VIDEHA — Issue 78 / अंक ७८

Publication: VIDEHA · Issue: 78
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452 453 ISSN 2229-547X VIDEHA 'विदेह' ७८ म अंक १५ मार्च २०११ (वर्ष ४ मास ३९ अंक ७८) वि  दे  ह विदेह Videha বিদেহ http://www.videha.co.in  विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका Videha Ist Maithili Fortnightly e Magazine   नव अंक देखबाक लेल पृष्ठ सभकेँ रिफ्रेश कए देखू। Always refresh the pages for viewing new issue of VIDEHA. Read in your own script Roman(Eng)Gujarati Bangla Oriya Gurmukhi Telugu Tamil Kannada Malayalam Hindi ऐ अंकमे अछि:- १. संपादकीय संदेश २. गद्य २.१.डॉ. शेफालिका वर्मा - एकटा संस्मरण एकटा प्रश्न २.२.शिव कुमार झा "टिल्लू"- मैथि‍ली कथाक वि‍कासमे गामक जि‍नगीक योगदान- २.३.किशन कारीगर- मोछ वाली माउगी २.४.1.राम प्रवेश मण्‍डल- विहनि कथा- आह मि‍थि‍ला! वाह मैथि‍ली! 2 सुमित आनन्द- भाव-भूमि रसवंत पुस्तकक लोकार्पण २.५. याेगानन्‍द झा- इसवी सन 2010 : मैथि‍लीक गति‍वि‍धि‍ २.६.सुजित कुमार झा- जंगलमे होरी २.७.राजदेव मण्‍डल- उपन्‍यास' आगाँ- हमर टोल २.८.डॉ. रमण झा- फोंका-एक विहगावलोकन ३. पद्य ३.१.1.जीवकान्‍त 2.आनन्द कुमार झा 3. सदरे आलम "गौहर" 4.जितमोहन झा (जितू)-मैथिली होली गीत ३.२.1.ज्योति सुनीत चौधरी-फगुआक खेल 2.जवाहर लाल कश्यप 1981- कौआ आउर बगरा 3  मुन्ना जी- सबला ३.३.1.रविभूषण पाठक- 1.हमर मैथिली, 2.होली 3. ई नमवरबा; 2.सुबोध ठाकुर- हम नै खेलब होली ३.४.1.राजेश मोहन झा 'गुंजन'- होलीक तरंग 2.किशन कारीगर- कक्का हमर उचक्का ३.५.1राम वि‍लास साहु-पागलप्रेमी 2.पंकज झा- अईंखक दोख आ कि हृदयक…. / आऊ चलु ३.६.नवीन कुमार आशा- आव मोन करें कमाई ३.७.1.शि‍वकुमार झा टि‍ल्‍लू 2.गजेन्द्र ठाकुर ३.८.१. जगदीश प्रसाद मण्‍डल- श्री शि‍वकुमार झा टि‍ल्‍लू'जीकेँ समर्पित- गीत २. उमेश मण्‍डल- संकलन, मूड़न गीत ४. मिथिला कला-संगीत-१.श्वेता झा चौधरी २.ज्योति सुनीत चौधरी ३श्वेता झा (सिंगापुर) ५. गद्य-पद्य भारती: मोहनदास: (दीर्घकथा):लेखक :  उदय प्रकाश (मूल हिन्दीसँ मैथिलीमे अनुवाद विनीत उत्पल) ६. बालानां कृते-संजय कुमार झा- बौआ बिसरि गेलहक ७. भाषापाक रचना-लेखन -[मानक मैथिली], [विदेहक मैथिली-अंग्रेजी आ अंग्रेजी मैथिली कोष (इंटरनेटपर पहिल बेर सर्च-डिक्शनरी) एम.एस. एस.क्यू.एल. सर्वर आधारित -Based on ms-sql server Maithili-English and English-Maithili Dictionary.] 8.VIDEHA FOR NON RESIDENTS 8.1.Original Poem in Maithili by Kalikant Jha "Buch" Translated into English by Jyoti Jha Chaudhary 9. VIDEHA MAITHILI SAMSKRIT EDUCATION (contd.)बिपिन कुमार झा- लैटेक्स : परिचयः उपादेयता च विदेह ई-पत्रिकाक सभटा पुरान अंक ( ब्रेल, तिरहुता आ देवनागरी मे ) पी.डी.एफ. डाउनलोडक लेल नीचाँक लिंकपर उपलब्ध अछि। All the old issues of Videha e journal ( in Braille, Tirhuta and Devanagari versions ) are available for pdf download at the following link. विदेह ई-पत्रिकाक सभटा पुरान अंक ब्रेल, तिरहुता आ देवनागरी रूपमे Videha e journal's all old issues in Braille Tirhuta and Devanagari versions विदेह ई-पत्रिकाक पहिल ५० अंक

विदेह ई-पत्रिकाक ५०म सँ आगाँक अंक विदेह आर.एस.एस.फीड। "विदेह" ई-पत्रिका ई-पत्रसँ प्राप्त करू। अपन मित्रकेँ विदेहक विषयमे सूचित करू। ↑ विदेह आर.एस.एस.फीड एनीमेटरकेँ अपन साइट/ ब्लॉगपर लगाऊ। ब्लॉग "लेआउट" पर "एड गाडजेट" मे "फीड" सेलेक्ट कए "फीड यू.आर.एल." मे http://www.videha.co.in/index.xml टाइप केलासँ सेहो विदेह फीड प्राप्त कए सकैत छी। गूगल रीडरमे पढ़बा लेल http://reader.google.com/ पर जा कऽ Add a  Subscription बटन क्लिक करू आ खाली स्थानमे http://www.videha.co.in/index.xml पेस्ट करू आ Add  बटन दबाउ। मैथिली देवनागरी वा मिथिलाक्षरमे नहि देखि/ लिखि पाबि रहल छी, (cannot see/write Maithili in Devanagari/ Mithilakshara follow links below or contact at ggajendra@videha.com) तँ एहि हेतु नीचाँक लिंक सभ पर जाऊ। संगहि विदेहक स्तंभ मैथिली भाषापाक/ रचना लेखनक नव-पुरान अंक पढ़ू। http://devanaagarii.net/ http://kaulonline.com/uninagari/  (एतए बॉक्समे ऑनलाइन देवनागरी टाइप करू, बॉक्ससँ कॉपी करू आ वर्ड डॉक्युमेन्टमे पेस्ट कए वर्ड फाइलकेँ सेव करू। विशेष जानकारीक लेल ggajendra@videha.com पर सम्पर्क करू।)(Use Firefox 4.0 (from WWW.MOZILLA.COM )/ Opera/ Safari/ Internet Explorer 8.0/ Flock 2.0/ Google Chrome for best view of 'Videha' Maithili e-journal at http://www.videha.co.in/ .) Go to the link below for download of old issues of VIDEHA Maithili e magazine in .pdf format and Maithili Audio/ Video/ Book/ paintings/ photo files. विदेहक पुरान अंक आ ऑडियो/ वीडियो/ पोथी/ चित्रकला/ फोटो सभक फाइल सभ (उच्चारण, बड़ सुख सार आ दूर्वाक्षत मंत्र सहित) डाउनलोड करबाक हेतु नीचाँक लिंक पर जाऊ। VIDEHA ARCHIVE विदेह आर्काइव भारतीय डाक विभाग द्वारा जारी कवि, नाटककार आ धर्मशास्त्री विद्यापतिक स्टाम्प। भारत आ नेपालक माटिमे पसरल मिथिलाक धरती प्राचीन कालहिसँ महान पुरुष ओ महिला लोकनिक कर्मभमि रहल अछि। मिथिलाक महान पुरुष ओ महिला लोकनिक चित्र 'मिथिला रत्न' मे देखू। गौरी-शंकरक पालवंश कालक मूर्त्ति, एहिमे मिथिलाक्षरमे (१२०० वर्ष पूर्वक) अभिलेख अंकित अछि। मिथिलाक भारत आ नेपालक माटिमे पसरल एहि तरहक अन्यान्य प्राचीन आ नव स्थापत्य, चित्र, अभिलेख आ मूर्त्तिकलाक़ हेतु देखू 'मिथिलाक खोज' मिथिला, मैथिल आ मैथिलीसँ सम्बन्धित सूचना, सम्पर्क, अन्वेषण संगहि विदेहक सर्च-इंजन आ न्यूज सर्विस आ मिथिला, मैथिल आ मैथिलीसँ सम्बन्धित वेबसाइट सभक समग्र संकलनक लेल देखू "विदेह सूचना संपर्क अन्वेषण" विदेह जालवृत्तक डिसकसन फोरमपर जाऊ। "मैथिल आर मिथिला" (मैथिलीक सभसँ लोकप्रिय जालवृत्त) पर जाऊ। संपादकीय होलीपर व्यंग्य “देखियौ तँ। एतेक टाक अपन भारत आ छोट सन देश सभसँ हारि जाइए। कखनो काल ओना जितितो अछि। क्रिकेटे टा नै यौ, ओहो, आनो खेल सभमे देखू ने।” “औ बाबू। क्रिकेट, फुटबॉलमे देश पैघ रहने थोड़बे होइ छै। पूरा देश मिलि कऽ थोड़बे खेलाइ छै। यौ, एगारहे टा ने खेलाड़ी खेलेतै यौ। आ से पैघ देश रहौ आकि छोट देश।” “मुदा पैघ देशमे ११ टा खेलाड़ी चुनबा काल नीक आ तेजगरकेँ नै चुनल हएत की? ” “नीक आ तेजगर चुनबा में सेहो झमेला अछि। आब दक्षिण अफ्रीकाकेँ लिअ। जखन ओतऽ रंगभेद रहै तखन खाली गोरका खेलाड़ी चुनल जाइ छलाह। आब रंभेद खतम भेल तँ बीच में कारी खेलाड़ी सेहो चुनल जाए लगलाह। मुदा जखन टीम हारऽ लागल तँ पता लागल जे उल्लिखित रूपमे ई निर्णय लेल गेल छल जे अदहा कारी आ अदहा गोर खेलाड़ी चुनल जएताह। आब भारतेकेँ लिअ। उत्तर-दक्षिण, पूब-पच्छिम आ मध्य सन कतेक क्षेत्रसँ बराबर मात्रामे खेलाड़ी चुनल जाइत छथि। पहिने जे टीम रणजी ट्राफी जितै छल तकर ढेर रास खेलाड़ी टीम में आबि जाइ छलाह। आ आब साहित्यमे सेहो ई प्रवृत्ति आएल अछि।” “साहित्यक गप कतऽ घोसिया देलियै मीत भाइ।” मीत भाइ चुनौटी निकालै छथि, एक कातसँ अहगरसँ तमाकुर झाड़ै छथि आ फेर चुनौटीक दोसर भागसँ आंगुरसँ चून बहार करै छथि आ तरहत्थीपर राखल तमाकुरमे मिज्झर करै छथि। जखन तमाकुर आ चूनक गधमिसान उठै अछि तखन नोसि झाड़ैत तमाकुरकेँ ठोढ़क नीचाँ दाबि दै छथि। “हौ, सभ गप मिलै छै। मैथिली साहित्यकेँ लैह। साहित्य आगाँ बढ़ि गेल मुदा समीक्षक ओतै ठाढ़ छथि, माने पछुआ गेल छथि। आब साहित्यकारकेँ लैह। लोक आ समाज आगाँ बढ़ि गेल मुदा साहित्यकार ओतै ठाढ़ छथि, माने पछुआ गेल छथि।” “मुदा अहाँ तँ सभकेँ एक्के संगे डाङि दै छिऐ। अपवाद तँ सेहो होइ छै।” “हौ, अपवाद तँ बेसी चीजमे होइ छै। आ जतऽ नहियो छै ओतौ सम्भावना रहै छै जे अपवाद भऽ सकै छै भविष्यमे। मुदा अपवादक डरे की निअम बनेनाइ छोड़ि दियौ हौ।” “हँ, से तँ ठीके।” “आब मैथिली साहित्यमे आउ। दछिनाहा, पछिमाहा तँ कहल जाइ छै मुदा उतराहा, पुबाहा सुनने छहक?” “नै, से तँ नै सुनने छिऐ।” “आब सुनै छिऐ पटनाबला ग्रुप, दिल्लीबल ग्रुप, कलकत्ताबला ग्रुप, जनकपुरबला ग्रुप आ दरभंगाबला ग्रुप सभ सेहो छै।” “मुदा जनकपुर आ दरभंगाकेँ छोड़ि ई आन नग्र सभ तँ मिथिलासँ बाहर छै मीत भाइ।” “हौ, सएह ने कहै छिअह। आब पटनाबला ग्रुपमे सभ पटनाक लोक थोड़बे छै। किछु पटनाक लोक दरभंगाबला ग्रुपमे आ किछु कलकत्ताबला ग्रुपमे सेहो छै।” “माने मात्र नामकरण छै।” “नै हौ। नामकरण छै आ संख्याक बहुलताक आधारपर ई नामकरण छै।” “मुदा मीत भाइ। जइ रचनामे जान रहतै तँ बिन ग्रुपोक बात सुनल जेतै ने।” “हौ, मिथिलाक क्षेत्रफल तँ थोड़ छै। मुदा तैयो ग्रुप छै, किए छै से ने बुजहक।” “से किए छै मीत भाइ।” “हौ, गाममे रहै छह तँ एक्के गाममे कएकटा फाँट नै देखै छहक।” “से तँ ई पंचायती चुनाव देखार कैये देने छै।” “आब पंचायती चुनावकेँ दोष देबहक। हौ, प्रवृत्ति होइ छै। गाममे जातिक मध्य ग्रुप होइ छै।” “आ जे एकछाहा होइ, मैथिली साहित्य जकाँ, तखन?” “तखन तँ आरो ग्रुप होइ छै। माने ब्राह्मणमे देखहक। एकहरे, दलिहरे, सरिसवे खांगुर। चर्चा कऽ कए देखहक तखन पता चलतह। सरिसवे खांगुर कहतह जे एकहरेसँ बेसी धूर्त आर कियो नै आ एकहरे कहतह जे सरिसवे खाङुर बड्ड मारुख। यादवमे कृष्णौठ आ गरेड़ी आ वैश्यमे मारवाड़ी (बाहरी) आ देसवाल (एतुक्का स्थानीय), तहिना धानुकमे मगहिया आ देसिल। हौ, कतेक गनेबह। परुकाँ साल गन्धबरिया आ चौहानी राजपूतक बीच झमेला नै मोन छह। दियाराक बनौत आ गंगा दियाराक गंगौत अलगे संगठन छै।” “तँ की हम सभ खण्ड-पखण्ड भऽ गेल छी।” “नै हौ। तोरा कहलियह जे ई प्रवृत्ति होइ छै। आब आगाँ आबह। गाम छोड़ि झंझारपुर आबि जाह तँ सौंसे गौआँ एक। झंझारपुर छोड़ि दरभंगा आबि जाह तँ सौँसे जिला एक। दरभंगासँ पटना आबि जाह तँ सौँसे मिथिला एक। दिल्ली, कोलकाता, काठमाण्डू चलि जाह तँ सौँसे बिहार आ मधेस एक बुझेतह। हिन्दीमे नै देखै छहक, बिहारी लेखकक संगठन, मध्य प्रदेशक लेखकक संगठन; सहित्य क्षेत्रमे हौ।” “माने एक हेबा लेल दूर गेनाइ जरीरू छै।” “नै हौ, सेहो नै। बात फेर वएह छै। साहित्य समाजक दर्पण हेबाक चाही, मुदा ओ पछुआ गेल छै हौ। आगाँक बदला पाछाँ जा रहल छै हौ।” मीत भाइ तमाकुर थुकरै छथि। “ई बुझू जे लोक तँ जुड़ल अछि मुदा साहित्यकार सभ नै जुड़ल छथि। हुनका सम्मान चाही आ तै लेल ओ राजनीतिज्ञ बनि गेल छथि, मैथिलीकेँ खण्ड-पखण्ड करबामे लागल छथि। आ से होइ छै ऐ छोट होइत जाइत भाषाक भौलिक क्षेत्रमे! सहरसा, सुपौल, जनकपुर, मधुबनी, दरभंगासँ बढ़ि कऽ पटना, दिल्ली, कलकत्ता आ आब प्रिन्ट आ इन्टरनेटक साहित्य मध्य सेहो ई लोकनि अन्तर करऽ चाहै छथि।” “इन्टरनेट साहित्य मध्य सेहो अन्तर! से किए मीत भाइ।” “फेर वएह गप। प्रवृत्ति होइ छै हौ। हमरा लोकनिक एकटा सांसद भारतीय संसदमे भाखड़ा नांगल परियोजनामे पनबिजली निकालबाक योजनाक विरोध केने छलाह।” “से किए मीत भाइ?” “प्रवृत्ति होइ छै हौ, जखन तोहर साहित्यकार आ राजनेता समाजसँ पछुआ जेतह तखन यएह सभ ने हेतह। आब सुनह ओ विरोध किए केने रहथिन्ह। हुनकर मानब रहन्हि जे पानिसँ जे बिजली निकालि लेल जाएत तँ किसानकेँ साबुत पानि नै भेटतै आ ओइसँ जे पटौनी हेतै तइसँ पुरकस फसिल नै हेतै।” “आब बुझलहुँ मीत भाइ। अन्तर्जालक साहित्यक विरोध पछुआएल साहित्यकार लोकनिक अज्ञानता देखबैत अछि।” “देखार तँ लोक भैये जाइ अइ ने हौ।” तावत मीत भाइ लेल अंगनासँ भांगक गोला अबै छन्हि आ हम बिदा होइ छी। ठामे गोनर भाइ भेटै छथि। “ई मितबा की सभ भाषण-भाख दै छल। बड्ड चिक्कन गप-सप होइ छै ओकर। मुदा लोक दू नमरी अछि। भरि टोलसँ केस-फौदारी लड़ि रहल अछि, पोखरिक केस तँ बान्हक केस। आ अपन माए-बापकेँ तँ बड्ड मारै छलै। मएकेँ तँ एक बेर टेटर उठि गेल छलै।” “मुदा गप्प-सप्प तँ ठीके कहै छलाह।” “तँ कोन नव गप कहै छलाह। हमहूँ कने काल बान्हपर लगही करबाक बहन्ने बिलमि गेल छलहुँ। ओ जे गप करै छल से ककरा नै बुझल छै यौ।” “हँ, से तँ सत्ते।” हम पुछै छियन्हि- “मुदा मीत भाइ जे अहूँक विषयमे सएह कहथि तखन?” “हौ, हमरा कोन बौस्तुक कमी अछि। मास्टरी करै छी। छह हजार नौ सए निनानबे टका दरमाहा अछि। ओइमे एक टका जोड़ि कऽ सात हजार टका सभ मास बैंकमे जमा कऽ दै छिऐ। आ से बीस बर्खसँ कऽ रहल छी, खेती-बाड़ीसँ गुजर करै छी। अपन बापक बेटा नै होइ जे ओइ जमा पाइसँ एकटा नवका पाइ निकालने होइ। लड़काबला लग जाइ छी, कन्यादान जे कपारपर अछि, तँ बैसैये नै दैए। की, तँ मास्टर छिऐ, कतऽसँ पाइ एतै। रौ, बाजै जो ने जे कत्ते पाइ चाही। ऐ कल्लर मीत भाइ जकाँ ठोड़बे हौ, जे भरि दिन भांग पीबि गप्प छँटैत रहैए।” बुझा पड़ल जे मीत भाइ गप्प सुनि लेने छलखिन्ह, से हमरा दुनू गोटेकेँ सोर केलन्हि। मुदा गोनर भाइ बहन्ना बना आगाँ ससरि गेलाह। मीत भाइ बजलाह- “हे ई की कहैए जे लड़काबला बैसैए नै दैए। से कोना बैसऽ दै जेतै। तेसुरकाँ हम एकटा कुटमैती कऽ देलिऐ। सभ चीज गछि लेलकै आ जखन बियाह भऽ गेलै तँ देबा काल की कहै छै बुजलहक। ... ’हमरा की मोन अछि जे ओइ धुनिमे की गछलियन्हि आ की नै, लड़काबला जे सभ कहैत गेलाह हम हँ, हँ करैत गेलियन्हि।’... आ जखन गछलाहा मोने नै छै तँ देतन्हि की कपार। आ से दोसर लड़काबलाकेँ बुझल छै, आ तखन के ओकरा बैसऽ देतै। आ हमर खिधांश करैए, धन हम जे एकटा कुटमैती भेलै।” मीत भाइ तामसे पएर झटकारैत आंगन दिस बिदा होइ छथि आ हम गुम्म भेल ठाढ़ रहि जाइ छी। ( विदेह ई पत्रिकाकेँ ५ जुलाइ २००४ सँ एखन धरि १०७ देशक १,७२६ ठामसँ ५७, ६६५ गोटे द्वारा विभिन्न आइ.एस.पी. सँ २,९४,९९० बेर देखल गेल अछि; धन्यवाद पाठकगण। - गूगल एनेलेटिक्स डेटा। ) गजेन्द्र ठाकुर ggajendra@videha.com http://www.maithililekhaksangh.com/2010/07/blog-post_3709.html ‍ २. गद्य २.१.डॉ. शेफालिका वर्मा - एकटा संस्मरण एकटा प्रश्न २.२.शिव कुमार झा "टिल्लू"- मैथि‍ली कथाक वि‍कासमे गामक जि‍नगीक योगदान- २.३.किशन कारीगर- मोछ वाली माउगी २.४.1.राम प्रवेश मण्‍डल- विहनि कथा- आह मि‍थि‍ला! वाह मैथि‍ली! 2 सुमित आनन्द- भाव-भूमि रसवंत पुस्तकक लोकार्पण २.५. याेगानन्‍द झा- इसवी सन 2010 : मैथि‍लीक गति‍वि‍धि‍ २.६.सुजित कुमार झा- जंगलमे होरी २.७.राजदेव मण्‍डल- उपन्‍यास' आगाँ- हमर टोल २.८.डॉ. रमण झा- फोंका-एक विहगावलोकन डॉ. शेफालिका वर्मा एकटा संस्मरण एकटा प्रश्न आइ अखबार मे पढ्लों मृदुला गर्ग केर एकटा आलेख ' सेक्युलर के नाम पर सम्मान का धंधा '....ओ ते लिखलनि ..आप हमारी संस्था को दास हज़ार रुपये दो,मै आपको  'फ़लाने' सम्मान से सम्मानित करूँगा..'...ओ चमत्कृत भ गेल छलीह .केओ ते हमरा सम्मान योग्य बुझ्लनी ..पाछा जे ओ दस हज़ार क गप सामने आइल... हमरो मोन पड़ी आइल . स्थायी रूप स हम दिल्ली आइल छलों स्यात २००९ क मार्च मे.. ....२ .३ मासक  उपरांत एकटा बड पैघ इंटर नेशनल संसथान दिसि से हमरा  बड़का लिफाफा भेटल . रंग विरंगी बेसकीमती  कागज़ मे बड़का बड़का लोगक फोटो छपल , पुरस्कार  लैत, दैत...भव्य मंच, सजावट....अंग्रेजी मे एकटा पत्र हमर नामे छपल छल ..जे  साहित्य आ समाजक सेवा लेल हम अहाँ के सम्मानित करे चाहैत छी..अहाँ देखि लेब जे हम कतेक गोटा  के सम्मानित केने छी ,सभक फोटो सेहो पठा रहल छी ..सांचे ओहि मे पूरा प्रोग्राम केर फोटो छल .सबटा आर्ट पेपर पर .....हमर जी थरथरा गेल ई कोन संस्था थीक जे दिल्ली अबितहि सम्मानित करे लेल अगुआय्ल अछ ...रोमांचित भ उठलों ..फेर सोच्लों ,अरे एतेक भाषाक ' हूज  हु'  मे नाम निकलल अछ ओहि से खोजी नेने होइत.लागले फोन आइल अहाँ के हमर लिफ़ाफ़ भेटल ..आमंत्रण  भेटल.हम सब अहाँ के सम्मानित कर चाहैत छी .......हम सोचैत सोचैत  ठीक  छै बाजि देलों..सब टा गप्प अन्ग्रेजिये मे भेल..हमर नाम के , किएक प्रस्तावित केने हेताह , दूर दूर धरि अहि युग मे केओ नै बुझा पडल..देखा पडल .....१ लाख रुपैया  मामूली गप नै थीक जे केकरो करेज होइत केओ आन के दय दी ..सभक जी अपना अपना ले ओनाय्ल अछ......बड देर धरि सोचैत रहलों ,अपन आन के गुनैत रहलों ..के भ सकैत अछ...ई कोन संस्था एतेक ठस्सा वाला  थीक एतेक पाई वाला..! तखन हम अपन जेठ बेटा राजीव के फोन लगेलों जे दिल्ली विश्व विद्यालय मे प्रोफेसर अछ आ आइ ३० बरिस से दिल्लीमे अछ --ओकरा जरुर बुझल हेतैक....हम सब बात ओकरा पढ़ी के सुना देलों....ओ ख़ुशी से गद गद भ गेल..मम्मी ,एहिठाम अबिते अहाँ  मैथिली भोजपुरीक सेमिनार  मे भाग लेलों...आब ई ...बहुत  ख़ुशी क  गप , हम बाजलों ..राजू मैथिली भोजपुरी मे ते सब अप्पन छल एहि मे ते देसी विदेसी भरल अछ...हमर नाम के कहलक ..ओ एतेक खुश छल जे --छोड़ू ई सब गप भगवन जे दै छथिन ख़ुशी ख़ुशी ग्रहण करु....हम आश्वस्त भ गेलों.....अपन सम्मान दुनिया मे केकरा ख़राब लगैत छैक.... दस दिन बाद क बात छी, हम बिसरी गेलों , दिल्ली मे नव नव किनल घर द्वार के ठीक करे लगलों .....अचक्के एक दिन फोन आइल.. आर यु  डॉ. शेफालिका ...हम यस बाजलों...अहांके मोन ऐछ ने काल्हिये प्रोग्रम्म थीक. ..हम चोंकि उठलों ..हं हं किएक नै...मोन अछि... तं काल्हि ५ बजे साँझ से प्रोग्राम  होइत...अहाँ एतेक हज़ार रुपैया एकटा लिफ़ाफ़ मे नेने आइब, प्रोग्राम से एक घंटा पहिने....... हम अव्चंक भ गेलों .कहियो ई सब जानि बुझि तखन ने , रूपया किएक ???  ई नियम थीक एहि संस्थाक  दीप तर अन्हार , वो बाला मधुर स्वरे बजलीह  एहि मे कोन बुराई, अहाँ के सम्मानक संग ट्को भेटत ..,,,,,कोनो लोस नै अछ खाली गेने गेन...हम सपाट स्वरे ब्ज्लों हमरा टका द क सम्मान नै चाही... तखन मोन मे घुमड़ लागल कतेको प्रश्न जाहि मे एकटा प्रश्न जरैत बुझैत आगि जकां ठाढ़ छल  ..की एहनो होइत छैक .... ऐ रचनापर अपन मतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। १.शिव कुमार झा "टिल्लू"- समीक्षा मैथि‍ली कथाक वि‍कासमे गामक जि‍नगीक योगदान- गामक जि‍नगी'क पहि‍ल कथा भैंटक लावा मि‍थि‍लाक बाढ़ि‍क दशाकेँ केन्‍द्रि‍त कऽ कऽ लि‍खल गेल अछि‍। भैंटक लावाक संदर्भमे हमरा सबहक गाम-गाममे एकटा कहबी चर्चित छैक- “बड़-बड़ जनकेँ भैंटक लाववा पदनोकेँ मि‍टाइ।‍” ऐसँ प्रमाणि‍त होइछ जे सोती, मुरदैया, पोखरि‍, धनखेतामे जलमग्‍नक परि‍णाम स्‍वरूप जनमल भैंटक- नि‍घृष्‍ठ भोज्‍य पदार्थ थि‍क। भोज्‍य पदार्थ मात्र समाजमे रहि‍तौं यायावरी जीवन व्‍यतीत करैबला लोक लेल। ऐ कथाकेँ पढ़ि‍ एकर प्रयोजन कनेक्शन वि‍स्‍मि‍त कर'बला परंच उपयोगी लागल। कथा मुसना ओकर अर्द्धांगि‍नी जीबछी आ दुनू बच्‍चाकेँ बाढ़ि‍क जीवन दशासँ जोड़ि‍ वि‍म्‍वि‍त कएल गेल अछि‍। अपना ऐठामक लोक संतान प्राप्‍ति‍क लेल जीबछ घाटमे मनौती मनैत अछि‍। जौं पुत्र लेलक तँ जीबछा आ जौं बेटी आएलि‍ तँ जीबछी। ऐ जीबछीक तँ नेनकाल नै देखाओल गेल, ओहेन मॉगल-चाॅगल छथि‍यो नै मुदा साहस देखनुक। मुसनाकेँ सर्पदंशक काल जीबछी साहस नै छोड़ली। झाड़-फूक सन भ्रांति‍केँ ऐ कथामे देखाओल गेल परंच परि‍णाम सकारात्‍मक- “मुदा ढोढ़ सॉप कटने रहए तेँ बि‍ख लगबे नहि‍ केलै।‍” ऐसँ रचनाकारक ग्राम्‍य जीवनक मनोदशाकेँ परि‍वर्तन करबाक उद्देश्‍य प्रमाणि‍त होइत अछि‍। श्रीकान्‍त सन गामक छड़ीदारकेँ बाढ़ि‍ उद्देश्‍य पूरा नै करए देलक। जौं अन्न रहि‍तनि‍ तँ सूदि‍खोरी चैलतनि‍ मुदा अपने खएबाक लेल नै तँए आगाँ की सोचथि‍.....? जीवछी हुनके आश्रममे कुटौनी करति‍ छलीह, श्रीकान्‍त बाबूकेँ सोगाएल देख जीबछीक कथन- “एक्केटा बाढ़ि‍मे चि‍न्‍ता करै छथि‍ कक्का, कनी नीक की कनी अधलाह, दि‍न तँ बि‍तबे करतनि‍।‍” मे साहसक संग-संग यथार्थबोध होइत अछि‍। अभावक नाहमे सवार व्‍यक्‍ति‍कें भासि‍ जएबाक कोनो चि‍न्‍ता नै, ओ तँ ई सोचि‍ कऽ जल-यात्रा करैत अछि‍ जे अथाह पानि‍मे नाह डूबबे करत। तँए हेलबाक कला पहि‍ने सीख लेल जाए। दीन-हीन आ साधन वि‍ि‍हन मानवीय जीवनमे वि‍चलन नै होइत छैक। मुसना अर्थात मकसूदन मूसक तीमन आ धुसरी चाउरक भातमे जीबछीक सि‍नेह आ दुखनीक आश देख अमृत मानि‍ कऽ ग्रहण कऽ लेलक। रातुक कोनो चि‍न्‍ता नै जीबछी साक्षात आर्या बनि‍ ठाढ़ छलीह- “ककरो कि‍छु होउ जकरा लूरि‍ रहतै ओ जीबे करत।” बाढ़ि‍सँ सभ क्‍यो तबाह कमला‍ महरानीकेँ दीप बाड़ि‍ अपन प्रभाव कम करबाक प्रार्थना सभ ि‍कयो करैत छल। यएह थि‍क मि‍थि‍लाक गामक जीवन केर मनोवैज्ञानि‍क रहस्‍य। हम-सभ भगवतीक आगाँ बलि‍ प्रदानो कऽ सकैत छी तँ कखनो प्रकृत पूजन सेहो। जखन पानि‍ कम भेल तँ सभ कि‍यो अपन डूबल खेत-पथारक गलल डाॅटकेँ गनऽ मे लागि‍ गेलाह मुदा जीबछीक पारखी दृष्‍टि‍ भैंटक कोखि‍केँ देखबामे मग्‍न छल। श्रीकान्‍त बाबूसँ आज्ञा लऽ कऽ हुनक खेतसँ भाँटि‍केँ उजाड़ि‍ अन्न नि‍का लऽ लगलीह। लावाक सुगंधसँ जीबछीक कल्‍पनामे चारि‍ चान लागि‍ गेल बाढ़ि‍केँ जीवनक उपहार मानि‍ कमला-कोसीकेँ धन्‍यवाद दि‍अ लगलीह। ऐ प्रकारक सोचसँ कि‍यो वि‍स्‍मि‍त भऽ सकैत अछि‍- बाढ़ि‍ कखनहुँ लाभकारी कोना होएत? मुदा जीबछीकेँ डूबैक लेल तँ कि‍छु रहबे नै करए धास-पातक घर फेर बनि‍ जाएत।‍ महींस नहि‍यो तँ गाइये कीनबाक योजना बनाबऽ लगलीह। स्‍वाभावि‍क अछि‍ कर्मठ लोककेँ दुआरि‍ ताकए नै पड़ैत अछि‍। कथाक सभसँ नीक प्रसंग लागल जे पहि‍लुक भैंटक चाउर श्रीकान्‍त बाबूकेँ देबामे जीबछीक दृष्‍टि‍कोण। गरीब कखनहुँ वि‍श्‍वासधात नै कऽ सकैत अछि‍। संग-संग कथाक आकर्षण घटना चक्रक क्रममे जखन ठेंगी मुसनाक भरि‍ पोख खून पी लेलक तखन मुसनाक शंकाग्रस्‍त करब जे जीबछी हुनक मरबाक कामना करैत अछि‍ कि‍एक तँ दोसर पुरूष भेंट जेतनि‍। समाजक दाबल वर्गमे नारी शोषण नहि‍, कि‍एक तँ नारी पुरूषक संग-संग जीवनक वाहनकेँ गति‍ देवामे गति‍शील रहैत छथि‍। ओ दोसरो वि‍वाह करबाक लेल स्‍वतंत छथि‍। आगाँक जाति‍ तँ नारीकेँ आब अधि‍कार दि‍अ लागल पहि‍ने तँ अो अंगनक लक्ष्‍मी मात्र छलीह। ऐ कथाकेँ पढ़बाक कम सोचऽ मे अबैत अछि‍ जे अागाँ कि‍नका मानल जाए मुसना सन मुसहरकेँ वा हमरा सन......। रचनाकारक एकटा आर दृष्‍टि‍कोण नीक मानल जाए जे समाजक दूटा अलग-अलग वर्गक कथा कहि‍तहुँ वर्ग संघर्ष नै वरन् सि‍नेहि‍ल भाव। श्रीकान्‍त लावा तँ स्‍वीकार करै छथि संगहि‍ जीबछीकेँ नव-वस्‍त्रक संग वि‍दाइ सेहो दै छथि‍ अइमे सामाजि‍क सामंजस्‍यकेँ बढ़ेबाक प्रयास देखऽ मे आएल।‍ क्रमश: ऐ रचनापर अपन मतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। किशन कारीगर मोछ वाली माउगी। होली पर हास्य कथा। धनिक दोकान दिस सॅ अबैत रही कि रस्ते मे खरंजे पर बिकाउ दास भेंट भए गेलाह पूछलनि बच्चा ई कहू करिया के कतहू देखलियैअ। हम बजलहूॅ नहि यौ बाबा हम अहॉ पोता के एमहर कहॉ देखलहूॅ। बिकाउ दास बजलाह धू जी महराज हम कारी सॅ केस दारही कटाएब आ अहॉ हमरा पोताक भांज कहि रहल छी। लगैए जे आई होरी खेलेबाक निशा मे अहॅू मातले छी। हमरे खनदानी नौआ छल कारी ठााकुर एमहर बिकाउ दासक पोतक नाम सेहो कारी। दूनू गोटे नामक अनुरूप देखैयोअ में ततबेक कारी। कारी जतबाक देखबा में कारी ओतबाक उजर धब- धब आकेर मोछ । बड्ड ईमानदारी सॅ शाही अंदाज मे हजामत करैत छल। ओकरा मोछक आगू मे त राजा महराजक मोछ छुछूआन लगैए। बिकाउ दास के हम कहलियैन बाबा बुझहैए मे धोखा भए गेल कारी नौआ तए अपने बथान दिस भेटत ओम्हरे जाउ ने। ताबैत उतरभारी दिस सॅ कारी अपने मगन में झूमैत चलि अबैत रहैए। ओनाहियो फागुन मे सभ अपना धुन में मगन रहैए। कारी के देखैत मातर बिकाउ दास बजलाह अईं रौ करिया एहि बेर जोगिरा गबै लेल नहि एबहि रौ तोहर सिद्धप वाली भाउज खोज पूछारी क रहल छलखुन जे एहि बेर किर्तन मंडली होरी गीत गाबि जोगीरा खेलेताह कि नहि। कारी मोछ पिजबैत बाजल भैया अहॉ जाउ ने अहॉ भाउजी के कहबैन भांगक सरबत बना के रखतीह। हम सभ पहिने भगवति स्थान में होरी गीत गाबि अबीर चढ़ाएब तकरा बाद अंगने अंगने होरी खेलाएब। कारी के गप सुनि त हमहूॅ राग मल्हार मे मोने मोन नाचए लगलहूॅ जे आई भंाग पीबि क कारी संगे खूम नाचब। एहि बिचार मे मगन रही की कारी बाजल जे बच्चा अहॅू चलि आएब एहि बेर झाइल बजौनिहार लोक कम छै त अहॉ गीत गाबि झाइलो बजाएब। गाम घर मे नाटक खेलाई त हमही गीत नाद गाबै सॅ ल के मंच संचालन तक करी। तहि द्वारे निधोखे हम बजलहॅू बेस जाउ हम भगवती स्ािान में भेंटइ भए जाएब । दूपहर दू बजे किर्तन मंडलीक सभ कलाकार आस्ते आस्ते जुटान होमए लगलयै। कारी अपना दरवज्जा पर बैसी के चिलम फूकै मे मगन रहैए एक सोंठ खिचनहियै रहै की केम्हरो सॅ मनोज क्रांतिकारी धरफराएल आएल आ कारी े देह पर धाई दिस खसल। बाजल हौ कारी कक्का आई तोरे संगे होरी खेलाएब। एतबाक मे कारी फनकैत बाजल कह त हनो खसान खसब होइत छैक एखने चिलमक आगि सॅ मोछ झरैक जाएत। फेर मनोज बाजल हौ कक्का हमरो स बेसी त डंफाक ओजन छै तही दुआरे धरफरा गेलहूॅ। तकरा बाद दूनू गोटे एक एक सोंठ चिलम खिचलक धुऑं नाक दए के फेकलकै की कारी बाजल रौ भातिज किर्तन मंडलीक कलाकार सभ कतए नुकाएल अछि। एतबाक में हरेकृष्ण ढ़ोलकिया ढ़ोल ढ़ूम-ढ़ूमबैत बुद्धना हरमोनियम पिपयबैत आ रामअशीष झाइलि झनकबैत तीनू गोटे तीन दिसि सॅं एकसुरे बजबैत आएल। ताबैत मे मनोज डंफा डूग-डूगबैत बाजल हल्ला गुल्ला बंद करू आ सुनु कारी कक्का के वाणी जी नहि त भरू ढ़ोलकिया के पानि जी। कि एतबाक मे कारी कठझाइल झनकबैत बाजल जोगी जा सारा...रा...रा. त सभ गोटे एक सुरे बाजल सारा रा रा। बुद्धन बाजल रौ मनोजबा तेहेन शास्त्रीय राग मे पानि भरबाक लेल कहलीह जे दू-चारि टा छौंड़ा मारेर त डरे स भागी गेल। मनोज बाजल हौ भौया रंग घोरबाक लेल त पानि चाहि ने। रामअशीष बाजल हं रौ भजार ई त ठीके कहलीहि आब ई कह जे एहि बेर भाउजी के बनत। एतबाक में कारी मोछ पिजबैत बाजल रौ भातिज जूनि चिंता कर हम एखन जीवते छी। होरी मे कारी सौंसे गौआक भाउजी बनैत छलैक की बुढ़-पुरान की छौंड़ा मारेर सभ गोटे हंसी खुशी सॅ गीत गाबि कारी संगे दिअर भाउज जेका होरी खेलाइत छल। मनोज बाजल हौ कक्का माउगी बनबहक से साड़ी बेलाउज कहॉ छह। कारी बाजल धूर रे बुरिबक जो ने तू अपने माए बला साड़ि नेने आ ने तोरे माए त हमरा भाउजे हेतीह। हौ कक्का तूं मारि टा खूएबह तोरा त बुझलेह छह हमर बाप मलेटी सॅ रिटायर आ हमर माए सेहो मलेटी। ज ई सारी मे लाल पीअर लागल देेखतैह त कतेक मुक्का मारत से कोनो ठीक नहि। अच्छा कक्का तू चिंता नहि करअ हम अपने कनियॉ वला नुऑ नेने अबैत छी। कारी बाजल रौ भातिज तू बुरहारी मे हमरा गंजन टा करेमेह। हम ससुर भए के पूतहॅू देहक नुऑ कोना पहिरब रौ राम-राम। लोक त साड़ी देखैते मातर चिन्हि जेतैए जे ई तोरे कनियॉक नुआ छै तब त लोको कोनो दसा बॉकि नहि राखत। बुद्धन कनेक बुझनुक ओ बाजल हौ तोरा डर किएक होइत छह कियो पूछतह त कहिअक जे ई त बुधनाक साउस के नुआं छियैक। हमर साउस एखन अपने गाम आएल छथहिन। कारि ई सुनि चौअनियॉ मुस्कान दैति एकसुरे दू गिलास देसी भांगक सरबत घोंटि गेल आ बाजल बुधन तूं हरमोनिया बजाअ ताबैत हम समधिन संगे होरी खेलेने अबैत छी जोगी जा सारा...रा....रा। कि फेर सभ एकसुरे गाबैए लागल जोगी जा सारा रा रा। हरेकृष्ण ढ़ोलकिया ढ़ोल धूम-धूमबैत बाजल होरी मे कक्का करै छथि बरजोरी बुरहोरी मे मोन होइत छनि थोरू थोरू जोगी जा सारा रा रा। मनोज डंफा डूग-डूगबैत बाजल हौ कारी कक्का एना किएक मोन लुपलुपाइत छह। कारी झाइलि झनकबैत बाजल रौ भातिज ई फगुआ होइते अछि रंगीन तोंही कह ने मलपुआ खेबाक लेल केकर मोने ने लुपलुपाइत छैक। हं हौ कक्का एनाहियो होरी मे नएका नएका भाउज सबहक गाल त मलपुए सन पुल पुल करैत रहैत छैक। कारी साड़ी पहिर अनमन माउगी बनि गेल मुदा मोछक देखार चिनहार दुआरे घोघ तनने। कारी हाथ सॅ झाइलि ल हम गीत गाबि झाइलि बजबैत होरी गाबै लगलहूॅ रंग घोरू ने कनहैया हो खेलैए होरी रंग घोरू सभ गोटे गीत गबैत भगवति स्थान बिदा भेलहूॅ। भगवति के अबीर चढ़ा प्रणाम करैत मंडलीक सभ कलाकार अंगने अंगने होरी खेलेबाक लेल बिदा भेलहूॅ। जेहेन घर तेहेन सरबत कतहॅ छूछे रंग टा। मुदा लोक हॅसी खुशी स होरी खेलाई मे मगन होइत होइत बिकाउ दासक दरवज्जा पर पहुॅचलहॅू त होरी गीत शुरू केलहॅू हो हो किनका के हाथ कनक पिचकारी बुधना हरमोनियम पिपयबैत बाजल हो बिकाउ कक्का के हाथ कनक पिचकारी। एतबाक सुनितेह विकाउ दास अपना बेटा के हाक देलखिहिन हौ मांगनि जल्दी सॅ मंडली सभहक लेल दूध भांगक सरबत नेने आबह। ई सुनि हम सभ आर बेसी जोर सॅ जोगीरा गबै लगलहूॅं ताबैत मनोज एक आध बेर डंफा लेने धरफड़ा के खसि पड़ल। ओकरा उठेलहूॅ आ सभ गोटे भरि छाक भांगक सरबत पीबि होरी गबै मे मगन। एम्हर जोगीरा देखबाक लेल कनिया-पूतरा धिया-पूता सभ घूघरू लागल। एतबाक मे सिद्धप वाली दाई अबीर उड़बैत एलीह आ हॅसैत बजलीह गे दाए गे दाए ई नचनिहार माउगी के छीयैक? सुखेत वाली कनिया बजलीह माए इहेए चिन्थुहुन ने। दाई बजलीह चिन्हबै की पहिने रंग अबीर स देह मुॅह छछारि दैति छियैक। दाई निधोखे रंग लगबै लगलीह की घिचा तिरी मे कारीक घोघ उघार भए गेलै। दाई बजलीह गे माए गे माए एहेन मोछ वाली कनियॉ त पहिनुक बेर देखलहूॅ। ताबैत कारी मुस्की मारैत बाजल भाउजी हम छी अहॉक दुलरूआ दिअर कारी। दाई एतबाक सुनि ठहक्का मारैत बजलीह अईं रौ मोछ वाली कनियॉ ला कनि तोहर मोछो कारीये रंग मे रंगि दैति छियौ। एकटा दिअर भाउज के निश्छल प्रेम त गामे घर में भेटत। तखने मनोज बाजल काकी ई कनियॉ पसीन भेल किने ? दाई बजलीह हं रौ मनोज बड्ड पसीन भेल 60 वर्षक अवस्था में पहिनुक बेर देखलहॅू एहेन सुनर मोछ वाली माउगी। ऐ रचनापर अपन मतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। 1.राम प्रवेश मण्‍डल- विहनि कथा- आह मि‍थि‍ला! वाह मैथि‍ली! 2 सुमित आनन्द- भाव-भूमि रसवंत पुस्तकक लोकार्पण 1 राम प्रवेश मण्‍डल विहनि कथा आह मि‍थि‍ला! वाह मैथि‍ली! अहाँ घर आंगनसँ नि‍कलि‍ संसारमे पसरि‍ गेलौं। संसार गाम जकाँ भऽ रहल अछि‍। सकेंडोमे वि‍श्वक कोनोठाम रहैबला परि‍जनसँ गप्‍प कऽ सकै छी। हुनक छाया देख‍ सकै छी। जइसँ हृदए आनंदि‍त, अह्लादि‍त भऽ जाइछ। ऐ आनन्‍दमे हमहुँ साझी हएब, इच्‍छा भेल। साठि‍ वसंत पार कऽ रहल छी। नूनूकेँ कहलि‍यनि‍- “हओ, एकटा मोवाइल कीन लैह। वि‍ज्ञान आ वैज्ञानि‍कक ऐ चमत्‍कारक लाभ हमहुँ सभ उठाबी।‍” नूनू एकटा नीक-दामी मोवाइल कीनलक आ हाथमे दैत कहलक- “लि‍अ अहूँ अपन इच्‍छाकेँ पूरा कऽ लि‍अ।‍” हम कहलि‍ऐ‍- “हओ, मॉरि‍ससमे सुन्‍दरलाल अर्थोपार्जनक लेल गेल अछि‍। हुनकासँ गप्‍प कराबह।‍” नूनू नम्‍बर टीपलक आ हमरा हाथकेँ देलक। गप्‍प हुअए लगल। हम पुन: मोवाइल नूनू हाथकेँ दैत कहलि‍यनि‍- “हओ नूनू, सुन्‍दरलाल तँ दोसर भाषामे बजै छै। गाममे तँ मैथि‍ली बजै छलै। एतेक ल्‍दी ई परि‍वर्तन केना भेलै? नम्वरकेँ जाँचि‍ अपन मातृभाषा मैथि‍लीमे गप्‍प कराबह। सुनै छी जे मोवाइलमे सभ भाषा रहै छै?‍” नूनू आगा कि‍छु नै बाजि‍ हमरापर ऑंखि‍ ला-पीयर करए लागल। 2 सुमित आनन्द

