलखि‍न। माएकेँ बहुते कहि‍ बलदेव अपन बाबूजीकेँ मनेलक। उ दि‍न आबि‍ गेल। आइ दुबजि‍या गड़ि‍सँ यात्रा कएल जेतै। एमहर गोरचंद अपन बलदेवसँ कहलक कि‍ उ बारह बजे ओकरा एक हजार रूपैआ कतौसँ, केनाहि‍ओ व्‍यवस्‍था कैर कऽ दऽ देतै। पर ई कि‍ बारह बजि‍ गेलै, अखैन तक गोरचंद थानासँ आपस नइ आएल। घरपर बलदेव गुस्‍सासँ अपन बापक बहुत भला-बुरा कहए लगल। माए श्‍यामबती जवान बेटाक मुँहसँ, अपन भगवान जकाँ दुल्‍हाक बारेमे जली-कुट्टी सुनि‍ आँखि‍सँ मोती जकाँ नोर गि‍रबए लगलि‍। तखने बलदेवक जोरदार अवाज- “माए-माए, देखलि‍ही बाबूक करतुत हम्‍मर बेइज्‍जत करा देलक, पुरे कॉलेजमे। आव... आव हम कोना कॉलेजमे..... ?‍” गुस्‍सामे बलदेव अपन साइकिल नि‍काइल चलि‍ पड़ल थाना तरफ। थाना पहुँचैत बलदेव देखै छै। ओकर बाबूजी एगो दरोगाक गोर दाबैत छै। तखनि‍ बलदेवक बाबू कहलक- “हुजुर-हुजुर भऽ सकै तँ पानसौ रूपैआ पैंचा द ि‍दअ। आ हुजुर आइ हमरा कनी जलदीए घर जेबाक अछि‍। हम्‍मर बेटा आइ दुबजि‍या गरि‍सँ आगरा जयछै।” दरोगा गोरखनाथ अपन रौब झाड़ैत- “चुप सार, बढ़ि‍यासँ जातैले आबै नै छौ आ बेटाकेँ आगरा घुमैले भेजै छेँ। आ ई की जखैन देखू तखैन बेटाले पैसा मांगे लगै छी। कहि‍यो ओकर एडमि‍शनले तँ कहि‍यो कपड़ाले कहि‍यो साइकिलले ई- ई कि‍ छि‍औ। एत्त तोहर बापक खजाना नै छौ बड़ा मेहनतसँ और बड़ा रि‍क्‍सपर घूसक पैसा आबै छै, हराममे नाइ। चल सि‍करेट जड़ा।‍” गोरचंद फफैक-फफैक कानए लगल- “हुजुर एक्के घंटा बचल छै हम्‍मर बेटा....।‍” “चुप चल सि‍करेट जड़ा। भाड़मे जाउ तोहर बेटा। हूं, बड़ा भाएल आगरा घुमैबला। चल-चल जांत आ सुन, ई ले एकसौ रूपैआ। जौ बाजारसँ कुछेक सब्‍जी कि‍न हम्‍मरा घर पहुँचा आ और कनि‍ हम्‍मर‍ बेटा गोलुआकेँ स्‍कूलसँ लाइब लि‍हैं।” कनि‍ देर रूकि‍ कऽ फेर बाजल- “तब देखबै सांझमे कुछ पैसा बेबस्‍था करबौ। जो-जो भाग....।‍” एते सुनि‍ बलदेवक भोँह फरैक उठल ओकर सभ बाप परक गुस्‍सा, दरोगापर आबि‍ गेल। मन मानि‍ होइ ओकरा बगलक बंदूक उठाए धाँइ-धाँइ गोली दरोगाक भेजामे उतारि‍ देत। पर बेचारा कि‍ करि‍ सकैत। चुपचाप घरक ओर वि‍दा भेल आ कसम खा लेलक। आइसँ पढ़ब आ सि‍र्फ पढ़ब। अपन बापकेँ ई अपमानक बदला हम कलक्‍टर बनि‍ कऽ लेब। आब ने जानि‍ बलदेवमे कोन शक्‍ति‍ आबि‍ गेलै, सबकुछ छोड़ि‍ सभसँ नाता तोड़ि‍ सि‍र्फ कि‍ताबसँ नाता जोड़ि‍ लेलक। गाम- नि‍र्मली पोस्‍ट- नि‍र्मली वार्ड न. 12 जि‍ला- सुपौल मोवाइल- 7654389984 ९ *एकटा पत्र एकटा समीक्षा

शैल झा “सागर किस्त किस्त जीवन” अहाँ तँ सागर जी के पठोलिऐ मुदा घरुआरी नारी हेवाक कारणे ई लाभ हम उठेलों हुनकासँ पहिने हमही पढ़ी गेलों ६-६ किस्त मे ! हमरा बुझवा मे नहि आबि रहल अछि कतऽ सँ शुरू करी, की लिखी, की कही? हँ एतेक जरुर कहब एहि किताब केँ हाथ मे लैत आ किताब दिसि तकैत अनेरो आंखि सँ दहो बहो  नोर झरय लागल, किये एकर कारण हम अपनों नहि जनैत छी. एहि बेर महाकुम्भक मेला लागल अछि .हमरो बहुत परिचित लोकनि सब महाकुम्भ करय जाय गेलीह अछि .हमरो कहलनि हम हिनकासँ पूछल मुदा हिनकर नहिये सन जबाब पाबि हम चुप भऽ गेलों किएक तँ हिनका एहि सबमे विश्वास कनी कम्मे छनि. लेकिन किस्त किस्त  पढ़ी गेलासँ मोनमे हिलकोर उठल जे कोनो टा कुम्भ स्नानसँ बेसी सुखमय लागल . एकटा बात आर जे मोनक कोनो दोगमे अहांक दर्शन करवाक प्रबल इच्छा जागि गेल अछि। ठीके जखन अहाँकेँ दर्शन करब तँ हाथसँ छुबि कऽ देखब, आंगुरसँ दाबि कऽ देखब, चरणमे झुकि कऽ देखब . की सरिपों अहाँ वैह शेफालिका  छी जे हमर माथ पर एखन हाथ रोपने छी. सत्ते विधाता क पैघ डांग अहांक रंगीन जीवन पर पडल, अहाँ लोकनिक अंतरंगता हुनको अखरि गेल्न्हि. अहाँ एकटा सफल बेटी, निश्छल प्रेयसी, सर्वस्व समर्पिता पत्नी , कुशल गृहिणी, ममतामयी माय, निष्णात लेखिका –समाजसेविका, राजनयिक  आ बांधवी आ आर की की नै छी ! से नहि जनितों जों ई पोथी नहि पढितों . अहाँ अतुलनीय छी तोहर सरिस एक तोंहे माधव मोन होयछ अनुमाने .( ई बात हम एहि लेल लिखलों जे सागर जी अहांक तुलना महादेवी वर्मा, महाश्वेता देवी वगैरह सँ करैत छथि, जे हो मुदा मैथिली साहित्य  केँ एकटा अनमोल वस्तु भेटलैक अहांक ई पोथी. हमरा बुझने एहि पोथिक उचित मूल्यांकन नहि भेलैक अछि . हमरा सन घरेलू महिला के अरवैध कऽ पढ़वाक चाहियनि पोथी. भाषा  आ शैली मे गति  छैक. एक दू पेज पढ्वाक बाद हैत नहि जे  पढ़ब छोड़ी . कोनो काज करी . यैह एहि कृतिक  सफलता भेलैक . १९७२ मे जखन हमर ब्याह भेल छल तखन सँ मैथिली पोथी पत्रिका पढैत आबि रहल छी ! तहिया मिथिला मिहिर मे अहांक दू जुटिया गुहल केश वाला फोटो संग अहांक कविता कथा सब पढैत रही , बड बढियां, बड्ड बेश --- किस्त किस्त जीवन एकटा विरल रचना छैक  आ अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस क वर्षगांठ पर हम आग्रह करबनि मैथिलीक भाग्यविधाता लोकनि सँ  जे एहेन उपाय करथि  जे एहि पोथीक अंतर्राष्ट्रीय  भाषा सब मे अनुवाद होइक ..................... आब हम अपन लेखनी के विराम देब चाहैत छी एहि एक पाती क   संग---- पढ़ी गेलों ई आत्मकथा मोन मे उठल उसांस एक .. कतेक व्यथित ई बारहो मास .. कतेक व्यथित ई बारहो मास ....................... १. रवि भूषण पाठक- विद्यापति २.डॉ0 मेघन प्रसाद- मैथिलीमे अनुवाद-कलाक शास्त्रीयकरणक इतिहास १ रवि भूषण पाठक विद्यापति

विद्यापति आ मैथिली के ल‘ के हिन्दी मे आरम्भहि सँ एकटा अंतर्विरोध व्याप्त अछि ।एकर मूल विषय अछि मैथिली आ हिन्दी क सम्बन्ध क देशीभाषापरिवार मे निर्धारण ।मैथिली कंे हटेला सँ हुनकर समावेशी या सर्वलपेटू सिद्धांत प्रभावित होइत अछि ।मैथिली के राखला सँ मैथिली क प्राचीनता आ एकर गौरवशाली साहित्यिक परम्परा हुनकर चालू फार्मूला के अस्तव्यस्त करैत अछि । हिन्दी आलोचना एकर निदान तेहने चालू ढ़ंग सँ करैत अछि । ई निदान अछि - 1 मैथिली कें हिन्दी क बोली रूप मे परिकल्पना । 2 विद्यापति कें आदि काल क कवि रूप मे स्वीकृति । पहिल निदान क चर्चा कहियो आराम सँ, आइ दोसर निदान क चर्चा कनिक विस्तार सँ करैत छी ।विद्यापति काव्य क प्रति हिन्दी आलोचना क दृष्टि पर एहि निबन्ध मे विचार करैत छी । सर्वप्रथम आचार्य रामचन्द्र शुक्ल द्वारा लिखित ‘हिन्दी साहित्य का इतिहास ’(संवत1986)पर चर्चा कएल जाए ।एहि पुस्तक क वीरगाथाकाल अध्याय मे विद्यापति क चर्चा मुख्यतः दू ठाम अछि । ‘अपभ्रंश काव्य‘ मे अपभ्रंश साहित्य मे प्रयुक्त छंद आ उदीयमान भाषा क वैशिष्टय क जानकारी अछि । दोसर ठाम अछि ‘वीरगाथा काल‘ मे ‘फुटकल रचनाऐं‘ मे अंकित टिप्पणी ।एहि ठाम आलोचक क प्रथम उददेश्य अछि मैथिली भाषा के अधीनस्थता क घोषणा ।ताहि दुआरे सर्वप्रथम हिन्दी साहित्य क विस्तार मे मैथिली आ विद्यापति क सम्मिलित क लेल जाइत अछि ।तत्पश्चात विद्यापति काव्य क विषय मे लेखक तीन-चारि टा मोट बात कहैत छथिन्ह- 1 कवि क अधिकांश पद श्रृंगारिक अछि,जाहि मे नायक नायिका राधा-कृष्ण छथि । 2 एहि पद क रचना संभवतः जयदेव क गीत काव्य क अनुकरण पर कएल गेल अछि । 3 पदावली क मूल दृष्टि श्रृंगारिक अछि,एहि पर आध्यात्मिकता या भक्ति क आवरण देनए ठीक नहि । आचार्य शुक्ल क आलोचना क एहि एकांगिता क मुख्य कारण अछि,हुनकर प्रबन्ध क प्रति विशेष आग्रह । एहि आग्रह क निहितार्थ अछि तुलसी आ जायसी क बड़का कवि सिद्ध केनए ।संदर्भित कवि नमहर कवि छथि,मुदा आलोचक क कमजोरी विद्यापति आ कबीर के जबर्दस्ती कमतर करए मे स्पष्ट अछि । अपभंश काव्य आ विद्यापति पदावली के सम्बन्ध मे हुनकर कम जानकारी सेहो आलोचना के प्रभावित करैत अछि ।अंतिम कारण अछि अवधी आ ब्रजभाषा क काव्य क प्रति आलोचक क अतिरिक्त स्नेह आ आग्रह । शुक्ल जी ’लोकमंगल‘ क एकटा खास काव्य दृष्टि के प्रति आग्रही छथि । अतः हुनकर समस्त लेखन क एकटा खास रंग अछि । एहि लेखन मे विद्यापति आ कबीर क एकटा सीमित स्थान अछि । एहि लेखन क कमजोरी पर सबसँ धारदार आक्रमण आचार्य हजारी प्रसाद द्वारा भेल । द्विवेदी जी क लेखन पर शांति निकेतन आ गुरूदेव क विचार क विशेष प्रभाव अछि ,ताहि दुआरे हिनकर प्रारंभिक लेखन मे विद्यापति काव्य के समझए -बूझए क दिशा मे गंभीर प्रयास क चिह्न भेटाइत अछि । ’सूरसाहित्य‘ मे जयदेव, विद्यापति,चण्डीदास आ सूरदास क राधा क तुलना कएल गेल अछि । राधा क विलास-कलामयी,किशोरी,वयःसन्धिसुषमा,अर्द्धोद्भिन्न उरोज पर द्विवेदी जी मोहित होइत छथि ।मुदा ई लेखन विद्यापति पदावली क केन्द्रीय भाव क दिश कोनो संकेत नहि करैत छैक । लेखक क उद्देश्य अछि सूर साहित्य क महत्व क उद्घाटन ।प्रसंगवश लेखक किछु बांग्ला लेखक क चर्चा करैत छथि ।रवीन्द्र नाथ क एकटा महत्वपूर्ण उद्धरण अछि ”विद्यापति क राधा मे प्रेम क तुलना मे विलाश बेशी अछि,एहि मे गम्भीरता क अटल धैर्य नहि ।एहि मे मात्र नवानुराग क उद्भ्रान्त लीला आ चांचल्य अछि । विद्यापति क राधा नवीना छथि, नवक्स्फुटा छथि ।“ई राधा महिमा एकटा बांग्ला लेखक दीनेश बाबू सेहो गाबैत छथि ”विद्यापति वर्णित राधिका एकाधिक चित्रपट क समष्टि अछि । जयदेव क राधा सदृश एहि मे शरीर क भाग ज्यादा आ हृदय क भाग कम अछि ।---- विद्यापति क राधा अत्यन्त सरला अछि ,अत्यन्त अनभिज्ञा ।“ द्विवेदी जी क उपरोक्त लेखन शुक्ल जी क विद्यापति सम्बन्धी मान्यता मे कोनो परिवर्तन करबा क प्रयास नहि करैत अछि ।हिनकर परवर्ती लेखन शुक्लवादी मान्यता क पोषण करैत अछि ।कबीर आ इतिहास सम्बन्धी मान्यता क सम्बन्ध मे हिनकर जोश विद्यापति क सम्बन्ध मे अनुपस्थित अछि,यद्यपि ई विद्यापति क कविता आ व्यक्तित्व क बेहतर जानकार छथि ।इतिहास सम्बन्धी हिनकर पोथी ‘हिंदी साहित्य:उद्भव और विकास ‘ मे कीर्तिलता पर दू पृष्ठ अछि आ पदावली पर मात्र चारि पांति । ई स्पष्ट करैत अछि जे लेखक क मंतव्य की अछि ।सगुण भक्ति परंपरा क आख्यान क बीच मे विद्यापति क झूठफूसिया चर्चा सँ खानापूरी कएल गेल अछि ।लेखक विद्यापति कें सिद्धवाक् कवि कहैत छथिन्ह आ पदावली मे वर्णित अपूर्व कृष्णलीला क संकेत दैत छथिन्ह ।भाव क सांद्रता आ अभिव्यक्ति क प्रेषणीयता क स्वीकारैत लेखक ई टिप्पणी देनए आवश्यक बूझैत अछि कि एहि परंपरा क प्रभाव संभवतः ब्रजभाषा काव्य परंपरा पर किछु नहि पड़ल । एकटा बात विचारनीय अछि द्विवेदी जी सन कद्दावर आलोचक तक शुक्लवादी मान्यता क विरोध नहि क सकल । एकर की कारण ? द्विवेदी जी कतिपय प्रसंग मे शुक्ल जी सँ पंगा ल लेने छलाह,ताहि दुआरे ओ विद्यापति पदावली क सम्बन्ध मे यथेष्ठ ध्यान नहि देलाह ।अवधी आ ब्रजभाषा काव्य परम्परा क प्रति तुलनात्मक स्नेह सेहो हिनका एहि दायित्व सँ वंचित कएलक । एहि बीच मे अन्य रचनाकार क टिप्पणी सब आबैत रहल । राम कुमार वर्मा क एकाक्षी दृष्टि मे विद्यापति काव्य मे आंतरिक सौंदर्य क अपेक्षा बाह्य सौंदर्य क प्रधानता अछि । स्वातंत्रयोत्तर परिदृश्य मे विद्यापति क सम्बन्ध मे बेहतर समझ विकसित भेल । राम विलास शर्मा विद्यापति काव्य के सम्बन्ध मे कम जानकारी क बावजूद ई बात बूझि सकलाह कि ओ नवजागरण क अग्रदूत छलाह । तहिना राम स्वरूप चतुर्वेदी अपन ग्रंथ ‘हिंदी साहित्य और संवेदना का विकास ’ मे शुक्ल जी द्वारा प्रतिपादित लौकिक आ आध्यात्मिक फांस के काटि पाबैत छथि । ”आचार्य शुक्ल एहि ठाम ओहि अनुभव तक नहि पहुँचैत छथि कि पदावली अपन श्रृंगारिक भावना क साथ वास्तव मे ऐहिक अछि आ तन्मयता क गंभीर अनुभूति ओकरा आध्यात्मिक स्तर पर रूपांतरित करैत अछि .........काम भाव आ शरीर क सौंदर्य हुनका ओहि ठाम उत्सव रूप मे अछि। ताहि दुआरे ई चिर परिचित होइतहुॅ चिर नवीन अछि ।” ई चतुर्वेदी जी क ईमानदारी छल कि हुनका पदावली मे सद्यःनवीनता क गंध मिल ।मुदा लेखक अवांछित संक्षिप्तता मे अपन काज चलाबैत अछि । ई पुस्तक त मानि के चलैत छैक जे रचना काशी आ आलोचना प्रयाग मे होइत छैक । शिव प्रसाद सिंह हिंदी आलोचना क एहि एकांगिता के नीक जँका चिन्हैत छथि ।अपन पुस्तक ’विद्यापति ‘ मे ओ विद्यापति आ पदावली क सौन्दर्य के काव्यशास्त्रीय दृष्टिकोण सँ देखैत छथि ।ओ विद्यापति के अपरूप क कवि मानैत छथि । “सौन्दर्य हुनकर दर्शन अछि आ सौन्दर्य हुनकर जीवन दृष्टि ।एहि सौन्दर्य के ओ नानाविधि देखलाह ,आ कुशल मणिकार क तरह चुनलाह ,सजा के,सँवारि के आलोकित कएलथि ”एहि सौन्दर्य क विश्वव्यापी रूप क ओ परख करैत छथि आ जायसी क ग्रंथ ’पद्मावत‘ सँ पदावली क सौन्दर्य क तुलना करैत अछि ।पद्मावती क दिव्य स्पर्श सँ सभ वस्तु अभिनव सौन्दर्य धारण करैत अछि ।लेखक मानैत अछि कि विद्यापति क राधा क अपरूप सेहो ई पारस अछि ।हुनकर अभिमत अछि“आश्चर्य होइत अछि जे जायसी सँ सौ वर्ष पूर्व विद्यापति जाहि पारस रूप क चित्रण कएल,ओहि पर ककरो ध्यान नहि गेल ,एकरा विद्यापति क अभाग्य कहल जाए ” डॉ0 सिंह क अवलोकन विन्दु प्रशंसनीय अछि, मुदा ई अभाग्य त हिन्दी आलोचना क अछि ,विद्यापति क नहि । मैनेजर पांडेय अपन पोथी ’भक्ति आंदोलन और सूरदास का काव्य ’ मे विद्यापति पर किछु चर्चा करैत छथि ।पुस्तक क शीर्षक सँ स्पष्ट अछि जे विद्यापति नाम क सीढ़ी क प्रयोग केवल सूरदास तक जएबा क लेल कएल गेल अछि ।तथापि एहि किताब मे गीतिकाव्य आ विद्यापति क सम्बन्ध मे किछु महत्वपूर्ण जानकारी अछि ।लेखक कहैत छथिन्ह “विद्यापति क पद मे सौंदर्य चेतना क आलोक भावानुभूति क तीव्रता घनत्व एवं व्यापकता आ लोकगीत तथा संगीत क आंतरिक सुसंगति अछि ” लेखक विद्यापति आ सूरदास दूनू के भक्ति कवि मानैत हुनका जन संस्कृति क रचनाकार मानैत छथि । विद्यापति आ हिन्दी आलोचना नामक ई निबन्ध एहि दृष्टि क मांग करैत अछि कि विद्यापति पर मौलिक दृष्टि सँ काज हो । ई प्रश्न हिन्दी आ मैथिली क नहि छैक,बल्कि समस्त भारतीय साहित्य क अछि ।विद्यापति सन मौलिक रचनाकार क जानबा-समझबा क लेल साधारण दृष्टि नहि आलोचना क तत्वान्वेषी दृष्टि चाही ।

2

बड़का रचना क लेल बड़का रचनात्मक साहस आ बड़का ईमानदारी क आवश्यकता होइत छैक । विद्यापति पदावली क विषय मे इएह साहस स्पष्ट ढ़ंग सँं उजागर होइत अछि ।‘दुखहि जनम भेल,दुखहि गमाओल ,सुख सपनहुॅं नहि भेल ’ ई पंक्ति विद्यापति पदावली मे निहित औदात्य क संकेत दैत अछि । संपूर्ण मध्यकालीन काव्य मे दुख क अबाध स्वीकृति आ सुख के सपना मे अएबा क दारूण रूपक अनुपस्थित अछि । हे आलोचकगण ! मध्यकालीन भारत क सामंती शासन आ समाज क वास्तविक रूप देखबा क साहस हो त विद्यापति पदावली फेर सँ पढ़बा क प्रयास करू । ई सत्य अछि कि ओहि मे श्रृंगार रस क बेगवती धारा बहि रहल छैक । आ किछु आलोचक ओहि मे स्नानहि के जीवन बूझ‘ लागैत छथिन्ह ।हमरा श्रृंगार रस क तीव्रता ,गांभीर्य स्वीकार्य अछि ।श्रृंगार रस मे निहित एकाग्रता आ स्थायित्व अन्यत्र अनुपलब्ध अछि । हमरा कहबा क मतलब अछि कि विद्यापति अपन श्रृंगार रस क कविता कहबा क लेल मैथिली मे रचना नहि केलाह । तथापि विद्यापति पदावली क कोनो आलोचक श्रृंगार मे भसबा आ फसबा सँ नहि बचलाह ।वयःसन्धि क नायिका क ई लावण्य देखि की कविकुलगुरू रवीन्द्रनाथ आ की आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी सभ गोटे मोहित छथि- सैसव जोबन दुहु मिलि गेल । स्रवनक पथ दुहु लोचन भेल ।। वचनक चातुरि लहु-लहु हास ।धरनिये चाँद कएल परगास ।। मुकुर हाथ लए करए सिंगार । सखि पूछए कइसे सुरत-बिहार ।। निरजन उरज हेरत कत बेरि। बिहुंसए अपन पयोधर हेरि ।। ताहि दुआरे गुरूदेव के विद्यापति क राधिका परमनवीना बूझाइत छन्हि । हे गुरूदेव हमर एहि भ्रांति के दूर करू कि ई राधिका पदावली क विस्तृत आकाश मे प्रगल्भे किएक रहि जाइत छैक,ओकरा मे प्रौढ़ता किएक ने आबैत छैक । अहाँ कहब जे प्रौढ़ राधा क रचना केनए कवि क लक्ष्य नहि छल या राधा क प्रौढ़ता क एक दू टा कविता सुना देब । हे गुरूदेव हमरा बताबू कि ओहि समय मे मिथिला यौवनोन्मत्त नारी सँ वंचित छल ?। विद्यापति त भरि जिनगी घूमिते रहलाह। कि नेपाल ,जौनपुर आ बंगाल तक मे हुनका प्रौढ़ दर्शन नहि भेल? ,ओ स्वयं भरपूर जिनगी आ भरि उमरि जीलाह । हुनका श्रृंगार क विविध रूप आ दशा के बतायत ?हमर एहि ठाम तुच्छ आग्रह अछि कि अपन तमाम योग्यता आ जीवनानुभव क बावजूद ओ श्रृंगार रस क क्षयोन्मुख प्रभाव के बूझलाह । ताहि दुआरे एहि अंतरंग रस क आनन्द लइतहुॅ,एकरा चरम लक्ष्य नहि बनेलाह । विद्यापति चौदहम-पंदरहम शताब्दी मे छलाह ।संस्कृत काव्यशास्त्र क सब प्रमुख आचार्य एहि समय मे लिखि लेने छलाह आ मम्मटाचार्य विभिन्न असहमति क बावजूद ‘साहित्यदर्पण’मे व्यापक सहमति बनएबा क प्रयास केलाह ।विद्यापति एहि प्रयास सँ अवगत छलाह । श्रृंगार रस क राजत्व के सम्बन्ध मे हुनका मन मे कोनो संशय नहि छल । मुदा तत्कालीन लेखन मे व्याप्त रीतिवाद आ कादो मे पड़नए ओ उचित नहि बूझलाह । हुनकर अवहट्ट आ मैथिली क दिश प्रयाण क सबसँ महत्वपूर्ण कारण छल जनोन्मुख भाषा आ टटकापन के स्वीकार केनए ।अपन समय क बंजरपन के लक्ष्य करैत कवि कीर्तिलता मे कहैत छथि- अक्खर रस बुज्झि निहार नहि कवि कुल भमि भिख्खरि भऊं । मतलब ई जे अक्षर रस क मर्मज्ञ केयो नहि बचल, कवि सब घूमि घूमि के भीखमंगा भए गेलाह । मिथिला अंचल मे नवविकसित भाषा क प्रति विद्यापति क उत्सुकता आह्लादित आ चकित करैत अछि ।कीर्तिलता मे एकटा आन स्थान पर ओ कहैत छथि- सक्कअ वाणी बुहअण भावइ पाइअ रस को मम्म न पावइ । देसिल बयणा सब जन मिट्ठा,तें तैसन जंपउ अवहट्टा ।। मतलब ई जे संस्कृत के पंडिते नीक जँका बूुझैत छथि,प्राकृत भाषा क रस केयो नहि पाबैत अछि । देशी बोली सब के नीक लागैत अछि ,ताहि दुआरे हम अवहट्ट बाजि रहल छी । विद्यापति भाषा के संगहि समाज क नवीनता के सेहेा संकेत करैत छथिन्ह - हिन्दू तुलुक मितल वास, एकक धम्मे ओकाक हास । कतहु बाँग,कतहु वेद कतहु विसमिल कतहु छेद कतहु ओझा कतहु खोजा कतहु नकत कतहु रोजा कतहु तम्बारू कतहु कूजा कतहु नीमाज कतहु पूजा कतहु तुलुका बल कर बाट जाएते बेगार धर ।। कीर्तिलता मे अवहट्ट के संगे मैथिली क ई प्रयोग ओते आश्चर्य उत्पन्न नहि करैत अछि,जतेक आश्चर्य उत्पन्न करैत अछि विद्यापति क नवीन सामाजिक स्थिति क प्रति सजगता ।हिंदी विद्वान अंबा दत्त पंत आ मैथिली -हिंदी के शताधिक विद्वान विद्यापति काव्य मे श्रृंगार क विभिन्न दशा के खोजि-खोजि बूड़िया गेलाह ।विद्यापति काव्य क नायिका के वक्षाकार देखि देखि के आलोचक सभ मस्त छथि ।ओ बैर अर्थात वदरीफल सँ बेल क यात्रा मे निर्वाण क रहल छथि । पहिल बदरि कुच पुनरंग ।दिने दिने बाढय पिड़ए अनंग । से पुन भए गेल वीजक पीर ।अब कुच बाढ़ल सिरिफल जोर । माधव पेखल रमनि संधान ।घाटहि भेटल करत सिनान । सुखद अछि कि विद्यापतिकाव्य मे विद्वान लोकनि नारियल,टाभनेबो आ तरबूजा नहि खोजलाह,यदि ई सब फल हुनका मिलि जायत,तखन फेर आलोचक महोदय क आनन्द क कल्पना नहि कएल जा सकैत अछि ।मित्र गौरी शंकर चौधरी कहैत छथिन्ह फल आ तरकारी मे संकर(हाईब्रिड) क कल्पना केनए विद्वान लोकनि बिसरि गेलाह,नहि त विद्यापति काव्य क असफलता पर दू-चारि टा पी0एच0डी0 आउर संभव छल । कहबा क तात्पर्य ई जे श्रृंगारिक वर्णन मे ई सब परंपरा रूप मे आबि गेल ।उरोज,नितंब,कटि,जांघ,त्रिबली क दर्शन कतहु कतहु परिस्थितिवश आ कतहु सायास भ गेल अछि;मुदा विद्यापति क कवित्व क ई केन्द्रीय स्थल नहि अछि ।विद्यापति पर तत्कालीन काव्य परंपरा क प्रभाव अछि ।ई समय अछि संस्कृत साहित्य मे अमरूक कृत‘अमरूक शतक’,भर्तृहरि कृत‘श्रृंगारशतक’जयदेव कृत‘रतिमंजरी’ गोवर्द्धनाचार्यकृत’आर्यासप्तशती’‘श्रृंगारतिलक’(कालिदास)क अनुकरण क ।कवि लोकनि जी जान सँ शतक(सेंचुरी) बनएबा मे व्यस्त भ गेलाह ।ई समय छल काव्यरूप,छंद,भाव,भाषा सब क्षेत्र मे अनुकरण क। संस्कृत साहित्य मे ई रचनात्मकता क दृष्टि सँ उल्लेखनीय समय नहि छल ।विद्यापति क संस्कृत साहित्य पर सेहो ई प्रभाव देखल जाइत छैक । कवि एहि सब प्रभाव क अतिक्रमण अपन अवहट्ट आ मैथिली रचना मे करैत अछि ।व्यक्ति के अपन नाम केहन नीक लागए छैक,मुदा कवि विद्यापति अपन नाम सेहो लोकभाषा आ उच्चारण के तर्ज पर बदलि लैत छथि- बालचंद विज्जावइ भासा दुहु नहिं लग्गइ दुज्जन हासा । सो परमेसर सेहर सोहइ,इणिच्चइ णाअर मन मोहइ ।। उत्तर सामंतवादी भारत मे रहए वला विद्यापति अपन समय आ इतिहास क क्रूर गर्जन सँ व्यथित छलाह ।सामंती शासन के नजदीक सँ देखए वला विद्यापति तत्कालीन राजनीतिक नपुंसकता क बड्ड नीक जँका परखैत छथिन्ह ।राजदरबार मे रहए वला राजकवि राजा आ राजपरिवार क कमजोर नस पर कुशलतापूर्वक हाथ राखैत छथि ।हजारी प्रसाद द्विवेदी कीर्तिलता के विषय मे कहैत छथिन्ह “एहि मे इतिहास क कविदृष्ट जीवंत रूप अछि । एहि मे ने काव्य के प्रति पक्षपात अछि ने इतिहास क उपेक्षा । ” जाहि विद्वान के तुलसीकृत रामचरितमानस क उत्तर काण्ड मे कलियुग क प्रताप देखाइत छैक,ओ कृपा क के कीर्तिलता क चित्रण देखि लेथु । बिकाए आए राज मानुसकरी पीसि वर आगे आंग डगर आनक तिलक आनका लाग पात्रहूतह परóीक वलआ माँग। ब्राहमणक यज्ञोपवीत चांडाल का आ गल। वेश्याह्नि पयोधरे जतिहि क ह्रदय चूर । धन संचरे धोल हाथि हति बापर चूरि जाथि । आवर्त्त विवर्त्त रोलहो नगर नहि नर समुद्दओ ।। यद्यपि ई जौनपुर नगर क वर्णन अछि, मुदा ऐतिहासिक प्रमाण अछि कि मिथिला क स्थिति सेहो एहने छल ।एक अन्य स्थान पर विद्यापति जाति व्यवस्था मे विघटन क चिह्न देखि रहल छथिन्ह जति अजाति विवाह अधम उत्तम का पाँरक परिवर्तन के एते नजदीक सँ देखए वला धर्म आ दर्शन क स्थायित्व मे कते विश्वास करत ! मुदा,विद्यापति क पदावली मे धर्म क उच्च कोटि क दर्शन होइत अछि ।किछु विद्वान विद्यापति रचनावली मे धर्म आ अध्यात्म खोजए वला क दिश लाठी ल के दौड़ए छथि ।आचार्य शुक्ल पदावली मे श्रृंगारिकता पर बल दैत,एकरा अनिवार्यतः ऐहिक घोषित करैत छथि ।ओ व्यंग्य करैत कहैत छथि “आइ-काल्हि आध्यात्मिकता क चश्मा सस्ता भ गेल छैक ।ओ पहिन के किछु लोग ’गीतगोविन्द‘ के साथहि पदावली मे आध्यात्मिक संकेत देखैत छथि ” शुक्ल जी पदावली के श्रृंगारिक साबित करए पर तूलि गेलाह । मुदा परवर्ती आलोचना मे ई कहल गेल कि श्रृंगार भावना मे तन्मयता क गंभीर अनुभूति आध्यात्मिकता मे रूपांतरित भ जाइत छैक । एहि सहमति क बावजूद किछु लोग शुक्लजी क निष्कर्ष के नहि मानबा मे पाप बूझैत छथि । एहने एकटा विद्वान छथि आदरनीय खगेन्द्र ठाकुर जी । एक टा आलेख मे ओ कहैत छथिन्ह जे भक्ति भावना होइतहु ओ भक्ति आंदोलन के अंग नहि छथि । हमरा ओहि तथाकथित आंदोलन सँ विद्यापति के जोड़बा मे कोनो रूचि नहि । मुदा एकटा बात स्पष्ट अछि पदावली मे भक्ति भाव क अद्वितीय स्थल अछि । विद्यापति क धार्मिकता एहि माने मे अद्भुत अछि कि ओ कोनो संस्थान क लेखक नहि छथि । एहि दृष्टि सँ हुनकर भक्ति भाव कोनो मठ क ध्वजा ल के नहि चलैत अछि ।साम्प्रदायिकता क एहि अनुपस्थिति पर ध्यान नहि देल गेल । राधा-कृष्ण के साथहि भगवान शंकर,पार्वती,गंगा आ भैरवी क ओ स्तुति करैत छथि ।ई धार्मिकता सब के साथ ल के चलए वला धार्मिक भावना अछि ।ई धार्मिकता धन-संपत्ति आ यश क लेल नहि छैक । एकर मूल उद्देश्य अछि दुनिया सँ आसुरी वृत्ति क नाश- जय -जय भैरवि असुर भयाओनि,पशुपति भामिनि माया । एहि कविता के आलोचक गण निराला क प्रसिद्ध कविता ’राम की शक्ति पूजा ‘ क ओहि अंश सँ तुलना करथि,जाहि मे भगवान राम क शक्ति पूजा सँ प्रसन्न भगवती क उदय होइत अछि । विद्यापति क कविता धर्म के खाल जँका नहि ओढ़ैत अछि,ई भारतीय धर्म भावना के उच्च आदर्श के अनुकूल अछि ।हिन्दी क रीतिकालीन कविता जँका एकरा मे कोनो द्वयर्थकता नहि अछि ।रीति कविता क धार्मिकता क मूल मे अछि कवि क विलास भावना मे छिपल अपराध भाव । एहि डर सँ ओ भगवान क नाम लैत छथि । एकटा कवि कहैत छथिन्ह यदि सूतरि जायत त कविता बूझब नहि त राधा कृष्ण क स्मरण एकटा बहाना अछि ।विद्यापति पदावली मे एहि द्वैधता क लेल कोनो स्थान नहि ।एहि मे भक्त क कातरता, ओकर दैन्य, आत्मसमर्पण आ अनन्य निष्ठा निहित अछि । विद्यापति भक्ति या श्रृंगार दूनू भावना के प्रकृति के मुक्ताकाश मे देखैत छथिन्ह ,ताहि दुआरे एहि मे मिथिला क प्राकृतिक सुषमा क अद्भुत दर्शन होइत अछि ।एहि अन्हार पीबए वला सूर्य क तेज सँ अन्यत्र परिचय नहि भेटत- ए री मानिनि पलटि निहार ।अरून पिबए लागल अन्हार । प्रेम आ माधुर्य मे डूबल प्रकृति कतहु सादृश्यमूलक अलंकार के रूप मे प्रकट होइत अछि -पहिल बदरि सम पुन नवरंग । आ कतहु विम्ब क रूप मे जइसे डगमग नलिनि क नीर । तइसे डगमग धनि क शरीर ।ं। वसंत गीत क सौन्दर्य त कोनो भारतीय भाषा मे नहि मिलत । “नवल वसंत नवल मलयानिल मातल नव अलि कूल ” एहि कविता क तुलना निराला क सरस्वती वन्दना सँ करब तखन महाकवि विद्यापति क मौलिकता क पता चलत । पता नहि कोन आलोचक विद्यापति के अभिनव जयदेव कहने छल । एहि सँ अधलाह उपमा आ उपनाम साहित्य जगत मे दोसर कोनो नहि देल गेल ।गीतगोविन्द मे जयदेव कहैत छथिन्ह- यदि हरिस्मरणे सरसं मनो यदि विलासकलासु कुतूहलम् ! मधुरकोमलकान्तपदावलीं श्रृणु तदा जयदेवसरस्वतीम् । अर्थात यदि हरि स्मरण मे मन सरस हो,यदि विलास-कला मे कुतूहल हो,तखन जयदेव क मधुर कोमल,कान्त पदावली के सुनु । विद्यापति त अपन पदावली के सम्बन्ध मे कोनो एकरस घोषणा नहि कएलथि, तैयो विद्यापति के केवल श्रृंगार सँ जोड़नए विद्यापति के कमतर करए के प्रयास अछि । विद्यापति के श्रृंगार आ भक्ति के कवि के रूप मे देखु, कोनो दिक्कत नहि,मुदा ओ साहित्य क वृहत्तर प्रयोजन के ल के चलैत छथिन्ह ।तखने विद्यापति क कविता मे छितराएल विशाल दर्द के अनुभव क सकब । राधा क प्रतीक्षा मिथिला के आम नारी वर्ग क प्रतीक्षा अछि । सामंतवाद पुरूष आ स्त्री के अलग -अलग संस्कार देलकए ।ओहि संस्कार मे नारी क लेल छलए अंतहीन प्रतीक्षा ।एहि प्रतीक्षारत नारी के कनैत-खीजैत आ स्वयं के मनाबए के कतेको चित्र सँ पदावली भरल अछि । कखन हरब दुख मोर हे भोलानाथ ! पद मे दुख क विशाल व्यंजना अछि ।जन्म सँ मृत्यु तक दुख क सागर मे रहबा क तर्क विद्यापति क नहि मिथिला के साधारण पुरूष क अछि । ’दुखहि जनम भेल,दुखहि गमाओल ‘क व्यंजना छह सौ साल बाद फेर एकटा कवि क सकल ,जकरा भारतीय साहित्य निराला नाम सँ जानैत अछि । ’दुख ही जीवन की कथा रही‘ पर लट्टू साहित्यिक वर्ग विद्यापति क अर्थगर्भित कविता के जेना सामान्य धार्मिक कोटि मे राखि बिसरि जाइत अछि ।ई एकटा सांस्कृतिक शर्म के विषय अछि । संस्कृत काव्यशास्त्र मानैत अछि जे महान रचना मे अर्थ क स्वाभाविक बहुस्तरीयता होइत छैक ।अतः रचना क शरीर सँ नहि ओकर आत्मा सँ केन्द्रीय संवेदना क पहचान होएबा क चाही । विद्यापति मे साहित्य आ शास्त्र क सब मान्यता एमहर ओमहर भ गेल अछि,एहि ठाम आलोचना क लोकतांत्रिकता देखाइत अछि ! जकरा जे मून हो लिख दे आ पी0एच0डी0 क डिग्री ल ले ! वाह रे विद्यापति !आ वाह रे विद्यापति क आलोचना ्!

