VIDEHA — Issue 75 / अंक ७५

Publication: VIDEHA · Issue: 75
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390 389 ISSN 2229-547X VIDEHA 'विदेह' ७५ म अंक ०१ फरवरी २०११ (वर्ष ४ मास ३८ अंक ७५) वि  दे  ह विदेह Videha বিদেহ http://www.videha.co.in  विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका Videha Ist Maithili Fortnightly e Magazine   नव अंक देखबाक लेल पृष्ठ सभकेँ रिफ्रेश कए देखू। Always refresh the pages for viewing new issue of VIDEHA. Read in your own script Roman(Eng)Gujarati Bangla Oriya Gurmukhi Telugu Tamil Kannada Malayalam Hindi एहि अंकमे अछि:- १. संपादकीय संदेश २. गद्य २.१.१.डॉ. कैलाश कुमार मि‍श्र- पोथी समीक्षा- गामक जि‍नगी- जगदीश प्रसाद मण्‍डल २.राजदेव मण्‍डल- कुरूक्षेत्रम् अन्‍तर्मनक (गजेन्द्र ठाकुर) लेल पत्रक शेषांश ३. डाॅ. योगानन्‍द झा- मैथि‍ली बाललोककथा : स्‍थि‍ति‍ आ अपेक्षा २.२.१. विनीत उत्पल- दीर्घकथा- घोड़ीपर चढ़ि लेब हम डिग्री –पाँचम भाग २. मि‍थि‍लेश मंडल- कथा-सुदि‍क रूपैआ ३.- कपि‍लेश्वर राउत- कथा- थरथरी ४.उमेश मंडल- विहनि कथा- दोस्‍ती २.३.हम पुछैत छी- मुन्नाजीक १.गौरीनाथ आ २अनमोल झासँ गप्प-सप्प। २.४.१.जगदीश प्रसाद मंडल- कथा- जगदीश प्रसाद मंडल- कथा- पड़ाइन २.ज्योति सुनीत चौधरी- अदृश्य बन्धन : २.५.१.रवि भूषण पाठक- एक टा अभिशप्त कवि : बूच बाबू २.कृपा नन्द झा मैथिलक जन नायक चुनचुन मिश्र २.६.१शि‍वकुमार झा टि‍ल्‍लू- समीक्षा- सूर्यमुखी २.बिपिन झा- यान्त्रिक अनुवाद आ Polysemy- पछिला अंक सऽ आगू ३. सुजित कुमार झा- कथा- भौजी २.७.१ . किशन कारीगर- दाम-दिगर (एकटा हास्य कथा) २.बेचन ठाकुर बेटीक अपमान- दृश्‍य सातम ३.लक्ष्मी दास- विहनि कथा- दाढ़ी ४ जितेन्द्र झा- के राखत रुमालक इज्जति २.८.१.डाँ कैलाश कुमार मिश्र यायावरी- उत्तराखण्‍डक नन्‍दा-राजजात २.रामभरोस कापड़ि "भ्रमर"- अन्तर्राष्ट्रीय मैथिली सम्मेलन ः २०६७ ३. पद्य ३.१.सुबोध कुमार ठाकुर ३.२.मनोज कुमार मण्‍डल ३.३. राम वि‍लास साहु ३.४.राजेश मोहन झा- कवि‍ता- पादुका वि‍योग ३.५.नवीन कुमार "आशा" ३.६.जगदीश प्रसाद मंडल ३.७.गजेन्द्र ठाकुर ३.८.संजय कुमार मंडल ४. मिथिला कला-संगीत-१.श्वेता झा चौधरी २.ज्योति सुनीत चौधरी ३श्वेता झा (सिंगापुर) ५. गद्य-पद्य भारती: मोहनदास: (दीर्घकथा):लेखक :  उदय प्रकाश (मूल हिन्दीसँ मैथिलीमे अनुवाद विनीत उत्पल) ६. बालानां कृते-ज्योति सुनीत चौधरी- वनभोज ७. भाषापाक रचना-लेखन -[मानक मैथिली], [विदेहक मैथिली-अंग्रेजी आ अंग्रेजी मैथिली कोष (इंटरनेटपर पहिल बेर सर्च-डिक्शनरी) एम.एस. एस.क्यू.एल. सर्वर आधारित -Based on ms-sql server Maithili-English and English-Maithili Dictionary.] 8.VIDEHA FOR NON RESIDENTS 8.1.Original Poem in Maithili by Kalikant Jha "Buch" Translated into English by Jyoti Jha Chaudhary 8.2.Maithili Short-story “Sidha Mahavir” by Gajendra Thakur re-written in English by the author himself. विदेह ई-पत्रिकाक सभटा पुरान अंक ( ब्रेल, तिरहुता आ देवनागरी मे ) पी.डी.एफ. डाउनलोडक लेल नीचाँक लिंकपर उपलब्ध अछि। All the old issues of Videha e journal ( in Braille, Tirhuta and Devanagari versions ) are available for pdf download at the following link. विदेह ई-पत्रिकाक सभटा पुरान अंक ब्रेल, तिरहुता आ देवनागरी रूपमे Videha e journal's all old issues in Braille Tirhuta and Devanagari versions विदेह ई-पत्रिकाक पहिल ५० अंक

विदेह ई-पत्रिकाक ५०म सँ आगाँक अंक विदेह आर.एस.एस.फीड। "विदेह" ई-पत्रिका ई-पत्रसँ प्राप्त करू। अपन मित्रकेँ विदेहक विषयमे सूचित करू। ↑ विदेह आर.एस.एस.फीड एनीमेटरकेँ अपन साइट/ ब्लॉगपर लगाऊ। ब्लॉग "लेआउट" पर "एड गाडजेट" मे "फीड" सेलेक्ट कए "फीड यू.आर.एल." मे http://www.videha.co.in/index.xml टाइप केलासँ सेहो विदेह फीड प्राप्त कए सकैत छी। गूगल रीडरमे पढ़बा लेल http://reader.google.com/ पर जा कऽ Add a  Subscription बटन क्लिक करू आ खाली स्थानमे http://www.videha.co.in/index.xml पेस्ट करू आ Add  बटन दबाऊ। मैथिली देवनागरी वा मिथिलाक्षरमे नहि देखि/ लिखि पाबि रहल छी, (cannot see/write Maithili in Devanagari/ Mithilakshara follow links below or contact at ggajendra@videha.com) तँ एहि हेतु नीचाँक लिंक सभ पर जाऊ। संगहि विदेहक स्तंभ मैथिली भाषापाक/ रचना लेखनक नव-पुरान अंक पढ़ू। http://devanaagarii.net/ http://kaulonline.com/uninagari/  (एतए बॉक्समे ऑनलाइन देवनागरी टाइप करू, बॉक्ससँ कॉपी करू आ वर्ड डॉक्युमेन्टमे पेस्ट कए वर्ड फाइलकेँ सेव करू। विशेष जानकारीक लेल ggajendra@videha.com पर सम्पर्क करू।)(Use Firefox 3.0 (from WWW.MOZILLA.COM )/ Opera/ Safari/ Internet Explorer 8.0/ Flock 2.0/ Google Chrome for best view of 'Videha' Maithili e-journal at http://www.videha.co.in/ .) Go to the link below for download of old issues of VIDEHA Maithili e magazine in .pdf format and Maithili Audio/ Video/ Book/ paintings/ photo files. विदेहक पुरान अंक आ ऑडियो/ वीडियो/ पोथी/ चित्रकला/ फोटो सभक फाइल सभ (उच्चारण, बड़ सुख सार आ दूर्वाक्षत मंत्र सहित) डाउनलोड करबाक हेतु नीचाँक लिंक पर जाऊ। VIDEHA ARCHIVE विदेह आर्काइव भारतीय डाक विभाग द्वारा जारी कवि, नाटककार आ धर्मशास्त्री विद्यापतिक स्टाम्प। भारत आ नेपालक माटिमे पसरल मिथिलाक धरती प्राचीन कालहिसँ महान पुरुष ओ महिला लोकनिक कर्मभूमि रहल अछि। मिथिलाक महान पुरुष ओ महिला लोकनिक चित्र 'मिथिला रत्न' मे देखू। गौरी-शंकरक पालवंश कालक मूर्त्ति, एहिमे मिथिलाक्षरमे (१२०० वर्ष पूर्वक) अभिलेख अंकित अछि। मिथिलाक भारत आ नेपालक माटिमे पसरल एहि तरहक अन्यान्य प्राचीन आ नव स्थापत्य, चित्र, अभिलेख आ मूर्त्तिकलाक़ हेतु देखू 'मिथिलाक खोज' मिथिला, मैथिल आ मैथिलीसँ सम्बन्धित सूचना, सम्पर्क, अन्वेषण संगहि विदेहक सर्च-इंजन आ न्यूज सर्विस आ मिथिला, मैथिल आ मैथिलीसँ सम्बन्धित वेबसाइट सभक समग्र संकलनक लेल देखू "विदेह सूचना संपर्क अन्वेषण" विदेह जालवृत्तक डिसकसन फोरमपर जाऊ। "मैथिल आर मिथिला" (मैथिलीक सभसँ लोकप्रिय जालवृत्त) पर जाऊ। संपादकीय महासुन्दरी देवीकेँ मिथिला चित्रकला लेल 2011 क पद्म श्री महासुन्दरी देवी (89 बर्ख) केँ मिथिला चित्रकला लेल 2011 क पद्म श्री देल जाएत। हिनका पहिने तुलसी सम्मान, शिल्पगुरू सम्मान भेटल छन्हि। भारतक राष्ट्रपति 128 पद्म पुरस्कारक देलन्हि, जइमे 13 टा पद्म विभूषण, 31 टा पद्म भूषण आ 84 टा पद्म श्री पुरस्कार अछि। ऐ 128 मे 31 टा महिला छथि, एकटा डुओ( गणना लेल एक) आ 12 टा विदेशी/ एन.आर.आइ./ पी.आइ.ओ/ मृत्योपरांत वर्गसँ छथि ।

पद्म पुरस्कार कला, सामाजिक कार्य, सार्वजनिक सेवा, विज्ञान आ आभियांत्रिकी, व्यापार आ उद्योग, चिकित्सा, साहित्य आ शिक्षा, खेलकूद आ लोकसेवा लेल देल जाइत अछि। पद्म विभूषण उत्कृष्ट आ नीक, पद्म भूषण उच्च कोटिक नीक आ पद्म श्री नीक सेवा लेल देल जाइत अछि। गणतंत्र दिवसक अवसरपर एकर घोषणा होइत अछि आ राष्ट्रपति द्वारा राष्ट्रपति भवनमे मार्च-अप्रैलमे देल जाइत अछि। भारतीय भाषा परिषदक युवा पुरस्कार गौरीनाथ (अनलकांत) केँ मैथिली लेल देल गेल 22 जनवरी, 2011 केँ भारतीय भाषा परिषद, कोलकाताक युवा पुरस्कार (2009-10 ) गौरीनाथ (अनलकांत) केँ मैथिली लेल देल गेल।संगमे युवा पुरस्कार (2009-10 ) हिन्दी लेल नीलेश रघुवंशी, कोंकणी लेल राजय रमेश पवार आ गुजराती लेल जातून जोशीकेँ देल गेल अछि। 12 मार्च 2011 केँ युवा पुरस्कारसँ हुन्दी लेल कुणाल सिंहकेँ, उड़िया लेल दिलीप स्वयंकेँ, नेपाली लेल उदय क्षेत्रीकेँ आ कन्नड़ लेल विक्रम विसाजीकेँ सम्मानित कएल जाएत।

अनलकांत मैथिली त्रिमासिक "अंतिका"क सम्पादक छथि।

19 फरबरी, 2011 केँ भारतीय भाषा परिषद, कोलकाताक रचना समग्र सम्मान हिन्दी लेल केदारनाथ सिंहकेँ, तेलुगु लेल ए. रामापति रावकेँ, बांग्ला लेल जय गोस्वामीकेँ मराठी लेल अरुण साधुकेँ, हिन्दी लेल उदय प्रकाशकेँ, असमिया लेल इन्दिरा गोस्वामीकेँ, उर्दू लेल गोपीचन्द नारंगकेँ आ मलयालम लेल एम.टी.वासुदेवन नायरकेँ देल जाएत। समारोहक विशिष्ट अतिथि- ज्ञानपीठ पुरस्कार प्राप्त श्री ओ.एन.वी.कुरुप आ श्री शहरयार। "गोविन्द रचनावली": अनेको पत्र-पत्रिकामे छिड़िआयल स्व. गोविन्द चौधरी (1909-2002) क अनुपलब्ध रचना सबहक एक नवीन संग्रह "गोविन्द रचनावली"क नाम सँ पांचजन्य ट्रस्ट दिससँ 2010 मे प्रकाशित भेल, दरभंगामे पुस्तकक लोकार्पण पं चन्द्र नाथ मिश्र "अमर" केलनि। 264 पृष्ठक एहि पुस्तकमे लेखकक दू टा दुर्लभ फोटोक संग 23 टा कथा, एक टा एकांकी नाटक, आठ टा कविता, दू टा संस्मरण एवं मैथिली अनुवाद सहित लहेरियासराय ओकालातिखानासँ संवंधित एक टा अंग्रेजी लेखक संग्रह कैल गेल अछि। पुस्तकक संयोजन एवं सम्पादन प्रो. भीमनाथ झा तथा प्रो. प्रेम शंकर सिंह केलनि अछि। सूचना: विदेहक ०१ मार्च २०११ अंक महिला अंक आ १५ मार्च २०११ अंक होली विशेषांक रहत। ०१ मार्च २०११ अंक लेल महिला लेखक लोकनिसँ गद्य-पद्य रचना  २६ फरबरी २०११ धरि आमंत्रित अछि, रचनाक ने विषयक सीमा छै आ नै शब्दक। आनो लेखक महिला केन्द्रित गद्य-पद्य २६ फरबरी २०११ धरि पठा सकै छथि। होली विशेषांक लेल हास्य विधाक गद्य-पद्य रचना अहाँ १३ मार्च २०११ धरि पठा सकै छी। रचना मेल अटैचमेण्टक रूपमे  .doc, .docx, .rtf वा .txt फॉर्मेटमे पठाओल जाए। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ अपन स्कैन कएल फोटो पठेताह, से आशा करैत छी। रचनाक अंतमे टाइप रहए जे ई रचना मौलिक अछि आ पहिल प्रकाशनक लेल विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि।

