VIDEHA — Issue 81 / अंक ८१

Publication: VIDEHA · Issue: 81
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412 413 ISSN 2229-547X VIDEHA 'विदेह' ८१ म अंक ०१ मइ २०११ (वर्ष ४ मास ४१ अंक ८१) वि  दे  ह विदेह Videha বিদেহ http://www.videha.co.in  विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका Videha Ist Maithili Fortnightly e Magazine   नव अंक देखबाक लेल पृष्ठ सभकेँ रिफ्रेश कए देखू। Always refresh the pages for viewing new issue of VIDEHA. Read in your own script Roman(Eng)Gujarati Bangla Oriya Gurmukhi Telugu Tamil Kannada Malayalam Hindi ऐ अंकमे अछि:- १. संपादकीय संदेश २. गद्य २.१. जितेन्द्र झा- अपने घरमे उपेक्षित मिथिला चित्रकला २.२.1.ज्योति सुनीत चौधरी- यूके मे भेल 2011 के वार्षिक मिथिला सांस्कृतिक कार्यक्रम पर एक विवरण, 2.समाचार:मीना झा २.३.जगदीश प्रसाद मण्‍डल- जगदीश प्रसाद मण्‍डल- विहनि कथा- गुहारि‍ २.४.जगदीश प्रसाद मण्‍डल- नाटक- कम्‍प्रोमाइज २.५.जगदीश प्रसाद मण्‍डल- कथा- मायराम २.६.प्रभात राय भट्ट - मिथिला गर्भपुत्र २.७.राजदेव मण्‍डल- उपन्‍यास- हमर टोल ३. पद्य ३.१.रवि भूषण पाठक- मरणोपरांत ३.२.आशीष अनचिन्हार ३.३.सुनील कुमार झा- हाइकू/ शेनर्यू ३.४.राजेश मोहन झा गुंजन- परि‍वार नि‍योजन ३.५.१.जीबू कुमार झा २प्रभात राय भट्ट ३.६.नवीन कुमार आशा-अनामिका ३.७. १.किछु त हम करब शि‍वकुमार झा टि‍ल्‍लू- कवि‍ता- उनटा-पुनटा २. किशन कारीगर- किछु त हम करब ३.८.विद्यानन्द झा “विदू”- शिक्षाक मौलिकता ४. मिथिला कला-संगीत- १.श्वेता झा चौधरी २.ज्योति सुनीत चौधरी ३.श्वेता झा (सिंगापुर) बालानां कृते-बिपिन झा- साक्षरता- बोधकथा- बालानां सुखबोधाय भाषापाक रचना-लेखन -[मानक मैथिली], [विदेहक मैथिली-अंग्रेजी आ अंग्रेजी मैथिली कोष (इंटरनेटपर पहिल बेर सर्च-डिक्शनरी) एम.एस. एस.क्यू.एल. सर्वर आधारित -Based on ms-sql server Maithili-English and English-Maithili Dictionary.] VIDEHA FOR NON RESIDENTS 8.2.1.Episodes Of The Life - ("Kist-Kist Jeevan" by Smt. shefalika Varma translated into English by Smt. Jyoti Jha Chaudhary )  2.Original Poem in Maithili by Kalikant Jha "Buch" Translated into English by Jyoti Jha Chaudhary विदेह ई-पत्रिकाक सभटा पुरान अंक ( ब्रेल, तिरहुता आ देवनागरी मे ) पी.डी.एफ. डाउनलोडक लेल नीचाँक लिंकपर उपलब्ध अछि। All the old issues of Videha e journal ( in Braille, Tirhuta and Devanagari versions ) are available for pdf download at the following link. विदेह ई-पत्रिकाक सभटा पुरान अंक ब्रेल, तिरहुता आ देवनागरी रूपमे Videha e journal's all old issues in Braille Tirhuta and Devanagari versions विदेह ई-पत्रिकाक पहिल ५० अंक

विदेह ई-पत्रिकाक ५०म सँ आगाँक अंक विदेह आर.एस.एस.फीड। "विदेह" ई-पत्रिका ई-पत्रसँ प्राप्त करू। अपन मित्रकेँ विदेहक विषयमे सूचित करू। ↑ विदेह आर.एस.एस.फीड एनीमेटरकेँ अपन साइट/ ब्लॉगपर लगाऊ। ब्लॉग "लेआउट" पर "एड गाडजेट" मे "फीड" सेलेक्ट कए "फीड यू.आर.एल." मे http://www.videha.co.in/index.xml टाइप केलासँ सेहो विदेह फीड प्राप्त कए सकैत छी। गूगल रीडरमे पढ़बा लेल http://reader.google.com/ पर जा कऽ Add a  Subscription बटन क्लिक करू आ खाली स्थानमे http://www.videha.co.in/index.xml पेस्ट करू आ Add  बटन दबाउ। Join official Videha facebook group. Join Videha googlegroups मैथिली देवनागरी वा मिथिलाक्षरमे नहि देखि/ लिखि पाबि रहल छी, (cannot see/write Maithili in Devanagari/ Mithilakshara follow links below or contact at ggajendra@videha.com) तँ एहि हेतु नीचाँक लिंक सभ पर जाऊ। संगहि विदेहक स्तंभ मैथिली भाषापाक/ रचना लेखनक नव-पुरान अंक पढ़ू। http://devanaagarii.net/ http://kaulonline.com/uninagari/  (एतए बॉक्समे ऑनलाइन देवनागरी टाइप करू, बॉक्ससँ कॉपी करू आ वर्ड डॉक्युमेन्टमे पेस्ट कए वर्ड फाइलकेँ सेव करू। विशेष जानकारीक लेल ggajendra@videha.com पर सम्पर्क करू।)(Use Firefox 4.0 (from WWW.MOZILLA.COM )/ Opera/ Safari/ Internet Explorer 8.0/ Flock 2.0/ Google Chrome for best view of 'Videha' Maithili e-journal at http://www.videha.co.in/ .) 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मिथिलाञ्चलक घरक भितमे बनाओल जाएबला मिथिला लोकचित्रकला विश्वभरि ख्याति कमओने अछि । मुदा एखत अपने भूमिमे एकरा पहिचान खोजबाक स्थिति छैक । मिथिला चित्रकलाके सरकार बेवास्ता कएने अछि, तें ई व्यवसायिक रुप नहि लऽ सकल अछि । एकर व्यावसायिक प्रबद्र्धन नहि भऽ सकल अछि । ग्रामीण क्षेत्रक महिलाके जीवनस्तर सुधार करबाक लेल बडका साधन भऽ सकैत अछि ई चित्रकला । कियाक त खासकऽ मैथिल ललनेक हाथमे नुकाएल रहैत अछि ई चित्रकलाक जादुगरी । आर्थिक, सामाजिक आ सांस्कृतिक समृद्धिक अथाह सम्भावना अछि मिथिला चित्रकलामे । लोकचित्रकलाके व्यवसायिक स्वरुप देलासं आर्थिक आ सांस्कृतिक दुनू लाभ उठाओल जा सकैत अछि । परम्परागत मिथिला चित्रकला जीवनक अंग अछि मिथिलामे । लोकचित्रकला संस्कारक द्योतक सेहो अछि । मुदा बढैत आधुनिकताक कारणे विस्तार प्रभावित भेल छैक । राज्य मिथिला चित्रकलाके एखनधरि चिन्ह नई सकल आरोप चित्रकारसभक छन्हि । नेपाल सरकार कलाके बढावा देबालेल ललितकला प्रज्ञा प्रतिष्ठान खोलने अछि । जत्तऽके प्राज्ञ परिषद्मे मिथिला चित्रकलास सम्बद्ध एक्कहु गोटे नहि अछि । ई एकटा प्रमाण मात्र अछि, आन बहुतो ठाम मिथिला चित्रकलासंग सौतिनिञा व्यवहार होइत आएल छैक । एना ललितकला प्रज्ञा प्रतिष्ठानक कुलपति किरण मानन्धर कहैत छथि जे मिथिला चित्रकलाके विशेष स्थान देने छी । मिथिला चित्रकलामे विशेष दखल भेनिहारि महिलाके स्थान देल जाएत से कुलपतिक कहब छन्हि । हिनक कथनी आ करनीमे कतेक समानता अछि, आबऽ बला दिने बताओत । जत्तऽ समग्र कलाक उन्नतिक बात होइक ओत्तऽ मिथिला पेन्टिङक चित्रकार नईं अछि, एकरा विडम्बने कहबाक चाही ।

मिथिला चित्रकलासं सम्बद्ध चित्रकारके उचित अवसर भेटबाक चाही । नेपाल पर्यटन वर्ष २०११ मना रहल अछि, एहनमे मिथिला चित्रकलाक मादे सेहो पर्यटकके आकर्षक कएल जा सकैत अछि । एहिबीच काठमाण्डूक बबरमहलस्थित सिद्धार्थ आर्ट ग्यालरीमे एस. सी. सुमनक मिथिला चित्रकला प्रदर्शनी मिथिला कसमस हालहि सम्पन्न भेल अछि । एहि प्रदर्शनीमे कलाप्रेमी मिथिला चित्रकलाक आधुनिक आयामसभसं परिचित भेलथि । सिद्धार्थ आर्ट ग्यालरीमे हुनक ११ म् प्रदर्शनी छल ई । मिथिला क्षेत्रक जीवनशैलीक झल्काबऽ बला चित्रकलासभ देखलासं ग्यालरी मिथिलामय भऽ गेल छल । एस. सी. सुमन मिथिला चित्रकला क्षेत्रमे परिचित नाम छथि । हिनक चित्रकलासभ बेस प्रशंसा पओलक । मिथिला चित्रकला सम्बन्धमे अध्ययन अनुसन्धानक सेहो बहुत खगता छैक । मिथिला लोक चित्रकलाक कुनो खास नियम वा सिद्धान्त नहि होइत अछि । तें ई स्वच्छन्दताक पर्याय सेहो अछि । मिथिलाक समृद्ध संस्कृतिक परिचायक सेहो अछि ।

सरकार कएलक सौतिनिञा व्यवहार एस.सी सुमन चित्रकार, मिथिला चित्रकला

मिथिला पेन्टिङ परम्परागत कला अछि, ई कला कोनो पाठशालामे नहि सिखाओल जाइत अछि । पीढीदर पीढी ई अपने आप सिखबाक काज होइत छैक । हमहु“ अपन दाइस“ सिखल“हु । कतउ सासुस“ पुतोहु सिखैत अछि त कखनो मायस“ बेटी । ताहि परिवेशमे हमहुं अपन दाइस“ मिथिला चित्रकला सिखल“हु । मिथिला पेन्टिङके अन्तर्राष्ट्रिय बजारमे बहुत माग अछि । ई त हट केक अछि । कलाकारके कलाकारितामे निर्भर करैत छैक ओकर मोल । जेना हमर पेन्टिङ १७ हजारस“ लऽकऽ ८० हजारधरिक अछि । जे सहजे बिका जाइत अछि । मिथिला पेन्टिङ व्यावसायिक रुप लेबा दिस उन्मुख अछि । कमर्सियल मार्केटमे देखी त सेरामिकमे, ब्यागमे कपडा आदिमे एकर प्रयोग भऽ रहल अछि । तें नीक बजार छैक एकर । ज“ अपन बात करी त जहन हम बजारमे अबैत छी त प्रदर्शनी लऽ कऽ हमरा कोनो दिक्कति नई होइत अछि । मिथिला चित्रकलाक विकासके जे आधारसभ अछि से किछु कमजोर भऽ रहल अछि जेना पहिने माटिक घर होइत छलै । भितके घरमे मिथिला चित्रकलाके नीक अभ्यास होइत छलै । माटिक घरक ठाममे आब क्रंक्रिटके जंगल अछि भऽ गेल । सामाजिक संस्कार आदिमे सेहो भितमे लिखबाक चलन छलै । मुदा आब बच्चा ज“ पेन्सिलस“ देबाल पर किछु लिखि दैत छैक त मायबाप डांटिदैत छैक । तें भितमे लिखबाक चलन प्रभावित भेल अछि । तैइयो तराईक मुसहर वस्ती, थारु आ झांगड जातिक वस्तीमे माटिक घरमे मिथिला चित्रकला देखल जा सकैत छैक । नेपाल सरकार एखनधरि किछु नई कऽ सकल अछि, मिथिला पेन्टिङके लेल । मिथिला पेन्टिङ जत्तऽ अछि अपने बुतापर, अपन स्थान अपने बनौने अछि । मिथिला चित्रकलामे लागल कलाकारसभ अपने मेहनतिस“ आगु बढल अछि । ललितकला प्रज्ञा प्रतिष्ठानके गठन करैत काल प्राज्ञ परिषद्मे मिथिला चित्रकलास“ सम्बद्ध एक्कहु गोटेके नहि राखल गेल । नामके लेल सभामे मिथिला पेन्टिङसं जुडल एकगोटेके जगह देल गेलै, बादमे विवाद भेलै आ ओहो पद छोडि देलनि । व्यक्तिगत रुपमे हमरा पुछी त राज्य मिथिला चित्रकलाक लेल ने किछु कएने अछि आ ने किछु कऽ सकैया । (सुमनकसंग कएल गेल बातचीतमे आधारित) प्रगतिक पथपर मिथिला चित्रकला धीरेन्द्र प्रेमर्षि साहित्यकार

गुणँत्मक दृष्टिकोणसं सेहो मिथिला पेन्टिङमे बहुत काज भऽ रहल अछि । परम्परा आ आधुनिकता दुनूके जोडिकऽ एच.सी सुमन मिथिला पेन्टिङके आगू बढा रहल छथि । मदनकला देवी कर्ण, श्यामसुन्दर यादवसहितके व्यक्तिसभ परिमाणात्मक आ गुणात्मक दुनू तरहें मिथिला पेन्टिंगके आगू बढा रहल छथि । सुमनक पेन्टिङ आधुनिकताक आकाशमे सेहो भरपुर उडान भरने अछि मुदा धर्ती बिन छोडने, जे एकदम महत्वपूर्ण बात अछि । मिथिला पेन्टिंगके साधनाके रुपमे लऽ कऽ आगु बढनिहार सभ अपने आप आगु बढि रहल छथि ।

राज्यके दिसस“ मिथिला पेन्टिङके लेल कोनो खास काज नहि भऽ सकल अछि । राष्ट्रिय स्तरमे चित्रकारसभके मूल्यांकन करैत काल मिथिला पेन्टिङस“ जुडल व्यक्तित्वके जे स्थान आ सम्मान देल जएबाक चाही, से नहि भऽ सकल अछि । जनस्तर आ अन्तर्राष्ट्रिय स्तरमे मिथिला पेन्टिङ नीक सम्मान पओने अछि । देशमे मिथिला पेन्टिङके स्थापित कएल जाए । खास कऽ महिला सभ एकरा जोगाकऽ रखने अछि । मैथिल महिलासभ किशोर अवस्थेसं अरिपन लिखब शुरु करैत अछि । तुसारी पावनि आदि सभ सेहो मिथिला पेन्टिङ सिखएबाक अवसर अछि । विविध पूजा–आजाक माध्यमे ओ सभ चित्रकलामे प्रवेश करैत छथि । राज्यके दिसस“ मिथिला पेन्टिङके स्वीकार्यता बढाएब, व्यावसायीक सम्भावनाके खुला करब, एहिमे लगनिहारसभके सम्मानके वातावरण बनएबाक काज करबाक चाही । तहन ई राष्ट्रिय स्तरमे स्थापित भऽ सकत । एहिमे अन्तरनिहीत वैशिष्टय जे अछि ताहिस“ ई अपने अन्तर्राष्ट्रिय रुपमे स्थापित भ जाएत, व्यापक भऽ जाएत । ं(बातचीतमे आधारित)