२ डॉ0 मेघन प्रसाद मैथिलीमे अनुवाद-कलाक शास्त्रीयकरणक इतिहास हम पहिनहि कहि दी जे हम अनुवाद कलाक ने तँ मर्मज्ञ छी आ ने कहियो अनुवादक काज कयलहुँ अछि। तथापि   राष्ट्रीय अनुवाद मिशन योजना  क तहत   केन्द्रीय भारतीय भाषा संस्थान  क अध्किारी लोकनि पूर्ण विश्वसनीयताक संग अनुवादक शास्त्रीय विषयपर आयोजित  राष्ट्रीय सेमिनारमे मंचसँ हमरा किछु कहबाक दायित्वपूर्णं ई भार देलनि तकरा लेल हम संस्थाक अध्किारी लोकनि खासक ऽ डॉ0 अजित मिश्रजीक प्रति कोटिशः आभार प्रकट करै छी। अनुवादक काज करबाक उत्कट इच्छा तँ छल मुदा साहित्य अकादेमीक प्रतिनिध् ितथा सदस्य लोकनि तकरा आइ ध्रि पूर्ण नहि होमय देलनि। पता नहि हमरा प्रति कोन प्रकारक दुराग्रह पोसने छथि। एकाध् बेर साहित्य अकादेमीक प्रतिनिध्/िपदाध्किारीसँ पत्राचारो कयलहुँ मुदा सेहो निरर्थके गेल। ई जरुर कहि दी जे मैथिलीसँ जुरल रहबाक कारणेँ मैथिलीमे अनुदित रचना बेस संख्यामे पढ़बाक अवसर प्राप्त भेल अछि तेँ ओहि अनुभवक आधर पर मैथिलीमे अनुवाद-कलाक इतिहासपर किछु कहबाक हिम्मति जुटा सकलहुँ अछि। अनुवाद-कलाक अर्थ - अनुवाद-कलाक मादेँ मैथिलीक अनुभवी आ सफल अनुवादक पण्डित श्री गोबिन्द झाजीक कहब बेसी उपयुक्त बूझि पडै¬़ अछि -   एहेन कोनो रहस्य  एहेन कोनो सूत्रा नहि वा एहेन कोनो मन्त्रा नहि छैक जे कानमे ढारि देने केओ सफल अनुवादक भ ऽ जाए। हमरा जनैत अनुवाद थिक कोदरबाहि जाहिमे शिक्षण-प्रशिक्षण नहि  केवल अभ्यास अपेक्षित होइत छैक।  1 स्वतन्त्राताक सन्दर्भमे अनुवाद जे थिक से एक प्रकारक व्याख्या थिक। प्रायः 1915 ई0मे भाषा वैज्ञानिक Saussure छलाह जे कॉलेज नोट (College Note) लिखलनि तकरा बादमे अनुवाद कहि क ऽ प्रकाशित कराओल गेल। ओ अपन नोटक व्याख्या क ऽ क ऽ प्रकाशित करौलनि जे हुनक मृन्युपरान्त अनुवाद कहि क ऽ प्रकाशित भेलैक। अनुदित रचना लोक सभ मनोरंजन लेल कम्मे  ज्ञान लेल बेसी पढ़ैए। तेँ ओकर मूल बिन्दु आ तकनीकि अर्थ बला शब्दक उपयोग कर ऽकाल पूर्ण सावधनीक आवश्यकता अछि। विषयवर्गानुसार अनुवाद तीन प्रकारक मानल गेल अछि - शास्त्रीय  व्यावहारिक आ साहित्यिक। अनुवाद शास्त्रीय कम व्यावहारिक बेसी होयबाक चाही। शास्त्रीय आ व्याव- हारिक अनुवादमे मुख्यतः अर्थ अर्थात् Suface Meaning  आ  भाव  अर्थात् Intended  Meaning  इएह  दूनू पकड़बाक प्रयोजन होइत छैक। मुदा साहित्यिक अनुवादमे मूलक अभिव्यजना सेहो सुरक्षित राखबाक अपरिहार्यता रहैत छैक। अभिव्यजनाकेँ पकड़ि पयबाक हेतु विद्वता नहि  भावुकता चाही। एहि अभिव्यजनामूलक विशिष्टताकेँ देखैत विभिन्न विद्वान् साहित्यिक अनुवादकेँ अनुवाद नहि कहि Transereation, Recreation पुनःसर्जन  प्रतिरूपण आदि नानाविध् नाम दैत छथि। परोक्षानुवाद - भारतीय भाषा सभमे खास क ऽ मैथिलीमे अनुवादक एक विकृत अर्थात् अवाछनीय परम्परा चलि पड़ल अछि। ई थिक परोक्षानुवाद। अर्थात् अनुवादसँ अनुवाद। एहि प्रकारक परोक्षानुवादमे बहुत-रास विकृति आबि जाइत छैक। विकृति कोना आ कतेक अबैत छैक  एक बेर तकर परीक्षण यूरोपक कोनो संस्था करौने छल। लेखक जेन आस्टिन केर प्रसि( उपन्यास   प्राइड एण्ड प्रीजूडिस   केर एक अध्यायक अनुवाद चीनक  मण्डेरिन  भाषामे भेल छलैक  ताहिसँ अरबीमे आ ताहिसँ फेर अंग्रेजीमे कयल गेलैक। बादमे ज्ञात भेलैक जे एहि अनुवाद-श्रंृखलामे मूल पाठक अध्कितर भाग आमसँ कटहर भ ऽ गेलैक। एहि प्रकारक अनुवादक Channel Distortion निश्चय परोक्षानुवादक श्रेणीमे अबैत अछि। परोक्षानुवादक मादेँ एक बात आओर कहल जा सकैत अछि- जँ अनुवादक मूल भाषा चीनी वा अरबी सदृश विदेशी हुअए तखन तँ मैथिली अनुवादमे मूल भाषाक कोनो खास कुप्रभाव नहि पड़तैक   किएक तँ दूनू मैथिलीसँ बहुत दूरक भाषा छैक। मुदा मूल भाषा हिन्दीसँ मैथिलीमे अनुवाद होयत तँ मूल भाषाक बेसी कुप्रभाव पड़तैक आ ओ मैथिलीक स्वरुपकेँ किछु-ने-किछु अवश्ये बिगाड़ि देतैक। हिन्दीक मूल ग्रन्थ वा अनुदित ग्रन्थसँ जतेक मैथिली अनुवाद हमरालोकनि देखि सकलहुँ अछि सभटा लगैत अछि जे  मैथिलीक परिधनमे साक्षात् हिन्दीए ठाढ़ हुअय। संगोष्ठीमे विचारणीय अछि जे एहि प्रवृत्तिक विरोध् कोना आ कतेक दूर ध्रि हुअय। सफल अनुवादकक प्रवीणता - सफल अनुवादककेँ तीन क्षेत्रामे प्रवीणता रहबाक चाहीऋ मूल भाषामे प्रवीणता  लक्ष्य भाषामे प्रवीणता आ अनूद्य सामग्रीक विषयक्षेत्रामे प्रवीणता। जेना मूल सन्दर्भ गणितक हो तँ गणित-शाड्डमे प्रवीणता वा कमसँ कम प्रवेश तँ अवश्ये चाही। मैथिलीमे वास्तविक स्थिति तँ ई अछि जे जेना आजुक मन्त्राी सर्वज्ञ बूझल जाइत छथि तहिना आजुक मैथिली अनुवादक सेहो   सौभाग्य वा दुर्भाग्यवश सर्वज्ञ  मानि लेल  जाइत छथि। आदर्श अनुवाद तँ ओ होयबाक चाही जे विषय-विज्ञ  मूलभाषा-विज्ञ आ लक्ष्यभाषा-विज्ञ लोकनिक सहयोगसँ प्रस्तुत होयत। उपयुक्त पर्यायक चयन - अनुवादमे भनहि भावक उपदेश देल जाय  उपयुक्त पर्यायकचयनकेँ सभसँ पहिने आ सभसँ उच्च स्थान दिअ ऽ पड़त। उपयुक्त पर्यायकेँ  चुनबाक हेतु अनुवादकर्त्ता पहिने अपन हृदयकेँ नहि  द्विभाषिक शब्द-कोशकेँ ढूँढ़ ऽ लगैत छथि। अनुवादकर्त्ता पहिने अपन हृदयमेसँ उपयुक्त पर्याय ताकथु आ अपन आत्मविश्वास बढ़ाबथु आ तकरा बाद द्विभाषिक वा बहुभाषिक शब्द-कोशमे ढूँढ़थु तँ नीक अनुवाद प्रस्तुत भ ऽ सकैछ। मैथिलीमे नीक अनुवादक लेल बहुभाषिक व्याकरण रहब आवश्यक अछि जकर अभाव मैथिलीमे सभसँ बेसी अखरैत अछि। एखन एहि दिशामे डॉ0 राम नारायण सिंहजी एकटा नीक काज क ऽ रहल छथि। डॉ0 राम नारायण सिंहजी व्यावसायसँ संस्कृतक शिक्षक छथि मुदा मैथिलीसँ नीक जकाँ जुड़ल छथि।   मैथिली-मलयालम-संस्कृत- अंग्रेजी क्रिया-कोश  (Multi Langual Verbal Dictionary)क निर्माणमे लागल छथि। प्रायः पूर्ण भ ऽ गेल छनि। आब छपबाक स्थितिमे अछि। ज्ञातव्य जे साहित्य अकादेमीसँ पुरस्कृत मलयालम भाषाक लेखक श्री तकष़ी शिवशंकर पिळैक एकटा उपन्यास   चेम्मीन्  साहित्य अकादेमीसँ पुरस्कृत आ विश्वक अनेक भाषामे अनूदित उपन्यासक मैथिली अनुवाद   मलाहिन   साहित्य अकादेमीसँ शीघ्र प्रकाश्य छनि। हिन्दीक लेखिका डॉ0 मिथिलेश कुमारी मिश्रक   छटता कोहरा   लघुकथा-संग्रहक मलयालममे   जाग्रता   शीर्षकसँ अनुवाद प्रकाशित भ ऽ चुकल छनि। मलयालम भाषाक प्रसि( लेखक श्री जी0 शंकर पिळैक तीनटा मलयालम नाटक   पूजा मुरि      करुत्त दैवत्ते तेडि      स्नेहदूतन्   केर हिन्दी अनुवाद    पूजा घर      काले देव की खोज      स्नेहदूत    शीर्षकसँ नेशनल बुक ट्र्रस्ट ऑफ इन्डियासँ  शीघ्र प्रकाश्य छनि। मैथिली भाषामे  शब्दकोषक परम्परा:- अनुवादक लेल आवश्यक सामग्री यथा शब्दकोषक परम्परा मैथिलामे आरम्भ भेल बहुत बादमे जा ऽ क ऽ 1951 ई0मे। एहिसँ पहिने बहुतो मैथिली शब्दक प्रयोग/समावेश आन-आन भाषाक कोश तथा शब्दावली सभमे कयल गेल छल। मैथिलीमे एखन ध्रि प्रकाशित 11 गोट कोश उपलब्ध् अछि- 1  मिथिला शब्द प्रकाश  3  2  मिथिलाभाषाकोष  4  3  धतुपाठ  5 4  बृहद् मैथिली शब्दकोश  6  5  पर्यायवाची शब्दकोश  7  6  मैथिली शब्दकोश  8   7  मैथिली शब्दकल्पद्रुम  9  8  अंगिका हिन्दी शब्दकोश  10   9  कल्याणी-कोश: मैथिली अंग्रेजी शब्दकोश  11   10  चातुर्भाषिक शब्दकोश  12 एवं  11  मैथिली  अंग्रेजी शब्दकोश  13। मैथिली मे प्रकाशित उपर्युक्त शब्दकोश सभक तुलना जँ आन भारतीय भाषा सभसँ करी तँ निश्चये मन खिन्न भ ऽ जायत। मैथिलीक नवीनतम कोश थिक श्री गजेन्द्र ठाकुरक मैथिली-अंग्रेजी-शब्दकोश जे प्रायः प्रकाशनक क्रममे अछि। एकर अतिरिक्त  न्यू हिन्दुस्तानी इंग्लिश डिक्शनरी    ऐन इन्ट्रोडक्शन टु द  मैथिली लैंगुएज ऑफ बिहार  भाग-2  क्रैस्टोमैथी एण्ड भोकेब्युलरी   ट्रान्सलेशन ऑफ मनबोध् स हरिवंश एण्ड इन्डेक्स टु मनबोध् स हरिवंश    बिहार पीजेन्ट लाइफ    ए कम्पैरेटिभ डिक्शनरी ऑफ द  बिहारी लैंगुएज  भाग-1    बंगीय शब्दकोश     ए कम्पैरेटिभ एण्ड ईटीमोलोजिकल डिक्शनरी ऑफ नेपाली लैंगुएज    अमरकोशविवशति    वर्णरत्नाकर    विद्यापतिर पदावली    कृषि कोश    बेसिक कलोक्विअल मैथिली  आदि कृति सभकेँ शब्दसूची  शब्दानुक्रमणी वा पारिभाषिक पदावली कहल जा सकैत अछि जकरासँ मैथिलीक कोश सभ बनल आ अनवादक काज लेल गेल अछि। अनुवाद भाषाक नहि भावक होयबाक चाही। अनुवादककेँ भाषाक फेरमे नहि पड़ि पूर्णतः भावग्राही होयबाक चाही। भाव प्रसंगसँ पकड़ल जाइत अछि। प्रसंग शब्दक अर्थ बड़ व्यापक अछि। एहिमे देश  काल  पात्रा  प्रकरण  घटनाक्रम  विषय आदि पारिवेशिक तत्त्व समाहित रहैछ। अनुवादमे प्रसंगसँ बेसी महत्त्व अछि संगतिक। अनुवादककेँ संगति पर सतत् ध्यान रखबाक चाही। अनुवादकक श्रेणीकरण - अनुवादककेँ  शब्दग्राही  वाक्यग्राही आ भावग्राही आदि तीन श्रेणीमे विभक्त कयल जा सकैत अछि। जेना साइकिल सिखनिहार खसबाक डरेँ  साइकिलकेँ कसिक ऽ पकड़ने रहैत अछि। तहिना नवसिखुआ अनुवादक अशु( भ ऽ जयबाक डरेँ मूल भाषाक शब्द आ वाक्य-विन्यासकेँ ध्यने रहैत छथि। हुनका डर होइत छनि जे मूल भाषासँ कनेको विचलित होयब तँ अनुवाद अशु( भ ऽ जायत।परिणाम उनटा भ ऽ जाइत छै। कहबाक तात्पर्य जे मूल भाषाक सतर्क अनुसरणक फेरमे हुनक लक्ष्य भाषाक सहज प्रवाह बिगड़ि जाइत छनि। तेँ अनुवादककेँ भाषाक फेरमे नहि पड़ि पूर्णतः भावग्राही होयबाक चाही। एकटा टंकक उदाहरण द ऽ अनुवादक पण्डित श्री गोबिन्द झा अनुवादकक एहि श्रेणीकरण - शब्दग्राही  वाक्यग्राही आ भावग्राही आदिक पुष्टि कयने छथि।2 भाषाक प्रभाव अनेक प्रक्रममे प्रतिफलित होइत अदि। भारतीय शब्दशाड्डमे एकर चारि प्रक्रम वखणत अछि - परा    पश्यन्ती    मध्यमा   आ   बैखरी  । बैखरी थिक भाषाक ध्वन्यात्मक स्वरुप। इएह एक भाषाकेँ दोसर भाषासँ फराक करैत अछि। प्रक्रमक विभिन्न ध्वन्यात्मक प्रतीकसँ जे प्रतीत होइत अछि से थिक अर्थ। एकरे कहल जाइत छै मध्यमा  किएक तँ ई प्रक्रम ध्वनि आ भाव दूनूक मध्यमे पड़ैत अछि। पश्यन्ती केवल ध्यान-चक्षुसँ देखल जाइत अछि। एही ध्यान-चक्षुसँ भाषाक अर्थात्मक स्वरुप देखाइत अछि। प्रक्रममे आगाँ जा ऽक ऽ पश्यन्ती लुप्त भ ऽ जाइत छैक  सकल भाव मिलि एक अखण्ड महाभाव भ ऽ जाइत छैक  तखन भावना परा पर पहुँचि जाइत छैक। ई परा योगशाड्ड वा दर्शनशाड्डक विषय थिक। परा छोड़ि शेष तीनू प्रक्रमक बोध् नीक अनुवादककेँ होयबाक चाही -1 पहिने मूल भाषाक  बैखरीकेँ पकड़ूऋ 2 तकरा द्वारा मूल भाषाक  मध्यमाकेँ पकड़ूऋ 3 पुनः तकरा द्वारा मूल भाषाक  पश्यन्तीकेँ पकड़ूऋ 4 आब ओहि पश्यन्तीक आधरपर लक्ष्य भाषाक  मध्यमाकेँ पकड़ू आ 5 ताहि आधरपर लक्ष्य भाषाक  बैखरीकेँ पकड़ू। एकरे नाम थिक अनुवाद। ई प्रक्रिया मूल भाषाक  ध्वन्यात्मक प्रतीकक decoding सँ आरम्भ होइत अछि आओर भावक प्रक्रम पर आबि encoded होइत-होइत लक्ष्य भाषाक ध्वन्यात्मक प्रतीकक रुपमे परिणत भ ऽ जाइत छैक। सरलता - अनुवादक भाषा एहेन हुअय जे जनसामान्य आसानीसँ बूझि सकय। एहिसँ अनुवाद बेसी लोकप्रिय होयत आ अनुवादकक कार्य-प्रगति प्रभावित होयत। एहि सन्दर्भमे अंग्रेज लेखक ग्रियर्सनक अनुसन्धनात्मक पोथीक मैथिली अनुवाद   बिहारक ग्राम्य-जीवन   निःसंदेह अनुकरणीय एवं सराहनीय अनुवाद-कार्य मानल जा सकैत अछि। बहुभाषिक व्याकरण वा क्रिया-कोश (Multi Langual Verbal Dictionary)क निर्माण-कालमे एहि बिन्दुपर बेसी ध्यान देल जयबाक चाही जाहिसँ कि आगाँक अनुवादककेँ अनुवाद-कार्य करबामे सुविध हुअय। अनुवादक शास्त्रीयता नीचाँसँ उपर जयबाक चाही - आम लोकक ज्ञान यथा- लोकशब्दाबलीक  उपयोग  कृषकक ज्ञान यथा- कृषकक जीवन-यापनमे   दैनिक व्यवहारमे आबयबला शब्दाबलीक उपयोग जेना उपर उल्लिखित   चेम्मीन्  क मैथिली अनुवाद   मलाहिन   उपन्यासमे कयल गेल अछि  तेहेन उपयोग आनो अनूदित पोथीमे कयल जयबाक चाही। तकनीकि शब्द यथा- मेडिकल साइन्सक अनुवादमे गामक पशुरोग  व्याध्कि नामादिक उपयोग अनुवादमे होयबाक चाही। तहिना मानवजनित रोगहुमे ग्रामीण लोकक देहाती रोगक नामावलीक उपयोग मैथिली अनुवाद लेल कयल जा सकैत अछि। संक्षिप्तता आ स्पष्टता - अनुवाद सरल  संक्षिप्त आ एकदम स्पष्ट हुअय  ताहि लेल आवश्यक अछि जे बेसीसँ बेसी तकनीकि (Technical Meaning) शब्दाबलीक उपयोग करैत  अर्थगूढार्थकेँ Foot Notes वा Bracket  मे ओतहि बुझा दी तँ से नीक रहत। अनुवादक शास्त्रीय सामग्रीक उपलब्ध्ता (History of knowledge:Text Translation in Maithili)-आब लिखित सामग्री  खास क ऽ अंग्रेजी (English)मे कम्प्यूटर (Computer)  इन्टरनेट (Internet)  ई-मेगजिन (e-magazines) ई-कोश (e-dictionary) ब्लॉग्स (Blogs) आदिपर उपलब्ध् होइ छै। मुदा बिडम्बना अछि जे आजुक मैथिलीक लेखक-अनुवादक अंग्रेजी आ आध्ुनिक तकनीकि ज्ञानसँ अलगे पड़ाइत रहैत छथि। मैथिलीमे अथवा मैथिलीसँ आन भाषामे नीक अनुवाद लेल अंग्रेजी भाषाक संग-संग आन भारतीय भाषाक  खास क ऽ दक्षिण भारतीय भाषाक ज्ञान राखब आ तकनीकि उपकरण यथा-कम्प्यूटर (Computer) एल सी डी  प्रोजेक्टर (LCD Projector) कैमरा (Camera) सी डी /डी वी डी (Compact Disk/Digital Video Disk) पेन ड्राइव (Pen Drive) आदि संचालित करबाक योग्ता एवं इन्टरनेट (Internet)  ई-कोश (e-dictionary) ई-मेगजिनम (e-magazines) ब्लॉग्स (Blogs)  आदिक उपयोग करबाक दक्षता रहब अत्याावश्यक भ ऽ गेल अछि। एकर अतिरिक्त अनुुवादककेँ कतेक स्वतन्त्राता भेंटबाक चाही ? अनुवादक कतेक स्वतन्त्राता चाहैत छथि ? संस्था कतेक स्वतन्त्राता देब ऽ चाहैए ? आदि-आदि नीति आ सि(ान्त आओर व्यावहारिक सम्बन्ध्पर अनुवादक स्तरीयता  पठनीयता  उपयेगिता  उपादेयता तथा अनुवादकक कुशलता आ प्रवीणता एवं अनुवाद-कार्यक सफलता 6 निर्भर करैत छैक। अनुवादपर केन्द्रित एहि राष्ट्रीय सेमिनारमे एहू मूल बिन्दू सभपर विमर्श होयब आवश्यक अछि। ध्न्यवाद। जय मिथिला। जय मैथिली। सन्दर्भ संकेतः- 1      अनुचिन्तन: पण्डित गोबिन्द झा: नवारम्भ प्रकाशन  पटना: 2010: पृ0- 113 2      अनुचिन्तन: पण्डित गोबिन्द झा: नवारम्भ प्रकाशन  पटना: 2010: पृ0- 115 3      पं0 भवनाथ मिश्र  प्रकाशक स्वयं  ग्राम-हटाढ-रुपौली  पो0- झंझारपुर  जि0- मध्ुबनी  प्र0 खण्ड  1951 4      पं0 दीनबन्ध्ु झा  प्रकाशक स्वयं  ग्राम-इसहपुर  पो0- मनीगाछी  जि0- दरभंगामध्ुबनी  1950 5      पं0 दीनबन्ध्ु झा  प्रकाशक- मैथिली साहित्य परिषद्  दरभंगा  1950 6      सम्पा0 डॉ0 जयकान्त मिश्र  प्रकाशक- इन्डियन काउन्सिल ऑफ एडभान्स्ड स्टडीज  शिमला  1973 7      प्रकाशक- प्रज्ञा प्रतिष्ठान  काठमाण्डु  नेपाल  1974 8      सम्पा0 गोबिन्द झा  प्रकाशक- मैथिली अकादमी  पटना  1992 9      पं0 मतिनाथ झा  प्रकाशक- मिश्र बन्ध्ु प्रकाशन  जमुथरि  जि0- मध्ुबनी  1997 10  डोमन साहु समीर  प्रकाशक- विनोद कुमार चतुर्वेदी  सिकन्द्राबाद  आन्ध््रप्रदेश  1997 11  सम्पा0 गोबिन्द झा  प्रकाशक- महाराजाध्रिाज कामेश्वर सिंह कल्याणी पफाउन्डशन  दरभंगा  1999 12  उमेश चन्द्र झा  प्रकाशक- सुमित्रा प्रकाशन  दरभंगा  2007 13  सम्पा0 गजेन्द्र ठाकुर,  नागेन्द्र कुमार झा तथा विद्यानन्द झा  प्रकाशक- श्रुति प्रकाशन  दिल्ली  2009 १.जीवकान्‍त- जगदीश प्रसाद मंडलक ‘जिनगीक जीत’ उपन्‍यासपर २. डा. रमण झा- मैथिली चित्रकथा ३. सुजित कुमार झा- जनकपुरमे पागे पाग, ४. बिपिन झा- यान्त्रिक अनुवाद आ Polysemy ५. सुमित आनन्द- संवाद ६.ज्योति सुनीत चौधरी- विहनि कथा- हिमदूत १. जीवकान्‍त जगदीश प्रसाद मंडलक ‘जिनगीक जीत’ उपन्‍यासपर - मैथि‍लीमे नवोदि‍त उपन्‍यासकार जगदीश प्रसाद मंडल। हि‍नक दोसर उपन्‍यास देखल- ‘जि‍नगीक जीत’। हि‍नकर अन्‍य उपन्‍यास अछि‍- ‘मौलाइल गाछक फूल, जीवन-सघर्ष, जीवन-मरण, उत्‍थान-पतन, इत्‍यादि‍। हि‍नकर नामपर कथा संग्रह आ नाटक सेहो अंकि‍त अछि‍। एहि‍ उपन्‍यासमे कि‍छु नव अछि‍। मि‍थि‍लाक खेती-प्रधान गामक जीवन आएल अछि‍। मैथि‍लीमे एहि‍ लेल आर नव सुखद अनुभूति‍ अछि‍ जे एकर लेखक खेति‍हर समुदायक बहुसंख्यक समाजसँ आएल छथि‍। ओ अपन गामक लोकक भाषा अनने छथि‍। सवर्ण जाति‍क लेखक जखन गामक अशि‍क्षि‍त आ दलि‍त लोकक भाषा साहि‍त्‍यमे टि‍पैत अछि‍, आ जे कदाचि‍त होइत आएल अछि‍, से बनौआ आ कृत्रि‍म जकाँ लगैत अछि‍। लेखक जे भाषा लि‍खलनि‍ अछि‍, से देशज मैथि‍ली थि‍क। मैथि‍लीमे उर्वराशक्‍ति‍ असीम आ कल्‍पनातीत अछि‍, से जगदीश जीक भाषा देखि‍-पढ़ि‍ कए बूझल जा सकैत अछि‍। नव अछि‍ जे एकर सभ पात्र खेतीसँ जुड़ल अछि‍। एहि‍मे कतहु बनि‍याँ-बेकाल, सूदखोर महाजन, शोषक सवर्ण भूस्‍वामी, पाकेटमार, डाकू, लम्‍पट आ खुनि‍याँ नहि‍ आएल अछि‍। खेतीमे जतेक समस्‍या छैक, जतेक गरीबी आ अभाव भए सकैत अछि‍, जतेक अकर्मण्‍यता आ आलस भए सकैत छैक, से सभ वि‍स्‍तारसँ आएल अछि‍। लेखकक दृष्‍टि‍कोण नव अछि‍। ओ कहैत अछि‍ जे गामक उन्नति‍ गामक लोकेक हाथमे छैक। ओ कहैत अछि‍ गामसँ पलायन आ वि‍स्‍थापनकेँ रोकबाक चाही। गामक धनि‍क आ गरीब मेल-पाँच कए खेतीमे पूँजी लगाबय, पूँजी जुटयबा लेल गामेमे संभावना ताकय आ तकर दोहन करय। शि‍क्षा पयबा लेल एक दोसरक मदति‍ करय, बि‍लटलक मदति‍ कए ओकर समर्थ आ सम्‍पन्न बनाबय। लेखक बैंकक कर्जा लए वि‍कास करबाक बात नहि‍ करैत अछि‍। ओ ब्‍लॉक आफि‍सक प्रखण्‍ड वि‍कास पदाधि‍कारीक आ ओकर अमलाक चर्चा नहि‍ करैत अछि‍। स्‍वयंसेवी आ स्‍वयं सहायता समूहक चर्चा नहि‍ करैत अछि‍। देशक पंचवर्षीय योजना आ नहर योजनाक प्रादुर्भाव आ अभावक बात नहि‍ करैत अछि‍। नव अछि‍ जे ओ मनुक्‍खक जि‍नगीकेँ अनमोल मानैत अछि‍। ओकरा बचएबा लेल ओ सार्थक सहयोगक कथा कहैत अछि‍। मनुक्‍खक गरि‍मामे ओकर वि‍श्‍वास छैक। एहि‍ गरि‍माकेँ स्‍थापि‍त कएल जा सकैत अछि‍, से बात ओ एहि‍ कथानककेँ लि‍खि‍ कए देखा देलक अछि‍। एकटा महात्‍माक उक्‍ति‍ क्‍यो उद्धृत कएने छथि‍- दू प्रकारक लोकक गरामे पाथर बान्‍हि‍ कए पानि‍मे डुबेबाक थि‍क, एक तँ ओहि‍ धनि‍ककेँ जे धन अछैत दान नहि‍ करैत अछि‍, आ दोसर ओहि‍ गरीबकेँ जे हाथ-पाएर अछैत परि‍श्रम नहि‍ करैत अछि। “जि‍नगीक जीत‍”मे एहेन धनि‍क अछि‍ जे सामाजि‍क काज लेल दान करैत अछि‍। एकर उदाहरण थि‍क बचेलाल आ ओकर माय सुमि‍त्रा। गरीबक एक एहेन उदाहरण थि‍क अच्‍छेलाल। दोसर उदाहरण थि‍क देवन आ बुधनी। लेखक जगदीश जीक उपन्‍यास मनुक्‍खक आदर आ गरि‍माक बात करैए। सभ ठाम वि‍भि‍न्न पात्र सभ एक दोसराक सम्‍मान करैए। वि‍वेकानन्‍दक भाषण सभ मोन पड़ैए, ओ बात-बातमे पराधीन भारतक हि‍न्‍दू सभकेँ धि‍क्कार करैत छलाह। जे सक्षम छल तकर कर्तव्‍य छलैक जे अन्नहीनकेँ अन्न देअए, वि‍द्याहीनकेँ वि‍द्या देअए। जे एहेन नहि‍ करैत छल, से मनुक्‍ख नहि‍ छल। वि‍देशमे ओ कहि‍ अबैत छलाह जे वेदमे अद्वैतवाद छैक, सभ मनुक्‍खकेँ एक समान मानैत अछि‍ हि‍न्‍दू। देशमे आबि‍ आर्थिक-सामाजि‍क वि‍षमता देखि‍ दुखी भए कहैत छलाह जे दीन-हीन-अज्ञानीकेँ समानता देबा लेल त्‍याग आ श्रम करू। लेखक जगदीश जी स्‍वामी वि‍वेकानन्‍दक भाषा बजैत छथि‍। पहि‍ल उपन्‍यास ‘मौलाइल गाछक फूल’मे रमाकान्‍तक चरि‍त्र-चि‍त्रण कएलनि‍ अछि‍। रमाकान्‍त मद्रासमे, बेटा सभक मत बुझलाक बाद अपन जमीन-जाल भूमि‍हीन सभमे बँटबाक नि‍र्णए लैत छथि‍, ताहि‍ ठाम वेदान्‍तक अद्वैतवादक चर्चा लेखक कएने छथि‍। पोथीक अंति‍म आवरणपर लेखकक परिचयमे कहल गेल अछि‍- ‘मार्क्‍सवादक गहन अध्‍ययन। हि‍नकर कथामे गामक लोकक जि‍जीवि‍षाक वर्णन आ नव दृष्‍टि‍कोण दृष्‍टगोचर होइत अछि‍।’ ई रचनाकर पूरा उपन्‍यासमे मार्क्‍सवादी शब्‍दावली नहि‍ अनैत छथि‍। अनेक ठाम मार्क्‍सवादक मूल धारणा सभकेँ स्‍थान देने छथि‍। बहुत चतुर चालाक छथि‍। कतहु कहताह, धर्म आ भाग्‍यकेँ मानब नि‍रर्थक थि‍क कतहु कोनो समाजवादीक सम्‍वादमे कहबा दैत छथि‍ जे उत्‍पादनक सभ स्रोतपर व्‍यक्‍ति‍क एकाधि‍कार नहि‍ रहए देबाक थि‍क, ओहि‍पर मानव-समाजक अधि‍कार देब न्‍याय-संगत थि‍क। सामान्‍यत: उत्‍पादनक स्रोत तीनटा थि‍क- जमीन (खेती), कारखाना आ खान। समाज बदलबा लेल ओ अनेक ठाम कहैत छथि‍- मनुक्‍खकेँ मनुक्‍खक आदर करबाक चाही। एहि‍ लेल व्‍यक्‍ति‍केँ सभसँ पहि‍ने अपनाकेँ मनुक्‍ख बनयबाक चाही। उपन्‍यासमे आदर्श अछि‍, गरीबक गरीबी दूर करबा लेल संगठि‍त आ योजना बद्ध रूपेँ प्रयास होएबाक चाही। समाज बदलि‍ सकैत अछि‍। से ओ कि‍छु परि‍वारक उदाहरण लए कए देखा देलनि‍ अछि‍। आजुक गाममे एहेन प्रयास छि‍टफुट होइत रहैत अछि‍। मुदा, गामक यथार्थ रूप भि‍न्न अछि‍। बैमानी-शैतानी अछि‍। गरीबक शोषण अछि‍। कमजोरक दमन अछि‍। धोखा, फरेब अछि‍। लगानी-भि‍रानी अछि‍। चक्रवृद्धि‍ व्‍याजक ताण्‍डव नृत्‍य भए रहल अछि‍। कथानकक अन्‍तमे लेखक देवनक संग महंथान सभ दि‍स जाइत अछि‍। सुख आ समृद्धि‍क टापूपर ई मठ-मठाधीश अछि‍। महंथ सभ भोग-वि‍लासमे डूबल अछि‍। महंथानमे शान्‍तीसँ भेँट होइत अछि‍। ओ महंथानमे भाेग वि‍लास लेल अछि‍। ओकर नाटकीय ढंगसँ अपहरण भेल छै। बन्‍द कए राखल आ पोसल जाइ छै। ओ अभि‍शप्‍त अछि‍, काम-क्षुधा शान्‍ति‍ लेल एक तुच्‍छ साधन भेल अछि‍। धर्मक वि‍रूद्ध बजलाह बुद्ध। हुनको नामपर मठ-महंथ अछि‍। कबीर बजलाह। हुनको नामपर संगठि‍त गुरूवार साहेबक परम्‍परा अछि‍। मार्क्‍स वर्गहीन, शोषणहीन समाज बनाएब लक्ष्‍य रखलनि‍। हुनको नामपर अनेक मस्‍तान मस्‍त भेल अछि‍। प्रजातंत्रमे हर राजनीति‍क दल जनताक सुख-सुवि‍धा लेल राजगद्दी मँगैत अछि‍। नेता सबहक रूपमे महंथ सभ अपन भोग-रागक व्‍यवस्‍था करैत अछि‍। कदाचि‍त उपन्‍यासमे वर्णित महंथान प्रत्‍येक वि‍चार-धाराक जन-वि‍रोधी भए जएबाक आ होइत जयबाक संकेत कए दैत अछि‍। मनुक्‍ख बहुत पाखण्‍डी आ अनुदार होइत अछि‍। अन्‍तमे देवन आ शान्‍ती मुक्‍ति लेल, मानव-जाति‍क मुक्‍ति‍ लेल संघर्षक बात करैत अछि‍, जीतक भावनासँ डेग उठबैत अछि‍। उपन्‍यासक अन्‍ति‍म पाँति‍ सभ एहि‍ प्रकारक संकल्‍प अंकति‍ करैत अछि‍- “तेँ जरूरी अछि‍ जे सभसँ पहि‍ने अपने उठि‍ कए मनुक्‍खक रास्‍तापर ठाढ़ होइ। जखन मनुक्‍खक रास्‍तापर ठाढ़ भए चलए लागब तखन जे गि‍रल मनुक्‍ख अछि‍ ओकरा उठबैक कोशि‍श करैक चाही। उठबैक दुनू उपाय अछि‍। ककरो बाँहि‍ पकड़ि‍ खि‍ंचैक अछि‍, ककरो पाछूसँ धक्का दए धकेलैक अछि‍।‍” यएह जि‍नगीक जीत थि‍क....। २ डा. रमण झा मैथिली चित्रकथा

श्रीमती प्रीति ठाकुरक दू गोट सचित्र कथा संग्रह -मैथिली चित्रकथा एवं गोनू झा आ आन मैथिली चित्रकथा देखलहुँ आ पढ़लहुँ । चित्रक माध्यमे कथाक प्रस्तुति एकटा अभिनव प्रयोग थिक जे लोकके ँ, विषेषतः बच्चा सभके ँ अपना दिस आकृष्ट करत। खिस्सा पिहानी कहबाक आ सुनबाक परंपरा मिथिलामे अदौसँ चल आबि रहल अछि। बूढ़ पुरान स्त्रीगण लोकनि छोट-छोट बच्चा सभके ँ सुतयबाक काल नाना प्रकारक खिस्सा सभ सुनबैत छथि जे मनोरंजनक संग संग उपदेषप्रद एवं षिक्षाप्रद सेहो रहैत अछि। ओहि खिस्सा सभमे प्रसिद्ध अछि -दैत्य सभक खिस्सा, राज कुमार सभक खिस्सा, रामायण महाभारतक खिस्सा, गोनू झाक खिस्सा प्रभृति। उच्च विद्यालय एवं महाविद्यालयमे प्रवेष कयलाक बाद छात्र-छात्रा लोकनि स्वयं कथा पढ़ैत छथि, बुझैत छथि, ओकर रसास्वादन करैत छथि आ समयपर लोकके ँ सेहो सुनबैत छथि। मैथिलीक संग विडम्वना ई अछि जे महा विद्यालय एवं विष्वविद्यालय स्तरपर लोक विषयक रूपमे मैथिली रखितो अछि, पढ़ितो अछि किन्तु विद्यालय स्तरपर सरकारी घोसनाक बादो लोक ने मैथिली विषयक रूपमे रखैत अछि आने मैथिली माध्यमे कोनो आने विषय पढ़ैत अछि। एतेक धरि जे मिथिलांचलक विद्यालय सभमे गुरुओजी लोकनि मैथिलीमे पढ़यबामे हीनताक बोध करैत छथि। नव युवक लोकनि विवाह होइतहि पत्नीक संग हिन्दी झारय लगैत छथि। कनेक पढ़ल लिखल आ पदवीवला लोक सभके ँ देखबनि जे अपनामे जँ मैथिलीयोमे गप्प करताह तँ बच्चा सभसँ निष्चय रूपसँ हिन्दीमे। हुनका सभके ँ ई नहि बुझाइत छनि जे मैथिली भाषा कठिन छैक। एकर समुचित ज्ञान जँ बच्चामे नहि होयतैक तऽ बादमे होयब कठिन छैक । कवीष्वर चन्दा झा अमैथिलीभाषी(अन्यदेषीयक)क हेतु मैथिली भाषा ओहने कठिन कहलनि अछि जेहन एकटा इचना माछक बच्चाक हेतु समुद्रक सभटा जलके ँ पीयब छैक- भाषा यदन्यदेषीयोः मिथिलायाः भवेत्तदा। प्ीतमिंचाकपोतेन समस्तं वारिधेर्जलम्।। जतय धरि हिन्दीक प्रष्न अछि तऽ ओ तऽ राष्ट्रªभाषा थिक । अनिवार्य विषय थिक। ओकर ज्ञान तऽ स्वतः प्रत्येक व्यक्तिके ँ होयतैक आ रहिते छैक। एहन स्थितिमे श्रीमती प्रीति ठाकुरक उपर्युक्त विवेच्य पोथी देखि हमर मन गदगद भए गेल। गोनू आ आन मैथिली चित्रकथामे कुल 16 गोट कथा अछि जाहिमे गोनू झासँ सम्बद्ध नओ गोट कथा, महाकवि कालिदाससँ सम्बद्ध एक गोट आ शेष छओटामे राजा सलहेस, नैका बनिजारा इत्यादि प्रमुख चर्चित कथा सभ काल्पनिक चित्रक माध्यमे चित्रित कयल गेल अछि। एहि सभ कथामे किछु बात तऽ शब्दक माध्यमे अभिव्यक्त कयल गेल अछि आ किछु गप्प चित्र स्वयं कहैत अछि। एहि कथा सभक प्रसंग जे लोकक मनमे एकटा भावचित्र छल होयतैक से एतय बुझि पड़ैत अछि जेना साकार भए उठल हो। विदुषी कथा लेखिकाक दोसर संग्रह थिक मैथिली चित्रकथा जाहिमे कुल 10 गोट प्रमुख कथा सभ वर्णित अछि। एहि कथा सभक बीच बीचमे काल्पनिक चित्र सभक समायोजन कथाक यथार्थताके ँ प्रमाणित करैत अछि। एहि संग्रहमे संग्रहित महत्वपूर्ण कथा सभ थिक -राजा सलहेस, बोधि कायस्थ, दीना भदरी, नैका बनिजारा, विद्यापतिक आयु अवसान प्रभृति। हमरा पूर्ण विश्वास अछि जे उपर्युक्त दुनू कथा संग्रह बच्चा सभके ँ तऽ आकृष्ट करबे करत अपितु समाजक सभ वर्गक लोकके ँएक बेरि एकरा उलटयबाक लिप्सा होयबे करतैक। एहि दिशामे श्रीमती ठाकुरक स्तुत्य प्रयास अछि, साहसिक डेग अछि आ अभिनव प्रयोग अछि। हमर शुभकामना अछि जे कथा लेखिका एहने सरस, सहज आ सजल रचना सभसँ मैथिली साहित्यक भण्डारके ँ सुरभित करैत रहथि। ३ सुजित कुमार झा जनकपुरमे पागे पाग पागक व्यवसायीकरण पर किया नहि सोची ? सुजीतकुमार झा राष्ट्रीय निजी तथा अवासिय विद्यालय एशोसिएशन (एनप्याब्सन)क राष्ट्रीय अधिवेशनमे सहभागि होवय जनकपुर आएल सदस्य सभकेँ माथ पर एखन कोनो अन्य टोपी नहि पाग मात्र रहैत अछि । जतय जाउ खाली पाग पहिरने लोक भेटत । राष्ट्रीय समाचार समितिक काठमाण्डू कार्यालयमे कार्यरत पत्रकार प्रकाश सिलवाल कहैत छथि — अहि बेर जनकपुर सँ पागे सनेश लऽ जा रहल छी । एन प्याब्सनक कार्यक्रममे हुनका पाग पहिराओल गेल छल । ओ समारोहमे एक हजार सँ बेसी पाग वितरण भेल छल । एन प्याब्सनक केन्द्रीय अध्यक्ष गीता राणा पागकेँ देशक पहिचान सँ जोडैÞत छथि । बातचितक क्रममे ओ कहलन्हि — ‘ढाका टोपी जतबे नेपालीक लेल प्रियगर अछि ओतबे प्रियगर पाग सेहो अछि ।’ हुनका सेहो जनकपुरमे पाग पहिरने घुमैत देखल गेल । पाग पहिराबयकेँ परम्परा मिथिलाञ्चलमे बहुत लम्बा समय सँ चलैत आएल अछि । विवाह, उपनयनमे विशेष रुपसँ पाग पहिराओल जाइत अछि । ओना किछ वर्ष सँ सम्मान स्वरुप पाग पहिराओल जएबाक चलन बढल अछि । आब पागकेँ सम्मानमे मात्र नहि व्यवसायिक रुपमे विकासक बात सेहो उठय लागल अछि । पत्रकार एवं मैथिली साहित्यकार श्याम सुन्दर शशि कहैत छथि — ‘व्यवसायिक रुपमे आगा बढावयसँ पहिने बनावटमे समय सापेक्ष बदलाब करय परत ।’ माथमे खप्प सँ बैसत तखने लोक एकरा कस्सि कऽ स्वीकार करत ओ कहलन्हि । पागक दोकानदारसभ कहैत छथि— ‘एन प्याब्सनक कार्यक्रममे बहुत पाग बिक्री भेल अछि एक गोटे चारि–चारि टा पाग किनलन्हि ।’

पाग उद्योग पर विचार पागकेँ बढैत मांगकेँ ध्यानमे रखैत जनकपुरमे सेहो अहि सँ जुडल लघु उद्योग खोलल जाय अहि पर जनकपुरक व्यापारीसभ छलफल करय लागल छथि । पहिले वर्षमे ४÷५ हजार पाग बिक्री होइत छल ओ पाग मधुवनी सँ आनि काम चलाओल जाइत छल । मुदा आब तीन चारि गुणा बिक्रीमे बढोतरी भेल अछि एहनमे बाहर सँ नहि आनल जा सकैत अछि व्यापारीसभ कहैत अछि । व्यापारी रामकुमार साह लगनमे मात्र नहि आन समयमे सेहो पागकेँ खोजी होइत रहैत अछि जानकारी दैत छथि । जनकपुर उद्योग वाणिज्य संघक कोषाध्यक्ष जितेन्द्र प्रसाद साह कहैत छथि ‘पाग उद्योग खोलवाक लेल वाणिज्य संघ सेहो प्रयत्न करत ।

१० वर्ष पूर्व जनकपुरमे पागो नहि भेटैत छल

जनकपुरमे पाग उद्योगकेँ बात उठि रहल अछि । मुदा १० वर्ष पूर्व एतयकेँ दोकानसभ पर पाग नहि भेटैत छल विवाह दानोक लेल मधुवनी आ दरभंगा सँ लोक पाग अनैत छल । पहिने विवाहदान सौराठ सँ होइत छल । ओतहि विवाह तय कएलक आ पाग लऽ आएल । जाहि कारण जनकपुरमे नहि कियौ पाग खोजी करैत छल आ नहि एतह बिक्री । जनकपुरक प्रसिद्ध स्थान जानकी मन्दिरक महन्थ रामतपेश्वर दास वैष्णव कहैत छथि—‘जानकी मन्दिरकेँ शतवार्षिकी हुऐ वा विशेष उत्सव दश वर्ष पहिने मधुवनी सँ पाग मंगबैत छलहँु ।’ अहि ठाम बिक्री भेला सँ सभकेँ सुविधा भेल अछि ओ कहलन्हि ।