भाव-भूमि रसवंत पुस्तकक लोकार्पण जखन-तखन द्वारा ललितनारायण मिथिला विष्वविद्यालयक संगीत एवं नाट्य विभागमे डॉ भीमनाथ झाक समग्र मूल्यांकन ‘भाव-भूमि रसवंत’ पुस्तकक लोकार्पण समारोह दिनांक 06 03 2011 के ँ अपराह्ण 03 बजे दिनमे मनाओल गेल। एहि 512 पृष्ठक पुस्तकक लोकार्पण करैत बहुभाषाविद् पं गोविंद झा कहलनि जे डॉ भीमनाथ झाक भाषा सर्वजन सुलभ अछि। ओ चिंता व्यक्त कयलनि जे वर्तमान समयमे भावना मरि रहल अछि संगहि कवि लोकनिके ँ दोसरक हेतु जीबाक परामर्ष देलनि। पुस्तकक समीक्षा करैत मैथिलीक सुप्रसिद्ध समीक्षक श्री मोहन भारद्वाज हिनक एहि पोथीके ँ साहित्यिक दस्तावेज कहलनि। ओ हिनक छन्दोबद्ध एवं तुकान्त रचनाक भूरि-भूरि प्रषंसा कयलनि संगहि ईहो कहलनि जे छन्दोबद्ध रचना स्थायी महत्वक थिक। बच्चा सभक पाठ्यक्रममे सम्मिलित करबाले हुनका अर्वाचीन कविक छन्दोबद्ध रचना नहि भेटैत छनि। श्री भारद्वाज हिनका एकसरे एहन लेखक मानैत छथि जे लगभग 150 साहित्यकारपर लिखि चुकल होथि। कार्यक्रमक अध्यक्षता करैत वयोवृद्ध साहित्यकार पं चन्द्रनाथ मिश्र ‘अमर’ डॉ झाक लेखनकेँ महत्वपूर्ण अवदान कहलनि। ज्योत्स्ना चन्द्रमक संचालन एवं डॉ अषोक मेहताक धन्यवाद ज्ञापनसँ सम्पन्न समारोहमे डॉ झा अपन लेखनक संबंधमे कहलनि जे ओ जे किछु कए सकलाह से अक्षरपुरुष लोकनिक सान्निध्य आ स्नेहभाजनक कारणसँ। कार्यक्रमक ष्षुभारम्भ श्री हीरेन्द्र कुमार झाक स्वागत भाषण एवं अंजली मेहता द्वारा ‘‘वाणी हेरू, कृपा दृग फेरू’’ कविताक गायनसँ भेल जे डॉ झाक लिखल थिक। पुस्तकक सुन्दर प्रस्तुतीकरणक हेतु प्रायः सभ वक्ता लोकनि डॉ विभूति आनन्दक प्रयासक प्रषंसा कयलनि। एहि अवसरपर पटना सहित आसपासक जिलाक पर्याप्त संख्यामे साहित्यकार लोकनिक उपस्थिति छल जाहिमे प्रमुख छलाह-डॉ सुरेष्वर झा, डॉ गणपति मिश्र, श्री कमला कान्त झा, प्रो अजीत वर्मा, डॉ शिवाकान्त पाठक डॉ देवनारायण यादव, डॉ षषिनाथ झा, डॉ नीता झा, डॉ रमण झा डॉ नरेन्द्र नारायण निराला, डॉ आषा मिश्र, डॉ नरेष मोहन झा, डॉ बुचरू पासवान, डॉ धीरेन्द्र नाथ मिश्र, डॉ पुष्पम नारायण, श्री अमलेन्दु शेखर पाठक इत्यादि। ऐ रचनापर अपन मतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। याेगानन्‍द झा इसवी सन 2010 : मैथि‍लीक गति‍वि‍धि‍ वर्ष 2003क अन्‍ति‍म मासमे जखन मैथि‍ली भाषाकेँ संवि‍धानक अष्‍टम अनुसूचि‍मे स्‍थान प्राप्‍त भेलैक तँ आवासी-प्रवासी मैथि‍ल जनसमुदाय तत्‍कालीन प्रधानमंत्री मान्‍यवार श्री अटल बि‍हारी बाजपेयी ओ गृहमंत्री मान्‍यवर श्री लालकृष्‍ण आडवाणीक प्रति‍ अभि‍भूत भेल अपन चि‍र आकांक्षाक प्रति‍पूर्तिसँ हर्षोल्‍लासमे नि‍मग्‍न प्रतीत भेल। ज्‍योति‍रीश्‍वर ओ वि‍द्यापति‍ ठाकुरक देसि‍ल वयना, ब्रजकि‍शोर ठाकुर आ कर्पूरी ठाकुरक सत्‍यप्रयाससँ आ अन्‍तत: मान्‍यवर डा. श्री सी.पी. ठाकुरक प्रयत्‍ने राष्‍ट्रीय क्षि‍ति‍जपर अपन उचि‍त स्‍थान पओलक। सुमन, मधुप, कि‍रण, मणि‍पद्म, प्रबोध, देवनारायण, यात्री आदि‍क आत्‍मा जुड़ा उठल हेतनि‍। सर्वश्री अमर, प्रदीप, वैद्यनाथ चौधरी आदि‍ गोटाक एकटा यज्ञ पूर्णाहुति‍ दि‍स अग्रसर भेलनि‍। हि‍नकालोकनि‍क संघर्ष सफलता प्राप्‍त कएलक आ एकबेर फेर नव स्‍पन्‍दन मैथि‍ली जगतमे अएलैक। मैथि‍ली पत्रकारि‍ता जगतमे ई स्‍पन्‍दन मि‍थि‍ला दर्शन, पूर्वोत्त मैथि‍ल, वि‍द्यापति‍ टाइम्‍स, समय-साल, आँकुर, पक्षधर, पूर्वोत्तर मैथि‍ल समाज, कर्णामृत, जखन-तखन, मि‍थि‍ला-दर्पण, सांध्‍य गोष्‍ठी, मि‍थि‍लायतन, गामधर, आङन ओ ई-पत्रि‍का वि‍देह आदि‍क माध्‍यमे वि‍गत वर्षमे मैथि‍ली गति‍वि‍धि‍केँ समंजि‍त-संयोजि‍ करैत रहल अछि‍। कलकत्तासँ प्रकाशि‍त मैथि‍लीक एकमात्र दैनि‍क मि‍थि‍ला समाद, स्‍वदेशक सरणि‍पर मैथली दैनि‍कक अवधारणाकेँ सम्‍पुष्‍ट करबामे लागल रहल अछि‍। पक्षधर (स. श्रीसीतांशु कश्‍यप, राँची) आ मि‍थि‍ला सृजन (स. श्रीऋृषि‍वशि‍ष्‍ठ, मधुबनी) एही वर्षक देन थि‍क। पोथी प्रणयन ओ प्रकाशनक दि‍शामे सेहो क्षि‍प्र गति‍त्‍व वि‍गत 2010क उपलब्‍धि‍ मानल जा सकैछ। प्रकाशक ओ वि‍तरकक सर्वथा अभाव रहतौं मैथि‍ली लेखकलोकनि‍ ग्राहकक परवाहि‍ बि‍नु केने स्‍वयं अपन-अपन रचनावलीक प्रकाशनसँ मैथि‍लीक समृद्धि‍ हेतु प्रति‍बद्ध देख पड़लाह। दि‍ल्‍लीक श्रुति‍ प्रकाशन, सरि‍सबक साहि‍त्‍यि‍की, दरभंगाक जखन-तखन, पटनाक चेतना समि‍ति‍ ओ शेखर प्रकाशन, एत' धरि‍ जे वि‍द्यापति‍ टाइम‍सो प्रकाशन आ मि‍थि‍ला रि‍सर्च सोसाइटी आदि‍ ऐ यज्ञमे लेखकलोकनि‍क सहायता-संवर्द्धनामे जुटल देख पड़ल। प्रकाशनक दृष्‍टि‍ये ऐ‍ वर्षक महत्वपूर्ण प्रकाशन अछि‍ पाँच खण्‍डमे प्रकाशि‍त रमानाथझा समग्र जकर सम्‍पादन कएलनि‍ अछि‍ श्रीमोहन भारद्वाज। पाँच हजार मूल्‍य ई बेछप रचना संचयन मैथि‍लीक गौरव ग्रन्‍थ थि‍क। पूर्वमे श्री गजेन्‍द्र ठाकुर पाँच हजार टाका मूल्‍यक जीनोम मैपि‍ंग एक्के खण्‍डमे प्रकाशि‍त कएने छथि‍। एकरे सबहक परि‍णामस्‍वरूप मैथि‍ली कथा आन्‍दोलनकेँ समर्पित सगर राति‍ दीप जरय आन्‍दोलन वर्ष 2010क चारू कि‍स्‍त, जकर आयोजन क्रमश: श्रीरमाकान्‍त राय रमा'क संयोजकत्‍वमे नरहन, समस्‍तीपुरमे, डा. योगानन्‍दझाक संयोजकत्‍वमे कबि‍लपुर, लहेरि‍यासराय, दरभंगामे, श्री जगदीश प्रसाद मण्‍डल'क संयोजकत्‍वमे बेरमा झंझारपुर, मधुबनीमे आ श्रीअरवि‍न्‍द ठाकुर'क संयोजकत्‍वमे सुपौल (कोशी क्षेत्र)मे सफलतापूर्वक सम्‍पन्न भेल आ ऐ‍‍ अवसरपर पोथीक लोकार्पण-प्रक्रि‍यामे नि‍रन्‍तरता बनौने रहल जइमे कबि‍लपुरक मि‍थि‍ला रि‍सर्च सोसाइटीक तत्‍वावधानमे सत्रह गोट पोथी आ एकटा सी.डी.क लोकार्पण कीर्तिमान स्‍थापि‍त करबा योग्‍य ऐति‍हासि‍क प्रकृति‍क रहल। ऐ अवसरपर लोकार्पित पोथीमे श्रीमती प्रीति‍ ठाकुरक- दू गोट चि‍त्रकथा संग्रह, श्री जगदीश प्रसाद मण्‍डल'क दूटा उपन्‍यास (जि‍नगीक जीत आ उत्‍थान-पतन) आ एकटा कथा संग्रह गामक जि‍नगी, श्री गजेन्‍द्र ठाकुर कृत मि‍थि‍लाक पंजी प्रबंध (तारपत्र आदि‍क डि‍जि‍टल इमेजि‍ंग, डी.भी.डी), डॉ. प्रेमशंकर सि‍ंह'क मैथि‍ली भाषा साहि‍त्‍य: बीसम शताब्‍दी (अलोचनात्‍मक नि‍बंध संग्रह) डा. वीणा ठाकुरक भारती उपन्‍यास, डॉ. मुरलीधर झाक पि‍लपि‍लहा गाछ बालकथा संग्रह, डॉ. धीरेन्‍द्रनाथ मि‍श्रक समाचार कथा कथा संग्रह, डॉ. अमरनाथ चौधरीक हमरो लेने चलू, कथा संग्रह, डॉ. योगानन्‍दझाक कथा-लोककथा कथा संग्रह आदि‍ उल्‍लेखनीय अछि‍। तहि‍ना बेरमाक 71म सगर राति‍ दीप जरय'क आयोजनक अवसरपर छह गोट पोथी आ दू गोट सी.डी-डी.भी.डी.क लोकार्पण भेल। जइमे श्री जगदीश प्रसाद मंडलक तीन गोट पोथी- जीवन-मरण आ जीवन संघर्ष उपन्‍यास, बाल-कि‍शोर प्रेरक कथा संग्रह तरेगन, कमलकान्‍त झा अलका, डाॅ. तारानन्‍द वि‍योगीक, प्रलय रहस्‍य (कवि‍ता संग्रह), श्रीपति‍ सि‍ंह नि‍बंध-तरंग (नि‍बंध संग्रह)क लोकार्पण भेल। स्‍वतंत्रो रूपेँ पोथीक लोकार्पण बरसात होइत रहल जइमे पं. श्रीचन्‍द्रनाथमि‍श्र अमर'क अतीत मन्‍थन ओ पं. श्रीगोवि‍न्‍द्रझाक जनम अवधि‍ हम आत्‍मसंस्‍मरण, डॉ. नीता झाक देश-काल कथा संग्रह, डॉ. महेन्‍द्र नारायण रामक लोकदर्शन आलोचना, स्‍व. गोवि‍न्‍द चौधरीक गोवि‍न्‍द रचनावली (रचना-संचय), प्रो. उमानाथझाक मैथि‍ली नवीन साहि‍त्‍य संग्रह, श्रीप्रदीप मैथि‍लीपुत्रक श्रीसीतावतरण महाकाव्‍य प्रबन्‍धक द्वि‍तीय संस्‍करण, श्रीमकलाकान्‍त झाक फोँका कवि‍ता संग्रह, डाॅ. सुरेन्‍द्र कुमार सुमनक राधाकृष्‍ण चौधरीक व्‍यक्‍ति‍त्‍व ओ कृति‍त्‍व शोध-ग्रंथ, प्रो. राजाराम प्रसादक मैथि‍ली लोकनाट्य शोधग्रंथ, डॉ. देवकान्‍त मि‍श्रक बेनीपुर अनुमंडलमे मैथि‍ली शोधग्रंथ आिदक संगहि‍ अनेकानेक लेखकलोकनि‍क पोथि‍क आयोजनपरक लोकार्पण होइत रहल। हरि‍मोहन झाक सरणि‍पर गप्‍प श्रेणीक वस्‍तुि‍नर्माण कऽ डाॅ. राम कि‍शोर झा 'वि‍भाकर' एही वर्ष मनीषा मामाक मीमांसा नामक ग्रन्‍थ प्रकाशि‍त करौलनि‍। नेपालमे श्रीराम भरेस कापड़ि‍ 'भ्रमर' द्वारा सम्‍पादि‍त मैथि‍ली नाटक संग्रह ओ स्‍वरचि‍त नओ गोट एकांकीक संग्रह भैया अएलै अपन सोराज मैथि‍ली नाट्यवि‍धाकेँ युगानुकूल प्रस्‍तुति‍क दृष्‍टि‍ऍं महत्‍वपूर्ण सावि‍त भेल। सामान्‍य अनुवाद प्रणालीसँ हटि‍ कऽ बि‍ना कोनो अनुबन्‍धक अनुवादकारि‍ताक दृष्‍टि‍ऍं ऐ वर्षक उपलब्‍धि‍मे रेमि‍का थापा कृत कवि‍ता संग्रह देश र अन्‍य कवि‍ताहरूक मैथि‍ली अनुवाद देश आ अन्‍य कवि‍ता सभ दृष्‍टि‍पथपर आबि‍ सकल अछि‍ जे श्रीमती मेनका मल्‍लि‍कक कृति‍ थि‍क आ स्‍वतंत्र रूपेँ अनुवादकारि‍ताक महत्‍वपूर्ण दि‍शाबोधक अछि‍। मैथि‍ली लेखन-प्रकाशनकेँ सम्‍वर्द्धित करबामे श्री गजेन्‍द्र ठाकुर प्रयोजि‍त ई-प्रत्रि‍का वि‍देह अन्‍यतम मानल जाए लागल अछि‍, जकर सदेह (हार्ड काँपी) अंक दू, तीन आ चारि‍ पत्रि‍काक चयनि‍त रचना सभसँ कथा, कवि‍ता आ प्रबन्‍ध-समालोचनाकेँ पुस्‍तकाकार प्रकाशि‍त कऽ ऐ वर्षक प्रारंभमे अपन सामार्थ्‍यक परि‍चय दऽ देने छल। महि‍ला सशक्‍ति‍करणक प्रतीक पत्रि‍का जानकी अपन अस्‍ति‍त्‍व अहू वर्ष बनौने रहल। मि‍थि‍ला दर्पण, बम्‍बइ, समय-साल ओ घर-बाहर, पटना तथा पक्षधर, राँची अपन अवधि‍ सोपेक्षाताक ि‍नर्वाह कएने रहल। मि‍थि‍ला दर्पणकेँ श्री हीरेन्‍द्र कुमार झाक ऊर्जाक लाभ भेटलैक। ऐ‍‍ वर्ष जे सर्वाधि‍क प्रशस्‍त सम्‍मान मैथि‍लीकेँ भेटलैक अछि‍ से थि‍क मैथि‍लीक वरेण्‍य कवि‍ ओ महारथी पं. श्रीचन्‍द्रनाथ मि‍श्र 'अमर'केँ साहि‍त्‍य अकादेमी, नई दि‍ल्‍ली द्वारा फेलोशि‍प प्रदान करब। मैथि‍लीक पालामे ई सम्‍मान पहि‍ले बेर आएल बूझल जएबाक चाही, जइसँ मि‍थि‍ला-मैथि‍ली गौवान्‍वि‍त अनुभव कएलक। श्री अमरकेँ भेटल ई सम्‍मान हुनका हि‍न्‍दीक केदारनाथ सि‍ंह आ अंग्रेजीक खुशवंत सि‍ंहक संगे प्रदान कएल गेलनि‍ अि‍छ जइसँ मैथि‍लीकेँ राष्‍ट्रीय क्षि‍ति‍जपर आत्‍मतोषात्‍मक अनुभूति‍ भेलैक। ओना ऐसँ पूर्व हि‍न्‍दी-मैथि‍लीक जनकवि‍ नागार्जुन-यात्रीकेँ 1955मे ई सम्‍मान भेटल छलनि‍ मुदा सुच्‍चा मैथि‍ली लेखक ओ सेवककेँ प्राप्‍त ऐ बेरूक उपलब्‍धि‍ मैथि‍ली प्रेमीलोकनि‍ द्वारा मानल गेल। ऐ वर्ष मैथि‍ली-संस्‍कृति‍क वि‍द्वान ओ हि‍न्‍दी-मैथि‍लीक बहुआयामी लेखक डाॅ. तारानन्‍द वि‍योगीकेँ साहि‍त्‍य अकादेमी द्वारा बाल साहि‍त्‍य 'ई भेटल तँ की भेटल' पर पुरस्‍कृत कएल गेलनि‍। जइसँ अभि‍नव प्रकृति‍ ओ अनुसन्‍धानात्‍मक बाल साहि‍त्‍य लेखन दि‍स मैथि‍ली साहि‍त्‍यकारलोकनि‍ प्रेरि‍त भेलाह अछि‍ आ युवा लेखन नव उत्‍साहक संचारसँ उत्‍फुलल अछि‍। हि‍नक प्रलय-रहस्‍य कवि‍ता संग्रह एही वर्ष प्रकाशि‍त भेलनि‍। साहि‍त्‍य अकादेमी द्वारा फूलचन्‍द्र मि‍श्र 'रमण' कृत मैथि‍ली वि‍नि‍बन्‍ध बुद्धि‍धारी सि‍ंह 'रमाकर' एही वर्ष प्रकाशमे आबि‍ सहल। डाॅ. रमानन्‍द झा रमण खोजी पत्रकार जकाँ जर्मन पत्रि‍कासँ ग्रि‍यसर्न संकलि‍त गीत दीनाभद्रीक ओ गीत नेवारककेँ ताकि‍-हेरि‍ उद्धार कऽ पं. गोवि‍न्‍दझाक सानुवाद प्रकाशि‍त करौलनि‍। उक्‍त अकादेमी द्वारा तंत्रनाथ झा ओ सुभद्रझाक जन्‍मशताब्‍दी सरि‍सवमे इशनाथ झा, लक्ष्‍मीपति‍ सि‍ंह ओ भुवनेश्‍वर सि‍ंह भुवनक जन्‍म शताब्‍दी मधुबनीमे तथा यात्री ओ आरसी प्रसाद सि‍ंहक जन्‍म शताब्‍दीक अवसरपर राष्‍ट्रीय संगोष्‍ठीक आयोजन क्रमश: पटनाक चेतना समि‍ति‍ ओ मुजफ्फरपुरक स्‍नातकोत्तर मैथि‍ली वि‍भागक तत्‍वाधानमे सम्‍पन्न भेल। एही क्रममे प्रगति‍शी लेखक संघ द्वारा नागार्जुन-यात्रीक जन्‍मशती समारोह उल्‍लेखनीय अछि‍। अकादेमीक वर्तमान मैथि‍ली प्रति‍नि‍धि‍ डॉ. वि‍द्यानाथ झा 'वि‍दि‍त' एही अवधि‍मे अपन औपन्‍यासि‍क कृति‍ सभ करपुरि‍या, अनामि‍काक चि‍ट्ठी, मात्र तीन घंटाक समय आदि‍क नि‍रन्‍तरता ओ वि‍पुलता-बहुसंख्‍यकताक कारणे प्रति‍ष्‍ठापि‍त भेलाह अछि‍। पूर्वमे पं. श्री गोवि‍न्‍दझा, पं. श्रीचन्‍द्रनाथ मि‍श्र 'अमर' श्री मायानन्‍द मि‍श्र, डॉ. रामदेव झा एवं मार्कण्‍डेय प्रवासीकेँ प्रदत्त 'ऑथर ऐट रेसि‍डेन्‍स' सुनबामे आएल जे एही वर्ष डॉ. सुरेश्वर झाकेँ भेटलनि‍ अछि‍। तुषारपात ई जे मार्कण्‍डेय प्रवासी सदृश मनीषी कवि‍, राष्‍ट्रीयता ओ गीतकाव्‍यक प्रति‍ समर्पित व्‍यक्‍ति‍त्‍व एही वर्षकेँ अपन महाप्रयाणक हेतु चुनि‍ मैथि‍लीसँ एक गोट सशक्‍त रचनाकारकेँ छीन‍ लेलखि‍न। डॉ. जयकान्‍त मि‍श्र ओ पं. जयमन्‍त मि‍श्रक नि‍धन सेहो असह्य अशनि‍पात रहल। ऐ‍‍ वर्षक अन्‍यतम उपलब्‍धि‍ अछि‍ गति‍वि‍धि‍येँ मृतप्राय मैथि‍ली अकादमी, पटनाक पुनर्जागरण। बि‍हार सरकार ऐ संस्‍थाक पुनर्गठन कऽ एकर बहुत दि‍नसँ रि‍क्‍त अध्‍यक्ष पद एक गोट वि‍शि‍ष्‍ट सेवी श्री कमलाकान्‍त झाक सशक्‍त हाथमे प्रदान कएलनि‍ जइसँ मैथि‍ली जगत प्रफुल्‍लि‍त अनुभव कएलक। श्री झाक अबि‍ते मैथि‍ली अकादमी कायाकल्‍पक अनुभव कएलक आ अनेको वर्षसँ दबल-पड़ल आधा दर्जन व्‍याख्‍यानमालाकेँ ओ पटना आ दरभंगामे आयोजि‍त कए, पुस्‍तक प्रदर्शनी लगाए लोककेँ एकबेर फेर अकादमीक सुगबुगाहटि‍सँ परि‍चय करा देलखि‍न। अकादमीक खर्चपर चेतना परि‍सरमे 'पारि‍जातहरण' नाटकक मंचन एकटा अलगे संदेश दऽ सकल। मैथि‍ली साहि‍त्‍यक उत्‍कृष्‍ट सेवाक हेतु वि‍द्वानलोकनि‍केँ सम्‍मानि‍त करबाक परम्‍पराकेँ जगजि‍यार करैत अकादेमी एम.एल.एस.एम. काओलेजक मैथि‍ली, ल.ना.मि‍थि‍ला.वि‍श्ववि‍द्यालयक श्री वि‍भूति‍ आनन्‍दक हाथेँ सम्‍मानि‍त कऽ नूतन अध्‍याय जोड़लक अछि‍। कीर्तिनारायण मि‍श्र पुरस्‍कार ऐबेर महाप्रकाशकेँ प्रदान कएल गेलनि‍ अछि‍। भारतीय भाषा संस्‍थान, मैसूर सेहो ऐ वर्ष मैथि‍लीक कार्यशालाक आयोजन कऽ मैथि‍ली अनुवादक माध्‍यमे ऐ भाषाकेँ राष्‍ट्रीय-अन्‍तर्राष्‍ट्रीय क्षि‍ति‍जपर प्रक्षेपि‍त करबाक प्रयास कएलक अछि‍। एकरा द्वारा वि‍भि‍न्न पत्रि‍काक पोषण ओ अनेक पोथीक क्रय सेहो मैि‍थली क्षेत्रमे उत्‍साहक कारण बनल रहल अछि‍। ऐ वर्ष स्‍व. हरि‍वंश 'तरूण', समस्‍तीपुर संस्‍थापि‍त ओ अखि‍ल भारतीय साहि‍त्य-सेवाकेँ समर्पित साहि‍त्‍यक संस्‍था भारतीय साहि‍त्‍यकार संसद जै मैथि‍ली रचनाकार-पत्रकारकेँ सम्‍मानि‍त करबाक ि‍नर्णय लेलक अछि‍ तइमे श्रीवि‍जयनाथ झा, डाॅ. सुरेन्‍द्र कुमार 'सुमन' ओ ि‍वद्यापति‍ टाइम्‍सक सम्‍पादक आ अधि‍ष्‍ठाता श्री वि‍नोद कुमारक नाम उल्‍लेखनीय अछि‍। ज्ञातव्‍य जे श्री वि‍जयनाथ झाकेँ ऐ वर्ष वि‍हार राष्‍ट्रभाषा परि‍षद, पटना सात हजारक लोकभाषा पुरस्‍कारसँ सम्‍मानि‍त कए मैथि‍लीक प्रति‍ अपन आत्‍मीयताक परि‍चय अनेक वर्षोपरान्‍त सम्‍मानि‍त कए मैथि‍लीक प्रति‍ अपन आत्‍मीयताक परि‍चय अनेक वर्षोपरान्‍त प्रस्‍तुत कऽ सकल। वि‍द्यापति‍ सेवा संस्‍थान, दरभंगा ओ चेतना समि‍ति‍, पटना अहू वर्ष परम्‍परि‍ते रूपमे विद्यापति‍ स्‍मृति‍-पर्वक आयोजन कऽ संतुष्‍ट देखल गेल। ऐ वर्ष श्री सोमदेवक रचनावलीपर डाॅ. सुधाकर चौधरीक 'बहुआयामी जनकवि‍ सोमदेव' समालोचनात्‍मक ग्रन्‍थ प्रकाशि‍त भेल जे जीवि‍त रचनाकारर लि‍खल जाइत वि‍रल पोथीक परम्‍परामे समादृत भेल आ सोमदेवजीकेँ स्‍वस्‍ति‍ फाउण्‍डेशन, सहरसा लाइफ टाइम एचि‍भमेन्‍टक आधारपर प्रबोध साहि‍त्‍य सम्‍मानक रूपमे एक लाख टाकाक पुरस्‍कारसँ सम्‍मानि‍त करबाक हेतु चयनि‍त केलकनि‍ जकर मैथि‍ली साहि‍त्‍य जगतमे स्‍वागत भेल अछि‍। साहि‍त्‍य अकादेमी, नई दि‍ल्‍ली ऐ वर्ष मैथि‍लीक हेतु मौलि‍क पुरस्‍कारक उद्घोषणा तकनीकी व्‍यवधानक कारणे नै कऽ सकल छल जे आब डॉ. श्रीमती उषा कि‍रण खानकेँ हुनक पोथी भामती नामक उपन्‍यासपर प्राप्‍त होएबाक सूचना अछि‍। मैथि‍लीक गति‍वि‍धि‍क दृष्‍टि‍ऍं ऐ वर्ष दि‍सम्‍बर बाइस-तेइसकेँ श्री रामभरोस कापड़ि‍ 'भ्रमर'क संयोजकत्‍वमे काठमांडूमे आयोजि‍त अन्‍तर्राष्‍ट्रीय मैथि‍ली सम्‍मेलन सेहो ऐति‍हासि‍क प्रकृति‍क कहल जा रहल अछि‍ जइमे नेपालक सम्‍पूर्ण सत्ता एतए धरि‍ जे राष्‍ट्रपति‍, उपराष्‍ट्रपति‍ सेहो समुपस्‍थि‍त भऽ मैथि‍लीक उत्‍थान-मार्गकेँ प्रशस्‍त करबाक आश्‍वासन देलनि‍। ऐ सम्‍मेलनमे भारतीय साहि‍त्‍यकार-कलाकारलोकनि‍क सेहो पर्याप्‍त सहभागि‍ता रहल जइमे सर्वश्री वैद्यनाथ चौधरी 'बैजू' चन्‍द्रेश, कमलकान्‍त, फुलचन्‍द्र झा 'प्रवीण' नलि‍नी चौधरी, कुंजबि‍हारी ि‍मश्र, रंजना झा, जय प्रकाश चौधरी 'जनक' उषा पासवान आदि‍क नाओं उल्‍लेखनीय अछि‍। नेपाल मैथि‍लीक ति‍रहुता लि‍पि‍केँ यूनीकोडमे समाहि‍त करेबाक हेतु दत्तचि‍त अछि‍, से अलगे प्रसन्नताक वि‍षय थि‍क। तथापि‍, भारतीय संवि‍धान, बि‍हार लोक सेवा आयोग, भारतीय संघ लोकसेवा आयोग सदृश संस्‍थामे मान्‍यताप्राप्‍त मैथि‍ली आइयो प्राथमि‍क शि‍क्षामे उपेक्षि‍त अपन आयामक मौलि‍कता ओ व्‍यापकताक बाट ताकि‍ये रहल छथि‍। तँए ने मैथि‍ली-मनीषी पं. श्री अमरजीकेँ लि‍खए पड़ि‍ रहलनि‍ अछि‍- फुनगीये दि‍स ताकि‍ रहल छथि‍ मैथि‍लीक सभ प्रेमी। घरमे डि‍बि‍या मि‍झा रहल अछि‍ के उकसाओत टेमी? ऐ रचनापर अपन मतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। सुजित कुमार झा- जंगलमे होरी एखन होरीकेँ मिथिलाञ्चलमे धुम अछि । जतय जाउ ओकरे चर्चा रहैत अछि । वैवाहिक कार्यक्रमसभमे तऽ रंग अविर श्रीपञ्चमीए दिन सँ शुरु भऽ गेल अछि । जे केउ सासुर जाइत छथि वा सम्धियनामे रंग अविर सँ स्वागत हेवे करैत छन्हि । साँझ होइते होरैया सभकेँ गीत गवैत लोक गाम गाममे देख सकैत अछि । जनकपुरमे होरीकेँ विशेष कार्यक्रम होइत अछि । मिथिला नाट्यकला परिषद प्रत्येक वर्ष अहि अवसरपर महामूर्ख सम्मेलन आयोजना करैत अछि । परिक्रमामे सहभागीसभ कञ्चनवनमे होरी तऽ एक हप्ता पहिने खेल चुकल अछि । कञ्चनवनमे होरी वनमे वा जंगलमे होरी हैत इ सुनलापर वहुतो लोककेँ आश्चर्य लागल हैत । मुदा सत्य इहे अछि । जनकपुर क्षेत्रक प्रसिद्ध धार्मिक स्थल कञ्चनवनमे फागुन २७ गते होरी सम्पन्न भेल अछि । ओ स्थलपर के बाबाजी के महिला पुरुष सभ होरी नहि हुरदंग तक खेललन्हि अछि । परिक्रमा डोला कञ्चनवनमे पहुँचलापर प्रत्येक वर्ष होरी होइत अछि जानकी मन्दिरक महन्थ रामतपेश्वर दास वैष्णव कहैत छथि । ओ होरीमे जनकपुरक अधिकांश मठ मन्दिरक महन्थ, समाजिक, सांस्कृतिक, राजनीतिक क्षेत्र सँ आवद्ध व्यक्ति सहभागि होइत अछि ओ जानकारी देलन्हि । यतेक रंग अविर होइत अछि जे जंगल सेहो रंगा जाइत अछि । रामनगरवाली नामक महिला कहैत छथि हमसभ कञ्चनेवनमे होरी खेलाइत छी पूर्णिमा दिन पुवा पुरी मात्र खाइत छी । कहल जाइत छैक त्रेता युगमे भगवान राम जानकी चारुभाइ आ चारु वहिन संगे कञ्चनवनमे होरी खेलायल छली । ओहिकेँ संस्मरणमे कञ्चनवनमे होरी खेलायल जाइत अछि । ‘जंगलमे होरीकेँ आनन्दे किछ आओर अछि’ , नेपाल ललितकला प्रज्ञा प्रतिष्ठानक प्राज्ञ रमेश रञ्जन झा कहैत छथि—‘जनकपुर क्षेत्रमे सही होरी तऽ कञ्चने वनमे होइत अछि । कञ्चनवनक होरीकेँ प्रसिद्धीकेँ देखैत नेपाल सरकारक वृहत्तर जनकपुर क्षेत्र विकास परिषद ओ होरीकेँ अगिला वर्ष सँ विशेष होरी बनावयकेँ निर्णय कएने परिषदक अध्यक्ष दिगम्वर राय जानकारी दैत छथि । महामूर्ख सम्मेलनक सेहो धुम पुवा माउस खायवलासभ वा पूर्णिमा दिन रंग अविर खेलायवलासभ वहुतो स्थानपर होरीकेँ आंगुरपर गनैत हेता । मुदा जनकपुरमे सभ सँ वेसी केकरो प्रतिक्षा भऽ रहल अछि तऽ ओ अछि होरी नहि महामुर्ख सम्मेलनकेँ । मैथिली भाषा, साहित्य, कला, सांस्कृतिक उत्थानकलेल काज करयवला नेपालक अग्रणी संस्था मिथिला नाट्यकला परिषद ओ सम्मेलनकेँ जनकपुरमे प्रत्येक बर्ष आयोजना करैत अछि । ओ सम्मेलनमे विभिन्न विशिष्ठ व्यक्तिकेँ व्यंङ्गयात्मक उपाधि वितरण कएल जाइत अछि । महामूर्खक उपाधि केकरा वितरण कएल जाए अहिकेँ मिनाप विशेष तयारी कऽ रहल मिनापक अध्यक्ष सुनिल मल्लिक कहैत छथि । इम्हर महामूर्ख बनवाकलेल सेहो भारी प्रतिस्पर्धा देखल जा रहल अछि । अहिवेर साहित्यिक क्षेत्रक, राजनीतिक क्षेत्रक वा समाजिक क्षेत्रक हातमे महामूर्खक उपाधि भेटैत अछि तेकरो प्रतिक्षा भऽ रहल अछि । २०६५ सालक महामूर्खक उपाधि प्राप्त कर्ता एवं मैथिलीक बरिष्ठ साहित्यकार डा. राजेन्द्र प्रसाद विमल कहैत छथि ‘उपाधि प्राप्त करब अपनामे बडका बात होइत अछि , प्रेम सँ लोक किछ पिब लैत अछि । तखन महामूर्ख पाएब बडका भारी बात नहि । जनकपुरमे २०६१ साल सँ महामूर्ख सम्मेलन होइत आएल अछि । २०६१ सालक महामूर्ख मैथिली कवि नरेश ठाकुर , २०६२ कें एमाले नेता शीतल झा , २०६३ कें जनकपुर नगरपालिकाक तत्कालीन मेयर हरि बहादुर बिसी, २०६४ कें सदभावना नेता ओमकुमार झा , २०६५ कें बरिष्ठ साहित्यकार डा. राजेन्द्र विमल आ २०६६ केँ पूर्व मन्त्री एवं एमाले नेता रामचन्द्र झा कें पदबी देल गेल ।

महामूर्खक नामपर बहुतो गीत बनल कोनो चिज जखन लोकप्रिय होइत अछि तखन ओकरा सभ क्यास करय लगैत अछि । महामूर्ख सम्मेलन सँ जोडिकऽ बहुत गीतकार सभ गीत लिखलन्हि अछि । मैथिलीक चर्चित गीतकार कालीकान्त झा त्रिषितक गीत खुब चर्चित भेल अछि । हुनक गीत ..... स्वागत वागत मूर्ख महान महामूर्ख सम्मेलन के अछि अपनेही पर अभिमान निप्पट मूर्ख चौपट्ट भट्ट अही आयब भेल प्रमाण छल प्रपंच पाखण्ड भरल जग सत्यक नहि पहिचान ई सम्मेलन कय प्रमाणित मूर्ख सकल विद्वान बनी प्रतिनिधि संसद सुनैत मूर्ख शिरोमणि शान पेन्ट पहिरि ठाडे भऽ मुतैत कुकुर सभक राग कुर्सी चढि लक्ष्मीके बाहन मूर्ख बनय विद्वान हा कुर्सी हे कुर्सी कुर्सी पक्ष विपक्षक प्राण स्वागत वागत मूर्ख महान ऐ रचनापर अपन मतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। राजदेव मण्‍डल उपन्‍यास' आगाँ हमर टोल गहवरक अँगनीमे जेना ललका इजोत उतरि‍ गेल छै। अन्‍हारक कोरामे लहुआएल लाल चि‍ल्हका खेला रहल हो, तहि‍ना सन लगैत अछि‍। धधकैत आहुत, चौमुख जरैत दीप, अड़हुलक लाल फूल, लाल सि‍नूर, ललका डाली। सबहक मुँह जेना ओही लालीसँ ढौंरल हो। लाल टुह-टुह भेल भगतकेँ आँखि‍ सपनामे डूबि‍-उगि‍ रहल हो। पहि‍ले कहि‍ देल गेल छलै। मरद सभ एककात आ औरति‍या सभ एककात। बात के सुनतै? ढीठ सभ मरदक झोंझि‍मे ढुकि‍ कऽ बैसल छै। दोसरो दि‍स तँ थेथरे सभ अछि‍। मौगि‍याह जकाँ दोगमे ढुकि‍ कनफुसकी कऽ रहल छै। पता नै चलै छै औरत आ मरदक। एक तँ इजोत तेजगर नै छै। दोसर साड़ीसँ आधा मुँह झँपने छै। आँखि‍क भाग देखलासँ केना ि‍चन्‍हत लोक। दसगरदा जगहपर सभ चलै छै। सभ की चलतै। उतरबरि‍या कातसँ औरति‍या सभकेँ नै बैठबाक चाही। उत्तरसँ देवताक आवाहन होय छै। गि‍यान तँ छौ नै। आबि‍ गेलौ संुघहा धान। सुंधाय मड़रकेँ सभ सुंघहाधान कहै छै। सुंघहाधान छूबि‍ते हाथमे गड़ि‍ जाए छै। टोकैते देरी सुंघाय मड़रकेँ बकटेटी शुरू। फेर कि‍यो सुंघहाघान बाजि‍ नै सकैत अछि‍। देख लि‍औ लाठीक हुड़ाठ। मुँह भाँगि‍ देबै, कि‍यो बजत तँ। मुँहकेँ चुप्‍प राख। तेरहे बरखक उचि‍तवक्‍ता छै तइसँ की। ओकरासँ गप्‍पमे के जीतत। उचि‍त बात फट्ट द' बजल- “गोहारि‍, गोसांय सब बन्न। सुंघाय बाबा कहि‍ देलक। कि‍यो मुँहसँ बाजि‍ नै सकैत छी। भगतो वाक केनाक देत। चलै चलू आब ि‍कछ ै हएत। के बतीसी लाठीसँ झड़ाएत।‍” भगतकेँ नवसि‍खुआ चेला फनका रपटैत बजल- “देहपर नै लत्ता-चौधरी बोलत्ता। ऐ गामक मालि‍क सुंघाय छि‍यो की जे ओकर औडर चलतौ। अखने सुंघबाकेँ कंठ पकड़ि‍ बाहर दि‍स ठोंठि‍या देबो। बुझि‍ले तोरो कोनो बाप नै बचेतौ।‍” उचि‍तवक्‍ताकेँ कपारपर तामस नाचि‍ उठल। सुंघाय मड़र पाछूसँ डाँड़मे लाठी लगौने ठाढ़ छै। बूढ़ देहक भार लाठीपर देने आँखि‍ मूनि‍ देवता-पि‍त्तरकेँ सुमरि‍ रहल अछि‍। गहवरक सीमामे बकटेटी नै करबाक चाही। हम पपि‍याहा। हमरा छेमा क' दि‍अ। “एहेन गप्‍प कहत।‍” उचि‍तवक्‍ता फोंफि‍या कऽ उठल आ सुंघाय मड़रकेँ पाछूसँ लाठी खैंच लेलक। लाठी चमकाबैत फनकापर हुड़कल। सुंघाय मड़र धाँय द' डाँड़ भरे खसल। कुहरैत बाजल- “हौ बाप, मारि‍ देलक। ऐ लुकड़बाकेँ जन्‍मे भेल छै मरचायसँ। तब ने एकर बात आ बानि‍ मरचाय जकाँ लगै छै। एकर बाप सभ साल लंगी मरचायकेँ खेती करै छलै। ओहीसँ जोड़ा बरद कीनलकै। ओइसँ की। दारू पी क' सि‍रजल चीज केहेन हेतै।‍” उचि‍तवक्‍ताकेँ हाथसँ लाठी छि‍ना गेल छै। महुराइत बजल- “अपना बेटा दि‍स नै तकै छहक। टूटलो डाँड़पर अनकर आड़ि‍ कोदारि‍सँ नै छाँटबहक तँ जलखै नै भेटतह। केहेन कुकरमी छहक, खेलि‍ देबै सभटा बात।‍” “नै गौ बाबू, कल जोड़ै छि‍यौ। हमरा उठा क' पहुँचा दे।‍” “‍अच्‍छा चुप रहू। शान्‍त भ' जाऊ। देखि‍यो ओने गोहारि‍ शुरू भ' रहल छै।‍” पहि‍लुका डाली जागेसरक लगल छै। डाली दौड़ क' अपने आगू चलि‍ गेलै। सभटा देवताक कि‍रपा छै। देव कि‍रपा बि‍नु डोले नै पात। आपसी फुसुर-फुसुर भ' रहल छै। ओकर पति‍ जागेसर गहवर घर दि‍स टकटकी लगौने। “एहेन जवानीसँ भरल देह आ तब बाल-बच्‍चा नै होइ छै।‍” “जागेसरक बाछी एहेने बनल छै। एेबेर गाभ टेकतै की नै?‍” “‍खेलावन भगत एे काजमे माहि‍र छै। आब देखि‍यो तँ....।‍” स्‍त्रीगण दि‍ससँ कने मन्‍द स्‍वर नि‍कलै छै। “भैयाखौकीकेँ लाज-धाक होइ छै की नै। अपने दहकेँ अपने जे करै छै। छि‍नरि‍या....।‍” “अइठाम अबि‍ते सभ देवी-देवा चढ़ि‍ जाइ छै। आ नैहरा जाइते सभटा छूटि‍ जाइ छै।‍” “सुनै छि‍ऐ जे नैहरासँ एकटा छौड़ा आठे दि‍नपर भेँट करए अबै छै। पछोड़ धेने रहै छै।‍” “ई सभ तँ होइते रहै छै। तोरो मन होइ छौ की।‍” एक दोसरकेँ मुक्का मारैत औरति‍या सभ एकसंग हँसैत अछि‍। “चुप। सभ मुँह बन्न क' ले। भगतकेँ भाव आबि‍ गेलै।‍” “कारणीकेँ एमहर लाबह।‍” भगति‍याक भगैत जोर-शोरसँ शुरू भ' गेल छै। “जय हौ देव। कनी नीकसँ देखि‍यो। माथ आ पेट दुनूमे दरद छै।‍” खेलावन भगत देह-हाथकेँ ऐंचैत धर्मडीहीवालीक आगूमे बैसैत अछि‍। मंतर पढ़ि‍ माथ हाथ द' रहल छै। माथपर सँ हाथ ओकरा छातीपर गि‍रबैत अछि‍। फेर पेटकेँ हँसोति‍ दै छै‍। पेटपर सँ हाथ ससरि‍ पुन: माथपर। धर्मडीहीवाली चौंक उठै छै। ओकर देह सि‍हरि‍ उठै छै। भगत फेर माथपर हाथ रखैत काजकेँ दोहरौलक। “चटाक।‍” धर्मडीहीवालीक चमेटा भगतकेँ मुँहपर लगल। संगहि‍ कंठ पकड़ि‍ धकेल देलक। आशा नै छलै से भेल। भगत ओंधरा गेल। तामसे थर-थर काँपैत। लोगमे हड़कम्‍प भ' गेल। कि‍छु ठाढ़ आ कि‍दु बैसल अछि‍। स्‍त्रीगणक आँखि‍ आश्चर्यमे डूबल। “गे माइ गे माइ। आब की हेतै।‍” “आगि‍ बरि‍स जेतै। ठनका गि‍रतै।‍” उचि‍तवक्‍ताकेँ नै रहल गेल तँ बजल- “भगतकेँ असल भूतसँ पाला पड़ि‍ गेल छै। सभ गुण-मंतर अखन भीतर भ' गेल छै। टाँग केना असमान दि‍स ठाढ़ केने छै। लगै छै जेना टि‍टही होइ।‍” फड़फड़ा क' उठैत अछि‍- भगत। बेंत ल' क' धर्मडीीवालीकेँ पीठपर तड़-तड़ा दैत अछि‍। “आइ हमसभ भूतकेँ भगा देबै।‍” धर्मडीहीवाली भागैत अछि‍। “रे खुनि‍याँ सभ। रे कोढ़ी फूटतौ रे बेईमनमा। गे माइ गेऽऽऽ‍।” जगेसरा आगूसँ घेर लै अछि‍। एक्के धक्कामे जगेसराकेँ गि‍रबैत धर्मडीहीवाली पड़ाइत अछि‍। भगत देहसँ गरदा झाड़ि‍ रहल अछि।‍ जगेसरा हाथ जोड़ि‍ थर-थर काँपि‍ रहल छै। “आब की हेतै यौ भगतजी। कोनो उपाए लगाऊ। जे कही अहाँ।‍” “‍हेतैक सभ उपाए लगतैक। भगतसँ भूत नै जीत सकै छै। कोखि‍या गोहारि‍ हेतै। तू परसू आबि‍ क' भेँट कर। हमरे नाम छि‍ऐ रामखेलावन भगत। पछुआरक अन्‍हारमे कि‍छु करूण क्रदन सन भेल। भगत छड़पि‍ क' गहवरमे ढुकि‍ गेल। हवाक झोंक अाएल। कि‍छु दीप मुझा गेल। लोक सभ पीठपर डरकेँ लादने एका-एकी ससरि‍ रहल अछि‍। ......। क्रमश: ऐ रचनापर अपन मतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। डॉ. रमण झा फोंका-एक विहगावलोकन