 ऐ रचनापर अपन मतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। 1.ज्योति सुनीत चौधरी- यूके मे भेल 2011 के वार्षिक मिथिला सांस्कृतिक कार्यक्रम पर एक विवरण, 2.समाचार:मीना झा 1 ज्योति सुनीत चौधरी यूके मे भेल 2011 के वार्षिक मिथिला सांस्कृतिक कार्यक्रम पर एक विवरण : बहुत गर्वक बात अछि जे अपन माटि सऽ दूर रहितो यू के मे रहैवला मैथिल सब. जाहिमे बेसीतर दम्पति कार्यरत छैथ. अपन कला आ संस्कृतिके प््राति सम्मानक भाव जीवित रखने छैथ।जाहि भव्य रूपे तेसर बेरक मैथिल वार्षिक समारोह 9 अप््िराल 2011 क स्लाऊमे सम्पन्न भेल हमरा सबके अपन संस्कृतिके स्वर्णिम युगक प््राारम्भ नजदीके बुझबाक चाही। कार्यक्रमक प््राारम्भ कल्पनाजी. जे लॉयड्स बैंकमे कार्यरत छैथ के मधुर वाणी सऽ स्वागत सम्भाषण सऽ भेल।कल्पनाजी स्वयम् भागलपुरके छैथ आ मैथिली उच्चारणमे पारंगत नहिं छैथ मुदा हुन्कर प््रायास आ अभ्यास सऽ ओ कठिन शब्दके तेहेन सहजता सऽ बजली जाहि लऽ कऽ हुन्का मिथिला के ‘कैटरीना कैफ’ कहल जा सकैत छैन। तकरबाद डॉक्टर जी डी झा सबके आर्शीवचन के संग एक भजन “जनक नन्दिनी मॉं” सुनेलखिन।पारूलके गायत्रीमन्त्र पर भरतनाट्यम् आ पारूल आ वत्सलाके ‘सुनु सुनु रसिया’ पर राधाकिसनक रूपमे नृत्य बड़ मनमोहक छल।फेर मिथिला संस्कृति पर मधुबनी ्र मिथिला पेण्टिग के माध्यम सऽ एक पावरप्वाइंट प््रोजेन्टेशन प््रास्तुत कैल गेल।फेर सबसऽ गर्वक समय छल मुख्य अतिथि आदरणीया डॉक्टर शेफालिका वर्मा जीके परिचय। किछु डॉक्टरसब अपन अपन अवैतनिक रूपसऽ कैल गेल सामाजिक कार्य आ चिकित्सा सुविधाक अभाव. विकासक आवश्यकता आ सम्भावना पर बहुत ज्ञानपूर्ण पावरप्वाइंट प््रास्तुतिकरण केलैन। डॉ अरूण झा ह्यसेण्ट अलबन्सहृ मानसिक रोग . सामान्य चिकित्सा तथा स्त्री शिक्षा पर बजला । डॉ रीता झा सबके मोन पारलखिन जे पानि. बिजली आ पौष्टिक आहारक उपलब्धता कतेक पैघ सौभाग्य अछि।हुन्कर प््रास्तुतिकरणमे गर्भावस्थामे होयवला मृत्युक कारण पर सेहो जोर देल गेल छल।डॉ रामभद्रजी शल्य चिकित्साक कौशल्य विकास पर सेहो बजला। अध्यक्ष डॉ अरूण झा ह्यबर्नलेहृ मैथिल साहित्यिक संस्था यूके के आर्थिक दशा पर अपन वक्तव्य देला।नब सदस्यसबहक स्वपरिचय के बाद मुख्य अतिथि अपन सुभाषण के प््राारम्भ ‘हरसिंगार’ के पंक्ति स केली जाहिमे हुन्कर नाम ‘शेफालिका’ राखैके कारण व्यक्त छल।हुन्कर भाषणमे विदेहके सबसऽ प््राचलित आ लोकप््िराय मैथिली पत्रिकाके रूपमे चर्चा भेल।कहैके आवश्यकता नहिं जे अहि पत्रिका के सम्पादक महोदयके सेहो प््राशंसा भेलैन।मुख्य अतिथिके फूल आदि उपहार देलाक बाद “विदेशमे रहै वला नबका दोसर पीढ़ी अपन संस्कृति बिसरि रहल छैथ” ताहि विषय पर वार्द विवाद प््रातियोगिता भेल।भाषा मैथिली तक सीमित नहिं छल कारण किछु बुद्धिजीवी नब पीढ़ीक लोक मैथिली बाजैमे असमर्थ छलैथ आ हुन्कर सबहक विचार बहुत महत्वपूर्ण छल।बहुत नीक विचारविमर्श छल मुदा सबहक निष्कर्ष किछु हद तक निराशाजनक छल जे ठीके हमसब अपन संस्कृति बिसरि रहल छी।मुदा अन्तमे एकटा खट्टरकक्काके प््रासंग ‘मिथिला संस्कृति’ पर हास्य नाट्य प््रास्तुत कैल गेल जाहिके संवाद बहुत तर्कसंगत आ विषय स सम्बद्ध छल। फेर नाच गान करैलेल बच्चा सबके मिथिला पेण्टिग सऽ बनल प््रामाणपत्र देलगेल।वाद विवाद जीतनाहरके मिथिला पेण्टिग छपल टी कप देल गेल। श्रीमती माला मिश्रा. डॉ वीणा झा. डॉ विभाष मिश्र. श्रीमती अनीता चौधरी द्वारा प््रास्तुत गीत नादक कार्यक्रम सेहो बड्ड मनोरंजक छल।कविता पाठ सेहो भेल। अध्यक्ष दम्पत्ति. सचिव दम्पत्ति. कोषाध्यक्ष दम्पत्ति के संग विभाषजी सपरिवार बड्ड प््रायास केने छलैथ अहि कार्यक्रमके सफल करैमे ताहि कारणे विशेष धन्यवादक पात्र छैथ। आशा करैत छी नब अध्यक्ष आ नब सदस्यगण अकरा आर ऊपर लऽ जेता ।कार्यक्रमके चित्र लेल www.maithili.co.uk वेब साइट देखू। 2 समाचार:(मीना झा) ९.४.२०११ आइ लंदनक स्लौवक ४०० वर्ष पुरान ऐतिहासिक  किला  बेलिस हाउस ( Baylis House , Slough )  लंदनमे मैथिल समाज ऑफ़ यु. के. केर तेसर वार्षिक समारोह भेल। एहि  समारोहमे भारतसँ मुख्य अतिथि   मैथिलीक सुप्रतिष्ठित  लेखिका एवं मैथिलीक महादेवी  वर्मा डॉ. शेफालिका वर्मा आयल छलीह। समारोहक आरम्भ बालिका  पारुल  क गायत्री मंत्रपर भारत नाट्यम  नृत्यसँ भेल. डॉ. विभाष मिश्र  संबोधन मे मैथिल  समाज केर परिचय देलनि ,डॉ.. अरुण कुमार झा (बर्नली ) अध्यक्ष मैथिल समाज , उद्घाटन भाषण केलनि 'हम सब मैथिल समाजक स्थापना संयुक्त राज्य मे बसल मैथिल सब कोना अपन संस्कृतिक रक्षा क सकी. खास कय हमर ब्रिटिश युवा वर्ग अपन देस कोस के नै बिसरैथ, हम की छी से जानैथ, अपन परंपरा  अपन संस्कृति के ज्ञान हुनका रहैक ,अपने सब देखैत छी जे कतेक ब्रिटिश युवा एहि मे आय भाग ल रहल छैथ...'  . डॉ. कल्पना झा   समारोहक विषय मे  विस्तार से सब बात कहलनि. . श्रीमती ज्योति झा चौधरी  मिथिलाक टूर पर अपन प्रोजेक्ट देखोलनी ,जाहि मे मिथिलाक संस्कार संस्कृतिक झलक छल. डॉ.  रीता झा अपन प्रोजेक्ट स्त्रीक स्वास्थ्य एवं स्तिथि भारत मे कोन दयनीय अवस्था मे छैक से अपन प्रोजेक्ट से जाहिर केलनि, लोग के आह्वान केलनि जे एहि स्तिथिक रोक्वाक उपाय कयल जाय..डॉ अरुण कुमार झा  (लन्दन ) अपन प्रोजेक्ट मे कन्या महाविद्यालय ,जनकपुर के देखोलनी ,जाहि मे स्कूल कोना चलि रहल अछ,कोना ओहि स्कूल के कंप्यूटर आदिक सुविधा उपलब्ध करोलनी. सब स  आग्रह  केलनि जे हम सब जे अपन लैपटॉप सब जे कनिको ख़राब होयत छैक टकरा फेकी दैत छी, से नहि क एकठाम जमा करी ओकरा अपन देस कोस मे भेजवाक प्रबंध करी...ठसाठस भरल हॉल मे सब मन्त्र मुग्ध सन सुनि रहल छलाह..डॉ. अरुण झा क पत्नी श्रीमती मीना झा जे स्वयं मैथिली मे लिखैत छैथ पूर्ण सहयोग द रहल छलीह समारोह मे डॉ. रामभद्र  झा , डॉ. कौशलेन्द्र कर्ण, डॉ. मिथिलेश झा आदि सबहक सहयोग छल. ..तकर  बाद, डॉ.नूतन  मिश्र  क आग्रह पर  डॉ. कलाधर  झा  मुख्य अतिथि डॉ. शेफालिका वर्मा क परिचय करोलनी-- कोना हिनकर विषय मे केरला सरकार की सब लिखने छैक,कोना हिनक कविता सब यु.के. क पाठ्य क्रम मे छैक. ...'  एहि से पहिने  बालिका पारुल आ वत्सला ----- राधा कृष्ण पर बड सुन्दर नृत्य नाटिका प्रस्तुत केलनि . समारोहक दोसर सत्र खुलल आकाशक नीचा  बासंती  उपवन  मे मुख्य अतिथि डॉ शेफालिका वर्मा के   भाषण स शुरू भेल. ओ अपन भाषण  मे मिथिलांचलक अतीत  केर  परिचय दैत,बजलीह.. विदेशक एहि भावभूमि पर अपन मिथिला देश के देखि रहल छी.मैथिल समाजक ई ओ समारोह अछ जाहि ठाम ह्रदय ह्रदय स जुडैत अछ ,बुध्धि बुध्धि स, चिंतन चिंतन स ..सब स पहिने हम अपन हार्दिक आभार प्रकट करैत छी जे अपने सब ई सम्मान हमरा देलों. हम कत्तो मिथिला मैथिली शब्द देखैत छी ते हमर मोन प्राण अद्भुद रूप स झंकृत होम लगैत अछ. अपने सब विदेश मे रही अपन समाज के नै बिसरल छी..एहि लेल अपने सब के बेर बेर नमन... सौँसे पृथ्वी पर यदी  हम घूमी आबि ते सब ठाम कत्तो ने कत्तो एक टा छोट मोट मिथिला अवस्य भेटि जायत. मिथिलाक संस्कृति,मिथिलाक संस्कार हमरा बुझने विश्व मे स्एतते कत्तो होई. वास्तव मे मिथिला आधा बिहार मे छपल अछ,लागले पडोसी देश नेपाल ते मैथिली स महामंवित अछ..पहिने दरभंगा ,समस्तीपुर  मुझफरपुर ,भागलपुर स लक सहरसा, सुपौल मधेपुरा कटिहार पुरनिया  सब मिथिले थीक..कहल जैत छैक जे चारि कोस पर पानि बदले, पांच कोस पर वाणी ...यानि सब ठाम मैथिलीक उच्चआरण  अपन अपन क्षेत्र क अनुसार होइत अछ..जेना विश्व भाषा अंग्रेजी के मानल गेल छैक जाहि मे कतेको स्थान के अंग्रेजी उच्चारण समाहित अछ ..हं, ई आन गप थीक जे मुझफरपुर बज्जिका बनि गेल, ते भागलपुर अंगिका के जन्म द देलक,किन्तु, सबहक ह्रदय मे मैथिलीक संस्कार ओहिना अविरल रूप से प्रवाहित होइत रहैत अछ.. , पुनः ओ विद्यापति क गीत स मैथिलीक कव्यधारक उत्पति कहैत लोकप्रिय साहित्य बनेवा मे प. हरिमोहन झा के साहित्य रचना के बड़का योगदान कहलनि....आजुक वैचारिक क्रांति , वैज्ञानिक क्रांति क उल्लेख करैत ओ कहलनि जे संचार क्रांतिक एहि युग मे सओनसे  विश्व एकटा गाम बनि गेल . हम सब देशक नै वरन विश्वक नागरिक बनि गेल छी. आय दुनियाक एक कोन स दोसर कोन धरि सोझे संवाद क लैत छी..एहि से मैथिली साहित्य के बहुत फायदा भेलैक ..नेट पर मैथिली पत्रिका सब अबी लागल ,मिथिलाक खबर अबए लागल.जाहि मे मिथिला मंथन ,मैथिल मिथिला , अनचिन्हार आखर, विदेह .कॉम आदि बहुतो पत्रिका नेट पर अवैत अछिमुदा, असगरे विदेह पत्रिका जे प्रसिद्ध साहित्यकार गजेन्द्र ठाकुर क सम्पादन मे शिव कुमार झा, उमेश मंडल  आदिक संयोजन मे  बंगला ,उड़िया, तमिल,तेलगु, कन्नड़, ,मलयालम, गुरुमुखी आदि लिपिमे छपैत अछ. एकटा सर्वेक्षण के अनुसार २००४ स आय धरि  विदेह १०७ देश के १०७२६, ठाम स ५७,००० लोग ,२००९४९९०   बेर  एहि पत्रिका के देख्लनी, सब स पैघ गप छैक जे नव लेखनक प्रतिभा के उजागर कयल गेल ,आ सब जाती पातिक  प्रतिभा के उजागर कयल गेल . दिल्ली स मिथिलांगन , अंतिका, कोलकाता स कर्नामृत ,मिथिला दर्शन,   बम्बई स मिथिला दर्पण, आसाम स पूर्वोत्तर मैथिल, पटना स समय साल, घर बाहर, झारखंड स पक्षधर आदि आदि कतेको पत्रिका बहराय रहल अछ मुदा सब टा नेट स जुडल  अछ.. हम हुनका सब के कहलों जे मैथिली पुस्तक एक से एक प्रकाशित भ रहल अछि मुदा बाज़ार नै छैक. सरकार nai ते विश्व विद्यालय के भरोसे छैक. अहाँ सब पुस्तक एहि ठाम मंगाऊ आ हिन्दीक पोथी पुस्तकालय मे एहिठाम अछिमैथिलीक पोथी किएक नै....मिथिला मैथिली बहुत तरहक समस्या स ग्रस्त अछ ओकर समाधान क सेहो सोचु.... दिल्ली सरकार क मैथिली भोजपुरी अकादेमी से बहुत काज मैथिली लेल भ रहल छैक...यानी मैथिलीक चहुमुखी विकास भ रहल अछ. तैयो  मिथिलांचल बाढ़ी,रौदी,दाही , बेरोजगारी आदि समस्या स ग्रस्त अछ..सब स पैघ बात ओ कहलनि  जे नबका पीढ़ी अपन भाषा बिसरल जा रहल छथि देश विदेश सब ठाम ,.. ई एकटा गंभीर प्रश्न सभक सोझा मे छैक, एहेन नहि होई जे एकदिन अपन मूल गामो बिसरी जित  हवाक वेग मे पानि मे हेलैत जडविहीन भाखन जकां हेलैत रही जाय...मिथिलाक नारी लेल सेहो ओ कहलनि कोना अपन अस्तित्व लेल छटपटा रहल छथि, स्त्री के सुरक्षित नै स्वरक्षित हेवाक चाही ,निर्णय लेवाक क्षमता हेवाक चाही. भाषण क अंत अपन कविता स केलनि..हमर घर कते हेरा गेल ;  कतेको श्रोता क  आंखी नोरा  गेल . एकर सब स मनोरंजक कार्यक्रम रहल विदेश मे रहल मैथिल बच्चा मैथिली कोना बाजत जकर बहुत नीक आ सटीक संचालन डॉ. अरुण झा ( लन्दन) केलनि. एकर आकर्षक पक्ष छल एक दिस पुरान पीढ़ी दोसर दिस नव पीढ़ी.. दुनूक समस्या आ समाधान क  चेष्टा...डॉ. विभाष मिश्र ,डॉ. नूतन मिश्र आ श्रीमती ज्योति झा  चौधरी  तिनु हरिमोहन झा क खट्टर ककाक तरंग पर एकटा छोट सनक स्वर- रूपक प्रस्तुत केलनि ,समूचा हॉल  ठाहक्का स गूंजी उठल. एहि समारोहक विशेष आकर्षण रहल मैथिली पुस्तक आ  मिथिला पेंटिंग क बिक्री .... गीत संगीत मे श्रीमती अनीता चौधरी आ श्रीमती माला मिश्र ,डॉ. वीणा झा आ  डॉ. विभाष मिश्र  क गान पर समस्त हाल झूमी उठल , पुनः अंग्रेजी कविता डॉ. सीमा झा ,मैथिली कविता श्रीमती ज्योति झा चौधरी आ डॉ. शेफालिका वर्मा क कविता ,माय विलेज ' क पाठ हुनके नतिनी सुश्री  अंकिता कर्ण केलनि . डॉ वंदना कर्ण  मुख्य अतिथि डॉ शेफालिका वर्मा के  हाथे पुरस्कार वितरण कयल गेल . सबहक समाप्ति डॉ. मिथिलेश झा क धन्यवाद ज्ञापन स  भेल ....एहि समारोहक समापन क उपरांत लागले  कार्यकारिणी समिति क मीटिंग भेल , जाहि मे समय पूर्ण हेवाक कारन नव कार्यकारिणी क  गठन भेल . पुरान कार्यकारिणी अध्यक्ष ..डॉ. अरुण झा  ( बर्नली ), सचिव एवं कोषाध्यक्ष - डॉ. मिथिलेश झा , कार्यकारिणी क सदस्य.--डॉ. रामभद्र झा,  डॉ. डॉ. वंदना कर्ण , डॉ. पूनम झा , डॉ. कल्पना झा  , डॉ. राजीव रंजन दास , वेब साईट रचयिता श्री अखिलेश कुमार नव समिति .. अध्यक्ष --डॉ. अरुण झा  ( लन्दन  ) सचिव  डॉ  वन्दना  कर्ण  , कोषाध्यक्ष--डॉ. मिथिलेश झा . कार्यकारिणी क सदस्य--डॉ. विभाष मिश्र , डॉ. राहुल ठाकुर ,  डॉ. आलोक झा , श्री राजेन्द्र चौधरी, श्री राज झा , श्रीमती  ज्योति झा चौधरी २०१२ मे ३१ मार्च के तारीख अखन राखल गेल ऐछ अन्नुअल जेनेरल मीटिंग के लेल. बेसी जानवा लेले  वेबसाइट www.maithili.co.uk  देख सकैत छी. ..... ऐ रचनापर अपन मतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। जगदीश प्रसाद मण्‍डल जगदीश प्रसाद मण्‍डल विहनि कथा गुहारि‍ कमला कातक नवटोलीक गहबर बड़ जगताजोर। सएह सुनि‍ अपनो गुहारि‍ करबैक वि‍चार भेल। भाँज लगेलौं तँ पता चलल जे ओना तीनू वेरागन-सोम, बुध आ शुक्र- भक्‍ता भाव खेलाइत छथि‍ मुदा शुक्र दि‍नकेँ तँ साक्षात् भगवति‍येक आवाहन रहै छन्‍हि‍। मन थि‍र भेल। डाली लगबए पड़ै छै तँए ओरि‍यौनक वि‍चार भेल। मन भेल जे पत्नीकेँ डाली ओिरयौनक भार दि‍यनि‍। मुदा बोलकेँ रोकि‍ वि‍चार कहलक- “देवालयक काज छी, एकोरत्ती कुभाँज भेने गुहारि‍यो उनटे हएत। डालीक बौस बाजरसँ कीनै पड़त। मुदा सस्‍ता दुआरे जनि‍जाति‍ उनटा-पुनटा बौसे कीन लेतीह।” मन उनटि‍ गेल। अपने हाथे कि‍नैक ि‍नर्णए केलौं। बाजार पहुँच फुल काढ़ल सीकीक रँगर डालीक संग बेसि‍ये दाम दऽ दऽ नीक-नीक बौस कीनलौं। मन पड़ल जे भरि‍ दि‍न उपास करै पड़त। चाहो तक नै पीब सकै छी। जँ पीबैओक मन हएत तँ गोसाइ उगैसँ पहि‍ने भलहि‍ं पीब लेब। तनावसँ भरि‍ दि‍न मन उदि‍गने रहैए। ने काज करैक मन होइए आ ने कि‍यो सोहाइए। एहेन तनाव दुि‍नयाँमे ककरो भरि‍सके हेतै। कोन जालमे पड़ गेल छी। तहूमे एकटा रहए तब ने। जालक-जाल लागल अछि‍। जमीन-जत्‍थाक जाल, जन जाल, मन जाल, तन जाल, शब्‍द जाल, वि‍चार जाल, वाक् जाल नै जानि‍ कते जाल बनौनि‍हार कते जाल बना कऽ पसारि‍ देने अछि‍। एक तँ ओहि‍ना इचना माछ जकाँ लटपटाएल छी तइपरसँ जालक-जाल। गैंचीक नजरि‍ नै जे ससरि‍-फसरि‍ छछारी कटैत जान बचा सोलहन्नी जि‍नगी पाबि‍ लेब। तँए नवटोलीक गहबरमे डाली लगेलौं। गुहरि‍याक कमी नै। अकलबेरेसँ गुहरि‍या पहुँच पति‍यानी लगा बैस गेल। गहबरक भीतर भगत बैस धि‍यान मग्‍न भऽ गेलाह। गहबरसँ उदेलि‍त भाव भगतक हृदेकेँ कम्‍पि‍त करैत। गुहारि‍ करए बाहर नि‍कलल। हाथमे जगरनथि‍या बेंतक छड़ी नेने। भगत गुहारि‍ शुरू करैत कहलखि‍न- “भगत, अश्रमसँ श्रमक बाट पकड़ि‍ चलि‍ जाउ। आगू कि‍छु ने हएत।” भगतक पछाति‍ डलि‍वाह कहथि‍न- “पाछु घुि‍र नै ताकब। कतबो जोगि‍न सभ कानि‍-कानि‍ कि‍अए ने बजए मुदा घुरि‍ नै ताकब।” हमरो नम्‍बर लगि‍चाइल। मुदा एक्के वाक् सुनि‍ उत्‍सुकता ओते नहि‍ये रहए जते नव वाक् सुनैक होइक। अनेरे मनमे तुलसीक वि‍चार उठि‍ गेल। कहने छथि‍ जे जेकरा जंजाल रहै छै तेकरा ने चि‍न्‍ता होइ छै। जकरा नै छै? तही बीच भगत सोझमे आबि‍ गेलाह। पैछले बातकेँ दोहरबैत एकटा नव बात पुछलनि‍- “छुटि‍ गेल कि‍ने?” बि‍नु तारतमे बजा गेल- “हँ।” वि‍दा भेलौं। बाटमे वि‍चारए लगलौं जे अश्रमक अर्थ कि‍ होइ छै। मुदा कोनो अर्थे ने लागल। हारि‍ कऽ ऐ नि‍ष्‍कर्षपर एलौं जे एक सोगे आएल छलौं दोसर नेने जाइ छी। गाम अबि‍ते टोल-पड़ोसक लोक भेँट करए आबए लगलाह। सभ एक्के बात पुछथि‍- “की भेल?” कि‍छु गोटेकेँ प्रश्ने बना कहलि‍यनि‍- अश्रमक अर्थे ने बुझलौं। अहीं कहू। मुदा जते मुँह तते रँगक उत्तर भेटऽ लगल। सुनैत-सनैत मन घोर-मट्ठा भऽ गेल। पछाति‍ जे कि‍यो पूछथि‍ तँ कहए लगलि‍यनि‍- “जहि‍ना छलौं तहि‍ना छी।” ऐ रचनापर अपन मतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। जगदीश प्रसाद मण्‍डल नाटक कम्‍प्रोमाइज पहि‍ल दृश्‍य (आसीन मास। रौदि‍याह समए) सोनि‍या-         अपनो नार सैध गेल। काल्हि‍ मनोहर मामागामसँ आनए गेल। दुइयो-चारि‍ बल्हीक ओरि‍यान अपनो नै करब तँ माल-जालकेँ की खाइले देबै? सुकदेव-         मनमे तँ अपनो अछि‍ मुदा छुछ हाथ थोड़े मुँहमे जाइ छै। सोनि‍या-         कोनो कि‍ अन्न नै खाइ छी जे नै बुझब। मगर दुआरपर जेकरा गरदनि‍मे डोरी बन्‍हने छि‍ऐ तेकर निमरजाना केकरा करए पड़तै। सुकदेव-         (मूड़ी डोलबैत) जेकरा पाइ छै उ आनो गामसँ कीन आनत। मुदा....? सोनि‍या-         मुदा कहने समए मानत। कोनो ओरि‍यान तँ करैये पड़त। सुकदेव-         (तरहथ्‍थीसँ आँखि‍ मलैत) ने एक्को मुट्ठी नार अछि‍, ने बाधमे घास अछि‍ आ ने बाँसक पत्ता एक्कोटा हरि‍यर अछि‍। आन साल अधि‍योपर तोड़ै छलौं तैयो कहुना कऽ काज चला लै छलौं। ऐबेर सेहो सभटा झड़ैकि‍ये गेल......। देखि‍यौ कि‍ होइ छै? सोनि‍या-         ताबे ओहि‍ना ठाढ़े रहत। दुआरपर लछमी कलपने प्रतबाए ककरो हेतै? सुकदेव-         गाममे ककरो देखबो कहाँ करै छि‍ऐ जे दू मुट्ठी मांगि‍यो लेब। जि‍नका सभकेँ बेसी होइतो छन्‍हि‍ ओ तँ अपने पाछु तबाह छथि‍। जकरा छैहे नै ओ अपनो पैत नै बचा सकैए तँ दोसरकेँ की बचाओत। तहूमे दुइये-चारि‍ दि‍नक बात रहैत तखैन ने। ऐबेर नै भेने अगि‍लो साल तेहने हएत। सोनि‍या-         छुछे सोग केने चि‍न्‍ता मेटाइ छै। जखैन दि‍ने उनटा भऽ गेल तखैन सुनटा सोचने हएत। सुकदेव-         (वेवस) की उपाए करब। जखैन समैये संग छोड़ि‍ देलक तखैन जीबैयेक कत्ते भरोस करब। सोनि‍या-         ई अहींटा बुझै छि‍ऐ कि‍ आउरो गोरे। सुकदेव-         की उपाए करब? सोनि‍या-         उपाए की करब! जेहेन समए बनल तेहेन बनि‍ जाउ। तखने कि‍छु पारो-घाट लागत। नै तँ......। (सुकदेव सोनि‍या मुँह दि‍स, बघजर लागल जकाँ, टकटकी लगा तकैत सुकदेवक आँखि सोनि‍या पढ़ि‍) चलु दुनू गोरे। मरहन्नाक जे बुट्टी-बाटी भेटत सेहो काटि‍ लेब आ कतौ-कतौ जे चि‍चोर सभ छै सेहो काटि‍ कऽ लऽ आनब। सुकदेव-         बेस कहलौं। जाबे बरतन ताबे बरतन। हाँसू नेने आउ। खोलि‍यापर चुनौटी अछि‍ सेहो नेने अाएब। (सोनि‍या जाइत। मनचनक प्रवेश) मनचन-          भैया, जान बचाएब भारी भऽ गेल। सुकदेव-         से की? मनचन-          कलक पाि‍न बन्न भऽ गेल। पानि‍ये ने खसै छै। सुकदेव-         से की भेलह? मनचन-          पान-सात दि‍नसँ मटि‍याह पानि‍ अबै छेलै। ओकरा जमा कऽ कहुना काज चलबै छलौं। काल्हि‍सँ ओहो बन्न भऽ गेल। सुकदेव-         दोसर कलसँ काज चलाबह? मनचन-          एहँ, कोनो कि‍ एक्केटा कल बन्न भेल। टोलक सभ बन्न भऽ गेल। सुकदेव-         तखन पीबै की छह? मनचन-          पोखरि‍क पीबै छी। ओहो लटपटाएले अछि‍। सुकदेव-         बौआ कि‍ करबहक। आखि‍र ऐ धरतीपर अपना सभ (मनुष्‍य) नै कि‍छु करबहक तँ माल-जाल, चि‍ड़ै-चुनमुनी बुत्ते हेतै। देखै नै छहक जे कते रंगक चि‍ड़ै पड़ा गेल। मनचन-          भैया, तोरे सबहक मुँह देख जीबै छी। सबहक गति‍ एक्के देखै छी। तामसो केकरापर करब। ऐ देहक कोनो ठेकान अछि‍। ने देहक ठेकान अछि‍ आ ने देखि‍नि‍हारक ठेकान। तखैन तँ जाबे हाथ-पएर घि‍सि‍आइए घि‍सि‍अबै छी। सुकदेव-         अखैन जाह। नि‍चेनमे कखनो गप करब। दू मुट्ठी मालक ओरि‍यान करए जाइ छी। देखहक जे आसीन मास जकाँ एक्कोरत्ती लगै छै। अखुनका ओससँ खढ़-पातक डगडगी रहैत से केहेन उखड़ाह लगै छै। मनचन-          ऐसँ नीक ने जेठमे छेलै। जेठोसँ खरहर समए लगै छै। एकटा बात मन पड़ल। सुकदेव-         की? मनचन-          ऐसँ पैछला रौदी नमहर रहै कि‍ छोट? सुकदेव-         तोरा की बुझि‍ पड़ै छह? मनचन-          नमहर बुझि‍ पड़ैए। सुकदेव-         ओ चारि‍ सालक भेल रहए। एकरा तँ सालो नै लगलै। मनचन-          हमरा नमहर बुझि‍ पड़ैए। सुकदेव-         दि‍न बीतने लोक दुखो बि‍सरि‍ जाइ छै। तोरो सएह भेलह। मनचन-          नै भैया, से नै भेल। वि‍धने मोटका कलमसँ लि‍ख देने छथि‍ तँए ने मन रहैए। (मुस्‍की दैत) मुदा एकटा बात कहै छि‍अह। सुकदेव-         की? मनचन-          हम सभ तँ जानि‍ये कऽ गरीब छी तँए बुड़ि‍वक छी। मुदा जेकरो महि‍क्का कलमसँ लि‍खलखि‍न ओहो तँ कोंकि‍आइते अछि‍। सुकदेव-         अखैन जाह। काजक बेर उनहि‍ जाएत। एकटा बात मन राखि‍हह। पछुलका शताब्‍दीमे पच्‍चीसटा रौदी भेलै। एक सालक रौदी लोककेँ चारि‍ बर्ख पाछु ठेलै छै। (दूटा हाँसू नेने सोनि‍याक प्रवेश। सुकदेव चि‍न्‍तामग्‍न बैसल।) सुकदेव-         (स्‍वयं) कतऽ गेल पचास बर्खक जि‍नगी। पानि‍क दुआरे कोसी नहरि‍ आ शक्‍ति‍क दुआरे पनि‍बि‍जली। जँ बनल रहैत तँ की औझके जकाँ मि‍थि‍लांचल वासीकेँ पड़ाइन लगि‍तै। चि‍ड़ै जकाँ उड़ैत-उड़ैत लोक चि‍ड़ै बनि‍ गेल। चि‍ड़ै बनने मनुख-मनुख कहबैक जोग रहत। जकरा अपन बाप-दादाक बनाओल सुन्‍दर गाम-घर छै ओ घर-छोड़ि‍ घुरमुरि‍या खेलाइए। खाइर.....। (सोनि‍याकेँ देख) तमाकुल अनलौं ि‍क ओहो सठि‍ गेल? सोनि‍या-         (मुँह चमका) सुआइत लोक कहै छै डोरी जरि‍ गेल ऐंठन नै गेल। पेटक ओि‍रयान रहै कि‍ नै रहै मुदा मुँहमे सुपारी चाहबे करी। सुकदेव-         सुपारीक मर्यादा की छै से अहीं बुझबै। सुपारी खेनाइक अंग छी जे खेलोपरान्‍त अति‍थि‍-अभ्‍यागतकेँ वि‍दाइ स्‍वरूप देल जाइ छै। सुपारीयो जोकर मान-मर्यादा जै पुरूखमे नै रहल ओहो पुरूखे भेल। हि‍जरोसँ बत्तर अछि‍। सोनि‍या-         बुझलौं, बुझलौं साँप फुसलबैक मनतर। (वि‍चार बदलैत) एकटा बात पूछौं? सुकदेव-         एकटा कि‍अए। एक हजार पूछू। सोनि‍या-         पेटक आशामे पेट काटि‍ भरै छी आ घर अनैकाल टुटरूम-टुम भऽ जाइए। छोड़ि‍ दि‍औ बटाइ खेती? (सोनि‍याक वि‍चार सुनि सुकदेव ऊपरसँ नि‍च्‍चाँ धरि‍ सोनि‍याकेँ नि‍हारि‍ नजरि‍ चेहरापर अँटका, अपन पैछला‍ जि‍नगीपर दौड़बैत, अएना जकाँ देखए लगल। तड़पैत मने।) सुकदेव-         जखैन अपना धन-वि‍त्त नै अछि‍ तखैन....? सोनि‍या-         तखैन की? सुकदेव-         बटाइयो खेती केने अपन रोजगार तँ ठाढ़ केने छी। मारि‍-धुसि‍ खटै छी, भरि‍ पेट आकि‍ आधा पेट खाइ तँ छी। जँ इहो छोड़ि‍ देब तँ कि‍ गोबर-गोइठा जकाँ कतौ पड़ल रहब। सोनि‍या-         बड़ीटा दुनि‍याँ छै। जतऽ पेट भरत ततऽ देह धुि‍न जि‍नगी बि‍ताएब। सुकदेव-         ई तँ बुझै छी जे हाथ-पएर लारने कतौ पेट भरह। मुदा जे फुलबारी (गाम) बाप-दादाक लगाओल अछि‍, मनुक्ख जकाँ मनुक्‍ख बनि‍ जीबैत एलौं, तकरा छोड़ि‍.....? सोनि‍या-         की आनठाम मनुक्‍ख नै रहै छै? सुकदेव-         हँ रहै छै। मुदा मनुक्‍ख मनुक्‍ख आ समाज समाजक बीच भुताहि‍ गाछी, मरूभूमि‍ पहाड़, समुद्र सदृश्‍य भाषा, काज बेवहारसँ जि‍नगी बदलि‍-बदलि‍ गेल अछि‍। जइसँ एते खाधि‍ मनुष्‍य-मनुष्‍यक बीच बनि‍ गेल अछि‍। जइसँ कि‍यो ककरो देखहि‍ नै चाहैए। ऐहेन स्‍थि‍ति‍मे.....। सोनि‍या-         कोनो कि‍ खुटा गाड़ि‍ सभदि‍न रहब जे अनेरे एत्ते माथा धुनि‍ देहक हड्डी झकझकबैक कोन जरूरत अछि‍। बुझि‍ते तँ छि‍ऐ जे घरवाली घर लेती दाइ जेती छुछे। सुकदेव-         बाप-दादाक फुलबाड़ी ओ नै छि‍अनि‍ जे मात्र समैया फुलक होय। बाप-दादाक फुलबाड़ी ओ छि‍अनि‍ जइमे कुण्‍डली फुलक गाछक जड़ि‍मे राखल अछि‍। पटाक्षेप दोसर दृश्‍य (सुकदेव सोमन ऐठाम जाइत बाटमे...।) सुकदेव-         (उत्तेजि‍त) पचास बर्खसँ कि‍सान-बोनि‍हारक संग हमहूँ मि‍ल कोसी नहरि‍क पानि‍सँ खेति‍ओ आ बि‍जलि‍योक सपना पुर्ति हएत तै आशामे रहलौं। मुदा आइ कि‍ देखै छी? घरमे अन्न नै खेतमे पानि‍ नै मशीनक नामो-नि‍शान नै। यएह सोराज (स्‍वराज) साठि‍ बर्खक छी। की हमसभ टकटकी लगौने मरि‍ जय। मुदा ऐ उमेरमे कएले की हएत? भगवान बुढ़ाढ़ी दैते कि‍अए छथि‍न। जँ दै छथि‍न तँ जीबैक जोगार कि‍अए ने कए दै छथि‍न। की टकटकीसँ आँखि‍ पथरा परान ति‍यागि‍ दी। उसैर रहल अछि‍ गामक चास-बास, उसरि‍ रहल अछि‍ पशुधन, उसरि‍ रहल अछि‍ गामक खेत-खरि‍हान, उसरि‍ रहल अछि‍ गामक कला-संस्‍कृति‍। (सोमनक घर। आंगनसँ नि‍कलि‍ सोमन देह खोलने कन्हापर धोती नेने नहाइले वि‍दा भेल।) सोमन-          सबेरे-सबेरे केम्‍हर-केम्‍हर भैया? सुकदेव-         एलौं तँ तोरेसँ कि‍छु वि‍चार करए मुदा तोरा देखै छि‍अ जे कतौ जाइक सुर-सार करै छह। सोमन-          हँ भैया, कनी हाटपर जाएब। तँए धड़फड़ करै छी। मुदा जखैन आबि‍ गेलह तँ कि‍छु इशारोमे कहि‍ दाए। जखैन भेँट भऽ गेलि‍यह तखैन चुपे-चाप चलि‍यो कन्ना जेबह? सुकदेव-         गप तँ गप छी, दोसरो घड़ी हएत। मुदा काजमे बाधा भेने तँ काज मारल जाएत। काज मरने जि‍नगी मरै छै। एक तँ समये तेहन दुरकाल भऽ गेल जे ओहि‍ना सभ पटपटाइए। तहूपर जँ जोगारो बाधि‍त हएत तखन तँ आरो तबाही बढ़त। सोमन-          गप जे कहि‍ देने रहबह तँ रस्‍तो-पेरा सोचैत-वि‍चारैत रहब। ओमहरसँ (हाट) घुरब तँ भेँट केने एबह। सुकदेव-         गप तँ नमहर अछि‍। मुदा तोरो बेर परक भदबा बनब नीक नै। अच्‍छा साँझमे भेँट हेबह कि‍ने? सोमन-          हाट जाएब अनठाइयो दैति‍ऐ। मुदा आइ सोमक हाट छी। कहैले तँ दूटा हाट लगै छै मुदा सोमक हाटक मोकाबला बरसपैतक हाट करतै। सुकदेव-         से की? सोमन-          सोमक हाटमे सीतामढ़ीक बेपारीसँ लऽ कऽ सुपौल फारवि‍स गंज धरि‍क बेपारी अबै छै। छअ दि‍न ओकरा सभकेँ अबै जाइमे लगै छै। तहूमे गाए-बड़दक पएरे एनाइ-गेनाइ सेहो रहै छै। सुकदेव-         हँ, से तँ लगि‍ते हेतै। तैओ ओही बेपारी सभकेँ धैनवाद दि‍ऐ जे एते मेहनत करैए। सोमन-          अनठौने नै बनत भैया। बहरबैया बेपारी सभ मुइल-टुटल सभ उठा लइए। सुकदेव-         केहेन कारोवार ओकरा सबहक छै जे मुइल-टुटल सभ कीन लइए? सोमन-          छी हे औगताइल भाय-सहाएब, नै तँ सभ बात बुझा देतौं। एको मुट्ठी लार-पात नै रहने देहमे कछमछी लागल अछि‍। खढ़-पानि‍ले जे हुकड़ैत देखै दि‍ऐ तँ मन घोर-मट्ठा भऽ जाइए। ओना......? सुकदेव-         की ओना? सोमन-          बेर परक बात बजने बेसी नीक होइ छै। खाइर, कनी देरि‍ये ने हएत। ओते लफड़ि‍ कऽ चलि‍ पुरा लेब। अपना गाममे हाटे ने होइए, नै तँ जीबैक एकटा बाट लोककेँ खुजि‍ जैतै। सुकदेव-         हँ, से तँ होइतै। तोरो देरी हेतह। सोमन-          की करब भैया, चारू दि‍ससँ घेरा गेल छी। तेहेन समए भऽ गेल अछि‍ जे अपनो सबहक जान बचब कठि‍न भऽ गेलहेँ। (दू डेग आगू बढ़ैत सुकदेव) सुकदेव-         कनी-मनी पूँजि‍यो तोड़ि‍ कऽ पहि‍ने मनुक्‍खक जान बचाबह। बादमे बुझल जेतै। सोमन-          जाबे साँस अछि‍ ताबे तँ आशामे हाथ-पएर लाड़बे-चाड़बे करब। अजगरो तँ अपन जि‍नगीक ओरि‍यान करि‍ते अछि‍। पटाक्षेप क्रमश: तेसर दृश्‍य (मवेशी हाट। माल-जालक संग अन्नो-पानि‍ आ तीमनो-तरकारी।) सोमन आ रामरूप रामरूप-         गोधि‍याँ, मालक मंदी आबि‍ गेल अछि‍। दोसर कोनो बाटे नै सुझल तँए कनी घटो लगाकेँ बेच लेलौं। तोहर केहन रहलह? सोमन-          (मुस्‍कुराइत) सुतड़ल गोधि‍याँ। सुपौलि‍या बेपारी पकड़ाएल। अपन मन तँ झुझुआइते छलए। सोमन-          पौरूके तीन हजारमे बड़द कीनने छलौं। लार-पातक दुआरे अधो देह नै छलै। मनमे छलए जे पाँच बरख मारि‍-धुसि‍ जोतबो करब आ तेकर बादो बेचब तैयो दाम आबि‍ये जाएत मुदा की कहबह खूट्टा उसरन भऽ गेल। रामरूप-         अही दुआरे हमहूँ बेच लेलौं। तेहेन धन छलै जे मनसँ नै जाइ छलए मुदा रखबो करि‍तौं तँ खाइले की दैति‍ऐ? महीना दि‍नसँ कपैच-कुपैच कऽ खाइले दै छेलि‍ऐ। मुदा परसू आबि‍ कऽ ओहो सैध गेल। गठूला घर उछेहलौं जे दू दि‍न चलल। सोमन-          घर उछेह खुआ लेलह तँ फेर घर? रामरूप-         खूट्टापर जेकरा बान्‍हि‍ कऽ रखने छेलि‍ऐ ओकरा जे अधो पेट खाइले नै दैति‍ऐ से केहेन होइत। जखने थैरमे जाइ छलौं आकि‍ हुकड़ए लगै छलए। ओकर कलपैत मन देख अपनो मन कलैप जाइ छलए। तँए सोचलौं जे बरसात तँ अगि‍ला साल आओत, बुझल जेतै। सोमन-          (मूड़ी डोलबैत) हँ से तँ ठीके। जैठीन एक दि‍न पार लगनाइ कठि‍न अछि‍ तैठीन साल भरि‍ आगूक सोचब बूड़ि‍बक्कि‍ये ने हएत। रामरूप-         आब तँ गामे चलबह कि‍ने? सोमन-          हँ। चलब तँ गामे मुदा एकटा काज पछुआएल अछि‍। चलह एक फेरा लगाइयो लेब आ आधमन चाउरो कीन लेब। रामरूप-         मन तँ हमरो होइए। मुदा मालक पएरे एलौं से थाकि‍ गेलौं। मोटरी उठबैक साहसे नै होइए। सोमन-          यएह हद करै छह तोहूँ। चलह ने कोनो दोकानपर बैस जलखैइयो चाह करब आ दस मि‍नट जि‍राइयो लेब। बुझै छहक जे कहुना पाँच रूपैया कि‍लो सस्‍ता भेटतह। (चाहक दोकान। बेंचपर चाउरक मोटरी रखि‍ रघुवीर सेहो बैसल) रामरूप-         कनी मोटरी घुसका लि‍अ। की छी मोटरीमे भाय? रघुवीर-          की रहत। चाउर छी। आब ि‍क कोनो भात खाइ छी कि‍ दि‍न घीचै छी। रामरूप-         से की? रघुवीर-          अपना सबहक जे अगहनी चाउरक सुआद आ मस्‍ती छै से थोड़े ऐ चाउरमे छै। तखन तँ अपन हारल......। रामरूप-         की भाव देलक? रघुवीर-          तँए, कनी मन मानलक। अगहनी चाउरसँ पाँच रूपैया सस्‍ता अछि‍। रामरूप-         तब तँ गोधि‍याँ अपनो सभ अध-अध मन कऽ लऽ लेब, से नीके? सोमन-          हमहूँ तँ यएह सोचि‍ कऽ कहलि‍यह। अखन जदी कनी भीरे हएत तँ तीन दि‍नक सि‍दहामे चारि‍ दि‍न कटि‍ जाएत। रामरूप-         हम सभ पछुआएल छी तै बीच सठतै ते ने भाय? रघुवीर-          से कि‍ अद्दी-गुद्दी बेपारी छी। पाँच गो ट्रक भि‍ड़ौने अछि‍। मुदा खड़तुआ जकाँ लेबाल ढेरि‍अाएल अछि‍। रामरूप-         (मोटरी दि‍स देख) तरजू देखै छी। अहूँ कोनो चीज बेचैले अाएल छलौं? रघुवीर-          हँ। तरकारी उपजेबौ करै छी आ हाटमे बेचबो करै छी। भगवान दसे कट्ठा खेत देने छथि‍। ओकरे बीचमे कल गरा देने छि‍ऐ आ बारहो मास तरकारीये उपजबै छी। रामरूप-         सभ कि‍छु बि‍क जाइए? रघुवीर-          (कनी ठमकि‍) हँ बि‍क तँ जाइए मुदा.....? रामरूप-         मुदा की? रघुवीर-          यएह जे तेहेन चि‍क्कनि‍या लेबाल सभ भऽ गेल अछि‍ जे चीज चि‍न्‍हबे ने करैए। रामरूप-         से की? रघुवीर-          की कहब। लहटगर देख चीज कीनैए। कीड़ी-फति‍ंगीक बेसी दवाइ हम नै दै छि‍ऐ। तैसँ देखैमे समान कनी दब रहैए। रामरूप-         अहाँ कि‍अए नै दवाइ दै छि‍ऐ? रघुवीर-          अपनो खाइ छी कि‍ने। देखैमे ने दवाइ देल नीक लगैए मुदा जहरक अंश ओइमे रहि‍ये जाइ छै कि‍ने। मुदा भगवान हमरो दि‍स देखै छथि‍? रामरूप-         से की? रघुवीर-          अखनो एहेन कीनि‍नि‍हार छथि‍ जे हमरे चीजकेँ पसि‍न्न करै छथि‍। दू-पाइ महगे वि‍काइए। अहाँ सभ कतऽ आएल छलौं? रघुवीर-          (मि‍ड़मि‍रा कऽ) की कहब भाय, रौदीक मारल डि‍रि‍आइ छी। बड़द-गाए बेचए आएल छलौं। खुट्टा उसरन भऽ गेल। रघुवीर-          (मूड़ी डोलबैत) दोसर उपाइये कि‍ अछि‍। तेहेन दुरकाल समए भऽ गेल अछि‍ जे लोकोक प्राण बँचव कठि‍न भऽ गेल अछि‍ तैठाम माले-जाल गेल कि‍ने। पहि‍ने मनुक्‍खक जान बचाउ। तखन बुझल जेतै। रामरूप-         अहाँ तँ हाटक तरी-घटी बुझैत हेबै। कहू जे एते-एते दूरसँ जे बेपारी सभ अबैए, से कना पार लगै छै? रघुवीर-          एकरा सबहक भाँज बड़ भारी छै। बड़का-बड़का बेपारी सभ छी। चरि‍-चरि‍, पॅच-पॅच बएच बनौने अछि‍। गामसँ हाट आ हाटसँ गाम एक बट्ट केने रहए। अड्डा बना-बना कारोबार पसारने अछि‍। रामरूप-         एकरा सभले रौदी-दाही नहि‍ये छै। रघुवीर-          (अचंभि‍त होइत) रौदी-दाही! हद करै छी अहूँ। सदि‍खन घैलापर पाइ चढ़ौने रहैए। जेना अपना सभले रौदी-दाही जनमारा छी तेना एकरा सबहक अगहन छी। एकबेर रौदी-दाही पौने सेठ बनि‍ जाइए। पटाक्षेप चारि‍म दृश्‍य (नसीबलालक घर। दरबज्‍जाक ओसारक कुरसीपर आँखि‍ मूनि‍ कि‍छु सोचैत सोमनक संग सुकदेव अबैत) सुकदेव-         नीन छी यौ  भाय? (सुकदेवक बात सुनि‍ आँखि‍ ओलि‍ धड़फड़ा कऽ) नवीसवलाल-       नै! नै! सुतल कहाँ छी। समैक फेरीसँ चि‍न्‍ति‍त भऽ गेल छी। खेलहो अन्न देहमे नै लगैए। एक दि‍स जहि‍ना पि‍यास मेटा गेल तहि‍ना आँखि‍क नीन्न सेहो। धैनवाद अहीं सभकेँ दी जे एहनो दुरकालमे हँसी-खुशीसँ जीबै छी। सोमन-          हद करै छी भाय! राँड़ कानए अहि‍वाती कानए तै लागल बरकुमारि‍ कानए। नसीवलाल-       तोहर बात कटैबला नहि‍ये छह सोमन मुदा......? सोमन-          मुदा की? नसीवलाल-       ओना, जे जते पछुआएल अछि‍ ओ ओते समस्‍यासँ गरसि‍त अछि‍। मुदा प्रकृतक वि‍पैत सभपर पड़ै छै। तहूमे जे जते अगुआएल रहैए ओकरा ओते बेसी पड़ै छै। सोमन-          हँ, से तँ पड़ि‍ते छै। नसीवलाल-       बौअा, ओना तोहर उमेरो कम छह। एक गाममे रहि‍तो कम सम्‍पर्कमे रहै छह। सुकदेव भाय बतरि‍या छथि‍। तहूमे बच्‍चेसँ दुनू गोरे गामसँ जहल तक संगे रहलौं। मुदा.....? सोमन-          मुदा की? नसीवलाल-       यएह जे आब बुझि‍ पड़ैए जे जि‍नगि‍ये ठका गेल। सोमन-          से की? नसीवलाल-       की कहबह आ कते कहबह। एकटा कोसि‍ये नहैरि‍क बात सुनह। जहि‍या जुआने रही तहि‍येसँ कहै छि‍अह। बड़ लि‍लसा रहए जे कोसी नहैर बनत। डैम बनतै। नहरि‍क पानि‍सँ खेत पटत आ डैममे पनि‍बि‍जलीक यंत्र बैसतै। जैसँ तते बि‍जली हएत जे घर-दुआरक इजोतक संग करखन्नो चलत। मुदा सभ आशापर पानि‍ हरा गेल। आइ जौं बि‍जली रहैत तँ गामो बजारे जकाँ भऽ गेल रहैत। मुदा......? सोमन-          मुदा की? नसीवलाल-       यएह जे ई बात मनसँ मेटा गेल छलए जे एहेन रौदीसँ भेँट हएत। मुदा.....! सोमन-          मुदा की? नसीवलाल-       अपन संग-संग गामोक कल्‍याण भऽ जाइत। खेती-पथारीक संग एते छोट-पैघ करखन्ना बनि‍ गेल रहैत जे बेरोजगार ककरा कहै छै से तकनौसँ नै भेटैत। मुदा आइ देखै छी जे गाम-गामक लोक उजहि‍ दि‍ल्‍ली, कलकत्ता चलि‍ गेल। सोमन-          हँ। से तँ भेल। मुदा माटि‍यो फाँकि‍ कऽ तँ मनुख नहि‍ये रहि‍ सकैए। जतऽ पेट भरतै ततऽ ने जाएत। नसीवलाल-       कहलह तँ बेस बात। मुदा गाम ताबे नै हरि‍याएत जाबे गामक बच्‍चा-बच्‍चा ठाढ़ भऽ अपन भवि‍स दि‍स नै ताकत। सोमन-          एहेन समए भेने लोक केना ठाढ़ हएत? नसीवलाल-       सएह ने मनकेँ नचा रहल अछि‍। सभ माए-बाप बेटा-बेटीपर आशा लगौने रहैए जे हमरासँ नीक बनि‍ धीया-पूता गुजरो करत आ नीक जकाँ आगूओ बढ़त। मुदा आँखि‍ उठा दुनि‍याँ दि‍स तकै छी तँ चौन्‍ह आबि‍ जाइए। बाल-बच्‍चाक कोन गप जे अपने बुढ़ाढ़ी भरिसक कनि‍ते कटत। सुकदेव-         वएह बात मनमे औंढ़ मारलक भाय, तँए एलौंहेँ। नसीवलाल-       भाय, कि‍ वि‍चार करब। छुछ हाथ मुँहमे दैए कऽ की हएत। ने कि‍यो गाम-घरक महौत बुझैए आ ने अपन शक्‍ति‍क उपयोग करए चाहैए। सभ अपन अमूल्‍य श्रम-मेहनत- दोसराक हाथे बेच बजारक चकचकीमे बौआइ-ए। सुकदेव-         यएह सभ देख ने मन उछटि‍‍ गेलहेँ। मुदा ककरा कहबै, के सुनत। अहाँ तँ गुल्‍ली-डंटासँ अखनि‍ धरि‍क संगी छी। जे तीत-मीठ भेल तैमे तँ दुनू गोरे संगे छी। नसीवलाल-       (चानि‍ परक पसेना पोछैत) जहि‍ना माटि‍क ईंटाकेँ वएह माटि‍ पानि‍क संग मि‍ल जोड़ि‍-साटि‍- दैत अछि‍ तहि‍ना ने मनुक्‍खोकेँ सि‍नेह साटि‍ दैत अछि‍। मुदा सि‍नेह आओत केना? एक दि‍स धनक भरमार दोसर दि‍स भूखल पेट। तै बीच चोर-उचक्काक सघन बोन। केना लोकक परान बँचतै? सुकदेव-         सोझे चि‍न्‍ते केनौ तँ नहि‍ये हएत। नै भगलाहाले तँ गामोमे रहनि‍हारले तँ सोच-वि‍चारए पड़त। जँ से नै करब तँ एक लोटा पानि‍ आ एकटा काठि‍यो मुइलापर के देत। नसीवलाल-       भाय, जहि‍या घोड़-दौड़ करैबला छलौं तहि‍या तँ करबे ने केलौं, आब आइ बुढ़ाढ़ीमे की हएत? कि‍छु करए लगै छी तँ हाथ-पएर थरथराए लगैए। जैसँ बुझलो काजमे धकचुका जाइ छी। सुकदेव-         भाय, असे तँ जि‍नगीक संगी छी। जै संग लोक जि‍नगीक रस चुसैत अछि‍। तेकरो छोड़ि‍ देब......? नसीवलाल-       (सुकदेवपर आँखि गरा मूड़ी डोलबैत) भाय कहै तँ छी लाख टकाक गप। अपनो जोकर नै सोच-वि‍चार करब तँ अकाल मरबो तँ नीक नहि‍ये छी। सुकदेव-         नीक अधला कतऽ छै भाय! भलहि‍ं लोक अपना जि‍नगीकेँ स्‍वार्थी बुझे मुदा जाबे धरि‍ अपने नि‍रोग नै रहब ताबे धरि‍ दोसराक वि‍षयमे कि‍ सोच आ कि‍ कऽ सकै छी। नसीवलाल-       हँ, से तँ ठीके। वि‍चारोकेँ प्रभावि‍त तँ जि‍नगि‍ये करैत अछि‍। नीक-नीक भाषणे करब आ अपन चालि‍ छुतहरक अछि‍ तँ ओइ भाषणक महौते की? जहि‍ना वि‍ज्ञान सि‍द्धान्‍त-थि‍योरीक- संग व्‍यवहारो-प्रेक्‍टि‍कलो- कऽ कऽ देखबैत अछि‍ तहि‍ना ने नीति‍शास्‍त्र सेहो अछि‍। सुकदेव-         अखन धरि यएह बुझि‍ ने जीबैत एलौं, मुदा.......? नसीवलाल-       हँ, समैक चक्र तँ प्रवल अछि‍ये मुदा एहेन प्रबल तँ नै अछि‍ जेकरासँ सामना नै कएल जा सकैत अछि‍। जीता-जि‍नगी हारि‍यो मानि‍ लेब, ओहो तँ......? सुकदेव-         हँ, से तँ उचि‍त नहि‍ये अछि‍। मुदा समनो तँ.......? नसीवलाल-       हँ, कठि‍न अछि‍। मुदा लंका सन राक्षसक बीच हनुमान केना.......? सुकदेव-         हँ, तहि‍ना। नसीवलाल-       (अपसोच करैत) पाछू घुरि‍ तकै छी तँ बुझि‍ पड़ैए जे जरूर चूक भेल। जना कोसी नहरि‍ आ पनि‍बि‍जली लेल सामाि‍जक स्‍तरपर ठाढ़ भेलौं तेना व्‍यक्‍ति‍गत जीवनक बाट छुटि‍ गेल। सुकदेव-         से की? नसीवलाल-       यएह जे जना मध्‍यम कि‍सान छी। अपना खेत अछि‍। तेना ने खेतमे पानि‍क ओरि‍यान केलौं आ ने परि‍वारो जोकर मशीन। जौं से केने रहि‍तौं तँ भलहि‍ं महग काज होइत मुदा जीबैक बाट जरूर धरौने रहैत। सुकदेव-         जखन चारि‍ पएरबला हाथी चूकि‍ जाइए तखन तँ मनुख दुइये पएरबला अछि‍। जै समए जे चूक भेल, आइ ने ओ समए बँचल अछि‍ आ ने जि‍नगीक ओ अंश। नसीवलाल-       अखन धरि‍ तँ हाले-चालमे समए नि‍कलि‍ गेल। काजक गप तँ छुटि‍ये गेल। कि‍महर आएल छलौं?