मैथिलक पहिचान बनि रहल मैथिलक पहिचान कि अछि ? अहि पर किछु वर्ष पूर्व तक पान मखान, माछ सहितक बात लोक कहैत छल । मुदा आब पाग बनि गेल अछि । पूरे मिथिलाञ्चलमे जतह कतहु कार्यक्रम होइत अछि सम्मानमे पागे रहैत अछि । नेपाल संगीत तथा नाट्य प्रज्ञा प्रतिष्ठानक प्राज्ञ रमेश रञ्जन झा कहैत छथि पाग आइ सँ मात्र नहि सभ दिन सँ अपन क्रेज बनौने अछि । मुदा जाहि रुप सँ एकर प्रसार भऽ रहल अछि ई सुखद अछि । पागक विकासक लेल सरकार दिस सँ एकटा योजना आनय परत इमेज च्यानल टेलिभिजन सँ आवद्ध पत्रकार रामअशिष यादव कहैत छथि । ओ आगा कहलन्हि पाग आव सम्पूर्ण मैथिलक पहिचान वनि गेल अछि अहिमे वहस कएनाइ बुद्धिमता नहि भऽ सकैत अछि । ४ बिपिन झा IIT Mumbai, kumarvipin.jha@gmail.com यान्त्रिक अनुवाद आ Polysemy संगणक केर विकासक संग यान्त्रिक अनुवाद संवादक सीमा के विस्तृत कयलक। ओतहि polysemy  यान्त्रिक अनुवाद हेतु एकटा विकट समस्या केर रूप मे प्रस्तुत भेल अछि। कारण ई अछि जे मनुक्ख तऽ मानवीय ज्ञान सीमा केर अधीन अछि मुदा मशीन तऽ मात्र ओहि कार्य के सम्पादित कय सकैत अछि ले इनपुट के रूप मे पूर्वप्रदत्त छैक। प्रश्न ई उठैत छैक जे पोलीसेमी की थीक? ई यान्त्रिक अनुवाद आ व्यवहार के दृष्टि स कोना समस्या उत्पन्न करैत अछि? एकरा लेल की समाधान कयल गेल? ओ कतय तक सार्थक भेल? एकर आगू की भविष्य छैक? सर्वप्रथम पोलीसेमी की थीक? पोली शब्दक अर्थ होइत अछि बहुत आ सेमी शब्दक अर्थ होइत अछि चिह्न। एवं प्रकारे पोलीसेमी ओहेन शब्द केर द्योतक अछि जे विविध अर्थ के प्रस्तुत करैत अछि। एहि विविध अर्थक कारण सन्देक उत्पन्न होइत अछि की एकर समुचित अर्थ की होयत? मानव मस्तिष्क तऽ सन्दर्भानुकूल अर्थ जनित करबा मे सक्षम भय समस्या के प्रस्तुत हेबाक मार्ग अवरुद्ध करवाक प्रयास करैत अछि मुदा यन्त्र तऽ ठहरल यन्त्र ओ अपना के अक्षम कहि या तऽ जूआ पटकि दैत अछि अथव हास्यास्पद अर्थ प्रस्तुत कय दैत अछि। उदाहरण हेतु- आब साँझ भय गेल..। एकर अर्थ मानव हेतु सेहो सन्देह प्रस्तुत करैत अछि। विद्यार्थीक लेल पढबाक समय, चोरक हेतु चोरीक समय, गोप हेतु गोशालाक समय, विपत्ति मे परल लोक हेतु अंतक समय  रूपी अर्थ दैत अछि। मानव मस्तिष्क तऽ सन्दर्भ देखि अर्थ ग्रहण करत मुदा संगणक ई नहि कय असमंजस मे परि जायत। आब प्रश्न उठैत अछि जे एहि दिशा मे की काज भेल? आ अखनि धरि यान्त्रिक अनुवाद मे पोलीसेमी सऽ निदान हेतु की उपाय कयल गेल? क्रमशः अगिला अंक मे ५ सुमित आनन्द

संवाद

कार्यशालाक आयोजन भारतीय भाषा संस्थान मैसूरक तत्वावधानमे ल॰ ना॰ मिथिला विष्वविद्यालयक मैथिली विभागमे द्वि दिवसीय कार्यषाला 20-12-2010 तथा 21-12-2010 के ँ सम्पन्न भेल । कार्यषालामे मैथिली जगतक अनुवादक एवं प्रकाषक गण भाग लेलनि । टेक्स्ट कोना छपय आ अनुवादकक की-की समस्या अछि आदि तथ्य सभपर विषद चर्चा कयल गेल । साहित्यकार लोकनि अनुवादकार्यमे वर्तनीक अनुषासनक पालन करबाले अनुवादकर्ता सभकेँ सुझाव देलनि । एहिसँ पहिने संस्थानक मुख्य शैक्षनिक सलाहकार डॉ अजीत मिश्र मैथिली अनुवाद साहित्यक इतिहास प्रस्तुत कयलनि । एहि कार्यक्रममे मैथिली अकादमीक अध्यक्ष श्री कमलाकांत झा , डॉ शषिनाथ झा, डॉ वीणा ठाकुर , डॉ भीमनाथ झा , डॉ रामदेव झा , हृदय रोग विषेषज्ञ डॉ गणपति मिश्र , डॉ रमण झा , डॉ विभूति आनन्द , डॉ कमल कांत झा , श्री शरदेन्दु चौधरी, डॉ जगदीष मिश्र, डॉ यषोदा नाथ झा, डॉ देवकांत मिश्र , सहित लगभग पाँच दर्जन प्रतिभागी लोकनि उपस्थित भए अपन अपन विचार व्यक्त कयलनि।

भाषणमाला मैथिली अकादमी, पटना द्वारा द्वि दिवसीय भाशणमालाक आयोजन विष्वविद्यालय मैथिली विभाग, .मे दिनांक 5-12-2010 तथा 6-12-2010 केँ भेल। पहिल दिन अर्थात् 5-12-2010 केँ सरस कवि ईषनाथ झा भाषणमालाक उद्घाटन ल0 ना0 मिथिला विष्वविद्यालयक कुलपति डॉ एस0 पी0 सिंह कयलनि तथा मुख्य अतिथि डॉ नीता झा छलीह। एहि अवसरपर मुख्य वक्ता छलीह डॉ वीणा ठाकुर, प्राचार्य एवं अध्यक्षा, विष्वविद्यालय मैथिली विभाग, ल0 ना0 मिथिला विष्वविद्यालय, दरभंगा जनिक व्याख्यानक विषय छल - मैथिली गीत साहित्यक विकास आओर परंपरा । दिनांक 6-12-2010केँ स्व0 सुषील झा व्याख्यानमालाक उद्घाटन ल0 ना0 मिथिला विष्वविद्यालय, दरभंगाक कुल सचिव डॉ विमल कुमार कयलनि। एहि अवसरपर मुख्य अतिथि छलाह डॉ मंजर सुलैमान तथा मुख्यवक्ता छलाह डॉ अमरनाथ झा, दर्षन विभाग, ल0 ना0 मिथिला विष्वविद्यालय, दरभंगा जे मिथिलामे न्याय दर्षनक विकासपर अपन व्याख्यान प्रस्तुत कयलनि। दुनू दिनक अध्यक्षता मैथिनी अकादमीक अध्यक्ष श्री कमलाकान्त झाजी कयलनि। एहि अवसरपर , डॉ शषिनाथ झा, डॉ भीमनाथ झा , डॉ वैद्यनाथ चौधरी ‘बैजू’, डॉ अषोक ठाकुर, डॉ रमण झा , डॉ विभूति आनन्द , डॉ मुरलीधर झा, डॉ योगानन्द झा, डॉ फूलचन्द्र झा प्रवीण सहित अनेक गणमान्य व्यक्ति सभ उपस्थित छलाह ।