काव्य वैह थिक जे रसिकक हृदयके ँ रसाप्लावित करय, गृहिणी वैह थिक जे अपन पतिके ँ अपन प्रेमपासमे जकरने रहय, भक्त वैह थिक जे भगवानके ँ अपन वषमे कयने रहय आ षत्रु वैह थिक जे मरितो दमधरि ष्षत्रुता नहि छोड़ए। अरसिक वा गँवारके ँ कविता सुनाके ँ की लाभ ? ते ँ ने संस्कृत साहित्यक प्रसिद्ध विद्वान एवं महाकवि वाणभट्ट कहने छथि-अरसिकस्तेषु काव्य निवेदनं षिरसि मा लिख! मा लिख! मा लिख!! वस्तुतः बानर नारिकेरक स्वाद की बूझत ? गँवार रत्नक महत्वके ँ की परखत ? तहिना अरसिक किंवा गँवारके ँ जँ कोनो कविता सुनयबैक तँ ओ अरण्यरोदने कहाओत, मुर्दाक शरीरपर उबटने लगायब होयत, स्थलपर कमल रोपबे सदृष कहाओत, ऊसर जमीनपर बेस काल धरि वर्षा करबे तुल्य होयत, कुकुरक नाडÛरिके ँ सोझे करब सदृष बुझाओत, बहिरक कानमे जपे करब तुल्य प्रतीत होयत अथवा आन्हरक आगाँमे दर्पणे रखबा सन भान होयत- अरण्य रुदितं कृतं षवषरीरमुद्वर्तितम्। स्थलेमारोपितं सुचिरमूसरे वर्षितम्।। स्वपुच्छमवनावितं वधिरकर्ण जापः कृतो। धृतोन्धमुखदर्पणः यद्वुधो जनः सेवितः।। (निदर्षनालंकार) जेना धनंजय नामक पाथरपर घसिकय सोनाक परीक्षा होइत अछि, रणक्षेत्रमे धनुर्धरक परीक्षा होइत अछि, विपत्तिक समयमे गृहिणीक परीक्षा होइत अछि आ श्रीमद्भागवतक अर्थ लगयबामे पण्डितक परीक्षा होइत अछि- धनंजये हाटक सम्परीक्षा रणांगनां षस्त्रभृतां परीक्षा। विपत्तिकाले गृहिणी परीक्षा विद्यावतां भागवते परीक्षा।। तहिना काव्यक परीक्षा काव्यषास्त्र रूपी कसौटीपर कयल जाइत अछि। प्रायः तथाकथित नव कविता लिखनिहार कवि लोकनि हमर एहि मतसँ सहमत नहियो होयताह मुदा वनस्पति कतबो शुद्ध रहय ओ शुद्ध घीक समता नहि कए सकैत अछि। वस्तुतः श्री कमलाकान्त झाजीक फोंका कविता संग्रह पढ़ि हमरा काव्यषास्त्रक अन्तर्गत पढ़ल शब्दषक्तिक भेद- लक्षणा-व्यंजनाक स्मरण कराए दैत अछि। एहि फोंकामे कुल 89 गोट कविता संगृहीत अछि जाहिमे अधिकांष कवितामे समाजक कोनो ने कोनो विरूपतापर प्रहार कयल गेल अछि, परषासनक कोनो ने कोनो अंगपर निषान साधल गेल अछि आ नेता लोकनिक भ्रष्ट चरित्रके ँ जगजियार कयल गेल अछि-एक शब्दमे जँ कही तऽ चारूकात पसरल भ्रष्टाचारपर व्यंग्यवाणक बौछार कयल गेल अछि। जँ एहि प्रकारक अवघात अभिधामे कयल जाय तँ मारि-पीट, पर-पंचैती, केस-मोकदमा सभ किछु भए जायत मुदा लक्षणा आ व्यंजनाक वाणसँ विद्ध लक्ष्य जालमे फँसल माछ सन छटपटाय लगैत अछि, आहुति युत होमक अग्नि जकाँ धधकि उठैत अछि आ चोटाओल नाग जकाँ फुफकार काटय लगैत अछि मुदा पलटवार नहि कए सकैत अछि। लक्षणा आ व्यंजनाक वाण लोकके ँ कतोक दिन धरि भीतरे भीतर दग्ध करैत रहैत अछि जेना सम्पूर्ण गात्रपर क ड़कल तेल वा घीक पड़ने भेल फोंका लोककें कतोक दिन धरि कुहरबैत रहैत छैक। कविश्रेष्ठ श्री कमलाकान्त झाजीक कवितामे कोन प्रकारक व्यंग्य निहित अछि से हुनक पंक्तिक अवलोकन विनु कयने अनुभव करब असंभव अछि। हिनक परिचय-नवरत्न शीर्षकमे समाजक प्रसिद्ध नओ पेषाक लोकपर जे व्यंग्य कयल गेल अछि ताहिमेसँ किछु द्रष्टव्य थिक- डाक्टर- पैघ डाक्टर वैह थिक चिन्हय सभटा रोग। अदलि - बदलि औषधि दिअए बाँचि सकए नहि लोग।। कवि- असली कवि थिक वैह जे कविता करए अनर्थ। लाम-काफ बेसी होअए श्रोता बुझए ने अर्थ।। अफसर- अफसर बड़का वैह थिक, जनिक पैध हो पेट। लेट-सेट कखनो पहुँचि, काटथि अनकर घे ँट।। गायक- असली गायक वैह थिक, जकर पैध हो तान। श्रोता सभ उठि हो विदा, बन्द होअए नहि गान।। फोंका-पृ. 40,41 कवि अपन काव्यमे सभसँ पैध निषान सधने छथि भ्रष्ट नेता लोकनिपर। किछु पंक्तिक उल्लेख करब आवष्यक बुझि पडै़त अछि- राजनीति हुनका लेल वरदान अछि प्हिने झोपड़ीमे रहैत छलाह आइ आलीषान मकान अछि। पुनष्च- ओ हस्ताक्षरक बदला अँउठा लगबैत छथि राजनेता छथि ते ँ विद्वान कहबैत छथि। फोंका -पृ. 51 राजनेतापर व्यंग्य करैत श्री झा मंत्रीजीकेँ कुकुर धरि कहि देबामे नहि हिचकैत छथि। हिनकहि शब्दमे द्रष्टव्य थिक- दिल्लीक अषोक पथपर मंत्रीक डेरासँ एक कुकुर नालीमे स्वयं जा खसि पड़ल हल्ला भेल लोक दौड़ल कुकुरके ँ निकालल गेल साबुन, तेल आ सेंट लगाओल गेल। कुकुरके ँ बैसा पुछल गेल मंत्रीक आवासक सुख त्यागि नालीमे बेर-बेर किएक? कुकुर सहज भावसँ बाजल- एक बंगलामे एकेटा कुकुर नीक। फोंका पृ.-93 कवि भविष्यद्रष्टा होइत छथि, समाज सुधारक होइत छथि आ सबसँ बेसी निर्भीक होइत छथि। हिनक निर्भीकताक पराकाष्ठा निम्नांकित पंक्तिमे व्यंजित अछि- मैडमजी पुछलनि सरदारजी अहाँ यू. पी. ए.क अर्थ जनैत छी- ओहिमे हमर की हैसियत मानैत छी ? सरदारजी बजलाह मैडम यू. पी. ए.क मतलब साफ छै एहिमे पी. ए. हम छी बाँकी सभ यू(अहाँ छी) फोंका-पृ.-6 हिनक एहि कविता संग्रहमे एहि प्रकारक व्यंग्य समाजक प्रत्येक वर्गपर अछि जतय कतहु हिनका व्यभिचार, अनाचार आ भ्रष्टाचारक अनुभूति होइत छनि। हिनक कविता संग्रहमे वक्रोक्ति(अलंकार)क माध्यमे सामान्यो गप्पके ँ तेनाने उपस्थापित कयल गेल अछि जे सुनितहि एक क्षणक हेतु अचंभित भए जाएब, हृदयमे गुदगुदी उठत आ मुहपर स्मितहास अवष्ये टपकि पड़त। अवलोकनीय थिक- एकटा मित्र पत्नीसँ पुछलथिन सुनैछी ? तुलसीदास कहने छथिन ‘ढ़ोल गँवार शूद्र पषु नारी ई सभ तारण के अधिकारी’ अर्थ बुझै छियै कि बुझाउ पत्नी बजलथिन एकर अर्थ तँ एकदम स्पष्ट छै एहिमे हम छी एक ठाम आ अहाँ छी चारि ठाम। फोंका-पृ.-44 श्री कमलाकान्त झाजीक कविता संग्रहमे जँ कतहु शृंगारिको वर्णन भेल अछि तऽ ओतहु व्यंग्येक माध्यमसँ। कने एहि अंषपर दृष्टिपात कयल जाय- क्रुद्ध वॉसक विनती करैत बजली घिघिया क’ पूर्वाह्नमे लेट एैल रही कम्पन्सेट क’ देब खराब नै मानी तँ साँझमे लेट क’ जैब। फोंका-पृ.-110 हिनक कविता सभमे ठाम-ठाम अलंकारक प्रयोग सेहो भेटैत अछि। एतय उत्प्रेक्षाक मालाक अवलोकन कयल जाय- तऽन मल-मल जकाँ, मोन मखमल जकाँ मूँह चाने जकाँ, दाँत मोती जकाँ । फोंका-पृ.-26 विनोक्ति अलंकार द्रष्टव्य थिक- बिनु चीनी केर चाह नहि, बिनु जलखइ केर प्लेट। बिनु सरिसो केर माँछ नहि, बिना धोधि केर सेठ।। फोंका-पृ.-41 पुनरुक्तिप्रकाष- एक आँखि स्वप्न-मिलन मेला लगौने एक आँखि विरही चकोर एक आँखि अपना लए जागल रहैए एक आँखि हुनका घर चोर। फोंका -पृ.-38 हिनक एहि संग्रहमे एक दिस जँ किछु मात्रिक छंदमे लिखल गेल कविता सभ अछि तऽ दोसर दिस आधुनिक कविक डेगमे डेग मिलबैत पूर्णतः अतुकान्त कविता सेहो अछि। किछु छन्दोबद्ध कविताक उल्लेख एतय कयल जा रहल अछि- कुण्डलिया-एहि छन्दमे दोहा एवं रोलाक मिश्रण एकटा शर्तक संग रहैत छैक जे दोहाक अंतिम पाद रोलाक आरम्भक पाद बनि जाइत अछि। एतबे नहि दोहा छन्दक आदि भागमे जे पद रहत से रोलाक अंतमे निष्चय देल जायत। एकर पूर्णतः निर्वाह कवि कयने छथि। कने देखल तऽ जाउ- खादीमे गुण बहुत छै, सभ दिन झॉपय अंग। छै उज्जर तँ की भेलै, एहिमे सातो रंग।। एहिमे सातो रंग दाममे सस्ते सस्ता सभठाँ छै उपलब्ध भेटै भरि बस्ता-बस्ता। कविगण बाजि उठथि सुनू औ भौतिकवादी बर्बादीसँ बचू मङा कऽ पहिरू खादी।। पुचष्च- खादी केर अछि बढ़ि रहल दिन- दिन दूना रेट। एकरा अंदरमे दबल भारी भरकम पेट।। भारी भरकम पेट देषके काला धंधा भ्रष्टाचारी चोर बजारिक बनल सुगन्धा। नैयायिक केर न्याय देहपर चढ़िते खादी सभटा नुका लैछ ई बापू केर खादी।। फोंका-पृ.-108 निष्कर्षतः यैह कहल जा सकैत अछि जे फोंका कविता संग्रह एकटा सफल काव्य संग्रह थिक जकर पाठक किंवा श्रोताके ँ धैर्य आ साहसक संग पारायण व श्रवण करबाक प्रयोजन छनि। फोंका पढ़ि एक बेरि अवष्ये लोकक देह सिहरि उठतैक, मोन उद्वेलित होयतैक आ कुमार्गके ँ छोड़ि सन्मार्गपर चलबाक प्रेरणा भेटतैक। हम एकर कविसँ आग्रह करबनि जे एहने सरस, सुन्दर आ संग्रहणीय रचनासँ मैथिली साहित्यक उद्यानके ँ सुरभित करैत रहथि। इत्यलम्। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com  पर पठाउ। ३. पद्य ३.१.1.जीवकान्‍त 2.आनन्द कुमार झा 3. सदरे आलम "गौहर" 4.जितमोहन झा (जितू)-मैथिली होली गीत ३.२.1.ज्योति सुनीत चौधरी-फगुआक खेल 2.जवाहर लाल कश्यप 1981- कौआ आउर बगरा 3  मुन्ना जी- सबला ३.३.1.रविभूषण पाठक- 1.हमर मैथिली, 2.होली 3. ई नमवरबा; 2.सुबोध ठाकुर- हम नै खेलब होली ३.४.1.राजेश मोहन झा 'गुंजन'- होलीक तरंग 2.किशन कारीगर- कक्का हमर उचक्का ३.५.1राम वि‍लास साहु-पागलप्रेमी 2.पंकज झा- अईंखक दोख आ कि हृदयक…. / आऊ चलु ३.६.नवीन कुमार आशा- आव मोन करें कमाई ३.७.1.शि‍वकुमार झा टि‍ल्‍लू 2.गजेन्द्र ठाकुर ३.८.१. जगदीश प्रसाद मण्‍डल- श्री शि‍वकुमार झा टि‍ल्‍लू'जीकेँ समर्पित- गीत २. उमेश मण्‍डल- संकलन, मूड़न गीत 1.जीवकान्‍त 2.आनन्द कुमार झा 3. सदरे आलम "गौहर" 4.जितमोहन झा (जितू)-मैथिली होली गीत - 1 जीवकान्‍त'क एकटा कवि‍ता- एक दि‍न एक दि‍न छोड़ए पड़ैछ क्षुधा सम्‍पूर्ण क्षुधा घुरा देबए पड़ैछै वनवासी बाघकेँ त्‍यागए पड़ैछै पि‍यास अछोर जे बलुआही परतीकेँ सोंपए पड़ैछै सन्‍तान-वृद्धि‍क लालसाकेँ एक दि‍न अरपि‍ देबए पड़ैछै संसार जेना गाछक टुटलाहा पात जे आगि‍ पजारबासँ बचि‍ गेल तँ वि‍लीन होइए माटि‍मे गाछक ढेग गाछी छोड़ि‍ आबि‍ कए खसैए चूल्हि‍मे वि‍लीन भेल जाइए बसातमे जरि‍-जरि‍ उड़ि‍आइए ओकर खंड-पखंड पाँच महादेशमे सोखि‍ लेल जाइए ओ हरि‍यर-हरि‍यर पातमे कि‍छु नै छै ठाढ़, ने सूर्य ने चान ने माथ महक थकरल केश ने मुँहमे सैंतल सोगहि‍-सोगहि‍ दाँत एक दि‍न अबैत छै सबहक लेल छोड़बाक दि‍न ओ क्षण भरि‍क दि‍न। 2 आनन्द कुमार झा 1 माँ मैथिलीक चरण मे अर्पित ओतबे करय छी जननी, जतबे अहाँ कहइ   छी माँ मैथिली अहाँ के, चरण मे हम परल छी ओतबे करय........................................... अहिं छी माँ जगजननी, अहिं छी माँ जगदम्बा सीता सेहो अहिं छी ,अहिं  छी काली अम्बा हमरा किछु  नै बुझल, सबटा अहिं करय छी माँ मैथिली ........................................... हमरा लग नै  किछु  अछि, बस पान र मखान के पिछरल छी सब ठाम, निश्तेज निष्प्राण भेल आबो कृपा जे करीतौं, किये ऐना रुसल छी माँ मैथिली .............................................. एहन की  हम करम केलों, हमरा अहाँ त्यागी देलौं हमहूँ  अहिं के पूत छी, हमरे पर किये जुलुम केलौं कहिया तक हमरा तेजब ,किये ने बजा रहल छी माँ मैथिली ................................................. जानी  ने कहिया स हम सब  भटकी रहल छी मिथिला के बात होय कोना, दुनियां के खटकी रहल छी सुनियौ बिनती आनंदो के किये सता रहल छी माँ मैथिली ...................................................... आनंद झा २. जं बाजी त गलत बजय छी जं नै बाजी त गर्बर छइ वाह रे दुनियां गजब के दुनियां जत देखू बस हर्बर  छइ जं बाजी ............................. आगू कोना अहाँ बढ़ी जायब धक्कम धुक्का कोना नै खायब बाहर भीतर एम्हर ओम्हर जत देखू सब ओझरल छइ वाह रे ................................ ककरा पर बिश्वाश करब ककरा कहबइ अप्पन छइ सब स्स्वारथक  मया मे जकरल बिन मुद्दा के चर्फर छइ ... वाह रे दुनियां .......................... सबहक सुनियो सबहक करियो जेम्हर कहै ये तेम्हरे चलियोय आनंदक अभिलाषित मोन मे सदिखन अतबे हलचल छइ वाह रे दुनियां गजब के दुनियां जत देखू बस हर बर छइ जय मिथिला जय मैथिली ३. करियोय कने भलाइ मिथिला के नाम पर कहिया तक भट्कब आब चलियोय  ने गाम पर जेना ले ये मैथिल बिना उजरल छइ गाम घर करियोय कने ............................ मैथिल जत गेला ओतय भेले बहूत विकाश ओकरे कान्हा पर लात राखी लोक सब छुबय लागल आकाश बलुक इ महल बनाबय मे कोना बिसरल छी गाम घर करियोय कने ................................. जं यूथ ऑफ़ मिथिला बढ़तइ   एहिना चा...रू दिश नवयुबक के इ संगठन बनायत अपने अपन भविष्य जय मिथिला के उद्घोष के लाबू सब गोटा अपना जुबान पर करियौ ...................................... 3 सदरे आलम "गौहर" गजल जैह देखू सैह बाजू हम त यैह पढने छी॰। राति के दिन कहैले हमरा केना कहै छी॥ चम्चागिरी चाटुकारिता नहिँ केलहुँ हम। ताहि द्वारे फूसक घर मे हम रहि छीः।। मिथिला देशक वासी छी हम मैथिली बाजब। अपन इ पहचान नहि कहियो बिशरै छीः॥ सभ दिन एके रंग नहि होयत छै कान धरु ई। कहियो नाह पर,कहियो गाङी पर नाह देखै छीः॥ सतयुग कलयुग मे नहि हम मोन के ओझराबी। दुनिया त ठीके छै जौ हम ठीक रहै छीः॥ हँसऽ मे सभ हँसत कानऽ मे नहि कानत। कानि के देखु तखन कहब जे ठीक कहै छीः॥ गजल जहिया जहिया कौआ बाजे टाट पर। देखै छी हम के अबैए बाट पर॥

झिल्ली मुरही कचरी एखनो भेटैए। आबि क' देखु अप्पन गामक हाट पर॥

सऊँसे घर मे पाबनि मनबैए सभ क्यो। बुढा बैसल खोखिँ रहल छथि खाट पर॥

निन्न कहाँ होई छै आब ओहि माएबाप केँ। बेटी बैसल रहै छै जकरा माथ पर॥

साफ सुत्थर सरकार कतय आई काल्हि भेटत भोट जतय आब खसबैए लोक जात पर॥

ताकै छी ओ पोखरि झाखङि कत' गेलै। डुब्बी मारि क' जाई छलौ जाहि जाठ पर॥

ठीक कहए छी मुदा खुट्टा गाङब एहि ठाम। लातक भूत कतय मानैए बात पर॥

जनता छी तेँनै सभ पार्टि ठकैए। दुध मलाई खाईए नेता खाट पर॥ 4. जितमोहन झा (जितू) मैथिली होली गीत - नव नवेली नवयौवना सँ विवाह रचेलाक बाद पतिदेव रोजगारक तलाश मे परदेश चैल जैत छथिन! ओ अपन अर्धांग्नी सँ वादा के कs गेल छथिन, की किछ दिन मे कमा - धमा कs ओ वापस गाम ओउता! तकर बाद बड्ड धूम - धाम  सँ हुनकर दुरागमन करोउता! मुदा एहेंन नै भेल! प्रियतमक बाट जोहैत - जोहैत ओय नवयुवतीक व्यथा कs हम फगुआ गीतक माध्यम सँ अपने लोकैंन के बिच व्यक्त करे चाहे छी.... लागल अछि फागुन मास यो पिया, हमर कहियो नै भेलई सुदिनवां, अगहन निहारलो, हम पूष निहारलो, माघ महिनवां मे जिया अकुलाबय, चरहल फागुनवां रिझाबई यो पिया ! हमर कहियो नै भेलई सुदिनवां !! लागल अछि फागुन......... राह देखि - देखि हमर दिनवां बीतल, जुल्मी सजनवां परदेशिया मे खटल, 'पंडित' कs हमर सुधिया नै आबई, चढ़ल अछि हमरो जवनिया यो पिया ! हमर कहियो नै भेलई सुदिनवां !! लागल अछि फागुन......... आमक गाछ पर बाजै कोयलिया, सुनी - सुनी करेजा मs लागैत अछि गोलिया, चिट्ठी नै सन्देशवां पठेलो यो पिया ! हमर कहियो नै भेलई सुदिनवां !! लागल अछि फागुन......... जल्दी सँ अहाँ टिकटवां कटायब, एहिबेर बलम हमर गवना करायब, अहाँ सँ मिल कs जियरा जुरायत, कचका कोरही सँ फूल फुलायत, छुटत संगतुरियाकें ताना यो पिया ! हमर कहियो नै भेलई सुदिनवां !! लागल अछि फागुन मास यो पिया..... दोसर फगुआ गीत.... फगुआ मे जियरा जुरायब यो पिया, हमर पाउते चिट्ठी चल आयब, गामक मोहल्ला के राह सजैत अछि, गल्ली गल्ली मे जोगीरा चलैत अछि, ढोलक के थाप पर बुढबो नाचैत छैथ, बुढबो गाबैत छैथ जोगीरा यो पिया ! हमर पाउते चिट्ठी चल आयब !! फगुआ मे जियरा............. तोरी उखैर गेल, गहुमो गहुमो पाइक गेल, आमक गाछ मे मोजर लैद गेल, सखी सहेली करैत छली मस्करियां, दूध भंगा घोटायत अपने दुवरियां, ननदों  के बहकल बोलीयां यो पिया ! हमर पाउते चिट्ठी चल आयब !! फगुआ मे जियरा............. देवर जीक मन सन - सन सनकाई, राह चलैत हुनक खूब मोंन बहकाई, देखि के जियरा डराबे यो पिया ! हमर पाउते चिट्ठी चल आयब !! फगुआ मे जियरा.............. गामक छौरा सभ बाजैत अछि कुबोली, कहलक भोउजी खेलब अहिं संग होली, रंग गुलाल सँ रंगब अहाँक चोली, भोउजी भोउजी कैह घेरयाबे यो पिया ! हमर पाउते चिट्ठी चल आयब !! फगुआ मे जियरा.............. आस परोसक लोग ताना मारैत छैथ, बूढियो मई सेहो मुह बिच्काबैत छैथ, छौरा जुआन सभ मिल खिस्याबैत छैथ, चलैत अछि करेजा पर बाण यो पिया ! हमर पाउते चिट्ठी चल आयब !! फगुआ मे जियरा............. अहाँक बिना सेजयो नै सोभई, रहि रहि जियरा हमर रोबई, अहाँक कम्मे पर करब कुन गुमानवां, सबके बलम छैथ आँखक समनवां, कोरा मे कहिया खेलत लालनमां यो पिया ! हमर पाउते चिट्ठी चल आयब !! फगुआ मे जियरा.............. सैयां "जितू" कोना गेलो भुलाई, सावन बीतल आब फगुओ बीत जाई, अहींक संगे रंगायब हम अपन सारी, कतो रहब जून पियब भाँग तारी, फगुआ मे जिया नै जराबू यो पिया ! हमर पाउते चिट्ठी चल आयब !! फगुआ मे जियरा............. ऐ रचनापर अपन मतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। 1.ज्योति सुनीत चौधरी-फगुआक खेल 2.जवाहर लाल कश्यप 1981- कौआ आउर बगरा 3  मुन्ना जी- सबला 1 ज्योति सुनीत चौधरी फगुआके खेल होलिका दहन के आगि देखैकै ईच्छा छल जाकऽ बड़का दलानमे बीचे ठाम रोकि लेलक सब रस्ता छल बड़ सुनसाने फेर स्त्री नहिं जायत छल कहियो ओहि घमासान मे बड़ी विचित्र नियम छल ई प््रादूषण बढ़ाबैत समाज आ पर्यावरणमे कियैक नहिं होलिका दाहक अग्नि प््राज्जवलित करी अपने आत्मामे ओहि सब दुर्गुणक नाश करी सबके अछि जे दूषित केने ओहि ईष्र्याके जराबी जे शत्रुता बढ़ौने अछि जे बना दैत अछि स्वार्थी जीती ओहि आसक्तिके प््राबलताक ईच्छा मारी जे कुटिलता जन्मेने अछि जे विवेक विहीन करै दमन करी ओहि दम्भके ओहि घृणाके घृणित करी जे मनुष्यता दुर्बल केलक प््रोमक ऊष्मा सऽ खेली आबसऽ फगुआके खेल के ।। 2 जवाहर लाल कश्यप 1981- पिता श्री- हेमनारायण मिश्र , गाम फुलकाही- दरभंगा। कौआ आउर बगरा

एकटा कौआ होइत अछि चुस्त - चालाक, चपल आ चतुर, चौकन्ना भऽ चारूकात ताकत,

आ खतरा के भापैत फुर्र ... सऽ उड़ि जायत।

एकटा बगरा होइत अछि निडर-निर्भीक, निरीह आ निस्चछल, लग मे आयत, चुगि - चुगि दाना खायत

आ ... भगेला के बादो फुदकि - फुदकि फेर आयत।

एकटा वात नोटिश केलहुं,

दिनानुदिन

बगरा छटल जा रहल अछि

आ ... कौआ बढल जा रहल अछि। 3  मुन्ना जी सबला  नारी! सभ दिन, पुरूषक गातमे जीवाक सुअवसर पबै-ए। आइ पिताक तऽ काल्हि पातिक। बुढ़ारी बितैत छैक संततिक छत्र छायामे। आ ओ निश्चिंत भऽ उघै-ए अपन सतीत्व। नेना- ओ नेनपन के बितबैया दुलार मलारमे रहैए खेलाइत पर पुरूषक कोरामे, उएह ओकर खेलौना सेहो होइत छैक पिता, कक्का, आओर भइया आदिक संगोरमे जुआनी- ओकरा संगी सबहक बीच बितबैए। आब ओ डेरए लगै-एपुरूषक स्पर्षसँ। परंज्च अहू ठाम ओकर रक्षक पुरूषे होइत छैक पतिक रूपमे। मातृत्व- मातृत्वक रक्षा करै-ए, संतानके सर्वस्वक अधार मानि। जीबै-ए भैसूर आ ससूरक बीच। सभ मिलि सतर्क रहैत छैक, ओकर मातृत्वक रक्षार्थ। बुढ़ारी- जँ भऽ जाइत अछि विधवा, शोक संतप्त भऽ जीबाक लेल होइ-ए बाध्य, परञ्च सत्य! कही तऽ- ओ तऽ एखनो सुरक्षित अछि। किएक तऽ डेन धऽ सत्य के भोगबाक सामर्थ्य देबाक लेल तैयार अछि पुत्र। वास्तवमे अब्बल तऽ ओ भेल-ए पितृहीन भऽ के। ऐ रचनापर अपन मतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। 1.रविभूषण पाठक- 1.हमर मैथिली, 2.होली 3. ई नमवरबा; 2.सुबोध ठाकुर- हम नै खेलब होली 1 रविभूषण पाठक 1.हमर मैथिली ने बातमे,ने जजात मे पोखरि सँ धार फेर धार सँ नदी जँका हमर मैथिली रूकल,ठमकल,सुखाएल,कदुआएल मैथिली नइ हमर मैथिली बहि रहल अछि ‘बालचंद बिज्जावइ ‘ क गाँव सँ ‘मैला आँचल‘ तक आ दिनकर क सिमरिया सँ जनकपुर धाम तक ओहिना निधोख ओहिना पवित्र मात्र नदी क नाम बदलैत छैक बागमती कखनो कोशी कखनो गंगा कखनो अधवारा भ‘ ओहिना बहि रहल अछि उपर सँ नीचा अहिगर सँ पातर दिश हमर मैथिली मे किताबक फूल कम आ यज्ञाश्व क हिनहिनाहट त एकदम नदारदे बूझू संध्या -धूपदीप क गंध नहि मजूरक पसीना भेटत आ ओहि पसीना मे पंजाबी,बंगाली,संथाली कखनहु पड़ोसी भोजपुरी ,मगही,नेपालीक शब्द ओहिना मिलत जहिना गहुम क कूड़ी मे कखनो कखनो तोरी आ तीसी हयओ सरकार ! हमरा मैथिली मे की संस्कार खोजब? हम छी दछिनबरिया मोटपसम राड़ हमर कटाह बोली क लेल पुरान उपमा भ गेलए कंसार क लावा अहाँ खोजू हमर दुष्ट ,धृष्ट,निकृष्ट मैथिलीरूप क लेल संज्ञा ,विशेषण आ विस्मयाधिबोधक शब्द आ चिह्न !! आ हम लिखइ छी फेर एकटा कविता ओएह कटहा मैथिली मे आ अहाँ बनबू कोमल कान्त पदावली क दुर्ग हम निछन्द,भदेस,भठियार मैथिली क संग बढि रहल आगू हमर संग अछि कोटि कोटि जनक दुखदर्द उत्साह आ आशा आहूँ बढ़ू जाति आ दिशा क संग संग हमरा संग भुवन भास्कर छथि आ उदयनाचार्य ओएह जे नास्तिके नइ भगवानो सँ लड़लथि एक ढ़ुहि हे !!कुलगोत्रक सोइत तमाशा हमरा संग मे अछिए की? डीह क उस्सर खपटैल खेत आ बागमती करेहक रक्तिम नेत्र आँखि खुजिते डूबि जाइछ खेत-पथार,मंदिर,पोखरि सहित जिला जवार आ परोपट्टा साँप कीड़ा क दया मोटका खोरा चाउर आ बी बी सी रेडियो पर जीवैत अपन गामघर आ देवता के हम उघार नइ करब । जहिना बात मे तहिना जजात मे कोनो लैस नइ ताहि दुआरे लीची सठि जाइछ पाँच कोस पहिने आ मखान क गंध तीन कोस बादे मिलत अछि केवल मकइ क ठोस शिष्टाचार आ तमाकू क पूरजोर लट्टमपट कट्ठा दसमोन अल्हुआक मीठ आ गुबगुब भाग्य कत‘पाएब कविवर? द्विविधा नइ चौपाड़ि पर छी फँसल सुमन,आरसी कोस भरि पर आ यात्री दस कोस उत्तर विद्यापति सेहो पन्द्रह कोस पर दिनकर बीस कोस दक्षिण आ पचास कोस पुरब छथि रेणु कखनो कखनो बागमती क धार संग तिरमुहानी मे गंगा सेहो देखैत छी ते निराला प्रसाद सेहो अबूझ नइ ओना गंगा दस कोस पहिले विसूखि भरमाबइ छथि हिंदी आ मैथिली के बीच छोड़ू ई बात यदि कविता मे हो प्रश्न पूछबाक गुंजाइश तखन कहू जे दिनकर आ रेणु के मैथिली मे नइ लिखबा क दोषी के? ओ स्वयं वा अहाँ हे मैथिलीपारिजात के सुमन,किण,अमर । आ तमाम कविगण जनिका कविता मे बान्हल रूप आ छन्द मे थक्का लिखबा क बीमारी छन्हि नबका बात,हवापानि के जे एंटीबायटिक खा के रोकैत छथि आ राजकमल ,यात्री के पानि पीबि के गरियाबइ छथि । अपन असभ्यता के साथ हम पुनःपुनःउपस्थित छी उदयनाचार्य क गौंवा आ राजकमल चौधरी क दियाद । गाँव क एक पलटन लोक तैयार छथि दिल्ली,पंजाब,कलकत्ता क लेल रेलक अनारक्षित डिब्बा क भीड़,गंध,पसीना,टीटी,कुली सँ बचैत रेलक छत,इंजन,शौचालय, डिब्बा क ज्वांइट पर बैसल तमाकुए नइ बोली,टोनक मर्दन करैत ई जनसमुद्र बढ़ि रहल अछि लालकिला दिस । मैथिलीपुत्र घूमि रहल छथि भारत आनि रहल छथि किछु नबका शब्द,गंध,चित्र ,बात उजरल धरती हुलसि रहल अछि कविता आ सपना सँ आगू किछु ठोस आश्वासनक साथ । 2.होली आएल छतीसा क्षण बीतल खन बारहमासा अहिना तहिना गएल पचीसा फूजल भक नहि खुलल गाल नहि नेाचउँ केश देखबउँ बतीसा किछु कविता अधलिखल कहानी बिनु किछ कएने बीतल जवानी बीतल पैंतीस आएल छतीसा धवल केश भभकए चालीसा ग्रंथ छपल नहि पुरः कार नहि बिन गुट गुरू के लगत पार नहि हे अकादमी यूनिवर सिटी ज्ञानपीठ के ध्यान धरै छी नमहर गुरू नमहर सम्माना लिखब लघु गुरू ऐ विधि नाना । 3.ई नामवरबा (हिंदी आलोचकक व्यथा) ई नामवरबा बहुत सताबइ कखनो टीवी कबहुँ रेडियो ब्लॉग , न्यूज पर आबइ । तुरते मम्मट तुरत लोंजाइनस मुक्तिबोध बताबइ की कविता नाटक वृतांत पर अजबे गजब सुनाबइ नागार्जुन अपभ्रंश हजारी सबहक सत्व दिखाबइ । लिख मारलक दू चारि किताब बस बाजि बाजि घोलटाबइ । आब रमत नहि लिखत पढ़त मे बात से बात निकालइ । बाज बाज बौआ दिन तोहर शणियो सुघड़ मंगलबो गाबइ ई नामवरबा बहुत सताबइ । की खाइ छें कोन पानि पीबए छें घाट घाट के बानि बजए छें हमरो दे किछ जंतर मंतर बाजी कम गुण अधिक सुनाबइ ई नामवरबा बहुत सताबइ ! ई नामवरबा बहुत सताबइ ! 2 सुबोध ठाकुर हम नै खेलब होली जुनि सुना घुलल घमल बोली हे गे करिक्की कोइली हम नै खेलब होली प्रियतम बसै दूर देश छै हृदएमे उठए कलेश छै एनामे के भिजायत मोर चोली हम नै खेलब होली अछि वसंत उन्माद नेने परंच हमरा मनमे विषाद देने नै सोहायत हमरा ई बसंतक रंगोली हम नै खेलब होली पिया देने ई आस छल फगुआमे पटोर आनब, कहने ई बात छल मुदा आब लगैत केने छलाह ओ ठिठोली नै-नै हम नै खेलब होली नै कुनु उमंग अछि नै कुनु तरंग अछि केकरा लग हम अपन वेदनाक गीरह फोली नै खेलब हम होली बेर-बेर्अ पुरवा आबि अँचरा उड़ाबए फगुआ बयार आबि विरहकेँ जगाबए महकि उठए मन जेना फूल चमेली मुदा नै हम खेलब होली कहै सुबोध धनी जुनि हीया हारू गाबि विरह पियाकेँ कहा पठाबू काँचे उमेरियाक सप्पत दियाबू देखू पिया आबि करताह बरजोड़ी तखन अहूँ खेलब होरी ऐ रचनापर अपन मतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। 1.राजेश मोहन झा 'गुंजन'- होलीक तरंग 2.किशन कारीगर- कक्का हमर उचक्का 1 राजेश मोहन झा 'गुंजन' होलीक तरंग- बुढ़वोक तनपर आएल जुआनी दाँत झड़ल छन्‍हि‍ करकर मोँछ ऐ भेटकेँ अपने की बूझब हम देखै छी हमहीं बूझै छी औ बाबू ई कि‍छु आर नै थि‍क होरीक बसातपर जागल पि‍रीत सटकू बाबूक एलखि‍न सारि‍ होलि‍क रंगमे रंगल दुआरि‍ कुरता फाड़ि‍ कऽ फगुआ गाबथि‍ छोटका बाबा ढोल बजाबथि‍ देख तमाशा बाबी भेलि‍ सन्न आब ने देब पानि‍ ने अन्न जुनि‍ रूसु हमर पुरनी रानी होली देख छॅटेलौं कानी बूढ़ भेलौं मुदा मोन तँ बच्‍चे पुनि‍ आएल जुआनी बात ई सत्ते चारि‍ कहार संग हरि‍यर डोली मोन पड़ए जुअनकी होली आरो लोक हमरोसँ बीस छथि‍ सटल सारि‍ संग जेना उड़ीस छथि‍ भांङ संग मरसटका खीर पूस खाटे कटलनि‍- होरीक वीर ऐ बरख पार केलनि‍ अस्‍सी होलीमे अंग्रेजी संग खस्‍सी बदनाम भेली मुन्नी संग शीला देख ल‍अ बूढ़बाक लीला बैस संगमे गि‍लासक गि‍लास पोता सबहक संग बाबो पास ई कथा थि‍क ऐ होरी केर राजा भेला राजमोहन बदनाम पि‍याजक नोरमे होरी भीजल पटना जुआन आ दि‍ल्‍ली पुरान। 2. किशन कारीगर कक्का हमर उचक्का । होली पर हास्य कविता ओंघराइत पोंघराइत हरबड़ाइत धड़फराइत धांई दिस बान्हे पर खसलाह कक्का हमर उचक्का होरी मे बरजोरी देखी मुस्की मारैत काकी मारलखिन दू-चारि मुक्का।। धिया-पूता हरियर पीयर रंग सॅं भिजौलकनि बड़की काकी हॅसी क घिची देलखिन धोतीक ढे़का पिचकारी मे रंग भरने दौगलाह हमर कक्का अछैर पिछैर के बान्हे पर खसलाह कक्का हमर उचक्का।। होरी खेलबाक नएका ई बसंती उमंग ततेक गोटे रंग लगौलकनि मुॅंह भेलैन बदरंग काकी के देखैत मातर कक्का बजलाह आई होरी खेलाएब हम अहींक संग।। कक्का के देखैत मातर काकी निछोहे परेलीह आ बजलीह होरी ने खेलाएब हम कोनो अनठीयाक संग जल्दी बाजू के छी अहॉं नहि त मुॅंह छछारि देब घोरने छी आई हम करिक्का रंग।। भाउजी हम छी अहॉक दुलरूआ दिअर होरी खेला भेल छी हम लाल पिअर आई त भैयओ नहि किछू बजताह जल्दी होरी खेलाउ एहेन मजा फेर भेटत नेक्सट ईअर।। सुहर्दे मुॅंहे मानि जाउ यै भाउजी नहि त करब हम कनि बरजोरी होरी मे त अहॉ जबान बुझाइत छी लगैत छी सोलह सालक छाउंड़ी।। आस्ते बाजू अहॉक भैया सुनि लेताह कहता किशन भए गेल केहेन उच्का केम्हरो सॅ हरबड़ाएल धड़फराएल औताह छिनी क फेक देताह हमर पिनी हुक्का।। आई ने मानब हम यै भाउजी फुॅसियाहिक नहि करू एक्को टा बहन्ना आई दिउर के भाउजी लगैत अछि कुमारि छांउड़ी रंग अबीर लगा भिजा देब हम अहॉक नएका चोली।। ठीक छै रंग लगाउ होरी मे करू बरजोरी आई बुरहबो लगैत छथि दुलरूआ दिअर ई सुनि पुतहू के भाउजी बुझि होरी खेलाई लेल बान्हे पर दौगल अएलाह कक्का हमर उचक्का।। ऐ रचनापर अपन मतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। 1राम वि‍लास साहु- पागलप्रेमी 2.पंकज झा अईंखक दोख आ कि हृदयक…. / आऊ चलु 1 राम वि‍लास साहु कवि‍ता- पागलप्रेमी बसंतक मास मधुराएल अछि‍ भौरा मंजरपर गुंजन करैत अछि‍ महुआक फूूलसँ रस टपकैत अछि‍ फागक मन्‍द हवा मन ललचाबैत अछि‍ चहु ओर चहकैत चि‍ड़ै चुनमुन फूलक सेजसँ धरती सजल अछि‍ ओसक कण मोती बनल अछि‍ मुदा हमरासँ हम साजन बि‍गरल अछि‍ चि‍ड़ि‍या चुनमुन हमरा जगाबैत अछि‍ चन्‍दाक चाँदनी बादलसँ मि‍लैत अछि‍ साजन बि‍नु हमर सुहाग उजड़ल अछि‍ जेना शराबी शराब पी क' पड़ल अछि‍ राति‍-दि‍न हमर मन घबराएल रहैत अछि‍ आशा हमर नि‍राशामे बदलल अछि‍ साजन बि‍नु हमर मन पागल बनल अछि‍ पागल प्रेमी नालायक बनल अछि‍। 2. पंकज झा अईंखक दोख आ कि हृदयक…. अईंखक कोन दोख, जे अहाँक सुन्दरता नई देखलक, ओ त देखै टा मात्र छै, बुझै नई छै, बिम्ब आ प्रतिबिम्बक, बिच फंसल मात्र एकटा पराबर्तक  छै, दोस त ह्रदय के छै, जे भावना शुन्य  छै, तैं अहाँक सुन्दरताक झीलों मे, मरुभुमिक दग्धातक देखै छै, ओना जे आन्हरो छैथ, से कल्पनाक ब्रश स, सुन्दरताक सृजन हृदयक भाव स करैत छैथ, मुदा ! जे भाव विहीन छैथ, अईंख रहितो, बिम्ब-प्रतिबिम्ब मे ओझराइल रहैत छैथ, अई मे हुनको कोनो दोख नई, जे भाव विहीन छैथ, यन्त्र बनी बरद  जँका, जीवनक दाउन मे लागल छैथ, हुनका त आभासों नई छैन, कि अहू स बिशेष किछ छैई, मुद्रा-मतलबक डोरी मे बन्हैल, सुखैल बासि खैक आदि, स्वक्षताक रस स दूर, जीवनक मकरजाल मे, फंसल छैथ, हेराइल छैथ, आऊ चलु आऊ चलु, हाथ पकरु, मोन मिलाउ, विश्वाष बढाऊ, सत्यक सोझ दिशा मे, चलैत चलि … चलैत चलि, प्रयाश करी, एक दोसर के गीत सुनी, एक दोसर के मीत बनी, अहँ जरा, ओकर भस्म लगा, प्रेमक रश मे स्नान करी, रँग रुप, कोनो ऊँच नीच ने, सहज भाव स, झुमि ऊठी, आँग-समाँग, ज्ञाण-विज्ञान, कला-श्रीजन के ध्यान करी, जिवनक रौद-बसात के, मोनक सब मलाल के, भरीभरीक पिचकारी मे, रंग स सराबोर करी, जीवन पथ पर सँगे-सँगे, चलैत रही...चलैत रही | ऐ रचनापर अपन मतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। नवीन कुमार आशा आव मोन करें कमाई