ऽ सुकदेव-         भाय, अहाँसँ नुकाएल नहि‍ये छी। अखन तक जे जीबैक आस बटाइ खेत अछि‍ ओ टुटि‍ गेल। खेतबलाकेँ तँ खेत रहबे करै छन्‍हि‍ मुदा बटेदारकेँ घरोक आँटा गील भऽ जाइ छै। नसीवलाल-       दुर्भाग्‍य अछि‍ भाय। सुकदेव-         जकरा सोन छै ओकरा पहीनि‍नि‍हार नै छै आ जे पहीरि‍नि‍हार अछि‍ ओकरा सोन नै छै। नसीवलाल-       से तँ अछि‍ये। गामक बारहआना खेत नोकरि‍हाराक अछि‍। जे खेती नै करैत अछि‍। जखन कि‍ बारहआना लोक खेतीपर जीबैत अछि‍। मुदा कोन दुख एहेन छै जेकर दवाइ नै छै। सुकदेव-         भारी बनर फाँसमे पड़ि‍ गेल छी। अखन तक‍ खेती छोड़ि दोसर लुरि‍ नै सीखलौं। खांहि‍सो नै भेल। घरसँ बाहरो जाएब से कोन लुरि‍ ल‍ऽ कऽ जाएब। भीख मांगि‍ खाइसँ नीक अन्न-पानि‍ बेतरे घरमे प्राण ति‍यागि‍ देब हएत। अगदि‍गमे पड़ि‍ गेल छी। नसीवलाल-       अहूँसँ बेसी तँ अपने पड़ि‍ गेल छी। अहाँ तँ नै ऐ गाम ओइ गाम जा कऽ कमाइयो-खा सकै छी मुदा.....। सुकदेव-         यएह बात मनमे अहुरि‍या काटि‍ रहल अछि‍। जहि‍ना संग-मि‍ल एते दि‍न कटलौं तहि‍ना आगूओ केना कटत, तेकर......? नसीवलाल-       कनि‍तो जीब। सेहो नीक नहि‍ये। (कर्मदेव आ सोमनक प्रवेश) नसीवलाज-       भाय, मन तँ अखनो तेहेन हुड़कैए जे शेष जि‍नगी जहलेमे बि‍ताएब मुदा बुढ़ाढ़ी.....। नवतुरि‍यामे समाजक प्रति‍ कोनो रूचि‍ये नै अछि‍। रूचि‍यो केना रहत। तहि‍ना परचा पोस्‍टरमे परि‍वारक परि‍भाषा दैत अछि‍ तहि‍ना समाजक कोन बात जे माइयो-बापकेँ परि‍वारसँ लोक अलगे बुझैए। कर्मदेव-          काका, हमहूँ सएह पुछए एलौं जे एहेन समैमे घरसँ बि‍ना भगने केना जीब? नसीवलाल-       बौआ, तोरे सभपर समाजक दारो-मदार अछि‍। मुदा जखन तोंही सभ चि‍ड़ै जकाँ उड़ि‍ पड़ा रहल छह तखन तँ समाजक-गामक- भगवाने मालि‍क। सोमन-          ककरापर करब सि‍ंगार पि‍या मोरा आन्‍हर हे। कर्मदेव-          काका, जँ जीबैक बाट भेट जाएत तँ कि‍अए भागब? नसीवलाल-       बौआ, तूँ तँ पढ़ल-लि‍खल नौजवान छह। तोरामे एते शक्‍ति‍ छह जे कि‍छु कऽ सकै छह। आशा जगाबह। कर्मदेव-          अखुनका समैसँ जे अपन तुलना करै छी तँ बुझि‍ पड़ैए जे करि‍या बादल लटकल भादोक अमवसि‍याक बारह बजे राति‍क बीच पड़ल छी। नसीवलाल-       पढ़ि‍-ि‍लखि‍ कऽ एते नि‍राश कि‍अए छह? कर्मदेव-          बुझि‍ पड़ैए जे एहेन पढ़ाइ पढ़ि‍ लेलौं जे ने घरक रहलौं आ ने घाटक। नसीवलाल-       ओना जीबैक बाट व्यक्‍ति‍-वि‍शेष सेहो बनबैए आ बना सकैए। मुदा समाजकेँ बनने बि‍ना जहेन हेबाक चाही से नै बनि‍ सकैए। तँए बेगरता अछि‍ जे दुनू संग-संग बनए। जइले तोरे सन-सन नवयुवक अपेकछा अछि‍। फाँड़ बान्‍हि‍ मैदानमे कुदए पड़तह। कर्मदेव-          कि‍यो तँ काजे देखि‍ ने फाँड़ बान्‍हत? नसीवलाल-       (अर्द्ध हँसी हँसि‍) अइले समाजकेँ जगबए पड़तह। जखने समाज नीन तोड़ि‍ सुनत तखने ओछाइन समेटि‍ घरसँ बहरा रस्‍तापर आबि‍ ठाढ़ भऽ जाएत। जखने ठाढ़ हएत तखने नव सुर्जक रोशनीमे अतीतक गौरव देखत। कर्मदेव-          की गौरव? नसीवलाल-       मि‍थि‍ला दर्शनक गौरव देखैक लेल ओकर बनैक प्रक्रि‍या देखए पड़तह। संयुक्‍त परि‍वार बजनहि‍ नै, बनैक आ चलैक ढंग घड़ए पड़तह। जहि‍ना कोनो बाट कोनो स्‍थान धरि‍ पहुँचबैत तहि‍ना मि‍थि‍ला दर्शन छी। कर्मदेव-          की दर्शन? नसीवलाल-       एते धड़फड़मे नै बुझि‍ सकबहक। अखन हमहूँ औगताएल छी। मालो-चाजकेँ पानि‍ नै पीयेलौंहेँ, हुकड़ैए। कर्मदेव-          तखन? नसीवलाल-       सौंसे समाजक बैसार ब्रह्मस्‍थानमे करह। सबहक वि‍चारसँ एकटा रास्‍ता ताकि‍ आगू डेग उठाबह। कर्मदेव-          आइये बैसार करब। नसीवलाल-       एते अगुतेने काज नहि‍ चलतह। कौल्हुका समए बना काने-कान सभकेँ जना दहुन। कर्मदेव-          बेस। पटाक्षेप। पाँच‍म दृश्‍य (बेरक समए। परतीपर बैसार।) सुकदेव-         (उठि‍ कऽ) भाए-बहि‍न लोकनि‍, जते दि‍न अपना सबहक अजादीक भेल ओतेक उमेर हमरो भेल। कि‍एक तँ कोसी नहरि‍ लेल नसीवलाल भाइक संग सरकारी आॅफि‍समे करीब पचास बर्खसँ धरना, प्रदर्शन सभाक संग जहलो जाइत-अबैत रहलौं। जे रौदी बि‍सरए लागल छलौं आ आशा एते जगि‍ गेल छल जे रौदीसँ भेँट नै हएत। मुदा अइबेरक रौदी सि‍खा रहल अछि‍ जे सभ केलाह पानि‍मे चलि‍ गेल। जहि‍ना सबहक जान अवग्रहमे पड़ल अछि‍ तहि‍ना तँ अपनो भऽ गेल अछि‍। सोमन-          (बैसले-बैसल) करबो तँ पानि‍ये ले ने केलौं। पानि‍ ले केलहा पानि‍मे गेल। नसीवलाल-       (ठाढ़ भऽ) लंगोटि‍या संगी सुकदेव भाय छथि‍। बच्‍चेसँ दुनू गोरे संगे रहलौं। दुनू गोटेक बीच अंतर एतबे अछि‍ जे हमरा अपन खेत अछि‍ आ हुनका अपन नै छन्‍हि‍। मुदा करै छी दुनू गोटे खेति‍ये। अपना खेत रहि‍तौ आशा-आसीमे रहि‍ गेलौं। तै बीच जि‍नगी ससरि‍ गेल। सोमन-          एक दि‍स नहरि‍ खुनाइ होइए आ दोसर ढहि‍-ढहि‍ भरैए। बीचमे सरकार मदारी-नाॅच पसारने अछि‍। नसीवलाल-       खेतीले पानि‍ ओहन जरूरी अछि‍ जेहने मनुक्‍ख आ माल-जाल ले। बि‍ना पानि‍ये खेती भइये नै सकैए। जै हि‍सावसँ नहरि‍ खुनाइ शुरू भेल जौं खुना गेल रहैत तँ अपना सभ बहुत अगुआ गेल रहि‍तौं। मुदा की देखै छी? कर्मदेव-          कनी फरि‍छा कऽ कहि‍यौ काका? नसीवलाल-       (हँसैत) बौआ गामक बात बड़ नमहर अछि‍ तँए ओते नै कहि‍ अपन बात बजै छी। दस बीघा जोत जमीन आ बाँकी गाछ बेख, खरहोरि‍ इत्‍यादि‍मे बरदाएल अछि‍। बाहर मासक सालमे तीनटा मौसम जाड़, गरमी, बरसात होइए। मौनसुनी बरखासँ बरसातमे काज चलैए। बाँकी सालक आठ मास (दू मौसम) ओहि‍ना रहैए। सोमन-          गोटे-गोटे बेर झाँटो आ पथरो खसैए। नसीवलाल-       हँ, हँ, सेहो होइए। अपन देश मूलत: कि‍सानक देश छी। खेती-पथारी मूल्‍य व्‍यवसाय छी जे अदौसँ अखन धरि‍ चलि‍ अबैत अछि‍। समैपर बरखा भेल तँ कि‍सानक मन हरि‍याएल रहल नै तँ सालो भरि‍ मरचुन्नी रहल। प्रश्न अछि‍ पान खाएल मुँह मुस्‍कि‍याइत रहए। जइठीन लोक पानि‍क जोगार केने अछि‍ ओइठीन हरि‍यरी अछि‍। उन्नति‍क रास्‍ता पकड़ि‍ आगू मुँहेँ ससरि‍ रहल अछि‍। खेतक बले रंग-वि‍रंगक करखन्नो ठाढ़ केने अछि‍। अपना सबहक जड़ि‍ये सुखाएल अछि‍ तँ ऊपर केना पोनगत? कर्मदेव-          समस्‍या तँ भारी अछि‍? नसीवलाल-       जुगक अनुकूल भारी नै अि‍छ। कि‍एक तँ आइ हम सभ ओइ जुगमे पहुँच गेल छी जइ जुगमे एहेन-एहेन समस्‍या धीया-पूता खेल सदृस अछि‍। मुदा.......? कर्मदेव-          मुदा की? नसीवलाल-       मुदा यएह जे जेकरा हाथमे काज करैक भार छै ओकर नेते भंगठल छै। कोन काज केना हएत तइ दि‍स नजरि‍ये नै छै। नजरि‍ छै जे कोन-काज केना दुइर हएत तइ दि‍स। कर्मदेव-          तखन की करब? नसीवलाल-       अखन बहुत बात बजैक समए नै अछि‍। जइ काज ले सभ एकठाम बैसलौं तइपर वि‍चार करू। गामक लोक आ गामक सम्‍पत्ति‍मे केना संबंध स्‍थापि‍त हएत तइपर ि‍वचार करू। कर्मदेव-          हम सभ तँ नवतुरि‍या छी नीक-नहाँति‍ नहि‍ये बुझै छी तँए कनी अपने रस्‍ता बता दियौ? नसीवलाल-       अखन इति‍हास-भूगोल देखैक काज नै अछि‍। अखन एतबे वि‍चार करैक अछि‍ जे गाममे जते जमीन अछि‍ आ जते लोक छी ओकर हि‍साब बुझैक। बारह आना जमीन हुनकर छन्‍हि‍ जे खेती छोड़ि‍ अन्तए जा नाैकरी करै छथि‍। चारि‍ आना गाममे रहनि‍हारकेँ छन्‍हि‍। हुनके सबहक जमीन लोक बटाइ कऽ कऽ कोनो धरानी जीबै छथि‍। तँए जरूरी अछि‍ ऐ खाधि‍केँ भरैक। जाबे से नै हएत ताबे समस्‍या बनले रहल। (कहि‍ बैस जाइत) कर्मदेव-          बेरा-बेरी अपन-अपन वि‍चार रखै जाइ जाउ? सोमन-          कहैले हमहूँ कि‍साने छी मुदा ने अपना खेत अि‍छ आ ने हर-बड़द। जनेपर हरो कीनै छी आ अनके खेतमे खेति‍यो करै छी। जेना-तेना जि‍नगी घि‍सि‍यबै छी। आगू-पाछूक बात सेहो नहि‍ये बुझै छी। तँए अपने-लोकनि‍क जे वि‍चार हएत ओइसँ बहार हमहँू नै रहब। (सोमन बैस जाइत। आभा उठि‍ कऽ ठाढ़ होइत) आभा-           (जोरसँ) जँ देश अपन छी तँ देशक सम्‍पत्ति‍यो अपन छी। जरूरत अछि‍ सबहक-सुख-दुखमे सबहक भागीदारीक। जे गाममे रहि‍ खेत जोतै छथि‍ गामक खेत हुनका जि‍म्‍मा हेबाक चाही। जँ से नै हएत तँ जहि‍ना मार-काटसँ इति‍हास भरल अछि‍ तहि‍ना नव पन्ना आरो जाड़ाएत? शान्‍ती-          आभा बहि‍नक बात कटैबला नहि‍ये छन्‍हि‍ कि‍एक तँ साले-साल पनरह अगस्‍तकेँ हमहूँ सभ स्‍वराजक झंडा फहराबै छी। मुदा की स्‍वराज अछि‍? मुदा समाजक सदस्‍यक संग सरकारक अंग सेहो छी तँए शान्‍तीसँ सभ काज करैत चलू। नसीवलाल कक्का आ सुकदेव कक्का जहि‍ना उमेरगर छथि‍ तहि‍ना अनुभवी। तँए जेना-जे वि‍चार दथि‍ हम सभ ओ करी। सुकदेव-         जेहने नवकवरि‍या आभा छथि‍ तेहने शान्‍ती। मुदा दुनूक वि‍चार सुनि‍ हृदए शान्‍त भऽ गेल। खुशीसँ मन भरि‍ गेल। सबहक वि‍चारसँ एकटा रास्‍ता तँइ हुअए। जेकरा मानि‍ सभ आगू बढ़ी। नसीवलाल-       दौड़-बड़हा करैबला उमेर तँ नहि‍ये अछि‍ मुदा मेहौता बड़द जकाँ संग-संग बहैले तैयारे छी। अखन गाममे पढ़ल-लि‍खल नौजवान कर्मदेव अछि‍। चाहब जे दौड़-धूप करैक भार ओकरे देल जाए। कर्मदेव-          जँ समाज भार देताह तँ जहाँ धरि‍ सकब इमानदारीसँ सम्‍हारब। नसीवलाल-       जते नोकरि‍या छथि‍ हुनकासँ सम्‍पर्क कऽ सभ बात कहि‍यनु। समाजक ि‍नर्माण सभ मि‍ल करब, सर्वोत्तम। पटाक्षेप छठम दृश्य (कृष्‍णदेवक डेरा। सूर्यास्‍तक समए। पनरह बर्खक बेटा दि‍नेश आ तेरह बर्खक बेटी सुधा दरवज्‍जापर बैस परीक्षाक गप-सप्‍प करैत।) सुधा-           भायजी, अहाँ सबहक परीक्षा तँ लगि‍चा गेल? दि‍नेश-          हँ। अगि‍ला महीना आठ तारीखसँ हएत। सुधा-           सुनै छी, अइबेर चोरि‍-तोरि‍ नै चलत? दि‍नेश-          चोरि‍ बन्न भेनाइ ओते असान अछि‍ जे नै चलत। भलहि‍ं सेन्‍टरपर नै होउ मुदा आरो जगह बन्न हएब साधारण अछि। सुधा-           (जि‍ज्ञासासँ) आरो ठाम होइ छै? दि‍नेश-          होइ छै भेला जकाँ खूब होइ छै। जएह भोजैतनी सहए चटैतनी। जेकरे उपर चोरि‍ रोकैक भार छै सएह सभ करैए। जेकरे फलाफल छी जे नीक वि‍द्यार्थीक रि‍जल्‍ट अधला होइ छै। आ अधला वि‍द्यार्थीक रि‍जल्‍ट नीक होइ छै। सुधा-‍           से एना कि‍अए होइ छै? (कृष्णदेवक प्रवेश) दि‍नेश-          हम तँ सभ बात बुझबो ने करै छी पापाकेँ सभ बुझल हेतन। सुधा-           पापा, परीक्षामे चाेरि‍ कतऽ-कतऽ होइ छै? कृष्‍णदेव-         बुच्‍ची, ओना पुछलह तँ कहबे करबह। मुदा अधला गप सुनैमे समए नहि‍ये लगावी, सएह नीक। सुधा-           जँ अधला गप नै सुनब तँ फेर नीक-अधला बुझबै केना? कृष्‍णदेव-         (मुस्‍की दैत) कहलह तँ ठीके। देखहक ओना लोक परीक्षाकेन्‍द्रपर जे कि‍ताब-चि‍ट-पुरजी लऽ कऽ लि‍खैए ततबे बुझै छै। मुदा ऐ सभसँ नमहर-नमहर चारि दोसर होइए। जखन कापी एकत्रि‍क भऽ परीक्षक ओइठाम पठौल जाइ छै तखन कापी बदैल-बदैल लेल जाइए। सुधा-           नै बुझलि‍ऐ। कनी नीक जकाँ फरि‍छा कऽ कहि‍यौ? कृष्‍णदेव-         परीक्षाभवनसँ बाहर काँपी लि‍खाइत अछि‍ आ जमा करैकाल बदलि‍ लेल जाइत अछि‍। सुधा-           (आश्चर्यसँ) तखन तँ ओकरा बहुत नम्‍बर अबैत हेतै? कृष्‍णदेव-         अबि‍ते अछि‍। कोनो कि‍ एतबे होइए। एकर उपरान्‍तो जइठाम काँपी जमा होइए आ मार्क-सीट तैयार होइए असली करामात तइठीन होइए। बनि‍याँक कारोवार जकाँ रूपैयाक बरखा होइए। सुधा-           तखन तँ रूपैयेबलाक वि‍द्यार्थीक रि‍जल्‍ट नीक होइत हेतै? कृष्णदवे-         होइते अछि‍। (कर्मदेवक प्रवेश) कर्मदेव-          गोड़ लगै छी कक्का। कृष्‍णदेव-         नीके रहह। गाम-घरक की हाल-चाल छह? (भीतरसँ कृष्‍णदेवक पत्नीक अबाज- गौआँ-घरूआ दुआरे रहब कठि‍न भऽ गेल। ककरो असपतालक काज होउ, आकि‍ कोट-कचहरीक दौड़ल चलि‍ आएत। जना सबहक तोरा एतै गारल होइ। कान घुमा कर्मदेव सुनि‍ ग्‍लानि‍सँ भरि‍ गेल। मुदा समाजक प्रति‍नि‍धि‍ बुझि‍ सभ सहैक लेल तैयार।) कर्मदेव-          काका, आइ धरि‍ एहेन रौदी नै देखने छलौं। ओना उमेरे कते अछि‍ मुदा जहि‍यासँ गि‍यान-परान भेल तहि‍यासँ एहेन समैसँ भेँट नै भेल छलए। कृष्‍णदेव-         (सुधासँ) बुच्‍ची कर्मदेव भाय एलखुन। चाह नेने आबह। (दुनू भाए-बहि‍न जाइत अछि‍) कर्मदेव-          अपना दि‍सक कि‍ हाल-चाल अछि‍? कृष्‍णदेव-         नीक नहि‍ये कहक चाही। तखन तँ कौबलाक छागर बनल छी। कखनो काल सोचए लगै छी तँ लाज हुअए लगैए जे एते दरमाहा पावि‍यो कऽ पेंइच-उधार करए पड़ैए। कर्मदेव-          कि‍अए? कृष्‍णदेव-         छअ-छअ मासक दरमाहा पछुआ जाइए। मुदा घरक खर्च तँ हेबे करैए। एते दि‍न मकानक पाछू तबाह छलौं मुदा पैछला महि‍ना नि‍वृत्ति‍ भेलौं। कर्मदेव-          बड़का चि‍न्‍ता पाड़ केलौं। कृष्‍णदेव-         की पाड़ केलौं। आगू दि‍स तकै छी तँ ओहूसँ नमहर-नमहर चि‍न्‍ता घेरने अछि‍। कर्मदेव-          से की? कृष्‍णदेव-         दू बर्खक बाद बेटाकेँ मेडीकलमे नाअों लि‍खाएब तइपरसँ बेटी सेहो वि‍आहे जोकर भइये जाएत। कर्मदेव-          हँ, से तँ हेबे करत। कृष्‍णदेव-         पढ़ौनाइ-लि‍खौनाइ आब हल्लुक रहल। लाखक तँ कोनो मोजरे नै छै। अपन कमाइ हजारमे अछि‍ आ खर्च लाखमे अछि‍ तखन चि‍न्‍ता कि‍अए ने पछुऔत। कर्मदेव-          अहाँकेँ की कमाइये टा अछि‍, गामोमे तते अछि‍ जे.......? कृष्‍णदेव-         सएह कखनोकाल सोचै छी जे गामक खेत बेच बैंकेमे रखि‍ ली। जइसँ मौका-कुमौका काजो करब आ सुदि‍यो हएत। कर्मदेव-          (आँखि‍ गड़ा कृष्‍णदेवकेँ देखैत) कक्का, परि‍वार माया-जाल छि‍ऐ कि‍ने? जे गरीब अछि‍ ओकरा छोटका माया पकड़ै छै आ जे जते नमहर हुनका ओते नमहर पकड़ै छन्‍हि‍। कृष्‍णदेव-         ठीके कहै छह। राज दुखी परजा दुखी, जोगीकेँ दुख दूना। अपने बात कहै छि‍अ, गाममे कते खेत अछि‍ जे देखते छहक। समए सुभ्‍यस्‍त होइए तँ सालो भरि‍क बुतातो आ कि‍छु बेचि‍यो-बि‍कीन लइ छी। अइबेर सेहो नै हएत। कर्मदेव-          अहाँ सभ पढ़ल-लि‍खल छी तखन........? कृष्‍णदेव-         (मुस्‍कुराइत) ब्रह्मफाँसमे पड़ि‍ गेल छी। जहि‍ना बाबाकेँ तहि‍ना बाबूकेँ चौगामा लोक मालि‍क कहै छलनि‍, मलि‍काना नि‍माहि‍तो छलाह। हमरो लोक तहि‍ना बुझै छथि‍। मुदा ब्रह्मफाँस केहन लागल अछि‍ जे ओ मान-प्रति‍ष्‍ठा सम्‍पत्ति‍मे सन्‍हि‍या गेल अि‍छ। जँ एको धुर बेचब तँ सोझे प्रति‍ष्‍ठा प्रभावि‍त हएत। कर्मदेव-          खाइर, छोड़ू खि‍स्‍सा-पि‍हानी। अपनेसँ भेँट करैले‍ समाज पठौलनि‍हेँ। कृष्‍णदेव-         (अकचका कऽ) समाज पठौलखुनहेँ? की बात, की बात, बाजह। कर्मदेव-          ऐ दुआरे पठौलनि‍हेँ जे गाममे खेत-पथारबला तँ अहीं सभ छि‍ऐ तँए सभकि‍यो एकठाम बैस गामक कल्‍याणक वि‍चार करी। बेर-बेर रौदी-दाही भऽ जाइए तेकर कोनो स्‍थायी समाधानक वि‍चार करी। कृष्‍णदेव-         बहरबैया सभ रहताह? कर्मदेव-          ओहीक जानकारी देवाले पठौलनि‍हेँ। अहीं लगसँ काज शुरू केलौंहेँ। एेठामसँ घनश्‍यामकाका ऐठाम होइत रघुनाथकाका ऐठाम जाएब। हुनका ऐठामसँ मोहनकाकाकेँ भेँट करैत गाम जाएब। कृष्‍णदेव-         अखन घनश्यामक दि‍न-दुनि‍याँ दोसर भऽ गेल अछि‍। एक तँ जमीन-जत्‍थाबला लोक पहि‍नेसँ रहलाह तइपरसँ बैंकक नोकरी। कर्मदेव-          हुनकर सोभावो कि‍छु आने ढंगक छन्‍हि‍। कृष्‍णदेव-         सोलहन्नी बनि‍याँक चालि‍ पकड़ने अछि‍। खाइर, जुगो-जमाना तँ ओकरे सबहक छि‍ऐ। कर्मदेव-          आठम दि‍न रवि‍केँ बैसार छी। से अपने समैपर पहुँच जाइऐ। कृष्‍णदेव-         बड़बढ़ि‍याँ। परसू तक तँ तोहूँ घुरि‍ जेबह? कर्मदेव-          हँ, हँ। जते जल्‍दी भऽ सकत ओते जल्‍दी घुमैक कोशि‍क करब। कृष्‍णदेव-         चारि‍म दि‍न हमहूँ फोनपर सभसँ सम्‍पर्क करब। एहेन नै जे एक गोटे जाय आ दोसर पहुँचबे ने करी। कर्मदेव-          हँ, हँ, सभ कि‍यो वि‍चारी लेब। आखि‍र समाजक तँ अहींसभ बुझनुक भेलि‍ऐ कि‍ ने? पटाक्षेप। सातम दृश्‍य (घनश्‍यामक घर। एजेंट शि‍वशंकरक संग।) शि‍वशंकर-        मैनेजर सहाएब, हमर कम्‍पनीक इति‍हास सए बर्खक अछि‍। वस्‍तुक गुणवत्ता आ व्‍यापारि‍क साख एहेन अछि‍ जेकर बाँहि‍ पकड़ैबला दुनि‍याँमे एकोटा कम्‍पनी नै अछि‍। जे पाइप (बोरि‍ंगक) आ इंजन (दमकल) हम देब ओ दोसर कि‍यो नै दऽ सकैए। घनश्‍याम-         बैंक की कोनो अप्‍पन छी। मात्र एक ब्रान्‍चक मनेजर छी। जाबे काज करै छी ततबे धरि‍। सरकारक नजरि‍ कनी गामक खेत दि‍स उठल तँए ई अवसर आएल। तइ अवसरसँ..........? शि‍वशंकर-        हँ, हँ। हमहूँ कहाँ चाहैक छी जे अवसरक लाभ नै हुअए। घनश्‍याम-         परसुए एक गोटे (दोसर कम्‍पनीक एजेंट) आएल रहथि‍ ओ पाँच प्रति‍शत कमीशनक बात केने छलाह। ओना अखन धरि‍ हमरो स्‍पष्‍ट आदेश उपरसँ नहि‍ये आएल अछि‍। मुदा पैछला मि‍टि‍ंगमे बाजाप्‍ता चर्चा भेल रहए। यएह बात हुनको कहि‍ पनरह दि‍नक वाद भेँट करैले कहलि‍यनि‍। शि‍वशंकर-        अहाँ, भलहि‍ं ओइ कम्‍पनीक बात नीक जकाँ नै बुझैत होइऐ मुदा हम तँ रत्ती-बत्तीक बात बुझै छी। केहन घटि‍या माल बना-बना सप्‍लाइ करैए। ओ दोसर-दोसर बैंकसँ पता लगा लेब। हमर पाइप जँ ओकरापर पटैक देतै तँ थौआ-थाकर कऽ देतै। अहूँ तँ जनि‍ते छी जे नीक वस्‍तुक उत्‍पादनमे नीक खरचो बैइसै छै। घनश्‍याम-         खरचा बेसी बैइसै छै तँ दामो बेसी होइ छै कि‍ने? शि‍वशंकर-        हँ, से तँ होइ छै। मुदा घटि‍या माल कते दि‍न चलत सेहो ने देखबै? घनश्‍याम-         से तँ बेस कहलौं मुदा जे आदेश हएत सएह ने करब। शि‍वशंकर-        ऐठामक सक्षम कि‍सानक रि‍पोट देबै तँ कि‍अए घटि‍या मालक आदेश हएत। जइठाम पछुआएल कि‍सान अछि‍, पहि‍ने-पहि‍ल बोरि‍ंग देखते ओ कि‍आने गेल नीक-अधला। घनश्‍याम-         हँ, से तँ मानलौं। मुदा सोलहो आना नेत बि‍गाड़ि‍यो लेब सेहो तँ नै। शि‍वशंकर-        (बात लपकि‍) हँ, एह वि‍चार हमरो कम्‍पनीक अछि‍। जे आॅनर छथि‍ हुनकामे ई भावना कूट-कूट भरल छन्‍हि‍। मुदा बीचमे जे घटि‍या कारोवारी सभ अछि‍ वएह सभ ने नीको मालक बजारकेँ घेर घटि‍या बजार बना दइए। दू-पाइ बेसि‍यो लगने जँ उपभोक्‍ताकेँ नीक वस्‍तु भेटै छै तँ ओकर उपयोगो बेसी दि‍न करैए। घनश्‍याम-         मानलौं, जे अहाँक समान तेज अछि‍ मुदा सभकेँ ने अपन-अपन कारोवार अछि‍। पद आ प्रति‍ष्‍ठाक लोभ ककरा नै छै। जे ब्रान्‍च जते लाभ बैंककेँ देखाओत ओते ने ओइ स्‍टापकेँ आगू बढ़ैक अवसर भेटतै। शि‍वशंकर-        हँ, से तँ मानै छी। मुदा हमर ओहन कम्‍पनी अछि‍ जे देशे नै वि‍देशोमे सप्‍लाइ दैत अछि‍। दू-साल बीतैत-बीतैत घटि‍या कम्‍पनी सभकेँ बजारसँ भगा दैत अछि‍। भलहि‍ं नव बजार ठाढ़ भेने शुरूमे कि‍छु कमाए लि‍अए मुदा कते दि‍न। घनश्‍याम-         खाइर, छोड़ू ओइ सभकेँ। मोट गाछक मोट मुसरो होइ छै। मुदा जहि‍ना अहाँ तहि‍ना हम। अपना दुनू गोटेक बीच संबंध केना बनत, तइपर वि‍चार करू। शि‍वशंकर-        (ठहाका मारि‍) आब रास्‍ताक बात भेल ने। अखन ने अहाँ सोचै छी जे एक्के भागक आमदनी अछि‍ मुदा से नै। दुनू भाग अछि‍। घनश्‍याम-        से केना? शि‍वशंकर-        हमहूँ गामेसँ आएल छी। पि‍ताजी कर्मचारी छलाह। जखन लगमे बैसै छलि‍यनि‍ तखन जमीन-जत्‍थाक खेरहा करै छलाह। घनश्‍याम-         (मुस्‍की दैत) की कहै छलाह? शि‍वशंकर-        (हँसैत) कहै छलाह जे जखन जमीन्‍दारी चार्ज सरकार लेलक तखन हमरा सभकेँ अगहन आबि‍ गेल। खेत-खरि‍हानसँ लऽ कऽ आँगनि‍-कोठी धरि‍ धाने-धान। घनश्‍याम-         नै बुझलौं? शि‍वशंकर-        गाममे कत्ते कि‍सान छथि‍ जि‍नका जमीनक सही-सलामत सबूत छन्‍हि‍। एक तँ पहि‍नहि‍सँ जाल-फरेबी, तइपर बाढ़ि‍ घर-दुआरक संग कागजो पत्तर ने लऽ जाइ छलै। घनश्‍याम-         (मुस्‍कुराइत) हँ, से तँ अछि‍। शि‍वशंकर-        सरकारक सुवि‍धा तँ बैंके माध्‍यमसँ ने हएत। असल कार्यालय तँ बैंक हएत। जे कि‍छु ि‍कसानकेँ भेटत ओइले तँ बैंकेमे ने बौण्‍ड बनबए पड़त। बौण्‍डक लेल तँ ताजा सबूत (करेंट कागजात) चाही। ई तँ अहीं हाथक भेल। घनश्‍याम-         (हँसैत) एक प्रति‍शत कम कऽ देब। शि‍वशंकर-        बड़बढ़ि‍याँ। कारोबारक गप भइये गेल। चलै छी। घनश्‍याम-         ओहि‍ना जाएब उचि‍त हएत। हम सभ मि‍थि‍लांचलक ने छी। अति‍थि‍केँ देवता बुझैत छी। कि‍छु रस-पानी केने बि‍ना........? शि‍वशंकर-        आब कि‍ ओ जुग रहल जे सुरा-सुन्‍दरीसँ अति‍थि‍क सेवा होइत छल। हम सभ तँ तेहेन जुगमे आबि‍ गेलौं जे ने खाइक ठेकान आ ने आराम करैक। घनश्‍याम-         (नोकरकेँ सोर पाड़ि‍) बहादुर, बहादुर? (पहाड़ी नौकरक प्रवेश) आँखि‍क इशारा घनश्‍याम देलनि‍। भीतर जा दूटा गि‍लास आ सनतोला रंगक शीशी नेने आबि‍ टेबुलपर रखि‍ चलि‍ जाइत। शीशी खोलि‍ दुनू गि‍लासमे लऽ गोटे पीलनि‍।) शि‍वशंकर-        आब आदेश होइ। (कहि‍ उठि‍ कऽ ठाढ़ होइत। घनश्‍यामो ठाढ़ होइत तखने कर्मदेवक प्रवेश। अबि‍ते कर्मदेव पएर छुबैत) घनश्‍याम-         बौआ, हि‍नका वि‍दा कऽ दै छि‍यनि‍। नि‍चेनसँ गप-सप्‍प करब। कर्मदेव-          हँ, हँ, कक्का। हमहूँ कि‍छु वि‍चारे करए एलौंहेँ। (हाथमे हाथ मि‍ला धनश्‍याम सड़क तक अबैत छथि‍। घुरि‍ कऽ आबि‍) घनश्‍याम-         आब कहह बौआ, गाम घरक हाल-चाल। मुदा पहि‍ने कपड़ा खोलि‍ फ्रेश भऽ चाह पीब लाए। तखन नि‍चेनसँ गप-सप्‍प हेतै। (चाह अबैत। कमदेवक हाथमे कप धड़बैत घनश्‍याम अपन चाह आपस करैत।) कर्मदेव-          अहाँ कि‍अए चाह घुमा देलि‍ऐ? घनश्‍याम-         देखबे केलहक। चाह पीबैत-पीबैत पेट भरि‍या गेल अछि‍। खाली शीशी आ गि‍लास देख...।) कर्मदेव-          (मुस्‍की दैत) कक्का, की कुशल गामक रहत। एक तँ अोहि‍ना सभतरहेँ खाधि‍मे खसल छी तइपरसँ तेहेन रौदी भऽ गेल जे परान बँचब लोकक कठि‍न भऽ गेल अछि‍। घनश्‍याम-         जे बात कहलह ओ नान्‍हि‍टा नै अछि‍। मुदा बि‍ना केनौं तँ नहि‍ये कल्‍याण हएत। भने छुट्टीक दि‍न रहने मनो हल्‍लुक अछि‍। मुदा तैयो एक दि‍नमे सभ बात कहलाे नै जा सकैए। ओना तू पढ़ल-लि‍खल नवयुवक छह तँए कम्‍मो कहने बेसी बुझबहक। कर्मनाथ-         अहाँ सभकेँ व्‍यवहारि‍क ज्ञान अछि‍ काका। हम तँ हालेमे कॉलेज छोड़लौंहेँ। गामक लेल तँ सोलहो आना अनाड़ि‍ये छी। घनश्‍याम-         गाम तँ तेहेन भऽ गेल अछि‍ जे दू-चारि‍ गोटे, एकठाम बैस अपन सुख-दुख नि‍वारणक गप करब, सेहो ने अछि‍। सभ अपने ताले बेताल। कि‍यो अपनाकेँ कम बुझैले तैयारे नै होइत अछि‍। सबहक मन घेराएल अछि‍ जे हमरासँ बुद्धि‍यार दोसर के अछि‍? कर्मदेव-          एना कि‍अए अछि‍? घनश्याम-         अखन धरि‍क जे बेबस्‍था रहल ओ संस्‍कारे बि‍गाड़ि‍ देने अछि‍। मुदा अखन ऐ बातकेँ छोड़ह। अखन जे दुरकाल उपस्‍थि‍त भऽ गेल अछि‍ ओइपर गप करह। कर्मदेव-          हँ, सएह बढ़ि‍याँ। घनश्‍याम-         अखन दुइये गोटे छी। तहूमे भने डेरेमे छी। तँए अखन दुइये परि‍वारक गप करह। देखते छह जे गाममे सभसँ बेसी खेत अछि‍। बाबाक अमलदारीमे एकटा मुनहर आ तीनटा बखारीक संग हाथि‍यो छलनि‍। तखन नोकरी करैक जरूरत हमरा कि‍अए भेल? कर्मदेव-          (कि‍छु सोचैत) कि‍अए भेल? घनश्‍याम-         यएह सोचै आ बुझैक बात छी। हमरा सम्‍पत्ति‍ छलए, घरसँ बाहर जा पढ़लौं। मुदा जेकरा खाइयोक उपाए नै छै ओकर बाल-बच्‍चा स्‍कूल आँखि‍ देखत? खि‍स्‍सा तँ सभ कहतह जे बहि‍न रहि‍तो लछमी-सरस्‍वतीक बास एकठाम नै होइत छन्‍हि‍। कर्मदेव-          (जि‍ज्ञासा करैत) छातीपर हाथ रखि‍ कहै छी जे ने अपने मनमे अखन धरि‍ ई बात उठल आ ने कि‍यो कहलनि‍। घनश्‍याम-         ई तँ मात्र पढ़ै-लि‍खैक बात कहलि‍यह। पढ़नाइ-लि‍खनाइसँ जरूरी अछि‍ खेनाइ, रहनाइ आ बर-बेगारीसँ बचैक उपाए। आँखि‍ उठा अपने देखह जे कि‍ अछि‍? कर्मदेव-          (आँखि‍ उठा उपर-नि‍च्‍चा देख) ठीके कहै छी काका। मुदा हएत केना? अहाँ सभ सन बुझि‍नि‍हार गामे छोड़ि‍ देने छी तखन अबूझ केना सबूझ बनत। जाधरि‍ बुझबे ने करत ताधरि‍ आगू डेग केना उठाओत? घनश्‍याम-         यएह बात बुझैक जरूरत अछि‍। कर्मदेव-          जाधरि‍ बुझत नै ताधरि‍ ओहि‍ना पाछु मुँहे गुड़कैत जाएत। घनश्‍याम-         (दुनू हाथसँ दुनू आँखि‍ मलैत) बौआ, सच पुछह तँ अपना सभ स्‍वतंत्र देशक गुलाम छी। कि‍सानक देश पूँजीपति‍सँ हारि‍ गेल छी। भलहि‍ं एकरा पछुअाएब कहि‍ अपन प्रति‍ष्‍ठा बचा ली मुदा शासनसँ बाहर छी। कर्मदेव-          सरि‍या कऽ कहि‍यौ कक्का। नीक नहाँति‍ नै बुझलौं। घनश्‍याम-         सत बात बजैमे कनि‍यो धड़ी-धोखा नै होइए। जइ परि‍वारक सम्‍पत्ति‍सँ चालि‍स-पचास परि‍वार चलै छल तइ परि‍वारकेँ नोकरी करए पड़ै, कते लाजि‍मी छी। मुदा.....? कर्मदेव-          काका, अहाँ लगसँ चाइक मन नै होइए। मुदा काजक भार बैइसै ने दि‍अए चाहैए। कि‍एक तँ एक नि‍श्चि‍त सीमामे काजक सम्‍पादन नै भेने, गड़बड़ाइये जाएत। अखन समाजक काजमे बन्‍हाएल छी। नि‍चेनमे दोसर दि‍न आरो बुझब। घनश्‍याम-         हँ, हँ। से तँ ठीके कहै छह। मुदा आइ बुझि‍ पड़ि‍ रहल अछि‍ जे एकटा संगी भेटल, जे पेटक बात पेटमे लि‍अए चाहैए। कोन चीजक कमी अछि‍। कर्मदेव-          से तँ नहि‍ये अछि‍। घनश्‍याम-         ओना लोकक बुद्धि‍ वि‍पत्ति‍क मारि‍सँ घटैत-घटैत एते घटि‍ गेल अछि‍ जे समयक संग पकड़ि‍ नै पबैत अछि‍। खाइर छोड़ह। काजक बात कहह? कर्मदेव-          गामक दशा बदसँ बदतर भऽ गेल अछि‍। माल-जाल उपैट रहल अछि‍। लोक भागि‍ रहल अछि‍। चलन्‍त सम्‍पत्ति‍ (खेत) पाछु मुँहे ससरि‍ रहल अछि‍। यएह सभ देख समाज वि‍चार केलनि‍ जे अगि‍ला रवि‍केँ सभ मि‍ल बैसार करी जइमे गामक कल्‍याणक बाट ताकी। घनश्‍याम-         (अध हँसी हँसि‍) हृदए गामक संग अछि‍। तँए जते संभव हएत ओते समाजक सहयोग करब। कर्मदेव-          जखने अहाँ सभ तैयार हेबै तखने समाजक कल्‍याण नि‍श्चि‍त हएत। आब जाइ छी। घनश्‍याम-         तोरा जइ चीजक जरूरत हुअ, आन नै बुझि‍हह। बड़बढ़ि‍याँ जाह। पटाक्षेप। अाठम दृश्‍य (इंजीनि‍यर मनमोहनक डेरा। दोसरि‍ साँझ। मनमोहन आ संतोष गप-सप्‍प करैत) मनमोहन-         बाउ, पहि‍ल ज्‍वानि‍ंग छि‍अह, तँए पहि‍ने घोसि‍या जाह। पछाति‍ बदलीक जोगार लगा देबह। संतोष-          बाबू, भलहि‍ं अहाँ सभ दि‍न शहरमे रहलौं मुदा गाम गाम छी। मनमोहन-         से की? संतोष-          डेरासँ ऑफि‍स आ आॅफि‍ससँ डेरा करैत रहलौं, ऑफि‍समे बैस घरसँ सड़क धरि‍क नक्‍शा कागजपर बनबैत रहलौं जइसँ काजक दायरा सि‍कुड़ गेल। मुदा हम तँ चारि‍ बर्खमे माटि‍ये-पानि‍क गुण-अवगुन बुझलौं। अपार धन माटि‍-पानि‍मे छि‍पल अछि‍। मनमोहन-         से केना? संतोष-          अपना ऐठामक जे माटि‍-पानि‍ आ मौसम अछि,‍ ओ दुनि‍याँमे कतौ ने अछि‍। नान्‍हि‍टा देश जापान, जे ऐशि‍ये महादेशमे अछि‍, देखि‍यौ ओकरा। मनमोहन-         की अछि‍, केहेन अछि‍। संतोष-          ओना ओकर आन बात तँ नै पढ़लौंहेँ। मुदा ओकर भौगौि‍लक बनाबटि‍ आ उन्नति‍ जरूर पढ़लौंहेँ। अपना देशक (अखुनका, पहि‍लुका एक राज्‍य) दूटा राज्‍यक बराबरि‍ ओकर लम्‍बाइओ-चौड़ाइ छै आ जनसंख्‍यो छै। मुदा दुनि‍याँक अगुआएल देश अछि‍। मनमोहन-         एतबे टा अछि‍? संतोष-          एतबेटा कि‍अए कहै छि‍ऐ। ओहूमे दुनि‍याँक सभ देशसँ बेसी भूमकमो होइ छै। मनमोहन-         भूमकम कि‍अए होइ छै? संतोष-          ओइठाम ज्‍वालामुखी बेसी अछि‍। खाइर, ऐ बातकेँ छोड़ू। छोट देश आ कम आबादी रहि‍तो ओ ओते अगुआ कि‍अए गेल अछि‍। मनमोहन-         कि‍अए अगुआएल अछि‍? संतोष-          जहि‍ना ओकर खेती अगुआएल अछि‍ तहि‍ना कल-कारखाना। दुनि‍याँक बाजारमे ओकर माल पटने अछि‍। तहि‍ना खेति‍ओक छै। जते उपज (रकबा हि‍साबे) ओकरा होइ छै आते ककरा होइ छै। मनमोहन-         केना एते उन्नति‍ खेती केलक? संतोष-          ओइसँ बेसी अपनो सभ कऽ सकै छी। मुदा ऐठाम सभसँ पैघ कारण अछि‍ जे साठि‍ बर्ख आजादीक उपरान्‍तो ऐठामक लोक गुलामीक जि‍नगी जीब रहल अछि‍। स्‍वतंत्र नागरि‍कक संस्‍कार आ गुलामीक संस्‍कारमे अकास-पातालक अन्‍तर होइ छै। ओना अपनो देश उद्योग-धंधामे जते अगुआएल अछि‍ ओते खेती-पथारीमे नै अछि‍। जे भारी खाधि‍ दुनूक बीच बनल अछि‍। मनमोहन-         एहेन बात अछि‍? संतोष-          अपने बात लि‍अ। अखनो गाममे खेतबला परि‍वार अपन अछि‍। मुदा खेती करै छी? सभटा बटाइ लगौने छी। बटेदारो सभ तेहेन अछि‍ जे ने आेकरा खेत जोतैक उचि‍त साधन छै आ ने खेती करैक आन साधन। सोलहो आना मौनसूनपर ि‍नर्भर रहैत अछि‍। एक तँ साधन नै दोसर करैक ऊहि‍यो ओहन नै जइसँ दुनि‍याँक खेतीक बराबरीमे आैत। मनमोहन-         ओते मत्‍था-पच्‍ची करैक कोन जरूरी छह। खाइत-पीबैत रामलला। जहुना जि‍नगी चलै छह तहुना जे नि‍माहि‍ लेबह, ओहो कम भेल। संतोष-          नै बाबू, जि‍नगीक सार्थकता होइत अपनासँ आगू बढ़ि‍ करैक। सरकारोक आँखि‍ गाम दि‍स उठलहेँ, तँए ओकर उपयोग हेबाक चाही। जहि‍ना बाबा अमलदारीमे बखारीक शोभा छल तहि‍ना फेर हएत? मनमोहन-         अखन जते असानीसँ शहरक लोक जीबैत अछि‍ ओते गाममे थोड़े हएत? संतोष-          ओइसँ बेसी हएत। हँ अखन नै अछि‍। मुदा केना हएत ई तँ गामेक लोककेँ सोचए पड़तै। अपने बात लि‍अ, हजार-बजारक नोकरी खुसीसँ करै छी मुदा ई बुझै छि‍ऐ जे जँ अपन खेतकेँ समुचि‍त सुवि‍धा बना कएल जाएत तँ करोड़ोक आमदनी हएत? मनमोहन-         हमरो नोकरी लगि‍चाइले अछि‍, संगे शरीरो एते भरि‍आ गेल अछि‍ जे कि‍छु करै जोकर नहि‍ये रहलौं। एहना स्‍थि‍ति‍मे केना जीब? संतोष-          केना की जीब? जहि‍ना गाम छोड़ि‍ नोकरी करए शरहल गेलौं तहि‍ना शहर छोड़ि‍ गाम चलब। हमहूँ ओतबे दि‍न नोकरी करब जाबे तक अपन समुचि‍त खेतीक रूप नै पकड़ि‍ लेत। अहाँ नै देखै छि‍ऐ जे पँच-पँच-सत-सत सए रूपैये कि‍लो अन्नक बीआ, आन-आन देशबला बेचैए। कनी गौर कऽ कऽ देखि‍यौ जे कि‍लो भरि‍ अन्नक दाम कते अछि‍। मनमोहन-         की हम अपने ओहन बीआ तैयार नै कऽ सकै छी। जरूर कऽ सकै छी। तहि‍ना नीक बना पशुपालन, नीक कि‍स्‍म बना माछ आ आरो कते कहब। हाथसँ करैक हि‍म्‍मत आ माथसँ सोचैक शक्‍ति‍क जरूरत अछि‍। (कर्मदेवक प्रवेश) मनमोहन-         आ-हा-हा, बाउ कर्मदेव? कर्मदेव-          (दुनू हाथ छातीपर रखि‍) प्रणाम, चाचाजी। मनमोहन-         बाउ (संतोष) लोटामे पानि‍ नेने आबह। बाटक झमाड़ल छथि‍। तेकरा बाद चाह-पान चलतै। (संतोष भीतर जाइत अछि‍ आ लोटामे पानि‍ आनि‍, कर्मदेवक आगूमे ठाढ़ भऽ) संतोष-          होउ, पहि‍ने पएर धोउ? कर्मदेव-          अच्‍छा पछाति‍ धो लेब। कोनो कि‍ पएरे चललौंहेँ। सड़कपर सवारीसँ उतड़लौंहेँ। मनमोहन-         चाह नेने आबह। (संतोष भीतर जाइत अछि‍।) आकि‍ पहि‍ने कि‍छु खेबह? कर्मदेव-          नै, अखैन कि‍छु ने खाएब। मन गदगड़ल अछि‍। चाह पीब लेब। (दू कप चाह नेने संतोष अबैत अछि‍।) मनमोहन-         (चाहक चुस्‍की लैत) अब कहह गामक हाल-चाह? कर्मदेव-          गामक हाल-चाह की कहब चच्‍चाजी। नरकंकाल जकाँ गामक हाड़ झक-झक करैए। (कर्मदेवक बात सुनि‍ मनमोहन बेउत्तर होइत मुँहपर हाथ लऽ मूड़ी झुका कऽ सोचए लगै छथि‍। बीचमे ठाढ़ संतोष कखनो पि‍ता दि‍स देखैत तँ कखनो कर्मदेव दि‍स। मुदा कि‍छु बजैत नै। दुनू गोटेकेँ चुप देख।) संतोष-          हम जेठ छी की कर्मदेव, बाबूजी? मनमोहन-         कर्मदेवक तँ नै बुझल अछि‍ मुदा तोहर एक्कैसम लगि‍चाएल छह। कर्मदेव-          हमरो एक्कैसम चलि‍ रहल अछि‍। मनमोहन-         तखन तँ कि‍छुए मासक कम-बेसी हेतह। एक बतरि‍ये भेलह। कर्मदेव-          चाचाजी, जौआँ बच्‍चाक अंतर पाँचे-दि‍स मि‍नट होइ छै मुदा ओहूमे जेठाइ-छोटाइ होइ छै? मनमोहन-         हँ, से तँ होइ छै। मुदा ई तँ सर्टिफि‍केटसँ फरि‍एतह। कर्मदेव-          ओहूसँ नीक जकाँ (इमानदरीसँ) नहि‍ये फड़ि‍आएत? कि‍एक तँ अहाँ घरमे भलहि‍ं जन्‍म टि‍प्‍पणि‍ हुअए मुदा हमरा घरमे नहि‍ये अछि‍। टि‍प्‍पणि‍ देख स्‍कूलमे नाओं लि‍खौने होय, मुदा हमर तँ अनठेकानी लि‍खाएल अछि‍। मनमोहन-         भैयारी बनब पेंचगर छह। दुनू गाेरे दोस्‍ती कऽ लाए। संतोषोक वि‍चार गामेमे रहैक छै आ तहूँ गामेमे रहै छह। कर्मदेव-          (मुस्‍की दैत) चाचाजी, अहाँ तँ अमृत फल खुआ देलौं। मि‍त्र तँ नरकोसँ उद्धार करैत अछि‍। (तीनू गोटेक ठहाका) हम केमहर एलौं से तँ पुछबे ने केलौं? मनमोहन-         गामसँ हटि‍ भलहि‍ं रहै छी, तँए कि‍ समाजक सभ कि‍छु छोड़ि‍ देलौं। दुआरपर आएल अति‍थि‍केँ पुछल जाइ छै जे केमहर एलौं? अति‍थि‍येक सेवा तँ धर्मखातामे लि‍खाइत अछि‍। कर्मदेव-          (मुस्‍की दैत) अपने कहै छी। अखन धड़फड़ीमे छी तँए बेसी गप-सप्‍पमे समए नै दऽ सकब। जते समए गमाएब तते काज पछुआएत। (मनमोहन आ संतोषो सुनैक इच्‍छासँ कर्मदेव दि‍स तकए लगैत।) रवि‍ दि‍न सामाजि‍क बैसार छी, सएह कहए एलौं। मनमोहन-         कनी फरि‍छा कऽ बाजह? कर्मदेव-          गामक मूल पूँजी (उत्‍पादि‍त) खेत छी। खेतेक उपजापर गामक लोक ठाढ़ भऽ जि‍नगी चलबैत अछि‍। समाज तँ बनि‍ गेल मुदा सामाजि‍क पूँजी नै बनि‍ सकल। जइसँ एते भारी खाधि‍ (दूरी) दुनूक बीच बनि‍ गेल जे अछैते पूँजि‍ये लोक पूँजी विहीन भऽ गेल अछि‍। अही सबहक विचारक लेल बैसार भऽ रहल अछि‍। मनमोहन-         (मूड़ी डोलबैत) उद्देश्‍य तँ जवरदस अछि‍, मुदा......? कर्मदेव-          मुदा की। ऐ धरतीपर सभसँ अगुआएल मनुष्‍य अछि, तखन? संतोष-          कर्मदेव भाय, अहूँ हालेमे काओलेज छोड़लौंहेँ आ हमहूँ हालेमे। व्‍यवहारिक दौरमे दुनू गोरे अनाि‍ड़ये छी। किएक तँ जइ गाममे रहै छी ओ जमीनक एक निि‍श्चत सीमाक अन्‍तर्गत निर्धारित अिछ। जहिना जमीन तहिना बसल लोक। मुदा.....। कर्मदेव-          मुदा की? संतोष-          जमीनकेँ जाल कहल जाइ छै। जाल फँसबैक वस्‍तु छी। जहि‍ना मछवार जाल फेक माछ फँसबैत, शि‍कारी शि‍कार फँसबैत, तेहने शि‍कारी सभ जमीनक जाल फेक जमीनकेँ फँसा नेने अछि‍, तँ........? (आँखि‍ वि‍थाड़ि‍ मनमोहन संतोषपर देने। तहि‍ना कर्मदेव सेहो संतोषक आँखि‍पर आँखि‍ अटकौने।) कर्मदेव-          तँए की? संतोष-          छोटका जालमे छोट माछ आ‍ छोट शि‍कार फँसैत मुदा जेना-जेना जाल नमहर होइत तेना-तेना नमहर माछो आ शि‍कारो फँसैए। जखन कि‍ महजालमे छोट-पैघ सभ फँसैए। तहि‍ना अखन सम्‍पत्ति‍क दौड़मे वि‍श्व-जाल पसरल अछि‍। कर्मदेव-          नीक जकाँ हमरो नै बुझल अछि‍। मुदा इशारा रूपमे ओइ दि‍न सुनलौं जइ दि‍न कओलेज दीक्षाक सटि‍फि‍केट समारोहमे शि‍क्षक लोकनि‍ वि‍दा केलनि‍। कर्मदेव-          दीक्षाक अर्थ? संतोष-          सेहो ओही दि‍न बुझलौं। कान फूकि‍ दीक्षा मंत्र देनि‍हार जेरक-जेर घुमैत अछि‍। मुदा दीक्षाक अर्थ होइत प्राप्‍ति‍। अहाँ कओलेजसँ नि‍कलैक सर्टिफि‍केट नै लेलौंहेँ? कर्मदेव-          हँ, ऑफि‍ससँ तँ जरूर भेटल मुदा दीक्षान्‍त समारोह कऽ कऽ नै। संतोष-          कि‍अए? कर्मदेव-          नीक जकाँ तँ नै बुझल अछि‍ मुदा दस-पनरह बर्खसँ कहाँ दीक्षान्‍त समारोह भेलहेँ। संतोष-          साले-साल हेबाक चाहि‍येक। कर्मदेव-          भने भाय अहूँ गामेमे रहि‍ मोटर साइकिलसँ आॅफि‍सो करब आ गामोक काज देखब। संतोष-          बेसी समए गामेक काजमे लागत। कर्मदेव-          बहुत बढ़ि‍या, बहुत बढ़ि‍या। पटाक्षेप नवम दृश्‍य (डॉ. रघुनाथक घर। ओसारक कुरसीपर बैसल, माथपर हाथ दऽ आँखि‍ मूनि‍ सोचैत। चाह नेने पत्नी अनुराधा अबैत।) अनुराधा-         आँखि‍ लगल अछि‍। चाह पीबू। रघुनाथ-         आँखि‍ कि‍ लागत कपार। अनेरे आँखि‍ बन्न भऽ रहल अछि‍। अनुराधा-         अपने डॉक्‍टर छी तखन......? रघुनाथ-         अपने डाॅक्‍टर छी तकर माने.......? अनुराधा-         तखन कि‍अए रोग......? रघुनाथ-         रोगक सीमा-नाङरि‍ अछि‍। मनुक्‍खे जकाँ बि‍ना सींघ-नाङरि‍क जानवर जकाँ अछि‍। देहक रोगक डॉक्‍टर ने छी, मनक रोगक थोड़े छी। अनुराधा-         से की? रघुनाथ-         कोनो कि‍ देहेटा मे रोग होइए। मुदा मनोक तँ देहे जकाँ ने सभ कि‍छु छै। अनुराधा-         तखन तँ आरो नीके कि‍ने। जहि‍ना थर्मामीटरसँ बोखार परखल जाइ छै, तहि‍ना ने मनोक बोखार परखैक यंत्र हेतइ। तइसँ नापि‍ दवाइ खा लि‍अ। रघुनाथ-         वि‍धाता ऐठाम जखन बुइधि‍क बँटवारा हुअए लगल तखन सभकेँ चम्‍मछ लऽ लऽ देलखि‍न आ अहाँ बेरमे बरतने उझैल देलनि‍। अनुराधा-         एना बताह जकाँ कि‍अए बजै छी? जखन मन गड़बर भऽ गेल तखन ओकर प्रति‍कार करब। हमहूँ सहयोगी छी, सहयोग करब आकि‍ सभकेँ भगा अपने पगलखन्नाक हरीमे ठोकाएब। मन थीर करू। चाह पीबू सि‍गरेट नेने अबै छी। (अनुराधा भीतर जाइत। रघुनाथ एक-एक चुस्‍की चाह पीबैत आ कखनो अकास दि‍स तँ कखनो नि‍च्‍चा दि‍स तकैत।) रघुनाथ-         (बड़बड़ाइत) भूमकम भेलापर उनटनो होइत। जहि‍ना अकासक गाछ-जमीनपर खसैत तहि‍ना ने जमीनो अकास दि‍स चढ़ैत। मुदा पाबस तँ अकासक अमृतसँ सीचैत। (रघुनाथकेँ बड़बराइत देख अनुराधा मुहथरि‍पर ठाढ़ भऽ सुनए लगली।) आ-हा-हा कि‍ सुन्‍दरता पाबसोक होइत। करोड़ो-अरबो जीब जन्‍तुकेँ सृजनो करैत, अमृतेसँ स्‍नानो करबैत, पीबोक लेल दैत आ दुनूक (अकास-जमीन) बीच अमृतेक बाटो बनबैत। अनुराधा-         (मने-मन उदास भऽ) भरि‍सक बुद्धि‍क बीमारी पकड़ि‍ लेलकनि‍। (आगू बढ़ैत) लि‍अ सि‍गरेट-सलाइ नेने एलौं। चाहो तँ नहि‍ये पीलौंहेँ? रघुनाथ-         हमरे नै सुझैए आकि‍........। मन भरि‍ गेल अहाँ कहै छी चाहो ने पीलौं। (रघुनाथक मुँहक सुरखी उदास होइत जाइत) अनुराघा-         मुँहक सुरखी बदलि‍ रहल अछि‍? रघुनाथ-         लाउ, सि‍गरेट पीब तखन चुहचुही आओत। की भकुआएल जकाँ बुझि‍ पड़ै छी? (सलाइ खरड़ि‍ सि‍गरेट धड़ा कस खींच उपर मुँहे धुआँ फेकैत।) देखि‍औ धुँआ केना उपर मुँहे जाइए। अनुराधा-         ओछाइन ओछा दै छी। आराम करू। रघुनाथ-         कहलौं तँ वि‍धाता बुइधि‍क बरतने अहाँ आगूमे उझैल देलनि‍। जागलमे जइ रोगकेँ भगाओल (इलाज) नै हएत सुतलमे केना हएत? अनुराधा-         कि‍ सभ होइए? रघुनाथ-         बैसू, कहै छी। ब्रज कन्‍या तँ अहींटा छी तँए अपन दि‍लक-दुख अहाँकेँ नै कहब तँ दोसराकेँ कहने कि‍ हएत? अनुराधा-         (मुस्‍की दैत) से की, से की? रघुनाथ-         अहाँ जे भकुआएल बुझै छी से ठीके बुझै छी। मुदा नीनक भक्क नै जि‍नगीक रास्‍ताक भक्क लागल अछि‍! कि‍महर जाए‍ब से चौरासापर बुझि‍ये नै पबै छी। अनुराधा-         बीचमे ठाढ़ भऽ कऽ देखि‍यौ जे कोन बाटक दुभि‍ (खढ़-पात) पएरक रगड़सँ उड़ि‍ गेल छै आ कोन दुभि‍याह अछि‍। रघुनाथ-         कहलौं तँ बेस बात, मुदा भकुआएल मने दुखबो करि‍ऐ तखन ने। आन्‍हरे जकाँ सभ अन्‍हारे बुझि‍ पड़ैए। (दुनू आँखि‍ दुनू हाथसँ मलैत) कि‍ सपना छल आ की देख रहल छी। अनुराधा-         से की? से की? रघुनाथ-         सभ कि‍छु समाप्‍त भऽ रहल अछि‍। आकि‍ जि‍नगि‍ये समाप्‍त भऽ रहल अछि‍ से बुझि‍ये ने पाबि‍ रहल छी। अनुराधा-         से की? रघुनाथ-         परसु रि‍टायर करब। अनुराधा-         सभ रि‍टायर करैत अछि‍ आकि‍ अहींटा करब? रघुनाथ-         खाली नोकरि‍येटा सँ नै ने रि‍टायर करब। देहोक रोग (ब्‍लड प्रेशरो) कि‍छु बढ़ि‍ गेल अछि‍ जइसँ रोगी सबहक शि‍काइत आबि‍ रहल अछि‍। अनुराधा-         से तँ आब उमेरो भेल कि‍ने? रघुनाथ-         उमेरक असर शरीरपर पड़ै छै आकि‍ ब्रेनपर। आमक आठी जकाँ कोइलीसँ पकुआ बनत आकि‍ पकुआसँ कोइली। अनुराधा-         तखन कि‍अए एना भेल? रघुनाथ-         ब्रेने छि‍ड़ि‍या गेल। एकरा केना समटब। अनुराधा-         आबो समटू। रघुनाथ-         छि‍ड़ि‍आएल बौस बीछ-बीछि‍ समटल जा सकैए। छि‍ड़ि‍आएल मन केना समटल जाएत? पाछु उनटि‍ तकै छी तँ कतौ गड़बड़ नै देखै छी। मुदा आगू तकै छी तँ नोकरीक संग प्राइवेट कमाइयोकेँ जाइत देखै छी। अनुराधा-         से केना? रघुनाथ-         चढ़त छल तखन मकान बनेलौं, क्‍लीनि‍क बनेलौं। रेस्‍ट-हाउसक संग जाँच-पड़ताल करैक यंत्र कीनलौं। मुदा आइ की देखै छी? अनुराधा-         की नै देखै छी, कोन चीजक कमी अछि‍? रघुनाथ-         अपने मुइने जग मुअए। जइठीन रोगीक भीड़ लागल रहै छलए तइठीन गोटि‍-पङरा आबि‍ रहल अछि‍। तहि‍ना रेस्‍ट-हाउस ढन-ढन करैए। सप्‍ताहक-सप्‍ताह जाँच मशीन बैसले रहैए। अपनो दरमाहा अधि‍याइये जाएत। मुदा खर्च.......? अनुराधा-         एना कि‍अए भेल? रघुनाथ-         समए कते आगू बढ़ि‍ गेल, से नै देखै छी। सभ चीज पुरान पड़ि‍ गेल। अनुराधा-         ऐ सभ दि‍स नजरि‍ नै गेल छल? रघुनाथ-         नजरि‍ कोना जाएत। नजरि‍ तँ शान्‍तचि‍त्तमे टहलैत अछि‍। से कहि‍यो कहाँ भेल। दि‍न-राि‍त एकबट्ट कऽ काजमे लागल रहलौं। जि‍नगीक वि‍षयमे सोचैक पलखति‍ये कहि‍या भेल। अनुराधा-         चि‍न्‍तो केने तँ नहि‍ये हएत। रघुनाथ-         से तँ नहि‍ये हएत। मुदा अनहरि‍या राति‍ जकाँ अन्‍हार तँ बढ़ले जाइए। (कर्मदेवक प्रवेश।) कर्मदेव-          (दुनू हाथ जोड़ि‍) गोड़ लगै छी चच्‍चाजी। (अनुराधाक पएर छुबि)‍ गोड़ लगै छी चाचीजी। रघुनाथ-         गाम-घरक हाल-चाल कहह? कर्मदेव-          गाम-घरक कि‍ हाल-चाल रहत। रद्दी कागज जकाँ गामोक दशा भऽ गेल अछि‍। पैछला साल तँ कनी-मनी नीको छल जे ऐ बेरक रौदी तँ उजाड़ि‍ लगा देलक। रघुनाथ-         बौआ, अपनो दशा ओहने भऽ गेल। मुदा कहबो ककरा करबै। अपन हारल बजि‍तो लाज होइए। मुदा.......? कर्मदेव-          मुदा की? रघुनाथ-         यएह जे गामक समाजमे अखनो बेर-बि‍पत्ति‍ पड़लापर एक-दोसरकेँ सहारा दैत। मुदा बजारक समाज तँ ठीक उल्‍टा अछि‍। सभ अपने ताले-बेताल अछि‍। ककरा एते छुट्टी छै जे अनको हाल-चाल पूछत। कर्मदेव-          चाचाजी, अखन हमहूँ औगताइले छी। कहि‍यो नि‍चेनसँ गप-सप्प करब। अखन जइ काजे एलौं से गप करू। रघुनाथ-         केहेन काजे धड़फराएल छह? कर्मदेव-          गामक दशा देख समाजक (गौआँक) वि‍चार भेलनि‍हेँ जे जेहो सभ बाहर नोकरी-चाकरी करै छथि‍ हुनको सभकेँ बजा समाजक कल्‍याण केना हएत? तइले एकठाम बैस रास्‍ता नि‍काली। सएह कहए एलौंहेँ। रघुनाथ-         छाँहो-छुहो तँ कि‍छु कहह? कर्मदेव-          चाचाजी, गाममे जे छथि‍ हुनका दूधक डाढ़ी जकाँ अपन खेत छन्‍हि‍। जखन कि‍ जे बाहर रहै छथि‍, बेसी जमीन हुनके सबहक छन्‍हि‍। तइले बैसार भऽ रहल अछि‍। रघुनाथ-         वि‍चार तँ बड़ दि‍व्‍य अछि‍, मुदा........? कर्मदेव-          मुदा की? रघुनाथ-         थाके पॉव पलंग भेल भारी, आब की लादब हौ बेपारी।' सोझे आगूमे देखै छह। धानक खखड़ि‍योसँ बत्तर हालत भऽ गेल अछि‍। जेहो जि‍नगी बाकी (बँचल) अछि‍ ओहो पहाड़ जकाँ बुझि‍ पड़ैए। कर्मदेव-          से कि‍अए, चाचाजी? रघुनाथ-         बौआ, डाॅक्‍टरी छोड़ि‍ आन चीज तँ पढ़लौं नै जइसँ दुनि‍यो-दारीक बात बुझि‍तौं। ऐ अवस्‍थामे आब बुझि‍ पड़ैए जे जि‍नगि‍ये ओझरा गेल। कर्मदेव-          जखने सभ मि‍ल एकठाम वि‍चार करब तखने ने अहूँक ओझरी छुटि‍ जाएत। रघुनाथ-         (कने गुम रहि‍, कि‍छु सोचि‍) बहरबैया सभ रहताह? कर्मदेव-          आश्वासन तँ सभ देलनि‍। तखन तँ........? रघुनाथ-         कहि‍याक समए बनौलनि? कर्मदेव-          समए तँ समाजे बनौने छथि‍। अहाँकेँ जानकारी दि‍अ एलौं। रवि‍ दि‍न दू बजेसँ बैसार छी। रघुनाथ-         बड़बढ़ि‍या। जरूर भाग लेब। परसुए सेवा-नि‍वृत्ति‍ सेहो भऽ रहल छी। कर्मदेव-          परसुए सेवा-नि‍वृत्त भऽ रहल छी? रघुनाथ-         (मि‍ड़मि‍ड़ा कऽ) हँ, बौआ। कर्मदेव-          (मुस्‍की दैत।) चाचाजी, अहीं सन-सन लोकक जरूरत समाजकेँ छै। रघुनाथ-         से की? कर्मनाथ-         ऐठामक काज ने हरा गेल। मुदा गाममे अहाँ सभले ओते काज अछि‍ जे कएले ने पाड़ लागत। रघुनाथ-         (कि‍छु सोचि, मुस्‍कुराइत) बेस कहै छह बौआ। पटाक्षेप दसम दृश्‍य (कृष्‍णदेव, घनश्‍याम, मनमोहन आ रघुनाथ। घनश्‍याम घर। चाह-पान, सि‍गरेट चलैत) घनश्‍याम-         कर्मदेव जे कि‍छु कहलनि‍, तइपर तँ अपनो सभ वि‍चारि‍ लेब। कृष्‍णदेव-         अबस-अबस। घनश्‍याम-         एक तँ बैंकक नोकरी, तहूमे ब्रान्‍चक जबावदेही। भरि‍ दि‍न लोकक चरबाहि‍ करैत-करैत परेशान रहै छी। जइसँ गाम-समाजक कुशलो-क्षेम नै बुझि‍ पबै छी। तँए अपने दि‍शा-ि‍नर्देश दि‍यौ। मनमोहन-         बहुत बढ़ि‍या, बहुत बढ़ि‍या घनश्‍याम भाय बजलाह। कृष्‍णदेव-         कहलौं तँ बड़बढ़ि‍या, मुदा जे चकचकी अहाँ सबहक अछि‍ ओ थोड़े अछि‍। रघुनाथ-         मनक बात अहाँ बुझि‍ गेलौं। कृष्‍णदेव-         अहाँ सभ कागज-पत्रक बीच रहै छी। हम कि‍तावक बीच अन्‍तर एतबे अछि‍। मुदा रहै छी तँ सभ कागजेक बीच। रघुनाथ-         कहलि‍ऐ तँ बड़बढ़ि‍या, मुदा हम सभ सादा कागजक बीच रहै छी अहाँ सजाैल कागजक बीच। कृष्‍णदेव-         सभकेँ अपन-अपन बुझैक दायरा होइ छै, तँए अहूँ सबहक वि‍चारकेँ नकारि‍ नहि‍ये सकब। मुदा कि‍छु छि‍पा कऽ बाजब उचि‍त नै, तँए.......? रघुनाथ-         तँए की? जखने अपन-अपन वि‍चार सभ व्‍यक्‍त करब तखने ने चारि‍ परि‍वारक तीत-मीठ सोझामे औत। जखने तीत-मीठ सोझामे औत तखने ने कि‍छु........? कृष्‍णदेव-         ई बात तँ सभ बुझै छि‍ऐ जे गामक-समाजक- पढ़ल लि‍खक अपने सभ छि‍ऐ। मुदा अपनो सबहक बीच तँ चारि‍ रँगक जि‍नगि‍यो अछि‍। जइठाम अहाँ सभकेँ दरमाहाक संग आनो आमदनी अछि‍ तइठाम हमरा तँ मात्र दरमेहेटा अछि‍। मनमोहन-         (मूड़ी डोलबैत) हँ, ई तँ अछि‍। कृष्‍णदेव-         मुदा परि‍वार तँ जहि‍ना अहाँ सबहक अछि‍ तहि‍ना अछि‍। खेनाइ-पीनाइ, कपड़ा-लत्ता, पढ़ाइ-लि‍खाइ तँ सभकेँ अछि‍। कनी सोचि‍ कऽ देखि‍यौ जे हम अहाँ सभसँ पछुआएल छी कि‍ने। रघुनाथ-         मानै छी। मुदा गामक बैसारमे गामक चर्च हएत कि‍ने। तइ हि‍साबसँ तँ सभ जमीनदारे (अधि‍क जमीनबला, नै कि‍ मालगुजारीबला) छी। गामक बारह आना जमीनक मालि‍क तँ अपने सभ छि‍ऐ कि‍ने। कृष्‍णदेव-         हँ, से तँ छि‍ऐहे। मुदा ओझरि‍यो तँ असान नै अछि‍। जइ तरहक जि‍नगी बनि‍ गेल अछि‍ ओते कमाइ-दरमाहा-सँ पूरा नै पबै छी। अपने गाममे नै रहै छी जे खेति‍यो करब। तइपर सँ जँ एको धुर बेचब तँ प्रति‍ष्‍ठा माटि‍मे मि‍लत। मनमोहन-         तखन? कृष्‍णदेव-         जँ सबुर कऽ छोड़ि‍यो देब सेहो नै हएत। मनमोहन-         ई तँ ि‍वचि‍त्र ओझरीमे फँसि‍ गेल छी? कृष्‍णदेव-         बाल-बच्‍चाकेँ नीक स्‍कूल-कओलेजमे नै पढ़ाएब सेहो नै हएत। कि‍छुए दि‍नक उपरान्‍त रि‍टायर करब तखन औझुका जकाँ दरमहो नै रहत। तीन-तीनटा कन्‍यादान अछि‍। रघुनाथ-         अच्‍छा, गामक बैसार संबंधमे वि‍चार रखि‍यौ। कृष्‍णदेव-         की वि‍चार राखब, कि‍छु फुड़बे ने करैए। घनश्‍याम-         आब अपन वि‍चार दि‍यौ डाॅक्‍टर सहाएब? रघुनाथ-         कृष्‍णदेव बाबूसँ कनि‍यो नीक नै