754 755 ISSN 2229-547X VIDEHA 'विदेह' ७७ म अंक ०१ मार्च २०११ (वर्ष ४ मास ३९ अंक ७७) वि दे ह विदेह Videha বিদেহ http://www.videha.co.in विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका Videha Ist Maithili Fortnightly e Magazine नव अंक देखबाक लेल पृष्ठ सभकेँ रिफ्रेश कए देखू। Always refresh the pages for viewing new issue of VIDEHA. Read in your own script Roman(Eng)Gujarati Bangla Oriya Gurmukhi Telugu Tamil Kannada Malayalam Hindi ऐ अंकमे अछि:- १. संपादकीय संदेश २. गद्य २.१.छिन्नमस्ता- हिन्दी उपन्यास- डॉ. प्रभा खेतान ; हिन्दीसँ मैथिली अनुवाद सुशीला झा २.२.१.शिव कुमार झा "टिल्लू"- समीक्षा अम्बरा- (राजदेव मण्डल); २. डा॰ धनाकर ठाकुर- प्रज्वलित प्रज्ञा (पूर्व राष्ट्रपति डा॰ कलामक पोथी Ignited Minds क डा॰ नित्यानन्द लाल दास द्वारा मैथिली अनुवाद) क समीक्षा २.३.- जगदीश प्रसाद मण्डल- नाटक कम्प्रोमाइज २.४.१. प्रो. वीणा ठाकुर- प्राचीन भारतीय संस्कृतिमे मिथिलाक योगदान २.ज्योति सुनीत चौधरी-उजागर भविष्य ३. हमर फोटो कहिया \ कन्या भ्रूणहत्या पर एकटा कथा २.५. रवि भूषण पाठक- १. भाग रौ:सामाजिक-राजनीतिक निहितार्थ २. आदर्श क उत्थान आ यथार्थ क पतन: उत्थान -पतन २.६.१.शेफालिका वर्मा- रेत आ रेत २. सुजित कुमार झा-कथा- बंश २.७.हम पुछैत छी: मुन्नाजी पुरनके जमानासँ लिखैत, नव कालमे देखार भेल दिग्गज कथाकार श्री धीरेन्द्र कुमार जीसँ मुन्नाजी पुछलनि .. २.८. मुन्ना जी- दूटा विहनि कथा ३. पद्य ३.१. १.संस्कृति वर्मा, २. चन्दन झा ३.२.गंगेश गुंजन- राधा ३०म खेप ३.३.जगदीश प्रसाद मण्डल- कविता/ गीत ३.४.राजेश मोहन झा- कविता-मुस्की रहल उदासे ३.५.गंगेश गुंजन- गीत ३.६.१. डॉ. शेफालिका वर्मा २. प्रभात राय भट्ट ३.७.१. राम विलास साहु- नैनाक खेल ३.८.१.संजय कुमार मण्डल, २. संजय कुमार झा ४. मिथिला कला-संगीत-१.श्वेता झा चौधरी २.ज्योति सुनीत चौधरी ३श्वेता झा (सिंगापुर) ५. गद्य-पद्य भारती: मोहनदास: (दीर्घकथा):लेखक : उदय प्रकाश (मूल हिन्दीसँ मैथिलीमे अनुवाद विनीत उत्पल) ६. बालानां कृते-१.संस्कृति वर्मा- मेहनत २.नवीन कुमार "आशा"- मस्ती करू यौ बौआ मस्ती करू ७. भाषापाक रचना-लेखन -[मानक मैथिली], [विदेहक मैथिली-अंग्रेजी आ अंग्रेजी मैथिली कोष (इंटरनेटपर पहिल बेर सर्च-डिक्शनरी) एम.एस. एस.क्यू.एल. सर्वर आधारित -Based on ms-sql server Maithili-English and English-Maithili Dictionary.] 8.VIDEHA FOR NON RESIDENTS 8.1.Original Poem in Maithili by Kalikant Jha "Buch" Translated into English by Jyoti Jha Chaudhary 8.2.DR. SHEFALIKA VERMA- DISCRIMINATION AGAINST WOMEN 9. VIDEHA MAITHILI SAMSKRIT EDUCATION (contd.)बिपिन कुमार झा- लैटेक्स : परिचयः उपादेयता च विदेह ई-पत्रिकाक सभटा पुरान अंक ( ब्रेल, तिरहुता आ देवनागरी मे ) पी.डी.एफ. डाउनलोडक लेल नीचाँक लिंकपर उपलब्ध अछि। All the old issues of Videha e journal ( in Braille, Tirhuta and Devanagari versions ) are available for pdf download at the following link. विदेह ई-पत्रिकाक सभटा पुरान अंक ब्रेल, तिरहुता आ देवनागरी रूपमे Videha e journal's all old issues in Braille Tirhuta and Devanagari versions विदेह ई-पत्रिकाक पहिल ५० अंक
विदेह ई-पत्रिकाक ५०म सँ आगाँक अंक विदेह आर.एस.एस.फीड। "विदेह" ई-पत्रिका ई-पत्रसँ प्राप्त करू। अपन मित्रकेँ विदेहक विषयमे सूचित करू। ↑ विदेह आर.एस.एस.फीड एनीमेटरकेँ अपन साइट/ ब्लॉगपर लगाऊ। ब्लॉग "लेआउट" पर "एड गाडजेट" मे "फीड" सेलेक्ट कए "फीड यू.आर.एल." मे http://www.videha.co.in/index.xml टाइप केलासँ सेहो विदेह फीड प्राप्त कए सकैत छी। गूगल रीडरमे पढ़बा लेल http://reader.google.com/ पर जा कऽ Add a Subscription बटन क्लिक करू आ खाली स्थानमे http://www.videha.co.in/index.xml पेस्ट करू आ Add बटन दबाउ। मैथिली देवनागरी वा मिथिलाक्षरमे नहि देखि/ लिखि पाबि रहल छी, (cannot see/write Maithili in Devanagari/ Mithilakshara follow links below or contact at ggajendra@videha.com) तँ एहि हेतु नीचाँक लिंक सभ पर जाऊ। संगहि विदेहक स्तंभ मैथिली भाषापाक/ रचना लेखनक नव-पुरान अंक पढ़ू। http://devanaagarii.net/ http://kaulonline.com/uninagari/ (एतए बॉक्समे ऑनलाइन देवनागरी टाइप करू, बॉक्ससँ कॉपी करू आ वर्ड डॉक्युमेन्टमे पेस्ट कए वर्ड फाइलकेँ सेव करू। विशेष जानकारीक लेल ggajendra@videha.com पर सम्पर्क करू।)(Use Firefox 3.0 (from WWW.MOZILLA.COM )/ Opera/ Safari/ Internet Explorer 8.0/ Flock 2.0/ Google Chrome for best view of 'Videha' Maithili e-journal at http://www.videha.co.in/ .) Go to the link below for download of old issues of VIDEHA Maithili e magazine in .pdf format and Maithili Audio/ Video/ Book/ paintings/ photo files. विदेहक पुरान अंक आ ऑडियो/ वीडियो/ पोथी/ चित्रकला/ फोटो सभक फाइल सभ (उच्चारण, बड़ सुख सार आ दूर्वाक्षत मंत्र सहित) डाउनलोड करबाक हेतु नीचाँक लिंक पर जाऊ। VIDEHA ARCHIVE विदेह आर्काइव भारतीय डाक विभाग द्वारा जारी कवि, नाटककार आ धर्मशास्त्री विद्यापतिक स्टाम्प। भारत आ नेपालक माटिमे पसरल मिथिलाक धरती प्राचीन कालहिसँ महान पुरुष ओ महिला लोकनिक कर्मभूमि रहल अछि। मिथिलाक महान पुरुष ओ महिला लोकनिक चित्र 'मिथिला रत्न' मे देखू। गौरी-शंकरक पालवंश कालक मूर्त्ति, एहिमे मिथिलाक्षरमे (१२०० वर्ष पूर्वक) अभिलेख अंकित अछि। मिथिलाक भारत आ नेपालक माटिमे पसरल एहि तरहक अन्यान्य प्राचीन आ नव स्थापत्य, चित्र, अभिलेख आ मूर्त्तिकलाक़ हेतु देखू 'मिथिलाक खोज' मिथिला, मैथिल आ मैथिलीसँ सम्बन्धित सूचना, सम्पर्क, अन्वेषण संगहि विदेहक सर्च-इंजन आ न्यूज सर्विस आ मिथिला, मैथिल आ मैथिलीसँ सम्बन्धित वेबसाइट सभक समग्र संकलनक लेल देखू "विदेह सूचना संपर्क अन्वेषण" विदेह जालवृत्तक डिसकसन फोरमपर जाऊ। "मैथिल आर मिथिला" (मैथिलीक सभसँ लोकप्रिय जालवृत्त) पर जाऊ। संपादकीय विदेशी पूँजीक भारतमे सोझ निवेश दोसर देशक फर्मसँ मिलि कऽ वा ओकर सम्पत्ति वा ओकर स्टॉक कीनि कऽ होइत अछि। ओ ऐ लेल स्वॉट अनेलिसिस करै छथि आ अपन प्रवेशक लेल अपन कम दाममे उत्पादन आ सेहो तीव्र गतिसँ कएक तरहक उपाय द्वारा करबाक क्षमताकेँ देखैत करै छथि। कोन देशमे विदेशी पूँजी निवेश होएत से किछु गपपर निर्भर करैत अछि। चीनमे भारतक बनिस्पत बेशी विदेशी पूँजी आओत कारण भारतमे कार्य करबा लेल ढेर रास लोकतंत्रीय प्रक्रिया सभ छै जे उत्पाद केर दाम बढ़बैत छै। ई एना बूझि सकै छी जापान आ स्विटजरलैण्ड आदि देशमे विदेशी पूँजी कम आएल बनिस्पत स्पेनक। आ ऐ तरहेँ तुलना करी तँ नेपालमे भारतक अपेक्षा तुलनात्मक पूँजी निवेश बेशी आओत। मैथिली आ आन भाषामे विदेशी पूँजी निवेशक आगमनक सम्भावना देखी तँ तुलनात्मक रूपमे मैथिलीमे बेशी पूँजी आओत, नेपाली वा हिन्दीक तुलनामे। आ मैथिलीक सन्दर्भमे नेपालक मैथिलीक भविष्य भारतक मैथिलीक भविष्यक तुलनामे बेशी नीक बूझि पड़त जँ विदेशी पूँजीक गप आओत। मुदा विदेशी पूँजी मात्र प्रबन्धन वा अर्थशास्त्रक उपरोक्त सैद्धांतिक प्रतिफल टा नै अछि। एतए हम राजनैतिक स्थिरता आ सामाजिक संकट दुनूकेँ सोझाँ पबै छी। भारतक भयंकर लाइसेंस फीस जेना सूचना आ प्रौद्योगिकीक क्षेत्रमे मैथिलीक दुर्दशाक लेल जिम्मेद्दारी लेलक से नेपालमे नै अछि। से ओतए रेडियो आ टी.वी.पर मैथिली नीक दशामे अछि। मुदा राजनैतिक अस्थिरता कखनो काल नेपालमे पूँजी निवेशमे बाधक भऽ जाइए। तहिना नेपालक मैथिलीक सामाजिक आधार विस्तृत अछि मुदा भारतक तेहन नै अछि। से भारतमे मैथिलीक लेल पूँजी निवेशक ई ऋणात्मक गुणक अछि। यूनेस्को कहैत अछि जे भारत विश्वक ६ठम सभसँ पैघ पुस्तक प्रकाशक अछि जतए अंग्रेजी लगा कऽ २५ मान्यताप्राप्त भाषामे पोथी प्रकाशन होइ छै। अंग्रेजीक पोथी प्रकाशनमे भारत संयुक्त राज्य अमेरिका आ ग्रेट ब्रिटेनक बाद तेसर स्थानपर अछि। मुदा चौबीस मुख्य भाषामे सँ यूनेस्कोक अनुसार पुस्तक प्रकाशन लेल मात्र १८ भाषा महत्वपूर्ण अछि आ ऐ १८ भाषामे मैथिली नै अछि। मैथिली ऐ १८ मे नै अछि। फेडरेशन ऑफ इण्डियन पब्लिशर्सक अनुसार मोटामोटी भारतमे १६००० प्रकाशक छथि जे सालमे ७०००० पोथी प्रकाशित करै छथि। ऐमे २१,००० पोथी अंग्रेजीमे छपैए आ तहूसँ बेशी पोथी हिन्दीमे छपैए। भारतमे साक्षरताक स्थिति जेना-जेना नीक हेतै, तेना-तेना पोथी पढ़ैबलाक संख्यामे सेहो वृद्धि हेतैक। नेपालमे मुख्यतः नेपालीक पोथी छापल जाइत अछि। भारत आ नेपाल दुनू ठाम मैथिली पोथीक प्रकाशन गुण आ संख्या दुनूमे पछुआएल अछि। सरकारी संस्थाक संग विदेशी निवेशकक सहयोग: आब प्रकाशन उद्योगसँ आगाँ बढ़ी आ सूचना-प्रसार माध्यमक आन क्षेत्र जेना टी.वी., रेडियो आ ऑनलाइन भाषाइ उपकरणपर आउ। एतऽ विदेशी निवेशक हमरा सभ लेल डॉक्यूमेन्टरी, मनोरंजन आ भाषाइ उपकरणक निर्माणमे सहयोग दऽ सकै छथि। सरकार मान्यताप्राप्त भाषा लेल बिना बजारकेँ ध्यानमे रखने खास कऽ मैथिली सहित ओइ छह भाषाकेँ ध्यानमे राखैत काज करए तँ बजारक दृष्टिसँ जे सांस्कृतिक ह्रास सूचना-प्रौद्योगिकी मध्य देखबामे आबि रहल अछि से मैथिलीमे नै आओत। द एकोनिमिस्ट मे एकटा खबरि आएल अछि। अरबी भाषाकेँ फंडक कोनो कमी नै छै मुदा ओ भाष किए मरि रहल अछि, जखन ओकरा पक्षमे सरकारी कामकाज छै, मस्जिद छै, शिक्षा पद्धति छै। लेबनान, जोर्डन आ इजिप्टक अतिरिक्त सउदी अरब आ आन गल्फ देशक एकरा संरक्षण छै। मुदा पाइ एकरा लेल आफत बनल छै। सभ शेख विदेशसँ पढ़ि कऽ अबैत छथि आ मिश्रित अरबी बजै छथि आ तकरा फैशन मानल जा रहल छै। जै अरबीमे कुराण लिखल गेल आ आइ काल्हिक शैक्षिक “आधुनिक मानकीकृत अरबी- मॉडर्न स्टैण्डर्ड अरेबिक- (एम.एस.ए.)” मे बड्ड पैघ भेद आबि गेल छै। ई “आधुनिक मानकीकृत अरबी” बाजै जाए बला अरबीसँ फराक भऽ गेल अछि आ एकर काज मात्र सभ अरब देशक बीच सूत्रबद्ध करबा धरि सीमित भऽ गेल छै, जइसँ सभ एक दोसराकेँ बुझि पाबए। मुदा यएह “आधुनिक मानकीकृत अरबी” दृश्य-श्रव्य-प्रिंटमे अछि जे ककरो मातृभाष नै छिऐ वरन व्याकरण पढ़ि कऽ सीखल जाइ छै। विदेशी निवेशककेँ जे सरकार मैथिली लेल मनोरंजक कार्यक्रमकेँ मैथिलीमे डब करबाक लेल सहायता करए तँ कार्टून चैनल सभक कार्यक्रम आ धारावाहिक सभ मैथिलीमे प्रसारित भऽ सकत भने ओकरा विज्ञापन भेटौ वा नै। आ एक बेर जे ई पहिया घुमत तँ मैथिली जीबि उठत। आ ई पहिया तखने घुमत जखन मधुबनी-दरभंगा-सहरसा-सुपौलक कथित पुरान साहित्यकार लोकनि मैथिलीकेँ जीबि उठऽ देताह, अपन ऋणात्मक ऊर्जाकेँ विराम देताह, समाजक सभ वर्ग जे मैथिलीसँ जुड़ि रहल अछि ओइमे बाधा देबाक बदला सहयोग करताह। समाजक राक्षसी प्रतिभायुक्त ई सर्वहारा वर्ग मैथिलीक रक्षा लेल समर्पित हसेरी बनत तखने ई भाषा आब बचत। मुख्य विदेशी निवेशक: अखन धरि हार्पर कॉलिन्स, पेंगुइन, ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस, मैकमिलन, रैंडम हाउस, पिकाडोर, हैचेट आ रुटलेज हावर्ड बिजनेस पब्लिशिंग अपन शाखा वा भारतीय सहयोगीक माध्यमसँ भाषायी क्षेत्रमे निवेश केने अछि। मुदा से निवेश अंग्रेजी धरि सीमित भऽ गेल अछि। भारतमे प्रकाशन उद्योगमे विदेशी खिलाड़ी अएलाक बाद एकटा पेंगुइन हिन्दीकेँ छोड़ि देल जाए तँ विदेशी निवेश भारतीय भाषामे लगभग नगण्य अछि। एकर कारण सेहो स्पष्ट अछि। भारतीय भाषाक प्रकाशक सरकारी खरीदपर निर्भर छथि आ गएर सरकारी खरीदमे ओ टेक्स्टबुक छपाइपर जोर दै छथि। विदेशी निवेशक सरकारी खरीद आ टेक्स्टबुक छपाइक आधारपर अपन नीति निर्धारित नै करै छथि। मैथिलीक लेल ई वरदान होइतए मुदा जे भविष्यक साक्षरता वृद्धिक अनुमान लैयो कऽ चली तँ नव साक्षर मैथिली पढ़ताह तकर आशा वर्तमान शिक्षा प्रणालीमे मैथिलीक कतिआएल स्थितिकेँ देखैत असम्भवे बुझा पड़ैत अछि, आ मैथिलीमे ने सरकारी लाइब्रेरीक खरीदक आशा छै आ ने टेक्स्ट बुक छपाइक। पाठकक संख्या तखन इन्टरनेटपर बढ़ाबए पड़त, आ जे पाठक कहियो सरकारी शिक्षा प्रणालीमे मैथिली नै पढ़ि सकल छथि तिनका प्रारम्भमे मंगनीमे डाउनलोडक सुविधा देबऽ पड़त। मैथिलीसँ अंग्रेजी आ संस्कृत आ तकर माध्यमसँ आन भाषामे अनुवाद द्वारा सरकारी आ संस्थागत पुरस्कार पद्धति द्वारा कतिआएल पोथी सभकेँ सोझाँ आनए पड़त जइसँ मैथिली साहित्यक उत्कृष्टता विदेशी निवेशकक सोझाँ आबए। आ ओम्हर सरकारी स्कूलक अतिरिक्त पब्लिक स्कूल सभमे सेहो मैथिलीक पढाइ हुअए तइ लेल समर्पित हसेरी तैयार करए पड़त। एक दोसरापर प्रत्यारोप लगेलाक बदला (कायस्थ आ ब्राह्मण द्वारा एक दोसरापर, मधुबनी-सहरसा-मधेपुरा-समस्तीपुर-बेगुसराय-पूर्णियाँक लोक द्वारा एक दोसरापर आरोप-प्रत्यारोप जे मैथिलीक दुर्दशा लेल हम नै ओ जिम्मेवार छथि- तइसँ हटि कऽ) एकमुखी, एक स्तरीय आ एक यत्नसँ प्रयास करए पड़त। आ जनताकेँ जोड़ए पड़त। हा पुरस्कार केलाक बदला जन साहित्यकारकेँ चिन्हबापर, जन नेताकेँ चिन्हबापर, जन विक्रेताकेँ चिन्हबापर अपन जान-जी लगाबऽ पड़त। विदेशी निवेशसँ छोड़ू भारतीय प्रकाशक जे कहियो ऐ क्षेत्रमे आबऽ चाहलक वा सरकारी खरीदक मशीनरी जे कोनो मैथिलीक पोथी कीनऽ चाहलक वा अनुवाद लेल कोनो स्वयंसेवी संस्था मैथिली पोथी सभक चयन करऽ चाहलक तखनो मैथिली साहित्यक पुरोधा लोकनि द्वारा, जे सलाहकार बनलाह, द्वारा भ्रमित सूची देल गेल, कतेक रास मिथिलाक्षरक पाण्डुलिपि देशक बाहर टपा देल गेल आ मारते रास लोक द्वारा ढेर रास बखेरा ठाढ़ कएल गेल। से सभ कियो भागि गेलाह, बाहरियो आ मैथिली सेवी सेहो। सरकारी खरीद गुणक आधारपर नै भेल, पैरवी-पैगाम आ ढेर रास आन गुणकक आधारपर भेल। विदेशी निवेशकक लग ई सभ ऋणात्मक पक्ष लऽ कऽ हमरा सभ कोना जा सकब। विदेशी निवेशककेँ मैथिलीमे निवेश केलासँ लाभ: विदेशी निवेशक कल्याणकारी कार्य सेहो करै छथि। हुनका मैथिलीक विशेषता बुझाबए पड़त। विश्व प्रसिद्ध वायोलिन वादक स्व. येहुदी मेनुहिन मैथिलीकेँ संसारक सभसँ लयात्मक आ मधुर भाषा कहने छलाह। विदेशी निवेशकक किछु निवेश यूनेस्कोक भाषा सम्बन्धी नीतिक आधारपर सेहो करैत अछि। आ ई कल्याणकारी निवेश लाभपर आधारित नै होइत अछि, सरकारी खरीदपर आधारित नै होइत अछि, विज्ञापनपर आधारित नै होइत अछि। अन्तर्राष्ट्रीय सर्टिफिकेशनपर आधारित गएर सरकारी संस्था सभक माध्यमसँ मैथिलीमे शैक्षिक पोथी आ मनोरंजन आ स्वास्थ्य आधारित फिल्म डोक्यूमेन्टरीक मैथिली भाषी क्षेत्रमे ग्राम पंचायतक स्कूल सभक माध्यमसँ कएल जाए तँ मैथिली भाषी लोकक हीन भावनामे कमी आओत आ भाषायी क्रान्तिक संगे आर्थिक क्रान्ति सेहो आएत। मैथिलीक स्वॉट Strenghth- Weakness- Opportunity- Threat (SWOT) एनेलेसिस आ विदेह मैथिली साहित्य आन्दोलन (अपन गुरु चमू कृष्ण शास्त्रीक सहयोगसँ) मैनेजमेन्टमे एकटा विषए छैक स्वॉट अनेलिसिस। मैथिलीक वर्तमान समस्याकेँ आ विदेह मैथिली साहित्य आन्दोलनक कार्ययोजनाकेँ एहि कसौटीपर कसै छी। Strenghth- शक्ति, सामर्थ्य, बल – मैथिली लेल हृदएमे अग्नि छन्हि, से सभक हृदएमे, परस्पर एक दोसराक विरोधी किएक ने होथु। जनक बीचमे एहि भाषाक आरोह, अवरोह आ भाषिक वैशिट्यकेँ लऽ कऽ आदर अछि आ एहि मे मैथिली नहि बजनिहार भाषाविद् सम्मिलित छथि। आध्यात्मिक आ सांस्कृतिक महत्वक कारण सेहो मैथिली महत्वपूर्ण अछि। एहि भाषामे एकटा आन्तरिक शक्ति छै। बहुत रास संस्था, जाहिमे किछु जातिवादी आ सांप्रदायिक संस्था सेहो सम्मिलित अछि, एकर विकास लेल तत्पर अछि। एहि भाषाक जननिहार भारत आ नेपाल दू देशमे तँ रहिते छथि आब आन-आन देश-प्रदेशमे सेहो पसरल छथि।
Weakness- न्यूनता, दुर्बलता, मूर्खता – प्रशंसा परम्परा जाहिमे दोसराक निन्दा सेहो एहिमे सम्मिलित अछि, एकरे अन्तर्गत अबैत अछि- माने आत्मप्रशंसाक। परस्पर प्रशंसा सेहो एहिमे शामिल अछि। सरकारपर आलम्बन, प्राथमिकताक अज्ञान- जकर कारणसँ महाकवि बनबा/ बनेबा लेल कवि समीक्षक जान अरोपने छथि- जखन भाषा मरि रहल अछि। कार्ययोजनाक स्पष्ट अभाव अछि आ जेना-तेना किछु मैथिली लेल कऽ देबा लेल सभ व्यग्र छथि, कऽ रहल छथि। स्वयं मैथिली नहि बाजि बाल-बच्चाकेँ मैथिलीसँ दूर रखबाक जेना अभियान चलल अछि आ एहिमे मीडिया, कार्टून आ शिक्षा-प्रणालीक संग एक्के खाढ़ीमे भेल अत्यधिक प्रवास अपन योगदान देलक अछि। मैथिलीक कार्यकर्ता लोकनिक कएक ध्रुवमे बँटल रहबाक कारण समर्थनपरक लॉबिइंग कर्ताक अभाव अछि। मैथिलीकेँ एहिअँ की लाभक बदला अपन/ अप्पन लोकक की लाभ एहि लेल लोक बेशी चिन्तित छथि। मैथिली छात्रक संख्याक अभाव। उत्पाद उत्तम रहला उत्तर सेहो विक्रयकौशलक आवश्यकता होइत छै। मैथिलीमे उत्तम उत्पादक अभाव तँ अछिए, विक्रयकौशलक सेहो अभाव अछि। Opportunity- अवसर, योग, अवकाश – विशिष्ट विषयक लेखनक अभाव, मात्र कथा-कविताक सम्बल। मैथिलीमे चित्र-शृंखला, चित्रकथा, विज्ञान, समाज विज्ञान, आध्यात्म, भौतिक, रसायन, जीव, स्वास्थ्य आदिक पोथीक अभाव अछि। ताड़ग्रन्थक संगणकक उपयोग कऽ प्रकाशन नहि भऽ रहल अछि। छात्र शक्तिक प्रयोग न्यून अछि। संध्या विद्यालय आ चित्रकला-संगीतक माध्यमसँ शिक्षा नहि देल जा रहल अछि। दूरस्थ शिक्षाक माध्यमसँ/ अन्तर्जालक माध्यमसँ मैथिलीक पढ़ाइक अत्यधिक आवश्यकता अछि। मैथिलीमे अनुवाद आ वर्तमान विषय सभपर पुस्तक लेखन आ अप्रकाशित ताड़ ग्रन्थ सभक प्रकाशनक आवश्यकता अछि। मैथिलीक माध्यमसँ प्रारम्भिक शिक्षाक आवश्यकता अछि। प्रवासी मैथिल लेल भाषा पाठन-लेखन-सम्पादन पाठ्यक्रमक आवश्यकता अछि। Threat- भीषिका, समभाव्यविपद् – हताशा, आत्महीनता, शिक्षासँ निष्कासन, पारम्परिक पाठशालामे शिक्षाक माध्यमक रूपमे मैथिलीक अभाव, विरल शास्त्रज्ञ, ताड़पत्रक उपेक्षा आ विदेशमे बिक्री, भाषा शैथिल्य, सांस्कृतिक प्रदूषण आ परिणामस्वरूप भाषा प्रदूषण, मुख्यधारासँ दूर भेनाइ आ मात्र दू जातिक भाषा भेनाइ, शिक्षक मध्य ज्ञान स्तरक ह्रास, राजनैतिक स्वार्थवश मैथिलीक विरोध ई सभ विपदा हमरा सभक सोझाँ अछि। विदेहक मैथिली साहित्य आन्दोलन मैथिलीकेँ जनभाषा बनएबाक प्रक्रममे लागल अछि। पाक्षिक रूपेँ मासमे दू बेर एहिपर विचिन्ता होइत अछि। नकारात्मक चिन्तन, परदूषण आ अभाव भाषण द्वारा ई आन्दोलन नहि अवरोधित होएत आ एकरा न्यून करबाक आवश्यकता अछि। ई सभटा ऊपरवर्णित बिन्दु प्रबन्धन-विज्ञानक कार्ययोजनाक विषय अछि, आ भाषणक नहि कार्यक आवश्यकता अछि आ से हम सभ कऽ रहल छी। सम्भाषण, मैथिली माध्यमसँ पाठन, नव सर्वांगीन साहित्यक निर्माण लेल सभकेँ एकमुखी, एक स्तरीय आ एक यत्नसँ प्रयास करए पड़त। धनक अभाव तखने होइत अछि जखन सरकारी सहायतापर आस लगेने रहब। सार्वजनिक सहायताक अवलम्ब धरू, दाताक अभाव नहि स्वीकारकर्ताक अभाव अछि। सूचना: डॉ. नित्यानन्द लाल दास केँ साहित्य अकादेमीक मैथिली अनुवाद पुरस्कार २०१० देल जाएत। डॉ. नित्यानन्द लाल दास , पिता स्वर्गीय सूर्यनारायण दास। फारबिसगंज कॉलेज, फारबिसगंज सँ अंग्रेजी विभागाध्यक्ष पदसँ अवकाशप्राप्त। डॉ. सुरेन्द्र झा "सुमन"क संयोजकत्वक कार्यकालमे "मैथिली परामर्शदातृ समिति" (साहित्य अकादेमी, दिल्ली)क सदस्य। डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलामक अंग्रेजी पोथी "इग्नाइटेड माइण्ड्स"क मैथिलीमे "प्रज्वलित प्रज्ञा" नामसँ अनुवाद। मैथिली पत्रिका सभ जेना बटुक, प्रयाग; मिथिला मिहिर, पटना; स्वदेश, दरभंगा; पहुँच, पटना आ परती पलार, अररियामे रचना प्रकाशित। १९६७ ई. सँ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ मे सक्रिय। प्रांतीय प्रतिनिधि २००४ धरि जिला सरसंघचालक। जे.पी.आन्दोलनमे लोकतंत्र सेनानी। नेपाल आ भारतक किछु प्रमुख सम्मानक सूची नेपाल प्रज्ञा प्रतिष्ठानक सदस्यता (नेपाल देशक भाषा-साहित्य, दर्शन, संस्कृति आ सामाजिक विज्ञानक क्षेत्रमे सर्वोच्च सम्मान) नेपाल प्रज्ञा प्रतिष्ठानक सदस्यता श्री राम भरोस कापड़ि 'भ्रमर' (2010) श्री राम दयाल राकेश (1999) श्री योगेन्द्र प्रसाद यादव (1994) नेपाल प्रज्ञा प्रतिष्ठान मानद सदस्यता स्व. सुन्दर झा शास्त्री नेपाल प्रज्ञा प्रतिष्ठान आजीवन सदस्यता श्री योगेन्द्र प्रसाद यादव फूलकुमारी महतो मेमोरियल ट्रष्ट काठमाण्डू, नेपालक सम्मान फूलकुमारी महतो मैथिली साधना सम्मान २०६७ - मिथिला नाट्यकला परिषदकेँ फूलकुमारी महतो मैथिली प्रतिभा पुरस्कार २०६७ - सप्तरी राजविराजनिवासी श्रीमती मीना ठाकुरकेँ फूलकुमारी महतो मैथिली प्रतिभा पुरस्कार २०६७ -बुधनगर मोरङनिवासी दयानन्द दिग्पाल यदुवंशीकेँ साहित्य अकादेमी फेलो- भारत देशक सर्वोच्च साहित्य सम्मान (मैथिली)
१९९४-नागार्जुन (स्व. श्री वैद्यनाथ मिश्र “यात्री” १९११-१९९८ ) , हिन्दी आ मैथिली कवि।
२०१०- चन्द्रनाथ मिश्र अमर (१९२५- ) - मैथिली साहित्य लेल।
साहित्य अकादेमी भाषा सम्मान ( क्लासिकल आ मध्यकालीन साहित्य आ गएर मान्यताप्राप्त भाषा लेल):-
२००७- पं. डॉ. शशिनाथ झा (क्लासिकल आ मध्यकालीन साहित्य लेल।) पं. श्री उमारमण मिश्र साहित्य अकादेमी पुरस्कार- मैथिली १९६६- यशोधर झा (मिथिला वैभव, दर्शन) १९६८- यात्री (पत्रहीन नग्न गाछ, पद्य) १९६९- उपेन्द्रनाथ झा “व्यास” (दू पत्र, उपन्यास) १९७०- काशीकान्त मिश्र “मधुप” (राधा विरह, महाकाव्य) १९७१- सुरेन्द्र झा “सुमन” (पयस्विनी, पद्य) १९७३- ब्रजकिशोर वर्मा “मणिपद्म” (नैका बनिजारा, उपन्यास) १९७५- गिरीन्द्र मोहन मिश्र (किछु देखल किछु सुनल, संस्मरण) १९७६- वैद्यनाथ मल्लिक “विधु” (सीतायन, महाकाव्य) १९७७- राजेश्वर झा (अवहट्ठ: उद्भव ओ विकास, समालोचना) १९७८- उपेन्द्र ठाकुर “मोहन” (बाजि उठल मुरली, पद्य) १९७९- तन्त्रनाथ झा (कृष्ण चरित, महाकाव्य) १९८०- सुधांशु शेखर चौधरी (ई बतहा संसार, उपन्यास) १९८१- मार्कण्डेय प्रवासी (अगस्त्यायिनी, महाकाव्य) १९८२- लिली रे (मरीचिका, उपन्यास) १९८३- चन्द्रनाथ मिश्र “अमर” (मैथिली पत्रकारिताक इतिहास) १९८४- आरसी प्रसाद सिंह (सूर्यमुखी, पद्य) १९८५- हरिमोहन झा (जीवन यात्रा, आत्मकथा) १९८६- सुभद्र झा (नातिक पत्रक उत्तर, निबन्ध) १९८७- उमानाथ झा (अतीत, कथा) १९८८- मायानन्द मिश्र (मंत्रपुत्र, उपन्यास) १९८९- काञ्चीनाथ झा “किरण” (पराशर, महाकाव्य) १९९०- प्रभास कुमार चौधरी (प्रभासक कथा, कथा) १९९१- रामदेव झा (पसिझैत पाथर, एकांकी) १९९२- भीमनाथ झा (विविधा, निबन्ध) १९९३- गोविन्द झा (सामाक पौती, कथा) १९९४- गंगेश गुंजन (उचितवक्ता, कथा) १९९५- जयमन्त मिश्र (कविता कुसुमांजलि, पद्य) १९९६- राजमोहन झा (आइ काल्हि परसू, कथा संग्रह) १९९७- कीर्ति नारायण मिश्र (ध्वस्त होइत शान्तिस्तूप, पद्य) १९९८- जीवकान्त (तकै अछि चिड़ै, पद्य) १९९९- साकेतानन्द (गणनायक, कथा) २०००- रमानन्द रेणु (कतेक रास बात, पद्य) २००१- बबुआजी झा “अज्ञात” (प्रतिज्ञा पाण्डव, महाकाव्य) २००२- सोमदेव (सहस्रमुखी चौक पर, पद्य) २००३- नीरजा रेणु (ऋतम्भरा, कथा) २००४- चन्द्रभानु सिंह (शकुन्तला, महाकाव्य) २००५- विवेकानन्द ठाकुर (चानन घन गछिया, पद्य) २००६- विभूति आनन्द (काठ, कथा) २००७- प्रदीप बिहारी (सरोकार, कथा) २००८- मत्रेश्वर झा (कतेक डारि पर, आत्मकथा) २००९- स्व.मनमोहन झा (गंगापुत्र, कथासंग्रह) २०१०-श्रीमति उषाकिरण खान (भामती, उपन्यास) साहित्य अकादेमी मैथिली अनुवाद पुरस्कार १९९२- शैलेन्द्र मोहन झा (शरतचन्द्र व्यक्ति आ कलाकार-सुबोधचन्द्र सेन, अंग्रेजी) १९९३- गोविन्द झा (नेपाली साहित्यक इतिहास- कुमार प्रधान, अंग्रेजी) १९९४- रामदेव झा (सगाइ- राजिन्दर सिंह बेदी, उर्दू) १९९५- सुरेन्द्र झा “सुमन” (रवीन्द्र नाटकावली- रवीन्द्रनाथ टैगोर, बांग्ला) १९९६- फजलुर रहमान हासमी (अबुलकलाम आजाद- अब्दुलकवी देसनवी, उर्दू) १९९७- नवीन चौधरी (माटि मंगल- शिवराम कारंत, कन्नड़) १९९८- चन्द्रनाथ मिश्र “अमर” (परशुरामक बीछल बेरायल कथा- राजशेखर बसु, बांग्ला) १९९९- मुरारी मधुसूदन ठाकुर (आरोग्य निकेतन- ताराशंकर बंदोपाध्याय, बांग्ला) २०००- डॉ. अमरेश पाठक, (तमस- भीष्म साहनी, हिन्दी) २००१- सुरेश्वर झा (अन्तरिक्षमे विस्फोट- जयन्त विष्णु नार्लीकर, मराठी) २००२- डॉ. प्रबोध नारायण सिंह (पतझड़क स्वर- कुर्तुल ऐन हैदर, उर्दू) २००३- उपेन्द दोषी (कथा कहिनी- मनोज दास, उड़िया) २००४- डॉ. प्रफुल्ल कुमार सिंह “मौन” (प्रेमचन्द की कहानी-प्रेमचन्द, हिन्दी) २००५- डॉ. योगानन्द झा (बिहारक लोककथा- पी.सी.राय चौधरी, अंग्रेजी) २००६- राजनन्द झा (कालबेला- समरेश मजुमदार, बांग्ला) २००७- अनन्त बिहारी लाल दास “इन्दु” (युद्ध आ योद्धा-अगम सिंह गिरि, नेपाली) २००८- ताराकान्त झा (संरचनावाद उत्तर-संरचनावाद एवं प्राच्य काव्यशास्त्र-गोपीचन्द नारंग, उर्दू) २००९- भालचन्द्र झा (बीछल बेरायल मराठी एकाँकी- सम्पादक सुधा जोशी आ रत्नाकर मतकरी, मराठी) २०१०- डॉ. नित्यानन्द लाल दास ( "इग्नाइटेड माइण्ड्स" - मैथिलीमे "प्रज्वलित प्रज्ञा"- डॉ.ए.पी.जे. कलाम, अंग्रेजी)
साहित्य अकादेमी मैथिली बाल साहित्य पुरस्कार २०१०-तारानन्द वियोगीकेँ पोथी "ई भेटल तँ की भेटल" लेल प्रबोध सम्मान प्रबोध सम्मान 2004- श्रीमति लिली रे (1933- ) प्रबोध सम्मान 2005- श्री महेन्द्र मलंगिया (1946- ) प्रबोध सम्मान 2006- श्री गोविन्द झा (1923- ) प्रबोध सम्मान 2007- श्री मायानन्द मिश्र (1934- ) प्रबोध सम्मान 2008- श्री मोहन भारद्वाज (1943- ) प्रबोध सम्मान 2009- श्री राजमोहन झा (1934- ) प्रबोध सम्मान 2010- श्री जीवकान्त (1936- ) प्रबोध सम्मान 2011- श्री सोमदेव (1934- ) यात्री-चेतना पुरस्कार २००० ई.- पं.सुरेन्द्र झा “सुमन”, दरभंगा; २००१ ई. - श्री सोमदेव, दरभंगा; २००२ ई.- श्री महेन्द्र मलंगिया, मलंगिया; २००३ ई.- श्री हंसराज, दरभंगा; २००४ ई.- डॉ. श्रीमती शेफालिका वर्मा, पटना; २००५ ई.-श्री उदय चन्द्र झा “विनोद”, रहिका, मधुबनी; २००६ ई.-श्री गोपालजी झा गोपेश, मेंहथ, मधुबनी; २००७ ई.-श्री आनन्द मोहन झा, भारद्वाज, नवानी, मधुबनी; २००८ ई.-श्री मंत्रेश्वर झा, लालगंज,मधुबनी २००९ ई.-श्री प्रेमशंकर सिंह, जोगियारा, दरभंगा २०१० ई.- डॉ. तारानन्द वियोगी, महिषी, सहरसा कीर्तिनारायण मिश्र साहित्य सम्मान २००८ ई. - श्री हरेकृष्ण झा (कविता संग्रह “एना त नहि जे”) २००९ ई.-श्री उदय नारायण सिंह “नचिकेता” (नाटक नो एण्ट्री: मा प्रविश) २०१० ई.- श्री महाप्रकाश (कविता संग्रह “संग समय के”)
भारतीय भाषा परिषद, कोलकाता युवा पुरस्कार (२००९-१०) गौरीनाथ (अनलकांत) केँ मैथिली लेल।
भारतीय भाषा संस्थान (सी.आइ.आइ.एल.) , मैसूर रामलोचन ठाकुर:- अनुवाद लेल भाषा-भारती सम्मान २००३-०४ (सी.आइ.आइ.एल., मैसूर) जा सकै छी, किन्तु किए जाउ- शक्ति चट्टोपाध्यायक बांग्ला कविता-संग्रहक मैथिली अनुवाद लेल प्राप्त। रमानन्द झा 'रमण':- अनुवाद लेल भाषा-भारती सम्मान २००४-०५ (सी.आइ.आइ.एल., मैसूर) छओ बिगहा आठ कट्ठा- फकीर मोहन सेनापतिक ओड़िया उपन्यासक मैथिली अनुवाद लेल प्राप्त। मैलोरंग, दिल्लीक ज्योतिरीश्वर रंगकर्मी सम्मान 2010- श्रीमति प्रेमलता मिश्र 'प्रेम' सूचना: विदेहक १५ मार्च २०११ अंक होली विशेषांक रहत। होली विशेषांक लेल हास्य विधाक गद्य-पद्य रचना अहाँ १३ मार्च २०११ धरि पठा सकै छी। रचना मेल अटैचमेण्टक रूपमे .doc, .docx, .rtf वा .txt फॉर्मेटमे पठाओल जाए। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ अपन स्कैन कएल फोटो पठेताह, से आशा करैत छी। रचनाक अंतमे टाइप रहए जे ई रचना मौलिक अछि आ पहिल प्रकाशनक लेल विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि।
( विदेह ई पत्रिकाकेँ ५ जुलाइ २००४ सँ एखन धरि १०७ देशक १,७११ ठामसँ ५७, ०४४ गोटे द्वारा विभिन्न आइ.एस.पी. सँ २,९३,१३७ बेर देखल गेल अछि; धन्यवाद पाठकगण। - गूगल एनेलेटिक्स डेटा। ) गजेन्द्र ठाकुर ggajendra@videha.com http://www.maithililekhaksangh.com/2010/07/blog-post_3709.html २. गद्य २.१.छिन्नमस्ता- हिन्दी उपन्यास- डॉ. प्रभा खेतान ; हिन्दीसँ मैथिली अनुवाद सुशीला झा २.२.१.शिव कुमार झा "टिल्लू"- समीक्षा अम्बरा- (राजदेव मण्डल); २. डा॰ धनाकर ठाकुर- प्रज्वलित प्रज्ञा (पूर्व राष्ट्रपति डा॰ कलामक पोथी Ignited Minds क डा॰ नित्यानन्द लाल दास द्वारा मैथिली अनुवाद) क समीक्षा २.३.- जगदीश प्रसाद मण्डल- नाटक कम्प्रोमाइज २.४.१. प्रो. वीणा ठाकुर- प्राचीन भारतीय संस्कृतिमे मिथिलाक योगदान २.ज्योति सुनीत चौधरी-उजागर भविष्य ३. हमर फोटो कहिया \ कन्या भ्रूणहत्या पर एकटा कथा २.५. रवि भूषण पाठक- १. भाग रौ:सामाजिक-राजनीतिक निहितार्थ २. आदर्श क उत्थान आ यथार्थ क पतन: उत्थान -पतन २.६.१.शेफालिका वर्मा- रेत आ रेत २. सुजित कुमार झा-कथा- बंश २.७.हम पुछैत छी: मुन्नाजी पुरनके जमानासँ लिखैत, नव कालमे देखार भेल दिग्गज कथाकार श्री धीरेन्द्र कुमार जीसँ मुन्नाजी पुछलनि .. २.८. मुन्ना जी- दूटा विहनि कथा छिन्नमस्ता- हिन्दी उपन्यास- डॉ. प्रभा खेतान ; हिन्दीसँ मैथिली अनुवाद सुशीला झा डॉ. प्रभा खेतान (१ नवंबर १९४२ - २० सितंबर, २००८) प्रभा खेतान फाउन्डेशनक संस्थापक अध्यक्षा, नारी विषयक कार्यमे सक्रिय, फिगरेट नाम्ना महिला स्वास्थ्य केन्द्रक स्थापक, १९६६- १९७६ धरि चमड़ा आ रेडीमेड वस्त्रक निर्यातक कंपनी 'न्यू होराइजन लिमिटेड' क प्रबंध निदेशका, हिन्दीक प्रतिष्ठित उपन्यासकार, कवि आ नारीवादी चिंतक। कोलकाता विश्वविद्यालयसँ दर्शन शास्त्रमे स्नातकोत्तर उपाधि, "ज्यां पॉल सार्त्रक अस्तित्त्ववाद" पर पी.एच.डी.। हिनकर आठटा उपन्यास- आओ पेपे घर चले, तालाबंदी(१९९१), अग्निसंभवा(१९९२), एडस, छिन्नमस्ता (१९९३), अपने -अपने चहरे(१९९४), पीली आंधी(१९९६) आ स्त्री पक्ष (१९९९) आ दूटा लघु उपन्यास “शब्दों का मसीहा सार्त्र” आ “बाजार के बीच: बाजार के खिलाफ” प्रकाशित छन्हि। फ्रांसीसी लेखक सिमोन द बोउवाक पुस्तक ‘दि सेकेंड सेक्स’ क हिन्दी अनुवाद ‘स्त्री उपेक्षिता’ आ आत्मकथा ‘अन्या से अनन्या’ सेहो प्रकाशित। डॉ. प्रभा खेतान श्रीमति सुशीला झाकेँ अपन उपन्यास “छिन्नमस्ता”क मैथिली अनुवादक अधिकार देने छलीह जे सुशीला झा पूर्ण केलन्हि। विदेह अपन ७७ म अंक(१ मार्च २०११) जे नारी विशेषांक सेहो अछि, मे एकरा ई-प्रकाशित कऽ गौरान्वित अछि। ई उपन्यास ओड़ियामे सेहो अनूदित भेल अछि। छिन्नमस्ता- हिन्दी उपन्यास- डॉ. प्रभा खेतान ; हिन्दीसँ मैथिली अनुवाद सुशीला झा छिन्नमस्ता ‘प्लेन मे बैसल बैसल डॉर अकड़ि गेल, माथक दर्द सँ मन व्याकुल लगै’छ। वड्ड गलती कयलहुँ। एतेक दूरीक फ्रलाइट नहिलेबऽ चाही।’ प्रिया दूनू हाथे माथ दबैत सोचलनि। बगल मे बैसल व्यक्ति शायद पूर्वी यूरोपियन वा हंगेरियन-हेतै’ हंगेरियन गोलाश सूप’क गंध् महसूस होइछ। हूँ, किछु लोक कतहु कतेक आराम सँ सुति रहै’छ मुँह खोलि केहन ढररऽ पाड़ि रहल अछि। एहि खर्राटाक घर-घर सॅ आयल निन्नो उचटि गेल। हमहूँ कखनौकऽ भसिया जाइत छी नहितऽ अइ एयरलाइन सँ नहिअबितहुँ। आब ई विमान बेलग्रेड मे उतरतै’। पफेर घंटा डेढ़ घंटाक ट्रांजिट .......... तकरबाद सोझे कलकत्ता। सोझे- कलकत्ता पहुँचैइ ए मे मजा छै...... नहितऽ भरि दिन दिल्ली या बम्बई मे बर्बाद करू। नहिजानि कियेक हमरे देश मे अध्रतिया मे लगभग बारह बजे से दू अढ़ाई के बीच सब फ्रलाइट्स उतरै’छ। अइ अध्रतिया मे या तऽ एयरपोर्ट पर बैसू या एयरपोर्टक होटल मे चारि-पाँच घंटाक लेल पन्द्रह सौ टाका पफेकू। एक्सपोर्टक काज मे एतेक रईसी असंभव। ओहूना दिनोदिन यात्रा महंगे भेल जाइछ। ....... कोनो मित्रा केँ अध्रतिया मे जगायब प्रिया केँ नीक नहिलगैत- छैन्हि, मुदा मोन बड्ड खराब बुझाइत छैन्हि। जी हौड़ैंत छैन्हि होइत छैन्हि अब रद्द भऽ जाएत। प्रिया एयरहोस्टेसक बत्ती जरौलनि मोने मोन बजलीह- ‘एहि यात्राक कहियो अन्त’ हेतै?’’ .......... ‘यस मैडम।’ विहुँसैत एयरहोस्टेस बजलीह। .......... ‘‘क्या आप मुझे कोका कोला दे सकती हैं?’’ ‘जरूर’ हदमद मोन मे कोका कोलाक स्वादो अजीब लगलैन्हि। बुझाइछ कलकत्ता पहुँचलापर दू दिन ध्रि बिछाओन पर पड़ले रहब। दू बेर डिस्प्रिन खेलैन्हि तइओ मथबथ्थी कम नहिभैलेनिह । विमान ध्ीरे-ध्ीरे नीचाँ उतरि रहल छल। प्रियाक ऑखि खिड़की सॅ बाहर भोरका इजोत मे बेलग्रेडक विमानपत्तन पर गड़ल छलैन्हि। पश्चिमी यूरोप टपिते गरीबीक झलक भेँटऽ लगै’छ बरू बीच मे दुबई आ कुवैतक एयरपोर्ट भनहिं चमकैत देखाइछ। न्यूयार्क, लन्दन या- Úैकपफर्ट क एयरपोर्टक मुकाबला तऽ नहिएँ कऽ सकै’छ। ......... ‘ट्रांजिट के पैसेंजर- पहले उतर जाएँ, अपना-अपना समान प्लेन में ही छोड़ सकते हैं। हां, पासपोर्ट लेना न भूलें।’ एयरहोस्टेसक अवाज छलै। प्रिया अपना हाथ मे अटैची उठौलनि। ट्रांजिट मे घंटा भरि समय लगतै। भऽ सकै’छ हाथ मुँह धेला सॅ मन हल्लुक होमए। नहिजानि कियेक दिनोदिन स्वास्थ्य खसल जा रहल अछि? ट्रांजिट लाउंच मे बामा दिस जयबाक छलनि। एकबेर पैर लड़खड़ा- गेलैन्हि। पफेर हिम्मत कऽ साँस धऽ देवारक सहारा लऽ पीठ ओंगठा कऽ ढाढ़ि भलीह। दू डेग बढ़लैन्हि कि चक्कर आबि गेलैन्हि। जाबत किछु सोच विचार करितथि तइँस पहिने आँखिक आगू अन्हार पसरि गेलैन्हि ठामहि अचेत भऽ खसि पड़लीह। होश भेला पर ऑखि पफोलिचारूभर देखलनि हम कतऽ छी? तखनहिं अंग्रेजी मे युगोस्लावियन डाक्टर पूछलकैन्हि- ‘आब मोन केहन अछि?’ प्रिया उतारा देबऽ चाहैत छलथिन मुदा से असंभव बुझना गेलैन्हि अगल-बगल कर देवार ऊपर नीचाँ होइत बुझेलैन्हि। लगलैन्हि जेना पफेरू ऑखिकऽ आगू अन्हार पसरि गेल होए, बेहोश भऽ गेलीह। डाक्टर एयरपोर्ट स्टापफ सॅ कहलथिन-इमरजैंसी। एंबुलेंस एलै आधा घंटा मे अस्पताल पहुँचलीह। अइबेर होश होइते देखलनि उजर देवार, उजर पोशाक पहिरने नर्स अस्पताल मे छी से बुझि गेलीह। हाथ अँकरल सन बुझेलैन्हि सोझ करऽ चाहलैन्हि। तखनहिं स्नेह सँ नर्स कहलकैन्हि- ‘अहाँ बेलग्रेडक सरकारी अस्पताल मे छी। हाथ के एहिना रहऽ दिऔ ग्लूकोज चढ़ाओल जाइछ।’ -‘हमरा की भेल अछि?’ ‘चिन्ता जुनि करू। एखनहिं डाक्टर अबैत छथि बता देता।’ ‘हम अपना घर कलकत्ता संवाद पठाबऽ चाहैत छी।’ ‘मैडम, अहंाक पासपोर्ट देखि ओतऽ पफोन कयल गेल अछि।’ - ओह, ओइमेतऽ हमर सासुर क पता छला की अहाँ हमरा एहि नम्बर पर पफोन करबा सकैत छी?’ प्रिया एतबा कहि’ हालैंऽ मे रहनिहार मित्रा पिफलिपक’ नम्बर देलथिन। - पिफलिप मात्रा सात घंटा मे बेलग्रेड पहुँचलाह। पिफलिप के देखिते प्रियाक सूखल ठोर पर खुशी क हँसी छिहुलल। लग आबि प्रियाक माथ चुमैत पिफलिप- बजलाह-‘प्रिया आब चिन्ताक कोनो बात नहि हम डाक्टर से बतिएलहुँ कहलनि आब एकदम स्वस्थ छथि। आब हम आबि गेलहुँ सब ठीक भऽ जेतै।’ ‘पिफलिप! ध्न्यवाद। मुदा हम बुझि ने पबैत छी-हमरा की भेल अछि?’ - ‘अहाँ के किछु नहिभेल अछि... मात्रा काजक ठेही। अहाँ केँ आराम चाही। शियर एक्जॉशन। प्रिया अहॉ काजक पाछू अपना शरीर पर कनिको ध्याने नहिदैत छी। क्षमता से वेशी खटैत रहैत छी तै इ हाल भेल।’ - ‘पिफलिप, सापफ-सापफ कहू कहीं हार्टक प्राब्लम तऽ नहि ............?’ - ‘नहि, नहिजैट लैग मे .......;हवाई यात्रा मे बैसल बैसल पैर अॅकड़ि जायब स्वभाविकेद्ध दोसर गप्प ई जे बिना किछु खयने-पीने हवा मे उड़ैत रहने कतेक बेर तऽ ‘वैसो बैगल एटैक’ भऽ जाइत छैक। सच-सच कहू अहाँ खाना खयने छलहुँ कखन? - ‘शिकागो मे।’ ‘मतलब, दू दिन भऽ गेल भोजन कयला आ प्लेन मे अहाँ कोका कोलाक अलावा आर किछु पीने नहिहेवै’। हम अहाँ के खूब नीक जकाँ चिन्हऽ गेलहुँ अछि। पन्द्रह वर्ष सँ देख रहल छी’ काजक पाछू अहाँ पागल भऽ गेलहुँ अछि।’ - ‘पिफलिप! प्लीज।’ ‘नहिप्रिया! अहि प्लीजक असर हमरा पर नहिहोएत। एखन मोन होइछ अहाँ के खूब कसिकऽ क्लास ली जेना इलोना केँ क्लास लैत छिऐन्हि कोनो गलती कयला पर।’ ‘इलोना नीकेँ छथि ने? हुनकर पढ़ाई केहन चलि रहल छैन्हि? आ जूडीक कुशल क्षेम कहू।’ ‘जुडी नीकेँ छथि अहाँक समाचार सुनिचिन्तित भऽ गेलीह। इलोना स्वस्थ छथि नीक जकॉ पढ़ाई चलि रहल छैन्हि।’ -पिफलिप! अहाँ नीना सँ गप्प कऽ लेब कहि देबैन्हि एतुका समाचार ठीक छैक। अन्यथा ओ हड़बड़ा कऽ एतऽ आब जेतीह।’ ‘अहाँ चिन्ता जुनि करू। एहि सभक जिम्मा हम जुडी केँ दऽ आयल छी- भऽ सकै’छ ओ आइ सांझि मे अहाँ से बात करतीह। अहॉक खबरि सुनि हम सभ स्तब्ध् भऽ गेल छलहुँ ओ हमरा संगहि आबऽ चाहैत छलीह। कहुना हुनका कहि सुनि हम अयलहुँ।’ पिफलिप पफेरू सांझि मे अस्पताल औता। हम कतबो सुतऽके प्रयास करैत छी मुदा निन्न नहिहोइत अछि मोन बोझिल लगै’छ। नर्स एकटा दबाई ढेलक आ हॉट चाकलेट। एखन माथ पर कतबो जोर दैत छी तइओ किछु सोचि नहिपबैत छी। लगै’छ जेना मानसाकाश मे छोट-छोट बादलक टुकड़ा हिलकोर मारि रहल अछि। -सत्ते इम्हर किछु दिन सँ हम काजक पाछु तेइन अपस्यॉत रहलहुँ अछि जे ने दिन केँ दिन बुझलिऐ ने रातिकेँ राति। ई शिकागोक प्रदर्शनी लेल तऽ करीब पन्द्रह दिन सॅ राति मे तीने चारि घंटा सूतैत हएब से निश्चिन्त भऽ नहि। नीना कहैत छलीह-भौजी एतऽ कनि’ आराम कऽ लिअ ओतऽ शिकागो मे तऽ एको पल पलखति नहिभेँटत देह कोना ठाढ़ रहत!’ तखन हम कहैत छलिए- ‘नहिनीना एखन आराम करबाक बेर नहिछै एहन मौका पफेर भेँटत की नहि। स्पिलवर्ग स्वयं-स्टाल लगयबाक आपफर देलक अछि।’ -नीना तीसवर्षक भऽ गेलीह मुदा एखनहुँ विवाह नहिकऽ रहल छथि आब विवाह कऽ लेबऽ चाही। ओना हमर ओ दहिन हाथ छथि सबसॅ वेशी हुनके सहारा अछि हमरा। इएह सभ गुन-ध्ुन करैत छलीह ध्ीरे-ध्ीरे ऑखि मुना गैलेन्हि। ख्ूाब गहीर निन्न मे सूतल छलीह। भोर मे निन्न टूटलैन्हि तऽ सामने टँगल कैलेंडर पर नजरि पड़लैन्हि आइ अट्ठाईस अप्रैल भऽ गेलै। गुड मार्निंग कहैत नर्स चौकठी टपलीह। - ‘‘की हम बहुत अबेर ध्रि सूतलि रहलहुँ?’’ - ‘‘हां, आह अहाँ खूब सुतलहुँ। एखन अहाँ पहिने नास्ता करब की स्नान?’’ - ‘स्नान कऽ ली तऽ नीके लागत।’ - ‘वेश, चलु। अहाँ केँ कमजोरि तऽ नहिबुझा रहल अछि?’ - ‘नहि, एकदम नहि।’ ‘वाह!’ नर्स प्रियाकेँ पलंग सॅ उतारलनि, सुसुम पानि सॅ नहा कऽ प्रिया के ताजगी महससू भेलैन्हि। नास्ता मे गरम-गरम क्रोशा, मक्खन, जैम आ दूध् संतराक रस पीलनि ब्लैक कापफी पीलनि। पश्चिमक प्रत्येक होटल मे ऐहि तरहक नास्ता करबाक आदत भऽ गेलैन्हिए। नास्ता क तृप्त भऽ सोचऽ लगलीह प्रिया चमड़ाक ई व्यवसाय शुरू कयल कतेक वर्ष बीत गेल! आ कहिया सॅ एहन यायावरी जिन्दगी जीवि रहल छी!! हम एहन एक्सपोर्टक काज शुरू हे कियेक कयलहुँ? देश-विदेश हरदम यात्रा मे समय बीतैत अछि। कोन दुःख दर्द बिसरऽ लेल ई यात्रा शुरू कयलहुँ? आ सुख? सुख कहिया भेँटल?? मोन ने पड़ै’छ कोनो सुखक क्षण। मुदा आई मोन मे स्नेहभावक उदवेग ककरा लेल एहन कोनो खास व्यक्ति ने मोन पड़ैछ ने रिश्ता-नाता। हँ, छोटकी माँ आ नीनाक प्रति स्नेह स्वभाविक बुझना जाइछ। स्नेहक पात्रा अछि हमर स्टापफ जे राति-दिन हमरा संग खटैत रहै’छ। अबैत काल संग-संग आबि माल जहाज पर चढ़बैत अछि। जँ से सभ बिमारीक समाचार सुनता तऽ बहुत चिन्तित हेताह। -किछु आर आत्मीय व्यक्ति छथि हुनको खबरि भेँटले हेतैन्हि। छोटकी मां क स्वभाव तऽ बुझले अछि परम्पराकेँ निमाहऽ वाली ओ नरेन्द्र के पफोन द्वारा अवश्य सूचित कयने हेथिन। एतके नहिओ संजु आ निध् िके पठयबाक लेल आग्रहो कयने हेथिन पफेरू मनाहि सुनि ठाकुर कड़ी मे बैसि कनने होएतीह। एतहु विदेश भूमि मे हमर किछु आत्मीय बन्ध्ु छथि जाहि मे सबसे वेशी निकटा अछि पिफलिप उठा जुडी सँ। अस्पताल मे आइ दोसर दिन बीता रहल छी। मोन पड़ै’छ अपन आन्तरिक संवेदनाक स्मृति स्मृतिक ओ क्षण जकरा हम विस्मृतिक खोह मे धकेल देने छलिऐ आई सेह क्षण बरे-बरे स्मृतिक पटल पर झलकै’छ एतबा दिन हम बिसरने छलहुँ चाहैत छलहुँ सभ दिन बिसराएले रहए जेना अनजान शहर क भीड़ मे कतेक अजनबी चेहरा लोक देखै’छ संगहि चलै’छ पैदल वा कोनो सवारी मे मुदा पफेर ओ स्मरण कहाँ रहैत छैक। यात्रा क बाद सब अपन-अपन ठेकान दिस बढ़ै’छ ककरो मुँह कान मोनो ने पड़ैत छै। अन्हार गुज-गुज सुरंग मे ध्ड़ध्ड़ाइत टयूब रेल मे अगल-बगल बैसल यात्राी एक दोसरा से असंपृक्त रहै’छ होइत जे तहिना हमर स्मृति दिन-राति दर्दक सुरंग मे हकमैत दौड़ैत रहत मुदा ओ कहियो-सुरंग सॅ बाहर आबि हुलकियो ने मारत। कखनहुँ नहि। -तखन आइ एना कियेक भऽ रहल अछि। एक बेर एक संग नहि बेरा-बेरी टुकड़ा-टुकड़ा मे ऑखिक आगू पसरि जाइछ। रूम मे दवाईक गंध्, पिफलिपके आनल टयूलिपक गमक संग मिझरा कऽ एकटा अजीब गंध्...... उज्जर दप-दप देवार स्वच्छ पफर्स आ रंग-बिरंगक-ट्यूलिप। कहने छलाह पिफलिप- अइ मौसमक ई पहिल ट्यूलिप छै। यूरोप मे एखन- पूर्णरूपेण बपर्फ पिघललै अछि नहि, तैँ अप्रैलोमासक ट्यूलिप के रंग हल्लुक छैक- दूध्यिा गुलाबी, पीअर आ नव रंग-रूप लेबऽ लेवन आतुर उज्श्र........हरियर पात। हम बहुत कष्ट झेलने छी। शोषण, उत्पीड़नकेर पीड़ा आ त्रासदी मे झुलसी एक-एक क्षण व्यतीत कयलहुँ अछि। जाहि दिन एहि त्रासदीकेँ अपन जिनगीक शर्त बुझलिऐ ताहि दिन सॅ आत्मस्वीकृतिक संग बेकार बेमतलबक विरोध् से जूझब छोड़ि देलहुँ। किछु विशेष अर्थ मे एकरा हमर समर्पण बूझल गेल। समस्त शोषण उत्पीड़न क सोझा अपना के सलीब पर टँगल रहबाक अनुभूति भेल। मुदा एहि एकटा पफायदा भेल आब हम अपना के जिनगीक समस्त चुनौतिक सामना करबा लेल तैयार छलहुँ। पूर्व स्मृति नहुँए सँ कान्ह-छुबै’छ कि सोझा मे हमर हम सम्पूर्ण रूप मे ठाढ़ होइछ एकदम शान्त निर्विकार। पहिलुका संस्मरण वापस चलि जाउछ। -‘ओइ दिन नरेन्द्र हमरा सोझा मे टका सँ भरल ब्रीपफकेश खोलिकऽ उझलैत चिचिआयल छलाह लिअ, अहाँके कतेक टका चाही?’ लाख, दस लाख, करोड़? टका, टका, टका राति-दिन टकाक पाछू अपस्याँत रहैत छी? बाजू, बाजु ने कतेक टका चाही लऽ लिअऽ।’ आ पफेर क्रो( से तमतमाइत दस-दस हजारक गडóी उठाकऽ हमरा देह पर पफेकऽ लगलाह। हम नीचाँ मे बैसल अपना बक्सा पैक करैत छलहुँ। डायरी मे लिखल समानक मिलबैत छलहुँ- कोट, कार्डिगन, नाइटी, ब्रा, पैंटी, शर्ट्स, पैंट, सलवार-समीज, साड़ी ब्लाउज...............की दू टा साड़ी सँ निमही जाएत। दवाई लऽली एहि बीच नरेनद्र तुपफान उठौलनि। नहिरहि भेल हुनका दिस तकैत बजलहुँ- नरेन्द्र। ई व्यवसाय हम टका अर्जित करबा लेल नहिकऽ रहल छी। ई हमर आइडेंटिटी अछि। हँ, चारि साल पहिने जहिया काज शुरू कयने छलहुँ तहिया भनहिं टका क जरूरत छल। आइ टका सॅ वेशी एकर महत्व छैक जे ऐहि देश सॅ विदेशक उड़ान हमरा जिनगीक कैनवास के बहुत पैघ बनबै’छ। नित नव व्यक्ति सॅ परिचय जान-पहिचान जीवन शैलीकेँ बूझऽ सूझऽ क अवसर दै’छ। -‘सोझ बात बाजु ने जे ऐहि व्यवसायक लाथे एसगर मौज मस्ती करबा मे नीक लगै’छ। -‘नरेन्द्र! अहाँ की बाजि रहल छी?’ -‘हम बिल्कुल सही कहि रहल छी। अहाँ विदेश मे की करैत छी से हम-देखऽ जाइत छी? देखू, हमरा दिस देखू मोन पाडन्ऩ् जहिया ई व्यवसाय शुरू कयने छलहु तहिये हम चेता’ देने छलँहु’ - काज करू मुदा ई नहिबिसरब जे अहाँ विवाहिता छी, एकटा बच््याक मां छी, अग्रवाल हाउसक पुतौहु छी।’ -‘नरेन्द्र, बिना बात क दोष नहिदिअ ककरो पर इल्जाम बिनु बुझने नहिलगाबी। एहन शक होइछ तऽ संगे चलू देखू हम ओत की करैत छी।’ - वाह! हम अहाँक संगे चलू! अहाँके पाछू-पाछू सैंपलक बक्सा उठौने? ध्न्य छी श्रीमती जी! अपन पतिक केहन दिव्य खाका-घिंचलहुँ अछि? हम आब चुप्पे रहनाई-नीक बुझि अपन पफाईल उनटेलहुँ। जँ कोनो कागज छुटि जाएत तऽ ओतऽ प्रर्दशनी मे आपफत भऽ जाएत। एखन धरि-श्यामल कॉस्टिंग पेपर्स नहिपठौलक। सांझुक पाँच बाजि रहल छै सैंपलो पूरा नहिआयल अछि। एयर इंडियाक बारह बजेक-फ्रलाइट अछि। ई फ्रलाइट सोझे लंदन- पहुँचतै। हम कनखि सॅ नरेन्द्र दिस तकलहुँ चेहरा घृणा सँ विकृत बुझना गेल। हे भगवान! ई पफेर ने कोनो उत्पात मचाबए एक तऽ ओहिना यात्राक समय खासकऽ व्यापारिक यात्राकाल तनाव से माथ पफटैत रहै’छ। -बेर पर कखनौ कोनो वस्तु नहिभेँटतै अछि तऽ कखनहुँ कोनो आवश्यक कागजात। जकर डर छल सेह भेल-पफेरू चिचिएनाइ शुरू भेल- ‘दरअसल हमरे गलती अछि एतेक छूट देबहि ने चाही। उड़ऽ सॅ पहिने पॉखि कतरि देबऽ चाहैत छला केना अहाँक बात मे आबि गेलहुँ। चेहरा देखि क्यो बुझियो ने सकै’छ जे अहाँ केहन मक्कार औरत छी।’ -आहत मन सॅ बजलहुँ-‘आबहु चुप्प होउ!’ ‘नहिहम चुप्प नहिरहब। पहिने तऽ अहाँ कहैत छलहुँ मोन नहिलगैत अछि घर मे गुमसुम बैसल रहने। तऽ मोन बहटारऽ लेल ई काज शुरू कयलहुँ। आ आब काजक अलावा आर कोनो बातक होशे नहिअछि? एकदिन-कानि- कानि कऽ अहीं कहने छलहुँ’ - ‘नरेन्द्र! हमरा मे आत्मविश्वासक कमी अछिं! कोनो मन लग्गू काज- करब तखने तनांव कम होएत आ स्वस्थ होएब।’ - ‘तऽ की आब हम स्वस्थ नहिछी? पहिने सॅ वेशी संतुलित, आत्मविश्वास नहिबुझाइत अछि?’ ‘‘संतुलन आ अहाँ? अहाँ तऽ सदैव ‘वन टैªक माइंड’ छी। पागल जकां जे करब ताहि मे अपस्यॉत रहब। भोरे आठ बजे-घर से बहराइत छी आ राति मे आठ बजे घरि घुरिकऽ आबि तऽ भाग्य सराहि।’’ - हम कतहु चलऽ कहब तऽ हम थाकल छी माथ मे दर्द होइत अछि, मुदा क्यो अहाँक व्यापारी आबि जाय तऽ ओकरा संगे बारह- बजे राति घरि बाहर रहब। तखन ने माथ मे दर्द होएत ने थकनी, खूब चहकैत-रहब।’ ‘नरेन्द्र! अहाँ जनैत छी- हम काज सॅ बाहर जाइत छी मुँह लटका कऽ बैसने हमर काज नहिभऽ सकै’छ। हम कतहु ककरा संग नेह-छोह लेल नहिजाइत छी।’ - ‘इएह तऽ हम जानऽ चाहैत छी- जे दिनो-दिन अहाँ मशीन कियेक बनल जा रहल छी? अहाँक व्यत्तिफत्व मे कनिको रस बुझाइते ने अछि केहन निरस भऽ गेलहुँ। कनि देह पर हाथ रखैत छी तऽ छिहुलिकऽ हटि जाइत छी जेना बिजलीक करेंट छूबि गेल होइ। एकदम Úिजिड........... होपलेस। अहीं कहने छलहुँ हम हरदम घरे मे बैसल रहब तऽ पागल भऽ जाएब।’ - हँ, हम कहने छलहुँ तऽ? - तऽ इएह जे आब की भेल? कतऽ गेल अहाँक शर्त? - नरेन्द्र! केहन शर्त! आ के चलै’छ शर्त पर? अहाँ चलैत छी शर्त पर? दुनियाँ मे सब अपन सुविधनुसार शर्त केँ तोड़ि-मरोड़ कऽ चलै’छ।’ - ‘यानि आपसी ईमानदारी, स्नेह-समर्पण........... सभटा पफुसी।’ - ‘नरेन्द्र! इ सभ शब्दक भ्रमजाल छैक! औरत केँ इसभ पाठ एहि पढ़ाओल जाइत छै जे ओ एहि शब्दक चक्र- ब्यूह से बहराई नहि। अन्यथा युग-युग से आहुति देबाक जे परम्परा छै से चालु कोना रहैत? - ‘हमरा अहाँक पिफलॉसपफी ने सुनबाक रूचि अछि ने बहस करबाक। हँ, एकटा बात अहाँ सुनि लिअजँ आइ राति-अहाँ लन्दन जायब तऽ घुरिक अइ-घर मे नहिआबि सकैत छी । कथमपि नहि।’ - ‘ठीक छै।’ हम यथासाध्य अपना केँ संयत रखलहुँ। ऑखिक नोर ऑखिये मे सुखा गेल। एखन यात्राक बेर मे हुनका से उलझब ठीक नहि। ओहिना ततेक तनाव अछि, बीच मे इ बखेड़ा। बिना मतलब के बकझक! गलती हमरे अछि। सोचने छलहुँ शनि के चंलला से कम से कम एक दिन रवि केँ लन्दन मे आराम कऽ लेब, पफेर ओतऽ से शिकागो- चलि जायब। मुदा इ नहिसोचने छलहुँ जे बक्सा पैक देखि नरेन्द्र एतेक - उत्पात मचौता। मोने-मोन इएह सभ गुनध्ुन करैत छलहुँ कि पफेरू नरेन्द्र दहाड़ऽ लगलाह- ‘सुनू प्रिया! हम सीरियस छी... आइ मीन इट..... अहाँ आब अइ घर मे घुरि कऽ नहिआबि सकै छी।’ - ‘हम हँसैत पूछलिऐन्हि - की ई घर-मात्रा अहिंक अछि?’ सोचने छलहुँ एना बजने वातावरण किछु हल्लुक होएत। ओ वातावरण के हल्लुक कियेक होमऽ देताह। विषाह लोक वातावरण केँ विषात्तफ बनाओत ने। क्रो( सँ बजलाह-‘हँ, हँ कानि खोलि कऽ सुनि लिअ ई घर हमर अछिआ कानूनक नजरि मे बेटाक कस्टडी बापे के भेँटैत छैक तैँ सँजु हमरे लग रहत।’ - ‘नरेन्द्र ! अहाँ के की भऽ गेल अछि? की आलतु-पफालतु बात लऽ कऽ बैस गेलहुँ क्यो बाहर सॅ सुनत तऽ की कहत?’ - ‘जकरा जे बुझबाक होइ बुझए। हम अहाँक तलाक देबऽ चाहैत छी।’ ‘राक्षस!’ एकाएक मुँह से उएह शब्द- बहराएल। ‘हँ, हम तऽ राक्षस छी आ अहाँ? अहाँ की देवी छी ! शैतान क जड़ि छी, ओहिना एतेक व्यापार पसरि गेल?’ आइ हेट यू ..... आइ रियली हेट यू।’ - ‘नरेन्द्र! व्यापार पसरल मेहनत आ ईमानदारी सँ ध्ूर्तै सॅ नहि! आ ने इ हमरा विरासत मे भेँटल अछि।’ - ‘ओह! तऽ विरासत कहि कऽ अहाँ हमरा पर व्यंग्य करैत छी। प्रिया ई जुनि बिसरू हम पुरूष छी-अई घरक मालिक! - ‘अइ घर मे हमर मर्जी चलत सिपर्फ हमर।’ - ‘से तऽ हम देखिए रहल छी। अहिंक मर्जी चलै’ छ। आ हम अहाँक कोनो सुख मे बिघ्नो नहिदैत छी। चुपचाप अपन काज कऽ रहल छी।’ - इ काजतऽ बहाना अछि पाई कमएबाक भूत सवार भेल अछि। असल मे अहाँ आत्ममुग्ध् महिला छी। अपने रूप के सजबैत रहऽ चाहैत छी। अहाँक महत्वाकांक्षा दिन दुगुना राति चौगुना बढ़िते जा रहल अछि।’ - की महत्वाकांक्षी भेनाई अपराध् छैक? की अहाँ टकाक पाछु अपस्यॉत नहिरहैत छी? शेयर के भाव बुझऽ लेल दिन-राति पफोन कान सँ सटेनहि रहैत छी। एतऽ सॅ लेलहुँ ओतऽ बेचलहुँ। तऽ अहाँक हमर कमाइ सँ जलन कियेक होइछ? अहाँ तऽ साल मे करोड़ो कमाइत छी हमरा तऽ मुश्किल सँ पाँच सँ सात लाख होइछ! की अहाँ ‘पिफकड्ढी’ क प्रेसीडेंट होमऽ नहिचाहैत छी? सभा-सोसायटी मे मंच पर बैसकऽ मे हार पहिरनाई नीक नहिलगै’ छ? - ‘ओह! तऽ अहाँके’ हमरा सँ जलन होइछ? तैँ सजि-ध्जि कऽ इंडिया टू डे मे पफोटो छपबेलहुँ? ए ग्रेट बिजनेस इंटरप्राइजर मिसेज प्रिया-अग्रवाल।’ ‘नरेन्द्र! सत्ते एखन अहाँक मूड खराब अछि।’ - ‘मूड’ क बहाना छोडू़ । हम पफेर सिरियस भऽ कहैत छी, जँ आई अहाँ लंदन जायब तऽ अइ घर में घुरि कऽ नहिआबि सकैत छी। - दुर इहो कोनो जिनगी भैले जखन देखू तखन बस बिजनेस। आइ कस्टमर आबि रहल अछि तऽ काल्हि सैम्पल बनबाबऽ मे पफैक्ट्री मे आध राति बीत जाइछ। राति मे मिनट-मिनट पर पफोनक घंटी बजैत रहै’ छ। घर ने भेल पागलखाना भऽ गेल।’ - ‘अहाँ केँ दिक्कत नहिहोमय तैँ तऽ हम अलग कमरा मे रहैत छी। पापा क देहांतक बाद तऽ .......।’ - ‘बाजू, बाजू ने चुप्प कियेक भऽ गेलहुँ? अहाँ इउह ने कहऽ चाहैत छी जे आबतऽ हम लड़की सभ केँ घरो लऽ अबैत छी?’ - ‘सब बुझिते छी। शान्त होउ। हम लंदन-अवश्य जायब।’ - ‘तऽ अहॉ जयबे करब ........ अहाँके एतेक हिम्मत?’ - हुनका ऑखिक लाली हिंसाक संकेत दऽ रहल छल करेज कॉपऽ लागल। पफेरू चिचिएलाह - ‘अंतिम बेर कहैत छी सुनि लिअ घुरि कऽ एत नहिआयब। गेटे पर से ध्क्का दऽ बाहर कऽ देब।’ बाहर हाल मे सोपफा पर माथ पकड़ने सासु बैसल छलीह- पाथरक मूरूत जकाँ। ऑखि से दहो-बहो नारे झहरैत छलैन्हि। घरक केवाड़ लग ठाढ़ भेल सँजू सभटा बात सुनैत छंल। पैर पटकैत नरेन्द्र घर सँ बहरेलाह। पलंग पर खुजल ब्रीपफकेश ओहिना ध्एल छल सभटा टका छिड़ियाल छलै। सँजु हमरा भरि पाँज पकड़ि कानऽ लागल। - ‘मां।’ ‘हँ, बौआ बाजू की ?’ - ‘मां की अहाँ केँ लंदन’ जाएब बहुत जरूरी अछि?’ - ‘हँ, बेटा काज समये पर करऽ पड़ैत छै।’ - ‘मुदा इ पापा के पसंद नहिछैन्हि। आ, मां..... अपना सभके पाइक अभाबो तऽ नहिअछि।’ - ‘बेटा हमरा तऽ टका क जरूरत अछि।’ मोने-मोन सोचलहुँ - एतेक समझौता कयलाक बाद ई हाल अछि पतिदेवक। संजु हमरा गरदनि मे बॉहि ध्ऽ जोर सँ कानऽ लागल। हम अपना केँ कहुना जप्तकऽ कोमल स्वर मे कहलिऐ - ‘बौआ, चुप्प भऽ जाउ। जिनगरिक बाट आसान नहिछैक।’ हाथ मे ताजा ट्यूलिपक गुच्छा नेने पिफलिप के देखलिएन्हि। लग आबि-नहुँए सॅ माथ पर हाथ रखैत पूछलैन्हि - - ‘आब केहन मोन अछि प्रिया?’ - ‘तरोताजा।’ - ‘की अई पफूल जकाँ?’ दूनू गोटे भभाक हँसलहुँ। ‘जूडी अहाँ के याद करैत छलीह । हम अहाँक रहबा लेल डूयब्रवनिक मे होटल बुक करा देलहुँ अछि। एखन कम से कम दस दिन आरामक जरूरत अछि। सेतीस्टेपफा मे पैघहस्ती छुटीð बिताबऽ अबै’ छ। देखऽ योग जगह छैक।’ ‘महग हेतै?’ ‘प्रिया! अहाँ एपफोर्ड कऽ सकैत छी।’ ‘तथापि....?’ ‘प्रिया नहिजानि कियेक भारतीय नारी अपना आप केँ प्यार कियेक नहिकऽ पबै’ छ? अहाँस्वयं एतेक कमाइत छी’ तखन एहन अवस्था मे अपना लेल सुख भोगब अन सोहाँत कियेक लगैत अतिछ?’ ‘ओह! पिफलिप! हमरा शब्द नहिभॅटैत अछि की कहि ध्न्यवाद दी!’ - ‘अच्छा! पिछला पन्द्रह वर्षक दोस्ती मे एखनहुँ ध्न्यवादक औपचारिकताक लेल जगह खालि छैक । अरे, हम एक दोसराक नीक अध्लाह नंहिसोचब तऽ के सोचतै? असल मे जूडीक इच्छा छलनि जे हम अहाँ के अपने घर नेने आबि। मुदा हम जैनेत छी अहाँ एकान्त वेशी पसिन करैत छी। हँ जँ मन अबि जाए तऽ हालैंड ऊबि जायब। ऑखि नोरा गेल एतेक अपनत्व? मानल हुँ एतेक वर्ष सँ मित्राता अछि साल मे कतेक बेर भेंट होइछ? हँ एतबा अवश्य जे एको दिन लेल भेंट होइछ तऽ आध-आध राति ध्रि जूडी, पिफलिप आ हम गप्पे करैत रहि जाइत छी। कॉपफी पर कॉपफी पिबैत-अतीत सॅ लऽलऽ वर्तमान ध्रिक वृतान्त कहैत-सुनैत बीतै’ छ। संजु पिताक वारिस बनल हुनके लग छल। हँ बीच-बीच मे हमरा सँ भेंट करऽ अबैत छल सहमल-सहमल बुझना जाइत छल। हम नहिचाहैत छलँहु जे हमरा दूनूक दोगला राजनीति मे इ लड़का पिसाइत रहए। ओना अपना भरि ओ हमरा खुश करऽ चाहैत छल। ध्ीरे-ध्ीरे संजु पूर्ण रूपेण नरेन्द्रक मुट्ठी मे बन्द होइत गेल। बापक डरेँ हमरा सँ दूर-दूर रहऽ लागल। नरेन्द्रक व्यवहार देखि हम शुरूहे सॅ क्षुब्ध् छलँहु। सच कहू तऽ हमरा नजरि मे ओ-हेल्दी एनिमल छलाइ। हम लंदन सँ घुरि कऽ कतऽ गेल छलहुँ। आई अस्पताल मे हमर तेसर दिन छल। भोर मे बहुत देर घरि बगीचा मे टहलैत रहलहुँ। डाक्टर आइभरि एतहि रहऽ कहलक अछि। काल्हि प्रातःकाल डूयब्रवनिक चलि जायब। नीना सॅ गप्प भेल ओ बेर-बेर कहैत छलीह भाभी अहाँ चिन्ता नहिकरब, एतऽ हम सब सम्हारि लेब। खिड़कीक उज्श्र पर्दा पर डूबैत सूर्यक-उदास छाया वातावरण के पफीका कऽ गेल। ध्ीरे-ध्ीरे उज्श्र आकाश मे रातुक स्याही पसरए लागल। हम करौट पफेरलहुँ अतीतक परछॉही आँखि मे हुलकी मारऽ लागल। सबसे पहिने देखलहुँ नेनपनक एकटा सांझि। स्मृतिक बाट पर नहुँ-नहुँ डेग बढ़ेलहुँ। तइओ स्मृतिक जंगल झाड़ मे करवनहुँ आँचर ओझराइत छल तऽ करवनहुँ पैर मे ठेस लगैत छल पाथर सॅ, करवनहुँ कुहेस सॅ भरल आकाश ....... कतहु किछु ने सुझाए तऽ कौखन शीतल ओसक स्पर्श से पैर से देह ध्रि भुलुकि उठय। पफेरू मोन पड़ल ऑखि से झफहरैत नोर! बहुत दूर से बीतलल अतीतक परछॉही के डोलैत देखलहुँ! मात्रा साढ़े नौ वर्षक नान्हिटा- बच््यी सांझि ए सॅ गुमसुम खिड़की पर बैसल- छैक! आई खेलऽ लेऽ नीचॉ नहिउतरल। संगी सहेली बजाबऽ एलै तऽ झनकि कऽ मना कऽ देलकै। शान्त गुम्म भऽ देवार पर अबैत-जाइत छॉही केँ देखैत रहल। सूर्य डूबि गेलै। अन्हार पसरि गेलै तइओ ओ ओतहि बैसल हल। ठंढ़ा बसात बहलै, दाई मां स्वेटर पहिरा देलथिन। - खेनाई ले’ पूछलकै दाई मां तऽ मना कऽ देलकै। सामने मे रहै’ छै चित्रा ओकरा एतऽ खेलहु नहिगेल। के छै इ लड़की? के? ई तऽ हम छी हम! अपने नेनपनक तऽ इ परछॉही देख रहल छी। नेनपनक ओ दुर्घटना कहियो बिसरा सकै’ छ। रतुका साढ़े नौ बाजक छलै-सुतबाक बेरा गुप्ता हाउस मे सब काज घड़ीक सूई संग होइत छै सभक समय निर्धरिक छैक। दाई मां हमर नाइटी पैंटी, देहपोछबा लेल तौलिया पावडर क्रीम सब चीज राखि रहल छलीह। एहनाबेर में हम वेशी काल चुप्पे बैसल रहैत छलहुु। कपड़ा राखि कऽ दाई मां दूध् उठा टोस्ट लऽ कऽ आबि गेलीह, चल बुच््यी, कनि दूध् पी’ ले सूतऽ क बेर भऽ गेलै’। दूध् पीबि हम बाथरूम मे घुसलहुँ। ब्रश-कयलहुँ। नहिजानि कियेक मां क सोझा मे नाइटी पहिन कऽ जयबा मे लाज लगैत छल ाई मांक सोझा किध्ु पहिरक चलि जाइत छलहुँ कनिको धख नहिहोइत छल। पैंटी बदल लहुँ समीज लेल हाथ बढ़ाबिते छलहुँ की दाई मां क नजरि हमरा पैंटी पर पड़लै’। उज्श्र पैंटी मे खूनक ध्ब्बा! ‘बाप रे, ई की भेल? ई खून..... एखन तऽ दसमां बरस शुरूहे भैले ए.... हे भगवान! हमरा बच््यीकेँ इ की भऽ गेलै?’ दाई मां! अहाँ कियेक चिचिआइत छी मां के सब मास एना खून लगिते छै कपड़ा मे? तऽ.... दाई मां एखनहुँ आतंकित छलीह। - ‘लड़का भैया आई हमरा ..............’ ‘अरे कसाई! अपन सहोदर बहिनो के नहिछोड़लें। ओना ओकर बानि तऽ बुझले अछि। बहुरानी केँ डरेँ किछु नहिबजैत छै। ‘दाई मां! भैया एना कियेक कएलन्हि? हम रोकने छलिएन्हि चिचिआय लगलहुँ तऽ जारे से थापड़ मारलैटि आ हमर मुँख बान्हि देलनि! हम मां के सबबात कहि देबई।’ ‘नहिबौआ नहि। आब अहॉ केँ शीलभंग तऽ भइए गेल। बुच््यी ई बात कहियो ककरो लग नहिबाजब।’ बजैत-बजैस दाई मां कानऽ लगलीहा हमरा अपना करेज मे सटने कतेककाल ध्रि हुचुक हुचुक के कनैत रहलीह। दाई मां क ममता हमरो मोून सिहरि उठल मन मे भेल जे हमरा सँ कोनो भयंकर गलती भऽ गेल अछि। अपराध् बोध् भेल, पहिल बेर जिनगी मे बुझायल जे एकरे पाप कहल जाइछ। ‘दाई मां! ....... मां हमरा कियेक भारतीह? भैय तऽ हमरा जबरदस्ती बाथरूम मे लऽ गेल छलाह आ हमर पैंटी खोलि कऽ.......।’ ‘हम कतबो कभैत रहलहुँ तइओ हमरा नहिछोड़लनि। हमर गलती तऽ नहिअछि तऽ मां हुनके बजथिन, बाबूजी क गेलाक बाद तऽ घर मे पैघ पुरूष भैये छथिन। मां कहैत छथिन भैया बड्ड बुझनुक छथि हरदम भैयाक बड़ाई करैत रहैत छथिन। मां कहैत छथि भैया नहिरहितथि तऽ हम साभ भूखे मरि जैयतहुँ। हमहुँ कभैत छलहुँ आ दाई मां तऽ कनिते छलीह। हम बरे बरे बजैत छलहु दाई मां हमर कोन दोष मां हमरा कियेक भारतीइ कहबैनिध्त? दाई मां भाभी नैहर। - गेल छलथिन तकर प्रात हम एसगर अइ रूम मे छलहुॅ तऽ भैया पैंटक बटन खोलैत छलाए तखने चमेलिया आंबि गेलै तऽ भैया बाहरन चलि गेलाह।’ दाई मां हमराकरेज सटनहि छल। पफेरन बाजल-बुच््यी! हमर बात मानू एखने नहिजिनगी मे कहियो ककरो लगई बात नति×ा बाजब। ब्याह हेत तऽ पति परमेश्वरी से नहिबाजबा आ आई सँ हरदम हम अपना नजरि से ओझल नहिहोम देब। बुच््यी! हम अहाँ केँ छोड़ि कऽ कतहु न×ि जाएब। सत्ते दाई मां! अहाँ अपना गाँव नहिजायब। दाई मां! अहाँ हरदम हमरा लग रहब? दाई मां घर मे अहीं तऽ हमरा दुलार करैत छी आर क्यो हमरा खूब मानैत छलाह, बाबूजी कियेक चलि गेलाह?’ ‘की कहू बुच््यी भगवानक मर्जी।’ हमर छोट छीन दिमाग सोचऽ मे व्यस्त भऽ गेल। पलंग पर पड़ल-पड़ल सोचैत छलहुँ बाबूजी कोना चलि गेलाह? हमरा त कखनौ काल लगै’ छ जे खड़ाम पहिरने बाबूजी हॉल मे चलि रहल छथि। ओई दिन बाबूजी ऑपिफस गेलाह से घुरि कऽ नहिअयलाहा राति मे बारह बजे खाली गाड़ी लऽ ड्राइवर घुरल छल दरबजे पर चिचिआइत ध्ड़ाम सॅ खसल -बड़का बाबूजी नहिरहलाह। हुनका हार्ट पफेल भऽ गेलैन्हि।’ दाई मां हमरा जगाकऽ कहने छलीह-बुच््यी! -अनर्थ भऽ गेलै, बड़का बाबूजी केँ आपिफसे मे हार्ट पफेल भऽ गेलैन्हि। देवता सन मालिक आब नहिरहलाह जुलुम भऽ गेलै। दाई मां ूदनू हाथ माथ पीटैत छल। मांक रूम सॅ कननइक स्वर आबि रहल छल हम दौड़ैत हुनका लग गेलहुँ। मां देवार सॅ कपाड़ पफोड़ि रहल छलीह सरला दीदी कनैत-कनैत बजलीह-मां, एना करबै तऽ हमरा सभके के देखत, आब अहींक सब सम्हारऽ पड़त। बड़का भैया काज सँ रंगून गेल छलाह। काल्हि भोर मे आबऽ बला छलाह। भैयाक कईसी बाबूजी के नहिसोहाइत छलैन्हि। हुनकर पिफजुलखर्ची देखि बहुत दुखी रहैत छलाह। रोज नव-नव सूट, इत्रा सॅ गमकैत रूमाल, केश मे तेल नहिबिल क्रीम लगबैत छथि। जहिया बाहर जाइत छलाह ओहू- दिन बाबूजी कहने छलथिन - विजयक मां, अहॉके बेटाक रईसीक अन्त नहि। कतबो कमाएत बचतै नहि।’ मां के नहिनीक लगलैन्हि लोहदि कऽ बजलथिन- ‘यौ, अहाँ तऽ हरदम ओकरे पाछु पड़ल रहैत छी कम से कम यात्राकाल तऽ शुभ-शुभ बाजू।’ बाबूजी ओहुना बड्ड कम बजैत छलाह। आ जखन मां क प्रलाप प्रारम्भ होइत छलै तखन तऽ सोझे उठि कऽ अपना रूम मे चलि जाइत छलाह। हँ घर बच््या सभ लेल हुनकर रूम हरिदम खुजले रहैत छल। बाबूजीक घर मे नेवारवाला पलंग छैलैन्हि ताहि खूब मोट गद्दा आ मसनद छलै। बाबूजीक पाछाँ-पाछाँ हरदम छोटका भैया चलैत छलाह। तकरा पाँछा। -सरोज आ हम बड़की दीदीक दूनू नेना रवि जकरा हम सभ बुल्ली कहैत छलिऐ से आ नीलू बुल्ली आ नीलू प्रायः एतहि रहैत छल। हम चारू सरोज, बुल्ली, नीलू। आ हमरा सभ मे मात्रा एक-एक साल क अन्तर। मां क दहिन हाथ छलथिन बड़का भैया आ बाम हाथ सरला दीदी। सरला दीदी के घर मे सब सल्लो कहि कऽ शारे पाड़ैत छलनि। सल्लो दीदी कें बड्ड पैछ घर मे विवाह भेल छलनि। जीजा जी देखबा मे कुरूप कारी छलाह बाबूजी हुनका देखि कऽ विवाह लेल मना कयने छलथिन। मुदा अइ विवाहक प्रस्ताव अनने छलाह मामा। ओ मां के बुझा सुझा कऽ मना लेलथिन। खानदानी घर छै, अपन जुटमिल, कॉटन मिल, बैरकपुर मे लोहाक कारखाना, चाय बगान छै। ई तऽ बेटीक भाग्य अन्यथा कहाँ हमरा लोकनि कहॉ हुनकर परिवार। मां मानि गेलथिन! बाबूजी केँ पसंद नहिनहिछलैन्हि। मामा केँ कहने छलथिन- ‘जय कुमार जी, सटोरिया परिवारक कतेक गुणगान करब? भऽ सकैंद काल्हि सटाð मे ओकर जुटमिल आ कॉटन मिलबिका जाइ? आ ओ लोकनि कोना पाइ बटोरलनि से हम नहिजनैत छिए? अहाँ कनिको अघलाह नहिलगैं’छ एहन सोनपरी सन भगिनी कें कारी कौआ सॅ ब्याह तय करब? हमरा कहीक कभी अछि? हँ, भौतिकता मे हुनका सॅ उन्नीस छी सेह ने! मुदा हमर खानदान? खनदानक बात सुनिते मां भड़कि गेलीह। हँ, हँ बड्ड नीक खानदान अछि अहाँक? - ने ककरो डेªस सेंस अछि ने बातचित करबाक शऊर। अहॉक मां के कहिकऽ थाकि गेलहुँ मुदा ओ सारी बिनु पेटीकोटे के पहिरतीह। कतेक खराब लगैत छॅ। ओई दिन भगवानक कथा सुनबा लेल रूँगटा हाउस गेल छलहुँ जमुना मौसी टोकिए देलनि - ए कस्तुरी ! अहाँक सासु-केहन पफुहड़ छथि एक छिन्ना सारी पहिरैत छथि आ ऊपर उघाड़ ब्लाउज नहि। आ तेहन गंवार भाई सभ अछि। बहिनक कोन गप्प ने कथुक लुरि व्यवहार ने पढ़ल लिखल। मामा जी इस भटाा वृतांत सुनिते कुटिल मुसकि छोड़लनि। बाबूजी हारि मानि बजलाह। - ‘ठीक दै अहाँ बेटीक मां छी आ इ अहाँक भाई छथि तऽ अहाँ दूनू गोटे के इ ‘कथा’ पसिन्न अदि तऽ त करू। मुद्र एकटा बात हम पहिने कहि दैत छी हम एक लाख टका पहिनहिंु दऽ देबैन्हि ओ जेना जे खर्च करथि बाद मे हमरा सॅ उम्मीद नहिराखथि। -जीजा जी, अहॉ कोन चर्चा लऽ कऽ बैसि गेलहुँ। अरे हुनका कथीक कमी छैन्हि? सेठानी चौअन्नीक आकारक पाँच-पाँच ट हीरा पहिरने रहैत छथि। पाँच-पाँच टा हीरावाला करोड़पतिक गुणगान मांक सॅ सदतिकाल सुनैत छलहुॅ। दूनू काने मे चौअन्नीक बराबर हीरा नाकक छक हीराक आ दूनू आंगुर मे हीराक अंगुठी। हॅ मायिओ के हीरा क अंगुठी छलैन्हि आ जमुना मौसीके हीरा क अंगुठी छैन्हि। पाँच टा हीरा तऽ मां के देहो पर झलकैत छैन्दि मनहिं छोट-छोट छैन्हि। अच्छा। -ओइ समय जे बाबूजी एक लाख टका देने छलथिन आइ चालीस साल बाद ओकर कतेक कीमत हेतै? करीब-करीब करोड़ टका सॅ ऊपर दहेज मे ढ़ेल गेल छलै। सोचबाक क्रम जारी छला एतेक दिनक बादो बाबूजीक स्मरण होइते ऑखि डबडबा जाइत अछि। ‘हँ, जहिया हमरा बरबाद कयने छलाह बड़का भैया तहिया कतेक हब्बी ढ़कार कनैत सोचैत छलहुँ जॅ बाबूजी एखन आबि जाएताह ...... मुदा मुइल लोक कतहु घुरि कऽ आबय।’ ....... ‘सूति रहू बुच््यी, उऽाक कनने की ..........’ दाई मांक ममत्व हुनकर हॅसोथैत हाथ देह मन कें शक्ति देने छल ऑखि कखन मुना गेल नहिबुझलिऐ । हम सब छह भाई-बहिन छलहुँ । बड़की दीदीक नाम छलैन्हि सुमित्रा। हुनक चौदहे वर्ष मे विवाह भेल छलैन्हि आ तइसम वर्ष होइत-होइत चारि बच््याक मां भऽ गेलीह। बड़की दीदीक विवाह समय मां मात्रा अटाòइस वर्षक छलीह। हुनका बाद छलीह मंझली दीदी सरला हुनका बाद बड़का भैया विजय पफेरू छोटका भैया अजय आ सरोज हमरा से एक साल मैघ। दाई मां कहने छलीह हमर नाम प्रिया डाक्टर अमृता कौर रखने छलीह। सब भाई-बहिनक रंग गोर छलै हमरे टा गेहुआँ रंग छल। कॉलेज मे संगी गेहुआँ गोर आ कटबार ऑखि नाक वाली कहैत छलीह। अपन रंग-रूपक नीक कॉम्पिलमेंट कॉलेजे में सुनलहुँ! बड़की दीदी सरोज बड्ड चंचल छलीह जखन तखन भैया आ दीदी कामक चुगली बाबूजी लग करैत छलीह। - हुनका सँ सब डरल-सहमल रहैत छल कखन ककरा बात पर हंगामा कऽ देतीह जोर-जोर कानऽ लगतीह तकर कोनो ठेकान नहि। ‘देखऽ मे बड्ड सुध्ंग मुदा एक नमरकेँ चुगलख्.ाोर जहरक पुड़िया।’ भैया आ सरला दीदी इएह कहि हुनका खौंपफ बैत छलथिन। आ सब सँ छोट रहितहुँ हम ने दुलारे छिड़िआइत छलहुँ ने करो चुगलीए करैत छलहुँ। तैं हम बड्ड नीक जकरा जे मोन होई हमरा कहैत छले । डूयब्रवनिक मे होटलक नाम छै ‘सेतीस्टेपफा’। कमरा नम्बर 211 केवार पफोलि भीतर गेलहुँ। खूब पैध् सापफ सुथरा बाथरूम। खिड़की सँ सटल बालकनी। कमरा मे आराम दायक दू टा पलंग। ईस्टर के छुटीð मे इ होटल टूरिस्ट सॅ भरल रहैत छैक तखन इएह रूमके डबल रूमक चार्ज लगैत छै। प्रत्येक दिनक कतेक डालर लगैतै ? अपन आइ सोच पर हँसी लागल। पिफलिप ठीके कहने छलाह ‘अहाँ केँ अपना आप सॅ प्रेम नहिअछि? भूख लागल अछि। आब की करू? ........ ककर दोष हमहीं चाहैत छलहुँ - ठीक छै आब रूम सर्विस केँ पफोन कऽ चाह आ टोस्ट के आर्डर दऽ दैत छिएक। - ‘मैडम अहाँ लेल क्ररेार अरलजहुँ अछि एखन तुरत बेकरी सॅ एलैए।’ मने मन हँसी लागल इ होटल वला सथ अपन गेस्टक कतेक ध्यान रखैत अछि आ समयानुकूल सुझाव दऽ देत। रूम सर्वेट केँ जाइते हम पफेरू पलंग पर आंघरा गेलहुँ पंख से भरल मुलायम तकिया नीक लगै’ छ पफेय मोन पड़क कोसा तऽ दऽ गेल चाह नहिढेलक। पफेरू पफोन कयलहुँ-चाह आबि गेल। एक घुंट पीलहुँ एकदम बेस्वाद। - लागत, क्रोसा कहुना आध खेलहुँ जी हौरंऽ लागल। अचानक नहिकी भऽ गेल? एखन हम सड़क पर छी मोन एखनहुँ नीक नहिलगै’छ घुरि कऽ होटल आबि गेलहुँ सम्पूर्ण शरीर मे थकनि दर्द क अनुभव होइछ ऑखि मुनि पलंग पर सुति रहलहुँ नहिजानि करवन ऑखि मुना गेल। भोर मे उठलहुॅ तऽ मन हल्लुक लागल। सोचलहुँ आब ऑर्गनाइज कऽ ली समय। सांझि भोर ऐहि होटल मे खायब, ओना हमरा लेल भोजन आतेक महत्व नहिरखैं’छ। घूमब प्रत्येेक दिन घंटाा दू घंटा चारि घंटा। से हो केहन घुमनाई? लक्ष्यहीन । वर्तमानक झरोखा सॅ अतीत बेर बेर हुलकी भारैत अछि। से हो क्रमब( नहि आगा पॉछा बेढंगा। लिखऽ चाहैत छी मुदा कोना लिखू? हँ एकटा अनुभूति भऽ रहल अछि जे एसगर रहने एकटा लाम-भेल अछि जे भीतर मे जमल बपर्फ पिघलऽ लागल अछि तरल पारदर्शी चेतना, अतीत मे बीतल घटना केँ हूबहू देख रहल छी आ बहुतो बात एहन छै जकर आब अपेक्षा नहिकयल जा सकै’ छ। हमर इ नितान्त अपन एकान्त कोना काजक व्यवस्तता मे ओझल रहैत हल। मुदा आब अपना के ठगब होएत एकरा अन्ठाएब। अपना के एसगर रहबाक त्रासदी केँ की कहिऐ आतंक की कर्मक पफल? ऑखिक नीर के तीव्र गति सॅ जीवनक दौड़ मे सुखबैत रहलहुँ अछि। पछिला दस वर्ष सॅ काजक पॉछा तेहन व्यस्त रहलहुँ जे कहियो अतीतक विषय मे सोचबाक लेल पलखति नहिभेँटल। - आ जँ काजक व्यस्तता नहिरहैत तऽ की हम जी सकितहुँ? हम्हर दस दिन सँ ई प्रश्न पूर्ण अस्मिताक संग हमरा आगाँ ठाढ़ रहै’ छ- उतारा मंगै’छ हम की उत्तर दिऐ? जिनगी व्यतीत करबाक आर बहुत तरीका छैक-मुदा कोन तरीका? जूडी हरदम कहै’ छ ‘प्रिया! अहाँ अपन मनक बात डायरी मे लिखल अरू मन क मार हल्लुक हेतऽ । महिला एखनहुँ मौन रहैत दथि मुदा हुनकर नीर दुनियॉ हॅसैत छैन्हि। हिस्टिरियाक दौड़ा पड़लापर कानब, चिकड़ब सुनि पुरूष कान मुनि लै’ छ। मुदा शब्दक महत्व छैक शब्तक अपन इतिहास छैक..... आ जॅ प्रकाशित भऽ जाय तऽ ओकर अपेक्षा नहिकएल जा सकै’ छ। - ‘मुदा जुडी एहन किछु हम नहिलिख सकैत छी।’ लिखाई शुरू करब तऽ अपना सन हजारो-लाखो महिलाक मन सँ संवाद स्थापित कऽ सकब। नहिजानि कतेक के अहाँक शब्द मरहम जकाँ घाव केँ शीतलता देतै! अनगिनत मौन महिला केँ मुखर बनाओत। गोंगा बनलि छथि से बजतीह हँ, हँ इ कथा सत्य छै एहन हमरो संग भेल अछि।’ आइ एतऽ अपन परिचित लोकवेद सॅ दूर भौगोलिक परिवेश सॅ सुन्दर छी तऽ लगै’छ जेना पियाजक छिलका जकॉ परत दर परत उघड़ि रहल अछि जे किछु हमर अपन वास्तविकता अछि जतबा बाहरी दुनियाँ के संघातक दौरन हम आत्मसात कयने छलहुँ से सभटा ऑखिक आगू नाचि रहल अछि। - आब जरूरी छै एकटा सभकेँ नीक जाकाँ चिन्हब। भनहिं हमरा पर परिस्थितिक प्रभाब परल आ हम जीनगीक जरूरतक अनुसार नव बाट पकड़लहुँ नव परिस्थिति गढ़लहु। मुदा आब कतेक चमत्कृत करै’छ जे आब हम परिस्थितिक हाथक कठपुतरी नीन्नो जेना पहिने परिस्थितिकेँ अपन नियति बुझि लेने छलहुँ से बात आब नहिरहल। एहि विराटक प्रक्रिया मे कोना छोट छीन प्रयास सम्मिलित होइत रहलै से भाव उभड़ै’छ तऽ आत्मविश्वास और बढ़ै’छ। की कहू, जिनगीक मादेँ खासकऽ हमर जिनगी तऽ विरोधभासक बंडल आछि। ओझराएल ताग, बीच बीच मे गीरह पड़ल लगै’छ नहि जे सोझरा सकबा मुदा आब उलझन संग जीयब सीख लेलहुँ अछि। आ इएह समझदारी जिनगीक प्रति लगाव केँ जीवित रखने अछि। एहि सँ आन्तरिक एहन अहोभावक अनुभूति होइछ जकर वर्णन करबा लेल शब्द नहिभेँटै’छ ने एहि आनन्दक बखान कऽ सकैत छी। आश्चर्यक गप्प त ई जे आइध्रि अपना विषय मे सोचैत ने अपना सॅ अतेक लग हलहुँ ने कहियो अपना सॅ एतेक दूरे। एक ही पल मे दूनू तरहक घटना घटित होएब केइन अजगुत लगै’छ जिनगीक। माथक ऊपर सॅ दू टा कारी कौआ पफड़पफड़ाइत उड़ि गेल। ऊपर नजरि गेल देखलिए होटल तग जे गेट सॅ सटले गुपटी छै ताहि पर बैसल छै कौआ। भोर का सुनहरा सूर्यक किरण पफूल पात पर पड़ल ओसक बुन्नकेँ सोखि रहल छल। लग सॅृ। - वृ( जर्मन पति-पत्नी हँसैत बढ़लीह। जहिया सॅ अयलहुँ अदि वृ( दम्पतिक हँसमुख चेहरा देखि मन-प्रसन्न भऽ जाइछ। ‘प्रेम’ ई उढ़ाई आखर मनुष्यताक सम्पूर्ण पुरम्परा केऽ उद्धेय करैं’छ। ................की प्रेम एखनहुँ बॉचल छैक? ऐहि जर्मन दम्पतिकेँ देखि भरोस होइछ हॅ एखनहुँ एहन भाग्यशाली लोक अछि एहि संसार मे जे अढ़ाई उठाखरक अर्थ बूझै’छ कतेक स्नेह सॅ बूद जर्मन पत्नी केँ कॉपफीक प्याली पकड़बैत छैक। बेर-बेर ससरैत शॉल के ठीक करैत रहैत छै। दूनू बेकती पूर्वी जर्मनी सॅ आयल छथि। इ लोकनि अंग्रेजी नहिजनैत छथि आ जर्मन भाषा नहिजनैत छी ब्रेक पफास्ट टेबुल पर स्टिवार्ड जोसेपफ दुभाषियाक काज कयलनि।नहिजानि कियेक जोसेपफ हमर परिचय लेखिकाक रूप मे कयलनि हम तऽ लेखिका छी नहि। ओह! अब बुझलिए ई प्रपंच पिफलिपक छैन्हि ............हमरा एकान्त चाही तैँ ओ हमरा लेखिका कहि रूम रिर्जव रौने हेता आ अई देश मे लेखक केँ विशेष आदर-सम्मान छैक। एहि वृ( दम्पति केँ देखिकऽ बुझाइछ प्रेमक कोनो सीमा नहि! एहि संसार मे सुखी वैवाहिक जीवन सॅ बढ़िकऽ किछु आर नहिभऽ सकै’छ मुदा एहन सुख कतेक लोक केँ नसीब मे होइत छैक? मुइल सम्बन्ध् केँ उद्यैत रहब बड्ड कस्टकर होइत छैक। एहन सड़ल-गलल सम्बंध् के पफेंकनहि कुशल-जिनगी बड्ड हल्लुक गमगम सुमन सौरभ सन लगैत छैक जॅ स्नेह रस सॅ सराबोर रहए। - रूमक खिड़की सँ सटल अंजीरक गाछ छै आ ओकेरे दोग सॅ झलकै’छ नीला आकाश। आ रूम सॅ सअले अछि सन बालकनी जतऽ बैसिकऽ समुद्र के दूर-दूर ध्रि देखल जा सकै’छ अनन्तक एहि विस्तार मे क्षितिजक महज कल्पना कयल जा सकै’छ। लहरक एहि संसारक ने दै ने अन्त! हमरा संग अछि हमर अकेलापन जे जीवनक सही अर्थ समझा रहल अछि। हम कोना-कोना अपनाके बचेलहुँ अछि, अपना जीवन मूल्य के संयोगि के रखलहुँ अछि। हां, टूटलहुँ अछि कतेक बेर मुदा हिम्मत नहिहारलहुँ तय चोटक निशान नहिरहल........दुनियाँ क पैर तर थकुचाइओ केँ माटिक मुरूत नहिबनलहुँ! अड़तालिसम वर्षक अवस्था मे अदद औरत छी जे जिनगी के आब पफैले’छ नहिहँसैत समय बीता रहल अछि। अपना उपलब्ध् िपर गौरव होइछ। मित्राता लेल हाथ बढ़ा गर्मजोशी सॅ लोक केँ लग कऽ लैत छी। आब हम एसगर नहिछी पहिने कहियो छलहुँ। आह तऽ नील आकाशक एक नव अर्थ लागल अछि-पहिने कहियो आकाशक विस्तार के अपना ऑखि सॅ नपबाक कोशिशो नहिकयने छलहुँ। एखनहुँ की दूनू ऑखि सॅ आकाशक विस्तार केँ नापि सकब? मुदा कहन अद्भूत आनन्दक अनुभूति मऽरहल अछि। नेनपन मे एसगर बरामदा मे बैसि चिड़ै-चुनमुनी संग एकालाप बड्ड नीक लगैत छल। - स्वयं प्रश्न करैत छलहुँ आ स्वयं उत्तर दैत छलहुँ। एक दिन की भेलै कि हम चुनमुनी संग नहिजानि की सभ गप्प करैत छलहुँ- रेलिंग पर बैसल। हमर उमर इएह पाँच छह वर्षक रहल दोएत। खूब मगन भऽ ओकरा सॅ पूछैत छलि अले, चनमुनि चिलियॉ आइ तू कतऽ कतऽ गेले कहने। चिलियाँ काली कौआ देखकऽ तोलो उल लगैछौ? बाज ने - तू हूॅ हमला से नहिबात कलबे?........ उतबा मे खूब जोर सॅ टहाका पाड़ि हँसब सुनलहुँ पाछाँ घुरिकऽ तकलहुँतऽ छोटका भैया, सरोज, नीलू आ बुल्ली छल। देखू, देख एहि पागल के चिड़ैँ सॅ बतिआइत छल ‘....... तू हू हमला से नहिबात कलबे ......? बड्ड बदमाश छयि छोटका भैया एक नम्बर केँ नकलची। हमरा चिढ़ाबलेल बेर-बेर सभकेँ कहैत छलथिन - अले, अले बाज ने चिड़ियाँ ........... तोतराही के दॉत चिड़ैए के चोंच जकां बहराएल छै। हम चिकड़ी-चिकड़ी कनैत छलहुँ आ हमर भाई-बहिन पेट पकड़ि हँसैत छल। कम्हरो सॅ सल्लो दीदी आबि गेलीह हरा कनैत देखि दया भेलौन्हि। लग आबि दुलार कयलनि कोरा मे उठा ले लैन्हि दुलार मलार पबिते हम तुरते चुप्प भऽ गेलहुँ। दीदी बड्ड नीक छघि। मोन पड़ल एक मासक बादे दीदीक ब्याह भऽ जेतैन्हि। हमर सबसँ नीक बहिन सल्लो दीदी सासुर चलि जयतीह। ई बात मोन पड़िते आँखि पफेर नोरा गेल। खूब ध्ुमधम सॅ विवाहक तैयारी भऽ रहल छै। ओ र्ध्मशाला हमरा एखनो याद अछि। ताहि दिन बाबूजीक पाँचो भाई। - दादी जीवित हलथिन। चौक आ सीढ़ि पर कोन मे ठंढ़ई लेल राखल रंगीन बपर्फक सिल्ली एखनो याद अछि। पर्फक सिल्लीक तर मे तरह-तरह के पफल जमाओल गेल छलै। कोनो सिल्लीक तर मे आम झलकैत छलैतऽ कोनो सिल्लीक तर मे पफालसा। अ तऽ बुल्ली हमरा बतौलक जे इ सभ नकली पफल छैक सजावट लेल राखल छै। दीदीक ब्याह भेलैन्हि 1949 क गर्मीक मौसम मे। बाबूजी केँ तहिया खूब आमदनी हलैन्हि तैँ दिल खोलि खूब खरच कयलैन्हि। सासुर सँ दीदीक जेवर अयलैन्हि से देखि सभक ऑखि पफाटि गेलै’ नाक, कान, गर सभमें हीरे हीरा झलकैत छलै ं पहिल बेर गुप्ता खानदान मे सासुर सॅ हीरा आयल हलै। नानी बड्ड प्रसन्न छलीह बाबूजी अपना भाई सभ मे अलगे सँ चमकैत छलाह। हुनकर रूआब क दब दबा छलै। बालीगंजक पॉश मकान मे हम सभ रहैत छलहुँ। हमर जन्मो एहि मकान मे भेल छल। दाई मां कहैत छलीह डा. अमृता कौर हमर जन्मकाल हलीह। हमर जन्म होइते डाक्टर अमृता दाई मां के कहने छलैन्हि - तुम्हीं जाकर सेठ जी से कहो लड़की हुआ है। हम बोलेगा तो हमारा प्रेक्टिस खराब हो जायेगा। सब कहेंगें डाक्टर अमृता से जापा करबाने से लड़की ही होती है। दाई मां केँ बाहर अबिते दादी पूछलथिन की भेलैन्हि? ‘बेटी भेलैन्हि मां जी। कार्तिक नवमी मे घर मे लक्ष्मी एलैन्हि लक्ष्मी।’ ‘हे भगवान एखन तऽ दू टा कुमारिए तेसर जुमि गेलै। खरचेक घर।’ बाबूजी बजलाह ‘माँ, सब अपन-अपन भाग्य लऽ कऽ अबैत छै। भगवतीक जे इच्छा।’ हे भगवान! चारि-चारि टा बेटी आबि गेलै बेटा ले ऑखिमुनने छथिन देव-पितर! - ‘अच्छा जे भेलै से नीके रहए-मां अहाँ आराम करू जा कऽ।’ ‘हँ, बाबू! आध राति सॅ वेशी बीत गेलै हम सूतऽ जाइत छी।’ दादी मां, मांक रूम मे झॉकबो नहिकेलथिन्हा डा. अमृता कौर दाई मांक कोरा मे हमरा ध्ऽ कऽ चलि गेलीह। बड़की दीदी मां क सिरमा मे बैसल छलीह। - ‘सुमित्रा, बाबूजी भोजन परसि दहुन भोर सॅ भूखले हथिन।’ मांक निराशा रोआँ-रोआँ मे परसल छलैन्हि। पलंग सँ नीचा पैर रोपबा मे तीन मास लागि पलंग सँ नीचा पैर रोपबा मे तीन मास लागि गेलैन्हि। हम्हर सल्लो दीदीक ब्याहक तैयारी करबाक छलै। मां पलंग पर पड़ले पड़ल आर्डर दैत हलथिन। सभ वस्तुक देख-रेख सुमित्रा दीदी करैत हलथिन। बच््ये सॅ देखैत हलिएन्हि मां, कहियो स्वस्थ नहिछलीह। हमरा मां कहियो कोर मे लऽ दुलार कयने होयतीह से मोन नहिपड़ै’छ। नहिजानि किएक शुरूहे से मां केँ हमरा सॅ कोन चीढ़ छलैन्हि। वा हुनक घार निराशाक। प्रतिक्रिया स्वरूप हमरा देख नहिचाहैत छलीह। हमरा पाललनि-पोषलनि दाई मां। अपन तीन सालक बेटा भोलाकेँ छोड़ि कऽ ओ विध्वा और भूख आ गरीबी सँ तंग आबि कऽ एत आयल हल। नानी जीक ओतऽ जे दाई काज करैत हलै से दाई मांक पिसिऔत सासुु हलै सम्बंध् सँ। दाई मां के एतऽ पिसिऔत सासुए रखबौने छलै। हमरा कोर मे लैते’ दाई मांक स्तन में दूध् होमऽ लगलैन्हि। हमर रंग गेंहुआ गोर अछि आ स्वास्थ नीक ताहि पर सॅ दाई मांक पालन-पोषण। हमर सर्वस्व छलीह दाई मांक। हम हुनकर आँचरक खूंद चौबिसो घड़ी छयने रहैत छलहुँ। ओ बेचारी बाथरूमो मे जाइत छलीह तऽ हम कानऽ लगैत छलिए। हमरा लेल मां माने दाई मां। ने अपना मां क कोरा मे रहबाक स्मरण अछि ने ओकर स्पर्श वा दुलार भलार। हमर नामे पड़िगेल छल दाई मांक बेटी। सुमित्रा दीदी हमरा बाछी कहैत छलीह हम चारि छाप मे हाल मे अइकात सँ ओइ कात पार भऽ जाइत छलहुँ। हँ नेना ये हमरा एकटा आर नाम भेटँल छल मिलिट्री घोड़ी। हमर शरीर स्वस्थ छल आ मांक प्रिय बेटी सरोज रोगियाहि छलै। हँ एकटा आर घटना स्पष्ट याद अछि। एतेक वर्षक बादो माथक घोघरि मे आहिना घतेक वर्षक बादो माथक घोघरि मे आहिना घएल अछि। किछु तेहन स्मृति रहैत छै जाहि पर कालक कनिको प्रभाव नहिपड़ैत छै। नहिजानि कोनो-कोनी स्मृतिक क्षय कहियो कोना नहिहोइत छैक। हम बरंडा पर बैसल खेलाइत छलहुँ। बाबूजी हमरा कोरा मे लऽ मांक बगल मे सुता देलनि। एखनहुॅ ओहिना याद अछि। मां क चिकड़ब। .... ‘ओह ई की हम ओहिना मरल जाइत छी-एको क्षण चैन नहिसेँटै’छ ताहि पर अहॉ एकरा आनिकऽ हमरा करेज पर लादि देलहुँ।’ मांक क्रिश्चियन नर्स बगले मे ढाढ़ि छलीह राध। ओकरा डपटैत कहलथिन ‘राध की देख रहल छेँ उठा एकरा आ जो चमेलियाक मां’ लग घऽ बाबूजी आहत भऽ बजलाह - ‘ए विजयमां अहॉ केँ एकरा सॅ एतेह यदि कियेक अछि? ई हो अहींक बेटी अछि।’ ‘की कहू! सत्ते हमरा ई नहिसोहाइत अछि। जहिया सॅ जनमल अछि हम खाट घऽलेलहुँ।’ बाबूजी हमरा कारे मे उठबैत बजलाह ‘हमर ई लक्ष्मी बेटी अछि। जहिया सँ जनमल अछि टका बरसि रहल अछि। संयोग एहन जे अपना मकान सबसँ पहिने एकरे जन्म भेलै।’ ‘तऽ हम की करू? खेलाउ लक्ष्मी बेटीकेँ। हमरा सँ नहिसम्हरत।’ मांक ओ कर्कश स्वर आइओ कान मे बजैत रहै’छ ‘लऽ जाउ एकरा, हटाउ! पटकि दिऔ एकरा दाई मांक कोरा में .....।’ बाबूजी सॅ भेटँ करऽ एकटा कनकटा ज्योतिषी अबैत छलैन्हि। बाबूजी हुलसी हमरा लऽ गेलाह ज्योतिषी लग। ओ हमरा देखिते बाजल छलाहु - ‘सेठ जी, ई लड़की बउऽ् यशस्वी होएत, अहाँक खानदानक नाम रौशन करत ...।’ मां सुनलनि तऽ लोहछि कऽ बजलीह - खूब नाम हेतैं’। मूँह मे बकार तऽ छैहे नहि। जे पबै छै से चोटि घीचलै’ छै जकरा मोन होइ छै से थापड़-मुक्का सॅ थोपिया दैत छै। बात सही छै। सरोज के क्यों कनि देह छुबिकऽ देखौ। कोनो भाई-बहिन कनि डॉटि-ऽपटी दौ सौंसे घर ओकरा चिचीएनाइ सॅ सहमि जाइ छै। ककर मजाल छै क्यो किछु कहि देतैं। कनैत-कनैत सबके पेरशान कऽ दैत छै आ सांझि जखन बाबूजी एथिन तखन अपराध्ी केँ जाबत सजा नहिभेँटतै ओ ककरो चैन सॅ सांस नहिलेबऽ देतै। बुल्ली तऽ हमरे बतारी छल तैँ हमरा वेशी तंग नहिकरैत छल ओना छीआ-पूताक खेल मे मारि-पीट होइते छै। मगर हमर छोटा भैया बड्ड उत्पाती छलाह। हमरा चारू बच््या केँ कनयाब छोड़ि हुनका आर कोनो काजे नहिछलैन्हि। बाबूजीक दुलरूआ छलाह हुनका के किछु कहैतन्हि। मुदा ऊहो सरोज दीदी सँ डेराइत छलाह हल्लाकऽ सौंसे घर माथ पर उठा लेतै कनिको छू ढेला पर। नीलू बड्ड सुकुमारि मांक ऑखिक पुतरी ओकरा के मारतै’ पीटतै या खौंझेतै’। बुल्ली तऽ भैयाक शागिर्दे छलैन्हि ओकरा किछु करथिन्ह तऽपोल खुजि जेतैन्हि। तऽ सबसे निमूह बचलहुँ हम। तऽ कखनहुँ घंटी हमरा मुर्गा बना एक पैर पर ढाढ़ कऽ दैत छलाह तऽ कखनहुँ सुतला मे हमर चोटीक पफीता खिड़कीक ग्रील सॅ बान्हि दैत छलाह। निन्न टूटला पर हम चिचिआइत छलहुँ ................ दाईमां कतऽ गेलहुँ केश दुखाइत अछि ......देखू हमर पफीता खिड़की क ग्रील मे बान्हल अछि........।’ भैया आराम सँ कुर्सी पर बैसल छलाह-‘कान......आर कान दाई मां तऽ स्नान करऽ गेेल छौ.....।’ हम हुनका नेहोरा करि-भैया, गोर लगै छी भैया! - खोलि दिअ पफीता..... केश बड्ड दुखाइत अछि। आब अहाँ जे कहब हम करब...........।’ ‘वेश प्रॉमिस कर.........।’ ‘हं, भैया प्रॉमिस।’ - ‘ठीक छै। चल छत पर।’ भैयाक संग-संग गेलहुँ दत पर। तमाशबीन सरोज आ बुल्ली पाछाँ-पाछाँ चलल। छत पर जाइते भैया हमरा दूनू हाथे उठा कऽ पानिवाला हॉज मे ध्ऽ देलनि। हम ऊपर आबऽ के कोशिश करि तऽ पफेर दाबि देल जाए। बुल्ली आ सरोज थप्पड़ी पारि खूब हँसैत छल। एहि नाटक कचरम सीमा पर पहुँचैत दाई मां हमरा तकैत ऊपर एलीह। ‘बापरे बाप! .......सब मिल कऽ बुच््यीक जान लऽ लेतै’। अजय बबुआ। हमरा बुच््यीक मारिए देबै। आब हम चुप्प नहिरहब आबऽ दियौन्ह मालिक केँ सब वृतांत सुना देबैन्ह। केहन अत्याचारी भऽ गेलै भाइ्र-बहिन!’ दाई मांक डॅटला सॅ सब भागल। दाई मां हॉज सॅ बाहर कऽ उनटा लेटाकऽ पेट सॅ पानि निकाललीह तखन हमरा होश भेल। कपड़ा बदलि कोरा मे लऽ हमर देह हॅसोथि रहल छलीह आ मुँह सॅ बजैत छलीह-नहिजानि कियेक सब हमरे बुच््यीकेँ नंग-चंग कयने रहै’छ। सरोज आ बुल्लीके अजय बाबू कहियो छुबि कऽ देखथुन। सबटा दोष मालकिन के छैन्हि। सब ले’ स्नेह अड़ैत रहै’ छैन्हि। बुच््यी पफुटली ऑखि नहिसोहाइत छैन्हि। बेटा नहिा भेलैन्हि तइमे बुच््यीक कोन दोष!’ ‘दाई मां! हमरा खाली अहां आ बाबूजी दुलार करैत छथिआर क्यो नहि।’ ‘बुच््यी। बाबूजी तऽ देवता छथि हुनकर परतर के करत।’ ‘दाई मां! अहाँ तऽ हमरा खूब प्यार करैत छी। अहॉ हमरा छोड़ि कऽ कतौ नहिजाउ दाई मां! राध कहैत छल-अहाँ अगिला सोमदिन अपना गाँव जाएब। दाई मां! हमरा दूध् के पियाएत? के खाना खुआएत। के हमरा सबसॅ बचा दे? सब मिलक मारत। दाई मां अहां नहिजाऊ?’ दाई मां किछु नहिबजलहि हमरा करेज सटा कऽ माथ सोहराबऽ लगलीह।’ ओई दिन स्कूल सॅ घुरिकऽ आयल छलहुँ तऽ बुल्ली सीढ़िए पर ढाढ़ छल थपड़ी पारी हॅसैत बाजल। ‘तोहर दाई गेलौ, आब के बचेतौ?’ ‘हरिया! कह हमर दाई मां चलि गेल? हम पूछलिऐ। ‘हँ, बौआ दाई मां अपना गाम गेल। हमरा ऑखि सॅ नोट टघरऽ लागल। हरिया गिलास मे दूध् दऽ गेल हम क्रो( मे दूध् ओकरे देह पर उझलि देलिऐ। ओ चुप्पे चलि गेला पिफर राध आयल कपड़ा बदलाबऽ हम ओकरो दनादन थापड़-मुक्का सॅ मारऽ लागलिए। सभके बड्ड आश्चर्य होइ हमर एहन रौद्र रूप क्यो नहिदेखने छल। हम चिचिआइत छलहुॅ दाई मां किये गेलै? दाई मां के बजा। हमर एहन जिद्द क्यो देखने छल ने क्रो(ा । बेचारी दाई मां सात सालक बाद अपना गाम गेल छल। ओकरो छोट-छोट नेना छलै। आ एत दर्जनो दाई नौकर दलै। गोविन्द महराज रसोइया छल, बलिया जिलाक नथुनीसिंह दरबान, पहाड़ी रामसिंह ड्राइवर, मीनीम कालूरामजी आ एकटा नर्स। कुल मिला कऽ चौदह जन स्टापफ। दक्षिणी कलकत्ताक शानदार कोटी मे हमर कोठी सबसँ भव्य। कोठीक भव्यता एहन जे लोक देखऽ अबैत छलै। - ताहिदिन हमर काका, काकी समस्त गुप्ता परिवार बजारवला पुरनका हवेली मे रहैत छलाह। नानीयोक घर छलै ओतहि बड़ा बाजार क हैरिसन रोड मे। सरोज पुरना हवेली मे जाएबाक नामे सॅ नाम भौं सिकोड़ि लै’छ-मां हम ओतऽ नहिजेबै बाथरूम बड्ड गंदा रहै छै। पुरना हवेली मे बड़की टा आंगन छलै चारू कात रूमा बाथरूम पफड़क। रसोइघर छत पर। सब काकी केँ एक-कएटा घर छलैन्हि ओहि मे सूतब बैसब चारि-चारि पांच-पांचटा घियापुता संग। ‘हं, तऽ ओई दिन सात बजे बाबूजी ऑपिफस सॅ एलाह। हम तीन बजे स्कूल सॅ आयल छलहुँ तखन सॅ एक घोंट पानियों नहिपीने छलहुँ-मां खिसियाकऽ दू थापड़ मारनहु छलीह-‘मर चमेलियाक मां लग जा कऽ राक्षती ! बुझाइते नहिछै हमरा कोखि सॅ जनमल अछि? आबऽ दहि आब चमेलियाक मां के ओकरो करबै एकदम बिगाड़ी देलकैए।’ ‘बाबूजी समटा बात सुनला पर हमरा लग आबि कोरा लऽ कऽ कहलनि-चल बौआ खाना खा ले।’ हम हुनका लग अबिते उतार हुचुकि-हुचुकि कान लगलहुँ। कोरा लेलनि तऽ मरि पॉज पकड़िक कहलिऐनह ‘बाबूजी, हमर दाई मां ...... बजा दिअऽ।’ बाबूजी कहलनि-हं, बौआ हम बजा लेबै। ‘नथुनी सिंह! सुनू एखने रतुका गाड़ी सँ जाउ, उठा एकरा दाई मांकऽ नेने आयब अपने संग। हं, चमेलिया के कहबै एत नेने आब ओकर इलाज हम करा देबै।’ - मां बाजलीह-‘सुनू दरबानजी, जँ चमेलियाकेँ छुतहा रोग होइ तऽ ओकरा नहिअनबै।’ - मां! चमेलियाक छोड़िकऽ दाई मां नहिअबै तऽ? ‘चुप्प रह! दाई मां, दाई मां रटð लगौने छेँ जो पर दाई मां लग।’ हम मां क कर्कश स्व्र सुतिन सहमल बाबूजीक कुरता हाथ सॅ पकड़ने टुकुड़-टुकुड़ हुनकर मुँह तकैत छलहुँ। बाबूजी हमरा भरोस दैत बजलाह-‘दाई मां जरूर आयत।’ खैर चारिमदिन नथुनी सिंह के संग दाई मां चमेलियाक लऽ कऽ पहुऽचल। चमेलिया केँ निमोनियॉ बोखार छलै, टीúबीú नहि। पफैमिली डाक्टर गांगुली कहलथिन-‘चिन्ताक बात नहिं इंजेक्शन सॅ जल्दी ठीक भऽ जेतै।’ चमेलियाक उम्र बड़की दीदी सॅ वेशी छलै। दाई मां के एकगोट इएब बेटी आर तीनटा बेटा छै-छेदी, मंगला आ भोला। दाईमां अबिते हमर कोरा लऽ करेज सॅ सटा लेलक हमर देह आगि जकॉ छीपल छलु ज्वर सॅ। डाक्टर गांगुली बबूजी केँ कहलथिन-‘गुप्ता साहेब! दाई मां तो एई मेये मां, ओ के आर जेूते देबेन ना। सेठानी जीर तो शरीर भालों थाकेें ना । एई निरीह मेय के आर के देखबे। ए तो दाई मां छोड़ेू किछु कोरचे ना.......।’ मां सत्ते अस्वस्थ रहैत छलहि। हमरा जहिया सॅ होश भेल ताहिया सॅ पलंगे पर सूतल देखैत छिऐन्ह कखनौ कऽ कुर्सी पर बैसैत छथि। कहियो ठाढ़ होइतो नहिदेखलिऐन्ह। लोकसभ बजैत छै जे हमरा जन्मक बाद तीन मास घरि ब्लीडिंग होइते रहलनि। ताहि दिन शायद युट्रेस निकालनाई कठिन ऑपरेशन बूझल जाइत छलै। मां के दिक्कत नहिहोइन्ह तयॅ प्रत्येक बच््या लेल एक-एक टा नौकर या दाई राखल गेल छलै। हरियाक काज छलै सब बच््याक नास्ता भोजन करेनाई। राध मांक देख-रेख करैत छलीह आ सरोज आ नीलूक जवाबदेही छलै। बच््या सभ शारे-गुल सॅ मां बेहोश भऽ जाइत छलीह। दोसर अइ बात क दुख छलैन्हि जे एकटा आर बेटे होइ तैन्हि, तैँ हमरा देखऽ नहिचाहैत छलीह। मां बड्ड पैघ ध्रक बेटी छलीह। नाना खानदानी रईस लोक कोलकिंग कहैत छलैन्हि। मां क शरीर आ तेवर दूनू राजसी छलैन्हि। मां क श्रीरआ तेवर दूनू राजसी छलैन्हि। बाबूजी मां के जी जान सॅ चाहैत हलथिन डाक्टर गांगुली केँ कहैत छलथिन-‘डाक्टर साहेब-विजय के मां के किछु भऽ जेतैन्हि तऽ हम बच््या सभकेँ कोना सम्हारबै? कहुना हुनका बचालिअ, कोनो उपाय करू।’ बड़का सॅ बड़का डाक्टर अबैत छलाह मास मास दिन ध्रि अंग्रेज डाक्टर वाटकिन आ नलिनी रंजन दत्ता क इलाज चलैत छलै मुदा कोनो पफायदा नहि। महीना मे बीस-बीस दिन ध्रि ब्लीडिंग होइत रहैत छलैन्हि। आखिर एक दिन अयलाह डाक्टर विधन चन्द्र राय जो बंगालक मुख्मंत्राी छलाह। विधन बाबू अयला पर घर मे आर्डर भेलै ‘साइलेन्स प्लीज।’ विधन बाबू पंाच मिन ध्रि मांक नब्ज पकड़ने सोचैत रहलाह। -पफेर बजलाह-‘रेडियम थेरेपी दी जाए।’ दादी बात बुझलथिन नहिमुदा बुझेूलैन्हि बहुत खरचाबला इलाज छै। ओ बाबूजी के अपना लग बजा कऽ कहलथिन-‘बाउ! सभ टकातऽ बहुए मे खरच भऽ रहल छऽ। सात-सात गो बच््या जन्मांकऽ ध्ऽ देलथुन ओकरो सभ्ज्ञक वास्ते सोचऽ। ई नखरावाली पलंग पर सूतल-सूतल तोरा नचा रहल छऽ .............।’ मां क ब्लीडिंग बंद भेलैन्हि मुदा टानसिल बढ़ि गेलैन्हि। अहि बीच बड़का भैयाक ब्याह तैय भऽ गेलैन्हि। बाबूजीक जिगरी दोस्त बालूरामजी केडियाक भाईक बेटी सॅ। एक दिन भोर-भोर बालूरामजी हमरा घर पर अयलाह। जाड़क समय छलै। बाहर वला रूम मे बदामक हलुआ खाइत बजलाह -‘भैया साँवर! अहॉ हमर प्रिय मित्रा छी हम एहि मित्राता केँ आपसी सम्बन्ध् कऽ स्थायी बनाबऽ चाहैत छी।’ बाबूजी कहलथिन ‘से कोना हम बुझलहुँ नहि।’ ‘देखू अहॉक बेटा अछि आ रघुक बेटी हमर भतीजी अछि। टकाहम दू लाख गनि देब बस अहॉ हॅ कहि दिअऽ।’ - ‘बालू! मात्रा टकाक बात नहिछै हमरा सोचबाक समय दिअ। लड़की कतेक पढ़ल लिखल अछि?’ ‘अहॉके नौकरी करयबाक अछि। अरे घर गृहस्ती सम्हारबाक लुड़ि छै’। एतबा कहि ओ अपन पगड़ी उतारि बाबूजीक पैर पर घऽ देलथिन। बाबूजी गुम्म भऽ गेलथिन। दोसर दिन हम सभ होमऽ वाली भाभी के देखऽ विक्टोरिया मेमोरल पाछूवला गेट पर गेलहुँ। मां गेलथिन डाक्टर गांगुलियो केँ। मां के सबसे वेशी हमदर्द, सबसे बड़का साइकोथेरापिस्ट, समसत घरेलू समस्याक सलाहकार छथिन डाक्टर गांगुली डाक्टर साहेब के बड़का भाई अपल गांगुली छथि बाबूजीक सालिसिटर। गांगुली बाबू बड्ड पैध् घरानाक लोक। मांक कहब छैन्हि कु समय तीनेटा संग दैत छै पुलिस, वकील आ डाक्टर गांगुली परिवारक बड़का बेटा पुलिस विभाग मे उच्च पद पर छथिन मांझिल अनिल बाबू वकील हुनका सॅ छोट भाई उदयन जे किच्छु कोरेना शुघु गान कोरे ओ कोबिता लेखे।’ हॅ तऽ भाभी के देखि मां बजलीह-‘बांगुली बाबू! लड़की बड्ड दुबर कमजोर बुझाइछने?’ नहि, नहि। सेठानीजी ब्याहक बाद तऽ सब लड़की मोटा जाइत छै।’ मुदा गांगुली बाबू रंग श्याम छै से?’ से तऽ श्यामा मां क रंग कारी छैन्हि। हमरा बंगाली समाज तऽ चोख, नाक देखै’छ मैदा सन उज्जर के कोन महत्व। बड़का भैया शौकिन मिजाजक लोक देखब मे खूब सुन्दर। ओइ समय मे ग्रेजुएट। तैॅ बाबूजीके लड़की देखलाक बाद मन में भेलैन्हि बेटाक लायक पुतौही नहिहेती। मुदा दोस्तीक कारण किछु नहिबजलाह। मामाजी पूछलथिन-‘बहिन ! लड़का राजी अछि?’ मां कहलथिन- ‘हॅ।’ -तखन हम की कहू - ‘अहॉ आ जीजा जी कहियो व्यवहारिक नहिहोएब। एखन सरलाक ब्याह मे एतेक खर्च भेल। बेटीक बाप पाइबला लोक छै। एत आयत तऽ एकटा अंग्रेज गवर्नेस राखि देबै-पूरा ट्रेनिंग भऽ जेतै। -ई तर्क बाबूजी के नीक लगलैन्हि। कहलथिन-जयकुमार ठीके कहैत छथि। पढ़ा-लिखाकऽ स्मार्ट बनाओल जा सकैं’ छ। सरला दीदीके सास तऽ मैट्रिकक परीक्षा नहिदेबऽ देलथिन। बाबूजी विवश छलाह। तै मां के कहैत छलथिन ‘अजयक मां! देखबै हम तोता, मैना केँ खूब पढ़ेबै’-हमरा आ सरोज केँ तोतो, मैना कहैत छलथिन बाबूजी। बाबूजी अपने मात्रा चौथा पास छलाह मुदा स्वाध्याय सॅ तेहन पफर्राटेदार अंग्रेजी बजैत छलाह जे क्यो ग्रेजुएट की बाजत। सरिपहुँ बाबूजी जीनियस ब्यक्ति छलाह। मुदा मों अपना कें बाबूजी सॅ वेशी बु(िमान बुझेैत छलीह वेशी महीनी आ सोपिफयानाक दाबी छलैन्हि। कोलकिंगक बेटी छलीह। नानीक आंगनको बैसऽ लेल चॉदीक सिल्ली छलैन्हि। मामा एकलौता बेटा। चर्चारा चारिटा मामा छलाह। पाँचो भौजाई के पाँच-पाँचटा हीरा छलैन्हि। आ हमरा गुप्ता परिवार मे पहिलबेर पॉचटा हीरा क जेवर मां के छलैन्हि तकरबाद सल्लो दीदीक सासुर सॅ हीरा कनेकलेस, अंगुठी, टाप्स नाकक छल सभटा छलैन्हि। बड़का भैयाक ब्याह खूब ध्ूमधम सॅ भेलैन्हि। पन्द्रह दिन घरि उत्सव चलल। बाबूजी हिया खोलि खरच कयलैन्हि। सब नोकर चाकर के इनाम भेॅटलै उतबे नहिओकरा सभक गांव मे जे कर्ज छलै से हो चुकता कएल गेलै। खूब दान र्ध्म मे खर्च भेलै। बाबूजी हमरा सॅ पूछलैन्हि - ‘तोेरा दाई मां के की दिऔ?’ हम कहलिएन्हि - ‘सोनाक चेन आ कंगन।’ राधनर्स इ सुनि जरि गेल। नहिबर्दास्त भेलैं तऽ बाजल-इंह, चमेलोक मां सोन पहिरत..........? मुँह ने कान बीच मे दोकान।’ दाई मां के बाबूजी दू भरिक चेन आतीन भरिक कंगन देलथिन । हमर खुशीक ठेकान नहि। दाई मां के कहलिएन्ह-‘दाई मां बरियात मे अहूँ चलब राध सन लाल साड़ी पहर कऽ।’ -दाई मां बजलीह - राम - राम बुच््यी एहन बात नहिकहू हम विध्वा छी। आइ हमर घरवला रहैत तऽ.......’ दाई मं के उदास भऽ एना बजैत सुनि हमरा भेल कोनो अध्लाह बात हम कहि देलिए। भाभी आबि गेलीह। विवाहक बाद भैया बिमार रहऽ लगलाह। आब हमरा बुझाइत अछि जे मन लायक पत्नी नहिभेलैन्हि तयॅ हुनकर नर्वस ब्रेक डाउन भेल छलैन्हि। मुदा मां के भ्रम छलैन्हि जे क्यो टोना-मोना कऽ देलकैए। बाबूजी बहुत दुखी रहैत छलाह इ की भऽ गेल बेटा क संग। भाभी एको आखर अंग्रेजी नहिजनैत छलीह ने पढ़बा-लिखबाक सेहंता छलैन्हि। छमास ध्रि सांझि भेर मिसेज विल्किन माथा हुनका संग माथापच््यी करैत रहल मुदा कोनो पफायदा नहिभाभीजी केॅ पढ़बा मे मोने नहिलगैत छलैन्हि। हारि थाकि कऽ मिसेज विल्किन बजलीह-मिस्टर गुप्ता-शी इजए रौंग मैच पफार योर सन .............दे आर पोल्स अपार्ट।’ ढ़रैत पिअर सांझिक ज्योति समुद्री लहरि संग मिझराकऽ हरियर भेल जाइछ। एखने कनिकाल मे इ समस्त दृश्य कारी भऽ जेतै’। दूर पुरनका किलाक बुर्ज पर नारंगी रंगक रोशनी जरऽ लागत। पता नहिपफोकस लाइट कतऽ पिफट कयने छै। एतऽ बरांडा पर सॅ देखने लगै’छ जेना गुच्छा क गुच्छा रोशनी समुद्रक लहरि सॅ बहरा कऽ किलाक देवार आ बुर्ज पर छिड़िया रहल छै। नहिजानि कियेक एतेक दूरो सॅ ई जादुई-माहौल मे डूयब्रवनिक केर कारी समुद्री राति हमरा बड्ड नीक लगै’छ। तरेगण केहन चटख लगैत छै। तेहने अपूर्व लगै’छ नारंगी रौशनी मे डूबैत समुद्रक लहरि। होटल केर डेक सॅ बान्हल पॉच छहटा मोटर वोट लहरक कोर मे मचलै’छ हम दूनू ऑखि ई दृश्य पीवि रहल छी। हमरा लेल मनोरम दृश्यक अवलोकन आवश्यको अछि अहि नशा मे हम अतीतक छिलका सोहि सकब। कखनौकऽ दूर घुमावदार सड़क पर कोनो गाड़ी तीव्र गति सॅ भगै’छ तथापि बहुत शान्ति छै वातावरण मे। छपाक सॅ एकटा माछ लहरिक ऊपर कूदलै दूर बहुत दूर चलि गेलै। हमर तन्द्रा टूटल। अख्यिासऽ लगलहुँ की सोचैत छलहुँ कथी यादें? हम सोचि रहल छी। सोचैत जा रहल छी। हमरा चारू कात रातुक कुहेस खूब सघन भऽ गेल अछि। दर्दक अनुभव होइछ। जनैत छी ई दर्द हड्डीक भीतर घुसल अछि एकर कोनो इलाज नहि। स्मरण करबाक प्रयास करैत छी लगै’छ जेना बेर बेर कोनो अदृश्य दैत्यक पंजा मुँह के जोर सॅ दाबि रहल अछि असहड्ढ पीड़ा सॅ कछमछा रहल छी। नहि, आब नहिचुप रहब हम। हम कह चाहैत छी अहॉ सॅ हुनका सॅ सब सॅ। अपना मां क लेल दुखी होएब वा हुनकर स्मरण क ई अर्थ नहि जे हमरा हुनका प्रति स्नेह अछि। ओ तऽ कहियो अपना कोर मे लऽ हमरा दुलरो नहिकयलनि। घंटो हुनका रूमक चौकठी लग ठाढ़ देखि अपना लग बजौतीह......... शायद अपना लग रजाई मे सुतौतीह। मुदा नहिकहियो कनिको काल ले अपना लग नहिआब ऽ देलनि। मां बैटीक बीच एकटा शाश्वत दूरी बनल रहल। मां हमरा कहियो अपन बेटी नहिबुझलनि। ममत्वक प्रसंग मे मोन पड़ै’छ दाई मां एखनो बुझाइछ कखनौक’ दाई मां दुलार सॅ हसोथि रहल छथि। पाढ़िवला उज्जर साड़ी, ढ़ील ढ़ाला बड़कीटा ब्लाउज सीध पल्ला आंचरक खंूट मे बान्हल खैनी। भोर सात बजिते दाई मां हमरा रूम मे पहुँच जाइत छलीह आ तखने सॅ हमर जिनगी शुरू भऽ जाइत छल। अविते हमरा चुम्मा लऽ कहै छलीह - बुच््यी ऊठू, जल्दी करू सात बाजि गेलै........ तुरत स्कूल जयबाक बेर भऽ जाएत। मुॅह-हाथ धेआ दैत छलीह पफेर हुनका हाथ सॅ दूध्क गिलास लऽ गटगट पीबि जाइ। शुरू भऽ जाइत छल दौड़ ध्ूप किताब कॉपी। प्रफाक क बटन दाई मां जल्दी करू.......पफीता कतऽ छै? दाई मां हमर बेल्ट, दाई मोजा नहिभेंटैए ई नहिनवका जूता-मोजा। देखिऔ दाई मां सरोज हमर नवका जूता मोजा पहिर लेलक अछि। सरोज खोल हमर जूता.....।’ ‘नहि, नहिदेबौ जे करबे से कर।’ दाई मां सरोज जूता नहिदेलक कानऽ लगलहुँ तऽ दाई मां चुप्प करा कहलनि-‘बुच््यी स्कूल जाय मे देरी भऽ जायत। आऊ पुरनके जूता पहिर लिअ सरोज मांक दुलएआ बेटी छै। सरोज के स्कूल जाइतकाल मांक नर्स राध तैयार करैत छलै। बढ़ियॉ सॅ चोटी गूथै रीबनक पफूल बना दैतत छलै। दाई मां नीक सॅ ने गूथै छल ने रीबन बन्हैत छल। केश मे तेल ततेक छऽ दैत छल जे माथ पर चुअैत रहै छल ऑखि मे मोट काजर। मुदा की कयल जाय दीदी सभ लग जा कऽ केश बन्हाबी से साहस नहि। स्कूलो मे संगी सभ हॅसैत छल। राध सरोज कें तैयार कऽ नीलू कें तैयार करैत छल बिल्लू के हरिया। खाना मे सब दिन एके चीज भात, दालि आलूक भूजिया से हो जल्दी-जल्दी बस छुटबाक डर। सरोज आ नीलू पहिने तैयार भऽ जाइत छल मुदा हमरा सब दिन किछु ने किछु ताकऽ मे देरी भऽ जाय। क्यो कोनो वस्तु एकठाम नहिरहऽ दैत छल। कहियो जाइत काल देखि जूता मे पॉलिश नहिभेल अछि दाई पॉलिश करऽ बैसए तऽ लेट भऽ गेल। दौड़ैत गेलहुँ ताबत बस हार्न बजबैत भागल। मुँह-लटका कऽ घर घुरलहुँ। मां आठ बजे सॅ पहिने उठैत नहिछलीह। बाबूजी भोरे 6 बजे जूटमील जाइत छलाह। हमर देखिते मां गर्ज लगलीह। ‘बस छुटि गेलौ ने आब बैस घर मे के जेतौ स्कूल पहुँचाबऽ।’ दाई मां कहलथिन-बहुरानी! कनि दरबानजीके कहियौ ने - ‘टैक्सी पर बैसरा देथिन।’ ‘पाई नहिलगै छै टैक्सी मे।’ पफेर दाई मां कते निहोरा कयलनि तखन स्कूल गेलहुँ। एखन किछु सोचि नहिपबै छी। बाहर रोशनी जगमगा रहल छै, नीचां डाइनिंग हॉल मे बीथोबन केर सिम्पफनी बाजि रहल छै। आ एत बरांडा मे हमरा चारू भर रतुका सन्नाटा पसरल अछि। ई सन्नाटा हमर संग कखन छोड़लक? भरल लोकक भीड़ मे एसगरे तऽ रहैत छी! बड़का घरक बेटीआ बड़का घर क पुतौहु दून्नू ठाम सम्पन्न मुदा हुम केहन विपन्न छी कतेक अभाव झेलैत रहलहुँ अछि! दर्द क संग सुतैत रहलहुँ दर्द क संग उठलहुँ कहाँ? साबुत बॉचल छी। विवाहक एक साल के बद भाभी जी केँ बेटी भेलैन्हि। बाबुजी नाम राखलथिन - गुडीó। गुडीó वास्तव मे गुड़िया सन छल। रंग छलै दादी सन दुध्यिा गोर मां सन कटगर आँखि नाक आ पापा सन तेजस्वी दिमाग। दू वर्ष पुरैत - पुरैत ओ रंग - बिरंगक खेल करय तोतरा तोतराक गीत गबैत छल ओकरा संग खूब मोन लगै छै सबसे मन मोहि लैत छल। एक दिन भाभी आकरा कोरा मे लऽ बरांडा पर ठाढ़ि छलीह गुडीó आ चिलियाँ आ चिलियाँ कहैत रेलिंग सॅ नीचा झुकलै आ मां क हाथ सॅ ससरि गेलै। तीन तल्ला पर सॅ नीचाँ खसलै कोन काल बिसा गेलै से नहिजानि। गुडीóक वियोग सॅ बाबूजी भीतर सॅ टूटि गेलाह। कखनौ गुडीóक बिसरी नहिपबैत छलाह। हरदम ओकर बाललला मोन पड़ैत छलैन्हि। दस मास बीतैत-बीतैत-भाभी जी केँ बेटा भेलैन्हि। मां बड्ड प्रसन्न छलीह। चांदीक थारी बजौलनि। खूब इनाम बक्खसीस बॅटललनि। मुदा बाबूजी कनैत ग्हलाह गुडीóक विरोग मे। शायद ताहि दिन बाबूजी को व्यापार मे बहुत घाटा भेल छलैन्हि। बाबूजी जीवन मे पहिलबेर एहन घाटा उठौलनि छल। समय कच्क बाबूजी कें सेठिया ओतऽ वर्किग पार्टनर शिप स्वीकारऽ पड़लनि। काका सभ व्यंग्य मे कहैत छलथिन ‘भैया! अहाँ सेठजी सॅ बाबू बनलहुँ आ आबतऽ नौकरी करऽ लगलहुँ!’ खैर सेठियाक ओत कहबा लेल वर्किग पार्टनरशिप छलै मुदा बनबारी लाल सेठिया बाबूजीक कोनो निर्णय पर दखल नहिदैत छलनि। स्वतंत्रा रूपें निर्णय लैत छलाह। हिनका अनुभव सॅ सेठिया कें खूब आमदनी बढ़लै। मुदा आमदनी बढ़िते ओकर नीयत ब्रोली गेलै हिस्सेदारी मे बड्ड बेईमानी कएलक। मन-मुटाव बढ़ि गेलै। जूट बाजार मे इ खबरि पसरि गेलै। मामाजी के स्वयं जूटमील छलैन्हि हुनका भनक लगलैन्हि। ओ मां के कहलथिन-‘जीजा जी पानि मे रहि कऽ मगरमच्छ सॅ असरि ठनलनि अछि। हमरा जनते एकर परिणाम-नीक नहिहेतै’।’ मामक आशंका निर्मूल नहिछलैन्हि। बाबूजी कें जिगरी दोस्त समध् िबालूरामजी आ बनबारी लाल सेठिया जहर दऽ मारि देल कैन्हि। ‘दोसर दिन अखबार मे ईसनसनीक खबर छपलै ‘ प्रसि( उद्योगपति श्री सॉवर मलजी गुप्ताक मृतशरीर ..... रहस्यमय मौत। लाश सोना गाछीक बाथ हाउस मे पाओल गेल।’ मॉ कुहरि उठलीस जालिम! एक तऽ बेकसूर पतिक हत्या कयलक ोसर देवतासन पुरूष पर एहन घिनाउन इल्जाम! बाबूजी मौत के बाद नहिमां के कहॉ सॅ अतेक शक्ति आबि गेलैन्हि जे कहियो पार्वान त्यौहर आ शुभ काजक अलावा कहियो पलंग सॅ नीचाँ पैर नहिरखैत छलीह कनिको शोर गुल भेला पर माथक दर्द सॅ बेहाल भऽ सैरिडन खाइत छलीह। से शेरनी जकॉ दहाड़ि कऽ बजैत छलीह-हमर पति मुइलाह नहिहुनका राक्षस सभ मारि देलकनि। हमर घर उजड़ि गेल। हत्यारा सभ के कहियो चैन नहिभेँटतै हमरे जकॉ बहु-बेटी कनतै।’ शायद ऊपर बला मांक आर्तनाद सुनलनि बालूराम जी आन्हर भऽ कऽ मुइलाइ आ बनबारी लाल सेठिया बीस बरस ध्रि जाबत जीवित रहल घर सॅ बाहर नहिबहरायल अपंग भऽ गेल। पफेपफड़ा मे से हो कोनो खतरनाक बिमारी भऽ गेलै प्रायः आक्सिजन पर दिन खेपलक। ओ राति कहियो ने बिसरत बड्ड बोझिल वातावरण छलै। मां एक-एक कऽ अपन पाँचो हीरा खोललनि आर दोसरो जेवर खोलि लेलनि लग मे मात्रा सल्लो दीदी छलथिन। मां सल्लो दीदी कें कहलथिन दादी या काकी सीा पता नहिचलै जे हम जेवर खोलिकऽ कतऽ राखलहुँ ओरिया कऽ राखि दे।’ हम स्तब्ध् छलहुँ किछु ने पफुराइत छल। मां लग ठाढ़ि सरोज सॅ पूछलिऐ दीदी, हार्ट पफेल ककरा कहेै छै? की होइ छै? दीदी जवाब मे कहलनि - ‘एंखन चुप्प रह।’ भोरे बड़का भैया आबि गेलाह। अखबाक समाचार पढ़ि मारवाड़ी समाज आश्चर्यचकित छल तकरा संग एहन सलूक! काका सभ पोस्टमार्टम के बाद दूपहर मे लाश अनलनि। ‘ज़हर खुआक हमरा भाई के मारलक हम बदला लऽ कऽ रहबै।’ मुदा के बदला लेलकै? हमरा ओ दृश्य नहिबिसराइत अछि जखन बाबूजी के चारूभाई कन्हा पर अर्थी पर लऽ गेलथिन। बाबूजी चारू कन्हा पर छलाह पाछू-पाछू दूनू भाई आ जीजा जी ताहि संगे सैकड़ों लोक। अनगिनत गाड़ी। हम खिड़कीक छड़। हमरा सभ मे कुमारि लड़की श्मशानघाट नहिजाइत छैक। मने मन होइत छल ई हमर बाबूजी नहिछलाह जकरा सभ नेने जाइत छै। मूँहो तऽ झाँपल छलै। नहिरहि भेल तऽ दाई मां सँ पूछलिऐ-दाई मां, दाई मां, हमर बाबूजी औता नै। ई जरूर ककरो आन लोकक लाश हेतै। झूठे खबरि छै जे हमर बाबूजी कें जहर खोआ कऽ मारि देलकैन्हि।’ दाई मां तऽ अपने कनैत-कनैत बेहाल छलीह-हे भगवान केहन दिन - देखयलह......।’ कनिते-कनिते दाई मां हमरा आ सरोज कें नहौलक। हम कनैत-कनैत सुति रहलहुँ पफेर कानब सुनि निन्न टूटल। देखलिए-घाट पर सॅ सब घुरिकऽ आयल छलाह। डाक्टर गांगुली मां क नब्ज पकड़ि कऽ बैसल छलाह। मां जोर-जोर सॅ बजैत छलीह-डाक्टर साहेब हुनकर हत्या कयल गेलैन्हि। हत्यारा हमर सोहाग उजाड़ि देलक। ‘भाभी अहाँ शान्त रहूँ! हम सभ बदला जरूर लेबै।’ ‘कोना बदला लैबै? आब हम बाल बच्चाक पोसब की घर-द्वारि बेचकऽ ममला-मुकदमा लड़ब?’ बहुत दिनक बाद सल्लो दीदी कहने छलीह जहिया बाबूजी दुनियॉ से गेलाह तहिया मां लग मात्रा पाँच सौ टका छलैन्हि। बाबूजीक अचानक मौत भेलैन्हि। सब टका पाई तऽ बालूजीक गददी मे जमा छलै। आर कतऽ कतऽ पाई छलैन्हि से ककरो बूझलो नहिछलै। बालूजी तऽ सभटा टका पचाइए लेलथिन। ‘काल्हि की हेतै’ बच्चा सभ के कोना पोसब पालब? मां एहि छगुंता मे सदति काल रहैत छलीह। एक दिन बड़का कका कहलथिन-भाभी आब रईसी नहिचलत बड़ा बजारक मकान मे चलू आई दाई नौकरक पफौज हटाऊ।’ मां मुँह झपनहिं कहलथिन-हम कतौ नहिजायब जेना होइत एलैए तहिना सब हेतै हुनकर मान-मर्यादा मे बटाð नहिलागऽ देबै।’ ‘खर्चा चलल कहाँ से?’ भगवान देथिन। स्वर्ग में बैसल बाप अपना बाल बच्चाक एतबो ख्याल नहिराखथिन?’ एहन पफुहड़ि औरत कें के समझाओत? खिसियाक बड़का कका चलि गेलाह। ‘मामला-मुकदमा लेल टका चाही? दोसर कका बजलाह। तऽ मां कहलथिन- हम पैघ खाना दानक बेटी छी अनपढ़ गंवार नहि! हमरा अपना बाल-बच्चा भविष्य देखबाक अछि। मुकदमा कोट-कचहरी सॅ हमरा सभ के सबूत अछि। सार सेठिया के पफॉसी दिया सकैछी। भाई साहब खानकदानक नाक छलाह।’ से जे होइ मुदा हम मामला-मोकदमा क चक्कर मे नहिपड़ब! के जानए काल्हि ओ विजय संग किछु कऽ बैसए!’ ‘की विजय एसगर छै बाप नहिछथिन तऽ कको सभ मरि गेलै? खैर अहाँ के जे इच्छा होए करू हम सभ नहिबाजब।’ मंझिलो कका चलि गेलाह। मामा - मां के कहलथिन-बगल मे जे खालि जमीन छै ताहि मे मकान बना कऽ किराया पर लगा दिऔ। मासे-मास टका भेंटैत रहत घरक खर्च लेल। मां कहलथिन ‘मकान बनाबऽ लेल बहुत टका चाही हम कतऽ अनबै ओतेक टका?’ ‘हम बात तऽ कहलहुँ लाख टका क। तखन रुपैया पैसा एखन हमरो हाथ पर नहिअछि। अहाँ जनिते छी सोध्पुरक कारखाना बन्द भऽ गेल अछि।’ ‘भैया हम अहाँ सँ टका कहाँ मंगैत छी?’ ओहि राति भैया बाबूजी के सपना मे देखलथिन बाबूजी कहलथिन-‘अहाँ सभ जुनि घबराऽ बड़का तिजोरीक दहिनाकातक ड्राअर खोलिक कहियो मां के देख।’ भैया हड़बड़ाक उठलाह मां के जगा कऽ सभटा बात कहलथिन-। मां तिजोरी खोललनि। दहिना ड्रॉअर मे बैंक के पासबुक छलै जाहि मे दस लाख टका जमा कयल छलै। पासबुक मे मां आ भैया दूनू गोटेक नाम छलैन्हि भोरे-भोरे भैया बैंक गेलाह टका निकालननि काजग वास्ते आर टका दोसर बैंक मे जमा कऽ देलथिन। मां अपन हीरक चारू चुड़ी बेच देलथिन। श्रा( कर्म मे कोनो कभी नहिकयल गेलै। अइबेर दिवाली मे ककरो उत्साहे नहिछलै कहुना विध् पुरल गेलै। दिवालीक बाद बगलबला खालि जमीन पर मकानक नेउ देल गेलै’ ध्ीरे-ध्ीरे मकान बनि गेलै। काल्हि राति मे अजीब सपना देखलहुँ। राति मे बारह बजेके बाद ऑखि मुनने होएब। सोचैत-सोचैत अचेतन अवस्था मे घॅसैत चलि गेलहुँ। सपना मे देखलिऐ हम एकटा पैद्य रूम मे बन्द छी। क्यो हमरा दिस झपटैत अछि। आ हम छलांग मारि रूम सँ बाहर लाबी मे भगैत जा रहल छी। अचानक एक्जिट देखाइत अछि। हम घड़घड़ाइत घुमावदार सीढ़ी पर उतरैत जा रहल छी बुझु जे दस मंजिला सॅ एक मिनट मे उतरि गेलहुँ। बड्ड हॉकि रहल छी। देह थाकि कऽ चूर-चूर भ्ज्ञऽ गेल अछि। बुझाइत अछि जे क्यो रस्सी सॅ करेज बान्हि रहल अछि।......पफेर एकटा स्वीमिंग पूल........नहिई तऽ गंगा नदी छै बड्ड तीव्र वेग ठहरल पानि नहि। तखने एकटा छोट लड़की के देखैत छी चारि पाँच बरसक ओकरा हेलऽ नहिअबैत छै। ऊब डूब भऽ रहल अछि। अरे ई तऽ डूबि रहल छै हम झटकि कऽ ओकरा लग गेलहुँ। अपना दूनू तरहथ्थी पर ओकरा उनटा पारिकऽ हेलनाई सीखा रहल छी। धरक तेज प्रवाह मे हम तलमलाइत छी। मन मे होइत ई हरिद्वारक गंगा पफेर होइछ नहिई बंगला देशक प(ा छै। प(ाक धरक एहन तीव्र वेग! खैर ओ बच्ची हेलनाई सीख गेल। आब ओ भभाकऽ हँसि रहल अछि। ‘देखू, आब हमरा हेलऽ आबि गेल।’ हमरा हमरा ई सुनि अद्भूत आनन्द भेंटल। प्रसन्नता सॅ कहलिऐ- हं, बेटा एहिना हेलब सीखैछ सब।’ भोरे निन्न टूटल। खिड़की सॅ देखलहुँ दूर-दूर ध्रि अनन्त अथाह समुद्र मोन पड़ल खुका सपना। अर्न्तमनक द्वन्द्व सॅ कहिया छुटकारा भेंटल! की करु!! कलकत्ता जायब तऽ पफेर काजक चक्करघिन्नी मे घुमैत रहब। ब्रेकपफास्ट के बाद वापस आबि बरांडा पर राखल डेक चेयर पर ऑखि मुनि बैसि रहलहुँ। पिफलिप जबरदस्ती हमरा समुद्रक कात मे पठौलनि। हमरमोन समुद्रक निरन्तरगर्जन सॅ घबरा जाइत अछि। हमरा पहाड़ नीक लगैत अछि। काल्हि रातिबला सपना पफेर मोन पड़ल। ओइ सपनाक मतलब नहिबुझाइल कहियो जूडी सॅ भेंट होएत तऽ पूछबै जरूर। ओकरा साइक्रियाटीक अनुसार और सपनाक विश्लेषण की हेतै।’ पिफलिप आ जूडी भारत सॅ एतेक दूर रहितहुँ कतेक निकट लगै’छ। शायद कलकत्ता मे एतेक अपनत्व ककरो सॅ नहिअछि शायद आब क्यो दोस्तो नहिए अछि। काल्हि रातिमे अपन नेनपनक बाते सभ सोचैत सुतल छलहुॅ ताहु मे वेशी मोन पड़ल छल बाबूजीक मृत्युक बात सभ। बाबूजीक मृत्युक समय हम लगभग साढ़े नौ बरसक रहल होएब। बाबूजीक मृत्युक बाद घरक आर्थिक हाल दिनोदिन बिगड़ैते गेलै। ओना बाहरी आडम्बर झाड़ पफनूस, तोरण सजाकऽ यथास्थिति रखबाक कोशिश मे मां जी जान सॅ लागल रहैत छलीह। भीतर सॅ रिक्त-तिक्त भऽ गेल छलीह किछु आर कठोर मुदा ध्यिा-पुता लेल बहुत स्नेह आवेश बुझना जाइत छल। नर्स छलैन्हि राध तकरा हटा देलथिन। आब डाक्टर गांगुलि यो वेशी काल नहिअबैत छलथिन। हं, आब दाई मां हुनकर आव-भगत मे लागल रहैत छल। दाई मां सलाहकार, सेविका, हमदर्द जे बुझि सभ छलैन्हि। मां क पलंग-बड़कीटा छलैन्हि से बाबूजीक बिना सुन्न लगैत छलै खाली-खाली सन। दाई मां ओहि घर मे नीचॉ मे गदाक्क ओछा कऽ हमरा सुता दैत छलीह। सरोज, बुल्ली आ छोटका भैया बाबूजीक रूम मे सूतैत छलाह। नीलू कहियो काल नानीक ओत रहैत छल कहियो दीदी लग। हम बाबूजी घर मे जाइत घंटो बरांडक कोना मे बैसल रहैत छलहुँ। आकाश दिस तकैत छलहुॅ तऽ ध्ॅुआ-ध्ॅुआ सन लगैत छल। वेशी काल हम गोरैया चिड़ैं सॅ बतिआइत रहैत छलहुॅ मुदा आब मोने-मोन बतिआइत छलहुँ डर होइत छल पफेर जॅ भैया सझ सुनता तऽ की करता की नहि। गोरैया जखन रेलिंग पर आबि कऽ बैसैत छल तऽ हम पूछैत छलिऐ- ‘ए चिड़ियॉ कह ने हमर बाबूजी कहिया औता?’ कहियोकऽ स्कूल सॅ आबि तऽ सीढ़ी पर चढ़ैत काल मन मे होइत छल-बाबूजी अपना रूम मे कान सॅ टेलिपफोन सटौने बतिआइत हेताह। मुदा से दिन कहियो ने भेलै। करीब छ मास बीतैत-बीतैत हमरा विश्वास भऽ गेल आब बाबूजी कें नहिदेखबैन्हि ओ सत्ते हमरा सभ कें छोड़िकऽ चलि गेलाह। तकरा बाद हमरा संग दुर्घटना भेल भैया बला। पैंटी मे जहिया दाई मां खून देखलनि तहिये सॅ मां क रूम मे हमरा सुताबड़ लगलीह। दाई मां बहुत देर घरि मां कें मालीश करैत छलथिन मां औधा जाइत छलीह तखन मालीश करब छोड़ैत छलीह। मांक संग मालीशकाल खूब बतिआइत छल खाली बाबूजी विषय मे। हम चाहैत छलहुँ जे सभटा बात सुनि मुदा ऑखि मुना जाइत छल। एक राति अध्रतिया मे निन्न टूटि गेल तऽ सुनलहुॅ मां हुचुकि हुचुकि कनैत छल तइओ पैर दाबि ध्ीरे-ध्ीरे मां लग पहुँचलहुॅ। आ दाई मां के दाई मां उठलीह हुनका ऑखि पनिया गेलैन्हि हमरा कहलनि-बुच्ची! मां कनतीह नहितऽ की करतीह दुःखक पहाड़ खासि पड़लैन्हि माथ पर। दाई मां पफेर हमरा लग एलीह तखन नहुॅए सॅ पूछलिऐन्हि- दाई मां दिन मे मां के कनैत नहिदेखैत छिऐनह! बुच्ची अहॉक बहुत जीवटवालीं छथि। जहिया सॅ मालिक विदा भेला कहियो राति मे चैन सॅ नहिसूतलनि। मुदा दिन मे करेज पर पत्थर राखि, सभटा भार सम्हारैत छथि। कहै’ छथिन-‘चमेलिया माथ हम कनबै तऽ बच्चा सभ दिहरू भऽ जायत। कतेक जतन सॅ ध्यिा-पुता के पालैत पोषैत छलथिन। एकरा सभके कष्ट हेतै तऽ हुनकर आत्मा दुखी हेतैन्हि। प्रात भऽ कऽ ई बात हम सरोज दीदी के कहलिउे जे राति मे मां दाई मां संग बाबूजीक बात करैत छै आ कनै छथि। सरोज एक नमर के चुगलखोर ओ ई बात बड़का भैया आ भाभी कें कहि देलकैन्हि। भाभी जी दूनू दीदी कें पफोन पर कहि देलथिन। दूनू बहिन एहि बात पर मां के पफोन कऽ बजलथिन ‘मां अहां एना कनबै तऽ हमरा सभके के देखत।’ सुमित्रा दीदी कहलथिन पफेर सरला दीदीक पफोन एलै-मां अहा कहि तऽ किछु दिन लेल हम आबि जाय अहाँ एना कियेक कनैत छी बाबूजी तऽ चलिए गेलाह अहां सब दिन अस्वस्थ रहैत छी एना मे अहूॅ नहिरहब तऽ हम सब तऽ टूअर भऽ जायब।’ मां कहलथिन-‘नहिहम कहॉ कनैत छी के कहलक अहॉ के? हमर तऽ चारूधम सब तीरथ अहीं सब छी। हमर घर तऽ मंदिर अछि। आ अहांक बाबूजी कतहु नहिगेलाह अछि हमरे सभ्क बीच एखनहु छथि। हं, हमरा लोकनि हुनका देख नहिपबैत छिऐनह। एहि पफोनक बाद मां हुक्म भेल जे आब प्रिया बच्चा बला रूम मे सूतत। आब सरोज आ हम एक रूम मे सूतैत छलहुँ आ दोसर रूम मे छोटका भैया आ बुल्ली। दोसर रूम मे सूतैत छलहुँ मुदा दाईमंा हरदम हमरा पर नजरि रखैत छलहि। हमरा याद अछि बाबूजीक देहान्तक शायद छ मासक बाद सल्लो दीदी सासुर सॅ आयल छलीह विवाहक दस वर्षक बाद बेटा भेल छलैन्हि। मां चान्दी थारी बजौलनि। रसगुल्ला बॉटल गेलै। मुदा भीतरे-भीतर हुनका चिन्ता सॅ मन बेचैन छलैन्हि खिचड़िक नेग मे बहुत खर्च होइत छै कोना हेतै’? आइ ओ रहथिन तऽ कम से कम पच्चीस हजारक खिचड़ि देल जाइत। बिल्लू भेल छलैतऽ शानदर नेग बाबूजी पठौने छलथिन। आइ सॅ पैंतिस वर्ष पहिने पच्चीस हजार टकाक महत्व छलै। हलांकि बगल मे मकान बनि गेलै। दस हजार टका प्रत्येक मास किराया मे अबैत छै। आब घर खर्च लेल मां निश्चिनत भऽ गेलीह। मुदा ई ऊपरि खर्च कोना निमाहल जायत। बाबूजी क गेलाक बाद शायद अहि चिन्ता पिफकिर सॅ मां क स्वभाव मे चिड़चिड़ापन आबि गेलैन्हि। बात-बात को खिसिया जाइत छथि। मुदा आर अहठाम हम कियेक मांक अतीतक पोथा लऽ कऽ उनटा रहल छी? कियेक कखनौक एकटा असहम वेदना यॅ कुहइि उठैछ मन-प्राण? केहन अन्सोहाँत लगैत छै अपन मांक आलोचना करब। मुदा बात छै तेहने मां हमरा कहियो स्नेह नहिदेलनि मांक ममता केहन होइ छै हम कहियो नहि बुझलिऐ! तकर कारण इएह जे हम चारिम बेटी छलिऐ। अइमे हमर कोनो दोष? मां चाहैत छलीऐ तीनटा बेटी कछिए आब बेटा होमए। तऽ की गुप्ता हाउस मे बेटी क रूप मे जन्म लेब वा बेटाक रूप मे हमरा वश मे छल? ओनो कखनौ काल मां पर दया होइछ- हुनका जिनगी मे भेटँलनि की? संघर्ष मात्रा संघर्ष। मुदाइ हो सत्य छै जे ओ स्वयं सुखक चिडै़ंक पॉखि नोचि-नोचि कऽ पफेकैत रहलनि। मां एकटा अहंकारी जिद्दी बच्चा जकां छलीह जे परसल थारी पटकी भखलो बैसल रहै छैै। नहिजानि कियेक हुनका व्यथा आ त्रासदी मे कोन सुख भेंटैत छलैन्हि। मंच पर एक सपफल निर्देशक जकाँ हमरा सभकेँ अपन त्रासदीक भागीदार बनाइए कऽ सांस लैत छलीह कखनौ अपने व्यथित रहैत छलीह तऽ कखनौ पर पीड़न सॅ सुख भेंटैत छलैन्हि। हुनकर बोली-वाणीक आक्रमकता आ शब्दक चाबुक तड़ाक-तड़ाक पीठ पर पडै़त छलै नील निशान रहि जाइत छलै आ लोक दर्द सॅ कुहड़ि उठैत छल। हम आ छोटका भैया मां क कोप भाजन वेशी काल बनैत छलहुँ। हमरा बुझना जाइछ मां क दृष्टिकोण सॅ महिला क जन्म पाप छला महिला माने एहन हीन स्थिति जेहन क्यो गुलाम होइ जे मालिक बिना जीवित नहिरहि सकै’छ। जँ मालिक असमय चलि गेलाह-सिंहासन खालि भऽ गेलै तऽ युवराज ओइ आसन पर बैसथु। आ सेह भेलै। बड़का भैया युवराजक रूप मे खालि भेल सिंहासन विराजमान भेलाह। मां के हमर किछु नीक नहिलगैत छलैन्हि। ने मुँह-कान ने पैध्-केश ने नमछर देह। सबसॅ वेशी अखरैत छलैन्हि हमर स्वस्थ कद काठी दसम वर्ष होइत-होइत पीरियड्स शुरू भेनाई किशोरी जकां उभार। हरदम टोकैत छलीह- ध्म-ध्म करैत चलै छेँ नहुँ-नहुँ चल ढंग सॅ बैस। कतेक जोर सॅ हँसैत छेँ। केना खों खों कऽ खॉसैत छँ खोंखी दाबि ली तऽ माल-जाल जकॅा गरगराइ छेँ कियेक। कोनो तरेहँ चैन नहि। हमरा एखनो आहिना याह अछि मां के पानि पीबऽ बला बहुत सुन्दर शीशाक केटली छलैन्हि जे हमरा हाथ सॅ छुटिकऽ पफुटि गेलै। चिचियाक क पुछलैन्हि- की पफुटलै। हम-हुनकर आवाज सुनिते भुगलहुँ पछिला बरांडाक रेलिंग पर। एक पैर अइ कात दोसर ओइ कात ध्ऽ नीचॉ खसबैतऽ हमहुॅ मारि जायब।नीके हेत मरि जाइतऽ। हमरा मरला पर कयो कानबो नहिकरत। हं, एकटा दाई मां हमरा ले’ कनतीह। मां तऽ नहि ए कनतीह हुनका तऽ हम मरि जाइ तऽ खुशी हेतैन्हि। हं सरोज आ बुल्ली कनतै। मुदा मरलाक बाद हम बुझबै कोना जे के कनै’छ के नहि? दाई- मां कहै छथिन जे अल्पआयु मे मरैत छै से प्रेत भऽ जाइ छै..... इएह सभ सोचैत छलहुँ ताबत चिचिआइत दाई मां दौड़ल एलीह - बाप रे बाप। ई को करै छी बुच्ची।’ आ हमरा ध्यि कऽ रेलिंग पर सॅ उतारंलनि। सोचत छी तऽ लगैए जे केहन असहाय, अनाथ सन छल हमर बचपन! शायद बैध्ब्य महिलामे हीनभाव आ असुरक्षाक बोध् सॅ कठोर स्वभाव भऽ जाइत छै। मां एसगर भऽ गेल छलीह तैँ हरदम ककरो ने ककरो सॅ बतिआइते रहैत छलीह। पहिने लोक सँ एतेक कहाँ बतिआइत छलथिन। आब तऽ कखनौ दीदी सब सॅ कखनौ बड़की भाभी सॅ तऽ कखनो यमुना मौसी या कमला मौसी सॅ। कखनौ काकीक बेटी राध सॅ। एके बात एकहि घटना मौका बे-मौका सभ सॅ बतिआइत छलीह। ओहुना कोनो बात के बतंगर बनाकऽ दू-दू घंटा। बतिआइत छलीह विषय किछु भऽ सकै’छ। हरिया गँाव-गेल दू दिन लेल आइध्रि ध्ुरिकऽ नहिआयल। गोविंद महाराज आब देरी करताह तऽ नौकरी सॅ हाटाइए देबैन्हि। .....बाजार मे सभ वस्तुक दाम बढ़ले जा रहल छै पफल कतेक महग भऽ गेलै। आब सब बच्चा केँ मौसमीक जूस देब संभव नहि। आर नहिकिध्ु तऽ बेट क बढ़ई। श्रवण कुमार अछि हमर बेटा! एहन बुझनुक बेटा नहिरहैत तऽ हम सभ एखन-सड़क पर रहितहुँ......। हमर अपन दियादनी सभ की सभ नहिकयलनि जादू टोना समेत मुदा भगवतीक कृपा हमर बेटा सरिपहुँ मातृभक्त अछि। एक मात्रा बड़की काकी के माहेँ मां नहिकिछु बजैत छलीह ओ चुकी निर्दलीय छलीह जे क्यो किछु अदगोई- बदगोइ कहैत छलैन्हि से अपने मन मे रखैत छलीह। दियाछनीक बाद ननदि सभक सिधंस शुरू करैत छलीह..... सभ खालि लेबऽ लेल मुँह बौने रहैत छथि...। दरअसल मां के भेटँलनि की? कोन विषय पर चर्चा करतीह। हर साल एकटाक बच्चा जन्मौलनि! आ बच्चाक कारण महिलाक शरीर खोखला भऽ जाइत छै ताहू अतेक संतति। पहिने अपनाध्यिा- पुताके कयलहूँनी पफेर सन्तानक बच्चाकोँ। इहए सब खरेहा लोक केँ सुनबैत छलीह। .......की कहँू कहियो चैन नहि सालोभरि पावनि त्यौार ताहि मे बेटी सभक सासुर मे सनेश पटेनाई! खर्चक कोनो अन्त नहि। अहिना गप्प पर गप्प पफोनो पर आ लोकोलग। ओना कोनो काजक गेर कखनौ हरिया के तऽ कखनौ लक्षमिनियॉ वा सीताराम केँ मुदा गप्प करबाकाल बड्ड पफुर्ति रहैत छैन्हि। अर घर मे पछिला पचास वर्ष सॅ नौकर बदलाइत रहल अछि मुदा कोनो नब नाम नहिसुनलहुॅ। जे आयल तकरा पुरनके नौकर वला नाम सम् शारे पाड़ल जाइत रहल अछि। खैर नाम मे की राखल छै हँ, तऽ बेचारा सीताराम तीन वर्ष ध्रि बर्तन-बस्सन मंजैत रहल ओकरा गेलाक बाद जे आयल तकरो नाम रहलै सीताराम। एहिना हरी छोटे मे आयल छल पहने हरि पफेर हरिया कहल जाइत छलै जखन बूढ़ भऽ रिटायर भऽ गाम गेल तऽ आयल बेचन ओकरो नाम रीलै हरिया। दाई मां क अलावा दू टा नौकरानी छलैन्हि मां केँ। राध नर्स चलि गेलै मुदा एखन जे नौकरानी छै तकरो नाम छै राध। जखन मां क्रो( मे रहैत छथि तखन रध्यिा कहि कऽ शोर पाडै़त छथिन। पछिला तीस वर्ष सॅ छाई मां के गेलाक बाद मां के देख-रेख करैत छैन्हि रध्यिा आ कृष्णा। तकर अलावा साक्षात राजलक्ष्मी बड़की पुतौहु आगाँ-पाछाँ करैत रहैत छथिन। मां क कहव छैन्हि भगवानक नाम रखने अनायास लोक अनेक बरे भगवानक नाम लऽ लै’छ। तखन हमर नाम प्रिया के राखलक? डा॰ अमृता कौर नहि, नाम रखलक राध नर्स! कृतज्ञ छी हम नर्स राध्क। सुमित्रा, सरला सरोज आ तकर बाद जँ हमर नाम सावित्राी राखल-जाइत तऽ? ओ तऽ राध नर्स राध नर्स कहलकै आब ‘स’ अक्षर सॅ नाम नहिरखियौ नहितऽ पांचम बेटीए होएत। एकटा बात बुझलहुँ मां के जँ दूइओ मिनट एसगर रहऽ पडै़त छैन्हि तऽ ओ घंटी पर घंटी बजा कऽ आडन घर केँ आन्दोलित कयने रहैत छथि। पलंग के सिरमा लग भैया कॉलिंग वेल लगबा देलथिन। मां बटन दबबैत रहैत छथि लोक दौड़ल- जाइत छैन्हि पूछऽ। वेशीकाल बड़की भाभीजी आ छोटकी भाभी जी जा कऽ पूछैत छथिन - ‘मां जी! की भेल? किछु चाही?? -नहि, रानी! ई रध्यिा कखनौ एकठाम टिकते नहिअछि। आ अहाँ सभके अपन ध्आि पुता ओझरौने रहै’छ। हमरा माथ मे दर्द होइत अछि तैँ घंटी बजौने छलहुँ जे रध्यिा बाहर सॅ आओत। - ‘मां जी कहू न कोन दवाई दी?’ - ‘सरिडान आ एकटा हार्टवला दवाई लिब्रियमा दवाई दऽ कऽ भभी जी घुरऽ लगैत छलथिन तऽ मां कहैत छलथिन अरे क्यो तऽ रहू- हमरा लग। हमरा लग। हमर मन घबरा रहल अछि।’ आ बड़का भैया केँ जँ ऑपिफस सँ घुरिकऽ। घर आबऽ मे आधे घंटाक देरी भेला पर हाय तौबा मचा दैत छलीह.......’ हे भगवान! आकाश मे बिजुरी चमकै’छै चारू भर मेघ लागल छै..... हमरा बड्ड चिन्ता भऽ रहल अछि। करेज थरथरा रहल अछि.... कहीं एकसीडेंट नहितऽ भऽ गेलै?’ - ‘मां जी! किछ नहिभेल हेतै’ अबिते होयताह कियेक चिन्ता करै छी।’ जँ रातुक बेर रहैत छलै तऽ कहैत छलथिन- ‘सब दिन कहैत छिऐ वशी राति कऽ नहिअबि। जमाना खराब छै, बाट-घाट मे चोर-डकैत अवसरक ताक मे रहै’छै।’ जहिया सही समय पर भैया घुरि कऽ अबैत छलथिन तऽ सबसे पहिने मां क रूप मे जाइत छलाह मां बैसल रहैत छलथिन ओ हुनके- लग सूतल-सूतल अपन दिनचर्चा सूनबैत छलथिन। ओ समय समिट कांप्रफेन्सक रहैत- छलै तखन आर क्यो गप्प-सप्प भेला क बाद मां बेटा भोजन लेल बैसैत छलाह तऽ बड़की भौजी बैसि कऽ भोजन करबैत छलथिन। बाबूजीक स्थान लेलैन्हि बड़का भैया। ध्रक आर सदस्य सहमल-सहमल अपना-अपना रूपमे रहैत छल। सभकेँ अंदेशा रहैत छलै नहिजानि आइ ककर पेशी हेतै’? ककरा डॉट-पफटकार लगतै?’ एकटा सांझि ओहिन याद अछि। ओना त अपन नेनपनक कतेक सांझि ओहने बीतल छल। छुटीð मे सब दुपहरिया मां क नाम समर्पित करऽ पडै़त छल। हुनका नजरिक सामने बेसल रहू हुनका कंखन कोन वस्तुक जरूरत पड़तैन्हि। पहरा दैत बीतैत छल दुपहरिया। हं, तऽ सांझि भेल जाइत छलै’। पछिला बरांडा मे मां कुर्सी पर बैसल छलीह। बगल मे मोढ़ा पर बैसल सल्लो दीदी स्वेटर बुनैत छलीह। नीचॉ सॅ सरोज, नीलू आ बुल्लीक आवाज सुनाइत छल। किछु पड़ोसियोक ध्यिा-पुता खेलाइत छलै खूब जोर-जोर सँ सब बजैत छल- ‘आलकी पालकी जय कन्हैया लालकी......... मां हमहूँ जाउ खेलऽ।’ की एक दिन नहिखेल जयबें तऽ मरि जयबें? देखैत छहीं सल्लो चुपचाप बेसल छै, यानी पीरियड्स मे। किछु बुझऽ सूझऽक अवगति नहि। जरलाहो मासे-मास ई आपफत! ;पीरियड्सद्ध आ बड़की ;बड़की भैजीद्ध राजलक्ष्मी नैहर गेल छथि मां बजौने छलथिन। मास दू बेर-तीन बैर नैहरकचक्कर लगबैत छथि। मां-दस दिन बीतैत-बीतैत पफोन करऽ लगैत छथिन ‘समध्नि! पारो केँ पठा दिअ।’ मन तऽ होइत कहिऐन्ह सब दिन राखि लिअ अपने ओतऽ। एक दिन आजीज भ कऽ कहबो कयलन्हि - ‘एक आबऽक काजे कोन ओतहि रहतीह!’ -पुतौहु बजलीह- मां अहाँ एना कियेक बजलिऐ?’ कोन अनर्राल बजलहुँ। अपने तऽ जाइते छी संगे मुन्नो के लऽ जाइत छी। घर केहन सुन्न भऽ जाइछ। मोन नहिलगैए। दोसर बात ई जे ओतऽ अल-बल खा लै छै आ बिमार पड़ि जाइत छै। तखन डाक्टरक पफीस कियेक नहिनानी दैत-छथिन। कहू तऽ चोर बगान रहऽ योग जगह छै? चारू भर रांदगी नाक नहिदेल जाइ छै।’ पफेर हमरा दिस तकैत बजलीह- ‘प्रिया जो हमर केश झाड़ऽ बला ब्रश नेने आ।’ जाए लगलहुँ ब्रश आनऽ नऽ सल्लो दीदी के कहलथिन ‘सल्लो, देखहि ई तऽ दिन दुगुना राति चौगुना बढ़िते जाइत छै ऊँट जकां। आ बु(ि-ज्ञान रत्ति भरि नहि।’ मां क ब्रश देलऐन्हि केश झाड़ वला तऽ बजलीह बिना अयनाक केश थकड़ब? सल्लो! कनि एकए टूेनिंग दऽ लुड़ि-व्यवहार सीखा। केना सासुर जायत एहन अलबटाहिके कोन लड़का पसिन्न करतै? हम अयना लऽ कऽ झटकल एलहुँ तऽ कहलनि जाइत छलेँ तऽ पूछिते ने आर की चाही? मूँहपोछऽ वला तौलिया आनि दे।’ तौलिया आन जाय- लागलहुँ तऽ पफेर चिकरलनि-‘कत जाइत छेँ?’ ‘तौलिया आनऽ।’ तौलिया गेल भाड़ मे। पहिने ‘चूडि कोलोन’क शीशी आनि दे। बाप रे माथ मे दर्द होमऽ लागल। -‘यूडिोलोन’क शीशी लऽ कऽ एलहुँ पफरमान जारी भेल-माथ मे लगा। माथ मे यूडकोलोन लगबैते छलिऐन्हि की पफेर बजलीह-माथ दाबि दे दर्द- होइए।’ माथ दबैत छलिऐन्ह तऽ हुकुम भेल- ‘ध्ुरऽ केना जातै छेँ हाथ मे दम नहिछौ? खाइ छथि भरि थारी......।’ हमर ऑखि नोरा गेल सल्लो दीदी दिस तकलहुँ मुदा हुनका हिम्मत छलैन्हि जे किछु बजितथि! कनि कालक बाद पफेर चिकड़लनि ‘बाप रे बाप कत्ते जोर सॅ दाबि रहल छेँ हाथ छै की लोहा....? जो हट हमरा टेलिपफोन आनि कऽ दे। -टेलिपफोन आनि कऽ देलऐन्ह तऽ कहलनि ‘यमुना मासी से बात करा।’ नमबर लगा कऽ चोंगा कान मे सटेलहुँ -‘मां ऑपरेटर कहैत अछि एखन लाइन एंगेज छै।’ -गदही, मुँह मे बकरा नहिछै-‘कहलही कियेक नहि जे अर्जेंट बात करबाक छैक, जलदी-लाइन दे।’ पफेर हमरा कपड़ा पर नजरि पड़लनि। समीज एतेक गंदा केना भऽ गेलौ? हरदि कोना लगलौ? खा कऽ समीज मे हाथ पोंछि लेलेँ। केहन ढ़हलेल भऽ गेलै’ ई कहियो नहिसुध्रत!’ मां, हमरा समीज मे बुल्ली हाथ पोछि लेलक। हम तौलिया सॅ हाथ पोछैत छी।’ ‘पोछऽ कियेक देलही? जो बदल कपड़ा चमैन सन लगैत छौ!’ ढ़हलेल, अपराजक, अलबटाहि कतेको उपाध् िसॅ विभूषित भऽ हम कपड़ा बदलऽ गेलहुँ। बुझायल पीरियड्स शुरू भऽ गेल। ओह! आब जँ एखन मां कहबनि तऽ पफेर चालू भऽ जयतीह ध्ंटो की कहॉ बजैत रहतीह। ठीक छै आइ पहिल दिन छै परसू माथ धे कऽ नहा लेब। पैड लेब लेल डेराइत-डेराइत मां के कहलिऐन्ह -‘मां पीरियड्स......’ मुँहक बात बहराइते भयानक विस्पफोट भेलै। -‘चंडाल! आइए इ हो होयबाक छलौ। काल्हि तोहर बाबूजीक बरखी छैन्हि। पीसी, काकी सब जुटतै। एकर काकी क तऽ गी(क दृष्टि छै ओ तऽ देऽते कहथिन- सल्लो! ई तऽ दस साढ़े- दस बरख उमरे मे चौदह बरसक देऽबा मे लगै’छ। मां बड्ड असहज भऽ दीदी दिस तकलनि। दूनू गोटा किछु पफुसुर-पफुसुर बतिऔलनि हम नहिसुनि सकलहुँ। हँ भीतरे-भीतरे उपफान उटल छल पीरियड्स होइछ ताहि मे हमर कोन दोष? बिना अपराधे के हरदम बात सुनैत छी। आ केहन निर्मम सजा भेँटैत अछि काल्हि भरि दिन पाछँा बला बराांडा मे बन्न रहऽ पड़त। बीच मे नास्ता, भोजन दाई मां दऽ जाइत छलीह -ऽा ले बुुच्ची।’ -‘दाई मां हम बाथरूम जायब।’ -बुच्ची, भरल आंगन लोकसभ छै हम कोना एऽन लऽ कऽ जाउ? बहुरानी त हमरा कांचे जीबा जेती। कनि ध्ैर्य राऽू चुच्ची। आहंक पीसी आ काकी सभ आंगन सॅ हटतीह तऽ हम लऽ जायब। भादवक उमस बला दुपहरिया आ एसगर गुमसुम बैसल रहब। हमर अस्तित्व डॅामाडोल भऽ रहल अछि। मां हमर कोन दोष? हमरा की नीक लगै’छ दूनू जांघक बीच ऽुन बहब? आ नाहि लेल एहन चातना। हमरा केहन आत्मग्लानि होइछ से मां के बूझल छैन्हि? की ओ हमर अपराध् बोध् अनुभव करैत छथि? एऽन ध्रि ई कस्ट सरोज के नहिभोगऽ पड़लै ओ तऽ हमरा सॅ पैघ अछि! सुनैत छिऐ जे सल्लो दीदी के चौदहम वर्ष मे पीरियड्स शुरू भेल छलैन्हि। तऽन हमरा अहि उम्र मे कियेक भेल? पॉच बजे मे दाई मां बरांडाककिवाड़ ऽोललैन्हि। मां ध्ीरे सॅ कहलनि कपड़ा तेना पफेकीहे जे ककरो नजरि नहिपड़ै।’ सरोज, बुल्ली, नीलू आ छोटका भैया बाहर ऽेलाइत छल। बुल्ली हमरा देऽिते चिढ़ाबकऽ लागल -‘ए अछूत कन्या! अछूत....।’ लाजे ऑऽि झुकि गेल। तऽ सब केँ बूझल छै? ‘दाई मां! हमरा देह सॅ प्रत्येक मास कियेक ऽून निकलै’छ!’ दाई मां कहलनि -‘होइत छै सबके मुदा अहॉ केँ -जल्दी भऽ गेल।’ ‘हमरा जल्दी कियेक भेल?’ -आब हम की कहू-दाई माँ उसाँस लैत बजलहि। -ओइ दिनक दुर्घटनामे पैंटी मे ऽून लागल छल। आ ओकर दू मासक बादे सॅ मासे-मास ऽून ऽसैत अछि। एकर माने हमर कस्टक कारण छथि बड़का भैया। सौंसे शरीर मे जेना आगि लागि गेल। बड़ी काल ध्रि कनैत रहलहुँ। -‘दाई मां! हरा सँ मां चिढ़ल कियेक रहैत छथि?’ बुच्ची! अहाँ सब तऽ शहर मे छी। गाँव मे तऽ जँ कोनो लड़कीकेँ ब्याह सॅ पहिने मासिकर्ध्म होइत छै तऽ लोक कहै छै जे माय-बाप केँ पाप बढ़ैत छै?’ -दाई मां अहीं कहैत छी पीरियड्स केँ मासिकर्ध्म! तऽ र्ध्म मे पाप केना बढ़ै?’ दाई मां कहलनि हम पढ़ल-लिऽल नहिछी लोेकक मूँहेँ जे सुनलिऐ से कहलहुँ।’ हमरा किछु बुझबा मे नहिआयल। बस एतबे बुझलिऐ जे हमरा संग बहुत गलत भेल। शायद एकरे पाप कहैत छै। आ तैँ मां हमरा सॅ एतेक घृणा करैत छथि। हमर कोनो बात नीक नहिलगैत छैन्हि-हॅसब, बाजब, चलब एतवे नहिदेह बाढ़ि सॅ देह मे लुत्ति लागि जाइत छैन्हि! हम एतेक लम्बा कियेक भऽ रहल छी? हमर रंग ऽूब उज्जर दूध्यिा गोराई नहिअछि। मां बाबूजी दूनू गोटे ध्प-ध्प गोर। दूनू भाई आ बहिन सभके रंग ऽूब सापफ हँ बड़की दीदी के गेहुऑ गोराई छैन्हि हमरे जकॉ। नहिजानि कियेक बाहरी लोक केँ चाह देबऽ काल हमर हाथ कॉपऽ लगै’छ। तहिना कतबो सतर्क रहैत छी तइओ चलैत छी तऽ ध्म-ध्म आवाज होइत छै। हम हरदम ओइ परिक कल्पना करैत रहैत छी जे अपना छड़ी सॅ छूबि कऽ लोककेँ सिंडूेला बना दैत छै एक बेर हमरो ओहि छड़ि सॅ छुबि दैत तऽ हमहूँ सिंडेला बनि जाइ। आब हमरा एकदम मन नहिलगै’छ कछु मे। मोन नहिपडै़ए जे कऽनौ कनैत काल मां दुलार कऽ कोरा मे उठौने हेजी। चाहेँ हम भूऽ सॅ कनैत होइ या पेटक दर्द सॅ। कतौ ऽसलौह कतहुँ छिला गेल या कथु सॅ आंगुर कटि जाय। मां चिचियाकऽ दाई मां के शोर पाड़तीह ‘ए चमेलिया माय देखियौ की भेल बेटी केँ। आब एऽन सॅ करैत रहू दवाईबिराँ। हमरसभटा परिचर्या करब दाईमांक काज छलैन्हि। हमरा बोखार लगैत छल तऽ राति-राति भरि दाई मां सिरमा मे बैासल रहैत छलीह। आ जँ बोखार दू-तीन दिन मे कम नहिहोइत छल तऽ दाई मां- मां लग जा कऽ रिरिआइत छलीह - ‘बहुरानी! तनि गांगुली बाबू के बजा दियौ ने। तीन दिन सॅ बुच्चीक बोखार सॅ देह ध्ीपल रहैत छै अहॉके कनिको दया-मया नहिअछि? एऽन सरोज बौआ या नीलू केँ कनि सर्दी हेतै’ तऽ तुरते डाकटर साहेब के बजालेब।’ -‘हमरा की कहै छेँ तोहर बेटी तऽ धेड़ा सन मजबूत छौ ठीक भऽ जेतै। डाक्टर गांगुली मंगनी मे नहिअबैत छथिन पफीस देबऽ पड़ैत छै।’ दाई मां ऑचर सॅ नोर पोछैत हमर रूम मे आबि सिरमा मे बैस जाइत छलीह वा तरबा सोहरबैत छलीह। आ हुनकर आत्मलाप शुरू भऽ जाइत छल। -‘लगिते नहिछै जे बहुरानीक ई अपन बेटी छैन्हि, कनिको दया-मायाक लेस नहिसतौतो माय के एहन पत्थर करेज नहिदेऽलहुँ! जहिया सँ मालिक गेलाह हिनकर स्वभाव आर कठोर भऽ गेलैन्हि।’ हम चुपचाप सोचैत रहैत छलहुँ मां केँ कोना ऽुश करि। तैँ ऽेलऽ कूदऽ के वयस मे हम सियान नर्स जकाँ हुनकर सेवा करैत छलिऐन्ह। मुदा ध्ीरे- ध्ीरे हमरा बुझा गेल सभटा व्यर्थ प्रयास अछि। ठुनका हमरा प्रति रत्ती भरि स्नेह ने छैन्हि ने कहियो हेतैन्हि। एक दिन हम अपना ने संगि सॅ पफोन पर बतिआइत छलहुँ। मां आबि गेलिह। हाथ सॅ टेलिपफोनक चोंगा ल कऽ नीचाँ मे पटकि देलथिन आ तड़ाक-तड़ाक थापड़ मारलनि -दिन भरि पफोन कान मे सटौने रहत।’ मां क आवाज सुनि बड़की भाभी दौड़ल एलीह। ठोर पर आंगुर राऽि हमरा चुप्प रहबाक इशारा कयलनि। बहुत देर के बाद पता चलल बगलबला मकान सँ एकटा किरायादार जा रहल छै। तैँ मां क पारा गरम छलैन्हि जाबत नव किरायादार नहिएतै ताबत दूसौ रूपयाक घाटा हेतै। जे होउ हमर कोन गलती क्रोध् होइत छैन्हि तऽ हमरे बात कहि मोन शान्त करैत छथि घर मे आर बाल-बाच्चा नहिछैन्हि? की सरोज-पफोन पर नहिबतिआइत छै- ओकरा कऽनो टोकबो करैत छथिन। हमरे एतेक गंजन कियेक करैत छथि की हम हुनकर बेटी नहिछिऐन्ह? मोन बड्ड अशान्त छल। दाईमां के पूछलिऐन्ह -दाई मां सच-सच कहू आहँके हमर सप्पत हम अहॉक बेटी छी? ओ हमर मां नहिछथि?’ हे भगवान! ई कोन बात भेलै। अई मे सप्पत देब बला कोन गध्! अरे बुच्ची अहूँ हुनकेकोऽि सॅ जनमलहुँ। डाक्टर अमृता साक्षी छथि। हमर भेला ताहि दिन तीन बरऽक छल। हमरा बड्ड दूध् होइत छल। भोला के गाम में छोड़ि कऽ आयल छलहुँ तऽ अपन दूध् अहिँ के पीबैत छलहुँ। तऽ हमर संगी कुमकुम कियेक कहलक जे ‘ई तोहर अपन मां नहिछौ सौतेली मां छौ?’ ‘सुनू बुच्ची! ओकर सभक बात पर ध्यान नहिदिअ। असल मे ओ देऽैत छै जे आर सभ बाल-बच्चा केँ दुलार-मलार करैत छथिन अहाँके कऽनौ नीक बातो नहिकहै छथि। तैँ हने हेत। मुदा ई बात जँ अहांक मां के कान मे जेतैन्हि तऽ ओ अहिंक कपाड़ पफोड़ि देती। कुमकुम केँ की बिगड़तै।’ -‘एऽन हम कतऽ छी? ई कोन स्थान छै?’ .......ओइ हम तऽ डूयब्रवनिक छी। आँऽि निन्न सॅ एऽनो बोझिल लगै’छ। सूर्यक- घाही एऽनो छै। हम डेक चेयर पर बैसल बैसले सूति रहल छलहुँ। पैर लग कॉपफीक कप ओध्रायल छल। एक दिस किताब आ डायरी छल। आई शुक्र छै। एत आयल चारी दिन भऽ गेल। उठि कऽ ठाढ़ भैलहुँ। हमरा ई बालकनि बड्ड नीक लगै’छ। दूर-दूर धरी लहराइत समुद्र। किलाक बुर्ज पर किछु सैलानी ठाढ़ छै जे एतेक दूर सॅ मात्रा छोट सॅ आकृति बुझाइछ। हवा कझोंका पहाड़ दिस सॅ आबि कऽ गाल छूबैत अछि शीतलता सॅ मन प्रसन्न भऽ जाइछ। हमरा ऽिड़की सॅ बगीचाक देबालक पीठ झलकै’छ आ किछु लतर देऽाइत अछि ओइ लतर पर भोर का सूर्य क किरण चमकै छै। लगे मे अंजीरक ऽूब पैध् गाछ छै एकटा अल्हड़ लड़कीक ऽिलऽिलाक हॅसऽ जकाँ हवा पात-पात पर झुमैत बुझाइछ। ई हवा हमर आशान्त मन के प्रपफुलित कऽ नव ताजगी दऽ रहल अछि। हमरा ऽिड़कीक पर्दा पर ध्ूप-छॉह का ऽेलौड़ भऽ रहल छै। आइ पूर्ण विश्राम लेब। ओना तन ध्ुर-ध्ुरिकऽ अतीत के ऽुरचैत रहै’छ। मुदा ओइ-ऽुरचन मे हमरा भेटँत की ...... की हम अपना आपके वापस कऽ सबक? मन क जख्मी चिथड़ा के टुकड़ाकेँ जोड़ि सबक? हं प्रयास कऽ सकैत छी। आ सेह कऽ रहल छी। नहिजानि कियेक बचपन मे हमरा मां बौकी ढ़हलेल, बकलेल नामे ध्यने छलीह। बाबूजी कहियो एना नहिबजैत छलाह ओत सदति काल बजैत छलाह-हमर ई बेटी बहुत तेज अीछ ऽून पढ़त विदुषी होएत। आ मां हमरा एकदम पफूहड़ बुझैत छलीह। हुनकर देल विशेषण एऽन ध्रि अचेतनमन मे सई जकां गंथल अछि। आ तैँ अहू उम्र मे जँ क्यो हमर प्रशंसा करैत अछि तऽ विश्वास नहिहोइत आछि। कोनो कॉम्पटनीमेंट केँ हम ग्रेसपफुली नहिलऽ पबैत छी। हँसैत काल दांत देऽाइत छल त सब भाई-बहिन हमरा दंतुली नाम ध्यने छल। सबसॅ रंग कम छल तऽ मां क आया राधक कहब छलै कतबो साबुन लगौती प्रिया तइओ सरोज सन उज्जर नहिए होयतीह। अपना वर्ग मे सबसे वेशी लम्बस छलहुँ तयॅ हमरा सब दिन पछिला बेंच पर बैसऽ पड़ैत छल। कहियो कोनो प्रश्नक जवाब नहिदऽ पबैत छलहुँ। घर मे हमरा लेल नव जूता अबैत छल तऽ पहिने सरोजे पहिरैत छल नव डूेस आबयतऽ पहिने सरोज पहिरए। साज-श्रृंगार मे हमरा कहियो रूचि नहिरहल। स्कूलक बाद जऽन कालेज मे प्रवेश कयलहुँ तऽ संगी साथी सब कहलक चेहरा केहन सुरेबगर छै! तऽ हमरा विश्वासे नहिभेल। लड़का सब सँ हम सहमल रहैत छलहुँ। दोसर बात ई जे सब हमरा नजरिमे बच्चे छल। पता नहिहमर केहन दिमाग छल जे चौबीस-पच्चीस वर्षक हमरा बच्चा सन बुझाइत छल। समय सॅ पहिने हम सियान भऽ गेल छलहुँ! -रिजेक्ट! रिजेक्ट देम टोटली-हमर मन कहैत छल। हमर सपना बदलि गेल छल आ हम ऽुब चैन सॅ ओइ सपना के देऽैत छलहुँ। ऽासकऽ सपना ओहने देऽैत छलहुँ जकर वास्तव मे अभाव ऽटकैत- छल। असल मे हमरा अर्न्तमन मे एक असुराक्षित लड़की छल जकरा एऽनो अपन बाबूजी रक्षक छलह। हुनकर जीवन शैली सभटा हमरा लेल गौरव क बात छल। हम पुरूषक निर्मम पक्ष नहिदेऽने छलहुँ कियेक तऽ हमर पिता शाऽा-प्रशाऽा पसारने एकटा वट-वृक्ष छलह। तैँप्रत्येक पुरूष मे हम हुनके छवि तकैत छलहुँ। सुरक्षा हं, सुरक्षाक गप्प तऽ छलैहे जे हमरा बड़का भैया सॅ बचाबए। हमरा ओ राति नहिबिसराइत अछि जहिया भाभी जी बड्ड बिमार छलीह आ सरोज सूतैत छलहुँ। ओ राति मे ससारिक हमरा पीठ लग सटि कऽ पफुसपफुसाकऽ बजैत छलाह प्रिया ए प्रिया आ तकर बाद हम सांस रोकि भगवान के नाम लऽ मने मन विनती करि हमरा बच्चा लिअ भगवान। बहुत देर ध्रि पीठ पर कोनो कड़ा वस्तुक रगड़बाक अनुभव होमए करेज ध्क-ध्क करैत छल। पफेर लगैत छल लसलस जकां समीज मे चादर मे। दाई मां भारे मे विछावन झाडै़त काल चादरि मे दाग देऽि हमरा दिस तकैत छलीह तऽ हमरा हुनका दिस ऑऽि उठा कऽ ताकि नहिहोइत छल। एकटा पाथर पर जीवित आदमी अपना केँ ध्सैत छल। सब दिन एहन नहिहोइत छलै मुदा तीन चारि मास मे कतेको बेर एहन भेलै। हम राति-राति भरि डरेँ सूति नहिपबैत छलहुँ! बी.ए. पफाइनल के परीक्षा छल आ मोन एकाग्र नहिभऽ रहल छल। कॉलेज सॅ घर घुर बाक इच्छा नहिहोइत छल। सूरज डूबिते एकटा दहशत घेर लैत छल। पता नहिआइ भैयाकतऽ सूतता जॅ पफेर हमरे रूम मे.....।’ एक राति सूतल छलहुँ डरेँ निन्न तऽ नहिए भेल छल कि भैया जोर सॅ बिठुआ कटलनि- हम उठिकऽ भगलहुँ बरांडा दिस दाई मांक विछावन नीक लागल अपन पलंग केर डनलप सॅ। भोर मे उठलहुँ तऽ दाई मां कहलनि- बुच्ची आब हम चुप्प नहिरहब। आब बहुरानी के अवएसे कहबैन्हि।’ -नहिदाई मां! अहॉ केँ हमर शपथ। दाई मां। अहाँ ककरो किछ नहिकहबै। ई हमर कर्मक दोष अछि। आब हम कुमारी छी कहाँ? दुःऽ आ क्षोभ सॅ दाई मां करेज पीटऽ लगलीह। अइ- बड़का घरक दाई मां बड़का घरक बेटीक दुऽ सॅ दुऽी भऽ बस एतबे बजलीह- केहन कुकर्मी छै अपना माय बहिन के नहिछोड़लक से कतौ मनुष होइ ई तऽ साक्षात राक्षस छै एहन देह मे आगि उठलै तऽ कोठा पर जाइत।’ मुदा आब हम बजबै। बाजऽ पड़त। मुदा कहबै ककरा? आर ककरा कहबै ऊ राक्षस आय एतै तऽ कहबै। की कहबै? हमरा नहिध्ू। निर्लज मानि जायत। हमरे उनटे गरदनि दवा देत। अहि घर मे सरोज छै ओकरा कहाँ ध्ुबऐ छै? हम एमरे शोषण कियेक करैत अहि? मां ठीके कहैत छथि- हम बौकी छी। बेवकूपफ छी, अप रोजक छी .....।’ राति मे साढ़े नौ बजे भैया बरांडा पर ठाढ़ भेल ािगरेट पीबैत छलाह आर क्यो नहिछलै। हम शान्ति पूर्वक ओइठाम जा कऽ ठाढ़ भेलहुँ। -‘भैया।’ हमरा दिंस तकैत बजलाह ‘ओह, अहाँ।’ ‘हं, हम छी। हम एऽने ऊपर सॅ कुदिक आत्महत्या करऽ जाइत छी....’ एतबा बाजि हम एकटा पैर रेलिंग पर रऽलहुँ। -‘शट अप! यू स्टूपिड गर्ल.....।’ आ ओ हमर हाथ पकड़ि लेलैन्हि। हम लोहछि कऽ बजलहुँ- हमर हाथ छोडू।’ -‘पहिने प्रामिस करू अहां कोनो एहन काज नहिकरब।’ ‘तऽ पहिने अहीं प्रॉमिस करू जे....।’ हां, प्रॉमिस बाबूजीक शपथ छल।’ महा झंझावात के बाद क शान्ति छल। आब ओ दोबरा कहियो नहिछुलैन्हि। मुदा हमरा अपने सॅ घृणा भऽ गेल। हं, ओ हमर उपेक्षा करऽ लगलाइ पफीस लेल पाइ नहिदैत छलाह कोनो छोट-छीन जरूरतो लेल तरसैत छलहुँ। ऽैर आब घर सुरक्षित-बुझाइत छल। हमरा मोन नहिपडै़ए हमर दादी केहन छलीह ने कऽनौ नानीक मुँहकान याद अछि। हं, नानीक घरक स्मरण अछि बड़ा बाजार मे हैरिसन रोड मे। हमसब साल मे मात्रा चारि बेर नानी ओतऽ जाइत छलहुँ। साओनक तीज मे। होलीक गनगौर मे राऽी मे दिवालीक दोसर दिन। गनगौरक सिंधरा मे नानी ग्यारह रूपया दैत छलीह। भोजन मे तिवारी दुकानक समोसा, उजरा रसगुल्ला कचौड़ी, आलूक रसदार, भरूआ परोर आ छोहराक - चटनी। दिवाली मे दिलरवुश बरपफी, दही बड़ा, आलू मटर के तरकारी, कोबीक भुजिया। मां कोबिक पफूल कहलाकपर ऽौंझाइत छलीह आ नानी तऽ किछु बजने चट मां के शिकायत करैत छलीह ‘कस्तुरी! तोहर बेटी बड्ड तर्कदैत छौ? हम बिनु अपरोध् नहुँ-नहुँ छोटकी नानीक घर मे जा कऽ नुका जाइत छलहुँ। हमरा छोटकी नानी ऽूब मानैत छलीह। मुदा मां आ यमुना मौसी छोटकी नानी केँ देऽऽ नहिचाहैत छलीह। नहिजानि नाना दूटा ब्याह कयने छलाह की कोनो ओ रहैत छलीह। हं, मामा दून्नू नानी केँ एक रंग आदर करैत छलथिन। कोनो भेदभाव नहि। मामा अपनो दूटा ब्याह कयने छलाह। छोटकी मामी मामा सॅ तीस वर्षक छोट छलीह। छोटकी मामी के कीनकऽ आनल गेल छलैन्हि। दुबर-पातरि ऽूब सुन्दर पफैशनवाली। मुदा बड़की मामी सन सम्मान नहिछलैन्हि परिवार मे। बहुत दिनक बाद एक दिन मामी हमरा मां केँ कहैत छलथिन -अहांक भाई हमरा कियेक ब्याहिकऽ अनलनि जऽन परिवार मे क्यो हमरा मनुष बुझिते नहिअछि! ऽालि बच्चा जनमाबऽ लेल ब्याह भेल हमर! बच्चो कहां हमरा अपन मां बुझैत अछि। कैलाश त बच्चे सॅ बड़कीए मां लग रहै’छ, हुनके हाथे ऽायत हुनके लग सूतत। पैध् भेल तऽहमरा संग कतहु जयबा मे लाज लगैत छै। कहैए अहाँ तऽ हमर भाभी सन लगैत छी। कुल मिला कऽ नेनपन मे हमरा ककरो प्यार-नहिभेँटल। एकहि खूटा छलै गड़ल एकेठाम चाहे दिन होउ या राति, जाड़क मौसम गर्मीक मौसम होउ या बरसातक, बिना कोना लोभ-लाभ के दाई मां दुलार करैत छलीह हमर जरूरत क ध्यान रखैत-छलीह। मोन नहिपड़ैत अछि जे कहियो क्यो हमरा लेल खेलौना किनकऽ अनने होमय। हे दाई मां सब मंगल केँ काली मंदीर जाइत छलीह ओ हमरा लेल पेड़ा, आ कोनो ने कोनो वस्तु अनैत दलीह। हम दाई मां के अबिते हुनका पकड़िकऽ पूछऽ लगैत छलिऐन्ह- दाई मां देखाउ ने हमरा लेल की अनलहुँ अछि। दाई मां पेड़ा रखने छी आ हमरा लेल चूड़ी अनलहुँ की नहि? पफीता कहने छलहु आनि देन। हं, दाई मां प्रसाद ककरो नहिदेबइ एकोटा पेड़ा नहिदेब सरोज केँ। -‘नहि, बुच्ची, हम ककरो नहिदेबइ।’ ई बात-चित्त होइते रहैत छल ताबत सरोज आबि जाइत छल। आ बुल्ली बिना पूछने मतने मिठाईक दोना पर झपटा मारैत छल। आ सरोज पेड़ा खाइओ लैत छल आ मां लग जा कऽ चुगलिओ करैत छल। बस मां झनकैत बाजऽ लगैत छलीह- ‘ए चमेलिया माय अहाँ बजारक सड़ल-गलल मिठाई खोबैत-छिऐ बच्चा सभ के। आ मोन खराब हेतै तऽ?’ हं, हं, काली मायक प्रसाद सॅ बच्चा बिमार पड़ि जेतई? हम सरोज दिस तकैत कहै छलिऐ- ‘खचड़ी कही के।’ दाई मां डॅटैत बजैत छलीह- ‘एक बुच्ची एहन गारि कतऽ सिखलहु? बहुत खराब बात छै नहिबाजि एहन बात।’ -‘तऽ कहू अहॉ देलिऐ किये सरोज केँ प्रसाद।’ -‘अच्छा आब नहिदेबै। उफ हो त बेटिए छै।’ नहि, दाई मां अहॉक बेटी हम छी आर केयो नहि। दाई मां क गरदनि पकड़िक कोरा मे बैसिकऽ कहैत छलिऐ- -दाई हमरा तऽ सब कहैए’ झल्लो माई, कल्लोमाई, आयी आयी, दाई मां की बेटी आयी।’ हमरा घर मे तुकबन्दी करबा मे छोटका भैया उस्ताद छलाह। भैया, दीदी सब हमरा खिसियबैत छल। इ तऽ दाई भऽ गेलै दाई मां क संग खाइत अछि। ठीके हम कतबो खा-पी लैत छलहुँ तइओ जाबत दाई मांक संग नहिखाइत छलहुँ ताबत मोन नहिभरैत छल। नौकर-चाकर लेल पफटक सरसोक तेल मे लहसून-पिआज बला तरकारी आ मसूरिक दालि बनैत छलै। दाई मां जखन खाइत छल पहिने हमरा भात-दालि सानि कऽ खुआ दैत छल तकर बाद अपने खाइत छल। भरि घरक लोक खा लैत छलै तखन दाई नौकर बरांडा पर बैसकऽ खाइत छलै। कहियो-कऽ दाई मांक थारी मे तरकारी नहिरहैत छलै भात-दालि आ हरियर मिरचाई पिआज संग खाइत छल। हम पूछिऐ- ‘दाई मां तरकारी नहिछै?’ तऽ कहैत छल- ‘हरिया सब हँसोथि लेलकै।’ -अहॉ रोकालिऐ कियेक नहि?’ -‘की हेतै’ आइ हम बिना तरकारिए के खा लेब।’ -‘अच्छा, आइ आबऽ दियौन्ह बाबूजी केँ, हम कहि देबैन्हि।’ -‘नहिबुच्ची! एकदम नहि। ई छोट छीन बात पुरुष केँ कान मे नहिदी।’ ई दाई मांक ट्रेनिंगक कमाल छलै जे हमरा जीवन मे क्षुद्र लोभ, लाभ दिस ध्यान नहिगेल। के हमरा की देलक आ हमरा सॅ बदला मे की लेलक तकर हिसाब नहिकयलहुँ। दाई मां-कहियो लेन-देन के हिसाब कहाँ कयलनि। दाई-मां जहिया गाम सॅ अबैत छलहि तऽ हुनका पोठरी मे रंग-बिरंगक खेलौना, जरीक चोटी, जौ के सतुआ आर कतेक वस्तु हमरा लेल अनैत छलीह। माँ जखन देखैत छलीह कपड़ाक बनल गुड़िया माटिक सुग्गा मैना तऽ हमरा पर हँसैत छलीह। उफँट सन भऽ गेलीह आ खेलतीह गुड़िया सॅ। हँ, दस वर्षक उम्र में हम औरत बनि गेलहुँ। तथापि कोनो कोन मे एखनहु नेनपन छल हम गुड़िया लऽ कऽ खेलाइत छलहुँ दाई मांक आनल जरीवला चोटि लगाकऽ खूब प्रसन्न होइत छलहुँ। आ दाई मां जे सतुआ। अनैत छलीह से तऽ ककरो पता लगिते नहिछलै। दाई मां चुपचाप नुकाकऽ खुआ दैत छलीह। -हम कहैत छलिए -‘दाई आर सत्तु दिअ ने।’ तऽ कहैत छलीह- ‘नहिबुच्ची एके दिन वेशी खा लेब तऽ खराबी करत, काल्हि पफेर देब।’ दाई मां क बेटी चमेलिया हमरे ओत आबि गेल छल मुदा ओ अलग रूम मे रहैत छल हमरा-सब संग नहि। ओकर बोखार उतरि गेल छलै। मुदा हमरा मां के शक होइत छलैन्हि कोनो-छुतहा रोग छै तैँ हमरा सबके ओकरा लग नहिजाय दैत छलीह। मुदा हम कहां मानऽ वाली छलहुँ। दाई मां हमरे कारण घर नहिजाइत छलीह तऽ चमेलिया केँ अहिठाम लऽ अयलीह। तैँ हम दाई मांक संग चमेलियाक कोठरी मे- जाइत छलहुँ। मां-बेटीक बात सुनैत छलहुँ। वेशी काल चमेलिया मां के देखि कनैते रहैत छल। हमरा ओकर कानब नहिनीक लागय। हं, चमेलिया कपड़ाक खूब सुन्दर गुड़िया बनबैत छल। पुरान उज्जर कपड़ा लऽक मूँह-बनबैत छल पफेर ओइ मे एइया भरैत छल। -कारी सूत सॅ ऑखि बनाबए लाल सूत सॅ डोर आ बिन्दी बनबैत छल। मुँह के धड़ बनाबय रूई ठुसि ठुसि कऽ छाती बनाबय पैर बनबय तऽ दाई मां के देखाकऽ पूछैत छलै- ‘देख तऽ माय ठीक बनल की नहि?’ जखन कखनौ चमेलिया जोर सॅ हँसैत छलै तऽ दाई मां डँटैत छलथिन- ‘एना जोर-जोर सॅ-कियेक हँसैत छेँ। आराम करऽ नहित पफेर बिमार पड़बे तऽ हम कतौके नहिरहब!’ हम अपन गुड़िया लऽ कऽ नीचाँ खेलऽ गेलहुँ। हमरा देखलक गुड़िया नेने तऽ सराज अपन वॉकी-टॉकी विलायती गुड़िया लऽ कऽ आयल। नीलू अपन बेबी डॉल अनलक जकरा हाथ मे एकटा शीशी छलै। नीलूक गुड़िया जखन शीशी सॅ पानि पीबैत छलै तऽ पेशाब करै आ सब हँसैत छलै। ई दूनू गुड़िया बाबूजीक मित्रा इतालवी अनने छलै। ओ देखने छल हमरा आ सरोज केँ मुदा जहिया ओ-गुड़िया लऽ कऽ आयल तहिया नीलू नानी घर सॅ आबि गेल छल। तऽ मां बेबी डॉल नीलू केँ देलथिन आ वॉकी-टॉकी सरोजझपटि लेलकै। मां कहियो देलथिन दूनू बहिन मिल कऽ खेला तखन हम दाई मां के कोरा मे बैसकऽ बड्ड कनलहुँ। खैर, आब हमरा नव-नव गुड़िया बना कऽ देबऽ कहलक- ‘हम कालीमाय के किरिया खा कऽ कहैत छी- ‘अहाँ के छोड़ि हम ककरो गुड़िया बना कऽ नहिदेबै।’ एक दिन चमेलियाक बनायल गुड़िया लऽ कऽ हम दाई मांक संग हुनकर संगी खेदरबाक माय के घर गेलहुँ। हमर गुड़िया देख कऽ खेदरबा बड्ड खुश भेल। ओ हमरा कहलक हम दूनू गोटे गुड़ियाक ब्याह करब। आब कहबै चमेलिया के कनि नम्हर गुड़िया बनाबए आ ओकरा घाघरा पहिरा देतै। -हमरा मोन पड़ल सल्लो दीदी ब्याह से घाघरा पहिरने छलीह। आ मां क भारी भरकम घाघरा त चर्चे नहि। ओइ मे असली मोती टांकल छलै। मां के बड़का-बड़का बक्सा मे कतेको रंग-बिरंगक पोशाक छलैन्हि। भारी-भरकम जरदोजीक काज कयल घाघरा, ओढ़नी असली जरीक काज कयल बनारसी साड़ी। मुदा मां केँ भारी साड़ी नहिसोहाइत छलैन्हि। कहियोकाल अपन अतीतक चिट्ठा लऽ कऽ सल्लो दीदी संग बतिआइत छलीह आरे ओ जमाना छलै भारी-भरकम घाघरा पहिरू, बोग्ला बान्हू बड़की टाक ओढ़नी ओढ़न्न्। हाथ मे चूड़ा, पैर मे पायल। हमर दादरी तेहन वेष बना दैत छलीह जे की कहियौ। आ भोरे चारिए बजे उठि कऽ दादी आ तोहर काकी जॉत पर बैस जाइत छलथुन ऑटा पीसऽ। जॉत पिसकाल जॅतसार गीतो गाबथि। नानी कहियो घाघरा नहिपहिरैत छलीह। मां क नैहर मे सब रंगरेजक रांगल ढाकाक महीन मलमल क सारी कढ़ाई कयल पहिरैत छलैन्हि। लम्बा कुरता जकॉ ब्लाउज। तैँ मां के घाघरा पफूहड़ ड्रेस बुझाइत छलैन्हि। हं, कड़की मे मां अपना एक-एक घाघरा सॅ दस-दस किलो चॉदी-निकालि कऽ ओकर थारी, बाटी गिलास बनबाकऽ बड़की दीदीक बेटीक ब्याह मे पठौने छलथिन। हं, तऽ हम चमेलिया के कहलिऐ- एकटा खूब सुन्दर आ नमहर गुड़िया बना दे ओकरा घाघरा पहिरा दिहे। ठारह भऽ सकय से ध्यान रखिह नहितऽ ‘वर’ गला मे वरमाला कोना पहिरेतै।’ चमेलिया के ई सुनि कऽ छगुन्ता भऽ गेलै। ढारह होमऽ वला गुड़िया कोना बनाओत। ओना सरोज आ नीलूक गुड़िया तऽ चलितो छै मुदा ओ विलायती गुड़िया छै। -तऽ की देसी गुड़िया ब्याह मे वरमाल काल ठाढ़ नहिभऽ सकै’छ? दुनियाँ भरिके उत्कंठा हमरा आवाज मे छल। पफेर हम चमेलिया केँ कहलिऐ- ‘सुनै छेँ हम अपन गुड़ियाक ब्याह खेदरबाक गुड्डा सॅ पक्का कयलहुँ अछि एहि शिवराति केँ ब्याह हेतै।’ चमेलिया मूँह मे ऑचर धऽ हँसैत बाजल- उफ खेदरबा बहु केँ ब्याह मे चढ़ायत की? ओकरा त एकटा चौअन्नी टा नहिछै।’ -‘हं चमेलिया, इ त हम सोचबे नहिकयलहुँ! आब कोन उपाय करू? एक बेर हं, कहिकऽ आब नहिकोना कहबै?’ ‘अच्छा छोड़ऽ जेहन गुड़ियाक भाग।’ -‘तऽ गुड़िया बनि जयतै ने?’ ‘हँ, अइ शर्त पर जे अहां बेर-बेर उफपर नहिआउ हमरा समय भेंटत त नीक गुड़िया बनत।’ -‘किये चमेलिया हम कोनो तोरा तंग करैत छिऔ?’ -‘नहिसे बात नहिछै। असल मे हमरा धूत वला बिमारी अछि जॅ अहाँ पटि जायत तऽ अहूँ बिमार पड़ि जायब।’ -‘धूतहा रोग छौ तोरा?’ पफेर मोन पड़ल सत्ते कहैत अछि। राधा मां के कहैत छलैन्हि चमेलियाक बर्त्तन अलग रखबाउ। ई सुनि हमार दाई मां बड़ी काल धरि कनैत रहलीह। चमेलिया सत्ते गुड़िया बना देलक। जरीक घाघरा चोली पहिरने घोघ तनने गुड़िया ठाढ़ छल। बड्ड सुन्दर लगैत छल देखऽ मे गुड़िया। पातर डॉर- ताहि मे मोतीक डरकस। अपूर्व! हम चमेलियाक पकड़ि हुलसैत कहलिऐ- ‘सत्ते चमेलिया तू- बड्ड गुणमंती छेँ।’ -‘चमेलिया तोरा कतेक बेर कहलियौ बात किये ने बुझैत छेँ? पफेर दाई मां हमरा दिस तकैत बजलीह- बुच्ची चमेलियाक संग एना सटल रह छी आ बहुरानीक कान मे ई बात पड़तैन्हि तऽ हमरा कतेक गंज्जन करतीह? -दाई मां हम जाइत छी- खेदरबा के कहऽ ओ अपन गुड्डा के लऽ एतै।’ हम, चमेलिया आ दाई मां छतवला कोठरी मे बैसल बतिआइत छलहुँ दोपहर छलै तीन बजैत हेतै। ‘दाई मां हम खेदरबा के खाय लेल की देबै?’ ‘बुच्ची, सतुआ छै ने।’ हम दाई मांक हाथ धयने सीढ़ी सँ उतरलहुँ। सड़क पार क खेदरबाक माय लग पहुँचलहुँ। दाई मां ओकरा संग बतिआय लागल। खेदरबा गुल्ली-डंडा खेलाइत छलै’ हम शोर पाड़लिऐ। खेदरबा दौड़ल आयल। हम पूछलिऐ ‘तू अपना-गुड्डाक ब्याह हमरा गुड़िया से करबें?’ खेदरबा केँ एकटा विलायती प्लास्टिक गुड्डा छलै कता कूड़ा मे भेँटल छलै। खेदरबा खुश भऽ बाजल, हं हम अपना गुड्डाक ब्याहकरब। कहकहिया?’ ‘एखने।’ दाई मां चलू। -‘ए बुच्ची कनि सांस लेबऽ दिअ।’ दाई मां पफेर बतियान मे लीन भऽ गेलीह। खेदरबाक मां हुनका हाथ मे हुक्का धरा देलकैन्हि। हम खेदरबा के कहलिऐ- ‘चल हमरा गुड़िया के देखऽ।’ खेदरबा हमरा संग आयल। पैर दाबि नहुँ-नहुँ सीढ़ी-पर चढ़लहुँ। गुड़िया ओहिना सजल-धजल ठाढ़ छल खेदरबा मुग्ध भऽ ओकरा देखते रहि गेल। ‘बहुत सुन्दर दै गुड़िया एकरा हम बढ़ियॉ सॅ रखबै’ खेदरबा बाजल। ताबत आबि गेल बुल्ली। बुल्ली के देखते हम गुड़िया के अपना कोरा मे नुका लेलहुँ। -ओ जिद्द करऽ लागल देखा की छै हमरा देखा दे...बुल्ली के छीनाझपटी करैत देख चमेलिया कहलक प्रिया, देखा दिऔ ने बराती लेल तऽ लोक चाहीने। ताबत सरोज आ नीलू दूने पहुँचल। -‘केहन सुन्दर गुड़िया छै अरे ई त ठाढ़ भऽ जाइ छै वाह!’ कहैत गुड़ियाक घाघरा उठा कऽ देखऽ लागल। हम चिचिएलहुँ छोड़ हमरा गुड़िया के तू सभ केहन बेशरम छे?’ मुदा हमर बात के सुनैत। नीलू चहकल-देखही-सरोज ई गुड़ियाक बांसक खपच्चीक पैर बनल छै। तीनू मिल कऽ गुड़िया लऽ हँसैत नारा लगाबऽ लागल प्रियाक गुड़िया क जय, जय। हम कनैत नीचॉ मे ओंघराए लगलहुँ। खेदरबा भागि गेल छल। सरोज, नीलू आ बुल्लीक संग-संग अइ जुलूस मे सांझिकऽ खेलऽ वला आर धिया-पुता सामिल भऽ गेलै। सब मिलकऽ गुड़ियाक तहस-नहस करऽ लागल बांसक खपची निकालि देलकै आ जोर जोर सॅ नारा लगौलक प्रियाक बच्ची, बॉसक खपच्ची...तकरबाद घरक पैघ लोक ताना मारनाइ शुरू कयल। दीदी मां के कहलथिन: मां प्रियाक ब्याह खेदरबा सॅ कऽ दही भरि दिन गोइठा ठोकैत रहतै।’ शायद ई गप्प बाबूजी सुनि गेलथिन। हरिया के पूछलथिन त ओ सभटा वृतांत जतबा ओ जनैत छल कहल कैन्हि। बाबूजीक पफरमान जारी भेल- ‘हरिया चमेलियाक मां के कहि दही प्रिया के अपना संग जतऽ ततऽ नहिलऽ जाई। ओइ राति ढाई मां आ हम दूनू बड्ड कनलहुँ। हम हुनकर नोर पोछैत छलहुँ आ ओ हमर। हुचुकैत दाई मां बजलहि- ‘बुच्ची गरीबी सब से बड़का अभिशाप छै।’ हं, दाई मां, आब हम कहिओ गुड़ियाक ब्याहक चर्चा नहिकरब। बहुत दिन धरि छोटका भैया आ दीदी सब हमरा खेदरबाक नामलऽ खौंझबैत छल। खेदरबा गोइठा ठोकऽ बाली गरीब महिलाक बेटा छलै आ हम महल मे रहऽ बाली बड़का घरक बेटी! मुदा बड़का घर क बेट रहितहुँ हमरा लग कहाँ विलायती वॉकी-टॉकी गुड़िया छल। ककरा हमरा सुधि छलै जे हमरा लेल खेलौना किनैत! हमरा तऽ दाई मां क- गेठरी मे भेँटैत छल खेलौना। चमेलिया बनाकऽ दैत छल गुड़िया। ओकर बाद तऽ हम गुड़िया खेलनाईए बिसरी गेलहुँ। हम जखन सरोज अ नीलूक गुड़िया देखैत छलहुँ तखन मोन कानि जाए। दाई मां पफेर कहियो हमरा खेदरबाक घर नहिलऽ गेलीह। दाई मां हमर दुःख बुझैत छलीह मुदा ओ की कऽ सकैत छलीह। किधु दिनक बाद सॅ बाबूजी विदा भऽ गेलाह। एकटा एहन समय आयल जहिया हमरा दाई मां आ अपन स्तरक बीचक दूरीक पता चलल। इ हो-बुझबा मे आयल जे दाई मां आ हमरा मां क संस्कार आ तौर तरीका मे जमीन आसमानक पफर्क छै। हमर मनक बहुत प्रश्न अनुत्तरित छल ककरो लग जकर उत्तर नहिछलै। आब हम पैघ भऽ गेल छलहुँ बी.ए. पास भऽ गेलहुँ। दाई मां के ऑखि मे मोतिया बिंद पाकि गेलैन्हि, डॉर झुकि गेलैन्हि। आब कोनो काज कयल-नहिहोइत छलैन्हि। कोनो ने कोनो दाई नौकर हुनका खिसियबैत रहैत छैन्हि आ ओ गारि पढ़ैत रहै छथिन। हुनका बैसऽ उठऽ मे कष्ट छलेन्हि केहियो ठेहुना में दर्द होइत छलैन्हि कहियो डॉर मे दर्द। एक-एक कऽ सभटा दॉत टूटि गेल छलैन्हि। आब दाई मे दालि मे रोटी गुरिकऽ खाइत छलीह। मां बिना किछु कहने-सुनने अपना काजक वास्ते कृष्णाकेँ राखि लेने छलीह। कृष्णा एखन जवान छल चारि लोकक काज एसगर करऽ वाली खूब रिष्ट पुष्ट। कोनो ने कोनो बात पर मां केँ दाई मां सँ रोज झगड़ा होइत छौन्हि। दाई मां हमरा कॉलेज सॅ घुरैत काल-नीचॉ गेट पर बैसल रहैत छथि। हुनका अगल-बगल दरबान, ड्राइबर, बगल मे काज करऽ बाली दाई सभक जमघट लागतल रहैत छै। दाई माँ बिड़ी पीबैत बड़बड़ाइत रहैत छथि-अरे जाबत मालिक छलाह ताबत गरीब-गुरबाक ख्याल रखैत छलाह ओ मनुष्य नहि देवात छलाह। हुनकर परतर के करत। आब ने ओ राजा ने ओ कराह। हमरा देखिलेते हुलसिकऽ कहैत छलीह। अरे, आबि गेल हमर बेटी। हिनके मुँह देखिकऽ एतऽ छी नहितऽ एत कियेेक रहितहुँ। हम अनायासअपना के अपराध्ी बुझैत छलहुँ। दाई मांक भविष्य एकदम अन्ध्कारमय लगैत छल। शायद आई पफेर मां दाईमां मे कहासुनी भेल हेतैन्हि। आब हम नेना नहिछी मां क दर्द बुक्षऽ लागलहुँ आछि। जेहन छथि जे छथि हमर जननी। जँ मां हिम्मतवाली नहिरहितथि तऽ काका सभत तऽ कहिया ने घर के बर्बाद कयने रहताह। एक दिन संवेदना छल निःस्वार्थ स्नेह दोसर हिस परिवारक प्रतिष्ठा उवा अन-बान शानक रक्षा लेल मां संघर्षशील छलीह। मां के कोन सुख भेटँलैन्हि? एक-एक पाइ जोडिृकऽ परिवार चलौलनि चारि-चारिटा बेटीक ब्याह कयलनि। की हुनका नहिबुझल छलैन्हि भैयाक चालि-चलन, हुनकर रईसी? ओ सब जनैत छलथिन मुदा विवश छलीह-किछु कऽ नहिसकैत छलीह। सदतिकाल बजैत छलीह आमदनि थोड़ खरचा अनन्त। एकबेर हम कहने छलिऐन्ह- मां, एतेक नौकर चाकर के रखबाक कोन जरूरी छै-समटा पाई तऽ एकरे सभ पर बुका जाइत छै ........ तऽ कहने छलीह-सबसे पहिने तू अपना दाई मां के गाँवा पठा। अपने जे खाय- पीबए तहि लेल कोनो मनाहीनहिछै मुदा भोज-भंडारा करत से नहिचलऽ बाला छै। रोज एकरा गाम से क्यों ने क्यों अबिते रहैत छै। एखने एक डेकची में भरिकऽ नीबूक शर्बत बना कऽ नेनेजाइत छल टोकलिऐ जे एतेक शर्बत की हैतै तऽ डेगची पटकि कऽ भागि गेल। की सभ ने बाजल ........... हमर मेहमान आयत तऽ ओकर खाय-पीअऽ लेल नहिदेबई ? भाभीजी कहलनि-‘बौआ, आई दुपहरे सें नीचे में बैसल अछि जखन से मां टोकलथिन। पूरा मोहल्लाक दाई-नौकर घेरने रहै छै ओ समक लीडर अछि। ओकरा अहीं बजा कऽ आनु’ सब जनै छै-हमरे बजौने ओ उफपर आयत। आई दाई मांक मन बउ्ड व्यथित छलै। बड़ी कालध्रि कनैत रहलीह। आब हमरा हुनकर कानब -रवीजव बर्दास्त नहिहोइत अछि। घर में अेहिना हरदम तनाव बनल रहैत छै। बड़की भाभी बहुत दिन से बीमार छथिन। मां पानि जकॉ पाई बहा रहल छथि काल्हि क्यों कहैनहिजे ठीक से इलाज नहिभेलै। भाभी सात बरसक बेटाक निहारैत डाक्टर से पूछलथिन ‘हम स्वस्थ भऽ सकै छी डाक्टर साहेब? मां हुनकर बात सुनि अपना रूम मे जा कऽ कानऽ लगलीह। बाबूजी गेलाक बाद अब कनि रास्ता पर ससरल छल परिवारक गाड़ी। सोचैत छलीह मां अब कहुना सरोजक ब्याह कऽ लेब। आ अब ई आपफत बेटाक घर उजड़ि रहल छैन्हि। हम ओई राति दाई मां से बात कयलहुँ। ‘ए बुच्ची हम तऽ आहींक मुँह देखिकऽ छी-अइ घर मे। हम तऽ कहिया ने चलि गेल रहितहुँ अपना गाम। अइबेर तऽ हमरा छेदी कहलक तोहर बेटा आब कमाइत छौ। मुदा बुच्ची अहाँ तऽ हमर जिम्मेदारी छी। अहांक बयाह भऽ जाए तऽ हम बूक्षब गंगा नहा लेलहुँ। दाई मां उफहाँ कान खोलिकऽ सुनि लिअ-‘हम एखन ब्याह नाहिकरब। आ अहाँके आब काज कयल नहिहोइछ। आब क्यों अहां संग नीक बात व्यवहार नहिकरैछ।’ ‘मुदा हम उफहाँके छेड़िकऽ कोना जाउ? राक्षस ..........?’ ‘दाई मां अहाँ चिन्ता नहिकरू। अब भैया हमरा संग किछ नहिकऽ सकैछ।’ ‘से कोना बुक्षैत छिऐ........?’ ‘हम कड़ा चेतावानी दऽ देलिऐ।’ ‘अरे आब ध्मकी देला सँ की। औरत के जिनगी जँ एकबेर बरबाह भेल तऽ सब खतम।’ ‘दाई मां अहाँ कोन युग के बात कऽ रहल छी?’ ‘तऽ अइ युग मेें की होइ छै अहांक अंग्रजीक किताब मे की लिखल अछि।’ ‘दाई मां हम अहाँ के कोना बुक्षाउ। अच ई कइने जे अहाँ नोकरी नहिकरितहुँ तऽ बाल- बचाक कोन हाल होइत सबसे पहिने औरत के अपना पैर पर ठाढ़ होमऽ चाही ’ स्वावलखन ब्याह से बेशी जरूरी छै।’ अरे हम कोनो खुशी से नौकरी कयलहुँ। आई अहाँँक बाबूजी रहितथि तऽ कहिया ने अहांक ब्याह मेल रहैत। एखन ध्रि तऽ हम नातिक मुँह देखने रहितहुँ!’ दाई मां के समक्षेनाई असम्भव छल। बहस से कोना पफायदा नाहितखन हम एकटा काज कयजहुँ अपना पाकेट मनी से किछु टका हुनका दऽ हैत छलिऐन्हि ई कहि जे अहाँक मेहमान आबय या ध्रक लोक तऽ बाजार सँ मंगाकऽ नास्ता भोजन करा देबई। ककरोसे बकझक नाहिकरब। परीक्षाक बाद भेल गर्मी छुटीð। हमरा छुटीðक समय हरदम बोझिल लगैत छल। एक दिनक छुटीð रवियों के तनाव बढ़ि जाइत अछि। छुटीðक दिन मांक सखती बढ़ि जाइत छैन्हि। दीदी के हुकूम सुना दैत छथिन-टूनू धैड़ी के काज ध्ंध सिखा।’ ई गप्प स्कूले दिन से सुनि रहल छी। काज-ध्ंधक मतलब चाइर दालि बीछनाई राई जमाइन, जोर मरीच ध्नि सभके सापफ कऽ सुखाउ। मां आरामकुर्सी पर बैसैत छलीह आ हुनका सोझा में हम, सरोज, दूनू भाभी आ दीदी काज करैत छलहुँ। मां कोन माटिक बनल छलीह से नहिजानि। पता नहिकोन शाप-पाप के ढ़ो रहल छलीह। आइ एतेक समय बीतलो पर सचाई सँ ऑखि मुनब कठिन लगै’छ। असल मे हम मां क स्वरचित नरक केँ ह कहियो स्वीकारि नहिपयलहुँ। एकबेर जाड़ मे बहुत सर्दी पड़ल छलै मां एक सौ कम्बल मंगा कऽ गरीब के बॅटलनि आ हुकूम भेल‘ हम सभ बाजि-कस्तुरी देवीक जय।’ ‘बाज जोर सँ बाज। ए लछमनियॉ, हरिया, सीताराम एकरा सभकेँ कहियै हम जगदम्बाक अवतार छी। हमर बाल-बच््या हमर पूजा करैत अछि।’ मन मे भेल कहबाक जे मां अहां ई नाटक छोड़ू प्लीज देवि जुनि बनू। साधारण लोक जकॉ व्यवहार करू। कहियो काल कतहु जाउ घूमू पिफरू।’ मुदा से कहाँ बाजि भेल। एक-एक कऽ मानवीय प्यार-व्यवहारक समस्त द्वार ओ बंद कऽ लेलैन्हि। ओ कखनौ नीचाँ मे नहिबैसैत छलीह। हुनक कहब छलैन्हि डाक्टर नीक सॅ हार्नियॉक आपरेशन नहिकयलक पैर क एकटा नस कटि गेल अछि। हलांकि डाú एú केú सेन अइ बात केँ नहिस्वीकारैत छलाह। ओ कतहु जाइतो छलीह तऽ गाड़ीक डिक्की मे हुनकर कुर्सी जाइत छलैन्हि। दू टा नौकर हुनका बड़का पीढ़ि पर बैसाकऽ उतारैत छलैन्ह। एकटा आया आ दूनू भाभी मे क्यो एकटा संग जाइत छलथिन। ओना तऽ ओ कहियो कतहु जाइते नहिछलीह कोनोकाज परोजन मे नैहर या दीदीक सासुर काका-काकीक घर तऽ एनाइ जेनाइ बंदे भऽ गेलै छल। हं ज कोनो घर मे पेरशानी होइ या क्यो बीमार पड़ैत छलैतऽ हुनका बड़ड पफुर्ती भऽ जाइत छलैन्हि। अपना देहोक होश नहिरहैत छैन्हि। मुदा सब भऽ गेलाक बाद अपना ढगयबाक हताश भाव मन मस्तिष्क केँ जकड़ि लैत छैन्हि। स्वार्थी लोकक चलाकी सॅ मर्माहत भऽ जाइत छथि। हुनकर इ मनोभाव दिनोदिन मुखर भेल जाइत छैन्हि दीदी यो सब बुझि गेलथिन। मां दुःखी छलीह अपन सन्तानक स्वार्थी स्वभाव सॅ, आपसी होड़, जलन आ ईर्ष्या सँ दुखी छलीह घरक सम्पत्ति पर बड़का भैयाक कब्जा सॅ। एक दिन कॉलेज सॅ घुुरलहुॅ तऽ देखलिए छोटकी भाभी मांके उजरा सारीक रफ्रपफू करैत छलीह। हमरा मुॅह सॅ बहरायल ‘भाभी अहाँ कियेक एतेक मेहनत करैत छी। दाई मां अपने सीब लेतै।’ भाभी गुम्मे छलीह मां हमर बात सुनिते लोहदिकऽ बजलीह ‘सौ-सौ रूपयाक ढ़ाकाक महीन साड़ी तोरा दाई मां के दऽ दिछि। पाइ कतौ गाछ मे पफड़ैत छै? पफाटल छैतऽ की हेतै हम रातिकऽ पहिरब।’ हमर आत्मा कुहड़ि उठल-हमर मां जे कहियो पुरान नहिपहिरैत छलीह से आब पफाटल साड़ी सीब कऽ पहिरतीह! काल्हिए बड़का भैया आ भाभी प्लैन सॅ दिल्ली गेलाह! मास दिन पहिने सल्लो दीदी केँ सासुर जाइतकाल बक्सा भारि कऽ कपड़ा देलथिन। तखन कतऽ सॅ टका आयल छलै? मां के अपना लेल हरदम अभावे रहैत छैन्हि! आब घरक लेल कतेक आहुति देतीह? मुदा हमरा हिम्मत नहिभेल जे हुनका किछु कहबैनिह। हं मने-मन संकल्प कयलहँु आब अइ घर सॅ एको पाई नहिले। पेफर हमहूँ तऽ मां ए जकां तिलतिल अपन छोट-छोट सुख क गला घोंटैत रहलहुँ। पुरूष के प्रति देवत्व भाव, एक निष्ठ श्र(ा स्वीकार करैत रहलहुँ अछि। की बेटीक मन मे अचेतन मे मां क प्रतिछाया प्रतिष्ठित रहैत छैक? उम्र क संग-संग कतेक बेर जीवन मे छल प्रपंचक शिकार भेलहुँ स्वयं केँ दोषी पयलहुँ। व्यथा आ अन्तर्द्वन्द्वक क्षण मे अपना आचरण मे मां क व्यवहारक छवि देखलहुँ। हं, विशु( ममत्व छल दाई मां क निःस्वार्थ स्नेह। दाई मां सन महिला आब कतहु भेटँत? मां के तऽ अपन ठोस अहम के प्रति, अपन संतति के प्रति ममता आ त्याग छलैन्हि। मुदा दाई मां तऽ आनक बेटी के लेल व्याकुल रहैत छलीह सत्ते व्यवहार एहन उदार हृदय मन ककरा हेतै? दाई मां क ममता मे सत्ताक संग्राम नहिछलै। हुनकर निश्छल वात्सल्य मे कोनो अपेक्षा नहिछलै। मुदा तै की हमर इ कर्त्तव्य अछि जे हम स्वयं अपन मांक कपफन के कपड़ा सीबी की इएह सोहाद्र छै? जॅ से करब तऽ की अपन व्यत्तिफत्वक कमि नहिसूझत? ओ तऽ चौकठी पार कऽ तीनो डग कहियो नहिचललैन्हि आ हम तऽ तीन डेग मे दुनियॉ धॅगि लेबऽ क कल्पना करैत छी। हं, तऽ हम गर्मी क छुटीðक बात करैत छलहुॅ। छुटीðक दिन मे एकटा नव रूटीन बनैत छल भोर दस बजे सॅ सांझुक पांच बजे ध्रि केँ। की मजाल जे क्यो टस सॅ मस करतै। जाड़ मे स्वेटर बुनब, गर्मी के रेशम कर कढ़ाई सिलावय ऊपर से मां के आर्डर दस दिन मे बेडकवर बनि जयबाक चाही। एक दिन रूमाल तकियाक खोल। जँ रेशम ओझरा जाय वा आंगुर मे सुई गड़ि गेल त मां बड्ड पफझूति करैत छलीह-नहिजानि पढ़ाई मे कोना पफर्स्ट भऽ जाइछ। मन मे होमय जे इ रेशमे कर पफूल पात बनौनाइ आ पढ़ाई मे कोन सम्बंध्? कोनो तुक नहिबुझाइत छल मुदा प्रतिवाद करबाक साहस कहां? - सरोज महाध्ूर्त ! मन होइतऽ कढ़ाई करए नहितऽ पढ़ाईक बहाना बना उठि जाए। कखनहुँ जानि कए खॉसऽ लागए। मां के हरदम ओकरस्वास्थक चिन्ता रहैत छलैन्हि। जाड़ मास मे सर्दी खांसी घऽ लैत छलैतऽ परीक्षाक समय मे उल्टी होमऽ लगैत छलै। सब दिन ओकर स्वास्थ खराबे रहैत छलै। ठीक से भोजन करतै नहिछल। कहुना दू टा रोटी खाइत छल आ नीलू बस एकटा आ हम तीनटा रोटीक बाद कनि भातो खाइत छलहुँ। तैँ हमर देह-दशा ओकरा सभ सॅ नीक छल मुदा हमरा मां केँ हमर डिलडौल कहियो ने सोहाइत छलैन्हि। आ बड़की काकी तऽ खोध्-िखोधि। - कऽ पूछैत छलथिन- ‘बहिन प्रिया कतेक पैघ भऽ गेल हमरा विमलाक बतारि अछि मुदा क्यो कहैतै जे दूनू क जन्म एकहि मास मे भेल छलेै।’ आ एहि सभ सँ तंग भऽ हम जहिया दसमा मे पढ़ैत छलहुँ तहिए मां हमर ब्याह क बात मीराक भाई सॅ चलौने छलीह ओना ब्याहक चर्चा शुरू कयने छलथिन मीराक मां। हुनका हम पसिन्न छलिऐन्हि तैँ अपन मांझिल बेटा जे ताहि दिन ओकालत पढ़ैत छलैन्हि तकरा वास्ते हमर चयन कयने छलीह पफेर की भेलै की नहि बात आगां नहिबढ़ैलै। तकर बाद मां क हमरा प्रति व्यवहार आर कठोर भऽ गेल छलैन्हि भाई - बहिन के नजरि मे तऽ हम कुरूपे छलहुँ। मंा बजैत छलीह- ‘सरोज के तऽ क्यो रीजेक्ट नहिकरैत- मुदा प्रियाक ब्याह कोना हेतै’? हमरा मन में विद्रोहक भाव बढ़ऽ लागल नहिहेत ब्याह नहिहोऽ हमरा ब्याह करबाक इच्छो नहिअछि। दाई मां के छोड़ि सभक प्रति उपेक्षा अवज्ञा बढ़ैत रहल। घरक लोक सॅ वेशी अपनत्व बाहरी लोक सॅ भेँटैत छल। मां क स्थान स्कूलक प्रधनअध्यापिका लेलैन्हि। हमर किशोर मन आब जीवनक अभाव केर पूर्ति कल्पना सँ करैत छल। स्नेही मांक कल्पना करैत छलहुँ। कल्पना मे कोनो भाई बहिन लेल जागह नहिछलै हम एसगरे छलहुँआ संग छलीह हमर दाई मां। - मुदा बहुत जल्दी हमरा एहि काल्पनिक संसारक सीमाक बोध् भऽ गेल। हम बुझ लगलहुँ जे जिनगी कल्पनाक सहारा सॅ नहिचलि सकै’छ। बहुत तरहक झंझटि छल जाहि मे हम ओझरायल छलहुँ। लाइब्रेरी सॅ सप्ताह मे एकहिटा किताब लऽ सकैत छलहुँ, हमर भूख बढ़िते जाइत छल। क्लास मे पाँच छह टा संगीक ग्रूप छल जे अपने पढ़ए वा नहिहमर चूनल किताब ओ सभ अपना नाम पर इसू करबा लैत छल। बस हम अपन किताबक दुनियाँ मे मगन रहैत छलहुँ ने मां क झिड़की ने भैयाक खौपफ। शरतचन्द्रक पारोक घुटन एन कोन काजक पागलपन। ओ प्रेमचंदक जालपा? जे गहना लेल पति केँ चोरि करबा लेल विवश कयल? मुदा र्ध्मवीर भारतीक गुनाहों का देवता’ पढ़ि हम बहुत दिन ध्रि कनैत रहलहुँ। हमरा मन मे स्वस्थ सहज प्रेमक कल्पना कहियो नहिभेल। हमर दिवास्वप्न नायक सतत् व्यथित दुखी शोषित वा जीवन सॅ उदासीन आ हम छलहुँ ओकर अभावक पूर्ति करऽ बाली। की पढ़बाक चाही आ की नहिसे कहियो नहिसोचलहुँ। श्लील-अश्लील जे भेँटए पढ़ैत छलहुँ। घर मे पढ़वला कुर्सी मेज पर बैसिकऽ कोर्सक किताब के बीच मे उपन्यास राखि कऽ पढ़ैत छलहुँतऽ क्यो बुझितो नहिछल। दोसर बात इ जे हमर चिन्ता ककरा छलै। जखन प्रेसीडेंसी कालेज मे गेलहुँ तऽ चारू भर किताबे-किताब छल। हमरा घर मे दू टा वर्ग छलै-एकटा शोषण करऽ वला सदस्यक वर्ग जकरा हाथ मे तिजोरीक चाबी छलै। ओकरा सभकेँ जौ कनि सर्दियो होइतऽ डाक्टर गंगुलिए नहिसौ टका पफीस लेब बला डाक्टर नलिनीरंजन दताक केँ बजाओल जाइत छलै। हुनका सभके घरऽक सब वस्तु पर अध्किार छलैन्हि। अइ दल मे छलीह-मां बड़का भैया, बड़की भाभी आ नान्हिटा चारि-पाँच वर्षक हुनकर बेटा, सल्लो दीदी, डाक्टरी पढ़ऽबाली सरोज। दलित वर्ग मे छलहुँ हम, छोटका भैया जे कोनो समझौता करबा लेल कखनहुँ तैयार नहिछलाह आ हमर छोटकी भाभी जे सदतिकाल मांक सेवा मे जुटल रहैत छलीह। बड्ड मध्ुर वाणी सबसॅ स्नेह सित्तफ व्यवहार जेठजीक हर बात के माथ झुका-स्वीकार कर वाली। जे व्यापारक आमदनी होइत छै आ किरायाक पाइ अबैत छै सब बड़के भैयाक हाथ मे जाइत छैन्हि। हाथ उठा कऽ ओ जकरा देथिन। पिताक सम्पत्तिक दूनू भाई बराबर के वारिस मुदा छोटका भैयाक हाथ मे एकटा पाइ नहि। मां कहैत छलथिन बड़का भैया केँ-‘अरे, आब घर-गृहस्थी वला भेलै एकरा अपना संग आपिफस ल जाहीं तोरा संग-संग रहतै तऽ काज ध्ंध सिखतै’ मां के कहला पर भैया छोटका भैयाकेँ घर सॅ ल जाइत छलथिन मुदा किछ दूर गेला पर मेट्रो सिनेमा हाल लग सिनेमाक टिकट हाथ मे दऽ कहैत छलथिन-‘जो सिनेमा देख।’ भैया व्यथिन भऽ घर घुरि अबैत छलाह। सांझि मे बड़का भैया घर अबिते मां केँ कहैत छलथिन। - ‘की करू मां किछ ने पफुराइत अछि।’ अहांक कहला पर हम लऽ गेलिऐ ऑपिफस। ओतऽ सँ कहलिऐ पफाइल लऽ कऽ इन्कमटैक्स ऑपिफस जयबा लेल तऽ चलि गेल सिनेमा देखऽ। एतबा सुनिते मां आगि बबुला भऽ जाइत छलीह। ‘कहाँ छै अजैया, आ इम्हर। खेऽ लेल अढ़ाई सेर चाही दू बेटाक बाप भऽ गेलेँ आ एक पाई कमाबऽ के लूरि नहि। लक्ष्मी सन पत्नीक जीवन बरबादकऽ देलकै।’ छोटका भैया बरांडा मे बैसल चुपचाप सब सुनैत छलाह कोनो प्रतिवाद नहि। बजैत-बजैत मां चुप्प भऽ जाइत छलीह तखन जरला पर नून छीटऽ लेल पहुँचैत छलीह बड़की भौजी। मां जो, अहॉ कियेक चिन्ता करैत छी समय अयला पर छोटका बौआ अपने सुध्रि जेथिन। एतेक क्रो( करब तऽ अहॉक बल्डप्रेशर बढ़ि जायत। बस मांक आहि अलम शुरू भऽ जाइत छल । छोटकी भौजी के ऑखि सॅ दहो-बहो नीर घुबैत छलैन्हि भैया मांक बात सुनि कऽ झट नीर पोछि पहुँच जाइत छलाह मांक सेवा मे। ‘मां कोन दवाई दिअ।’ ‘कोरामिन दऽ दिअ रानी! हार्ट ....।’ सत्तो बात बजबाक साहस नहिछलैन्हि छोटकी भाभी केॅ। बेचारी निरीह जकां सभक बात सहैत छलीह नैहरो तेहन नहिछलैन्हि जे तकर गुमान होइतैन्हि ओना कहबा लेलतऽ राज परिवारक बेटी छलीह कहियो राजसी ठाठ छलैन्हि मुदा आब तऽ भोजनो पर आपफत छलै। छह बहिनक ब्याह करोड़पतिक घर मे भेल छलैन्हि ताहि दिन एहन विपन्न नहिछलाह। हिनकर सम्बंध् हमर मसिऔत भाई करौने छलथिन। कहने छलथिन ‘पीसी, लड़की हजारो मे एक छै। दिल्लीक लेडी डरविन कॉलेज सॅ आईú एú पास छै। संगीत मे ग्रेजुएट, संस्कृत मे विशारद् घरकलुरि-व्यवहार मे कुशल। नाम छै सविता।’ तखन मां, बड़का भैया केँ लड़की देखऽ पठौने छलथिन। हुनका पसिन्न पड़लैन्हि तुरत चारि टा गिन्नी हाथ पर घऽ शगुन दऽ देलथिन। क्यो छोटका भैया सॅ किछ पूछबाक जरूरत नहिबुझलकैं। सल्लो दीदी कहबो कयलथिन्ह जे एकबेर अजय के लड़की देख लेब चाही’-की देखतै पफोटो तऽ आयले छै आ विजय देखिए लेलकै। एक दिन रूम मे बैसल भैया कपसि-कपसिकऽ कनैत छलाह। मूक गाय जकाँ भाभी अहुरिया कटैत छलीह। एकाएक भैया उठलाह पैर में चप्पल पहिर बाहर चलि गेलाह। मां हॉले मे कुर्सी पर बैसल छलीह पूछलथिन-‘अजय कतऽ जाइ छेँ’? ‘काज करऽ।’ ‘हॅ, खूब काज करबें!’ मांक ओल सन बोल सुनि ओ विदा भेलाह। जखन चारि बजे सांझि ध्रि नहिघुरलाह तऽ सभ के चिन्ता भेलै। खोज शुरू भेल। छोटकी भाभी के कनैत्-कनैत ऑखि लाल भऽ गेल छलैन्हि हम कहलिएन्ह मां के-‘मां आइ भोर में भौयाके कनैत देखने छलिऐन्ह। बड़का भैया घर अयलाह तऽ मां क कानब खीझब चालू भऽ गेलैन्हि। ‘ए बौआ, ऊ कसाई हमरे दुःख देबऽ लेल जनमल अछि। बाबूजी गेलथुन से दुःख की कम छल जे ई हमरा आर व्यथा दऽरहल अछि। डर होइछ किछ भऽ जेतै तऽ एहन लक्ष्मी सन पुतौहु के कोना मुँह देखब?’ भैया पफोन कऽ पारिवारिक सालि सिटर सॅ राय-विचार लेलैन्हि। तखन मां के कहलथिन - ‘हम पुलिस स्टेशन जा कऽ पता लगबैत छी।’ भैया सीढ़ि पर उतैरते छलाह कि देखलथिन बड़का जीजाजी क संग छोटका भैया आबि रहल छलाह। मां एतबा काल मे अनगिन मनौती मानलैन्हि हनुमान-जी के सवामन केँ दाल-चूरमाक प्रसाद, राणीसती जी केँ चूड़ा-चूनरी क चढ़ावा आर नहिजानि कोन-कोन देवता-देवीक मनौती मान लैन्हि। आ छोटका भैया केँ देखते चिचिआ उठलीह - ‘चंडाल! कतऽ छलैंह एखन ध्रि। एक भोरे के गेल आब घर क सुध् िभैलौ।’ - छोटका भैया बिना किछु बजने अपना रूम मे चलि गेलाह। जीजा जी मां आ बड़का भैया केँ कहलथिन। - ‘अहाँ दूनू गोटे भीतर चलू-बात करबाक अछि।’ दू घंटा ध्रि मां, बड़का भैया आ जीजा जी नहि, जानि की-पफुसुर पफुसुर बतिआइत रहलाह’ पफेर खौंझायल जकॉ ध्ुरिकऽ चलि गेलाह एक कप चाहो नहिपी लैम्ह। हुनका जाइते घर मे भूकम्प मचि गेलै। मां बजलीह-‘अजैया! तोहर एहन हिम्मत जे तू बॉट-बखड़ाक बात करैत छेँ? जीजाजी केँ पंच बनाबऽ गेल छलैंह ।’ अपना हिस्साक बात करैत छेँ? मां अपना पैर सॅ चप्पल खोलि दोड़लीह छोटका भैया दिस।’ छोटकी भभी झट दऽ हुनकर पैर पर खसि पड़लीह-‘नहिमां जी एना जुनि करू।’ बड़का भैया अबिकऽ मांक हाथ पकड़ि बैसा देलथिन। छोटका भैया दिस गुम्हरैत बजलाह-इ एना नहिमानतै’ आब एकर इलाज हमरे करऽ पड़त।’ बाजू ने कोन इलाज करब? अहाँ की कमाईत छी से हमरा नहिबूझल अछि। हमर बाल बच््या एक टका क वस्तु लेल तरसैत रहैंछ। छोटका भैया के करेज पफाटि-गेलैन्ह! मां किछ कहऽ चाहैत हलथिन ताबत बड़का भैया बजलाह-‘तू बुझैत छठीं जे बॅटबाड़ा कयने बाबूजीक प्रतिष्ठा बढ़ि जयतैन्ह? इएह जीजाजी हमरा सॅ पफरक कऽ तोहर टका तोरा लग रहऽ देथुन?’ जीजाजी के दोष नहिदिऔ। हम नेना छीजे ओ हमरा सॅ टका लऽ लेता? दूनू भाइ आमने-सामने बजैत छलाह कि मां तड़ाक सॅ छौटका भैया गाल पर थापड़ मारलथिन-‘नालायक! हमरा कोखि केँ कलंकित कयलक।’ ‘मां जी.... मां जी! एना जुनि करूँ? अपना के सम्हारू!’ छोटकी भाभी अनुनय-विनय करैत छलथिन। मां ध्म्म सॅ कुर्सी पर बैसलीह-अचेत भऽ गेलीह। की भेलै मां के की भेलै? कहैत, भैया दौड़लाह। ‘जल्दी पफोन लगा डाú गांगुली केँ। ‘सविता, जल्दी सॅ कोरामीन लाउ। छोटकी भाभी तरबा रगड़ैत छलथिन। बड़की भाभी कोरामीन दऽ पंखा हौंकऽ लगलीह। बड़का भैया गरजलाह-‘आई जँ मां के किछ भेलै तऽ अजय केँ जान मारि देबै।’ छोटका भैया कनैत मां केँ पैर पकड़ि कहऽ लागलथिन। -‘मां मां हमरा मापफ कऽ दिअ। हमरा नहिचाही ध्न सम्पत्ति। नहिलेब अपन हिस्सा बखड़ा।’ नहिजानि कियेक अवाक् छलहुँ। कान मे बिना कोनो प्रतिक्रियाक एकहिटा बात गंुजि रहल छल-‘तू बूझैत छहीं बॅटबाड़ा सॅ स्वर्गीय बाबूजीक प्रतिष्ठा बढ़ैतन्हि? घर्र-घर्र-घर्र स्वर.......अरे इ तऽ सीलिंग पफैनक आवाज छैक। आ हमरा होइछ जे एतेक सालक बादो भैयाक कर्कश स्वर अइ हॉलक कोनो कोन सॅ आबि रहल छै। हं, तऽ मां क बेहोशी टूटलैन्हि। दूनू भाभी सहारा दऽ कऽ रूम मे पलंग पर सुता देलथिन। ताबत डाक्टर गांगुली आबि गेलाह। ‘डाक्टर बाबू, आइ तऽ बुझू हमर हार्ट पफेले भऽ जाइत। हमरा कोखि सॅ कंस जनम लेलक अछि। बड़का बेटा तऽ श्रवण कुमार अछि राति-राति भरि हमर सेवा करै’छ। -‘शोब ठी भऽ जायत। विजय बाबू के अजय के अपना संग काज करऽ लऽ जाय। अहॉ सभतऽ लड़काक काज-ध्ंध से पहिने शादी कऽ दैत छिऐ।’ की कहू डाक्टर साहेब हमर दियादनी सभ माथा खराब कयने छल। सदति काल एकहि गप्प अजय क ब्याह कहिया करबै? बूढ़ारी मे ब्याह देत? -‘अच्छा! आब बायॉ बायॉ करौट पफेरू। हं, कनि पेटिकोट ढ़ीला करू। एकटा सूई दैत छी आराम हेत। अहां कें नरबस ब्रेकडाउन भऽ गेल अछि।’ ‘हम तऽ एकदम बुझू डाउन भऽ गेलहुश् अछि जहिया सॅ साहेब गेलाह।’ ‘साहेब तऽ देवता छलाह। मां कालीक मोर्जी। सूई लगाबऽ से पहिनहिं मां-आह -ऊह करऽ लगलीह हुनकर ई पुरान आदत छैन्हि। डाक्टर गांगुली हॅसैत बजलाह-‘ओ मां हम तऽ एखन सूई लगेबहु ने कयलहुँ आ अहॉ आह-आह करैछी? मां चुप्प भऽ गेलही। मां के निन्न भऽ गेलेन्हि। छोटका भैया बिना खयने पीने चुपचाप हुनका अगल मे बैसल छलाह। छोटकी भाभी सेवा मे जुटल छलीह। मां के आदेशानुसार खास-खास व्यक्ति के पफोन कऽ देलथिन बड़की भाभी। सबसे पहिने अयलाह मामाजी। मां क प्रिय आदर्श पुरूष। खूब खुसुर-पफुसुर भेलैन्हि दूनू गोटे मे। पाछू पता चलल जे मामा मां के कहलथिन जावत बेटी सभक ब्याह नहिहोइछ ताबत घर के बान्हि के राखू। किन्नहु बॉट बखड़ा नहिहोमए। लोक के तऽ मजा अबैछै घर पफुटने मुदा ई सोलहो आना सच छै जे घर करोड़ोक से पफुटने चौअन्नीक भऽ जाइछ। मामा जी गेलाह। मां के ई बात बुझबामे कोनो भांगठ नाहिभेलैन्हि जे बड़का जमाय अजय केँ पक्षध्र छथि हुनके ई आगि लगाएल अछि। बस ओ किराया बला मकान बड़का भैया क नाम लिख देलथिन। बड़का भैया मां के सामने घर क पूजा घर मे जा भगवतीक सोझा आ स्वर्गीय पिताक पफोटो केँ साक्षी मानि शपथ खयलनि-जहिया मां कहतीह मकानक आध हिस्स अजय के दऽ देबै। मां मने-मन निश्चय कयलनि करिया नाम क दांत तोड़ब। ओ तऽ हम बेहोश भऽ गेलहुँ तयँ बात नहिबढ़लै अन्यथा अजय बहनोई सई पर कोर्टक दरवाजा खटखटबैत। तैँ मां बड़की दीदी केँ बजाकऽ बेटी जमाय दूनू कें बड्ड बात कहलथिन । तकरबाद कबुला कयने छलीह से हनुमान जीक सवा मन क दालि-चूरमा क प्रसाद चढ़ा सबकेँ बजाकऽ खूब महोत्सव मनौलनि। पफेर भादोक अमावस्या दिन खूब ध्ूमधम सॅ अढ़ाई हजारक चूड़ा-चूनड़ सती राणी के चढ़ाओल गेल। मारवाड़ी समाजमे सतीराणीक चढ़ाओल चूड़ा-चूनड़ सोहागिन ननदि आ बेटी के देल जाइत छै। तऽ बड़की दीदी सॅ मां नाराज छलीह तऽ चूनड़ सल्लो दीदी कें भंेटलनि। सल्लो दीदी पन्द्रह वर्ष क बाद जखन बेटी ब्याह मे ओ चूनड़ देलथिन तखन ओकर कीमत छलै पच््यीस हजार। अइ सभक परिणाम इ भेल जे सब ध्न बड़का भैयाक हाथ मे छलै आ सभटा गहना बड़की भाभी के जिम्मा। मां बहला पफुसियाक छोटकी भाभी क डायमंड केर कानवला आ डाइमंडक अंगुठी लऽ कऽ तिजोरी मे रखबा देलथिन। तिजोरीक चाभी रहैत छलैन्हि भाभीक हाथ। मतलब बड़का भैया आ भाभी घरक मालिक। किछ दिनक बाद सल्लो दीदी आ मंा बतिआइत छलीह आ हम ओहिठाम बैसल सरोज के सांठ मे देबऽ लेल बैडकवर पर पफूल काढ़ैत छलहुँ। मारवाड़ी परिवार मे जहिया सॅ बेटी जन्मै छै बेटी क मां सांठ मे देबऽ लेल टीशूक थान, जरदोजीक साड़ी, घाघड़ा, ओढ़नी, चांदीक बर्त्तन जोगाबऽ लगैत छै। -आ सारोज तऽ आब मेडिकलक पार्टवन के पफाइनल दऽ रहल छै। तैँ बेडकवार, तकियाक खोल आ रूमाल पर नव-नव डिजाइनक कढ़ाई कयल जाइत छै। मां धीरे-धीरे सल्लो दीदी कें कहैत छलथिन। ‘हम बगल बला मकान विजय क नाम लिख देलिऐ। अजयक कोन भरोस कखन रखन कोन तमासा ठाढ़ करत।’ हमरा हुनकर बात नहिनीक लागल तैं बजलहुँ मां अहां देखबै बड़का भैया ओई मकान मे छोटका भैया के हिस्सा नहिदेथिन। तड़ाक सॅ गाल पर थापड़ मारलैन्हि पॉचो आंगुर क निशान पड़ि गेल पूरा कान झनझना उठल। ऊपर सॅ कर्कश स्वर मे बजलीह -‘पफेर कहियो एहन बात बजबें तऽ जीह उखाड़ि लेबौ।’ हमरा ओतऽ नहिरहि भेल उठि कऽ बरांडा पर चलि गेलहुँ। बड़ी काल घरि कनैत रहलहुँ। ओना आई-काल्हि हम कनैत नहिछलहुँं। अपना मन के बुझा लेने छलहुँ। ‘प्रिया जाबत अइ घर मे छे गांध्ीजी क तीनू बानरक अनुशरण कर। ने किछ बाज ने सुनमे किछ देख। जतबा संभव होइ चुप्प रह। एहि घर मे सरोज जखन जे पफरमाइश करैत छै तुरत पूरा कयल जाइत छै आ तू दस टका क किताब किनबा लेल तरसैत छें।’ दिन बीतैत रहल। हमर बीúएú क परीक्षा समाप्त भेल। सरोज मेडिकल पफाइनल मे छल। बड़का भैया हमरा दूनू बहिन, बुल्ली दूनू भतीजा कें कश्मीर घुमाबऽ लऽ गेलाह। जिनगी मे पहिलबेर पहाड़ देखलहुँ। पहिलबेर एú सीú कम्पार्टमंेट मे एतेक दूरक यात्रा कयलहुँ। खूब ऐश मौज कयलहुँ। मुदा एत बेर-बेर छोटका भैया आ भाभी क उदास चेहरा मोन पड़ैत छल। मां क देख-रेख के करतै से कहि छोटका भैया-भाभी के नहिआलथिन। कोन ठेकान अगिलो गर्मी मे छोटका भैया-भाभी घूम एती की नहि? कहॉ सॅ एताह बच््याक दूध्क पाइके हिसाब देबऽ पड़ैत छैन्हि। हुनका हाथ मे छैन्हि की? कश्मीर सॅ घुरला पर बड़की भाभी बीमार रह लगलीह। ओतुका हवा-पानि सूट नहिभेलैन्ह। भैयाा रोज राति मे एक दू पैग व्हिस्की पीबैत छलाह भाभी के नहिबर्दास्त होइत छलैन्हि। हुनका ई शराब पीयब चारित्राहीनताक लक्षण लगैत छलैन्हि ओ पुरान संस्कार क महिला छलीह। भैयाक इच्छा छलनि ओ सूट पहिरकऽ बाहर घूमथि। लिपिस्टिक लगाबथि भाभी कहैत छलथिन हम कुलबध्ु छी कोठा पर बाली नहि। भाभी जॅ मां लग भैयाक शिकायत करैत छलीह तऽ मां हुनके पफझति करैत छलथिन-‘भरि दिन खटिकऽ अबैत छै तऽ राति मे एक गिलास औरंजक जूस पीबैत छै से अहॉ के बर्दास्त नहिहोइत अछि? -‘मां जी! ओ शराब पीबैत छथि जूस नहि।’ -‘हे, पफालतू बात जुनि करू। हमर ओ श्रवण-पुत अछि। अहॉ के होइत अछि जे ओ मां के सेवा कियेक करैछ? अहाँक इशारा पर कियेक ने नचैत अछि?’ भाभी गुम्म भऽ जाइत छलीह। बड़की दीदी सॅ पफरियाद कयलनि। तऽ दीदी सापफ-सापफ कहलथिन‘भैयाक खिलापफ बाजि कऽ के मां सॅ उलझत? अहाँ अपन परिवारक बात अपने सोझराउ।’ भैया क चरित्रा क गुनध्ुन मे भाभी क चिन्ता बढ़ैत रहलनि। भैया जाति-पाति नहिमानैत छलाह आ भाभी छूआ-छूतमानैत छलीह। कश्मीर यात्रा मे ध्रक बनल पेठा-पकवान आ पफले खाइत छलीह। हाउसबोट मे मुसलमान खाना बनबैत छलै मुदा ओ अपन र्ध्म नहिछोड़लनि। भाभी मनोव्यथा बढ़ैत रहलनि। कश्मीर सॅ घुरलीह तहिया सॅ दुखिते छलीह। पेट मे बच््या छलैन्हि। दिन भरि उल्टी करैत छलीह। एक दिन बेहोश भऽ खसि पड़लीह। डाú गांगुली एलाह। ब्लड प्रेशर चेक भेलै। डाú अमृता कौर कहलथिन ‘तुरत एर्बार्शन कराओल जाय नहितऽ मांक जान नहिबचा सकबै। भाभी छमासक भू्रण हत्या क पाप अपना माथ पर नहिलेब चाहैत छलीह। मुदा भैयाक आगु हुनकर बात के मोजर की छलैह। मुदा भैयाक आबुगु हुनकर बात के मोजर के दितै। एर्बार्शन भेलै मुदा भाभी पफेर उठि कऽ ठाढ़ नहिभेलीह खाट घऽ लेलैन्ह। डाú गांगुली आ डाú अमृताक दवाई काज नहिकऽ रहल छलै। डाक्टर नलिनी सेन गुप्ता के बजाओल गेल। डाú शरत सेन अयलाह सम्पूर्ण शरीरक जॉच भेलै तऽ पता चललै हार्ट उनलार्ज्ड भऽ गेलैन्हि, थायरडो काज नहिकरैत छलैन्हि। दवाई आ इलाज सॅ किछ सुधर भेलैन्ह मुदा भाभीजीक मनरोग नहिछुटलैन्ह। जहिया कऽ भैया हुनका ग्रैंड होटल मे संग लऽ जाइत छलथिन भोजन कराबऽ तहिया ओ अबिते बाथरूम मे उल्टी करऽ लगैत छलीह। हुनका नजरि मे भैया अबारा चरित्राहीन शराबी छलाह। भैया ताहि दिन खूब पाइ पीटैत छलाह तइओ खर्चा आमदनी सॅ दुगुना छलै तैं पाइ जमा नहिभऽ पबैत छलै। सरोजक ब्याह के चिन्ता मे मां उदास रहैत छलीह। मां कें खुश करबा लेल भैया मांक हाथ पर किछ टका दऽ दैत छलथिन मुदा नीक घर, वर लेल 1962 ई क समय मे लाख टका सॅ कम दहेज नहिलगैत छलै। इं हमरा आइ कतेक तरहक बात याद आबि रहल अछि। मां क स्वभाव मे कनि नरमि अयलैन्हि। आब हमरे नहिसरोजी के मासिक शुरू भऽ गेलै। हम दूनू गोटे बड़की दीदी के कहि सुनि कऽ मां के मना लेलहुँ जे ‘आब हम सभ तीन दिन घरि छुआ छुत नहिमानब। हं प्रिफज नहिछुअब, रसोई घर मे नहिजायब ने अहॉक घर मे मुदा आब एसगर एक कोन मे बैसल नहिरहब तीन दिन घरि।’ खैर इ तऽ समझौता भऽ गेल मुदा बात अटकि गेल बस हमरा वास्ते। हमर वाह्य शरीरक रूपांतरित भऽ रहल छल। बारह वर्षक किशोरी देखबा मे युवती लगैत छलहुँ। आ हमर ई उभारसॅ मां परेशान छलीह। सत्ते हम उम्र सॅ वेशी पैध् लगैत छलिए। हमर स्वास्थ्य नीक छल दिन-प्रतिदिन देह भराएल जाइत छल। एक दिन सल्लो दीदी एकटा नव समीज देलैन्हि जकर डॉर सॅ ऊपरका भाग छलै जैकेट जकाँ। कहलनि ‘इ पहिर।’ पहिरलहुँ बहुत टाइट छलै। दीदी के कहलिऐन्ह । ‘दीदी इ हमरा साइज सॅ दू इंच छोट छै।’ दीदी कहलैन्ह-‘ तैं पहिर ऽ देलिऔ। सबटा बटन लगा। अइ सॅ छाती सपाट लगतौ।’ ओहातऽ हिनका सबके हमर छातीक उभार अखरैत छैन्हि। हम तऽ बाथरूमक अयना मे प्रस्पफुटित होइत रूप के देखि प्रसन्न होइत छी। साहस कऽ पफेर बजलहुँ ‘दीदी ई बहुत टाइट दै अकशक लगैए।’ ‘अकशक लगने मरि नहिजएबें। आदत पड़ला पर सब ठीक भऽ जेतौ। समीज क तर मे सब दिन पहिर।’ -‘से कियेक?’ से अइद्वार जे नेना छे लोक युवती नहिबुझै। ‘अहॉ कियेक ने पहिरैत छी? -‘कुमारि छलहुँ तऽ हमहूँ पहिरैत छलहुँ। मुदा थोडबे दिन पहिरलहुँ। हमर ब्याह बारहे वर्ष मे भऽ गेल छल। आ तोरा जकॉ दसे वर्ष मे हमरा पीरियड्स श्ुारू नहिभेल छल।’ स्कूल गेलहुँ तऽ बुझाइत छल जेना दमपफुलैए, पानि पीबऽ के छुटीð लऽ बाथरूम गेलहुँ। ऊपरका समीज खोलि ओइ जैकेट केर सिलाई खोलिकऽ पहिरलहुँ। आब मोन अकशक नहिकरैत छल। घर घुरलहुँ- दुपटाð ओढ़ने छलहुँ तइओ मां क नजरि सॅ किछ नुकाएल नहिरहल। ओ हमरा नहिकिछ कहलनि मुदा दीदी के कहने हेथिन। हम अपना रूम मे जा कऽ किताब रखिते छलहुँ कि दीदी पहुँचलीह। केवाड़ बंद कऽ आर्डर देलैन्हि। प्रिया समीज खोल।’ ‘नहिदीदी। आब हमरा किछ नहिकहूॅ। क्लास मे हमरा सांस नहिलऽ होइत छल।’ ‘ठीक छै हम किछ नहिकहबौ। चल मां लग कहुन जे सांस नहिलऽ होइए।’ हमर बोलती बंद भऽ गेल मां क नाम सुनिते। ‘दीदी-सरोज आ नीलू तऽ एहन जैकेट नहिपहिरैत छै?’ -‘सुन वेशी बात नहिबना। जहिया समय एतै ओकरो सभके पहिरऽ पड़तै। अच्छा खोल हम कनि ढ़ीला कऽ के सीब दैत छिऔ।’ दीदी ई घरो मे पहिरऽ पड़त?’ -‘हं, घर-बाहर, सांझि, भोर राति-दिन हरदम।’ हमरा मोन पड़ल पर्ल-बर्क क एकटा नायिका। जकरा बचपन मे लकडीक जूता पहिराएल गेलै पैर छोट रखबा लेल। जखन औ पैद्य भेलैतऽ पैर ततेक छोट भऽ गेल छलै जे आकरा चलबा मे कष्ट होइत छलै। ओ दासीक सहारा लऽ कऽ चलैत छल। की आब ई पहिरने हमरो विकास रूकि जाएत? पुरूष जकाँ सपाट.... नहिएहन नहिहोमऽ देबै’ लोक हमरा हिजड़ा कहत। दाई मां हमर प्रश्न के उत्तर नहिदेलैन्हि। ओ कहलनि-बुच््यी। अहाँक उम्र मे तऽ हमरा छेदी जनमल छल। ‘तऽ ओइ समय मे अहॉक साइज की छल ?’ ‘अच्छा ई कहू जे एखन जेहन छाती अछि तेहने पहिने छल?’ ‘नहिपहिने एहन नहिछल। ई तऽ छह-छहटा नेना के दूध् पिला सॅ एना टूटि गेल। आब हम बूढ़भेल हुँ।’ ‘तऽ मां आ दीदी हमरा कियेक तोड़ऽ चाहैत छथि?’ बुच््यी मासिक भेला क बाद औरत जवान होमऽ लगैत छै। अहॉ समय से पहिने जुआन भेल जाइत छी। आ अइ सभ भेल ओइ राक्षस के कारण पफुलाय सॅ पहिने ओ तोड़ि देलक।’ ओह तऽ असमय युवती होइबाक कारण अछि हमर निर्दय बड़का भैया रोआँ-रोआँ कलपि उठल। ओहि दानव के कारएा हमर इ हाल भेल। बच््ये मे पीरियड्स पफेर इ उभार जॅ क्रम चलिते रहितै तऽ पेट मे बच््यो। ओई राति एको घड़ी चैन सॅ सूतलहुँ नहि......। असमय बोझिल कैशोर्य, कुम्हलाएल नेनपन जो राक्षस तिल-तिल के मॅरबें हमर नोर क श्राप पड़तौ। हमर सम्पूर्ण अस्तित्व हाहाकार कऽ रहल छल। दाई मां क शब्द बेर-बेर माथ पर हथौड़ी कचोट जहॉ काँ बुझना जाइत छल......‘कलि के पफूलाए सॅ पहिने मयोड़ि देलकै।’ ने हम पफूल बनलहुँ ने नागपफनीक कॉट। एक सुनगैत अंगारे! छुॅआ उगलैत ऑखिक नोर सॅ भीजल जारन। की कहल जाए । हमर तऽ व्यक्तित्वे चूर-चूर भऽ गेल। एक दिस विद्रोहक आंगि मे जड़ैत दोसर दिस भयाक्रान्त। हम तऽ सब पुरूष मे अपन दुष्ट भाईक प्रतिबिम्ब देखऽ लगलहुँ। सहमल, भीतरे-भीतर कुहरैत लड़की। कहॉ चलि गेलाह बाबूजी। आब कहियोनहिऔता? हुनकर आश्वस्त करैत ओ सुदीर्घ कद, सुरक्षाक बोध् करबैत ममत्वपूर्ण नयन-अपन उपेक्षित बेटी कें दाई मां क कोर मे प्रसन्न देखि प्रसन्नता छलकैत चेहरा। जँ बाबूजी भैयाक कुकर्म बुझि जयताह तऽ ओ की करितथि? की भैया के घर सॅ निकालि देथिन छल? नहिकथमपि नहि। मां किन्नहुँ बेटा के घर सॅ निकालऽ नहिदेथिन छल ओ बेटाक गलती नहिमानि सकैत छषि वरू हमरा ब्याहि घर से हटा दितथि। आ इएह होइत रहलै ए युग-युग सॅ। लड़कि के पैघ होमऽ सॅ पहिने ब्याहिक सासुर पठा घर का पुरूष कें नजरि मे खटकए ताहि सॅ पूर्व घर सॅ भगा। पता नहिअलबल सोचैत हमर ऑखि कखन मुनाएल सपना मे देखलहुँ क्यो बरांडा सॅ उठा कऽ बाहर सड़क पर पफेक देलक। मुदा हमरा किछ भेल नहिचोटो नहिलागल। बस गरदा झाड़ि कऽ उठलहुँ आ मकानक पाछूवला बरांडा सॅ लटकैत सीढ़ि पर चढ़ि वापस घर आबि गेलहुँ। मां क घर होइत हुनका बिनु देखनहिं हॉल टपलहुँ। पफेर बाबूजी क रूम तकरबाद ओ बरांडा पफेर वएह दृश्य बरांडा सॅ उठा कऽ पफेकब.. दहशत सॅ चिचिआ उठलहुुँ। -‘की भेल बुच््यी? कियेक कनै छी?’ मम्त्वपूर्ण हाथ माथ हसौं थि पूछैत अछि। -‘दाई मां, दाई मां!’ बुच््यी! हम कहैत छी सूतऽ से पहिने हाथ पैर धे कऽ हनुमान चालीसा पढ़ि कऽ सूतू, मुदा हमर बात अहॉ किये मानब। हम तऽ गंवार अनपढ़ औरत छी? जाउ, एखन ऑखि मुनि सूति रहू। देरी सॅ उठब तऽ मां बजतीह।’ -‘हं, दाई मां! अहूँ सूति रहू ऊतऽ सपना छल।’ हमरा माथ पर हाथ रखने ओहिठाम दाई मां सूति रहलीह। हमहूँ ऑखि मुनि पड़ल छलहुँ। निन्न टूटल। अरे! ई तऽ डूयब्रवनिक छै। सांझुक लुक-झुक बेर छलै। कतहु किछ नहि। शून्य-सापफ विस्तृत आकाश उड़ैत सांगल पाखी। निःशब्दता भंग करैत निरन्तर छप-छप लहरि समुद्रक। अइ बेर मे नहिजानि कियेक होटलो शान्त भऽ जाइत छैक। लोक सब पफुसपफुसाक बाजत। दूर सॅ कोनो-जहाजक सीटी सुनाई पड़ल। अई क्षणिक गोध्ूलि बेर मे कतबा किछ घटित भऽ जाइत छै। अनाम उदासी हवा मे भिझरायल बुझना जाइछ। संझुका पहर प्रायः टूरिस्ट किलाक भीतर सजल दोकानक मे चक्कर लगबै’छ। अइ छोट छीन शहरक सबसॅ वेशी आकर्षणक केन्द्र छैक इएह किला। अहि मे सजल ध्जल छोट छोट बाजार, रेस्टोरेंट आखरी छोर पर एकटा ऊँच जगह छै जतऽ कहियो काल नाटक होइत छै। किला मे जाइते बाम भाग मे कन्सर्ट हॉल छै। दहिन भाग मे आबिजान के चित्राक प्रदर्शनी लागल छै। हम मोने-मेन संकल्प कऽ लेलहुँ जे लड़की बनल रहब औरत नहि। तैं समीजक नीचा पहिरऽ बला जैकेट के खूब कासिकऽ पहिरऽलगलहुँ। आब सत्ते ऊपर सॅ एकदम सपाट करेज बुझाइत छलै। मुदा तइओ नहिजानि हमरा चेहरा मे की अभरैत छलै। जे लड़का, पुरूष सभके गि( दृष्टि हमरे चेहरा पर गड़ल रहैत छलै। ने ओइ नजरि सॅ क्यो सरोज कें देखैत छलै ने नीलू कें। सभक कामुक दृष्टि हमरे पर कियेक? जहिया एगारह वर्षक छलहुँ तखन हमरा माथ मे कतहु कतहु केश झड़ि जाए आ उज्श्र चकत्ता भऽ जाइत छल। पहिने अठन्नी जकॉ पफेर ओहू सॅ पैध्। भाभी के देखेलिएन्ह। भाभी मां के कहि देलथिन। मां माथ ध्ुनऽ लगलीह। बजैत बजैत हुनकर मुँह टेढ़ भऽ गेलैन्हि ओ बेहोश भऽ गेलीह। भाभी झट कोरामिन आनऽ गेलीह दाई मां मँह पर यूडीकोलोन छींटलथिन, बड़की भाभी पंखा सॅ हैंकात छलीह। होश भेलैन्हि। दाई मां हुनकर तरबा रखड़ैत बजैत छलीह- ‘बहुरानी। हिम्मत राखू इलाज हेतै सब ठीक भऽ जेतै।’ मांक पुफेर विलाप शुरू भेलैन्हि-चमेलिया भाय। एकर भागे पफूटल छै कोना एकर ब्याह हेतै।? सौसें माथक केश उड़ि जेतै? हे देव-पितर। बालाजी।। आब अहिंक हाथ मे लाज अछि। हे राणी सत्ती दादी-हमर अहिंक हाथ मे लाज अछि। हे राणी सत्ती दादी हम झुझणु जा कऽ चूड़ा चुनड़ी चढ़ायब हमरा बेटीक रोग छुटि जाए। हे मां एकरा पर कृपा करिऔ’ एतबा कहि मां पफेर बुक्का पफाड़ि कानऽ लगलीह पफेर मुँह टेढ़ भऽ गेलैन्हि। नहिजानि कियेक मां कें एना विलाप करैत देख हमरा भीतर सॅ खुशी भऽ रहल छल। पहिल बेर अनुभव भेल जे ओ हमरो मां छथि। पहिल बेर हुनका मुँह सॅ सुन लहुँ बेटी कहैत। हमरा लेल चिन्तित छथि से देखि सुख भेँटल। भाभी पफेर हुनका कोरामीन पिया कऽ विछावन पर लऽ जा कऽ सुता देलथिन। दुपहरक समय छलै दू बजैत रहै। गर्मीक छुटीð छल। भीषण गर्मी मे हम माथ झुकौने सरोज के सॉठ मे देबऽ लेल आरगंडी साड़ी मे महीन शैडोवर्क के पफूल काढ़ैत छलहुँ। आत्मा भीतर सॅ तृप्त छल-मां के हमर चिन्ता छैन्हि। हमरो मानैत छाथि। कनैत-कनैत बेहोश भऽ गेलीह। दाई मां गोरथाड़ी मे बैसल मां क पैर जॅतैत छलीह। आइ भोर सॅ दाई मां हुनके सेवा मे लागल छथि किछ खयबो नहिकयलैन्हि। मां आई जतेक हमरा लेल कनलनि ततेक ककरो लेल कहाँ कनै छथि। बुल्लियो के माथ मे चकत्ता भेल छै। मां ओकरा लऽ कऽ डाक्टर ओतऽ गेलीह। तखन सॅ डाú पंजाक देल दवाई सॅ रोज ओकरा माथ मेमालिश करबैत छथिन। मुदा ओकरा लेल कहियो कानलथिन? हम सिलाई कऽ के उठलहँु। मां के कहलिएन्ह ‘मां हम पैर जॉति दै छी। दाई मां नहा खा लेतीह। मां इशारा सॅ दाई मां के जाय कहलथिन। हम हुनकर पैर जॅतैत छलहुँ। थोड़ेकालक बाद मां बजलीह-‘जा बैआ सूतऽ। आराम करऽ।’ नहिमां। अहांक मोन खराब अछि हम एखन नहिसूतब। हम विजयोल्लास मे सरोज दिस ताकि ओकर मूँह दूसलिऐ। देख मां हमरा कतेक मानैत छथि। डाक्टर गांगुली अयलाह। एखनो मां क मुँह टेढ़ै छलैन्हि। मां के देख डाक्टर गांगुली बजलाह। ‘शोब ठीक भऽ जायत। मिसेज गुप्ता।’ की ठीक हेतै डाक्टर बाबू। चारि मास सॅ बुल्लीक इलाज भऽी रहल छै। कतेक डाक्टर बदललै। खैर बुल्ली तऽ लड़का छै चीनी क लड्डू टेढ़ो भला। मुदा प्रिया लड़की छैं कोना हेतै ब्याहदान? ओहिना त एखन बारहोवषक नहिभेल अछि आ लगैत छै जेना सोलह वषक होई। किछ करू डक्टर साहब। कहुना एकर केश नहिउड़ै, आ उजरा चकत्ता मेटा जाइ। -ठीक छै हम सोचिक कहब। अहाँ एखन किछ नहिसोचू। डाú गांगुली असली मनुष के ताकि कऽ आनत।’ आइ काल्हि हमरा सभक सहानुभूति भेंट रहल अछि। सबसे पहिने मां बड़का भैया कें हमर माथ देख बैत कहलथिन। ‘देखहि अठन्नीक बराबर उज्श्र चकत्ता भऽ गेलैए।’ मां, अहाँ चिन्ता जुनि करू। जँ एतऽ ठीक नहिहेतै तऽ हम एकरा बम्बई लऽ जेबै इलाज कराबऽ। ‘छोट-पैघ सब देखलक। बुल्लीकऽ अहिना माथ मे कतेक ठाम केश उड़ल छै आ उज्श्र चकत्ता भऽ गेलैए। मुदा तैं की ओ तऽ लड़का छै। हँ, हमरा कोनो रोग ग्रसित कऽ लेत तऽ हमर ब्याह कोना हेत?’ दोसर दिन मां हमरा लऽकऽ नानीक घर गेलीह। नानी हमरा माथक केश हटा कऽ उज्श्रा दाग देखलनि तऽ माथ पर हाथ घऽ बैसि गेलीह- ए कस्तुरी! एकटा नीक जकॉ इलाज कराबऽ पड़तै। लड़की छै ब्याह-दान करबा मे कठिनाइ हेतै। मामा, मामी देखलनि। मामा कहलथिन-‘बौआ, कलकत्ता मे तऽ एकरा टोप डाक्टर छै डाú बीú सीú राय। तोरो ओकरे सँ इलाज भेल छलौ।’ ताहि पर मामी बजलीह-मुदा ओतऽ आइ काल्हि पेशेंट के देखते नहिछै।’ -‘अरे, पाइ रहऽ चाही। टका मे बहुत तागत छै। टका छै तऽ सब छै टका नहितऽ किछ नहि। टका भेला सॅ कलिया मुनिम के आब लोक कालूराम जी कहै छै।’ मामा डाक्टर राय सॅ बात कयलनि। समय लऽ लेलथिन। मामा मामी आ हम डाú बीú सीú राय ओत गेलहुँ। डाú राय विटामिन क इंजेक्सन सप्ताह मे तीन-दिन लेबऽ कहलनि। पानि सन कोनो लोशन देलनि आ केश मे जवाकुसुम तेल लगाबऽ कहलनि। डाú साहेब मामा कें कहलथिन-‘किछु दिन मे बिमारी जड़ि सॅ खत्म भऽ जेतै जँ ठीक नहिहेतै तऽ डाú बीúसीú राय अपन नाम बदलि लेताह। ध्ुरती काल मामीजी हमरा रैली सिंह के गुलाबक शरबत पिऔलनि। हमरा एतेक इम्पार्टेन्स क्यो कहियो नहिदैत छल। हम तऽ कल्पनो नहिकरैत छलहुँ जे मां हमरा डाक्टर सॅ इलाज कराबऽ लऽ जयतीह। आब बुझलिऐ मां बड्ड नीक छथि हमरो सॅ स्नेह छैन्हि। दू दिन सॅ तेहन अन्हर बरसात भऽ रहल छै जे सूर्यक दर्शनो नहिभेल। नीचाँ उपफनैत समुद्र ऊपर बरसैत आकाश। मोटाक मोटा पानि उझलि रहल छै आकाश तइओ नहितृप्त होइत छै समुद्रक पिआस। जतबा पानि पीबै’छ समुद्र ततबे नशा मे मां तल रहै’छ। समुद्रक सतह गतिहीन छै, बरखा क चोट सॅ लहरि लगै’छ स्तब्ध्! एखन हम बाहरे सॅ टहलि कऽ अबि रहल छली। छाता लऽ कऽ गेल छलहुँ मुदा तइओ ऊपर सॅ नीचॉ ध्रि भीजल छी किछ लोक एसगर रहऽ मे घबराइत छै। तैं मन बहटारऽ लेल ककरो सॅ दोस्ती कऽ लै’छ सेह तॅे सब गप्प-सप्प मे मगन छल। हम सोचैत छलहुँ कतऽ बैसि हॉल मे की लाउन्च मे। मदा लाउन्च मे त कतहु जगह नहिछै। जर्मन दम्पति भरि दिन ताश खेल मे मस्त छल। जोसेपफ हमरा कहलक ‘मैडम! अहाँ कनिएक प्लम ब्रांडी लऽ लिअ।’ हम एक घांेट पीलहुॅ कि बुझाएल जेना कंठ सॅ पेटक अॅतरि ध्रि आगि लेस देलक। ओ बाजल-‘मैडम! ब्रांडी ताहू मे प्लम ब्रांडी एना नहिपीअल जाइछ।’ हम ओकरा कहलिए -‘जोसेपफ अहॉ कहलहुँ दवाई जकॉ पीब जाउ तऽ हम पी लेलहुँ मुँह कान सॅ लऽ कऽ कंठ करेज सब मे धह दऽ रहल अछि!’ -मैडम घाह तुरते ठीक भऽ जाएत। हं एसागर बैसल छी। चलू, दू टा अमेरिकन काल्हि ए आयल अछि ओकरा सँ दोस्ती कऽ लिअ।’ -‘नहि, जोसेपफ। अमेरिकन बड्ड बजैत छै आ हम......।’ -हँ, हँ, हम बुझि गेलहुँ अहॉंके एकान्त प्रिय अछि अहा लेखिका छी।’ हमरा हँसी लागल। सत्ते अइठाम लेखक के बड्ड सम्मान छै। ‘मैडम! अहाँ कोन भाषा मे लिखैत छी?’ -‘हिन्दी मे।’ ‘अंग्रेजी मे कियेक नहिलिखैत छी?’ ‘हमरा लेल ओ विदेशी भाषा अछि।’ ‘मुदा हम पढ़ित हुँ.........।’ -‘ठीक छै कहियो अंग्रेजी मे अनुवाद कऽके पठा देव।’ ‘ध्न्यवाद! मैडम आब मोन केहन लगैए। आब तऽ कनिको ठंडा नहिलगैत हेत?’ ‘नहिसत्ते कनिको ठंडा नहिलागि रहल अछि। प्लम ब्रांडी क लेल ध्न्यवाद आब तऽ ताजगी महसूस कऽ रहल छी।’ -‘वेश तऽ मैडम आब अहाँ लंच कऽ लिअ। हम वेजिटेबल प्लेट सजा दैत छी।’ ‘जोसेपफ! किछ और नहिभेंट सकैए। एहन मौसम मे ई टीन वेजिटेबल। ऊँ हूँ।। ओहूना इ खाइत-खाइत मोन ऊबि गेल अछि।’ ‘जोसेपफ उदास भऽ गेल। पफेर किछु सोचैत बाजल मैडम अहाँ लेल कढ़ी बनबैत छी। राइस एंड कढ़ि।’ ‘बना लेब ?’ ‘हं, कियेक नहि। अहॉ पहिने पफरमाइश कयने रहितहुँ। हमरा तऽ होइत छल जे डाक्टर अहॉ कें ऊसनल तरकारी कहलक अछि। बेलग्रेड सॅ अहॉक दोस्त इएह निर्देश देने छलाह।’ -पिफलिप! ओह! तऽ ई पिफलिपक कारस्तानी छै। सॉरी। जोसेपफ, हमर दोस्त किछ वेशीए हमर ध्यान रखैत छथि। आब अहा केँ जे इच्छा होमय बना कऽ दिअ।’ जोसेपफ खुश भऽ गेल। ओ कहलक आइ राति मे अहाँ केँ स्पेशल ‘कीश’ बनाकऽ खोआब आ ओकरा संग चीज बॉल। ओह हमरा पहिने कहने एहितहुँ। सॉरी वेरी सॉरी!!’ ‘गलती हमर अछि अहॉ क कोन दोष?’ जोसेपफ टमाटरक रस मे तरकारी सिझौलक नीक स्वाद छलै भातो बढ़ियाँ छलै आ ताहि संग छलै’ स्टाबेरी टर्टि। मुँह क स्वाद कतेक दिनक बाद बदलल। विछाबन पर सूतिते प्लम बांडीक असर बुझाएल। खूब गहरा निन्न मे सूतलहुँ। निन्न टूटल तऽ खिड़की लग जा कऽ ठाढ़ भेलहुँ। समुद्र मे खसैत मूसलाधर वर्षा आ ध्ुआँ-ध्ुआँ सन उठैत समुद्री लहरक बाहरि। सप्पूर्ण शहर भींजल तितल। चटाðन पोर-पोर भीजल ओइ पर पड़ैत बौछरक नजारा अद्भूत लगैत छल। लगैत छल खिड़की लग ठाढ़ छी से हवा तऽ लगिते छल पानियो पीबऽ रहल छी। थोड़ेक काल एहिना ठाढ़ रहलहुँ। बॉलकनि मे एखन बैसब कठिन छै। तऽ की करू? लिखू बुझाएल जेना जूडी आदेश दऽ रहल अछि। मुदा एहन मौसम मे एना एसगर -एसगर ....? त की भीड़ भाड़ मे लिखल जाइछ? अपन बेवकूपफी पर अपने हॅसलहुँ। एसगरक तहे-तह जिनगीक झंकार सुनाई पड़ल। बरसाक कारण माटिक सोंह सुगंध् नाक मे हलचल मचौने छल। चारू भर ध्ुंध् छलै तैं ककरो चेहरा-चिन्हब मुश्किल छल। कखनौ कऽ बरसाक बौछार कम भऽ जाइत छलै तऽ बीच-बीच मे बत्तीक झिलमिलाहट झलकैत छल। बुझाइत छै आइ बरसा घुटतै नहि। भोरे उठि कऽ हम बॉलकनि मे गेलहुँ। बरसा थम्हि गेल छलै। ताजा खिलल गुलाब सन भींजल भोर का समुद्र क शान्त लहरि बड्ड नीक लगैत छल। सबटा मकान राह-बाट, गाछ-बिरीछ पफूल-पात सब मे ताजगी छलै। मन मे अजीब बेचैनी महसूस भऽ रहल अछि, माथक नस मे तनाव। भीतर मे किछु घुमड़ि रहल अछि। अथाह समुद्र। गरजैत लहरि संग किनार पर ठाढ़ि एसगर छी। निस्पंद। कतहु सॅ आवाज आबि रहल छै मुदा हम नहिसुनि रहल छी। समुद्रक लहरि के शोरगुल मे आवाज स्पष्ट नहिभऽ रहल अछि तथापि चेष्टा करैत छी। के अछि ओइ पार? समुद्रक ओइ पार, क्षितिज के पार जतऽ जमीन क कोनो कोन मे हम सब संग छलहुँ......... जतऽ हमर घर छल, बाबूजी छलाह। गप्प कर ऽ चाहैत छी सबसॅ जे बहुत पॉछा छुटि गेल। ‘हेलो आपरेट?’ ‘यस’ ‘कैन यू गिव मी दिस नम्बर?’ हम ओकरा पिफलिपक नम्बर दैत छिऐ। एमस्टरडमा सॅ पचास मील दूर वाल वाइक केँ जतऽ पिफलिप आ जूडी रहैत छयि। व्यापारक रिश्ता घनिष्ठ मित्राता मे बदलि गेल अछि। निःस्वार्थ, निस्पाप पारस्परिक सद्भावना। किछु ए दिनक परिचय क बाद व्यापार के पफरक कोनों कंपनर मे राखि देल गेलै। व्यापारे तऽ करैत छी हम सब। ढ़ेरो व्यापारी एकटा भऽ जायत, किनऽ बला बेच बला मुदा मीत? बड्ड मुश्किल सॅ भेंटैत छै मन क मीत ई कहब छैन्हि जुडि केँ। हेला! ........... हं, पिफलिप.........हँ हम एकदम स्वस्थ छी। की....आवाज मे उदासी? नहिएहन कोनो बात नहि। हं, हम चाहैत छी किछ दिन आब अहीं सबके संग रहि?.... नहिहम कतहु घूमऽ नहिजाए चाहैत छी। बस हमरा अहिंक घर....। ओह पिफलिप पफोन पर सबटा नहिकहि सकब। .... ओह अहॉ तऽ सदिकाल जेट स्पीड मे रहैत छी। जूडी कतऽ छथि? ऑपिफस मे? कहि देवैन्हि हम याद करैत छिऐन्ह। ओ के भोजन करैत काल हम पफेर सोचऽ लगलहुँ। मां आब कतेक वर्षक भेल हेती? पचासीक ऊपर त अवस्से भेल हेती। लगैं’छ दिनोदिन हुनके जकां शिथिलता आ चिड़ चिड़ापन हमरा रग-रग मे लहु संग दौड़ रहल अछि। की तैं हम कहियो अपना के नहिस्वीकारि पबै छी? अर्न्तमन मे दस वर्षक अबोध् लड़की कें जीबैते जरा देलिए। नहि, हम ओहन औरत नहिबनऽ चाहैत छी? मां अहॉ जकॉ या दीदी सब जकॉ जिनगी कें हम नहिस्वकारि सकैत छी? ने बड़की भाभी जी जकां भीतरे-भीतर कुहूकैत मरऽ चाहैत छी। तइओ परम्पराक जड़ि हमर पछोड़ नहिछोड़ि रहल अछि। युग-युग करे एहन अमानवीय परम्परा के कोन रोगक नाम देल जाए जकरा कारण हमरा सन विद्रोही महिनाला समर्पित पत्नी आ मां बनऽ लेल विवश होइछ। हम तऽ जिनगीक बहुत लम्बा हिस्सा मां सन नहिबनऽ मे बितेलहुँ संघर्ष करैत। तथापि इच्छाा मां प्रसन्न रहथि,....... मुदा नहिओ तऽ बाबूजीक मुइला क बाद अपना जीवन क रेगिस्तान बना लेलैन्हि। ने कतहु जायब ने ककरो सॅ कोनो तेहन मैत्राी। बाबूजी जाबत जीवित छलाह हमरा लोकनि प्रत्येक साल पूजाक छुटीð मे लाव-लश्कर संग यानी महराज, मुनीम, चारि टा ढ़ेनामा, देनमी, दूनू भाई सल्लो दीदी कलकत्ता सॅ बाहर जाइत छलहुँ। से हो दूर-दूर कहियो हजारीबाग तऽ कहियो जसीडीह या देवघर। बिहारक लाल-लाल माटि, सांय-सांय करैत शीतल बसात, ऊबाऊ दुपहरिया आ कखनौ नहिखत्म हुअबला राति। जाय सॅ पूर्व डाक्टर गांगुलीक सोझा मे सब घिया-पुताक वजन लेल जाइत छलै। डायरी मे मुनीम जी नाम संग सभक वजन नोट करैत छलाह। मां कहैत छलथिन-‘बच््या सभ दुबरा गेल अछि। बंगालक अइ बरसाती मौसम मे बाहर रहत त शरीर स्वस्थ रहतै।’ डाú गांगुली ताहि पर टिपैत छलाह हं सात्ति कहै छथि एतुका गरम हवा ऑत के सड़ा दै छै एखन बच््या सभ लेल पाश्चिमक के हवा जोरूरी छै।8 मां स्वयं बिमार रहैत छलीह बाहर जायब हुनको लेल जरूरी छलै। तऽ एक मास पहिने सॅ तैयारी शुरू होइत छल। सबसे पहिने एकटा कोठी भाड़ा पर लेल जाइत छल। सल्लो दीदी लिस्ट बनबैत छलीह कोन-कोन बक्सा जेतै। बड़का बड़का लोहाक कारी बक्सा मे कोनो मे बर्तन-बासन कोनो मे भोजनक सामग्री कोनो मे दवाई, गरम कपड़ा सभक ओढ़ना बिछौना बिस्तरबंद बड़का-बड़का बंडल। स्टेशन पर बाबूजीक परेशान चेहरा। कालूरामजी के रूपैया क थैली सम्हारबाक डियुटी बड़का भैया क सख्त आदेश। तखन पहुँचैत छलहुँ हजारीबाग क सुनसान जंगल क सुन्न बंगला मे। बंगलाक चारू भर बड़का बड़का गाछ-बिरीछ। दाई मां सॅ राति मे हरिया बतिआइत छल-‘मौसी काल्हि राति ओइ गाछ तर भूतनी बैसल छलै।’ ‘सच््ये।’ ‘हं, हं हम सुनने रहिऐ छन-छन आवाज अबैत छलै मोन तऽ भेल लग जा कऽ देखिए मुदा ऽर भेल।’ -‘हे भगवान! एहन गलती नहिकरिहे जान चलि जेतौ।’ -‘हम पूछलिऐ-दाई मां भूतनी कें लोक कोना चिन्हतै? -‘भूत-प्रेत क डरेँ वरके गाछ लग चबुतरा छै ओम्हर क्यो नहिजाइत छल। खाली दाई मां जाइत छल शिवजीक जल ढ़ारऽ। दाई मां कहैत छल-‘भूत प्रेत शिवजी लग रहिते छै। -पहिल सप्ताह नीक जकॉ बीतैत छल। मां अपन दवाई बिरो बन्द कऽ लैत छलीह। भोजनक रूचि बढ़ि जाइत छलैन्हि आ खोराको। राध कहैत छलै-जॅ मैडम तीन मास एतऽ रहथि तऽ पूर्ण स्वस्थ भऽ भयतीह। मां कहैत छलथिन तीन मास तऽ नहिसवा मास ध्रि अवश्य रहब, ध्नतेरस दिन कलकत्ता। पहुँचब। सप्ताह बीतैत-बीतैत राध आ दाई मां क बीच लड़ाई शुरू भऽ जाइत छलै। मां क आर्डर छल ध्यिा-पुता के तेल-उबटन राध लगेतै। राध कामचोर ककरो ठीक सॅ मालिश नहिकरै ताहि पर दाई मां टोकि दै। पफेर महराज क भोजन हमरा सभकेँ नीक नहिलगैत छल। रोज सजमनि आ पालक, मूंगक पातर दालि। आलू-मटर कोबी कहियो पत्ता कोबी। सब मे एके स्वाद। जीर आ हींग सॅ छौकल हरैद, ध्नियॉ, लाल मिरचाईक क सूखल पावडर आ खटाई। हं तऽ झगड़ा होइत छलै भानस ध्से चमेलियाक मां गेलै सब ध्ुआ गेल। चमेलियाक मां जाइत छल जखन महराज इनार पर स्नान करैत छलाह। ओ ध्यिा-पुता लेल पिआज दऽ भुजिया बना दैत छलै से पिआजक गंध् लगैत छलैन्ह महराज कें। दोसर हल्ला होइत छल जे लछमनियाँ पानि छू देलकै। हरियाक ई हिम्मत जे बच््या सभकेँ टमाटरक सलाद मे पिआज दऽ देतै? महराज जी चौकला-बेलना पटकि कऽ पछुआर मे जाऽ कऽ बैसथि। घ मे सब खेतै आ ब्राह्मण कोणा भूखल रहताह तैँ दाई मां पूरा रसोई धो पोछिदैत छलथिन। तइओ ओ गरि-सराम दऽ रसोई मे जाइत छलाह। हम दाई मां के कहैत छलिए - ‘दाई मां अहां महराज के मनाबऽ किये जाइत छी ओ गारि सराप दैइ ए।’ -जाय दिऔ बुच््यी! ब्राह्मणक गारि, सराप आर्शीवाद होइ छै। एक दिन हरिया बगीचा मे दू टा ईंट जोड़ि कऽ लकड़ी जरा कऽ लहसून-पिआज आ गरम मसाला दऽ कऽ खिच््यड़ि बनौलक आ बगीचा सॉ गाजर-मूरै आ टमाटर पिआजक सलाद संग केेरा के पात पर परसि कऽ बच््या सभके खुऔलक। सब प्रसन्न भऽ खूब खेलक। महराज जी क मक्खन वला टिकिया घयले रहि गेलै। एहन बेइज्श्ति। महराज जी बड़बड़ाइत गेलाह मुनीमजी लग-‘मनीम जी हम तऽ चललहुँ बहुरानी के कहि देबैन्ह।’ मुनीम जी कतबो खुशमद कयलनि, मुदा ओ सरपट भगलाह लछमिनियॉ स्टेशन घरि हुनका पाछु गेलै मुदा ओ टेनू मे बैसिए गेलाह। हुनकर राम छलैन्ह सुजानगढ़। हम सब खूब खुब खुश छलहुँ। महारज जी लहसून पिआज नहिदैत छलाह कथु मे। आब दाई मां आ हरियाक हाथक बनल खास खास तरकारी बनत आलूदम, आलूबड़ी, पिआज बला भुजिया आ सांझि मे पिआजक कचड़ी भेँटत। सप्ताह बीतैत-बीतैत भानसघर अराजकता सॅ मां परेशान भऽ गेलीह। मुनीम जी अलगे बड़बड़ाइत छलाह -‘बहुरानी! नोकरी करैत छी तकरकी मतलब छुआछुत के नहिमानी? सब ध्यिा पुताक मुँ सॅ लहसून-पिआजक गंध् अबैत छै। घी मे बनल बदामक हलुआ रसखले रहि जाइछ आ सब चाट पकोड़ा खाइए। एतेक तेल मसाला ध्आि पूता खाएत तऽ लीवर खराब भऽ जेतै। ओना मां लेल बिनु तेल मसालाक तरकारी बनैत छलै तइओ रोज झमेला होइत छल। मां क माथा गरम भऽ गेलैन्हि जखन बाबूजीक संग तीन-तीन टा गाड़ी मे हुनकर मित्रा अन्तिम सप्ताह बीता बऽ आयल छलैन्हि। दिन भरि ताशक महपिफल आ पर चाह। नास्ता लेल बाबूजी कलकत्ता सॅ अनने छलाह बीकानेरके भुजिया आ कलकत्ते सॅ बनबाक मंूग दालि के भरल कचोड़ी, रंग-बिरंगक मिठाई। मां क अनुसार तीनेटा मध्ुर स्वास्थ के लेल नीक होइछ मामड़ा बदामक बपर्फी संदेश आ उजरा रसगुल्ला। सूजी आ खोआक तड्डू, गुलाब जामुन, पेड़ा इ सभ स्वास्थ लेल हानिकारक। बच््याक सेहत लेल एकदम वर्जित ताहू मे सरोज आ नीलू दूनू रोगाही। कनिएक जॅ छींकत तऽ मा क हिसाब सॅ खान-पान के गड़बड़ी क कारण तैँ मां क अति सतर्कता के वजह सॅ हेल्थपफूड एकदम स्वादहीन। आ मेनू लिखैत छलाह डाक्टर गांगुली। घी-तेल सॅ छह-छह करैत मारवाड़ी भोजन सॅ डाú गांगुली के चीढ़ छलैन्हि। एक बेर बरसात क सांझि मे बाबूजी डाú गांगुली के ताशक महपिफल मे शामिल कयने छलथिन भोजन मे बनल छल पचमेल दाल-बाटि आ चूरमा सूखल संागर क मिरचाई मसाला बला तरकारी आ लहसूनक चटनी। मुंग, उड़िद, चना राहड़ि आ छिलकाबला मूंग के पफेंटल गाढ़ दालि जकरा लौंग इलायची, दालचीनी दऽ घी सॅ छौकल गेलै। आ बाटी तऽ लिटीð जकरा गोइठा पर सेद कऽ घ्ीक डेगजी मे डूबा देल गेलै। चुरमा मे तऽ घी पुस्ट सॅ देले जाइत छै खादार ऑटा मे मोयन दऽ कड़ा सानिकऽ मुड़िया बनाकऽ घी मे तरह जाइत छै। पफेर चीनी आ इलांइची घऽ कऽ कुटि कऽ आध-आध पौआक लड्डू बनलै। डाú गांगुली सबक संग खूब स्वाद लऽ खयलनि। मुदा राति मे हुनकर मोन खराब भऽ गेलैन्हि। बारह बजे रति मे पफोन एलै अरे भाई मिú सांवर जी हमरा की खोआ देलहुत्र तेहन कड़ा लड्डू छलै जे पेट मे गुड़-गुड़ करैए। बाबू जी ओतेक राति मे नेबोक रस मे सुखाएल हरियर पीपरवटी आ पत्थर हजम चूड़न दादी क बनाओ लऽ कऽ गेलाह। गरम पानि संग चूड़न खयने कनिकालमे पेटक गैस बहरे लैन्ह त चैन सॅ सूतलाह डाú गांगुली के किछ भऽ जेतैन्हि तऽ मां क की हेतैन्ह एहन नीक लोक कतऽ भेँटत। ताहि दिन सॅ मारवाड़ी भोजन सॅ डाú गांगुली ए के नहिबल्कि मां क मन मे बैस गेलैन्हि जे ओ गरिष्ट होइत छै। डाú गांगुलीत चीढ़ले छलाह मारवाड़ी भोजन सॅ तैं मां के कहैत छलथिन जे ‘बच््या देर ओइ झोल भात दिन आरा कांचा कला आर पेपे शे(ो।’ बाबूजी केँ हजारीबाग अबिते आर झमेला बढ़ि गेलै। एक तऽ गोविन्द महाराज रूसिक चलि गेल छलाह। बीस लोकक नास्ता, भोजन, पिकनिक के समान दाई मां दिन भरि भानसे घर मे रहैत छलीह। मां किछ करतीह से ककरचनो नहिकयल जा सकै’छ। बड्ड करती तऽ चटनीक लेल ध्निक पात, पुदिनाक पात बिछ-चुनि कऽ राखि देतीह आ एहु लेल टोपिया मे पानि आ हाथ मे तौलिया नेने नर्स राध ठाढ़ रहैत छला। हं, मोनपड़ल भोजनक संदर्भ मे मां क बनाओल खिच््यड़ि। साओनक मास छलै। महराज गाम गेल छलाह। कलकत्ता मे खूब जोर सॅ फ्रलू पसरल छलै। हम बड़का भैया, मां आ बाबूजी के अलावा सब बिमार छलै। दाई मां क देह आगि जकॉ गरम छलैन्ह आ भोर सॅ हरियो माथ पर पटीð बान्हि सूतल छल। लक्षमीनियाँ आ राध मिलकऽ खाना बना सकैत छल मुदा मां क छुआ-छुति बला रोग छैन्हि। र्ध्म-कर्म जाति पाति के वहम मााि मे कुंडलीमारी कऽ बैसल छनि। खासकऽ मेहतर सॅ बडड घृणा छैन्हि। मेहतर के चढ़ऽ लेल पफरक सॅ सीढ़ी बनल। आलीशान आध्ुनिक मकानरहैंत मां कें कारण एटेच्ड बाथरूम नहिबनल। तैं स्नान घर पफरक छै। दू टा लैटरीन एकटा अंग्रेजीक स्टाइल बला एकटा भारतीय। पेशाब घर पफरक। माटि सॅ हाथ धेबऽ पड़ैत छल बाद मे लाल साबुन सॅ हाथ धेबऽ लगलहुँ डाú गांगुली के कहला पर। बड़की टा स्नान घर जाहि मे एक दिन बाथटब छल तऽ दोसर दिसन चबुतरा बैस कऽ स्नान करबाक लेल, इटालियन मार्बलक बसिन छलै मतलब पूरब आ पछिम स्टाबूलक खिच््याड़ि। मेहतरक सीढ़ी पर आर क्यो लात नहिघऽ सकैत छल। मेहतरक सीढ़ी पर आर क्यो लात नहिघऽ सकैत छल। मेहतर ग्यारह बजे घरि शोर पाड़ैत अबैत छल ‘पानि दिअऽ।’ ओकर नल ध्ुबऽक मनाही छलै। लछमिनियाँ नल खोलिकऽ बाल्टीए बाल्टी पानी दैत छलै मेहतर कें मेहतर आबि गेलै मे सुनिते मां नाक पर रूमाल घऽ घर मे बैसि रहैत छलीह। मेहतर के गेलाक बाद लछमिनियाँ बाथरूम आ लैट्रिन खूब पानी उझलि कऽ सापफ करैत छल। एहि क्रिया कलाप मे करीब एक डेढ़ घंटा लागि जाइत छलै अइ बीच मे जॅ ककरो पैखाना लागि जाय त आ छटपटाइत रहैत छल। लछमिनियाँ जखन सापफ कऽ बाल्टी लऽ कऽ हॉल पार कऽ ऊपर जाइत छल तऽ रामू हॉल मे पोछा लगबै’छ। हम कहैत छलहुँ मां क रसोई के विषय मे। हरिया के अचानक बहुतर जोर सॅ बुखार लगलै आ लछमिनियॉ त मेहतर कें पानि दैत छलै पफेर बाथरूम सापफ करैत छलै तैं मां ओकरा अछूते बुझैत छलथिन। रामू कपड़ा सापफ करऽ गेल छलै। राध नर्स क्रिश्चियन छै रसोई घर मे कोना जाएत। शंभु बाबूजीक नौकर छैन्ह ओ भोरे आमक पथिया लऽ बड़की दीदीक सासुर गेल छल एखन ध्रि घूरल नहि। साढ़े ग्यारह बाजि गेलै आध घंटा मे बाबूजी जूट मील सॅ आबि जेथिन आ खाना नहिबनलै। भोर मे सबके दवाई आ बार्ली बनाकऽ हम देने छलिए। खाना बनाबऽ हमरा अबितो नहिअछि। हारि-थाकि कऽ मां गेलीह रसाई घर मे। आलू उसनऽ लेल चुल्हि पर चढ़ौलनि। थारी मे चाउर तऽ कऽ सुनऽ बैसलीह। राध के कहलथिन सबके अनारक रस निकालिकऽ पीयाबऽ। हम कहलिएन्ह ‘मां आइ भोर सॅ दाई मां किछु नहिखयने छथि।’ मां झनकैत बजलीह-क्यो मना कयने छै? कियेक नहिखाइत छै? राध बात के नमरबैत बाजल हम त कतेक बकर खाय लेल पूछऽ गेलिए किछ खाइते नहिछै। हमरा चुप्प नहिरहि भेल-‘झुठी कहीं के। एको बेर दाई मां क रूम मे झांकऽ नहिगेल अछि। मां हम दाई मां कें दूध् दऽ अबिए? ‘हं, आ जँ साबूदाना या बार्ली खेतई तऽ दऽ दिहे बुखार उतरलै की नहिथर्मामीट लगाकऽ देख। चमेलियाक मांक बिमार पड़ने हमर हाथे-पैर टूटि गेल अछि।’ हम दूध् लऽ कऽ जाइत छलहुँ तऽ सुनलिऐ मां कें राध कहैत छलै-‘प्रिया कें दूध् लऽ कऽ कियेक जाय कहलिऐ फ्रलू के ध्ूत जल्दी पटैत छै। चमेलियाक मां के बुखार हेतै नहिओ भारे-भोर उठि कऽ नहाएत पूजा करत बड़का पूजारिन बनैए। हमहूँ सब तऽ जीसू के मानै छी। हम घुरिकऽ मां के कहलिएन्ह मां राध के कहि दिऔ दाई मां क आदगोई बदगोई बंद करय नहितऽ ओकरो बुखार लागि जेतै।’ - मां, कहलनि-‘अच्छा जो चुपचाप।’ ‘हम जल्दी जल्दी सीढ़ी पर चढ़ि दाई मां क रूम मे गेलहुॅ। माथ छू कऽ देखलिएन्ह-दाई मां आब के हम मन अछि?’ दूध् पी लिअ। दाई मां कहलनि-‘मोन बड्ड बेचैन लगैए। हम एखन दूध् नहिपीयब।’ ओहिठाम हरिया सूतल छलै। दाई मां दूध्क गिलास हरिया के दैत बजलीह ले दूध् पी ले। हम बूढ़ पुरनियॉ छी ठीक भइए जेत। हरिया गटागट दूध् पी गेलै हमरा नीक नहिलागल। आइ भोर मे हरिया नास्ता कंयनहि छल ओकर बाद आकरा बोखार लगलै। तैं हम दाई मां के कहलिए ‘पफेर दूध् लऽ कऽ अबै छी।’ दाई मां मना कऽ देलनि। कहलनि-नहिहमरा एक गिलास पानि दिअ आ पोटरी मे बान्हल धनक लावा छै आ गुड़ से खोलि कऽ दिअऽ।’ दाई मां लावा गुड़ खा, पानि पी नीचां उतरल। रसोई घर मे खिच््यड़ि चढ़ल छलै मां पीढ़ी पर बैसल छलीह राध पाछू मे ठाढ़ हुनका पंखा हौंकैत छल। दाई मां के देख कऽ मां बजलीह-‘चमेलिया मां कियेक नीचॉ उतरलें हम बना लेबै खिच््यड़ि आ साना।’ तइओ दाई मां रसाई मे जा कऽ आलू के ठंडा पानि मे रखलनि आलू बड्ड गलि गेल छलै। पफेर खिच््यड़ि के देखऽ गेलीह-हे भगवान! बहूरानी ई की बनेलहुँ? एतेक ने पानि ध्ऽ देलिऐ चाउर-दालि के पते नहिछै? ‘तऽ हम की करिए हमरा मानस घर मे गर्मी सॅ माथ ध्ूमऽ लगैए। आब जे भेलै से भेलै। अइमे नेबो गारि कऽ जूस जकॉ सबके पिआ देबै। आ, साहेब के? हुनको इएह जूस देबैन्ह?’ हम किछ नहिकरबै सब इएह खाएत चल राध हमरा माथ मे यूडिकोलोन लगा दे माथ पफाटल जाइए। आ हमर प्रिय मां गेलीह अपना रूममे। जिनगी मे शायद पहिल बेर मां रसोई घर मे गेल छलीह। दाई मां बड़बड़ाइत छलीह छह बच््याक मां छथि आ एकटा खिचड़ियो बनबऽ नहिअबैत छैन्ह। हमरा कहलनि-‘बुच््यी अहॉ ई खिचड़ीक जूस सबके दऽ आउ। हम साहेब लेल’ खाना बना दै छी।’ दाई मां कनि खिच््यड़ि अहूँ खा लिअ। ‘सुनू तऽ हमर बुच््यीक बात। अरे घर क मालिक एखन खयलनि नहिताबत हमहीं खाउ?’ बुखार सॅ ध्ीपल शरीर बेर-बेर पसीना पोछत पयपन वर्ष क प्रौढ़ा आ तकर एहन स्वामिभक्ति.......एतेक ममता। बाबूजी खाना खाय बैसलाह ताबत मां सैरिडानक दू टा गोली खा लेलनि आ बजैत छलीह-गृहस्थी औरत लेल बड़का अभिशाप छै। असल मे मां के अइबात क दुःख छलैन्ह जे सब एके बेर कियेक बिमार पड़ि गेल। सबसॅ वेशी कष्ट छलैन्ह जे हरिया आ दाई मां बिमार पड़लै। तैं बजैत छलीह जे आब महराज आयत तऽ ओकरा नौकरी सॅ हटाइए देबै हरबम गांव जइत रहैए। आई मां के मानस घर मे जाए पड़लनि खिच््यड़ि बनौलनि आ डाú गांगुली के अयलापर बच््याक रूम मे बैसऽ पड़लनि। बाबूजी तुरत आपिफस मे पफोन कऽ कालूरामजी के कहलथिन जे जल्दी ठेका पर काज करऽ बला रसोइया पठाउ। आ डाú गांगुली के पफोन प बहलथिन सांझि मे आबि कऽ पफेर रोगी सब के देख लेबैं’ हमर गाल थपथपबैत बजलाह ई हम्मर बहादुर बेटी अछि। ‘हं, ई तऽ खा-खा कऽ पहलवान भऽ गेल अछि। मां खौंझ कऽ बजलीह। नीक बात छै स्वस्थ अछि अंग्रेजी मे कहबी छै हेल्थ इज वेल्थ। अहॉ अहॉक खुश होमऽ चाही जे ई स्वस्थ अछि तैं अहॉक मदति कऽ रहल अछि।’ हुनका सुनल नहिभेलैन्हि। झट आर्डर देलनि-‘प्रिया जो सरोज के थर्मामीटर लगा कऽ देखहि।’ पता नहिकियेक आइ एतेक बात मोन पड़ि रहल अछि। घड़ि देखलहु रातुक बारह बाजि रहल छै। समुद्रक लहरि कें मंथर स्वर सुनाई पड़ैत छल। आइ सेतीस्टेपफा मे अन्तिम राति अछि। ऊठि कऽ बरांडा मे गेलहुँ। पूर्णिमाक राति छलै। चानी जकॉ चमकैत छै समुद्रक लहर। मंत्रा मुग्ध् बड़ी काल ध्रि निहारैत रहलहुँ पफेर कुर्सी पर बैस गेलहुँ। छिट-पफुट बहुत बात मोन पड़ल-इ सभ याद रहत-लिख सकबै? ठेकनाबऽ लगलहुँ हजारीबागक बात सब। बाबूजी आबि गेलाह। आब के तेल-मालिश करा कऽ रौद मे बैसत? पफेर सुसुम पानि मे नीमक पात घऽ नहाओत। मां क सब योजना पफेल भऽ जाइत छैन्हि। रोज सांझि मे गरम-गरम नास्ता बनै छल बदलि-बदलिकर बाबूजी के बुझल छै माहाराज कें हन नास्ता भोजन बनबैत छथि तै ँ सोहन महाराज कें ठेका पर बजालेलथिन। ओ नास्ता मे कहियो समोसा बनबैत छल तऽ कहियो गरम-गरम जिलेबी, कहियो आलू -मटर भरल कचौड़ी आ सूजीक हलुआ। सोहन महाराज के छुआ-छूति के रोग नहिछलैन्ह। तै ँ दाई मां हमर पसिन्न के आटॉ बला हलूआ बना दैत छलीह गुड़ ध्ऽ कऽ। एक दिन प्रोग्राम बनल हजारी बाग सॅ सौ मील दूर रॉचीक हुडरूपफॉल पिकनिक पर जयबाक। बाबूजीक संग तीन टा गाड़ी आयल छलै। भरतीय जी आ बाबूजी पहिने रॉची चलि गेल छलाह पिकनिक मे ओतई सॅ पहँुचता। मां ओतऽ जयबा लेल किन्नहु राजी नहिभऽ रहल छलीह। बाबूजीक बहुत आग्रह पर तैयार भेलीह मुदा हुनकर शर्त छलैन्ह-अलगे गाड़ी मे जयतीह संग मे राध नर्स रहतैन्ह आ हरिया। मां क टिपिफन भोरे चारी बजे उठि कऽ दाई मां बनौने छलथिन-घी मे छानल नरम-नरम पुरी, आलू-मटर कू सूखल भूजिया आ नीबूक अंचार, छेनाक संदेश, थर्मस मे संतराक जूस। एकटा अटैची मै चारि टा तौलिया, साड़ी ब्लााउज, पेटीकोट, माथ दर्द क दवाई, उल्टीक दवाई, पेट ददर्क दवाई आ हार्ट बाला दवाई। दून्नू भाई बाबूूजीक संग आगॉवला गाड़ी पर बैसलाइ। दादी मां घरक रखवारी करऽ डेरा पर छलीह। हुनकर कहब छलैन्ह हम की करऽ जायब कोनो कुम्भ के मेला छै। जखन गाड़ी स्टार्ट होमऽ लगलै तऽ मां आर्डर देलथिन एकटा बच्चा के हमरा संग बैसा दिउनै सब एके ठामा रहत तऽ उफध्म मचा देत। राध गेट खोलैत बाजल-‘आउ प्रिया अहाँ मां लग बैसू’। ‘नहिहम नहिउतरब।’ नहिजानि कोना आइ हमरा मुँह सॅ विद्रोह स्वर बहराएल। नहिसुनिते मां क पारा गरम भऽ गेलैन्हि। जोर सॅ बजलीह ‘उतरैत छेँ की नहि?’ हरिया जो ओकरा लऽआ। मन मे भेल कहिऐ-मां, हमर कोन काज पड़ि गेल? मुदा हिम्मत नहिभेल। ऑखि नोरा गेल। तऽ मां राध के कहलथिन- ‘सरोज बात नहिमानैत आ बिल्लू तऽ बानरे छै भरि बाट तबाह कऽ दैत।’ नीलू मां क दुलरूआ छै तैँ ओ कोना मे खिड़की लग बैसल छल। एकटा हमहीं दब्बू छी जे मां क हुकूम पर नचैत छलहुँ। सुनसान रास्ता मे मां राध सॅ बतिआइत रहलीह। ‘राध! हम तऽ पफेर अस्वस्थ भऽ गेलहुँ। दस दिन मे जे कनि सुधर भेल छल सब चौपट भऽ गेल। साहेब जहिया सॅ अयलाह हरदम हंगामा होइते रहैत छै बच्चाक संग बच्चे बनि गेलाह। संग मे दूचारि टा सब दिन दोस्त रहिते छैन्ह। हमर एहन शरीर, अहाँ तऽ कहियो स्वस्थ रहितेनहिछी!’ अरे हंम की स्वस्थ रहब। एतेक ध्यिा-पुता के पालब पोसब आसान छै। किछुए दिन पहिले देखलहुँ ने बरसात मे सब बिमार पड़ल छल। ‘हं, गांगुली बाबू तऽ कहनहि छलाह-अहाँ के ँ एखन आराम करऽ चाही।’ घुर! हमार नसीब मे आराम लिखले नहिअछि। जहियासॅ साहेब अयलाह अछि रोज घोड़ दौडे़ भऽ रहल अछि। ‘सत्ते कहैत छी। आब दूपहरो मे बच््या सभ हल्ला गुल्ला करिते रहे छै। क्यो नहिसूतै छै।’ ‘राध। हमर सभक जिनगी मे खुशी कहाँ? जहिया सॅ विवाह भेल साले-साल बच््या पर बच््या। एकटा लड़कातऽ मुइले जन्म लेने छल। पहिल बेटी आठ वर्षक उम्र मे मुइल। चारिबेर तऽ ओगण ;एबसिनद्ध भेल। शरीर मे शक्ति रहत कोना? सुमित्रा के देखियौ चौदहम मे ब्याह भेलै आ पन्द्रहम मे बुल्ली भऽ गेलै।’ -‘ह, ई उम्र मे कतहु बच््या होइ?’ अटाòईस वर्ष क उम्र मे चारि-चारिटा बच््या। तैं बुल्ली आ नीलू के हम अपने लग रखैत छिए। ऊ त चमेलियाक मां छै जे सबके सम्हारै छै। ‘घुर, चमेलियाक मां कोन जोकरक छै। एकदम गंवार छै कनिको अक्किल नहि। प्रिया पर कोन जादू कयने छै जे अहां सॅ वेशी मोजर प्रिया ओकरे दैत छथि।’ दू घंटा सॅ गप्प पर गप्प होइत रहल अछि। राध दाई मां के देखऽ नहिचाहै’छ तैं मौका तकैत रहै’छ हुनका विरोध् मे बजबाक। हम खिड़की सॅ बाहर माथ झुकौने नागपुरक पहाड़, जंगल आ आकाश् मे घुमड़ैत बादल देख रहल छलहुँ। गप्प बंद भेलै तऽ मां क ध्यान इम्हर भेलैन्हि। हमरा कहलनि-‘खिड़की बन्द कर ठंढ़ा लगतौ।’ पफेर हुकुम भेल-‘सोझ भऽ कऽ बैस मुदा बजबाक साहस नहिभेल। सुसू करबाक छल से हो हिम्मत नहिकोना बाजू? ऑखि नोरा गेल। अइ घर मे दाई मां क सिवाय आर क्यो हमर जरूरत नहिबूझै’छ। हम अपना के एकदम एसगर बुझैत रहलहुँ अछि। अनचाही सन्तान से हो बेटी! पेट मे दर्द होमऽ लागल बुझाइत छल आब उल्टी भऽ जाएत। एकाएक उल्टी भइए गेल। से हो मां क देह पर! जुलूम भऽ गेलै। मां जोर से बजलीह-‘गाड़ी रोकू, ड्राइवर जी।’ राध पफरके चिचिआइत छल। हमरा सम्पूर्णशरीर ऐंठ रहल छल आ भयभीतभऽ मां दिस तकैत छलहुँ। ई हम की कयलहुँ? मां क चेहरा सॅ घृणा आ जुगुप्साक भाव झलकैत छल। मां के तऽ मेहतरक नामे सुनि कऽ जी ओकिआए लगैत छैन्ह। गाड़ी रूकल। ड्राइवर-दौड़ल पानि आनऽ। मुदा पानि कतऽ भेँटतै? पछिला गाड़ी मे पानि बला थर्मस छलै। मां काठक मुरूत जकां ठाढ़ छलीह सड़क पर। राध तौलिया भीजाक उल्टी सापफ कयलक। मां कुरूर कयलनि। राध हुनका कपड़ा बदलि देलकैन्हि। मां बजैत छलीह-हमरा जी ओकिआ रहल अछि। राध जल्दी-जल्दी गाड़ी सापफ कऽ यूडी कोलोन छीटलक। मां गाड़ी मे बैसलीह। सरोज आ नीलू झाड़िक अढ़ मे सुसूकरऽ गेल। बुल्ली सड़के पर ठाढ़े ठाढ़ पेशाब कयलक। मुदा हमरा एखनो बकौर लागल छल कुरूर करबा लेल एक गिलास पानियो मांगबाक हिम्मत नहिभेल। मुँहक स्वाद खटाइन लगैत छल। आब मां क ध्यान हमरा दिस भेलैन्ह। राध के कहलथिन हाथ-मूँह छोआ कऽ कपड़ा बदलऽ। ताबत नीलू के हरिया मांक गाड़ी मे बैसौलक। हम दोसर गाड़ी मे खिड़की लग बैसलहुँ। बुल्ली कहलक हम अपन सीट सॅ नहिहटबै। सरोज बाजल-ले हमहीं बीच सॅ उठि जाइत छी। कोन ठेकान पफेर उल्टी हेतै तऽ? बुल्ली आ सरोज दूनू हमरा सॅ हटि कऽ बैसल। आगाँ गाड़ी गेलै तऽ देखलहुँ-बाबूजी गाड़ी रोकि कऽ ठाढ़ छथि। की भेलै? गाड़ी कतहु रूकलै छल? मां झुझलाकऽ सबटा बात कहलथिन। बाबूजी चिन्तित भऽ हमरा लग आबिकऽ पूछलनि बौआ, आब केहन मोन छौ? एखनो जी हौडै छी? अजय, एकरा जमाइन दहिं।’ मन विहवल भऽ गेल अपना के संयत कयलहुँ। हंडरू पफाल पर सब नीचां उतरि स्नान करऽ गेल। मां हमरा मना कऽ देलैन्ह। पफेर मोन खराब भऽ जेतै प्रतिवाद करबाक हिम्मते नहिभेल। राध दिस ताकि कऽ मां बजलीह-उल्टीक दुर्गंध् सॅ माथ मे दर्द भऽ रहल अछि ऊपर सॅ ई रौद! मां चटाðनक सीढ़ी पर उतरियो ने सकैत छलीह। तैं मां आ हम रहि गेलहुँ। राध मां क पैर जॅतैत छलीह। हम चुपचाप सीढ़ी दिस तकैत छलहुँ। दूर सँ अबैत झर-झर झरनाक स्वर कान मे जा पूछैत छल-उल्टी भेल ताहि मे हमर कोन दोष? खूब ऊपर पहाड़, पहाड़ सॅ झहरैत पानिके झर-झा स्वर! मोने मन होइत छल मां, एहन अपूर्व सुख के कियेक नकारैत रहैत छथि आ अपना-संग-संग हमरो छोट-छोट सुख सॅ वंचित रखैत छथि? आध घंटाक भीतर राम सिंह ड्राइभर दौडै़त आयल। -‘बड़ा बाबूक पैर मे चोट लागि गेलैन्हि दू गोटे सहारा दऽ ऊपर आनि रहल छैन्हि।’ ‘की भेलै? की वेशी चोट लगलैए? घबराहट मे बड़बड़ाइत छलीह-पहाड़ पर चलबाक अभ्यास नहिछै। किछ भऽ जेतै तऽ? एक ने एक आपफत अबिते रहै छ। हमर मोन ठीक हेएत कोना? कहियो शान्ति सॅ समय बीतैत अछि?’ ताबत बाबूजी के सहारा दऽ हरिया अबैत छला। चोट गंभीर छले। दिहिना पैर क घुठòीक हड्डी निकलि गेल छलैन्ह। पन्ना महराज जल्दी सॅ चूना लऽ कऽ अयलाह। मां ध्यिा-पुता दऽ पूछलथिन- ‘विजय आ अजय कत छै। आ तीनू छोटका?’ बाबूजी कहलथिन -‘नहा कऽ अबिते हेतै। एलैए मौज-मस्ती करऽ।’ ‘भेलै खूब मौज-मस्ती भऽ गेलै। भाई जी। आब हम हिनका लऽ कऽ कलकत्ता जायब। कहीं पैर मे अबाह भऽ जेतैन्ह।’ मां क जिद्द क आगॉ ककरो वश नहिचललै। हजारी बाग जयबाक बदला दू गाड़ी मे मां, बाबूजी, बड़का भैया, बालू जी, हरिया आ राध पुरूलियाक बाट दिस बढ़़ल। एकटा गाड़ी मे छोटका भैयाक संग हम सब हजारीबाग घुरलहुँ। दू दिनक बाद पूरा लाव-लश्कर कलकत्ता चलल। सत्ते बाबूजी के चोट गंभ्ज्ञीर छलैन्ह। छह मास घरि ओ लंगारा क चलैत छलाह। आ मां सब दिन हुडरूपफालक पिकनिक मादे बजैत छलीह। एहिना हमरा लोकनि प्रत्येक साल मां क संग पश्चिमक हवा मे सॉस लेबऽ कहियो देवघर कहियो जसीडीह कहियो रॉची-तऽ कहियो हजारीबाग जाइत छलहुँ। हं, एक बेर ‘पुरी’ गेल छलहुँ कुल मिला कऽ सोलह वषक उम्रध्रि मां क संग हमर वार्षिक छुटीð बीतल छल। जाहि मे सब खेप हम एक-एक दिन गनैत बीतबैत छलहुँ जे कहिया ई छुटीð खत्म हेत आ स्वास्थ लाभक कर्म कांड सॅ पिंड छूटत। जहिया ट्रेन सॅ घुरैत छलहँुतऽ बंगालक हरियरि देखते थप्पड़ी पीटैत छलहुँ-‘सरोज देख, देख ने बाहर कतेक नीक लगैत छै धनक खेत। आ देखहि ने आम-कटहर बला गाछी। कतहुँ घरक चार पर सजमनि आ छिंगुनीक लती छलै तऽ कतहु खेत। आ देखहि ने आ छिंगुनीक लती छलै छलै तऽ कतहु कदीमाक लती। एक पतिआनि सॅ नारियरक गाछ बड़ड नीक लगैत छलै देख मे। बंगालक भूमि जत ने गर्दा-ध्ूल ने खालि परती पॉतर! सौन्हगर माटिक महक सॅ मनात प्रपफुल्लित भऽ जाइत छल नयन हरियरि देख जुड़ाइत छल। हमसब महालयाक दोसर दिन जाइत छलहुँ। पाँच-सात दिन छुरछुरि पटाखाक छोड़ में बीतैत छल। मां सॅ चोराऽ कऽ छोटका भैया दू सौ अनार बनबाकऽ अनैत छलाह एहि मे लछमिनियाँक पूरा सहयोग हुनका भेँटैत छलैन्हि। दिवालीक चारि-पाँच दिनक बाद पफेर घर क सोझा मे स्कूलक बस ठाढ़ होइत छलै। किताब-कॉपी लऽ जल्दी जल्दी भगैत छलहुँ बुझू जे जेल सॅ कैदी भगैत होई। सत्ते हमरा घर जेलखाना बुझाइत छल। कनि पैघ भेलहुँ तऽ बोर्डिग हाउस मे रहऽ लगलहुँ। हमरा स्कूलक दुनियॉ बड्ड प्रिय छल। संगी सभक स्नेह भेंटैत छल। शिक्षिका प्रशंसा करैत छलीह। बहन जी मां क स्थान लऽ लेलैन्ह। हुनक घवल वस्त्रा में श्वेत केश मे आ शु( आचरण तक कतहु बनाबटीपन नहिनजरि अबैत छल। हमर समस्त समस्याक व्यवहारिक समाधन करैत छलीह बड़ी बहन जी। ककरो बुझौ ने दैत छलथिन। कहियो मां के जाऽ कऽ बुझबैत छलथिन कहियो पफोन पर कहैत छलथिन-‘प्रिया के एनú सीú सीú कैम्प मे जाए दिऔ।’ आब दाई मां लग बैसऽ मे मोन नहिलगैत छल। आब हमरा लग छल मन लग्गु किताब आ संगी सहेली, आब दाई मां साल मे दू बेर कऽ गामो जाइत छलीह। हं एखनो राति मे माथ मे तेल घऽ चोटी बनेनाई आ तरबा मे बिनु तेल लगौने हुनकर मोन नहिमानैत छलैन्हि। बीú एú मे जाइते हमरा संग पढ़वाली संगी सभक एकां एकी ब्याह होमऽ लगलै। सब से पहिने पुष्पा इंदौर चलि गेलीह। सुनीता बम्बई चलि गेलै। विभा पढ़ऽ दिल्ली चलि गेल आ सुध के ब्याह भऽ गेलै। एकटा हमहीं मारवाड़ी प्रेसिडंेसी कॉलेज मे पढ़ि रहल छलहुँ। नव संगी, नया महौल को-एजूकेशन बला कॉलेज। विद्वान प्रोपफेसर सब। आब बुझाना जाइछ जे आर्य कन्या महाविद्यालयक बहिन जी के कतेक कम ज्ञान छलैन्ह। मुदा ओ हमर घर छल। बाहरी दुनियाँ मे आब पैर रखलहुँ अछि। किलाक पूब बला पहाड़ि पर सांझुक झल-पफल दृष्टिगोचर भेल। नहुँ-नहुँ बसात पफूल पात के छुबि रहल छै। अचानक नजरि गेल शान्त समुद्रक लहरि केँ डूबैत सूर्य देख खितिज दिस लहराइत। आकाश मे अन्हार पसरल जाइत छै आ सब दिस परछॉही कें पकड़ि पबैत छी? सबटा कोना मिझराएल जाइछ। सुखःदुख, ध्ूप-छाँह रोशनी मे सभक भुतिएनाई। कतऽ कतऽ ताकू? मोनक कोन-कोन कोना मे झाँकू? जिनगी केहन रहस्यमय भऽ जाइत छै जखन अहाँ ओकरा आखर मे अभिव्यक्त नहिकऽ पबैत छी। जखन कि अहाँ प्रयत्नशील रहैत छी पारदर्शिता देखयबा लेल। मुदा कि जिनगी कें सिसोहि कऽ व्यक्त कयल जा सकै’छ? ऊँच आर ऊँच हिलोर लैत लहरि। सूर्य निपत्ता भऽ गेलाह समुद्रक पफेन में। ओना लाली खत्म नहिभेलैए। हम मुग्ध् भऽ देख रहल छी समुद्र में नील आ लाल रंग क छिड़काव। शान्त, निस्तब्ध् गोध्ूलि बेर, हल्लुक सन स्पर्श सॅ जेना एक क्षण लेल सब किछु ठहरि गेल होइ पुनः सांझ बसातक ऑचर पकड़ि क्षितिज दिस भगैत अछि। आ हमरा भीतर एक टा सुप्त वेदना सिसकि उठै’छ। थाकल सांसक संग हमर ऑखि दूर-दूर ध्रि-अन्हार मे किछ टटोलि रहल अछि। स्मृतिक अयना मे एक पर एक झलकै’छ। पहिने की सोचू आ ककरा पाछू धकेल दिअ। कल्हुका गोछूली वेला मोन पड़ल। भरि दिन बरसैत पानि प्लम ब्रॉडी.......... पफेर अतीतक घटना क विषय मे सोचैत-सोचैत सूति रहब।भोर मे कॉपफी क कप। मोन पड़ै’छ तहिया हम बीú एú अन्तिम वर्ष मे छलहुँ। मूसलाधर वर्षा भेल छलै। सड़क पर बुझाइत रहेै जे नदि बहि रहल छै। घर जेनाई असंभव छल। किछ लड़का-लड़की जकर घर लग छलै से हाथ पकड़ि-पकड़ि पानि ठेलैत आगॉ जाइत छल। संझुका साढ़े चारिए बाजल छलै। दूर जकर घर छै से कोना जाएत? हमर एकटा सहपाठी असीम लैंस डाउन रोड लग रहैत छल। सीध सादा लड़का। देखबा मे खूब सुन्दर। प्रायः लाइब्रेरी सॅ घुरैत कावल ओकरे संग बतिआइत घर घुरैत छलहुँ। ओकरे कहलिए-‘चलब पैदल।’ -‘एतेक डॉर भरि पानि मे?’ ‘केहन डरपोक छी?’ ‘वेश चलू।’ रमेश बाबू हमर दर्शन विभागक प्रोपफेसर, ओहि ठाम ठाढ़ छलाह। -‘ई प्रिया जे अछि..... हम झटकि कऽ बदलहुँ जेना किछ नहिसुनने होई। दू घंटा मे हम सब लैंस डाउन रोड के मोड़ घरि पहुचलहुँ। पानि डॉर सॅ कनी ऊपरे छल से पैर जेना एक-एक मन के भारि भऽ गेल छल। डेग उठाबी तऽ लगैत रहए जे आब खसलहुँ। शायद इएह हाल छलै असीम के मुदा ओ एकदम चुप्प छल डरपोक क विश् ोषण सुनि। दूनू एक-दोसर के सहारा दऽ बढ़ैत छलहुँ। म(िम इजोत मे चारू भर पानिए पानि देखाइत छल ताहि मे डूबल गाड़ी, बस। चलैत अभरल एक टू टा रिक्सा या मिलिट्री या पुलिसक जीप। आब एलगीन रोड क मोड़ पर छी। -‘असीम, आब कतेक चलऽ पड़त?’ ‘झोसीक रानी! थाकि गेलहुँ?’ ‘नहिचलू।’ पफेर हिम्मत कऽ आगाँ बढ़लहुँ। बेचारा असीम अपने अध्मरू भऽ गेल छल मुदा की बाजत? हम ओकर हाथ छोड़ि देलिए। -‘प्रिया आगॉ ख(ा छै आ मैन होल खुजल छै सम्हरि कऽ चलू।’ -‘अहॉ अपन ध्यान राखू।’ तखने कात दऽ एकटा रिक्सा जाइत छलै। पूछलक ‘जरूरी अछि’? हमरा बाजऽ सॅ पहिने असीम बाजल ‘हं भाई रूकऽ। सर्दन एवेन्यू जयबाक अछि।’ ‘पच््यीस टका लेब से हो एडवांस।’ हम सब अपन-अपन पाई देखलहुँ। तय भेलै जे पाँचटका घर पहुँचला पर देबै। घड़ी मे साढ़े सात बाजि रहल छले। दूनू गोटे रिक्स पर बैसलहुँ। ध्ीरे-ध्ीरे वर्षा भऽ रहल छलै। रिक्सावला पर्दा लगा देलकै। थाकल देह मन के राहल भेँटल असीम हाथ सॅ हमरा कान्ह पर कसियारिक पकड़ने छल जोर बढ़ले जाइत छलै। ओ पागल जकॉ हमरा चूमि रहल छल। उन्नमाद.....? एहन उन्माद? नहिइ देहक र्ध्म छै एकरा नकारल नहिजा सकै’छ। सुखद अनुभूतिक तात्कालिकता मे के नहिबहकि जाए। हमरो ठोर ओकरा ठोर सॅ सटल पफेर लजाक मुँह घुमा लेलहुॅ। मुदा ओ आर कसिकऽ पकड़ि लोलक दूनूक सांस भिझरा गेल कि तखने रिक्सा रूकलै। पर्दा उठा रिक्सावला बाजल-हम कनि सुस्ता लैत छी। हम दूनू गोटे विहुँसलहुँ। बड्ड मासूम, निर्दोष छल ओ मुस्कान। नीक परिवारक सज्श्न लड़का जकरा प्रोपफेसर कहैत छलै भालो छेले।’ ‘भालो छेले’ कहएबा लेल प्रेसीडेंसी कॉलेज मे किछ विशेष विशिष्टा जरूरी छलै। ओ कोनो पैघ डाक्टर, बैरिस्टर वा आईúएúएसú के बेटा होई। बीड़ी-सिगरेटक आदत नहिहोइ। लड़कीक चक्कर नहिलगबैत होमए। मृदु भाषी शिष्ट व्यवहार, मेघावी आ सुदर्शन होमए। विश्वविद्यालय मे प्रथम या द्वितीए स्थाना होइ। असीम सॅ पालिटिकल सांइसक लेक्चरर आ विभाग अध्यक्ष के इएह अपेक्षा छलैन्ह। दर्शन विभागक हेड आपफ डिपटिमेंट डाú सुखमय चटर्जी एक दिन हमरा बजा कऽ पूछलैन्ह-‘अहॉक भविष्यक योजना की अछि? -‘कहियो सोचलहु नहि, मुदा आक्सपफोर्ड या कैंब्रिज मे पढ़बाक मन अछि।’ ‘की प्रोपफेसर बनऽ चाहैत छी?’ ‘नहिबैरिस्टर।’ -‘ठीक छै। तखन प्रथम आ द्वितीय स्थान मंजुला आ सुबोध् लेल रहऽ दिऔ।’ कॉलेज में लड़का संग पढैतौ हमरा कोनो लड़का सॅ विशेष सम्पर्क नहिछल ने क्यो तेहन प्रिय। असलमे हमरा औरतपना सॅ चीढ़ छल। एकर परिभाषा छलै क्ला समे ताक-झांक, रोमांटिक बातचित, रूमानी कल्पना पफेर विवाहक सपना। सबटा बकवास। मुदा सरिपहुँ नीक लागल छल युवा शरीर क स्पर्श, आलिंगन, उत्तेजित गर्म साँस, चुम्बन आ ओ सिहरन! घर पहुँचैत-पहुँचैत रातुक नो बाजि गेल। बहुत बात सुनऽ पड़ल कियेक तऽ बड़का भैया पुलिसक जीप लऽ कॉलेज पहुँचलछलाह हमरा आनऽ। ओतऽ पता लगलैन्ह हम दोस्त संग पैदल विदा भेलहुँ। मुदा हमरा ककरो बात क असर कहॉ पड़ल। मां की सभ बजलीह बुझबो नहिके लिए। हम तऽ अजीब नशा मे मद्मस्त छलहुँ। रग-रग कसमसा रहल छल। सपने देखैत राति बीतल। भोर होइत-होइत बहुत तेज बोखार भऽ गेल। तीन-चारि दिन घरि बोखाकर नहिउतरल तखन खून टेस्ट कराओल गेल। डॉक्टर गांगुली कहलथिन-‘टायपफॉयड छै।’ मतलब कम से कम पन्द्रह दिन घरि कॉलेज जेनाई बंद। हमरा इ सुनि नीके लागल। पता नहिकियेक हम दोबरा असीम सॅ भेंट नहिकरऽ चाहैत छलहुँ। अपन देह के एना अपका भेनाई नीक नहिलागल छल। आ प्रेम? हमरा न ककरो सॅ प्रेम करबाक अछि ने ककरो सॅ विवाह। विवाह पफेर बच््या। ऊँ हूँ!! मां केँ कहियो सुखी नहिदेखलिऐन्ह। ओना उपन्यास मे पढ़ने छलहुँ जे बच््या भेला पर औरत सम्पूर्ण होइछ। मुदा मां तऽ अपन बच््या पर हरदम कुपित रहैत छथि। सदति काल खौझाएल। देखैत छिए जे बड़की दीदी के चारिटा बच््या छैन्ह तखनहुँ सम्पूर्ण कहाँ छथि हरदम माथे दर्द होइत रहैत छैन्ह हरदम झखैत रहैत छथि। आ सल्लो दीदी के माइग्रेन सॅ छटपटाइत देखैत छिऐन्ह। बड़की भाभी के सतत् घुटन महसूस होइत छैन्ह। ककरो खुश नहिदेखैत छी। हमरा जनैत जे समाजक बनल Úेम मे अपना कें कोनो तरहें पिुट नहिकऽ पबैछ ओ अपना नजरि मे खसिते नहिअछि बल्कि अपना पर संदेशों करऽ लगैत अछि। इम्हर किछ दिन सॅ अड़ोसी-पड़ोसी आ सर-सम्बन्ध्ी सरोज आ हमरा ब्याह लेल बड्ड उत्सुक छल-‘बेटीक ब्याह नहिकरबै थी? अजग भऽ गेल कतेक दिन घर मे बैसाने रहबै?.... बड़की दीदी घोषित कयलनि हम बेटीक ब्याह कऽ रहल छी’। नीलू हमरा सॅ छमास छोट अछि। मां सरोेज लेल जे सांढक वस्तु ओरिऔने छलीह सबटा नीलू के दऽ देलथिन। भात मे मामाक घर सॅ जतबा टका जाय चाही तकर दुगुना समान गेलै। क्यो ई नहिबूझय जे टकाक अभाव मे विवाह नहिभऽ रहल छै। ताहि दिन आर्थिक स्थिति नीक छलै आ सरोज के लेल चूँकी ओ डाक्टरी पढ़ि रहल छलै कतेको वर के प्रोपोजल अबैत छलै मुदा ओ मना कऽ दैत छलै। हं, हमरा लेल कहियो कोनो ठाम सॅ प्रस्ताव नहिआयल छल। हम अपनो नजरि मे कुरूप छलहुँ। कॉलेज मे जॅ कोनो लड़का हाथ बढ़ावऽ चाहैत छल तऽ ओकरा तेना डपटि दैत छलिऐ जे ओकरा सिटीð-पिटीð गुम्म भऽ जाइत छलै। टाइपफॉयड सॅ मुक्त भऽ जखन कॉलेज गेलहुँ तऽ हमरा देखि कऽ असीम प्रसन्न भऽ बाजल-‘कॉपफी पीअ चलब?’ हम एकदम रूखऽ उतारा देलिऐ-‘नहि।’ बस मे हम सब चढ़लहुँ संगहि मुदा संग उतरलहुँ नहि। हम कहलिए-‘हमरा गरियाहाट बड़की दीदीक ओतऽ जयबाक अछि।’ ओकर खुलम खुल्ला उपेक्षा करऽ लगलहुँ। ओ जतबे हमरा मे सटऽ चाहैत छल हम ओतबे दूर हटैत छलहुँ। औ घंटो बस स्टॉप पर हमर प्रतीक्षा करैत छल। आ हम या तऽ तखन कॉमन रूम सॅ बहराइते नहिछलहुँ या आन बस पर संगी सबक संग चढ़ैत छलहुँ। एक दिन ओ एसगर मे भेंटल। हमरा सॅ नाराज छी?’ ‘नहितऽ’ ‘तखन एना दूर-दूर कियेक रहैत छी?’ ‘सापफ बात छै। अहॉ जे चाहैत छी से हम नहिदऽ सकैत छी।’ ‘हम प्रतीक्षा करब। सत्य कहैत छी प्रिया! हम आजीवन प्रतीक्षा करब।’ ‘हमरा देवदास वला लचपच भावुकता सॅ सख्त चीढ़ होइछ।’ अइ तरहक अपमान सॅ ओकर चेहरा स्याह भऽ गेलै। ओ बाजल-‘प्रिया अहाँ एहन कठोर कोना भऽ गेलहुँ। हम देवदास बनबाक दावा कखनौ नहिकयलहुँ।’ ‘तऽ आजीवन प्रतीक्षाक बात कोना बजलहुँ?’ ‘प्रतीक्षा करबा मे आ तिल तिल कऽ मारऽ मे पफर्क होइत छै।’ ‘हम बुझलहुँ नहि।’ बुझि जेबई एक दिन। हम चाहैत छी अहाँ कें। मनींह एकहि क्षण हमरा भेंटल, यदि क्यो दोसर देत तऽ ओकरा अपन बना लेब मुदा अहाँ कें कहियो बिसरब नहि। प्रिया! अहाँके क्षण भरि जकरा स्पर्श भेंटतै ओ कहियो नहिबिसरत। ‘छोडूजखन ककरो संग चलिए जायब तखन कोन बातक दावाक बात करैत छी? जाऊ, प्रतीक्षा करबाक कोन प्रयोजन?’ ‘ओह! आब बुझलहुँ। अहाँ अपना जिनगी मे एकटा आरक्षित स्थान राखऽ चाहैत छी?’ ‘मतलब ?’ ‘मतलब इएह जे हम प्रेम करैत छी आ ई एकटा एहन मध्ुर स्वप्न अछि जे हम चाहब आजीवन ई जीवंत रहए ....... मुदा आरक्षित स्थानक पूरक भऽ रहब.......? ऊ हूँ! प्रिया हम एहन सस्ता नहिछी।’ तखन ओकर बात क सही अर्थ नहिबुझने छलिऐ आ ने बुझबाक प्रयास कयने छलहुँ। ताहि दिन हमरा एकटा ध्ुन सवार छल अपन प्रत्येक कोमलभावना के थकुचबाक आ एना मे आनन्द भेंटैत छल। एकदम पुरखाह स्वभाव भेल जाइत छल। हं, कतेको वर्षक बाद एक दिन ओकरा सॅ भेँट भेल छल। हम जर्मनीक बिजनेस ट्रीप सॅ घुरल छलहुँ। एयर इंडियाक फ्रलाइट मे भेंटल। ओ अपना पत्नीक संग भारत आबि रहल छल। बाबाक मृत्युक बाद असीम लन्दन मे अपना मौसीक संग रहऽ लागल। बार एट लॉ ओहिठाम कयलक। विवाहो भेलै लंदने मे। मांक देहान्त भऽ गेल छलै बच््या छल तखने। मौसी अमीर छलै आ सगरे छलै। कोनो अंग्रेज सॅ ब्याह कयने छलै ताहि अपराध् मे लंदनक कारावास मे बन्द छलै। पीटर कहिया ने छोड़ि देने छलै आब कोन मुँह लऽ बंगाल घुरैत! -‘एखन कोनो काज सॅ भारत जा रहल छी?’ ‘हं, पुरनका स्मरण के ताजा करऽ।’ ओकर ऑखि मे पुरना स्वप्नक इन्द्रध्नुषी रंग अभरल। असीम कहलक-‘व्यापार मे लागल छी?’ ‘से कोना बुझलहुँ?’ ‘इंडिया टुडे’ मे अहॉक विषय मे पढ़ने छलहुँ। अहाँ सब दिन विद्रोही ए रहलहुँ।’ -‘असीम! आब तऽ विद्रोहक भाषा बिसरि गेलहुँ। हम चाहैत छी जिनगी मे क्रान्ति! हम अपन जिनगीक खालि पन्ना पर अपने तारीख लिखलहुँ अछि।’ ‘की एतेक एसगर चलब जरूरी छै? एहन त भऽ ने सकै’छ जे अहाँ पर ककरो नजरि नहिपड़ल होइ?’ ‘हम तऽ एक बच््याक मां छी।’ ‘मुदा इंडिया टुडे मे एकर कोनो चर्चा नहिछै?’ ‘हम रहैत छी एसगरे।’ ‘ओह।’ ‘असीमक ऑखि मे एखनहुँ एकटा अजीब सन पिआस झलकल। की एकर पत्नी पिआस केँ तृप्त नहिकऽ सकलै? के ककरा तृप्त कऽ पबैत छै? हम जकरा लेल अपन जिनगीक होम कयलहुँ से संतुष्ट अछि?’ ‘ए प्रिया! की सोचऽ लगलहुँ एहन व्यथा वेदनाक भाव!’ ‘नहि, किध् नहि! जाउ अहॉ अपन पत्नीक संग बैसू।’ ‘की हम अहॉक मित्रा नहिछी? अपन कार्ड नहिदेब?’ हमर कार्ड खत्म भऽ गेल अछि। अहों अपन कार्ड दिअ हम करब सम्पर्क।’ ‘जरूर देब। जहिया लंदन जाउ सम्पर्क करब। हमर ऑपिफस पार्क एवेन्यु मे अछि ताकऽ मे कोनो दिक्कत नहिहेत।’ ओकर पैघ-पैघ ऑखि हमरे पर गड़ल छलै। पफेर हमरा ओकरा ऑखि मे पुरनका पिआस बझलकल आ एतेक वर्षक बादो हम पफेर महिलाक अई पक्ष कें नकारि देलिए जकरा कारण बेर-बेर ठगाइत छी। कहि नहिभेल जे असीम अहूँ विवाहित छी हमरा की दऽ सकब? आ हमरे आब की बॉचल अछि? बहुत कानि लेलहुँ। प्रेम कऽ ओई पुरूषक लेल अपन आधा जिनगी कनैत बीतेलहुँ। नहिअसीम! नहि!! आब ऑखि मे नोर सूखा गेल आब हिम्मत नहिबांचल अछि कानबाक! आ सबसॅ पैघ बात ई छै जे हम भ्रम मे जी नहिसकैछी। आ ‘प्रेम’ ओ उठैत-खसैत लहरि छै मात्रा मृग मरीचिका। हम प्रेम क कोनो वैश्विक परिभाषा नहिकऽ रहल छी। ई हमर निजी अनुभवक निचोड़ अछि। आ अपन तित-मीठ अनुभव कें के नकारि पबै’छ? लोक ओकरे दोहर बैत छै जकर अभ्यास रहैत छै। प्रेम नहिकरबाक अभ्यस्त भऽ गेल छी। हं, सत्ते कहैत छी ‘असीम’ आब कानि यो ने सकब? मुदा असीम के हम किछ नहिकहलिऐ। चुपचाप हाथक किताब मे ऑखि गड़ौने बैसल छलहुँ। विमान दिल्लीक हवाई अडाó पर उतरि रहल छल। ओ उठिकऽ पत्नी लग जा कऽ बैसल पत्नीक बगल मे गुलथुल चारि सालक बच््या बैसल छलै। पत्नी खूब सुन्दरि शालीन छलै। सुखी जिनगी बुझना जाइछ तखन ओकरा ऑखि मे ओ पुरनका पिआस कोना झलकलै? हमरा लोकनि हजारों वर्ष सॅ किछ रोमांटिक शब्द सॅ मन-मानस कें अनुकूलित नहिकयने छी? मुदा एक सपना कें पिआस के जिनगी भरि जोगौने राखब कनिटा बात नहि। से हो अइ युग जमाना मे। अई सॅ आसान छै अपना के मारब। हं, हम कायर छी। प्रेम करऽ सँ चोट सॅ डेराइत छी। सच छै हम डेराइत छी नोर सॅ प्रतिकूल व्यवहार सॅ। कॉलेजक समय सॅ जेना-जेना हम पैद्य भऽ रहल छलहुँ। दुनियाँक देखबाक दृष्टिकोण बदलि रहल छल। हं एकटा बात गहाई सॅ मन मे जमि गेल छल जे हम मां सन जीवन नहिजीयब। ने बड़की भाभी जकॉ घुटन जिनगी मे बर्दास्त करब। हम अपन जीवन नोर मे नहिबहाबऽ चाहैत छी। की एक बुन्न नोरे मे महिलाक समस्त ब्रह्माण्ड घुसिया जाए? कियेक? कनैत नोर बहबैत नोर क नदी, समुद्र मे हेलैत रहू? मां, दीदी, बड़की भाभी, पीसी, काकी एतेक ध्रि जे हमर शिक्षिको जिनका दिस हम बड्ड उम्मीद सॅ तकैत छलहुँ जे हमरा नजरि मे क्रान्ति चेता छलीह से हो अपन-अपन नोर सॅ समुद्र के भरैत छलीह। लड़कियो सब कियेक नहिउन्मुक्त भऽ भभाकऽ हँसै’छ जेना मदमस्त लड़काहँसैत छै? कॉपफी हाउस मे जाइत अछि लड़िकियो सब मुदा सभक ध्येय रहैत छै आत्मप्रदर्शन। जहॉ चारिटा लड़की एक टेबुल पर जमा भेल कि बस बात शुरू हेतै इश्क, मोहब्बत आ पफलां लड़का सुन्दर छै तऽ पफलां स्मार्ट। हम चाहैत छलहुँ किछ सार्थक बहस होमए। ताहि दिन विश्वविद्यालयक प्रांगण मे छात्रा परिषद् केर समर्थक जोर अजमाइस करैत छल। बात बात मे बम पफेकल जाइत छल। घंटा भरि मे आठ टा ट्राम आ कतेको बस जरा देल गेल। रमेश बाबू बजैत छलाह ई प्रतिक्रिया छैक क्रान्ति नहि। तऽ क्रान्ति ककरा कहैत छै? जे इतिहासक तारीख बदलए। की हम कहियो इतिहासक तारीख बदलि सकब? कम से कम अपन जीवनक इतिहास के तारीख बदलि ली सेह बहुत। एक दिन डाú चटर्जी स्टापफ रूम मे बजौलनि। ‘की बात छै? देख रहल छी आइ काल्हि अहाँक मोन क्लास मे नहिलागि रहल अछि।’ ‘सर, हमरा मन मे दर्शनक जे रूप रेखा छल से नहिपढ़ाओल जाइछ। सर..।’ ‘हं, हं, बाजू डरू जुनि।’ सर, देकार्त, कांट, हीगेल, ब्रैडले सब पढ़ि लेलहुँ । एतेक अभूर्त बात, आध बात तऽ बूझऽ मे अबिते नहिछै ........... आ सर भारतीय दर्शन तऽ आर विकट बुझाइछ अद्वैंत, वेदांत...... ब्रह्म सत्यम् जगत मिथ्या ई वाक्य बस हम रटैत छी। रटि कऽ लिखला सॅ कोन लाभ? -‘अहॉ दर्शन शास्त्राक चुनाव कयलहुँ कियेक? नम्बर बढ़ियॉ आयल छल- पोलिटिकल साइंस या अर्थ-शास्त्रा लितहुँ।, ‘सर नहिजानि कियेक बिना सोचने-विचारने हम चुनाव कयलहुँ। मुदा जाबत हम अपना कें अपन स्थिति के नहिजानब-बूझब ताबत पढ़ने कोन पफायदा? हमरा मात्रा समाज शास्त्राक विषय नीक लगैत अछि। जान स्टुअडि, मिल विदकेनस्टाइन आ सर सबसे नीक लगै’छ मार्क्स पफेर दर्शन।’ हूँ। डाú चटर्जी गंभीर भऽ माथ डोलौलनि। ओ एंटी एसú एपफú छलाह। गांध्ीक परम भक्त। त की मार्क्स के नाम लेने नम्बर कटि जायत? कटौ हमरा कोन पफर्स्ट क्लास चाही। ‘काल्हि एहि समय मे आऊ। हम किताबक लिस्ट तैयार राखब। हं, किछ अर्मूत धरणा के समझनाईयो जरूरी छ।’ ‘मतलब?’ ‘अरस्तु आ प्लेटो, हीरोल आ शंकराचार्य अइचारू मे मात्रा शंकरा चार्यक अद्वैत वेदांत ध्यान सँ पढ़ि ली तऽ मानस-भूमि पोख्ता भऽ जायत।’ ‘हम कोशिश करब।’ नहिकोशिशे नहिभारतीय दर्शन अवश्य पढ़ू, बेर बेर पढू। अर्थक खोंइचा उद्यड़ैत-रहत। हं अहांक भीतर तीन बातक जरूरी हेत-अभीप्सा, जिज्ञासा आ संकल्प। आ सबसे वेशी जरूरी छै बेर-बेर दोहरयबाक अभ्यास’। दोसर दिन डाú चटर्जी किताबक लम्बा लिस्ट देलनि। पफेर पूछलनि-‘कीन सकब? किछ किताब एहन छै जे अवश्य किनबाक चाही। ओहुना-किताब किनबाक अभ्यास जरूरी छै। हम लिस्ट देखलहुॅ-हीगेल, नीत्शे, कीर्केगार्द, हर्सेलक पोइट्री, डाइडेगरक बीइंग, सार्त्राक साइकोलॉजी ऑपफ इमैजिनेशन, ईगोक सि(ात, लार्नाशेक उपन्यास, प्लेग, मिला आपफ सिसिपिफस, मार्लो पोंतीक नोट्स। सर कहलनि ‘अध्ययन शुरू करू जतऽ बूझबा मे भांगठ होमए हमरा सॅ पूछि लेब। स्टापफ रूम वा हमरा घर अयबा मे संकोच नहिकरब। अहाँक मानसक जे बनाबट अछि आ अहां जे तकैत छी ओ सभटा किताब मे भेंटत। हं, एकटा बात आर जे दर्शनक पैद्य व्याध् िछै जे ओ विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण के विकसित करैत छै। आ हमरा विचारें जीवनक एकटा समग्र दृष्टिकोण अपनाबऽ चाही। गीता के धर्मिक पोथी जकां नहिपढ़ू, महाकाव्य जकाँ पढ़ैत-पढ़ैत अर्थ बोध् गम्य हेत। ओना होना हिन्दी अनुवाद भैल छै। हं एकटा बात पर ध्यान राखब-कॉपफी हाउसक राजनीति मे कहियो भाग नहिलेब।’ ‘मुदा अराजनैतिक दृष्टिकोण?’ ‘पहिने महिलाक गुलामीक विषय मे सोचू विचारू।’ -हम स्टापफ रूम सॅ सोझे लाइब्रेरी मे गेलहुँ। डाú चटर्जीक स्पेशल नोट मे छल मोट-मोट पोथी। पहिने हम ओइ पोथी सबके संघैत रहलहुँ पफेर चिक्कन कागज के हाथ सॅ छू लहुँ। तकरबाद पढ़ब शुरू कयलहुज मैं कौन हूँ .... मैं सॅ शुरू होम वला समस्या, चुनावक समस्या........।’ आब हम दू दिन तीन दिन पर लगातार डाú चटर्जी लग जाइत छलहुँ। ओ अपन व्यस्त समय सॅ एक घंटा, आध घंटा जे निकालि पबैत छलाह से हमरा पढ़ाबऽ मे बीतबैत छलाह। एक दिन घटना मोन पड़ै’छ। सर नीत्शे के समझा रहल छलाह जे नीत्शेपर प्रभाव पड़ल छलै Úेंच दार्शनिक वर्गसांक। हम भाव-विभोर भऽ सुनि रहल छलहुँ। स्टापफ रूमक एक कोन मे रमेश बाबू साप्ताहिक परीक्षाक पेपर करेक्ट कऽ रहल छलाह ‘कांट की कैटगरी’ हमर पेपर लऽ डाú चटर्जीक मेज पर अयलाह। ‘देखियौ की लिखलनि अछि ‘कांट’ पर.. डाú चटर्जी हंसैत कहलथिन-रमेश, हिनका ‘कांट’ पर नोट्स द दिऔ। आ ई जे पढ़ऽ चाहैत छथि से पढ़ऽ दिऔ।यौ, कतेक विद्यार्थी पफर्स्ट-क्लासक मोह छोड़ि ज्ञानक पिपासा रखै’छ? ‘अच्छा’ प्रिया ! कहू गुरूदक्षिणा मे की देब?’ ‘सर हम की दऽ सकै छी।’ -‘बहुत किछ। नारी भेनाई कोनो अपराध् नहिहँ, नारीत्वक नोर कें नियति मानब बहुत पैद्य अपराध् छै। अपना नियति कें बदलि सकब तऽ ओ एकलव्य केर गुरू दक्षिणा हेत।’ हम तऽ अवाक भऽ हुनका देखते रहि गेलहुँ। ओ गौरवपूर्ण उन्नत ललाट, घंुघरल कारी केश स्वच्छ पारदर्शी दृष्टि, .......... पुरूषक एहनो रूप होइत छै? हम उठि कऽ हुनक चरण-स्पर्श कयलहुँ-सर आइ सॅ अहॉ हमर गुरू भेलहुँ। ‘नहिकोनो बाहरी व्यक्ति कें गुरू नहिमानि। जे क्यो किछु सिखाबय से कृतज्ञता सहित ध्न्यवाद दऽ आगॉ बढ़ऽ चाहि। आत्मे आत्माक गुरू भऽ सकै छै।’ विधताक विधन एहन जे एक दिन स्टापफेरूम मे चक्कर आबि गेलैन्ह ओ खसि पड़लाह। हुनका तुरत पीú जीú अस्पताल मे लऽ गेलैन्ह। खूनक उल्टी भेलैन्ह। ब्रेन ट्यूमर छलैन्ह। हुनकर देल किताबक लिस्ट, ओ स्वच्छ हँसी आ ओहन आदेश। औरत होएबाक नोर के नियति कहियो नहिस्वीकारब हम हुनक बात क स्मरण करैत छलहुँआ डाú चटर्जी दुनियाँ सॅ विदा भऽ गेलाह। सूरत आखरी साँस लऽ रहल छल। मन मे भेल एखन क्यो एतऽ रहैत भनहि ओ अजनबी रहैत। सोझा मे बैसल चाह पीबैत। बातचित नइओ होइत। एक दोसर के उपस्थित रहबाक एहसास तऽ होइत। समयक ऑचर सॅ हम अइ क्षण के एक टुकड़ा काटि कऽ राखि लेब चाहैत छी। जिनगी कतेक छोट छै आ से हम बेवकूपिफ मे दोसर कें खुश राखऽ मे बीता देलहुँ? ओना कनि-मनि तऽ सक्रिय छलहँु हम मुदा कोन पफर्क पड़ैत जॅ नहिकिछ करित हुँ? एतऽ समुद्र पर अचानक राति पसरि जाइत छै। आ कखनौ-कखनौ बुझाइत छै जे समुद्रक गर्भ सॅ आदिम अन्हरिया बहराइत होई आ सम्पूर्ण ध्रती के अपना बॉहि मे समेटऽ लेल छटपटाइत होइ। आकाश मे एखन तुरत निकलल शुक्र ताराक चमक मे हम मुग्ध् भऽ रतुका अन्हरियाक तरलता मे ऊब-डूब होइत रहलहुँ। आइ अइठामक आखरी इजोरिया राति अछि। बाल्कनि मे बैसल रजत रागिनी क स्वर मे सब किछु बिसरल छी। चान बढ़ैत-बढ़ैत अपन पूर्ण आकार मे विहुँसै’छ। समुद्रक लहरि पर मंद बसात नक्षत्राक जगर-मगर प्रकाश आ प्रकृतिक शोभा श्री केहन विलक्षण दृश्य छैक। आ एहन मनोहारी वातावरण मे हमरा मन के अनाम व्यथा मथऽ लागल। आब हम अपना कें अपना प्रति सहज समर्पित के नाई सीख लेलहुँ अछि। ई आत्मकेन्द्रित भाव नहि। Úायड के बाद नारसिसिस्म या आत्मपूजा सन विशेषण बड्ड पफैशनेबुल भऽ गेल छै। मुदा आत्मस्थ भेनाई तऽ वास्तव मे अपनाके जेना छी तेना स्वीकारब होइत छै। अपना प्रति आश्वस्त भेनाई ए ...... ई स्वीकृति वास्तव मे नव शक्ति दैत छै। ब्रेकपफास्टक टेबुल पर बैसल हम पफेर चिन्तन करऽ लगैत छी। काल्हि राति पफेर व एह पुरनका सपना देखलहुँ। अई सपनाक दहशत सँ कहिया मुक्ति भेंटत? जहिया ई सपना देखैत छी भरि दिन उदासी मे बीतैत अछि। कियेक देखैत छी एहन सपना? हम बिसरि जाय चाहैत छी-मुदा बिसरब आसान छैक? सदिकाल पुरूष सॅ एतेक डर? कखनौ क्यो एसगर मे? डाú चटर्जी सन व्यक्तियोक लेल मन मे एहने भय छल। ककरा कहबै मन क भय। एकटा दाई मां छलीह जे हमर अतीत जनैत छलीह। मात्रा ओ साक्षी छलीह। भेदभाव सॅ भरल नेनपन। खैर हमरा आब कोनो पफर्क नहि। हमरा किछ नहिचाही एहि बड़का घराना सॅ। नहिबसऽ चाहैत छी बड़का गाड़ी मे। नहिचाही कीमती वस्त्रा। भैया आ मां क विशेष स्नेह भाजन छल सरोज। ओ डाक्टर बनतै खूब पाइआ यश कमाओत। आ प्रिया!..... सामने वाली पड़ोसनीक कुतिया पर रिसर्च करत! कहैत छल सब हँसी मजाक मे मुदा की हमरा दुःख नहिहोइत छल। हमरे संग एहन क्रूर मजाक कियेक? ई भाई बहिनक चुनाव की हम कयने छलहुँ? एक दिस तऽ बूझाइत अछि जे हम एकरा सब सॅ पफरक छी हमर चेतनाक ध्रातल बदलि रहल अछि, दोसर दिस भय कातरता, दहशत सॅ चिचिआइत लड़की, टूटल बिखरल, मरनासन्न! कखनौक अयना मे अपन नग्न शरीर निहारैत छलहुँ कतहु किछ टूटल तऽ नहि? चिक्कन-चुनमुन मांसल शरीर पर कोनो खंरोचक निशान तऽ नहि? तइओ खंरोचक एहसास! हम भीतरे-भीतर कुहूकैत रहैत छी। छिः! घीन होइत अछि पुरूष जाति सॅ। घोर घृणा होइत अछि जे अबोध् बच््िययो कें नहिछोड़ैत छै। आब ई बुझबा मे अबैत अछि जे सब समाज मे इनसेस्ट प्रेम पर एतेक भयानक टैबू कियेक छै। कियेक सहज प्रकृतिक मृत्यु-र्ध्म इससेस्ट प्रेम पर लागू होइत छै। नहितऽ जन्मे सँ औरत’...... असहाय औरत। ने पिता छोड़ैत छै ने भाई। अपन नारी देह मे, स्वयं क्षत विक्षत भऽ जाइछ। ओ कहियो पर पुरूष कें प्यार नहिकऽ पबै’छ ने सृजनक सबसे सुन्दर रूप ककरो बीजक रक्षा अपना गर्भ मे कऽ पबै’छ। मानव जातिलेल एकर प्रसार जरूरी छै। मुदा की समाज नारीक रक्षा कऽ पबैए? की कामुक पुरूषक हवस के शिकार होमऽ सॅ अबोध् बच््यी बचैत छै? कत, कखन नहिहमरा पर आक्रमण भेल? केहन नेनपन छल। अपन भाई ए नहिबल्कि एक दिन तऽ एकटा नौकरो अपना कोर मे बैसाने छल। तखन हम बहुत छोट छलहँ मात्रा पाँच वर्षक! तहिया तऽ बाबूजी जीविते छलाह आ दाईमां देख लेने छलै। बाध्नि जकॉ दाई मां झपटि कऽ हमरा अपना कोरा मे लेने छल आ खूब गारि पढ़ने छलीह। हम किछ नंहिबूझने छलिए। हं Úाक मे लसलस किछ लागल छल जे दाई मां रगड़ि-रगड़ि के छोड़ने छलीह।....... तू हमर बेटा मंगल के उमरक छेँ...... बेटा जकां नहितऽ आइ हम तोहर गरदनि छोपि दितिऔ..भाग सरघुआ......, पफेर दाई मां क आदेश ‘ए बुच््यी इ बात कहियो ककरो लग नहिबाजब। भगवान औरत के जिनगी मे एतेक दुःख कियेक लिखैत छथिन। के जानय हुनकर माया।’ मौन! हरदम मौन!! आखिर कहिया ध्रि? कहियो कोनों पुरूषक हाथ कान्ह पर। सिनेमा हॉलक छुप्प अन्हरिया मे शरीर मे सैकड़ो कीड़ा क देह पर ससरबाक अनुभूति! क्रिसमस दिन हम छोटका भैया आ सरोज न्यू मार्केट मे गेल छलहुँ क्रिसमस के खेलौना आ टापफी किनऽ। तहिया हम बारह वर्षक छलहुँ। ठसाठस भीड़। देह पर देह। चलनाइ कठिन। कहुना डेग उठाबी कियेक तऽ पीरियड्स क समय छल आ हमरा पाछाँ-पाँछा अबैत ओ पुरूष जे पैंटक बटन खोलने छल। पौरूषक नग्न प्रदर्शन.....। आ हमरा हिम्मत नहिहोइत छल जे भैयावा सरोज के कहिए। किये? किये हम एहन दब्बु छलहु? -की दाई मांक कारण भय बला संस्कार ग्रसित कयल? की मांक उमेक्षा सॅ वा भऽ सकै’छ हमरा समाज मे हजारो लाखो महिला आ बच््यी सभक संग एहिना होइत होइ। आ सब मौन धरण करैत होइ। मां सॅ आदेश भेंटैत होइ चुप्प रहबाक। बड़की बहिन सिखबैत होइ कतौ नहिबाजऽ लेल। की इएह कारण छै जे बेटीक जन्म लेला पर मां दुखी होइत छै? औरत भेनाईए अभिशाप छैक। हम कहियो ककरो सॅ प्रेम नहिकरब। ब्याह नहिकरब। सेक्स सॅ घृणा होइछ। पुरूषा सॅ बदला लेबाक इएह उपाय हमरा सूझैत छल। हम तऽ सोचने छलहुँ पुरूषक सम्पर्क सॅ दूर रहब, मुदा बचल रहलहुँ? एमú एú क परीक्षा माथ पर छल आ लॉ के इंटरमीडिएट..... तखने ओ पुरूष हमरा जिनगी मे आयल। ओ बडड पैद्य घरक संभ्रात परिवारक एकलौता बेटा। जखन ओ कलास मे लेक्चर देबऽ लेल ठाढ़ होइत छलाह तऽ प्रत्येक विद्यार्थी मंत्रा-मुग्ध् भऽ सुनैत छल। हम अगिला बेंच पर बैसैत छलहुँ। बातक शुरूआत भेल ऑखि सॅ। दू ऑखि चारि भेल। कल्पनाक सोलह पॉखिक रथ पर सवार भऽ मनोरथ दुनियॉ क सैर करऽ लगलहुँ। रंग-बिरंगक सपना देखऽ लगलहुँ। एक दिन ओ हमरा स्टापफ रूम मे बजौलनि। हुनका लग मे ठाढ़ होइते करेजक ध्ड़कन बढ़ल जा रहल छल। ओ पूछलनि ‘हमरा घर चलब?’ वशीभूत भेल जकॉ हम कहलिऐन्ह-हं।’ ओ आगाँ-आगाँ हम पॉछाँ। बस स्टाप सॅ 2--बीú पर चढ़लहँुं। गरियाहाटक मोड़ से पहिने उतरलहुँ। ओ हमरा सॅ आठ दस डेगक दूरी बना कऽ चलैत छलाह सांझुक लुकझुक बेर छलै। जाड़क समय। बीच-बीच में पाछॉ घूमिकऽ हमरा दिस ताकि विहुँसैत छलाह। दू तल्ला मकानक आगाँ रूकलाह। पफेर भीतर गेलाह। हमझिझकैत आगाँ बढ़ि रहल छलहुँ। हुनकर पैरक आहट ऊपर सीढ़ि सॅ अबैत छल। पफेर ताला खुजबाक आवाज सुनलहुँ। सीढ़ि पर चढ़ैत पीठ देखलिए। एक क्षण ठिठकि कऽ ठाढ़ रहलहु। हम ई की कऽ रहल छी? किछ नहिपफुराएल आ भीतर गेलहुँ। ओ केवाड़ बन्न कऽ हमरा दिस घुरलाह। हमर ऑखि झुकल छल। सांसक गति तीव्र। ओ हमरा डॉर में हाथ घऽ अपना दिस घिचलनि हम लत्ती जकॉ झुकैब गेलहुँ जे होएबाक छलै भऽ गेलै। देह अपन र्ध्म निमाहलक। कान मे मध्ु मिश्री सन स्वर गेल ‘हम अहॉ से प्रेम करैत छी। बस अहीं सॅ।’ ओइ दिन हमरा कनिको ग्लानि महसूस भेल ने जुगुप्सा। पुरूषक स्पर्श एतेक मादक होइत छै, एहन सुखद! एतेक मनलग्गू आकर्षक से आइ पहिल दिन महसूस भेल। हम बाइस वर्षक होइत-होइत पूरा औरत बनि गेल छलहुँ ओ बत्तीस वर्षक अनुीज्ञवी पुरूष छलाह। सप्ताह मे दू-तीन दिन ई खेल छमास घरि चलैत रहल। परीक्षा माथ पर छल। एक दिन ओ कहलनि-‘परीक्षा लग आबि गेल आब अहॉ पढ़बा मे ध्यान दिअ।’ -चाहैत छी एकाग्रमन सॅ पढ़ि मुदा अहाँ बिना मोने नहिलगैए। पफेर ओहने उन्माद ओहने आवेग। इम्हर किछ दिन सॅ ओ कॉलेज नहिआबि रहल छलाह। हमर मन एकदम बेचैन छल। की भेलै? बिमार नहितऽ छथि? एक दिन हम स्टापफ रूम मे जा कऽ प्रोपफेसर दास गुप्ता सॅ पूछलिऐन्ह-‘सर! प्रोú मुकर्जी नहिआबि रहल छथि?’ -‘ओ पन्द्रह दिनक छुटीð लेने छथि,’ ई सुनि हमरा रूकल नहिगेल। की भेलै? ओ पफोन कऽ सकैत छलाह। संकोच भेल हेतैन्ह। ठीक छै हमहीं जाकऽ देखैत छिऐन्ह। ओ घर मे एसगरे रहैत छथि। हमर पैर हुनका घर दिस बढ़ल। घर मे ताला नहिलागल छलै। ओ! तऽ घरे मे छथि। अवस्से बिमार हेताह। हम मने मन क्षुब्ध् छलहुँ ओ हमरा आबहु आने बुझैत छथि। के हुनकर सेवा टहल कैत हैतेन्ह? घंटी बजेलहँु। केबाड़ पफूजल। करेज ध्क-ध्क कऽ रहल छल। आब ओ सोझा मे हेता देखते भरि पाँज ध्ऽ चूमऽ लगताह। केवाड़ खूजल। उम्र मे हमरा सॅ किछ पैद्य खूब सुन्दर महिला ठाढ़ छलीह। मांग मे सिन्दुर, लाल तांतक साड़ी, भरि हाथ सोना क चूड़ि, शाखा, नोवा। गला मे सोनाक सीताहार, कान मे हीरा जड़ल सतपफूल। हमरा पूछलनि-‘अहाँ के?’ हम प्रोपफेसर मुकर्जी सॅ भेंट करऽ आयल छी। ओ छथि।’ आऊ भीतर आऊ। रूम क सजावट बदलल छलै। नव सोपफा सेट, खिड़की पर नव पर्दा, ओ महिला हमरा बैसाक भीतर गेलनि। प्रोú अयलाह-आग्नेय दृृष्टि सॅ हमरा दिस तकलनि। आश्चर्य भेल। घबराइत बजलहुँ। ‘हम नहिअबितहुँ मुदा नहिरहि भेल चिन्तित छलहुँ अहॉ बिमारने होई।’ ओ किछ सुनबा लेल तैयार नहिछलाह। ध्ीरे सॅ गुर्राक बजलाहऽ मूर्ख लड़की। हम कहिया कहलहुँ अहां सॅ विवाह करब? दूनू मौज कयलहुँ खिस्सा खत्म। पफेर कहियो आइठाम नहिआयब। हम विवाहित छी।’ ओह! एतेक अपमान। हमरा चक्कर आबि गेल। हुनक पत्नी चाय-नास्ताक ट्रे लऽ ठाढ़ छलीह। ‘अरे, अहाँ हिनकर छा×ाा छी-मूँह मीठ क के जाउ।’ ‘नहि, एखन हम बहुत जल्दी मे छी पफेर कहियों।’ हम तीर जकां बहरेलहुँ। सांझुक पाँच बजि रहल छलै। पफरवरी मास। कतऽ जाउ? सामने सॅ डबल डेकर बस आबि रहल छलै। मोन भेल एकरे चक्का तर कूदि जाइ। पफेर कहलक-नहिमरब कियेक? नहि, हमरा की भेल? पढ़ल-लिखल सभ्य पुरूष धेखा देलक। हमरा संग ओ एना कियेक कचल? भारतीय वेदांत पढ़ाबऽ बला व्यक्ति एहन नीच! एतेक निर्मम!! हम झोंक मे चलल जा रहल छलहुँ। होश नहिछल कम्हर जा रहल छी। बस एकहिटा बात दिमाग मे घुरिया रहल छल-हमरा किछ तऽ कहैत। हम तऽ किछ मांगने नहिछलिऐ शर्तहीन समपर्ण। तखन ओ ठगलक कियेक। आर क्लास मे छात्रा छलै। लड़की क कोनो कमी छलै। आखिर हमरे संग एहन धेखा कियेक? लेक के कात मे ठेहुन पर माथ झुकौने कनि रहल छलहँ। बुझाएल क्यो छै माथ उठेलहुँ। देखलिए तीन चारि टा छोड़ा ठाढ़ छल। हड़बड़ाक उठलहुँ। सुनलिऐ एकटा छोड़ा बजैत छल- ‘प्रेम कोरेछे, ताइ जोन्नो कान्ना।’ ;प्रेम कयने होएत तैँ कानि रहल अछि।द्ध दोसर टिपलकै-‘अहा ! मोरी-मोरी।’ ;मुइलहुँ, मुइलहुँ।द्ध तेसर बजलै-‘की दीदी! आमादेर पछोन्दो होबे की? ;की हम पसिन्न छी?द्ध हम ओतऽ सॅ भगलहँु। पॉछॉ सॅ आवाज आयल-‘एई रे पालिये छे बेचारी।’ ;अरे बचारी भगलै।द्ध हम बुझू दौड़ैत जा रहल छलहुँ.............