334 335 ISSN 2229-547X VIDEHA 'विदेह' ७६ म अंक १५ फरवरी २०११ (वर्ष ४ मास ३८ अंक ७६) वि दे ह विदेह Videha বিদেহ http://www.videha.co.in विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका Videha Ist Maithili Fortnightly e Magazine नव अंक देखबाक लेल पृष्ठ सभकेँ रिफ्रेश कए देखू। Always refresh the pages for viewing new issue of VIDEHA. Read in your own script Roman(Eng)Gujarati Bangla Oriya Gurmukhi Telugu Tamil Kannada Malayalam Hindi ऐ अंकमे अछि:- १. संपादकीय संदेश २. गद्य २.१.डॉ. कैलाश कुमार मिश्र- भावमय, भोगमय, योगमय बृन्दावन २.२.शिव कुमार झा "टिल्लू"- मैथिली कथाक विकासमे गामक जिनगीक योगदान २.३.राजदेव मंडल- उपन्यास- हमर टोल २.४.१.ज्योति सुनीत चौधरी-रातिक इजोतः २. किरीम लगाउ-मुहॅ चमकाउ- एकटा हास्य विहनि कथा २.५.डाॅ. योगानन्द झा- मैथिली बाललोककथा : स्थिति आ अपेक्षा- आगाँ २.६.सुजित कुमार झा- मिनापक लेल एकटा आओर उपलब्धी दू लाखक पुरस्कार २.७.१.जगदीश प्रसाद मंडल- एकांकी- सतमाए २.बेचन ठाकुर- बेटीक अपमान केर अंतिम दृश्य २.८.१.सुमित आनन्द- शोध-पत्रिका- मैथिलीक लोकार्पण २.मुन्ना जी-अप्पन आंगनमे ठाढ़ आइ हम अपने घरकेँ ताकि रहल छी ३. पद्य ३.१.चन्दन झा- की भऽ रहल अछि अपना गाममे ३.२.मोहन प्रसाद- आउ करी नव मिथिलाक निर्माण ३.३.गिरीश चन्द्र लाल ३.४.राजेश मोहन झा- कविता- माय मनाइन ३.५.नवीन कुमार "आशा" ३.६.जगदीश प्रसाद मंडल ३.७.१. राम विलास साहु- नींदिया बैरी भेल पहुना २. आनंद कुमार झा ३.८.१.रमाकान्त राय 'रमा'- सांझुक सांझे उपास २.संजय कुमार मण्डल-माघक जाड़ ४. मिथिला कला-संगीत-१.श्वेता झा चौधरी २.ज्योति सुनीत चौधरी ३श्वेता झा (सिंगापुर) ५. गद्य-पद्य भारती: मोहनदास: (दीर्घकथा):लेखक : उदय प्रकाश (मूल हिन्दीसँ मैथिलीमे अनुवाद विनीत उत्पल) ६. बालानां कृते-ज्योति सुनीत चौधरी- वनभोज ७. भाषापाक रचना-लेखन -[मानक मैथिली], [विदेहक मैथिली-अंग्रेजी आ अंग्रेजी मैथिली कोष (इंटरनेटपर पहिल बेर सर्च-डिक्शनरी) एम.एस. एस.क्यू.एल. सर्वर आधारित -Based on ms-sql server Maithili-English and English-Maithili Dictionary.] 8.VIDEHA FOR NON RESIDENTS 8.1.Original Poem in Maithili by Kalikant Jha "Buch" Translated into English by Jyoti Jha Chaudhary 8.2.Maithili Novel Sahasrashirsha by Gajendra Thakur re-written in English by the author himself. 9. VIDEHA MAITHILI SAMSKRIT EDUCATION (contd.)बिपिन कुमार झा- लैटेक्स : परिचयः उपादेयता च विदेह ई-पत्रिकाक सभटा पुरान अंक ( ब्रेल, तिरहुता आ देवनागरी मे ) पी.डी.एफ. डाउनलोडक लेल नीचाँक लिंकपर उपलब्ध अछि। All the old issues of Videha e journal ( in Braille, Tirhuta and Devanagari versions ) are available for pdf download at the following link. विदेह ई-पत्रिकाक सभटा पुरान अंक ब्रेल, तिरहुता आ देवनागरी रूपमे Videha e journal's all old issues in Braille Tirhuta and Devanagari versions विदेह ई-पत्रिकाक पहिल ५० अंक
विदेह ई-पत्रिकाक ५०म सँ आगाँक अंक विदेह आर.एस.एस.फीड। "विदेह" ई-पत्रिका ई-पत्रसँ प्राप्त करू। अपन मित्रकेँ विदेहक विषयमे सूचित करू। ↑ विदेह आर.एस.एस.फीड एनीमेटरकेँ अपन साइट/ ब्लॉगपर लगाऊ। ब्लॉग "लेआउट" पर "एड गाडजेट" मे "फीड" सेलेक्ट कए "फीड यू.आर.एल." मे http://www.videha.co.in/index.xml टाइप केलासँ सेहो विदेह फीड प्राप्त कए सकैत छी। गूगल रीडरमे पढ़बा लेल http://reader.google.com/ पर जा कऽ Add a Subscription बटन क्लिक करू आ खाली स्थानमे http://www.videha.co.in/index.xml पेस्ट करू आ Add बटन दबाउ। मैथिली देवनागरी वा मिथिलाक्षरमे नहि देखि/ लिखि पाबि रहल छी, (cannot see/write Maithili in Devanagari/ Mithilakshara follow links below or contact at ggajendra@videha.com) तँ एहि हेतु नीचाँक लिंक सभ पर जाऊ। संगहि विदेहक स्तंभ मैथिली भाषापाक/ रचना लेखनक नव-पुरान अंक पढ़ू। http://devanaagarii.net/ http://kaulonline.com/uninagari/ (एतए बॉक्समे ऑनलाइन देवनागरी टाइप करू, बॉक्ससँ कॉपी करू आ वर्ड डॉक्युमेन्टमे पेस्ट कए वर्ड फाइलकेँ सेव करू। विशेष जानकारीक लेल ggajendra@videha.com पर सम्पर्क करू।)(Use Firefox 3.0 (from WWW.MOZILLA.COM )/ Opera/ Safari/ Internet Explorer 8.0/ Flock 2.0/ Google Chrome for best view of 'Videha' Maithili e-journal at http://www.videha.co.in/ .) Go to the link below for download of old issues of VIDEHA Maithili e magazine in .pdf format and Maithili Audio/ Video/ Book/ paintings/ photo files. विदेहक पुरान अंक आ ऑडियो/ वीडियो/ पोथी/ चित्रकला/ फोटो सभक फाइल सभ (उच्चारण, बड़ सुख सार आ दूर्वाक्षत मंत्र सहित) डाउनलोड करबाक हेतु नीचाँक लिंक पर जाऊ। VIDEHA ARCHIVE विदेह आर्काइव भारतीय डाक विभाग द्वारा जारी कवि, नाटककार आ धर्मशास्त्री विद्यापतिक स्टाम्प। भारत आ नेपालक माटिमे पसरल मिथिलाक धरती प्राचीन कालहिसँ महान पुरुष ओ महिला लोकनिक कर्मभूमि रहल अछि। मिथिलाक महान पुरुष ओ महिला लोकनिक चित्र 'मिथिला रत्न' मे देखू। गौरी-शंकरक पालवंश कालक मूर्त्ति, एहिमे मिथिलाक्षरमे (१२०० वर्ष पूर्वक) अभिलेख अंकित अछि। मिथिलाक भारत आ नेपालक माटिमे पसरल एहि तरहक अन्यान्य प्राचीन आ नव स्थापत्य, चित्र, अभिलेख आ मूर्त्तिकलाक़ हेतु देखू 'मिथिलाक खोज' मिथिला, मैथिल आ मैथिलीसँ सम्बन्धित सूचना, सम्पर्क, अन्वेषण संगहि विदेहक सर्च-इंजन आ न्यूज सर्विस आ मिथिला, मैथिल आ मैथिलीसँ सम्बन्धित वेबसाइट सभक समग्र संकलनक लेल देखू "विदेह सूचना संपर्क अन्वेषण" विदेह जालवृत्तक डिसकसन फोरमपर जाऊ। "मैथिल आर मिथिला" (मैथिलीक सभसँ लोकप्रिय जालवृत्त) पर जाऊ। संपादकीय बूच जीक कविताक -मार्क्सवाद, ऐतिहासिक दृष्टि, संरचनावाद, जादू-वास्तविकतावाद, उत्तर-आधुनिक , नारीवादी आ विखण्डनवाद दृष्टिसँ अध्ययन संगमे भारतीय सौन्दर्यशास्त्रक दृष्टिसँ सेहो अध्ययन जेठी करेह: बूच जीक कविता जेठी करेह कवितामे कवि कहै छथि जे ई भोरमे उधिआइ अछि, बर्खा हेठ भेलोपर उपलाइत अछि। ओकर खतराक बिन्दु बड्ड ऊपर छै तखन ओ किए अकुलाइत अछि। आ आखिरीमे कहै छथि जे बान्ह तोड़ि ई प्रलय मचाओत से बुझाइत अछि।ई भेल ऐ कविताक सामान्य पाठ। आब एतए एकरा संरचनावादी दृष्टिकोणसँ देखी तँ लागत जे करेह सवेरे उधिआइ अछि तँ आशा करू जे आन बेरमे ई नै उधिआइत होएत। बरखा हेठ भेने उपलाइत अछि मुदा से नै हेबाक चाही। इन्होर पानिक चमकब, मोरपर भौरी देब आ तकर परिणाम जे डीहक करेजकेँ ई अपनामे समा लैत अछि।ओकर रेतक बढ़लासँ कविक धैर्य चहकै छन्हि। आब कने संरचनावादसँ हटि कऽ एकर ऐतिहासिक विश्लेषणपर आउ। ई नव युगक लेल एकटा नव अर्थ देत। खतराक बिन्दु जे कविक समएमे ऊँचगर लगैत हएत आब बान्हक बीचमे भेल जमा धारक मवादक चलते ओतेक ऊँच नै रहि गेल। से नव पीढ़ी लेल कविक कविता कविसँ फराक एकटा नव स्वरूप लऽ लैत अछि। आब कने संरचनावादसँ हटि कऽ विखण्डनवाद दिस आउ। विखण्डनवादी कहत जे संरचनावादीक ध्रुव दार्शनिक स्वरूप लैत अछि। बर्खा हेठ भेलै, तैयो उपलायब, बान्ह बनबैबला इंजीनियरक करेहकेँ बान्हबाक प्रयासक बुरबकीक रूप लेब आ कविक करेह द्वारा बान्ह तोड़ि प्रलय मचेबाक भविष्यवाणी स्वयं कविक ध्रुवीकरणक स्थायी वा क्षणिक होएबापर प्रश्नचिन्ह लगेबाक प्रमाण अछि। आब फेर कने कविताक ऐतिहासिकतापर जाउ। जादू-वास्तविकतावादी साहित्यमे भूतकालमे गेलापर हम देखै छी जे ६०क दशकमे बान्ह बनेबाक भूत सवार रहै, बान्ह, ऊँच आ चाकर, जे धारकेँ रोकि देत आ मनुक्ख लेल की-की फाएदा ने करत। ओइ स्थितिमे जादू-वास्तविकताबला साहित्यक पात्र लग ई कविता जाएत तँ ओ ऐ कविताक तेसरे अर्थ लगाओत। कविक अस्तित्व ओतए खतम भऽ जाएत आ शब्दशास्त्र अपन खेल शुरू करत। जादू-वास्तविकताबला साहित्यक ओ पात्र जे भविष्यमे जीयत तकरा लेल सेहो ई एकटा अलगे अर्थ लेत, ओ धारक खतराक निशानक ऊँच होमयबला गप बुझबे नै करत आ कविक कविताक भावक ताकिमे रहत। मुदा विखण्डनवाद तकरा बाद अपने जालमे फँसि जाएत, बहुत रास बात नै रहत मुदा बहुत रास बात रहत। बरखा रहत, धार सेहो परिवर्तित रूपमे रहबे करत, रौदमे ओकर पानि इन्होर होइते रहत।उधियेनाइ आ उपलेनाइ रहबे करत। स्वागत गान: स्वागत गानक सामान्य पाठ- कवि सभक स्वागत कऽ रहल छथि मुदा मिथिलाक उपटैत धरतीक करुण क्रन्दनक बीच उल्लासक गीत कोन होएत। भ्रमर पियासल, फलक गाछ मौलायल तखन ई समारोही गोष्ठीसँ की होएत? कविताक संग लाठी आ रसक संग खोरनाठी लिअए पड़त। कविताक नीचाँमे सूचना अछि- विद्यापति स्मृति पर्व समारोह १९८४, ग्राम-बैद्यनाथपुर, प्रखंड-रोसड़ा, जिला-समस्तीपुरमे आगत अतिथिक स्वागत। ओ कालखण्ड मिथिलासँ पड़ाइनक प्रारम्भ छल। हाजीपुरमे गंगा पुल बनि गेल छल। विकासक प्रतिमान लागल जेना विफल भऽ गेल। पैघ बान्हक प्रति मोहभंग भऽ गेल छल। कृषिक आ कृषकक दुर्दशाक लेल बाढ़िक विभीषिका छल तँ स्थानीय फसिल आधारित औद्योगीकरण निपत्ता छल आ शिक्षाक अभियान कतौ देखबामे नै आबि रहल छल। आ ताइ स्थितिमे समारोही गोष्ठीक स्वागतक भार कविजी सम्हारने रहथि। ध्वनि सिद्धान्त: आनन्दवर्धन ध्वन्यालोकमे साहित्यक उद्देश्य अर्थकेँ परोक्ष रूपेँ बुझाएब वा अर्थ उत्पन्न करब कहैत छथि। ई सिद्धान्त दैत अछि परोक्ष अर्थक संरचना आ कार्य, रस माने सौन्दर्यक अनुभव आ अलंकारक सिद्धान्त।आनन्दवर्धन काव्यक आत्मा ध्वनिकेँ मानैत छथि। ध्वनि द्वारा अर्थ तँ परोक्ष रूपेँ अबैत अछि मुदा ओ अबैत अछि सुसंगठित रूपमे। आ ऐसँ अर्थ आ प्रतीक दूटा सिद्धान्त बहार होइत अछि। ऐसँ रसक प्रभाव उत्पन्न होइत अछि। ऐसँ रस उत्पन्न होइत अछि। न्याय आ मीमांसा ऐ सिद्धान्तक विरोध केलक, ई दुनू दर्शन कहैत अछि जे ध्वनिक अस्तित्व कतौ नै अछि, ई परिणाम अछि अनुमानक आ से पहिनहियेसँ लक्षणक अन्तर्गत अछि। आ से सभ शब्द द्वारा वर्णित होएब सम्भव नै अछि। स्वागत गानक ध्वनि सिद्धान्तक हिसाबसँ पाठ: विद्यापति शिव स्वरूप मृत्युंजय मऽरल छथि कहि कवि अर्थ आ प्रतीक दुनू सोझाँ अनै छथि। ध्वनि सिद्धान्तक न्याय दर्शन विरोध केलक मुदा उदयनक गाम करियनक कवि बूच जी दार्शनिक नै, कवि छथि। ओ ध्वनिक जोरगर संरचना सोझाँ अनै छथि- हमरा सबहक अभाग अजरो भऽ जऽड़ल छथि, आ मात्र ई समारोही गोष्ठी सँ की हेतै ? आगाँ ओ कहै छथि- काव्य पाठ करू मुदा कान्ह पर लिअ लाठी, एक हाथ रसक श्रोत दोसर मे खोर नाठी। ऐ प्रतीक सभसँ भरल ई कविता सुगठित रूपे आगाँ बढ़ैत अछि आ अभ्यागतक स्वागत करैत अछि। मार्क्सवादी दृटिकोणसँ देखलापर लागत जे कविक काजकेँ ऐ कवितामे काव्यपाठसँ आगाँ भऽ देखल गेल अछि। ऐमे सकारबाक भावक संग ओकरा फुसियेबाक, पुरान आ नव; आ विकास आ मरण दुनूक नीक जकाँ संयोजन भेल अछि। स्वागत गान अपन परिस्थितिसँ कटि कऽ आह-बाह करऽ लगैत तँ मार्क्सवादी दृष्टिकोणसँ ई निम्न कोटिक कविता भऽ जाइत (जकर भरमार मैथिलीक स्वागत आ ऐश्वर्य गान गीत सभमे अछि), मुदा कवि एकरा एकटा गतिशील प्रक्रियाक अंग बना देलन्हि आ ई मैथिलीक सर्वश्रेष्ठ स्वागत गान बनि गेल। बेटी बनलि पहाड़: बेटी बनलि पहाड़ कविताक सामान्य पाठ: दुलरैतिन बेटी घेंटक घैल बनल छथि। बेटी अएलीह तँ उड़नखटोला चढ़ि कऽ मुदा हरि गरुड़ त्यागि कार माँगि रहल छथिन्ह। पैंतीस ग्राम सोना पुड़ेलन्हि मुदा आब बियाह रातिक खर्चा चाही आ बरियाती दस गाही अओताह; सौँसे बल्ब जड़ि रहल अछि मुदा माझे ठाम अन्हार अछि। दशरथ एको पाइ नै मँगलन्हि, रामो किछु नै बजलाह। इतिहास तँ कृष्णक लव मैरेजक छल मुदा तैसँ की। जनक वर्तमानमे हाहाकार कऽ रहल छथि। बेटाक कंठ बाप पकड़ने अछि आ घरे-घर बूचड़खाना बनल अछि आ गामे-गाम बजार लागल अछि। बेटी बनलि पहाड़ कविताक समाजशास्त्रीय समीक्षा पद्धतिक दृष्टिसँ पाठ: ई कविता काटर प्रथाक विरोधक कविता अछि। समाजमे ओइ कालमे (अखनो) काटर प्रथाक कारण उड़नखटोलापर चढ़ि कऽ आयलि दुलरैतिन बेटी बाप अपस्यांत छथि। करूण गीत: करूण गीत कविताक सामान्य पाठ: कोकिलक करुण गीत सुनि श्रवित लोचनसँ कुसमित कानन देखब! सुवर्णक सौर्य शिखरपर शान्ति सागरक सुलभ जीत! जहिना किछु आलिंगन करै छी अनेको वक्रशूल भोका जाइत अछि। सुषमा दू क्षणक लेल आयलि, (आ चलि गेलि!) प्रेमक मधु तीत भऽ गेल। रजनीक रुदन विगलित प्रभात! करूण गीत कविताक रूपवादी दृष्टिकोणसँ पाठ: कुसुमित काननक श्रवित लोचन द्वारा देखब, श्रृंगार सेज पर ज्वलित मसानक रौद्र रूपक आएब आ सुवर्णक शौर्य शिखर पर - शांति सागरक सुलभ जीत केँ देखू। भाषाक अनभुआर पक्षकेँ कवि नीक जकाँ उपयोग करै छथि। आ अहीसँ हुनकर कवितामे कवित्व आबि जाइत अछि। विरोधी शब्द सभक बाहुल्य आ संयोजनक अनभुआर प्रकृति शब्दालंकारसँ युक्त भाषा ऐ कविताकेँ विशिष्ट बनबैत अछि। फूलक शूल सन ढुकब आ एहने आन संयोजन ऐ कविताकेँ रूपवादी दृष्टिकोणसँ श्रेष्ठ बनबैत अछि। गामे मोन पड़ैए: गामे मोन पड़ैए कबिताक सामान्य पाठ: गाममे रोटी एकोण रहए आ बथुओ साग अनोन रहए मुदा तैयो कलकत्तामे गामे मोन पड़ि रहल अछि। करेहक पानि पटा कऽ मोती उपजाएब तँ बच्चा सभ बिलटत? हुगलीक बाबू रहब नीक आकि कमला कातक जोन रहब? ईडेन गार्डनसँ नीक कमला कातक बोन अछि, पति पत्नीकेँ ईडेन गार्डनमे माला पहिरा रहल छथि मुदा कमला कातक बोनमे तिरहुतनी अपन भोला लेल धतूर अकोन ताकि रहल छथि! नारीवादी दृष्टिकोणसँ गामे मोन पड़ैए कविताक पाठ: प्रवासक कविता अछि ई। तिरहुतनी अपन भोला लेल धतूर अकोन ताकि रहल छथि, आ भोला प्रवासमे छथि। अस्तित्ववादी दृष्टिकोणसँ देखी तँ ई भोला अपन दशा लेल, असगर जीबा लेल, चिन्ता लेल अपने जिम्मेदार छथि। सोन दाइ: सोन दाइ कविताक सामान्य पाठ: सोन दाइक जीवनमे ने हास रहतन्हि आ ने विलास, मुदा से किएक? बाल वृन्द जा रहल छथि, नव युवको चलल छथि आ तकरा बाद बूढ़-सूढ़ गलि गेल छथि। तैयो किए विश्वास छन्हि सोन दाइकेँ? ऐ सभक उत्तर आगाँ जा कऽ भेटैत अछि, देसकोस बिसरि ओ प्रवास काटि रहल छथि। आ जौँ-जौँ उमेर बढ़तै कहिया धरि सोन दाइक घरमे वास हेतै।नारीवादी दृष्टिकोणसँ सोन दाइ कविताक पाठ: नारीक लेल वएह सिद्धान्त, किए ने ओ काव्येक सिद्धान्त होए, जे पुरुष केन्द्रित समाजमे पुरुष लोकनि द्वारा बनाओल गेल अछि, समीचीन नै अछि। सोन दाइ देसकोस बिसरि ककरा लेल प्रवास काटि रहल छथि? अकाल: अकाल कविताक सामान्य पाठ: अकालक वर्णनमे कवि नाङरिमे भूखक ऊक बान्हि ओकर चारपर ताल ठोकबाक वर्णन करैत छथि।अनावृष्टिसँ अकाल आ तइसँ महगीक आगमन भेल, तइसँ जड़ैत गामक अकास लाल भऽ गेल। भारतमे लंका सन मृत्युक ताण्डव शुरू भेल अछि मुदा ऐबेर विभीषणक घर सेहो नै बाँचत कारण ओकर मुंडमाल डोरी-डोरीसँ बान्हल अछि। माए भरि-भरि पाँज कऽ धरती पकड़ि रहल छथि। दशानन अपन बीसो आँखि ओनारि माथ हिला रहल छथि। औचित्य सिद्धान्त: क्षेमेन्द्र औचित्यविचारचर्चामे औचित्यकेँ साहित्यक मुख्य तत्व मानलन्हि। आ औचित्य कतऽ हेबाक चाही? ई हेबाक चाही पद, वाक्य, प्रबन्धक अर्थ, गुण, अलंकार, रस, कारक, क्रिया, लिंग, वचन, विशेषण, उपसर्ग, निपात माने फाजिल, काल, देश कुल, व्रत, तत्व, सत्व माने आन्तरिक गुण, अभिप्राय, स्वभाव, सार-संग्रह, प्रतिभा, अवस्था, विचार, नाम आ आशीर्वादमे। कंपायमान अछि ई ब्रह्माण्ड आ ई अछि कंपन मात्र। कविता वाचनक बाद पसरैत अछि शान्ति, शान्ति सर्वत्र आ शान्ति पसरैत अछि मगजमे। अकाल कविताक औचित्य सिद्धान्तक हिसाबसँ पाठ: ई अकाल नहि, महाकाल अछि, भूखक ऊक बान्हि नाड़रि सँ, चारे पर ठोकैत ताल अछि मिथिलाक काल-देशमे अकालक ई वर्णन कविक कविताक औचित्य अछि। रावण तँ उपटबे करत, विभीषण सेहो नै बाँचत। तोहर ठोर: तोहर ठोर कविताक सामान्य पाठ: पानक ठोर आ सुन्नरिक ठोर। सुन्नरि द्वारा बातक चून लगाएब आ कऽथक सन लाल बुन्न कपोल सजाएब। मुदा प्रेमक पुंगी कतए? भोरक लाली सुन्नरिक ठोर सन, बिनु सुन्नरि व्याकुल साँझ जेकाँ। बधिक जे बनत सुन्नरिक वर तँ हम बनब विखण्डित राहु। स्वर्गोमे सुधा कम्मे अछि, तहिना सुन्नरिक ठोर सेहो कतऽ पाबी। सकरी मिल महान बनत जे हम विश्वकर्मासँ विज्ञान सीखब। आ ओइ मिलसँ बहार होएत माधुर्य। कुसियारक पाकल पोर सन सुन्नरिक ठोर अछि। पुनर्जन्ममे सेहो धान आ चिष्टान्न बनि सुन्नरि हम अहाँक लग आएब। मुदबा एतबा बादो शब्दसँ उद्देश्य कहाँ प्रगट भेल। अलंकार सिद्धान्तक हिसाबसँ तोहर ठोर कविताक पाठ: भामह अलंकारकेँ समासोक्ति कहै छथि जे आनन्दक कारण बनैए। दण्डी आ उद्भट सेहो अलंकारक सिद्धान्तकेँ आगाँ बढ़बै छथि। अलंकारक मूल रूपसँ दू प्रकार अछि, शब्द आ अर्थ आधारित आ आगाँ सादृश्य-विरोध, तर्कन्याय, लोकन्याय, काव्यन्याय आ गूढ़ार्थ प्रतीति आधारपर। मम्मट ६१ प्रकारक अलंकारकेँ ७ भागमे बाँटै छथि, उपमा माने उदाहरण, रूपक माने कहबी, अप्रस्तुत माने अप्रत्यक्ष प्रशंसा, दीपक माने विभाजित अलंकरण, व्यतिरेक माने असमानता प्रदर्शन, विरोध आ समुच्चय माने संगबे। बातक चून लगाएब अप्रस्तुत, कऽथक सन लाल बुन्न कपोल, पानक ठोर आ सुन्नरिक ठोर, भोरक लाली सुन्नरिक ठोर सन, कुसियारक पाकल पोर सन सुन्नरिक ठोर ई सभ उपमा कवि द्वारा प्रयुक्त भेल अछि। मुदा कतऽ छह प्रेमक पुंगी हूक? मे सादृश्य-विरोध अछि। अहाँ बिनु व्याकुल वाटक माँझ मे रूपक प्रयुक्त भेल अछि। काव्यक भारतीय विचार: मोक्षक लेल कलाक अवधारणा, जेना नटराजक मुद्रा देखू। सृजन आ नाश दुनूक लय देखा पड़त। स्थायी भावक गाढ़ भऽ सीझि कऽ रस बनब- आ ऐ सन कतेक रसक सीता आ राम अनुभव केलन्हि (देखू वाल्मीकि रामायण)। कृष्ण भारतीय कर्मवादक शिक्षक छथि तँ संगमे रसिक सेहो। कलाक स्वाद लेल रस सिद्धांतक आवश्यकता भेल आ भरत नाट्यशास्त्र लिखलन्हि। अभिनवगुप्त आनन्दवर्धनक ध्यन्यालोकपर भाष्य लिखलन्हि। भामह ६अम शताब्दी, दण्डी सातम शताब्दी आ रुद्रट ९अम शताब्दी एकरा आगाँ बढ़ेलन्हि। रस सिद्धान्तक हिसाबसँ तोहर ठोर कविताक पाठ: रस सिद्धान्त:भरत:- नाटकक प्रभावसँ रस उत्पत्ति होइत अछि। नाटक कथी लेल? नाटक रसक अभिनय लेल आ संगे रसक उत्पत्ति लेल सेहो। रस कोना बहराइए? रस बहराइए कारण (विभाव), परिणाम (अनुभाव) आ संग लागल आन वस्तु (व्यभिचारी)सँ। स्थायीभाव गाढ़ भऽ सीझि कऽ रस बनैए, जकर स्वाद हम लऽ सकै छी।भट्ट लोलट:- स्थायीभाव कारण-परिणाम द्वारा गाढ़ भऽ रस बनैत अछि। अभिनेता-अभिनेत्री अनुसन्धान द्वारा आ कल्पना द्वारा रसक अनुभव करैत छथि। लोलट कविकेँ आ संगमे श्रोता-दर्शककेँ महत्व नै दै छथि। शौनक:- शौनक रसानुभूति लेल दर्शकक प्रदर्शनमे पैसि कऽ रस लेब आवश्यक बुझै छथि, घोड़ाक चित्रकेँ घोड़ा सन बूझि रस लेबा सन। भट्टनायक कहै छथि जे रसक प्रभाव दर्शकपर होइत अछि। कविक भाषाकेँ ओ भिन्न मानैत छथि। रससँ श्रोता-दर्शकक आत्मा, परमात्मासँ मेल करैए। रसक आनन्द अछि स्वरूपानन्द। आ ऐसँ होइत अछि आत्म-साक्षात्कार। रस सिद्धान्त श्रोता-दर्शक-पाठक पर आधारित अछि। ई श्रोता-दर्शक-पाठकपर जोर दैत अछि। बार्थेज संरचनावाद-उत्तर-संरचनावादक सन्दर्भमे लेखकक उद्देश्यसँ पाठकक मुक्तिक लेल लेखकक मृत्युकेँ आवश्यक मानै छथि- लेखकक मृत्यु माने लेखक रचनासँ अलग अछि आ पाठक अपना लेल अर्थ तकैत अछि। लगौलह बातक पाथर चून । आ सजौलह कऽथ कपोलक खून । विभाव अछि आ ऐ कारणसँ देखि कऽ लहरल हमर करेज अनुभाव माने परिणाम बहार होइत अछि। स्फोट सिद्धांत: भर्तृहरीक वाक्यपदीय कहैत अछि जे शब्द आकि वाक्यक अर्थ स्फोट द्वारा संवाहित अछि। वर्ण स्फोटसँ वर्ण, पद स्फोटसँ शब्द आ वाक्य स्फोटसँ वाक्यक निर्माण होइत अछि। कोनो ज्ञान बिनु शब्दक सम्बन्धक सम्भव नै अछि। ई भारतीय दर्शनक ज्ञान सिद्धान्तक एकटा भाग बनि गेल। अर्थक संप्रेषण अक्षर, शब्द आ वाक्यक उत्पत्ति बिन सम्भव अछि। स्फोट अछि शब्दब्रह्म आ से अछि सृजनक मूल कारण। अक्षर, शब्द आ वाक्य संग-संग नै रहैए। बाजल शब्दक फराक अक्षर अपनामे शब्दक अर्थ नै अछि, शब्द पूर्ण होएबा धरि एकर उत्पत्ति आ विनाश होइत रहै छै। स्फोटमे अर्थक संप्रेषण होइत अछि मुदा तखनो स्फोटमे प्राप्ति समए वा संचारक कालमे अक्षर, शब्द वा वाक्यक अस्तित्व नै भेल रहै छै। शब्दक पूर्णता धरि एक अक्षर आर नीक जकाँ क्रमसँ अर्थपूर्ण होइए आ वाक्य पूर्ण हेबा धरि शब्द क्रमसँ अर्थपूर्ण होइए।सांख्य, न्याय, वैशेषिक, मीमांसा आ वेदान्त ई सभ दर्शन स्फोटकेँ नै मानैत अछि। ऐ सभ दर्शनक मानब अछि जे अक्षर आ ओकर ध्वनि अर्थकेँ नीक जेकाँ पूर्ण करैत अछि। फ्रांसक जैक्स डेरीडाक विखण्डन आ पसरबाक सिद्धान्त स्फोट सिद्धान्तक लग अछि। स्फोट सिद्धांतक आधारपर तोहर ठोर कविताक पाठ: आब उदयनक करियनक धरतीपर रहबाक अछैतो न्याय सिद्धान्तक स्फोट सिद्धान्तकेँ नै मानब कविक कविताकेँ नै अरघै छन्हि। मने मे रहल मनक सब बात कहि ओ अलभ्य चित चोर सँ सुन्नरिक ठोरक तुलना कऽ दै छथि। उदयनक गामक कवि बूच कहै छथि भऽ रहल वर्ण - वर्ण निःशेष, शब्द सँ प्रगटल नहि उद्य़ेश्य; एतए शब्दसँ नै मुदा स्फोटसँ अर्थक संप्रेषण कवि द्वारा तोहर ठोर आ ऐ संग्रहक आन कविता सभमे जाइ तरहेँ भेल अछि, से संसारक सभसँ लयात्मक आ मधुर भाषा मैथिली मे (यहूदी मेनुहिनक शब्दमे) विद्यापतिक बादक सभसँ लयात्मक कविक रूपमे बूचजी केँ प्रस्तुत करैत अछि आ मैथिली कविताकेँ ऐ रूपमे फेरसँ परिभाषित करैत अछि। फूलकुमारी महतो मेमोरियल ट्रष्ट काठमाण्डू, नेपाल:- फूलकुमारी महतो मेमोरियल ट्रष्टद्वारा स्थापित मैथिलीक सभसँ पैघ राशिक पुरस्कार फूलकुमारी महतो मैथिली साधना सम्मान २०६७ सँ मिथिला क्षेत्रक सुपरिचित रङ्गसंस्था मिथिला नाट्यकला परिषदकेँ सम्मानित करबाक निर्णय कएल गेल अछि। एहि सम्मानमे दू लाख एक हजार) टकाक संगहि प्रशस्तिपत्र प्रदान कएल जएतैक। जनकपुरधामस्थित मिथिला नाट्यकला परिषद ( मिनापक वि.सं. २०३६ सालमे स्थापना भेल छल। तीन दशकसँ अधिक समयसँ मूलतः नाट्यविधाकेँ केन्द्रमे राखि ई संस्था नाट्य संगीत साहित्य तथा सामाजिक अभियानक माध्यमसँ मैथिली भाषा-संस्कृति एवं समाजक विकासमे विशिष्ट योगदान दैत राष्ट्रिय-अन्तर्राष्ट्रिय स्तरपर ख्याति कमबैत आएल अछि। तहिना फूलकुमारी महतो मैथिली प्रतिभा पुरस्कारसँ सप्तरी राजविराजनिवासी श्रीमती मीना ठाकुर आ बुधनगर मोरङनिवासी दयानन्द दिग्पाल यदुवंशीकेँ सम्मानित करबाक निर्णय कएल गेल अछि। एहि पुरस्कारमे पच्चीस-पच्चीस हजार टकाक संगहि प्रशस्तिपत्र प्रदान करबाक प्रावधान अछि। एहि दुनू व्यक्तिमेसँ श्रीमती मीना ठाकुर विगत चारि दशकसँ मैथिली सांस्कृतिक, साहित्यिक तथा साङ्गीतिक क्षेत्रमे निरन्तर क्रियाशील रहैत विविध गतिविधिक माध्यमसँ महिला सशक्तिकरणमे निरन्तर सक्रिय छथि। सप्तरीक बेस सक्रिय संस्था- मैथिल महिला परिषदक संस्थापक अध्यक्ष ठाकुरक सम्पादनमे सृजनधारा (कवितासङ्ग्रह प्रकाशित छनि। तहिना दयानन्द दिग्पाल यदुवंशी विगत चारि दशकसँ साहित्य तथा सत्संगक माध्यमसँ मैथिली भाषा-संस्कृतिक विकास एवं सामाजिक सद्भाव सम्बर्द्धनमा निरन्तर सक्रिय छथि। आशुकवित्वप्रतिभासम्पन्न कवि दिग्पालक कहिया फेरु अबै छी (कवितासङ्ग्रह प्रकाशित छनि। विख्यात् उद्योगपति तथा समाजसेवी डा. उपेन्द्र महतोद्वारा स्वर्गीय माता फूलकुमारी महतोक नामपर अपन मातृभाषा तथा मातृसंस्कृतिक उत्थानार्थ स्थापित एहि पुरस्कारक लेल प्रसिद्ध साहित्यकार डा. राजेन्द्र विमलक संयोजकत्वमे श्रीमती पूनम ठाकुर आ धीरेन्द्र प्रेमर्षिक सदस्यतावला तीन सदस्यीय सिफारिश समिति गठन कएल गेल छल। स्व. फूलकुमारी महतोक जन्मजयन्तीक सन्दर्भमे फागुन १५ गते तदनुरूप फरवरी २७ तारिख कऽ जनकपुरधाममे एक विशेष कार्यक्रमक आयोजन कऽ ई सम्मान तथा पुरस्कार समर्पण कएल जएबाक कार्यक्रम अछि। धीरेन्द्र प्रेमर्षि- - फूलकुमारी महतो मैथिली साधना सम्मान समितिक सदस्य सचिव छथि। सूचना: विदेहक ०१ मार्च २०११ अंक महिला अंक आ १५ मार्च २०११ अंक होली विशेषांक रहत। ०१ मार्च २०११ अंक लेल महिला लेखक लोकनिसँ गद्य-पद्य रचना २६ फरबरी २०११ धरि आमंत्रित अछि, रचनाक ने विषयक सीमा छै आ नै शब्दक। आनो लेखक महिला केन्द्रित गद्य-पद्य २६ फरबरी २०११ धरि पठा सकै छथि। होली विशेषांक लेल हास्य विधाक गद्य-पद्य रचना अहाँ १३ मार्च २०११ धरि पठा सकै छी। रचना मेल अटैचमेण्टक रूपमे .doc, .docx, .rtf वा .txt फॉर्मेटमे पठाओल जाए। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ अपन स्कैन कएल फोटो पठेताह, से आशा करैत छी। रचनाक अंतमे टाइप रहए जे ई रचना मौलिक अछि आ पहिल प्रकाशनक लेल विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि।
( विदेह ई पत्रिकाकेँ ५ जुलाइ २००४ सँ एखन धरि १०७ देशक १,६८९ ठामसँ ५६, ३७० गोटे द्वारा विभिन्न आइ.एस.पी. सँ २,९०,८८३ बेर देखल गेल अछि; धन्यवाद पाठकगण। - गूगल एनेलेटिक्स डेटा। ) गजेन्द्र ठाकुर ggajendra@videha.com http://www.maithililekhaksangh.com/2010/07/blog-post_3709.html २. गद्य २.१.डॉ. कैलाश कुमार मिश्र- भावमय, भोगमय, योगमय बृन्दावन २.२.शिव कुमार झा "टिल्लू"- मैथिली कथाक विकासमे गामक जिनगीक योगदान २.३.राजदेव मंडल- उपन्यास- हमर टोल २.४.१.ज्योति सुनीत चौधरी-रातिक इजोतः २. किरीम लगाउ-मुहॅ चमकाउ- एकटा हास्य विहनि कथा २.५.डाॅ. योगानन्द झा- मैथिली बाललोककथा : स्थिति आ अपेक्षा- आगाँ २.६.सुजित कुमार झा- मिनापक लेल एकटा आओर उपलब्धी दू लाखक पुरस्कार २.७.१.जगदीश प्रसाद मंडल- एकांकी- सतमाए २.बेचन ठाकुर- बेटीक अपमान केर अंतिम दृश्य २.८.१.सुमित आनन्द- शोध-पत्रिका- मैथिलीक लोकार्पण २.मुन्ना जी-अप्पन आंगनमे ठाढ़ आइ हम अपने घरकेँ ताकि रहल छी डॉ. कैलाश कुमार मिश्र- यायावरी भावमय, भोगमय, योगमय बृन्दावन “बृन्दावन सन वन नहीं नन्दग्राम सन ग्राम बंशीवट सन बट नहीं रामनाम सन नाम”. जखन बच्चे रही तँ हमर धर्मार्थी नानी हमरा संस्कृतक किछु श्लोकिआदिक संगे उपरोक्त दोहा सुग्गा जकाँ रटा देने रहथि। सूरदास, विद्यापति, रसखान आदि कवि लोकनिकेँ रचना पढ़लाक बाद बृन्दावनक बारेमे सदतिकाल कल्पना करैत रही। यमुनाक जल हरियर कचोर आ स्वच्छ कल-कल करैत होइ छैक। ई कहब छलन्हि हमर नानीक। अपनो मोनमे अबैत छल, ताहिं तँ गोपी सभ ऐ यमुनामे कखनो स्नान तँ कखनो पनघट लए धधरा चुनरी पहिरने, पएरमे पाजेब पहिर झुमैत-गबैत अबैत छल हेतीह। केतेक नैशर्गिक दृश्य होइत हेतैक यमुनाक कछेरमे! कदम्बक गाछ, गामक ग्वाल-बाल सबहक मधुर स्वर, मुरलीक तान, गोपीक गान, साधु- संतक शंखनाद, हरे-कृष्ण राधे-राधेक नाओंसँ उच्चारित आ मुग्धमय वातावरण, पण्डित, पण्डा आ विद्वान लोकनिक भगवद् चर्चा एवं राधा-कृष्णक प्रसंगपर वाद-विवाद, मस्त वातावरण। कृष्णमय बृन्दावन। राधामय बरसाना। नन्दमय नन्दग्राम। कान्हाक मथुरा। भगवानक कगुरियापर उठल 18 किलोमीटर केर परिधिमे पसरल गोवर्धन पहार। दूध-दही, मक्खन, रबड़ीसँ रेलम-पेल भेल समस्त चौरासी कोस। सफ-स्वच्छ वेगवान हरियर कचोर जलसँ अप्लावित आ कल-कल करैत यमुना। कातमे रंग-विरंगक गाछ-कदम्ब, जामुन, आम, नीम, बैर इत्यादि। नाना तरहक हरियरी। काते-काते मस्त भावसँ चरैत गाए-बाछा-बाछी। होइत छल एहने किछु दृश्य हेतैक समस्त ब्रजक्षेत्रक। माए ऊपरसँ हमरा हमेशा कहैत छलीह: समस्त ब्रजक धरतीमे किछु देवत्वक भाव छैक। आकर्षक छैक। आइयो ऐ धरतीक छटा किदु अलगे छैक। एकबेर जाएब तँ आबक मोने ने करत। हएत ओतै रहि जाइ। सुग्गा सभ चौंचसँ चौंच मिलबैत, गाए-बछरा सभ आनन्दक उन्मादमे चरैत। खेत खरिहानमे मोर धुमैत, एहने छटा छैक बृन्दावन केर। माएक बातकेँ नै मनबाक प्रश्ने कहाँ छल। रसखान स्मरण अबैत छलाह : मानस हो तो वही रसखान। बसहु ब्रज गोकुल गॉव केर ग्वारन। जौं पसु हो तो कहा वसु मेरो। चरौ नित नन्दक चेन्ु मन्जारन। आर तँ आर रसखान तँ ओहि कौआ केर भागकेँ नीक बुझै छथि जकर जन्म ब्रजभूमिमे भेल छैक। भगवान जँ पाथरो बनाबथि आ ब्रजभूमिमे रही तँ जीवन कृत-कृत। ई मान्यता छलन्हि रसखानक। दिल्लीमे पढ़ैकाल किछु लोक सभ मथुरा बृन्दावनक चर्च करैत छलाह मुदा कहि नै किएक कहियो ओतए जएबाक योजना नै बनल। बादमे जखन 1997 ईं.