कि कहू यो टूना भाई आव मोन करें कमाई दोस लोकनि सेहो धेलथि बाट एखन धरि हम पकड़ने दी खाट। माई बाप नहि कहथि किछु नहि ताकथि हमरा पिछु नहि वो कहथि त हम नहि सोचि इ तय अछि हुनक अपमान। जखन-जखन दुविधा मय आबी दथि वो हमर संग बच्चा सँ पकर लथि वो हाथ आब बने अछि हम दि साथ। जखन-जखन तड़ते इ मोन नहि किछु करि पाबि वो छन हर दम घुटि-घुटि के जीबी हर दुख के विस जकाँ पिबी आँखिक नोर बहावि कोना ओकर तोड़ पाबि कोना उपर सँ रहि हम खुष आ भीतरे भीतर काने मोन कालि रातिक बात कहिओं रातिक में कानेक भेल मोन नहि भेटल ककरों संग फेर भेटल निर्जिव क संग टोकरे पकरि कलों अलाव। लेक आब कहे यो भाई भय गेले छौड़ा बढ अलोकिक नछि हम अलोकिक आ लगे लोकक लाज बुझी हम ओकर इलाज। माई बाप नहि बुझी पावथि तखन कोढ फाटे यो। कि करथिन ओलोकइन छियनी तय हुनक आस। कखनो-कखनो मोन करइ अछि द दि हम अपन परान। जखन आवे इ बिचार तखन होई माई बापक बिचार फेर हुनका सोची रूक जाय माने जो आई हम फसरी लगेवे कि नहि घटथि हुनक मान फेर खाई एकटा कसम जखन धड़ी रहत पड़ान नहि छोड़ब हुनक ध्यान कि ऐ रचनापर अपन मतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। 1.शि‍वकुमार झा टि‍ल्‍लू 2.गजेन्द्र ठाकुर 1. शि‍वकुमार झा टि‍ल्‍लू कवि‍ता मुदा जीबै छी जीवनक डोरि‍ फुजि‍ उड़ल व्‍योममे कातर प्राण मुदा जीबै छी सड़ल वसन पजड़ल अछि‍ आंगुर गलल ताग गुदरी सीबै छी.... ककरो बाड़ी बेली फुलाएल ककरो पोखरि‍ भैंटक लावा हमरा घरक परथनो गि‍ल्‍ल भेल ऑचक बि‍ना सुन्न अछि‍ तावा कागत-मुद्राकेँ बीड़ी बना कऽ कोंढ़सँ लेसि‍-लेसि‍ पीबै छी..... लाल रंग शोणि‍त सन टपकय पीत कुटि‍ल पि‍लहा बनि‍ धधकय कुपि‍त होलि‍का छाॅह देखाबथि‍ बड़ीपर काक-भुसुण्‍डी हबकय अग्‍नि‍देवक हथ्‍थ डाॅङसँ सुधाकेँ खोड़ि‍-खोड़ि‍ जड़बै छी.... कटाह वसंत कहि‍यो नै आबथि‍ राखथु अपने संग वि‍धाता कुसुमि‍त रहै सबहक आङन घर हॅसि‍-हॅसि‍ कौड़ी खेलथि‍ पुनीता अपन संत्रासकेँ हि‍यामे नुका कऽ सबहक सुखक कामना करै छी.....।। 2 गजेन्द्र ठाकुर गजल की कहबै जे लुझतै ओ, कोना कहने बुझतै ओ आँखिक नोर खसतै रूसतै आ फेर बजै ओ दाबी देखेतै जखन से देखबै नुका अँचरासँ बहरा ाइ छी हम मुदा घबरा कऽ, नै ताकै ओ कोन बातपर तमसाइत अछि नै बुझलिऐ यौ असोथकित आँखि लेने ओङठल पियासल ओ सर्वज्ञानी बनल हम जाइ ऐ देशकेँ छोड़ने छोड़ल गेल नै हएत बनल पाथर-मूर्ति ओ उड़ै अछि अनेरे ई चिड़ै नील अकाशक बिच हमर मोनो उड़ैए देखैए नै किअए अछि ओ चम्मन फूल भमरा गुम्म जब्बर छी सोझाँ ठाढ़ जलबाह सोझाँ माँछ बनल हमरा देखैए ओ बनि माँछ आकुल छी बाझब ऐ जालमे कखन फँसि त्राण पाएब आ आँखि बओने देखत की ओ धानी रंगक ई आगि देखल हम पियासल छी धाना ठाढ़ अछि शान्त निश्छल मुखाकृति लेने ओ देशक धान अछि खखरी बनल, आगि धानी भेल कखन जाइ ओइ देश जे पियासल, देखै नै ओ धानी रंगक आगि आ पानि बनल ओकर संगी धौरबी बनल हम आइ रूसत बुझत नै ओ धुधुनमुहाँ बनल छी धोधराह गाछक सोझाँ आगि जरबैत बनेलक फाहा बूझि देखल ओ मिरदङियाक ध्वनि तरंग धारमे भँसियाइ ओइ मोनिमे घुरमैत अकुलाइत देखै नै ओ ऐ आँखिमे जे नोर एतै आ खसेतै आबि ओ सोझाँ कहिया देखि हकासल हमरा जे दबाड़त ओ देखितिऐ अँचरासँ आ बहरा जाइ दुअरासँ चिड़ै उड़तै तँ उड़तै मोनसँ बेसी कोनो की ओ सगुन बान्हसँ बान्हल ऐ मोनक उछाही बिच सगुनियाँ छी बनल ठाढ़ कहिया देखत ई ओ हरसट्ठे स्वयंसँ अपन चेन्हासी मेटा लेलक माटिक मूरुत हम हरपटाहि बनेलक ओ छरछर बहल धार मोनक कतऽ अछि गेल बहि धेलक बाट आ उधोरनि बनल अछि ओ ऐ रचनापर अपन मतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। १. जगदीश प्रसाद मण्‍डल- श्री शि‍वकुमार झा टि‍ल्‍लू'जीकेँ समर्पित- गीत २. उमेश मण्‍डल- संकलन, मूड़न गीत १. जगदीश प्रसाद मण्‍डल श्री शि‍वकुमार झा टि‍ल्‍लू'जीकेँ समर्पित- गीत ओढ़ि‍ दुपट्टा नम-गम केर बति‍ वसंती बौड़ाइ छै खटमीठ रस चूसि‍-चूसि‍ ति‍रपि‍त भए औनाइ छै सुरभि‍ सुगंध पीब सि‍हरि‍ कू-कू कए कुकूआइ छै चेत मन मधु स्‍वर तानि‍ बि‍लति‍-बि‍लति‍ बि‍लबि‍लाइ छै दसो दुआरि‍ दृष्‍टि‍ दौगाए चनकि‍ चैत चुनचूनाइ छै। २ उमेश मण्‍डल संकलन, मूड़न गीत गोसाउनि‍ नोतक गीत बट्टा भरि‍ चानन रगड़ल पाने पत्र लि‍खल हे। ताहि‍ पान नोतब गोसाउनि‍ जे नि‍त पूजि‍ थि‍कि‍ हे। ताहि‍ पान नोतब पि‍तर लोक जे नि‍ज आशि‍ष देथि‍ हे ताहि‍ पान नोतब ऐहब लोक जाहि‍ स मंगल हैत हे। मूड़न बेरक- कौने बाबा दि‍नमा गुनाय जग ठानल हे। कौने बाबी पड़ि‍छथि‍ केश ि‍क होड़ि‍या के मूड़न हे। लाल पीयर चीर पहि‍रब केश परीछब हे बाँस पुरैन लेल खोंइछ कि‍ होड़ि‍लाक मूड़न हे देबउ हजमा बड़ इनाम कि‍ होड़ि‍लाक मूड़न हे। शुभ-शुभ काट हजमा केश कि‍ होड़ि‍लाक मूड़न हे। लावा भुजै कालक लाव भूजय बैसली बहि‍नि‍या चुलहा दहि‍नि‍या हे। हे सुन्‍दरि‍ मंगल आगि‍ पजारल हे सात्री पत्र मे राखल लावा पुनि‍ भूजल हे। दुलहि‍न गृह मे बैसि‍ जे ब्‍याहल हे। कहय हे सखि‍ सभ आनन्‍द मनावि‍य प्रभु गोहरावि‍य हे। जुगे-जुगे बढ़ू अहि‍बात कि‍ अइहब गाबि‍य हे। महेशवाणी दुर-दुर छीया ए छीया, एहन बौराहा बर संग जयती कोना धीया पाँच मुख बीच शोभनि‍ तीन अंखि‍या सह-सह नचै छनि‍ सांप सखि‍या दुर-दुर.....। काँख तर झोरी शोभनि‍, धथूर के बीया दि‍गम्‍बर के रूप देखि‍ साले मैना के हीया दुर-दुर.....। जँ धि‍या के वि‍ष देथि‍न पि‍आ कोहबर मे मरती धीया भनहि‍ वि‍द्यापति‍ सुनू धीया के माय बैसले ठाम गौरी के गुजरि‍या दुर-दुर......। ऐ रचनापर अपन मतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। विदेह नूतन अंक मिथिला कला संगीत १.श्वेता झा चौधरी २.ज्योति सुनीत चौधरी ३.श्वेता झा (सिंगापुर) १ श्वेता झा चौधरी गाम सरिसव-पाही, ललित कला आ गृहविज्ञानमे स्नातक। मिथिला चित्रकलामे सर्टिफिकेट कोर्स। कला प्रदर्शिनी: एक्स.एल.आर.आइ., जमशेदपुरक सांस्कृतिक कार्यक्रम, ग्राम-श्री मेला जमशेदपुर, कला मन्दिर जमशेदपुर ( एक्जीवीशन आ वर्कशॉप)। कला सम्बन्धी कार्य: एन.आइ.टी. जमशेदपुरमे कला प्रतियोगितामे निर्णायकक रूपमे सहभागिता, २००२-०७ धरि बसेरा, जमशेदपुरमे कला-शिक्षक (मिथिला चित्रकला), वूमेन कॉलेज पुस्तकालय आ हॉटेल बूलेवार्ड लेल वाल-पेंटिंग। प्रतिष्ठित स्पॉन्सर: कॉरपोरेट कम्युनिकेशन्स, टिस्को; टी.एस.आर.डी.एस, टिस्को; ए.आइ.ए.डी.ए., स्टेट बैंक ऑफ इण्डिया, जमशेदपुर; विभिन्न व्यक्ति, हॉटेल, संगठन आ व्यक्तिगत कला संग्राहक। हॉबी: मिथिला चित्रकला, ललित कला, संगीत आ भानस-भात। २. ज्योति सुनीत चौधरी जन्म तिथि -३० दिसम्बर १९७८; जन्म स्थान -बेल्हवार, मधुबनी ; शिक्षा- स्वामी विवेकानन्द मि‌डिल स्कूल़ टिस्को साकची गर्ल्स हाई स्कूल़, मिसेज के एम पी एम इन्टर कालेज़, इन्दिरा गान्धी ओपन यूनिवर्सिटी, आइ सी डबल्यू ए आइ (कॉस्ट एकाउण्टेन्सी); निवास स्थान- लन्दन, यू.के.; पिता- श्री शुभंकर झा, ज़मशेदपुर; माता- श्रीमती सुधा झा, शिवीपट्टी। ज्योतिकेँwww.poetry.comसँ संपादकक चॉयस अवार्ड (अंग्रेजी पद्यक हेतु) भेटल छन्हि। हुनकर अंग्रेजी पद्य किछु दिन धरि www.poetrysoup.com केर मुख्य पृष्ठ पर सेहो रहल अछि। ज्योति मिथिला चित्रकलामे सेहो पारंगत छथि आ हिनकर मिथिला चित्रकलाक प्रदर्शनी ईलिंग आर्ट ग्रुप केर अंतर्गत ईलिंग ब्रॊडवे, लंडनमे प्रदर्शित कएल गेल अछि। कविता संग्रह ’अर्चिस्’ प्रकाशित। ३.श्वेता झा (सिंगापुर) विदेह नूतन अंक गद्य-पद्य भारती १. मोहनदास (दीर्घकथा):लेखक: उदय प्रकाश (मूल हिन्दीसँ मैथिलीमे अनुवाद विनीत उत्पल) मोहनदास (मैथिली-देवनागरी) मोहनदास (मैथिली-मिथिलाक्षर) मोहनदास (मैथिली-ब्रेल) २.छिन्नमस्ता- प्रभा खेतानक हिन्दी उपन्यासक सुशीला झा द्वारा मैथिली अनुवाद छिन्नमस्ता उदय प्रकाश (१९५२- ) “मोहनदास”- हिन्दी दीर्घ कथाक लेखक उदय प्रकाशक जन्म १ जनवरी १९५२ ई. केँ भारतक मध्य प्रदेश राज्यक शहडोल संभागक अनूपपुर जिलाक गाम सीतापुरमे भेलन्हि। हुनकर हिन्दी पद्य-संग्रह सभ छन्हि: सुनो कारीगर, अबूतर कबूतर, रात में हारमोनियम, एक भाषा हुआ करती है। हिनकर हिन्दी गद्य-कथा सभ छन्हि: तिरिछ, और अन्त में प्रार्थना, पॉल गोमरा का स्कूटर, पीली छतरी वाली लड़की, दत्तात्रेय के दुख, अरेबा परेबा, मैंगोसिल, मोहनदास। मोहनदास- दीर्घकथा लेल हिनका साहित्य अकादेमी पुरस्कार २०१० (हिन्दी लेल) देल गेल अछि। अनुवादक: विनीत उत्पल  (१९७८- ) आनंदपुरा, मधेपुरा। प्रारंभिक शिक्षासँ इंटर धरि मुंगेर जिला अंतर्गत रणगांव आ तारापुरमे। तिलकामांझी भागलपुर, विश्वविद्यालयसँ गणितमे बीएससी (आनर्स)। गुरू जम्भेश्वर विश्वविद्यालयसँ जनसंचारमे मास्टर डिग्री। भारतीय विद्या भवन, नई दिल्लीसँ अंगरेजी पत्रकारितामे स्नातकोत्तर डिप्लोमा। जामिया मिल्लिया इस्लामिया, नई दिल्लीसँ जनसंचार आ रचनात्मक लेखनमे स्नातकोत्तर डिप्लोमा। नेल्सन मंडेला सेंटर फॉर पीस एंड कनफ्लिक्ट रिजोल्यूशन, जामिया मिलिया इस्लामियाक पहिल बैचक छात्र भs सर्टिफिकेट प्राप्त। भारतीय विद्या भवनक फ्रेंच कोर्सक छात्र। आकाशवाणी भागलपुरसँ कविता पाठ, परिचर्चा आदि प्रसारित। देशक प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिका सभमे विभिन्न विषयपर स्वतंत्र लेखन। पत्रकारिता कैरियर- दैनिक भास्कर, इंदौर, रायपुर, दिल्ली प्रेस, दैनिक हिंदुस्तान, नई दिल्ली, फरीदाबाद, अकिंचन भारत, आगरा, देशबंधु, दिल्ली मे। एखन राष्ट्रीय सहारा, नोएडा मे वरिष्ट उपसंपादक। "हम पुछैत छी" मैथिली कविता संग्रह प्रकाशित। मोहनदास पोथीक आवरण चित्र मार्कूस फोरनेलक चित्रक उदय प्रकाश द्वारा रूपान्तरण। (उदय प्रकाश जीकेँ "विदेह" विनीत उत्पलकेँ "मोहनदास"क मैथिली अनुवादक अनुमति देबाक लेल धन्यवाद दैत अछि- गजेन्द्र ठाकुर- सम्पादक।) मोहनदास : उदय प्रकाश (मूल हिन्दीसँ मैथिलीमे अनुवाद विनीत उत्पल द्वारा) मोहनदास: पाँचम आ अंतिम खेप ओरियंटल कोल माइंसक इंक्वायरी कमेटीक रिपोर्टक बाद मोहनदास टूटि गेल। घनश्याम आओर गोपालदास जनरल मैनेजर एस.के. सिंहसँ एक बेर आओर भेँट कऽ हुनकासँ दोबारा इंक्वायरी करबाक मांग केलक मुदा ओ कहि देलकन्हि जे बेर-बेर ई नै हएत।  हमर सभसँ सक्षम आ ईमानदार अधिकारी एकर जाँच केलक, दोबारा इंक्वायरीक आदेश  दऽ कऽ हम हुनकापर संदेह पैदा नै हेबऽ दै चाहै छी। बादमे पता चलल जे बिसनाथ आ अमिता जनरल मैनेजरकेँ सेहो लेनिन नगरक अप्पन घरपर बजा कऽ  खुआयब-पिआयब शुरू कऽ देने छल आ ओकर कनियाकेँ सेहो "समाज सेवा' आ किटी पार्टीमे इनवाल्व कऽ देने छल। कोल माइंसमे अफवाह ईहो छल जे अमिता जनरल मैनेजर एस. के. सिंहकेँ फाँसि लेने छै आ आब रहरहाँ ओकर कार लेनिन नगरक फ्लैट नंबर ए बटा एगारहक बाहर मोहनदास, कनिष्ठ आगार अधिकारीक फाटकपर ठाड़ रहैत छ। खबर ईहो छल जे बिसनाथ सेहो हुनका पटा लेने अछि। सिंह साहेब ओहिनो मौज-मस्ती, खाइ-पीबैक शौकीन लोक  छल। मोहनदास टूटि कऽ छिड़िया गेल। नै तँ ओ ठीकसँ खा सकैत छल, नै तँ सुति सकैत छल। कोनो काजमे ओकरा मोन नै लागै छलै। केहन-केहन प्रश्न आओर संदेह ओकर दिमागमे आबैत छल आ ओ बेचैन भऽ जाइत छल। ओकरा लागैत छल जे जत्ते लोक नौकरीमे छै वा ऊँच जगहपर बैसल छै, कारमे घूमि रहल छै आ जे नाम आ चेन्हसँ ओ सभ जानल जा रहल छै ओ असलमे कियो आर छै आ ओ जालसाजी कऽ कोनो आन मुखौटा लगा रखने छै। की लेनिन नगरमे कोनो असली लोक, अप्पन नाम, वल्दियत, पता-ठेकानक बचलो छै वा सभ बिसनाथे सन बहुरूपिया आ डुप्लीकेट छै?  मोहनदासकेँ सेहो अपनापर संदेह हुअए लागल जे आखिर ओ के छी?  मोहनदास वा बिसनाथ? आकि ओ एम.जी. डिग्री कॉलेजसँ बी.ए. क परीक्षामे जे डिग्री पौने छल ओ बिसनाथक लेल छल?  की सभक संग अहिने होइत छै? ओ घरक भितरे कोनमे सरकारी रोजगार दफ्तरसँ पठाओल गेल पुरनका पोस्टकार्डकेँ तकैत रहतिऐ। नै भेटलापर कस्तूरीसँ लड़ितिऐ-झगड़ा करितिऐ। ओ किछु बरख पहिलुका एहन कतेक पोस्टकार्ड ताकि कऽ निकालने छल, जइमे ओकर नाम आ पता लिखल छलै। ओ गाममे अप्पन लोककेँ ओ सभ चीज देखाबै छल। लोक सभ या तँ चुप रहैत छल वा ओकरा कोनो अफसर आकि नेतासँ भेंट करबाक सलाह दैत छल। मोहनदास जेहन हालम ल, ओइमे एहन भऽ सकब संभव नै रहि गेल छल। पुरबनराक सरपंच पंडित छत्रधारी सेहो ई लिखित प्रमाणपत्र दऽ देने छल जे बिसनाथ पुरबनराक मोहनदास छी। ओकर बेटा विजय तिवारी तँ ओहिनो बिसनाथसँ मिलल छल। कस्तूरीपर ओकर नजरि सेहो छलै आ गिदरमारा जकाँ ओ अही इंतजारमे छल जे एक नै एक दिन टूटि कऽ मोहनदास ओकर पएरपर आबि खसत आ ओकर महिसवारीक काज सम्हारि लेत। मोहनदास देखैत छल जे सरकार दिससँ ग्राम पंचायतकेँ जे हैंडपंप स्वीकृत होइत रहै ओ पैघ लोकक घरक आगू लागि जाइ छलै। शिक्षाकर्मीक नियुक्ति होइत छल,  स्त्रीगणक लेल आंगनबाड़ी आ शिक्षिकाक पद निकलैत छल, इंदिरा आवास योजनामे घर बनाबै लेल अनुदान भेटै छल, इनार आ खेतकेँ ठीक करबा लेल ग्रामीण विकास विभागसँ टका अबैत छल, नेहरू रोजगार योजनामे शिक्षित बेरोजगारक लेल कोनो परियोजना आबैत छल तँ ई सभ ओइ लोकक बीच बँटि जाइ छलै। शारदा आ देवदास कहैत छै जे स्कूलमे दुपहरियामे जे खेनाइ बँटै छै ओइमे भेदभाव होइत छै। ओइ दिन मोहनदास कतेक बरखक अप्पन नेनाक संगी बीरन बैगाक घर जा कऽ महुक दारू उतरबौलक आ सुगरक माउस बनबौलक। संगमे ओकर साढू गोपालदास सेहो छल। ओ चारि-पाँच लोक छल आ साँझ सात बजेसँ ओ सभ पिनाइ शुरू कऽ देलक। ढोल-मंजीरक इंतजाम करने रहय। ओइ दिन मोहनदासकेँ "विंध्यांचल हैंडीक्राफ्ट' बला सेठ बाँसक मालक भुगतान केने छल। बारह सए टका ओकरा भेटल छलै। गोपालदासक जेबी सेहो ओइ दिन भरल छल। घर तँ बीरन बैगाक छल मुदा दारू-माउसक सभटा खर्चा मोहनदास उठेने छल। बीरनक घरबाली आ ओकर बहिन महुक दारू एतेक नीक उतारै छल जे भीतपर जोरसँ रगड़ि दियौ तँ भक्कसँ आगि लागि जाइत छल। मोहनदास ओइ राति अप्पन दोस्तक संग रास-रंगमे किछु क्षण लेल अप्पन सभटा दुख बिसरि गेल छल। बिहारी ढोल बजा रहल छल, परमोदी मंजीरा। मोहनदास मस्ती आ नशामे गाबि रहल छल: "पता दइ जा रे, पता लइ जा रे...गाड़ीबला.... तोहर नामक, तोहरा गामक पता दइ जा... माया रे, मायाक ठाम बताबै मायाक आनथि खबरिया काया माया दुनू नाच नचाबै, मायाक सगर नगरिया पता दइ जा रे, पता लइ जा रे...गाड़ीबला...।' बीरनक घरवाली जखन खाना परसलक तँ रातिक दू बाजि गेल छलै। भूख सभकेँ लागल छलै। तोरीक तेलमे मसल्ला-लहसून-पियाजु दऽ कऽ सुअरक मौस बीरनक बहिन रान्हने छल। रसक गंध पूरा आंगनमे पसरल छल। सभ लोक हाथमे रोटी लऽ कऽ खाइपर टूटि पड़ल। टोकना भरि भात सेहो बनल छल। मुदा मोहनदास चुप छल। गीत गबैत-गबैत ओकरा भीतर कतौ कोनो एकटा फाँस, जना एकबैग गरि गेल छल। ओकर टीस बेर-बेर ओकर छातीक भीतर जागैत छल, जकरा दबाबै लेल आ बिसरैले ओ आर लोकसँ बेसी पी लेने छल। खाइत-खाइत एकाएक कौर हाथमे रोकि कऽ मोहनदास बेर-बेर सभकेँ देखलक फेर ओकर गरसँ हिचकी निकलऽ लगलै। ओ कूही भऽ कानऽ लागल। गोपालदास, बीरन, बिहारी, परमोदी सभ कियो एत्ते भूखाएल छल आ एत्ते दिनक बाद एत्ते नीक खेनाइ भेटि रहल छलै जे ओकरा सभकेँ मोहनदासक ऐ काल कानब नीक नै लागै छलै। सभ कियो अप्पन मुँहसँ भरि-भरि कौर चबा रहल छल आ पुछैत सेहो जा रहल छल जे की भेल! पहिने खेनाइ किए नै खा रहल छिऐ? "अहाँ के छी? अहाँक नाम की?' "हमर नाम छी बीरन। बीरन बइगा।” बीरनकेँ हंसी आबि गेलै। "आ अहाँक बल्दियत? अहाँक बाप के छथि?” मोहनदास फेर पुछलक। "हमर बापक नाम डिंडवा बैगा अछि।”  बीरन हँसैत जवाब देलक। अहाँकेँ महुक दारू चढ़ि गेल अछि। सब हँसऽ लागल। मोहनदासक आँखि लाल भऽ गेल। ओ हाथक कौर छिपलीमे दऽ देलक आ गरजि कऽ बाजल: "हौ बीरन, हौ परमोदी...हम के छी? सत सत बाजू? हमरा बुरबक नै बनाउ। अहाँ सभकेँ मलइहा माइक किरिया!” "अहाँ छी मोहनदास! अहाँक बाप काबा दास आ माइ पुतलीबाइ!” बीरन अप्पन अइंठ हाथ मोहनदासक छातीपर गड़ाबैत जोरसँ जवाब देलक। सभ कियो हँसऽ लागल। मोहनदास कनी काल चुपचाप बीरनकेँ निङहारैत रहल, फेर बेरा-बेरी सभकेँ ताकऽ लागल। ओ अप्पन शंका मेटाबऽ चाहै छल जे ओ सभ असली लोक अछि वा कियो आर अछि? कनी-कनी ओकरा लागै छल जे ई सभ ओकरे सन ठकाएल गेल असली लोक अछि। एकरा सभकेँ धोखा देल गेल छै। अन्तर मात्र एतबे जे ओ ऐ रहस्यकेँ बुझि गेल अछि आ एकरा सभकेँ एखन धरि नै पता चलल छै। मोहनदास अप्पन नेनाक संगी-साथीकेँ बताबऽ चाहै छल जे अहाँ सभ कियो सरकारी दफ्तरमे, शहरक ऊँच-ऊँच बिल्डिंगमे आ पैघ-पैघ बंगला-कोठीमे, कोइला खदान-कारखानामे आ लेनि नगर, गांधीनगर, अंबेडकर नगर, शास्त्रीनगर जेहेन कॉलोनीमे जा कऽ पता करू जे कतौ ओतए अहाँक नाम, बल्दियत आ पता-ठेकानाक कियो दोसर फर्जी जालसाजी तँ नै बैसल अछि, जे अहाँक हक छीन लेने अइ।  मुदा निशाँक बादो ओकरा लागि रहल छल जे एहन गप कहलापर ई सभ कियो ओकरासँ कहत जे अहाँपर ठर्रा निशाँ बेसी चढि़ गेल अछि। बीरन, परमोदी, गोपालदास, बिहारी सभ कियो खाइमे लागल छल। बीरनक घरवाली सितिया आ ओकर बहिन रमोली सेहो आबि गेल छल। ओ दुनू सेहो महु पीबि रहल छल आ चुहुलक जवाब चुहुलसँ दऽ रहल छल। सभ कियो हँसि-बाजि, खा-पी रहल छल। मुदा मोहनदास सभसँ फराक, भीतक कोनमे बोतल लऽ कऽ बैसि गेल छल आ हिचकीक बीच कबीरदासक पद गेबाक संग पीब सेहो रहल छल। भोरक चारि बाजि गेल छल जखन ओकर संगी ओकरा लादि-टांगि कऽ घर धरि पहुंचौलक। कसतूरी पहिल बेर अप्पन साँयक ई हालत देखले छल। ओ गोपालदास आ बीरनपर कबदय लागल। मुदा जखन गोपालदास ओकर तरहत्थीपर एक हजारसँ ऊपर टका राखलक आ दुखी भऽ कऽ कहलक, "हम कतेक रोकलहुँ जे मोहना नै पी...नै पी मुदा ई नै मानलक। ई टका राखि लिअ। एकर जेबीसँ बाहर खसि पड़ल छल।”  तँ कस्तूरी चुप भऽ गेल। भोर सात बाजल छल जखन काबा दासकेँ खोंखीक दौरा पड़ल। कोनो आन्ही जना खोंखी भेल छल। थमैक नामे नै लऽ रहल छल। आन्हर पुतलीबाइ डोरी टूटल गाए सन चारू दिस खसैत-पड़ैत भसियाएल दौगि रहल छल। ओकर कानब पूरा बस्तीमे गूंजि रहल छलै। कस्तूरी सेहो जागि गेल आ मोहनदासकेँ हिला-हिला कऽ जगेबाक कोशिश कऽ रहल छल। मुदा ओ महुक नशामे धुत्त पड़ल छल आ उठबाक नाम नै लऽ रहल छल। कस्तूरी डोलमे पानि लऽ कऽ आएल आ ओकरा मोहनदासक ऊपर ढारि देलक। मोहनदासक आँखि खुजल। ओ एतेक लाल छल जे ओकरामे खून हेल रहल छल। ओकर नशा नै उतरल छलै। कस्तूरी चिकरि कऽ बाजल, "उठियौ...यौ! डॉक्टरकेँ लऽ कऽ अबियौ! बाबूकेँ खोंखी भऽ रहल छै!” गामसँ लोक-वेद आ स्त्रीगण-नेना सभ आबऽ लागल छल। देवदास आ शारदा डरायल अप्पन बाबा काबाक खाट लग ठाढ़ छल। काबाक गर जना फाटि गेल छलै आ ओइमे सँ खून आ मौसक थक्का सभ बेर खोंखीक संग बाहर निकलि रहल छल। धरतीपर चिट्टा-मट्ठाक धारी लागल छल। गिद्धा मांछीक झुंड ओकर चारू कात भिनभिनाइत घूमि रहल छल। लोक मोहनदासकेँ उलटा-पुलटा रहल छल आ ओकरा जगाबैमे लागल छल। बड़ मुश्किलसँ मोहनदास हाथ टेक कऽ कनी टा उटंगा भेल आ खून जेहन लाल आँखिसँ चारू दिस भकुआएल चोन्हराएल देखऽ लागल। ओ केकरो चिन्ह नै सकै छल। ओकर नजरि कतौ स्थिर नै भऽ रहल छल। एकाएक ओकर ठोढ़पर हँसी एलै। ओ अप्पन आँखिपर जोर लगा कऽ रमइ कक्काकेँ चिन्ह गेल। ओ गरसँ टूटल अवाज निकाललक, "कक्का, हम के छी? हमर नाम की अछि कक्का! हमरा कहू कक्का, हमरा बतबियौ?” आ ओ बेदम भऽ कऽ ओइ ठाम ओंघरा गेल। गामसँ आएल स्त्रीगणक कानब आ चिकरबाक हल्ला उठल। पुतलीबाइक चिकरब सभसँ ऊँच छल। कनी काल सभ स्त्रीगण जना कोनो लयमे कानै लागल। काबा दास मरि गेल। ओकर खाटक नीचाँ राखल बाँस आ कचियापर माँछी भिन-भिन करै लागल। काल्हि अदहा राति धरि ओ टोकरीक लेल कमची छीलैमे लागल छल। काल्हि दुपहरमे बजारक विन्ध्याचल हैंडीक्राफ्ट्ससँ तीस टोकरी आ पच्चीस सूप बनाबैक आर्डर भेटल छलै। ओइ भोर करीब साढ़े सात बजे कस्तूरीक कोठरीमे बिलैया झपट्टा मारलक आ अलोपी मैनाक जोड़ाकेँ खा गेल। मादा मैनाक पेटमे नब अंडा आएल छल। ओकर नोचल पाँखि आ खूनक दाग कोठरीक माटिक जमीनपर बचल रहि गेल छल। कस्तूरी एक्के दिन पहिने गोबरसँ ओकरा निपने छल। ओइ दिन मोहनदासकेँ किछु नै बुझल भेलै जे ओकर बाप काबा दासक दाह-क्रिया कोना भेलै, ओकरा ओसारपर नशामे बेहोश छोड़ि कऽ गाम-बिरादरीक लोक काबाक लाशकेँ श्मशान धरि लऽ गेल, ओकर माए पुतलीबाइ कोनो तरहेँ काबाक खाटपर माथ पटकैत रहल आ बाँस, पथिया, कमची, पटिया, लोटा आ कचियासँ ओकर खून धाबैत-धुआबैत कानि-कानि कऽ गाबैत रहए, छोट-सन देवदास कोना अप्पन बाप मोहनदासक बदला अपनेसँ अप्पन बबाक चितामे आगि देलक आ ओकर नेनाक संगी बीरन बैगा ओकर किरिया-करम केलक! मोहनदासकेँ किच्छो पता नै। गोसार्इं कस्तूरीसँ पाँच सए टका सुतारलक, पाँच सए जंगलक फारेस्टगार्ड लऽ लेलक। ओ पतेरासँ काबाक चिता लेल सुख्खल लकड़ी बिछै लेल नै दऽ रहल छल। कस्तूरी लग ओ सभटा टका खत्म भऽ गेल जे गोपालदास ओकरा देने छल। मोहनदासक गरसँ फोंफ कटबाक ध्वनि लगातार निकलि रहल छल। एकाध बेर ओ अप्पन आंखिकेँ खोलि, चारू कात एहन तरहेँ देखतियै, जना ओ कोनो नब आ अनचिन्हार ठामपर आबि गेल छै आ फेर ओ सुति जाइत छल। ओ नीन छल वा फेर महुक दारूमे यूरिया वा लैंटिनाक पात मिला कऽ उतारल शराब छल वा सुगरक मौसमे कोनो छूति लागल छल। मुदा एहन हैतियै तँ ओइ राति ओकरा संग खाइ-पीबैबला बीरन, परमोदी, बिहारी, सितिया, रमोलीक संगो एहने हेतियै। ओ सभ कियो तँ ठीक छल आ काबाक मरलापर लकड़ीक जोगाड़सँ लऽ कऽ खांड़ा गाम जा कऽ गोसाईंकेँ बजाबै आ सभटा कर्म निपटाबैमे तँ वएह सभ कियो लागल छल। मोहनदासक नशा साधारण नै छलै। "दारू दिमाग धरि चढ़ि गेल छै। दहीमे जीरा-जमैन धरिकेँ कंठक भीतर दियौ।” बीरन बैगा सलाह देलक। कस्तूरी बाटीमे जीरा-जमैनक घोर लऽ कऽ मोहनदास लग आएल आ गोपालदास ओकर माथकेँ अप्पन कोरामे राखि कऽ जखन ओकर मुँह खोलय लागल तँ मोहनदासक आँखि खुजलै। ओ कस्तूरी आ  गोपालदासकेँ एना देखलक जना ओ ओकरा चिन्हैत नै छलै। ओ बड़ कमजोर आ खरखरायल अवाजसँ कस्तूरीसँ पुछलक- "अहाँ के छी बाइ? आ हम के छी? हमरा बताबियौ?' एकर बाद ओ कस्तूरी दिस ताकि-ताकि कऽ मुस्कियाइत नीक अवाजमे गाबऽ लागल- "अहाँ बिलसपुरहिन छी, हम छी रैगड़िया, हमर-अहाँक जोड़ी, सजल अछि बड़ बढ़िया....।" कस्तूरीसँ रहल नै गेलै। ओ कूही भऽ कानऽ लागल। शारदा सेहो अप्पन पिताक हाल देखि कऽ कानऽ लागल। गोपालदास अपनाकेँ संयमित करैत कस्तूरीक हाथसँ बाटी लऽ लेलक आ मोहनदाससँ कहलक, "लिअ, ई काढ़ा पीब लिअ।” मोहनदास कतेक रास गहीर आँखिसँ गोपालदासकेँ  किछु काल धरि देखलक आ फेर कोनो बच्चा सन बाटी मुँह लगा कऽ सभटा काढ़ा गटागट पीब गेल। शाइत ओकर दिमागक कोनो कोनमे अपनाकेँ ठीक करबाक सेहन्ता एखनो दम मारि रहल छल। कस्तूरी आ गोपालदासकेँ आफियत भेलै। जौं दवाइ असर कऽ जाए तँ ठीक नै तँ डॉक्टरकेँ बजाबऽ पड़त। मोहनदास फेर सुति गेल। मोहनदास अप्पन घरक ओसारपर ओनाहिते पाँच दिन आ चारि राति लगातार सुतल रहल। गाममे ई गप पसरि गेल जे ओकर दिमाग सनकि गेल छै आ ओ केकरो चिन्हैत नै अछि, एतए धरि जे अप्पन कनियाँ कस्तूरी आ बच्चा धरिकेँ नहि। कियो कहतिऐ जे महुक दारूमे यूरियाक फेँटक कारण एहन भेल , कियो कहतिऐ जे ओ ओरियंटल कोल माइंसक कॉलोनी लेनिन नगरमे लू लागि गेलासँ खसि गेल छल, तखनेसँ ओकर स्मृति चलि गेल। विजय तिवारी ई गप पसारि देलक जे ओकर कबरा कुत्ता मोहनदासकेँ धोखासँ काटि लेलकै, आब देखैत रहब, जहिना पानि बरसत ओ कुकुर जना भूकत। जतेक मुँह छल ओतेक गप छल। मुश्किल देवदास आ शारदाक संग सेहो छल। ओ स्कूल जाइत छल तँ ओतए मास्टर आ बच्चा ओकरा सँ पुछैत छल,  की अहाँक बाप बताह भऽ गेल अछि? अहाँक बाप अहाँकेँ चिन्हैत नै अछि की? की ओ सुतल रहैत अछि? तखन फेर ओकर दातमनि-सफाइ आ हगब-मूतब कोना होइत छै? एकटा अफवाह इहो पसरल जे एक राति मोहनदास एकाएक उठल आ अप्पन बाप काबा दासक कचिया लऽ कऽ घरक सभ लोककेँ काटै-मारै लेल दौगल। ओ तँ कस्तूरी ओकरासँ ओझरा गेल आ आन्हर पुतलीबाइ ओकरा रस्सीसँ बान्हि देलक, नै तँ पता नै की भऽ जैतिऐ। (ई सभ घटना ओइ कालक छी जखन "इंडिया शाइन' कऽ रहल छल आ वित्तमंत्री आ विश्वबैंकक दावा छल जे सन १९९० सँ शुरू भेल ५.८ प्रतिशतक आर्थिक विकासक अखुनका विकास दर जौं एतेक साल भरि आओर बनल रहल तँ इंडिया अमेरिका बनि जाएत किएकि ऐ सँ अदहा विकास दरपर पचास बरखक भीतर अमेरिका अमेरिका बनि गेल। ...वएह काल जखन हमरा अस्थि-यक्ष्मा भेल छल आ हमर रीढ़क हड्डी एल.आर-४ आ ५ गलि गेल छल। हम नौ मास ओछाओनपर रहि आ कांधारमे बमियानक पहाड़मे बुद्धक मुस्काइत मूड़ीकेँ फिरकापरस्त ोर लांचर-मिसाइलसँ तोड़ि रहल छलौं... ...वएह काल जखन दिल्लीमे गरीब मजदूरक चारि सालक घामसँ, १९ हजार टन लोहा आ ४ लाख ५७ हजार घन मीटर धरतीकेँ खोदि कऽ एशियाक सभसँ पैघ, दुनियाक सभसँ महग आ आधुनिक मेट्रो रेल बनाओल जा रहल छल...।...जखन साढ़े तीन हजार बान्हक लेल पाँच करोड़सँ बेसी आदिवासी आ दलितक घर-खेत-बाड़ी पानिमे डुमा देल गेल छल...। जखन देशक २० करोड़  लोक लग पिबाक लेल पानि धरि नै छलै...आ साठि करोड़ लोक लग हगै, नहाबैक आ मूतैक लेल जगह नै छलै.. ...जखन सरकारमे साझीदार वामपंथी पार्टी पेट्रोलक दाम नै बढ़बै लेल दिल्लीमे हल्ला मचा रहल छल, जखन हिन्दुस्तानक पूरा आबादीक ९० प्रतिशत माने लगभग ९२ करोड़ लोककेँ पेट्रोलसँ किछु लेनाइ-देनाइ नै छल... ...जखन राजस्थानक गंगानगर आ टोंकक एक दर्जन गरीब किसानकेँ पुलिस ऐ लेल गोली चला कऽ मारि देने छल किएकि ओ अप्पन सुखाइत फसिलकेँ पानि पटाबैक लेल पानि मांगैत पत्थरबाजीपर उतरि गेल छल... ...वएह काल जखन अब्दुल करीम तेलगी कतेक हजार करोड़ टकाक जाली टिकट बेचले छल आ ऐ घोटालामे देशक कतेक पैघ अफसर आ नेता मिलल छल!...वएह काल जखन हिन्दीक एकटा बूढ़ आलोचक एक अफसरकेँ मुक्तिबोध आ दोसर खुर्राट दोसर अफसर केँ प्रेमचंद आ फणीश्वरनाथ रेणु घोषित कऽ रहल छल...जखन पोखरणमे बम फूटि गेल छल आ कारगिलक बाद सद्भावना बस चलाओल ज रह छल... ...वएह काल जखन पुरबनराक कठिना धारक पानि एकटा कागजक कारखानाक लेल लकड़ी सड़ाबैक बान्हमे बदलल जा रहल छल आ ओ सभटा हिस्सा पानिमे डूमि गेल छल, जतए मोहनदास पलिया बना कऽ तरबूज, ककड़ी, खरबूज, सजमनि उगाबै छल... ...आ जतए एक राति "हु तु तू...तू तू..' करैत ओ कस्तूरीक छपाकसँ कठिनाक धारमे खसि कऽ प्रेम केने छल आ नक्षत्रक सलेटी आभामे कएल गेल ओइ उद्दाम सहवासक स्मृतिक रूपमे ठीक नौ मासक बाद शारदाक जन्म भेल छल...) मुदा असलमे मोहनदास नै तँ पागल भेल छल, नै ओकर स्मृतिमे कोनो खोट छल। ओकर चेतनामे जे घाव लागल छल ओ लगभग एक हफ्ताक अखंड नीन, मूर्छा वा नशा काल चुपचाप भरि गेल। जखैन ओ जागल तँ ओ फेर पहिलुके जेहन मोहनदास छल, जे नीक तरहेँ बुझैत छल जे असली मोहनदास वल्द काबा दास, साकिन पुरबनरा, थाना आ जिला अनूपपुर, मध्यप्रदेश वएह रहै, जे आठ-दस बरख पहिने शासकीय एम.जी. कॉलेजसँ बी.ए. कएने छल आ मेरिटमे दोसर ठाम हासिल कएने छल। असली मोहनदास वएह छल जकरा नौकरी ऐ द्वारे नै भेटल छल किएकि ओकरा लग कोनो पैरवी, चिन्हल-जानल तिकड़म आ घूसक लेल टका नै छलै। ओ कोनो गिरोह वा माफियाक सदस्य नै छल, किएकि ओ ओइ जातिक आ वर्गक नै छल, जै जाति-वर्गक लग तागति छल। ओकरा नीक जकाँ बूझल छलै जे ओकरा संग आ ओकरा जेहन असंख्य लोकक संग लगातार पिछला कतेक सालसँ धोखाधड़ी आ छल कएल जा रहल छल मुदा ओ किछु कऽ सकैमे असहाय छल। मोहनदासकेँ ई सेहो नीकसँ बुझल छलै जे बिछिया टोलाक बिसनाथ बल्द नगेंद्रनाथ, जे लेनिन नगरमे मोहनदास विश्वकर्मा बल्द काबा दास बनि कऽ ओरियंटल कोल माइंसमे कनिष्ठ आगार अधिकारीक नौकरी करैत दस हजारसँ बेसी दरमाहा लऽ रहल छल, ओ कत्तौसँ मोहनदास नै छल। ओ एकटा बदमाश, कट्टर जातिवादी जालसाज अछि, जकर तागति एतेक बेसी छलै जे मोहनदास ओकर आगू कोनो लाचार-बीमार मूस सन छल। मोहनदास बुझै छल जे ओकर बाप माने असली काबा दास, जे टी.बी.क रोगी छल आ जे खोंीक संग खूनक कै करैत बाँसक टोकरी, सूप आ पटिया बनाबै छल, ओ मरि गेल छल मुदा एकरा साबित कऽ सकब ओकर वशमे नै छलै, किएकि बिसनाथक बाप नागेंद्रनाथ काबा दासक रूपमे बिछिया टोल आ लेनिन नगरमे अखनो रहै छल आ ओकरा सभ लग एकर दस्तावेजी सबूत छलै। मोहनदास चुप रहब शुरू कऽ देने छल। ओ कम्मे बजैत छल। कठिनामे बान्ह बनि गेलासँ ओकर रोजी-रोटीक एकटा आसरा छिना गेल छलै तइसँ ओ बजारमे इमरानक "स्टार कंप्यूटर सेंटर' पर टाइपिंग, प्रिंट आउट आ जीरॉक्सक काज सीखब शुरू कऽ देलक। ओकर बेटा देवदास, सड़कक कात "दुर्गा ऑटो रिपेयरिंग वर्क्स” मे पंचर लगाबए आ पाना-पेचकसक लमरा-पहुँची करएबला हेल्परक काज करए लागल छल। मासमे सए-दू सए धरि ओ कमा लैत छल आ अप्पन पढ़बाक खर्चा अपनासँ उठाबऽ लागल छल। शारदा तँ दू बरखसँ बिछिया टोलमे बिसनाथक बच्चाकेँ सम्हारैक काज धेने छल आ घरक काज छोड़ि देने छल किएकि रेनुका देवी लेनिन नगर जाए अप्पन वर बिसनाथ लग रहए लागल छल। शारदाकेँ पछिला एक बरखसँ बजारमे "ऐश्वर्या ब्यूटी पार्लर” मे नोकरी भेट गेल छल। ओतुक्का शिखा मैडम ओकरासँ बड़ प्रेम करै छल आ ओकरा पढ़बामे मदति करैत छल। ओ कहैत छल- "शारदा हम अहाँकेँ एक दिन एहन मॉडल बनाएब जे अहाँ मिस वर्ल्ड बनि जाएब आ टी.वी. पर आच्छादित भऽ जाएब!” आठ बरखक शारदा सत्तेमे रातिमे एहन सपना देखऽ लागल छलि। कस्तूरी गाम-मोहल्ला मे खेत-मजूरी कऽ फसलक ओगरबाहीक काज कऽ लैत छल। हँ, मोहनदासक माँ पुतलीबाइक दुनू ठेहुन काबा दासक मरलाक बाद पाथर भऽ गेल छल आ ओ चलि-फिरि नै सकै छल। दिशा-फराकत लेल सेहो घिसियाइत-घिसियाइत पछवड़िया कातक बारी धरि जाइत छल आ फेर घुरि कऽ परछीक कोनमे ओछाओल पटियापर बैसि जाइत छल। ओकर आँखिमे अन्हार गहींर भऽ गेल छल। "स्टार कंप्यूटर सेंटर' मे हर्षवर्धन सोनीसँ मोहनदासक भेंट भेल। हर्षर्धन ओतए किछु अदालती कागजातक फोटोकॉपी आ किछु टाइपिंगक काज करबा लेल गेल छल। ताधरि मोहनदासक टाइपिंग स्पीड ठीक-ठाक भऽ गेल छलै आ ओ कम्मे गलती करैत छल। ओतए मोहनदास अपनेसँ हर्षवर्धनकेँ अप्पन सभटा खिस्सा बतौलक। बीसम सदीक उत्तरार्धमे जेहन विचारधारा बला पार्टीमे हम लगभग बीस बरख धरि काज कएने रही, हर्षवर्धन सोनी ओही पार्टीमे छल। ओकर जीवन कतेक तरहक दुख-संघर्षसँ आ उत्थान-पतनसँ भरल छल। माध्यमिक स्कूलक एकटा मास्टरक बेटा हर्षवर्धन शुरूहेसँ संवेदनशील आ स्वतंत्र विचारक छल। ओकर पैघ भाए श्रीवर्धन सोनी बी.इ.क परीक्षामे टॉप केने छल आ इंजीनियरिंगक डिग्रीक बादो, छह बरख धरि खींचल बेरोजगारीसँ हताश भऽ, पाँच बरख पहिने एक राति अप्पन कोठलीक सीलिंग फैनमे रस्सीक फंदा लगा कऽ आत्महत्या कऽ लेने छल। बजारमे छोट-सन दुकान चलाबैबला बूढ़ बाप आ मिडिल स्कूलक मास्टरी करएवाली माँक बेटा हर्षवर्धन सोनीक मोनमे अप्पन भाइक आत्महत्याक घटना एकटा एहन गहींर घा छल जे पढ़ै कालेसँ ओ छात्र आंदोलनमे भाग लिअए लागल छल। ओ दोसर जातिमे बियाह केने छल आ ओकर दंडमे ओकरा जातिसँ पैरछा देल गेल छल। हर्षवर्धन सोनी एल.एल.बी. कऽ लेने छल आ अप्पन पार्टीक संग स्थानीय अदालतमे ओकालतक काज करैत अप्पन आजीविका चला रहल छल। ओ ओइ दिन जखन "स्टार कंप्यूटर सेंटर” मे मोहनदाससँ ओकर खिस्सा सुनलक जे असलमे खिस्सा नै, एकटा असल जिनगीक सत्यक खेरहा छल, तँ ओ ऐ केसकेँ लऽ कऽ अदालतक शरणमे जएबाक फैसला केलक। "अहाँ लग ऐ लेल कतेक पाइ यए?', मोहनदासक बेरंग, फाटल-चीटल, पैबंद लागल, कोनो जमानामे नील रंग रहल डेनिम पेंटकेँ तकैत हर्षवर्धन बाजल, "हम अहाँक केस लड़ब आ अहाँकेँ न्याय दिआएब।” मोहनदासक आँखिमे चमक आबि गेल। ओकर दुब्बर-पातर देह एक-दू बेर थरथरायल। एक बेर तँ ओकरा विश्वास नै भेल जे कियो ऐ तरहेँ ओकर संग दऽ सकैत अछि, फेर ओ बाजल, "हमरा संग ऐ काल अस्सीटा टका अछि। दू-चारि दिनमे चालीसक जुगाड़ कऽ देब। इमरानसँ सए-दू सए पेशगी भेट जाएत।” हर्षवर्धन बुझि गेल जे मोहनदास बेसीसँ बेसी चारि-पांच सए टका जोगाड़ मास भरिमे कऽ सकैत अछि जखन कि अदालतमे केस दाखिल करबामे कुल खर्च करीब पाँच हजार टका छल। एकक बाद दोसर सरकारक ओ आर्थिक नीति, जे देसक महानगरकेँ अमेरिका बना रहल छल, ओही देशक गाम आ पिछड़ल इलाकाकेँ कंगाल बना कऽ ओतए असंख्य इथियोपिया, रवांडा आ घानाकेँ जन्मा रहल छल। दिल्ली-लखनऊ, मुंबई-भोपाल, कोलकाता-पटनामे जखन सभ राजनीतिक पार्टी आ विचारधाराक प्रोफेसर चालीस-पचास हजार वेतन लऽ रहल छल आ छोटसँ छोट फ्री-लांसर धरि दू पन्नाक रपटपर पाँच सएसँ हजार टका कमा रहल छल, तखन गाम आ छोट कस्बामे, मेहनति कऽ काज करएबला मोहनदास जेहन लोककेँ चारि सए टका जोगाड़ करबामे मास लागि जाइ छै। हर्षवर्धन बुझि गेल जे मोहनदासकेँ अदालतसँ न्याय दियाबैक लेल ओकरा अपनेसँ टका जमा करए पड़तै। ओ एक हजार टका अपना लगसँ लगेलक, दू हजार किछु दोस्तसँ मांगलक आ बाकी टका लायंस क्लबक चैरिटी फंडसँ डोनेशनमे लेलक, माने संक्षेपमे जे जोगाड़ भऽ गेल। तँ ऐ तरहेँ आखिरीमे मोहनदासक मामला गजानन माधव मुक्तिबोध, न्यायिक दंडाधिकारी (प्रथम श्रेणी), जे सिगरेट नै पीबै छल आ बड़ दुब्बर छल, जकर गालक हड्डी छुरी सन छल आ उभरल छल आ जकर माथपर असंख्य टेढ़-टूढ़ डड़ीर छलै, क अदालतमे दाखिल भऽ गेल। मोहनदास बल्द काबा दास जाति विश्वकर्मा, साकिन पुरबनरा, थाना आ जिला अनूपपुर, म.प्र. बनाम विश्वनाथ बल्द नगेंद्रनाथ, जाति ब्राह्मण साकिन बिछिया टोला, हाल-वाशिन्दा ए/11, लेनिन नगर, ओरियंटल कोल माइंस, जिला-दुर्ग, छत्तीसगढ़। मामिलाक दाखिल हेबाक संगे अदालत ओरियंटल कोल माइंसक महा-प्रबंधक एस.के. सिंह आ वेलफेयर ऑफिसर ए.के. श्रीवास्तव संग कतेक आओर प्रबंधक श्रेणीक अधिकारीकेँ तलब केलक आ ओकरासँ अदालतक आगू ई साक्ष्य पेश करै  लेल कहलक जे ओ प्रमाणित करए जे ओकर कंपनी ओरियंटल कोल माइंसमे जूनियर डिपा. ऑफिसरक पदपर पछिला कतेक बरखसँ काज करैबला मोहनदास विश्वकर्मा असल मे बिछिया टोलाक विश्वनाथ बल्द नगेंद्रनाथ कियो आन नै अछि? न्यायिक दंडाधिकारी गजानन माधव मुक्तिबोध अनूपनगर आ दुर्गक जिलाधीशकेँ आदेश देलक जे ओ ऐ मामिलाक शासकीय जाँच करए आ दू सप्ताहक भीतर अदालतक सोझाँ अप्पन जांचक रिपोर्ट पेश करए। बीड़ी पियैबला न्यायिक दंडाधिकारी जी.एम. मुक्तिबोधक ऐ आदेश आ अदालतक सम्मनसँ ओरियंटल कोल माइंसमे हड़कंप मचि गेल। स्थानीय अखबारमे एकर खबरि छपल- "असल'" मोहनदास के?” "एन.डी.टी.वी.” आ "आज तक” ैनलक स्थानीय संवाददाता क्रमश: अनिल ादव आ खालिद रशीद ऐ मामलाक बाइट दिल्ली आ भोपाल पठेलक मुदा समाचार "राष्ट्रीय स्तर” आ "अखिल भारतीय परिव्याप्ति” क नै भऽ सकल, कारण जे ऐ मे दिल्ली-भोपाल-लखनऊ क कोनो पैघ नेता वा अफसरक नाम शामिल नै छल, तइसँ ई प्रांतीय वा राष्ट्रीय "खबर” वा "सूचना'क रूपमे प्रसारित नै कएल गेल। (...ई  ओइ कालक ब्यौरा अछि, जखन विधु विनोद चोपड़ाक फिल्म "मुन्ना भाई एम.बी.बी.एस.”, बॉक्स ऑफिसपर सुपर हिट भऽ गेल छल। जॉर्ज बुश आ टोनी ब्लेयर, दुनू अप्पन-अप्पन देशमे दोबारा चुनाव जीति कऽ सत्तामे आबि गेल छल, अमेरिकाक जहलमे भिखमंगा फकीर जेहन दाढ़ी आ नाक, झाइसँ भरल चेहराबला सद्दाम हुसन अरबमे कविता लिखऽ लागल छल आ मंडल आयोगक सिफारिश लागू करैबला भारतक पूर्व प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंहकेँ कैंसर भऽ गेल छल, किडनी खराब छल। ओ जे.पी. जकाँ डायलिसिसपर छल आ दिल्लीक एक कोनमे कैनवासपर चुपचाप चित्र बना रहल छल... ...वएह काल जखन पटनाक कलेक्टर बाढ़ राहतक करोड़ों टका मारि कऽ नपत्ता भऽ गेल छल आ नव सरकार फिल्म सेंसर बोर्डक पुरान अध्यक्षकेँ हटा कऽ जकरा नव अध्यक्ष बनौने छल, ओ बालीवुड फिल्मसँ बाहर लखाह दैत रहल ओइ दृश्यपर सेंसरक कैंची चलेबापर विचार कऽ रहल छल, जइमे एकटा खानदानी नवाबक जिप्सीसँ शिकारमे मारल गेल कालिया मृग, दूटा खरगोशक लाश, सर्च लाइट आ बंदूकक बरामदगीक शॉट छल। ...ई वएह काल छल जखैन लगातार पंद्रह बरखसँ हिंदी भाषाक संबंधित पदक चयन समितिक सभ सदस्य, खाली पदपर अप्पन जमाय, बेटा, बेटी, समैध, चापलूस, सेवककेँ निर्लज्जतासँ नियुक्ति कऽ दैत छल आ ओइपर नै कोनो सी.बी.आइ. इंक्वायरी होइल छल, नै राज्यसभा वा लोकसभामे कोनो सवाल उठैत छल... ...जखैन सभ सत्ताधारी पार्टी, मानव संसाधन मंत्रालय, पब्लिक सेक्टर भ्रष्ट कारखाना बनि गेल छल आ ई सभ विद्वान, शिक्षामित्र, समाजशास्त्री, साहित्यकार, बुद्धिजीवी, इतिहासकार, कलाकार, अध्यापकक उत्पादन कऽ रहल छल... आ बच्चाक दिमागपर कब्जा करै लेल शिक्षा-संस्थानमे इतिहास आ पाठ्य¬पुस्तककेँ दोबारा-तिबारा लिखबाक राजनीतिक जंग चलि रहल छल... ...