कापफी दूर ध्रि। अचानक रूकलहॅु। बाट चलैत लोक सब आश्चर्यचकित भऽ हमरा देख रहल छल। हम विवेकानन्द पार्क लग सॅ घर क बाट छएलहुँ। एक मासक बाद एमú एú क परीक्षा अछि। आ हम एको लाइन पढ़ि ने पबैत छी। हमरा संग एतेक पैद्य धेखा? कियेक? हम की बिगाड़ने छलिए। पढ़ल लिखल दानव। हम कखनौ बाथरूम मे, कखनहुँ बरांडा मे हुचुक-हुचुक कनैत छलहुँ हमरा अपने नजरि मे अपन तस्वीर कॉचल टुकड़ा जकां छहों छित भऽ गेल। दरार कें जोड़ल जा सकै’छ, खु(ा के भरल जा सकै’छ मुदा कांचक टुकड़ि के ने जोड़ल जा सकैछ ने पूर्ण प्रतिरूप देखल जा सकै’छ। हं, हम प्यार कयने छलहुँ, पूरा ईमानदारी सॅ अपना कें समप्रित कयने छलहुँ, बिना कोनो शर्त कें ककरो सॅ बिना किछ पूछने। बहुत दिनक बाद बुझलिए जे बिना सोचने-विचारने बिना कोनो शर्तक सम्बंध् भनहिं मानवीयताक द्योतक होइ मुदा ओ अहॉक व्यवहारिक दिवालियापन के परिचायको बुझल जाइछ। जेना-तेना परीक्षा देलहुँ तकर बाद यूनिवर्सिटी को कहियो पैर नहिदेलहुँ। ने कलकत्ताक भीड़-भाड़ वला जन-समुदाय मे कहियो ओ नजरि आयल। ओ जीवित अछि की मुइल से हो नहिजनैत छिऐ मुदा ओकर दोगलापन कहियो नहिबिसरा सकै’छ। ओ हत्दयक अन्हार कोन मे एखनहुँ खटकैत अछि। ओ घटना हमरा आत्मबल के छहोंछित कऽ देलक विश्वास क्षत-विक्षत भऽ गेल। आब हमरा पुरूषक जरूरत महसूस भऽ रहल छल। हमरा सुरक्षा चाही। ई दुनियॉ दानव सॅ भरल छै। जे हम ऑखि सॅ देखैत छिऐ सेह नहिछै वास्तव मे। ब्रैडले सत्ते कहने छै-‘एपिरियन्स इज नॉट रियल्टी।’ उपाध् िरहित व्यक्ति की रहि जाइछ? निगुर्ण ब्रह्म। एकर पहिचान की छै? नेति-नेति। हं, हमरा जीवन मे प्रेमक भूमिका नेति-नेति रहल। किछ नहि............अन्त मे किछ नहि। केवल शून्य।। सबटा पूफसि ............ धेखा......। प्रेम, समर्पण, पारंपरिकता की अई सब शब्द कें दोहरबैत दोहरबैत हम आत्मसम्मोहित नहिभऽ गेलहुँ ? औरत प्रेमक जाल मे कियेक पफँसैत अछि। राति-राति भरि हम इएह सब सोचैत रहि जाइत छलहुँ। पीड़ा, भयानक यंत्राणा आ प्रचंड क्रो(। मुदा आश्चर्य होइछ अपने पर हम ओकरा दोष नहिदैत छलिऐ अपने कें अपराध्बिुझैत छलहुँ। हमहीं दोषी छी अपने पर क्रो( होइत छल। आ तैं अपने सॅ बदला लेबऽ चाहैत छलहुँ। अपन प्रस्पफुटित होइत जीवन कें अन्हार कोन में सौ-सौ तेज धरवला अस्त्रा शस्त्रा नुकौने छलहुँ। आब हम ततेक जोर सॅ ठहाका लगबैत छलहुँ जे माँ, भैया कें टोकऽ पड़ैत छलैन्ह। हम अपन समस्त अपमान कें ठगयबाक यातना कें हँसी कहिलोर मे डूबा देबऽ चाहैत छलहुँ। सरोज विदेश जयबाक तैयारी कऽ रहल छल आ हमरा आगां भबिष्यक अन्हरिया छल। प्रेम, सेक्स, विवाह ई समस्त शब्द हमरा युग-युग केर घसल पुरान सिक्का बुझाइत छल। शब्द नहिमासुक टुकड़ा, टपकैत लिघुर। अइ शब्दक पाछाँ पागलपन आ आदिकाल सॅ अबैत परम्पराक चेहरा औरतक नोर सॅ तरबतर छै। हम आब हरदम हँसैत रहबाक चेष्टा करैत छलहुॅ। खुश छी तकर एलान करैत छलहुँ। ओ हमर उदासीक दौर छल। भीतर सॅ कुहूकैत बाहर सॅ हँसैत समय बीता रहल छलहुँ। हम औरत बनऽ नहिचाहैत छलहुँ मुदा बनि गेल छलहुँ अदद औरत! एतबा बुझि गेल छलहुँ जे कानला सॅ किछ नहिहोमऽ बला छै। डिप्रेशन से डिप्रेशन आर बढ़ैत छै। बड़की भाभीक मृत्यु भऽ गेलैन्ह। हुनक मृत्युक छ मासक बाद नव भाभी आबि गेलीह। ई भाभी भैयाक अनुकूल व्यवहार करैत छलथिन। भैया आब पूर्ण सुखी स्वस्थ-प्रसन्न छलाह। घरक सम्पत्ति पर पूरा अध्किार छलैन्ह। आब ककरो किछ नहिभेंटऽ बला छै। सरोज के कम से कम विदेश जयबाक खर्च तऽ भेंटलै। मुदा हम तऽ जहिया मां के देखलिऐन्ह सियल साड़ी, तहिये मने मन संकल्प कयने छलहुँ जे आब घर सॅ अपना खर्च लेल एको पाइ नहिलेब। एमú एú क पफीसो अपन संगी विभा सॅ लऽ कऽ भरने छलहुँ। तीन सौ टका आर उधर लेलहुँ। कछ किताब किनबाक छल। पढ़बाक प्रयास करैत छलहुँ मुदा मन एकाग्र नहिहोइत छल। क्षत-विक्षत मन बेर-बेर पूछैत छल कियेक एना भेल? हमर कोन अपराध्? ओ पढ़ल-लिखल सभ्य पुरूष एना धेखा कियेक देल। बात-बात में गीता आ उपनिषद्के श्लोक बॉचऽ बलाक एहन नीचताई हमरा मोन पड़ल ईशोपनिषद्क श्लोक-‘हे प्राणी! तू अपने कर्म का स्मरण कर........ स्मरण कर।’ ओह! की ई सभ पढ़ावहि लेल पढ़ैलैन्ह प्रोपफेसर! जेना-तेना कऽ एमú एú क परीक्षा खत्म भेल। हमरा पफर्स्टक्लास नहिभेँटल-विभागाध्यक्ष नाराज भेलाह! हं, तर्कशास्त्रा मे गोल्डमेडल भेंटल। तर्क आ विश्लेषण। हम अपन जीवनक परिस्थितिक रेशा-रेशाक विश्लेषण करैत छलहुँ। विश्लेषण चीड़-पफाड़। अजीब द्वन्द्व अपना होमऽ आ नहिहोमक बीच। ठोस हाड़-मासु वला जीवित शरीरक भीतर ई कोन अभावक कीड़ा कैंसर जकां तरे-तर शरीर के खोखला कयने जा रहल अछि। अई सॅ पूर्व कोनो पुरूष दिस नजरि उठैत नहिछल आ आब हिरणी जकॉ ऑखि नचैत रहै’छ। जेना शराब बिना शराबीक हाल होइत छै तहिना हमरो हाल छल। हमहीं उचित-अनुचित के द्वन्द्व में कियेक झुलैत रहू? ई दुनियाँ हमरा संग न्याय कयलक? जे हमरा संग भेल तकर औचित्य सि( कयल जा सकै’छ? आ सदतिकाल अपना प्रति हताश भाव! एहना मे भविष्यक कोन रूप रेखा बनओल जा सकै’छ? आ हमरा लेल सबसे पहने आपना पैर पर ठाढ़ भेनाई अत्यन्त आवश्यक अछि। घर मे दूनू समय भोजन तऽ भेंट जाएत मुदा एकर अलावा आर किछ नहि। ओना अई बड़का घर मे दस बारह टा एखनो नौकर रहैत छै दाई, महराज, दरबान, ड्राइवर, मुशी, किछु विशिष्ट सदस्य लेल खीरा, ककड़ी, मौसंबी। ओना पफल खयबा लेल आतुरता नहिछल मुदा मने-मन विद्रोह होइत छल। मां क एहन भेदभाव देख भूखो मरि जाइत छल। संतराक जूस मां बड़का भैया, सरोज आ छोट ध्यिा-पुता के दैत छलथिन। जँ मौसम क पहिल दिन महँगा मटर अबैत छलै तऽ ओ बड़का भैया आ सरोजक थारी ए मे परसल जाइत छल। एक दिन तऽ हद भऽ गेलै। दाई मां हमरा थारी मे एकटा संदेश ध्ऽ देलैन्ह। संदेश राखल छलै विशिष्ट लोक लेल। बस मां ई देखिते आगि बबूला भऽ गेलीह। ‘चमेलिया मां! राति-दिन तोरा अपने बेटीक चिन्ता रहैत छऽ आर छै बाल-बच््या। बूझल छौ जे आइ-काल्हि दूध् कम लेल जाइत छै। संदेश विजय बाबू लेल राखल छलै।’ ‘हम विजय बाबू के पूछने छलिएन्ह ओ नहिलेलथिन।’ ‘तऽ सरोज के थारी मे ध्ऽ दितिऐ। बेचारी दस दिन सॅ खाँसी से परेशान छै ताहि पर सॅ डाक्टरीक पढ़ाई।’ बहूरानी! आब हमरा सॅ नौकरी कयल नहिहेत। खाइत काल एना दुश्मन जकॉ जे मन मे अबैए बजने जाइत छी। कनि प्रियाक मूँह देखिऔ केहन कननमूॅह भऽ खाइत अछि।’ हं, हं बुझलिए आब पहिलुका बला बात नहिछै जे शाही खर्च हेतै।’ ठीक छै। पहिलुका दिन नहिरहल तऽ आब हमरा सॅ नोकरियो नहिपाड़ लागत।’ हम डबडबाएल ऑखि सॅ छेनाक संदेश कहुना पानि संग घोंटलहुँ। ओकर बाद रोटी-दालि तरकारी भात के अलावा कोना विशिष्ट व्यंजन वा मध्ुर दही ठोर मे नहिसटेलहुँ। बड़का घरक बेटी ओइ घर मे कहियो ने बदामक बपर्फी ध्ूलक ने संदेश! हं, कहबा लेल हमहुँ बड़का घर क बेटी छलहुँ। ओई घटनाक सप्ताह दिन बाद दाई मां क चिटीò पाबि बेटा मंगला एलै दाई मां के लऽ जाए। ओइ दिन संदेश बला बात पर दाई मां बरामदा पर बैसल मां के दू रंगा व्यवहार लेल खिध्ंासे करैत रहलनि। आब अइ बुढ़ारी मे दाई बहुत बदलि गेलीह अछि। पहिने बात बात पर कनैत छलीह आब कनैत नहिछथि ने ककरो सॅ डरैत छथि बल्कि आब कोनो बात पर अड़ि जाइत छथि आब बहुत कठोर भऽ गेलीह अछि, बुझाइत अछि अन्याय देखैत-देखैत दाइ मांक एहन स्वभाव भऽ गेलैन्ह। दाई मां आब नीक जकाँ बूझि गेलीह जे हमर विवाह नहिहेतै। दहेज लेल टका चाही आ मां क हाथ छैन्ह खालि। झूठ शान शौकत लेल मां क जेवर बिका रहल छैन्ह। तैं दाई मां बूझि गेलीह जे ओ जे सपना देखैत छलीह जे हमर ब्याह ध्ूमधम सॅ पैद्य खानदान मे होएत नाति के कोर मे खेलाकऽ मुइब से सौख पूरा नहिहोमऽ बला छै। तैं ओ गाम चलि गेलीह। हम बहुत काल ध्रि बरामदा मे ठाढ़ भेल कारी पिअर टैक्सी के जाइत देखैत रहलहुँ। गरमीक उमस बला सांझि छलै। एकटा थाकल गोरैया आबि बरामदाक रेलिंग पर बैसल। हम उदास ऑखि सॅ ओकरा दिस तकलहुँ। आइ हम दूनू चुप्प छलहुँ। गोरैया ऑखि झपकबैत छल आ हम बेर-बेर ऑखि पोछैत छलहुँ। हम नहिचाहैत छलहुँ जे क्यो हमर नोर देखए। आइए दुपहर मे हम मां आ भाभी के बतिआइत सुनने छलिऐन्ह-‘भने’ चमेलियाक मां गाम जा रहल अछि। दिन भरि हंगामा मचौने रहैत छल।’ ‘मां जी की कहिऐन्ह-ततेक खाना बना कऽ नीचॉ लऽ जाइत छल जे पाँच लोक खइतै। टोकला पर कहैत छल हमर घर क लोक आयल अछि खाय-पीऽ लेल नहिदेबै?’ हं, अइ मंहगायी मे कहॉ से एतेक लोकक खर्च जुटतै। पींड छुटल।’ दाई माँ के जाइत काल हम अपना गला सॅ खोलि कऽ चेन जबरदस्ती हाथ मे दऽ देने छलिऐ। नहिलैत छल तऽ कहलिऐ। दाई मां बेटीक एकटा यादगार नहिराखब?’ - ‘नहिबुच््यी, ई सिकड़ी अहीं राखू। बेर वक्त पर काज देत। मां बेटीके दैत छै बेटीक चीज लै छै नहिहमरा पाप लागत।’ ओ महामहिला सोनाक चेन नहिलेलक। किछ नहिलेलक विदा भऽ गेल। ओ ठीके कहने छल एक दिन हम ओ सोनाक चेन दू हजार टका मे बेच देलिऐ। हमरा विभाक कर्ज चुकएबाक छल आ आगाँक खर्च लेल टकाक काज छल। दाई मां सँ भेंट करऽ हम सब गेल छलहुँ भैयाक विवाहक समय। दोसर भाभी छलीह इलाहाबादक। पफल-मिठाई लऽ कऽ मिर्जापुरक अहीर टोला मे गेल छलहुँ। आंगन मे खाट पर बैसल छलीह-मोतियाबिंद के कारण सूझैत नहिछलैन्ह। -‘दाई मां! अहाँ नीकें छी?’ ‘अरे हमर बुच््यीक आयल अछि। ए मंगला मंगल, दुलहिन सब गोटे आ देख हमर बेटी आयल अछि..........।’ आ तकर बाद सूखल झुलैत हाथ सॅ हमर सौंसे दह हँसोथि करेज मे सटबैत बाजल छल ‘ए बुच््यी देह तऽ एकदम सूखि गेल-कोन जरूरी छै एतेक दिन-राति पढ़ाई करऽ के। विजय बाबू हमर बुच््यीक आब जल्दी ब्याह कऽ दिऔ।’ थोड़े कालक बाद हम-सब घुरलहुँ। दाई मां अबैत काल अपना पोटरी सॅ पाँच टका निकालिकऽ हमरा हाथ मे देलनि। मंगलाक बहू कहलक माई राति-दिन अहिंक चर्चा करैत रहैत छथि। अहां जे टका-पाई पठबैत छिऐ से सब जोगाकऽ रखने छथि जे बुच््यीक ब्याह हेतै’ तऽ हम बनारसी बिहौति जोड़ा लऽ कऽ जायब।’ सत्ते प्रेम मे लोक प्रतिदान नहिचाहैत छै। वास्तविक प्रेम कयनिहार मात्रा समिध बनि हवन कुंड मे स्वाहा होइछ। साल भरि के बाद मिर्चापुर सॅ मंगल के लिखल चिठीò एलै-‘माई का स्वर्गवास हो गयां’ हमरा घर मे एकर कोनो प्रतिक्रिया नहिभेल। मां क मुँह सॅ बहरे लैनह-‘बेचारी बड्ड नीक छल निः स्वार्थ भाव सॅ प्रियाक पालन पोषण कयलक।’ बस आर ककरो किछ कहबाक ने समय छलै ने इच्छा। हम घर मे बिना ककरो किछ कहने चलि गेलहुँ बालूघाट गंगा स्नान करऽ आब हम सत्ते अनाथ भऽ गेलहुँ। हम एकटा नर्सरी स्कूल मे काज करऽ लागलहुँ। साढ़े तीन सौ रूú मास भेँटैत छल ताहि सँ हमर व्यक्तिगत खर्च निमहि जाइत छल। पढ़ेनाई हमरा वश क बात नहिछल पढ़ेनाई नीक नहिलगैत छल। खैर अहि बीच हम यादव पुर विश्व विद्यालय मे थीसिस लेल आवेदन दऽ देने छलिऐ। आर्थिक सहयोग तऽ नहिभेंटल मुदा परमीशन भेंट गेल। हम सांझि मे एकटा टयूशन शुरू कयलहुँ। एकटा मारवाड़ी महिला कें अंग्रेजी पढ़बाक सौख भेलै। दू सौ टका मासिक पर। सांझि मे छ बजे से आठ बजे ध्रि सप्ताह मे पाँच दिन। एक मास बीतैत बीतैत असली बात बुझलिऐ जे ओकर पतिदेव राति मे अबेर कऽ घर अबैत छलथिन। बेचारी एसगर बोर होइत छल तैँ एकटा लोक व्यथा-कथा सुनऽ बला चाही तऽ हम छलहुँ कान। एक दिन संझि कऽ गेलहुँ तऽ ओ नहिछलीह हुनका पतिदेव के देख लिऐन्ह हम चोटे घुरि एलहुँ। तकरबाद पफेर हम कहियो नहिगेलिऐ। अहिना जिनगी खेपने जाइत छलहुँ। सरोज चलि गेल छल लंदन पढ़ऽ। ओतऽ नोकरियो कऽ रहल छल। ओ पत्रा लिख कऽ पूछने छल टकाक वास्ते। हम मना कऽ देलिऐ। घर मे मांक बक-झक भैया-भाभीक उपेक्षा। जखन कखनौ दीदी सब अबैत छथि तऽ एकहीटा रटनी-एकर नैया कोना पार लगतै-‘तुसब नहिमदति करबें तऽ केकरतै?’ ‘लॉ’ क पफाइनल उपर छल मुदा पढ़बा मे मोन नहिलगैत छल। परीक्षा नहिदेलिऐ। बड़का भैया आर कुपित भेलाह। हमरा मे एहन कोनो गुण नहिछल जाहि पर गर्व कयल जा सकए। क्यो हमरा सॅ कियेक विवाह करबा लेल तैयार होइत? एतेक पढ़ाई के बाद लड़का भेंटनाई कठिन छलै। खैर एक दिन बिलाड़िक भागें सींक टूटल। रामकुमार हजाम विवाहक दलाल छल से एकटा कथा लऽ कऽ आयल छल। इएह हजाम भैयाक दोसर ब्याह करौने छलनि। ओ अबिते भैया के कहलकैन्ह -‘बड्ड नामी परिवार छै अग्रवाल छथि हिनका परिवार के परिचय पूछऽ के काज नहि। अहां ऑखि मुनि कऽ सम्बन्ध् कऽ सकैत छी। एकलौता बेटा छैन्ह। करोड़पति छथि। लड़का देखबा मे स्मार्ट, अमेरिका सॅ बिजनेस मैनेजमेंट पढ़ि कऽ आयल अछि। आब अहॉ सब अपना मे विचारि लिअ।’ ‘कतेक खर्च करऽ पड़त ?’ - पहिनेतऽ हुनका सब के लड़की पसंद होइ तखन ने आगां क बात करब। हुनका घर मे तऽ लक्ष्मीक वास छैन्ह ओ चाहैत छथि पढ़ल-लिखल बेटा योग पुतोहु। मां आ बड़का भैया दूनू गोटे एके बेर बजलाह। -‘रामकुमार अहाँ इ सम्बन्ध् करा दिअ तऽ हम जनम भरि अहॉक गुण गबैत रहब।’ -‘कनि एकबेर हमरा लड़की देखा दिअ।’ भाभी झट तैयार कऽ मां क रूम मे हमरा लऽ कऽ अएलीह । हजाम क दृष्टि हमरा पर पड़लै-बाजल ठीक छै-‘हम कथा पटा देब मुदा हमर दलाली नहिमारब।’ ओ लाकनि हमरा देख अयलाह। नरेन्द्र हमरा सॅ दू-चारिटा बात अंग्रेजी मे कयलनि आ है कहि देलथिन। क्यो हमर इच्छा, अनुमतिक जरूरत नहिबुझलकै। ओना सत्ते नरेन्द्र स्मार्ट युवक छलाह। नरेन्द्र के मां आ पापा हमरा हाथ पर पाँचटा गिन्नी ध्ऽ सगुन कऽ चलि गेलाह। बड़का भैया तुरत न्यूमार्केट गेलाह। पफल के एकाबन टा टोकरि पठौलनि-सब तरहक पफल। सबटा बात ततेक जल्दी सॅ भेलै जे किछ सोचऽ-विचारऽ क मौका भेटबे नहिकयलै। भोरे प्रस्ताव आयल छलै आ मात्रा चारि घंटा मे भैया सब पता लगा लेलथिन। बड्ड प्रसन्न छलाह भैया, कराड़पति छथिन लड़काक पिता आ इएह एकमात्रा वारिस! अमेरिका सॅ पढ़ि कऽ आयल छथि। प्रिया क उम्र तेइस वर्ष आ लड़का क छब्बीजम। राति ध्रि घर पूरा भरि गेलै दीदी सब आबि गेल छलीह। हँसी-मजाक सॅ आँगन-घर क वातावरण मे उल्लास स्पष्ट झलकैत छलै। हमहँ हँसैत छलहुँ। अपना सौभाग्य पर विश्वासे नहिभऽ रहल छल। हं, माथक धोध्री मे एकटा लालबत्ती बेर-बेर जरैत छल। कहीं ओ अतीतक विषय मे ने पूछथि। हम तऽ कुमारि छी नहि, सोहागराति मे जँ पता चलि जाइ? की सब बात सापफ-सापफ कहि दिऐ। मुदा से सब सुनला पर जँ सम्बन्ध् करबा सॅ मना कऽ देताह तऽ? नहिएहन गलती नहिकरब। विवाह भेलाक बाद आन क्यो शोषण नहिकरत। तैं बहुत सोचि-विचारि कऽ चलऽ चाही। एखन स्वीकृति आ सुरक्षा दूनू भेंट रहल अछि। आब हम नेना नहिछी। बिना व्यवस्थाक स्वीकृतिकें हम किछ नहिकऽ सकैत छी। बिना कोनो प्रयास कें एखन परसल थारी मे छप्पन भोग उपलब्ध् भऽ रहल अछि। कहाँ सड़कपर चप्पल घुसीटैत छलहुँ नौकरी लेल कहां एकेबेर करोड़पति क पत्नी.........।’ खूब ध्ूमधम सॅ विवाह भेल। हमर ससुर के एकहि टा मांग छलैन्ह बरियातक स्वागत खूब नीक जकां होमए। भैया बरियातक स्वागत मे कोनो कमी नहिराखलथिन। तिलक के समय हमर ससुरजी एक लाख टका क थैली पहिने पठा देलथिन-हुनके टका हुनका देल गेलैन्ह। एहिना विदाई काल एकटा चॉदीके कटोरा मे सवालाख टका भैया के चुपचाप दऽ देलथिन भैया हुनकर पैर पकड़ि लेलथिन.............। ‘‘शाहजी, अपनेक एहि एहसान क तर मे दबि गेलहुँ एकरा हम कोना चुका सकब?’ ई अहाँ की बजै छी विजय बाबू? अहाँक इज्श्त आब हमरो इज्श्त अछि। विदाईकाल हमरा कनिको करेज नहिपफाटल। मन मे भेल अइ नरक सॅ पिंड छूटल। मां के एतेक खुश कहियो नहिदेखने छलिएन्ह। हमरा सासुर सॅ आयल गहना-कपड़ा चीज वस्तु देख गदगद छलीह। बेटी मर्सिडीज गाड़ी मे विदा भऽ रहल छलैन्ह। ओ बजलीह-‘सल्लो। ज्योतिषी सत्ते कहने छलै एकर भाग्य बहुत नीक छै राज करत।’ हमरा दाई मां मोन पड़लीह। आइ दाई मां जीवित रहैत तऽ केहन खुश होइत। विवाहक जोड़ा...........। ब्रेक पफास्ट टेबुल पर हम बहुत देर ध्रि बैसले रहि गेलहुँ। प्रायः सभटा टेबुल खालि भऽ गेल। तेसर बेर जब वेट्रेस पूछलक-‘मैडम, सम मोर कॉपफी?’ ‘ओ नो थैक्स।’ वेट्रेस वर्त्तन बासन समटऽ लगलीह। ओकर गाल लालटेस छलै आ केश कारी घुघरल ऑखि खूब पैध्। बड्ड हॅ समुख खूब सुन्दर मुँह मुदा मोट-मोट हाथक आंगुर परूषाह कड़ा काज करैत-करैत एहन भऽ गेल हेतै। आब हमरा अइठाम सॅ उठि जयबाक चाहि ओ हाथ मे स्पंज नेने ढाढ़ि छल पोछा लागबऽ लेल। हम उठ लगलहुँ तऽ कहलक-‘हैपी डे मैडम........।’ टिप लेल किछ सिक्का ध्ऽ बढ़लहुँ। काउंटर पर बैसल औरत चिन्हल सन मुसकी सॅ स्वागत कयलक। बिल पर साइन कऽ हाथ मे छाता लऽ सड़क दिस बढ़लहुँ। बिना कोनो उद्देश्य कें टहलब बड्ड नीक लगै’छ खास कऽ जँ मन मे कोनो कहानीक ताना-बाना बुनैत होइ। हं विदा होइत काल गाड़ी मे बैसल-बैसल हम सोचैत छलहुँ आब हम बड़का घरक पुतौहु छी। सासु आदर पूर्वक गाड़ी सॅ उतारलनि। हमरा देह पर छल पचास हजारक घाघरा आ दस लाखक हीराक सेट। इ ह सेट ससुर जी चुप चाप पठौने छलाह। आब भविष्य मे जे होमए एखन त हम या परिवारक लोक जेहन कल्पनो नहिकयने छल। तेहन सम्बंध् भेल। एहि गुनध्ुन मे हम माथ झुकौने पीढ़ा पर बैसल छलहुँ ओतऽ मुदा मन कतहु आन ठाम छल। हँसी वा गाीत-नाद किछ मन के छुबैत नहिछल। कपड़ा बदलि कऽ नरेन्द्र अयलाह तऽ हमरा ओहिना बैसल देख झुझलाक बजलाह-‘मम्मी की हिनका एहिना मूरूत जकां बैसौने रहबैन्ह? बड़की पीसी बजलथिन-‘अरे मुन्ना ई आइ तोरा लग नहिजेथुन काल्हि सोहागराति हेतै।’ से कियेक? हुनका स्वर मे झुझलाहट....आवेग उत्कंठाक अलावा दर्प के बोध् भेल। ‘बेटा, ब्याहक राति पफरक रहैत छै कनियाँ वर काल्हि देवी, देवता क आराध्नाक बाद सोहागक थारी मे भोजन कऽ वर कनियॉ कोबर घर मे जाइत छै’ मां बड्ड मोलायम स्वर मे बजलथिन। ‘हम ई पूजा-पाठ के नहिमानेत छी सब पोंगापथी गप्प छै।’ हाल मे ससुर जीक संग आर दू चारि गोटे छलाह। नरेन्द्र दृढ़ता सॅ ठाढ़ छलाह। मने-मन सोचलहुँ ई केहन लोक दथि कुल देवताक पूजा सॅ पहिने.... बड़की पीसी किछ कहिथिन ताहि सॅ पहिने मां हुनका रूम मे लऽ गेलथिन। लग मे बैसल चचेरी ननदि हँसी मे बजलीह-‘यौ नरेन्द्र भैया, एको राति प्रतीक्षा नहिकऽ सकैत छी?’ ससुर जी लोक सभक संग नीचाँ चलि गेल छलाह। आ हम लाजे माथ झुकौने छलहुँ। ई केहन तमाशा शुरू कऽ देलनि ई हमरो बुझल अछि पहिल राति वर-कनियाँ संग नहिसूतैत छै। करेज ध्ुक-ध्ुक करैत छल कोनो अपशकुन ने भऽ जाए। नरेन्द्र ओहिना ठाढ़ छलाह तऽ सासुमां बड़की पीसी के हाथ। पकड़ि बाहर लऽ गेलथिन। बेटा के कहैत गेलथिन ‘बौआ ठीक छै जे अहॉक उचित बुझाए सेइ सही।’ ‘पहिने हिनका कपड़ा बदलाव दिऔन्ह अइ कपड़ा मे कोना आराम करतीह।’ सासु ध्ीरे सॅ हमरा कान मे कहलनि ‘चलू कपड़ा बदलि लिअ।’ निन्न आ थकनि सॅ सब औंघाएल छल बड़की पीसी सोपफा पर बैसल छलीह तामस सॅ मुँह लाल लगैत छलैन्ह। हमरा सासु के देखकऽ बजलथिन ‘भाभी अइ घर क रीत नीत सब बदलि गेलै?’ हमरा कीकहैत छी ‘आब बौआ नेना नहिछथि।’ -तखनहु.........। हमर सासु रूकलैन्ह नहिएक तरहें हमरा घीचने बढ़ि गेलीह। सुहागराति मे हम बपर्फ बनल छलहुँ-छब्बीस वर्षक युवक नरेन्द्र देह के नोंचैत-खंसोटैत रहलाह मुदा हमरा कोनो उछाह नहि। देहक एकटा स्वाद होइत छैक.............जेना झाग बला बीयर! हमरा उत्साह होइत कोना? हम तऽ डरें सूखल पात जकाँ थर-थर कँपैत छलहुँ। प्रत्येक पुरूष हमरा दंशित कयने छल। हम बेर बेर नरेन्द्र कें कहऽ चाहैत छलिए-‘हम कुमारि नहिछी... हमर तन-मन टूटल अछि ... अहॉ हमर सहचर छी.... हम सब बात सापफ-सापफ कहि देबऽ चाहैत छी-सभटा ईमानदारी पूर्वक। नरेन्द्र अहाँ पढ़ल-लिखल छी अमेरिका सॅ एमú बीú एú कऽ के घुरलहुँ अछि, मुदा नहिओ एतेक अवसर कियेक दितथि बीस मिनट मे अपन भूख शान्त कऽ करोट पफेर सूति रहलाह। हम थाकल, क्षुब्ध् पड़ल छलहुँ। औंघएल स्वर मे बजलाह-‘बत्ती बन्द कऽ दियौ रौशनी मे ऑखि.....। हम चुपचाप उठि कऽ बत्ती बंद कयलहुँ। बाथरूम मे जा कऽ बाथटब मे बैसलहुँ। मेंहदी लागल हाथ सॅ ऑखिक नोर पोछ लहुँ। पफेर शावर खोलि देलिऐ बहुत काल ध्रि देह मलि-मालिकऽ नहाइत रहलहुँ। शीतल जल सॅ तन-मन कें राहत भेंटल। ई हमर जिनगीक प्रथम-मिलन छल जीवन संगीक संग। दू दिनक बाद हम सब हनीमून मनाब गेलहुँ। दहेज मे आयल समान खोलि कऽ देखलनि। बजलनि। किछ न×ि। अध्कितर समान बक्से मे रहलै। बक्सा बंद कऽ बॉक्स रूम मे राखि देलथिन। मां सॅ वेशी गहना कपड़ासासुर क देल छल। कीमती साड़ी, पश्मीनाक कश्मीरि शाल। हनिमूनक बाक्सा सासुए पैक कयलनि। रंग-बिरंगक ब्रा आ पैंटी। एक सॅ एक सुन्दर मॅहगा नाइटी, दू टा सूट आ दू टा साड़ी। संभवतः बेटाक स्वभाव बुझल छैन्ह मां कें। नरेन्द्र दस दिन क हनीमून के समय मे मात्रा दू-दिन बाहर घूमऽ गेलाह। नरेन्द्र कहियो हमर अतीत के विषय मे नहिजानऽ चाहलनि ने हमर पसन्द बूझऽ चाहलनि। भोजनक आंडरो दैत छलाह अपने इच्छा अनुसार। भोजन करैत काल पेट भरि गेला। पर पानि पीबि उठि जाइत छलाहटा इ हो नहिदेखैत छलाह जे हम एखन एको टो रोटी नहिखयलहुँ अछि। नरेन्द्रक वहशी भूख सॅ हम आंतकित छलहुँ दिनोदिन हुनकर सेक्सुअल भूख बढ़िते गेलैन्ह। रातिए मे नहिसंाझि दिन-दुपहर आ भोर बेर-कुबेर कखनहुँ। कतेक बेर पार्टी मे जयबा लेल तैयार होइत छलहुॅ कि घर घीच कऽ लऽ जाइत छलाह। ‘प्रिया.........एखन अहॉ बहुत सुन्दर लागि रहल छी पार्टी मे जे देखत तकरा लेर चुबऽ लगतै तऽ अपन वस्तुक पहिने अपने कियेक ने स्वादि ली।’ - ‘छिः नरेन्द्र एखन ई बेर छै?’ ‘ अहॉक मने तऽ कखनहु बेर नहिहोइ छै? आइ घरि कहिओ अहॉ के सेक्स के जरूरत भेल अछि?’ ‘नरेन्द्र हमरा एकर भूख नहिस्नेहक भूख अछि।’ ‘तऽ की बिना स्नेहकें हम अहांक पाछू पागल भेल छी?’ ‘मुदा स्नेह आ सेक्स मे पफर्क होइत छै।’ ‘अहाँ अपन पिफलॉसपफी अपने लग राखू।’ ‘नरेन्द्र एक बेर हमर बात तऽ सुनू ............... मुदा के सुनत पफेर चारू हाथ-पैर कसल बहशी उन्माद........! नरेन्द्र मे गजब छलनि। इएह पैशन गदहा-जकॉ राति-दिन खटबैत छलनि। टका, आर टका, जाहि दिन कोना सपफल डील होइत छलनि तहिया भोजन काल कोनो विशेष वस्तुक पफरमाइश करैत छलाह वा ऑपिफसे सँ पफोन कऽ दैत छलाह-‘भोजन बढ़िया बना कऽ राखब।’ आब बढ़ियाँ भोजनक अर्थ बूझि गेल छलहुँ तैं सोझे रसोई घर मे जा कऽ महराज जी कें कहि दैत छलिऐन्ह बा मां के कहैत छलिऐन्ह-मां सुनि कऽ हर्ष सॅ विभोर भऽ जाइत छलीह। मां-बेटा मे एकटा अजीब समानता छैन्ह। एके रंग संग्रही वृति आ भावनात्मक लगाव मे कमी। मम्मीक देखैत छलिऐन्ह दिन-राति शॉपिंग चूड़ी, मैचिंग चप्पल हुनका ड्रेसिंग रूम मे एक लाइन सॅ आलमारी छलैन्ह ओह मे कम से कम एक हजार साड़ी ब्लाउज, पेटीकोट आ रंग-बिरंगक चूड़ी, चप्पल के कतार लागल ततबे मेकअप के समान। ओना ओ वेशी काल हल्का लिपिस्टिक लगबैत छलीह मुदा राखल छलै सब रंगक लिपिस्टिक, बिन्दी। हमरा एहन संग्रही वृति सॅ विरोध् छल हम चीज वस्तु किनैत छलहुँ व्यवहारिक दृष्टिकोण सॅ। पहिने सासु टोकितो छलीह ‘प्रिया नीक साड़ी पहिरू ई की गर सुन्न, हाथ सुन्न... श्रृंगार तऽ सोहागिन क....। -मम्मी! हमरा जेवर पहिरनाई असुविध जनक लगै’छ आ भरि दिन कपड़ा बदलैत रहब समय के दुरूपयोग नहितऽ आर भी? हुनका हमर उतर नीक नहिलगलैन्हि-चेहराक भाव सँ बुझलहुँ। मां-बेटाक विपरीत स्वभाव छलैन्हि पापाक लम्बा छरहरा शरीर, गौर वर्ण, खादीक कुरता आ धेती मे सौभ्य व्यक्तित्व। अति मिलनसार, मृदु भाषी कहियो जोर सँ बजैत नहिसुनने छलहुँ। तखन बेटा एहन प्रचंड। नरेन्द्र के स्वर मे अनुरोध् क बदला आदेशक गर्जना रहैत छलनि। हुनका सोझा सब जी हजुर क मुद्रा ठाढ़ रहैत छलनि। दूध्क गिलास नेने नरेन्द्र के पाछू नेहोरा करैत छलीह - ‘बौआ दूध् पी लिअ।’ भऽ सकै’छ ओ एखनहुँ एहिना नेहोरा करैत होयतीह। बचपन सँ आइ ध्रि हुनकर जूताक पफीता बन्हैत छैन्ह नौकर। ऑपिफस सँ घुर ला पर ओ सोझे अपना रूम मे जाइत छथि। जूता पहिरने बिछाबन पर ओंघरा जाइत छथि कोट एक दिस पफेकल रहैत छै नौकर जूता खोलि, मोजा खोलैत छै पफेर तौलिया पानि मे भिजाकऽ तरबा रगड़ि पावडर लगा दैत छैन्ह। नरेन्द्र एखनहुँ बदलल नहिहोएताह। ओ कहियो अपना हाथ मे ब्रीपफकेश लऽ आपिफस लेल विदा नहिहोइत छलाह। रामू ब्रीपफकेश नेने जाइत छलै गाड़ी मे ध्ऽ दैत छलै। मां के घर मे हम ककरो नौकर सॅ जूता पहिरैत देखने छलिऐ ने खोलैत। हमरा तैं अजीब लगैत छल। नरेन्द्र केश कटाबऽ लेल सेलून मे नहिजाइत छलाह । सेलून बला अबैत छलनि पेडिक्योर आ मेनिक्युर करऽ। पता नहिदिन मे कतेक बेर सेंट लगबैत छलाह। कपड़ा क आर्डर होइत छल तऽ एक बेर मे कम से कम एक दर्जन। हुनकर सबटा हिसाब-किताब रहैत छलनि पिफक्सड आ रिजिड। नाक क सोझ मे चल बला नरेन्द्र कें कखनौ बाम-दहिन देखबाक पलखति नहि। आब तऽ हम इ हो बुझि गेलिए जे ओ कखन कोना हाथ बढ़बैत अछि कतेक लग मे घिचै’छ आ कतेक काल हँपफैत रहै’छ। ध्न कमयबाक तरीको ओकर अपने ढंगक छलै मेहनत नहिकरैत छल। स्पेक्यूलेीशन....... गजब छलै सत्ते कुशाग्र बु(ि छै। माल स्टाक करब तखन वेशी सॅ वेशीकीमत मे बेचब। कहियो पेट्रोलियमक कोनो वस्तु कहियो केमिकल, कहियो स्टील तऽ कहियो दालि। कोनो तरहक वस्तुक स्टाक कऽ सकैत छल जँ दलाल ओकरा सॅ वेशी पाइ न असुलै। ओ हारनाइ जनिते नइ छल। जाहि दिन शेयर बाजार मे मंदी होइत छलै बस माइग्रेन के दौर शुरू भऽ जाइत छलै। घंटों माथ दबैंत रहैत छलिऐ तइओ आराम नहि। मम्मी जी दस बेर भोजन लेल आग्रह करथिन तऽ ‘ओह! मम्मी हमरा तंग नहिकरू एखन भोजन नहिकऽ सकब।’ ‘खा लिअ, बौआ! हमर बात राखऽ लेल एकोटा पफुलका खा लिअ नहितऽ हम राति भरि बेचैन रहब।’ शायद हमरा एसगर खाइत मम्मी के नीक नहिलगैत छलैन्ह मुदा ओ अपनो एसगरे खाइत छलीह। अजीब घर छै नास्ताक टेबुल के अलावा चारू सदस्य कहियो संग बैसकऽ भोजन नहिकरैत छथि। पापा सांझि मे चाह पी कऽ बहराइत छथि तऽ राति कऽ घर अबैत छथि। पहिने हम बुझैत छलिऐ जे पापा क्लब जाइत छथि ताश खेलऽ। तैं एकदिन मम्मी के कहने छलिऐन्ह-मम्मी पापा रोज ताश खेलऽ बाहर जाइत छथिन त कियेक नहिएकदिन घरे पर ताश पार्टीक आयोजन कयल जाए? एतबा सुनिते मांक सांस तीव्र गति सँचलऽ लगलैन्हि ओईठाम सँ उठैत बजलीह-‘अहीं पापा सॅ पूछि लेबैन्ह!’ सत्ते हम किछ नहिबूझने छलिऐ। मम्मीक अचानक एहन व्यवहार सॅ चिन्तित छलहुँ तऽ मोन पड़ल-सल्लोदीदी आ मां पफुसुर-पफुसुर बतिआइत छलीह-मां हुनका घर क वातावरण नीक नहिछै नरेन्द्र के पापा क एकटा बंगालिन सॅ सम्बंध् छैन्ह।’ ‘ताहि सॅ की कोनो घर मे रखने छथिन।’ ‘मां, ओइ बंगालिन के एकटा बेटियो छै।’ ‘सल्लो दू बच््याक मां भऽ गेलहुँ आ एखनहु ज्ञान नहिछौ। जैं किछ कमी छै तैं ने करोड़पति हमरा ओतऽ ब्याह करबा लेल तैयार भेल। आ लड़का मे कोनो कमी नहिछै एहन घर वर किन्नहु पार लगैत।’ हम सोचैत छलहुँ पाप जतऽ जाइत छथि आ आतेक राति क घुरैत छथि से की मम्मी के बूझल छनि? मुदा मां क चेहरा देखला सँ तऽ कनिको किछ नहिबुझना जाइछ एकदम सपाट कोनो व्यथाक लकीर नहिचेहरा पर। हँ, कहियोकाल नास्ताक टेबुल पर ऑखि लालटेस पफूलल पल देखैत छिऐन्ह जेना राति मे कानल होथि। तखन पापा क स्वर आर मोलायम खुशामद करैत सुनैत छी आ मम्मी मात्रा हं, नहिमे उतारा दैत छथिन। कहियोक हमहीं पूछैत छिऐन्ह-मम्मी, मोन खराब अछि? ‘नहि, बेटी, हम एकदम नीके छी।’ ‘अहॉक ऑखि सूजल अछि?’ ओ हड़बड़ाक कहैत छथि सर्दी मे हमरा एना भऽ जाइत अछि।’ ‘पापा माथ झुकौने चाहक कप मे चम्मच सॅ चीनी मिलबैत रहैत छथि आ नेरेन्द्र क हिंसक ऑखि पापाक चेहरा पर चिपकल रहै’छ। लगै’छ टहलैत-टहलैत हम बहुत दूर आबि गेलहुँ अछि। एकदम खुजल आकाश आ चमकैत पहाड़। एक दिस उगैत सूर्य आ दूर क्षितिज पर दोसर दिस मेघ खंड। गर्मी महसूस होइछ कोट खोलिक हाथ मे राखि लेलहुँ। दुपटाð सॅ मुँह-कान पोछलहुँ। आब कतेक चलब? घुरऽ चाही। होटल पहँुचैत-पहुँचैत साढ़े बारह बाजि गेलै। भूख लागल छल कियेक ने भोजन कऽ ऊपर जाइ। मुदा एखन स्नानो नहिकयने छी। खैर, कोनो बात नहिबाद मे स्नान कऽ लेब। भोजन करैत काल जर्मन दम्पति पर नजरि पड़ल। जोसेपफ कखन पॉछा मे आबि कऽ ठाढ़ भेल बुझबे नहिके लिऐ। -‘मैडम।’ हम चौंकलहुँ। -‘अहाँ जर्मन जनैत छी?’ ‘नहि।’ ‘आ, ओ लोकनि अंग्रेजी नहिजनैत छथि नहितऽ अहा सॅ अवश्य गप्प करितथि।’ हमरा खुशी होइत। नीक लोक बुझाइत छथि। -‘हँ, बड्ड नीक लोक छथि। प्रत्येक वर्ष पन्द्रह-बीस दिन एतऽ रहैत छथि।’ ‘कहिया सॅ आबि रहल छथि।’ ‘पछिला दस वर्ष्ज्ञ सॅ। मैडम अहाँ स्ट्राबेरी सूपफले लेब? एकदम पफूल-सन हल्लुक बनलैए, मुँह मे रखिते गलि जाएत।’ ‘जोेसेपफ बुझाइत अछि अहाँकें मीठ बहुत पसंद अछि।’ - ‘मुदा हमरा बुढ़िया खाय ने दैत अछि।’ - ‘से कियेक?’ ‘हमरा बाप केँ डाइबिटीज छै ओकरा छै हमरो भजेतै। ‘अहाँक बहुत मानैत छथि। अहाँ कें बाल-बच््याक अछि की नहि?’ ‘इएह तऽ दुःख अछि। बच््या नहिअछि हम सोपफीक बिग बेबी छी।’ हम दूनू खूब हँसलहुँ। जर्मन दम्पत्ति हमरा विश कयलनि हम अंग्रेजी मे उतारा देलिएन्ह। आब हमरा दूनूक बीच जोसेपफ दुभाषिया बनि गेल छल। हुनका हमर कुरताक कढ़ाई बड्ड नीक लगलैन्ह। पफेर पुछलनि हम की लिख रहल छी कोन भाषा मे लिख रहल छी। सुपफला आनऽ जोसेपफ गेल त हमरा सभके हँसी लागल कियेक तऽ गप्पक पुल बनल छल। अपना रूम मे जा कऽ परि रहलहुँ तुरत भोजन कऽ स्नान कोना करब। कखन ऑखि मुना गेल नहिबुझलिऐ। ऑखि खुजल तऽ चारि बाजि रहल छलै। उठिकऽ बालकनी मे अयलहुँ। दूर-दूर ध्रि समुद्रक अथाह पानि आ कछेड़ मे पाथर....... कुर्सी घिच कऽ ओहिठाम बैसि गेलहुँ। एहिना हम बच््या मे बालकनी मे बैसैत छलहुँ। ओत ऽत गोरैया रहैत छल कोन चिड़ैंक चूनल जाए ? आ चुनाव सॅ हमर चिड़ै भेंट जाएत? भऽ सकै’छ भेंट जाए’ मुदा हम अपन भविष्यक चुनाव कऽ सकैत छी? ............ व्यवस्था जतऽ सुरक्षा दैत छै ओतऽ दमघोंटु वातावरण। तथापि शुरू मे हम सहज रूपें सभटा स्वीकारने छलहुँ। नरेन्द्र के पाछू लागल रहैत छलथिन मम्मी जी। अपन सुपुत्राक प्रत्येक श्वास गनैत रहैत छलीह आ चाहैत छलीह हमहूँ हुनके जकॉ नरेन्द्रक आगॉ-पाछॉ डोलैत रहि-बहुत दिन ध्रि हम ओहिना करैत छलहुँ। तऽ हमरा महसूस भेल जे नरेन्द्र हमरा अपन पत्नी सॅ वेशी सेक्रेटरी आ नौकरानी बुझैत छथि। नरेन्द्र कखनहुँ कहैत छलाह ‘प्रिया अइ नम्बर सभ पर पफोन मिलाउ तऽ कखनहु आर्डर दैत छलाह-‘ई पार्टीक लिस्ट छै हिनका सभके समय पर कार्ड भेंट जाए चाही। आ सुनू काल्हि हमरा पार्टीक मेनूक लिस्ट बनाक ऽदऽ देब।’ हम घंटो मेनू लेल माथापच््यी करैत छलहुँ पफेर कहियो कोनो कैटरर सॅ तऽ कहियो कोनो कैटरर सॅ बात करैत छलहुँ। सभटा एवन होइबाक चाही। हं लगातार पाँच वर्ष ध्रि हम एकदम जुटल रहैत छलहुँ तऽ पार्टी एवन होइतो छलै। मरि-मरि कऽ सभटा ओरियान करैत छलहुँ पफूल सजेनाई हरदम मेज पर नव क्रॉकरी। एपल पाई सूपफले कतऽ के नीक टार्ट बनबैत अछि से तकैत अपस्यॉत रहैत छलहुँ। सब खेप नव-नव डिश लेल तबाह रहैत छलहुँ। दिन पक्का सोलह घंटा मेहनत। प्रात भऽ सब बर्तन के सापफ करबेनाई, लॉन सापफ करेनाई खर्च क हिसाब किताब। हमरा सॅ वेशी मम्मीजी के पार्टी क उत्साह रहैत छलनि हँ, हुनकर बड्ड सहारा भेंटैत छल। मुदा पापा लेखे ध्न्न सन्न ओ चुपचाप कोनो कात मे ठाढ़ रहैत छलाह एकदम निरपेक्ष जेना ओइठाम रहितो ओतऽ नहिहोथि। वेशी काल तऽ गेस्टके अबिते नहुँ-नहु ओतऽ सॅ विदा भऽ जाइत छलाह। दोसर दिन पफेर देखैत छलिऐन्ह मम्मी जीक मुरझाएल मुंह पफूलल लाल ऑखि। सपफाई दैत छलीह पार्टीक थकनि सॅ एना लगै’छ। पार्टी क दिन मात्रा घर क सजावट आ लॉन मे मेज सजौनाईए नहिअपनो सजऽ पड़ैत छल। आर्डर दैत छलाह-‘प्रिया पिफरोजी प्रेंफच शिपफॉन पहिरब जे अइबेर हम पेरिस सॅ अनने छलहुँ ओकर संग पिफरोजी सेट पहिरब। लोक देखै हमर श्रीमतीक शान-शौकतं’ नीचाँ उतरैत-उतरैत पफेर सवाल-‘इ की अहॉ कार्टियरबला घड़ी नहिपहिरलहुज? अंचार बनाएब रंग-बिरंगक घड़ी रहैत एहन पहिर लेलहुँ! कतेक बेर कहलहु कनि नीक जकां मेकअप करू कनि स्टाइल सॅ रहू बस पोनीटेल कऽ लैत छी? ‘हम मने-मन क्षुब्ध् होइत छलहुँ।’ आ पार्टी मे बहुत गर्व सॅ नरेन्द्र बैंकक चेयर मैन सँ हमर परिचय मे कहैत छलाह-दर्शन मे पीú एचú डीú छथि। प्रिया इम्हर आउ ई छथि जस्टिस बनर्जी, मिस्टर कौल, ई छथि हमर पत्नी आ अहॉ कलक्टर कस्टम्स। प्रिया-ई छथि शंकर भाई पापाक खास दोस्त। आ हमर अखरल छल-शंकर भैयाक भेदैत नजरि बुझू जे साड़ी क भीतरी शरीर धरि पहुँचल होमय। एहिना ई पफलां छथि ओ पफलां छथि....... ई सब शुरूह मे भेलै। सब दिन पार्टी हंगाम राति मे देह चूर-चूर लगैत छल। मन मे होइत छल की एहिना हमर जिनगी बीतत? मारवाड़ीक दू अढ़ाई सौ करोड़पति खान दान सब पार्टी मे वएह चेहरा हुनके बीच घूमनाई। कला-मंदिर जाइ तखनो वएह लोक। क्लब जाइ तऽ एकहिटा रटल रटाओल शब्द-अहॉ कोना छी?.... नीकें छी, कुशल-क्षेम......बहुत बढ़ियाँ........ पफेर क्यो भेंटल त वएह शब्द दोहराउ। सब परिचित मुदा क्यो मित्रा नहिबनल। नरेन्द्र के परिचितक परिध् िछल गुलरके पफल जाहि मे असंख्य बीज रहैत छै। आब हम अइ सब सॅ ऊबऽ लागल छलहुँ। बात-बात मे चिड़चिड़ापन। दाई नौकर पर बजैत छलहुँ। ऊबि गेल छलहुँ बैंकाक सॅ मंगाएल पपीता, लीचू, कीवीआ आ अमरूद सॅ। बम्बई सॅ आयल अलपफांसो आम आ स्टाªेरीक सूपफले सॅ। स्काईरूम सॅ अबैत छल एपल स्टूडल, चितरंजन मिष्ठान भंडार सॅ रसगुल्ला आ मोहन भोग, नूतन बाजार सॅ संदेश कौलेज स्ट्रीट सॅ कांचा गोला, शमकि केशरिया राबड़ी.... ऊँ हूॅ आब नहि। जिनगी भरि खाउ आ खुआउए टेबुल सजाए घर सॅ लान ध्रि सजाउ, बर्त्तन बाहर कराउ पफेर रखबाउ एकहिटा रूटिन बड्ड नीरस लगैत छल। ..... ई गृहस्थीक झमेला कहियो एकऽ वला नहि। कीएकरे संसार-सागर कहल जाइत छै? ई रिपीटेशन ........ सबटा ओहने कहियो कोनो बदलाव नहि। विवाहक डेढ़ साल बाद संजुक जन्म भेलै। हमरा मांक स्थिति दिनो-दिन खराबे भेल गेलैन्ह। सास-ससुरक उदारता पफेर देखलिए। अपने एक लाखक समान बंटलनि। ससुर जी लग पफेर गाड़ी मे भैया मिमिआइत बजलाह-‘शाह जी हम तऽ अपनेक एहसान कहियो नहिचुका सकब।’ ससुरजी पफेर दोहरा देलथिन ‘विजय बाबू आब अहांक इज्श्त हमरो इज्श्त अछि।’ राति मे मम्मी जी चारिटा थारी मे पफल आ मिठाई सजौलनि एकटा कीमती साड़ी आ ग्यारह सौ टाका एकटा लिपफापफ मे ध्ऽ पुरनका ड्राइवर राम सिंह के पफुसपफुसाक किछ कहलथिन। हम एतबे सुनलिए जे ‘राम सिंह देखब नरेन्द्र बाबू नहिबुझथि।’ आइ पहिल बेर हम मम्मी जी सॅ पूछलिऐन्ह-‘मम्मी जॅ ओ बुझिए जेथिन तऽ की हेतै? आ हुनका सॅ नुका कऽ कियेक पठबैत छिऐ?’ ‘हम की करू। बाप बेटाक लड़ाई मे हमहीं पिसाइत छी। नहिपठेबै तऽ ओ मुँह पफुला लेता आ नरेन्द्र के कान मे ई खबरि जेतै तऽ घर मे महाभारत मचि जेतै।’ हम मम्मी जी क बु(िमत्ताक लोहा मानि लेलहुँ। अपना स्वत्व लेल हमर सासु कुटनीति सॅ काज लैत छथि। जे बात अपने नहिकहऽ चाहैत छथिन से बात नरेन्द्र सॅ कहबा दैत छथिन। तैं बेटो वश मे छैन्ह आ पति दूनू। हम डेढ़ मास क बाद पहिलबेर संजुके लऽ कऽ नैहर गेल छलहुँ तऽ घुरती काल राम सिंह के कहने छलिऐ-राम सिंह! कनि कारनानी स्टेट्स चलब।’ ओ कहलक..... मुदा छोटा साहब? ‘ओ नहिबुझताह।’ हं, तऽ पापाक दोसर पत्नी के हम पहिल बेर देखलिएन्ह। मुन्ना के करेज सॅ सटा लेलैन्ह हुनकर ऑखि डबडबा गेलैन्ह। पचास वर्षक अई प्रौढ़ाक पैर छुवि प्रणाम कयलिऐन्ह मुदा पफुराइत नहिछल की कहि हुनका सम्बोध्ति करिऐन्ह? पफेर अनायास हमरा मुँह सँ ‘छोटकी मां’ बहराएल। ओ भरि पॉज घऽ अपना हाथक सोनाक मोटका कंगन निकालि कऽ पहिरा देलैन्ह’ ‘छोटकी मां! ई जरूरी छै?’ ‘हं, बहुत जरूरी छै पहिल बेर अहांक मूंह देखलहुँ अछि। ब्याह मे नहिजा सकलहुँ। नीना बड्ड कनैत छलीह मुदा समाज मे ककर-ककर मूँह बन्द कयल जा सकै’छ?’ ‘एखन कत छथि नीना?’ ‘अबिते हेतै। अहां के देख कऽ बड्ड खुश हेतै।’ ‘कतेक टा छथिन ?’ ‘उन्नीसम वर्ष छैक।’ मन भेल जे पूछिऐन्ह-‘अहाँ अइ जीवन सॅ असंतुष्ट होउब! नीनाक भविष्य लऽ चिन्तित रहैत हेवई?’ यद्यपि ओ पापाक नामक सिन्दुर लगबैत छथि। गला मे मंगलसूत्रा पहिरने छथि। मुदा ओ मम्मी जी क स्थान नहिपाबि सकैत छथि। मोन पड़ल विवाहक समय मांक रोषपूर्ण स्वर- ‘बौआ विजय, शाहजी के एकटा बात पफरीछाक कहि दहुन जे बरियात मे अपन दोसर पत्नी के नहिआनथि। लोक दुर छी दुर छी करत ककर-ककर मूँह बन्न करबै दस लोक दस मुँह बाजत जे समध् िरखैल रखने छथिं’ डेराइत-डेेराइत सल्लो दीदी पूछने छलथिन जे रखैल ककरा कहैत छै तऽ बड़की दीदी कहलथिन जकरा सॅ विवाह बिना कयने सम्बन्ध् रहैत छै आ भरण-पोषण करैत छै तकरे उप पत्नी वा रक्षिता रखैल कहैत छै।’ तऽ हम एहि सासुक शान्त-स्निग्ध चेहरा देख रहल छलहुँ। अहू उमर मे भव्य लगैत छथि सोना सन दमकैत रंग-रूप। के कहतै एहन पवित्रा व्यक्तित्व क स्वामिनी के कलंकनि? छोटी मां के मुँहे सुनलहुँ जे हुनकर पिता कलकत्ता हाईकोर्ट के प्रसि( बैरिस्टर छलथिन। हमर ससुर तहिया बैरिस्टर शुभेन्दु सेन ओतऽ मवक्किल के रूप मे जाइत-अवैत छलाह। तखने दोस्ती भेलैन्ह। पापाक उम्र तखन लगभग चालिस वर्ष छलैन्ह। आ छोटी मां एक्कैस वर्षक नव युवती। लॉरेटो कॉलेज सँ अंग्रेजी मे बीú एú आर्नस। पापा बैरिस्टर सेन के परिवारक सदस्य जकॉ निर्धेख जाइत अबैत छलाह। बैरिस्टर साहेब कें एकटा बैटा छलनि जे बार एटलॉ करबा लेल लंदन गेल छलैनह से ओतहि बैसि गेलैन्ह। पापा संग मम्मी जी जाइत छलथिन। छोटी मां शुरूहे सँ हुनका दीदी कहैत छलथिन। पापा, मम्मी आ छोटी मां जकर नाम छलैन्ह तिलोत्तमा संग प्रेम प्रसंग बढ़बैत रहलाह। मम्मी जाबत बुझलथिन ताबत बात बहुत आगाँ बढ़ि चुकल छलै। छोटी मां क पापा क्रो( मे हुनका घर से भगा देलथिन। पापा कालीघाट जा कऽ छोटी मां सॅ विवाह कऽ लेलैन्ह। कानून मानै या नहिमानै मुदा साक्षी छलैन्ह र्ध्म मां काली। बिना कोनो शर्तक पापा लेल मौन स्वीकृति छलैन्ह एकोन्मुखी अग्नि जकाँ अहर्निस जरैत रहब। हं, नैहर सॅ नाता टूटि गेल छलैन्ह सब दिन लेल नैहर सॅ क्यो अबैत छलैन्ह ने छोटी मां कहियो नैहर गेलीह। नीना अपन नानाक मुँहो नहिदेखलैन्ह। बाबा हमरा मापफ नहिकयलनि हम हुनका लेल कलंक छलहुँ। अइ घटनाक बाद पापा बैरिस्टर समाज मे कहियो माथ उठा क नहिचललाह......... छोटी मां अपन अतीतक कथा सुना रहल छलीह। औरत क जिनगी विचित्रा होइत छैक कनि खरोंचि दिऔ कि दुःख-दर्द, व्यथा-पीड़ा आ त्रासदीक क बहैत समुद्र देखब। नीना कें देखिते नैन जुड़ा गेल मन प्रसन्न भेल। उन्नीस वर्षक नवयुवती एकहरा देह नाम, कारी-कारी लम्बा केश, पैद्य-पैद्य ऑखि ठोर लाल पापा सन पातर, घूरी सन नाक। ‘नीना.....।’ हम शोर पाड़लिऐन्ह। ‘भाभी!’ कहि ओ गर ध्ऽ लपटि गेलीह। ‘भाभी ब्याहक बाद अहाँ आर सुन्दर भऽ गेलहुँ।’ ‘ब्याह सॅ पहिने अहॉ हमरा देखने छलहुँ?’ ‘हँ, ब्याहे दिन। हम सब सॅ नुका कऽ गेल छलहुँ। ककरो पता नहिलगलै ने पापा के ने मम्मी के, ने आर क्यो बुझि पाओल। हमरा आन्तरिक इच्छा छल भैया-भाभी केहन लगैत छथि से देखी।’ हमर ऑखि नोरा गेल। केहन निष्ठुर छै इ। दुनियाँ एहन मौसुम बच््यीक संग एतेक निष्ठुरता। हम एकटक नीनाक मुँह देख रहल छलहुँ। एकटा अपूर्व चमक छलै नीनाक चेहरा मे। पैघ-पैघ आकर्षक ऑखि, पातर-सुगबा नाक बंगालक नजाकत आ राजस्थानक कद-काठी। लॉरेटो मे बचपन सॅ एखनध्रि अध्ययनरत अइ लड़की मे रचल-बसल छलै खुलापन। कनिको कुठा नहि। सहज-सरल ढंग सॅ बात करऽ बाली। आगां की करऽ चाही, की नहिसे नीक जकाँ बुझैत छथि। ‘भाभी, पापा चाहैत छथि हमर ब्याह आब भऽ जाए चाही। मुदा हम से नहिहोमऽ देबै। हम पहिने अपना पैर पर ठाढ़ होएब।’ ‘पहिने अहाँ एमúएú करऽ आवश्यक नहिछै। हम काल्हिए ग्रैंड होटल मे इंटरव्यू दऽ कऽ अएलहुँ अछि। बुझाइत अछि नौकरी भेंट जाएत। ‘इ नौकरी पापा पसंद करता?’ ‘भाभी सब बात मे हुनकर इच्छा-अनिच्छाक ध्यान देब आवश्यक छैक? भाभी हम नीक जकां जनैत छी-जे हम पापाक नजायज संतान छी। मां भनहिं पापाक नामक लाल सिन्दुर लगाबथु मुदा ओइ लाल रंग मे करिखा लेभरल छै।’ ‘नीना मन मे एतेक कड़बाहट रखने अपने नुकसान हेत’ ने।’ ‘नहिहम से नहिमानैत छी। जीवित रहबा लेल आ अपन स्वत्त्वक लड़ाई लड़बा लेल आवश्यक छै जे अपन अपमान आ वंचना के सदति काल याद राखी। हमरा नीक नहिलगै’छ जँ क्यो सिखबैत अछि जे चुप रहू।’ ‘ठीक छै। मुदा अइ सॅ अहा दुखी नहिरहैत छी?’ ‘हं दुखी छी तैँ चाहैत छी सुख अर्जित करऽ। स्वाब लम्बी महिला केँ क्यो निरादर नहिकऽ पबैत छै। सच कहैत छी भाभी पापा जे मासे मास टका पठबैत छथि ताहि सॅ हमरा घृणा होइत अछि। पापा सन डेरबुक व्यक्ति सॅ हमरा घोर घृणा अछि।’ ताबत चाभीक गुच्छाक स्वर सुनलहुँ। छोटी मां ट्रे मे चाह-नास्ता लऽ कऽ आबि गेल छलीह। हुनकर पति-भक्ति, उदार-हृदय, सहज-समर्पण आ बहिर गाय जका स्थिति सॅ मूक समझौता हमरा मन मे कतेको प्रश्न चिन्ह..। सीढ़ी पर उतरैत काल ओ नहु-नहु बेटी प्रिया अहाँ अयलहुँ से क्यो बूझए नहिखासकऽ अहांक मां आ दीदी। मुदा हम चाहैत छी जे पफेर मौका पाबि अहॉ अइठाम आउ।’ पता नहिछोटीमांक स्नेह-सिक्त व्यवहार मे कोन एहन जादू छलनि जे हम हुनका करेज मे मुँह सटा कानऽ लगलहुँ। हुनका करेज मे सटिते हमरा दाई मां मोन पड़ल। आ तकरबाद मोन बड्ड हल्लुक भऽ गेल। पापा, आब हमरा प्रति कृतज्ञ रहै छथि। आ हमरो मन के शान्ति भेंटैत अछि छोटकी मांक घर गेला सॅ। आ नीना तऽ हमर अन्तरंग सखी, बहिन सब किछु छथि। हम सदतिकाल सोचैत रहैत छी नीनाक विषय मे। एहन होनहार लड़की छथि केहन हेतैन्ह हिनकर भविष्य? मां-बापक कलंक? बीच-बीच मे हम सँजुकें पठा दैत छलिऐ छोटकी मां लग। एक दिन की भेलै जे भोजनक मेज पर बैसल ओ बक बक कऽ रहल छलै-‘हम नीना पीसी कें कहलिऐन्ह जे जाबत अहाँ हमरा संग लूडो नहिखेलब हम कहियो.....।’ हमर सासु गरजैत पूछलथिन-कोन नीना पीसी? सँजु तऽ नेना अछि हम जाबत किछ कहितियै ताहि सॅ पहिने सॅजु बाजि देलकै। ‘ओ जे हमर सभक दोसर घर अछि.. जत छोटकी दादी मां छथिन..हमरा खूब मानैत छथि....।’ हमर सासुक चेहरा क्रो( आ अपमान सॅ लाल भऽ गेलैन्ह। आ नरेन्द्र त बुझू जे जेना पफूस मे चिनगी सॅ ध्ध्कि उठैत छै तहिना छऽ छऽ कऽ लगलाह। ‘संजु कें लऽ कऽ के छलै ओतऽ ? पापा अहाँ ??’ ‘व्यथा आ अपमान सॅ पापाक चेहरा स्याह भऽ गेलैन्ह। हमरा नहिरहि भेल तऽ कहलिऐ-‘हम पठौने छलिए।’ ‘कियेक आ ककरा आर्डर सॅ?’ नरेन्द्रके क्रो(क ज्वाला बढ़ले जा रहल छलै। अपना घर मे अपने दादी आ पीसी लग जयबाक लेल संजु के आर्डर लेबऽ पड़तै?’ ‘की बकबक कऽ रहल छी। बिना सोचने-विचारने जे मन होइ ए से करैत छी आ बजैत छी।’ ‘हम गलत कतऽ छी? की चुटकी भरि सिन्दुर सॅ क्यो पत्नीक हक पाबि लैत छै? आ बीस वर्ष ध्रि बिना सात पफेरा लेने जे सम्बन्ध् कें जीबैत छै से नकारल जेतै?’ ‘ओ रखैल छै......मिस्ट्रेस......हमर मां नहि।’ घृणा सॅ हमरा तन-मन मे आगि लागि गेल। आइ पहिल बेर देखलिऐन्ह सासुके निष्क्रिय चेहरा पर परमतृप्तिक भाव। पापा उठिकऽ चलि गेल छलाह। सुनू प्रिया। ‘आब कहियो संजू ओतऽ नहिजेतै’ ई नरेन्द्रक रोषपूर्ण पफरमान छल। ‘तऽ अहूँ सुनि लिअ, हम ओतऽ जेबै आ हमरा संग संजुओ जेतै ओ मात्रा अहीं के बेटा नहिअछि ओकरा पर हमरो हक अछि। छीः अहाँ सभ के तऽ ने दया अछि ने ममता। इंसानियत ककरा कहैत छै से संवेदनहीन व्यक्ति कोना बुझतै? पापा ककरा भरोसे चलि पिफर रहल छथि?’ ‘प्रिया! हम कहैत छी चुप्प रहू।’ ‘नहि, आब हम चुप्प नहिरहब। नीना हमर ननदि छथि, संजुक पीसी, अइ घरक बेटी।’ ‘तड़ाक! सँ एक थापड़ दहिना गाल पर पड़ल। हम हतप्रभ भेल चालीस वर्षक नबालिग पुरूष के देखते रहि गेलहुँ। एहिना, एक दिन एकटा पुरूष कहने छल, ‘बेवकूपफ लड़की के कहने छल हम अहाँ से ब्याह करब?’ हां, हं, एहिना...... की एहिना हमरा संग होइत रहत? हम नोराएल ऑखिए सासु दिस तकलहुँ ओ गुम्म भेल माटिक मूरूत जकाँ बैसल छलीह। शून्य, प्रतिक्रिया विहीन गोर चिक्कन चुनमुन..... नाक मे हीरा क लौंग चमकैत छलैन्ह। माथ पर लाल बिन्दी मांग मे सिन्दुर। सुहागिन.....पत्नी......जायज संतान! छीः औरत लेल ई समाज केहन निर्मम छै? आ एहि समाजक निर्माण करऽ बला पुरूष केहन कायर? सत्ते नरेन्द्र संवेदन शून्य पुरूष अछि। ओ मात्रा टका, नीक भोजन आ सेक्स जनै’छ। हमरा अपना चारूभर सभटा ओझराएल सन लगैत छल।...... गाल पर थापड़, सासुके चुप चाप तकैत रहब, पापाक उठि कऽ बाहर जायब आ सबसॅ वेशी अखरैत छल अपन कर्पूर जकां विद्रोह मे ध्ध्कब आ तुरत नोर बहाकऽ शान्त भऽ जायब। अपन अइ प्रवृति कें हम कखनहुँ दया, कखनहुँ उपेक्षा आ कखनहुँ किछ आर विशेषण दैत छलहुँ । अपन अइ खंडित व्यक्तित्वक परिसीमा सॅ परिचित छलहुँ। नरेन्द्र के छोड़ि नहिसकैत छी। कारण-सुरक्षाक भाव? व्यवस्थाक स्वीकृति? अपने सॅ प्रश्न पूछैत छलहुँ-‘सच,सच कहू प्रिया! अई घुप्प अन्हार गुपफा सॅ कहिया बाहर निकलब? एकटा मन कहैत छल सब चुपचाप रहैत रहू। मुदा कतेक दिन की सब सहैत रहब-गारि-बात, मारिपीट आ अन्तहीन शोषण क समर्थन करैत घरक लोक के उपदेीश सुनैत रहू?’ किछ नहिपफुराएल तऽ आलमारी खोलि अपन दू-चारि टा साड़ी लेलहुँ आ पर्स मे एक हजार टका पैर मे चप्पल पहिर सीढ़ी सॅ उतरलहुँ। हमर मन हमरे पर हँसैत छल-वाह! मिसेज प्रिया अग्रवाल, इ कोन पिफल्मक दृश्य छैं?’ ‘हाथ दहिना गाल पर अनायास गेल अहिठाम थापड़ मारने छल नरेन्द्र। तारा सिंह के कहलिए गाड़ी गेट पर आनऽ। ‘मां के घर जयबाक अछि।’ नैहर पहुँचलहुँ। मां लग जा कऽ चुपचाप गद्दा, पर बैसलहुँ। मां कुशल-क्षेम पूछलैन्ह । भाभी पूछलैन्ह ‘की लेब चाह की शर्बत?’ ‘हम, हम..... एतऽ रहऽ आयल छी।’ बजैत-बजैत स्वर खड़खड़ा गेल। हं तऽ रह ने। नैहर मे लोक रहैत नहिछै। हम तऽ कतेक बेर कहलिऔं किछ दिन एतऽ रहऽ।’ नहि, मां! हम आब ओत नहिजयबैऽ। हम नरेन्द्र सॅ तलाक लेबऽ चाहैत छी।’ ‘की बक-बक कऽ रहल छेँ?’ मां जी, बुझाइत अछि प्रिया जी कें नरेन्द्र बाबू सॅ झगड़ा भेलैन्ह अछि। आपस मे ककरा झगड़ा नहिहोइत छै। सब ठीक भऽ जेतै। अहाँ चिन्ता नहिकरू।’ भाभी बजने छलीह। ‘भाभी, हम सत्ते सीरियस छी। अहाँ मां के समझा दिऔ ............. हमरा ओइ नरक मे कियेक पठौलैन्ह? ‘हमरा ओ की बुझौतीह आ तू की कहबें? तोहर केहन स्वभाव छौ से हम नहिजनैत छिऔ। ब्याहक बाद तऽ आर बिगड़िए गेलौ बोली-वाणी।’ अच्छा, प्रिया जी एखन अहाँ चलू हमरा रूम मे आराम करू पफेर गप्प-सप्प् हेतै। हं एकटा बात कहैत छ जे आब अहाँ कें मुन्नाक ध्यान मे राखिकऽ किछ बात-व्यवहार करऽ चाही। दस वर्षक भऽ गेल, दस वर्षक बाद पुतौहु घर आयत।’ प्रिया! तू जनम लेने तहिए सॅ हमरा दुःख दैत रहलें। हमरा आर बेटा-पुतौहु अछि मुदा ककरो एहन कड़ा स्वभाव नहिछै। सरोज डाक्टरद छै। मुदा कहियो कमल बाबू कें शिकायतक मौका नहिदैत छैन्ह। सुन-हम अइ घर सॅ विदा कऽ देलिऔ आब तोहर घर छौ ओतऽ। एखन हिं तोहर सासुक पफोन आयल छलौ। बेचारी कनैत-कनैत कहलनि। ‘समध्नि! आब हमर इज्श्त अहींक हाथ मे अछि। अहाँ जनैते छिऐ-‘नरेन्द्रक स्वभाव क्रोध्ी छै मुदा प्रियो चुप्प नहिरहैत छथि।’ ‘ओह! तऽ एतबे काल मे ओ अहाँ कं पफोनोकऽ देलैन्ह?’ ‘तऽ बेचारी कोन अघलाह कयलनि बेचारी गाय छथि आनठाम कतहु ब्याह होइतौ तऽ पता चलितौ।’ ‘प्रिया छोड़ू इसभ बात। मियाँ-बीबी मे झगड़ा होइते रहैत छै। अहाँक भैया क बोली कड़ा नहिछैन्ह?’ हम उठिकऽ भाभी क संग हुनका रूम मे गेलहुँ। जाइत-जाइत सुनलहुँ मां बजैत छलीह-‘प्रियाके समझा-बुझा कऽ पठा दिऔ काल्हि अहाँ सभक बेटीक ब्याह कोना हेत? कहै छै तलाक लऽ लेब एहनो बात क्यो बजैंछ कुल मयार्दा किछ नहिबुझैत छै। हम भाभीक बिछावन पर बैसते छलहुँकी नरेन्द्र के पफोन आयल-‘हम आबि रहल छी।’ दूनू भाभी मंद-मंद मुसुका रहल छलीह। छोटकी भाभी झट रसोई घर गेलीह। नरेन्द्र अयलाह। हमरा देखते ‘अपन कान पकड़ैत छी....उठठू चलू। हम मंत्रा-मुग्ध् भेल नरेन्द्र संग विदा भेलहुँ।’ घर अयलहुँ। सासु सोपफा पर बैसल छलीह संजु कोरा मे बैसल-छ लैन्ह। संजु के देख कऽ हमरा करेज पफाटि गेल बुक्का पफाड़ि कनलहुँ। हम एखन पफेर अपनाके डरल सहमल, व्यवस्थाक क सुरक्षा तकैत नीरीह लड़की जकां देखलहुँ। आब हमरा अपन निर्णय बचपना बुझाइत छल। पलंग पर पड़ल छलहुँ ऑखि सॅ नोर टघरैत छल। नरेन्द्र आबि कऽ भरि पॉज छऽ नोर पोछैत बजलाह-‘प्रिया हम तऽ क्रो(ी छिहे अहूँ के बजैत काल होश नहिरहैत अछि जे मन मे होइए बाजि दैत छी।’ अपना दिस घुमबैत बजलाह हे, हमरा ऑखि मे देखिऔ हम अहाँके कतेक मानैत छी। अहाँ केँ हमर शपथ पफेर कहियो एहन डेग नहिउठायब। हमर नोर देख ओ करेज सॅ सटा लेलैन्ह एना बताहि जकाँ कियेक कनैत छी। मारू अहूॅ हमरा थापड़ मारू। पफेर हमरा चूमऽ लगलाह-हम नहिजानि कोना सम्पूर्ण समर्पण-घबरा कऽ केवाड़ दिस तकलहुँ त हँसैत बजलाह-घबराउ जुनि केवाड़ बन्द छै।’ ओइ दिन पापा कहने छलाह-‘बेटी! प्रिया अहाँ पढ़ल-लिखल छी।’ ‘नरेन्द्रो तऽ पढ़ल-लिखल छथि पापा।’ डिग्री सॅ की होइत छै जकर जेहन मानस भूमि तकर तेहन सोच। अहाँ संवेदनशील छी। तैं हम अहाँ कें कहि रहल छी। हमरा लेल अहॉ अपन जीवन के नरक नहिबनाउ। अहॉक दुगर्ति हमरा नहिबर्दाश्त हेत। अपन अपराध्क सजा हम अपने भोगब। हम जनैत छी नरेन्द्र हमरा कहियो मापफ नहिकरत! कनि रूकि कऽ पफेर बजलाह इ हमर त्रिकोण अछि, अइ मे अहॉ नहिओझराउ। आ संजुके ओतऽ नहिजाए दिऔ।’ हमरा मोन मे कतेको प्रश्न घुड़िआइत छल-बहुत किछ पापा के कहबाक छल बहुत प्रश्न क उत्तर सुनाबक छल। बेर-बेर मन मे होइत छल पापा सॅ पूछिऐन्ह की छोटी मांक प्रति हुनकर कोनो दायित्व नहिछैन्ह? हिनका बाद छोटी मांक देखरेख के करतैन्ह? नीना हिनकर बेटी नहिछैन्ह.......ओ कतेक दिन ध्रि नजायज संतानक संताप सहैत रहतीह........?’ मुदा हम किछ नहिपूछलिऐन्ह । पापा उठि कऽ चलि गेलाह। हुनकर झुकल कान्ह जेना आओर झुकि गेलैन्ह। ध्ीरे-ध्ीरे दिन ढ़रल। गाछ बिरीछ केर नमरल छॉही अपन बेचैनी हवा मे मिझरा रहल छल। वातावरण मे नीरस शुष्क पारदर्शित ऊबाऊ लगैत छल। हम स्वयं सँ दूर अपन अस्तित्वक निषेध्क तत्त्वक आगाँ नमस्तक छलहुँ। निन्न टूटल। देखल प्रात प्रभा स्नात, चिडैँ़ चुनमुनिक चुं-चु, डाइनिंग हाल मे बजैत सिम्पफनीक मध्ुर स्वर संग नील आकाशक राग-रागिनी सुनलहुँ। चाहक चुसकि लैत सोचैत छलहुँ की करू? मोन नहिपड़ल आइ कोन तारीख छैक। एतऽ अयला मात्रा सात दिन भेल अछि मुदा बुझाइत अछि जेना महीनों सॅ एतऽ रहि रहल छी। समुद्रक लहरि आ दूर सॅ अबैत लाल मोटर बोट केर एकटा अद्भूत आनन्द कें महसूस करैत छी। हवा मे सुगंध् छै जे श्वास-श्वास कें सुवासित कऽ रहल अछि। हमर अपन जिनगी? जिनगी मे गर्म चटाðनक ऊष्मा अछि जे समुद्रक नमकीन लहरि के चुमि-चुमि ताजगी दऽ रहल अछि। अपना कें सम्बोध्ति कऽ मन बजै’छ-प्रिया वर्तमान के भोगब सीखू समय अयला पर इएह स्वतः सृजनक कृति क रूम पे उभरत। वर्तमानक एहि वैभव के छोड़ब बु(िमानी नहि। हमर एकटा अतीत अछि जे वर्तमानक संग घिसियाइत रहैत अछि। संजु वला घटनाक साल भरि बाद पापा क देहान्त भेलैन्ह। हमरा होइत क्यो जा कऽ छोटी मां के लऽ अबितैन्ह। पापाक अत्तिमबेर दर्शन भऽ जेतैन्ह छल। मुदा नहिप्रतिष्ठित अग्रवाल हाउस मे ओ कदापि नहिआबि सकैत छथि-नरेन्द्र बाजल छलाह। निष्ठुर, संवेदनहीन आर नहिजानि की सभ मोने-मोन हम बाजल छलहुँ। पफेर साहस कऽ नहु-नहु सासु के कहलिएन्ह-ओ आर जोर सॅ कानऽ लगलीह। पीसी सान्त्वना देत छलथिन ‘भाभी, अपना कें सम्हारू। हिम्मत सॅ काज लिअ..... अहॉ तऽ सब दिन बर्दाश्त करैत रहलहुँ अछि।’ हमरा ऑखिक सोझा छोटी मां चेहरा बेर-बेर अबैत छल हुनकाऽ तऽ क्यो दू टा बोल भरोस देबहु बला नहिछैन्ह के ककरा बर्दाश्त कएल से के कहि सकै’छ। हं, बाबूघाट पर बहुत दूर एकटा औरत के नहाइत देखलिए। अरे ..... इ तऽ छोटी मां.... एसगरे.....चूड़ी पफोड़ैत...... सिन्दुर मेटाएल एकदम एसगर......पफेर हुनका जाइत देखलिऐन्ह! मोन पड़ैत अछि ओ दृश्य तऽ एखनहु ऑखि नोरा जाइत अछि! हमरा सासु के द-दस टा औरत आगाज-पाछाँ छलैन्ह। मुदा हम ककरा दोष देबै? व्यक्ति के? समाज के? की परम्परा के? की छोटी मां स्वयं अइ सभक जिम्मेदार नहिछलीह हरदम निष्क्रिय मौन छलीह। हुनके खून छैन्ह नीना जे एलान करै’छ सुख नहिअछि तऽ अर्जित करब।’ पापाक गेलाक बाद घर मे चुप्पी पसरल रहैत छल आ नरेन्द्र आर पावर पफुल भऽ गेलाह। पहिने कनिको लाज-धख तऽ छलैन्ह पापाक। आब तऽ ओ स्वयं सम्पूर्ण परिवारक कर्ता-र्ध्ता छथि। विवाहक मात्रा पांच वर्ष बीतल छल आ हमर सभक आपसी सम्बंध् क्षत-विक्षत होमऽ लागल छल। कनि-मनि खरोंच तऽ बहुत पहिने लागल छल....सुहाबराति...... वा हनीमून के समय ऊँ हूँ संभवतः संजुक भेलाक बाद। नीक जकां मोन नहिपड़ि रहल सब दिन तऽ बक झक होइते रहैत छल दिनो-दिन दू हृदय मध्य दूरी बढ़िते रहल। शायद दूनूक भिन्नविचार के कारण। दूनू गोटेक स्वभाव एकदम भिन्न छल। एक दोसर के सहन करब कठिन छल। नरेन्द्र के संग हम पहिलबेर अमेरिका गेल छलहुँ त पन्द्रह दिन संग रहब कठिन भऽ गेल छल। न्यूयार्क मे हमर इच्छा छल आर्ट गैलरी देखबाक, राति मे ब्राडवे मे कोनो नाटक..... मिú नरेन्द्र अग्रवाल..........? भोर सॅ शापिंग के चक्कर मे हम परेशान भऽ जाइत छलहुँ कहितो छलिऐ। नरेन्द्र एतेक वस्तुक कोन प्रयोजन ?......’ ‘अहॉके कोनो वस्तु नहिचाही ठीक छै। अहाँ जोगिन बनल रहू। मुदा हमरा किछ किनऽ काल टोकू जुनि।’ शापिंग, शापिंग, शापिंग। भोर सँ सांझि घरि। शर्ट, पैंट्स, स्वेटर्स, जैकेट, टाई, परफ्रयूम, साबुन, पेस्ट की कहॉ एक दू नहिसब दर्जनक हिसाब सॅ। आ राति मे भोजन लेल भारतीय वा चाइनीज रेस्टोरेंटक खोज। भोजनक बाद ब्लू पिफल्म देखनाई! सेक्स के पफूहड़ प्रदार्शन!! हम अकछि कऽ बजैत छलहुँ नरेन्द्र एक बेर देखलहुँ दू बेर देखलहुँ की रोज-रोज.......।’ अरे, की बजैत छी एहन थ्रील देखबालेल पफेर कहिया भेंटत? आ ओतऽ सॅ घुरला पर होटल मे वएह वहशी उत्तेजना हमर एक-एक अंग निस्पंद भऽ जाइत छल। महिलाक शरीरक पफूहड़ प्रदर्शन सॅ कोनो महिला कोना उत्तेजित भऽ सकै’छ? शायद ककरो होइत होइ मुदा हमरा तऽ ओ देखि घृणा भेल। सत्ते पश्चिमी भोगवादी समाज मे औरत मात्रा वस्तु बनि गेल छैक। ओ लाइव शो देखि कऽ हमरा मोन पड़ल छल सर्कस। ओना आबतऽ सबठां खुलापन बढ़ले जाइत छैक अपन-अपन रूचि। खैर हम जखन वाश्ंिाटन जाए लागलहुँ तऽ हमर शर्त छल जे हम ऐतिहासिक स्थानके देखब। ‘नरेन्द्र! अहॉ हमरा ईष्ट विलेजो नहिदेखऽ देलहुँ।’ ध्ुर, की देखितहुँ। आ इ अमेरिकन सबठां लाइन लगाकऽ ठाढ़ होइछ। हमरा सॅ लाइन मे ठाढ़ भेनाई नहिपार लागत। तऽ सबसे पहिने हम सब वाशिंगटन के म्यूजियम मे गेलहुँ। स्पेश क्ररफ्रटक विभाग मे एकटा विशाल पर्दा पर पूरा सौर मंडल जगमगाइत छलै आ एकटा छोट सन चमकैत बिन्दु छलै जत लिखल छलै-‘पृथ्वी।’ हमरा एकटा विचित्रा सन वैश्विक अनुभूति भेल। हम बाजि उठलहुँ एहि असंख्य ग्रह-नक्षत्रा मे एकटा छोट छीन पृथ्वी, ताहि पृथ्वी पर असंख्य मनुष मे एकटा हम तखन एतेक अहंकार! कनि सोचिऔ नरेन्द्र! बिना मतलब के कतेक अहंकार डेबने रहैत छी। हमर ‘हम’ की अछि? किछ नहिमहा सागर मे जेना एक बुदा पानि मुदा नरेन्द्र छलाह कहां ओत? हम बेचैन भऽ चारू भर तकलहुँ कतऽ गेलाह। तऽ देखलिऐन्ह कापफी क काउंटर पर ठाढ़ भऽ पोटाटो चिप्स खाइत छलाह। मन झूर झमान भऽ गेल। हम दूनू गोटे दू भिन्न दिशा मे सोचऽ वला मनुष छी। कखनहुँ संवाद संभव नहि। एकर बाद अइ यात्रा क्रम मे हम कतहु जयबाक जिद्दनहिकएलहुँ। अपना मन के बुझालेलहुँजे भऽ सकैंछ हम पहिलबेर आयल छी तँय सभटा एतेक आकर्षित कऽ रहल अछि। नरेन्द्र तऽ कतेक बेर आयल छथि दोसर बात जे ओ बिजनेस मैनेजमेंटक कोर्स व्हार्टन स्कूल आपफ मैनेजमेंटस सेॅ कयने छथि। आ अपन-अपन रूचिक बात छै। मुदा पढ़ल-लिखल व्यक्तिक रूचिकारिष्कृत परिमार्जित नहिभऽ सकै’छ? भऽ सकै’छ मुदा मिस्टर अग्रवाल के नहिभऽ सकै’छ। कखनौ मन कहैत छल-की हम हुनक रूचि नहिबदलि सकैत छी प्रयास करऽ चाही। कखनौ मन कहैत छल-सब प्रयास हमहीं करबै की हुनकर जिम्मेवारी नहिछैन्ह किछ? जिम्मेवारी दूनू गोटेक अछि। गलत बात व्यवहार लेल दूनू गोटे सहअपराधी होएब। हं, ई हमर दोष अछि जे हम गुलामी स्वीकारि ..... गुलाम बनल रहबाक अपन नियति मानि ली। कोनो एकटा घटना होमए तऽ ओकर विश्लेषण कयल जाए। वैवाहिक जीवनक कोनो एकटा पक्ष कमजोर रहैत तऽ ओकरा पर ध्यान नहिदितिऐ मुदा जखन बात सम्पूर्ण अस्तित्वक होइ तऽ क्यो कोना अनठा देत? महिलाक आदर करब तऽ नरेन्द्र सीखबे नहिकयलनि। घर मे पीसी अबैत छलथिन या सर कुटुम्बक भाभी बहिन ककरो टेउरैत नहिछलाह प्रणाम-पाति वा कुशल क्षेम किछ नहिबस अबैत जाइत काल ‘हाय-हेलो।’ आ जाबत पीसी किछ कहिथीन ताबत ओ आगाँ बढ़ि जाइत छलाह। एतेक धरि जे अपना मां के आदर पूर्वक कखनौ गप्प-सप्प करैत कहां देखैत छिऐन्ह ..... मां अहॉ किछ नहिबूझैत छिऐ पफूहड़ जकां बजैत छी.... अहाँ के कोनो तौर तरीका नहिबूझऽ अबैत अछि।... ओह अहॉ के किछ नहिबनबऽ अबैत अछि वएह वदामक हलुआ की मालपुआ धुर.....जेमन मे अबैत छैन्ह बकऽ लगैत छथि। मां भोरे सॅ लागल छलथिन छेना पफाड़ि कऽ मालपुआ बनौने छलीह बेटाक बात सुनि अपरतीप सन भेल हमरा कहलनि पहिने इएह मालपुआ क पफरमाइश करैत छल आब नीके नहिलगैत छै अहीं मन पसंद वस्तु बना दिऔ।’ मम्मी ‘अहॉक बनाएल एतेक स्वादिष्ट नास्ता नहिनीक लगैत छैन्ह तऽ हम की बना कऽ देबैन्ह जएता कल्ब मे, ओतहि खयता। हमरा सॅ नहिहेतै।’ नहिहेत? बस श्रृंगार-पटार करू रंडी जकॉ आ ऑपिफस जाउ। कहैत कॉचक मेज पर जोर सॅ चम्मच पटकि उठिकऽ ठाढ़ भऽ गेल छलाह। ‘रे’ इ कोन बाजऽ के तरीका छै’? मां कहने छलथिन। हम बेमन सॅ पुआ टुंगैत रहलहुँ। दस वर्षक संजु एक बेर हमरा एकबेर पापा के टुकुर-टुकुर देखैत छल। पापा के गेलाक बाद बाजल-‘दादी, बहुत नीक बनल अछि मालपुआ खूब टेस्टी। पापाक मूड खराब छलैन्ह तैं नीक नहिलगलैन्ह।’ बेचारा सँजु-मां-पापा क झगड़ा मे अनेरो पिसाइत छल। सम्बन्ध्क इतिहास होइत छैक मुदा घटना जे घटित होइत छैक तकर कोनो तारीख दर्ज नहिहोइत छै। कहिया, कखन कोन घटना हमरा दूनू गोटे के पफरक-पफरक दिशा मे धकेलऽ लागल मोन नहिपड़ैत अछि। बस एतवे मोन पड़ैत अछि हथौड़ी सॅ क्यो ध्माक-ध्माक हमरा अस्तित्व के थुड़ि रहल छल। घुटन दिनो-दिन बढ़िते रहल। तखन हम किताब मे मन लगयबाक कोशिश करऽ लगलहुँ। अहू लेल नरेन्द्र कहने छलाह...... ‘इन्टेलेक्चुअल शो ऑपफ।’ जम्हर देखू किताबे-किताब। बेकार पाइ बर्बाद करैत छी नेशनल लाइब्रेरी सॅ आनि के पढू़ ‘किताब नहिपढ़ूतऽ की करूॅ? कोना समय बिताऊ?’ ‘आर महिला कोना समय बीतबै छै?’ कहबाक मोन भेल मुदा चुप्पे रहलहुँ। हिनकर मित्रा आ ओकर पत्नी ताशपार्टी छै। रंग-बिरंगक नास्ताक प्लेट, शिवासक बोतल, पफूहड़ मजाक बचकानी चुटकुला मात्रा सेक्स पर चर्चा। ओइ बैसक मे हम सामिल नहिभऽ पबैत छलहुँ। नरेन्द्र अहू पर व्यंग्य करैत छलाह-‘की ओकर सभक पत्नी पढ़ल-लिखल नहिछै ओ सभ तऽ बैसल रहैत छै। अहींक मानसिक स्तर उच््य अछि?’ ‘नरेन्द्र हम से कहाँ कहैत छी? छुटीðक दिन दोसरो ढंग सँ बीता सकैत छी कतहु घूम जाइ वा घरे मे बैस कऽ संगीत सुनि......। ’ ‘प्रिया, हम जे पिफल्म अनैत छी से हो अहाँ के नीक नहिलगैत अछि।’ नरेन्द्र अहाँ कतेक दिन धरि ब्लू पिफल्म देखैत रहब ? आब त संजुओ पैद्य भऽ रहल अछि।’ संजुक अलग रूम छै ओइ रूम मे अलग विडीओ छै।’ हम जिनगी भरि देखैत रहब ब्लू पिफल्म।’ संजु ओ पिफल्म अइठाम सॅ उठा कऽ लऽ जेतै तऽ?’ ‘अहॉ करैत रहू रखवारी।’ सत्ते हम उबिया गेल छलहुँ ओइ वातावरण मे ? बस दिन भरि किताब नेने बैसल रहैत छलहुँ पढ़ऽ सॅ बेशी सोचैते रहैत छलहुँ। सासु कहैतो छलीह-‘प्रिया, केहन मुँह-कान बनौने रहैत छी। एखन नहिसजब-ध्जब तऽ की बुढ़ारी मे सजब? मने नहिहोइए मम्मी जी। ‘एकटा बच््या भऽ जाइत तऽ ओइ मे अहॉ बाझल रहित हुँ......।’ हम सोचऽ लगलहुँ की बच््या भेला सॅ हमर खलिपन भरि जाएत-आ से कतेक दिन एक वर्ष, दू वर्ष अध्कि सॅ अध्कि पाँच वर्ष? मोन भेल सासु से पूछिऐन्ह मम्मी जी अहाँ केँ समय बीतेनाइ कठिन नहिलगै’छ ? कोन एहन काज करि जाहि मे व्यस्त रहि से नहिपफुराइत छल। हं मन भेल पढ़ौनीक काज करि । नरेन्द्र सँ पूछलिऐन्ह। उतारा भेंटल-अहॉक दिमाग खराब भऽ गेल अछि ऽ आब अहाँ गुप्ता हाउसक बेटी नहिअग्रवाल हाउसक पुतौहु छी। संकेत छल कुमारि मे एकटा स्कूल मे पढ़बैत छलहुँ। सुनि कऽ काठ भऽ गेलहुँ। पफेर एहन संयोग जे नरेन्द्र स्वयं प्रोपोजल देलनि। सत्तर केर दशकं विदेशी मुद्राक अभाव, विदेश गमन पर पाबंदी। आ मिú अग्रवाल मित्रा मंडली मे शान बधरैत छलाह साल मे दू-दू बेर विदेश जा कऽ। आब कछमछी छयने छैन्ह।बजलाह ‘प्रिया हम चाहैत छी अपनो एक्सपोर्टक ध्ंध शुरू करू। सार प्रमोद दिन-राति उठैत-बैसैत विलायतक डींग मारैत रहैत अछि।’ प्रमोद नरेन्द्रक जिगरी दोस्त छलै। पच््यीस वर्षक दोस्ती मुदा तइओ ओकरा शिकायत छलै प्रमोद जी सँ। इम्हर पाँच वर्ष सॅ ओ जिनगीके पटरी पर आनलनि अछि। सोझ, सच्चरित्रा लोक। बापक मुइलाक बाद भाई सब ध्न दाबि लेलथिन। बेचारा पत्नीक जेबर बेच कऽ सिल्कक कारोबार शुरू कयलनि। अपना करोड़ोक ध्ंध ध्ैन्ह तइओ प्रमोदक उन्नति सॅ जरैत छथि। पार्टी मे प्रमोदके बजबैत छथिन मुदा ककरो सँ परिचय नहिकरबैत छथिन। एक दिन बजलाह आइ प्रमोद के बजा कऽ कहबै अपना कम्पनी मे हमरा डाइरेक्टर बना दे। प्रमोद जी बड्ड शालीनता सॅ ई बात टारि देलथिन। ओ जनैत छलथिन नरेन्द्र के लेबऽ आ देबऽ बला तराजू भिन्न-भिन्न छैक। प्रमोद जी कहलथिन। ‘भाई! एकटा व्यापारी भारत सॅ हैंडीक्राफ्रट अयात करऽ चाहै’छ....जँ कोनो हैंडीक्राफ्रटक वस्तु पढाओल जाए तऽ कारोबार शुरू भऽ सकैत छै।’ ‘अरे, तऽ ई कोन पैद्य समस्या छै कोनो मैनेजर.....’ हं, मैनेजर राखि लिअ, आ एक वर्षक बाद अपन एक्सपोर्ट शुरू भऽ जाएत। मुदा एतेक छोट स्केलक काज तऽ अपने हाथे करऽ पड़त।’ ‘से तऽ छै मुदा हमरा ओतेक समय कहाँ रहैए?’ हम किछ बजितहुँ ताहि सॅ पहिने प्रमोद भैया कहलथिन-‘अहाँ केँ समय नहिअछि तऽ भाभी जी के कहियोन्ह कारोबार सम्हारऽ लेल।’ ‘हूँ, प्रिया आ एक्सपोर्ट......। रसोई घर मे तऽ जाइते नहिछथि।’ हमर मोन झुर-झुमान भऽ गेल। ‘भाई, हमरा जे कहबाक छल कहि देलहुँ आब अहॉ दूनू गोटेक जे इच्छा होइ करू। कलात्मक रूचि बिना ई व्यापार नहिभऽ सकै’छ आ प्रिया भाभीक व्यक्तित्व मे कलात्मक रूझान छैन्ह।’ ‘आर्डर कतेक दिन मे भेटतै?’ ‘जहिया कहू। अगिले मास ओ एमस्टरडम सॅ आबऽ बला छै। भभी जी कें कोनो ऑपिफस मे भरि दिन रहऽ पड़तैन्ह मात्रा दू-तीन घंटा क बात छै। एहि व्यापारक बहाना सॅ जतेक बेर इच्छा होइ विदेश घूमि आयब। जिनगी मे पहिलबेर आ शायद आखरीबेर सासु हमर पक्ष लेलैन्ह-‘नरेन्द्र, प्रिया के इ व्यापार सम्हार दिऔ मन बाझल रहतैन्ह।’ हं, तऽ हम मोन लगाबऽ लेल काज शुरू कयलहुँ। जे बनि गेल हमर जीवनी शक्ति। छोटे स्तर पर छलै कारोबार मुदा हम व्यापारक सम्पूर्ण संरचना कें बुझबाक प्रयास कयलहुँ। हैंडीक्राफ्रटक पूरा इतिहास पढ़ि लेलहुँ। गाँव-गाँव जा कऽ देखलिऐ कोन वस्तु कोना बनैत छै। आब बुझलिऐ हमर देश केहन समृ( अछि! ......... पीतर आ ताम्बाक मूर्ति, हाथी दाँतक समान, लकड़ीक लुगदीक बनल वस्तु........। पहिल बेर हम नरेन्द्र संग विदेश गेलहुँ। पिफलिप के ऑपिफस में घुसऽ से पहिने नरेन्द्र कहलनि-‘प्रिया, अहाँ चुप्पे रहब।’ हम चुप्प छलहुँ। पिफलिप जे समान बनयबाक-सप्लाईक बात कहैत छलथिन तुरत नरेन्द्र कहैत छलथिन-‘नो प्रॉब्लम।’ हम जनैत छलिए कोनो वस्तु बनयबाक मे कतेक समस्या उत्पन्न हेतै। मुदा हमरा मनाही छल तैं चुप्पे छलँहु। अन्त मे बजलाह पिफलिप-मिस्टर नो प्रॉब्लम! हमरा अछि एकटा समस्या। हम चाहैत छी ‘जे प्रदर्शनी मे भारतक व्यापारी भारतीय शिल्प के विषय मे चर्चा करए।’ प्रदर्शनी मे कतेक दिन रहऽ पड़ैत ?’ -‘सात-आठ दिन।’ ‘सात-आठ दिन? बट आइ एम ए बिजी पर्सन।’ -पिफलिप बजलाहः ‘देन डोंट डू दिस वर्ष। ओ. के.। कहि घड़ी देखऽ लगलाह पिफलिप । बात टूटैत देख नरेन्द्र के चेहरा पर तनाव झलकैत छलैन्ह। हम डराइत-सकुचाइत बजलहुँ- ‘मि. रॉथवेल! अहाँ हमरा पाँच मिनट समय दऽ सकैत छी?’ ‘हं, हं, कियेक नहि?’ ‘सुनू-हमरा हैंडीक्राफ्रटक विषय मे किछु जानकारी अछि। -अहाँ जाहि मूर्तिक विषय कहि रहल छी, तकर दू-चारि टा पीस त हूबहू बनि जायत मुदा हजारक संख्या मे असंभव छैक।’ ‘कियेक?’ ‘कारण स्पष्ट छैक हाथ सॅ बनाओल जेतैं प्रत्येक कारीगरक अलग-अलग ढंग होइत छैक। रंग मे पफर्क भऽ सकैत छै तैँ।’ ‘मुदा हमर गांहक?’ ‘ई अहाँक काज अछि जे अपना गांहक के हैंडीक्राफ्रटक अर्थ बुझाबी। हाथ सॅ बनैत छैक तैं मात्रा वैरियेशन एकर सुन्दरता छै। मशीनक बनल वस्तु लेल अहाँ हमरा देश नहिआयब। मशीनक बनल वस्तु तऽ अहाँ कें ताईवान मे भेंट जायत।’ ‘अहाँ एकदम सत्य बाजि रहल छी।’ पिफलिप के चेहरा प्रसन्नता सॅ खिलल छलै। नरेन्द्र कें कहलथिन बुझाइत अछि अहाँक पत्नी अहाँ सॅ वेशी बुझैत छथि एहि विषय मे।’ ई सुनि नरेन्द्र के चेहरा पफक भऽ गेलैन्ह। पिफलिप एक लाख टकाक आर्डर देलनि। हम अति प्रसन्न छलहुँ। खुशी सॅ ध्रती पर पैर नहिपड़ैत छल। होटल पहुँचिते नरेन्द्रके गर पकड़ि लपटैत बजलहुँ ‘लेट्स सेलेब्रेट नरेन्द्र! चलू शैम्पन पीबऽ।’ ‘हँू, एक लाखक आर्डर की भेंटलनि, रानी जी नाचऽ लगलीह। हम करोड़ो कमाइत छी तइओ एना नहिउधिएलहुँ कहियो।’ हम गुम्म भऽ गेल छलहुँ। संभवतः आपसी सम्बन्ध् मे ओहि दिन पहिलगांठ परि गेल छल, एमस्टरडमक रॉयल होटल, कमरा नम्बर तीन सौ चारि मे। कमराक घंटी बाजल। चौंकलहुँ। ‘कम-इन’ कहैत केवाड़ खोललहुँ। रूम क्लीनिंग लेल होटलक नौकरानी आयल। ‘गुड मार्निग मैमऋ कहि सपफाई मे जुटि गेल। घड़ी देखलहुँ दस बजैत छै यानि सात बजे सॅ हम अहि बालकनि मे बैसल छी! नौकरानी सपफाई कऽ चलि गेल। हम शीशा मे अपन मुँह देखलहुँ ओझराएल केश। उदास ऑखि आ थाकल देहक पोर-पोर। विदेश मे अइठामक परिवेश वातावरण सॅ अपना के कटल-छंटल अनुभव होइत छै तयॅ लोक अपना के संदर्भ हीन बुझऽ लगै’छ । चाहैत छलहुँ अपन कथा लिखब मुदा सोचिते रहि गेलहुँ। एखन घरि एको पॉती नहिलिखलहुँ अछि। कतऽ सॅ शुरू करि की लिखी से पफुराइते ने अछि। ऑखि गेल दूर लहराइत समुद्रदिस। नील झिलमिल लहरि टूटल चटाðन क टुकड़ा कछेड़ पर देखाइत अछि। अचानक हमरा सब किछ ऊबाऊ लागऽ लागल। काल्हिए पिफलिप ओतऽ वालवाइक चलि जायब। हम आपरेटर सॅ वालवाइकक नम्बर मांगलिऐ। एखन पिफलिप ऑपिफस मे हेतै। ‘हं पिफलिप, हम काल्हि आबि रहल छी लुफ्रतांसाक फ्रलाइट सँ बेलग्रेड होइत। कनपफर्म्ड बुकिंगऋ नहि, ओ नहिभेंट जेतै। की बेलग्रेड सॅ नहिभेंटतै? जँ नहिभेंटतै तऽ हम सूचित कऽ देब। अहाँ एयरपोर्ट पर नहिआयब हम एमस्टरडम उतरि ट्रेन सॅ पहुचबा हं, बुझलहुँ, गलती भऽ गेल पहिने कनपफर्म्ड कऽ लितहुॅ तखन पफोन करऽ चाही। कहि तऽ रहल छी सॉरी पिफलिप। अहाँ सांझि मे पफोन कऽ रहल छी। ठीक। जूडी के हमर स्नेह....... बाई।’ पफोन रखलहुँ। अपन गलतीक एहसास भेल। दिमाग एहन सुस्त कोना भऽ गेल? अतीतक स्मरण की नरेन्द्रक व्यंग्यवाण सुनि! ‘.............. प्रमोदे के कारण अहाँ कें पिफलिप सॅ परिचय भेल’। मोन भेल कहिऐ-परिचय तऽ अहूँ के भेल छल तखन लोक के कियेक हमरा सॅ दोस्ती भऽ जाइत छै आ अहॉ सॅ छीह कटैत अछि? जोर सॅ भूख लागल। काल्हि राति मे खाना नहिखयने छलहुँ। नहा कऽ जल्दी-जल्दी कैपफे दिस बढ़लहुँ। एखन ने ब्रेक पफास्ट के बेर छै ने लंचक। कापफे प्रायः खालिए छल मात्रा दू चारि गोटे कापफीककप नेने अखबार पढ़ैत छल। सर्विस वाली लड़की खिड़की लग बैसल औंध रहल छल। हमरा देखिते पूछलकः ‘ह्नाट कैन यू आपफर? -ओनली चीज एण्ड ब्रेड ‘मैडम इट्स यू लेट’ कहि हसॅऽ लागल। पफेर पूछलक -‘कैन यू पिफक्स ए सैंडविच?’ हम कहलिऐ ‘एस व्हाई नॉट?’ नास्ता कऽ घूम बहरेलहुँ। पफेर तुरंत वापस आबि गेलहुँ। मोन पड़ल जा बुकिंग क बारे मे नहिपूछलिऐ? खैर, बुकिंग भेल। सांझि मे पिफलिप पफेान करबे करत। पिफलिपे हॉपफमैन सॅ परिचय करौने छल। हापफमैन जर्मनी मे चमड़ाक व्यापारी छै। पिफलिप कहने छल चमड़ाक व्यापार मे वेशी स्कोप छै। पफेर वएह सड़क गाछ बिरीछ। की करू? कत जाउ? मन कहलक चलैत रहू थाकि जायबतऽ बैस रहब। काज ध्ंध तऽ अछि नहि। कतेक दिनक बाद एहन चैन भेंटल अछि। ..... दूर क्षितिज दिस तकैत छी....... ओई पार हमर घर छल। हमर नेनपन, बाबूजी, मां, दाई मां, सरोज, बुल्ली, नीलू ............ पफेर ब्याह एकटा नव घर....... विदाई काल माँ कहने छलीह-बेटीक नैहर सॅ डोली उठैत छै आ सासुर सॅ अर्थी। तखन अइ घिसल-पिटल कहबी पर हँसी लागल छल। मुदा नैहर तऽ सत्ते छुटि गेल, आ सासुर तऽ कहियो अपन घर बनबे नहिकयल। घर छैन्ह नरेन्द्रक, सँजुक आ हमर सासुके। ओतुका व्यवस्था जाहि मे हम अपना के पूरा इमानदारी सॅ झोंकलहु मुदा रहलहुँ मिसपिफट। जहिया मां के घर मे कोनो परेशानी होइत छल तऽ मन के मना लैत छलहुँ कहियो हमरो अपन घर हेत। आ आब ओहू घर सॅ हटा देल गेल तऽ आब कतऽ जाउ? कतेक सहजभऽ नरेन्द्र कहि देलनि-‘एत घुरिकऽ नहिआयब। यह, आइ मीन इट...... आइ एम सीरियस। हम कतेक परेशान छलहुँ जखन प्लेन दिल्ली उतरि रहल छल, विमानक भीतर एयर होस्टेस क स्वर गंूजि रहल छल ‘लंदन सॅ चलल प्लेन दिल्लीक इन्दिरा गांध्ी हवाई अडाó पर उतरि रहल अछि। आशा अछि अहाँ लोकनिक यात्रा सुखद रहल होएत। लंदन सँ दिल्लीक दूरी हम आठ घंटा मे पूरा कयलहुँ। अहाँ सभके सूचित कऽ रहल छी बाहरक तापमान एखन 28 डिग्री सेलसियस छैक।’ हम दिल्ली एयरपोर्ट पर उतरि कऽ सोचलहुँ कतऽ जाउ? कलकत्ता..... नहि। नरेन्द्रक स्वर दसो दिन यात्रा मे माथ पर हथौड़ीक चोट जकां खटखट बुझाइत रहल-एत घुरिकऽ नहिआयब ........कहियो नहि। आ मां, मोन पड़ल कोना बजने छलीह आ हम पफेर नरेन्द्र संग विदा भेल छलहुँ। हमर अपन क्यो नहिअछि? एतेक कारोबार पसरल अछि, एतेक बड़का आर्डर लऽ कऽ आयल छी। तखन तऽ चाहैते छथि झगड़ा बढ़ए मुदा अइ लडाई सॅ पफायदा? मुदा एतबा सच छै जे ओ हमरा घर मे घुस नहिदेत। पफेर मन कहलक-कानूनी सहायता सॅ नरेन्द्र अग्रवाल कें चौबिस घंटा क भीतर जेल पठा सकैत छी। मुदा अइ सॅ पफायदा? पफेर मोन पड़ल वीरेन ओ एक दिन कहने छल ‘दीदी! अहींक भरोसे हमर सभक दू सौ लोकक भातक हंडी चूल्हा पर चढ़ैत छै। अहां आब एसगर नहिछी।’ आ लंदन जाइतकाल नीना बाजल छलीहः ‘भाभी! आब हम कारनानी स्टेट्स मे नहिरहैत छी। बालीगंज मे अपना फ्रलैट मे रहैत छी। अहाँ मां के छोटी मां कहैत छिऐतऽ हम सब आन कोना भेलहुँ?’ आ तखन हम सोचि रहल छी कतऽ जाउ? छोटी मां बहुत आहुति देलनि पापक नाम पर। हुनका मुइलाक बाद कहियो ऑखिक नोर नहिसुखलैन्ह। वातावरण कें हल्लुक करबा लेल नीना बजैत छथि-‘भाभी, ई भारतीय मानसून छै।’ -नीना! एहन कटुवचन जुनि बाजू छोटी मांक लेल।’ -अहीं कहू-मां कियेक अन्याय सहलनि। अपन हक पर अध्किार कियेक ने कयलनि।’ -ओह, नीना, अहाँ नहिबूझबै। अहाँ ने ब्याह कयलहुँ अछि ने प्रेमक जाल मे पफॅसलहुँ......... छोटी मां जे जेहन छलै सेह स्वीकारलनि।’ नीना कें पापा सॅ घृणा छलै। आ नरेन्द्र कें मि0 कोबरा कहैत छथि बड़ी मां के देवी जी। ग्रैंड होटल मे ओ इंटीरियल पर्सनल मैनेजमेंट पोस्ट पर छलीह। सब संग हॅसैत-बजैत खुशमिजाज। बस छोटी मां के नोर देखिकऽ उदास भऽ जाइत छलीह। कहैत छलीह-भभी! हमरा लोकनिके आर सभटा बात सिखाओल जाइत छै मुदा खुश रहनाइ सिखाओल नहिजाइछ। मम्मी ने कतहु जाइत अबैत छथि ने मनोरंजन क लेल हुनका समय छैन्ह। एकसंझा भोजन आ मात्रा पूजा घर देखैत छिऐ। लड्डूगोपालक सोझामे ध्यान लगौने तऽ हमरा होइत अछि गुडाó-गुड़िया राखल छै। शायद मां कें बेटा नहिभेलैन्ह तकर रिक्तस्थानक पूर्ति करैत छथिन बाल-गोपाल।’ हम सिनेह सॅ भरि पाँज पकड़ि नीना के कहलिऐन्ह-नीना आब अहॉ बड्ड बक-बक करऽ लगलहुँ अछि आब अहाँ लेल हम वर ताकब। कहू केहन लड़का चाही? ‘की ब्याह कऽ अहाँ खुश छी? खुश छथि बड़ी मां, मम्मी..... भाभी अहाँ के तऽ मिú कोबरा भेंटलनि आब हमरा कोनो बानरक गरमे बान्ह्ऽ चाहैत छी?’ -मिú लॉयन या मिú टाइगर कियेक नहि?’ ‘घुर आइ काल्हि के लड़का?’ हम मने-मन प्रार्थना कयलहुँ भगवती! नीना के नीक सहचर भेंटए।’ दुनियाँ मे सुहृदय, संवेदनशील पुरुषोछै। मुदा नीना अपना कें ततेक इंसक्युलेट कऽ लेने छथि जे बाहरी हवा क ताजगी लेल कतहु कनिको टा भूर नहिभेंटैत छे। नीना अपन साथी लग कहियो पापाक चर्चा नहिकयलनि। एतबे कहने छथि जे हम बहुत छोट छलहुँ तखने पिताक मृत्यु भऽ गेलैन्ह। नीनाके सँजु सॅ कनि लगाव भऽ गेल छलै तऽ ओकरा अइठाम अयबालेल रोकिए देल गेलै। नरेन्द्र आ ओकर दादी नीक जकॉ सिखा-पढ़ा देलथिन जे ओ सभ नीक लोक नहिछै ने ओ जागह ध्यिा-पुताक जाय जोग छै। तोहर मां तऽ राति-दिन पढ़ैते-लिखैत रहै छौ तयँ ओकरा व्यवहारिक ज्ञान नहिछै। एयर इंडियाक फ्रलाइट साढ़े तीन बजे दिल्ली एयरपोर्ट पर उतर छल। कलकत्ताक विमान साढ़े आठ बजे जायबला छलै। सुस्त-सूतल एयरपार्ट जागि रहल छल-चाय-कॉपफी। हमरा दिस बला काउंटर खुजलै। श्रीनगर, बम्बई, जामनगर, आ हैदराबाद केर काउंटर खुजि रहल छल। देह झाड़ि उठलहुँ। बैसल-बैसल डॉर अकड़ि गेल छल। हम बगल मे बैसल महिला कें कहलिए-अहॉ कनिकाल हमर समान पर नजरि राखब? ओ बजलीह-‘हं, हं कियेक नाहि।’ यात्रा करैत-करैत अनुभव भेल अछि जे यात्रा में प्रायः महिला अपना के असुरक्षित महसूस करैत छथि आ सहयात्राी लेल आत्मीयता कनि वेशिए रहैत छनि। बाथरूम सॅ हम हाथ-मुँह धेऽ कऽ बहरेलहुँ। दू कप कॉपफी अनलहुँ। एक कप कॉपफी हुनका देलिऐन्ह। कॉपफी लैत बजलीह-‘बहुत-बहुत ध्न्यवाद! बहिन, हम तऽ इ बच््याक लऽ कऽ कतहु जा नहिपबैत छी। अहॉ कतऽ जा रहल छी?’ ‘कलकत्ता।’ ‘हमहूँ कलकत्ते जा रहल छी। न्यूयार्क सॅ राति पैन-एम सॅ उतरलहुँ अछि। छोट बच््याक लऽ कऽ यात्रा करबा मे बड्ड असुविध होइत छै। आब अहांक संग नीक लागत।’ हम हुनकर बात सुनि सोचऽ लगलहुँ-आब, ई महिला हमरा चैन सँ किछ सोचऽ विचारऽ नहिदेत। इम्हर-अहर उम्हर तकलहुँ। ठाढ़ भऽ हुनका कहलिऐन्हहम कानिकाल आगाँवला कुर्सी पर पैर पसारि आराम करऽ जाइत छी। अहॉक कोनो हर्ज नहिने।’ ‘नहि, नहि।’ हम अपन अटैची उठाकऽ आगाँवला कुसी पर जा कऽ पैर पसारि ऑखि मुनि लेलहुँ । मन मे पफेर वएह प्रश्न घुड़िआए लागल........ कत जाउ?’ हमरा एतेक स्पष्ट बुझल अछि जे नरेन्द्र हमरा सँ खुल्मखुल्ला लड़ाई करऽ चाहैत छथि। यद्यपि आब हमरा सेक्स भाव प्रायः खत्म भऽ चुकल अछि। मुदा हमर उद्दाम महत्वाकांक्षों कें नरेन्द्र बेर-बेर सेक्सुअल Úस्ट्रेशन क नाम दैत छथि। कतेक बेर मोन मे भेल अछि जे पूछिऐन्ह अहीं सन खेलाड़ी अहाँक कतेको मित्रा छथि हुनक पत्नी कियेक न्यूरोटिक छैन्ह? नरेन्द्र क्रूर टेढ़यालि। ओ सोचैत छथि हम हक लेलड़ब। केहन हक आ कथित हक? जखन प्रीत प्रतीत नहिएको क्षण लेल मध्ुर सम्बन्ध् नहितखन की बाँचल अछि? आ ध्न-सम्पत्ति? नरेन्द्रक ध्न? खरीद बिक्री, टका, टकाक सूदि ब्याज दर ब्याज। एनपफ! बहुत भेल, जें मोन होइन्ह करथु मुदा हमर पछोड़ छोड़थि। आ सँजु?’ एकमात्रा संजु हमर कमजोरि अछि बलिके बकरा जकॉ छटपटाइत छी। कानूनी दांव-पेंच के तौर पर सँजुक कस्टडी नरेन्द्रे के भेंटतैन्ह। हम सभ दिन आहुतिए दैत रहलह अछि। एहि जीवन यज्ञक मे इ हमर पूर्णाहुति होएत संजुँ अग्रवाल वंशक कुलदीपक। जहिया सॅ जनमल अछि। एखने सॅ बात-बात पर पापाक तरपफदारी करैत अछि। बात-व्यवहार मे नरेन्द्रेवला ठसक। कहैत अछि-‘मम्मी, देखबै हम बहुत बड़का इंडस्ट्री बनायब। इ एक्सपोर्टक काज तऽ सर्विस-ओरियंेटेड काज छैक के सार ‘गोर चमड़ी वलाक तड़बा रगड़त। सँजु! अहॉ इ गाड़ि पढ़ब कतऽ सॅ सिखलहुँ?’ मम्मी! हम कोन गलत बात बजलहुँ? पापा कहिलनि जे इ श्वेत अंग्रेज हमरा देशक शोषण कयने अछि। तऽ ओकरा गाड़ि नहिपढ़बै तऽ स्तुती करबै? अच्छा बहुत बुझनुक भऽ गेलहुँ। पापा ई नहिबतौलनि जे ओ स्वयं ककर-ककर शोषण करैत छथि?’ बेचारा मासूम नेना हमर बात सुनि टकटकी लगा हमरा देखैत रहल। स्त्राीगण शोषणक परम्परा कें कोना झेलैत छथि से संजु की जानऽ गेल! राति भरि जागले छलहुँ से ऑखि बेर-बेर मुना जाइत छल। आवाज सुनि ऑखि खुजल। एयरहोस्टेस पूछलनि-‘अहॉ चाय, कॉपफी किछ लेब? अहॉ सूतल छलहुँ।’ -‘चाह सर्ब करबा मे असुविध तऽ नहिहोएत?’ ‘नहि, नहि, हम तुरत अनैत छी।’ एयरहोस्टेस के देखि कऽ हमरा नीना मोन पड़लीह। नीना एयरहोस्टेस बनऽ चाहैत छलीह। मुदा छोटी मां के कनने खिझने गैं्रड होटल मे नौकरी कयलनि। पिताक स्थान पर लिखने छलीह स्वर्गीय अग्रवाल। इ बात ओ निःसंकोच हमरा कहने छलीह। एयरपोर्ट पर नीना छलीह। ‘भाभी! मां बजौलेनि अछि घर चलू। नहि, नीना, हमरा सबके अपन अपन लड़ाई स्वंय लड़ऽ पड़त। दोसर बात इ जे अहाँ कें बूझल अछि मिस्टर कोबराक जहर........।’ हम टैक्सी लऽ सासुर एलहुँ। हमरा देखिकऽ सासु प्रसन्न छलीह । दाई-नौकर सब खुश भेल। ‘बहू, अहाँक आइ अएबाक छल से सँजु बाबू कें बुझल नहिछलनि?’ बुझल रहैत छैन्हि तऽ ओ भोरे सॅ हमरा कहऽ लगैत छथि-रामसिंह समय पर एयरपोर्ट चलि जाए मम्मी आबि रहल छथि। ताबत नरेन्द्र ऊपर सॅ उतरलाह। करैत साँप जकाँ पफुपफकार छोड़ैत बजलाह-‘अहाँ एतऽ एलहुँ कियेक? जाऊ एखन तुरत हमरा घर सॅ बाहर जाऊ।’ ‘सुनू, वेशी हल्ला नहिकरू। इ घर हमरो अछि। तथापि हम दस दिनक भीतर अलग फ्रलैट लऽ लेब। एखन दस दिन हम एतहि गेस्ट रूम मे रहब।’ भीतरे-भीतर आगि ध्ध्कि रहल छल। नहिजानि कियेक इ पराया घर के ह बाँटऽ नहिचाहैत छलहुँ। ओना अइठामक ध्न-सम्पत्तिक लेल रति भरि मोह नहिअछि। आ नरेन्द्र तऽ कहिया सॅ हमरा सॅ दूर भऽ गेल छथि। मन मे इएह बात सब घुरिआइत छल कि नरेन्द्र बजलाह। ‘हमर ऑपिफस खालि कऽ दिअ।’ ‘आर किछ........’ ‘लॉकर के चाभी ककरा लग छै?’ मां लग। ‘मुदा ओइ मे तऽ हमर गहना अछि?’ बहुत गहना संयुक्त परिवारक छै। हीराक सेट आ चूड़ी कंगन सब मां के नाम सँ छै। ‘आ हमर गहना............ ?’ ‘अहाँ नैहर सॅ अनने की छलहुँ? मात्रा दस भरि सोना से लऽ लिअ। ‘नरेन्द्र?’ हे वेशी बाजू जुनि। बकबास करबत अहॉक व्यापारो बन्द करबा देब। बसएकटा चिटीò रिजर्व बैंक के लिख देबै।’ -‘यू........ यू ब्लैकमेलर!’ आ, अहाँ खिसियाल बिलाड़ि घुरखुर नोंचए।’ हमरा तऽ बुझू बकौर लागि गेल। हे भगवान क्यो एतेक नीचॉ खसत, हम कल्पनो ने कयने छलहुँ। इनारो मे नीचॉ जमीन रहैत छै........ आ नरेन्द्रक नीचताई अन्तहीन छै कतहुँ ठौर ठेकान नहि। हमरा किछु नहिपफुराइत छल। गेस्टरूमक केवाड़ बन्द कऽ ध्ड़ाम सॅ पलंग पर खसलहुँ। नोर हिचकी...... आ सबसॅ कष्टकर अनुभूति निहथ्था एसगर लड़बाक बोध्। हम कोना निपटब एहन खूंखार जानवर सॅ ? कहिया अन्त होएत समझौता करबाक। मन मे नरेन्द्रक प्रति केहन प्रतिक्रिया छल क्रो(! नहिक्रो( नहि। अर्न्तमन मे आहत पशु क चित्कार छल। होइत छल जॅ आब एको शब्द बजताह तऽ गरदनि दाबि देबैन्ह। आर किछ तऽ नहिकयलहुॅ हं, अपन चप्पल खोलि ठेकनाक देह पर पफेकलहुँ। मन कनि शान्त भेल। ग्लानि कनिको नहिभेल ने पश्चाताप। नरेन्द्रक प्रतिक्रिया आर तीव्र-‘राक्षसी .......... अपनाकें बड्ड बु(िमती बुझै’छ पढ़ल-लिखल हूँ...।’ मेज पर राखल पफूलदान उठाकऽ जोर सॅ देवार पर पटकलनि......... ‘जाउ जतऽ जयबाक मन होए जाउ मुदा अपन मुँह हमरा नहिदेखाउ। हम एको क्षण अहाँ कें देखऽ नहिचाहैत छी। आ तमतमा कऽ घर सॅ बहराइत हमरा मुँह पर पच््य सॅ थुकलनि। हम भोकारिपारि कनैत रहलहुँ अपने हाथे अपन कपार पीटैत छलहुँ। शायद ओइ दिन पफेर हमरा भीतर ओएह दस वर्षक बालिका अन्तिम बेर सुरक्षाक लेल संरक्षण मांगि रहल छल। नरेन्द्र वापस नहिघुरलाह। भरि घर शीशाक टुकड़ि पसरल छल। हम रूमाल सॅ सबके बटोरि रहल छलहुँ आ मने-मन सोचि रहल छलहुँ हम इ शीशाक टुकड़ि कियेक समेट रहल छी? जखन ककरो हमर जरूरते नहिछै तऽ घर मे किछ पसरल रहऔ ताहि सॅ हमरा की? ओ छमास पर सेक्रेटरी बदलैत रहैत छथि एक सॅ बढ़ि कऽ एक सुन्दरी जे हिनकर भूख शान्त करैत छैन्हि। ई तमासा पापा छलथिन तखने सॅ देख रह छी। पापाक गेलाक बाद तऽ रूप-सुन्दरी सब घरो पर आब लागल। खैर, जकरा सॅ हमरा कनिको लगाव नहिसे किछ करय। हं, एक बेर एकटा सेक्रेटरी छमासक बदला डेढ़ साल रहिगेल छलै। ओ वास्तव मे नरेन्द्र सॅ प्रेेम करैत छल। ओकरा गर्भ मे नरेन्द्रक सन्तान छलै तइओ इ राक्षस ओकरा हटा देने छलै। ओकरा कहने छलै-बिसरी जाउ हमरा सॅ प्रेम भेल छल, शपथ खेने छलहुँ! बाजु कतेकटका जाही इ ऑपिफस छोड़बा लेल? ओ कहने छलै- ‘टका? यू वास्टर्ड सन ऑपफ विच। की अहाँ बुझैत छी जे टका सॅ कोनो औरत कें मुँह बन्द कऽ देबै? हम अहाँ कें बर्बाद कऽ चैन लेब।’ बिजली जकाँ ओकर कड़कैत आवाज घर देवार के झकझोरि रहल छलै, आ नरेन्द्र मुसुकैत ओकरा पकड़ि कऽ घर सॅ बाहर ध्केलने छलै। ओ बताहि जकॉ केवाड़ पीटैत छल। हमर मन हहरि उठल मुदा हम ओकरा सॅ नहिपूछलिए जे अइ पुरूषक विषय मे तो सब बात जनैत छलै बूझल छलौ’जे विवाहित भऽ रोज औरत बदलैत छै तखन कोन भ्रमवश एकरा पर विश्वास कयलें। मुदा बिना किछ पूछने ओकरा हम अपना रूम मे लऽ एलिऐ। बड़ी कालध्रि ओ हमरा पकड़ि कनैत रहल पफेर शान्त भऽ चलि गेल। ओकरा गेलाक बाद नरेन्द्र व्यंग्य सॅ बजने छलाह-‘बड्ड हमदर्दी भऽ गेल। सौतिन आनि दिअ?’ एकबेर जूरीक लग हम अइ घटनाक चर्चा कयने छलहुँ। नरेन्द्रक क्रूरताक प्रसंग मे। तऽ जूरी कहने छल-अपना स्वार्थ पर चोट पड़ने लगभग सब लोकक प्रतिक्रिया एहने हिंसक होइत छैक, कियेक तऽ हमर आजुक सम्पूर्ण सभ्यता हिंसा आ प्रमादे पर टिकल अछि। नहि, प्रिया एहन नहिछै जे मात्रा महिलाक शोषण होइत छै पुरुषो क शोषण होइत छैक। व्यक्तिक अपन-अपन संवेदनशीलता छै एम्पैथी-दोसरक दुःख दर्द के अनुभव करबाक क्षमता। तखन हम पूछने छलिए जूडी सॅ खैर, इ कहू जे गलती हमर छल? नहिप्रिया नहि। असल मे अहाँक आ नगेन्द्रक सम्बन्ध् निगेटिव रूप लऽ लेने छल जत एक दोसर के मारऽ पर उताहुल छलहुँ हम अहॉ कें दोष नहिदऽ रहल छी-मुदा हमरा विचार सँ नीक होइत हटि जायब। एक दोसर पर निर्मम प्रहार करबा सॅ। कनैत-कनैत नहिजानि कखन सूति रहलहुँ। ऑखि खुजल केवाड़ ढ़कढ़कयबाक आवाज सँ। केवाड़ खोललहुँ। सॅजु हब्बोढ़कार कानि रहल छल। नरेन्द्र पसीना सॅ लथ-पथ आतंकित छलाह। सँजु हमरा भरि पाँज पकड़ि एखनहु हुचुकि हुचुकि कानि रहल छल। सासु माथ पकड़ने नीचाँ मे बैसल छलीह। सब दाई नौकर, महराज..... हम घबड़ाकऽ पूछलिए-‘की भेलै?’ क्यो किछ नहिबाजल। सँजु कहलक-‘मां। पापा बुझलथिन अहाँ जहर खा कऽ सूतल छीं।’ ‘ओह।’ ‘मम्मी!’ सँजु पफेर कानऽ लागल। आया मम्मीजी के उठाकऽ सोपफा पर बैसौलकिन। मिस्टर कोबरा ऊपर अपना रूम मे चलि गेल छलाह। होस्टल आबि, भोजन कऽ सूति रहलहुँ। पिफलिप के पफोन सँ निन्न टूटल।पिफलिप कें कहि देलिऐ-हम काल्हि आबि रहल छी। बुकिंग पक्का भऽ गेल। चाह पीबि पैकिंग मे जुटि गेलहुँ। नीचाँ जा कऽ बिल बनाबऽ कहलिऐ। अइ सात दिन मे एत सॅ लगाव भऽ गेल छल। सभक चेहरा परिचित सन लगैत छल एकटा आत्मीय भावक अनुभूति होइत छल। राति मे भोजनकाल जोसेपफ पूछने छल-‘मैडम, अहाँ काल्हि जा रहल छी?’ ‘हँ!’ ‘मैडम हमर वेजिटेरियन प्लेट नहिनीक लागल?’ ‘जोसेपफ-हमरा खूब नीक लागल आ सबसे बेशी नीक लागल तोहर आत्मीयता।’ ‘मैडम किताब पूरा भऽ गेल?’ नहि, जोसेपफ एखन हम सोचिए रहल छी। जोसेपफ गंभीरता सॅ माथ डोलबैत कहलक Úांसक बड्ड पैद्य लेखक ठहरल छलाह। मैडम की कहू ओ ततेक पीबैत छलाह। मैडम की कहू ओ जतबे पीबैत छलाह, ततबे लिखैतो छलाह। जखन ओ जाइत छलाह तऽ बड़का बक्सा कागज सॅ भरल छलैन्ह। ‘हुनकर नाम की छलैन्ह?’ ‘सॉरी, मैडम हम अपन मेहमानक नाम नहिबता सकैत छी। अच्छा, अहॉ लेल मीठ की आनु?’ -‘आइ मीठ की बनेलहुँ अछि?’ ‘पीचमल्वा.....मेडिटेरियन पीच के स्वाद अपूर्व होइत छैक.....इटली सॅ मंगाओल गेल अछि। कान लग आबि पफुसपफुसाकऽ बाजल मैडम ई डिश हमरा एत खास मेहमान लेल छै।’ अच्छा! हमरा हॅसी लागल। ‘लऽ जाऊ?’ ‘हँ-हँ।’ हम जोसेपफ कें कहलिए हम अपन कोनो ने कोनो उपन्यास मे तोहर पीच मल्वाक चर्चा अवश्य करब। पफेर ओकरा हाथ मे किछ डालर दऽ ओकरा सॅ विदाई लेलहुँ। ऊपर जा कऽ सूति रहलहुँ भोरे चारिए बजे उठबाक छल। एक मन भेल जे एक बेर समुद्र देखि मुदा नहिगेलहुँ। निन्न टूटल आपरेटरक आवाज सॅ-गुडमार्निंग, मैडम, इट इज टाइम टू वैक अप।’ हड़बड़ाकऽ उठलहुँ। एयरपोर्ट या स्टेशन जयबा लेल हमरा हरदम हड़बड़ी रहैत अछि। जँ समय सॅ आध घंटा पहिने पहुँच जाइ तऽ कोन हर्ज? पहिने पहुँचने तनाव नहिहोइछ। डूयब्रवनिक एयरपोर्ट पर शायद हमहीं पहिल यात्राी छलहुँ। काउंटर खुजलो नहिछलै। हम कोना वला कुर्सी पर जा कऽ बैसलहुँ- प्लेन जखन उड़ि रहल छल। खिड़की लग हमर सीट छल। स्वच्छ नील आकाश, उज्जर-उज्जर ठाम-ठाम बादरि नीचाँ आल्प्स करे बपर्फ सॅ झॉपल पहाड़ि। भूरा चितकबरा चटाðन पर बपर्फक तिरछाह रेखा बुझाइत छल। असीम तनाव वला समय छल। लंदन सॅ घुरिकऽ घर आयल छलहुँ मुदा छलहुँ बेघर। सँजु बेचारा निरीह नेना। कखनौ पापाक अगवाज सुनि दौड़ैत अछि तऽ कखनौ मम्मी के कोरा मे बैसिकऽ दुलार मलार करै’छ। ‘मां अहाँ अहिठाम रहू ने? पापा क बातक दुःख नहिकरू। ओ तऽ सबके डँटैत रहैत छथिन। काल्हि राति दादी बड्ड कनैत छलीह। हम मने-मन सोचलहुँ-दादी एतेऽ बढ़ावा देलथिन आब कानऽ के अलावा की करतीह। पैंतालीस वर्षक एकलौता बेटा। आ हुनका जे संस्कार छैन्हि पुरुषक वर्चस्व वला ताहि हिसाबें बेटा क बात-व्यवहार अनुचित्त लगितो नहिछैन्ह। हमर संस्कार दोसर अछि हम सँजुक सहारा लऽ नहिजी सकब। ने जिनगीक सहारा बेटा भऽ सकै’छ ने पति ने प्रेम। हँ हिनक संग सहयोग सॅ जीयब सहज भऽ सकै’छ। मन केँ भरोस भेटैत छै जे अपन क्यो अछि हमरा संग। मुदा जॅ ओ संग नहिदेमए उनटे एकतरपफा कर्त्तव्यक निर्वाह करैत अपन आहुति दैत रहि तऽ एक संग रहब कठिन भऽ जाइत छै। तैं हम अपना मन के मना लेने छलहुँ एकलाचलो रे जे संघर्ष करबाक होएत से करब। हम अपना दृष्टिकोण सॅ सही छी तऽ आनकऽ नजरि मे सही स्थापित करबा लेल कठिन तपस्याक कोन काज? बिल्कुल व्यर्थ। खास कऽ ई व्यर्थता क एहसास सॅ तखन आर कचोट होत छैक जखन बुझना जाइछ जे हमर बात सामने वला सुनऽ चाहिते ने अछि। अपना मन के कतेक तरहे बुझबैत छलहुँ मुदा हमर मन छल जे बुझियौ कें अबुझ बनल छल। हमर बेटा? एकलौता बेटा...... नहिनरेन्द्र किन्नहु नहिछोड़त। ओ नरेन्द्रक मुठीò मे छै कानूनो नरेन्द्रेक पक्ष मे छै। समाजो ओकरे संग देतै। प्रिया, अपना करेज पाथर पर राखू मुदा ओइ अबोध् नेनाकेँ बेघर नहिहोमऽ दिऔ। ओकरा अपना दादी सॅ लगाव छै पापा, पापा दिन भरि रट लगौने रहै’छ एको दिन पापा बिना नहिरहि सकै’छ। हँ, हमरो सॅ स्नेह छै-मुदा हमरा ओकरा जिनगी सॅ चुपचाप हटऽ पड़ल। दादी आ पापा सँजु केँ नीक जकाँ लालन-पालन कऽ लेथिन। प्रिया, स्वार्थी जुनि बनू ने अपना मातृत्व केँ महिमा मंडित करबा लेल बेचैन होउ। जँ स्वार्थी छी तऽ से स्वीकारि लिअ। कम से कम अपना आत्मा सॅ छल नहिकरऽ चाही। सत्य तऽ ई छै जे अहाँ बेटा सॅ वेशी अपना रोजगार कें चाहैत छी.....अहाँ के जँ स्नेह अछि तऽ अपना सॅ।मानलहुँ अपना आपके के नहिनेह करै’छ। इ हो बुझैत छी जे आइ ध्रि मात्रा महिले अपन आहुति दैत रहल अछि। मुदा से कियेक? अदौ से इएह होइत रहलैए तैं? मुदा जे अहॉ से होइत रहलै अछि सेह एखनहु होमए ई कोनो तर्क छै? तऽ..... हमकी करू?..... हे भगवान अइठाम ई अलाय बलाय सोचैत सोचैत हम पागल भऽ जायब। आ एकटा न्यरोटिक, राति-दिन कनैत-खीझैत मां लग कोनो नेना कतेक काल रहैत। एखन अबोध् छै दस वर्षक बाद बीस वर्षक युवा हमरा संग रहत किन्नहु नहिआ तखन हमर उम्र होएत पैंतालीस वर्ष! तऽ की पैंतालिसम वर्ष मे हम मृत्युक प्रतीक्षा करब? अपन समस्त स्वप्न कें आहूति दऽ दिअ?? भोर मे निन्न टूटल तऽ अपने सॅ पूछलहुँ-आब की करबाक चाही? आब कतेक दिन ध्रि कनैत रहू? आब कोनो ने कोनो रास्ता चुनऽ पड़त-अपन जंग अपने लड़ पड़ैत छै। नरेन्द्र सबसे पहिने हमरा नैहर मे हमरा मां क सोझा मे हमरा विरू( बात उठेलैन्ह-प्रियाक बड्ड गर्म मिजाज छैन्ह! मां, ओ चप्पल उठा कऽ हमरा देह पर पफेकलनि। सँजु तऽ हिनका डरें थर-थर कँपैत रहै’छ अहाँ तऽ एतेक दिन सँ हमरा मां के जनैत छी-अहीं कहू हमर मां कहियो हिनका कथु लेल रोक-टोक कयलथिन? मुदा ई कहियो अपन घर-गृहस्थी बुझलनि? सोझे मे कहैत छी पूछियौन्ह-कहियो भोजन बनौलनि? अहीं कहूॅ हिनका काज करबाक कोन जरूरत छै? ई कियेक भोर सॅ सांझि धरि खटैत रहैत छथि? ई हो नहिजे कलकत्ते मे रहैत छथि आइ दिल्ली काल्हि मद्रास। घर घुरलनि कि पफेर लंदन तऽ अमेरिका। हिनका ऑपिफस सॅ सेक्रेटरी पफोन कऽ आया कें कहैत छै-‘मेम साहब के बक्सा सैंत कऽ राखि देबै’ ओ रतुका प्लेन सँ हांगकांग जयतीह।’ कहू तऽ आया बक्सा सैंत सकै’छ मम्मी कें हिनकर बक्सा सैंत कऽ राखऽ पड़ैत छैन्ह! की कहू ई अपन आलमीरा क चाभी ध्रि आया के सौंप कऽ चलि जाइत छथि। ऑपिफस सॅ हड़बड़ाइत औतीह आ विदा होमऽ लगतीह’ हमर मां दूध् क गिलास लऽ हुनका पाछू लागल रहैत छथि-प्रिया दूध् पी लिअ।’ बड़का भैया हं मे हं मिलबैत बजलाह। नरेन्द्रबाबू अहॉक कहब उचित अछि-सरासर प्रियाक गलती छै। अहू घर मे पुतौहु छै एकरा जकॉ करतै क्यो तऽ एको दिनबास नहिहेतै।’ सेह, बुझियौ अहां सब। विजय बाबू की सब कहू ई हमरा राक्षस, कसाई आ जानवर कहैत छथि।’ आब मां कें रहल नहिगेलैन्ह। गुम्हरैत बजलीह। ‘प्रिया तोहर ई हिम्मत! छीः छीः तू जन्म लैते कियेक ने मुइलें।’ नरेन्द्र, हम गलत के गलते बुझैत छिऐ अपन बेटी अछि तैं की हम एकर पक्ष कखनहुँ ने लेलिऐ से अहॉकें बूझल अछि।’ मां, से तऽ हम बूझैत छी मुदा ‘ई प्रिया तऽ सबटा दोष हमरे दैत छथि। जनै’ छी ई हमरा कहलनि अछि जे चौबिस घंटाक अन्दर ई हमरा जेल मे बंद करबा सकैत छथि। ‘कोन आधर पर?’ बड़का भैया गरजैत बजलाह। पर स्त्राीगमन.....मानसिक अत्याचार.....शोषण..... प्रिया एखन चुप्प कियेक छी बाजू ने की हम झूठ बजैत छी? कोन-कोन उपाध् िसॅ हमरा विभूषित करैत रहैत छी। हं, ई हमरे गलती अछि जे हम हिनका प्रेम मे पागल भऽ जे कहैत छलीह से करैत छलहुँ हिनका इशारा पर नचैत रहलहुँ। ई एक्सपोर्टक व्यापार करऽ चाहलनि हम यथासंभव सहयोग देलिएन्ह। हमरो भेल जे बैसल मन नहिलगैत छैन्ह हैंडी क्राफ्रटक काज छै मन लगतैन्ह किछु टको भऽ जैतेन्ह ‘हमरा ई कहाँ बूझल छल जे हिनकर महत्वाकांक्षाक सीढ़ि कहियो खत्म नहिहेतैन्ह। हिनकर लक्ष्य भारत सरकार सँ प्रथम पुरस्कार प्राप्त....... -नरेन्द्र ई सत्य छै जे हमरा पुरस्कार भेंटल मुदा हम कखनहुँ चर्चा कयलहुँ की एकर प्रचार कयलहुँ? ‘प्रिया, हमरा कहऽ दिअ-हम विवाहक बाद- पन्द्रह वर्ष ध्रि चुप रहलहुँ आब हम चुप नहिरहब। हम पलंग पर पड़ल-पड़ल करैट पफेरैत रहैत छी आ ई आबि कऽ कारपेट पर सूति रहैत छथि। बत्ती ऑपफ कऽ कहतीह ‘हम बहुत थाकल छी आब सूतब’। हरदम इएह सुनैत छी-‘...हम व्यस्त छी विदेश सॅ ग्राहक आयल अछि।’ आ नहितऽ पफाइलक गठठर लऽ औती घर ऑपिफस बनि जाइछ।’ - ‘एकर कोनो मध्यम मार्ग ताकल जाए।’ बड़की दीदी बजलीह। -‘पूछिऔ अपना बहिन सँ। काज दिनो-दिनो बढ़ले जाइत छैन्ह।.....हिनका हमरा सॅ कम्पटिशन छैन्ह........टका अहींटा नहिकमा स कैत छी हमहूँ कमा कऽ देखा सकै छी। एतेक अहंकार?’ ‘हम की बाजू नरेन्द्रक बाबू! ई बेटी तऽ हमर सभक नाक कटा देलक। समाज मे कतहु मुँह देखाबऽ योग नहिरहलहुज। आर बेटी अछि क्यो एना-तमाशा नहिकएलक। हमरा तऽ आब चिन्ता होइछ हमर पोती सभक विवाह कोना होयत जकर पीसी एहन छै?’ भैया तऽ आर मक्खन बाजी शुरू कयलनि। समय पर उधरी टका भेटैत छैन्ह नरेन्द्र सँ। मां अन्तिम निर्णय सुनौलनि-प्रिया, हमर बात एखनहुॅ मान सोझे चलि जो नरेन्द्र बाबूक संग।’ ‘प्रिया, मां ठीके कहैत छथि जे भेलै आब घर-गृहस्थी पर ध्यान दे। एहनघर-वर बड्ड भाग्य सॅ भेटैत छै।’ बड़की दीदी कहलनि। बड़का भैया डपटैत बजलाह-‘अगर एखन नरेन्द्र बाबूक संग नहिगेलें तऽ तोरा लेल अइ घरक दरवाजा बन्द भऽ जयतौ।’ छोटकी भाभी बजलीह-सरोज जी डाक्टर छथिन तइओ घरक खाना अपने बनबैत छथि। अहाँ आबहु चेत जाउ, लोक कहैए ताहि पर ध्यान दिऔ। सत्ते कहैत छी नरेन्द्र बाबू सन पति अग्रवाल हाउस सन सासुर भेंटत ने देवी सन सासु।’ ओह! सब एकतरपफा न्याय कऽ रहल अछि एखन धरि सभक बात सुनि ऑखि सॅ टप-टप नोरे चुबैत छल। आब नहिरहि भेल हम अपन पफैसला सुना देलिऐ-ठीक छै सभक नजरि मे हमहीं दोषी छी। तऽ हमरा नहिचाही एहन घर ने एहन वर ने देवी तुल्य सासु ने अग्रवाल हाउस! हमर अपन खून, अपना कोखिके बेटा कानूनन नरेन्द्रे के हेतैन्ह। आब सब सम्हारथु नरेन्द्र।’ मां अहू उम्र मे कड़कैत बजलीह-‘प्रिया चुंप रहबें की लगाबिऔ-थापड़?’ हम ओइठाम सॅ चुपचाप उठलहुँ। बाथरूम मे जा कऽ हाथ मुँह धे नीचा उतरलहुँ। अपना गाड़ी पर बैसक विदा भेलहुँ। गाड़ी स्टार्ट भेला पर ओ सब बुझलनि। बहादूर गाड़ीक पाछू दौड़ल-गाड़ी रोकू प्रिया बौआ, मां जीक आर्डर छैन्ह.......।’ सब स्वाहा भऽ गेल। किछु नहिबाँचल। ने अपन खून अपन होइत छै ने पानि। तखन अपन ककरा कहल जाए? छोटी मांक कोर मे बैसल कनैत रहलहुँ। पारंपरिक संस्कार आ स्वभाव बाली छोटी मां हमरा घर वापस पठा देलनि। हम दिन भरि पलंग पर पड़ल-पड़ल अपन अतीत आ वर्तमान देखैत रहलहुँ। घर क मुँह पर आबि सासु बजलीह-‘कनियाँ भरि दिन उपासले रहब? आउ कनि खा लिअ।’ ओह! आब सासुमां के हमर ध्यान अयलैन्ह! ठीक बेटे बला स्वभाव। मां बेटा दूनू के पर-पीड़न में आनन्द भेंटैत छैन्ह। आजीवन अपने वेदनाक प्रतिमूर्ति बनि बेटाक सहानुभूति बटोरि पापा के बात कहलथिन। एकदम संवेदन शून्य छथि। मुदा बेटा लेल तऽ बड्ड संवेदनशील छथि। खैर हमरा अइ सब सॅ आब कोन मतलब? एखन तऽ हमर अपने आस्तित्व पर संकट अछि। एखन चोटाह सांप जकॉ पूपफकार छोड़ैत नरेन्द्र पहुँचताह। भोजन करऽ गेलहुँ। मुदा दू कौर कहुना खा कऽ उठि गेलहु। बेचारा संजु मां-बापक लड़ाई मे पिसा रहल अछि। हाथ धे कऽ अयलहु तऽ सासु बजलीह। ‘प्रिया! घर नहिउजारू। एहन काज सॅ कोन पफायदा। नरेन्द्र नहिचाहैत छै तऽ व्यापार छोड़ि दिअ। बात आगॉ’ नहिबढ़ाऊ।’ सँजुक सोझा मे मां क ई सब बाजब हमरा नहिनीक लागल। बजैत-बजैत चुप भऽ गेलहुॅ जे घर तऽ उजड़ि गेलै। अहॉक बेटा के हमर कोनो जरूरत नहिछैन्हि छ मास पर सेक्रेटरी बदलैत छथि। सब सुख भोगैत छथि। देखाबऽ लेल हम पत्नी छिऐन्ह। मुदा कहलिऐन्ह नहिकिछ। बुझल अछि मां अपना बेटाक कोनो गलती नहिस्वीकारती ठीक छै। हमहीं बदमाश छी। नरेन्द्र पहुँचलाह तऽ हम कहलिऐन्ह ‘हमरा किछ कहबाक अछि।’ ‘अहाँ के हमरा सँ एना लड़ब-झगड़ब...... -हम लड़ैत छी..... ‘शांति पूर्वक बाजू। हम कोनो समझौताक बात नहिकहि रहल छी।’ ‘तऽ की कहऽ चाहैत छी?’ काउंटर चैलेंज। हं, अहां एकरा ध्मकी कहि सकैत छी। अहां हमरा कहने छलहुँ ने जे बिजनेश बंद करबा सकैत छी?’ ‘हं, कहू तऽ कऽ के देखा दी।’ ‘व्यापार हमर अन्तिम सहारा अछि।’ आ अहि व्यापारक बलें अहाँ कूदैत छी। अहाँ ई जुनि बसरू जे अहाँ सपफल उद्योगपतिक पत्नी छी।’ ‘देखू अहाँ पफेर हमरा ध्मकी दऽ रहल छी।’ ‘ई ध्मकी नहि, आई मीन इट........ , तऽ की बाजू ने। हम इनकम टैक्स, सेल्स टैक्स, एक्साइज संग सभटा घुरी पफंदी क भंडा पफोड़ब देखब अहाँ कोना बचैत छी? ‘ओह! तऽ अहॉ अतेक ध्रि सोचि लेन छी तऽ आब इ सब करबा सॅ पूर्वहि अहॉक गरदनि दबा दी सेह नीक।’ हं, इहो सौख पूरा लिअ। हम थाना मे एपफúआईúआरú कऽ के आयल छी। हम मुइलहुँ त अइ संसार मे एक व्यक्ति एहन छै जे हमर मौत के बदला अहाँ सँ अवश्य लेत। पिशाच जकाँ विकृत हँसी हँसल नरेन्द्र। पफेर व्हिस्कीक छूंट पिबैत बजलाह ‘अच्छा, ई इशारा सँजु दिस तऽ नहि। हम बेर-बेर कहि चुकल छी हमरा कुल-दीपक दिस कखनौ वक्र दृष्टि सॅ नहिदेखू अन्यथा.....।’ ‘सूनू नरेन्द्र हम सॅजु बिना रहब जीयब। अई झागड़ा मे हम बेटाक बलिनहिचढ़ायाब। हम नीना क बात कऽ रहल छी।’ नीना? नीना क नाम सुनिते भौंचक रहि गेलाह। आब गुम्म कियेक भऽ गेलहुँ। अहाँ बड़का व्यवसायी छी हमर व्यवसाय तऽ बड्ड छोट अछि मुदा हमरा जे अपन स्टापफक लॉयलटी भेंटल अछि से अहाकें नहिअछि। आ हमर गांहक सात समुद्र पार रहैत अछि जे हमरा सॅ चमड़ाक बैग किनैत अछि। हम सती सावित्राी छी-कि चरित्रा हीन ताहि सॅ ओकरा कोनो मतलब नहिछै’ तैँ एतेक हिम्मत! बौखलाउ जुनि। हमर बात पर ध्यान दिऔ। हमरा बस दू मासक समय दिअ, हम ऑपिफस, घर, जेवर कपड़ा आ सँजु के छोड़ि देब।’ एतबा कहि हम सीढ़ी सॅ उतरलहुँ। हाल मे सासु बैसल छलीह। हमरा तमतमाकऽ उतरैत देखि पूछलनि ‘की-भेल प्रिया?’ ‘नहिकिछ नहिहम अपना रूम मे जा रहल छी।’ केवाड़ बन्द कऽ लेलहुँ। करेज पफाटि गेल। आँचर से मुँह बन्न कयने छलहुँ तथापि हिचकी बहरा रहल छल। हमरा संग सब दिन एना कियेक होइत अछि नेनपन सॅ एखन ध्रि कहियो चैन सॅ समय नहिबीतल। एना कियेक? हमर कोन अपराध् ?? दोसर दिन भोरे उठि सबसे पहिने मकानक दलाल के पफोन कयलहुँ....‘दो कमरे का छोटा सा फ्रलैट चाहिए, कम से कम सलामी। दलाल बेर-बेर पूछैत छल मिसेज अग्रवाल फ्रलैट ककरा लेल चाही। अन्त मे कहऽ पड़ल हमरा अपने लेल। ‘अपना लेल?’ ‘हां, आब वेशी पूछताछ नहिकरू।’ नहि, आब किछु नहिपूछब। बस हमरा दस-दिनुका समय दिअ पता लगा कऽ सूचित करब। ओना एकटा फ्रलैट कारनानी स्टेट्स मे खाली छै, आ आब ओइ बिल्डिंग के रेपुटेशन नीक भऽ गेलैए पहिलुका बला बात नहिछै।’ ‘अहाँ पूरा पता लगाकऽ बताऊँ।’ ऑपिफस जा कऽ हम सैम्पल सॅ भरल बक्सा वरेन के ध्रा देलिए। ‘आर्डर नीक भेंटल अछि....समय पर माल सप्लाइ कऽ दिऐ तऽ कोनो परेशानी नहिहेतै।’ ‘कतेक के आर्डर छै दीदी। ई पार्टी तऽ एखन ध्रि बहुत कम आर्डर देलक अछि।’ हुनका हमर माल पसंद छैन्ह तैं जतबा बना सकब ततेक ओ लऽ लेता।’ एकर बाद हम बैंक मे पफोन कऽ एúजीúएमú सॅ समय लेलहुँ। हम जनैत छी-नरेन्द्र सॅ डेढ़ लड़ाई मे नहिसकब तैं सोझ बाट पकड़लहुँ। यूनियन बैंक पूरा सहयोगक वचन देलक। जँ एलúसीúपर माल जेतै तखन कोनो दिक्कत नहिहेतै। यूनियन बैंक सॅ हम सोझे इलाहाबाद बैंक गेलहुँ। चेयरमैन सॅ पार्टी मे परिचय भेल छल। कार्ड देखिते भीतर बजौलक। ‘हम यूनियन बैंक सॅ एकाउन्ट शिफ्रट करऽ चाहैत छी। अहाँ सॅ सहयोग भेंट सकै’छ?’ ‘पूर्ण सहयोग भेंटत। चेयरमैन पफेर सब स्टेप्स एक-एक कऽ बुझौलनि। तकर बाद पूछलनि की हम जानि सकैत छी अहाँ बैंक कियेक बदलि रहल छी?’ बैंकर सँ कोनो बात नुका लेब गलत बुझाएल तैं सापफ-सापफ कहलिऐ-‘व्यक्तिगत कारण छै। हम पति, पत्नी पफरक भऽ रहल छी आ पफरक भेला पर पति हमरा लेल गारंटी नहिदेब चाहता।’ ‘अहॉ अपन व्यक्तिगत गारंटी की दऽ सकै’छ?’ ‘किछ नहि। मात्रा इएह जे हम ग्राहक दस लाख के रिवाइविंग एलúसीú खोलबाक लेल तैयार छथि।’ चेयरमैन कनिकाल गुम्म रहल पफेर पूछलक-अहांक भाई वा दोस्त?’ ‘नहि, हम ककरो सॅ मदद नहिचाहैत छी आ हम तऽ एलúसीúक संग माल पठा रहल छिऐ।’ ‘वेश, मुदा जॅ कहियो ओवर ड्राफ्रिंटगक जरूरत पड़ए तऽ?’ ‘नहिसे जरूरत नहिहेत।’ ‘तखन कोनो समस्या नहि।’ दस दिन के भीतर कारनामी स्टेट्स मे फ्रलैट भेंटल कहियो एहिठाम छोटी मां रहैत छलीह। आब इएह हमर घर आ आपिफस। छोटी मां अहि मे रहैत छलीह, मुदा आइ जे एत रहऽ आयल अछि से अग्रवाल हाउसक पुतौहु नहिमात्रा ‘प्रिया’ नामक महिला अछि। लोक बुझि नहिपबैछ कहिया, कखन जिनगी क गति विस्पफोटक भऽ जेतै। आ कखन अतीत के पफेकि कऽ ठाढ़ भऽ जायत।’ ओई दिन नरेन्द्र सॅ हमर आखरी बातचित भेल छल। अन्तिम राति छल ओइ बड़का घर मे। भोर होइते हम अपन बक्सा लऽ सीढ़ि सॅ उतरैत छलहुँ। हमरा बक्सा लऽ उतरैत देखि सासु माथ पकड़िकऽ पाथरक मूरत जकाँ गुम्म बैसल छलीह। नरेन्द्र निरपेक्ष भाव सॅ नास्ता कऽ रहल छलाह। सँजु स्कूल गेल छल। हम जानि बुझिक अहि समय मे विदा भऽ रहल छलहुँ। सँजु स्कूल सॅ अयला पर की सोचत? पफेर मन कहलक प्रिया कानूनन सँजु पर अहाँक कोनो हक नहिअछि। तखन करोड़ोक रोज सौदा करऽ बला ओकर बाप की बेवकूपफछै ओ सँजु के मां क बदला टका सॅ स्नेह करब सिखा देतै आ मां क जे तस्वीर ओकर मन मे छै तकरा छहों छित्त कर खत्म कऽ देतै। आ सेह भेलै। हम अयलहुँ कारन नी स्टेट्सक फ्रलैट मे तऽ हमरा सॅ भेंट करऽ अयलीह सबसे पहिने नीना आ छोटी मां। छोटी मां हमरा अपना करेज मे साटि कानऽ लगलीह। हमर दुःख-दर्द आ एकाकीपीन के अनुभव इएह कऽ सकै छथि। नीना-हाथ बढ़ा कहलनि की हम अहॉक काज मे किछ मदति कऽ सकैछी अहॉ हमरा अपन छोट बहिन,दोस्त वा बेटी किछ मानि आदेश दऽ सकैछी। हम अपन जी, जान लगा देब मुदा अहॉके प्राण, प्रतिष्ठा पर खरोंच नहिलागऽ देब।’ पफेर संजु आयल कनैत। हमर बेटा! ‘मम्मी, घर चलू ने...।’ ‘नहिबौआ हम ओतऽ नहिजाएब।’ ‘मम्मी हम की करू?’ ‘जे दादी कहथि से करब आ बेटा पापाक वात मानब।’ हमरा अपना खून मे पफेंटल पानिक एहसास भेल। सँजुक कोन दोष! जहिया सॅ जनमल स्वार्थे देखैत रहल अछि। अइ नेना कें पैद्य लोक कोन मूल्यक बोध् करौल कै। जेहन वातावरण मे रहै’छ ओहने बनत। आ बच्चा कें हमरा इमोशनल ब्लैकमेल करब बड्ड अनुचित बुझनाजाइछ। मातृत्वकें देखाबटी महिमा मंडित करबाक कखनौ-इच्छा नहिभेल। चारि वर्षक बाद सँजु अठारह वर्षक बालिग पुरुष भऽ जायत। हां, ओहि दिन सांझि मे हम नरेन्द्रक के पफोन के लिए कियेक तऽ ओई करोड़पति कें हमरा हिसाब देबाक छल जे हम की सभ अपना संग एतऽ अनलहुँ अछि-‘नरेन्द्र! हम सभटा ओतहि छोड़ि के आयल छी। मात्रा बीस पल्ला साड़ी आ अपन किताब एतऽ आनलहुँ अछि।’ बहुत बढ़ियाँ ध्न्यवाद!’ ‘हं, सँजु के कहियो-कहियो एतऽ आबऽ देबै, कहीं एहन ने होमय जे ओकरा देखबा लेल हमरा कोर्ट जाए पड़ए।’ ‘बड्ड तैश मे बात कऽ रहल छी?’ ‘नरेन्द्र! मनुषक भाषा मे बाजू। अपन घर कोन महिला छोड़ चाहै’छ? आ, अहाँ तऽ हमर बेटो के राखि लेलहुँ?’ ‘उचित कयलहुँ अछि। अपना कें सम्हारि लिअ सेह बहुत। अपन ठेकान नहिबेटा कें पालन-पोषण करतीह! विलायत आ अमेरिका बेटा के लऽ कऽ जायब? हाट फ्रयूचर कैन यू गिव हिम? टेल मी?’ हम व्यर्थ बुझैत छी किछ कहब दंभी व्यक्ति केँ नरेन्द्र आर किछ बकैत छल हम रिसीवर राखि देलिए। -प्लेन एमस्टरडाम के एयरपोर्ट पर उतरि रहल छल। हम अपन ब्रीपफकेश बन्द कयलहुँ। हैंड पर्स मे टिकट, पासपोर्ट, टैªवेलर्स चेक सब केँ चेक कयलहुँ। एयरपोर्ट पर पिफलिप ठाढ़ छल। लम्बा सुदर्शन आकर्षक व्यक्तित्व उम्रक प्रभाव सॅ खिचड़ी पाकल दाढ़ी खूब पफबैत छै। पिफलिप हमर दहिन गाल चूमैत पूछलक मित्रा, आब स्वास्थ केहन अछि? ‘एकदम नीक।’ ‘हॅ देखऽ सॅ एकदम प्रफेश लगितो छी।’ ओकरा ऑखि मे बहुत जिज्ञासा छलै। मुदा संकोच संभ्रान्त संस्कार क ब्रिटिश मैनरिर्ज्मा हरदम हँसैत छथि पिफलिप पर। जूडी अमेरिकन छथि। गाड़ी स्टार्ट करैत पिफलिप पूछलक की प्रोग्राम अछि? आब उतर देबहि पड़त। ‘पिफलिप हम लिखऽ चाहैत छी।’ - ‘कि?’ ‘अपन स्मृति। ओ सम्पूर्ण अतीत जकरा ठीक सॅ एखन सोचि नहिपयलहुँ अछि।’ ‘मुदा ककरा लेल?’ से नहिसोचलहुँ अछि। जूड़ी घरे पर छलीह गाड़ी सॅ उतरिते लपटि गेलीह। पिफलिप कहलकैन्ह-‘प्रिया एत एकान्त मे किछ लिखऽ चाहैत छथि।’ ‘वाह।’ कहि जूड़ी हमरा दिस तकलैन्ह। हम हुनकर हाथ नहुए दाबि कहलिऐन्ह हं, जूड़ी हमरा अहॉक सान्निध्यक, अहां दूनू गोटेक आवश्यकता अछि। हमर मनः स्थिति अहीं दूनू गोटे नीक जकां बुझि सकैत छी। ‘ओ. के. डियर! चलू हाथ-मुँह धे Úेश भऽ भोजन करू। पिफलिप चलि गेल। लगे मे ऑपिफस छै। छह बेडरूम बला मकान छै, पाँच टा गाड़ी, एकटा बेटी छै जे लंदन मे पढ़ैत छै। एत रहै’छ बस मियाँ-बीबी। पिफलिप के तरह-तरह के गाड़ीक सौरव छै। आ जूड़ी सॅ गप्प करबाक। हम पफूसि नहिकहैत छी.... बड्ड भेटक दृष्टि छै ओकर आर-पार ध्रि सब देख सकै’छ। हम किचेन क पर्दा निहारि रहल छलहुँ। जूडि कोना बूझि गेल। ‘प्रिया, ए प्रिया कोन दुनियाँ क सैर कऽ रहल छी?’ -कतहु नहि। अपने अड़तालीस वर्षक लेखा-जोखा कऽ रहल छलहुँ। ‘जतेक सोचब ततेक सिलसिला टूटत।’ ‘सत्ते कहैत छी जुड़ी। क्रम भंग भऽ जाइछ। अपन सम्पूर्ण तस्वीर नहिबना पबैत छी। कखनहुँ माथ गायब तऽ कखनहुँ हाथ-पैर, अंग-प्रत्यंग छिड़ियाएल लगै’छ अजीब हैल्यूसिनेशन।’ ‘मन मे जखन जे घटना मोन पड़ए तुरत से लिख लेल करू।’ ‘मुदा एना लिखने आत्मकथा कोना हेतै।’ प्रिया हम वा अहाँ साधरण मनुष छी। सजि ध्जि कऽ क्रमानुसार विशिष्ट व्यक्तिक जीवन वृतान्त लिखाइत छै।’ वाह जूडी अहा सरिपहुँ जीनिइस छी। हमर सब समस्याक समाधन अहाँ लग रहैछ।’ -‘सब समस्याक नहि। कतेक बेर तऽ अहाँ आ पिफलिप कोनो समस्या मे तेहन ओझराएल रहैत छी जे हमरा ओइठाम सॅ उठऽ पड़ैत अछि। अच्छा चलू आब अहाँ अपन रूम देख लिअ।’ ‘वाह रूम बहुत मेहनत सॅ सजौने छी मन गदगद भऽ गेल। एहन नीक दोस्त भाग्य सॅ भेंटैत छै। ओतऽ’ कलकत्ता में एक-एक कऽ सब दोस्त घूटल जा रहल अछि। लगैछ जेना अपन शहर नहिहोमए। ओत क्यो अपन नहिरहल। मात्रा घर आ पफैक्ट्री अछि। साल मे छमास तऽ बाहरे रहैत छी। कहियो कतहु तऽ कहियो कतहु। हँ, दिल्ली या बम्बई जाइत छी तऽ क्यो पुरान परिचित भेंट जाइत अछि.......।’ -‘ए प्रिया नीचाँ आयब?’ ‘पिफलिप जूड़ि के मना कयलो पर हमरा शोर पाड़लक, ई ओकर आदति छै। ओ जाबत सबटा बात पफरिछा कऽ बूझि नहिलेत ताबत सांस नहिलेबऽ देत। हमर जीवनक कोनो बात तऽ एकरा दूनू बेकती सॅ नुकायल नहिछै।’ कलम राखि नीचॉ गेलहुँ। एखन धरि मात्रा किछ प्वाइंट्स आ तारीख नोट कयलहुँ अछि। जूड़ी पूछलक ‘किछ लिखलहुँ की नहि।’ -‘नाम मात्रा।’ ‘अहाँ नी के छी ने कहैत हमर बॉही पकड़ि पिफलिप सोपफा पर बैसौलक।’ ‘किछ नहि। पिफलिप हम अपना विषय मे लिखऽ चाहैत छी आत्मकथा तऽ नहिओकरा आत्म विश्लेषण कहल जा सकै’छ। ‘आ जूडी अहाँ........?’ हम जा रहल छी किचेन मे करीब आध घंटा हमरा लागत खाना बनाबऽ मे। ‘हं, तऽ प्रिया.....?’ की हँ, तऽ? ‘मतलब अहाँ कथा-पिहानी लिखब!’ ‘हँ, सेह सोचि रहल छी।’ ‘कतेक दूर ध्रि सोचलहुँ अछि?’ ‘की कहू।’ ‘की कहू नहि, लिखब शुरू करू।’ ‘हं, मुदा अजीब सन ब्लॉकेड लगै’छ एहन कोनो खास तऽ नहिअछि जहि सॅ हमरा जीवनीक प्रति ककरो रूचि होई?’ ‘ई, तऽ अहाँक जर्नल अछि ने?’ ‘हँ।’ पिफलिप सॅ गप्प करैत छलहुँ आ अर्न्तमन मे एकटा कथा जन्म लऽ रहल छल। गप्प करैत करैत पिफलिप एकाएक गुम्म भऽ गेल। पफेर हमरा आगाँ हाथ हिला कऽ पूछल ‘प्रिया अहाँ कतऽ छी?’ हम वापस अयलहुँ। पिफलिप कहने छलाह-‘प्रिया, कखनौ कऽ अहाँ कें बूझब कठिन भऽ जाइछ। ‘तऽ छोड़ि दिऔ ने प्रियाक बूझब’ इ जूड़ी बजलीह। सत्ते जूडी पिफलिप पर खिसियाल छलीह-‘अहाँ पफेर प्रिया के बिमार पाड़ि देबै, अपना ढंग सॅ रहऽ दिऔ।’ हम उठि कऽ अपना रूम मे आबि गेलहुँ। किछ नहिपफुराइत छल। बिछावन पर पड़ि रहलहुँ ऑखि मुना गेल। भोर मे ऑखि खुजल। खूब सूतलहुँ तथापि तन्द्रा मे बेचैन छलहुँ। पर्दा हटाकऽ खिड़की खोल लहुँ शीतल ताजा हवा नीक लागल। घड़ी देखलहुँ पांच बजै छै। आकाश ललछौंह छै एखन सूरज नहिउगैत। आकाश मे मेघ लागल छै। सामने लैम्पपोस्ट पर रौबिन चिड़ै बैसल छै। एत गोरैया नहिछै। जूड़ी क्लास लेबऽ रोज पचास मील गाड़ी चलाकऽ जाइत छै। पिफलिप अपन बी.एम.डब्लू या पोर्शे मे हजार मीलक यात्रा करै’छ। मुदा जखन दूनू-गोटे रहै’छ तखन ने देश पराया लगै’छ ने ई घर। जूड़ीक व्यवहार बड्ड नीक छैक स्वभाव अति मधुर। लगै’छ जूडीक जन्मे सॅ प्रज्ञा जागृत छै बिना किछु कहने सब बात बुझि जाइछ। लगै’छ जूडी जागि गेलीह नीचाँ कीचेन सॅ बर्तन क आवाज आबि रहल छै। ऊपर तकलक जूडी हमरा पर नजरि पड़िते विहुँसैत पूछलक-‘हाय, प्रिया राति मे निन्न भेल?’ ‘हँ, आ नहि।’ से की? असल मे हम सूतैते छी कम। मोन नहिपड़ैत अछि जेना लोक राति भरि चैन सॅ सूतैत छै तेना हम कहियो सूतल होइ! मानसिक त्रासदी मे क्यो कोना सूतत? तिल-तिल कऽ मरैत लोकक लेल आनन्द कहाँ? ‘आ जूडी अहाँकबूझल अछि तऽ एहन क्रूर भऽ कोना पूछैत छी?’ प्रिया, क्रूर हम नहि। क्रूर अछि अहाँक अर्न्तमन मे बैसल हजारो सालक परम्परा सँ ग्रसित रूग्न सोच जे अहाँ कें कहियौ चैन सँ रहऽ नहिदैत अछि। अपन उपलब्ध् िसॅ खुश नहिहोमऽ दै’छ। अहाँ स्वयं अपना प्रति आक्रमक छी। तैं सलीब पर लटकल अपने तरहथ्थी पर कील ठोकैत रहैत छी! की भेंटैत अछि आत्मपीड़न सॅ। ‘आत्मपीड़न?’ हमर स्वर आहत छल। गलत नहिकहि रहल छी। सोलह आना सच आत्मपीड़न। अहीं कहू की अहाँ के बुझि पड़ै’छ जे अहाँक जिनगी मे एकदम सन्नाटा अछि एकदम नीरस। हमरा लोकनिक कोनो महत्व नहिहमर प्रेम देखाबटी अछि? नीना आ छोटी मां क अहाँ लेल कोनो महत्व नहि? प्रिया, अहॉ पिफक्स इमजेक शिकार छी। पति, पत्नी, बच्चा...... पारम्परिक परिवार......’। ‘सॉरी जूड़ी हमरा बात सॅ अहाँ केँ तकलीपफ भेल।’ तकलीपफक बाते छै। अहाँ अपनो कनैत छी आ दोसरो के कनबैत रहैत छी। अहाँ सँ तऽ वेशी बुझनुक नीना अछि। नीना के लेल आगि होइ वा पानि सब कें जिनगीक र्ध्म मानैत अछि। ओकरा। जिनगीक मे एकटा लय छै गति छै ओकरा कखनौ एकाकीपन चूभैत नहिछै। जिनगी समस्त तूपफान कें हँसि कऽ स्वागत करै’छ आ निर्भय, निःशंक भऽ जिनगी जीबैत अछि। ‘गुडमार्निंग लेडिज! की हम भीतर आबि सकैत छी?’ पिफलिप रसोई घरक, चौकठी लग हँसैत बाजल। पफेर जिज्ञास कयल-‘की जूडीक सैशन भोरे-भोर शुरू भऽ गैलेन्ह?’ अरे नहि, पिफलिप! ई प्रियाक दिमाग खराब भऽ गेलैए राति-दिन अपने तन-मन पर चाबुक सॅ प्रहार करैत रहै’छ। ओना एखन गप्प करू ने तऽ बुझाएत तेहन-सन जेना एहन संतुलित क्यो भइए ने सकै’छ। ‘की डाक्टर के देखिते रोगी शान्त....।’ हम बजलहुँ। अरे चुप्प रहू बेवकूपफ महिला! हम अहाँक दोस्त छी कोनो साइकियाट्रिस्ट नहि। हम जूड़ी लग जा कऽ ओकर हाथ चूमि लेलिऐ। ‘प्लीज, जूड़ी हँसी दिअ। हम अहॉक भावना बूझैत छी।’ ‘सुनू प्रिया......।’ अरे रे जूडी, अहाँक क्लास ग्यारह बजे सॅ शुरू होएत। एखन तऽ भोरका छः बाजि रहल छै.... -जुडि भभाकऽ हँसल-हम एकरा जतबे प्यार करैत छी ऐ इ ततबे.. ततबे की? हम जूडी दिस तकैत पूछलिऐ। ‘किछ नहि। आब हम चललहुँ स्नान करऽ अहाँ पिफलिप संग माथापच्ची करू।’ हम पिफलिप के कान्हा पर हाथ ध्ऽ घूमि कऽ जुड़ी दिस तकलहुँ जूडी खिड़की लग ढाढ़ि छलीह। हम पूछलिऐन्ह। ‘जूड़ी अहाँ स्नान करऽ गेलहुँ नहि?’ अहाँ कें दुखी छोड़ि कऽ हम कतहुँ नहिजायब, चलू ऊपर कनिकाल गप्प-सप्प करब। पिफलिप नौ बजे जयबा लेल कहने छलाह। जूडी कहलनि नहिहम सब संगे बहराएब। ग्यारह बजे अहाँ आ पिफलिप लंच पर आबि जायब आ हम अपना क्लास मे रहब। प्रिया, आइ एम सॉरी हम जानऽ चाहैत छी जे अहाँक सम्बन्ध् एहन ऊबाऊ कोना भऽ गेल? स्मरण करैत अतीतक घाव सॅ पीबऽ बहऽ लगै’छ श्रम सॅ बहार होइते एकटा निःशब्द दहशत घेर लै’छ। निरन्तर दुःखक सुरंग मे डूबि जयबाक भय। कठोर सत्यक सामना करबाक भय। स्वयं के भय। कठोर सत्यक सामना करबाक भय। स्वयं के प्रति संशय। अतीतक एहन कोनो हिस्सा नहिअभरैत छल जतऽ चोट, दर्द टीस नहिहोमए। थूरल-थकुचल बचपन जे झट सॅ किशोरी बना देलक पफेर संघर्ष करैत औरत जे व्यवस्था सॅ समझौता करब कहियो सीखऽ नहिचाहलक। ईमानदारी सॅ तेहन ग्रसित मानसिकता अछि जे कोनो सम्बंध् मे बनाबटीपन या कृत्रिमता नहिस्वीकारि पबै’छ। सूनू, जिनगी के पफेर सॅ शुरू करबाक लेल जीवित रहबाक लेल असीम साहस आ ध्ैर्य चाही। हम पश्चिमी महिला की कम संघर्ष कयलहुँ अछि? जखन हमर घर उजड़ल, बच्चा संग छोड़लक, साठि वर्षक पुरुष पाईक बल पर बीस वर्षक लड़की संग भोग करऽ लागल तखन हमहुँ सभ तिलमिला उठल छलहुँ। पुरूषक भोगवादी प्रवृति चरम पर छलै आ भोग्या छलीह हमर बहिन-बेटी। सामंतवादक नंगा नाच देखने छी। आइ तऽ कम से कम हम एतबा जनैत छी जे इलोना एक व्यक्ति जकाँ सोचैत अछि अपन निर्णय अपने लैत अछि अपना शर्त पर जीबैत अछि। ‘अहॉ ठीके कहैत छी।’ जूड़ी उसाँस लैत बजलीह-‘प्रिया, आब अहाँ तैयार भऽ जाउ। हमरो क्लास लेब जयबाक अछि।’ ‘जूडी अहाँ तऽ साइकियाट्रिस्ट छी ने?’ ऊँ हूँ सबटा भूमिका पाछाँ हम एकटा संवेदनशील महिला छीं महिलाकदुःख दर्दक अनुभव करैत छी। प्रिया, मात्रा अहींक शोषण नहिभेल अछि। प्रत्येक महिलाक अपन-अपन दर्दक तहखाना छैक।’ ‘जूडी, नरेन्द्रक संग जीवन-यापन करबाक लेल हम प्रत्येक क्षण समझौता करबाक प्रयास कयलहुँ मुदा सबटा असपफल भेल। हम नीक जकाँ बुझि गेलिऐ नरेन्द्रक परिवेशक जे ढ़ॉचा छै ताहि मे कनिको पफेर बदल असम्भव! हँ ओ चाहैत छल हम ओकरे अनुकूल भऽ जाइ ओकरे परिवेश मे दूध् पानि जकॉ हमर व्यक्तित्व घुलि जाए। मुदा हम ओइ ढंग सॅ ने सोचि सकलहुँ न ओइ अनुरूप हमर व्यक्तित्व बदलल। ई ककर दोष? तैं हम मात्रा अपने के दोषी बुझैत छी। नैहर मे मां, भाभी, दीदी सब बजैत छलीह मां जतबे प्रियाक विवाहक लेल चिन्तित छल प्रियाक ततबे नीक घर-वर भेंटलै। की ठाठ छै प्रियाक कतबो टका गनने दोसर बेटी कें एहन हैसियत बला घर-वर भेंटलै। कहै छै ने जे गुड़क मारि धेकड़े भोगैत छै सेह। हम केहन अभाव क अनुभव कऽ रहल छी से के बुझि सकै’छ हम अपना कंे एकदम एसगर पबैत छी क्यों हमर अपन नहिने मां, ने भाई-भाभी, ने दीदी एतऽ अपन पति छथि से हो अपन नहि। कखनौक मन मे होइत जखन हमरा सुख-दुःख मे संग देनहार क्यो नहिअछि तखन केहन रिश्ता-नाता? हमहीं कियेक ककरो लेल सोचू? विपत्तिकाल जॅ घर-परिवार समाज क्यो पूछनिहार नहितऽ ककर लेहाज करू कोन समाजक भय? समाज नाम क भीड़ केँ हम कहियो जानि पयलहुँ ने किछ बुझलहुँ। मनुष के जीवऽ लेल बहुत कम लोकक आवश्यकता होइत छैक से एतेक टा संसार मे हमरा अपन क्यो नहिभेंटै’छ? जे सबसॅ निकट अछि जकरा सॅ अपनापन बोध् होइत से तऽ बुझाइत जे हम आ नरेन्द्र उत्तरी आ दक्षिणी ध््रुव छी। दूनू क बात व्यवहार सोच सब मे आकाश-पतालक भिन्नता। मोन पड़ै’छ कॉलेजक दिन! ओ किताब-पोथी जाहि मे मानवीय मूल्य क विषय मे पढ़ने छलहुँ। सत्ते बहुत घुटन महसूस होइछ। व्यवस्थाक विपरीत चलऽ बला पुरुष के क्रान्तिकारी कहल जाइछ आ महिला के हेय दृष्टि सॅ देखल जाइछ। महिला कें कतहु ठौर नहि। तथापि हमरा नोर बहाबऽ बाली महिला नहिसोहाइत अछि। निष्क्रियता सॅ नीक संघर्ष करब। ‘कोनो महिलाकेँ अपन लड़ाई अपने लड़ऽ पड़ैत छै। जॅ महिला व्यवस्थाक प्रतिकूल पैर बढ़बैत अछि तऽ ओकरा कीमत ओकरा चुकाबऽ पड़ैत छै। हम जनैत छी जे भारतीय हमरा सभ पर हँसैत अछि ओ सभ बुझैत अछि जे पश्चिमी महिला बड्ड स्वच्छंद जीवन बीतबैत अछि कोनो रोक-टोक नहिजकरा संग मोन होमए राति बिताबी एतबे नहिहमरा लो कनि के घर उजाड़ऽ बाली बुझल जाइछ।’ हम स्वयं एहन बात नहिसोचैत छी।’ मात्रा अहॉ या किछ आंगुर पर गनऽ जोग लोक नहिसोचैत होइ मुदा भारतीय दृष्टिकोण इएह छैक। मुदा एकटा बात याद राखू इतिहास, समाजशास्त्रा मानव शास्त्रा वा मनोविज्ञान सभटा पुरूषक लिखल छैक इ मात्रा पूरबे नहिपश्चिमो मे। आज सच त इएह छैक जे कोनो पुरूष परिवर्तन नहिचाहैत छै ‘युग-युग सँ जे सुविध प्राप्त छैन्ह से कियेक छोड़ऽ चाहता।’ ‘जूडी से तऽ अहॉ सत्ते कहैत छी। व्यवस्थाक बाहर पैर रखने हमरा बहुत कठोर सजा भेंटल। अपना मन के हम टुकड़ा-टुकड़ा कऽ बॉटि लेलहुँ अछि।’ आब हम आत्मनिर्भर छी। अपना काज मे खूब मोन लगैए व्यस्त रहैत छी। हं, अतीत कें बिसरऽ चाहैत छी से नहिभऽ पबैए।’ ‘ओना प्रिया हम एकटा बात कहऽ चाहैत छी जे दुनियॉ मे सब पुरूष ने नरेन्द्रे सन छै ने डा बनर्जी सन। नीको लोक छै दुनियॉ मेँ।’ हं, जूड़ी, हम मानैत छी जे नीको लेक छै दुनियॉ मे। तऽ की महिलाक जिनगी क लक्ष्य सही सहचरक तलाश करब छैक? आइ धरिके अनुभवक आधार पर हम कहि सकैत छी जे पुरूषके सत्ताक लोभ रहैत छै। सत्य कहैत छी जूड़ी-एहन प्रेम हमरा लेल बड्ड कठिन अछि। समर्पणक ई परम्परा....ई तऽ दूनू दिस से होमऽ चाही?’ .....‘हूँ, पुरुष कहै’छ जे ओकर समर्पण देवत्वक प्रति रहै’छ तै ओ स्वयं भगवानबनऽ चाहै’छ। आ ओकर’ अपेक्षा रहैत छै जे महिला पुरूष के अपना सॅ वेशी महत मानि समर्पित भऽ अपन आहुति दै।’ मुदा से कियेक? अपना सॅ वेशी महत महत मानबाक कोनो तर्क छै? एतबे नहिजॅ आहूति देबऽ बला आहूतिक कीमत बूझै तऽ ओकरा कहल जाइछ जे निःस्वार्थ, शर्तहीन स्नेहक कीमत नहिहोइत छै ! हमरा तऽ अपना जीवन मे निःस्वार्थ स्नेह मात्रा दाई मां सॅ भेंटल। अन्यथा सब ठाम प्रतिस्पर्ध प्रतियोगिता, प्रथम पंक्ति मे बनल रहबाक कोशिक देखलहुँ। जूड़ी, पुरुष हरदम जीतऽ कियेक चाहै’छ? प्रिया, तकर मुख्य कारण छै जे ओ नीक जकाँ जनै’छ जे ओ दिनोदिन हारि रहल अछि। मालिक बनल रहबाक वा सत्ता के पकड़ने रहबाक एकटा भिन्न प्रकारक पीड़ा होइत छै। मुदा ओ किछ कऽ नहिपबै’छ। कोनो विकल्प नहिभेंटैत छै। ‘मतलब स्त्राी-पुरूषक सम्बन्ध्क अर्थ मालिक आ गुलाम! भोक्ता आभोज्या!! कहिया ध्रि, प्रिया कहिया ध्रि इ द्वन्द्व चलैत रहतै?’ ‘प्रिया! अहाँ कें अध्लाह नहिलागय तऽ एकटा बात कहऽ चाहैत छी। हम आ पिफलीप दूनू गोटे अइ विषय पर बहस कयलहुँ अछि आ हमरा ग्रुप थेरेपी मे अइ पर प्रायः चर्चा चलैत रहैत छै।’ एखन सभ्यताक संक्रमण काल छैक। तैं अहॉ एतेक कष्ट झेललहुँ। मुदा अइ कष्ट सॅ अहाँक भ्रम टूटल। अहॉ बनल बनायल रूढ़िग्रस्त व्यवस्थाक प्रतिकार कऽ पारस्परिकता क सम्बन्ध् स्थापित कयलहुँ। मुदा नरेन्द्र! ओकर चेतना त मालिकाना अहम तर दबले जा रहल छै। ध्न आ सत्ताक मद ओकरा केहन अहंकारी आ पागल बना देलकैए। ओ बूझैत छै टका क बल पर सब हासिल कऽ लेत। मुदा अहिं सोचि कऽ देखिऔ ओ की हासिल कऽ लेलक? ककरा सहानुभूति छै ओकरा सॅ? के स्नेह करैत छै ओकरा सॅ? ओकरा मुठीò मे बन्द भेल सँजु खुजल हवा मे साँस लेबऽ लेलि आकुलाइत नहिछै? आ कोन जीवन मूल्य देलकै अछि नरेनद्र सँजु कें? हँ, जूडी! हम अइ बात सॅ सहमत छी-मुदा कखनौ कऽ होइत अछि जे एकरा पाछॉ हमहूँ अपराध्ी छी। संजूक प्रति नरेन्द्र जकॉ तऽ नहिमुदा ओहि परम्पराक हिस्सेदार बुझैत छी अपना कें। तखन होइ ए जे सँजु कें हम अपना संग कियेक ने राखलिऐ?’ तऽ की ओ अहाँक संग रहैत? मानलहुँ दू-चारि वर्ष, रहि जाइत मुदा पफेर ओ नरेन्द्र लग जाइत। ‘नहिजानि ओ रहैत, की नहि। मुदा हमरा कचोट अछि जे हम मां क भूमिका नहिनिभााहलहुँ। ओना तऽ एक तरहें अपन कोनो भूमिका क निर्वाह नहिए कयलहुँ अछि। भऽ सकै’छ सँजुओ हमरे गलत बूझए ओकरो मन मे इ बात उठि सकैत छै जे हम अपना महत्वाकांक्षाक कारण ओकर अवहेलना के लिऐ?’ ‘अहाँ जहिया इ व्यवसाय शुरू कयलहुँ तहिया ओ कतेक वर्षक छल?’ ‘बारह वर्षक।’ ‘तऽ अहीं कहू बारह वर्षक लड़का के मां क जरूरत रहैत छै की पिताक?’ ‘पिताक । शायद मां आ पिता दूनूक। बालवाइक सॅ करीब-करीब चालीस मील दूर जंगलक बीचो-बीच एकटा खूब सुन्दर रेस्टोरेंट छलै। पिफलिपक कोशे अपना गति सँ चलि रहल छलै। हम नहुए नहुए अपन सीट के कनि नीचॉ कऽ चित्त भऽ पड़ि रहलहुँ। ऊपर आकाश दिस तकैत छलहुँ पॉछा छुटैत गाछ बिरीछक कतार देखैत छलहुँ पफेर कखनौ ऑखि मुनि लैत छलहुँ। कखनौ-कखनौ मित्राक संग कतेक सुख भेंटैत छै? पिफलिप आ जूडी केहन मन क मीत अछि। दूनू मे के वेशी अपनत्व दै’छ कहब कठिन। आइ ध्रि ने पिफलिप पूछलनि जे जूडी संग की बतिआइत छलहुँ ने जूडी कहियो पूछलनि जे पिफलिप संग की बात भेल। तनाव ग्रस्त मे हम एतऽ आबि गेलहुँ से नीके भेल। ‘प्रिया, अहॉक व्यापार केहन चलि रहल अछि? शिकागोक प्रदर्शनी केहन रहल? किछ आर्डर भेंटल?’ पिफलिपक स्वर सुनि हम मुनाइत ऑखि खोललहुँ।’ ‘नीक जकाँ चलि रहल अछि पिफलिप। प्रत्येक व्यापारक अपन व्यवस्था होइत छै, अहाँ व्यापार शुरू किये कयलहुँ? अहाँक टकाक कोनो कमी नहिछल?’ ‘जँ सच कहि तऽ टकाक अभाव छल। अमीरीक आवरण तर गरीब मनक ओछपनि झेलैत झेलैत हम थाकि गेल छलहुँ। कनि-कनिटा वस्तुलेल पाइ मांगऽ पड़ैत छल नरेन्द्र सॅ। एतबे नहिकथि मे कतेक पाइ खर्च भेलै से हिसाबो देबऽ पड़ैत छल। रोज अहिलेल बकझक होइत छल।’ से की? ‘नरेन्द्र सॅ खर्च लेल टका मांगऽ मे एक तऽ हमर स्वाभिमान आहत होइत छल दोसर ओकर बाद व्यंग्यवाण सॅ मानसिक तनाव बढ़ैत छल। टका दैत काल नरेन्द्र कहैत छलाह खूब पाइ उड़ाऊ, खर्च करऽ मे खूब मन लगैए आ जँ हिसाब मांगब तऽ रानी जी कहतीह हमरा सॅ दू-चारि टकाक हिसाब नहिलिखल पार लगै’छ। आखिर एतेक टका जाइ छै कतऽ पांच हजार टका हाथ खर्च लेल दैत छी।’ आ दोसर दिस घर खर्चा सॅ बांचल लाखो टका मम्मीक लगमे जमा रहैत छलनि जकर कोनो हिसाब किताब नहि।’ हम कतेक बेर कहनहु छलिए - ‘नरेन्द्र ओहि पाँच हजार टका मे सँजुक पढ़ाई-लिखाई कपड़ा लत्ता सब होइत छै। ‘तऽ कहैत छल ‘नरेन्द्र हमरा हिसाब चाही।’ ‘नरेन्द्र! हिसाब नौकर सॅ मांगल जाइत छै हम अहांक पत्नी छी।’ ताहि लॅ की मम्मी तऽ आलू-परबल किनैत छथि से हिसाब लिखकऽ रखैत छथि। की ओ घर क सदस्या नहिछथि?’ एहन मनुष्य सॅ के मुँह लगाबय हमतऽ कहियो नहिदेखलिऐ जे मम्मी आलू परबल के हिसाब लिखने होइतीह। बाबूजी सॅ मम्मी कहियो टका मंगैत नहिछलथिन जे अपना मन सॅ दैत छलथिन ताहि सॅ खर्च करैत छलीह। हमकहियो हुनका पाई मंगैत नहिसुनलिऐन्ह। नरेन्द्र तऽ कहियो समय पर पाई दैते नहिछथि। संजुक स्कूल सॅ रिमाइंडर अबैत छलै तऽ मम्मी जी अपन टका सॅ कहैत छलीह पफीस दऽ देब। ओ सत्ते व्यवहारिक छथि बेर-कुबेर लेल अपन टका राखने रहैत छथि। तखन पिफलिप बजलाहः कोनो व्यक्तिक किछतऽ अपन कौशलिया ;नीजि पाईद्ध रहैए चाहि। पॉकेटमनी पर दोसर के कोन अध्किार ओ तऽ खर्चे करबा लेल देल जाइत छै। जकर जेहन औकादि से ततेक टका बाल बच्चा आ पत्नीकें दैत छै। की कहू, पिफलिप! हमरा घरक बात अनोखे छै। जहिया नरेन्द्र कहैत छलथिन आइ घर पर भोजन नहिकरब ताहि दिन मम्मी रसोइ घर मे जा कऽ कहैत छलथिन महराज जी आइ छोटे बाबू खाना नहिखेथिन तैं हमरा तीनू गोटे ;मम्मी हम आ संजुद्ध लेल भरबा परबल बना लेब। अ। गनिकऽ छटा परोर दैत छलथिन। भनसिया आ नौकर दाई लेल आलू आ साग-पात। जँ कहियो कोनो काज लेल हम रुपया लैत छलिऐन्ह तऽ एकटा पुर्जा लिखकऽ थमा दैत छलीह प्रिया, अहाँक नाम पर एतेक टका अछि। कहबाक लेल तऽ हम बड़का घर क पुतौहु छलहुँ मुदा हमरा कोनो हक नहिछल। आ अइ बड़का घरक नौकर जाकर जँ ककरो कोनो आपफत होउ तऽ ककरो लग मुँह नहिखोलैत बस आबि कऽ हमरे कहैत छल बहुरानी! हमरा सौ टका चाही बेटा बीमार अछि इलाज बिना मरि जायत। ककरो घर दहा-भासिया जाय वा आगि लागि जाइ तऽ कहैत छल बहुरानी! अहीं कें कहि सकैछी कहुना उबारि दिअ। छोटे बाबू या मां जी कें कहने कोनो पफायदा नहि। बड़ा बाबू छलाह तऽ बेर-कुबेर बुझैत छलथिन। हम दऽ दैत छलिऐ। आ अइ सौ-दू सौ टका क हिसाब हमरा लग नहिरहैत छल। मां जी ककरो जँ सौ टका देतो छलथिन त प्रत्येक मास बीस-बीस टका काटि लैत छलथिन दरमाहा सॅ। हमरा सॅ एहन हिसाब किताब असंभव छल। दर्जी कपड़ा सीबि कऽ अनैत छलै आ जँ कहै ‘मां जी सिलाई दू सौ साठि टका भेल’ तऽ ओकरा अढ़ाई सौ दऽ कहैत छलथिन बस भऽ गेल आब एको टका नहि।’ हमर मन विचलित भऽ उठैत छल बेचारा दू-तीन हजारक कपड़ा सीब कऽ दऽ गेल आ अहाँ ओकर मेहनतक दस टका पचा लेलिए ताहि सॅ कतेक बचत भऽ जायत। हँ, एकटा हमर अपन व्यक्तिगत खर्च छल किताब कीनब जे नरेन्द्र के एकदम पिफजूल खर्ची बुझाइत छलैन्ह।’ ‘प्रिया नरेन्द्र तऽ एम.बी.एम. कयने छथि ने। से हो अमेरिका सॅ पढ़ि कऽ आयल छथि। तखन किताबक प्रति एतेक उदासीनता।’ हं, पिफलिप ओ अमेरिका सॅ पढ़ि कऽ आयल छथि। तइओ हुनक कहब छैन्ह ‘प्रिया अहाँ लाइब्रेरी मे जा कऽ कियेक ने पढ़ैत छी। मैगजीनक खर्च तऽ बुझबा मे अबै’छ मुदा ई हजारो टका क किताब? की कहू एकबेर पुस्तक-मेला सॅ किछ किताब किन कऽ अनने छलहुँ किताबक ढ़ेर देखि मन पुलकित छल होइत छल कखन खोलिकऽ पढ़िा। तखने नरेन्द्र अयलाह। किताब देखिते बजलाह-प्रिया अहूँ ध्न्य छी कोन जरूरी छल एतेक किताब किनबाक? हमरा जनैत ई देखाबऽ लेल किनलहुँ अछि आधे किताब पढ़ब नहि। टका पफूकबाक ध्ुन अछि पफूकि लिअ।’ ‘हमरा तत्काल किछ नहिपफूरल गुम्मे रहि गेलहुँ। घर क पुरान ठाकुरा पच्चीस वर्ष सॅ काज करैत छल आब रिटायर्ड भऽ घर जा रहल छलै। हमरा लग आबि अपन दुखरा सुनाबऽ लागल-बहुरानी। अहीं घरक लक्ष्मी छी। छोटे बाबू त हजार टका हाथ पर घऽ देलनि बस भऽ गेलै। आइ जॅ बड़ा बाबू जीवित रहितथि तऽ.....।’ ‘........ठाकरा जी, मोन छोट जुनि करू। छोटे बाबू अहॉक बहुत चाहैत छथि अहाँ हुनका अपना कारे मे खेलौने छिऐन्ह।’ ‘नहि, बहुरानी नहि! आब हुनका किछ याद नहिछैन्ह। सभटा बिसरी गेलाह।’ हम आलमीरा खोली दू हजार टका आ नरेन्द्रक पुरान दू टा सपफारी सूट अपन पुरान साड़ी आ सँजुक पुरान कपड़ा ठाकरा जी के देलिऐन्ह।’ भगवान अहॉ के भरल-पुरल राखथि। बहुरानी अहाँ लक्ष्मी छी लक्ष्मी। ओ हमरा आशीष दैत गेठरी बन्हैत छल तखने नरेन्द्र आबि गेलाह। हमर करेजक धुकधुकी बढ़ि गेल आ ठाकरा जी खुशी सॅ बजैत जाइत छल छोटे बाबू देखियौ बहुरानीक करेज केहन पैद्य छैन्ह देखू हमरा दू हजार टका देलनि अछि ई कपड़ा सब। भगवान सदा सुहागिन राखथिन।’ ठाकरा जी के जाइते बम गोला पफाटल प्रिया, अहाँक कहिया बु(ि विवेक हेत? अहाँ ककरा सॅ पूछि कऽ दू हजार टका आ हमर सूट देलिए? की सभक मालकिन अहीं छी?’ ‘प्रिया, बुझि-सुझि कऽ कोनो काज करबाक चाही!’ सासु बजलनि। मने-मन बजलहुँ हँ, मम्मी जी अहाँ जकाँ नौकर-चाकर के कलपैत देखबाक सामर्थ रहैत तऽ नहिदितिऐ ककरो टका-पाई वा कपड़ा लत्ता। अहीं जकाँ एक के दू टका हिसाब मे लिखितहुँ तऽ हमरो बक्सा मे कपड़ा, टका भरल रहैत। आब सासु चुप्प छलीह। हुनको बदला बेटा गरजैत छलैन्ह ‘लुटा दिऔ सभटा, खोलि लिअ सदाव्रत।’ मम्मी आब अहीं कें सँजुक पढ़ाई-लिखाई, कपड़ा लत्ता लेल टका देब। प्रिया के मात्रा हाथ-खर्चा लेल देबैन्ह। सुनिकऽ स्तब्ध् रहि गेलहुँ। पफेर नहिरहल गेल तऽ बजलहुँ ‘नरेन्द्र। हम की नेना छी? हमरा बूझऽ नहिअबैए? की हमर कोनो उसूल नहिअछि कोनो सि(ान्त नहि, कोनो मानवीय भावना नहि? अहाँ बजैत छी कियेक तऽ अहाँ कमाइत छी, घर क मुखिया छी?’ ‘हं, हं, हम कमाइत छी? कमाकऽ पाइ आनु तऽ बुझब।’ आब ओतऽ ठाढ़ रहब कठिन भऽ गेल हम अपना रूम मे आबि कानऽ लगलहुँ। एतेक अपमान घर क नौकर-चाकर सभक सोझा मे! मालकियत के एतेक अहंकार!! काल्हि पार्टी मे शंकर भैयाक सोझा मे गप्प हँकैत छलाह-पापा की छोड़ि कऽ गेलाह आइ दस करोड़ अछि हमरा हाथ मे। जे मन होए खाइ पहिरि। मन भेल कहिऐ जा कऽ नरेन्द्र जहिया अहाँ मरब तहिया संजु के कहि देबै ओ अहॉ लेल टकाक चिता सजाबए। घुटन बढ़ले जा रहल छल। मानसून सॅ पहिने जेना समस्त वातावरण मे उमस रहैत छै, अबैत-जाइत श्वास आकाश दिस टकटकी लगौने रहैत छै, कखन मेद्य लगतै बुन्न टपकैत जे लोक क तन-मन शीतल हेतै-तहिना श्वास प्रश्वास शीतलता लेल व्याकुल छल।.......... बात-बात मे ऑखि सॅ नोर ढ़रकैत छल व्यथा के मरहम लगएबा लेल मुदा आइ ऑखि मे जल नहिमात्रा उमस सूखा गेल नीर नयनक।..... नव टटका घाव छल मन-प्राण पर जाहि पर खूनक पपड़ी जमि गेल छलै दर्द सॅ स्याह भऽ गेल छल। सम्पूर्ण अस्तित्व मे टीसक अनुभव भऽ रहल छल। मन कुहरि छल टका-टका-टका जन्म सॅ एखन ध्रि वैभव बीच रहलहुँ मुदा हाथ पर कहियो टका नहिजेना छप्पन भोग परसल होमए मुदा मुँह मे एक कौर नहिजाए! ई पारिवारिक ढाँचा ऐतिहासिक छैक। आत्मग्रस्तताक सीमा पार ......ई लोकनि केहन ग्रस्त छथि टका सॅ? सासुके आलमीरा मे लाखोक समान छै मुदा.....। कम से कम मां स्वभाव सॅ भावुकतऽ छलीह। सन्तुलनक अभाव छलैन्ह मुदा मन होइत छलैन्ह तऽ सबटा उठा कऽ दऽ दैत छलथिन। हं, हुनका एतबे दुख छलैन्ह जे ओ आदरणीयॉ देवी नहिबनलीह ने घर मे ने समाज मे। नहिजानि कियेक ओई दिन मां के प्रति सहानुभूति भेल छल हुनक पीड़ाक बुझबाक प्रयत्न कयने छलहुँ। हमर सासु तऽ लोकक नजरि मे देवी छथि-आत्मदाह आ वेदनाक प्रतिमूर्ति। ककरो कोनो सहायता नहिकरैत छथि तथापि प्रशंसा होइत छैन्ह। बजतीह किछ करतीह किछ कथनी आ करनी मे कोनो तालमेल नहि। ई पापा कें हरदम महसूस करौलथिन जे ओ अपराध्ी छथि। बेटो के सह देलथिन बाप क प्रति घृणाभाव कें। पापाक सोझा मे तेहन दयनीय मनोभाव देखबैत छलथिन जे ओ सतत् क्षति पूर्तिक लेल प्रयत्न करैत रहलथिन। छोटी मां के काली मंदिर मे कालीजी क समझ पापा सिन्दुर लगौने छलथिन। तऽ की ओ विवाह नहिभेलै? धूर हमहू हदे छी की सोचऽ बैसैत छी आ कतऽ चलि जाइत छी। मन मे अबैत भाव आ विचार के छॉटनाई संभवो नहिछै। गाड़ी रूकल। देखलहुँ छोट सन एकटा रेस्टोरेंट सामने अछि। खूब पैद्य-पैघ बर्च आ पाइनक पेड़.......किछ आर गाड़ी लागल छलै। रेस्टोरेंट मे गेलहुँ कोना मे बैसैत पिफलिप सॅ पूछलिऐ-‘अहाँ किछ पूछने छलहुँ?’ ‘हं, एक घंटा पहिने अहाँ तऽ कल्पना लोक मे रहैत छी। पफेर हमर माथ छुबैत बजलाह प्रिया रिलैक्स......आइ से रिलैक्स।’ नहिकहू ने की व्यापारक सम्बन्ध् मे पूछने छलहुँ?’ ‘कहैत छी ने हम किछ तेहन नहिपूछने छलहुँ। हे, देखिऔ केहन नीक रौद छै। खाना खा कऽ चलब टहलऽ। की लेब? नीक बवारियन वाइन मंगाउ? अहाँ के मीठ स्वाद बला डसर्ट बाइन नीक लगैत अछि।’ ‘एखन मोन नहिहोइए।’ बहुत अपनत्व सॅ देखैत बाजल-प्रिया अहॉ बहुत बहादुर महिला छी, एना जुनि करू टूटि जायब। आब तऽ अहॉ आत्मनिर्भर छी। अतीत के बिसरी जाउ। याद कयने कोनो लाभ नहिं’ ‘से तऽ सत्ते कोनो पफायदा नहिछै। हम चाहैतो नहिछी बीतल बात मोन पारऽ जूड़ी ठीक कहने छलीह। शायद बीमारीक वजह सॅ वा व्यस्तातक कारण पछिला पन्द्रह वर्ष मे कहियो किछ सोचबाक पलखति नहिभेंटल।’ हम सब ग्रेप-जूस पी रहल छलहुँ जाहि मे छोट-छोट मिंट के पात आ संतराक छिलका क कतरन छलै। स्टुआर्ड आर्डर लिखैत छल-पिफलिप के हमर स्वादक वस्तु बुझल छैन्ह। डेनमार्क मे आलूके ततेक तरह क व्यंजन भेंटैत छै जे कि कहू। मक्खन, आलू, चीज आ चीनी सॅ छौंकल ऊपर सॅ नमक आ मरीच निबू संग मे वाइन .......... हम कोकाकोला लेलहुँ, खाना खा कऽ खूब टहललहुँ। पिफलिप पूछलक-‘हापफमैनक आर्डर कतेक के छैक?’ ‘करीब-करीब दू तिहाई।’ ‘हैंडबैग, की आर किछ?’ ‘सब मिलल-जुलल।’ ‘प्रापिफट?’ ‘मार्जिन तऽ बहुत कम दैत छै। मुदा ओकर तीनटा बात बहुत नीक बुझाइत अछि। समय पर एल.सी. खोलि दैत अछि। क्वालिटी कनिको गड़बड़ भेला परमीन मेष निकालैत अछि मुदा क्लेम नहिकरैत अछि आ तेसर बात इ जे रेगुलर आर्डर दैत अछि।’ ‘बड्ड तेज अछि हापफमैन। एहन खरीददार बड्ड कम भेंटत। हमरा तऽ जूडीक जिद्द के कारण एतेक नीक सप्लायर कें छोड़ऽ पड़ल। जूडीक कहब छै जे हमरा सभकें आर स्प्लायर भेंट जायत प्रियो के गाहक भेंटतै मुदा दोस्ती? ओकरा’ नजरी मे दोस्तीक महत्वपूर्ण स्थान छैक।’ आ अहॉक नजरि मे?’ सच तऽ ई छै जे जखन कलकत्ता या दिल्ली सॅ समय पर माल नहिभेंटैत अछि तऽ अहॉ सॅ समय पर माल नहिभंेटैत अछि तऽ अहाँ सन नीक सप्लायर कें हापफमैन सॅ जोड़बाक पछतावा होइत अछि। ‘पिफलिप एक तरहें ई नीके भेलै जे अहॉ ओइ समय नव-नव काज शुरू कचने छलहुँ तैं एल.सी.नहिखोलि पयलहुँ आ नरेन्द्र अहॉक संग हमरा काज करऽ दैत नहि। आब इ चमड़ाक व्यापार शुरू कऽ हमरा ई तऽ होइत अछि जे हम स्वयं काज शुरू कयलहुँ।’ ‘से नीके कहैत छी प्रिया! हमरा क्रेडिट पर माल लेबाक छल आ अहॉ क्रेडिट पर नहिदऽ सकैत छलहुँ। तखन बैंक सॅ रुपया लेबाक लेल हापफमैन सन पैघ व्यापारीक जरूरत छलै।’ हं, मोन पड़ल, नरेन्द्र अहाँकें ध्मकी देने छल। अहाँक बैंकक गारंटी वापस लऽ लेने छल। ओकर छह सात दिनक बादे तऽ हम सब कलकत्ता पहुँचल छलहुँ आ अहाँक माल तैयारो नहिभेल छल ने सप्लायर के देबऽ लेल टका छल।’ ‘तऽ अहीं एक लाख टका एडवांस देने छलहुँ आ हम अहाँ के सबटा बात सापफ-सापफ कहि देने छलहुँ।’ ‘हँ, तखन हमरा लाखे टका संग मे छल आर रहैत तऽ वेशी दितहुँ। ओहि दिन हम कहने छलहु पफरक व्यवसाय शुरू करऽ लेल। मुदा प्रिया सत्य कहैत छी दैट वास्टर्ड। हम पुरूष होइतो ओकरा बुझि नहिपबैत छी।’ एकदम सही कहलहुँ! पिफलिप हमरो कतेक बेर मोन भेल नरेन्द्रकें गरियाबक! की कहू पिफलिप ओइ बेर लंदन सॅ घुरलाक बाद हम ओइ घर मे एक छत के नीचा रहैतो ककरो संग नहिछलहुँ। अन्त मे हमरा कठोर कदम उठाबऽ पड़ल।’ ‘से की?’ ‘ओ हमरा ब्लैकमेल करऽ चाहलक तखन हमरा ध्मकी देब पड़ल।’ एक बेर ओ चुप्प भेल। मुदा जखन ओ देखलक जे ओकरा बिना सहयोगक हमर काज सुचारू ढंग सॅ चलि रहल अछि तखन आर खुुंखार भऽ गेल। ओ अहंकारी पुरुष बर्दाश्त नहिकऽ पबैत छल जे पत्नी ओकरा बिना आगॉ बढ़ि रहल छै। ओह! पिफलिप अहाँ तऽ कल्पनो नहिकऽ सकब ओकर नीचताई के विषय मे।’ एतबा बजैत-बजैत प्रभाक स्वर थरथराए लगलैन्ह। ऑखि ऊपर उठलैन्ह गाछक पफुनगी पर होइत आकाश दिस तकैत रहलीह। पैरक नीचॉ सूखल पातक खर-खर स्वर। मन मे एहन हाहाकार जे चाहैत छलीह पिफलिप के करेज मे सटि खूब कानि। बहुत दिन सॅ ऑखि नोर सूखल छैन्ह पफेर तुरत दोसर मन बरजैत कहलकैन्ह की जिनगी मे एकटा पुरुषक सम्बल एहन जरूरी छै? पफेर मोन पड़लैन्ह जूडी कहैत छथि मात्रा महिले पुरुष सॅ सम्बल नहिचाहै’छ पुरुषो स्त्राीक सम्बल लेल आकुल-व्याकुल रहै’छ। हं, याचक बनिकऽ सम्बल कथमपि नहिस्वीकारि!’ हमरा नरेन्द्रक परिवार सॅ भनहिं किछ नहिप्राप्त होमए मुदा एकटा अदद वस्तु भेंटल अकारण आक्रमकता, निर्ममता मे डूबल व्यंग्य वाण जे शूल जकॉ गरल रहै’छ। ई इक्कैसम शताब्दीक समाज छैक की अठारहवीं शताब्दी से बुझब अइठाम कठिन। हम जखन कखनौ कोनो पार्टी मे जाइत छलहुँ तऽ सोझे-सोझे मुँह पर चाबुक मारैत शब्द उछलैत छल-‘आइ काल्हि अहॉकें एसगरे देखैत छी नरेन्द्र जी अहॉक संग नहिरहैत छथि?’ ‘नहिरहैत छथि।’ ‘कियेक?’ आब अइ कियेक के उत्तर की देल जाए? हम असमंजस मे रहैत छी लोक कनखी मारि एक दोसरा के किछ संकेत कऽ जहरीला हँसी हँसऽ लगै’छ। हम साहस कऽ बजैत छी इ हम्मर व्यक्तिगत सवाल अछि..बात पूरा होमऽ से पहिने व्यंग्यवाण पीठ पर भोंका जाइछ-अरे हमर सभक घरबला की व्यापार नहिकरैत छथि? प्रिया जी अहॉ किछ वेशीए व्यस्त रहऽ लगलहुँ अछि मिसेज वर्मा अहीं कहू ने हम पफूसि बजैत छी? ‘हे हम की बाजू मियां-बीबी क झगड़ा जे बाजए से लबड़ा।’ एना पल्ला झाड़ने समाज मे काज नहिचलैत छै की मिसेज आहूजा? हं, हमरा विचार सँ तऽ महिला के समझौत कऽ लेबऽ चाही.....ई अनगिन व्यंग्यवाण आ आगाँ-पाछाँ बामा, दहिना गरल ऑखि सॅ लहुलुहान भेल मन-प्राण समस्त शरीर मे झुनझुनी-की बाजू कतेक प्रश्नक उत्तर दिऐ? संग कियेक ने रहैत छी?....कोन बातक झगड़ा.....? आब की एसगरे रहब.....? आअइ सभक मूक गवाह हमर सासु! हुनका लेल छन्न-सन क्यो हमरा किछ कहए हम कतबो आहत होउ ओ मूक मौन रहतीह, निरूत्तर पत्थरक मूर्ति जकाँ। हुनक एहन सर्द उपेक्षा क लेल कोनो आखर नहिभेंटैत अछि। जखन ओ पुतौहु लेल एहन संवेदनहीन छथि तखन छोटी मां लेल सहानुभूति क प्रश्ने व्यर्थ ओ तऽहिनकर सौतिन छथिन! उनटे हुनका होइत छैन्ह जे हम परम्पराक अनुसार कियेक ने व्यवहार करैत छी? जेना घरक पुतौहु रहैत छै तेना कियेक ने रहैत छी? से हो मुँह खोलि कऽ नहिबजतीह आ हुनक ई चुप्पी सौ-सौ बिच्छुक डंक मारै’छ हमरा मन पर। आ हम मुखौटा। लगा नहिसकैत छी जे हुनका हं मे हं मिलाउ। एहन ओ कऽ सकै’छ जकरा पीठ मे रीढ़ नहिहोई मरुदंडहीन मनुष मुँहदेख बजै’छ ओ जकरा कोनो क्षुद्र स्वार्थक पूर्ति करबाक होइ वा बहुत एहन जाहिल महिलाक सम्पर्क सॅ वेशी एक्सपोजर के कारण, खैर जे होइ हमरा क्रोध् होइछ पुरुष पर। खास कऽ ओहन पुरुष पर जे शक्तिशाली आ सामर्थ्यवान बुझै’छ अपना कें। शुरू मे हम सभटा बर्दाश्त करैत छलहुँ होइत छल एना कयने ओ सुध्री जयताह। तैं अपमान, वंचना सब चुपचाप बिना कोनो प्रतिरोध् कयने सहैत छलहुँ। आब तऽ एहन बात सब लिखबाक मोनो ने होइत अछि। ने हाथक कलम ओहन लिखबाक लेल तैयार होइछ। जीवन के जीवंत बनाबऽ लेल हम सबसे पहिने नरेन्द्र संग जोड़ल गेठबन्हनक गेंठ खोलनाई शुरू कयलहुँ। जतऽ जतऽ ओ हमरा संग जाइत छलाह ओतऽ हम अपना कें लूल्ह-नांगर महसूस करैत छलहुँ। पार्क स्ट्रीटक मोड़ पर एक दिन देखने छलिऐ लूल्ह-नांगर कें भीख मंगैत लागल जेना हमहूँ ओहने अपंग छी आ समाज सॅ स्वीकृतिक भीख मांगि रहल छी। हम कतेक आ कतऽ धरि। जे नितांत एकांत क्षण मे जखन नरेन्द्र लग मे रहैत छलाह अन्तरंग गप्प-सप्प वा कोनो क्रिया कलाप मे हुनक वर्यस्व-भाव आ व्यवस्थाक विषाक्त लहरि तनाव बढ़ा दैत छल। एकर परिणाम भेल जे हम नरेन्द्र सॅ दूर रहबाक चेष्टा करऽ लागलहुँ तथापि भयभीत क्षुब्ध छलहुँ। हरदम मन मे होइत छल जे नरेन्द्र नराज ने भऽ जाए। हमर सपफलता सॅ जरैत रहैत छल तैं अपन सपफलता पर खुशी सॅ वेशी ओकर प्रतिक्रिया डर होइत छल। सब दिन एके रंगक रूटिन छल। भोरे आठ बजे घर सॅ बहराइत छलहुँ दिनभरि काज मे व्यस्त रहैत छलहुँ घर आबितऽ घर गृहस्थीक काज मे ओझरा जाइ पफेर पढ़ब-लिखब आध-आधा राति धरि जागले रहि। ऑखि मे नन्नि नहिढ़ेरो संशय कोनो राति चैन सॅ दूइओ तीन घंटा सूतल नहिहोएब। ‘की अहॉ के समाज सॅ डर होइत छल?’ नहि, पिफलिप समाज सँ नहिडर होइत छल पिफलिपक सर्कल सॅ। नहिजानि कियेक ओकर सभक सामना नहिकऽ पबैत छी। ओकरा सभक सोझा मे हम अपने कें अपराध्ी बुझऽ लगैत छलहुँ। ‘पफालतुडर! अरे, अहाँ व्यापार करैत छलहुँ कोनो अपराध् नहितखन डर कथिन?’ ‘ई बात सही छै मुदा ई बुझऽ मे हमर आध जिनगी बीत गेल। नहिजानि ई केहन राजसिंहासन छलै जकर पाया पकड़ने-पकड़ने तरहत्थ लहूलुहान कऽ लेलहुँ।’ ‘प्रिया सम्मान ककरो क्यो दैत नहिछै ओ लेाक के स्वयं अर्जित करऽ पड़ैत छै।’ अच्छा, पिफलिप अहीं कहू हम की सभ अर्जित करितहुँ, की एहन कतहु देखलिऐ ए जे अपने घर मे आन जकॉ लोक रहए हम एना छलहुँ जेना ककरो कोनो मतलब नहि। एकदम उपेक्षित ककरो हमर कोना परवाह नहि। हमरा अपन पीठ अपने ठोकऽ नहिअबैत अछि ने हम अपना पीठ पर अपन त्यागक ब्यौरा साटिकऽ घूमि सकैत छलहुँ। तखन पफैसला हमरा पक्ष मे होइत कोना? हँ, ई संघर्ष सॅ एतबा सीख भेंटल जे जिनगी मे जँ एकटा गलत समझौता करै’छ तऽ सौटा गलत समझौता करऽ पड़ैत छै। अहाँ जँ एक व्यक्तिक पैर तर तरहत्थ रखबै तऽ आबऽ बला प्रत्येक व्यक्ति अहाँक तरहत्थ के पैर पोछना बूझत। ‘हं, ई एकदम शोध्ल बात बजलहुँ।’ आब हम चुप्प मने-मन सोचैत छलहुँ। केहन छल हमर अतीत? कखनौ क्षोभ, कखनौ असहय व्यथा झेलैत रहलहुँ तऽ जिनगी विध्ेयक बनैत कोना। सही आ गलत की होइत छै इ मात्रा नैतिक विवादक विषय नहितैं हम हरदम जिनगीक गुणवत्ता पर विचारैत रहलहुँ। ई केहन जीवन हम जीवि रहल छी? भविष्यक भयावह छवि के कोना सुधरू जे व्यवस्थाक ठेकेदारक नजरि बदलए। एकरा हमर जिद बुझिवा बेवकूपफी। असंभव करे कल्पना करब आ व्यवस्थाक चुनौती देब नीक बुझाइत छल। चटाðन सॅ टकराइत विघ्न-बाध सॅ जुझैत निरन्तर प्रयासरत छलहुँ। मुदा हमर समस्त प्रयास विपफल भऽ रहल छल। असल मे संघर्ष करबा लेल जे हथियार छल से एकदम भोध् छल मुदा से बुझबा मे बड्ड समय गवां चुक्लहुँ। आब हमर मन हमरे सॅ पूछैत छल-कहू प्रिया, ककरो अहाँक जरूरत छै? तऽ विवेक उत्तर दैत छल-‘ककरो नहि।’ आ हमर अहम? ठोस एकटन लोहाक सख्त वजनदार ईगो कहैत छल नहिहम हार नहिमानब पैद्य से पैघ कीमत चुकाएब आर आहुति देब। देखै छी कोना क्यो उपेक्षा करै’छ? हमर जरूरत छै परिवार के समाज के हम नींव के पत्थर बनब। ई केहन अर्न्तद्वन्द्व मे हम पिसारहल छी मन क दू हिस्सा एकटा पूर्ण स्वतंत्रा सजग सतर्क दोसर डेग-डेग पर भय भीत। चारूभर बुझाइत छल जे सभक ऑखि मे प्रश्न प्रति प्रश्न छै व्यंग्य छै। सभके ई डरजे एहन महिलाक असर कहीं हमरो बेटी, पुतौहु पर पड़ि ने जाए। लोक हमरा सॅ एकटा दूरी बनाबऽ लागल। एहन खुल्लम खुल्ला अपमान! बिना कोनो अपराध् कयनहुँ लोकक लांछना!! नरेन्द्र क पत्नीक चालिचलन नीक नहिछै। आब हमरा ध्ैर्य संग छोड़ऽ लागल एहन बहिष्कृत जिनगी? हमर अपन परिवारक सदस्य, कुटुम्ब, अड़ोसी-पड़ोसी सभक चेहरा पर एकटा अजीब भाव भंगिया! अई सभक बहुत प्रभाव पड़ैत छलै सँजु पर ‘बेचारा ककर तरपफदारी करत मां क की पापाक। आ हमरा होइत छल जे लोकक हमरा प्रति एहन धरण कोना बनलै? हम तऽ घर के जोड़ने रखबाक प्रयास मे रहलहुँ तोड़लिऐ कोना? आ नरेन्द्र के हमर सपफलता पर प्रसन्नता होमऽ चाही शिकायत छै तकर सापफ मतलब छै जे ओ हीन ग्रंथि सॅ ग्रसित छथि। हम न्यूरोटिक भेल जा रहल छलहुँ। हम जनैत छी जे पागल के इलाज भऽ सकै’छ मुदा जे स्वयं अपन न्यूरोटिस बुझैछ, जे बेर-बेर हिस्टिरिक दौरा पड़ला पर हिंसक आक्रोशक कारण अपने देह के थकुचए बकए हे भगवती हमरा लऽ चलू तकर कोन इलाज? एक दिन हमर काज-व्यवसाय मे हमर क्षमता बु(िमताक प्रशंसा होइछ दोसर दिन परम्पराक ठेकेदार के बहुत-बहुत शिकायत छैन्ह। तखन विचारलहुँ जे जॅ हम सपफल व्यवसायी छी टका कमाइत छी तऽ अपन व्यक्तिगत समस्याक समाधन कियेक नहिकऽ सकै छी। एतेक पढ़ला लिखलाक बादो एना कियेक मनोविज्ञान बुझितो आक्रमक औदास्य आ डिप्रेशनक घुन जकाँ तरे-तर खा रहल अछि? महीना मे दू-तीन बेर दौरा पड़ैत अछि। ट्रिगर पाइन्ट तऽ नरेन्द्र अछि आ ओकर द्वेषभाव क्यो आमंत्रित कयने छलै पूरा परिवार के मुदा आब नरेन्द्र हमरा कतौ नहिलऽ जाइत छथि। क्यो पूछितो छैन्ह तऽ कहि दैत छथिन-ओ बड्ड व्यस्त छथि। जेकरा जे मोन होइत छै अनुमान लगबैत अछि। हम सोचैत छी दोसर औरत के घर आनऽ बला ई पुरुष हमरा पर हाथ उठबैत अछि, लोक क सोझा मे अपमानित करैत अछि तइओ ओ हमर पति अछि? इ हमरे गलती अछि जे हमर संवेदना गहींर अछि वा हमर मूल्यबोध् भिन्न अछि। दिन-प्रतिदिन त्रासदी मन क भीतर अपन पैशाचिक पंजा गड़ौने बिना नहिरहै’छ क्षत-विक्षत हृदय कहै’छ बस काज मे व्यस्त रहू सभटा बिसरल रहत। ई काजे व्सवसाय तऽ ग्रह अछि एकरे कारण एतेक अपमान होइछ...मुदा ई छोड़ि देब से हो असंभव! छोड़बाक प्रश्ने नहिउठै’छ? ‘प्रिया! बुझाइत पफेर अहॉ कतहु भसिया गेलहुँ।’ ‘सॉरी पिफलिप! बात ई छै जे......।’ ‘आखिर अहॉ एतेक की सोचौत रहैत छी?’ पिफलिप कखनौ कऽ होइत अछि जे एहि व्यवसाय लऽ कऽ हमर दूनू गोटे मे दूरी बढ़ल?’ ‘प्रिया! असल बात ई छै जे नरेन्द्र सन पुरुष महिलाक महत्वाकांक्षा कें सहन नहिकऽ पबै’छ। भनहिं ओ आन सपफल महिला दिस आकर्षित होउ मुदा अपना पत्नी कें दबाऽ कऽ रखबामे ओकर अहं संतुष्ट होइत छै हे, देखू अहॉ मे कतबो प्रतिभा होमए रहब हमरे अध्किार मे।’ अच्छा अहॉक कहियो जूडीक प्रति एहन भाव रहल अछि?’ प्रिया हम सत्य कहैत पता नहिजूडी अहाँ के कहियो कहलक की नहि। एलोना घर सॅ गेल तहिया सॅ हम दूनू गोटे पति-पत्नी सॅ वेशी दोस्त जकॉ रहैत छी। हमरा दूनू गोटे के एक दोसरा क प्रति परस्पर स्नेह सद्भाव अछि। हमरा ओ सम्मान दैत छथि आ हम हुनका सम्मान दैत छिऐन्ह स्वतः कोनो दबाव नहि। हुनकर काजक महत्व दैत छिऐन्ह ओ हमरा काजक महत्व दैत छथि। मुदा नरेन्द्र मे परस्पर प्रेम क भाव नहिछै ओ अपना के अहॉक मालिक बुझैत छथि। वास्तव मे अहॉक देश मे पति क वर्चस्व रहलैए तैं जॅ पत्नी चेतन शील रहैत छै तऽ वैवाहिक व्सवस्था दम तोड़ऽ लगैत छै।’ हम एकदम चुप्प भऽ गेलहुँ। पिफलिप इमानदारी पूर्वक उत्तर देने छलाह हम हुनक बात सॅ सहमत छी। भोजन परसल गेल मेज पर। दूनू गोटे चुपचाप खाइत रहलहुँ। मुदा हमर मन चुप्प नहिछल दिमाग मे चलैत टेप-रेकार्डर के बन्द करब अपना वश के बात नहि। हम नरेन्द्र के अध्ीन भऽ जे काज करैत छलहुँ से हुनका नीक लगैत छलैन्ह। मुदा जहिया सॅ हम अपन स्वतंत्रा निर्णय लेब लगलहुँ तहिया सॅ हम पफुटलो ऑखि नहिसोहाइत छलिऐन्ह। बात-बीत मे टीका-टिप्पणी। जहिया हमरा घर सॅ बाहर जएबाक रहैत छल अरबैध् कऽ तहिये घर मे पार्टी क आयोजन होइत छल। हमरा सम्पर्क मे जे अबैत छल तकरा ओ देखऽ नहिचाहैत छलाह। आइ घरि कहियो हमरा व्यवसाय के विषय मे कोनो उत्सुकता देखौलनि ने किछ पूछलनि। जहिया पहिल बेर हापफमैन सँ हमरा आर्डर भेंटल छल हम बहुत प्रसन्न छलहुँ। हुलसैत कहने छलिऐ ‘नरेन्द्र आब तऽ अहाँ ई स्वीकारब जे हम स्वयं अपना स्तर पर नीक व्यवसाय कऽ सकैत छी?’ ‘तऽ की अहाँ स्वयं कयलहुँ अछि? हापफमैन सॅ परिचय तऽ ओ अहॉक मित्रा की नाम छै.....पिफलिप हां पिफलिप करौने छल।’ ‘अहॉ की बुझैत छिऐ जे मात्रा परिचय सॅ काज भऽ जाइत छै?’ हं, होइते छै।’ एहन विबाह बोल सुनि हम गुम्म भऽ गेलहुँ। अइ व्यक्ति संग गप्प करब असंभव। हमरा दूनू गोटेक बीच एकटा विचित्रा जंग चलि रहल छल। हम ई नहिकहैत छी जे हमरा मे कोनो कमी नहिअछि हम तऽ शुरूहे सॅ मुँहदुब्बर अन्तर्मुखी लड़की छलहुँ। कहियो बहादुरीक मुखौटा लगएबहु ने कयलहुँ। सभा-सोसायटी, पार्टी/भीड़भाड़ मे एकदम असगर भऽ जाइत छी आ तखन हमर ऑखि ताकऽ लगैत छल नरेन्द्र केँ। जेना भीड़ मे नेना मां के तकै’छ। आ अई समस्त प्रक्रियाक प्रमुख कारण हमरा दृष्टिकोण सॅ अत्यअध्कि संवेदनशीलता वा आत्मविश्वासक कमी। हम नरेन्द्र कें कतेक बेर कहने छलिऐन्ह ई पैद्य लोकक सोशल सर्कल, ब्याह क भोजभात, कॉकटेल पार्टी मे हम सहज भऽ नहिरहि पबैत छी बहुत असहाय अनुभव होइछा एकतऽ घंटो पहिने तैयार होमऽ मे लगै’छ पफेर डर कोनो ने कोनो कमी बताकऽ नरेन्द्र भरि बाट बजताह.....अहाँ के कोनो लूरि नहिअछि....केहन साड़ी पहिरलहुँ आ अहॉक लग मैचिंग जेवर नहिअछि....कार्टियार बला घड़ी क अंचार बनैत......? अपना देहो पर ध्यान नहिरहै’छ कतेक मोट भेल जा रहल छी। ऑखि डबडबा जाइत छल.....नरेन्द्र अहॉक ई भाषण सुनैत सुनैत हम हीनभाव सॅ ग्रसित छी आब अपनो नजरि मे.... हम स्वीकारैत छी जे हम अहॉक लायक नहिछी। हम देखैत छी जे पार्टी मे अहाँक आगाँ-पाछाँ, बाम दहिन एक सॅ एक रूपसी डोलैत रहै’छ ओइ रूपसी मे ककरो कोनो विषयक अध्ययन-मनन मे रूचि नहि, अपन कोनो व्यक्तित्व नहि। ओई सर्कल मे पाँचो मिनट क्यो कोनो विषय पर गम्भीरता पूर्वक बाजि नहिसकै’छ तथापि सब मगन रहै’छ हमहीं ओतऽ असहज भऽ जाइत छी। तइओ कोशिश करैत छी व्यवहारिक बनबाक, अहाँक अनुकूल बनबाक कोशिश करैत छी अपन व्यथित अतीत के बिसरबाक। मन होइत छल जे अहाँ के अपन मित्रा बनाबी मन क बात कही - सुनी मुदा ने अहॉ कखनौ शान्तिपूर्वक हमरा लग बैसलहुँ ने कहियो पूछलहुँ कियेक उदास छी? की हम अहॉक पाछू दौड़ैत-दौड़ैत अपन अतीत सुनाबितहुँ? दोसर बात ई जे जाबत अहॉ चैन सॅ नहिसूनब ताबत अध्खरू बात पर उखड़ि जायब अंट-संट बाजऽ लागब हमर कुंठित व्यक्तित्व के एकटा आर विशेषण दऽ देब। कियेक त अहॉक तर्क मे दू आ दू मात्रा चारि होइछ। अहॉ कहब प्रिया दू आर दू कहियो पाचँ नहिभऽ सकैछ? असंभव छै- प्रिया। ‘प्लीज बी लॉजिकल ....’ इएह तऽ अहाँ कहैत रहलहुँ अछि। तै ॅ नेकहलहुँ अतीत क व्यथा कथा ने कहब। एतेक वर्षक बाद आब हम अपन अतीत के बूझऽ लगलहुँ अछि। मात्रा बुझिए सकैत छी ओकरा बदलल नहिजा सकैत छ। वेटर पिफलिप के प्लेट उठा रहल छलै। हम जल्दी-जल्दी खालि कयलहुँ। पिफलिप बात ई छै जे हमरा अर्न्तमन मे जबरदस्त विरोधभास शुरू भऽ गेल अछि। हम नरेन्द्र केँ कहने छलिऐन्ह-हमारा कनि समय दिअ । जिनगीक एक विशेष। स्थिति सॅ जूझि रहल छी। सन्तुलन बनयबाक प्रयास कऽ रहल छी। हमरा घर मे अबिते स्वंय महसूस होइछ जे हम सासुक नजरि मे नीक पुतौहु नहिछी ने अहॉ लेल नीक पत्नी ने सॅजुक नीक मां। मुदा हम की करू समय के अभाव तैं कोनो भूमिका मे सपफल नहिभेलहुँ। ‘अच्छा ई कहूँ जे अपना व्यवसाय तऽ अहॉक बहुत यश प्रतिष्ठा देलक’ से नहिमहसूस करैत छी? पिफलिप! होइछ अनुभूति। मुदा समस्त सपफलताक बादों हृदय स्थल मे जे घाव अछि। तकर टीस बेचैन कऽ दैत अछि। एकटा एहन समय छल जहिया घर-बाहर सभठां लोक-हमरा सूली पर चढ़यबाक लेल सदिकाल आतुर छल। समाजक ठेकेदार केँ शायद मन होइत छलनि जे एक औरत एना विरोध् - भेलो पर व्यवसाय कऽ रहल अछि विदेश-ध्रि एसगरे जाइछ तऽ एकरा देखा देखी दोसरो घरक बेटी - पुतौहु के हिम्मत बढ़तै, ओ आत्मनिर्भर होेएबाक प्रयास करत।’ ‘पिफलिप बजलाह हे, कनि रूकब हमरा पिआस लागल अछि।’ हं, हं कियेक नहि? गाड़ी सॅ उतरि हमहूँ डॉर सोझ कयलहुँ। पाइन आ बर्च के बड़की-बड़की टा गाछ। पैरक नीचा सूखल पात। कनि ठंढ़ दुपहरक मीठका रौद। पिफलिप नहुॅए सॅ हमरा कन्हा पर अपन - कोट ध्ऽ दैत छथि एक दोस्तक गर्म संवेदनाक अनुभूति ..........निःस्वार्थ स्नेह ....एहन दोस्त भाग्य सॅ भेंटैत छैक। ‘शायद एहन दोस्तक स्नेह-सदभाव नहिभेंटैत तऽ शायद हम किछ नहिसकितहुँ अथबल भऽ बड़का घर मे नोर चुबैत बैसल रहितहुँ। मुदा आब दोस्तक प्रोत्साहन सॅ लगैछ जीनाई सीख लेलहुँ। अइ ध्रती पर हमरा हिस्साक हवा, पानी आ रौद सब प्राप्त अछि। अपन एक गति अछि लय अछि जे हमरा आगॉ बढ़ा रहल अछि। प्रिया, पहुँचऽ कतऽ चाहैत छी?’ ‘पिफलिप! सदिखन लोक चलैछ कतहुॅ पहुँचबा लेल नहि! ओहुना चलैत रहब बिना उद्देश्य के ताहु मे एकटा आनन्द छै।’ ‘ओह प्रिया! अहॉ तऽ दार्शनिक छी हम नहितैँ अहाँक एहन भाषा बुझब हमरा लेल कठिन अछि।’ ‘ऊँहूँ दर्शन नहि। असल मे अइ त रहक अहाँ के अनुभव नहिभेल अछि तऽ बुझबै कोना? जखन मन क बात दबबैत-दबबैत ऑखिक नोर सूखा जाइत छै तखन....’ - ‘की तखन की होइत छै?’ बुझाइत छै जे करेज पर राखल पाथरक बोझ सॅ साँस बन्द होमऽ लगैल होए। आ अतीत हुलकी मारऽ लगैत छै.........। ‘पहिने दर्शन आब कविता! प्रिया अहाँ के बूझल अछि हमरा साहित्य सॅ कहियो नाता नहिरहल.......’ ‘हम भभाक हँसैत छी। की सत्ते पिफलिप-अहॉ किछ नहिबुझलहुँ! एतेक काल सॅ हम व्यर्थे बक-बक कयलहुँ।’ प्रिया, अध्लॉह नहिमानब मुदा एकटा सच छै जे अहाँ एखनहुँ अपन अतीत। रूढ़िवादी समाज आ घर परिवार सॅ मुक्त नहिभेलहुँ अछि।’ हं, जूडी कहैत छथि जे एकर कारण छै- ज हम अपराधबोध सॅ ग्रसित छी। की अहॉ ककरो हत्या कयलहुँ अछि की चोरी डकैती?’ -‘किछ नहिमुदा अपना पैर ठाढ़ एक आत्म निर्भर महिला केँ स्वीकारऽ मे समाज के समय-लगतै। खैर, अब चलू घर। चारि बाजी रहल छै जुड़ी आबि गेल होएतीह।’ गाड़ी पर बैसलहुँ। पिफलिप चुप छल। हमरा चुप्प नहिरहि भेल मन क बात बाजिए देलिए-पिफलिप! मुइल सम्बन्ध् केँ उघऽ मे जतबा शक्ति लगैत छै तकर चौथाई शक्ति मे व्यापार चमकऽ लगैत छै। अपना पर क्रो( होइत अछि जे नरेन्द्र के बुझऽ समझऽ मे एतेक समय कियेक नष्ट कयलहुँ।’ ‘होइत छै एहन। अहाँक की बुझाइए जे हमरा मन मे कोनो द्वन्द नहि अछि?’ आब हम चुपचाप सौन्दर्य निहारि रहल छी खाली-खाली सड़क सापफ आकाश मन हल्लुक लगै’छ ठीक कहैछ पिफलिप आ जूडी सबके कोनो ने कोनो समस्या रहैत छै। -पिफलिप कतेक दिन ध्रि आपसी तनाव झेलने अछि। समय एकरंग सब दिन नहिरहै छै। पिफलिप बड़ी काल सॅ गुम्म छलाह। एकाएक पूछलनि -‘अहाँ एतेक भावुक कियेक भऽ जाइत छी’ व्यस्त रहबा लेल ढ़ेरो काज अछि?’ की कहू पिफलिप हम तऽ अतीत बिसरी गेल छलहुँ आ वर्तमान मे आन कहिया अपन बनि गेल से बुझबो नहिके लिए। हम बेटी ककर छी सेह नहिबुझैत छलहुँ मां के बदला दाई मां हमरा पोसलनि अपना सासु के बदला छोटी मां सम्हारलनि। छोटी मां अपन गहना बेच कऽ टका देलनी जाही सॅ हम दमदम बाला पफैकट्री लगाबऽ लेल। काज मे हमरा सब दिन मोन लागल। आ आब तऽ हमर द्वन्द्व खत्म भऽ गेल। ओकर बाद तऽ कोनो परेशानी नहिभेल? कोनो प्रकारक दुःख?’ हं, एकबेर जहिया सँजुक विवाह छलै ओ बाप सँ लड़िकऽ आयल छल हमरा बजाबऽ।’ अहाँ गेल छलिऐ विवाह मे?’ ‘नहि’ ‘से कियेक?’ ‘जाहि घर मे छोटी मां आ नीना नहिजा सकै छ ओतऽ हमरा जयबाक प्रश्ने नहिउठै ‘छ’। ‘तखन तऽ सत्ते अहाँ के बहुत दुःख भेल होएत आ सँजुओ के खराब लागबे कएलै ओ पफेर कहियो घुरिकऽ आयल नहि।’ ‘मुदा हमरा अपना ईमानदारी पर संतोष भेल।’ -‘तऽ अहाँ पहिल बेर कहिया पुतौहुक मुँह देखलहुँ?’ -निधि ;हमर पुतौहुद्ध एक दिन चोरा क आयल छलीए बेटा के लऽ कऽ। हम निध् िके ओ कंगन देलिऐन्ह जे - छोटी मां हमरा देने छलीह। सँजु सॅ वेशी इमानदार छथि निध् िसंवेदनशील - बु(िमती । मुदा पिफलिप सच कहैत छी आब हमरा लेल ई समस्त संसार अपने बुझाइछ पहिने जे अपन कहऽ बला रिश्ता-नाता क संकीर्ण घेरा छल जकरा हम शाश्वत बुझौत छलिऐ से सम्मोहन आब टूटि गेल।’ ‘तऽ की आर बात क दुःख अछि?’ नहि, आब कनिको दुःख नहि होइछ। हं, शुरू मे दुःख होइत छल जहिया सीमित परिध् िसॅ - बहरएबाक प्रयास करैत छलहुँ। पिफलिप दू-तिहाई जिनगी खत्म भऽ गेल व्यर्थक विवाद मे। देखल स्वप्न टूटि गेल छल चाहैत छलहुँ नया सपना देखि, शरीर चाहैत छल स्नेहक स्पर्श। नरेन्द्रक नहि...... एक पुरूषक जे हमरा बूझए हमर दोस्त बनए।’ ‘बुझाइछ जे कॉलेजक समय जे अहाँक अपफेयर छल तकरे याद अबैत होएत।’ ‘नहि, पिफलिप ! ककरो याद स्पष्ट वा आवेगमय नहिछल तखन एसगर नीक नहिलगैत छल। जखन हम छोटी मां आ नीना भोजन करऽ बैसैत छलहुँ तऽ होइत छल जे कोनो पुरूष उपस्थित रहैत....... पापा रहितथि वा नीना क विवाह ककरो सॅ भेल रहितै? होइत छल जेना हम तीनू महिला समाज सॅ कटल छी। पफेर तकर बाद?’ ‘बाद मे बुझना गेल जे आत्मनिर्भर महिलाक लेल पारम्परिक बन्हन तोड़ब कठिन नहि।’ गाड़ी ध्र के सोझा पहुँच गेल छल। गैरेज खोलि पिफलिप गाड़ी रखलनि। दरवाजा क ताला खोलैत पूछलनि ‘कतऽ बैसब?’ -‘उपर टेरेस पर ।’ ‘ठीक छै। अहाँ चलू हम कॉपफी लऽ कऽ अबैत छी।’ शीतल बसात, सांझुक लुक झुक बेरआ अतीतक अतल - तल मे गोंता लगबैत हमर मन। -‘कॉपफी लिअ।’ आ इतमिनान सँ कहू- की कहऽ चाहैत छलहुँ।’ इएह जे पुरूष कमाइत अछि आ अपन आश्रितक पालन पोषण करैत अछि तऽ ओकर पौरूष मानैत छै लोक समाज। मुदा जॅ महिला कमाइत छै तऽ परम्परावादी समाज ओकरा हेय-दृष्टि सॅ देऽैत छै।’ मुदा इ संसार मात्रा परम्परावादी लोके धरि सीमित नहिछै। आ हम इहो बुझैत छी जे हम औरत भऽ जे समाजक उपकार कऽ सकैत छी से नरेन्द्रर पुरूष भऽ नहिकऽ सकै छ।’ पुरूष भूमि, आकाश, हवा, जल आ अम्नि अछि महिला बीया जे ध्रतिक तरमे रहैछ समय पर अंकुरिकऽ शाखा-प्रशाखा मे पसरैत छै। पुरुष वा महिला प्रत्येक व्यक्ति एक इकाई होइछ मुदा वास्तव मे जैविक ईकाइ ओ होइछ जे पुरूष प्रधन समाजक वर्यस्व के तोड़ि समतामूलक नव-निर्माण मे योगदान दैछ। ‘से तऽ छैक। प्रिया अहॉक बहुतो एहन पुरूष भेंटत जे लिंगभेद के मेटएबालेल सतत् प्रयत्नशील रहैंछ। तऽन एकटा बात छै जे पुरूष वा महिला एसगर रहने अपूर्ण रहैछातैँ एक-दोसराक जरूरत दूनू के छै परस्पर प्रेम रहने स्व केँ रिजेकशन नहिहोइ छै बल्कि एहि स्वीकृति सॅ पुरूष वा महिला अध्कि संवधर््ित होइछ अपना आगाँक पीढ़ी लेल किछु देबाक साम्थर्य रखै’छ। अपन सृजनात्मक उर्जा सॅ समाजक कुरीति के दूर करै’छ। ‘हँ, से बुझैत छिऐ पिफलिप!’ तखन कियेक बेर-बेर व्यथाक समुंद्र मे डूबैत छी?’ से की हरदम हम व्यथित रहैत छी? आब ओ समय बीत गेल, बीतल हमर अभिशापित अतीत बीतल। आब तऽ हमर मन हरियर पात, पफरल पफुलाएल ड़ारि जकॉ तरोताजा रहैछ आ हृदय करूणाक ओस सॅ भीजल-सरस सजल। सच कहैत छी पिफलिप एहन दूनू तरहक स्वभाव सॅ हमरा होइछ जे एहन-उतार चढ़ाव सॅ हमर व्यक्तित्व असंतुलित तऽ नहिअछि। एक बेर हम ई बात जूडि सॅ पूछने छलिऐ - ‘कहू सापफ-सापफ की हमर व्यक्तिव अहाँ केँ असंतुलित बुझाइत अहि? हमरा कोनो मानसिक रोग तऽ नहिभऽ गेल?’ जूडी कहने छलीह-डोंट बी सिली प्रिया। अहाँ-एकदम सहज स्वभाविक रूप में छी? औरत-माने पाथर नहिने औरत कोनो बालूक समतल मैदान जे सब ट्टतु मे एके रंग रहतै! मनुष के नीक अध्लाह बात व्यवहारक प्रभाव पड़ैत छै ओ कखनहुँ हँसैत अछि तऽ कखनहुँ कनैत अछि। एहन कोनो औरतेक संग नहिहोइत छै पुरुषो के नीक-अध्लाह बातक प्रभाव पड़ैत छै। जॅ एहन नहिहोइतै’ तऽ ओ शराब नहिपीबैत! ने ओ रोज नव-नव महिलाक संग संभोग कऽ पौरुष क दंभ भरैत। ने बात-बात पर लाठी आ बंदूक लऽ मरऽ मारऽ पर उताहुल होइत। कोनो पुरुष देवता नहिमनुषे होइछ। अच्छा आब हमरा एकटा प्रश्नक उत्तर ‘दिअ अहॉक जीवन मे सुख-शान्तिक क्षण कतबा छल आ आब सबसॅ वेशी संतुष्टि कथि मे भेंटैत अछि?’ ‘बात ई छै जे एखनहुँ अतीत मोन पड़ैत अछि मुदा ओकरा हम बिसरौने रहैत छी तथापि ओकर प्रभाव वर्तमान पर झलकै’छ। हं तखन आब अपन काज जाहि मे सृजन आ अभिव्यक्तिक सुख भेंटैत अछि इएह हमर सबसँ पैघ आलंबन अछि, मुठीò भरि बीया छींटने छलहुँ से पफरऽ पफुलाए लागल अछि। पिफलिप महिला बिना लगाव, नेह-छोह के जीविए नहिसकै’छ। हमरा मां के लगाव छलैन्ह बेटा सॅ दाई मां के छलै हमरा, सॅ ओना हम ओकर के छलिऐ? आ हमर आत्मीयताक परिध् िहुनका सबसँ- विस्तृत अछि तैं हम एकरा अपन उपलब्ध् िबुझैत छी। आर किछु नहि। हम विशिष्टताक बोझ तर अपना के दाबल राखियो ने सकैत छै। एकदम सहज भऽ समय बीताबऽ चाहैत छी। दोसर गप्प ई जे हमरा अगिला पीढ़ी हमरा सँ वेशी बुझनुक, व्यवहारिक सशक्त आ ईमान्दार अछि। नीना के हम जखन देखैत छिऐ तखन अनुभव होइत अछि जे हम जे नहिकऽ सकलहुँ से ई कऽ सकैत छथि। हमरा होइत अछि जे काज हम शुरू कयलहु तकरा नीना आगॉ बढ़ाबथि। हमरा हुनका विवाहक चिन्ता नहिअछि ओ अपना योग सहचर ताकि लेतीह जँ मनक अनुकूल नहिभेंटतैन्ह तऽ अपन उपलब्ध् िके व्यर्थ नहिबुझतीह।’ ‘अहॉक एतेक विश्वास अछि नीना पर?’ हँ, अपना सॅ वेशी विश्वास अछि। हम शताब्दीक अस्त होइत परिणाम छी। नीना आ नीध् िसन असंख्यलड़की, औरत हमर सभक कल्पनाकें साकार करऽ बाली भविष्यक ज्योति अछि। एखनध्रि समाजक परिपाटि रहलैए जे प्रत्येक घर मे बेटीक मां अपना के विवश बुझैत रहल अछि हीनभाव सॅ मुक्त नहिभऽ समाज परिवार स्वजन-परिजन सब टोका टाकी करैत-करैत बेगुनाह लड़की के गुनाहक सजा दैत छै। आ हमर मां क तेहन सोच छलै जे हमरा जन्म भेला पर ने अपना कें कहियो मापफ कएलनि ने हमरा। हमर सासु पति के परमेश्वर बुझैत छलीह आ छोटीमां के महापापी। अहीं कहू पिफलिप अपराध्ी पापा छलथिनकी छोटी मां? आ एहन वातावरण मे रहि नरेन्द्र सीखलनि औरत सॅ घृणा करब। हुनका नजरिये औरत के कोनो महत्व नहिओ मात्रा भोग्या छै।’ प्रिया हमरा दृष्टिकोण सॅ मनुष आखिर मनुषे होइछ, समस्त भूमिका सॅ हटि कऽ ओकर प्रेम के उपेक्षा कयने हमरा मनुषक कोटि मे रहबाक हक नहि बनै’छ। प्रेम हमहूँ कयलहुँ अछि बहुतो सॅ प्रेम भेल ककरो एक क्षण तऽ ककरो वेशी काल ककरो सॅ मात्रा स्वप्न मे। अन्त मे इएह निष्कर्ष भेल जे स्थायी प्रेम क समतल जमीन पर ठाढ़ रहब कठिने नहि असंभव छैक?’ ‘पिफलिप। एहन कियेक ?’ प्रिया हमरा जनैत शाश्वत प्रेम, स्थायी रिश्ता वा सम्बन्ध् ई मिथक के अनावृत कयल जाए तऽ जीवन मे की बॉचल रहतै? विश्लेषण करब तऽ अहॉक स्वभाव अछि बिना चिड़-पफाड़ कयने अहाँ रहब नहिमुदा हमर आग्रह अछि ने अइ बात पर ध्यान दिऔ।’ ‘एहन सत्य सॅ जीवन नीरस नहिभऽ जेतै।’ ‘अहीं कहू अहाँ कें महसूस होइत अछि जे अहॉक भ्रम नहिटूटैत से नीक? पुरुष मात्रा सॅ अहॉक विश्वास उठल की नहि?’ हं, से तऽ सही कहलहुँ। मुदा पिफलिप स्त्राी पुरुषक सम्बन्ध्क जे परम्परा छै ताहि परम्परा सॅ विश्वास उठबाक मतलब ई नहिजे हमरा जिनगी सॅ विश्वास उठि गेल। जेना जेना हम अपना काज मे स्थापित होइत गेलहुँ तेना प्रेमक जरूरत कोना पुरुषक आवश्यकता क चाह खत्म होइत गेल। पहिने अपनत्व नहिभेंटला पर हम अपने के चीड़ पफाड़ कऽ तकैत छलहुँ जे हमर गलती की अछि। आब से नहिहोइए मन मे। आब सोचैत छी जे क्यो हमरा मोजर देबए वा नहिलोकक मर्जी। क्यो अइ सच के नकारि नहिसकै’छ जे ई सीमित दुनियॉ मे हमर सच अन्तिम सच नहिअछि। हमर स्वक परिध् िवृहद् सॅ वृहत्तर दिस अग्रसर भऽ रहल अछि। हम अइ दुनियाँ मे असुरक्षित नहिछी। हमर अपन व्यवसाय अछि। अइ व्यवसाय के माध्यम सॅ हमरा नित नव-नव लोक सॅ भेंट होइछ। हं, एक दिन मने-मन निश्चय कएलहुँ जे आब आर नहि। पाथर पर माथ पटकने कोनो लाभ नहि। हमरा चारूभर मनुष नहिचटाðन अछि जे या तऽ जड़वत अछि वा पहाड़ जकॉ गुरगुराइत नीचॉ लुढ़कै’छ ओकर अपने ततेक शोरगुल छै जे हमर सिसकी सुनल नहिजा सकै’छ। हं, ताहि दिन सॅ हम सबकिछ बिसरी जएबाक प्रयास कयलहुँ। अतीत के खाध्खिुनि ध्ऽ देलिए तरमे। अनावश्यक चुनौती केँ ‘महत्व नहिदैत छी। आब जीयब जीवंत भऽ जी कऽ देखेबै दुनियाँ कें। अपन अस्तित्वक एहसास बड्ड सुखद लगैछ। भविष्यक आधर भूमि हमर इएह वर्तमान बनत।’ पिफलिप पूछलनि ‘आर कापफी?’ ‘नहिजॅ आब पीयब कॉपफी तऽ निन्न नहिहेत।’ अन्हार पसरल जाइत छलै वातावरण एकदम शान्त। हृदयक ध्ड़कन जाबत संग दै’छ ई दुनियाँ तखने ध्रि। ई अन्हरिया राति, ध्ंुध् मे मिझराएल पीयर इजोत बल्बके, नहँ-नहुँ अबैत आहट आ बगल मे बैसल पिफलिप। की पिफलिप सत्ते हमर मित्रा अछि? मन कहै’छ। हं, हं।’ बालवाइक छोट-छीन छै मुदा भव्य शहर अछि एकदम अलग व्यवस्था छै एतऽ। जूडी ऑपिफस सॅ एलैन्ह। दूनू हाथ मे भोजनक वस्तु क थैला छलैन्ह। ‘अबिते आश्चर्य सॅ बजलीह-एँ, अहॉ दूनू गोटे एना गुमसुम कियेक बैसल छी’? झगड़ा भऽ गेल की?’ ‘नहि, झगड़ा त नहिभेल अछि हम प्रियाक जिनगीक ध्ुनकें पकड़ऽ के प्रयास कऽ रहल छलहुँ।’ ‘पिफलिप अहॉ अपन सिम्पफनिऐक ध्ुन सुनैत रहू।’ ‘ओ. के., हम आब चललहुँ।’ आब पिफलिप घंटो गाना सुनैत रहताह। हमहँु सभ अपना-अपना रूम मे गेलहुँ। हम तीन घंटा सॅ बतिइआइत छलहुँ मुदा बात खत्म भेल? कहियो खत्म हेएत ई बात? नरन्द्र केहन क्षुद्र लड़ाई लड़ने छल। पुरुष की एके रंग होइत छै? पलंग पर सूतल-सूतल इएह सब सोचैत छलहुँ। हमरा राति मे जल्दी निन्न होइते ने अछि।’ अन्त-अन्त धरि नरेन्द्र हमरा संग न्याय नहिकयलनि। हुनके कारण समाज हमरा जलील कयलक। करौ ओकर समाज छै के कतेक टा? मात्रा दू सौ अढ़ाई सौ मातवर घरानाक समाज? ओइ घराना सॅ कै गुणा वेशी छैक मानव समाज। आ जहिया सॅ हमर डेग बढ़ल अइ वृहत्तर समाज दिस तहिया सॅ हम रूकलहुँ एको क्षण? हम जतेक अपना व्यवसाय मे सपफल होइत रहलहुँ ततेक कचोटैतछल नरेन्द्रक क्षुद्र लोभ-लाभ द्वेष भाव। व्यापारक दुनियाँ मे काज क हमर आत्म-विश्वास बढ़ैत छल। हम स्वतंत्रा भऽ व्यापार मे दस टा संभावना मे एकटा चुनैत छलहुँ। स्वतंत्रा व्यक्तिक हैसियत सॅ अपन चुनाव पर डटल रहऽ मे कोनो कठिनाई महसूस नहिहोइत छल। आ नरेन्द्रक प्रेम ओ तऽ हमरा जीवनक अंकुरैत संभावना के देखिए कऽ सहमि जाइत छल। हुनका संग मे दस करोड़ टका छलैन्ह मुदाओ हमर दस लाख टका बर्दास्त नहिकऽ पबैत छलाह। हरदम हुनका मुँह सँ बहराइत छलैन्ह ऊँह, एतेक महत्वाकांक्षा। ई औरत हमरा तबाह कऽ देलक। एखनो संतोष नहिहोइ छै। ओ अपना के मालिक बुझैत छलाह। बढ़ैत गाछ के जड़िए सॅ काटि कऽ ओकरा बौना बनाबऽ मे आनन्द भेंटैत छलैन्ह। हमर विकास कोना सहन होइतैन्ह? एकटा गुलामक नजरि मालिकक कुर्सी पर रहतै? क्रो(े ऑखि कोना लाल भऽ गेल छलैन्ह जखन ओ हमरा पहिल बेर आपिफस मे कुर्सी पर बैसल देखने छलाह। व्यंग्यवाण छोड़ने छलाह ओह, हो, सीगल एक्सपोर्टक मैनेजिंग डाइरेक्टर? आब अहाँ कें हमरा सॅ टका-पाई लेबाक कोन जरूरी? हमर आनल वस्तु कियेक नीक लागत आब तऽ श्रीमती जी अपने पाइ कमाइत छथि.... ‘नरेन्द्र हम पाइ लेल काज नहिकरैत छी।’ तऽ काज करैत छी कथि लेल? भोर सॅ सांझि घरि एक पैर पर घिरनी जकॉ नचैत कियेक रहैत नरेन्द्र! हम अपन आइडेंटिटी, व्यक्तित्वक विकास.... दिन-राति पोथा पढ़ि-पढ़ि कऽ पगला गेलहुँ अहाँ, अपना के महान, जीनियस बुझैत छी? अहाँ के होइत अछि मैडम क्यूरी, वा फ्रलोरेंस नाइटंेगल बनि जाएब? घर-गृहस्थी क लुरिए नहिचललीह महान बनऽ। एहन कोनो रंग रूप भगवान देनहुँ ने छथि।’ हम अपना के ने जीनियस बुझैत छी ने महान बनऽ चाहैत छी। मुदा की साधरण औरत के अपना ढ़ंग सॅ जीवऽ के अध्किार नहिछै? काज कयने हमर आत्मविश्वास बढ़ैत अछि। नहिजानि कियेक अहॉ सदिकाल हमर आत्मबल कें थूरैत रहैत छी? मोनतऽ भेल कहिऐ-नरेन्द्र अहीं कोन महान पुरुष छी? पापा क कमाएल ध्न मे दू-चारि करोड़ आर जोड़लहुँ। हम ककरो देल पूँजी सँ व्यवसाय शुरू नहिकएलहुँ। गली-गली घूमि कऽ काजक शुरूआत कएलहँु। अहाँ के तऽ एयरकंडीशन मर्सीडिज मे बैसल-बैसल पसेना चूबैत अछि अहॉ कोना बुझबै जे सैम्पलक बक्सा हाथ मे उठौने कतेक बौआइत छी, कारखाना मे मजदूरक संग खटैत छी।’ मुँह टेढ़ कऽ नरेन्द्र पफेर बजलाह-बहुत अहंकार अछि अपना पर?....... हं, नरेन्द्र अहाँक मापदंड दोहरा अछि जे अहाँक लेल आत्मसम्मान से हमरा लेल अहंकार! ‘की अहाँ नहिचाहैत छी घर, परिवार, पाई समाज मे रूतबा.........? तखन हम किछ चाहैत छी तऽ अहॉ एतेक बौखलाइ छी कियेक? बजैत काल हमर स्वर स्वतः ऊँच भऽ गेल। नरेन्द्रक कोना सहन करताह तैं व्यंग्यवाण छोड़लनि-चिचियाउ नहिई हमर आपिफस अछि। हमहीं बेवकूपफ छी। कोना एहन महिलाक मुँह लगलहुँ जकरा पाई क अलावा किछ सुझिते नहिछै?’ ‘पाईक भूख हमरा? परसल थारी लग बैसल भूखल व्यक्ति केहन जीवन जीयत? पाई-पाई के हिसाब। ई करू ई नहिकरू एक, एक क्षण हुकूमत! हँ गहना छल आंजुर मे अॅटए नहिततेक हीरा। मुदा कतेक सपफाई सॅ अहाँ कहने छलहुँ सभटा मां के नाम छैन्ह एहि मे से किछ संयुक्त परिवारक थाती छै। ई गहना अग्रवाल हाउसक पुतौहु पहिर सकै’छ घर सॅ जाय बाली औरत नहि।’ ‘हं, हं अहाँक रंग-ढंग देखिए कऽ हम अहाँक एकाउन्ट सँ सब जेवर निकालि लेने छलहुँ। ‘हमर अनुमति बिना!’ ‘नहिसे कोना होइतै हे देखिओई कागज अहॉक हस्ताक्षर!’ एतेक पैद्य विश्वास घात। मने मन सोचलहुॅ हमरा कहियो अविश्वास नहिभेल। जखन जाहि कागज पर कहैत छलाह हस्ताक्षर कऽ दैत छलिऐ। खैर आब ई सोचने विचारने की....। ई नीक जकॉ बुझि गेलहुँ अइ व्यक्ति सॅ अरारी ठानने परिणाम घातक होएत। पहिनहि बहुत किछ गंवा चुकलहुँ। आब जे समय शेष अछि से एकरा सॅ झगड़ा मे व्यर्थ किएक बीताबी। किछ टका-पाई भेंटत से अपना पेट भरऽ योग अपने अर्जित करैते छी। जखन कोनो सम्बन्ध्े नहिरहल तखन विषध्र सॅ दूर रहनहिं कुशल! तखन सँजुक लेल हृदयक हाहाकार विचलित करैत छल। मुदा हम इ हो जनैत छी जे नरेन्द्रक आतंक सॅ संजु के बकार नहिपफुटैत छै ने पगडंडी पर चलैत हमर लहुलूहान पैर क पाछाँ ओकर कोमल पैर बढ़ि सकैछ ओ तऽ राजमार्ग पर चलबाक अभ्यासी अछि। जँ ओ हमरा संग रहबो करैत तऽ कहिया ने चलि जाइत पिता लग। बिरासत मे मात्रा सम्पत्तिए नहिभेंटैत छै स्वभावो भेंटैत छै। भूआ क बच्चा बिना रोऑ क भऽ सकै’छ? काल्हि हम भारत घुरि रहल छी। की करू की नहिसे नहिपफुराइत अछि। जूड़ी ट्रे मे गरम मपिफन आ ब्लैक कॉपफी ने ने अयलीह। ‘गुड मार्निग प्रिया!’ गुड मार्निग स्वीट हार्ट! ब्रेेक पफास्ट उफपर आन क कोन काज छल हम आबि जैतहुँ नीचॉ। ‘तऽ हम दूनू गोटे रजाई मे घुसियाक कोना कॉपफी पीबतहुँ।’ वेश, त हम ब्रश कयने अबैत छी। ‘ओह! तखन तऽ कॉपफी सेरा जेतै। अच्छा पिफलिप के कहैत छिऐन्ह गरम कापफी कनिकाल मे दऽ जयता।’ ‘नहि, हम अपने लऽ आयब ओइ बेचारा के परेशान नहिकरऔि।’ ओ. के.। जूडी हमरा रजाई मे घुसियाकऽ हाथ मे कापफी नेने किछ सोचैत छलीह। ‘हम तुरत अबैत छी।’ हम नित्यक्रिया बिना कयने किछ नहिखा सकै छी। मुदा इ बात कहबै तऽ जूड़ी हमर मानस के अनुकूलन पर भाषण शुरू कऽ देतीह। ‘कॉपफी लऽ ऽ अयलहुँ तऽ देखलिऐ जूडी हमरा नीचाँ सॅ ऊपर घरि निहारि रहल छलीह।’ ‘अहॉ तऽ एकदम यंग लगैत छी।’ ‘जूडी, हमरा तऽ बुढ़ापा नीक लगैत अछि।’ अइ पागलपन के कोनो जवाब छै। लेकिन सत्य कहैत छी अहॉ एखनहुँ चालीस सॅ ऊपर के नहिलगैत छी। जूडी हम चालीस सॅ वेशी उम्र क लगैत छी वा नहिताहि सॅ कोनो पफर्क नहि। मुदा आब हमर केश पकैत अछि ठेहुन मे दर्द होइत रहै’छ एतबे नहिआब सैम्पलक भारी बक्सा उठा कऽ एक एयरपोर्ट सॅ दोसर एयरपोर्ट धरि पहुँचऽ मे बहुत थाकि जाइत छी। इमिग्रेशन आ कस्टमक कागज बिना चश्मा लगौने पढ़ि नहिपबैत छी। आब सबसे वेशी नीनाक ऑखि मे हेलैत स्वप्न, काजक प्रति ललक आ आगाँ बढ़बाक संकल्प बेर बेर कहैछ जे भाभी हम बिना अध्कि लागत के माल उत्पादन मे बीस प्रतिशत बढ़ा सकैत छी से सुनि होइछ जे आब हम व्यर्थ दौड़ ध्ूप करैत छी। सरिपहुँ नीना लौह महिला अछि। तैं आब हम विश्राम चाहैत छी। अइ व्यापारक दुनियॉ सॅ बाहर होइबाक इच्छा अछि। ‘व्यापारक दुनियॉ सॅ बाहर भऽ की करऽ चाहैत छी?’ ‘किछ नहिमात्रा अपन अनुभव। पचासवर्षक एक महिलाक महिला होएबाक अनुभव।’ ‘तखन एकटा किताब लिखू। प्रॉमिस?’ ‘प्रॅामिस।’ पतझड़ क मौसम। अक्टूबर मे कलकत्ताक वातावरण सम पर रहैत छैक पाबनि-तिहार शुरू भऽ जाइत छै। हम अपन किताब क भूमिका लिखब शुरू कयलहुँ। सैंतीस वर्षक नीना हापफमैनक बेटा सॅ विवाह कऽ रहल छथि। अपन देश छोड़ि रहल छथि। हमरा पूछलनिः ‘भाभी मां जर्मनी मे नहिरहि सकै’छ?’ ‘नीना, छोटी मां पैंसठ वर्षक उम्र मे जर्मनी मे कोना रहतीह?’ भाभी! मां क उदास देखि हमरा अपराबोध् होइत अछि। शायद मां के ई विवाह पसंद नहिछै तऽ हम नहिकरब विवाह।’ हमरा ऑखि मे साकार होइछ छोटी मांक झुर्रि भरल मुँह, कॅपैत हाथ उज्जर साड़ी मे लपटल मझोला कद। पफेर मोन पड़ै’छ बाल गोपाल कें भोग लगबैत छोटी मां क ध्यानमग्न चेहरा। ‘नीना, मन छोट नहिकरू। सभक बेटी सासुर जाइत छै-मां उदास होइतो बेटीक विदाक परम सुख पबैछ। ‘भाभी हम सच कहि रहल छी एंडरू चाहै’छ मां हमरा सभक संग रहए। की ओ मां के बेटा नहिछै’? ‘नीना-अहॉ निश्चिन्त रहू एत हम छी ने।’ ‘अहाँ एसगरे व्यवसाय सम्हारि लेबै?’ ‘जतबा दिन चलतै चलेबै।’ ‘भाभी तैं हमरा होइछ जे हम गलत कऽ रहल छी।’ नीना प्लीज! अहॉ अपना कें अपराध्ी जुनि बूझू। जे भऽ रहल छै से नीके भऽ रहल शुभ-शुभ विवाह भऽ जाय।’ ‘नहिभाभी, जे भऽ रहल छै से मां क दृष्टिए नीक नहिभऽ रहल छै हुनकर इच्छा छनि भारतीय लड़का सॅ विवाह होइतै।’ नीना आब ई चर्चा करब व्यर्थ छै। भाभी हमरा अपराध् बोध् भऽ रहल अछि........। हम मने-मन सोचलहुँ नीना क स्थान पर जँ छोटी मांक बेटा रहितैन्ह तऽ ओकरा अपराध् बोध् होइतै? आ जँ से होइतै तऽ अपन जर्मन पत्नी के लऽ कऽ कलकत्ते मे रहैत वा मां के ओतऽ लऽ जाइत जे नीना नहिकऽ पबैत छथि दोसर पुरुष एहनो कऽ सकै’छ जे एकटा पत्नी जर्मन, जर्मनी मे रहितै दोसर भारतीय मां लग। तइओ ओ अपना के अपराधी नहिबुझैत। मन मे होयबो करितै अपराध् बोध् तऽ नीना जकाँ ईमानदारी पूर्वक हमरा लग स्वीकारैत नहि। हमरा तऽ डर होइछ जे एहि अपराध् बोध् सॅ नीना डिप्रेस ने भऽ जाए। औरत कतऽ नहिकनै’छ? कखन नहिकनै’छ? सड़क पर झाड़ू लगबैत काल, खेत मे काज करैत, एयरपोर्ट पर बाथरूम सापफ करैत, लोकक घर मेचौका बर्तन सापफ करैत वा समस्त ऐश्वर्य सुख-सुविधक रहैत हमरा सासु जकॉ एसगर सूतल करौट बदलैत। हाड़-मासुक बनल महिला-अपना ढंग अपना शर्त पर जीवन व्यतीत करऽ लेल छटपटाइत रहै’छ। हमर तऽ ऑखिक नोरे सूखा गेल। हृदय आ मन मे नून जकॉ जमल जा रहल अछि नूनक पहाड़ जमले जा रहल अछि। बाहर सॅ लोक के बुझाइत छै जे हम बहुत मजबूत छी, हिम्मतबाली। बुझए लोक। आब तऽ के की बुझै’छ तकर कोनो मायने नहि। ओह बड्ड पिआस लागल अछि। निन्न टूटल केहन अजीब-अजीब सपना देखऽ लगलहुँ अछि। सत्ते कंठ सूखि रहल अछि। थर्मस सॅ पानि ढ़ारि पूरा गिलास पीब गेलहुँ। एखन कतऽ छी हम? ओह, हं कलकत्ता मे छोटी मां क बगल मे अपना फ्रलैट मे। नीना जर्मनी सॅ आयल छलीह। मासदिन एतऽ रहि कऽ घुरलीह। कोर मे दस मासक खूब सुन्दर नेना छैन्ह। जर्मन आ भारतीय मिक्चर गोर रंग भूरा केश आ भूरा ऑखि। छोटी मां के कतहु ने कतहु मन मे कचोट छैन्ह किछ बजैत नहिछथिन मुदा मुँह सँ हरदम बहराइत छैन्ह जे हमर बेटी तऽ प्रिया छथि। नीना के दुःख होइत छैन्ह। मां एना कियेक बजै’छ? हम तऽ जेहन चाहत छलहुँ तेहन घर-वर भेंटल! हम बहुत सुखी छी। ‘नीना अहॉ खुश छी से सुनि बहुत प्रसन्नता भेल भाभी अहॉ कें एसगर रहबा मे मन ऊबै’छ नहि?’ नहिनीना एकान्त तऽ प्रिय अछि। ओना एकबेर ई एसगर सॅ दोसराइत होइबाक भूल कऽ चुकल छी। बड्ड भयंकर परिणाम भोगलहुँ समझौता कऽ के। आइ हम कहऽ लेल एसगर छी मुदा हमरा आस-पास दू चारिटा एहन लोक अछि जकरा पर हम ऑखि मुनि भरोसकऽ सकै छी। आ ई भरोस, आस्था जीवन लेल अनिवार्य छै। एहन कोन नायिका हेतै जे अभिमानिनी होइ, स्वतंत्रा विचार वाली होइ तइओ संयमित रहै, सुरूचि होइ, मौलिक चिन्तन वाली होइ आ पुरुषक केहनो दुर्व्यवहार के हँसैत सहन करए ओकरा करेज मे सटल रहए? की एहन क्यो भऽ सकै’छ? हँ, कथा, उपन्यासक नायिका एहन भऽ सकै’छ कियेक तऽ पुरूष रचनाकार एहने नायिकाक कल्पना करै’छ।...... परिस्थितिक दास के नहिहोइछ? मुदा अमानवीय करण केर चरम विन्दु पर अपना के साबुत बचाकऽ राखब सभक वश के बात नहि। हमरा लेल तऽ असंभव। हमरा तऽ जे क्यो आहत कएल तकरा हम कखनहुँ बिसरि नहिपबैत छी। हं, ओइ स्मृति दंश के प्रति आब मन मे उपेक्षा क भाव रहै’छ। आ सत्य कहैत छी पुरूषक कोनो भूमिका क आब जीवन मे महत्व नहिबुझना जाइछ। क्यो की देत? एकरा हमर अहंकार नहिबुझू यर्थाथ कहि रहल छी आइ हम हाथ खोलि खर्च करैत छी मुदा क्यो रोक-टोक कयनिहार नहिने ककरो हिसाब देबऽ पड़ै’छ।.... नीना विवाह कएल......हमर अध्ूरा स्वप्न ओकरे मे पूर्ण होमए। संवेदना, मित्राता, नेह ई सब परस्पर होइत छैक मालिक आ गुलाम बुझतै तऽ स्नेह नहिभऽ सकै छै। नरेन्द्र करोड़पति छल मुदा हमरा सॅ एक-एक पाइक हिसाब लैत छल। पेट भरबा लेल दू टा रोटी चाही ताहि लेल ओतेक अपमान! जे भेल से नीके भेल। जँ नरेन्द्र सॅ मन नहिटूटैत त एतेक प्रगति कऽ सकितहुँ ? मोम के गुड़िया जकॉ पिघलैत रहितहुँ। घुर, इ हो कोनो जिनगी भेलै? हजारों साल सॅ पुरुषके अपन पत्नी के Úेम’ क कल्पना एकहि बिन्दु पर अटकल छै जे पिजराक सुग्गा जकॉ जे रटबए सेह दोहरबै। आ हमरा सभके देखू आध्ुनिकाक भूमिकाक नित नव-नव भूमिका जुड़ल जा रहल अछि आ सपफलतापूर्वक नित नव प्रतिमान गढ़ि रहल छी। प्रत्येक क्षेत्रा मे पुरुष से बीस साबित भऽ रहल छी उन्नीस नहि। तखन एकटा बात एकदम सही छै जे किछु पाबऽ लेल किछ छोड़ऽ पड़ैत छै। हमरे देखू जे संजु क मन मे होइत हेतै जे हम मां क भूमिका नीक जकॉ नहिनिमाहलहुँ। आब नहिनिमाहि पयलहुँ तऽ की करू? हमर मां हमरा जन्म देलनि की ओ अपन भूमिकाक निर्वाह कयलनि? नहिने। आ ने हुनका तकर कचोट भेलैन्ह।.... सँजू के तइओ हम बारह वर्ष धरि मातृत्वक भूमिकाक निर्वाह कयलहुँ तखन नरेन्द्र लग छोड़लिए। सॅजु उगैत गाछ छल संभावना रहित ठूंठ नहि। कानूनो तऽ नरेन्द्रक पक्ष लितै। आ किएक हम ओइ नादान बच्चाक जीवन बर्बाद करितिऐ? हमरा सॅ वेशी सामर्थयवान नरेन्द्र छल। भऽ सकै’छ नरेन्द्र कें क्यो दोसर औरत खुश राखि सकितै’ मुदा हमरा तऽ ओकरा संग रहब कठिन छल। हम अपन स्वप्न कें अपने हाथे चकनाचूर नहिकऽ सकै छी। तखन ऑखिक नोर! नहिजानि ई नोर क परम्परा कहिया खत्म हेतै? प्रशान्त महासागर क पानि की कम नूनछराह छै जे सागर के सागर बनल रहबाक लेल महिलाक नोर क जरूरत रहै छै? नीना चलि गेलीह। हमरा काज मे ओ सहारा दैत छलीह। तथापि अहू उम्र मे हमरा ऑखि मे सपना शेष अछि टटका पफूलक रस मे डूबल मध्ुसन मीठ, ओस मे भीजल गुलाब क सुगंध् मे साराबोर गमकैत, भोर का आकाश सन स्वच्छ। ई हमर जिनगीक सपना हमर अपन अछि एकदम निजि अपन। मात्रा रोमान्सेक सपना नहिसंयोगै’छ नयन आ ने स्नेहक जुनून सॅ जिनगीक सब कोन भरि जाइत छै। इम्हर दू वर्ष सॅ हम स्वयं गाड़ी चलबैत छी आ मोन होइए जेएसगरे सम्पूर्ण भारतक भ्रमण करि। मन होइछ कोनो आदिम शहरक एसगरे यात्रा करि। आदिम शहरक गुपफा मे अंकित महिलाक मूर्ति सॅ पूछिऐ की अहूँ ओ व्यथा सहलहुँ अछि जे हम भोगलहुँ? हृदयक जड़ता कम भेल अछि। कुंठाक बपर्फ पिघलल आब ई जिनगी बहुत सुन्दर लगै’छ ऐनमेन कविता सन। हं, आब हम जीवंत जीवन जीबैत छी। बेर-बेर प्रसन्नता क पुलक सॅ रोऑ-रोऑ आनन्दित रहै’छ। एतेक हल्लुक पारदर्शी जीवन व्यतीत करबाक बहुतो तरीका छैक। हम ओ तरीका अपनाएबाक प्रयास कयलहुँ मुदा कतहु समझौता नहिकयलहुँ। समझौता नहिकऽ सकलहुँ बस! ई जरूरी छै जे लोक अपन प्रत्येक असमर्थताक विश्लेषण करए? तर्क दऽ अपन औचित्य स्थापित कऽ अनका गलत साबित करए? ई सभ बिना कहने सुनने पृथ्वी अपन धुरी पर घूमैत रहत। सूर्य क उदय अस्त होएत। चन्द्रमाक बढ़ैत-बढ़ैत पूर्णिमाक इजोरिया राति हेतै आ घटैत-घटैत अमावस्याक अन्हरिया राति। मौसम बदलैते रहतै, नदी बहैत रहतै ककरो हमर विश्लेषणक अपेक्षा ने छै ने रहतै। तखन एकटा बात महत्वपूर्ण्ण छै जे हम आइ धरि ई नहिबुझि। पयलहुँ जे हम के छी? की चाहैत छी? हँ, शिकायत रहल जे ई प्राप्त नहिभेल ओ प्राप्त नहिभेल। अन्तःकरण सॅ सदति इएह आवाज अबैत रहल। क्षण मे प्रसन्न क्षणे मे व्यथित। की इ सब एहिना चलैत रहऽ दिऐ सहज गति सॅ? हम छी एहने एखन कोनो आदर्श लऽ डेग उठा कऽ बढ़ब पफेर कखनौ निराश भऽ पाछु घुरब। हम समस्त अतीत बिसरी गेलहुँ अछि। पाछु सॅ कोनो शोर पाड़ैत स्वर सुनि कान मुनि लैत छी। जिनगीक संघर्ष मे सक्रिय छी। भऽ सकै’छ एहने मे कहियो चुपचाप मृत्यु आबि हमर के बार खटखटाबए। तखन हम तुरत ओकर आहट पर प्रस्तुत हेबै। आ अपन छोट छीन जिनगीक विषय मे ओकरा संग बतियाब। - इति समाप्त - ऐ रचनापर अपन मतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। १.शिव कुमार झा "टिल्लू"- समीक्षा अम्बरा- (राजदेव मण्डल); २. डा॰ धनाकर ठाकुर- प्रज्वलित प्रज्ञा (पूर्व राष्ट्रपति डा॰ कलामक पोथी Ignited Minds क डा॰ नित्यानन्द लाल दास द्वारा मैथिली अनुवाद) क समीक्षा १ शिव कुमार झा "टिल्लू" समीक्षा अम्बरा (राजदेव मण्डल) बक हॅसैत अछि कुटिल हॅसी, कलपै छथि लुब्ध मराल। जे कॅपैत छल डरसँ थरथर, आब ने तकरो लाज। पड़ल छथि बंधनमे मृगराज।। प्रस्तुत पद्यांश कवि सरोज भुवनेश्वर सिंहक कवितासँ लेल गेल अछि। ऐ कवितामे समाज विस्मयकारी अवस्थासँ कवि क्षुब्ध छथि। ऐमे देखाएल युगक विषमताक मार्मिक उद्वोधनसँ जौं अपन भाषा ओ साहित्य दु:दशाक तुलना कएल जाए तँ कोनो अतिशयोक्ति नै। किछु महान साहित्यकार विस्मृत रहि कालक गालमे समा गेलाह। लोक कहै छथि कवि कहियो नै मरैछ ओ तँ अपन रचनामे जीवंत रहै छथि मुदा जखन रचने मरि गेल तँ कवि कोना जीबथि। जे भेल से भ्ोल मुदा हमर दृष्टिकोण जे आबहु चिन्तन कएल जाए। एखनो किछु एहेन रचनाकार उदीयमान छथि वा उगवाक प्रयास कऽ रहल छथि जनिक लेखनीकेँ प्रोत्साहित नहियों तँ कमसँ कम किछु चर्च कएल जाए तँ ओहि रचनाकारक संग-संग भाषा-साहित्यकेँ अमरत्व अवश्य भेटत। एकटा परिपक्व मुदा साहित्यक भाषामे नवतुिरया कवि मैथिलीक पल्लवकेँ वसन्तक वातसँ हिलएवाक अपना भरि प्रयास कऽ रहल छथि श्री राजदेव मण्डल। हिनक पहिल कविता संग्रह- अम्बरा, श्रुति प्रकाशनक सौजन्यसँ पाठकलोकनि लग परसल गेल अछि। राजदेवजी परिपक्व ऐ दुआरे किएक तँ ओ नव रचनाकार नै छथि मैथिलीकेँ के कहए राजभाषा हिन्दीमे हिनक तीन गोट उपन्यास- पिंजरे के पंछी, दरका हुआ दरपन आ जिन्दगी और नाव छद्म नाओं राजदेव प्रियंकर'क नामें प्रकाशित अछि। बाहर सम्मान अपन घर अपमानसँ नै वॉिच सकलाह तँए कतेक बर्ख ठकाइते रहलाह। जखन आत्मीय लोक मैथिली अकादमीक अध्यक्ष बनाओल गेलाह तँ राजदेव जीकेँ आश जगलनि, जे समाजक कात लागल वर्गक लोक अकादमीमे अएलनि, रचना प्रकाशित होएत वा किछु मदति भेटत। अकादमीक अध्यक्षक संग-संग अकादमीक पत्रिकाक संपादक मण्डलमे सेहो अपनलोक देख दोहरि आश नेने येनकेन प्रकारेण संपर्क स्थापित कएलनि। करीब तीसटासँ उपरे कविता देबो केलखिन किन्तु मृग मरीचिका मात्र देखबैत रहलखिन। परिणाम निराशावादी रहल। विदेह' पत्रिकाक पदार्पणक पश्चात श्री उमेश मण्डल जीक माध्यमसँ संपादक श्री गजेन्द्र ठाकुर जी संग जुड़ि रचना पठाबए लगलाह। श्रुति प्रकाशनक अंतिम मुहर लगितहिं अम्बरा समान्य अर्थमे तँ छॉह मुदा नवल-धवल इजोत नेने पाठक धरि पहुँच गेल अछि। राजदेव जीकेँ नवतुरिया ऐ दुआरे कहल जाए किएक तँ पूर्वमे लिखल गेल कविता एखन धरि पाठकक लोचनसँ दूर छल। ऐ संग्रहमे 75 गोट कविता देल गेल अछि। आह'सँ श्री गणेश आ ऑखिक प्रतीक्षासँ इतिश्री। एकर तात्पर्य जे रसहीन जीवनसँ आकुल मनुक्ख कुपित अछि मुदा अंतिम स्वप्न वा कल्प आशक संग मूर्त्त रूपमे क्षणहिंमे परिवर्तित भऽ जाइछ। बाह्य रूपमे शीतलता अर्थात शांति देख'मे अबैत अछि परंच भीतरमे धाह.....। कोन प्रकारक धाह? एकरा अश्रु उच्छ्वास, आकुलता, संत्राह वा प्राप्तिक आश नै पूर्ण होएबाक क्रममे उद्विग्नताक नाआंे देल जाए। जै व्यक्तिक जीवनक चौमुख आह वा क्षोभसँ घेरल हुअए ओ जौं आकाशकेँ छूवाक कल्पना करए तँ ओकरा विक्षिप्त नै तँ कमसँ कम अतिविश्वासी अवश्य कहल जा सकैत छैक। कुरूक्षेत्रक युद्ध समाप्तिक पश्चात् गांधारीक मनोदश जकाँ अकाश स्पर्शक कल्पनामे अकाश तँ शून्य दृष्टिगोचर होइछ मुदा पाएरक नीचाँ असंख्य लहास आ बॉचल बन्धु बांधब केर कंठ दोहन कविक मोनकेँ अशांत कऽ देलकनि। भौतिकवादी युगक हीराक चमकिमे अपन साहसक रजत नेने नव मार्गकेँ ताकि रहल छथि- बिनु लेने आह कि भेटि सकत वाह-वाह परंच, नहि छी लापरवाह खोजब नवका राह। 'खोजव' शब्दक स्थानपर ताकब वा हेरब लिख रहितए तँ आर नीक लगितए। संग-संग छंद लेपनक क्रममे कतौ-कतौ अपन भावकेँ कवि व्यक्त नहि कऽ सकलाह। ज्ञानक झंडा' कवितामे ज्ञानक परिभाषा विज्ञानक अन्वेषणक रूपेँ कएल गेल। विज्ञानक विकास-क्रममे अन्ध विश्वास शनै: शनै समाप्त भऽ रहल अछि- आब नहि चलत अंध विश्वासक हथकंडा फहरा रहल विज्ञानक झंडा....। प्रयोग धर्मितामे ई गप्प तँ सत्य मुदा वास्तविकताक अवलोकन कएलापर स्थिति भिन्न होइ छैक। ऐ युगमे सेहो पितृ कर्म आ देवकर्ममे विश्वास जागले अछि जखन कि विज्ञानक शब्दकोषमे स्वर्ग-नर्कक परिभाषा असंभव। लोक एखनो श्राद्ध करै छथि, जीवनकालमे भरि पेट अन्न नै मुदा मुइलाक पश्चात सोहल अचार। मििथलामे जमीन बेच कऽ पितृ श्राद्ध कएल जाइत अछि। साधनविहिन मानव अपन जीवित संतानक प्रति अपन दायित्वक पालन कोना करथि, समाजकेँ एकर कोनो परवाहि नै ओ तँ मात्र पितृधर्म पालनक उपदेश दै छथि। तँए 'ज्ञानक झंडा'मे कविकेँ अनुकरणीय बिम्बक चित्रण करबाक चाही छल जे नै कएलनि। राजदेवजी शिल्पी नै छथि, किएक तँ कोनो शिल्पक कृत्रिम बिम्ब नै तैयार कएलनि, स्वाभाविक अछि जै व्यक्तिकेँ आरसी, यात्री, चन्द्रभानु, बहेड़ आ बूच जकाँ अपन गृहस्थ धर्मक पालन हेतु अभाव आ संत्रासक अनुभव नित्य-प्रति होइत हुअए ओइ व्यक्तिकेँ कल्पनाशीलताक शिल्प बिम्बित करबाक लेल समए कखन भेटए? ओ तँ जौं अपन जीवन दशासँ समाजक तुलना कर' लागए तँ सदिखन बिम्बे-बिम्ब। झाॅपल अस्तित्व'क शीर्षक कविता हृदेकेँ स्पर्श करैत अछि- भीतरमे ओ लगा रहल अछि फानी, सुनि रहल छी बक्रवाणी प्राप्त करबाक लेल उत्कर्ष करऽ पड़त आब संघर्ष....।। विरोध कोनो जीव ताधरि कऽ सकैत अछि जाधरि ओकरामे संघर्ष करबाक सार्मथ्य जीवित हुअए। पराजयक बेर-बेर िहलकोर लगलासँ आत्म समर्पणक संभावना प्रबल भऽ जाइछ। कखनो कखनो आसक्तिक कारणेँ लोक सेहो आत्मसमर्पण कऽ दै छथि। जेना कुरूक्षेत्रमे भीष्मपितामह अर्जुनकेँ चाहितथि तँ धाराशायी कऽ सकैत छलथि मुदा ओ तँ अर्जुनक विजय हृदेसँ चाहै छलाह। रहब अहींक सभक संग' कविता आसक्ति, मृगतृष्णा वा मजबूरी कोन रूपक समझौता थिक एकर विवेचन संभव नै, ई तँ कविक जीवनक अनुभवक सार अछि, ओ स्पष्ट रूपेँ बॉटए चाहै छथि- नहि करब आब नियम भंग नहि करब अहाँ सभकेँ तंग लिअ अपन राज, नहि चाही हमरा ताज....।। एकटा अर्न्तमुखी सोझ विचारक लोक जखन स्वयंसँ लड़ैत-लड़ैत थाकि जाइत अछि तखन एहने वेदना कृत्रिम हंसीक संग-संग निकसैत। फेरो अपन परिवारिक धर्म मोन पड़िते नदीक माछ बनि जाइछ। जीव जखन प्राणकेँ छोड़ि दैछ वा प्राण जीवकेँ छोड़ि दैछ तखन लहासक रूप.....ओहि प्रकारें कवि नदीक माछकेँ जलदुनियासँ बाहर निकलबाक प्रयास करै छथि। परिणाम हुनके मुखसँ सुनल जाए- सुनने छल ओ अपनहि कान कहने रहथिन बूढ़-पुरान कहियो नहि जाइहेँ ओहि दुनिया ओहिठाम भरल अछि खुनियाँ।'' सभ किछु रहितौं अर्थाभाव एखन समाजक सभसँ पैघ अभिशाप बनि गेल छथि समाजक मध्य जत' इमानदरी आन्हर जकाँ गांधारी बनि ठाढ़ छथि, तँए उद्विग्न भऽ जलदुनियासँ बाहर जएबाक प्रयास कएलनि परंच क्षणहिंमे अपन मातृभूमिक सिनेहक कड़ीमे फँसि फेर पानिमे कूदि गेलाह- मुदा ओ अछि अभागल जलबून्द कड़ी अछि लागल विफल भेल छल बलमे पुन: खसल ओहि नदीक जलमे जखन लोक अपनाकेँ पूर्णत: एकसरि मानि लैत अछि ओहि कालक मनोदशाक अभिव्यक्तिकेँ करए? नहि किओ दऽ रहल अछि साथ, पहाड़ीपर पटकब आब माथ हूबा देबैक हम खूनसँ अपना घामक बूनसँ.....। ऐ प्रकारक परिस्थितिजन्य पद्यक संग-संग सीमा परक झूला, कांध परक मुरदा, दीप, हित-अहित, प्रयास, ऑफिसक भूत, कठुआएल रूप, सुनगैत चिनगी, अहाँक अगवानीमे, लाल ज्योति, बीखक घैल, पत्रोतर, अन्हारक खेल, नाचक विखाह आदि-आदि विचारमूलक मर्मस्पर्शी पद्य ऐ संग्रहमे संकलित अछि। मुदा अंत धरि नव जीवनक आशमे कविक आँखि मात्र प्रतीक्षा कऽ रहल छन्हि- मन्द-मन्द सिहकैत बसात केना रहब अहाँसँ भऽ कात एको बेर तँ बोलू आबो आॅखि खोलू निकलए नेह वा धिक्कार हमरा दुनू अछि स्वीकार...।। सम्पूर्ण संग्रहमे अश्रुरोदनक बिम्बित चित्रमे नूतन आयामक संग-संग जीवनक नवल आश धएने कवि 'अम्बरा'सँ मुक्तिपर रहब चाहे चलैत, सूतल, ठार वा बैसल....। अम्बरा अर्थात् छायाकेँ लोक एकाकार तँ नै कऽ सकैत अछि परंच भगाएब सेहो असंभव। तँए दुनू रूपेँ कवि अपन जीवनक अम्बराकेँ स्वीकार कऽ लिअ चाहै छथि। रचनाक िनर्बल पक्ष जे कतौ आकर्षण नै, कतौ शिल्प नै, कतौ बिम्ब नै मुदा सभ छंद आयामक अभावक बादो राजदेवजी अनचोकेमे एहेन 'कविता संग्रह' लिख देलनि जकर तुलना दोसर कविसँ करब प्रासंगिक नै किएक तँ मैथिली भाषाक लेल एकटा नव प्रकारक प्रयोग ऐमे भेटल। २ डा॰ धनाकर ठाकुर प्रज्वलित प्रज्ञा (पूर्व राष्ट्रपति डा॰ कलामक पोथी Ignited Minds क डा॰ नित्यानन्द लाल दास द्वारा मैथिली अनुवाद) क समीक्षा
ई ओहि पोथीक अनुवाद अछि जकरा 2002 ई॰ मे पढ़ि देशक राजनेता सोचने हेताह जे कलाम जँ राष्ट्रपति हेताह तँ ओ भारतकेँ विकासक ओहि मिसाइलक ऊँचाइ तक लए जेताह जाहि लेल ओ विख्यात छथि।
ओहि पोथीक अनुवाद 2008 ई॰ मे पढ़ि कय अनुवादकक अथाह परिश्रमक संग-संग मूल पोथीक भावना पर सेहो भाव उठब स्वाभाविक अछि कारण जाहि 2020 ई॰क विकसित राष्ट्रक सपनाक कलाम एहि पोथीक कथ्य बनौलाह ओकर प्रायः आधा समय बीति चुकल अछि आ‘ जकर प्रायः आधा समय ओ स्वयं राष्ट्रपति रहलाह आ‘ जाहिमे आधा समयसँ स्वयं बाजपेयी सन प्रखर राष्ट्रीय व्यक्ति प्रधानमंत्री रहलाह आ‘ आधा समय डा॰ मनमोहन सिंह सन प्रखर अर्थ विषेशज्ञ व्यक्ति प्रधानमंत्री रहलाह।
प्रस्तुत पोथीक दूई आधार छैक राष्ट्रीय भावना आ‘ विकसित अर्थ व्यवस्थाक सपना। भारतकेँ 2020 ई॰ तक जँ चारिम वा पाँचम विकसित अर्थ व्यवस्थाक सपना छैक तऽ आइ ओ कतऽ अछि। लगैत अछि स्वयं राष्ट्रपति बनि कलाम ओ समय बेकार कए लेलथि जे ओ नेना आ‘ युवा सभकेँ पदविहीन रहि उत्साहित केने रहितथि कारण एहि देशमे ऋषिक स्थान राजभवन नहि छैक।
मुदा ताहिसँ कलामक अनुभूतिक मूल्य नहिं घटि जाइत छैन्हि आ‘ वैह प्रस्तुत पोथीक 2008 ई॰ मे अनुवादक औचित्य प्रमाणित करैत अछि।
पोथीक जन्म जाहि झारखंडक बोकारोक एक हेलीकॉप्टर दुर्घटनासँ होइत अछि ओहि झारखंडक लेल देखल कलामक सपना एखनहुँ सपना अछि कारण राजनेताक चयन आ‘ प्रषिक्षण ओहि आधार पर नहिं होइत छैक जेना अन्तरिक्ष आ‘ रक्षा संधानमे कलामक अनुभव छलैन्हि।,
दुर्घटनाक बाद ओ देखलाह बोकारोमे आगिक नदीक रूपमे बनैत स्टील देखलन्हि। झारखंडमे स्टीलक उपयोगी सामान बनैत तऽ अधिक लाभ एतुक्का लोककँे भेटतैक से दिल्ली उड़ानक मध्य सोचैत रहलाह।
116 पृष्ठक लघु पोथीमे पृष्ठ 96-102 मध्य ओ झारखंडरूपमे ‘एक नब राज्यक निर्माण‘ मे एहि राज्यक मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी द्वारा हिनका संरक्षक, विज्ञान प्रौद्यौगिकी परिषदक बनौला पष्चात एतुक्का प्रचूर वनौषधिक विकासक चर्चा करैत सेगहि क्षुद्र व्यापारिक लाभ लेल दुर्लभ प्राकृतिक संसाधनकेँ औद्यौगीकरणसँ नष्ट हेबाक शंका करैत छथि। षिक्षा आ‘ स्वास्थ्य पर केन्द्रित प्रो॰ बसुक नेतृत्वमे पहाड़ी भ्रमणक चर्चा त अछिए आ‘ चिन्मय विद्यालय, बोकारोक चर्चा छात्रसबसँ बातक सविस्तर चर्चा अछि जाहि मध्य हुनक रामेष्वरमसँ आएल फोन पर बात करक बाध्यता जे ओ दुर्घटनामे सुरक्षित छथि पर, ‘जेठ भाई ताजिनगी जेठ बनल रहैत छथि‘ एक सहज टिप्पणी अछि। बोकारोक सभा भवनमे ओ कहलाह केना बेरीलियम डायफ्राम नहि भेटला पर देशहिंमे गुण अभिवर्द्धन कएलन्हि।
गांधी, आइन्सटीन, अशोक, उमर खलीफा, लिंकन सन पांच सर्वोत्तम मानव के ओतहि दवाइ प्रभावे देखल सपनाक बातसँ प्रारम्भ भेल पोथी सपना, त्रिपुरासँ प्रारम्भ भेल नेना छात्रसभक संग हुनक प्रष्नक उत्तर आ‘ नेताक त्रिकोणमे झूलैत अछि जाहिमे वैज्ञानिक कलाम एक चिन्तकक रूपमे उभरलाह अछि।
कोनो नेनाक प्रष्न पाकिस्तानक शस्त्रास्त्रसँ भारतक ‘शास्त्रास्त्र‘ श्रेष्ठ वा नहिं (पृष्ठ 33) क कलामक जे उत्तर हो प्रूफ अषुद्धि रहितहुँ भारतक ‘शास्त्रास्त्र‘ श्रेष्ठ उत्तर रहैत।
आर्यभट्ट, ब्रह्मगुप्त, भास्कराचार्यक काल प्रूफ अषुद्धि भनहिं (पृष्ठ 37 ई॰र्पू॰ नहिं बाद हेबाक छल) हो ई हमर देशक ओ गौरव चित्र उपस्थित करैत अछि जाहि पर विकसित भारतक निर्माण सम्भव अछि। जगदीश चन्द्र बोस, रामण, मेघनाथ साहा, श्रीनिवास रामानुजन, के बाद नब रामानुजनक ताकक कलामक आग्रह सटीक अछि। 1910 सँ 1925क बीच 5-6 एहन अन्तरराष्ट्रीय व्यक्तित्व विविध क्षेत्रमे आबि गेलाह जाहिसँ हमर सभक प्रतिष्ठा बढ़ि गेल।
बादमे कोठारी, भाभा आ साराभाई सन वैज्ञानिक जकर आधारषिला रखलाह ओ सभ फलित भेल धवन आदि द्वारा। परियोजना हमेषा परियोजना नायकसँ पैघ रहैत अछि।(पृष्ठ 45)।
‘हमरो लोकनि ई कए सकैत छी‘ ई कलामक टीम देखौलथि।(पृष्ठ 47) आ‘ रूसक डा॰ योफ्रोमोपक संग ब्रह्मपुत्र आ‘ मास्को पर ‘ब्रह्मोस‘ प्रक्षेपास्त्रक नाम रखलन्हि (पृष्ठ 48) ओना ‘ब्रह्मोल्गा‘ यदि वोल्गा नदीसँ लेल गेल रहैत तऽ अधिक समीचीन होइत जेना बीजू पटनायक कहियो ने केवल उड़ीसासँ स्वयं विमान चला इंडोनेषिया जा राष्ट्रपति सुकार्णोकेँ बेटी हेबापर बधाइ देब गेलाह आ‘ ओहि दिन लागल मेघ कारण मेघावती नामकरणहुँ केने छलाह (पृष्ठ 69) जे बादमे राष्ट्रपतियो भेलीह आ‘ कइएक मामलामे बदनाम। ओना बीजू पटनायकक भारतक आइसीबीएन क्षमता लेल व्यग्रता देखबैत अछि ओहि कालक नेताक ऊँचाइक।
कुरियनक ‘एन अनफिनिस्ड ड्रीम‘ मे हुनक सुनल ‘लंदनक नालीक पानि जीवाणुसभक दृष्टिएँ मुम्बईक दूधसँ उत्तम अछि‘ (पृष्ठ 48) हूनका देशमे ‘श्वेत क्रांति‘ अनएकेँ प्रेरणा देलकैन्हि। डा॰ सुब्बारावक कैन्सरसँ वचाब पर ‘हँ‘ वा ‘नहिं‘ सँ कलाम प्रेरित भेलाह।
दूरदृष्टि आ‘ मेधाक समागम कलाम जे॰आर॰डी॰ टाटा, विक्रम साराभाई, कुरियन, सतीश धवन आदि वैज्ञानिकमे देखैत छथि मुदा जखन ओ गुजरातक संत स्वामीनारायणक समक्ष षिक्षा ओ स्वास्थ्य,कृषि,सूचना ओ संचार, महत्वपूर्ण प्रौद्यौगिकीक पंचसूत्रीय मिशन भारतकेँ विकसित बनेबाक रखलन्हि तऽ स्वामीजीक छठम ईष्वरमे आस्था ओ आध्यात्मिक आधार पर मनुष्यक विकास जे षास्त्रीय नियम ओ ईष्वरीय निष्ठा पर आधारित हो कारण भारतमे अपरा(भौतिक) आ परा (आध्यात्मिक) दूनू आवष्यक मानल गेल अछि।
कलाम पुण्य आत्मा, पुण्य नेता आ‘ पुण्य अधिकारी छलाह जे ‘तिरूकुरल‘ क भाव असफलताकेँ प्रसन्न भावसँ लेबक अनुसारे राकेटक पहिल असफल प्रक्षेपनसँ निराश नहि भेल छलाह।
हुनका अजमेरमे गरीबनमाज आ‘ पुष्करक समान षांतिक संदेश आ तहिना कांची परमाचार्यक ग्रामीण विकासमे रूचि आ‘ ओतुक्का बगलक पुरान मस्जिदक सामंजस्य प्रभावित केलकैन्हि कहियो हुनक पिता रामेष्वरममे समुद्रमे एक मचानसँ खसल देवमूर्तिकेँ तुरन्त फानि निकालि प्रथम दर्शनक अधिकारी बनल छलाह। कलाम माउन्ट आबूमे ब्रह्माकुमारीसँ शान्तिक पाठ मध्य ‘भारतभूमि सभसँ सुन्दर बनत सुनि‘ मुदित भेलाह आ‘ ओ सत्य साईंक चिकित्सा संस्थान आ‘ चेन्नई लेल जलक व्यवस्थासँ आह्लादित भेलाह।
त्रिशूल, आकाश, नाग, पृथ्वी, अग्नि, ब्रह्मोस, पिनाक, लक्ष्य नामक प्रखेपास्त्र बनबएबला कलाम एक छात्रकेँ उत्तर देलखिक्ष्ह ‘शक्तिए शक्तिक सम्मान करैत अछि नहिं कि शक्तिहीनक। डा अमर्त्य सेनसँ असहमत होइत बजलाह ओ भारतकेँ पष्चिमीय नजरिसँ देखैत छथि।‘ पूर्व एडमिरल रामदासक परमाणु परीक्षणक विरूद्ध राजघाट पर धरनाक बात सुनि बजलाह ओ धरना लेल व्हाइट आउस आ‘ क्रेमलिन पर पहिने प्रदर्षन करथु जे हजारो परमाणु बमक क्षमता रखने छथि।
अनप उपलव्धि पर गर्व, एकत्व, समवेत पराक्रमक योग्यता सँ जँ भस्मीभूत जर्मनी महान भए सकैत अछि तऽ भारत किएक नहिं? कृषि, श्रम,पूंजी क बाद ज्ञान सामाजिक परिवर्तन आ धनक उत्पादन आई॰ टी॰ , बायोटेक्नालाजी आदि द्वारा होएत।
90 वर्षीय सुब्रह्मण्यममे ओ द्वितीय हरित क्रांतिक सपनासँ आ‘ 80 वर्षीय डा॰ महालिंगम जे 2000 वर्ष पूर्वक द्वितीय संगमक तमिल लिपि पढ़ने छलाहकेँ 5000 वर्ष पूर्वक प्रथम संगमक तमिल लिपि पढ़बाक सपनासँ कलाम अभिभूत भेलाह।
ग्रामीण-नगरीय देषान्तरगमन षुन्य केना हो कलाम चिन्ता लेल आई॰ आई॰ टी॰ चेन्नई क उत्तर इन्दिरेशक ग्राम काया कल्प योजना लगलैन्हि । मदुराईमे ओ डा॰ नचियार लग लाइ्रनमे लागि अपन आँखि देखेनाइ पसन्द केलप्हि।
देशमे 20 टा आओर आई॰ आई॰ टी॰ एवे अनेक चिकित्सा संस्थानक ओ जरूरत बुझलाह।
विप्रोक अजीम, इन्फोसिसक नारायणरमूर्र्ति क अलावे रतन टाटाक कारक उपाख्यान संक्षेपमे ओहि सभ गोटेक सेग हुनक क्षणक चर्चा अछि एहि पोथीमे जे वर्तमानमे महत्वपूर्ण छथि।
20 वर्षमे भारत कोना विकसित देश बनत जे हम भारतक हम गीत गाबी विदेशक नहिं। चंडीगढक एक छात्रक एहि लेल प्राध्यापक बनब हुनका नीक लगलैन्हि तऽ चदुच्चेरीक एक उत्तर ‘एकाकी पुष्प पुष्पहार नहि बनबैत अछि। आ‘ तहिना गोवासँ एक उत्तर जे ओ एक इलेक्ट्रान जकाँ घुमैत रहत। अटलांटासँ एक अनिवासी भारतीयक उत्तर कलामकेँ नीक लगलैन्हि,‘जखन भारत कोनो दोसर देशक प्रति प्रतिबन्ध लगाएत तऽ हम सोहर गायब।‘भ् भारतक 35 वर्षसँ कमक 70 कोटि युवा कलामक विष्वासक कारण छथि। पारदर्षी भारत लेल अभियान ओहिना हो जेना स्वतंत्रता लेल भेल छल कारण पारदर्षिंता विकासक आधारषिला अछि।
विकसित देशक कारण ओकर स्थिर विकासक उच्च दर अछि जे सिंगानुर लेल प्रथत आ‘ फेर अमेरिकाष् हांगकांगष् ताइवान, कनाडा लेल अछि। ब्रिटेन आठम, फ्रांस 23म, जर्मनी 25म आ‘ भारत 59म पर अछि। जी॰ डी॰ पी॰ मे भारत 75म पद अछि जे चारिम वा पांचम केना होए से विचारणीय।
दायित्वधारी युवा नागरिक चाही जे बुझथि एकसरे काज नहि होइत छैक मुदा सहयोगसँ होइत छैक। सिलिकॉन वैलीक चन्द्रषेखर कहलखिन्ह जे खतरा मोल लेब हुनका नीक लगैत छैन्हि।
कलाम अपन ओहि दिनकेँ याद केलथि जहिया मद्रासमे हुनक षिक्षक डा॰ श्रीनिवास कहलखिन्ह जँ तीन दिनमे काज पूरा नहि होएत तऽ हुनक छात्रवृर्ति बन्द। काज भेला पर प्रषंसा सेहो केलखिन्ह। कलामक कथन जे संकट घड़ीमे मानव प्रज्ञा प्रज्वलित भए उठैत अछि जतए सही ओतहि इहो जे एहने षिक्षक कलाम उत्पन्न करैत छथि राजनेता नहि तेँ षिक्षक कलाम सफल मुदा राजनेता कलाम असफल ।
इ सत्य जे असफल भेनहुँ अनुभव जरूर भेटैत छैक।(पृष्ठ 105) ष्‘कार्यं साधयामि वा शरीरे पातयामि‘ क संग अभियान संगठनसँ पैघ, संगठन संचालकसँ पैघ। टाटा, पी सी राय आदि पराधीन भारतमे राह देखौलथि। बी॰ एच॰ यू॰, ए॰ एम॰ यू॰ आदि बनल।
हमरासभकेँ विकसित राष्ट्रक गौरव हो, पुनर्जन्म लए भारतक यषोगाथा गाबी लिखैत कलाम अपन धार्मिक विष्वाससँ ऊपर उठि जाइत छथि आ पोथीक समापन इन्टरनेट पर दू नेनाक ब्रह्म आ‘ आत्मा पर संवादसँ करैत कोलकाताक एक छात्र सर्वाननक प्रष्न ‘पीपर गाछक शक्ति ओकर निहित ओकर बीयामे मुदा सब कीयाकेँ अवसर कियैक नहि‘ के सुलझेबाक लेल देशक विभिन्न क्षेत्रक लाखों छात्र लग जेबाक निष्चय कए ष्‘हम ओ हमर राष्ट्र भारत‘ क युवा गीतसँ करैत छथि जे हमर देश विकसित देश हो।
‘प्रज्वलित प्रज्ञा‘ पोथी संग्रहणीय अछि। ओना कागद किछु दब मुद्रक द्वारा देल गेल अछि। सीमित प्रतिक पोथी प्राप्ति लेल मूल्य 150 टाका मनीआर्डरसेँ एहि पता पर पठौलासेँ डा॰ नित्यानन्द लाल दास, आचार्यपुरी, फारबिसगंज 854318 संपर्क मोबाइल 9430467019 ऐ रचनापर अपन मतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। जगदीश प्रसाद मण्डल नाटक कम्प्रोमाइज (आसीन मास। रौदियाह समए) सोनिया- अपनो नार सैध गेल। काल्हि मनोहर मामागामसँ आनए गेल। दुइयो-चारि बल्हीक ओरियान अपनो नै करब तँ माल-जालकेँ की खाइले देबै? सुकदेव- मनमे तँ अपनो अछि मुदा छुछ हाथ थोड़े मुँहमे जाइ छै। सोनिया- कोनो कि अन्न नै खाइ छी जे नै बुझब। मगर दुआरपर जेकरा गरदनिमे डोरी बन्हने छिऐ तेकर निमरजाना केकरा करए पड़तै। सुकदेव- (मूड़ी डोलबैत) जेकरा पाइ छै उ आनो गामसँ कीन आनत। मुदा....? सोनिया- मुदा कहने समए मानत। कोनो ओरियान तँ करैये पड़त। सुकदेव- (तरहथ्थीसँ आँखि मलैत) ने एक्को मुट्ठी नार अछि, ने बाधमे घास अछि आ ने बाँसक पत्ता एक्कोटा हरियर अछि। आन साल अधियोपर तोड़ै छलौं तैयो कहुना कऽ काज चला लै छलौं। ऐबेर सेहो सभटा झड़ैकिये गेल......। देखियौ कि होइ छै? सोनिया- ताबे ओहिना ठाढ़े रहत। दुआरपर लछमी कलपने प्रतबाए ककरो हेतै? सुकदेव- गाममे ककरो देखबो कहाँ करै छिऐ जे दू मुट्ठी मांगियो लेब। जिनका सभकेँ बेसी होइतो छन्हि ओ तँ अपने पाछु तबाह छथि। जकरा छैहे नै ओ अपनो पैत नै बचा सकैए तँ दोसरकेँ की बचाओत। तहूमे दुइये-चारि दिनक बात रहैत तखैन ने। ऐबेर नै भेने अगिलो साल तेहने हएत। सोनिया- छुछे सोग केने चिन्ता मेटाइ छै। जखैन दिने उनटा भऽ गेल तखैन सुनटा सोचने हएत। सुकदेव- (वेवस) की उपाए करब। जखैन समैये संग छोड़ि देलक तखैन जीबैयेक कत्ते भरोस करब। सोनिया- ई अहींटा बुझै छिऐ कि आउरो गोरे। सुकदेव- की उपाए करब? सोनिया- उपाए की करब! जेहेन समए बनल तेहेन बनि जाउ। तखने किछु पारो-घाट लागत। नै तँ......। (सुकदेव सोनिया मुँह दिस, बघजर लागल जकाँ, टकटकी लगा तकैत सुकदेवक आँखि सोनिया पढ़ि) चलु दुनू गोरे। मरहन्नाक जे बुट्टी-बाटी भेटत सेहो काटि लेब आ कतौ-कतौ जे चिचोर सभ छै सेहो काटि कऽ लऽ आनब। सुकदेव- बेस कहलौं। जाबे बरतन ताबे बरतन। हाँसू नेने आउ। खोलियापर चुनौटी अछि सेहो नेने अाएब। (सोनिया जाइत। मनचनक प्रवेश) मनचन- भैया, जान बचाएब भारी भऽ गेल। सुकदेव- से की? मनचन- कलक पािन बन्न भऽ गेल। पानिये ने खसै छै। सुकदेव- से की भेलह? मनचन- पान-सात दिनसँ मटियाह पानि अबै छेलै। ओकरा जमा कऽ कहुना काज चलबै छलौं। काल्हिसँ ओहो बन्न भऽ गेल। सुकदेव- दोसर कलसँ काज चलाबह? मनचन- एहँ, कोनो कि एक्केटा कल बन्न भेल। टोलक सभ बन्न भऽ गेल। सुकदेव- तखन पीबै की छह? मनचन- पोखरिक पीबै छी। ओहो लटपटाएले अछि। सुकदेव- बौआ कि करबहक। आखिर ऐ धरतीपर अपना सभ (मनुष्य) नै किछु करबहक तँ माल-जाल, चिड़ै-चुनमुनी बुत्ते हेतै। देखै नै छहक जे कते रंगक चिड़ै पड़ा गेल। मनचन- भैया, तोरे सबहक मुँह देख जीबै छी। सबहक गति एक्के देखै छी। तामसो केकरापर करब। ऐ देहक कोनो ठेकान अछि। ने देहक ठेकान अछि आ ने देखिनिहारक ठेकान। तखैन तँ जाबे हाथ-पएर घिसिआइए घिसिअबै छी। सुकदेव- अखैन जाह। निचेनमे कखनो गप करब। दू मुट्ठी मालक ओरियान करए जाइ छी। देखहक जे आसीन मास जकाँ एक्कोरत्ती लगै छै। अखुनका ओससँ खढ़-पातक डगडगी रहैत से केहेन उखड़ाह लगै छै। मनचन- ऐसँ नीक ने जेठमे छेलै। जेठोसँ खरहर समए लगै छै। एकटा बात मन पड़ल। सुकदेव- की? मनचन- ऐसँ पैछला रौदी नमहर रहै कि छोट? सुकदेव- तोरा की बुझि पड़ै छह? मनचन- नमहर बुझि पड़ैए। सुकदेव- ओ चारि सालक भेल रहए। एकरा तँ सालो नै लगलै। मनचन- हमरा नमहर बुझि पड़ैए। सुकदेव- दिन बीतने लोक दुखो बिसरि जाइ छै। तोरो सएह भेलह। मनचन- नै भैया, से नै भेल। विधने मोटका कलमसँ लिख देने छथि तँए ने मन रहैए। (मुस्की दैत) मुदा एकटा बात कहै छिअह। सुकदेव- की? मनचन- हम सभ तँ जानिये कऽ गरीब छी तँए बुड़िवक छी। मुदा जेकरो महिक्का कलमसँ लिखलखिन ओहो तँ कोंकिआइते अछि। सुकदेव- अखैन जाह। काजक बेर उनहि जाएत। एकटा बात मन राखिहह। पछुलका शताब्दीमे पच्चीसटा रौदी भेलै। एक सालक रौदी लोककेँ चारि बर्ख पाछु ठेलै छै। (दूटा हाँसू नेने सोनियाक प्रवेश। सुकदेव चिन्तामग्न बैसल।) सुकदेव- (स्वयं) कतऽ गेल पचास बर्खक जिनगी। पानिक दुआरे कोसी नहरि आ शक्तिक दुआरे पनिबिजली। जँ बनल रहैत तँ की औझके जकाँ मिथिलांचल वासीकेँ पड़ाइन लगितै। चिड़ै जकाँ उड़ैत-उड़ैत लोक चिड़ै बनि गेल। चिड़ै बनने मनुख-मनुख कहबैक जोग रहत। जकरा अपन बाप-दादाक बनाओल सुन्दर गाम-घर छै ओ घर-छोड़ि घुरमुरिया खेलाइए। खाइर.....। (सोनियाकेँ देख) तमाकुल अनलौं िक ओहो सठि गेल? सोनिया- (मुँह चमका) सुआइत लोक कहै छै डोरी जरि गेल ऐंठन नै गेल। पेटक ओिरयान रहै कि नै रहै मुदा मुँहमे सुपारी चाहबे करी। सुकदेव- सुपारीक मर्यादा की छै से अहीं बुझबै। सुपारी खेनाइक अंग छी जे खेलोपरान्त अतिथि-अभ्यागतकेँ विदाइ स्वरूप देल जाइ छै। सुपारीयो जोकर मान-मर्यादा जै पुरूखमे नै रहल ओहो पुरूखे भेल। हिजरोसँ बत्तर अछि। सोनिया- बुझलौं, बुझलौं साँप फुसलबैक मनतर। (विचार बदलैत) एकटा बात पूछौं? सुकदेव- एकटा किअए। एक हजार पूछू। सोनिया- पेटक आशामे पेट काटि भरै छी आ घर अनैकाल टुटरूम-टुम भऽ जाइए। छोड़ि दिऔ बटाइ खेती? (सोनियाक विचार सुनि सुकदेव ऊपरसँ निच्चाँ धरि सोनियाकेँ निहारि नजरि चेहरापर अँटका, अपन पैछला जिनगीपर दौड़बैत, अएना जकाँ देखए लगल। तड़पैत मने।) सुकदेव- जखैन अपना धन-वित्त नै अछि तखैन....? सोनिया- तखैन की? सुकदेव- बटाइयो खेती केने अपन रोजगार तँ ठाढ़ केने छी। मारि-धुसि खटै छी, भरि पेट आकि आधा पेट खाइ तँ छी। जँ इहो छोड़ि देब तँ कि गोबर-गोइठा जकाँ कतौ पड़ल रहब। सोनिया- बड़ीटा दुनियाँ छै। जतऽ पेट भरत ततऽ देह धुिन जिनगी बिताएब। सुकदेव- ई तँ बुझै छी जे हाथ-पएर लारने कतौ पेट भरह। मुदा जे फुलबारी (गाम) बाप-दादाक लगाओल अछि, मनुक्ख जकाँ मनुक्ख बनि जीबैत एलौं, तकरा छोड़ि.....? सोनिया- की आनठाम मनुक्ख नै रहै छै? सुकदेव- हँ रहै छै। मुदा मनुक्ख मनुक्ख आ समाज समाजक बीच भुताहि गाछी, मरूभूमि पहाड़, समुद्र सदृश्य भाषा, काज बेवहारसँ जिनगी बदलि-बदलि गेल अछि। जइसँ एते खाधि मनुष्य-मनुष्यक बीच बनि गेल अछि। जइसँ कियो ककरो देखहि नै चाहैए। ऐहेन स्थितिमे.....। सोनिया- कोनो कि खुटा गाड़ि सभदिन रहब जे अनेरे एत्ते माथा धुनि देहक हड्डी झकझकबैक कोन जरूरत अछि। बुझिते तँ छिऐ जे घरवाली घर लेती दाइ जेती छुछे। सुकदेव- बाप-दादाक फुलबाड़ी ओ नै छिअनि जे मात्र समैया फुलक होय। बाप-दादाक फुलबाड़ी ओ छिअनि जइमे कुण्डली फुलक गाछक जड़िमे राखल अछि। दोसर दृश्य- (सुकदेव सोमन ऐठाम जाइत बाटमे...।) सुकदेव- (उत्तेजित) पचास बर्खसँ किसान-बोनिहारक संग हमहूँ मिल कोसी नहरिक पानिसँ खेतिओ आ बिजलियोक सपना पुर्ति हएत तै आशामे रहलौं। मुदा आइ कि देखै छी? घरमे अन्न नै खेतमे पानि नै मशीनक नामो-निशान नै। यएह सोराज (स्वराज) साठि बर्खक छी। की हमसभ टकटकी लगौने मरि जय। मुदा ऐ उमेरमे कएले की हएत? भगवान बुढ़ाढ़ी दैते किअए छथिन। जँ दै छथिन तँ जीबैक जोगार किअए ने कए दै छथिन। की टकटकीसँ आँखि पथरा परान तियागि दी। उसैर रहल अछि गामक चास-बास, उसरि रहल अछि पशुधन, उसरि रहल अछि गामक खेत-खरिहान, उसरि रहल अछि गामक कला-संस्कृति। (सोमनक घर। आंगनसँ निकलि सोमन देह खोलने कन्हापर धोती नेने नहाइले विदा भेल।) सोमन- सबेरे-सबेरे केम्हर-केम्हर भैया? सुकदेव- एलौं तँ तोरेसँ किछु विचार करए मुदा तोरा देखै छिअ जे कतौ जाइक सुर-सार करै छह। सोमन- हँ भैया, कनी हाटपर जाएब। तँए धड़फड़ करै छी। मुदा जखैन आबि गेलह तँ किछु इशारोमे कहि दाए। जखैन भेँट भऽ गेलियह तखैन चुपे-चाप चलियो कन्ना जेबह? सुकदेव- गप तँ गप छी, दोसरो घड़ी हएत। मुदा काजमे बाधा भेने तँ काज मारल जाएत। काज मरने जिनगी मरै छै। एक तँ समये तेहन दुरकाल भऽ गेल जे ओहिना सभ पटपटाइए। तहूपर जँ जोगारो बाधित हएत तखन तँ आरो तबाही बढ़त। सोमन- गप जे कहि देने रहबह तँ रस्तो-पेरा सोचैत-विचारैत रहब। ओमहरसँ (हाट) घुरब तँ भेँट केने एबह। सुकदेव- गप तँ नमहर अछि। मुदा तोरो बेर परक भदबा बनब नीक नै। अच्छा साँझमे भेँट हेबह किने? सोमन- हाट जाएब अनठाइयो दैतिऐ। मुदा आइ सोमक हाट छी। कहैले तँ दूटा हाट लगै छै मुदा सोमक हाटक मोकाबला बरसपैतक हाट करतै। सुकदेव- से की? सोमन- सोमक हाटमे सीतामढ़ीक बेपारीसँ लऽ कऽ सुपौल फारविस गंज धरिक बेपारी अबै छै। छअ दिन ओकरा सभकेँ अबै जाइमे लगै छै। तहूमे गाए-बड़दक पएरे एनाइ-गेनाइ सेहो रहै छै। सुकदेव- हँ, से तँ लगिते हेतै। तैओ ओही बेपारी सभकेँ धैनवाद दिऐ जे एते मेहनत करैए। सोमन- अनठौने नै बनत भैया। बहरबैया बेपारी सभ मुइल-टुटल सभ उठा लइए। सुकदेव- केहेन कारोवार ओकरा सबहक छै जे मुइल-टुटल सभ कीन लइए? सोमन- छी हे औगताइल भाय-सहाएब, नै तँ सभ बात बुझा देतौं। एको मुट्ठी लार-पात नै रहने देहमे कछमछी लागल अछि। खढ़-पानिले जे हुकड़ैत देखै दिऐ तँ मन घोर-मट्ठा भऽ जाइए। ओना......? सुकदेव- की ओना? सोमन- बेर परक बात बजने बेसी नीक होइ छै। खाइर, कनी देरिये ने हएत। ओते लफड़ि कऽ चलि पुरा लेब। अपना गाममे हाटे ने होइए, नै तँ जीबैक एकटा बाट लोककेँ खुजि जैतै। सुकदेव- हँ, से तँ होइतै। तोरो देरी हेतह। सोमन- की करब भैया, चारू दिससँ घेरा गेल छी। तेहेन समए भऽ गेल अछि जे अपनो सबहक जान बचब कठिन भऽ गेलहेँ। (दू डेग आगू बढ़ैत सुकदेव) सुकदेव- कनी-मनी पूँजियो तोड़ि कऽ पहिने मनुक्खक जान बचाबह। बादमे बुझल जेतै। सोमन- जाबे साँस अछि ताबे तँ आशामे हाथ-पएर लाड़बे-चाड़बे करब। अजगरो तँ अपन जिनगीक ओरियान करिते अछि। क्रमश: ऐ रचनापर अपन मतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। १. प्रो. वीणा ठाकुर- प्राचीन भारतीय संस्कृतिमे मिथिलाक योगदान २.ज्योति सुनीत चौधरी-उजागर भविष्य ३. हमर फोटो कहिया \ कन्या भ्रूणहत्या पर एकटा कथा। १. प्रो. वीणा ठाकुर प्राचीन भारतीय संस्कृतिमे मिथिलाक योगदान प्राचीन भारतक इतिहासमे मिथिलाक सांस्कृतिक इतिहास अत्यंत गौरवपूर्ण एवं महिमाशाली रहल अछि। सत्य तँ ई अछि जे मिथिलाक सांस्कृतिक इतिहासक ज्ञान बिना भारतक इति सांस्कृतिक इतिहासक यथार्थ ज्ञान संभव नहि अछि। सुदूर अतीतमे मानव मनीषा आर प्रतिभाक प्रोज्वल प्रकाश एतय विद्दमान छल, धर्म-दर्शन, ज्ञान-विज्ञानक प्रत्येक क्षेत्रमे विश्व विश्रुत ज्ञानी-गुणी जनक जन्मभूमि होएबाक सौभाग्य मिथिलाके प्राप्त छल। धर्म तथा दर्शनक क्षेत्रमे मिथिला नहि मात्र अपन महत्व स्थापित कयलक अपितु ओकर पुष्टि सेहो कयलक तथा तत्कालीन विश्वक चारू-दिशामे ओकर संदेश प्रसारित करैत मानव जातिक कल्याण साधन कयलक। जनक सदृश राजर्षि, याज्ञवल्क्य सदृश ज्ञानी, गार्गी, मैत्रेयी, भारती सदृश विदुषी नारी, जगत-जननी सीताक जन्म स्थली तथा गौतम, कपिल, मंडन मिश्र, वाचस्पति मिश्र, उअदयनाचार्य, गंगेश उपाध्याय, पक्षधर मिश्र, दार्शनिक प्रवर एवं ज्योतिरीश्वर-विद्यापति सदृश कवि तथा विद्वानक जन्म स्थली मिथिला भारतक इतिहासमे अनंत काल धरि अपन उज्वल कीर्त्ति स्थापित कऽ लेने अछि। जाहि प्रकारे प्राचीन युगमे एथेंस युनानि लेल ज्ञान-विज्ञान एवं सभ्यता-संस्कृतिक केन्द्रस्थल छल, तहिना मिथिला सम्पूर्ण भारत वर्ष लेल। प्राचीन संस्कृत वाङ्मयक अवलोकन सँ ज्ञात होइत अछि-जे भू-भाग वर्त्तमानमे बिहार कहल जाइत अछि, ओ प्राचीन कालमे तीन खण्ड राज्यमे वियक्त छल; विदेह, मगध आर अंग। गंगा नदीक दक्षिण-पश्चिममे ‘मगध’ राज्य छल, जकर प्राचीन नाम “कीकट’’ छल आर जे अनार्यक निवास स्थान बुझल जाइत छल। पश्चात् ई प्रदेश मगध नामसँ अभिहित होमय लागल एवं एतुका निवासी के हेय दृष्टिसँ देखल जाइत छल। पाश्चात्य विद्वान वेवर, पार्जिटर आदि विस्तारसँ विचार करैत कहने छथि जे- अनार्थक आगमन एहि ठाम पूर्व दिशसँ बराबर होइत छल आर एहि ठामक निवासी आर्य सभ्यताक अधिपत्य सहजहिं स्वीकार नहि कयलक, ताहि हेतु वैदिक साहित्यमे ई प्रदेश निंदनीय कहल गेल। निरंतरमे कहल गेल अछि- “की कदा नाम देशोऽनार्थ विशेषः” मुदा एहि कीकट प्रदेशमे गया तीर्थ के अत्यंत पवित्र मानल गेल अछि; कीकटेषु गया पुण्या नदी पुण्या पुनः पुनः। च्यवनस्याल्रयं पुण्यं पुण्यं राज गृह वनस”। वौद्धायन धर्मसूत्रमे अंग एवं मगध निवासी संकीर्णयोनि कहल गेल छथि। मुदा वैदिक युगमे बिहारक एकटा भाग एहन छल जे आर्य सभ्यताक केन्द्रक रूपमे प्रसिद्ध छल आर ओ छल विदेह। शतपथ ब्राह्मणक अनुसार विदेह अपन पुरहितक संग सरस्वती नदीक तीरसँ सदानीरा (गंडकी)क तीरपर आयल छलाह आर नदी पार कऽ ओ पूर्व दिशामे अयलाह आर ओतए बसि गेलाह। इयह विदेह कालातंरमे मिथिला आर तीरभुक्ति नामसँ प्रसिद्ध भेल। वाल्मिकि रामायणक बाल-काण्डमे मिथिलाक चर्च करैत कहल गेल अछि; “रामोऽपिपरमा पूजा गौतमस्य महात्मनः। सकाशाद विधिवत् प्राण्य जगाम मिथिलां ततः”। ‘अनर्घ राघव’मे मिथिलाके विदेहक एकटा नगरी कहल गेल अछि; “वत्स! शृणोषि विदेहेषु मिथिलां नाम नगरीम्”। कालिदासक “रघुवंश”, श्री हर्षक “नहिषधीय चरित” तथा जयदेवक “प्रसन्न राघव” नाटकमे सेहो मिथिलाक उल्लेख भेटैत अछि। ‘भृंगदूत’मे “तीरभुक्ति”क उल्लेख मिथिला लेल बुझल गेल अछि। “गंगातीरावधिरधिगता यदभुवो भृङग युक्तिनाम्ना सैव त्रिभुवनतले विश्रुतः तीरभुक्ति:”। विदेह वशंक सभसँ प्रसिद्ध राजा जनक भेलाह, जे बहुत पैघ ब्रह्मज्ञानी छलाह आर राजर्षि जनक नामसँ विख्यात भेलाह। हिनक राज सभा महाज्ञानी ब्राह्मण विद्वानसँ अलंकृत छल आर जाहिमे सर्व प्रधान ऋषि याज्ञवल्क्य छलाह। “शुक्ल यजुर्वेद’क प्रवर्त्तक याज्ञवल्क्य मानल जाइत छथि। आध्यात्म्य विद्याक संगहि वैदिक कर्मकाण्ड निष्णात ज्ञाता याज्ञवल्क्य: ख्याति सम्पूर्ण ब्रह्मावर्त्तमे व्याप्त छल। राजा जनक स्वंय ब्रह्म विधाय ज्ञाता एवं ब्राह्मणक पोषक छलाह। ब्राह्मग्रंथ आर उपनिषदमे जनक तथा याज्ञवल्क्यक आध्यात्म विधा संबन्धी शास्त्रार्थक चर्चा बहुतो प्रसंगमे कयल गेल अछि, मात्र चर्चा नहि अपितु प्रशंसा सेहो कयल गेल अछि। “बृहदारण्यकोपनिषद”क एक कथामे जनक द्वारा आहूत एक सभाक उल्लेख भेल अछि, जाहिमे कुरू-पांचाल आदि प्रदेशक बहुतो वेदक विद्वान पधारल छलाह आर जिनका सभके शास्त्रार्थमे परास्त कऽ याज्ञवल्क्य राज-सम्मान प्राप्त कयने छलाह। एहि सभामे विदुषी गार्गी सेहो उपस्थित छलीह। गार्गी आर याज्ञवल्क्य मध्य शास्त्रार्थक चर्चा “वृहदारण्यकोपनिषद”मे कयल अछि। तथा याज्ञवल्क्य द्वारा अपन पत्नी विदुषी मैत्रेयीकेँ प्रदत्त आध्यात्म्य तत्वक उपदेशक उल्लेख “बृहदारण्यकोपनिषद”मे अछि। बीतरागी, ब्रह्मज्ञानी आर त्यागी राजा जनकक सम्बन्धमे एकटा उक्ति प्रसिद्ध अछि- मिथिलायां प्रदीप्रायां नमे दहनति किञ्चन (सम्पूर्ण मिथिला जौं प्रदग्ध भऽ जाए, तथापि हमर किछु नष्ट नहि होएत)। शुकदेव सदृश सहज वीतरागी एवं परमज्ञानी पिता व्यासदेवक आज्ञासँ राजा जनकसँ त्राणोपदेश प्राप्त कएने छलाह। भगवान कृष्ण गीतामे प्रवृतिमार्गक आदर्श रूपमे जनकक उल्लेख कएने छथि। महर्षि याज्ञवल्क्य द्वारा रचित विख्यात स्मृति ग्रंथ थिक। एहि ग्रंथमे चौदह विद्याक परिगणन एहि प्रकारे कएल गेल अछि – चारि वेद, छह अंग, एक मीमांसा, एक न्याय, एक पुराण आर एक धर्मशास्त्र। सम्पूर्ण वाङ्मयक समावेश एहि चौदह विद्यामे भऽ जाइत अछि, तथा याज्ञवल्क्य स्मृतिक अनुसार हिन्दु सम्पतिक उत्तराधिकार निर्णीत होइत अछि। न्याय दर्शन कर्त्ता महर्षि गौतम मिथिलाक निवासी छलाह, जिनका श्रापसँ हिनक पत्नी अहिल्या पाथरक भऽ गेल छलीह। आर भगवान श्री राम जनकपुर यात्राक मार्गमे चरण स्पर्शसँ हिनक उद्धार कएने छलाह। न्याय शास्त्रक अतिरिक्त गौतम एकटा स्मृतिक रचना सेहो कएने छलाह। विद्वान लोकनिक मतानुसार गौतम रचित ब्रह्म विद्यापर एकटा ग्रंथ छल, जे अनुपलब्ध अछि। वर्त्तमान कालहुँमे गौतम कुंड आर अहिल्या स्थान प्रसिद्ध अछि तथा गौतमक पुत्र शतानन्द राजा जनकक पुरहित छलाह। सांख्य शास्त्रक निर्माता महर्षि कपिलक आश्रय मिथिलामे छल। हिनका द्वारा स्थापित शिवलिंग वर्त्तमानमे कपिलेश्वर नाथ महादेव नामसँ प्रसिद्ध तीर्थ स्थल अछि। आचार्य शंकराचार्यक संग शास्त्रार्थ कएनिहार न्याय आ मीमांसाक अद्वितीय विद्वान मंडन मिश्र सेहो मिथिलाक रत्न छलाह। महिषी गाममे हिनक निवास स्थान छल, जे वर्त्तमानमे सहर्षा जिलामे अवस्थित अछि। हिनक धर्मपत्नी सरस्वतीक साक्षात अवतार विदुषी भारती शंकराचार्य आर मंडन मिश्रक मध्य शास्त्रार्थमे मध्यस्तता कएने छलीह आर मंडनमिश्रक पराजयक पश्चात स्वंय शंकराचार्यकेँ शास्त्रार्थमे पराजित कएने छलीह। कहल जाइत अछि जे मडंन मिश्रक गृहक पता शंकराचार्यसँ पूछबाक क्रममे एकटा पनिभरनी हुनका उत्तर दैत कहने छलनि जे “जगद् ध्रुवं स्याजगद् ध्रुवं आ कीड़ाङ्गना यत्र गिरो गिरंति। द्वारस्थ पीड़ाङ्गणसन्निरन्धो जानोहि तन्मण्डन मिश्र धाय”। ई प्रमाणित करैत अछि जे ओहि कालमे मिथिलामे संस्कृत विद्याक पूर्ण प्रचार छल तथा साधारण स्त्री सेहो सुशिक्षित छलीह। मिथिला निवासी वाचस्पति मिश्र षददर्शनक अतिरिक्त समस्त शास्त्रक विद्वान छलाह। ब्रह्मसूत्र शंकर भाष्यपर हिनक “भामती टीका अत्यंत प्रसिद्ध अछि। वेदांतक ई एकटा प्रमाणिक ग्रंथ मानल जाइत अछि। हिनक रचित अन्य ग्रंथ अछि। ब्रह्म तत्व समीक्षा, न्याय कणिका, सांख्य तत्व कौमुदी, न्याय वर्त्तिक तात्पर्य आ योगदर्शन, ई हिनक विद्या-वेदध्यक परिचायक अछि। एकर काल एगारहम शताब्दी (सवंत) मानल जाइत अछि। मिथिलाक न्याय शास्त्रक प्रसिद्ध पण्डित उदयनाचार्य रचित बहुतो ग्रंथ यथा – कुसुमाञ्जलि, किरणावली, लक्षणावली, न्यायपरिशिष्ट, आत्मतत्व विवेक आदि। स्वाभिमानी पण्डित उदयनाचार्यक ई गर्दौति, एखनहु प्रसिद्ध अछि - ”वयमिह पदविद्यां तर्कमान्वीक्षिको आ। यदि पथि विपथे आ वर्त्तयामस्स पन्था॥ उदयति दिशि यस्यां भानुमान् सैव पूर्वा। नहि तरणिरन्दीते दिक् पराधीन वृत्ति:”॥ मिथिलाक अन्य प्राचीन दार्शनिकमे गंगेश उपाध्याय आ पक्षधर मिश्रक नाम विशेष रूपसँ उल्लेखनीय अछि। गंगेश उपाध्याय न्याय शास्त्रक अप्रतिम विद्वान छलाह आ खाद्य खडंन मतक खडंन अत्यंत विद्वतासँ कएने छलाह आ हिनक रचित प्रसिद्ध ग्रंथ थिक “तत्व चिंतामणि”। पक्षधर मिश्रक सम्बन्धमे प्रचलित श्लोक-–“शंकर वाचस्पत्योः शंकरवाचस्पती सदृशौ। पक्षधर प्रतिपक्षी लक्षीभूतो नचय्वापि”॥ हिनक विद्वताकेँ प्रमाणित करैत अछि। विद्यापतिक समकालीन पक्षधर मिश्र “तत्व चिंतामणि” ग्रंथक “आलोक” नामक टीका रचना कयलनि संगहि “प्रसन्न राघव” आर “चन्द्रालोक” ग्रंथक सेहो रचना कयलनि।बंगालसँ बहुतो छात्र न्यायशास्त्रक अध्ययन करवा हेतु हिनका सँ अबैत छलाह तथा हिनक बंगाली शिष्य रघुनन्दन नवद्वीपमे न्यायशास्त्रक पठन-पाठन आ प्रचार कयलनि आर पक्षधर मिश्र द्वारा प्रवर्त्तित नव्यन्यायक परम्पराकेँ आँगा बढ़ौलनि। मिथिलावासी गोवर्द्धनाचार्य उदयनाचार्यक शिष्य आ ‘आर्यासप्तशती’क रचयिता छलाह। दर्शनशास्त्रक पण्डितक संगहि कवि सेहो छलाह, जकर प्रमाण उक्त ग्रंथ थिक। भवनाथ मिश्र आ हिनक सुपुत्र शंकर मिश्र दुनू प्रकाण्ड पण्डित छलाह। भवनाथ मिश्र महान पण्डितक संगहि सर्वथा निस्पृह छलाह, कहियो ककरहुँसँ कोनो याचना नहि कयलनि, ताहि हेतु हिनक नाम अयाची मिश्र पड़ि गेल। हिनक पुत्र शंकर मिश्रक ख्याति सम्पूर्ण मिथिलामे एकटा अलौकिक योग्यता सम्पन्न बालक रूपमे ख्यात भऽ गेल। मात्र पाँच वर्षक अवस्थामे हिनक इ महाराज दरभंगाक समक्ष निम्न श्लोक पढ़ि कऽ सुनौने छलाह- ”वालोऽहं जगदान्द नमे वाला सरस्वती। अपूर्णे पंचमे वर्षे वर्णयामि जगत्यायम”॥ (हम बालक छी, एखन पाँच वर्षक अवस्था सेहो पूर्ण नहि भेल अछि। मुदा हमर सरस्वती अर्थात् विद्या वला नहि छथि। तीनू लोकक हम वर्णन कऽ सकैत छी।) ”अनर्थराघव” नाटकक रचयिता दार्शनिक प्रवर मुरारि मिश्र मिथिलाक निवासी छलाह आ साहित्यशास्त्रक ज्ञाता छलाह। बहुतो ग्रंथक रचयिता महान दार्शनिक वर्द्धमान उपाध्याय सेहो मिथिला निवासी महान विभूति छलाह। महामहोपाध्याय महेश ठाकुर अपन विद्वताक बलपर सम्राट अकबरसँ मिथिला राज्य प्राप्त कयने छलाह। व्याकरण आ न्यायशास्त्रक श्रेष्ठ विद्वान महेश ठाकुर दरभंगा राजवंशक संस्थापक सेहो छलाह। महाराज शिवसिंहक मित्र आ राजपण्डित कवि कोकिल विद्यापति नहि मात्र मैथिली भाषाक सर्वश्रेष्ठ कवि छलाह अपितु हिनक गीत द्वारा विभिन्न भारतीय भाषा अनुप्राणित भेल आर बंगाल, आसाम, उड़ीसामे हिनक गीतक अनुकरणसँ एक नव भाषा साहित्यक उदय भेल जकरा व्रजवुलिक संज्ञा देल गेल। एहि प्रकारे प्राचीन कालहिसँ मिथिला धर्म, दर्शन आ विभिन्न शास्त्रक केन्द्रस्थली रूपमे विख्यात रहल अछि। वेद, वेदांत, न्याय, मीमांसा, धर्मशास्त्र, ज्योतिष, व्याकरण, साहित्य, कर्मकाण्ड कोनो एहन विद्या नहि अछि, जकर विश्व-विख्यात पण्डित एतय नहि भेलाह। मात्र प्राचीन आ मध्ययुगमे नहि अपितु वर्त्तमान कालमे अर्थात् बीसम शताब्दीमे सेहो एहि भूमिकेँ महामहोपाध्याय मीमांसक चित्रधर मिश्र, सर्वतंत्र-स्वतंत्र बच्चा झा, विद्या-वाचस्पति विश्व विख्यात वेदज्ञ मधुसुदन झा, महामहोपाध्याय वैयाकरण केसरी परमेश्वर झा, महामहोपाध्याय जयदेव मिश्र, महावैयाकरण विश्वनाथ झा, महामहोपाध्याय सर गंगानाथ झा, ज्योतिषी बबुआजी मिश्र, विख्यात विद्वान त्रिलोकनाथ मिश्र सदृश विख्यात विद्वान आ साहित्यमर्मज्ञक जन्म देबाक सौभाग्य प्राप्त अछि। एहिमे बच्चा झा अपना समयक दर्शनशास्त्रक अद्वितीय पण्डित छलाह आर दर्शन आ साहित्य विषयपर उच्च कोटिक रचना कयलनि। वैदिक साहित्यक प्रकाण्ड पण्डित मधुसूदन झाक ख्याति देश-विदेशमे विख्यात छलनि। काव्य आ काव्यशास्त्र आर श्रृंगारक क्षेत्रमे सेहो एतय “प्रसन्न राघव”, “अनर्थराघव”, “काव्यप्रदीप”, “रसमंजरी” “रसिक सर्वस्व” आर संगीत शास्त्र सबन्धी ग्रंथ “संगीत सर्वस्व” आ “सरस्वती छद्यलंकार”क रचना भेल। आधुनिक भारतीय आर्यभाषामे सर्वप्रथम गद्य ग्रंथ होयबाक गौरव मिथिला निवासी ज्योतिरिश्वर रचित “वर्णरत्नाकर”केँ प्राप्त अछि। आ एवम् प्रकारे स्वतः सिद्ध अछि जे विश्वव्यापी भारतीय संस्कृतिक केन्द्र स्थल मिथिला रहल अछि, आर मिथिला चिरकालहिसँ अपन महत्वपूर्ण भूमिकाक निर्वाह धर्म, साहित्य, दर्शन आ न्यायक क्षेत्रमे करैत रहल अछि। २. ज्योति सुनीत चौधरी उजागर भविष्य : कतेक उत्साह सऽ अहिभफ्फर बनाओल आ बॉंटल गेल छल भरिगाम।एक सऽ एक अमीर आ प््राभावशाली परिवारक घटक आयल छलैन मुदा मिसराइनजी अपन एकलौता बेटा के विवाह एक मध्यम वर्गीय परिवारक शिक्षित बेटी के पुतहु बनाकऽ अनली आ सब बिध बड्ड मोन सऽ पुरौली।पुतहु के स्नेह सऽ ‘सुकृती’ नामकरण सेहो केली। ओना तऽ एकटा भट्ठी आ कै टा छोट मोट व्यापार छलैन परिवार के जाहि लऽ कऽ सम्पन्न परिवार मे गिनती छलैन। मुदा मोन छलैन जे गरीब परिवारक बेटी आनब तऽ सहमिलु होयत आ बेसी नीक सऽ संयुक्त परिवारमे मिल कऽ रहत।शुरूआतमे तऽ ठीके बड्ड प््रासन्न छलीह मुदा पाइक गौरब सऽ बेसी खतरनाक ज्ञानक गरमी होयत छहि से मिसराइन सहित पूरा परिवार के बड्ड जल्दी बुझा गेलैन जखन पोर्तापोती के आगमन भेलैन। पोता के प््राति सबहक व्यवहार बेसीतर पुतहुक अनुकूले छलैन मुदा पोती के मैट्रिक पास करेलाक बाद जैने सब घरक काज दिस झोंकय चाहलखिन त पुतहु विद्रोह कय देलखिन।ननदि सब मिडिल स्कूले तक पढ़ने छली से सब कहलखिन जे अहि सऽ बेसी पढ़क कोनो प््रायोजन नहिं। मुदा सुकृतीजी में सबसऽ विद्रोह कय असगर अपन विचार पर अडिग रहय के साहस कतय सऽ आयल छलैन ताहिपर सबके क्षोभ छलैन।पति सऽ मात्र आर्थिक सहारा चाही छलैन से अतेक दिनक नीष्ठाक बदले भेट गेलैन। सुकृतीजी भूत जकॉं सब काज अपने कय बेटी के पाहुन जकॉं भोजन हाथ कय दय कॉलेज विदा करैत छलीह। घरक बूर्ढ़ बुजुर्गक विरूद्ध काज केनाई आसान तऽ भऽ नहिं सकैत छलैन। बेटी कुनो असाधारण प््रातिभा के धनी नहिं छलैन।ओ एक सामान्य छात्रा छलैन ईहो बात ककरो सऽ नुकायल नहिं छल।एहेनमे घरक लोक सब खूब चुटकी लय रहल छलैन। दियाद सबमे हहारो मचल छल। बेटीके रिक्सा पर कॉलेज जायत आबैत काल भरि ऑंगनक कनिया सब घोघ तानि ताना मारैत छलैर्न नहिं जानि कोन कलक्टर बनतैन बेर्टी जकर माय एहेन अनुशासनहीन आ एकढ़बा अछि तकर बेटी केहेन होयत. आदि आदि।मुदा सुकृतीजीके शिक्षाक महत्ता पर अतेक विश्वास छलैन जे ओ अहि सबलेल बहिर भऽ गेल छली आ अपन बेटी के कॉलेज जायर्त आबैत देखि हुन्का स्त्रीवर्गक एक उजागर भविष्यके दर्शन होएत छलैन।
२ किशन कारीग़र हमर फोटो कहिया \ कन्या भ्रूणहत्या पर एकटा कथा। कुसुम दाई भिंसरे सॅं हिंचैक-हिंचैक के कानि रहल छलीह किएक ने जानि से हमरो नहि बूझना गेल। ऑखि सॅं टप-टप नोर झहैर रहल छलैक कनैत-कनैत केखनो के हमरो दिस तकैत मुदा एक्को बेर चुप हेबाक नाम नहि। हम कॉलेज सॅ पढ़ा केॅं विद्यार्थी सभ के जल्दीए छुटटी दए के किछू काज सॅं आएल रही। जहॉ अंगना अएलहूॅं की केकरो कनबाक अवाज़ सुनलहॅू लग मे गएलहूॅ त देखलीयै जे कुसुम दाई कानि रहल छेलीह। हम लग मे जाके कुसुम के कोरा लेबाक प्रयास कएलहॅू मुदा ओ रूसि केॅं बाजल जाउ पप्पा हम अहॉ सॅ नहि बाजब। एतबाक बाजि ओ रूसि के बरंडा पर सॅ घर चलि गेल। हम दुलार कए के बजलहूॅ कुसुम अहॉ के की भेल हमर सुग्गा ने अहॉ बाजू ने। एतबाक सुनि ओ ऑखिक नोर पोछैत बाजल बाबू अहॅू बेईमान भए गेलहूॅ त आब हम केकरा सॅ अप्पन दुखःक गप कहियौअ अहि निसाफ कहू ने हमर फोटो कहियाअ \ ई गप सुनि हम कनेक अचंभित भए गेलहॅू हम फेर सॅं पुछलहूॅ कुसुम अहॉ किएक कानि रहल छलहॅू की भेल से कहू ने। त ओ बाजल बाबू अहॉ त माए के बुझहा सकैत छियैक हमर फोटो लगेबा मे कोन हर्ज हमहूॅ त मनुक्खे छी ने फेर हमरा सॅ बेइमानी किएक? अहिं कहू जे हमर फोटो कहियाअ? एतबाक मे हमर कनियॉ चाह बनौने अएलीह कि ताबैत कुसुम दाई धिया-पूता सभ संगे खेलाई धूपाई लेल चलि गेल। हम एक घोंट चाह पीबि के अपना कनियॉ सॅं पुछलहॅू कुसुम किएक कानि रहल छलैक। हमर कनियॉ मुहॅ पट-पटबैत बजलीह मारे मुहॅ धए के अहिं त ओकरा दुलारू सॅ बिगाड़ि देने छियैअ त अहिं बुझियौअ। हमरा त एखने सॅ निलेशक चिंता लागल अछि केहेन होएत केहेन नहि। हम बजलहॅू बेटाक चिंता त अछि अहॉ के मुदा ई बेटीयो त हमरे अहिंक छी एक्कर चिंता के करतै एसगर हमही की अहॅू? एतबाक सुनि हमर कनियॉ मुहॅं चमकबैत रसोइघर दिस चलि गेलिह। भिंसर भेलैक मुदा राति भरि हम ऑखि नहि मूनलहॅू एक्को रति नीन नहि आएल। भरि राति सोचैत विचारैत रहि गेलहॅू मुदा कुसुम के प्रशनक कोनो जवाब नहि सूझल। भिंसर ठीक सात बजे कुसुम दाई स्कूल जाइ लेल स्कूल बैग लए बिदा भेल त हमरा रहल नहि गेल। हम बजलहॅू कुसुम आई अहॉ स्कूल नहीं जाउ हमहॅू आइ कॉलेज सॅ छुटटी लए लेने छी तहि ,द्वारे दूनू बाप-बेटी भरि मोन गप-शप क लैत छी।एतबाक सुनि कुसुम फुदकैत हॅसैत हमरा लग मे आबि गेल कि हम ओकरा कोरा मे लए के झुला झुलाबए लगलहॅू। कुसुम बाजल पप्पा आई अहॉ पढ़बै लेल कॉलेज किएक नहि गेलहॅू अहॉ कथिक चिंता मे परि गेलहॅू से कहू। हम बजलहॅू चिंता एतबाक जे अहॉक फोटो कहियाअ? मुदा अहॉ हमरा फरिछा के कहब तखने हम बूझहब हमरा अहॉक प्रशनक कोनो जवाब नहि भेट रहल अछि त अहिं साफ साफ कहू। एतबाक सुनि कुसुम दाई बाजल अहिं कहू त पप्पा अहॉ पी.एच.डी माए हमर एम.बी.ए मुदा देबाल पर हमर फोटो नहि। एहि ,द्वारे त हम समाजक सभ लोक सॅ पूछि रहल छी जे हमर फोटो कहियाअ? समाजक सोच कहियाअ बदलत। एक त कोइखे मे हमरा मारि देल जाइत अछि। जॅं बॅचियोअ जाइत छी त हमरा दाए-माए सभक मुहॅ मलीन भए जाइत छन्हि। ओ पहिने सॅ पोता बेटा हेबाक स्वपन देखैत छथहिन मुदा बेटी हेबाक सपना कियो ने देखैत अछि। देखैत छियैक गर्भवति माउगी सभ दू-चारि मास पहिने सॅ देवाल पर बेटाक फोटो लगेने रहैत छैक। अड़ोसी पड़ोसी बजैत छथहिन हे महादेव एहि कनियॉ के बेटा देबैए फलां दाए के पोता देबैए। बेटा हाइए ,द्वारे कौबला पाति सॅ लए के अल्टॉसाउण्ड तक ई पूरा समाज बेटीक दुश्मन अछि। हमर माए त एकटा बेटीए छथहिन मुदा कहियोअ सेहन्तो देवाल पर हमर फोटो नहि लगेलखिन। त हम कोन खराब गप पुछलहूॅ जे हमर फोटो कहियाअ। कोन दिन समाजक सोच बदलत कहियाअ माए बहिन सभ देवाल पर बेटीक फोटो लगेतीह? कहियाअ बेटीक जनम भेला पर ढ़ोल पिपही बजा खुशी मनाउल जाएत मधुर बॉटल जाएत? देखैत छियैक बेटाक जनम भेला पर जिलेबी बुनियॉ मुदा बेटीक जनम भेला पर गुड़-चाउर बॉटल जाइत अछि।ई हमरा सॅ बेईमानी नहि त आर की थीक? पप्पा आई हम समाजक सभ लोक सॅ पूछि रहल छी हमर निसाफ कहियाअ? एखन हम कॉचे-कुमार छी मुदा जेना एखने सॅ हमरा बुझना जा रहल अछि जे हमर कुसुम दाई दुःखित भेल हमरा सॅ हमरा समाजक सभ पुरूख-माउगी सॅ पूछि रहल अछि बाबू अहिं निसाफ कहू हमर फोटो कहियाअ \\ ऐ रचनापर अपन मतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। रवि भूषण पाठक १ भाग रौ:सामाजिक-राजनीतिक निहितार्थ २ आदर्श क उत्थान आ यथार्थ क पतन: उत्थान -पतन – १ भाग रौ:सामाजिक-राजनीतिक निहितार्थ साहित्यक प्रतिमान बदलैत रहैत अछि ,मुदा किछु तत्व क निरंतरता बनल रहैत अछि ।नाटक साहित्य मे दू तत्वक महत्व कमोबेश सब युग मे रहल अछि । प्रासंगिकता आ रंगमंचीयता एहने दू टा तत्व अछि ।पहिलक सम्बन्ध मोटामोटी विषयवस्तु आ दोसरक सम्बन्ध शिल्प सँ अछि ।विभा रानी लिखित ‘भाग रौ‘ क विश्लेषण ऐ दृष्टि सँ कएनए उचित अछि । विभा रानी द्वारा ऐ नाटक मे भीखमंगा बच्चाक जीवन आ समाजक क्रूर दृष्टि क चर्चा कएल गेल अछि ।लेखिका द्वारा चयनित विषय वस्तु मैथिलीए मे नइ बल्कि आनोआन भाषा मे विरल अछि ।भीखमंगा बच्चा सभ आपसी वार्ता मे समाज आ जिनगीक कतिपय क्रूर पक्ष सँ परिचय करबैत अछि ।समाज ,सरकारक साथेसाथ भगवानहुँ सँ उपेक्षित ई बच्चा भारतीय समाज आ राष्ट्रक महानता पर व्यंग्य करैत अछि । भीखमंगा बच्चा सभ अपन जिनगी क क्षतिपूर्ति गोविन्दा,रितिक रोशन,शाहरूख,अभिषेक आदि क चर्चा सँ करैत अछि आ अपन कथात्मक सन्दर्भ मे ई जेहन करूण साबित होइत अछि ,रंगमंचीय दृष्टि सँ ओहने कलात्मक ।यद्यपि विद्वान लोकनि कें हीरो हीरोइन क ई अतिचर्चा अनसोंहांत लागि सकैत छन्हि मुदा अपन संदर्भ क मध्य ई रूचिगर आ प्रासंगिक बुझाइत अछि । ‘दानापुर माने दाना स‘ पूरम पूरा ‘ भाग रौ नाटकक कथा प्रसंग देशक एहने दाना दाना चुगए वला सबसँ वंचित आ कर्मठ वर्ग क कथा छैक । एहि वर्गक सबसँ अभीप्सित भूख,चाह आ गंध थिकए,रोटी क गंध ।पेट मे ‘मरल सनकिरबो‘क थाह नइ मिललइ ;देशक नीतिनिर्माता आ प्रभुवर्ग पर प्रचण्ड प्रहार अछि ।भूखल बच्चा ऐ समाज मे अपन स्तर आ महत्व सँ परिचित अछि,ताहि दुआरे बच्चा1 कहैत अछि ‘प्रधानमंत्री छें जे मरि जेबें त‘ देसक काजधंधा थम्हि जेतै । नाटकक भाषा विषयवस्तुक अनुरूप करू आ मारक अछि ।तद्भव आ देशज शब्द क बाहुल्य नाटक के रूचिगर आ रंगमंचीय बनेने रहैत अछि । ‘सिटी स‘ साहेब भ‘ गेलै त‘ हमरा आओरक भूख-पियासक रंग बदलि गेलै की?‘ उपरोक्त वाक्यक प्रश्नवाचकता आ कथनगत असंभाव्यता एकटा तनाव के जन्म दैत अछि । भीखमंगा सभ आपसी गपशप मे दूटा महिला राजनीतिज्ञ क चर्चा सेहो करैत अछि आ विडंबना ई जे दूनू महिला परिवारवाद आ भारतीय राजनीति क अनुर्वरता क पोषक छथि ।बच्चा सभ कहैत अछि जे पढि के की बनब?ई या ई ,दुर्भाग्य देखु जे दूनू महिला अपन विद्वता आ नैतिक शक्ति सँ जनमन क नेतृत्व नइ कइलक । एहन समाज आ राजनीति एकटा खास तरहक भाषा क इस्तेमाल करैत अछि ।ई भाषा प्रथमदृष्टया अश्लील आ मूलतः असंवेदनशील होइत अछि । ‘ई डंडा एमहर स‘ घुसतौ त‘ मुंह दने निकलतौ ‘ वर्चस्व ,आक्रमण आ यौनविद्वेष सँ भरल ई भाषा एकटा खास सामंती आ मर्दवादी समाजक मानसिकता के पोषित करैत अछि । ऐ समाजक बुद्धिजीवी एहन भाषाक उपयोग नै करैत अछि ,मुदा अपन अनुर्वरता मे इहो तेहने अछि । दू टा पत्रकार - युवक आ युवती अपन शिक्षा आ संस्कार मे किछु अलग अछि ,मुदा इहो वर्ग सृजनशीलता आ नवोन्मेष सँ पूर्णतः रहित अछि ।युवती मे किछु नया करबाक संभावना अछि ,मुदा अंधकारक विराट आकाश मे ई संभव नै भेल । ऐे वर्ग क भाषा मे एकटा खास किस्मक नफासत अछि । तत्सम बहुलता आ अंग्रेजी शब्द आ वाक्य क बाहुल्य सँ ई वर्ग अपन विशिष्ट अस्तित्व आ रूचि पर बल दैत अछि । ‘नॉट ए बैड आइडिया ‘ ही इज डफर ,बी पेशेंट सनक चालू वाक्य रंगमंचीय अछि । रंगमंचीय उपकरण क रूप मे किछु नव प्रयोग सेहो अछि ।नाटक मे समवेत स्वर मे गान या बलाघात सँ किछु खास कहबा क प्रयास कएल गेल अछि । ‘हम सब किछु नय क सकैत छी‘ आ हमसब.......मात्र पुतली भरि ई सब अपन संदर्भ मे बहुत अर्थवान अछि ,मुदा ऐ ठाम रंगमंचीय कौशल सेहो अपेक्षित अछि ,अन्यथा अंतिम प्रभाव उड़ियएबा क संभावना अछि । भाग रौ नाटकक असफलता सेहो स्पष्ट अछि । दोसर अंकक पहिल दृश्य मे मंगतू एक पृष्ठक स्वगत बाजैत अछि । ऐ दृश्यक उद्देश्य स्पष्ट रहितहुँ रंगमंचीयता संदिग्ध अछि ।दोसर अंक मे लेखिका क नियंत्रण नाटक पर कम अछि । भीखमंगा वला संदर्भ जतेक जीवंत अछि ,ओतेक पत्रकार आ प्रेस वला नै ।मध्यांतर क बाद ऐ गुरूत्वाकर्षण क कमी एकदम स्पष्ट अछि । नाटकक अंत एकटा कविता सँ होइत अछि ।संयोगवश ऐ कविताक समानता आ समरूपता हिन्दी कवि शमशेर बहादुर सिंह क कविता ‘काल, तुझसे होड़ है मेरी ‘सँ बहुत ज्यादा अछि । शमशेर- काल, तुझसे होड़ है मेरी: अपराजित तू - विभा -ओ काल... अहीं स‘ हँ,अहीं स‘ अछि टक्कर हमर शमशेर-भाव,भावोपरि सुख,आनंदोपरि सत्य,सत्यासत्योपरि विभा-जे अछि सत्यो स‘ बढ़ि क‘ सत्य शिवो स‘ बढ़ि क‘ शिव अमरो स‘ अमर सुंदरतो स‘ सुंदर..... ई कविता नाटक ‘भाग रौ ‘ क महत्वपूर्ण भाग नै अछि ।तें एकर शमशेर क कविता सँ समानता क कोनो खास महत्व नै अछि ।मैथिली नाटकक इतिहास मे विभारानी अपन ऐ नाटक क संग विशेष महत्व क उत्तराधिकारिणी छथि ।विषयवस्तु मे नवोन्मेष क संगेसंग ट्रीटमेंट क अभिनवता ‘भाग रौ ‘नाटक के उल्लेखनीय बनबैत अछि । २ आदर्श क उत्थान आ यथार्थ क पतन: उत्थान -पतन जगदीश प्रसाद मंडल जी क एहि उपन्यास मे आदर्श क प्रति एकटा खास दृष्टि अछि ।लेखकीय विजन मे आदर्श अछि ।ओ मानवीय स्वभाव क उच्चादर्श मे विश्वास करैत छथिन्ह ।मानवीय वृत्ति क नीक पक्ष पर ओ झूमैत ंछथिन्ह आ अधलाह पक्ष पर कानैत छथिन्ह ,मुदा एहि हर्ष आ विषाद क लेल आवश्यक संघर्ष उपन्यास मे समवितरित नहि अछि ।उपन्यास क प्रारम्भ गंगानन्द क कथा सँ होइत अछि आ प्रारम्भिक किछु पृष्ठ तक कथा क विकास ,चरित्र क विकास,मिथिला क्षेत्रक रंग आ मनोवैज्ञानिकता क चित्रण मे लेखक के अतीव सफलता भेटैत अछि ।लेखक क ई नियंत्रण संपूर्ण उपन्या स मे एके रंग नहि भेटत । जाहि ठाम लेखक कथा क अनियंत्रित जंगल मे भ्रमण कर‘ लागैत छथि,ओहि ठाम पाठकीयता प्रभावित होइत अछि ।तहिना लेखक चरित्र क विकास मे हस्तक्षेप करैत छथिन्ह आ पात्र कठपुतली जँका लेखक सँ नियंत्रित होइत अछि । गंगानन्द,विसेसर सनक सब प्रमुख पात्र एहि आदर्शवादी ढ़ंग आ रंग सँ निर्मित अछि । वास्तव मे ई कवि जगदीश प्रसाद मंडल क जीत अछि आ लेखक जगदीश प्रसाद मंडल क हारि ।पात्र क व्यक्तित्व क विकास मिथिला क तत्कालीन सामाजिक राजनीतिक स्थिति सँ कम आ लेखक क आदर्शवाद सँ बेशी होइत अछि ।ताहि दुआरे जत‘ पाठक लाठी आ भाला चलबा क अनुमान लगबैत अछि,ओहि ठाम ह्रदय परिवर्तन सब काज क‘ दैेत छैक ।विसेसर कें खेत एकटा मामूली सिपाही सँ मिलि जाइत छैक ।वास्तविक जिन्दगी मे ई विरल घटना संभव अछि,मुदा ई समाजक प्रतिनिधि घटना नहि अछि ।विरल घटना सेहो साहित्य क अंग भ‘ सकैत अछि ,मुदा ओकर अंकन अनुभवक भट्टी सँ अनिवार्य अछि । ई उपन्यास स्वतंत्रता पूर्व क समय सँ सम्बन्धित अछि ।बीसम सदी क पूर्वार्द्ध क किछु घटना क उल्लेख उपन्यास मे अछि ।स्वाभाविक अछि जे उपन्यास क तुलना ‘बलचनमा‘ आ ‘मैला आँचल‘ सँ हो । उपन्यास मे ऐतिहासिकता क बलाघात क कतहु प्रयास नहि अछि । ताहि दुआरे अतीत क कालखण्ड क उपन्यास होएबा क बावजूद ई सामाजिक उपन्यास अछि । उपन्यास मे मिथिला क सामाजिक आ आर्थिक पिछड़ापन के विशेष चिह्नित कएल गेल अछि ।मिथिला क सर्वांगीन विकास लेखकक अभीष्ट अछि ।लेखकक ई लक्ष्य एतेक महत्वपूर्ण भ गेल छैक जे यथार्थ सँ आदर्श क पटरी बैसेनए अत्यंत कठिन भ गेल छैक । आधुनिक काल मे उपन्यास विधा एकटा खास उद्देश्य सँ साहित्य मे विकसित भेल आ क्रमशः प्रधान होइत चलि गेल ।सामंती युग आ समाज क उत्कृष्टता आ भव्यता सँ परिचय करेनए महाकाव्य विधा क काज छल । आधुनिक युगक वर्ग संरचना आ वर्गवृत्ति बदललए आ युगक उद्देश्य सेहो बदलि गेलए । एहि युग क वैशिष्ट्य के प्रकट करबा मे महाकाव्य विधा क कमजोरी प्रकट भेल,फलतः पद्य आ महाकाव्य क स्वीकार्यता कम भेल ।नवयुग के व्यक्त करबा क लेल गद्य,नाटक आ उपन्यास सनक विधा पर जोर पड़लए ।महाकाव्य क स्थान पर किछु खास मकसद सँ उपन्यास क आसन लाग‘ लागलए ।एहि विस्थापनक सबसँ मुख्य कारण छल उपन्यास विधाक सर्वसमावेशिता ।उपन्यास क प्रत्यास्थ शिल्प सबकिछु के अपना मे समाविष्ट क लेलक ।विद्वान लोकनि क बीच ऐ बात पर सर्वसम्मति भेल कि नवयुगक प्रवृत्ति के महाकाव्यात्मक गहराई सँ प्रकट करबा मे उपन्यास सक्षम अछि ।‘उत्थान-पतन‘ क लेखक उपन्यास विधाक महाकाव्यात्मक आयाम सँ परिचित छथि ।हम ई नहि कहि रहल छी जे ई महाकाव्यात्मक उपन्यास अछि ,मुदा जाहि भाषा मे महाकाव्यात्मक उपन्यास लिखल जाइत छैक,ओहि भाषा मे पहिले एहने सामाजिक उपन्यास सब मिलि के एकटा रचनात्मक वातावरण क निर्माण करैत अछि । ई हमर सौभाग्य अछि जे हमरा समय मे जगदीश प्रसाद मंडल सनक स्पष्ट सामाजिक बोध वला उपन्यासकार मैथिली मे छथि । ।‘उत्थान-पतन‘ क संरचना यदि भारतीय उपन्यास क संदर्भ मे कएल जाए तखन ओएह प्रेमचंदीय आ शरतचंद्रीय विजन क स्पर्श अछि । गाम पर आ गाम क लोक क प्रति प्रेमचंद सँ किछु बेसिए अपनत्व क भाव । ई व्यक्ति क स्वभाव सँ ल के घर क संरचना तक स्पष्ट अछि । ‘कँचके ईंटाक आ खढ़क छारल दरवज्जा ।नीक कारीगर क जोड़ल देबाल आ नीक छाड़निहार छाड़ने ,तें दरवज्जा सुन्दर ।दरवज्जा क ओसार मे एक भाग एकटा कोठली बनल ‘। प्रेमचंद क उपन्यास मे अहाँ के खोजला पर गाम क प्रति प्रशंसाक भाव नहि मिलत । हँ गाम क प्रति दया क भाव प्रेमचंद मे जरूर अछि ।गाम क दलित-शोषित जन क प्रति प्रेमचंद मे विशेष पक्षधरता क दृष्टि मिलत,मुदा गाम क प्रति एकटा नास्टेल्जिक भाव जे आंचलिक आंदोलनक विशेषता अछि से अनुपलब्ध अछि । ‘उत्थान-पतन‘क लेखकीय दृष्टि मे किछु किछु रेणु क गा्रम्य प्रेम अछि ।मुदा एहि ठाम रेणु वला विराट व्यंग्य अनुपलब्ध अछि । लेखकक दृष्टि क रूप मे एकटा खास प्रगतिशीलता उपन्यास मे व्याप्त अछि ।ई दृष्टि अछि पिछड़ल मनुष्य के आगू बढ़एबा क उपक्रम । एकठाम विसेसर कहैत छथिन्ह- ’हमरा तोरा सन जे पछुआइल परिवार आ लोक अछि,ओकरा मे किछु एहेन दुरगुन अछि जकरा सुधारने बिना अगुआइब कठिन अछि ‘ उत्थान-पतन क भाषा पर विचार कएल जाए एकर भाषा मे कतहु बिहाड़ि नहि भेंटत एकदम आत्मीय वार्तालाप क भाषा- ‘बीघा भरि मकइ ।पँच-पँच हाथक हरियर हरियर फुलायल गाछ।तीनि-तीनि,चारिटा बाइल गाछ मे झूमैत।जेना जुआन कनियाँ अपन जुआनी क गुण सँ झूमैत तहिना मकइ क गाछ झूमि झूमि एक दोसर सँ लट्टा पट्टी सेहो करैत ‘। यदि ‘उत्थान-पतन‘ क त्रुटि क बात करी,त किछु मुख्य दोष अछि- 1 संवाद मे स्फीति ।जखन विसेसर अपन सासुर मे अमृतलाल सँ घर बनएबा क आग्रह सुनैत छथिन्ह तखन विसेसर एकटा लम्बा अनुच्छेद मे कालदेवता क महात्म्य बताबैत छथिन्ह ।श्यामानंद बोरिंग खुनएबा क बाद विसेसर के सामने एकटा नमहर भाषण मे क्रियाशील पूंजी आ गतिहीन पूूंजी क चर्चा करैत छथिन्ह । 2उपदेश क भाव कतहु कतहु नाटकीयता आ रोचकता क भंग करैत अछि । एहि ठाम लेखक अपन विचार घुसएबा क लेल आदर्श क चाशनी सँ कतहु आवश्यक आ कतहु अनावश्यक विस्तार करैत छथि । पृष्ठ 41-42 मे ज्ञानचंद एकटा नमहर अनुच्छेद मे सामाजिकता पर बजैत छथि । 3उपन्यास मे एक साथ एकाधिक कथा विद्यमान अछि ।विसेसर क कथा, गंगानन्द तीनू भाए क कथा,डाक्टर नीलमणि क कथा ।मुदा एहि कथा क बीच मे कोनो गंभीर संपर्कसूत्र अनुपस्थित अछि ।कखनो कखनो लागैत अछि जे एक उपन्यास मे कतेको टा कहानी एक साथ चलि रहल अछि । पाश्चात्य विद्वान लोंजाइनस कहैत छथिन्ह जे महान रचना निर्दोष नहि होइत छैक ,निर्दोष रचना क फेरा मे क्षुद्रता बढ़बा क संभावना बढ़ि जाइत अछि ।‘उत्थान-पतन‘ क कतिपय दोष एहने दोष अछि जे विराट सामाजिकता क आवाहन क क्रम मे बाई-प्रोडक्ट जँका प्राप्त होइत अछि ।मैथिली क ऐ महान लेखक सँ हमरा आरो आर महान कृति क अपेक्षा आ आर्शीवाद चाही जे हमरा मे पढ़बा-गुनबाक सामर्थ्य विकसित हो । ऐ रचनापर अपन मतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। १.शेफालिका वर्मा- रेत आ रेत २. सुजित कुमार झा-कथा- बंश १ शेफालिका वर्मा रेत आ रेत ‘भौजीकेँ की भ’ गेलि छैक पायल?’ बादलक स्वर सुनि चौंकि भाइ दिस तकलक पायलμ‘सदिखन एकटा स्वप्न-लोकमे डूबल आँखि, व्यथा-वेदनाक जीवंत रूप, भौजी जखन बात करैत छथि तँ चारू दिस जलतरगक अपूर्व ध्वनि पसरि जाइछ! जेना कोनो दीयाक ‘लौ’ हुनक पानी पर, गालपर दहकि रहल हो पायल, काल्हि राति ओ जखन पफोनपर गप्प करैत छलीह तँ लगैत छल जेना पफोन छोड़बाक हुनका मोन नहि होनि, कतेक तन्मयता, कतेक आत्मीयता...’ एकटा साँस लैत बाजल-‘अपना सभकेँ हुनक मदति करबाक चाही...’ μ‘मदति.....?’ पायल चौंकि गेल। μह! पायल, भौजी हमरा माए जकाँ पोसने छथि। हम माएक अभाब कहियो नहि अनुभव कयलहुँ। ओएहा मातृतुल्य भौजी हमर कतेक उदास, कतेक परेशान.....आखिर किएक.....? ‘μएहि वयसमे हिनका एहि तरहक-हमरा जेना कोना दन लगैत अछि। दुइ बच्चाक माए भौजी तखनμ! स्वयंकेँ मारि देतीह, अपन इच्छाक गराँ घोंटि देतीह, मुदा हारि मान’ वाली नहि छथि’ μ‘नहिए, पायल हमरा तँ होइए, भौजी स्वयं नहि जनैत छथि जे ओ ककरो अथाह प्रेममे डूबलि छथि। एहि तरहक आदमी स्वयंकेँ पुफसियबैत अछि। अपनोकेँ स्वयंसँ नुकबैत अछि। हृदयक अन्तरतम गहींरंइसँ पुफटैत कामनाकेँ थकुचि दैत अछि।’ μहमरा बुझबामे किछु अबैत अछि भैया, अहाँ की बाजि रहल छी? μ‘हमरा होइछ, भौजी ककरो चाहैत छथि। मुदा एहि वयसमे पहुँचि कोनो स्त्राीक सतीत्बकेँ ई स्वीकार नहि होइत अछि। अपनापर अधिकार क’ अपन इच्छाक अरथी निकालि दैत छथि। जनैत छीμ झाड़ि बहारि पथ नित राखब कृष्ण भेला परम कठोर... एतेक उदासीμएतेक व्यथा-वेदना-आघगनसँ भौजीक गीतक स्वर जेना बादल आ पायलकेँ मूक क’ गेल। भौजीकँ गीत गयबाक बड़ स’ख छलनि। ओ सदिखन किछु ने किछु गुनगुनाइत रहैत छलीहμसभटा उदासीक गीत। कनेक कालक लेल गीतक स्वर रुकि गेल। प्रायः भौजी अपन नोर पोछि रहल छलीहμ अपन सनेस छोड़ि जायब सखिया इहो दूनू नयन चकोर एक-एक आखन जेना कराहि रहल छल, एक-एक स्वर आहत भ’ छटपटा रहल छल......!! बादल अपन सोचमे ओझरायल रहल। भौजी किएक एना बदलि गेलीह? नहि जानि, ककर खियालमे भौजी कटल गुîóी सन बेबस जकाँ पहुँचि जाइत छथि? बैसलि-बैसलि गुम-गुम! गप्प करैत-करैत जेना हेरा जाइत छथि। हमरा होइत अछि, भौजी स्वयं नहि बुझैत छथि। ओ ककरो चाहैत छथि एहि वयसमे खास क’ धर्मभीरु, दुई जुआन बच्चाक माए ककरो चाहबाक कल्पनो नहि क’ सकैत अछि। कहियो अपन दुर्बलता स्वीकार नहि क’ सकैत अछि। तैयो भावनाक बिहाड़ि कखनो-कखनो हुनका अद्वेलित क’ दैत छनि। हुनक अधरपर खेलाइत एकटा जादुइ मुस्की, हुनक व्यवहारमे कखनो चंचलता आबि जाइछ। भौजीक हृदयमे कोनो दबल-दबल पुफलझड़ी अछि। हुनक तीतल पलक कँपैत अवर आ बाझर स्वर जेना हुनक बेबसीक चेन्ह थिक। ओह! बादलक माथक नस सभ चरचरमराय लगलैक यदि ई बात सत्य होयत तँ भौजी कहियो अपन लोकसँ, अपन परम्परागत रास्तासँ हटि नहि सकैत छथि? नहि जानि एहि तरहँ कतेक जीवन अमावस्याक चिर अंधकारमे डूबि जाइछμनोन जकाँ पानिमे चुपचाप घुलैत..... ओहि दिन कोनो बातपर तमसा क’ भैया आपिफस चल गेलाह। भौजी किछु नहि बजलीह। भैयाक भयंकर गर्जन-तर्जनमे डूबल भौजी मौन-मूक ठाढ़ि रहि गेलाह-भैयामे इएह एकटा खराबी छनि जे तामसमे हुनका समय-असमय, निर्दोष-दोषी-कथूक ख्याल नहि रहैत छनि। भैयाक आपिफस गेलाक बाद भौजी चुपचाप बादल आ पायलकेँ जलखै करब’ लगलीह! बादल कतेक आग्रह कयलक भौजीसँ खयवा लेल-पायल भौजीसँ प्रार्थना करैत रहलीह, मुदा भौजी!... नहि जानि हुनका की भ’ गेलनि? उदास-उदास, कानल-कानल, चिन्तामे डूबल। जेना कनबाक कोनो बहाना ताकि रहलि छथि। जेना हुनक किछु हेरा गेल हो, खाली-खाली आँखियेँ शून्य मे ताकि रहल छलीह। नहि ककरो माए, नहि ककरो पत्नी, नहि ककरो भौजीμकिछुत’ नहि छलीह ओμओहि काल। भौजीक ओहि रूपकेँ देखि पायल कानय लगलीहμअहा!केँ की भ’ गेल भौजी? की भ’ गेल? बादलक समस्त तन, रोम रोम जेना भौजीसँ प्रश्न क’ रहल छल। मुदा, सभटा प्रश्नकेँ अनुत्तरित घुरबैत भौजी चलि गेलीह, बाथ रुममे। नहा धो क’ निकललीह आ पेफर ओएह भौजी! बादल पायलक अवरपर मुस्कीक किरण चमकि गेलैक। सभ केओ जलखै करवालेल बैसलाह। बादल कोनो अवसादमे डूबल चुपचाप भौजीक मुँह देख रहल छलाह। खिड़की पारसँ रहल छल! बादल जेना अभिभूत भ’ उठल। सिन्दूरी रंगमे डूबल भौजीक तेजोमय सौन्दर्य देखि.....ओकर आँखि एहि महान देवीक समक्ष नमित भ’ रत्तिफम किरणमे अछि, ओतबे अहाँक आत्मामे। तखन अहाँ एतेक उदास किएक छी? एतेक दुखी किएकμ? मुदा बादलक प्रत्येक प्रश्नकेँ भौजी अपन तिलस्मी हँसीसँ बिच्चे पगडंडीमे भटका दैत छलीह। बादल चुपचाप सोचक एकटा नमहर रास्तापर निकलि जाइत छल। ओ एहन बाट छल जाहिमे कतेको भटकाव, कतेको घुरची छल। एहि घुरचीकेँ सोझरयबामे अनेक क्षण मिलि मिनटक स्वरूप लेलेक आ अनेक मिनट मिलि घंटा। अचक्के ओकर सोचक ई क्रम टूटि कानमे दूरसँ अबैत कोनो आबाज सुनाय पड़लैकμ‘की बात छैक बाउ, एना ठाढ़ भ’ की सोचि रहल छी?’ बादल हड़बड़ा गेलμ‘किछु त’ नहि भौजीμकिछु नहि।’ भौजी ओकर बाँहि पकड़ि लेलक ‘किछु बात अछि बाउ, अहाँकेँ कथीक सोच अछि? भौजीक प्रश्न सुनि ओ आँखि उठा क’ हुनका दिसि तकलक। ओह! भौजीक ओ नजरि बादलक अंतरकेँ जेना प्रकप्मित क’ गेल। ओ चुप नहि रहि सकल- ‘अहाँकेँ कखनो कखनो की भ’ जाइत अछि भौजी? सभ सुख प्राप्त रहितो भौजी कखनो लगैछ भौतिक सुख उपलब्धिक एतेक जयघोषक मध्य जेना अहाँ विराट् शून्यमे हेरा जायत छी। किएक भौजी किएक?’ जेना बादलक प्रश्न भौजीक समस्त अस्तित्वकेँ झकझोरि देलक। किछु अकचका क’ ओ एकटा निसाँस छोड़लनि। एक तोड़ पानि-बिहारिक बाद वातावरणमे एकटा विचित्रा शांति रोम जाइछ, तहिना कतेक काल धरि भौजीक चेहरा सपाट रहल आ पुनः दोसर तोड़ पानि बिहाड़ि उठल। कनेक काल पहिने धरि जे चेहरा सपाट छल, से कतेक मनोभावनासँ भीजि-तीति गेल। μभौजी, बाजू ने भौजी! कोन करणेँ अहाँ एतेक आत्मपीड़न भोगि रहल छी? कखनो लगैछ अहाँ एकटा कली छी गुमसुम, चुपचुप! जखन अहाँ हँसैत छी तँ कली पूफल भ’ जाइछ। अहाँक संपर्कमे आयल सभ केओ एहि सौरभसँ सुरभित भ’ उठैछ। अपन दुःख अपन पीड़ा बिसरि जाइछ। भैयो तँ बजैत छथि जे अहाँक भौजी एकटा ‘टॉनिक’ छथि, हँसीक ‘टॉनिक’, सौरभक ‘टॉनिक’। आ’ पेफर लगैछ हवाक कोनो तीव्र झोँक आयल आ पूफलक सभटा पंखुरी धूरामे छिड़िया गेल! पूफल-पूफल नहि रहैछ, अहाँ-अहाँ नहि रहैत छी? भौजी, ई कोन बयार थिकμकोन पीड़ा थिक?μ बादल आवेशसँ हाँपफ’ लागल। भौजी ता घरि अपनाकेँ सहज क’ लेने छलीह? किछु बाजबा लेल हुनक अधर खुजल की पफोनक घंटी टनटनाय लागल। ओ दौड़लि ‘ड्राइंग-रुम’ चल गेलीह! बादलक कानमे भौजीक म(िम स्वर पड़लμ‘हेलो की हाल छैक? हम? जीबैत छीμ हँ, जीबैत-जीबैत थााकि गेल छीμहम जीब’ नहि चाहैत छीμ जीब’ नहि चाहैत छीμबड़ कठोर यात्रा अछि एहि जीवनक.....’ बादलक कानमे भौजीक दर्द भरल स्वर घुमरैत रहल। पफोनपरकेँ छल? भौजीकेँ कोन दुःख छनि? के अछि जकरा दुःख नहि छैक? ककर जीवन सर्वथा क्लेश, व्यथासँ रिक्त अछि! मुदा ओहि दुःख, क्लेश, व्यथाकेँ अभिव्यक्त करबाक लेल सभ केओ कोनो-ने-कोनो रूपमे माध्यम ताकि लैत अछि। प्रकृति धरि एहिसँ छटल नहि अछि। आकाशक हृदयक व्याकुलताकेँ अभिव्यक्त नहि करैत अछि? आ’ सोचक ई सीमा असीम भ’ उठैत अछि,μ जखन आकाशक छटपटी एकटा बिजुरी .....?????? कौंधि जाइत अछि! मेघक ई स्वर.....आकाश जखन अपन वेदनाकेँ सहाजकरबामे असमर्थ भ’ जाइछμत! वेदनाक ईं चीत्कार समस्त संसारकेँ कँपा दैत अछि। आकाश तँ सरिपों एतेक कमजोर, एतेक असमर्थ भ’ जाइछ जे आँखिसँ अविरल अश्रुकरण खस’ लगैछ। मुदा भौजीकेँ कनितो तँ नहि देखैत छियनि! सभटा नोर ओ पीबि लेने छथि......तावत भौजीक खनखनाइत हँसी ड्राइंग-रुमसँ पेफर सुनाइ पड़ल। परदा हँटाक’ चुपचाप बादल देखलक। मोहल्लाक चारि-पाँचटा छौड़ा भीजीकेँ घेरने-‘चाची, सरस्वती पूजाक चंदा चाहीμचाची, बिना अहाँक मदतिक कोनो भ’ सकैछμ‘आँटी आप हमलोगों को सलाह देती रहेंμ‘सभक स्वरक जयमाल पहिरने भौजी मुस्कियाइत रहलीहμ‘बेस, अहाँ सभ निश्चिन्त रहू, एहि बेर एहि मोहल्लामे एहेन सरस्वती पूजा होयत जेहन कहियो नहि भेल अछि। μ‘चाची जिन्दाबादμअ!टी जिन्दाबाद’ नाराक संग छौड़ा सभ चल गेल। समयक सागरमे ज्वार-भाटा अबैत रहल आ एक दिन डाकिया चिट्टòी ल’ क’ आयल। साइकिल घंटी बजबाक संगे भौजी पागल जकाँ दौड़लीह। डाकिया एकटा लिपफापफ द’ चल गेल। भौजी छटपटाक’ चिट्टðी पढ’ लगलीह। हुनक चेहरापर अबैत-जाइत रंगकेँ खिड़कीसँ बादल चुपचाप देखैत रहल! तखन बादलक मोनमे हल्लुक सन संदेहक साँप पफन काढ़लक।μ ककर चिट्टðी भौजी एतेक प्रेमसँ पढ़ि अपन कोठलीमे ओछाओनतरमे राखि देलनि? बादलक निः शब्द आँखि भौजीक पाछाँ क’ रहल छल। ओकर हृदयमे एकटा आवेग उठलμएकटा भनसा घरमे छलीह। अपन कोठली बंद क’ आशंकित मोन आ अव्यक्त भयक संगे ओ चिट्टðी पढ’ लागलμ ‘प्रिय नेहा! .....’ आ नेहाμभौजीक नामक संबोधन ओकरा कोनादन लगलैक। एहिठाम केओ भौजीक नाम नहि कहैत छलनि। खाली भौजी, चाची, काकी, माँ इएह सभ रूप हुनक छलनि! खैर, बादल आगाँ बढ़लμ‘पत्रा, ‘अहाँक भावमय पत्रा भेटल। हम ओकरा एकबेर दुइ बेर, अनेक बेर पढ़लहुँ। ओह! कतेक भावमयी अहाँ छी! लगैछ ईश्वर अहाँकेँ, अहाँक मोन-प्राणकेँ कोनो रेशमक मुलायम, सुकुमार, ‘मासूम’ तारक ताना-बानासँ बुनने अछि, जाहिमे सलोनी पूखणमाक स्निग्ध, चन्द्रिकाक रस निचोड़ि राखल.....’ओ पत्रा पढ़ैत जाइत छल आ बादलक माथपर आबि रहल छलμभौजीक रहस्य जेना खुजि रहल छलμ‘एहि मोन-प्राणमे मानसरोवरक हँसक शुभ्रता आ मयूरपंखक चित्रामयता अछि। कतेक रंग, कतेक सम्मोहन भरि देल गेल अछि अहाँक अन्तरक नीलाभ आकाशमे? साओनक घटाक करुण कोमल व्याप्ति आ बिजलीक तड़ित लयसँ अपन सपनाक सिंगार कयने छी अहाँ।’ बादल अपन हृदयक धड़कन स्वयं सुनि रहल छल। भौजीक प्रत्येक हाव-भाव, एक-एक रहस्य ओकरा रोमांचित क’ रहल छल...‘एहि विशाल विश्वमे जाहि ठाम हमरा लेल कोनो विशेष आकर्षण आ सम्मोहन नहि अछि, जाहि ठाम हमरा जीवामे कि मरि जयबामे कोनो अन्तर नहि अछि ओहिठाम अहाँक पत्रा एकटा पुलक, एकटा भोरक किरण, एकटा शरदकालीन ओसक चमक आ बसन्ती बयार बनि अबैछ, हम अपन ऊपर रसवंती केतकी वा चमेली वा किछु आरक अनुभूति करैत छी.....’ बादलकेँ लगलैक, भाभी कतेक ‘Úॉड’ अछि? कतेक ‘भोला-भाला’ कतेक नीरक्षीर सन पावन मुदा असलमेμ? ओकरा मोन भेलैक, तुरत भौयाकेँ जाक’ पत्रा देखा दी। तुरत भौजीसँ पुछी। पेफर सोचलक, कने आर आगाँ पढ़ि लीμ अहाँक मोनमे किछु घुमरैत रहैत अछि। हम बुझैत छी, अपन भाइपर विश्वास नहि अछि?’ भाइ-बहिन? बहिन-भाई? बादलक दिमाग जेना चक्कर काट’ लगलैक... ओकर बनाओल रेतक सभटा रेखा बिहाड़िमे लुप्त भ’ गेलैक। ओकर ऊपर साँस जेना नीचाँ आयल? भौजी-ओह! कतेक बात ओ सोचि गेल? जेना भयंकर सपना देखिक’ ओ उठल होअयμजेना कोनो अनर्थ होइत-होइत बाँचि गेलैकμ‘अहाँ हमरा राखी बन्हने छी। तखन अहाँकेँ हमरापर विश्वास नहि अछि? राखीक अर्थें थिक बहिनक रक्षाक भार!’ μबादलक मानस-जेना पानि बरसि आकाश निरभ्र भ’ जाइत छैकμ एकटा पैघ ‘एक्सीडेंट, होइत-होइतμएकटा भयंकर ‘ट्रैजेडी’ होइत-होइत बचि गेल। मुदा की ‘ट्रेजेडी’ होइत-होइत बचल? की भयंकर ‘एक्सीडेंट’ नहि भ’ गेल? ओहि भाग्यहीन दिवसक रेत बादलक आँखिमे गड़’ लागलμएहि तरहक ओझराहटि आ भौजीक पाछाँ बेहाल बादलक प्रकृति एकदम रूक्ष भ’ गेल छल। अपन पढ़ाई-लिखाइ सभ बिसरि गेल छल! मेडिकलमे एडमिशन टाकाक तंगीक कारण नहि भ’ रहल छलैक! ओ चुप भ’ नियतिक खेल देख रहल छल। एम्हर भौजीक प्रवंचनाμह!, प्रवंचने तँ छलीह-दोसर लोक लग कतेक उत्पुफल्ल, कतेक उन्मुक्त, कतेक सहज, मुदा अपने घरमे कतेक निराश, कतेक बंदिनी, कतेक दुरुह। समस्त शहरमे भौजीक बड़ाइ, छोट-पैघ, बूढ़-बेदरा स्त्राी-पुरुष सभ केओ मुक्त कंठेँ करैत छल! ओएह भौजी भरल घर, लोक रहितो, कतेक असम्पृक्त भ’ जाइत छलीह। जखन भैयाकेँ कोनो गरजे नहि छनि तँ हम कथी लेल भौजीक पाछाँ तबाह भेल छी। आ’ कॉलेज जयबा लेल बादल तैयार होब’ लागल। ड्राइंग रूममे पेफर पफोन घंटी टनटना उठल? आ पुनः भौजीक स्वर स्थिरसँ तीब्र। पुनः एकटा खनखनाइत हँसी.....आ’ बादलक कानमे जेना काँच पिघलैत रहलμ दस मिनट बीतल, बीस मिनट बीतलμभौजीक गप्पक कतहु अन्त नहि छलμबादलक दिमाग साँय-साँय क’ रहल छल। ई कोन गप भेलै पफोनपर! गप करैत छी, हँसैत जा रहल छीμई की भेलैक? हम जलखै करबा लेल ठाढ़ छी, कालेज जाक’ पता लगौनाइा अछि आ भौजीμएकटा नम्हर गपमेडुबल, बात-बातमे ठहाका...गप किछु सुनाइ नहि पड़ैत छल, मुदा स्वरसँ बादलक समस्त तनमे लहरि पूफकि देने छल! ओ तामसे कालेजदिस विदा भेल......गेट लग पहुँचल कि भौजी पाछाँसँ दौड़लि ओकर बाँहि पकड़ि लेलकैμ‘‘जलखै क’ लिय’ बाउ!’μ‘‘नहि बड़ अबेर भ’ गेल, हमरा कॉलेजमे किछु काज अछि।’ तिक स्वरेँ बाजल बादल। ओकर स्वर पर भौजी चौंकि उठलीह! ‘बाउ, अहाँक दुआरे हमहूँ नहि करब’ किछु अप्रतिभ होइत भौजी बजलीह। ‘हमरासँ कोन मतलब अछि अहाँकेँ? अपन जाक’ खा लिय’μ उपेक्षासँ बादल बाजल। ‘हम नहि जाय देब, जा धरि अहाँ जलखै नहि करब।’ बासी मुँहेँ हम नजि जाय देबμभौजी ओकर बाँहि घिचने भनसा घर दिस ल’ जाय लगलीह। ‘हम एक बेर कहि देलहुँ, नहि खायब’। अपन जगहपर अडिग छल ओ। भौजीक लेल बादलक ई रूप अकल्पनीय छल, अकथनीय छल। ओ अवाक् छलीह! वेदनाक एकटा ज्वार हुनका आँखिमे उठल, मुदा तुरते अपन कौशलसँ ओहि ज्वारकेँ उपेक्षित क’ देलनि। एकटा दर्द भरल मुस्कीक संग बजलीहμ‘हे यौ, केओ किछु कहि देने अछि? अहाँ एना किएक क’ रहल छी? हमरा सँ कोनो गलती भेल अछि? की बात अछि? चलू हमरा भूख लागि गेल अछि रविक प्रात थिक।’ ‘रविक प्रात...जा क’ अहाँ खा लिय’? हमरा की कहैत छीμएतेक कालसँ जे अहाँ निहोरा करबा रहल छी एतेकमे त’ अहाँ कैक बेर खा लितहुँ।’ बादलक सभ उपेक्षाकेँ अनदेखन सन क’ भौजी कहैत रहलीहμ‘हम अहाँ बिना खाइत छी?’ अनुनय करैत बजलीह। बादलकेँ विवेक जेना कतहु हेरा गेल छलμ‘एतेक बहाना नहि करु भौजी! अहाँकेँ हम खूब चीन्हैत छी।’ ‘बा...द...ल....’ बादलक विद्रूप हँसीसँ भौजी जेना विवश भ’ गेलीह। ‘अहाँ अपनाकेँ की बुझैत छी? छोड़ू हमर हाथ!’ ‘बादल...! भौजीक हाथ ओकर गट्टðा पर आर मजगूत भ’ गेल।’ ‘बी बात छैक बादल जी? अहाँकेँ...’ बादलकेँ जेना अपन होश हवास पर कोनो कब्जा नहि रहलैकμनहि छोड़ब? त’ लिय’...।’ भौजीक हाथ बामा हाथसँ कसि क’ मोचड़ि देलकμअपन हाथ उन्मुत्तफ क’ लेलक। भौजीक मुँहसँ एकटा पीड़ा निकलल ‘ओह!’ आ हुनक सौँसे चेहरा रक्तिम भ’ गेल। बादलकेँ की भ’ गेल छैक? ‘ई कुहरब काहरब नकल हमरा ल’ग किछु नहि चलत।’ बादल क्रोधावशमे माहुर भ’ गेल छलμओकर कंठ स्वर सौंसे आंगनकेँ प्रकम्पित क’ रहल छलμओ बिसरि गेल छल, हमर ई भौजी थिकीह, कोमल मसृण ओस सन मातृ तुल्य-ओ भैया छथि जे वर्दाश्त करैत छथि। हमरा सभ-आ आवेशसँ ओकर स्वर रु( भ’ गेलैक। ‘अहाँ की करितहुँ?’ भौजी पुछैत रहलीह। ‘हमμ? पूछू, की नहि करतहुँ? आन आन लोक संग टेलीपफोन पर एतेक हँसी, एतेक ठट्ठाμभैया नहि जनैत छथि तेँ ने? अहाँ भैयाक आँखि मे धूरा नहि झोँकेत छी की?μ अहाँ अपना केँ...... तावत बादलक गालपर पाछासँ दू-चारि चाट लागलμ‘बदतमीज बेहाया, अपन मातृतुल्य भौजीसँ उकटा पैंची क’ रहल छें? कोम्हर दनसँ भैया आबि गेल छलाह। थापड़ लगिते बादलक आँखि मे तरेगन नाचि गेलैक। बीचमे भैयाक हाथ पकड़ि भौजी बाजि उठलीहμ‘ई की करैत छी? बेटा सन छोट भाइ पर हाथ उठबैत छी’? ‘जे बेटा अपन माए पर कलंक लगबैक ओहि बेटासँ बेटा नहि रहनाइ नीक थिक।’ मुदा बादल, ओकर दिमाग जेना पगला गेल छलμ‘भैया, अहाँ भौजीसँ पूछू। एखन किछु काल पहिने ओ पफोन पर ककरासँ हँसि-हँसि गप्प करैत छलीह’? ‘अरे निर्लज्ज, मोन होइछ जाहि जुबानसँ ई प्रश्न निकलल, ओहि जुबानकेँ पकड़ि क’ खींचि ली.....। अहाँ के हमर सप्पत थिक। आब अहाँ शान्त भ’ जाउ। हमरा बेटा नहि अछि। हम बादलकेँ बेटासँ बढ़ि क’ मानैत छी। बेटा माएके किछु कहैत छैक त’ ओ कलंक नहि होइत छैक।’ आ भौजी पफपफकि-पफपफकि कान’ लगलीह। मुदा, भैया तमसायले स्वरमे बाज’ लगलाहμ ‘किछु काल पहिने तोहर भौजी हमरेसँ गप्प करैत छलीह। बुझलही, खाली तोहर विषयमे’! बादल अवाक् छल। ‘कहैत छलहु तोहर भौजी जे मेडिकल कॉलेजमे जेना होयत बौआक नाम अवश्य लिखायब। कम्पिटीशनमे नहि अयला त’ की होयतैक? जेना होयत, हम सभ टाका-पैसाक इंतिजाम क’ हुनका डॉक्टर बनायब।’ भैया दाँत पींसैत एक-एक शब्द पर जोर दैत बजैत रहलाह। ‘हम कहलियनि एतेक टाकाक इंतिजाम मुश्किल अछि! तोहर भौजी की जबाब देलकौ से बुझलही?μ अहाँक बैंक में पाँच हजार जमा अछिए। हमर गहना जेबर बन्हकी राखि दस हजारसँ उपर भ’ जायत। हम कतेक विरोध कयलहुँ जे बन्हकी नहि लगायब। अहाँक गहना पर हमर कोन अधिकार अछि? मुदा हमर सभ बातकेँ ओ हँसैत-हँसैत काटि देलनि-नाम लिखयबामे मात्रा दुइए दिन बाँचल छै! हम सभ गप्प क’ रहल छी बंधकी लगयबा लेल! एखन तुरंत अहाँ चल आऊ-।’ भैयाक गर बोझिल भ’ गेलनि।...‘आ एहिठाम तोँμबड़ नीक प्रतिदान प्रेमक दैत छलाह? तो ठीके पैघ आदमी बनबह। आ बादलकेँ काटू त खून नहि। रेतक ढेर...ढेर बिरहो ओकर आँखि कान, नाकमे भरि गेल आ बादलक दम औना रहल हो, घुटि रहल हो... ‘बाउ, चलू जलखै करबा लेल’ μओएह स्नेहिल स्पर्श.... २ सुजित कुमार झा- कथा