६ ज्योति सुनीत चौधरी विहनि कथा हिमदूत : हेमन्तजी नौकरीक कारणे परिवार सऽ दूर असगर अमेरिका मे रहैत छलैथ।जाड़क प््राकोप अपन पराकाष्ठा पर छल।तोरक तोर बर्फक बरखा सब भूमिपर चॉंदीक ओढ़ना ओढ़ेने छल।ताहि पर सऽ हुन्कर पंजामे कनिके क्रैक भऽ गेल छलैन से बहुत दिनसऽ प्लास्टर छलैन।नेंगड़ा कऽ चलि चलि कहुना अपन जरूरी काज करैत छलैथ। अतेक दिन सऽ ऑफिस नहिं जा रहल छलैथ से ओतहु सऽ सूचना आबिगेल रहैन जे यथाशीघ्र दफ्तर औनाई प््राारम्भ करू।छुट्टीक कारण देर सऽ उठैत छलैथ आ जखन बाहर ताकैत छलैथ त हिमदूतक छाप देखायत छलैन जे नेन्ना भुटका सबहक टोली भरिसक बाहर बर्फपर सूतिकऽ हाथ पैर हिला हिलाक बनौने छल। ई देखि हुन्का अप्पन बाल्यकाल ध्यान आबि गेलैन जखन हिमदूतक खिस्सा सब सुनै मे हुन्को खूब मजा आबैत छलैन। अखनो मोन तऽ बड्ड छलैन जे बाहर जा कऽ बच्चा सब संगे बच्चा बनि खेल करैथ मुदा पैरक प्लास्टर आहिये कटल रहैन।डॉक्टर अखनो सतर्क रहैलेल कहने छलैन। आब आर कार्यालय नहिं गेनाय ठीक नहिं छलैन से हेमन्तजी अपन तैयारी प््राारम्भ केला। ओ अतेक दिन बाहरक सफाई नहिं कऽ सकल छलैथ से अनुमान रहैन जे गैरेजक आगू जे बर्फक भरमार भऽ गेल हेतैन जकरा कार निकालय लेल साफ केनाई अनीवार्य भऽ गेल छलैन।से सबसऽ पहिने कहुना नेंगड़ाएत फड़सा लय बाहर गेला। बाहर के दृष्य विस्मित करय वला छल कारण पूरा रस्ता आ द्वारक भाग साफ छल।बड्र्ड आश्चर्यचकित छलैथ जे ई कोना भेल। नहिं किछु तऽ पिछला दस दिन सऽ लगातार बरफ खसि रहल छल। फेर बच्चा सब जे हिमदूतक छाप बनौने छल सेहो बिना बर्फक मोट ढ़ेरके बिना कोना सम्भव छल।कहिं ई हिमदूतक अस्तित्व सच तऽ नहिं. हेमन्त जी सोचला। दोसर दिन हेमन्तजी काजपर जायलेल जल्दी उठला तऽ अपन द्वार लग किछु हलचल लगलैन।खिड़की सऽ तकला तऽ देखला जे बच्चा सब मिलिकऽ हुन्कर जगह साफ करैत छलैन। जखन ओकरा सबके टोकलखिन तऽ ओ सब कहलकैनजे हुन्कर अस्वस्थता सबके बूझल छलै ताहि द्वारे बच्चा सब प््रातिदिन खेलय काल हुन्कर रस्ता साफ कऽ दैत छलैन।हेमन्तजीक हृदय भावाविभोर भऽ अपन आभार व्यक्त करयमे असमर्थ भऽ गेल छलैन।आहि हेमन्तजीके असली हिमदूतक दर्शन भऽ गेल छलैन। १मुन्नाजी- अझुको क्षणकेँ अंगीकार करैछ “क्षणिका” २. धनाकर ठाकुर- जगदीश प्रसाद मंडलक “ गामक जि‍नगी‍” ३.उमेश मंडल- मैथि‍ली उपन्‍यास साहि‍त्‍यमे संवेदनाक स्‍वर १ मुन्नाजी अझुको क्षणकेँ अंगीकार करैछ “क्षणिका” विहनि कथाक नींवक पहिल ठोस खाम्ह बनि सोझाँ आएल “क्षणिका” पैंतीस बर्ख बाद पुनर्प्रकाशित अपनामे समेटने तीस गोट विहनि कथा (लघुकथा)क संगोर अछि। ऐ मे प्रकाशित अधिकांश कथा अपना गात आ विहनि कथाक शिल्पेँ आइयो प्रासंगिक आओर विवरणीय अछि। ऐमे प्रकाशित कथाक नींव आइसँ चारि दशक पहिने श्री अमरनाथजी द्वारा तहिया राखल गेल जहिया कि मैथिलीमे विहनि कथाक स्थिति द्वितीयाक चान जेकाँ छल। आन गद्य विधाक एक प्रकारेँ फरिछा गेल विहनि कथाक तहिया शैशवावस्था छल। शैशवो केहेन तँ जेना कहियो अप्पन समाजमे बेटीकेँ सोइरीयेमे नोन चटा अस्तित्वेकेँ मेटा देबाक सोच व्याप्त छलै। आइसँ चारि दशक पहिनेसँ आजुक सामाजिक परिवेशक तुलनात्मक स्थिति देखी तँ तहिया अमावश आ आइ पूर्णिमा सन देखाएत। तहियाक समग्र स्थितिक ठाम-ठीम चित्रण ऐ संगोरक कथा सभमे स्पष्ट देखाइछ। मुदा किछु सोच किछु कुरीतिक तहियाक चित्रण आइयो प्रासंगिक लगैछ जेनाकि “पपीहा” शीर्षक कथामे बुढ़ा-बुढ़ीक दुर्दशाकेँ बेटा-पुतौहक सेवासँ निराश भऽ स्वयं जीबाक लेल बाट तकैत ई बुजुर्ग दम्पत्तिक मानसिक चेतनाक शिकार अझुको बुजुर्गक दुर्दशाकेँ आलोकित करैए। ओना समाजक सभ व्यक्ति एके रंग अवचेतन नै होइछ जे तहियो छल आ आइयो अछि। आइयो ऐमे प्रकाशित कथा- “लालटेम”मे चित्रण जुआ जकाँ हारल जुआनीसँ वृद्ध भेल पिता जखन अपन आश्रय तकैत छथि तँ अपने विमोहित घरकेँ घुरि अबैत छथि। ई चेतना अझुको किछु धिया-पुतामे धारल उसारल राखल भेटत, पूर्णतः मूइल नै। धनिक गरीबक फाँट तँ सभ दिन रहलैए आ ई अमर अछि। चाहे वैज्ञानिक तकनीकी दृष्टिये संसार कतबो बदलि जाए। ऐ संगोरक श्रेष्ठ कथामे सँ एक “माटि पानि” साहेब सभ गरीबकेँ हेट कऽ रखैत छथि। हुनक ऐय्यासी, सामाजिक परिवर्तन  हुनक संवेदनाकेँ सेहो सुखबैत जा रहल अछि। मुदा एकटा गरीबे एहेन अछि जे सभ संकटक घड़ीमे साहेबकेँ जिनगीक पटरीपर लऽ आनि आगू बढ़बाक रस्ता देखबैछ। उपरोक्त कथा सभकेँ पढ़लोपरान्त अहाँकेँ ई भान अवश्य होएत जे विहनि कथा, जे आइसँ चारि दशक पूर्व मैथिलीयोमे आने भाषाक लघुकथाक समकक्ष अपन खुट्टा गरबामे समर्थ भेल छल। ऐ “क्षणिका” नामक विहनि कथा संगोरकेँ प्रकाशित करबाक दुस्साहस अमरनाथजी देखौलनि जे आजुक विहनि कथाक बाटक हेतु मीलक पाथर साबित भऽ रहल अछि। चारि दशक पहिने अमरनाथजीक संगोर अवश्य सोझाँ आएल। मुदा ऐ विहनि कथाक ओ एसगर लेखक नै छलाह। ओही समएमे एहने निश्शन “विहनि कथा” मिथिला मिहिरक माध्यमे नियमित सोझाँ अबैत रहल, ओइ रचनाकारक नाम छल एम. मभिकान्त। मुदा ई दुनू गोटे विहनि कथाक फलकपर नै जानि कतऽ हेरा गेला। “विदेह” पाक्षिक ई पत्रिकाक ६७म अंक “जे विहनि कथा विशेषांक” छल तइमे विषयवस्तुजन्य व्यक्ति आ रचना जुटेबाक क्रममे भाइ अनमोल झाक माध्यमे संपर्के जुड़लहुँ ऐ रचनाकारसँ जे आइयो ओही उद्गारक संग अपन चारि गोट टटका रचना पठा ऐ संग्रहसँ एक डेग आओर आगाँ बढ़ि विहनि कथाकेँ मजगुत करबामे सार्थक सहयोग केलनि। एम. मणिकान्त एखनो हेराएले छथि...। ई रचनाकार युवाकालमे जै जोशे किछु निश्शन रचना सभ देलनि, चारि दशक बादो आजुक रचनाकार सभ ओतै केन्द्रित भऽ रचना करैत देखाइत छथि, जेना देखू “शान्ति” शीर्षक कथाकेँ। लोक जीवन जीबाक लेल जीवनमे शान्ति पेबाक लेल भागादौड़ीमे लागल सम्पूर्ण जिनगीकेँ अशान्त बना लेने अछि। आ जीवन भरि कतौ शान्ति नै भेटि पबै छै, जँ शान्तिक दर्शन होइत छैक तँ जिनगी शान्त भेलाक पछातिये जे आइयो सगरो ईएह स्थिति व्याप्त अछि। उपरोक्त ठोस रचनाक पछाति ऐ संग्रहकेँ आओर मजगुत आधार दैए सुमनजी द्वारा लिखल गेल आमुखमे सोदाहरण प्रस्तुत कएल गेल खलील जिब्रानकेँ। सत्य लघुकथाकेँ खलील द्वारा एक-एक बिन्दुपर देखार करैत जिनगीक सत्यकेँ सोझाँ अनलासँ साहित्य, सामाजिक आ राजनीतिक परिवेशमे खलबली मचि गेल रहै। जकर कोलाहल वा प्रासंगिकता आइयो बाँचल अछि आ सदा अमर रहत। मैथिली विहनि कथाक ऐ पहिल संग्रहक दोसर प्रस्तुति आइयो समीचीन भऽ ऐ साहित्यिक विधाकेँ एक प्रकारसँ आगाँ बढ़ेबा लेल उत्प्रेरकक काज करत। २ धनाकर ठाकुर जगदीश प्रसाद मंडलक “ गामक जि‍नगी‍” श्री जगदीश प्रसाद मंडलक “ गामक जि‍नगी‍” कथा संग्रहमे 19 कथा छनि‍। कथा सभक शीर्षक बहुत छोट राखव लेखकक वि‍शेषता छनि‍ मुदा एहि‍ कारणे ई मुख्‍य पात्र प्रधान रहि‍ जाइत अछि‍। गामक जि‍नगी केना शहरसँ अलग अछि‍ संभवत: लेखक एकरहि‍ प्रदर्शित करक प्रयास वि‍वि‍ध कथामे केने छथि‍। औद्यौगि‍क क्रांति‍क बाद बनल शहर गामहि‍सँ उपटल लोकसँ बसल अछि‍ गामहि‍सँ जीवि‍काक खोजमे गेल लोकसँ जे बादमे क्रमश: गाम छोड़ि‍ देलन्‍हि‍। गाम छोड़ि‍ कोनो शहरमे जेवाक कारण प्रारम्‍भि‍क अवस्‍थामे औद्यौगि‍क पूंजी हो जाहि‍मे गामक वर्णवैषम्‍यक भाव भनहि‍ रहल हो मि‍थि‍लाक लेल कोशी-कमला समेत अनेक नदीमे अबएबला बाढ़ि‍ कारण रहल अछि‍ ओना बाढ़ि‍ स्‍वयं सेहो बड़का औद्यौगि‍क देशक सामान बेचक प्रकरण-उपकरणमे बनएबला बड़का बैराज-बांध आदि‍क कारणहि‍ अछि‍। लेखककेँ मनमे कचोट छनि‍ जे लोक कि‍एक गाम छोड़ि‍ बाहर जाइत अछि‍ पंजाब तक जकर परिणाम होइत छनि‍ बादमे नाव चलवैत, वा गामपर रि‍क्‍शा चलबैत लगक कसबा वा स्‍टेशनसँ जे पात्र कहैत छनि‍ “हमर गामक लोक पंजाब नहि‍ जाइत अछि‍।‍” कि‍छु वर्ष पूर्व घोघरडीहा वा जयनगर सन स्टेशनसँ पंजाब आदि‍क छपल टि‍कट भेटैत छलैक जे एक दि‍नमे एक-एक स्‍टेशनसँ लाख- लाख टाकाक कटि‍ जाइत छलैक जहि‍पर पंजाबमे हरिiत क्रांति‍ अओलैक। प्रति‍नि‍धि‍ कथा “डाक्‍टर हेमन्‍त‍”, स्‍वयं डाक्‍टर होइक चलते हम सर्वप्रथम पढ़लहुँ। एक डाक्‍टरक बेटा डाक्‍टर हेमन्‍त प्राय: दरभंगामे काज करैत “लक्ष्‍मीपुर‍” (बाढ़ि‍क गाव नि‍र्मली लग) जाइत अछि अधि‍कारीक आदेशसँ। चूँकि‍ ओ स्‍वयं एक गामसँ नि‍कलल अछि‍ पि‍ताजीक उपार्जित धनक बंटवारामे मुकदमेबाजीसँ त्रस्‍त अछि। डाक्‍टर हेमन्‍त तँ मि‍थि‍लेक शहरमे रहलाह। जतए कि‍ प्रमंडल एखन तक सहरसा या शहर सा कहबैत अछि‍। जतए कोनो शहर शहर सन‍ नहि‍ अछि‍ बल्‍कि‍ गामहि‍क एक प्रति‍रूप अछि‍। मुदा हुनक बेटा कोनो दोसर प्रांतक शहरमे नौकरी लेल चलि‍ गेलखि‍न्‍हि‍। डाक्‍टर नहि‍ बनलखि‍न यद्यपि‍ कहानीमे ई लि‍खल नहि‍ अछि‍ कि‍एक मुदा संभवत: आब डाक्‍टरी पढ़नाइ कम टाका दऽ भए गेल अछि‍ तँए।  कि‍छु वर्ष पहि‍ने तकक बि‍हारक गुंडाराजमे फि‍रौती अपहरणक कथा सामान्‍य छल जकर धमकी स्‍वरूप लाख टाका वा मौतक धमकी हेमन्‍तकेँ सेहो भेटलनि‍ मुदा ओहूसँ पैघ धमकी बाढ़ि‍ क्षेत्रमे काज करए जाउ वा जेल जे सामान्‍यत: सुनल नहि‍ गेल अछि‍ मुदा शासनक आतंक चोर-गुंडासँ कम नहि‍ तकर उदाहरण अछि‍ एहि‍मे। फि‍रौतीक माँगसँ बँचवाक लेल यदि‍ बाढ़ि‍-ड्यूटीकेँ हेमन्‍त अंतमे धन्‍यवाद दैत तँ कथाक पूर्णतामे एक डेग होइत आ तहि‍ना बाढ़ि‍मे कतहुँसँ आएल कोनो परि‍वारमे पालि ता सुकन्‍या सुलोचनाक प्रति डाक्‍टरक मनोभावक वि‍कास कथामे नहि‍ भऽ पाएल। सुन्‍दरी सुलोचनाक आयु कि‍छु बढ़ा नवयौवना बना ओहि‍पर कामुक मनोदशाक चि‍त्र खेंचल जा सकैत छल वा एक छोट कन्‍याक रूपमे बालि‍का सुलोचनाक प्रति‍ वात्‍सल्‍यताक जे मैथि‍ल परम्‍परा अनुसार होइत- “चलू दरभंगा ओतहि‍ पढ़व अहाँ।‍” कि‍एक तँ वि‍देशी मनोदृष्‍टि‍जन्‍य कामव्‍याधि‍सँ छोट बालि‍कामे कामुकता तकनाइ हमरा सबहक अग्राह्य रहैत। वा, सुलोचना कि‍छु मास बाद दरभंगा कोनो बीमारी जेना सांपक वि‍ष (जकर चर्चा प्रारम्‍भमे अछि‍, लए डाक्‍टर हेमन्‍तक क्‍लि‍नि‍कपर आबि‍ बचि‍ जइतथि‍ वा एन्‍टी-स्‍नेक भेनमक अभावमे तँ कहुना पहुँचि‍यौ कऽ दम तोड़ि‍ दि‍तथि‍ वा बँचलाक बाद ओहि‍ समए डाक्‍टर हेमन्‍तक नौकरीया बेटा गामपर आएल रहैत आ ओकरा बि‍याहि‍ बंगलोर लए जइतथि‍। मतलब जे कथामे बात उठए से पूर्ण हेबाक चाही। गामक पलायन रूकि‍ जाए, दरि‍द्रा कम भऽ जाए आदि आ तहि‍ना भाषागत शुद्धता हि‍न्‍दीसँ लेल शब्‍द लेल सेहो समान “सामान‍” जकाँ ग्रहण करब उचि‍त लेखककेँ। कि‍ताबक छपाइ नीक मुदा फोन्‍ट एक एक पैघ हेबाक छल आ दाम कि‍छु कम उपेक्षि‍त छल जे प्रकाशकीय धर्मक अनुरूप होइत। ३.उमेश मंडल- मैथि‍ली उपन्‍यास साहि‍त्‍यमे संवेदनाक स्‍वर वाक् कलाक बाद संवेदनाक उद्बोधन दोसर गुण थि‍क जे मनुष्‍यकेँ आन जीवसँ अलग करैत अछि‍। ओना तँ संवेदना दुनियाँ-जहानमे उपस्‍थि‍त सकल-सजीवक वृत्ति‍ चि‍त्र मानल जाइत अछि‍ मुदा दोसर जीवमे प्रत्‍यक्ष संवादक अभावक कारणे एकर प्रासंगि‍कताक व्‍याख्‍या असहज भऽ जाइत अछि‍। साहि‍त्‍यि‍क अवधारणामे संवेदनाक स्‍वर मूलत: कवि‍तामे भेटैत अछि‍ मुदा आशु कवि‍ताक गणना सभ भाषामे अति‍-अल्‍प तँए भावक प्रवाह एहि‍ठाम (कवि‍तामे) समुचि‍त नहि‍ कएल जा सकैत अछि‍। उपन्‍यासक हृदयांन्‍ति‍क मर्मक छाया चि‍त्र थि‍क तँए एहि‍मे रचनाकारकेँ वि‍म्‍ब वि‍श्‍लेषणमे कोनो बाधा नहि‍ होइत अछि‍। उपन्‍यासमे ताल-मात्राक कोनो बंधन नहि‍। वि‍षए-वस्‍तुक कोनो सीमा नहि‍, मात्र बिम्‍बक सूक्ष्‍मताक उद्बोधन आवश्‍यक तँए उपन्‍यासमे संवेदनाक स्‍वरक प्रदर्शन सभसँ बेसी भऽ सकैत अछि‍। उपन्‍यासकेँ कोनो साहि‍त्‍यक आत्‍मा मानल गेल। जँ आत्‍मामे मर्म नहि‍ हुअए तँ संसारमे संबंधक मर्यादा अप्रासंगि‍क भऽ जाएत तँए संवेदनाक स्‍वर समाजकेँ नव गति‍ वा नव यति‍ दैत अछि‍। मैथि‍ली भाषाक अवस्‍था जे हुअए मुदा एकर साहि‍त्‍य काेनो आन भारतीय भाषासँ कमजोर नहि‍। अपन दैनि‍क जीवनक आयामक अनुकूल मि‍थि‍ला मैथि‍लीमे वेदना मर्मक हि‍मगंगे बड़ व्‍यापक छथि‍। पंडि‍त जनार्दन झा जनसीदनक उपन्‍यास ‘नि‍र्दयी सासु’सँ प्रथमत: संवेदनाक स्‍वर फूटि‍ श्री जगदीश प्रसाद मंडलक उपन्‍यास ‘जीवन-संघर्ष’ धरि‍ पहुँचि‍ गेल अछि‍ आ अनंत दि‍शामे गति‍मान भऽ रहल अछि‍। आब प्रश्‍न उठैत अछि‍ संवेदनामे दृष्‍टि‍कोणक बि‍न्‍दु, जे समाजमे दर्शन दऽ सकैछ, पाठक धरि‍ ओहि‍ स्‍वरकेँ पहुँचेबाक चाही। मि‍थि‍लामे समाजि‍क क्षेत्र आ आर्थिक वि‍षमता अन्‍य भाषा परि‍धि‍ क्षेत्रसँ बेसी रहल तँए हम ओहि‍ स्‍वर मात्रक वर्णन करब आवश्‍यक बुझैत छी। जाहि‍मे सम्‍पूर्ण मि‍थि‍लाक चि‍त्रण भेटैत अछि‍। मैथि‍ली दर्शनमे मर्मक अंकुर हरि‍मोहन झाक लि‍खल उपन्‍यास द्वय- कन्‍यादान आ द्वरागमनमे सभसँ पहि‍ले भेटल। हास्‍य-रसक वसुंधरापर दर्शन रूपी साङहकेँ गाड़ि‍ कऽ संवेदनाक पलान चढ़ा कऽ सामाजि‍क रूढ़ि‍तापर हरि‍मोन बाबू प्रहार केलनि‍ मुदा की एहि‍ प्रकारक संवेदना सम्‍पूर्ण मैथि‍लीक प्रति‍नि‍धि‍त्‍व करैत अछि‍? हरि‍मोहन बाबू सन प्रांजल उपन्‍यासकार पछाति‍क लोक धरि‍ नहि‍ पहुँचि सकलाह एहिमे हुनकासँ बेसी समाजक आडंबर धर्मी व्‍यवस्‍था दोषी मानल जा सकैत अछि‍, दीन-साधक, ऊँच-नीच, सवर्ण-अवर्णक बीचक खाधि‍ मि‍थि‍लाक सनातन लोकपर चमौकनि‍ जकाँ सि‍हरि‍ कऽ मैथि‍ली संस्‍कृति‍केँ लाजवन्ति‍क पात जकाँ जड़ि‍मे सटा देलक। मैथि‍लीक तथा-कथि‍त ि‍कछु समीक्षकगण सेहो समन्‍वयवादी दृष्‍टि‍कोण मात्र मंचेटा पर रखैत छथि‍, नेपथ्‍य वा लेखनीमे एहि‍ बि‍न्‍दुक हुनका सबहक लेल कोनो प्रयोजन नहि‍ देखबामे अबैत अछि‍। संवेदनाक स्‍वर जँ अर्थनीति‍क मूलसँ नि‍कसि‍ आबद्ध हुअए तँ एकर बि‍म्‍ब समाजमे क्रांति‍क हि‍लकोरि‍ उत्‍पन्न कऽ सकैत अछि‍। एक दि‍स आगाँक पाँति‍मे बैसल रचनाकार साधन वि‍ही‍न उपेक्षि‍तक भावनापर एक्को आखर 1925ई. धरि‍ उपन्‍यासक रूपमे नहि‍ लि‍खलनि‍ तँ दोसर दि‍स मैथि‍ली साहि‍त्‍यक क्रांति‍ पुरूष बैद्यनाथ मि‍श्र यात्री अपन आंचलि‍क उपन्‍यास गाथा सभमे मात्र उपेक्षि‍त व्‍यक्‍ति‍ सभकेँ केन्‍द्रि‍त केलनि‍। अो वास्‍तवमे साम्‍यवादी छलाह। हुनक रचना संसारक वैशि‍ष्‍टता अछि जतए ऊँच-नीचक व्‍याख्‍या बड्ड व्‍यापक अछि‍। मार्क्सवादक मूल सि‍द्धान्‍त शोषि‍त व्‍यक्‍ति‍क भावनाकेँ केन्‍द्र-बि‍न्‍दु‍ बना कऽ यात्री जी मि‍थि‍लामे साम्‍यवादी साहि‍त्‍यकारक रूपमे समाजमे क्रांति‍क ज्‍योति‍ जरौलनि‍। हि‍नक बलचनमा उपन्‍यासमे आत्‍मकथाक शैलीमे लि‍खल एकटा यादव बच्‍चाक खि‍स्‍सा आएल अछि‍। फूल बाबूक संग ओकर गामसँ प्रस्‍थान आ वि‍भि‍न्न पार्टीसँ मोहभंग भेलाक बाद कम्‍युनि‍स्ट पार्टीपर वि‍श्‍वास स्‍थापि‍त कएल गेल। खि‍स्‍साक अंतमे बलचनमाकेँ मारि‍ कऽ पारि‍ देल जाइत छैक। पारो उपन्‍यासमे- बाल वि‍वाहपर दारूण प्रहार कएल गेल अछि‍। जाहि‍मे मर्मक संग संवेदनापूर्ण चि‍त्र अाएल अछि‍। बाल वि‍वाहपर आक्रामक प्रहार नवतुरि‍यामे आएल अछि‍। डॉ. योगानन्‍द झाक लि‍खल भलमानुष उपन्‍यासमे बि‍कौआ प्रथाक फलस्‍वरूप वधूक नर्क होइत जीवनक वि‍वेचन कएल गेल अछि‍, एहि‍मे मर्म ओ संवेदनाक स्‍वरक हि‍लकोर‍ शुरूसँ अंत धरि‍ देखबामे अबैत अछि‍। तहि‍ना सुधांशु शेखर चौधरीक उपन्‍यास- ’तऽर पट्टा ऊपर पट्टा’मे बहि‍न गंगाक प्रेरणासँ भाइ परमा द्वारा गामक राजनीति‍मे प्रवेश होइत अछि‍ जाहि‍सँ कि‍छु वि‍रोध आ अपमानक बाद वि‍जय प्रदर्शित भेल अछि‍। हि‍नक उपन्‍यास -दरि‍द्र छि‍म्‍मरि‍मे- अमलाक माने दरि‍द्र छि‍म्‍मरि‍क आत्‍मा कथा संवेदनपूर्ण अछि‍। ‘ई बतहा संसार’ मे प्रेमक एकटा गाथा कहल गेल  अछि‍ जाहि‍मे संवेदनाक स्‍वर तँ सहजे अपन वि‍शेष रूप लऽ आएल अछि‍। सोमदेवक ‘चानो दाइ’ मे नारी सशक्‍ति‍करणपर आधारि‍त विषए-वस्‍तु  व्‍यापक रूपेँ आएल अछि‍। मायानंद मि‍श्रक ‘बि‍हाड़ि‍, पात आ पाथर’ बेटी बेचबाक प्रथापर लि‍खल गेल समकाली‍न समस्‍याक संवेदनयुक्‍त बि‍म्बकेँ उजागर करैत अछि‍। व्‍यास जीक ‘दू पत्र’मे कथा भारतीय आ यूरोपीय संदर्भमे नारीक यथास्‍थि‍ति‍केँ उजागर करैत आगाँ बढ़ल अछि‍। जाहि ऊपर नि‍:संकोच नारी संवेदनाक प्रदर्शन स्‍वभावि‍क ढंगे आएल अछि‍। प्रभास कुमार चौधरीक ‘नवारम्‍भ’ हवेली मोहनपुर, लंकामोहनपुर आ नवारम्‍भ नामसँ तीन खण्‍डमे क्रमश: उत्‍थान, पतन आ पुनर्जागरणक कथा कहैत अछि‍। तेसर खण्‍डमे दलि‍तक मर्म आ संवेदना स्‍वत: उभरि‍ कऽ आएल अछि‍। हुनक ‘राजा पोखरि‍मे कतेक मछरी’ उपन्‍यास शोषण आ प्रति‍रोधक कथा कहैत अछि‍ जे मार्मिक तँ अछि‍ए संगे संवेदनपूर्ण आ स्‍वभावि‍क सेहो अछि। गंगेश गुंजनक- ‘पहि‍ल लोक’मे वि‍वश राजूक कथा संवेदनाक संग  कहल गेल अछि। लि‍ली रे क ‘पटाक्षेप’ उपन्‍यासमे शि‍वनारायण नक्‍सली आन्‍दोलनकारीक आ आन्‍दोलनक दमनक कथा मार्मिक रूप लऽ आगाँ बढ़ल अछि‍। जगदीश प्रसाद मंडलक उपन्‍यास- ‘मौलाइल गाछक फूल’मे समाजक अंति‍म व्‍यक्‍ति‍ वौएलाल लगसँ खि‍स्‍सा प्रारम्‍भ भऽ साम्‍यवादी वि‍चार धारासँ ओतप्रोत रामाकान्‍तक आदर्श सोचक चि‍त्र खि‍चैत गामक मौलाइल गाछ सदृश्‍य रूप-रेखाक वर्णन भेटैत अछि‍, संगहि मौलाइल गाछकेँ गंगाजल सन पवि‍त्र पानि‍सँ समाजकेँ पुर्नप्रति‍ष्‍ठि‍त करबाक संवेदना मार्मिक ढंगे उपस्‍थि‍त भेल अछि‍। तहि‍ना हि‍नक दोसर उपन्‍यास- ‘जि‍नगीक जीत’मे‍ ि‍न:सहाय देवन जे अपना जि‍नगीसँ ऊपर उठि‍ समाजक जि‍नगीमे जा मि‍लैत अछि आ से‍  ठीक ओहि‍ना जेना धार अपन उद्धार करबा लेल समुद्रमे मि‍लैत अछि‍। एही‍ ताना-बानाकेँ प्रस्‍तुत करैत एहि‍ उपन्‍यासमे संवेदनाक हि‍लकोरि‍ उझमि‍ आएल अछि‍। तेसर उपन्‍यास ‘उत्‍थान-पतन’मे सामंती व्‍यवस्‍थाक वातावरणक उल्‍लेख करैत वि‍च्‍छि‍न्न होइत गाम-घर आ टूटैत बेकती सबहक समस्‍याक संवेदनपूृर्ण मार्मिक चि‍त्र आएल अछि। समाजक यथार्थक दर्शन स्‍वत: आबि‍ अपन गुण-अवगुणक छाप छोड़ि‍ दैत अछि‍, जाहि‍मे संवेदना स्‍वभावि‍क रूपेँ अपन डीहपर नृत्य करैत नजरि अबैत अछि‍ जेना एहि‍ कथोपकथनपर दृष्‍टि‍पात कएल जा सकैत अछि‍- “हँ, उपाय अछि‍। हम अहाँकेँ रास्ता बता दइ छी। अहाँ बंगाली छी जहि‍सँ जाति‍ आ धर्म- दुनू छपाएल अछि‍। एहि‍ठाम मोटा-मोटी हि‍न्‍दूमे तीन‍ वर्ग अछि‍। पहि‍ल अगुआएल जाति‍, जेना सोति‍, ब्राह्मण, राजपूत, भुमि‍हार इत्‍यादि‍। दोसर पनि‍चल्‍ला जाति‍- जेना यादव, धानुक, कि‍योट, अमात, बरैइ, कोइर इत्‍यादि‍ आ तेसर अछि‍ हरि‍जन। जकरा समाजमे अछोप जाति‍ कहल जाइ छैक। एहि‍ जाति‍क पानि‍ उच्‍च जाति‍क लोक नहि‍ पीबैत‍ छथि‍। ने पानि‍ पीबैत छथि‍ आ ने छुअल अन्न खाइ छथि‍।‍” “अरे, बाप रे, तब तँ समाज टुकड़ी-टुकड़ीमे बँटल अछि‍?‍” “यएह अहि‍ठामक -मि‍थि‍लाक- वि‍शेषता छैक जे सभ जाति‍ आ धर्मसँ बँटल अछि‍ मुदा सामाजि‍क संबंध सेहो मजबूत अछि‍। जखन कखनो कोनो आफद-असमानी होइत तखन सभ एकजुट भऽ सहयोग करैत। ततबे नहि‍, जखन कोनो धरमि‍क काज होइत तखन सभ एकजुट भऽ सहयोग करैत।‍” चारि‍म उपन्‍यास- ‘जीवन-मरण’मे मनुक्‍खक जि‍नगीक दू भागक वर्णन भेटैत अछि‍- एक जे जीवन कालक होइत अा दोसर जे मुइला पछाति‍। जीवन कालक कृत मनुष्‍यक अगि‍ला जीवन माने मुइला पछाति‍ सेहो प्राभावकारी होइत अछि‍। यएह चित्रण एहि‍ उपन्‍यासमे प्रस्‍तुत भेल अछि‍। हि‍नक पाँचम उपन्‍यास- ‘जीवन-संघर्ष’मे चि‍त्रि‍त जीवनेक दोसर नाओ संघर्ष थि‍कैक। जेहन जि‍नगी ओहेन संघर्ष। एही ताना-बानाकेँ देखाओल जि‍नगीमे सामाजि‍क, आर्थिक आ भौगोलि‍क समस्‍याक चि‍त्रण अनायास भेटैत अछि‍। जाहि‍मे अमर-संवेदन अपन अस्‍ति‍त्‍व  बचाबए लेल समन्‍वयवादि‍ताक सहारा लऽ फूटि‍ बहराएल अछि‍, जेना एहि‍ वि‍षय-बस्‍तुपर नजरि‍ देला उत्तर सहज लगैत अछि‍- - “(१) गामेक कारीगर माने मुर्ति बनौनि‍हार मुरती बनावे। ओना   एकपर एक कारीगर दुनि‍याँमे    अछि‍ मुदा, पूजाक मुरतीमे कला   नहि‍ देवी-देवताक स्‍वरूप देखल जाइत अछि‍। दोसर जँ हम अपन बनौल मूर्तिकेँ अपने अधलाह कहब तँ गामक कलाकार आगू कोना ससरत। तेँ      जे गामक कला अछि‍ ओकरा सभ ि‍मलि‍ प्रोत्‍साहि‍त करी। (२)         काली मंडप गामेक घरहटि‍या बनावथि‍। जि‍नका घर बनवैक लूरि‍ छन्‍हि‍ ओ मंडप ि‍कएक नहि‍ बना सकैत छथि‍। संगे इहो हएत जे गामक अधि‍कसँ अधि‍क लोकक सहयोग सेहो होएत। (३)    मनोरंजनक लेल गामोक कलाकारकेँ अवसर भेटनि‍। संगे बाहरोक ओहन-ओहन तमाशा     आनल जाए जेहन एि‍ह परोपट्टामे      नहि‍ आएल हुअए। (४)    पूजाक लेल, परम्‍परासँ अबैत ओहनो पुजेगरीकेँ अवसर भेटनि‍ जे पूजाक प्रेमी छथि‍। (५)    गामक जते गोटे काज करथि‍ ओहि‍मे नीक केनि‍हारकेँ पुरस्‍कृत आ अधला केनि‍हारकेँ आगू मौका नहि‍ देल जाइन।” श्रीमती वीणा ठाकुर लि‍खि‍त ‘भारती’ उपन्‍यासकेँ नि‍योजि‍त उपन्‍यास ग्रथ तँ नहि‍ कहल जा सकैत अछि‍ मुदा एहि‍ ऐति‍हासि‍क वि‍षए-बि‍म्‍बक चि‍त्रणमे मैथि‍ली संस्‍कृति‍क समस्‍त भारतीय दर्शनपर वि‍जयश्री मे मर्म स्‍पर्शक टी‍स अनायास देखल जा सकैत अछि।‍ गजेन्‍द्र ठाकुर जीक लि‍खल ‘सहस्‍त्रवाढ़नि’‍ उपन्‍यासक आखर-आखरमे संवेदनाक स्‍वर झलकैत अछि‍। संवेदनाक बि‍म्‍ब उद्दाध आ सम्‍यक अर्थनीति‍सँ भरल मार्मिक चि‍त्रण- जाहि‍मे एकटा कर्तव्‍यनि‍ष्‍ट आ इमानदार व्‍यक्‍ति‍ नन्‍दकेँ गृहस्‍त धर्मक संग-संग सामाजि‍क दायि‍त्‍वक पालन करवाक क्रममे उद्वेलि‍त व्‍यथा प्रस्‍तुत कएल गेल अछि‍। ओना तँ एहि‍ साहि‍त्‍कि‍ परि‍धि‍सँ बाहर बहुत ठाम संवेदना-स्‍वरक दर्शन भेल हएत मुदा हमर अध्‍ययन संसार रास पघि‍ नहि‍ तँए एकरा उपेक्षा वा ति‍रस्‍कार नहि‍ मानल जाए। ई अलग बात जे शब्‍दक सीमा रेखा सेहो अछि‍। १.डाँ कैलाश कुमार मिश्र यायावरी २.राजदेव मंडल-उपन्‍यास- हमर टोल ३.धीरेन्‍द्र कुमार-नो एंट्री : मा प्रवि‍श ४. डा. रमानन्द झा ‘रमण’-शब्द विभक्ति सम्वाद ५. मुन्नाजीक दूटा विहनि कथा ६.डाॅ. योगानन्‍द झा- वनदेवी आ नारी अस्‍मि‍ताक गाथा १ डाँ कैलाश कुमार मिश्र यायावरी संगाईप्राऊ : नागा पूर्वजक स्‍मरणक धरोहर उत्तर-पूर्व भारतक तमाम प्रदेश हमरा नीक लगैत अछि‍। नीक लगैत अछि‍ ओतए केर पहाड़, पठार, जंगल, गाछ, बृक्ष, फल, फूल, खेत, खरि‍हान, सुरम्‍य झरना, जीव-जन्‍तु आ ओइ परि‍वेशमे बसल भांति‍-भांति‍क लोक जे अपन बहुरंगी संस्‍कृति‍क संग जीब रहल अछि‍। तखन जखन हमर मणीपुर केर राजधानीसँ लगभग 7 कि‍लोमीटर केर दूरीपर समतल भूमि‍मे बसल कबुई नागा जनजाति‍ बहुल गाममे जएबाक निमंत्रण शोधक कारणे भेटल तँ मोन गद-गद भऽ गेल। ई समए थीक सि‍तम्‍बर 2010 केर मध्‍य। हमरा लग हवाई जहाजक टीकट यात्रा करक पाँच दि‍न पहि‍ने आबि‍ गेल छल। इहो निर्णय भऽ गेल छल जे शोध कार्यमे हमरा एकटा कबुई बाला - बीजू जे कि‍ ओही गामसँ थीकीह से मदति‍ करतीह। बीजू समाजशास्‍त्रमे पूणे वि‍श्‍ववि‍द्यालयसँ एम.ए. केलाक बाद आइ-काल्हि‍ असम सेन्‍ट्रल वि‍श्‍ववि‍द्यालय सि‍लचरसँ पी.एच.डी. कऽ रहलि‍ छथि‍। बीजुक आयु लगभग 26 वर्षक हेतन्‍हि‍। मोट मुदा मजगुतगर देह हष्‍टि‍। थुलथुन नहि, आकर्षक। नाक कनी पीचल, आँखि‍ कनी धसल मुदा सोहनगर। गसल-गसल बाहि, भरल गाल, उन्नत वक्ष आ मध्‍यम कद-करीब 5फीट 2 ईच, गौर वर्ण, गसल-गसल दुधि‍या दाँत  चमचम  करैत। हँसैत मुँह, लज्‍जाभावसँ भरल, अति‍थि‍ सेवा-सत्‍कारमे सदति‍काल तैय्यार। अंग्रेजी बीजू मातृभाषा जकाँ बजैत छथि‍ तँए हमरा हुनका संगे सम्‍प्रेषणमे कुनो तरहक दि‍क्कत नै भेल। ओना हमर परि‍योजनाक सम्बन्ध महि‍ला वि‍कास, इन्‍फॉरमेशन टेक्‍नोलॉजी, आ संस्‍कृति‍सँ रहैत अछि‍ आ बीजू सोसल वर्कमे शोध कार्य करैत छलीह। मुदा हुनकर फोकस उत्तर-पूर्व भारत केर जनजातीय महि‍ला समुदायमे एड्स एवं अही तरहक वि‍मारी (अथवा महामारी)क प्रकोपपर छलन्‍हि‍। सोचल, नारी चेतना दि‍स तँ कार्य करि‍ते छथि‍, कि‍छु ट्रेनिंग आ उत्‍साह सम्‍बर्धन केर पश्‍चात हमरो संगे काज कऽ लेतीह . यएह सोचैत बीजूकेँ हम अपन परि‍योजनामे राखि‍ लेलयन्‍हि‍। जखन पहि‍ल बेर मणि‍पुरक राजधानी इम्‍फालसँ संगाइप्राऊ गाम दि‍स गामक चारि‍ युवक आ Read Global संस्‍थाक एगो सहयोगी नाहि‍द जुबेरक संग हमरा लोकनि‍ वि‍दा भेलहुँ तँ लागल जे युवक सभ उत्‍साही छथि‍ आ हि‍नका लोकनि‍क मदति‍ से हमरा एतऽ कार्य करैमे सुवि‍धा हएत। संगाइप्राऊ एक साफ आ सुन्‍दर गाम थीक जे कि‍ पश्‍चि‍मी इम्‍फाल जि‍लाक अन्‍तर्गत लमजाओतोंगबा ग्राम पंचायतमे अबैत अछि‍। अगर इम्‍फाल शहरसँ हवाई अड्डा दि‍स प्रारंभ करब तँ शहरसँ लगभग 7 कि‍लो मीटर चललाक बाद दूटा राष्‍ट्रीय राजमार्ग संख्‍या 53 और 150 केर मध्‍य ई गाम बसल अछि‍। संगाईप्राऊ नाम मणि‍पुर राज्‍यक माइथोलाॅजीसँ लेल गेल छैक। तै मीथक अनुसारे संगाईप्राऊ संगाई जे कि‍ राज्‍यक जानबर छैक केर आवास स्‍थान मानल जाइत छैक। ओइ गाममे अधि‍कांश लोक सभ कबुई नागा समुदायसँ छथि‍। कबुई नागाकेँ रोंगमेई नामसँ सेहो जानल जाइत छैक। गाममे प्रवेश करि‍ते हमरा बीजू भेँट भेलीह। हम बीजूकेँ कहलि‍एनि‍ जे हम अतए केर कि‍छु बुढ़-पुरान, कि‍छु महि‍ला, कि‍छु युवक  आदि सँ भेँट करए चाहैत छी आ हुनका लोकनि‍सँ ऐ गाम, एकर लोक इति‍हास, एतुक्का परम्‍परा, आर्थिक-सामाजि‍क परि‍वेश इत्‍यादि‍ पर अपन जानकारी बढ़बए चाहैत छी जैसँ रि‍पोर्ट लीखबामे सुवि‍धा रहत। हमरा बातकेँ सुनि‍ते बीजू हमरा गामक सभसँ बुढ़ आ जातीय प्रधान लग लऽ गेलीह। बुढ़ 86 वर्षक छलाह। सातमा पास केलाक बाद सरकारी स्‍कूलमे मास्‍टर भऽ गेलाह। बेटा-बेटी सभकेँ नीक शि‍क्षा देलन्‍हि‍। हुनकासँ ज्ञात भेल जे हुनकर पूर्वज कि‍छु आरो लोक सबहक संगे पहाड़सँ उत्तरि‍ ऐ गाममे लगभग 1780 ई.मे बसलाह। यद्यपि‍ हुनका लग ऐ बातक ऐति‍हासि‍कताक कुनो लि‍खि‍त प्रमाण नै छलन्‍हि‍। हुनका हि‍साबे प्रारम्‍भमे मात्र ग्‍यारह परि‍वार ऐ गाममे बसल। ऐ ग्‍यारह परि‍वारकेँ मुखि‍याक नाम  आइयो गामक बूढ़-पुरान सबहक मँुहमे छै। ई ग्‍यारह व्‍यक्‍ति‍ छलाह- 1. गोन्‍बी 2. थोम्‍बुई 3. बोंकमलाक 4. सचाऊ 5. लंगखोंग्‍टबा 6. गंगबी 7. ममुईबा 8. गंगथवांगम 9. मईपाक 10. तरांगबोन्नांग 11. कपजीलुपूई (महि‍ला) अगर दन्‍तकथाकेँ मानी तँ ई लोकनि‍ बड्ड उद्यमी छलाह। स्‍थानीय राजा हि‍नकर उद्यमि‍तासँ प्रसन्न भऽ हि‍नका लोकनि‍केँ अगल-बगल केर पनि‍गर खेत सभमे धान उपजेबाक लेल कहलखि‍न। ई सभ बड़ा साहसी आ दबंग सेहो छलाह। तै दि‍नमे हि‍नका लोकनि‍केँ गुण्‍डा आ अपराधी तत्‍वकेँ पकरबाक तथा सजा देबाक अधि‍कार सेहो दऽ देलखि‍न। ई ग्‍यारह पूर्वज संगाईप्राऊ बच्‍चा संगे बसि‍ अवश्‍य गेलाह मुदा अपन-अपन मूलग्रामसँ सम्‍बन्‍ध सेहो बनौने रहलन्‍हि‍। ओतए अर्थात पहारक घर इत्‍यादि‍केँ नै छोड़लाह। जाइत-अबैत रहलाह। जखन द्वि‍तीय वि‍श्‍वयुद्ध चलि‍ रहल छल, तै क्षण नेताजी सुभाषचन्‍द्र बोस अपन आजाद हि‍ंद फौजक संग जापानक सहयोगसँ अही रस्‍ते  ताहि समएक वर्मा (आ आजुक म्‍यंमार)सँ सम्‍पर्क रखने छलाह। मणि‍पुर म्‍यंमारक  सीमा सं  सटल अछि‍। फलत: अतए केर लोकके भयंकर बमबारीक समाना करए पड़लैक। पहाड़ीपर रहैबला लोकक जीवन लगातार, बमबारीसँ परेशान भऽ कखनहुँ झाड़-झंखाड़ दि‍स तँ कखनहुँ मैदानी भाग दि‍स दहशतसँ प्राणरक्षाक लेल भागए लागल। ओहुकाल पहाड़ीपर बसल गामसँ कि‍छु कबुई नागा लोकनि संगाईप्राऊ गाममे आबि‍ बसि‍ गेलाह। तँ बात करैत रही गामक सभसँ बुढ़ पुरूषक। ओ परम्‍परागत रूपसँ कबुई समाजक प्रधान छथि‍। ओ कहलनि‍ जे आब ऐ गामक लगभग 35 प्रति‍शत नागा लोकनि‍ ईसाई भऽ गेलाह अछि‍। एकर बादो आपसमे कुनो वैमनस्‍य नै लोक सभ परम्‍परागत पाबनि‍-ति‍हार, नाच-गान, सभ एक्के संग अखनहुँ बड़ उत्‍साहसँ मनबैत छथि‍। अखनहुँ ई लोकनि‍ अपन पूर्वजकेँ देवतासँ बेसि‍ए सम्‍मान दैत छथि‍। अखनहुँ अपने-आपकेँ कुनो धर्म आ संस्‍कृति‍सँ ऊपर उठि‍ नागा बुझएमे गर्वक अनुभूति‍ करैत छथि‍। पि‍तृक प्रति‍ अतेक सि‍नेह कतहुँ नै देखल हम अपन आइ धरि‍क यायावरीक प्रवृत्ति‍मे। पि‍तृक प्रति‍ अतेक समर्पण जे कबुई नागामे देखलहुँ से एकाएक हमरा अपने-आपकेँ अपन पि‍तृक प्रति‍ सचेत कऽ देलक। पि‍तृक प्रति‍ अतेक इमानदारी जे गामक एक नागा चि‍त्रकार प्रथम ग्‍यारह पूर्वजक चि‍त्र बनाए गामक ि‍नर्माणक  एक भव्‍य पेन्‍टि‍ंग बनौलनि‍। पेन्‍टि‍ंग भव्‍य आ पैघ। आकर्षक आ रंग तथा तुलि‍काक समायोजन केर सर्वश्रेष्‍ठ उदाहरण। केनवासमे एक-एक रत्ती जगह भरक असाधारण प्रयास। बाह रे कलाकार! बाह रे कला!  बह रे पित्रिक प्रति समर्पण!  हम पूरा आत्‍मवि‍श्‍वासक संग कहि‍ सकैत छी जे अतेक सि‍नेह हमर पि‍ताक अलावे आर कि‍योक आन पुरूष हमरा नै दऽ सकैत छल। परम्‍परागत कबुई नागा धर्मकेँ मानैबला प्रकृति‍क समि‍प छथि‍। ओ एकटा सर्वशक्‍ति‍मान भगवान अर्थात् तींगकाओ रगवांग' केँ मानैत छथि‍, एकर अति‍रि‍क्‍त अनेक तरहक देवी-देवताक अराधना आ पूजा-उपचार सेहो करैत छथि‍। परम्‍परागत कबुई नागाकेँ बीच ई वि‍श्‍वास अखनहुँ छन्‍हि‍ जे मनुक्‍ख तखने वि‍मार पड़ैत अछि‍ जखन ओकरा कुनो भूत-प्रेत परेशान करैत छैक आ ओकरापर सवार भऽ जाइत छैक। कखनो काल डाइन-जोगि‍न सभ सेहो जादू-टोनासँ लोककेँ परेशान करैत छैक। भूत-प्रेत या शैतानी आत्‍मासँ मुक्‍त करबाक लेल वि‍मार व्‍यक्‍ति‍क सामने गामक ओझा हरि‍यर तरकारी, फल, फूल, मुर्गीक बच्‍चाक शोणि‍त, चाउर, देशी दारू आदि‍सं अपन ईष्‍ट देव पि‍तृ इत्‍यादि‍केँ अर्पित करैत अछि‍ आ निष्ठापूर्वक पूजा करैत अछि‍। वि‍श्‍वास ई कएल जाइत अछि‍ जे  एहि प्रक्रि‍या आ आराधनासँ लोकक कष्‍टक समाधान भऽ जएतैक। संगाईप्राऊ गामक कबुई नागा मूलत: छः गोत्रक छथि‍। ई 6 गोत्र गामक बुजुर्ग लोकनि‍क कथनानुसार नि‍म्नलि‍खि‍त अछि‍- क. कामेई             27 घर ख. पालमेई          09 घर ग. गोलमेई          11 घर घ. गंगमेई            08 घर च. मारि‍ंगमेई   08 घर छ. न्‍यूमेई            01 घर इसाइयक प्रभाव तेजीसँ बढ़ि‍ रहल छैक। गाममे एकता  मध्यम आकृति केर गि‍रि‍जाघर आ एकटा एक्‍टीभीटी केन्‍द्र इसाइ मि‍शनबला बना देने छैक। गामक लोक सभ, मुख्‍यरूपेण महि‍ला लोकनि‍ बड़ा कलात्‍मक आ रचनात्‍मक प्रवृति‍क छथि‍। Read- Global संस्‍थाक सहयोगसँ पच्‍चास प्रति‍शत साझेदारीकेँ स्‍वीकारैत ऐ गामक स्‍त्री-पुरूष गामक गैरमजरूआ भूमि‍पर सार्वजनि‍क प्रयोगक हेतु एगो पुस्‍तकालय, कम्‍प्‍यूटर प्रशि‍क्षण केन्‍द्र, महि‍ला वर्गक लेल आर्थिक उपार्जन हेतु व्‍यवसायि‍क प्रशि‍क्षण केन्‍द्र बना रहल छथि‍। ऐ प्रांगणाक नाम तजाई राखल गेल छै। पूछलापर पता चलल जे स्‍थानीय भाषामे तजाई केर अर्थ होइत छै पहाड़ी जंगलमे एहेन पोखरि‍ जतए नूनगर पानि‍ उपलब्‍ध होइत छै। आ सभ तरहक जानवर ओइ पानि‍क स्‍वाद स्‍वतंत्र भावसँ अतए लैत अछि‍। तहि‍ना तजाई प्रांगण अगल-बगलक तमाम लोकक हेतु चाहे वो स्‍त्री-पुरूष, बच्‍चा-बुढ़, नव-पुरान, जनजाि‍त-सामान्‍य जाति‍क कि‍एक नै हो, सबहक लेल छै। सभ कि‍यो अतऽ आबि‍ ऐठाम उपलब्‍ध सुवि‍धाक लाभ उठा सकैत अछि‍। आब बुझैमे कुनो भांगठ नै अछि‍ जे आपसी सौहार्दक बीच कोना कऽ कबुई नागामे व्‍याप्‍त अछि‍। ई रहस्‍य अखनो धरि‍ पता नै चलल जे बीजू कि‍एक बहुत रास अगरबत्ती जरेने छलीह। हलांकि‍ कुनो वि‍शेष तरहक दुरगन्‍धक अनुभूति‍ अवश्‍य भऽ रहल छल। जखन ओइ गामसँ सम्‍बन्‍धि‍त नाना तरहक जानकारी लऽ लेलहुँ तँ ओइ बुजुर्गकेँ कहलि‍एनि‍- “बीजू हमरा लेल जानकारी इकत्रि‍त कऽ रहलि‍ छथि‍। अहाँ लोकनि‍ लग बेर-बेर एतीह आ वि‍भि‍न्न तरहक प्रश्‍न करतीह। नि‍वेदन जे ऐ गामक नागा समाजक प्रधान होमाक नाते, सभसँ बुजुर्ग होबाक नाते, अनुभवी होबाक नाते अहाँ हि‍नका यथासंभव मदति‍ करबन्‍हि‍ ; गामक लोक सभसँ सेहो आग्रह करबनि‍ जे ई लोकनि‍ बीजूकेँ सहयोग करथि‍।‍” बुढ़ बजलाह- “कुनो बात नै। बीजू तँ गामक बेटी थीकीह। आर अहाँ लोकनि‍ तँ हमरे सभ लेल कार्य कऽ रहल छी। फेर सहयोग तँ करबे करबनि‍।” एकर बाद हुनका नमस्‍कार कए एक महि‍ला लग  विदा भेलहुँ। रास्‍तामे बीजू कहलनि‍- “श्रीमान्, ऐ घरक  बारी मे एकटा तीन दि‍न पूर्व मरल बरदक मांस नि‍कालल जाइत छलैक तथा खालकेँ अलग करैत छलीह घरक महि‍ला लोकनि‍। तकरे दुर्गन्‍ध आबि‍ रहल छल। दुरगन्‍ध कनि‍ कम भऽ जाए तँए तीन-चारि‍ मुट्ठी अगरबत्ती जरा देने रही।‍” आब हमरा लोकनि‍ गामक एक 64 वर्षीए नागा महि‍ला श्रीमती एथेनाक घर पहुँचलौं बड्ड साफ-स्‍वच्‍छ आ कलात्‍मक घर। चारू कात फूल आ हरि‍यरीसँ भरल। घरक भीतरसँ एक युवक बाहर एलाह। हमरा लोकनि‍केँ बैसवाक लेल कहलनि‍। कनी कालक बाद श्रीमती एथेना कमरमे फनेक लपेटने तथा ब्‍लाऊज पहि‍रने एलीह। सहज आ सुन्‍दर स्‍वरूप। नि‍श्‍छल मोन। शांत स्‍वरूप। बात होमए लागल। कहलनि‍- “हम्‍मर माता-पि‍ता कहि‍ नै कि‍एक इसाइ भऽ गेलाह। मुदा हमरा लोकनि‍ नागा परम्‍पराकेँ धेने रहलहुँ। पि‍ताजी हमरा एदति‍काल बेटे जकाँ सि‍नेह देलनि‍। अन्‍तत: 1969 ई.मे गुवाहाटी वि‍श्‍ववि‍द्यालयसँ राजनीति‍ शास्‍त्रमे एम.ए. केलहुँ। हम पहि‍ल कबुइ नागाक महि‍ला छी जे एम.ए. केलहुँ तकरबाद हमर वि‍वाह भऽ गेल। हमर पति‍ इन्‍जि‍नीयर छलाह। ओ हमरा कहलनि‍ जे अहाँ चाही तँ नौकरी कऽ सकैत छी। फेर की छल। भारतीय डाक वि‍भागमे भेकेन्‍सी एलैक हम अपन आवेदन पत्र जमा केलौं आ हमरा नौकरी भेट गेल। आब अवकाश प्राप्‍त कए अपन गाममे रहि‍ रहल छी। बेटा अपन मकान गौहाटीमे बनौने अछि‍ आ बेटी ि‍दल्‍लीमे। दुनू कहैत अछि‍ गौहाटी कि‍ंवा दि‍ल्‍ली आबि‍ जाऊ। अतए तमाम सुवि‍धा उपलब्‍ध छै। मुदा हम कतौ नै जाए चाहैत छी। हमर पति‍ केन्‍सरसँ मरि‍ गेलाह। हम देखैत छी जे गामक बच्‍चा सभ दि‍शाहि‍न भऽ रहल अछि‍। युवक सभ बेरोजगार आ सड़कछाप छथि‍। महि‍ला लोकनि‍ शोषि‍त जीवन जीबाक लेल बाध्‍य छथि‍। लोकमे देशी दारू बनेबाक आ पीबाक जबरदस्‍ती रोग भऽ गेल छै। बच्‍चासभ लेल कुनो एहेन सार्वजनि‍क स्‍थल नै छै जतए ओ सभ खेल-कुदि‍ सकए, कला आ रचनात्‍मक प्रवृत्ति‍केँ आगाँ बढ़ा सकै, महि‍ला एवं युवा वर्ग सभ लेल कुनो आमदनीक जरि‍या नै छै। सोचैत छी गामेमे रहि‍ ऐ दि‍शामे कार्य करब। आब Read Global संग कार्य प्रारंभ भेल अछि‍। कि‍छु-ने-कि‍छु अवश्‍य भऽ जएतैक।‍” एथेनाकसँ इहो पता चलल जे गामक अनेको युवक दारू पीब समएसँ पहि‍ने काल-कवलि‍त भऽ गेलाह। हुनका लोकनि‍क विधवा सभ बड़ा कष्‍टक जीवन जीवाक लेल बाध्‍य छथि‍। संगाईप्राऊ गामक अधि‍कांश महि‍ला लोकनि‍ स्‍थानीय दारू भातसँ बनबैत छथि‍। शहरक लोक सभ घरे-घरे आबि‍ दारू पीबैत अछि‍। पच्‍चास टकामे एक मग दारू आ ओकरा संगे सुगरक मांस, कनि‍क सलाद सेहो भेटैत छै। एक ग्राहक  सँ लगभग 20-25 टकाक आमदनी भऽ जाइत छै। अगर एक घरमे एक दि‍नमे पाँचोटा ग्राहक आबि‍ गेलैक तँ औसतन 125 टकाक आमदनी। मुदा एकर वि‍परीत प्रभाव स्‍पष्‍ट छै। दारू पीऐबला सभ महि‍ला सभकेँ कुदृष्‍टि‍सँ देखैत अछि‍। आर्थिक वि‍वशता तथा पैसाक लोभें कि‍छु नागा महि‍ला देह व्‍यापारमे लागलि‍ छथि‍। घरमे दारू सदरि‍काल उपलब्‍ध रहबाक कारणे पुरूष सभ बच्‍चेसँ दारूक सेवन प्रारम्‍भ कऽ लैत अछि‍। महि‍ला सभकेँ अगर अवसर भेटनि‍ तँ ऐ धंधा छोड़ि‍ अर्थोपार्जन केर कुनो आन ब्‍यौंत करतीह। ई बड़ा आशचर्यक वि‍षए थि‍क। मणीपुर राज्‍य दू प्रकारक लोकमे बाटल अछि‍। समतल भू-भागमे रहएबला मैतेई आबादी जे मूलत: वैष्‍णव छथि‍, कृषि‍क कार्यमे दक्ष छथि‍, आ राज्‍यक जनसंख्‍याक पैघ प्रति‍शत छथि‍, आ दोसर दि‍स पहारी क्षेत्रमे बसनि‍हार 31 जनजातीय समुदाय। मैतई महि‍ला लोकनि‍ बड्ड उद्यमी छथि‍। मणि‍पुर केर प्रत्‍येक जि‍ला तथा ब्‍लॉक स्‍तरपर आमा मार्केट अर्थात मातृ-बाजार लगैत छै। ऐ तरहक अमां-मार्केटमे केवल स्‍त्रीगणें सभ  दोकान लऽ सकैत छथि‍। आश्‍चर्यक बात ई जे समस्‍त मणि‍पुरमे अमां-मार्केटमे एकौटा दोकान आदि‍वासी महि‍ला लोकनि‍ नै लेलनि‍ अछि‍। आर-त-आर संगाईप्रऊ गाममे जे तरकारी बेचैवाली महि‍ला सभ छलीह सेहो सभ मैतेई महि‍ला छलीह। एकर एगो कारण इहो बुझना गेल जे मैतेई पुरूष बड़ा उद्यमी होइत छथि‍। महि‍ला लोकनि‍ कपड़ा बुनि‍, खेत-पथारमे कार्य कऽ कि‍छु तरकारी इत्‍यादि‍ बेच, कि‍छु समानकेेँ बाजारमे बेच आ नेरेगाक कार्यक्रममे कि‍छु दि‍न कार्य  के अपन-अपन घरक हेतु कि‍छु अति‍रि‍क्‍त आमदनीक ब्‍यौंत कऽ लैत छथि‍। ऐ तरहेँ गृहस्‍थीमे स्‍त्री-पुरूषक सौहार्दपूर्ण सहभागि‍ता देखल जा सकैत अछि‍। हलांकि‍ एथेना आ संगाइप्राऊ गामक अन्‍य उत्‍साही महि‍ला लोकनि‍ हमरा कहलनि‍ जे अगर महि‍ला लोकनि‍केँ तकनीकि‍ ज्ञानक शि‍क्षा, उद्यमि‍ताक प्रशि‍क्षण आ इन्‍टरीप्रेन्‍युअर केर ज्ञान वैज्ञानि‍क ढंगसँ देल जानि‍ तँ ई लोकनि‍ वस्‍त्रक बुनकरी, सुगर-आ अन्‍य मांसक आचार आदि‍ प्रोसेसि‍ंग आ पेकेजि‍ंग, नेबो, हरि‍यर मि‍रचाइ, बांसक कोपर इत्‍यादि‍ अचार बना बजारमे बेच सकैत छथि‍। आ एथेना ऐ दिशा मे प्रयासरत छथि‍। अगर सांस्‍कृति‍क पक्षकेँ देखल जाए तँ ऐ गामक कबुई नागा अपन संस्‍कार, लोक रीति‍-रि‍वाज, वस्‍त्र-वि‍न्‍यास, श्रृंगार, परम्‍परासँ अखनो जुरल छथि‍। बुजुर्गक सम्‍मान सर्वोपरि‍ अछि‍। युवक आइयो बि‍ना बुजुर्गक आज्ञा लेने कुनो वि‍शेष किंवा  महत्‍वपूर्ण निर्णय  नै लैत अछि‍। बहुरंगी वस्‍त्र आ आकर्षक युवती-युवककेँ नचैत-गबैत देखब तँ देखि‍ते रहि‍ जाएब। सौन्‍दर्य जेना हि‍नका लोकनि‍क बीच कैद भऽ गेल हो। बाह रे देह सौष्‍ठव। बाह रे सुन्‍दरता!  बाह रे श्रृंगार! बाह रे युवक आ युवतीक मध्‍य नैसर्गिक प्‍यार! कबुई नागाक प्रत्‍येक घरमे पूर्वजक फोटो टांगल देखलहुँ। फोटोमे नागा जनजाति‍क लोकक पहाड़, या प्रकृति‍सँ सम्‍बन्‍ध सेहो सम्‍मि‍लि‍त रहैक। अपन घर आ दैनि‍क जीवनसँ सम्‍बन्‍धि‍त उपयोगक तमाम वस्‍तुकेँ कलाकृति‍सँ मण्‍डि‍त कए  जीबाक कला सीखबाक हो, स्‍वच्‍छ केना रही से जनबाक हो, पि‍तृ केँ सदति‍काल केना याद रखी से शि‍क्षा लेबाक हो, गरीबी जीवनमे रहि‍यो अपन मांटि‍-आ संस्‍कारसँ सि‍नेह देखबाक हो, सदति‍काल चौअन्नी मुस्‍कान बला चेहरा बनेवाक हो तँ कुनो नागा समाजमे जा कऽ कि‍छु दि‍न रहू। पता लागि‍ जाएत। २ राजदेव मंडल उपन्‍यास हमर टोल पूर्वरूप :- (क) अहाँ अही वसुंधराक कोनो कोनपर छी। ई हमर आत्‍मवि‍श्‍वास कहि‍ रहल अछि।‍ अहाँक नै देखि‍तहुँ हम देख रहल छी। अहाँक उपस्‍थि‍ति‍क ज्‍योज्‍स्‍ना हमरा चारूभर आभासीन भऽ रहल अछि‍। आर ओइ ज्‍योति‍सँ हमर रोम-रोम पुलकि‍त भऽ रहल अछि‍। हमहूँ तँ ओइ नृत्‍यलीलाक अंश छी। हम बुभुक्षि‍त छी अहाँक सि‍नेह आ आशीरवादक लेल। हमरा क्षमा नै करब तँ दण्‍ड दि‍अ। कि‍न्‍तु बि‍सरू नै। यएह कामना अछि‍। अहाँक स्‍मरण कऽ कि‍छु रचबाक प्रयत्‍न कऽ रहल छी। (ख) वि‍शाल सागरक पसरल जलपर धनुकटोली ठाढ़ अछि‍। की ओ हँसि‍ रहल छै? आकि कानि‍‍ रहल छै? लगैत अछि‍ जेना रँग-बि‍रँगक जलमे ओ उगि‍ आएल अछि‍। चारूभर उड़ैत सुगन्‍धि‍त धुइयाँ। मुँह आ देहमे लटपटाइत बादल जकाँ कारी आ उज्‍जर धुइयाँ। आ लगैत छै जे ऊ आकृति‍ रसे-रस बढ़ि‍ रहल हो। गाम-नगर-महानगर सभटा आकृति‍क भीतर ढुकल जा रहल हो। नजरि‍क जे एकटा बि‍स्‍तार होइ छै, सेहो जेना ओकरा सोझहामे छोट भेल जा रहल छै। ओकरा नि‍साँससँ नि‍कलैत हवा, बुझाइ छै जेना बि‍हाड़ि‍ बहैत हो। बहुत गोटे जेना एक्के बेर जय-जयकार केलक। मथापर जटा, अधपक्कू दाढ़ी-मोछ, लाल कुंडाबोर आँखि‍ हाथमे बड़कीटा शंख लेने एकटा बाबाजी देखाए पड़ैत छै। ओकरा आँखि‍सँ लहू बहि‍ रहल छै। हवाकेँ कंपि‍त करैत गम्‍भीर वाणी नि‍कलैत अछि‍- “दैवि‍क दैहि‍क भौति‍क तापा....।‍” आकास फाड़ैबला शंखनादसँ आगूक शब्‍द झपा गेल। संगे बाबा महतोकेँ जय-जयकार होअए लगल। धनुकटोली शनै: शनै: जलमे समा रहल अछि‍। ओइ स्‍थानपर उगैत छै- एकटा छोटका टोल। जेना हमर टोल। छोट-पैघ, नीक-अधलाह घर-दुआरि‍। हँसैत-कानैत लोक-वेद, धीया-पुता, माल-जाल, चि‍रइ-चुनमुन्नी, सुखल आ हरि‍यर- गाछ-बि‍रि‍छ, पोखरि‍, इनार गली, सड़क, चौबटि‍या। की ई सपना छी आकि‍ सत्‍य.....। आकि‍ सत्‍यक सपना? क्रमश: ३ धीरेन्‍द्र कुमार नो एंट्री : मा प्रवि‍श (उदय नारायण सि‍ंह 'नचि‍केता') टि‍प्‍पणी- नाटक अधुनातन अछि‍। पूर्वक नाटक नै पढ़ने मात्र हमर वि‍चार ऐ नाटकपर केन्‍द्रि‍त अछि‍। समएक संगे लेखन, वि‍षए-वस्‍तु, पात्र काल सभमे परि‍वर्त्तन होइत अछि‍। मैथि‍ली साहि‍त्‍यकेँ अधुनातन हेबाक चाही, तै आकांक्षाकेँ ई नाटक पूर्ति करैत अछि‍। नाटककारकेँ एकर सम्‍यक बोध छन्‍हि‍ तँए मैथि‍ल होएबाक कारणे हम आभार व्‍यक्त करैत छी। समाजमे जे घटि‍त होइत अछि‍ रचनाकार प्राय: ओकरे चि‍त्रण करैत छथि‍। नाटककार स्‍वर्ग-नरकक अवधारणापर नाटक लि‍खने छथि‍ मुदा नाटकक वि‍षए-वस्‍तु प्रासंगि‍क धरतीक वि‍द्रूपता अछि‍। ऐ वि‍द्रूपताक माध्‍यम बनौने छथि‍। भागम-भाग, क्‍यू, वर्ण-व्‍यवस्‍था समाजसँ उपजल चाेरि‍, बेरोजगारी आ धूर्तता सन समस्‍या ऐ नाटकमे संयोजि‍त अछि‍। नाटकमे पात्रक संख्‍याक अनुकूल वि‍षए-वस्‍तु जे उठैत गेल अछि‍ ओकरा नाटककार ऐसँ कमो पात्रमे मंचपर आनि‍ सकैत छलाह। पात्रक अधि‍क्‍य मंचपर सफल ि‍नर्देशककेँ सुलभ हेतनि‍ मि‍थि‍लामे एकर अभाव होएत। भऽ सकैत अछि‍ हुनकर दृष्‍टि‍मे संपूर्ण धरती हुअए। समस्‍याकेँ मंचपर आनब पूर्ण सफलता होइत अछि‍ ओकरा तीक्ष्‍णता संगे राखब जैसँ दर्शकक हृदएपर प्रभाव पड़ै तैमे कमी अनुभव होइत अछि‍। कोनो रचना जँ हमरा बान्‍हि‍ लि‍अए ऐमे अभाव अछि‍। नाटकक संवादमे शब्‍दक खेल कतहुँ-कतहुँ देखएमे अबैत अछि‍ पृष्‍ट सं- 20-21 द्रष्‍टव्‍य अछि‍। संवादकेँ बान्हल नै जा सकल अछि‍। नाटककार अतीतक प्रत्‍यंचापर भवि‍ष्‍यक वाण चढ़ा शर-संधान करैत अछि‍। समाजक स्‍थि‍ति‍सँ ओकर वि‍संगति‍ लक्ष्‍य छन्‍हि‍। “‍चोर सि‍खावय बीमा-महि‍मा पाकेटमारो करै बयान! मार उच्‍चका झाड़ि‍ लेलक अछि‍ पाट-कपाट तऽ जय सि‍याराम।।” समाजक छदम्, राजनीति‍क उलटा-फेर आकर्षक ढंगसँ व्‍यक्‍त अछि‍। नि‍रालाक शीध्र झरो हे जीर्ण पत्र' सदृश नाटककारकेँ नवीन आकांक्षा छन्‍हि‍- “आऊ पुरातन, आऊ हे नूतन। हे नवयौवन, आऊ सनातन।। प्राण-परायण, जीर्ण जरायन। कज्र-कठि‍न प्रणाम गौण गरायन।‍” नाटकमे गीतक प्रयोग श्‍लाध्‍य अछि‍। संगीत दर्शककेँ बान्‍हि‍ कऽ रखैत अछि‍ तैमे नाटककार सफल छथि‍। हास्‍य जै ढंगे मुखर अछि‍। करूण तहि‍ना मुखर नै अछि‍। नाटककारकेँ संस्‍कृतक नीक ज्ञान छन्‍हि‍- नाटकसँ उद्भाषि‍त होइत अछि‍। काल-बोध आ वास्‍तवि‍कतो चि‍त्रणमे जतऽ उपयोगी अछि‍ ततहि‍ं आम दर्शक लेल बोधगम्‍यतामे अशक्‍त अछि‍। ओना श्री गजेन्‍द्र ठाकुर जी प्रकाशकक दि‍ससँ वि‍चार व्‍यक्‍त केने छथि‍। पाश्‍चात्‍य आ भारतीय काव्‍यशास्‍त्रीय दृष्‍टि‍कोणसँ हुनकर वि‍चार स्‍वागत योग्‍य अछि‍। कोनो रचनामे गुण-अवगुण दुनू होइत अछि‍। तै दृष्‍टि‍कोणसँ हम सशक्त भऽ सकैत छी नाटक सफल अछि‍ आ मैथि‍ली साहि‍त्‍यक एकटा उपलब्‍धि‍ अछि‍। ४ डा. रमानन्द झा ‘रमण’ शब्द विभक्ति सम्वाद शब्द - आउ, लग आउ, एना छिटकल किए छी ? अहाँ लगमे रहैत छी तँ दस गोटे पूछै अछि। नहि रहब तँ हमरा के पूछत? विभक्ति - ई हमर सौभाग्य भेल। अहाँक बिना हमर कोन ठेकान ? मुदा की कहू ? अपन मैथिल समाज केहन कुचेष्टी आ झगड़ लगाओन अछि, से जनतहि होएब? नहि सोहाइत छैक जे लोक मिलि के ँ रहए। घर फुटौअलिमे मजा अबैत छनि। फेर किछु भाषाशास्त्री छथि, किछु उत्साही लेखक छथि जे अहाँसँ फराके रहबाक लेल हमरा उसकबैत रहैत छथि। कहल कोना टालबनि, भय होइत अछि, कहीं गोलैसीमे ने फँसा देथि। शब्द - धुत्! भाषाशास्त्री! वैयाकरण! से कतय पाबी? अल्पज्ञानी लेखकक अभाव सेहो नहि ने अछि, यै? ई अल्पज्ञानीए ने कहत, हम जे बजैत छी सएह शुद्ध अछि, हम जे लिखैत छी, सएह ठीेक अछि। कहू तँ एहन कोनो भाषामे भेलैक अछि? विभक्ति - से हम की जानए गेलिऐ। हमरा अहाँक संग नीक लगैए, सएह टा हम कहि सकैत छी। शब्द - स े तँ मानलहँ।ु मुदा बरजबाक कारण की छनि? कहे न लाभ दिआबए चाहैत छथि आ े सभ? आ कि हम नहि सोहाइत छीअनि? ते ँ ? विभक्ति - अहाँ नहि सेाहेबनि, से की बनतनि? तखन की मंसा छनि, से तँ ओएह लोकनि जानथि। मुदा हमरा मोनमे किछु खुटकैत अछि, से कहि दैत छी। अहाँ भेलहुँ पुरुष आ हम भेलहुँ स्त्री। अहाँ छी अनन्त पुरुष आ हम अहाँक भक्तिक आकांक्षी, विभक्ति। हमरा अहाँके ँ एकठाम आ सेहो एक पाँतीमे सटि बैसब कथमपि उचित नहि अछि। किनसाइत जँ इएह हुनकालोकनिक नहि पचैत होनि? शब्द - से, हम नहि जानी। मुदा हम जे अनुभव करैत छी आ किछु विश्वासो अछि, से कहैत छी। ओ सब ई बिसरि जाइत छथि जे संस्कृत भाषाक साम्राज्यमे अहाँ हमर संगिनी बनल रहलहुँ। कोनो विद्वानके ँभ्रम नहि भेलनि। असमंजस्यमे नहि पड़लाह। मुदा मैथिलीक नवका विद्वान आ नवसिखुआ लेखकके ँ भ्रम होइत छनि। भ्रमाह लोकक परामर्श मानि अवसर अबितहि हमरा लगसँ अहाँ छिटकि जाइत छी। दूनू गोटेक कतेक दिनक साहचर्य अछि, एहन कोनो घटना मोन अछि जखन हम कोनो प्रकारक अत्याचार अहाँ पर कएने होइ? सुनू, अहाँ असगर रही वा दू गोटे मिलि के ँ रही, विश्वास राखू अहाँक धर्म पर कनिको आघात नहि लागत। अहाँ सन उपकारी लोकके ँहम बारि रखने रही, कोना छजत हमरा? कोना उचित होएत? हमर आत्मा कलपत नहि? विभक्ति - से तँ बुझलहुँ, मुदा जँ हम अहाँक लग नहि आबि अहाँक सहयोगी बनल रही तँ एहिमे कोनो हर्ज? ओना हमरा अहाँक संग रहबामे कोनो आपत्ति नहि अछि। अहीं ने हमर धर्मपिता आ अवलम्ब छी, तखन कोन आपत्ति! मुदा जे स्त्रीक स्वतन्त्रताक विरोधी छथि आ जे स्त्री एवं पुरुषके ँ फराक-फराक रखबामे अपन चातुर्यक परिचय देमए चाहैत छथि, से नहि ने चाहताह जे हम आ अहाँ एक पाँतीमे बैसी। सन्निकट आबी। ओना कौखन ई हमरा उचितो लगैत अछि। शब्द - अहाँ अपन इच्छासँ वा अपन प्रकृतिक कारणे ँ भलहिं हमरासँ हटल रहबाक विचार करी। मुदा हम ई कहिओ नहि चाहब जे एहि लेल अहाँके ँकेओ संकपंज कर्रिथ वा बहकाबथि। आ स्वतन्त्र भए अहाँ जतए-ततए असगर बैसल करी। सोचिऔ, एहिसँ समाजक कोन उपकार होएतैक? विभक्ति - हम फराको रहि अहाँक नजरिसँ किन्नहुँ कात नहि भए सकैत छी। यदि अहाँक कृपा-दृष्टि बनल रहए। शब्द - यदि अहाँ फराके रहबाक ठानि लेने होए तँ हमर कृपा-दृष्टि कतेक दिन बनल रहत? प्रबुद्ध पाठकक कृपा-दृष्टि रहबाक चाहिअनि। अन्यथा हमर अहाँक जे सम्बन्ध अदौसँ अछि, से भंगे बूझू। विभक्ति - नहि, नहि। से नहि करू। एहि लेल यदि अहाँ सम्बन्ध-विच्छेद करए चाहैत छी तँ हम वचन दैत 1 छी ककरो कहलमे हम नहि आएब। कहिओ अहाँक संग नहि छोड़ब। मुदा एक टा शर्त अछि। शब्द - शर्त? कहू कोन शर्त अछि। विभक्ति - अहाँ बहुरूपिया छी, कौखन संज्ञा रूपमे रहैत छी, कौखन सर्वनाम रूपमे, कौखन विशेषण रूपमे, कौखन क्रिया रूपमे। एहिना आनो-आनो रूपसभ अहाँक अछि। ई रूप-परिवर्तन हमरा पसीन नहि अछि। शब्द - सभटा छी तँ हमरे रूप। जखन जेहन प्रयोजन भेल, तखन तेहन रूप धारण कए लैत छी। से नहि करब तँ सम्प्रेषण-व्यापार सार्थक नहि होएतैक। विभक्ति - तखन तँ अहाँ मैथिलीक कतेको साहित्यकार जकाँ बहुविधावादी भेलहुँ। सगर रातिक आयोजनमे जएबाक अछि तँ कथा लिखि लेल, मंच भेटल तँ पांती जोड़ि कवि भए गेलहुँ आ समांग संयोजक भेलाह तँ संगोष्ठी लेल एमहर-ओमहरसँ आलेख तैआर कए लेल। एहन मंचलुब्धक पाछू-पाछू चलैत रहब, हमरासँ पार नहि लागत। अहाँक कोन रूपक हम सहगामी होउ, अहीें निर्णय करू। शब्द - अहाँक आरोप अयुक्तपूर्ण एवं अयथार्थ नहि अछि। अहाँ जनैत छी हम सामाजिक लोक छी। लोक हमरा अपन अव्यक्त भावक अभिव्यक्तिक माध्यम बनबैत अछि। हम लोकक ई उपकार आवश्यकतानुसार अपन रूप बदलि-बदलि करैत रहैत छी। व्याकरणक योगबलसँ अपन रूप बदलब हमरा लेल कोनो कठिन नहि अछि। अहाँ बिसरल नहि होएब ‘परोपकाराय पुण्याय पापाय परपीडन’। से परोपकार छोड़ि परपीड़क हम कोना बनि जाउ? विभक्ति - से हम कहाँ कहैत छी। मुदा अहाँ भेलहुँ पुरुष आ हम भेलहुँ स्त्री। व्याकरणिक योगबलसँ अहाँ रूप बदलैत रही आ हम अहाँक संग रासलीला रचबैत रही, से देखि लोक की कहत? लोक-लाजो तँ कोनो वस्तु थिकैक? अहाँक सान्निध्य हम चाहैत छी, तखन कोन उपाय अछि? शब्द - अहीं कहू हमर कोन रूप अहाँके ँ पसीन अछि। ई कहि शब्द चट अपन रूप देखबए लगलाह। खन सर्वनाम रूप, खन क्रिया रूप, खन विशेषण रूप, खन क्रियाविशेषण रूप, खन अव्यय रूप, आदि। शब्दक रूप परिवर्तन शक्तिपर अचम्भित विभक्तिक आँखि ओकर संज्ञा रूप पर आबि अंटकि गेलैक आ ओ शब्दक संज्ञा रूपमे जाए सटि गेल (जेना, गामके ँ- द्वितीया, गामसँ - तृतीया, गामके ँ-चतुर्थी, गामसँ - पंचमी, गामक - षष्ठी, गाममे - सप्तमी)। ई देखि शब्दक संज्ञा रूप विभक्तिसँ अपन प्रतिरूप सर्वनामक स्थिति स्पष्ट कएलक। ओ विभक्तिके ँबुझओलक जे प्रयोग सौष्ठव लेल लोक हमर एहि रूपक प्रयोग अनवरत करैत अछि। ई नहि मानि लेब जे ई हमर अपांक्तेय रूप थिक। सहमतिमे विभक्तिक मूरी डोलल। विभक्तिक मोनसँ फराक रहबाक विचार निपत्ता भए गेलैक। कोनो विवाद नहि रहल। ई निर्णय भेलैक जे विभक्तिक उच्चारण वा लेख सदा शब्दक संज्ञा रूपक मूलमे सटाए कएल जाए। विभक्ति ओ संज्ञाक बीचमे ने कोनो विच्छेद कएल जाए आ ने कोनो आन पद ओकर बीचमे राखल जाए तथा शब्दक गणनामे सदा एक शब्द मानल जाए। ओहि दिनसँ विभक्ति-संयोजन संज्ञा आ सर्वनाममे होअए लागल। ५ मुन्नाजीक दूटा विहनि कथा हाथीक दाँत १० मै १९४६ केँ यूनेस्को द्वारा अमेरिकाक मैनहट्टन शहरमे सर्वभाषिक सम्मेलनक आयोजन कएल गेल। उद्देश्य छल अंग्रेजीक स्थानपर ओकर वैकल्पिक भाषा चयनक, जे सरल, संक्षिप्त आ कर्णप्रिय हो। भीड़ भरल सम्मेलन भवनमे घुसवासँ पहिने अप्पन-अप्पन भाषामे घुसवाक अधिकार मँगबाक लेल कहल गेल। चूँकि पहिनेसँ वैश्विक भाषा अंग्रेजी छल, ओकरासँ तुलनात्मक अध्ययन वास्ते ओकर प्रतिभागीक पहिल प्रवेश- मे आइ कम इन सर! यस, कम इन। भारतीय भाषामे सँ बांग्ला, पंजाबी आ मैथिलीकेँ ऐ मे सम्मिलित कएल गेल छल। बांग्ला प्रतिभागी- “आमि आस्ते पारी...!” पंजाबी प्रतिभागी- “मैं अन्दर आवाँ...!” आब बेर मैथिली प्रतिभागीक एलै, दुआरिपर जा कहलक- “पैसी...?” यूनेस्कोक जुरी सभ अगिला शब्दक प्रतीक्षारत मैथिली प्रतिनिधिक मूँह तकलक, ओ कहलनि- आऊ! सर्वसम्मतिसँ मैथिलीकेँ वैश्विक भाषा बनेबाक प्रस्ताव राखल गेल। मैथिल श्रोताजन समवेत स्वरे विरोध जतेवा लेल ठाढ़ भेला -नै, किन्नहुँ हम सभ अपन बपौतीकेँ आन लोककेँ नै भोग देबै। यूनेस्को अधिकारी आश्चर्यचकित होइत कहलनि- “ई भाषा सुनबामे मधुर, बजबामे सरल आ संक्षिप्त तँ अछि मुदा एकरा भीतर एहेन विस्फोटक अछि जइसँ ई सभ कतौ आगि लगा हाथ तापि सकै छथि।” साढ़े एक्कैसम सदी (२०५०) हेलो...