( विदेह ई पत्रिकाकेँ ५ जुलाइ २००४ सँ एखन धरि १०७ देशक १,६६९ ठामसँ ५५, ४७७ गोटे द्वारा विभिन्न आइ.एस.पी. सँ २,८७,८१० बेर देखल गेल अछि; धन्यवाद पाठकगण। - गूगल एनेलेटिक्स डेटा। ) गजेन्द्र ठाकुर ggajendra@videha.com http://www.maithililekhaksangh.com/2010/07/blog-post_3709.html ‍ २. गद्य २.१.१.डॉ. कैलाश कुमार मि‍श्र- पोथी समीक्षा- गामक जि‍नगी- जगदीश प्रसाद मण्‍डल २.राजदेव मण्‍डल- कुरूक्षेत्रम् अन्‍तर्मनक (गजेन्द्र ठाकुर) लेल पत्रक शेषांश ३. डाॅ. योगानन्‍द झा- मैथि‍ली बाललोककथा : स्‍थि‍ति‍ आ अपेक्षा २.२.१. विनीत उत्पल- दीर्घकथा- घोड़ीपर चढ़ि लेब हम डिग्री –पाँचम भाग २. मि‍थि‍लेश मंडल- कथा-सुदि‍क रूपैआ ३.- कपि‍लेश्वर राउत- कथा- थरथरी ४.उमेश मंडल- विहनि कथा- दोस्‍ती २.३.हम पुछैत छी- मुन्नाजीक १.गौरीनाथ आ २अनमोल झासँ गप्प-सप्प। २.४.१.जगदीश प्रसाद मंडल- कथा- जगदीश प्रसाद मंडल- कथा- पड़ाइन २.ज्योति सुनीत चौधरी- अदृश्य बन्धन : २.५.१.रवि भूषण पाठक- एक टा अभिशप्त कवि : बूच बाबू २.कृपा नन्द झा मैथिलक जन नायक चुनचुन मिश्र २.६.१शि‍वकुमार झा टि‍ल्‍लू- समीक्षा- सूर्यमुखी २.बिपिन झा- यान्त्रिक अनुवाद आ Polysemy- पछिला अंक सऽ आगू ३. सुजित कुमार झा- कथा- भौजी २.७.१ . किशन कारीगर- दाम-दिगर (एकटा हास्य कथा) २.बेचन ठाकुर बेटीक अपमान- दृश्‍य सातम ३.लक्ष्मी दास- विहनि कथा- दाढ़ी ४ जितेन्द्र झा- के राखत रुमालक इज्जति २.८.१.डाँ कैलाश कुमार मिश्र यायावरी- उत्तराखण्‍डक नन्‍दा-राजजात २.रामभरोस कापड़ि "भ्रमर"- अन्तर्राष्ट्रीय मैथिली सम्मेलन ः २०६७ १.डॉ. कैलाश कुमार मि‍श्र- पोथी समीक्षा- गामक जि‍नगी- जगदीश प्रसाद मण्‍डल २.राजदेव मण्‍डल- कुरूक्षेत्रम् अन्‍तर्मनक (गजेन्द्र ठाकुर) लेल पत्रक शेषांश- ३. डाॅ. योगानन्‍द झा- मैथि‍ली बाललोककथा : स्‍थि‍ति‍ आ अपेक्षा १ डॉ. कैलाश कुमार मि‍श्र- पोथी समीक्षा- गामक जि‍नगी- जगदीश प्रसाद मण्‍डल समाजमे परि‍वर्तन किंवा परि‍स्‍थि‍ति‍क अनुसार कुनो अल्‍टरनेटि‍व उपायक ब्‍यौंत करक हेतु हमेशा कुनो अवतार, पैगम्‍बर, महान पुरूष, वि‍द्वान, राजा राममोहन राय अथवा  महात्‍मा गान्‍धीक जरूरत नै। अनेको परि‍स्‍थि‍ति‍मे ऐ तरहक कार्य कि‍योक- गामक सामान्य एवं नि‍रक्षर महि‍ला, रि‍क्‍शा चलबैबला, बारह बर्खक बालि‍का, चाह बेचैबला युवक, गामक लोककेँ बेर वि‍पत्ति आ पावनि‍-ति‍हारमे कार्य आबए वाली वृद्ध महि‍ला, पोखरि‍मे माछक धंधा करैबला मल्‍लाह कऽ सकैत अछि‍। प्रकृति‍ आ संस्‍कृति‍मे सामंजस्‍य कए कऽ मनुष्‍य रहि‍ सकैत अछि‍। जापानमे बेर-बेर भुकम्‍प होइत छैक। तकर मतलब तँ ई नै जे जापानक लोक जापाने छोड़ि‍ दि‍अए! जापानक  लोक अपना देशसँ बड्ड सि‍नेह रखैत छथि‍। ओइ भूमि‍क रचना आ भुकम्‍पकेँ देखैत घरक रचना एवं संस्‍कृति‍क वि‍कास करैत छथि‍। जापान वि‍श्‍वमे एक चमकैत आ उदीयमान नक्षत्र अछि‍। तहि‍ना अपन 19 गोट कथाक माध्‍यमसँ जगदीश प्रसाद मण्‍डल कहए चाहैत छथि‍ जे बाढ़ि‍,  रौदी एवं अन्‍य प्राकृति‍क वि‍पदाकेँ समाधान अगर मि‍थि‍लाक लोक चाहथि‍ आ लगनसँ कार्य करथि‍ तँ स्‍थानि‍य तौरपर कएल जा सकैत अछि‍। लोकक जत्‍थाक-जत्‍था पड़ाइनकेँ रोकल जा सकैत अछि‍। कथामे गामक परि‍वेश आ परि‍स्‍थि‍ति‍केँ सटीक वर्णन कएल गेल अछि‍। अपन छोट-छोट कथासँ लेखक पाठकेँ सोचबाक लेल वि‍वश कऽ दैत छथि‍। ऐ कथा-संग्रहक नाम थीक- गामक जि‍नगी। गामक जीवनक लगभग प्रत्‍येक परि‍स्‍थि‍ति‍क चर्चा अलग-अलग रूपेँ अलग-अलग कथाक माध्‍यमसँ कएल गेल अछि‍। पहि‍ल कथा थीक भैंटक लावा। ऐ कथाक तुलना कुनो भाषाक कुनो कालजयी लेखक केर कथासँ कएल जा सकैत अछि‍। भयंकर बाढ़ि आ बाढ़ि‍क वि‍भाषि‍का संगहि‍-संग बाढ़ि‍क बाद जे लोककेँ समस्‍याक समना करए पड़ैत छै तकर बेजोड़ वर्णन। एहि‍ना स्‍थि‍ति‍मे सामान्‍यतया साहि‍त्‍यकार लोकनि‍ जखन कुनो जमि‍न्‍दारक चरि‍त्रक वर्णन करैत छथि‍ तँ ओकरा क्रूर, नृशंस, हृदएहीन बना मात्र  ओकर व्‍यक्‍ति‍त्‍वक गलत पक्षक वर्णन करैत छथि‍। लेकिन मंडलजी त सामंजस्य स्थापित करबा में माहिर छथि। एहि कथा में महाजनों ओतबे परेशां अछि जतेक कुनो आन ग्रामीण.।  बल्कि महाजन ज्यादे परशान अछि- कोना अपन इज्जत आ कोना गामक लोक सबहक भारपन राखत? कथा में माहाजन श्रीकान्‍त परेशान जे बाढ़ि‍सँ धानक फसलि‍ सुड्डाह। “एक्को धुर धान नहि‍ बंचल अछि जे अगहनोक आशा होइत। जे सभ दि‍न कीनि‍-बेसाहि‍ कऽ खाइत अछि‍ ओकरा तँ कोनो नै मुदा हमरा लोक की कहत? चाह-पीबि‍ते-पीबि‍ते श्रीकान्‍तकेँ चौन्‍ह आबए लगलन्‍हि‍। मन पड़लनि‍ जे बाबा कहने रहथि‍ जे दरबज्‍जापर जँ क्‍‍यो दू-सेर वा दू-टाका मांगए लेल आबए तँ ओकरा ओहि‍ना नहि‍ घुमबि‍हक। ओहि‍सँ लक्ष्‍मी पड़ाइ छथि‍।‍” लेखक माहाजनक वेदनाकेँ सेहो उजागर करैमे सफल छथि‍। समान्‍यतया अन्‍य लेखक लोकनि‍ ऐ तरहक भावनाकेँ नै व्‍यक्‍त कऽ सकैत छथि‍। श्रीकान्त बजै छथि‍- “जहि‍ना सभ कि‍छु बाढ़ि‍मे दहा गेल तहि‍ना जँ अपनो सभ तुर भसि‍ जइतहुँ, से नीक होइत। जाबे परान छुटैत, ततबे काल ने दुख होइत। आगू तँ दुख नहि‍ काटय पड़ैत।‍” भैंटक लावा कथाक दोसर आ मुख्य आधार या वि‍शेषता एक नि‍रक्षर महि‍ला- मलाहि‍न द्वारा भैंटक खोज अनाजक रूपमे करब थीक। कोना भैंटि‍क दानाकेँ जमा करब, कुटब, छाँटब आ लावा भुजबक प्रक्रि‍या  जे जीबछी मलाहि‍न करैत अछि‍ से पाठककेँ एको क्षण कथासँ भटकऽ नै दैत अछि‍। भैंटक दानाक लावा गामक लोककेँ जीबाक एक पैघ सामग्री बनि‍ जाइत अछि‍ आ ओकर श्रेय जीबछीकेँ जाइत छै। जीबछीक लावाकेँ चीखैत श्रीकान्‍त पत्नीसँ कहैत छथि‍- “एत्ते सुन्नर वस्‍तुकेँ एखन धरि‍ जनि‍तहुँ नहि‍ छलहुँ। धन्‍य अछि‍ जीबछीक ज्ञान आ लूरि‍ जे एहेन सुन्नर हराएल वस्‍तुकेँ ऊपर केलक। साक्षात देवी छी जीबछी। जाउ, सन्‍दुकमे सँ एक जोड़ी‍ साड़ी आ आंगी नि‍कालने आउ। जीबछीकेँ अपना ऐठामसँ पहि‍रा कऽ वि‍दा करब। गरीब-दुखि‍याक देवी छी जीबछी।”‍ ऐसँ ई पता चलैत अछि‍ जे लेखक समाजक सभ वर्गक लोककेँ ध्‍यानमे रखैत अपन रचनाकेँ आगा बढ़बैत छथि‍। जीबछीक ज्ञानक सम्मान होइएत अछि आ जीब्ची एकता क्रांति लाबैत अछ। आहें क्रांति जे समाज में एकटा जीवन जीबाक आधार देत अछि । नारी ज्ञान आ बि‍पत्ति‍क क्षणमे नारीक सुझाएल ओरि‍यात जइसँ रौदीकेँ, वि‍भि‍षि‍काकेँ सामाना कएल जा सकैत अछि‍ केर ज्ञान बि‍साँढ़ कथाक माध्‍यमसँ होइत अछि‍। कथाक पात्र डोमन केर पत्नी सुगि‍या द्वारा ई कहब जे, “जकरा खाइ-पीबैक ओि‍रयान करैक लूरि‍ बुझल छैक ओ कथीक चि‍न्ता करत?‍” ऐ बातक प्रमाण अछि‍। लगातार तीन-चारि‍ वर्ष रौदी हेबाक कारणे गामक गाम लोक खाली कऽ परदेश भागि‍ गेल। मुदा सुगि‍याक सोझाएल  ओि‍रयाॅनसँ ओकर पति‍ डोमनकेँ जखन ऐ बातक भान होइत छैक जे पुरैनि‍क जड़ि‍मे बि‍साँढ़ फड़ैत छैक। अल्हुए जकाँ। आ ओ अपन कार्यमे लागि‍ जाइत अछि‍। कोदारि‍ चलाबैमे जखन परेशानी होइत छै तँ डोमनकेँ सुगि‍या ई कहि‍ कार्य करबाक प्रति‍ जोश उत्पन्न करैत छैक- “हमर चूड़ी-साड़ी पहीर लि‍अ आ हमरा धोती ि‍दअ। तखन कोदारि‍ पाड़ि‍ कऽ देखा दै छी।‍” पुरुषक दंभ ओकरा गतिमान बना देत छैक  फेर जोशमे आबि‍ डोमन कोदारि‍ भांजय लगैत अछि‍। तकर परि‍णाम ई जे बि‍साँढ़क जड़ि‍ भेटलैक। बि‍साँढ़क वर्णन जे लेखक करैत छथि‍ तँ यात्रीक कटहरक वर्णनक स्‍मरण होमय लगैत अछि‍! बि‍साँढ़क वर्णन ने देखू- “उज्‍जर-उज्‍जर। नाम-नाम। लठि‍आहा बाँस जेकाँ। गोल-गोल, मोट। हाथी दाँत जेकाँ चि‍क्कन, बीत भरि‍सँ हाथ भरि‍क। पाव भरि‍सँ आध सेर धरि‍क।‍” लागत एना जेना बि‍साँढ़क जड़ि‍सँ उत्म खाद्य पदार्थ दुनि‍यामे कुनो नै! बातो सैह अगर लोक के किछु खेबाक लेल नहि  उपलब्ध हेतैक त किछु त चाही जाही स प्राणरक्षा भा सके।  ओहो खोज एहेन जे लोकक दोसर ठाम जेनइए रोकि दे । ‍बि‍साँढ़ एक उत्तम उपाय अथवा व्योंत बनि जाएत अछि। पीरारक फड़ कथामे मण्‍डलजी एक पात्र धनि‍याक माध्‍यमसँ पीरारक फड़'क वि‍शेषताक वर्णन करैत छथि‍। कोना धनि‍या अपन पति‍ पि‍चकुन केर सहायतासँ पीरारक फड़ तोरि‍-तोरि‍ हाटे-हाटे गामे-गामे बेचैत अछि‍ आ पि‍चकुन अनेरूआ माछ मारि‍ बेचबो करैत अछि‍ आ खाइतो अछि‍। धनि‍या अपन युक्ति‍सँ पीरारक फड़ आ अनेरूआ माछसँ अपन आर्थिक तंगीकेँ दूर करैत अछि‍ आ जीवनमे सभ कि‍छु जोड़बाक प्रयास। अगर मनुष्य लगन स कार्य करे त सब किछु संभव छैक । अनेरे गाम या मिथिला स पड़ा गेने समस्याक समाधान नहि भा सकैत अछि । अनेरूआ बेटा एक एहेन गरीब गृहस्‍तक थीक जे लगभग पचासक बयसमे अएलाक बादो संतानहीन छल गंगाराम। हाटसँ आबएकाल जखन एकटा जनमौटी अनेरूआ बच्‍चाकेँ कोरामे लऽ कऽ गंगाराम घर अबैत अछि आ घरवालीकेँ कहैत छैक- “आइ भगवान खुश भऽ एकटा बेटा देलनि‍।‍” दुनू परानी प्रसन्न भऽ ओइ बेटाकेँ पोसए लागल। गंगाराम आ विशेष रूप स ओकर पत्नीक ओही अनेरुआ शिशुक प्रति प्रेमक अपूर्व सोहनगर दृश्य उत्पन्न करैत अछि ई कथा। शरीरसँ खि‍न्न होमाक कारने गंगाराम कि‍छु उपार्जन करबा जोकरक नै रहल। बेटा मंगल कि‍छु  पढलक  बाद  आर्थिक वि‍पन्नताक कारणे पढ़ाइ छोड़ि‍ चाहक दोकान खाेि‍ल लैत छै। मंगल अपन पढ़ाइ चाहक दोकानोमे रहि‍ करैत अछि‍। मरै काल गंगाराम मंगलकेँ ओकर जन्‍मक कथा बता देने रहैक। मंगल कि‍ताबक संग-संग समाजक बेबहारक अध्‍ययन सेहो करैत अछि‍। मंगलक कथा एकटा पत्रकार सुनैत छथि‍ आ ओकरा छापि‍ दैत छथि‍न्‍ह। मंगलक एहने कथा पढ़ि‍ सुनयना नामक एक पढ़लि‍ नायि‍का मंगल लग अबैत छथि‍ आ मंगलक प्रति‍भासँ प्रभावि‍त भऽ सुनयना अपन वकील पि‍तासँ दलि‍ल दऽ मंगलसँ वि‍वाह करए लेल पि‍ताकेँ तैय्यार कऽ लैत छथि‍। आ अंततः मंगल आ सुनयनाक वि‍वाह भऽ जाइत छैक। बिम्बक दृष्टिकोने ई कथा उत्तम संगही अहि कथा केर मध्यम स लेखक समाजक दू वर्गके जोडबक प्रयास केलन्हि अछि। परिवेशक वर्णन यथार्थ आ उत्तम बुझना जायत। एहनो बात नहि जे एहि तरहक कथा पूर्व में नहि लिखल गेल हो मुदा ए कथा एकटा नव परिव्षक जन्म देत अछि, चीज के लिखबाक एकटा सहज आ सुन्दर शैली प्रस्तुत करैत अछि। दूटा पाइ कथा ओइ तरहक नवयुवकपर कटाक्ष करैत अछि‍ जे दि‍ल्‍ली, मुम्‍बई जा कऽ ओतए केर चकाचौंधमे अपन जड़ि‍केँ बि‍सरि‍ जाइत अछि‍। मुदा माइयक ममत्‍व तँ अथाह समुद्र होइत छैक। फेकुआ अपन कमाइकेँ वस्‍त्र आ फैशनमे बरबाद कऽ लैत अछि‍। बि‍सरि‍ जाइत अछि‍ जे ओकर वि‍धवा माए गाम में कोना जीबैत हेतैक। माए बेटा परदेश गेल अछि‍ आ वापस आएत तँ कमा कऽ ढौआ लाओत तकर ख्‍याली पोलाव बनबैत छैक। परन्‍तु जखन ओकरा बेटाकेँ यर्थाथक पता चलैत छैक तखनो ओ अर्थात  माए अपन महानताक परि‍चए देबए मे बाज नै अबैत छैक। माए बेटाकेँ कहैत छैक- तों वापस गाम आबि‍ जो। हमरा तोहर कमाइक जरूरत नहि‍ अछि‍। भाड़ा नहि‍ छौक तँ ककरोसँ पैंच लऽ ले, अतय अएलापर दऽ देबै। बोनि‍हारि‍न मरनी कथा मार्मिक ढंगे लि‍खल गेल अछि‍।  बरबस सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला क स्मरण हरियर भा जेट अछि: वह तोडती  पत्तथर इलाहाबाद के पथ पर/  कथाक एक-एक पांति‍ अर्थपूर्ण लागत बिना कुनो बनबत के यथार्थ के जोड़ैत सत्य के बाचैत। कथाक मुख्‍य पात्र पचास वर्षक मरनीक पति‍, बेटा आ पुतोहू तीनू बज्र खसलासँ गाछक तरमे खून बोकरि‍ कऽ मरि‍ जाइत छै। असहाय अबला लाचार भऽ पाँच वर्षक पोता आ आठ वर्षक पोतीक आशाक संग जीब रहल अछि‍। मरनीक देह आ जीबनक वि‍वरण देबामे लेखकक जवाब नै- “कारी झामर एक हड्डा देह, ताड़-खजुरपर बनाओल चि‍ड़ैक खोंता जेकाँ केश, आंगुर भरि‍-भरि‍क पीअर दाँत, फुटल घैलक कनखा जेकाँ नाक, गाइयक आँखि‍ जेकाँ बड़का-बड़का आँखि‍, साइयो चेफड़ी लागल साड़ी, दुरंगमनि‍या आंगी फटलाक बाद कहि‍यो देहमे आंगीक नसीब नहि‍ भेल। बि‍ना साया-डेढ़ि‍याक साड़ी पहि‍रने। यएह छी मरनी।‍” राष्‍ट्रीय राजमार्गक पक्की सड़कक ि‍नर्माणमे जखन मरनीकेँ गि‍ट्टी फोड़ैक कार्य भेटैत छै तँ अपन थाकल आ जीर्न शरीर लऽ सेहो अपन छोट-छोट बच्‍चा सभ लेल ओ ओइमे तल्‍लीन भऽ जाइत अछि‍। लेखक गि‍ट्टी फोड़ैत मरनीक बड़ा सजीब आ कारूणि‍क वर्णन करैत छथि‍ : “पचास वर्खक मरनी जे देखैमे झुनकुट बूढ़ि‍ बूझि‍ पड़ैत। सौंसे देहक हड्डी झक-झक करैत। खपटा जेकाँ मुँह। खैनी खाइत-खाइत अगि‍ला चारू दाँत टूटल। गंगी-जमुनी केश हवामे फहराइत। तहूमे सड़कक गरदासँ सभ दि‍न नहाइत। मुदा तैयो मरनी अपन आँखि‍ बचेने रहैत। जखन पुरबा हवा बहै तँ पछि‍म मुँहे घुरि‍ कऽ गि‍ट्टी फोड़ए लगैत आ जखन पछवा बहए लगैत तँ पूब मुँहे घुरि‍ जाइत। बीच-बीचमे सुसताइयो लैत आ खैनि‍यो खा लैत। मुदा तैयो ओकर मुँह कखनो मलि‍न नै होइ। कि‍एक तँ हृदएमे अदम्‍य साहस आ मनमे असीम वि‍श्‍वास सदि‍खन बनल रहैत। तेँ सदि‍खन हँसि‍ते रहए।‍” मुदा मरनीमे आत्‍मबल छैक। जखन ठीकेदार मरनीसँ बात करैत छैक तँ अाेकर मन कानय लगैत छैक। ई लेखकक महानता कहल जा सकैत अछि‍। ठीकेदार की सोचैत अछि‍ से देखू- “एत्ते भारी काज केनि‍हारक देहपर कारी खट-खट कपड़ा छै, तहूमे सइयो चेफड़ी लागल छै, काज करै जोकर उमेर नै छै, तैपर एते भारी हथौरी पजेबापर पटकैत अछि‍। ठी‍केदारक मन दहलि‍ गेलै।‍” फेर लेखक द्वारा ठीकेदार मनोदशाक चि‍त्रण देखू : “जहि‍ना आकास आ पृथ्‍वीक बीच क्षि‍ति‍ज अछि‍, जाहि‍ठाम जा चि‍ड़ै-चुनमुन्नी लसकि‍ जाइत अछि‍, तहि‍ना ठीकेदारक मन सुख-दुखक बीच लसकि‍ गेल। जेना सब कुछ मनक हरा गेलै। शून्न भऽ गेलै। ने आगूक बाट सूझै आ ने पाछुक। मरनीसँ आगू की पूछब से मनमे रहबे ने केलै। साहस बटोरि‍ पुछलक- भरि‍ दि‍नमे कते रूपैया कमाइ छी?‍” ठीकेदारक प्रश्‍न सुनि‍ मरनीक मोनमे झड़क उठलै। बाजलि‍- “कते कमाएब! जेहने बैमान सरकार अछि‍ तेहने ओकर मनसी छै। चारि‍ दि‍न एकटा पजेबाक ढेरी फोड़ै छी तँ तीन-बीस रूपैया दैए। आइसँ तीन तूरक पेट भरत? भरि‍ दि‍न ईंटा फोड़ैत-फोड़ैत देह-हाथ दुखाइत रहैए मुदा एकटा गोटि‍यो कीनब से पाइ नै बॅचैए।‍” लेखक कथाक नि‍ष्‍कर्ष बड्ड संक्षेपमे करैत छथि‍ : ठीकेदारक आँखि‍मे नोर आबि‍ गेलै। मनुष्‍यता जागि‍ गेलै। मुदा ई मनुष्‍यता कते काल जि‍नगीमे अँटकतै? जि‍नगी तँ उनटल छै। जाहि‍मे मनुष्‍यता नामक कोनो दरस नहि‍ छैक। हारि‍-जीत कथा Internal innovation  केर संदेश दैत अछि‍। एकटा कुम्‍हारक परि‍वार जकर गाम कोसीक बाढ़ि‍सँ कोसीमे धँसि‍ जाइत छैक। अपन जरूरी समान लऽ अन्‍तहीन दि‍शा ि‍दस बढ़ैत अछि‍। रस्‍तामे लछमीपुरक एक बटोही भेट जाइत छै। लछमीपुरमे कुम्‍हार नै रहैत छैक। सोमन ओही गाममे बैस जाइत अछि‍ धंधा चलि‍ पड़ैत छैक। लेखककेँ वि‍शेषता ई जे कुम्‍हारक चाकसँ सम्‍बन्‍धि‍त तमाम प्रक्रि‍याक बनाएल समाग्रीक सेहो पैघ फेररि‍हत प्रस्‍तुत करैत छथि‍। लागत जेना कुनो कुम्‍हार अपन वि‍वरण प्रस्‍तुत कऽ रहल अछि‍। खएर : कथा आगाँ बढ़ैत छैक कुम्‍हारक एक छोट बेटा मेलामे हेरा जाइत छैक। बादमे नै भेटैत छैक। स्‍टील आ आन तरहक वर्त्तन अएलाक कारणे परम्‍परागत वर्तन केर मांग खत्‍म भऽ जाइत छैक। अहि‍ना स्‍थि‍ति‍मे दुनू प्राणी इहो गाम छोड़बाक प्रण करैत अछि‍। सभ ब्‍यौंत कऽ लैत अछि‍। ठीक ओही समएमे बि‍छुरल बेटा जवान भऽ आबि‍ जाइत छैक। समएक अनुसारे ओ नव-नव चीज बनाएब सीख आएल छैक। तँए पुन: कुम्‍हारक धंधा चलि‍ जाइत छैक। लेखक कथाक अन्‍तमे शायद ई कहबाक प्रयास केलन्‍हि‍ अछि‍ जे परम्‍पराकेँ नूतन परि‍प्रेक्ष्‍यमे अपने-आपकेँ मि‍लान कऽ कऽ चलक चाही। अगर समय अनुसरे परंपरा में परिवर्तन आनब त परंपरा कहिओ नहि मरत। कुनो बस्तुक उपाय जरुरी भागने कही कल्याण संभव छैक? ठेलाबला कथा एक सिद्धान्‍तक जन्‍म दैत अछि‍। भोला नौकरीक तलाशमे कलकत्ता जाइत अछि‍। ओतय ठेला चलबए लगैत अछि‍। दूटा बेटा गामपर  छैक तकरा कष्टों काटि‍ पढ़बैत अछि‍। मैट्रि‍क पास केलाक बाद दुनू भाँइ के अपन पीटक पारिस्थितिक आभाष होइत छैक। पैसाक तंगीक कारण आगाँ नै पढ़ि‍ पबैत छैक, परन्‍तु गामक स्‍कूलमे शि‍क्षा-मि‍त्रक नौकरी दुनू भाँइकेँ लागि‍ जाइत छैक। जखन भोलाकेँ दुनू पुत्र हुनका पत्र लीख कऽ कहैत छन्‍हि‍ जे आब गाम आबि‍ जाऊ तँ भोला गाम आबि‍ जाइत छथि‍। बेटाक पत्र पढ़लाक बाद भोलाक मनोदशाक चि‍त्रण बड्ड मार्मिक लगैत अछि‍ : “समाजसँ नि‍कलि‍ छातीपर ठेला घीचि‍, दूटा शि‍क्षक समाजकेँ देलि‍ऐक, की ओहि‍ समाजक आरो ऋृण बाकी छैक?” ए कथ्य अपना आप में अभूत किछु छैक! जीवि‍का कथाक माध्‍यमसँ परम्‍परासँ जुड़ल मानक परि‍वेशसँ सि‍नेह, परि‍वारक दायि‍त्‍वक ि‍नर्वाह करक संदेश देल गेल अछि‍। लोक शहरीकरणक नकलमे अपन अहि‍तत्‍वक आ संस्‍कार कोना समाप्‍त कऽ लैत अछि‍, तकर चि‍त्रण कएल गेल अछि‍। माता-पि‍ताक प्रति‍ दायि‍त्‍वक ि‍नर्वाह केने कोन लाभ भऽ सकैत अछि‍ तकर वर्णन। रि‍क्‍साबला कथा ई संदेश दैत अछि‍ जे सम्‍पति‍ अथवा पैसा आ भोग-वि‍लासक वस्‍तुसँ लोक प्रसन्न नै रहि‍ सकैत अछि‍। प्रसन्न रहबाक लेल आत्‍मसंतोष भेनाइ जरूरी। कथाक रचना प्रभावकारी आ उद्देश्‍यपूर्ण। पात्रकेँ कथा आदि‍सँ अंत धरि‍ अपनामे सराबोर केने रहैत अछि‍। मि‍थि‍लामे डोका, सि‍तुआ कि‍ंवा खूरचन आदि‍सँ चून बनेबाक प्रथा प्राचीन छल। ऐ कार्यक सम्‍पादन करैत छलीह मल्‍लाह वर्गक महि‍ला लोकनि‍ आब लगभग ई प्रथा समाप्‍त भऽ गेल। ओकरा बदला लोक आब एक्केठाम बजारसँ चून कीन कऽ लऽ अबैत अछि‍। सुखल चून। जकरा सहजतासँ गील कय वएह मलाह सभ बजारे-बजारे आ घरे-घरे बेचैत अछि‍। एे कथाकेँ पढ़लासँ समाप्‍त प्राय परम्‍परापर दृष्‍टि‍ देबाक एक प्रयास कएल गेल अछि‍। शि‍क्षा आ संस्‍कार अलग-अलग चीज थीक। गामसँ पढ़ इन्‍जि‍ीनीयर बनि‍ गलत-सलत पैसा कमा जतय गामक दू पि‍तयौत भाय अवकाश प्राप्‍त करबाक बाद गाममे रहि‍ फइलसँ मकान बनबए लेल सीमि‍त घरारीमे सँ धुरफन्‍दी कय 10 धूर जमीन ज्‍यादे लेबाक ब्‍यौंतमे लागल छथि‍।  डिहक  बटबारा कथामे गामक लोक हुनका दुनूकेँ ऐ गलत मंसाकेँ बुझि‍ जाइत अछि‍ आ दुनूसँ पैसा ठकि‍ लैत अछि‍। अंन्‍तत: जमीन दुनूमे बहि‍स्‍सा बराबर बॅटैत अछि‍। ने ककरो कम आ ने ककरो बेसी। गामक लोकक दृष्‍टि‍मे पढ़ला-लि‍खलाक बादो दुनू इन्‍जि‍नीयर चरि‍त्रहीन आ गामक वातावरणकेँ प्रदुषि‍त केनि‍हार मानल जाइत छथि‍। लेखक ऐ परम्‍पराकेँ मर्मज्ञतासँ उजागर करैत छथि‍। भैयारी कथा शहरी जीवनक चकाचौंधसँ लोककेँ सावधान करैत अछि‍। जे ऐ बातकेँ नहि बुझैत छथि‍ आ अपन परम्परा आ संस्‍कारकेँ नै  ध्यान में राकेट गामक जमीन जत्‍था बेच, गामक जड़ि‍ के समाप्त कए जे शहरमे बैस जाइत अछि‍ तकर परि‍णाम नीक नै होइत अछि‍। ई कथा लेखक केर आत्‍मासँ नजदि‍क छन्‍हि‍। बहीन कथाक माध्‍यमसँ मण्‍डलजी कहए चाहैत छथि‍ जे केबल माइयक कोरासँ जन्‍म लेने बहि‍न या माए नै भऽ सकैत अछि‍। एक दि‍स जतऽ अपन बेटी अपना कार्यमे अतेक लीन अछि‍ जे मरनासन्न माएकेँ देखबाले समए नै नि‍कालि‍ पाबि‍ रहल अछि‍ अोतहि‍ दोसरठाम माइयक एक मुसलमान सखी हल्‍ला-फंसाद रहि‍तहुँ राति‍मे चोरा कऽ माएकेँ देखए अबैत अछि‍। ई कथा हि‍न्‍दु-मुसलमानक संग आपसी प्रेमक गंगा-जमुनी प्रवाह कहल जा सकैत अछि‍। मैथि‍लीमे ऐ तरहक कथाक रचना हेवाक चाही। मण्‍डल जीक रचनाक एक वि‍शेषता हमरा जनैत पात्रक नामकरण छन्‍हि‍। हरेक नामक  प्रति‍ साकांक्ष रहै छथि‍ आ उद्देश्‍यपूर्ण ढंगसँ नाम रखैत छथि‍। एकर उत्तम उदाहरण थीक एक कथा पीहुआ। पात्रक नाओं पीहुआ कि‍एक पड़लैक तकर वि‍वरण सुनू : “छठि‍यार राति‍, दाइ-माइ पुहुपलाल नामकरण केलखि‍न। जखन ओ आठ-दस बर्खक भेल, तखन जाड़क मास बाधमे फानी लगबए लागल। गहींर खेत सभमे सि‍ल्‍लि‍यो आ पीहुओ आबि‍-आबि‍ धान चभैत। जकरा ओ फानी लगा-लगा फॅसबैत। अपनो खाइत आ बेचबो करैत। कि‍छु दि‍नक बाद स्‍त्रीगण सभ पीहुआबला कहए लगलैक। फेर कि‍छु दि‍नक पछाति‍ भौजाइ सभ पीहुआ कहए लगलैक। तँए पुहुपलाल बदलि‍ पीहुआ भऽ गेल।‍” पछताबा एक एहेन कथा थीक जकरा माध्‍यमसँ ई कहक प्रयास कएल गेल अछि‍ जे आधुनि‍क आ तकनीकि‍ शि‍क्षा प्राप्‍त कए लोक बाहर भागि‍ जाइत अछि‍। बाहर जाए जीवन मशीन भऽ जाइत छैक। रघुनाथ कि‍छु एहने कार्य केलन्‍हि‍। चलि‍ गेलाह अमेरि‍का। मुदा अन्‍तमे अपन गलतीक अनुभव भेलन्‍हि‍ आ अपने-आपकेँ बोनि‍हार-मजदुरसँ नि‍षि‍ह मानए लेल तैय्यार भेलाह- “हमरासँ सइयो गुना ओ नीक छथि‍ जे अपना माथापर घैल उठा मातृभूमि‍क फुलवाड़ीक फूलक गाछ सींचि‍ रहल अछि‍। अपन माए-बाप समाजक संग जि‍नगी बि‍ता रहल छथि‍। आइ जे दुनि‍याँक रूप-रेखा बनि‍ गेल अछि‍ ओ कि‍छु गनल-गूथल लोकक बनि‍ गेल अछि‍। जि‍नगीक अन्‍ति‍म पड़ावमे पहुँचि‍ आइ बुझि‍ रहल छी जे ने हमरा अपन परि‍वार चि‍न्‍हैक बुद्धि‍ भेल आ ने गाम समाजकेँ।‍” डॉ. हेमन्‍त प्रति‍नि‍धि‍त्‍व करैत छथि‍ ओइ तमाम डाक्‍टर समुदायकेँ जे अपन वि‍धाकेँ मर्यादा बि‍सरि‍ शहरी जीवन जीबैत अछि‍, पैसा कमाइत अछि‍, गाम-घर कि‍ंवा दुर्गम स्‍थानमे जेनाइ जहल जेनाइ कि‍ंवा कालापानीक सजा बुझैत अछि‍। जखन डाॅ.  हेमन्त कोसि‍कन्‍हामे बसल बाढ़ि‍सँ प्रभावि‍त गाम जाइत छथि‍ तँ एक बारह वर्षक कि‍शोरी सुलोचना अपन व्‍यवहार आ गामक लोकक सि‍नेह पाबि‍ ओ कृत-कृत भऽ जाइत छथि‍। अभावक सि‍नेह कतेक रमनगर आ सुअदगर भऽ सकैत अछि‍। सुलोचनाक मुँहसँ गाम आ शहरी जीवनक तुलना मि‍रचाइ आ चीनीक कीड़ासँ कए लेखक कहानीमे नव बि‍म्‍वक रचना करैमे सफल होइत छथि‍। कथामे सुलोचना डॉ. हेमन्‍तकेँ कहैत छन्‍हि‍- “हम तँ बच्‍चा छी डाॅक्‍टर सहाएब तेँ बहुत नै बुझै छी। मुदा तइयो एकटा बात कहै छी। जहि‍ना चीनी मीठ होइत अछि‍ आ मि‍रचाइ कड़ू। दुनूमे कीड़ा फड़ै छै आ ओइमे जीवन-यापन करैत अछि‍। मुदा चीनीक कीड़ीकेँ जँ मि‍रचाइमे दऽ देल जाइए तँ एको क्षण नै जीबि‍त रहल। उि‍चतो भेलै। मुदा की मि‍रचाइक कीड़ाकेँ चीनीमे देलाक बाद जीबि‍त रहत? एकदम नहि‍ रहत। तहि‍ना गाम आ बाजारक जि‍नगी होइत।‍” बाबी कथाक माध्‍यमसँ लेखक एक एहेन सामाजि‍क महि‍लासँ परि‍चए करबैत छथि‍ जे ओना तँ अपन नाओं लि‍खऽ नै जनैत छथि‍ परन्‍तु व्‍यवहार आ बुद्धि‍सँ समास्‍त गाममे पूज्या थीकी। गामक लोक कुनो कार्य हुनका पुछने बि‍ना नै करैत अछि‍। बाबी सबहक लेल छथि‍ आ सभ बाबी लेल तत्‍पर। कथाक प्रारम्‍भमे एकटा उपमा खाटी देसी आ औरि‍जनल लगैत अछि‍ काति‍क मासक वर्णन करैत बाबी कहैत छथि‍ जे ई एहेन मास थि‍क जैमे लुंगि‍या मि‍रचाइक घौंदा जकाँ पावनि‍क घौंदा अछि‍। एहेन उपमा हमरा अन्‍यत्र नै भेटल अछि‍। अही कथामे “‍पथि‍यामे दूटा नारि‍यल, पान छीमी केरा, दूटा टाभ नेबो, दूटा दारीम, दूटा ओल, दूटा अड़ुआ, दूटा टौकुना, दूटा सजमनि‍, एक मुट्ठी गाछ लागल हरदी, एक मुट्ठी आदी नेने रहमतक माए आंगन पहुँचि‍ बाबीक आगूमे रखि‍ बाजलि‍- बाबी अपनो डालीले आ हि‍नकोले नेने एलि‍एनि‍हेँ।” ई कथा हि‍न्‍दु-मुसलमानक बीच प्रेम आ सांस्‍कृति‍क एकताक कड़ी थीक। अपन बेटा रहमत जे कि‍ बच्‍चामे बीमार भऽ गेलैक आ बाबी ओकरो लेल छठि‍ मइयासँ कबुला कऽ देलथि‍न्‍ह, तँए ओकर माए बाबीक माध्‍यमसँ पाँच वर्ष धरि‍ नि‍ष्‍ठाक संग छठि‍ मनबैत अछि‍। ओहि‍ना उपास, सभ चीजक पालन, छठि‍क प्रति‍ आस्‍था। बाबी जखन खरनाक खीरक प्रसाद रहमतक माएकेँ दैत छथि‍न्‍ह तँ ओ खुशीसँ नाचि‍ उठैत अछि‍। छठि‍ इमयाकेँ गोर लगैत छन्‍हि‍ आ बेटाकेँ ि‍नरोग जि‍नगी जीबैक आशा सेहो लगा लैत अछि‍। कामि‍नी कथामे कामि‍नीक पि‍ता भैयाकाका कामि‍नीक वि‍वाहमे पाँच लाख टाका खर्च केलाक बादो ऐ बातकेँ स्‍वीकारैत छथि‍ जे ओ कंंजुसाइ केलन्‍हि‍। कि‍एक? तँ हुनका दस बीघा जमीन आ अन्‍य सम्‍पति‍। कामि‍नी तीन भाए-बहि‍न माने दू भाँइ आ एक बहिन। खेतक मात्र कीमत अस्‍सी लाख! तै हि‍साबे कामि‍नीक हि‍स्‍सा 25 लाख टाकासँ बेसी होमाक चाही मुदा खर्च भेलन्‍हि‍ पाँच लाख। ओ इहो मानैत छथि‍ जे हि‍नका लेल जेहने बेटा तेहने बेटी। तँए जखन कामि‍नीक पति‍ दोसर पत्नी आनि‍ लैत छथि‍ आ कामि‍नीक प्रति‍ हुनकर सौति‍न आ पति‍ कि‍छु प्‍लान बनबए लगैत छथि‍ तँ कामि‍नी अप्‍पन दूटा बच्‍चाकेँ लऽ सोझे गाम आबि‍ जाइत छथि‍। सभ कथा प्रभावोत्‍पादक आ शि‍क्षाप्रद लागत। मण्‍डल जी लोक वि‍धा अथवा फाॅकलाेर केर नीक ज्ञाता छथि‍। गाम-घरक परि‍वेशक ठेठ उदाहरण, उपमा, कहावत, इत्‍यादि‍क समावेश देखब तँ मोन तीरपीत-तीरपीत भऽ जाएत। रौदीक वर्णन देखू : “जे मूस अगहनमे अंग्रेजी बाजा बजा-बजा सत-सतटा वि‍आह करैत छल ओ या तँ बि‍लमे मरि‍ गेल वा कतऽ पड़ा गेल तेकर ठेकान नहि‍।‍” “डोमनक मनमे आशा रहए जे जहि‍ना लुल्हि‍यो कनि‍याँ बेटा जनमा कऽ गि‍रथाइन बनि‍ जाइत, तहि‍ना तँ पानि‍ भेने परति‍यो खेत हएत कि‍ने।‍” पीरारक फड़क वर्णन करैत मण्‍डलजी लीखै छथि‍- सहतक कोथी जेकाँ चोखगर काँट, डारि‍ रूपी पहरूदारकेँ सजौने। छड़गर-छड़गर डाि‍रमे चौरगर-चौरगर पात जेना इन्‍द्रकमल वा तगड़ फूलक होइत। तहि‍ना फूलो। आन उदाहरण जेना “अनकर पहीरि‍ कऽ साज-बाज छीनि‍ लेलक तँ बड़ लाज।‍” “‍गांगाी-जमुनी केश हवामे फहराइत।” “मेघनक दुआरे सतभैंयाँ झँपाएल। जेम्‍हर साफ मेघ रहए ओन्‍हुरका तरेगन हँसैत मुदा जेम्‍हर मेघौन रहए ओम्‍हुरका मलि‍न।‍” सुभाष चन्‍द्र यादव मण्‍डल जीक कथाक बारेमे लि‍खैत छथि‍ : “हुनक कथाक सन्‍दर्भमे जे सर्वाधि‍क उल्‍लेखनीय बात अछि‍ से ई जे हुनक सभ कथामे औपन्‍यासि‍क वि‍स्‍तार अछि‍।‍” परन्तु हमर तँ मानब ई अछि‍ जे हि‍नक कथा अपने-आपमे सम्‍पूर्ण अछि‍ आ अपन सम्‍बाद या नि‍चाेरक सहजतासँ कहि‍ दैत अछि‍। हलांकि‍ पोथीमे कतहुँ-कतहुँ छपबामे गलती सभ भेल अछि‍। जेना कि‍ डाक्‍टर हेमन्‍त कथामे हेमन्‍त केर स्‍थानपर हमन्‍त भऽ गेल अछि‍। मुदा पूरा पाथी अपने-आपमे एकटा उत्तम आ संग्रह योग्‍य वस्‍तु थीक। मैथि‍ली पाठककेँ ऐ तरहक कथाकेँ पढ़बाक आदति‍ लगेबाक चाहि‍एनि। २ राजदेव मण्‍डल कुरूक्षेत्रम् अन्‍तर्मनक (गजेन्द्र ठाकुर) लेल पत्रक शेषांश- सहस्‍त्राब्‍दीक चौपड़पर- सहस्‍त्राब्‍दीक चौपड़पर बैसल अहाँ जि‍नगीक खेल देख रहल अछि‍। गहन अन्‍वेषण करैत एक-एकटा चि‍त्रक रचना कऽ रहल छी आ ओइ उमंगमे डूबि‍ रहल छी। “असीम समुद्रक कातक दृश्‍य हृदय भेल उमंगसँ पूरि‍त....।‍” अहाँक अन्‍तरक कवि‍ रवि‍क चि‍त्र उपस्‍थि‍त करैत कहैत अछि‍- “सूर्य कि‍रण पसरि‍ छल गेल कतेक रहस्‍य बि‍लाएल ति‍मि‍रक धुँध भेल अछि‍ कातर मुदा ई की.......।‍” संग्रहमे कि‍छु हैकू पढ़बाक सुअवसर भेटल। कि‍छु सुआद बदलबाक लेल....। मि‍थि‍लांचलक गमकसँ अहाँक कवि‍ता हमरा सबहक मोनकेँ गमका रहल अछि‍ : “‍मोन पाड़ैत छी धानक खेत झि‍ल्‍ली कचौड़ी लोढ़ैत काटल धानक झट्टा ओहि‍ बीछल शीसक पाइसँ कीनल लालझड़ी जेकरे नाओं लाल छड़ी आ सत धरि‍आ खेल....।” प्रवासमे रहैत स्‍मरण होइत गाम घर। ऐ पाँति‍मे वि‍योगक ओइ व्‍याथाक वर्णन भेटैत अछि‍। एकटा नवीन लयक संग- “‍पता नहि‍ घुरि‍ कऽ जाएब आकि‍ एतहि‍ मरि‍-खपि‍ बि‍लाएब.....।” ऐ व्‍यंग्‍यमे स्‍पष्‍ट दृष्‍टि‍गोचर भऽ रहल अछि‍। “लाठी मारबामे कोनो देरी नहि‍ बाछी भेलापर शोको थोड़ नहि‍ परन्‍तु छी पूजनीया अहाँ....।‍” बाढ़सँ उत्‍पन्न भेल समस्‍या आ ओकरा छोट-छीन पाँति‍मे समेटनाइ गागरमे सागर भरबाक प्रयास ऐ पाँति‍मे परि‍लक्षि‍त भऽ रहल अछि‍- “ठाम-ठाम कटल छल हठहर ऊपरसँ बुन्नी पड़ि‍ रहल सभटा धान चाउर भीतक कोठी टटि‍ खसल पानि‍क भेल ग्रास...।‍” नव-नव बि‍म्‍बसँ कवि‍ता सभ पूरि‍त अछि‍- “सहस्‍त्रबाढ़नि‍ जकाँ दानवाकार घटनाक्रमक जंजाल फूलि‍ गेल साँस हड़बड़ा कऽ उठलहुँ हम....।‍” हड़बड़ा कऽ नै बल्‍कि‍ अहाँ सचेत भऽ कऽ उठलहुँ। नव-नव चि‍त्र ध्‍वनि‍ लऽ कऽ नवीन दृष्‍टि‍क संगे। पता नै कतऽ धरि‍ जाएब। कतऽ गन्‍तव्‍य अछि‍ अहाँक। “वि‍श्‍वक मंथनमे होएत कि‍छु बहार आब.... पथक पथ ताकब..... प्रयाण दीर्घ भेल आब....।‍” प्रबन्‍ध-नि‍बन्‍ध समालोचना :- प्रारंम्‍भमे फल्‍ड वर्कपर आधारि‍त खि‍स्‍सा सीत-बसंत अछि‍। ई लोक कथा मार्मिक अछि‍ संगहि‍ शि‍क्षा आ उपदेशसँ भरल। सतमाएक चरि‍त्र केहेन होइत अछि‍ आ केहेन होएबाक चाही से स्‍पष्‍ट भेल अछि‍। समाज द्वारा बि‍सरल जा रहल ऐ कथाकेँ अहाँ पुन: जीअत करबाक कएने छी जैमे माए-बाप बेटा आ सतमाएक मर्मस्‍पर्शी वर्णन भेल अछि‍। वर्तमानमे सीत-बसंत नाच बि‍हारक गाम-गाममे लोक मानसकेँ आनन्‍दि‍त कऽ रहल अछि‍। दोसर अछि‍- मायानन्‍द मि‍श्रक प्रथमं शैल पुत्री च, मंत्रपुत्र, पुरोहि‍त आ स्‍त्रीधन। जे वेदकालीन इि‍तहासपर आधारि‍त अछि‍। जेकर समीक्षा इति‍हास आ साहि‍त्‍य दुनू आधार लऽ अहाँ नीक जकाँ प्रस्‍तुत कएने छी। एकर बाद अछि‍ केदान नाथ चौधरी जीक दूटा उपन्‍यास- चमेली रानी आ माहुर ई पाठक द्वारा आढ़ृत उपन्‍यास अछि‍। एकर समीक्षा अहाँ नीक तरहेँ कएने छी। अहा कहने छी जे- नव समीक्षावाद कृति‍क वि‍स्‍तृत वि‍वरणपर आधारि‍त अछि‍। नो एंट्री : मा प्रवि‍श  नचि‍केता जीक नाटक अछि‍। जेकरा अहाँ कि‍छु नव तरहेँ समीक्षा करबाक प्रयत्‍न कएने छी। कवि‍शेखर ज्‍योति‍रीश्‍वर शब्‍दावली- वि‍द्यापति‍ शब्‍दली, कवि‍ चतुर्भुज शब्‍दावली आ बद्रीनाथ झा शब्‍दावली द्वारा मैथि‍ली शब्‍द भंडारकेँ वि‍शद वर्णन कएल गेल अछि‍। मैथि‍ली हैकू आ क्षणि‍का पढ़बाक अवसर भेटल। श्रीमती ज्‍योति‍ झा चौधरीक इंग्‍लि‍श हैकू अहाँक मैथि‍ली अनुवाद सहि‍त। मि‍थि‍लाक बाढ़ि‍- जे एतुक्का रहनि‍हारक लेल प्रलय बनि‍ आबैत अछि‍। ऐ समस्‍या आ सरकारी प्रयासक वर्णन नीक जकाँ भेल अछि‍। वि‍स्‍मृत कवि‍ पं. रामजी चौधरीक रचनाकेँ पठकक सोझा रखबाक प्रयास। वास्‍तवमे ई अहाँक अवि‍स्‍मरणीय कार्य अछि‍। वि‍द्यापति‍क बि‍देशि‍या- पि‍आ देसाँतर- ऐमे कि‍छु नव तथ्‍य सभ सोझा आएल अछि‍। बनैत-बि‍गड़ैत सुभाष चन्‍द्र यादवक कथा संग्रहक समीक्षामे अहाँ द्वारा सार्थक प्रयास भेल अछि‍। ई कथन जे “‍ओ कथाक माध्‍यमसँ जीवनकेँ रूप दैत अछि‍। शि‍ल्‍प आ कथ्‍य दुनूसँ कथाकेँ अलंकृत कए कथाकेँ सार्थक बनबैत छथि‍।” ऐ कथा संग्रहक अहाँ वि‍शद रूपेँ समीक्षा कएने छी। अन्‍तर्जालपर मैथि‍ली- ऐमे नवीन एवं ज्ञानवर्द्धक तथ्‍य सभ पाठकक लेल परोसने छी। आजुक समएमे एकर ज्ञान आ अनुभव बड्ड आवश्‍यक भऽ गेल अछि‍। लोरि‍कक गाथामे समाज ओ संस्‍कृति‍- ऐ गाथामे ओइकालक समाज ओ संस्‍कृति‍ एवं राजनीति‍क पक्षकेँ अहाँ उजागर कएने छी। मि‍थि‍लाक खोज- अहाँ करैत रहलहुँ गाम-गाम। संगहि‍ पाठककेँ स्‍थान सभसँ परि‍चि‍त करबैत सराहनीय कार्य कएलहुँ। त्‍वन्‍चाहन्‍च आ असन्जाति‍ मन (महाकाव्‍य)-  महाकाव्‍यमे जीवनक अत्‍यन्‍त व्‍यापक चि‍त्रण उदात मानवीय अनुभूति‍क रूपमे प्रगत कएल जाइत अछि‍। अहाँ प्रारम्‍भमे लि‍खने छी- “ई भारत ग्रंथ जयक जाहि‍मे गान तखन कहि‍या सँ भेलाह एतुक्का लोक कर्महीन, संकीर्ण.....।‍” अहाँ अन्‍त ऐ पाँति‍सँ कएने छी- “असन्‍जाति मनक ई सम्‍बल देलहुँ अहाँ हे बुद्ध हे बुद्ध- हे बुद्ध।‍” ओना आब महाकाव्‍य कम लि‍खल जा रहल अछि‍। कि‍न्‍तु साहि‍त्‍यक सभ वि‍धा जीअत रहबाक चाही। ऐ परम्‍पराकेँ अहाँक द्वारा आगू बढ़ेबाक प्रयास भेल अछि‍। धर्म-उपदेशपर आधारि‍त पौराणि‍क कथाकेँ अहाँ कथावस्‍तुक रूपेँ कि‍छु नूतन तरहेँ सजेबाक प्रयास कएने छी। अभि‍व्‍यक्‍ति‍ लेल तत्‍सम शब्‍दावलीक प्रयोग भेल अछि‍। ओना पात्रानुकूल ओहन शब्‍द आनब आवश्‍यके छल। शीर्षक कहबामे काठि‍न्‍य सन अनुभव भेल। ताद्यपि‍‍ रचना आदर करबाक योग्‍य अछि‍। बाल कवि‍ता-  ऐमे उपदेशक संगहि‍ मनकेँ रंजि‍त करबाक क्षमता होएबाक चाही। जे उत्‍सुकता बनौने रहए। नव-नव मोहक दृश्‍य देखबैत अहाँ बच्‍चा सभकेँ नव संसारसँ परि‍चि‍त करबाक प्रयास कएने छी। जेना- “मेहनति‍ अहाँ करू फल हमरा दि‍अ.....।‍” दोसर पाँति‍- “मुइलपर भाबहु की भैंसुर केलहुँ अततह समए बदलल नहि‍ बदलल ई गाम हमर।।‍” नि‍श्‍चय एतेक रास बाल कवि‍ता रचि‍ अहाँ बाल साि‍हत्‍यक भण्‍डार भरबाक सराहनीय प्रयास कएने छी। अन्‍तमे, यएह जे साहि‍त्‍यक सभ वि‍धाकेँ एक्केठाम संग्रहि‍त करबाक एकटा नव प्रयोग भेल अछि‍। व्‍याकरण आ भाषाक शुद्धता अछि‍। श्रुति‍ प्रकाशन धन्‍यवादक पात्र छथि‍ जे नीक जकाँ एतेक पैघ पोथीक प्रकाशन कएलनि‍। दीर्घकाय पोथीक मूल्‍य कम अछि‍। जैसँ पाठककेँ क्रय करबामे सुवि‍धा हेतैक। पोथि‍क लेल यएह कहब जे- अहाँ भि‍न्न-भि‍न्न प्रकारक पुष्‍पसँ सुसज्‍जि‍त एहेन पुष्‍पबाटि‍का बनेलहुँ जैमे प्रवेश कऽ पाठक जेहने आकांक्षा करत तेहने रूप, गंध प्राप्‍त करत आ हमरे जकाँ आनन्‍दि‍त भऽ कहत- “धन्‍यवाद।‍” ३ डाॅ. योगानन्‍द झा- मैथि‍ली बाललोककथा : स्‍थि‍ति‍ आ अपेक्षा मैथि‍ली बाललोककथा मैथि‍ली लोकसाहि‍त्‍यक एक गोट वि‍शि‍ष्‍ट प्रभेद थि‍क। लोक साहि‍त्‍यक अन्‍यान्‍ये वि‍धा जकाँ इहो वि‍धा अदौसँ लोककंठमे वि‍राजमान रहला अछि‍। तथा पुस्‍त दर पुस्‍त कण्‍ठान्‍तरि‍त होइत रहला अछि‍। एहेन लोककथा जेे अपन सहजता, सुबोधता ओ मनोरंजकताक संगहि‍ नेनालोकनि‍क मनोमस्‍ति‍ष्‍ककेँ प्रेरि‍त-प्रभावि‍त करबामे सक्षम होइछ, बाललोककथाक अन्‍तर्गत परि‍गणि‍त कएल जा सकैछ। एहेन लोककथा सभ सामान्‍यत: नाति‍ दीर्घ आकारक होइत अछि‍ आ अपन रोचकताक कारणेँ सुननि‍हार नेनालोकनि‍मे उत्‍सुकता बनौने रहैत अछि‍। अपन बाल आ कि‍शोरावस्‍थामे नेनालोकनि‍ अपन दादी-नानी ओ परि‍वारक वएस्‍कलोकनि‍सँ एहेन कथाक श्रवण करैत रहलाह अछि‍ जइसँ हुनकालोकनि‍क मनोरंजन तँ होइते रहल अछि‍, संगहि‍ हुनकालोकनि‍मे बीरता, बुद्धि‍मत्ता, सांस्‍कृति‍क चैतन्‍य आदि‍क प्रादुर्भावक संगहि‍ सामाि‍जक जगतक वि‍धि‍-नि‍षेधक ज्ञानक वि‍कास होइत रहलनि‍ अछि‍। पूणत: श्रुत साहि‍त्‍य होएबाक कारणे मैथि‍ली लोकसाहि‍त्‍यक इहो वि‍धा युगीन संक्रमणक प्रभावें क्रमश: वि‍लुप्‍तप्राय भेल जा रहल अछि‍। आब ने धि‍या-पुतालोकनि‍केँ मनोरंजनक लेल दादी-नानीक कोड़मे बैस कथा सुनबाक वि‍वशता रहलनि‍ अछि‍ आ ने आधुनि‍क दादी-नानीये लोकनि‍ ऐ वि‍धाक प्रति‍ आत्‍मीयता ओ प्रति‍बद्धताकेँ जोगा कऽ राखि‍ सकलीह अछि‍। तथापि‍ कि‍दु अग्रसोची वि‍द्वानलोकनि‍ अछि‍ जइसँ एकरा सबहक नमूनाक नि‍दर्शन भेट सकैत अछि‍। प्रसि‍द्ध साहि‍त्‍येति‍हासकार डाॅ. जयकान्‍त मि‍श्र “‍एन इन्‍ट्रोडक्‍सन टू द फॉक लि‍टरेचर आॅफ मि‍थि‍ला” मे मि‍थि‍लाक लोककथाकेँ आठ श्रेणीमे वि‍भाजि‍त कएने छथि‍- (1) व्रत कथा (2) परी कि‍ंवा प्रेम कथा (3) भूत-प्रेत ओ डाइन-जोगि‍नि‍क कथा (4) उपदेशात्‍मक ओ तथ्‍यात्‍मक कथा (5) बुद्धि‍-वि‍नोद कथा (6) बालकथा (7) उपासकलोकनि‍क कथा अेा (8) स्‍थान सम्‍बन्‍धी कथा। एेमे व्रत कथा महि‍लालोकनि‍क व्रतसँ सम्‍बन्‍धि‍त कथा थि‍क जे मि‍थि‍ल स्‍त्रीगणक सांस्‍कृति‍क जीवनक प्रमुख अंग थि‍क यथा- जि‍ति‍या व्रत कथा, काति‍क व्रत कथा, छठि‍क कथा, हरि‍सों व्रत कथा, सपता-वि‍पताक कथा, वट-साहि‍त्री व्रत कथा, मधुश्रावणी व्रत कथा आदि‍। मुदा ई व्रत कथा सभ व्रत-वि‍शेषक प्रति‍ आस्‍था जगएबाक उद्देश्‍यपरक थि‍क एवं नेनालोकनि‍क हेतु उपादेय नै रहबाक कारणे एकरा सभकेँ बाललोककथा मध्‍य परि‍भाषि‍त नै कएल जा सकैछ। परीकथा अो प्रेमकथामे अद्भुत चमत्‍कार, अलौकि‍कता, प्रबल पराक्रम, रहस्‍य-रोमांच आदि‍क वर्णन रहैत अछि‍ तथा नायक-नायि‍काक पारस्‍परि‍क राग ओ अन्‍तत: अनेक वि‍ध्‍न-बाधाकेँ पार करैत मि‍लनक वर्णन रहैत अछि‍। ऐ कोटि‍क कथा सभमे औत्‍सुक्‍यक ि‍नर्वाह रहैत अछि‍ आ ई सभ श्रोताकेँ बन्‍हने रहैत अछि‍। अद्भुत घटनासँ सम्‍बद्ध एहेन कथा सभ वयस्‍कलोकनि‍क संगहि‍ बालवृन्‍दकेँ सेहो अह्लादक लगैत छन्‍हि‍। तँए ऐ कोटि‍क कथा सभ बाललोककथा मध्‍य परि‍गणि‍त कएल जा सकैछ। भूत-प्रेत ओ डाइन-जाेगि‍नि‍क कथा सेहो अद्भुत चमत्‍कारसँ भल रहैत अछि‍ जैमे भूत-प्रेतक वि‍वि‍ध रूप-परि‍वर्त्तन तथा डाइन-जोगि‍नि‍क अपूर्व कृत्‍य सबहक वर्णन रहैत अछि‍। अहू कोटि‍क कथाकेँ शि‍शुलोकनि‍ अत्‍यन्‍त तन्‍मयता पूर्वक सुनैत छथि‍ मुदा अपन भ्‍यावहताक कारणे ऐ कोटि‍क कथा नेनाकेँ डेरबुक बना दैत छै। तथापि‍ ऐ कोटि‍क कथाकेँ सेहो बाललोककथा मध्‍य परि‍गणि‍त कएल जा सकैछ। उपदेशात्‍मक ओ तथ्‍यात्‍मक कथा सभमे दैन्‍दि‍न जीवनक साक्षात अनुभूत सत्‍यक वर्णन रहैछ जकर श्रवणसँ नेनालोकनि‍क ज्ञानक वि‍स्‍तार होइत छन्‍हि‍। एहेन कथा सभकेँ नीति‍-कथा सेहो कहल जा सकैछ। ऐ कोटि‍क अनेक बाललोककथा मि‍थि‍लाक लोकजीवनमे प्रचलि‍त रहल अछि‍। बुद्धि‍-ि‍वनोदक कथा सभ बहुधा हास्‍य-वि‍नोद ओ चातुर्यसँ सम्‍बद्ध रहैछ यथा-गोनू झाक कथा, अकबर-बीरबलक कथा आदि‍। एकरा सभकेँ बाललोककथा मध्‍य परि‍गणि‍त कएल जा सकैछ। पशु-पक्षी, चि‍ड़ै-चुनमुन्नी आदि‍केँ पात्र बनाए नेना-भुटकाक मनोंरजन ओ ज्ञानवर्द्धनक उद्देश्‍यपरक बाललोकथा सभ वस्‍तुत: केवल शि‍शुएलोकनि‍क हेतु होइत अछि‍। एहन कथा सबहक वि‍स्‍तार अपेक्षाकृत छोट रहैत छै। उपासकलोकनि‍ ओ स्‍थान वि‍शेषसँ सम्‍बद्ध दन्‍तकथा सभकेँ बाललोककथा मध्‍य परि‍गणि‍त नै कएल जा सकैछ। डॉ. जयकान्‍त मि‍श्रक उक्‍त पोथीक मि‍थि‍लाक प्रत्‍येक कोटि‍क लोककथाक उदाहरण स्‍वरूप ओकरा सबहक संक्षि‍प्‍त कथासार कहल गेल अछि‍। ऐ क्रममे ति‍लमा जनि‍ कुमारी, आबऽ आबऽ कचनारा, पनसज्‍जा कुमारि‍, हाहापुरक कोठा, सोने रूपे काँि‍त, डाला सन पान कोहा सन सुपारी, बेलवती कुमरि‍, मि‍रचाइबत्ती कुमरि‍, हँसराजक घोड़ा, उड़नखटोला, गि‍रि‍मोहर बालाक कथा, मयूर बालक बालकक कथा : भैया हओ भैया! एभे माछ खाइहऽ ओही माछ जुनि‍ खइह, हंसावती कुमरि‍, भाँकी कुकुर, फुलवन्‍ती कुमरि‍, विखलाहा मेटल नै जाय, घण्‍टीबला कथा, लालबला कथा, कि‍छु करनी कि‍छु कर्मफल, चन्‍दन गछि‍याक कथा, चारि‍ इयारक कथा आदि‍ प्रेम कथा ि‍कंवा परी कथा तथा शि‍शु कथाक रूपमे मुसरि‍याक कथा, फुद्दीरानीक कथा, बि‍त्तू मि‍याँक कथा, फोकचक कथा, ढि‍ल्‍ली रानीक कथा, क्रौन्चक कथा, गि‍रगि‍टि‍याक कथा, की खाओं की लय परदेश जाओँ, बगि‍याबला कथा, दरि‍द्रछि‍म्‍मरि‍क कथा, हरमजदबाक कथा, पेटू खबासक कथा, ठेठपाल झाक कथा आदि‍क संक्षि‍प्‍त वस्‍तुपरक परि‍चए प्रस्‍तुत भेल अछि‍। ऐ प्रकारक वस्‍तुसँ मैथि‍ली बाललोककथाक स्‍वरूपक अभि‍ज्ञान तँ होइछ मुदा से मैथि‍ली बाललोककथाक वि‍वेचनक दृष्‍टि‍ये भलहि‍ं महत्‍वपूर्ण अछि‍, ओकर संकलन-प्रकाशनक दृष्‍टि‍ये केबल मार्गप्रदर्शकेटा कहल जा सकैछ। ऐ प्रकारक स्‍थि‍ति‍ बि‍हार राष्‍ट्रभाषा परि‍षद्, पटना द्वारा प्रकाशि‍त लोककथा कोशक मैथि‍ली भागमे प्रदत्त एकतीस गोट बाललोककथाक कथासारक सेहो अछि‍। मैथि‍ली बाललोककथाक संकलन-प्रकाशनक दृष्‍टि‍ये जे महत्‍वपूर्ण कार्य सभ होइत रहल अछि‍ तकरा सबहक संक्षि‍प्‍त परि‍चए एतऽ प्रस्‍तुत कएल जाइछ। एगो रहथि‍ राजा- क्रमश: १. विनीत उत्पल- दीर्घकथा- घोड़ीपर चढ़ि लेब हम डिग्री –पाँचम भाग २. मि‍थि‍लेश मंडल- कथा- सुदि‍क रूपैआ ३.- कपि‍लेश्वर राउत- कथा- थरथरी ४.उमेश मंडल- विहनि कथा- दोस्‍ती १ विनीत उत्पल- दीर्घकथा- घोड़ीपर चढ़ि लेब हम डिग्री –पाँचम भाग                                                            आगू बढि से पहिने अहां से एकटा गप करब आवश्यक अछि। जे यहि ठाम छी जतय से शीर्षक गप 'घोड़ि पर चढ़ि लेब हम डिग्री" के गप शुरू भेल। एक ठाम जामिया मिल्लिया इस्लामिया के हिन्दी विभाग छल जतय आलोक बाबू हिन्दी मे पढ़ैत छल। एतय हिन्दी भाषाक प्रकांड विद्वान सभ हुनका पढाबैक लेल आबैत छल। ओहि काल मे हास्य कवि डॉ. अशोक चक्रधर हिन्दी विभाग के कमान संभालने छल आओर विभाग मे 'जो लाहौर नहीं देख्या ओ जन्मया नहीं" के लेखक असगर वजाहत छल तऽ 'भीनी-भीनी बीनी चदरिया" उपन्यासक लेखक अब्दुल बिस्मिल्लाह सेहो ओतय छल। अहांके ते जानतै छियै जे असगर वजाहतक नाटक 'जो लाहौर नहीं देख्या ओ जन्मया नहीं" भारत-पाकिस्तान विभाजन पर आधारित अछि। अपना सब जे नाटक गाम-घर मे देखैत छी, ओहिना अहि नाटक के नहि देखल जाइत अछि। टाऊन मे जखन ई नाटक देखाअल जाइत अछि ते मारि परैत अछि। एतेक नीक नाटक ओहिने नहि लिखल जा सकैत अछि। पाय दैके, टिकस लैके लोक सभ ई या अहिने नाटक लोक देखैत छै। भारते टा मे नहि विदेशो मे अहि नाटक के मंचन भऽ चुकल अछि। यै हाल 'भीनी-भीनी बीनी चदरिया" उपन्यासक अछि। बनारसक जुलाहा पर लिखल गेल ई उपन्यास कथा के नब आयाम लिखने अछि। दोसर ठाम छल भारतीय विद्या भवन। जतय ओ अंग्रेजी मे पत्रकारिताक कोर्स करैत छल। अंग्रेजी हुनकर मजबूत नहि छल, मुदा जोश मे आबि के अंग्रेजी मे पत्रकारिता करहि लागल छल। किछु दिन तऽ नीक लागल मुदा भीतरे-भीतर जे हुनका पर बीतैत छल, से वैह ठा जानैत छल। ओना ई गप हम बता दैलहुं तऽ अहां ई नहि बुझियो जे कथाक अंत भऽ गेल। क्याकि जे आलोक बाबू के अंग्रेजी के नाम से सांप सूघि जाइत छल ओ आय आस्ट्रेलिया मे अछि तऽ कोनो नहि कोनो गप तऽ जरूर होयत। क्योकि आस्ट्रेलिया मे बिन अंग्रेजी जानल तऽ काज नहियै होयत। फेर आजुक दिन आलोक बाबू तऽ पैघ पोस्ट पर अछि। दिल्ली, दुबई, हांगकांग, न्यूयार्क मे घुमैत रहैत अछि। फेर हुनका इंटरनेट से जते मन लागैत अछि, ओकरा लेल हम की कहि। जहिना हमर जीमेलक स्टेटस पर हरका बल्ब जलैत देखैत अछि, ओ टिपटिपबै लागैत अछि। ओना ई आदत ओ कोनो रायपुर से संगे नहि आनलै छल। बेरसराय मे जखन ओ रहै लगलाह तखन ते एक्के-दूई टा ओतय साइबर कैफे छल मुदा कनिक ठामे मुनिरका मे कतेक साइबर कैफे खुजल छल जकरा अंगुरी मे गिनब आसान नहि अछि। बेरसराय में एक-दूई टा सेहो दोस्त बनि गेल छल। जखन सांझ राति आठ-नौ बजे ओ क्लास से फारिग भऽ कऽ डेरा घुरैत छल तऽ अप्पन दोस्तक संग  मुनिरका के साइबर कैफे मे देर राति धरि चैटिंग करैत छल। ओहिनो ओहि काल मे चैटिंग करब बरका गप छल, क्याकि कम्मे लोक छल जकरा चैटिंग करै लेल आबैत छल। मुदा, आब तऽ लोक अप्पन मोबाइल से चैटिंग करैत अछि। ओहि काल याहू, रेडिफ छल। आओर आर्कुट के तखने अहि दुनिया मे आयल छल। फेसबुक, ट्विटर ओहि काल भविष्यक गर्भ मे छल। लोक याहू मैसेंजर पर घंटों लागत रहैत छल। आलोक बाबू के लऽ कऽ एकटा गप तऽ छल, जे ओ जतय जाइत छल या बैसैत छल, ओतय तुरंते लोक सभ जानै लागैत छल। मेहनती आ कर्मठ ते रहबे करल। अहि बीच एक सांझ जखन ओ जामिया मिल्लिया इस्लामिया से घुरि के भारतीय विद्या भवनक क्लास मे छल तखने एकटा लड़की हुनकर नाम लऽ कऽ बजौलखिन, 'आलोक अहांके नाम अछि। प्रोफेसर राजेंद्र जोशी हमरा अहांक लग पठौलखिन अछि।" 'हां, कहूं।", आलोक अनमनने ढंग से ओहि लड़की दिस ताकि के कहलखिन। 'हम तऽ एतय पार्ट टाइम कोर्स कऽ रहल छी।" 'नीक गप।" 'हम संयुक्त राष्ट्र संघक यूएनडीपी मे काज करैत छी आओर हमर नाम करिश्मा सिंह अछि।" 'ते हमरा से कोन गप।", आलोक बाबू कहलखिन। 'क्याकि हमरा आफिस से टाइम नहि भेटैत अछि। ताहि सं हमरा पढ़ै मे दिक्कत होयत अछि। जोशीजी कहलखिन जे जतय हमरा कोनो दिक्कत होय ओतय हमरा अहां सहयोग कऽ देब।" 'हम ते ओना कोनो नियम नहि बनौले छी, जे अहां के हेल्प नहि करब। मुदा, जहिना हम सभ के करैत छी, अहों कऽ हेल्प कऽ देब।" 'ठीक अछि।" 'जी।" ई कहिके आलोक बाबू एक कात आओर करिश्मा दोसर कात चलि देलक। आब दिक्कत ई छल जे एक कात हुनका अंग्रेजी भारि लागै तऽ दोसर कात करिश्मा हुनका नीन खराब कऽ के राखि देन छल। उमढ़ हिन्दी मे ओ कतेक रास काज सभ कऽ रहल छल। जामिया मे पढ़ैत काल हुनकर आलेख हिन्दी के सभ पैघ-पैछ अखबार मे छपि लागल छल। करिश्मा जतय हुनका सं अंग्रेजी मे गप करैत छल ओतय हुनका अंग्रेजी मे बाजहि मे सांप सूंघि जाइत छल। आलोक जखन तंग भऽ जाइत छल तखन हुनकर मुंह सं निकलि जाइत छल, 'देखब,जखन हम भारतीय विद्या भवन सं कोर्स भऽ जाइत ते हम घोड़िपर चढ़ि हम लेब डिग्री।" मुदा, आलोक बाबूक ई गप भारतीय विद्या भवनक कोर्सक बादे खत्म नहि भेल। ई गप कहि-कहि के ओ आओर लोक सभ के अंग्रेजी से डरा दैत छल जे अहि बेर ओ परीक्षा मे फेल जरूर करत आओर कनि-कनि अंग्रेजी मे पढ़ैत-पढ़ैत एहि भाषा के नीक कऽ लेलक। ई गप हमरे टा मालूम छल जे ओ खूब मन सं अंग्रेजी भाषा कऽ लऽ के मेहनत कऽ रहल छल। आगू बढ़हि सं पहिले अहांके ई गप हम कहि दैत छी जे अंिह ठाम आलोक बाबूक ई कथाक अंत नहि भऽ रहल अछि। क्याकि आय जदि ओ अंग्रेजी नहि जानैत अछि ते कोना आस्ट्रेलिया मे अछि। आओर जहिया सं आस्ट्रेलिया गेल अछि तहिया सं फोन-ते-फोन चैटिंगो हमरा सं खूब करैत अछि। हमहूं खूब करैत छी। ओहि दिन हमरा संग खूब चैट करलक। आलोक: हाय (अंग्रेजी बला) हम: मजे मे छी, अहां सुनाबू। 'अहां फोटू देखलहुं की, अहां के एकटा आओर मेल कईने छी"। 'हां, हम तऽ सभटा फोटो देखहि ुचुकल छी"। 'अहां ओकरे मे हुनका चिन्ह सकैत छी"। ई कहिके आलोक बाबू हमरा फेकरा बुझाबै लागल। 'दूनू अलबम देखलहुं अहां"। फेसबुक पर कुछु फोटू लोड केने छी की? हां, पुरैनका आओर नबका दोनो फोटू अछि ओतय"? 'ओके" 'यार अप्पन किछु ग्रुप फोटू अहांक लग अछि आओर संभव हुए तऽ अहां ओकरा स्कैन कऽ पठाह देब। हमहूं सभटा फोटू पटाह देब। आइये अप्पन लैपटॉप पर सेव कईने छी", आलोक बाबू हमरा कहलखिन। 'हां, हम भागलपुर से सभटा फोटू ले आइने छी"। हम कहलहुं। (एकटा गप तऽ बिसुरि गेलहुं जे हम माने गोविंद भागलपुरक छी। तिलकामांझी एकटा मोहल्ला अछि। ओहि ठाम सबौर जाहि बला रोड मे शीतला स्थान रोड अछि जतय हम रहैत रहि आओर आय-काल पापा-मम्मी रहैत अछि।) 'कोनो दिन बैसि कऽ सभटा फोटू स्कैन कऽ लेब, तखन अहां के पठा देब।' हम कहलहुं। एकटा अलबम भेजि रहल छी, चेक कऽ लियौ।" हम कहलहुं। 'ओके" 'अहि फोटू में अहां नहि छी"। 'कोनो बात नहि"। 'ओह मजा आबि गेल।" 'हमरो मजा आबि गेल।" कतेक पुरनका गप ख्याल आबि गेल आओर हमरा मन मे किछु आओर गप छल। हम जे लिखने छी, अहां पढ़लियै की नहि", आलोक बाबू कहलखिन। 'कोन गप"। 'अहि बीच हम कवि बनि गेल छलौंह"। 'अच्छा, आस्ट्रेलिया मे"। 'तीन-चारि दिन पहीने बहुत दिन बाद किछु लिखने रहि हिन्दी मे, 'लम्हे क्या लम्हे।" 'भेज देब नहि, ओकरा हम पढ़ब"। 'अलबम मे नहि पढ़लौ कि। गुरु ओतय पढ़हि के मजा अछि"। 'ओतय तऽ पढ़लौ, आओर की लिखने छी", हम कहलहुं। 'लम्हे के विस्तार देने छी"। 'हा, हा, मजा आबि गेल"। 'अइयों अहां खराब चौक के ट¬ूब लाइट छी की, केहन लिखने छी, ई गप हम पुछि रहल छी" आलोक बाबू हमरा पर व्यग्य करलखिन। जारी... ‍ २ मि‍थि‍लेश मंडल- कथा सुदि‍क रूपैआ गाममे एकटा मास्‍टर छलाह। बारह हजार रूपैआ दरमाहा रहनि‍। हुनका एकटा लड़का रहनि‍ लगभग 15 सालक। तीने परानी परि‍वारमे रहथि‍। बाप-बेटा आ माए। मास्‍टर सहाएब अपने रूपैआ सुइदपर लगबैमे एक नम्‍बर गाममे। समूचा गौआँ जनैत जे मास्‍टर लग बारह बजे दि‍न आकि‍ राति‍मे जाएब तँ रूपैआ भऽ जाएत। मास्‍टरकेँ गाममे सभ ए.टी.एम. बुझैत। जे कखनो जाएब तँ भऽ जाएत। 25 हजार रूपैआ तक राति‍ या दि‍न कखनो लोक लऽ सकैत छल। मुदा 25 हजारसँ बेसी लेल एक दि‍नक समए दि‍अ पड़ैत रहै। बि‍ना समान रखने कि‍नको एक्कोटा छि‍द्दि‍यो ने दैत। से सभकेँ बुझल। यएहटा एकटा शर्त्त रहनि‍ मास्‍टर सहाएबक। बड़नीक लेन-देन चलैत। लोक सभ बन्हकी लगा-लगा अपन जरूरतकेँ पुरबैत। मास्‍टरो सहाएबकेँ मन लगनि‍। हि‍नको मन आगु बढ़ैत गेल।  संजोगसँ मास्‍टर सहाएबक बेटा ताबत 20 वर्षक भेल। जवान भेल। बेटो ओही फेरामे पड़ल। एककेँ दू कन्ना हएत, मोनमे एलनि‍ जे रूपैआ सुइदपर लगाएब तँ घर बैसले आमदनी हएत। ने हाथ मोलि‍ आ ने पएर मोलि‍। बेटा 500 रूपैआ लोककेँ दैत 1500रूपैआ लोकसँ लैत। सुइदक सुइद जोड़ैत। मास्‍टर सहाएब एक दि‍न अपन हि‍साब-बारी करैले बैसलाह तँ सुि‍दक रूपैआ 36 हजार कऽ महि‍नामे अबैत रहनि‍। मास्‍टर सहाएबकेँ मन चसकैत। बेटा एक तरफ सोचैत जे हमरा सन महाजन गाममे कि‍यो नै अछि‍। क्रमश: ३ कपि‍लेश्वर राउत कथा थरथरी ओता तँ ऋृतु छह टा होइत अि‍छ। गृष्‍म, वर्षा, शरद, हेमन्‍त, शि‍शि‍र आ वसन्‍त। मुदा व्‍यवहारमे लोक तीनटाकेँ मानै छै गर्मी, वर्षा आ जाड़। सभ ऋृतुकेँ अपन ललग-अलग गुण अवगुण होइत छै। मुदा जाड़केँ एकटा अपन अलगे गुण अवगुण अछि‍। कोन भगवान जाड़केँ जन्‍म देलनि‍ से नै कहि‍। अान ऋृतुमे तँ लोक हर्ष-वि‍षम, रंगरभस आ वर्षाक फूहारक आनन्‍द लऽ कऽ ि‍बता दैत छै। मुदा जाड़ तँ कोढ़केँ कँपा दैत छै। गरीबक वास्‍तु मारूख आ धनि‍कक वास्‍तु बि‍लासक ऋृतु होइत छै। घुटर एक दि‍न एहने समएमे सुरेश बाबूक खेत जे मरखप केने छल पटबैले गेल। समए छलै माघ मासक सुरूआतक। जहि‍ना 2003ई.मे शीतलहरी छलै तहि‍ना अहू बेर भेलै। पछि‍या बहैत जाड़ सुसकारी दैत। सूरूजो भगवान कतए नुका रहला तकर ठेकान नै। कुहेश लागल। पनि‍क बुन्‍द जकाँ वर्फ खसैत। लोक हरदम धुरे लग आगि‍ तपैत। ठि‍ठुरल घास-पात खेलासँ माल-जालकेँ पीठ पाँजर बैस गेलै। आ वि‍मारो पड़ए लागल। तनुक चि‍रै-चुनमुनी सभ जहि‍ंपटार मरए लागल। साँप सभ कोनो बीलमे तँ कोनो आरि‍क कातमे मूइल परल। जीनाइ लोककेँ कठीन भऽ गेलै। एक पनरहि‍यासँ जे शीतलहरी चलल से लधले रहि‍ गेल। एहने समएमे घुटर मनखप गहूम केने छल। तकरा पटबैक लेल गेल जोखन बोरि‍ंग चलबैक लेल गेल। बोरि‍ंगमे जहन पम्‍पसेटसँ पानि‍ धराबए लागल पानि‍ धऽ लेलके। पलास्‍टि‍क पाइपसँ पानि‍ लऽ गेनाइ छलै से जहाँ कि‍ पाइप पम्‍पसेमे धराबए लागल आकि‍ पानि‍ दोसर दि‍सामे फूच्चूका मारलके आकि‍ घुटर आ जोखन दुनू गोटाकेँ नहा देलके। तथापि‍ कोनो तरहेँ पाइपकेँ बान्‍हि‍ लेलक। जाड़े दुनू गोटे थरथर काँपए लागल। घुटर खेत जा एक कि‍यारीमे पानि‍ खोलि‍ देलके। आ आगि‍क जोगारमे घुटर बगलमे कलमवाग छलै ओतए नार राखल छलै जैमे सँ एक पाँज नार थरथराइते अनलक। आब जखने सलाइसँ आगि‍ धराबऽ लगल आकि‍ तेहेन जाड़ होइत रहै जे सलाइक काठी खड़ड़ले ने होइत होइ। थरथरीसँ सलाइक काठी मुझा जाय। जँ कठीमे आगि‍ धरे तँ नारमे धरबेकाल मि‍झा जाय। खाएर कोनो तरहेँ आगि‍ धरौलक आगि‍ धधका दुनू गोटे आगि‍ तापए लागल। थोड़ेक कालक बाद होश भेलै। सुरेश बाबू खेत देखक लेल पएर लग तक कोट देने, पएरमे मोजा-जूत्ता लगौने, जाँधमे ट्रोजर देने कानमे मोफलर लगौने तैपर सँ माथमे टोपी देने आँखि‍योमे चश्‍मा छलनि‍। तैयो जाड़े थरथराइत छलाह। जखन बोरि‍ंग लग एला तँ देखलखि‍न जे दुनू गोटे आगि‍ तापि‍ रहल अछि‍। सुरेशो बाबू हाथ महक दस्‍ताना नि‍काि‍ल आगि‍ तापए लगला। आ बजला- “घुटरा केहेन समए भऽ गेलै जे केतनो कपड़ा देहमे दैत छि‍ऐ तैयो जाड़ जना जाइते ने अछि‍। तूँ सभ कोना कऽ रहैत छेँ।‍” घुटर बाजल- “याै मालि‍क गरीबक जि‍नगी कोनो जि‍नगी छि‍ऐ। एक तँ दैवि‍क मारल छी, दोसर सरकारोक व्‍यवस्‍था तेहेन ने छै जे की कहब। कमाए लंगोटीबला आ खाए धोतीबला।‍ देहमे देखैत छि‍ऐ जेतने कपड़ा अछि‍ तैसँ राति‍क जाड़मे गुजर करैत छी। घरवाली परसौती भेल अछि‍। एकेटा रहैक घर अछि‍। दोसर बकरी आ गाए लेल अछि‍। तहि‍मे एक कोनमे जारैन-काठी रखैत छी। सेहो बकरीबला घरक टाट टूटल अछि।‍” सुरेश बाबू बजला- “तब तँ बर दि‍क्कत होइत हेतौ?” घुटर बाजल- “यौ मालि‍क, की कहू। खएर जाए दि‍औ। हमरा सभले तँ एकटा उपरेबला छथि‍। मुदा हे एकटा बात कहैत छी जे केतनो अहाँ सभ कपड़ा लगाएब, बि‍जलीक गर्मीमे रहब मुदा तीन बेर अहूँ सभकेँ जाड़ पछारबे करत।‍” सुरेश बाबू अकचकाइत पुछलाह- “कन्ना रौ।‍” घुटर कहए लगल- “नै बुझै छि‍ऐ, नहाइ, खाइ आ झारा फि‍रै कालमे।‍” सुरेश बाबू- “ठीके कहै छेँ।‍” घुटर- “मालि‍क, हमरा सभकेँ कोन अछि‍। खूब मोटगर कऽ लार बीछा दै छि‍ऐ तैपर सँ कुछो बी‍छा दै छि‍ऐ आ चद्दैर ओढ़ि‍ लै छी आ तखनो जँ जाड़ होइए तँ झट्टासँ बनेलहा पटि‍या ओढ़ि‍ लै छी। बगलमे गोरहन्नी आ खड़ड़न-मड़ड़नकेँ ओरि‍या कऽ रखने रहै छी नै भेल तँ ओकरो पजारि‍ दै छि‍ऐ। भरि‍ राति‍ सुनगैत रहल घर गरमाएल रहल। अहाँकेँ तँ बुझलै हएत जे बोरैसक आगि‍ केहेन होइ छै। ठाठसँ सुतै छी।‍” “तहन तँ एअर-कण्‍डीशन‍ बना कऽ घरमे रहै छेँ। बड़ नीक एहि‍ना जाड़सँ बँचैक कोशि‍श करि‍हेँ। नै तँ सत्तो डाक्‍टर जकाँ हेताै, बेचारा काल्हि‍खि‍न पैखानासँ अाएल, कलपर कूरूर करि‍ते रहए आकि‍ ठंढ़ा मारि‍ देलकै। टांगि‍-टुंगि‍ कऽ डाक्‍टर लग लऽ गेलै। तँए कहलि‍ओ जे जाड़सँ बचि‍ कऽ रहिहँ। बकरी आ गाएकेँ सेहो झोली ओढ़ा कऽ रखि‍हँ।” सुरेश बाबू कहलखि‍न। मुँड़ी डोलबैत घुटर बाजल- “ठीके कहै छी मालि‍क।‍” सुरेश बाबू- “रौ घुटर, छि‍यो-पुतोकेँ हाँटि‍-दबाि‍र दि‍हेँ जे ठंढ़ासँ बँि‍च कऽ रहतौ।‍” घुटर- “से छौड़ा मानि‍ते नै अछि‍। खन गुल्‍ली डण्‍टा, खन क्रि‍केट तँ खन कबड्डी खेलाइते रहैए। की करबै। हम तँ कहबे ने करबै मालि‍क।‍” सुरेश बाबू- “सएह हम कहबो ने।‍” घुटर- “हम तँ भरि‍ दि‍न काम धन्‍धामे लागल रहलौं। अहीं सबहक बस बॅसबि‍ट्टीमे बाँसक ओधि‍ उखारि‍ चीर-फार कऽ लै छी। जैसँ देहमे घाम फेकैत रहैए।‍ आ राति‍ कऽ बौरेसबला आगि‍ गरमेने रहैए।” सुरेश बाबू- “ठीक करै छेँ। जान छौ तँ जहान छौ।‍ शरीर नै तँ कि‍छु नै। अच्‍छा एकटा कह जे योगासन करै छेँ आकि‍ नै?” घुटर- “यौ मालि‍क, हम मूर्ख आदमी की जानए गेलि‍ऐ‍ योगासन आकि‍ प्रणायाम। हमरा सभले देहे धुनब योगासन आ परनि‍याम होइत छै। खटनि‍यौ सँ ने देह दुहाइत रहैए।” सुरेश बाबू बजलाह- “इहो बात ठीके छौ।‍” घुटर बाजल- “मालि‍क अगहनमे मारि‍-घुसि‍ क‍ऽ कमेलौं, खूब धान कटलौं जैसँ घरमे एक कोठी धानो अछि‍ आ थोड़ेक चाउरो अछि‍। खेतसँ खेसारी साग, बथुआ साग, सेरसो साग, तोरी साग सबहक तीमन कऽ लै छी। कहि‍यो काल अल्‍लू, कोबी, भट्टा, मुरै सेहो सभक तीमन खा लै छी आ बम-बम करैत रहै छी।” सुरेश बाबू- “तहन तँ नीके वस्‍तु सभ खाइ छेँ।‍” घुटर- “अहाँ सभ जकाँ की अण्‍डा, मौस-तौस आकि‍ दूध-दही हमरा सभकेँ भेटैत अछि‍। हमरा सबहक देह तँ वैसाख जेठक रौद, भादबक वर्षा आ माघ मासक जाड़सँ ठाेकाएल-ठठाएल अछि‍। अहाँ सभ जकाँ की गैद परहक बाँस जकाँ मोटगर नै ने अछि‍ जे तागत कि‍छु ने। केहनो भीरगर काज देखा दि‍अ कऽ देब।‍ हँ अहाँ सभ जकाँ पोथी-पतरा नै ने पढ़ने छी। थमहू खेत देखने अबै छी।” कहि‍ खेत आबि‍ दोसर कि‍यारीमे पानि‍ खोलि‍ फेर घूर तर चलि‍ आएल आ गप-सप्‍प केलक। बाजल- “यौ मालि‍क, अहाँ सभ जकाँ की हमरा सौ बीघा खेत अछि‍। लऽ दऽ कऽ अपन दस कट्ठा खेत अछि‍। कनीमे तरकारी-फरकारी, कनीमे दलि‍हन-तेलहन, कनीमे साग-पात केने छी। धान-गहूम तँ अहीं सबहक खेतमे मनखप कऽ के गुजर करै छी।‍” सुरेश बाबू- “एकटा कहाबत छै जे लड़ा-चड़ा धन पाइये बैठे देगा कौन। हे बड़ जाड़ होइ छै जल्‍दी खेत पटा लै आ घरपर जो। हमहूँ आब अधि‍क घुम फि‍र नै करब घरेपर जाइ छी।‍” घुटर कहलक- “जँ गपे-सप्‍प करै छी तँ एकटा गप आओर सुनि‍ लि‍अ। हम तँ पंजाब-भदोही आकि‍ दि‍ल्‍ली-बम्‍बइ नै ने कमाइले गेलौं। देखै छि‍ऐ जे ढबाहि‍ लागल लोक देासर मुलुक जाइत अछि‍। हँ ओतऽ सँ पाइ तँ अनैए मुदा परि‍वारसँ हटल रहैए। जबकि‍ सरकारो खेतीपर वि‍शेष धि‍यान देलकैहेँ। खेत अफर-जात परल अछि‍ केनि‍हारक चलैत। कम उपजा भेने तंगी तँ बढ़बे करत गाममे माए-बाप से हकन कनैत छै। माि‍लक अहीं अपन दशा देखि‍ओ ने, एते खेत अछि‍ आ धि‍या-पूता सभ वि‍देशमे नोकरी करैए। मालकि‍न बूढ़मे कन्ना कऽ भानस भात करैत हेती से वएह जनैत हेती।‍” सुरेश बाबू बजला- “से तँ ठीके कहैत छेँ। कखनो कऽ हमरो मनमे होइत अछि‍ जे कथीले एते कमेलौं आ एते जमा केलौं।‍ अच्‍छा छोर ई सभ बात। हम जाइ छि‍औ।”‍ कहि‍ सुरेश बाबू घर दि‍स वि‍दा भेला। आ घुटर अंति‍म कि‍यारीमे पानि‍ काटए लगल। ४. उमेश मंडल विहनि कथा- दोस्‍ती एटका गाममे दूटा दोस्‍त छल। एकटाक नाओं आत्‍मा आ दोसराक नाओं शरीर छेलै। दुनूक दोस्‍ती बच्‍चेसँ छल। दुनूक बीच एहेन दोस्‍ती रहै जे आन कि‍यो बुझबे ने करै छल जे दुनू दू छी। कि‍एक तँ सदि‍खन दुनू संगे रहैत। संगे खाइत, संगे सुतैत आ संगे टहलैत-बुलैत। दुनू नि‍श्‍चय केने छल जे जि‍नगी भरि‍ प्रेम आ मि‍त्रता नि‍माहब। एक दोसरकेँ मदति‍ सदति‍ काल करैत रहब। शरीर परदेश जा व्‍यापार करए लगल। खूब धन अर्जित केलक। धन भेने एश-मौजक सभ सुवि‍धा बना लेलक। नमगर-चौड़गर कोठी, एअर कंडीशन गाड़ी, टी.बी. मोवाइल इत्‍यादि‍ सभ कि‍छु कीन लेलक। आत्‍माकेँ जखन जानकारी भेलै तँ मने-मन खूब खुशी भेलै। एक दि‍न आत्‍मा शरीरसँ भेँट करए वि‍दा भेल। शरीर लग पहुँचते, अत्‍मो शरीरकेँ चि‍न्‍हलक आ शरीरो आत्‍माकेँ। मुदा अनचि‍न्‍हार बनि‍ शरीर आत्‍माकेँ पुछलक- “‍अहाँ के छी, कतए रहै छी, हम नै चि‍न्‍हलहुँ?” शरीरक बात सुनि‍ आत्‍मा मने-मन सोचए लगल जे भरि‍सक एकरा धनक मद आन्‍हर बना देलकै, तँए एहेन बात बजैए। मन मसोसि‍ आत्‍मा कहलक- “दोस, सुनै मे आएल जे अहाँ आन्‍हर भऽ गेलहुँ, तँए जि‍ज्ञासा करए आएल छलहुँ। मुदा ऐठाम आबि‍ प्रत्‍यक्ष भऽ गेल जे अहाँ सचमुच आन्‍हर भऽ गेल छी। आब जाइ छी।‍” हम पुछैत छी- मुन्नाजीक १.गौरीनाथ आ २.अनमोल झासँ गप्प-सप्प। १ हिन्दी-मैथिली साहित्यक सेतु सदृश बहुआयामी व्यक्तित्वक धनिक युवा रचनाकार श्री गौरीनाथसँ युवा विहनि कथाकार मुन्नाजी द्वारा भेल गप्प-सप्पक प्रमुख अंश राखल जा रहल अछि:- मुन्नाजी: गौरीनाथजी नमस्कार। सर्वप्रथम भारतीय भाषा परिषद, कोलकाताक सम्मानक लेल बधाइ। अहाँक साहित्यिक क्रियाकलापक मोटामोटी दू दशक बीति रहल अछि, अपन प्रारम्भिक रचनात्मक सक्रियताक पूर्ण जनतब दी। गौरीनाथ: अहांक एहि हार्दिकताक लेल धन्‍यवाद। अपन लेखनक मूल्यांकन अपने नै कऽ सकै छी। मुन्नाजी: अहाँक सृजनरथ कथायात्रासँ प्रारम्भ भेल छल, प्रारम्भसँ एखन धरि अपन कथायात्राकेँ कोन दृष्टिये देखै छी। ऐ बीच कथा आ कथानकमे कोन बदलाव देखबामे आएल? गौरीनाथ: अपन कथायात्राक बारे मे हम पहिनहि कहलहुँ जे स्‍वयं किछु नै कहब। एकर सही मूल्‍यांकन दोसर लेखक, पाठक वा आलोचक कऽ सकै छथि। ओना मैथिली मे आलोचक तँ छथिये नै तहन सहृदय पाठक आ दोसर लेखक एकर निर्णायक भऽ सकै छथि। ओना मैथिली कथामे बदलावक गप्प कहबै तँ समएक जे दवाब छै से तँ अबै छै मुदा जतेक एबाक चाही से हमरा मैथिली साहित्यमे नै देखबा मे अबैए। मुन्नाजी: अहाँ अपनाकेँ साम्यवादी रूपेँ स्थापित करबाक प्रयास केलौं। सातम-आठम दशकमे उठल साम्यवादी विचारधाराक हो-हल्लाक बाद एहेन कोनो विचारधारा मैथिली मध्य बनि सकल? गौरीनाथ: नै हमरा ई गलत लगैए जे सातम आकि आठम दशकमे हो हल्ला भेल। बाबा नागार्जुन जखन रचनात्मक शुरुआत केलनि आजादीक पूर्वे, ओइ समयक जे हुनकर लेख देखबनि ओ जे राजघरानाक विरुद्ध प्रश्‍न उठेलनि, से की छल ? ओ किसान आन्दोलन, कम्यूनिस्ट आन्दोलनक समर्थक ताहि जमाना सं छलाह। जहिया मार्क्सवादी विचार नै छलै तहिया न्‍यायक प्रश्‍न नै छलै की ? हँ, सातम-आठम दशकमे नक्सलबाड़ी आन्दोलनक बाद मैथिलीमे अग्नि पीढ़ी आगू भऽ एलै आ तहिया  जे सामाजिक दवाब छलै- ओइमे रामलोचन ठाकुर, अग्निपुष्प, कुणाल, नरेन्‍द्र आदि हस्‍तक्षेप कयलनि। हँ ओ एहेन दवाब छलै जाइमे जे ओइ धाराक समर्थक नहियो रहयवला अनेक दृष्टिसंपन्‍न लेखक एहि पीढि़क संग समानधर्मे टा नै, सहमना रूप मे सेहो सोझा अयलाह। आइ ओहि धारा मे कुमार पवन, सारंग कुमार, विद्यानंद झा, कामिनी आदि सन अनेक युवा रचनाकार भेटताह। मुन्नाजी: अहाँ मैथिली-हिन्दी मध्य समान रूपेँ सक्रिय छी, दुनू मध्य की समानता-भिन्नता अनुभव करै छी? गौरीनाथ: एकटा हमर मातृभाषा छी, दोसर हमर रोजी-रोटीक भाषा। हमरा दुनू मे कोनो द्वैध नै बुझाइ अछि। मुन्नाजी: अहाँ प्रकाशकीय गतिविधि (प्रकाशन आ वितरण)मे सेहो सक्रिय छी। तँ कहू मैथिलीमे श्रेष्ठ रचनाक की स्थिति अछि, पाठकक भेल वृद्धि कते महत्व रखैत अछि? गौरीनाथ: पाठकक मैथिलीमे अभाव भेलैए। १९९९-२००० मे जतेक पत्रिका-किताब बिका जाइत छलै आब से स्थिति नै छै। मुन्नाजी: अहाँ अपना जनतब कहू जे मैथिली पत्रकारिता वा प्रकाशन कतऽ अछि, ई आर्थिक लाभमे जा सकैए? गौरीनाथ: निश्चित रूपसँ आर्थिक लाभ भऽ सकै छै, ओइ लेल आवश्यक छै पैघ प्रकाशन संस्थाक, जतऽ पर्याप्‍त पूजी संग व्‍यावसायिक सूझ-बूझ सेहो होइ। हमरा सभकेँ ओते संसाधन नै अछि। हमरा सभकेँ आर्थिक लाभ नै भेल, मुदा घाटामे सेहो नै रहलौं। ओइ रूप मे हम बजारकेँ गलत नै कहै छिऐ। आब हम एक बेर कतौसँ विज्ञापन आनि लेलौं तँ हमरा लाभ भऽ गेल, मुदा तकरा एहि व्‍यवसायक स्‍थायी भाव तं नै कहबै ? हमसभ किछु खास नै केलहुं, एकदम छोट प्रयास अछि हमरासभक... मुन्नाजी: अहाँ अंतिकासँ किछु रचनाकारकेँ बेरा कऽ रखैत रहलौंहेँ, तकर की कारण, विचारधाराक अभाव की रचनाक स्तरक अभाव? गौरीनाथ: हमरा नै कोनो नाम मोन पड़ैत अछि, जिनका हमसभ बेराकऽ रखने होइ। अंतिका मे हमरासभ जते लोककेँ छपने छी तकर नाम नुकायल नै छै। तकर अलाबे के बारल छथि तकर नाम अहीं कहि सकैत छी... मुन्नाजी: अपन समतुरिया रचनाकारकेँ कतऽ राखऽ चाहब, ओइ भीड़ मध्य अपनाकेँ कतऽ पबै छी? गौरीनाथ: हम अपन समकक्ष सभ रचनाकार केँ अपना सँ आगू मानै छी। ओइ भीड़ मे हम सब सं पाछू छी। मुन्नाजी: मैथिली साहित्य बभनौटी (ब्राह्मणवादक) शिकार रहल अछि। मुदा नव सदीमे सक्रिय गएर ब्राह्मण रचनाकारक प्रवेशकेँ अहाँ कोन तरहेँ देखै छिऐ? गौरीनाथ: ब्राह्मणेत्तर जे छथि, हुनका लग भोगल पीड़ा छनि तें हुनके स्‍वर सभसँ विश्‍वसनीय हैत। मुन्नाजी: अपन अमूल्य समए दऽ उतारा देबा लेल बहुत-बहुत धन्यवाद। गौरीनाथ: अहूँ के धन्‍यवाद। २ राग द्वेष, भेदभाव, मैथिलीक उठापटकसँ दूर एकान्त भऽ अपन प्रारम्भिक रचना समएसँ आइ धरि अनवरत विहनि कथा लेखनमे लीन श्री अनमोल झा सँ युवा विहनि कथाकार एवं समालोचक मुनाजीक अन्तरंग गपशप: मुन्नाजी: भाइ नमस्कार। सामान्यतः रचनाकार सभ कथा-कवितासँ लिखब शुरू करैत छथि मुदा अहाँ विहनि कथासँ रचना लिखब प्रारम्भ कऽ विहनि कथेकेँ प्रमुखतासँ लिखैत रहलौंहेँ। एकरा प्रति रुचि वा आदर कोना जागल? अनमोल झा: नमस्कार भाइ। बहुत-बहुत नमस्कार। शुरू तँ हम केने रही- “बाबा कहथिन महरानी” कथासँ जे हमर पहिल रचना छल। मुदा तकरा बादेसँ हम विहनि कथा लिखऽ लगलौं। जहाँ धरि रुचि आ आदरक प्रश्न अछि भाइ, से निश्चित रूपसँ हम कहब जे ऐ लेल हम “सगर राति दीप जरय” (कथा गोष्ठी) सँ बहुत उपकृत होइत रहलौंहेँ। हम दोसर कथागोष्ठी जे २९.०४.१९९० ई. मे श्री जीवकान्तअ जीक संयोजनमे भोला उच्च विद्यालय, डेओढ़मे भेल रहए, तहियासँ जुड़ल छी। आ ओइसँ लुरि-भास सभ सिखैत रहलौंहेँ। ओना कथा गोष्ठीमे कथाक प्रधानता रहैत अछि। एम्हर आबि कऽ थोड़-थोड़ विहनि कथा सभ सेहो पढ़ल जाइत अछि, जकर हमरा आतुरताक संग प्रतीक्षा रहैत अछि। अन्य भाषामे विहनि कथा चिन्हार भऽ स्थापित भऽ गेल अछि। मैथिलीयोमे कथाक संगे-संग भारतक सभ भाषा लग ई ठाढ़ हो, स्थापित हो, तँए हम विहनि कथेकेँ प्रमुखता दऽ रहलौं अछि। मुन्नाजी: विहनि कथाक अतिरिक्त कथो लिखलौं आ से छपबो कएल। दुनूक मध्य की समानता आ भिन्नता अछि? दुनूमे सँ जे एकटा पसिन्न करए लेल कहल जाए तँ ककरा पसिन्न करब आ किएक? अनमोल झा: हमर एखन धरि १६० टा लघुकथा मैथिलीक विभिन्न पत्र-पत्रिका आ संकलनमे प्रकाशित अछि, जकर सभ पत्र-पत्रिका आ संकलन हमरा लग उपलब्ध अछि। एकर अतिरिक्त आरो कतौ छपल अछि आ से हमरा सूचना नै अछि से सभ छोड़ि कऽ। आ तहिना सतरहटा कथा सेहो प्रकाशित अछि। कथा आ विहनि कथाक मध्य समानता आ भिन्नताक बात पुछैत छी से हमरा जनैत उपन्यास आ कथामे जे समानता वा भिन्नता अछि सएह कथा आ विहनि कथामे अछि। दुनूमे सँ निश्चित रूपे हम विहनि कथाकेँ पसिन्न करब। कारण ऐमे जे मारक क्षमता होइत अछि से आन कोनोमे नै। आ सफल विहनि कथाक ईएह गुण अछि जे ओ पाठककेँ बिना मर्माहत केने नै छोड़ि सकैत अछि। मुन्नाजी: विहनि कथाक अतिरिक्त बाल कथा सेहो लिखैत रहलौं अछि, आर की की लिखैत छी? सभ तरहक लेखनक की उद्देश्य? अनमोल झा: बाल रचना लिखैत हमरा नीक लगैत अछि तैं लिखैत छी। जखन हम ई लिखैत छी तँ अपना-आपकेँ बालपनमे अनुभव करैत छी जे नीक लगैत अछि। एकर अतिरिक्त कथा, कविता, रिपोर्ताज लिखैत रही आ एखनो हल्का-फल्लक लिख लैत छी। एकर सबहक पाछाँ कोनो तेहेन उद्देश्य नै अछि। मुदा विहनि कथा हमर प्राण छी आ तैं एकरे सभटा समर्पित अछि। मुन्नाजी: मैथिलीमे विहनि कथाक कोनो मोजर वा पुछारि नै छै। विहनि कथाकारक तँ कोनो नामे निशान नै बुझल जाइछ। एहन स्थितिमे जगजियार हेबासँ बेसी हेरा जएबाक सम्भावना अछि। ऐ स्थितिमे अपनाकेँ कोना पबै छी? अनमोल झा: हम जतऽ छी ठीक छी। मैथिलीमे ओनाहो बड़ पेंच-पाँच छैक। बिना पैरबी, पाइ वा पदक किछु नै होइत छैक आ से हमरा लग नै अछि तैं हेरा जाएब वा जगजियार होएब ई बिना माथामे रखने विहनि कथा लिखैत छी आ लिखैत रहब। मुन्नाजी आब मैथिलीमे विहनि कथाक मोजर वा पुछारि नै छैक से नै कहियौ। यदि अहाँ सन समर्पित लोक आर थोड़बो भेटि जाइ मैथिलीकेँ तँ अपने ने मोजर भऽ जेतै एकर। मुन्नाजी: अहाँ एखन धरि ढेर रास विहनि कथा लिखि गेल छी। संख्यात्मक बलेँ बड्ड मजगूत छी। मुदा किछु रचना कमजोर बनि सोझाँ आएल अछि। तँ अहाँकेँ नै लगैछ जे बेसी लिखबासँ बेसी आवश्यक अछि जे कम्मे आबए मुदा ठोस रचना आबए? अनमोल झा: अहाँक कहब यथार्थ अछि भाइ। ओना धान कुटलापर चाउरमे खुद्दी हएब स्वाभाविक अछि। खुद्दीमे चाउर नहि ने देखाइ अछि अहाँकेँ। ओना अहाँक सुझावक स्वागत अछि। हम एकर ध्यान राखब। मुन्नाजी: अहाँकेँ डेढ़ दशकक अपन विहनि कथा यात्रामे की अनुभव रहल। तहियासँ आइक स्थितिमे की अन्तर छै। अनमोल झा: डेढ़े दशक किएक कहैत छी मुन्नाजी। दू दशक ने कहियै। हमर पहिल प्रकाशित रचना २ टा विहनि कथा घृणा-स्नेह आ विवश चेतना समितिक स्मारिका विद्यापति स्मृति पर्व १९९१ ई. मे छपल अछि। खएर छोड़ू, काजक गप करी। विहनि कथा यात्राक मादे की कहू भाइ, हमरे सन थेथर लोक अछि जे १९, २० बरख सँ एकरा पकड़ि कऽ लेखन करैत रहल। बड़ दुरूह रस्ता छल तखन (एखन नै) आ तैं बहुत गोटा ऐ विधामे आबि कऽ फेर अपन कथा-कविता दिस चल गेलाह। देखलन्हि जे नाम ने जस तँ की करब एतऽ। ऊपरसँ उपहासे। ओना आब पुछबनि तँ कहता ओ सभ एकर जन्मदाते हम छी तँ हम छी। मुदा हमरा ऐ विधामे मोन लगैत अछि आ ऐ बले लोक चिन्हतो अछि हमरा। एखन पहिलुका सन स्थिति नै रहलै। विहनि कथा मैथिलीमे अपन स्थान बना लेने अछि, जकर प्रमाण पत्र-पत्रिकाक लघुकथा विशेषांक आ सभ पत्र-पत्रिकामे विहनि कथाक रहब अछि। एकर भविष्य नीक अछि। लोककेँ कथा-उपन्यासकेँ पढ़बाक पलखति नै छैक एखन। एहन स्थितिमे ओ सभ बात विहनि कथामे कनिये कालमे भेटि जाइत छै। तैँ एकर पाठको वर्ग तैयार भऽ गेल अछि। दिनानुदिन विहनि कथाकारो सभ उभरि कऽ आबि रहलाहेँ आ से सतति रचनाशील छथि। आजुक परिप्रेक्ष्यमे विहनि कथाक तुलनात्मक स्थिति नीक अछि, बहुत नीक जे रचनाकार सभ थोड़े लिख कऽ पड़ा नै जाइत छथि आन विधा दिस। मुन्नाजी: अहाँ अपन सर्वस्व ऊर्जा विहनि कथामे लगा रहल छी। ऐ यात्रामे आर के सभ सहभागी छथि आ हुनकर सभक की रुखि छनि। अनमोल झा: हमर ऐ यात्रामे श्री सत्येन्द्र कुमार झा, श्री गजेन्द्र ठाकुर, श्री मुन्नाजी, श्री अमलेन्दु शेखर पाठक, श्री मिथिलेश कुमार झा, श्री रघुनाथ मुखियाक संग आर कतेको नव लोक हमरा संग आ सहभागी छथि। आ हिनका सभसँ मैथिली विहनि कथा बहुत आशा रखैत अछि। हिनका सभक रुखि नीक छनि। ऐमे श्री सत्येन्द्र कुमार जीक तँ एकटा विहनि कथाक संग्रह प्रकाशितो छनि आ दोसर प्रकाशनार्थ ओरियाओल छनि। मुन्नाजी: अन्यान्य कथा साहित्य मध्य मैथिली विहनि कथा कतऽ देखाइछ आ एकर की भविष्य छै? अनमोल झा: अन्यान्य कथा साहित्य लग मैथिली विहनि कथाक पहुँच प्रायः एखन धरि नै भेल अछि। कारण अछि एकरा घरेमे आ अपने लोक मोजर दैक लेल तैयार नै छथि। जे शुरू-शुरूमे सभ भाषामे लघुकथा अपन जगह पाबै लेल झेलने आ भोगने छल यएह बात एकरो संग भऽ रहल अछि। मुदा एकर भविष्य उज्जवल अछि। दिनपर दिन नीक-नीक विहनि कथा सभ सामने अबैत अछि जे अपन मजगूतीक बात कहैत अछि। मुन्नाजी: अहाँक विहनि कथा संख्याक बलेँ मजगूत होइतो एकर कोनो संगोर सोझाँ नै आएल अछि, आगामी योजना की अछि? अनमोल झा: हमर धरि कोनो संग्रह नै निकलल अछि तकर प्रमुख कारण अछि अर्थ। हम एकटा प्राइभेट कम्पनीमे काज करैत छी। ततएसँ नून-तेलसँ बेसी नै किछु होइछ जे ई सभ किछु करब। कोनो संस्था, प्रकाशक वा व्यक्ति ओकरे पोथी प्रकाशित करैत छथिन जे अपने सम्पन्न हो वा जकर पहिलेसँ पोथी प्रकाशित होनि। हम तहूमे छटा जाइत छी। ओना हमर तीनटा विहनि कथाक पाण्डुलिपि तैयार अछि, तीनटा फाइल कऽके। पहिल विहनि कथाक संग्रहक पाण्डुलिपि जे तीन साल पहिने डॉ. विद्यानाथ झा “विदित” जीकेँ देने रहियनि। ओ कहलनि जे चालीस बर्खसँ कम उमेरक साहित्यकारकेँ साहित्य अकादेमीमे पोथी छापैक प्रावधान छैक, तइमे छपि जाएत। दू सालक बाद कहलनि प्रेसमे अछि। तकरो आब एक सालक करीब भऽ गेलै। कत्तौ पता नै, कोनो सूचना नै। दोसर संग्रहक प्रकाशन लेल श्री गजेन्द्र ठाकुर जीकेँ निवेदन कएल जे श्रुति प्रकाशन बहुत मैथिली पोथी छपैत अछि। एकटा हमरो विहनि कथाक संग्रह छपवा दिअ। ओहो स्पष्ट रूपे नै तँ नै कहलनि, हँ भऽ जेतै आश्वासन देने रहथि। ओकरो कतेक दिन भऽ गेलै। कोनो बात फेर आगाँ नै बढ़ल। तेसर विहनि कथा संग्रहक प्रकाशन लेल कोलकाताक “मिथिला सांस्कृतिक परिषद” लग पाण्डुलिपि जमा कएल अछि। देखियौ की होइत अछि। जखने कतौसँ छपत तखने बुझवै जे छ्पल। आगामी योजनाक मादे पुछैत छी से योजना की रहत भाइ। हमरा सन साधारण लोक लेल कोन योजना आ कथीक योजना? हँ एकटा योजना धरि अवश्य अछि जे विहनि कथा लिखैत रहब, से सदति लिखैत रहब। छपय तँ सेहो नीक, नै छपय तँ सेहो नीक। संग्रह आबए तँ सेहो नीक, नै आबए तँ सेहो नीक। धरि लिखैत रहब विहनि कथा अवश्ये हम। मुन्नाजी: दू दशकक विहनि कथा यात्रामे अपनासँ वरिष्ठ (पुरान वा मध्यम पीढ़ी)क केहेन सहयोग/ विरोधक आभास भेल, हुनकर सभक योगदानक विषयमे की कहबै? अनमोल झा: हमरासँ वरिष्ठ (पुरान वा मध्यम) पीढ़ीक साहित्यकार सभक सहयोग सदति भेटैत रहल अछि। बीच-बीचमे उठा-पटक सेहो ओ सभ खूब करथि। हमर विहनि कथा लऽ कऽ मुँहो-कान खूब घोकचाबथि। हमरा मोन अछि जे विराटनगर कथा-गोष्ठी (१४.०४.१९९२ ई.) मे हमर विहनि कथाकेँ सभ लोकि कऽ हवामे उड़ा देलनि। तकरा बाद सभकेँ खारिज करैत गुरुवर पं. श्री गोविन्द झा हमर ओइ विहनि कथाक प्रशंसा केलनि। हमरा बल भेटल आ हम विहनि कथा लिखिते रहलौं। ओना निश्चय रूपेँ कहए पड़त जे ऐ ठोक-ठाक उठा-पटकमे हमरा हतोत्साह नै, एक प्रकारक बले भेटैत रहल, जे एना नै एना लिखलासँ नीक विहनि कथा बनत। आर एखन वएह लोक सभ पटना कथा-गोष्ठी (२१.०२.२००९) मे हमर विहनि कथा टेक्नोलोजी आ युद्ध क प्रशंसे नै केलनि, भरि रातिमे कएक बेर ओकर बड़ नीक हेबाक चर्चा करैत रहलाह। हमरा ऐ विधामे श्री प्रदीप बिहारी, श्री तारानन्द वियोगीक सहयोग आ योगदान निश्चय रूपसँ भेटल। आ हम हुनका सभसँ आ हुनक विहनि कथा संग्रह सभसँ बहुत किछु सिखलौंहेँ। अस्तु, धन्यवाद भाइ। १.जगदीश प्रसाद मंडल- कथा- जगदीश प्रसाद मंडल- कथा- पड़ाइन २.ज्योति सुनीत चौधरी- अदृश्य बन्धन : १ जगदीश प्रसाद मंडल- कथा- जगदीश प्रसाद मंडल कथा- पड़ाइन पछुलका बाढ़ि‍मे खेतक फसल तँ धुआइये गेल जे मालो-चाल गामसँ उपैट गेल। अपनो दुनू बड़दो आ महीसो मरि‍ गेल। जहि‍ना जंगलक जानवरकेँ मेघसँ खसैत पाथरक चोट छटपटबैत तहि‍ना ऐ साल आन-आन कि‍सानक संग अपनो भेल। बाधसँ लऽ कऽ घर धरि‍क दशा सहाज करै जोकर नै रहल। बाढ़ि‍ अबि‍ते खेतक धान डूबि‍ गेल। मोटाइत-मोटाइत पानि‍ अंगना-घरमे सलाढ़ लगि‍ गेल। नारक टाल पानि‍क बेगमे भसि‍ गेल। भुसकाँर खसि‍ पड़ल जइसँ गहूमक भूसी भसि‍या गेल। आश्रमक घरक संग-संग मालो घरमे पानि‍ पहुँच गेल। जहि‍ना लाठीपर लाठी खाइत दशा होइत तहि‍ना भेल। चढ़ि‍ते काति‍क आगि‍ला खेतीक लेल सभ सुर-सार करए लगल। मुदा खेतीक तँ प्रमुख अंग बड़द छी। बि‍ना बड़दे खेत जोताएत कोना? अपने टा गामक दशा नै, परोपट्टाक एक्के रंग दशा। एक्के रंग समस्‍या कि‍सानक बीच पसरि‍ गेल। जइसँ बचल-खुचल माल-जालक दाममे आगि‍ लगि‍ गेल। दोबर-तेबर दाम बड़दक भऽ गेल। एक तँ भेटैबला नै दोसर पैकार सभ जे बाहरसँ आनि‍-आनि‍ बेचए ओकरो वएह हवा। अपन इलाका छोड़ि‍ दोसर इलाकासँ बड़द कीन अनैक वि‍चार भेल। मुदा असगर-दुसगर आननाइयो भारी बुझि‍ पड़ल। गाममे गप्‍प चलेलौं। एक्के-दुइये आठ-नअ गोटेक वि‍चार भेल। जोड़ा कीनि‍नि‍हार तीन गोटे भेलौं। बाकी छबो गोटे पल्‍ले-पल्‍ला कीनि‍नि‍हार। हुनका सबहक वि‍चार जे एकटा बड़दसँ हर नै जोतल जाएत मुदा जोड़ा लगा लेलासँ भजैती नीक रहत। बेजोड़ बड़द रहने एकटाकेँ बेसी भीर होइ छै आ एकटाकेँ कम। जइसँ साले भरि‍मे बड़द टूटि‍ दाम बुरा दै छै। तेसर दि‍न नवो गोटे लौकहावाली गाड़ी झंझारपुर हाॅल्‍टपर पकड़लौं। साढ़े बारह बजे लौकहा स्‍टेशन उतड़ि‍ मेन रोड छोड़ि‍ धनबदहेक उत्तर मुहेँ रस्‍ता पकड़लौं। कखन सीमा टपलौं से वुझबे ने केलि‍ऐ। एक्के रंग बाध आ बाधक उपजा। नमहर-नमहर बाध, खेतमे लहलाहइत धान। दुधाएल धानक सीस जइसँ जहि‍ना धानक गाछक रंग तहि‍ना सीसोक। ऊँचगर-चौड़गर खेतक आड़ि‍, जइपर फुलाइतो आ छीमि‍यो भेल राहरि‍। टाट जकाँ राहरि‍क गाछ खेतक सबहक परि‍चए करबैत। अपन सभ जकाँ चनकी राहरि‍क गाछ जेना नै, मझोलका गाछ। खेसारी छि‍टैत एक गोरेकेँ पुछलि‍ऐ ते कहलक जे ऐ दि‍गारमे बेसी पये (पाया) राहरि‍ होइ छै। धानोक संग-संग अगहनेमे कटाइ छै। सोहरी लागल घुरछा-घुरछे फड़ल। छीमि‍यो नमहर। कोला-कोली गि‍रहस्‍त खेसारी, मौसरी छि‍टैत। आड़ि‍ सभपर जेरक-जेर ढेरबासँ सि‍यान धरि‍ घसवाहि‍नी घास छि‍लैत। उपजा देख माटि‍ नि‍हारलौं तँ सोलहन्नी खसि‍आइ माटि‍ (कारी माटि‍) बुझि‍ पड़ल। माटि‍ देख मन गदगद भऽ गेल। मुदा अपन इलाका मन पड़ि‍ते मन तीता गेल। कमला-कोसीपर खाैंझ उठल। दुनू तेहेन हेहर अछि‍ जे इलाकाक माटि‍केँ बि‍गाड़ी देलक। बालु भरि‍ खेतकेँ बलुआह बना देलक। रस्‍ताक पछबारि‍ भाग एकटा नमगर-चौड़गर परतीपर पचासो महीस चरैत देख मन खुशी भऽ गेल। चरवाह सभ महीसकेँ अनेर चरैले छोड़ि‍ अपने सभ खेलाइत। खेलो अजगुत ठेंगा ठेंगा। कनी अटँकि‍ देखए लगलौं। एकटा सीमा -चेन्‍ह- देने। ओइ सीमापर सँ रागक तर देने उनटि‍ कऽ दुनू हाथे ठेंगा फेकैत। जेकर ठेंगा जते दूर जाए ओ ओते सुरक्षि‍त। जेकर लग रहै ओ हारै। जे हारै ओकरा घुघुआ -पीठ- पर चढ़ि‍ ठेंगा लग तक जाए। फेर दोहरा कऽ खेल शुरू होइ। गोबर बि‍छनी सेहो बैस कऽ खेल देखैत। कोनो धड़फड़ी रहबे ने करै। तीि‍नये चारि‍ गोरे रहै, कते पथि‍यामे अँटतै। जहि‍ना एकाधि‍कार पूँजीपति‍क कारोवार नि‍चेनसँ चलैत, कोनो प्रति‍योगि‍ता रहबे ने करैत तहि‍ना पचास महीसक गोबरक बीच तीनू-चारू गोबर बि‍छनी। मुदा एकटा देखलि‍ऐ जे एक बेर एकटा महीस धानक खेत दि‍स बढ़ए लगलै तँ एक गोरे माने एकटा ढेरबा गोबर बि‍छनी उठि‍ कऽ महीस घुमा देलक। कोसक अन्‍दाज आगू बढ़लौं तँ हाट लगल देखलि‍ऐ। समएओ चाइरि‍क करीब भऽ गेल। मनमे भेल जे कोनो ठेकानल जगहपर थोड़े जाइ कऽ अछि‍ जे अबेर हएत। जखन एलौं तँ देखैत-सुनैत जाएब। हाट देखए बढ़लौं। गमैया हाट। कट्ठा डेढ़ेह परतीपर लगल। तीन-चारि‍ पल्‍लाबला दू-तीनटा अन्न-पानि‍क दोकानदार, दस-बारहटा तीनम-तरकारीक, एक-एकटा माछ-मासुक दूटा झि‍ल्‍ली-कचड़ी, मुरहीवाली एकटा मनि‍हारा, एकटा माटि‍क वर्त्तन, एकटा छि‍ट्टा-पथि‍याक एकटा चाहक दोकान आ एकटा पान-बीड़ीक। मुदा खरीदारी बढ़ि‍या होइत। अन्‍दाज केलौं तँ बुझि‍ पड़ल जे जते कीनि‍ि‍नहार अछि‍ ओतबे समानो आ बेचि‍नि‍हारो। चाहक दोकानपर बैस चाह दइले दोकानदारकेँ कहलि‍ऐ। चुल्हि‍क छाउर झाड़ि‍, डोमौआ बीअनि‍सँ हौंकि‍, चुल्हि‍पर केटली चढ़ौलक। दोकानदारसँ पुछलि‍ऐ- “हाट सभ दि‍न लगैए?‍” दोकानदार उत्तर देलक- “ऐ पचकोसीमे चारि‍टा हाट लगै छै। सोम आ शुक्रकेँ ई हाट लगैए। रवि‍ आ बुधकेँ वि‍स्‍टौल लगै छै, मंगलवार आ वरसपति‍केँ चि‍कना आ शनि‍-मंगलकेँ परसा।‍” चाह बनल। सभ ि‍कयो पीब दोकानदारकेँ पाइ दऽ वि‍दा भेलौं। अपने गाम जकाँ गामो, अपना सबहक तँ पोखरि‍-इनार या तँ बालुमे भथा गेल वा मरने भऽ गेल अछि‍, ओइ सभमे अखनो अछि‍ये। गोटि‍-पङरा ईंटाक घर। रस्‍ता-पेरा कच्‍चि‍ये। उत्तरे-दछि‍ने गाम सभ। जइसँ आगि‍-छाइसँ सुरक्षि‍त। जँ कतौ पुरबा-पछबामे आगि‍ लगबो कएल तँ कम घर जरल। जहि‍ना गाम उत्तरे-दछि‍ने तहि‍ना अंगनो सभ। अपने सभ जकाँ लोकोक बगए-बानि आ बोलि‍यो। जइसँ अनभुआर जकाँ बुझि‍ऐ ने पड़ै। गोसाँइ लुक-झुका गेल। जहि‍ना पछबा सबेर-सकाल अपन बोरा-बि‍स्‍तर समेटि‍ लैत तहि‍ना ने परदेशि‍योकेँ सबेर-सकाल ठढ़ पकड़ि‍ लेबाक चाही। मनमे उठि‍ते अँटकैक गर लगबए लगलौं। एक गोटेसँ पुछलि‍ऐ- “कोन गाम छी?‍” “रोहि‍तपुर।‍” मुदा कोनो नि‍श्‍चि‍त गाम तँ जेबाके ने छल जे दोहरा कऽ पुछि‍ति‍ऐ। तै काल एक गोरेकेँ दोसर गोरे सोर पाड़लक- “मधेपुरबला हौ, हौ मधेपुरबला। कनी एम्‍हर आबह।‍” मधेपुर सुनि‍ मन चौंकल। मुदा लगले असथि‍र भऽ गेल। नाम-गामक कोनो ठेकान अछि‍। एक-एक नामक कतेक लोको आ कतेक गामो हाइए। मुदा मनमे तैयो घुरि‍आइते रहि‍ गेल। मधेपुरबलाक घर पूवारि‍ भाग रस्‍ताकातेमे। घास झाड़ि‍ते मधेपुरबला उत्तर देलक- “हाथ लागल अछि‍, लगले अबै छी।‍” कहि‍ घास झारब छोड़ि‍ मधेपुरबला उत्तर मुहेँ वि‍दा भेल। लगमे अबि‍ते पुछलि‍ऐ- “कोन मधेपुर रहै छी?‍” गामक नाआें सुनि‍ बाजल- “अहाँ सभ कतऽ रहै छी?‍” कहलि‍ऐ- “हमहूँ मधेपुरे रहै छी। तँए पुछलौं।‍” मधेपुर सुनि‍ ओ चौंक‍ गेल। जना कि‍छु भेट गेल होइ तहि‍ना। मुस्‍कुराइत बाजल- “झंझारपुरसँ पूव-दछि‍नक जे मधेपुर छै, ओही मधेपुर रहै छी।‍” अपन मधेपुर सुनि‍ हमहूँ हँसैत बजलौं- “हमरो सबहक घर तँ ओही मधेपुर अछि‍।‍” हमरा सबहकेँ दरबज्‍जापर बैसबैत बाजल- “लगले अबै छी। ओइ बेचारा ऐठाम पाहुन सभ आओत डेढ़ि‍या परक टाट लगाओत आकरे गर धरौने अबै छी। हमर भाग जे गौआँ-घरूआ सभ ऐलाह।‍” अपन भेटैत ठढ़ देख कहलि‍एनि‍- “हँ, हँ भेल आउ। समाजमे सबहक काज सभकेँ होइ छै।‍” काजक बोझसँ अपनाकेँ लदल देख चेथरू रस्‍तेपर सँ सोर पाड़ि‍ पत्नीकेँ कहलक- “लगले अबै छी।‍ ताबे अहाँ एक बाल्‍टीन पानि‍ आ एकटा लोटा आनि‍ पाएर धोयले दि‍अनु।” कहि‍ चथरू आगू बढ़ल। भरि‍ बाल्‍टीन पानि‍ आ एकटा लोटा नेने चमेली दरबज्‍जापर आबि‍ पुछलखि‍न- “बौआ अहाँ सबहक घर कतऽ अछि‍?‍” कहलि‍एनि‍- “मधेपुर।‍” जहि‍ना अनचोकमे देहपर खढ़ो गि‍रते लोक चौंक जाइत तहि‍ना मधेपुर सुनि‍ चमेली चौंक गेलीह। अधा मुँह झपैत बजलीह- ‍“‍ऑक्‍सी महादेव मंदि‍रसँ थोड़बे हटि‍ क‍ऽ हमरो नैहर अछि‍।” चमेलीक बात सुि‍न दूबीक मुँहसँ छोड़ैत नव पत्ती (पात) जकाँ हृदएमे भेल। अपन तीस बर्ख पहि‍लुका जि‍नगीमे ओ -चमेली- डूबि‍ गेलीह। मुँह शि‍थि‍ल भ‍ऽ गेलनि‍, जइसँ कि‍छु आगूक बकार नै नि‍कललनि‍। मुदा दरबज्‍जापर आएल अति‍थि‍क लेल घरवारीक रहब अनि‍वार्य बुझि‍ खूँटा जकाँ ठाढ़ रहली। बेरा-बेरी हमहूँ सभ पाएर धोय-धोय चौकीपर बैसए लगलौं। जहि‍ना देवालयमे दर्शकक नजरि‍ एकोएकी मुरती सभपर पड़ैत तहि‍ना चमेलीक आँखि‍ हमरा सभपर नचए लगलनि‍। घुमि‍ क‍ऽ अबि‍ते चेथरू पत्नीकेँ कहलखि‍न- “जलखै नेने आउ। रस्‍ताक झमाड़ल सभ छथि‍ भूख लगल हेतनि‍।‍” हमहूँ सभ बेराबेरी कुर्रा क‍ऽ बैसलौं। चंगेरा भरि‍ मुरही, नोन-मि‍रचाइ आंगनसँ आनि‍ चमेली बीचमे रखि‍ देलनि‍। जलखै देख चेथरू बजलाह- “अहाँ सभ जाबे जलखै करब ताबे छि‍ड़ि‍ऐलहा काज सभ समेटि‍ लै छी।‍” कहि‍ एकटा छि‍ट्टा आ हँसुआ नेने बाड़ी दि‍स चेथरू आ आंगन दि‍स चमेली बढ़लीह। काति‍क मास रंग-वि‍रंगक तरकारीसँ सजल चौमास। बि‍ना तजबीज केनहि‍ चेथरू आठो-नवो रंगक तरकारीक छि‍ट्टा आंगनमे रखि‍, लगमे आबि‍ बैसलाह। बैसि‍ते कहलि‍एनि‍- ‍“अपन इलाकाक जेहने खेती-पथारी उपटि‍ गेल तहि‍ना मोलो-जाल। मुदा बि‍ना बड़दे खेती कोना करि‍तौं। तँए एलौं। सुनै छी जे ऐ इला इलाकाक लोक अपना इलाकाबलाकेँ कहै छथि‍ जे अपन कमाएल रूपैआ ल‍ऽ क‍ऽ एलौं आकि‍ बाप-दादाक‍, से ठीके छि‍ऐ‍?‍” हमर बात सुनि‍ चेथरू तरे-तर हँसए लगलाह। मुदा अपनाकेँ दुनू ठामक पाबि‍ कनी काल गुम रहि‍ बजलाह- ‍“खि‍स्‍सा-पि‍हानी एहि‍ना लोक जोड़ती-जोड़ि‍ बना लइए। एहनो-एहनो बात हुअए। कोनो धरती कर्मभूमि‍सँ धर्मभूमि‍ बनैत अछि‍। देखै छी जे गामोमे दि‍ल्‍ली-बम्‍वईसँ घुमि‍ क‍ऽ आएल कनि‍याँ सभ अति‍थि‍-अभ्‍यागतकेँ ओतुक्के चालि‍-ढालि‍सँ सुआगत करैत छथि‍ तँ ऐहनो सभ छथि‍ जे केरल-मद्रासमे रहि‍तो गाम-घर जकाँ सुआगत करैत छथि‍। हम अहाँ भैयारी भेलौं। तँए भैयारी जकाँ दुख-धंधाक गप-सप्‍प करू।‍” चेथरूक वि‍चारसँ मन खनहन भ‍ऽ गेल। हृदए बाजि‍ उठल जे सहारा भेटल। अखन तँ धान फुटबे कएल, जखन पाकत तँ बीओ-बाि‍ल ल‍ऽ जाएब। ऐठामक बड़दो अपना ऐठामक बड़दसँ सक्कतो होइ छै आ बेसी दि‍न जीबो करै छै। अपना ऐठामक माल गदि‍याह भ‍ऽ गेल। ऐठाम ठनक जमीनक माल नि‍रोग अछि‍। चुप्‍पा-चुप्‍पी देख पुछलि‍एनि‍- “अहाँ कना ऐठाम आबि‍ गेलौं‍?‍” हमर बात सुि‍न चेथरूक मन पसि‍ज गेलनि‍। गपकेँ आगू नै बढ़ा बजलाह- ‍“भानसो भ‍ऽ गेल हएत। अहँू सभ थाकल छी। जखन बड़द कीनै एलौं तँ हेबे करतै। कोनो की अनतै। कोनो की अनत‍ऽ एलौं। अपन घर छी। पाँच दि‍नमे इलक्को घुमा क‍ऽ देखा देब। मन मोतावि‍क बड़दो कीन देब।‍” चेथरूक बात सुनि‍ हूँहकारी भरैत बजलौं- “हँ, हँ, से तँ ठीके। देस-कोस ने बदलैए। मनुक्‍ख तँ मनुक्‍खे रहैए कि‍ने।‍” खेला-पीला वाद संगी सभ नीनसँ सुति‍ रहलाह। मुदा अपना नीने ने हुअए। अधा घंटा बाद चेथरू खा-पी, मालक घरक घुर सरि‍या, खाइले द‍ऽ बड़का बाटीमे शुद्ध तोड़ीक तेल नेने आबि‍ बजलाह- ‍“सुति‍ रहलौं।‍” आरो गोटेक साँसे कहैत जे सुतल छी। बजलौं- ‍“नै, जगले छी।‍” हमरा लग आबि‍ चेथरू तेलक बाटी बढ़बैत कहलनि‍- “थाकल-ठहि‍आएल छी पाएरमे तेल औंस लि‍अ।‍” दहि‍ना हाथ तेलमे डूबा बजलौं- ‍“भ‍ऽ गेल। ऐकरे मि‍ला लै छी। रखि‍ दि‍औ।‍” एकेठाम बैस दुनू गोरे गप-सप्‍प शुरू केलौं। पुछलि‍एनि‍- ‍“ऐठाम ऐना कते दि‍न भेल‍?‍” कनी काल चुप रहि‍ चेथरू बजलाह- ‍“जहि‍ना बि‍नु पढ़ल-लि‍खल परि‍वारक (टि‍प्‍पणि‍ दुआरे) बेरा-बेटी जनमोक ठेकान रहैत तहि‍ना हमहूँ छी। अंदाज पच्‍चीस बर्खसँ उपरे भेल हएत‍?‍” ‍“ऐठाम बेसी नीक लगैए आकि‍ ओइठीन (मधेपुर)?‍” ‍“प्रश्‍न सुनि‍ चुप भ‍ऽ गेला। जहि‍ना दू बट्टी तीन बट्टीपर पहुँच अपन रस्‍ता लोक हि‍याब‍ऽ लगैत तहि‍ना चेथरूओ हि‍यबए लगला। उठि‍ क‍ऽ तमाकू थुकड़ि‍ आबि‍ बैस बजए लगलाह- ‍“जत‍ऽ बसी वएह सुन्‍दर। भने अखन दुइये भाँइ जागल छी। अपन गाम मन पड़ैए तँ छाती दहलि‍ जाइए। बाबाक रोपल गाछी भुताहि‍ भ‍ऽ गेल। बाबाक कहल सभ बात तँ मन नै अछि‍ मुदा गोटे-गोटे मन अछि‍। कहने छलाह जे कोना अपन गाम बसल आ अखन धरि‍ कोना परि‍वार चलैत रहल। दैवी चक्र ऐहेन चलल जे बि‍गड़ैत-बि‍गड़ैत एते बि‍गड़ि‍ गेल जे वास होइ जोकर नै रहल।‍” कहैत-कहैत हुचकी उठए लगलनि‍। गरा -कंठ- बझए लगलनि‍। चुप होइत देख पुछलि‍एनि‍- ‍“से की‍? से की‍?‍” आंगुरसँ अपन मौसा घर दि‍स देखबैत बजलाह- “हमरा अबैसँ पहि‍ने ऐठाम मौसा ऐला।‍” मौसाक नाओं सुनि‍ पुछलि‍एनि‍- ‍“ओ कि‍अए ऐला‍?‍” चेथरू- ‍“आब तँ अपने नै छथि‍ बेटा छन्‍हि‍। वएह ऐठामक गाम-परधान छी। ओकरे दुआरपर पाँचटा धरम बखारी (धान रखैबला) छै। सौंसे गौआँ बेर-बेगरताले धान जमा केलक। साले-साले बढ़बैत गेल। अखन तते जमा भ‍ऽ गेल अछि‍ जे जेकरा (गामक लोककेँ) जते बेगरता होइ छै ओ ओते लइए आ पीठक-पीठ आपस करैए।‍” मुँहसँ नि‍कलि‍ गेल- ‍“वाह‍! अच्‍छा, ओ कि‍अए ऐला‍?‍” चेथरू- ‍“मौसाकेँ अनटेटल गप आ अन्‍ट-सन्‍ट काज पसि‍न्न नै छलनि‍। सोभावे ओहने छलनि‍। जहि‍क चलैत चारि‍-पाँच बेर गौआँ सभ मारलकनि‍। अंति‍म माि‍रमे बेसी चोट लगलनि‍। मन टूटि‍ गेलनि‍। जहि‍ना एक धटनासँ कि‍यो बेरागी बनि‍ जाइत तँ कि‍यो अपराधी, कि‍यो नि‍रमोही बनि‍ घर-परि‍वार छोड़ि‍ दैत तँ कि‍यो सि‍ंह सदृश्‍य गर्जन करैत। तहि‍ना गामक मोह छोड़ि‍ खेत-पथार बेचि‍ चलि‍ ऐला।‍” ‍“‍अहाँकेँ की भेल?”‍ ‍“‍कोनो एक्के गाम ओहन अछि‍। हमर गाम तँ ओरो बेसी बि‍गड़ि‍ गेल। एक दि‍स महाजनक अति‍याचार तँ दोसर दि‍स खेत-पथारक बेइमानी-शैतानी। बलजोरी अपन नमहर खेतमे छोटका खेतक आड़ि‍ तोड़ि‍ जोइत लैत। तहि‍ना चोराइयो आ देखाइयो क‍ऽ खेतक जजात गाए-महीससँ चरा लैत। आम तोड़ि‍ लैत, दोसराक माए-बहीनि‍क इज्‍जत-आवरूपर हाथ बढ़बैत तँ आगि‍-पानि‍ ढाठि‍ भगैक लेल उड़ी-बि‍ड़ी लगबैत। सि‍न्‍ह काटि‍-काटि‍ घरक वस्‍तु-जात ल‍ऽ भगैत तँ बि‍ना कि‍छु बजनहुँ दसटा बात-कता कहि‍ दैत।‍” चेथरूक बात सुनि‍, जहि‍ना भूमहूर आगि‍क धुआँ नि‍कलैत तहि‍ना लहड़ल हृदएक गर्म सांस नि‍कलल। पुछलि‍एनि‍- ‍“शुरूमे (ऐलापर) तँ बड़ दि‍क्कत भेल हएत‍?‍” ‍“नै। अपना तीन कट्ठा खेत रहए। दू साए रूपैये कट्ठा बेच लेलौं। घरो बेच लेलौं। खाली अपन देहक कपड़ा आ रूपैया ल‍ऽ क‍ऽ मौसे ऐठाम एलौं। वएह दस कट्ठा खेतो कीन देलनि‍ एकटा घरो बना देलनि‍ आ कहलनि‍ जे जै चीजक बेगरता हुअ, से लि‍हह। घरक बीचला खूँटा जकाँ ठाढ़ भ‍ऽ गेला। आब तँ अपने सभ कि‍छु भ‍ऽ गेल। जाबे सासु-ससुर जीबै छलाह ताबे सासुर जाइ छलौं, मामा-मामी धरि‍ मात्रि‍क। बहीन-बहि‍नोइ ऐठाम जाइते छी। ओहो सभ अबि‍ते अछि‍।‍” चेथरूक बात सुनि‍ मन औनाए लगल। कछ-मछी आबि‍ गेल। कहलि‍एनि‍- ‍“नीनसँ देह भसि‍आइ-ए बड़ राि‍त भ‍ऽ गेल। अहुँ सुतैले जाउ।‍” ‍“एतै ने हमहूँ सुतब।‍” पाँचम दि‍न मेजमानी केलौं। छठम दि‍न बड़द नेने गामक रस्‍ता धेलौं। २. ज्योति सुनीत चौधरी अदृश्य बन्धन : स्वतंत्र विचारक स्वामिनी माया अपन पेशा के प््राति अत्यधिक समर्पित एक बाल्य मनोविज्ञान के विशेषज्ञा छली।अहि विषय मे हुन्का बच्चे सऽ लगाव छलैन आ अपन परिवार सेहो बड्ड आधुनिक विचारक छलैन।मार्तापिता क दिस सऽ कहियो कुनो जोर नहिं छलैन. ने व्यवसाय के चयन बेर मे आ ने ब्याहक निर्णयमे।ओना मायाके एक बड्ड नीक पुरूष मित्र छलखिन जे ने मात्र हुन्कर वरन हुन्कर परिवारक सेहो बहुत स्नेही छलैथ।मुदा ई मायाक अपन व्यवसायक प््राति अनुराग व अपन निजी महत्वाकांक्षाक उन्माद छलैन जे ओ अपन एहेन पुरान व घनिष्ठ मित्र द्वारा आयल विवाहक प््रास्तावके अस्वीकार कय एक क्रेश. छोट बच्चा सबके दिन मे देखभाल करय वला संस्था. मे नौकरी पकड़ली। विषयविशेषमे पारंगत मायाके कार्यमे अपन निपुणता के प््रामाणित करयमे कनियो देरी नहिं लगलैन।ओ अपन क्रेशके सब बच्चा के व्यक्तिगत व्यवहार पर विशेष ध्यान राखै छलैथ आ आवश्यक परामर्श अभिभावक सबके दैत छलैथ। बच्चा सबके अभिभावक के कोनो समस्या नहिं छल जकर उपाय हिन्का लग नहिं छलैन। अहि तरहे बहुत शीघ्र हुन्का अपन कार्यक्षेत्रमे प््रासिद्धि आ प््राशंसा भेट गेलैन।धीर्रेधीरे अपन कार्य में अभ्यस्त भेला पर माया के अपन निजी जीवन के विषयमे सोचैके समय सेहो भेटय लगलैन। एक मनोवैज्ञानिक के रूपमे तऽ ओ अपन अस्तित्व बना लेने रहैथ मुदा जखन कखनो ओ बच्चा सब सऽ आन्तरिक प््रोम स्थापित करय के प््रायास करैत छली हुन्का आन हुअ के आभास आवि जायत छलैन। दिन भरि बच्चा क भोजनक पौष्टिकता. रहर्नसहन के शुद्धता. आ खेल मे मस्तिष्कक विकासक समावेश क ध्यान राखैमे माया कतेक श्रम करैत छथि।मुदा जखन बच्चा सबके ओकर अभिभावक लेब आबय छल तखन बच्चा सबमे एक अद्रभुत खुशी बुझायत छल।अभिभावको के कहब छल जे अपन बच्चा के पाबि सबटा थकान दूर भय जायत अछि।बच्चा सबके मुँहपरक ओ खुशी जे ओकरा सबमे अपन मार्तापिताके देखला पर आबैत छल से खुशी देबाक सेहन्ता माया मे जागि गेल रहैन। बहुत सोच विचारक बाद ओ निर्णय केली जे अपन मार्तापिता सऽ अपन मित्रक जानकारी ली।ज्ञात भेलैन जे ओकर कुनो खोज खबरि नहिं अछि।माया के विचार एलैन जे एक बच्चा के गोद ली।मुदा सब कहलकैन जे एना मे बच्चा के पिताक सुख नहिं भेटतैन।तखन माया अपन मार्तापिता सऽ अपन विवाहलेल एहेन वरक चयन करय कहलखिन जे एक बच्चा के गोद लेबय सऽ मना नहिं करैन।अन्यथा ओ ओहिना बच्चा के गोद लेती कारण दुनिया मे कतेको बच्चा बिना मार्तापिता के सेहो रहैत अछि। मार्तापिता अपन कार्य मे लागि गेला। किछु दिन बाद ‘वेलेन्टाइन्स’ दिवस पर माया के अभिभावक हुन्का अपना लग बजेलखिन।माया अपन कार्य सऽ कमे दिनक छुट्टी लय अपन घर गेली।ओतय हुन्कर अभिभावक घर पर पार्टी रखने रहथिन जाहि मे हुन्का एक टा बढ़िया आश्चर्यजनक उपहार भेटलैन। माया के पुरान मित्र ओहि पार्टी मे आयल छलैन जे अखनो माया सऽ विवाह लेल तैयार छलैन। अतबय नहिं ओ मायाक जे अनाथ बच्चा के गोद लय अपन बनाबक विचार रहैन ताहु सऽ सहमत छलैन।सब बेर माया अपन मार्तापिता के वेलेन्टाइन्स डे पर किछु उपहार दैत छलखिन मुदा अहि बेर हुन्का अपन मार्तापिता सऽ अमूल्य उपहार भेटल रहैन।अपन कार्य हेतु समर्पित माया कखन गृहस्थि के अदृश्य बन्धन मे बँधि गेली से हुन्को नहिं बुझेलैन।