छी। घनश्‍याम-         से कि‍अए? हुनके जकाँ बेतनेटा पर तँ नै छी? रघुनाथ-         बेस कहलौं। दुरसक ढोल सोहनगर लगै छै। मुदा लगमे.......। मनमोहन-         जँ लग तबला हाथ बजौल जाए, तखन.......? रघुनाथ-         बेस कहै छी। तबले जकाँ ढोलोक मुँह छोट आ पॉलि‍स कएल होइए। रि‍टायर भेने पेन्‍शन (अधा दरमाहा) पर आबि‍ गेलौं। जते जाँच-जुच करैक यंत्र कीनने छी ओ पैछला खाढ़ि‍क भऽ गेल। नवका ठाढ़ भऽ गेल। अपन जे इलाजक प्रक्रि‍या छल ओ पछड़ि‍ गेल। मनमोहन-         आगूक कि‍ साचै छि‍ऐ? रघुनाथ-         रोग-रोगी आ इलाज छोड़ि‍ सोचलौं कहि‍या जे आन बात सोचब। मनमोहन-         जीब केना? रघुनाथ-         जे भाेग-पारसमे हएत से थोड़े ि‍कयो बाँटि‍ लेत। जाबे सुखक दि‍न छल सुख केलाैं, दुखक दि‍न औत दुख करब। यएह ने भगवानक लीला छि‍यनि‍। घनश्‍याम-         अपने सभ जे एना सोचबै तखन समाज केना आगू बढ़त? समुद्रक ज्‍वार जकाँ तँ समाजक गति‍ नै छैक। रघुनाथ-         (कने गुम्‍म भऽ, मूड़ी डोलबैत) प्रश्न तँ वि‍चारणीय अछि‍। मुदा आगूक स्‍पष्‍ट रास्‍ता कहाँ देख पबै छी। कनी समए ि‍दअ, पछाति‍ कहब। मनमोहन-         भाय सहाएब, अहाँ अहाँसँ कनि‍यो नीक नै छी। घनश्‍याम-         (मुस्‍कुराइत) से की। से की? मनमोहन-         ओना पाँच बर्ख नोकरी बँचल अछि‍। मुदा जे रूखि‍ देख रहल छी ओइसँ बुझि‍ पड़ैए जे आगूमे बनरफाँस लटकल अछि‍। घनश्‍याम-         से केना? मनमोहन-         अपने इंजीनि‍यर बनि‍ गामसँ शहर एलौं आ बेटा एग्रीकल्‍चर पढ़ि‍ गामेक ब्‍लौकमे जुआइन केलक। घनश्‍याम-         ई तँ बढ़ि‍याँ बात। मनमोहन-         अपने कतऽ रहब। सभ दि‍न शहरमे रहलौं आब गाममे नीक लागत? घनश्‍याम-         शहरेमे रहब। मनमोहन-         कहलौं तँ बड़बढ़ि‍या। अपन बेटा-पुतोहू गाममे रहत। रि‍टायर भेलापर सरकारि‍ये अमि‍ला-फमि‍ला रँगगर कपड़ा पहि‍रा वि‍दा कऽ देत। तखन.......? घनश्‍याम-         तखन की? मनमोहन-         बुढ़ाढ़ीमे एक गि‍लास पानि‍यो के देत। घनश्‍याम-         गामे चलि‍ आएब। मनमोहन-         (मजबूरी हँसी) सभ दि‍न पढ़ल-लि‍खल लोकक बीच प्रति‍ष्‍ठा बना रहि‍ रहल छी। मुदा गामक कोन लूरि‍ अछि‍ जे बुद्धि‍क उपयोग करब। घनश्‍याम-         नै बुझलौं? मनमोहन-         जेकरा जइ काजक लूरि‍ रहल ओ ओहीमे ने बुद्धि‍यार अछि‍। मुदा हम? रघुनाथ-         तीनू गोटेक बात तँ सभ सुनबे केलौं। अहीं (घनश्‍याम) आब वि‍चार ि‍दयौ। घनश्‍याम-         भाय सहाएब, अपने बि‍गड़ि‍ गेलि‍ऐ। रघुनाथ-         बि‍गड़ब कि‍अए। मुदा.......। घनश्‍याम-         मुदा की? रघुनाथ-         बि‍नु बुझल पैघ रोग रहि‍तो जँ रोगीकेँ रोगक जनतब नै दऽ रोगमुक्‍त होइले दवाइ खाइले कहबै तँ हँसी-खुशी खाइए। घनश्‍याम-         हँ से तँ खाइए। मुदा इहो तँ होइ छै जे समुचि‍त ढंगसँ रोगक जनतब दऽ इलाजोक प्रक्रि‍याक जनतब देल जाए तँ आरो खुशीसँ दवाइ खाइए। मनमोहन-         हँ, इहो तँ होइए। घनश्‍याम-         मनमोहन भाय, जहि‍ना रोगक नि‍दान डॉक्‍टर, इंजीनि‍क नि‍दान इंजीनि‍यर करैत छथि‍ तहि‍ना समाज कल्‍याणक नि‍दान समाजशास्‍त्री करै छथि‍। मुदा.......? मनमोहन-         मुदा की? कृष्‍णदेव-         (बि‍चहि‍मे) समाजशास्‍त्री तँ हमहूँ छी। जि‍नगी भरि‍ समाजशास्‍त्रे पढ़लौं। मुदा......। घनश्‍याम-         भाय सहाएब, अपने अधि‍कारी वि‍द्वान छि‍ऐ, तँए........? कृष्‍णदेव-         तँए की? घनश्‍याम-         हम बैंकर नै छी, मुदा बैंकक काज केने समाज आ धनक संबंध थोड़-थाड़ बुझए लगलौं। तँए कृष्‍णदेव भायसँ आग्रह करबनि‍ जे जँ आदेश दथि‍ तँ कि‍छु कहबनि‍। कृष्‍णदेव-         जखन सभ एक प्रश्नपर बैसल छी तखन आदेशक कोन प्रश्न। अखन तँ सभ अपन-अपन सुझि‍क अनुसार सुझाव राखि‍ रहल छी। घनश्‍याम-         अपने तँ कि‍ताबमे लि‍खल पढ़ै छी मुदा कि‍ताबी बात ताधरि‍ ठमकल रहत जाधरि‍ समाजक गति‍क अनुकूल चलैत नै रहत। कृष्‍णदेव-         (साँस छोड़ि‍) हूँ......। घनश्‍याम-         अखन जइ काजे बैसलौं तइपर वि‍चार करू। कोनो काज करैक जेहेन इच्‍छा शक्‍ति‍ लोकमे रहै छै ओ ओते आगू बढ़ि‍ कऽ सकैए। तँ कोनो ऐहेन समस्‍या नै छै जेकर समाधान नै भऽ सकैए। सभ कि‍यो आदेश दी तँ.......? (तीनू गोटे) तीनू गोटे-        (कृष्‍णदेव, रघुनाथ आ मनमोहन) आदेशे-आदेश। खुलि‍ कऽ बाजू। घनश्‍याम-         रघुनाथ भाय छथि‍, शहरमे पछड़ि‍ रहला अछि‍ मुदा गाम तँ ओइ जगहपर ठाढ़ अछि‍ जइ जगहपर रोगक इलाजक लेल अखनो झाड़-फूक आ टोना-टापर होइए। रघुनाथ-         (मुस्‍की दैत) बेस कहलौं। घनश्‍याम-         एहि‍ना सभ समस्‍या अछि‍। जरूरत अछि‍ एक-एक समस्‍यामे एक-एक आदमीकेँ सटाएब। जखने समस्‍यासँ आदमी सटत तखने......। रघुनाथ-         ठीके कहै छी घनश्‍याम। गामक संबंधमे.......? घनश्‍याम-         भाय, एक तँ ओहि‍ना बाढ़ि‍-रौदीक चपेटमे पड़ि‍ गाम अधमरू भऽ गेल अछि‍, तइपर लोकोक कि‍रदानी एहेन रहैए जे आरो गर्तमे ठेल रहल अछि‍। कृष्‍णदेव-         ऐठाम चारि‍ये गोटे छी, तँए सबहक (सौंसे गौआँक) बीचमे बैस जे वि‍चार करब ओ ओते अधि‍क नीक हएत। पटाक्षेप एगारहम दृश्‍य (नसीवलालक दरबज्‍जा। कर्मदेव आ नसीवलाल गप-सप्‍प करैत।) नसीवलाल-       काजक की समाचार अछि‍ बौआ कर्मदेव? कर्मदेव-          तीत-मीठ दुनू अछि‍। नसीवलाल-       (मुस्‍कुराइत) तीत-मीठ दुनू अछि‍। बेसी कोन अछि‍? कर्मदेव-          स्‍पष्‍ट कहाँ बुझि‍ पौलौ। जँ स्‍पष्‍ट रहैत तँ दुनूकेँ मि‍ला कहि‍तौं। नसीवलाल-       ओ मि‍लबो मोसकि‍ल अछि‍। कर्मदेव-          ओ कोना मि‍लत? नसीवलाल-       प्रकृति‍क अद्भुत खेल अछि‍। कि‍छु वस्‍तु एहेन होइए जे अपन सुआद आरो गाढ़ बनबैए। तँ कि‍छु अपने सुआदे बदलि‍ लैत अछि‍। तीतसँ मीठ आ मीठसँ तीत भऽ जाइए। कि‍छु एहनो अछि‍ जे ने तीते अछि‍ आ ने मीठे। दुनूक बीच अछि‍। कर्मदेव-          एहेन पेंचगर स्‍थि‍ति‍मे सोझराएब कठि‍न अछि‍। नसीवलाल-       एहेन कोन दुख अछि‍ जेकर दवाइ नइए। भलहि‍ं ओ दवाइ समझसँ बाहर कि‍अए ने हुअए। कर्मदेव-          तखन? नसीवलाल-       सभ खेल जि‍नगीये ले चलैए। ऐ प्रश्नक उत्तर दू गोटेक बीच नै भेटत। प्रश्नो ओझराएल-ए। एहेन ओझरी लगल अछि‍ जेहन अमती आ तेतरि‍क सुआद बेराएब। कर्मदेव-          (वि‍हुँसैत) आगू कि‍ करब? नसीवलाल-       जानकारी (बैसारक) भेलापर कि‍ कहलनि‍? कर्मदेव-          बैसारमे भाग लेबाक आश्वासन तँ सभ देलनि‍। (आभा आ शान्‍तीक प्रवेश) नसीवलाल-       आभा आ शान्‍ती तँ आबि‍ये गेलीह। चारि‍ गोटे सेहो भेलौं। कनी पहि‍ने कि‍ कनी पाछू ओहो सभ एबे करताह। कर्मदेव-          हुनका सभकेँ बजौने आबी। नसीवलाल-       नै जरूरी अछि‍। जि‍नगी दू रस्‍ते चलैत अछि‍। एक काजक सवारीसँ दोसक खाली-खाली। कर्मदेव-          की मतलब? नसीवलाल-       काजक सवारी कतबो उभर-खाभर होइत कि‍अए ने चलए मुदा सुरो-सुन्‍दरीसँ बेसी सोहनगर होइए। जइसँ समैक ठेकाने बि‍ला जाइत अछि‍। कर्मदेव-          तखन? नसीवलाल-       एबे करताह। काजक अपन महत्‍व होइए। जे महत्‍व सभ समान दृष्‍टि‍ये नै बुझैत छथि‍। जेकर फल समए पाबि‍ नीकसँ बेसी अधले भऽ जाइए। आभा-           हमहूँ घरपर सँ सोझे कहाँ एलौं। जलखै खा कऽ जे नि‍कललौं से नि‍कलले छी। कर्मदेव-          कतौ बाहर गेल छलौं? आभा-           गामसँ कहाँ बहराएल छलौं। मुदा गामोमे तँ रँग-वि‍रँगक सरोवर, झील, जंगल, पहाड़ अछि‍। जेकरा पार करैमे कि‍छु अधि‍क समए, सरपट रास्‍तासँ, बेसी लगि‍ते अछि‍। कर्मदेव-          कि मतलब? आभा-           मतलब यएह जे एक तँ ओहि‍ना कुम्‍मकर्णी नीनमे अधासँ बेसी सुतल अछि‍। तइपर सँ दुखक दर्द सेहो सुता रहल अछि‍। नसीवलाल-       ई तँ होइते अछि‍ जे जइ खेतकेँ जोत-कोड़ नै होइ छै ओ रौद-वरसात पाबि‍ परती बनि‍ जाइए। मुदा पृथ्‍वी पुत्र ओकरो उपजाउ बनाइये लइए। कर्मदेव-          (मूड़ी डोलबैत) हूँ-अ-अ। नसीवलाल-       जे जि‍बटगर अछि‍ ओकरा परति‍ये तोड़ब बेसी नीक लगै छै। शान्‍ती-          चाचाजी, कनी काल सोचए लगै छी तँ छगुन्‍तामे पड़ि‍ जाइ छी जे हम सभ केहेन स्‍वतंत्र देशक जि‍म्‍मेदार नागरि‍क छी। जि‍म्‍मेदारी की छी आ कतऽ अछि‍। नसीवलाल-       प्रश्न तँ गंभीर अछि‍। मुदा बेहद खुशी भऽ रहल अछि‍ जे एहेन प्रश्नपर नजरि‍ जा रहल अछि‍। धन्‍यवाद। शान्‍ती-          (उत्‍साहि‍त होइत) चाचाजी जहि‍ना गहबरकेँ आँचरसँ पोछि‍ नोरसँ नीप भक्‍ति‍नि‍ एकटंगा दऽ शक्ति‍सँ शक्‍ति‍ पबैत तहि‍ना मन हुअए लगैए। नसीवलाल-       वि‍चार तँ बहुत पैघ अछि‍। मुदा ओइले धरतीमे जमि‍ कऽ पएर रोपए पड़त। शान्‍ती-          कि‍ मतलब? नसीवलाल-       मतलबसँ पहि‍ने ई कहू जे जेकर प्रति‍नि‍धि‍त्‍व (अगुआइ) करै छि‍ऐ ओ कतऽ ठाढ़ अछि‍? शान्‍ती-          ठाढ़ तँ कम्‍मे देखै छी। बेसीकेँ तँ जहि‍ना मुइल नढ़ि‍याकेँ कुत्ता लि‍ड़ी-बि‍ड़ी कऽ खाइत अछि‍ तहि‍ना समस्‍या खा रहल अछि‍। नसीवलाल-       समस्‍याक रँग-रूप केहेन अछि‍? शान्‍ती-          कते कहब। नसीवलाल-       कि‍छुओ जँ बाजब नै तँ आन केना बुझत? शान्‍ती-          चाचाजी, (माथक घाम पोछैत) कि‍यो खोपड़ी ले तरसैए तँ कि‍यो ताजमहल ले, कि‍यो दूधक धारमे नहाइए तँ कि‍यो एक घोंट लेल। (सुकदेव, सोमन आ मनचनक प्रवेश) आभा-           जहि‍ना मनचन भायकेँ पछुआ रोटी भौजी खुअबैत छथि‍न तहि‍ना गामोक काजमे। मनचन-          (वि‍हुँसैत) भरि‍ दि‍न अहूँ बाल-बोधकेँ सि‍खबैत हेबै जे खाइमे (भोजमे) आगू आ काजमे पाछू रही। आभा-           से कहाँ सि‍खबै िछऐ। सि‍खबै छि‍ऐ जे पहि‍ने करू तखन खाउ। ककहारामे जहि‍ना डारि‍-पात छुटैत जाइए तहि‍ना। मनचन-          (अधहँसी) भूखे भजन ने होइ गोपाला। आभा-           कठि‍या लाड़नि‍क कोन काज होइ छै, से तँ......? मनचन-          हँ, से तँ जि‍नगीमे कते पँचकठि‍या देखलौं आ आगूओ देखब। सुकदेव-         (दमसैत) रे बूड़ि‍वाण, सभ दि‍न एक्के रंग रहमे। उमेरक ठेकान नै छौ। मनचन-          भैया, दुनू हाथ उठा भगवानोकेँ यएह करै छि‍यनि‍ जे जहि‍ना जि‍नगी भरि‍ गाए दूधे दैत रहि‍ जाइए, आमक गाछ आमे तहि‍ना हँसते-खेलते दि‍वस काटि‍ ली। की लऽ एलौं आ कि‍ लऽ जाएब। नसीवलाल-       अखन जइ काजे सभ एकठाम छी से काज करै जाइ जाउ? सुकदेव-         की बाउ कर्मदेव, जि‍नका सभ ऐठाम गेल छलौं ओ सभ औता कि‍ नै? कर्मदेव-          कहलनि‍ तँ सभ। मुदा.....? सुकदेव-         मुदा की? कर्मदेव-          पढ़ल-लि‍खल लोकक कोन ठेकान। एक-एकटा बातक सत्तरह-सत्तरहटा अर्थ अगर-मगर करैत बुझैत छथि‍। तँए....? सुकदेव-         तँए की? कर्मदेव-          यएह जे हमरा गप्‍पक कि‍ माने लगौलनि‍। से थोड़े बुझै छी। सुकदेव-         गामक-समाजक- प्रति‍ कि‍नकर केहेन आकर्षण छन्‍हि‍? कर्मदेव-          ओना सबहक उपरा-उपरी छन्‍हि‍। मुदा घनश्‍याम कक्काक कि‍छु वि‍शेष छन्‍हि‍। सुकदेव-         आरो गोटेक? कर्मदेव-          सभ अपने बेथे बेथाएल छथि‍। मुदा घनश्‍याम कक्काक जेहने बेवहार छन्‍हि‍ तेहने आगू देखैक वि‍चार। असकरो जँ ओ आबि‍ जाथि‍ तैयौ बहुत-कि‍छु भऽ सकैए। नसीवलाल-       जँ चौथाइयो बल बाहरसँ भेट जाए तैयौ उठि‍ कऽ ठाढ़ होइमे सूहलि‍यत हएत। मनचन-          नसीवलाल भैया, जहि‍ना पानि‍मे डूबैत चुट्टीकेँ साधारनो खढ़ भेटने जान बचै छै तहि‍ना जँ कनि‍यो आस भेटत तैयौ कदमक गाछमे मचकी लगा झूलि‍ लेब। चारि‍यो आनासँ कम भोट पौने एम.एल.ए. एम.पी. बनि‍ मुर्गी दकड़ैए आ हम सभ भातो-रोटी नै खा सकै छी। आभा-           अहाँ भोट दै छि‍ऐ की नै? मनचन-          कि‍अए ने देबै। आभा-           ककरा दै छि‍ऐ। मनचन-          जेकरा जीतैत देखै छि‍ऐ तेकरा। अाभा-           से पहि‍ने केना बुझै छऐ? मनचन-          हद करै छी। जखन जीतक घोषणा होइ छै तखन जा कऽ माला पहि‍रा दै छि‍ऐ। आभा-           ओ मानि‍ लइए? मनचन-          कि‍अए नै मानत। जे अपने सात घाटक पानि‍ पीब‍ गरि‍थानि‍ जकाँ बजैए आ पति‍वरता कहबैए, ओ कि‍अए ने मानत। आभा-           तब ते अहाँ ठकोसँ नमहर ठक छी। मनचन-          से केना? आभा-           ठक तँ ओ भेल जे नि‍रीह, मुँहदुब्‍बर, सोझमति‍याकेँ ठकैत अछि‍ आ अहाँ तँ ठकक ठक भेलौं। मनचन-          एहि‍ना ने उनटल गंगामे लोक नहा गंगा-स्‍नानक फल गंगासँ मंगैत छन्‍हि‍। आभा-           गंगा दै छथि‍न? मनचन-          कि‍अए ने देथि‍न। भलहि‍ं सुनटाक फल देथि‍न वा नै नहि‍ उनटाक फल कि‍अए ने देथि‍न। आभा-           कोना दै छथि‍न? मनचन-          साँपक केचुआ देखलि‍ऐहेँ? आभा-           कि‍अए ने देखबै? मनचन-          की ओइ केचुआमे साँपे जकाँ मुँहसँ नांगड़ि‍ तक नै रहै छै? आभा-           हँ, से तँ रहै छै। मनचन-          तखन। आभा-           मुदा? मनचन-          मुदा तुदा कि‍छु नै। अहाँकेँ बुझैमे फेर अछि‍। देखै छि‍ऐ ि‍कने जे गामक सभ कहत जे एकोटा आॅफि‍समे बि‍ना घुस नेने काज नै चलैए। अाभा-           हँ से तँ अछि‍ये। मनचन-          मुदा पाइ लऽ लऽ भोँट दै छि‍ऐ सेहो कहि‍यो। आभा-           यएह बुझैक बात अछि‍, जखैन भोटरसँ भोँट लेनि‍हार धरि‍ घुसेक बेपार करए लगत तखैन जुग बदलतै। पटाक्षेप बारहम दृश्‍य (गामक वि‍द्यालयक आंगन। बच्‍चा सभ फील्‍डपर खेलैत। रस्‍ता धऽ कऽ राही सभ चलैत। गोल-मोल बैसार। एकठाम कृष्‍णदेव, मनमोहन आ रघुनाथ बैसल। बगलमे घनश्‍याम, नसीवलाल, सुकदेव आ गामक लोक बैसल।) क्रमश: ऐ रचनापर अपन मतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। जगदीश प्रसाद मण्‍डल कथा मायराम अमावास्‍याक राति‍, बारहसँ उपर भऽ गेल मुदा एक नै बाजल। डंडी-तराजू माथसँ नि‍च्‍चा उतड़ि‍ गेल। सन-सन करैत अन्‍हार।नअ बजेमे नि‍न्न पड़ैवाली मायरामकेँ आँखि‍क नीन नि‍पत्ता। कछमछ करैत ओछाइनपर एक करसँ दोसर कर उनटैत-पुनटैत, अकछि‍ केबार खोलि‍ बाहर नि‍कलली तँ काजर घोराएल राति‍मे अपनो हाथ-पएर नै सुझन्‍हि‍। जहि‍ना करि‍छौंह दुनि‍याँ आँखि‍सँ नै देखथि‍ तहि‍ना दसो दुआरि‍ बन्न मन खलि‍आएल बुझि‍ पड़लनि‍। पुन: घुरि‍ कऽ ओछाइनपर आबि‍ आेंघरा गेलीह। दि‍न-राति‍क बोध-वहीन मन तड़पि‍ उठलनि‍- “नैहर।” पहि‍ल सन्‍तान भेलोपरान्‍त सुदामा (मायराम) बाइसे बर्खमे वि‍धवा भऽ गेलीह। गत्र-गत्रसँ जुआनी, फुलझड़ीक लुत्ती जकाँ, छि‍टकैत! ओना सरकारी रजि‍ष्टरमे जुआन भऽ गेल छलीह मुदा बत्तीसीक अंति‍म दना नै उगल रहनि‍। साँपक बीखसँ करि‍आएल देह देख अपनो मरनासन भऽ गेलीह। पथराएल आँखि‍ टक-टक टकैत मुदा अन्‍हारसँ अन्‍हराएल। बगलमे डेढ़ बर्खक बेटा उठैत-खसैत अंगना-घर घुमैत-फि‍ड़ैत। तइ बीच हहाएल-फुहाएल शंकरदेव (भाय) आँखि‍मे यमुनाक धार नेने पहुँचलाह। बहीन बहि‍नोइक रूप देख अपन आँखि‍क नोर पोछि‍ भागि‍नकेँ उठा छाती सटा, बहि‍न (सुदामा)केँ कहलखि‍न- “बुच्‍ची होश करू। दुनि‍याँक यएह खेल छि‍ऐ। अहीं जकाँ नानि‍योकेँ भेल रहनि‍। मुदा आइ केहन भरल-पूरल्‍ा परि‍वार छन्‍हि‍। एक ने एक दि‍न, ओहि‍ना अहूँक परि‍वार दुनि‍याँक फुलवाड़ीमे फुलाएल।” शंकरदेवक बात सुनि‍ सुदामाक आँखि‍ खुजल मुदा बकार नै फुटलनि‍। मुदा नर-नारीक करेजो तँ दू धारक दू माइटि‍क सदृश्‍य होइत बहि‍नोइक जरबैक ओरि‍यानमे आंगनसँ नि‍कलि‍ शंकर समाजक दि‍स बढ़लाह। पनरहम दि‍न बहि‍नकेँ संग नेने अपना गाम वि‍दा भेला। गामक सीमानपर अबि‍ते गाममे कन्नारोहट शुरू भेल। बच्‍चासँ बूढ़ि‍ धरि‍ सुदामाकेँ छाती लगबए आगू बढ़ल। बेचारी नि‍सहाय भेल पड़ल। जहि‍ना चांगरा परक घर खसैत, तहि‍ना। मुदा ताधरि‍ गामक धरोहि‍क अगि‍ला अंक पहुँच गेल। एक्के-दुइये ढेरो छाती सुदामाक छातीमे सटि‍, चारू दि‍ससँ पकड़ि‍ टोल दि‍स बढ़ल। सुदामाक मनमे उठलनि‍ जँ अपने कानब तँ समाजक कानब केना सुनबै। सं नै तँ समाजेक कानब सुनि‍ जे आगूक जि‍नगी केना जीब। बीच आंगनमे माय ओंघरनि‍या दैत आ दरबज्‍जापर पि‍ता भुइयेँ पेटअकान देने। अपन-अपन अथाह समुद्रमे सभ डूबल। के ककर नोर पोछत। पएर भतीजी धाेय गाराजोरी केने आंगन बढ़लि‍। दुरखापर पएर दैतै सुदामाक रूदनसँ नि‍कलल- “हे मइया...।” जहि‍ना धड़सँ कटल अंग छटपटाइत तहि‍ना कामि‍नीक (माए) मन छटपटाइत-छटपटाइत मनमे प्रश्नपर प्रश्न उठए लगलनि‍। मुदा कोनो प्रश्नक सोझ रास्‍ता नै देख काँटक ओझरी जकाँ मन ओझराए लगलनि‍। एक ओझरी छोड़बथि‍ बीचेमे दोसर लगि‍ जाइन। .....कि‍‍ आगूक जि‍नगीक लेल बेटीकेँ दोसर वि‍याह कऽ देब। फेर उनटि‍, जि‍नगीक लेल सहचर तँ आवश्यक अछि‍? .....कि‍ सहचरक लेल पति‍ आवश्यक अछि‍? मुदा जते असानीसँ गुंथी खोलए चाहथि‍ ओते असानीसँ खुजबे ने करनि‍। तइ बीच दोसर प्रश्न अकुर जाइन। बेटीक संग नाति‍यो अछि‍। जँ बेटी दोसर घरकेँ अपन घर बनाओत तँ नाति‍क.....? पुत्र हत्‍याक पाप ककर कपार चढ़त? कि‍ कुत्ता जकाँ पछि‍लग्‍गू एहेन सुकुमार फुलकेँ बना देब। अखन ओ दूधमुँह अछि‍, कि‍ बुझत? अपन भूमि‍ आ आनक भूमि‍क मरजादा एक्के रँग होइत। कि‍ दोसरो घरमे ओहने ममता माइक भेटतै? मनुक्‍खेक क्रि‍या-कलाप ने कुल-खनदानक जड़ि‍मे पानि‍ ढारैत अछि‍। घुरि‍याएल मनकेँ राह भेटलनि‍। सुफल नारी जि‍नगी तँ वएह ने छी जेकरा आँचरक लाल मातृत्‍व प्रदान करैत अछि‍। जइसँ वीणाक झंकृत मधुर स्‍वर हृदेकेँ कम्‍पि‍त करैत अछि‍। से तँ भेटि‍ये गेल छै। मुदा जहि‍ना ठनकैत आकाशसँ ठनका खसैत तहि‍ना मनमे खसलनि‍- “मुदा समाज?” कि‍ मनुष्‍य-पोनगैक स्‍थि‍ति‍ समाजमे जीवि‍त अछि‍। सुदामाक सम्‍पन्न पि‍तृ परि‍वार। अदौसँ श्रम-संस्‍कृति‍क बीच पुष्‍पि‍त-पल्‍लवि‍त परि‍वार। जइसँ रग-रगमे समाएल अपन संस्‍कृति‍। ओना सम्‍पन्नताक सीमा असीमि‍त अछि‍ मुदा अपन आँट-पेट देख अपन (परि‍वार) जि‍नगीक स्‍तर बना चलब सम्‍पन्नताक अनेको कारणमे एक प्रमुख छी। तँए सम्‍पन्न परि‍वार। ओना आर्थिक दृष्‍टि‍ये सुदामाक वि‍याह दब परि‍वारमे भेल छलनि‍ मुदा व्‍यवहारि‍क दृष्‍टि‍ये बराबरीमे छलनि‍। कम रहि‍तो गोरहा खेत छलनि‍ जइसँ खाइ-पीबैक कोताही नै। कि‍छु आगुओ बढ़ि‍ ससरैत। सालक तेरहम मासमे घरक कोठी-भरली झाड़ि‍ इजोरि‍या दुति‍यासँ भागवत कथाक संग हरि‍वंश कथा सुनि‍, भोज-भनडारा कऽ सामा-चकेवा जकाँ आगू दि‍स बढ़ैत। बेटाक पालन आ धरमक काज देख अपनो गाम आ चौबगलि‍यो गामक लोक सुदामक नाओं मायराम रखि‍ देलकनि‍। बच्‍चासँ बूढ़ धरि‍ माइयेराम कहए लगलनि‍। सुदामाक पि‍ता रवि‍शंकर परि‍वारमे चुल्हि‍ नै पजड़ल। जखन सुदामा आइलि‍ तखन जे कन्नारोहट शुरू भेल, से भरि‍ दि‍न होइते रहि‍ गेल। कखनो बेसी तँ कखनो कम। चुल्हि‍ नै पजड़ने टोल-पड़ोसक परि‍वारसँ थारी-थारी भात-दालि‍ एते आएल जे राति‍ धरि‍ चलैत रहल। सायंकाल रवि‍शंकर, आंगन ओसरपर बैस, सुदामाक भावी जि‍नगीक लेल पत्नि‍यो आ बेटो-पुतोहूकेँ बैसाए वि‍चार करए लगलाह। वि‍चारोत्तर ि‍नर्णए भेल जे काल्हि‍ये शंकरदेव ओइठाम-सुदामाक सासुर- जा खेती-गि‍रहस्‍ती ताधरि‍ सम्‍हारथि‍ जाधरि‍ बच्‍चा-सुदामाक बेटा जुआन नै भऽ जाए। संग-इहो भेल जे छह मास सुदामा सासुर आ छह मास नैहरमे रहत। अठारह बर्ख पुरि‍ते राहुलक वि‍याह भऽ गेल। नव परि‍वार बनि‍ ठाढ़ भेल। शंकरदेव अपना ऐठाम चलि‍ एलाह। तीन साल बाद पि‍ता रवि‍शंकर आ पाँच साल बाद माए शंकरदेवक मरि‍ गेलनि‍। मुदा दुनूठामक परि‍वारमे कोनो कमी नै रहल। हवाइ-जहाज जकाँ तेज गति‍ये तँ नै मुदा असथि‍र सवारी-टायरगाड़ी जकाँ परि‍वार आगू मुँहे ससरए लगल। मायरामक प्रति‍ समाजक नजरि‍या सेहो बदलल। समाजक आन वि‍धवा जकाँ नै। जे कि‍यो अशुभ बुझि‍ कनछी कटैत तँ कि‍यो पशुवत बेबहार लेल मरड़ाइत। तीर्थस्‍थान जकाँ मायरामक परि‍वार बनि‍ गेलनि‍। साले-साल भागवत कथाक संग हरि‍वंश कथा आ भोज-भनडारा कऽ समाजकेँ खुआ सालक वि‍सर्जन मायराम करए लगलीह। पाँच बर्ख पछाति‍ मायरामक भरल-पुरल नैहर-शंकरदेवक परि‍वार- कोशीक कटनि‍यासँ धार बनि‍ गेल। गामक बीचो-बीच सनमुख धार बहए लगल। घटनो अजीव घटल। चारि‍ बजे करीब बाढ़ि‍क हल्‍ला गाममे भेल। कि‍रि‍ण डुबैत-डुबैत धारक कटनि‍या शुरू भेल। गामक सभ बाध नदि‍या गेल। उत्तरसँ दछि‍न मुँहे बहए लगल। बाढ़ि‍क बि‍कराल रूप देख गामक लोक माल-जाल, बक्‍सा-पेटीक संग ऊँचगर-ऊँचगर जमीनपर पहुँचल। नट-मघैया जकाँ नव बास बनि‍ गेल। बाढ़िक गूंगूआहट सुनि‍-सुनि‍ सभ कि‍छु बि‍सरि‍ परान बचबैक बात सोचए लगल। चारू कात बाढ़ि‍ पसरल। जइसँ इहो डर होइत जे जँ कहीं अहूपर पानि‍ चढ़त तखन कि‍ हएत? अन्‍हरि‍या राति‍, हाथ-हाथ नै सुझैत। जीवन-मरनक मचकीपर सभ झुलए लगल। भूख-पि‍यास मेटा गेल। जहि‍ना दुखि‍त नव वि‍आएल गाए-महीस व्‍यथि‍त आँखि‍ये बच्‍चाकेँ देखैत रहैत अछि‍ तहि‍ना सभ माए-बापक आँखि‍ बाल-बच्‍चापर। मुदा मनुख तँ मनुख छी नहि‍ कि‍ जानवर। जेना जानवर हरि‍यर घास देख बच्‍चो आगूक लुझि‍ कऽ खा लैत अछि‍ तेना मनुक्‍खो करत? बाल-बच्‍चाक लेल तँ मनुक्‍ख अपन खूनकेँ पानि‍ बनबैत, अपन सुआदकेँ छोलनी धि‍पा दगैत, अपन मनोरथ बच्‍चामे देखैत अछि‍। अपन जि‍नगीकेँ बलि‍वेदीमे आहूत दैत अछि‍। भोरहरबामे हल्‍ला भेल जे बीस नमरी पुल कटि‍ कऽ दहा गेल। पुलक समाचार सुनि‍ सबहक छाती डोलए लगल। पूव दि‍सक रास्‍ता बन्न भऽ गेल। कि‍छुए काल पछाति‍ पुन: हल्‍ला भेल जे बेटा संग रोगही पानि‍मे डूबि‍ गेल। कि‍छु काल धरि‍ तँ हल्‍लामे बाते नै फुटैत मुदा तोड़मारि‍ हल्‍लामे वि‍हि‍आि‍त-वि‍हि‍आति‍ समाचार वि‍हि‍आ गेल। भासि‍ कऽ कते दूर गेल हएत तेकर ठेकान नै तँए कि‍यो आगू बढ़ैक हूबे ने केलक। जहि‍ना एक टाँग टुटने गनगुआरि‍ नै नेङराइत तहि‍ना एक गोटे मुइने समाज थोड़े नेङराएत। सभ दि‍न होइत एलै आ होइत रहतै। हल्‍ला शान्‍त होइते शंकरदेव पत्नीकेँ कहलखि‍न- “आब जान नै बँचत।” पत्नी- “एते अन्‍हारमे कतऽ जाएब। भने ऐठाम छी।” पति‍- “जँ अहूपर बाढ़ि‍ चढ़ि‍ जाएत?” “सभ तूर संगे कोसीमे डूबि‍ जाएब। कि‍यो बँचब तखन ने दुख हएत। जँ दुख केनि‍हारे नै रहब तँ दुख ककरा हएत।” पौरूकी घुटकल। आन-आन चि‍ड़ै सुतले रहए। पौरूकी आवाज सुनि‍ शंकरदेवक, दुभीक नव मूड़ी जकाँ, मनमे नव चेतना जगलनि‍। बजलाह- “भि‍नसर होइमे देरी नै अछि‍। जँए एते काल तँए कनी काल आरो। दि‍न-देखार तँ असगरो लोक अमेरि‍या चलि‍ जाइए। अपना सभ तँ बाधक थोड़े रास्‍ता काटब।” कि‍रि‍ण उगैसँ पहि‍नहि‍ ऊँचकापर पानि‍ चढ़ए लगल। चढ़ैत पानि‍ देख हरवि‍रड़ो भेल। गाए-महीस, बक्‍सा-पेटी छोड़ि‍ सभ अपन जान बँचबए वि‍दा भेल। जहि‍ना बेरागी दुनि‍याँकेँ मायाजाल मानि‍, छोड़ि‍, आत्‍मचि‍न्‍तनमे लगि‍ जाइत तहि‍ना माल-असबाव छोड़ि‍ सभ वि‍दा भेल। तही बीच बाँसक झोंझमे मैनाक झौहरि‍ भेल। जना ककरो बनबि‍लाड़ पकड़ि‍ नेने होउ, तहि‍ना। पूब दि‍स फीक्का गुलावी जकाँ अकासमे पसरए लगल। मुदा बि‍लटैत जि‍नगी आ डुबैत सम्‍पत्तिक‍ सोग अन्‍हारकेँ आरो बढ़बैत। सुखल जमीनपर पहुँचते छोट-छीन आशा शंकरदेवक मनमे जगलनि‍। मुदा चारू बच्‍चो आ पत्नि‍योक मनमे दुधाएल चाटल दानाक खखरी जकाँ। बेर-बेर शंका खेहारैत जे हो-न-हो फेर ने आगूएसँ बाढ़ि‍ चलि‍ आबए। मि‍रमि‍रा कऽ पत्नी शंकरदेवकेँ कहलनि‍- “एते लोकक गाममे एक्कोटा संगी नै देख रहल छी।” “सभ अपने जान बँचबै पाछु अछि‍ तखन के केकरा देखत।” “जाबे लोक, भरल-पूरल रहैए ताबे दुनि‍याँ हरि‍यर बुझि‍ पड़ै छै। मुदा......।” “हँ, से तँ होइते छै। मुदा......।” “हँ इहो होइ छै। अखन माए जीबैए, कतऽ बौआएब। बच्‍चो सबहक मात्रि‍के भेल, अपनो नैहरे भेल आ अहूँक सासुरे।” पत्नीक बात सुनि‍ शंकरदेव गुम भऽ गेलाह। मनमे चुल्हि‍पर खौलैत पानि‍ जकाँ वि‍चार तर-उपर हुअ लगलनि‍। बजलाह- “कहलौं तँ बड़बढ़ि‍याँ। मुदा सासुरसँ नीक बहीन ऐठाम हएत।” “केना?” “जइ दि‍न वेचारि‍क उपर वि‍पत्ति‍ आएल छलै तइ दि‍न यएह देह अपन घर-परि‍वार छोड़ि‍ ठाढ़ भेल छलै। आइ कि‍ हमरे गाम-घर मेटा रहल अछि‍ आकि‍ ओकरो नैहर।” “अहाँकेँ जे वि‍चार हुअए।” “वि‍चारे नै, वि‍पत्ति‍मे लोकक बुद्धि‍ हरा जाइ छै। जइसँ नीक-अधलाक वि‍चार नै कऽ पबैत अछि‍। मुदा अहीं कहूँ जे सासुरमे कान्‍हपर कोदारि‍ लऽ कऽ खेत-पथार जाएब से केहेन हएत। अपन जे दुरगति‍ हएत से तँ हेबे करत मुदा दुनू परि‍वारक-सासुर-नैहर- की गति‍ हएत।” बाढ़ि‍क समाचार इलाकामे पसरि‍ गेल। मायरामक कानमे सेहो पड़लनि‍। भाय-भौजाइक आशा-बाट तकैत मायराम बेटा राहुलकेँ संग केने आगू बढ़लीह। मुदा कि‍छु दूर बढ़लापर सोगसँ पथराएल पएर उठबे ने करनि‍। बाटक बगलक गाछक नि‍च्‍चा बैस बेटाकेँ कहलखि‍न- “बौआ, पएर तँ उठबे ने करैए। केना आगू जाएब? तू आगू बढ़ि‍ कऽ देखहक।” छबो तूर शंकरदेव ऐ आशासँ झटकल अबैत जे जते जल्‍दी पहुँचब ओते जल्‍दी बच्‍चा सभकेँ अन्न-पानि‍सँ भेँट हेतै। रौतुको सभ भुखले अछि‍। तइ बीच राहुलक नजरि‍ मामपर आ मामक नजरि‍ भागि‍नपर पड़ल। नजरि‍ पड़ि‍ते राहुल दौड़ कऽ ठाढ़े मामाकेँ गोड़ लागि‍ मामीक कोराक बच्‍चाकेँ लऽ बाजल- “माइयो अबैए मुदा डेगे ने उठै छलै। आगूमे बैसल अछि‍।” राहुलक बात सुनि‍ मामी बच्‍चा सभकेँ कहलखि‍न- “भैयाकेँ गोड़ लगहुन।” बच्‍चाकेँ कोरामे नेने आगू-आगू आ पाछु-पाछु सभ कि‍यो वि‍दा भेला। सभसँ पाछु शंकरदेव अपने। मन पड़लनि‍ रौतुका दृश्‍य। केना छनमे छनाक भऽ गेल। जि‍नगी भरि‍क जोड़ि‍आएल घरक वस्‍तु-जात आगि‍ लगने आकि‍ बाढ़ि‍ एने केना लगले नास भऽ जाइ छै। मान-प्रति‍ष्‍ठा, गुण-अवगुण, केना छनेमे कतएसँ कतऽ चलि‍ जाइ छै। ठीके लोक बजैए जे दि‍न धराबे तीन नाम। अपने छी जे एक दि‍न बहीनक रक्षक बनि‍ ऐ गाममे छलौं आ आइ......। एक दि‍न गाड़ीपर नाह आ एक दि‍न नाहपर गाड़ी। माटि‍-पानि‍क खेल छी। गंगा-यमुनाक बीच कतौ माटि‍ओ छै अाकि‍ पानि‍ये-पानि‍ छै। कि‍छु फरि‍क्केसँ भाय-भौजाइकेँ अबैत देख मायरामक मन ओइ धरतीपर पहुँच गेलनि‍ जे सात समुद्रक बीच अछि‍। एक ओद्रक रहि‍तो एक भि‍खारी दोसर राजा। परोपट्टाक लोक सि‍नेहसँ मायराम कहै छथि‍ मुदा भैयाकेँ कि‍ कहतनि‍। कि‍ भैयाक कर्म वि‍गड़ल छन्‍हि‍। एक परि‍वारक बचाओल कर्म छन्‍हि‍। चान, सुरूज, धरती, ग्रह-नक्षत्र इत्‍यादि‍ तँ अपना गति‍ये करोड़ो बर्खसँ नि‍यमि‍त चलि‍ रहल अछि‍ आ चलैत रहत कि‍ मनुक्‍खोक गति‍ ओहन भऽ सकैए। आकि‍ चाने-सुरूज जकाँ मनुक्‍खोक चलैक एकबटि‍ये अछि‍। ब्रह्मक अंश जीवि‍ रहि‍तो कि‍ फुलझड़ीक लुत्ती जकाँ नै अछि‍? जतऽ जेहेन जलवायु ततऽ तेहेन उपजा-बाड़ी। जँ कतौ वायु प्राणक रूपमे घट-घटकेँ आगू बढ़ैक प्रेरणा दैत तँ वएह वि‍षाक्‍त बनि‍ प्राण नै लैत। गोलाक चोटसँ जहि‍ना पोखरि‍क पानि‍मे हि‍लकोर उठैत आ आस्‍ते-आस्‍ते असथि‍र होइत चि‍क्कन आंगन जकाँ सहीट बनि‍ जाइत तहि‍ना मायरामक मन सहीट भऽ गेलनि‍। मुदा लगले नजरि‍ उड़ि‍ भतीजीपर गेलनि‍। भतीजीपर पहुँचते मन तड़पए लगलनि‍। बाप रे बाप, एहेन दुरकालमे भैया केना इज्‍जत बचौताह। अपनो लग जमा कि‍छु तँ नहि‍ये अछि‍ साले-साल हि‍साव फरि‍या लइ छी। हे भगवान जँ ककरो दुखे दइ छऐ आकि‍ सुखे दइ छि‍ऐ तँ तुलसी पात आकि‍ दूबि‍क मूड़ी जकाँ खोंटि‍-खाेंटि‍ कि‍अए ने दइ छि‍ऐ जे गुलाब-गेन्‍दा तोड़ि‍ये कऽ दऽ दइ छि‍ऐ। लगले नजरि‍ मायराम छि‍पा जकाँ छि‍हलि‍ अपन मातृत्‍वपर पहुँच गेलनि‍। केना बेटाकेँ पोसि‍-पालि‍ ठाढ़ केलौं आ ई सभ.........। लुधकी लागल एकटा गाछ फड़बे करत तइसँ गामक सबहक मुँहमे थोड़े जाएत। जते मनुख अछि‍ ओकरा तँ धरतीसँ अकास धरि‍ चाहये। तखन ने जीबैक आजादी भेटतै। मुदा लगले जहि‍ना पानि‍ ठंढ़ेने बरकक रूप लि‍अए लगैत तहि‍ना दूधसँ उपजैत दही जकाँ मायरामक मन सकताए लगलनि‍। साँस सुषुमा गेलनि‍। मनमे खौललनि‍। नैहर मेटा गेल तँए कि‍ सासुरो मेटा गेल। जहि‍ना भैया नैहरमे भैया छलाह तहि‍ना अहूठाम भैया रहताह। भगवान अपन कोखि‍ अगते लऽ लेलनि‍ तँए कि‍ ओकरा-भतीजी- अपन कोखि‍क नै बुझबै। ऐठाम जे अछि‍ ओ कि‍ भैयाक नै छि‍यनि‍। खेत-पथार, घर-दुआरि‍ चलि‍ गेलनि‍ आकि‍ हाथे-पएर चलि‍ गेलनि‍। गुमे-गुम, जहि‍ना मृत्‍युक अवसरपर गुम भऽ असमरन कऽ नि‍राकरणक बाट जोहल जाइत, तहि‍ना सभ घरपर पहुँचलाह। ताधरि‍ पुतोहू-रोहि‍तक पत्नी- हाँइ-हाँइ कऽ खि‍चैड़ आ अल्‍लूक सन्ना बना, बाट तकैत रहथि‍। सबहक आँखि‍ सभ दि‍स हुलैक-हुलैक बौआइत। तइ बीच राहुलक कोरक छोटका बच्‍चा, घर देखि‍ते, बाजल- “दीदी, बड़ भूख लागल ऐछ?” बच्‍चाक बात सुनि‍ मायरामक भक्क टुटलनि‍। अनायास मन पड़लनि‍ बटोहीकेँ जहि‍ना इनारपर ठाढ़े-ठाढ़ पानि‍ पि‍औल जाइत तहि‍ना ने अखन इहो सभ छथि‍। नहाय-धोयमे अनेरे देरी ि‍कअए लगाएब। बजलीह- “कनि‍याँ, भरि‍ राति‍क थाकल-ठेहि‍याएल सभ छथि‍ तँए पहि‍ने कि‍छु खुआ कऽ आराम करए दि‍अनु। गप-सप्‍प पछाति‍यो हेतै। भोजन बादेक आराम तँ सोग कम करैक उपाए छी।” ऐ रचनापर अपन मतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। प्रभात राय भट्ट मिथिला गर्भपुत्र माँ हम अहाक गर्भ मे पलिरहल्छी,मुदा जन्म लेबS पहिले हम अपन मोनक बात किछ आहा के सुनाब चाहैत छि! यी हमर पुनर्जन्म अछी हमअहि मिथिलांचल के जनकपुरधाम मे जन्मलरहलौ ताहि समय मे विदेह एकटा समृद्ध राष्ट्र रहैक जेकर अपन भाषा अपन भेष बिदेह के गौरव रहैक,कोशी स गण्डकी तक गंगा स हिमालय के पट यी सम्पूर्ण भूमि मिथिलांचल रहैक जतय कोशी कमला विल्वती यमुनी भूयसी गेरुका  जलाधीका दुधमती व्याघ्र्मती विरजा मांडवी इछावती लक्ष्मणा वाग्मती गण्डकी अर्थात गंगा आर हिमालय के मध्य भाग मे यी पंद्रहनदी के अंतर्गत परम पवन तिरहुत देश विख्यात छल !  जतये कोशी कमला क वेग स संगीत उत्पन होइत्छल दुधमतीस दूध बहथी नारायणी मे स्नान कैयलास स्वस्थ काया भेटैत छल, गण्डकी के वेग स प्रेरित कवी गंडक काव्यसुधा रचित छल,कवी कौशकी कोशी तट बईस काव्यवाचन करैत छल ! अनमोलसंस्कृति  आर अनुपम  प्रकृति केर उद्गमस्थल याह मिथिलाधाम छल बागबगीचा मे कोइली मीठ मीठ संगीत गबै छल ! शुभ-प्रभातक लाली स मिथिलाक जनजीवन स्वर्णिम छल !हर घर मंदिर आ लोग इह के साधू संत छल चाहे कोनो मौसम होइक सद्खन ईहाबहैत बसंत छल ! पग पग पोखईर माछ मखान मीठ मीठ बोली मुह मे पान इ छल मिथिलाक पहिचान, अहि ठाम जन्म लेलैथ पैघ पैघ विद्वान वाचस्पति, विद्यापति, गौतम, कपिल, कणाद, जौमिनी, शतानंद, श्रृंगी, ऋषि याज्ञवल्क्य, सांडिल, मंडन मिश्र, कुमारिल भट्ट, नागार्जुन, वाल्मीकि, कवी कौशकी, कवी गंडक, कालिदास, कवीर दास, महावीर यी सब छलैथ मिथिलापुत्र एतही जन्म लेलैथ माँ जानकी राजर्षि जनक के पुत्रीक रूप मे !एतही भगवान शिव उगना महादेव के रुपमे महा कवी विद्यापति के चाकर बनलाह ! मिथिला भूमि से अवतरित होइत छल ऋषि मुनि साधू संत भगवान ताहि स कहलगेल की यी मिथिलाभूमिअछि वसुधा के हृदय ! मिथिलाक मान समान स्वाभिमान भाषा  भेष प्रेम स्नेह ज्ञान विज्ञान विश्व बिख्यात छल! अहि ठाम जन्म लेबक लेल देवी देबता सबलालायित होइत छल ! तायहेतु हमहू पूर्व जन्म मे माँ जानकी s कमाना कयने रहलू जे हे माता जाऊ हम फेर मानव कोइख मे जन्म ली ता हमरा मिथिले मेजन्म देव ! ताहि स हम अपनेक कोइख मे पली रहल छि! मुदा  आजुक मिथिलाक दुर्दशा देखिक हम संकोचित भगेल्हू,विस्वास नए bh हरहाल अछि जे यी वाह्य मिथिला छई राजर्षि जनक के नगरी वैदेहिक गाम की कोनो दोसर ?सब किछ बदलल बदलल जिका लगैय,कियो कहिय हम नेपाल के मिथिला मे छि ता कियो कहैय हम विहार के मिथिला मे छि यी विदेह नगरी दू भाग मे विभक्त कोना भगेलई माए? राजा प्रजा शाषक जनता भाषा भेष व्यबहार व्यापार ज्ञान विज्ञान सब किछ बदलल बुझाईय !मिथिलाक अस्तित्व विलीन आ परतंत्र शासन के आधीन मे हमर मिथिला  कोना आबिगेल माए ? मैथिल भाषा कियो नए बाजैय, धोती कुरता फाग के उपहास भरह्लय,महा कवी विद्यापति क गीत कियो नए गबैय ! मिथिलाक संस्कृति लोप के स्थिति मे कोना आबिगेल माए ?समां चकेवा ,जट जटिन,झिझिया, झूमर,झंडा निर्त्य,सल्हेश कुमार्विर्ज्वान,आल्हा उदल,कजरी मल्हार यी नाट्यकला सब कतय चलिगेल ? मिथिलाक एतिहासिक स्थल सब एतेक जरजट कोना भगेल ?माए हम त पुनर्जन्म मांगने छलु मिथिला राज्य मे मुदा आहा अछि विहार मे,माए हम त पुनर्जन्म मांगने छलु मिथिला राज्य मे मुदा आहा अछि नेपाल मे ,माए हमर विदेह राज्य कतय चलिगेल ?माए हम त अपन मिथिला राज्य मे जन्म लेब चाहैत छि मिथिला माए क कोरा सन निश्छल आ बत्सल प्रेम खोजलो स नए भेटत चहुओरा मे !हम अपन मोनक सबटा जिज्ञासा ब्यक्त केनु आब आहा किछ मार्गदर्शन करू माए !हम मजधार मे फसल छि हमर करूणा सुनी हमर सपना साकार करू माए !!! ऐ रचनापर अपन मतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। राजदेव मण्‍डल उपन्‍यास हमर टोल (गतांषसँ आगाँ) ढेरूवा नै नाचै छै असलमे जागेसरक मन नाचै छै। सुतरी कटा रहल छै- कतौ मोट कतौ पातर। मन थि‍र रहै तब ने। मनकेँ थि‍र राखब बड्ड कठि‍न। ई तँ कि‍यो साधक कऽ सकैत छै। सभ जँ साधक भऽ जेतै तँ देश दुनि‍याँकेँ कोन गति‍ हेतइ। तँए पहि‍ने मन उड़ै छै तब तन। जागेसरक मन धारक थौकड़ा जकाँ उपला रहल अछि‍। आइ तँ भुटायौ वैध जबाब दऽ देलकै- “धर्मडीहीवालीकेँ सन्‍तान नै हेतौ। वि‍धाता कलम मारि‍ देने छौ। एकर कोखि‍ ऐ जनममे नै भरतौ।” हौ बा आब कोन उपाय हेतै हो। पहि‍ने तँ लोक खोंखीबाला कहै छलै। आब मुँह दाबि‍ कऽ कहै छै- “नि‍रवंश।” दुआरि‍पर जगेसरा ढेरूआकेँ गि‍नगि‍ना रहल अछि‍। सँगे ओकर माथा घूमि‍ रहल अछि‍ आ माथामे घूमि‍ रहल अछि‍- धर्मडीहीवाली। कि‍न्‍तु पछि‍ला फूइसक घर थि‍र अछि‍। ठीके कहै छलै- उचि‍तवक्ता- “हटा ऐ ठाँठ गाएकेँ। कर दोसर वि‍याह। ला टटका माल। नीक नसल देख-सुनि‍ कऽ। पुरहि‍या लऽ आन। चाइरे-पान सालमे छौड़ा-छौड़ीसँ खोभारी भरि‍ जेतौा।” नसल तँ एकरो खराब नहि‍ए छै। नमगर-छरहर काजा, भरल-पूरल सीना। जखनी सि‍ंगार कऽ कए नि‍कलै छै तँ संगी-साथीकेँ कहए पड़ै छै- “जगेसरा भागशाली अछि‍। अपना तँ कमजोर करि‍आएल बेमरि‍याह अछि‍। कि‍न्‍तु ओकरा मौगीकेँ देखि‍यौ। जँ आगूसँ नि‍कलै छै तँ मन फुरफुरा उठै छै।” भाग्‍यशाली  कतऽ। भाग्‍य कतएसँ नीक हएत। सुन्‍दर तँ अछि‍ लेकि‍न बाँझ। जँ नि‍पूतर रहब तँ पि‍ण्‍डदान के करत। हमरा बाद सम्‍पति‍केँ के भोगत? बुढ़ारीमे सहारा के बनत? ओह ऐ औरति‍याकेँ भगबहि‍ पड़त। ठीके कहै छलै- उचि‍तवक्‍ता। लेकि‍न भगेबै केना? छै तँ ई बड़ जब्‍बर। ओइदि‍न खेलावन भगतसँ झाड़फूँक करबैले गेलि‍ये। एके झापटमे भगतकेँ दाँत चि‍याइर कऽ खसा देलकै। महतो बाबाकेँ थानसँ भभूत लाबि‍ देलि‍ऐ। छाउर बुझि‍ कऽ मूतनारमे फेक देलकै। यएह भोंसड़ीकेँ बि‍सबासे नै छै कि‍छोपर। फल कतएसँ भेटतै? आब एकरा डेँगा-ठेठा कऽ भगबहि‍ पड़तै। लेकि‍न केना कऽ आँखि‍ उनटा कऽ जँ हमरा दि‍स तकै छै तँ हमरा लघी लगि‍ जाइत अछि‍। तैयो हम तँ मरद छी, देह तानहि‍ पड़त। हम जँ मौगा बनल रहबै तँ उ बेहया बनि‍ जेतै। संभार तँ हमरहि‍ करए पड़तै। कतेक दि‍नसँ एकर चालि‍-चलन देख रहल छी। नकोरबा बनि‍याँसँ कतेक सटि‍या कऽ गप्‍प करैत रहै छै। छनमाकेँ अँगनामे ढुकै छै तँ नि‍कलैक मने नै होइ छै जेना। हम भूखल रहि‍ जाइयो कोनो बात नै लेकि‍न ई भोरे नि‍कलि‍ जाएत- टोल चक्कर लगेबाक लेल। टोलक चक्कर थोड़बे लगबै छै ई तँ दोसरे चक्करमे लगल रहै छै। कतेक बेर भऽ गेलै। भूखसँ पेट दुखा रहल अछि‍। हमरा दि‍स धि‍यान रहै तब ने। धि‍यान तँ आओर ककरोपर रहै छै। धर्मडीहीवाली अँगनासँ नि‍कलि‍ कऽ टोल दि‍स जा रहल अछि‍। जागेसराक ढेरूआ रूकि‍ गेलै। “ऐ- कतऽ जा रहल छी? छूछे कूद फन? ऐ अँगनासँ ओइ अँगना? जेना कोनो काजे नै छै। एके लाठीमे टाँग तोड़ि‍ देबौ। अपने घरमे बैठल रहबेँ।” धर्मडीहीवालीकेँ टाँग रूकि‍ गेलै। उनटि‍ कऽ बजल- “देहमे तागद तँ छै नै आ टाँग तोड़ता? देखै नै छी केहेन बेमारी ढुकल छौ, तोरा देहमे। कोढ़ि‍ फुट्टा कहीं कऽ।” झगड़ा बढ़तै। जागेसरकेँ बढ़ि‍या चांस भेँट गेल छै। उ झगड़ाकेँ बढ़ाबए चाहैत अछि‍। “मुँहसँ गारि‍ नि‍कलतौ तँ थुथुन तोड़ि‍ देबौ।” “गारि‍ नै देबौ तँ असि‍रवाद देबौ?” “यएह बड़का आएल अछि‍- असि‍रवाद देनि‍हारि‍। नि‍पूतरी, बाँझि‍न। गे भौंसरी, एकटा मूसोकेँ जन्मा कऽ देखही। तोरी माइकेँ।” “खबरदार, हमरा माइक नाम नै ले। पूछलीही नै अपना माएसँ। कतऽ कतऽ मुँह मारलकौ तब ने तोरा सन बेटा पैदा केलकौ। बेमरि‍याहा.......।” जागेसर ढेरूआ फेकैत लग चलि‍ गेल अछि‍। करोधसँ थरथरा रहल अछि‍। “मुँह बन्न राखबें आकि‍ देबौ चमेटा।” धर्मडीहीवालीकेँ आँखि‍ तामसे ललि‍या गेलै। उ आओर लग आबि‍ गेलै। देह अड़ि‍ कऽ बाजलि‍- “ले मार। असल बापक बेटा छी तँ मारि‍ कऽ देखही। बापसँ भेँट करबा देबो।” चटाक, चटाक। मुँहपर थप्‍पर पड़ल। “तु थप्‍पर मारलें-हमरा। आइ हम जे न से कऽ देबो। आओर बखतमे टि‍टही जकाँ पड़ल रहैत छै आ मारै कालमे कतएसँ गरमी चढ़ि‍ जाइ छै।” ओ जगेसरा ि‍दस हुड़कैत अछि‍। ओ डाँड़क डोरा आ झाँपल अंग मे लटकए चहैत अछि‍। लेकि‍न जगेसरा तँ लाठी लऽ कऽ तैयार भऽ गेल अछि‍। “नि‍कल हमरा घरसँ- छि‍नरि‍या। कोन-कोन कुकरम कऽ के तब हमरा घर अएलें। पता नै। भागबें अइठामसँ आकि‍ चलेबाै डंटा?” “ले मार। आओर मार हमरा। अहि‍ना भागि‍ जेबो तोरा सात पुरखाकेँ घि‍ना देबो। पूरा समाजमे उकैट देबो-सबकुछो।” उ कानि‍-काि‍न कऽ फाेंफि‍या रहल अछि‍। हाथ चमकाबैत जगेसराक लग सटल जा रहल अछि‍। “भगा देबही। छातीपर छि‍पाठी रोपि‍ कऽ रहबो। बहुते बल भऽ गेलो, हाथेमे। थप्‍पर मारबें।” कहैत जागेसरकेँ धकेल देलक। आसाकेँ वि‍परीत जागेसर धड़फड़ा कऽ गि‍र पड़ल आगि‍ नेस देलक- जगेसरकाकेँ। तामसे काँपैत ओ लाठी लेने उठल। “तोरी माँ की.........। आइ तोहर हड्डी तोड़ि‍ देबो। परान लऽ लेबो।” फटाक-फटाक। धर्मडीहीवालीक पीठ आर जाँघपर लाठी बरि‍स रहल अछि‍। “गे माइ गे माइ। मारि‍ देलक रेऽऽऽ। दौड़ रेऽऽऽ। कोढ़ि‍फुट्टा बेदरादा, रे लकवाबला। गे माइ, मरि‍ गेलियौ गेऽऽऽ।” दूरेसँ टोलक लोक चि‍चि‍या रहल छै। “रे जगेसरा- रूकि‍ जो। मरि‍ जेतै बेचारी। गलत बात। गाए-भैंस जकाँ पीटै छी।” “एना मारबें तँ कोनो दि‍न लंका कांड भऽ जेतौ।” “आखि‍र कोन झगड़ाकेँ नि‍पटारा नै होइ छै।” “ई औरति‍यो बड्ड झगड़ालू अछि‍। छुलही कहीं के, आबो अइठामसँ जेबें की अड़ल छँए।” लोक सभ बीच-बचाव करऽ रहल अछि‍। धर्मडीहीवाली दस पन्‍द्रह डेगपर ठाढ़ भऽ गेल अछि‍। आ ओइठामनसँ गरि‍या रहल अछि‍। “हम छुलही? झगड़ाउ? केकरा घरमे सतबरती बैसल छै? हम सबटा जानै छी। सबहक बात सुनै छी। ऐ खुनि‍या, बेदरदाक कारने। रे अनजनुआँ जनमल, देहमे कोढ़ि‍ फुटतौ रेऽऽ। हाथमे घुन लगतौ।” जागेसर गरजैत अछि‍- “ऐ बीचमे नै आबै कोइ। ई औरति‍या सनैक गेल छै। दुसमन सभ एकटा सि‍खा-पढ़ा कऽ तुल-तैयार कऽ देने छै।” कातमे ठाढ़ भेल लोक सभकेँ बाजए पड़ैत अछि‍- “हमरा बुझि‍ पड़ैत अछि‍ मरदे सभ सनकल अछि‍। दू-चारि‍ दि‍नपर एहि‍ना पि‍टाइ प्रोग्राम चलैत रहैत छै।” “पि‍टाइ नै करब तँ पूजा करू। कपारपर चढ़ा कऽ राखू।” “से कहाँ कहै छी हम। सभ कि‍छुकेँ एगो रास्‍ता होइ छै ने। आकि‍ कि‍छु बुझे ने सुझे फरमा दि‍या फाँसी।” “ठीके कहै छै। सबहक औरति‍या कोनो बाँझि‍न छै आकि‍ छुलाहीए छै, ऐँ?” औरति‍यो सभ चुप नै रहि‍ सकैत अछि‍। “हे यौ बउआ मरद भेल सोना। ओकर सभ गलती माफ। औरति‍यो भेलै टलहा। ओकर की गि‍नती छै।” “चुप रहु अहूँ तँ अपना पुतहूकेँ खोरनीसँ खांेचारैते रहै छि‍ऐ। की बजब।” “केकरापर करब सि‍ंगार-पि‍या मोरा आन्‍हरे हे...।” धि‍या-पुता कातमे डेराएल सन मुँह कएने ठाढ़ अछि‍। धर्मडीहीवाली चौबटि‍यापर ठाढ़ भऽ कऽ सात पुरखाकेँ गरि‍या रहल अछि‍। जगेसारा लाठी लऽ कऽ लेबाड़ैत अछि‍। “ठाढ़ रह भोंसरी। आइ चौबटि‍येपर बेदशा करबौ।” चोटक मोन पड़ि‍ते धर्मडीहीवाली भागैत अछि‍। पाछुसँ बाघ जकाँ गरजैत जागेसर। लोक तमाशा देख रहल अछि‍। कनेके दूर दौगलापर जागेसर हककऽ लगैत अछि। “जो अपना बापक पास। एमहर जँ घुरि‍ कऽ एबें तँ प्राण लऽ लेबौ।” कानैत-खीजैत धर्मडीहीवाली जा रहल अछि‍- नैहर दि‍स। नुआ-बस्‍तरक कोनो ठेकान नै। जेना सुइध-बुइध हेरा गेल हो। ओ कानैत अछि‍। कि‍न्‍तु भीतरसँ बोल फूटि‍ रहल अछि‍। “हमरा तँ बापसँ मोलाकात करबा देलही रे नि‍वंशा। तोरो छोड़बो नै। अठगामा मैनजन-पंच जमा कऽ देबौ- तोरा दुआरि‍पर। आठो गामक लाेकसँ थू-थू करबा देबौ।” जागेसर ओहीठाम बैस कऽ खांेखि‍या रहल अछि‍। “खों...... खों...... खों....... आक थू.....।” पता नै ओ थूक केकरापर पड़ल। समाजपर गामपर आइ स्‍थानपर, धर्मडीहीवालीपर, आकि‍ अपनहि‍ आपपर। पता नै......। कमश: ऐ रचनापर अपन मतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। ३. पद्य ३.१.रवि भूषण पाठक- मरणोपरांत ३.२.आशीष अनचिन्हार ३.३.सुनील कुमार झा- हाइकू/ शेनर्यू ३.४.राजेश मोहन झा गुंजन- परि‍वार नि‍योजन ३.५.१.जीबू कुमार झा २प्रभात राय भट्ट ३.६.नवीन कुमार आशा-अनामिका ३.७. १.किछु त हम करब शि‍वकुमार झा टि‍ल्‍लू- कवि‍ता- उनटा-पुनटा २. किशन कारीगर- किछु त हम करब ३.८.विद्यानन्द झा “विदू”- शिक्षाक मौलिकता रवि भूषण पाठक मरणोपरांत 1. कामना हुनकर मृत्युक कामना के करैत अछि जखन कि कतेको वृद्ध जवान विदा भऽ गेलाह। बिला गेलइ कतेको सरकार बन्हा गेलइ कतेको बाँध आ मिटा गेलइ बाढ़ि भूकम्पक छोट नमहर निशान । जीवनशतक तरफ अग्रसर ऐ धतालबूढ़ सँ के डराइत अछि कोन पंडित आ के कवि चऽर चांचड़ के सठ लण्ठ कत‘ के ज्योतिष आ कहिया के कहबैका परोपट्टा के पुरनिया आंगन टोल क अज्ञविज्ञ दियाद फरीक जजिमान पुरहित सेवा सँ पूतोहू आ मर्यादा सँ बेटा अपन अपन नौकरी आ बालबच्चा क पोसैत पोता नाती के धखाइत अछि बाभन कि सोलकन डीही कि भगिनमान जिरात कि नाशी गाछी कि मचान ककरा की चाही ? 2. समाचार दलान पर खोखैत रस्ता दिस देखैत छोटका बाबू कतेको गणना के असफल करैत अड़ल रहथिन्ह दोसर के दिन गुणैत जोगीभाई विजय बाबू हारि गेलाह अंदाज लगबैत डाक्टर लोकनि थाकि गेलाह आला लगबैत गौंआ घरूआ बिसरि गेलाह कि केओ वृद्ध मरणासन्न छैक बेटा पोता क सेवा जिज्ञासा क संगे जमल रहलखिन्ह छोटका बाबू । जिजीविषा क आगाँ हारि गेलाह यमराज हृदयाघात क दू-दू प्रयासक बाद पस्त भेलाह । मुदा छोटका बाबू हारि गेलाह उपेक्षा क कल्पना सँ सहि नइ सकलाह अपन रोपल फूलवाड़ी मे वृथा कांट कूश अमरबेलक लत्ती सोहराय जहरफूस ।