मे हम इन्दिरा गान्धी राष्ट्रीय कला केन्द्रमे शोधकर्मीक रूपमे नौकरी प्रारम्भ केलौं तँ हमर विभाग जनपद-सम्पदा केर विभागाध्यक्ष प्रोफेसर बैधनाथ सरस्वती हमरा मुख्यरूपेँ दू कार्यपर केन्द्रित करबाक निर्देश देलन्हि। पहिल, UNESCO, UNDP केर ग्रामीण भारत परियोजनापर कार्य करब आ दोसर, विभागक क्षेत्र सम्पदा कार्यक्रम केर अन्दर ब्रज प्रकल्प परियोजनाकेँ देखबाक छल। क्षेत्रसम्पदा केर अन्तर्गत ई विभाग कुनो विख्यात सास्कृतक क्षेत्र लय ओहि क्षेत्रक सांस्कृतिक निधिक सर्वांग अध्ययन करैत छलैक। सर्वांगसँ तात्पर्य ओइ सांस्कृतिक क्षेत्रक सम्बन्धमे उपलब्ध रचना, ओतए केर लोकक मान्यता, ओतय केर इतिहास, पुरातत्व, वास्तु निर्माण कला, मूर्तिकला, लोक गीत, संगीत, वाह्य, वाह्ययंत्र, कृषि-कार्य पद्धति केर दक्षता, वेश-भूषा, गहना, वस्त्र विन्यास, श्रृंगार आर नै जानी की की सबहक समग्रता में अध्ययन, ओकर ज्ञानक प्रकाशन केनाइ, ओइपर चर्चा, परिचर्चा, सम्बाद, संगोष्ठी, कार्यशाला आदिक आयोजनसँ छलैक। ओइ समएमे क्षेत्र परम्परा केर अन्तर्गत दू क्षेत्रपर कार्य चलैत रहैक- दक्षिण भारतमे बृहदेश्वर मन्दिर तथा उत्तर भारतमे ब्रज प्रकल्प। ब्रज प्रकल्पमे ओना तँ बहुत रास विद्वान आ अन्य विषयक विशेषज्ञ सभ छलाह परन्तु हमरा जे सर्वाधिक प्रभावित केलाह से छलाह श्रीवत्स गोस्वामी। श्री वत्स गोस्वामी बृन्दावनसँ छथि। हिनकर पूरखा पश्चिम बंगालसँ आबि बृन्दावनक खोज केलन्हि आ ततय केर मुख्य पुजारी भेलाह। अखनो बृन्दावन केर बाके बिहारी मन्दिर केर मुख्य पुजारी हिनके पितऔत छथिन्ह। ई लोकनि एक अपन संस्था बनौने छथि- बृन्दावन शोध-संस्थान। ई संस्था बृन्दावन केर इतिहास, प्रेम, परम्परा इत्यादिपर शोध करैत अछि। हिनकर छोट भाए भागवत कथा करैत छथि। श्रीवत्स गोस्वामी बिना सील वस्त्र पहिरैत छथि। केवल धोती आ शरीरपर चद्दरि। धोती आ चद्दरि दुनू पीताम्बरी। महग आ शुद्ध टवीस्टेड रेशमसँ बनल। बहुत छोट-छोट केस। बिना मोछ दाढ़ीक चिक्कन मुँह आ गाल। नमहर-नमहर पनिगर डोका जकाँ आखि आभासँ चमकैत कपार, गोर वर्ण, करीब साठिक उमेरि, पाथरक आकर्षक मूर्ति जकाँ तरासल सनक मुँह, नाक, कान, आँखि, गोखूर जकाँ टीकी, कपारपर कुमकुम चानन केर टीका, छह फूटा काया, छरहर शरीर, सुडोल पेट, धोधि केर नामो-निशान नै, सीटल-टोटल स्मार्ट। तइपर सँ संस्कृत, ब्रजबोली, हिन्दी, बंग्ला, अंग्रेजी, फ्रेन्च आ जर्मन, अतेक भाषा धारा प्रवाह बजैत-लिखैत। के नै मन्त्र-मुग्ध भ' जेता अहेन व्यक्तत्वसँ? हमहुँ भेलौं तँ कून आश्चर्य। त भेलै ई जे एक दिन श्रीवत्स गोस्वामी एक अन्तर्राष्ट्रीय संगोष्ठीमे बृन्दावन केर बांके बिहारी मन्दिरमे छप्पन भोगपर अपन एक आलेख पढ़लनि। रसगर विन्यास, सोहनगर सामग्री, मधु टपकैत भाषा आ तइपर पॉवर प्वाईन्ट प्रजेन्टेशन। हुनकर ऐ प्रजेन्टेशनकेँ सुनला आ देखलाक बाद सभागारमे उपस्थित तमाम देशी-विदेशी विद्वान लोकनि मन्त्रमुग्ध भ' गेलाह। हमहुँ भेलौं। हुनकर प्रजेन्टेशनसँ ऐ बातक जानकरी भेल जे प्रति दिन बृन्दावन केर बांके बिहारी जीक मन्दिरमे मन्दिरक मुख्य देवता (प्रस्तर प्रतिमा) राधा-कृष्णकेँ कमसँ कम छप्पन-पच्चास आओर छ-छप्पन भोज्य सामग्रीसँ भोग लगैत छन्हि। लोक सभ एवं स्थानीय पण्डा लोकनि अपन-अपन धरक चिनवारसँ अति सूचिताक संग बिना पीयाज, लहसून एवं कुनो वर्जित आ अखाद्य वस्तुकेँ देने बनल व्यंजन लबै छथि। नियम तँ ई छै जे छप्पन व्यंजन हेबाक चाही मुदा सामान्यता ई संख्या दू गुना बढ़ि जाइत छैक। श्रीवत्स गोस्वामी केर स्लाइड ततेक नीक रहैक तकर वर्णन शब्दसँ नै कएल जा सकैत अछि। व्यंजनक आकर्षन आ मनमोहक सौन्दर्य। वनेवा स ल' क' सजेबा धरि केर बिहंगम दृश्य। सौन्दर्य, संयोजन आ समर्पण केर बेजोड़ उदाहरण। एकाएक बुझाएल जेना व्यंजन बनेबा आ सचार लगेबासँ पैघ कुनो कला नै भ' सकैत अछि। गाम स्मरण आबए लागल। जखन कखनो हमर बहिनक ससुर हमरा ओतए अबैत छलाह तँ हमर माए नाना तरहक व्यंजन आ तरकाी, तरूआ, पापर, अचार, चटनी, सलाद, सम्दास, बर, बड़ी आ नै जाने की की बनबैत छलीह। घरमे पावनि-तिहारबला उत्साह भ' जाइत छल। अलग- बगल केर महिला सभ सेहो माएकेँ मदति करबाक लेल आबि जाइत छलथिन्ह। भोजन बनलाक बाद गाएक गोबरसँ ठॉव नीपल जाइत छल। बड़का कांसक थारी (बल्कि थार कहु) मे कमसँ कम एक सेर अरबा चाउरक गम-गम करैत छरहर भात सजाएल, थारी दिससँ अर्धचन्द्राकारक स्वरूपमे पैघ आ छोट विभिन्न प्रकारक बाटी सजाएल ओइ सभमे दालि, घृत, तरकारी, अचार, सन्ना, चटनी इत्यादि राखल एकटा मध्यम आकारक छिपलीमे तरूआ इत्यादि सजाएल पापर हमर माए जानि-बुझि क' भटक ढेर पर राखैत छलीह । कलपरसँ टटका पानि लाबक जिम्मेदारी हमर होइत छल। लोटाक संग एकटा फुलही गीलास सेहो होइत छलैक। जखन माए केर ई सभ तैय्यारी पूर्ण भ' जाइत छलन्हि तँ हमरा कहैत छलीह- “जाऊ दरब्ज्जापर दद्दा (हमर पिताक बेमातर जे हमर पितासँ करीब 20 वर्षक पैघ छलाह। हम हुनका पितामह तुल्य मानैत छलअनि। आ सिनेहसँ दादा कहैत छलयनि। ) के कहिऔन्ह जे भोजनक सचार लगि गेल अछि। समधिकेँ भोजन करा देथुन्ह।” हम माएक सम्वाद ल' चट्ट दनी दरबज्जापर चलि जाइ छलौं आ दादाकेँ कातमे बजा माएक सम्वाद नहु-नहु बता दै छलयन्हि। दादा साकांक्ष होइत बहिनक ससुरकेँ बड़ा विनम्रतापूर्वक कहैत छलथिन्ह- “समधि, भोजन तैयार अछि। हाथ-पएर धोल जाओ। चलू भोजनक हेतु।” आ पाहून महोदय बड़ा विनम्रता स दादाक आग्रहकेँ स्वीकार करैत ओछायनपर सँ उठि खराम पहीर- हाथ-पएर धो दादाक संग भोजनक हेतु विदा होइत छलाह। आगाँ-आगाँ हम आ पाछाँ-पाछाँ ओ सभ। बड्ड प्रेमसँ भोजन करैत छलाह। अन्तमे माए बड़का बट्टामे छालीसँ भरल गरम दूध आ सभसँ अन्तमे दही भेजबैत छलथिन्ह। पाहुन महोदय थारीक परोसल ब्यंजन एवं तमाम वस्तुक लगभग 75 प्रतिशत हिस्सा बड़ा मनोयोग पूर्वक ग्रहण क' लैत छलाह। एक-आध-बेर भोजनक प्रशंसा सेहो मुक्त कंठसँ करैत छलाह। किछु हँसी-मजाक आ कटाक्ष: सेहो चलैत छलैक। दादा हुनका सामनेमे एक छोट पीढ़ीपर बैसल, बेंत पकरने हुनकर आव-भगतमे लागल रहैत छलाह। ओह!!!! कतए भटकि गेलौं हम छप्पन भोगक चर्चामे!!! श्री वत्स गोस्वामी हमरा मोनमे एक हिसाबें ब्रजप्रकल्पक खूब नीकसँ जनबाक जिज्ञासा उत्पन्न क' देलन्हि। बीच-बीचमे किछु सांस्कृतिक कार्यक्रममे ब्रजभूमिसँ कलाकार आ कथावाचक सभ अबैत छलाह। गीतमे आ कथा वाचनाक क्रममे ई लोकनि ब्रजभाषाक किछु खांटी शब्दक प्रयोग करैत छलाह। ओ शब्द एहेन जे एकाएक प्रेमक नशामे मनुक्ख धूत्त भ' जाए। फेर की छल हम अपन संस्थाक ब्रज-प्रकल्प परियोजनामे लागि गेलौं। मुदा एकाएक आरो परियोजना सभ आबि गेलै आ हमरा ब्रज-प्रकल्प छोड़ए पड़ल। मोन हमेशा कचोट करैत रहल मुदा की कएल जा सकैत छल। 2007 ईंमे गामसँ हमर माता-पिता दिल्ली ऐलाह। माए मथुरा वृन्दावन जेबाक इच्छा व्यक्त केलनि। हम तुरंत तैय्यार भ' गेलौं। मुदा समयाभाव छल। हमरा लग समएक कमी रहैत अछि ऐ बातसँ पिताजी नीक जकाँ अवगत छलाह। ओ कहलनि- “ठीक छै। हमरा लोकनि दिल्लीसँ तीन बजे प्रात: बृन्दावनक हेतु प्रस्थान करब। बांके बिहारी, रंगनाथ इस्कॉन मन्दिर आ किछु अन्य प्रसिद्ध मन्दिरक दर्शन करैत सीधे मथुरा चलि पड़ब। मथुरामे द्वारकाधीशक पूजा कए आ भगवान श्रीकृष्णक जन्मस्थली (गर्भ गृह) देखलाक बाद भोजन- तत्पश्चात गोबरधनक परिक्रमा (कारेसँ) आ अन्तत: बरसाना जाय राधा-रानी या लाड़लीजीकेँ दर्शन करैत देर-सवेर ओही दिन दिल्ली वापस आबि जाएब।” पिताजीक ऐ योजनासँ हम प्रसन्न भेलौं। भेल जे सभ कार्य एके दिन (रवि दिन) मे भ' जाएत। इहो भेल जे पिताजी ब्रजक्षेत्रसँ नीक जकाँ वाकिफ छथि। माए सेहो पिताजी केर योजनाकेँ सहर्ष स्वीकारि लेलनि। दोसर दिन प्रात: हमरा लोकनि स्नान-ध्यान कए ठीक तीन बजे बृन्दावन यात्राक हेतु दिल्ली सँ निकलि गेलौं। रस्ता साफ आ भीड़क नामो निशान नै। गाड़ीक चालक साकांक्ष। बहुत वेगसँ मुदा सधल गाड़ी हँकैत। ठीक- दू घंटामे बृन्दावन पहुँच गेलौं। सभसँ पहिने इस्कान मन्दिर, फेर रंगनाथ मन्दिर किछु- छोट-मोट आनो मन्दिर आ अन्तत: बांके बिहारीक मन्दिर जा ओतए राधा-कृष्णक दर्शन केलौं। सभ कर्म शीघ्रतामे आ अन्हारेमे। ओतएसँ सीधे मथुराक हेतु, प्रस्थान केलौं। होइत छल शीघ्र द्वारकाधीशक दर्शन भ' जाएत तँ माए-बाबूजी अन्नजल ग्रहण करताह। द्वारकाधीशक दर्शन कए कृष्ण जन्मस्थलीक दर्शन केलौं। पुन: एक होटलमे भोजन कए बिना समए गमौने हमरा लोकनि गोबर्धन पर्बत दिस बिदा भेलौं। आब सुरूज पूरा उगि गेल छलाह। जाड़ कम भ' रहल छल। गोबर्धन कोनो दृष्टिकोणे पहाड़ नै लागि रहल छल। मुदा माए कहलनि- “बाऊ, भाव देखिओ स्वरूप नै। कलयुग केर मनुक्खक दुष्कर्म आ पापसँ गाेबर्धन नीचा भ' गेल छैक। अहाँ पढ़ल-लीखल छी। कनी सोचू : भगवान कृष्ण जै गोबर्धनकेँ अपना आंगुरपर उठेने हेताह से की सामान्य पहार छल हेतैक? किन्नौ नै।” माएक बातकेँ हम बिना कुनो तर्क केने सुनि लेलौं। एक बात ई नीक लागल जे गोबर्धन साफ-सुथड़ा छलैक। बीच-बीचमे अगल-बगल केर गामक महिला सभ गोबरक चिपड़ी आ गोईठा पथैथ। कतौ-कतौ गाए-बाछी (आ बाछा) चड़ैत। चहुओर हरियरी। रस्तामे झुण्डक-झुण्ड महिला आ पुरूष लोकनि बिना जूता-चप्पल पहिरने गोबर्धनक परिक्रमा करैत। राधे-कृष्ण, राधे-कृष्णक रट लगबैत। मुरलीधर की जाय। श्रीकृष्ण की जय। करैत। आ किछु लोक सभ गीत गबैत प्रेमक उन्मादमे विभोर भेल चलल जाइत। एक ठामक ई दृश्य देख माए भावुक भ' गेलीह। कहलनि- “बाऊ, 10-१५ मिनट लेल हमरा कारपर सँ उतारि दीअ। कमसँ कम 1008 डेग पएरे तँ चलि ली ऐ भूमिपर! ई माटि जौं पएरमे लागि जएत तँ जीवन धन्य भ' जएत।” हम गाड़ी रोकि माए केर संग लगभग दू किलोमीटर पैदल चलैत रहलौं। माए बड़ प्रसन्न भेलीह। मुदा ई कचोट रहिये गेलन्हि जे शायद पूरा गोबर्धनक परिक्रमा पएरे-पएरे करितौं। बादमे हमरा लोकनि कारपर बैस गेलौं। गोबर्धनसँ हमरा लोकनि बरसानाक हेतु विदा भेलौं। बरसाना पहुँच क' राधा-रानीक मन्दिर जेबाक छल। ओतए गेलाक बाद ज्ञात भेल जे मन्दिर तँ पहाड़ीपर छैक जै लेल लगभग चारि सए सीढ़ीक पैदानपर चढ़ह पड़तैक। धर्मसँ ओतप्रोत भेल माए बड़ा सहजतासँ सीढ़ी चढ़ए लगलीह। पिताजी घुटनाक दर्दसँ ग्रसित छलाह तथापि नहु-नहु ओहो सीढ़ी चढ़ैत रहलन्हि। बीच-बीचमे सुसताइत आ आगू बढ़थि। अन्तत: हमरा लोकनि मन्दिरक प्रांगणमे प्रवेश केलौं। मुदा प्रवेश केलाक बाद पता चलल जे मन्दिरक पट बन्द छैक। तइकाल दू बजैत रहैक। लोक सभ कहलक जे मन्दिरक पट साढ़े चारि बजे सांझमे खुजतैक। थाकल तँ रहबे करी। एकठाम भुईयेमे ओछाइन ओछा, जाजीम बीछा हमरालोकनि बैस गेलौं। कनीकालक बाद दूटा 8-10 बर्खक लड़का आ दू टा बालिका सभ स्थानीय, हमरा सभ लग पहुँचल। कहए लगल- “बाबू जी, राधा-रानी की गीत सुनाऊँ?” कहि नै कियाएक हम तुरत कहि देलिऐक- “ठीक है सुनाओ।” आ ओ सभ गीत गाबए लागल: “राधा रानी की जय। महरानी की जय......।” सभ आखर सुन्दर बोली मनमोहक। स्वर खांटी लोकल आ सुअदगर। गीतक बाद गीत। ओ सभ गबैत रहल। ब्रजबोलीमे समस्त वातावरण राधामय। माए भाव-विभोर भ' हाथ जोड़ने राधा-रानी की जाय, माहरानी की जय, राधे-कृष्ण, राधे-कृष्ण बजैत रहलीह। गीत सुनैत रहलीह। तीर्थक इच्छाक पूर्ति भेलनि तै सुखसँ उह्लादित भ' गर्म-गर्म नोर खसैत रहलन्हि। जेना-जेना माए केर आँखिसँ नोर खसन्हि तेना-तेना हुनकहि आँखि आ मुँह सुन्नर भेल गेलन्हि। पिताजी सेहो प्रसन्न छलाह। ठीक साढ़े चारि बजे मन्दिरक पट खुजलैक। लोक सभ जोरसँ राधा- रानी की जय केर धोष केलक आ मन्दिरमे प्रवेश केलक। दर्शन केर बाद हमरा लोकनि किछु काल आरो ओतए रहलौं। जखन अन्हार होमए लगलैक तँ पहाड़ीपर सँ नीचाँ उतरए लगलौं। नीचाँ उतरि चाह-नाश्ता क' एकबेर पुन: भगवान श्रीकृष्ण आ राधा रानी केर जयकार करैत दिल्लीक हेतु प्रस्थान केलहुँ। दिन भरिक थाकल आ भोरे ऑफिस जेबाक बोझ तँए सूति रहलौं। मुदा मोनमे ई भावना प्रबल भ' गेल जे एकबेर चैनसँ ब्रजक्षेत्र घूमब। यमुनाकेँ देखक इच्छा आ बरसानेक सौन्दर्यक अवलोकन सदरिकाल मोनमे औढ़ मारैत रहल। जनवरी 2011मे हमर सासु बृन्दावन जेबाक इच्छा हमरासँ व्यक्त केलनि। ओ हमर स्वर्गीय स्वसुर पण्डित कालीनाथ झा केर प्रथम पुण्यतिथिसँ पूर्व एकबेर यमुनामे स्नान एवं अपन गौरक विसर्जन करए चाहैत छलीह। हम तुरत अपन संगी श्री विरेन्द्र कुण्डुसँ बात कए जनवरी मासक अन्तिम रवि दिन अप्पन सासुक संग विरेन्द्रक कारसँ बृन्दावन जेबाक योजना बना लेलौं.......। क्रमश: शिव कुमार झा "टिल्लू" शिव कुमार झा 'टिल्लू' मैथिली कथाक विकासमे गामक जिनगीक योगदान- अपन जन्म कालहिंसँ “मैथिली” समाजक अग्र आसनपर बैसल वाचकगण द्वारा महिमामंडित होइत रहलीह। स्वाभाविक अछि शिक्षित लोक ऐ वर्गसँ संबंध रखैत छलथि। आर्य परिवारक सभ भाषा समूहक जननी संस्कृत मानल जाइत अछि तँए मैथिली कोना तत्समसँ बचथि? सरिपहुँ मैथिलीक अधिष्ठाता ब्राह्मण आ कर्ण-कायस्थ रहल छथि, तँए काव्य, महाकाव्य, कथा वा नाटक हुअए सभ साहित्य पल्लवक उदय तत्सम मिश्रित मैथिलीसँ भेल। आिदकवि विद्यापतिक पदावली पुरान-रहितौं एे रूपेँ अपवाद अछि मुदा हुनक पुरूष परीक्षा संस्कृतक आवरणसँ बाहर नै निकलि सकल। संभवत: मैथिलीक कथाक आरंभ पुरूष परीक्षाक मैथिली अनुवाद कऽ चन्दा झा कएलनि। प्रथम मैथिलीक मौलिक कथा विद्यासिन्धुक कथा, कथा संग्रह थिक। तत्पश्चात् स्वतंत्र रूपेँ मैथिलीमे कथा लिखव प्रारंभ भऽ गेल। भुवन जीसँ लऽ कऽ वर्त्तमान युगक कथा यात्रामे किछु एहेन कथाकार भेल छथि जनिक यात्रासँ ऐ भाषाकेँ स्थायी स्तंभ भेटल। ऐमे कुमार गंगानंद सिंह, नागेन्द्र कुमर, मनमोहन झा, रामदेव झा, हंसराज, व्यास, किरण, रमानंद रेणु, गौरी मिश्र, लिलि रे, रूपकान्त ठाकुर, रमेश, धीरेन्द्र धीर, अशोक, मन्त्रेश्वर झा, धूमकेतु, तारानंद वियोगी, विभूति आनंद, चित्रलेखा देवी, रामभरोष कापड़ि भ्रमर, श्यामा देवी, शेफालिका वर्मा, कमला चौधरी, कामिनी कामायनी, प्रदीप बिहारी, हीरेन्द्र, लल्लन प्रसाद ठाकुर, गौड़ीकान्त चौधरी कान्त, अरविन्द ठाकुर, अशोक मेहता, राजाराम सिंह राठौर, परमेश्वर कापड़ि, विजय हरीश, उमानाथ झा, योगानंद झा, सुधांशु शेखर चौधरी, गोविन्द झा, राधाकृष्ण बहेड़, मणिपद्म, मायानंद मिश्र, जीवकान्त, अशोक, राजमोहन झा, प्रभास कुमार चौधरी, नरेश कुमार विकल, सुभाष चन्द्र यादव, केदार कानन, बलराम, अमर, चन्द्रेश, रमाकान्त राय 'रमा', कुमार पवन, सियाराम झा सरस, रामभद्र, रौशन जनकपुरी, राजेन्द्र विमल, रमेश रंजन, सुजीत कुमार झा, जितेन्द्र जीत, नारायणजी, शैलेन्द्र आनन्द, अनमोल झा, उग्रनारायण मिश्र कनक, राजदेव मण्डल, कपिलेश्वर राउत, वीणा ठाकुर, कैलाश कुमार मिश्र, देवशंकर नवीन, महाप्रकाश, धीरेन्द्र नाथ मिश्र, साकेतानंद, शिवशंकर श्रीनिवास, मानेश्वर मनूज, अनलकांत, श्रीधरम, सत्यानंद पाठक, मिथिलेश कुमार झा, नवीन चौधरी, आशीष अनचिनहार, विरेन्द्र यादव, बेचन ठाकुर, मनोज कुमार मण्डल, अजीत आजाद, अकलेश कुमार मण्डल, संजय कुमार मण्डल, भारत भूषण झा, लक्ष्मी दास, नीता झा, उषा किरण खान, ज्योत्सना चंद्रम, सुस्सिमा पाठक, शुभेन्द्र शेखर, कुसुम ठाकुर, दुर्गानन्द मण्डल, नीरजा रेणु, ज्योति सुनीत चौधरी, शंकरदेव झा आ गजेन्द्र ठाकुर प्रमुख छथि। ऐ बीछल कथाकारक समूहसँ विलग किछु एहेन कथाकार भेल छथि जनिक सृजनशीलतासँ मैथिलीकेँ नव गति भेटल। जइमे प्रो. हरिमोहन झा, ललित आ राजकमलकेँ राखल जाए। हरिमोहन बाबू हास्य आ दर्शनसँ समाजक सत्यकेँ नाङट करैत इतिश्री मर्म वा अनुशासित मजाकसँ कएलनि। ललित जीक कथामे सम्यक समाजक परिकल्पना तँ भेटैत अछि मुदा समाजक कात लागल वर्गक विवरण स्वातीक बून जकाँ कतौ-कतौ भेटैत अछि। राजकमल चौधरी प्रयोगवादी कथाकारक रूपेँ प्रसिद्ध छथि। जौं एकैसम शताब्दीक कथा िवकासक चर्च कएल जाए तँ ऐ विधामे संतान रहितौं मैथिली बॉझ जकाँ भऽ गेल छलथि। सन् २००१सँ २००८ईं. धरिक कथा विकासक चर्च करब प्रासंगिक नै अछि। धन्यवाद दैत छी मिथिला दर्शन (कोलकाता) आ घर बाहर (पटना)क संपादककेँ जनिक प्रयाससँ मैथिली साहित्यकेँ एकटा बेछप्प कथाकार भेटल। ओ मात्र कलमें वा वाचक रूपेटा नै जीवनक सभ क्षेत्र, सम्यक चरित्र रखैबला साम्यवादी साहित्यकार श्री जगदीश प्रसाद मण्डल। हिनक पहिलुक कथा भैंटक लावा आ बिसाँढ़ घर बाहरमे आ चूनवाली मिथिला दर्शनमे प्रकाशित भेल। तत्पश्चात विदेहक सौजन्यसँ हिनक रचना क्रमश: मैथिलीक पाठक लोकनिकेँ भेटए लागल। सन् २००९ईं.मे विदेहक संपादक श्री गजेन्द्र ठाकुरक प्रयाससँ श्रुतिप्रकाशन दिल्लीक अधिष्ठाता श्री नागेन्द्र कुमार झा आ हुनक साहित्य प्रेमी धर्मपत्नी श्रीमती नीतू कुमारी हिनक पहिल कथा संग्रह गामक जिनगी प्रकाशित कएलनि। संयोगसँ ऐ पोथीक प्रारंभ भैंटक लावा कथासँ कएल गेल। एक सए पैंसठ पृष्ठक ऐ संग्रहमे १९ गोट कथा संग्रहीत अछि। आमुख देसिल वयनाक सिद्धहस्त कथाकार सुभाष चन्द्र यादव जी लिखने छथि। जेना-तेना सुभाष बाबू कथाकारक महिमामंडन तँ कएलनि, परंच ऊपर मोने आ हियासँ लिखल आमुखमे भिन्नता होइत अछि, जेकर िनर्णए प्रबुद्ध पाठकपर छोड़ि देल जाए। बंगभाषीकेँ कोलकाता सन महानगर, मगधीकेँ पटलिपुत्रसन ऐतिहासिक शहर, भोजपुरी लोकनिकेँ गोरखपुर आ वाराणसी सन धाम भेटल। मैथिली भाषीकेँ गनि-गुथि कऽ दरिभगा आ सहरसा सन ग्राम्य नगरी। तखन भाषाक शहरीकरण आ आदान-प्रदानक सपनों देखब उचित नै। भारतवर्ष जौं गामक देश तँ मिथिला महागामक भूिम। एक वर्ष बाढ़ि तँ दोसर वर्ष सुखाड़। कोनो उद्योगक साधन नै, शिक्षा, स्वास्थ्य आ सड़क सन मौलिक समस्या मकड़जालमे ओझराएल अछि। परिणाम पलाएन अर्थात पड़ाइनक रूप लऽ रहल। भोजपुरी लोक सेहो पलाएन कएलनि परंच अपन भाषाक संग, दृष्टिकोण नीक लगैत अछि। अपन देशकेँ के कहए माॅरीशस आ फिजी धरि अपन बोली धेने छथि। अपन जीवन-आचारकेँ हाइटेक बनेबाक क्रममे मैथिल संस्कृतिक दोहन भऽ रहल अछि। आनक कोन कथा? किछु एहेन साहित्यकार भेलाहेँ जिनका साहित्य आकादमी पुरस्कार तँ मैथिली भाषाक लेल भेटल मुदा हुनक परिवारक नेना-भुटका गलतियोसँ मैथिली नै बजै छथि। कथा जगतक प्रयोगवादी शिल्पी राजकमल जीक कथा रीति-प्रीतिक समागमसँ ओत-प्रोत छन्हि। ललका पाग, साँझक गाछ, कादम्वरी उपकथा सन बहुत रास कथामे सिनेहक मर्मस्पर्शी चित्रण कएल गेल अिछ। परंच कतौ-कतौ राजकमल जी सेहो भटकि कऽ अनैतिक प्रेमकेँ चलन्त साहित्यक रूप देलनि। जेना घड़ी शीर्षक कथा कोनो रूपेँ समाजमे नीक संदेशक वाहक नै भऽ सकैत अछि। ऐमे उल्लेख तँ समाजक एकात लागल जहूरनीक कएल गेल परंच की अनुशासित सिनेहक प्रदर्शन राजकमल जी कऽ सकलाह? जखन प्रांजल आ प्रवीण कथाकारक ई दशा तँ आनक विषएमे की लिखल जाए। एक अर्थमे किछु जनवादी साहित्यकार अपन कथा सोतीमे मैथिली पाठककेँ आनन्दित अवश्य कएलनि ओइमे प्रभाष कुमार चौधरी, रामदेव झा आ कांचीनाथ झा किरणक संग-संग धूमकेतु, कुमार पवन, कमला चौधरी आ डॉ. शेफालिका वर्माकेँ राखल जा सकैछ। जौं सम्पूर्णताक चर्च करी तँ जगदीश बाबूकेँ एकैसम शताब्दीक सर्वश्रेष्ठ कथाकार माननाइ यथोचित। किएक तँ ओलती आ चिनुवार बिसरैबला मैथिली प्रेमीकेँ भैंटक लावा, बिसाँढ़, पीरार, करीन आ मरूआसँ परिचए करौलनि। मैथिली भाषाकेँ नव-नव शब्द देलनि। पाग पहिर कऽ सभामे आगाँ बैसैबला लोकसँ लऽ कऽ मुसहर धरिक प्रति सम्यक सिनेह हिनक कथाक विशिष्टता अछि। जगदीश जी समाजक ओइ वर्गसँ अबै छथि जकरा अखन धरि मंचपर आसन िदअमे हमरा सभकेँ संकोच होइत अछि। परंच कतौ हिनक कथामे व्यक्तिगत द्वेष आ पूर्वाग्रहक प्रदर्शन नै। जगदीश जी समाजक आगाँक पिरहीकेँ सम्मानित करैत सम्यक ज्योति जगेबाक आश अपन कथा सभमे रखने छथि। क्रमश राजदेव मंडल उपन्यास हमर टोल पूर्वरूप :- (क) अहाँ अही वसुंधराक कोनो कोनपर छी। ई हमर आत्मविश्वास कहि रहल अछि। अहाँक नै देखितहुँ हम देख रहल छी। अहाँक उपस्थितिक ज्योज्स्ना हमरा चारूभर आभासीन भऽ रहल अछि। आर ओइ ज्योतिसँ हमर रोम-रोम पुलकित भऽ रहल अछि। हमहूँ तँ ओइ नृत्यलीलाक अंश छी। हम बुभुक्षित छी अहाँक सिनेह आ आशीरवादक लेल। हमरा क्षमा नै करब तँ दण्ड दिअ। किन्तु बिसरू नै। यएह कामना अछि। अहाँक स्मरण कऽ किछु रचबाक प्रयत्न कऽ रहल छी। (ख) विशाल सागरक पसरल जलपर धनुकटोली ठाढ़ अछि। की ओ हँसि रहल छै? आकि कानि रहल छै? लगैत अछि जेना रँग-बिरँगक जलमे ओ उगि आएल अछि। चारूभर उड़ैत सुगन्धित धुइयाँ। मुँह आ देहमे लटपटाइत बादल जकाँ कारी आ उज्जर धुइयाँ। आ लगैत छै जे ऊ आकृति रसे-रस बढ़ि रहल हो। गाम-नगर-महानगर सभटा आकृतिक भीतर ढुकल जा रहल हो। नजरिक जे एकटा बिस्तार होइ छै, सेहो जेना ओकरा सोझहामे छोट भेल जा रहल छै। ओकरा निसाँससँ निकलैत हवा, बुझाइ छै जेना बिहाड़ि बहैत हो। बहुत गोटे जेना एक्के बेर जय-जयकार केलक। मथापर जटा, अधपक्कू दाढ़ी-मोछ, लाल कुंडाबोर आँखि हाथमे बड़कीटा शंख लेने एकटा बाबाजी देखाए पड़ैत छै। ओकरा आँखिसँ लहू बहि रहल छै। हवाकेँ कंपित करैत गम्भीर वाणी निकलैत अछि- “दैविक दैहिक भौतिक तापा....।” आकास फाड़ैबला शंखनादसँ आगूक शब्द झपा गेल। संगे बाबा महतोकेँ जय-जयकार होअए लगल। धनुकटोली शनै: शनै: जलमे समा रहल अछि। ओइ स्थानपर उगैत छै- एकटा छोटका टोल। जेना हमर टोल। छोट-पैघ, नीक-अधलाह घर-दुआरि। हँसैत-कानैत लोक-वेद, धीया-पुता, माल-जाल, चिरइ-चुनमुन्नी, सुखल आ हरियर- गाछ-बिरिछ, पोखरि, इनार गली, सड़क, चौबटिया। की ई सपना छी आकि सत्य.....। आकि सत्यक सपना? 1 (नाम, स्थान आदि कल्पनापर आधारित अछि) गहवर घर हल्ला कऽ रहल अछि। सघन अन्हार कान ठाढ़ केने सुनि रहल अछि। गिरहतबाकेँ ईंटाबला घरपर बैसल इजोत हनहना कऽ हँसैत अछि। हँसी अन्हारमे छिड़िया जाइत अछि कन्तु अन्हारमे छिड़िआएलो इजोत भकजोगनी जकाँ भुकभुकाइत अछि। हड़हड़ाइत हवा आ ओकरा कान्हपर चढ़ल भगैतक स्वर दड़बड़ मारि रहल अछि- सौंसे टोल। “कतेक दूर रहलह हौ सेवक-राजा फुलबरिया हौ.....। एके कोस रहलह हौ सेवक राजा फुलबरिया हौ.....। लागि गेल चौदहम केवाड़ हौ....।” ताल काटैत मिरदंग आ झनकैत झाइल। भगैतया सभ गाबैसँ बेसी देह मचकाबैत अछि। जेना देह नाचैत अछि टाँग नै। साज-बाजक तालपर नाचैत देह आ मन। गहवरक पछुआरमे अन्हार खटखटा रहल अछि। ऊ अन्हार नै भूत प्रेतक छाँह छिऐ। नेंगरा बुढबा कहैत रहै छै। रौ गहवरक देवी-देवताक डरे सबटा साहन सभ पछुआरमे नाँगटे नाचैत रहैत छै। वएह सभ कखनो काल नढ़ियाकेँ कान पकड़ि केंकिया दैत अछि- भूउउऊ.....। ओकरे सुरमे सुर मिला कऽ भूत प्रेत कानए लगैत अछि- कुउउऊ....। तखैन टोलक लोक भलहिं सुटैक जाइ किन्तु कुताकेँ देख लिओ ताल। जना नाँगरिपर कियो मटिया तेल ढारि देने होइ। गहवरक आगू सौंसे अँगनीमे दीया जरि रहल अछि, गोल-गोल पाँतिमे। अन्हरियाकेँ गरदनियाँ दऽ भगा रहल अछि। तैयो उ थेथर जकाँ दोग-दागमे ठाढ़ रहैए चाहैत अछि। हे एकोटा दीपक टेमी निच्चाँ नै हो। हँ... हँ एहेन बखतमे भकइजोत बड्ड खराब। डाइन आ भूत केनौ सँ लपकि छौ। अपन-अपन सतरकी घटलासँ पहिने दीपमे तेल ढारैत रह। पता छह तेल कते डहतै। महगाइ तँ अासमानमे भूर कऽ देने छै। ओइ कारणे तँ सभकेँ झकभकाइते छै। यएह तेल जरे ककरो फटै छै एकरो....। झकाश इजोत देखैक छौ तँ देखही शहर जा कऽ। राइतोमे सड़कपर गिरल सुइया ताकि लेबही। भगतकेँ कोनो कम पामर होइ छै। चाहतै तँ ऐ गाछो सभमे इजोत जरए लगतै। अच्छा चुप। बड़का लाल बुझक्कर भऽ गेलेँ। हम नै अहाँ बड़का विदुआन। अहाँ चुप रहू। एम्हर देखू। खेलाबन भगत पूजा ढारि रहल अछि। खीर, लड्डू, पान, सुपारी, तुलसी, गंगाजल सभटा डाली सभमे सजाएल छै। मनक तरजूपर तौल कऽ अछत-फूल राखि रहल अछि। सभटा पूजाकेँ कुड़ि एके रंग एके आकार। भगत जखैन लिहुरि कऽ पूजाकेँ कुड़ि रखैत छै तखैन ओकरा पेट बोमिया उठै छै। “गै माए, भगत पेटमे बाघ रखने छै। देखै छीही हुमड़ै छै।” “गै दाइ देवता-पितर नै बुझै छौ तोहर बेटी तँ जुगमे भूर करतौ। अखैन तँ पा-भैरिक छौ।” हे मुँह सम्हारि कऽ बाजू। अपन बेटी जेना बड्ड सतबरती। कोन-कोन रसखेल केलक के नै बुझलक। हे लबरी.....। हे चुप.....। झगड़ा-झाँटी बन्न। पहिले कहलौं औरतिया सभकेँ एक कात आ पुरूष सभकेँ एककात बैठाएल जाए। हँ-हँ सएह कएल जाए। आइ गहवर घरमे पहिलुक डाली जागेसरकेँ लागल अछि। ओकरा स्त्रीकेँ कोखिया गोहारि हेतैक। अोकरा देहपर कखनौ भूत सवार भऽ जाइत अछि आर उ खेलाए लगैत अछि। केना भूत सवार नै हेतै? धर्मडीहीवालीकेँ देहो तँ सवारीकेँ जोग अछि। भरल-पूरल जवानी, श्याम वर्ण, तेलसँ छट-छट करैत देह, खलिआएल आँखि, गोल बाहिंपर कसल अँगिया। कारी भौंरा केश। आँखिकेँ जेना स्वत: खैंत लैत अछि अोकर देह। एकर ठीक उनटा जगेसराक शरीर। जेना जुआनीमे घुन लगल हो। तहिना ओकरा देहकेँ बेमारी अधखिज्जु कऽ देने अछि। कमजोरीक कारणें तामस हरदम नाकेपर चढ़ल रहैत अछि। तइपर सँ बाल-बच्चा नै होइ छै। तामस आर दुगुना। ई सभटा तामस उतारत धर्मडीहीवालीपर। कखनो फनकए लगैत अछि- “सन्तानक मुँह कतऽ देखते ई पपिआही। जीनगी भरि तँ कुकरम केने अछि।” धर्मडीहीवालीकेँ भरि देह ई बात छूबि लैत अछि। अपन असल नाम निरमला जेकरा उ नैहरमे राखि कऽ अाएल अछि। अपना नैहराक बड़ाइ चिबा-चिबा करए लगैत अछि- “हमरा धर्मडीहीकेँ लोक असल धर्म-कर्म करैबला सभ अछि। पपिआहा सभ तँ अहीठाम भरल अछि।” दिन, दुपहर, राति कखनो दुनू बेकैतमे बकटेटी शुरू भऽ जाइत अछि। टोलक बूढ़-सुरकेँ अनसोहाँत लागब स्वभाविके। जगेसराकेँ किछो तँ कहऽ पड़तै- “हे रौ, नै होइ छौ तँ ओझहो-धामिकेँ देखाबहि। कोनो धरानी एकोटा बाल-बच्चा भऽ जेतौ तँ बुझही जे सभ दुख पार। ई भूत-देवी आ तामस-पित सभटा एकरा देहसँ भागि जेतौ।” “सन्तान लेल तँ कोखिया गोहारि करबै पड़तौक।” कतेक दिनसँ जागेसर गोचर विनतीमे लगल अछि। किन्तु भगत पिघलत तब ने। भगतकेँ छुट्टी कहाँ रहै छै। आइ ऐ गाम तँ काल्हि दोसर गाम। नाते-नत। आखिर पक्का भगत छिऐ रामखेलाबन। दू पीढ़ीसँ ओझहा-धाइमक काज कऽ रहल छै। पहिने ओकरा गहवरमे गछौटी करियौ। साफ-साफ कहियो पूजामे कतेक खरच करबै। पाठीक बलि देबै। गछि लिओ। तब भगत तैयार हएत। कतेक खुशामदे आइ तैय्यार भेल अछि अछि खेलाबन भगत। क्रमश: १.ज्योति सुनीत चौधरी-रातिक इजोतः २. किरीम लगाउ-मुहॅ चमकाउ- एकटा हास्य विहनि कथा १. ज्योति सुनीत चौधरी रातिक इजोतः
भगजोगनीक चमक के बिना गामक राति सामान्य राति नहिं बुझायत छल।आइयो गामक सामन्य राति छल मुदा मास्टर साहेब के घरमे किछु विशेष चहर्लपहल छल।हुन्कर पुत्रीके विवाह ठीक भेल छलैन से खान पीन पर बेटावला सब आयल छलैन।बड्ड सम्पन्न परिवारमे विवाह ठीक केने छला मास्टर साहेब। बेटीके पढ़ेबो मे कुनो कमी नहिं रखने छलैथ।जतेक सुविधा गाम मे उपलब्ध छल ताहि लऽ कऽ बेटीके बी एड करेने छलैथ। एक मध्यम वर्गीय पुरूषप््राधान परिवारमे बेटीके शिक्षण बिना घरक स्त्रीक प््राबल आ निरन्तर सहयोगक सम्भव नहिं होयत अछि मुदा अपने सब तऽ स्त्रीके संस्कार आ गृहस्थीक गुणक परिचालक मानैत छी से मास्टर जीके बेटी घरक काज मे सेहो निपुण छलैथ।मुदा हुन्कर बेटी किछु क्रान्तिकारी विचारक भऽ गेल छलीह।ओना तऽ हुन्का वरपक्षक मारिते परिवार सब देखक पसन्द केने रहैन आ हुन्को लग लड़का के फोटो सब रहैन मुदा हुन्कर कहब छलैन जे बिना लड़का सऽ बात केने आ मेल जोल बढ़ेने ओ विवाह नहिं करती।अपन पत्नी पर अनुशासनक ढ़िलाईक आरोप लगेलो पर माय बेटी टस स मस नहिं भेली तखन मास्टरजी तय केला जे ई प््रास्ताव ओ वरपक्ष लग खान पीन दिन रखता।ताहि लऽ कऽ आजुक राति बड्ड महत्वपर्ण छल। बड़ पक्षक लोक सब बड्ड सम्पन्न आ आधुनिक विचारक छलैथ। परिवारक स्त्री पुरूष सब आयल छलैथ खान पान पर।पूरा दू सूमो भरिकऽ लोक सब औलथि।जाहिमे बड़की ननदि आ हुन्कर बिनब्याहल बेटी सेहो रहैन।खूब नीक स्वागत कएल गेलैन हुन्कर सबहक। नास्ता पानी के बाद भोजनक बात चलल।सब एके ठाम बैसला खाय लेल।तखन मास्टर जी धीरे सऽ अपन बेटीक विचार रखलखिन।सुनला पर सबके कनि भौं सिकुड़लैन मुदा जे सबसऽ बेसी खौंझेलैथ से छलैथ बड़क बहिन जिनका अपने ब्याह तुरिया बेटी छलैन।तखन मास्टर साहब कहलखिन जे अहॉं अपन बेटी सऽ पुछियौ जे ओकरो एहने ईच्छा छहि कि नहिं।मास्टर साहब के ई प््राश्न सबके निरूत्तर कऽ देलकैन परञ्च ननदि अखनो तमसायल छलैथ ।भरिसक हुन्का अपन भाउजमे अपन छवि देखक शौख छलनि अपन बेटीक नहिं।जाबे स्त्री अपन निजी प््रातिशोध छोड़िक आनके नीक करैमे आनन्दित नहिं हेती ताबे मैथिल समाजक धुरि मैथिल स्त्रीवर्गक विकास कोना होयत ऋ कनिक देरक विचार विमर्शके बाद वरक पिता आ बहिनोई अपन सहमति दऽ देलखिन आ कहलखिन जे हमसब अपन खुशीमे ई बिसरि गेल छलहुँ जे जिनका सबके संगे जीवन काटक छैन तिनका सबमे सामञ्जस्य भेनाई ओतबय अथवा ई कहि जे अहुस बेसी आवश्यक छै जतेक दुनु परिवारक बीच सामञ्जस्य भेनाई जरूरी छहि।मास्टर साहेब आ हुन्कर परिवार पाहुनक अहि विचार सऽ बहुत आह्लादित भेलैथ।बेटीक जिद्द सऽ आहि राति हुन्कर घरमे नव ईजोत आयल छलैन।