१.रवि भूषण पाठक- एक टा अभिशप्त कवि : बूच बाबू २.कृपा नन्द झा मैथिलक जन नायक चुनचुन मिश्र १ रवि भूषण पाठक- एक टा अभिशप्त कवि : बूच बाबू ऐ आलेखक आरंभ सर्वप्रथम गाम करियनमे कविक छविसँ करैत छी। गाममे ई कविजीक रूपमे ख्यात रहलाह मुदा हिनकर उपेक्षाक कथा सेहो गामेसँ प्रारम्भ होइत अछि। प्रख्यात दार्शनिक उदयनाचार्यक भूमिमे जनमल ई कवि ने गाममे न्याय पओलक ने बाहर। गंभीर लेखनकेँ मान्यता नै भेटैत देखि कवि गामक व्याहमे अभिनंदन पत्र लेखनमे सेहो रूचि लिअ लागलाह। एहि काजसँ ने हुनका गाममे केओ रोकलक ने बाहर केओ ।सौभाग्य ई जे एहि हीन साहित्यिक वृत्तिमे रमलाक बादो कवि मैथिलीक सर्वश्रेष्ठ स्वागतगान लिखलन्हि। प्रत्यक्षदर्शी कहैत छथि जे गाम वैद्यनाथपुरमे ऐ गानक समए कतेको मंचस्थ माननीय तिलमिला उठलाह। ई गान मिथिला सहित मैथिलीक दुर्दशाक व्यथागीत बनि गेल- उल्लासक गीत कतऽ सगरो करूणा क्रन्दन उपटि रहल विपटि रहल मैथिलीक नन्दन वन भ्रमरझुण्ड प्यासल छथि, वृहगवृन्द बड़ भूखल मुरूझल छथि आम-मऽहू, रऽसक सरिता सूखल बबुरे वन कवि कोकिल, लाजे मरै छी आउ आउ आउ सब के स्वागत करै छी कवि दोसर अनुच्छेदमे मैथिली मानुसक उत्सवप्रियतापर व्यंग्य करै छथि। हम सभ विद्यापति समारोह, हिन्दी दिवस, स्वतंत्रता दिवस, गांधी जयन्तीकेँ सत्यनारायण भगवानक कथाबला रीतिनिष्ठासँ मना लैत छिऐ आ समारोहक उच्च उद्देश्य ओहिना उपेक्षित रहि जाइत अछि । मात्र ई समारोही गोष्ठीसँ की हेतै? स्थिति जहिना तहिना, संवत एतै जेतै मुरदा जगाउ लाउ पैर पकड़ै अछि आउ आउ सब के स्वागत करै छी ई गान साहित्यक उद्देश्यपर सेहो विचार करैत अछि। कोनो खंडन मंडनक गुंजाइश नै छोड़ैत, ई स्पष्ट कहैत अछि- काव्यपाठ करू मुदा कान्ह पर लिअ लाठी एक हाथ रसक श्रोत, दोसरमे खोरनाठी पुरना किछु त्यागि त्यागि, पकड़ू किछु नऽव ढ़ंग मोंछो पिजाउ बाउ श्रृंगारक संग संग अहाँ गीत गाउ मुदा हम हहरै छी रसश्रोतक संगे खोरनाठी लऽ कऽ चलएबला ई कविता साधारण नै अछि। पाश्चात्य काव्यशास्त्र ई मानैत अछि जे महान साहित्य कोनो एक भाव लऽ कऽ नै चलैत अछि। ई साहित्यमे विविध आ कखनो कखनो परस्पर विरोधी भावक संश्लेष करैत अछि। बूच बाबूक कवितामे विरूद्धक ई सामंजस्य हमरा चकित करैत अछि। हिंदी आलोचक राम चन्द्र शुक्ल विरूद्धक सामंजस्यकेँ एकटा बड़का काव्योपकरण मानैत छथिन्ह। बूच बाबूक एकटा आर कवितामे एकर दर्शन होइत अछि। ‘सोनदाय’ कविताकेँ ध्यानसँ पढ़ू।सर्वप्रथम एकरामे श्रृंगारिक लक्षण बुझाइत अछि। रहतौ ने हास बहि जेतौ विलास गय दुइ दिवसक जिनगीसँ हेवे निराश गय भरमक तरंग बीच मृगतृष्णा जागल छौ मोहक उमंग बीच प्राण किएक पागल छौ चलि जेतौ सुनें कंठ लागल पियास गय दुइ........ कवितामे दू टा भाव स्पष्ट अछि। प्रथम प्रेम निवेदन आ दोसर विरागक स्वीकृति। आ दूनू मिलि कऽ विषादक विराट रूपकेँ जन्म दैत छैक। जे ऐ कवितामे कोनो एकटा भाव रहितै, तखन ई कोनो विलक्षण कविता नै बनि सकैत छल। एहि वैशिष्ट्यकेँ बूच बाबू कवितामे कोना आनैत छथि, ई बात बेस रूचिगर अछि। कवितामे विद्वान लक्षणा आ व्यंजनाकेँ पैघ बूझैत छथिन्ह मुदा कवि बूच अभिधापर निर्भर छथि। हुनकर कवितामे अलंकारक सेहो कतहु विशेष उपयोग नै अछि। तखन ऐ वैशिष्ट्यक श्रोत की अछि? एकर श्रोत अछि हुनकर विराट जीवनानुभव। अपन समृद्ध अनुभवक आधारपर ओ शब्दक नव जाल बूनैत छथि आ अपन रचनात्मक शक्तिकेँ यादि करैत ओकरा दृढ़ आ सुरेबगर बनबैत छथि। एकटा अध्यापकक घरमे जन्म लेनिहार ई कवि सौन्दर्यक विविध रूपक साक्षात्कार कएलक। कखनहु जेठक उद्धत नदी करेह एकर मोनकेँ मोहैत अछि- ई इन्होर पानि चमकै छौ मोर मोरपर भौरी दै छौ काटि काटि डीहक करेजकें तऽरे तऽरे समाइ छौ इएह कवि नागार्जुनक कविता ‘एक फांक आंख’ जकाँ नायिकाक ठोरक रस्तासँ अभिनव सौंदर्य देखैत अछि- कि जहिना कुरकुर पानक ठोर कि तहिना सुन्नरि तोहर ठोर लगौलह बातक पाथर चून सजौलह कऽथ कपोलक खून कि रहलह एक्के बातक चूक कतऽ छह प्रेमक पुंगी हूक? ई कवि भारतक ग्राम्य सुषमाक अनन्य प्रेमी अछि। महानगरीय कृत्रिमताक स्थानपर ई सहज सौंदर्यकेँ वरेण्य मानैत अछि- ईडेन गार्डेन सँ सुन्नर अछि कोशी कातक बोन गय इएह प्रेम एकटा प्रेमिकाक ह्रदयसँ निकलैत अछि- प्रियतम चलि आबू पटनासँ गाम ऐ प्रेमक ठोस आधार अछि। कवि नगरीय जीवन, शहरीकरण आ प्रशासनिक भ्रष्टाचारकेँ निशाना बनबैत अछि- घूसखोर मच्छर उड़ीस जकाँ जीवै छै शोनित तँ ओ अवशिष्ट पीवै छै हड्डी सुखायल अछि तैयो ओ अधिकारी खगले केर तीरै छै चाम कुत्ता जहिना हड्डी सँ मांस,खून आ रस खींचैत अछि, तहिना सरकारी अधिकारी वर्ग सेहो आम जनताक संग करैत अछि। कवि स्वयं बिहार सरकारक राज्य कर्मचारी छलाह, ताइ दुआरे ऐ अनुभवसँ ओ नित्य प्रति गुजरैत हेताह।

मैथिली कवितामे हिंदी कविताक तुलनामे बेटीक ब्याह, दहेज आदिक बेशी चिंता रहलैक अछि। यद्यपि ई चिंता सीता, पार्वतीक ब्याहक रूपमे धार्मिक आयाम लैत अछि, तथापि एकर मूलाधार सामाजिक अछि। अन्य मैथिल कविक संगे हुनको गौरी आ सीताकेँ कुमारी रहबाक दर्द छन्हि- चामक सेज, कुगामक वासी खन कैलाश, खनेखन काशी लागथि बुत्त भुताह हे, गौरी रहथु कुमारी !