हाय! की हाल छैक? फाइन! ई कोनो समय अछि एबाक, निर्धारित समयसँ डेढ़ घंटा लेट। यौ, खिसिया किएक गेलौं? रस्तामे सौरभ भेट गेल, लेपटा गेल हमरासँ। कहू, की हम भागि जैतौं। केहेन एक्सपीरियेन्स गेन करैत ओ? मुदा अहूँ तँ समयपर नहिये आएल हएब! नै, रियाक संग छलौं, ओकरा हमरा संग गोल्डेन पार्कमे ततेक मोन लगै छलै जे घरा-जोड़ी कऽ लेने छल। छोड़िते नै छ्ल। “जखन रियासँ एतेक घनिष्ठता अछि तँ हमर प्रयोजने की?” अहाँसँ नीक तँ सौरभ जे हमरे टा प्रतीक्षा करैए। “ओ नामरद अछि की...?” हम जाइ छी। कतऽ? सौरभ लग। कथी लेल? इनज्वाय करबा लेल! हेलो...,जुगनू कतऽ छी? बुद्धा गार्डनमे। की करै छी? किछु नै, हर्षक संग छलौंहेँ, आब फ्री छी। आबि जाऊ डियर पार्कमे। अबैत छी। तँ करू प्रतीक्षा जुगनूक। हम चललौं। आब की कियो एकपर आश्रित रहि सकैछ। एक जँ केलक इन्कार तँ दोसर अछि तैयार। बिहुँसि कऽ कऽ लैए अंगीकार! आब विआह तँ कियो ककरोसँ कतौ कऽ लैए। भोगैए कियो, कतौ, ककरो दोसराकेँ। बीसम सदी नै रहलै आब। “पहिने प्रथा छल घर बदलबाक, मुदा आब..., आब तँ परम्परा बनि गेलैए घरबला बदलबाक।” ६ डाॅ. योगानन्‍द झा वनदेवी आ नारी अस्‍मि‍ताक गाथा कथा, उपन्‍यास, नाटक आदि‍ वि‍भि‍न्न वि‍धामे गरि‍मामय लेखनक हेतु प्रख्‍यात, आधुनि‍क मैथि‍ली महि‍ला लेखनमे अग्रि‍म पाङक्‍तेय आ डा. श्रीमती उषा कि‍रण खानक जाइ सँ पहि‍ने एक गोट गद्यात्‍मक खण्‍डकाव्‍य थि‍क। ऐमे सीताक व्‍याथा-कथाकेँ उपजीव्‍य बनाए नारी-अस्‍मताक अन्‍वेषण कएल गेल अछि‍। स्‍वभावत: पौराणि‍क पात्रक आश्रए लऽ अत्‍याधुनि‍क सुगीन वृत्ति‍क प्रतीक्षा साकांक्ष दृष्‍टि‍ ऐ काव्‍यक महत्‍वपूर्ण उपलब्‍धि‍ थि‍क। मर्यादा पुरूषोत्तम श्रीराम आ सती शि‍रोमणि‍ सीताक कथा भारतीय जीवनादर्शनक प्रतीक बनल रहल अदि‍। सीता अदौसँ मि‍थि‍लाक पहचान बनलि‍ रहलि‍ छथि‍। मुदा भूमि‍जा सीताक उत्तरचरि‍तमे ग्रथि‍त सीता-वनवासक कथा मैथि‍ल मानसकेँ सदति‍ उद्वेलि‍त कएने रहलैक अछि‍। एतऽ धरि‍ जे सीताक वि‍वाहक दि‍न वि‍वाह पंचमीकेँ एखनो धरि‍ लोक सरि‍ भऽ कऽ अपन बेटीक वि‍वाहक दि‍वसक रूपमे स्‍वीकार करबामे धखाइत रहल अछि‍। सीताक जन्‍म वि‍रोगहि‍ गेल लोककंठमे हुनका प्रतीक्षा सहानुभूति‍क रूपमे वि‍द्यमान अछि‍। ऐ ठामक सन्‍त परम्‍परामे एकटा समुदाय तँ एतबो धरि‍ मानबाक लेल तत्‍पर नै जे सीता द्वि‍रागमनक बाद अपन सासुर अयोध्‍यो गेलीह आ तत:पर कखनो राम वनवासक कारणे तँ कखनो अपन वनवासक कारणे दु:ख भरल जीवन बि‍तबैत रहलीह। हि‍नकालोकनि‍क तँ ई मान्‍यता छन्‍हि‍। जे वि‍वाहोपरान्‍त दुल्‍लह श्रीराम सभ दि‍नक हेतु मि‍थि‍लेक बनल रहि‍ गेलाह आ मि‍थि‍लाक सखी-लोकनि‍ हुनक दुलार-मलार करैत हुनका सासुरेमे छेकने रहि‍ गेलखि‍न। सीताक दु:खक जीवन-प्रसंगकेँ ओलोकनि‍ ऐ माध्‍यमे बि‍सरबाक आयोजन कएलनि‍। मैथि‍ली दधीचि‍ पं. सुरेन्‍द्र झा सुमन अपन सीतावन्‍दनामे अत्‍यन्‍त कटु शब्‍दें सीता वनवासक प्रति‍ अपन आक्रोश प्रकट कएलनि‍- कि‍ए बनलि‍ वनवासि‍नी पति‍-पद-रेणु सुता हमर। ज्‍वालामुखी न थीक ई ज्‍वलि‍त प्रश्‍न धरणी उरक।। वस्‍तुत: पत्नीक रूपमे सीता पति‍-पद- अनुगमनक भारतीय आदर्श प्रस्‍तुत कएलनि‍ तथापि‍ राजधर्म हुनका वनवासक दण्‍ड दऽ प्रताड़ि‍त कएने छल, जकरा हुनक माता पृथ्‍वी आइयो धरि‍ पचा नै सकलीह अछि‍ आ हुनक आक्राेश आइयो ज्‍वालामुखीक रूपमे प्रकट अछि‍। ई केवल कवि‍कल्‍पने नै, मैथि‍ल मानसक आक्रोशो थि‍क। सीता मि‍थि‍लाक बेटी छलीह। परवर्ती कालमे ओ अयोध्‍याक पुतहु बनलीह आ अपन कर्त्तव्‍य भावना ओ पति‍व्रत्‍य द्वारा एहेन आदर्श उपस्‍थि‍त कएलनि‍ जे भातीय लोकजीवनक आदर्शक रूपमे आइयो प्रथि‍त अछि‍। ओ नैहर आ सासुर दुनू कुलक मान रक्षाक हेतुक यज्ञमे ि‍नरन्‍तर आहुति‍ प्रदान करैत रहलीह। मुदा समाज हुनक चरि‍त्रपर आशंका करैत रहलनि‍। ऐ आशंकाक नि‍वारणर्थ हुनका सर्वसामान्‍यक बीच अग्नि‍ परीक्षा देबए पड़लनि‍। अग्‍नि‍ परीक्षाक बाद जखन ओ अयोध्‍या आपस आएलनि‍, तकर बादो पुनश्‍च हुनक चरि‍त्रपर आक्षेप कएल गेलनि‍ आ मर्यादापुरूषोत्तम राम राजधर्मक अनुदेशे हुनका वनवासक दण्‍ड प्रदान कऽ देलखि‍न सेहो एहन स्‍थि‍ति‍मे जखन ओ दुजीवा छलीह। अग्‍नि‍ परीक्षाक साक्षी राम, अक्षय अनुरागसँ संबलि‍त पति‍ राम हुनका प्रतीक्षा कएल गेल आक्षेपक कोनो प्रति‍रोध नै कऽ सकलखि‍न। नारीक प्रति‍ ई उपेक्षाभाव संभवत: सीताकेँ सहन नै भऽ सकलनि‍ जकर परि‍णाम पाताल-प्रवेशक रूपमे आएल जे आइयो पुरूष समाजक नारीक प्रति‍ हीन मनोभावनाक द्योतक थि‍क आ द्योतक थि‍क नारीक नारीक आक्रोश, वि‍रोध आ वि‍द्रोहक, जकरा श्रीमती खान अपन ऐ गद्य खण्‍डकाव्‍यमे रूपायि‍त कएलनि‍ अछि‍। श्रीराम अयोध्‍याधि‍पति‍ छलाह। प्रजावत्‍सलता हुनक राजधर्म छलनि‍। ऐ राजधर्मक वशीभूत भऽ ओ धोबि‍ द्वारा लांछि‍त सीताकेँ, पूर्वहि‍ अग्‍नि‍ परीक्षि‍ता सीताकेँ वनवास देबाक दण्‍ड सुनौलनि‍। रामक ई मानसि‍कता मर्यादापुरूषोत्तमत्‍वक प्रति‍ हुनक भावनाक अति‍रेकक प्रदर्शन छल। ओ प्रजासँ वाहवाही पएबाक फेरमे एकटा सती सावि‍त्रीक आहि‍पर ध्‍यान नै दऽ सकल छलाह। हीरानन्‍द झा शास्‍त्री ऐ वाहवाहीक फेरमे पड़ल भीष्‍मक मानसि‍कताकेँ उजागर करैत अपन सोचो तो भीष्‍म दीर्धकवि‍तामे कहने छथि‍- सुनते भी कैसे भीष्‍म तुम तो थे वाहवाही लूटने की धुन में बड़ा तेज होता है, यह वाहवाही लूटने का नशा इस नशे में तो मनुष्‍य सब कुछ भूल जाता है बहरे हो जाते हैं, उसके कान ि‍सर्फ एक ही शब्‍द सुनाई देता है उसके कानों को और शायद उसी शब्‍द को वह सुनना भी चाहता है बार-बार जानते हो, क्‍या है वह शब्‍द वह शब्‍द है वाह वाह अहंभाव का ही शायद वि‍कृत रूप है, यह जब मनुष्‍य अपने हर कार्य पर लोगों के मुँह से ि‍सर्फ वाह-वाह ही सुनना चाहता है। भूमि‍जा, रामक ऐ अहंभावक परि‍तुष्‍टि‍क यज्ञाग्‍नि‍मे झोंकि‍ देल गेल छलीह। मुदा हुनको दि‍न फि‍रलनि‍। लव-कुश सन सन्‍तानक माता भेलाक बाद सीताक आत्‍मगौरव उद्दीप्र भेलनि‍। श्रीमती खान सीताक ओइ स्‍वरूपक चि‍त्रण करैत कहैत छथि‍- मंजरायि‍ता गाछ गदरायल माछ बाधवाली गाय आ सन्‍तानवती माय के छथि‍? सभ सि‍या सुकुमारि‍ये तँ छथि‍। आ सन्‍तानवती वनदेवीक पुत्र द्वय राजा रामक अश्‍वेमेध यज्ञक घोड़ाकेँ रोकि‍ लैत छन्‍हि‍, हुनक सैन्‍य समूहकेँ पराजि‍त कऽ दैत छन्‍हि‍। सीता हस्‍क्षेप कऽ कऽ यज्ञक ओइ घोड़ाकेँ ि‍वमुक्‍त करबैत छथि‍। महर्षि वाल्‍मीकि‍ द्वारा सीताक पाति‍व्रत्‍य अभ्‍यर्थनापर राम अपन कृत्‍यपर लज्‍जि‍त होइत छथि‍ आ सीताकेँ वाल्‍मीकि‍ आश्रमसँ अयोध्‍या लऽ चलबाक हेतु तैयार भऽ जाइत छथि‍। रामक उक्‍ति‍ श्रीमती खानक शब्‍दमे द्रष्‍टव्‍य अछि‍- बदलि‍ देब सभटा जे हेबाक छैक से होएत जे नि‍यत छैक से नहि‍ वि‍धि‍क वि‍धान हम तहस नहस कए देब। मुदा सीता अयोध्‍या आपस होएब स्‍वीकार नै करैत छथि‍ आ भूमि‍ पुत्रीमे भूमि‍मे बि‍ला जाइत छथि‍। हुनक भूमि‍मे जयबा सँ पहि‍ने'क उद्घोष ऐ खण्‍डकाव्‍यक परि‍णति‍ थि‍क आ नारी अस्‍मि‍मताक उत्‍कर्षक द्योतक सेहो- हम नहि‍ छी पाषाणी अहल्‍या वातभक्षा नि‍राहारा जनकर कयल प्रभू उद्धार मि‍लाओल स्‍वामी गौतक सँ हम छी सशक्‍त, स्‍वयंपूर्ण सीता श्रीमती खान ऐ खण्‍डकाव्‍यमे सीता धरि‍तक अनुगायनक माध्‍यमे सासुरवास बेटीक मनोभावकेँ अत्‍यन्‍त मनोरम ढंगे प्रस्‍तुत करैत भाव व्‍यक्‍त कएने छथि‍- वि‍आह होइत देरी नारीक स्‍तरीयतामे आकस्‍मि‍क परि‍वर्त्तन भऽ जाइत छैक। ओकर अस्‍मि‍ताकेँ जेना बाकसमे बन्न कऽ देल जाइत छैक, ओकर स्‍वातंत्र्यकेँ बेढ़ि‍ देल जाइत छैक। हुनकहि‍ शब्‍दमे- बि‍सरलहुँ छल्‍हि‍गर दही, हरि‍यर चूड़ा सपना भेल भुन्नाक पेटी, रहूक मूड़ा छूटल एकछि‍न्ना नूआ नौगज्‍जीमे हेरायल तनुक धूआ घरे-घर, गलि‍ये गली, जतय मोन करय ततय चली एतय कनक मन्‍दि‍रक चतुष्‍कोण देहरि‍ के कहय साधंस कतय कि‍ कक्ष कौखन पार करी नारीकेँ पुरूषक समकक्ष कि‍ंवा पुरूषहुसँ अधि‍क सबला स्‍वरूपमे प्रस्‍तुत करबाक भावाभि‍व्‍यक्‍ति‍क कोनो अवसर श्रीमती खान ऐ खण्‍डकाव्‍यमे छोड़लनि‍ नै अछि‍ जे नारी अस्‍मि‍ताक अन्‍वेषणक प्रति‍ हि‍नक साकांछ दृष्‍टि‍क द्योतक अछि‍। ऐमे एक गोट प्रसंग अछि‍ धनुष यज्ञक। धनुष वास्‍तवमे अनेकानेक बलशाली राजालोकनि‍क द्वारा टकसाओलो नै भेल छलनि‍ तकरा राजा राम सहजहि‍ं तोड़ि‍ देलनि‍। मुदा तैसँ हुनक अपौरूषेय बलवि‍क्रम बूझि‍ पुरूष समाजकेँ गर्व करबाक कोनो कारण नै छल, कारण सीता अत्‍यन्‍त सहज रूपसँ ओकरा उठा कऽ प्रति‍दि‍न ठाँव कऽ लेल करैत छलीह। श्रीमती खान कहने छथि‍- केहन केहन मोँछबला अयलाह अएलाह धोंछ भेल मुँह गेलाह एकहु रत्ती कहाँ टसकलनि‍ धनुषा..... कमल नाल सन कोमल कान्‍त कि‍शोर सहजहि‍ उठाओल जनु फूल सि‍ंगरहारक हो हल्‍लुक गे दाइ! ताहू सँ कोमल हमर सि‍या सुकुमारि‍ उठबथि‍ नि‍त दि‍न ठाँव करैक काल जेना सि‍मरक फाहा होइक एही प्रकारक दोसर प्रसंग अछि‍ सहस्रबाहु वधक जैमे अद्भुत रामायणक अनुरूप ई कथा आएल अछि‍ जे सहस्रबाहु राजा रामकेँ अपन बलसँ परास्‍त करबामे सक्षम छल, युद्धभूमि‍मे राजा राम अचेत भऽ गेल छलाह। तखन सीता कालीक रूप धऽ सहस्रबाहुकेँ पराजि‍त करबामे अपन सामर्थ्‍य देखैने छलीह। श्रीमती खान द्वारा अहू कथाक समावेशसँ हुनक काव्‍यमे अभि‍व्‍यक्‍त नारी-भावनाक परि‍चए भेटैत अि‍छ। श्रीमती खानक ऐ खण्‍डकाव्‍यमे वाल्‍मीकीय रामायणमे उद्धतृ ओहू अंशक सवि‍शेष उल्‍लेख अछि‍ जैमे राम द्वारा लंका वि‍जयक उपरान्‍त सीताकेँ परि‍त्‍याग कऽ देबाक कथा अनुस्‍यूत अछि‍ आ जकर मार्जन अग्‍नि‍ परीक्षासँ होइत अछि‍। ऐ सन्‍दर्भमे वाल्‍मीकि‍क कि‍छु श्‍लोकक भावराशि‍केँ श्रीमती खान यथावत् पि‍रगृहीत कऽ लेलनि‍ अछि‍ जे हुनक बहुश्रुति‍क प्रतीक थि‍क यथा- ि‍वदि‍तश्चस्‍तु भद्रं ते योऽ यं रण परि‍श्चम:। सुतीर्ण: सुहृदां वीर्यान्न त्‍वदर्थ मया कृत:।। रक्षता तु मया वृत्तपवादं च सर्वत:। प्रख्‍यातस्‍यात्‍म वंशस्‍ न्‍याङ्गं च परि‍मार्जिता:।। लक्ष्‍मणे वाथ भरते कुरू बुद्धि‍ यथासुखम्।। शत्रुध्‍ने वाथ सुग्रीवे राक्षसे वा वि‍भीषणे। नि‍वेशय मन: सीते यथा वा सुखमात्‍मना।।6/115/। श्रीमती खानक शब्‍दमे ऐ भावकेँ ऐ रूपेँ उपस्‍थापि‍त कएल गेल अि‍छ- सीत हम अहाँक लेल नहि‍ कयलहुँ युद्ध रावण केँ करक परास्‍त देवसत्ता केँ स्‍थापि‍त करक पत्नी जनि‍कर हरण भेल ताहि‍ राजाक कलंक मेटब छल अभि‍ष्‍ट से भेल सि‍द्ध तेँ कयल युद्ध हे सीते, आइ अहाँकेँ कएलहुँ मुक्‍त पत्नी धर्मसँ रहू लंका मे कि‍ंवा जाउ भारतवर्ष भरत कि‍ंवा शत्रुध्‍न आि‍क लक्ष्‍मण जकरा संग रहबाक हो रहू- रामक ई प्रसंग अत्‍यन्‍त कारूणि‍क अछि‍। अहूठाम ि‍नर्दोष सीतापर रामक वचन वाणक प्रहार भेल अछि‍ जकरा नारी अस्‍मि‍तापर प्रहार कहल जा सकैछ। महात्‍मा तुलसीदासकेँ श्रीरामक ई कटूक्‍ति‍पूर्ण वचनसँ ततेक अप्रि‍य बुझना गेलनि‍ जे ओ अपन रामकथामे वस्‍तुक आग्रहेँ ऐ घटनाक अल्‍पतम शब्‍दावलीमे उल्‍लेख कऽ कऽ आगू बढ़ि‍ गेलाह- सीता प्रथम अनल मुह राखी। प्रकट कीन्‍ह चह अंतर साखी।। तेहि‍ कारण करूणानि‍धि‍ कहे कछुक दुर्बाद। युपत जातु धानी सब लागी करै वि‍षाद।। मुदा ऐ प्रसंगमे वाल्‍मीकि‍क सीतामे जै अपार ऊर्जाक दर्शन होइत अछि‍, तकर श्रीमती खानक खण्‍डकाव्‍यमे अभाव देख पड़ैत अछि‍, जकरा आश्‍चर्यजनक कहल जा सकैछ। वाल्‍मीकि‍कि‍ सीता अग्‍नि‍ परीक्षासँ पूर्व प्रगल्‍यतार्वक अपनापर कएल गेल शंकाक प्रति‍वाद करैत छथि‍ जे नारी अस्‍मि‍ताक प्रति‍ हुनक दृढ़ भावनाक प्रति‍क थि‍क यथा- कि‍ं माम सदृशं वाक्‍यमीदृशं शोकदारूणम्। रूक्षं प्रावयसे वीर प्रकृत: प्राकृतामि‍व।। पृथक्‍स्‍त्रीणां प्रचारेण जाति‍त्‍वं परि‍शङ्कसे। परि‍त्‍यजैनां शंङ्कं तु यदि‍ तेऽहं परीक्षि‍ता।। यदहं गात्रसंस्‍पर्शं गतास्‍मि‍ वि‍वशा प्रभो। कामकारो न मे तत्र दैवं दत्राापराध्‍यति‍।। सह संवृद्धभावेन संसर्गेण च मानद। यदि‍ तेऽहं न वि‍ज्ञाता हता तेनास्‍मि‍ शाश्‍वतम्।। त्‍वया तु नृपशार्द्ल शेषमेवानुवर्तता। लघुनेव मनुष्‍येण स्‍त्रीत्‍वमे पुरस्‍कृतम्।। न प्रमाणीकृत: पणि‍र्बाल्‍ये मम नि‍पीडि‍त:। मम भक्‍ति‍श्‍च शीलंच सर्वं ते पृष्‍टत: कृतम्।। इत्‍याति‍। तथापि‍ श्रीमती खानक ऐ खण्‍डकाव्‍यक ई वि‍शि‍ष्‍टता थि‍क जे ऐमे मि‍थि‍लामे रामजानकी वि‍षयक रूढ़ि‍ सभकेँ सेहो महत्‍वपूर्ण स्‍थान देल गेल अछि‍। मि‍थि‍लामे प्रत्‍येक कन्‍याकेँ सीताक प्रतीक मानल जाइत छन्‍हि‍ आ मि‍थि‍लाक लोकगीतमे सीता प्रत्‍येक जनकक पुत्रीक रूपमे गृहीत छथि‍। मैथि‍ली लोकगीतमे सीताक वैवाहि‍क प्रसंगक बहुलय अछि‍ आ लोक सीताक व्‍यथा-कथाकेँ जेना बि‍सरि‍ गेल छथि‍। ऐ तथ्‍यकेँ श्रीमती खान ऐ शब्‍दें अभि‍व्‍यक्‍त कएने छथि‍- सीकी खोंटैत लि‍खि‍या करैत सुआसि‍म लोकनि‍ गओतीह गीत ढौरतीह कोबर बि‍सरि‍ जयतीह सायास सि‍या धि‍याक अनसोहाँत पीर। श्रीमती खान नारी ओ पुरूषक समकक्षता ओ सहभवहि‍ केँ प्रेय रूपमे ऐ साहि‍त्‍यि‍क कृति‍मे प्रस्‍तुत कएलनि‍ अछि‍ जे ऐति‍हासि‍क-पौराणि‍क कथावस्‍तुकेँ अधुनातन युगजीवनक परि‍प्रेक्ष्‍यमे देखबाक अन्‍वेषक दृष्‍टि‍क काणे हि‍नका साहि‍त्‍यकार वरेण्‍य श्रेणीमे पाङ्केय सावि‍त करै छन्‍हि‍। द्रष्‍टव्‍य अछि‍ रामक प्रतीक्षा सीताक ई उक्‍ति‍- हमरा लेल अहाँ प्राणहरि‍ छी राम ने छी साध्‍य, ने साधन अहाँ साक्षत वि‍जय थि‍कहुँ हम मुदा पराजय नहि‍ थि‍कहुँ नहि‍ होइत छैक प्रत्‍येक प्रति‍स्‍पर्द्धामे जय आ पराजय सहजता, सरलता ओ प्रसाद गुण सम्‍पन्नतासँ मण्‍डि‍त तत्‍सम् ओ तद्भवबहुल श्रीमती खानक ऐ खण्‍डकाव्‍यमे उपमा, उत्‍प्रेक्षादि‍ अलंकार सहजहि‍ं आकृष्‍ट करैत अछि‍ आ भवभूति‍क एको रस: करूण एवं प्रति‍ध्वनि‍त होइत देख पड़ैछ। ऐ पठनीय, मननीय ओ संग्रहणीय कृति‍क हेतु श्रीमती खान साधुवादक पात्र छथि‍। मैथि‍ली जगतक तँ सहजहि‍ं, रामकथाक प्रत्‍येक अध्‍येताकेँ हि‍नक ई खण्‍डकाव्‍य आकर्षित करतनि‍, से अपेक्षा कएल जएबाक चाही। कि‍छु परि‍मार्जनक संग ई कृति‍ कालजयीक श्रेणीमे गण्‍य होएबाक योग्‍यता रखैछ। मैथि‍ली रामकथाक आयामकेँ संवद्धि‍त करैबला ऐ कृति‍केँ वि‍भि‍न्न दृष्‍टि‍ये समीक्षा-समालोचनाक वि‍मर्श परक आयाम भेटक चाही। ‍ ३. पद्य ३.१.गंगेश गुंजन- राधा- २९ म खेप ३.२.ज्योति सुनीत चौधरी- दलमा ३.३.उमेश मंडल- कवि‍ता- नोर ३.४.राजेश मोहन झा- कवि‍ता-  मि‍झाइत दीप ३.५.नवीन कुमार "आशा"- हमरा भेटल ३.६. राम वि‍लास साहु- कवि‍ता- महगाइ ३.७.१.किशन कारीग़र- दौगल चलि जाएब गाम ३.८.गजेन्द्र ठाकुर- कटिहारी गंगेश गुंजन राधा- २९ म खेप पछिला खेप अपने पढ़ि चुकल छी-- बहुत प्रतिष्ठा जीवन कें संसार छोड़ा दैये बहुत प्रतिष्ठा कउखन तेहेन प्रतिष्ठित क' दैये बहुत प्रतिष्ठा भ'लो कें अ-लोक बना दैये बहुत प्रतिष्ठा बना राखि दय भथल इनार आब आगाँ पढ़ू- बहुत प्रतिष्ठा लोकक जीवन मरुथल क' दैए बहुत प्रतिष्ठा प्राणि मात्र से करैत-करैत उदास बहुत प्रतिष्ठा आखिर तँ क' दैत अछि अमर्मक बहुत प्रतिष्ठा सब किछु द' जा सकैत अछि से ठीक बहुत प्रतिष्ठा सब अछैत सभ व्यर्थ बना दैये बहुत प्रतिष्ठा सिन्धु जकाँ अति गंहिर आओर विस्तार बहुत प्रतिष्ठा लोक के लोक-असभ्य बना दैए बहुत प्रतिष्ठा एक तरहें होइत अछि वर्ग विभाजन बहुत प्रतिष्ठा एक समाज बाँटि बखरा क' दैये बहुत प्रतिष्ठा एकहि घर मे बनि जाइछ देबाल बहुत प्रतिष्ठा भाए कें भायक देयाद बना दैये बहुत प्रतिष्ठा निज श्रेष्ठ-बोध सँ कम कें हीन करैये बहुत प्रतिष्ठा एक परिवार अनेक बना दैये बहुत प्रतिष्ठा मधु माहुर बनि व्यक्ति मे भरय विकार बहुत प्रतिष्ठा विद्यो कें व्यापार बना दैये बहुत प्रतिष्ठा कखनो महल कउखन क वैभव बहुत प्रतिष्ठा जीवन-मूल्य दोकान बना दैये बहुत प्रतिष्ठा निबहय तं बना दिअय जन नायक बहुत प्रतिष्ठा ऊघि ने पाबी दैत्य बना दैये बहुत प्रतिष्ठा अपन स्वभावक अपनहि होइछ संघात बहुत प्रतिष्ठा अहंकार बनि पाथर बनबैये बहुत प्रतिष्ठा लेल आखिर लोक रहैछ बेहाल बहुत प्रतिष्ठे लोक मे लोक-दयार्द्र बना दैये सोची, बेर-बेर सोची सब क्यो कतबा क' चाही प्रतिष्ठा सोची आ तय करी प्रतिष्ठा केहन मनुख बनबैये ! बहुत-बहुत क' रखबाक-कहबाक तेहन भेलय रेवाज सब तँ सब सँ श्रेष्ठ धनिक ज्ञानी आ अछि विद्वान क्यो ककरो सँ छोट ने, बयसो मे बुद्धि मे सब तँ सब सँ श्रेष्ठ सबि सँ एवं बड़े महान ई संसार कोना बनलै विकसित भेलैक आ बढ़लैक तकरा लेल जे बुधि-विवेक चाही से सब हाजिर दुनुक बीच केर सेतु टुटल अछि धारे मे बहि गेल खुट्टा-खुट्टी व्यर्थ बात सन ठामक ठामे रहि गेल मुदा अपन एहू स्थिति मे गाम के सब कहि गेल गाम गुम्म अछि, कड़ाम मे गंथाएल बड़द सब जेकाँ एकटा मेहक चारू कात घूमि रहल अछि, अहल भोरे सँ जेना। साँझ धरि सब दिन जानि ने कोन अदृश्य अन्नक क' रहल अछि दाउन एक दिस लोकक देह पर नव-नव वस्त्रक झकाझकी चढ़ि गेलैक अछि। चमकैत रहै छै बेशी लोकक अंग वस्त्र। दोसर दिस बड़द-गाय, जकरा बलें बितैत अछि जीवन, आयुक दिन, मास बर्ख तकर गर्दनि क्रमशः भेल जा रहलए सुन्न । रिक्त, लाल-पीयर-हरियर गरदानी, पैघ-पैघ आकर्षक झमटगर फुदना पुरान मैल होइत एक एक क' सब माल जालक गर्दनि सँ उतरैत गेल आ आब तँ कोनो सौभाग्ये सँ देखाइ पड़ैए-तिनधारी-पंचधारी चित्ती कौड़ीक गाँथल हार। कहाँ देखाइछ नव फुदना सुन्दर गर्दनि वला बड़द कि बच्छा ! यद्यपि दुर्लभ परन्तु से सौख सौभाग्य हुक-हुक करैत जीवि रहल अछि, रच्छ अछि । कोनो गर मे घंटी नहि। कोना दन लगैत सुन्न चुपचाप गर्दनिक बड़द सब बेबस बेमोने क' रहल दाउन-भरि गाँव । एना किएक भेलय बेसी घरक लोक, हमर गाम ! गाम गुम्म अछि, लोकक जेहन अप्पन मोनक हो संसार, तहिना अनमन देखाइत अछि समाज ई संसार मोन खुशी हो सौंसे गाम गबैत लगैत अछि दुःख हो मन मे भरि समाज कनैत लगैत अछि ओना प्रकृति- पहिया नहि कहियो चलब बन्द हो यद्यपि मन ठहरल हो तं चक्र ईहो रूकल लगैत अछि तें पहिने उल्लास उछाह खुशी अंतर केर चाही तें पहिने आलोक-इजोत दिनक मन मे उपजयबाक चाही असल खेत तँ चित्त मनुष्यक जेहन उर्वर हो दुःख-सुख स्वप्न विचार आदर्शक उपजैत अछि तेहन फसील कर्मक जे हो सामर्थ्य जत' धरि अनथक कार्यक सैह बनैत अछि प्रेरक मोनक उर्वरता केर सब दिन परती ओना हरेक हृदय मे रहि आएल अछि सब दिन तहिना किंचित हरियर स्निग्ध क्षेत्र सेहो होइतहिं अछि मनुखक ध्यान मात्र हरियरी कें सम्हारि क' परती उस्सर भूमि विचार परोक्ष बना दैए बेशी काल एक प्रकारें तखनहि नोत पड़ि जाइत छैक दुर्दिन कें एक तरहें करें तखनहि सँ प्रारंभ होइछ अकाल। लोक बूझि नहि पाबय बेसी, जे बुझितो छथि दैनंदिन तुच्छ संतुष्टिक बाटे पर  चलि पड़ैत अपन मोनक संसार साजै छथि अपन रहैत छथि ई समाज जेहि सरल सुलभ प्रवाहक अभ्यासी ताही मध्य बहैत चलैत बहैत छथि ओतबो मे संसार अवश्ये प्रिय थिक रहबा योग्य किन्तु मात्र ई नीक आ रहबा योग्य भ' गेने कथमपि नहि भ' जाइत अछि संसार एहन उपलभ्य जीवन, मनुखक जीवन कें चाही एकटा आदर्श जे  यथार्थ जीवैत लोक रहैत अछि मने मगन से यथार्थ अंततः बालबोधी सुख मात्रक रूप जाहि प्रयोजन सँ भेलय स्त्री-पुरुषक ई सृष्टि तकरा सुन्दर मंगल क' जीवाक व्यवस्था करबाक मनुखेक अछि दायित्व से गंभीर विषय हल्लुक-फुल्लुक जीवन केर दैनिक किछु क्षण संभव हो भने मुदा सतत किछु शाश्वतक बोध पूरित काज सएह बनैत आयल अछि एहि संसारक प्रेय  श्रेयस्कर श्रेयस्कर आर अधिक श्रेयस्कर   मनुखक चिन्ता, मनुजक चेष्टा मनुखेक कर्मक यात्रा अति साधारण,साधारण सँ श्रेष्ठ श्रेष्ठतर सएह जीवनक निजता मुक्त पैघ समाजोन्मुख चेतना ताहि चेतना कें चाही तेहने मूल्यक आहार जीवन मूल्य स्वयं चेतनाक होइछ आत्मिक सामर्थ्य वैह यथार्थ केर भूमिक उपजल फसिलक करैत जाइत अछि नित्य उत्कर्ष, नवीन उत्कर्ष ,उदात्त उत्कर्ष गढ़ैत जाइत अछि टूटल- भग्न मनुष्यक जीवनक नव साँच साँच मे नव रूपाकार जकर नव प्राणस्पन्दने गढ़ैत अछि नव नव जीवन मूल्य, नव आदर्श बनबैत गौण अपन व्यक्तिगत दुःख-सुखक अनुभूति अपन एकान्ती जीवनक सीमित अनुभव यथार्थ तकर संवेदनाक  प्रवाह बनैछ, उद्यत करैत अछि मनुखक एक वचन मनक बहु वचन समाज, समाजक बड़ विराट संसार प्रसारित करैत, बनबैत अपन कर्म सप्रसंग ! ....जारी ज्योति सुनीत चौधरी दलमा दलमाक जड़िपर ठाढ़ बस सऽ निकलल सैलानी सब तैयार भऽ हाथमे रस्सी. पहिन ऑंखिमे चश्मा. जूता. टोपी संग करय करिश्मा ध्येय छल पहुँचब चोटी पर रस्ता भरल घनघोर जंगल विदा भेल रस्ता पर करैत निशान कनिये देर मे भेल भारी थकान ऊपर आ कि गाछ आ कि आकाश नीचा दूर दूर तक समतल के नहि आस बीच ढलान पर पहुँचल छल टोली सुनि रहल छल हिरणक बोली रूकिकय जखन पकरलक गाछ सिहराबय वला चीज आयल हाथ किछु टायर सन पातर ट्यूब ई तऽ छल एक सॉंपक केंचुल कहुना कय रहल छल डर पर काबू कि देखायल हाथी भेल बेकाबू सुर्निसुनि ओकर जोरदार चिंघार सब होशियारी भेल छल बेकार नुकायत पड़ायत कहुना बचल हाथी सब अपन रस्ता बढ़ल आब फेर बेधड़क छल चढ़ब कि भेल शुरू बानरक उपद्रव कहुना पूरा भेल चढ़ाई दैत एक दोसर के बँधाई ऊपर सऽ चारूकातक अद्भुत दृश्य सब भय भऽ गेल छल एकदम अदृश्य। उमेश मंडल कवि‍ता नोर गोरसपट टकधि‍यान लगेने मुन्नि‍या बैसलि‍ अकानैए घर-अंगन, द्वारि‍-दरबज्‍जा भोरे सभ दि‍न बहारैए बर्तन-वासन, छि‍पली-कटोरी सभ दि‍न चमका कऽ मांजैए झक-झक झलकैत थारी-बाटी देख मुन्नि‍या माए गुनगुनाइए गुनगुन्नीमे अह्लाद भरल छै सुख-दुख सेहो उमरल छै मुन्नि‍या आब छोड़त ई दुनि‍या। माइयक आँखि‍क नोर मुन्नि‍याक हृदएमे उठबैत हि‍लकोर भऽ जाइत अछि‍ बेहोश। होश अबि‍ते फेर अकानैए आँखि‍क नोर नि‍ङहारैए माइयक मन टटोलैए सुखक नोर आ दुखक नोर दुनू एक्के संग टघरैत-झहड़ैत माएक चेहरापर देखैए खूर-खूर, खूर-खूर काजौ करैए घर-आंगन सम्‍हारबो करैए। मुन्नि‍या मुदा ई बुझि‍ नै पबैए की खुशी आ की‍ दुख, एक्के संग माइयक आँखि‍मे ई नै पबैए यएह बेवसी मुन्नि‍याकेँ सतबैए। राजेश मोहन झा 'गुंजन' कवि‍ता मि‍झाइत दीप बि‍नु वातीक दीप बनल छी मोती बि‍नु ति‍रस्‍कृत सीप बनल छी कहब की बि‍नु टाकाक गरीवक बेटी ने ताज ने राज महीप बनल छी साज सौन्‍दर्य रहि‍तो मुदा बि‍नु लक्ष्‍मी शारदा की करती मोनक व्‍यथा ककरासँ कही ति‍लक सि‍न्‍धुक ि‍नर्जन द्वीप बनल छी आत्‍मो भावे तन अछि‍ जहि‍ना बि‍नु सोनक श्रृंगार अछि‍ तहि‍ना जनकक हृदए पझाइत भुस्‍सी सम सौराठ-सभामे अपरतीप बनल छी नोरक धारसँ आँखि‍ सुरवाएल वि‍द्या गुणक पुष्‍प मौलाइल ऐ धनक सवंतमे जेठक दुपहरि‍याक वि‍रह गीत बनल छी आगाँ बढ़ू नव तरूण सभ मि‍ल कऽ नै मौलाइत स्‍वर्ण पुष्‍प धन बि‍नु मि‍झाइत दीपमे भरू सि‍नेह-सर करू आलोकि‍त बुझब आकाशदीप बनल छी.....। नवीन कुमार "आशा"- हमरा भेटल नवीन कुमार "आशा" (१९८७- ) पिता श्री गंगानाथ झा, माता श्रीमति विनीता झा। गाम- धानेरामपुर, पोस्ट- लोहना रोड, जिला- दरभंगा। सुनू सुनाउ अपन खबरि नै बनू अहाँ बेखबर बेखबर बनै नै समए अछि मीत अखन गाऊ संगीत संगीतक नै करू अभेलना ओकर सभ स्वरमे अछि तान ओकरा नै करू अनजान जँ आइ फेरब ओकरासँ मुँह फेर जीनाइ भऽ जाए दुरूह एखन अछि बेर संघर्षक ओकरा नै दियौ विराम जँ आइ लगाएब अहाँ विराम नै बनि पाओत अहाँक पहिचान कते दिन लोक पहिचानत छथिन ओ हुनकर सन्तान किछु तय करू प्रत्यत करू तखन अपनाकेँ संयत रचथु भऽ संयत ई अछि सत्य यौ मीत जँ अहाँ छी निर्बल नै देत अहाँकेँ कियो बल जँ अहाँ किछु करब अपने तखन बनि पाओत पहिचान हमर ऐ गामक राखब ध्यान देबनि माता पिताकेँ सम्मान ऐ सँ नै बनू अनजान जँ आइ कनी होएत अपमान नै राखू अपन मान बस देखू एकटा लक्ष्य ओकरा जुनि करू भक्ष जे आइ होइ अपमानित तँ तैँ राखू ई ध्यान लीअए चाही ई शपथ नै होएब ऐ मे दू मत जखन अहाँ पाएब सम्मान नै करब ककरो अपमान आब आशा गपकेँ विराम लगाबथि अपनो आब पहचान बनाबथि सुनू सुनाऊ अपन खबरि (मित्र पी.एस.ठाकुर “बबलू” लेल) राम वि‍लास साहु कवि‍ता- महगाइ महगाइ अहाँ कतएसँ आ कि‍अए एलौ आकि‍ जवरदस्‍ती हमरा देशमे घुसि‍ एलहुँ अहाँ वि‍देशमे भलहि‍ं छलाैं के अहाँकेँ बजेलक आकि‍ भूलसँ एलौं अहाँ अबि‍ते हमरा देशमे आगि‍ लगेलौं नोन शुन्‍य भऽ गेल तेल कतऽ पता नै भेल हरदी कि‍नेमे हड्डी टूटी गेल मशालासँ मन फीर गेल पि‍औज-लहसुन सोना भाव बि‍क गेल पेट्रौल-डि‍जल आसमान चढ़ि‍ गेल अहाँक मारि‍सँ देह टुटि‍ गेल महगाइ कहलक- “‍कि‍एक हमरा दै छी दोख अहाँ सभकेँ नै अछि‍ होश अहाँक देशमे होइए बड़-बड़ घोटाला हमरा बजा कऽ लाबलक घोटालाबला आब हम अहाँ देशकेँ बना देब दि‍वाला खून बेचबा देत वि‍देशबला नेता आ अधि‍कारी भऽ जाएत मालबला सभ जनता बनब बेचारा-बेसाहारा।” अहाँ हमरा सभकेँ कि‍अए बनेलहुँ दि‍वाला महगाइ अहाँ कतएसँ कि‍अए गलौं....। किशन कारीग़र दौगल चलि जाएब गाम। मनुक्ख दौग रहल अछि मचल अछि आपा-धापी जतए केकरो कियो ने चिन्ह रहल अछि एहेन नगर आ पाथर हृद्य सॅं दूर एखने होइए जे दौगल चलि जाएब गाम।। लोहाक छड़ आ सीमेंट कंक्रीट सॅं बनल ओना तऽ ई एकटा आधुनिक महानगर अछि मुदा शहरक एहि आपा-धापी मे मनुक्खक हृद्य जेना पाथर भऽ गेल अछि।। किएक मचल अछि आधुनिकताक ई हरविड़ो ? कि भेटत एहि सॅं कियो ने किछू बूझि रहल अछि जेकरे दूखू रूपैयाक ढ़ेरी लेल अपसियॉंत रहैत अछि पाथर हृद्य मनुक्ख मानवताक मूल्य केने अछि जीरो।। लिफट लागल उ दसमंजिला  मकान एक्के फलैट पर रहितौ लगैत छी अनजान ओ अड़ोसी हम पड़ोसी मुदा एक दोसर के नहि कोनो जान-पहचान।। कहू एहेन कंक्रीटक शहर कोन काजक आधुनिकताक काल कोठरी अछि साजल एहि चमचमाईत कोठरी मे कियो ने केकरो चिन्ह रहल अछि रूपैयाक खातिर आबक मनुक्ख की कि ने कऽ रहल अछि।। अतियौत-पितियौत ममियौत-पिसियौत जेकरा देखू अपने मे मगन चिन्हा परिचे सॅं कोन काज आधुनिकताक काल कोठरी मे आब अनचिन्हार भऽ गेलाह जन्मदाता बूढ़ माए-बाप।। शहरक एहेन अमानवीय आपा-धापी देखि केॅं पसीज गेल हमर हृद्य एहेन अनचिन्हार नगर छोड़ि केॅं मोन होइए एखने आब दौगल चलि जाएब गाम।। हे यौ भलमानुस आधुनिक मनुक्ख एहेन अनचिन्हार नगर ने नीक एहि कंक्रीटक महल सॅ एक बेर तऽ देखू गामक कोनो टूटली मरैया बड्ड नीक।। मनुक्ख एक दोसर के चिन्ह रहल अछि चिड़ै चुनमून चॅू चॅू कए रहल अछि रस्ता-पेरा निश्छल प्रेमक धार बहि रहल अछि हरियर-हरियर खेत-पथार आई सोर कऽ रहल अछि।। टूटलाहा टाट खर-पतारक किछू घर जतए नहि कियो अनचिन्हार नहि कोनो डर चौवटिया लग फरैत अछि खूम आम एहने नगर के औ बाबू लोग कहैत छैक गाम।। गजेन्द्र ठाकुर कटिहारी कनकनी छै बसातमे हाड़मे ढुकि जाएत ई कनकनी पोस्टमार्टम कएल शरीर जे राखल अछि सातटा मोटका शिल्लपर, जड़त कनीकालमे गोइठामे आगि जे अनलन्हिहेँ सुमनजी राखि देल नीचाँ कनकनाइत पानिमे डूम दऽ गोइठाक आगिसँ आगि लऽ शरीरकेँ गति- सद्गति देबा लेल कऽ देलन्हि अग्निकेँ समर्पित तृण, काठ आ घृत समेत घुरि कऽ जएताह सभ लोह, पाथर, आगि आ जल लांघि, छूबि डेढ़ मासक बच्चाकेँ कोरामे लेने माएकेँ छोड़ि घर सभ घुरत एक्कैसम शताब्दीक पहिल दशकक अन्तिम रातिक भोरमे मुदा नै छै कोनो अन्तर पहिरावा आ पुरुखपातकेँ छोड़ि दियौ महिलाक अवस्था देखू एहि कनकनाइत बसातसँ बेशी मारुख हाड़मे ढुकल जाइत अछि कमला कात नै यमुनाक कात हजार माइल दूर गामसँ आबि मिज्झर होइत अछि खररखवाली काकीक श्वेत वस्त्र साइठ साल पूर्वक वएह खिस्सा वएह समाज मात्र पहिराबा बदलि गेल मात्र नदी-धार बदलि गेल सातटा शिल्लपर राखल ओ शरीर अग्नि लीलि रहल सुड्डाह कऽ रहल एकटा परिवार फेरसँ बनबए पड़त आ तीस बर्खक बाद देखब ओकर परिणाम ताधरि हाड़मे ढुकल रहत ई सर्द कनकनी एहि बसातक कनकनीसँ बड्ड बेशी सर्द ........... गोपीचानन, गंगौट, माला, उज्जर नव वस्त्र मुँहमे तुलसीदल, सुवर्ण खण्ड गंगाजल कुश पसारल भूमि तुलसी गाछ लग उत्तर मुँहे पोस्टमार्टम कएल शरीर सुमनजी सेहो नव उज्जर वस्त्र पहिरि जनौ, उत्तरी पहिरि, नव माटिक बर्तनक जलसँ तेकुशासँ पूब मुँहे मंत्र पढ़ै छथि आ ओहि जलसँ मृतककेँ शिक्त करै छथि वामा हाथमे ऊक लऽ गोइठाक आगिसँ धधकबैत छथि तीन बेर मृतकक प्रदीक्षणा कऽ मुँहमे आगि अर्पित होइत अछि कपास, काठ, घृत, धूमन, कर्पूर, चानन कपोतवेश मृतक पाँच-पाँचटा लकड़ी सभ दैत छथि कपोतक दग्ध शरीरावशेष सन मांसपिण्ड भऽ गेलापर सतकठिया लऽ सातबेर प्रदक्षिणा कऽ कुरहरिसँ ओहि ऊकक सात छौ सँ खण्ड कऽ सातो बनहनकेँ काटि सातो सतकठिया आगिमे फेंकि बाल-वृद्धकेँ आगाँ कऽ एड़ी-दौड़ी बचबैत नहाइ लेल जाइ छथि तिलाञ्जलि मोड़ा-तिल-जलसँ बिनु देह पोछने आ फेर मृतकक आंगनमे द्वारपर क्रमसँ लोह, पाथर, आगि आ पानि स्पर्श कऽ घर घुरि जाइ छथि एक्कैसम शताब्दीक पहिल दशकक अन्तिम रातिक भोरमे विदेह नूतन अंक मिथिला कला संगीत १.श्वेता झा चौधरी २.ज्योति सुनीत चौधरी ३.श्वेता झा (सिंगापुर) १ श्वेता झा चौधरी गाम सरिसव-पाही, ललित कला आ गृहविज्ञानमे स्नातक। मिथिला चित्रकलामे सर्टिफिकेट कोर्स। कला प्रदर्शिनी: एक्स.एल.आर.आइ., जमशेदपुरक सांस्कृतिक कार्यक्रम, ग्राम-श्री मेला जमशेदपुर, कला मन्दिर जमशेदपुर ( एक्जीवीशन आ वर्कशॉप)। कला सम्बन्धी कार्य: एन.आइ.टी. जमशेदपुरमे कला प्रतियोगितामे निर्णायकक रूपमे सहभागिता, २००२-०७ धरि बसेरा, जमशेदपुरमे कला-शिक्षक (मिथिला चित्रकला), वूमेन कॉलेज पुस्तकालय आ हॉटेल बूलेवार्ड लेल वाल-पेंटिंग। प्रतिष्ठित स्पॉन्सर: कॉरपोरेट कम्युनिकेशन्स, टिस्को; टी.एस.आर.डी.एस, टिस्को; ए.आइ.ए.डी.ए., स्टेट बैंक ऑफ इण्डिया, जमशेदपुर; विभिन्न व्यक्ति, हॉटेल, संगठन आ व्यक्तिगत कला संग्राहक। हॉबी: मिथिला चित्रकला, ललित कला, संगीत आ भानस-भात। चित्रक विषयमे: सूर्य आशाक आ संकल्पसिद्धिक प्रतीक अछि, अन्हारक बादक प्रकाशक प्रतीक अछि। ई पृथ्वीक जीवनक जड़ि अछि, दैवत्वक आशीर्वादक प्रतीक अछि। तेँ विश्वक सभ संस्कृतिमे ई पूजित अछि, खास कऽ मैथिल संस्कृतिमे (छठि आ मकर संक्रान्ति)। ई चित्र ऐ सभकेँ चित्रित करबाक प्रयास अछि। २. ज्योति सुनीत चौधरी जन्म तिथि -३० दिसम्बर १९७८; जन्म स्थान -बेल्हवार, मधुबनी ; शिक्षा- स्वामी विवेकानन्द मि‌डिल स्कूल़ टिस्को साकची गर्ल्स हाई स्कूल़, मिसेज के एम पी एम इन्टर कालेज़, इन्दिरा गान्धी ओपन यूनिवर्सिटी, आइ सी डबल्यू ए आइ (कॉस्ट एकाउण्टेन्सी); निवास स्थान- लन्दन, यू.के.; पिता- श्री शुभंकर झा, ज़मशेदपुर; माता- श्रीमती सुधा झा, शिवीपट्टी। ज्योतिकेँwww.poetry.comसँ संपादकक चॉयस अवार्ड (अंग्रेजी पद्यक हेतु) भेटल छन्हि। हुनकर अंग्रेजी पद्य किछु दिन धरि www.poetrysoup.com केर मुख्य पृष्ठ पर सेहो रहल अछि। ज्योति मिथिला चित्रकलामे सेहो पारंगत छथि आ हिनकर मिथिला चित्रकलाक प्रदर्शनी ईलिंग आर्ट ग्रुप केर अंतर्गत ईलिंग ब्रॊडवे, लंडनमे प्रदर्शित कएल गेल अछि। कविता संग्रह ’अर्चिस्’ प्रकाशित। ३.श्वेता झा (सिंगापुर) विदेह नूतन अंक गद्य-पद्य भारती मोहनदास (दीर्घकथा):लेखक: उदय प्रकाश (मूल हिन्दीसँ मैथिलीमे अनुवाद विनीत उत्पल) उदय प्रकाश (१९५२- ) “मोहनदास”- हिन्दी दीर्घ कथाक लेखक उदय प्रकाशक जन्म १ जनवरी १९५२ ई. केँ भारतक मध्य प्रदेश राज्यक शहडोल संभागक अनूपपुर जिलाक गाम सीतापुरमे भेलन्हि। हुनकर हिन्दी पद्य-संग्रह सभ छन्हि: सुनो कारीगर, अबूतर कबूतर, रात में हारमोनियम, एक भाषा हुआ करती है। हिनकर हिन्दी गद्य-कथा सभ छन्हि: तिरिछ, और अन्त में प्रार्थना, पॉल गोमरा का स्कूटर, पीली छतरी वाली लड़की, दत्तात्रेय के दुख, अरेबा परेबा, मैंगोसिल, मोहनदास। मोहनदास- दीर्घकथा लेल हिनका साहित्य अकादेमी पुरस्कार २०१० (हिन्दी लेल) देल गेल अछि। अनुवादक: विनीत उत्पल  (१९७८- ) आनंदपुरा, मधेपुरा। प्रारंभिक शिक्षासँ इंटर धरि मुंगेर जिला अंतर्गत रणगांव आ तारापुरमे। तिलकामांझी भागलपुर, विश्वविद्यालयसँ गणितमे बीएससी (आनर्स)। गुरू जम्भेश्वर विश्वविद्यालयसँ जनसंचारमे मास्टर डिग्री। भारतीय विद्या भवन, नई दिल्लीसँ अंगरेजी पत्रकारितामे स्नातकोत्तर डिप्लोमा। जामिया मिल्लिया इस्लामिया, नई दिल्लीसँ जनसंचार आ रचनात्मक लेखनमे स्नातकोत्तर डिप्लोमा। नेल्सन मंडेला सेंटर फॉर पीस एंड कनफ्लिक्ट रिजोल्यूशन, जामिया मिलिया इस्लामियाक पहिल बैचक छात्र भs सर्टिफिकेट प्राप्त। भारतीय विद्या भवनक फ्रेंच कोर्सक छात्र। आकाशवाणी भागलपुरसँ कविता पाठ, परिचर्चा आदि प्रसारित। देशक प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिका सभमे विभिन्न विषयपर स्वतंत्र लेखन। पत्रकारिता कैरियर- दैनिक भास्कर, इंदौर, रायपुर, दिल्ली प्रेस, दैनिक हिंदुस्तान, नई दिल्ली, फरीदाबाद, अकिंचन भारत, आगरा, देशबंधु, दिल्ली मे। एखन राष्ट्रीय सहारा, नोएडा मे वरिष्ट उपसंपादक। "हम पुछैत छी" मैथिली कविता संग्रह प्रकाशित। मोहनदास पोथीक आवरण चित्र मार्कूस फोरनेलक चित्रक उदय प्रकाश द्वारा रूपान्तरण। (उदय प्रकाश जीकेँ "विदेह" विनीत उत्पलकेँ "मोहनदास"क मैथिली अनुवादक अनुमति देबाक लेल धन्यवाद दैत अछि- गजेन्द्र ठाकुर- सम्पादक।) मोहनदास : उदय प्रकाश (मूल हिन्दीसँ मैथिलीमे अनुवाद विनीत उत्पल द्वारा) मोहनदास: पहिल खेप डरक रंग केहन होइत अछि?  भटरंग, खकस्याह, खुनाहनि सन , कारी-स्याह आकि फेर छाउर सन?  एहन छाउर जकरामे आगि एखन धरि मिझाएल नै गेल अछि!... आ फेर कोनो एहन रंग, जकरा पाछाँसँ एकबैग कियो सून-मसान सन ताकए लागैत अछि आ ओकर फाटल ठाममे सँ कनेके दूरीपर कोनो कानैक गधमिसान थकमकाएल सन लखा दैत अछि। समुद्र आ धारक कोनो धारसँ अनचोक्के बालुपर तरपि कऽ पटकल माछक आँखि कहियो अहाँ देखने छिऐ? दम तोड़ैत, खुजल-फाटल आँखि...?...ओहिनो तरहक रंग...! फिल्मक नीकसँ नीक हीरो सेहो अप्पन आँखिक डिम्हा, तकर चारू कातक उजरका स्थल आ मुँहपर कतबैयो कोशिश केलाक बादो ओ रंग नै आनि सकैत अछि जे असल जिनगीमे कोनो बड़ डराएल जिबैत मनुखक आँखि आ मुँहपर देखा पड़ैत अछि। एहन मनुखक, जे कत्तौ बेरिया काल धरि काज कऽ थाकि-हारि कऽ घर घुरि रहल अछि। ओकर हाथमे एकटा झोरा अछि, ओइमे नेनाक लेल कम्मे दामबला टॉफी आ खिलौना छै आ कनियाँक खोंखीक गोली सेहो , मुदा एक्के कोनक आगू ओ दंगा करऽबला सभक बीचमे कोनो सुन-मसान ठामपर अनचोक्के लसकि जाइत अछि आ दुर्भाग्यसँ ओ ओइ संप्रदाय, नस्ल आ संगोरक नै अछि जे भीड़ ओकरा घेरने छै। तखने ओइ काल अप्पन हत्याक एकाध क्षण पहिने ओइ मरैबलाक आँखि, मुँह आ समूच्चे देहमे वएह रंग देखाइ पड़ैत छै, जेकर चर्चा हम केने छी आ जकरा ओइ दिन हम मोहनदासमे देखने रही। "शिंडलर्स लिस्ट' आ फेर ओहने कतेक सिलेमामे अहाँ ओइ जर्मन रेलगाड़ीक दृश्य देखने होएब, जकरा कतौ दूर ठाम पठाएल जा रहल छै। ओइ रेलगाड़ीक डिब्बाक खिड़कीसँ बाहर ताकैत नेना, मौगी आ बुढबाक मुँह अहाँक मोनमे होएत! आ एखन किछु दिन पहिने गुजरातक कतेक शहर-मोहल्लाक घरक छत, खिड़की आ छातमे सँ बाहर ताकैत मुँह। डरक रंग किछु-किछु ओहने रंगक होइत अछि। मोहनदास आगू ठाढ़ अछि आ  अप्पन थरथराइत, दुब्बर अबाजमे कहैत अछि,-"कका, कोनो तरहेँ हमरा बचा लिअ! हम अहाँक आगू हाथ जोडै़त छी!...नेना-बेदरा सभ अछि हमरा! बूढ़ बाप मरि रहल अछि टी.बी.सँ!... अहाँ कही तँ हम अहाँक संग चलि कऽ कोर्टमे हलफनामा दै लेल तैयार छी जे हम मोहनदास नै छी। हम ऐ नामक कोनो मनुखकेँ नै चिन्हैत छी! कियो आर होएत मोहनदास! खाली कोनो तरहेँ हमरा बचा लिअ!' मोहनदाससँ जखन अहाँक भेंट होएत तँ पहिने तँ अहाँकेँ ओकरापर दया आएत मुदा अहाँ डरा जाएब। किएक तँ ई काल डरैएबला काल अछि आ ई आर डरैबला भेल जा रहल अछि। मोहनदास आ हुनकर परिवारक कएकटा पीढ़ीकेँ हम जानैत छी। गाम-घरमे तँ एहने होइत अछि। हुनका देखि कऽ अहाँ सोचियो ने सकैत छी जे ओ ऐ जिलाक सरकारी एम.जी. डिग्री कॉलेजसँ ग्रेजुएट छथि। फर्स्ट डिवीजनक संग! ...आ विश्वविद्यालयक टॉपर सूचीमे, आइसँ दस बरख पहिने हुनकर नाम दोसर नंबर पर छल। हुनकर आजुक देह-दशा हुनकर ओइ कालकेँ लऽ कऽ कोनो गप नै करैत अछि। एकटा फाटल, बेदरंग भेल, ठामे-ठाम चिप्पी लागल, कोनो काल नील रंगक डेनिमक फुलपैंट, सस्ता टेरिकॉटक आधा बाँहिक, दहिना कन्हा लग उघड़ल अंगा। एकरामे कोनो काल चौखाना बनल रहैत, जेकरासँ ओ डरीड़ मेटा रहल अछि, जेकर रंग कहियो हल्लुक रहल होएत। आ एकटा रबड़क सस्ता-बरसाती पनही, जकरा माटि, धूरा, दुख, पानि, काल आ रौद एत्ते चाटि गेल अछि जे  आब ओ कखनो चमड़ा तँ कखनो माटिक बनल देखा पड़ैत अछि। मोहनदासक उमेर अखन पैंतीस-सैंतीस बर्खक होएत, मुदा देखबामे ओ हमरे बराबर आकि हमरासँ बेसी लागैत अछि। एक  तरहेँ हकासल आ दौड़-भाग करैत ओकरा हम सदिखन देखलहुँ। गाममे कत्तौ बैसि कऽ गप करैत, ताश खेलाइत, हँसी-ठहक्का दैत आ टीवी देखैत नै देखलहुँ। कियो कतबो लचार आ डराएल वा जल्दीमे अछि; ई ओकरा कत्तौ ठाढ़ नै हुअए दैत अछि। मोहनदासकेँ लऽ कऽ लोक-बेद कहैत अछि जे ओ सदिखन कोनो-नै-कोनो काज पकड़िये कऽ राखैत अछि, किएक तँ ओकरा पानि पीबाक लेल सभ दिन एकटा नबका इनार कोड़ऽ पड़ैत छै आ सोहारी खेबाक लेल नित्तः नवका फसिल जनमाबऽ पड़ैत छै। ओकरा परिवारमे रोटी-पानिक लेल ओकर बाट जोहैबला एक गोटा नै पाँच गोटा छै। पाँचटा पेट आ पाँचटा मुँह। मोहनदासक बाप काबा दास, जकरा पछिला आठ बरखसँ टी.बी. छै। ओकर माए पुतलीबाइ, जकर आँखि कोनो मंगनीक नेत्र शिविरमे मोतियाबिंद आपरेशन भेलाक बाद आन्हर भऽ गेल छै आ चारू दिस अन्हारे-अन्हार लखा दै छै। ओकर कनियाँ कस्तूरी बाइ, जे किछु नै, अप्पन वरक छाह छिऐ। कस्तूरी बाइ मोहनदासक काजमे संग दैत छथिन आ घरक चूल्हा-चौका ओरियाबैत छथिन। गामक लोक कहैत अछि जे आइ धरि कहियो दुनूकेँ लड़ैत- झगड़ा करैत नै देखने छी। लागैत अछि  ओ विपैत आ आफैत होइत अछि, जे स्त्री-पुरुखक संबंधक नीवकेँ कमजोर करैत अछि। बचल दूटा प्राणीमे एकटा अछि देवदास आ दोसर अछि शारदा।  मोहनदास आ कस्तूरीक दुइटा संतान। उमेर आठ आ छह बरख। देवदास गामक प्राथमिक पाठशालामे पढैत अछि आ स्कूलक बाद गामसँ जाइबला सड़कपर खुजल "दुर्गा ऑटो वर्क्स' मे गाड़ीमे हवा भरैए,  पंचर साटैए आ  स्कूटर-मोटर साइकिलक छोट-मोट भङठी करबामे हेल्परक काज करैए। ऐ काजक लेल ओकरा मासमे सए टका भेटैत छै। तइमे सँ कहि सकैत छी जे मोहनदासक बेटा अप्पन पढ़बाक संग अप्पन दालि-भातक इंतजाम अप्पन मेहनतिसँ कऽ रहल अछि। तइपर सँ ओ अप्पन पएरपर ठाढ़ अछि। पाठशालाक मास्टर साहेबक कहब अछि जे चारिम क्लासमे देवदास पढबामे सभसँ नीक रहए। मुदा जखन ई गप ओकर पिता मोहनदासकेँ बतौलन्हि तँ ओकर आँखि कत्तौ टंगि गेलै। ओकरा जेना अकाशी लागि गेलै। ओकरा मुँह परक डरीड़ थरथराइत छै। आँखिक तेजी मिझाए लागैत छै। जेना कोनो गह्वरसँ ओकर कंठक अवाज बहराइत अछि, "हमहूँ तँ बी.ए. फर्स्ट क्लास छी। दिन-राति घोटैंत रही...! की भेल?" एकर बाद मोहनदासक आँखि चमकि जाइत अछि आ ओ पपड़ी पड़ल ठोरसँ हँसैत कहैत अछि, "आइ काल्हि हम कमप्यूटर सिखैत छी। बस स्टैंडपर जे "स्टार कमप्यूटर सेंटर' अछि, ओतए हम जाइत छी। इमारती समान आ हार्डवेयरक दोकान चलबैबला मोहम्मद इमरानक बेटा शकील ऐ कमप्यूटर सेंटरक मालिक अछि आ ओ कहैत अछि, "कका, टाइपिंग, कंपोजिंग आ प्रिंट निकालैबला काज बुझि गेलहुँ तँ छह सए  टकासँ बेसी देब।' मोहनदास कहैत अछि जे, "टाइपिंगमे ऐ मास हम तीसक स्पीड निकालि लेलहुँ।  छोट-मोट काज भेट जाइत अछि मुदा एखन बहुत रास गलतियो भऽ जाइत अछि आ बहुत रास काल ओइ गलतीकेँ ठीक करैमे लागि जाइत अछि।' मुदा ई सभटा गप बहुत काल पहिलुके अछि। मोहनदासकेँ भारी विपैत पड़ल छै आ ओ बेर-बेर कहैत अछि- "हमर नाम मोहनदास नै अछि।... हम अदालतमे हलफनामा दै लेल तैयार छी। जेकरा बनैक छै ओ बनि जाए मोहनदास। कोनो तरहेँ अहाँ सभ हमरा बचा लिअ!... हम अहाँ सभक कऽल जोड़ैत छी!' मोहनदासक दिक की अछि? ई बताबैक पहिने ओकर परिवारक पाँचम प्राणी माने मोहनदासक घरक छह बरखक शारदाक गप कऽ लेल जाए। छह बरखक शारदा गामक  सरकारी प्राथमिक पाठशालामे दोसर कक्षामे पढ़ैत अछि आ स्कूलक बाद ओ अढाइ किलोमीटर दूर, दू पोखरि पार बसल गाम बिछिया टोला चलि जाइत अछि, जतएसँ ओ माँझ रातिकेँ करीब नौ-दस बजे घर घुसैत अछि। बिछिया टोलामे ओ बिसनाथ प्रसादक एक बरखक बेटाकेँ सम्हारैत अछि आ ओकर घरक काज-धाज हाथे-पाथे करैत अछि। बिछिया गामक पैघ किसान आ जीवन बीमा निगममे बाबूगिरी करैबला नगेंद्रनाथक कलेक्टरीसँ लऽ कऽ मंत्री धरि पहुँच आ धाख छै। दूइ बेर ग्राम पंचायतक सरपंच आ एक बेर जिला जनपदक उपाध्यक्ष रहल अछि। बिसनाथ प्रसाद, जिनकर एक बरखक बेटाकेँ शारदा सम्हारैत छन्हि, ऐ नगेन्द्रनाथक पाँच मे सँ एक बेटा छथिन्ह। हुनकर असली नाम विश्वनाथ प्रसाद अछि मुदा गामक लोक हुनका बिसनाथ कहि कऽ बजाबैत अछि आ पीठ पाछाँ कहैत अछि, "असूल करैत अछि बिसनाथ। गजबक बिखधारी। ककरो फूकि मारि दिअए तँ बूझू जे टें...। बाप नागनाथ तँ बेटा सांपनाथ...। ओ अहाँकेँ देखि कऽ मुस्किया रहल अछि आ गुड़क रसमे लपेटि कऽ कहि रहल अछि तँ अहाँ साकांक्ष भऽ जाऊ। डसबाक पूरा तैयारी अछि।' बिसनाथक लग एकटा चीज नै अछि, ओ अछि ईमान। कखनो शराब पी लेलाक बाद ओ अपने मुँहसँ कहैत अछि, "एकक टोपी दोसराक मुँहमे टांगैबला हेराफेरीमे जे आनंद छै भइया, तकर सोझाँ अनकर कनियाँकेँ जांघक नीचाँ दाबैबला मजा बड्ड छोट चीज छै...! हा...हा...हा...!' ओकर उठब-बैसब सेहो गामक आ एम्हर-ओम्हरक तेहन लोक सभक संग अछि, जेकरा लऽ कऽ कहियो कोनो नीक गप नै सुनल गेल। बिसनाथ ऊँच जातिक अछि  मुदा मोहनदास नीच जातिक कबीरपंथी अछि। ओकर बिरादरीक कतेक लोक सभ आइयो सूप-चटाइ, दरी-कंबल बुनैत अछि। मोहनदास हमरे गाम नै, आसपासक कतेको गाममे अप्पन बिरादरीक पहिलुक लड़का हएत जे बी.ए. पास केने छल। आ ओहो फर्स्ट डिवीजनसँ आ मेरिटमे दोसर नंबरक संग। (एतए थम्हि जाऊ। सत्त बताऊ जे कतौ अहाँकेँ ई तँ नै लागैए जे हम अहाँकेँ कोनो प्रतीकवादी कूटकथा सुनाबै लेल बैसि गेलहुँ? एहि कथाक मुख्यपात्रक नाम मोहनदास, ओकर कनियाँक नाम कस्तूरीबाइ, माएक नाम पुतलीबाइ आ बेटाक नाम देवदास...? कस्तूरी बाइ नामसँ कस्तूरबाक मोन पड़ैत अछि, मोहनदास तँ साफे अछि। मुदा अहाँ महात्मा गांधीक "आत्मकथा' माने "दि स्टोरी ऑफ माइ एक्सपेरिमेंट्स विद ट्रूथ' पढबै तँ पता लागत जे हुनकर पिता करमचंदक दोसर नाम काबा सेहो रहन्हि। आ माएक नाम सेहो पुतली बाइ... फेर हुनकर बेटा देवदासक खिस्सा केकरा नै बुझल छै? जे अहाँ मोहनदासक बगे-बानी आ देह-दशा देखबै तँ अहाँकेँ फेर ओ इतिहास घेर लेत। अंतर बस एतबे जे ओ एहन मोहनदास सन अछि जेकरा पोरबंदर, काठियावाड़, राजकोट, विलायत, दक्खिन अफ्रीका आ बजाज-बिड़ला भवनमे नै छत्तीसगढ़ आ विंध्यप्रदेशक बोन-झाँकुड़, खोह-तरहरि, खेत-पथारमे रौद-भूख, रोग-घाम आ अन्याय-अपमानक आँचमे पालल-पोसल गेल छै।... आरो सभ सभटा ओहने... ...मुदा ऐठाम हम, कथाक बीचेमे ठाढ़ भऽ ई कहि दैत छी, जे बगे-बानीक मिलान एकटा संजोगे अछि। जखन हम अहाँक लेल ई कथा लिखैले  बैसलहुँ, ओइ काल हमरा अपने नै बुझल छल जे हमर गामक मोहनदास आ ओकर परिवारक लोकक लिस्टमे इतिहासक कोनो एहन अनुगूंज सेहो नुकाएल छै। विश्वास करू, एहन किछु नै अछि। ई कोनो प्रतीक कथा, रूपक आकि कूटाख्यान नै अछि। ई तँ एकटा साफे सरल खिस्सा छी। मुदा सत कही तँ ई कोनो खिस्सा  नै अछि। किएक तँ हम सदिखन काल जना खिस्साक आड़िमे, अहाँकेँ फेरसँ अप्पन काल आ समाजक एकटा असल जिनगीक ब्यौरा दै लेल बैसल छी। मोहनदास वास्तवमे एकटा जीवैत असल मनुख अछि आ ओकर जिनगी एखन बड़ संकटमे छै। हँ, ई गप अवश्य अछि जे हम सत गपमे सदिखन जना ऐबेर फेरसँ कम-बेस हेरफेर केने छी। मुदा ई हेरफेर तेहने अछि, जेना कियो हाथीकेँ नुकेबा लेल ओकर बड़का देहक ऊपर डेढ़ हाथक गमछा ओछा दैत अछि। अहाँकेँ मानऽ पड़त जे सत गप एकटा हाथी होइत अछि आ जखन कोनो कवि आ कहानीकार ओकर ऊपर गमछा ओछा कऽ ओकरा नुका कऽ रोमि कऽ सभक आगू ठाढ़ करैत अछि, तँ तखन ओकर अपनक जिनगीक सभटा पुल टूटि जाइत छै आ ओकर सभटा नाह जरि कऽ छाउर भऽ जाइत छै। ...तँ... मोहनदास एकटा असल लोक अछि। एकर पुष्टि अहाँ चाही तँ हमर गामेक लोकसँ नै ऐ देशक कोनो गामक कोनो लोकसँ पूछि कऽ कऽ सकैत छी।) (अनुवर्तते............) बालानां कृते १. गजेन्द्र ठाकुर-  २. राजदेव मंडल- दूटा बाल कविता ३.नवीन कुमार “आशा”- मच्छर मच्छर १ गजेन्द्र ठाकुर १.बेसी छुट्टी कम इसकूल बेसी छुट्टी कम इसकूल खेली-धूपी आरि-धूरपर रौद-बसाते घूमी खूब मम्मी-पापा बाबी-बाबा ताकि--थाकि कऽ आबथि घूरि बाड़ी-झाड़ी कल्लम गाछी मेला ठेला गामे-गाम भरि दिन भागा-भागी पाछू बौका बुधनी संग रसूल बेशी छुट्टी कम इसकूल। कनियाँ-पुतरा बना सजाबी खर-पात सँ घर बनाबी बेंतक छड़ी बनाबी घोड़ा चढ़ी ताइपर आ दौगाबी झुट्ठे लोक कहैछ उकाठी देखए धीया-पुता कऽ भूल बेसी छुट्टी कम इसकूल। इसकूलोमे गलती केने मास्टर साहेब बड्ड डेराबथि बेंट पकड़ने छड़ी घुमाबथि टेबुलपर ओ पटकि बजाबथि सुतलोमे सपनाइत छी हम कहीं हुअए नै कोनो भूल बेसी छुट्टी कम इसकूल। कनियाँ-पुतरा चलू घुमाबी बेंतक छड़ी हम किए बनाबी? घर बनाबी बत्ती-कड़चीसँ करची कलमसँ लिखी खूब चित्र लिखि टांगी स्कूलमे, आ सपना देखी खुब्बे-खूब बेसी छुट्टी कम इसकूल। बोने-बोन बिसरी रस्ता तँ वनसप्तो घर घुराबै छथि इसकूलमे गलती केने मुदा जे मास्टर साहेब मारै छथि बेंट पकड़ने छड़ी घुमाबथि मास्टर साहेब बड्ड डराबथि मोन बेकल अछि भय भागल नै छड़ी-बेंत सपनाइत छी हम छड़ी-बेंत सभ फेकथि दूर आ साँझ घूरि घर सूती हम खूब बेशी छुट्टी कम इसकूल। २.कोनो सजाए नै बदमस्ती हम खूब करी आ हल्ला घरमे सेहो बस्तुजात फेकी एम्हर लोटी गर्दामे फेरो कादो-कदवा बीच लोटाइ आ छप-छप पानिमे भागी मुदा सजाए कोनो नै भेटए निअम एहेन बनाबी रंग लगाबी कपड़ा-लत्तामे हाथ-पएरमे सेहो मम्मी-पापा भागि-भागि पकड़ए चाहथि नै पकड़ाइ आस-पड़ोसी करथि शिकाइत पापा-मम्मी मानथि नै खूब सुनाबी खूब बनाबी मुदा सजाए भेटए नै पंक्ति तोड़ि नवका पाँतीमे सभ बच्चा जे जाएत पुरना पाँतिक छोटका बड़का अंतर तखन मेटाएत आ ई देखत आ देत सजाए मुदा तखन हे मैय्या टूटत पाँति नव बनत कोना जे भेटत सभकेँ सजाए द्वेष मुदा नै राखी ककरोसँ मुदा करी खूब बदमस्ती धार जेना बहैए आगू दिस हमहूँ बढ़िते जाइ छी भेक जेना भदबरियामे टर्र-टर्र कऽ गीत गबैए हम गाबी भरि साल मुदा सजाए कोनो भेटए नै २ राजदेव मंडल दूटा बाल कविता १ मुनि‍याँक चि‍न्‍ता (बाल कविता) “बच्‍चा जनमि‍ गेल बेटा भेल‍” सुनतहि‍ घर खुशीसँ भरि‍ गेल सौंसे टोल खबरि‍ पसरि‍ गेल बढ़ए लगल उछाह कहलक लोग-वाह-वाह मुनि‍याँ अछि‍ लछमि‍नि‍याँ तब ने एकरापर सँ जनमल छौंड़ा हे गै तू कि‍एक धेने छेँ दादीक कोरा मुनि‍याँ टक-टक ताकि‍ रहल अछि‍ आ मने-मन आँकि‍ रहल अछि‍ दादी बजल-की लेबेँ बाज करए दे हमरा काज खसौने घाड़ कनैत छह जार-बेजार यएह करतह रक्षि‍या जि‍नगीक उठौतह भार धेने छह हमर गात ई तँ छै खुशीक बात जनमल तोरा भाए कतेक खुशी छह तोहर माए दादी, सबटा जानै छी हम ओइ लए नहि‍ कानै छी चि‍न्‍ता अछि‍ हमरा आब के कोराकेँ लेत दूधो माए पि‍बऽ नहि‍ देत आँइ, सभ हँसल आ मुनि‍याँ फँसल। २ कथीक गाछ (बाल कविता) चारि‍टा छाैंड़ा छल गाछ तर फनैत जि‍द लगौने डरि‍केँ गनैत पहुँचल पाँचम- हे रौ की गनै छेँ ई कथीक गाछ ि‍छएे से जनै छेँ? सभ भेल अवाक अपन जमौलक धाक सुनने रहि‍ ई गाछ ि‍छऐ अनचि‍न्‍हार जेकरा चि‍न्‍हलहुँ से चि‍न्‍हार नहि‍ चि‍न्‍हलहुँ तँ भेल अनचि‍न्‍हार कहैत माथ उठौलक तानि‍ एकटा छौंड़ा बजल फानि‍ तहूँ तँ नहि‍ रहल छेँ जानि‍ अपनहुँ ठकाइत छेँ आ दोसरोकेँ ठकै छि‍ही टेढ़ी देखा संतोख करै छी झूठक कऽ रहल छी परचार दुर-छी दुर-छी करतौ संसार अनजानकेँ करैक चाही जनैक प्रयास नहि‍ छोड़ैक चाही आस पहि‍ले बढ़ाले अपन गि‍यान तब बाजबेँ तँ बढ़तउ मान। ३ नवीन कुमार “आशा” (१९८७- ) पिता श्री गंगानाथ झा, माता श्रीमति विनीता झा। गाम- धानेरामपुर, पोस्ट- लोहना रोड, जिला- दरभंगा। मच्छर मच्छर अछि बड़ खच्चर जँ ई काटै मोन पड़ावै दादी नानी गामक जँ नै जरै कोनो बत्ती ताधरि नै प्राण यौ सभ घरक शान बढ़ावै सभ घरक याद दियाबै देखैमे छी छोट मुदा होइ बड़ खच्चर मच्छर मच्छर... धुँआ धुकुरक छै जमाना मुदा ओकर एकटा फसाना खून जाधरि नै चूसै तावत नै रुकै ओ सभ कियो करै सम्मान बूढ़ होए चाहे बच्चा सभ कए दैए खरमैच्चा मच्छर मच्छर... साँझ होए चिन्ता धरै रातिमे खूब सताबै मच्छरदानी जँ नै लगेलौं बादमे प्राण सुखाबै मच्छर मच्छर (मित्र पी.एस.ठाकुर “बबलू” लेल) बच्चा लोकनि द्वारा स्मरणीय श्लोक १.प्रातः काल ब्रह्ममुहूर्त्त (सूर्योदयक एक घंटा पहिने) सर्वप्रथम अपन दुनू हाथ देखबाक चाही, आ’ ई श्लोक बजबाक चाही। कराग्रे वसते लक्ष्मीः करमध्ये सरस्वती। करमूले स्थितो ब्रह्मा प्रभाते करदर्शनम्॥ करक आगाँ लक्ष्मी बसैत छथि, करक मध्यमे सरस्वती, करक मूलमे ब्रह्मा स्थित छथि। भोरमे ताहि द्वारे करक दर्शन करबाक थीक। २.संध्या काल दीप लेसबाक काल- दीपमूले स्थितो ब्रह्मा दीपमध्ये जनार्दनः। दीपाग्रे शङ्करः प्रोक्त्तः सन्ध्याज्योतिर्नमोऽस्तुते॥ दीपक मूल भागमे ब्रह्मा, दीपक मध्यभागमे जनार्दन (विष्णु) आऽ दीपक अग्र भागमे शङ्कर स्थित छथि। हे संध्याज्योति! अहाँकेँ नमस्कार। ३.सुतबाक काल- रामं स्कन्दं हनूमन्तं वैनतेयं वृकोदरम्। शयने यः स्मरेन्नित्यं दुःस्वप्नस्तस्य नश्यति॥ जे सभ दिन सुतबासँ पहिने राम, कुमारस्वामी, हनूमान्, गरुड़ आऽ भीमक स्मरण करैत छथि, हुनकर दुःस्वप्न नष्ट भऽ जाइत छन्हि। ४. नहेबाक समय- गङ्गे च यमुने चैव गोदावरि सरस्वति। नर्मदे सिन्धु कावेरि जलेऽस्मिन् सन्निधिं कुरू॥ हे गंगा, यमुना, गोदावरी, सरस्वती, नर्मदा, सिन्धु आऽ कावेरी  धार। एहि जलमे अपन सान्निध्य दिअ। ५.उत्तरं यत्समुद्रस्य हिमाद्रेश्चैव दक्षिणम्। वर्षं तत् भारतं नाम भारती यत्र सन्ततिः॥ समुद्रक उत्तरमे आऽ हिमालयक दक्षिणमे भारत अछि आऽ ओतुका सन्तति भारती कहबैत छथि। ६.अहल्या द्रौपदी सीता तारा मण्डोदरी तथा। पञ्चकं ना स्मरेन्नित्यं महापातकनाशकम्॥ जे सभ दिन अहल्या, द्रौपदी, सीता, तारा आऽ मण्दोदरी, एहि पाँच साध्वी-स्त्रीक स्मरण करैत छथि, हुनकर सभ पाप नष्ट भऽ जाइत छन्हि। ७.अश्वत्थामा बलिर्व्यासो हनूमांश्च विभीषणः। कृपः परशुरामश्च सप्तैते चिरञ्जीविनः॥ अश्वत्थामा, बलि, व्यास, हनूमान्, विभीषण, कृपाचार्य आऽ परशुराम- ई सात टा चिरञ्जीवी कहबैत छथि। ८.साते भवतु सुप्रीता देवी शिखर वासिनी उग्रेन तपसा लब्धो यया पशुपतिः पतिः। सिद्धिः साध्ये सतामस्तु प्रसादान्तस्य धूर्जटेः जाह्नवीफेनलेखेव यन्यूधि शशिनः कला॥ ९. बालोऽहं जगदानन्द न मे बाला सरस्वती। अपूर्णे पंचमे वर्षे वर्णयामि जगत्त्रयम् ॥ १०. दूर्वाक्षत मंत्र(शुक्ल यजुर्वेद अध्याय २२, मंत्र २२) आ ब्रह्मन्नित्यस्य प्रजापतिर्ॠषिः। लिंभोक्त्ता देवताः। स्वराडुत्कृतिश्छन्दः। षड्जः स्वरः॥ आ ब्रह्म॑न् ब्राह्म॒णो ब्र॑ह्मवर्च॒सी जा॑यता॒मा रा॒ष्ट्रे रा॑ज॒न्यः शुरे॑ऽइषव्यो॒ऽतिव्या॒धी म॑हार॒थो जा॑यतां॒ दोग्ध्रीं धे॒नुर्वोढा॑न॒ड्वाना॒शुः सप्तिः॒ पुर॑न्धि॒र्योवा॑ जि॒ष्णू र॑थे॒ष्ठाः स॒भेयो॒ युवास्य यज॑मानस्य वी॒रो जा॒यतां निका॒मे-नि॑कामे नः प॒र्जन्यों वर्षतु॒ फल॑वत्यो न॒ऽओष॑धयः पच्यन्तां योगेक्ष॒मो नः॑ कल्पताम्॥२२॥ मन्त्रार्थाः सिद्धयः सन्तु पूर्णाः सन्तु मनोरथाः। शत्रूणां बुद्धिनाशोऽस्तु मित्राणामुदयस्तव। ॐ दीर्घायुर्भव। ॐ सौभाग्यवती भव। हे भगवान्। अपन देशमे सुयोग्य आ’ सर्वज्ञ विद्यार्थी उत्पन्न होथि, आ’ शुत्रुकेँ नाश कएनिहार सैनिक उत्पन्न होथि। अपन देशक गाय खूब दूध दय बाली, बरद भार वहन करएमे सक्षम होथि आ’ घोड़ा त्वरित रूपेँ दौगय बला होए। स्त्रीगण नगरक नेतृत्व करबामे सक्षम होथि आ’ युवक सभामे ओजपूर्ण भाषण देबयबला आ’ नेतृत्व देबामे सक्षम होथि। अपन देशमे जखन आवश्यक होय वर्षा होए आ’ औषधिक-बूटी सर्वदा परिपक्व होइत रहए। एवं क्रमे सभ तरहेँ हमरा सभक कल्याण होए। शत्रुक बुद्धिक नाश होए आ’ मित्रक उदय होए॥ मनुष्यकें कोन वस्तुक इच्छा करबाक चाही तकर वर्णन एहि मंत्रमे कएल गेल अछि। एहिमे वाचकलुप्तोपमालड़्कार अछि। अन्वय- ब्रह्म॑न् - विद्या आदि गुणसँ परिपूर्ण ब्रह्म रा॒ष्ट्रे - देशमे ब्र॑ह्मवर्च॒सी-ब्रह्म विद्याक तेजसँ युक्त्त आ जा॑यतां॒- उत्पन्न होए रा॑ज॒न्यः-राजा शुरे॑ऽ–बिना डर बला इषव्यो॒- बाण चलेबामे निपुण ऽतिव्या॒धी-शत्रुकेँ तारण दय बला म॑हार॒थो-पैघ रथ बला वीर दोग्ध्रीं-कामना(दूध पूर्ण करए बाली) धे॒नुर्वोढा॑न॒ड्वाना॒शुः धे॒नु-गौ वा वाणी र्वोढा॑न॒ड्वा- पैघ बरद ना॒शुः-आशुः-त्वरित सप्तिः॒-घोड़ा पुर॑न्धि॒र्योवा॑- पुर॑न्धि॒- व्यवहारकेँ धारण करए बाली र्योवा॑-स्त्री जि॒ष्णू-शत्रुकेँ जीतए बला र॑थे॒ष्ठाः-रथ पर स्थिर स॒भेयो॒-उत्तम सभामे युवास्य-युवा जेहन यज॑मानस्य-राजाक राज्यमे वी॒रो-शत्रुकेँ पराजित करएबला निका॒मे-नि॑कामे-निश्चययुक्त्त कार्यमे नः-हमर सभक प॒र्जन्यों-मेघ वर्षतु॒-वर्षा होए फल॑वत्यो-उत्तम फल बला ओष॑धयः-औषधिः पच्यन्तां- पाकए योगेक्ष॒मो-अलभ्य लभ्य करेबाक हेतु कएल गेल योगक रक्षा नः॑-हमरा सभक हेतु कल्पताम्-समर्थ होए ग्रिफिथक अनुवाद- हे ब्रह्मण, हमर राज्यमे ब्राह्मण नीक धार्मिक विद्या बला, राजन्य-वीर,तीरंदाज, दूध दए बाली गाय, दौगय बला जन्तु, उद्यमी नारी होथि। पार्जन्य आवश्यकता पड़ला पर वर्षा देथि, फल देय बला गाछ पाकए, हम सभ संपत्ति अर्जित/संरक्षित करी। 8.VIDEHA FOR NON RESIDENTS Original Poem in Maithili by Kalikant Jha "Buch" Translated into English by Jyoti Jha Chaudhary Kalikant Jha "Buch" 1934-2009, Birth place- village Karian, District- Samastipur (Karian is birth place of famous Indian Nyaiyyayik philosopher Udayanacharya), Father Late Pt. Rajkishor Jha was first headmaster of village middle school. Mother Late Kala Devi was housewife. After completing Intermediate education started job block office of Govt. of Bihar.published in Mithila Mihir, Mati-pani, Bhakha, and Maithili Akademi magazine. Jyoti Jha Chaudhary, Date of Birth: December 30 1978,Place of Birth- Belhvar (Madhubani District), Education: Swami Vivekananda Middle School, Tisco Sakchi Girls High School, Mrs KMPM Inter College, IGNOU, ICWAI (COST ACCOUNTANCY); Residence- LONDON, UK; Father- Sh. Shubhankar Jha, Jamshedpur; Mother- Smt. Sudha Jha- Shivipatti. Jyoti received editor's choice award from www.poetry.comand her poems were featured in front page of www.poetrysoup.com for some period.She learnt Mithila Painting under Ms. Shveta Jha, Basera Institute, Jamshedpur and Fine Arts from Toolika, Sakchi, Jamshedpur (India). Her Mithila Paintings have been displayed by Ealing Art Group at Ealing Broadway, London. Original Poem in Maithili by Kalikant Jha "Buch" Translated into English by Jyoti Jha Chaudhary Kalikant Jha "Buch" 1934-2009, Birth place- village Karian, District- Samastipur (Karian is birth place of famous Indian Nyaiyyayik philosopher Udayanacharya), Father Late Pt. Rajkishor Jha was first headmaster of village middle school. Mother Late Kala Devi was housewife. After completing Intermediate education started job block office of Govt. of Bihar.published in Mithila Mihir, Mati-pani, Bhakha, and Maithili Akademi magazine. Jyoti Jha Chaudhary, Date of Birth: December 30 1978,Place of Birth- Belhvar (Madhubani District), Education: Swami Vivekananda Middle School, Tisco Sakchi Girls High School, Mrs KMPM Inter College, IGNOU, ICWAI (COST ACCOUNTANCY); Residence- LONDON, UK; Father- Sh. Shubhankar Jha, Jamshedpur; Mother- Smt. Sudha Jha- Shivipatti. Jyoti received editor's choice award from www.poetry.comand her poems were featured in front page of www.poetrysoup.com for some period.She learnt Mithila Painting under Ms. Shveta Jha, Basera Institute, Jamshedpur and Fine Arts from Toolika, Sakchi, Jamshedpur (India). Her Mithila Paintings have been displayed by Ealing Art Group at Ealing Broadway, London. Munna Kakka Is Going To In-laws Attiring the dhoti, very carefully he got dressed Unlcle Munna is going to in-laws being prepared First he steeped into the pond on the way Then slipped while trying to climb the quay His forehead was covered with black clay Finally he came out sweeping out his dress Cleaning himself in a small ditch Uncle Munna is going to in-laws being prepared Munna! Why are you so perturbed? Are you the only one having in-laws Has  the priest announced By researching all around When the day would be passed at two past ten Uncle Munna is going to in-laws being prepared He is forwarding step by step unmitigatedly Like dry storm of heated summer Vision is uninterrupted by the things on the way The growing darkness of evening seems a curse Moving the steps forward with all his effort Uncle Munna is going to in-laws being prepared Covering her face, mother-in-law said Jha really favours me a lot always “He brings hot rasogulla For me, every now and then” “This is all gulgulla today” , Jha said with a smile. Uncle Munna is going to in-laws being prepared Input: (कोष्ठकमे देवनागरी, मिथिलाक्षर किंवा फोनेटिक-रोमनमे टाइप करू। Input in Devanagari, Mithilakshara or Phonetic-Roman.) Output: (परिणाम देवनागरी, मिथिलाक्षर आ फोनेटिक-रोमन/ रोमनमे। Result in Devanagari, Mithilakshara and Phonetic-Roman/ Roman.) English to Maithili Maithili to English इंग्लिश-मैथिली-कोष / मैथिली-इंग्लिश-कोष  प्रोजेक्टकेँ आगू बढ़ाऊ, अपन सुझाव आ योगदान ई-मेल द्वारा ggajendra@videha.com पर पठाऊ। Top of Form विदेहक मैथिली-अंग्रेजी आ अंग्रेजी मैथिली कोष (इंटरनेटपर पहिल बेर सर्च-डिक्शनरी) एम.एस. एस.क्यू.एल. सर्वर आधारित -Based on ms-sql server Maithili-English and English-Maithili Dictionary. १.भारत आ नेपालक मैथिली भाषा-वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक शैली आ २.मैथिलीमे भाषा सम्पादन पाठ्यक्रम १.नेपाल आ भारतक मैथिली भाषा-वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक शैली