२ किरीम लगाउ-मुहॅ चमकाउ ।एकटा हास्य विहिन कथा। बाबूबरही बज़ार सॅ घूमी क अबैत रही जहॉ सतघारा टपलहूॅ की मुक्तेश्वर स्थान लग बाबा भेंट भए गेलाह। हुनका देखैते मातर हम प्रणाम कहलियैन की बाबा बजलाह आबह बच्चा तोरे बाट ताकि रहल छलहूॅ जे कहिया भेंट हेबअ कतेक दिन बाद एमहर माथे एलह कहअ केमहर सॅ ख़बर नेने आबि रहल छह। हम बजलहूॅ बाबा हम त बरही हाट सॅ तीमन तरकारी किनने आबि रहल छी। बाबा हरबड़ाईत बजलाह हौ बच्चा हमरो एगो मुहॅ चमकौआ किरीम देए ने ।हम पुछलियैन बाबा ई कहू जे मुहॅ चमकौआ किरीम केहेन होइत छैक। बाबा खिसियाअैत बजलाह कह त तोंही मीडियावला सभ प्राइम टाइम मे हल्ला कए लोक के कहैत छहक जे मरद भए के माउगीवला किरीम यदि हमरा जॅका गोर बनना है त ईमामी हैण्डसम मरदवला किरीम सिरीफ साते दिन मे दोगुना गोरापन। अहि दुआरे भेल जे हमहॅू कनि गोर-नार भए जाइत छी। हम बजलहूॅ बाबा अहॉ कथि लेल एहि किरीम सबहक फेरा मे परैत छी अहॉ त केहेन बढ़ियॉ सौंसे देह बिभूत लेप के अपने मगन मे रहैत छी। हमहूॅ तए अहिं जॅका साधुए छी हमरा लग मुहॅचमकौआ किरीम नहि अछि। ई सुनि बाबा तामसे अघोर भेल बजलाह तहॅू फूसि बजैत छह देखेत छहक मीडियावला लक तए रंग बिरंगक किरीम रहैत छैक तहूॅ मंगनी मे मदैद नहि करबह त हयिए ले 5रूपया आ लाबह मुहॅचमकौआ किरीम। हम असमंजस मे परि गेलहॅू जे बाबा सन औधरदानी लोक के किरीमक कोन काज से कनेक फरिछा के पूछि लैति छियैन जे की भेल। हम पुछलियैन त बाबा बजलाह हौ बच्चा तोरा सभटा गप की कहियअ। बड्ड सख सॅ चारि बरिख बाद बसहा पर बैसि हम अपन सासुर हरीपुर गेल रही। गौरी दाए त बियाहे दिन सॅ हमर ठोर मुहॅं देखि रूसल छलीह। हम सोचलहॅू जे आई हुनकर सखी सहेली माने हम अपन सारि सभ सॅ हॅसी मज़ाक कए मोन मे संतोख कए लैति छी। हम अपना सारि सॅ पूछलहू कहू कुशल समाचार कि हमर सारि उपकैरि के बजलीह बुरहबा बर बड्ड अनचिनहार बुरहारी मे लगलैन किरीमक बोखार आ सभ गोटे भभा भभा के खूम हॅसैए लगलीह। हम पूछलियैन जे साफ साफ कहू ने की कहि रहल छी कि हमर दोसर सारि आर जोर सॅ हॉ हॉ के हॅसैत बजलीह अईं यौ पाहुन बुरहारी मे सासुर अएलहॅू त अकील रस्ते मे हेरा गेल की\ हम बजलहू से की त एतबाक मे हमर छोटकी सारि मुहॅ चमकबैत बजलीह देखैत छियैक हाट बज़ार मे रंग बिरंगक किरीम पाउण्डस बोरो प्लस डोभ एसनो पाउडर फेरेन लबली बिकायत छै से सब लगा के मुहॅ उजर धब धब बना लेब से नहि। एहेन कारि झोरी मुहॅ पर त घसबैहनियो ने पूछत आ हम तए एम.बी.ए केने छी। जाउ थुथून चमकौने आउ तब हॅसी मज़ाक करब। आब तोंही कहअ जे बिना किरीम लगौनेह जान बॉचत। देखैत छहक नएका नएका छौंड़ा सभ सासुर जाइअ सॅ पहिने ब्यूटी पार्लर जा थूथून चमकबैत अछि। हौ बच्चा कि कहियअ एखुनका छौंड़ीयो सभ कम ने अछि देखैत छहक किरीम लगबैत लगबैत मुहॅ मे फाउंसरी भए जाइत छैक मुदा थुथून चमकबै दुआरे इहो मंजूर। पछिला पूर्णिमा मेला देखबाक लेल छहरे-छहरे पिपराघाट मेला गेल रही त ओतए गौरी दाए के दू चारि टा बहिना सभ भेंट भए गेलीह हम पूछलियैन जे कहू मुहॅ मे एतेक फाउंसरी केना? कि ताबैत हमर साउस केमहरो सॅ बजलीह पाहुन हिनका सभटा गप कि कहियैन ई सभ किरीम लगेबाक फल। ई छाउंड़ी सभ फिलमी हिरोईन सॅ एक्को पाई कम नहि अछि बिना ब्यूटि पार्लर जेने एकरा सभ के अनो पानि नहि नीक लगैत छैक। ई सुनि हमरो भेल जे ब्यूटी पार्लर जा कनेक थुथून चमका लैति छी। मुदा हम जे ब्यूटि पार्लर जाएब से जेबी मे एक्कोटा पाइओ नहि अछि। भागेसर पंडा के कतेको दिन कहलियैअ जे हमरो ब्यूटि पार्लर नेने चलअ से ओकरो भरि भरि दिन फूंसियाहिक पूजा-पाठ सॅ छुट्टी ने। हम बजलहॅू त बाबा दिल्ली चलू ने ओतए त बड्ड नीक एक पर एक ब्यूटि पार्लर छै। बाबा बजलाह हौ बच्चा हम डिल्ली नहिं जाएब हौ कियो नमरो पता नहि बता दैत छैक एक सॅ एक ठग लोक सभ रस्ते पेरे भेटतह हमरा त डर होइए। त बाबा चलू ने फिलिम सिटी नोएडा ओहि ठाम फेसियल करा लेब। बाबा बजलाह नहि हौ बच्चा बुरहारी मे एहेन करम नहि करब जे कोनो न्यूज़ चैनल जाएब। तोरो मीडियावला के सेहो कोनो ठीक नहि छह बेमतलबो गप के ब्रेकींग न्यूज़ बना दैति छहक। हम एमहर ब्यूटि पार्लर आ कोन ठिक तों खटाक दिस चैनल पर चला देबहक ब्रेकींग न्यूज़ किरीम लगाउ-मुहॅ चमकाउ। डाॅ. योगानन्द झा मैथिली बाललोककथा : स्थिति आ अपेक्षा आगाँ- एगो रहथि राजा- मैथिली बाललोककथाक अकृत्रिम संग्रहक दृष्टिए निरक्षर किसुन कामति द्वारा कहल ओ प्रो. हंसराज द्वारा सम्पादित संग्रह 'एगो रहथि राजा' अत्यन्त महत्वपूर्ण अछि, कारण ऐमे खिस्सा कहनिहारक भाषाकेँ यथावत् रखबाक प्रयास भेल अछि। ऐ संग्रहमे तीन गोट कथा अन्तर्भुक्त अछि क्रमश: एक लालसँ सात लाल, तूरक घोड़ा आ दलिदरा जोग। एक लालसँ सात लाल दीर्घ कथा थिक जइमे चारि गोट उपकथा सेहो अन्तर्भुक्त अछि। संग्रहक तीनू कथा उत्सुकता अो कुतूहलसँ युक्त मनोरंजक ओ ज्ञानवर्द्धक प्रकृतिक बाललोककथा थिक। बाल- प्रसून किरणजीक बाल प्रसून कथासंग्रह यद्यपि नेना सभकेँ धियानमे राखि ऐतिहासिक महाभारतीय कथानकक पुन: व्याख्या थिक। शैली शास्त्रीय होइतो अपन उद्देश्यक कारणे एकरो बाललाेककथाक संग्रह मानल जा सकैछ। कथा-कहानी ई डाॅ. शैलेन्द्र माेहन झा द्वारा संग्रहीत चौदह गोट बाल-लोककथाक संग्रह थिक। एकर कथा सभ नातिदीर्घ आकारक अछि। अधिकांश कथामे पशु-पक्षीकेँ आधार बना कऽ कोनो ने कोनो नैतिक शिक्षा प्रदान करब कथा सबहक उद्देश्य अछि जे बालमनकेँ प्रभावित करैबला अछि। लोक जगतक सुख-दु:ख, आशा-निराशा, भावानुभाव, हर्ष-विषाद, आचार-व्यवहार आदिक सहज ओ अकृत्रिम अभिव्यंजनाक कारणे मैथिली बाल-लोककथाक संग्रहक दृष्टिए ई नियामक ओ मार्गदर्शी संग्रह सिद्ध भेल। ऐ संग्रहमे किछु कथा हास्य-विनोदपरक तँ किछु लोकजीवनक अकृत्रिम झाँकीसँ सम्बद्ध अछि। एकर भाषा सेहो नेना-भुटकाक हेतुओ सरल, सहज ओ औत्सुक्यकेँ जगबैबला अछि। मैथिली लोककथा मैथिली लोककथाक सर्वाधिक प्रशस्त प्रकाशित संचयनक दृष्टिए श्री रामलोचन ठाकुरक मैथिली लोककथा अद्वितीय अछि। एकर प्रथम प्रकाशित संस्करण 1983 ईं.मे भेल जाइमे अठारह गोट कथा मात्र संकलित छलैक मुदा 2006 मे भेल द्वितीय परिवर्द्धित संस्करणमे ठीक दुन्ना अर्थात छत्तीस गोट कथा संग्रहीत छैक। लेखकक कहब छन्हि जे ओ ई कथा सभ अपन नानी, माँ आ लालमामासँ सूनि क' संग्रहीत केने छलाह तँए एकर सबहक अकृत्रिमता असंदिग्ध छैक। लेखक कथाभाषाकेँ सेहो सहजता प्रदान केने छथि तथापि कतौ-कतौ शास्त्रीयताक प्रभाव अवश्ये गछारने छन्हि। एकर अधिकांश कथा अपन रोचकताक कारणें बाल-लोककथा मध्य परिगणित कएल जा सकैछ। अष्टदल मैिथली लोककथाक ऐ संग्रहक संग्रहकर्त्ता छथि डॉ. श्री अमरनाथ झा। ऐमे आठ गोट लोककथा क्रमश: नीक-बेजाए, पुनर्जन्मक कथा, चरबाहक न्याय, सन्तोषी ओ हाहुति, हंसराज, मोहन कमार, चक्रवर्ती राजा ओ झोड़ाक माहात्म्य संकलित अछि। कथा सभ पैघ-पैघ अछि तथा शिष्ट साहित्यिक भाषाक प्रयोगक कारणे कृत्रिम प्रकृतिक भ' गेल अछि। तथापि ऐ संग्रहक मोहन कमार ओ झोड़ाक माहात्म्य कथा बाल-लोककथा मध्य परिभाषित हेबाक योग्य नीक नमूना थिक। अवश्ये ई दुनू बाल-लोककथाक किंचित परिवर्त्तनक संग पूर्व वर्णित मैथिली लोककथामे सेहो अछि। एकटा छला गोनू झा- धूर्त्त शिरोमणि गोनू झा मिथिलाक हास्य-विनोदपरक कतोक लोक कथाक नायक छथि। हिनक चरित्रपर आधारित कथा सबहक संग्रह अनेक संकलनकर्त्ता लोकनि करैत ऐलाह अछि जइमे हिन्दीमे डॉ. वीरेन्द्र झाक संग्रह राजकमल प्रकाशन (पटना, नई दिल्ली) सँ प्रकाशित भ' बेस प्रचलित भेल। एहने चौबीस गोट कथा सभकेँ मैथिलीमे डाॅ. विभूति आनन्द ’एकटा छला गोनू झा' नामे प्रकाशित करौलनि। बुद्धि ओ विवेकक प्रयोग, मनोरंजकता ओ सहजताक कारणे ई सभ मिथिलाक बाललोककथाक उत्कृष्ट दृष्टान्त तँ अछि मुदा बालमनक निश्छलता एकर शिक्षण-पद्धतिसँ कालुष्ये दिस जा सकैत छैक। कृत्रिम भाषा-प्रयोगक कारणे एकटा छला गोनू झा लोककथाक मर्यादाक पालन नै क' सकल अछि, तेहन प्रतीत होइत अछि। मैथिलीमे ऐ कोटिक कथाक अन्य संग्रह थिक श्री गोपीकान्त झा 'उमापति' द्वारा सम्पादित संकलन 'गोनू झाक चटनी' जे लोक जगतमे मैथिलीक प्रसारक दृष्टये महत्वपूर्ण मानल जा सकैछ। प्रेत कथा- ई हंसराज रचित छओ गोट प्रेतकथा संग्रह थिक। एकर अधिकांश कथा शिष्ट साहित्यक भाषासँ सम्पन्न अछि तथापि प्रेत विवाह पद्धति आ यावत् पढ़बह रूद्रकेँ अवश्ये बाललोक कथा मध्य परिगणित कएल जा सकैछ। कुरूक्षेत्रम् अन्तर्मनक ई पोथी श्री गजेन्द्र ठाकुरक विभिन्न विधाक रचनाक संकलन थिक। एकर सातम खंडमे बालकथाक रूपमे तेइस गोट कथा संग्रहीत अछि। ऐ कथा सभमे अधिकांश मिथिलाक लोकनायक सबहक कथा िथक तथापि अाधा दर्जनक लगभग कथाकेँ बाल-लोककथा कहल जा सकैछ, यद्यपि ओकरो सबहक भाषा पूर्णत: शास्त्रीय प्रकृतिक अछि। बाललोक कथाक संकलनक क्षेत्रमे चलैत प्रयास सबहक नमूनाक रूपमे एकरा महत्वपूर्ण कहल जा सकैछ। क्षमाक जीत महिलालोकनि द्वारा बाललोकथाकेँ संरक्षित करबाक प्रयास क्रमश: कण्ठसँ अक्षर दिस प्रवहमान भ' रहल अछि, से ऐ पोथीसँ भान होइत अछि। एकर लेखिका थिकीह श्रीमती पुष्पा कुमारी। ऐमे कएकटा स्रोतसँ उपलब्ध पाँच गोट कथा संग्रहीत अछि जकरा सभकेँ बाललोककथा मध्य परिगणित कएल जा सकैछ। एकरो भाषापर शास्त्रीय भाषाक प्रभाव अत्यधिक देखि पड़ैछ। पिलपिलहा गाछ हालहिमे डॉ. श्री मुरलीधर झाक बाल कथा संग्रह पिलपिलहा गाछ प्रकाशित भेलनि अछि जइमे एक्कैस गोट कथा संग्रहीत कएल गेल अछि। ऐमे पशु-पक्षीक कृत्यपर आधारित दुष्ट खिखिर, सिनेहक सिन्दूर तथा धूर्त्ततापर आधारित ठक्क कथा बाललोककथाक दृष्टान्त स्वरूप अछि। एकरा सबहक कथाभाषा पूर्णत: परिमार्जित साहित्यिक भाषा थिक। बाललोक कथाक संकलन-प्रकाशनक दिशामे मैथिली साहित्यकार लोकनिक उपर्युक्त प्रयास सभ श्लाध्य अछि मुदा एतबे धरिकेँ संतोषप्रद नै मानल जा सकैछ। ऐ हेतु क्षेत्र-कार्य करबाक आवश्यकता छैक जै दिस अनुसंधित्सुलोकनि प्रयास क' सकैत छथि आ मैथिलीक ऐ विधाकेँ जिया क' राखि सकैत छथि, ओकर मौलिकताक क्षरणकेँ रोकि सकैत छथि। अन्यान्य भाषामे उपलब्ध लोककथा सबहक मैथिली रूपान्तरणक माध्यमे सेहो कतोक बाललोक कथा मैथिलीक ऐ विधाक अभिवृद्धिमे सहायक भेल अछि आ एकरो आयाम पर्याप्त छैक। ऐ दिशामे कृत प्रयास सभमे पं. श्री गोविन्द झाक 'अओ बाबा : की बौआ, डा. इन्द्रकान्त झाक िवश्व प्रसिद्ध मैिथली लोककथा, डॉ. योगानन्द झाक 'बिहारक लोककथा', विजयनाथ ठाकुरक लोककथा आदि लोककथा संग्रह उल्लेखनीय अछि। मैथिली पत्र-पत्रिका सेहो बाललोककथाक प्रकाशन यदा-कदा करैत रहला अछि। एम्हर ऋृषि वशिष्ठ कृत 'कोढ़िया घर स्वाहा' शीर्षकसँ मात्र एक गोट बाललोककथाक प्रकाशन पुस्तकाकार कराओल गेल अछि जइमे विद्यापतिक अलस कथाकेँ उत्सक रूपमे ल' बाललोक कथा शैलीक प्रति सचेष्टता देख पड़ैछ। ई ऐ दिशामे एकटा अभिनव प्रयास आ दूरदृष्टिपूर्ण संकेत बुझना जाइछ। नेनालोकनिमे अपन भाषाक प्रति अनुराग जगाएबाक दृष्टिये सम्प्रति बाललोककथाकेँ चित्रकथाक माध्यमे प्रस्तुत करबाक दिस किछु अग्रसोची साहित्यकारक धियान गेलनि अछि। ऐ दिशामे संभवत: पुस्तकाकार प्रथम प्रयास भेल अछि श्रीमती प्रीति ठाकुर द्वारा, जनिक 'गोनू झा आ आन मैथिली चित्रकथा', श्रुति प्रकाशन दिल्ली द्वारा भव्य साज-सज्जाक संग प्रकाशित भेल अछि। ऐमे गोनू झासँ सम्बद्ध नओ गोट हास्य-विनोदपरक कथा तथा मिथिलाक किछु लोककथा यथा रेशमा-चुहड़मल, नैका-बनिजारा, भगत ज्योति पँजियार, महुआ घटबािरन, राजा सलहेस, छैछन महाराज ओ कालिदासक कथाकेँ चित्रावली द्वारा प्रस्तुत कएल गेल अछि। मैथिली बाललोक कथा प्रकाशनकेँ युगानुरूप अग्रनीत करबाक दिशामे श्रीमती ठाकुरक ई प्रयास अन्यतम कहल जा सकैछ। आब मैथिली बाललोक कथाक किछु बैशिष्ट्यपर विचार कएल जाए। मैथिली बाललोककथामे राजा, राजकुमार, मंत्री, साधु, ब्राह्मण, नौका, सेठ, तेली, धोबि, मालिन, रानी आदि विभिन्न वर्गक पात्र, सियार, सपनौर, हाथी, धोड़ा, साप, गाए, बाध, सिंह, पशु पात्र, सुग्गा, कौआ, मैना, फुद्दी, मुर्गा आदि पक्षी पात्र, विध-िवधाता, शंकर-पार्वती, डाइन-जोगिन, परी, भूत-प्रेत, देवी-देवता आदि अलौकिक पात्र ओ हुनकालोकनिक कृत्य समाहित रहैत अछि। ओ लोकनि पारस्परिक ओ मनुष्यक संग व्यवहार ओहिना करैत छथि, बोलीयो तहिना बजैत छथि जेना मानव-मात्र। अतिमानवीय पात्रलोकनि असंभवो कार्यकेँ संभव करैत देख पड़ै छथि आ अलौकिक क्षमतासँ पूर्ण देखल जाइत छथि। हिनका लोकनिक कार्य-व्यापार नेनालोकनिकेँ चमत्कृत ओ आश्चर्यचकित क' दैत छन्हि। ऐसँ मनोरंजनक संगहि नेनालोकनिमे अद्भुत पराक्रम प्रदर्शित करबाक भावनाक उदय होइत छन्हि तथा कथाक प्रति हुनका लोकनिक उत्सुकता बनल रहैत छन्हि। मैथिली बाललोककथा सामान्यत: सुखान्त होइत अछि। ऐमे नायक बहुधा विभिन्न विघ्न-बाधाकेँ पार क' अपन अभीष्टक सिद्धिमे सफल देखाओल जाइत छथि जइसँ नेना लोकनिक मन उत्फुल्ल भ' उठैत छन्हि आ परिश्रम ओ प्रयास द्वारा कोनो प्रकारक अभीष्ट प्राप्त कएल जा सकैत अछि, से भावना हुनका लोकनिक मनमे जमैत जाइत छन्हि। मैथिली बाल लोककथा सभमे लोकमानसक उदार ओ व्यापक चित्र-वृत्तिक निदर्शन भेटैत अछि। परदु:ख कातरता ओ सहानुभूति, सहिष्णुता अेा वीरत्व तथा जीवमात्रक प्रति प्रेम भावना बाल लोककथाक अन्यतम विशिष्टता थिक जइमे नेनालोकनिक मनपर धनात्मक प्रभाव पड़ैत छन्हि। मैथिली बाल लोककथा सभमे धटनाक वर्णन अत्यन्त सहजताक संग कएल रहैत अछि। स्वभावत: कोनो घटनाकेँ बालमन स्वभाविक रूपसँ ग्रहण क' लैत अछि। ऐ प्रकारक लोककथा सभमे औत्सुक्य जगैबाक अद्भुत झमता रहैत छैक। जइसँ नेनालोकनि एहन कथा अत्यन्त मनोयोगसँ सुनैत छथि आ बेर-बेर सुनबाक हेतु लुसफुसाइत रहैत छथि। एतए धरि जे कथा श्रवणक क्रममे हुनकालोकनिक निन्नो अलोपित भ' जाइत छन्हि। ओ सभ ऐ प्रकारक कथामे तेना भ' क' रमि जाइत छथि जे हुनकालोकनिक सुधि-बुधि पर्यन्त हेरा जाइत छन्हि। मैथिली बाललोककथा वस्तुत: लोकमानसक अभिव्यक्ति थिक। तँए ऐमे उड़नखटोला ओ उड़ैबला घोड़ाक कल्पना कएल गेल अछि, पशु-पक्षीकेँ राजकुमारीक रूपमे परिवर्तित होइत देखाअोल गेल अछि, पक्षीकेँ मारि देलासँ राक्षसक मरि जाएबाक कल्पना कएल गेल अछि, देवनदी गंगा ओ अन्यान्यो देवता-पितरक प्रति आस्था देखाओल गेल अछि, विध-विधाता द्वारा ककरोपर असीम कृपा करबाक प्रवृत्तिक वर्णन भेल अछि, भूत-प्रेत अद्भुत कृत्यक कल्पना कएल गेल अछि। आधुनिकताक कसौटीपर एहन कथा सभमे अतिरंजनाक पराकाष्ठामे देख पड़ैछ मुदा लोकमानस एहन कथ्यक प्रति आस्थावान अछि आ एहन वर्णन सभसँ कनेको असहजताक अनुभव नै करैछ। आकारक दृष्टिये मैथिली बाललोककथाक दुइ गोट प्रकार देख पड़ैत अछि- दीर्घ आ लघु। दीर्घ कथा सभमे एके कथामे अनेक उपकथा सभ अन्तर्मुक्त रहैत अछि मुदा लघु आकारक बाल लोककथामे एकेटा छोट घटनापर आधारित विवरण रहैत अछि। मैथिली बाललोककथा सामान्यत: गद्यात्मक होइत अछि मुदा अनेक कथामे चम्पू शैलीक आश्रय लैत पद्योग समाहार बीच-बीचमे देख पड़ैत अछि यथा- एकटा बाललोककथामे जखन एकटा मृतक स्त्रीक सारापर गाछ जनमि जाइत छैक आ ओकर पुष्पपर मुग्ध भ' ओकर ससुर ओ फूल तोड़ए चाहैत छैक तँ गाछतरसँ आवाज अबैत छैक- “ससुरजी, ससुरजी डारि जुनि छूबू, पात जुनि छूबू भैया मारलनि, कूड़ खेत गाड़लनि चुनरी रंगौलनि, बहु पहिरौलनि हमरा देल वनवास डारि-पात लागू अकास।” एहिना अनेक मैथिली बाललोककथाक पद्य कथ्य दोसरो भाषामे यथा हिन्दी, भोजपुरी, बंगला आदिमे सेहो देख पड़ैछ, उदाहरणार्थ- “आजा माजा कान में समा जा।” “की खाओं की पियओँ, की लए परदेस जाओँ। आदि।” एेठाम ई तथ्य ज्ञातव्य अछि जे जै बाललोककथामे जतेक लहरदार भाषाक प्रयोग रहैत अछि, से ततबे आकर्षक होइत अछि। मैथिली बाललोककथाक भाषा अत्यन्त सरल, बोधगम्य ओ प्रवाहपूर्ण होइत अछि। एकर वाक्य संरचना अत्यन्त छोट-छोट रहैत छैक तँए जटिल ओ मिश्रवाक्यसँ ऐमे परहेज रहैत छैक। एकर पात्रक भाषा जकरा आलाप भाग कहल जा सकैछ सर्वथा लोकमुखी होइत अछि जइमे कर्तृवाच्य ओ वक्ताक अवक्र शब्दावलीक प्रयोग देख पड़ैछ। एकर कथातत्वकेँ आगू बढ़ौनिहार भाषाकेँ आख्यान भाषा कहल जा सकैछ। ई भाषा अत्यन्त परिवर्त्तनशील रहैत अछि। लोककथाक ऐ भाषापर कहनिहारक वएस, परिवेश, शिक्षा, लिंग आदिक प्रभाव देख पड़ैछ। लोककथा जखन श्रुत साहित्यसँ लिखित साहित्यमे परिणत होइछ, तखन एके कथाक रूप बहुलता, लिखित भाषाक रूप आदिमे संकलन कर्त्ताक भाषाक पर्याप्त प्रभाव पड़ैत छैक। यएह कारण थिकैक जे कथा समानो रहलापर ओकर स्वरूप विभिन्न लेखक-सम्पादक भिन्न रूपमे प्रस्तुत करैत देखल जाइत छथि। शास्त्रीयतासँ आछन्न लोककथाक क्रियापदमे छैक, छलाह, गोट, जाइत आदि पदक प्रयोग होइछ जखन कि रूपमे छै, छला, गो, जाइ आदि लघु स्वरूप देख पड़ैत अछि। ऐ विधामे भाववाचक संज्ञाक अत्यल्प प्रयोग भेल अछि आ तकर स्थानपर विशेषणे शब्दक प्रयोग वांछित बुझना जाइत रहलैक अछि। एतावता मैथिली बाललोककथा मैिथली लोकसाहित्यक अमूल्य निधि िथक जकर संकलन-प्रकाशन आे अध्ययनक आवश्यकता अछि जइसँ ई सम्पदा अन्यान्य भाषाक समक्ष आबि सकए आ अनन्तकाल धरि नेनालोकनिक मनाेरंजन कऽ सकए। क्रमश: सुजित कुमार झा- मिनापक लेल एकटा आओर उपलब्धी दू लाखक पुरस्कार
मैथिली भाषा, कला, साहित्य एवं सांस्कृतिक क्षेत्रमे काज करयबला अग्रणी संस्था मिथिला नाट्यकला परिषद जनकपुरकेँ फलकुमारी महतो मैथिली साधना सम्मान पुरस्कार सँ सम्मानित करबाक निर्णय कएल गेल अछि । फुलकमारी महतो मेमोरियल ट्रष्ट द्वारा स्थापित ओ पुरस्कारक राशि दू लाख एक हजार रुपैया रहल ट्रष्टक सदस्य सचिव एंव मैथिली साहित्यकार धीरेन्द्र प्रेमर्षि जानकारी देलन्हि अछि । ट्रष्ट मिनापक अतिरिक्त फुलकुमारी महतो मैथिली प्रतिभा पुरस्कार राजविराजक मिना ठाकुर आ मोरङ्गक दयानन्द दिगपाल यदुवंशीकेँ देबयकेँ निर्णय कएलक अछि । दूनु गोटेकेँ २५–२५ हजार रुपैया देल जाएत । गैर आवसिय नेपाली डा. उपेन्द्र महतो द्वारा अपन माय फुलकुमारी महतोक नाममे ट्रष्टकेँ स्थापना कएल गेल अछि । पुरस्कारक सिफारिसक लेल मैथिलीक वरिष्ठ साहित्यकार डा. राजेन्द्र विमलक संयोजकत्वमे धीरेन्द्र पे्रमर्षि आ पुनम ठाकुर सदस्य रहल समिति गठन कएल गेल छल । ओ समिति पुरस्कारक घोषणा कएलक अछि । सभ सँ बडका पुरस्कार प्राप्त भेलाक बाद मिनापक अध्यक्ष सुनिल मल्लिक कहलन्हि , हमसभ सही दिशामे काज कऽ रहल छी तकर पुष्टि भेल अछि । आब आओर लगन सँ काज करब बतौलन्हि अछि । मिनापक इतिहास मिनापक स्थापना २०३६ सालमे होइतो एकर पृष्ठभूमि २०२४ साल सँ शुरु भेल मिनापक संस्थापक सभ कहैत छथि । विलट साह एण्डी, पारस प्रसाद बदामी, भरत अकेला आ योगेन्द्र साह नेपाली २०२४ सालमे जनकपुरमे आधुनिक नाटय कला मन्दिर स्थापना कएलन्हि । प्रारम्भिक अवस्थामे अहि संस्थाक माध्यम सँ जनकपुरमे हिन्दी नाटक प्रदर्शन होइत छल । अहि क्रममे २०२८ सालमे मैथिली भाषाक मूर्धन्य साहित्यकार डा. धीरेश्वर झा धीरेन्द्र, योगेन्द्र साह नेपाली सँ भेट कएलन्हि आ आधुनिक नाटय कला मन्दिरक मञ्च पर मैथिली गीत सेहो गायल जाय अनुरोध कएलन्हि आ तकर बाद सँ ओहि मञ्च पर मैथिली गीत चलय लागल मिनापक संस्थापक योगेन्द्र साह नेपाली मिनापक २०४९ सालमे प्रकाशित स्मारिकामे लिखने छथि । ओहि समयमे डा. धीरेन्द्रक ‘तार काटु तरकुन काटु’ आ योगेन्द्र साह नेपाली ‘मरुआक रोटी खेसारीक दालि’, ‘देशी मुर्गी आ बेलायती बोल’ , ‘हे गै सगतोरनी’ सनक गीत लिखलन्हि जे बेस चर्चा पौलक । अहि गीत सभक लोकप्रियता देखि आधुनिक नाटय कला मन्दिरक मञ्च पर मैथिली नाटक सेहो होबय लागल । छिक प्रहसन, चमेलीक विआह, ब्रह्मस्थान सन नाटक मञ्चन भेल । ई क्रम चलिते रहल आ डा. धीरेन्द्रक सभापतित्वमे एकटा बैसार भेल जाहिमे योगेन्द्र साह नेपाली, बलराम प्रसाद राय, भोला दास, राम अशिष ठाकुर आ मदन ठाकुर उपस्थित भेल रहथि । निर्णय भेल जे अहि नाटय संस्थाकेँ विशुद्ध मैथिली नाटय मञ्चक रुप देल जाय । जेकर किछ गोटे विरोध कएलन्हि मुदा चारि वर्ष नहि बितैत मिनाप नामक नाटय संस्थाक गठन भऽ गेल । योगेन्द्र साह नेपाली स्मारिकामे लिखने छथि, ‘हम, धीरेन्द्र आ राजेन्द्र कुसवाहा मिल कऽ समाजसेवी राजदेव मिश्रक अध्यक्षतामे एकटा बैसार कएलहुँ जाहिमे सुदर्शन लालक नेतृत्वमे एकटा कमिटी गठन कएल गेल ।
मिनापक संस्थापक के छथि ? जखन कोनो संस्था बड्ड बेसी चर्चामे अबैत अछि तऽ क्रेडिट लेबाक लेल होड़ चलि अबैत अछि । अहुमे मिनाप सनक संस्थाक तऽ स्वभाविके अछि । डा. धीरेन्द्रक प्रेरणा आ योगेन्द्र साह नेपालीक अपन भाषा, साहित्य एवं सांस्कृतिक लेल किछ करी से सोच एकर स्थापनामे किछ बहुत मद्दत कएने अछि । मिनापक संस्थापक कमिटीक अध्यक्षमे सुदर्शन लाल कर्ण, उपाध्यक्षमे योगेन्द्र साह नेपाली, सचिवमे भोला दास, निर्देशकमे वलराम प्रसाद राय, कोषाध्यक्षमे महेश साह आ सदस्यमे राम अशिष ठाकुर, मदन ठाकुर, राजेन्द्र अकेला, राजेन्द्र कुशवाहा, परमेश्वर साह, नवीन मिश्र, पुरुषोतम शर्मा आ देव नारायण जी रहथि । ओना मिनापक स्थापना सम्बन्धि बैसार राजदेव मिश्रक अध्यक्षतामे जानकी पुस्तक भण्डारमे भेल छल ।
मिनापक उपलब्धी मिनाप जनकपुरमे मात्र नहि नेपाल आ भारतक विभिन्न स्थानमे झण्डा गारि चुकल अछि । मैथिली सम्बन्धि कतहु नाटक वा सांस्कृतिक कार्यक्रम होइ यदि मिनाप नहि रहत तऽ अपूर्ण लगैत अछि । स्वयं चर्चित नाटककार महेन्द्र मलंगिया कहैत छथि –‘जतय रमेश रंजन, मदन ठाकुर, सुनिल मिश्र, विष्णुकान्त मिश्र आ राम नारायण ठाकुर सन कलाकार हुए कोनो नाटक टिमक लेल चुनौती ठाढ़ कऽ सकैत अछि ।’ फेर नयाँ युवा युवती सभ सेहो ओहि रुपमे आएल अछि । अनिल चन्द्र झा, रविन्द्र झा, घनश्याम मिश्र, रंजु झा आ प्रियंका झा सनक कलाकार काइल्हो मिनापेक दिन छैक तकर संकेत दऽ रहल अछि । फेर सांस्कृतिक टिमकेँ एकटा फौजे मिनापक संग अछि । सुनिल मल्लिककेँ नेतृत्वमे प्रवेश मल्लिक, रमेश मल्लिक, नेहा प्रियदर्शिनी, संगीता देव, ललित कापर, शम्भु कर्ण, राम नारायण ठाकुर, दिगम्वर झा दिनमणि सहितक छथि । मिनापकेँ सर्वनाम, रामानन्द युवा क्लव, साँस्कृतिक संस्थान काठमाण्डू, सहित दर्जनो संस्था सम्मानित कएने अछि । तहिना सुनिल मिश्र, रमेश रञ्जन झा, मदन ठाकुर, रंजु झा, महेन्द्र मलंगिया, रेखा कर्ण सभ बहुतो बेर सम्मानित भऽ चुकल छथि ।
मिनापक एकटा आओर योजना
मिनाप अखन अपन भवन निमार्णमे लागल अछि । नाट्यशाला आ कार्यालय भवनक लेल नाटक मञ्चन कऽ रहल अछि । मिनापक प्राङ्गणमे अस्थायी नाटक घर बनाय टिकटमे प्रत्येक राति नाटक मञ्चन करैत अछि । मिनापक महासचिव अनिल चन्द्र झा कहैत छथि, भवनक लेल नाटक मञ्चनके क्रममे टिकट सँ प्राप्त भेल आम्दानी आ अन्य व्यक्तिसभ सँ सहयोग लेबयकेँ काज शुरु कएल गेल अछि । किछु महिना पूर्व मैथिलीक वरिष्ठ नाटककार महेन्द्र मलंगिया नाटक घरकेँ शिलान्यास कएने छलथि । ओना पुस्तकक प्रकाशन दिस सेहो मिनाप आगा आएल अछि । डा. धीरेन्द्रक कथा संग्रह प्रकाशन कएलक अछि । तहिना जीवनाथ झाकेँ कृति सेहो प्रकाशन करबाक निर्णय कएलक अछि । मिनाप अध्यक्ष सुनिल मल्लिक कहैत छथि, मिनाप मैथिलीक हरेक पक्षकेँ लेल काज करैत रहत । अहिमे डगमगायत नहि । १.जगदीश प्रसाद मंडल- एकांकी- सतमाए २.बेचन ठाकुर- बेटीक अपमान केर अंतिम दृश्य १ जगदीश प्रसाद मंडल एकांकी सतमाए विद्यालय। समए माघक 3 बजे। स्कूलक अग्नेय (आंगन)मे बुद्धिधारी बाबू (प्रधानाचार्य) विपत्तिबाबू (सहयोगी शिक्षक) कुरसीपर आ पुलकित (चपरासी) स्टूलपर बगलमे बैस गप-सप्प करैत। बुद्धिधारी बाबू- आब विद्यालयमे नै मन लगैए। होइए जे कखन रिटायर भऽ जाइ। कखनो कऽ तँ एहनो भऽ जाइए जे भोलेनट्री रिटायरमेंट लऽ ली। पुलकित- से किअए मासएब? बुद्धिधारी- तहूँ तँ पनरह-बीस बर्खसँ संगे रहिते छह देखते छहक जे की मान-प्रतिष्ठा स्कूलोक आ शिक्षकोक छल आ अखन की अछि। पुलकित- ऐ युगमे मान-प्रतिष्ठा लऽ कऽ धो-धो चाटब। भने दिन-राति दरमाहा बढ़बे करैए, सुखसँ जीबू। बुद्धिधारी- (कनडेरिये आँखिये पुलकित दिस देख) तू जे सवाल उठेलह पुलकित ओ बड़-भारी अछि। मुदा प्रश्न तोहर छिअह तँए जबाब देब उचित भऽ गेल। (जिज्ञासासँ विपतिबाबू बुद्धिधारी बाबूक नजरिपर आँखि गाड़ि मनकेँ असथिर कऽ सुनैक बाट तकऽ लगलाह) पुलकित- मासएब, जहिना खेतक आड़ि-धुर बाढ़िक बेगमे विगड़ि जाइत तहिना भऽ गेल अछि। (पुलकितक दोहराओल प्रश्नसँ बुद्धिधारी बाबूक मन आरो अमता गेलनि। मुदा धैर्यसँ शक्ति जगबैत) बुद्धिधारी- पुलकित, जते सुख आ चैनसँ जीबए चाहैत छी ओते दुख आ बेचैनी बढ़ल जाइए। तोंही कहह जे बिना काजक बोइन जे भेटतह ओ अन्न देहमे लगतह। पुलकित- (धड़फड़ा कऽ) से कोना लगत। काजमे जते देह दुहाइत अछि ओते भूख जगै छै जते भूख जगै छै ओते अधिक अन्न पचै छै। देह थकबे ने करत तँ भूख कन्ना जागत। जँ भूख नै जागत तँ खाइक क्षुधा कन्ना हएत? जेहन खाइ अन्न तेहन बने मन, जेहन बने मन, जते जगे अर्पण। बुद्धिधारी- अपने विद्यालयक खिस्सा कहै छिअए। जै दिनमे एलौं ओइ दिनमे एगारह गोटे शिक्षक रही आ चारू किलास मिला कऽ साढ़े चारि साए विद्यार्थी रहए। साइंस, कौमर्स आ आर्ट तीनू फेक्लटी रहए। पुलकित- चपरासी कतेक रहए? बुद्धिधारी- (मुस्की दैत) एक्केटा। काजो कम रहए। अच्छा सुनह। सभ किलासमे सेक्शन चलैत रहए। अखन देखहक जे रजिष्टरमे छह सौ विद्यार्थी आ सत्तरह गोटे शिक्षक छी। पुलकित- हँ, से तँ छी। बुद्धिधारी- मुदा की देखै छहक जे आइ मात्र चर्तुदसी छी, ने शिक्षक ऐलाह आ ने छात्र। पुलकित- छुट्टी दरखास आएल की नै? बुद्धिधारी- एकोटा नै। पुलकित- मासएब, ऐ बुढ़ाढ़ीमे कते माथा-पच्ची करब। भरमे-सरम अपन जिनगी आ परिवारकेँ देखियौ। बुद्धिधारी- से उचित हएत? पुलकित- रूइया जकाँ जे माथ धुनि-धुनि उड़ेबे करब तइसँ सीरक कन्ना बनत? (विपति बाबूपर नजरि दैत) बुद्धिधारी- एते दिन तँ नै कहलौं विपति बाबू किएक तँ साल नै लागल छल मुदा आब तँ सालसँ ऊपर भऽ गेल। एकटा बात पुछू? विपति बाबू- एकटा किअए हजारटा पुछि सकै छी। जखन सभ दिन एकठाम रहै छी, एक पेशा अछि, तखन पूछैक लेल आदेशक की प्रयोजन? बुद्धिधारी- अहाँ विआह कऽ लिअ? विपति बाबू- यएह जे दूटा बेटो-बेटी अछि। बुद्धिधारी- मानै छी। मुदा ई कहू जे बेटा-बेटीक उम्र कते अछि? विपति बाबू- अपने विद्यालयमे बेटा एगाढ़मामे पढ़ैत अछि आ बेटी नाइन्थमे। बुद्धिधारी- (आंगुरपर हिसाब जोड़ि) चौदह-पनरह बर्खक बेटा आ बारह-तेहर बर्खक बेटी हएत? विपति बाबू- करीब-करीब। बुद्धिधारी- पान-सात बर्खमे बेटी सासुर चलि जाएत। जे हवा बनि रहल अछि ओइमे जँ बेटाकेँ इंजीनियर वा एम.बी.ए. नै कराएब सेहो नै बनत। विपति बाबू- जँ से नै कराएब तँ हँसारते हएत। तइपर सँ इहो दोख लागत जे माए मरिते बेटा-बेटीकेँ विपति कुभेला करै छै। बुद्धिधारी- (किछु सोचैत) कहलौं तँ ठीके। मुदा जँ अपना काजमे कमी नै आनब तँ लोक बाजत किअए। कहुना तँ पच्चीस-तीस हजार महिना उठैबते छी। असानीसँ सभ काज चला सकै छी। विपति बाबू- (मुड़ी डोलबैत) एक तरहक विचार अछि। बुद्धिधारी- (नमहर साँस छोड़ैत) ई भार हमरा ऊपर रहल। जहिना एक-एक समस्या डोरीक सूत जकाँ बाँटल अछि तहिना ओकरा खोलि कऽ उघारि-उघारि सोझराबए पड़त। पुलकित- (फड़कि कऽ) मासएब, कँटहो बाँस तँ लोके काटि कऽ घरमे लगबैए आ ई कोन ओझरी छिऐ। बुद्धिधारी- एक आदमीक समस्या (ओझरी) कतेकोकेँ ओझरबैत अछि। तँए अौगता कऽ किछु बाजि देब वा करैले डेग उठा देब, अनुचित हएत। (घड़ी देख कऽ) सवा तीन बजिये गेल। काजो नहिये जकाँ अछि। चाभी लऽ कऽ क्लासोक कोठरी आ आॅफिसो बन्न कऽ दहक। (पुलकित चाभीले बढ़ए लगल। दुनू गोटे कुरसीपर सँ उठि गेलाह। दुनू कुरसियो आ स्टूलो आॅफिसमे रखि कोठरी बन्न कऽ पुलकित अबैत अछि।) बुद्धिधारी- विपति बाबू, अहाँक जिनगी देख मनमे उदिग्नता उठि रहल अछि। विपति बाबू- किअए? बुद्धिधारी- अपना सभ समाजक उच्च श्रेणीक रहितो जिनगी आ मनुष्यक रहस्य नै बुझि रहल छी। जे सहजे निम्न श्रेणीक (बौद्धिक) छथि ओ कोना बुझत। जँ से नै बुझत तँ अमती काँट जकाँ ओझरी (जिनगीक) कोना छोड़ा पाओत? विपति बाबू- (मुड़ी डोलबैत) बड़ गंभीर बात कहलौं। बुद्धिधारी- सदैत इच्छा रहैए जे सबहक परिवार नीक जकाँ फड़ै-फुलाइ मुदा से कहाँ भऽ पबैए। जहिना आगू बढ़ल चिन्ता ग्रस्त (दुखी) तहिना पछुआएल। आखिर एना होइ किअए छै? पुलकित- मासएब, अनेरे मन भरिओने छी। हँसि-खेल जिनगी गुदस कऽ ली सभसँ नीक। (पुलकितक बात बुद्धिधारीक करेजकेँ आरो बेध देलकनि। मुदा कोढ़मे चोट लगने असीम दरदो होइत तँ मुँहसँ हसियो फुटैत।) बुद्धिधारी- (मुस्की दैत) पुलकित, औझका दरमाहा तँ फोकटेमे भेल किने? पुलकित- फोकटमे कन्ना भेल। भरि दिन बरदाएल जे रहलौं। बुद्धिधारी- अच्छा चलह संगे, तोरे ऐठाम चाह पीब। पुलकित- दुआर पर तँ नहिये पीआएब दोकानमे जरूर पीया देब। बुद्धिधारी- से किअए? पुलकित- घरवारी व्रत केने छथि। ओ तँ अनेरे पेटकान लधने हेती। तइपर चाह बनबए कहबनि। बाढ़नि सूप छोड़ि आरो किछु भेटत। बुद्धिधारी- तखन तँ तोहर घरवाली बड़ धर्मात्मा छथुन? पुलकित- सोलहन्नी। बिना धरमत्मेक भरि दिन खटै छी आ दरमाहा हुनका हाथ पड़ै छन्हि। बुद्धिधारी- धर्मो कते रंगक होइए? पुलकित- मासएब, अहीं मुँहे ने सुनने छी, जते रंगक लोक तते रंगक धरम। कियो कोदारि पाड़ि पसिना चुबा धरम-करम (धर्म-कर्म) बुझैए, तँ कियो बम-गोली लऽ धर्म-कर्म बुझैए। कर्म तँ दुनू करैए। दोसर दृश्य- “विपति बाबूक दरबज्जा। सुलक्षणी माए आ शिव कुमार (विपति बाबूक बेटा) दरबज्जापर बैसल।” (बुद्धिधारी, विपति बाबू आ पुलकितक प्रवेश। सुलक्षणीकेँ गोड़ लगैत बुद्धिधारी। उठि कऽ ठाढ़ होइत सुलक्षणी कुरसीकेँ आँचरसँ झाड़ैत।) सुलक्षणी- ऐपर बैसू। (बुद्धिधारीकेँ बैसते) बाल-बच्चा सभ आनन्दसँ छथि किने? बुद्धिधारी- भगवानक कृपासँ सभ आनन्दित अछि। सुलक्षणी- भगवान नीक करथि। एहिना सभ दिन परिवार फुलाइत-फड़ैत रहए। बुद्धिधारी- एकटा विचार लेल एलौं? सुलक्षणी- हम कोन जोकरक छी जे अहाँकेँ विचार देब। तखन तँ जे बुझै छी सएह ने कहब। बुद्धिधारी- विपति बाबूकेँ बड़ कष्ट होइ छन्हि। तँए विचार भेल जे ओ दोसर विआह कऽ लथि। सुलक्षणी- (कने काल चुप रहि) जहिना बेटा विपति अछि तहिना अहूँकेँ बुझै छी बौआ। तँए बजैमे धड़ी-धोखा नै होइए। हमर आशा कते दिन? वृद्ध भेलौं, कखन छी कखन नै, तेकर कोनो ठेकान नै अछि। बुद्धिधारी- तँए ने विचार करैक जरूरत अछि। सुलक्षणी- दुनियाँमे ने सभ मनुक्ख एक रंग अछि आ ने एक रंग चालि-चाढ़ि छै। नीको छै अधलो छै। (कहि चुप भऽ जाइत) बुद्धिधारी- अहाँक विचार की अछि? सुलक्षणी- के अपन परिवारकेँ उजड़ैत-उपटैत देखए चाहत। बुद्धिधारी- अपन जे अखन परिवार अछि, ओ कोना लहलहाइत रहत अइले ने विचारैक जरूरत अछि? सुलक्षणी- विपति हमर बेटा छी आ शिवकुमार पोता छी। दुनू कन्ना नीक-नहाँति जिनगी बिताओत सएह ने मनमे अछि। पोती तँ पाँच वर्खक बाद सासुर जाएत। बुद्धिधारी- (मूड़ी डोलबैत) हँ, कहलौं तँ नीके, मुदा.....? सुलक्षणी- मुदा की? बुद्धिधारी- मुदा यएह जे जहिना पोखरिमे करहर-सौरखीक जनमौटी गाछक पात पकड़ि ओरिया कऽ गाछ पकड़ि जड़िमे (िनच्चामे) पहुँच उखाड़ल जाइत अछि तहिना केलासँ परिवारक कल्याण हएत। सुलक्षणी- बौआ, अहाँक बात नै बुझलौं? बुद्धिधारी- परिवारमे जते गोरे छी सबहक जिनगीक डोर पकड़ि-पकड़ि ठढ़ धड़बऽ पड़त। तखने जा कऽ सुढ़िआएत। सुलक्षणी- (मूड़ी डोलबैत) कहलौं तँ ठीके मुदा समाजो तँ तेहन अछि जे नीक-अधला बात बाजि मनकेँ घोर कऽ दैत अछि। जइसँ लोकक विचारमे धक्का लगै छै। (कहि चुप भऽ जाइत) (बिचहिमे पुलकित) पुलकित- मासएब आ चाची, दुनू गोरेकेँ कहै छी। विपति भाय एकबतरिये हेता। हमर जे घरवाली मरल रहैत तँ ककरोसँ पुछबो ने कैरतिऐ आ दोहरा कऽ विआह कऽ नेने रहितौं। (पुलकितक बात सुिन) बुद्धिधारी- (हँसैत) पुलकित, परिवारक संग समाजोक विचार करए पड़ै छै। पुलकित- समाजकेँ अपने ठेकान नै छै। नीकोकेँ अधला कहैत अछि आ अधलोकेँ नीक। बुद्धिधारी- हँ, से तँ अछि। पुलकित- (अपना विचारपर जोर दैत) मासएब, जे समाज ककरो घर नै बना सकैए ओकरा कोन अधिकार छै जे ककरो घर उजाड़ै। बुद्धिधारी- कहलह तँ ठीके मुदा धड़फड़मे किछु करबो तँ सब नीके नै होइत अछि। अधलो भऽ सकैत अछि। पुलकित- हँ, से तँ होइतो अछि। बुद्धिधारी- तँए ने विचारक जरूरत अछि। तू तँ विपति बाबूक परेशानी देख धाँय दे बजलह। तोरह विचार कटैबला नै छह। पुलकित- एक बेर आरो चाह पीबू तखन मन आरो खनहन हएत। जइसँ झब दे रस्ता भेटत। (पुलकितक बात सुनि) विपति बाबू- बौआ (शिवकुमार) चाह बनौने आबह। पुलकितक कपमे कनी बेसी कऽ चीनी देने अबिहह। पुलकित- हम की आन दुआरे चाह पीबै छी मीठे दुआरे पीबै छी की। जावतो जीबै छी तावतो जँ हँसी-खुशीसँ नै जीयब तँ अनेरे जीबिये कऽ की करब। (चाह अबैत अछि सभसँ पहिने पुलकितेक कप बढ़बैत अछि।) बुद्धिधारी- हमरो कपक चाह कनी पुलकितमे ढारि दहक। पुलकित- ऍंह, मासएब केहेन गप बजै छी। अनकर हिस्सा खाएब से पचत। बुद्धिधारी- (हँसैत) हमरा आन बुझै छह? पुलकित- नै मासएब, मुँहसँ निकलि गेल। अच्छा कनी ढारि दिऔ। (चाह पीब पान खा) बुद्धिधारी- चाची, विपति बाबू जँ दोसर विआह करथि तँ अहाँकेँ कोनो विरोध नै ने? सुलक्षणी- नै। आब हमरा की चाही। वस एतबे ने जे पाँच कर भोजन आ पाँच हाथ वस्त्र भेटैत रहए। बुद्धिधारी- वाउ, शिवकुमार, अहाँ मनमे की बनैक (पढ़ैक) विचार अछि? शिवकुमार- अखन तँ हाइये स्कूलमे छी। मुदा मनमे अछि जे चाहे इंजीनियरिंग वा एम.