ई मिथिला अंचल मे व्याप्त दहेज आ समएसँ बेटीक व्याह नै हेबाक चिंता अछि। कवि सेहो ऐ चिंतासँ जूझैत अछि आ बेटीक लेल एकटा अद्भुत रूपक खोजैत अछि।‘फूलडाली‘ क रूपमे बेटीक कल्पना करैत कवि बेटीमे तमाम पवित्रता आ दैवत्वकेँ रूपांतरित करैत अछि- फूलडाली सन बेटी बनलै माथे परक पहाड़ एक कवितामे कवि कोनो बेटाक बापकेँ चारिटा बेटी होएबाक व्यंग्यात्मक कल्पना करैत अछि- तोरेा कुमारि चारि दाय हो मोन पड़ि जयतह नानी एक अन्य कवितामे वरक खानदानकेँ व्यापारी देखाओल गेल अछि- बबा दलाल बाप बड़दक व्यापारी, बेटा बछौड़ बीकि गेलै हजारी कविक ख्याति हास्य आ भक्ति कविक रूपमे रहल मुदा कविक फूलडालीमे सभ तरहक फूल छलए। फूल नाममात्रक नै काव्य उपवनक सभसँ मधुर, सुगंधित आ पवित्र फूल। कवि अपन दैन्य आ निराशाकेँे भक्ति गीतमे व्यक्त कएलक, ई गीत बहुत बेसी मात्रामे अछि मुदा मात्र एक गीतक चर्चा हम करैत छी, लागैत अछि जेेना विद्यापति पदावलीक कोनो पद होअए- जननि हय, जीवन हमर कठोर अध्यावधि सुख-शांति न भेटल पयलहँू विपति अघोर जननि हय जीवन हमर कठोर बूच बाबू अपन जिनगी आ कवितामे काव्यशास्त्रीय रूढ़िक पालन नै केलाह ने ओ कोनो काव्यात्मक आंदोलनसँ जुड़ि कुकुरमुतिया काव्यक रचना केलाह। ओ ह्रदएसँ कविता करैत छलाह, ताइ दुआरे हुनकर आलोचना सेहो ह्रदएसँ हेबाक चाही। बिझिआइल हाँसूसँ भरिगर गाछ नै कटत। बूच बाबूक काव्यक आलोचना सोचि समझि कऽ होएबाक चाही। यद्यपि ओ कोनो तत्कालीन आंदोलनमे रूचि नै लेलाह, परन्तु हुनकर कविता भाव आ शिल्प दुनू दृष्टिसँ रचनात्मक अछि। रचनात्मकता आ मौलिकताक औजारसँ हुनका परखल जाए तँ ओ मैथिली कविताक इतिहासमे किछु शीर्ष कविमे गणनीय छथि। मुदा हुनकर कविताक विषयमे बहुत भ्रांति अछि। कखनहु छपलाक दृष्टिसँ तँ कखनहु पुरस्कारक दृष्टिसँ हुनकर अवहेलना होइत चलि जाइत अछि। केओ आलोचक कविताक संख्याक दृष्टिसँ सेहो आपत्ति कऽ सकैत छथि! किएक तँ ई अभिनवगुप्त आ मम्मटक देश नै अछि। ई शतक आ सहस्रकम लिखएबलाक देश अछि! विडम्बना ई अछि जे कविक सुपुत्र श्री शिव कुमार झा सेहो मैथिली आलोचनासँ जुड़ल छथि आ अपन आलोचनामे ककरो निराला आ ककरो प्रसाद बनाबैत छथिन्ह मुदा मर्यादावश वा जे कारण हो पिताक रचनात्मकतापर ओ श्रद्धा तँ व्यक्त करैत छथिन्ह मुदा खुलि कऽ सोझाँ नै आबैत छथिन्ह। हम ऐठाम इएह कहब जे ओ निराला आ प्रसाद नै, ओ बूच छलाह, मैथिलीक बूच। हुनका मात्र ऐ रूपमे सम्मान दऽ हम मैथिली आलोचनाक तर्पण कऽ सकैत छी । कविक रचनात्मकताक दूटा संदर्भ आर अछि। कविक रचना ‘अकाल’ संभवतः नागार्जुनक हिंदी कविता ‘अकाल और उसके बाद’ क बाद भेलए। मुदा दुनूक दू संदर्भ आ दृश्य। नागार्जुन जाइ ठाम पशु पक्षी आ मानवक स्थितिक चित्र दऽ रहल छथि, ओइ ठाम बूच बाबूू गुजराती उपन्यासकार पन्नालाल पटेलक रचना ’मानभीनी भवाई’ जकाँ काल देवताक याद करैत छथि। ई अकाल नहि महाकाल अछि भूखक उक बान्हि नांगरिसँ चारेपर ठोकैत ताल अछि। .............................................. बीसहूँ आँखि ओनारि दसानन घुटुकि घुटुकि हिलबैत भाल अछि बूच बाबू अपन एक अन्य कविता ’राम प्रवासी’मे रामकेँ वनवासीक बदला प्रवासी कहैत छथि। मात्र ऐ शब्दक द्वारे ई कविता अपन पौराणिक केंचुलकेँ त्यागि आधुनिकता दिस संक्रमित होइत अछि। धिक धिक जीवन दीन अहाँ बिनु बीतल बरख मुदा जीवै छी जीर्ण-शीर्ण मोनक गुदड़ीकें स्वार्थक सुइ भोंकि सीबै छी निष्ठुर पिता पड़ल छथि घर मे कोमल पुत्र विकल वनवासी आउ हमर हे राम प्रवासी जीता जी हुनकर कोनो किताब नै छपल। मरलाक बाद हुनकर ९८ टा कविताक संग्रह श्रुति प्रकाशनसँ आबि रहल अछि। निन्नानबेक फेरमे हमरा जनैत कवि कहियो नै पड़लाह। जिनगीक ऐश्वर्य आ प्रेमकेँ कवि खूब नीक जकाँ भोगलाह। परन्तु ई सभ मृगतृष्णा बनि कविक जिनगीमे आबैत जाइत रहल- कयलहुँ जहिना किछु आलिंगन चुभि गेल अनेको वक्रशूल उड़ि गेल गगन दुर्लभ सुगंध झड़ि गेल धरा मकरंद प्रीत सौन्दर्यक भूमि मरूभूमि भेल रमणीय देवसरि सुखा गेल कवि जिनगीकेँ ऊँच-नीचक कविता जकाँ देखलखिन्ह अर्थात विभिन्न भाव आ रससँ परिपूर्ण। कोनो एक रस आ भावमे रमनाइ ओ नै सिखलन्हि। संभवतः काल देवता स्वयं हुनकर कीर्तिक सोझाँ आबि गेलाह अन्यथा हुनकासँ कम सामर्थ्यक कविगण बेशी यश, पुरस्कार आ सम्मानक भागीदार बनलाह। ई अभिशाप कविक कम आ मैथिली आ भारतीय साहित्य आ आलोचनाक बेसी अछि। २ कृपा नन्द झा महासचिव, भारत अंतरराष्ट्रिय मैथिली परिषद मैथिलक जन नायक चुनचुन मिश्र (25/10/1942—16/11/2010) चुनचुन मिश्र ओ मुखियाजी  जीक 25/10/1942  केँ भारतक आजादीक सन्घर्षक गर्भसँ जन्म भेलनि। हुनकर जन्मक वर्ष हुनकर सम्पूर्ण जिनगीमे झलकैत रहल। ओ आजन्म मिथिला ओ मैथिलीक लेल संघर्षरत रहलाह। अपन जीवनक अन्तिम क्षण धरि ओ मिथिला राज्यक लेल संघर्ष करैत रहलाह। 16-11-2010 केँ 2 बजे प्रात: काल मिथिला  राज्यक सपना लेने  चुनचुन बाबू एहि दुनियाकेँ छोड़ि चलि गेलाह। चुनचुन बाबूक जन्म रहिका गाम, तहिया दरिभंगा जिला आ आब मधुबनी जिलामे भेलनि। हुनकर प्रारम्भिक शिक्षा रहिका एवं वाटशन स्कूल, मधुबनीमे भेलनि। ओ 1960 ई  वाटशन स्कूल, मधुबनीसँ मेट्रिक पास केलनि। ओकरा बाद आर. के. कॉलेजसँ 1966 मे स्नातक कएलनि। चुनचुन बाबूक विवाह 1960 ई मे श्रीमति प्रेमलता मिश्रक संग भेलनि। हुनका 4 पुत्र आ 3 पुत्री छथिन। सब पुत्र आ पुत्रीक विवाह दान भय गेल छनि। भरिघर नैत, नातिन, पोता आ पोती सब छैनि। निवर्तमान हुनक पत्नी रहिका मे परिवरक सन्ग रहिरहल छथि। समाजिक ओ राजननीतिक जीवन 1966 मे मिथिलाक महन सोसलीष्ट नेता बाबू सूर्य नरायण सिन्ह के सम्पर्क मे आबि सोसलीष्ट पर्टी के समर्पित कर्यकर्ता भय गेल छलाह्। 1978 ई मे ओ रहिका पन्चायत के मुखिया चुनल गेलाह्। पुन: ओकरा बाद 2001 में  मुखियाक चुनाव भेल जाहि में पुन: ओ मुखिया चुनल गेलाह्। 1980 ई में जखन मैथिली के दरकिनार करैत बिहार मे उर्दु के बढावा देल गेल त चुनचुन बबू मैथिली अन्दोलन में कुदि गेलाह्। 1992 मे जहन श्री लालू प्रसाद मैथिली के बी पी एस सी स निकालि देलखिन तखन मैथिली सेवी सब उग्र अन्दोलन कैलनि। ओहि में चुनचुन बाबू दिल्ली में आमरण अनसन पर बैसि गेलाह्। 2000 में मधुबनी में मैथिली के अष्टम शूची मे सामिल करवाक लेल आमरण अनशन पर पर 12  दिन तक रहलाह्। 1994 मे मिथिला राज्य सन्घर्ष समिति के उपाध्यक्ष मनोनीत भेलाह जकर अध्यक्ष डा जय कन्त मिश्र छलाह्। एहि संस्थाक संस्थापक सेहो डा जय कन्त मिश्र के नेत्रित्व मे अन्तरराष्ट्रिय मैथिली परिषदक अन्तर्गत भेल छल्। जय कन्त बाबुक निधन के बाद राज्य सन्घर्ष समिति के अध्यक्षक भार चुनचुन मिश्र के फ़रवरी 2010 में देल गेलनि। हुनकर नेत्रृत्व में  मधुबनी, दरिभंगा, मुजफ़्फ़रपुर, समसतीपुर, पटना आदि कतेको जगह मिथिला रज्यक निर्माणक लेल धरना प्रदर्शन भेल्। एकरा अलावा ओ नेपालक मैथिल मे सेहो क्रियासील रहलाह्। चुनचुन बबू जनकपुर, सिरहा, राजविराज, आदि मे सेहो मैथिली अन्दोलनकारी के मर्गदर्शक छलाह्। नेपाल मे हुनकर लोकप्रीयताक पता तखन चलल जखन हमरा ईमेल पर नेपालक 4-5 टा मुख्या अखबार मे छपल श्रद्दान्जलीक कटिंग आयल्। विचारधारा चुनचुन बबू के जीवन, सन्घर्ष करवाक तरिका ओ जुझारूपन में सोसलीज्म झलकैत रहल। एकटा आधा बाहि वाला कुर्ता, दू टा कपरा वाल गन्जी, एकटा गमछा आ एकटा धोती बस, सबटा एकटा झोरा मे। कोनो लाम काफ नहि। कोनो रिजर्वेशन के चिन्ता नहि। जेबी में पाई अछि की नहि तकरो चिन्ता नहि। कहब छलनि जहन समाजक काज कारैत छी त समाजे ने पूरा कर्तैक सबटा! ककरो डर नहिं। मधुबनी, दरिभंगा, मुजफ़्फ़रपुर बेगूसराय, भागलपुर, देवघर, जनकपुर, सिरहा, सुरसरि, कानपुर, बम्बई, दिल्ली, हैदराबाद आ कतय नहि, चुनचुन बाबू सबठाम्। आन्दोलन मैथिली के अष्ट्म सुचीक लेल हो, मिथिला राज्य के लेल हो, या सैराठ सभाक उत्थान के लेल चुनचुन बाबू के अगुआ बिना एखन धरि कोनो कार्य सम्भव नहि भेल छल्। दिल्ली मे हुनका देखितहि Intelligence ओ दिल्ली पुलीस सब कहनि, “आ गये मिथिला राज्य वाले”। 22-12-2009 क जन्त्तर मन्तर पर एकटा पुलीस कहलकनि “बाबा आप चौरहे से पीछे जा कर धरना पर बैठिये, यहाँ जाम लग जयेगा” चुनचुन बाबू कहल्थिन “कोनो हम पहुनाई करय आयल छियैक, हम त धरना पर आयल छियौक, बैसबौ त एहिठाम, हिम्मत छौ त पकरि क हमरा जहल में दय दे। ओहि समय मात्र 15-20 आदमी जमा भेल छलाह्। चुनचुन बाबू के 27/11/2010 के अन्तरराष्ट्रि मैथिली परिषद मैथिलक जन नायक के उपाधि स सम्मानित केलक्। हमर परिचय चुनचुन बाबू स हमर पहिल भेंट 2005 के अन्तरराष्ट्रि मैथिली परिषदक, जयपुर सम्मेलन में भेल छल्। तहिया स ओ हमरा लेल ओ आदर्नीय आ अनुकर्नीय मैथिली सेवी रहलाह्। आब ओ किछु दिन स अस्वस्थ रहैत छलाह्। 16-10-2010 क बेनीपट्टी क्षेत्र जयबा काल हुनकर अन्तिम दर्शण भेल आ तखनहु ओ स्वस्थ नहि छलाह मुदा कहलनि जे 2012 मे मिथिला राज्यक लेल पूरा दरभंगा मधुबनी जाम कय देबैक। ओ कहलनि जे दिसम्बर मे जन्त्तर मन्त्तर पर धरना पर बैसवाक लेल आबि रहल छी। पुन: भेंट होयत। हमरा नहि बूझल छल जे चुनचुन बाबू स पुन: भेंट नहि होयत। परन्तु एहि मैथिलीक सपूत के हम आजन्म नमन करैत रहब आ हुनकर मिथिला रज्याक सपना पुरा करब। माँ मैथिली अहाँके शान्ति दैथि चुनचुन बाबू। १शि‍वकुमार झा टि‍ल्‍लू- समीक्षा- सूर्यमुखी २.बिपिन झा- यान्त्रिक अनुवाद आ Polysemy- पछिला अंक सऽ आगू- ३. सुजित कुमार झा- कथा- भौजी १ शि‍वकुमार झा टि‍ल्‍लू समीक्षा सूर्यमुखी मैथि‍ली साहि‍त्‍यमे अंग्रेजी अथवा हि‍न्‍दी भाषा साहि‍त्‍य जकाँ पद्य वि‍धाकेँ कालक आधारपर रेखांकि‍त नै कएल गेल अछि‍। कि‍एक तँ छायावाद, हालावाद, रीति‍, क्रांति‍ आदि‍ वि‍षए मूलक पद्यक रचना हमरा सबहक वयनामे सभ युगक साहि‍त्‍यकार कऽ रहल छथि‍, कोनो वि‍शेष कालकेँ एकवादसँ जोड़ब उचि‍त आ प्रासंगि‍क नै। एतदर्थ पद्य वि‍धाक आत्‍मा जौं आशु कवि‍ता आ गीतकेँ मानल जाए तँ कि‍छु पद्य संग्रह मैथि‍ली साहि‍त्‍यकेँ भारतीय भाषाक प्रवर समूहमे स्‍थापि‍त करैत अछि‍ ओइमे यात्रीजी रचि‍त चि‍त्रा आ पत्रहीन नग्‍न गाछ, चंदा झा रचि‍त गीत सप्‍तसती, सीता राम झा रचि‍त उनटा बसात, भुवन कृत आषाढ़, मधुप कृत शतदल, उपेन्‍द्र ठाकुर मोहन कृत बाजि‍ उठल मुरली, सुरेन्‍द्र झा सुमन कृत पयस्‍वि‍नी, उपेन्‍द्रनाथ झा व्‍यास रचि‍त प्रतीक, अमर कृत गुदगुदी, गोपाल जी झा गोपेश कृत गुम्‍म भेल ठाढ़ छी, चन्‍द्रभानु सि‍ंह रचि‍त के ई गीत अलापि‍ छेँ, सोमदेव कृत कालध्‍वनी, नचि‍केता कृत कवि‍यो: वदन्‍ति‍, रवीन्‍द्र नाथ ठाकुर कृत रवीन्‍द्र पदावली, नवल कृत असमंजस, शेफालि‍का वर्मा रचि‍त मधुगन्‍धी वसात, श्‍यामादेवी रचि‍त कामना, इलारानी सि‍ंह रचि‍त वि‍न्‍दन्‍ती, मार्कण्देय प्रवासी रचि‍त एतदर्थ, कीर्ति नारायण मि‍श्र सि‍ंह कृत सीमान्‍त, सरस रचि‍त आंजुर भरि‍ सि‍ङरहार, कालीकान्‍त झा बूच जीक संकलि‍त पद्य संग्रह कलानि‍धि‍, राजदेव मंडल रचि‍त अम्‍बरा, ज्‍योति‍ चौधरी रचि‍त अर्चिस प्रमुख अछि‍। यात्री जीक दुनू पद्य संग्रहमे साम्‍यवादक धरातल चि‍क्कन चुनमुन आ उपेक्षि‍तक प्रति‍ वि‍शेष अनुलोम भाव प्रस्‍फुटि‍त भेल छै मुदा समग्र साहि‍त्‍यि‍क वि‍चार धाराकेँ जौं आधार मानल जाए तँ सर्वकालि‍क मैथि‍ली भाषा साहि‍त्‍यि‍क पद्य संग्रहमे सूर्यमुखी केँ सर्वश्रेष्‍ठ मानल जा सकैछ। एकर मुख्‍य कारण जे यात्री जीक रचनामे समाजमे साम्‍यवादकेँ मान्‍यता देबाक प्रयास तँ कएल गेल मुदा यात्रीजी असहज जीवनक मनोवृत्ति‍सँ कतहु-कतहु उद्वेलि‍त भऽ कऽ पलायनवादक पक्षधर भऽ जाइत छथि‍‍ हुनक मनोदशासँ ककरो कोनो द्वेष नै, समग्र मि‍थि‍ला यात्री जीक प्रति‍भाकेँ नमन करैत छन्‍हि‍ परंच रचनाकारकेँ अपन हृएयक व्‍यथाकेँ रचनापर प्रकट नै होमए देलासँ रचनाक स्‍तर कि‍छु बेसी मान्‍य भऽ जाइछ जकर प्रत्‍यक्ष प्रमाण आरसी प्र. सि‍ंह रचि‍त सूर्यमुखी अछि‍। यात्री भुवन, चंदा आ मधुपकेँ छोड़ि‍ कोनो मैथि‍ली साहि‍त्‍यकारक कवि‍ता आरसीबाबूक सूर्यमुखीक जड़ि‍ धरि‍ नै पहुँच सकल, डाढ़ि‍ आ पातकेँ छूबाक कल्‍पना सेहो असंभव अछि‍। सन् 1969सँ लऽ कऽ 1981ई. धरि‍क रचनाक संकलनमे 61 गोट पद्यक संग-संग 36 गोट लधुकवि‍ता संकलि‍त अछि‍। सन् 1984ई.मे सूर्यमुखी पद्य लेल आरसी प्र. सि‍ंहकेँ साहि‍त्‍य अकादमी पुरस्‍कारसँ सम्‍मानि‍त कएल गेल। रचनाक आरंभमे 22 पृष्‍ठक आरसी बाबूक शब्‍दमे लि‍खि‍त प्रवेशि‍का सन्नि‍हि‍त कएल गेल अि‍छ। एे प्रवेशि‍काकेँ आमुख वा भूमि‍का सेहो मानल जाए। कवि‍ताक परि‍भाषाकेँ आन अग्रणी साहि‍त्‍यसँ जोड़ि‍ कऽ जे बि‍म्‍ब तैयार कएल गेल ओकरासँ पाठककेँ काव्‍यधाराक प्रति‍ नि‍श्‍चि‍त रूपेँ नव आयाम भेटत। आरसी बाबू हि‍न्‍दी साहि‍त्‍यक प्रवीण कवि‍ छथि‍। कवि‍ सरोज भुवनेश्‍वर सि‍ंहक प्रेरणासँ आरसी मैथि‍ली साहि‍त्‍यमे पएर रखलनि‍। अपन पहि‍ल कवि‍ता शेफालि‍का'क रचना 1936ई.मे कएलनि‍। ओइकाल धरि‍ आरसी बाबूक दृष्‍टि‍कोणमे मैथि‍ली मात्र एकटा बोली छल मुदा भाषाक हृदएमे प्रवेश करि‍ते कृत-कृत्‍य भऽ गेलाह आ हि‍न्‍दी जकाँ अपन तृण-तृणमे देसि‍ल बयनाकेँ समाहि‍त कऽ लेलनि‍। शेफालि‍कामे आरसीकेँ सत्‍यक बोध भेटलनि‍ तँ रजनीगंधामे सौन्‍दर्य बोध। सूर्यमुखीमे साक्षात् मंगल मूर्तिक दर्शनसँ कवि‍ भाव वि‍भोर भेल छथि‍। सूर्यमुखी ऐ पोथीक पहि‍ल कवि‍ता अछि‍ कोनो एकटा कवि‍ताक शीर्षककेँ कवि‍ताक संग्रहक शीर्षक बनएबाक दृष्‍टि‍कोण कोनो पाठक लेल झाॅपल नै भऽ सकैछ। नि‍श्‍चि‍त रूपेँ आरसी सूर्यमुखीकेँ अपन प्रखर कवि‍त्‍वक आवरण मानैत छलथि‍। आदि‍त्‍य आ सूर्यमुखीक मध्‍यक संबंध वि‍चारणीय अपन सि‍नेही दि‍स मात्र देखबाक लेल सूर्यमुखी प्रेरणा स्‍त्रोत भऽ सकैछ। रीति‍ वा प्रीति‍क एहेन रूप मूक जीवे टा मे भेट सकैछ। साकार रहि‍तहुँ आरसीक जीवन ि‍नरंकार जकाँ छल। जलमे रहि‍तहुँ पुरनि‍पातक जकाँ परंच पुष्‍पसँ सि‍नेहकेँ सीख श्रंृगारक भान स्‍वाभावि‍क, कि‍एक तँ प्रकृति‍स्‍थ वस्‍तुमे पुष्‍पक सौन्‍दर्यसँ नि‍रंकुशोमे आसक्‍ति‍ पनपि‍ जएवाक संभावना भऽ सकैछ। सूर्यमुखी पद्यमे ऋृतुराजक अवाहान कालमे आन फूलक सौन्‍दर्यसँ सूर्यमुखीक तुलनामे परार्थ प्रेमक अनुभव अनुशासि‍त आ नि‍ष्‍ठासँ कएल गेल। वसंतक माधुर्य बेलामे पारि‍जातकेँ अमरत्‍व भेटल, हरसि‍ंगार ब्रह्मबेाला मे वसुन्‍धराकेँ स्‍पर्श कएलक, रजनीगंधा रैनक मादक मधुगंधी बसातकेँ आलोि‍कत कएलक। अभि‍सार पथक प्रशांत बनि‍ बेला मधुर मि‍लनक स्‍पर्श कएलक, संगहि‍ जूही आ चमेली सखी बहि‍नपा बनि‍ वसंतकेँ उन्‍मादि‍त कएलक। ऐ पावन परि‍णयकालमे उपेक्षि‍त रहि‍ गेली तँ मात्र- सूर्यमुखी। ऐ नवल वि‍म्‍बि‍त सि‍नेहक प्रदर्शन मैथि‍ली की सभटा भारतीय भाषामे वि‍रले देखैमे आबैत अछि‍। सूर्यमुखीकेँ भेटल मात्र तँ दि‍वाकरक प्रति‍ सि‍नेहि‍ल दृष्‍टि‍। जखन धरि‍ रवि‍ वसुन्‍धराकेँ देखैत छथि‍, तखन धरि‍ सूर्यमुखी हुनक परम समर्पिता प्रेमि‍का बनि‍ हुनके दि‍स तकैत छथि‍, रवि‍क, ज्‍योति‍ दुआरि‍ बन्न होइते सूर्यमुखीक नयन पट बन्न। सूर्यमुखी जकाँ जौं आदि‍त्‍यक कोनो आन सि‍नेही तँ ओ पंकज.....। वि‍रले आत्‍मा कोनो पंकजे सन उठबै छै माथा जन्‍म पंक मे लैत, सरोवर-सलि‍ल राशि‍ कऽ लंघन तोहर सन सौभाग्‍य ककर जे परम प्रकाश बनौलक उद्घाटन ले तोहर आनने अपन चेतना दर्पण प्रभात मे पुनीत प्रेमक झलकि‍ अरूणोदय कविता‍ मे भेटैत अछि‍। कोनो अनुभव मात्रक व्‍यथि‍त सि‍नेहसँ कवि‍क मन भीजल छन्‍हि‍ मुदा अदृश्‍य विद्युत धारक अनुभव मात्रसँ अपन सुधि‍-बुधि‍ बि‍सरि‍ गेल छथि‍। उगैत सूर्य केँ प्रणाम पद्यक शीर्षकसँ भान होइछ जे मात्र सकल साध्‍य पूर्णकेँ नमन करबाक चाही मुदा कवि‍ताक बि‍म्‍ब एकदम अलग लागल। प्रभातक लालि‍मासँ पहि‍ने जगबाक उद्घोष कऽ रहल छथि‍- आशुकवि‍। अपन स्‍वदेश भूमि‍केँ वैश्‍वि‍क मानचि‍त्रपर स्‍थापि‍त करवाक लेल ई कवि‍ता जागरण-गान जकाँ छै। चेतना तरंग मैथि‍ली साहि‍त्‍यमे लि‍खल गेल छाया गीत रूपक अनुभव करा रहल अछि‍। प्रकृति‍ सौन्‍दर्य बोधमे महुआक भंगि‍मा मि‍थि‍लाक बहुत रास संस्‍कार परम्‍पराक द्योतक थि‍क, तँए कोइली पपि‍हा आ चैतीकेँ चेतना तरंगसँ जोड़ब प्रासंगि‍क लागल। प्रात:कालमे हरसि‍ङार झड़ि‍ कऽ प्रभातकेँ अनुगामी बनबैत अछि‍, कवि‍क चंचल मन शरत ऋृतुक उषाकाल जकाँ आ प्राण हरसि‍ंगार बनि‍ गेल। रीति‍क नि‍शामे कवि‍ अपन नाआंे आ गाआंे सेहो बि‍सरि‍ गेल छथि‍ ऐ आशुगीतक अनुभव हरसि‍ंगार कवि‍तामे भेल सनातन पुरूष कवि‍तामे द्वैत आर्य संस्‍कृति‍केँ नील नदीक सभ्‍यतासँ जोड़ि‍ कवि‍ सत्‍य, अहि‍ंसा, करूणा, मैत्री आ सि‍नेहक पाठ प्रस्‍तुत करैत छथि‍। कोनो धर्म यथा-हि‍न्‍दू, इस्‍लाम, बौद्ध, इसाइ पंथक ि‍नर्वाह करैबला लोकक आचार ि‍वचार कतवो भि‍न्न हुअए मुदा हृदएक स्‍पन्‍दन आ रक्‍तक प्रवाह सरि‍ता सभमे सम अछि‍। सनातन पुरूष शीर्षक कवि‍ताक माध्‍यमसँ पाथरमे देवत्‍वक प्रवेश करएबाक प्रयास कएलनि‍। वर्षा उल्‍लास शीर्षक कवि‍तामे पावस ऋृतु कालक चराचर जीवनक रंग भावुक लागल। शस्‍य गान कृषि‍ प्रधान भारत भूमि‍क हरि‍यरी भरल वसुधाक वि‍प्‍लव चि‍त्रण करैछ। अखण्‍डता मे एकताक दृष्‍टि‍कोण हम एक छी शीर्षक कवि‍तामे देखएमे आएल परतंत्रताक कलुप अध्‍याय तँ सन् 1947ई.मे समाप्‍त भेल मुदा आर्शिक सामाजि‍क आ वैश्‍वि‍क दृष्‍टि‍सँ हमरा लोकनि‍क देश सन् 1962ई. धरि‍ पाछाँ रहल। चीन युद्धमे पराजयक कलंक लागल मुदा शनै: शनै: राष्‍ट्रीय एकताक रक्षा करैत हम सभ 1965मे एकटा पड़ोसी राष्‍ट्रकेँ धराशायी केलहुँ। तदुपरांत अन्‍तर्राष्‍ट्रीय परि‍दृष्‍यमे भारत भूमि‍क चर्च हुअए लागल। सन् 1969ई.मे आरसी बाबू ऐ दशापर हमर देश जागल कवि‍ताक रचना कएलनि‍। मुदा संगहि‍-संग कि‍छु व्‍यभि‍चारसँ कवि‍क मोन उद्वि‍ग्‍न छन्‍हि‍- जमाना क मोफि‍ल, जुआनीक नटुआ मगन भेल जनता हेरा गेल बटुआ घरक बेचि‍ कनि‍याँ लेलक कीनि‍ धनि‍याँ भगत भेल बनि‍याँ, जगत ज्ञान जागल हमर भाग जागल हमर देश जागल सन् 1972-73मे मि‍थि‍ला दर्शन, गोति‍या आ अॅजौर सन् पत्रि‍कामे ई काव्‍यगीत प्रकाशि‍त भेल आ लोकप्रि‍य सेहो भेल। एकर प्रमाण जे आरसी बाबूक कवि‍तासँ प्रेरि‍त भऽ कऽ काव्‍य जगतमे प्रवेश करएबला एकटा कवि‍ काली कान्‍त झा 'बूच', ऐ ऊपरि‍ लि‍खि‍त कवि‍ताकेँ पढ़ि‍ अपन प्रेरणास्‍त्रोतकेँ जागरण गान लि‍ख समर्पित कएलनि‍- असम बंग पंजाब गुजरात जागल अहीं टा पड़ल छी उठू औ अभागल। समाजमे जागृति‍ उत्‍पन्न करबाक लेल हि‍न्‍दी साहि‍त्यमे जे स्‍थान दि‍नकर नेपाली, सुभद्रा कुमारी चौहान आ महादेवी वर्मा सन कवि‍-कवयि‍त्रीकेँ देल गेल अछि‍ ठीक ओहि‍ना आरसी बाबूक कि‍छु कवि‍ता जेना जन-जागरण, राष्‍ट्र गीत, युवाशक्‍ति‍, राग भारू, हाक, नि‍बोधन, ललकारा, क्रांति‍पूत आदि‍केँ पढ़ि‍ मैथि‍ली साहि‍त्‍यक लेल हि‍नका देल जा सकैछ। मैथि‍ली मन्‍दि‍रमे शीर्षक कवि‍ताक माध्‍यमसँ वैदेहीक संग-संग वि‍देह आ मि‍थि‍लाक वन्‍दनामे मातृत्‍वक सि‍नेह अवि‍रल लागल। आन भाषा जकाँ मैथि‍ली साहि‍त्‍यक संग ई बि‍डम्‍वना रहल जे कवि‍ता सभमे अधि‍क ठाम रीति‍क आड़ि‍मे आसक्‍ति‍क रूप अवांछि‍त भेटैत अछि‍। सुमि‍त्रा नंदन पंत जकाँ मैथि‍लीमे नगण्‍य रीति‍ कवि‍ छथि‍- मानस मंदि‍र मे सती, प्रि‍य की प्रति‍मा थाप, जलती थी प्रि‍य वि‍रह मे बनी आरती आप। मुदा सूर्यमुखीक कि‍छु पद्य जेना आसंगि‍नी, मनोरथ, मनक बात शीर्षक कवि‍ता सभमे प्रीति‍क आकुलता आ लावण्‍य स्‍त्रोत कवि‍ पंतसँ कनेको कमतर नै। वि‍चार मूलक कवि‍ताक रचनामे आरसी बाबूक एकटा अलग स्‍थान छन्‍हि‍। सूर्यमुखीमे बहुरूपि‍या, वि‍भावना, आत्‍मज्‍योति‍, सत्‍यआस्‍वप्‍न, अछाह, जगजीवन, वि‍रोधाभास, मि‍थ्‍यापाथर, युगवोधक वि‍पति‍, अस्‍वीकृति‍क आयाम, आनंदक खुजल दुआरि‍ आ जीवन संध्‍या सन बहुआयामी वि‍चारमूलक कवि‍ताकेँ संकलि‍त कऽ पोथीक मर्यादा नि‍श्‍चि‍त रूपेँ बढ़ल। एक वस्‍तुकेँ प्राप्‍त करबाक आशमे कवि‍केँ कतेको बेर प्रयास करए पड़ैत छन्‍हि‍। क्षण भरि‍क तृप्‍ति‍क लेल सम्‍पूर्ण जीवनकेँ समाप्‍त कऽ देलनि‍। जकरा लेल लोक संसारक सुख-दुखकेँ कि‍छु नै बूझैत अछि‍ ओ कतऽ धरि‍ लोकक संग दैत छन्‍हि‍‍। बहुरूपि‍या शीर्षक कवि‍तामे समाजक द्वैध नीति‍क अनमोल प्रदर्शन कएल गेल। ऐ कवि‍तामे समाजक अन्‍तर्द्वन्‍दक मध्‍य वि‍षम अर्थनीति‍केँ छायावादि‍तासँ झाँपि‍ आरसीबाबू रचनाकेँ अमरत्‍व प्रदान कऽ देलनि‍- एक मंगल रूप मोहन रूप दोसर घोर एक ि‍नर्मम बनि‍ कनाओल एक पोछय नोर के एहन बहुरूपि‍या? के कऽ रहल अछि‍ खेल? जान ककरो जाए, उत्‍सव खेल ककरो लेल। वि‍चार मूलक कवि‍तामे दृष्‍टि‍क महत्‍व होइत छै, कि‍ओ एक रूप तँ दोसर आन रूपसँ देख सकैत छथि‍। उपरलि‍खि‍त पद्यकेँ बलि‍ प्रथा वा दोहरि‍ मानसि‍कता कोन रूपमे देखल जाए, एकर दृष्‍टान्‍त तँ आब असंभव......। साम्‍यवादी वएह भऽ सकैत छथि‍ जि‍नकामे व्‍यथा हुअए, ओ व्‍यथा अभावक हो वा संत्रासक मुदा जे मात्र कलमे टा मे नै, नि‍त्‍य कर्ममे समग्र संसारकेँ आत्‍म सात् करवाक शक्‍ति‍ रखैत होथि‍। आरसी बाबूक जीवन सरल छलनि‍ तँए समाजक ओछ होथि‍ वा उच्‍च सबहक मानसि‍कतामे अभावक दर्शन करैत छलाह। कतहु जीवन जीवाक लेल साधनक अभावक दर्शन होइत छलनि‍ तँ कतहु साधनक प्राप्‍ति‍क लगातार प्रयास करबाक क्रममे असंतोष दर्शन- डूबै अछि‍ देह मुइल सूर्यक प्रकाशमे, शीशा केर भीत छेद आबै अछि‍ पासमे अप्‍पन प्रति‍ वि‍म्‍व सँ अपनहि‍ टकराइ छी धुआँ जकाँ बन्न घर मे हम औनाइ छी हमरा सबहक लेल दुर्भाग्‍य अछि‍ जे मि‍थि‍लाक परि‍धि‍ कोशी, कमला, गंडकी, बागमती, बलान, करेह आ कि‍छु गंगा माएक हड़होरि‍सँ साओन मासमे तबाह हुअए प्रारंभ भऽ जाइत अछि‍। ऐ बाढ़ि‍क वि‍नाश लीलासँ मि‍थि‍लाकेँ प्राय: प्रति‍वर्ष भारी कलेषक सामना करए पड़ैत छन्‍हि‍। कवि‍वरक जन्‍म भूमि‍ समस्‍तीपुर जि‍लाक एरौत गाम बागमतीक कि‍छेरमे छन्‍हि‍ तँए ऐ वि‍षएपर लेखनी मूक कोना राखथि‍। बाढ़ि‍क हकरोस, सजल कुशल, वागमतीक धारमे आि‍द शीर्षक कवि‍ताक माध्‍यमसँ कवि‍ जीवनक नाओं कतऽ लागत केर उद्घोष करैत छथि‍। बाढ़ि‍ हकरोसमे जनजीवन परेशान भऽ जाइत अछि‍। मुदा एक अर्थमे बाढ़ि‍ समाजक एकताक प्रतीक सेहो थि‍क- एहन आपत्‍काल वि‍सरल वैरि‍यो अरि‍-भाव, साप मूसक मि‍लन देखल रंक भेटल राव। मात्र सभ जीवे टा एकत्रि‍त रहैत छथि‍, कि‍एक तँ सबहक साधन समाप्‍त भऽ जाइत छन्‍हि‍, प्राणकेँ तनमे रखवाक मात्र आशा तँए ककरोसँ कोनो द्वेष नै। ऐ वि‍षम परि‍स्‍थि‍ति‍मे आरसी बाबू बहुत बेरि‍ घेराएल छलथि‍, तँए राजधर्मसँ नि‍श्‍चि‍त रूपेँ अवगत भेल हेताह- खाली शुभकामनाक कोनो ने मानि‍, उपछऽ मे लागि‍ गेला हाथे सँ पानि‍ तर्पण मे भीड़ल छथि‍, जूटि‍ कऽ कि‍सान दाहर मे डूबि‍ गेल कुशलक सभ धान। एक दि‍श प्रलयक भयंकर लीला मुदा दोसर दि‍स हमरा सबहक भौति‍कवादी दृष्‍टि‍कोणक प्रवृति‍मे चार्वाक दर्शनक अनुपालन आवश्‍यक तँए कवि‍ मर्माहि‍त छथि‍ जे भोजनक अभाव मुदा अय्याशीक साधनक लेल लोक सभ उद्यत छथि‍- सान्‍त्‍वनाक हस्‍तलि‍खि‍त पोथी गलि‍ गेल, पान एक ढोली ले गोली चलि‍ गेल....। उछाह शीर्षक कवि‍तामे कवि‍ दु:खक सागरमे गोता तँ लगा रहल छथि‍ मुदा कॅपैत छन्‍हि‍ आत्‍मा जे संसारमे दु:ख मुदा कतऽ जाएब। अर्थावलम्‍वी संसारमे सभटा उनटा-पुनटा भऽ रहल अछि‍। वाचक चुप्‍प छथि‍ आ गोंग वाचाल बनवाक प्रयास कऽ रहल छथि‍। जगजीवन शीर्षक कवि‍तामे वि‍म्‍ब आ वि‍वेचन दुनू नीक मुदा ऐ कवि‍तासँ अपन जीवनकेँ नीरस मानएबला लोककेँ कोन प्रकारक चेतना भेटत? आरसीक अर्थ होइत अछि‍-दर्पण मुदा आरसी बाबूक ऐ कवि‍तासँ दार्शनि‍क केँ तँ अवश्‍य दर्शन भेटल मुदा अल्‍पज्ञ समाजकेँ मात्र छोह आ आकुलताक दर्शन भेटतनि‍ तँए ऐ कवि‍ताकेँ आरसी बाबू सन रचनाकारक अति‍साधारण प्रस्‍तुति‍ मानल जाए। वि‍रोधाभास शीर्षक कवि‍ता सेहो देशकालक दशासँ उबल मनुक्‍खक लेल कोनो अर्थमे प्रेरणास्‍त्रोत नै मानल जा सकैत अछि‍- कतहु चैन नहि‍ पाबइ छै नर, आशा तृष्‍णा शरसँ बेधल एक फांस सँऽ जखनहि‍ छूटल, दोसर मे तखने उद्बेगल। ज्ञान झाक वि‍योग शीर्षक कवि‍ता कोनो व्‍यक्‍ति‍ वि‍शेषकेँ ि‍नर्देशि‍त नै कए कऽ सरस्‍वतीक भंगि‍मामे जीवनक तादात्‍म्‍यकेँ झलकाबैत अछि‍। समए कालक दशापर वृति‍ चि‍त्र जकाँ लि‍खल गेल कवि‍तामे भ्रष्‍टाचार आ जाति‍ समाजक कुण्‍ठाक वि‍वरण प्रसंगि‍क मानल जा सकैछ। प्रेमक रूप जौं अनुशासि‍त हुअए तँ प्रेमी-प्रेमि‍काक चरि‍त्र आ वि‍चारकेँ नकारात्‍मक मानव उचि‍त नै। मैथि‍ली साहि‍त्‍यमे ऐ वि‍षएपर बहुत रास कवि‍ता लि‍खल गेल अि‍छ मुदा सूर्यमुखीमे सन्नि‍हि‍त रूप-राशि‍ कवि‍ताकेँ कि‍छु आर अनुशासि‍त पद्यक श्रेणीमे राखब उचि‍त। कवि‍क दृष्‍टि‍मे प्रेमि‍काक देह चानन जकाँ, कंठ मुरली सन, करतल कि‍सलय सन, रूप दर्पण सन, आँखि‍ कालि‍न्‍दी सन आ छाँह चुम्‍बक जकाँ लगैत छन्‍हि‍। कवि‍ प्रेमि‍काक गामकेँ वृन्‍दावन जकाँ आ जइठाम प्रेमि‍काक चरण पड़ैछ ओइ भूमि‍केँ गोकुल जकाँ पवि‍त्र मानैत छथि‍। वास्तवि‍क जीवनमे अारसी बाबू पवि‍त्र आचरणक व्‍यक्‍ति‍ छलाह तँए व्‍यक्‍ति‍गत जीवनमे भऽ सकैछ जे अपन अर्द्धांगि‍नीक प्रति‍ समर्पित कवि‍ता लि‍खने होथि‍ वा समाजक लेल प्रेम संदेश सेहो ऐ पद्यकेँ मानल जा सकैछ। राग लय आ गति‍मे महाकवि‍ वि‍द्यापति‍क पद्य सबहक कोनो तुलना नै भऽ सकैछ मुदा नीक लागल जे आरसी बाबूक दू गोट पद्य वि‍द्यापति‍क पदावलीमे सन्नि‍हि‍त गीत जकाँ सूर्यमुखीमे लि‍खल गेल अछि‍- हरि‍गीति‍का आ अनुराधा दुनू पद्य विद्यापति‍क रचनाक छाँह जकाँ लागल। अनुराधा तँ राग भैरवीमे महाकवि‍क लि‍खल बहुत रास कवि‍तासँ मि‍लैत अछि‍। मैथि‍ली साहि‍त्‍यमे गजल नाअों सँ तँ बहुत कवि‍क बहुत रास पद्य लि‍खल गेल अछि‍ मुदा जौं श्रंृगार रसकेँ सरावोरि‍ कऽ गजल वनएबाक चर्च कएल जाए तँ अारसी बाबू रचि‍त गुलाबी गजल केँ एकटा अलग स्‍थान देल जाए। गजलक पाँति‍-पाँति‍मे वि‍म्‍ब अलग-अलग होइत छैक। तँए परि‍धि‍ नि‍श्‍चि‍त नै। गुलाबी गजल पढ़लाक वाद ई भम्र दूर भऽ गेल जे एकटा प्रेमीकेँ अपन प्रेमि‍काकेँ समर्पित कएल गेल अछि‍। चूॅकि‍ कवि‍ अपन सि‍नेहीसँ अलग-अलग दि‍वसक रूप सरि‍ताक चर्च करैत छथि‍ तँए ऐ पद्यकेँ कोनो पति‍केँ अपन पत्नीक प्रति‍ परम सि‍नेह भरल उद्वोधन मानल जा सकैछ। वसंतक नहुँ-नहुँ शीतल वयारसँ प्रेमि‍का मोन आ अंग-अंग फूलल गुलाव जकाँ भऽ गेल अछि‍। वि‍नु ि‍नसा ग्रहन कएने कवि‍ उन्‍मत्त छथि‍, अपन प्रेमि‍का वा वामाक रूप फण बढ़ाएल सर्प जकाँ लहलहाइत देखाइत छन्‍हि‍। वास्‍तवमे फागुनक रंगसँ आरसी रंगा गेल छथि‍। 1981ई.क होली वि‍शेषांक (मि‍थि‍ला मि‍हि‍र) मे ई कवि‍ता छपल छल। कवि‍क मोन कहि‍ओ वृद्ध नै भऽ सकैत छै तँए ने कवि‍ अपन अर्द्धांगि‍नीसँ कहैत छथि‍- “कतहु ने जाउ भरि‍ फागुन हमरे लग रहू।‍” वास्‍तवमे आरसी बाबू ककरा मुखसँ कि‍नका प्रति‍ समर्पित ई गजल लि‍खलन्‍हि‍ ई प्रश्‍नवाचक चि‍न्ह रहि‍ गेल। मात्र एतवे मानल जाए जे सामाजि‍क जीवन आ पारि‍वारि‍क मर्यादासँ बान्‍हल आरसी गृहस्‍थ धर्मक कि‍छु रूपकेँ सदि‍खन अपन लेखनीसँ स्‍पर्श करैत रहलाह। कि‍छु पद्यक वि‍षएमे मैथि‍ली साहि‍त्‍यमे अखनो मतैक्‍य नै। ओइमे सँ एक- “वि‍रहमासा‍” अछि‍। सामान्‍य रचनाकार ऐ प्रकारक पद्यकेँ बारहमासा लि‍खैत छथि‍ आ वर्ख भरि‍क प्रेमि‍काक वि‍रहवेदनाक वर्णन करैत छथि‍। परंच वास्‍तवमे वारहमासा नै भऽ कऽ एहेन पद्य वि‍रहमासा थि‍क। वि‍रहि‍नी जतेक मास धरि‍ पति‍क वि‍योगमे ि‍वलग छथि‍ मात्र ततेक मासक चर्च कएल जाए। कवि‍ मधुपक वि‍रहमासा तँ कतहु पाॅच-छ: मास तँ कतहु वर्ष धरि‍ लि‍खल गेल। सूर्यमुखीमे देल गेल वि‍रहमासा काति‍कसँ लऽ कऽ आसि‍न धरि‍क प्रेमि‍काक वेदना थि‍क। शब्‍द-शब्‍दमे स्‍वत: मर्मस्‍पर्शी झंकार, मुदा एकटा कमजोर पक्ष जे वर्ख भरि‍क वेदनामे कार्ति‍कक पश्‍चात् अगहनक चर्च तँ कएल गेल मुदा तकरा बाद मूस माध लुप्‍त। फागुनक पश्‍चात् सोझे जेठ मासमे कवि‍ प्रवेश कऽ गेलनि‍। अषाढ़क चर्च आरसीक मोनेमे रहि‍ गेलनि‍। वि‍रहक सभसँ हि‍लकोरि‍ भरैबला मास भादवक ऐ पद्यमे कोनो प्रयोग नै कएलनि‍। तँए वि‍रहमासाकेँ पूर्ण नै मानल जा सकैत अछि‍। जौं मात्र छ: मासक चर्च करवाक छलनि‍ तँ लगातार करवाक चाही, सम्‍पूर्ण सालकेँ छ: मासमे समेटब उचि‍त नै लागल। कवि‍ कोनो राजनेता नै जे गरीवी भगेबाक योजना तैयार करथि‍ मुदा लेखनीसँ प्रगती शीर्षक पद्य लि‍ख गरीबी दूर करवाक कल्‍पना अनुखन लागल। वचनि‍का, उपराग, ि‍दलासा, मुइल सती, परि‍पाटी, ज्‍योति‍वरण, ललि‍त स्‍मृति‍, ऋृतुराज दर्शन, असीम आहवान, अर्थीक अर्थ, संक्रान्‍ति‍ आदि‍ कवि‍ताक माध्‍यमसँ ई ज्ञात होइत अछि‍ जे कवि‍ आरसी कोनो योजना बना कऽ कवि‍ता नै लि‍खैत छलाह, कवि‍त्‍वक संचार हि‍नक कण-कणमे व्‍याप्‍त छलनि‍ यएह कारण जे आधुनि‍क मैथि‍लीक सर्वश्रेष्‍ठ आशुकवि‍क श्रेणीमे आरसीक स्‍थान वि‍लक्षण मानल जाए। आरसी वीसम सदीमे रहि‍तहुँ भूतकालमे प्रवेश कऽ कखनो-कखनो कवि‍ता लि‍खैत छलाह, जकर प्रत्‍यक्ष प्रमाण दोहा दोहन कवि‍ता थि‍क। जइमे 12 गोट दोहा लि‍खल गेल अछि‍। कवीर, रहीम जकाँ समए कालक दोहा सभमे वर्त्तमान कालक कलुषि‍‍त मनोवृत्ति‍क वि‍वि‍ध रूप चि‍त्रण ऐ सभमे भेटैत अछि‍- पोथी पढ़ि‍ कि‍छु हैत ने, तोड़ऽ चाही रोट, जोड़ू नोट बकोटि‍ कऽ भोट बटोरू मोट अस्‍पताल सँ नीक अछि‍ हमरा लगै पताल कालक ओतऽ अकाल अछि‍ काल एतऽ तत्‍काल। दीपक दर्प आ नव पढ़ुआक संग-संग 36 गोट मुक्‍त मुक्‍तावली सभमे कवि‍ताक वि‍वि‍ध धाराक ऑचलमे कवि‍ समाजक लेल कि‍छु नव आ वहुआयामी दृष्‍टि‍कोण उत्‍पन्न करए चाहैत छथि‍। कखनो कवि‍ बाढ़ि‍क पसाहीमे पानि‍सँ तबाह छथि‍ तँ लघुकवि‍ता पानि‍ मे जल-महि‍मा क गुणगान करैत छथि‍- पानि‍ वि‍ना नहि‍ धानक जीवन, मोतीक रूप न पानि‍ बि‍ना पानि‍ वि‍ना नहि‍ चूनक रौनक शोभि‍त भूप न पानि‍ बि‍ना......।। एवं प्रकारे आरसीक सूर्यमुखी मात्र सूर्येटा केँ नै दर्शन करैत छन्‍हि‍, अइमे सम्‍पूर्ण मानवताक लेल वि‍वि‍ध वि‍षएक दृष्‍टि‍ समाहि‍त अछि‍। मैथि‍लीक लेल दुर्भाग्‍य जे जनि‍क कवि‍ताक अर्थ कि‍ओ नै बूझए ओ मंचपर ज्ञानक शेखी छॅटैत छथि‍, आ आरसी सन आशुकवि‍केँ अखन धरि‍क कथाकथि‍त ि‍कछु समाज जेना-तेना कवि‍ स्‍वीकार कएलकनि‍। वास्‍तवमे जौं दृष्‍टि‍केँ हृदएसँ जोड़ि‍ सूर्यमुखी पढ़ल जाए तँ स्‍पष्‍ट भऽ सकैत अछि‍ जे ई मैथि‍लीक सर्वश्रेष्‍ठ कवि‍ता संग्रह थि‍क। पोथीक नाआंे- सूर्यमुखी प्रकाशक- मैथि‍ली अकादमी पटना प्रकाशन वर्ष- 1981 रचनाकार- आरसी प्रसाद सि‍ंह २ बिपिन झा- यान्त्रिक अनुवाद आ Polysemy यान्त्रिक अनुवाद आ Polysemy बिपिन झा IIT Mumbai, kumarvipin.jha@gmail.com पछिला अंक सऽ आगू- पोलीसेमी अर्थात नानार्थी मूलतः निओ  लैटीन “पोलीसेमस” सऽ लेल गेल अछि। ‘पोली’ क अर्थ होइत अछि बहुत आ ‘सेमी’ केर अर्थ होइत अछि चिह्न। एवम्प्रकारें पोलीसेमी नानार्थक शब्द कें द्योतित करैत अछि। उदाहरण हेतु ई वाक्य कें देखू- आब साँझ भय गेल। एहि में साँझ पद विभिन्न सन्दर्भ में विभिन्न अर्थ दैत अछि ·         चरवाहा सभ लेल ’मालजाल के गोशाला लय जेबाक बेर’ ·         विद्यार्थी हेतु ’पढबाक समय’ ·         चोर हेतु ’चोरी करबाक समय’ ·         दीपदेनहारि के ’दीप देबाक समय’ एहि तरहे अनेक शब्द एहि तरहक अछि जेकर भिन्न-भिन्न अर्थ होइत छैक। ई  नानार्थकता मानवमात्र के अर्थनिर्धारण में परेशानी कय दैत छैक। किन्तु मानवीय ज्ञानसीमा  केर कारण एकर निराकरण भय जाइत छैक। ओतहि संगणक हेतु त ई विशेष परेशानी उत्पन्न करैत छैक। एकर उदाहरण गूगल केर यान्त्रिक अनुवाद क्रम में देखि सकैत छी। आब प्रश्न अछि जे एकर समाधान की अछि? एहि सन्दर्भ में अनेकानेक प्रयास भेल जाहि में  Bar-Hillel (1964), Katz एवं Fodor (1963) आदि केर प्रयास महनीय रहल। Katz एवं Fodor केर निबन्ध 'A Theory of Semantic interpretation' केर योगदान महत्त्वपूर्ण रहल।  Kelly and Stone (1975) १९७० धरि अपन ३० टा शिष्यक संग ६७१ टा शब्द के चयन कय अलगोरिद्म तैयार कयलथि। नानार्थी शब्दक झंझट सं मुक्त हेबाक एकटा उपाय ई भय सकैत अछि जे- नानार्थी शब्दक सूची बनय ओकर विविध अर्थ देलजाय एकटा प्रोग्राम बनय जे नानार्थी के चिह्नित कय सकय संगहि विविध अर्थ देखा सकय एहेन अल्गोरिद्म बनय जे यथासम्भव ई समस्या दूर कय सकय आशा अछि जे उक्त प्रक्रिया लाभदायक होयत। यदि पाठकवर्ग के कोनो अन्य विचार हो एहि समस्या केर समाधानक त अवश्य सूचित करथि। (लेखक एहि विषय पर IIT Bombay मे अनुसंधान कय रहल छथि) ३ सुजित कुमार झा कथा भौजी