अ.नेपालक मैथिली भाषा वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक  उच्चारण आ लेखन शैली (भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक धारणाकेँ पूर्ण रूपसँ सङ्ग लऽ निर्धारित) मैथिलीमे उच्चारण तथा लेखन १.पञ्चमाक्षर आ अनुस्वार: पञ्चमाक्षरान्तर्गत ङ, ञ, ण, न एवं म अबैत अछि। संस्कृत भाषाक अनुसार शब्दक अन्तमे जाहि वर्गक अक्षर रहैत अछि ओही वर्गक पञ्चमाक्षर अबैत अछि। जेना- अङ्क (क वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ङ् आएल अछि।) पञ्च (च वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ञ् आएल अछि।) खण्ड (ट वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ण् आएल अछि।) सन्धि (त वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे न् आएल अछि।) खम्भ (प वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे म् आएल अछि।) उपर्युक्त बात मैथिलीमे कम देखल जाइत अछि। पञ्चमाक्षरक बदलामे अधिकांश जगहपर अनुस्वारक प्रयोग देखल जाइछ। जेना- अंक, पंच, खंड, संधि, खंभ आदि। व्याकरणविद पण्डित गोविन्द झाक कहब छनि जे कवर्ग, चवर्ग आ टवर्गसँ पूर्व अनुस्वार लिखल जाए तथा तवर्ग आ पवर्गसँ पूर्व पञ्चमाक्षरे लिखल जाए। जेना- अंक, चंचल, अंडा, अन्त तथा कम्पन। मुदा हिन्दीक निकट रहल आधुनिक लेखक एहि बातकेँ नहि मानैत छथि। ओ लोकनि अन्त आ कम्पनक जगहपर सेहो अंत आ कंपन लिखैत देखल जाइत छथि। नवीन पद्धति किछु सुविधाजनक अवश्य छैक। किएक तँ एहिमे समय आ स्थानक बचत होइत छैक। मुदा कतोक बेर हस्तलेखन वा मुद्रणमे अनुस्वारक छोट सन बिन्दु स्पष्ट नहि भेलासँ अर्थक अनर्थ होइत सेहो देखल जाइत अछि। अनुस्वारक प्रयोगमे उच्चारण-दोषक सम्भावना सेहो ततबए देखल जाइत अछि। एतदर्थ कसँ लऽ कऽ पवर्ग धरि पञ्चमाक्षरेक प्रयोग करब उचित अछि। यसँ लऽ कऽ ज्ञ धरिक अक्षरक सङ्ग अनुस्वारक प्रयोग करबामे कतहु कोनो विवाद नहि देखल जाइछ। २.ढ आ ढ़ : ढ़क उच्चारण “र् ह”जकाँ होइत अछि। अतः जतऽ “र् ह”क उच्चारण हो ओतऽ मात्र ढ़ लिखल जाए। आन ठाम खाली ढ लिखल जएबाक चाही। जेना- ढ = ढाकी, ढेकी, ढीठ, ढेउआ, ढङ्ग, ढेरी, ढाकनि, ढाठ आदि। ढ़ = पढ़ाइ, बढ़ब, गढ़ब, मढ़ब, बुढ़बा, साँढ़, गाढ़, रीढ़, चाँढ़, सीढ़ी, पीढ़ी आदि। उपर्युक्त शब्द सभकेँ देखलासँ ई स्पष्ट होइत अछि जे साधारणतया शब्दक शुरूमे ढ आ मध्य तथा अन्तमे ढ़ अबैत अछि। इएह नियम ड आ ड़क सन्दर्भ सेहो लागू होइत अछि। ३.व आ ब : मैथिलीमे “व”क उच्चारण ब कएल जाइत अछि, मुदा ओकरा ब रूपमे नहि लिखल जएबाक चाही। जेना- उच्चारण : बैद्यनाथ, बिद्या, नब, देबता, बिष्णु, बंश, बन्दना आदि। एहि सभक स्थानपर क्रमशः वैद्यनाथ, विद्या, नव, देवता, विष्णु, वंश, वन्दना लिखबाक चाही। सामान्यतया व उच्चारणक लेल ओ प्रयोग कएल जाइत अछि। जेना- ओकील, ओजह आदि। ४.य आ ज : कतहु-कतहु “य”क उच्चारण “ज”जकाँ करैत देखल जाइत अछि, मुदा ओकरा ज नहि लिखबाक चाही। उच्चारणमे यज्ञ, जदि, जमुना, जुग, जाबत, जोगी, जदु, जम आदि कहल जाएबला शब्द सभकेँ क्रमशः यज्ञ, यदि, यमुना, युग, यावत, योगी, यदु, यम लिखबाक चाही। ५.ए आ य : मैथिलीक वर्तनीमे ए आ य दुनू लिखल जाइत अछि। प्राचीन वर्तनी- कएल, जाए, होएत, माए, भाए, गाए आदि। नवीन वर्तनी- कयल, जाय, होयत, माय, भाय, गाय आदि। सामान्यतया शब्दक शुरूमे ए मात्र अबैत अछि। जेना एहि, एना, एकर, एहन आदि। एहि शब्द सभक स्थानपर यहि, यना, यकर, यहन आदिक प्रयोग नहि करबाक चाही। यद्यपि मैथिलीभाषी थारू सहित किछु जातिमे शब्दक आरम्भोमे “ए”केँ य कहि उच्चारण कएल जाइत अछि। ए आ “य”क प्रयोगक सन्दर्भमे प्राचीने पद्धतिक अनुसरण करब उपयुक्त मानि एहि पुस्तकमे ओकरे प्रयोग कएल गेल अछि। किएक तँ दुनूक लेखनमे कोनो सहजता आ दुरूहताक बात नहि अछि। आ मैथिलीक सर्वसाधारणक उच्चारण-शैली यक अपेक्षा एसँ बेसी निकट छैक। खास कऽ कएल, हएब आदि कतिपय शब्दकेँ कैल, हैब आदि रूपमे कतहु-कतहु लिखल जाएब सेहो “ए”क प्रयोगकेँ बेसी समीचीन प्रमाणित करैत अछि। ६.हि, हु तथा एकार, ओकार : मैथिलीक प्राचीन लेखन-परम्परामे कोनो बातपर बल दैत काल शब्दक पाछाँ हि, हु लगाओल जाइत छैक। जेना- हुनकहि, अपनहु, ओकरहु, तत्कालहि, चोट्टहि, आनहु आदि। मुदा आधुनिक लेखनमे हिक स्थानपर एकार एवं हुक स्थानपर ओकारक प्रयोग करैत देखल जाइत अछि। जेना- हुनके, अपनो, तत्काले, चोट्टे, आनो आदि। ७.ष तथा ख : मैथिली भाषामे अधिकांशतः षक उच्चारण ख होइत अछि। जेना- षड्यन्त्र (खड़यन्त्र), षोडशी (खोड़शी), षट्कोण (खटकोण), वृषेश (वृखेश), सन्तोष (सन्तोख) आदि। ८.ध्वनि-लोप : निम्नलिखित अवस्थामे शब्दसँ ध्वनि-लोप भऽ जाइत अछि: (क) क्रियान्वयी प्रत्यय अयमे य वा ए लुप्त भऽ जाइत अछि। ओहिमे सँ पहिने अक उच्चारण दीर्घ भऽ जाइत अछि। ओकर आगाँ लोप-सूचक चिह्न वा विकारी (’ / ऽ) लगाओल जाइछ। जेना- पूर्ण रूप : पढ़ए (पढ़य) गेलाह, कए (कय) लेल, उठए (उठय) पड़तौक। अपूर्ण रूप : पढ़’ गेलाह, क’ लेल, उठ’ पड़तौक। पढ़ऽ गेलाह, कऽ लेल, उठऽ पड़तौक। (ख) पूर्वकालिक कृत आय (आए) प्रत्ययमे य (ए) लुप्त भऽ जाइछ, मुदा लोप-सूचक विकारी नहि लगाओल जाइछ। जेना- पूर्ण रूप : खाए (य) गेल, पठाय (ए) देब, नहाए (य) अएलाह। अपूर्ण रूप : खा गेल, पठा देब, नहा अएलाह। (ग) स्त्री प्रत्यय इक उच्चारण क्रियापद, संज्ञा, ओ विशेषण तीनूमे लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना- पूर्ण रूप : दोसरि मालिनि चलि गेलि। अपूर्ण रूप : दोसर मालिन चलि गेल। (घ) वर्तमान कृदन्तक अन्तिम त लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना- पूर्ण रूप : पढ़ैत अछि, बजैत अछि, गबैत अछि। अपूर्ण रूप : पढ़ै अछि, बजै अछि, गबै अछि। (ङ) क्रियापदक अवसान इक, उक, ऐक तथा हीकमे लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना- पूर्ण रूप: छियौक, छियैक, छहीक, छौक, छैक, अबितैक, होइक। अपूर्ण रूप : छियौ, छियै, छही, छौ, छै, अबितै, होइ। (च) क्रियापदीय प्रत्यय न्ह, हु तथा हकारक लोप भऽ जाइछ। जेना- पूर्ण रूप : छन्हि, कहलन्हि, कहलहुँ, गेलह, नहि। अपूर्ण रूप : छनि, कहलनि, कहलौँ, गेलऽ, नइ, नञि, नै। ९.ध्वनि स्थानान्तरण : कोनो-कोनो स्वर-ध्वनि अपना जगहसँ हटि कऽ दोसर ठाम चलि जाइत अछि। खास कऽ ह्रस्व इ आ उक सम्बन्धमे ई बात लागू होइत अछि। मैथिलीकरण भऽ गेल शब्दक मध्य वा अन्तमे जँ ह्रस्व इ वा उ आबए तँ ओकर ध्वनि स्थानान्तरित भऽ एक अक्षर आगाँ आबि जाइत अछि। जेना- शनि (शइन), पानि (पाइन), दालि ( दाइल), माटि (माइट), काछु (काउछ), मासु (माउस) आदि। मुदा तत्सम शब्द सभमे ई निअम लागू नहि होइत अछि। जेना- रश्मिकेँ रइश्म आ सुधांशुकेँ सुधाउंस नहि कहल जा सकैत अछि। १०.हलन्त(्)क प्रयोग : मैथिली भाषामे सामान्यतया हलन्त (्)क आवश्यकता नहि होइत अछि। कारण जे शब्दक अन्तमे अ उच्चारण नहि होइत अछि। मुदा संस्कृत भाषासँ जहिनाक तहिना मैथिलीमे आएल (तत्सम) शब्द सभमे हलन्त प्रयोग कएल जाइत अछि। एहि पोथीमे सामान्यतया सम्पूर्ण शब्दकेँ मैथिली भाषा सम्बन्धी निअम अनुसार हलन्तविहीन राखल गेल अछि। मुदा व्याकरण सम्बन्धी प्रयोजनक लेल अत्यावश्यक स्थानपर कतहु-कतहु हलन्त देल गेल अछि। प्रस्तुत पोथीमे मथिली लेखनक प्राचीन आ नवीन दुनू शैलीक सरल आ समीचीन पक्ष सभकेँ समेटि कऽ वर्ण-विन्यास कएल गेल अछि। स्थान आ समयमे बचतक सङ्गहि हस्त-लेखन तथा तकनीकी दृष्टिसँ सेहो सरल होबऽबला हिसाबसँ वर्ण-विन्यास मिलाओल गेल अछि। वर्तमान समयमे मैथिली मातृभाषी पर्यन्तकेँ आन भाषाक माध्यमसँ मैथिलीक ज्ञान लेबऽ पड़ि रहल परिप्रेक्ष्यमे लेखनमे सहजता तथा एकरूपतापर ध्यान देल गेल अछि। तखन मैथिली भाषाक मूल विशेषता सभ कुण्ठित नहि होइक, ताहू दिस लेखक-मण्डल सचेत अछि। प्रसिद्ध भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक कहब छनि जे सरलताक अनुसन्धानमे एहन अवस्था किन्नहु ने आबऽ देबाक चाही जे भाषाक विशेषता छाँहमे पडि जाए। -(भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक धारणाकेँ पूर्ण रूपसँ सङ्ग लऽ निर्धारित) आ. मैथिली अकादमी, पटना द्वारा निर्धारित मैथिली लेखन-शैली