बी.ए. पढ़ी। बुद्धिधारी- बहुत बढ़िया। मुदा जखन इंजीनियर वा एम.बी.ए. करबह तखन तँ नोकरी करए कारखाना वा शहर-बजार जेबह। परिवारो (पत्नी) जेथुन। (शिवकुमार गुम भऽ जाइत अछि) बुद्धिधारी- चुप किअए भेलह। बाजह। शिवकुमार- हँ। बुद्धिधारी- बात तोंही कहह जे दादी मरि जेथुन, तों परिवारक संग शहर चलि जेबह, बहीन सासुर चलि जेतह, ऐठाम विपति बाबूक दशा की हेतनि? शिवकुमार- मासएब, अहाँ बाबूक संगियेटा नै छिअनि, गुरूओ छी। अपने जे कहब शिरोधार्य अछि। बुद्धिधारी- विपति बाबू, दुनियाँमे मनुष्य खराब नै होइत अछि। ओकरा बनबैमे नीक-अधला होइ छै। जइसँ नीक-अधला बनैत अछि। पुलकित- हँ, से तँ होइ छै। बुद्धिधारी- माएक लेल बेटा-बेटीक लेल पिता आ पत्नीक (विवाहक बाद) लेल पति बनि आगूक जिनगी बना जीब। यएह अंतिम बात अछि। पुलकित एकटा कनियाँ ताकह। तेसर दृश्य- तेतरी आ खजुरिया बिपरीत दिशासँ अबैत बाटपर भेँट। खजुिरया- फुल कतऽ दौड़ल जाइ छी। पएरपर पएर नै पड़ैए? तेतरी- की कहब फुल, देखियौ जे सूर्ज सिरपर आबि गेल, अखैन तक भानस नै चढ़ैलौं। अपने (पति) नहाइले गेल हेता भानस चढ़ेबे ने केलौं। खजुिरया- किअए ने अखैन तक भानस चढ़ेलौंहेँ? तेतरी- की पुछै छी फुल, (मुस्की दैत) रजकुमराकेँ देखियौ जे पहिलुका (विआही) बौह छोड़ि कऽ अबलट लगाकेँ चलि गेल छेलै जे ऐहेन पुरूखसँ खनदान नै बढ़त। जखैन ओ (रजकुमरा) चुमौन कऽ लेलक तखैन फेर घुरि कऽ अपने फुरने चलि आएल। खजुरिया- चलि एलै तँ राखि लिअ। जहिना अबलट लगा पड़ाएल जे ऐ पुरूखसँ खनदान नै बढ़तै तहिना कमाएत-खाएत अपन रहत। जखैन रहेक मन हेतै रहत जाइक मन हेतै जाएत। तइले एते मत्था-पच्ची करैक कोन जरूरत छै? तेतरी- जेहने खेलाड़ि मौगी छै तेहने रजकुमरा अपने अछि। हँसि-हँसि बजैत रहैए तँए बुझै छिऐ। नमरी अछि, नमरी। खजुरिया- ओइ पाछु अहाँक भानसक अबेर किअए भऽ गेल। झगड़ा ककरो आ काज छुटि गेल अहाँकेँ? तेतरी- नून आनए दोकान विदा भेलौं आकि हल्ला सुनलिऐ, भेल जे ककरो किछु भऽ गेलै। ससरि कऽ गेलौं तँ यएह रमा-कठोला देखलिऐ। ओही लटारममे लागि गेलौं। खजुरिया- फेर भेलै की? तेतरी- की हेतै। मन दुनूक लसिआएल बुझि पड़ल। मुदा हारल तँ दुनू अछि। लाजे लोक लगमे की बाजत तँए दुनू अनकर मन पतिअबै छै। अखैन जाए दिअ फुल। निचेनमे सब गप कहब। खजुरिया- भानस हेबे करतै मुदा अधा गप कहि कऽ छोड़ि देलिऐ। अखैनसँ पेटमे उनटैत-पुनटैत रहत। अनका पुरूख जकाँ कि हिनकर पुरूष छन्हि जे मुँह अलगौतनि? तेतरी- मुँह जे अलगौत से कोनो सपेत कऽ। कमा कऽ हाथमे आनि दै छथि मुदा नूनसँ हरैद धरि तँ हमरे जोरह पड़ैए। भरि दिन दौड़ैत-दौड़ैत तबाह रहै छी। खजुरिया- एकटा गप सुनलिऐहेँ? तेतरी- की? नै! खजुरिया- गाममे नै छेलखिन? तेतरी- गाममे कि कोनो एक्केटा गप चलैए जे सभ एक्के गप सुनत? रंग-विरंगक गप पुरवा-पछवा जकाँ सदिखन चैलते रहैए कि? खजुरिया- अखैन इहो अगुताएल छथि आ हमरो काज सभ अछि। कखनो निचेनमे दुनू फुल गप कऽ लेब। तेतरी- तोहुँ हद करै छह। आ जे बिसरि जा? खजुरिया- एहनो गप विसरल जाइए। तेतरी- हँ, तँ विसरल जाइए कि? आ जे अहूसँ निम्मन गप आबि जाए तँ हल्लुक गप लोक विसरिये जाइए किने? खजुरिया- हँ, बेस कहलथि। मुदा खरिआइर कऽ नै कहबनि। उपरे-झापरे कहि दै छिअनि। तेतरी- हँ, सएह कहह। खजुरिया- पढ़ि-लिखि कऽ तँ आरो लोक गाम घिनबैए। तेतरी- से की? खजुरिया- ऍंह, की कहबनि? तेतरी- नै-नै, कनी फरिया कऽ कहू। खजुरिया- बिपैत मासटर दोसर विआह करताह? तेतरी- तँ ई कोन बड़-भारी बात भेल। वेचाराक स्त्री मरि गेलनि भानस-भातमे दिक्कत होइत हेतनि। खजुिरया- ऍंह, एहिना बुझै छथिन। तेतरी- से की? खजुिरया- आइ जँ बेटा-बेटी नै रहितनि तखैन जँ करितथि तँ एकटा सोहनगर होइतै। जखैन बेटा-बेटी ढेरबा-जवान भेल तखैन किअए करै छथि। तेतरी- (मुँह बन्न केने) हूँ। खजुरिया- हमरा काकाकेँ देखलखिन। बेचारेकेँ तँ एक्केटा बेटी भेलनि आ काकी मरि गेलनि। कतबो लोक हिला-डोला कऽ रहि गेल तैयो मानलखिन। तेतरी- हँ, से तँ बेस कहलौं। तेतरी- (कनी काल चुप रहि) हूँ...। खजुरिया- भानसो भातक दिक्कत कि होइ छन्हि। अखैन हाथी सन माइयो छेबे करनि, बेटियो भानस करै जोकर भइये गेलनि तखैन किअए करै छथि। पुरूखक किरदानी बुझबै। तेतरी- अपने फुरने करै छथि आकि घरोक लोकक विचार छन्हि? खजुरिया- ऍंए, हद करै छी। अहाँ नै देखै छिऐ जे आबक बेटा-बेटी माए-बापसँ केहेन पुछै छै। तेतरी- से तँ ठीके कहै छी। मुदा सभ की एक्के-रंग होइए। हमरे घरबला छथि, मरैयौ बेर तक माइयेक कहलमे रहला। बेटो ने मनाही केलकनि। खजुरिया- बेटा कि मनाही करतनि। चुमौन कऽ कऽ कनी घर आबए दियौ तखैन ने हुरयाहा देखबै। जहिना बुढ़ीकेँ अतर-गुलाबसँ मालिश करतनि तहिना ने बेटो-बेटीकेँ टेमपर खाइले देतनि। तेतरी- सभ सतमाए की एक्के रंग होइए। ने सभ वियौहती नीके होइए आ ने सभ समदाही अधले होइए। पुरूखे की सभ एक्के रंग होइए? खजुिरया- हँ, से तँ बेस कहलौं। मुदा ओहिना नै ने लोक बजैए। तेतरी- से बाजह। गामेमे सोनमाकेँ देखै छिऐ। जहियासँ समदाही एलै तहियासँ घरमे लछमी आबि गेलै। से तँ मनुक्ख-मनुक्खपर छै। खजुरिया- मुदा नीके औतनि तेकर कोन बिसवास? तेतरी- से तँ ठीके। खजुिरया- मुदा..? तेतरी- मुदा की? यएह ने जे जेहेन परिवारक लोक रहत तेहने ने नवका मनुक्ख बनत। खजुिरया- ई की विपति मासटरकेँ बुझै छथिन? तेतरी- हम तँ नीके बुझै छिअनि। खजुरिया- घुइयाँ पुरूखक चालि यएह बुझथिन। मूड़ी गोंति कऽ चललासँ हेतनि। महकारी जकाँ पुरूख होइए। तरे-तर तना ने बिठुआ काटि लेतनि जे बुझबे ने करथिन। तेतरी- जाए दिऔ नीक की अधला अपना परिवारमे हेतनि तइसँ हमरा-हिनका की? खजुिरया- हमरा की? एना किअए बजै छी। गाम की हमर नै छी जे जेकरा जे मन फुड़तै से करत आ टुटुर-टुटुर देखैत रहब। तेतरी- अनकर झगड़ा मोल लेब। खजुरिया- किअए ने लेब? झगड़ाक डर करब तँ एक्को दिन गाममे बास हएत। तेतरी- (आँखि उठा कऽ ऊपर दिस देख) बड़ अबेर भऽ गेल। आइ बात-कथा सुनबे करब। खजुरिया- एकटा बात तँ कहबे ने केलिएनि? तेतरी- की? खजुरिया- ढोरबा फेर चुमौन केलकहेँ। तेतरी- ओकरा तँ मारे धियो-पुतो आ घरोवाली छइहे? खजुरिया- (विहुँसैत) छठम छऐ। तेतरी- निरलज्जा-निरलज्जी सभ सभ उठा कऽ पीब नेने अछि। जहिना पुरूखक धनमंडल अछि तहिना मौगीक। एकरा सभले रौदी-दाही अबिते अछि। चारिम दृश्य- (चिन्तामणिक दरबज्जा) चिन्तामणि- (स्वयं) हे भगवान अधमरू जिनगीमे किअए फँसौने छी। अइसँ नीक जे मौगैत दिअ। आशाकेँ जते हृदएसँ लगबए चाहैत छी ओते ओ पिछड़ि-पिछड़ि हटैत जाइए आ जिनगीकेँ अन्हार बनौने जाइए। अपनो भ्रम भेल जे आशा-निराशा (अन्हार-इजोत) केँ शब्दकोषक शब्द मात्र बुझलिऐ। मुदा आइ बुझि रहल छी जे खाली शब्दकोषेक शब्द नै जिनगी छी। एते दिन माइयो बापक उत्तरी गरदनिमे लटकने घर-घरारी उपटैत छल मुदा आब तेसरो उत्तरी लटकए लगल। खाइर, जे जिनगी देलह ओ तँ भोगबे करब। मुदा मरैयो बेर तक माछी जकाँ नाकपर नै बैसऽ देब। जाधरि (जाबे आँखि तकै छी तकै छी बन्न हएत-हएत) (पुलकितक प्रवेश) चिन्तामणि- अहाँ के छी, किनकासँ काज अछि? पुलकित- आदर्श स्कूलक चपरासी छी, बुद्धिधारी बाबू पठौलनि अछि। चिन्तामणि- (आँखि ऊपर उठबैत) के....। बुद्धिधारी बाबू। आदर्श स्कूलक शिक्षक। ओ तँ हमरा नै जनैत छथि, फेर.....। पुलकित- पता चललनि जे चिन्तामणि बाबूकेँ कन्या छन्हि। जँ ओ कन्याक विआह विपति बाबूक संग करए चाहथि तँ....? चिन्तामणि- विपति बाबू...। पुलकित- हँ-हँ। ओहो सहयोगिएक रूपमे काज करै छथि। चिन्तामणि- ओ अविवाहिते छथि। पुलकित- नै। पत्नी मरि गेलखिन। दोहरा कऽ करताह। चिन्तामणि- (व्यग्र होइत) दोहरा कऽ करताह। सौतीनक तर तँ नै भेल। मुदा दोती बरसँ कुमारि कन्याक िवआह....। की अपन बेटीक भरि-भरि दिनक उपासक पूजाक फल भगवान यएह देलखिन। मुदा उपाइये की? मृत्युकाल साधारण खढ़ोक आशा पाबि चुट्टी धारक धारामे उगैत-डूबैत जान बचाइये लैत अछि। आशा भेट रहल अछि। बाउ, उमेर कते छन्हि? पुलकित- हम दुनू गोरे एक बत्तरिये छी। घरो एक्केठीन अछि। (पुलकितकेँ निच्चासँ ऊपर माथ धरि निहारि-निहारि चिन्तामणि देखै छथि) चिन्तामणि- बालो-बच्चा छन्हि? पुलकित- हँ। एकटा बेटा एकटा बेटी छन्हि। चिन्तामणि- तखन दोहरा कऽ किअए विआह करताह? पुलकित- माए बूढ़े छन्हि, विआहक बाद बेटी सासुरे बसए लगतनि। नँउऐ-कौंउएे कऽ बचलनि बेटा। बेटो सभ तेहेन ढाठी धऽ लेलक जे ओइसँ नीक बेटिये। जे कमसँ कम पावनि-तिहारमे नै सनेस तँ वेनो पठेबे करैए। तँए जुगक अनुकूल अपन-अपन आशा बना जिनगी चलबैत रही। चिन्तामणि- नीक-नहाँति अहाँक बात नै बुझलौं? पुलकित- अपने पढ़ल-लिखल नै छी मुदा संगत पाबि किछु बुझल अछि। आगू बढ़ैक हाेड़मे समाज बिखंडित भऽ रहल अछि जइसँ गामक दशा दिनानुदिन गिरले जा रहल अछि। चिन्तामणि- (मूड़ी डोलबैत) हँ, से तँ भाइये रहल अछि। पुलकित- अहीं कहू जे किसान परिवारमे जन्म लेनिहार किसान बनैत छलाह। पूर्वजक लगौल फुलवाड़ीकेँ कोर-कमठौनक संग पानि ढारैत छलाह जइसँ समाजक हरीयरी बढ़ैत रहल। मुदा कल-कारखाना दिस घुसकि समाजक (गामक) घर खसा रहल अछि। एहेन स्थितिमे की कएल जाए। चिन्तामणि- बाउ, अहाँ चपरासी छी? पुलकित- हँ। मुदा विपति बाबूक लंगोटिया संगी सेहो छी। हमर माए-बाप गरीब छलाह, नै पढ़ौलनि। ओ (विपति बाबू) बी.ए. पास कऽ कऽ हाइ स्कूलमे शिक्षक बनलाह। मुदा बच्चेसँ जहिना रहलौं तहिना अखनो छी। चिन्तामणि- बेटा नै बेटी छी तँए जिनगीक प्रश्न अछि। ओना विअाह लेल डेग उठबैमे ने कोनो बाधा अछि आ ने संकोच। मुदा जते अधिकार हमरा अछि तइसँ मिसियो कम माएकेँ नै छन्हि। तँए डेग उठबैसँ पहिने हुनको पूछि लेब जरूरी अछि। (जोरसँ) कतऽ छी कनी सुनि लिअ? (सावित्रीक प्रवेश) सावित्री- की कहलौं? चिन्तामणि- (मुस्कुराइत) तीन सालक चिन्ता हेट भऽ रहल अछि। सावित्री- (विहुँसैत) से की? से की? चिन्तामणि- गीताक विआहक सूहकार आएल अछि। कने बुझने-सुझने अबै छी। जँ किछु धएल-धड़ल विचार हुअए तँ अखने कहि िदअ। सावित्री- राखल जोगाएल विचार की रहत। पेटीमे राखल पुरान साड़ी जकाँ तरेतर सभ गुमसरि गेल। पहिरै जोकर नै रहल। मुदा तैयो तँ कहबे करब जे नोर बहबैत बेटी सरापे नै। चिन्तामणि- अहाँ अर्द्धांगिनी छी जेकर आड़िपर बेटा-बेटीक गाछ होइ छै। कोनो बात (विचार) जोर दऽ कऽ हँ नै कहाएब। अखन समए अछि तँए मनसँ विचार देब तखने डेग उठाएब। सावित्री- बरक विषएमे किछु कहि दिअ? पुलकित- शरीरसँ पूर्ण स्वस्थ, हाइ स्कूलमे शिक्षक छथि। धतपत तीस-पेंइतीसक अवस्था हेतनि। पहिल कनियाँ पैछला साल मरि गेलनि। तँए परिवारक लेल दोहरा कऽ विआह करब जरूरी छन्हि। सावित्री- नौकरी करै छथि, तहूमे शिक्षक छथि। ई तँ दीब बात भेल। जाधरि नोकरी करै छथि ताधरि तलब भेटतनि आ छुटलाक (रिटायर) उत्तर पेन्शन। (मुस्की दैत) पाँच कर अन्न आ पाँच हाथ वस्त्रक दुख गीताकेँ नै हएत। गामक नाओं कहू? पुलकित- धरमपुर। सावित्री- गामो तँ दुसैबला नहिये अछि। लगो अछि। जाबे जीब ताबे आवा-जाही रहबे करत। (पतिसँ) एक-दूटा बात विचारणीय अछि। चिन्तामणि- (व्यग्र) से की, से की? सावित्री- जहाँ धरि उमेरक बात अछि ओहो परमपराक अनुकूले अछि। राजा दशरथ तीनटा विआह केने रहथि। किअए केने छलाह? अही दुआरे ने जे पहिल कन्याँसँ सन्तान नै भेलनि। प्रश्न अछि जे सन्तानक प्रतीक्षामे दस वर्ष समए लगले हेतनि? चिन्तामणि- कने सोझरा कऽ कहियौ? सावित्री- सन्तान नै हेबाक घोषणा (िनर्णए) दस वर्ष पछातिये ने होइत छै। तै बीच तँ ओकर प्रतिकार होइ छै। जोग-टोनसँ लऽ कऽ दवाइ-विड़ोमे दस वर्ष लगिये जाइत अछि। चिन्तामणि- हँ, से तँ होइते अछि। सावित्री- पहिलसँ तेसर पत्नीक बीच पनरह-बीस बर्ख लगिये जाइत अछि। ऐ हिसावसँ लड़का (बर) उपयुक्त छथि। दोसर प्रश्न अछि दोसर पत्नीक। चिन्तामणि- हँ, से तँ अछिये। सावित्री- दोसर पत्नी तँ ओतऽ अधला होइत अछि जतऽ सौतीन बनि जिनगी चलैत। से तँ नहिये अछि। रहल बच्चाक सतमाए होएब? सासुक लेल तँ पुतोहूए हएत। चिन्तामणि- (मूड़ी डोलबैत) हँ, से तँ अछिये? सावित्री- ई तँ नीके भेल। चिन्तामणि- कोना? सावित्री- (हँसैत) जहिना गुरूसँ श्रेष्ठ सतगुरू होइत छथि तहिना। चिन्तामणि- नै बुझलौं? सावित्री- माएसँ श्रेष्ठ सतमाए ऐ लेल श्रेष्ठ होइत जे माए अपन (कोखिक) सन्तानक सेवा करैत (पालैत-पोसैत) जहन कि सतमाए दोसराकेँ। जँ आन बच्चाक सेवा अपन बच्चा सदृश्य कियो करैत तँ वएह ने सतमाए भेली। चिन्तामणि- मुदा.....? सावित्री- हँ। अपना समाजमे सतमाएकेँ सौतिनिया डाहक प्रतीक बुझल जाइत अछि। ठाम-ठीम अछियो। मुदा (सत-माए) सतमाए तँ ओ भेली जे अपने बच्चा जकाँ दोसरोक बच्चाकेँ बुझि सेवा करए। चिन्तामणि- (ठहाका मारि) आगू बढ़ै छी। अंतिम दृश्य- (चिन्तामणिकेँ पुलकित स्कूलक अग्नेयमे ठाढ़ कऽ विपति बाबू आ बुद्धिधारी बाबूकेँ बजा अनैत) चारू गोटे बैसल। बुद्धिधारी- अपनेक नाओं? चिन्तामणि- लोक चिन्तामणि कहैए। बुद्धिधारी- अपनेकेँ कन्या छथि? चिन्तामणि- हँ। बुद्धिधारी- (विपति बाबूकेँ देखबैत) यएह बर (लड़का) छथि। सहयोगी छथि। हिनक पत्नी पैछला साल मरि गेलखिन। बृद्ध माए आ दूटा बच्चा छन्हि। आब अपन विचार देल जाउ? चिन्तामणि- विद्यालयक आंगनमे बैसल छी तँए कहै छी। ओना हम बड़ गरीब छी। उनैस-बीस बर्खक बेटी अछि। तीन सालसँ विआहक बात मनमे नाचि रहल अछि मुदा कतौ नाकपर माछी नै बैस रहल अछि। बुद्धिधारी- अपनेकेँ एको-पाइ खर्च नै हएत। विपति बाबू कमाइ छथि। सब खर्च करताह। चिन्तामणि- केहेन बात बजै छी। ई कहू जे लाम-झामसँ बरिआती नै जाएत। मुदा अपना दरबज्जापर सँ बेटी जमाएकेँ पाँच हाथ नव वस्त्र पहिरा अरिआति कऽ विदा नै करब से केहेन हएत? बुद्धिधारी- जहन संबंध स्थापित कए रहल छी तहन भेद किअए? चिन्तामणि- जहिना आमक गाछकेँ दोसर गाछक डारिमे बान्हि कलम बनाओल जाइत अछि तहिना ने दू परिवार मिल बनैत अछि। मुदा दुनूक अपन-अपन गुण तँ रहिते अछि। बुद्धिधारी- नै बुझलौं? चिन्तामणि- हमर कन्या मिथिलाक ललना छी। एक बेर जै पुरूषसँ हाथ पकड़बैत अछि जिनगी भरि स्वामी, पति आ गुरूभक्त बनि सेवा करैत अछि। कहियो अपन सीमाक उल्लंघन नै करैत अछि। भलहिं राम सन बेटाकेँ पिता बनवास दऽ देलखिन मुदा कौशल्या बात कहाँ कटलकनि। बुद्धिधारी- से की? चिन्तामणि- यएह जे रामपर जते अधिकार पिता दशरथक छलनि तइसँ कम तँ माए कौशल्याक नै छलनि। मुदा कहाँ अपन अधिकारक प्रयोग केलनि। आँखि मुनि सुहकारि लेलकनि। बुद्धिधारी- (नमहर साँस छोड़ैत) विपति बाबूक परिवार अलग छन्हि। जेहने अपने छथि तेहने माए छथिन। दुनू बच्चा तँ गाइयोक बच्चासँ कोमन आ सुशील अछि। चिन्तामणि- भाग्य हमरा बेटीक जे लगौल फुलवाड़ीक माली बनि सेवा करत। अंतिम दृश्य, मिथिलाक विआहक। समाप्त। २ बेचन ठाकुर बेटीक अपमान केर अंतिम दृश्य- दृश्य- आठम (स्थान- दीपक चौधरीक आवास। गोपालक विआहक तैय्यारी पूर्ण भए गेल अछि। जयामालाक मंच सजल-धजल अछि। दीपक आओर प्रदीप जयमाला-मंचक लगमे राखल कुर्सीपर बैस कऽ गप-सप्प करैत छथि।) प्रदीप : दीपक बाबू, सुनलौं अनरीतक रीत। ठीके गप छी की? दीपक : बिल्कूल ठीक अछि। हम की कए सकै छलौं? मनुष्य परिस्थितिक दास थिकै। प्रदीप : हँ, ई बात तँ सदा सत्य अछि जे समए किनको नै छोड़लनि आ नै छोड़त। खाइर होनीकेँ कियो नै रोकि सकैछ। दीपक बाबू, एखन धरि बलवीर बाबू बरयाती लऽ कऽ नै एलाह। दीपक : अबिते हेताह। बेसी बिलंब करताह तहन बसिऔरा खेताह। (बैंड पार्टीक आवाज सुनि) प्रदीप बाबू, बरआती आबि रहल अिछ। ऐ बीच हम नश्ता-पानि सरिया लै छी। प्रदीप : बेस जाउ। जल्दी करू। (दीपक प्रस्थान करैत छथि। बलवीरक प्रवेश बरिआतीक संग। बरआतीमे संजू लड़िकी छथिन्ह। आअोर गंगाराम, चन्देश्वर ओ हरेराम छथिन्ह। सभ बरिआती कुर्सीपर बैसैत छथि। मोहन ओ सोहन बरिआती बरिआतीकेँ नश्ता-चाह-पान करबैत छै। लड़िका गोपालक जयमाला कराबए अबैत छथि। लड़िकीकेँ चुमा कऽ जयमालाक जोगार करै छथि।) बलवीर : दीपक बाबू, बस करू। ऐसँ आगू जुनि बढ़ू (बिगैर कऽ) (सभ रूकि जाइ छथि।) प्रदीप : किअए नै बिगरब? नगद गिनलथि दीपक बाबू। सवा लाख टाका अखन गिनथु तहन जयमाला करताह। प्रदीप : दीपक बाबू, पहिने बलवीर बाबूकेँ नगद गिनु तहन जयमाला करब। (जयमाला छोड़ि दीपक अन्दरसँ सवालाख टाका आनि बलवीर बाबूकेँ गिनि कऽ दै छथिन्ह। बलवीर रूपैआ लऽ कऽ प्रसन्न छथि।) बलवीर : हँ, आब अपने सभ जयमाला करू। (सभ कियो जयमाला करबै छथि। पहिने लड़िका लड़िकीकेँ जयमाला पहिरौलन्हि। जोरदार तालीक गदगड़ाहटि भेल। लड़िकीबला बिस्कुट चकलेट लुटेलन्हि। लड़िका-लड़िकी मंचपर बैसल छथि। वातावरण बिल्कुल शांत अछि।) समधि, घरपर पार्टीक व्यवस्था पूर्ण भए गेल अछि। यथाशीध्र हमरा लोकनिक विदाइ कऽ दिअ। हमरा लोकनिक िनयम अछि जे लड़िकी-लड़िकीक घर जएताह। फेर एक सप्ताह बाद लड़िका-लड़िकी अहाँक घर आबि स्थायी रूपसँ रहतथि। हरेराम : दीपक बाबू, जल्दी समधी-मिलान कए लिअ। दीपक : सरकार, जे जेना विचार। हरेराम : बलवीर बाबू, जल्दी समधी-मिलन करू। (बलवीर आ दीपक गरदनि मिलि कऽ समधी मिलन कएलन्हि। समधी मिलनमे बलवीर दीपककेँ पच्चीस हजार टाका दै छथिन। बरिआतीक संग लड़िका-लड़िकीक प्रस्थान। आपसमे नमस्का-पाती होइत छन्हि।) पटाक्षेप दृश्य- नवम (स्थान- दीपक चौधरीक आवास। दीपक चौधरी, मोहन चौधरी, मंजू, सोहन चौधरी व शालिनी मंचपर उपस्थित छथि। दीपकक हालत बड्ड गड़बड़ अछि। खोंखी करैत-करैत मरनासन भए जाइत छथि। अन्त कालमे दुनू बेटा-पुतौह हिनक सेवा-सत्कारमे लागल छथि।) दीपक : आइ बुझाए रहल अछि जे हम स्वर्गमे छी। मुदा एहेन पहिने रहितए तँ हमरा चिन्ता नै खैताए। चिन्ते हमर बेमारीकेँ ओते बढ़ाओलक। कहबी ठीके अछि- जे तुकपर नै से कथीदनपर। (खोंखी करैत-करैत बेदम भऽ जाइत छथि।) मंजू : (मोहनसँ) स्वामी, बाबू जीक हालत बड़ खराब छन्हि। जल्दी डाकदरकेँ बजाउ। मोहन : हम अपन बापक हमहीटा बेटा थिकहुँ की? साेहन बाबूकेँ कहिऔन, गोपाल बाबूकेँ कहिऔन। शालिनी : (सोहनसँ) स्वामी, अहीं डाकदरकेँ देखिऔन। सोहन : अहीं देखिऔन ने, बड़ दयालु थिकहुँ तँ। हिस्सा लेताह सभ बराबर-बराबर आ डाकदरकेँ देखिऔ हमहींटा। दीपक : बुझलौं-बुझलौं। अहाँ दुनू भए केहन पितृभक्त थिकहुँ? लोककेँ देखबैबला सेवा कए रहल छी जे हिस्सा कम नै भेटए। अहाँ दुनू भाँइसँ चिक्कन स्वभाव दुनू पुतौह जनीकेँ देख रहल छिअन्हि। मोहन आ सोहन, आब हम नै बाँचब। कने छोटका बेटा आ पुतौहकेँ मुँह देखाए दिअ। मोहन : सोहन, कने गोपाल दुनू परानीकेँ बजाए आनहुन। सोहन : भाइजी, हमरा देखल नै अछि। जदि अपने चलि जइतौं तहन बढ़िया रहितैक। मोहन : बौआ, हमरो नै देखल अछि गोपालक ससुरारि। ओना एक-दू दिनमे गोपाल दुनू परानीक अबैया अछिए। घबरेबाक कोनो काज नै। (दीपक खाेंखी करैत-करैत काफी हकमि रहल छथि) दीपक : आह! ओह!! आब नै बाँचब। छोटका बेटा पुतौहुक मुँह शायद नै देख पाएब। आह! ओह!! आह!! मोहन : बाबू, बाबू, अहाँकेँ की हएत की नै। कतौ किछु धएने-उसारने छी, से हमरा लोकनिकेँ बताए दिअ। दीपक : बौआ सभ, धएल-उसारल तँ किछु नै छौ। मुदा तोरा सबहक बिआहक करजा हमरासँ अदऍं कएल नै भेल। अहीं सभ अदाए कए देब। करजा हम महावीर मालिकसँ लेने छी। मुरि डेढ़ लाख अछि आ सूिदक दर प्रतिशत मासिक अछि। वएह करजा हमरा जान लाए रहल अछि। अहाँ सभ करजा सधेनाइ नै बिसरब। हमर सेवा अहाँ सभ करी वा नै। मोहन : अहाँ पागल कुकुर छी। अहाँक सेवा केनाइ धोर पाप अछि। हमरा सबहक कप्पारपर बड़का बोझ लादि कऽ मरि रहल छी। मंजु : स्वामी, एना बेहोश नै होउ। मोहन: ऐ छोंकरी, होशमे तों रह। गूड़क मारि धोकरा जानत की तों जानमें। सोहन : भैया ठीक कहै छथि एहेन बापकेँ। शालिनी : स्वामी, अहुँ सएह निकललौं बुधियार। सोहन : ऐ बुधयार बापक बेटी, अखन मारैत-मारैत बुढ़बे संग विदा कए देबौ। शालिनी : हँ हँ, किएक नै। अहाँ सनक बुधयारपर कोन भरोस? जे बाबाजी बापकेँ नै देखलनि। दीपक : (खोंखी कऽ) अहाँ सभ एना किअए करै जाइ छी। किनको मानवता नहि अछि। हमरा अहाँ सभ पागल कुकुर कहै छी। अहुँ सभकेँ एक दिन एहेन आओत जइमे अहुँ सभ सुगर भए सकैत छी। बेटा सबहक खातिर हम की की नै केलौं। आ से बेटा आइ हमरा पागल कुकुर कहैत छथि। बेटा सबहक खातिर हम कतेको बेटीकेँ नाश कए देलौं जे बेटा सबहक संपतिमे कोनो घटबी नै होइ। मोहन : अहाँ ठीके कुकुर छी। कुकर्मक फल भोगहि पड़त। बबाजी बनलासँ किछु नै हएत। अहाँ लोभी कुक्कुर छी। दीपक : हँ हँ, जरि-मरि कऽ तोरा सभकेँ एत्तेकटा कए देलिऔ, तेकरे फल हमरा भेटैत अछि। (खोंखी करैत-करैत बेदम छथि। दुनू पुतौह लगमे बैसल छथि आ दुनू बेटा दूरमे बैसल छथि।) आह! आब नै बाँचब। ओह! हे भगवान, आब लऽ चलू। आह! ओहो! आह! आह! (प्रदीपक प्रवेश) प्रदीप : दीपक बाबू, की भए रहल अछि? दीपक : आब नै पुछु सर। आब ऐ दुनियासँ जाए दिअ। प्रदीप : किएक, बेटा सभ इलाज नै करौलनि की? दीपक : ओ सभ हमर इलाज की करौताह? इलाजक बदला हमरा पागल कुक्कुर, लोभी कहैत छथि। कहलियन्हि छोटका बेटा-पुतौहुक मुँह देखए दे, सेहो नै। प्रदीप बाबू, अहाँकेँ मोवाइलमे बलवीर बाबूक नम्बर अछि की? प्रदीप : हँ अछि। हँ कहि दै छिअनि जे जदि अहाँकेँ समधिक मुँह देखबाक अछि तँ जल्दी आउ। आ बेटी-दमादकेँ सेहो लेने आउ। (प्रदीप आ बलवीर मोवाइलसँ गप करै छथि। किछु देर बाद बलवीर गोपाल आ संजूक प्रवेश।) बलवीर : की भए गेल समधि? दीपक : आह! ओह! आब हम जए रहल छी। हमरासँ जे किछु गलती भेल हुअए तकरा माफ करब। गोपाल : बाबूजी, हम कने डाकदरकेँ बजौने अबै छी। दीपक : आब नै बेटा, बेकारमे पाय पािनमे चलि जाएत। संजु : बाबूजी, जए दिऔन। जे होनी हेतै से हएत। अपन कर्त्तव्य करबाक चाही। दीपक : बेस जाउ गोपाल। मुदा फेदा नै हएत। (गोपाल डाक्टर प्रेमनाथ मेहताकेँ अनैत छथि। डाक्टर आला लगा कऽ चेक करैत छथि। आँखिमे टॉर्च बारि कऽ देखैत छथि।) प्रेमनाथ : अहाँक पेसेन्ट सम्हरैबला नै अछि। हिनका अहाँ सभ आगू लऽ जाउ। गोपाल : से हम आगूक व्यवस्था कए रहल छी। तत्काल अपनेसँ जे किछु बनि पड़ै से करियौक। प्रेमनाथ : बेस, हम कोशिश करै छी। (प्रेमनाथ पानिक बोतल टाङैत छथि बोतलमे सूइया-दवाइ दऽ कऽ पानि चढ़बै छथि।) दीपक : (कछमछाइत) आह! ओह! आह! बौआ सभ। प्रदीप : गोपाल, बाबूजी किछु कहै छथि। गोपाल : जी बाबू जी, दीपक : बौआ, तोहर माएक बेमारीबला आ तोरे सबहक विआहक करजा डेढ़ लाख मूइर महावीर मालिककेँ छन्हि, से अवस्स तीनू भाँइ सधाए देबनि आओर दहेज हेतु बेटाक लोभमे नै पड़ब। बेटी-बेटासँ कम नै होइत अछि। बेटा आ बेटी ऐ दुनियाँमे नै रहत तँ दुनियाँक संतुलन बिगरि जाएत। गर्भपातसँ पैघ कोनो पाप नै अछि। (बेटीक अपमान नै हेबाक चाही)- 3 (तीन बेर कहि दिपक दम तोड़ि दैत छथिन्ह।) प्रेमनाथ : आइ.एम.सॉरी। बेचारा चलि गेलाह दुनियासँ। (सभ कियो कानि रहल छथि। प्रेमनाथ ओ प्रदीपक प्रस्थान। पर्दा गिरैत अछि अन्दरसँ राम नाम सत्यक आवाज जोरसँ भए रहल अछि।) इति शुभम् १.सुमित आनन्द- शोध-पत्रिका- मैथिलीक लोकार्पण २. मुन्ना जी-अप्पन आंगनमे ठाढ़ आइ हम अपने घरकेँ ताकि रहल छी १ सुमित आनन्द शोध-पत्रिका मैथिलीक लोकार्पण विश्वविद्यालय मैथिली विभागक शोध-पत्रिका मैथिली-अंक-5 केर लोकार्पण दिनांक 31-01-11केँ ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालयक कुलपति डा. समरेन्द्र प्रताप सिंहक कर-कमलसँ विश्वविद्यालय मैथिली विभागमे भेल। ई शोध-पत्रिका दिसम्वर 2010 मे छपि चुकल छल किन्तु किछु अपरिहार्य कारणसँ लोकार्पणमे देरी भेल। एहि अवसरपर मैथिलीमे भाषण करैत कुलपति बजलाह जे प्रत्येक विभागसँ शोध-पत्रिका अवश्य प्रकाशित होअए तथा प्रत्येक शिक्षक वर्षमे कम सँ कम एकटा शोध-पत्र अवश्य छपाबथि। ओ ईहो कहलनि जे पी. जी. विभागक दायित्व मात्र अपनहि धरि सीमित नहि अछि अपितु एकर भूमिका सभ कॉलेजक अपन विषयक विभागक उत्थान आ विकासमे होयबाक चाही। एहि अवसरपर साहित्य अकादेमी,दिल्लीक पूर्व प्रतिनिधि डा. सुरेश्वर झा शिक्षकसँ नियमित वर्ग संचालन, शोध-कार्य करब आ करायब तथा पुस्तकालयमे समय देबाक हेतु कहलनि। साहित्य अकादेमी सम्मान प्राप्त डा. भीमनाथ झा शोध-पत्रिकाकेँ आओरो उत्कृष्ट बनयबाक हेतु अनेक मूल्यवान सुझाव देलनि। मैथिली अकादमी, पटनाक अध्यक्ष श्री कमला कान्त झा डा. जयकान्त मिश्रक पुस्तकालय एहि विभागकेँ उपहारस्वरूप भेटबापर प्रसन्नता व्यक्त कयलनि तथा कुलपतिसँ ओकर संरक्षणक हेतु आग्रह कयलनि। डा. वैद्यनाथ चौधरी ‘बैजू’ कुलपतिसँ आग्रह कयलनि जे विश्वविद्यालयसँ जे कोनो आमंत्रण पत्र जारी होअए ताहिमे एक पीठपर मैथिलीमे सेहो अंकित रहय। कार्यक्रक संचालन करैत डा. रमण झा विश्वविद्यालयक नीतिमे परिवर्तन कए अन्य विषयक प्रतिष्ठाक छात्रकेँ दोसर विषयमे पी. जी. करबाक अवसर देबाक आवश्यकतापर बल देलनि। विभागाध्यक्ष एवं सभाध्यक्ष डा. वीणा ठाकुर शिक्षकक बहाली नहि होयबाक कारण पी. जी. मे छात्रक कमी कहलनि। एहि अवसरपर डा. शशिनाथ झा सेहो अपन मूल्यवान विचार रखलनि। श्री सुमित आनन्दक गोसाउनिक गीत एवं स्वागत गीतसँ प्रारम्भ भेल समारोहमे डा. नीता झा, डा. विभूति आनन्द सहित अनेक विभागाध्यक्ष, अनेक पदाधिकारी, भारी संख्यामे षिक्षक एवं साहित्यकार लोकनि उपस्थित छलाह। समारोहक समापन डा. रमण झाक धन्यवाद ज्ञापनसँ भेल।