सार्वजनिक पुस्तकालयक बोर्डपर नजरि पड़िते राधाक हृदयक गति एना भऽ गेलन्हि, जेना कोनो मशीनक ईन्जिन चलैत होइ । ओ डेरायले नजरिसँ भौजीकेँ देखलन्हि । राधाकेँ डर रहन्हि, कहीं हृदयक धक—धकी भौजी नहि सूनि लैथ । राधा पुरा एक महिनाकेँ बाद आइ पुस्तकालय आयल छली । आईएस्सी परीक्षाक तैयारीमे व्यस्त भेलाक कारण मास दिन पुस्तकालय नहि आबि सकल छली । काल्हि परीक्षा समाप्त भऽ चुकल छल । भौजीकेँ आदेश रहन्हि जाधरि परीक्षा समाप्त नहि हैत ताधरि पढाÞइक अतिरिक्त किछु नहि । राधा सेहो पढाÞइकेँ प्रति पुरे समर्पित रहयकेँ प्रयत्न कएली । मुदा मन तैयो बेर—बेर पुस्कालयकेँ लग—पास मडराइत रहैत छलन्हि । राधा देखलन्हि, भौजीकेँ चालिमे थोड़ेक गति आएल अछि । मुदा ओ जानि बुझि कऽ ओही गतिमे चलैत रहली, जाहिसँ भौजीसँ थोड़ेक पाछु रही आ मौका भेटिते एक नजरि—हुनका देखली, जकरा लेल ओ मास दिनसँ प्रतिक्षा करैत रहल छली । हुनका विश्वास छलन्हि, ओ आइयो ओही गाछ तर नयन बिछौने हुनकर प्रतिक्षामे ठाढ़ हैत । ताहि विश्वासँ मनक सितार झन झना रहल छल । मुदा गाछपर नजरि पड़िते हृदयक रोमाञ्च करपूरक गोटी जेकाँ उड़ि गेल आ मनमे कतेको आशंका आ बिचार हिलोरि मारय लगलन्हि । ओ ओतय नहि छल । किए ? भऽ सकैत अछि एक महिनासँ राधाकँे नहि अएलासँ हुनका प्रति निराश भऽ गेल होइक । इहो भऽ सकैत अछि की कही विमार भऽ गेल होइ । ६ महिना पहिने भौजी एहि पुस्कालयकेँ सदस्यता लेने छली आ तहियेसँ राधा सेहो भौजीसं पुस्तकालयमे आवय लागल छली । एक दिन ओ युवक अहि गाछक निचा ठाढ़ देखाइ देने छल । आ ताहिकँे बाद तऽ दिनचर्या बनि गेल छलै । आकर्षक व्यक्तित्वक धनी ओ पहिले नजरिमे राधाकेँ प्रभावित कएने छल । मौन प्रेमक प्रस्ताव राधाकेँ हृदयमे बैस गेल छल ओ युवक । राधा आ भौजीकेँ संगे—संगे देखि ओ थोड़े संकुचित भऽ चोर दृष्टिसँ क्रमशः राधा आ भौजीकेँ देखैत रहैत छल जे कखनो राधाक नजरि पड़ि जाइत तऽ ओ युवक अपन दुष्टि दोसर दिश घुमालैत छल । एक महिनासँ ओहि युवककेँ देखबाक कौतुहलता आ ओकरा भेटाबाक विश्वास, मुदा सुनसान ठाढ़ ओहि गाछकेँ देख असहय पीडाÞ भेल राधाकँे । आइ ओकरा ओतय नहि होएब राधाकेँ लेल कोनो आघात सँ कम नहि छल । हृदयक टीस आँखिमे नोर बनि छलछलाय लागल रहैक मुदा ओहि नोरकेँ पिव कहुना अपना पर काबु कएलन्हि आ अपन बेदनाकँे उजागर नहि होबय देलैथ । सहज होबएकँे कोशिस करैत भौजीकँे पाछु–पाछु पुस्तकालयमे प्रवेश कऽ गेली । भौजी पुस्तक फिर्ता कऽ अलमारीमेसँ दोसर पुस्तक खोजय लगालथि । राधा सेहो पुस्तक खोजवाक अभिनय करय लगली, मुदा हुनक मनोभाव त.....। ‘राधा, राजकमल, गोविन्द झा, रामानन्द रेणुकेँ सम्पूर्ण किताब हम पढि चुकलौ आब डा. धीरेन्द्रकेँ पढबाक इच्छा अछि’ भौजी डा. धीरेन्द्रकेँ कविता संग्रह ‘हैगरमे टांगल कोट’ केँ अपन हातमे उलटबैत कहली तऽ राधा चुप भऽ एक मौन स्वीकृति दऽ देली । ‘अहाँ डा. धीरेन्द्रकँे पढ़ि रहल छी ?’ अनायसे एक अपरिचित युवककेँ स्वर सुनि राधा आ भौजी एक्कहि संग पाछा घूमि देखलथि तऽ राधाकँे आश्चर्य आ रोमाञ्च एक्कहि सँग झक्झोरि देलकन्हि आ अपलक ओ देखिते रहि गेली । हाथमे पुस्तक लेने उएहे युवक ठाढ़ छल । ‘ई लऽ लिअ, डा. धीरेन्द्रकँे उपन्यास छन्हि, ‘भोरुकवा’ विद्वान सभक कहव छैक एकरा जतेक बेर पढू ततेक नव बात भेटत’ ओ बाजल । आगा भौजी ठाड़ रहथि तएँ भौजीए ओ पुस्तक हुनका हाथ सँ लेलन्हि । राधा अपन प्रसन्नता नुकेवाकमे जेना असमर्थ भऽ रहल छली, अपनाकँे सामान्य करबाक हेतु भौजीकँे हाथसँ ‘भोरुकवा’ कितावकँे झपटि लेली आ बहुत तेजीसँ पन्न उल्टाबैत अपन मनोभाव कँे रोकबाक प्रयास करय लगली । तखने हुनक नजरि एक मोडल कागतपर पड़लन्हि जे पुस्तककेँ भितरमे छल ओ नजरि उठा कऽ युवक दिश देखली, मुदा युवक तऽ पुस्तकालयसँ बाहर जाइत छल । भौजी पुस्तक राधाकँे हाथसँ लऽ ओकरा अपना नामसँ जारी करबा लेली । घर घुरैत काल राधा अपन भितरमे एक प्रकारक घवराहट अनुभव करैत रहली । हुनका विश्वास छलन्हि, पुस्तक भित्तर राखल ओ मोड़ल कागतमे हुनका लेल कोनो संदेश छिपल छल । हुनका भय रहन्हि यदि तेजतर्रार भौजी ओकरा देख लेती तऽ की हैत ? ओना राधा पर आंच आएबाक कोनो संभावना नहि छल । हुनका विश्वास छलन्हि की ओइ पर हुनका लेल कोनो सम्बोधन नहि हैत कारण ओ युवककेँ राधाक नामो नहि बुझल छन्हि । यदि भौजी ओइ कागजकेँ देखबो करती तऽ सन्देहकेँ तऽ कोनो प्रश्ने नहि अछि । राधाक मोन तऽ इएह चाहि रहल छल, की भौजीकेँे हाथसँ पुस्तक ली, मुदा हुनका इहो सोचि भय भऽ रहल छल की यदि भौजीकेँ सन्देह भऽ गेलैन्हि की ? ओ धीरेसँ भौजी दिस देखली, जे पुस्तककँे दहिना हाथमे धएने राधाकँे सोचसँ बेखबर आगा बढि रहल छली । घर पहुँचला पर राधा आओर बेसी व्यग्र भऽ गेल छली । सोचि रहल छली जे कोनो तरहे पुस्तक हाथ लागि जाय तऽ पता चलत हुनक सोच सही छैक वा मात्र भ्रम भऽ गेल अछि । भौजी कँे प्रकृति कनी गम्भीर छन्हि आ ओ अपन प्रत्येक क्रियाकलापकेँ सीमा तय कऽ कऽ रखने छथि, जेकरा ओ नहि स्वंय उल्लंघन करैत छथि आ नहि केकरो द्वारा कएलगेल सहन करैत छथि । आवश्यकता सँ वेसी हँसी मजाक हुनका कनिको पसिन नहि छन्हि । ओना इ नहि छैक जे हुनकामे इ परिवर्तन भैऐकँे मरलाक बाद एलन्हि अछि । ओ पहिनहि सँ एहने छथि । विवाहक २ महिनाकँे बाद भैयाक मोन खराब भेल रहन्हि । भैयाकेँ दिन—दिन देह गलल जाए लगलन्हि । धरान लऽ जाए पड़लन्हि, ओतय डाक्टर कहलन्हि, ‘ब्लड क्यान्सर भऽ गेल छैक ।’ जाहिया तक भैया जिवित रहलाह भौजी सदैव इएह प्रयास कएलन्हि, की हुनकर जीवनमे कोनो प्रकारक अभाव नहि रहैक । भैयाकँे रेखदेख ओ स्वंय करथि । साँझखन भैयाकेँ घुमाबय लजाथि । पहिने—पहिने तऽ भैया पैदले चलथि, मुदा किछुए दिनक बाद आशक्त भऽ गेलापर भौजी हुनका ब्हील चेयर पर लऽ जायकँे शुरु कऽ देलन्हि । भौजी भैयाकेँ सन्तुष्टीकँे लेल हरेक समय मुस्कुराइत रहैत छली मधुर आ स्नेहिल शब्दकँे वर्षा कऽ हुनकर पीडाÞकँे हरि लेवाक लेल प्रयास करथि । राधा अपन माय बावुकेँ संगे स्तब्ध भऽ ओ सशक्त महिलाकेँ तकैत रहि जाइथि जे दुःखक अथाह समुद्रकँे सामने पाबि कऽ सेहो भैयाक हेतु मुसकुराइत आगा बढि रहल छली । मुदा भैयाक शरीरसँ प्राण निकलिते भौजी पस्त भऽ गेली । दुःखक असीम पीड़ा सँ छटपटाइत भौजीकेँ सम्हारयमे सभ असमर्थ भऽ रहल छल । कनैत कनैत अन्ततः भौजी बेहोस भऽ गेल छली । भैयाक मरलाक बाद भौजीकँे बाबु भऽ गेल रहथिन बाबुजी, ससुर नहि । ओ अपन कमजोर कन्हा पर भौजीकेँ जिम्मेवारी उठा लेलन्हि । बड़का भैया आ भौजी जे काठमाण्डूमे रहैछथि, ओ बाबुजीकँे आगा प्रस्ताव राखने रहथिन की ओ, भौजीकँे अपनासंग लऽ जाऽ चाहैत छथि मुदा बाबुजी साफ—साफ मना कऽ देने रहथि । हुनका लेल राधा आ पुतौहुमे कोनो अन्तर नहि छल । भौजीक वेदना कम करबाक उद्देश्यसँ बाबजुजी भौजीकँे पुस्तकसँ मित्रता करबाक सल्लाह देने रहथिन्ह । ‘बेटी पुस्तकसँ बढिया आओर कोनो मित्र नहि भऽ सकैत अछि । ओइमे हरेक समस्याकँे निकास सेहो भेटि सकैत अछि । पुस्तकसँ जतय हमरा संकटसँ जुझयकेँ प्रेरणा मिलैत अछि, ओतहि ओहिमे हरेक समस्याकेँ समाधान सेहो भेटैत अछि । मन उदास अछि तऽ व्यङ्ग रस पढि ली, किछुवे देरमे हँसयकेँ लेल विवस भऽ जायव । यदि पुस्तक सँ प्रेम भऽ जाय तऽ जीवय असान भऽ जाएत ।’ बाबुजीक उपदेश भौजीकँे पुस्तक प्रेमी बना देलकन्हि । भौजी सार्वजनिक पुस्तकालयकँे सदस्यता लऽ लेली हुनकेँ संगे रहि कऽ राधामे सेहो पढयÞकँे शौख जागि गेलन्हि आ ओ सेहो पुस्तकालय जाय लगली । भौजी कहियो कोनो पुस्तक पढ़य सँ अकछाइत नहि छली बरु, जे पुस्तक पढय शुरु करैत छली ओकर एके बैसारमे पढ़ि जाइत छली । बाबुजी तऽ किताबी कीडा छलथि । अई दुआरे भौजी बाबुजीसँ ओइ पुस्तकपर विशेष रुपसँ परिचर्चा करैत छली । कहियो ओ लेखककँे दूरदर्शिता पर अचम्भित भऽ कऽ ओकर लेखन शैलीकँे सराहना करैत तऽ कहियो लेखककँे विचारसँ कुंठित भऽ ओकर तीव्र आलोचना करथि । घरमे भौजीकँे बेसीसँ बेसी ध्यान राखल जाइक । भौजी स्वयं कहियो अपन साउस, ससुर वा राधाकँे भावनाकँे अपमान नहि कएने छली । घरक पुरा जिम्मेवारी उठा रखने छली । कहियो माँ भौजीकँे कर्तव्यनिष्ठासँ गौरवान्वित होइथि तऽ कहियो हुनकर उज्जर आँचरकेँ देखि चुपचाप नोर बहालैत छली । राधाकेँं एतेक साहस नहि छलन्हि की ओ भौजीसँ मजाक कऽ ली अन्यथा ओ अवश्य ओहि पुस्तककेँ छिन लितथि ताकि कोनो तरहे ओइ कागतकेँ पुस्तकमेसँ निकालि एकान्तमे पढि आश्वस्त भऽ सकती । एखन ओना किछु करव सम्भव नहि छल । राधा बरन्डामे चलि अएलि । माँ आ बाबुजी बड़का भइयाकेँ ८ वर्षीय पुत्रकँे लेवय काठमाण्डू गेल छलथि । भौजीकँे बच्चासँ बहुत लगाव रहैत छलन्हि । ताहि दुआरे ओ सदैव छुट्टी शुरु होइते माँ बाबुजीसँ आग्रह करैत की ओ काठमाण्डू जाथि आ बड़का भइयाकँे बच्चाकँे लऽ कऽ आबथि अहि सँ बेसी किछु नहि । भौजीकँे इच्छा रखबाक हेतु माँ बाबुजी काठमाण्डू गेल रहथि । ‘राधा’, अचानक भौजीकेँ अवाज सुनि कऽ राधा चौक पड़ली । अहि पुस्तककेँ हम पढि लेने छी अहाँ, चाही तऽ पढि सकैत छी’ भौजी बरन्डामे राखल टेबुलपर पुस्तक रखथि कहलथि, आ तेजीसँ भितर घुमि गेलथि । ‘भोरुकवा’ कँे पुनः अपन समिप पावि राधाकँे हृदयक धडकन कँे गती बढैत चलि गेल । ओ झपटि कऽ पुस्तककँे उठा लेली आ तेजीसँ पन्नाकँे उलटावय शुरु कऽ देली, किताबक बिचमे मोडल राखल कागज ओहिना नजरि आएल । राधा ओकरा खोलि पढ़य लगली । हुनकर अनुमान सही छल । ओ प्रेम पत्रे छल आ सम्बोधन सेहो मोहक आ आश्चर्यजनक छल । ‘सुनु’ । हम काल्हि साँझ ६ बजे रंगभूमि मैदानमे अहाँकँे प्रतिक्षा करब । आशा अछि, अहाँ अवश्य आएब । राजन । राधा क्षणभरिकँे लेल ओइ पत्रकँे अपन छातीसँ लगा लेली । फेर ओइपत्रकँे निचा लिखल नामकेँ चुप्पेसँ चुमलाक बाद मनकेँ कठोर करैत पत्रकेँ टुकरा टुकरा करैत सड़क पर फेक देली । ओहि राति भावना आ विचारक बीच उड़ान भरैत रहली राधा, आँखिसँ निन्न पुरा हेरा गेल रहन्हि । दोसर दिन साँझ ६ बजे, रंगभूमि मैदान जायब उचित हैत की नहि, जाएब तऽ की कहबै, ओ की कहता । कखनो माँ, बाबुजी आ भौजीकँे की कहवै एहने सोचमे ओ क्षणभरि कँे लेल सेहो नहि सुति सकली । यदि गेलौ तऽ भऽ सकैत अछि राजन हुनका एक अवारा लड़की सम्झय लागय जे एकबेर बजविते भागिते चलि अबैत अछि आ यदि नहि गेलौ तऽ सम्झय नहि लगथि जे राधाकँे हुनका कोनो लगावे नहि छन्हि आ ओ अपना लेल कोनो.....। राजन विना किछु कहने राधाकेँ हृदयमे अपन स्थान बना लेने छल । वितल कए महिनासँ राधा अपन अन्तर मनमे राजनकँे लेल एक निश्छल स्नेहकँे अनुभुति कऽ रहल छली । राजन अपन प्रतिक्षा सँ ई सिद्ध कऽ देने छल, की राधा हुनका लेल बहुत महत्व रखैत होइ आ ओहीक परिणाम छल हुनक प्रति सम्वेदनशील रहयबाली राधाकँे हृदय राजनकेँ पक्षमे निर्णय लेलक । राजनसँ भेटबाक निर्णय लेलाक बाद राधाकँे किछु शान्ति भेटलन्हि, मुदा रंगभूमि मैदान तक जायकँे लेल भौजीकेँ आदेश आवश्यक छल । पता नहि भौजी मानती वा नहि, फेर कही खिसिया कऽ मना नहि कऽ दैथ । माँ काठमाण्डू गेल छली नहि तऽ राधा माँ सँ कोनो ने कोनो तरहे जायकेँ आदेश मांगि लितथि, मुदा की अनुशासन प्रिय आ अपन जिवन शैलीकँे शालिनताक भितर बान्हि कऽ राखयवाली भौजी अहि तरहे हुनका कोनो युवक सँ भेटवाक आदेश देती ? दुपहरियामे खायकेँ टेबुलपर भौजीकेँ संगै बैसैत राधा ई निर्णय लेली की भौजीकँे निसंकोच अपन मनक बात बतादेती आ यदि भौजी तमसा जेती तऽ तत्काल अपन गल्तीकेँ लेल क्षमा सेहो मांगि लेती । भौजीकेँ बतौने विना जायब संभव नहि छल । अतः ओ भौजीसँ आदेश लेवयकेँ लेल उचित शब्द खोजिए कऽ रहल छली की अनायसे भौजी पुछि बैसली ‘राधा, अहाँसँ किछु पुछय चाहैत छी ?’ ‘जी भौजी’ ‘अहाँ ओ पुस्तक भितर लिखल पत्रकँे पढ़लियै अछि ?’ जी, राधा ई जान्हि कऽ चौंक गोली की भौजी सेहो पत्रकँे पढि लेने छली । जी हँ, ओ डराइते उत्तर देली । ‘अहाँकेँ नजरिमे राजन केहन छथि ?’ जी, राधा पुनः चौंक गेली आ थरथराइते स्वरमे मात्र एतवे कहि सकली ‘ठीके छैक ।’ फेर तऽ अहाँकेँ नजरिमे कोनो खरावी छैक राधा ? नइ—नइ ठिक नहि बहुत निक छैक, कहि राधाकँे मुँहसँ ई शब्द सुनि भौजीकँे चेहरा... आ राधा सेहो... पहिने कहियो भौजी आ राधा एहन विषय पर चर्चा नहि कएने छली, इएह कारण छलैक जे दूनुकँे चेहरापर संकोच आ लज्जाकँे एक्के तरहक भाव छल आ राधाकँे हालत तऽ एहन छलन्हि जे ओ माथ झुका कऽ बैसयकेँ लेल विवश छली । भौजीकेँ चेहराकँे ध्यानसँ देख कऽ, हुनकर मनोभावकेँ सही अन्दाज लगायबमे असमर्थ भऽ रल छली । ‘किछु दिन अहाँ पुस्तकलय नहि अएलौ, तखन ओ हमरा सँ गप्पो कएने रहथि । हुनकर गप्पसँ ओ भ्रद आ बुद्धिमान छथि से बुझाएल । जी, राधा चुपचाप सुनैत रहली । राधा, आइ अहाँ रंगभूमि चलि जाउ ।’ जी.., राधाकँे विश्वास नहि भऽ रहल छल, जे भौजी एतेक सहजतापूर्वक जाए देती । हँ, राधा, हम अपना हिसाबे हुनका परखि लेने छी मुदा अहाँक राय सेहो बहुत आवश्यक अछि । अहि विषय पर बाबुजीसँ अहीकेँ बात करय परत । ओना अहाँ हुनको सेहे कहबन्हि जे जल्दीबाजी मे निर्णय नहि लैथ । खुब सोचि बिचारि कऽ निर्णय लैथ । अपना घरक लोकसँ सेहो गप्प कऽ लैथ एना नइ होइ जे......। जी’ राधा माथ झुकौने भौजीकेँ बात सुनि रहल छली । हम जनैत छी राधा की अहिकेँ ई सभ बड़ उटपटांग लगैत हैत । हँ की नहि ? हम स्वाभिमानी, कर्तव्यनिष्ट आ शालिन तऽ छी, मुदा रुढीबादी नहि छी । हमरा लगैत अछि प्रत्येक महिलाकेँ अपन जिवन पर पूरा अधिकार होइत छैक । रुढीवादी परम्पराकेँ चादरि ओढि कुहरैत पुरा जिवन जिवाक की औचित्य ? तएँ अहाँ हुनका परखु आ यदि अहाँकँे ओ बढियाँ लगाथि तऽ विना संकोच विना हिचाकिचाहट अहि विषयपर माँ आ बाबुजीसँ बात करब । सभ बात अहिकेँ करबाक अछि कहि कऽ भौजी अपना रुम दिस चलि गेली । राधाकँे मोन खुशी सँ नाचय लागल । भौजी हुनका पसिनक बात कहि हुनकर मनोवलकँे आओर बढा देने रहथि । आब भौजीकँे आदेशानुसार हुनका परखयकँे मात्र छलन्हि । साँझ खन राधा निर्धारित समय सँ किछु पहिने तैयार भऽ रंगभूमि पहँुच गेली मुदा ओहु सँ पहिने राजन रंगभूमि मे बेचैनी पूर्वक इम्हर ओम्हर घूमि रहल छल, देख कऽ राधा एकटा गाछक पाछा नुका गेली आ हुनका देखय लगली । कढ़ाहिदार कुर्ता आ पाइजामा पहिरने आन दिनसँ बेसी आकर्षक लागि रहल छल । हुनकर नजरि प्रतिक्षासँ व्यग्र चारुभर ताकि रहल छल । कायबेर घुमिते–घुमिते ओ रुकि गेला । झुकि कऽ जमिनसँ एकटा दूभि उपर उखारि लैथ आ ओकरा धीरेसँ कनि दाँतमे दबालथि आ घुमा कऽ हाथमे नचावय लगथि आ फेर वएह प्रतिक्षा..... । इ उपक्रमकँे कतेको बेर चलैत देखलाक बाद अपन भावनाकँे संयम रखबाक प्रयास करैत राधा धीरेसँ राजनकेँ सोझा आबि ठाढ भऽ गेली । लाजे मूड़ि गोतने पएरक अंगूठासँ जमिन खोदय लगली । ओ चाहियो कऽ अपन माथ उाठ कऽ हुनका दिस नहि देखि पावि रहल छली । मनमे एकटा उदवेग, समाजक लोक लाज, इहो पहिलबेर.... । अहाँ..... अहाँ एतय कोना ? आश्चर्यसँ भरल हुनक ई प्रश्न सुनि कऽ राधा चकित होइत अपन मुँह उठेलन्हि तऽ राजनकेँ चेहरा पर आश्चर्यक भाव देख ओ स्तव्ध रही गेली । राजन, ‘ओ नहि अएली ? अहाँक भौजी ......। राधा नहिमे मँुह हिला देली । ‘किए ?’ ओ हमरे पठा देलन्हि । ताकि हम हुनका अपन राय दऽ सकियन्हि । ओह.....किछु झुंझुलाहट भऽ रहल मुदा शान्त स्वरमे । की ५÷६ भेटघाटक बाद ओ स्वंय कोनो राय नहि बना सकली ? देखु राधाजी अहाँकेँ अएने हमरा कनियो खराव नहि लागल अछि, मुदा पहिलबेर हुनका बजेवाक कारण महत्वपूर्ण बात छल । आइ हुनका सँ एहन बात कहितियन्हि, जाहि सँ हुनका बहुत खुशी होइतन्हि से ओहि खुशी देखय सँ हमरो बञ्चीत होवय परि रहल अछि । ‘की ओ बात हमरा नहि बताओल जा सकैत अछि ? राधा जल्दीए हुनकर अटपटाङ्ग व्यवहारकेँ कारण जानि लेवय चाहैत छली । ‘किया नहि अवश्य बताओल जा सकैत अछि । बात.... , बात इ अछि की हमर माय बाबु हमर विवाहक हेतु मानि गेलथि । ओना तऽ ओ विधवा विवाहक विरुद्ध कहियो नहि छलथि, मुदा अपने घरमे एकटा विधवा पुतहुकेँ रुपमे स्वीकार करावयमे संकोच भऽ रहल छलन्हि, चुकीं हम मनावयमे सफल भऽ गेलहँु । राजन आओर बहुत किछु कहय चाहि रहल छला, मुदा राधा स्तव्ध ठाढ़ छली । मानु हुनकर शरीरकेँ सम्पूर्ण शक्ति बिलिन भऽ गेल होइ आ ओ सुखल पात जकाँ हावामे उधिया रहल होइथि । मस्तिष्क अपन काज करव बन्द कऽ देने होइ, कानमे यतेक हल्ला भऽ रहल छलन्हि की राजन द्वारा ओहि सँ आगा कहल गेल शब्द मे सँ एकहु शब्द कानधरि नहि पहुँच पाएल छल । राजन हुनका सँ नहि भौजी सँ.....। ओ मात्र भौजीकेँ प्रतिक्षा करैत छला इ जानि राधाकेँ अस्तित्व तहस नहस होवयकेँ लेल उद्यत भऽ रहल छल । भौजी दुपहरीयामे जे कहने छली ओ राधाकँे लेल नहि अपना आओर राजनकेँ लेल । भौजी बहुत विश्वासक संग राधाकेँ इ जिम्मेवारी सोपने छली की ओ माँ बावु जी सँ अहि विषयपर बात करवाक हेतु । राधाक लेल भौजीकँे यैह विश्वासक मान राखव अति आवश्यक भऽ गेल छलन्हि । अहि विचारकँे अविते राधा अपना पर कावु पएवाक प्रयत्न करय लगली आ ओहि परिस्थिति सँ उवरवाक । भौजीकेँ सुनसान जिवनमे सतरंगी रंग भरवाक लेल उद्यत ओहि महान युवककेँ आगा कानय सँ हुनकर महानताकेँ अपमान सेहो भऽ जायत जे राधा सोचने छली , ओ युवक कहियो नहि सोचने छल । अहिदुआरे राधाकँे अपन श्रद्धेय पुरुष प्रति हृदयमे उत्पन्न सिनेह भावनाकेँ बहुत निष्ठुरता सँ दवा देवय परलन्हि । राधा अपन सपना टुटय सँ बेसी प्रसन्न छली जे हुनक अपन प्रिय भौजीक लेल त्याग करयकेँ अवसर भेटल अछि । ओ कोनो किम्मत पर अहि अवसरकेँ गमावय नहि चाहैत छली । भौजी चाहने छली की ओ राजनकेँ परखि कऽ निर्णय ....। राजनकेँ परखयकेँ प्रश्ने नहि उठैत छल, हुनकर दृष्टीमे हुनक जे योग्यता बुझाइत छलन्हि ओकरा शब्दमे कहव राधाक लेल मुस्कील छल । अपनाकँे सम्हारि राधा हुनका सँ विदा लऽ आगा रहल रिक्सावालाकँे इसारा कएलन्हि । तखने राजन एकटा प्रश्न पुछलन्हि ‘राधा जी अहाँ कहियो केकरो सँ प्रेम कएने छी ?’ ‘प्रेम.!.. नहि.......’ बहुत सफाइ सँ झुट बजैत राधा रिक्सामे बैस रहली । आ राजनकेँ प्रस्तावकँे स्वागत करैत शुभकामना दैत रिक्सावाला सँ रिक्सा बढावयकेँ इसारा कएली । रिक्सा चलि परल । १ . किशन कारीगर- दाम-दिगर (एकटा हास्य कथा) २.बेचन ठाकुर बेटीक अपमान- दृश्‍य सातम ३.लक्ष्मी दास- विहनि कथा- दाढ़ी ४ जितेन्द्र झा- के राखत रुमालक इज्जति १ किशन कारीगर दाम-दिगर (एकटा हास्य कथा) टूनटून राम टनटनाईत बाजल कहू त एहनो कहूॅं दाम दिगर भेलैयए जे दोसर पक्ष वला के तऽ दामे सुनि केॅं चक्करघूमी लागि जाइत छैक। हे बाबा बैजनाथ अहिं कनि नीक मति दियौअ एहेन दाम-दिगर केनिहार सभ केॅं। एतबाक सुनितैह बमकेसर झा बमकैत बजलाह आईं रौ टूनटूनमा हम अपना बेटाक दाम-दिगर कए रहल छी तऽ एहि मे तोहर अत्मा किएक खहरि रहल छौ। ताबैत फेर सॅं टूनटून राम जोर सॅं बाजल अहिं कहू ने अत्मा केना नहि खहरत हम जे अपना बेटा बच्चा राम के संस्कृत सॅं इंटर मे नाम लिखबैत रही तऽ अहॉ कतेक उछन्नर केने रही। मुदा तइयो ओ नीक नम्बर सॅं पास केलक आब हम ओकरा फूलदेवी कॉलेज अंधराठाढ़ी मे संस्कृत सॅं बी.ए मे नाम लिखा देलियैअ। ई सुनि बमकेसर झा तामसे अघोर भ बमकैत बजलाह रौ टूनटूनमा तू साफ साफ कहि दे ने जे हमरा बेटाक दाम-दिगर मे बिना कोनो भंगठी लगौनेह तों नहि मानबेए। दूनू गोटे मे एतबाक कहाकही होइते रहै की पिपराघाट सॅं पैरे-पैरे धरफराएल हम अप्पन गाम मंगरौना चलि अबैत रहि। दरभंगा सॅं बड़ी लाइनक टेन पकरि राजनगर उतरल रही। ओतए सॅ बस पकरि कहूना कऽ पिपराघाट अएलहूॅं मुदा ओतए रिक्शावला नहि भेटल तही द्वारे पैरे-पैरे गाम जाइत रही। मुदा जहॉ गनौली गाछी लक अएलहूॅं तऽ टूनटून आ बमकेसर के कहा-कही हैत देखलियैअ उत्सुकता भेल जे दाम-दिगर कोन चिड़ैक नाम छियैक से बूझिए लियैए। मोन भेल जे एखने टूनटून सॅं पूछि लैत छियैक जे कथिक दाम-दिगरक फरिछौट मे अहॉ दूनू गोटे ओझराएल छी मुदा बमकेसर झाक बमकी आ टूनटून के टनटनी देखि तऽ हमर अकिले हेरा गेल आओर  हिम्मत जवाब दए देलक। सोचलहूूॅं जे गाम पर जाइत छी तो ओतए ठक्कन सॅं एहि प्रसंग मे सभटा गप-शप भए जायत। गाम पर आबि केॅं सभ सॅं प्रणाम-पाति भेल तेकरा बाद नहा सोना के हम ठक्कन के भॉज मे भगवति स्थान दिस बिदा भेलहॅू। मुदा कियो कहलक जे ठक्कन त सतबिगही पोखरि दिसि भेटत। हुनकर नामे टा ठक्कन रहैन मुदा ओ बड्ड मातृभाषानुरागी रहैथ कहियो गाम जाइ त हुनके सॅं मैथिली मे भरि मोन गप-नाद करी। भिंसुरका पहर रहै हम बान्हे बान्हे गामक हाई स्कूल दिस बिदा भूलहॅू जे कहीं रस्ते मे भेंट भऽ जाइथ। मुदा ठक्कन महराज कतहू नहि भेटलाह त बाधहे बाधहे सतबिगही पोखरि लक अएलहूॅं दूरे सॅं देखलियै जे ठक्कन आ परमानन दूनू गोटे गप करैत चलि अबैत रहैए अवाज़ हम साफ साफ सुनैत। ठक्कन बाजल आईं हौ भैया इ कह तऽ अमीनो सहेब के जे ने से रहैत छन्हि। कहू तऽ ततेक दाम दिगर कहैत छथहिन जे घटक के घटघटी आ घूमरी धए लैत छैक। बेसी दाम भेटबाक लोभ मे पारामेडिकल वला लड़का के एम.बी.बी.एस कहि रहल छथहिन कहअ ई अन्याय नहि तऽ आर की थीक परमानन खैनी चुना के पट पट बाजल रौ ठक्कना तोरो तऽ गजबे हाल छौ अमीन सहेब अपना बेटाक दाम दिगर कए रहल छथि तई सॅं तोरा। ताबैत ठक्कन बाजल हमरा तऽ किछू नहि तोहिं कहअ ने अपना चैनो उरल पर 2लाख रूपैया गना लेलहक आ हमर मोल जोल करबा काल मे तोरा दिल्ली कमाई सॅं फुरसत नहिं रहअ। हौ भैया तेहेन ठकान ठकेलहूॅं से की कहियअ हम विपैत मे रही आ तूं अमीन सहेबक चमचागीरि मे लागल रहअ। परमानन बाजल आसते बाज रौ ठक्कन जॅं कही अमीन सहेबक बेटाक दाम दिगर भंगठलै त कोनो ठीक नहि ओ हमरा जमीनक दू चारि ज़रीब हेरा-फेरी कए देताह आ तोरो चारि सटकन द देथहून। ठक्कन बाजल हम कोन हुनकर तील धारने छियैन तू धारने छहक तऽ तोरा डर होइत छह हम त नहि मानबैन सोहाइ लाठी हमहू बजाइरे देबैन की। दूनू गोटे एतबाक गप मे ओझराएल रहैए मुदा परमानन हमरा दूरे सॅं अबैत देखलक तऽ बाजल रौ ठक्कन रस्ता पेरा चूपे चाप बाज ने देखैत नहि छिहि जे मीडियावला सेहो एखने धरफराएल अछि तू तेहेन भंगठी वला गप बाजि देल्हि से डरे झारा सेहो सटैक गेल। ताबैत हम लग मे पहुॅंचि क दूनू गोटे केॅं प्रणाम कहलियैन। हमरा देखि ठक्कन अकचकाईत बाजल किशन जी कहू समाचार की आई भोला रामक रिक्शा नहि भेटल जे पैरे पैरे आबि रहल छी। हम बजलहूॅं सेहेए बुझियौ मुदा ई कहू जे अहॉ सभ कथिक दाम-दिगर के फरिछौट मे लागल छलहॅू एतबाक मे परमानन  बजलाह जाउ एखन हम सभ पोखरि दिस सॅ आबि रहल छी जॅं बेसी बुझबाक हुएअ त सॉंझ खिन ठीक पॉच बजे अमीन सहेबक दरबज्जा पर चलि आएब। ठीक समय पर 5बजे हम अमीन सहेबक दरबज्जा दिस बिदा भेलहूॅं। ओतए लोक सभ घूड़ तपैत गप नाद करैत टूनटून सेहो ओतए बैसल। ओ पूछलक कहू अमीन सहेब मोन माफिक दाम भेटल की अहॉं पछुआएले छी एतबाक मे परमानन फनकैत बाजल हौ टूनटून भैया बमकेसर संगे पटरी खेलकअ तऽ आब एहि ठाम दाम दिगर भंगठबैक फेर मे आएल छह की नहि रौ परमानन तो तऽ दोसरे गप बूझि गेलही। ताबैत चौक दिसि सॅ धनसेठ धरफराइल आइल आ बाजल यौ अमीन बाबा हमरो दाम-दिगर करा दियअ ने। ई सुनि अकचकाइत घूरन अमीन ठोर पट पटबैत खिसिआयैत बजलाह मर बहिं तूं के हरबराएल छैं रौ हमरा त अपने बेटाक दाम दिगर भंगठि रहल अछि आ तू हरबरी बियाह कनपटी सेनुर करैए मे लागल छैं। ओ बाजल बाबा हम छी धनसेठ आईए पूनासॅ गाम आबि रहल छी। मर बहिं मूरूब चपाट तोरा कहने रहिय ैजे संस्कृत सॅं मध्यमा कए ले तऽ से नहि केलही। कह तऽ ठक्कना सी.एम साइंस कॉलेज सॅं इंटर केने अछि ओकरा कियो पूछनाहर नहि भेटलै तोरा के पुछतहू रौA सेठ महासेठ आ धनसेठ खूम गरीबक धीया पूता तहि द्वारे नान्हिटा मे परदेश कमाई लेल चलि गेल रहैए। तीनू भाई मे सभ सॅं छोट धनसेठ कनी पढलो रहैए ओ कनी साहस कए बाजल यौ बाबा हम पूणे मे ओपन सॅ मैटीक पास कए केॅं आब इंटर मे नाम लिखा लेलहूॅं। ई सुनि अमीन सहेबक दिमाग गरम भए गेलैन ओ बजलाह रौ परमानन ई ओपेन-फोपेन की होइत छैक रौ आई तऽ धनसेठो नहिए मानत। ताबैत ठक्कन बाजल कक्का पत्राचार कोर्स के ओपेन कहल जाइत छैक अहूॅं नाम लिखा लियअ ने ई सुनि सभ गोटे भभा भभा हॅसए लागल मुदा अमीन सहेब तामसे अघोर भेल तमसा के बजलाह रौ उकपाति सभ हम देह जरि रहल अछि आओर तू सभ हॅसी ठीठोला मे लागल छैंह। टूनटून बाजल कक्का हम तऽ कहैत छी जे दाम दिगरक परथे हटा दिअउ ने नहि दाम दिगर हेतै ने एतेक सोचबाक काज। ताबैत केम्हरो सॅं बमकेसर झा घूमैत-घूमैत अमीन सहेब एहि ठाम पहुॅचलाह। ओही ठाम टूनटून के देखि बमकैत बजलाह बुझलहॅू की अमीन सहेब टूनटूनमा द्वारे अकक्ष भेल छी। ई सुनि ठक्कन बाजल अपने करतबे ने अकक्ष छी अहॉ कम्पाउण्डर बेटा के प्रैक्टीसनर डागडर कहि लोक के ठकि रहल छियैक तहि द्वारे त घटक सभ घूमी रहल छथि तए एहि मे टूनटून भैयाक कोन दोख। अमीन सहेब पानक पीक फेकी बजलाह मर तोरी केॅं रौ ठक्कना आबो सुखचेन सॅं गप सुनअ दे ने की भेल औ बमकेसर बाबू अमीन सहेब ईशारा क बजलाह। बमकेसर टूनटून सॅं भेल कहा-कही कहलखिन अमीनो सहेब अपन दुःखरा सुनौलनि। सभटा गप सुनि टूनटून बाजल दाम दिगरक चलेन मे ग़रीब लोक मारल जा रहल अछि ओ कतए सॅ लड़कवला सभ के एतेक फरमाइसी पुराउअत। बेटीक बियाह त सभ गोटेक छैन्हि हमरो अहॅू के समाजक सभ लोक केॅं अहिं दूनू गोटे निसाफ कहू। बमकेसर बजलाह तू ई त सोलहो आना सच्च गप बजलेह। कि औ अमीन सहेब अहॉक की बिचार। अमीन सहेब बजलाह टूनटून ठीके कहि रहल अछि हमरो इहए बिचार जे लेब देब के प्रथा हटा देल जाए तऽ अति उत्तम। जेकरा जे जुड़तै से देतै मुदा कोनो तरहक फरमाईस केनाइ उचित नहि। हम ई सभटा गप बान्हे पर सॅ ठाढ़ भेल सुनैत रही लग मे जाके सभ गोटे के प्रणाम कहैत ठक्कन सॅं पूछलहॅू दाम-दिगर की होइत छैक कनि अॅहि बुझहा दियअ ने। एतबाक मे टूनटून मुस्की मारैत बाजल कहू तऽ इहो मीडियावला भ केॅं अनहराएल लोक जेॅका बजैत छैथि अमीन सहेब कनी अहीं बुझहा दियौन हिनका। की सभ गोटे ठहक्का मारि हॅसैए लगलाह। अमीन सहेब हॉ हॉ क खीखीआयैत हॅसैत बजलाह बच्चा एखन अहॉ कॉच कुमार छी तानि ने जहिया अपने बिकायब त अहॅू बुझिए जेबै  जे केकरा कहैत छैक दाम-दिगर। २ बेचन ठाकुर बेटीक अपमान दृश्‍य सातम (स्‍थान- सुरेश कामतक घर। भोरहि‍ भोर दीपक चौधरी मामाश्री ओइठाम पहुँचलाह) दीपक :      मामा, मामा, यौ मामा, मामा यौ। सुरेश :       (अन्‍दरसँ) हँ भागि‍न, हइए अएलहुँ। शीघ्र आबि‍ रहलहुँ अछि‍। (कि‍छु बि‍लंब भए जाइत छन्‍हि‍ सुरेशकेँ। तहन दीपक अन्‍दर जा कऽ। दीपक :      मामी, मामी, अहाँ मामाकेँ जल्‍दी कि‍एक नै छोड़ैत छि‍ऐ? ओतेक कसि‍ कऽ पकड़नाइ होइ छै? आउ मामा, जल्‍दी आउ। हम दलानपर छी। सुरेश :       चलू बैसू तुरन्‍त अएलहुँ। (दीपक दलानपर बैसल छथि‍। कि‍छुए काल बाद सुरेशक प्रवेश) चलू भागि‍न, बड़ बि‍लंब भए गेल। (दीपक ओ सुरेश बलवीरक ओइठाम जा रहला अछि‍। कि‍छु देरमे बलवीर चौधरीक ओइठाम दुनू गोटे पहुँचि‍ कऽ दलानपर बैसलाह।) सुरेश :       घरवारी थि‍कहुँ। यौ घरवारी। घरवारी। दीपक :      छोड़ि‍ दि‍औन मामाश्री समधि‍केँ। ओ अखन समधीन लग हेथि‍न। बलवीर :      (अन्‍दरसँ) समधीन लग छेलहुँ ठीके मुदा आब नै छी। एक क्षणमे आबि‍ रहल छी। (दूटा लोटामे पानि‍ लऽ कऽ बलवीरक प्रवेश। सभ ि‍कयो आपसमे नमस्‍कार पाती करैत छथि‍। पएर-हाथ धोइ कऽ सुरेश ओ दीपक कुरसीपर बैसैत छथि‍।) सुरेश :       बलवीर बाबू, हमरा लोकनि‍ कि‍छु उद्देश्‍यसँ आएल छी। ओइ उद्देश्‍यक पूर्ति अहींक हाथमे अछि‍। बलवीर :      बाजल जाउ, की उद्देश्‍य अछि‍ अपने सभकेँ। सुरेश :       यएह जे अपन छोटकी बुच्‍चीक वि‍आह दीपक बाबूक छोटका बेटासँ करू। बेचारा समधि‍ अस्‍वस्‍थ रहैत छथि‍। अपन जीता-जि‍नगी ओ छोटका बेटाकेँ सेहो नि‍माहि‍ देमए चाहैत छथि‍। हि‍नका लड़ि‍की नै भेट रहल छन्‍हि‍। हाि‍र कऽ ओ ऐ उद्देश्‍यसँ अपनेक दुआरि‍पर अएलाह अछि‍। बलवीर :      समधि‍, उद्देश्‍य कि‍नको खराब नै होइत। मुदा संबंधीमे कुटमैती नीक नै होइत अछि‍। दीपक :      समधि‍, अपनेक ई कथन बि‍ल्‍कुल ठीक अछि‍। मुदा मजबूरीक नाम महात्‍मा गाँधी छि‍ऐक। बलवीर :      अहाँक मजबूरीसँ हमरा की मतलब अछि‍। तैयो समधि‍ बाजू, बेटाक बि‍आहमे अपने की केना ख्‍रच-बरच करब। आब सेबकाहा जमाना नै रहि‍ गेल अछि‍। सुरेश :       समधि‍ की खरच करताह? कि‍छु नै। सि‍रि‍फ बेटा देताह, लड़ि‍का देताह। आओर हि‍नका लग कि‍छु छन्‍हि‍ए नै। बलवीर :      समधि‍, टि‍टकारीसँ दही कोना जनमत? सुरेश  :      बलवीर बाबू बाजू, अपनेक लड़ि‍की हेतु समधि‍केँ की सेवा करए पड़त? बलवीर :      समधि‍ छथि‍ तँ की कहबनि‍, जाउ अढ़ाइए लाख नगद दऽ देबनि‍ अलावे लड़ि‍का-लड़ि‍कीक सभ सनोमान। (सुनि‍तहि‍ दीपक अचेत भऽ जाइत छथि‍। बलवीर अन्‍दरसँ बेना आनि‍ कऽ सुरेशकेँ दै छथि‍। सुरेश हुनका बेना हौंकैत छन्‍हि‍। दीपक होशमे नै आबैत छथि‍। फेर बलवीर लोटामे पानि‍ आनैत छथि‍। अपनेसँ हुनका बलवीर मुँह पोछि‍ दै छथि‍न्‍ह। दीपक होशमे आबि‍ नीक जकाँ बेसैत छथि‍।) समधि‍, एना कि‍एक भए गेल? दीपक :      से नै कहि‍। ओना ऐ बीचि‍मे अस्‍वस्‍थ रहि‍ रहलहुँ अछि‍। हम अपनेसँ कल जोड़ि‍ आग्रह करै छी जे अपन बेटी हमरा बेटा हेतु दए दि‍अ। हम हर तरहेँ मजबूर छी। बलवीर :      ओइ बेटीपर मरूकि‍याबला चारि‍ लाख एकावन हजार टका नगद आओर सभ श्रमजान दए गेलाह। मुदा हम पाँच लाखसँ कम नै केलि‍एन्‍हि‍। खाइर हमर समधि‍ थि‍कहुँ आ बड़ मजबूर सेहो थि‍कहुँ। तँए सबा लाख टाका नगद आ लड़ि‍की-लड़ि‍काक वास्‍ते परमावश्‍यक सभ चीज-बौस। तहने ई कुटमैती संभव अछि‍। नै तँ जय रामजी की। ऐसँ कम हम अपना बापोकेँ नै करबनि‍। स्‍वीकार अछि‍ तँ बाजू नै तँ कुटुमक नाते, समधि‍क नाते भोजन साजन करू आ चुपचाप बैस आराम करू। दीपक :      समधि‍, हमरा स्‍वीकार अछि‍। तहन बाजू, नगद कहि‍या लेब आ कोना लेब। बलवीर :      समधि‍, अहींक सुवि‍धा। दीपक :      बरयाती लऽ कऽ आएब, तहने गि‍नि‍ देब। बलवीर :      बरयाती लऽ कऽ अहाँ आएब? नै नै। हमहीं आएब। तखनहि‍ हमरा नगद गि‍नि‍ देब। सुरेश :       से कोना होएत? लड़ि‍काबला हम आ बरयाती लऽ कऽ आएब अहाँ? लोक की कहतथि‍? बलवीर :      लोक की कहतथि‍? समए बलवान होइछ। सभ दि‍न लकीरक फकीर बनलासँ काज नै चलैबला अछि‍। जखन जेहेन हवा बहए तखन ओहने पीठि‍ ओरबाक चाही। समधि‍, ई सुनि‍ लि‍अ जे बरयाती लऽ कऽ हमहीं आएब, हमहीं आएब। नै तँ कुटमैती नै होएत। सुरेश :       जाउ अपनेक जे वि‍चार। बलवीर :      हँ हँ, बरयाती साजि‍ कऽ हमहीं आएब। समधि‍, मंजूर अछि‍ वा नै? दीपक :      नै मंजूर कएने कोनो गुंंजाइश नै। मंजूर करहि‍ पड़त। बलवीर :      से जे बुझी आ जेना बुझी। बरयाती हम परसुए आबि‍ रहल आबि‍ रहल छी। परसु अन्‍ति‍महि‍ लगन अछि‍। दीपक :      जेना पदाउ समधि‍, मादहि‍ पड़त। खाइर जय रामजी की। आब जेबाक आज्ञा देल जाउ। बलवीर :      आब जेबाक बेर नै रहि‍ गेल अछि‍। भोजन-साजन करू आ वि‍श्राम करू। दीपक :      नै समधि‍, बि‍याहक ओरि‍यान केनाइ अछि‍। दि‍न साफे नै अछि‍। हम जाइ छी। जय रामजी की। (नमस्‍कार-पातीक पश्‍चात् दीपक ओ सुरेश प्रस्‍थान करैत) पटाक्षेप दृश्‍य- आठम क्रमश: ३. लक्ष्मी दास विहनि कथा- दाढ़ी एहेन समधीन सबहक फेरमे वि‍वेक कक्का कहि‍यो नै पड़ल छलाह जेहेन काल्हि‍ पड़लाह। जहि‍ना-जहि‍ना ऋृतु बदलै छै तहि‍ना-तहि‍ना रीता गेलापर वि‍चारो बदलै छै। मुदा एना कि‍अए होइ छै? क्षुब्‍ध भेल वि‍वेक कक्काक अत्‍मा झहरए लगलनि‍। वि‍चार करए लगलाह जे पहि‍ने दाढ़ी कटा समधि‍यौर अबै छलौं तँ मानो-दान बेसी होइ छलए आ समधि‍न सभ गालपर चुटकि‍यो बजबै छली। एक तँ पाकल दाढ़ी तहूमे आठ-नअ दि‍नक। जहि‍ना पाकल बाँसक बेलैस भऽ जाइ छै। तहि‍ना तँ ने बेलैस भऽ गेलौं। एक तँ दस-बारह दि‍नपर दाढ़ी कटबै छी तैयो कटनि‍हारकेँ घंटा भरि‍ लगै छै, तैपर जँ अखुनका लोक जकाँ सभ दि‍न कटबए लगब तहन तँ आरो गरदनि‍कट्टी करब। गुम्‍म भेल कक्काकेँ मन कहलकनि‍- “‍साल भरि‍क दाढ़ी कटाइ कमाइल एक पसेरी धान होइ छै जे एक दि‍नक बोइन भेल। एक ि‍दनक बोइनमे सालो भरि‍ काज कराएब कते उचि‍त अछि‍।” दोसर मन कहलकनि‍- “कि‍यो बत्तू बुझऽ आकि‍ साँढ़ बि‍ना कमाइ बढ़ौने ऐसँ बेसी काज कराएब अन्‍याय छी।‍” ४ जितेन्द्र झा के राखत रुमालक इज्जति

एकटा मैल, पुरान रुमाल आ गीताक किताब चीरकालधरि सुरक्षित राखऽ चाहैत छथि अरविन्द ठाकुर । कियाकी बलिदानक चिन्हासी आ मित्रताक याद सहजने अछि ई रुमाल । जर्जर रुमाल याद दिअबैत छन्हि हिनका जेल जीवन आ दुर्गानन्दस“गे बिताओल समय ।

शहिद दुर्गानन्द झाके फांसी देलाक बाद काठमाण्डूक केन्द्रिय कारागारमे हिनका रुमाल आ गीताक पोथी सोंपल गेलनि । गीताक किताब त नहि मुदा रुमाल एखनधरि सहजने छथि अरविन्द । ओहि गीता किताबक प्रतीकके रुपमे ई एकटा ओहने गीता रखने छथि । प्रजातन्त्रक योद्धा ठाकुर ई रुमालक संरक्षण के करत से खोजि रहल छथि । एहि वास्ते ओ बहुतो नेताके आग्रह कऽ चुकल छथि, मुदा केओ हिनक आग्रह के औचित्य नहि बुझि सकल । नेपालक संग्रहालयसभ संस्कृति मन्त्रालय अन्तर्गत पडैत अछि । संस्कृतिमन्त्री नेपाली कांग्रेसक मिनेन्द्र रिजाल छथि । ठाकुर कहैत छथि जे मिनेन्द्र रिजालसहित कतेकोस“ अनुरोध कऽ चुकल छी एकर संरक्षणक लेल मुदा केओ नहि सुनलक । जत्तऽ दुर्गानन्द झाक नामे उपेक्षित अछि, ओत्तऽ हुनक रुमालके के पुछए ? ठाकुरक माग छन्हि जे रुमालके राष्ट्रिय संग्रहालयमे राखल जएबाक चाही । दुर्गानन्दके एकटा शहिदक रुपमे नेपाल सरकार सम्मान नहि कऽ सकल अछि एहनमे गीता आ रुमालक खोजी आ संरक्षण के करत ? वि.स. २०२० माघ १५ गते दुर्गानन्द झाके फांसी देल गेल रहनि । ओहिके तीन दिनबाद जेलर ठाकुरके दुनू वस्तु देने रहथि । आब ४ दशक होबऽ लागल अछि ओहि दिनके, जहिया तत्कालीन राजापर बम फेकबाक आरोपमे दुर्गानन्द झाके फांसी चढाओल गेल रहनि । २०१८ सालमे जनकपुरक जानकी मन्दिरमे तत्कालीन राजा महेन्द्रपर बम प्रहार भेल छल । जाहिमे महेन्द्र सकुशल बांचि गेल छल । दुर्गानन्द आ अरविन्द बमप्रहारक आरोपमे जेल सजाय काटैत रहथि । नावालिग भेलाक कारणे अरविन्दके फांसी नहि देल गेलनि । जेल जीवनक चरम यातनाके याद करैत अरविन्दक आंखि नोरा जाइत छन्हि । अरविन्दक अनुसार दुर्गानन्द झाके तडपा तडपाकऽ मारने रहए तत्कालीन क्रुर शाही शासक । ठाकुर अनुसार एकबेर रस्सीपर लटकाओल गेल फेर कनी काल सांस फेरऽलेल छोडल गेल । तहन फंसरी पर लटकाकऽ यातना देल गेल । आ अन्तमे गोली दागल गेल दुर्गानन्द झापर । एतेक केलाक बादो क्रुुरता जारीए रहलै । दुर्गानन्दके शवधरि हुनक परिवार जनके नहि देल गेल छलैक ।

राज्य शहिदक जीवनीके सेहो उन्टा पुन्टाकऽ राखि देने अछि । कक्षा १० के पाठयपुस्तकमे दुर्गानन्द जीवनी अछि जाहिमे हुनक बलिदानी तिथिए गलत लिखल छैक ।

दूर्गानन्द झाक बलिदानके सम्मान करबाक राज्यके दायित्व छैक । मुदा साम्प्रदायिक मानसिकतासं जकडल नेता, मन्त्रीसभ एकरा अनदेखी करैत रहल । लगैछ जे दुर्गानन्द झाके शहिदक रुपमे चिन्हाबहोमे राज्यके लज्जाबोध छैक ।

हुनका प्रतिक विभेदसं दुखित छथि अरविन्द । नेपालमे प्रजातन्त्र एलाक बाद वएह सभ कुर्सी पओलक जे दुर्गानन्दसंगे आन्दोलनमे छल । मुदा ओ सभ कहियो दुर्गानन्द आ हुनक माय आ पत्नीके याद नहि कएलक । घरक एक्कहिटा सहारा दुर्गानन्दके फांसीक बाद घर सभदिनक लेल अन्हार अन्हार भऽ गेलै ।

प्रजातन्त्र एलाक बाद सत्तामे सभसं बेशी समय रहल नेपाली कांग्रेस दूर्गानन्द झाके अपन कार्यकर्ता कहैत गर्व करैत अछि मुदा ओकर व्यवहारमे मात्र घृणेटा देखाइ दैत छैक । शहिद झाक माय सुकुमारी देवी आ पत्नी काशी देवीके गुजर बसर करब मुश्किल छलैक । तहिया कोनो कांग्रेसी नेताके याद नहि एलै दुर्गानन्दक शोणित । काशी देवी सिकीमौनी बुनिकऽ संघर्षक पथपर आगु बढैत रहली । वएह काशी देवी आइ संविधान सभाक सदस्य छथि । तराई मधेश लोकतान्त्रिक पार्टी हुनका समानुपातिक सभासद् बनौने छन्हि । नेपाल एखन शहिद सप्ताह मनाबि रहल अछि । शहिदक नामपर नेता लम्बा चौडा भाषण दैत अछि । तालीक गडगडाहटि सेहो सुनाइत छै । मुदा दुर्गानन्द सनके शहिदके पुछनिहार कियो नहि । शहिद परिवारके घरमे चुल्हि जरलै की नहि से के देखत ? नेपालमे बलिदानी देनिहार सभके इएह गति छैक । शहिद परिवारक व्यथा कतबो बखानी कम्मे हएत । वंशवाद र परिवारवादसं रंगल कांग्रेस दुर्गानन्दक उपेक्षासं खिन्न छथि अरविन्द । ओ कहैत छथि हमसभ इएह दिन देखबालेल बलिदान नहि कएने रहौं ।

नेपालमे शहिदक नामसं कतेको प्रतिष्ठान, अस्पताल, ट्रष्ट संचालित अछि । मुदा दुर्गानन्दक नामसं किछु नहि । हुनक नामक पाछा कोइराला या एहने किछु थर लागल रहैत त बहुत किछु सम्भव छलै । दुर्गानन्दके उचित सम्मान करबास“ वि.पी. कोइराला, गिरिजाप्रसाद कोइरालासभके के रोकलकै से बुझऽ चाहैत अछि जनता । जकर शोणित पर प्रजातन्त्रक जग निर्माण भेलै तकरे सं सौतिनिञा व्यवहार किया ? कांग्रेस पार्टीए जहन कोनो मतलब नहि रखलक शहिदसं तहन दलीय राजनीतिमें आन पार्टी आ सरकारके देखबाक बाते कोन ?

गिरिजाप्रसादक मगरमच्छक नोर संविधान सभामे जहन पहिल बेर सभासद् आ तत्कालीन कांग्रेस सभापति गिरिजाप्रसाद कोइराला काशी देवीके देखलनि त कोइरालाके आंखि नोरा गेल रहनि । घटनाक प्रत्यक्षदर्शी सभासद् वसन्तीदेवी झा कहैत जे हमही गिरिजाके याद दिऔलियनि जे ई दुर्गानन्द झाक पत्नी छथि । तहन भावविह्वल होइत गिरिजा काशीदेवीके हाथ पकरिक कहनेरहथि हम किछु नहि कऽ सकलौं । जनकपुरक सभा, सम्मेलनमे गिरिजाप्रसादसं काशीदेवीक भेट होइत छलन्हि । दुर्गानन्दके चिन्हाबऽ लेल एउटा शालिक बनाओल गेल अछि धनुषा जिलाक जटहीमे । देशके लेल ओहन बलिदानी देनिहारक लेल सरकारके कोनो आन महत्वपुर्ण जगह नहि भेटलै । की दुर्गानन्दक प्रतिमा लेल राजधानी काठमाण्डू छोट पडि गेल रहै ? जनकपुरक कोनो चौक खाली नहि रहै ? जानकी मन्दिरमे बम काण्ड भेल छलै, मन्दिर परिसरमे शालिक रखलासं मन्दिर अपवित्र भऽ जइतै ? काठमाण्डूके केन्द्रमे शहिद गेट छैक, की ओत्त दुर्गानन्दके शालिक रखबाक हैसियत नहि रहै ? संघीय गणतन्त्र नेपालक राजधानी काठमाण्डूमे एखनो शाहवंशीय राजासभक शालिक आ राणा क्रुर शासक सभहक चिन्हासी शोभाक वस्तु बनल अछि । व्यवहारमे दुर्गानन्दसं एत्तेक भेदभाव केनिहार कांग्रेस पार्टी दुर्गानन्दके भजाबऽसं पाछु नहि अछि । दूर्गानन्द झाक नाम बेचिकऽ भोट बटोरबाक काज सेहो चुनावमे होइते अछि । ततबे नहि दूर्गानन्द झाक नाममे संघसंस्थारुपी दोकान सेहो खोलल गेल अछि । जकर काज छैक मात्र दुर्गानन्दक नामपर लोकके सहानुभूति आ पाइ बटोरब । १.डाँ कैलाश कुमार मिश्र यायावरी- उत्तराखण्‍डक नन्‍दा-राजजात २. रामभरोस कापड़ि "भ्रमर"- अन्तर्राष्ट्रीय मैथिली सम्मेलन ः २०६७ १ डाँ कैलाश कुमार मिश्र यायावरी यायावरी उत्तराखण्‍डक नन्‍दा-राजजात गाम बद्द याद अबैत अछि दिल्ली में हमरा मुदा गाम अत्बो नजदीक त  नहि अछि जे चट दनी बिदा भ जाएब! ताहि जखन कखनहु दिल्ली स मों औने लागैत अछि त हम ऋषिकेश चलि जीत छी। एक दू दिन गंगाक कट में आनंद स रही फेर दिल्ली में कर्म धुन चैल अबैत छी। हिमालय केर विभिन्न भाग में जेबक आ कार्य करबाक अवसर भेटल अछि- कखनो सिक्किम में जा कन्चंजनघक दर्शन, भूटिया आ लेपचा जनजातिक जीबंक अध्ययन एवं सांस्कृतिक विश्लेषण त कखनहु अरुणाचल प्रदेशक तवांग में जा ओते केर परम्परक अवलोकन। अनुभव हमेश उत्तम। हिमालय दर्शन केर क्रम में काटको बेर हिमाचल प्रदेश, कश्मीर आ उत्तराखंड सेहो गेल छी. अह्ने साल छल 2005 जखन हम उत्तराखंड गेल रही। ओतए स वापस एलक बाद  2005 ई. मे हम नन्‍दा-राजजातपर एकटा लेख हि‍न्‍दीमे अपन मानवशास्‍त्रीय सर्वेक्षण केर आधारपर लीखने रही। ओ लेख इन्‍दि‍रा गान्‍धी राष्‍ट्रीय कला केन्‍द्र केर वेवसाइटपर प्रकाशि‍त भेलैक। कि‍छु दि‍नक बाद हमरा उतराखण्‍डसँ बहुत लोक सभ लेख लीखबाक हेतु साधुवाद देअए लगलाह। कतेको लोकनि‍ ओइ लेखक लि‍ंककेँ अपन ब्‍लॉगसँ जोड़लनि‍। हालहि‍ंमे एक उतराखण्‍डक नवयुक अपन माटि‍ आ पहाड़सँ सि‍नेह देखबैत एकटा पद्यमय पत्र लि‍खलनि‍। पत्र कि‍छु एना लीखल छल- “‍आँखो के आगे वनश्री के खुलते पट न्‍यारे-न्‍यारे हैं, छोटे-छोटे खेत और आड़ू सेबों के बगीचे, देवदार वन, जो नभ तक अपनी छवि‍ जाल पसारे हैं। मुझको तो हि‍म से भड़े अपने पहाड़ ही प्‍यारे हैं।‍” ऐ कवि‍तामय चि‍ट्ठीकेँ पढ़लाक बाद मोन भेल जे उत्तराखण्‍डक नन्‍दा राजजातके मैथि‍ली पाठक लोकनि‍ केर लेल मैथि‍लीमे सेहो अपन यायावरीक माध्‍यमसँ लीख ली। नन्‍दाराज-जातक अर्थ भेल नन्‍दादेवीक यात्रा। लोक इति‍हासमे जाइ आ ि‍स्‍थति‍केँ अध्‍ययन करी तँ पता लगैत अछि जे नन्‍दा गढ़वालक राजा लोकनि‍क संग-संग कुँमाऊ केर कत्‍युरी राजवंशक ईस्‍टदेवी छलीह। ईष्‍टदेवी हेबाक कारणें नन्‍दादेवीकेँ राजराजेश्‍वरीकेँ रूपमे सेहो सम्‍बोधि‍त कएल जाइत छन्‍हि‍। नन्‍दाकेँ लोक ओना पार्वतीक बहि‍न सेहो मानैत छथि‍। समस्‍त उत्तराखण्‍डमे समान रूपें पूजि‍त हेबाक कारणे नन्‍दादेवी समस्‍त प्रदेशमे धार्मिक एकता केर सूत्र सांस्‍कृति‍क रूपसँ मानल जाइत छथि‍। अर्थात हि‍नकासँ समस्‍त प्रदेश एक सूत्रमे जेना बन्‍हा जाइत हो! स्‍थानीय दंतकथा तँ ई कहैत अछि‍ जे नन्‍दादेवी दक्ष प्रजापति‍ केर सात कन्‍यामे सँ एक छलीह। एहेन मानल जाइत अछि‍ जे हि‍नकर वि‍आह भगवान महादेवसँ भेल रहनि‍। भगवान महादेवक संग ऊँच आ हि‍मसँ आच्‍छादि‍त पहाड़पर नन्‍दा देवी रहैत छथि‍। पति‍सँ एहेन सि‍नेह जकर वर्णन असंभव! पति‍ जखन संग रहैत छथि‍न तँ सुखक बदलामे धोरसँ धोर कष्‍टकेँ नन्‍दा दाइ सहि‍ लैत छथि‍। कुनो-कुनोठाम तँ नन्‍दादेवीकेँ पार्वतीक साक्षात् रूप मानल जाइत छन्‍हि‍। नन्‍दाकेँ बहुत नामसँ जानल जाइत छन्‍हि‍- शि‍वा, सुनन्‍दा, शुभानन्‍दा, नन्‍दि‍नी इत्‍यादि‍। उतराखण्‍डमे देवी-देवताक स्‍तुति‍ या स्‍मरणमे दि‍न-राति‍ जागि‍ कऽ गाबैबला गीत अथवा कीर्तनकेँ जागर कहल जाइत छै। तहि‍ना जेना अपना मि‍थि‍लामे अष्‍टयाम होइत अछि‍। नन्‍दा देवीक बारेमे अनेक जागरक अनुसार भांति‍-भाति‍क दन्‍तकथा भेटैत छै। एहने एक कथामे नन्‍दा दाइकेँ नन्‍द महराजक बेटी मानल जाइत छन्‍हि‍। नन्‍द महराजक ई बेटी भगवान श्री कृष्‍णक जन्‍मसँ पहि‍ने कंसक हाथसँ छहरि‍ कऽ आकाशमे उड़ैत नागाधि‍राज हि‍मवंतक पत्नी मैनाक कोरामे पहुँच गेलीह। एक दोसर जागरमे नन्‍दा दाइकेँ चान्‍दपुर गढ़केँ राजा भानुप्रतापक पुत्री कहल जाइत छन्‍हि‍। एक जागरमे लोक सभसँ पता चलल जे नन्‍दा देवीक जन्‍म ऋृषि‍ हि‍मवंत आओर हुनकर पत्नी मैनाक घरपर भेल छलनि‍। मुदा तमाम तरहक अलग-अलग धारणा भेलाक बादो पर्वतीय अंचलमे रहनि‍हार लोकनि‍ नन्‍दादेवीकेँ लोक मानस केर एक दृढ़ आस्‍थाक प्रतीक मानैत छन्‍हि‍। संगहि‍ नन्‍दा राजजातकेँ परम्‍परा केर अभि‍न्न हि‍स्‍सा मानैत प्रत्‍येक बारह बर्षमे राजजातक भव्‍य आयोजन करैत छथि‍। राजजात किंवा नन्‍दाजातक अर्थ भेल राज राजेश्‍वरी नन्‍दादेवीक यात्रा। गढ़वाल क्षेत्रमे देवी-देवताक जात अथवा यात्रा खूब धूमधामसँ मनाएल जाइत छै। अर्थात एतऽ ऐ क्षेत्रक लोकक दृष्‍टि‍मे जातक अर्थ भेल देवयात्रा। लोक वि‍श्‍वास इहो छै जे नन्‍दा देवी भादवक अन्‍हरि‍या पक्षमे अपन नैहर अबैत छथि‍। कि‍छु दि‍नक बाद अष्‍टमी दि‍न हुनका नैहरसँ सासुर वि‍दा कएल जाइत छन्‍हि‍। राजजात या नन्‍दाजात नन्‍दा दाइकेँ अपन नैहरसँ एक बनल-ठनल, वस्‍त्र आ गहनासँ सुसज्‍जि‍त नव व्‍याहि‍ता कनि‍याँ जकाँ सासुर जेबाक यात्रा छन्‍हि‍। सासुर के स्‍थानीय भाषामे सौरास कहल जाइत छै। ऐ अवसर पर नन्‍दादेवीकेँ सजा कऽ बना ठना कऽ महफामे बैसा तथा वस्‍त्र, आभूषण, खाद्यान्न, पैसा, मि‍ठाइ इत्‍यादि‍ सनेस दऽ गढ़वालक परम्‍पराक अनुसारे वि‍दा कराएल जाइत छन्‍हि‍। ओना तँ हरेक साल नन्‍दाजात आयोजन करबाक प्रथा छै परन्‍तु बारह वर्षमे भव्‍य आओर मनोरंजक राजजातक आयोजन कएल जाइत छै। आयोजन एहेन जकरा शब्‍दमे नै कहल जा सकैत अछि‍। केबल अनुभव कएल जा सकैत अछि‍। नन्‍दाजात प्रति‍ वर्ष इजोरि‍या पक्षक अष्‍ठमीक दि‍न मनाएल जाइत अि‍छ। तही दि‍न नन्‍दा दाइकेँ महफामे बैसा कऽ वि‍दा कएल जाइत छन्‍हि‍। नैनीताल, बैजानाथ आ अल्‍मोड़ामे वि‍शेष धूमधामसँ ऐ महापावनि‍केँ मनाएल जाइत अछि‍। नैनीतालमे प्रति‍वर्ष नन्‍दा-सुनन्‍दा मेलाक आयोजन कएल जाइत छै। ऐ अवसरपर नन्‍दा आओर सुनन्‍दा दुनू बहि‍नकेँ वि‍शि‍ष्‍ट रूपेँ केराक गाछसँ बनल मूर्तिकेँ महफामे बैसा चारू तरफ घुमाएल जाइत छन्‍हि‍। केराक एहेन आकर्षक मूर्ति कुमाऊँकेँ अति‍रि‍क्‍त अन्‍यत्र नै बनाएल जाइत छै। आ सभसँ अन्‍तमे मूर्तिक वि‍सर्जन नैनी झीलमे कऽ देल जाइत छै। कुमाऊँ क्षेत्रक बात भऽ रहल अछि‍ तँ एक बात आरो स्‍पष्‍ट कऽ दी। कुमाऊँमे नन्‍दाक एक वि‍शेष बात ई छन्‍हि‍ जे गरूड़केँ कोट भ्रामरी मन्‍दि‍रमे नन्‍दादेवीक अवतार एक पुरूषक शरीरमे होइत छन्‍हि‍ जखन कि‍ उतराखण्‍डक अन्‍य क्षेत्रमे देवीक अवतार स्‍त्रीक शरीरमे आ देवता लोकनि‍क अवतार पुरूषक शरीरमे होइत छन्‍हि‍। प्रसि‍द्ध इति‍हासकार एटकि‍ंसन महोदय हि‍मालयन गजेटि‍यरमे प्रत्‍येक बारह बर्षपर नन्‍दा राजजात मनेबाक वि‍स्‍तृत वर्णन करैत छथि‍। ऐ यात्रामे करीब 250 कि‍लोमीटर दूरी- नौटीसँ होमकुण्‍ड धरि‍ पैदल करए पड़ैत छै। ऐ यात्राक मध्‍य धनधोर जंगल, दुर्गम चोटी आ बर्फसँ झाँपल पहाड़केँ पार करए पड़ैत छै। यात्राक कठि‍नता आ दुरूहताक कल्‍पना अहाँ ऐ बातसँ लागालीय बाण गांवसँ आगाँ रि‍णकीधारसँ यात्री सभकेँ पएरे- बि‍ना जूत्ता-चप्‍पलकेँ ज्‍यूगरालीदार देसी करीब 18000 फीटक ऊँचाइ पार करए पड़ैत छै। यात्रा जखन रि‍णकीधारसँ आगाँ बढ़ैत छै तँ नाना तरहक प्रति‍बन्‍धक पालन केनाइ अनि‍वार्य भऽ जाइत छै जेना स्‍त्रीगण, बच्‍चा, अभक्ष्‍य ग्रहण करैबला जाति‍क लोक चामक बनल वस्‍तु- गाजा बाजा इत्‍यादि‍ नि‍षि‍द्ध भऽ जाइत छै। सम्‍भवत: ई यात्रा संसारक सभसँ पैघ, दुर्गम आ कठि‍न धर्मयात्रा थीक। ऐ यात्राकेँ केबल समर्पित तथा नि‍ष्‍ठावान भक्‍त लोकनि‍केँ सकैत छथि‍। हजारोक संख्‍यामे श्रद्धालु लोकनि‍, धर्म तथा परम्‍परामे वि‍श्‍वास करैबला आइयो केर धोर कलि‍युगमे ऐ यात्राकेँ श्रद्धापूर्वक पूरा करैत छथि‍। २ रामभरोस कापड़ि "भ्रमर" अन्तर्राष्ट्रीय मैथिली सम्मेलन ः २०६७ सम्मानक एकटा नव अध्याय प्रारंभ भेल अछि अन्तर्राष्ट्रीय मैथिली सम्मेलनः २०६७ हाले काठमाण्डूमे सम्पन्न भेल अछि । एहि सम्मेलनक आन बहुतो विशिष्टतामे एकटा रहल सम्मानित व्यक्तित्वक औपचारिक छनौट आ तकरा सम्मानपूर्वक प्रदान करबाक व्यवहार । एहिसं पूर्व भारतमे भेल अन्तर्राष्ट्रीय मैथिली सम्मेलन सभमे एकटा पूर्वमे छपा राखल सम्मानपत्रमे अनुहार देखि भरैत ‘मिथिलारत्न’ देबाक परमपराकें सर्वथा तोडैत व्यक्तिक गरिमाकें सेहो ध्यानमे राखि ताम्रपत्रमे विशिष्ट प्रकारक फ्रेम लागल सम्मान पत्र, पाग आ दोसल्ला ओढ़ा सम्मान कएल गेल । ओहो नेपालक पहिल राष्ट्रपति डा. रामवरण यादवक हाथें अपनामे ई प्रतिष्ठा स्वयं अभूतपूर्व छल । ‘मिथिलारत्न’ सं सम्मानित भेलाह प्रसिद्ध भाषाविद् डा. योगेन्द्र प्र. यादव । तहिना नेपालक एकमात्र मैथिल पुरातत्वविद् श्री तारानन्द मिश्र । सभ केओ एहि सम्मानसं आहलादित देखल गेलाह । सम्मानक क्रममे सभसं विशिष्ट रहल नेपाली माटि पानिक अपन छाप रखने ‘मिथिलाश्री’ सम्मान, जे अपन–अपन क्षेत्रमे विशिष्ट योगदान देनिहार मैथिल, अमैथिलकें सेहो देल गेल । एहिमे डा. प्रफुल्ल कुमार सिंह मौन रहलाह, जनिका प्रथम नेपालीय मैथिली साहित्यक इतिहासकार आ संस्कृतिविद्कें रुपमे सम्मानित कएल गेलन्हि । तहिना संस्कृतिविद् आ नेवारी भाषी सत्यमोहन जोशीजी सम्मानित कएल गेलाह । संस्कृतिविद् डा. जगमान गुरुङ्ग, भाषा वैज्ञानिक डा. नोवल किशोर राइ, भाषाविद्, अवद्यी साहित्यकार विश्वनाथ पाठक, हिन्दीक साहित्यकार डा. सूर्याथ गोप सेहो ‘मिथिलाश्री’सं सम्मानित भेल छलाह । अन्तर्राष्ट्रीय मैथिली सम्मेलनमे एहि तरहें आन भाषा भाषी विद्वान सभकें सम्मान करबाक ई शुभारंभमसं आनो भाषा–भाषी विच एकटा नीक संदेश गेलैए – भाषा साहित्यक क्षेत्रमे सहकार्य आ समन्वयसं अन्तर सम्वन्धमे वृद्धि होइछ । मैथिली क्षेत्रमे सम्मान एवं पुरस्कारक कमिकें देखैत एहि तरहक प्रारंभसं अगामी दिनमे लोकक हृदय आर विशाल हयतैक आ ई सम्मान देवाक क्रम आगां एहिना जारी रहत से विश्वास उपस्थित सहभागी लोकनि व्यक्त करैत जाइत देखल गेल छलाह ।