3.ई ब्रेकिंगन्यूज नइ अछि नब्बेपार बूढ़ क मरला मे कोन आश्चर्य कथी क दुख आ केहन असौकर्य मृत्यु क एकाधिक बेर अफवाह सँ अइ समाचार क सेंसेशन खतम रहए बेटा भतीजा पोता नाती तैयार पहिनहि सँ छुट्टी क जोगाड़ काननए पीटनए आ लोर क दिशा पहिनहि छल भ्रमित । मृतकक औदात्य ओकर मांगलिकता पर नइ भेलइ यथेष्ट चर्चा पता नइ ई कोन किसिमक कंजूसी भेलइ । 4.समाचार मिलला पर ई जत्ते अंतिम संस्कार रहए ततबे अंतिम रूढ़ि छोटका बाबू वरक गाछ जकाँ शताधिक जड़ि के समेटने छलखिन्ह तीन भाइ,पाँच बेटा चौदह जवान नाती पोताक परिवार आ भातिज क अलगे खूट पितियौत क तीनटा बेटा सेहो ततबे नजदीक जमाए भागिन बहिनोइक बात नइ पूछू एकटा महान मध्यविन्दु परिवारक गुरूत्वकेंद्रक समाप्ति पर जे जहिना छल तहिना भागल सिमरिया घाट । 5.सिमरिया घाट पर कवि दिनकर कऽ घर सँ कोस भरि पूरब चैत क्रुद्ध भ जेठ भेलइ दुखी सूर्य झुकि गेलखिन्ह गंगा मे खसब की ? दुपहरिया बालू आगि उगलति छल साबुत माटि कतहु नहि जरल लकड़ी रूइया कपड़ा हड्डी क टुकड़ा बाउल पन्नी घी क डिब्बा आ फूल चकमकिया कपड़ा जिंदगी क सब ऊंच-नीच के धकियाबैत । 6.जड़बए सँ पहिले अनुपात बिसरि गेलखिन्ह घरवारी कत्ते मून लकड़ी कत्ते घी आ कत्ते चंदन चिंता क कोनो बात नइ अस्सी पार जोगी भाइ जे कून हप्ता नइ आनैत छथिन्ह एकटा लहाश सत्तर के लगभगबैत रामाश्रय बाबू आ तहिना मजगूत जगदीश आ संतोष बिना चालीसे के शंभूपंडी जी कंे आदत भ गेलइ जरैया चिरैया गंध लेबाऽक गाँवक शताधिक व्यक्ति भऽ गेलखिन्ह म्ूाकसाक्षी अंतिम दर्शन प्रारम्भ भऽ गेलइ 7.जड़बैत काल कतेको अनुभवी भीड़ि गेलखिन्ह मचान बनऽ लागलइ अपन अपन बाप माए के जारए वला केओ केओ अपन कनिया आ भाए के एक दू टा महा अभागा जे जरेने गाड़ने रहए अपन संतान के सबक ध्यान महादाहक सफलता दिसि जोगी भाइ चेरा बिछबऽ लागलाह रामाश्रय बाबू दोहराबऽ लागलाह उठऽ जगदीश बायाँ सँ मजगूत करह रूकू संतोष पतरका चेरा उपर मे देबइ गणेश भाइ चारू खंभा ठोकऽ लागलाह गंगेश जी कहलखिन्ह मुँह पर चेरा नइ राखियौ मुखाग्नि पड़तए सुरेश जी टोकलखिन्ह मात्र विध छैक केवल सटएबाक काज चंद्रदेव भाए जीपे मे रहलाह यम के डरे वा थाकल हारे घनश्याम जी एगो के डांटि देलखिन्ह खड़ही के हाथ नइ लगाबहक औखन बड्ड काज छैक ओ अलगे रूसल “हमहूँ देखब कोना लहाश जरत!” अंतिम परिक्रमाक बाद मुखाग्नि पड़लए आ अग्नि खींचऽ लागलखिन्ह दिशांतक कोणांतक हवा सूर्यदेव माथ पर आबि गेलाह गंगाक धार प्रशांत भऽ गेलइ परिजन निश्चिंत भेलाह एकटा नवतुरिया खोललक बिस्लेरी टो टापि के शीतल जल बँटऽ लागल मुँहगर सब जुड़बऽ लागला अपन कण्ठ पेट एकाएक दछिनबरिया कोना लचि गेलइ सब एक दोसर पर बाजऽ लागलइ “हम तऽ पहिले कहैत छलियइ दछिनबरिया कोना फलाँ बाबू बनेलखिन्ह हओ बाबू आँचक दिशा बदलऽ लाबऽ पतरका चेरा संठी ढ़ैंचा घी तू ओमहर सँ बाँस भिराबह हे हे उत्तर सँ देह उघार भेलइ देखियौ तऽ हाथ पैर अकड़ि रहल छइ कि ओ आर्शीवादक हाथ छैक ? बूढ़बा अखनो तमसाइल छैक”