२ मुन्ना जी अप्पन आंगनमे ठाढ़ आइ हम अपने घरकेँ ताकि रहल छी। उपरोक्त पाँती युवा कवि मनोज कश्यप जीक गजलक अंश थिक। जे “मैथिली-बोजपुरी कविता उत्सव 2011”क अवसरपर 24 जनवरी 2011केँ दिल्लीक आइ.टी.ओ. स्थित आजाद भवनमे पढ़ल गेल छल। ऐ अवसरपर मैथिली-बोजपुरीक आठ-आठ (कुल सोलह) गोट कवि अपन रचना पाठ कयलनि। कविगोष्ठीक शुरोआत मैथिलीक युवा कवि श्री कुमार शैलेन्द्र जीक कविता पाठसँ भेल। श्री कुमार द्वारा पठित दु गोट कवितमे ‘चिट्ठी आ गाम’ बेशी प्रभावित केलक- इ मे कवि गामक विस्मृतिकेँ सेलफोनमे समाहित होइत आ थोड़वेमे गप्प के सिमटि जेवाक बाद गामक पिछला जीवन स्मरण मात्रे जीवाक सुन्दर व्याख्या केलनि- एक बानगी देखल जाओ- “आव गामेसँ चिट्ठी नहि अवैछ, सेलफोनेपर भऽ जाइछ गप्प। पहिने चिट्ठीमे गामक वर्णन होइत छलै आव सेलफोनपर होइत छैक कुशलक्षेम मात्र”। तकर पछाति गोटा गोटी सात गोट कवि अपन पद्य विधाक अनेको प्रकारक रचनाक पाठ केलनि। जाहिमे रविन्द्र लालदास पहिले सब बेर जकाँ अहू बेर ‘क्षणिका’, जकरा ओ तुरंत नामे लिखै-पढ़ै छथिकेँ सुनौलनि सबटा तुरंता मार्मिक आ प्रासंगिक छल मुदा श्रोताक सिरखारी देखि श्रोता गणक मानसिक परिपक्वता बेलरता छल। सब गप्पकेँ अर्थकेँ श्रोता देरीसँ बुझलक आ बुझबे नहि केलक। तकर पछाति ‘कुमार मनोज कश्यप’ अपन ‘गजल’ पढ़लनि जाहि माध्यमे ओ जिनगीक नव विहानकेँ तकवाक आ अपने आंगनमे पड़ौआ सन बनि जेवाक सटीक चित्रण केलनि- देखल जाओ इ पाँतीकेँ “धज्जी रातुक स्याह आँचरमे , अहलभोरकेँ ताकि रहल छी, अप्पन आंगनमे ठाढ़ आइ हम अपने घरकेँ ताकि रहल छी,, बेरा-बेरी प्रतिष्ठित, प्रौढ़ कवि सब अपन अपन रचना पाठ केलनि जाहिमे प्रमुख छलाह सुकांत सोम (पटना) राम लोचन ठाकुर (कोलकाता) प्रो. शेफालिका वर्मा दिल्ली। कार्यक्रम मनलग्गु कम आ त्रुटिगत वेशी देखाएल। पहिल बात जे इ अकादमीक स्थापने कालसँ चलि आबि रहल अछि जे पूर्ण स्थापित, समर्थ, सजग मैथिलीके शैशव, हाशियापर आ फुहड़पनक द्योतक भोजपुरी अपन अकादमीय आ मंपीय सामर्थे एकरा (मैथिली) गरोसि लैह। कखनो-कखनो तऽ दृऍष्टिगोचर होइछ जेना भोजपुरी मैथिलीकेँ काँचे घोटि एकरापर सवार भऽ जाइछ। जे अहू कार्यक्रममे पूर्णतः देखाएल। ओना अकादमीक सचिव श्री रविन्द्र श्रीवास्तव ‘परिचय दास’ जी दुनूक समन्वयनक वास्ते आंशिक आ असफल प्रयास करैत रहैत छथि। कविगणमे नवतुरक समिलताक बेगरता देखल गेल। कुल मिला कऽ सरकारी आयोजनक खानापुर्त्ति स्पष्ट परिलक्षित होइत रहल। इ कार्यक्रमक अध्यक्षता मैथिलीक प्रख्यात कवित्री शांति सुमन आ मंच संचालन भोजपुरी कवि रविन्द्र श्रीवास्तव उर्फ जुगानी भाइ केलनि। इ कार्यक्रमकेँ सरकारी तौरपर मजगुती देखल गेल दिल्ली सरकारक राजभाषा मंत्री डॉ. प्रो. किरण वालिया जीक उपस्थितिसँ। किएक तऽ हुनकर उपस्थितिक पछाति सचिव, संचालक आ किछु कविगण हुनकर स्वागतगाणक राग अलापैत एना देखल गेला जे किछु काल धरि इ आयोजन अकादमीक नहि कोनो विशेष राजनैतिक पार्टीक आयोजनक भ्रम जनमा देलक। बेगरता देखाएल ऐ सभसँ उबरबाक स्वतंत्र साहित्यिक माहौलक। ३. पद्य ३.१.चन्दन झा- की भऽ रहल अछि अपना गाममे ३.२.मोहन प्रसाद- आउ करी नव मिथिलाक निर्माण ३.३.गिरीश चन्द्र लाल ३.४.राजेश मोहन झा- कविता- माय मनाइन ३.५.नवीन कुमार "आशा" ३.६.जगदीश प्रसाद मंडल ३.७.१. राम विलास साहु- नींदिया बैरी भेल पहुना २. आनंद कुमार झा ३.८.१.रमाकान्त राय 'रमा'- सांझुक सांझे उपास२.संजय कुमार मण्डल- माघक जाड़ .. चन्दन झा पिता श्री मदन मोहन झा, बाबा- डॉ. उपेन्द्र नाथ झा, गाम- लोरिका, भाया-बेनीपट्टी (मधुबनी) की भऽ रहल अछि अपना गाममे की भऽ रहल अछि अपना गाममे सब बदलि रहल अछि सब गोटा गाम गाम छोड़ि नग्रक लेल दौगि रहल अछि शान्तिक त्याग कऽ हहारो दिस जा रहल अछि गामक छाछक बदला कोकाकोला बाजि रहल अछि चिट्ठी चौपातीक आब आस नै रहि गेल जहिया सँ आयल मोबाइल बात गजब भऽ गेल जहिया सँ चलल पश्चिमी बसात हवामे अश्लीलता भरि गेल आठ गजक साड़ीक बदला छः इंचक मिनी एस्कर्ट भऽ गेल जय गंगाक किनारपर साधु साधना चलए अब ओ गंगा किनार पापीक बसेरा भऽ गेल गामक झोपड़ी आब रंग बदलि रहल अछि झोपड़ी सँ पक्का मकान बनि रहल अछि गामक माटिमे आब ओ गमक नै रहि गेल आब चारो दिशासँ शराब महकि रहल अछि की भऽ रहल अछि गाममे ....(राधे ) मोहन प्रसाद आउ करी नव मिथिलाक निर्माण आउ करी नव मिथिलाक निर्माण करी संस्कारक दान बाँटी अनुभवक दान करी रोटीक दान आउ करी नव मिथिलाक निर्माण आउ करी नव मिथिलाक निर्माण करी संस्कारक दान बाँटी अनुभवक ज्ञान करी रोटीक दान कऽ रक्तक दान आउ करी नव मिथिलाक निर्माण बिलखि-बिलखि कानि रहल छै कमला कोसीक प्रवाह बहि रहल छै अन्हरियामे अन्हरा गेलै अछि आउ करी संस्कारक दान आउ करी नव मिथिलाक निर्माण बिन बरखा थलाह भेलै अछि बिन जाड़क थरथरा रहल अछि बहै जखन कखनो पछबा हृदए ओकर कपकपा रहल अछि आउ बाँटि अनुभवक दान आउ करी नव मिथिलाक निर्माण पेट पाँजरमे सटि रहल छै फाटल धोती लटकि रहल छै माघमे छठि जकाँ हाफि रहल अछि दूटा रोटी लेल जद्दोजहद कऽ रहल अछि आउ करी रोटीक दान आउ करी नव मिथिलाक निर्माण तन उधिया रहल छै पवनक झकझोर पीरा सहि-सहि पीअर झाम झिंझोर आब खसत तब खसत भीजल माटिक जड़ि एकटा दूटा के कही भरल बीमारीक घर खून बनल छै मदिराक पानिसँ आउ दियौ जीवनदान अपन रक्तक दान मान बढ़ाउ करि कऽ सभ संभव महादान आउ करी नव भारत निर्माण कोनो जाति नै कोनो पाति नै आत्मा तँ अजर अछि अमर अछि सभ जीवन एक्के छी सभक सम्मान करू आउ नव मिथिलाक निर्माण करू गिरीश चन्द्र लाल गिरीश चन्द्र लाल , काठमांडू , नेपाल – गिरीश जी नेपालक सर्वोच्च न्यायालयमे न्यायाधीश छथि। १ शुभ प्रभात उदयाचल पर होइत अरुणिमाक आरोह आशा आर विश्वासक संग तन मन एवं जन जन मे पूर्व संचित अभिलाषाके साकार करक लेल भेल अछि स्वागत अछि हे शुभ प्रभात १ स्वागत अछि आहाँ हमर धरती पर नव प्राणक संचार हेतु अपन सभटा शुभेच्छा संग अयलहुँ स्वागत अछि । मुदा ई नहि बुमmव जे आबो अहाँक यात्रा निर्विघ्न चलबे करत समय केर धवल एवं कृष्ण पट किनको चल देलकैन्हि अछि निष्कन्टक ? बिसरि गेलहुँ किछुए दिन पहिलका इतिहास अहाँक अनन्त यात्राक क्रम मे किछुए दिन पहिले त राम अवतरित भेल छलाह वनबासक क्लेश पत्नीक अपमान आ कि कि नै सह पडलैन्हि । तहिना कृष्ण कतवो हँसला कतवो बजला मुरली पर गीत गौलैथ रथ पर गीता रचलैथ मुदा जखन एकटा शिकारीक गुलेटी पर यहि धरती सँ प्रयाण कयलैथ तखन हुनक सुदर्शन कत रहथीन ईशा जाहि शूली पर मसीहा बनलाह से त मोने होएत ओहि शूलीक रँग एखनो भटरंग नहि भेल अछि करवलाक शहीद त अँहाक नोरेमे छैथ तैं हे प्रभात । अहाँ सदिखन एहने शीतल आ निश्छल नहि रहव से जनितहुँ बुझितहुँ अँहाक यात्राक मंगल कामना कऽ रहलछी अँहा त निरन्तर अपन प्रिय प्रकाशक संग पूर्व सँ पश्चिम आ पश्चिम सँ पूर्व सतत चलैत हमरो धरती पर अयलहुँ स्वागत अछि हे शुभ प्रभात ! स्वागत अछि । २ मन मे भेल अछि भोर
मन मे भेल अछि भोर प्रभुजी । मन मे भेल अछि भोर । अर्पण अछि ई नोर प्रभुजी । अर्पण अछि ई नोर । नयन भेल छल पाथर पाथर । पथ हेरैत छल आखर आखर । शून्य हृदय मे प्रगट भेल अछि रुनमmुन रुनमmुन शोर । मन मे भेल अछि भोर प्रभुजी । मन मे भेल अछि भोर । चैन चैन के आस लगौने । सुख के मनसा मन मे धैने । चलैत चलैत हम श्रान्त भेल छी नहि अछि कोनो छोर । नहि अछि कोनो छोर प्रभुजी । नहि अछि कोनो छोर । अर्पण अछि ई नोर प्रभुजी । अर्पण अछि ई नोर । अयन अयन मे व्याप्त अहाँ छी । सभक अंगमे रंग जकाँ छी । पावि रहल नहि नयन हमर अछि अहाँक कोनो ओर । अहाँक कोनो ओर प्रभुजी । अहाँक कोनो ओर । मन मे भेल अछि भोर प्रभुजी । मन मे भेल अछि भोर ।
३ एक रंग अनेक रंग
एक रंग अनेक रंग रंगक ई खेल बुझैत बुझैत जिनगी सभक शेष भेल । ओर नहि छोर नहि कोरक कोनो पोर नहि भेदक यहि खेल मे साँझ नहि भोर नहि एक रंग सभक संग सभक संग एक रंग एक रुप अनेक रुप एक एक भेल । एक रंग अनेक रंग................... धरती अछि नभक संग नभक अंग रंग रंग चलैत चलैत संग संग मनक तार भेल दंग भूतल आर सागर मे खेत आर रेत पर खोज नित नव नव प्रगट प्रगट भेल । एक रंग अनेक रंग ............... पूmल पर पात पर गाछ सभक हाथ पर बीजक परिवर्तन पर प्रकृतिक समर्थन पर एक फूल अनेक तुल तुल तुल धूल धूल धूल संग तुल मिलि फूल फूल भेल । एक रंग अनेक रंग.............. राजेश मोहन झा 'गुंजन' माय मनाइन अंग विभूति छन्हि जटाजूट छन्हि रहती कोना अपन अपर्णा खाइत धथूर भॉग छथि सदिखन की बुझता जगतक दु:खहणा पीटथि करेज माय मनाइन की भेल ई विधना केर लेखा औता नारद निश्चित पुछबनि बॅचलथि कन्ना भाग्यक रेखा बौराएल शिव बसहापर बैसल गिरिजा कन्ना रहती कैलाश- घर सखि हे हम कहियो नै देखलौं विचित्र वरिआती आ एहन बेछप्प बर चिन्ता जुनि करू माय मनाइन सकल सृष्टि छन्हि ठाम आ गाम अखिल भुवनक सध: छथि स्वामी क्षण कैलाश क्षण भक्तक धाम भाग्यवती छथि हमर अपर्णा कहलनि हिमराज भूदेव भवानी संग बसहापर बैसल चलला सभगण संग महादेव। नवीन कुमार "आशा" (१९८७- ) पिता श्री गंगानाथ झा, माता श्रीमति विनीता झा। गाम- धानेरामपुर, पोस्ट- लोहना रोड, जिला- दरभंगा। नै बिसरलौं चारि साल केना बिसरी ओ चारि साल जे बुनने छल एकटा जाल बदलि देलक जीवनक परिभाषा कतो नै छल एकटा आशा देखने छलौं एकटा सपना पढ़ी-लिखी शहरमे बनब एकटा अफसर छल हमर ई अभिलाषा जे बनि गेल छल निराशा आइ ओ दिन नै बिसरल ओ मनमे रचल बसल जखन केने छलौं फेल सभ कियो हाथो हाथ लेल सभ ठाम होइ अपमानित किए नै होइत सम्मानित मुदा सुनि कऽ मन करी शान्त फेर राखी दिलपर हाथ ओतएसँ आएल अवाज बौआ जँ तूँ केले फेल नै बुझ छुटि गेल रेल फेर देखा देलक पथ जइसँ आस निर्गत फेर देखा देलक किरण आ करऽ लगलौं विचरण केना बिसरी ओ चारि साल जे बुनने छल एकटा जाल केना बिसरी हम ओ दिन जकरा कटलौं गिन-गिन-गिन-गिन जखन जाइ कोनो गाम लोक जिनाइ करए हराम किए नै आइ बनल अफसर किए नै घुमी शहर किए नै पाबी सम्मान पर नै बिसरलौं चारि साल केना... जगदीश प्रसाद मण्डल- कविता/ गीत संगी संगे-संगे एलौं संगिया मरि गेल हम भुतिआइ छी। संगे अबैत मिल ठेसिया गेलौं बाट संगिया छुटि गेल। अचेत भऽ पूव मुहेँ पथराएल नयन निष्प्राण बाटे लसिया गेल। आगूसँ पाछु नोचि खाइले प्राण मर्ड़ाइत रहैए। कोइ भुतिया बना बाट तँ कोइ बहटि-बहटि पेटे विलाइए। कोइ खुनि निरमा नव बाट-घाट तँ कोइ घाटे बौआइए। पिछड़ि-पिछड़ि खसि लतखुरदन बनल छी चारू कात घुरि-घुरि टुक-टुक देखै छी चौदहो भुवनक बाट चलैत चौदहो दिस कोन बाट पकड़ि देखब चौदहो दिस। झगड़ा भाँग पीब भकुआ शिव चुप भऽ बैसला आसन धो-धा सिलौट-लोढ़ी पार्वती लेलनि चढ़ा। लग आबि पाँजर बैसते बीन-बिन्नी उठलनि मन नजरि उठा देखते कड़कि बजलनि मन सिहरि छाती डोलिते थर-थर कपलनि तन कलपैत मन खिसया अधे-छिधे पुछल प्रश्न- “अहाँ कहू केकर छी प्रेमी गंगा आकि अपन। सिर सजौने छी गंगाकेँ पतिअबै छी हमरा। पुरूखक कोनो ठेकान नै बुझि पड़ैए हमरा।” कनखिया शिवजी बजलाह- “भावक लेल प्रश्न भावसँ उठाउ सदिखन आगू। चिन्मय रूप समेट हृदए बढ़ाउ डेग सदि आगू।” आदरणीय भाय, श्री राजनन्दन लाल दासक अठहतरीम जन्म दिनपर.... गंगावन्दना- जुग-जुग आस लगौने मइये शीत-रौद चटैत एलौं लुप्त भेल नयन-ज्योति। हे मइये... रेगहा टा जपैत एलौं। गंगाजलीमे नीर बोझि सिक्त करब दसो दुआरि। आंगन-घरक संग-संग नीपब गोसौनिक चौपाड़ि। हे मइये... हँसैत, गबैत, नचैत, भसैत पहुँचब तोर दुआर मुदा फँसि मकड़जालमे बरिसैत सदैत नोर। हे मइये... दसो दिशा अछि घेराएल अकास बहैत देखै छी मुदा ससरि गेल भूमा कानि-कानि भजै छी। हे मइये... विषधरक बीख सुति उठि निकलिते आंगन लप दे धेलक विषधर। तड़बाक बीख मगज चढ़िते लटुआ खसलौं पेराक पार जखने देखलक पहिने जौहरी छाती पीट-पीटि फुकलक शंख अवाज सुनि कुत्ता अकानि भूकि-भूकि जोड़लक संख। अचेत देख जौहरी बाजल झब दे आउ चटधारी। मरि गेल बाटे विषधर बगदल यात्रा (सगुन) चटधारी। नै उतड़ल बीख चटिऔने तैयो बँचल छै प्राण। बपहारिक संग बेथा गाबि कहिया हेतै प्रेमीक त्राण। फुलबाड़ी लुरि-बुइधिक कृत्य फुलबाड़ी दिनो-दिन ऐलसाइ छै। फुनगी चढ़ि कलैप कुहरि पीतर डिरिआइ छै। मृत्युसज्जा सजल धरती झल-अन्हार बजैत छै। रेहे-रेह रोग सन्हिआ मुसरा सड़ैत छै। धरतीक बेथा सुनि अपराजित फानि-फािन फुफुआइ छै। कर्म-धर्मक डाकैन दऽ दऽ सदए मुस्किआइ छै। तैयो दाकक सुरसुरी पाबि पट-पट छिकाइ छै। घाम चुबा, डोल भरि-भरि सिक्त करैत एलौं संगे-संग रभसि-रभसि सुरताल मिलबैत एलौं। जहिना हँसैत-खेलैत रहलौं तहिना रहब सभदिन। संगे जीब मरब संगे मिल हृदए विराजत थीर। भुतहा गाछ चित्र-विचित्र वस्त्रसँ सज्जित झोंझगर बगए बनौने छातीक रस्सी लटका-लटका गोरा रोपने मनमे। अन्हार पाबि चतड़-चतैड़ छुलक धरती ओ अकास खट-मधुर बीआ छिट-छिट जनमल चक-चक प्रकाश। झरहा बीआ पकड़ि चालि अन्हार सेबलक भूत। चिकड़ि-चिकड़ि गर्द करए माँ-देवीक यमदूत। मंत्रक दुहाइ दैत मनतरिया छुबिते छुटत भूत। सजा-सजा डाली भरू दुबि-तुलसी-अच्छत मनतर पाबि-पाबि भूतलग्गू बेसूध भऽ बौड़ा गेल। बाट हेराएल, विचार हेराएल हेराएल जिनगीक सुख। चारू दिस झपटि-झपटि मनक बढ़ाओल भुख। जाबे भुतहा गाछ नै खसतै जोगीक जीवन बलाए। भोगक स्वर्ग नचैत रहतै जोगी-जोग रहत नुकाए। सरस्वती पूजाक शुभ अवसरपर अपनेकेँ समर्पित- बोनक आगि गाछ-बिरीछक रग्गड़सँ लुत्ती छिटकै छै बोनमे। सुखल पात ठौहरी पकड़ि पसरै छै सघन बोनमे। धधड़ा धधकैसँ पहिने करिया धुआँ पसरे छै लगैत आँखि अश्रु करूआइते जीव-जन्तु पड़ाइ छै। आगिक डर केकरा ने होइ छै चाहे बाघ हो आकि हाथी मुदा, धीरजसँ जे सहैत.....। सएह कहै छी यौ भाय साथी। १. राम विलास साहु- नींदिया बैरी भेल पहुना २. आनंद कुमार झा १ राम विलास साहु कविता- नींदिया बैरी भेल पहुना नींदिया बैरी भेल पहुना वाली उमर हमर भेल गौना हमरा अहाँ किएक बिसरलौं अहिना चिट्ठिया-पतिया बहुतों भेजलौं एको नै धुमेलौं सनेस कोन दोख हमर अछि पहुना कतैक फागुन बीत गेल अहिना सोलह बरख हमर उमरि बीतैए सजल पलंग हमर सुनाओ परड़-अए सभ दिन सजि-धजि अहाँक आशमे अपन आँखिक नोर बहबै छी मन पड़ैत अहाँले सोलह श्रंृगार करै छी रस्ता बहािर बाट अहाँक जोहै छी सुतल छी हम सजल पलंगपर अहाँक बिनु नीन्न नै भेल सोलहसँ अठरह बीत गेल बीस बरस तक ऑचर बान्हि हम अपन यौवन रखलौं सम्हारि धर्म सतीत्वक पालन करैत हम जिनगी बन्न बीतबे छी दिन-राति कोन बैरिनियाँ नजर लगेलक अहाँकेँ जे हमरासँ नजरि छिपौने छी अहाँक आशमे हम पहुना हमर जिनगी बितैए सुना-सुना पहुना कत्तैक दिन जिनगी बिताएब अहिना निंदिया बैरी भेल पहुना....। २ आनंद कुमार झा १. मिथिलाक नवयुवक कने नींदसँ जागू माँ मैथिली कुहैर रहल छैथ जुनी आहाँ आव भागू जनक धाम सीता के धरती फाटल दरारि लागैत अछि परती आखिकं नोर बनल अछि शोणित किछ बढ़ी’क आब बाजू माँ मैथिली कुहैर रहल छैथ जुनी आहाँ आव भागू की मिथिला के खून में दोषर प्रान्त सन गर्मी नई छै मिथिला के इतिहास रचब कोनों बेशर्मी नई छै चलू एक बेर प्रगतिक झंडा ल क बढू ने आगू माँ मैथिलि कुहैर रहल छैथ जुनी आहाँ आव भागू सोचू सब जन किछ टाकाके खातिर भटिक रहल छी कोन आईग ई धधैक रहल छै, जाही में झुलैस रहल छी कतेक साल धीर सुतल रहब आब आलस्य के त्यागु माँ मैथिली कुहैर रहल छैथ जुनी आहाँ आव भागू
२. सब परा गेल गाम घर स सुन्न परल अछि दालान यो स्वर्ग स सुन्दर जे मिथिला छल बनी गेल उजरल मचान यो गेलें दुलरुआ बेटा तोहूँ परदेश , कोना बिसरी गेलें गाम रौ कानईत तकई छी बेटा भरी दिन बटबा, एहिना ने छूटी जाय प्राण रौ कोना बिसरी गेंलें गाम रौ ........................... .................... पुछई ये बहिनी तोहर सदिखन हमरा , भैय्या नै अबई छथीन गाम रौ कतई हरा गेल समां चकेबा, राखी भार्दुतिया बनी गेल आन रौ कोना बिसरी गेंलें गाम रौ ............................................................... ................... बीती गेल दुर्गा पूजा छैठो दिवाली, करय के छई आब कन्यादान रौ तों जा बसी गेलंय परदेश जा क, हमरा बना देलें आन रौ कोना बिसरी गेंलें गाम रौ.......................................................... .............. हमरा बिसरी गेलें तई ले ने कानी, क जो ने धरती के प्रणाम रौ बार पावनी छाई इ मिथिला के धरती, जतय बसई छाथीन भगवन रौ कोना बिसरी गेलें गाम रो कोना बिसरी गेलें गाम रौउ जय मिथिला जय मैथिलि जय मैथिल जय भारत जय हिंद ३. भटकि रहल छी तरपि रहल छी अपने के हम पटकी रहल छी नै बढ़ देब मिथिला के हम बाहर रही क चमैक रहल छी कत बिला गेल अप्पन भाषा अंग्रेजी फारसी संग बमैक रहल छी छोरु मिथिला के बात नै करू आनक भाषा के साथ नै छोरु लेकिन एक दिन मिथिले काज देत अतबे कहै ले चहैक रहल छी भटकी रहल छी ................................................ १.रमाकान्त राय 'रमा'- सांझुक सांझे उपास२.संजय कुमार मण्डल- माघक जाड़ १ रमाकान्त राय 'रमा', जन्म- भादो पूर्णिमा सम्वत् 2003, प्रथम रचना- बटुक, बाल मािसक प्रयाग, कथा विशेषांक द्वितीय भागमे 1964ई., प्रकाशित कृति-(क) तीिनटा बाबाजी-(रूसीसँ मैथिलीमे मैथिलीमे टाल्स्टायक कथाक अनुवाद-1967ई.मे, (ख) फूलपात कविता संग्रह 1978, (ग) भांगक गोला (2004 ई.मे), (घ) कटैत पाँखि : हँसैत आँखि , कथा संग्रह-2005, शीघ्र प्रकाश्य- कृष्णकान्त मिश्र (िवनिबन्ध) साहित्य अकादेमी नई दिल्ली।प्राय: डेढ़ सए रचना (कथा-निबन्ध कविता) मैथिली हिन्दीक पत्र-पत्रिका, आकाशवाणी एवं दूरदर्शनसँ प्रकाशित/ प्रसारित। साहित्य अकादेमी द्वारा आयोजित कवि सम्मेलनक आयोजनक क्रममे रेलक चपेटमे पड़ि दहिना पएर छाबा धरि गमा विकलांग।सेवा निवृत अध्यापक (उच्च विद्यालय) सम्पर्क- श्री रमानिवास, मानाराय टोल पो. नरहन (समस्तीपुर) बिहार विधानसभा चुनव-प्रचारपर कवि दृष्टि सांझुक सांझे उपास हुलकल छै गाममे हुड़रबा रे जकर जंगलमे वास तोड़लक सीमान सभ गिदरबा रे जकर लाॅखि धरती-अाकास सिहकै खन पुरिबा तँ लपटै खन पछिया नेरू बिनु गाए जेना काटै छै अहुड़िया गेल भैंस पानिये पड़रू समेत मुदा पानिये मांछ बॉटै नौ-नौटा गुड़िया फुटकै छै जहिना टिकुलिया रे लूटि फूलक सुवास हुलकल छै गाममे हुड़रबा रे जकर जंगलमे वास ओहिना फड़काबै छै बॉहि दुनू सुअमे दिन भरि भाट जकाँ भाभट पसारै छै करै झिकमझोरि चोरि रातुक निन्नमे शांत सोन चाेरबै सोनरबा रे फूँकि ठमकल विश्वास हुलकल छै गाममे हुड़रबा रे जकर जंगलमे वास हमहीं छी बाबा, परबाबा छी हमहीं टांगेपर सरङ जेना उठबै छै टिटही केओ कहै बौआ रौ हमहीं छी हौआ सभ सखि झुमरि खेलै लूल्ही कहए हमहीं सबहक धार छै बसुलबे रे कोना चतरत विश्वास हुलकल छै गाममे हुड़रबा रे जकर जंगलमे वास तोंही छह माए, बाप तोहीं सुगुनियाँ सेवक छी हम तँ चमका देबऽ दुनियाँ जागह भाय, दाइ, जागह दुलरूआ पॉच बरिसले तँ मांगै छी निनियाँ सुतबह तँ चरतह ढकरबा रे कोना लहरतै चास हुलकल छै गाममे हुड़रबा रे जकर जंगलमे वास हमरा लग मोर सन, तोरा लग तोर सन बाजब मधुर जे छल काल्हिए अङोर सन हम छी राजा मलिकबा रे सांझुक सांझ उपास हुलकल छै गाममे हुड़रबा रे जकर जंगलमे वास। २ संजय कुमार मण्डल कविता- माघक जाड़ कट-कट दाँत बजैए थरथर देह कँपैए सन-सन पछिया चलैए जेना देहकेँ छेदैए ओसक सघनता एहेन जेना वर्फ गिरैए एक माससँ सूर्यदेव नै उगलाह बुझना जाइछ ओहो जाड़सँ घर घुसलाह सरकारी उद्घोसना भेल कोट-कचहरी, स्कूल सभ बन्न क' देल गेल रोड-सड़क, गली-मोहल्ला सभ सुन्न भेल गाछक पातसँ टप-टप पानि चुबैए मनुक्खक कोन गप कुकुरो-बिलाड़ि नहिए बहराइए खड़-पतार, जारन-काठी सिमसि गेलैए लाख जतन करी धुआँ छोड़ि आगि नै पजरैए भनसा-भात, चुल्हा-चौकी सभ बन्न भेले अए मौसम वैज्ञानि घोषना भेलै- कश्मीरमे भीषण बारिस भेलै हजारो लोकक जान गेलै सेकड़ो ट्रक-गाड़ी-घोड़ाक आवागमन सड़कपर वर्फ जमलासँ बन्न भेलैए जे जहिना से तहिना ओइठाम जाम भेल ट्रक-बस, कार दुपहिया जेना वर्फ बनि जमि गेल बंगालक खाढ़ीसँ समुद्री तूफान उठलैए अस्सी मिलक रफ्तारसँ बढ़ि रहलैए गाछ-विरिछ झार-झंखार के पुछैए जे सोझा पड़ल ओकरे मोचरि खसबैए दैंत छी वा भूत-प्रेत नै जानि पड़ैए ई शीतलहरि कते जान लैत नै बुझि पड़ैए मंगला मचानेपर बैस सोचि रहल छै गाएक नेरू आ बकरीक पठरूक डाँड़ धेने छै तै बीच चारि वर्खक बेटा बेमार पड़ल छै कन्ना इलाज हएत कतए जाउ सोचि रहल छै जान बचेबा लेल बकरी बेचि कम्मल किनलकै दू सए टाका बचलै पेटक बुतात अनलकै मंगलाक हाथ खाली पड़ल छै के देत कर्जा ककरा लग जाउ किछुटा नै फुरै छै पहिनहिसँ महाजनक पाँच हजार कर्जा छै मूलधन छोड़ि ब्याज अलगे पड़ल छै गाए-बकरी पहिनहि बेच नेने छै घरवालीक हौसली बन्हकी धेने छै मंगला हिम्मत कए रहल छै घरसँ बहड़ेबाक साहस नै होइ छै इलाज बेगेर बेटा मरि जाएत मंगला हिम्मत बन्हलक हिम्मत बान्हि मंगला बच्चाकेँ उठौलक डाँड़सँ धोती खोलि बच्चाकेँ झँपलक सड़क पर अबिते पछिया मंगलाकेँ हौंकलक बुझना गेले मंगलाकेँ जेना ई हाड़ गलौलक कहुना-कहुना मंगला डाक्टर लग गेल बच्चाकेँ डाक्टर टेबुलपर राखि मंगला अचेत भेल बरबराइत बाजल- मालिक एकरा बचा लिऔ मजूरी क' पैसा चुकाएब एकरा प्राण दान दिऔ बजैत-बजैत मंगला एकबेर जोरसँ काँपल प्राण शरीर छोड़ि रस्ता स्वर्ग नापल डाक्टरकेँ मानवता जगलै बच्चाक इलाज नि:शुल्क केलकै सप्ताह दिनक दवाइ कीनि देलकै कफनक कपड़ा आ पाँच सए टाका द' मंगलाकेँ रिक्सापर झाँपि भेजबा देलकै तैयो ई जाड़ बच्चा-जवान आिक बूढ़ केकरो किछु नै बुझलकै। विदेह नूतन अंक मिथिला कला संगीत १.श्वेता झा चौधरी २.ज्योति सुनीत चौधरी ३.श्वेता झा (सिंगापुर) १ श्वेता झा चौधरी गाम सरिसव-पाही, ललित कला आ गृहविज्ञानमे स्नातक। मिथिला चित्रकलामे सर्टिफिकेट कोर्स। कला प्रदर्शिनी: एक्स.एल.आर.आइ., जमशेदपुरक सांस्कृतिक कार्यक्रम, ग्राम-श्री मेला जमशेदपुर, कला मन्दिर जमशेदपुर ( एक्जीवीशन आ वर्कशॉप)। कला सम्बन्धी कार्य: एन.आइ.टी. जमशेदपुरमे कला प्रतियोगितामे निर्णायकक रूपमे सहभागिता, २००२-०७ धरि बसेरा, जमशेदपुरमे कला-शिक्षक (मिथिला चित्रकला), वूमेन कॉलेज पुस्तकालय आ हॉटेल बूलेवार्ड लेल वाल-पेंटिंग। प्रतिष्ठित स्पॉन्सर: कॉरपोरेट कम्युनिकेशन्स, टिस्को; टी.एस.आर.डी.एस, टिस्को; ए.आइ.ए.डी.ए., स्टेट बैंक ऑफ इण्डिया, जमशेदपुर; विभिन्न व्यक्ति, हॉटेल, संगठन आ व्यक्तिगत कला संग्राहक। हॉबी: मिथिला चित्रकला, ललित कला, संगीत आ भानस-भात। २. ज्योति सुनीत चौधरी जन्म तिथि -३० दिसम्बर १९७८; जन्म स्थान -बेल्हवार, मधुबनी ; शिक्षा- स्वामी विवेकानन्द मिडिल स्कूल़ टिस्को साकची गर्ल्स हाई स्कूल़, मिसेज के एम पी एम इन्टर कालेज़, इन्दिरा गान्धी ओपन यूनिवर्सिटी, आइ सी डबल्यू ए आइ (कॉस्ट एकाउण्टेन्सी); निवास स्थान- लन्दन, यू.के.; पिता- श्री शुभंकर झा, ज़मशेदपुर; माता- श्रीमती सुधा झा, शिवीपट्टी। ज्योतिकेँwww.poetry.comसँ संपादकक चॉयस अवार्ड (अंग्रेजी पद्यक हेतु) भेटल छन्हि। हुनकर अंग्रेजी पद्य किछु दिन धरि www.poetrysoup.com केर मुख्य पृष्ठ पर सेहो रहल अछि। ज्योति मिथिला चित्रकलामे सेहो पारंगत छथि आ हिनकर मिथिला चित्रकलाक प्रदर्शनी ईलिंग आर्ट ग्रुप केर अंतर्गत ईलिंग ब्रॊडवे, लंडनमे प्रदर्शित कएल गेल अछि। कविता संग्रह ’अर्चिस्’ प्रकाशित। ३.श्वेता झा (सिंगापुर) विदेह नूतन अंक गद्य-पद्य भारती मोहनदास (दीर्घकथा):लेखक: उदय प्रकाश (मूल हिन्दीसँ मैथिलीमे अनुवाद विनीत उत्पल) उदय प्रकाश (१९५२- ) “मोहनदास”- हिन्दी दीर्घ कथाक लेखक उदय प्रकाशक जन्म १ जनवरी १९५२ ई. केँ भारतक मध्य प्रदेश राज्यक शहडोल संभागक अनूपपुर जिलाक गाम सीतापुरमे भेलन्हि। हुनकर हिन्दी पद्य-संग्रह सभ छन्हि: सुनो कारीगर, अबूतर कबूतर, रात में हारमोनियम, एक भाषा हुआ करती है। हिनकर हिन्दी गद्य-कथा सभ छन्हि: तिरिछ, और अन्त में प्रार्थना, पॉल गोमरा का स्कूटर, पीली छतरी वाली लड़की, दत्तात्रेय के दुख, अरेबा परेबा, मैंगोसिल, मोहनदास। मोहनदास- दीर्घकथा लेल हिनका साहित्य अकादेमी पुरस्कार २०१० (हिन्दी लेल) देल गेल अछि। अनुवादक: विनीत उत्पल (१९७८- ) आनंदपुरा, मधेपुरा। प्रारंभिक शिक्षासँ इंटर धरि मुंगेर जिला अंतर्गत रणगांव आ तारापुरमे। तिलकामांझी भागलपुर, विश्वविद्यालयसँ गणितमे बीएससी (आनर्स)। गुरू जम्भेश्वर विश्वविद्यालयसँ जनसंचारमे मास्टर डिग्री। भारतीय विद्या भवन, नई दिल्लीसँ अंगरेजी पत्रकारितामे स्नातकोत्तर डिप्लोमा। जामिया मिल्लिया इस्लामिया, नई दिल्लीसँ जनसंचार आ रचनात्मक लेखनमे स्नातकोत्तर डिप्लोमा। नेल्सन मंडेला सेंटर फॉर पीस एंड कनफ्लिक्ट रिजोल्यूशन, जामिया मिलिया इस्लामियाक पहिल बैचक छात्र भs सर्टिफिकेट प्राप्त। भारतीय विद्या भवनक फ्रेंच कोर्सक छात्र। आकाशवाणी भागलपुरसँ कविता पाठ, परिचर्चा आदि प्रसारित। देशक प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिका सभमे विभिन्न विषयपर स्वतंत्र लेखन। पत्रकारिता कैरियर- दैनिक भास्कर, इंदौर, रायपुर, दिल्ली प्रेस, दैनिक हिंदुस्तान, नई दिल्ली, फरीदाबाद, अकिंचन भारत, आगरा, देशबंधु, दिल्ली मे। एखन राष्ट्रीय सहारा, नोएडा मे वरिष्ट उपसंपादक। "हम पुछैत छी" मैथिली कविता संग्रह प्रकाशित। मोहनदास पोथीक आवरण चित्र मार्कूस फोरनेलक चित्रक उदय प्रकाश द्वारा रूपान्तरण। (उदय प्रकाश जीकेँ "विदेह" विनीत उत्पलकेँ "मोहनदास"क मैथिली अनुवादक अनुमति देबाक लेल धन्यवाद दैत अछि- गजेन्द्र ठाकुर- सम्पादक।) मोहनदास : उदय प्रकाश (मूल हिन्दीसँ मैथिलीमे अनुवाद विनीत उत्पल द्वारा) मोहनदास: तेसर खेप मोहनदासक नील रंगक जींसक पेंट आ चरिखाना बुश्शर्टक रंग उड़ि गेल छल आ ठामे-ठाम कस्तूरीक लगाएल चिप्पीसँ भरि गेल छल। काबा दास दिशा-मैदान करबे टा लेल खाटसँ उठैत छल मुदा जखन ओकर नैत-नातिन देवदास आ शारदा ओकरा लग रहतिऐ, ओकरा लागैत रहै जे ओकर देहक मरबठट्ठीमे प्राणे टा नै वरन ममता आ वात्सलताक रस लबालब भरल छै। देवदास अप्पन बब्बा काबाक खाटपर कूद-फान मचाबैत छल आ शारदा अप्पन आजी पुतलीक कोरामे छिड़ियाइत खेलाइत रहैत छल। ओइ दिन आंगनमे मोहनदास आ कस्तूरी बांस आ छींदीक पटिया, खोंभरी आ पथिया-पकउथी बनाबैमे लागल छल। बजारक मोहनलाल मारवाड़ीक दुकान "विंध्याचल हैंडीक्राफ्ट्स' सँ एतेक बड़का आर्डर भेटल छलै जे दू-तीन मास धरि मोहनदास आ कस्तूरीकेँ दम मारबाको फुरसति नै छलै। काबा आ पुतली बच्चा सभकेँ संम्हारने रहै। पचासटा पटिया, पचास टा खोंभरी आ तीसटा पकउथी बनाबैक रहै। काबा बीच-बीचमे अप्पन खाटसँ उतरि जाइत छल आ जखन धरि खोंखी ओकरा बेहाल नै कऽ दैत छलै, बाँस-कमची छीलहिमे ओ लागल रहैत छल। पुरान ईलम आ तर्जुबा छलै। कस्तूरी पटिया ओहिना बुनैत छल जेना ओकर आंगुरकेँ कोनो मशीन चला रहल होइ। साढ़े चारि बरखक देवदास खोंभरीकेँ माथपर लगा कऽ हाथमे बाँसक लाठी लऽ कऽ अढ़ाइ बरखक शारदाकेँ बकरी सन "अर्र अर्र...' करैत जा रहल छल आ छोट सन शारदा तरहत्थी आ ठेहुन भरे गुड़कैत बकरी बनल छल, आंगनक एक कोनसँ दोसर कोन धरि, खसैत-पड़ैत गुड़कि रहल छल। तखने दरवाजापर आहटि भेल। मोहनदासक साढू गोपाल दास अप्पन साइकिलकेँ देवालसँ अड़का कऽ भीतर आएल। ओ बजारक "नर्मदा टिंबर एंड फर्नीचर' मे आरा मशीन चलबैत छल आ मालिकक कहलापर ओसूली लेल साइकिलसँ एतए-ओतए जाइत रहैत छल। गोपालक आबैसँ कस्तूरी बड़ खुश भेल। कतेक दिन बाद ओकर नैहर लगक गामसँ कोनो पाहुन ओकर सासुर आएल छल। पानि-तमाखूक बाद गोपाल मोहनदासकेँ बतौलक जे एखन तीन दिन पहिने ओ ओरियंटल कोल माइंस कोनो काजसँ गेल छल। ओतए गेलापर ओकरा मालूम भेलै जे बिछिया टोलक बिसनाथ ओतए मोहनदासक नामसँ पछिला चारि बरखसँ डिपो सुपरवाइजरक नौकरी कऽ रहल अछि आ दस हजारसँ बेसी सभ मास दरमाहा लऽ रहल अछि। गोपालदास कहलक जे ओकरा पता लगलै जे बिसनाथक बाप नागेंद्रनाथ भर्ती दफ्तरक बाबूकेँ पटिया कऽ मोहनदासबला नोकरीक चिट्ठी अप्पन अवारा बेटा बिसनाथकेँ दऽ देलक। मोहनदास साक्षात्कारक दिन जे प्रमाणपत्र आ अंक-सूची जमा केने छल ओइमे मोहनदासक फोटो नै लागल छलै, एकर फाएदा उठा कऽ बिसनाथ अपनाकेँ मोहनदासक रूपमे प्रस्तुत कऽ देलक आ सभ ठाम अप्पन फोटो लगा कऽ अदालती हलफनामासँ लऽ कऽ गजेटेड अफसर धरि सँ ओकरा प्रमाणित करा लेलक। ऐ तरहे बिसनाथ ओरियंटल कोल माइंसमे मोहनदास बल्द काबा दास, जात कबीरपंथी विश्वकर्मा बनि कऽ निचेनसँ डिपो सुपरवाइजरक नोकरी करऽ लागल आ दस हजार मास दरमाहा लिअ लागल। गोपालदास कहलक जे ओ बिसनाथकेँ कोलियरी लग एकटा होटलमे चाह पिबैत देखने रहए, ओकर गरमे जे प्लास्टिकक आइ. कार्ड टांगल छलै ओइमे नाम तँ मोहनदासक छल मुदा फोटो बिसनाथक छल। एतबेटा नै ओकरा संग ओइ काल जतेक लोक छल ओ सभ ओकरा मोहनदासे कहि रहल छल। ओतए इहो पता लागल जे बिसनाथ अप्पन गाम बिछिया टोलामे रहब चारि सालसँ छोड़ि देने अछि आ आब ओरियंटल कोल माइंसक वर्कर्स कॉलोनी "लेनिन नगर' मे बाल-बच्चा संग रहि रहल अछि, जतए ओकर कनिया ब्याजपर टका देबाक धंधा करैत छै आ चिटफंड चलाबैत छै। मजाबला गप ई रहै जे लेनिन नगरमे रहैबला सभ गोटे बिसनाथकेँ मोहनदास आ ओकर कनिया अमिताकेँ कस्तूरी मैडम नामसँ जनैत छै। बिसनाथ मोहनदासे जना बी.ए. तँ छै नै, दसमा फेल छै, ताइसँ कोलियरीमे काज करबाक बदला अफसरक चापलूसी, कोयलाक तस्करी आ यूनियनबाजीमे लागल रहैत छै। अप्पन साढू गोपालदासक गप सुनि मोहनदासक माथ घुमि गेलै। एना कोना भऽ सकैत छै? कोनो लोक ओना कोना दोसर लोक बनि सकैत अछि? आ सेहो दिने-देखारे, सोझाँ-सोझी एना भऽ कऽ? एकाध दिनक लेल नै, पूरे चारि सालसँ? मुदा मोहनदास अप्पन गरीबी आ लचारीमे जेहन दिन देखले छल आ अप्पन बाप काबासँ ओ ओकर जिनगीक जे पुरान खिस्सा सुनने छल, ओइसँ ओकरा लागलै जे अफसर-हाकिम, धनीक-मनीक आ पार्टीबला लोक एतेक तागतिबला होइत अछि जे किछु नहि कऽ सकैत छी। ओ कुकुरकेँ बड़द, सुग्गरकेँ बाघ, खधाइकेँ पहाड़, चोरकेँ साहु- ककरो किछु बना सकैत अछि। मोहनदासँके अप्पन साँस रूकैत सन बुझाएल। हे सत् गुरु, केहन काल अछि जे चारि बरखमे एतए एक्को टा लोक एहन नै भेल जे कहि सकैत छल जे ओरियंटल कोल माइंसमे जे लोक मोहनदासक नामसँ सभ मास दस हजार दरमाहा लऽ रहल अछि ओ मोहनदास नै बिसनाथ अछि, जकर बापक नाम काबा नै नगेंद्रनाथ छिऐ, जकर कनियाँक नाम कस्तूरीबाइ नै अमिता भारद्वाज छिऐ आ जकर माए पुतलीबाइ नै, रेनुका देवी छिऐ?...