अन्तर्राष्ट्रीय मैथिली सम्मेलन सफलतापूर्वक सम्पन्न

जनकपुरधाम । अन्तर्राष्ट्रीय मैथिली सम्मेलन पुस ७,८ गते काठमाण्डूमे भव्यताक संग सम्पन्न भेल अछि । नेपाल–भारतक डेढ सयसं उपर प्रतिनिधि सभक सहभागितामे सम्पन्न भेल । उक्त सम्मेलन १७ वुंदे काठमाण्डू घोषणापत्रक संग सम्पन्न भेल हयबाक जानकारी आयोजन पक्ष देलनि अछि । प्रथम दिन पुष ७ गते काठमाण्डूक बसन्तपुरसं मिथिला पहिरन आ पागमे सजल सैयों मैथिल सभक आकर्षक जुलुश विभिन्न नारा लगबैत प्रज्ञा प्रतिष्ठान धरि आयल छल । नेपाल प्रज्ञा प्रतिष्ठानक भव्य सभाहलमे राष्ट्रपति डा. रामवरण यादव सम्मेलनक उद्घाटन कएलनि । उद्घाटन समारोहमे डा. रामवरण यादवक अतिरिक्त उप प्रधान मंत्री विजय कुमार गच्छेदार, संस्कृति मंत्री मृनेन्द्र रिजाल, भारतीय प्रतिनिधि डा. बैद्यनाथ चौधरी बैजू अपन–अपन विचार व्यक्त कएने छलाह । तहिना समारोहमे सम्मेलनक संयोजक राम भरोस कापडि ‘भ्रमर’ स्वागत मन्तव्य आ कार्य सम्पादन समितिक सदस्य जीवछ मिश्र धन्यवाद ज्ञापन कएने रहथि । सम्मेलनमे ताहि अवसर पर निकलल ‘स्मारिका’ आ राम भरोस कापडि ‘भ्रमर’क टटका नाटक पुस्तक ‘भैया, अएलै अपन सोराजक लोकार्पण राष्ट्रपति डा. राम वरण यादव कएलनि । तकरावाद ‘मिथिलारत्न’ सं दू गोटे आ ‘मिथिलाश्री’ सं ६ गोटे राष्ट्रपति हाथें सम्मानित भेलाह । सम्मेलनमे राष्ट्रपतिकें संयोजक ‘भ्रमर’ शाल आ पागसं सम्मानित कएलनि । प्रारंभमे राम भरोस कापडि ‘भ्रमर’ रचित थीम सौंग’क गायन स्वागत गानक रुपमे गायक रामा मंडल लगायतक साथी सभ प्रस्तुत कएने छलाह । सम्मेलन समाप्तिक वादो राष्ट्रपति जी सांस्कृतिक कार्यक्रम देखलनि जाहिमे कुंज विहारी मिश्रक विद्यापति संगीत छल । तकराबाद साँझ ६ बजे धरि भव्य सांस्कृतिक कार्यक्रम शुरु भेल जाहिमे जनकपुरक रामानन्द युवा क्लव द्वारा ‘भ्रमर’ लिखित ‘जट–जटिन’ लोक नाट्यक सफल प्रदर्शन कएल गेल । नव शिल्प ओ शैलीक कारणें दर्शक सभ द्वारा खूब सराहल गेल । तखन मिथिलाक प्रसिद्ध नृत्यांगना डा. नलिनी चौधरीक कत्थक नृत्य सभा कक्षकें मंत्रमुग्ध कऽ देने छल । दोसर दिन भिनसरे ९ बजेसं महाकवि विद्यापतिमे समर्पित विचार गाष्ठीक आयोजन कएल गेल, जकर प्रायोजन नेपाल पज्ञा प्रतिष्ठान, संस्कृति विभाग कएने छल । डा. योगेन्द्र प्र. यादव, श्री तारानन्द मिश्रक कार्य पत्र प्रस्तुत भऽ सकल । तहिना डा. धीरेन्द्रकें समर्पित भव्यकवि गोष्ठीक आयोजन सेहो कएल गेल । समापन समारोहक मुख्य अतिथि उपराष्ट्रपति छलाह जे लगभग चारि घंटा कार्यक्रममे समय दऽ सहभागि सभकें आहलादित कएलखिन्ह ।ओ अपन भाषणमे आयोजनके ऐतिहासिक बतौलनि । दोसर राति मिनापक प्रस्तुती ‘डोम कक्ष’ सभके प्रभावित कैलकैक । सांस्कृतिक कार्यक्रमक दुनू दिन रश्मि रानीक गीत सं श्रोता मस्तीक अनुभूति करैत रहल । ‍ ३. पद्य ३.१.सुबोध कुमार ठाकुर ३.२.मनोज कुमार मण्‍डल ३.३. राम वि‍लास साहु ३.४.राजेश मोहन झा- कवि‍ता- पादुका वि‍योग ३.५.नवीन कुमार "आशा" ३.६.जगदीश प्रसाद मंडल ३.७.गजेन्द्र ठाकुर ३.८.संजय कुमार मंडल सुबोध कुमार ठाकुर १ नव वर्षक रंग नव उमंग नव तरंग छाएल सगरो नव रंग परिताहीन धरापर नव प्रभातक पहिल किरण चमकि उठल धरतीक कण-कण परैताहीन धरापर नव प्रभातक पहिल किरण बीतल ऐ तरहेँ जे पूर्व वर्ष देलक ककरो दुख ककरो हर्ष केकरो देलक शुभ संदेश ककरो देलक खाली लिफाफा ककरो उठा कऽ लऽ गेल तोड़ि दुनियाँक फंद ऐ तरहेँ बीतल एक आर वर्षक रम्ग जे बीत गेल से बीत गेल मानल वएह इतिहास रचि गेल परंच आबए नव वर्षमे नव कल्पना करब नव चाँदक संग देखू पसरि गेल सगरो नव वर्षक रंग होअए मंगल सुखमय सभक नव वर्ष रहए सभक जीवनमे हर्ष रहए सदिखन छाएल नव तरंग अछि सुबोधक कामना नव वर्षक संग २ प्रयास जुनि तोड़ू अपन आस करैत रहू सदिखन अपन प्रयास सोचू सभ दिन नूतन दिन अछि, सोचू आजुक दिन नीमन अछि भरैत चलू निस दिन नव उल्लास करैत रहू सदिखन अपन प्रयास कने सोचियौ मीता, जौँ राम होइतथि अधीर तँ सेतु बना लंका नै पहुँचितथि पाण्डव कौरव संग नै लड़ितथि तँए देख कठिन कार्यकेँ जुनि होउ निराश करैत रहू सदिखन अपन प्रयास देखू कखनो मकड़ाकेँ, सीखू किछु ओकरासँ कए कऽ पुरजोर बेर-बेर अपन प्रयत्न जाल बनाबए सुन्दर नीमन दए सनेस ओ सभकेँ नै छोड़ी कखनो प्रयास विजय निश्चित भेटत कहए सुबोध दैत ई आस राखू अपनापर विश्वास मनोज कुमार मण्‍डल कवि‍ता बूढ़ चि‍थड़ा वस्‍त्र हाथमे लाठी शाल चि‍पड़ा मुँह सि‍कुड़ल दाँत नि‍पत्ता आँखि‍क चश्‍मा माथक अस्‍ति‍त्‍व बचौने लगैत जेना नर कंकाल हुअए चारि‍-पाँच गोट नव तुरि‍या छाैड़ा जि‍ंस झारने, देह लचकबैत आगू भऽ बाजल- “अँए हौ बूढ़ू हमरा सभकेँ देख लगै छह हमहूँ आब जवान बनी आकि‍ जीवन लीला समाप्‍त कऽ आब पृथ्‍वीक भार हल्लुक करी?‍” मुड़ि‍ उठबैत चश्‍मा सम्‍हारैत बूढ़ा बजलाह- “के छि‍अह बच्‍चा कने चि‍न्‍हए देह जबाब तँ बि‍नु कहनहुँ भेटतह कने समए जरूर लगतह करनी तँ देखबे करबह मरनी बेर कने आबए दहक।‍” राम वि‍लास साहु कवि‍ता- मोनक बात की कहब चलू बहि‍ना चलू जहि‍ना छी तहि‍ना की कहब हालचाल बीत गेल ओहि‍ना मंदि‍र,मेला कतंको घुमलौं जहि‍ना तहि‍ना पूजा-पाठ बहुतो केलौं पीया आएत कहि‍या फूल, बेलपत्ता, चंदन-अछत, धूप-दीप सभ देबताकेँ चढ़ेलहुँ तीन पेखन आब की करब समझि‍ नै पबै छी अखन जादू-टोना सेहो केलौं चारू कोना चलू बहि‍ना चलू जहि‍ना..... चढ़ल उमरि‍या हम कोना बि‍ताएब जि‍नगीक भार पहाड़ बनल अछि‍ पहाड़क भारसँ यौवन भार अधि‍क बनल अछि‍ देव-धरमकेँ दया नै अबैत अछि‍ चंचल मन दि‍ल धधकैत अछि‍ सभ कि‍छु रहि‍तौं दि‍न-राति‍ सुना बि‍तैत अछि‍ पि‍या बि‍ना जि‍नगी सुना-सुना लगैत अछि‍ मनक बात की कहब...... राजेश मोहन झा 'गुंजन' कवि‍ता पादुका वि‍योग भरल फगुनहटि‍ गंगाक बसात छल प्रदीप भैयाक वि‍आहक परात छल बाबू शि‍वदानीक भरल दलानपर बरि‍आती सभ मारै छल ठहक्का झणहि‍ंमे अएला मास्‍टर साहेव सरि‍आती मध्‍यक पाहुन अनूप सटकल चट्टीमे दड़वरि‍ मारैत गंगाक बालुसँ मोन छन्‍हि‍ तप्‍त हॅफैत अपसि‍यांत कान्‍हपर गमछा टूटल पादुका लेलनि‍ नुकाए नवका सैन्‍डि‍ल ताकि‍ रहल छथि‍ कतहु भेटत तँ लेब चोराए तखने नजरि‍ पड़लनि‍ एक जोड़ि‍ नवका चप्‍पल छल बड़ सोहनगर बढ़ि‍याँ हएत एकरे पएर लगावी सभ दि‍न हवाइए पर चललहुँ आबहु गर्दभ छान छोड़ाबी हाथमे लऽ कऽ फुलही लोटा नव चप्‍पल पहि‍रि‍ नदी कात चललनि‍ देखते चट्टी चोरि‍ लुटकुन बाबू पंकज संग चोरकेँ दौड़ खेहाड़लनि‍ सभ बरि‍आती लग पहुँि‍च गेल ई चप्‍पल तँ टि‍ल्‍लूक थि‍क खोलि‍ दि‍औ औ मास्‍टर साहेब कतेक दि‍न काटब लऽ आनक चीज बतीसी नि‍पोरि‍ मास्‍टर बजलनि‍ गलती भऽ गेल देखू उदर बेगमे बूझि‍ गेलहुँ ई हमरे चप्‍पल लोटा लऽ चललहुँ उद्वेगमे दुरजी साहेब फूसि‍ बजै छी जोरसँ बजला पंकज झट दऽ टुटल चट्टीमे अहाँ गामसँ अएलहुँ कोना पहि‍रलहुँ नैका खट दऽ कीनै छी सभ दि‍न सड़ले आलू महकल भट्टा भरि‍ कऽ बोरी की पढ़बै छी नेना सभकेँ अपने शि‍क्षक मुदा करै छी चोरी देखू महादेव केहेन अभ्‍यागत अहाँक दलानक नाम हॅसैलनि‍ पाहुन तँ छथि‍ बरि‍आतक गामे केर ई कहि‍ महादेव अप्‍पन जान छोड़ैलनि‍ उदयन गामक छथि‍ पुरूष ई अपरूप जीवन छन्‍हि‍ काज महान टूटल चप्‍पल फाटल छन्‍हि‍ धोती वि‍नु टीकट रामदीरीमे गंगा स्‍नान। .....। नवीन कुमार "आशा" (१९८७- ) पिता श्री गंगानाथ झा, माता श्रीमति विनीता झा। गाम- धानेरामपुर, पोस्ट- लोहना रोड, जिला- दरभंगा। की लिखू तोरा लेल गे सुनरी प्राण प्रिय हे मधुप्रिय, हे कर्णप्रिय मोन कहए लिख ओकरा लेल जकर कोनो नै मोल गे सुनरी प्राण प्रिय हे मधुप्रिय, हे कर्णप्रिय जखन देखी तोहर काया कहए मोन फुसफुसाय बौआ तूँ कर किछु माया जखन देखी तोहर खुजल केश मोन करए बदलि किछु भेष आँखि जखन देखी खाली मोने मोन दी गारि कही जँ रहितौं हम काजर भेटितै तोर छुबैक अवसर हे... तोहर देखि कऽ ठोर लागि जाए मनमे होर हमर कहए निर्लज्ज मोन जँ रहितै ठोरक शोभा पाबि जइतें तूँ ई मेवा गे सुनरी... जखन देखी श्रृंगारित रूप लागए जेना निकलि गेल धूप आब की लिखू तोरा लेल नै अछि कोनो शब्द मेल आब कही मोनसँ आब नै हमरा तूँ टोक आस लगौने कही मोनसँ जँ बनि पओतै ओ घरवाली नै बुझाइत छी हम खाली गे... जगदीश प्रसाद मंडल कवि‍ता- १ गाछी भुताइ बाबाम रोपल गाछी भुताइ घाम बहा जड़ि‍-जड़ि‍ सि‍चलनि‍ तामि‍ कोड़ि‍-कोड़ि‍ गाछ रोपलनि‍ देख-देखि‍ मन हर्षित भेलनि‍ नै बुझलनि‍ बॉझि‍क कि‍रदानी जे ने कहि‍यो माटि‍ देखलक फुनगी पकड़ि‍ अकास पकड़लक नै देखि‍ जड़ि‍ दि‍स कहि‍यो सदति‍ उड़ि‍ बादल पकड़लक गामक पोखरि‍ जहि‍ना डेरौन तहि‍ना दबकल अढ़मे मन कानि‍-खीज सदति‍ कलपैत कि‍यो ने बँचबैवला अछि‍ पैत जै धरतीपर बहति‍ गंगा कमला सहि‍त जमुना धार शान्‍त भऽ सरस्‍वतीक संग पहुँचैत मि‍ल गंगा सागर ति‍ल-ति‍ल उत्तर ढलान दि‍स अनबरत बहैत सूर्यक धार नाि‍च-नाचि‍ मि‍ल गाबह जेबै जरूर जरूर ओइ पार गाछी बीच बैस सदि‍ बाबा सभ कि‍छु देख रहल छथि‍ बाँझक बच्‍चा अनकर नेत बि‍हुँसि‍-बहुँसि‍ कहै छथि-‍ “‍नै अछि‍ बौआ गाछी भुताइ (२)  कानि‍ कलपि‍ कते कहब गामेमे हराएल छी रंग-वि‍रंगक अन्न-पानि‍मे नीकसँ छि‍ड़ि‍आएल छी समेटनौ तँ ने समटाइए थाकि‍ कऽ ठकुआएल छी डरे आँखि‍ये ने उठैए कातेमे नुकाएल छी। (३)  मुँहसँ बोल कन्ना कऽ फुटतै दरदसँ दुखाइ छै टीससँ टि‍सकै छै छाती लहि‍-लहि‍ लटुआएल छै मुँहसँ बोल कन्ना.... आशाक सभ आशा मेटलै बाटे सभ धेराएल छै ककरो कहने कि‍छु ने भेटत अपने बेथे बेथाएल छै मुँहसँ बोल कन्ना.... चोटसँ चोटाएल छै मन ढहि‍-ढहि‍ कऽ ढनमनाइ छै तैयो हँसि‍-हँसि‍ नाचए-गाबए राति‍-दि‍न बड़बड़ाइ छै मुँहसँ बोल कन्ना....। (४) दि‍न घटतै आकि‍ राति‍ यौ भैया मौसम मुस्‍की दै छै साले दि‍नक समैइये कते लीलाक रंग बदलैत छै दि‍न घटतै आकि‍ राति‍.... अपन-अपन सनेस बाँटि‍ सभ सुरभि‍त वायु परसैत छै खसल-पड़लमे जान फूकि‍ थामि‍-थामि‍ उठबैत छै दि‍न घटतै आकि‍ राति.... समए ने ककरो संग पुड़ैए ने ककरो ओ दैत छै अपन-अपन सभ समेट-समेट सि‍रे-सि‍र उठबैत छै दि‍न घटतै आकि‍ राति‍.....। गजेन्द्र ठाकुर लवनचूश चूसी भरि दिन लवनचूश  चूसी भरि दिन मम्मी-पापा कहथि चूसैले कुरकुड़ा कऽ नै यौ मुदा चूसि-चूसि थाकल छी कुरकुड़ाइत जे लवनचूश व्याकुल छी मम्मी टोकथि डैडी टोकथि दाँतमे लागत चुट्टी मुदा ककरो टोक नै मानी लवनचूश हम फाँकी कुरकुड़ खाइ चूसि अघाइ हुअए एहन सभ दिन लवनचूश चूसी भरि दिन संजय कुमार मंडल कवि‍ता- १ परदेसि‍या असगर मनुख जाधरि‍ युवा रहैए पढ़ैए-लि‍खैए, खेलैए-धुपैए पढ़ाइ समाप्‍त कऽ वि‍आह करैए परि‍वारि‍क जि‍म्‍मेबारीक हेतु दूर-देश जा नोकरी-चाकरी करैए भोरे उठि‍ टि‍फि‍न लऽ ड्यूटी जाइए अधि‍क रूपैयाक लोभे ओभर टाइम खटैए बेचाराकेँ नवकी कनि‍याँक यादि‍ अबैए सब रवि‍ कऽ सासूर फोन करैए कनि‍याँ आ सारि‍-सरहोजि‍सँ घंटा-घंटा भरि‍ गप्‍प करैए “‍कहि‍या गाम आएब?” कनि‍याँ पुछै छै माघक शी‍तलहरी कन्ना बि‍तेलहुँ कहै छै अहाँ नि‍र्दय छी, हमर हाल नै जनै छी भरि‍-भरि‍ राति‍ हम करौट फेड़ैत जगै छी की कहतै कि‍छ नै फुड़ै छै ओ बेवस्‍थाक जंजालमे ओझराएल फि‍रै छै डेढ़े मास बाद होली पावनि‍ छै होलीमे नै आएब तँ कहि‍यौ ने आएब एक्के बेर हमरा मुइलाक बाद अाएब मरल मुँह देख एकटा लकड़ी चढ़ाएब कनि‍याँक बोली सुनि‍ तिलमि‍ला उठैए उनटि‍ अपन शहरी जीवन दि‍स तकैए कहि‍यो बर्गर, कहि‍यो छोला-भटोरा कहि‍यो बड़ा-पाउ खा राति‍ बि‍तबैए कोड़ी-कौड़ी, छि‍द्दी-छि‍द्दी जोड़ि‍ महि‍ने-महि‍ना हजार रूपैआ बाबुकेँ पठबैए वि‍डम्‍बना देखू, मनुख सालक तीन साए तीस दि‍न जतऽ जी‍बैए, ओढ़ना-बि‍छान छोड़ि‍ कि‍छुओटा ने कि‍नैए सभ दि‍न बीना सि‍रहौनेक सुतैए गाम एबाक लेल ठि‍केदारसँ एडभांस उठबैए आधा रूपैआसँ साड़ी-धोती, साबुन-शेम्‍पू, सेन्‍ट कि‍नैए आधा रूपैआ बचा गाड़ी पकड़ि‍ गाम अबैए सुनि‍ते महाजन आबि‍ दरबज्‍जाक माटि‍ खुनैए पनरह दि‍न धरि‍ खुब मासु-माछ कचरैए अबै काल मासुलक लेल फेर महाजनक दरबज्‍जा ओगरैए जाइत देरी रूपैआ पठा देब महाजनकेँ गछैए ककरा कहतै के पति‍येतै परदेसि‍या मनुख कोना जीबैए बाप सदि‍खन कहै छै ई छौड़ा तँ फाउ खैलाइए। २ शीतलहरि‍ हम छी पछि‍या शीतलहरि‍ हम छी पछि‍या शीतलहरि‍ जन मानसपर हम ढाहब कहरि‍ हम छी कहि‍ रहल चि‍करि‍-चिकरि‍ हम छी पछि‍या शीतलहरि‍.... जौं कनि‍यो अछि‍ जानक फि‍कड़ि‍ हमरा सोझासँ हटि जाउ नै तँ हम बेध देब, सेद देब हाथ पाएर सुइसँ छेद देब हम नै बुझब छी अहाँ बूढ़, बच्‍चा आकि‍ सि‍यान जौं करब कनि‍याें जुआनि‍क अभि‍मान हम एक्के झोंकामे देब पटैक एक बेर रमकब तँ कऽ देब लुल्ह-नाङर जखन हएत पेरेलाइसि‍स एटैक जल्‍दी कोनो कोनमे रहू दुबैक अपन नाङरि‍केँ राखू सुटैक हम छी पछि‍या शीतलहरि.... हम अहि‍ना रमकब-उमकब जे आओत सोझा ओकरेपर बमकब हम छी पछि‍या शीतलहरि.... ३ डेंगू बेरोजगारीसँ तंग आबि‍ बीजा,पासपोर्ट बनाओल सात समुन्दर पार गल्‍फ कंट्रीमे नोकरी पाओल आर्थिक मंदी भेलासँ नोकरी छुटल बुझना गेल तारसँ खसल खजूरपर लटकल हारि‍-थाकि‍ घुरि‍ गाम एलौं अर्थाभावे जेना अनाथ भेलौं अबि‍ते गाम पत्नी पड़ली बेमार दरि‍भंगासँ पटना धरि‍ कएल उपचार दि‍नो-दि‍न रोग बढ़ि‍ते गेल नै भेल सुधार सी.टी स्‍केन सहि‍त नाना प्रकारक इनवेस्‍टीगेशन भेल हजारो खर्चाक बादो रोग नै पहचानल गेल ब्‍लडमे सीरम प्‍लेटलेट घटि‍तहि‍ गेल डाक्‍टरो सभकेँ अचरज भेल डि‍स्‍चार्ज सि‍लि‍प दैत कहलनि‍- “मरीजकेँ घर लऽ जाउ, सेवा-सुश्रुषा करिओन, खुब खुआउ-पीआउ‍‍, जतेक दि‍न जीबै छथि, मेहमाने बुझू, फेर उठि‍ ठाढ़ नै हेती छाती बज्र करू।” अंतमे दस सी.सी. ब्‍लड लऽ दि‍ल्‍ली‍ टेस्‍ट लेल भेजल गेल रि‍पोर्ट आएल, बेमारी डेंगू छी कहल गेल। .. विदेह नूतन अंक मिथिला कला संगीत १.श्वेता झा चौधरी २.ज्योति सुनीत चौधरी ३.श्वेता झा (सिंगापुर) १ श्वेता झा चौधरी गाम सरिसव-पाही, ललित कला आ गृहविज्ञानमे स्नातक। मिथिला चित्रकलामे सर्टिफिकेट कोर्स। कला प्रदर्शिनी: एक्स.एल.आर.आइ., जमशेदपुरक सांस्कृतिक कार्यक्रम, ग्राम-श्री मेला जमशेदपुर, कला मन्दिर जमशेदपुर ( एक्जीवीशन आ वर्कशॉप)। कला सम्बन्धी कार्य: एन.आइ.टी. जमशेदपुरमे कला प्रतियोगितामे निर्णायकक रूपमे सहभागिता, २००२-०७ धरि बसेरा, जमशेदपुरमे कला-शिक्षक (मिथिला चित्रकला), वूमेन कॉलेज पुस्तकालय आ हॉटेल बूलेवार्ड लेल वाल-पेंटिंग। प्रतिष्ठित स्पॉन्सर: कॉरपोरेट कम्युनिकेशन्स, टिस्को; टी.एस.आर.डी.एस, टिस्को; ए.आइ.ए.डी.ए., स्टेट बैंक ऑफ इण्डिया, जमशेदपुर; विभिन्न व्यक्ति, हॉटेल, संगठन आ व्यक्तिगत कला संग्राहक। हॉबी: मिथिला चित्रकला, ललित कला, संगीत आ भानस-भात। चित्रक विषयमे: सूर्य आशाक आ संकल्पसिद्धिक प्रतीक अछि, अन्हारक बादक प्रकाशक प्रतीक अछि। ई पृथ्वीक जीवनक जड़ि अछि, दैवत्वक आशीर्वादक प्रतीक अछि। तेँ विश्वक सभ संस्कृतिमे ई पूजित अछि, खास कऽ मैथिल संस्कृतिमे (छठि आ मकर संक्रान्ति)। ई चित्र ऐ सभकेँ चित्रित करबाक प्रयास अछि। २. ज्योति सुनीत चौधरी जन्म तिथि -३० दिसम्बर १९७८; जन्म स्थान -बेल्हवार, मधुबनी ; शिक्षा- स्वामी विवेकानन्द मि‌डिल स्कूल़ टिस्को साकची गर्ल्स हाई स्कूल़, मिसेज के एम पी एम इन्टर कालेज़, इन्दिरा गान्धी ओपन यूनिवर्सिटी, आइ सी डबल्यू ए आइ (कॉस्ट एकाउण्टेन्सी); निवास स्थान- लन्दन, यू.के.; पिता- श्री शुभंकर झा, ज़मशेदपुर; माता- श्रीमती सुधा झा, शिवीपट्टी। ज्योतिकेँwww.poetry.comसँ संपादकक चॉयस अवार्ड (अंग्रेजी पद्यक हेतु) भेटल छन्हि। हुनकर अंग्रेजी पद्य किछु दिन धरि www.poetrysoup.com केर मुख्य पृष्ठ पर सेहो रहल अछि। ज्योति मिथिला चित्रकलामे सेहो पारंगत छथि आ हिनकर मिथिला चित्रकलाक प्रदर्शनी ईलिंग आर्ट ग्रुप केर अंतर्गत ईलिंग ब्रॊडवे, लंडनमे प्रदर्शित कएल गेल अछि। कविता संग्रह ’अर्चिस्’ प्रकाशित। ३.श्वेता झा (सिंगापुर) विदेह नूतन अंक गद्य-पद्य भारती मोहनदास (दीर्घकथा):लेखक: उदय प्रकाश (मूल हिन्दीसँ मैथिलीमे अनुवाद विनीत उत्पल) उदय प्रकाश (१९५२- ) “मोहनदास”- हिन्दी दीर्घ कथाक लेखक उदय प्रकाशक जन्म १ जनवरी १९५२ ई. केँ भारतक मध्य प्रदेश राज्यक शहडोल संभागक अनूपपुर जिलाक गाम सीतापुरमे भेलन्हि। हुनकर हिन्दी पद्य-संग्रह सभ छन्हि: सुनो कारीगर, अबूतर कबूतर, रात में हारमोनियम, एक भाषा हुआ करती है। हिनकर हिन्दी गद्य-कथा सभ छन्हि: तिरिछ, और अन्त में प्रार्थना, पॉल गोमरा का स्कूटर, पीली छतरी वाली लड़की, दत्तात्रेय के दुख, अरेबा परेबा, मैंगोसिल, मोहनदास। मोहनदास- दीर्घकथा लेल हिनका साहित्य अकादेमी पुरस्कार २०१० (हिन्दी लेल) देल गेल अछि। अनुवादक: विनीत उत्पल  (१९७८- ) आनंदपुरा, मधेपुरा। प्रारंभिक शिक्षासँ इंटर धरि मुंगेर जिला अंतर्गत रणगांव आ तारापुरमे। तिलकामांझी भागलपुर, विश्वविद्यालयसँ गणितमे बीएससी (आनर्स)। गुरू जम्भेश्वर विश्वविद्यालयसँ जनसंचारमे मास्टर डिग्री। भारतीय विद्या भवन, नई दिल्लीसँ अंगरेजी पत्रकारितामे स्नातकोत्तर डिप्लोमा। जामिया मिल्लिया इस्लामिया, नई दिल्लीसँ जनसंचार आ रचनात्मक लेखनमे स्नातकोत्तर डिप्लोमा। नेल्सन मंडेला सेंटर फॉर पीस एंड कनफ्लिक्ट रिजोल्यूशन, जामिया मिलिया इस्लामियाक पहिल बैचक छात्र भs सर्टिफिकेट प्राप्त। भारतीय विद्या भवनक फ्रेंच कोर्सक छात्र। आकाशवाणी भागलपुरसँ कविता पाठ, परिचर्चा आदि प्रसारित। देशक प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिका सभमे विभिन्न विषयपर स्वतंत्र लेखन। पत्रकारिता कैरियर- दैनिक भास्कर, इंदौर, रायपुर, दिल्ली प्रेस, दैनिक हिंदुस्तान, नई दिल्ली, फरीदाबाद, अकिंचन भारत, आगरा, देशबंधु, दिल्ली मे। एखन राष्ट्रीय सहारा, नोएडा मे वरिष्ट उपसंपादक। "हम पुछैत छी" मैथिली कविता संग्रह प्रकाशित। मोहनदास पोथीक आवरण चित्र मार्कूस फोरनेलक चित्रक उदय प्रकाश द्वारा रूपान्तरण। (उदय प्रकाश जीकेँ "विदेह" विनीत उत्पलकेँ "मोहनदास"क मैथिली अनुवादक अनुमति देबाक लेल धन्यवाद दैत अछि- गजेन्द्र ठाकुर- सम्पादक।) मोहनदास : उदय प्रकाश (मूल हिन्दीसँ मैथिलीमे अनुवाद विनीत उत्पल द्वारा) मोहनदास: दोसर खेप मोहनदास जखन बी.ए. पास केलक तँ बाप काबा आ माय पुतलीबाइकेँ आशा रहै जे आब ओकरा तुरत्ते नोकरी भेट जएतै। मोहनदासक बियाह चौदह-पंद्रह  बरखमे कटकोना गामक विरंजुक सुन्नर सन बेटी कस्तूरी बाइक संग भऽ गेल छल। कस्तूरी बड़ काज करैवाली छल। सासुर आबैक संग ओ घरक सभटा काजे टा नै सम्हारलक मुदा एम्हर-ओम्हर छोट-मोट मजूरी कऽ किछु पाइयो कमाबै लागल, जइसँ मोहनदासक पढ़बाक खर्चा निकलि जाए। सभक आँखि मोहनदासेपर लागल रहै। बी.ए. करैबला ओ जाइत-समाजक पहिल बच्चा रहए। सेहो फस्ट डिवीजन। परीक्षाक रिजल्ट जखैन बहराएल तखन ओकर कएकटा फोटो सेहो अखबारमे छपल। कोचिंग चलाबैबला कंपनी सेहो ओकर फोटो छापलक। मोहनदास रोजगार कार्यालयमे अप्पन नाम लिखौलक आ "रोजगार समाचार' मे छपैबला विज्ञापनकेँ देख कऽ जत्तऽ–तत्तऽ दर्खास्त पठाबए लागल। लिखित परीक्षामे सभसँ ऊपर रहै छल मुदा जखन इंटरव्यू होइत रहै तँ ओकरा अनुत्तीर्ण कऽ देल जाइत छल। ओ देखैत छल जे ओकर ठाम आठम-दसम पास, थर्ड-सेकेंड डिवीजनसँ बी.ए. करैबला लड़काकेँ नोकरी भऽ जाइत अछि। ओइमे सभक लग कोनो-ने-कोनो पैरवी रहैत छलै। सभ कोनो-ने-कोनो अफसरक, नेताक आ पैघ लोकक जमाय, बेटा, भातिज, भागिन आ लल्लो-चप्पो करैबला आकि कर्मचारी रहैत छल। मोहनदास सभ बेर असफल भऽ कऽ घुरैत छल मुदा ओ अप्पन आस नै छोड़लक। ओ बुझैत छल जे हिन्दुस्तानमे भ्रष्टाचार बड्ड रास छै मुदा तखनो सैकड़ामे दस-बीसटा लोककेँ अप्पन मेरिट आ योग्यताक दमपर नोकरी भेट जाइत छै। आस्ते-आस्ते मोहनदासकेँ ईहो बुझऽमे आबि गेलै जे कतेक रास नौकरी लेल बोली लागै छै। ओकर बाप काबा दास लग जे लाख-पचास हजार रहितियै तँ दू-तीनटा एहन नौकरी हाथ जे ओकर हाथसँ छुटलै तइमे ओ घूस दऽ बहाल भऽ सकै छल। काल बितैत गेलै। ओकर उमेर सरकारी नोकरीक आयुरेखा पार करऽ लगलै। घरक लोक सभ असोथकित हुअए लागल। तैयो कस्तूरी बोल-भरोस दैत छल। कोनो गप नै, सरकारी नौकरी नै भेटत तँ प्राइवेटमे देखि ले। नै तँ कोनो धंधा कऽ ले। आइ-काल्हि पढ़ब-लिखब बेरोजगारक लेल सरकारक कएकटा योजना अछि। कुक्कट पालन कऽ ले। अंडाक धंधामे कतेक रास फाएदा अछि। मोमबत्ती, अगरबत्ती आ आटा-दलिया बनाबैक कारखाना खोलि ले। सरकार बैंकसँ लोन दैत छै। एक बेर साक्षरताक काज आएल छल। शिक्षाकर्मीक अस्थायी काज ओकरा भेट सकै छलै। मुदा बादमे पता चललै  जे जाइ अफसरक नीचाँ ई काज छल ओ अप्पन जाति आकि एक-दू राजनीतिक पार्टीक लोककेँ ओइमे भरि रहल अछि। मोहनदास नीचाँक जातिक छल आ कोनो पार्टीक सदस्यो नै छल। मोहनदास बड़ सोझ, संकोची आ स्वाभिमानी छल। ऐ काजक लेल जतेक दौग-भाग करऽ पड़ितै, जतेक अफसर-हाकिमक हाथ-पएर जोड़ै पड़ितै , एतए-ओतए जे खुआबऽ–पियाबऽ पड़ितै ओ ओकरा सक्कमे नै रहै। ओइ संगे नौकरीक जकाँ एतए सेहो लड़ाइ-झगड़ा सेहो छलै। एहन नै छल जे मोहनदास प्रतिस्पर्धासँ डराइ छल, एहन रहितै तँ ओ बी.ए. क परीक्षाक मेरिटमे कोना अबितै?  मुदा ओ जल्दीये बुझि गेल जे स्कूल-कॉलेजक बाहरक असल जिनगीक खेल एकटा एहन मैदान अछि, जतए ओ गोल बना सकैत अछि जकरा लग दोसराकेँ लंगड़ी मारबाक तागति छै। आ ई तागति पैरवी-पैगाम, जोड़-तोड़, घूस, चिन्हल-जानल, धुरफंदी एहन कतेक अवैध आ अनैतिक बौस्तुसँ बनैत अछि, जकरामे सँ एक्कोटा मोहनदासक बूताक गप नै छल। मोहनदासे टा नै, ओकर कनियाँ कस्तूरी, बाप काबा आ माय पुतलीबाइ सभक भीतर ओकर सरकारी-अफसर-हाकिम बनैक आस मिझा गेल, आब तँ लऽ दऽ कऽ सएह लागैत छल जे एहन किछु भेट जाए, जकरासँ बेरोजगारी आ असगर रहनाइसँ मोहनदासक पिंड छुटि जाए आ घरक दालि-रोटी कोनो तरहेँ चलए लागै। अही बीच काबा दासकेँ टी.बी. भऽ गेलै। ओ खाँसै लागल आ कफक संग खून बोकरऽ लागल। ठीक एकर बाद एकटा खैराती नेत्र चिकित्सा शिविरमे पुतलीबाइक आँखिक इजोत चलि गेलै। कस्तूरीपर घरक काज-धाज आ बाहरक मजूरीक संग सास-ससुरक सेवा-सुश्रुषाक भार सेहो आबि गेलै। सेहो एहन कालमे जखन ओकरा सुस्ताइक जरूरी छलै, किएकि ओ गढ़ुआरि छल। गर्भमे देवदास आबि गेल छलै। मोहनदासकेँ देखिये कऽ लागैत छल जे ओ कतेक दिनसँ बेमार अछि। गाममे ओ कम्मे लोकसँ भेंट करैत छल। गाम-घरक लोकक आगू आबैसँ ओ नुकायल रहैत छल। सभटा लोक लग एक्केटा प्रश्न होइ छलै- , "की कऽ रहल छी? कोनो जोगाड़ भेल?' गामक लग कठिना नामक एकटा धार बहैत छल। मोहनदास गर्मीमे गामक दोसर लोक जकाँ धारक बालूमे खीरा, ककड़ी, तरबूज, खरबूज रोपैक काज केलक। कनियाँ कस्तूरी टा नै, ओकर बाप-माय काबा आ पुतलीबाइ सेहो ओतए जाइत छल आ पलिया बना कऽ धारक पानिसँ छोट लत्तीकेँ पानि पटा कऽ खेती करैत छल। दुपहरिया आ रातिमे बेरा-बेरी पहरा दैत छल। बरख भरिमे आठ-दस हजार टाका अही तरहे भऽ जाइत छलै। मुदा कतेक रास बिन कालक पानि पड़ैसँ धारक पानि बढ़ि जाइत छल। मोहनदास संगे एहन दू बेर भेल छलै। कनी-कनी कऽ बड़का अवसाद आ निराशा ओकरा भीतर बैसए लगलै। जइ दिन कस्तूरी देवदासकेँ जन्म देलक, ओइ राति मोहनदास अप्पन घर नै घुरल। ओ कठिना धारक बालुपर निचाट पड़ल आकाशक सून-सपाटकेँ ताकि रहल छल। संजोगेसँ ओइ राति सेहो अमावशक राति छल, जै राति देवदासक जन्म भेल। प्रसवक काल एक बेर तँ एहन भऽ गेलै जे कस्तूरी मरत की जीत। नालक गड़मे फँसि गेलासँ बच्चा अधबीचेमे रहि गेल छल आ प्रसव करबै लेल आएल बिलसपुरहिन घबरा कऽ कष्टमे बेहोश कस्तूरीकेँ मुइल घोषित कऽ देलक। आन्हर भऽ गेल माय पुतलीबाइ आ टीबीसँ खोँखी करैत बाप काबा दास, दुनू अप्पन बेटा मोहनदासकेँ ताकैत रहल, मुदा ओ कतए भेटतियै? ओ तँ ओइ राति कठिना धारक रेतमे, अमावशक आकाशकेँ कोनो मुर्दा जना घूरि रहल छल, अप्पन भीतर जीवनक कोनो चिह्न ताकि रहल छल। हुनकर देहक नसमे ओइ राति खून नै, अमावशक कारि अन्हार बहि रहल छल। आ हुनकर सुन्न भेल मगजमे नीन नै, ओ डराएल सपना उमड़ि-घुमड़ि रहल छल, जे कोनो भ्रष्ट आ पतित भऽ गेल व्यवस्थाक कोखिसँ जन्म लैत अछि। मोहनदास ओइ राति धारक कातमे बेहोश छल,  तइसँ ओकरा अप्पन बाप काबा आ माय पुतलीबाइक टेर सुना नै पड़लै आ नै कस्तूरीक कानब; आ नहिये भिनसरे चारि बजेक आसपास अप्पन नवजात बेटा देवदासक कानब। भोरक सुरुज ऊपर आबि गेल छल, जखैन रौदक आँच गामसँ एक किलोमीटर दूर कठिना धारक रेतमे सुतल मोहनदासक नीन आ मूर्च्छा तोड़लक। मोहनदास कतेक काल धरि धीपल रेतपर ओहिना पड़ल रहल। ओकर देह पाटल छलै आ स्मृति मिज्झड़ छलै। ओकरा ई बुझबामे कनेक काल लगलै जे ओ अप्पन घरक ओसार आ आंगनमे नै, कठिनाक ओइ रेतपर पड़ल अछि, जतए किछु दिवस पहिने ओ मतीरा, ककड़ी, खरबूज आ कुम्हर-टमाटर रोपने छल आ कालक पानिसँ उगडुम धारक पानि सभटा गीरि गेल छलै। मोहनदास जखन घर घुरल तँ ओतए गामक कतेक रास लोक ठाढ़ छल। स्त्रीगण सेहो छलै। लागैत छल जे सभ कियो ओकरे लऽ कऽ गप करैत छल। किएकि ओकरा देखिये कऽ सभ चुप भऽ गेल आ एकाएकी सभ कियो ओतएसँ चलि गेल। "पूत खाली दयऊक किरपासँ बचल। गामक लोक तँ तुलसी-गंगाजल लऽ कऽ आबि गेल छल।” माय पुतलीबाइ आँचरसँ नोर पोछैत कहलखिन। "जा कऽ देखि लियौ। देउता सन झलकैए।' मोहनदास ओइ सोइरी घर गेल, जाइमे कस्तूरी एखने किछु काल पहिने मृत्युक मुँहसँ बहार भऽ अप्पन नेनाक संग खाटपर सुतल छल। बोरसीमे गोइठाक संग नीम-अजवाइन जड़ैत छल आ कोठरीमे तकर धुआँ भड़ल छल। कस्तूरी थाकल आँखिसँ मोहनदासकेँ देखलक। ओकरा देखबेमे एतेक असहायता आ ग्लानि छलै जे मोहनदासक करेज धकसँ रहि गेलै। एकटा आर पेट आजुक दिन घरमे जन्म लऽ लेलक। आब कमसँ कम छह-आठ मास धरि सभ दिन आध सेर गायक दूधक इंतजाम करैए पड़त। कस्तूरीक लेल मास भरि देसी सोंठ, गुड़ आ घी आ हरदिक संग भात। छठ्ठी, बरहों आ पसनी (अन्नप्राशन) मे लोकक खुआबैक खर्चा सेहो। मुदा तखने मोहनदासक नजरि कस्तूरीक बगलमे सुतल बच्चापर पड़ल। मोट-सोंट, गोल-मटोल बच्चा निश्चिन्त भऽ माएसँ सटि कऽ सुतल छल। बड़ सुन्नर आ अबोध। सतमे कोनो देवताक बच्चा लागैत छल। मोहनदासक भीतर पहिलुक बेर एक बापक संवेदना जन्म लेलक। हुनकर आँखि बच्चापर सँ नै हटैत रहए। तखने बाहर ओसारेसँ काबाक चिकरैक अबाज सुनाइ पड़ल। "सीताराम डाकिया आएल छल। कोनो कारड देने छल।' मोहनदास देखलक, एहि जिलाक सभसँ पैघ कोलियरीसँ नोकरीक लेल इंटरव्यू लेटर आएल अछि। मोहनदास लग पछिला कतेक माससँ एहन तरहक कार्ड नै अबैत छल। तँ की रातिमे कठिना धारक रेतमे जे किछु ओ सोचैत छल, ओकरे कोनो भनक आकाशक कोनो ग्रह-नक्षत्रकेँ लागि गेल छलै? कोनो देवता हुनकर दुख आ आफत जानि गेल?  की कस्तूरी तँ नै जे आइ भिनसरे बेटा जन्म देलक, वएह सतमे कोनो देवदूत अछि जे अप्पन जन्मक संग अप्पन परिवारक लेल एकटा नबका जीवनक केवाड़ खोलि रहल अछि। ओरियंटल कोल माइंसकेँ पठाओल गेल आ रोजगार कार्यालयक मार्फत ओकरा भेटल इंटरव्यू कार्डमे मोहनदासकेँ एकटा नबका भविष्यक भोर झिलमिलाइत लखा दैत छल। कतेक काल बाद ओकर हृदएमे फेरसँ आशाक एकटा हरियरका नरम दूबि उगै लागल। ओइ राति मोहनदास नीक जना नै सुति सकल। अप्पन जीवनक जै गाछकेँ ओ एकटा ठुट्ठ बुझऽ लागल छल, ओइमे कतौसँ फेर नबका पात बहरा रहल छल। ओरियंटल कोल माइंसमे ओइ दिन ओ साक्षात्कारक कालसँ एक घंटा पहिने पहुँचि गेल छल। अप्पन कुलदेवी मलइहा माय आ सतगुरु कबीरदासजीक नाम जपैत ओकर भीतर एहि बेर एकटा अलगे आत्मविश्वास छल। कोनो तरहेँ नोकरी भेटैक जोश। एक घंटाक लिखित परीक्षा छल, फेर एक घंटाक अंतरालक बाद शारीरिक परीक्षा। मोहनदास भरि मोनसँ आ जान लगा कऽ जुमि गेल। एक घंटाबला लिखित परीक्षा ओ आध घंटासँ कम्मे कालमे पूरा कऽ लेलक। प्रश्न बड़ आसान छलै आ ओकर जवाब तँ ओतए नीचामे लिखल छलै। बस सही उत्तरपर सहीक चेन्ह लगाबैक छलै। एकर बाद १५०० मीटरक दौड़,  भागि कऽ चलब, मैदानक पाँच चक्कर लगाबैक, आँखिक परीक्षण, रंगकेँ चिन्हबाक आदिक शारीरिक परीक्षामे दू घंटा लगलै। मोहनदास एतए ककरोसँ उन्नैस नै छल। साँझ चारि बजे कोलियरीक भरतीक दफ्तर दरवाजासँ डेढ़ सए प्रतियोगीमे सँ चुनल गेल पाँचटा नाम पुकारल गेल, ओइमे पहिलुक नाम मोहनदासक छल। मोहनदासक हृदए धरधड़ कऽ रहल छलै। एकटा एहन गप भऽ रहल छल। आब कतेक जल्दी ओकर जीवनक अनिश्चितताक अंत होइबला छलै। सभ मास ओकरा दरमाहा  भेटतै। घरमे सभ दिन चूल्हि जरतै। आ तरकारी बनतै। बाप आ मायक इलाज हेतै। देवदासक लालन-पालन आ पढ़ाइ नीकसँ हेतै। कस्तूरीकेँ मजूरीमे दोसरा जकाँ नै खटऽ पड़तै। कोलियरीक बाबू मोहनदाससँ हुनकर सभटा सर्टिफिकेट आ मार्कशीट जमा करेलक मुदा बी.ए. मार्कशीट देखैत ओ कहलक, "आंय हो, एखन धरि कोना नै अहाँ नोकरीक जोगाड़ कऽ सकलिऐ? एकरामे तँ अहाँकेँ थोड़-बेस लमरा-पहुँच कैलासँ कोनो नीक सन नोकरी भेट जैतियै।” "ज्वाइनिंग कहियासँ होएत?” जखन मोहनदास पुछलक तँ जवाबमे बाबू कहलखिन, "ज्वाइनिंगे बुझू। ऐ हफ्तामे भीतरे-भीतर कागजी काज पूरा भऽ जाएत आ अगिला हफ्ता धरि नियुक्ति पत्र अहाँक पतापर पठा देल जाएत।...बेसीसँ बेसी पंद्रह दिन लगा कऽ चलू।” मोहनदासक घरमे एकटा नब युग आबि गेलै। पोस्ट आफिसक खातामे जे दू हजार टका छल तइसँ मोहनदास नबका मसहरी, एक सेर देशी घी, चिन्नी, सोंठ, किछु नब बरतन आ कस्तूरी आ देवदासक लेल किछु कपड़ा किनलक। अपना लेल सेहो ओ नील रंगक जींसक पैंट, टेरिकॉटक चौखाना बनल अंगा, तीस टकाक पर्स आ पाँच-पाँच टकाक दू टा रूमाल किनलक। परसूकेँ कहि कऽ ओ रोज भिनसरे आध सेर दूधक सेहो व्यवस्था कऽ देलक। गाममे ई गप हुअए लागल जे मोहनदासकेँ आखिरीमे ओरियंटल कोल माइंसमे नीक सन नोकरी भेट गेल अछि। गाममे जे सभ ओकरासँ सोझ मुँह गप नै करैत छल, सेहो ओकरासँ मेल-जोल बढ़ाएब शुरू कऽ देलक। जे सभ ओकर मेहनति आ पढ़ैक हँसी करैत छल, सेहो नीकसँ बाजब शुरू कऽ देलक, "ई तँ हेबाके छलै। एहन डिग्री आ पढ़ाइक बाद मोहनदास कहिया धरि खाली बैसितियै।” किछु लोक सभ ईहो टिप्पणी केलक, "असलमे मोहनदास जै बंसहर-पलिहा जातिक अछि, ओकरा आब रिजर्वेशनमे राखि देल गेल छै। नौकरी ओकरा कोटासँ भेटल छै किएकि ऐ जातिक कोनो दोसर लड़का बी.ए. छेबे नै करै।” ओइ हफ्ता मोहनदासक घरमे एक बेर खीर सेहो बनल आ एक बेर आलू-मटरक मसल्हा सेहो। माय पुतलीबाइ अप्पन आँखिक अन्हारकेँ बिसरि गेली आ आंगुरसँ छूबि-हथोड़िया दऽ सूपमे पसरल दालि आ चाउरसँ कांकोड़ बिछै लागल। तोड़ीक तेल आ नून-अमचुरसँ लाल मिरचाइक चटनी सेहो बनौलक। बाप काबादास गणेश छाप मंगलूरी बीड़ीक पूरा कट्टा आ नबका जहाज छाप सलाइक डिबिया किनलक, जकर काठीकेँ रगड़पट्टीमे आस्तेसँ घिसलासँ फर्रसँ आगि जरि जाइत छल। घरक बाहर ओसारपर बैसल, सुट्टा मारैत काबा कतेक राति भोकारि पारि कऽ कबीरदासक भजन गओलक आ ओकरा नै तँ एक्को बेर खोँखी भेलै आ नहिये खूनक संग कफ बाहर निकललै। एक दिन भोरे-भोर आन्हर पुतलीबाइ आंगनमे खुशीसँ घूमि-घूमि कऽ नाचैत जोर-जोरसँ गाबऽ लागल, "टोरबा-पुतऊ की कोठरिया माझे अलोपी मइना खोंथा डारिस हबै। भाग आइस, कलेस गइस...!!! किसमत जागिस...' जै हो मलइहा माइ...! तोराले गोर  लागी सतगुरू  महराज...!!! जै हो...जै हो!' सभ कियो देखलक जे मोहनदासक आन्हर मायक आँखि अलोपी मैनाक जे खोता कस्तूरी-देवदासक कोठरीमे देखने छल, ओ सत छल। मोहनदास दोसर हफ्तासँ कोलियरीक चिट्ठीक बाट जोहै लागल। मुदा ओइ हफ्ता डाकिया नै आएल। एकर बादक हफ्ता सेहो बीति गेल। बीस-बाइस दिन भऽ गेल छलै। पता चललै जे कांसाकोड़ाक कंचलमल शर्माक बेटा संतोष कुमार शर्माकेँ चिट्ठी पहिने भेट गेलै आ ओ नोकरी सेहो ज्वाइन कऽ लेलक। मोहनदास बेचैन भऽ गेल। ओ राज्य परिवहनक बस पकड़लक आ कोलियरी पहुँचल। भर्ती दफ्तरमे ओ बाबू कहलक जे एखन लेटर पठाओल जा रहल अछि। पोस्ट तीन टा छल, चुनल गेल छल पाँच टा लोक। मुदा जगह नै बढ़ाओल गेल तँ दू कैंडिडेट कटत। मोहनदास डरि गेल। ओकर झाइ पड़ल चेहरा देखि कऽ बाबू भरोस देलकै, उम्मीद अछि जे दू टा पोस्ट बढ़ि जाएत आ नै बढ़त तँ मोहनदासक नाम नै कटत किएकि लिस्टमे हुनकर नाम पहिल अछि। मोहनदास घुरि गेल। बाबू ओकरा एकाध मास इंतजार करै लेल कहलक आ पूरा भरोसा देलक। मुदा मोहनदासक भीतर किछु मिझा गेलै। ओकरा चिन्ता हुअए लगलै जे परसू मास बितैत दिनक आधा सेरक दूधक पूरा हिसाब देबऽ पड़तै। जोशमे एतए-ओतए किछु उधारी सेहो भऽ गेल छलै। आब सभटा कोना चुकाओल जाएत? कस्तूरी ओकरा ढाढ़स राखऽ लेल कहलक। माय पुतलीबाइ मलइहा माइसँ गछलक। हँ, काबा दास किछु दिनसँ चुप रहऽ लागल। रातिमे भजन गाओल ओ छोड़ि देलक आ ओकरा खोँखी आबऽ लगलै। डेढ़ मासक बाद मोहनदास फेर ओरियंटल कोल माइंस गेल। कतेक प्रतीक्षा केलाक बाद बाबू ओकरा भरती दफ्तरक भीतर आबऽ देलक। ओ ओकरा आर इंतजार करैले कहलक। मुदा ऐ बेर ओ इंतजार लेल कोनो अंतिम समए नै बतेलक। ऐ बेर ओकर आवाजमे पहिने सन अपनापा सेहो नै छलै। मोहनदास चलैसँ पहिने जखन जोर दऽ कऽ पुछलक तँ अमनसँ ओ कहलक, "ओना पता करबाक जरूरत की अछि? चिट्ठी भेटत तँ अपने आप पता भऽ जाएत।' फेर ओे कहलक, "असलमे ओइ दिन कैंडीडेटकेँ सलेक्ट करै लेल बिहारसँ कोल इंडियाक जे अफसर आएल छल, ओ एकटा पोस्टपर अप्पन जमायकेँ फिट कऽ देलक। सभटा ऊपर बलाक खेल छी।'  मोहनदासक आंखिक आगू अन्हार पसरऽ लगलै। अगिला मास मोहनदास फेर पता करै लेल गेल। कतौसँ किछु भऽ जाए। भोर दस बजेसँ लऽ कऽ दुपहरियाक साढ़े तीन बजे धरि ओकरा दफ्तरक बाहर बैसल रहऽ पड़लै। चपरासीक चिरौती-बिनतीक बाद जखन ओकरा भीतर आबऽ देल गेलै तँ पता चललै जे पहिलुक बाबू छुट्टीपर गेल अछि आ ओकरा ठाम जे दोसर मोट-सन बाबू ओकर काज देखि रहल अछि, ओकरा ओइ फाइलक कोनो जानकारी नै छै। मोहनदासकेँ अप्पन मार्कशीट आ सभटा ओरिजनल प्रमाणपत्र केँ लऽ कऽ चिन्ता हुअए लगलै। जखन ओ एकरा दिया पुछलक तँ नबका मोटका बाबू कहलकै जे अहाँक सर्टिफिकेटक हम की करब? नौकरी नै देल जाइत तँ रजिस्ट्रीसँ आपस घुरा देब, नै तँ अगिला बेर आबि कऽ अप्पन संगे लऽ जाएब। मोहनदास फेर घुरि गेल। ओकरा मोनक सभसँ भीतरी कोन सेहो नीकसँ बुझि गेल छल जे ओकर जिनगीक ठूठ गिरहसँ जै नबका कोंपरक कल्लै आश्चर्यसँ बहराइबला छलै, आकाशक देवता ओकर बिपतिकेँ जानि, ओकरा लेल दयाक जे बून खसेने छल, तकरा दुर्भाग्य आ भ्रष्टाचारक लू झरका देलक। आब कोनो आस कतौसँ नै बाँचल अछि। जौँ ओकरा संग कोनो नकदी जमा-पूँजी होइत तँ कोनो दलालसँ भेट कऽ टका ऊपर धरि पहुँचा कऽ ओ ऐ नोकरी केँ लऽ लितए। मोहनदासक हालत गामक धनीक लोक सभसँ पहिने बुझि गेल आ पहिने जकाँ ओ फेर ओकर पढ़ाइ आ प्रतिभाक हँसी करऽ लागै गेल। ओइ दिन मोहनदास अपमानक कड़ू घूँट पीब कऽ रहि गेल, जाइ दिन पंडित छत्रधारी तिवारीक बेटा विजय तिवारी, जे ओकरा संगे कॉलेजमे पढ़ैत छल आ थर्ड डिवीजनसँ बड़ मुश्किलसँ बी.ए. पास भऽ सकल छल मुदा अप्पन ससुरक तिकड़म आ  पैरवीसँ पुलिसमे सब-इंस्पेक्टर भऽ गेल छल, ओकरापर गरैज कऽ बाजल आ कहलक, "मोहना, परसुए हम सरकारी योजनामे दस टा महीस किनने छी। डेयरी खोलि रहल छी। जौं ठीक बुझी तँ महीससक सानी-भुस्सा, गोठुल्लाक काज कस्तूरी भऊजीक संग सम्हारि लिअ। सभ मास पहिलुक तारीखकेँ दरमाहा तँ भेटबे करत, इंदिरा आवास योजनामे हम अहाँकेँ मकान पक्का सेहो करबा देब। भऊजीक मोन लागि जाएत हम्मर गोसारेमे।' "सोचि कऽ बताबैत छी।' मोहनदास जबाव देलक आ अप्पन भीतर उठैत अपमानक आगिकेँ मुँह घुमा कऽ नुका लेलक। विजय तिवारीक मुँहसँ कस्तूरीक नाम सुनि कऽ ओकरा भीतर कतौ अप्पन असहायता आ निर्बलताक अहसास गहींर भऽ गेलै आ एकटा डर सेहो दिमागक कोनो-कोनामे आबि गेलै। जल्दिये किछु करए पड़तै, नै तँ ओकर परिवार टूटि कऽ छिड़िया जाएत। कोनो एहन काज, जे ओकरा वशमे छै। जकरा लेल ककरो मदति आ तिकड़मक जरूरत नै छै। कस्तूरीक सुन्नर चेहरा आ विजय तिवारीक शातिर आँखि बेर-बेर ओकरा आगू घुमि जाइत छल। ओइ काल ओ सोचि लेलखिन जे ओ अप्पन प्रमाणपत्र, अंक-सूची आ दोसर कागचक पता करबा लेल ओरियंटल कोल माइंस नै जाएत, किएकि ओइ कागचक टुकड़ाक मूल्य कतौ किछु नै रहि गेल छलै। जइ आधारपर नोकरी भेटैत छल आ सरकारी योजनाक लाभ उठाओल जाइत छल, ओ आधार ओकरा सन लोक लग नै छलै। मोहनदास ओइ राति खेनाइ खेलाक बाद घरमे नै सुतल। कस्तूरीसँ भोरमे घुरैक गप कहि कऽ कन्हापर कोदारि राखि आ रोपा टांगि कऽ ओ कठिना धार दिस चलि गेल आ भरि राति कोनो बताह प्रेत सन मतीरा, खरबूज, कुम्हर, तरबूज, टमाटर, भट्टा, ककड़ी लगाबैक लेल पलिया बनाबैमे लागल रहल। भोर साढ़े चारि बजेक आसपास, जखन उत्तरबरिया कात ध्रुवतारा अप्पन पूर्ण आभामे दोसर ताराक एक्का-एक्की मिझैलाक बाद चमकि रहल छल, मोहनदास अप्पन माथ आ छातीक पसेनाकेँ पोछि आ कनी-कनी बुलैत कठिनाक धारमे ठाढ़ भऽ गेल। अंजुलिमे पानि भरि ओ अप्पन माथपर छींटा मारलक आ दुनू हाथ जोड़ि कऽ बाझल गड़सँ कहलक, "बस अहाँ टा आँखि नै मोरब कठिना माय। तोहरा मलइहा मायक किरिया। हमर बेटा देवदासक किरिया। हमर पसेनाक उपजिसँ अप्पन पेटक जठर आगि नहि बुझाएब कठिना माय...! नै तँ...दयऊ कसम, बीच असाढ़ तोहर धारमे बाल-बच्चा संग कूदि कऽ तोहर पेट हम भरि देब...।' मोहनदास जखन सतगुरु कबीरक नाम जपैत कठिना धारसँ बाहर आबि रहल छल, तखैन ओकर आँखिसँ बहैत नोर कठिना धारक पानिमे ढबकि कऽ बहि रहल छल, जतए छोट-छोट कोतरी माँछ ओकर नूनकेँ चीखै लेल एक-दोसरासँ उपरौंझ कऽ रहल छल। जखन मोहनदास घर पहुँचल तँ ओ देखलक जे कस्तूरी पूरा आंगैनकेँ गोबरसँ नीपि कऽ राखने छल, माय पुतलीबाइ सूपपर मतीरा, कद्दू, खरबूजक बिया पसारि कऽ अप्पन  आंगुरसँ लजबिज्जीकेँ बीछ रहल छै, बाप काबादास परछीक कोनमे बाँसक कमची निकालैमे लागल छै आ मांझ आंगनमे ओकर डेढ़ बरखक बेटा देवदास खुरपीसँ घासकेँ छिलैक बुतरूबला खेल खेलाइमे मगन छै। ओकर बुलबाक आहट सुनि कऽ पुतलीबाइ अप्पन मूड़ीकेँ ऊपर केलक आ किछु नै लखा दैबला आँखिसँ अप्पन बेटाक आँखि मिला कऽ मुस्काइत कहलक, "जानैत छीहीं मोहना, आइ अलोपी मैनाक खोतामे मादा मैना दुइ टा बच्चाकेँ जन्म देलक।' पुतली बाइ बेसी खुश हेतियै जौं लखा दैतियै जे ओकर गप सुनि ओकर बेटा मोहनदासक चेहरापर खुशी कोन तरहेँ दिपदिपा रहल छै। ओइ दिन-रातिमे बियारीक बाद मोहनदास कस्तूरी आ देवदासकेँ सेहो अपना संग कठिना धार लऽ गेल। कस्तूरी अप्पन डाँड़क खोंइछ-ओटनीमे कतेक रास बीया राखने छल आ कान्हपर देवदासकेँ बैसैने छल। मोहनदासक कान्हपर रांपी, कोदारि आ बगइक डोरी छल। देवदास कनी कालमे धारक कातक ठाढ़ हवाक झोंकसँ भेटैबला सुखमे डूमि कऽ गहींर नीनमे सूति गेल छल। कस्तूरी आ मोहनदास बीया उगाबैक पलियामे गोबरक खाद दऽ कऽ अलगे-अलग फल आ तरकारीक पलहा बनाबैमे लागल रहल। दुइ घंटामे काज भऽ गेल। कस्तूरी जखन बासन-घैलासँ कठिनासँ पानि आनि कऽ बीयाकेँ पलियामे पटा रहल छल तँ आकाशमे टिमटिमाइत रहल ताराक इजोतमे मोहनदास ओकर सुंदरताकेँ देखि रहल छल। आकाशक नक्षत्रसँ झरैत सलेटी चानीक मद्धिम आभामे कस्तूरीक पिरसाम देह मलइहा मायक मढ़ियाक  बाहर राखल ओइ पुरनका पाथरक मूर्ति जेहन देखा दऽ रहल छल, जे बन्हेरू पोखरिकेँ कोड़ै काल निकलल छल आ जेकरा आनि कऽ लोक सभ ओतए राखि देने छल। देह, डांड़, बांहि, छाती, जांघक ठीक ओहिने कटाव आ ओहने सुंदरता, जना कोनो कारीगर छेनी-हथौरी लऽ कऽ मन लगा कऽ बरखमे हुनका रकम-रकम गढ़ने छल। अधासँ बेसी राति बीत गेल छल। टिटहरी आ पनकुकरीक शोर कखनो-काल सुना जाइत छल। कठिना धारक भारी हवाक भारीपनमे कस्तूरीक देहसँ उठएबला पसेनाक गंध मोहनदासकेँ चारू दिससँ घेर लेलक। ई स्त्री ओकरासँ ब्याह करै काल कोन सपना देखने हेती आ ओकरा की भेटल? भोरसँ लऽ कऽ राति धरि, सभ दिन बिना नागाक, सभ सुख-दुख, हारी-बेमारी, भूख-प्यासमे ओ ओकरा संग ठाढ़ छल। मोहनदासक मनमे कस्तूरीक लेल बड़ सहानुभूति आ आत्मीयता आएल। ओ ओकरा एकटकसँ ताकि रहल छल। कस्तूरी बासनकेँ बालुपर टिकौलक आ ठाढ़ भऽ कऽ अप्पन जूड़ा बान्हऽ लागल। मोहनदास उठि कऽ ओकरा लग आएल। कस्तूरी चुप छल। "ऐ कस्तूरी, कबड्डी खेलब?' मोहनदास मुस्काइत कहलक, "हू...तू...तू...!' ओ कस्तूरीक बाँहिकेँ पकड़ि लेने छल आ ओकर बगली आ पेटमे गुदगुदी करऽ लागल छल। कस्तूरी ओकरासँ छूटऽ लेल छटपटा रहल छल, "ईह...ईह...! देवदास जागि गेल...! की करैत छी? छोड़ि... दिअ...हमरा छोड़ू ने!...छोड़ू...! ' कस्तूरी देखलक जे मोहनदास ओकरा छोड़ैबला नै अछि तँ ओ ओकरा धक्का दऽ देलक आ घुरि कऽ कठिना धार दिस भागि गेल। ओ कोनो उल्लसित स्वतंत्र हिरण जना तरपान मारि नक्षत्रक धुँआइत सिलेटीक फरीच्छमे नीचाँ दूर धरि पसरल धारक रेतपर दौगि रहल छल। "आ...आ...आ...! हमरा छुबौ....तँ जानियह....! आ...आ....!' ओकर आवाज सभ पल दूर भेल जाइत छल आ ओ प्रति पल छाह बनैत अन्हारमे बिलायल जा रहल छल। "हू...तु...तू...तू...तू...तु...तू...तू...! ' कहैत मोहनदास खूब जोरसँ ओकरा दिस दौगल। कस्तूरी आओर दम लगौलक। मोहनदास सभ पल ओकरा लग आबि रहल छल। ओ आर जोर लगेलक आ कठिना धारक काते-कात, पानिमे छप-छप करैत पूरा जी जानसँ भागैत चलि गेल। "आ...आ...! छूबौ हमरा...तँ हम मानब!' ओकर दम फुलऽ लगलै। ओ हाँफै लागल छल। मोहनदासक "हू...तु...तू...तू...' सभ क्षण ओकर कान लग आबि रहल छलै। कस्तूरी बुझै छल जे ओ आब मोहनदासकेँ आर छका नै सकत, तकर बादो ओ आखिरी जोर लगौलक। मुदा तखैन धरि एक्के तरपानमे मोहनदास ओकरा पकड़ि लेलक। दुनू कठिनाक धारमे छपाकसँ खसि गेल। "छोड़ू...! ऐ...छोडू!' ओ झगड़ा कऽ रहल छल आ मोहनदासक ऊपर पानि उपछि रहल छल मुदा मोहनदास ओकरा छोड़बाक बदला ओकरासँ आर सटल जा रहल छल। धारक भारी हवामे दुनूक साँस एक-दोसरामे पैसि रहल छल। ओ जेहन तरहे ओकर देहमे अप्पन आंगुरसँ गुदगुदी कऽ रहल छल, ओइसँ कस्तूरीक गरसँ निर्बन्ध किलकारी आ हँसी बहरा रहल छलै। ओकर छद्म प्रतिरोध शिथिल भऽ रहल छलै आ ओ सेहो मोहनदासकेँ दूर धकेलैबला दिखावाक संगे ओकर देहसँ सटल जा रहल छल। तहिना जना लोहाक कोनो टुकड़ा कोनो चुंबकसँ सटै छै। मोहनदास कठिनाक पानिमे ओकरा खसा देलक आ ऊपर ससरि कऽ कहलक, "अहाँ बड़ नीक छी आ कतेक सुंदर छी कस्तूरी...! देखू हमरा...!' आ ओकर चुम्मा लेलक। वैशाख ओ गरम रातिमे दूर आकाशमे टिमटिमाइत ताराक मद्धिम सलेटी इजोतमे, कठिना धारक शीतल पानिमे दूइटा जवान गोंछ वा पाढ़िन मांछ सन ओ दुनू उद्दाम आ निर्बंध छपाछप कऽ रहल छल। बीच-बीचमे कस्तूरीक कंठसँ उठैत हँसी आ किलकारीक संग मोहनदासक भारी साँससँ निकलैत "हू...तु...तू...तू' रातिक निस्तब्धताकेँ चिरैत जाइत छल। थाकल कस्तूरी धारसँ घुरि कऽ भीजल नुआमे देवदासक बगलमे सुति गेल छल मुदा मोहनदास नै जानि कतेक राति धरि कठिनाक कातक उथली धारमे पड़ल रहल, आकाशक देवताकेँ तकैत गाबि रहल छल, "पंछी-परौना बाजैत अछि, कतऽ गेल हे संगवारी, करउंदा फरत हे... करउंदा फरत हे... मोर बाली हे उमरिया करउंदा बता तोला के...' ओकर गरमे आइ एकटा एहन सुर उतरि गेल छल जे दूर धरि सुना दैत पुनकुकरी आओर टिटहरीक बोल सेहो ओकरा लग आबि कऽ संगत करऽ लागल। बादमे शारदा ओइ रातिक स्मृति बनल। ओइ बरख तँ ककड़ी-तरबूज आओर तरकारीक फसिल नीक भेल मुदा बाजारक भाव मंदा भऽ गेलासँ कमाइ कोनो खास नै भेलै। कस्तूरी गढ़ुआरि छल, तकर बादो ओकरा दोसरक मजूरी करहि पड़ैत छलै। मोहनदास सेहो जी-तोड़ मेहनति करैत छल। कठिना एक बेर तँ ओकर प्रार्थना सुनि नेने छल मुदा बादमे बेसी काल ओइमे पानि झझा जाइत छलै। काबा दासक खोँखी बढ़ऽ लागल छलै। मुदा छह किलोमीटर दूरक कस्बाक सरकारी अस्पतालमे एकटा खूब नीक  डॉक्टर आबि गेल छलै, डॉक्टर वाकणकर, आ मोहनदासकेँ बुझेलै जे टी.बी.क लेल अस्पतालमे मुफ्त दबाइ भेटैत छै आ ओकर बापकेँ एकर पूरा कोर्स करबाक चाही। ओ हुनका एकटा पॉलिथिनक थैलीमे दू मासक दवाइक खुराक भरि कऽ देलक मुदा काबादास नै तँ समएपर खुराक लैत रहथिन आ नै परहेजे राखि सकैत छल। खाइ-पीबैक कोनो ठेकान नै छलै। माय पुतलीबाइ आँखिक लेल डॉक्टर वाकणकरकेँ कहलखिन जे आपरेशनसँ चालीस पैसा इजोत घुरि जाएत मुदा एकरामे आठ-दस हजार टकासँ कम खर्चा नै होएत। ओ मोहनदासकेँ भरोस देलक जे जौं जिलामे कोनो नीक आ ईमानदार कलेक्टर आओत तँ ओ ओकर ई काज करबा देत। मुदा बरखपर बरख बीतल गेल, एहन कलेक्टर नै आएल। बीचमे एक बेर एकटा स्वयंसेवी संस्था दिससँ एकटा लड़का आ एकटा लड़की बंसहर-कबीरपंथीक बस्तीमे आबऽ लागल छल। ओ कस्तूरी आ मोहनाकेँ कतेक रास आश्वासन देलक जे जल्दिये ओ एहन कोनो व्यवस्था कऽ देत जे ओकर परिवार अप्पन गुजर-बसर आरामसँ करऽ लगताह। ओ कतेक रास अर्जी सेहो लिखलक आ ओकरापर मोहनदाससँ दस्तखत सेहो करौलक। मुदा फेर ओकर आएब-जाएब बंद भऽ गेल। पता लागल जे दुनू लड़का-लड़की ब्याह कऽ लेलक आ ओ दिल्ली चलि गेल। ओ लड़की आब कोनो टी.बी. चैनलमे काज करैत अछि  आ लड़का दिल्लीमे अप्पन आइ.ए.एस. फूफाक सहायतासँ झुग्गीमे रहैबला लोक लेल काज करैए बला संस्था खोलि लेल छल आ देश-विदेशक जत्रापर रहैत अछि। समए बितैत गेल। मोहनदास आ कस्तूरी अप्पन मेहनत-मजूरी आ मलइहा मायक कृपासँ कोनो तरहेँ दिन गुजरि रहल छल। शारदा दू बरखक भऽ गेल छल आ देवदास चारि बरखक। काबा आब बेसी-खाटेपर पड़ल रहैत छल। बगइक डोरी कखनो काल बना दैत छल वा बाँसक कमची निकालि दैत छल। मुदा ओकर खोँखी बढ़िते जा रहल छल। ओकर छातीक एक-एकटा पसली गानल जा सकैत छल। कतेक बेर ओ खांसैत छल तँ कफक संग खूने टा नहि, लागैत छल जना मौसक थक्का बाहर निकलि रहल छै। ओम्हर डॉक्टर वाकणकरक बदली नेता-अफसर कोनो दोसर जिलामे करा देलक। आब मोहनदासकेँ अस्पतालसँ टी.वी.क मुफ्त गोली दैबला कियो नै छल। जखन कखनो ओ जाइत छल, ओ अगिला हफ्ता आबैक लेल कहि देल जाइत छल। ओकर बाप काबा एतेक कमजोर भऽ गेल छल जे खोँखीकेँ थूकलाक बाद, खाटपर पटायल-पटायल चुपचाप धरतीकेँ देखैत रहैत छल। चिट्ठा आ माँछी धरि ओकर खोँखीक आवाज चिन्है छल, पता नै कतएसँ मटा आ चिट्टा ओकर कफ दिस झुंड बना कऽ दौगि पडै़त छल। एक दिन तँ काबा हदसि गेल, जखन ओ देखलक जे ओकर खोंखी करैत देरी गिद्धा माछी भिनभिन करैत ओकर चारू दिस मँडराबऽ लागल। काबाकेँ अप्पन अंत लग आएल बुझाए लागल छल। ओ पुतलीबाइकेँ शोर करऽ चाहलक मुदा जखैन धरि ओकर आवाज निकलितियै, तकर पहिने खोँखीक तेज दौरा ओकर गरकेँ फेरसँ अप्पन कब्जामे कऽ लेलकै आ आखिरमे ओतएसँ आँजुर भरि खून आ मांसक थक्का बाहर निकलल। मोहनदास आ कस्तूरी कठिनाक पलिया संभारै लेल जा चुकल छल, घरमे आन्हर पुतलीबाइ टा छल। ओ दौगि गेल, गिरैत-पड़ैत आएल आओर अप्पन वर काबाकेँ छुबि-छुबि कऽ कानऽ लागल। पौरुकासँ ओकर ठेहुनमे गठिया धऽ लेने छल। काबा बेहाल रहै। कनी देरीमे ओकर साँस स्थिर भेल आ पुतलीबाइकेँ बिगड़ि कऽ कहलक, "कानै किए छी अंधरी?  हम एखन नै मरब। देवदासक बियाह आ शारदाक दुरागमन करा कऽ मरब। ...नै कानू।' काबा अप्पन कनियाँक माथपर हाथ फेरलक आ कहलक, "दिअ हमरा बाँस आ कुरहड़ि। हम बाँसक कमची छील दैत छी।' (एतए ठाढ़ भऽ जाउ एक मिनट। अहाँकेँ लागि रहल हएत जे हम हिन्दीक कथा सम्राट प्रेमचंदक सवा-सएम जयंतीक अवसरपर समकालीन कथाक बहन्ने अहाँकेँ कोनो सवा सए बरख पुरनका खिस्सा सुना रहल छी। मुदा सत तँ ई अछि जे एहन पुरनका आ पिछड़ल शैली, शिल्प आ भाषामे जे ब्यौरा अहाँक सोझाँ अछि ओ ओइ कालक अछि जखन ९/११ सितम्बर भऽ गेल छै आ न्यूयार्कक दूटा गगनचुंबी व्यापारिक इमारतकेँ खसबाक प्रतिक्रियामे एशियाक दूटा सार्वभौमिक, संप्रभुता-संपन्न राष्ट्रकेँ गर्दा आ कदबामे बदलल जा चुकल छै। जखन अमेरिका आ योरोपक भगवानक अलावा बाकी सभटा भगवानक आगू प्रार्थनामे ओ लिबल फासिस्ट, आतंकवादी आ सांप्रदायिक मानि लेल गेल। तेल, गैस, पानि, बजार, नफा आ लूटैक लेल सभ दिन कंपनी, सरकार आ सेना समुच्चा धरतीपर दिन-राति निर्दोषक हत्या कऽ रहल छै। एहन काल, जकरा नीक जना देखू तँ जे कोनो सत्तामे छै, ओइमे सभ कियो एक-दोसराक क्लोन अछि। सभ कियो एक सन ब्रांडक उपभोक्ता अछि। ओ एक्के जेहेन चीज पाबि रहल अछि, एक्के सन चीज खा रहल अछि। एक्के सन कंपनीक कारमे घुमि रहल अछि। सभक एकाउंट एक्के सन बैंकमे अछि। सभक जेबीमे एक्के सन ए.टी.एम. वा क्रेडिट कार्ड आ हाथमे एक्के सन मोबाइल अछि। एक्के सन ब्रांडक शराबक नशामे अखबारक पेज एकसँ लऽ कऽ पेज थ्री धरि वा टीवी क एकटासँ लऽ कऽ सत्तर चैनल धरि ओ एक्के जेहन धूर्त, निर्लज्ज आ नांगट अछि। नीकसँ देखू, हुनकर चमड़ीक रंग आ हुनकर भाषा एक्के अछि।) (अनुवर्तते............) बालानां कृते ज्योति सुनीत चौधरी वनभोज बीतल आब तीला संक्रान्ति आयल छल नभ पर कान्ति सूर्यदेव जगला आसकति त्यागि ओढ़ल बदरीक तोसक के उघारि मुदा अखनो छल बसात जड़ौने रौदक आसरा सोहनगर बनौने सौर्यऊष्मा कतेक सहज आ मृदुल तपल गर्मीलय दिन छल दूर ई नमल रौद कमे दिन रहि गेल रोज आनन्द वनभोजक लेब करब लाई मुरही क नस्ता खायब बगिया भरि रस्ता फेर पहुँचि क बीच बाधमे भानस करब खुजल आकासमे खेल कबड्रडी आ लुक्का छिप्पी भोजन करब बनाकय पॉंती घुरब घरदिस जहन सूर्य हेता पछबार पहुँचब घर पहिने हुअसऽ अन्हार बच्चा लोकनि द्वारा स्मरणीय श्लोक १.प्रातः काल ब्रह्ममुहूर्त्त (सूर्योदयक एक घंटा पहिने) सर्वप्रथम अपन दुनू हाथ देखबाक चाही, आ’ ई श्लोक बजबाक चाही। कराग्रे वसते लक्ष्मीः करमध्ये सरस्वती। करमूले स्थितो ब्रह्मा प्रभाते करदर्शनम्॥ करक आगाँ लक्ष्मी बसैत छथि, करक मध्यमे सरस्वती, करक मूलमे ब्रह्मा स्थित छथि। भोरमे ताहि द्वारे करक दर्शन करबाक थीक। २.संध्या काल दीप लेसबाक काल- दीपमूले स्थितो ब्रह्मा दीपमध्ये जनार्दनः। दीपाग्रे शङ्करः प्रोक्त्तः सन्ध्याज्योतिर्नमोऽस्तुते॥ दीपक मूल भागमे ब्रह्मा, दीपक मध्यभागमे जनार्दन (विष्णु) आऽ दीपक अग्र भागमे शङ्कर स्थित छथि। हे संध्याज्योति! अहाँकेँ नमस्कार। ३.सुतबाक काल- रामं स्कन्दं हनूमन्तं वैनतेयं वृकोदरम्। शयने यः स्मरेन्नित्यं दुःस्वप्नस्तस्य नश्यति॥ जे सभ दिन सुतबासँ पहिने राम, कुमारस्वामी, हनूमान्, गरुड़ आऽ भीमक स्मरण करैत छथि, हुनकर दुःस्वप्न नष्ट भऽ जाइत छन्हि। ४. नहेबाक समय- गङ्गे च यमुने चैव गोदावरि सरस्वति। नर्मदे सिन्धु कावेरि जलेऽस्मिन् सन्निधिं कुरू॥ हे गंगा, यमुना, गोदावरी, सरस्वती, नर्मदा, सिन्धु आऽ कावेरी  धार। एहि जलमे अपन सान्निध्य दिअ। ५.उत्तरं यत्समुद्रस्य हिमाद्रेश्चैव दक्षिणम्। वर्षं तत् भारतं नाम भारती यत्र सन्ततिः॥ समुद्रक उत्तरमे आऽ हिमालयक दक्षिणमे भारत अछि आऽ ओतुका सन्तति भारती कहबैत छथि। ६.अहल्या द्रौपदी सीता तारा मण्डोदरी तथा। पञ्चकं ना स्मरेन्नित्यं महापातकनाशकम्॥ जे सभ दिन अहल्या, द्रौपदी, सीता, तारा आऽ मण्दोदरी, एहि पाँच साध्वी-स्त्रीक स्मरण करैत छथि, हुनकर सभ पाप नष्ट भऽ जाइत छन्हि। ७.अश्वत्थामा बलिर्व्यासो हनूमांश्च विभीषणः। कृपः परशुरामश्च सप्तैते चिरञ्जीविनः॥ अश्वत्थामा, बलि, व्यास, हनूमान्, विभीषण, कृपाचार्य आऽ परशुराम- ई सात टा चिरञ्जीवी कहबैत छथि। ८.साते भवतु सुप्रीता देवी शिखर वासिनी उग्रेन तपसा लब्धो यया पशुपतिः पतिः। सिद्धिः साध्ये सतामस्तु प्रसादान्तस्य धूर्जटेः जाह्नवीफेनलेखेव यन्यूधि शशिनः कला॥ ९. बालोऽहं जगदानन्द न मे बाला सरस्वती। अपूर्णे पंचमे वर्षे वर्णयामि जगत्त्रयम् ॥ १०. दूर्वाक्षत मंत्र(शुक्ल यजुर्वेद अध्याय २२, मंत्र २२) आ ब्रह्मन्नित्यस्य प्रजापतिर्ॠषिः। लिंभोक्त्ता देवताः। स्वराडुत्कृतिश्छन्दः। षड्जः स्वरः॥ आ ब्रह्म॑न् ब्राह्म॒णो ब्र॑ह्मवर्च॒सी जा॑यता॒मा रा॒ष्ट्रे रा॑ज॒न्यः शुरे॑ऽइषव्यो॒ऽतिव्या॒धी म॑हार॒थो जा॑यतां॒ दोग्ध्रीं धे॒नुर्वोढा॑न॒ड्वाना॒शुः सप्तिः॒ पुर॑न्धि॒र्योवा॑ जि॒ष्णू र॑थे॒ष्ठाः स॒भेयो॒ युवास्य यज॑मानस्य वी॒रो जा॒यतां निका॒मे-नि॑कामे नः प॒र्जन्यों वर्षतु॒ फल॑वत्यो न॒ऽओष॑धयः पच्यन्तां योगेक्ष॒मो नः॑ कल्पताम्॥२२॥ मन्त्रार्थाः सिद्धयः सन्तु पूर्णाः सन्तु मनोरथाः। शत्रूणां बुद्धिनाशोऽस्तु मित्राणामुदयस्तव। ॐ दीर्घायुर्भव। ॐ सौभाग्यवती भव। हे भगवान्। अपन देशमे सुयोग्य आ’ सर्वज्ञ विद्यार्थी उत्पन्न होथि, आ’ शुत्रुकेँ नाश कएनिहार सैनिक उत्पन्न होथि। अपन देशक गाय खूब दूध दय बाली, बरद भार वहन करएमे सक्षम होथि आ’ घोड़ा त्वरित रूपेँ दौगय बला होए। स्त्रीगण नगरक नेतृत्व करबामे सक्षम होथि आ’ युवक सभामे ओजपूर्ण भाषण देबयबला आ’ नेतृत्व देबामे सक्षम होथि। अपन देशमे जखन आवश्यक होय वर्षा होए आ’ औषधिक-बूटी सर्वदा परिपक्व होइत रहए। एवं क्रमे सभ तरहेँ हमरा सभक कल्याण होए। शत्रुक बुद्धिक नाश होए आ’ मित्रक उदय होए॥ मनुष्यकें कोन वस्तुक इच्छा करबाक चाही तकर वर्णन एहि मंत्रमे कएल गेल अछि। एहिमे वाचकलुप्तोपमालड़्कार अछि। अन्वय- ब्रह्म॑न् - विद्या आदि गुणसँ परिपूर्ण ब्रह्म रा॒ष्ट्रे - देशमे ब्र॑ह्मवर्च॒सी-ब्रह्म विद्याक तेजसँ युक्त्त आ जा॑यतां॒- उत्पन्न होए रा॑ज॒न्यः-राजा शुरे॑ऽ–बिना डर बला इषव्यो॒- बाण चलेबामे निपुण ऽतिव्या॒धी-शत्रुकेँ तारण दय बला म॑हार॒थो-पैघ रथ बला वीर दोग्ध्रीं-कामना(दूध पूर्ण करए बाली) धे॒नुर्वोढा॑न॒ड्वाना॒शुः धे॒नु-गौ वा वाणी र्वोढा॑न॒ड्वा- पैघ बरद ना॒शुः-आशुः-त्वरित सप्तिः॒-घोड़ा पुर॑न्धि॒र्योवा॑- पुर॑न्धि॒- व्यवहारकेँ धारण करए बाली र्योवा॑-स्त्री जि॒ष्णू-शत्रुकेँ जीतए बला र॑थे॒ष्ठाः-रथ पर स्थिर स॒भेयो॒-उत्तम सभामे युवास्य-युवा जेहन यज॑मानस्य-राजाक राज्यमे वी॒रो-शत्रुकेँ पराजित करएबला निका॒मे-नि॑कामे-निश्चययुक्त्त कार्यमे नः-हमर सभक प॒र्जन्यों-मेघ वर्षतु॒-वर्षा होए फल॑वत्यो-उत्तम फल बला ओष॑धयः-औषधिः पच्यन्तां- पाकए योगेक्ष॒मो-अलभ्य लभ्य करेबाक हेतु कएल गेल योगक रक्षा नः॑-हमरा सभक हेतु कल्पताम्-समर्थ होए ग्रिफिथक अनुवाद- हे ब्रह्मण, हमर राज्यमे ब्राह्मण नीक धार्मिक विद्या बला, राजन्य-वीर,तीरंदाज, दूध दए बाली गाय, दौगय बला जन्तु, उद्यमी नारी होथि। पार्जन्य आवश्यकता पड़ला पर वर्षा देथि, फल देय बला गाछ पाकए, हम सभ संपत्ति अर्जित/संरक्षित करी। 8.VIDEHA FOR NON RESIDENTS 8.1.Original Poem in Maithili by Kalikant Jha "Buch" Translated into English by Jyoti Jha Chaudhary 8.2.Maithili Short-story “Sidha Mahavir” by Gajendra Thakur re-written in English by the author himself. Original Poem in Maithili by Kalikant Jha "Buch" Translated into English by Jyoti Jha Chaudhary Kalikant Jha "Buch" 1934-2009, Birth place- village Karian, District- Samastipur (Karian is birth place of famous Indian Nyaiyyayik philosopher Udayanacharya), Father Late Pt. Rajkishor Jha was first headmaster of village middle school. Mother Late Kala Devi was housewife. After completing Intermediate education started job block office of Govt. of Bihar.published in Mithila Mihir, Mati-pani, Bhakha, and Maithili Akademi magazine. Jyoti Jha Chaudhary, Date of Birth: December 30 1978,Place of Birth- Belhvar (Madhubani District), Education: Swami Vivekananda Middle School, Tisco Sakchi Girls High School, Mrs KMPM Inter College, IGNOU, ICWAI (COST ACCOUNTANCY); Residence- LONDON, UK; Father- Sh. Shubhankar Jha, Jamshedpur; Mother- Smt. Sudha Jha- Shivipatti. Jyoti received editor's choice award from www.poetry.comand her poems were featured in front page of www.poetrysoup.com for some period.She learnt Mithila Painting under Ms. Shveta Jha, Basera Institute, Jamshedpur and Fine Arts from Toolika, Sakchi, Jamshedpur (India). Her Mithila Paintings have been displayed by Ealing Art Group at Ealing Broadway, London. Dying For The Feast Dear uncle, you’re great ! Dying for the feast Your stomach is a PORVARI of Dhaka (Bangladesh) Teeth is like the dam of Farakka A pile of food you do  eat Tummy is puffed with fried treats Aunt vilifies you as a sick one Granny hurts herself in dudgeon The tight fitting vest does detonate Dear uncle, you’re great ! Want to eat  up all solus Always loaded in excess As soon as you hear of cooking You create clutter for eating You make me tired while eating boiled potato sweet Dear uncle, you’re great ! While chewing dry chapatti Your lips works like Sakari factory Two kilos of flour is cooked for you A big bowl of curry of aubergine too After finishing all, by opening mouth, asking for more yet Dear uncle, you’re great ! This ghost is to be called uncle Found in cemetery, he is that sparkle Keeps his mouth open showing teeth Face looks like filled up vessel indeed Buch falls by laughing loud as soon as he hears it Dear uncle, you’re great ! An order was placed by the aunt Tying kilos of food in front Uncle started to Jajimanika as she said The towel was the only luggage The long lasting day of the hot weather of Jeth Dear uncle, you’re great ! Maithili Short-story “Siddha Mahavir” by Gajendra Thakur re-written in English by the author himself. Gajendra Thakur (b. 1971) is the editor of Maithili ejournal “Videha” that can be viewed at http://www.videha.co.in/ . His poem, story, novel, research articles, epic – all in Maithili language are lying scattered and is in print in single volume by the title “KurukShetram.” He can be reached at his email: ggajendra@airtelmail.in The Proved Mahavir (Siddha Mahavir) 1 Beside the road was Anmana Didi’s house. It was a hut not a house. In every courtyard of the village there happens to be a house of a widow. But when the family expands then some of the members rotate the front of their house and some other encircles their home. And sometime latitude and longitude of that widow’s home changes; and that last option was applicable to Anmana Didi’s house. But the house of Anmana Didi is beside the road. She is originally from the other side’s Majkothia quarter of the village, but her house has shifted near to my house. They are majority people. The daughter’s of nearby places go to Anmana Didi’s house during day time, during midday, for picking louse from the head of Anmana Didi. To whom she is nearer in lineage that would be known after she dies. During rites whoever is nearer in lineage would do last-rites and he would get the dwelling-land of Anmana Didi. But that possibility has gone now. Anmana Didi was married in Jhanjharpur. There she kept her sister’s son as her own son. But the love for her father’s village still remains in her heart. She comes in her hut, once a month at least. She cooks herself. But at Jhanjharpur she has a big house and a big courtyard. But she did not invite her son and daughter-in-law even once to her father’s village. The whole village calls a widow Didi, if she resides in her father’s village and ‘aunty of abc vilage’, if she resides in her husband’s village. So the whole village calls her Anmana Didi. Beside the hut she has constructed a temple of Mahavir Bajarangwali. From the beginning it was not a pucca one but she made it pucca by selling grains. Earlier it was a hut-temple. Whenever Anamana Didi went to Jhanjharpur, she did shut its gate. Later on she started locking it with chain and lock. But the temple of Bajarangwali remained open for people, all the time. The village daughters did cleaning work. It was converted to a pucca one, later on. The ceiling of the temple was casted even later; earlier it was a raw one. She wanted the floor to be plastered but the estimate came into the way. The home of the Lord would trinkle in rainy season? But for casting and plaster-work money would come from where? Today I feel that we all do hard labour; that we do not have affinity with anybody; Oh, I do not get time. But Anamana Didi’s day to day work, devoted to God from morning to evening. But for her adopted son she often finds time. In between she goes to her village situated near Jhanjharpur bazaar. She maintains her house at Jhanjharpur. Then again she comes to village…her father’s village. See… your attempt to become Sthitaprajna by reading Gita. Look at Anamana Didi? The answer to my salute by Anamana Didi; be happy, she replies. No happiness or sorrow in her voice! No desire for any respect, no desire for getting any help. She goes to the Dhanuktola, Dusadhtola quarters of the village. The people of these tolas give her respect. They do not have any desire to grab her dwelling land. I see Anama Didi’s face smile, when she visits these tolas. She never asks for any help from the people of her own tola. The people of her tola will help once and would tell their wives. And after that for years these wifes would remind Anamana Didi of the favour they had done. -Didi, it is work for Lord Hanumanji, his temple is beside the road. We all go by the road and worship him by bowing our head. We would work without accepting any wages. -No dear, the pilgrimage and God’s work should not be undertaken in this manner. I am not a queen and would never construct temple or would never dig a pond without paying wages to the labourers. But the casting and plaster work? 2 Adjacant to this roadside temple one acre of land is in the name of Anamana Didi. After casting work is over she will register this land in the name of God. Whatever harvest would be cropped, it would be used in the maintenance of the temple. From some time a nephew from the neighbourhood is after Anamana Didi. -Didi, I am your nearest nephew. This land is adjacent to my house. Earlier the people gave land adjacent to road to people of lower caste and to widows. But now the time has changed. Now the value of the house and land beside the road has increased. You will die someday. Then this land would be bone of contention among all of the people of our quarter of the village. You will die someday- tell this to a woman whose husband is alive! But you can tell it to a widow; although she had adopted a boy and has full-fledged family having daughter-in-law and grandchildens; okay sir. -This land has been earmarked for God. This is the only source of my livelihood. Whatever I save after cutting my expense from my livelihood that is preserved for casting and plaster of God’s house. The land and earning of Jhanjharpur property is for son and daughter-in-law. So how could I… -Again Didi. You did not understand the thing. Till your death keep all these property; earn your livelihood. I ask if the people of our quarter of village should quarrel after your death? You would like it? And I am your nearest nephew… See, look at the adage. The nephew works as a salaried person in some distant town. Whoever lives in village desist fom talking with Didi fearing she might ask for some help. But whenever this nephew comes to village he comes to meet her. And this time when I was in Jhanjharpur he went there too. That I know now how it came to his mind! Now I understand. But how casting of this temple-ceiling would be done. I would get it plastered later on. The ceiling of the temple leaks so much, this year it leaked even more. The raw ceiling did not work even for two years. That would be replaced by casting by Karim Miyan and Lakshmi Mistri; then only it would work. See what happens. The nephew comes to Didi’s house even more often. -Alright Didi, give me half the land. In half acre your nephew’s dwelling would get settled and land for God would also be saved. -But there would not be any outlet to road for your dwelling land. Then what would be the benefit? -Leave it. Even now I am coming through our quarter of the village. Now-a-days only it has become a fashion to construct house near crossings and beside the road. But on crossings or beside the road only the house of God would be appropriate. Ten thousand rupees for half an acre, whenever you ask I would pay; the registry of land would be in addition to that. -Alright. Then I will think over it and then I will inform you. Once I would have to ask my son and daughter-in-law. What is the way out? The walls of God’s house are blackened with tampblack. Leave the wall, the statue of Lord Bajrangwali is also blackened with tampblack. Anmana Didi was thinking over all these. She was thinking and thinking and then the morning birds started singing. I will sell the land, what other option, no? The son and daughter-in-law said- “Dear Mother. That land is for God and that we know since beginning. But look, he should not be doing any mischief.” -What mischief? He is paying price on the upperside. For God’s temple ten thousand rupees is not a small amount. I had only this much out of my lifetime savings. This half-constructed temple would remain as it is? I would talk to Lakshmi Mistri and Karim Miyan. Ten thousand rupees is sufficient not only for casting and plaster but this is sufficient for constructing a boundary-wall too! Estimate was made. The work would start from the following day of registry; and it would be completed before the rainy season of Bhadra. 3 Look, registry was completed. Dasji is expert in paperwork; it is a proved fact- my God, it must have been a complete work, perfect paper must have been prepared. “This is the first time that I have got the opportunity of preparing papers for God!” Dasji’s spoken line made Anamana Didi ecstatic. People tell lie that the faith of people in God has diminished. Look at this Dasji. I never met him before and not have even a distant introduction. Two registry paper’s- one half-acre land registry in the name of the nephew and the second half-acre registry in the name of God! But he has prepared the papers charging only one fee. He told in clear terms- Didi, I would not accept the fee for the registry-papers prepared in the name of God. Whoever comes for help in times of need are our real ones; the adage by old people is always held true; and they had said this looking at these similar instances. Anamana Didi is in a fit. She had come to village on foot. In excitement she is not able to think anything else. She brings out everything from the temple building. From tomorrow work will begin. Laxmi Mistri has kept there all his implements for work. Anamana Didi has already preserved the empty vessels for this work. Pond is nearby, although full of lichen and moss; but the people of the village had made some space clear at various places of pond so that their buffalows could drink the water. But there is chaos in the morning. Karim Mian has been stopped from doing work. Who stopped him? Inform my nephew. But after registry he proceeded directly from Jhanjharpur to his place of work. The registry papers are also with Anamana Didi. The work has been objected by tne nephew’s brother-in-law. He will not allow the boundary wall to be constructed. But yesterday at the time of registry he was also present, then? He is saying that the land beside the road is of his brother-in-law. Look, then this temple would also be in his name? He must be in some confusion. The nephew would return in the beginning of the next month, after he withdraws his salary. For a month Anamana Didi did detours of Jhanjharpur and the village. The son and daughter-in-law told her that it might have been a ploy by the nephew. No, do not tell that. Dasji seemed so good-natured. Look what happens. 4 -Didi, you are having some confusion. -Then this temple is also yours, no? -No Didi. This temple is of God and would remain that of God. And the lord of the other side of land is also God. -Then this hut is also yours, no? -No Didi. Till you live remain there. Who will stop you? -Boy, I am obliged. And the outlet for the backside land is neither from our quarter of the village nor from the roadside. -Didi. Go through my land, who will stop you? And in the cultivated areas everybody passes through the raised dividing line. Those farmers who do not have land beside the road go to their land or not? You are talking in a divisive tone of the new generation people. -But all these you did not tell me early on. -Didi. I told you all these. But it appears that you are in a confusion. If you do not remember I would call Dasji, after all he is a neutral outsider. -Alright. He is also part of the plot. -He charged fee for only one registry and you are saying that he is part of the plot? The voice of the nephew became harsher, he became restless and uttering loud words departed quickly. 5 Today’s morning of Anamana Didi at his father’s village is similar to that morning of his husban’s place the day on which she got widowed. Today the daughter of the village did not come for licking louse out of the head of Anamana Didi. The night long discussion of Anamana Didi with Lord Bajrangwali has just concluded in the morning. The people hearing this in night tried to lull their children by patting. Somebody came in the morning and suggested for arbitration with the help of village panchayat. But Anamana Didi was angry with Lord Bajrangwali. “I was planning to sell only half the land but he got registered the land beside the temple and the land that is in the name of God now has no approach from the temple. Not only talk about the connection, there is not any way to go to that land from the temple? And look to this Bajrangwali. Mahavir! What power is inside him? After half-starving for forty years I brought him from hut to pucca building. Let casting be done, let boundary wall be constructed, only that was my desire and that too for him. Ha… 6 That morning Anamana Didi was standing at the door of his nephew. The people thought that now more strife would ensue. But look, what is happening? The brother of Lakshmi has brought rickshaw. Anamana Didi is going to Jhanjharpur accompanied by her nephew! Who said this? She does not have a word with anybody. I even asked for arbitration but she almost disagreed. Alright, Lakshmi’s brother told all this. Yes, one who has gone to call the rickshaw must have told him that the rickshaw is to go to Jhanjharpur. Dasji had to prepare one more registry paper. By looking at Anamana Didi he started trembling, O God, what she would tell to him. But Anamana Didi was in so much anger that she did not tell anything. She swallowed her anger. She registered the backside land too in the name of her nephew. And she returned after registry from Jhanjharpur station to Jhanjharpur bazaar to her son and daughter-in-law. Lakshmi’s brother returned to village. He took two passengers to Jhanjharpur station but came back with only one passenger. He brought a message also, message from Lakshmi Mistri and Karim Miyan. From tomorrow morning the work would be started, again? 7 The boundary wall was constructed barring the temple of God and Anamana Didi’s house. I have told Anamana Didi, nobody would touch her house till she dies. House or hut, first year it got partly damaged. In second rainy season the bamboo support fell. But Anamana Didi did not come. The message was given to her by a person from the village. The casting work of temple could not be completed. Anamana Didi went to Haridwar and returned to Jhanjharpur. People asked her- -What you asked from the Ganges. -This blind faith should go out of my mind. -And what you sacrificed to the Ganges. -My anger, I gave it to the Ganges. Anamana Didi said only this- “What would you do? There is no power in Lord Bajrangwali. Let the hut fall. The hut with a bamboo support- how long would it last. 8 Many years passed. Not many years but only five years. The nephew had come to village, after withdrawing his monthly salary. In the morning after he got himself relieved near the pond he came near to the handpump to clean his hand. He sat there with his water-pot. Then a pain he felt near his chest, and he could not be saved. People began to talk, look at the curse of Anamana Didi; Didi had wept and wept that day. Before that day there was no power inside the statue of Bajrangwali. But a curse with deep-hurt feeling does work. That day the Bajrangwali awoke. Today he has shown his power. But Anamana Didi told the messenger that there happens to be no life inside the stone. It must have been a heart attack. Near her house a day before a Marwari had a heart attack. This attack comes with anxiety. Here there are qualified doctors and this Marwari fellow’s life was saved. In village due to delay in treatment people lose their lives. So I, in this old age, am living with my son and daughter-in-law in Jhanjharpur. 9 The village is mostly inhabited by the cattle-grazer Brahmins. When I saw the game of buffalows fighting with pig during Sukharati festival I lost interest in the game of Polo. The onslaught by the bhang-intoxicated buffalows over the purchased pig from the Dom caste of village Samiya is worth watching. The buffalo grazers sat over the buffalo in control is also unimaginable. The participation of Dom caste in festivals is apparent. From making big baskets to fans for summer season; there is participation of Dom caste in public life. And the the meat for marriage party is obtained through slaughter house of Muslim tola. The head of sacrificed animal is retained by the Durga Pooja committee. Look where your mind is wandering. The Muslims do slaughter in normal days, the half cut neck remains intact. He keeps the head and skin. And the people from the buffalo-grazer Brahmins perform devotional songs on weekdays or on a more auspicious twentyfour-hour round-the-clock devotional song running event, using the drum that is constructed using those skins. And that devotional song is going to be performed today before the Lord Bajrangwali. Devotional song is to be performed today before the proved Mahavira! The big flag is flying, that is there since the Ramanavmi festival. The bell alongwith some other gadget is ringing. The flag of the Hanuman temple is flying. It is evening time, the buffalo grazers have arrived. If there is any festival, be it the Sukharati festival or Ramnavmi or any other festival, the devotional song is performed before Lord Hanuman. And that is matter of faith of the people of the village. And that is being performed today. The smoke of fire is trying to separate the insect from the body of cattle. One person has come with another for a solemn vow. The villagers have got plastered the Hanumanji temple. The casting of ceiling has also been completed. The number of persons who do not want to repay their debt can simply deny it by touching the verandah of the temple, but there is only one brave exceptional person. He says- the solemn vow is meant for breaking the vow. Yes brother, if one is free from debt by simply touching the verandah of the temple then what is the problem. But it is the only exception. People have started calling Anamana Didi as Anamana mystic (Baba). She died some years back. She did not return to village. To reduce the effects of evil eye over the dwelling land of her nephew some priest has suggested that a cow should always be there at the door and that cow is there. The passers by see the cow grazing green grass and that takes out the effect of evil eye. Hanumanji’s flag is flying high. It is evening time. Brother Gonar is playing the drum ceaselessly. Now Anamana mystic’s word is accepted by many. True, before the statue of Hanumanji there are two sets of devotees. One set of people are of rationalistic thought- Anamana mystic registered the remaining half acre of the land to her nephew that instilled fear and anxiety in her nephew’s heart. He could not resist this attack from Anamana Didi. True, there cannot be any power in a stone-statue. But the second group has all faith in this Hanumanji, this Hanumanji is a proved one, this Hanumanji is a live one. Look, challenge an ant and she would bite you even though it may mean death for her. And Anamana Didi challenged Lord Mahavir and how he would leave the challenge? Brother Gonar is playing drum ceaselessly. He would please Hanumanji, no doubt about that. The intoxicant bhang-pill is working, his eyes are intoxicated and his hands are ceaselessly playing the drum. And if seen from his eyes, the stone statue of the proved Mahavir would look like a live one as though soul has entered into it. Input: (कोष्ठकमे देवनागरी, मिथिलाक्षर किंवा फोनेटिक-रोमनमे टाइप करू। Input in Devanagari, Mithilakshara or Phonetic-Roman.) Output: (परिणाम देवनागरी, मिथिलाक्षर आ फोनेटिक-रोमन/ रोमनमे। Result in Devanagari, Mithilakshara and Phonetic-Roman/ Roman.) English to Maithili Maithili to English इंग्लिश-मैथिली-कोष / मैथिली-इंग्लिश-कोष  प्रोजेक्टकेँ आगू बढ़ाऊ, अपन सुझाव आ योगदान ई-मेल द्वारा ggajendra@videha.com पर पठाऊ। Top of Form विदेहक मैथिली-अंग्रेजी आ अंग्रेजी मैथिली कोष (इंटरनेटपर पहिल बेर सर्च-डिक्शनरी) एम.एस. एस.क्यू.एल. सर्वर आधारित -Based on ms-sql server Maithili-English and English-Maithili Dictionary. १.भारत आ नेपालक मैथिली भाषा-वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक शैली आ २.मैथिलीमे भाषा सम्पादन पाठ्यक्रम १.नेपाल आ भारतक मैथिली भाषा-वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक शैली