बंश
हमर दृष्टि तीव्र गती सँ पत्रिकामे प्रकाशित परिणाममे अपन रोल नम्बर ताकि रहल छल । अपन रोल नम्बर पर नजरि पड़िते हमर मोनमे ओहने खुशी भेल जेना कोनो सातदिनक भुखाएलकेँ आगामे छप्पन प्रकारक व्यंजन पड़ोसि कऽ कियो धऽ देने होइ । समिपमे बाबुओ जी आ माँ ठाढ़ रहथि । हुनको आँखिमे खुशीकँे सागर हिलोर मारैत कियो देख सकैत छल । मेडिकल प्रवेश परीक्षा पास कऽ गेल छलहुँ, एहि क्षणकँे प्रतिक्षो एक—एक पल एक—एक वर्ष जकाँ बितौने छलहुँ हम । सम्भवतः हमरोसँ बेसी एहि क्षणकेँ प्रतिक्षा माँ कँे छल । तएँ अनायासे ओकरोे मुँहसँ निकलि पडल ‘हमर बेटी कोनो बेटासँ कम अछि ? हाकिम बनि हमर खनदानकेँ नाम रोशन करत ।’ आखिर ई हमर सपना सकार कइए कऽ देखौलक ! ओकर एहि कथनमे खुशी छलैक रहल छल आ की खुशीसँ बेसी पीडा । हमर माँ कँे मनोभावकेँ बुझि बावुजी प्रेम सँ ओकर बाहि थपथपा देलन्हि । हमरा मेडिकलमे चयनकेँ खुशीमे बाबुजी सभकेँ मँुह मिठ करएबाक लेल मिठाइ लाबय बजार चलि गेलाह । माँ भानस घरमे चलि गेल । शायद ओ कोनो निक जलपान बना हमरासभकँे खुआ अपन खुशी व्यक्त करय चाहैत छल । हम अतितक पुस्तककेँ पन्ना उलटाबय लगलहुँ । जहिएसँ हम होशगर अर्थात बुझय बला भेलहुँ । अपन मायकँे दाइद्वारा प्रताडित होइत देखने छलहुँ । पहिने तऽ हमरा बुझबामे नहि आबय । आखिर हमर माँ हुनकर की बिगाड़ने छल , कोन कमी वा अपराधक कारण सदिखन दाइ आ पिसीकेँ व्यंग्य वाणक मारि झेलैत अछि माँ ? धीरे—धीरे हम बड़का होइत गेलहुँ आ पारिवारिक तथा समाजिक परिस्थितिकेँ बुझय लगलहुँ । दाइक आक्रोशक कारण हमरा बुझयमे आबय लागल । हम तीन बहिन छी । हमरा कोनो भाइ नहि अछि । दाइकँे दृष्टिमे माँकेँ कोनो बेटा नहि होएब सबसँ बड़का अपराध छैक । तेसर बेटी यानी हमर जन्म भेलाक बाद तऽ घरमे हंगामे ठाड़ भऽ गेल छल । दाइकेँ पुरा उम्मीद छलन्हि की अहिबेर लड़कँे हेतै, मुदा से भेल नहि । फेर लड़कीए होएबाक खबर सुनि ओ हमर मुँह देखब तऽ दूर, माँ कँे छठिहार दिनक बिध तक नहि करओलन्हि । बाबुजी अस्पतालसँ किछु दिनक बाद हमरा आ माँकँे घर अनने रहथि । माँ कँे दुःख जखन कखनो बाबुजी बाँटय चाहथि, हिम्मत नइ हारबाक बात कहथि हँसय हँसाबय कँे बात करथि, ओ दाइ कँे पसिन नहि पड़ैक आ मुँह बिचुका कऽ दाइ बाजल करथि, ‘ई जोरुकँे गुलाम अछि ।’ माँ एखन तनमनक पीडा सँ उवरलो नहि रहथि की दाइ अपन बेटा यानी हमर बाबुजी पर दोसर विवाहक दबाबक बात शुरु कऽ देलन्हि । दाइयक कहब छल, ‘आखिर बेटा बिना वंश कोना चलतै ?’ जखन बाबुजी दाइकेँ बातकँे अनसुना कऽ दैथ तऽ ओ हमर माँ पर तामस उतारथि ‘३÷३ बेटीकेँ जन्म देलक, एकटा बेटा जन्माओल नहि भेलन्हि ।’ तऽ कहियो कहथि ‘ई नहि होइ छन्हि की हमर बेटाकँे पिण्ड छोड़ि दैथ जहिसँ हम दोसर पुतहुँ लऽ आउ, पता नहि केहन सँ पाला पड़ल अछि । दोसर पुतौहँु बेटा जन्माबयकँे सर्टिफिकेट अपन संग लऽ कऽ औती ? अहि सभ गप्प सँ माँ भितरे—भितर टुटय लागल, मुदा बाबुजीकेँ दृढताक कारणे दाइकेँ एक्को नहि चललन्हि , एहि मादे । माँ बाबुजी कँे कतेकोबेर बतिआइत आ दुःखी होइत सुनने आ देखन छी । एखन तक हम बहुत सम्झदार भऽ गेल छलहुँ , पढाइमे हमर रुचिकेँ देख बाबूजी हमरा विज्ञान विषयसँ इन्टर करेलाक बाद मेडिकलकँे प्रवेश परीक्षामे बैसौलथि, जखन की हमर दूनु बहिनकेँ दाइक हस्तक्षेपक कारण माध्यमिक कँे बाद घरेमे बैसय पड़ल छल । दाइकँे माँ सँ कोनो सहानुभूति नहि छलैक, विवाह कएलाक बाद सासुर अयलापर माँ कँे नाम दाइ बौअसिन रखने छल । मुदा हमरा जन्म भेलाक बाद तऽ हुनकर नजरिमे अलक्ष्नी बाहेक किछु नहि रहि गेल छल । ओ अपन आक्रोश कोनो ने कोनो बहन्ना लगा कऽ उताडैÞत रहैत छली । आ माँ अपन व्यथा छातीमे दबा नोर पीबैत रहैत छल । माँ पर होइत अत्याचारकँे देख हम मनेमन एक संकल्प लेलहुँ आ ओकरा पुरा करबाक लेल जि जान सँ पढाइमे जुटि गेलहुँ । हमर मेहनत आ लगन सफल भेल आ आइ हमरा मेडिकलमे चयन भऽ गेल । हमरा चयनमे माँ केँ बड़का हाथ छलैक, जेकरा हम शब्दमे व्यक्त नहि कऽ सकैत छी । बाबुजी हाथमे कए प्रकारक मिठाइ लऽ कऽ एला आ खुशीसँ झुमैत कहलन्हि, ‘आइ हम अपन संगी साथी करकुटुम्बसभकँे मिठाई खुएबै । मीनाकँे जन्मपर तऽ घरमे मिठाइकेँ एकटा टुकड़ियो तक नहि आएल ।’ डाक्टरीमे हमरा चयन भऽ गेल ई सुनि दाइ सेहो अचंभित छली । हुनकर दृष्टिमे तऽ लड़कीकँे अधिक पढय सँ की लाभ ? आखिर लड़कीकेँ तऽ चुल्हे फुकयकेँ छैक । जे होइक , हम धरान मेडिकल कलेजमे पढय चलि गेलहुँ । छुट्टीमे जखन हम आवी तऽ दाइसँ विशेष रुपसँ भेटैत छलहुँ । धीरे—धीरे हम अनुभव केलहुँ जे लड़कीकँे प्रति दाइकँे धारणामे परिवर्तन आवि रहल छलैक । हमरा एकर किछु—किछु अनुमान तऽ छल, मुदा तइयो हम एकर कारण माँ सँ जानय चाहैत छलहुँ । ओ कहलक कि हमर पिसीकेँ लड़काकँे लालसामे एककेँ बाद एक करैत ५ टा लड़की भेलन्हि । छठममे लड़का भेलन्हि । एतेक ने लाड प्यार ओकरा देल गेल जे ओ बिगरि गेल । बड़का भेलापर ओ अपराधी प्रवृतिको निकलल । ओकर आदत आ व्यवहार सँ मायबाबुकँे ओकरा बेटा कहयमे लाज होबय लागल छैक । पाँच बरखकँे बाद जखन हम एमविविएस कँे डिग्री लऽ कऽ घर एलहुँ तऽ मायबाबुकँे सँग—सँग दाइकँे आँखिमे सेहो खुशी देख हम पुलकित भऽ उठलहुँ । एखन हमर संघर्ष जारीए अछि । आगा आओर पढिलिख कऽ सर्जन बनय चाहैत छी । दूनु दिदीकँे विवाह भऽ गेल अछि । आब बाबुजी हमर विवाह कऽ अपन उत्तरदायित्वसँ मुक्त होबय चाहैत छथि, मुदा हमरा सर्जन बनबाक इच्छाकेँ देखैत हमर माँ मात्र नहि दाइ सेहो हमरा आगा पढावयकेँ लेल बाबुजीकँे मनौने छल । आइ कठिन परिश्रमक बाद हम एक कुशल सर्जन बनि गेल छी । दाइकँे अल्सरक अपरेशन हम स्वयं अपने हाथसँ कएलहुँ अछि । आब हमर दाइ बेटाकँे वकालत नहि करैत अछि । आब तऽ ओ कहल करैया बेटा हो वा बेटी कूलकँे मर्यादा हेतु शिक्षा आ संस्कार आवश्यक अछि । एकर अर्थ हम बढिया जकाँ बुझैत छी, मुदा जखन दाइ बजैत अछि तऽ खुशीकेँ ठेकान नहि रहैत अछि । ऐ रचनापर अपन मतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। हम पुछैत छी: मुन्नाजी पुरनके जमानासँ लिखैत, नव कालमे देखार भेल दिग्गज कथाकार श्री धीरेन्द्र कुमार जीसँ मुन्नाजी पुछलनि हुनक संपूर्ण कथा यात्राक तीत-मीठ अनुभव जे प्रस्तुत अछि अपने सबहक सोझा- (1) मुन्नाजी- धीरेन्द्रजी प्रणाम! अहाँ आइसँ कतेक दशक पहिने “मिथिला मिहिर”क माध्यमे कथा-यात्रा प्रारम्भ केलौं। पहिल कथा कोन आ कहिया छपल? धीरेन्द्र कुमार- नमस्कार मुन्नाजी, हम सतरि दशकसँ लिखब शुरू केने रही। रमानंद रेणुक सानिध्य भेटल छल। मिथिला मिहिरक सम्पादक भीमनाथ झा पहिल पहिल कथा प्रकाशित केने छलाह। पहिल कथा कोन अछि से मोन नै अछि। (2) मुन्नाजी- एतेक पहिने प्रारम्भ भेल कथायात्रा आगू चलि किएक ठमकि गेल ओकर कोनो विशेष कारण तँ नै? धीरेन्द्र कुमार- 92क बाद हमरा लागल छल हम जे लिखै छी ओकर पढ़ुआ कम लोक छथि आ कथामे जे कथ्य होइ छै ओ समाजक प्रत्यक्ष स्तर कम अबैत अछि। ओकर बाद भारतीय कम्युनिष्ट पार्टीसँ प्रभावित भेलौं आ ए.आइ.टी.सी.सँ सम्बद्ध भ' जमीनपर काज करए लगलौं। 1995-96मे आकाशवाणीसँ कथा-वाचनक आमंत्रण भेटल छलए, जत' अधिकारीसँ वाद-विवाद भ' गेल। ओ अधिकारी के छलाह मोन नहि अछि। हँ, सीताराम शर्माजी ऐ गप्पक संकेत पहिने द' देने छलाह। हमरा प्रतीत भेल छल जे अन्याय आ भ्रष्टाचारक विरूद्ध जँ किछु क' सकी सएह सार्थक। (3) मुन्नाजी- अहाँ जहिया कथा लिखब शुरू केलौं तहिया आओर आजुक कथा रचनाक तुलनात्मक परिवेश केहेन देखना जाइछ? धीरेन्द्र कुमार- भाषा जीवंत होइ छै। तै समैमे अधुनातन प्रयोगक आभाव छल मुदा आइ साहित्य समाजक संगे ताल मिला क' चलि रहल अछि। तै लेल आजुक रचना सभ दृष्टव्य अछि। (4) मुन्नाजी- अहाँ एखन धरि कतेक कथा लिखलौं आ कतए-कतए छपल, पुन: रचनात्मक मुख्यधारामे जुड़बाक सुत्र की छल? धीरेन्द्र कुमार- करीब पचास कथा प्रकाशित अछि। मिथिला मिहिर, मिथिला दर्शन वैदेही आदिमे। विभूति आनंदक तगेदा आ उमेश मण्डलजीक सम्पर्क हमरा कलम पकड़ा देलक। (5) मुन्नाजी- अहाँक कथाक रचनात्मक प्रक्रिया केहेन कथानकपर केन्द्रित रहैछ आ तकर की कारण? धीरेन्द्र कुमार- उदात-प्रेम आ समाजक छोट-छोट दुख जे प्रत्यक्षत: देखबामे कम अबैत अछि। हम समाजक निम्नवर्गमे तथाकथित समाजसँ गिनल जाइ छी ओहो गरीब परिवारमे जन्म। गरीब संगे उठनाइ-बैसनाइ। ऐमे ग्लानि नै आनि कमजोर बुझै छी। (6) मुन्नाजी- अहाँ मैथिली रचना आन्दोलनमे जातिवादी वा समूहवाजी फाँटकेँ कोन नजरिये देखै छी, की ऐसँ प्रभावित भऽ अहाँक रचनात्मक धारासँ पुन: हेरा जेबाक वा बिला जेबाक संभावना तँ नै देखाइछ? धीरेन्द्र कुमार- मैथिली रचनामे आ प्रोत्साहनमे गुटबंदी, राजनीति अवस्य अछि। हिंदी साहित्योकेँ इतिहास देखल जा सकैत अछि। मुदा हम ऐ गुटबंदीसँ प्रभावित कहियो नै भेलाैं। हमरा संगे, अग्नि पुष्प, नरेन्द्र झा, उदय मिश्र, विभूति आनंद, शैलेन्द्र, रतिनाथ, साकेतानंद, प्रभास कुमार चौधरी, मोहन भारद्वाज, ज्योतिवर्द्धन, शैवाल सभ संगे रहलौं। रचनात्मक स्तर आ व्यक्तिगत स्तरपर हम कहियो उपेक्षित नै भेलाैं। दमदार रचना आत्मतोष अवस्स पहुँचबैत अछि। ओकरा कोनो गुटबंद सदाक लेल झांपि नै सकैत अछि। हँ तखन किछु समए तँ जरूर अपना प्रभावमे दाबि वा कतिया सकैत अछि जे बेबस्थाक दोष भेल। ओना हमरा एकर कोनो भय नै अछि। रचना हमरा लेल स्वांत:सुखाय अछि। (7) मुन्नाजी- गएर बाभनक रचनाकारक समूहक सक्रिय उपस्थितिसँ अहाँ अपनाकेँ कतेक प्रभावित मानै छी, ओकरा माध्यमे अपन गातक मजगुती देखाइछ वा प्रतिद्वन्दिता? धीरेन्द्र कुमार- एे प्रश्नक जबाब ऊपर आबि गेल अछि। (8) मुन्नाजी- कथाक अतिरिक्त आओर की सभ लिखै छी, तकर की कारण? धीरेन्द्र कुमार- रचनाकार कोनो विधा किए लिखै छथि ई िनर्भर अछि अभ्यास, कुशलता आ सहजतापर। जँ कौशल अछि तँ किछु लिख सकैत। एम्हर नाट्य विद्यालय दिल्लीसँ सम्पर्क भेलापर नाटक दिस रूझान भेल। नाटकमे परिस्थितिजन्य गीत होइत छैक- तँए कविता। (9) मुन्नाजी- नवतुरक रचनाकारक प्रति केहेन अभिव्यक्ति रखैत छी ऐसँ केहेन आशा देखाइछ? धीरेन्द्र कुमार- नवतुरिया रचनाकारसँ आशा अछि। पहिने ज्ञानवर्द्धन, शास्त्रक ज्ञान, समाजक अनुभव, जटिल मनोवृत्तिक अध्ययन आ अन्य भाषाक साहित्यक ज्ञान प्राप्त करताह। जिज्ञासु हृदेसँ दुनियाकेँ देखताह, नवीन प्रयोगसँ कथ्यक प्रस्तुितकरण करताह। तै दिस नवतुरक रचनाकारमे किछु प्रयत्नशील छथि। ऐ रचनापर अपन मतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। मुन्ना जी मुन्नाजीक दूटा विहनि कथा नियंत्रण माइकल घरमे वापिस अबिते छितराएल चीज सभ देखि चित्कारि उठल- “ ओह गॉड! द्रौपदी, जकर सबहक किरदानीक फल छौ ई तीनटा बच्चा ओकरे सभ लग ऐ तीनूकेँ छोड़ि कऽ आएल कर काज करबाक वास्ते। नाइ जानि कतेक दुरखा लागि जनमओने हएत एतेक बच्चा!” “ चुप्प रहू मालिक, बहुत बजलौं। हमर सबहक घरबला एखनो धरि मुट्ठीयेमे रखै छै हमरा सभकेँ। मालकिन जकाँ छुट्टा हम सभ नै छिऐ।“ “गै, देखै छीही अपन मलकीनीकेँ एकेटा बेटीमे प्रसन्न! इएह तँ फाँट देखबैए बड़कबा आ छोट घरक बेटी-पुतौहमे।” “नै मालिक, दुनू घरक पुतौह, पुतौह जकाँ नै र्है छै। अन्तर छै दुनूमे- छोटकाक पुतौह जन्मा लै छै आ बड़काक पुतौह खसा लै छै।” टकटकी बेरा-बेरी लोकक जमा भेल भीड़क सोझाँ ठोहि पारि कऽ कानए लागल छल ओ छौड़ी। कियो किछु पुछै तँ उतारा नै दऽ सबहक दिस टुकुर-टुकुर तकैत रहैत छल। भीड़ बढ़ैत जा रहल छल...मुदा सभ मूक दर्शक बनल। निःशब्द भीड़मेसँ आब शब्द बहरेलै- “गै, ई कह जे तोहर नाम ठेकान की छौ?” -यौ, छोड़ू, की करब नाम ठेकान बुझि। -तोरा घर तक पहुँचा देबौ। -यौ, हमर नै आब कियो सहारा बचल आ ने कोनो ठेकाना। हम तँ दंगा पीड़ित शिविरमे सँ भागि एलौं अछि। -किए भगलीही, अपन जान बचेबा लेल? -नै यौ। अपन सम्पत्ति बचेबा लेल। -आँए, तहन तोँ अपन गाम-घर जो ने अपन संपत्तिक रक्षार्थ। -गाममे किछु कहाँ बाँचल अछि, जे किछु संपत्ति शेष अछि ओ तँ हमरे लग अछि आ तकरे बचेबा लेल तँ गामसँ भगलौं। -कत्तौ कियो रक्षक नै देखाएल! -के पुरुख राखत तोरा, जे राखत ओहो बदनाम भऽ जाएत। ठठा कऽ हँसैत- -यौ, जँ पुरुख सभकेँ बदनामीक कनिको डर होइतै तँ गामसँ परदेश धरि हमर संपत्तिक नोचा-नोची नै ने करतै? भीड़ उछहि गेल। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। ३. पद्य ३.१. १.संस्कृति वर्मा, २. चन्दन झा ३.२.गंगेश गुंजन- राधा ३०म खेप ३.३.जगदीश प्रसाद मण्डल- कविता/ गीत ३.४.राजेश मोहन झा- कविता-मुस्की रहल उदासे ३.५.गंगेश गुंजन- गीत ३.६.१. डॉ. शेफालिका वर्मा २. प्रभात राय भट्ट ३.७.१. राम विलास साहु- नैनाक खेल ३.८.१.संजय कुमार मण्डल, २. संजय कुमार झा १.संस्कृति वर्मा, २. चन्दन झा १ संस्कृति वर्मा हमर देश हम सब भारत केर संतान छी जगमग धरतीक ख़ुशी महान छी हिमालय पर्वत स निकलैत गंगाक पावन धार छी हमर भारत देश महान सब से सुन्दर ,सब से प्यारा हमर देश सब ठाम से न्यारा.. रंग रंग के फूल खिलल अछि चलि रहल सुंदर सुखद समीर जन जन के मोन में सत्य , शिव आ सुन्दर क भाव भरल अछि ... उत्तर में कश्मीर - फूल क घाटी दक्षिण में कन्या कुमारी क पैर छुवैत सागर अछि रंग रंग क वेश भूषा में एकताक सूत्र में बान्हल ई हमर देश भारत अछि ........ २ चन्दन झा पिता श्री मदन मोहन झा, बाबा- डॉ. उपेन्द्र नाथ झा, गाम- लोरिका, भाया-बेनीपट्टी (मधुबनी) बीतल माघ फागुन आयल बीतल माघ फागुन आयल फूलसँ लहरैत खेत जगमगायल जीवनमे रस भरि आयल ढलैत ठंड तपैत धरती सरसों अलसी राहरि गहूम ऊघि-ऊघि सभ घर आनत रोटी दुनू साँझ पकायत काजल नैना पेट भरि खेती फसल अछि नीक खाइ भरि कऽ खेत न आइत जाइत कियो आ करू मजदूरी जा हम ओ सभक सभ घरपर रहता नैना माइकेँ हम कहबनि ओ रोज खेत पर आबथि साथ लगा देबैन काजर नैनाकेँ जे किछु बेशी धन लौती चाहथि भगवन यदि तँ अगहनमे पहुना औता अबकी बेर बड़की बेटीक हाथमे हरदि लगबायब केथरी-कंबल साठ जे लेता माघक रैना गुरगुर करता २ संस्कृतिक विडंबना संस्कृतिक विडंबनाक जखन जखन अहसास होइए एकटा प्रश्न बेर-बेर हृदएमे तीर जकाँ चुभैए हिंदी आ अंग्रेजीक बरसातमे मैथिली भाषा मलिछोंह भऽ गेल कोनबलाक कारण अपन संस्कृति अनचोक्के हेरा गेल की भेल एहन जे अपन चन्दन गावर भय गेला शब्दक असरि हेरा गेल परिभाषा मलिछोंह सन भऽ गेल कहा गेल ओ पत्थरक पता चतुरताइ हवा भऽ गेल की भेल एहन जे अपन चन्दन गावर भऽ गेल .. ऐ रचनापर अपन मतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। गंगेश गुंजन राधा ३०म खेप अखन धरि अहाँ पढ़ने रही... ..अपन एकान्ती जीवनक सीमित अनुभव यथार्थ तकर संवेदनाक प्रवाह बनैछ, उद्यत करैत अछि मनुखक एक वचन मनक बहु वचन समाज, समाजक बड़ विराट संसार प्रसारित करैत, बनबैत अपन कर्म सप्रसंग ! आब आगाँ... कोनो प्रसंग मे की क' जाइछ मनुष्य कोनो प्रसंगें की भ' जाइछ मनुष्य सेहो एकटा विचित्र प्रहेलिका थिक देखबा मे जे यथार्थ बुझाइत अछि बेशी काल से नितान्त अपूर्ण आ भ्रामक निकलैत अछि तें तर्क निष्कर्ष प्रयत्न बड़ सार्थक कम संदेहास्पद अधिक होइत अछि ई सबटा मनुक्खेक द्वारा मनुक्खेक होइत अछि एही दशा दिशा मे लोक पर पीड़न सँ ल' आत्म पीड़नक रोगी बनि जाइत अछि उपचारक उपहास कर' लागि जाइत अछि आ दुःखक उपभोग कर' लगैत अछि। भोग नहि, उपभोग। सात रंग सुन्दर सृष्टि कें एक रंग पीयर-पीयर आ रुग्ण देख'-बूझ' आ कह' लगैत अछि, मनुक्ख नितांत अपन झीवन-भोगक आँखियें, भरि समाज संसार कें देख' आ बूझ' लगैत अछि, अपन सैह नियति बना लैत अछि, सबटा ओहन यथार्थ जे ओकरा अतिरिक्तो सौंसे समाजक लोकक किछु यथार्थ सेहो होइत छैक-भ' सकैत छैक तकरा पर ध्यान देब तँ भिन्न ओकर अस्तित्वे सँ अनभिज्ञ होइत चलि जाइत अछि प्रति पल,दिन,मास वर्ष, आयु स्वयं अपना चतुर्दिक एकटा रोगाह परिवेश निर्मित कर' लगैत अछि आ बाँचल अपन समस्त जिजीविषा-ऊर्जा कें एहि बुद्धिये दिशा मे सक्रिय क' लैत अछि मनुख्ख अपने विरुद्ध अपना चारू कात बन्धन बान्हि लैत अछि। अपन गति, अपन सहज जीवन-प्रवाह कें अनेरेक अवरोधक पहाड़ी चेखान सभक अपनहि निर्मित बाधा सब सँ कुंठित क' लैत अछि। अपन से कुंठा अपन स्नेही,संबंधी, सौंसे समाज पर उगलैत रहैत अछि। जत'-जत'सृजन छैक ओत' ओत' संहारक ब्यौंत-वातावरण बनब' लगैत अछि। अपन, नितांत अपन कुंठाक माहुर -मनें ओ अपना अतिरिक्त सभकें कलुषित, जीवन विरोधी आ अमानुष बुझबाक तदनुरूपे आचरण करबाक एकटा दुःस्वभाव बना लैत अछि, सबकें व्यर्थ ,बाहरी लोक बना देबाक अपनहि सक्रिय मनोदशा मे, अपनहि असकर एकान्त तथा दयनीय बनि क' रहि जाइछ, से ओकरा बुझबा मे अबैत नहिं छैक। नहि बुझबा मे अबैत छैक जे ओ भ' चुकल अछि -रोगी, मनोरोगी ! देह-रोग सँ बहुत बेशी, बहुत गंभीर मनोरोग...' -' तँ कि हम मनोरोगी भ' गेलौंहें, हम ?' अकस्मात् राधाक प्राण चौंकल। स्वयं के पूछ' लागल यैह टा प्रश्न ! गुंजित-अनुगुंजित-प्रति गुंजित... बड़ आर्त स्मरण कएलनि- ' हे कृष्ण' किछु नहि हएत, कृष्ण कें बजौलहु सँ हएत नहि किछु, आने जेकाँ हुनको छनि आब कम्मे फुरसति बहुत रास छनि कपार पर काज, उत्तर दायित्वक पैघ संसार हुनको आखिर चाहियनि अपन काज-कर्तव्य सँ अवकाश हुनको संसार मे बहुत किछु घटित भ' रहलनिहें न'व हुनको मोनक स्थिति आब नहि छनि स्वाधीन, ने छनि किछुओ नितांत मनमौजी-अपनहि सुखक संग रहब संभव नहि छनि हुनको लेल ओहो अपना प्रकार सँ फिफियाइत रहैत छथि, छुच्छ गाय चरायब आ बँसुरी बजायब नहि रहि गेलनिहें हुनक एकमात्र काज। माखन चोरायब भ' रहल छनि दुर्घट ! गाम मे कम दूध देब' लगलैक अछि सभ घरक गाय, दुब्बर भ' रहलैए नेरू-बाछी, गायक हुकड़ब नहि रहलै आब असंभव, भ' रहल छैक आइ काल्हि बेसी काल । सुन्नर कोमल गुड़कुनियाँ लैत नेरू पर्यन्त भ' रहलैक अकाल काल कवलित अपना मायेक सोझाँ देखैत गाय माय होइछ मनुक्ख नहि, मनुक्कक माय कें पर्यन्त यद्यपि सह' पड़ि रहलैक अछि-संतान शोक ! चर-चाँचर सभक हरियरी जानि नहि कोन अदृश्य महापशु अन्हरिया, चरि क' चलि गेलय केकरो नहि ज्ञात। सौंसे फाटल शुष्क माटिक धरती पर पीयर-पीयर सुखएल खुट्टी-खुट्टी चलैत पएर सभक तरबा मे गड़ैत जे यमुना अपना कंठ धरि ऊपर आबि क' द' देत छलीह समय-समय पर हुलकी, स्वयं दूबरि गता, स्थिर भेलि स्तब्ध छथि। धार-कातक सघन रंग लता-वृक्ष ? केहन भेल श्रीहीन तट ! स्तब्धे अछि बेसी बस्तु। मथुराक बेशी घटना स्थल, लोक लोकक आचार-व्यवहार स्तब्ध' । कोनो परोक्ष बोझक त'र प्रतिपल दबायल जाइत .. ककरो नहि भ' पाबि रहलैये अंटकर एकर कोनो अनुमान। अपना-अपना घर मे सब क्षुब्ध बैसल। हेराएल छैक ज्ञान ! पूछ' चाहैत अछि सब एक दोसरा कें मुदा पड़ितहि ओकर आकृति अपना सोझाँ, बदलि जाइत अछि लोकक मन ओकर उदासीक ध्यान भम पड़ैत अछि मोन,मोनक उदासी सँ भरल सब दलान कृष्ण एही सब मे छथि ओझरायल करैत आवश्यक अनुसंधान कृष्ण छथि किन्तु अन्यथा सेहो हरन-फिरीसान जेना साँस कोनो आन देह ल' रहल हो अन्त' जेना देह कोनो आन नाक सँ घिचि रहल हो साँस जेना देह हो कतहु, क्रिया आ स्पंदन होइत हो कतहु अन्त' जेना राधा छथि अपना आँगन एकान्त मे कृष्ण अपना कर्म, क्रिया-कलापक संसार मे अपस्यांत होइत परस्पर एक दोसरा सन करैत क्रिया अप्पन-अप्पन काज कतहु कारण कतहु ओतहु सेह, सैह एतहु ककरा लेल के अछि विकल-बचैन ककरा लेल ककरा ननहि अबैत छैक कतेक दिन सँ चैन निर्णय करब अछि असंभव। एना किएक एहि समय मे बेसी रास बात जे, नितांत छल सहज संभव, भ' गेलय निठ्ठाहे असंभव, हाथ सँ बाहर, बेहाथ ! स्थिति यैह यैह स्थिति दू टा पीठ दू टा विरुद्ध बेशी किछु विरुद्ध किएक भ' रहलय एहि युगक बेसी विषय भाव आ वस्तु एना विरुद्ध... ऐ रचनापर अपन मतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। जगदीश प्रसाद मण्डल- कविता/ गीत मधुमाछी पुष्प रस पीब मधुमाछी मधुर चालि चलए मधुमास मोहि-मोहि रस बना मधु बिलहए उपकारक आश माछी रहितौ तान मारि-मारि गबैत जिनगीक गीत वायु सदृश्य गंध पसारि बनैत सबहक हित डंक रहितौ डंकिनी नै जोगा मधु मधुरानी सबहक सिनेह पाबि राति-दिन महतानि बनि कहबए रानी महलक बीच संग-संग बाँटि काज चलबए दरवार जे जेहेन से तेहेन करि पबैत स-मान परिवार उपैत धन जोगा-जोगा महल बीच सजबए रानी सबहक सभ छी सभ छी एक मुस्की दए-दए सुनबए रानी कियो उपैत, करैत कियो रक्षा कियो पसारए परिवार एक सुत्र संचालित भऽ हँसैत-बजैत वारम्वार अजगुत मोहनि छाती सजा सृजति नाजूक परिवार हराएल-ढराएल बाजि-बाजि नित सजबए राज-दरवार तियाग-तपस्या समेत बीछ जोगबए मान-सम्मान जे लेलौं से देने जाइ छी नै कहब िकयो बइमान की लए एलौं की लऽ जाएब जानए जागल नैनि घर नै सजने बनबै केना सजल घरक गिरथानि आबो सुनू, सुनू आबो छाती फाड़ि कहै छी अपने केलहा छी भागी सदएसँ सुनै छी पौरूष पाबि पूजू विवेक लाज जेकर जेबर छी डेगे-डेग सम बना चालि दिन-राति सजबै छी जे जे छी से से सएह छी परखु अपन-अपन सीमा ककरो मनमे ई नै उठए भसिया गेल बालुक सीमा कालक टूकड़ी सभकेँ भेटल अपन-अपन छी रक्षक कलंकक मोटरी बान्हि जुनि हँसाउ नाओं बनि भक्षक देव कतए दानव अछि कतए दुनियाँक सभ लीला छी बेमत भऽ इन्द्रिय घोड़ा दानव देव बनै छी। (श्री गजेन्द्र ठाकुर जीकेँ सादर समर्पित....।) २ श्री नागेन्द्र कुमार झा जीकेँ समर्पित- भुताहि गाछी बीया उगि अकुर-अकुर बढ़ैत बनि बनल गाछ पुरूष संग पौरूष पाबि बनाओल जिनगीक आस। सोन्हि सिर सन्हिया धरतीमे उठा पाएर सुन-सान अकास संगी सजि चलि दुओ संगे बैस गेल धरती ओ अकास। डेगे-डेगे डगर निरमा नै जेकर ओर-छोर तृप्त चित्त बैस सरोवर मढ़ै-गढ़ै साँझ-भोर। घाट पहुँच देख तुलसी अनन्त सरोवर झील उमरि-घुमरि गाबै वसन्त हुलसि-हुलसि भऽ तुलि। अश्रु ओस सजि अनन्त कमल लगबै भोम्हरा छाती विष-अमृतक सेज सजा प्रेम पसारि दिन-राति। बाँसक घर देख भोम्हरा भोमहैर बनाओल माटि मुसरी ढहि डगर हुच्ची बनिते संग नचए लगल टुसरी। अपन सुख सिरजैले उजाड़ि-उजाड़ि दोसरकेँ वंश उजाड़न भेल बनौनिहार क्षण-पल मेटबै दोसराकेँ। हुच्ची खसि हिया हारि लगल तियागए जान-परान एका-एकी मेटए लागल हँसैत-खेलैत खनदान। पावसक परसाद पबए हँसि-हँसि आबए भूत पाबि परसाद पौरूख जगिते बनि बदलि यमदूत। मिल सभ यमदूत निरमा जौ-तिल चढ़बए यमराज साटि-साटि सहे-सहे नैयायिक बनाओल धर्मराज। अकास-पतालक बीच रचि जिनगी-मृत्युक संसार स्वर्ग-नरकक बीच बाँटि लीला शुरू भेल अपरमपार। नि:सहाय निरीह धरतीकेँ बनाअोल भोगक चास तामि-कोड़ि परती-पराँत ऊँचगर बनाओल डीह-बास। जामुन चढ़ि यमदूत हँसए बना बास देवी फुलवारी जीन पसरि धरती चुमए भूत लपैक बीट बँसवारी। देख दशा गाछी-विरछीक लगौनिहार भऽ गेल बताह होइबला कहाँ होइ छै कानि-कुहरि भरए आह। अबोध कुहरि बोध कुहरि कुहरि भरए आहि सिहरि-सिहरि सिसकै विवेक बनि गेल गाछी भुताहि। भूतक डर ककरा ने होइ छै बूढ़ हुअ आकि जुआन मुदा भूत तँ भूते छी जिन्दा रखैत सदति धियान। ऐ रचनापर अपन मतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। राजेश मोहन झा 'गुंजन' मुस्की रहल उदासे डोलि पत्ता, छिती-तित्ती चाेरि आर नुकैआ सिखलौं ककरहा देखिते भेलौं दूसरा पासे छलौं लड़कपनमे खेलैत बचपनमे की जानी ने की भ' गेल मुस्की रहल उदासे। दिन कटै छल साग तोड़ैमे राति बिताबी मायक कोरमे मुँहक लाली पीयर भ' गेल सीताक जीवन जकाँ वनबासे। आठ बयसमे मॉग भराएल कन्यादानक अर्थ नै बुझलाैं तैयो देव नै देखला लाली चान बिनु जेना अकाशे। झहफल सन प्रभात बनल छी बैशाखक पत्रहीन गाछ बनल छी नै देखलौं सिनेही वसंतकेँ नोरक पारण जेना उपासे। अपन वेदना कहू ककरासँ? दुष्ट समाजक रीति घेरने अछि जड़ल भाग्य पजड़ल अछि जीवन सुक्खल कली बिनु रवि-प्रकाशे। अपरोजक आ डाइन कहाबी कछमछ जीवन डगराक बैगन विधाता हमरा अपन संग लगाबथु देह निष्प्राण मुदा संग अछि सांसे। ऐ रचनापर अपन मतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। गंगेश गुंजन गीत १
दुर दुर छीया छीया छीया अपना घर मे पैसारी क’ गेलय एक अनठीया
आन कोनो नहि बात लाभ कामनाक कारण ध्ुरखुर पर बाड़ल जाइए अनकर माटिक दीया
स्नेह प्रेम सौहार्द्र लगा देलौंहें सबकिछु भरना देखब बेचि घरारी एक दिन खेत-पथारो सबटा
प्रेमक मार्ग कांट कुश उपजल खद्ध-खुद्ध्ी लतखुर्दनि संबंध् स्वकीया अभिनन्दित परकीया
पिफरीशान छथि बेशी अपनहि स्वजन लोक सं पूछि-पूछि हलकान कहू जे-स्नेह काहे को कीया
आब समाजक रुचि रुझान अपने दोसर दिसि तुच्छ बात पर झगड़ा-झंझटि कतेक हो तसपफीया
तें हमरे नहि चित्त गंुजनोक आंदोलित छनि प्रति पल मन विरुद्ध् युग मे जरैत रहै छनि हीयक २ अहांक बात तं अहां जानी अनेरे भेल हमर बदनामी
ओना तं चुप रहबाक सप्पत छल बीत जाय किछु दःुख मे नहि कानी
से निबाहल नहि तें ई दुनिया गढै़ये नित्य नवे नब कहानी
जे भेल-भेल तमाशा एक रतीक रागा रागी तं ऐपर नै ठानी
तंग बड़ हाथ मोन विकल अहुंक बजार नित्य महग भेल की आनी
तैयो अनुरोध् अहांक दोखी हम वचन रहय ने ठोढ़ पर आनी ऐ रचनापर अपन मतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। १. डॉ. शेफालिका वर्मा २. प्रभात राय भट्ट १. डॉ शेफालिका वर्मा हम आबि रहल छी.. ........ माँ ! अहाँ किएक कानि रहल छी कोन सोच में डूबल छी शक्ति रहितो अशक्त बनल छी हम सबटा जनैत छी सबटा बूझैत छी ................. अहाँ स्वयं के मेटी आन के बनव चाहलों लोक बनैत रहल ,अहाँ मिटैत रहलों ई की अहाँक त्याग नै थीक माँ ? ------हम चौंकी उठलों ..अहाँ के छी कत स बाजि रहल छी ?? माँ - हम अहांक कोखि में छी अहाँ हमरा नहि चिन्हलों.. हम अहींक गर्भ स बाजि रहल छी अहाँ चोंकि किएक गेलों अहींक तं प्रतिकृति छी हम \ हमर दादा दादी स डरा गेलों माँ फेर बेटिय भेल के दंस स तिलमिला गेलों घाह घाह भेल अहांक अंतर हम देखने छी ...किन्तु, अहाँ हमरा नष्ट नहि करब माँ हम अहांक हिस्सा छी अहांक अपूर्ण कामनाक पूर्णता छी हम जनैत छी हमर माँ नै कान्तिह बाबु उदास नै हेताह एखनही त एकटा माय बाबु अपन विकलांग बेटी के योग्य बना देलनि बेटी की होयत छैक जमाना के देखा देलनि अहांक विहुँसैत चेहरा हमर ताकत बनत हम आबि रहल छी माँ अहाँ जत जत हारलों अपन आन में उन जकां ओझरेलों हम ओते ओते जीती के देखा देब सबटा सम्बन्ध सोझरा लेब हम आबि रहल छी माँ .................... २ ठप्पा अहांक गाम कते अछ प्रश्न सुनतही अकचका गेलों हम कनिक काल सोचैत --- हमर गाम ?? उयेह ने जाहि ठाम अपन घर होयत छैक ? हं हं उयेह घर ,उयेह गाम ! हमरा ते दू टा गाम अछ .. एकटा जते से हम आयल छी दोसर हम जते एलहुं अछ मुदा, एहि में हमर कोन अछ हम नै बूझैत छी जते स हम एलों ओते स सनेस बारि द हमरा विदा क देल गेल 'जाह अपन घर बेटी' जाहि ठाम आयल छी ओहिठाम सब सनेस बारी बिल्हल गेल 'कनियाक गाम से आयल छैक' हम की जाने गेलों हमर गाम कोन थीक हमरा नाम पर ते कत्तो किछ नै भरल पुरल घर में हमर अस्तित्व किछ नै बस 'फलना गामवाली' बनि रही गेलों जाहि ठाम स आयल छलों ओहि गामक ठप्पा बनल रही गेलों............ २ प्रभात राय भट्ट, ग्राम: धिरापुर - २, जिल्ला महोतरी ,अंचल जनकपुरधाम, नेपाल पिता :-श्री गंगेस्वर राय (शिक्षक ) माता :-श्रीमती गायत्री देवी (समाज सेविका ), शिक्षा :-आई .ए., भूतपूर्व पेशा :- नेपाल ट्राफिक प्रहरी , वर्तमान पेशा :आर्म्ड फ़ोर्स (अमेरिकन राजदुतावास ,साउदी अरबिया ) कुमारी धिया
सुनु सुनु यौ मिथिलावासी आऔर मिथिलाक बाबु भैया !!
संगी सखी सभक भेलई ब्याह, हमर होतई कहिया !!
तिस वरखक भेली हम, मुदा अखनो रहिगेली कुमारी धिया !!
हमरा लेल नए छाई संसार में, एक चुटकी सिंदुरक किया !!
रोज रोज हम सपना देखैत छि, डोली कहार ल्या क ऐलैथ पिया !!
आईख खुलैय सपना टूटईय, जोर जोर स: फटईय हमर हीया !!
गामे गाम हमर बाबा घुमैय,ल्याक हाथ में माथक पगरी !!
कतहु वर नए भेटैय,की विन पुरुख के छई यी मिथिला नगरी ?!!
बेट्टावाला केर चाहि पाँच दश लाख टाका आ गाड़ी सफारी !!
तिनचाईर लाख टाका ऊपरस:जौ चाहैछी जे ओझा करे नोकरी सरकारी !!
अन्न धन्न गहना गुरिया एतेक चाही जे भईरजाई हुनक भखारी !!
बेट्टीवाला दहेज़ में सबकुछ लुटा क अपने भजाईत अछि भिखारी !!
बाबा हमर खेत खलिहान बेच देलन आ बेच रहल छैथ अपन घरारी !!
अहि कहू यौ मिथिलावासी आऔर मिथिलाक बाबु भैया !!
कतय स:देथिन बाबा हमर दहेज़ में एतेक रुपैया !! बालविबाह हम नए ब्याह करब यौ बाबा वालीउमरिया मे !!
पढ़ लिख खेल कूद दिय,हमरा अपन संग्तुरिया मे !!
--निक घर वर भेटल छौ,दहेज सेहो कमे मंगैछौ !!
आगुम की हेतै से नए मालूम,ब्याह करहीटा परतौ !!
ब्याह करहीटा परतौ गे बेट्टी.........................!!
--हम चौदह वरखक कन्याकुमारी अहाक राजदुलारी !!
मुदा दूल्हा छैथ विदुर आ पाकल हुनक केस दाढ़ी !!
हम नए ब्याह करब यौ बाबा वालिउमरिया मे २ !!
--दूल्हा विदुर भेलई तईस: की धन सम्पति अपार छई !!
भेटतौ नए कतौ एहन घर वर दूल्हा सेहो रोजगार छई !!
--रुईक जाऊ रुईक जाऊ बाबा यौ हमरा पैघ होब दिय !!
पैढ़लिख क हमरो कोनो सरकारी नोकरी करदिय !!
बेट्टावाला अहाक दरवाजा पर अओता !!
कहता अहाक बेट्टी स:हम अपन बेट्टा क ब्याह करब !!
अहा कहब नै नै अखन हम बेट्टी क ब्याह नए करब !!
फुइक फुइक क चाय पीयब ,अहू किछ शान धरब !!
हम नए ब्याह करब यौ बाबा वालिउमरिया मे !!
--एक लाख टका के बात कहले तू भगेले सयान गे !!
बेट्टी क भविष्य नए सोचलौ,हमही छलौ नादान गे !!
बेट्टी क ब्याह कोना हयात सतौने छल हमरा दहेज़ क डर !!
बाल विबाह करबई छलौ,खोईज लेलौ बुढ्बा वर !!
नए ब्याह करबौ गे बेट्टी तोहर वालिउमरिया मे !!
पढ़ लिख खेलकूद तू अपन संगतुरिया मे !! बालविधवा आहा जे नई भेटतौ त जिनगी रहित हमर उदास !! सागर पास होइतो मे बुझैत नई हमर मोनक प्यास !! अहि स पूरा भेल हमर जिनगी केर सबटा आस !! नजैर मे रखु की करेजा मे राखु अहि छी हमर भगवान !! उज्जरल पुज्जरल हमर जिनगी मे आहा एलौ !! रंग विरंग क ख़ुशी केर फूल खिलेलौं !! की हम भेलू अहाक प्रेम पुजारी ,अहा हमर भगवान यौ !! मुर्झायल फूल छलौ हम ,अहि स खिलल हमर प्रेमक बगिया !! बालविधवा हम अबोध छलौ ,समाज केर पैरक धुल !! उठैलौ अहा हमरा करेजा स लगैलौ, बैनगेली हम फूल !! पतझर छलौ भेल हम,सिच सिच क अहा लौटेलौ हरियाली !! अनाथ अबला नारी के अपनैलौ आ बनेलौ अपन घरवाली अहि स यी हमर जिनगी बनल सुन्दर सफल सलोना !! गोद मे हमर सूरज खेलैय,अहा बनलौ बौआक खेलौना !! हमर उज्जरल पुज्जरल जिनगी मे अहा येलौ !! रंग विरंग क ख़ुशी केर फूल खिलेलौ,ख़ुशी स हमर आँचल भरलौं !! हमर मन उपवन मे अहि बास करैत छी, अहि केर हम पूजित छी !! हमर परिचय ई अछि हमर परिचयरुपी कविता, ई अछि हमर प्रेमपरागक सरिता, धन्य धन्य अछि भाग्य हमर, जन्म लेलौ हम मिथिलाधाम मे, बास अछी हमर पावनभूमि धिरापुर गाम मे, स्वर्ग स सुन्दर आनन्द बरसैय,अई मिथिलाधम मे, धिरापुर केर धिरेस्वरमहादेव छैथ बड़ ओढरदानी, हम बालक प्रभात अबोध अज्ञानी, पिता गंगेस्वर छैथ ईश्वर के स्वरूप , माता गायत्री ममता स भरल देवीक रुप, भातृत्व प्रेमक प्रतिक प्रकाश प्रभात प्रविन, सब भाई मे अछी आदर सत्कार स्वाभिमान नबिन, सुन्दर सरल सुशिल शालीन बहिन आशा, धन्य धन्य अछि भाग्य हमर पुरा भेल अभिलाषा , भौजी सद्खन ममता स भरल स्नेह बर्सबैय, भावो भावनात्मक बत्सल स्नेह बच्चा सब मे बटैय, हमर मन उप्वनमे बास करैय चन्द्रबदन पत्नी पुनम, सोन स सुन्दर सरल शुशिल बेट्टी अछी स्वर्णिम, सत्यमार्गी संतान तेज्स्व्बी बेट्टा अछी सत्यम , धन्य धन्य अछि भाग्य हमर जन्म लेलौ मिथिलाधाममे गीत स्वतंत्रताक सुनु सुनु ययो बाबु भैया , नींद स तू जगबा कहिया , भूखे पेट पेटकुनिया देला स नई चलत आब कम हौ कालरात्री के भेलई अस्त , उठह उठह कर दुसमन के पस्त , आइधैर तोरा पर शासन केलक , आब कतय दिन रहबा गुलाम हौ, भेलई परिवर्तन बदैल गेलई दुनियाँ, मधेस अखनो रहिगेलई शासक केर कनियाँ, हसैछ दुसमन दैछ ललकार , उठह उठह दुष्ट शासक के करः प्रतिकार , मग्लाह स त भूख गरीबी रोग शोक देलकह , आब छिनक ला ला अपन अधिकार हौ , अखनो नई जगबा त जिनगी हेतह बेकार हौ , बेसी सुत्बा त अम्लपित बैढ़ जेताह , बिस्फोट भक्ह प्राण निकैइल जेताह , उठह उठह करः अपन प्राण क रक्षा , सिखह तू मान-स्वाभिमान क शिक्षा , प्राण तोहर मधेस माई मे , मान-स्वाभिमान छह तोहर स्वतंत्रता मे , बन्धकी परल छह तोहर मधेस माई, उठह उठह हों बाबु भाई , मधेस माई केर मुक्ति दिलाब , सुन्दर शांत विकाशील मधेस बनाब , कालरात्री केर भेलई अस्त , उठह उठह करः दुसमन केर पस्त माहासंग्राम संग्राम संग्राम ई अछि मधेस मुक्ति केर महासंग्राम !! विना हक हित अधिकार पौने हम नए लेब आब विश्राम !! अईधैर हम सहित गेलौ दुस्त शासक केर अन्याय !! मुदा आब नई हम सहब लक हम रहब अपन न्याय !! निरंकुश शासक शासन करईय घर मे हमरा घुईस !! मेहनत मजदूरी हम करैतछी, खून पसीना ललक हमार चुईस !!
अढाईसय वरखक बाद आई भेलई मधेस मे भोर हौ !! गाऊ गाऊ गली गली मे आजादी क नारा लागल छै जोर हौ !! निरंकुश शासक कहैया हम छी बड़ा बलबंत !! मुदा आई हेतई दुष्ट निरंकुश शासक केरअंत !! संग्राम संग्राम यी अछि मधेस मुक्ति केर महासंग्राम !! विना हक हित अधिकार पौने आब नई हम लेब विश्राम !!
अईधैर हम सहैत गेलौ उ बुझलक हमरा कांतर !! तन मन धन सब कब्जा कौलक हमरा बुझलक बांतर !! आब हम मांगब नई छीन क लेब अपन अधिकार हौ !! उतैर गेलौ हम रणभूमि मे करैला दुष्ट शासक केर प्रतिकार हौ !! मेची स महाकाली चुरेभावर स तराई,समग्र भूमि अछि मधेस माई !! हिन्दू मुश्लिम यादव ब्राम्हिन थारू सतार संथाल हम सब एक भाई !! जातपात कोनो नई हमर हम सब छी एक मधेसी हौ !! अपन भाषा भेष संस्कृति नया संविधान मे हम करब समावेशी हौ !! हम रहैत छी परदेश हम रहैत छी परदेश मुदा प्रेम अछि अपने देश स:!! हम छी पावनभूमि मिथिलाधाम मधेस स:!!
लिखैत छी चिठ्ठी अपन ब्याथ केर नैनक नोर स:!! मोनक बात चिठ्ठी मे लिखैत छी मुदा बाईज नई सकैत छी ठोर स:!!
लिखैत छी अपन दुःख क पाती,रहैत छी कोना परदेश मे !! अईब केर परदेश हम फैस गेलौ बड़का क्लेश मे !!
माए केर ममता भौजी केर स्नेह बिसरल नई जाईय !! साथी संगी खेत खलिहान हमरा बड मोन परईय !!
माथ जौ दुखैत हमर माए लग मे अब्थिन !! की भेल हमर सोना बेट्टा के कहिक माथ मालिश करथिन !!
बोखार जौ लागैत हमरा भौजी बौआ बौआ करैत लग अब्थिन !! दुधक पट्टी माथ पर रख्थिन आ दबाई ला क हमरा खुअब्थिन !!
मुदा अ इ परदेश मे धर्ती गगन चंदा सूरज सब लगईय अनचिन्हार !! बड अजगुत लगैय हमरा देख क ऐठामक दूरब्यबहार !!
मानब्ता नामक छीज नई छई इन्शान बनल अछि इंजिन !! अठारह घंटा काम कर्बैय मालिक बुझैय हमरा मशीन !!
जान जी लगाक केलौ काम दू चैरगो रोग हमरा भेटल इनाम !! नई सकैत छी त आब कामचोर कहिक हमरा केलक बदनाम !!
लिखैत छी कथा अपन ब्यथा केर बुझाब आहा सब बिशेष मे !! नून रोटी खैहा भैया अपने देश मे ,जैइहा नई परदेश मे !! मिथिलाधाम मिथिलाधाम... स्वर्ग स: सुन्दर अछी हमार मिथिलाधम !! ऋषि मुनि तपस्वी आर माँ जानकी जन्म लेलैथ अहि ठाम !! ज्ञानभूमि तपोभूमि आर स्वर्गभूमि अछी हमर जनकपुरधाम !! गौतम कणाद मन्दन भारतीसुशिला यी अछी मिथिलांचल के गरिमा !! युगो युग गुनगान होइत अछी मथिलांचल धर्ति क महिमा !! हरबाहक श्रमदेखि धर्ति प्रतिदान केलैथ सिया जी सन् गहना !! मिथिला क सब घर स्वर्ग लगैया,लोग ईहा के साधु सन्त !! चाहे कोनो ऋतु होइ सद्खन बहैत ईहा बसन्त !! मनोरम प्रकृति आर मनमोहक मिथिला क संस्कृति !! एक दोसर स: सब लोग करैत अगाध प्रेम आर प्रिती !! हर जीव ईहा के स्वाभिमानी करैथ नै किनको आशा !! मधुरों स: मधुर मिथिला क मैथिल भाषा !! मिथिले मे पुनरजन्म लि यी सब लोग मे अछी अभिलाषा !! महाकवि विधयापति आर नागार्जुन सन् प्रखर विद्वान !! जग ब्याप्त कैलैथ मिथिला क गरिमामय शान !! स्वर्ग स सुन्दर धर्ति अछी हमर मिथिलाधम !!!!!! सपना देख्लौ बड अजगुत सपना देख्लौ बड अजगुत..
की कहिय राएत सपना देखलौं बड अजगुत हो भाई , हमरा पाछु लागल रहे एकटा बहुरुपिया कसाई, धमकी देलक गल्ह्थी लगौलक देखौलक चाकू छुरा , जान स माएर देबौ,प्राण निकाइलदेबौ,नईतकर हमर माग पूरा , गाल हमर लाल कौलक खीच क मारलाक चटा चट चांटा , निकाल बाक्स पेटी स फटा फट दू चार लाख टाका, डर स हम थर थर कापी मोन रहे घबराईल , तखने एकटा पहरा करैत प्रहरी हमरा लग चईल आईल , मोने मोन हम सोचलौ इ करता हमरा मदत , मुदा उहो रहे ओई चंडाल कसाई केर भगत , दुनु गोटा कान मे कौलक फुस फूस , बाईन्ध क हमरा डोरी स घर मे गेल घुईस , छन मे सबटा भेल छनाक घर मे परल डाका , झट पट जे आईंख खोल लौ ,त की कहिय काका , उ सपना नई सचे के बिपना रहे , हमर बिपति क एकटा घटना रहे , गीत वियोगक गीत वियोग के...
पिया निर्मोहिया गेलैथ परदेश , भेजलैथ नई चिठ्ठी आ कोनो सन्देस, जिया घबराईय ,चैन नई भेटैय, सद्खन साजन अहि पर सुरता रहैय, अहाविन हे यौ साजन मोन नई लगैय - २
आईबकेर परदेस हमहू छी कलेश मे , दुःख केर पोटरी की हम भेजू सन्देस मे , आईबकेर परदेस मोन पचताईय , अहाक रे सुरतिया सजनी बिसरल नई जाईय , अहा विन हे ये सजनी मोन नई लगईय - २
नई चाही हमरा गहना ,रुपैया आऔर बड़का नाम ययौ , ख्याब नून रोटी झोपडी मे मुदा चएल आउ गाम ययौ , अहाक मुन्ना मुन्नी पर नई अछि हमार काबू , बाट चलैत बटोही क कहीदईया झट सा बाबु , सम्झौला स झट पुईछबैठेय कतए गेल हमर बाबु , सुनीकेर बेट्टाबेट्टी के बोली ,दिल पर चैइल जाईत अछि गोली , चुप चाप हम भजईत छी ,मोने मोन हम लाजईत छी
कहिदु मुन्ना मुन्नी के बाबु गेल छौ पाई कमाईला विदेस , ल क अईतोऊ तोरासबल्या खेलौना आ मीठ मीठ सनेश , मोन तर्शैय हमरो सजनी अहाक प्यार आ अनुरागला , आ बेट्टा बेट्टी केर मिठिका दुलार ला - २ !!! गंगा तट स: हिमालय केर पट गंगा तट स: हिमालय केर पट कोसी स: गनडकी तक !! यी सम्पूर्ण भूमि अछि मिथिलांचल !! जतेय बहथी निर्मलगंगाजल !! हम थिक मिथिलाभूमि केर संतान !! मिथिलांचल अछि हमार आन वान शान !! मिथिलाक संस्कृति अछि हमर स्वाभिमान !! स्वर्ग स: सुन्दर अछि हमर मिथिलाधाम !! वसुधा केर हृदय थिक यी जनकपुरधाम !! जतेय जन्म लेलैथ माँ जानकी आऔर साधू संत कवीर !! एतही परम्पद पैलैथ ऋषि मुनि संत महंथ आऔर फकीर !! राजर्षि जनक छलैथ विदेह राज्यक महर्षि राजा !! कवी कौशकी गंडक बाल्मिकी मंडन !! भारती सुशीला कुमारिल भट्ट नागार्जुन !! महाकवि बिध्यापतिसं: बिद्वान रहथि प्रजा !! मिथिला रहथि न्यायिक आऔर मसंसा ज्ञानक प्रदाता !! येताही ब्याह केलैथ चारो भाई मर्यादापुरुषोतम राम बिधाता !! मिथिला अछि भारतवर्ष केर प्राकृतिकाल स: ज्ञानबिज्ञान क स्रोत !! यी सब हम जनैत भेलंहू ख़ुशी स: ओत प्रोत !! मिथिला माए अहो भाग्य अछि हमर जन्म लेलौ मिथिला माए के कोरा में !!
एहन निश्छल आ बत्सल प्रेम भेटत नए चाहुओरा mइ
प्रकृति केर सुन्दर उपहार ,संस्कृति केर बिराट संसार !!
मानबता केर सर्बोतम ब्याबहार मिथिलाक मुलभुतआधार !!
राम रहीम मंदिर मस्जिद दसहरा होई या ईद क रित !!
मिथिलावासी हिदू होई या मुस्लिम एक दोसर स:करैछैथ प्रीत !!
मिथिलाक पसु पंछी सेहो जनैत अछि प्रेमक परिभाषा !!
मधुरों स:मधुर अछि मिथिलाक मैथिलि भाषा !!
ज्ञान सरोबर एतिहासिक धरोहर अछि मिथिलाक संस्कृति !!
मन मग्न भजईत अछि देख क सुन्दर आ मनोरम प्रकृति !!
मिथिले में जन्म लेलैथ सीता केर रूप में माए भगवती !!
महाकवि विद्यापति केर चाकर बनला महादेव उमापति !!
वैदेही केर सुन्दरता पर मोहित भेलैथ भगवान राम !!
बसुधा केर हृदय बनल अछि हमर महान मिथिलाधाम !!
कहैछैथ शास्त्र पुराण विद्वान पंडित आऔर प्रोहित !!
मिथिलावासी क दर्शन स:मात्र भजाईत अछि !!
मनुख क सम्पूर्ण पाप तिरोहित !! मजदुर !!! भगवान क असिम कृपा स अहा भेलौ धनवान !!
मुदा भुखा निर्बस्त्र आर निर्धन सहो छैथ इन्सान !!
भुख स छटपटा रहल छै,निर्धन ख्याला एक टा रोटि !!
मुदा धनक लोभ स खुली नै रहल अछी अहा क पोटि !!
भुखा प्यासा निर्बत्र मे करु अपन अन्न धन्न दान !!
तखने ह्याब अहा सबकेर नजैर मे महान् !!
दुख:भुख आ विपति सहके बईनगेल छै गरिब क मजबुरी !!
दु टुक्रा रोटि ख्यालेल खुन आ पसिना बहाके करैया मजदुरी !!
मजदुरक श्रम स उब्जैया फलफुल तरकारी आ बिभिन्न अन्न !!
मालिक भजाईय धनवान मुदा श्रमिक रही जाईय निर्धन !!
आदमी नै छै अहाक नजैर मे नोकर चाकर आर मजदुर !!
निर्धन गरिब पर हुक्मत करैछी कहाँ भेलौ अहा निस्ठुर !!
नै देखाऊ अईठाम ककरो झुठा रुवाब आर साख !!
एकदिन जईरके भ ज्याब अहु अई माटीमे राख !!
कंकर पाथर थाली मे भेटत् भुख स जौं अहा छ्टपटयाब !!
मुठी बांधके जग मे एलि हाथ पसाइरके ज्याब !! ऐ रचनापर अपन मतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। राम विलास साहु कविता- नैनाक खेल नैना-भूटका खलैए खेल अपनामे करैए ठेलमठेल मारि-पिट करैत खेलैए खेल खेल-खैलैत जँ होइत झगड़ा अठा-पटक करैत रगड़ा गरदा झारि करैत मेल सभ मिल करैत खेल खेल जाति-पाति मिट गेल जेना पानि-पानि एक भ' गेल नै कोनो मनमे अछि मैल एकताक पाठ पढ़ल गेल देशक लेल सोच बदलल गेल देशक विकास लेल खेलब खेल नैना-भुटका खलैए खेल....। ऐ रचनापर अपन मतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। १.संजय कुमार मण्डल, २.संजय कुमार झा १ संजय कुमार मण्डल कविता- परदेसिया असगर मनुख जाधरि युवा रहैए पढ़ैए-लिखैए, खेलैए-धुपैए पढ़ाइ समाप्त कऽ विआह करैए परिवारिक जिम्मेबारीक हेतु दूर-देश जा नोकरी-चाकरी करैए भोरे उठि टिफिन लऽ ड्यूटी जाइए अधिक रूपैयाक लोभे ओभर टाइम खटैए बेचाराकेँ नवकी कनियाँक यादि अबैए सब रवि कऽ सासूर फोन करैए कनियाँ आ सारि-सरहोजिसँ घंटा-घंटा भरि गप्प करैए “कहिया गाम आएब?” कनियाँ पुछै छै माघक शीतलहरी कन्ना बितेलहुँ कहै छै अहाँ निर्दय छी, हमर हाल नै जनै छी भरि-भरि राति हम करौट फेड़ैत जगै छी की कहतै किछ नै फुड़ै छै ओ बेवस्थाक जंजालमे ओझराएल फिरै छै डेढ़े मास बाद होली पावनि छै होलीमे नै आएब तँ कहियौ ने आएब एक्के बेर हमरा मुइलाक बाद अाएब मरल मुँह देख एकटा लकड़ी चढ़ाएब कनियाँक बोली सुनि तिलमिला उठैए उनटि अपन शहरी जीवन दिस तकैए कहियो बर्गर, कहियो छोला-भटोरा कहियो बड़ा-पाउ खा राति बितबैए कोड़ी-कौड़ी, छिद्दी-छिद्दी जोड़ि महिने-महिना हजार रूपैआ बाबुकेँ पठबैए विडम्बना देखू, मनुख सालक तीन साए तीस दिन जतऽ जीबैए, ओढ़ना-बिछान छोड़ि किछुओटा ने किनैए सभ दिन बीना सिरहौनेक सुतैए गाम एबाक लेल ठिकेदारसँ एडभांस उठबैए आधा रूपैआसँ साड़ी-धोती, साबुन-शेम्पू, सेन्ट किनैए आधा रूपैआ बचा गाड़ी पकड़ि गाम अबैए सुनिते महाजन आबि दरबज्जाक माटि खुनैए पनरह दिन धरि खुब मासु-माछ कचरैए अबै काल मासुलक लेल फेर महाजनक दरबज्जा ओगरैए जाइत देरी रूपैआ पठा देब महाजनकेँ गछैए ककरा कहतै के पतियेतै परदेसिया मनुख कोना जीबैए बाप सदिखन कहै छै ई छौड़ा तँ फाउ खैलाइए। (2) शीतलहरि हम छी पछिया शीतलहरि हम छी पछिया शीतलहरि जन मानसपर हम ढाहब कहरि हम छी कहि रहल चिकरि-चिकरि हम छी पछिया शीतलहरि.... जौं कनियो अछि जानक फिकड़ि हमरा सोझासँ हटि जाउ नै तँ हम बेध देब, सेद देब हाथ पाएर सुइसँ छेद देब हम नै बुझब छी अहाँ बूढ़, बच्चा आकि सियान जौं करब कनियाें जुआनिक अभिमान हम एक्के झोंकामे देब पटैक एक बेर रमकब तँ कऽ देब लुल्ह-नाङर जखन हएत पेरेलाइसिस एटैक जल्दी कोनो कोनमे रहू दुबैक अपन नाङरिकेँ राखू सुटैक हम छी पछिया शीतलहरि.... हम अहिना रमकब-उमकब जे आओत सोझा ओकरेपर बमकब हम छी पछिया शीतलहरि.... २ संजय कुमार झा, पिता-श्री लक्ष्मी नारायण झा, माता- श्रीमती मुंद्रिका देवी, पता- ग्राम-बेलौन, पोस्ट-नवादा, भाया- बहेरा, जिला- दरभंगा, बिहार १ जन्म सों मैथिल, कर्म सों मैथिल जन्म सों मैथिल, कर्म सों मैथिल मिथिलांचल अछि गाम यौ काज करै छी सबहक किछु-किछु सब सों किछु-किछु काम यौ शिक्षा-दीक्षा मिथिलांचल केर बचपन बीतल गाम यौ चाकर एकटा एमएनसी केर दिल्ली बीतय शाम यौ मिथिलाक बेटी जीवन संगी दू बेटी केर बापो छी असगर पुत्र पिता केर छी हम दू टा भागिनक माम यौ निहुरी-निहुरी कए गोर लगई छी भेट-थि जों अप्पन सों पैघ छोटक माथ राखै छी सदिखन आशीषक निज पाम यौ नोर बहै या सुख में, दुःख में नोर पोछ-इ में छी आगाँ नीक लग-इ या पोथी-पतरा मनुक्खक अछि चाम यौ किछु विद्रोही किस्म हमर अछि भागी नहि कहियो रन सों हारिक नहि कहियो भेल खेद जीतक नहि गुमान यौ सब रहथि कुशल जीवन भरि येअह रख-इ छी मोनक चाह अपनों गारी खर-खर चलय जीब सकी विथ मान यौ २ चलू दोस यौ गाम मैट भ गेलै जिनगी ओकर जे नहि जाई या गाम यौ आम खा रहल आने-आने सूखि रहल लताम यौ
खेत परल परात बरिस सों सुन्न परल दालान यौ के पटाबय बारिक मेथी टूटि रहल मचान यौ
उजरल-उपटल गाम लगय या फुलवारी मसोमांत यौ ओ करौछ आ घैला, पटिया लोटकी, सोहारी, जांत यौ
छोटकी काकिक नैहरक भरिया कहाँ भेटत ओ चतुर सुजान कहाँ सुनब दुखियाक ओ राग कोर्थू वाली भ गेल आन
भग्वात्ती घरक ओ कीर्तन कहिया सुनबई आब नवाह कहिया फेर खेलेबई नाटक शोले, गोरख और गवाह
बाबा संगे बैगनी गेन्नै सपने रहि जेत्तई यौ दोस झिल्ली-कचरी कतय सा किनबई कहाँ भेटै ओ भोरक ओस
भौजिक मूंह देखब भेल साल गाल छुबय ले तरसय मोन होलिक ओ हुरदंग ने भेटय कानि रहल छी कोने-कोन
कतेक सुनाबी मोनक आह कोंढ़ फटे या, सुखाई नोर चलू चलय छी गाम दोस यौ जिनगी रहि गेल थोरबे-थोर ऐ रचनापर अपन मतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। विदेह नूतन अंक मिथिला कला संगीत १.श्वेता झा चौधरी २.ज्योति सुनीत चौधरी ३.श्वेता झा (सिंगापुर) १ श्वेता झा चौधरी गाम सरिसव-पाही, ललित कला आ गृहविज्ञानमे स्नातक। मिथिला चित्रकलामे सर्टिफिकेट कोर्स। कला प्रदर्शिनी: एक्स.एल.आर.आइ., जमशेदपुरक सांस्कृतिक कार्यक्रम, ग्राम-श्री मेला जमशेदपुर, कला मन्दिर जमशेदपुर ( एक्जीवीशन आ वर्कशॉप)। कला सम्बन्धी कार्य: एन.आइ.टी. जमशेदपुरमे कला प्रतियोगितामे निर्णायकक रूपमे सहभागिता, २००२-०७ धरि बसेरा, जमशेदपुरमे कला-शिक्षक (मिथिला चित्रकला), वूमेन कॉलेज पुस्तकालय आ हॉटेल बूलेवार्ड लेल वाल-पेंटिंग। प्रतिष्ठित स्पॉन्सर: कॉरपोरेट कम्युनिकेशन्स, टिस्को; टी.एस.आर.डी.एस, टिस्को; ए.आइ.ए.डी.ए., स्टेट बैंक ऑफ इण्डिया, जमशेदपुर; विभिन्न व्यक्ति, हॉटेल, संगठन आ व्यक्तिगत कला संग्राहक। हॉबी: मिथिला चित्रकला, ललित कला, संगीत आ भानस-भात। २. ज्योति सुनीत चौधरी जन्म तिथि -३० दिसम्बर १९७८; जन्म स्थान -बेल्हवार, मधुबनी ; शिक्षा- स्वामी विवेकानन्द मिडिल स्कूल़ टिस्को साकची गर्ल्स हाई स्कूल़, मिसेज के एम पी एम इन्टर कालेज़, इन्दिरा गान्धी ओपन यूनिवर्सिटी, आइ सी डबल्यू ए आइ (कॉस्ट एकाउण्टेन्सी); निवास स्थान- लन्दन, यू.के.; पिता- श्री शुभंकर झा, ज़मशेदपुर; माता- श्रीमती सुधा झा, शिवीपट्टी। ज्योतिकेँwww.poetry.comसँ संपादकक चॉयस अवार्ड (अंग्रेजी पद्यक हेतु) भेटल छन्हि। हुनकर अंग्रेजी पद्य किछु दिन धरि www.poetrysoup.com केर मुख्य पृष्ठ पर सेहो रहल अछि। ज्योति मिथिला चित्रकलामे सेहो पारंगत छथि आ हिनकर मिथिला चित्रकलाक प्रदर्शनी ईलिंग आर्ट ग्रुप केर अंतर्गत ईलिंग ब्रॊडवे, लंडनमे प्रदर्शित कएल गेल अछि। कविता संग्रह ’अर्चिस्’ प्रकाशित। ३.श्वेता झा (सिंगापुर) विदेह नूतन अंक गद्य-पद्य भारती मोहनदास (दीर्घकथा):लेखक: उदय प्रकाश (मूल हिन्दीसँ मैथिलीमे अनुवाद विनीत उत्पल) उदय प्रकाश (१९५२- ) “मोहनदास”- हिन्दी दीर्घ कथाक लेखक उदय प्रकाशक जन्म १ जनवरी १९५२ ई. केँ भारतक मध्य प्रदेश राज्यक शहडोल संभागक अनूपपुर जिलाक गाम सीतापुरमे भेलन्हि। हुनकर हिन्दी पद्य-संग्रह सभ छन्हि: सुनो कारीगर, अबूतर कबूतर, रात में हारमोनियम, एक भाषा हुआ करती है। हिनकर हिन्दी गद्य-कथा सभ छन्हि: तिरिछ, और अन्त में प्रार्थना, पॉल गोमरा का स्कूटर, पीली छतरी वाली लड़की, दत्तात्रेय के दुख, अरेबा परेबा, मैंगोसिल, मोहनदास। मोहनदास- दीर्घकथा लेल हिनका साहित्य अकादेमी पुरस्कार २०१० (हिन्दी लेल) देल गेल अछि। अनुवादक: विनीत उत्पल (१९७८- ) आनंदपुरा, मधेपुरा। प्रारंभिक शिक्षासँ इंटर धरि मुंगेर जिला अंतर्गत रणगांव आ तारापुरमे। तिलकामांझी भागलपुर, विश्वविद्यालयसँ गणितमे बीएससी (आनर्स)। गुरू जम्भेश्वर विश्वविद्यालयसँ जनसंचारमे मास्टर डिग्री। भारतीय विद्या भवन, नई दिल्लीसँ अंगरेजी पत्रकारितामे स्नातकोत्तर डिप्लोमा। जामिया मिल्लिया इस्लामिया, नई दिल्लीसँ जनसंचार आ रचनात्मक लेखनमे स्नातकोत्तर डिप्लोमा। नेल्सन मंडेला सेंटर फॉर पीस एंड कनफ्लिक्ट रिजोल्यूशन, जामिया मिलिया इस्लामियाक पहिल बैचक छात्र भs सर्टिफिकेट प्राप्त। भारतीय विद्या भवनक फ्रेंच कोर्सक छात्र। आकाशवाणी भागलपुरसँ कविता पाठ, परिचर्चा आदि प्रसारित। देशक प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिका सभमे विभिन्न विषयपर स्वतंत्र लेखन। पत्रकारिता कैरियर- दैनिक भास्कर, इंदौर, रायपुर, दिल्ली प्रेस, दैनिक हिंदुस्तान, नई दिल्ली, फरीदाबाद, अकिंचन भारत, आगरा, देशबंधु, दिल्ली मे। एखन राष्ट्रीय सहारा, नोएडा मे वरिष्ट उपसंपादक। "हम पुछैत छी" मैथिली कविता संग्रह प्रकाशित। मोहनदास पोथीक आवरण चित्र मार्कूस फोरनेलक चित्रक उदय प्रकाश द्वारा रूपान्तरण। (उदय प्रकाश जीकेँ "विदेह" विनीत उत्पलकेँ "मोहनदास"क मैथिली अनुवादक अनुमति देबाक लेल धन्यवाद दैत अछि- गजेन्द्र ठाकुर- सम्पादक।) मोहनदास : उदय प्रकाश (मूल हिन्दीसँ मैथिलीमे अनुवाद विनीत उत्पल द्वारा) मोहनदास: चारिम खेप मोहनदास ओरियंटल कोल माइंसक मुख्य गेटक बाहर सड़कपर ठाढ़ छल। एकदम बीचोबीच। ओकर दिमाग किछुओ सोचब छोड़ि देने छलै। एकटा डरौन सन गुमकी छलै जे सौंसे वातावरणमे सांय-सांय करैत बाजि रहल छलै। ओकरा ईहो होश नै छलै जे ओ सड़कक ठीक मांझमे ठाढ़ अछि आ ओकर दुनू कातसँ ट्रक, मेटाडोर, टेंपो आ दोसर गाड़ी हॉर्न बजाबैत ओकरा कोनो तरहेँ थकुचेबासँ बचाबैत तेज गतिसँ लगातार जा रहल छलै। मोहनदासक जेबीमे ओ पर्स एखनो छल जे ओ नोकरी लागैक आसमे तीस टकामे किनने रहए। ओइमे अखनो एक सए सत्तरि टका छलै। ओकर मेहनति आ कमाइक टका। पैंसठि टका बसक किराया देलाक बादो ओकरा लग एत्ते टका बचल छलै। अप्पन जेबीक पर्स छुलासँ ओकर दिमाग शांत हुअए लागल। एत्ते काल बाद ओकरा एकाएक रौदक तेज हेबाक अनुभूति भेलै। ओ झटकारि कऽ सड़कक कात आबि गेल। ओकरा भूख लागल छलै। "मोटू वैष्णव शुद्ध शाकाहारी होटल” ढाबामे खाइत काल ओकरा पता लगलै जे साँझमे एतएसँ राज्य परिवहनक दूटा आर एकटा प्राइवेट बस सेहो ओकर गाम पुरबनरा दिस जाइ छै। एखन तँ खाली एक्के बजल छै। ओ निर्णय लेलक जे ओ एक चक्कर ओरियंटल कोल माइंसक कॉलोनी "लेनिन नगर' दिस घुमि आबए। ओतए किंसाइत चिन्हन-जानल कियो देखा जाए। स्कूल-कॉलेजक कोनो पुरनका सहपाठी आकि कियो आन। लेनिन नगरमे एतएसँ ओतए धरि ओ घुरिआइत रहल। दुपहरिया काल छलै। सभटा फ्लैट एक्के जेहन बनल छलै। लोक काज करबा लेल कोलयरी जाइ गेल छल। घरमे स्त्रीगण आ नेना सभ टा छल। स्कूलक एकटा बस ठामे-ठाम ठाढ़ होइत बच्चा सभकेँ उतारि कऽ आगू चलल जा रहल छल। लेनिन नगर बड़ पैघ कॉलोनी छल। जौँ हमरा संग धोखाधड़ी आ जालसाजी नै कएल गेल होइत तँ हमहूँ अप्पन परिवारक संग लेनिन नगरक एहने कोनो फ्लैटमे रहतौं, सभ मास दरमाहा भेटतिऐ, देवदास आ शारदा ऐ तरहेँ स्कूल ड्रेस आ जूता-पैताबा पहिरि कऽ ऐ बससँ उतरितिऐ। कूलर-पंखामे सुतितिऐ। मुदा केहन भाग्यक खेला छल जे मोहनदासकेँ बिसनाथक फ्लैटक पता पूछै लेल अप्पन नाम लिअ पड़ि रहल छलै। "मोहनदासक फ्लैट कोन छै, भाइ साहेब?' "कोन? ओ सुपरवाइजर साहब?' "हँ...!” "आगू चलि जाउ सोझे। तीन कट छोड़ि कऽ चारिममे बामा हाथ घुमि जाएब। तेसर मकान छै। ए बट्टा एगारह। डॉक्टर जनार्दन सिंहक बगलबला फ्लैट।' फ्लैटक दरबज्जा बंद छल। बाहरी देवालपर नेम प्लेट लटकि रहल छल, जाइपर लिखल छल- "मोहनदास विश्वकर्मा, कनिष्ठ आगार अधिकारी, ओरियंटल कोल माइंस”। मोहनदास कनी काल धरि गुम्म भऽ नेम प्लेट पढ़ैत रहल, फेर ओ कॉलबेलक स्विच दबौलक, जे ठामे नेम प्लेटक नीचाँ छल। मोहनदास एक बेर तँ डरि गेल किएक तँ जे आवाज भेल ओ ठीक वएह कटाह आवाज छल जे भर्ती दफ्तरक बाबूक टेबुलबला घंटीसँ भेल छलै आ तकर बाद ओकरा संग ई दुर्घटना भेल छलै। दरवज्जा एकटा चौदह-पंद्रह बरखक बच्चा खोललक। "साहब नै अछि! अखने निकलल अछि। आगूबला बजारमे लस्सी पिबैत हएत।' छौरा एक्के सूरमे बाजल। "पिबै लेल पानि भेटत की?”, मोहनदासक ठोंठ सुखा रहल छल। रौद बड़ तीख भऽ गेल छलै आ हवामे लू बहै छलै, से ओ झरका रहल छलै। कोलयरीमे जखन ओकरा धक्का मारि कऽ पिटैत बाहर निकालल गेल छल। ओकर कोहनी, गाल आ पीठपर एक-दू ठाम नोछार लागि गेल छलै। ओ नोछार घामक नूनसँ लहरि रहल छलै। "अहाँ एतए ठाढ़ रहू, दैत छी।' छौरा ओकरा माथसँ पएर धरि निङहारलाक बाद कहलक आ भीतर चलि गेल। मोहनदास तीन गिलास पानि सुरकि गेल। छौरा फ्रिजसँ ठरल बोतल निकालि कऽ आनने रहै। पानि पिलासँ ओकर देहमे जान एलै, आँखिमे रोशनी घुरलै आ मोन किछु शांत भेलै तँ ओ देखलक जे गिलास घुरा कऽ लऽ जाएबला छौरा ओकरा सहानुभूतिक संग देखि रहल अछि। "ओकर घरमे एखन के-के छै?', मोहनदास पुछलक। "कियो नै। कस्तूरी मैडम टा छै।...एखन सुतल छै। अहाँ पांच बजेक बाद आउ।' छौरा खाली बोतल आ गिलास लऽ कऽ अंदर जाय लागल तँ मोहनदास कहलक, "अहाँक साहब आबथि तँ हुनकासँ कहब जे पुरबनरा गामसँ मोहनदास आएल छल। साँझकेँ हम फेर आएब।' लड़का भीतर जाइत-जाइत ठाढ़ भऽ गेल। ओ मोहनदासकेँ निङहारि कऽ देखलक आ कहलक, "की कहलिऐ?...के आएल छल!” "मोहनदास!”, मोहनदास जोरसँ बाजल आ रकमे-रकमे मइ मासक आगिमे जरैत आ पसिझैत कोलतारक सड़कपर घुरि कऽ आबि गेल। लेनिन नगरक मार्केट बड़ पैघ नै छल। मुदा आधुनिक हेबा लेल ओ छटपटा रहल छल। तीन-चारि डिपार्टमेंटल स्टोर्स, किछु खुदरा सन किरानाक छोट सन दोकान। डोसा-इडली-बड़ा बला "कावेरी फास्ट फूड”। दू तंदूर, साल मखनी, कड़ाही पनीर, बटर चिकेन, आलू पराठा बला होटल। एकटा देशी आ अंग्रेजी शराबक दोकान, जइमे "एतए शीत बीयर सेहो भेटैत अछि' क बोर्ड लागल छल। पान-सिकरेटक दूटा गुमटी आ प्लास्टिक, इलेक्ट्रानिक्स आ इलेक्ट्रॉनिक्स सामानक, सीसा बला शो-विंडोजबला दूटा दोकान। एकटा कपड़ाक बड़ पैघ हालसन दोकान छल, जकर आगू गेटपर आ सीसाक भीतर सेहो, जालीदार ब्रोसरी आ जालीदार जंघिया पहिरने, अप्पन सभ किछु देखबैत, आदम-ईव सन उज्जर फाइबरक पुतुल ठाढ़ छल। मोहनदास देखलक जे लक्ष्मी वैष्णव भोजनालयक आगू पुलिसक टाटा सुमो ठाढ़ छल, जइमे दू-तीन टा सिपाहीक संग ओकर गामक पंडित छत्रधारी तिवारीक लड़का विजय तिवारी, जे अप्पन ससुरक घुरपेंचसँ दरोगा भऽ गेल छल, लस्सी पीबि रहल छल।...आ बिसनाथ सेहो ओतै छल। बिसनाथ कोनो गपपर ठठा कऽ हँसि रहल छल आ अप्पन लस्सी सठा कऽ टाटा सुमो दिस बढ़ि रहल छल, तखने ओकर नजरि मोहनदासपर पड़लै। ओ सतर्क भऽ गेल। एक क्षण लेल ओकर चेहराक रंग उड़ि गेलै। एखन धरि जे हँसी ओकर चेहरापर नाचि रहल छलै से तुरत्ते बिला गेलै। बिसनाथक चेहरापर आएल गड़बड़ीकेँ अकानि कऽ विजय तिवारी घुरि कऽ देखलक। ओ गाड़ीमे ड्राइवर सीटपर बैसल छल, वर्दीमे सजल-धजल। मोहनदास चेथड़ीमे, लू मे झरकैत, सड़कक कात, बिजलीक खाम्ह लग, लगभग पंद्रह गजक दूरीपर ठाढ़ छल। एकटा तनावसँ भरल गुमकी अनचोक्के ओइ दुपहरियाक रौदमे एतएसँ ओतए धरि पसरि गेल छलै। बिसनाथ गाड़ीपर चढ़ि गेल। विजय तिवारी चाभी घुमा कऽ इंजन स्टार्ट केलक आ एक्के धक्कामे ओकरा दौगबैत जोरसँ ओइ दिस आएल जेम्हर मोहनदास ठाढ़ छल। मोहनदास थकमका गेल आ डोलि कऽ बिजलीक खुट्टा दिस सहटल। विजय तिवारी जोरसँ ब्रेक मारलक आ गाड़ीकेँ मोहनदासक ठीक आगू ठाढ़ कऽ देलक। ब्रेक नै लगितियै तँ मोहनदास खुट्टा संग ओकर चपेटमे आबि जैतियै। मोहनदासकेँ अदंक लऽ लेलकै। "एम्हर आ!', विजय तिवारी ओकरा बजेलकै। आइसँ मोटामोटी सात-आठ बरख पहिने, यएह विजय तिवारी ओकरा संग एम.जी. डिग्री कॉलेजमे पढ़ैत छल। सभ दिन एक्के क्लासमे ओ बैसैत छल। पढ़ै-लिखैमे ओ लद्धढ़ छल। ओकर बाप पंडित छत्रधारी ओकरा मोहनदासक उदाहरण दैत छलै जे सभ बरख फर्स्ट आबैत छल। अखन वएह विजय तिवारी पुलिसक वर्दीमे बत्ती आ लाउडस्पीकर लागल टाटा सुमोमे बैसल ओकरा जइ तरहे निङहारि रहल छल, ओइमे अनचिन्हार बनबासँ बेसी हिंसा आ तामस साफ-साफ लखा दैत छल। एहन की भऽ रहल छल? की मोहनदास गरीब आ निचलका जातिक छल, ताइसँ? वा ताइसँ जे ओ बेरोजगार छल आ अप्पन मेहनतिसँ चुपचाप अप्पन परिवारक आजीविका चला रहल छल? वा ऐ लेल जे ई सभ लोक ओकरा ठकने छल। ओकर अहं मारि देने छल आ आब एतए ओकर सोझाँ ओकर आजादी आ मौज-मस्तीमे बाधा बनि रहल छल? "खुट्टा बचा लेलकै बरगाही भाइ, नै तँ अखन लोथ बनि गेल रहतिऐ!” विजय तिवारी रकमसँ फुसफुसा कऽ कहलक। "हौ छोड़ू! माछी मारि आर हाथ गंध करत!' बिसनाथ बाजल। "ओहिने हुड़कि दैत छिऐ! कखनो एम्हर दिस नै ताकत सार!' मोहनदास अखन धरि अप्पन ठामसँ हिलल नै छल। विजय तिवारी जोरसँ कतेक बेर हॉर्न बजेलक, आ तकर बाद एकाएक गाड़ीक ऊपर लागल स्पीकरमे ओकर आवाज चारू दिस गूंजै लागल, "हे हौ बिसनाथ! गाड़ीक आगू किए कुदलह हौ बिसनाथ? तोहर दिमाग सनकि गेल छह की बिसनाथ? बिसनाथ, बाजैत किए नै छह? बहीर भऽ गेल छह की हौ बिसनाथ! बिसनाथ, हे हौ बिसनाथ!” गाड़ीक भीतर जोरसँ ठहक्का उठऽ लागल छल। "भौजीकेँ एतए नै आनलौं बिसनाथ? असकरे मरै लेल आएल रहह...हे!” बिसनाथ गाड़ीसँ उतरल आ मोहनदास लग आबि कऽ ठाढ़ भऽ गेल। ओ अप्पन जेबीसँ पाँच सएक एकटा नोट निकालि कऽ मोहनदासक शर्टक जेबीमे खोंसि देलक। "सुनू, आब अहाँ अप्पन पुरनका नाम बिसरि जाउ आ आब आइक बाद कहियो लेनिन नगर दिस पएर नै बढ़ाएब! बुझलिऐ! आइ तँ हम दारू नै लस्सी पीबि राखने रही, ऊपरसँ बिजलीक खाम्ह आबि गेल, नै तँ आइ चापि दैतौं। दोबारा कतौ आसपास देखा देलौं तँ कॉलयरीक भट्टीमे छाउर बना देब।” एकर बाद बिसनाथ घूमल आ मोटू वैष्णव ढाबा दिस देखैत जोरसँ गरजल, "हे हौ नंद किशोर, ऐ बिसनाथकेँ एक गिलास लस्सी पिया देबहीं ठंडा! बरफ दऽ कऽ! बरफ दऽ कऽ हौ! हम्मर पड़ोसी गामक अछि बिसनाथ...!” टाटा सुमोक भीतरसँ अनवरत ठहक्काक आवाज आबि रहल छल। बिसनाथ सेहो हँसऽ लागल छल। घुरि कऽ गाड़ीमे चढ़ैत-चढ़ैत ओ रकमसँ विजय तिवारीसँ कहलक, "ई नंद किशोर अछि तँ भखारक ढीमर मुदा एतए बाभन बनि कऽ वैष्णव शाकाहारी होटल चला रहल अछि। सजनपुरक चौबे घरेनक बहूकेँ बियाहि आनलक सार। "पंडीजी कहियौ तँ फूलि कऽ कुप्पा भऽ जाइत छै।” "नीके छै! समांग बढ़ैत छै।”, विजय तिवारी बाजल आ ठहक्का लगा कऽ ढाबा दिस मुँह कऽ बाजल, "बिसनाथकेँ कनेटा सम्हरि कऽ लस्सी पिआयब पंडितजी, उपरका पेंच कनी लूज भऽ गेल छै...! हाँ रूपा हम्मर खातामे चढ़ा लेब।” निफिकिर रहू! निफिकिर! घरक काज छिऐ! पेंच तँ हम सेट कऽ देबै!” मोहनदासक मुँहमे टाटा सुमोक धुरा-गर्दा आ धुँआ छोड़ैत ओ सभ चलि गेल। मोहनदास ओइ ठाम ठाढ़ रहल, बिजलीक खुट्टाकेँ अप्पन हाथसँ थाम्हने। की ई कोनो फिल्म छल जकर सीन एखने-एखन पूरा भेल आ जाइमे ओ सेहो एकटा पात्र छल? वा ई कोनो अजीबे सपना छल? मोटू वैष्णव शाकाहारी ढाबासँ गोर-नार, कारी-चमकैत आँखिक अधवयसू बड़का पेटबला हलुवाइ नंद किशोर लस्सीक गिलास हाथमे थम्हने गरजि रहल छल- "आबू भाइ बिसनाथ! लस्सी तँ पीबैत जाउ!” मोहनदास जखन लेनिन नगरक मार्केटसँ बस स्टैंड दिस जा रहल छल तँ ओकर रस्तामे एकटा परेशान-सन अबैत लोक देखाइ पड़ल। ओ लेनिन नगर दिस जा रहल छल। ओकर अंगाक रंग कहियो लाल छल हेतै जे आब मैल आ पुरान भऽ कऽ कत्थइ भऽ गेल छलै। मोहनदास लग आबि कऽ ओे रूकल आ पुछलक- "भाइ, लेनिन नगरमे सूर्यकांतक फ्लैट कोन छै?” मोहनदासक मोनमे एलै, जखन ओ बिसनाथक पता ताकि रहल छल, तखने ओ ई नेम-प्लेट देखने छल। ओ मन पाड़ैक कोशिश केलक। "आगूसँ दहिन हाथ घुमि जाएब आ सए गज आगू जा कऽ तिनमुहानी लग, मटियानी चौक लग ककरोसँ पूछि लेब। ओतै छै।” जखन ओ सभ जाए लागल तँ मोहनदास रकमसँ ओकरासँ पुछलक- "अहां केकर फ्लैट ताकि रहल छी?” "सूर्यकांतक! उन्नाव लगक गामक छै।” "ओकर गामक की नाम छिऐ?” "गढ़ाकोला...!” "आ अहाँक की नाम छी?” ओ लोक कनी काल चुप रहल। ओकर ठोढ़ थरथरेलै, गहींर धसल आँखिसँ पानि खसऽ लगलै। ओकर सुखाएल गरासँ एकटा क्षीण भरभराएल आवाज एलै- "सूर्यकांत! गढ़ाकोलाक सूर्यकांत।” ओ आदमी घुमल आ रकम-रकम थरथराइत लेनिन नगर दिस बढ़ि गेल। (ई खिस्सा ओइ कालक अछि जखन संसारक सभ देशक सभ सरकारक अर्थनीति आ राजनीति एक्कहि रंगक छल, जखन धनीकक आ गरीबक बीचक खधाइ एत्ते गहींर आ चाकर भऽ गेल छलै जे ओकर कोनो प्रायोजित विज्ञापन नुका नै सकै छल...ओइ काल जखन बीसम सदीक शुरूमे उत्पीड़ित आ शोषित मनुष्यताकेँ लऽ कऽ क्रांति करैबला तागति, साझा सरकार बनाबै लेल, पेट्रोलक दाम कम करबाक आ गरीबपर राज करबाक शतरंज खेला रहल छल...आ एहन समए जाइमे ऐ देशमे जे कियो ईमानदार छल आ अप्पन श्रम आ प्रतिभापर जिबैत छल, ओकरा मारबा वा थकुचबा लेल एकैसम सदीक उत्तर औद्योगिक लोकतंत्रमे एकटा अभूतपूर्व सर्वदलीय ऐतिहासिक सहमति छल...। राजनीतिक सभटा रूप सत्ताक एहन उपकरणमे बदलल गेल छल, जकर इस्तेमाल प्रजाक उत्पीड़न, दमन आ ओकरापर अन्याय लेल भऽ रहल छल।) रातिमे एगारह बजे मोहनदास अप्पन घर पहुँचल। सभ कियो ओकर बाट जोहि रहल छल। कस्तूरी भात-दालि आ रामझुमनीक खुशीमा बनेने रहथि। कनीटा काँच आमक चटनी सेहो ओ सिल्ला-लोरहीपर पिसने छली। देवदास आ शारदा सुति गेल छल। काबा ओसारपर खाटपर पड़ल-पड़ल खोंखी कऽ रहल छल। "आइ तीन बेर खोंखीक संग खून आ मौस खसल।” कस्तूरी बतेलकै। पुतलीबाइ ओतए काबाक खाटक नीचाँ शतरंजी ओछा कऽ सुति गेल छलि। कस्तूरी एखनि धरि नै खेने छलि। ओ थारीमे अप्पन आ मोहनदासक खेनाइ लगा कऽ झाँपि देने छल। हाथ-पएर धोलाक बाद जखन मोहनदास अप्पन कपड़ा उतारलक आ गमछा लपेटलक तँ ओकर उघार देहमे लागल चोट आ नोछारक चेन्ह कस्तूरीकेँ देखा पड़लै। ओ चिंतित भऽ गेलि। "की भऽ गेल? कत्तऽ खसि पड़लिऐ?”, कस्तूरी उठि कऽ ओकरा लग आयलि आ ध्यानसँ ओकर देहकेँ छूबि-छूबि कऽ देखऽ लागलि। "हे दाइ! ई तँ मारि-पीटक घाव छिऐ!”, मोहनदास चुपचाप हाथ-पएर धोइत रहल। ठार पानिक संग ओकर दिन भरिक थकान धुआ कऽ नालीमे बहैत जा रहल छलै। मंजनौटे लग बेलक एकटा पैघ सन गाछ लागल छलै जइमे कतेक रास फूल भेल छलै आ ओकर महक भरि आंगनमे भरल छलै। मोहनदास सांस घीचि कऽ अप्पन कलेजामे भरि लेलक आ कनी काल धरि आँखि मूनि कऽ सतगुरु कबीरक जाप करैत रहल। कस्तूरी खेबाक थारीक ऊपरसँ परात हटेलक तँ भरि आंगनमे भातक गमक भरि गेलै। लोहंदी चाउर छलै, पुरनका। गोठल्लाक कोनो कोनमे पुतलीबाइ नुका कऽ राखने छल आ बिसरि गेल छल। आइ ओकरा ओ जोगाएल चाउर मोन पड़लै जे छुबि-छुबि कऽ ओ पोटरी ताकि कऽ निकालने छल। मोहनदास हपसि कऽ खेलक। ओ आमक चटनी आंगुरमे लगा कऽ चाटि रहल छल तँ कस्तूरी कहलक- "बिसैंधी आमक गाछपर खूब फल आएल छल। बेचलापर कमसँ कम हजार-दू हजार तँ भेटबे करत। काल्हि बेचि दी की?” मोहनदास तिरपित भऽ कऽ बड़का ढेकार मारलक आ कहलक, "अहाँक हाथक पकाएल भोजनमे जादू अछि कस्तूरी। आमक चटनी, भात आ भूखक संग जौं अहाँक हाथसँ परसबाक संयोग भऽ जाए तँ स्वर्गे भेट जाइत अछि।” कस्तूरीक आँखि नोरा गेलै। ओ बुझैत छल जे आइ मोहनदासक संग कोनो अनहोनी भेल छै, जकरा ओ सभ दिन जकाँ ओकरासँ नुका रहल छै। ओइ राति कस्तूरीकेँ बड़ राति धरि जगरनाक बाद सुतल भेलै मुदा मोहनदासक आँखि एक्को क्षण लेल नै लगलै। ओ बेर-बेर उठैत छल आ गटागट पानि पिबैत छल। ओकर दिमागक भीतर कोनो धुरा-गर्दा आ कुहेससँ भरल तेज आन्ही चलि रहल छलै। आन्हिये नै, कोनो कतेक रास घुरमैत बिर्रो। मोहनदास दू-एक बेर फेर ओरियंटल कोल माइंस गेल मुदा ओतए जाएब व्यर्थ भेलै किएकि ओतए आर लेनिन नगरमे ई उक्का पसारि देल गेल छलै जे एकटा बताह हफ्ता-पंद्रह दिनपर एतए अबैत अछि आ अपनाकेँ माइंसक असली डिपो सुपरवाइजर आ असली मोहनदास बी.ए. कहैत अछि। जौं ओकरा बिसनाथ कहि कऽ गरजियौ तँ अंट-शंट बाजऽ लागैत अछि आ ओकरा बतहपनीक दौड़ा पड़ै छै। मोहनदास हारि गेल आ ओ कोलियरी जाएब छोड़ि देलक। ओ दिन-राति पजरैत रहल। कठिनाक रेतपर राति भरि जागि कऽ चुपचाप आकाशकेँ घुरैत रहैत छल। गाममे ओहिनो कबीरपंथी बंसहर-पलिहा निचला जातिक मानल जाइत छल। ओ अनुसूचित जातिक अछि वा आदिवासी वा आदिम जनजातिक, एखन धरि सरकारी गजेटमे ई फरिछाएल नै छल। दस बरख पहिने भेल जनगणनामे ओकर जातिक आगू "बंसोर” वा "पलिहा” टा लिखल छल। दोसर कागजमे धर्म "हिन्दू' आ राष्ट्रीयता "भारतीय”। ओकर सभक संख्या कम छलै। ओकर समांगक कोनो लोक पार्टी वा सरकारमे नै छल। ओइसँ मोहनदास एतए मजाक आ ठट्ठाक विषय बनि गेल छल। ऊँच जातिक धनीक लोक ओकरा देखैत आ पुछैत छल, "तोहर नोकरी कहिया लागि रहल छौ रे मोहना?” कियो ओकरा सलाह दैत छलै जे विजय तिवारीक महिसवारी सम्हारि ले। कमसँ कम खाइ-पिबैले तत्ता-सिहर तँ नै हेतौ। कस्तूरी सेहो मौज करतौ। साड़ी-सैंडिलक दिक्कत नै रहतौ।” कियो-कियो तँ ओकरा लेनिन नगर जा कऽ बिसनाथक पएर पकडि़ कऽ ओकर घरक चाकरी करबाक सुझाव दैत छल। मोहनदास गामक पैघ लोककेँ देखिये कऽ रस्ता बदलि लै छल। ओ ओकरा देखये कऽ दूरसँ घुमि जाइ छल। एहनो नै छल जे ओकरा लऽ कऽ गामक लोककेँ सहानुभू्त नै छलै। सत तँ ई छै जे बेसी लोक ओकरा लऽ कऽ चिंतित छल। कोनो-नै-कोनो तरहे ओकर मदति करऽ चाहै छल। मुदा ई ओ लोक छल जे अपने कतेको तरहक संकट आ विपदामे बाझल छल। एकरामे सँ ककरो कत्तौसँ ऊपर धरि पहुँच नै छलै। ओ सभ अप्पन घाम आ अप्पन-अप्पन नोरक संग ऐ कालमे चुपचाप जीबैबला लोक छल। घनश्याम एहने लोकमे एकटा रहए। जातिक कुर्मी रहै। मुदा ओ गरीब नै रहए। तीस बीघाक खेती छल। बैंकमे किस्तपर ओ ट्रैक्टर लेने छल। शाक-सब्जी आदि उगाबैक अलावा ओ अप्पन ट्रैक्टर किरायापर उठा रखने छल। तखनो सभ मास साढ़े सात हजारक किस्त कटायब ओकरा मुश्किल होइल छलै। खेतमे उपजैबला अनाज आ दोसर फसलक दाम बाजारमे नै रहि गेल छलै। लग-पासक गाम बलहराक बिसेसर जे ग्रामीण बैंकसँ कर्ज लऽ कऽ सोयाबीनक खेती केने छल, दू मास पहिने अप्पन खेतकेँ नीलामीसँ बचाबै लेल बिजलीक खुट्टापर चढ़ि नांगट तारसँ सटि कऽ मरि गेल छल। छोटका किसान आ जोन-मजदूर गाम छोड़ि-छोड़ि शहरक दिस भागि रहल छल। घनश्याम सेहो परेशान रहैत छल। ओइ दिन मोहनदासकेँ कनी जूड़ी चढ़ल छलै। दिन भरि सूप-टोकरी बुनाय आओर बड़ राति धरि पलियामे पानि पटाबैक बाद ओ एत्ते थाकि गेल छल जे बिना खाएल-पीएल सुति गेल छल। भिनसरे उठल तँ देह गरम छलै। परछीमे पटाएल छल तखने घनश्याम आबि गेलै। ओ अपना संगमे मोहनदासक साढू गोपालदासकेँ सेहो पकड़ि कऽ आनने छल। दुनू मोहनदाससँ कहलक जे ओकर चिन्हार एकटा लोक भेट गेल जे ओरियंटल कोल माइंसक जी.एम. (जनरल मैनेजर) ए.के. सिंहकेँ जानैत अछि। ओ मोहनदाससँ कहलक जे ओ एखन तुरत हाथ-मुंह धो कऽ तैयार भऽ जाए, अगला बससँ ओतए चलबाक छै। घनश्याम आ गोपालदास दुनू उत्साहमे छल। ओ सभ कहलकै जे आइए पहुँचब ऐ लेल जरूरी छै किएक तँ परसू सँ जी.एम. एक मासक छुट्टीमे बाहर जा रहल छै। गोपालदास अप्पन झोरासँ मोहनदासक पहिरबा लेल एकटा पैंट आ एकटा शर्ट सेहो कीन कऽ आनने छल। ओ हसैत कहलक, "लिअ, एकरा पहिर लिअ! बुढबा बड़दक पोथा सन मैनेजर लग चेहरा लटका कऽ नै जाउ।" मोहनदास जूड़ीमे हँसए लागल। ओरियंटल कोल माइंसक जनरल मैनेजर एस.के. सिंहसँ भेंट करबामे कोनो दिक्कत नै भेलै। गोपालदासक पैंट आ बुश्शर्ट मोहनदासक भीतर नव आत्मविश्वास भरि देने छलै। ओ जी.एम. केँ सभटा खिस्सा बतौलक जे कोना 18 अगस्त, 1997 केँभर्ती परीक्षामे ओ नोकरी लेल सलेक्ट भेल छल आ पाँच कैंडिडेटक लिस्टमे ओकर नाम सभसँ ऊपर छलै। ओइ दिन ओ अप्पन सभटा सर्टिफिकेट आ कागच दफ्तरमे जमा कऽ देने छल मुदा ओकरा लग कहियो नियुक्ति पत्र नै एलै आ आब कोना बिछिया टोलाक बिसनाथ ओकर नामसँ पिछला पाँच बरखसँ एतए नोकरी कऽ रहल छै आ डिपो सुपरवाइजर बनि दस हजारसँ ऊपर दरमाहा लऽ रहल छै। मोहनदासकेँ घनश्याम कहि कऽ राखने छल जे ओ जी.एम. केँ ओइ दिनुका घटना नै बताबै, जहिया ओ कोलियरी अप्पन कागज मांगै लेल आएल छल आ भरती दफ्तरक बाबू सभ ओकरा मारने छलै आ फेर बादमे लेनिन नगरमे पुलिसक दरोगा विजय तिवारी आ बिसनाथ ओकरा धमकी देने छलै। ऐ लेल मोहनदास एतबेपर रुकि गेल। ओकर गपक समर्थन ओतए बैसल घनश्याम आ गोपालदास सेहो केलक। जनरल मैनेजर एस.के. सिंह केँ लऽ कऽ ई प्रसिद्ध छल जे ओ बड़ सोझ अफसर अछि। धुरफंदीबला लोकक संग जौँ ओ रहितो अछि तँ ऐ लेल जे ओकरा महग दारूक हिस्सक छै। नै तँ ओ एत्ते सोझ छै जे ओ नै तँ केकरो अधलाह कऽ सकैत अछि, नहिये केकरो नीक। मुदा जी.एम. मोहनदासक सभटा गप सुनि कऽ ओरियंटल कोल माइंसक वेलफेयर ऑफिसर ए.के. श्रीवास्तवकेँ ऐ मामिलाकेँ जांचैक आदेश देलक आ कहलक जे अगला मास जखन ओ छुट्टीसँ घुरताह, तखन धरि हुनका जांच रिपोर्ट भेट जेबाक चाही। मोहनदास एस.के. सिंहक एहि रूखसँ एतेक भावुक भऽ गेल जे बेर-बेर ओकर आँखि नोरा जाइ छलै। ओ मोने मोन सतगुरू कबीर आ मलइहा माइक नाम जपि रहल छल। अगिला हफ्ता जांच भेल। वेलफेयर ऑफिसर ए.के. श्रीवास्तव लेनिन नगरक फ्लैट नंबर ए बटा एगारह पहुँचल। बिसनाथकेँ एक-एक गपक जानकारी पहिनेसँ छलै। ओकर तार सभ जगह फिट छलै। पछिला पाँच बरखसँ ओ लेनिन नगरमे मोहनदास नामसँ रहि रहल छल ताइसँ ओ लेनिन नगरमे मोहनदासक नामसँ जानल जाइत छल। ए.के. श्रीवास्तव जकरासँ पुछैत छल जे फ्लैट नंबर ए बटा एगारहमे रहैबला लोकक की नाम छै तँ सभ कियो एक्के जवाब दैत छल, "मोहनदास।” ओ सेहो पछिला चारि-पाँच बरखसँ जकरा मोहनदास नामसँ जानैत छल आ जकरा लेल ओ वर्कर्स वेलफेयर फंडसँ लोन सेहो सेंक्शन केने छल ओ "मोहनदास' माने बिसनाथ छल। फेर ओइ दिन जी.एम. क चैंबरमे जकरा ओ देखले छल जे अपनाकेँ मोहनदास कहि रहल छल, ओकरा देखि कऽ ओकर मोनमे कत्तौ-नै-कत्तौ संदेह भऽ रहल छलै जे एहन लखा दै बला लोक ग्रेजुएट कोना भऽ सकैत अछि? अप्पन साढू गोपालदासक कपड़ा पहिर लेलाक बादो एत्ते बरखक बेरोजगारी, मेहनत आ अभावसँ मोहनदासक चेहरा आ समुच्चा देहक हुलिया एहन बनि गेल छलै जे एक नजरिमे ओ बेमार, बताह आ अनपढ़ नजर आबैत छल। इंक्वायरी ऑफिसर श्रीवास्तवक मन बेर-बेर कहैत छल जे भऽ सकैत अछि जे मोहनदास बनल लोक डिपो सुपरवाइजर मोहनदास नै हुअए मुदा कियो आर हुअए मुदा ई जे अपनाकेँ मोहनदास हेबाक दाबी कऽ रहल अछि ओ सेहो कत्तौसँ मोहनदास नै लगैत अछि। बिसनाथ जबरदस्त व्यवस्था कऽ के राखने छल। अप्पन फ्लैटमे ओ श्रीवास्तवजीक खूब सत्कार केलक। अप्पन कनियाँ अमिताकेँ ओ लो कट ब्लाउज आ नीचाँ सारीमे शर्बतक ट्रे लऽ कऽ ड्राइंग रूममे आबै लेल कहि देने छल। लेनिन नगर मार्केटमे एम्हर खुजल शिल्पा ब्यूटी पार्लरमे जा कऽ अमिता अप्पन फेशियल करौने छल। ओ शर्बतक ट्रे टेबुलपर राखैत मुस्कुराइत छ्ल जखन श्रीवास्तवजीकेँ ओ नमस्ते केलक आ कहलक, "सरिता दीदीकेँ संगमे नै आनलिऐ सर?” तँ एकाएक ओतुक्का वातावरण आत्मीय, घरेलू आ ऐंद्रिक भऽ गेलै। इंक्वायरी ऑफिसरक नजरि बेर-बेर अमिताक खुजल ढोढ़ीपर जाइत छल। टीवीपर तखन दिल्ली-मुंबइ मे चलैबला फैशन शो कार्यक्रमक समाचार चैनल नर-बड़ देखल जाइत छल। मुदा एतए तँ एकदम्मे जिंदा मॉडल जेहन स्त्री आगू ठाढ़ छलै। ई समाचार नै मुदा एकटा सत छलै। "ई हमर कनिया अछि सर!” बिसनाथ नमकीन बिगजी श्रीवास्तवजी दिस बढ़बैत कहलक-"कस्तूरी!' "नाम कोनो पुरान स्टाइलक नै लगैत अछि?” इंक्वायरी ऑफिसर ठाम टेबुल पर नमकीनक राखल प्लेटसँ एकटा बिसकुट उठबैत मुस्कियाइत कहलक। अमिताकेँ हँसी लागि गेलै। "ई की अछि सर जे ज्योतिषी पिताजीसँ कहने छल जे मीन राशिवाली लड़कीकेँ अप्पन बाजैबला नाम सेहो राशि बला राखबाक चाही...! तखन फल होइत छै। तइसँ हमहूँ सेहो कहलिऐ...चलू कोनो गप नै! राखि लैत छी।” "ओह! तँ कस्तूरी अहाँक राशिबला नाम छी?” इंक्वायरी ऑफिसर आब अमितासँ गप्प कऽ रहल छल। "अच्छा तँ बाजैबला नाम की छी अहाँक?” ओकर हँसीमे आत्मीयताक घनत्व लगातार बढ़ि रहल छलै। अमिताक चेहरापर असमंजसक डरीड़ बनऽ लागलै। एक पल लेल ओ चुप रहि गेल। बिसनाथ ऐ गपकेँ तत्काले बुझि गेल। "खूब छी! आब नाम बताबैमे कथी लेल लजाइ छी कस्तूरी!" बिसनाथ ठहाका लगौलक-"चलू, हमहीं बता दैत छी!... सर हिनकर बाजैबला नाम छन्हि अमिता!... अमिता भारद्वाज। घरमे सभ यएह कहै छन्हि।” इंक्वायरी ऑफिसर श्रीवास्तव हंसै लागल। "लेडिज केँ लाज नै हुअए तँ नीक नै लागैत छै। कनीटा किछो तँ लेडिजपना बनल रहबाक चाही आकि नै!...चलू कस्तूरीजी हम अहाँकेँ अमिताजीए कहब! कोनो ऑब्जेक्शन तँ नै अहाँकेँ?” "नै सर! एक्को रत्ती नै!" अमिता फुदकि उठल। "मुदा सत गप तँ ई अछि जे जखन कियो हमरा अमिता कहैत अछि तँ लागैत अछि जे ओ हमरे घर दिसका अछि।” अमिता एकटा बड़का सांस भरलक, "ऐ इलाकामे अप्पन सन किछु लागिते नै छै! बैकवर्ड छी हम सभ! बोर भऽ जाइत छी हम सभ।” "एखन डेवलप हैमे टाइम लागत। ओना प्रोग्रेस तँ बड़ छै एम्हर। दू बरख पहिने की छल एतए?' श्रीवास्तवजी सहज भऽ रहल छल। "अहाँकेँ टाइम कोना पास होइत अछि एतए, लेनिन नगरमे?” "बस भऽ जाइत अछि कोनो तरहे। किट्टी पार्टी भऽ जाइत छै। एक-दू कमेटे डालि देने छी, गरीब मजदूरक भलाइ लेल। सोशल सर्विसमे मन लागि जाइत अछि।” "नीक अछि, नीक अछि। सरिताकेँ सेहो बड़ शौक छै सोशल सर्विसक। अहाँ आएल करू हमरा दिस। सरिताकेँ सेहो इनवाल्व करू अपना सँ।” श्रीवास्तवजी बिसरि गेल छल जे ओ एतए कोन काज लेल आएल छल। बिसनाथक बांहि फूलि गेलै। मौका सही छलै। ओ बाजल, "देखू सर, ई लेनिन नगर एहन कॉलोनी छै जतए पड़ोसिये पड़ोसीक दुश्मन अछि। कियो ककरो हंसी-खुशी आर बढ़ैत देखिये नै सकैए। आब यएह बिन-बातक बात। आर किछो नै भेटलै तँ पकड़ि आनलक ककरो दू-चारि दाना फेंक कऽ आ कऽ देलक शिकाइत। हम जानैत छी ककर कारस्तानी छिऐ ई। जातिवाद बेसी पसरि रहल छै आइ-काल्हि। ई सभ आब माथपर बैसत। हम बुझै छी जे ककर कराएल छै ई सभटा खेल मुदा जाए दियौ। साँचकेँ आँच की? अहाँ अपन इंक्वायरी निष्पक्ष भऽ कऽ करू।” इंक्वायरी ऑफिसर डायरी निकाललक आ पुछलक, "फादरक की नाम छी अहाँक?” "बाबूजी! ओ बाबूजी! कनी बैसकीमे आबि जाउ!” बिसनाथ जोरसँ चिकरल आ फेर मुस्कुरा कऽ कहलक, "देखू संजोगे छै जे माय-बाबूजी दुनू काल्हि एतए आएल छथि। अचार सभ बनल रहै। पहुँचाबैक बहन्ना चलि आएल, बेटा-बहुकेँ देखबा लेल! हमर बल्दियत अहाँ हमर फादर-मदरसँ पूछि लियौ।” "हम तँ जाइत छी।” अमिता कहलक, "ट्रेडिशनल फैमिली अछि हमर।” ओ उठि कऽ भीतर चलि गेलि। नगेंद्रनाथक पाछाँ ओकर कनियाँ रेणुका देवी सेहो ड्राइंग रूममे आबि गेलि। तिलक चंदन देखि कऽ इंक्वायरी ऑफिसर श्रीवास्तवजी अपन सोफासँ उठि कऽ हुनका नमस्कार करबासँ अपनाकेँ रोकि नै सकल। बड़ विनम्रताक संग ओ पुछलक, "अप्पन-अप्पन शुभ नाम बता दिअ अहाँ दुनू गोटे। असलमे कागजी कारवाइ छै। पूरा तँ करैए पड़ैत छै।” नगेंद्रनाथ एक्को पलक देरी नै केलक, "हम्मर नाम छी काबादास।” ओ कुरताकेँ गरमे सँ खींच कऽ माला निकालि बाजल- "ई तुलसीक माला जहियासँ धारण केने छी, तहियासँ तुलसीदासक चौपाइ हम्मर ओढ़ना-बिछौना अछि। "दास” नाम हम तहियेसँ जोड़ि राखने छी।...आ ई अछि हमर कनिया पुतलीबाइ। मोहनाक महतारी।" रेणुका देवी मूड़ी डोला कऽ हँ कहलक। ऐ तरहे इंक्वायरी पूरा भऽ गेल। ओरियंटल कोल माइंसक वेलफेयर ऑफिसर ए.के. श्रीवास्तव अप्पन जांचमे पेलक जे मोहनदास बल्द काबा दास, ग्राम पुरबनरा, थाना आ जिला अनूपनगर, मध्यप्रदेश केँ लऽ कऽ उठाओल गेल सभटा आपत्ति निराधार अछि। ओ पुष्टि लेल पुरबनराक सरपंच छत्रधारी तिवारी आ जिला जनपद सदस्य श्यामला प्रसादक कएल गेल तस्दीकक कागज सेहो रपटक संग नत्थी कऽ देलक जे ओकरा बिसनाथ देने रहै। बिसनाथ आ अमिता माने मोहनदास आ कस्तूरीक आग्रहपर श्रीवास्तवजी दुपहर धरि ओतए विश्राम केलन्हि, साँझमे बियर आ बादमे व्हिस्की सेहो ओतए पिलन्हि, सामिष आहारमे देशी मुर्गा आ जखन ओ राति एगारह बजे अप्पन नबका "मारुति जेन” सं ओतएसँ बिदा भऽ रहल छल, तखन बेर-बेर अमिताकेँ "कस्तूरीजी” संबोधित करैत अप्पन घर आबैक लेल आ अप्पन वाइफ सरिताकेँ समाज सेवामे इन्वाल्व करैक आग्रह कऽ रहल छल। मुदा नशाक बादो ओकर आँखि अमिताक ढोढ़ीपर टिकल छलै जे रातिक अन्हारमे पैघ भऽ कऽ ओकर समुच्चा चेतनापर आच्छादित भऽ गेल छलै। (ई सभटा गप ओइ कालक अछि जखन पंजाबमे लोक सेवा आयोगक चयन समितिक अध्यक्ष करोड़ो टका घूस खा कऽ, पूरा राज्यमे हजारो सरकारी अधिकारीक नियुक्ति कऽ देने छल आ सी.बी.आइ.क छापा मारल गेलापर फरार भऽ गेल छल। ...जखन पैघ-पैघ मंत्रीक आवासमे जेड सिक्योरिटीक भीतर सूटकेस आ नोटक बंडल पहुँचि रहल छल आ ओतए भारतक कोनो साधारण लोकक प्रवेश वर्जित छल।...जखन हरियाणाक एकटा आइ.जी. आओर उत्तरप्रदेशक एकटा कबीना मंत्री स्त्रीगणक संग अवैध संबंध आ हत्याक आरोपमे गिरफ्तार छल आ मुंबइमे एनकाउंटरसँ अंडरवर्ल्डक अपराधीकेँ मारैबला "सुपरकॉप” सेहो माफियाक "सुपारी किलर"छल।...एहन काल जखन ऐ उपमहाद्वीपक प्रजाक भाषा हिंदी आ उर्दू केँ "राजभाषा' बनेलाक बाद प्रेमचंद, नेरूदा, फैज आ नजरूल-निराला केँ "राज-लेखक” बनेबा लेल सत्ताधारी राजनीतिक दलक लोक लेखकक मुखौटा लगा कऽ कमेटी बना रहल छल। ...एहन काल जखन दिल्लीक एकटा बेमार आ कर्जदार दर्जी अप्पन दूटा संतान आ अप्पन कनियाकेँ माहुर खुआ कऽ मारि देलाक बाद अप्पन हत्याक प्रयास करैत पकड़ल गेल, किएक तँ ओकरा लग आजीविकाक कोनो विकल्प नै रहि गेल छल। आब ओकरा जेलमे दऽ कऽ इंडियन पीनल कोडक धारा 302 आओर 309 लगा कऽ हत्या आ आत्महत्याक कोशिशक मुकदमा चलाओल जा रहल छल। ...आ...) (अनुवर्तते............) बालानां कृते १.संस्कृति वर्मा- मेहनत २.नवीन कुमार "आशा"- मस्ती करू यौ बौआ मस्ती करू १ संस्कृति वर्मा मेहनत एक टा गाम में दू टा गाछ छल ,एकटा फूल से भरल दोसर काँट से भरल छल. फूल के अपन सुन्दरता पर बड घमंड छल. कांट वाला गाछ चुपचाप रहैत छल,किन्तु वो मेहनती छल..पानी लेल ओकर जड़ी दूर दूर धरि चलि जायत छल. फूल वाला गाछ बड आलसी छल. ओ मालीक पटेल पानि पर जिन्दा रहैत छल. अपने से पानी लेनाय त ओ सीखबे नहि केने छल. आ एक दिन मालीक मृत्यु भ गेलैक. पानी क अभाव में फूल क गाछ सुखि साखि गेल ,फूल,पात सब टा सुखि बेजान भ गेलैक. एक दिन लकडहारा आबि ओहि गाछ के काटी ल गेल. ई देखि कांट वाला गाछ डेराय गेल.मुदा ओहि गाछ के केओ नहि काटलक. ओकर ठारी के काटी सब ल जायत छल अपन पेड़ पौधाक रक्षा करवा लेल अपन फसिल के रक्षा लेल....काँट क गाछ खुश भ गेल हम केकरो काज ते आबि रहल छी.. एहि कारन कहल गेल छैक जे रूप से किछ नै होयत छैक, जे कर्म होयत अछ ओ फल दैत छैक. अस्तु, मेहनत से जी नै चुरेबाक चाही केकरो.... २ नवीन कुमार "आशा" (१९८७- ) पिता श्री गंगानाथ झा, माता श्रीमति विनीता झा। गाम- धानेरामपुर, पोस्ट- लोहना रोड, जिला- दरभंगा। मस्ती करू यौ बौआ मस्ती करू मस्ती करू यौ बौआ मस्ती करू मुदा पढ़ाइपर कस्ती करू आएल छला अहाँक मास्टर कहि गेला कहि गेला हमरा दू आखर बौआ जँ तूँ नै पढ़बेँ तँ हमरा सभकेँ की देखबेँ तोरामे अछि उम्मीद बसल की ओ निकलत हम्मर भ्रम नै तूँ तोरिहेँ हम्मर आस नै तूँ करिहेँ हमरा निराश मस्ती करू यौ बौआ मस्ती करू मुदा पढ़ाइपर कस्ती करू आब नै तूँ छह नेना नै देखेबह तोरा ऐना तूँ जँ अपने नै बौझबऽ तँ तूँ केना की करबऽ जखन देखी तोरा पढ़ैत मनमे उल्लास फेर जागल जखन देखी खैलै-खेलाइ मनमे आबए रस मलाइ मस्ती करू यौ बौआ मस्ती करू मुदा पढ़ाइपर कस्ती करू हमर आस तूँ नै तोरिहेँ अपन माएकेँ नै बिसरिहेँ माइक सपना पूरा करिहेँ आ ओकर नाम अमर रखिहेँ कहै छलौ तोहर माए अहाँक बौआ नाम कमाए देखबै बौआक बापू अहाँकेँ मनपर नै रहत काबू जखन बौआ बनत डॉक्टर फेर होएत ओकरापर गर्व की बौआ ई निकलत भ्रम की बौआ तूँ तोरमे आस तोरासँ अछि जुड़ल हमर साँस नओ तूँ करिहेँ हमरा निराश बौआ जौँ तोरा लगलौ अधला जुनि तूँ करिहेँ तूँ अधला कहैक मतलब छलौ बौआ नै तूँ एना कतै टौआ आइ हमर मन भेल प्रसन्न किएक तँ तूँ भेलेहेँ पास माइक सपना पूरा हेतौ आ तोरा डिग्री भेटतौ ऐसँ छौ सभकेँ संदेश जुनि अहाँ बिसरू अपन भेष जुनि बिसरू अपन देश माता-पिताक करू सम्मान पहिने देखू हुनकर मान मस्ती करू यौ बौआ मस्ती करू मुदा पढ़ाइपर कस्ती करू ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। बच्चा लोकनि द्वारा स्मरणीय श्लोक १.प्रातः काल ब्रह्ममुहूर्त्त (सूर्योदयक एक घंटा पहिने) सर्वप्रथम अपन दुनू हाथ देखबाक चाही, आ’ ई श्लोक बजबाक चाही। कराग्रे वसते लक्ष्मीः करमध्ये सरस्वती। करमूले स्थितो ब्रह्मा प्रभाते करदर्शनम्॥ करक आगाँ लक्ष्मी बसैत छथि, करक मध्यमे सरस्वती, करक मूलमे ब्रह्मा स्थित छथि। भोरमे ताहि द्वारे करक दर्शन करबाक थीक। २.संध्या काल दीप लेसबाक काल- दीपमूले स्थितो ब्रह्मा दीपमध्ये जनार्दनः। दीपाग्रे शङ्करः प्रोक्त्तः सन्ध्याज्योतिर्नमोऽस्तुते॥ दीपक मूल भागमे ब्रह्मा, दीपक मध्यभागमे जनार्दन (विष्णु) आऽ दीपक अग्र भागमे शङ्कर स्थित छथि। हे संध्याज्योति! अहाँकेँ नमस्कार। ३.सुतबाक काल- रामं स्कन्दं हनूमन्तं वैनतेयं वृकोदरम्। शयने यः स्मरेन्नित्यं दुःस्वप्नस्तस्य नश्यति॥ जे सभ दिन सुतबासँ पहिने राम, कुमारस्वामी, हनूमान्, गरुड़ आऽ भीमक स्मरण करैत छथि, हुनकर दुःस्वप्न नष्ट भऽ जाइत छन्हि। ४. नहेबाक समय- गङ्गे च यमुने चैव गोदावरि सरस्वति। नर्मदे सिन्धु कावेरि जलेऽस्मिन् सन्निधिं कुरू॥ हे गंगा, यमुना, गोदावरी, सरस्वती, नर्मदा, सिन्धु आऽ कावेरी धार। एहि जलमे अपन सान्निध्य दिअ। ५.उत्तरं यत्समुद्रस्य हिमाद्रेश्चैव दक्षिणम्। वर्षं तत् भारतं नाम भारती यत्र सन्ततिः॥ समुद्रक उत्तरमे आऽ हिमालयक दक्षिणमे भारत अछि आऽ ओतुका सन्तति भारती कहबैत छथि। ६.अहल्या द्रौपदी सीता तारा मण्डोदरी तथा। पञ्चकं ना स्मरेन्नित्यं महापातकनाशकम्॥ जे सभ दिन अहल्या, द्रौपदी, सीता, तारा आऽ मण्दोदरी, एहि पाँच साध्वी-स्त्रीक स्मरण करैत छथि, हुनकर सभ पाप नष्ट भऽ जाइत छन्हि। ७.अश्वत्थामा बलिर्व्यासो हनूमांश्च विभीषणः। कृपः परशुरामश्च सप्तैते चिरञ्जीविनः॥ अश्वत्थामा, बलि, व्यास, हनूमान्, विभीषण, कृपाचार्य आऽ परशुराम- ई सात टा चिरञ्जीवी कहबैत छथि। ८.साते भवतु सुप्रीता देवी शिखर वासिनी उग्रेन तपसा लब्धो यया पशुपतिः पतिः। सिद्धिः साध्ये सतामस्तु प्रसादान्तस्य धूर्जटेः जाह्नवीफेनलेखेव यन्यूधि शशिनः कला॥ ९. बालोऽहं जगदानन्द न मे बाला सरस्वती। अपूर्णे पंचमे वर्षे वर्णयामि जगत्त्रयम् ॥ १०. दूर्वाक्षत मंत्र(शुक्ल यजुर्वेद अध्याय २२, मंत्र २२) आ ब्रह्मन्नित्यस्य प्रजापतिर्ॠषिः। लिंभोक्त्ता देवताः। स्वराडुत्कृतिश्छन्दः। षड्जः स्वरः॥ आ ब्रह्म॑न् ब्राह्म॒णो ब्र॑ह्मवर्च॒सी जा॑यता॒मा रा॒ष्ट्रे रा॑ज॒न्यः शुरे॑ऽइषव्यो॒ऽतिव्या॒धी म॑हार॒थो जा॑यतां॒ दोग्ध्रीं धे॒नुर्वोढा॑न॒ड्वाना॒शुः सप्तिः॒ पुर॑न्धि॒र्योवा॑ जि॒ष्णू र॑थे॒ष्ठाः स॒भेयो॒ युवास्य यज॑मानस्य वी॒रो जा॒यतां निका॒मे-नि॑कामे नः प॒र्जन्यों वर्षतु॒ फल॑वत्यो न॒ऽओष॑धयः पच्यन्तां योगेक्ष॒मो नः॑ कल्पताम्॥२२॥ मन्त्रार्थाः सिद्धयः सन्तु पूर्णाः सन्तु मनोरथाः। शत्रूणां बुद्धिनाशोऽस्तु मित्राणामुदयस्तव। ॐ दीर्घायुर्भव। ॐ सौभाग्यवती भव। हे भगवान्। अपन देशमे सुयोग्य आ’ सर्वज्ञ विद्यार्थी उत्पन्न होथि, आ’ शुत्रुकेँ नाश कएनिहार सैनिक उत्पन्न होथि। अपन देशक गाय खूब दूध दय बाली, बरद भार वहन करएमे सक्षम होथि आ’ घोड़ा त्वरित रूपेँ दौगय बला होए। स्त्रीगण नगरक नेतृत्व करबामे सक्षम होथि आ’ युवक सभामे ओजपूर्ण भाषण देबयबला आ’ नेतृत्व देबामे सक्षम होथि। अपन देशमे जखन आवश्यक होय वर्षा होए आ’ औषधिक-बूटी सर्वदा परिपक्व होइत रहए। एवं क्रमे सभ तरहेँ हमरा सभक कल्याण होए। शत्रुक बुद्धिक नाश होए आ’ मित्रक उदय होए॥ मनुष्यकें कोन वस्तुक इच्छा करबाक चाही तकर वर्णन एहि मंत्रमे कएल गेल अछि। एहिमे वाचकलुप्तोपमालड़्कार अछि। अन्वय- ब्रह्म॑न् - विद्या आदि गुणसँ परिपूर्ण ब्रह्म रा॒ष्ट्रे - देशमे ब्र॑ह्मवर्च॒सी-ब्रह्म विद्याक तेजसँ युक्त्त आ जा॑यतां॒- उत्पन्न होए रा॑ज॒न्यः-राजा शुरे॑ऽ–बिना डर बला इषव्यो॒- बाण चलेबामे निपुण ऽतिव्या॒धी-शत्रुकेँ तारण दय बला म॑हार॒थो-पैघ रथ बला वीर दोग्ध्रीं-कामना(दूध पूर्ण करए बाली) धे॒नुर्वोढा॑न॒ड्वाना॒शुः धे॒नु-गौ वा वाणी र्वोढा॑न॒ड्वा- पैघ बरद ना॒शुः-आशुः-त्वरित सप्तिः॒-घोड़ा पुर॑न्धि॒र्योवा॑- पुर॑न्धि॒- व्यवहारकेँ धारण करए बाली र्योवा॑-स्त्री जि॒ष्णू-शत्रुकेँ जीतए बला र॑थे॒ष्ठाः-रथ पर स्थिर स॒भेयो॒-उत्तम सभामे युवास्य-युवा जेहन यज॑मानस्य-राजाक राज्यमे वी॒रो-शत्रुकेँ पराजित करएबला निका॒मे-नि॑कामे-निश्चययुक्त्त कार्यमे नः-हमर सभक प॒र्जन्यों-मेघ वर्षतु॒-वर्षा होए फल॑वत्यो-उत्तम फल बला ओष॑धयः-औषधिः पच्यन्तां- पाकए योगेक्ष॒मो-अलभ्य लभ्य करेबाक हेतु कएल गेल योगक रक्षा नः॑-हमरा सभक हेतु कल्पताम्-समर्थ होए ग्रिफिथक अनुवाद- हे ब्रह्मण, हमर राज्यमे ब्राह्मण नीक धार्मिक विद्या बला, राजन्य-वीर,तीरंदाज, दूध दए बाली गाय, दौगय बला जन्तु, उद्यमी नारी होथि। पार्जन्य आवश्यकता पड़ला पर वर्षा देथि, फल देय बला गाछ पाकए, हम सभ संपत्ति अर्जित/संरक्षित करी। 8.VIDEHA FOR NON RESIDENTS 8.1.Original Poem in Maithili by Kalikant Jha "Buch" Translated into English by Jyoti Jha Chaudhary 8.2. DR. SHEFALIKA VERMA- DISCRIMINATION AGAINST WOMEN Original Poem in Maithili by Kalikant Jha "Buch" Translated into English by Jyoti Jha Chaudhary Kalikant Jha "Buch" 1934-2009, Birth place- village Karian, District- Samastipur (Karian is birth place of famous Indian Nyaiyyayik philosopher Udayanacharya), Father Late Pt. Rajkishor Jha was first headmaster of village middle school. Mother Late Kala Devi was housewife. After completing Intermediate education started job block office of Govt. of Bihar.published in Mithila Mihir, Mati-pani, Bhakha, and Maithili Akademi magazine. Jyoti Jha Chaudhary, Date of Birth: December 30 1978,Place of Birth- Belhvar (Madhubani District), Education: Swami Vivekananda Middle School, Tisco Sakchi Girls High School, Mrs KMPM Inter College, IGNOU, ICWAI (COST ACCOUNTANCY); Residence- LONDON, UK; Father- Sh. Shubhankar Jha, Jamshedpur; Mother- Smt. Sudha Jha- Shivipatti. Jyoti received editor's choice award from www.poetry.comand her poems were featured in front page of www.poetrysoup.com for some period.She learnt Mithila Painting under Ms. Shveta Jha, Basera Institute, Jamshedpur and Fine Arts from Toolika, Sakchi, Jamshedpur (India). Her Mithila Paintings have been displayed by Ealing Art Group at Ealing Broadway, London. Separation In The Season Of Spring The old orchid tree laughed with new leaves The aged Mahua is also filled with nectars The magic of the Malay wind worked The barren mango trees are also in florescence The ages old pipal(plaksa) tree of the square Is filled with the new leaves all over The melody of cuckoo is pampering the nature The aged Mahua is also filled with nectars The Jasmine is hugging the Oleander (kanail) The pot of juices underlying in the wood-apple Arrangin the newly organised look Abuses the cold wind from west The bride of banana is removing veil of hers The aged Mahua is also filled with nectars Blossoms have taken place on each spear The Malati (mogra) has been making mind The Jasmine is filled with fragrance The Champa (Plumeria) went to in-laws’ place being angry Even the widow simmer is filled with ruby flowers The aged Mahua is also filled with nectars What much can I say about my well-being I dreamed about my man in foreign An overflowing chalice for a long-lasting thrust The starvation had been washed up The parched edge was soaked with the flow of extracts The aged Mahua is also filled with nectars I was awake in rest of the night It wasn’t his fault, I was the unfortunate The ocean of relish was overflowing But I was dying for a drop The moon is accompanying the sky, the earth remains dark The aged Mahua is also filled with nectars DR. SHEFALIKA VERMA DISCRIMINATION AGAINST WOMEN Right cannot be enjoyed without knowledge of their existence. Justice cannot be obtained without awarness of the remedies available to correct injustice. Human rights are increasingly vulnerable. Our society is scared by an increasing number of Humun Rights violations. It is an old saying that the hands of a women are behind every man's success. Even our religious and Scared book Durga-Saptashati has recognized that every women possesses Power, Energy & Respect like Goddess Durga and she is a part and parcel of the Goddess. The concept of Ardh-Narishwar and it's worship are indicative of the basic fact that man and woman play equal parts in creation 'या देवी सर्व भूतेशु मात्रीरुपें संस्थिता ,' या देवी सर्व भूतेशु श्रध्हा रुपें संस्थिता'' या देवी सर्व भूतेशु शक्ति रुपें संस्थिता" etc. Mantras support the said concept. The aim of the humanity should be to give a practical shape to the concept and make the same a part of our thought and conduct . Then alone the development of Woman Folk and entire Nation is possible. In conformity with the aforesaid thought Article-7 of the 1993 United Nations Convention on the elimination of all forms of discrimination against women calls upon all Government to ensure women's full participation in the political and public life of their countries, but our experience is that women are subjected to various types of discrimination including torture and harassment because of their civil, political, social, cultural or economic activities. In principle Human Rights of Women are an integral part of Univerasal Declaration of Human Rights. The full and equal participation of women in Political, Civil, Economic, Social and Cultural life at the National, Regional and International level are the basic objectives of the International Community. Eradication of all forms of discrimination on grounds of sex is one of the main objectives, but discrimination and violence experienced are reported from every nook and corner of the world. Journalists in Morocco, Lawyers in the Phillipines, Judges in Columbia, Political Reforms in Burma, Opposition Leaders in Mozambique, Environmentalists in Kenya, Feminists in Peru, Academics in China have suffered the pangs of misries because of their participation in the political and public life of their countries. Recently, efforts have been made worldwide to determine the condition of women. It has been found that majority of world's poor are women and the number of women living in rural poverty has increased by 50% since 1955. The number of illiterate women rose to 597 million in 1985 from 543 million in 1970. This shows that majority of world's illiterate are women. The statistics also showed that women earned 30% to 40% lesser than for doing equal work in violation of the human right of equal pay for equal work. They work for 13 hours a week more than men and in Asia and Africa they are mostly unpaid. They hold between 10% to 20% managerial and administrative jobs only. They make up less than 5% of the World's Heads of States. It is thus evident that the discrimination against women is all pervasive throughout the world, though Equality of Rights for women is the basic feature of the United States. In our Country the situation is more alarming. The marriage which is the basic need of human society for procreation has degenerated due to the virus of dowry system. Marriage can be performed by the equal participation of men & women, but dowry system has become so rampant that only women are victimized. We all know that marriage is a social system for systematic existence of our society, but it is not known why only women should be victimized, tortured, burnt or killed. Hardly any case has been reported in which any man has suffered due to the evils of dowry. Is not it a vital and fatal discrimination? Women do jobs mostly for the financial support of their family, but when any trouble arises with women, men very often harass them instead of extending help. When the joint family breaks it is only the Women, who are made responsible for it. When a person dies in rural area the responsibility for the said death is thrown on women with the allegation of practising witchcraft and they are severely tortured. There are countless instances of discrimination of severe consequences. Will the society ever bring women on equal footing with men? Translatd by writer herself VIDEHA MAITHILI SAMSKRIT TUTOR बिपिन कुमार झा लैटेक्स : परिचयः उपादेयता च (गताङ्कतः अग्रे) बिपिन कुमार झा वरिष्ठ अनुसंधाता भारतीयप्रौद्योगिकीसंस्थानम् मुम्बई तदनु txnic center इत्यस्य डेस्कटाप मध्ये संक्षिप्तचित्रिका सह संस्थापनं जातम्। अत, डेस्कटापस्थितस्य टेक्सनिक केन्द्रस्य उपरि नोदनद्वयं करोतु तदनु लांच करोत्य्। सम्यक्, अत्र डेस्कटाप अस्ति। अहं अस्य प्रदर्शनं करवाणि। अहं अधुना अस्य पिधानं करोमि। सम्यक्। अस्तु यत् करणीयं अस्ति तत् अस्ति एतस्य् कन्फीगरकरणं । अत्र एतत् पृच्छति कुत्र टेक्सविभाजनंस्थितः अस्ति इति। तत् वयं जानीमः कुत्र अस्ति इति।अहं अत्र मार्गं ददामि c colon, program files, miktex 2.7, miktex, bin. नूनं भवान् एतस्य कृते अन्वेषणं कृत्वा मार्गप्रदानं कर्तुं शक्नोति।अवगतम्, अहम् अग्रिमे पृष्टे अस्मि, एतत् पोस्टलिपिदर्शकः अस्ति, वयं एतत् स्वीकुर्मः। अधुना वयं किंचिदपि तत्र न दद्मः। अत्र यत् अहं करिष्यामि तत् अस्ति यत्र अडोब रीडर स्थितम् असि तत्र डायरेक्टरी इत्यस्य ब्राउज तथा संस्थापनं। अवगतम्। एतत् कार्यक्रम संचिकायाम् अस्ति अडोब रीडर, रीडर 9.0, रीडर। अहम अत्र नोदनं करोमि।अस्तु एतत चयनीकृतम्। अधुना अग्रिमः कुर्मः। पूर्णम्। शोभनम्। अधुना टेक्सनिक केन्द्रं सज्जितम्। अधुना यत् करणीयम् अस्ति तत् अस्ति अहं समानं करवानि यतोहि भवान् सम्यक् रूपेण पश्यतु> एतत् अत्र आगतम्। अहं किंचित् विस्तारं करोमि। सम्प्रति एतत् उपयोगार्थं सज्जितम् अस्ति। अधुना इतः प्रत्यावर्तनं भवेत्। अस्तु एतत् एका सूचना दास्यति – पिधानं करोतु इति| एका सज्जासूची उद्घाटिता भविष्यति तथ लेटेक्स विभाजनस्थापनार्थं कथयिष्यति अनेन सह मिटेक्स इत्यस्यार्थमनुरोधमपि करिष्यति। अस्तु वयं तत् पूर्वमेव स्वीकृतवन्तः । वयं next इति अत्र नोदनं कृतवन्तः । एतत् प्रक्ष्यति यत् कुत्र मिटेक्स इत्यस्य संचिका संरक्षिता अस्ति इति। वयं तत्रापि गमनं कुर्मः। मदीयसूच्याम् एतत् अत्र अस्ति। अहम् हस्तप्रक्रियया एतत् पूरणं करोमि। PS इति संचिकायां किंचिदपि पुटीकरणं न अपेक्षते तथा जालान्वेषणं करणीयं अपि च अक्रोबाइट PDF रीडर अन्वेषणं कृतवान्। अधुना टेक्सनिककेन्द्रं उपयोगार्थं सज्जितमस्ति| यदि भवता पूर्वं न कृतवान् अस्ति तु कृपया मौखक शिक्षणं प्रति गच्छतु एतत् maudgalya.org इत्यत्र विद्यते। एतदेवपूर्णाहूतिरूपमस्ति। अन्यत् सर्वं अनुमीयते यत् भवता दृष्टं स्यात् इति। अस्तु, टेक्सनिक केन्द्रं प्रति गच्छामः एवं संचिकासूचीनोदनं करवामः। तर्हि किं करणीयम्? यदि भवान नूतनसंचिकां वाछति तु new इति नोदनं करोतु लेखनं तथा रक्षणमपि करोतु। मम पार्श्वे पूर्वतः एव संचिका अस्ति ‘hello.txt’ load करोतु। अस्तु एतत् तदेव यत् करणीयमस्ति. सम्यक्? तत्र गच्छतु file> open, मम पार्श्वे लेटेक्स संचिका मध्ये एतत् अस्ति। अस्तु उद्घाटयामः।मम पार्श्वे एतत् इण्टेक्स संचिका मध्ये अस्तिhello.tex इति। सम्यक्, अत्र चलामः। टेक्सनिक केन्द्रस्य सर्वातिशयं साहाय्यम् अत्र दृश्यते। अन्य स्रोतरूपे अस्तिtexniccenter.org एतत् पूर्वमेव दृष्टम्। अस्तु, help इत्यत्र चलामः। contents इत्यत्र नोदनं भवेत्। टेक्सनिककेन्द्रतः तथा लेटेक्स इत्यतः सहाय्यं मिलितुं शक्नोति। यत् मया इष्टम् अस्ति- वयं तत्र चलामः। help contents इति अत्र सन्ति। अस्तु अत्र द्रष्टुं शक्यते यत् help इति कार्यद्वयस्य कृते उपलब्धम् अस्ति। नामितरूपे टेक्सनिककेन्द्रस्य कृते अपरम् लेटेक्स ईग्रन्थकृते। यदि भवान अत्र नोदनं करोति, बहूनि वस्तूनि द्रक्ष्यति। भवान एतदपि नोदनं करोतु, तत्राप् बहून् वस्तूनि मिलिष्यति। उदाहरणतया लेटेक्स गणितं तथा ग्राफिक्स इति। गणितम्- इत्यत्र बहनि बस्तूनि प्राप्तुं शक्नोति फ्रिक्सन, मट्रिक्स प्रभृतयः अस्तु पिधानं कुर्मः। आधुनिकतम लेटेक्स विविध उपयोगिवस्तूनि ददाति यथा अलामेण्ट्स चित्राणि इति एतानि। अस्तु एतदपि पिधानं कुर्मः सम्यक् अधुना अत्र आगच्छामि। टेक्सनिककेन्द्रस्थः सहायकः सर्वप्रथमं लिपिसन्दर्भे साहाय्यं करोति। पश्यतु एवं टेक्सनिककेन्द्रस्यानुभवं करोतु।टेक्सनिककेन्द्रस्य समायोजनं कथं करणीयमिति कथयति एतत्। यदा कदा मेन्वल तथा वास्तविक प्रक्रिया इत्यनयोर्मध्ये भेदे सति अन्तर्जालम् अनुगम्य उत्तरं प्राप्नोतु। वास्तविकतया एषा मुक्त स्रोत साफ्टवेयर बहुसम्यक् प्रक्रिया अस्ति- कमपि पृच्छतु स उत्तरं दास्यति। अपरम् आसीत् लेटेक्स सन्दर्भित साहाय्यम्। केन प्रकारेण रिपोर्ट संरचनीयम् कथम् अनुसूची निर्मेयम् प्रभृतीनां उत्तरम् इतः प्राप्तुं शक्यते। नूनमेव अन्तर्जालान्वेषणम् दक्षविकल्परूपे अस्ति। अस्तु अत्र आगत्य अख्शरस्य आकारवर्द्धनं कुर्मः। एतत् कृतम्। एतत् अत्र अस्ति tools, options text format. यदि अक्षराकरः 12 स्यात् तु सम्यक् भवता दृषटम् यत् आकारः वर्धितः। मया एतस्याकारः वर्धितः। भवान् स्वेच्छया एडुटर इत्यतः पंत्कि संख्यायोजनं कर्तुं शक्नोति। अस्तु अत्र आगच्छावः tools, options, editor , show line numbers प्रभृति। अस्तु भवान् पंक्ति संख्या द्रष्टुं शक्नोति। अधुना स्वकीय संचिका सज्जार्थं चलामः। विकल्पं चिनोतु latex to pdf इति अस्तु latex to pdf करवामः। समकालिअकरूपे एव शिफट तथा f5 न्दनं करोतु। अहम् एतत् करोमि। यदि अहम् shift, crtl तथा f5 समकालिकरूपे एव नोदनम् करोमि तु किं भवति? एतत् सज्जां करोति तथा pdf उद्घाटनं करोति। एतत् online भवति। अधुना तदेव कुमः shift, crtl तथा f5 इति। भवान् सजां द्रष्टुं शक्नोति। अनेन pdf रीडर् उद्घाटितम्। अस्तु अत्र आगन्तव्यम्। अहम् दीर्घतरं कर्तुम् इच्छामि। भवान् on line द्रष्टुं शक्नोति। भवान् परिवर्द्धनं कर्तुं शक्नोति। अस्तु hello.txt तथा hello.pdf पिधानं करोमि। भव्ष्ये अपि एवं कर्तुं शक्यते। अधुना वयं अडोब रीडर सन्दर्भितं व्याख्यानं कुर्मः। एतस्य कृते तत्र मौखिकशिक्षणस्य कृते report लेखनक्रमे उपयुक्तस्य report.tex इत्यस्य स्थापनं करवानि। एतत् maudgalya.org इत्यत्र वर्तते। अस्तु अत्र एतत् स्वीकरवाणि येन सम्यक् रीत्या दर्शनं स्यात्। तावत् प्रथमं किं करणीयम्? तावत् ctrl, shift f5 नोदनद्वारा संचयनं करणीयम्। एतस्य संचयनं भवति । एकपृष्ठात्मकं report इत्यागतम्। अस्तु एतत् अत्र आनयामि। सम्यक्, किंचित् परिवर्धनं करोमि। सम्यक्.. किमभवत्? वयं एतत् कृतवन्तः।अधुना यत् करणीयमस्ति तत् अस्ति संचिकातः रिपोर्ट मध्ये एतस्य वर्गपरिवर्तनम्। अत्र लेखः अस्ति।एतस्य लोपं करोमि तथा एतस्य परिवर्तनं रिपोर्टरूपे करोमि। रक्षनं करोतु तथा सचयं करोतु ctrl, shift f5. सम्यक् अधुना पृष्ठद्वयमागतम्। अनन्तरं एतत् स्वीकुर्मः। परिवर्द्धनं करोमि। अपरं पृष्ठं प्रति गच्छतु। शोभनम् एतत् द्वितीये पृष्ठे अस्तियथा दृष्टम् एतत् पृष्ठद्वयं यावत् अस्ति अतो अपरे पृष्ठे एतत् पश्यामि।अस्तु एकवारं पुनः संचयं करोमि। अत्र आगच्छतु।अस्तु एतस्य कार्यं नास्ति। पिधानं करोतु। report.pdf इत्यत्र आगच्छतु। यदहं कथयितुं इच्छामि तत् द्वितीये पृष्ठे अस्ति। भवान अत्र द्वितीये पृष्ठे एतत् द्रष्टुं शक्नोति वयं द्वितीयं पृष्ठं पश्यामः। अत्र आगच्छामि। पुनर्संचयं करोमि। ctrl, shift f5 भवान् द्रष्टुं शक्नोति यत् एतत् प्रथमे पृष्ठे आगच्छति इति। एतस्य पुनरुधाटनं भवति किन्तु प्रथमं पृष्ठम् एव दर्शयति। एतस्मात् कारणात् एव मया उक्तं प्रथमं पृष्ठमेव उद्घाटयति इति। वयं द्वितीयं पृष्ठमेव पश्यामः कितु संचयानन्तरं प्रथमं प्रति गच्छति। एषा समस्या अस्ति। अडोब रीडर तत् पृष्ठं न स्मरति यस्य अधुना दर्शनं भवति। एतत् बृहत् अभिलेखस्य कृते महती समस्या भविष्यति। यदि भवान् अडोब रीडर इत्यस्य उपयोगं करोति तु संचयानन्तरं प्रथमं पृष्ठमेव उद्घाटयिष्यति।बृहदभिलेखस्य कृते महती समस्या एषा। सुमात्रा एतस्य निराकरणं करोति। सुमात्रा स्वमेव pdf इत्यस्य रिफ्रेश करोति तथा पूर्वदृष्टपृष्ठस्य स्मरणं करोति। सुमात्रा मुक्तमूल्यरहितश्च साफ्टवेयर अस्ति। अस्तु एतस्य रीडर इत्यस्य अन्वेषणस्य कृते भवान् अत्र अस्ति। अहं संक्षेपेण अत्र दर्शयामि। एतत् अत्र अस्ति। एतस्य अवतारणं करोतु । एतत् स्थापनार्थं विकल्पं दर्शयति। प्रायशः 1.5 मेगाबाइट स्थानं वाछति एतत्। मया पूर्वम् अवतारितम्। पिधानं करोमि एतत्। अत्र आगच्छतु। अपरं पृष्ठं गच्छतु। बारद्वयं नोदनं कृत्वा तथा पूर्वनियत् उत्तरं दत्वा स्थापनं कुर्मः। तत् अहं अधुना करोमि। अपरं पृष्ठं गच्छामि। अस्तु मदीये संगणके सुमात्रा डाट पीडीएफ इत्यस्य स्थापनं जातम्। प्रथमं तावत् टेक्सनिककेन्द्रस्य आवस्यकता अस्ति यत् सुमात्रायाः उपयोगं करिष्यति। build इत्यत्र गच्छतु तथा संचिकानियतनं करोतु। तदनु अन्यत् कुर्मः। अधुना viewer इत्यस्यावश्यकता। एतत् कुत्र? अन्वेषणं कुर्मः वस्तुतः एतस्य आवस्यकता अपि नास्ति। पिधानं करोमि। एतत् टेक्सनिक केन्द्रमस्ति। अस्तु क्रमेण एवं करोतु - build, define output profile, go to viewer. एतत् अडोब इत्यस्य सन्दर्भे अस्ति। परिवर्तनार्थं कथयामि। सम्यक्, इतः चलतु। कार्यक्रम संचिकायां सुमात्रायाः अन्वेषणं कुर्मः। एषा अत्र। सम्यक् वयं कृतवन्तः शोभनम्। एतत् सुमात्रायाः संचयार्थ प्रचलति। एतत् किं कृतम्। अन्वेषणं प्राप्तिश्च अभवत्। सुमात्रा उपयोगार्थं सज्जिता अस्ति। अडोब रीडर इति पिधानं करोमि। समकालिकरूपे ctrl and f7 नोदनेन सह report.tex इत्यस्य संचयं कुर्मः। तदेव कुर्मः न तु पूर्वं यत्कृतम्। crtl f7नोदनं कुर्मः। पश्यामि यत् एतत् संचितम्। अधुना किं करणीयम्। report.pdf इत्यस्य अन्वेषणं कुर्मः। सुमात्रया सह उद्घाटनं करोतु। लेटेक्स इत्यत्र गच्छतु। report.pdf अत्र अस्ति। किं करणीयमस्ति? सुमात्रया सह उद्घाटनम् इति। एषा सुमात्रा। एतां स्वीकरोमि। अपरं पृष्ठं प्रति गच्छतु। एतत् प्रथमं पृष्ठम्। द्वितीये पृष्ठे इतः गन्तुं शक्नोमि। यत् करणीयमस्ति तदस्ति द्वितीयं पृष्ठं प्रति गमनम्। अधुना एकां पक्तिं योजयामि। add line तदनु रक्षणं crtl f7. भवान् report.pdf द्रष्टुं शक्नोति। अधुनापि पंक्तिसंख्या समाना अस्ति। वस्तुतया यत् मया कृतम् तत् पूर्वतः एव अस्ति। सहजताकृते न्यूनं करोमि यतोहि समकाले एव उभौ दृष्टिपथि आगच्छेत्। एतस्य लोपं, रक्षणं संचयं च कुर्मः। उद्घाटयतु। भवान् द्रक्षति यत् एतत् गतम्।किं करणीयं तत्र गमनं इति।अधुना कथयामि ‘chapter- new” इति। पिधानं, रक्षणं च करोमि ctrl f7 . अस्तु अत्र आगच्छतु। तृतीयं पृष्ठं प्रति चलतु। यदि एतस्य् पुनर्संचयं स्यात्। अत्र आगच्छतु। एतत् परिवर्तितं नाभवत्।एतदेव वैशिष्ट्यम् अस्ति सुमात्रायाः। तत्र चलतु।pdf स्वयमेव परिवर्तितं भवति। किंचित् न करणीयं अपेक्षते।प्रमुखता अस्ति यत् एषा पूर्वं पृष्ठं दर्शयति इति। परिषिष्टयोजनं करोतु ctrl f7 द्वारा संचयं करोतु। पृष्ठत्रयमस्ति। एतस्य पुनर्संचयं करोतु। तृतीये पृष्ठे एतत् निरन्तरं भविष्यति। अधुना किम्? वयं मिटेक्स इत्यस्य प्रारंभिक संस्करणं स्थापितम्। केवलं प्रारंभिक संस्करणं एव उपलब्धं अस्ति लेटेक्स इत्यस्य। नूनमेव बहुविधं कार्यं कर्तुं क्षमं एतत्। विविध स्यूतं तु न उपलब्धं किन्तु काश्चित् सूचयः अत्र वर्तते। बीमर प्रभृति अपि उपयोगिनं सन्ति। शेषस्यूतानां उपयोगं कथं स्यात् इति अग्रिमे स्लाइड इत्यत्र वक्ष्यामि। यथा एव प्रारंभिक संस्करणं स्थापितं अद्यतनं करोतु। टास्कबार् इत्यत्र् स्टार्ट इति नोदनं करोतु एतत् विण्डोज स्क्रीन इतस्य बामकोणे अधः विद्यते। programs तदनु miktex 2.7 इत्यत्र गच्छतु। update इत्यत्र नोदनं करोतु। mirror इति चिनोतु अनेन सह proxt प्रभृति यथा अपेक्षते। तर्हि. Texnic center इत्यस्य यथानिर्दिष्टं उपयोगेन सह अग्रे चलतु। यदा कापि संचिका विस्मर्यते स्थापनं करोतु। भवान् एतत् internet इत्यतः स्थापनं कर्तुं शक्नोति अथवा CD माध्यमेन कर्तुं शक्नोति। प्रथमतया स्वकीय हार्ड डिस्कमध्ये समग्रं रक्षणं करोतु तदनु एव स्थापनं करोतु। काचित् समस्या तु भविष्यति। एतत् 1GB इत्यस्य स्थानं अपेक्षते यदि काचित् शंका अस्ति निःश्शंकभावेन उपयोक्तासमुदायेन सह वार्तां करोतु। उदाहरणरूपे सम्पर्कं साधयतु TUG India. वयं fosee.in द्वारा अपि साहाय्यं कुर्मः।वयं भविष्ये लेटेक्सकृते अधिकं मौखिकशिक्षणंदास्यामः। कृपया स्वकीयप्रतिक्रियां प्रेषयतु। एषः अस्ति बिपिन कुमार झा ( http://sites.google.com/site/bipinsnjha/ ) भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान मुम्बईतः। धन्यवादाः शुभमस्तु ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। Input: (कोष्ठकमे देवनागरी, मिथिलाक्षर किंवा फोनेटिक-रोमनमे टाइप करू। Input in Devanagari, Mithilakshara or Phonetic-Roman.) Output: (परिणाम देवनागरी, मिथिलाक्षर आ फोनेटिक-रोमन/ रोमनमे। Result in Devanagari, Mithilakshara and Phonetic-Roman/ Roman.) English to Maithili Maithili to English इंग्लिश-मैथिली-कोष / मैथिली-इंग्लिश-कोष प्रोजेक्टकेँ आगू बढ़ाऊ, अपन सुझाव आ योगदान ई-मेल द्वारा ggajendra@videha.com पर पठाऊ। Top of Form विदेहक मैथिली-अंग्रेजी आ अंग्रेजी मैथिली कोष (इंटरनेटपर पहिल बेर सर्च-डिक्शनरी) एम.एस. एस.क्यू.एल. सर्वर आधारित -Based on ms-sql server Maithili-English and English-Maithili Dictionary. १.भारत आ नेपालक मैथिली भाषा-वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक शैली आ २.मैथिलीमे भाषा सम्पादन पाठ्यक्रम १.नेपाल आ भारतक मैथिली भाषा-वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक शैली
१.१. नेपालक मैथिली भाषा वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक उच्चारण आ लेखन शैली (भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक धारणाकेँ पूर्ण रूपसँ सङ्ग लऽ निर्धारित) मैथिलीमे उच्चारण तथा लेखन १.पञ्चमाक्षर आ अनुस्वार: पञ्चमाक्षरान्तर्गत ङ, ञ, ण, न एवं म अबैत अछि। संस्कृत भाषाक अनुसार शब्दक अन्तमे जाहि वर्गक अक्षर रहैत अछि ओही वर्गक पञ्चमाक्षर अबैत अछि। जेना- अङ्क (क वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ङ् आएल अछि।) पञ्च (च वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ञ् आएल अछि।) खण्ड (ट वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ण् आएल अछि।) सन्धि (त वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे न् आएल अछि।) खम्भ (प वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे म् आएल अछि।) उपर्युक्त बात मैथिलीमे कम देखल जाइत अछि। पञ्चमाक्षरक बदलामे अधिकांश जगहपर अनुस्वारक प्रयोग देखल जाइछ। जेना- अंक, पंच, खंड, संधि, खंभ आदि। व्याकरणविद पण्डित गोविन्द झाक कहब छनि जे कवर्ग, चवर्ग आ टवर्गसँ पूर्व अनुस्वार लिखल जाए तथा तवर्ग आ पवर्गसँ पूर्व पञ्चमाक्षरे लिखल जाए। जेना- अंक, चंचल, अंडा, अन्त तथा कम्पन। मुदा हिन्दीक निकट रहल आधुनिक लेखक एहि बातकेँ नहि मानैत छथि। ओ लोकनि अन्त आ कम्पनक जगहपर सेहो अंत आ कंपन लिखैत देखल जाइत छथि। नवीन पद्धति किछु सुविधाजनक अवश्य छैक। किएक तँ एहिमे समय आ स्थानक बचत होइत छैक। मुदा कतोक बेर हस्तलेखन वा मुद्रणमे अनुस्वारक छोट सन बिन्दु स्पष्ट नहि भेलासँ अर्थक अनर्थ होइत सेहो देखल जाइत अछि। अनुस्वारक प्रयोगमे उच्चारण-दोषक सम्भावना सेहो ततबए देखल जाइत अछि। एतदर्थ कसँ लऽ कऽ पवर्ग धरि पञ्चमाक्षरेक प्रयोग करब उचित अछि। यसँ लऽ कऽ ज्ञ धरिक अक्षरक सङ्ग अनुस्वारक प्रयोग करबामे कतहु कोनो विवाद नहि देखल जाइछ। २.ढ आ ढ़ : ढ़क उच्चारण “र् ह”जकाँ होइत अछि। अतः जतऽ “र् ह”क उच्चारण हो ओतऽ मात्र ढ़ लिखल जाए। आन ठाम खाली ढ लिखल जएबाक चाही। जेना- ढ = ढाकी, ढेकी, ढीठ, ढेउआ, ढङ्ग, ढेरी, ढाकनि, ढाठ आदि। ढ़ = पढ़ाइ, बढ़ब, गढ़ब, मढ़ब, बुढ़बा, साँढ़, गाढ़, रीढ़, चाँढ़, सीढ़ी, पीढ़ी आदि। उपर्युक्त शब्द सभकेँ देखलासँ ई स्पष्ट होइत अछि जे साधारणतया शब्दक शुरूमे ढ आ मध्य तथा अन्तमे ढ़ अबैत अछि। इएह नियम ड आ ड़क सन्दर्भ सेहो लागू होइत अछि। ३.व आ ब : मैथिलीमे “व”क उच्चारण ब कएल जाइत अछि, मुदा ओकरा ब रूपमे नहि लिखल जएबाक चाही। जेना- उच्चारण : बैद्यनाथ, बिद्या, नब, देबता, बिष्णु, बंश, बन्दना आदि। एहि सभक स्थानपर क्रमशः वैद्यनाथ, विद्या, नव, देवता, विष्णु, वंश, वन्दना लिखबाक चाही। सामान्यतया व उच्चारणक लेल ओ प्रयोग कएल जाइत अछि। जेना- ओकील, ओजह आदि। ४.य आ ज : कतहु-कतहु “य”क उच्चारण “ज”जकाँ करैत देखल जाइत अछि, मुदा ओकरा ज नहि लिखबाक चाही। उच्चारणमे यज्ञ, जदि, जमुना, जुग, जाबत, जोगी, जदु, जम आदि कहल जाएबला शब्द सभकेँ क्रमशः यज्ञ, यदि, यमुना, युग, यावत, योगी, यदु, यम लिखबाक चाही। ५.ए आ य : मैथिलीक वर्तनीमे ए आ य दुनू लिखल जाइत अछि। प्राचीन वर्तनी- कएल, जाए, होएत, माए, भाए, गाए आदि। नवीन वर्तनी- कयल, जाय, होयत, माय, भाय, गाय आदि। सामान्यतया शब्दक शुरूमे ए मात्र अबैत अछि। जेना एहि, एना, एकर, एहन आदि। एहि शब्द सभक स्थानपर यहि, यना, यकर, यहन आदिक प्रयोग नहि करबाक चाही। यद्यपि मैथिलीभाषी थारू सहित किछु जातिमे शब्दक आरम्भोमे “ए”केँ य कहि उच्चारण कएल जाइत अछि। ए आ “य”क प्रयोगक सन्दर्भमे प्राचीने पद्धतिक अनुसरण करब उपयुक्त मानि एहि पुस्तकमे ओकरे प्रयोग कएल गेल अछि। किएक तँ दुनूक लेखनमे कोनो सहजता आ दुरूहताक बात नहि अछि। आ मैथिलीक सर्वसाधारणक उच्चारण-शैली यक अपेक्षा एसँ बेसी निकट छैक। खास कऽ कएल, हएब आदि कतिपय शब्दकेँ कैल, हैब आदि रूपमे कतहु-कतहु लिखल जाएब सेहो “ए”क प्रयोगकेँ बेसी समीचीन प्रमाणित करैत अछि। ६.हि, हु तथा एकार, ओकार : मैथिलीक प्राचीन लेखन-परम्परामे कोनो बातपर बल दैत काल शब्दक पाछाँ हि, हु लगाओल जाइत छैक। जेना- हुनकहि, अपनहु, ओकरहु, तत्कालहि, चोट्टहि, आनहु आदि। मुदा आधुनिक लेखनमे हिक स्थानपर एकार एवं हुक स्थानपर ओकारक प्रयोग करैत देखल जाइत अछि। जेना- हुनके, अपनो, तत्काले, चोट्टे, आनो आदि। ७.ष तथा ख : मैथिली भाषामे अधिकांशतः षक उच्चारण ख होइत अछि। जेना- षड्यन्त्र (खड़यन्त्र), षोडशी (खोड़शी), षट्कोण (खटकोण), वृषेश (वृखेश), सन्तोष (सन्तोख) आदि। ८.ध्वनि-लोप : निम्नलिखित अवस्थामे शब्दसँ ध्वनि-लोप भऽ जाइत अछि: (क) क्रियान्वयी प्रत्यय अयमे य वा ए लुप्त भऽ जाइत अछि। ओहिमे सँ पहिने अक उच्चारण दीर्घ भऽ जाइत अछि। ओकर आगाँ लोप-सूचक चिह्न वा विकारी (’ / ऽ) लगाओल जाइछ। जेना- पूर्ण रूप : पढ़ए (पढ़य) गेलाह, कए (कय) लेल, उठए (उठय) पड़तौक। अपूर्ण रूप : पढ़’ गेलाह, क’ लेल, उठ’ पड़तौक। पढ़ऽ गेलाह, कऽ लेल, उठऽ पड़तौक। (ख) पूर्वकालिक कृत आय (आए) प्रत्ययमे य (ए) लुप्त भऽ जाइछ, मुदा लोप-सूचक विकारी नहि लगाओल जाइछ। जेना- पूर्ण रूप : खाए (य) गेल, पठाय (ए) देब, नहाए (य) अएलाह। अपूर्ण रूप : खा गेल, पठा देब, नहा अएलाह। (ग) स्त्री प्रत्यय इक उच्चारण क्रियापद, संज्ञा, ओ विशेषण तीनूमे लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना- पूर्ण रूप : दोसरि मालिनि चलि गेलि। अपूर्ण रूप : दोसर मालिन चलि गेल। (घ) वर्तमान कृदन्तक अन्तिम त लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना- पूर्ण रूप : पढ़ैत अछि, बजैत अछि, गबैत अछि। अपूर्ण रूप : पढ़ै अछि, बजै अछि, गबै अछि। (ङ) क्रियापदक अवसान इक, उक, ऐक तथा हीकमे लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना- पूर्ण रूप: छियौक, छियैक, छहीक, छौक, छैक, अबितैक, होइक। अपूर्ण रूप : छियौ, छियै, छही, छौ, छै, अबितै, होइ। (च) क्रियापदीय प्रत्यय न्ह, हु तथा हकारक लोप भऽ जाइछ। जेना- पूर्ण रूप : छन्हि, कहलन्हि, कहलहुँ, गेलह, नहि। अपूर्ण रूप : छनि, कहलनि, कहलौँ, गेलऽ, नइ, नञि, नै। ९.ध्वनि स्थानान्तरण : कोनो-कोनो स्वर-ध्वनि अपना जगहसँ हटि कऽ दोसर ठाम चलि जाइत अछि। खास कऽ ह्रस्व इ आ उक सम्बन्धमे ई बात लागू होइत अछि। मैथिलीकरण भऽ गेल शब्दक मध्य वा अन्तमे जँ ह्रस्व इ वा उ आबए तँ ओकर ध्वनि स्थानान्तरित भऽ एक अक्षर आगाँ आबि जाइत अछि। जेना- शनि (शइन), पानि (पाइन), दालि ( दाइल), माटि (माइट), काछु (काउछ), मासु (माउस) आदि। मुदा तत्सम शब्द सभमे ई निअम लागू नहि होइत अछि। जेना- रश्मिकेँ रइश्म आ सुधांशुकेँ सुधाउंस नहि कहल जा सकैत अछि। १०.हलन्त(्)क प्रयोग : मैथिली भाषामे सामान्यतया हलन्त (्)क आवश्यकता नहि होइत अछि। कारण जे शब्दक अन्तमे अ उच्चारण नहि होइत अछि। मुदा संस्कृत भाषासँ जहिनाक तहिना मैथिलीमे आएल (तत्सम) शब्द सभमे हलन्त प्रयोग कएल जाइत अछि। एहि पोथीमे सामान्यतया सम्पूर्ण शब्दकेँ मैथिली भाषा सम्बन्धी निअम अनुसार हलन्तविहीन राखल गेल अछि। मुदा व्याकरण सम्बन्धी प्रयोजनक लेल अत्यावश्यक स्थानपर कतहु-कतहु हलन्त देल गेल अछि। प्रस्तुत पोथीमे मथिली लेखनक प्राचीन आ नवीन दुनू शैलीक सरल आ समीचीन पक्ष सभकेँ समेटि कऽ वर्ण-विन्यास कएल गेल अछि। स्थान आ समयमे बचतक सङ्गहि हस्त-लेखन तथा तकनीकी दृष्टिसँ सेहो सरल होबऽबला हिसाबसँ वर्ण-विन्यास मिलाओल गेल अछि। वर्तमान समयमे मैथिली मातृभाषी पर्यन्तकेँ आन भाषाक माध्यमसँ मैथिलीक ज्ञान लेबऽ पड़ि रहल परिप्रेक्ष्यमे लेखनमे सहजता तथा एकरूपतापर ध्यान देल गेल अछि। तखन मैथिली भाषाक मूल विशेषता सभ कुण्ठित नहि होइक, ताहू दिस लेखक-मण्डल सचेत अछि। प्रसिद्ध भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक कहब छनि जे सरलताक अनुसन्धानमे एहन अवस्था किन्नहु ने आबऽ देबाक चाही जे भाषाक विशेषता छाँहमे पडि जाए। -(भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक धारणाकेँ पूर्ण रूपसँ सङ्ग लऽ निर्धारित) १.२. मैथिली अकादमी, पटना द्वारा निर्धारित मैथिली लेखन-शैली
१. जे शब्द मैथिली-साहित्यक प्राचीन कालसँ आइ धरि जाहि वर्त्तनीमे प्रचलित अछि, से सामान्यतः ताहि वर्त्तनीमे लिखल जाय- उदाहरणार्थ-
ग्राह्य
एखन ठाम जकर, तकर तनिकर अछि
अग्राह्य अखन, अखनि, एखेन, अखनी ठिमा, ठिना, ठमा जेकर, तेकर तिनकर। (वैकल्पिक रूपेँ ग्राह्य) ऐछ, अहि, ए।
२. निम्नलिखित तीन प्रकारक रूप वैकल्पिकतया अपनाओल जाय: भऽ गेल, भय गेल वा भए गेल। जा रहल अछि, जाय रहल अछि, जाए रहल अछि। कर’ गेलाह, वा करय गेलाह वा करए गेलाह।
३. प्राचीन मैथिलीक ‘न्ह’ ध्वनिक स्थानमे ‘न’ लिखल जाय सकैत अछि यथा कहलनि वा कहलन्हि।
४. ‘ऐ’ तथा ‘औ’ ततय लिखल जाय जत’ स्पष्टतः ‘अइ’ तथा ‘अउ’ सदृश उच्चारण इष्ट हो। यथा- देखैत, छलैक, बौआ, छौक इत्यादि।
५. मैथिलीक निम्नलिखित शब्द एहि रूपे प्रयुक्त होयत: जैह, सैह, इएह, ओऐह, लैह तथा दैह।
६. ह्र्स्व इकारांत शब्दमे ‘इ’ के लुप्त करब सामान्यतः अग्राह्य थिक। यथा- ग्राह्य देखि आबह, मालिनि गेलि (मनुष्य मात्रमे)।
७. स्वतंत्र ह्रस्व ‘ए’ वा ‘य’ प्राचीन मैथिलीक उद्धरण आदिमे तँ यथावत राखल जाय, किंतु आधुनिक प्रयोगमे वैकल्पिक रूपेँ ‘ए’ वा ‘य’ लिखल जाय। यथा:- कयल वा कएल, अयलाह वा अएलाह, जाय वा जाए इत्यादि।
८. उच्चारणमे दू स्वरक बीच जे ‘य’ ध्वनि स्वतः आबि जाइत अछि तकरा लेखमे स्थान वैकल्पिक रूपेँ देल जाय। यथा- धीआ, अढ़ैआ, विआह, वा धीया, अढ़ैया, बियाह।
९. सानुनासिक स्वतंत्र स्वरक स्थान यथासंभव ‘ञ’ लिखल जाय वा सानुनासिक स्वर। यथा:- मैञा, कनिञा, किरतनिञा वा मैआँ, कनिआँ, किरतनिआँ।
१०. कारकक विभक्त्तिक निम्नलिखित रूप ग्राह्य:- हाथकेँ, हाथसँ, हाथेँ, हाथक, हाथमे। ’मे’ मे अनुस्वार सर्वथा त्याज्य थिक। ‘क’ क वैकल्पिक रूप ‘केर’ राखल जा सकैत अछि।
११. पूर्वकालिक क्रियापदक बाद ‘कय’ वा ‘कए’ अव्यय वैकल्पिक रूपेँ लगाओल जा सकैत अछि। यथा:- देखि कय वा देखि कए।
१२. माँग, भाँग आदिक स्थानमे माङ, भाङ इत्यादि लिखल जाय।
१३. अर्द्ध ‘न’ ओ अर्द्ध ‘म’ क बदला अनुसार नहि लिखल जाय, किंतु छापाक सुविधार्थ अर्द्ध ‘ङ’ , ‘ञ’, तथा ‘ण’ क बदला अनुस्वारो लिखल जा सकैत अछि। यथा:- अङ्क, वा अंक, अञ्चल वा अंचल, कण्ठ वा कंठ।
१४. हलंत चिह्न निअमतः लगाओल जाय, किंतु विभक्तिक संग अकारांत प्रयोग कएल जाय। यथा:- श्रीमान्, किंतु श्रीमानक।
१५. सभ एकल कारक चिह्न शब्दमे सटा क’ लिखल जाय, हटा क’ नहि, संयुक्त विभक्तिक हेतु फराक लिखल जाय, यथा घर परक।
१६. अनुनासिककेँ चन्द्रबिन्दु द्वारा व्यक्त कयल जाय। परंतु मुद्रणक सुविधार्थ हि समान जटिल मात्रापर अनुस्वारक प्रयोग चन्द्रबिन्दुक बदला कयल जा सकैत अछि। यथा- हिँ केर बदला हिं।
१७. पूर्ण विराम पासीसँ ( । ) सूचित कयल जाय।
१८. समस्त पद सटा क’ लिखल जाय, वा हाइफेनसँ जोड़ि क’ , हटा क’ नहि।
१९. लिअ तथा दिअ शब्दमे बिकारी (ऽ) नहि लगाओल जाय।
२०. अंक देवनागरी रूपमे राखल जाय।
२१.किछु ध्वनिक लेल नवीन चिन्ह बनबाओल जाय। जा' ई नहि बनल अछि ताबत एहि दुनू ध्वनिक बदला पूर्ववत् अय/ आय/ अए/ आए/ आओ/ अओ लिखल जाय। आकि ऎ वा ऒ सँ व्यक्त कएल जाय।
ह./- गोविन्द झा ११/८/७६ श्रीकान्त ठाकुर ११/८/७६ सुरेन्द्र झा "सुमन" ११/०८/७६
२. मैथिलीमे भाषा सम्पादन पाठ्यक्रम २.१. उच्चारण निर्देश: (बोल्ड कएल रूप ग्राह्य):- दन्त न क उच्चारणमे दाँतमे जीह सटत- जेना बाजू नाम , मुदा ण क उच्चारणमे जीह मूर्धामे सटत (नै सटैए तँ उच्चारण दोष अछि)- जेना बाजू गणेश। तालव्य शमे जीह तालुसँ , षमे मूर्धासँ आ दन्त समे दाँतसँ सटत। निशाँ, सभ आ शोषण बाजि कऽ देखू। मैथिलीमे ष केँ वैदिक संस्कृत जकाँ ख सेहो उच्चरित कएल जाइत अछि, जेना वर्षा, दोष। य अनेको स्थानपर ज जकाँ उच्चरित होइत अछि आ ण ड़ जकाँ (यथा संयोग आ गणेश संजोग आ गड़ेस उच्चरित होइत अछि)। मैथिलीमे व क उच्चारण ब, श क उच्चारण स आ य क उच्चारण ज सेहो होइत अछि। ओहिना ह्रस्व इ बेशीकाल मैथिलीमे पहिने बाजल जाइत अछि कारण देवनागरीमे आ मिथिलाक्षरमे ह्रस्व इ अक्षरक पहिने लिखलो जाइत आ बाजलो जएबाक चाही। कारण जे हिन्दीमे एकर दोषपूर्ण उच्चारण होइत अछि (लिखल तँ पहिने जाइत अछि मुदा बाजल बादमे जाइत अछि), से शिक्षा पद्धतिक दोषक कारण हम सभ ओकर उच्चारण दोषपूर्ण ढंगसँ कऽ रहल छी। अछि- अ इ छ ऐछ (उच्चारण) छथि- छ इ थ – छैथ (उच्चारण) पहुँचि- प हुँ इ च (उच्चारण) आब अ आ इ ई ए ऐ ओ औ अं अः ऋ ऐ सभ लेल मात्रा सेहो अछि, मुदा ऐमे ई ऐ ओ औ अं अः ऋ केँ संयुक्ताक्षर रूपमे गलत रूपमे प्रयुक्त आ उच्चरित कएल जाइत अछि। जेना ऋ केँ री रूपमे उच्चरित करब। आ देखियौ- ऐ लेल देखिऔ क प्रयोग अनुचित। मुदा देखिऐ लेल देखियै अनुचित। क् सँ ह् धरि अ सम्मिलित भेलासँ क सँ ह बनैत अछि, मुदा उच्चारण काल हलन्त युक्त शब्दक अन्तक उच्चारणक प्रवृत्ति बढ़ल अछि, मुदा हम जखन मनोजमे ज् अन्तमे बजैत छी, तखनो पुरनका लोककेँ बजैत सुनबन्हि- मनोजऽ, वास्तवमे ओ अ युक्त ज् = ज बजै छथि। फेर ज्ञ अछि ज् आ ञ क संयुक्त मुदा गलत उच्चारण होइत अछि- ग्य। ओहिना क्ष अछि क् आ ष क संयुक्त मुदा उच्चारण होइत अछि छ। फेर श् आ र क संयुक्त अछि श्र ( जेना श्रमिक) आ स् आ र क संयुक्त अछि स्र (जेना मिस्र)। त्र भेल त+र । उच्चारणक ऑडियो फाइल विदेह आर्काइव http://www.videha.co.in/ पर उपलब्ध अछि। फेर केँ / सँ / पर पूर्व अक्षरसँ सटा कऽ लिखू मुदा तँ / कऽ हटा कऽ। ऐमे सँ मे पहिल सटा कऽ लिखू आ बादबला हटा कऽ। अंकक बाद टा लिखू सटा कऽ मुदा अन्य ठाम टा लिखू हटा कऽ– जेना छहटा मुदा सभ टा। फेर ६अ म सातम लिखू- छठम सातम नै। घरबलामे बला मुदा घरवालीमे वाली प्रयुक्त करू। रहए- रहै मुदा सकैए (उच्चारण सकै-ए)। मुदा कखनो काल रहए आ रहै मे अर्थ भिन्नता सेहो, जेना से कम्मो जगहमे पार्किंग करबाक अभ्यास रहै ओकरा। पुछलापर पता लागल जे ढुनढुन नाम्ना ई ड्राइवर कनाट प्लेसक पार्किंगमे काज करैत रहए। छलै, छलए मे सेहो ऐ तरहक भेल। छलए क उच्चारण छल-ए सेहो। संयोगने- (उच्चारण संजोगने) केँ/ कऽ केर- क ( केर क प्रयोग गद्यमे नै करू , पद्यमे कऽ सकै छी। ) क (जेना रामक) –रामक आ संगे (उच्चारण राम के / राम कऽ सेहो) सँ- सऽ (उच्चारण) चन्द्रबिन्दु आ अनुस्वार- अनुस्वारमे कंठ धरिक प्रयोग होइत अछि मुदा चन्द्रबिन्दुमे नै। चन्द्रबिन्दुमे कनेक एकारक सेहो उच्चारण होइत अछि- जेना रामसँ- (उच्चारण राम सऽ) रामकेँ- (उच्चारण राम कऽ/ राम के सेहो)। केँ जेना रामकेँ भेल हिन्दीक को (राम को)- राम को= रामकेँ क जेना रामक भेल हिन्दीक का ( राम का) राम का= रामक कऽ जेना जा कऽ भेल हिन्दीक कर ( जा कर) जा कर= जा कऽ सँ भेल हिन्दीक से (राम से) राम से= रामसँ सऽ , तऽ , त , केर (गद्यमे) एे चारू शब्द सबहक प्रयोग अवांछित। के दोसर अर्थेँ प्रयुक्त भऽ सकैए- जेना, के कहलक? विभक्ति “क”क बदला एकर प्रयोग अवांछित। नञि, नहि, नै, नइ, नँइ, नइँ, नइं ऐ सभक उच्चारण आ लेखन - नै त्त्व क बदलामे त्व जेना महत्वपूर्ण (महत्त्वपूर्ण नै) जतए अर्थ बदलि जाए ओतहि मात्र तीन अक्षरक संयुक्ताक्षरक प्रयोग उचित। सम्पति- उच्चारण स म्प इ त (सम्पत्ति नै- कारण सही उच्चारण आसानीसँ सम्भव नै)। मुदा सर्वोत्तम (सर्वोतम नै)। राष्ट्रिय (राष्ट्रीय नै) सकैए/ सकै (अर्थ परिवर्तन) पोछैले/ पोछै लेल/ पोछए लेल पोछैए/ पोछए/ (अर्थ परिवर्तन) पोछए/ पोछै ओ लोकनि ( हटा कऽ, ओ मे बिकारी नै) ओइ/ ओहि ओहिले/ ओहि लेल/ ओही लऽ जएबेँ/ बैसबेँ पँचभइयाँ देखियौक/ (देखिऔक नै- तहिना अ मे ह्रस्व आ दीर्घक मात्राक प्रयोग अनुचित) जकाँ / जेकाँ तँइ/ तैँ/ होएत / हएत नञि/ नहि/ नँइ/ नइँ/ नै सौँसे/ सौंसे बड़ / बड़ी (झोराओल) गाए (गाइ नहि), मुदा गाइक दूध (गाएक दूध नै।) रहलेँ/ पहिरतैँ हमहीं/ अहीं सब - सभ सबहक - सभहक धरि - तक गप- बात बूझब - समझब बुझलौं/ समझलौं/ बुझलहुँ - समझलहुँ हमरा आर - हम सभ आकि- आ कि सकैछ/ करैछ (गद्यमे प्रयोगक आवश्यकता नै) होइन/ होनि जाइन (जानि नै, जेना देल जाइन) मुदा जानि-बूझि (अर्थ परिव्र्तन) पइठ/ जाइठ आउ/ जाउ/ आऊ/ जाऊ मे, केँ, सँ, पर (शब्दसँ सटा कऽ) तँ कऽ धऽ दऽ (शब्दसँ हटा कऽ) मुदा दूटा वा बेसी विभक्ति संग रहलापर पहिल विभक्ति टाकेँ सटाऊ। जेना ऐमे सँ । एकटा , दूटा (मुदा कए टा) बिकारीक प्रयोग शब्दक अन्तमे, बीचमे अनावश्यक रूपेँ नै। आकारान्त आ अन्तमे अ क बाद बिकारीक प्रयोग नै (जेना दिअ , आ/ दिय’ , आ’, आ नै ) अपोस्ट्रोफीक प्रयोग बिकारीक बदलामे करब अनुचित आ मात्र फॉन्टक तकनीकी न्यूनताक परिचायक)- ओना बिकारीक संस्कृत रूप ऽ अवग्रह कहल जाइत अछि आ वर्तनी आ उच्चारण दुनू ठाम एकर लोप रहैत अछि/ रहि सकैत अछि (उच्चारणमे लोप रहिते अछि)। मुदा अपोस्ट्रोफी सेहो अंग्रेजीमे पसेसिव केसमे होइत अछि आ फ्रेंचमे शब्दमे जतए एकर प्रयोग होइत अछि जेना raison d’etre एतए सेहो एकर उच्चारण रैजौन डेटर होइत अछि, माने अपोस्ट्रॉफी अवकाश नै दैत अछि वरन जोड़ैत अछि, से एकर प्रयोग बिकारीक बदला देनाइ तकनीकी रूपेँ सेहो अनुचित)। अइमे, एहिमे/ ऐमे जइमे, जाहिमे एखन/ अखन/ अइखन केँ (के नहि) मे (अनुस्वार रहित) भऽ मे दऽ तँ (तऽ, त नै) सँ ( सऽ स नै) गाछ तर गाछ लग साँझ खन जो (जो go, करै जो do) तै/तइ जेना- तै दुआरे/ तइमे/ तइले जै/जइ जेना- जै कारण/ जइसँ/ जइले ऐ/अइ जेना- ऐ कारण/ ऐसँ/ अइले/ मुदा एकर एकटा खास प्रयोग- लालति कतेक दिनसँ कहैत रहैत अइ लै/लइ जेना लैसँ/ लइले/ लै दुआरे लहँ/ लौं गेलौं/ लेलौं/ लेलँह/ गेलहुँ/ लेलहुँ/ लेलँ जइ/ जाहि/ जै जहिठाम/ जाहिठाम/ जइठाम/ जैठाम एहि/ अहि/ अइ (वाक्यक अंतमे ग्राह्य) / ऐ अइछ/ अछि/ ऐछ तइ/ तहि/ तै/ ताहि ओहि/ ओइ सीखि/ सीख जीवि/ जीवी/ जीब भलेहीं/ भलहिं तैं/ तँइ/ तँए जाएब/ जएब लइ/ लै छइ/ छै नहि/ नै/ नइ गइ/ गै छनि/ छन्हि ... समए शब्दक संग जखन कोनो विभक्ति जुटै छै तखन समै जना समैपर इत्यादि। असगरमे हृदए आ विभक्ति जुटने हृदे जना हृदेसँ, हृदेमे इत्यादि। जइ/ जाहि/ जै जहिठाम/ जाहिठाम/ जइठाम/ जैठाम एहि/ अहि/ अइ/ ऐ अइछ/ अछि/ ऐछ तइ/ तहि/ तै/ ताहि ओहि/ ओइ सीखि/ सीख जीवि/ जीवी/ जीब भले/ भलेहीं/ भलहिं तैं/ तँइ/ तँए जाएब/ जएब लइ/ लै छइ/ छै नहि/ नै/ नइ गइ/ गै छनि/ छन्हि चुकल अछि/ गेल गछि २.२. मैथिलीमे भाषा सम्पादन पाठ्यक्रम नीचाँक सूचीमे देल विकल्पमेसँ लैंगुएज एडीटर द्वारा कोन रूप चुनल जेबाक चाही: बोल्ड कएल रूप ग्राह्य: १.होयबला/ होबयबला/ होमयबला/ हेब’बला, हेम’बला/ होयबाक/होबएबला /होएबाक २. आ’/आऽ आ ३. क’ लेने/कऽ लेने/कए लेने/कय लेने/ल’/लऽ/लय/लए ४. भ’ गेल/भऽ गेल/भय गेल/भए गेल ५. कर’ गेलाह/करऽ गेलह/करए गेलाह/करय गेलाह ६. लिअ/दिअ लिय’,दिय’,लिअ’,दिय’/ ७. कर’ बला/करऽ बला/ करय बला करैबला/क’र’ बला / करैवाली ८. बला वला (पुरूष), वाली (स्त्री) ९ . आङ्ल आंग्ल १०. प्रायः प्रायह ११. दुःख दुख १ २. चलि गेल चल गेल/चैल गेल १३. देलखिन्ह देलकिन्ह, देलखिन १४. देखलन्हि देखलनि/ देखलैन्ह १५. छथिन्ह/ छलन्हि छथिन/ छलैन/ छलनि १६. चलैत/दैत चलति/दैति १७. एखनो अखनो १८. बढ़नि बढ़इन बढ़न्हि १९. ओ’/ओऽ(सर्वनाम) ओ २० . ओ (संयोजक) ओ’/ओऽ २१. फाँगि/फाङ्गि फाइंग/फाइङ २२. जे जे’/जेऽ २३. ना-नुकुर ना-नुकर २४. केलन्हि/केलनि/कयलन्हि २५. तखनतँ/ तखन तँ २६. जा रहल/जाय रहल/जाए रहल २७. निकलय/निकलए लागल/ लगल बहराय/ बहराए लागल/ लगल निकल’/बहरै लागल २८. ओतय/ जतय जत’/ ओत’/ जतए/ ओतए २९. की फूरल जे कि फूरल जे ३०. जे जे’/जेऽ ३१. कूदि / यादि(मोन पारब) कूइद/याइद/कूद/याद/ यादि (मोन) ३२. इहो/ ओहो ३३. हँसए/ हँसय हँसऽ ३४. नौ आकि दस/नौ किंवा दस/ नौ वा दस ३५. सासु-ससुर सास-ससुर ३६. छह/ सात छ/छः/सात ३७. की की’/ कीऽ (दीर्घीकारान्तमे ऽ वर्जित) ३८. जबाब जवाब ३९. करएताह/ करेताह करयताह ४०. दलान दिशि दलान दिश/दलान दिस ४१ . गेलाह गएलाह/गयलाह ४२. किछु आर/ किछु और/ किछ आर ४३. जाइ छल/ जाइत छल जाति छल/जैत छल ४४. पहुँचि/ भेट जाइत छल/ भेट जाइ छलए पहुँच/ भेटि जाइत छल ४५. जबान (युवा)/ जवान(फौजी) ४६. लय/ लए क’/ कऽ/ लए कए / लऽ कऽ/ लऽ कए ४७. ल’/लऽ कय/ कए ४८. एखन / एखने / अखन / अखने ४९. अहींकेँ अहीँकेँ ५०. गहींर गहीँर ५१. धार पार केनाइ धार पार केनाय/केनाए ५२. जेकाँ जेँकाँ/ जकाँ ५३. तहिना तेहिना ५४. एकर अकर ५५. बहिनउ बहनोइ ५६. बहिन बहिनि ५७. बहिन-बहिनोइ बहिन-बहनउ ५८. नहि/ नै ५९. करबा / करबाय/ करबाए ६०. तँ/ त ऽ तय/तए ६१. भैयारी मे छोट-भाए/भै/, जेठ-भाय/भाइ, ६२. गिनतीमे दू भाइ/भाए/भाँइ ६३. ई पोथी दू भाइक/ भाँइ/ भाए/ लेल। यावत जावत ६४. माय मै / माए मुदा माइक ममता ६५. देन्हि/ दइन दनि/ दएन्हि/ दयन्हि दन्हि/ दैन्हि ६६. द’/ दऽ/ दए ६७. ओ (संयोजक) ओऽ (सर्वनाम) ६८. तका कए तकाय तकाए ६९. पैरे (on foot) पएरे कएक/ कैक ७०. ताहुमे/ ताहूमे ७१. पुत्रीक ७२. बजा कय/ कए / कऽ ७३. बननाय/बननाइ ७४. कोला ७५. दिनुका दिनका ७६. ततहिसँ ७७. गरबओलन्हि/ गरबौलनि/ गरबेलन्हि/ गरबेलनि ७८. बालु बालू ७९. चेन्ह चिन्ह(अशुद्ध) ८०. जे जे’ ८१ . से/ के से’/के’ ८२. एखुनका अखनुका ८३. भुमिहार भूमिहार ८४. सुग्गर / सुगरक/ सूगर ८५. झठहाक झटहाक ८६. छूबि ८७. करइयो/ओ करैयो ने देलक /करियौ-करइयौ ८८. पुबारि पुबाइ ८९. झगड़ा-झाँटी झगड़ा-झाँटि ९०. पएरे-पएरे पैरे-पैरे ९१. खेलएबाक ९२. खेलेबाक ९३. लगा ९४. होए- हो – होअए ९५. बुझल बूझल ९६. बूझल (संबोधन अर्थमे) ९७. यैह यएह / इएह/ सैह/ सएह ९८. तातिल ९९. अयनाय- अयनाइ/ अएनाइ/ एनाइ १००. निन्न- निन्द १०१. बिनु बिन १०२. जाए जाइ १०३. जाइ (in different sense)-last word of sentence १०४. छत पर आबि जाइ १०५. ने १०६. खेलाए (play) –खेलाइ १०७. शिकाइत- शिकायत १०८. ढप- ढ़प १०९ . पढ़- पढ ११०. कनिए/ कनिये कनिञे १११. राकस- राकश ११२. होए/ होय होइ ११३. अउरदा- औरदा ११४. बुझेलन्हि (different meaning- got understand) ११५. बुझएलन्हि/बुझेलनि/ बुझयलन्हि (understood himself) ११६. चलि- चल/ चलि गेल ११७. खधाइ- खधाय ११८. मोन पाड़लखिन्ह/ मोन पाड़लखिन/ मोन पारलखिन्ह ११९. कैक- कएक- कइएक १२०. लग ल’ग १२१. जरेनाइ १२२. जरौनाइ जरओनाइ- जरएनाइ/ जरेनाइ १२३. होइत १२४. गरबेलन्हि/ गरबेलनि गरबौलन्हि/ गरबौलनि १२५. चिखैत- (to test)चिखइत १२६. करइयो (willing to do) करैयो १२७. जेकरा- जकरा १२८. तकरा- तेकरा १२९. बिदेसर स्थानेमे/ बिदेसरे स्थानमे १३०. करबयलहुँ/ करबएलहुँ/ करबेलहुँ करबेलौं १३१. हारिक (उच्चारण हाइरक) १३२. ओजन वजन आफसोच/ अफसोस कागत/ कागच/ कागज १३३. आधे भाग/ आध-भागे १३४. पिचा / पिचाय/पिचाए १३५. नञ/ ने १३६. बच्चा नञ (ने) पिचा जाय १३७. तखन ने (नञ) कहैत अछि। कहै/ सुनै/ देखै छल मुदा कहैत-कहैत/ सुनैत-सुनैत/ देखैत-देखैत १३८. कतेक गोटे/ कताक गोटे १३९. कमाइ-धमाइ/ कमाई- धमाई १४० . लग ल’ग १४१. खेलाइ (for playing) १४२. छथिन्ह/ छथिन १४३. होइत होइ १४४. क्यो कियो / केओ १४५. केश (hair) १४६. केस (court-case) १४७ . बननाइ/ बननाय/ बननाए १४८. जरेनाइ १४९. कुरसी कुर्सी १५०. चरचा चर्चा १५१. कर्म करम १५२. डुबाबए/ डुबाबै/ डुमाबै डुमाबय/ डुमाबए १५३. एखुनका/ अखुनका १५४. लए/ लिअए (वाक्यक अंतिम शब्द)- लऽ १५५. कएलक/ केलक १५६. गरमी गर्मी १५७ . वरदी वर्दी १५८. सुना गेलाह सुना’/सुनाऽ १५९. एनाइ-गेनाइ १६०. तेना ने घेरलन्हि/ तेना ने घेरलनि १६१. नञि / नै १६२. डरो ड’रो १६३. कतहु/ कतौ कहीं १६४. उमरिगर-उमेरगर उमरगर १६५. भरिगर १६६. धोल/धोअल धोएल १६७. गप/गप्प १६८. के के’ १६९. दरबज्जा/ दरबजा १७०. ठाम १७१. धरि तक १७२. घूरि लौटि १७३. थोरबेक १७४. बड्ड १७५. तोँ/ तूँ १७६. तोँहि( पद्यमे ग्राह्य) १७७. तोँही / तोँहि १७८. करबाइए करबाइये १७९. एकेटा १८०. करितथि /करतथि १८१. पहुँचि/ पहुँच १८२. राखलन्हि रखलन्हि/ रखलनि १८३. लगलन्हि/ लगलनि लागलन्हि १८४. सुनि (उच्चारण सुइन) १८५. अछि (उच्चारण अइछ) १८६. एलथि गेलथि १८७. बितओने/ बितौने/ बितेने १८८. करबओलन्हि/ करबौलनि/ करेलखिन्ह/ करेलखिन १८९. करएलन्हि/ करेलनि १९०. आकि/ कि १९१. पहुँचि/ पहुँच १९२. बत्ती जराय/ जराए जरा (आगि लगा) १९३. से से’ १९४. हाँ मे हाँ (हाँमे हाँ विभक्त्तिमे हटा कए) १९५. फेल फैल १९६. फइल(spacious) फैल १९७. होयतन्हि/ होएतन्हि/ होएतनि/हेतनि/ हेतन्हि १९८. हाथ मटिआएब/ हाथ मटियाबय/हाथ मटियाएब १९९. फेका फेंका २००. देखाए देखा २०१. देखाबए २०२. सत्तरि सत्तर २०३. साहेब साहब २०४.गेलैन्ह/ गेलन्हि/ गेलनि २०५. हेबाक/ होएबाक २०६.केलो/ कएलहुँ/केलौं/ केलुँ २०७. किछु न किछु/ किछु ने किछु २०८.घुमेलहुँ/ घुमओलहुँ/ घुमेलौं २०९. एलाक/ अएलाक २१०. अः/ अह २११.लय/ लए (अर्थ-परिवर्त्तन) २१२.कनीक/ कनेक २१३.सबहक/ सभक २१४.मिलाऽ/ मिला २१५.कऽ/ क २१६.जाऽ/ जा २१७.आऽ/ आ २१८.भऽ /भ’ (’ फॉन्टक कमीक द्योतक) २१९.निअम/ नियम २२० .हेक्टेअर/ हेक्टेयर २२१.पहिल अक्षर ढ/ बादक/ बीचक ढ़ २२२.तहिं/तहिँ/ तञि/ तैं २२३.कहिं/ कहीं २२४.तँइ/ तैं / तइँ २२५.नँइ/ नइँ/ नञि/ नहि/नै २२६.है/ हए / एलीहेँ/ २२७.छञि/ छै/ छैक /छइ २२८.दृष्टिएँ/ दृष्टियेँ २२९.आ (come)/ आऽ(conjunction) २३०. आ (conjunction)/ आऽ(come) २३१.कुनो/ कोनो, कोना/केना २३२.गेलैन्ह-गेलन्हि-गेलनि २३३.हेबाक- होएबाक २३४.केलौँ- कएलौँ-कएलहुँ/केलौं २३५.किछु न किछ- किछु ने किछु २३६.केहेन- केहन २३७.आऽ (come)-आ (conjunction-and)/आ। आब'-आब' /आबह-आबह २३८. हएत-हैत २३९.घुमेलहुँ-घुमएलहुँ- घुमेलाें २४०.एलाक- अएलाक २४१.होनि- होइन/ होन्हि/ २४२.ओ-राम ओ श्यामक बीच(conjunction), ओऽ कहलक (he said)/ओ २४३.की हए/ कोसी अएली हए/ की है। की हइ २४४.दृष्टिएँ/ दृष्टियेँ २४५ .शामिल/ सामेल २४६.तैँ / तँए/ तञि/ तहिं २४७.जौं / ज्योँ/ जँ/ २४८.सभ/ सब २४९.सभक/ सबहक २५०.कहिं/ कहीं २५१.कुनो/ कोनो/ कोनहुँ/ २५२.फारकती भऽ गेल/ भए गेल/ भय गेल २५३.कोना/ केना/ कन्ना/कना २५४.अः/ अह २५५.जनै/ जनञ २५६.गेलनि/ गेलाह (अर्थ परिवर्तन) २५७.केलन्हि/ कएलन्हि/ केलनि/ २५८.लय/ लए/ लएह (अर्थ परिवर्तन) २५९.कनीक/ कनेक/कनी-मनी २६०.पठेलन्हि पठेलनि/ पठेलइन/ पपठओलन्हि/ पठबौलनि/ २६१.निअम/ नियम २६२.हेक्टेअर/ हेक्टेयर २६३.पहिल अक्षर रहने ढ/ बीचमे रहने ढ़ २६४.आकारान्तमे बिकारीक प्रयोग उचित नै/ अपोस्ट्रोफीक प्रयोग फान्टक तकनीकी न्यूनताक परिचायक ओकर बदला अवग्रह (बिकारी) क प्रयोग उचित २६५.केर (पद्यमे ग्राह्य) / -क/ कऽ/ के २६६.छैन्हि- छन्हि २६७.लगैए/ लगैये २६८.होएत/ हएत २६९.जाएत/ जएत/ २७०.आएत/ अएत/ आओत २७१ .खाएत/ खएत/ खैत २७२.पिअएबाक/ पिएबाक/पियेबाक २७३.शुरु/ शुरुह २७४.शुरुहे/ शुरुए २७५.अएताह/अओताह/ एताह/ औताह २७६.जाहि/ जाइ/ जइ/ जै/ २७७.जाइत/ जैतए/ जइतए २७८.आएल/ अएल २७९.कैक/ कएक २८०.आयल/ अएल/ आएल २८१. जाए/ जअए/ जए (लालति जाए लगलीह।) २८२. नुकएल/ नुकाएल २८३. कठुआएल/ कठुअएल २८४. ताहि/ तै/ तइ २८५. गायब/ गाएब/ गएब २८६. सकै/ सकए/ सकय २८७.सेरा/सरा/ सराए (भात सरा गेल) २८८.कहैत रही/देखैत रही/ कहैत छलौं/ कहै छलौं- अहिना चलैत/ पढ़ैत (पढ़ै-पढ़ैत अर्थ कखनो काल परिवर्तित) - आर बुझै/ बुझैत (बुझै/ बुझै छी, मुदा बुझैत-बुझैत)/ सकैत/ सकै। करैत/ करै। दै/ दैत। छैक/ छै। बचलै/ बचलैक। रखबा/ रखबाक । बिनु/ बिन। रातिक/ रातुक बुझै आ बुझैत केर अपन-अपन जगहपर प्रयोग समीचीन अछि। बुझैत-बुझैत आब बुझलिऐ। हमहूँ बुझै छी। २८९. दुआरे/ द्वारे २९०.भेटि/ भेट/ भेँट २९१. खन/ खीन/ खुना (भोर खन/ भोर खीन) २९२.तक/ धरि २९३.गऽ/ गै (meaning different-जनबै गऽ) २९४.सऽ/ सँ (मुदा दऽ, लऽ) २९५.त्त्व,(तीन अक्षरक मेल बदला पुनरुक्तिक एक आ एकटा दोसरक उपयोग) आदिक बदला त्व आदि। महत्त्व/ महत्व/ कर्ता/ कर्त्ता आदिमे त्त संयुक्तक कोनो आवश्यकता मैथिलीमे नै अछि। वक्तव्य २९६.बेसी/ बेशी २९७.बाला/वाला बला/ वला (रहैबला) २९८ .वाली/ (बदलैवाली) २९९.वार्त्ता/ वार्ता ३००. अन्तर्राष्ट्रिय/ अन्तर्राष्ट्रीय ३०१. लेमए/ लेबए ३०२.लमछुरका, नमछुरका ३०२.लागै/ लगै ( भेटैत/ भेटै) ३०३.लागल/ लगल ३०४.हबा/ हवा ३०५.राखलक/ रखलक ३०६.आ (come)/ आ (and) ३०७. पश्चाताप/ पश्चात्ताप ३०८. ऽ केर व्यवहार शब्दक अन्तमे मात्र, यथासंभव बीचमे नै। ३०९.कहैत/ कहै ३१०. रहए (छल)/ रहै (छलै) (meaning different) ३११.तागति/ ताकति ३१२.खराप/ खराब ३१३.बोइन/ बोनि/ बोइनि ३१४.जाठि/ जाइठ ३१५.कागज/ कागच/ कागत ३१६.गिरै (meaning different- swallow)/ गिरए (खसए) ३१७.राष्ट्रिय/ राष्ट्रीय Festivals of Mithila DATE-LIST (year- 2010-11) (१४१८ साल) Marriage Days: Nov.2010- 19 Dec.2010- 3,8 January 2011- 17, 21, 23, 24, 26, 27, 28 31 Feb.2011- 3, 4, 7, 9, 18, 20, 24, 25, 27, 28 March 2011- 2, 7 May 2011- 11, 12, 13, 18, 19, 20, 22, 23, 29, 30 June 2011- 1, 2, 3, 8, 9, 10, 12, 13, 19, 20, 26, 29 Upanayana Days: February 2011- 8 March 2011- 7 May 2011- 12, 13 June 2011- 6, 12 Dviragaman Din: November 2010- 19, 22, 25, 26 December 2010- 6, 8, 9, 10, 12 February 2011- 20, 21 March 2011- 6, 7, 9, 13 April 2011- 17, 18, 22 May 2011- 5, 6, 8, 13 Mundan Din: November 2010- 24, 26 December 2010- 10, 17 February 2011- 4, 16, 21 March 2011- 7, 9 April 2011- 22 May 2011- 6, 9, 19 June 2011- 3, 6, 10, 20 FESTIVALS OF MITHILA Mauna Panchami-31 July Somavati Amavasya Vrat- 1 August Madhushravani-12 August Nag Panchami- 14 August Raksha Bandhan- 24 Aug Krishnastami- 01 September Kushi Amavasya- 08 September Hartalika Teej- 11 September ChauthChandra-11 September Vishwakarma Pooja- 17 September Karma Dharma Ekadashi-19 September Indra Pooja Aarambh- 20 September Anant Caturdashi- 22 Sep Agastyarghadaan- 23 Sep Pitri Paksha begins- 24 Sep Jimootavahan Vrata/ Jitia-30 Sep Matri Navami- 02 October Kalashsthapan- 08 October Belnauti- 13 October Patrika Pravesh- 14 October Mahastami- 15 October Maha Navami - 16-17 October Vijaya Dashami- 18 October Kojagara- 22 Oct Dhanteras- 3 November Diyabati, shyama pooja- 5 November Annakoota/ Govardhana Pooja-07 November Bhratridwitiya/ Chitragupta Pooja-08 November Chhathi- -12 November Akshyay Navami- 15 November Devotthan Ekadashi- 17 November Kartik Poornima/ Sama Bisarjan- 21 Nov Shaa. ravivratarambh- 21 November Navanna parvan- 24 -26 November Vivaha Panchmi- 10 December Naraknivaran chaturdashi- 01 February Makara/ Teela Sankranti-15 Jan Basant Panchami/ Saraswati Pooja- 08 Februaqry Achla Saptmi- 10 February Mahashivaratri-03 March Holikadahan-Fagua-19 March Holi-20 Mar Varuni Yoga- 31 March va.navaratrarambh- 4 April vaa. Chhathi vrata- 9 April Ram Navami- 12 April Mesha Sankranti-Satuani-14 April Jurishital-15 April Somavati Amavasya Vrata- 02 May Ravi Brat Ant- 08 May Akshaya Tritiya-06 May Janaki Navami- 12 May Vat Savitri-barasait- 01 June Ganga Dashhara-11 June Jagannath Rath Yatra- 3 July Hari Sayan Ekadashi- 11 Jul Aashadhi Guru Poornima-15 Jul VIDEHA ARCHIVE १.विदेह ई-पत्रिकाक सभटा पुरान अंक ब्रेल, तिरहुता आ देवनागरी रूपमे Videha e journal's all old issues in Braille Tirhuta and Devanagari versions विदेह ई-पत्रिकाक पहिल ५० अंक
विदेह ई-पत्रिकाक ५०म सँ आगाँक अंक २.मैथिली पोथी डाउनलोड Maithili Books Download ३.मैथिली ऑडियो संकलन Maithili Audio Downloads ४.मैथिली वीडियोक संकलन Maithili Videos ५.मिथिला चित्रकला/ आधुनिक चित्रकला आ चित्र Mithila Painting/ Modern Art and Photos "विदेह"क एहि सभ सहयोगी लिंकपर सेहो एक बेर जाऊ। ६.विदेह मैथिली क्विज : http://videhaquiz.blogspot.com/ ७.विदेह मैथिली जालवृत्त एग्रीगेटर : http://videha-aggregator.blogspot.com/ ८.विदेह मैथिली साहित्य अंग्रेजीमे अनूदित http://madhubani-art.blogspot.com/ ९.विदेहक पूर्व-रूप "भालसरिक गाछ" : http://gajendrathakur.blogspot.com/ १०.विदेह इंडेक्स : http://videha123.blogspot.com/ ११.विदेह फाइल : http://videha123.wordpress.com/ १२. विदेह: सदेह : पहिल तिरहुता (मिथिला़क्षर) जालवृत्त (ब्लॉग) http://videha-sadeha.blogspot.com/ १३. विदेह:ब्रेल: मैथिली ब्रेलमे: पहिल बेर विदेह द्वारा http://videha-braille.blogspot.com/ १४.VIDEHA IST MAITHILI FORTNIGHTLY EJOURNAL ARCHIVE http://videha-archive.blogspot.com/ १५. विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका मैथिली पोथीक आर्काइव http://videha-pothi.blogspot.com/ १६. विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका ऑडियो आर्काइव http://videha-audio.blogspot.com/ १७. विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका वीडियो आर्काइव http://videha-video.blogspot.com/ १८. विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका मिथिला चित्रकला, आधुनिक कला आ चित्रकला http://videha-paintings-photos.blogspot.com/ १९. मैथिल आर मिथिला (मैथिलीक सभसँ लोकप्रिय जालवृत्त) http://maithilaurmithila.blogspot.com/ २०.श्रुति प्रकाशन http://www.shruti-publication.com/ २१.http://groups.google.com/group/videha VIDEHA केर सदस्यता लिअ Top of Form Bottom of Form ईमेल : एहि समूहपर जाऊ २२.http://groups.yahoo.com/group/VIDEHA/ Top of Form Subscribe to VIDEHA Powered by us.groups.yahoo.com Bottom of Form २३.गजेन्द्र ठाकुर इडेक्स http://gajendrathakur123.blogspot.com २४.विदेह रेडियो:मैथिली कथा-कविता आदिक पहिल पोडकास्ट साइट http://videha123radio.wordpress.com/ २५. नेना भुटका http://mangan-khabas.blogspot.com/ महत्त्वपूर्ण सूचना:(१) 'विदेह' द्वारा धारावाहिक रूपे ई-प्रकाशित कएल गेल गजेन्द्र ठाकुरक निबन्ध-प्रबन्ध-समीक्षा, उपन्यास (सहस्रबाढ़नि) , पद्य-संग्रह (सहस्राब्दीक चौपड़पर), कथा-गल्प (गल्प-गुच्छ), नाटक(संकर्षण), महाकाव्य (त्वञ्चाहञ्च आ असञ्जाति मन) आ बाल-किशोर साहित्य विदेहमे संपूर्ण ई-प्रकाशनक बाद प्रिंट फॉर्ममे। कुरुक्षेत्रम्–अन्तर्मनक खण्ड-१ सँ ७ Combined ISBN No.978-81-907729-7-6 विवरण एहि पृष्ठपर नीचाँमे आ प्रकाशकक साइट http://www.shruti-publication.com/ पर । महत्त्वपूर्ण सूचना (२):सूचना: विदेहक मैथिली-अंग्रेजी आ अंग्रेजी मैथिली कोष (इंटरनेटपर पहिल बेर सर्च-डिक्शनरी) एम.एस. एस.क्यू.एल. सर्वर आधारित -Based on ms-sql server Maithili-English and English-Maithili Dictionary. विदेहक भाषापाक- रचनालेखन स्तंभमे। कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक- गजेन्द्र ठाकुर गजेन्द्र ठाकुरक निबन्ध-प्रबन्ध-समीक्षा, उपन्यास (सहस्रबाढ़नि) , पद्य-संग्रह (सहस्राब्दीक चौपड़पर), कथा-गल्प (गल्प गुच्छ), नाटक(संकर्षण), महाकाव्य (त्वञ्चाहञ्च आ असञ्जाति मन) आ बालमंडली-किशोरजगत विदेहमे संपूर्ण ई-प्रकाशनक बाद प्रिंट फॉर्ममे। कुरुक्षेत्रम्–अन्तर्मनक, खण्ड-१ सँ ७ Ist edition 2009 of Gajendra Thakur’s KuruKshetram-Antarmanak (Vol. I to VII)- essay-paper-criticism, novel, poems, story, play, epics and Children-grown-ups literature in single binding: Language:Maithili ६९२ पृष्ठ : मूल्य भा. रु. 100/-(for individual buyers inside india) (add courier charges Rs.50/-per copy for Delhi/NCR and Rs.100/- per copy for outside Delhi)
For Libraries and overseas buyers $40 US (including postage)
The book is AVAILABLE FOR PDF DOWNLOAD AT
https://sites.google.com/a/videha.com/videha/
http://videha123.wordpress.com/
Details for purchase available at print-version publishers's site website: http://www.shruti-publication.com/ or you may write to e-mail:shruti.publication@shruti-publication.com विदेह: सदेह : १: २: ३: ४ तिरहुता : देवनागरी "विदेह" क, प्रिंट संस्करण :विदेह-ई-पत्रिका (http://www.videha.co.in/) क चुनल रचना सम्मिलित। विदेह:सदेह:१: २: ३: ४ सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। Details for purchase available at print-version publishers's site http://www.shruti-publication.com or you may write to shruti.publication@shruti-publication.com २. संदेश- [ विदेह ई-पत्रिका, विदेह:सदेह मिथिलाक्षर आ देवनागरी आ गजेन्द्र ठाकुरक सात खण्डक- निबन्ध-प्रबन्ध-समीक्षा,उपन्यास (सहस्रबाढ़नि) , पद्य-संग्रह (सहस्राब्दीक चौपड़पर), कथा-गल्प (गल्प गुच्छ), नाटक (संकर्षण), महाकाव्य (त्वञ्चाहञ्च आ असञ्जाति मन) आ बाल-मंडली-किशोर जगत- संग्रह कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक मादेँ। ] १.श्री गोविन्द झा- विदेहकेँ तरंगजालपर उतारि विश्वभरिमे मातृभाषा मैथिलीक लहरि जगाओल, खेद जे अपनेक एहि महाभियानमे हम एखन धरि संग नहि दए सकलहुँ। सुनैत छी अपनेकेँ सुझाओ आ रचनात्मक आलोचना प्रिय लगैत अछि तेँ किछु लिखक मोन भेल। हमर सहायता आ सहयोग अपनेकेँ सदा उपलब्ध रहत। २.श्री रमानन्द रेणु- मैथिलीमे ई-पत्रिका पाक्षिक रूपेँ चला कऽ जे अपन मातृभाषाक प्रचार कऽ रहल छी, से धन्यवाद । आगाँ अपनेक समस्त मैथिलीक कार्यक हेतु हम हृदयसँ शुभकामना दऽ रहल छी। ३.श्री विद्यानाथ झा "विदित"- संचार आ प्रौद्योगिकीक एहि प्रतिस्पर्धी ग्लोबल युगमे अपन महिमामय "विदेह"केँ अपना देहमे प्रकट देखि जतबा प्रसन्नता आ संतोष भेल, तकरा कोनो उपलब्ध "मीटर"सँ नहि नापल जा सकैछ? ..एकर ऐतिहासिक मूल्यांकन आ सांस्कृतिक प्रतिफलन एहि शताब्दीक अंत धरि लोकक नजरिमे आश्चर्यजनक रूपसँ प्रकट हैत। ४. प्रो. उदय नारायण सिंह "नचिकेता"- जे काज अहाँ कए रहल छी तकर चरचा एक दिन मैथिली भाषाक इतिहासमे होएत। आनन्द भए रहल अछि, ई जानि कए जे एतेक गोट मैथिल "विदेह" ई जर्नलकेँ पढ़ि रहल छथि।...विदेहक चालीसम अंक पुरबाक लेल अभिनन्दन। ५. डॉ. गंगेश गुंजन- एहि विदेह-कर्ममे लागि रहल अहाँक सम्वेदनशील मन, मैथिलीक प्रति समर्पित मेहनतिक अमृत रंग, इतिहास मे एक टा विशिष्ट फराक अध्याय आरंभ करत, हमरा विश्वास अछि। अशेष शुभकामना आ बधाइक सङ्ग, सस्नेह...अहाँक पोथी कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक प्रथम दृष्टया बहुत भव्य तथा उपयोगी बुझाइछ। मैथिलीमे तँ अपना स्वरूपक प्रायः ई पहिले एहन भव्य अवतारक पोथी थिक। हर्षपूर्ण हमर हार्दिक बधाई स्वीकार करी। ६. श्री रामाश्रय झा "रामरंग"(आब स्वर्गीय)- "अपना" मिथिलासँ संबंधित...विषय वस्तुसँ अवगत भेलहुँ।...शेष सभ कुशल अछि। ७. श्री ब्रजेन्द्र त्रिपाठी- साहित्य अकादमी- इंटरनेट पर प्रथम मैथिली पाक्षिक पत्रिका "विदेह" केर लेल बधाई आ शुभकामना स्वीकार करू। ८. श्री प्रफुल्लकुमार सिंह "मौन"- प्रथम मैथिली पाक्षिक पत्रिका "विदेह" क प्रकाशनक समाचार जानि कनेक चकित मुदा बेसी आह्लादित भेलहुँ। कालचक्रकेँ पकड़ि जाहि दूरदृष्टिक परिचय देलहुँ, ओहि लेल हमर मंगलकामना। ९.डॉ. शिवप्रसाद यादव- ई जानि अपार हर्ष भए रहल अछि, जे नव सूचना-क्रान्तिक क्षेत्रमे मैथिली पत्रकारिताकेँ प्रवेश दिअएबाक साहसिक कदम उठाओल अछि। पत्रकारितामे एहि प्रकारक नव प्रयोगक हम स्वागत करैत छी, संगहि "विदेह"क सफलताक शुभकामना। १०. श्री आद्याचरण झा- कोनो पत्र-पत्रिकाक प्रकाशन- ताहूमे मैथिली पत्रिकाक प्रकाशनमे के कतेक सहयोग करताह- ई तऽ भविष्य कहत। ई हमर ८८ वर्षमे ७५ वर्षक अनुभव रहल। एतेक पैघ महान यज्ञमे हमर श्रद्धापूर्ण आहुति प्राप्त होयत- यावत ठीक-ठाक छी/ रहब। ११. श्री विजय ठाकुर- मिशिगन विश्वविद्यालय- "विदेह" पत्रिकाक अंक देखलहुँ, सम्पूर्ण टीम बधाईक पात्र अछि। पत्रिकाक मंगल भविष्य हेतु हमर शुभकामना स्वीकार कएल जाओ। १२. श्री सुभाषचन्द्र यादव- ई-पत्रिका "विदेह" क बारेमे जानि प्रसन्नता भेल। ’विदेह’ निरन्तर पल्लवित-पुष्पित हो आ चतुर्दिक अपन सुगंध पसारय से कामना अछि। १३. श्री मैथिलीपुत्र प्रदीप- ई-पत्रिका "विदेह" केर सफलताक भगवतीसँ कामना। हमर पूर्ण सहयोग रहत। १४. डॉ. श्री भीमनाथ झा- "विदेह" इन्टरनेट पर अछि तेँ "विदेह" नाम उचित आर कतेक रूपेँ एकर विवरण भए सकैत अछि। आइ-काल्हि मोनमे उद्वेग रहैत अछि, मुदा शीघ्र पूर्ण सहयोग देब।कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक देखि अति प्रसन्नता भेल। मैथिलीक लेल ई घटना छी। १५. श्री रामभरोस कापड़ि "भ्रमर"- जनकपुरधाम- "विदेह" ऑनलाइन देखि रहल छी। मैथिलीकेँ अन्तर्राष्ट्रीय जगतमे पहुँचेलहुँ तकरा लेल हार्दिक बधाई। मिथिला रत्न सभक संकलन अपूर्व। नेपालोक सहयोग भेटत, से विश्वास करी। १६. श्री राजनन्दन लालदास- "विदेह" ई-पत्रिकाक माध्यमसँ बड़ नीक काज कए रहल छी, नातिक अहिठाम देखलहुँ। एकर वार्षिक अंक जखन प्रिंट निकालब तँ हमरा पठायब। कलकत्तामे बहुत गोटेकेँ हम साइटक पता लिखाए देने छियन्हि। मोन तँ होइत अछि जे दिल्ली आबि कए आशीर्वाद दैतहुँ, मुदा उमर आब बेशी भए गेल। शुभकामना देश-विदेशक मैथिलकेँ जोड़बाक लेल।.. उत्कृष्ट प्रकाशन कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक लेल बधाइ। अद्भुत काज कएल अछि, नीक प्रस्तुति अछि सात खण्डमे। मुदा अहाँक सेवा आ से निःस्वार्थ तखन बूझल जाइत जँ अहाँ द्वारा प्रकाशित पोथी सभपर दाम लिखल नहि रहितैक। ओहिना सभकेँ विलहि देल जइतैक। (स्पष्टीकरण- श्रीमान्, अहाँक सूचनार्थ विदेह द्वारा ई-प्रकाशित कएल सभटा सामग्री आर्काइवमे https://sites.google.com/a/videha.com/videha-pothi/ पर बिना मूल्यक डाउनलोड लेल उपलब्ध छै आ भविष्यमे सेहो रहतैक। एहि आर्काइवकेँ जे कियो प्रकाशक अनुमति लऽ कऽ प्रिंट रूपमे प्रकाशित कएने छथि आ तकर ओ दाम रखने छथि ताहिपर हमर कोनो नियंत्रण नहि अछि।- गजेन्द्र ठाकुर)... अहाँक प्रति अशेष शुभकामनाक संग। १७. डॉ. प्रेमशंकर सिंह- अहाँ मैथिलीमे इंटरनेटपर पहिल पत्रिका "विदेह" प्रकाशित कए अपन अद्भुत मातृभाषानुरागक परिचय देल अछि, अहाँक निःस्वार्थ मातृभाषानुरागसँ प्रेरित छी, एकर निमित्त जे हमर सेवाक प्रयोजन हो, तँ सूचित करी। इंटरनेटपर आद्योपांत पत्रिका देखल, मन प्रफुल्लित भऽ गेल। १८.श्रीमती शेफालिका वर्मा- विदेह ई-पत्रिका देखि मोन उल्लाससँ भरि गेल। विज्ञान कतेक प्रगति कऽ रहल अछि...अहाँ सभ अनन्त आकाशकेँ भेदि दियौ, समस्त विस्तारक रहस्यकेँ तार-तार कऽ दियौक...। अपनेक अद्भुत पुस्तक कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक विषयवस्तुक दृष्टिसँ गागरमे सागर अछि। बधाई। १९.श्री हेतुकर झा, पटना-जाहि समर्पण भावसँ अपने मिथिला-मैथिलीक सेवामे तत्पर छी से स्तुत्य अछि। देशक राजधानीसँ भय रहल मैथिलीक शंखनाद मिथिलाक गाम-गाममे मैथिली चेतनाक विकास अवश्य करत। २०. श्री योगानन्द झा, कबिलपुर, लहेरियासराय- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पोथीकेँ निकटसँ देखबाक अवसर भेटल अछि आ मैथिली जगतक एकटा उद्भट ओ समसामयिक दृष्टिसम्पन्न हस्ताक्षरक कलमबन्द परिचयसँ आह्लादित छी। "विदेह"क देवनागरी सँस्करण पटनामे रु. 80/- मे उपलब्ध भऽ सकल जे विभिन्न लेखक लोकनिक छायाचित्र, परिचय पत्रक ओ रचनावलीक सम्यक प्रकाशनसँ ऐतिहासिक कहल जा सकैछ। २१. श्री किशोरीकान्त मिश्र- कोलकाता- जय मैथिली, विदेहमे बहुत रास कविता, कथा, रिपोर्ट आदिक सचित्र संग्रह देखि आ आर अधिक प्रसन्नता मिथिलाक्षर देखि- बधाई स्वीकार कएल जाओ। २२.श्री जीवकान्त- विदेहक मुद्रित अंक पढ़ल- अद्भुत मेहनति। चाबस-चाबस। किछु समालोचना मरखाह..मुदा सत्य। २३. श्री भालचन्द्र झा- अपनेक कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक देखि बुझाएल जेना हम अपने छपलहुँ अछि। एकर विशालकाय आकृति अपनेक सर्वसमावेशताक परिचायक अछि। अपनेक रचना सामर्थ्यमे उत्तरोत्तर वृद्धि हो, एहि शुभकामनाक संग हार्दिक बधाई। २४.श्रीमती डॉ नीता झा- अहाँक कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़लहुँ। ज्योतिरीश्वर शब्दावली, कृषि मत्स्य शब्दावली आ सीत बसन्त आ सभ कथा, कविता, उपन्यास, बाल-किशोर साहित्य सभ उत्तम छल। मैथिलीक उत्तरोत्तर विकासक लक्ष्य दृष्टिगोचर होइत अछि। २५.श्री मायानन्द मिश्र- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक मे हमर उपन्यास स्त्रीधनक जे विरोध कएल गेल अछि तकर हम विरोध करैत छी।... कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पोथीक लेल शुभकामना।(श्रीमान् समालोचनाकेँ विरोधक रूपमे नहि लेल जाए।-गजेन्द्र ठाकुर) २६.श्री महेन्द्र हजारी- सम्पादक श्रीमिथिला- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़ि मोन हर्षित भऽ गेल..एखन पूरा पढ़यमे बहुत समय लागत, मुदा जतेक पढ़लहुँ से आह्लादित कएलक। २७.श्री केदारनाथ चौधरी- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक अद्भुत लागल, मैथिली साहित्य लेल ई पोथी एकटा प्रतिमान बनत। २८.श्री सत्यानन्द पाठक- विदेहक हम नियमित पाठक छी। ओकर स्वरूपक प्रशंसक छलहुँ। एम्हर अहाँक लिखल - कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक देखलहुँ। मोन आह्लादित भऽ उठल। कोनो रचना तरा-उपरी। २९.श्रीमती रमा झा-सम्पादक मिथिला दर्पण। कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक प्रिंट फॉर्म पढ़ि आ एकर गुणवत्ता देखि मोन प्रसन्न भऽ गेल, अद्भुत शब्द एकरा लेल प्रयुक्त कऽ रहल छी। विदेहक उत्तरोत्तर प्रगतिक शुभकामना। ३०.श्री नरेन्द्र झा, पटना- विदेह नियमित देखैत रहैत छी। मैथिली लेल अद्भुत काज कऽ रहल छी। ३१.श्री रामलोचन ठाकुर- कोलकाता- मिथिलाक्षर विदेह देखि मोन प्रसन्नतासँ भरि उठल, अंकक विशाल परिदृश्य आस्वस्तकारी अछि। ३२.श्री तारानन्द वियोगी- विदेह आ कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक देखि चकबिदोर लागि गेल। आश्चर्य। शुभकामना आ बधाई। ३३.श्रीमती प्रेमलता मिश्र “प्रेम”- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़लहुँ। सभ रचना उच्चकोटिक लागल। बधाई। ३४.श्री कीर्तिनारायण मिश्र- बेगूसराय- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक बड्ड नीक लागल, आगांक सभ काज लेल बधाई। ३५.श्री महाप्रकाश-सहरसा- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक नीक लागल, विशालकाय संगहि उत्तमकोटिक। ३६.श्री अग्निपुष्प- मिथिलाक्षर आ देवाक्षर विदेह पढ़ल..ई प्रथम तँ अछि एकरा प्रशंसामे मुदा हम एकरा दुस्साहसिक कहब। मिथिला चित्रकलाक स्तम्भकेँ मुदा अगिला अंकमे आर विस्तृत बनाऊ। ३७.श्री मंजर सुलेमान-दरभंगा- विदेहक जतेक प्रशंसा कएल जाए कम होएत। सभ चीज उत्तम। ३८.श्रीमती प्रोफेसर वीणा ठाकुर- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक उत्तम, पठनीय, विचारनीय। जे क्यो देखैत छथि पोथी प्राप्त करबाक उपाय पुछैत छथि। शुभकामना। ३९.श्री छत्रानन्द सिंह झा- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़लहुँ, बड्ड नीक सभ तरहेँ। ४०.श्री ताराकान्त झा- सम्पादक मैथिली दैनिक मिथिला समाद- विदेह तँ कन्टेन्ट प्रोवाइडरक काज कऽ रहल अछि। कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक अद्भुत लागल। ४१.डॉ रवीन्द्र कुमार चौधरी- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक बहुत नीक, बहुत मेहनतिक परिणाम। बधाई। ४२.श्री अमरनाथ- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक आ विदेह दुनू स्मरणीय घटना अछि, मैथिली साहित्य मध्य। ४३.श्री पंचानन मिश्र- विदेहक वैविध्य आ निरन्तरता प्रभावित करैत अछि, शुभकामना। ४४.श्री केदार कानन- कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक लेल अनेक धन्यवाद, शुभकामना आ बधाइ स्वीकार करी। आ नचिकेताक भूमिका पढ़लहुँ। शुरूमे तँ लागल जेना कोनो उपन्यास अहाँ द्वारा सृजित भेल अछि मुदा पोथी उनटौला पर ज्ञात भेल जे एहिमे तँ सभ विधा समाहित अछि। ४५.श्री धनाकर ठाकुर- अहाँ नीक काज कऽ रहल छी। फोटो गैलरीमे चित्र एहि शताब्दीक जन्मतिथिक अनुसार रहैत तऽ नीक। ४६.श्री आशीष झा- अहाँक पुस्तकक संबंधमे एतबा लिखबा सँ अपना कए नहि रोकि सकलहुँ जे ई किताब मात्र किताब नहि थीक, ई एकटा उम्मीद छी जे मैथिली अहाँ सन पुत्रक सेवा सँ निरंतर समृद्ध होइत चिरजीवन कए प्राप्त करत। ४७.श्री शम्भु कुमार सिंह- विदेहक तत्परता आ क्रियाशीलता देखि आह्लादित भऽ रहल छी। निश्चितरूपेण कहल जा सकैछ जे समकालीन मैथिली पत्रिकाक इतिहासमे विदेहक नाम स्वर्णाक्षरमे लिखल जाएत। ओहि कुरुक्षेत्रक घटना सभ तँ अठारहे दिनमे खतम भऽ गेल रहए मुदा अहाँक कुरुक्षेत्रम् तँ अशेष अछि। ४८.डॉ. अजीत मिश्र- अपनेक प्रयासक कतबो प्रशंसा कएल जाए कमे होएतैक। मैथिली साहित्यमे अहाँ द्वारा कएल गेल काज युग-युगान्तर धरि पूजनीय रहत। ४९.श्री बीरेन्द्र मल्लिक- अहाँक कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक आ विदेह:सदेह पढ़ि अति प्रसन्नता भेल। अहाँक स्वास्थ्य ठीक रहए आ उत्साह बनल रहए से कामना। ५०.श्री कुमार राधारमण- अहाँक दिशा-निर्देशमे विदेह पहिल मैथिली ई-जर्नल देखि अति प्रसन्नता भेल। हमर शुभकामना। ५१.श्री फूलचन्द्र झा प्रवीण-विदेह:सदेह पढ़ने रही मुदा कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक देखि बढ़ाई देबा लेल बाध्य भऽ गेलहुँ। आब विश्वास भऽ गेल जे मैथिली नहि मरत। अशेष शुभकामना। ५२.श्री विभूति आनन्द- विदेह:सदेह देखि, ओकर विस्तार देखि अति प्रसन्नता भेल। ५३.श्री मानेश्वर मनुज-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक एकर भव्यता देखि अति प्रसन्नता भेल, एतेक विशाल ग्रन्थ मैथिलीमे आइ धरि नहि देखने रही। एहिना भविष्यमे काज करैत रही, शुभकामना। ५४.श्री विद्यानन्द झा- आइ.आइ.एम.कोलकाता- कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक विस्तार, छपाईक संग गुणवत्ता देखि अति प्रसन्नता भेल। ५५.श्री अरविन्द ठाकुर-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक मैथिली साहित्यमे कएल गेल एहि तरहक पहिल प्रयोग अछि, शुभकामना। ५६.श्री कुमार पवन-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक पढ़ि रहल छी। किछु लघुकथा पढ़ल अछि, बहुत मार्मिक छल। ५७. श्री प्रदीप बिहारी-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक देखल, बधाई। ५८.डॉ मणिकान्त ठाकुर-कैलिफोर्निया- अपन विलक्षण नियमित सेवासँ हमरा लोकनिक हृदयमे विदेह सदेह भऽ गेल अछि। ५९.श्री धीरेन्द्र प्रेमर्षि- अहाँक समस्त प्रयास सराहनीय। दुख होइत अछि जखन अहाँक प्रयासमे अपेक्षित सहयोग नहि कऽ पबैत छी। ६०.श्री देवशंकर नवीन- विदेहक निरन्तरता आ विशाल स्वरूप- विशाल पाठक वर्ग, एकरा ऐतिहासिक बनबैत अछि। ६१.श्री मोहन भारद्वाज- अहाँक समस्त कार्य देखल, बहुत नीक। एखन किछु परेशानीमे छी, मुदा शीघ्र सहयोग देब। ६२.श्री फजलुर रहमान हाशमी-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक मे एतेक मेहनतक लेल अहाँ साधुवादक अधिकारी छी। ६३.श्री लक्ष्मण झा "सागर"- मैथिलीमे चमत्कारिक रूपेँ अहाँक प्रवेश आह्लादकारी अछि।..अहाँकेँ एखन आर..दूर..बहुत दूरधरि जेबाक अछि। स्वस्थ आ प्रसन्न रही। ६४.श्री जगदीश प्रसाद मंडल-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक पढ़लहुँ । कथा सभ आ उपन्यास सहस्रबाढ़नि पूर्णरूपेँ पढ़ि गेल छी। गाम-घरक भौगोलिक विवरणक जे सूक्ष्म वर्णन सहस्रबाढ़निमे अछि, से चकित कएलक, एहि संग्रहक कथा-उपन्यास मैथिली लेखनमे विविधता अनलक अछि। समालोचना शास्त्रमे अहाँक दृष्टि वैयक्तिक नहि वरन् सामाजिक आ कल्याणकारी अछि, से प्रशंसनीय। ६५.श्री अशोक झा-अध्यक्ष मिथिला विकास परिषद- कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक लेल बधाई आ आगाँ लेल शुभकामना। ६६.श्री ठाकुर प्रसाद मुर्मु- अद्भुत प्रयास। धन्यवादक संग प्रार्थना जे अपन माटि-पानिकेँ ध्यानमे राखि अंकक समायोजन कएल जाए। नव अंक धरि प्रयास सराहनीय। विदेहकेँ बहुत-बहुत धन्यवाद जे एहेन सुन्दर-सुन्दर सचार (आलेख) लगा रहल छथि। सभटा ग्रहणीय- पठनीय। ६७.बुद्धिनाथ मिश्र- प्रिय गजेन्द्र जी,अहाँक सम्पादन मे प्रकाशित ‘विदेह’आ ‘कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक’ विलक्षण पत्रिका आ विलक्षण पोथी! की नहि अछि अहाँक सम्पादनमे? एहि प्रयत्न सँ मैथिली क विकास होयत,निस्संदेह। ६८.श्री बृखेश चन्द्र लाल- गजेन्द्रजी, अपनेक पुस्तक कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़ि मोन गदगद भय गेल , हृदयसँ अनुगृहित छी । हार्दिक शुभकामना । ६९.श्री परमेश्वर कापड़ि - श्री गजेन्द्र जी । कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़ि गदगद आ नेहाल भेलहुँ। ७०.श्री रवीन्द्रनाथ ठाकुर- विदेह पढ़ैत रहैत छी। धीरेन्द्र प्रेमर्षिक मैथिली गजलपर आलेख पढ़लहुँ। मैथिली गजल कत्तऽ सँ कत्तऽ चलि गेलैक आ ओ अपन आलेखमे मात्र अपन जानल-पहिचानल लोकक चर्च कएने छथि। जेना मैथिलीमे मठक परम्परा रहल अछि। (स्पष्टीकरण- श्रीमान्, प्रेमर्षि जी ओहि आलेखमे ई स्पष्ट लिखने छथि जे किनको नाम जे छुटि गेल छन्हि तँ से मात्र आलेखक लेखकक जानकारी नहि रहबाक द्वारे, एहिमे आन कोनो कारण नहि देखल जाय। अहाँसँ एहि विषयपर विस्तृत आलेख सादर आमंत्रित अछि।-सम्पादक) ७१.श्री मंत्रेश्वर झा- विदेह पढ़ल आ संगहि अहाँक मैगनम ओपस कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक सेहो, अति उत्तम। मैथिलीक लेल कएल जा रहल अहाँक समस्त कार्य अतुलनीय अछि। ७२. श्री हरेकृष्ण झा- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक मैथिलीमे अपन तरहक एकमात्र ग्रन्थ अछि, एहिमे लेखकक समग्र दृष्टि आ रचना कौशल देखबामे आएल जे लेखकक फील्डवर्कसँ जुड़ल रहबाक कारणसँ अछि। ७३.श्री सुकान्त सोम- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक मे समाजक इतिहास आ वर्तमानसँ अहाँक जुड़ाव बड्ड नीक लागल, अहाँ एहि क्षेत्रमे आर आगाँ काज करब से आशा अछि। ७४.प्रोफेसर मदन मिश्र- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक सन किताब मैथिलीमे पहिले अछि आ एतेक विशाल संग्रहपर शोध कएल जा सकैत अछि। भविष्यक लेल शुभकामना। ७५.प्रोफेसर कमला चौधरी- मैथिलीमे कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक सन पोथी आबए जे गुण आ रूप दुनूमे निस्सन होअए, से बहुत दिनसँ आकांक्षा छल, ओ आब जा कऽ पूर्ण भेल। पोथी एक हाथसँ दोसर हाथ घुमि रहल अछि, एहिना आगाँ सेहो अहाँसँ आशा अछि। ७६.श्री उदय चन्द्र झा "विनोद": गजेन्द्रजी, अहाँ जतेक काज कएलहुँ अछि से मैथिलीमे आइ धरि कियो नहि कएने छल। शुभकामना। अहाँकेँ एखन बहुत काज आर करबाक अछि। ७७.श्री कृष्ण कुमार कश्यप: गजेन्द्र ठाकुरजी, अहाँसँ भेँट एकटा स्मरणीय क्षण बनि गेल। अहाँ जतेक काज एहि बएसमे कऽ गेल छी ताहिसँ हजार गुणा आर बेशीक आशा अछि। ७८.श्री मणिकान्त दास: अहाँक मैथिलीक कार्यक प्रशंसा लेल शब्द नहि भेटैत अछि। अहाँक कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक सम्पूर्ण रूपेँ पढ़ि गेलहुँ। त्वञ्चाहञ्च बड्ड नीक लागल। ७९. श्री हीरेन्द्र कुमार झा- विदेह ई-पत्रिकाक सभ अंक ई-पत्रसँ भेटैत रहैत अछि। मैथिलीक ई-पत्रिका छैक एहि बातक गर्व होइत अछि। अहाँ आ अहाँक सभ सहयोगीकेँ हार्दिक शुभकामना। विदेह मैथिली साहित्य आन्दोलन (c)२००४-११. सर्वाधिकार लेखकाधीन आ जतय लेखकक नाम नहि अछि ततय संपादकाधीन। विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। सह-सम्पादक: उमेश मंडल। सहायक सम्पादक: शिव कुमार झा आ मुन्नाजी (मनोज कुमार कर्ण)। भाषा-सम्पादन: नागेन्द्र कुमार झा आ पञ्जीकार विद्यानन्द झा। कला-सम्पादन: ज्योति सुनीत चौधरी आ रश्मि रेखा सिन्हा। सम्पादक-शोध-अन्वेषण: डॉ. जया वर्मा आ डॉ. राजीव कुमार वर्मा। रचनाकार अपन मौलिक आ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि) ggajendra@videha.com केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx, .rtf वा .txt फॉर्मेटमे पठा सकैत छथि। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेताह, से आशा करैत छी। रचनाक अंतमे टाइप रहय, जे ई रचना मौलिक अछि, आ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। मेल प्राप्त होयबाक बाद यथासंभव शीघ्र ( सात दिनक भीतर) एकर प्रकाशनक अंकक सूचना देल जायत। ’विदेह' प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका अछि आ एहिमे मैथिली, संस्कृत आ अंग्रेजीमे मिथिला आ मैथिलीसँ संबंधित रचना प्रकाशित कएल जाइत अछि। एहि ई पत्रिकाकेँ श्रीमति लक्ष्मी ठाकुर द्वारा मासक ०१ आ १५ तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि। (c) 2004-11 सर्वाधिकार सुरक्षित। विदेहमे प्रकाशित सभटा रचना आ आर्काइवक सर्वाधिकार रचनाकार आ संग्रहकर्त्ताक लगमे छन्हि। रचनाक अनुवाद आ पुनः प्रकाशन किंवा आर्काइवक उपयोगक अधिकार किनबाक हेतु ggajendra@videha.co.in पर संपर्क करू। एहि साइटकेँ प्रीति झा ठाकुर, मधूलिका चौधरी आ रश्मि प्रिया द्वारा डिजाइन कएल गेल। सिद्धिरस्तु वि दे ह विदेह Videha বিদেহ विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका Videha Ist Maithili Fortnightly e Magazine विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका 'विदेह' ७७ म अंक ०१ मार्च २०११ (वर्ष ४ मास ३९ अंक ७७)http://www.videha.co.in/ मानुषीमिह संस्कृताम् ISSN 2229-547X VIDEHA वि दे ह विदेह Videha বিদেহ विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका Videha Ist Maithili Fortnightly e Magazine विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका 'विदेह' ७७ म अंक ०१ मार्च २०११ (वर्ष ४ मास ३९ अंक ७७)http://www.videha.co.in/ मानुषीमिह संस्कृताम् ISSN 2229-547X VIDEHA
i Br | oz ¥% if oer © Ng ही; | | Geet ap ee |
| | : Fit है ै कर । oe cs aT - दि " é “= ' _ =o H,
| «है
&
ft 4 ea i | 7. : ' a _ Bp pay वि
| मम \ / ’ a IN 74
> wr
F _— \ x के eS yk लि भा : os A 3 a | (Km | \\ A A ; a ‘ a ; = i as ’ थे का + : a 7 i ‘| ; J m 4 \ i q *~ = be ) LJ ail #
: hy हि ‘ \ , | “oy
दर ि 2. Sra Oe Mitral De OUT छा). तेरे. <D } \ Se h a कै; Ms ‘ डी Be ‘v4 iF ही ( J हा J i (ch d Ve op ill? a QO RQ OrLQWT GP 4
™ a + mee ei
| A it | I €.3 Sai ‘ |) Ra