१. जे शब्द मैथिली-साहित्यक प्राचीन कालसँ आइ धरि जाहि वर्त्तनीमे प्रचलित अछि, से सामान्यतः ताहि वर्त्तनीमे लिखल जाय- उदाहरणार्थ-

ग्राह्य

एखन ठाम जकर, तकर तनिकर अछि

अग्राह्य अखन, अखनि, एखेन, अखनी ठिमा, ठिना, ठमा जेकर, तेकर तिनकर। (वैकल्पिक रूपेँ ग्राह्य) ऐछ, अहि, ए।

२. निम्नलिखित तीन प्रकारक रूप वैकल्पिकतया अपनाओल जाय: भऽ गेल, भय गेल वा भए गेल। जा रहल अछि, जाय रहल अछि, जाए रहल अछि। कर’ गेलाह, वा करय गेलाह वा करए गेलाह।

३. प्राचीन मैथिलीक ‘न्ह’ ध्वनिक स्थानमे ‘न’ लिखल जाय सकैत अछि यथा कहलनि वा कहलन्हि।

४. ‘ऐ’ तथा ‘औ’ ततय लिखल जाय जत’ स्पष्टतः ‘अइ’ तथा ‘अउ’ सदृश उच्चारण इष्ट हो। यथा- देखैत, छलैक, बौआ, छौक इत्यादि।

५. मैथिलीक निम्नलिखित शब्द एहि रूपे प्रयुक्त होयत: जैह, सैह, इएह, ओऐह, लैह तथा दैह।

६. ह्र्स्व इकारांत शब्दमे ‘इ’ के लुप्त करब सामान्यतः अग्राह्य थिक। यथा- ग्राह्य देखि आबह, मालिनि गेलि (मनुष्य मात्रमे)।

७. स्वतंत्र ह्रस्व ‘ए’ वा ‘य’ प्राचीन मैथिलीक उद्धरण आदिमे तँ यथावत राखल जाय, किंतु आधुनिक प्रयोगमे वैकल्पिक रूपेँ ‘ए’ वा ‘य’ लिखल जाय। यथा:- कयल वा कएल, अयलाह वा अएलाह, जाय वा जाए इत्यादि।

८. उच्चारणमे दू स्वरक बीच जे ‘य’ ध्वनि स्वतः आबि जाइत अछि तकरा लेखमे स्थान वैकल्पिक रूपेँ देल जाय। यथा- धीआ, अढ़ैआ, विआह, वा धीया, अढ़ैया, बियाह।

९. सानुनासिक स्वतंत्र स्वरक स्थान यथासंभव ‘ञ’ लिखल जाय वा सानुनासिक स्वर। यथा:- मैञा, कनिञा, किरतनिञा वा मैआँ, कनिआँ, किरतनिआँ।

१०. कारकक विभक्त्तिक निम्नलिखित रूप ग्राह्य:- हाथकेँ, हाथसँ, हाथेँ, हाथक, हाथमे। ’मे’ मे अनुस्वार सर्वथा त्याज्य थिक। ‘क’ क वैकल्पिक रूप ‘केर’ राखल जा सकैत अछि।

११. पूर्वकालिक क्रियापदक बाद ‘कय’ वा ‘कए’ अव्यय वैकल्पिक रूपेँ लगाओल जा सकैत अछि। यथा:- देखि कय वा देखि कए।

१२. माँग, भाँग आदिक स्थानमे माङ, भाङ इत्यादि लिखल जाय।

१३. अर्द्ध ‘न’ ओ अर्द्ध ‘म’ क बदला अनुसार नहि लिखल जाय, किंतु छापाक सुविधार्थ अर्द्ध ‘ङ’ , ‘ञ’, तथा ‘ण’ क बदला अनुस्वारो लिखल जा सकैत अछि। यथा:- अङ्क, वा अंक, अञ्चल वा अंचल, कण्ठ वा कंठ।

१४. हलंत चिह्न निअमतः लगाओल जाय, किंतु विभक्तिक संग अकारांत प्रयोग कएल जाय। यथा:- श्रीमान्, किंतु श्रीमानक।

१५. सभ एकल कारक चिह्न शब्दमे सटा क’ लिखल जाय, हटा क’ नहि, संयुक्त विभक्तिक हेतु फराक लिखल जाय, यथा घर परक।

१६. अनुनासिककेँ चन्द्रबिन्दु द्वारा व्यक्त कयल जाय। परंतु मुद्रणक सुविधार्थ हि समान जटिल मात्रापर अनुस्वारक प्रयोग चन्द्रबिन्दुक बदला कयल जा सकैत अछि। यथा- हिँ केर बदला हिं।

१७. पूर्ण विराम पासीसँ ( । ) सूचित कयल जाय।

१८. समस्त पद सटा क’ लिखल जाय, वा हाइफेनसँ जोड़ि क’ ,  हटा क’ नहि।

१९. लिअ तथा दिअ शब्दमे बिकारी (ऽ) नहि लगाओल जाय।

२०. अंक देवनागरी रूपमे राखल जाय।

२१.किछु ध्वनिक लेल नवीन चिन्ह बनबाओल जाय। जा' ई नहि बनल अछि ताबत एहि दुनू ध्वनिक बदला पूर्ववत् अय/ आय/ अए/ आए/ आओ/ अओ लिखल जाय। आकि ऎ वा ऒ सँ व्यक्त कएल जाय।

ह./- गोविन्द झा ११/८/७६ श्रीकान्त ठाकुर ११/८/७६ सुरेन्द्र झा "सुमन" ११/०८/७६ २.मैथिलीमे भाषा सम्पादन पाठ्यक्रम नीचाँक सूचीमे देल विकल्पमेसँ लैंगुएज एडीटर द्वारा कोन रूप चुनल जएबाक चाही: वर्ड फाइलमे बोल्ड कएल रूप: १.होयबला/ होबयबला/ होमयबला/ हेब’बला, हेम’बला/ होयबाक/होबएबला /होएबाक २. आ’/आऽ आ ३. क’ लेने/कऽ लेने/कए लेने/कय लेने/ल’/लऽ/लय/लए ४. भ’ गेल/भऽ गेल/भय गेल/भए गेल ५. कर’ गेलाह/करऽ गेलह/करए गेलाह/करय गेलाह ६. लिअ/दिअ लिय’,दिय’,लिअ’,दिय’/ ७. कर’ बला/करऽ बला/ करय बला करै बला/क’र’ बला / करए बला ८. बला वला ९. आङ्ल आंग्ल १०. प्रायः प्रायह ११. दुःख दुख १२. चलि गेल चल गेल/चैल गेल १३. देलखिन्ह देलकिन्ह, देलखिन १४. देखलन्हि देखलनि/ देखलैन्ह १५. छथिन्ह/ छलन्हि छथिन/ छलैन/ छलनि १६. चलैत/दैत चलति/दैति १७. एखनो अखनो १८. बढ़न्हि बढन्हि १९. ओ’/ओऽ(सर्वनाम) ओ २०. ओ (संयोजक) ओ’/ओऽ २१. फाँगि/फाङ्गि फाइंग/फाइङ २२. जे जे’/जेऽ २३. ना-नुकुर ना-नुकर २४. केलन्हि/कएलन्हि/कयलन्हि २५. तखन तँ/ तखन तँ २६. जा’ रहल/जाय रहल/जाए रहल २७. निकलय/निकलए लागल बहराय/ बहराए लागल निकल’/बहरै लागल २८. ओतय/जतय जत’/ओत’/ जतए/ ओतए २९. की फूरल जे कि फूरल जे ३०. जे जे’/जेऽ ३१. कूदि/यादि(मोन पारब) कूइद/याइद/कूद/याद/ यादि (मोन) ३२. इहो/ ओहो ३३. हँसए/ हँसय हँसऽ ३४. नौ आकि दस/नौ किंवा दस/ नौ वा दस ३५. सासु-ससुर सास-ससुर ३६. छह/ सात छ/छः/सात ३७. की की’/कीऽ (दीर्घीकारान्तमे ऽ वर्जित) ३८. जबाब जवाब ३९. करएताह/ करयताह करेताह ४०. दलान दिशि दलान दिश/दलान दिस ४१. गेलाह गएलाह/गयलाह ४२. किछु आर/ किछु और ४३. जाइत छल जाति छल/जैत छल ४४. पहुँचि/ भेटि जाइत छल पहुँच/भेट जाइत छल ४५. जबान (युवा)/ जवान(फौजी) ४६. लय/लए क’/कऽ/लए कए/ लऽ कऽ/ लऽ कए ४७. ल’/लऽ कय/ कए ४८. एखन/अखने अखन/एखने ४९. अहींकेँ अहीँकेँ ५०. गहींर गहीँर ५१. धार पार केनाइ धार पार केनाय/केनाए ५२. जेकाँ जेँकाँ/ जकाँ ५३. तहिना तेहिना ५४. एकर अकर ५५. बहिनउ बहनोइ ५६. बहिन बहिनि ५७. बहिन-बहिनोइ बहिन-बहनउ ५८. नहि/ नै ५९. करबा / करबाय/ करबाए ६०. तँ/ त ऽ तय/तए ६१. भाय भै/भाए ६२. भाँय ६३. यावत जावत ६४. माय मै / माए ६५. देन्हि/दएन्हि/ दयन्हि दन्हि/ दैन्हि ६६. द’/ दऽ/ दए ६७. ओ (संयोजक) ओऽ (सर्वनाम) ६८. तका कए तकाय तकाए ६९. पैरे (on foot) पएरे ७०. ताहुमे ताहूमे

७१. पुत्रीक ७२. बजा कय/ कए ७३. बननाय/बननाइ ७४. कोला ७५. दिनुका दिनका ७६. ततहिसँ ७७. गरबओलन्हि  गरबेलन्हि ७८. बालु बालू ७९. चेन्ह चिन्ह(अशुद्ध) ८०. जे जे’ ८१. से/ के से’/के’ ८२. एखुनका अखनुका ८३. भुमिहार भूमिहार ८४. सुगर सूगर ८५. झठहाक झटहाक ८६. छूबि ८७. करइयो/ओ करैयो/करिऔ-करइयौ ८८. पुबारि पुबाइ ८९. झगड़ा-झाँटी झगड़ा-झाँटि ९०. पएरे-पएरे पैरे-पैरे ९१. खेलएबाक ९२. खेलेबाक ९३. लगा ९४. होए- हो ९५. बुझल बूझल ९६. बूझल (संबोधन अर्थमे) ९७. यैह यएह / इएह ९८. तातिल ९९. अयनाय- अयनाइ/ अएनाइ १००. निन्न- निन्द १०१. बिनु बिन १०२. जाए जाइ १०३. जाइ (in different sense)-last word of sentence १०४. छत पर आबि जाइ १०५. ने १०६. खेलाए (play) –खेलाइ १०७. शिकाइत- शिकायत १०८. ढप- ढ़प १०९. पढ़- पढ ११०. कनिए/ कनिये कनिञे १११. राकस- राकश ११२. होए/ होय होइ ११३. अउरदा- औरदा ११४. बुझेलन्हि (different meaning- got understand) ११५. बुझएलन्हि/ बुझयलन्हि (understood himself) ११६. चलि- चल ११७. खधाइ- खधाय ११८. मोन पाड़लखिन्ह मोन पारलखिन्ह ११९. कैक- कएक- कइएक १२०. लग ल’ग  १२१. जरेनाइ १२२. जरओनाइ- जरएनाइ/जरयनाइ १२३. होइत १२४. गरबेलन्हि/ गरबओलन्हि १२५. चिखैत- (to test)चिखइत १२६. करइयो (willing to do) करैयो १२७. जेकरा- जकरा १२८. तकरा- तेकरा १२९. बिदेसर स्थानेमे/ बिदेसरे स्थानमे १३०. करबयलहुँ/ करबएलहुँ/ करबेलहुँ १३१. हारिक (उच्चारण हाइरक) १३२. ओजन वजन १३३. आधे भाग/ आध-भागे १३४. पिचा / पिचाय/पिचाए १३५. नञ/ ने १३६. बच्चा नञ (ने) पिचा जाय १३७. तखन ने (नञ) कहैत अछि। १३८. कतेक गोटे/ कताक गोटे १३९. कमाइ- धमाइ कमाई- धमाई १४०. लग ल’ग १४१. खेलाइ (for playing) १४२. छथिन्ह छथिन १४३. होइत होइ १४४. क्यो कियो / केओ १४५. केश (hair) १४६. केस (court-case) १४७. बननाइ/ बननाय/ बननाए १४८. जरेनाइ १४९. कुरसी कुर्सी १५०. चरचा चर्चा १५१. कर्म करम १५२. डुबाबए/ डुमाबय/ डुमाबए १५३. एखुनका/ अखुनका १५४. लय (वाक्यक अतिम शब्द)- लऽ १५५. कएलक केलक १५६. गरमी गर्मी १५७. बरदी वर्दी १५८. सुना गेलाह सुना’/सुनाऽ १५९. एनाइ-गेनाइ १६०. तेना ने घेरलन्हि १६१. नञि १६२. डरो ड’रो १६३. कतहु- कहीं १६४. उमरिगर- उमरगर १६५. भरिगर १६६. धोल/धोअल धोएल १६७. गप/गप्प १६८. के के’ १६९. दरबज्जा/ दरबजा १७०. ठाम १७१. धरि तक १७२. घूरि लौटि १७३. थोरबेक १७४. बड्ड १७५. तोँ/ तूँ १७६. तोँहि( पद्यमे ग्राह्य) १७७. तोँही / तोँहि १७८. करबाइए करबाइये १७९. एकेटा १८०. करितथि करतथि

१८१. पहुँचि पहुँच १८२. राखलन्हि रखलन्हि १८३. लगलन्हि लागलन्हि १८४. सुनि (उच्चारण सुइन) १८५. अछि (उच्चारण अइछ) १८६. एलथि गेलथि १८७. बितओने बितेने १८८. करबओलन्हि/ करेलखिन्ह १८९. करएलन्हि १९०. आकि कि १९१. पहुँचि पहुँच १९२. जराय/ जराए जरा (आगि लगा) १९३. से से’ १९४. हाँ मे हाँ (हाँमे हाँ विभक्त्तिमे हटा कए) १९५. फेल फैल १९६. फइल(spacious) फैल १९७. होयतन्हि/ होएतन्हि हेतन्हि १९८. हाथ मटिआयब/ हाथ मटियाबय/हाथ मटिआएब १९९. फेका फेंका २००. देखाए देखा २०१. देखाबए २०२. सत्तरि सत्तर २०३. साहेब साहब २०४.गेलैन्ह/ गेलन्हि २०५.हेबाक/ होएबाक २०६.केलो/ कएलहुँ २०७. किछु न किछु/ किछु ने किछु २०८.घुमेलहुँ/ घुमओलहुँ २०९. एलाक/ अएलाक २१०. अः/ अह २११.लय/ लए (अर्थ-परिवर्त्तन) २१२.कनीक/ कनेक २१३.सबहक/ सभक २१४.मिलाऽ/ मिला २१५.कऽ/ क २१६.जाऽ/ जा २१७.आऽ/ आ २१८.भऽ/भ’ (’ फॉन्टक कमीक द्योतक) २१९.निअम/ नियम २२०.हेक्टेअर/ हेक्टेयर २२१.पहिल अक्षर ढ/ बादक/बीचक ढ़ २२२.तहिं/तहिँ/ तञि/ तैं २२३.कहिं/ कहीं २२४.तँइ/ तइँ २२५.नँइ/ नइँ/  नञि/ नहि २२६.है/ हए २२७.छञि/ छै/ छैक/छइ २२८.दृष्टिएँ/ दृष्टियेँ २२९.आ (come)/ आऽ(conjunction) २३०. आ (conjunction)/ आऽ(come) २३१.कुनो/ कोनो २३२.गेलैन्ह-गेलन्हि २३३.हेबाक- होएबाक २३४.केलौँ- कएलौँ- कएलहुँ २३५.किछु न किछ- किछु ने किछु २३६.केहेन- केहन २३७.आऽ (come)-आ (conjunction-and)/आ २३८. हएत-हैत २३९.घुमेलहुँ-घुमएलहुँ २४०.एलाक- अएलाक २४१.होनि- होइन/होन्हि २४२.ओ-राम ओ श्यामक बीच(conjunction), ओऽ कहलक (he said)/ओ २४३.की हए/ कोसी अएली हए/ की है। की हइ २४४.दृष्टिएँ/ दृष्टियेँ २४५.शामिल/ सामेल २४६.तैँ / तँए/ तञि/ तहिं २४७.जौँ/ ज्योँ २४८.सभ/ सब २४९.सभक/ सबहक २५०.कहिं/ कहीं २५१.कुनो/ कोनो २५२.फारकती भऽ गेल/ भए गेल/ भय गेल २५३.कुनो/ कोनो २५४.अः/ अह २५५.जनै/ जनञ २५६.गेलन्हि/ गेलाह (अर्थ परिवर्तन) २५७.केलन्हि/ कएलन्हि २५८.लय/ लए (अर्थ परिवर्तन) २५९.कनीक/ कनेक २६०.पठेलन्हि/ पठओलन्हि २६१.निअम/ नियम २६२.हेक्टेअर/ हेक्टेयर २६३.पहिल अक्षर रहने ढ/ बीचमे रहने ढ़ २६४.आकारान्तमे बिकारीक प्रयोग उचित नहि/ अपोस्ट्रोफीक प्रयोग फान्टक तकनीकी न्यूनताक परिचायक ओकर बदला अवग्रह (बिकारी) क प्रयोग उचित २६५.केर/-क/ कऽ/ के २६६.छैन्हि- छन्हि २६७.लगैए/ लगैये २६८.होएत/ हएत २६९.जाएत/ जएत २७०.आएत/ अएत/ आओत २७१.खाएत/ खएत/ खैत २७२.पिअएबाक/ पिएबाक २७३.शुरु/ शुरुह २७४.शुरुहे/ शुरुए २७५.अएताह/अओताह/ एताह २७६.जाहि/ जाइ/ जै २७७.जाइत/ जैतए/ जइतए २७८.आएल/ अएल २७९.कैक/ कएक २८०.आयल/ अएल/ आएल २८१. जाए/ जै/ जए २८२. नुकएल/ नुकाएल २८३. कठुआएल/ कठुअएल २८४. ताहि/ तै २८५. गायब/ गाएब/ गएब २८६. सकै/ सकए/ सकय २८७.सेरा/सरा/ सराए (भात सेरा गेल) २८८.कहैत रही/देखैत रही/ कहैत छलहुँ/ कहै छलहुँ- एहिना चलैत/ पढ़ैत (पढ़ै-पढ़ैत अर्थ कखनो काल परिवर्तित)-आर बुझै/ बुझैत (बुझै/ बुझैत छी, मुदा बुझैत-बुझैत)/ सकैत/ सकै। करैत/ करै। दै/ दैत। छैक/ छै। बचलै/ बचलैक। रखबा/ रखबाक । बिनु/ बिन। रातिक/ रातुक २८९. दुआरे/ द्वारे २९०.भेटि/ भेट २९१. खन/ खुना (भोर खन/ भोर खुना) २९२.तक/ धरि २९३.गऽ/गै (meaning different-जनबै गऽ) २९४.सऽ/ सँ (मुदा दऽ, लऽ) २९५.त्त्व,(तीन अक्षरक मेल बदला पुनरुक्तिक एक आ एकटा दोसरक उपयोग) आदिक बदला त्व आदि। महत्त्व/ महत्व/ कर्ता/ कर्त्ता आदिमे त्त संयुक्तक कोनो आवश्यकता मैथिलीमे नहि अछि। वक्तव्य २९६.बेसी/ बेशी २९७.बाला/वाला बला/ वला (रहैबला) २९८.वाली/ (बदलएवाली) २९९.वार्त्ता/ वार्ता ३००. अन्तर्राष्ट्रिय/ अन्तर्राष्ट्रीय ३०१. लेमए/ लेबए ३०२.लमछुरका, नमछुरका ३०२.लागै/ लगै (भेटैत/ भेटै) ३०३.लागल/ लगल ३०४.हबा/ हवा ३०५.राखलक/ रखलक ३०६.आ (come)/ आ (and) ३०७. पश्चाताप/ पश्चात्ताप ३०८. ऽ केर व्यवहार शब्दक अन्तमे मात्र, यथासंभव बीचमे नहि। ३०९.कहैत/ कहै ३१०. रहए (छल)/ रहै (छलै) (meaning different) ३११.तागति/ ताकति ३१२.खराप/ खराब ३१३.बोइन/ बोनि/ बोइनि ३१४.जाठि/ जाइठ ३१५.कागज/ कागच ३१६.गिरै (meaning different- swallow)/ गिरए (खसए) ३१७.राष्ट्रिय/ राष्ट्रीय उच्चारण निर्देश: दन्त न क उच्चारणमे दाँतमे जीह सटत- जेना बाजू नाम , मुदा ण क उच्चारणमे जीह मूर्धामे सटत (नहि सटैए तँ उच्चारण दोष अछि)- जेना बाजू गणेश। तालव्य शमे जीह तालुसँ , षमे मूर्धासँ आ दन्त समे दाँतसँ सटत। निशाँ, सभ आ शोषण बाजि कऽ देखू। मैथिलीमे ष केँ वैदिक संस्कृत जेकाँ ख सेहो उच्चरित कएल जाइत अछि, जेना वर्षा, दोष। य अनेको स्थानपर ज जेकाँ उच्चरित होइत अछि आ ण ड़ जेकाँ (यथा संयोग आ गणेश संजोग आ गड़ेस उच्चरित होइत अछि)। मैथिलीमे व क उच्चारण ब, श क उच्चारण स आ य क उच्चारण ज सेहो होइत अछि। ओहिना ह्रस्व इ बेशीकाल मैथिलीमे पहिने बाजल जाइत अछि कारण देवनागरीमे आ मिथिलाक्षरमे ह्रस्व इ अक्षरक पहिने लिखलो जाइत आ बाजलो जएबाक चाही। कारण जे हिन्दीमे एकर दोषपूर्ण उच्चारण होइत अछि (लिखल तँ पहिने जाइत अछि मुदा बाजल बादमे जाइत अछि), से शिक्षा पद्धतिक दोषक कारण हम सभ ओकर उच्चारण दोषपूर्ण ढंगसँ कऽ रहल छी। अछि- अ इ छ  ऐछ छथि- छ इ थ  – छैथ पहुँचि- प हुँ इ च आब अ आ इ ई ए ऐ ओ औ अं अः ऋ एहि सभ लेल मात्रा सेहो अछि, मुदा एहिमे ई ऐ ओ औ अं अः ऋ केँ संयुक्ताक्षर रूपमे गलत रूपमे प्रयुक्त आ उच्चरित कएल जाइत अछि। जेना ऋ केँ री  रूपमे उच्चरित करब। आ देखियौ- एहि लेल देखिऔ क प्रयोग अनुचित। मुदा देखिऐ लेल देखियै अनुचित। क् सँ ह् धरि अ सम्मिलित भेलासँ क सँ ह बनैत अछि, मुदा उच्चारण काल हलन्त युक्त शब्दक अन्तक उच्चारणक प्रवृत्ति बढ़ल अछि, मुदा हम जखन मनोजमे ज् अन्तमे बजैत छी, तखनो पुरनका लोककेँ बजैत सुनबन्हि- मनोजऽ, वास्तवमे ओ अ युक्त ज् = ज बजै छथि। फेर ज्ञ अछि ज् आ ञ क संयुक्त मुदा गलत उच्चारण होइत अछि- ग्य। ओहिना क्ष अछि क् आ ष क संयुक्त मुदा उच्चारण होइत अछि छ। फेर श् आ र क संयुक्त अछि श्र ( जेना श्रमिक) आ स् आ र क संयुक्त अछि स्र (जेना मिस्र)। त्र भेल त+र । उच्चारणक ऑडियो फाइल विदेह आर्काइव  http://www.videha.co.in/ पर उपलब्ध अछि। फेर केँ / सँ / पर पूर्व अक्षरसँ सटा कऽ लिखू मुदा तँ/ के/ कऽ हटा कऽ। एहिमे सँ मे पहिल सटा कऽ लिखू आ बादबला हटा कऽ। अंकक बाद टा लिखू सटा कऽ मुदा अन्य ठाम टा लिखू हटा कऽ– जेना छहटा मुदा सभ टा। फेर ६अ म सातम लिखू- छठम सातम नहि। घरबलामे बला मुदा घरवालीमे वाली प्रयुक्त करू। रहए- रहै मुदा सकैए (उच्चारण सकै-ए)। मुदा कखनो काल रहए आ रहै मे अर्थ भिन्नता सेहो, जेना से कम्मो जगहमे पार्किंग करबाक अभ्यास रहै ओकरा। पुछलापर पता लागल जे ढुनढुन नाम्ना ई ड्राइवर कनाट प्लेसक पार्किंगमे काज करैत रहए। छलै, छलए मे सेहो एहि तरहक भेल। छलए क उच्चारण छल-ए सेहो। संयोगने- (उच्चारण संजोगने) केँ/ के / कऽ केर- क (केर क प्रयोग नहि करू ) क (जेना रामक) –रामक आ संगे (उच्चारण राम के /  राम कऽ सेहो) सँ- सऽ चन्द्रबिन्दु आ अनुस्वार- अनुस्वारमे कंठ धरिक प्रयोग होइत अछि मुदा चन्द्रबिन्दुमे नहि। चन्द्रबिन्दुमे कनेक एकारक सेहो उच्चारण होइत अछि- जेना रामसँ- (उच्चारण राम सऽ)  रामकेँ- (उच्चारण राम कऽ/ राम के सेहो)। केँ जेना रामकेँ भेल हिन्दीक को (राम को)- राम को= रामकेँ क जेना रामक भेल हिन्दीक का ( राम का) राम का= रामक कऽ जेना जा कऽ भेल हिन्दीक कर ( जा कर) जा कर= जा कऽ सँ भेल हिन्दीक से (राम से) राम से= रामसँ सऽ तऽ त केर एहि सभक प्रयोग अवांछित। के दोसर अर्थेँ प्रयुक्त भऽ सकैए- जेना के कहलक? नञि, नहि, नै, नइ, नँइ, नइँ एहि सभक उच्चारण- नै त्त्व क बदलामे त्व जेना महत्वपूर्ण (महत्त्वपूर्ण नहि) जतए अर्थ बदलि जाए ओतहि मात्र तीन अक्षरक संयुक्ताक्षरक प्रयोग उचित। सम्पति- उच्चारण स म्प इ त (सम्पत्ति नहि- कारण सही उच्चारण आसानीसँ सम्भव नहि)। मुदा सर्वोत्तम (सर्वोतम नहि)। राष्ट्रिय (राष्ट्रीय नहि) सकैए/ सकै (अर्थ परिवर्तन) पोछैले/ पोछैए/ पोछए/ (अर्थ परिवर्तन) पोछए/ पोछै ओ लोकनि ( हटा कऽ, ओ मे बिकारी नहि) ओइ/ ओहि ओहिले/ ओहि लेल जएबेँ/ बैसबेँ पँचभइयाँ देखियौक (देखिऔक बहि- तहिना अ मे ह्रस्व आ दीर्घक मात्राक प्रयोग अनुचित) जकाँ/ जेकाँ तँइ/ तैँ होएत/ हएत नञि/ नहि/ नँइ/ नइँ सौँसे बड़/ बड़ी (झोराओल) गाए (गाइ नहि) रहलेँ/ पहिरतैँ हमहीं/ अहीं सब - सभ सबहक - सभहक धरि - तक गप- बात बूझब - समझब बुझलहुँ - समझलहुँ हमरा आर - हम सभ आकि- आ कि सकैछ/ करैछ (गद्यमे प्रयोगक आवश्यकता नहि) मे केँ सँ पर (शब्दसँ सटा कऽ) तँ कऽ धऽ दऽ (शब्दसँ हटा कऽ) मुदा दूटा वा बेशी विभक्ति संग रहलापर पहिल विभक्ति टाकेँ सटाऊ। एकटा दूटा (मुदा कैक टा) बिकारीक प्रयोग शब्दक अन्तमे, बीचमे अनावश्यक रूपेँ नहि। आकारान्त आ अन्तमे अ क बाद बिकारीक प्रयोग नहि (जेना दिअ, आ ) अपोस्ट्रोफीक प्रयोग बिकारीक बदलामे करब अनुचित आ मात्र फॉन्टक तकनीकी न्यूनताक परिचायक)- ओना बिकारीक संस्कृत रूप ऽ अवग्रह कहल जाइत अछि आ वर्तनी आ उच्चारण दुनू ठाम एकर लोप रहैत अछि/ रहि सकैत अछि (उच्चारणमे लोप रहिते अछि)। मुदा अपोस्ट्रोफी सेहो अंग्रेजीमे पसेसिव केसमे होइत अछि आ फ्रेंचमे शब्दमे जतए एकर प्रयोग होइत अछि जेना raison d’etre एतए सेहो एकर उच्चारण रैजौन डेटर होइत अछि, माने अपोस्ट्रॉफी अवकाश नहि दैत अछि वरन जोड़ैत अछि, से एकर प्रयोग बिकारीक बदला देनाइ तकनीकी रूपेँ सेहो अनुचित)। अइमे, एहिमे जइमे, जाहिमे एखन/ अखन/ अइखन केँ (के नहि) मे (अनुस्वार रहित) भऽ मे दऽ तँ (तऽ त नहि) सँ ( सऽ स नहि) गाछ तर गाछ लग साँझ खन जो (जो go, करै जो do) Festivals of Mithila DATE-LIST (year- 2010-11) (१४१८ साल) Marriage Days: Nov.2010- 19 Dec.2010- 3,8 January 2011- 17, 21, 23, 24, 26, 27, 28 31 Feb.2011- 3, 4, 7, 9, 18, 20, 24, 25, 27, 28 March 2011- 2, 7 May 2011- 11, 12, 13, 18, 19, 20, 22, 23, 29, 30 June 2011- 1, 2, 3, 8, 9, 10, 12, 13, 19, 20, 26, 29 Upanayana Days: February 2011- 8 March 2011- 7 May 2011- 12, 13 June 2011- 6, 12 Dviragaman Din: November 2010- 19, 22, 25, 26 December 2010- 6, 8, 9, 10, 12 February 2011- 20, 21 March 2011- 6, 7, 9, 13 April 2011- 17, 18, 22 May 2011- 5, 6, 8, 13 Mundan Din: November 2010- 24, 26 December 2010- 10, 17 February 2011- 4, 16, 21 March 2011- 7, 9 April 2011- 22 May 2011- 6, 9, 19 June 2011- 3, 6, 10, 20 FESTIVALS OF MITHILA Mauna Panchami-31 July Somavati Amavasya Vrat- 1 August Madhushravani-12 August Nag Panchami- 14 August Raksha Bandhan- 24 Aug Krishnastami- 01 September Kushi Amavasya- 08 September Hartalika Teej- 11 September ChauthChandra-11 September Vishwakarma Pooja- 17 September Karma Dharma Ekadashi-19 September Indra Pooja Aarambh- 20 September Anant Caturdashi- 22 Sep Agastyarghadaan- 23 Sep Pitri Paksha begins- 24 Sep Jimootavahan Vrata/ Jitia-30 Sep Matri Navami- 02 October Kalashsthapan- 08 October Belnauti- 13 October Patrika Pravesh- 14 October Mahastami- 15 October Maha Navami - 16-17 October Vijaya Dashami- 18 October Kojagara- 22 Oct Dhanteras- 3 November Diyabati, shyama pooja- 5 November Annakoota/ Govardhana Pooja-07 November Bhratridwitiya/ Chitragupta Pooja-08 November Chhathi- -12 November Akshyay Navami- 15 November Devotthan Ekadashi- 17 November Kartik Poornima/ Sama Bisarjan- 21 Nov Shaa. ravivratarambh- 21 November Navanna parvan- 24 -26 November Vivaha Panchmi- 10 December Naraknivaran chaturdashi- 01 February Makara/ Teela Sankranti-15 Jan Basant Panchami/ Saraswati Pooja- 08 Februaqry Achla Saptmi- 10 February Mahashivaratri-03 March Holikadahan-Fagua-19 March Holi-20 Mar Varuni Yoga- 31 March va.navaratrarambh- 4 April vaa. Chhathi vrata- 9 April Ram Navami- 12 April Mesha Sankranti-Satuani-14 April Jurishital-15 April Somavati Amavasya Vrata- 02 May Ravi Brat Ant- 08 May Akshaya Tritiya-06 May Janaki Navami- 12 May Vat Savitri-barasait- 01 June Ganga Dashhara-11 June Jagannath Rath Yatra- 3 July Hari Sayan Ekadashi- 11 Jul Aashadhi Guru Poornima-15 Jul VIDEHA ARCHIVE १.विदेह ई-पत्रिकाक सभटा पुरान अंक ब्रेल, तिरहुता आ देवनागरी रूपमे Videha e journal's all old issues in Braille Tirhuta and Devanagari versions विदेह ई-पत्रिकाक पहिल ५० अंक