तखन भारत भ्रष्ट देशक सूचीमे...संसारमे ८३म,  परमाणु बम बनाबै बला देश मे ६अम, जनसंख्यामे दोसर आ भयावह गरीबीमे खाली बांग्लादेश टासँ ऊपर छल।) हर्षवर्धन सोनी आ मोहनदास दुनूकेँ मुदा उम्मीद छल जे न्यायिक दंडाधिकारी जी.एम. मुक्तिबोधक अदालतमे दूधक दूध आ पानिक पानि भऽ जाएत। ऐ विश्वासक पाछाँ दूटा मुख्य कारण छल। पहिल तँ ई जे दंडाधिकारी बीड़ी पिबैत छल आ ठेलाक कड़क चाय सेहो। आ हुनका कोनो तरहक घूस वा लालचसँ भ्रष्ट नै कएल जा सकैत छल... ...आओर दोसर ई जे सत मोहनदास दिस छल किए तँ असल मोहनदास बी.ए. वएह छल। "झूठक पएर-मूड़ी किच्छो नै होइत अछि! भिनसरेक इजोत सन सभ किछु साफ लखाह भऽ जाएत! जै हो मलइहा माइ! कृपा बनल रहए सतगुरू कबीर!”  कस्तूरीक मौलाइल जिनगीमे आशाक एकटा खूब नव हरियर कोमल दूबि उगि रहल छल। पुतलीबाइक आँखिमे अन्हार तँ काबाक जेबाक बादेसँ बढ़ि गेल छल मुदा परछीक कोनमे चटाइपर कोनो बूढ़, पंखझरी चील सन बैसल ओ अप्पन कान लगातार कोनो भीतर कोठली दिस लगओने राखै छल। आ एक दिन भिनसरे जखन मोहनदास अदालतक पेशीमे जएबा लेल बासि भात आ अल्लूक तरकारी खा रहल छल, तखने एकाएक पुतलीक खुशीसँ भरल बोल आंगनमे गूंजि गेल। ओकरा गरसँ जेना कोनो प्रसन्न चिड़ै बाजि रहल छल: "हे...ऐ...कनियाँ! हे देवदास! कोठरीक भीतर ताकि कऽ देखियौ! लागैत अछि जे अलोपी मैना नबका घोंसला बनेने छै की? दौगू-दौगू...!” मोहनदास जल्दी-जल्दी खाइमे लागल छल, जइसँ बेरसँ पहिने अदालत पहुँचि जाए किए तँ लोक कहैत छल जे बीड़ीक सुट्टा मारैबला जज टाइमक बड़ पाबंद अछि। जौं पांच मिनटक बेर भेल तँ पिछला पेशीमे अगला तारीख दऽ कऽ अगला पेशी शुरू कऽ दैत छै। जखन मोहनदास दिन भरि लेल, भरि पेट भात-तरकारीक कलेवा खा कऽ घरसँ बाहर निकलि रहल छल तँ पाछाँ ओकर आन्हर-बूढ़ चिड़ै सन माँ पुतली जोर-जोरसँ पुलकित भेल गाबि रहल छल: "चोला तर जइ रामा...तन तर जइ रामा, सत गुरु साखी ला...चोला तर जइ... ...चोला तर जइ' अदालत मे ओरियंटल कोल माइंसक महाप्रबंधक एस.के. सिंह हाजिर नै भेल छल। हुनकर अर्जी वकील पेश कऽ देलक। कॉलयरीक वेलफेयर ऑफिसर ए.के. श्रीवास्तव अप्पन इनक्वायरीक सभटा फाइल आ संगमे लागल सभटा दस्तावेज न्यायिक दंडाधिकारी, प्रथम श्रेणीक अवलोकनार्थ हुनकर टेबुलपर राखि देलक। हर्षवर्धन सोनीक चेहरा उड़ल छलै किए तँ बिछिया टोलासँ जै तीनटा गवाहकेँ अदालतमे आबि कऽ साक्ष्य देबाक छल, जे मोहनदास नामक जे क्यो ओरियंटल कोल माइंसमे पछिला कतेक बरखसँ कनिष्ठ आगार अधिकारीक नौकरी कऽ रहल छल, ओकरा ओ सभ नेनासँ नीकसँ चिन्हैत छल जे ओ मोहनदास नै बिश्वनाथ अछि। ओइ तीन गवाहमे सँ दूटा गवाह अदालतमे हाजिर नै भेल आ तेसर गवाह दिनेश कुमार साहू पलटी मारैत भरि अदालतमे तस्दीक कऽ देलक जे विश्वनाथ मोहनदास छी। ओ आंगुरसँ ह्षवर्धन सोनी आ मोहनदास दिस इशारा करैत ईहो कहलक जे ई दुनू गोटे मास भरि पहिने ओकर घर आएल छल आ ओकरासँ कहलक जे जौं अहाँ हमर सिखायल बयान कोर्टमे दऽ देब तँ हम अहाँकेँ पाँच हजार टका देब। न्यायिक दंडाधिकारी गजानन माधव मुक्तिबोध अगला सुनवाईक लेल एक मास बादक तारीख धऽ देलक। हर्षवर्धन आ मोहनदास दुनू स्तब्ध छलाह। आब सभटा आस जिलाधीशक जाँच रिपोर्टपर लागल छल। मोहनदासकेँ न्याय जौं भेंट सकैत छल, तँ तखन जखन सत आगू आबतिऐ। अगला पेशीमे दुर्ग आ अनूपपुर, दुनू जिलाक कलेक्टरक जाँच रिपोर्ट जखन अदालतमे पेश कएल गेल तँ हर्षवर्धन आ मोहनदास अवाक रहि गेल। ओइ जाँच रिपोर्टमे छल जे मोहनदास वल्द काबा दास, जूनियर डिपो ऑफिसर, ओरियंटल कोल माइंसक नाम आ शिनाख्तीकेँ लऽ कऽ उठाएल गेल सभटा आरोप निराधार अछि। दस्तावेज, आवश्यक साक्ष्य, परिस्थितिगत प्रमाण, कएकटा ग्रामीण आ पंचायत सदस्यसँ गपसपक बाद निर्विवाद रूपसँ ई सिद्ध होइत छल जे मोहनदास, मोहनदासे अछि, विश्वनाथ नै। बादमे पता चलल जे विश्वनाथ ऐ बेर दुर्ग आ अनूपपुर दूनू जिलाक संबंधित पटवारीकेँ दस-दस हजार टका घूस आ दारू-मुर्गा देने छल। विजय तिवारी सेहो पुलिस गाड़ीमे बिसनाथकेँ बैसा कऽ पटवारीकेँ घूस पहुँचाबऽ लेल गेल छल। असलमे जेहन प्रशासनिक परिपाटी छल, ओइमे कलेक्टर माने जिलाधीश माने डिस्ट्रिक्ट मैजिस्ट्रेटक इंक्वायरीक असल मतलबे होइत छल संबंधित तहसील वा परगनाक पटवारीसँ जाँच। जौं कोनो अदालत कलेक्टरकेँ कोनो जाँचक आदेश दैत छल तँ कलेक्टर नोट लगा कऽ ओइ आदेशकेँ अप्पन मातहत, संबंधित इलाकाक एस.डी.एम. केँ पठा दैत छल। एस.डी.एम. ओकरा तहसीलदार आ तहसीलदार ओकरा नयब तहसीलदारकेँ दऽ दैत छल। ऐ तरहेँ रेवेन्यू इंस्पेक्टर माने आर.आर. माने कानूनगोसँ भेल आखिरमे ओ आदेश पटवारी लग पहुँचि जाइ छल। माने आखिरमे पटवारी कलेक्टरक आँखि-कान आ नाक बनि जाइ छल। ओइ राति जखन गाम बिछिया टोला आ पुरबनराक पटवारी कमल किशोरकेँ बिसनाथ आ विजय तिवारी दस हजार टकाक गड्डी देलक आ मैकडॉवल नंबर वन व्हिस्कीक संग बटर चिकेन आ मटन जींसक कबाब खुएलक तँ कमल किशोर पटवारी जमीनपर दुनूक पएरपर लोटपोट करए लागल। "यौ, अहाँ सभक हुकुम हम कहियो टारब यौ?...एत्ते एमाउंटमे तँ हम सार मूसकेँ हाथी, खेतकेँ सड़क आ बलगोविनाकेँ छह बच्चाक माए बना देब।” कमल किशोर पटवारी मगन भऽ कऽ नोटकेँ अप्पन झोरामे धऽ कऽ उड़ि रहल छल। ओ मैकडॉवल नंबर वनक पटियाला पैग एक घोंटमे गराक नीचाँ उतारलक आ ओतए ओकर सभका सोझेँ, बिना कत्तौ गेने, मामलाक सभटा तफ्तीश कऽ देलक आ पंद्रह मिनटमे मोहनदास बनाम विश्वनाथ मामिलामे जिलाधीश द्वारा पूर कएल गेल इंक्वायरीक पुख्ता रिपोर्ट सफेद कागजक एकटा पन्नापर तैयार भऽ गेल। अर्थात अंग्रेजक गुलाम भारतपर शासनक लेल तैयार कएल गेल नौकरशाहीक ऐ बीझ खाएल लौह ढाँचामे, जे आजादीक साठि बरखक बादक आधिकारिक सरकारी दस्तावेज धरि विश्वनाथ वल्द नगेंद्रनाथ छल, केँ मोहनदास वल्द काबा दास बना देलक। मोहनदास फेर टूटए लागल। ओ लगातार कबीरक जाप करैत छल। मलइहा माइक मढ़ियाक ड्योढ़ीपर ओ घंटो बैसल रहैत छल। मलइहा माइ मलाइ टाक भोग लगाबैत छल। सेहो बकरीटा दूधक मलाइक। ऊँच जातिक लोक ओकर मढ़ियामे नै जाइत छल। ठाकुर, बनिया, बाभन, लालाक देवी-देवता दोसर छल। मलइहा माइक पूजाक काज ब्राहमण नै गोसाईं करैत छल। कहैत छै जे दलित-आदिवासीक संग भात-रोटी, बेटा-बेटीक संबंध बनाबैक कारण, जाति-पातिसँ निकालल गेल ब्राह्मण गोसाईं कहबैत छल। मोहनदास खाड़ा गाम जा कऽ सिउनारायण गोसाईंकेँ बजौलक, ओकरा बीस टका आओर दालि-चाउर, नून, हरैद, चुदक, सीधा देलक। ओकरासँ ओ मलइहा माइक पूजा करौलक आ शुद्ध बकरीक दूधसँ निकालल गेल पाव भरि मलाइक भोज चढ़ेलक। ऐहि बीच एकटा घटना आर भऽ गेल। एक दिन भिनसर काल, जखैन कस्तूरी गामक दू-तीन टा मौगी संगे दिशा-फरकत करए लेल गेल, ओकरा सभकेँ जंगल-झाड़क पाछाँ कोनो हलचलक आभास भेलै। जेना कियो ओतए नुकाएल छै। कस्तूरी आइ-काल्हि अप्पन हिफाजत लेल हरदम कछनीमे कचिया खोँसि कऽ राखैत छल। ओकरा  ऐ गपक नीकसँ आभास छलै जे दू बच्चाक माए बनि गेलाक बादो ओ एखन धरि गाममे सभसँ सुन्नर काठी आ चेहरा-मोहराक मौगी अछि। आओर कतेक दिनसँ गामक ठकुरान-बभान शोहादक नजरि गिद्ध जेहन ओकरापर गड़ल छै। कस्तूरी उठि कऽ ठाढ़ भऽ गेल। ओ डाँरमे खोँसल कचिया निकालि कऽ हाथमे थाम्हि लेलक आ समधानल डेगसँ जंगल-झाड़ दिस बढ़ल। ओकर पाछाँ रमोली, सितिया, चंदना आ सावित्री छल। “की छी...केकर भीतर हबस पैसल छै! निकल तोहर गर्मी निकालि दैत छी टटीबे! मुँहझड़को।” कस्तूरी चिकरलक। बाँकी मौगी सभ सेहो बोन-झाँकुरकेँ घेरब शुरू कऽ देलक। सभक हाथमे एक-एक दिसा-फारकतबला लोटा छलै। झाँकुरसँ फटाकसँ निकलि कऽ छत्रधारीक लड़का विजय तिवारी भागल। गंजी-जंघियामे ओकर चर्बी चढ़ल थुलथुल देह भागैत काल गोलमटोल तरबूज जेहन लखाह दऽ रहल छल। कस्तूरी किछु दूर धरि हाँसू तानि कऽ ओकरा दिस दौगल। रमोली, सितिया आ सावित्री गरियाबैत पोखरि दिसक लोटा खेंचि-खेंचि कऽ मारलक। दरोगा विजय तिवारी खसैत-पड़ैत लंक लऽ भागि रहल छल। मौगी सभ पाछाँसँ चिकरि रहल छल: 'यौ, टी.वी. बलाकेँ बजाउ, सीन खीचू।' 'दौड़ऽ हे दौगऽ! दरोगा कछियामे हगि रहल छै...' ओइ दिन सच्चेमे विजय तिवारी डरि गेल छल जे कत्तौ मोहनदास अप्पन वकील हर्षवर्धन सोनी संग मिल कऽ टी.वी. आ अख़बारमे किछु अंट-शंट नै देखा-छपा दिऐ। (ई सभ किछु ओइ दिनक घटना छी जखन समुच्चा एशियाक राजनीतिक इतिहासमे पहिल बेर एकटा भारतीय स्त्री कम्युनिस्ट पार्टीक पोलित ब्यूरोक सदस्य बनल छलि, एकटा दोसर स्त्री प्रधानमंत्रीक कुर्सी ठुकरा देने छलि......आ स्त्री, संसारक ओइ सभसँ प्रतिष्ठित जूरीक सदस्य बनि गेल छलि, जइमे ऋत्विक घटकक सुवर्ण रेखा वा कोमल गांधार वा शैलेंद्रक तीसरी कसमक स्क्रीनिंग धरि नै भऽ सकल छल......आ ओही काल जखन बगदादक अबू गरीब जेलमे एकटा अमेरिकी स्त्री ईराकी पुरुषकेँ नांगर कऽ ओकरा एक-दोसराक ऊपर लादि कऽ एकटा पिरामिड जेहन बना देल छल आ अमेरिकी झंडा लऽ कऽ ओकर ऊपर चढ़ि गेल छलि......ओही काल जखन पावर सत्यमे जेंडरकेँ परिभाषित कऽ रहल छल!...ओइ काल जखन दिल्लीक धौलाकुआँ लग उत्तर-पूर्वक एकटा लड़कीकेँ कारक भीतर खींच कऽ राजधानीक सभ वी.आइ.पी. सड़कपर अढाइ घंटा धरि लगातार दिल्लीक पाँच पुरुष बलात्कार करैत रहल छल...आ इम्फालमे मनोरमाक बलात्कार आ हत्याक विरोधमे कृष्णक उपासना करएवाली कएक सए मैतेइ स्त्रीगण तामसमे आ हतास भऽ नांगट भऽ गेल छलि......ओइ काल जखन दूटा स्त्री सरदार सरोवरमे ४०.००० दलित आ आदिवासीक घर-जमीन-जायदादकेँ पानिमे डुमा दै बला योजनाक विरुद्ध लड़ाइ हारि गेल छल आ जलप्लावनमे वन्य प्राणी, वनस्पति, गाछ सभ किछु डूमि गेल छल......टी.वी.पर ओइ टटाएल स्त्रीगणक कानैत, हरल चेहरा लगातार लखाह भऽ रहल छल......वएह काल जखन हम दिल्ली छोडि कऽ वैशाली आबि गेल रही आ हमर छतसँ गाजियाबाद ओ झंडापुर  साफ लखाह दैत छल, जतए ठीक पंद्रह बरख पहिने ओइ क्रांतिकारी कलाकार आ रंगकर्मीक हत्या भेल छल, जाकर नाम सफ़दर हाशमी छल...) गजानन माधव मुक्तिबोध, न्यायिक दंधाधिकारी (प्रथम श्रेणी) क अदालतमे सभ गवाह, सबूत, जाँच रिपोर्ट एतए धरि जे दू-दूटा जिलाधीशक इनक्वायरी ई सिद्ध कऽ देलक जे बिसनाथे मोहनदास अछि। तखन जे गरीब सन आदमी मोहनदास हेबाक दावा कऽ रहल छल ओ के अछि?- एकर अदालतमे चलि रहल मामलासँ कोनो सोझ कानूनी संबंध तँ नै छलै। ओ एकटा अलग केस भऽ सकैत छल, मुदा से तखन जखन ओकर दरख्वास्त अदालतमे कोनो वकील वादी दिससँ दाखिल करए। हर्षवर्धन सोनी तीन दिन, तीन राति धरि सुति नै सकल। ओ नीकसँ बुझै छल जे मोहनदास मोहनदास छी, मुदा एकरा प्रमाणित कऽ सकब लगातार कठिनेटा नै असंभव भऽ रहल छलै। ओ हमरा ई-मेल पठेलक: "ई तँ हद छै! नै हमरा किछु खाएल-पीएल भऽ रहल अछि, नै रातिमे नीन आबैत अछि। ओम्हर मोहनदासक सेहो यएह हालत छै। सभ कियो बुझैत अछि जे असली मोहनदास यएह छी मुदा एकरा साबित कऽ सकब मुमकिन नै रहि गेल छै। की करी किछु सुझैत नै अछि। मोहनदास आ हमरा दुनू गोटेकेँ धमकी देल जा रहल अछि जे चुप भऽ कऽ बैसि जाउ....ऐ बीच पता चलल जे बिसनाथ रासबिहारी रायकेँ अप्पन वकील बनौने अछि। हुनका तँ अहाँ जनैत छियन्हि, सत्ताधारी पार्टीक बड़ पैघ नेता छथिन। वहु नगर निगमक अध्यक्ष छनि आ कतेक सरकारी-गैर-सरकारी संगठनक प्रमुख छथिन। मोहनदासक पक्षमे आब चारि-पाँच लोक गवाही दै लेल तैयार भेल अछि- बीरन बैगा, गोपालदास, बिहारीदास, रमोली, सितिया...मुदा ओकर सभ बगे-बानी एहन छै जे लागैत छै जे एहन गवाह तँ पचीस-पचासमे कत्तौ भेट जाएत। भिखमंगा लागैत अछि सभ गोटे। ...सोचैत छी हम न्यायिक दंडाधिकारीसँ सोझे भेंट कऽ कए देखिऐ। ओ बीड़ी पीबैत छथि आ किछु अजीब सन लागितो छथि। जी.एम. मुक्तिबोध हुनकर नाम छन्हि। मराठी छथि मुदा हुनकर हिन्दी अद्भुत अछि। कोर्टक बाद सड़कक कात रामदीनक ठेलापर कड़क चाह पिबैत छथि। ...हम नोट केने रही जे ओ जखन अदालतमे मोहनदास दिस देखैत छथि तँ ओकर आँखिमे एकटा बेचैनी आबि जाइ छनि। हुनकर  माथक एकटा नस उभरल छनि आ जखन ओ किछु सोचैत छथि तँ ओ फुलि जाइ छनि।....हमरा डर  लागले रहैत अछि जे कत्तौ कोनो दिन ओ नस फाटि ने जाए। हुनकर आँखिमे किछु एहन तँ अछि जना ओ कोनो जासूस वा खुफियाक आँखि हुअए जे कानि कऽ चुपचाप केकरो आत्माक भीतर धँसि कऽ ओकर सभ किछु पखारि सकैत अछि। ...सभ कहैत अछि जे हुनकर घरमे कतेक रास किताब छन्हि आ ओ तीन बजे राति धरि पढै़त रहैत छथि। एकटा विचित्र सन गप हमरा ईहो पता लागल जे जी.एम. मुक्तिबोध छथि तँ प्रथम श्रेणी दंडाधिकारी मुदा सरकार हुनकर पाछाँ सी.आइ.डी. लगा कऽ राखने छल...।' कोनो दोसर बात नै देखि हर्षवर्धन एक तरहेँ जुआ खेलेलक। कोनो विचाराधीन मामिलाक संबंधमे भेंट करब, सेहो एहन जजसँ जे किछु रहस्यपूर्ण देखबामे लगैत अछि, एकटा खतरासँ भरल निर्णय छल। जौं जी.एम. मुक्तिबोध तमसा जेतथि तँ ओकर कैरियर बर्बाद भऽ सकैत छल। हर्षवर्धन सोनीक अतीत ओहिनो बड़ कठिनाइ, संघर्ष आ दु:खसँ भरल छलै, बेरोजगारीमे भाइक हताश आत्महत्या ओकर मनसँ कखनो एक्को पल लेल नै जाइ छलै। वकालत तँ खाली नाम मात्र लेल छलै। ओकरा लग बेसी वएह सभ अबैत छल जकर जेबीमे महग वकील करबा लेल टका नै होइ छलै। मोहनदासक मोकदमामे ओकरा किछु नै भेट रहल छलै, ऊपरसँ ओकरा पाँच हजार टका अपनेसँ जोगाड़ करए पड़ल छल। तकर  बादो ओ न्यायिक दंडाधिकारीसँ भेंट करबाक खतरा लेलक। हर्षवर्धनकेँ आश्वस्ति भेलै जखन अप्पन फ्लैटपर ओकरा देख कऽ गजानन माधव मुक्तिबोधक चेहरापर एहन भाव एलै जना ओकरा पहिनेसँ ओकर एबाक गप बुझल हुअए। जना हुनका पहिनेसँ पता छल जे हर्षवर्धन ओकरा लग अएबे करत। ओ एकरा लेल लकड़ीक एकटा पुरनका कुर्सी राखि देलक आ  "बैसू! हम चाह बनाबैत छी!,  कहि कऽ भीतर चलि गेल'। हर्षवर्धन कोठलीमे नजरि दौगेलक। ओतए सभटा चीज बेतरतीब छल। कतेक किताब एतए-ओतए पसरल छल आ ओकरामे सँ कतेक पन्ना खुजल छल, जकर बीचमे पेंसिल, कार्ड आ गाछक पात खोँसल गेल छल। भऽ सकैत अछि जे किताबक ओ पृष्ठ ओकरा बड्ड पसीन हेतै आ ओ बेर-बेर ओकरा पढ़ैत छल होएत। कोठलीक हालत देखि कऽ लागैत छल जे ओ एतए असगरे रहैत छथि। हर्षवर्धनकेँ पता लागल जे ओकर बदली अधिक काल ओइ आदिवासी आ पिछड़ल इलाकामे कऽ देल जाइत अछि, जतए एहन मुकदमा नै आबैत छै, जकरासँ कोनो पैघ लोक आ व्यापारीकेँ कोनो नुकसान भऽ जाए। हर्षवर्धनक आँखि ऊपर उठलै। भीतपर गाँधीजी आ मार्क्सक चित्र टांगल छल। एकटा कोनमे गणेशक प्रतिमा सेहो ाखल छल। वाम भागक भीतसँ लागल बुकसेल्फ छल, जइमे कानूनक कतेक किताब राखल छल, जना ओकरा कतेक बरखसँ खोलले नै गेल हुअए। जी.एम. मुक्तिबोध चाह लऽ कऽ आबि गेल छल। संगेमे एकटा छिपलीमे कनीटा बेसनक सेब छल। चाहकेँ मचियापर राखि कऽ मुक्तिबोध तख्तापर बैस गेलथि। चाह बड़ कड़गर आ महोर छल। खूब औंटल आ भफाएल। कतेक काल धरि कोठलीमे सुन-सन्नाटा रहल। हर्षवर्धनकेँ हिम्मत नै भऽ रहल छलै जे ओ ओकरासँ गप शुरू करितिऐ। सोझाँक भीतपर एकटा पुरान घड़ी छल जे चाभी भरलासँ चलैत होएत। मुदा लागैत छल जे कतेक कालसँ कियो ओकरामे चाभी भरनहिये नै अछि। ओ ठाढ़ छल। घरमे एकटा कलेंडर टांगल छल, जइमे माथपर मुरेठा बान्हल बाल गंगाधर तिलकक चित्र छपल छल। हर्षवर्धन देखलक जे ओ कलेंडर सन 1964 क अछि। -हम जानैत छी जे (एकटा बड़ पैघ कतेक दूरसँ जा कऽ घुरैत साँस).... मोहनदासे असली मोहनदास अछि। न्यायिक दंडाधिकारीक अवाज जना कोनो गहींर इनार वा तरहरिमे सँ आबि रहल छल। बड़ रकम, मद्धिम अवाज। ओ चाहक एकटा बड़का चुस्की भरलक। ओ घोंट आ स्वाद जेना ओकर माथक तनावकेँ कनी कम कऽ देलक। "...आ ओ दोसर लोक फ्रॉड अछि। ओ सरासर इमपर्सोनेट कऽ रहल अछि। हमरा बुझल यऽ ओ विसनाथ वल्द नगेंद्रनाथ, जूनियर डिपो ऑफिसर छी जे ए बटा एगारह, लेनिन नगरमे अवैध ढंगसँ मोहनदासक आइडेंटिटी, चोरा कऽ रहि रहल अछि। ही इज अ चीट, अ क्रिमिनल। अ स्काउंड्रल!' हुनकर बाजब बड़ पातर मुदा कोनो धातु जेहन धग्गड़ आ दृढ़ छल। ओ अप्पन जेबीसँ बीड़ीक बंडल निकालन्हि आ ओइमेसँ एकटा बीड़ी निकालि कऽ पहिने ओइमे उल्टा फूक मारलक, फेर सलाइक काठीसँ ओकरा पजारि कऽ एकटा गहींर सन सुट्टा मारलक। हर्षवर्धनकेँ लागल जेना ओ अप्पन कालसँ बाहर, कोनो टाइम मशीनपर बैसल, कोनो दोसर कालमे पहुँचि गेल अछि। ओ बाजल, "हम यएह तँ बताबैक लेल अहाँ लग आएल रही। मुदा अहाँ कोना जानि लेलिऐ जे असली मोहनदास के छिऐ।' "एकरा जानब तऽ बड़ हल्लुक अछि। जौं अहाँ लग कनियो संवेदना आ विवेक हुअए”, मुक्तिबोध बाजल आ ओ चिंतित भऽ कऽ किछु सोचऽ लागल। ओ बीड़ीक एकटा खूब गहींर सोंट लेलक। "हम तीन रातिसँ लगातार जागि रहल छी। आइ कांट स्लीप फॉर अ मोमेंट! ...इट इज अबसर्ड एंड अ वेरी टेंस एक्सपीरिएंस।’ हुनक आंगुरक बीचमे फँसल बीड़ी मिझाइबला छल। हुनकर आँखि जेना कत्तौ आर नै, अपनाकेँ देखऽ लागल छल। "दि होल सिस्टम हैज टोटली कोलैप्सड...! जस्ट लाइक ट्विन टॉवर्स इन न्यूयार्क...नाइन इलेवन!...नाउ व्हाट इज लेफ्ट फॉर दि सबजेक्ट्स एंड पुअर इज अनार्की एंड कैटॅस्ट्राफ!! (सभटा व्यवस्था ढहि गेल अछि, न्यूयार्कक जोड़ा मीनार सन...सितम्बर एगारह!...आब प्रजा आ गरीबक आगू अराजकता आ विनाश टा बचल छै।) हमरा लगैत अछि, पूँजी आ सत्ता...कैपिटल एंड पावरकेँ एकटा एकदम्मे नव रूपमे आगू अछि। मोहनदास इज बिइंग डिनाइड ऑफ अ सिंपल इसेंशियल लीगल जस्टिस, किए तँ ओ न्यायकेँ कीनि नै सकत! ओह!” गजानन माधव मुक्तिबोधक माथक नस फूलि रहल छल। ओकर आंगुर थरथरा रहल छल। ओ बेचैन भऽ कऽ ठाढ़ भऽ गेल छल। ओ मिझाएल बीड़ीकेँ देखलक आ जेबीसँ सलाइ निकालि कऽ ओकरा फेर सुनगाबै लागल। "सभटा सिद्धांत खत्म भऽ सकैत छै।...कहियो बड़ परिवर्तनकारी लागैबला बौद्धिक आ दार्शनिक संरचना बदलैत कालमे खाली वाग्जाल, अनर्गल बकवास आ ठकक प्रवचनमे बदलि सकैत छै। इतिहासमे एहन बेर-बेर भेल छै। मुदा...' ओ बीड़ीक एकटा गहीर सोंट भीतर खींच कऽ साँस कनी काल लेल रोकि लेलक। लगैत छल जे ओ अप्पन चढ़ैत बेचैन साँसकेँ निकोटीनक धुआँसँ शांत करबाक कोशिश करैत छल। ओकरा खोंखी भऽ गेलै। बामा हाथसँ ओ अप्पन छातीकेँ किछु काल धरि दबा कऽ राखलक, फेर खरखर अवाजमे बाजल, "मुदा मनुखक भीतर एकटा चीज एहन अछि जे कहियो कोनो जुगमे कोनो तरहेँ सत्तासँ मेटाएल नै जा सकैत अछि!...आ ओ अछि न्यायक आकांक्षा! डिजायर फॉर जस्टिस इज इनडिस्ट्रक्टबल...! इट इज आल्वेज इम्मोर्टल...! न्यायिक आकांक्षा कालातीत अछि!' ओ अप्पन मध्यमा आ तर्जनीक बीच फसल बीड़ीकेँ खिड़कीसँ बाहर फेकि देलक। ओ मिझा गेल छल। हर्षवर्धन सोनी मंत्रविद्ध छल। ई केहन लोक अछि। एहन लोककेँ न्यायिक दंडाधिकारीक तरहेँ आइक कालमे देखब कोनो असंभव स्वप्न छल। एकटा दुर्लभ फैंटेसी। ओ बेचैनीक संग कोठलीमे टहलि रहल छल। एकाएक ओ ठाढ़ भऽ गेल आ ओकर आँखिमे एकटा गहींर आत्मीय हँसी कोनो तरल द्रव्य सन झिलमिल करै लागल। "अहां जाउ, हर्षवर्धन!...डोंट वरी मच! हमरा पता अछि जे अहूँ पछिला कतेक रातिसँ सुतल नै छी। हमरे सन'! ओ बड़ जोरसँ एकटा ठहक्का लगेलक आ बाजल, "पार्टनर, बेफिकिर भऽ कऽ सुतू। स्लीप लाइक अ डेड हॉर्स। नाउ, आइ हैव गॉट विद समथिंग'। एकर बाद ओ हर्षवर्धन लग आएल। ओकर कान्हपर ओ हाथ राखलक। हर्षवर्धनकेँ लागल ओकर हाथमे कोनो भार नै छै। कागज, फूल, स्वप्न आ भाषासँ बनल हाथ। गजानन माधव मुक्तिबोध, न्यायिक दंडाधिकारी, प्रथम श्रेणी रकमसँ हर्षवर्धनक कान लग फुसफुस कऽ बाजल, "हमरा लग एकटा पावर अछि। बस एकटा पावर। दैट इज... सीक्रेट जूडीशियल इंक्वायरी। हम अपना सँ ई जाँच करब। गोपनीय न्यायिक जांच। जस्ट लीव इट टु मी'। हर्षवर्धन सोनी जखन मुक्तिबोधक फ्लैटसँ बाहर आएल तँ ओकरा लगलै जे ओ कोनो बड़ पैघ स्वप्नक बीहड़िसँ बाहर निकलि कऽ अप्पन काल आ यथार्थमे घुरि रहल रहए। ओतए जतए मोहनदास अछि, बिसनाथ अछि, ओ सेहो अछि आ आइक यथार्थ अछि। चारि दिन बादे विश्वनाथ आ ओकर बाप नागेंद्रनाथकेँ जी.एम. मुक्तिबोध न्यायिक दंडाधिकारी (प्रथम श्रेणी) क आदेशपर जालसाजी, धोखाधड़ी, फरेब, चोरी आ गबनक जुर्ममे इंडियन पीनल कोडक धारा 419/420/464/467/ आ 403 क तहत गिरफ्तार कऽ जेल पठा देल गेलै। अदालत ओरियंटल कोल माइंसक जनरल मैनेजर एस.के. सिंह केँ आदेश देलक जे ओ मोहनदास विश्वकर्मा उर्फ विश्वनाथ, जूनियर डिपो ऑफिसरक विरुद्ध तुरंते कार्रवाइ कऽ कार्रवाइक सूचना दू हफ्ताक भीतर अदालतमे पेश करए। एकर अलाबे ऐ पूरा प्रकरणमे प्रत्यक्ष आ परोक्ष रूपसँ सम्मिलित आ लिप्त अधिकारी आ कर्मचारीक विरूद्ध उपयुक्त विभागीय जाँच आ कार्रवाई शुरू कएल जाए। जौं ओरियंटल कोल माइंस ऐ सभक विरूद्ध न्यायिक आपराधिक प्रक्रियाक अंतर्गत अपराध काएम करए चाहैत अछि तँ ई न्यायालय एकर अनुशंसा करैत अछि। हरबिर्रो मचि गेल। अखबारमे नकली मोहनदासक गिरफ्तारीक खबर प्रमुखतासँ छपल। ओरियंटल कोल माइंसे टा नै मुद कतेक खदान आ सार्वजिनक उपक्रम अधिकारी, यूनियन नेता आ कर्मचारीक होश उड़ि गेलै। चारू दिस भागा-दौरी छल। लेनिन नगर, गाँधीनगर, अंबेडकर नगर, जवाहर नगर, शास्त्री, नेहरू आ तिलक नगर जेहेन सुव्यवस्थित कॉलोनीमे हजारो बिसनाथ जेहन लोक छल जे कोनो दोसर पहचान, अधिकार, योग्यता आ क्षमताकेँ चोरा कऽ कतेक बरखसँ बैसल छल आ कएक हजारमे दरमाहा लऽ रहल छल। बादमे मालूम भेल जे गजानन माधव मुक्तिबोध, न्यायिक दंडाधिकारी (प्रथम श्रेणी), अनूपपुर, (म.प्र.) अप्पन आपातकालीन सुरक्षित न्यायिक अधिकारक इस्तेमाल कऽ अपनेसँ ऐ मामिलाक गोपनीय जाँच कएले छल। ओइ राति बड़ी काल धरि ओ पढ़ैत रहल। भोरमे ओ नौ बजे ड्राइवरकेँ फोन कऽ अप्पन सरकारी गाड़ी मंगौलक, जकर इस्तेमाल ओ अदालतेटा जएबा आ ओतएसँ घुरबा लेल करैत छल। दोसर फोन ओ एच.एस. परसाई (हरिशंकर परसाई) केँ कएलक, जे पब्लिक प्रॉसिक्यूटर छल। तेसर फोन ओ एस.बी. सिंह (शमशेर बहादुर सिंह) केँ कएलक, जे अनूपपुरक एस.एस.पी छल। ई सभटा अधिकारी अप्पन-अप्पन कर्तव्यनिष्ठा आ ईमानदारीक लेल जानल जाइत छल। चारिम फोन ओ हर्षवर्धन सोनीकेँ कएलक आ ओकरासँ एतबेटा बाजल- "पार्टनर, स्टैंप पेपर लऽ कऽ तुरत आबि जाउ'! शमशेर बहादुर सिंह बतौलक जे न्यायिक दंडाधिकारीक गाड़ी सीधा लेनिन नगरमे मटियानी चौक लग, ए/11 नंबरक फ्लैटपर रूकल। बिसनाथ ओइ काल विजय तिवारीक संग कोनो नेताक सरोकारमे बाहर गेल छल। फ्लैटमे ओकर कनियाँ कस्तूरी माने रेनुका देवी टा छल, जे चिटफंड, सोशल सर्विस, किटी पार्टी आ फाइनेंसक धंधा करैत छल। न्यायिक दंडाधिकारी ओकरासँ सोझे ओकर बल्दियत आ ओकर नैहरक पता पुछलक। कस्तूरी मैडम माने रेनुका देवी सरकारी बत्तीनला गाड़ी आ एत्ते लोककेँ देखि कऽ घबड़ा गेल छल। एकर बाद न्यायिक दंडाधिकारीक गाड़ी लेनिन नगरसँ निकलि कऽ मिर्जापुर-बनारस जाए बला सड़कपर दौगय लागल। ठीक पैंसठि किलोमीटर बाद ई गाड़ी आवाजपुर गाम दिस जाएबला कच्ची सड़कपर उतरि गेल आ आध घंटा बाद लंकापुर नामक गाममे एकटा भव्य पक्काक मकानक आगू ठाढ़ भऽ गल। न्यायिक दंडाधिकारी ओतए ओइ मकानमे रहैबला लालू प्रसाद पांडे आ ओकर कनियाँ जय ललिता पांडेसँ दूटा सवाल केलक। पहिल ओकर आ ओकर बेटा-बेटीक की नाम छै। आ दोसर ओकर जमाय सबहक नाम आ पता। एकर बाद ओ पब्लिक प्रासिक्यूटर एच.एस.परसाईकेँ निर्देश देलक जे ओ हर्षवर्धन सोनीसँ स्टैंप पेपर लऽ कऽ ओकर हलफनामा तैयार कऽ लिअए। न्यायिक दंडाधिकारीक गाड़ी एकर बाद ग्राम पंचायतक सरपंचक घरपर रूकल, जतए सरपंच आ किछु गवाहक बयान दर्ज कएल गेल। एस.एस.पी. शमशेर बहादुर सिंह जोरसँ ठहक्का लगा कऽ बाजल,  "जालसाज तँ एत्ते धरि सोचलो नै छल आ सभक सभ फँसि गेल। हम तँ लंकापुरसँ अनूपपुर थानाक एस.एच.ओ. केँ फोन कऽ देने रही जे बिछिया टोला आ लेनिन नगर जा कऽ नगेन्द्रनाथ आ बिसनाथकेँ थाना लेने आबू, नै तँ फरार भऽ गेल तँ मोसीबत भऽ जाएत। एकर बादक विवरण बड़ संक्षिप्त अछि। हर्षवर्धन सोनी आ मोहनदास दुनू ऐ जीतसँ बड़ खुश भेल। कस्तूरी सौंसे पुरबनरामे नचैत रहल। आन्हर पुतलीबाइ गठुल्लामे लजबिज्जीक बीच नुका कऽ राखल एकटा पोटरी फेर खोजि कऽ निकाललक, जइमे बिसुनभोग चाउर छल। मोहनदासक घरक सभटा कोन बिसुनभोग, खेसारी आ बकरीक दूधसँ बनैबला खीरक गमकसँ गमकि गेल। अलोपी मैनाक खोतामे अंडाक खोलकेँ अप्पन छोट-छोट लोलसँ भीतरसँ फोड़ि कऽ दूटा सुन्नर बच्चा बाहर निकलि आएल छल आ ओकर अबोध चिचियेनाइ कोठरी आ ओसारमे एकटा नव संगीत भरि देलक। पुतलीबाइक गठियाक दर्द कम भऽ गेल आ पहिलुक बेर ओ आंगन आ परछीमे अपनेसँ बाढ़नि लगेलक। ओ मगन भऽ कऽ चलल जा रहल छल मुदा ओइ गीतमे कोनो प्रसन्न चिड़ैक कंठक संग एकटा कोनो उदास-सन स्वर सेहो छल: "अहाँ बिन जग लागे सुन्न... जग लागे सुन्न... नै भावै हमरा सोना-चानी महल अटारी...' हर्षवर्धन सोनी मोहनदाससँ कहलक जे आब अगला केस ओरियंटल कोल माइंसमे तोरा तोहर नोकरी घुरा कऽ दियाबैक लेल दाखिल होएत। अदालत बिसनाथक सर्विस बुकसँ अहाँक सभटा सर्टिफिकेट, मार्कशीट आ टेस्टिमोनियल जब्त कऽ लेने अछि। ओ अहाँकेँ दऽ देल जाएत। मोहनदास हर्षवर्धनसँ लिपटि गेल। ओकर  कमजोर-गरीब शरीर थरथरा रहल छलै। ओकर गर भारी छल आ आँखिसँ कृतज्ञता आ आह्लादक नोर लगातार बहि रहल छलै। जना अषाढ़- साओनक तोर लागल हुअए। बीरन बैगाक घरमे फेर रास रंग भेल। सितिया तोरीक तेल, रसून-प्याज आ गरम मस्सलामे रसदार सुअरक मौस रान्हलक। तीन मटकी महुक शराब उतारलक। ढोलक, मंजीराक संग ऐ बेर राम करन हारमोनिया सेहो लऽ कऽ आएल छल। गोपालदास, बीरन, बिहारी, परमोदी, मोहनदास सभ कियो पीलक। सितिया, रमोली, कस्तूरी, सावित्री सेहो ठर्रा पीब कऽ भेर भऽ गेल। ओ नाचि रहल छल आ गाबि रहल छल। मोहनदासकेँ पता नै कतए-कतएसँ एकक बाद एक गीत मोना पड़ि रहल छलै। सभ मस्त भऽ गेल छल। कस्तूरीकेँ आइ दारू किछु बेसी चढ़ि गेल छलै। ओ बेर-बेर मोहनदासक हाथ पकड़ि कऽ खींचऽ लागल।  "हु तू तू ...तु...तु! हमरा संग कबड्डी खेलब? हु तू तू तू तु तु...!' ओ मोहनदासक देहमे गुदगुदी लगाबऽ लागल। " जो भाग ऐ ठामसँ! जो दरोगा तिवारीक महिसवारीकेँ सम्हार...!'  मोहनदास ओकरासँ चुहुल कऽ रहल छल। सभ हँसैत-हँसैत लोटपोट भऽ रहल छल। जखन सावित्री एकाएक गरजि कऽ बाजल, "दौगऽ हौ...दौगऽ! तिवारी दरोगा धरियामे हगि रहल अछि!!' तँ हँसी आ ठहक्का एक्के बैग बम जना फूटल, जकर धमक्कासँ आध रातिमे पूरा पुरबनरा डोलि उठल। मोहनदास आ बीरन बैगा उठि कऽ आंगनक बीचोबीच ठाढ़ भऽ गेल छल। जना ओतए कोनो अदालत चलि रहल हुअए। दुनू डायलॉग मारि रहल छल। मोहनदास: ए...हे! अहाँ के छी? अहाँक नाम की? चलु कोरटक नाम बताउ! बीरन बैगा: हमर नाम छी बीरन बैगा। आ हमर बापक नाम अछि डिंडवा बइगा! डिंडवा बइगा!! मोहनदास: ए हे! आ हम के छी? हमर की नाम? बीरन बैगा: (आगू बढ़ि कऽ ओकर छातीपर आंगुर गड़ाबैत) हे साँढ़ भुक्खड़! तोहर नाम छियौ मोहनदास! मोहनदास!! (गरजि कऽ) मोहनदास कबीरपंथी बंसोर!!! मोहनदास: आ हमर बापक नाम की छी? बीरन बैगा: तोहर बाप तँ मरि गेलौ! तोहर बापक नाम रहौ काबा दास! मोहनदास: ए हे! हम मोहनदास एम्हर आ हमर बाप काबा दास ओम्हर ऊपर, सरगमे...तँ सार ओ ओम्हर अनूपपुरक जेलखानामे के बैसल अछि? बीरन दास: (कूदि कऽ हाथ नजाबैत गरजैत अछि)...ओ देहजरा बिसनाथ! चारि सौ बीस...! ओकर बाप डबल चारि सौ बीस! ओकर मौगी चारि सौ बीस...! कोइला खदानबला लेनिन नगरक अफसर नेता सभ कियो चारि सौ बीस! (परमोदी, सितिया, बिहारी, रामकरन, रमोली, सवित्री, गोपाल दास सभक मिलल ठहाकाक संग ढोलक, मंजीरा, हारमोनियमक संगीत) ऐ पूरा कथाक उदास, हताश धूसर रंगक बीचमे चटख प्रसन्न रंगक ई छिट्टा अहाँकेँ कोनो क्षेपक सन लागि रहल होएत। कि नै? अहाँक सोच एकदम्मे सत अछि। गरीब आ अन्यायक शिकार लोकक जिनगीक खरखर यथार्थमे एहन सुन्नर रंग कहियो-काल खाली एहने किछु पल लेल अबैत अछि। सत्ता आ पूंजीसँ जुड़ल तागति एकाएक कोनो बाज सन झपट्टा मारि कऽ अलोपी मैनाक खोताकेँ उजाड़ि दैत अछि आ बाहर लखाह दैत छै चिड़ैक छोट-छोट गेल्हक पंख आ खूनक किछु दाग। ई दाग कोनो पार्टीक सरकारक मानव संसाधन मंत्रालयसँ लिखाएल इतिहासक पाठ¬पुस्तकमे कहियो नै लखाह दैत अछि। किएकि इतिहासकारक पेशे अछि जे अपना कालक सत्ताक आँचरक दागकेँ नुकाएब। ओ मास कतेक रास अजगुत घटनासँ भरल छल। भारतक राजधानी दिल्लीसँ एक हजार पचास किलोमीटर दूर जे किछु भऽ रहल छल, ओकर सूचना आ खबरि ऐ खिस्साक अलाबे अहाँकेँ आर कत्तौसँ नै भेटत। अनूपपुरमे मोहनदासक जीवन जइ हलातसँ गुजरि रहल छलै, ओकर संक्षिप्त विवरण ई अछि: गजानन माधव मुक्तिबोध, न्यायिक दंडाधिकारी, प्रथम श्रेणीक बदली एकाएक राजनांदगांव भऽ गेल आ ओ अनूपपुर छोड़ि कऽ चलि गेल। बिसनाथक वकील रास बिहारी राय, जे सत्ताधारी पार्टीक पैघ नामवर- मातबर नेता छल आ जकर पुतोहू नगर निगमक अध्यक्ष छल ओ एक्के पेशीमे बिसनाथ आ ओकर बाप नगेंद्रनाथक जमानत करा देलक। रास बिहारी राय एखुनका राजनीतिक माँजल खिलाड़ी छल। विश्वनाथ माने मोहनदासकेँ जेलसँ रिहा करैत, पुलिससँ गठजोड़ कऽ ओ ई चलाकी केलक जे पुलिस रिकार्डमे मोहनदासे नाम दर्ज रहए देलक। किएकि जाधरि अदालत अंतिम फैसला नै सुनैबितिऐ ताधरि मोहनदास माने विश्वनाथ अपराधी नै कानूनी रूपमे खाली संदिग्ध भरि छल। माने पुलिसक दस्तावेज आ आधिकारिक कागजमे अनूपपुर जेलसँ जे दूटा कैदी जमानतपर रिहा कएल गेल छल ओ अप्पन पुरान नाम मोहनदास माने विश्वनाथ आ काबादास माने नगेंद्रनाथक नामसँ जेलसँ बाहर छल। ओइ दुनू टाक रिहाइबला दस्तावेजपर बादबला नाम एहन तरहे लेभरा कऽ लिखल गेल छल जे पढ़बामे नै अबै छल। ओम्हर एकाएक एक दिन खबर भेटल जे राजनांदगांवमे न्यायिक दंडाधिकारी जी.एम. मुक्तिबोधकेँ ब्रेन हेमरेज भेल अछि आ हुनका अचेतावस्थामे बिलासपुरक अपोलो अस्पतालमे भरती कएल गेल अछि। अपोलोमे कांग्रेस पार्टीक महामंत्री श्रीकांत वर्मा आ मुक्तिबोधक अभिन्न मित्र नेमिचंद जैन हुनका लग छल। मुदा 72 घंटा धरि जीवन-मृत्युक बीच चलल कठिन संग्रामक बाद गजानन माधव मुक्तिबोध, न्यायिक दंडाधिकारी, प्रथम श्रेणी अप्पन अंतिम साँस लेलक। ...ऐ अंतिम साँसमे ओ "हे राम!' कहलक। ओकर मृत्युक सूचना भेटलापर हर्षवर्धन सोनीक संग कूही भऽ कानैबला पुरबनरा गामक मोहनदास कबीरपंथी बंसोर सेहो छल। ओकर जिनगीक आशाक असगर इजोत मिझा गेल। अखुनका हाल ई अछि जे बिसनाथ अप्पन कनिया रेनुका संग मिलि कऽ कोलियरीक दलालीमे बड़ पाइ कमा लेने अछि। विजय तिवारीक संग ओकर बैसकी अखनो चलैत अछि। ओ अखन सोझाँ भऽ राजनीतिमे आबि गेल अछि आ जिला जनपदक अध्यक्ष पदक चुनाव लड़ि रहल अछि। ओकर जाति-बिरादरीक लोक तँ ओहिनो ऊँच जगहपर अछि। ओ सभ तरहेँ ओकर मदति करैत अछि। ओ कहैत अछि, "असली मोहनदास के अछि आ नकली के, एकर फैसला तँ हम करब। ओ सार दू कौड़ीक कल्लर बंसोर हमर इज्जतिपर बट्टा लगौलक, लागल-लगाएल नोकरी छिनलक, आब हम अपन तागति ओकरा देखा देबै। अखन पछिला हफ्ता जखन हम अप्पन गाम गेल रही तँ हर्षवर्धनक चेहरा उड़ल छलै ओकर आँखि लाल छलै। ओ बाजल, "पछिला तीन रातिसँ हम सुतल नै छी। बुझबामे नै अबैत अछि जे की करी। बिसनाथकेँ लऽ कऽ पुरबनराक लोग सत कहैत अछि। गज भरिक बिसधारी। असल करैत'। ओ बड़का साँस भरलक आ बाजल, "लेनिन नगरक इलाकामे बिसनाथ सभ दोसर-तेसर दिन कोनो-नै-कोनो क्रिमिनल अपराध करैत अछि। कखनो केकरो चेन खींच लैत अछि, कखनो ककरो संग मारिपीट करैत अछि। ओकर कनियाँ फाइनेंस आ चिटफंडक जइ धंधामे अछि, ओकर वसूलीमे ओ कर्जदारसँ मारिपीट करैत अछि आ घरमे पैसि कऽ समान उठा लैत अछि।...आब थानामे जे एफ.आइ.आर. दर्ज होइत अछि ओ तँ मोहनदासक नामसँ दर्ज होइत अछि किएकि ओतए बेसी लोक बिसनाथकेँ अखन धरि मोहनदासक नामसँ जनैत छल। आ ओम्हर पुलिस पुरबनरा जा कऽ ऐ बेचारा असली मोहनदासकेँ पकड़ि लैत अछि। हर्षवर्धनक आँखिमे असहायताक नोर छल। बिसनाथ पुलिस इंस्पेक्टर विजय तिवारीसँ भेंट कऽ थानाक सिपाहीकेँ खुआ-पिआ कऽ राखने अछि। ओ मोहनदासकेँ पीट-पीट कऽ ओकर हाथ-पएर तोड़ि देने छल। ओ चलि-फिरि नै सकै छल। ओकर माइ पुतलीबाइ सेहो चारि दिन पहिने इनारमे खसि कऽ मरि गेल छल। कस्तूरी हाड़-तोर मजूरी कऽ कोनो तरहेँ चूल्हाक आगि जरौने रखने छल। हमर आँखि ऊपर उठल। आगुएसँ मोहनदास नंगड़ाइत बुलल आबि रहल छल। ओकर देहपर पुरनका बेरंग, चिप्पी लागल पेंट आ चेथड़ी भेल चौखुट्टा अंगा नै, एकटा धरियाटा बचल छल। ओकर माथक केस खसि गेल छल आ आँखिमे गोल फ्रेमक सस्ता सन चश्मा लागल छल। ओ रकम-रकम डगमग करैत लाठीक संग कोनो बेमार बूढ जना बुलि रहल छल। "कका, राम राम'! ओ हमरा देखि कऽ हाथ जोड़लक। ओकर चेहरापर पीड़ा आ हारबाक गहींर डड़ीर आबि गेलै। हम देखलहुँ ओ बड़ बूढ लागि रहल छल। अस्सी-पचासी सालक आसपास। लाठी टेक कऽ ओ ओतए धरतीपर बैस गेल। ओकर गरसँ कुहरैक संग भारी अवाज निकलल, मुदा ओ अवाज जेहन भाषामे छल ओ छल राजभाषा हिन्दी। ओ बाजल: "हम अहाँ सभक हाथ जोडै़त छी। हमरा कोनो तरहेँ बचा लिअ। हम कोनो अदालतमे चलि कऽ हलफनामा दै लेल तैयार छी जे हम मोहनदास नै छी। हमर बाप काबा दास नै अछि आ ओ मरल नै अछि, अखनो जिबैत अछि। बड़ मारने अछि हमरा पुलिस, बिसनाथक कहलापर। सभटा हड्डी तोड़ि देने अछि। सांसो टा लेबामे छाती दुखाइत अछि।' हम देख रहल रही, मोहनदासक ठोढ़ कटल छल आ मुँह पोपटा गेल रहै। शाइद थानामे ओकर दाँत तोड़ि देल गेल छल। ओकर अवाज टूटि कऽ छितरा रहल रहै: "जकरा बनबाक छै बनि जाए मोहनदास। हम नै छी मोहनदास। हम कहियो कत्तौसँ बी.ए. नै केलहुँ। कहियो टॉप नै केलहुँ। हम कहियो कोनो नोकरीक काबिल नै रही। खाली हमरा चैनसँ जिबैत रहल देल जाए। आब हिंसा नै करू। जे लुटबाक अछि लुटि लिअ। अप्पन-अप्पन घर भरू। मुदा हमरा तँ अप्पन मेहनतिपर जियए दिअ। काका, अहाँ सभ हमर संग दिअ'। पता चलल मोहनदासक बारह बरखक बेटा देवदास दस दिनसँ घर नै घुरल अछि। कियो कहैत अछि जे बिसनाथ ओकरा गाएब करा देलक, कियो कहैत अछि जे ओ डरे मुंबई भागि गेल छै... ...आ कियो-कियो ईहो कहैत अछि जे ओकरा परसू बस्तरक जंगलमे देखल गेल अछि। (ई ओइ कालक गप अछि, जखन भरूच लगक एकटा ऊँच डिम्हापर राघव नामक एकटा तीस बरखक धनुहार ठाढ़ भेल छल। ओ राति भरि जागि कऽ बाँस चीर-चीर कऽ कतेक रास तीर बनेने छल। ओ धनुषक प्रत्यंचा चढ़ा कऽ आकाश दिस तीर चलबैत छल, फेर दौगि कऽ डिम्हाक नीचाँ खसल तीरकेँ बिछि कऽ आनैत छल। दोबारा, तिबारा...पता नै कते बेर ओ ऐ तरहे तीर अकाश दिस चलबैत रहल आ धरतीपर ओकरा बिछैत छल। मुदा कतेक रास तीर आब पानिमे डूमए लागल छल। ओकरा ताकब आ बीछब मुश्किल भेल जा रहल छल। किएकि पहाड़क बीच, दूर-दूर धरि पसरल मैदानमे पानि भरल जा रहल छल, गाछ डूमि रहल छल। दिशा आ स्मृति सभ किछु डूमि रहल छल। ...तीस बरखक राघव मुदा ओइ डिम्हाक ऊपरसँ अकाश दिस ताधरि तीर चलबैत रहल आ दौग-दौग कऽ ओकरा बिछैत रहल, जाधरि ओ सेहो डूमि नै गेल... राघव आब कत्तऽ अछि? जतए ओ छल, ओतए आब पानिये-पानि रहए। अजग अथाह जल।...ओतए बिजली पैदा होएत।...भरूचमे हिलसा माछ होइल छल। भारतक धारक सभसँ महान आ संसारक विलक्षण माँछ। हिलसा बहैत पानि टामे, धारक तेज धारे टामे जिबैत रहि सकैत अछि। ...हिलसा आब ठाढ़ बान्हक बेमार आ प्रदूषित पानिमे मरि गेल होएत। ...ई ओइ कालक गप अछि, जखन हम ई खिस्सा अहाँक लेल जइ भाषामे लिख रहल छी, ओइ भाषाक भीतर हम बगदादक अबु गरीब जेलमे इराकीक तरहे छी! वा 1943 क जर्मनीक कोनो गैस चेंबरमे यहूदी सन! वा कोनो बीमार प्रदूषित ठाढ़ पानिमे डूमल हिलसा माँछ जेहन!...वा अखनो संग्रामरत राघव धनुहार जेहेन! ...ई वएह काल अछि, जइमे मोहनदास अछि, अहाँ छिऐ, हम छी आ बिसनाथ अछि। आ आइक यथार्थ अछि। ...ओइ काल, जकरा एकैसम शताब्दीक पहिल दशकक रूपमे सभ कियो जनैत अछि आ जखन हम सभ हिन्दीक कथा सम्राट मुंशी प्रेमचंदक सवा सएम जयंती सत्ताधारीकेँ मनाबैत देखि रहल छी... मुदा सत बताउ, मोहनदासक गाम पुरबनराक नाम की अहाँकेँ पोरबंदरक मोन नै पाड़ैत अछि?...) ऐ रचनापर अपन मतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। बालानां कृते संजय कुमार झा, पिता-श्री लक्ष्मी नारायण झा, माता- श्रीमती मुंद्रिका देवी, पता- ग्राम-बेलौन, पोस्ट-नवादा, भाया- बहेरा, जिला- दरभंगा, बिहार बौआ बिसरि गेलहक बौआ बिसरि गेलहक माइक आँचर चअर चांचर गाछी-पांतर