जे पुरबनरा गामक नै बिछिया टोलक बसिन्दा अछि? जे बी.ए. पास नै दसमा फेल अछि...? ओइ दिन पटिया बुनैत-बुनैत मोहनदास बेर-बेर ठमकि जाइत छल। ओकर आँखि कतौ बिसरा जाइत छलै आ ओ किछु-किछु सोचैत गुम भऽ जाइत छल। बाँसक कमची बनबैत-बनबैत ओकर हाथ भसिया जाइत छल। एक बेर तँ कचियासँ ओकर हाथ कटैत-कटैत बचल। कस्तूरी सभ किछु देखि रहल छल आ अप्पन वरक भीतर चलि रहल उथल-पुथल आ बेचैनीकेँ नीकसँ बुझि रहल छल। ओ मोहनदासक हाथसँ कचिया लऽ लेलक आ कहलक, "आइ रौद किछु बेसिये छै। जाउ, अहाँ हाथ-मुँह धो कऽ कनी काल पटाय रहू।” अगिला भोर सात बजेबला बस पकड़ि मोहनदास ओरियंटल कोल माइंसक लेल बिदा भेल। राति भरि ओकरा नीकसँ नीन नै एलै। ठीक साढ़े दस बजे ओ कोलियरी पहुँचि गेल। दिक्कत ई छल जे ओ ओतए ककरासँ गप करितिऐय? केकरो तँ ओ जनैत नै छल? ऊपरसँ ओकर बगेबानी एहन छलै जे केकरो ई मानबामे दिक्कत होइतै जे असली मोहनदास वएह छी जे एम.जी. कॉलेजसँ बी.ए. फस्ट डिवीजन अछि आ आइसँ किछु बरख पहिने जकर फोटो अखबारमे छपल छल। दिक्कत ईहो छलै जे ओकरा लग ओ अखबार नै बचल छलै जइमे छपल अप्पन फोटो देखा कऽ ओ बता सकैत छल, "देखू, हमहीं छी मोहनदास, वल्द काबा दास, साकिन पुरबनरा, जिला अनूपपुर, मध्यप्रदेश जे एम.जी. शासकीय डिग्री कॉलेजसँ बी.ए.क परीक्षामे मात्र किछु बरख पहिने, फस्ट डिवीजनक संग मेरिटमे दोसर स्थान हासिल केने छल। चेहराक मिलान कऽ देखि लियौ। हमहीं छी असली मोहनदास।' बड़ मोश्किलसँ मोहनदासकेँ फाटकक भीतर आबऽ देल गेल। ओकर नील रंगक पैंट ठेहुन धरि फाटि गेल छल। पाछाँसँ घसा कऽ ओ जाफरी बनि गेल छल जतए कस्तूरी ओही रंगक चिप्पी साटि देने छलै, जे या तँ ओकर पुरना ब्लाउजमे सँ निकालल गेल छल या पुरना चद्दरिमे सँ। रौद, गुमार, ठंढी, कड़ाचूर मेहननि आ एतेक दिनुका भूख-पियास मोहनदासक चेहरा आ चामक रंगकेँ स्याह-पकिया बना देने छलै। दुख आ बिपति ओकर चेहरापर एतेक डड़ीर खेंचि देने छलै जे लागैत नै छल जे ओकर उमेर एखन चालीसकेँ पार नै केने अछि। जतेक बेर अप्पन अभावक बोझसँ ओ कुहरैत छल आकि अपमानक आगिमे चुपचाप लहकैत रहल, ओकर भौं आ हाथ-छातीक रोइयां उज्जर भेल गेल। तीस-पैंतीसक उमेरमे ओ पचास-पचपन सन लगैत छल। मोहनदास ओइ दफ्तरक आगू ठाढ़ छल जतए चारि बरख पहिने ओ अप्पन सभटा सर्टिफिकेट आ कागज जमा करै लेल गेल छल आ जतए काज करैबला बाबू भरोस देने रहैक जे अहाँक नाम तँ कहियो कटि नै सकैत अछि, किएकि लिखित आ शारीरिक परीक्षामे अहाँ सूचीमे सभसँ ऊपर छी। मोहनदास देखलक जे वएह बाबू ओइ कोठलीमे बैसल अछि, जकरासँ ओ पहिने भेँट करैत छल। ओकर कुर्सी पैघ भऽ गेल छलै आ आगूक टेबुल सेहो। ओकर पीठक पाछाँ ठाढ़ हवा फेकैबला ए.सी. लागल छलै। मोहनदास दरबज्जा लग ठाढ़ भऽ कऽ देखि रहल छल जे बाबू बिस्कुट खा आ चाह पीब रहल अछि आ ओकर आगूक कुर्सीपर दू गोटे बैसि कऽ आस्ते-आस्ते रकम-रकम गप कऽ रहल अछि। एकाएक बाबू ओकरा दिस देखलक तँ मोहनदास कल जोड़ि कऽ नमस्कार केलक आ पुरनका यादकेँ जगाबैक लेल ओकरा दिस देखि कऽ मुस्कुरायल। बाबूक माथपर जोर पड़ि गेलै। किंसाइत ओ ओकरा चीन्हि नै सकल। मोहनदास ओकरा दोबारा कल जोड़ि कऽ नमस्कार केलक आ बाजल, "साहब, हम मोहनदास...!' मुदा तखन धरि बाबू अप्पन मेजक नीचाँ लागल घंटीक स्विच दबा देलक। बड़ जोर कटाह सन खरखरायल अवाज भेल आ एकटा चपरासी दौगैत भीतर गेल। बाबू ओकरापर कनी बिगड़ल जे मोहनदास नै सुनि सकल। चपरासी आबि कऽ कोठलीक पर्दा खेंचि देलक आ मोहनदासकेँ माथसँ पएर धरि निङहारि कऽ कहलक, "की काज अछि? जाउ ओम्हर बैसू, ओसाराक ओइ ब्रेंचपर...! एम्हर कोना आएल छी?' मोहनदास ओकरा कहऽ चाहलक जे ओकर नाम मोहनदास छिऐ आ आइसँ चारि बरख पहिने ओ कोलियरीमे नोकरी लेल सलेक्ट भेल छल आ अप्पन सभटा कागज ओइ आफिसमे जमा केने छल मुदा ओकर ठाम कियो आर लोक ओकर नामसँ नोकरीपर लागि गेलै....। ओकर अवाज ततेक कमजोर छलै, ऊपरसँ चपरासी ओकरा जेना धकलैत ओसाराक कोनामे राखल बेंच दिस लऽ जा रहल छल, ओइसँ धरफड़ीमे बाजल गेल ओकर गपक लाइनमे कोनो तारतम्य नै रहि गेल छलै। गरमे किछु फँसि रहल छलै आ ओ तोतरा रहल छल। मोहनदासकेँ बकौर लागि गेलै मुदा ओ चपरासीसँ अप्पन बाँहि छोड़ाबैत बाजए लागल, "भाइ, एक बेर ओइ बाबूसँ भेँट करा दिअ। हमरा अप्पन प्रमाणपत्र आ मार्कशीट वापस लेबाक अछि।' चपरासी हुनका धकियाबैत देवालसँ सटल लकड़ीक बेंचपर बैसा देलक आ जाए लागल। मोहनदास बुझि गेल जे आब ओकरा दोबारा एतए धरि आएब मुश्किल हेतै। ई आखिरी बेर छै। ओ जोरसँ चपरासीपर गरजल जे भर्ती कार्यालयक दरवाजासँ भीतर पैसि कऽ नपत्ता होए बला छल। " हे...हे..! जा कऽ ओइ बाबूसँ कहियौ जे मोहनदास बी.ए. आएल अछि आ 18 अगस्त, 1997 केँ जमा कराएल अप्पन सभटा कागज आपस मांगैत अछि...। तमाशा बना कऽ राखि देने छै। कोठली आ कुर्सीमे बैसि गेल छै तँ कि अंधेर मचेतै? ...दिअ, पर्ची दिअ, हम अप्पन नाम लिख दैत छी...! बाबूकेँ दऽ देबै!' चपरासी एक बेर तँ सन्न रहि गेल। कोनो बूढ़ भिखमंगा सन चेथरीमे घोंसिलाएल एहि लोकक गरसँ बड़ नीक फरिछायल भाषा निकलि रहल छै। एहन भाषा आ लहजा जे पढ़ल-लिखल बाबू आ अफसरक होइत अछि। चपरासी दरवाजापर किछु काल ठमकल आ मोहनदासकेँ निङहारैत रहल। फाटल बेरंग भेल, ठामे-ठाम चिप्पी लागल पेंट, फाटल घिनायल चौखुटा बुश्शर्ट। चनेल भेल माथपर सुखल बिखरल खिच्चड़ि सन अधपक्कू केस। झुर्री आ भङतराह सन, टेढ़-टूढ़ झुर्रीसँ भरल पकिया रंगक अस्कताइत चेहरा। गहींर, धँसल, कनी-कनी मिझाइत सन अपनाकेँ देखैत, हताश कमजोर आँखि। नीचा पएरक आंगुरमे कोनो तरहे ओझराएल रबड़क कतेक पुरान, सस्त चप्पल, जकरा बेरोजगारी, अभाव, दुख आ हताश रबड़क रहैये नै देलक, माटि, काठ आ कागचक बना देल छल। "बुरबलेल...! सार बताह...! बहानचो... कोन पार्टी आ अफसर अहि ससुर भुक्खलक संग देत?' यएह ई फदरैत रहै जइसँ चपरासीक ठोढ़ तामसे हिलि रहल छलै। मोहनदासकेँ लागलै जे चपरासीकेँ ओकर गपपर विश्वास नै भऽ रहल छै मुदा भगवान जानै छल जे ओ सत बाजि रहल छल, ताइसँ ओ बेंचसँ उठि कऽ आत्मविश्वाससँ भरि सधल चालिसँ ओकरा दिस बढ़ल। ओकरा मनमे छल जे ओ जा कऽ ओकरा बुझाबैक प्रयत्न करत जे विसनाथ ओकरे संग टा नै वरन ओरियंटल कोल माइंसक संग जालसाजी आ धोखाधड़ी कऽ रहल अछि। मोहनदास जेहन व्यग्रता आ जल्दीसँ चपरासी दिस बढ़ि रहल रहै आ ओकर चेहरापर दिमागमे चलि रहल उठा-पटकक कारण टेढ़-टूढ़ डड़ीर बनि रहल छल, गहींर धसल आँखिमे जे एकटा खास कछमछीक चमक आबि गेल छलै आ अप्पन सभटा गप एक्के संग कहि दै लेल उग्र व्याकुलतामे ओकर सुखायल पपड़ी पड़ल ठोढ़ जेना थरथरा रहल छलै, ओइसँ चपरासी सत्ते डरा गेल छल। ओ मोहनदास दिस देखैत जोरसँ चिकरल: "हे...हे...! एक्को डेग आगू नै बढ़ाउ, बुझलिऐ! ठाढ़ भऽ जाउ ओइ ठाम बरगाही भाइ...! हम कहै छी, ठाढ़ भऽ जाउ...ओही ठाम...!' "हे...हे... भाय! ...हमर गप तँ सुनू...!' मोहनदास बिगड़ि गेल। गपकेँ सम्हारबा लेल किछु जोरसँ बाजल। मुदा ओकर गपमे विनम्रता कम आ किंसाइत बेचैनी बेसी छलै, जाइसँ गप आर बिगड़ि गेल। चपरासी तति कऽ ठाढ़ भऽ गेल आ जोरसँ चिकरल; "बहीर छी की? थम्हि जाउ ओइ ठाम, नै तँ खुइन कऽ गारि देब बरगाही भाइ! एक्को डेग आगू बढ़ेलियै तँ!' दरवाजा पर हो हल्ला सुनि कऽ दफ्तरक भीतरसँ चारि-पाँच गोटे बाहर बहरा कऽ आएल। ओ अफसर नीक कपड़ामे छल आ घुरि कऽ मोहनदासकेँ माथसँ पएर धरि देखि रहल छल। "के छी?...एतए भीतर धरि कोना आबि गेल?' "सिक्योरिटी ऑफिसर पांडेकेँ बजाबियौ?...ई गार्ड खैनी रगड़ि कऽ कुर्सीपर सुतल रहैए।' "आइ मेन गेटपर ड्यूटी केकर-केकर रहै? ड्यूटी रजिस्टर आनू?' "हे, भगाउ एकरा।' "ई तँ अकड़हर कऽ देलक...! कियो ऐ तरहे अंदर पैसि जाइत अछि, ककरो ठांय-ठांय गोली मारि देत...! हे, किछु नै तँ बमे फोड़ि दितियै...!' "पुलिसमे दऽ दियौ। शर्माजी, मिलाबू अप्पन मोबाइल...वएह सए नम्बर!' मोहनदासक गप कियो नै सुनि रहल छल। ओकरा धकियायल जा रहल छल। माथ, पीठ, कनहा आ मुँहपर थापर, मुक्का, आ कोहनी बरसि रहल छल। मोहनदास दुनू हाथसँ अप्पन चेहरा झांपि कऽ अप्पन आँखि बचा रहल छल। "हम्मर गप तँ सुनि लियौ!...हे...मारू नै! हे...हे...!' एतबैयेमे तीन-चारिटा गार्ड दौगैत आएल। ओइमे एकटा कऽ हाथमे बारह बोरक दुनाली छलै, जेहन बैंकक चौकीदार लग रहैत छै। आ सभक हाथमे डंटा छलै। मोहनदासक पीठ खलोदार भऽ गेलै। ओकर आँखिक आगू कठिना धारमे अमावशक रातिमे देखल सभटा नक्षत्र हहारो करैत, कुहरैत, उकापतंग सन टूटि-टूटि कऽ खसऽ लगलै। कोनो एहन वज्र चोट कतौ पड़लै जे ओकर गरसँ ठीक ओहने कुहरबाक अबाज निकललै, जेहन ओइ सुगरक गरसँ निकलैत छै, जकर टांगकेँ बान्हि कऽ ओकरा गरकेँ रेतल जाइत छै। ओ एहन जोरसँ कुहरल जे कोइला खदानक सभटा कामगार बाहर निकैल गेल आ घेरा बना कऽ ओइ तमाशाकेँ देखऽ लागल। (ध्याद दियौ, ई घटना ओइ कालक छी जखन हिंदूक जगदगुरु अप्पन मठमे बैसि एकटा स्त्रीक संग वएह सभ किछु कऽ रहल छल जे हजार किलोमीटर दूर, कतेक समुद्र पार, व्हाइट हाउसक कुर्सीपर बैसल अमेरिकाक राष्ट्रपति कऽ रहल छल। जखन दजला आ फरात धारक लग कोनो खधाइमे अप्पन जान बचाबैक लेल नुकायल गिलगमेशकेँ एकटा पुरान समुद्री डाकूक वंशज बाहर खींच कऽ ओकर दाँत गानि रहल छल। एहन काल जाइमे जकरा लग जतेक मात्रामे सत्ता छल ओ विलोमानुपात नियमसँ ओतेक बेसी निरंकुश, हेहर, खुनीमा, अनैतिक आ शैतान भऽ गेल छल।...आ ई गप राष्ट्र, राजनीतिक दल, जाति, धार्मिक समुदाय आ लोक धरि एक्के सन लागू होइत छै।) (अनुवर्तते............) बालानां कृते बच्चा लोकनि द्वारा स्मरणीय श्लोक १.प्रातः काल ब्रह्ममुहूर्त्त (सूर्योदयक एक घंटा पहिने) सर्वप्रथम अपन दुनू हाथ देखबाक चाही, आ’ ई श्लोक बजबाक चाही। कराग्रे वसते लक्ष्मीः करमध्ये सरस्वती। करमूले स्थितो ब्रह्मा प्रभाते करदर्शनम्॥ करक आगाँ लक्ष्मी बसैत छथि, करक मध्यमे सरस्वती, करक मूलमे ब्रह्मा स्थित छथि। भोरमे ताहि द्वारे करक दर्शन करबाक थीक। २.संध्या काल दीप लेसबाक काल- दीपमूले स्थितो ब्रह्मा दीपमध्ये जनार्दनः। दीपाग्रे शङ्करः प्रोक्त्तः सन्ध्याज्योतिर्नमोऽस्तुते॥ दीपक मूल भागमे ब्रह्मा, दीपक मध्यभागमे जनार्दन (विष्णु) आऽ दीपक अग्र भागमे शङ्कर स्थित छथि। हे संध्याज्योति! अहाँकेँ नमस्कार। ३.सुतबाक काल- रामं स्कन्दं हनूमन्तं वैनतेयं वृकोदरम्। शयने यः स्मरेन्नित्यं दुःस्वप्नस्तस्य नश्यति॥ जे सभ दिन सुतबासँ पहिने राम, कुमारस्वामी, हनूमान्, गरुड़ आऽ भीमक स्मरण करैत छथि, हुनकर दुःस्वप्न नष्ट भऽ जाइत छन्हि। ४. नहेबाक समय- गङ्गे च यमुने चैव गोदावरि सरस्वति। नर्मदे सिन्धु कावेरि जलेऽस्मिन् सन्निधिं कुरू॥ हे गंगा, यमुना, गोदावरी, सरस्वती, नर्मदा, सिन्धु आऽ कावेरी धार। एहि जलमे अपन सान्निध्य दिअ। ५.उत्तरं यत्समुद्रस्य हिमाद्रेश्चैव दक्षिणम्। वर्षं तत् भारतं नाम भारती यत्र सन्ततिः॥ समुद्रक उत्तरमे आऽ हिमालयक दक्षिणमे भारत अछि आऽ ओतुका सन्तति भारती कहबैत छथि। ६.अहल्या द्रौपदी सीता तारा मण्डोदरी तथा। पञ्चकं ना स्मरेन्नित्यं महापातकनाशकम्॥ जे सभ दिन अहल्या, द्रौपदी, सीता, तारा आऽ मण्दोदरी, एहि पाँच साध्वी-स्त्रीक स्मरण करैत छथि, हुनकर सभ पाप नष्ट भऽ जाइत छन्हि। ७.अश्वत्थामा बलिर्व्यासो हनूमांश्च विभीषणः। कृपः परशुरामश्च सप्तैते चिरञ्जीविनः॥ अश्वत्थामा, बलि, व्यास, हनूमान्, विभीषण, कृपाचार्य आऽ परशुराम- ई सात टा चिरञ्जीवी कहबैत छथि। ८.साते भवतु सुप्रीता देवी शिखर वासिनी उग्रेन तपसा लब्धो यया पशुपतिः पतिः। सिद्धिः साध्ये सतामस्तु प्रसादान्तस्य धूर्जटेः जाह्नवीफेनलेखेव यन्यूधि शशिनः कला॥ ९. बालोऽहं जगदानन्द न मे बाला सरस्वती। अपूर्णे पंचमे वर्षे वर्णयामि जगत्त्रयम् ॥ १०. दूर्वाक्षत मंत्र(शुक्ल यजुर्वेद अध्याय २२, मंत्र २२) आ ब्रह्मन्नित्यस्य प्रजापतिर्ॠषिः। लिंभोक्त्ता देवताः। स्वराडुत्कृतिश्छन्दः। षड्जः स्वरः॥ आ ब्रह्म॑न् ब्राह्म॒णो ब्र॑ह्मवर्च॒सी जा॑यता॒मा रा॒ष्ट्रे रा॑ज॒न्यः शुरे॑ऽइषव्यो॒ऽतिव्या॒धी म॑हार॒थो जा॑यतां॒ दोग्ध्रीं धे॒नुर्वोढा॑न॒ड्वाना॒शुः सप्तिः॒ पुर॑न्धि॒र्योवा॑ जि॒ष्णू र॑थे॒ष्ठाः स॒भेयो॒ युवास्य यज॑मानस्य वी॒रो जा॒यतां निका॒मे-नि॑कामे नः प॒र्जन्यों वर्षतु॒ फल॑वत्यो न॒ऽओष॑धयः पच्यन्तां योगेक्ष॒मो नः॑ कल्पताम्॥२२॥ मन्त्रार्थाः सिद्धयः सन्तु पूर्णाः सन्तु मनोरथाः। शत्रूणां बुद्धिनाशोऽस्तु मित्राणामुदयस्तव। ॐ दीर्घायुर्भव। ॐ सौभाग्यवती भव। हे भगवान्। अपन देशमे सुयोग्य आ’ सर्वज्ञ विद्यार्थी उत्पन्न होथि, आ’ शुत्रुकेँ नाश कएनिहार सैनिक उत्पन्न होथि। अपन देशक गाय खूब दूध दय बाली, बरद भार वहन करएमे सक्षम होथि आ’ घोड़ा त्वरित रूपेँ दौगय बला होए। स्त्रीगण नगरक नेतृत्व करबामे सक्षम होथि आ’ युवक सभामे ओजपूर्ण भाषण देबयबला आ’ नेतृत्व देबामे सक्षम होथि। अपन देशमे जखन आवश्यक होय वर्षा होए आ’ औषधिक-बूटी सर्वदा परिपक्व होइत रहए। एवं क्रमे सभ तरहेँ हमरा सभक कल्याण होए। शत्रुक बुद्धिक नाश होए आ’ मित्रक उदय होए॥ मनुष्यकें कोन वस्तुक इच्छा करबाक चाही तकर वर्णन एहि मंत्रमे कएल गेल अछि। एहिमे वाचकलुप्तोपमालड़्कार अछि। अन्वय- ब्रह्म॑न् - विद्या आदि गुणसँ परिपूर्ण ब्रह्म रा॒ष्ट्रे - देशमे ब्र॑ह्मवर्च॒सी-ब्रह्म विद्याक तेजसँ युक्त्त आ जा॑यतां॒- उत्पन्न होए रा॑ज॒न्यः-राजा शुरे॑ऽ–बिना डर बला इषव्यो॒- बाण चलेबामे निपुण ऽतिव्या॒धी-शत्रुकेँ तारण दय बला म॑हार॒थो-पैघ रथ बला वीर दोग्ध्रीं-कामना(दूध पूर्ण करए बाली) धे॒नुर्वोढा॑न॒ड्वाना॒शुः धे॒नु-गौ वा वाणी र्वोढा॑न॒ड्वा- पैघ बरद ना॒शुः-आशुः-त्वरित सप्तिः॒-घोड़ा पुर॑न्धि॒र्योवा॑- पुर॑न्धि॒- व्यवहारकेँ धारण करए बाली र्योवा॑-स्त्री जि॒ष्णू-शत्रुकेँ जीतए बला र॑थे॒ष्ठाः-रथ पर स्थिर स॒भेयो॒-उत्तम सभामे युवास्य-युवा जेहन यज॑मानस्य-राजाक राज्यमे वी॒रो-शत्रुकेँ पराजित करएबला निका॒मे-नि॑कामे-निश्चययुक्त्त कार्यमे नः-हमर सभक प॒र्जन्यों-मेघ वर्षतु॒-वर्षा होए फल॑वत्यो-उत्तम फल बला ओष॑धयः-औषधिः पच्यन्तां- पाकए योगेक्ष॒मो-अलभ्य लभ्य करेबाक हेतु कएल गेल योगक रक्षा नः॑-हमरा सभक हेतु कल्पताम्-समर्थ होए ग्रिफिथक अनुवाद- हे ब्रह्मण, हमर राज्यमे ब्राह्मण नीक धार्मिक विद्या बला, राजन्य-वीर,तीरंदाज, दूध दए बाली गाय, दौगय बला जन्तु, उद्यमी नारी होथि। पार्जन्य आवश्यकता पड़ला पर वर्षा देथि, फल देय बला गाछ पाकए, हम सभ संपत्ति अर्जित/संरक्षित करी। 8.VIDEHA FOR NON RESIDENTS 8.1.Original Poem in Maithili by Kalikant Jha "Buch" Translated into English by Jyoti Jha Chaudhary 8.2.Maithili Novel Sahasrashirsha by Gajendra Thakur re-written in English by the author himself. Original Poem in Maithili by Kalikant Jha "Buch" Translated into English by Jyoti Jha Chaudhary Kalikant Jha "Buch" 1934-2009, Birth place- village Karian, District- Samastipur (Karian is birth place of famous Indian Nyaiyyayik philosopher Udayanacharya), Father Late Pt. Rajkishor Jha was first headmaster of village middle school. Mother Late Kala Devi was housewife. After completing Intermediate education started job block office of Govt. of Bihar.published in Mithila Mihir, Mati-pani, Bhakha, and Maithili Akademi magazine. Jyoti Jha Chaudhary, Date of Birth: December 30 1978,Place of Birth- Belhvar (Madhubani District), Education: Swami Vivekananda Middle School, Tisco Sakchi Girls High School, Mrs KMPM Inter College, IGNOU, ICWAI (COST ACCOUNTANCY); Residence- LONDON, UK; Father- Sh. Shubhankar Jha, Jamshedpur; Mother- Smt. Sudha Jha- Shivipatti. Jyoti received editor's choice award from www.poetry.comand her poems were featured in front page of www.poetrysoup.com for some period.She learnt Mithila Painting under Ms. Shveta Jha, Basera Institute, Jamshedpur and Fine Arts from Toolika, Sakchi, Jamshedpur (India). Her Mithila Paintings have been displayed by Ealing Art Group at Ealing Broadway, London. Our Mithila Knowledge, thoughts and devotion filled in profuse in our Mithila An ascetic life within the wordly enjoyment in our exquisite Mithila She had got such a son Who became father of Tribhuvan Angamedini, Apara, Maya Embraced being daughter here Those wonderful miracles took place in Mithila An ascetic life within the wordly enjoyment in our exquisite Mithila The Shukradeva also accepted her glory Called Janak his ultimate master The passionate is not having charm of flesh The hermit is crying for self-indulgence What about the earth, the sky is in reach of Mithila An ascetic life within the wordly enjoyment in our exquisite Mithila The one who dominates life everywhere Known as Maya, the origin of power She became Tirhutani at her will Turned to be a good spirit by covering in soil And she had been embellished in details in Mithila An ascetic life within the wordly enjoyment in our exquisite Mithila In this land the great masters are born Like Gautam, Kapil, Kanadi, Ayaachi and Udayan Enriched with the power of deeds The scholars are defeated indeed The biggest flow of justice and philosophy is our Mithila An ascetic life within the wordly enjoyment in our exquisite Mithila The Hindu Scriptures are what we narrate The poem is what we descant Such a lovely place where Maithils rest The sweet offerings of mithila are the best The garland of Kavikokila Vidyapati is our Mithila An ascetic life within the wordly enjoyment in our exquisite Mithila Even though we are poor now We had eaten the makhan anyhow The granddad soaked the amot sweet And I ate the basmati chuda mixed with it The gift of big bamboo palate of chuda and dahi is our Mithila An ascetic life within the wordly enjoyment in our exquisite Mithila The Gangodidi makes the tea The daughter Kamla prepares the beetel The sister Koshi beats the rice paddy The Baghmati makes the grains ready The Laxmi of the house touches the entrance of our Mithila An ascetic life within the wordly enjoyment in our exquisite Mithila Maithili Novel Sahasrashirsha by Gajendra Thakur re-written in English by the author himself. Gajendra Thakur (b. 1971) is the editor of Maithili ejournal “Videha” that can be viewed at http://www.videha.co.in/ . His poem, story, novel, research articles, epic – all in Maithili language are lying scattered and is in print in single volume by the title “KurukShetram.” He can be reached at his email: ggajendra@videha.com The Thousand-headed I Garh Narikel, a village. It is predominantly inhabited by cattle-grazer Brahmins. Ponds and trees are all around this village. In this village one…two…three and one more, four ponds exist. Exactly it is not so. There are three more ponds in this village. One is in the northern direction of the north pond, popularly known as the gigantic pond. People say that some monster dig thios pond in just one night. But while digging it the whole night was spent and the monster coul not install the centrak sacred wooden pole in the middle of the pond. As the monster was in a hurry so he left shoe of one leg there beside the mond and left the place. For many years that huge shoe remained there but again one year during flood that too got lost. So the only evidence that was there vanished. This pond is far away from the village, so no relation of this village could be established with the Chhatha festival. Yes, but this pond finds mention during the ceremony of sacred thread. Various types of fishes reside in this pond. There is never dearth of fishes here. No need has ever been felt for putting seeds (small fishes) of fishes into this pond. There happens an annual fish catching festival and barring the southern quarter of village, the whole village gets its daily share of fishes for at least one month. To the southern direction of the south pond, there is a village called Buchiya (in the name of a person) pond. It is also far from the village, but there is sacred wooden pole installed in the centre of this village. When this central sacred wooden pole was being installed a big ceremony was thrown by the great great grandfather of the Zamindar, the Piyar Bachcha (meaning yellow boy). He had organized a grand great feast. This pond is far far away from the village and in all directions of this pond there are fields only. People rarely come here for taking a bath. Here too there happens an annual fish-catching ceremony, but that is only for this southern quarter of the village. There are many things attached with this pond. During Durga Pooja goddess Durga proceeds to her husband’s place, actually on the last day of the festivities. On that day the idol of goddess Durga is immersed into this pond. Not the men, but yes, the women weep bitterly at the time of immersion of Durga. The idol of Durgaji is not made in this village, no question of its being constructed in the southern quarter of the village. But it is immersed in this pond. This idol of Durga is made and worshipped in the neighboring Garh Tola (small village). The Garh Narikel people are mischievous ones. Till the sixth day of Durga festival, the idol of Durgaji remains covered. Only the artist can see her because if he does not then how the idol be constructed. Any other people, however, would become blind if they see the Durga before being unveiled. Yes, but after the ceremony of Belnoti- when eye of Durga is placed out of an invited wood-apple fruit, the idol of Durga is unveiled and then only the people can see it. And from that day the actual festival begins. If idol of Durga is made in this village many people would become blind before the sixth day of the festival. The neighboring village is not less mischievous one, its only the degree. In the name of festival all of them become disciplined. In the name of their village the suffix is added, tola (quarter of a village) suffix. But that does not make it a quarter of a village; it is actually a full-fledged village. Garh Tola village is also inhabited by the cattle grazing Brahmins. In mischievousness there is always a competition between these two villages. If you pass through the Garh Tola village, the lads sitting in front verandas of their houses beside the road would often pass comments on you. But the naughty boys of Garh Narikel will consciously go through that village. But the disciplined ones pass through the road beside this Buchiya pond. Although the route is circuitous; but it is safe. (contd.) VIDEHA MAITHILI SAMSKRIT TUTOR बिपिन कुमार झा लैटेक्स : परिचयः उपादेयता च वरिष्ठ अनुसंधाता भारतीयप्रौदोगिकीसंस्थानम् मुम्बई लैटेक्स इत्यस्य उपयोगं अभिलेखस्य बोधविस्तारार्थं कर्तुं शक्यते। यदि भवन्तः स्वकीये अधिशेषे जीवने अनेकाभिलेखानां रचनाकर्तुं इच्छन्ति तर्हि एषः एव कालः यदा लेटेक्स इत्यनेन सह कार्यप्रारंभं कुर्वन्तु। यदि अधिकाधिकगणितप्रयोगम् इच्छति तर्हि लेटेक्स इत्येतद् भिन्नं न किमपि अन्यमार्गं नास्ति। एकस्मिन् आपरेटिंग सिस्टम यथा विण्डोज इत्यस्मिन् रचितस्य लेटेक्स अभिलेखस्य पुनरुपयोगं किञ्चिदपि परिवर्तनं बिना अन्यस्मिन् आपरेटिंग सिस्टम यथा लाइनक्स एवं मैक इत्यस्मिन् कर्तुं शक्यते तथा प्रत्युत् लेटेक्स मुक्तं तथा मूल्यरहितं स्रोत अस्ति। सर्वातिरिक्तम् एतस्य विशेषः उपयोक्तासमुदायः अस्ति यः भवतां सन्देहसन्दर्भे साहाय्यं करोति उदाहरणरूपे संघर्षशील भारतदर्शने। अधोलिखित लेटेक्स मौखिक शिक्षणं maudgalya.org इति अन्तर्जालपुटे विद्यते कृपया प्रकृत मौखिक शिक्षणस्य उपयोगात् पूर्वं प्रथमतया तत्र गत्वा यथानिर्दिष्टसूचीं पश्यन्तु को नाम compilation. प्रभृति। अन्ततः अन्तर्जाले अन्वेषणं सूचनायाः सर्वोत्तमस्रोतरूपे भवितुं शक्नोति। भविष्ये fosse.in इत्यतः लेटेक्स सन्दर्भे साहाय्यार्थं अपेक्षां कर्तुं शक्यते। अवधानं ददतु द्वौ s’s तथा द्वौ e’s FOSSEE विज्ञानस्य तथा अभियान्त्रिकी इत्यस्य क्षेत्रे मुक्त तथा मूल्यरहित साफ़्टवेयर इत्यतौ स्तः। अधुन अहं लेटेक्स इत्यस्य विण्डोज आपरेटिंग सिस्टम मध्ये कथम् उपयोगं भवेत् इति व्याख्यानं करोमि। अत्र प्राभ्यते माइटेक्स इत्यस्य स्थापनं कथं भवेत्।एतत् लेटेक्स इत्यस्य प्रभागरूपे अस्ति। तर्हि टेक्सनिक-केन्द्रं मिटेक्सपर्यन्तं मुक्तं अस्ति। अहम दर्शयामि यत् केन प्रकारेण टेक्सनिककेन्द्रस्य उपयोगं कृत्वा संकलनं क्रियते तथा अडोबरीडर माध्यमेन तद्दर्शनम् इति। अहम् एतस्य सारं प्रस्तोष्यामि सुमात्रा नामकं एकं वैकल्पिक मुक्त तथा मूल्यरहितपीडीएफ् रीडर इत्येतस्य वर्णनेन सह। मिकटेक्स विण्डोजकृते लेटेक्स इत्यस्य लोकप्रियस्थापनम् अस्ति। Miktex.org इत्यतः 2.7 संस्करणं स्वीकुर्वन्तु। सम्यक्! तर्हि तत्र गमनं भवेत्. अहो ! एतत् अत्र अस्ति। भवान् तर्हि डाउनलोड करोतु। एतस्य अवतारणानन्तरं रक्षणं करोतु यथा हि भवान् किंचित् कालानन्तरम् एतस्य उपयोगं करिष्यति। अभिलेखस्य नाम अत्र अस्ति। एतत् बृहत्-फाइल अस्ति प्रायः त्रयाशीतिः MB इत्यस्य। मिकटेक्स इत्यस्य सम्पूर्ण फाइल बृहत्तरः अस्ति प्रायः ९०० MB इत्यस्य एतदर्थम् अहम् एतस्य अनुशंसां न करोमि। यदि सम्यक् कनेक्टिविटी नास्ति तर्हि CD इत्यस्य उपयोगं करोतु यत् fosse.in इत्यत्र उपलब्धम् अस्ति। अहम् संस्थापन फाइल इत्यस्य रक्षणं डाउनलोड डयरेक्टरीमध्ये कृतवान् अस्मि। अधुना तस्य उद्घाटनं करोमि। अहं पूर्वम् एव एतस्य डाउनलोड कृतवान् अस्मि। अहम् एतस्य आयकन उपरि नोदनं कृत्वा संस्थापनं प्रारंभं करोमि। सर्वेषां कृते पूर्वनिर्धारित उत्तरं ददातु। संस्थापनहेतवे प्रायः विंशति निमेषात्मकं कालम् अपेक्षते एतदर्थं तस्य प्रस्तुतीकरणम् अत्र न करोमि। मया एतत् पूर्वं संस्थापितम्। एतत् अत्र संस्थापितम् अस्ति। अपरः अडोबरीडर, एतत् अस्ति मूल्यरहित रीडर यस्य उपयोगः pdf फाइलप्रदर्शने क्रियते। भवतः संगणके पूर्वतः एव एतत् संस्थापितम् भवितुम् अर्हति। यदि एवम् अस्ति तर्हि भवान् एतस्य स्लाइड इत्यस्य वर्जनं कर्तुं शक्नोति। यदि एवं नास्ति तर्हि adobe.com इत्यत्र गच्छतु। मूल्यरहित अडोबरीडर इत्यस्य अवतारणं करोतु। अहम् स्वकीय अवतारणस्थले एतस्य अवतारणं कृतवान् । एषः अत्र। द्विवारं नोदनं कृत्वा एतस्य संस्थापनं करोतु। पूर्वनियतम् उत्तरम् अपेक्षते. मया पूर्वम् एव तत् कृतम्। अधुना वयं विण्डोजमध्येटेक्सनिककेन्द्रस्य संस्थापनं कुर्मः। सम्यक्। तावत् अहं पश्यामि एतत् अत्र। भवान् तत्र। मया संस्थापितस्य टेक्सनिककेन्द्रस्य डायरेक्टरी अत्र। एवं यदि भवान् अत्र अधः आगच्छति। प्रथमं तावत् अहं पश्यामि। यथा चिन्तये वयं texnic center.org इत्यस्य पृष्ठे गच्छामः। तत्र चलामः। यतोहि वयं एतत् कुर्मः। अहो पृष्ठतः एव वयं अत्रैव टेक्सनिककेन्द्रस्य मुखपुटम। भवान् अत्र पश्यति एतत् टेक्सनिककेन्द्रस्य विषये कथयति। भवतः लेटेक्सजगतः प्रभृतेः। नोदनं करणीयं अवतारणं करणीयम्। एतत् पुरातनं जालं अस्ति यत् अस्माकं पार्श्वे अस्ति। एकदा भवान् तत्र गच्छतु प्रथमं तावत् नोदनम् एवम् अवतारणम् अस्ति। मया पूर्वमेव अवतारितम्। भवान् अत्र डाउनलोड डाय्रेक्टरी अस्ति यस्मिन् मया अवतारितम्। सम्यक्, वयं यत् करवामः तत् अस्ति पुरातने पृष्ठे गमनम् एवम् अवतारणविन्दु नोदनम्। एतत् भवन्तं अवतारणपुटे नेष्यति यत् मया पूर्वम् उक्तम्। भवान् टेक्सनिक केन्द्रं वांछति यत् सूचीमध्ये अस्ति। एतत् नोदयतु। भवान् एतस्य कृते मीरर इत्यस्य आवशकताऽनुभूतिं करिष्यति। अवतारणानन्तरं एतस्य भविषोपयोगस्य कृते रक्षणं करोतु येन भवान् भविष्ये अनेकाधिकावसरे उपयोगं कर्तुं क्षमः भविष्यति। यथा पूर्वम् उक्तम् मम पार्स्वे अवतरण संचिकायाम् अस्ति एतत्। अधुना वयं नोदनद्वयेन तथा पूर्वनियतोत्तरप्रदानेनसह संस्थापनं कुर्मः। सम्यक्, एवं अग्रे चलामः। अधुना gpl सहमति प्रदानं भवेत् । एवम् अग्रे चलामः तथा संस्थापनं कुर्मः। एतस्य संस्थापनं भवति। क्रमशः Input: (कोष्ठकमे देवनागरी, मिथिलाक्षर किंवा फोनेटिक-रोमनमे टाइप करू। Input in Devanagari, Mithilakshara or Phonetic-Roman.) Output: (परिणाम देवनागरी, मिथिलाक्षर आ फोनेटिक-रोमन/ रोमनमे। Result in Devanagari, Mithilakshara and Phonetic-Roman/ Roman.) English to Maithili Maithili to English इंग्लिश-मैथिली-कोष / मैथिली-इंग्लिश-कोष प्रोजेक्टकेँ आगू बढ़ाऊ, अपन सुझाव आ योगदान ई-मेल द्वारा ggajendra@videha.com पर पठाऊ। Top of Form विदेहक मैथिली-अंग्रेजी आ अंग्रेजी मैथिली कोष (इंटरनेटपर पहिल बेर सर्च-डिक्शनरी) एम.एस. एस.क्यू.एल. सर्वर आधारित -Based on ms-sql server Maithili-English and English-Maithili Dictionary. १.भारत आ नेपालक मैथिली भाषा-वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक शैली आ २.मैथिलीमे भाषा सम्पादन पाठ्यक्रम १.नेपाल आ भारतक मैथिली भाषा-वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक शैली