विदेह ई-पत्रिकाक ५०म सँ आगाँक अंक २.मैथिली पोथी डाउनलोड Maithili Books Download ३.मैथिली ऑडियो संकलन Maithili Audio Downloads ४.मैथिली वीडियोक संकलन Maithili Videos ५.मिथिला चित्रकला/ आधुनिक चित्रकला आ चित्र Mithila Painting/ Modern Art and Photos "विदेह"क एहि सभ सहयोगी लिंकपर सेहो एक बेर जाऊ। ६.विदेह मैथिली क्विज  :  http://videhaquiz.blogspot.com/ ७.विदेह मैथिली जालवृत्त एग्रीगेटर : http://videha-aggregator.blogspot.com/ ८.विदेह मैथिली साहित्य अंग्रेजीमे अनूदित http://madhubani-art.blogspot.com/ ९.विदेहक पूर्व-रूप "भालसरिक गाछ"  : http://gajendrathakur.blogspot.com/ १०.विदेह इंडेक्स  : http://videha123.blogspot.com/ ११.विदेह फाइल : http://videha123.wordpress.com/ १२. विदेह: सदेह : पहिल तिरहुता (मिथिला़क्षर) जालवृत्त (ब्लॉग) http://videha-sadeha.blogspot.com/ १३. विदेह:ब्रेल: मैथिली ब्रेलमे: पहिल बेर विदेह द्वारा http://videha-braille.blogspot.com/ १४.VIDEHA IST MAITHILI  FORTNIGHTLY EJOURNAL ARCHIVE http://videha-archive.blogspot.com/ १५. विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका मैथिली पोथीक आर्काइव http://videha-pothi.blogspot.com/ १६. विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका ऑडियो आर्काइव http://videha-audio.blogspot.com/ १७. विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका वीडियो आर्काइव http://videha-video.blogspot.com/ १८. विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका मिथिला चित्रकला, आधुनिक कला आ चित्रकला http://videha-paintings-photos.blogspot.com/ १९. मैथिल आर मिथिला (मैथिलीक सभसँ लोकप्रिय जालवृत्त) http://maithilaurmithila.blogspot.com/ २०.श्रुति प्रकाशन http://www.shruti-publication.com/ २१.http://groups.google.com/group/videha VIDEHA केर सदस्यता लिअ Top of Form Bottom of Form ईमेल : एहि समूहपर जाऊ २२.http://groups.yahoo.com/group/VIDEHA/ Top of Form Subscribe to VIDEHA Powered by us.groups.yahoo.com Bottom of Form २३.गजेन्द्र ठाकुर इ‍डेक्स http://gajendrathakur123.blogspot.com २४.विदेह रेडियो:मैथिली कथा-कविता आदिक पहिल पोडकास्ट साइट http://videha123radio.wordpress.com/ २५. नेना भुटका http://mangan-khabas.blogspot.com/ महत्त्वपूर्ण सूचना:(१) 'विदेह' द्वारा धारावाहिक रूपे ई-प्रकाशित कएल गेल गजेन्द्र ठाकुरक  निबन्ध-प्रबन्ध-समीक्षा, उपन्यास (सहस्रबाढ़नि) , पद्य-संग्रह (सहस्राब्दीक चौपड़पर), कथा-गल्प (गल्प-गुच्छ), नाटक(संकर्षण), महाकाव्य (त्वञ्चाहञ्च आ असञ्जाति मन) आ बाल-किशोर साहित्य विदेहमे संपूर्ण ई-प्रकाशनक बाद प्रिंट फॉर्ममे। कुरुक्षेत्रम्–अन्तर्मनक खण्ड-१ सँ ७ Combined ISBN No.978-81-907729-7-6 विवरण एहि पृष्ठपर नीचाँमे आ प्रकाशकक साइट http://www.shruti-publication.com/ पर । महत्त्वपूर्ण सूचना (२):सूचना: विदेहक मैथिली-अंग्रेजी आ अंग्रेजी मैथिली कोष (इंटरनेटपर पहिल बेर सर्च-डिक्शनरी) एम.एस. एस.क्यू.एल. सर्वर आधारित -Based on ms-sql server Maithili-English and English-Maithili Dictionary. विदेहक भाषापाक- रचनालेखन स्तंभमे। कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक- गजेन्द्र ठाकुर गजेन्द्र ठाकुरक निबन्ध-प्रबन्ध-समीक्षा, उपन्यास (सहस्रबाढ़नि) , पद्य-संग्रह (सहस्राब्दीक चौपड़पर), कथा-गल्प (गल्प गुच्छ), नाटक(संकर्षण), महाकाव्य (त्वञ्चाहञ्च आ असञ्जाति मन) आ बालमंडली-किशोरजगत विदेहमे संपूर्ण ई-प्रकाशनक बाद प्रिंट फॉर्ममे। कुरुक्षेत्रम्–अन्तर्मनक, खण्ड-१ सँ ७ Ist edition 2009 of Gajendra Thakur’s KuruKshetram-Antarmanak (Vol. I to VII)- essay-paper-criticism, novel, poems, story, play, epics and Children-grown-ups literature in single binding: Language:Maithili ६९२ पृष्ठ : मूल्य भा. रु. 100/-(for individual buyers inside india) (add courier charges Rs.50/-per copy for Delhi/NCR and Rs.100/- per copy for outside Delhi)

For Libraries and overseas buyers $40 US (including postage)

The book is AVAILABLE FOR PDF DOWNLOAD AT

https://sites.google.com/a/videha.com/videha/

http://videha123.wordpress.com/  

Details for purchase available at print-version publishers's site website: http://www.shruti-publication.com/ or you may write to e-mail:shruti.publication@shruti-publication.com विदेह: सदेह : १: २: ३: ४ तिरहुता : देवनागरी "विदेह" क, प्रिंट संस्करण :विदेह-ई-पत्रिका (http://www.videha.co.in/) क चुनल रचना सम्मिलित। विदेह:सदेह:१: २: ३: ४ सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। Details for purchase available at print-version publishers's site http://www.shruti-publication.com  or you may write to shruti.publication@shruti-publication.com २. संदेश- [ विदेह ई-पत्रिका, विदेह:सदेह मिथिलाक्षर आ देवनागरी आ गजेन्द्र ठाकुरक सात खण्डक- निबन्ध-प्रबन्ध-समीक्षा,उपन्यास (सहस्रबाढ़नि) , पद्य-संग्रह (सहस्राब्दीक चौपड़पर), कथा-गल्प (गल्प गुच्छ), नाटक (संकर्षण), महाकाव्य (त्वञ्चाहञ्च आ असञ्जाति मन) आ बाल-मंडली-किशोर जगत- संग्रह कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक मादेँ। ] १.श्री गोविन्द झा- विदेहकेँ तरंगजालपर उतारि विश्वभरिमे मातृभाषा मैथिलीक लहरि जगाओल, खेद जे अपनेक एहि महाभियानमे हम एखन धरि संग नहि दए सकलहुँ। सुनैत छी अपनेकेँ सुझाओ आ रचनात्मक आलोचना प्रिय लगैत अछि तेँ किछु लिखक मोन भेल। हमर सहायता आ सहयोग अपनेकेँ सदा उपलब्ध रहत। २.श्री रमानन्द रेणु- मैथिलीमे ई-पत्रिका पाक्षिक रूपेँ चला कऽ जे अपन मातृभाषाक प्रचार कऽ रहल छी, से धन्यवाद । आगाँ अपनेक समस्त मैथिलीक कार्यक हेतु हम हृदयसँ शुभकामना दऽ रहल छी। ३.श्री विद्यानाथ झा "विदित"- संचार आ प्रौद्योगिकीक एहि प्रतिस्पर्धी ग्लोबल युगमे अपन महिमामय "विदेह"केँ अपना देहमे प्रकट देखि जतबा प्रसन्नता आ संतोष भेल, तकरा कोनो उपलब्ध "मीटर"सँ नहि नापल जा सकैछ? ..एकर ऐतिहासिक मूल्यांकन आ सांस्कृतिक प्रतिफलन एहि शताब्दीक अंत धरि लोकक नजरिमे आश्चर्यजनक रूपसँ प्रकट हैत। ४. प्रो. उदय नारायण सिंह "नचिकेता"- जे काज अहाँ कए रहल छी तकर चरचा एक दिन मैथिली भाषाक इतिहासमे होएत। आनन्द भए रहल अछि, ई जानि कए जे एतेक गोट मैथिल "विदेह" ई जर्नलकेँ पढ़ि रहल छथि।...विदेहक चालीसम अंक पुरबाक लेल अभिनन्दन। ५. डॉ. गंगेश गुंजन- एहि विदेह-कर्ममे लागि रहल अहाँक सम्वेदनशील मन, मैथिलीक प्रति समर्पित मेहनतिक अमृत रंग, इतिहास मे एक टा विशिष्ट फराक अध्याय आरंभ करत, हमरा विश्वास अछि। अशेष शुभकामना आ बधाइक सङ्ग, सस्नेह...अहाँक पोथी कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक प्रथम दृष्टया बहुत भव्य तथा उपयोगी बुझाइछ। मैथिलीमे तँ अपना स्वरूपक प्रायः ई पहिले एहन  भव्य अवतारक पोथी थिक। हर्षपूर्ण हमर हार्दिक बधाई स्वीकार करी। ६. श्री रामाश्रय झा "रामरंग"(आब स्वर्गीय)- "अपना" मिथिलासँ संबंधित...विषय वस्तुसँ अवगत भेलहुँ।...शेष सभ कुशल अछि। ७. श्री ब्रजेन्द्र त्रिपाठी- साहित्य अकादमी- इंटरनेट पर प्रथम मैथिली पाक्षिक पत्रिका "विदेह" केर लेल बधाई आ शुभकामना स्वीकार करू। ८. श्री प्रफुल्लकुमार सिंह "मौन"- प्रथम मैथिली पाक्षिक पत्रिका "विदेह" क प्रकाशनक समाचार जानि कनेक चकित मुदा बेसी आह्लादित भेलहुँ। कालचक्रकेँ पकड़ि जाहि दूरदृष्टिक परिचय देलहुँ, ओहि लेल हमर मंगलकामना। ९.डॉ. शिवप्रसाद यादव- ई जानि अपार हर्ष भए रहल अछि, जे नव सूचना-क्रान्तिक क्षेत्रमे मैथिली पत्रकारिताकेँ प्रवेश दिअएबाक साहसिक कदम उठाओल अछि। पत्रकारितामे एहि प्रकारक नव प्रयोगक हम स्वागत करैत छी, संगहि "विदेह"क सफलताक शुभकामना। १०. श्री आद्याचरण झा- कोनो पत्र-पत्रिकाक प्रकाशन- ताहूमे मैथिली पत्रिकाक प्रकाशनमे के कतेक सहयोग करताह- ई तऽ भविष्य कहत। ई हमर ८८ वर्षमे ७५ वर्षक अनुभव रहल। एतेक पैघ महान यज्ञमे हमर श्रद्धापूर्ण आहुति प्राप्त होयत- यावत ठीक-ठाक छी/ रहब। ११. श्री विजय ठाकुर- मिशिगन विश्वविद्यालय- "विदेह" पत्रिकाक अंक देखलहुँ, सम्पूर्ण टीम बधाईक पात्र अछि। पत्रिकाक मंगल भविष्य हेतु हमर शुभकामना स्वीकार कएल जाओ। १२. श्री सुभाषचन्द्र यादव- ई-पत्रिका "विदेह" क बारेमे जानि प्रसन्नता भेल। ’विदेह’ निरन्तर पल्लवित-पुष्पित हो आ चतुर्दिक अपन सुगंध पसारय से कामना अछि। १३. श्री मैथिलीपुत्र प्रदीप- ई-पत्रिका "विदेह" केर सफलताक भगवतीसँ कामना। हमर पूर्ण सहयोग रहत। १४. डॉ. श्री भीमनाथ झा- "विदेह" इन्टरनेट पर अछि तेँ "विदेह" नाम उचित आर कतेक रूपेँ एकर विवरण भए सकैत अछि। आइ-काल्हि मोनमे उद्वेग रहैत अछि, मुदा शीघ्र पूर्ण सहयोग देब।कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक देखि अति प्रसन्नता भेल। मैथिलीक लेल ई घटना छी। १५. श्री रामभरोस कापड़ि "भ्रमर"- जनकपुरधाम- "विदेह" ऑनलाइन देखि रहल छी। मैथिलीकेँ अन्तर्राष्ट्रीय जगतमे पहुँचेलहुँ तकरा लेल हार्दिक बधाई। मिथिला रत्न सभक संकलन अपूर्व। नेपालोक सहयोग भेटत, से विश्वास करी। १६. श्री राजनन्दन लालदास- "विदेह" ई-पत्रिकाक माध्यमसँ बड़ नीक काज कए रहल छी, नातिक अहिठाम देखलहुँ। एकर वार्षिक अ‍ंक जखन प्रिं‍ट निकालब तँ हमरा पठायब। कलकत्तामे बहुत गोटेकेँ हम साइटक पता लिखाए देने छियन्हि। मोन तँ होइत अछि जे दिल्ली आबि कए आशीर्वाद दैतहुँ, मुदा उमर आब बेशी भए गेल। शुभकामना देश-विदेशक मैथिलकेँ जोड़बाक लेल।.. उत्कृष्ट प्रकाशन कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक लेल बधाइ। अद्भुत काज कएल अछि, नीक प्रस्तुति अछि सात खण्डमे।  मुदा अहाँक सेवा आ से निःस्वार्थ तखन बूझल जाइत जँ अहाँ द्वारा प्रकाशित पोथी सभपर दाम लिखल नहि रहितैक। ओहिना सभकेँ विलहि देल जइतैक। (स्पष्टीकरण-  श्रीमान्, अहाँक सूचनार्थ विदेह द्वारा ई-प्रकाशित कएल सभटा सामग्री आर्काइवमे https://sites.google.com/a/videha.com/videha-pothi/ पर बिना मूल्यक डाउनलोड लेल उपलब्ध छै आ भविष्यमे सेहो रहतैक। एहि आर्काइवकेँ जे कियो प्रकाशक अनुमति लऽ कऽ प्रिंट रूपमे प्रकाशित कएने छथि आ तकर ओ दाम रखने छथि ताहिपर हमर कोनो नियंत्रण नहि अछि।- गजेन्द्र ठाकुर)...   अहाँक प्रति अशेष शुभकामनाक संग। १७. डॉ. प्रेमशंकर सिंह- अहाँ मैथिलीमे इंटरनेटपर पहिल पत्रिका "विदेह" प्रकाशित कए अपन अद्भुत मातृभाषानुरागक परिचय देल अछि, अहाँक निःस्वार्थ मातृभाषानुरागसँ प्रेरित छी, एकर निमित्त जे हमर सेवाक प्रयोजन हो, तँ सूचित करी। इंटरनेटपर आद्योपांत पत्रिका देखल, मन प्रफुल्लित भऽ गेल। १८.श्रीमती शेफालिका वर्मा- विदेह ई-पत्रिका देखि मोन उल्लाससँ भरि गेल। विज्ञान कतेक प्रगति कऽ रहल अछि...अहाँ सभ अनन्त आकाशकेँ भेदि दियौ, समस्त विस्तारक रहस्यकेँ तार-तार कऽ दियौक...। अपनेक अद्भुत पुस्तक कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक विषयवस्तुक दृष्टिसँ गागरमे सागर अछि। बधाई। १९.श्री हेतुकर झा, पटना-जाहि समर्पण भावसँ अपने मिथिला-मैथिलीक सेवामे तत्पर छी से स्तुत्य अछि। देशक राजधानीसँ भय रहल मैथिलीक शंखनाद मिथिलाक गाम-गाममे मैथिली चेतनाक विकास अवश्य करत। २०. श्री योगानन्द झा, कबिलपुर, लहेरियासराय- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पोथीकेँ निकटसँ देखबाक अवसर भेटल अछि आ मैथिली जगतक एकटा उद्भट ओ समसामयिक दृष्टिसम्पन्न हस्ताक्षरक कलमबन्द परिचयसँ आह्लादित छी। "विदेह"क देवनागरी सँस्करण पटनामे रु. 80/- मे उपलब्ध भऽ सकल जे विभिन्न लेखक लोकनिक छायाचित्र, परिचय पत्रक ओ रचनावलीक सम्यक प्रकाशनसँ ऐतिहासिक कहल जा सकैछ। २१. श्री किशोरीकान्त मिश्र- कोलकाता- जय मैथिली, विदेहमे बहुत रास कविता, कथा, रिपोर्ट आदिक सचित्र संग्रह देखि आ आर अधिक प्रसन्नता मिथिलाक्षर देखि- बधाई स्वीकार कएल जाओ। २२.श्री जीवकान्त- विदेहक मुद्रित अंक पढ़ल- अद्भुत मेहनति। चाबस-चाबस। किछु समालोचना मरखाह..मुदा सत्य। २३. श्री भालचन्द्र झा- अपनेक कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक देखि बुझाएल जेना हम अपने छपलहुँ अछि। एकर विशालकाय आकृति अपनेक सर्वसमावेशताक परिचायक अछि। अपनेक रचना सामर्थ्यमे उत्तरोत्तर वृद्धि हो, एहि शुभकामनाक संग हार्दिक बधाई। २४.श्रीमती डॉ नीता झा- अहाँक कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़लहुँ। ज्योतिरीश्वर शब्दावली, कृषि मत्स्य शब्दावली आ सीत बसन्त आ सभ कथा, कविता, उपन्यास, बाल-किशोर साहित्य सभ उत्तम छल। मैथिलीक उत्तरोत्तर विकासक लक्ष्य दृष्टिगोचर होइत अछि। २५.श्री मायानन्द मिश्र- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक मे हमर उपन्यास स्त्रीधनक जे विरोध कएल गेल अछि तकर हम विरोध करैत छी।... कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पोथीक लेल शुभकामना।(श्रीमान् समालोचनाकेँ विरोधक रूपमे नहि लेल जाए।-गजेन्द्र ठाकुर) २६.श्री महेन्द्र हजारी- सम्पादक श्रीमिथिला- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़ि मोन हर्षित भऽ गेल..एखन पूरा पढ़यमे बहुत समय लागत, मुदा जतेक पढ़लहुँ से आह्लादित कएलक। २७.श्री केदारनाथ चौधरी- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक अद्भुत लागल, मैथिली साहित्य लेल ई पोथी एकटा प्रतिमान बनत। २८.श्री सत्यानन्द पाठक- विदेहक हम नियमित पाठक छी। ओकर स्वरूपक प्रशंसक छलहुँ। एम्हर अहाँक लिखल - कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक देखलहुँ। मोन आह्लादित भऽ उठल। कोनो रचना तरा-उपरी। २९.श्रीमती रमा झा-सम्पादक मिथिला दर्पण। कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक प्रिंट फॉर्म पढ़ि आ एकर गुणवत्ता देखि मोन प्रसन्न भऽ गेल, अद्भुत शब्द एकरा लेल प्रयुक्त कऽ रहल छी। विदेहक उत्तरोत्तर प्रगतिक शुभकामना। ३०.श्री नरेन्द्र झा, पटना- विदेह नियमित देखैत रहैत छी। मैथिली लेल अद्भुत काज कऽ रहल छी। ३१.श्री रामलोचन ठाकुर- कोलकाता- मिथिलाक्षर विदेह देखि मोन प्रसन्नतासँ भरि उठल, अंकक विशाल परिदृश्य आस्वस्तकारी अछि। ३२.श्री तारानन्द वियोगी- विदेह आ कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक देखि चकबिदोर लागि गेल। आश्चर्य। शुभकामना आ बधाई। ३३.श्रीमती प्रेमलता मिश्र “प्रेम”- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़लहुँ। सभ रचना उच्चकोटिक लागल। बधाई। ३४.श्री कीर्तिनारायण मिश्र- बेगूसराय- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक बड्ड नीक लागल, आगांक सभ काज लेल बधाई। ३५.श्री महाप्रकाश-सहरसा- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक नीक लागल, विशालकाय संगहि उत्तमकोटिक। ३६.श्री अग्निपुष्प- मिथिलाक्षर आ देवाक्षर विदेह पढ़ल..ई प्रथम तँ अछि एकरा प्रशंसामे मुदा हम एकरा दुस्साहसिक कहब। मिथिला चित्रकलाक स्तम्भकेँ मुदा अगिला अंकमे आर विस्तृत बनाऊ। ३७.श्री मंजर सुलेमान-दरभंगा- विदेहक जतेक प्रशंसा कएल जाए कम होएत। सभ चीज उत्तम। ३८.श्रीमती प्रोफेसर वीणा ठाकुर- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक उत्तम, पठनीय, विचारनीय। जे क्यो देखैत छथि पोथी प्राप्त करबाक उपाय पुछैत छथि। शुभकामना। ३९.श्री छत्रानन्द सिंह झा- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़लहुँ, बड्ड नीक सभ तरहेँ। ४०.श्री ताराकान्त झा- सम्पादक मैथिली दैनिक मिथिला समाद- विदेह तँ कन्टेन्ट प्रोवाइडरक काज कऽ रहल अछि। कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक अद्भुत लागल। ४१.डॉ रवीन्द्र कुमार चौधरी- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक बहुत नीक, बहुत मेहनतिक परिणाम। बधाई। ४२.श्री अमरनाथ- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक आ विदेह दुनू स्मरणीय घटना अछि, मैथिली साहित्य मध्य। ४३.श्री पंचानन मिश्र- विदेहक वैविध्य आ निरन्तरता प्रभावित करैत अछि, शुभकामना। ४४.श्री केदार कानन- कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक लेल अनेक धन्यवाद, शुभकामना आ बधाइ स्वीकार करी। आ नचिकेताक भूमिका पढ़लहुँ। शुरूमे तँ लागल जेना कोनो उपन्यास अहाँ द्वारा सृजित भेल अछि मुदा पोथी उनटौला पर ज्ञात भेल जे एहिमे तँ सभ विधा समाहित अछि। ४५.श्री धनाकर ठाकुर- अहाँ नीक काज कऽ रहल छी। फोटो गैलरीमे चित्र एहि शताब्दीक जन्मतिथिक अनुसार रहैत तऽ नीक। ४६.श्री आशीष झा- अहाँक पुस्तकक संबंधमे एतबा लिखबा सँ अपना कए नहि रोकि सकलहुँ जे ई किताब मात्र किताब नहि थीक, ई एकटा उम्मीद छी जे मैथिली अहाँ सन पुत्रक सेवा सँ निरंतर समृद्ध होइत चिरजीवन कए प्राप्त करत। ४७.श्री शम्भु कुमार सिंह- विदेहक तत्परता आ क्रियाशीलता देखि आह्लादित भऽ रहल छी। निश्चितरूपेण कहल जा सकैछ जे समकालीन मैथिली पत्रिकाक इतिहासमे विदेहक नाम स्वर्णाक्षरमे लिखल जाएत। ओहि कुरुक्षेत्रक घटना सभ तँ अठारहे दिनमे खतम भऽ गेल रहए मुदा अहाँक कुरुक्षेत्रम् तँ अशेष अछि। ४८.डॉ. अजीत मिश्र- अपनेक प्रयासक कतबो प्रश‍ंसा कएल जाए कमे होएतैक। मैथिली साहित्यमे अहाँ द्वारा कएल गेल काज युग-युगान्तर धरि पूजनीय रहत। ४९.श्री बीरेन्द्र मल्लिक- अहाँक कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक आ विदेह:सदेह पढ़ि अति प्रसन्नता भेल। अहाँक स्वास्थ्य ठीक रहए आ उत्साह बनल रहए से कामना। ५०.श्री कुमार राधारमण- अहाँक दिशा-निर्देशमे विदेह पहिल मैथिली ई-जर्नल देखि अति प्रसन्नता भेल। हमर शुभकामना। ५१.श्री फूलचन्द्र झा प्रवीण-विदेह:सदेह पढ़ने रही मुदा कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक देखि बढ़ाई देबा लेल बाध्य भऽ गेलहुँ। आब विश्वास भऽ गेल जे मैथिली नहि मरत। अशेष शुभकामना। ५२.श्री विभूति आनन्द- विदेह:सदेह देखि, ओकर विस्तार देखि अति प्रसन्नता भेल। ५३.श्री मानेश्वर मनुज-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक एकर भव्यता देखि अति प्रसन्नता भेल, एतेक विशाल ग्रन्थ मैथिलीमे आइ धरि नहि देखने रही। एहिना भविष्यमे काज करैत रही, शुभकामना। ५४.श्री विद्यानन्द झा- आइ.आइ.एम.कोलकाता- कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक विस्तार, छपाईक संग गुणवत्ता देखि अति प्रसन्नता भेल। ५५.श्री अरविन्द ठाकुर-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक मैथिली साहित्यमे कएल गेल एहि तरहक पहिल प्रयोग अछि, शुभकामना। ५६.श्री कुमार पवन-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक पढ़ि रहल छी। किछु लघुकथा पढ़ल अछि, बहुत मार्मिक छल। ५७. श्री प्रदीप बिहारी-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक देखल, बधाई। ५८.डॉ मणिकान्त ठाकुर-कैलिफोर्निया- अपन विलक्षण नियमित सेवासँ हमरा लोकनिक हृदयमे विदेह सदेह भऽ गेल अछि। ५९.श्री धीरेन्द्र प्रेमर्षि- अहाँक समस्त प्रयास सराहनीय। दुख होइत अछि जखन अहाँक प्रयासमे अपेक्षित सहयोग नहि कऽ पबैत छी। ६०.श्री देवशंकर नवीन- विदेहक निरन्तरता आ विशाल स्वरूप- विशाल पाठक वर्ग, एकरा ऐतिहासिक बनबैत अछि। ६१.श्री मोहन भारद्वाज- अहाँक समस्त कार्य देखल, बहुत नीक। एखन किछु परेशानीमे छी, मुदा शीघ्र सहयोग देब। ६२.श्री फजलुर रहमान हाशमी-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक मे एतेक मेहनतक लेल अहाँ साधुवादक अधिकारी छी। ६३.श्री लक्ष्मण झा "सागर"- मैथिलीमे चमत्कारिक रूपेँ अहाँक प्रवेश आह्लादकारी अछि।..अहाँकेँ एखन आर..दूर..बहुत दूरधरि जेबाक अछि। स्वस्थ आ प्रसन्न रही। ६४.श्री जगदीश प्रसाद मंडल-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक पढ़लहुँ । कथा सभ आ उपन्यास सहस्रबाढ़नि पूर्णरूपेँ पढ़ि गेल छी। गाम-घरक भौगोलिक विवरणक जे सूक्ष्म वर्णन सहस्रबाढ़निमे अछि, से चकित कएलक, एहि संग्रहक कथा-उपन्यास मैथिली लेखनमे विविधता अनलक अछि। समालोचना शास्त्रमे अहाँक दृष्टि वैयक्तिक नहि वरन् सामाजिक आ कल्याणकारी अछि, से प्रशंसनीय। ६५.श्री अशोक झा-अध्यक्ष मिथिला विकास परिषद- कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक लेल बधाई आ आगाँ लेल शुभकामना। ६६.श्री ठाकुर प्रसाद मुर्मु- अद्भुत प्रयास। धन्यवादक संग प्रार्थना जे अपन माटि-पानिकेँ ध्यानमे राखि अंकक समायोजन कएल जाए। नव अंक धरि प्रयास सराहनीय। विदेहकेँ बहुत-बहुत धन्यवाद जे एहेन सुन्दर-सुन्दर सचार (आलेख) लगा रहल छथि। सभटा ग्रहणीय- पठनीय। ६७.बुद्धिनाथ मिश्र- प्रिय गजेन्द्र जी,अहाँक सम्पादन मे प्रकाशित ‘विदेह’आ ‘कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक’ विलक्षण पत्रिका आ विलक्षण पोथी! की नहि अछि अहाँक सम्पादनमे? एहि प्रयत्न सँ मैथिली क विकास होयत,निस्संदेह। ६८.श्री बृखेश चन्द्र लाल- गजेन्द्रजी, अपनेक पुस्तक कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक पढ़ि मोन गदगद भय गेल , हृदयसँ अनुगृहित छी । हार्दिक शुभकामना । ६९.श्री परमेश्वर कापड़ि - श्री गजेन्द्र जी । कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक पढ़ि गदगद आ नेहाल भेलहुँ। ७०.श्री रवीन्द्रनाथ ठाकुर- विदेह पढ़ैत रहैत छी। धीरेन्द्र प्रेमर्षिक मैथिली गजलपर आलेख पढ़लहुँ। मैथिली गजल कत्तऽ सँ कत्तऽ चलि गेलैक आ ओ अपन आलेखमे मात्र अपन जानल-पहिचानल लोकक चर्च कएने छथि। जेना मैथिलीमे मठक परम्परा रहल अछि। (स्पष्टीकरण- श्रीमान्, प्रेमर्षि जी ओहि आलेखमे ई स्पष्ट लिखने छथि जे किनको नाम जे छुटि गेल छन्हि तँ से मात्र आलेखक लेखकक जानकारी नहि रहबाक द्वारे, एहिमे आन कोनो कारण नहि देखल जाय। अहाँसँ एहि विषयपर विस्तृत आलेख सादर आमंत्रित अछि।-सम्पादक) ७१.श्री मंत्रेश्वर झा- विदेह पढ़ल आ संगहि अहाँक मैगनम ओपस कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक सेहो, अति उत्तम। मैथिलीक लेल कएल जा रहल अहाँक समस्त कार्य अतुलनीय अछि। ७२. श्री हरेकृष्ण झा- कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक मैथिलीमे अपन तरहक एकमात्र ग्रन्थ अछि, एहिमे लेखकक समग्र दृष्टि आ रचना कौशल देखबामे आएल जे लेखकक फील्डवर्कसँ जुड़ल रहबाक कारणसँ अछि। ७३.श्री सुकान्त सोम- कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक मे  समाजक इतिहास आ वर्तमानसँ अहाँक जुड़ाव बड्ड नीक लागल, अहाँ एहि क्षेत्रमे आर आगाँ काज करब से आशा अछि। ७४.प्रोफेसर मदन मिश्र- कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक सन किताब मैथिलीमे पहिले अछि आ एतेक विशाल संग्रहपर शोध कएल जा सकैत अछि। भविष्यक लेल शुभकामना। ७५.प्रोफेसर कमला चौधरी- मैथिलीमे कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक सन पोथी आबए जे गुण आ रूप दुनूमे निस्सन होअए, से बहुत दिनसँ आकांक्षा छल, ओ आब जा कऽ पूर्ण भेल। पोथी एक हाथसँ दोसर हाथ घुमि रहल अछि, एहिना आगाँ सेहो अहाँसँ आशा अछि। ७६.श्री उदय चन्द्र झा "विनोद": गजेन्द्रजी, अहाँ जतेक काज कएलहुँ अछि से मैथिलीमे आइ धरि कियो नहि कएने छल। शुभकामना। अहाँकेँ एखन बहुत काज आर करबाक अछि। ७७.श्री कृष्ण कुमार कश्यप: गजेन्द्र ठाकुरजी, अहाँसँ भेँट एकटा स्मरणीय क्षण बनि गेल। अहाँ जतेक काज एहि बएसमे कऽ गेल छी ताहिसँ हजार गुणा आर बेशीक आशा अछि। ७८.श्री मणिकान्त दास: अहाँक मैथिलीक कार्यक प्रशंसा लेल शब्द नहि भेटैत अछि। अहाँक कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक सम्पूर्ण रूपेँ पढ़ि गेलहुँ। त्वञ्चाहञ्च बड्ड नीक लागल। ७९. श्री हीरेन्द्र कुमार झा- विदेह ई-पत्रिकाक सभ अंक ई-पत्रसँ भेटैत रहैत अछि। मैथिलीक ई-पत्रिका छैक एहि बातक गर्व होइत अछि। अहाँ आ अहाँक सभ सहयोगीकेँ हार्दिक शुभकामना। विदेह मैथिली साहित्य आन्दोलन (c)२००४-११. सर्वाधिकार लेखकाधीन आ जतय लेखकक नाम नहि अछि ततय संपादकाधीन। विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। सह-सम्पादक: उमेश मंडल। सहायक सम्पादक: शिव कुमार झा आ मुन्नाजी (मनोज कुमार कर्ण)। भाषा-सम्पादन: नागेन्द्र कुमार झा आ पञ्जीकार विद्यानन्द झा। कला-सम्पादन: ज्योति सुनीत चौधरी आ रश्मि रेखा सिन्हा। सम्पादक-शोध-अन्वेषण: डॉ. जया वर्मा आ डॉ. राजीव कुमार वर्मा। रचनाकार अपन मौलिक आ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि) ggajendra@videha.com केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx, .rtf वा .txt फॉर्मेटमे पठा सकैत छथि। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेताह, से आशा करैत छी। रचनाक अंतमे टाइप रहय, जे ई रचना मौलिक अछि, आ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। मेल प्राप्त होयबाक बाद यथासंभव शीघ्र ( सात दिनक भीतर) एकर प्रकाशनक अंकक सूचना देल जायत। ’विदेह' प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका अछि आ एहिमे मैथिली, संस्कृत आ अंग्रेजीमे मिथिला आ मैथिलीसँ संबंधित रचना प्रकाशित कएल जाइत अछि। एहि ई पत्रिकाकेँ श्रीमति लक्ष्मी ठाकुर द्वारा मासक ०१ आ १५ तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि। (c) 2004-11 सर्वाधिकार सुरक्षित। विदेहमे प्रकाशित सभटा रचना आ आर्काइवक सर्वाधिकार रचनाकार आ संग्रहकर्त्ताक लगमे छन्हि। रचनाक अनुवाद आ पुनः प्रकाशन किंवा आर्काइवक उपयोगक अधिकार किनबाक हेतु ggajendra@videha.co.in पर संपर्क करू। एहि साइटकेँ प्रीति झा ठाकुर, मधूलिका चौधरी आ रश्मि प्रिया द्वारा डिजाइन कएल गेल। सिद्धिरस्तु वि दे ह विदेह Videha বিদেহ  विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका Videha Ist Maithili Fortnightly e Magazine  विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका 'विदेह' ७४ म अंक १५ जनवरी २०११ (वर्ष ४ मास ३७ अंक ७४)http://www.videha.co.in/ मानुषीमिह संस्कृताम् ISSN 2229-547X VIDEHA वि दे ह विदेह Videha বিদেহ  विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका Videha Ist Maithili Fortnightly e Magazine  विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका 'विदेह' ७४ म अंक १५ जनवरी २०११ (वर्ष ४ मास ३७ अंक ७४)http://www.videha.co.in/ मानुषीमिह संस्कृताम् ISSN 2229-547X VIDEHA

LS | La i i i | a

am PS = a ar ee शी दिउ | P| j a 42 . dl & Pj

: hy हि ‘ \ , | “oy

| | : Fit है ै कर । oe cs aT - दि " é “= ' _ =o H,

) 7 ~ ह की अ.. i ; ” iN * ' The, \ : | ¥ Tig

अर Ne 3 ; कम fa

ft 4 ea i | 7. : ' a _ Bp pay वि

F _— \ x के eS yk लि भा : os A 3 a | (Km | \\ A A ; a ‘ a ; = i as ’ थे का + : a 7 i ‘| ; J m 4 \ i q *~ = be ) LJ ail #

रह EGS des bes Sate LID SSS oe Pas fs y jis ! Nal ae niet os epee Na a ( < ily EX (aS { थी किक iS A Cy oN Yessy) HLA Se sais Be oe] e

नि कि गे मी मे एड 7) Pie as Tones MN A eg of Rise ae ie oi AE ta opiate CC: eee 7 = 7 Je ; SPR al, ah ee SONS 723 ं! पट SS हैं हु. ८८८:2.2->->... ता डरा,

™ a + mee ei

fj | Pu “ 5 : मय > HoT | १4 J ' "Vv 7 a ¢ ri ; { Ye’ rf ver? ही y / कं wi है . { & aes Ky at aks ye ? pi Po

डे ee 2 क्र rus > cf P B23 SS el) ad ye for ch 4 3205205 a Cr Ae b> Z V4 WG Aa? oo छह: 8 26° ees Teg \ Pao, YE ep oe Teeter Ve23 > Ae ee \ eS Veees ate g ७ es A \ a) SS ललि = @ 0, A O24 Jy a /A ही, ys 4 ’ ee Pr RN wIS>75 5 (लि 2९6, ७: ना | > ' Gayl GP» Ss Ke Ee; CY a2 SWAY? « iz X |! Cae i 50-4 ye . 3) > S a NC LE A) eS ES

{KONKaN!) ays. Yoga Nand Jha (Maithili) _

| A it | I €.3 Sai ‘ |) Ra

ee rx JS St VAN \’ ras ING ‘ = 4 दा Bu a | $ कि i . : थक. & oF री ० ७ ही कै) कर ae SS SD " ~~ eg i -