बौआ बिसरि गेलहक खेत-पथार आँगन-बथान डीहबार बाबाक थान

बौआ बिसरि गेलहक तेलियाक तेल चौक सअ जाएत रेल गोली-झुटकीक खेल

बौआ बिसरि गेलहक ठेठरक मजा चोरीक बथुआ आ बेंतक सजा

बौआ बिसरि गेलहक अष्ट्जामक सांझ दिल्ररखनक गीत मंडलबाक माँछ

बौआ बिसरि गेलहक टएरक सवारी भौजी जिनक गाम सुसारी आ हुनक बिदागरी

बौआ बिसरि गेलहक डीह परक मीटिंग फुलवारी में रिहलसल लालूक नक़ल

बौआ बिसरि गेलहक बाधक पोखरि किरकेटक झगरा बुधनीक परबा

बौआ बिसरि गेलहक बाऊ मसाहेबक सटक्का मैयांक गारि कोरियाक मोनक्का

बौआ बिसरि गेलहक मुखियाजीक पंचैती बौसक पान सलहेसक गान

बौआ बिसरि गेलहक डम्फाक ठाप भांगक सरबत भोलक नचारी

बौआ बिसरि गेलहक रांटीबालिक गीत मखानक खीर कतेक छौ मीत

बौआ बिसरि गेलहक स्कूलक रोज शानिचरक भोज छौरीक पान्छां

बौआ बिसरि गेलहक मामक कोरा कक्काक झोरा भुस्साक बोरा

बौआ बिसरि गेलहक चूड़ा-दहिक भोज करियाक कराह नबका गाछी अवाह

बौआ बिसरि गेलहक तासक जोड़ी नेताजीक गप्प आ गाजाक सोट

बौआ बिसरि गेलहक सकरीक सिनेमा मकरंदाक फील्ड मनीगाछिक कचरी

बौआ बिसरि गेलहक बिनोद मसाहेबक थापड सिंघजिक जो है सो बाबाक-क्या समझा

बौआ बिसरि गेलहक दुर्गा स्थानक मेला छौरीक पाँछा झमेला आ चोरएल केला

कत्ते मोन पारबअ सबटा की मोने रहत किछु इन्तजार करअ बाकी फेर कहियो ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com  पर पठाउ। बच्चा लोकनि द्वारा स्मरणीय श्लोक १.प्रातः काल ब्रह्ममुहूर्त्त (सूर्योदयक एक घंटा पहिने) सर्वप्रथम अपन दुनू हाथ देखबाक चाही, आ’ ई श्लोक बजबाक चाही। कराग्रे वसते लक्ष्मीः करमध्ये सरस्वती। करमूले स्थितो ब्रह्मा प्रभाते करदर्शनम्॥ करक आगाँ लक्ष्मी बसैत छथि, करक मध्यमे सरस्वती, करक मूलमे ब्रह्मा स्थित छथि। भोरमे ताहि द्वारे करक दर्शन करबाक थीक। २.संध्या काल दीप लेसबाक काल- दीपमूले स्थितो ब्रह्मा दीपमध्ये जनार्दनः। दीपाग्रे शङ्करः प्रोक्त्तः सन्ध्याज्योतिर्नमोऽस्तुते॥ दीपक मूल भागमे ब्रह्मा, दीपक मध्यभागमे जनार्दन (विष्णु) आऽ दीपक अग्र भागमे शङ्कर स्थित छथि। हे संध्याज्योति! अहाँकेँ नमस्कार। ३.सुतबाक काल- रामं स्कन्दं हनूमन्तं वैनतेयं वृकोदरम्। शयने यः स्मरेन्नित्यं दुःस्वप्नस्तस्य नश्यति॥ जे सभ दिन सुतबासँ पहिने राम, कुमारस्वामी, हनूमान्, गरुड़ आऽ भीमक स्मरण करैत छथि, हुनकर दुःस्वप्न नष्ट भऽ जाइत छन्हि। ४. नहेबाक समय- गङ्गे च यमुने चैव गोदावरि सरस्वति। नर्मदे सिन्धु कावेरि जलेऽस्मिन् सन्निधिं कुरू॥ हे गंगा, यमुना, गोदावरी, सरस्वती, नर्मदा, सिन्धु आऽ कावेरी  धार। एहि जलमे अपन सान्निध्य दिअ। ५.उत्तरं यत्समुद्रस्य हिमाद्रेश्चैव दक्षिणम्। वर्षं तत् भारतं नाम भारती यत्र सन्ततिः॥ समुद्रक उत्तरमे आऽ हिमालयक दक्षिणमे भारत अछि आऽ ओतुका सन्तति भारती कहबैत छथि। ६.अहल्या द्रौपदी सीता तारा मण्डोदरी तथा। पञ्चकं ना स्मरेन्नित्यं महापातकनाशकम्॥ जे सभ दिन अहल्या, द्रौपदी, सीता, तारा आऽ मण्दोदरी, एहि पाँच साध्वी-स्त्रीक स्मरण करैत छथि, हुनकर सभ पाप नष्ट भऽ जाइत छन्हि। ७.अश्वत्थामा बलिर्व्यासो हनूमांश्च विभीषणः। कृपः परशुरामश्च सप्तैते चिरञ्जीविनः॥ अश्वत्थामा, बलि, व्यास, हनूमान्, विभीषण, कृपाचार्य आऽ परशुराम- ई सात टा चिरञ्जीवी कहबैत छथि। ८.साते भवतु सुप्रीता देवी शिखर वासिनी उग्रेन तपसा लब्धो यया पशुपतिः पतिः। सिद्धिः साध्ये सतामस्तु प्रसादान्तस्य धूर्जटेः जाह्नवीफेनलेखेव यन्यूधि शशिनः कला॥ ९. बालोऽहं जगदानन्द न मे बाला सरस्वती। अपूर्णे पंचमे वर्षे वर्णयामि जगत्त्रयम् ॥ १०. दूर्वाक्षत मंत्र(शुक्ल यजुर्वेद अध्याय २२, मंत्र २२) आ ब्रह्मन्नित्यस्य प्रजापतिर्ॠषिः। लिंभोक्त्ता देवताः। स्वराडुत्कृतिश्छन्दः। षड्जः स्वरः॥ आ ब्रह्म॑न् ब्राह्म॒णो ब्र॑ह्मवर्च॒सी जा॑यता॒मा रा॒ष्ट्रे रा॑ज॒न्यः शुरे॑ऽइषव्यो॒ऽतिव्या॒धी म॑हार॒थो जा॑यतां॒ दोग्ध्रीं धे॒नुर्वोढा॑न॒ड्वाना॒शुः सप्तिः॒ पुर॑न्धि॒र्योवा॑ जि॒ष्णू र॑थे॒ष्ठाः स॒भेयो॒ युवास्य यज॑मानस्य वी॒रो जा॒यतां निका॒मे-नि॑कामे नः प॒र्जन्यों वर्षतु॒ फल॑वत्यो न॒ऽओष॑धयः पच्यन्तां योगेक्ष॒मो नः॑ कल्पताम्॥२२॥ मन्त्रार्थाः सिद्धयः सन्तु पूर्णाः सन्तु मनोरथाः। शत्रूणां बुद्धिनाशोऽस्तु मित्राणामुदयस्तव। ॐ दीर्घायुर्भव। ॐ सौभाग्यवती भव। हे भगवान्। अपन देशमे सुयोग्य आ’ सर्वज्ञ विद्यार्थी उत्पन्न होथि, आ’ शुत्रुकेँ नाश कएनिहार सैनिक उत्पन्न होथि। अपन देशक गाय खूब दूध दय बाली, बरद भार वहन करएमे सक्षम होथि आ’ घोड़ा त्वरित रूपेँ दौगय बला होए। स्त्रीगण नगरक नेतृत्व करबामे सक्षम होथि आ’ युवक सभामे ओजपूर्ण भाषण देबयबला आ’ नेतृत्व देबामे सक्षम होथि। अपन देशमे जखन आवश्यक होय वर्षा होए आ’ औषधिक-बूटी सर्वदा परिपक्व होइत रहए। एवं क्रमे सभ तरहेँ हमरा सभक कल्याण होए। शत्रुक बुद्धिक नाश होए आ’ मित्रक उदय होए॥ मनुष्यकें कोन वस्तुक इच्छा करबाक चाही तकर वर्णन एहि मंत्रमे कएल गेल अछि। एहिमे वाचकलुप्तोपमालड़्कार अछि। अन्वय- ब्रह्म॑न् - विद्या आदि गुणसँ परिपूर्ण ब्रह्म रा॒ष्ट्रे - देशमे ब्र॑ह्मवर्च॒सी-ब्रह्म विद्याक तेजसँ युक्त्त आ जा॑यतां॒- उत्पन्न होए रा॑ज॒न्यः-राजा शुरे॑ऽ–बिना डर बला इषव्यो॒- बाण चलेबामे निपुण ऽतिव्या॒धी-शत्रुकेँ तारण दय बला म॑हार॒थो-पैघ रथ बला वीर दोग्ध्रीं-कामना(दूध पूर्ण करए बाली) धे॒नुर्वोढा॑न॒ड्वाना॒शुः धे॒नु-गौ वा वाणी र्वोढा॑न॒ड्वा- पैघ बरद ना॒शुः-आशुः-त्वरित सप्तिः॒-घोड़ा पुर॑न्धि॒र्योवा॑- पुर॑न्धि॒- व्यवहारकेँ धारण करए बाली र्योवा॑-स्त्री जि॒ष्णू-शत्रुकेँ जीतए बला र॑थे॒ष्ठाः-रथ पर स्थिर स॒भेयो॒-उत्तम सभामे युवास्य-युवा जेहन यज॑मानस्य-राजाक राज्यमे वी॒रो-शत्रुकेँ पराजित करएबला निका॒मे-नि॑कामे-निश्चययुक्त्त कार्यमे नः-हमर सभक प॒र्जन्यों-मेघ वर्षतु॒-वर्षा होए फल॑वत्यो-उत्तम फल बला ओष॑धयः-औषधिः पच्यन्तां- पाकए योगेक्ष॒मो-अलभ्य लभ्य करेबाक हेतु कएल गेल योगक रक्षा नः॑-हमरा सभक हेतु कल्पताम्-समर्थ होए ग्रिफिथक अनुवाद- हे ब्रह्मण, हमर राज्यमे ब्राह्मण नीक धार्मिक विद्या बला, राजन्य-वीर,तीरंदाज, दूध दए बाली गाय, दौगय बला जन्तु, उद्यमी नारी होथि। पार्जन्य आवश्यकता पड़ला पर वर्षा देथि, फल देय बला गाछ पाकए, हम सभ संपत्ति अर्जित/संरक्षित करी। 8.VIDEHA FOR NON RESIDENTS 8.VIDEHA FOR NON RESIDENTS 8.1 to 8.3 MAITHILI LITERATURE IN ENGLISH 8.1.1.The Comet   -GAJENDRA THAKUR translated by Jyoti Jha chaudhary 8.1.2.The_Science_of_Words- GAJENDRA THAKUR translated by the author himself 8.1.3.On_the_dice-board_of_the_millennium- GAJENDRA THAKUR translated by Jyoti Jha chaudhary 8.1.4.NAAGPHANS (IN ENGLISH)- SHEFALIKA VERMA translated by Dr. Rajiv Kumar Verma and Dr. Jaya Verma 8.2.Original Poem in Maithili by Kalikant Jha "Buch" Translated into English by Jyoti Jha Chaudhary Original Poem in Maithili by Kalikant Jha "Buch" Translated into English by Jyoti Jha Chaudhary Kalikant Jha "Buch" 1934-2009, Birth place- village Karian, District- Samastipur (Karian is birth place of famous Indian Nyaiyyayik philosopher Udayanacharya), Father Late Pt. Rajkishor Jha was first headmaster of village middle school. Mother Late Kala Devi was housewife. After completing Intermediate education started job block office of Govt. of Bihar.published in Mithila Mihir, Mati-pani, Bhakha, and Maithili Akademi magazine. Jyoti Jha Chaudhary, Date of Birth: December 30 1978,Place of Birth- Belhvar (Madhubani District), Education: Swami Vivekananda Middle School, Tisco Sakchi Girls High School, Mrs KMPM Inter College, IGNOU, ICWAI (COST ACCOUNTANCY); Residence- LONDON, UK; Father- Sh. Shubhankar Jha, Jamshedpur; Mother- Smt. Sudha Jha- Shivipatti. Jyoti received editor's choice award from www.poetry.comand her poems were featured in front page of www.poetrysoup.com for some period.She learnt Mithila Painting under Ms. Shveta Jha, Basera Institute, Jamshedpur and Fine Arts from Toolika, Sakchi, Jamshedpur (India). Her Mithila Paintings have been displayed by Ealing Art Group at Ealing Broadway, London. A Poor Man’s Child Look my dear child, that crow sings Listen to the crow, it is telling you something You are sleeping here in the middle of the corridor And the crow is roaming on the eastern wall The sound of flute played by the eastern wind Listen to the crow, it is telling you something For you, there is no biscuit or chocolate The salt and chapatti cannot fill your stomach The melody of the voice that conversation brings Listen to the crow, it is telling you something Your father has become the foreigner It had been long, he hadn’t sent a letter It awakes your mother’s suffering Listen to the crow, it is telling you something What is poverty, how can you understand There is no happiness even in the dream for a workman It sets a fire that leading people to settle in the city Listen to the crow, it is telling you something Biniya is making you rest on her lap Oh baby’s sleep! Come very fast For me, your hunger is very humiliating Listen to the crow, it is telling you something VIDEHA MAITHILI SAMSKRIT TUTOR बिपिन कुमार झा लैटेक्स : परिचयः उपादेयता च (गताङ्कतः अग्रे) बिपिन कुमार झा वरिष्ठ अनुसंधाता भारतीयप्रौद्योगिकीसंस्थानम् मुम्बई लेटेक्स इत्यस्य उपयोगं कुर्वन् गणितीयटंकननियमनसन्दर्भितमौखिकशिक्षणे भवतां हार्दं स्वागतम्। तृतीयस्मारिका- विण्डोज math.tec एका स्रोतसंचिका विद्यते। द्वितीयस्य विण्डोज इत्यस्य उपयोगं एतस्याः संचिकायाः कम्पाइल इत्यस्य कृते भवति। आउटपुट संचिका pdf ब्राउजर इत्यत्र maths.pdf इति वर्तते। आयान्तु गणितमध्ये उपयुक्तेन युनानी संकेतेन सह कार्यप्रारंभं कुर्वन्तु। वयं तावत् लेटेक्स  इत्यस्य व्याख्यानं कुर्मः यतोहि वयं डालर चिह्नेन सह गणितीयाभिव्यक्तिं लिखामः। उदाहरणरूपे वयं अल्फा इत्यस्य प्रयोगं कुर्वन्तः डालर अल्फा इति लिखामः। संकलनकाले वयं अल्फा प्राप्नुमः। एतद्वदेव वयं बीटा, गामा, डेल्टा प्रभृतयः लिखामः। अस्तु किम भवति यदा एतेषां संचयनं कुर्मः। अन्तर्जालात् अथवा लेटेक्स इत्यस्य मानकग्रन्थात् कोऽपि पूर्णसूची प्राप्तीकर्तुं शक्नुवन्ति। वयं अधुना गणितीयाअभिव्यक्तौ विस्तार्स्य अवधारणासन्दर्भे विचारं कुर्मः। एतत् कार्यस्य पूर्वं एतत् डीलिट  कुर्मः। तन्त्रस्य संकलनं कुर्मः। कथम् अल्फा ए इत्यस्य जननं स्यात्? अल्फा ए इत्यस्य कृते प्रयासं कुर्मः यस्य उत्पत्तिकृते वयं चिन्तनं कुर्मः एतत् अल्फा तथा ए त्यनयोः परिणामरूपः अस्ति। अस्तु अप्ल्फा ए इत्यस्य कृते यत्नं कुर्मः। लेटेक्स कथयति यत् अल्फा ए एक अपरिभाषितं नियन्त्रितं तारतम्यं विद्यते। एतत् कथयति यत् एतत् अनुदेशं न अनुभवति। एतस्य निराकरणंस्रोत संचिका मध्ये अवकाशस्य अनुमतिप्रदानेन तथा आउटपुट संचिकायाम् उपेक्षाभावेन सम्भवति। प्रथमं तावत् निर्गमं कुर्मः। पुनर्संकलनं कुर्मः। एतत् कथयति अल्फा ए अल्फा ए अस्ति इति। एवं प्रकारेण वयं द्रष्टुं शक्नुमः यत् अवकाशं स्रोतसंचिकायां अनुदेशं ददाति। एतदवकाशानां दर्शनं आउटपुटफाइलमध्ये न भवति।