अ.नेपालक मैथिली भाषा वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक उच्चारण आ लेखन शैली (भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक धारणाकेँ पूर्ण रूपसँ सङ्ग लऽ निर्धारित) मैथिलीमे उच्चारण तथा लेखन १.पञ्चमाक्षर आ अनुस्वार: पञ्चमाक्षरान्तर्गत ङ, ञ, ण, न एवं म अबैत अछि। संस्कृत भाषाक अनुसार शब्दक अन्तमे जाहि वर्गक अक्षर रहैत अछि ओही वर्गक पञ्चमाक्षर अबैत अछि। जेना- अङ्क (क वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ङ् आएल अछि।) पञ्च (च वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ञ् आएल अछि।) खण्ड (ट वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ण् आएल अछि।) सन्धि (त वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे न् आएल अछि।) खम्भ (प वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे म् आएल अछि।) उपर्युक्त बात मैथिलीमे कम देखल जाइत अछि। पञ्चमाक्षरक बदलामे अधिकांश जगहपर अनुस्वारक प्रयोग देखल जाइछ। जेना- अंक, पंच, खंड, संधि, खंभ आदि। व्याकरणविद पण्डित गोविन्द झाक कहब छनि जे कवर्ग, चवर्ग आ टवर्गसँ पूर्व अनुस्वार लिखल जाए तथा तवर्ग आ पवर्गसँ पूर्व पञ्चमाक्षरे लिखल जाए। जेना- अंक, चंचल, अंडा, अन्त तथा कम्पन। मुदा हिन्दीक निकट रहल आधुनिक लेखक एहि बातकेँ नहि मानैत छथि। ओ लोकनि अन्त आ कम्पनक जगहपर सेहो अंत आ कंपन लिखैत देखल जाइत छथि। नवीन पद्धति किछु सुविधाजनक अवश्य छैक। किएक तँ एहिमे समय आ स्थानक बचत होइत छैक। मुदा कतोक बेर हस्तलेखन वा मुद्रणमे अनुस्वारक छोट सन बिन्दु स्पष्ट नहि भेलासँ अर्थक अनर्थ होइत सेहो देखल जाइत अछि। अनुस्वारक प्रयोगमे उच्चारण-दोषक सम्भावना सेहो ततबए देखल जाइत अछि। एतदर्थ कसँ लऽ कऽ पवर्ग धरि पञ्चमाक्षरेक प्रयोग करब उचित अछि। यसँ लऽ कऽ ज्ञ धरिक अक्षरक सङ्ग अनुस्वारक प्रयोग करबामे कतहु कोनो विवाद नहि देखल जाइछ। २.ढ आ ढ़ : ढ़क उच्चारण “र् ह”जकाँ होइत अछि। अतः जतऽ “र् ह”क उच्चारण हो ओतऽ मात्र ढ़ लिखल जाए। आन ठाम खाली ढ लिखल जएबाक चाही। जेना- ढ = ढाकी, ढेकी, ढीठ, ढेउआ, ढङ्ग, ढेरी, ढाकनि, ढाठ आदि। ढ़ = पढ़ाइ, बढ़ब, गढ़ब, मढ़ब, बुढ़बा, साँढ़, गाढ़, रीढ़, चाँढ़, सीढ़ी, पीढ़ी आदि। उपर्युक्त शब्द सभकेँ देखलासँ ई स्पष्ट होइत अछि जे साधारणतया शब्दक शुरूमे ढ आ मध्य तथा अन्तमे ढ़ अबैत अछि। इएह नियम ड आ ड़क सन्दर्भ सेहो लागू होइत अछि। ३.व आ ब : मैथिलीमे “व”क उच्चारण ब कएल जाइत अछि, मुदा ओकरा ब रूपमे नहि लिखल जएबाक चाही। जेना- उच्चारण : बैद्यनाथ, बिद्या, नब, देबता, बिष्णु, बंश, बन्दना आदि। एहि सभक स्थानपर क्रमशः वैद्यनाथ, विद्या, नव, देवता, विष्णु, वंश, वन्दना लिखबाक चाही। सामान्यतया व उच्चारणक लेल ओ प्रयोग कएल जाइत अछि। जेना- ओकील, ओजह आदि। ४.य आ ज : कतहु-कतहु “य”क उच्चारण “ज”जकाँ करैत देखल जाइत अछि, मुदा ओकरा ज नहि लिखबाक चाही। उच्चारणमे यज्ञ, जदि, जमुना, जुग, जाबत, जोगी, जदु, जम आदि कहल जाएबला शब्द सभकेँ क्रमशः यज्ञ, यदि, यमुना, युग, यावत, योगी, यदु, यम लिखबाक चाही। ५.ए आ य : मैथिलीक वर्तनीमे ए आ य दुनू लिखल जाइत अछि। प्राचीन वर्तनी- कएल, जाए, होएत, माए, भाए, गाए आदि। नवीन वर्तनी- कयल, जाय, होयत, माय, भाय, गाय आदि। सामान्यतया शब्दक शुरूमे ए मात्र अबैत अछि। जेना एहि, एना, एकर, एहन आदि। एहि शब्द सभक स्थानपर यहि, यना, यकर, यहन आदिक प्रयोग नहि करबाक चाही। यद्यपि मैथिलीभाषी थारू सहित किछु जातिमे शब्दक आरम्भोमे “ए”केँ य कहि उच्चारण कएल जाइत अछि। ए आ “य”क प्रयोगक सन्दर्भमे प्राचीने पद्धतिक अनुसरण करब उपयुक्त मानि एहि पुस्तकमे ओकरे प्रयोग कएल गेल अछि। किएक तँ दुनूक लेखनमे कोनो सहजता आ दुरूहताक बात नहि अछि। आ मैथिलीक सर्वसाधारणक उच्चारण-शैली यक अपेक्षा एसँ बेसी निकट छैक। खास कऽ कएल, हएब आदि कतिपय शब्दकेँ कैल, हैब आदि रूपमे कतहु-कतहु लिखल जाएब सेहो “ए”क प्रयोगकेँ बेसी समीचीन प्रमाणित करैत अछि। ६.हि, हु तथा एकार, ओकार : मैथिलीक प्राचीन लेखन-परम्परामे कोनो बातपर बल दैत काल शब्दक पाछाँ हि, हु लगाओल जाइत छैक। जेना- हुनकहि, अपनहु, ओकरहु, तत्कालहि, चोट्टहि, आनहु आदि। मुदा आधुनिक लेखनमे हिक स्थानपर एकार एवं हुक स्थानपर ओकारक प्रयोग करैत देखल जाइत अछि। जेना- हुनके, अपनो, तत्काले, चोट्टे, आनो आदि। ७.ष तथा ख : मैथिली भाषामे अधिकांशतः षक उच्चारण ख होइत अछि। जेना- षड्यन्त्र (खड़यन्त्र), षोडशी (खोड़शी), षट्कोण (खटकोण), वृषेश (वृखेश), सन्तोष (सन्तोख) आदि। ८.ध्वनि-लोप : निम्नलिखित अवस्थामे शब्दसँ ध्वनि-लोप भऽ जाइत अछि: (क) क्रियान्वयी प्रत्यय अयमे य वा ए लुप्त भऽ जाइत अछि। ओहिमे सँ पहिने अक उच्चारण दीर्घ भऽ जाइत अछि। ओकर आगाँ लोप-सूचक चिह्न वा विकारी (’ / ऽ) लगाओल जाइछ। जेना- पूर्ण रूप : पढ़ए (पढ़य) गेलाह, कए (कय) लेल, उठए (उठय) पड़तौक। अपूर्ण रूप : पढ़’ गेलाह, क’ लेल, उठ’ पड़तौक। पढ़ऽ गेलाह, कऽ लेल, उठऽ पड़तौक। (ख) पूर्वकालिक कृत आय (आए) प्रत्ययमे य (ए) लुप्त भऽ जाइछ, मुदा लोप-सूचक विकारी नहि लगाओल जाइछ। जेना- पूर्ण रूप : खाए (य) गेल, पठाय (ए) देब, नहाए (य) अएलाह। अपूर्ण रूप : खा गेल, पठा देब, नहा अएलाह। (ग) स्त्री प्रत्यय इक उच्चारण क्रियापद, संज्ञा, ओ विशेषण तीनूमे लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना- पूर्ण रूप : दोसरि मालिनि चलि गेलि। अपूर्ण रूप : दोसर मालिन चलि गेल। (घ) वर्तमान कृदन्तक अन्तिम त लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना- पूर्ण रूप : पढ़ैत अछि, बजैत अछि, गबैत अछि। अपूर्ण रूप : पढ़ै अछि, बजै अछि, गबै अछि। (ङ) क्रियापदक अवसान इक, उक, ऐक तथा हीकमे लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना- पूर्ण रूप: छियौक, छियैक, छहीक, छौक, छैक, अबितैक, होइक। अपूर्ण रूप : छियौ, छियै, छही, छौ, छै, अबितै, होइ। (च) क्रियापदीय प्रत्यय न्ह, हु तथा हकारक लोप भऽ जाइछ। जेना- पूर्ण रूप : छन्हि, कहलन्हि, कहलहुँ, गेलह, नहि। अपूर्ण रूप : छनि, कहलनि, कहलौँ, गेलऽ, नइ, नञि, नै। ९.ध्वनि स्थानान्तरण : कोनो-कोनो स्वर-ध्वनि अपना जगहसँ हटि कऽ दोसर ठाम चलि जाइत अछि। खास कऽ ह्रस्व इ आ उक सम्बन्धमे ई बात लागू होइत अछि। मैथिलीकरण भऽ गेल शब्दक मध्य वा अन्तमे जँ ह्रस्व इ वा उ आबए तँ ओकर ध्वनि स्थानान्तरित भऽ एक अक्षर आगाँ आबि जाइत अछि। जेना- शनि (शइन), पानि (पाइन), दालि ( दाइल), माटि (माइट), काछु (काउछ), मासु (माउस) आदि। मुदा तत्सम शब्द सभमे ई निअम लागू नहि होइत अछि। जेना- रश्मिकेँ रइश्म आ सुधांशुकेँ सुधाउंस नहि कहल जा सकैत अछि। १०.हलन्त(्)क प्रयोग : मैथिली भाषामे सामान्यतया हलन्त (्)क आवश्यकता नहि होइत अछि। कारण जे शब्दक अन्तमे अ उच्चारण नहि होइत अछि। मुदा संस्कृत भाषासँ जहिनाक तहिना मैथिलीमे आएल (तत्सम) शब्द सभमे हलन्त प्रयोग कएल जाइत अछि। एहि पोथीमे सामान्यतया सम्पूर्ण शब्दकेँ मैथिली भाषा सम्बन्धी निअम अनुसार हलन्तविहीन राखल गेल अछि। मुदा व्याकरण सम्बन्धी प्रयोजनक लेल अत्यावश्यक स्थानपर कतहु-कतहु हलन्त देल गेल अछि। प्रस्तुत पोथीमे मथिली लेखनक प्राचीन आ नवीन दुनू शैलीक सरल आ समीचीन पक्ष सभकेँ समेटि कऽ वर्ण-विन्यास कएल गेल अछि। स्थान आ समयमे बचतक सङ्गहि हस्त-लेखन तथा तकनीकी दृष्टिसँ सेहो सरल होबऽबला हिसाबसँ वर्ण-विन्यास मिलाओल गेल अछि। वर्तमान समयमे मैथिली मातृभाषी पर्यन्तकेँ आन भाषाक माध्यमसँ मैथिलीक ज्ञान लेबऽ पड़ि रहल परिप्रेक्ष्यमे लेखनमे सहजता तथा एकरूपतापर ध्यान देल गेल अछि। तखन मैथिली भाषाक मूल विशेषता सभ कुण्ठित नहि होइक, ताहू दिस लेखक-मण्डल सचेत अछि। प्रसिद्ध भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक कहब छनि जे सरलताक अनुसन्धानमे एहन अवस्था किन्नहु ने आबऽ देबाक चाही जे भाषाक विशेषता छाँहमे पडि जाए। -(भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक धारणाकेँ पूर्ण रूपसँ सङ्ग लऽ निर्धारित) आ. मैथिली अकादमी, पटना द्वारा निर्धारित मैथिली लेखन-शैली
१. जे शब्द मैथिली-साहित्यक प्राचीन कालसँ आइ धरि जाहि वर्त्तनीमे प्रचलित अछि, से सामान्यतः ताहि वर्त्तनीमे लिखल जाय- उदाहरणार्थ-
ग्राह्य
एखन ठाम जकर, तकर तनिकर अछि
अग्राह्य अखन, अखनि, एखेन, अखनी ठिमा, ठिना, ठमा जेकर, तेकर तिनकर। (वैकल्पिक रूपेँ ग्राह्य) ऐछ, अहि, ए।
२. निम्नलिखित तीन प्रकारक रूप वैकल्पिकतया अपनाओल जाय: भऽ गेल, भय गेल वा भए गेल। जा रहल अछि, जाय रहल अछि, जाए रहल अछि। कर’ गेलाह, वा करय गेलाह वा करए गेलाह।
३. प्राचीन मैथिलीक ‘न्ह’ ध्वनिक स्थानमे ‘न’ लिखल जाय सकैत अछि यथा कहलनि वा कहलन्हि।
४. ‘ऐ’ तथा ‘औ’ ततय लिखल जाय जत’ स्पष्टतः ‘अइ’ तथा ‘अउ’ सदृश उच्चारण इष्ट हो। यथा- देखैत, छलैक, बौआ, छौक इत्यादि।
५. मैथिलीक निम्नलिखित शब्द एहि रूपे प्रयुक्त होयत: जैह, सैह, इएह, ओऐह, लैह तथा दैह।
६. ह्र्स्व इकारांत शब्दमे ‘इ’ के लुप्त करब सामान्यतः अग्राह्य थिक। यथा- ग्राह्य देखि आबह, मालिनि गेलि (मनुष्य मात्रमे)।
७. स्वतंत्र ह्रस्व ‘ए’ वा ‘य’ प्राचीन मैथिलीक उद्धरण आदिमे तँ यथावत राखल जाय, किंतु आधुनिक प्रयोगमे वैकल्पिक रूपेँ ‘ए’ वा ‘य’ लिखल जाय। यथा:- कयल वा कएल, अयलाह वा अएलाह, जाय वा जाए इत्यादि।
८. उच्चारणमे दू स्वरक बीच जे ‘य’ ध्वनि स्वतः आबि जाइत अछि तकरा लेखमे स्थान वैकल्पिक रूपेँ देल जाय। यथा- धीआ, अढ़ैआ, विआह, वा धीया, अढ़ैया, बियाह।
९. सानुनासिक स्वतंत्र स्वरक स्थान यथासंभव ‘ञ’ लिखल जाय वा सानुनासिक स्वर। यथा:- मैञा, कनिञा, किरतनिञा वा मैआँ, कनिआँ, किरतनिआँ।
१०. कारकक विभक्त्तिक निम्नलिखित रूप ग्राह्य:- हाथकेँ, हाथसँ, हाथेँ, हाथक, हाथमे। ’मे’ मे अनुस्वार सर्वथा त्याज्य थिक। ‘क’ क वैकल्पिक रूप ‘केर’ राखल जा सकैत अछि।
११. पूर्वकालिक क्रियापदक बाद ‘कय’ वा ‘कए’ अव्यय वैकल्पिक रूपेँ लगाओल जा सकैत अछि। यथा:- देखि कय वा देखि कए।
१२. माँग, भाँग आदिक स्थानमे माङ, भाङ इत्यादि लिखल जाय।
१३. अर्द्ध ‘न’ ओ अर्द्ध ‘म’ क बदला अनुसार नहि लिखल जाय, किंतु छापाक सुविधार्थ अर्द्ध ‘ङ’ , ‘ञ’, तथा ‘ण’ क बदला अनुस्वारो लिखल जा सकैत अछि। यथा:- अङ्क, वा अंक, अञ्चल वा अंचल, कण्ठ वा कंठ।
१४. हलंत चिह्न निअमतः लगाओल जाय, किंतु विभक्तिक संग अकारांत प्रयोग कएल जाय। यथा:- श्रीमान्, किंतु श्रीमानक।
१५. सभ एकल कारक चिह्न शब्दमे सटा क’ लिखल जाय, हटा क’ नहि, संयुक्त विभक्तिक हेतु फराक लिखल जाय, यथा घर परक।
१६. अनुनासिककेँ चन्द्रबिन्दु द्वारा व्यक्त कयल जाय। परंतु मुद्रणक सुविधार्थ हि समान जटिल मात्रापर अनुस्वारक प्रयोग चन्द्रबिन्दुक बदला कयल जा सकैत अछि। यथा- हिँ केर बदला हिं।
१७. पूर्ण विराम पासीसँ ( । ) सूचित कयल जाय।
१८. समस्त पद सटा क’ लिखल जाय, वा हाइफेनसँ जोड़ि क’ , हटा क’ नहि।
१९. लिअ तथा दिअ शब्दमे बिकारी (ऽ) नहि लगाओल जाय।
२०. अंक देवनागरी रूपमे राखल जाय।
२१.किछु ध्वनिक लेल नवीन चिन्ह बनबाओल जाय। जा' ई नहि बनल अछि ताबत एहि दुनू ध्वनिक बदला पूर्ववत् अय/ आय/ अए/ आए/ आओ/ अओ लिखल जाय। आकि ऎ वा ऒ सँ व्यक्त कएल जाय।
ह./- गोविन्द झा ११/८/७६ श्रीकान्त ठाकुर ११/८/७६ सुरेन्द्र झा "सुमन" ११/०८/७६ २.मैथिलीमे भाषा सम्पादन पाठ्यक्रम शब्द जइ/ जाहि/ जै जहिठाम/ जाहिठाम/ जइठाम/ जैठाम एहि/ अहि/ अइ/ ऐ अइछ/ अछि/ ऐछ तइ/ तहि/ तै/ ताहि ओहि/ ओइ सीखि/ सीख जीवि/ जीवी/ जीब भलेहीं/ भलहिं तैं/ तँइ/ तँए जाएब/ जएब लइ/ लै छइ/ छै नहि/ नै/ नइ गइ/ गै छनि/ छन्हि समए शब्दक संग जखन कोनो विभक्ति जुटै छै तखन समै जना समैपर इत्यादि। असगरमे हृदए आ विभक्ति जुटने दृदे जना हृदेसँ, हृदेमे इत्यादि। नीचाँक सूचीमे देल विकल्पमेसँ लैंगुएज एडीटर द्वारा कोन रूप चुनल जएबाक चाही: वर्ड फाइलमे बोल्ड कएल रूप: १.होयबला/ होबयबला/ होमयबला/ हेब’बला, हेम’बला/ होयबाक/होबएबला /होएबाक २. आ’/आऽ आ ३. क’ लेने/कऽ लेने/कए लेने/कय लेने/ल’/लऽ/लय/लए ४. भ’ गेल/भऽ गेल/भय गेल/भए गेल ५. कर’ गेलाह/करऽ गेलह/करए गेलाह/करय गेलाह ६. लिअ/दिअ लिय’,दिय’,लिअ’,दिय’/ ७. कर’ बला/करऽ बला/ करय बला करै बला/क’र’ बला / करए बला ८. बला वला ९. आङ्ल आंग्ल १०. प्रायः प्रायह ११. दुःख दुख १२. चलि गेल चल गेल/चैल गेल १३. देलखिन्ह देलकिन्ह, देलखिन १४. देखलन्हि देखलनि/ देखलैन्ह १५. छथिन्ह/ छलन्हि छथिन/ छलैन/ छलनि १६. चलैत/दैत चलति/दैति १७. एखनो अखनो १८. बढ़न्हि बढन्हि १९. ओ’/ओऽ(सर्वनाम) ओ २०. ओ (संयोजक) ओ’/ओऽ २१. फाँगि/फाङ्गि फाइंग/फाइङ २२. जे जे’/जेऽ २३. ना-नुकुर ना-नुकर २४. केलन्हि/कएलन्हि/कयलन्हि २५. तखन तँ/ तखन तँ २६. जा’ रहल/जाय रहल/जाए रहल २७. निकलय/निकलए लागल बहराय/ बहराए लागल निकल’/बहरै लागल २८. ओतय/जतय जत’/ओत’/ जतए/ ओतए २९. की फूरल जे कि फूरल जे ३०. जे जे’/जेऽ ३१. कूदि/यादि(मोन पारब) कूइद/याइद/कूद/याद/ यादि (मोन) ३२. इहो/ ओहो ३३. हँसए/ हँसय हँसऽ ३४. नौ आकि दस/नौ किंवा दस/ नौ वा दस ३५. सासु-ससुर सास-ससुर ३६. छह/ सात छ/छः/सात ३७. की की’/कीऽ (दीर्घीकारान्तमे ऽ वर्जित) ३८. जबाब जवाब ३९. करएताह/ करयताह करेताह ४०. दलान दिशि दलान दिश/दलान दिस ४१. गेलाह गएलाह/गयलाह ४२. किछु आर/ किछु और ४३. जाइत छल जाति छल/जैत छल ४४. पहुँचि/ भेटि जाइत छल पहुँच/भेट जाइत छल ४५. जबान (युवा)/ जवान(फौजी) ४६. लय/लए क’/कऽ/लए कए/ लऽ कऽ/ लऽ कए ४७. ल’/लऽ कय/ कए ४८. एखन/अखने अखन/एखने ४९. अहींकेँ अहीँकेँ ५०. गहींर गहीँर ५१. धार पार केनाइ धार पार केनाय/केनाए ५२. जेकाँ जेँकाँ/ जकाँ ५३. तहिना तेहिना ५४. एकर अकर ५५. बहिनउ बहनोइ ५६. बहिन बहिनि ५७. बहिन-बहिनोइ बहिन-बहनउ ५८. नहि/ नै ५९. करबा / करबाय/ करबाए ६०. तँ/ त ऽ तय/तए ६१. भाय भै/भाए ६२. भाँय ६३. यावत जावत ६४. माय मै / माए ६५. देन्हि/दएन्हि/ दयन्हि दन्हि/ दैन्हि ६६. द’/ दऽ/ दए ६७. ओ (संयोजक) ओऽ (सर्वनाम) ६८. तका कए तकाय तकाए ६९. पैरे (on foot) पएरे ७०. ताहुमे ताहूमे
७१. पुत्रीक ७२. बजा कय/ कए ७३. बननाय/बननाइ ७४. कोला ७५. दिनुका दिनका ७६. ततहिसँ ७७. गरबओलन्हि गरबेलन्हि ७८. बालु बालू ७९. चेन्ह चिन्ह(अशुद्ध) ८०. जे जे’ ८१. से/ के से’/के’ ८२. एखुनका अखनुका ८३. भुमिहार भूमिहार ८४. सुगर सूगर ८५. झठहाक झटहाक ८६. छूबि ८७. करइयो/ओ करैयो/करिऔ-करइयौ ८८. पुबारि पुबाइ ८९. झगड़ा-झाँटी झगड़ा-झाँटि ९०. पएरे-पएरे पैरे-पैरे ९१. खेलएबाक ९२. खेलेबाक ९३. लगा ९४. होए- हो ९५. बुझल बूझल ९६. बूझल (संबोधन अर्थमे) ९७. यैह यएह / इएह ९८. तातिल ९९. अयनाय- अयनाइ/ अएनाइ १००. निन्न- निन्द १०१. बिनु बिन १०२. जाए जाइ १०३. जाइ (in different sense)-last word of sentence १०४. छत पर आबि जाइ १०५. ने १०६. खेलाए (play) –खेलाइ १०७. शिकाइत- शिकायत १०८. ढप- ढ़प १०९. पढ़- पढ ११०. कनिए/ कनिये कनिञे १११. राकस- राकश ११२. होए/ होय होइ ११३. अउरदा- औरदा ११४. बुझेलन्हि (different meaning- got understand) ११५. बुझएलन्हि/ बुझयलन्हि (understood himself) ११६. चलि- चल ११७. खधाइ- खधाय ११८. मोन पाड़लखिन्ह मोन पारलखिन्ह ११९. कैक- कएक- कइएक १२०. लग ल’ग १२१. जरेनाइ १२२. जरओनाइ- जरएनाइ/जरयनाइ १२३. होइत १२४. गरबेलन्हि/ गरबओलन्हि १२५. चिखैत- (to test)चिखइत १२६. करइयो (willing to do) करैयो १२७. जेकरा- जकरा १२८. तकरा- तेकरा १२९. बिदेसर स्थानेमे/ बिदेसरे स्थानमे १३०. करबयलहुँ/ करबएलहुँ/ करबेलहुँ १३१. हारिक (उच्चारण हाइरक) १३२. ओजन वजन १३३. आधे भाग/ आध-भागे १३४. पिचा / पिचाय/पिचाए १३५. नञ/ ने १३६. बच्चा नञ (ने) पिचा जाय १३७. तखन ने (नञ) कहैत अछि। १३८. कतेक गोटे/ कताक गोटे १३९. कमाइ- धमाइ कमाई- धमाई १४०. लग ल’ग १४१. खेलाइ (for playing) १४२. छथिन्ह छथिन १४३. होइत होइ १४४. क्यो कियो / केओ १४५. केश (hair) १४६. केस (court-case) १४७. बननाइ/ बननाय/ बननाए १४८. जरेनाइ १४९. कुरसी कुर्सी १५०. चरचा चर्चा १५१. कर्म करम १५२. डुबाबए/ डुमाबय/ डुमाबए १५३. एखुनका/ अखुनका १५४. लय (वाक्यक अतिम शब्द)- लऽ १५५. कएलक केलक १५६. गरमी गर्मी १५७. बरदी वर्दी १५८. सुना गेलाह सुना’/सुनाऽ १५९. एनाइ-गेनाइ १६०. तेना ने घेरलन्हि १६१. नञि १६२. डरो ड’रो १६३. कतहु- कहीं १६४. उमरिगर- उमरगर १६५. भरिगर १६६. धोल/धोअल धोएल १६७. गप/गप्प १६८. के के’ १६९. दरबज्जा/ दरबजा १७०. ठाम १७१. धरि तक १७२. घूरि लौटि १७३. थोरबेक १७४. बड्ड १७५. तोँ/ तूँ १७६. तोँहि( पद्यमे ग्राह्य) १७७. तोँही / तोँहि १७८. करबाइए करबाइये १७९. एकेटा १८०. करितथि करतथि
१८१. पहुँचि पहुँच १८२. राखलन्हि रखलन्हि १८३. लगलन्हि लागलन्हि १८४. सुनि (उच्चारण सुइन) १८५. अछि (उच्चारण अइछ) १८६. एलथि गेलथि १८७. बितओने बितेने १८८. करबओलन्हि/ करेलखिन्ह १८९. करएलन्हि १९०. आकि कि १९१. पहुँचि पहुँच १९२. जराय/ जराए जरा (आगि लगा) १९३. से से’ १९४. हाँ मे हाँ (हाँमे हाँ विभक्त्तिमे हटा कए) १९५. फेल फैल १९६. फइल(spacious) फैल १९७. होयतन्हि/ होएतन्हि हेतन्हि १९८. हाथ मटिआयब/ हाथ मटियाबय/हाथ मटिआएब १९९. फेका फेंका २००. देखाए देखा २०१. देखाबए २०२. सत्तरि सत्तर २०३. साहेब साहब २०४.गेलैन्ह/ गेलन्हि २०५.हेबाक/ होएबाक २०६.केलो/ कएलहुँ २०७. किछु न किछु/ किछु ने किछु २०८.घुमेलहुँ/ घुमओलहुँ २०९. एलाक/ अएलाक २१०. अः/ अह २११.लय/ लए (अर्थ-परिवर्त्तन) २१२.कनीक/ कनेक २१३.सबहक/ सभक २१४.मिलाऽ/ मिला २१५.कऽ/ क २१६.जाऽ/ जा २१७.आऽ/ आ २१८.भऽ/भ’ (’ फॉन्टक कमीक द्योतक) २१९.निअम/ नियम २२०.हेक्टेअर/ हेक्टेयर २२१.पहिल अक्षर ढ/ बादक/बीचक ढ़ २२२.तहिं/तहिँ/ तञि/ तैं २२३.कहिं/ कहीं २२४.तँइ/ तइँ २२५.नँइ/ नइँ/ नञि/ नहि २२६.है/ हए २२७.छञि/ छै/ छैक/छइ २२८.दृष्टिएँ/ दृष्टियेँ २२९.आ (come)/ आऽ(conjunction) २३०. आ (conjunction)/ आऽ(come) २३१.कुनो/ कोनो २३२.गेलैन्ह-गेलन्हि २३३.हेबाक- होएबाक २३४.केलौँ- कएलौँ- कएलहुँ २३५.किछु न किछ- किछु ने किछु २३६.केहेन- केहन २३७.आऽ (come)-आ (conjunction-and)/आ २३८. हएत-हैत २३९.घुमेलहुँ-घुमएलहुँ २४०.एलाक- अएलाक २४१.होनि- होइन/होन्हि २४२.ओ-राम ओ श्यामक बीच(conjunction), ओऽ कहलक (he said)/ओ २४३.की हए/ कोसी अएली हए/ की है। की हइ २४४.दृष्टिएँ/ दृष्टियेँ २४५.शामिल/ सामेल २४६.तैँ / तँए/ तञि/ तहिं २४७.जौँ/ ज्योँ २४८.सभ/ सब २४९.सभक/ सबहक २५०.कहिं/ कहीं २५१.कुनो/ कोनो २५२.फारकती भऽ गेल/ भए गेल/ भय गेल २५३.कुनो/ कोनो २५४.अः/ अह २५५.जनै/ जनञ २५६.गेलन्हि/ गेलाह (अर्थ परिवर्तन) २५७.केलन्हि/ कएलन्हि २५८.लय/ लए (अर्थ परिवर्तन) २५९.कनीक/ कनेक २६०.पठेलन्हि/ पठओलन्हि २६१.निअम/ नियम २६२.हेक्टेअर/ हेक्टेयर २६३.पहिल अक्षर रहने ढ/ बीचमे रहने ढ़ २६४.आकारान्तमे बिकारीक प्रयोग उचित नहि/ अपोस्ट्रोफीक प्रयोग फान्टक तकनीकी न्यूनताक परिचायक ओकर बदला अवग्रह (बिकारी) क प्रयोग उचित २६५.केर/-क/ कऽ/ के २६६.छैन्हि- छन्हि २६७.लगैए/ लगैये २६८.होएत/ हएत २६९.जाएत/ जएत २७०.आएत/ अएत/ आओत २७१.खाएत/ खएत/ खैत २७२.पिअएबाक/ पिएबाक २७३.शुरु/ शुरुह २७४.शुरुहे/ शुरुए २७५.अएताह/अओताह/ एताह २७६.जाहि/ जाइ/ जै २७७.जाइत/ जैतए/ जइतए २७८.आएल/ अएल २७९.कैक/ कएक २८०.आयल/ अएल/ आएल २८१. जाए/ जै/ जए २८२. नुकएल/ नुकाएल २८३. कठुआएल/ कठुअएल २८४. ताहि/ तै २८५. गायब/ गाएब/ गएब २८६. सकै/ सकए/ सकय २८७.सेरा/सरा/ सराए (भात सेरा गेल) २८८.कहैत रही/देखैत रही/ कहैत छलहुँ/ कहै छलहुँ- एहिना चलैत/ पढ़ैत (पढ़ै-पढ़ैत अर्थ कखनो काल परिवर्तित)-आर बुझै/ बुझैत (बुझै/ बुझैत छी, मुदा बुझैत-बुझैत)/ सकैत/ सकै। करैत/ करै। दै/ दैत। छैक/ छै। बचलै/ बचलैक। रखबा/ रखबाक । बिनु/ बिन। रातिक/ रातुक २८९. दुआरे/ द्वारे २९०.भेटि/ भेट २९१. खन/ खुना (भोर खन/ भोर खुना) २९२.तक/ धरि २९३.गऽ/गै (meaning different-जनबै गऽ) २९४.सऽ/ सँ (मुदा दऽ, लऽ) २९५.त्त्व,(तीन अक्षरक मेल बदला पुनरुक्तिक एक आ एकटा दोसरक उपयोग) आदिक बदला त्व आदि। महत्त्व/ महत्व/ कर्ता/ कर्त्ता आदिमे त्त संयुक्तक कोनो आवश्यकता मैथिलीमे नहि अछि। वक्तव्य २९६.बेसी/ बेशी २९७.बाला/वाला बला/ वला (रहैबला) २९८.वाली/ (बदलएवाली) २९९.वार्त्ता/ वार्ता ३००. अन्तर्राष्ट्रिय/ अन्तर्राष्ट्रीय ३०१. लेमए/ लेबए ३०२.लमछुरका, नमछुरका ३०२.लागै/ लगै (भेटैत/ भेटै) ३०३.लागल/ लगल ३०४.हबा/ हवा ३०५.राखलक/ रखलक ३०६.आ (come)/ आ (and) ३०७. पश्चाताप/ पश्चात्ताप ३०८. ऽ केर व्यवहार शब्दक अन्तमे मात्र, यथासंभव बीचमे नहि। ३०९.कहैत/ कहै ३१०. रहए (छल)/ रहै (छलै) (meaning different) ३११.तागति/ ताकति ३१२.खराप/ खराब ३१३.बोइन/ बोनि/ बोइनि ३१४.जाठि/ जाइठ ३१५.कागज/ कागच ३१६.गिरै (meaning different- swallow)/ गिरए (खसए) ३१७.राष्ट्रिय/ राष्ट्रीय उच्चारण निर्देश: दन्त न क उच्चारणमे दाँतमे जीह सटत- जेना बाजू नाम , मुदा ण क उच्चारणमे जीह मूर्धामे सटत (नहि सटैए तँ उच्चारण दोष अछि)- जेना बाजू गणेश। तालव्य शमे जीह तालुसँ , षमे मूर्धासँ आ दन्त समे दाँतसँ सटत। निशाँ, सभ आ शोषण बाजि कऽ देखू। मैथिलीमे ष केँ वैदिक संस्कृत जेकाँ ख सेहो उच्चरित कएल जाइत अछि, जेना वर्षा, दोष। य अनेको स्थानपर ज जेकाँ उच्चरित होइत अछि आ ण ड़ जेकाँ (यथा संयोग आ गणेश संजोग आ गड़ेस उच्चरित होइत अछि)। मैथिलीमे व क उच्चारण ब, श क उच्चारण स आ य क उच्चारण ज सेहो होइत अछि। ओहिना ह्रस्व इ बेशीकाल मैथिलीमे पहिने बाजल जाइत अछि कारण देवनागरीमे आ मिथिलाक्षरमे ह्रस्व इ अक्षरक पहिने लिखलो जाइत आ बाजलो जएबाक चाही। कारण जे हिन्दीमे एकर दोषपूर्ण उच्चारण होइत अछि (लिखल तँ पहिने जाइत अछि मुदा बाजल बादमे जाइत अछि), से शिक्षा पद्धतिक दोषक कारण हम सभ ओकर उच्चारण दोषपूर्ण ढंगसँ कऽ रहल छी। अछि- अ इ छ ऐछ छथि- छ इ थ – छैथ पहुँचि- प हुँ इ च आब अ आ इ ई ए ऐ ओ औ अं अः ऋ एहि सभ लेल मात्रा सेहो अछि, मुदा एहिमे ई ऐ ओ औ अं अः ऋ केँ संयुक्ताक्षर रूपमे गलत रूपमे प्रयुक्त आ उच्चरित कएल जाइत अछि। जेना ऋ केँ री रूपमे उच्चरित करब। आ देखियौ- एहि लेल देखिऔ क प्रयोग अनुचित। मुदा देखिऐ लेल देखियै अनुचित। क् सँ ह् धरि अ सम्मिलित भेलासँ क सँ ह बनैत अछि, मुदा उच्चारण काल हलन्त युक्त शब्दक अन्तक उच्चारणक प्रवृत्ति बढ़ल अछि, मुदा हम जखन मनोजमे ज् अन्तमे बजैत छी, तखनो पुरनका लोककेँ बजैत सुनबन्हि- मनोजऽ, वास्तवमे ओ अ युक्त ज् = ज बजै छथि। फेर ज्ञ अछि ज् आ ञ क संयुक्त मुदा गलत उच्चारण होइत अछि- ग्य। ओहिना क्ष अछि क् आ ष क संयुक्त मुदा उच्चारण होइत अछि छ। फेर श् आ र क संयुक्त अछि श्र ( जेना श्रमिक) आ स् आ र क संयुक्त अछि स्र (जेना मिस्र)। त्र भेल त+र । उच्चारणक ऑडियो फाइल विदेह आर्काइव http://www.videha.co.in/ पर उपलब्ध अछि। फेर केँ / सँ / पर पूर्व अक्षरसँ सटा कऽ लिखू मुदा तँ/ के/ कऽ हटा कऽ। एहिमे सँ मे पहिल सटा कऽ लिखू आ बादबला हटा कऽ। अंकक बाद टा लिखू सटा कऽ मुदा अन्य ठाम टा लिखू हटा कऽ– जेना छहटा मुदा सभ टा। फेर ६अ म सातम लिखू- छठम सातम नहि। घरबलामे बला मुदा घरवालीमे वाली प्रयुक्त करू। रहए- रहै मुदा सकैए (उच्चारण सकै-ए)। मुदा कखनो काल रहए आ रहै मे अर्थ भिन्नता सेहो, जेना से कम्मो जगहमे पार्किंग करबाक अभ्यास रहै ओकरा। पुछलापर पता लागल जे ढुनढुन नाम्ना ई ड्राइवर कनाट प्लेसक पार्किंगमे काज करैत रहए। छलै, छलए मे सेहो एहि तरहक भेल। छलए क उच्चारण छल-ए सेहो। संयोगने- (उच्चारण संजोगने) केँ/ के / कऽ केर- क (केर क प्रयोग नहि करू ) क (जेना रामक) –रामक आ संगे (उच्चारण राम के / राम कऽ सेहो) सँ- सऽ चन्द्रबिन्दु आ अनुस्वार- अनुस्वारमे कंठ धरिक प्रयोग होइत अछि मुदा चन्द्रबिन्दुमे नहि। चन्द्रबिन्दुमे कनेक एकारक सेहो उच्चारण होइत अछि- जेना रामसँ- (उच्चारण राम सऽ) रामकेँ- (उच्चारण राम कऽ/ राम के सेहो)। केँ जेना रामकेँ भेल हिन्दीक को (राम को)- राम को= रामकेँ क जेना रामक भेल हिन्दीक का ( राम का) राम का= रामक कऽ जेना जा कऽ भेल हिन्दीक कर ( जा कर) जा कर= जा कऽ सँ भेल हिन्दीक से (राम से) राम से= रामसँ सऽ तऽ त केर एहि सभक प्रयोग अवांछित। के दोसर अर्थेँ प्रयुक्त भऽ सकैए- जेना के कहलक? नञि, नहि, नै, नइ, नँइ, नइँ एहि सभक उच्चारण- नै त्त्व क बदलामे त्व जेना महत्वपूर्ण (महत्त्वपूर्ण नहि) जतए अर्थ बदलि जाए ओतहि मात्र तीन अक्षरक संयुक्ताक्षरक प्रयोग उचित। सम्पति- उच्चारण स म्प इ त (सम्पत्ति नहि- कारण सही उच्चारण आसानीसँ सम्भव नहि)। मुदा सर्वोत्तम (सर्वोतम नहि)। राष्ट्रिय (राष्ट्रीय नहि) सकैए/ सकै (अर्थ परिवर्तन) पोछैले/ पोछैए/ पोछए/ (अर्थ परिवर्तन) पोछए/ पोछै ओ लोकनि ( हटा कऽ, ओ मे बिकारी नहि) ओइ/ ओहि ओहिले/ ओहि लेल जएबेँ/ बैसबेँ पँचभइयाँ देखियौक (देखिऔक बहि- तहिना अ मे ह्रस्व आ दीर्घक मात्राक प्रयोग अनुचित) जकाँ/ जेकाँ तँइ/ तैँ होएत/ हएत नञि/ नहि/ नँइ/ नइँ सौँसे बड़/ बड़ी (झोराओल) गाए (गाइ नहि) रहलेँ/ पहिरतैँ हमहीं/ अहीं सब - सभ सबहक - सभहक धरि - तक गप- बात बूझब - समझब बुझलहुँ - समझलहुँ हमरा आर - हम सभ आकि- आ कि सकैछ/ करैछ (गद्यमे प्रयोगक आवश्यकता नहि) मे केँ सँ पर (शब्दसँ सटा कऽ) तँ कऽ धऽ दऽ (शब्दसँ हटा कऽ) मुदा दूटा वा बेशी विभक्ति संग रहलापर पहिल विभक्ति टाकेँ सटाऊ। एकटा दूटा (मुदा कैक टा) बिकारीक प्रयोग शब्दक अन्तमे, बीचमे अनावश्यक रूपेँ नहि। आकारान्त आ अन्तमे अ क बाद बिकारीक प्रयोग नहि (जेना दिअ, आ ) अपोस्ट्रोफीक प्रयोग बिकारीक बदलामे करब अनुचित आ मात्र फॉन्टक तकनीकी न्यूनताक परिचायक)- ओना बिकारीक संस्कृत रूप ऽ अवग्रह कहल जाइत अछि आ वर्तनी आ उच्चारण दुनू ठाम एकर लोप रहैत अछि/ रहि सकैत अछि (उच्चारणमे लोप रहिते अछि)। मुदा अपोस्ट्रोफी सेहो अंग्रेजीमे पसेसिव केसमे होइत अछि आ फ्रेंचमे शब्दमे जतए एकर प्रयोग होइत अछि जेना raison d’etre एतए सेहो एकर उच्चारण रैजौन डेटर होइत अछि, माने अपोस्ट्रॉफी अवकाश नहि दैत अछि वरन जोड़ैत अछि, से एकर प्रयोग बिकारीक बदला देनाइ तकनीकी रूपेँ सेहो अनुचित)। अइमे, एहिमे जइमे, जाहिमे एखन/ अखन/ अइखन केँ (के नहि) मे (अनुस्वार रहित) भऽ मे दऽ तँ (तऽ त नहि) सँ ( सऽ स नहि) गाछ तर गाछ लग साँझ खन जो (जो go, करै जो do) Festivals of Mithila DATE-LIST (year- 2010-11) (१४१८ साल) Marriage Days: Nov.2010- 19 Dec.2010- 3,8 January 2011- 17, 21, 23, 24, 26, 27, 28 31 Feb.2011- 3, 4, 7, 9, 18, 20, 24, 25, 27, 28 March 2011- 2, 7 May 2011- 11, 12, 13, 18, 19, 20, 22, 23, 29, 30 June 2011- 1, 2, 3, 8, 9, 10, 12, 13, 19, 20, 26, 29 Upanayana Days: February 2011- 8 March 2011- 7 May 2011- 12, 13 June 2011- 6, 12 Dviragaman Din: November 2010- 19, 22, 25, 26 December 2010- 6, 8, 9, 10, 12 February 2011- 20, 21 March 2011- 6, 7, 9, 13 April 2011- 17, 18, 22 May 2011- 5, 6, 8, 13 Mundan Din: November 2010- 24, 26 December 2010- 10, 17 February 2011- 4, 16, 21 March 2011- 7, 9 April 2011- 22 May 2011- 6, 9, 19 June 2011- 3, 6, 10, 20 FESTIVALS OF MITHILA Mauna Panchami-31 July Somavati Amavasya Vrat- 1 August Madhushravani-12 August Nag Panchami- 14 August Raksha Bandhan- 24 Aug Krishnastami- 01 September Kushi Amavasya- 08 September Hartalika Teej- 11 September ChauthChandra-11 September Vishwakarma Pooja- 17 September Karma Dharma Ekadashi-19 September Indra Pooja Aarambh- 20 September Anant Caturdashi- 22 Sep Agastyarghadaan- 23 Sep Pitri Paksha begins- 24 Sep Jimootavahan Vrata/ Jitia-30 Sep Matri Navami- 02 October Kalashsthapan- 08 October Belnauti- 13 October Patrika Pravesh- 14 October Mahastami- 15 October Maha Navami - 16-17 October Vijaya Dashami- 18 October Kojagara- 22 Oct Dhanteras- 3 November Diyabati, shyama pooja- 5 November Annakoota/ Govardhana Pooja-07 November Bhratridwitiya/ Chitragupta Pooja-08 November Chhathi- -12 November Akshyay Navami- 15 November Devotthan Ekadashi- 17 November Kartik Poornima/ Sama Bisarjan- 21 Nov Shaa. ravivratarambh- 21 November Navanna parvan- 24 -26 November Vivaha Panchmi- 10 December Naraknivaran chaturdashi- 01 February Makara/ Teela Sankranti-15 Jan Basant Panchami/ Saraswati Pooja- 08 Februaqry Achla Saptmi- 10 February Mahashivaratri-03 March Holikadahan-Fagua-19 March Holi-20 Mar Varuni Yoga- 31 March va.navaratrarambh- 4 April vaa. Chhathi vrata- 9 April Ram Navami- 12 April Mesha Sankranti-Satuani-14 April Jurishital-15 April Somavati Amavasya Vrata- 02 May Ravi Brat Ant- 08 May Akshaya Tritiya-06 May Janaki Navami- 12 May Vat Savitri-barasait- 01 June Ganga Dashhara-11 June Jagannath Rath Yatra- 3 July Hari Sayan Ekadashi- 11 Jul Aashadhi Guru Poornima-15 Jul VIDEHA ARCHIVE १.विदेह ई-पत्रिकाक सभटा पुरान अंक ब्रेल, तिरहुता आ देवनागरी रूपमे Videha e journal's all old issues in Braille Tirhuta and Devanagari versions विदेह ई-पत्रिकाक पहिल ५० अंक