8.विदेहक धरती पैकबंद बोतल के फुजिते बदलि गेलइ मौसम जेना कि मृत्यु नइ कोनो जन्म क उत्सव हो विदेहक ई धरती देहक मजाक उड़बऽ लागल रंग रंगक चुटकुला हवा बसात क्षेत्रक वर्गक गामक अलग अलग अनुभव । जगह धुंएने रहए मुदा कठिहारी के यात्री नहबऽ लागला रगडि रगड़ि़ के देहांतक बात बिसरि आ दस मिनट बाद खाए लागलाह चूड़ा-दही जिलेबी पूरी गरम गरम मसाला नमक क चर्चा करैत ओएह पेटक लेल ओएह देहक लेल ऐ विदेहक धरती पर 9.ऐ सिमरिया मे मात्र देहे नइ धर्म आ धनहु क प्रति विरागक लेल तैयार रहू ऐ गंगा क माटि मे एकहि ढ़ांचा क आदमी बंाध सँ घाट तक । घाटक डोम आ पंडित सभ लोकनि एके संख्या कहताह एक हजार एक आ तहिना होटल वला नाम लियऽ अन्नपूर्णा विद्यापति मिथिला वैष्णव शंकर आदि आदि सभ मिला के एके बात एक हजार एक 10.चर्चा क विषय चर्चा क विषय ई नइ छैक कि छोटका बाबू कत्ते परहल लिखल कत्ते बड़का विद्वान ज्योतिषी केाना के पढ़ेलाह धिया पूता के कि ओ चाहैत छलाह कि पओलाह आ कि मूने रहि गेलेन्ह चर्चा ई छैक कि कोना मरलखिन के सेवा केलकए आ के अनठेलकए ककरा कि देलखिन्ह आ के कि चाहैत अछि कोना हेतए श्राद्ध आ कोना कोना भोज के सम्हारतए आ के चौकी बजारतए हरेक गौंआ घरूआ के हाथ मे छैक चित्रगुप्तक धर्मदण्ड ओ नापि तौलि रहल छैक आ आबि रहल छैक निर्णय बदलि बदलि के सब चौकस अछि के एलए के बिसरलए अएबा के कारण आ बिसरबा के बात पर भऽ रहल छैक गोल गोलैसी घिन घिन घोंघाउज । ऐ रचनापर अपन मतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। आशीष अनचिन्हार कविता १ इ कविता समस्त स्त्री लोकनिक स्वतंत्रता के समर्पित छैक। स्त्रीक अस्तित्व कतए छैक से विचार करबाक समय आब आबि गेल छैक। अंठेने कोनो काज नहि होइत छैक। स्त्री ( मैथिलानीक जय हो)। इ कविता दू खंड मे बाँटल गेल अछि। प्रत्येक खंड मे पाँच-पाँच गोट चरित्र लेल गेल अछि। त करू आस्सवादन एहि कविताक। कविता पंचसती - पंचउपसती सती खंड १ अहिल्या सूनू गौतम ओहि भोर जखन अहाँ चल गेल छलहुँ स्नान करबाक लेल आ आएल छलाह इन्द्र अहाकँ रूप धए हमर देहक लेल ओही क्षण बूझि गेल छलहुँ हम इ इन्द्र छथि मुदा इ मोने छैक सूनू गौतम हम भासि गेल रही अहाँक नजरि मे मुदा इ अर्धसत्य थिकैक सत्य त इ थिक आत्माक सर्मपण आ देहक सर्मपण दूनू फराक- फराक गप्प छैक सूनू गौतम हम आहाँके देहक सर्मपण नहि कए सकलहुँ अहाँ पाथर बना सकैत छी फेर सँ आब हमरा रामक पएरक कोनो मोह नहि सूनू गौतम ध्यान सँ सूनू ॰ २ तारा इ सत्य थिकैक सुग्रीव जे हम बालिक कनियाँ छलहुँ आ बालिक पश्चात अहाकँ इहो सत्य छैक जतबे हम बालि सँ प्रेम प्रेम करैत छलियैक ततबे अहुँ सँ करैत छी मुदा ताहू सँ बेसी इ सत्य छैक जे अहाकव मृत्युक पश्चात हम तेसरोक कनियाँ हेबैक ओकरो ओतबे प्रेम करबैक जतेक अहाँ सभ के केलहुँ करैत छी. आ इहए चक्र चलैत रहत हमरा संग त्रेतायुग सतयुग द्वापर आ कलियुग सभ युग मे ॰ ३ मंदोदरी राज्यक संग-संग विजेताक रनिवासक सेहो विस्तार होइत छैक मुदा एकर इ अर्थ नहि जे हम विभीषणक कनियाँ भए गेलियैक हँ एकर अर्थ जरूर भए सकैत छैक जे हमरा अर्थात मंदोदरी के ढ़ेप बनेबा मे कोनो कसरि बाँकी नहि छैक जँ बाँकी होइक त ओकरो स्वागत छैक हमरा दिस सँ मुदा तैओ हम विभीषणक कनियाँ नहि भए सकैत छियैक विभीषणक संग संभोगरत रहितो ॰ ४ कुंती योनि हरदम योनि होइ छैक चाहे ओ अक्षत हो वा क्षत लिंग लग इ ज्ञात करबाक कोनो साधन नहि छैक जे योनिक की अवस्था छैक इ त पुरुषक मोन छैक जे योनि के क्षत-अक्षतक खाम्ह मे बान्हि स्त्री के गुलाम बना लेलकै कर्ण के त्याग करैत काल मे हमरा लग लोक लाज छल मुदा आब नहि संतान हरदम संतान होइत छैक चाहे ओ कुमारिक होइक वा बिआहलक आब लोक लाज भय सँ मुक्त छी हम मने कुंती अर्थात कर्ण आ पांडवक माए ५ द्रौपदी जखन कोनो जीवक जिनगी पंचतत्व सँ बनि सकैत छैक त हमर सोहाग पंचपति सँ किएक नहि ? उपसती-खंड १ सीता राम विश्वामित्रक संग मिथिला अएलाह। धनुष तोरलाह। हमरा संग बिआह कएलाह। अयोध्या जा निर्वासित भेलाह। हमहू संग धेलिअन्हि। हमर अपहरण भेल। हम अग्नि-परीक्षा देलहुँ(अनावश्यक रुपेँ)। अयोध्या अएलहुँ। पुनः हमर निर्वासन भेल ( मजबूरीवश)। धरती फाटल, हम असमय प्राण त्यागलहुँ। ने त आब मिथिला अछि ने अयोध्या आ ने रामे । मुदा हम अदौ सँ निर्वासित होइत रहलहुँ । अग्नि-परीक्षा दैत रहलहुँ आ धरती मे घुसि जाइत रहलहुँ। केखनो अनावशयक रुपेँ केखनो मजबूरीवश।॰ २ अनूसूया नाम थिक हमर अनूसूया मुदा एकटा गप्प सँ हमरा असूया होइत रहल आर्यगण शूद्र स्त्री पर किएक मोहित होइत रहलाह घरक स्त्री उपेक्षित रक्त-शुद्धताक तराजू बनल बैसल इ बड्ड बादक गप्प थिक जे आर्य ललना अपन स्त्रीतत्वक रक्षाक लेल शूद्र पुरुषक सहारा लेलथि मुदाहाय रे हमर कपार हम महासती त बनि गेलहुँ मुद स्त्री नहि ॰ ३ दमयंती जंगल मे नल हमरा छोड़ि पड़ा गेलाह इ कोनो बड़का गप्प नहि जखन ओ नाङट रहथि हम अपन नूआ फाड़ि हुनक गुप्तांग झाँपल मुदा इहो कोनो बड़का गप्प नहि बड़का गप्प त इ छैक जे की मात्र पुरुषे स्त्रीक इज्जतक रक्षा कए सकैत अछि स्त्री पुरुषक नहि जँ नहि त हम कोना केलियैक ? ४ राधा अच्छर-कटुआ हमरा कृष्णक घरवाली बुझैए साक्षर कुमारि आ हम राधा एहि बिआहल आ कुमारि दूनूक अवरुद्ध धारा मे फसँल एकटा नारि मुदा अबला नहि कलियुग जँ कहिओ कदाचित् मुक्त संभोग व्यवहार मे हेतैक सादर हम स्वागत लेल तैआर रहबै ओनाहुतो इ जरुरी नहि छैक जे बिआहक बादे संभोग कएल जाए आ ने इ जरुरी छैक जे संभोगक बाद बिआह कएल जाए बिआह आ संभोग मे की संबंध छैक से विवेचना मिमांसक करताह मुदा एतबा कहबा मे कोनो संकोच नहि जकरा संग मोन नहि मानैत हो ओकरा संगक संभोग बलात्कार सँ कम नहि ॰ ५ गांधारी हमरा एक सए एक पुत्र छल अर्थात लोकक नजरि मे हमर पति हमरा संग एक सए एक बेर संभोग कएने हेताह मुदा हम जनैत छी ओ संभोग नहि बलात्कार छल एहन बलात्कार जाहि मे ने त स्त्री चिचिआ सकैत अछि आ ने केकरो कहि सकैत अछि सुनिगबाक अतिरिक्त लोक हमरा सती बुझैए एहि लेल आनहर पतिक संग बनि गेलहुँ आन्हर मुदा पट्टी बान्हल हमर आँखि मे अबैत रहल कतेक रास सपना इ केओ कोना देखत ? २ छत्तीस-चौबीस-छत्तीस कोनो बचिआ सुन्ना-सुन्ना-सुन्ना रहैत-रहैत अनचोके मे बदलि जाइत छैक छत्तीस-चौबीस-छत्तीस मे कैमरा-लाइट-एक्शन एहि तीनू मे नहाइत अछि ओ आ तखन छत्तीस के सम्हारने रहैत छैक पारदर्शी ब्रा चौबीस-छत्तीस के बिकनी संयुत्ताक्षर जकाँ ओहिकाल मे ओकरा हाथ मे रहैत छैक कोनो ने कोने वस्तु आ वस्तु सटि जाइत छैक केखनो छत्तीस मे केखनो चौबीस-छत्तीस मे आ तखने तव हमहूँ सभ बुझैत छिऐक जे वस्तु नीक छैक बंधु एकटा गप्प सत्त इमान सँ कहैत छी छत्तीस-चौबीस-छत्तीस देखलाक पछातिए तँ बुझैत छिऐक जे वस्तु णीक हएबे करतैक एकरा अबस्स किनबाक चाही ऐ रचनापर अपन मतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। सुनील कुमार झा हाइकू / शेनर्यू करियो कृपा/ करैत छि नमन/ हे छठी माई साँझक बेर/ सूर्य देव के आगांs/ जोडैत हाथ दुहि रहल/ पेट भरय लेल/ बकरी केर दूर नै ये/ बस चारि कदम/ मंजिल लेल सड़के कात/ बेचीं रहल छैक/ हाथक कला अपन गीत/ अपन वेश-भूषा/ अपन नाच नाचि रहल/ ढोल के धुन पर/ छोड़ा आ छौड़ी फेनिल पानि/ कल कल करता/ देत डूबाई स्वर्गक सीढ़ी/ बनाउ देलक ये/ विधना लेल निर्मल पानि/ शांत पड़ल छैक/ ये किछु बात धरती पर/ उतरी रहल ये/ नभ प्रकृति मोहक दॢश्य/ प्राकृतिक रचना/ इन्द्रधनुषी शेनर्यू नेता सबटा चोर/ मरय केर बाद/ बनल नेता