यदि वयं आउटपुटसंचिकायां अवकाशस्य अन्वितिः कुर्मः तर्हि किं भवति? लेटेक्स प्रति स्पष्टरूपे कथनं स्यात्। उदाहरणतया अल्फा इति स्लैश अफा ए इत्यस्मिन् प्रतिवर्तनं करोति। एतस्य संकलनं कुर्मः। पश्यन्तु अत्र अवकाशं त्यजति। वयं भिन्नं ल्मबकाय अन्तरालं दद्मः। उदाहरणतया अग्रिमां पंक्तिं प्रति गच्छामः। क्वाड ए अत्र अवकाशः अस्ति। अल्फा क्यू क्वाड ए विस्तृतावकाशं ददाति। वयं एतस्य संकलनं कुर्मः। पश्यतु एतत् विस्तृतं भवति।यद्यपि विस्तृतं अवकाशं स्यत् वयं एच. स्पेश प्रभृति-अनुदेशपालनमपि कर्तुं शक्नुमः अस्तु, कथम् अस्माभिः पंक्तिं तत्र अनुस्यूता। यतो हि गद्यांशस्य प्रारंभः अस्ति अत्र। अधुना अत्र भवानि। शोभनम् अधुना अहं कथयामि यत् केनप्रकारेण सूक्ष्मावकाशस्य निर्माणं स्यात्।  अस्तु एतत् स्लैश कमाण्ड ए द्वारा कृतम् अस्ति। अत्र तावत् पश्यतु। अन्तिमं सूक्क्ष्मावकाशं स्लैश कौमा कमाण्ड द्वारा निर्मितम् अस्ति। लेटेक्स्ट मोड इत्यतः गणितीयमोड इत्यत्र गमनात् पूर्वम् अक्षरस्य परिवर्तनम् अधुना पश्यामि। वस्तुतया एतत् अत्र स्पष्टम् अस्ति अस्माकं पार्श्वे ए अत्र अस्ति सहैव यद्यपि आउटपुटरूपे ए अत्र अस्ति किन्तु यदि भवान एतत् पश्यति एतत् ए, भिन्नफ़ोण्टरूपे वर्तते। डालरसंकेतस्य समीपस्थस्य ए इत्यस्य लेखनात् एतत् निरकृतं भवति। पश्यतु एतत् फ़ोण्ट अधुना, एतानि अक्षराणि तादात्म्यरूपाणि सन्ति। चरस्य अक्षरतादात्म्यस्वीकृतिः- लेटेक्स इत्यस्य प्रारम्भिक उपयोक्ताद्वारा प्रायशः एषा त्रुटिः क्रियते। डालरसंकेतस्य उपयोगं ऋणात्मक चिह्नस्यकृते उपयोगस्य आवशकता भवति। एतस्य कृते एतत् त्यजामि, एतस्य संचयं कुर्मः। सम्यक्। मन्ये  निगेटिव अल्फा ए माइनस अल्फा ए अस्ति इति लिखामः। किं भवति यदा वयं एतत् लिखामः? संचयं कुर्वन्तु। अत्र मानस चिह्नं स्माल डैश रूपे अत्र दृश्यते। डालरचिह्नसमीपस्थस्य माइनसचिह्नस्वीकरणात् एतत् निराकृतं भवति। इत्यस्यां अवस्थायां डालरचिह्नसमीपे वयं माइनस चिह्नं लिखामः। वस्तुतया तुलना कृते एतत् अत्र स्वीकरोमि तथा माइनस चिह्नेन सह एतस्य अत्र प्रतिलिपिं करोमि।पश्यतु किं भवति, एतत् माइनस चिह्न तथा अन्य माइनस चिह्नयोर्मध्ये भेदं पश्यतु। एतत् माइनस चिह्न डालर माइनस चिह्नस्य मध्ये अस्ति एतत् भिन्ना त्रुटिः अस्ति या लेटेक्स प्रारम्भिकशिक्षार्थी द्वारा सामान्यतया उत्पाद्यते। एतत् गणितीय संकेते आवश्यकं भवति। एतत् डैश उपयोगस्य कृते नास्ति। क्रमशः..... ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com  पर पठाउ। Input: (कोष्ठकमे देवनागरी, मिथिलाक्षर किंवा फोनेटिक-रोमनमे टाइप करू। Input in Devanagari, Mithilakshara or Phonetic-Roman.) Output: (परिणाम देवनागरी, मिथिलाक्षर आ फोनेटिक-रोमन/ रोमनमे। Result in Devanagari, Mithilakshara and Phonetic-Roman/ Roman.) English to Maithili Maithili to English इंग्लिश-मैथिली-कोष / मैथिली-इंग्लिश-कोष  प्रोजेक्टकेँ आगू बढ़ाऊ, अपन सुझाव आ योगदान ई-मेल द्वारा ggajendra@videha.com पर पठाऊ। Top of Form विदेहक मैथिली-अंग्रेजी आ अंग्रेजी मैथिली कोष (इंटरनेटपर पहिल बेर सर्च-डिक्शनरी) एम.एस. एस.क्यू.एल. सर्वर आधारित -Based on ms-sql server Maithili-English and English-Maithili Dictionary. १.भारत आ नेपालक मैथिली भाषा-वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक शैली आ २.मैथिलीमे भाषा सम्पादन पाठ्यक्रम १.नेपाल आ भारतक मैथिली भाषा-वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक शैली

१.१. नेपालक मैथिली भाषा वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक  उच्चारण आ लेखन शैली (भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक धारणाकेँ पूर्ण रूपसँ सङ्ग लऽ निर्धारित) मैथिलीमे उच्चारण तथा लेखन १.पञ्चमाक्षर आ अनुस्वार: पञ्चमाक्षरान्तर्गत ङ, ञ, ण, न एवं म अबैत अछि। संस्कृत भाषाक अनुसार शब्दक अन्तमे जाहि वर्गक अक्षर रहैत अछि ओही वर्गक पञ्चमाक्षर अबैत अछि। जेना- अङ्क (क वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ङ् आएल अछि।) पञ्च (च वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ञ् आएल अछि।) खण्ड (ट वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ण् आएल अछि।) सन्धि (त वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे न् आएल अछि।) खम्भ (प वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे म् आएल अछि।) उपर्युक्त बात मैथिलीमे कम देखल जाइत अछि। पञ्चमाक्षरक बदलामे अधिकांश जगहपर अनुस्वारक प्रयोग देखल जाइछ। जेना- अंक, पंच, खंड, संधि, खंभ आदि। व्याकरणविद पण्डित गोविन्द झाक कहब छनि जे कवर्ग, चवर्ग आ टवर्गसँ पूर्व अनुस्वार लिखल जाए तथा तवर्ग आ पवर्गसँ पूर्व पञ्चमाक्षरे लिखल जाए। जेना- अंक, चंचल, अंडा, अन्त तथा कम्पन। मुदा हिन्दीक निकट रहल आधुनिक लेखक एहि बातकेँ नहि मानैत छथि। ओ लोकनि अन्त आ कम्पनक जगहपर सेहो अंत आ कंपन लिखैत देखल जाइत छथि। नवीन पद्धति किछु सुविधाजनक अवश्य छैक। किएक तँ एहिमे समय आ स्थानक बचत होइत छैक। मुदा कतोक बेर हस्तलेखन वा मुद्रणमे अनुस्वारक छोट सन बिन्दु स्पष्ट नहि भेलासँ अर्थक अनर्थ होइत सेहो देखल जाइत अछि। अनुस्वारक प्रयोगमे उच्चारण-दोषक सम्भावना सेहो ततबए देखल जाइत अछि। एतदर्थ कसँ लऽ कऽ पवर्ग धरि पञ्चमाक्षरेक प्रयोग करब उचित अछि। यसँ लऽ कऽ ज्ञ धरिक अक्षरक सङ्ग अनुस्वारक प्रयोग करबामे कतहु कोनो विवाद नहि देखल जाइछ। २.ढ आ ढ़ : ढ़क उच्चारण “र् ह”जकाँ होइत अछि। अतः जतऽ “र् ह”क उच्चारण हो ओतऽ मात्र ढ़ लिखल जाए। आन ठाम खाली ढ लिखल जएबाक चाही। जेना- ढ = ढाकी, ढेकी, ढीठ, ढेउआ, ढङ्ग, ढेरी, ढाकनि, ढाठ आदि। ढ़ = पढ़ाइ, बढ़ब, गढ़ब, मढ़ब, बुढ़बा, साँढ़, गाढ़, रीढ़, चाँढ़, सीढ़ी, पीढ़ी आदि। उपर्युक्त शब्द सभकेँ देखलासँ ई स्पष्ट होइत अछि जे साधारणतया शब्दक शुरूमे ढ आ मध्य तथा अन्तमे ढ़ अबैत अछि। इएह नियम ड आ ड़क सन्दर्भ सेहो लागू होइत अछि। ३.व आ ब : मैथिलीमे “व”क उच्चारण ब कएल जाइत अछि, मुदा ओकरा ब रूपमे नहि लिखल जएबाक चाही। जेना- उच्चारण : बैद्यनाथ, बिद्या, नब, देबता, बिष्णु, बंश, बन्दना आदि। एहि सभक स्थानपर क्रमशः वैद्यनाथ, विद्या, नव, देवता, विष्णु, वंश, वन्दना लिखबाक चाही। सामान्यतया व उच्चारणक लेल ओ प्रयोग कएल जाइत अछि। जेना- ओकील, ओजह आदि। ४.य आ ज : कतहु-कतहु “य”क उच्चारण “ज”जकाँ करैत देखल जाइत अछि, मुदा ओकरा ज नहि लिखबाक चाही। उच्चारणमे यज्ञ, जदि, जमुना, जुग, जाबत, जोगी, जदु, जम आदि कहल जाएबला शब्द सभकेँ क्रमशः यज्ञ, यदि, यमुना, युग, यावत, योगी, यदु, यम लिखबाक चाही। ५.ए आ य : मैथिलीक वर्तनीमे ए आ य दुनू लिखल जाइत अछि। प्राचीन वर्तनी- कएल, जाए, होएत, माए, भाए, गाए आदि। नवीन वर्तनी- कयल, जाय, होयत, माय, भाय, गाय आदि। सामान्यतया शब्दक शुरूमे ए मात्र अबैत अछि। जेना एहि, एना, एकर, एहन आदि। एहि शब्द सभक स्थानपर यहि, यना, यकर, यहन आदिक प्रयोग नहि करबाक चाही। यद्यपि मैथिलीभाषी थारू सहित किछु जातिमे शब्दक आरम्भोमे “ए”केँ य कहि उच्चारण कएल जाइत अछि। ए आ “य”क प्रयोगक सन्दर्भमे प्राचीने पद्धतिक अनुसरण करब उपयुक्त मानि एहि पुस्तकमे ओकरे प्रयोग कएल गेल अछि। किएक तँ दुनूक लेखनमे कोनो सहजता आ दुरूहताक बात नहि अछि। आ मैथिलीक सर्वसाधारणक उच्चारण-शैली यक अपेक्षा एसँ बेसी निकट छैक। खास कऽ कएल, हएब आदि कतिपय शब्दकेँ कैल, हैब आदि रूपमे कतहु-कतहु लिखल जाएब सेहो “ए”क प्रयोगकेँ बेसी समीचीन प्रमाणित करैत अछि। ६.हि, हु तथा एकार, ओकार : मैथिलीक प्राचीन लेखन-परम्परामे कोनो बातपर बल दैत काल शब्दक पाछाँ हि, हु लगाओल जाइत छैक। जेना- हुनकहि, अपनहु, ओकरहु, तत्कालहि, चोट्टहि, आनहु आदि। मुदा आधुनिक लेखनमे हिक स्थानपर एकार एवं हुक स्थानपर ओकारक प्रयोग करैत देखल जाइत अछि। जेना- हुनके, अपनो, तत्काले, चोट्टे, आनो आदि। ७.ष तथा ख : मैथिली भाषामे अधिकांशतः षक उच्चारण ख होइत अछि। जेना- षड्यन्त्र (खड़यन्त्र), षोडशी (खोड़शी), षट्कोण (खटकोण), वृषेश (वृखेश), सन्तोष (सन्तोख) आदि। ८.ध्वनि-लोप : निम्नलिखित अवस्थामे शब्दसँ ध्वनि-लोप भऽ जाइत अछि: (क) क्रियान्वयी प्रत्यय अयमे य वा ए लुप्त भऽ जाइत अछि। ओहिमे सँ पहिने अक उच्चारण दीर्घ भऽ जाइत अछि। ओकर आगाँ लोप-सूचक चिह्न वा विकारी (’ / ऽ) लगाओल जाइछ। जेना- पूर्ण रूप : पढ़ए (पढ़य) गेलाह, कए (कय) लेल, उठए (उठय) पड़तौक। अपूर्ण रूप : पढ़’ गेलाह, क’ लेल, उठ’ पड़तौक। पढ़ऽ गेलाह, कऽ लेल, उठऽ पड़तौक। (ख) पूर्वकालिक कृत आय (आए) प्रत्ययमे य (ए) लुप्त भऽ जाइछ, मुदा लोप-सूचक विकारी नहि लगाओल जाइछ। जेना- पूर्ण रूप : खाए (य) गेल, पठाय (ए) देब, नहाए (य) अएलाह। अपूर्ण रूप : खा गेल, पठा देब, नहा अएलाह। (ग) स्त्री प्रत्यय इक उच्चारण क्रियापद, संज्ञा, ओ विशेषण तीनूमे लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना- पूर्ण रूप : दोसरि मालिनि चलि गेलि। अपूर्ण रूप : दोसर मालिन चलि गेल। (घ) वर्तमान कृदन्तक अन्तिम त लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना- पूर्ण रूप : पढ़ैत अछि, बजैत अछि, गबैत अछि। अपूर्ण रूप : पढ़ै अछि, बजै अछि, गबै अछि। (ङ) क्रियापदक अवसान इक, उक, ऐक तथा हीकमे लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना- पूर्ण रूप: छियौक, छियैक, छहीक, छौक, छैक, अबितैक, होइक। अपूर्ण रूप : छियौ, छियै, छही, छौ, छै, अबितै, होइ। (च) क्रियापदीय प्रत्यय न्ह, हु तथा हकारक लोप भऽ जाइछ। जेना- पूर्ण रूप : छन्हि, कहलन्हि, कहलहुँ, गेलह, नहि। अपूर्ण रूप : छनि, कहलनि, कहलौँ, गेलऽ, नइ, नञि, नै। ९.ध्वनि स्थानान्तरण : कोनो-कोनो स्वर-ध्वनि अपना जगहसँ हटि कऽ दोसर ठाम चलि जाइत अछि। खास कऽ ह्रस्व इ आ उक सम्बन्धमे ई बात लागू होइत अछि। मैथिलीकरण भऽ गेल शब्दक मध्य वा अन्तमे जँ ह्रस्व इ वा उ आबए तँ ओकर ध्वनि स्थानान्तरित भऽ एक अक्षर आगाँ आबि जाइत अछि। जेना- शनि (शइन), पानि (पाइन), दालि ( दाइल), माटि (माइट), काछु (काउछ), मासु (माउस) आदि। मुदा तत्सम शब्द सभमे ई निअम लागू नहि होइत अछि। जेना- रश्मिकेँ रइश्म आ सुधांशुकेँ सुधाउंस नहि कहल जा सकैत अछि। १०.हलन्त(्)क प्रयोग : मैथिली भाषामे सामान्यतया हलन्त (्)क आवश्यकता नहि होइत अछि। कारण जे शब्दक अन्तमे अ उच्चारण नहि होइत अछि। मुदा संस्कृत भाषासँ जहिनाक तहिना मैथिलीमे आएल (तत्सम) शब्द सभमे हलन्त प्रयोग कएल जाइत अछि। एहि पोथीमे सामान्यतया सम्पूर्ण शब्दकेँ मैथिली भाषा सम्बन्धी निअम अनुसार हलन्तविहीन राखल गेल अछि। मुदा व्याकरण सम्बन्धी प्रयोजनक लेल अत्यावश्यक स्थानपर कतहु-कतहु हलन्त देल गेल अछि। प्रस्तुत पोथीमे मथिली लेखनक प्राचीन आ नवीन दुनू शैलीक सरल आ समीचीन पक्ष सभकेँ समेटि कऽ वर्ण-विन्यास कएल गेल अछि। स्थान आ समयमे बचतक सङ्गहि हस्त-लेखन तथा तकनीकी दृष्टिसँ सेहो सरल होबऽबला हिसाबसँ वर्ण-विन्यास मिलाओल गेल अछि। वर्तमान समयमे मैथिली मातृभाषी पर्यन्तकेँ आन भाषाक माध्यमसँ मैथिलीक ज्ञान लेबऽ पड़ि रहल परिप्रेक्ष्यमे लेखनमे सहजता तथा एकरूपतापर ध्यान देल गेल अछि। तखन मैथिली भाषाक मूल विशेषता सभ कुण्ठित नहि होइक, ताहू दिस लेखक-मण्डल सचेत अछि। प्रसिद्ध भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक कहब छनि जे सरलताक अनुसन्धानमे एहन अवस्था किन्नहु ने आबऽ देबाक चाही जे भाषाक विशेषता छाँहमे पडि जाए। -(भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक धारणाकेँ पूर्ण रूपसँ सङ्ग लऽ निर्धारित) १.२. मैथिली अकादमी, पटना द्वारा निर्धारित मैथिली लेखन-शैली

१. जे शब्द मैथिली-साहित्यक प्राचीन कालसँ आइ धरि जाहि वर्त्तनीमे प्रचलित अछि, से सामान्यतः ताहि वर्त्तनीमे लिखल जाय- उदाहरणार्थ-

ग्राह्य

एखन ठाम जकर, तकर तनिकर अछि

अग्राह्य अखन, अखनि, एखेन, अखनी ठिमा, ठिना, ठमा जेकर, तेकर तिनकर। (वैकल्पिक रूपेँ ग्राह्य) ऐछ, अहि, ए।

२. निम्नलिखित तीन प्रकारक रूप वैकल्पिकतया अपनाओल जाय: भऽ गेल, भय गेल वा भए गेल। जा रहल अछि, जाय रहल अछि, जाए रहल अछि। कर’ गेलाह, वा करय गेलाह वा करए गेलाह।

३. प्राचीन मैथिलीक ‘न्ह’ ध्वनिक स्थानमे ‘न’ लिखल जाय सकैत अछि यथा कहलनि वा कहलन्हि।

४. ‘ऐ’ तथा ‘औ’ ततय लिखल जाय जत’ स्पष्टतः ‘अइ’ तथा ‘अउ’ सदृश उच्चारण इष्ट हो। यथा- देखैत, छलैक, बौआ, छौक इत्यादि।

५. मैथिलीक निम्नलिखित शब्द एहि रूपे प्रयुक्त होयत: जैह, सैह, इएह, ओऐह, लैह तथा दैह।

६. ह्र्स्व इकारांत शब्दमे ‘इ’ के लुप्त करब सामान्यतः अग्राह्य थिक। यथा- ग्राह्य देखि आबह, मालिनि गेलि (मनुष्य मात्रमे)।

७. स्वतंत्र ह्रस्व ‘ए’ वा ‘य’ प्राचीन मैथिलीक उद्धरण आदिमे तँ यथावत राखल जाय, किंतु आधुनिक प्रयोगमे वैकल्पिक रूपेँ ‘ए’ वा ‘य’ लिखल जाय। यथा:- कयल वा कएल, अयलाह वा अएलाह, जाय वा जाए इत्यादि।

८. उच्चारणमे दू स्वरक बीच जे ‘य’ ध्वनि स्वतः आबि जाइत अछि तकरा लेखमे स्थान वैकल्पिक रूपेँ देल जाय। यथा- धीआ, अढ़ैआ, विआह, वा धीया, अढ़ैया, बियाह।

९. सानुनासिक स्वतंत्र स्वरक स्थान यथासंभव ‘ञ’ लिखल जाय वा सानुनासिक स्वर। यथा:- मैञा, कनिञा, किरतनिञा वा मैआँ, कनिआँ, किरतनिआँ।

१०. कारकक विभक्त्तिक निम्नलिखित रूप ग्राह्य:- हाथकेँ, हाथसँ, हाथेँ, हाथक, हाथमे। ’मे’ मे अनुस्वार सर्वथा त्याज्य थिक। ‘क’ क वैकल्पिक रूप ‘केर’ राखल जा सकैत अछि।

११. पूर्वकालिक क्रियापदक बाद ‘कय’ वा ‘कए’ अव्यय वैकल्पिक रूपेँ लगाओल जा सकैत अछि। यथा:- देखि कय वा देखि कए।

१२. माँग, भाँग आदिक स्थानमे माङ, भाङ इत्यादि लिखल जाय।

१३. अर्द्ध ‘न’ ओ अर्द्ध ‘म’ क बदला अनुसार नहि लिखल जाय, किंतु छापाक सुविधार्थ अर्द्ध ‘ङ’ , ‘ञ’, तथा ‘ण’ क बदला अनुस्वारो लिखल जा सकैत अछि। यथा:- अङ्क, वा अंक, अञ्चल वा अंचल, कण्ठ वा कंठ।

१४. हलंत चिह्न निअमतः लगाओल जाय, किंतु विभक्तिक संग अकारांत प्रयोग कएल जाय। यथा:- श्रीमान्, किंतु श्रीमानक।

१५. सभ एकल कारक चिह्न शब्दमे सटा क’ लिखल जाय, हटा क’ नहि, संयुक्त विभक्तिक हेतु फराक लिखल जाय, यथा घर परक।

१६. अनुनासिककेँ चन्द्रबिन्दु द्वारा व्यक्त कयल जाय। परंतु मुद्रणक सुविधार्थ हि समान जटिल मात्रापर अनुस्वारक प्रयोग चन्द्रबिन्दुक बदला कयल जा सकैत अछि। यथा- हिँ केर बदला हिं।

१७. पूर्ण विराम पासीसँ ( । ) सूचित कयल जाय।

१८. समस्त पद सटा क’ लिखल जाय, वा हाइफेनसँ जोड़ि क’ ,  हटा क’ नहि।

१९. लिअ तथा दिअ शब्दमे बिकारी (ऽ) नहि लगाओल जाय।

२०. अंक देवनागरी रूपमे राखल जाय।

२१.किछु ध्वनिक लेल नवीन चिन्ह बनबाओल जाय। जा' ई नहि बनल अछि ताबत एहि दुनू ध्वनिक बदला पूर्ववत् अय/ आय/ अए/ आए/ आओ/ अओ लिखल जाय। आकि ऎ वा ऒ सँ व्यक्त कएल जाय।

ह./- गोविन्द झा ११/८/७६ श्रीकान्त ठाकुर ११/८/७६ सुरेन्द्र झा "सुमन" ११/०८/७६

  २. मैथिलीमे भाषा सम्पादन पाठ्यक्रम २.१. उच्चारण निर्देश: (बोल्ड कएल रूप ग्राह्य):- दन्त न क उच्चारणमे दाँतमे जीह सटत- जेना बाजू नाम , मुदा ण क उच्चारणमे जीह मूर्धामे सटत (नै सटैए तँ उच्चारण दोष अछि)- जेना बाजू गणेश। तालव्य शमे जीह तालुसँ , षमे मूर्धासँ आ दन्त समे दाँतसँ सटत। निशाँ, सभ आ शोषण बाजि कऽ देखू। मैथिलीमे ष केँ वैदिक संस्कृत जकाँ ख सेहो उच्चरित कएल जाइत अछि, जेना वर्षा, दोष। य अनेको स्थानपर ज जकाँ उच्चरित होइत अछि आ ण ड़ जकाँ (यथा संयोग आ गणेश संजोग आ गड़ेस उच्चरित होइत अछि)। मैथिलीमे व क उच्चारण ब, श क उच्चारण स आ य क उच्चारण ज सेहो होइत अछि। ओहिना ह्रस्व इ बेशीकाल मैथिलीमे पहिने बाजल जाइत अछि कारण देवनागरीमे आ मिथिलाक्षरमे ह्रस्व इ अक्षरक पहिने लिखलो जाइत आ बाजलो जएबाक चाही। कारण जे हिन्दीमे एकर दोषपूर्ण उच्चारण होइत अछि (लिखल तँ पहिने जाइत अछि मुदा बाजल बादमे जाइत अछि), से शिक्षा पद्धतिक दोषक कारण हम सभ ओकर उच्चारण दोषपूर्ण ढंगसँ कऽ रहल छी। अछि- अ इ छ  ऐछ (उच्चारण) छथि- छ इ थ  – छैथ (उच्चारण) पहुँचि- प हुँ इ च (उच्चारण) आब अ आ इ ई ए ऐ ओ औ अं अः ऋ ऐ सभ लेल मात्रा सेहो अछि, मुदा ऐमे ई ऐ ओ औ अं अः ऋ केँ संयुक्ताक्षर रूपमे गलत रूपमे प्रयुक्त आ उच्चरित कएल जाइत अछि। जेना ऋ केँ री  रूपमे उच्चरित करब। आ देखियौ- ऐ लेल देखिऔ क प्रयोग अनुचित। मुदा देखिऐ लेल देखियै अनुचित। क् सँ ह् धरि अ सम्मिलित भेलासँ क सँ ह बनैत अछि, मुदा उच्चारण काल हलन्त युक्त शब्दक अन्तक उच्चारणक प्रवृत्ति बढ़ल अछि, मुदा हम जखन मनोजमे ज् अन्तमे बजैत छी, तखनो पुरनका लोककेँ बजैत सुनबन्हि- मनोजऽ, वास्तवमे ओ अ युक्त ज् = ज बजै छथि। फेर ज्ञ अछि ज् आ ञ क संयुक्त मुदा गलत उच्चारण होइत अछि- ग्य। ओहिना क्ष अछि क् आ ष क संयुक्त मुदा उच्चारण होइत अछि छ। फेर श् आ र क संयुक्त अछि श्र ( जेना श्रमिक) आ स् आ र क संयुक्त अछि स्र (जेना मिस्र)। त्र भेल त+र । उच्चारणक ऑडियो फाइल विदेह आर्काइव  http://www.videha.co.in/ पर उपलब्ध अछि। फेर केँ / सँ / पर पूर्व अक्षरसँ सटा कऽ लिखू मुदा तँ / कऽ हटा कऽ। ऐमे सँ मे पहिल सटा कऽ लिखू आ बादबला हटा कऽ। अंकक बाद टा लिखू सटा कऽ मुदा अन्य ठाम टा लिखू हटा कऽ– जेना छहटा मुदा सभ टा। फेर ६अ म सातम लिखू- छठम सातम नै। घरबलामे बला मुदा घरवालीमे वाली प्रयुक्त करू। रहए- रहै मुदा सकैए (उच्चारण सकै-ए)। मुदा कखनो काल रहए आ रहै मे अर्थ भिन्नता सेहो, जेना से कम्मो जगहमे पार्किंग करबाक अभ्यास रहै ओकरा। पुछलापर पता लागल जे ढुनढुन नाम्ना ई ड्राइवर कनाट प्लेसक पार्किंगमे काज करैत रहए। छलै, छलए मे सेहो ऐ तरहक भेल। छलए क उच्चारण छल-ए सेहो। संयोगने- (उच्चारण संजोगने) केँ/  कऽ केर- क ( केर क प्रयोग गद्यमे नै करू , पद्यमे कऽ सकै छी। ) क (जेना रामक) –रामक आ संगे (उच्चारण राम के /  राम कऽ सेहो) सँ- सऽ (उच्चारण) चन्द्रबिन्दु आ अनुस्वार- अनुस्वारमे कंठ धरिक प्रयोग होइत अछि मुदा चन्द्रबिन्दुमे नै। चन्द्रबिन्दुमे कनेक एकारक सेहो उच्चारण होइत अछि- जेना रामसँ- (उच्चारण राम सऽ)  रामकेँ- (उच्चारण राम कऽ/ राम के सेहो)। केँ जेना रामकेँ भेल हिन्दीक को (राम को)- राम को= रामकेँ क जेना रामक भेल हिन्दीक का ( राम का) राम का= रामक कऽ जेना जा कऽ भेल हिन्दीक कर ( जा कर) जा कर= जा कऽ सँ भेल हिन्दीक से (राम से) राम से= रामसँ सऽ , तऽ , त , केर (गद्यमे) एे चारू शब्द सबहक प्रयोग अवांछित। के दोसर अर्थेँ प्रयुक्त भऽ सकैए- जेना, के कहलक? विभक्ति “क”क बदला एकर प्रयोग अवांछित। नञि, नहि, नै, नइ, नँइ, नइँ, नइं ऐ सभक उच्चारण आ लेखन - नै त्त्व क बदलामे त्व जेना महत्वपूर्ण (महत्त्वपूर्ण नै) जतए अर्थ बदलि जाए ओतहि मात्र तीन अक्षरक संयुक्ताक्षरक प्रयोग उचित। सम्पति- उच्चारण स म्प इ त (सम्पत्ति नै- कारण सही उच्चारण आसानीसँ सम्भव नै)। मुदा सर्वोत्तम (सर्वोतम नै)। राष्ट्रिय (राष्ट्रीय नै) सकैए/ सकै (अर्थ परिवर्तन) पोछैले/ पोछै लेल/ पोछए लेल पोछैए/ पोछए/ (अर्थ परिवर्तन) पोछए/ पोछै ओ लोकनि ( हटा कऽ, ओ मे बिकारी नै) ओइ/ ओहि ओहिले/ ओहि लेल/ ओही लऽ जएबेँ/ बैसबेँ पँचभइयाँ देखियौक/ (देखिऔक नै- तहिना अ मे ह्रस्व आ दीर्घक मात्राक प्रयोग अनुचित) जकाँ / जेकाँ तँइ/ तैँ/ होएत / हएत नञि/ नहि/ नँइ/ नइँ/ नै सौँसे/ सौंसे बड़ / बड़ी (झोराओल) गाए (गाइ नहि), मुदा गाइक दूध (गाएक दूध नै।) रहलेँ/ पहिरतैँ हमहीं/ अहीं सब - सभ सबहक - सभहक धरि - तक गप- बात बूझब - समझब बुझलौं/ समझलौं/ बुझलहुँ - समझलहुँ हमरा आर - हम सभ आकि- आ कि सकैछ/ करैछ (गद्यमे प्रयोगक आवश्यकता नै) होइन/ होनि जाइन (जानि नै, जेना देल जाइन) मुदा जानि-बूझि (अर्थ परिव्र्तन) पइठ/ जाइठ आउ/ जाउ/ आऊ/ जाऊ मे, केँ, सँ, पर (शब्दसँ सटा कऽ) तँ कऽ धऽ दऽ (शब्दसँ हटा कऽ) मुदा दूटा वा बेसी विभक्ति संग रहलापर पहिल विभक्ति टाकेँ सटाऊ। जेना ऐमे सँ । एकटा , दूटा (मुदा कए टा) बिकारीक प्रयोग शब्दक अन्तमे, बीचमे अनावश्यक रूपेँ नै। आकारान्त आ अन्तमे अ क बाद बिकारीक प्रयोग नै (जेना दिअ , आ/ दिय’ , आ’, आ नै ) अपोस्ट्रोफीक प्रयोग बिकारीक बदलामे करब अनुचित आ मात्र फॉन्टक तकनीकी न्यूनताक परिचायक)- ओना बिकारीक संस्कृत रूप ऽ अवग्रह कहल जाइत अछि आ वर्तनी आ उच्चारण दुनू ठाम एकर लोप रहैत अछि/ रहि सकैत अछि (उच्चारणमे लोप रहिते अछि)। मुदा अपोस्ट्रोफी सेहो अंग्रेजीमे पसेसिव केसमे होइत अछि आ फ्रेंचमे शब्दमे जतए एकर प्रयोग होइत अछि जेना raison d’etre एतए सेहो एकर उच्चारण रैजौन डेटर होइत अछि, माने अपोस्ट्रॉफी अवकाश नै दैत अछि वरन जोड़ैत अछि, से एकर प्रयोग बिकारीक बदला देनाइ तकनीकी रूपेँ सेहो अनुचित)। अइमे, एहिमे/ ऐमे जइमे, जाहिमे एखन/ अखन/ अइखन केँ (के नहि) मे (अनुस्वार रहित) भऽ मे दऽ तँ (तऽ, त नै) सँ ( सऽ स नै) गाछ तर गाछ लग साँझ खन जो (जो go, करै जो do) तै/तइ जेना- तै दुआरे/ तइमे/ तइले जै/जइ जेना- जै कारण/ जइसँ/ जइले ऐ/अइ जेना- ऐ कारण/ ऐसँ/ अइले/ मुदा एकर एकटा खास प्रयोग- लालति‍ कतेक दि‍नसँ कहैत रहैत अइ लै/लइ जेना लैसँ/ लइले/ लै दुआरे लहँ/ लौं गेलौं/ लेलौं/ लेलँह/ गेलहुँ/ लेलहुँ/ लेलँ जइ/ जाहि‍/ जै जहि‍ठाम/ जाहि‍ठाम/ जइठाम/ जैठाम एहि‍/ अहि‍/ अइ (वाक्यक अंतमे ग्राह्य) / ऐ अइछ/ अछि‍/ ऐछ तइ/ तहि‍/ तै/ ताहि‍ ओहि‍/ ओइ सीखि‍/ सीख जीवि‍/ जीवी/ जीब भलेहीं/ भलहि‍ं तैं/ तँइ/ तँए जाएब/ जएब लइ/ लै छइ/ छै नहि‍/ नै/ नइ गइ/ गै छनि‍/ छन्‍हि‍  ... समए शब्‍दक संग जखन कोनो वि‍भक्‍ति‍ जुटै छै तखन समै जना समैपर इत्‍यादि‍। असगरमे हृदए आ वि‍भक्‍ति‍ जुटने हृदे जना हृदेसँ, हृदेमे इत्‍यादि‍। जइ/ जाहि‍/ जै जहि‍ठाम/ जाहि‍ठाम/ जइठाम/ जैठाम एहि‍/ अहि‍/ अइ/ ऐ अइछ/ अछि‍/ ऐछ तइ/ तहि‍/ तै/ ताहि‍ ओहि‍/ ओइ सीखि‍/ सीख जीवि‍/ जीवी/ जीब भले/ भलेहीं/ भलहि‍ं तैं/ तँइ/ तँए जाएब/ जएब लइ/ लै छइ/ छै नहि‍/ नै/ नइ गइ/ गै छनि‍/ छन्‍हि‍ चुकल अछि/ गेल गछि २.२. मैथिलीमे भाषा सम्पादन पाठ्यक्रम नीचाँक सूचीमे देल विकल्पमेसँ लैंगुएज एडीटर द्वारा कोन रूप चुनल जेबाक चाही: बोल्ड कएल रूप ग्राह्य: १.होयबला/ होबयबला/ होमयबला/ हेब’बला, हेम’बला/ होयबाक/होबएबला /होएबाक २. आ’/आऽ आ ३. क’ लेने/कऽ लेने/कए लेने/कय लेने/ल’/लऽ/लय/लए ४. भ’ गेल/भऽ गेल/भय गेल/भए गेल ५. कर’ गेलाह/करऽ गेलह/करए गेलाह/करय गेलाह ६. लिअ/दिअ लिय’,दिय’,लिअ’,दिय’/ ७. कर’ बला/करऽ बला/ करय बला करैबला/क’र’ बला / करैवाली ८. बला वला (पुरूष), वाली (स्‍त्री) ९ . आङ्ल आंग्ल १०. प्रायः प्रायह ११. दुःख दुख १ २. चलि गेल चल गेल/चैल गेल १३. देलखिन्ह देलकिन्ह, देलखिन १४. देखलन्हि देखलनि/ देखलैन्ह १५. छथिन्ह/ छलन्हि छथिन/ छलैन/ छलनि १६. चलैत/दैत चलति/दैति १७. एखनो अखनो १८. बढ़नि‍ बढ़इन बढ़न्हि १९. ओ’/ओऽ(सर्वनाम) ओ २० . ओ (संयोजक) ओ’/ओऽ २१. फाँगि/फाङ्गि फाइंग/फाइङ २२. जे जे’/जेऽ २३. ना-नुकुर ना-नुकर २४. केलन्हि/केलनि‍/कयलन्हि २५. तखनतँ/ तखन तँ २६. जा रहल/जाय रहल/जाए रहल २७. निकलय/निकलए लागल/ लगल बहराय/ बहराए लागल/ लगल निकल’/बहरै लागल २८. ओतय/ जतय जत’/ ओत’/ जतए/ ओतए २९. की फूरल जे कि फूरल जे ३०. जे जे’/जेऽ ३१. कूदि / यादि(मोन पारब) कूइद/याइद/कूद/याद/ यादि (मोन) ३२. इहो/ ओहो ३३. हँसए/ हँसय हँसऽ ३४. नौ आकि दस/नौ किंवा दस/ नौ वा दस ३५. सासु-ससुर सास-ससुर ३६. छह/ सात छ/छः/सात ३७. की  की’/ कीऽ (दीर्घीकारान्तमे ऽ वर्जित) ३८. जबाब जवाब ३९. करएताह/ करेताह करयताह ४०. दलान दिशि दलान दिश/दलान दिस ४१ . गेलाह गएलाह/गयलाह ४२. किछु आर/ किछु और/ किछ आर ४३. जाइ छल/ जाइत छल जाति छल/जैत छल ४४. पहुँचि/ भेट जाइत छल/ भेट जाइ छलए पहुँच/ भेटि‍ जाइत छल ४५. जबान (युवा)/ जवान(फौजी) ४६. लय/ लए क’/ कऽ/ लए कए / लऽ कऽ/ लऽ कए ४७. ल’/लऽ कय/ कए ४८. एखन / एखने / अखन / अखने ४९. अहींकेँ अहीँकेँ ५०. गहींर गहीँर ५१. धार पार केनाइ धार पार केनाय/केनाए ५२. जेकाँ जेँकाँ/ जकाँ ५३. तहिना तेहिना ५४. एकर अकर ५५. बहिनउ बहनोइ ५६. बहिन बहिनि ५७. बहिन-बहिनोइ बहिन-बहनउ ५८. नहि/ नै ५९. करबा / करबाय/ करबाए ६०. तँ/ त ऽ तय/तए ६१. भैयारी मे छोट-भाए/भै/, जेठ-भाय/भाइ, ६२. गि‍नतीमे दू भाइ/भाए/भाँइ ६३. ई पोथी दू भाइक/ भाँइ/ भाए/ लेल। यावत जावत ६४. माय मै / माए मुदा माइक ममता ६५. देन्हि/ दइन दनि‍/ दएन्हि/ दयन्हि दन्हि/ दैन्हि ६६. द’/ दऽ/ दए ६७. ओ (संयोजक) ओऽ (सर्वनाम) ६८. तका कए तकाय तकाए ६९. पैरे (on foot) पएरे  कएक/ कैक ७०. ताहुमे/ ताहूमे ७१. पुत्रीक ७२. बजा कय/ कए / कऽ ७३. बननाय/बननाइ ७४. कोला ७५. दिनुका दिनका ७६. ततहिसँ ७७. गरबओलन्हि/ गरबौलनि‍/ गरबेलन्हि/ गरबेलनि‍ ७८. बालु बालू ७९. चेन्ह चिन्ह(अशुद्ध) ८०. जे जे’ ८१ . से/ के से’/के’ ८२. एखुनका अखनुका ८३. भुमिहार भूमिहार ८४. सुग्गर / सुगरक/ सूगर ८५. झठहाक झटहाक ८६. छूबि ८७. करइयो/ओ करैयो ने देलक /करियौ-करइयौ ८८. पुबारि पुबाइ ८९. झगड़ा-झाँटी झगड़ा-झाँटि ९०. पएरे-पएरे पैरे-पैरे ९१. खेलएबाक ९२. खेलेबाक ९३. लगा ९४. होए- हो – होअए ९५. बुझल बूझल ९६. बूझल (संबोधन अर्थमे) ९७. यैह यएह / इएह/ सैह/ सएह ९८. तातिल ९९. अयनाय- अयनाइ/ अएनाइ/ एनाइ १००. निन्न- निन्द १०१. बिनु बिन १०२. जाए जाइ १०३. जाइ (in different sense)-last word of sentence १०४. छत पर आबि जाइ १०५. ने १०६. खेलाए (play) –खेलाइ १०७. शिकाइत- शिकायत १०८. ढप- ढ़प १०९ . पढ़- पढ ११०. कनिए/ कनिये कनिञे १११. राकस- राकश ११२. होए/ होय होइ ११३. अउरदा- औरदा ११४. बुझेलन्हि (different meaning- got understand) ११५. बुझएलन्हि/बुझेलनि‍/ बुझयलन्हि (understood himself) ११६. चलि- चल/ चलि‍ गेल ११७. खधाइ- खधाय ११८. मोन पाड़लखिन्ह/ मोन पाड़लखि‍न/ मोन पारलखिन्ह ११९. कैक- कएक- कइएक १२०. लग ल’ग १२१. जरेनाइ १२२. जरौनाइ जरओनाइ- जरएनाइ/ जरेनाइ १२३. होइत १२४. गरबेलन्हि/ गरबेलनि‍ गरबौलन्हि/ गरबौलनि‍ १२५. चिखैत- (to test)चिखइत १२६. करइयो (willing to do) करैयो १२७. जेकरा- जकरा १२८. तकरा- तेकरा १२९. बिदेसर स्थानेमे/ बिदेसरे स्थानमे १३०. करबयलहुँ/ करबएलहुँ/ करबेलहुँ करबेलौं १३१. हारिक (उच्चारण हाइरक) १३२. ओजन वजन आफसोच/ अफसोस कागत/ कागच/ कागज १३३. आधे भाग/ आध-भागे १३४. पिचा / पिचाय/पिचाए १३५. नञ/ ने १३६. बच्चा नञ (ने) पिचा जाय १३७. तखन ने (नञ) कहैत अछि। कहै/ सुनै/ देखै छल मुदा कहैत-कहैत/ सुनैत-सुनैत/ देखैत-देखैत १३८. कतेक गोटे/ कताक गोटे १३९. कमाइ-धमाइ/ कमाई- धमाई १४० . लग ल’ग १४१. खेलाइ (for playing) १४२. छथिन्ह/ छथिन १४३. होइत होइ १४४. क्यो कियो / केओ १४५. केश (hair) १४६. केस (court-case) १४७ . बननाइ/ बननाय/ बननाए १४८. जरेनाइ १४९. कुरसी कुर्सी १५०. चरचा चर्चा १५१. कर्म करम १५२. डुबाबए/ डुबाबै/ डुमाबै डुमाबय/ डुमाबए १५३. एखुनका/ अखुनका १५४. लए/ लिअए (वाक्यक अंतिम शब्द)- लऽ १५५. कएलक/ केलक १५६. गरमी गर्मी १५७ . वरदी वर्दी १५८. सुना गेलाह सुना’/सुनाऽ १५९. एनाइ-गेनाइ १६०. तेना ने घेरलन्हि/ तेना ने घेरलनि‍ १६१. नञि / नै १६२. डरो ड’रो १६३. कतहु/ कतौ कहीं १६४. उमरिगर-उमेरगर उमरगर १६५. भरिगर १६६. धोल/धोअल धोएल १६७. गप/गप्प १६८. के के’ १६९. दरबज्जा/ दरबजा १७०. ठाम १७१. धरि तक १७२. घूरि लौटि १७३. थोरबेक १७४. बड्ड १७५. तोँ/ तूँ १७६. तोँहि( पद्यमे ग्राह्य) १७७. तोँही / तोँहि १७८. करबाइए करबाइये १७९. एकेटा १८०. करितथि /करतथि १८१. पहुँचि/ पहुँच १८२. राखलन्हि रखलन्हि/ रखलनि‍ १८३. लगलन्हि/ लगलनि‍ लागलन्हि १८४. सुनि (उच्चारण सुइन) १८५. अछि (उच्चारण अइछ) १८६. एलथि गेलथि १८७. बितओने/ बि‍तौने/ बितेने १८८. करबओलन्हि/ करबौलनि‍/ करेलखिन्ह/ करेलखि‍न १८९. करएलन्हि/ करेलनि‍ १९०. आकि/ कि १९१. पहुँचि/ पहुँच १९२. बत्ती जराय/ जराए जरा (आगि लगा) १९३. से से’ १९४. हाँ मे हाँ (हाँमे हाँ विभक्त्तिमे हटा कए) १९५. फेल फैल १९६. फइल(spacious) फैल १९७. होयतन्हि/ होएतन्हि/ होएतनि‍/हेतनि‍/ हेतन्हि १९८. हाथ मटिआएब/ हाथ मटियाबय/हाथ मटियाएब १९९. फेका फेंका २००. देखाए देखा २०१. देखाबए २०२. सत्तरि सत्तर २०३. साहेब साहब २०४.गेलैन्ह/ गेलन्हि/ गेलनि‍ २०५. हेबाक/ होएबाक २०६.केलो/ कएलहुँ/केलौं/ केलुँ २०७. किछु न किछु/ किछु ने किछु २०८.घुमेलहुँ/ घुमओलहुँ/ घुमेलौं २०९. एलाक/ अएलाक २१०. अः/ अह २११.लय/ लए (अर्थ-परिवर्त्तन) २१२.कनीक/ कनेक २१३.सबहक/ सभक २१४.मिलाऽ/ मिला २१५.कऽ/ क २१६.जाऽ/ जा २१७.आऽ/ आ २१८.भऽ /भ’ (’ फॉन्टक कमीक द्योतक) २१९.निअम/ नियम २२० .हेक्टेअर/ हेक्टेयर २२१.पहिल अक्षर ढ/ बादक/ बीचक ढ़ २२२.तहिं/तहिँ/ तञि/ तैं २२३.कहिं/ कहीं २२४.तँइ/ तैं / तइँ २२५.नँइ/ नइँ/  नञि/ नहि/नै २२६.है/ हए / एलीहेँ/ २२७.छञि/ छै/ छैक /छइ २२८.दृष्टिएँ/ दृष्टियेँ २२९.आ (come)/ आऽ(conjunction) २३०. आ (conjunction)/ आऽ(come) २३१.कुनो/ कोनो, कोना/केना २३२.गेलैन्ह-गेलन्हि-गेलनि‍ २३३.हेबाक- होएबाक २३४.केलौँ- कएलौँ-कएलहुँ/केलौं २३५.किछु न किछ- किछु ने किछु २३६.केहेन- केहन २३७.आऽ (come)-आ (conjunction-and)/आ। आब'-आब' /आबह-आबह २३८. हएत-हैत २३९.घुमेलहुँ-घुमएलहुँ- घुमेलाें २४०.एलाक- अएलाक २४१.होनि- होइन/ होन्हि/ २४२.ओ-राम ओ श्यामक बीच(conjunction), ओऽ कहलक (he said)/ओ २४३.की हए/ कोसी अएली हए/ की है। की हइ २४४.दृष्टिएँ/ दृष्टियेँ २४५ .शामिल/ सामेल २४६.तैँ / तँए/ तञि/ तहिं २४७.जौं / ज्योँ/ जँ/ २४८.सभ/ सब २४९.सभक/ सबहक २५०.कहिं/ कहीं २५१.कुनो/ कोनो/ कोनहुँ/ २५२.फारकती भऽ गेल/ भए गेल/ भय गेल २५३.कोना/ केना/ कन्‍ना/कना २५४.अः/ अह २५५.जनै/ जनञ २५६.गेलनि‍/ गेलाह (अर्थ परिवर्तन) २५७.केलन्हि/ कएलन्हि/ केलनि‍/ २५८.लय/ लए/ लएह (अर्थ परिवर्तन) २५९.कनीक/ कनेक/कनी-मनी २६०.पठेलन्हि‍ पठेलनि‍/ पठेलइन/ पपठओलन्हि/ पठबौलनि‍/ २६१.निअम/ नियम २६२.हेक्टेअर/ हेक्टेयर २६३.पहिल अक्षर रहने ढ/ बीचमे रहने ढ़ २६४.आकारान्तमे बिकारीक प्रयोग उचित नै/ अपोस्ट्रोफीक प्रयोग फान्टक तकनीकी न्यूनताक परिचायक ओकर बदला अवग्रह (बिकारी) क प्रयोग उचित २६५.केर (पद्यमे ग्राह्य) / -क/ कऽ/ के २६६.छैन्हि- छन्हि २६७.लगैए/ लगैये २६८.होएत/ हएत २६९.जाएत/ जएत/ २७०.आएत/ अएत/ आओत २७१ .खाएत/ खएत/ खैत २७२.पिअएबाक/ पिएबाक/पि‍येबाक २७३.शुरु/ शुरुह २७४.शुरुहे/ शुरुए २७५.अएताह/अओताह/ एताह/ औताह २७६.जाहि/ जाइ/ जइ/ जै/ २७७.जाइत/ जैतए/ जइतए २७८.आएल/ अएल २७९.कैक/ कएक २८०.आयल/ अएल/ आएल २८१. जाए/ जअए/ जए (लालति‍ जाए लगलीह।) २८२. नुकएल/ नुकाएल २८३. कठुआएल/ कठुअएल २८४. ताहि/ तै/ तइ २८५. गायब/ गाएब/ गएब २८६. सकै/ सकए/ सकय २८७.सेरा/सरा/ सराए (भात सरा गेल) २८८.कहैत रही/देखैत रही/ कहैत छलौं/ कहै छलौं- अहिना चलैत/ पढ़ैत (पढ़ै-पढ़ैत अर्थ कखनो काल परिवर्तित) - आर बुझै/ बुझैत (बुझै/ बुझै छी, मुदा बुझैत-बुझैत)/ सकैत/ सकै। करैत/ करै। दै/ दैत। छैक/ छै। बचलै/ बचलैक। रखबा/ रखबाक । बिनु/ बिन। रातिक/ रातुक बुझै आ बुझैत केर अपन-अपन जगहपर प्रयोग समीचीन अछि‍। बुझैत-बुझैत आब बुझलि‍ऐ। हमहूँ बुझै छी। २८९. दुआरे/ द्वारे २९०.भेटि/ भेट/ भेँट २९१. खन/ खीन/  खुना (भोर खन/ भोर खीन) २९२.तक/ धरि २९३.गऽ/ गै (meaning different-जनबै गऽ) २९४.सऽ/ सँ (मुदा दऽ, लऽ) २९५.त्त्व,(तीन अक्षरक मेल बदला पुनरुक्तिक एक आ एकटा दोसरक उपयोग) आदिक बदला त्व आदि। महत्त्व/ महत्व/ कर्ता/ कर्त्ता आदिमे त्त संयुक्तक कोनो आवश्यकता मैथिलीमे नै अछि। वक्तव्य २९६.बेसी/ बेशी २९७.बाला/वाला बला/ वला (रहैबला) २९८ .वाली/ (बदलैवाली) २९९.वार्त्ता/ वार्ता ३००. अन्तर्राष्ट्रिय/ अन्तर्राष्ट्रीय ३०१. लेमए/ लेबए ३०२.लमछुरका, नमछुरका ३०२.लागै/ लगै ( भेटैत/ भेटै) ३०३.लागल/ लगल ३०४.हबा/ हवा ३०५.राखलक/ रखलक ३०६.आ (come)/ आ (and) ३०७. पश्चाताप/ पश्चात्ताप ३०८. ऽ केर व्यवहार शब्दक अन्तमे मात्र, यथासंभव बीचमे नै। ३०९.कहैत/ कहै ३१०. रहए (छल)/ रहै (छलै) (meaning different) ३११.तागति/ ताकति ३१२.खराप/ खराब ३१३.बोइन/ बोनि/ बोइनि ३१४.जाठि/ जाइठ ३१५.कागज/ कागच/ कागत ३१६.गिरै (meaning different- swallow)/ गिरए (खसए) ३१७.राष्ट्रिय/ राष्ट्रीय Festivals of Mithila DATE-LIST (year- 2010-11) (१४१८ साल) Marriage Days: Nov.2010- 19 Dec.2010- 3,8 January 2011- 17, 21, 23, 24, 26, 27, 28 31 Feb.2011- 3, 4, 7, 9, 18, 20, 24, 25, 27, 28 March 2011- 2, 7 May 2011- 11, 12, 13, 18, 19, 20, 22, 23, 29, 30 June 2011- 1, 2, 3, 8, 9, 10, 12, 13, 19, 20, 26, 29 Upanayana Days: February 2011- 8 March 2011- 7 May 2011- 12, 13 June 2011- 6, 12 Dviragaman Din: November 2010- 19, 22, 25, 26 December 2010- 6, 8, 9, 10, 12 February 2011- 20, 21 March 2011- 6, 7, 9, 13 April 2011- 17, 18, 22 May 2011- 5, 6, 8, 13 Mundan Din: November 2010- 24, 26 December 2010- 10, 17 February 2011- 4, 16, 21 March 2011- 7, 9 April 2011- 22 May 2011- 6, 9, 19 June 2011- 3, 6, 10, 20 FESTIVALS OF MITHILA Mauna Panchami-31 July Somavati Amavasya Vrat- 1 August Madhushravani-12 August Nag Panchami- 14 August Raksha Bandhan- 24 Aug Krishnastami- 01 September Kushi Amavasya- 08 September Hartalika Teej- 11 September ChauthChandra-11 September Vishwakarma Pooja- 17 September Karma Dharma Ekadashi-19 September Indra Pooja Aarambh- 20 September Anant Caturdashi- 22 Sep Agastyarghadaan- 23 Sep Pitri Paksha begins- 24 Sep Jimootavahan Vrata/ Jitia-30 Sep Matri Navami- 02 October Kalashsthapan- 08 October Belnauti- 13 October Patrika Pravesh- 14 October Mahastami- 15 October Maha Navami - 16-17 October Vijaya Dashami- 18 October Kojagara- 22 Oct Dhanteras- 3 November Diyabati, shyama pooja- 5 November Annakoota/ Govardhana Pooja-07 November Bhratridwitiya/ Chitragupta Pooja-08 November Chhathi- -12 November Akshyay Navami- 15 November Devotthan Ekadashi- 17 November Kartik Poornima/ Sama Bisarjan- 21 Nov Shaa. ravivratarambh- 21 November Navanna parvan- 24 -26 November Vivaha Panchmi- 10 December Naraknivaran chaturdashi- 01 February Makara/ Teela Sankranti-15 Jan Basant Panchami/ Saraswati Pooja- 08 Februaqry Achla Saptmi- 10 February Mahashivaratri-03 March Holikadahan-Fagua-19 March Holi-20 Mar Varuni Yoga- 31 March va.navaratrarambh- 4 April vaa. Chhathi vrata- 9 April Ram Navami- 12 April Mesha Sankranti-Satuani-14 April Jurishital-15 April Somavati Amavasya Vrata- 02 May Ravi Brat Ant- 08 May Akshaya Tritiya-06 May Janaki Navami- 12 May Vat Savitri-barasait- 01 June Ganga Dashhara-11 June Jagannath Rath Yatra- 3 July Hari Sayan Ekadashi- 11 Jul Aashadhi Guru Poornima-15 Jul VIDEHA ARCHIVE १.विदेह ई-पत्रिकाक सभटा पुरान अंक ब्रेल, तिरहुता आ देवनागरी रूपमे Videha e journal's all old issues in Braille Tirhuta and Devanagari versions विदेह ई-पत्रिकाक पहिल ५० अंक