विदेह ई-पत्रिकाक ५०म सँ आगाँक अंक २.मैथिली पोथी डाउनलोड Maithili Books Download ३.मैथिली ऑडियो संकलन Maithili Audio Downloads ४.मैथिली वीडियोक संकलन Maithili Videos ५.मिथिला चित्रकला/ आधुनिक चित्रकला आ चित्र Mithila Painting/ Modern Art and Photos "विदेह"क एहि सभ सहयोगी लिंकपर सेहो एक बेर जाऊ। ६.विदेह मैथिली क्विज : http://videhaquiz.blogspot.com/ ७.विदेह मैथिली जालवृत्त एग्रीगेटर : http://videha-aggregator.blogspot.com/ ८.विदेह मैथिली साहित्य अंग्रेजीमे अनूदित http://madhubani-art.blogspot.com/ ९.विदेहक पूर्व-रूप "भालसरिक गाछ" : http://gajendrathakur.blogspot.com/ १०.विदेह इंडेक्स : http://videha123.blogspot.com/ ११.विदेह फाइल : http://videha123.wordpress.com/ १२. विदेह: सदेह : पहिल तिरहुता (मिथिला़क्षर) जालवृत्त (ब्लॉग) http://videha-sadeha.blogspot.com/ १३. विदेह:ब्रेल: मैथिली ब्रेलमे: पहिल बेर विदेह द्वारा http://videha-braille.blogspot.com/ १४.VIDEHA IST MAITHILI FORTNIGHTLY EJOURNAL ARCHIVE http://videha-archive.blogspot.com/ १५. विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका मैथिली पोथीक आर्काइव http://videha-pothi.blogspot.com/ १६. विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका ऑडियो आर्काइव http://videha-audio.blogspot.com/ १७. विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका वीडियो आर्काइव http://videha-video.blogspot.com/ १८. विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका मिथिला चित्रकला, आधुनिक कला आ चित्रकला http://videha-paintings-photos.blogspot.com/ १९. मैथिल आर मिथिला (मैथिलीक सभसँ लोकप्रिय जालवृत्त) http://maithilaurmithila.blogspot.com/ २०.श्रुति प्रकाशन http://www.shruti-publication.com/ २१.http://groups.google.com/group/videha VIDEHA केर सदस्यता लिअ Top of Form Bottom of Form ईमेल : एहि समूहपर जाऊ २२.http://groups.yahoo.com/group/VIDEHA/ Top of Form Subscribe to VIDEHA Powered by us.groups.yahoo.com Bottom of Form २३.गजेन्द्र ठाकुर इडेक्स http://gajendrathakur123.blogspot.com २४.विदेह रेडियो:मैथिली कथा-कविता आदिक पहिल पोडकास्ट साइट http://videha123radio.wordpress.com/ २५. नेना भुटका http://mangan-khabas.blogspot.com/ महत्त्वपूर्ण सूचना:(१) 'विदेह' द्वारा धारावाहिक रूपे ई-प्रकाशित कएल गेल गजेन्द्र ठाकुरक निबन्ध-प्रबन्ध-समीक्षा, उपन्यास (सहस्रबाढ़नि) , पद्य-संग्रह (सहस्राब्दीक चौपड़पर), कथा-गल्प (गल्प-गुच्छ), नाटक(संकर्षण), महाकाव्य (त्वञ्चाहञ्च आ असञ्जाति मन) आ बाल-किशोर साहित्य विदेहमे संपूर्ण ई-प्रकाशनक बाद प्रिंट फॉर्ममे। कुरुक्षेत्रम्–अन्तर्मनक खण्ड-१ सँ ७ Combined ISBN No.978-81-907729-7-6 विवरण एहि पृष्ठपर नीचाँमे आ प्रकाशकक साइट http://www.shruti-publication.com/ पर । महत्त्वपूर्ण सूचना (२):सूचना: विदेहक मैथिली-अंग्रेजी आ अंग्रेजी मैथिली कोष (इंटरनेटपर पहिल बेर सर्च-डिक्शनरी) एम.एस. एस.क्यू.एल. सर्वर आधारित -Based on ms-sql server Maithili-English and English-Maithili Dictionary. विदेहक भाषापाक- रचनालेखन स्तंभमे। कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक- गजेन्द्र ठाकुर गजेन्द्र ठाकुरक निबन्ध-प्रबन्ध-समीक्षा, उपन्यास (सहस्रबाढ़नि) , पद्य-संग्रह (सहस्राब्दीक चौपड़पर), कथा-गल्प (गल्प गुच्छ), नाटक(संकर्षण), महाकाव्य (त्वञ्चाहञ्च आ असञ्जाति मन) आ बालमंडली-किशोरजगत विदेहमे संपूर्ण ई-प्रकाशनक बाद प्रिंट फॉर्ममे। कुरुक्षेत्रम्–अन्तर्मनक, खण्ड-१ सँ ७ Ist edition 2009 of Gajendra Thakur’s KuruKshetram-Antarmanak (Vol. I to VII)- essay-paper-criticism, novel, poems, story, play, epics and Children-grown-ups literature in single binding: Language:Maithili ६९२ पृष्ठ : मूल्य भा. रु. 100/-(for individual buyers inside india) (add courier charges Rs.50/-per copy for Delhi/NCR and Rs.100/- per copy for outside Delhi)
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Details for purchase available at print-version publishers's site website: http://www.shruti-publication.com/ or you may write to e-mail:shruti.publication@shruti-publication.com विदेह: सदेह : १: २: ३: ४ तिरहुता : देवनागरी "विदेह" क, प्रिंट संस्करण :विदेह-ई-पत्रिका (http://www.videha.co.in/) क चुनल रचना सम्मिलित। विदेह:सदेह:१: २: ३: ४ सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। Details for purchase available at print-version publishers's site http://www.shruti-publication.com or you may write to shruti.publication@shruti-publication.com २. संदेश- [ विदेह ई-पत्रिका, विदेह:सदेह मिथिलाक्षर आ देवनागरी आ गजेन्द्र ठाकुरक सात खण्डक- निबन्ध-प्रबन्ध-समीक्षा,उपन्यास (सहस्रबाढ़नि) , पद्य-संग्रह (सहस्राब्दीक चौपड़पर), कथा-गल्प (गल्प गुच्छ), नाटक (संकर्षण), महाकाव्य (त्वञ्चाहञ्च आ असञ्जाति मन) आ बाल-मंडली-किशोर जगत- संग्रह कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक मादेँ। ] १.श्री गोविन्द झा- विदेहकेँ तरंगजालपर उतारि विश्वभरिमे मातृभाषा मैथिलीक लहरि जगाओल, खेद जे अपनेक एहि महाभियानमे हम एखन धरि संग नहि दए सकलहुँ। सुनैत छी अपनेकेँ सुझाओ आ रचनात्मक आलोचना प्रिय लगैत अछि तेँ किछु लिखक मोन भेल। हमर सहायता आ सहयोग अपनेकेँ सदा उपलब्ध रहत। २.श्री रमानन्द रेणु- मैथिलीमे ई-पत्रिका पाक्षिक रूपेँ चला कऽ जे अपन मातृभाषाक प्रचार कऽ रहल छी, से धन्यवाद । आगाँ अपनेक समस्त मैथिलीक कार्यक हेतु हम हृदयसँ शुभकामना दऽ रहल छी। ३.श्री विद्यानाथ झा "विदित"- संचार आ प्रौद्योगिकीक एहि प्रतिस्पर्धी ग्लोबल युगमे अपन महिमामय "विदेह"केँ अपना देहमे प्रकट देखि जतबा प्रसन्नता आ संतोष भेल, तकरा कोनो उपलब्ध "मीटर"सँ नहि नापल जा सकैछ? ..एकर ऐतिहासिक मूल्यांकन आ सांस्कृतिक प्रतिफलन एहि शताब्दीक अंत धरि लोकक नजरिमे आश्चर्यजनक रूपसँ प्रकट हैत। ४. प्रो. उदय नारायण सिंह "नचिकेता"- जे काज अहाँ कए रहल छी तकर चरचा एक दिन मैथिली भाषाक इतिहासमे होएत। आनन्द भए रहल अछि, ई जानि कए जे एतेक गोट मैथिल "विदेह" ई जर्नलकेँ पढ़ि रहल छथि।...विदेहक चालीसम अंक पुरबाक लेल अभिनन्दन। ५. डॉ. गंगेश गुंजन- एहि विदेह-कर्ममे लागि रहल अहाँक सम्वेदनशील मन, मैथिलीक प्रति समर्पित मेहनतिक अमृत रंग, इतिहास मे एक टा विशिष्ट फराक अध्याय आरंभ करत, हमरा विश्वास अछि। अशेष शुभकामना आ बधाइक सङ्ग, सस्नेह...अहाँक पोथी कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक प्रथम दृष्टया बहुत भव्य तथा उपयोगी बुझाइछ। मैथिलीमे तँ अपना स्वरूपक प्रायः ई पहिले एहन भव्य अवतारक पोथी थिक। हर्षपूर्ण हमर हार्दिक बधाई स्वीकार करी। ६. श्री रामाश्रय झा "रामरंग"(आब स्वर्गीय)- "अपना" मिथिलासँ संबंधित...विषय वस्तुसँ अवगत भेलहुँ।...शेष सभ कुशल अछि। ७. श्री ब्रजेन्द्र त्रिपाठी- साहित्य अकादमी- इंटरनेट पर प्रथम मैथिली पाक्षिक पत्रिका "विदेह" केर लेल बधाई आ शुभकामना स्वीकार करू। ८. श्री प्रफुल्लकुमार सिंह "मौन"- प्रथम मैथिली पाक्षिक पत्रिका "विदेह" क प्रकाशनक समाचार जानि कनेक चकित मुदा बेसी आह्लादित भेलहुँ। कालचक्रकेँ पकड़ि जाहि दूरदृष्टिक परिचय देलहुँ, ओहि लेल हमर मंगलकामना। ९.डॉ. शिवप्रसाद यादव- ई जानि अपार हर्ष भए रहल अछि, जे नव सूचना-क्रान्तिक क्षेत्रमे मैथिली पत्रकारिताकेँ प्रवेश दिअएबाक साहसिक कदम उठाओल अछि। पत्रकारितामे एहि प्रकारक नव प्रयोगक हम स्वागत करैत छी, संगहि "विदेह"क सफलताक शुभकामना। १०. श्री आद्याचरण झा- कोनो पत्र-पत्रिकाक प्रकाशन- ताहूमे मैथिली पत्रिकाक प्रकाशनमे के कतेक सहयोग करताह- ई तऽ भविष्य कहत। ई हमर ८८ वर्षमे ७५ वर्षक अनुभव रहल। एतेक पैघ महान यज्ञमे हमर श्रद्धापूर्ण आहुति प्राप्त होयत- यावत ठीक-ठाक छी/ रहब। ११. श्री विजय ठाकुर- मिशिगन विश्वविद्यालय- "विदेह" पत्रिकाक अंक देखलहुँ, सम्पूर्ण टीम बधाईक पात्र अछि। पत्रिकाक मंगल भविष्य हेतु हमर शुभकामना स्वीकार कएल जाओ। १२. श्री सुभाषचन्द्र यादव- ई-पत्रिका "विदेह" क बारेमे जानि प्रसन्नता भेल। ’विदेह’ निरन्तर पल्लवित-पुष्पित हो आ चतुर्दिक अपन सुगंध पसारय से कामना अछि। १३. श्री मैथिलीपुत्र प्रदीप- ई-पत्रिका "विदेह" केर सफलताक भगवतीसँ कामना। हमर पूर्ण सहयोग रहत। १४. डॉ. श्री भीमनाथ झा- "विदेह" इन्टरनेट पर अछि तेँ "विदेह" नाम उचित आर कतेक रूपेँ एकर विवरण भए सकैत अछि। आइ-काल्हि मोनमे उद्वेग रहैत अछि, मुदा शीघ्र पूर्ण सहयोग देब।कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक देखि अति प्रसन्नता भेल। मैथिलीक लेल ई घटना छी। १५. श्री रामभरोस कापड़ि "भ्रमर"- जनकपुरधाम- "विदेह" ऑनलाइन देखि रहल छी। मैथिलीकेँ अन्तर्राष्ट्रीय जगतमे पहुँचेलहुँ तकरा लेल हार्दिक बधाई। मिथिला रत्न सभक संकलन अपूर्व। नेपालोक सहयोग भेटत, से विश्वास करी। १६. श्री राजनन्दन लालदास- "विदेह" ई-पत्रिकाक माध्यमसँ बड़ नीक काज कए रहल छी, नातिक अहिठाम देखलहुँ। एकर वार्षिक अंक जखन प्रिंट निकालब तँ हमरा पठायब। कलकत्तामे बहुत गोटेकेँ हम साइटक पता लिखाए देने छियन्हि। मोन तँ होइत अछि जे दिल्ली आबि कए आशीर्वाद दैतहुँ, मुदा उमर आब बेशी भए गेल। शुभकामना देश-विदेशक मैथिलकेँ जोड़बाक लेल।.. उत्कृष्ट प्रकाशन कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक लेल बधाइ। अद्भुत काज कएल अछि, नीक प्रस्तुति अछि सात खण्डमे। मुदा अहाँक सेवा आ से निःस्वार्थ तखन बूझल जाइत जँ अहाँ द्वारा प्रकाशित पोथी सभपर दाम लिखल नहि रहितैक। ओहिना सभकेँ विलहि देल जइतैक। (स्पष्टीकरण- श्रीमान्, अहाँक सूचनार्थ विदेह द्वारा ई-प्रकाशित कएल सभटा सामग्री आर्काइवमे https://sites.google.com/a/videha.com/videha-pothi/ पर बिना मूल्यक डाउनलोड लेल उपलब्ध छै आ भविष्यमे सेहो रहतैक। एहि आर्काइवकेँ जे कियो प्रकाशक अनुमति लऽ कऽ प्रिंट रूपमे प्रकाशित कएने छथि आ तकर ओ दाम रखने छथि ताहिपर हमर कोनो नियंत्रण नहि अछि।- गजेन्द्र ठाकुर)... अहाँक प्रति अशेष शुभकामनाक संग। १७. डॉ. प्रेमशंकर सिंह- अहाँ मैथिलीमे इंटरनेटपर पहिल पत्रिका "विदेह" प्रकाशित कए अपन अद्भुत मातृभाषानुरागक परिचय देल अछि, अहाँक निःस्वार्थ मातृभाषानुरागसँ प्रेरित छी, एकर निमित्त जे हमर सेवाक प्रयोजन हो, तँ सूचित करी। इंटरनेटपर आद्योपांत पत्रिका देखल, मन प्रफुल्लित भऽ गेल। १८.श्रीमती शेफालिका वर्मा- विदेह ई-पत्रिका देखि मोन उल्लाससँ भरि गेल। विज्ञान कतेक प्रगति कऽ रहल अछि...अहाँ सभ अनन्त आकाशकेँ भेदि दियौ, समस्त विस्तारक रहस्यकेँ तार-तार कऽ दियौक...। अपनेक अद्भुत पुस्तक कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक विषयवस्तुक दृष्टिसँ गागरमे सागर अछि। बधाई। १९.श्री हेतुकर झा, पटना-जाहि समर्पण भावसँ अपने मिथिला-मैथिलीक सेवामे तत्पर छी से स्तुत्य अछि। देशक राजधानीसँ भय रहल मैथिलीक शंखनाद मिथिलाक गाम-गाममे मैथिली चेतनाक विकास अवश्य करत। २०. श्री योगानन्द झा, कबिलपुर, लहेरियासराय- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पोथीकेँ निकटसँ देखबाक अवसर भेटल अछि आ मैथिली जगतक एकटा उद्भट ओ समसामयिक दृष्टिसम्पन्न हस्ताक्षरक कलमबन्द परिचयसँ आह्लादित छी। "विदेह"क देवनागरी सँस्करण पटनामे रु. 80/- मे उपलब्ध भऽ सकल जे विभिन्न लेखक लोकनिक छायाचित्र, परिचय पत्रक ओ रचनावलीक सम्यक प्रकाशनसँ ऐतिहासिक कहल जा सकैछ। २१. श्री किशोरीकान्त मिश्र- कोलकाता- जय मैथिली, विदेहमे बहुत रास कविता, कथा, रिपोर्ट आदिक सचित्र संग्रह देखि आ आर अधिक प्रसन्नता मिथिलाक्षर देखि- बधाई स्वीकार कएल जाओ। २२.श्री जीवकान्त- विदेहक मुद्रित अंक पढ़ल- अद्भुत मेहनति। चाबस-चाबस। किछु समालोचना मरखाह..मुदा सत्य। २३. श्री भालचन्द्र झा- अपनेक कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक देखि बुझाएल जेना हम अपने छपलहुँ अछि। एकर विशालकाय आकृति अपनेक सर्वसमावेशताक परिचायक अछि। अपनेक रचना सामर्थ्यमे उत्तरोत्तर वृद्धि हो, एहि शुभकामनाक संग हार्दिक बधाई। २४.श्रीमती डॉ नीता झा- अहाँक कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़लहुँ। ज्योतिरीश्वर शब्दावली, कृषि मत्स्य शब्दावली आ सीत बसन्त आ सभ कथा, कविता, उपन्यास, बाल-किशोर साहित्य सभ उत्तम छल। मैथिलीक उत्तरोत्तर विकासक लक्ष्य दृष्टिगोचर होइत अछि। २५.श्री मायानन्द मिश्र- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक मे हमर उपन्यास स्त्रीधनक जे विरोध कएल गेल अछि तकर हम विरोध करैत छी।... कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पोथीक लेल शुभकामना।(श्रीमान् समालोचनाकेँ विरोधक रूपमे नहि लेल जाए।-गजेन्द्र ठाकुर) २६.श्री महेन्द्र हजारी- सम्पादक श्रीमिथिला- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़ि मोन हर्षित भऽ गेल..एखन पूरा पढ़यमे बहुत समय लागत, मुदा जतेक पढ़लहुँ से आह्लादित कएलक। २७.श्री केदारनाथ चौधरी- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक अद्भुत लागल, मैथिली साहित्य लेल ई पोथी एकटा प्रतिमान बनत। २८.श्री सत्यानन्द पाठक- विदेहक हम नियमित पाठक छी। ओकर स्वरूपक प्रशंसक छलहुँ। एम्हर अहाँक लिखल - कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक देखलहुँ। मोन आह्लादित भऽ उठल। कोनो रचना तरा-उपरी। २९.श्रीमती रमा झा-सम्पादक मिथिला दर्पण। कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक प्रिंट फॉर्म पढ़ि आ एकर गुणवत्ता देखि मोन प्रसन्न भऽ गेल, अद्भुत शब्द एकरा लेल प्रयुक्त कऽ रहल छी। विदेहक उत्तरोत्तर प्रगतिक शुभकामना। ३०.श्री नरेन्द्र झा, पटना- विदेह नियमित देखैत रहैत छी। मैथिली लेल अद्भुत काज कऽ रहल छी। ३१.श्री रामलोचन ठाकुर- कोलकाता- मिथिलाक्षर विदेह देखि मोन प्रसन्नतासँ भरि उठल, अंकक विशाल परिदृश्य आस्वस्तकारी अछि। ३२.श्री तारानन्द वियोगी- विदेह आ कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक देखि चकबिदोर लागि गेल। आश्चर्य। शुभकामना आ बधाई। ३३.श्रीमती प्रेमलता मिश्र “प्रेम”- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़लहुँ। सभ रचना उच्चकोटिक लागल। बधाई। ३४.श्री कीर्तिनारायण मिश्र- बेगूसराय- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक बड्ड नीक लागल, आगांक सभ काज लेल बधाई। ३५.श्री महाप्रकाश-सहरसा- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक नीक लागल, विशालकाय संगहि उत्तमकोटिक। ३६.श्री अग्निपुष्प- मिथिलाक्षर आ देवाक्षर विदेह पढ़ल..ई प्रथम तँ अछि एकरा प्रशंसामे मुदा हम एकरा दुस्साहसिक कहब। मिथिला चित्रकलाक स्तम्भकेँ मुदा अगिला अंकमे आर विस्तृत बनाऊ। ३७.श्री मंजर सुलेमान-दरभंगा- विदेहक जतेक प्रशंसा कएल जाए कम होएत। सभ चीज उत्तम। ३८.श्रीमती प्रोफेसर वीणा ठाकुर- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक उत्तम, पठनीय, विचारनीय। जे क्यो देखैत छथि पोथी प्राप्त करबाक उपाय पुछैत छथि। शुभकामना। ३९.श्री छत्रानन्द सिंह झा- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़लहुँ, बड्ड नीक सभ तरहेँ। ४०.श्री ताराकान्त झा- सम्पादक मैथिली दैनिक मिथिला समाद- विदेह तँ कन्टेन्ट प्रोवाइडरक काज कऽ रहल अछि। कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक अद्भुत लागल। ४१.डॉ रवीन्द्र कुमार चौधरी- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक बहुत नीक, बहुत मेहनतिक परिणाम। बधाई। ४२.श्री अमरनाथ- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक आ विदेह दुनू स्मरणीय घटना अछि, मैथिली साहित्य मध्य। ४३.श्री पंचानन मिश्र- विदेहक वैविध्य आ निरन्तरता प्रभावित करैत अछि, शुभकामना। ४४.श्री केदार कानन- कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक लेल अनेक धन्यवाद, शुभकामना आ बधाइ स्वीकार करी। आ नचिकेताक भूमिका पढ़लहुँ। शुरूमे तँ लागल जेना कोनो उपन्यास अहाँ द्वारा सृजित भेल अछि मुदा पोथी उनटौला पर ज्ञात भेल जे एहिमे तँ सभ विधा समाहित अछि। ४५.श्री धनाकर ठाकुर- अहाँ नीक काज कऽ रहल छी। फोटो गैलरीमे चित्र एहि शताब्दीक जन्मतिथिक अनुसार रहैत तऽ नीक। ४६.श्री आशीष झा- अहाँक पुस्तकक संबंधमे एतबा लिखबा सँ अपना कए नहि रोकि सकलहुँ जे ई किताब मात्र किताब नहि थीक, ई एकटा उम्मीद छी जे मैथिली अहाँ सन पुत्रक सेवा सँ निरंतर समृद्ध होइत चिरजीवन कए प्राप्त करत। ४७.श्री शम्भु कुमार सिंह- विदेहक तत्परता आ क्रियाशीलता देखि आह्लादित भऽ रहल छी। निश्चितरूपेण कहल जा सकैछ जे समकालीन मैथिली पत्रिकाक इतिहासमे विदेहक नाम स्वर्णाक्षरमे लिखल जाएत। ओहि कुरुक्षेत्रक घटना सभ तँ अठारहे दिनमे खतम भऽ गेल रहए मुदा अहाँक कुरुक्षेत्रम् तँ अशेष अछि। ४८.डॉ. अजीत मिश्र- अपनेक प्रयासक कतबो प्रशंसा कएल जाए कमे होएतैक। मैथिली साहित्यमे अहाँ द्वारा कएल गेल काज युग-युगान्तर धरि पूजनीय रहत। ४९.श्री बीरेन्द्र मल्लिक- अहाँक कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक आ विदेह:सदेह पढ़ि अति प्रसन्नता भेल। अहाँक स्वास्थ्य ठीक रहए आ उत्साह बनल रहए से कामना। ५०.श्री कुमार राधारमण- अहाँक दिशा-निर्देशमे विदेह पहिल मैथिली ई-जर्नल देखि अति प्रसन्नता भेल। हमर शुभकामना। ५१.श्री फूलचन्द्र झा प्रवीण-विदेह:सदेह पढ़ने रही मुदा कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक देखि बढ़ाई देबा लेल बाध्य भऽ गेलहुँ। आब विश्वास भऽ गेल जे मैथिली नहि मरत। अशेष शुभकामना। ५२.श्री विभूति आनन्द- विदेह:सदेह देखि, ओकर विस्तार देखि अति प्रसन्नता भेल। ५३.श्री मानेश्वर मनुज-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक एकर भव्यता देखि अति प्रसन्नता भेल, एतेक विशाल ग्रन्थ मैथिलीमे आइ धरि नहि देखने रही। एहिना भविष्यमे काज करैत रही, शुभकामना। ५४.श्री विद्यानन्द झा- आइ.आइ.एम.कोलकाता- कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक विस्तार, छपाईक संग गुणवत्ता देखि अति प्रसन्नता भेल। ५५.श्री अरविन्द ठाकुर-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक मैथिली साहित्यमे कएल गेल एहि तरहक पहिल प्रयोग अछि, शुभकामना। ५६.श्री कुमार पवन-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक पढ़ि रहल छी। किछु लघुकथा पढ़ल अछि, बहुत मार्मिक छल। ५७. श्री प्रदीप बिहारी-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक देखल, बधाई। ५८.डॉ मणिकान्त ठाकुर-कैलिफोर्निया- अपन विलक्षण नियमित सेवासँ हमरा लोकनिक हृदयमे विदेह सदेह भऽ गेल अछि। ५९.श्री धीरेन्द्र प्रेमर्षि- अहाँक समस्त प्रयास सराहनीय। दुख होइत अछि जखन अहाँक प्रयासमे अपेक्षित सहयोग नहि कऽ पबैत छी। ६०.श्री देवशंकर नवीन- विदेहक निरन्तरता आ विशाल स्वरूप- विशाल पाठक वर्ग, एकरा ऐतिहासिक बनबैत अछि। ६१.श्री मोहन भारद्वाज- अहाँक समस्त कार्य देखल, बहुत नीक। एखन किछु परेशानीमे छी, मुदा शीघ्र सहयोग देब। ६२.श्री फजलुर रहमान हाशमी-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक मे एतेक मेहनतक लेल अहाँ साधुवादक अधिकारी छी। ६३.श्री लक्ष्मण झा "सागर"- मैथिलीमे चमत्कारिक रूपेँ अहाँक प्रवेश आह्लादकारी अछि।..अहाँकेँ एखन आर..दूर..बहुत दूरधरि जेबाक अछि। स्वस्थ आ प्रसन्न रही। ६४.श्री जगदीश प्रसाद मंडल-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक पढ़लहुँ । कथा सभ आ उपन्यास सहस्रबाढ़नि पूर्णरूपेँ पढ़ि गेल छी। गाम-घरक भौगोलिक विवरणक जे सूक्ष्म वर्णन सहस्रबाढ़निमे अछि, से चकित कएलक, एहि संग्रहक कथा-उपन्यास मैथिली लेखनमे विविधता अनलक अछि। समालोचना शास्त्रमे अहाँक दृष्टि वैयक्तिक नहि वरन् सामाजिक आ कल्याणकारी अछि, से प्रशंसनीय। ६५.श्री अशोक झा-अध्यक्ष मिथिला विकास परिषद- कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक लेल बधाई आ आगाँ लेल शुभकामना। ६६.श्री ठाकुर प्रसाद मुर्मु- अद्भुत प्रयास। धन्यवादक संग प्रार्थना जे अपन माटि-पानिकेँ ध्यानमे राखि अंकक समायोजन कएल जाए। नव अंक धरि प्रयास सराहनीय। विदेहकेँ बहुत-बहुत धन्यवाद जे एहेन सुन्दर-सुन्दर सचार (आलेख) लगा रहल छथि। सभटा ग्रहणीय- पठनीय। ६७.बुद्धिनाथ मिश्र- प्रिय गजेन्द्र जी,अहाँक सम्पादन मे प्रकाशित ‘विदेह’आ ‘कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक’ विलक्षण पत्रिका आ विलक्षण पोथी! की नहि अछि अहाँक सम्पादनमे? एहि प्रयत्न सँ मैथिली क विकास होयत,निस्संदेह। ६८.श्री बृखेश चन्द्र लाल- गजेन्द्रजी, अपनेक पुस्तक कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़ि मोन गदगद भय गेल , हृदयसँ अनुगृहित छी । हार्दिक शुभकामना । ६९.श्री परमेश्वर कापड़ि - श्री गजेन्द्र जी । कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़ि गदगद आ नेहाल भेलहुँ। ७०.श्री रवीन्द्रनाथ ठाकुर- विदेह पढ़ैत रहैत छी। धीरेन्द्र प्रेमर्षिक मैथिली गजलपर आलेख पढ़लहुँ। मैथिली गजल कत्तऽ सँ कत्तऽ चलि गेलैक आ ओ अपन आलेखमे मात्र अपन जानल-पहिचानल लोकक चर्च कएने छथि। जेना मैथिलीमे मठक परम्परा रहल अछि। (स्पष्टीकरण- श्रीमान्, प्रेमर्षि जी ओहि आलेखमे ई स्पष्ट लिखने छथि जे किनको नाम जे छुटि गेल छन्हि तँ से मात्र आलेखक लेखकक जानकारी नहि रहबाक द्वारे, एहिमे आन कोनो कारण नहि देखल जाय। अहाँसँ एहि विषयपर विस्तृत आलेख सादर आमंत्रित अछि।-सम्पादक) ७१.श्री मंत्रेश्वर झा- विदेह पढ़ल आ संगहि अहाँक मैगनम ओपस कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक सेहो, अति उत्तम। मैथिलीक लेल कएल जा रहल अहाँक समस्त कार्य अतुलनीय अछि। ७२. श्री हरेकृष्ण झा- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक मैथिलीमे अपन तरहक एकमात्र ग्रन्थ अछि, एहिमे लेखकक समग्र दृष्टि आ रचना कौशल देखबामे आएल जे लेखकक फील्डवर्कसँ जुड़ल रहबाक कारणसँ अछि। ७३.श्री सुकान्त सोम- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक मे समाजक इतिहास आ वर्तमानसँ अहाँक जुड़ाव बड्ड नीक लागल, अहाँ एहि क्षेत्रमे आर आगाँ काज करब से आशा अछि। ७४.प्रोफेसर मदन मिश्र- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक सन किताब मैथिलीमे पहिले अछि आ एतेक विशाल संग्रहपर शोध कएल जा सकैत अछि। भविष्यक लेल शुभकामना। ७५.प्रोफेसर कमला चौधरी- मैथिलीमे कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक सन पोथी आबए जे गुण आ रूप दुनूमे निस्सन होअए, से बहुत दिनसँ आकांक्षा छल, ओ आब जा कऽ पूर्ण भेल। पोथी एक हाथसँ दोसर हाथ घुमि रहल अछि, एहिना आगाँ सेहो अहाँसँ आशा अछि। ७६.श्री उदय चन्द्र झा "विनोद": गजेन्द्रजी, अहाँ जतेक काज कएलहुँ अछि से मैथिलीमे आइ धरि कियो नहि कएने छल। शुभकामना। अहाँकेँ एखन बहुत काज आर करबाक अछि। ७७.श्री कृष्ण कुमार कश्यप: गजेन्द्र ठाकुरजी, अहाँसँ भेँट एकटा स्मरणीय क्षण बनि गेल। अहाँ जतेक काज एहि बएसमे कऽ गेल छी ताहिसँ हजार गुणा आर बेशीक आशा अछि। ७८.श्री मणिकान्त दास: अहाँक मैथिलीक कार्यक प्रशंसा लेल शब्द नहि भेटैत अछि। अहाँक कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक सम्पूर्ण रूपेँ पढ़ि गेलहुँ। त्वञ्चाहञ्च बड्ड नीक लागल। ७९. श्री हीरेन्द्र कुमार झा- विदेह ई-पत्रिकाक सभ अंक ई-पत्रसँ भेटैत रहैत अछि। मैथिलीक ई-पत्रिका छैक एहि बातक गर्व होइत अछि। अहाँ आ अहाँक सभ सहयोगीकेँ हार्दिक शुभकामना। विदेह मैथिली साहित्य आन्दोलन (c)२००४-११. सर्वाधिकार लेखकाधीन आ जतय लेखकक नाम नहि अछि ततय संपादकाधीन। विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। सह-सम्पादक: उमेश मंडल। सहायक सम्पादक: शिव कुमार झा आ मुन्नाजी (मनोज कुमार कर्ण)। भाषा-सम्पादन: नागेन्द्र कुमार झा आ पञ्जीकार विद्यानन्द झा। कला-सम्पादन: ज्योति सुनीत चौधरी आ रश्मि रेखा सिन्हा। सम्पादक-शोध-अन्वेषण: डॉ. जया वर्मा आ डॉ. राजीव कुमार वर्मा। रचनाकार अपन मौलिक आ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि) ggajendra@videha.com केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx, .rtf वा .txt फॉर्मेटमे पठा सकैत छथि। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेताह, से आशा करैत छी। रचनाक अंतमे टाइप रहय, जे ई रचना मौलिक अछि, आ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। मेल प्राप्त होयबाक बाद यथासंभव शीघ्र ( सात दिनक भीतर) एकर प्रकाशनक अंकक सूचना देल जायत। ’विदेह' प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका अछि आ एहिमे मैथिली, संस्कृत आ अंग्रेजीमे मिथिला आ मैथिलीसँ संबंधित रचना प्रकाशित कएल जाइत अछि। एहि ई पत्रिकाकेँ श्रीमति लक्ष्मी ठाकुर द्वारा मासक ०१ आ १५ तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि। (c) 2004-11 सर्वाधिकार सुरक्षित। विदेहमे प्रकाशित सभटा रचना आ आर्काइवक सर्वाधिकार रचनाकार आ संग्रहकर्त्ताक लगमे छन्हि। रचनाक अनुवाद आ पुनः प्रकाशन किंवा आर्काइवक उपयोगक अधिकार किनबाक हेतु ggajendra@videha.co.in पर संपर्क करू। एहि साइटकेँ प्रीति झा ठाकुर, मधूलिका चौधरी आ रश्मि प्रिया द्वारा डिजाइन कएल गेल। सिद्धिरस्तु वि दे ह विदेह Videha বিদেহ विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका Videha Ist Maithili Fortnightly e Magazine विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका 'विदेह' ७६ म अंक १५ फरवरी २०११ (वर्ष ४ मास ३८ अंक ७६)http://www.videha.co.in/ मानुषीमिह संस्कृताम् ISSN 2229-547X VIDEHA वि दे ह विदेह Videha বিদেহ विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका Videha Ist Maithili Fortnightly e Magazine विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका 'विदेह' ७६ म अंक १५ फरवरी २०११ (वर्ष ४ मास ३८ अंक ७६)http://www.videha.co.in/ मानुषीमिह संस्कृताम् ISSN 2229-547X VIDEHA
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