अ.नेपालक मैथिली भाषा वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक  उच्चारण आ लेखन शैली (भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक धारणाकेँ पूर्ण रूपसँ सङ्ग लऽ निर्धारित) मैथिलीमे उच्चारण तथा लेखन १.पञ्चमाक्षर आ अनुस्वार: पञ्चमाक्षरान्तर्गत ङ, ञ, ण, न एवं म अबैत अछि। संस्कृत भाषाक अनुसार शब्दक अन्तमे जाहि वर्गक अक्षर रहैत अछि ओही वर्गक पञ्चमाक्षर अबैत अछि। जेना- अङ्क (क वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ङ् आएल अछि।) पञ्च (च वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ञ् आएल अछि।) खण्ड (ट वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ण् आएल अछि।) सन्धि (त वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे न् आएल अछि।) खम्भ (प वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे म् आएल अछि।) उपर्युक्त बात मैथिलीमे कम देखल जाइत अछि। पञ्चमाक्षरक बदलामे अधिकांश जगहपर अनुस्वारक प्रयोग देखल जाइछ। जेना- अंक, पंच, खंड, संधि, खंभ आदि। व्याकरणविद पण्डित गोविन्द झाक कहब छनि जे कवर्ग, चवर्ग आ टवर्गसँ पूर्व अनुस्वार लिखल जाए तथा तवर्ग आ पवर्गसँ पूर्व पञ्चमाक्षरे लिखल जाए। जेना- अंक, चंचल, अंडा, अन्त तथा कम्पन। मुदा हिन्दीक निकट रहल आधुनिक लेखक एहि बातकेँ नहि मानैत छथि। ओ लोकनि अन्त आ कम्पनक जगहपर सेहो अंत आ कंपन लिखैत देखल जाइत छथि। नवीन पद्धति किछु सुविधाजनक अवश्य छैक। किएक तँ एहिमे समय आ स्थानक बचत होइत छैक। मुदा कतोक बेर हस्तलेखन वा मुद्रणमे अनुस्वारक छोट सन बिन्दु स्पष्ट नहि भेलासँ अर्थक अनर्थ होइत सेहो देखल जाइत अछि। अनुस्वारक प्रयोगमे उच्चारण-दोषक सम्भावना सेहो ततबए देखल जाइत अछि। एतदर्थ कसँ लऽ कऽ पवर्ग धरि पञ्चमाक्षरेक प्रयोग करब उचित अछि। यसँ लऽ कऽ ज्ञ धरिक अक्षरक सङ्ग अनुस्वारक प्रयोग करबामे कतहु कोनो विवाद नहि देखल जाइछ। २.ढ आ ढ़ : ढ़क उच्चारण “र् ह”जकाँ होइत अछि। अतः जतऽ “र् ह”क उच्चारण हो ओतऽ मात्र ढ़ लिखल जाए। आन ठाम खाली ढ लिखल जएबाक चाही। जेना- ढ = ढाकी, ढेकी, ढीठ, ढेउआ, ढङ्ग, ढेरी, ढाकनि, ढाठ आदि। ढ़ = पढ़ाइ, बढ़ब, गढ़ब, मढ़ब, बुढ़बा, साँढ़, गाढ़, रीढ़, चाँढ़, सीढ़ी, पीढ़ी आदि। उपर्युक्त शब्द सभकेँ देखलासँ ई स्पष्ट होइत अछि जे साधारणतया शब्दक शुरूमे ढ आ मध्य तथा अन्तमे ढ़ अबैत अछि। इएह नियम ड आ ड़क सन्दर्भ सेहो लागू होइत अछि। ३.व आ ब : मैथिलीमे “व”क उच्चारण ब कएल जाइत अछि, मुदा ओकरा ब रूपमे नहि लिखल जएबाक चाही। जेना- उच्चारण : बैद्यनाथ, बिद्या, नब, देबता, बिष्णु, बंश, बन्दना आदि। एहि सभक स्थानपर क्रमशः वैद्यनाथ, विद्या, नव, देवता, विष्णु, वंश, वन्दना लिखबाक चाही। सामान्यतया व उच्चारणक लेल ओ प्रयोग कएल जाइत अछि। जेना- ओकील, ओजह आदि। ४.य आ ज : कतहु-कतहु “य”क उच्चारण “ज”जकाँ करैत देखल जाइत अछि, मुदा ओकरा ज नहि लिखबाक चाही। उच्चारणमे यज्ञ, जदि, जमुना, जुग, जाबत, जोगी, जदु, जम आदि कहल जाएबला शब्द सभकेँ क्रमशः यज्ञ, यदि, यमुना, युग, यावत, योगी, यदु, यम लिखबाक चाही। ५.ए आ य : मैथिलीक वर्तनीमे ए आ य दुनू लिखल जाइत अछि। प्राचीन वर्तनी- कएल, जाए, होएत, माए, भाए, गाए आदि। नवीन वर्तनी- कयल, जाय, होयत, माय, भाय, गाय आदि। सामान्यतया शब्दक शुरूमे ए मात्र अबैत अछि। जेना एहि, एना, एकर, एहन आदि। एहि शब्द सभक स्थानपर यहि, यना, यकर, यहन आदिक प्रयोग नहि करबाक चाही। यद्यपि मैथिलीभाषी थारू सहित किछु जातिमे शब्दक आरम्भोमे “ए”केँ य कहि उच्चारण कएल जाइत अछि। ए आ “य”क प्रयोगक सन्दर्भमे प्राचीने पद्धतिक अनुसरण करब उपयुक्त मानि एहि पुस्तकमे ओकरे प्रयोग कएल गेल अछि। किएक तँ दुनूक लेखनमे कोनो सहजता आ दुरूहताक बात नहि अछि। आ मैथिलीक सर्वसाधारणक उच्चारण-शैली यक अपेक्षा एसँ बेसी निकट छैक। खास कऽ कएल, हएब आदि कतिपय शब्दकेँ कैल, हैब आदि रूपमे कतहु-कतहु लिखल जाएब सेहो “ए”क प्रयोगकेँ बेसी समीचीन प्रमाणित करैत अछि। ६.हि, हु तथा एकार, ओकार : मैथिलीक प्राचीन लेखन-परम्परामे कोनो बातपर बल दैत काल शब्दक पाछाँ हि, हु लगाओल जाइत छैक। जेना- हुनकहि, अपनहु, ओकरहु, तत्कालहि, चोट्टहि, आनहु आदि। मुदा आधुनिक लेखनमे हिक स्थानपर एकार एवं हुक स्थानपर ओकारक प्रयोग करैत देखल जाइत अछि। जेना- हुनके, अपनो, तत्काले, चोट्टे, आनो आदि। ७.ष तथा ख : मैथिली भाषामे अधिकांशतः षक उच्चारण ख होइत अछि। जेना- षड्यन्त्र (खड़यन्त्र), षोडशी (खोड़शी), षट्कोण (खटकोण), वृषेश (वृखेश), सन्तोष (सन्तोख) आदि। ८.ध्वनि-लोप : निम्नलिखित अवस्थामे शब्दसँ ध्वनि-लोप भऽ जाइत अछि: (क) क्रियान्वयी प्रत्यय अयमे य वा ए लुप्त भऽ जाइत अछि। ओहिमे सँ पहिने अक उच्चारण दीर्घ भऽ जाइत अछि। ओकर आगाँ लोप-सूचक चिह्न वा विकारी (’ / ऽ) लगाओल जाइछ। जेना- पूर्ण रूप : पढ़ए (पढ़य) गेलाह, कए (कय) लेल, उठए (उठय) पड़तौक। अपूर्ण रूप : पढ़’ गेलाह, क’ लेल, उठ’ पड़तौक। पढ़ऽ गेलाह, कऽ लेल, उठऽ पड़तौक। (ख) पूर्वकालिक कृत आय (आए) प्रत्ययमे य (ए) लुप्त भऽ जाइछ, मुदा लोप-सूचक विकारी नहि लगाओल जाइछ। जेना- पूर्ण रूप : खाए (य) गेल, पठाय (ए) देब, नहाए (य) अएलाह। अपूर्ण रूप : खा गेल, पठा देब, नहा अएलाह। (ग) स्त्री प्रत्यय इक उच्चारण क्रियापद, संज्ञा, ओ विशेषण तीनूमे लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना- पूर्ण रूप : दोसरि मालिनि चलि गेलि। अपूर्ण रूप : दोसर मालिन चलि गेल। (घ) वर्तमान कृदन्तक अन्तिम त लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना- पूर्ण रूप : पढ़ैत अछि, बजैत अछि, गबैत अछि। अपूर्ण रूप : पढ़ै अछि, बजै अछि, गबै अछि। (ङ) क्रियापदक अवसान इक, उक, ऐक तथा हीकमे लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना- पूर्ण रूप: छियौक, छियैक, छहीक, छौक, छैक, अबितैक, होइक। अपूर्ण रूप : छियौ, छियै, छही, छौ, छै, अबितै, होइ। (च) क्रियापदीय प्रत्यय न्ह, हु तथा हकारक लोप भऽ जाइछ। जेना- पूर्ण रूप : छन्हि, कहलन्हि, कहलहुँ, गेलह, नहि। अपूर्ण रूप : छनि, कहलनि, कहलौँ, गेलऽ, नइ, नञि, नै। ९.ध्वनि स्थानान्तरण : कोनो-कोनो स्वर-ध्वनि अपना जगहसँ हटि कऽ दोसर ठाम चलि जाइत अछि। खास कऽ ह्रस्व इ आ उक सम्बन्धमे ई बात लागू होइत अछि। मैथिलीकरण भऽ गेल शब्दक मध्य वा अन्तमे जँ ह्रस्व इ वा उ आबए तँ ओकर ध्वनि स्थानान्तरित भऽ एक अक्षर आगाँ आबि जाइत अछि। जेना- शनि (शइन), पानि (पाइन), दालि ( दाइल), माटि (माइट), काछु (काउछ), मासु (माउस) आदि। मुदा तत्सम शब्द सभमे ई निअम लागू नहि होइत अछि। जेना- रश्मिकेँ रइश्म आ सुधांशुकेँ सुधाउंस नहि कहल जा सकैत अछि। १०.हलन्त(्)क प्रयोग : मैथिली भाषामे सामान्यतया हलन्त (्)क आवश्यकता नहि होइत अछि। कारण जे शब्दक अन्तमे अ उच्चारण नहि होइत अछि। मुदा संस्कृत भाषासँ जहिनाक तहिना मैथिलीमे आएल (तत्सम) शब्द सभमे हलन्त प्रयोग कएल जाइत अछि। एहि पोथीमे सामान्यतया सम्पूर्ण शब्दकेँ मैथिली भाषा सम्बन्धी निअम अनुसार हलन्तविहीन राखल गेल अछि। मुदा व्याकरण सम्बन्धी प्रयोजनक लेल अत्यावश्यक स्थानपर कतहु-कतहु हलन्त देल गेल अछि। प्रस्तुत पोथीमे मथिली लेखनक प्राचीन आ नवीन दुनू शैलीक सरल आ समीचीन पक्ष सभकेँ समेटि कऽ वर्ण-विन्यास कएल गेल अछि। स्थान आ समयमे बचतक सङ्गहि हस्त-लेखन तथा तकनीकी दृष्टिसँ सेहो सरल होबऽबला हिसाबसँ वर्ण-विन्यास मिलाओल गेल अछि। वर्तमान समयमे मैथिली मातृभाषी पर्यन्तकेँ आन भाषाक माध्यमसँ मैथिलीक ज्ञान लेबऽ पड़ि रहल परिप्रेक्ष्यमे लेखनमे सहजता तथा एकरूपतापर ध्यान देल गेल अछि। तखन मैथिली भाषाक मूल विशेषता सभ कुण्ठित नहि होइक, ताहू दिस लेखक-मण्डल सचेत अछि। प्रसिद्ध भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक कहब छनि जे सरलताक अनुसन्धानमे एहन अवस्था किन्नहु ने आबऽ देबाक चाही जे भाषाक विशेषता छाँहमे पडि जाए। -(भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक धारणाकेँ पूर्ण रूपसँ सङ्ग लऽ निर्धारित) आ. मैथिली अकादमी, पटना द्वारा निर्धारित मैथिली लेखन-शैली

१. जे शब्द मैथिली-साहित्यक प्राचीन कालसँ आइ धरि जाहि वर्त्तनीमे प्रचलित अछि, से सामान्यतः ताहि वर्त्तनीमे लिखल जाय- उदाहरणार्थ-

ग्राह्य

एखन ठाम जकर, तकर तनिकर अछि

अग्राह्य अखन, अखनि, एखेन, अखनी ठिमा, ठिना, ठमा जेकर, तेकर तिनकर। (वैकल्पिक रूपेँ ग्राह्य) ऐछ, अहि, ए।

२. निम्नलिखित तीन प्रकारक रूप वैकल्पिकतया अपनाओल जाय: भऽ गेल, भय गेल वा भए गेल। जा रहल अछि, जाय रहल अछि, जाए रहल अछि। कर’ गेलाह, वा करय गेलाह वा करए गेलाह।

३. प्राचीन मैथिलीक ‘न्ह’ ध्वनिक स्थानमे ‘न’ लिखल जाय सकैत अछि यथा कहलनि वा कहलन्हि।

४. ‘ऐ’ तथा ‘औ’ ततय लिखल जाय जत’ स्पष्टतः ‘अइ’ तथा ‘अउ’ सदृश उच्चारण इष्ट हो। यथा- देखैत, छलैक, बौआ, छौक इत्यादि।

५. मैथिलीक निम्नलिखित शब्द एहि रूपे प्रयुक्त होयत: जैह, सैह, इएह, ओऐह, लैह तथा दैह।

६. ह्र्स्व इकारांत शब्दमे ‘इ’ के लुप्त करब सामान्यतः अग्राह्य थिक। यथा- ग्राह्य देखि आबह, मालिनि गेलि (मनुष्य मात्रमे)।

७. स्वतंत्र ह्रस्व ‘ए’ वा ‘य’ प्राचीन मैथिलीक उद्धरण आदिमे तँ यथावत राखल जाय, किंतु आधुनिक प्रयोगमे वैकल्पिक रूपेँ ‘ए’ वा ‘य’ लिखल जाय। यथा:- कयल वा कएल, अयलाह वा अएलाह, जाय वा जाए इत्यादि।

८. उच्चारणमे दू स्वरक बीच जे ‘य’ ध्वनि स्वतः आबि जाइत अछि तकरा लेखमे स्थान वैकल्पिक रूपेँ देल जाय। यथा- धीआ, अढ़ैआ, विआह, वा धीया, अढ़ैया, बियाह।

९. सानुनासिक स्वतंत्र स्वरक स्थान यथासंभव ‘ञ’ लिखल जाय वा सानुनासिक स्वर। यथा:- मैञा, कनिञा, किरतनिञा वा मैआँ, कनिआँ, किरतनिआँ।

१०. कारकक विभक्त्तिक निम्नलिखित रूप ग्राह्य:- हाथकेँ, हाथसँ, हाथेँ, हाथक, हाथमे। ’मे’ मे अनुस्वार सर्वथा त्याज्य थिक। ‘क’ क वैकल्पिक रूप ‘केर’ राखल जा सकैत अछि।

११. पूर्वकालिक क्रियापदक बाद ‘कय’ वा ‘कए’ अव्यय वैकल्पिक रूपेँ लगाओल जा सकैत अछि। यथा:- देखि कय वा देखि कए।

१२. माँग, भाँग आदिक स्थानमे माङ, भाङ इत्यादि लिखल जाय।

१३. अर्द्ध ‘न’ ओ अर्द्ध ‘म’ क बदला अनुसार नहि लिखल जाय, किंतु छापाक सुविधार्थ अर्द्ध ‘ङ’ , ‘ञ’, तथा ‘ण’ क बदला अनुस्वारो लिखल जा सकैत अछि। यथा:- अङ्क, वा अंक, अञ्चल वा अंचल, कण्ठ वा कंठ।

१४. हलंत चिह्न निअमतः लगाओल जाय, किंतु विभक्तिक संग अकारांत प्रयोग कएल जाय। यथा:- श्रीमान्, किंतु श्रीमानक।

१५. सभ एकल कारक चिह्न शब्दमे सटा क’ लिखल जाय, हटा क’ नहि, संयुक्त विभक्तिक हेतु फराक लिखल जाय, यथा घर परक।

१६. अनुनासिककेँ चन्द्रबिन्दु द्वारा व्यक्त कयल जाय। परंतु मुद्रणक सुविधार्थ हि समान जटिल मात्रापर अनुस्वारक प्रयोग चन्द्रबिन्दुक बदला कयल जा सकैत अछि। यथा- हिँ केर बदला हिं।

१७. पूर्ण विराम पासीसँ ( । ) सूचित कयल जाय।

१८. समस्त पद सटा क’ लिखल जाय, वा हाइफेनसँ जोड़ि क’ ,  हटा क’ नहि।

१९. लिअ तथा दिअ शब्दमे बिकारी (ऽ) नहि लगाओल जाय।

२०. अंक देवनागरी रूपमे राखल जाय।

२१.किछु ध्वनिक लेल नवीन चिन्ह बनबाओल जाय। जा' ई नहि बनल अछि ताबत एहि दुनू ध्वनिक बदला पूर्ववत् अय/ आय/ अए/ आए/ आओ/ अओ लिखल जाय। आकि ऎ वा ऒ सँ व्यक्त कएल जाय।