गिरगिट सों/ रंग बदलनाय/ सिखलक ये

मुहं में राम/ बगल में छुरी के/ करैत सिद्ध

वोटक लेल/ लगेता दाँव पर/ आँखिक लाज

सात पुश्त भी/ नेहाल भए जेता/ बनिके नेता

निगैल गेल/ सुरसा बनि केर/ सोंसे देश के

नेताक नाम/ सुनैय में लागय/ जेना गारि ये मुखिया -: चुनाव लेल पहिरे लागल ये खादी कुरता

सरपंच-: बुझायल जों महिमा चुनाव के गेल बोराय

पंच-: दारु,टका सों ख़रीदे रहल ये सबटा वोट

वार्ड-सदस्य -: चुनावी नैया पार करय लेल जोड़ैत हाथ

जनता-: पाँच साल के निकालैत छिकार ये बुधियार दादा -: नेता बनिके पहिरे लागल ये खादी कुरता

दादी-: पान चबौने नेने हाथ में लाठी घूमि रहल

बाबूजी -: धिया पुता ले रौद में दिन भरि खटैत रहे

माय -: बनि पुतौह करैत ये चाकरी अपने घोर

बहिन -: भेल जवान बियाहक आस में गिनैत दिन

भाई -: लुच्चा बनिके अंगना दुआर पे छिछियाबैत

हम -: देखि सुनि के परिवारक गाथा भेलोंउ क्षुब्ध ऐ रचनापर अपन मतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। राजेश मोहन झा गुंजन कवि‍ता परि‍वार नि‍योजन छोटका नेना बड़का नेना एतेक नेनाक कोन प्रयोजन? समाजक समस्‍या जकड़ि‍ रहल बि‍नु सफल परि‍वार नि‍योजन टुनि‍या मुनि‍या गुड़कि‍ रहल छै एकटा बौआ फुदकि‍ रहल छै फुदनी फुद-फुद फुदकि‍ रहल छै बलचनमा दही सुड़कि‍ रहल छै फुलमति‍या माइक मति‍ अछि‍ मारल कहथि‍ भगवान हमर कपाड़केँ जाड़ल कहलौं हम अहाँ देब ने दोषू आबहुँ रूकि‍ जाउ एकरा सोचू ऐ बि‍च टुनमा टाँग तोड़ौलक जखने लोड़ही मॉथ उठौलक केहेन अकि‍लपर पड़ल छै पाथर सातसँ की बढ़ाएब सत्तर जखने हाथे बाढ़नि‍ देखलौं लत्ते-फत्ते दलान पड़ेलौं पकड़ि‍ कान नै देब सजेसन बढ़बए दि‍औ एहि‍ना, पोपुलेशन। ऐ रचनापर अपन मतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। १.जीबू कुमार झा २प्रभात राय भट्ट १ जीबू कुमार झा १ शक्ति स्वरूपा माँ अम्बे, हमर छी प्रणाम, घूरि अबियौ अहाँ आब, मिथिलाक गाम। कनडेरिये अहाँ जँ, ताकियो देबै, महमहाँ भऽ उठतै, मिथिलाक गाम॥ विन्ध्यवासिनि अहाँ कहेलौं मैया, दयाक सागर अहाँ बहेलौँ मैया। क्षणहि चण्डी रूप धारण केलौंहेँ माँ। संग महिषासुरकेँ पहुँचेलौं सुरधाम।.. काली लक्ष्मी अहाँ छी वीणावादिनी, संहार करिते कहेलौं महिषमर्दिनी। आर्त भऽ हम पुकारै छी, माँ अम्बे, आब “मिथिला”क करियौ अहीं कल्याण॥ २ पहिल भेंट पहिल भेंट छी प्रियतम मिलनक ई राति यौ धीरेसँ दबायब अहाँ कोमल ई हाथ यौ पकड़ि ठेललक जखन, एहि घरमे सखि साँस फूलि गेल हमर, देखि एक अजनबी चुपचाप बैसलहुँ, हम एक कात यौ... चौकलहुँ देखि हम बढ़ल दुइ हाथ यौ धीरेसँ उठायब पिया, कोमल कली यौ देह सिहरि उठल, थर-थर काँपय छाति यौ..धीरे मूरि गोंति बैसलहुँ हुनके बगलमे पुछलनि नाम हमर, लाज भेल मोनमे धीरेसँ बजलहुँ हम “फूलकुम्मरि” यौ धीरे... हमरा छोड़ि किए अहाँ पड़िलौं यै अपने-जखने अहाँ भागि गेलौं जीवन रेखा पोति देलौं यै.. ओ सुन्दर सजल कोबर घर तै मे नव-नव कनियाँ वर पाछू-पाछू अँगुरी धेने छलौं तकरा बिचहि मोचरि देलौं यै... पहिल रातिक ओ मधुर मिलन ठोढ़ लाल ओ सजल नयन हाथ जखनहि अपन बढ़ेलौं हम अँगुरी किए तोड़ि देलौं यै.. अहाँ देखने हमर नै मोन मानै रूसि भागलौं तखन कोन ज्ञाने तखन होइत छल, जे की करी नै करी दर्दक सभ नोर पीबि गेलौं यै.. हमरा छोड़ि अहाँ... २ प्रभात राय भट्ट १ देलौ हम पेटकुनिया तिनगो बेट्टी देख कनियाँ, देलौं हम पेटकुनियां, डाक्टर कहैय अल्ट्रासाउंडमें, फेर अछि बेट्टीये  यए, बड मुस्किल स करपरत निर्वाह, कोना हयात बेट्टीक व्याह, चलू कनियाँ करादैछी एबोर्सन, हम नए लेब आब एतेक टेंसन, रूईक जाऊ!!रूईक जाऊ!!रूईक जाऊ!! मईट स जन्म लेलक सीता, करेजा स सट्लक जनक पिता, हम अहाँक कोईखक सन्तान, किया करैत छि हमर अबसान, जनक छैथ मिथिलाक पिता, बेट्टी इहाँ के सब सीता, किया करैत छि बाबा अहाँ चिंता, बेट्टा बेट्टी में नए छै कोनो भिन्ता, भैया संग हमहू स्कुल जेबई, मोन लगाक पढ़ाई करबई, डाक्टर इंजिनियर पाईलट बनबई, जगमे अहाँक नाम रोशन करबई, २ दुल्हे पीयोलक जहर व्याह क्याक पिया घर गेलौं, मोन में सुन्दर सपना सजेलौं, सासुर घरके स्वर्ग समझलौं, डोली चैढ पिया घर एलौं, हर्षित मन केकरो नए देखलौं, गिद्ध नजैर स सब हमरा देखलक, झाड़ू बारहैन स स्वागत केलक , बाप किया नए देलकौ तिलक, जरल परल जूठकुठ खियोलक, सपना सबटा भेल चकनाचूर, सास भेटल बड़ा निठुर, ठनका जिका ठंकैय ससूर, बात बात में चंडाल जिका आईंख देख्बैय भैंसुर, जेकरा साथै लेलौं सात फेरा ओहो रहैय मर स दूर, जाधैर बाप देतौने रुपैया , सूत बिछाक आँगनमें खटिया, कल्पी कल्पी केलों गोरधरिया, कतय स बाप हमर देत रुपैया, बाबु यौ हम अहाँक राजदुलारी, छालों हम म्याके प्यारी , विधाता लिखलन केहन विधना, किया रचौलक एहन रचना, नरक स बतर जीवन हम जीबैत छि, आईंखक नोर घुईट घुईट पिबैत छि, दूल्हा मगैछौ फटफटिया आ सोनाके चैन, नए देभि त छीन लेतौ हमर सुखचैन, बेट्टीक हालत देख बाप धैल्क हाथ माथ, चैन फटफटिया लक आएब हम साथ सासूर घुइर जो बेट्टी रख बापक मान, सपना भेल सबटा चकनाचूर, सास सासूर भेटल बड़ा निठुर, मालजाल जिका बन्ह्लक देवर, ननद उतारलक गहना जेवर, मुग्ड़ी स माईर माईर बडकी दियादिन देखौलक तेवर, पिजड़ा में हम फसल चीडैया, कटल रहे हमर पंख  पंखुड़िया , पकैर धकैर दुल्हे पियोलक जहर, छटपट हम छटपटएलौं  कतेक प्रहर, पत्थरके संसारमें कियो नए सुनलक हमर चीत्कार, प्राण निकलैत हम मुक्त भेलौं, छोइड दलों यी पापी संसार, ऐ रचनापर अपन मतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। नवीन कुमार आशा अनामिका .................................. साँझक समय निकली दुनु भाई छति ओ हमर छोट पर छथि हमर जिगरी / जखन जखन निकली घर से टोकियनी हुनका सदिखन सुनु यो भाई सुनु यो भाई कानो करब आइ घुमाई साझक............................../ किछु काल बाद ओ बजला चलू बुझी भौजीक  हाल बुझलो भैया भौजीक हाल ओहो ते हेती बेहाल साझक................................/ हम ओही पर बाजल सुनु यो भाई सुनु यो बोआ अहिने किछु अछी हमर हाल रति के नहि नींद आवे दिन के नहि चैन यो साझक......................................./ सुनु यो भाई सुनु यो भाई साझक कि कहू हाल मोन रहे अछी बेकल लागल रहे टकटकी  यो ६बजेक इंतज़ार मे जखन बाजे साझक ६ तखने भए जाइ हम छू साझक .............................../ गपक क्रम आगू बढ़ल आब पहुचलो चौक  पर फेर पुछला हमरा भाई और सुनाऊ अपन हाल साझक................................../ फेर उनका से कहल जहिया से पायल हुनका जिनगी भयी गेल उनटा पुन्टा साझक......................................./ एकटा आरो गप कही सुनी के जुनी हसब यो जहिया जहिया देखि हुनका बढ़ी जाए धड़कन एक बेर जे सुरु भेल फेर नहि सुने यो साझक........................................../ अनामिका अनामिका अनामिका ई शब्द सदिखन पावी दोसरक नहि ज्ञान यो जखन देखि आगू पाछु सदिखन पावी हुनके आगू साझक ........................................../ आब गप क विराम लगाके साफ़ साफ़ हम कहे छि हुनक छियानि  हम प्रिये ओ हमर प्राणप्रिये ओ हमर अनामिका मनभावन प्रीतम अनामिका साझक समय निकली .............................................../ ऐ रचनापर अपन मतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। १.किछु त हम करब शि‍वकुमार झा टि‍ल्‍लू- कवि‍ता- उनटा-पुनटा २. किशन कारीगर- किछु त हम करब १ शि‍वकुमार झा टि‍ल्‍लू कवि‍ता उनटा-पुनटा सबरी मायक सि‍नेह उनटल छन्‍हि‍, पनटि‍ गेल छथि‍- तात राम ति‍यागक मूरति‍ सि‍या बदलि‍ गेली प्रति‍ झण बदलए आठो-याम बोतल क्षीरमे नेना उबडुब पुष्‍ट वक्षक लेल अंबा अंध टाॅप पहि‍रलनि‍ यशोदा मैया कान्‍हा हेरथि‍ ऑचर गंध कक्का दलानपर रसमंजरि‍ लागल पढ़ि‍-लि‍ख पूत भेलनि‍ अधि‍कारी घूसक टाकासँ दलानकेँ छाड़ब लालबत्ती बरू भऽ जाउ कारी अन्न-पानि‍ बि‍नु बाबा मुइला भीठ बि‍का हेतनि‍ वृषोत्‍सर्ग सभ बौराएल यशोगान लेल गजि‍या शीत तप्‍पत अपवर्ग नांगरक चार चुआठ बनल ति‍रपि‍त झाकेँ भेटलनि‍ शमि‍याना गोदानक संग जौं सॉढ़ नै दागब लोकवेद सभ देत ताना पहि‍ल छायामे हमरो भेटल राहरि‍ दालि‍ संग वासमती बाबाकेँ जौं एहि‍ना खुआबि‍ति‍यनि‍ एखन नै जेता छल तट वागमी छोट परि‍वारक लेल मामी माहुर कात भेली नानी बनि‍ अपरतीप आर्य भूमि‍मे मि‍झा गेल अछि‍ संयुक्‍त परि‍वारक खहखह दीप सुकेश्वर रामक गाराक कंठी हाथ धएने धर्मक पतवार अपैत कुलमे जन्‍म की भेलनि‍? माॅथ लि‍खयलनि‍ जाति‍ चमार सुरावोरि‍ मुर्गी टांग चि‍बाकऽ वि‍वि‍ध कुलक्षणक संग राति‍ बि‍ताबथि‍ पंडि‍त वंशक कठुआएल पौरूष मास्‍टर साहेब ब्राह्मण कहाबथि‍। २ किशन कारीगर किछु त हम करब अवस्था भेल हमर आब बेसी टूघैर टूघैर हम चलब अहाँ आगू आगू हम पाछू पाछू मुदा अपना माटि पानि लेल किछु त हम करब

नुनु  बौआ अहाँ  आऊ बुचि दाय अहूँ आऊ दुनू गोटे मिली जल्दी सँ मैथिली में किछु खिस्सा सुनाऊ

नान्ही टा में बजलौहं एखनो बाजू मातृभाषा में बाजू अहाँ निधोख कनि अहाँ बाजू कनेक हम बाजब नहि बाजब त कोना बुझहत लोक

परदेश जायत मातर किछु लोग बिसैर जायत छित मातृभाषा कें अहिं बिसैर जायब त आजुक नेना कोना बुझहत कहें मीठगर स्वाद होयत अछि मातृभाषा कें

अप्पन माटि पानि अप्पन भाषा संस्कृति पूर्वज के दए गेल एकटा अनमोल धरोहर एही धरोहर के हम बंचा के राखब अपना माटी पानि लेल किछु त हम करब

कोना होयत अप्पन माटिक आर्थिक विकास सभ मिली एकटा बैसार करू कनेक सोचू सभहक अछि एकटा इ दायित्व किछु बिचार हम कहब किछु त अहूँ कहू

हमरा अहाँक किछु कर्तब्य बनैत अछि एही परम कर्तब्य सँ मुहँ नहि मोडू स्नेह रखू हृदय में सभ के गला लगाऊ अपना माटी पानि सँ लोक के जोडू

समाजक लोक अपने में फुट्बैल करैत छथि मनसुख देशी त धनसुख परदेशी एक्के समाज में रहि ऐना जुनि करू एकजुट हेबाक प्रयास आओर बेसी करू

एक भए एक दोसरक दुःख दर्द बुझहब अनको लेल किएक ने कतेको दुःख सहब आई एकटा एहने समाजक निर्माण करब जीबैत जिनगी किछु त हम करब