विदेह ई-पत्रिकाक ५०म सँ आगाँक अंक २.मैथिली पोथी डाउनलोड Maithili Books Download ३.मैथिली ऑडियो संकलन Maithili Audio Downloads ४.मैथिली वीडियोक संकलन Maithili Videos ५.मिथिला चित्रकला/ आधुनिक चित्रकला आ चित्र Mithila Painting/ Modern Art and Photos "विदेह"क एहि सभ सहयोगी लिंकपर सेहो एक बेर जाऊ। ६.विदेह मैथिली क्विज  :  http://videhaquiz.blogspot.com/ ७.विदेह मैथिली जालवृत्त एग्रीगेटर : http://videha-aggregator.blogspot.com/ ८.विदेह मैथिली साहित्य अंग्रेजीमे अनूदित http://madhubani-art.blogspot.com/ ९.विदेहक पूर्व-रूप "भालसरिक गाछ"  : http://gajendrathakur.blogspot.com/ १०.विदेह इंडेक्स  : http://videha123.blogspot.com/ ११.विदेह फाइल : http://videha123.wordpress.com/ १२. विदेह: सदेह : पहिल तिरहुता (मिथिला़क्षर) जालवृत्त (ब्लॉग) http://videha-sadeha.blogspot.com/ १३. विदेह:ब्रेल: मैथिली ब्रेलमे: पहिल बेर विदेह द्वारा http://videha-braille.blogspot.com/ १४.VIDEHA IST MAITHILI  FORTNIGHTLY EJOURNAL ARCHIVE http://videha-archive.blogspot.com/ १५. विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका मैथिली पोथीक आर्काइव http://videha-pothi.blogspot.com/ १६. विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका ऑडियो आर्काइव http://videha-audio.blogspot.com/ १७. विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका वीडियो आर्काइव http://videha-video.blogspot.com/ १८. विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका मिथिला चित्रकला, आधुनिक कला आ चित्रकला http://videha-paintings-photos.blogspot.com/ १९. मैथिल आर मिथिला (मैथिलीक सभसँ लोकप्रिय जालवृत्त) http://maithilaurmithila.blogspot.com/ २०.श्रुति प्रकाशन http://www.shruti-publication.com/ २१.http://groups.google.com/group/videha VIDEHA केर सदस्यता लिअ Top of Form Bottom of Form ईमेल : एहि समूहपर जाऊ २२.http://groups.yahoo.com/group/VIDEHA/ Top of Form Subscribe to VIDEHA Powered by us.groups.yahoo.com Bottom of Form २३.गजेन्द्र ठाकुर इ‍डेक्स http://gajendrathakur123.blogspot.com २४.विदेह रेडियो:मैथिली कथा-कविता आदिक पहिल पोडकास्ट साइट http://videha123radio.wordpress.com/ २५. नेना भुटका http://mangan-khabas.blogspot.com/ महत्त्वपूर्ण सूचना:(१) 'विदेह' द्वारा धारावाहिक रूपे ई-प्रकाशित कएल गेल गजेन्द्र ठाकुरक  निबन्ध-प्रबन्ध-समीक्षा, उपन्यास (सहस्रबाढ़नि) , पद्य-संग्रह (सहस्राब्दीक चौपड़पर), कथा-गल्प (गल्प-गुच्छ), नाटक(संकर्षण), महाकाव्य (त्वञ्चाहञ्च आ असञ्जाति मन) आ बाल-किशोर साहित्य विदेहमे संपूर्ण ई-प्रकाशनक बाद प्रिंट फॉर्ममे। कुरुक्षेत्रम्–अन्तर्मनक खण्ड-१ सँ ७ Combined ISBN No.978-81-907729-7-6 विवरण एहि पृष्ठपर नीचाँमे आ प्रकाशकक साइट http://www.shruti-publication.com/ पर । महत्त्वपूर्ण सूचना (२):सूचना: विदेहक मैथिली-अंग्रेजी आ अंग्रेजी मैथिली कोष (इंटरनेटपर पहिल बेर सर्च-डिक्शनरी) एम.एस. एस.क्यू.एल. सर्वर आधारित -Based on ms-sql server Maithili-English and English-Maithili Dictionary. विदेहक भाषापाक- रचनालेखन स्तंभमे। कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक- गजेन्द्र ठाकुर गजेन्द्र ठाकुरक निबन्ध-प्रबन्ध-समीक्षा, उपन्यास (सहस्रबाढ़नि) , पद्य-संग्रह (सहस्राब्दीक चौपड़पर), कथा-गल्प (गल्प गुच्छ), नाटक(संकर्षण), महाकाव्य (त्वञ्चाहञ्च आ असञ्जाति मन) आ बालमंडली-किशोरजगत विदेहमे संपूर्ण ई-प्रकाशनक बाद प्रिंट फॉर्ममे। कुरुक्षेत्रम्–अन्तर्मनक, खण्ड-१ सँ ७ Ist edition 2009 of Gajendra Thakur’s KuruKshetram-Antarmanak (Vol. I to VII)- essay-paper-criticism, novel, poems, story, play, epics and Children-grown-ups literature in single binding: Language:Maithili ६९२ पृष्ठ : मूल्य भा. रु. 100/-(for individual buyers inside india) (add courier charges Rs.50/-per copy for Delhi/NCR and Rs.100/- per copy for outside Delhi)

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Details for purchase available at print-version publishers's site website: http://www.shruti-publication.com/ or you may write to e-mail:shruti.publication@shruti-publication.com विदेह: सदेह : १: २: ३: ४ तिरहुता : देवनागरी "विदेह" क, प्रिंट संस्करण :विदेह-ई-पत्रिका (http://www.videha.co.in/) क चुनल रचना सम्मिलित। विदेह:सदेह:१: २: ३: ४ सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। Details for purchase available at print-version publishers's site http://www.shruti-publication.com  or you may write to shruti.publication@shruti-publication.com २. संदेश- [ विदेह ई-पत्रिका, विदेह:सदेह मिथिलाक्षर आ देवनागरी आ गजेन्द्र ठाकुरक सात खण्डक- निबन्ध-प्रबन्ध-समीक्षा,उपन्यास (सहस्रबाढ़नि) , पद्य-संग्रह (सहस्राब्दीक चौपड़पर), कथा-गल्प (गल्प गुच्छ), नाटक (संकर्षण), महाकाव्य (त्वञ्चाहञ्च आ असञ्जाति मन) आ बाल-मंडली-किशोर जगत- संग्रह कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक मादेँ। ] १.श्री गोविन्द झा- विदेहकेँ तरंगजालपर उतारि विश्वभरिमे मातृभाषा मैथिलीक लहरि जगाओल, खेद जे अपनेक एहि महाभियानमे हम एखन धरि संग नहि दए सकलहुँ। सुनैत छी अपनेकेँ सुझाओ आ रचनात्मक आलोचना प्रिय लगैत अछि तेँ किछु लिखक मोन भेल। हमर सहायता आ सहयोग अपनेकेँ सदा उपलब्ध रहत। २.श्री रमानन्द रेणु- मैथिलीमे ई-पत्रिका पाक्षिक रूपेँ चला कऽ जे अपन मातृभाषाक प्रचार कऽ रहल छी, से धन्यवाद । आगाँ अपनेक समस्त मैथिलीक कार्यक हेतु हम हृदयसँ शुभकामना दऽ रहल छी। ३.श्री विद्यानाथ झा "विदित"- संचार आ प्रौद्योगिकीक एहि प्रतिस्पर्धी ग्लोबल युगमे अपन महिमामय "विदेह"केँ अपना देहमे प्रकट देखि जतबा प्रसन्नता आ संतोष भेल, तकरा कोनो उपलब्ध "मीटर"सँ नहि नापल जा सकैछ? ..एकर ऐतिहासिक मूल्यांकन आ सांस्कृतिक प्रतिफलन एहि शताब्दीक अंत धरि लोकक नजरिमे आश्चर्यजनक रूपसँ प्रकट हैत। ४. प्रो. उदय नारायण सिंह "नचिकेता"- जे काज अहाँ कए रहल छी तकर चरचा एक दिन मैथिली भाषाक इतिहासमे होएत। आनन्द भए रहल अछि, ई जानि कए जे एतेक गोट मैथिल "विदेह" ई जर्नलकेँ पढ़ि रहल छथि।...विदेहक चालीसम अंक पुरबाक लेल अभिनन्दन। ५. डॉ. गंगेश गुंजन- एहि विदेह-कर्ममे लागि रहल अहाँक सम्वेदनशील मन, मैथिलीक प्रति समर्पित मेहनतिक अमृत रंग, इतिहास मे एक टा विशिष्ट फराक अध्याय आरंभ करत, हमरा विश्वास अछि। अशेष शुभकामना आ बधाइक सङ्ग, सस्नेह...अहाँक पोथी कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक प्रथम दृष्टया बहुत भव्य तथा उपयोगी बुझाइछ। मैथिलीमे तँ अपना स्वरूपक प्रायः ई पहिले एहन  भव्य अवतारक पोथी थिक। हर्षपूर्ण हमर हार्दिक बधाई स्वीकार करी। ६. श्री रामाश्रय झा "रामरंग"(आब स्वर्गीय)- "अपना" मिथिलासँ संबंधित...विषय वस्तुसँ अवगत भेलहुँ।...शेष सभ कुशल अछि। ७. श्री ब्रजेन्द्र त्रिपाठी- साहित्य अकादमी- इंटरनेट पर प्रथम मैथिली पाक्षिक पत्रिका "विदेह" केर लेल बधाई आ शुभकामना स्वीकार करू। ८. श्री प्रफुल्लकुमार सिंह "मौन"- प्रथम मैथिली पाक्षिक पत्रिका "विदेह" क प्रकाशनक समाचार जानि कनेक चकित मुदा बेसी आह्लादित भेलहुँ। कालचक्रकेँ पकड़ि जाहि दूरदृष्टिक परिचय देलहुँ, ओहि लेल हमर मंगलकामना। ९.डॉ. शिवप्रसाद यादव- ई जानि अपार हर्ष भए रहल अछि, जे नव सूचना-क्रान्तिक क्षेत्रमे मैथिली पत्रकारिताकेँ प्रवेश दिअएबाक साहसिक कदम उठाओल अछि। पत्रकारितामे एहि प्रकारक नव प्रयोगक हम स्वागत करैत छी, संगहि "विदेह"क सफलताक शुभकामना। १०. श्री आद्याचरण झा- कोनो पत्र-पत्रिकाक प्रकाशन- ताहूमे मैथिली पत्रिकाक प्रकाशनमे के कतेक सहयोग करताह- ई तऽ भविष्य कहत। ई हमर ८८ वर्षमे ७५ वर्षक अनुभव रहल। एतेक पैघ महान यज्ञमे हमर श्रद्धापूर्ण आहुति प्राप्त होयत- यावत ठीक-ठाक छी/ रहब। ११. श्री विजय ठाकुर- मिशिगन विश्वविद्यालय- "विदेह" पत्रिकाक अंक देखलहुँ, सम्पूर्ण टीम बधाईक पात्र अछि। पत्रिकाक मंगल भविष्य हेतु हमर शुभकामना स्वीकार कएल जाओ। १२. श्री सुभाषचन्द्र यादव- ई-पत्रिका "विदेह" क बारेमे जानि प्रसन्नता भेल। ’विदेह’ निरन्तर पल्लवित-पुष्पित हो आ चतुर्दिक अपन सुगंध पसारय से कामना अछि। १३. श्री मैथिलीपुत्र प्रदीप- ई-पत्रिका "विदेह" केर सफलताक भगवतीसँ कामना। हमर पूर्ण सहयोग रहत। १४. डॉ. श्री भीमनाथ झा- "विदेह" इन्टरनेट पर अछि तेँ "विदेह" नाम उचित आर कतेक रूपेँ एकर विवरण भए सकैत अछि। आइ-काल्हि मोनमे उद्वेग रहैत अछि, मुदा शीघ्र पूर्ण सहयोग देब।कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक देखि अति प्रसन्नता भेल। मैथिलीक लेल ई घटना छी। १५. श्री रामभरोस कापड़ि "भ्रमर"- जनकपुरधाम- "विदेह" ऑनलाइन देखि रहल छी। मैथिलीकेँ अन्तर्राष्ट्रीय जगतमे पहुँचेलहुँ तकरा लेल हार्दिक बधाई। मिथिला रत्न सभक संकलन अपूर्व। नेपालोक सहयोग भेटत, से विश्वास करी। १६. श्री राजनन्दन लालदास- "विदेह" ई-पत्रिकाक माध्यमसँ बड़ नीक काज कए रहल छी, नातिक अहिठाम देखलहुँ। एकर वार्षिक अ‍ंक जखन प्रिं‍ट निकालब तँ हमरा पठायब। कलकत्तामे बहुत गोटेकेँ हम साइटक पता लिखाए देने छियन्हि। मोन तँ होइत अछि जे दिल्ली आबि कए आशीर्वाद दैतहुँ, मुदा उमर आब बेशी भए गेल। शुभकामना देश-विदेशक मैथिलकेँ जोड़बाक लेल।.. उत्कृष्ट प्रकाशन कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक लेल बधाइ। अद्भुत काज कएल अछि, नीक प्रस्तुति अछि सात खण्डमे।  मुदा अहाँक सेवा आ से निःस्वार्थ तखन बूझल जाइत जँ अहाँ द्वारा प्रकाशित पोथी सभपर दाम लिखल नहि रहितैक। ओहिना सभकेँ विलहि देल जइतैक। (स्पष्टीकरण-  श्रीमान्, अहाँक सूचनार्थ विदेह द्वारा ई-प्रकाशित कएल सभटा सामग्री आर्काइवमे https://sites.google.com/a/videha.com/videha-pothi/ पर बिना मूल्यक डाउनलोड लेल उपलब्ध छै आ भविष्यमे सेहो रहतैक। एहि आर्काइवकेँ जे कियो प्रकाशक अनुमति लऽ कऽ प्रिंट रूपमे प्रकाशित कएने छथि आ तकर ओ दाम रखने छथि ताहिपर हमर कोनो नियंत्रण नहि अछि।- गजेन्द्र ठाकुर)...   अहाँक प्रति अशेष शुभकामनाक संग। १७. डॉ. प्रेमशंकर सिंह- अहाँ मैथिलीमे इंटरनेटपर पहिल पत्रिका "विदेह" प्रकाशित कए अपन अद्भुत मातृभाषानुरागक परिचय देल अछि, अहाँक निःस्वार्थ मातृभाषानुरागसँ प्रेरित छी, एकर निमित्त जे हमर सेवाक प्रयोजन हो, तँ सूचित करी। इंटरनेटपर आद्योपांत पत्रिका देखल, मन प्रफुल्लित भऽ गेल। १८.श्रीमती शेफालिका वर्मा- विदेह ई-पत्रिका देखि मोन उल्लाससँ भरि गेल। विज्ञान कतेक प्रगति कऽ रहल अछि...अहाँ सभ अनन्त आकाशकेँ भेदि दियौ, समस्त विस्तारक रहस्यकेँ तार-तार कऽ दियौक...। अपनेक अद्भुत पुस्तक कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक विषयवस्तुक दृष्टिसँ गागरमे सागर अछि। बधाई। १९.श्री हेतुकर झा, पटना-जाहि समर्पण भावसँ अपने मिथिला-मैथिलीक सेवामे तत्पर छी से स्तुत्य अछि। देशक राजधानीसँ भय रहल मैथिलीक शंखनाद मिथिलाक गाम-गाममे मैथिली चेतनाक विकास अवश्य करत। २०. श्री योगानन्द झा, कबिलपुर, लहेरियासराय- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पोथीकेँ निकटसँ देखबाक अवसर भेटल अछि आ मैथिली जगतक एकटा उद्भट ओ समसामयिक दृष्टिसम्पन्न हस्ताक्षरक कलमबन्द परिचयसँ आह्लादित छी। "विदेह"क देवनागरी सँस्करण पटनामे रु. 80/- मे उपलब्ध भऽ सकल जे विभिन्न लेखक लोकनिक छायाचित्र, परिचय पत्रक ओ रचनावलीक सम्यक प्रकाशनसँ ऐतिहासिक कहल जा सकैछ। २१. श्री किशोरीकान्त मिश्र- कोलकाता- जय मैथिली, विदेहमे बहुत रास कविता, कथा, रिपोर्ट आदिक सचित्र संग्रह देखि आ आर अधिक प्रसन्नता मिथिलाक्षर देखि- बधाई स्वीकार कएल जाओ। २२.श्री जीवकान्त- विदेहक मुद्रित अंक पढ़ल- अद्भुत मेहनति। चाबस-चाबस। किछु समालोचना मरखाह..मुदा सत्य। २३. श्री भालचन्द्र झा- अपनेक कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक देखि बुझाएल जेना हम अपने छपलहुँ अछि। एकर विशालकाय आकृति अपनेक सर्वसमावेशताक परिचायक अछि। अपनेक रचना सामर्थ्यमे उत्तरोत्तर वृद्धि हो, एहि शुभकामनाक संग हार्दिक बधाई। २४.श्रीमती डॉ नीता झा- अहाँक कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़लहुँ। ज्योतिरीश्वर शब्दावली, कृषि मत्स्य शब्दावली आ सीत बसन्त आ सभ कथा, कविता, उपन्यास, बाल-किशोर साहित्य सभ उत्तम छल। मैथिलीक उत्तरोत्तर विकासक लक्ष्य दृष्टिगोचर होइत अछि। २५.श्री मायानन्द मिश्र- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक मे हमर उपन्यास स्त्रीधनक जे विरोध कएल गेल अछि तकर हम विरोध करैत छी।... कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पोथीक लेल शुभकामना।(श्रीमान् समालोचनाकेँ विरोधक रूपमे नहि लेल जाए।-गजेन्द्र ठाकुर) २६.श्री महेन्द्र हजारी- सम्पादक श्रीमिथिला- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़ि मोन हर्षित भऽ गेल..एखन पूरा पढ़यमे बहुत समय लागत, मुदा जतेक पढ़लहुँ से आह्लादित कएलक। २७.श्री केदारनाथ चौधरी- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक अद्भुत लागल, मैथिली साहित्य लेल ई पोथी एकटा प्रतिमान बनत। २८.श्री सत्यानन्द पाठक- विदेहक हम नियमित पाठक छी। ओकर स्वरूपक प्रशंसक छलहुँ। एम्हर अहाँक लिखल - कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक देखलहुँ। मोन आह्लादित भऽ उठल। कोनो रचना तरा-उपरी। २९.श्रीमती रमा झा-सम्पादक मिथिला दर्पण। कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक प्रिंट फॉर्म पढ़ि आ एकर गुणवत्ता देखि मोन प्रसन्न भऽ गेल, अद्भुत शब्द एकरा लेल प्रयुक्त कऽ रहल छी। विदेहक उत्तरोत्तर प्रगतिक शुभकामना। ३०.श्री नरेन्द्र झा, पटना- विदेह नियमित देखैत रहैत छी। मैथिली लेल अद्भुत काज कऽ रहल छी। ३१.श्री रामलोचन ठाकुर- कोलकाता- मिथिलाक्षर विदेह देखि मोन प्रसन्नतासँ भरि उठल, अंकक विशाल परिदृश्य आस्वस्तकारी अछि। ३२.श्री तारानन्द वियोगी- विदेह आ कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक देखि चकबिदोर लागि गेल। आश्चर्य। शुभकामना आ बधाई। ३३.श्रीमती प्रेमलता मिश्र “प्रेम”- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़लहुँ। सभ रचना उच्चकोटिक लागल। बधाई। ३४.श्री कीर्तिनारायण मिश्र- बेगूसराय- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक बड्ड नीक लागल, आगांक सभ काज लेल बधाई। ३५.श्री महाप्रकाश-सहरसा- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक नीक लागल, विशालकाय संगहि उत्तमकोटिक। ३६.श्री अग्निपुष्प- मिथिलाक्षर आ देवाक्षर विदेह पढ़ल..ई प्रथम तँ अछि एकरा प्रशंसामे मुदा हम एकरा दुस्साहसिक कहब। मिथिला चित्रकलाक स्तम्भकेँ मुदा अगिला अंकमे आर विस्तृत बनाऊ। ३७.श्री मंजर सुलेमान-दरभंगा- विदेहक जतेक प्रशंसा कएल जाए कम होएत। सभ चीज उत्तम। ३८.श्रीमती प्रोफेसर वीणा ठाकुर- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक उत्तम, पठनीय, विचारनीय। जे क्यो देखैत छथि पोथी प्राप्त करबाक उपाय पुछैत छथि। शुभकामना। ३९.श्री छत्रानन्द सिंह झा- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़लहुँ, बड्ड नीक सभ तरहेँ। ४०.श्री ताराकान्त झा- सम्पादक मैथिली दैनिक मिथिला समाद- विदेह तँ कन्टेन्ट प्रोवाइडरक काज कऽ रहल अछि। कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक अद्भुत लागल। ४१.डॉ रवीन्द्र कुमार चौधरी- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक बहुत नीक, बहुत मेहनतिक परिणाम। बधाई। ४२.श्री अमरनाथ- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक आ विदेह दुनू स्मरणीय घटना अछि, मैथिली साहित्य मध्य। ४३.श्री पंचानन मिश्र- विदेहक वैविध्य आ निरन्तरता प्रभावित करैत अछि, शुभकामना। ४४.श्री केदार कानन- कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक लेल अनेक धन्यवाद, शुभकामना आ बधाइ स्वीकार करी। आ नचिकेताक भूमिका पढ़लहुँ। शुरूमे तँ लागल जेना कोनो उपन्यास अहाँ द्वारा सृजित भेल अछि मुदा पोथी उनटौला पर ज्ञात भेल जे एहिमे तँ सभ विधा समाहित अछि। ४५.श्री धनाकर ठाकुर- अहाँ नीक काज कऽ रहल छी। फोटो गैलरीमे चित्र एहि शताब्दीक जन्मतिथिक अनुसार रहैत तऽ नीक। ४६.श्री आशीष झा- अहाँक पुस्तकक संबंधमे एतबा लिखबा सँ अपना कए नहि रोकि सकलहुँ जे ई किताब मात्र किताब नहि थीक, ई एकटा उम्मीद छी जे मैथिली अहाँ सन पुत्रक सेवा सँ निरंतर समृद्ध होइत चिरजीवन कए प्राप्त करत। ४७.श्री शम्भु कुमार सिंह- विदेहक तत्परता आ क्रियाशीलता देखि आह्लादित भऽ रहल छी। निश्चितरूपेण कहल जा सकैछ जे समकालीन मैथिली पत्रिकाक इतिहासमे विदेहक नाम स्वर्णाक्षरमे लिखल जाएत। ओहि कुरुक्षेत्रक घटना सभ तँ अठारहे दिनमे खतम भऽ गेल रहए मुदा अहाँक कुरुक्षेत्रम् तँ अशेष अछि। ४८.डॉ. अजीत मिश्र- अपनेक प्रयासक कतबो प्रश‍ंसा कएल जाए कमे होएतैक। मैथिली साहित्यमे अहाँ द्वारा कएल गेल काज युग-युगान्तर धरि पूजनीय रहत। ४९.श्री बीरेन्द्र मल्लिक- अहाँक कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक आ विदेह:सदेह पढ़ि अति प्रसन्नता भेल। अहाँक स्वास्थ्य ठीक रहए आ उत्साह बनल रहए से कामना। ५०.श्री कुमार राधारमण- अहाँक दिशा-निर्देशमे विदेह पहिल मैथिली ई-जर्नल देखि अति प्रसन्नता भेल। हमर शुभकामना। ५१.श्री फूलचन्द्र झा प्रवीण-विदेह:सदेह पढ़ने रही मुदा कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक देखि बढ़ाई देबा लेल बाध्य भऽ गेलहुँ। आब विश्वास भऽ गेल जे मैथिली नहि मरत। अशेष शुभकामना। ५२.श्री विभूति आनन्द- विदेह:सदेह देखि, ओकर विस्तार देखि अति प्रसन्नता भेल। ५३.श्री मानेश्वर मनुज-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक एकर भव्यता देखि अति प्रसन्नता भेल, एतेक विशाल ग्रन्थ मैथिलीमे आइ धरि नहि देखने रही। एहिना भविष्यमे काज करैत रही, शुभकामना। ५४.श्री विद्यानन्द झा- आइ.आइ.एम.कोलकाता- कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक विस्तार, छपाईक संग गुणवत्ता देखि अति प्रसन्नता भेल। ५५.श्री अरविन्द ठाकुर-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक मैथिली साहित्यमे कएल गेल एहि तरहक पहिल प्रयोग अछि, शुभकामना। ५६.श्री कुमार पवन-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक पढ़ि रहल छी। किछु लघुकथा पढ़ल अछि, बहुत मार्मिक छल। ५७. श्री प्रदीप बिहारी-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक देखल, बधाई। ५८.डॉ मणिकान्त ठाकुर-कैलिफोर्निया- अपन विलक्षण नियमित सेवासँ हमरा लोकनिक हृदयमे विदेह सदेह भऽ गेल अछि। ५९.श्री धीरेन्द्र प्रेमर्षि- अहाँक समस्त प्रयास सराहनीय। दुख होइत अछि जखन अहाँक प्रयासमे अपेक्षित सहयोग नहि कऽ पबैत छी। ६०.श्री देवशंकर नवीन- विदेहक निरन्तरता आ विशाल स्वरूप- विशाल पाठक वर्ग, एकरा ऐतिहासिक बनबैत अछि। ६१.श्री मोहन भारद्वाज- अहाँक समस्त कार्य देखल, बहुत नीक। एखन किछु परेशानीमे छी, मुदा शीघ्र सहयोग देब। ६२.श्री फजलुर रहमान हाशमी-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक मे एतेक मेहनतक लेल अहाँ साधुवादक अधिकारी छी। ६३.श्री लक्ष्मण झा "सागर"- मैथिलीमे चमत्कारिक रूपेँ अहाँक प्रवेश आह्लादकारी अछि।..अहाँकेँ एखन आर..दूर..बहुत दूरधरि जेबाक अछि। स्वस्थ आ प्रसन्न रही। ६४.श्री जगदीश प्रसाद मंडल-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक पढ़लहुँ । कथा सभ आ उपन्यास सहस्रबाढ़नि पूर्णरूपेँ पढ़ि गेल छी। गाम-घरक भौगोलिक विवरणक जे सूक्ष्म वर्णन सहस्रबाढ़निमे अछि, से चकित कएलक, एहि संग्रहक कथा-उपन्यास मैथिली लेखनमे विविधता अनलक अछि। समालोचना शास्त्रमे अहाँक दृष्टि वैयक्तिक नहि वरन् सामाजिक आ कल्याणकारी अछि, से प्रशंसनीय। ६५.श्री अशोक झा-अध्यक्ष मिथिला विकास परिषद- कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक लेल बधाई आ आगाँ लेल शुभकामना। ६६.श्री ठाकुर प्रसाद मुर्मु- अद्भुत प्रयास। धन्यवादक संग प्रार्थना जे अपन माटि-पानिकेँ ध्यानमे राखि अंकक समायोजन कएल जाए। नव अंक धरि प्रयास सराहनीय। विदेहकेँ बहुत-बहुत धन्यवाद जे एहेन सुन्दर-सुन्दर सचार (आलेख) लगा रहल छथि। सभटा ग्रहणीय- पठनीय। ६७.बुद्धिनाथ मिश्र- प्रिय गजेन्द्र जी,अहाँक सम्पादन मे प्रकाशित ‘विदेह’आ ‘कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक’ विलक्षण पत्रिका आ विलक्षण पोथी! की नहि अछि अहाँक सम्पादनमे? एहि प्रयत्न सँ मैथिली क विकास होयत,निस्संदेह। ६८.श्री बृखेश चन्द्र लाल- गजेन्द्रजी, अपनेक पुस्तक कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक पढ़ि मोन गदगद भय गेल , हृदयसँ अनुगृहित छी । हार्दिक शुभकामना । ६९.श्री परमेश्वर कापड़ि - श्री गजेन्द्र जी । कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक पढ़ि गदगद आ नेहाल भेलहुँ। ७०.श्री रवीन्द्रनाथ ठाकुर- विदेह पढ़ैत रहैत छी। धीरेन्द्र प्रेमर्षिक मैथिली गजलपर आलेख पढ़लहुँ। मैथिली गजल कत्तऽ सँ कत्तऽ चलि गेलैक आ ओ अपन आलेखमे मात्र अपन जानल-पहिचानल लोकक चर्च कएने छथि। जेना मैथिलीमे मठक परम्परा रहल अछि। (स्पष्टीकरण- श्रीमान्, प्रेमर्षि जी ओहि आलेखमे ई स्पष्ट लिखने छथि जे किनको नाम जे छुटि गेल छन्हि तँ से मात्र आलेखक लेखकक जानकारी नहि रहबाक द्वारे, एहिमे आन कोनो कारण नहि देखल जाय। अहाँसँ एहि विषयपर विस्तृत आलेख सादर आमंत्रित अछि।-सम्पादक) ७१.श्री मंत्रेश्वर झा- विदेह पढ़ल आ संगहि अहाँक मैगनम ओपस कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक सेहो, अति उत्तम। मैथिलीक लेल कएल जा रहल अहाँक समस्त कार्य अतुलनीय अछि। ७२. श्री हरेकृष्ण झा- कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक मैथिलीमे अपन तरहक एकमात्र ग्रन्थ अछि, एहिमे लेखकक समग्र दृष्टि आ रचना कौशल देखबामे आएल जे लेखकक फील्डवर्कसँ जुड़ल रहबाक कारणसँ अछि। ७३.श्री सुकान्त सोम- कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक मे  समाजक इतिहास आ वर्तमानसँ अहाँक जुड़ाव बड्ड नीक लागल, अहाँ एहि क्षेत्रमे आर आगाँ काज करब से आशा अछि। ७४.प्रोफेसर मदन मिश्र- कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक सन किताब मैथिलीमे पहिले अछि आ एतेक विशाल संग्रहपर शोध कएल जा सकैत अछि। भविष्यक लेल शुभकामना। ७५.प्रोफेसर कमला चौधरी- मैथिलीमे कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक सन पोथी आबए जे गुण आ रूप दुनूमे निस्सन होअए, से बहुत दिनसँ आकांक्षा छल, ओ आब जा कऽ पूर्ण भेल। पोथी एक हाथसँ दोसर हाथ घुमि रहल अछि, एहिना आगाँ सेहो अहाँसँ आशा अछि। ७६.श्री उदय चन्द्र झा "विनोद": गजेन्द्रजी, अहाँ जतेक काज कएलहुँ अछि से मैथिलीमे आइ धरि कियो नहि कएने छल। शुभकामना। अहाँकेँ एखन बहुत काज आर करबाक अछि। ७७.श्री कृष्ण कुमार कश्यप: गजेन्द्र ठाकुरजी, अहाँसँ भेँट एकटा स्मरणीय क्षण बनि गेल। अहाँ जतेक काज एहि बएसमे कऽ गेल छी ताहिसँ हजार गुणा आर बेशीक आशा अछि। ७८.श्री मणिकान्त दास: अहाँक मैथिलीक कार्यक प्रशंसा लेल शब्द नहि भेटैत अछि। अहाँक कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक सम्पूर्ण रूपेँ पढ़ि गेलहुँ। त्वञ्चाहञ्च बड्ड नीक लागल। ७९. श्री हीरेन्द्र कुमार झा- विदेह ई-पत्रिकाक सभ अंक ई-पत्रसँ भेटैत रहैत अछि। मैथिलीक ई-पत्रिका छैक एहि बातक गर्व होइत अछि। अहाँ आ अहाँक सभ सहयोगीकेँ हार्दिक शुभकामना। विदेह मैथिली साहित्य आन्दोलन (c)२००४-११. सर्वाधिकार लेखकाधीन आ जतय लेखकक नाम नहि अछि ततय संपादकाधीन। विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। सह-सम्पादक: उमेश मंडल। सहायक सम्पादक: शिव कुमार झा आ मुन्नाजी (मनोज कुमार कर्ण)। भाषा-सम्पादन: नागेन्द्र कुमार झा आ पञ्जीकार विद्यानन्द झा। कला-सम्पादन: ज्योति सुनीत चौधरी आ रश्मि रेखा सिन्हा। सम्पादक-शोध-अन्वेषण: डॉ. जया वर्मा आ डॉ. राजीव कुमार वर्मा। रचनाकार अपन मौलिक आ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि) ggajendra@videha.com केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx, .rtf वा .txt फॉर्मेटमे पठा सकैत छथि। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेताह, से आशा करैत छी। रचनाक अंतमे टाइप रहय, जे ई रचना मौलिक अछि, आ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। मेल प्राप्त होयबाक बाद यथासंभव शीघ्र ( सात दिनक भीतर) एकर प्रकाशनक अंकक सूचना देल जायत। ’विदेह' प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका अछि आ एहिमे मैथिली, संस्कृत आ अंग्रेजीमे मिथिला आ मैथिलीसँ संबंधित रचना प्रकाशित कएल जाइत अछि। एहि ई पत्रिकाकेँ श्रीमति लक्ष्मी ठाकुर द्वारा मासक ०१ आ १५ तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि। (c) 2004-11 सर्वाधिकार सुरक्षित। विदेहमे प्रकाशित सभटा रचना आ आर्काइवक सर्वाधिकार रचनाकार आ संग्रहकर्त्ताक लगमे छन्हि। रचनाक अनुवाद आ पुनः प्रकाशन किंवा आर्काइवक उपयोगक अधिकार किनबाक हेतु ggajendra@videha.co.in पर संपर्क करू। एहि साइटकेँ प्रीति झा ठाकुर, मधूलिका चौधरी आ रश्मि प्रिया द्वारा डिजाइन कएल गेल। सिद्धिरस्तु वि दे ह विदेह Videha বিদেহ  विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका Videha Ist Maithili Fortnightly e Magazine  विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका 'विदेह' ७८ म अंक १५ मार्च २०११ (वर्ष ४ मास ३९ अंक ७८)http://www.videha.co.in/ मानुषीमिह संस्कृताम् ISSN 2229-547X VIDEHA वि दे ह विदेह Videha বিদেহ  विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका Videha Ist Maithili Fortnightly e Magazine  विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका 'विदेह' ७८ म अंक १५ मार्च २०११ (वर्ष ४ मास ३९ अंक ७८)http://www.videha.co.in/ मानुषीमिह संस्कृताम् ISSN 2229-547X VIDEHA

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