ह./- गोविन्द झा ११/८/७६ श्रीकान्त ठाकुर ११/८/७६ सुरेन्द्र झा "सुमन" ११/०८/७६ २.मैथिलीमे भाषा सम्पादन पाठ्यक्रम नीचाँक सूचीमे देल विकल्पमेसँ लैंगुएज एडीटर द्वारा कोन रूप चुनल जएबाक चाही: वर्ड फाइलमे बोल्ड कएल रूप: १.होयबला/ होबयबला/ होमयबला/ हेब’बला, हेम’बला/ होयबाक/होबएबला /होएबाक २. आ’/आऽ आ ३. क’ लेने/कऽ लेने/कए लेने/कय लेने/ल’/लऽ/लय/लए ४. भ’ गेल/भऽ गेल/भय गेल/भए गेल ५. कर’ गेलाह/करऽ गेलह/करए गेलाह/करय गेलाह ६. लिअ/दिअ लिय’,दिय’,लिअ’,दिय’/ ७. कर’ बला/करऽ बला/ करय बला करै बला/क’र’ बला / करए बला ८. बला वला ९. आङ्ल आंग्ल १०. प्रायः प्रायह ११. दुःख दुख १२. चलि गेल चल गेल/चैल गेल १३. देलखिन्ह देलकिन्ह, देलखिन १४. देखलन्हि देखलनि/ देखलैन्ह १५. छथिन्ह/ छलन्हि छथिन/ छलैन/ छलनि १६. चलैत/दैत चलति/दैति १७. एखनो अखनो १८. बढ़न्हि बढन्हि १९. ओ’/ओऽ(सर्वनाम) ओ २०. ओ (संयोजक) ओ’/ओऽ २१. फाँगि/फाङ्गि फाइंग/फाइङ २२. जे जे’/जेऽ २३. ना-नुकुर ना-नुकर २४. केलन्हि/कएलन्हि/कयलन्हि २५. तखन तँ/ तखन तँ २६. जा’ रहल/जाय रहल/जाए रहल २७. निकलय/निकलए लागल बहराय/ बहराए लागल निकल’/बहरै लागल २८. ओतय/जतय जत’/ओत’/ जतए/ ओतए २९. की फूरल जे कि फूरल जे ३०. जे जे’/जेऽ ३१. कूदि/यादि(मोन पारब) कूइद/याइद/कूद/याद/ यादि (मोन) ३२. इहो/ ओहो ३३. हँसए/ हँसय हँसऽ ३४. नौ आकि दस/नौ किंवा दस/ नौ वा दस ३५. सासु-ससुर सास-ससुर ३६. छह/ सात छ/छः/सात ३७. की की’/कीऽ (दीर्घीकारान्तमे ऽ वर्जित) ३८. जबाब जवाब ३९. करएताह/ करयताह करेताह ४०. दलान दिशि दलान दिश/दलान दिस ४१. गेलाह गएलाह/गयलाह ४२. किछु आर/ किछु और ४३. जाइत छल जाति छल/जैत छल ४४. पहुँचि/ भेटि जाइत छल पहुँच/भेट जाइत छल ४५. जबान (युवा)/ जवान(फौजी) ४६. लय/लए क’/कऽ/लए कए/ लऽ कऽ/ लऽ कए ४७. ल’/लऽ कय/ कए ४८. एखन/अखने अखन/एखने ४९. अहींकेँ अहीँकेँ ५०. गहींर गहीँर ५१. धार पार केनाइ धार पार केनाय/केनाए ५२. जेकाँ जेँकाँ/ जकाँ ५३. तहिना तेहिना ५४. एकर अकर ५५. बहिनउ बहनोइ ५६. बहिन बहिनि ५७. बहिन-बहिनोइ बहिन-बहनउ ५८. नहि/ नै ५९. करबा / करबाय/ करबाए ६०. तँ/ त ऽ तय/तए ६१. भाय भै/भाए ६२. भाँय ६३. यावत जावत ६४. माय मै / माए ६५. देन्हि/दएन्हि/ दयन्हि दन्हि/ दैन्हि ६६. द’/ दऽ/ दए ६७. ओ (संयोजक) ओऽ (सर्वनाम) ६८. तका कए तकाय तकाए ६९. पैरे (on foot) पएरे ७०. ताहुमे ताहूमे

७१. पुत्रीक ७२. बजा कय/ कए ७३. बननाय/बननाइ ७४. कोला ७५. दिनुका दिनका ७६. ततहिसँ ७७. गरबओलन्हि  गरबेलन्हि ७८. बालु बालू ७९. चेन्ह चिन्ह(अशुद्ध) ८०. जे जे’ ८१. से/ के से’/के’ ८२. एखुनका अखनुका ८३. भुमिहार भूमिहार ८४. सुगर सूगर ८५. झठहाक झटहाक ८६. छूबि ८७. करइयो/ओ करैयो/करिऔ-करइयौ ८८. पुबारि पुबाइ ८९. झगड़ा-झाँटी झगड़ा-झाँटि ९०. पएरे-पएरे पैरे-पैरे ९१. खेलएबाक ९२. खेलेबाक ९३. लगा ९४. होए- हो ९५. बुझल बूझल ९६. बूझल (संबोधन अर्थमे) ९७. यैह यएह / इएह ९८. तातिल ९९. अयनाय- अयनाइ/ अएनाइ १००. निन्न- निन्द १०१. बिनु बिन १०२. जाए जाइ १०३. जाइ (in different sense)-last word of sentence १०४. छत पर आबि जाइ १०५. ने १०६. खेलाए (play) –खेलाइ १०७. शिकाइत- शिकायत १०८. ढप- ढ़प १०९. पढ़- पढ ११०. कनिए/ कनिये कनिञे १११. राकस- राकश ११२. होए/ होय होइ ११३. अउरदा- औरदा ११४. बुझेलन्हि (different meaning- got understand) ११५. बुझएलन्हि/ बुझयलन्हि (understood himself) ११६. चलि- चल ११७. खधाइ- खधाय ११८. मोन पाड़लखिन्ह मोन पारलखिन्ह ११९. कैक- कएक- कइएक १२०. लग ल’ग  १२१. जरेनाइ १२२. जरओनाइ- जरएनाइ/जरयनाइ १२३. होइत १२४. गरबेलन्हि/ गरबओलन्हि १२५. चिखैत- (to test)चिखइत १२६. करइयो (willing to do) करैयो १२७. जेकरा- जकरा १२८. तकरा- तेकरा १२९. बिदेसर स्थानेमे/ बिदेसरे स्थानमे १३०. करबयलहुँ/ करबएलहुँ/ करबेलहुँ १३१. हारिक (उच्चारण हाइरक) १३२. ओजन वजन १३३. आधे भाग/ आध-भागे १३४. पिचा / पिचाय/पिचाए १३५. नञ/ ने १३६. बच्चा नञ (ने) पिचा जाय १३७. तखन ने (नञ) कहैत अछि। १३८. कतेक गोटे/ कताक गोटे १३९. कमाइ- धमाइ कमाई- धमाई १४०. लग ल’ग १४१. खेलाइ (for playing) १४२. छथिन्ह छथिन १४३. होइत होइ १४४. क्यो कियो / केओ १४५. केश (hair) १४६. केस (court-case) १४७. बननाइ/ बननाय/ बननाए १४८. जरेनाइ १४९. कुरसी कुर्सी १५०. चरचा चर्चा १५१. कर्म करम १५२. डुबाबए/ डुमाबय/ डुमाबए १५३. एखुनका/ अखुनका १५४. लय (वाक्यक अतिम शब्द)- लऽ १५५. कएलक केलक १५६. गरमी गर्मी १५७. बरदी वर्दी १५८. सुना गेलाह सुना’/सुनाऽ १५९. एनाइ-गेनाइ १६०. तेना ने घेरलन्हि १६१. नञि १६२. डरो ड’रो १६३. कतहु- कहीं १६४. उमरिगर- उमरगर १६५. भरिगर १६६. धोल/धोअल धोएल १६७. गप/गप्प १६८. के के’ १६९. दरबज्जा/ दरबजा १७०. ठाम १७१. धरि तक १७२. घूरि लौटि १७३. थोरबेक १७४. बड्ड १७५. तोँ/ तूँ १७६. तोँहि( पद्यमे ग्राह्य) १७७. तोँही / तोँहि १७८. करबाइए करबाइये १७९. एकेटा १८०. करितथि करतथि

१८१. पहुँचि पहुँच १८२. राखलन्हि रखलन्हि १८३. लगलन्हि लागलन्हि १८४. सुनि (उच्चारण सुइन) १८५. अछि (उच्चारण अइछ) १८६. एलथि गेलथि १८७. बितओने बितेने १८८. करबओलन्हि/ करेलखिन्ह १८९. करएलन्हि १९०. आकि कि १९१. पहुँचि पहुँच १९२. जराय/ जराए जरा (आगि लगा) १९३. से से’ १९४. हाँ मे हाँ (हाँमे हाँ विभक्त्तिमे हटा कए) १९५. फेल फैल १९६. फइल(spacious) फैल १९७. होयतन्हि/ होएतन्हि हेतन्हि १९८. हाथ मटिआयब/ हाथ मटियाबय/हाथ मटिआएब १९९. फेका फेंका २००. देखाए देखा २०१. देखाबए २०२. सत्तरि सत्तर २०३. साहेब साहब २०४.गेलैन्ह/ गेलन्हि २०५.हेबाक/ होएबाक २०६.केलो/ कएलहुँ २०७. किछु न किछु/ किछु ने किछु २०८.घुमेलहुँ/ घुमओलहुँ २०९. एलाक/ अएलाक २१०. अः/ अह २११.लय/ लए (अर्थ-परिवर्त्तन) २१२.कनीक/ कनेक २१३.सबहक/ सभक २१४.मिलाऽ/ मिला २१५.कऽ/ क २१६.जाऽ/ जा २१७.आऽ/ आ २१८.भऽ/भ’ (’ फॉन्टक कमीक द्योतक) २१९.निअम/ नियम २२०.हेक्टेअर/ हेक्टेयर २२१.पहिल अक्षर ढ/ बादक/बीचक ढ़ २२२.तहिं/तहिँ/ तञि/ तैं २२३.कहिं/ कहीं २२४.तँइ/ तइँ २२५.नँइ/ नइँ/  नञि/ नहि २२६.है/ हए २२७.छञि/ छै/ छैक/छइ २२८.दृष्टिएँ/ दृष्टियेँ २२९.आ (come)/ आऽ(conjunction) २३०. आ (conjunction)/ आऽ(come) २३१.कुनो/ कोनो २३२.गेलैन्ह-गेलन्हि २३३.हेबाक- होएबाक २३४.केलौँ- कएलौँ- कएलहुँ २३५.किछु न किछ- किछु ने किछु २३६.केहेन- केहन २३७.आऽ (come)-आ (conjunction-and)/आ २३८. हएत-हैत २३९.घुमेलहुँ-घुमएलहुँ २४०.एलाक- अएलाक २४१.होनि- होइन/होन्हि २४२.ओ-राम ओ श्यामक बीच(conjunction), ओऽ कहलक (he said)/ओ २४३.की हए/ कोसी अएली हए/ की है। की हइ २४४.दृष्टिएँ/ दृष्टियेँ २४५.शामिल/ सामेल २४६.तैँ / तँए/ तञि/ तहिं २४७.जौँ/ ज्योँ २४८.सभ/ सब २४९.सभक/ सबहक २५०.कहिं/ कहीं २५१.कुनो/ कोनो २५२.फारकती भऽ गेल/ भए गेल/ भय गेल २५३.कुनो/ कोनो २५४.अः/ अह २५५.जनै/ जनञ २५६.गेलन्हि/ गेलाह (अर्थ परिवर्तन) २५७.केलन्हि/ कएलन्हि २५८.लय/ लए (अर्थ परिवर्तन) २५९.कनीक/ कनेक २६०.पठेलन्हि/ पठओलन्हि २६१.निअम/ नियम २६२.हेक्टेअर/ हेक्टेयर २६३.पहिल अक्षर रहने ढ/ बीचमे रहने ढ़ २६४.आकारान्तमे बिकारीक प्रयोग उचित नहि/ अपोस्ट्रोफीक प्रयोग फान्टक तकनीकी न्यूनताक परिचायक ओकर बदला अवग्रह (बिकारी) क प्रयोग उचित २६५.केर/-क/ कऽ/ के २६६.छैन्हि- छन्हि २६७.लगैए/ लगैये २६८.होएत/ हएत २६९.जाएत/ जएत २७०.आएत/ अएत/ आओत २७१.खाएत/ खएत/ खैत २७२.पिअएबाक/ पिएबाक २७३.शुरु/ शुरुह २७४.शुरुहे/ शुरुए २७५.अएताह/अओताह/ एताह २७६.जाहि/ जाइ/ जै २७७.जाइत/ जैतए/ जइतए २७८.आएल/ अएल २७९.कैक/ कएक २८०.आयल/ अएल/ आएल २८१. जाए/ जै/ जए २८२. नुकएल/ नुकाएल २८३. कठुआएल/ कठुअएल २८४. ताहि/ तै २८५. गायब/ गाएब/ गएब २८६. सकै/ सकए/ सकय २८७.सेरा/सरा/ सराए (भात सेरा गेल) २८८.कहैत रही/देखैत रही/ कहैत छलहुँ/ कहै छलहुँ- एहिना चलैत/ पढ़ैत (पढ़ै-पढ़ैत अर्थ कखनो काल परिवर्तित)-आर बुझै/ बुझैत (बुझै/ बुझैत छी, मुदा बुझैत-बुझैत)/ सकैत/ सकै। करैत/ करै। दै/ दैत। छैक/ छै। बचलै/ बचलैक। रखबा/ रखबाक । बिनु/ बिन। रातिक/ रातुक २८९. दुआरे/ द्वारे २९०.भेटि/ भेट २९१. खन/ खुना (भोर खन/ भोर खुना) २९२.तक/ धरि २९३.गऽ/गै (meaning different-जनबै गऽ) २९४.सऽ/ सँ (मुदा दऽ, लऽ) २९५.त्त्व,(तीन अक्षरक मेल बदला पुनरुक्तिक एक आ एकटा दोसरक उपयोग) आदिक बदला त्व आदि। महत्त्व/ महत्व/ कर्ता/ कर्त्ता आदिमे त्त संयुक्तक कोनो आवश्यकता मैथिलीमे नहि अछि। वक्तव्य २९६.बेसी/ बेशी २९७.बाला/वाला बला/ वला (रहैबला) २९८.वाली/ (बदलएवाली) २९९.वार्त्ता/ वार्ता ३००. अन्तर्राष्ट्रिय/ अन्तर्राष्ट्रीय ३०१. लेमए/ लेबए ३०२.लमछुरका, नमछुरका ३०२.लागै/ लगै (भेटैत/ भेटै) ३०३.लागल/ लगल ३०४.हबा/ हवा ३०५.राखलक/ रखलक ३०६.आ (come)/ आ (and) ३०७. पश्चाताप/ पश्चात्ताप ३०८. ऽ केर व्यवहार शब्दक अन्तमे मात्र, यथासंभव बीचमे नहि। ३०९.कहैत/ कहै ३१०. रहए (छल)/ रहै (छलै) (meaning different) ३११.तागति/ ताकति ३१२.खराप/ खराब ३१३.बोइन/ बोनि/ बोइनि ३१४.जाठि/ जाइठ ३१५.कागज/ कागच ३१६.गिरै (meaning different- swallow)/ गिरए (खसए) ३१७.राष्ट्रिय/ राष्ट्रीय उच्चारण निर्देश: दन्त न क उच्चारणमे दाँतमे जीह सटत- जेना बाजू नाम , मुदा ण क उच्चारणमे जीह मूर्धामे सटत (नहि सटैए तँ उच्चारण दोष अछि)- जेना बाजू गणेश। तालव्य शमे जीह तालुसँ , षमे मूर्धासँ आ दन्त समे दाँतसँ सटत। निशाँ, सभ आ शोषण बाजि कऽ देखू। मैथिलीमे ष केँ वैदिक संस्कृत जेकाँ ख सेहो उच्चरित कएल जाइत अछि, जेना वर्षा, दोष। य अनेको स्थानपर ज जेकाँ उच्चरित होइत अछि आ ण ड़ जेकाँ (यथा संयोग आ गणेश संजोग आ गड़ेस उच्चरित होइत अछि)। मैथिलीमे व क उच्चारण ब, श क उच्चारण स आ य क उच्चारण ज सेहो होइत अछि। ओहिना ह्रस्व इ बेशीकाल मैथिलीमे पहिने बाजल जाइत अछि कारण देवनागरीमे आ मिथिलाक्षरमे ह्रस्व इ अक्षरक पहिने लिखलो जाइत आ बाजलो जएबाक चाही। कारण जे हिन्दीमे एकर दोषपूर्ण उच्चारण होइत अछि (लिखल तँ पहिने जाइत अछि मुदा बाजल बादमे जाइत अछि), से शिक्षा पद्धतिक दोषक कारण हम सभ ओकर उच्चारण दोषपूर्ण ढंगसँ कऽ रहल छी। अछि- अ इ छ  ऐछ छथि- छ इ थ  – छैथ पहुँचि- प हुँ इ च आब अ आ इ ई ए ऐ ओ औ अं अः ऋ एहि सभ लेल मात्रा सेहो अछि, मुदा एहिमे ई ऐ ओ औ अं अः ऋ केँ संयुक्ताक्षर रूपमे गलत रूपमे प्रयुक्त आ उच्चरित कएल जाइत अछि। जेना ऋ केँ री  रूपमे उच्चरित करब। आ देखियौ- एहि लेल देखिऔ क प्रयोग अनुचित। मुदा देखिऐ लेल देखियै अनुचित। क् सँ ह् धरि अ सम्मिलित भेलासँ क सँ ह बनैत अछि, मुदा उच्चारण काल हलन्त युक्त शब्दक अन्तक उच्चारणक प्रवृत्ति बढ़ल अछि, मुदा हम जखन मनोजमे ज् अन्तमे बजैत छी, तखनो पुरनका लोककेँ बजैत सुनबन्हि- मनोजऽ, वास्तवमे ओ अ युक्त ज् = ज बजै छथि। फेर ज्ञ अछि ज् आ ञ क संयुक्त मुदा गलत उच्चारण होइत अछि- ग्य। ओहिना क्ष अछि क् आ ष क संयुक्त मुदा उच्चारण होइत अछि छ। फेर श् आ र क संयुक्त अछि श्र ( जेना श्रमिक) आ स् आ र क संयुक्त अछि स्र (जेना मिस्र)। त्र भेल त+र । उच्चारणक ऑडियो फाइल विदेह आर्काइव  http://www.videha.co.in/ पर उपलब्ध अछि। फेर केँ / सँ / पर पूर्व अक्षरसँ सटा कऽ लिखू मुदा तँ/ के/ कऽ हटा कऽ। एहिमे सँ मे पहिल सटा कऽ लिखू आ बादबला हटा कऽ। अंकक बाद टा लिखू सटा कऽ मुदा अन्य ठाम टा लिखू हटा कऽ– जेना छहटा मुदा सभ टा। फेर ६अ म सातम लिखू- छठम सातम नहि। घरबलामे बला मुदा घरवालीमे वाली प्रयुक्त करू। रहए- रहै मुदा सकैए (उच्चारण सकै-ए)। मुदा कखनो काल रहए आ रहै मे अर्थ भिन्नता सेहो, जेना से कम्मो जगहमे पार्किंग करबाक अभ्यास रहै ओकरा। पुछलापर पता लागल जे ढुनढुन नाम्ना ई ड्राइवर कनाट प्लेसक पार्किंगमे काज करैत रहए। छलै, छलए मे सेहो एहि तरहक भेल। छलए क उच्चारण छल-ए सेहो। संयोगने- (उच्चारण संजोगने) केँ/ के / कऽ केर- क (केर क प्रयोग नहि करू ) क (जेना रामक) –रामक आ संगे (उच्चारण राम के /  राम कऽ सेहो) सँ- सऽ चन्द्रबिन्दु आ अनुस्वार- अनुस्वारमे कंठ धरिक प्रयोग होइत अछि मुदा चन्द्रबिन्दुमे नहि। चन्द्रबिन्दुमे कनेक एकारक सेहो उच्चारण होइत अछि- जेना रामसँ- (उच्चारण राम सऽ)  रामकेँ- (उच्चारण राम कऽ/ राम के सेहो)। केँ जेना रामकेँ भेल हिन्दीक को (राम को)- राम को= रामकेँ क जेना रामक भेल हिन्दीक का ( राम का) राम का= रामक कऽ जेना जा कऽ भेल हिन्दीक कर ( जा कर) जा कर= जा कऽ सँ भेल हिन्दीक से (राम से) राम से= रामसँ सऽ तऽ त केर एहि सभक प्रयोग अवांछित। के दोसर अर्थेँ प्रयुक्त भऽ सकैए- जेना के कहलक? नञि, नहि, नै, नइ, नँइ, नइँ एहि सभक उच्चारण- नै त्त्व क बदलामे त्व जेना महत्वपूर्ण (महत्त्वपूर्ण नहि) जतए अर्थ बदलि जाए ओतहि मात्र तीन अक्षरक संयुक्ताक्षरक प्रयोग उचित। सम्पति- उच्चारण स म्प इ त (सम्पत्ति नहि- कारण सही उच्चारण आसानीसँ सम्भव नहि)। मुदा सर्वोत्तम (सर्वोतम नहि)। राष्ट्रिय (राष्ट्रीय नहि) सकैए/ सकै (अर्थ परिवर्तन) पोछैले/ पोछैए/ पोछए/ (अर्थ परिवर्तन) पोछए/ पोछै ओ लोकनि ( हटा कऽ, ओ मे बिकारी नहि) ओइ/ ओहि ओहिले/ ओहि लेल जएबेँ/ बैसबेँ पँचभइयाँ देखियौक (देखिऔक बहि- तहिना अ मे ह्रस्व आ दीर्घक मात्राक प्रयोग अनुचित) जकाँ/ जेकाँ तँइ/ तैँ होएत/ हएत नञि/ नहि/ नँइ/ नइँ सौँसे बड़/ बड़ी (झोराओल) गाए (गाइ नहि) रहलेँ/ पहिरतैँ हमहीं/ अहीं सब - सभ सबहक - सभहक धरि - तक गप- बात बूझब - समझब बुझलहुँ - समझलहुँ हमरा आर - हम सभ आकि- आ कि सकैछ/ करैछ (गद्यमे प्रयोगक आवश्यकता नहि) मे केँ सँ पर (शब्दसँ सटा कऽ) तँ कऽ धऽ दऽ (शब्दसँ हटा कऽ) मुदा दूटा वा बेशी विभक्ति संग रहलापर पहिल विभक्ति टाकेँ सटाऊ। एकटा दूटा (मुदा कैक टा) बिकारीक प्रयोग शब्दक अन्तमे, बीचमे अनावश्यक रूपेँ नहि। आकारान्त आ अन्तमे अ क बाद बिकारीक प्रयोग नहि (जेना दिअ, आ ) अपोस्ट्रोफीक प्रयोग बिकारीक बदलामे करब अनुचित आ मात्र फॉन्टक तकनीकी न्यूनताक परिचायक)- ओना बिकारीक संस्कृत रूप ऽ अवग्रह कहल जाइत अछि आ वर्तनी आ उच्चारण दुनू ठाम एकर लोप रहैत अछि/ रहि सकैत अछि (उच्चारणमे लोप रहिते अछि)। मुदा अपोस्ट्रोफी सेहो अंग्रेजीमे पसेसिव केसमे होइत अछि आ फ्रेंचमे शब्दमे जतए एकर प्रयोग होइत अछि जेना raison d’etre एतए सेहो एकर उच्चारण रैजौन डेटर होइत अछि, माने अपोस्ट्रॉफी अवकाश नहि दैत अछि वरन जोड़ैत अछि, से एकर प्रयोग बिकारीक बदला देनाइ तकनीकी रूपेँ सेहो अनुचित)। अइमे, एहिमे जइमे, जाहिमे एखन/ अखन/ अइखन केँ (के नहि) मे (अनुस्वार रहित) भऽ मे दऽ तँ (तऽ त नहि) सँ ( सऽ स नहि) गाछ तर गाछ लग साँझ खन जो (जो go, करै जो do) Festivals of Mithila DATE-LIST (year- 2010-11) (१४१८ साल) Marriage Days: Nov.2010- 19 Dec.2010- 3,8 January 2011- 17, 21, 23, 24, 26, 27, 28 31 Feb.2011- 3, 4, 7, 9, 18, 20, 24, 25, 27, 28 March 2011- 2, 7 May 2011- 11, 12, 13, 18, 19, 20, 22, 23, 29, 30 June 2011- 1, 2, 3, 8, 9, 10, 12, 13, 19, 20, 26, 29 Upanayana Days: February 2011- 8 March 2011- 7 May 2011- 12, 13 June 2011- 6, 12 Dviragaman Din: November 2010- 19, 22, 25, 26 December 2010- 6, 8, 9, 10, 12 February 2011- 20, 21 March 2011- 6, 7, 9, 13 April 2011- 17, 18, 22 May 2011- 5, 6, 8, 13 Mundan Din: November 2010- 24, 26 December 2010- 10, 17 February 2011- 4, 16, 21 March 2011- 7, 9 April 2011- 22 May 2011- 6, 9, 19 June 2011- 3, 6, 10, 20 FESTIVALS OF MITHILA Mauna Panchami-31 July Somavati Amavasya Vrat- 1 August Madhushravani-12 August Nag Panchami- 14 August Raksha Bandhan- 24 Aug Krishnastami- 01 September Kushi Amavasya- 08 September Hartalika Teej- 11 September ChauthChandra-11 September Vishwakarma Pooja- 17 September Karma Dharma Ekadashi-19 September Indra Pooja Aarambh- 20 September Anant Caturdashi- 22 Sep Agastyarghadaan- 23 Sep Pitri Paksha begins- 24 Sep Jimootavahan Vrata/ Jitia-30 Sep Matri Navami- 02 October Kalashsthapan- 08 October Belnauti- 13 October Patrika Pravesh- 14 October Mahastami- 15 October Maha Navami - 16-17 October Vijaya Dashami- 18 October Kojagara- 22 Oct Dhanteras- 3 November Diyabati, shyama pooja- 5 November Annakoota/ Govardhana Pooja-07 November Bhratridwitiya/ Chitragupta Pooja-08 November Chhathi- -12 November Akshyay Navami- 15 November Devotthan Ekadashi- 17 November Kartik Poornima/ Sama Bisarjan- 21 Nov Shaa. ravivratarambh- 21 November Navanna parvan- 24 -26 November Vivaha Panchmi- 10 December Naraknivaran chaturdashi- 01 February Makara/ Teela Sankranti-15 Jan Basant Panchami/ Saraswati Pooja- 08 Februaqry Achla Saptmi- 10 February Mahashivaratri-03 March Holikadahan-Fagua-19 March Holi-20 Mar Varuni Yoga- 31 March va.navaratrarambh- 4 April vaa. Chhathi vrata- 9 April Ram Navami- 12 April Mesha Sankranti-Satuani-14 April Jurishital-15 April Somavati Amavasya Vrata- 02 May Ravi Brat Ant- 08 May Akshaya Tritiya-06 May Janaki Navami- 12 May Vat Savitri-barasait- 01 June Ganga Dashhara-11 June Jagannath Rath Yatra- 3 July Hari Sayan Ekadashi- 11 Jul Aashadhi Guru Poornima-15 Jul VIDEHA ARCHIVE १.विदेह ई-पत्रिकाक सभटा पुरान अंक ब्रेल, तिरहुता आ देवनागरी रूपमे Videha e journal's all old issues in Braille Tirhuta and Devanagari versions विदेह ई-पत्रिकाक पहिल ५० अंक

विदेह ई-पत्रिकाक ५०म सँ आगाँक अंक २.मैथिली पोथी डाउनलोड Maithili Books Download ३.मैथिली ऑडियो संकलन Maithili Audio Downloads ४.मैथिली वीडियोक संकलन Maithili Videos ५.मिथिला चित्रकला/ आधुनिक चित्रकला आ चित्र Mithila Painting/ Modern Art and Photos "विदेह"क एहि सभ सहयोगी लिंकपर सेहो एक बेर जाऊ। ६.विदेह मैथिली क्विज  :  http://videhaquiz.blogspot.com/ ७.विदेह मैथिली जालवृत्त एग्रीगेटर : http://videha-aggregator.blogspot.com/ ८.विदेह मैथिली साहित्य अंग्रेजीमे अनूदित http://madhubani-art.blogspot.com/ ९.विदेहक पूर्व-रूप "भालसरिक गाछ"  : http://gajendrathakur.blogspot.com/ १०.विदेह इंडेक्स  : http://videha123.blogspot.com/ ११.विदेह फाइल : http://videha123.wordpress.com/ १२. विदेह: सदेह : पहिल तिरहुता (मिथिला़क्षर) जालवृत्त (ब्लॉग) http://videha-sadeha.blogspot.com/ १३. विदेह:ब्रेल: मैथिली ब्रेलमे: पहिल बेर विदेह द्वारा http://videha-braille.blogspot.com/ १४.VIDEHA IST MAITHILI  FORTNIGHTLY EJOURNAL ARCHIVE http://videha-archive.blogspot.com/ १५. विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका मैथिली पोथीक आर्काइव http://videha-pothi.blogspot.com/ १६. विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका ऑडियो आर्काइव http://videha-audio.blogspot.com/ १७. विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका वीडियो आर्काइव http://videha-video.blogspot.com/ १८. विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका मिथिला चित्रकला, आधुनिक कला आ चित्रकला http://videha-paintings-photos.blogspot.com/ १९. मैथिल आर मिथिला (मैथिलीक सभसँ लोकप्रिय जालवृत्त) http://maithilaurmithila.blogspot.com/ २०.श्रुति प्रकाशन http://www.shruti-publication.com/ २१.http://groups.google.com/group/videha VIDEHA केर सदस्यता लिअ Top of Form Bottom of Form ईमेल : एहि समूहपर जाऊ २२.http://groups.yahoo.com/group/VIDEHA/ Top of Form Subscribe to VIDEHA Powered by us.groups.yahoo.com Bottom of Form २३.गजेन्द्र ठाकुर इ‍डेक्स http://gajendrathakur123.blogspot.com २४.विदेह रेडियो:मैथिली कथा-कविता आदिक पहिल पोडकास्ट साइट http://videha123radio.wordpress.com/ २५. नेना भुटका http://mangan-khabas.blogspot.com/ महत्त्वपूर्ण सूचना:(१) 'विदेह' द्वारा धारावाहिक रूपे ई-प्रकाशित कएल गेल गजेन्द्र ठाकुरक  निबन्ध-प्रबन्ध-समीक्षा, उपन्यास (सहस्रबाढ़नि) , पद्य-संग्रह (सहस्राब्दीक चौपड़पर), कथा-गल्प (गल्प-गुच्छ), नाटक(संकर्षण), महाकाव्य (त्वञ्चाहञ्च आ असञ्जाति मन) आ बाल-किशोर साहित्य विदेहमे संपूर्ण ई-प्रकाशनक बाद प्रिंट फॉर्ममे। कुरुक्षेत्रम्–अन्तर्मनक खण्ड-१ सँ ७ Combined ISBN No.978-81-907729-7-6 विवरण एहि पृष्ठपर नीचाँमे आ प्रकाशकक साइट http://www.shruti-publication.com/ पर । महत्त्वपूर्ण सूचना (२):सूचना: विदेहक मैथिली-अंग्रेजी आ अंग्रेजी मैथिली कोष (इंटरनेटपर पहिल बेर सर्च-डिक्शनरी) एम.एस. एस.क्यू.एल. सर्वर आधारित -Based on ms-sql server Maithili-English and English-Maithili Dictionary. विदेहक भाषापाक- रचनालेखन स्तंभमे। कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक- गजेन्द्र ठाकुर गजेन्द्र ठाकुरक निबन्ध-प्रबन्ध-समीक्षा, उपन्यास (सहस्रबाढ़नि) , पद्य-संग्रह (सहस्राब्दीक चौपड़पर), कथा-गल्प (गल्प गुच्छ), नाटक(संकर्षण), महाकाव्य (त्वञ्चाहञ्च आ असञ्जाति मन) आ बालमंडली-किशोरजगत विदेहमे संपूर्ण ई-प्रकाशनक बाद प्रिंट फॉर्ममे। कुरुक्षेत्रम्–अन्तर्मनक, खण्ड-१ सँ ७ Ist edition 2009 of Gajendra Thakur’s KuruKshetram-Antarmanak (Vol. I to VII)- essay-paper-criticism, novel, poems, story, play, epics and Children-grown-ups literature in single binding: Language:Maithili ६९२ पृष्ठ : मूल्य भा. रु. 100/-(for individual buyers inside india) (add courier charges Rs.50/-per copy for Delhi/NCR and Rs.100/- per copy for outside Delhi)

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Details for purchase available at print-version publishers's site website: http://www.shruti-publication.com/ or you may write to e-mail:shruti.publication@shruti-publication.com विदेह: सदेह : १: २: ३: ४ तिरहुता : देवनागरी "विदेह" क, प्रिंट संस्करण :विदेह-ई-पत्रिका (http://www.videha.co.in/) क चुनल रचना सम्मिलित। विदेह:सदेह:१: २: ३: ४ सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। Details for purchase available at print-version publishers's site http://www.shruti-publication.com  or you may write to shruti.publication@shruti-publication.com २. संदेश- [ विदेह ई-पत्रिका, विदेह:सदेह मिथिलाक्षर आ देवनागरी आ गजेन्द्र ठाकुरक सात खण्डक- निबन्ध-प्रबन्ध-समीक्षा,उपन्यास (सहस्रबाढ़नि) , पद्य-संग्रह (सहस्राब्दीक चौपड़पर), कथा-गल्प (गल्प गुच्छ), नाटक (संकर्षण), महाकाव्य (त्वञ्चाहञ्च आ असञ्जाति मन) आ बाल-मंडली-किशोर जगत- संग्रह कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक मादेँ। ] १.श्री गोविन्द झा- विदेहकेँ तरंगजालपर उतारि विश्वभरिमे मातृभाषा मैथिलीक लहरि जगाओल, खेद जे अपनेक एहि महाभियानमे हम एखन धरि संग नहि दए सकलहुँ। सुनैत छी अपनेकेँ सुझाओ आ रचनात्मक आलोचना प्रिय लगैत अछि तेँ किछु लिखक मोन भेल। हमर सहायता आ सहयोग अपनेकेँ सदा उपलब्ध रहत। २.श्री रमानन्द रेणु- मैथिलीमे ई-पत्रिका पाक्षिक रूपेँ चला कऽ जे अपन मातृभाषाक प्रचार कऽ रहल छी, से धन्यवाद । आगाँ अपनेक समस्त मैथिलीक कार्यक हेतु हम हृदयसँ शुभकामना दऽ रहल छी। ३.श्री विद्यानाथ झा "विदित"- संचार आ प्रौद्योगिकीक एहि प्रतिस्पर्धी ग्लोबल युगमे अपन महिमामय "विदेह"केँ अपना देहमे प्रकट देखि जतबा प्रसन्नता आ संतोष भेल, तकरा कोनो उपलब्ध "मीटर"सँ नहि नापल जा सकैछ? ..एकर ऐतिहासिक मूल्यांकन आ सांस्कृतिक प्रतिफलन एहि शताब्दीक अंत धरि लोकक नजरिमे आश्चर्यजनक रूपसँ प्रकट हैत। ४. प्रो. उदय नारायण सिंह "नचिकेता"- जे काज अहाँ कए रहल छी तकर चरचा एक दिन मैथिली भाषाक इतिहासमे होएत। आनन्द भए रहल अछि, ई जानि कए जे एतेक गोट मैथिल "विदेह" ई जर्नलकेँ पढ़ि रहल छथि।...विदेहक चालीसम अंक पुरबाक लेल अभिनन्दन। ५. डॉ. गंगेश गुंजन- एहि विदेह-कर्ममे लागि रहल अहाँक सम्वेदनशील मन, मैथिलीक प्रति समर्पित मेहनतिक अमृत रंग, इतिहास मे एक टा विशिष्ट फराक अध्याय आरंभ करत, हमरा विश्वास अछि। अशेष शुभकामना आ बधाइक सङ्ग, सस्नेह...अहाँक पोथी कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक प्रथम दृष्टया बहुत भव्य तथा उपयोगी बुझाइछ। मैथिलीमे तँ अपना स्वरूपक प्रायः ई पहिले एहन  भव्य अवतारक पोथी थिक। हर्षपूर्ण हमर हार्दिक बधाई स्वीकार करी। ६. श्री रामाश्रय झा "रामरंग"(आब स्वर्गीय)- "अपना" मिथिलासँ संबंधित...विषय वस्तुसँ अवगत भेलहुँ।...शेष सभ कुशल अछि। ७. श्री ब्रजेन्द्र त्रिपाठी- साहित्य अकादमी- इंटरनेट पर प्रथम मैथिली पाक्षिक पत्रिका "विदेह" केर लेल बधाई आ शुभकामना स्वीकार करू। ८. श्री प्रफुल्लकुमार सिंह "मौन"- प्रथम मैथिली पाक्षिक पत्रिका "विदेह" क प्रकाशनक समाचार जानि कनेक चकित मुदा बेसी आह्लादित भेलहुँ। कालचक्रकेँ पकड़ि जाहि दूरदृष्टिक परिचय देलहुँ, ओहि लेल हमर मंगलकामना। ९.डॉ. शिवप्रसाद यादव- ई जानि अपार हर्ष भए रहल अछि, जे नव सूचना-क्रान्तिक क्षेत्रमे मैथिली पत्रकारिताकेँ प्रवेश दिअएबाक साहसिक कदम उठाओल अछि। पत्रकारितामे एहि प्रकारक नव प्रयोगक हम स्वागत करैत छी, संगहि "विदेह"क सफलताक शुभकामना। १०. श्री आद्याचरण झा- कोनो पत्र-पत्रिकाक प्रकाशन- ताहूमे मैथिली पत्रिकाक प्रकाशनमे के कतेक सहयोग करताह- ई तऽ भविष्य कहत। ई हमर ८८ वर्षमे ७५ वर्षक अनुभव रहल। एतेक पैघ महान यज्ञमे हमर श्रद्धापूर्ण आहुति प्राप्त होयत- यावत ठीक-ठाक छी/ रहब। ११. श्री विजय ठाकुर- मिशिगन विश्वविद्यालय- "विदेह" पत्रिकाक अंक देखलहुँ, सम्पूर्ण टीम बधाईक पात्र अछि। पत्रिकाक मंगल भविष्य हेतु हमर शुभकामना स्वीकार कएल जाओ। १२. श्री सुभाषचन्द्र यादव- ई-पत्रिका "विदेह" क बारेमे जानि प्रसन्नता भेल। ’विदेह’ निरन्तर पल्लवित-पुष्पित हो आ चतुर्दिक अपन सुगंध पसारय से कामना अछि। १३. श्री मैथिलीपुत्र प्रदीप- ई-पत्रिका "विदेह" केर सफलताक भगवतीसँ कामना। हमर पूर्ण सहयोग रहत। १४. डॉ. श्री भीमनाथ झा- "विदेह" इन्टरनेट पर अछि तेँ "विदेह" नाम उचित आर कतेक रूपेँ एकर विवरण भए सकैत अछि। आइ-काल्हि मोनमे उद्वेग रहैत अछि, मुदा शीघ्र पूर्ण सहयोग देब।कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक देखि अति प्रसन्नता भेल। मैथिलीक लेल ई घटना छी। १५. श्री रामभरोस कापड़ि "भ्रमर"- जनकपुरधाम- "विदेह" ऑनलाइन देखि रहल छी। मैथिलीकेँ अन्तर्राष्ट्रीय जगतमे पहुँचेलहुँ तकरा लेल हार्दिक बधाई। मिथिला रत्न सभक संकलन अपूर्व। नेपालोक सहयोग भेटत, से विश्वास करी। १६. श्री राजनन्दन लालदास- "विदेह" ई-पत्रिकाक माध्यमसँ बड़ नीक काज कए रहल छी, नातिक अहिठाम देखलहुँ। एकर वार्षिक अ‍ंक जखन प्रिं‍ट निकालब तँ हमरा पठायब। कलकत्तामे बहुत गोटेकेँ हम साइटक पता लिखाए देने छियन्हि। मोन तँ होइत अछि जे दिल्ली आबि कए आशीर्वाद दैतहुँ, मुदा उमर आब बेशी भए गेल। शुभकामना देश-विदेशक मैथिलकेँ जोड़बाक लेल।.. उत्कृष्ट प्रकाशन कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक लेल बधाइ। अद्भुत काज कएल अछि, नीक प्रस्तुति अछि सात खण्डमे।  मुदा अहाँक सेवा आ से निःस्वार्थ तखन बूझल जाइत जँ अहाँ द्वारा प्रकाशित पोथी सभपर दाम लिखल नहि रहितैक। ओहिना सभकेँ विलहि देल जइतैक। (स्पष्टीकरण-  श्रीमान्, अहाँक सूचनार्थ विदेह द्वारा ई-प्रकाशित कएल सभटा सामग्री आर्काइवमे https://sites.google.com/a/videha.com/videha-pothi/ पर बिना मूल्यक डाउनलोड लेल उपलब्ध छै आ भविष्यमे सेहो रहतैक। एहि आर्काइवकेँ जे कियो प्रकाशक अनुमति लऽ कऽ प्रिंट रूपमे प्रकाशित कएने छथि आ तकर ओ दाम रखने छथि ताहिपर हमर कोनो नियंत्रण नहि अछि।- गजेन्द्र ठाकुर)...   अहाँक प्रति अशेष शुभकामनाक संग। १७. डॉ. प्रेमशंकर सिंह- अहाँ मैथिलीमे इंटरनेटपर पहिल पत्रिका "विदेह" प्रकाशित कए अपन अद्भुत मातृभाषानुरागक परिचय देल अछि, अहाँक निःस्वार्थ मातृभाषानुरागसँ प्रेरित छी, एकर निमित्त जे हमर सेवाक प्रयोजन हो, तँ सूचित करी। इंटरनेटपर आद्योपांत पत्रिका देखल, मन प्रफुल्लित भऽ गेल। १८.श्रीमती शेफालिका वर्मा- विदेह ई-पत्रिका देखि मोन उल्लाससँ भरि गेल। विज्ञान कतेक प्रगति कऽ रहल अछि...अहाँ सभ अनन्त आकाशकेँ भेदि दियौ, समस्त विस्तारक रहस्यकेँ तार-तार कऽ दियौक...। अपनेक अद्भुत पुस्तक कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक विषयवस्तुक दृष्टिसँ गागरमे सागर अछि। बधाई। १९.श्री हेतुकर झा, पटना-जाहि समर्पण भावसँ अपने मिथिला-मैथिलीक सेवामे तत्पर छी से स्तुत्य अछि। देशक राजधानीसँ भय रहल मैथिलीक शंखनाद मिथिलाक गाम-गाममे मैथिली चेतनाक विकास अवश्य करत। २०. श्री योगानन्द झा, कबिलपुर, लहेरियासराय- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पोथीकेँ निकटसँ देखबाक अवसर भेटल अछि आ मैथिली जगतक एकटा उद्भट ओ समसामयिक दृष्टिसम्पन्न हस्ताक्षरक कलमबन्द परिचयसँ आह्लादित छी। "विदेह"क देवनागरी सँस्करण पटनामे रु. 80/- मे उपलब्ध भऽ सकल जे विभिन्न लेखक लोकनिक छायाचित्र, परिचय पत्रक ओ रचनावलीक सम्यक प्रकाशनसँ ऐतिहासिक कहल जा सकैछ। २१. श्री किशोरीकान्त मिश्र- कोलकाता- जय मैथिली, विदेहमे बहुत रास कविता, कथा, रिपोर्ट आदिक सचित्र संग्रह देखि आ आर अधिक प्रसन्नता मिथिलाक्षर देखि- बधाई स्वीकार कएल जाओ। २२.श्री जीवकान्त- विदेहक मुद्रित अंक पढ़ल- अद्भुत मेहनति। चाबस-चाबस। किछु समालोचना मरखाह..मुदा सत्य। २३. श्री भालचन्द्र झा- अपनेक कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक देखि बुझाएल जेना हम अपने छपलहुँ अछि। एकर विशालकाय आकृति अपनेक सर्वसमावेशताक परिचायक अछि। अपनेक रचना सामर्थ्यमे उत्तरोत्तर वृद्धि हो, एहि शुभकामनाक संग हार्दिक बधाई। २४.श्रीमती डॉ नीता झा- अहाँक कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़लहुँ। ज्योतिरीश्वर शब्दावली, कृषि मत्स्य शब्दावली आ सीत बसन्त आ सभ कथा, कविता, उपन्यास, बाल-किशोर साहित्य सभ उत्तम छल। मैथिलीक उत्तरोत्तर विकासक लक्ष्य दृष्टिगोचर होइत अछि। २५.श्री मायानन्द मिश्र- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक मे हमर उपन्यास स्त्रीधनक जे विरोध कएल गेल अछि तकर हम विरोध करैत छी।... कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पोथीक लेल शुभकामना।(श्रीमान् समालोचनाकेँ विरोधक रूपमे नहि लेल जाए।-गजेन्द्र ठाकुर) २६.श्री महेन्द्र हजारी- सम्पादक श्रीमिथिला- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़ि मोन हर्षित भऽ गेल..एखन पूरा पढ़यमे बहुत समय लागत, मुदा जतेक पढ़लहुँ से आह्लादित कएलक। २७.श्री केदारनाथ चौधरी- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक अद्भुत लागल, मैथिली साहित्य लेल ई पोथी एकटा प्रतिमान बनत। २८.श्री सत्यानन्द पाठक- विदेहक हम नियमित पाठक छी। ओकर स्वरूपक प्रशंसक छलहुँ। एम्हर अहाँक लिखल - कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक देखलहुँ। मोन आह्लादित भऽ उठल। कोनो रचना तरा-उपरी। २९.श्रीमती रमा झा-सम्पादक मिथिला दर्पण। कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक प्रिंट फॉर्म पढ़ि आ एकर गुणवत्ता देखि मोन प्रसन्न भऽ गेल, अद्भुत शब्द एकरा लेल प्रयुक्त कऽ रहल छी। विदेहक उत्तरोत्तर प्रगतिक शुभकामना। ३०.श्री नरेन्द्र झा, पटना- विदेह नियमित देखैत रहैत छी। मैथिली लेल अद्भुत काज कऽ रहल छी। ३१.श्री रामलोचन ठाकुर- कोलकाता- मिथिलाक्षर विदेह देखि मोन प्रसन्नतासँ भरि उठल, अंकक विशाल परिदृश्य आस्वस्तकारी अछि। ३२.श्री तारानन्द वियोगी- विदेह आ कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक देखि चकबिदोर लागि गेल। आश्चर्य। शुभकामना आ बधाई। ३३.श्रीमती प्रेमलता मिश्र “प्रेम”- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़लहुँ। सभ रचना उच्चकोटिक लागल। बधाई। ३४.श्री कीर्तिनारायण मिश्र- बेगूसराय- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक बड्ड नीक लागल, आगांक सभ काज लेल बधाई। ३५.श्री महाप्रकाश-सहरसा- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक नीक लागल, विशालकाय संगहि उत्तमकोटिक। ३६.श्री अग्निपुष्प- मिथिलाक्षर आ देवाक्षर विदेह पढ़ल..ई प्रथम तँ अछि एकरा प्रशंसामे मुदा हम एकरा दुस्साहसिक कहब। मिथिला चित्रकलाक स्तम्भकेँ मुदा अगिला अंकमे आर विस्तृत बनाऊ। ३७.श्री मंजर सुलेमान-दरभंगा- विदेहक जतेक प्रशंसा कएल जाए कम होएत। सभ चीज उत्तम। ३८.श्रीमती प्रोफेसर वीणा ठाकुर- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक उत्तम, पठनीय, विचारनीय। जे क्यो देखैत छथि पोथी प्राप्त करबाक उपाय पुछैत छथि। शुभकामना। ३९.श्री छत्रानन्द सिंह झा- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़लहुँ, बड्ड नीक सभ तरहेँ। ४०.श्री ताराकान्त झा- सम्पादक मैथिली दैनिक मिथिला समाद- विदेह तँ कन्टेन्ट प्रोवाइडरक काज कऽ रहल अछि। कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक अद्भुत लागल। ४१.डॉ रवीन्द्र कुमार चौधरी- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक बहुत नीक, बहुत मेहनतिक परिणाम। बधाई। ४२.श्री अमरनाथ- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक आ विदेह दुनू स्मरणीय घटना अछि, मैथिली साहित्य मध्य। ४३.श्री पंचानन मिश्र- विदेहक वैविध्य आ निरन्तरता प्रभावित करैत अछि, शुभकामना। ४४.श्री केदार कानन- कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक लेल अनेक धन्यवाद, शुभकामना आ बधाइ स्वीकार करी। आ नचिकेताक भूमिका पढ़लहुँ। शुरूमे तँ लागल जेना कोनो उपन्यास अहाँ द्वारा सृजित भेल अछि मुदा पोथी उनटौला पर ज्ञात भेल जे एहिमे तँ सभ विधा समाहित अछि। ४५.श्री धनाकर ठाकुर- अहाँ नीक काज कऽ रहल छी। फोटो गैलरीमे चित्र एहि शताब्दीक जन्मतिथिक अनुसार रहैत तऽ नीक। ४६.श्री आशीष झा- अहाँक पुस्तकक संबंधमे एतबा लिखबा सँ अपना कए नहि रोकि सकलहुँ जे ई किताब मात्र किताब नहि थीक, ई एकटा उम्मीद छी जे मैथिली अहाँ सन पुत्रक सेवा सँ निरंतर समृद्ध होइत चिरजीवन कए प्राप्त करत। ४७.श्री शम्भु कुमार सिंह- विदेहक तत्परता आ क्रियाशीलता देखि आह्लादित भऽ रहल छी। निश्चितरूपेण कहल जा सकैछ जे समकालीन मैथिली पत्रिकाक इतिहासमे विदेहक नाम स्वर्णाक्षरमे लिखल जाएत। ओहि कुरुक्षेत्रक घटना सभ तँ अठारहे दिनमे खतम भऽ गेल रहए मुदा अहाँक कुरुक्षेत्रम् तँ अशेष अछि। ४८.डॉ. अजीत मिश्र- अपनेक प्रयासक कतबो प्रश‍ंसा कएल जाए कमे होएतैक। मैथिली साहित्यमे अहाँ द्वारा कएल गेल काज युग-युगान्तर धरि पूजनीय रहत। ४९.श्री बीरेन्द्र मल्लिक- अहाँक कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक आ विदेह:सदेह पढ़ि अति प्रसन्नता भेल। अहाँक स्वास्थ्य ठीक रहए आ उत्साह बनल रहए से कामना। ५०.श्री कुमार राधारमण- अहाँक दिशा-निर्देशमे विदेह पहिल मैथिली ई-जर्नल देखि अति प्रसन्नता भेल। हमर शुभकामना। ५१.श्री फूलचन्द्र झा प्रवीण-विदेह:सदेह पढ़ने रही मुदा कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक देखि बढ़ाई देबा लेल बाध्य भऽ गेलहुँ। आब विश्वास भऽ गेल जे मैथिली नहि मरत। अशेष शुभकामना। ५२.श्री विभूति आनन्द- विदेह:सदेह देखि, ओकर विस्तार देखि अति प्रसन्नता भेल। ५३.श्री मानेश्वर मनुज-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक एकर भव्यता देखि अति प्रसन्नता भेल, एतेक विशाल ग्रन्थ मैथिलीमे आइ धरि नहि देखने रही। एहिना भविष्यमे काज करैत रही, शुभकामना। ५४.श्री विद्यानन्द झा- आइ.आइ.एम.कोलकाता- कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक विस्तार, छपाईक संग गुणवत्ता देखि अति प्रसन्नता भेल। ५५.श्री अरविन्द ठाकुर-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक मैथिली साहित्यमे कएल गेल एहि तरहक पहिल प्रयोग अछि, शुभकामना। ५६.श्री कुमार पवन-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक पढ़ि रहल छी। किछु लघुकथा पढ़ल अछि, बहुत मार्मिक छल। ५७. श्री प्रदीप बिहारी-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक देखल, बधाई। ५८.डॉ मणिकान्त ठाकुर-कैलिफोर्निया- अपन विलक्षण नियमित सेवासँ हमरा लोकनिक हृदयमे विदेह सदेह भऽ गेल अछि। ५९.श्री धीरेन्द्र प्रेमर्षि- अहाँक समस्त प्रयास सराहनीय। दुख होइत अछि जखन अहाँक प्रयासमे अपेक्षित सहयोग नहि कऽ पबैत छी। ६०.श्री देवशंकर नवीन- विदेहक निरन्तरता आ विशाल स्वरूप- विशाल पाठक वर्ग, एकरा ऐतिहासिक बनबैत अछि। ६१.श्री मोहन भारद्वाज- अहाँक समस्त कार्य देखल, बहुत नीक। एखन किछु परेशानीमे छी, मुदा शीघ्र सहयोग देब। ६२.श्री फजलुर रहमान हाशमी-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक मे एतेक मेहनतक लेल अहाँ साधुवादक अधिकारी छी। ६३.श्री लक्ष्मण झा "सागर"- मैथिलीमे चमत्कारिक रूपेँ अहाँक प्रवेश आह्लादकारी अछि।..अहाँकेँ एखन आर..दूर..बहुत दूरधरि जेबाक अछि। स्वस्थ आ प्रसन्न रही। ६४.श्री जगदीश प्रसाद मंडल-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक पढ़लहुँ । कथा सभ आ उपन्यास सहस्रबाढ़नि पूर्णरूपेँ पढ़ि गेल छी। गाम-घरक भौगोलिक विवरणक जे सूक्ष्म वर्णन सहस्रबाढ़निमे अछि, से चकित कएलक, एहि संग्रहक कथा-उपन्यास मैथिली लेखनमे विविधता अनलक अछि। समालोचना शास्त्रमे अहाँक दृष्टि वैयक्तिक नहि वरन् सामाजिक आ कल्याणकारी अछि, से प्रशंसनीय। ६५.श्री अशोक झा-अध्यक्ष मिथिला विकास परिषद- कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक लेल बधाई आ आगाँ लेल शुभकामना। ६६.श्री ठाकुर प्रसाद मुर्मु- अद्भुत प्रयास। धन्यवादक संग प्रार्थना जे अपन माटि-पानिकेँ ध्यानमे राखि अंकक समायोजन कएल जाए। नव अंक धरि प्रयास सराहनीय। विदेहकेँ बहुत-बहुत धन्यवाद जे एहेन सुन्दर-सुन्दर सचार (आलेख) लगा रहल छथि। सभटा ग्रहणीय- पठनीय। ६७.बुद्धिनाथ मिश्र- प्रिय गजेन्द्र जी,अहाँक सम्पादन मे प्रकाशित ‘विदेह’आ ‘कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक’ विलक्षण पत्रिका आ विलक्षण पोथी! की नहि अछि अहाँक सम्पादनमे? एहि प्रयत्न सँ मैथिली क विकास होयत,निस्संदेह। ६८.श्री बृखेश चन्द्र लाल- गजेन्द्रजी, अपनेक पुस्तक कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक पढ़ि मोन गदगद भय गेल , हृदयसँ अनुगृहित छी । हार्दिक शुभकामना । ६९.श्री परमेश्वर कापड़ि - श्री गजेन्द्र जी । कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक पढ़ि गदगद आ नेहाल भेलहुँ। ७०.श्री रवीन्द्रनाथ ठाकुर- विदेह पढ़ैत रहैत छी। धीरेन्द्र प्रेमर्षिक मैथिली गजलपर आलेख पढ़लहुँ। मैथिली गजल कत्तऽ सँ कत्तऽ चलि गेलैक आ ओ अपन आलेखमे मात्र अपन जानल-पहिचानल लोकक चर्च कएने छथि। जेना मैथिलीमे मठक परम्परा रहल अछि। (स्पष्टीकरण- श्रीमान्, प्रेमर्षि जी ओहि आलेखमे ई स्पष्ट लिखने छथि जे किनको नाम जे छुटि गेल छन्हि तँ से मात्र आलेखक लेखकक जानकारी नहि रहबाक द्वारे, एहिमे आन कोनो कारण नहि देखल जाय। अहाँसँ एहि विषयपर विस्तृत आलेख सादर आमंत्रित अछि।-सम्पादक) ७१.श्री मंत्रेश्वर झा- विदेह पढ़ल आ संगहि अहाँक मैगनम ओपस कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक सेहो, अति उत्तम। मैथिलीक लेल कएल जा रहल अहाँक समस्त कार्य अतुलनीय अछि। ७२. श्री हरेकृष्ण झा- कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक मैथिलीमे अपन तरहक एकमात्र ग्रन्थ अछि, एहिमे लेखकक समग्र दृष्टि आ रचना कौशल देखबामे आएल जे लेखकक फील्डवर्कसँ जुड़ल रहबाक कारणसँ अछि। ७३.श्री सुकान्त सोम- कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक मे  समाजक इतिहास आ वर्तमानसँ अहाँक जुड़ाव बड्ड नीक लागल, अहाँ एहि क्षेत्रमे आर आगाँ काज करब से आशा अछि। ७४.प्रोफेसर मदन मिश्र- कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक सन किताब मैथिलीमे पहिले अछि आ एतेक विशाल संग्रहपर शोध कएल जा सकैत अछि। भविष्यक लेल शुभकामना। ७५.प्रोफेसर कमला चौधरी- मैथिलीमे कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक सन पोथी आबए जे गुण आ रूप दुनूमे निस्सन होअए, से बहुत दिनसँ आकांक्षा छल, ओ आब जा कऽ पूर्ण भेल। पोथी एक हाथसँ दोसर हाथ घुमि रहल अछि, एहिना आगाँ सेहो अहाँसँ आशा अछि। ७६.श्री उदय चन्द्र झा "विनोद": गजेन्द्रजी, अहाँ जतेक काज कएलहुँ अछि से मैथिलीमे आइ धरि कियो नहि कएने छल। शुभकामना। अहाँकेँ एखन बहुत काज आर करबाक अछि। ७७.श्री कृष्ण कुमार कश्यप: गजेन्द्र ठाकुरजी, अहाँसँ भेँट एकटा स्मरणीय क्षण बनि गेल। अहाँ जतेक काज एहि बएसमे कऽ गेल छी ताहिसँ हजार गुणा आर बेशीक आशा अछि। ७८.श्री मणिकान्त दास: अहाँक मैथिलीक कार्यक प्रशंसा लेल शब्द नहि भेटैत अछि। अहाँक कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक सम्पूर्ण रूपेँ पढ़ि गेलहुँ। त्वञ्चाहञ्च बड्ड नीक लागल। ७९. श्री हीरेन्द्र कुमार झा- विदेह ई-पत्रिकाक सभ अंक ई-पत्रसँ भेटैत रहैत अछि। मैथिलीक ई-पत्रिका छैक एहि बातक गर्व होइत अछि। अहाँ आ अहाँक सभ सहयोगीकेँ हार्दिक शुभकामना। विदेह मैथिली साहित्य आन्दोलन (c)२००४-११. सर्वाधिकार लेखकाधीन आ जतय लेखकक नाम नहि अछि ततय संपादकाधीन। विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। सह-सम्पादक: उमेश मंडल। सहायक सम्पादक: शिव कुमार झा आ मुन्नाजी (मनोज कुमार कर्ण)। भाषा-सम्पादन: नागेन्द्र कुमार झा आ पञ्जीकार विद्यानन्द झा। कला-सम्पादन: ज्योति सुनीत चौधरी आ रश्मि रेखा सिन्हा। सम्पादक-शोध-अन्वेषण: डॉ. जया वर्मा आ डॉ. राजीव कुमार वर्मा। रचनाकार अपन मौलिक आ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि) ggajendra@videha.com केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx, .rtf वा .txt फॉर्मेटमे पठा सकैत छथि। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेताह, से आशा करैत छी। रचनाक अंतमे टाइप रहय, जे ई रचना मौलिक अछि, आ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। मेल प्राप्त होयबाक बाद यथासंभव शीघ्र ( सात दिनक भीतर) एकर प्रकाशनक अंकक सूचना देल जायत। ’विदेह' प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका अछि आ एहिमे मैथिली, संस्कृत आ अंग्रेजीमे मिथिला आ मैथिलीसँ संबंधित रचना प्रकाशित कएल जाइत अछि। एहि ई पत्रिकाकेँ श्रीमति लक्ष्मी ठाकुर द्वारा मासक ०१ आ १५ तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि। (c) 2004-11 सर्वाधिकार सुरक्षित। विदेहमे प्रकाशित सभटा रचना आ आर्काइवक सर्वाधिकार रचनाकार आ संग्रहकर्त्ताक लगमे छन्हि। रचनाक अनुवाद आ पुनः प्रकाशन किंवा आर्काइवक उपयोगक अधिकार किनबाक हेतु ggajendra@videha.co.in पर संपर्क करू। एहि साइटकेँ प्रीति झा ठाकुर, मधूलिका चौधरी आ रश्मि प्रिया द्वारा डिजाइन कएल गेल। सिद्धिरस्तु वि दे ह विदेह Videha বিদেহ  विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका Videha Ist Maithili Fortnightly e Magazine  विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका 'विदेह' ७५ म अंक ०१ फरवरी २०११ (वर्ष ४ मास ३८ अंक ७५)http://www.videha.co.in/ मानुषीमिह संस्कृताम् ISSN 2229-547X VIDEHA वि दे ह विदेह Videha বিদেহ  विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका Videha Ist Maithili Fortnightly e Magazine  विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका 'विदेह' ७५ म अंक ०१ फरवरी २०११ (वर्ष ४ मास ३८ अंक ७५)http://www.videha.co.in/ मानुषीमिह संस्कृताम् ISSN 2229-547X VIDEHA

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