हाम्रो अछि एकटा सेहनता एक ठाम बैसी सभ लोक अपन भाषा में बाजब औरदा अछि आब कम मुदा जीबैत जिनगी अपना माटी पानि लेल किछु त हम करब ऐ रचनापर अपन मतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। विद्यानन्द झा “विदू” शिक्षाक मौलिकता शिक्षाक साहचर्य सऽ सम्भव विकास हटए अन्हार अज्ञानक पसरए ज्ञान प्रकाश॥ मानवक मौलिकता शिक्षा सभ्य समाजक अछि पहचान हर समाज आओर हर मानवकेँ शिक्षामे अछि बसल प्राण॥ ज्ञान आओर विज्ञानक सीमा शिक्षा सऽ अछि बढ़ि रहल छूबि सकल छी चांद गगनकेँ अनेको खोज अछि चलि रहल॥ कृषि कार्यमे हरित क्रान्ति शिक्षाक परिणाम भेल वृक्षारोपणक की महत्व अछि शिक्षा सऽ ई ज्ञान भेल॥ जीवनकेँ साकार करू शिक्षाक प्रसार करू अनपढ़ बचए ने एको मानव सब मिलि ई प्रयास करू॥ राष्ट्र समाज आओर हर मानवक ई प्रथम कर्तव्य हो बच्चा-बच्चा हो सबल ई हमर संकल्प हो॥ विकासक परिभाषा शिक्षा उत्थानक आयाम बनत मूलभूत अति आवश्यक ई सम्मानक आधार बनत॥ सुख शान्तिक श्रोत ई शिक्षा हर समाजक मान बढ़त अध्ययन-अध्यापन सऽ बच्चा-बच्चा महान बनत॥ शिक्षा तऽ अछि असीमित सरोवर चाही जते से जल भरि ली बँटला सऽ विस्तारे होयत ई मनमे विश्वास करी॥ जन-जनक हितकारी शिक्षा आउ एकर प्रसार करी धन्य करी हम अपनहुँ जीवन अहूँ किछु प्रयास करी॥ ऐ रचनापर अपन मतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। विदेह नूतन अंक मिथिला कला संगीत १.श्वेता झा चौधरी २.ज्योति सुनीत चौधरी ३.श्वेता झा (सिंगापुर) १. श्वेता झा चौधरी गाम सरिसव-पाही, ललित कला आ गृहविज्ञानमे स्नातक। मिथिला चित्रकलामे सर्टिफिकेट कोर्स। कला प्रदर्शिनी: एक्स.एल.आर.आइ., जमशेदपुरक सांस्कृतिक कार्यक्रम, ग्राम-श्री मेला जमशेदपुर, कला मन्दिर जमशेदपुर ( एक्जीवीशन आ वर्कशॉप)। कला सम्बन्धी कार्य: एन.आइ.टी. जमशेदपुरमे कला प्रतियोगितामे निर्णायकक रूपमे सहभागिता, २००२-०७ धरि बसेरा, जमशेदपुरमे कला-शिक्षक (मिथिला चित्रकला), वूमेन कॉलेज पुस्तकालय आ हॉटेल बूलेवार्ड लेल वाल-पेंटिंग। प्रतिष्ठित स्पॉन्सर: कॉरपोरेट कम्युनिकेशन्स, टिस्को; टी.एस.आर.डी.एस, टिस्को; ए.आइ.ए.डी.ए., स्टेट बैंक ऑफ इण्डिया, जमशेदपुर; विभिन्न व्यक्ति, हॉटेल, संगठन आ व्यक्तिगत कला संग्राहक। हॉबी: मिथिला चित्रकला, ललित कला, संगीत आ भानस-भात। २. ज्योति सुनीत चौधरी जन्म तिथि -३० दिसम्बर १९७८; जन्म स्थान -बेल्हवार, मधुबनी ; शिक्षा- स्वामी विवेकानन्द मि‌डिल स्कूल़ टिस्को साकची गर्ल्स हाई स्कूल़, मिसेज के एम पी एम इन्टर कालेज़, इन्दिरा गान्धी ओपन यूनिवर्सिटी, आइ सी डबल्यू ए आइ (कॉस्ट एकाउण्टेन्सी); निवास स्थान- लन्दन, यू.के.; पिता- श्री शुभंकर झा, ज़मशेदपुर; माता- श्रीमती सुधा झा, शिवीपट्टी। ज्योतिकेँwww.poetry.comसँ संपादकक चॉयस अवार्ड (अंग्रेजी पद्यक हेतु) भेटल छन्हि। हुनकर अंग्रेजी पद्य किछु दिन धरि www.poetrysoup.com केर मुख्य पृष्ठ पर सेहो रहल अछि। ज्योति मिथिला चित्रकलामे सेहो पारंगत छथि आ हिनकर मिथिला चित्रकलाक प्रदर्शनी ईलिंग आर्ट ग्रुप केर अंतर्गत ईलिंग ब्रॊडवे, लंडनमे प्रदर्शित कएल गेल अछि। कविता संग्रह ’अर्चिस्’ प्रकाशित। ३.श्वेता झा (सिंगापुर) ऐ रचनापर अपन मतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। विदेह नूतन अंक गद्य-पद्य भारती १. मोहनदास (दीर्घकथा):लेखक: उदय प्रकाश (मूल हिन्दीसँ मैथिलीमे अनुवाद विनीत उत्पल) मोहनदास (मैथिली-देवनागरी) मोहनदास (मैथिली-मिथिलाक्षर) मोहनदास (मैथिली-ब्रेल) २.छिन्नमस्ता- प्रभा खेतानक हिन्दी उपन्यासक सुशीला झा द्वारा मैथिली अनुवाद छिन्नमस्ता बालानां कृते बिपिन झा, IIT Bombay साक्षरता- बोधकथा बालानां सुखबोधाय एकटा नेना अपन बाबा सँऽ जिद्द केलक जे- “बाबा यौ हम पाठशाला जायब आ पढब!” बाबा के बड्ड मोन आह्लादित भेलन्हि। ओ कहलथि-“ कियाक नै हम आइये अहाँ के नाम लिखबा दैत छी। ओ गामे कऽ राधाकृष्ण इङ्गलिश पब्लिक स्कूल में अपन पौत्र कें नाम लिखबा देलखीन्ह। बच्चा पढबा में होशियार छल्हे सोजहे बर्षे ओ सा ते भवतु... आ बालोऽहं जगदानन्द... आदि कण्ठस्थ कय लेलक। ओकर बाद ओकरा मास्टर साहेब वर्णमाला सिखौलखीन्ह। ओ सम्पूर्ण आखर सिखिलेलक। घर आबि ओ कहलक जे- “बाबा यौ हम साक्षर भय गेलहुँ!! बाबा के बड्ड मोन प्रसन्न भेलन्हि। हुनकर बाबा बड्ड पैघ विद्वान छलखीन्ह आ शताधिक ग्रन्थ लिखने छलखीन्ह। आब ओ बाबा के  ग्रन्थालय जा के अपन बाबा द्वारा लिखल सब सँऽ मोट ग्रन्थ उठा के पन्ना पलटावय लागल। कनिकाल केर बाद ओ बाजल-“ बाबा अहाँ तऽ एहि किताब के पहिले पाँती में गल्ती लिखिने छी!! बाबा हँसय लगलाह आ कहलथि कतय? ओ बच्चा बाजल हमरा मास्टर साहेब पढेलथि जे – ’क’ केर बाद ’ख’ होइत छैक मुदा अहाँ तऽ ’क’ केर बाद ’म’ लिखिने छी! पंक्ति छल – पयसा कमलम्, कमलेन पयः। पयसा कमलेन विभाति सरः॥ बच्चा केर गप्प सुनि बाबा मन्द-मन्द मुस्कान दिय लगलथि। सोचू आ अपन टिप्पणी kumarvipin.jha@gmail.com पर पठाउ। कथा केर लेखक छथि बिपिन झा, CISTS, IIT Mumbai. ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com  पर पठाउ। बच्चा लोकनि द्वारा स्मरणीय श्लोक १.प्रातः काल ब्रह्ममुहूर्त्त (सूर्योदयक एक घंटा पहिने) सर्वप्रथम अपन दुनू हाथ देखबाक चाही, आ’ ई श्लोक बजबाक चाही। कराग्रे वसते लक्ष्मीः करमध्ये सरस्वती। करमूले स्थितो ब्रह्मा प्रभाते करदर्शनम्॥ करक आगाँ लक्ष्मी बसैत छथि, करक मध्यमे सरस्वती, करक मूलमे ब्रह्मा स्थित छथि। भोरमे ताहि द्वारे करक दर्शन करबाक थीक। २.संध्या काल दीप लेसबाक काल- दीपमूले स्थितो ब्रह्मा दीपमध्ये जनार्दनः। दीपाग्रे शङ्करः प्रोक्त्तः सन्ध्याज्योतिर्नमोऽस्तुते॥ दीपक मूल भागमे ब्रह्मा, दीपक मध्यभागमे जनार्दन (विष्णु) आऽ दीपक अग्र भागमे शङ्कर स्थित छथि। हे संध्याज्योति! अहाँकेँ नमस्कार। ३.सुतबाक काल- रामं स्कन्दं हनूमन्तं वैनतेयं वृकोदरम्। शयने यः स्मरेन्नित्यं दुःस्वप्नस्तस्य नश्यति॥ जे सभ दिन सुतबासँ पहिने राम, कुमारस्वामी, हनूमान्, गरुड़ आऽ भीमक स्मरण करैत छथि, हुनकर दुःस्वप्न नष्ट भऽ जाइत छन्हि। ४. नहेबाक समय- गङ्गे च यमुने चैव गोदावरि सरस्वति। नर्मदे सिन्धु कावेरि जलेऽस्मिन् सन्निधिं कुरू॥ हे गंगा, यमुना, गोदावरी, सरस्वती, नर्मदा, सिन्धु आऽ कावेरी  धार। एहि जलमे अपन सान्निध्य दिअ। ५.उत्तरं यत्समुद्रस्य हिमाद्रेश्चैव दक्षिणम्। वर्षं तत् भारतं नाम भारती यत्र सन्ततिः॥ समुद्रक उत्तरमे आऽ हिमालयक दक्षिणमे भारत अछि आऽ ओतुका सन्तति भारती कहबैत छथि। ६.अहल्या द्रौपदी सीता तारा मण्डोदरी तथा। पञ्चकं ना स्मरेन्नित्यं महापातकनाशकम्॥ जे सभ दिन अहल्या, द्रौपदी, सीता, तारा आऽ मण्दोदरी, एहि पाँच साध्वी-स्त्रीक स्मरण करैत छथि, हुनकर सभ पाप नष्ट भऽ जाइत छन्हि। ७.अश्वत्थामा बलिर्व्यासो हनूमांश्च विभीषणः। कृपः परशुरामश्च सप्तैते चिरञ्जीविनः॥ अश्वत्थामा, बलि, व्यास, हनूमान्, विभीषण, कृपाचार्य आऽ परशुराम- ई सात टा चिरञ्जीवी कहबैत छथि। ८.साते भवतु सुप्रीता देवी शिखर वासिनी उग्रेन तपसा लब्धो यया पशुपतिः पतिः। सिद्धिः साध्ये सतामस्तु प्रसादान्तस्य धूर्जटेः जाह्नवीफेनलेखेव यन्यूधि शशिनः कला॥ ९. बालोऽहं जगदानन्द न मे बाला सरस्वती। अपूर्णे पंचमे वर्षे वर्णयामि जगत्त्रयम् ॥ १०. दूर्वाक्षत मंत्र(शुक्ल यजुर्वेद अध्याय २२, मंत्र २२) आ ब्रह्मन्नित्यस्य प्रजापतिर्ॠषिः। लिंभोक्त्ता देवताः। स्वराडुत्कृतिश्छन्दः। षड्जः स्वरः॥ आ ब्रह्म॑न् ब्राह्म॒णो ब्र॑ह्मवर्च॒सी जा॑यता॒मा रा॒ष्ट्रे रा॑ज॒न्यः शुरे॑ऽइषव्यो॒ऽतिव्या॒धी म॑हार॒थो जा॑यतां॒ दोग्ध्रीं धे॒नुर्वोढा॑न॒ड्वाना॒शुः सप्तिः॒ पुर॑न्धि॒र्योवा॑ जि॒ष्णू र॑थे॒ष्ठाः स॒भेयो॒ युवास्य यज॑मानस्य वी॒रो जा॒यतां निका॒मे-नि॑कामे नः प॒र्जन्यों वर्षतु॒ फल॑वत्यो न॒ऽओष॑धयः पच्यन्तां योगेक्ष॒मो नः॑ कल्पताम्॥२२॥ मन्त्रार्थाः सिद्धयः सन्तु पूर्णाः सन्तु मनोरथाः। शत्रूणां बुद्धिनाशोऽस्तु मित्राणामुदयस्तव। ॐ दीर्घायुर्भव। ॐ सौभाग्यवती भव। हे भगवान्। अपन देशमे सुयोग्य आ’ सर्वज्ञ विद्यार्थी उत्पन्न होथि, आ’ शुत्रुकेँ नाश कएनिहार सैनिक उत्पन्न होथि। अपन देशक गाय खूब दूध दय बाली, बरद भार वहन करएमे सक्षम होथि आ’ घोड़ा त्वरित रूपेँ दौगय बला होए। स्त्रीगण नगरक नेतृत्व करबामे सक्षम होथि आ’ युवक सभामे ओजपूर्ण भाषण देबयबला आ’ नेतृत्व देबामे सक्षम होथि। अपन देशमे जखन आवश्यक होय वर्षा होए आ’ औषधिक-बूटी सर्वदा परिपक्व होइत रहए। एवं क्रमे सभ तरहेँ हमरा सभक कल्याण होए। शत्रुक बुद्धिक नाश होए आ’ मित्रक उदय होए॥ मनुष्यकें कोन वस्तुक इच्छा करबाक चाही तकर वर्णन एहि मंत्रमे कएल गेल अछि। एहिमे वाचकलुप्तोपमालड़्कार अछि। अन्वय- ब्रह्म॑न् - विद्या आदि गुणसँ परिपूर्ण ब्रह्म रा॒ष्ट्रे - देशमे ब्र॑ह्मवर्च॒सी-ब्रह्म विद्याक तेजसँ युक्त्त आ जा॑यतां॒- उत्पन्न होए रा॑ज॒न्यः-राजा शुरे॑ऽ–बिना डर बला इषव्यो॒- बाण चलेबामे निपुण ऽतिव्या॒धी-शत्रुकेँ तारण दय बला म॑हार॒थो-पैघ रथ बला वीर दोग्ध्रीं-कामना(दूध पूर्ण करए बाली) धे॒नुर्वोढा॑न॒ड्वाना॒शुः धे॒नु-गौ वा वाणी र्वोढा॑न॒ड्वा- पैघ बरद ना॒शुः-आशुः-त्वरित सप्तिः॒-घोड़ा पुर॑न्धि॒र्योवा॑- पुर॑न्धि॒- व्यवहारकेँ धारण करए बाली र्योवा॑-स्त्री जि॒ष्णू-शत्रुकेँ जीतए बला र॑थे॒ष्ठाः-रथ पर स्थिर स॒भेयो॒-उत्तम सभामे युवास्य-युवा जेहन यज॑मानस्य-राजाक राज्यमे वी॒रो-शत्रुकेँ पराजित करएबला निका॒मे-नि॑कामे-निश्चययुक्त्त कार्यमे नः-हमर सभक प॒र्जन्यों-मेघ वर्षतु॒-वर्षा होए फल॑वत्यो-उत्तम फल बला ओष॑धयः-औषधिः पच्यन्तां- पाकए योगेक्ष॒मो-अलभ्य लभ्य करेबाक हेतु कएल गेल योगक रक्षा नः॑-हमरा सभक हेतु कल्पताम्-समर्थ होए ग्रिफिथक अनुवाद- हे ब्रह्मण, हमर राज्यमे ब्राह्मण नीक धार्मिक विद्या बला, राजन्य-वीर,तीरंदाज, दूध दए बाली गाय, दौगय बला जन्तु, उद्यमी नारी होथि। पार्जन्य आवश्यकता पड़ला पर वर्षा देथि, फल देय बला गाछ पाकए, हम सभ संपत्ति अर्जित/संरक्षित करी। 8.VIDEHA FOR NON RESIDENTS 8.VIDEHA FOR NON RESIDENTS 8.1 to 8.3 MAITHILI LITERATURE IN ENGLISH 8.1.1.The Comet   -GAJENDRA THAKUR translated by Jyoti Jha chaudhary 8.1.2.The_Science_of_Words- GAJENDRA THAKUR translated by the author himself 8.1.3.On_the_dice-board_of_the_millennium- GAJENDRA THAKUR translated by Jyoti Jha chaudhary 8.1.4.NAAGPHANS (IN ENGLISH)- SHEFALIKA VERMA translated by Dr. Rajiv Kumar Verma and Dr. Jaya Verma 8.2.1.Episodes Of The Life - ("Kist-Kist Jeevan" by Smt. shefalika Varma translated into English by Smt. Jyoti Jha Chaudhary )  2.Original Poem in Maithili by Kalikant Jha "Buch" Translated into English by Jyoti Jha Chaudhary 1. Episodes Of The Life - ("Kist-Kist Jeevan" by Smt. shefalika Varma translated into English by Smt. Jyoti Jha Chaudhary )  2.Original Poem in Maithili by Kalikant Jha "Buch" Translated into English by Jyoti Jha Chaudhary १ Episodes Of The Life - ("Kist-Kist Jeevan" by Smt. shefalika Varma translated into English by Smt. Jyoti Jha Chaudhary ) Shefalika Verma has written two outstanding books in Maithili; one a book of poems titled “BHAVANJALI”, and the other, a book of short stories titled “YAYAVARI”. Her Maithili Books have been translated into many languages including Hindi, English, Oriya, Gujarati, Dogri and others. She is frequently invited to the India Poetry Recital Festivals as her fans and friends are important people.

Translator:Jyoti Jha Chaudhary, Date of Birth: December 30 1978,Place of Birth- Belhvar (Madhubani District), Education: Swami Vivekananda Middle School, Tisco Sakchi Girls High School, Mrs KMPM Inter College, IGNOU, ICWAI (COST ACCOUNTANCY); Residence- LONDON, UK; Father- Sh. Shubhankar Jha, Jamshedpur; Mother- Smt. Sudha Jha- Shivipatti. Jyoti received editor's choice award from www.poetry.comand her poems were featured in front page of www.poetrysoup.com for some period.She learnt Mithila Painting under Ms. Shveta Jha, Basera Institute, Jamshedpur and Fine Arts from Toolika, Sakchi, Jamshedpur (India). Her Mithila Paintings have been displayed by Ealing Art Group at Ealing Broadway, London."ARCHIS"- COLLECTION OF MAITHILI HAIKUS AND POEMS. Episodes Of The Life : Preface: An autobiography is not merely a story of a life but this rotates around the chronology of philosophical thoughts, ideological revolutions and the ups and downs of the emotions. This is also an analysis of a situation. For writing a full autobiography, even if the entire land on the Earth becomes the paper and the oceans become the ink, the story would remain incomplete. In this way the ‘Episodes of the Life’ was written in six to seven hundreds of pages. I had never thought about its publishing. Suddenly, the five headed moon emerged in the treasure of the nature. Pressure for the publishing arose. I was requested to summarise the story. In this process, where someone left, where I missed some event, I left all these to be judged by the readers. I am not a role model whose autobiography would be desired by the readers, neither am I a litterateur to know whom, people would be enthusiastic. This is a story of a very emotional ordinary girl who, although, born and brought up in the facility and luxury of a city life, rendered her duty regarding family, social and traditional front in the orthodoxy of village-life with her utmost patience. How she could at least reach the doorway of the Maithili literature. How the earth is filled three fourth with water and one fourth with land,  likewise, my life is also filled three fourth with emotions and imaginations and one fourth with the reality -  but apart from all these, my whole life is made up of compromises and adjustments with situation, family and society. (to be continued..................) २ Kalikant Jha "Buch" 1934-2009, Birth place- village Karian, District- Samastipur (Karian is birth place of famous Indian Nyaiyyayik philosopher Udayanacharya), Father Late Pt. Rajkishor Jha was first headmaster of village middle school. Mother Late Kala Devi was housewife. After completing Intermediate education started job block office of Govt. of Bihar.published in Mithila Mihir, Mati-pani, Bhakha, and Maithili Akademi magazine. Jyoti Jha Chaudhary, Date of Birth: December 30 1978,Place of Birth- Belhvar (Madhubani District), Education: Swami Vivekananda Middle School, Tisco Sakchi Girls High School, Mrs KMPM Inter College, IGNOU, ICWAI (COST ACCOUNTANCY); Residence- LONDON, UK; Father- Sh. Shubhankar Jha, Jamshedpur; Mother- Smt. Sudha Jha- Shivipatti. Jyoti received editor's choice award from www.poetry.comand her poems were featured in front page of www.poetrysoup.com for some period.She learnt Mithila Painting under Ms. Shveta Jha, Basera Institute, Jamshedpur and Fine Arts from Toolika, Sakchi, Jamshedpur (India). Her Mithila Paintings have been displayed by Ealing Art Group at Ealing Broadway, London. The Race Of Blinds The girl having ugly nose gets married One having beautiful eyes remains unmarried Look at the trend of the urban life This is a race of blinds The fair of marriages in the villages The groom has become a calf or a bull Own granddad is merchandising Father is shaking his empty wallet The more one has money the more he gets significance Look at the trend of the urban life This is a race of blinds Those boys are the costliest among all Who have medical and engineering degree Tying the price tag in the neck Showing their false status The less wealthy college students have also high prices Look at the trend of the urban life This is a race of blinds How much I describe you the glory of the money Many are born from money Knowledge and prudence is not valued One who has money is spotless Mother-in-law is cheap, daughter-in-law is heroin The sister-in-law is a shopping spree Look at the trend of the urban life This is a race of blinds Even though you are a gentle man And your daughter is beautiful and well deserving The groom’s family will not accept this If your materialistic possession is empty The cat goes to the kohwar and the beauty is at the door Look at the trend of the urban life This is a race of blinds Everyone talks about dowry free marriage But stays away when this is their turn For fixing the dowry even a poor counts high At the time of giving that much the rich fails Where maithil is born the house is turned to be a cremation Look at the trend of the urban life This is a race of blinds In the basket of parents’ house and in-law’s house A girl is rolling like an aubergine With the chapatti of complains She swallows the curry of tears In the in-laws place and the parent’s house she had always been abused Look at the trend of the urban life This is a race of blinds Send your comments to ggajendra@videha.com Input: (कोष्ठकमे देवनागरी, मिथिलाक्षर किंवा फोनेटिक-रोमनमे टाइप करू। Input in Devanagari, Mithilakshara or Phonetic-Roman.) Output: (परिणाम देवनागरी, मिथिलाक्षर आ फोनेटिक-रोमन/ रोमनमे। Result in Devanagari, Mithilakshara and Phonetic-Roman/ Roman.) English to Maithili Maithili to English इंग्लिश-मैथिली-कोष / मैथिली-इंग्लिश-कोष  प्रोजेक्टकेँ आगू बढ़ाऊ, अपन सुझाव आ योगदान ई-मेल द्वारा ggajendra@videha.com पर पठाऊ। Top of Form विदेहक मैथिली-अंग्रेजी आ अंग्रेजी मैथिली कोष (इंटरनेटपर पहिल बेर सर्च-डिक्शनरी) एम.एस. एस.क्यू.एल. सर्वर आधारित -Based on ms-sql server Maithili-English and English-Maithili Dictionary. १.भारत आ नेपालक मैथिली भाषा-वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक शैली आ २.मैथिलीमे भाषा सम्पादन पाठ्यक्रम १.नेपाल आ भारतक मैथिली भाषा-वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक शैली

१.१. नेपालक मैथिली भाषा वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक  उच्चारण आ लेखन शैली (भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक धारणाकेँ पूर्ण रूपसँ सङ्ग लऽ निर्धारित) मैथिलीमे उच्चारण तथा लेखन १.पञ्चमाक्षर आ अनुस्वार: पञ्चमाक्षरान्तर्गत ङ, ञ, ण, न एवं म अबैत अछि। संस्कृत भाषाक अनुसार शब्दक अन्तमे जाहि वर्गक अक्षर रहैत अछि ओही वर्गक पञ्चमाक्षर अबैत अछि। जेना- अङ्क (क वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ङ् आएल अछि।) पञ्च (च वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ञ् आएल अछि।) खण्ड (ट वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ण् आएल अछि।) सन्धि (त वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे न् आएल अछि।) खम्भ (प वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे म् आएल अछि।) उपर्युक्त बात मैथिलीमे कम देखल जाइत अछि। पञ्चमाक्षरक बदलामे अधिकांश जगहपर अनुस्वारक प्रयोग देखल जाइछ। जेना- अंक, पंच, खंड, संधि, खंभ आदि। व्याकरणविद पण्डित गोविन्द झाक कहब छनि जे कवर्ग, चवर्ग आ टवर्गसँ पूर्व अनुस्वार लिखल जाए तथा तवर्ग आ पवर्गसँ पूर्व पञ्चमाक्षरे लिखल जाए। जेना- अंक, चंचल, अंडा, अन्त तथा कम्पन। मुदा हिन्दीक निकट रहल आधुनिक लेखक एहि बातकेँ नहि मानैत छथि। ओ लोकनि अन्त आ कम्पनक जगहपर सेहो अंत आ कंपन लिखैत देखल जाइत छथि। नवीन पद्धति किछु सुविधाजनक अवश्य छैक। किएक तँ एहिमे समय आ स्थानक बचत होइत छैक। मुदा कतोक बेर हस्तलेखन वा मुद्रणमे अनुस्वारक छोट सन बिन्दु स्पष्ट नहि भेलासँ अर्थक अनर्थ होइत सेहो देखल जाइत अछि। अनुस्वारक प्रयोगमे उच्चारण-दोषक सम्भावना सेहो ततबए देखल जाइत अछि। एतदर्थ कसँ लऽ कऽ पवर्ग धरि पञ्चमाक्षरेक प्रयोग करब उचित अछि। यसँ लऽ कऽ ज्ञ धरिक अक्षरक सङ्ग अनुस्वारक प्रयोग करबामे कतहु कोनो विवाद नहि देखल जाइछ। २.ढ आ ढ़ : ढ़क उच्चारण “र् ह”जकाँ होइत अछि। अतः जतऽ “र् ह”क उच्चारण हो ओतऽ मात्र ढ़ लिखल जाए। आन ठाम खाली ढ लिखल जएबाक चाही। जेना- ढ = ढाकी, ढेकी, ढीठ, ढेउआ, ढङ्ग, ढेरी, ढाकनि, ढाठ आदि। ढ़ = पढ़ाइ, बढ़ब, गढ़ब, मढ़ब, बुढ़बा, साँढ़, गाढ़, रीढ़, चाँढ़, सीढ़ी, पीढ़ी आदि। उपर्युक्त शब्द सभकेँ देखलासँ ई स्पष्ट होइत अछि जे साधारणतया शब्दक शुरूमे ढ आ मध्य तथा अन्तमे ढ़ अबैत अछि। इएह नियम ड आ ड़क सन्दर्भ सेहो लागू होइत अछि। ३.व आ ब : मैथिलीमे “व”क उच्चारण ब कएल जाइत अछि, मुदा ओकरा ब रूपमे नहि लिखल जएबाक चाही। जेना- उच्चारण : बैद्यनाथ, बिद्या, नब, देबता, बिष्णु, बंश, बन्दना आदि। एहि सभक स्थानपर क्रमशः वैद्यनाथ, विद्या, नव, देवता, विष्णु, वंश, वन्दना लिखबाक चाही। सामान्यतया व उच्चारणक लेल ओ प्रयोग कएल जाइत अछि। जेना- ओकील, ओजह आदि। ४.य आ ज : कतहु-कतहु “य”क उच्चारण “ज”जकाँ करैत देखल जाइत अछि, मुदा ओकरा ज नहि लिखबाक चाही। उच्चारणमे यज्ञ, जदि, जमुना, जुग, जाबत, जोगी, जदु, जम आदि कहल जाएबला शब्द सभकेँ क्रमशः यज्ञ, यदि, यमुना, युग, यावत, योगी, यदु, यम लिखबाक चाही। ५.ए आ य : मैथिलीक वर्तनीमे ए आ य दुनू लिखल जाइत अछि। प्राचीन वर्तनी- कएल, जाए, होएत, माए, भाए, गाए आदि। नवीन वर्तनी- कयल, जाय, होयत, माय, भाय, गाय आदि। सामान्यतया शब्दक शुरूमे ए मात्र अबैत अछि। जेना एहि, एना, एकर, एहन आदि। एहि शब्द सभक स्थानपर यहि, यना, यकर, यहन आदिक प्रयोग नहि करबाक चाही। यद्यपि मैथिलीभाषी थारू सहित किछु जातिमे शब्दक आरम्भोमे “ए”केँ य कहि उच्चारण कएल जाइत अछि। ए आ “य”क प्रयोगक सन्दर्भमे प्राचीने पद्धतिक अनुसरण करब उपयुक्त मानि एहि पुस्तकमे ओकरे प्रयोग कएल गेल अछि। किएक तँ दुनूक लेखनमे कोनो सहजता आ दुरूहताक बात नहि अछि। आ मैथिलीक सर्वसाधारणक उच्चारण-शैली यक अपेक्षा एसँ बेसी निकट छैक। खास कऽ कएल, हएब आदि कतिपय शब्दकेँ कैल, हैब आदि रूपमे कतहु-कतहु लिखल जाएब सेहो “ए”क प्रयोगकेँ बेसी समीचीन प्रमाणित करैत अछि। ६.हि, हु तथा एकार, ओकार : मैथिलीक प्राचीन लेखन-परम्परामे कोनो बातपर बल दैत काल शब्दक पाछाँ हि, हु लगाओल जाइत छैक। जेना- हुनकहि, अपनहु, ओकरहु, तत्कालहि, चोट्टहि, आनहु आदि। मुदा आधुनिक लेखनमे हिक स्थानपर एकार एवं हुक स्थानपर ओकारक प्रयोग करैत देखल जाइत अछि। जेना- हुनके, अपनो, तत्काले, चोट्टे, आनो आदि। ७.ष तथा ख : मैथिली भाषामे अधिकांशतः षक उच्चारण ख होइत अछि। जेना- षड्यन्त्र (खड़यन्त्र), षोडशी (खोड़शी), षट्कोण (खटकोण), वृषेश (वृखेश), सन्तोष (सन्तोख) आदि। ८.ध्वनि-लोप : निम्नलिखित अवस्थामे शब्दसँ ध्वनि-लोप भऽ जाइत अछि: (क) क्रियान्वयी प्रत्यय अयमे य वा ए लुप्त भऽ जाइत अछि। ओहिमे सँ पहिने अक उच्चारण दीर्घ भऽ जाइत अछि। ओकर आगाँ लोप-सूचक चिह्न वा विकारी (’ / ऽ) लगाओल जाइछ। जेना- पूर्ण रूप : पढ़ए (पढ़य) गेलाह, कए (कय) लेल, उठए (उठय) पड़तौक। अपूर्ण रूप : पढ़’ गेलाह, क’ लेल, उठ’ पड़तौक। पढ़ऽ गेलाह, कऽ लेल, उठऽ पड़तौक। (ख) पूर्वकालिक कृत आय (आए) प्रत्ययमे य (ए) लुप्त भऽ जाइछ, मुदा लोप-सूचक विकारी नहि लगाओल जाइछ। जेना- पूर्ण रूप : खाए (य) गेल, पठाय (ए) देब, नहाए (य) अएलाह। अपूर्ण रूप : खा गेल, पठा देब, नहा अएलाह। (ग) स्त्री प्रत्यय इक उच्चारण क्रियापद, संज्ञा, ओ विशेषण तीनूमे लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना- पूर्ण रूप : दोसरि मालिनि चलि गेलि। अपूर्ण रूप : दोसर मालिन चलि गेल। (घ) वर्तमान कृदन्तक अन्तिम त लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना- पूर्ण रूप : पढ़ैत अछि, बजैत अछि, गबैत अछि। अपूर्ण रूप : पढ़ै अछि, बजै अछि, गबै अछि। (ङ) क्रियापदक अवसान इक, उक, ऐक तथा हीकमे लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना- पूर्ण रूप: छियौक, छियैक, छहीक, छौक, छैक, अबितैक, होइक। अपूर्ण रूप : छियौ, छियै, छही, छौ, छै, अबितै, होइ। (च) क्रियापदीय प्रत्यय न्ह, हु तथा हकारक लोप भऽ जाइछ। जेना- पूर्ण रूप : छन्हि, कहलन्हि, कहलहुँ, गेलह, नहि। अपूर्ण रूप : छनि, कहलनि, कहलौँ, गेलऽ, नइ, नञि, नै। ९.ध्वनि स्थानान्तरण : कोनो-कोनो स्वर-ध्वनि अपना जगहसँ हटि कऽ दोसर ठाम चलि जाइत अछि। खास कऽ ह्रस्व इ आ उक सम्बन्धमे ई बात लागू होइत अछि। मैथिलीकरण भऽ गेल शब्दक मध्य वा अन्तमे जँ ह्रस्व इ वा उ आबए तँ ओकर ध्वनि स्थानान्तरित भऽ एक अक्षर आगाँ आबि जाइत अछि। जेना- शनि (शइन), पानि (पाइन), दालि ( दाइल), माटि (माइट), काछु (काउछ), मासु (माउस) आदि। मुदा तत्सम शब्द सभमे ई निअम लागू नहि होइत अछि। जेना- रश्मिकेँ रइश्म आ सुधांशुकेँ सुधाउंस नहि कहल जा सकैत अछि। १०.हलन्त(्)क प्रयोग : मैथिली भाषामे सामान्यतया हलन्त (्)क आवश्यकता नहि होइत अछि। कारण जे शब्दक अन्तमे अ उच्चारण नहि होइत अछि। मुदा संस्कृत भाषासँ जहिनाक तहिना मैथिलीमे आएल (तत्सम) शब्द सभमे हलन्त प्रयोग कएल जाइत अछि। एहि पोथीमे सामान्यतया सम्पूर्ण शब्दकेँ मैथिली भाषा सम्बन्धी निअम अनुसार हलन्तविहीन राखल गेल अछि। मुदा व्याकरण सम्बन्धी प्रयोजनक लेल अत्यावश्यक स्थानपर कतहु-कतहु हलन्त देल गेल अछि। प्रस्तुत पोथीमे मथिली लेखनक प्राचीन आ नवीन दुनू शैलीक सरल आ समीचीन पक्ष सभकेँ समेटि कऽ वर्ण-विन्यास कएल गेल अछि। स्थान आ समयमे बचतक सङ्गहि हस्त-लेखन तथा तकनीकी दृष्टिसँ सेहो सरल होबऽबला हिसाबसँ वर्ण-विन्यास मिलाओल गेल अछि। वर्तमान समयमे मैथिली मातृभाषी पर्यन्तकेँ आन भाषाक माध्यमसँ मैथिलीक ज्ञान लेबऽ पड़ि रहल परिप्रेक्ष्यमे लेखनमे सहजता तथा एकरूपतापर ध्यान देल गेल अछि। तखन मैथिली भाषाक मूल विशेषता सभ कुण्ठित नहि होइक, ताहू दिस लेखक-मण्डल सचेत अछि। प्रसिद्ध भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक कहब छनि जे सरलताक अनुसन्धानमे एहन अवस्था किन्नहु ने आबऽ देबाक चाही जे भाषाक विशेषता छाँहमे पडि जाए। -(भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक धारणाकेँ पूर्ण रूपसँ सङ्ग लऽ निर्धारित) १.२. मैथिली अकादमी, पटना द्वारा निर्धारित मैथिली लेखन-शैली

१. जे शब्द मैथिली-साहित्यक प्राचीन कालसँ आइ धरि जाहि वर्त्तनीमे प्रचलित अछि, से सामान्यतः ताहि वर्त्तनीमे लिखल जाय- उदाहरणार्थ-

ग्राह्य

एखन ठाम जकर, तकर तनिकर अछि

अग्राह्य अखन, अखनि, एखेन, अखनी ठिमा, ठिना, ठमा जेकर, तेकर तिनकर। (वैकल्पिक रूपेँ ग्राह्य) ऐछ, अहि, ए।

२. निम्नलिखित तीन प्रकारक रूप वैकल्पिकतया अपनाओल जाय: भऽ गेल, भय गेल वा भए गेल। जा रहल अछि, जाय रहल अछि, जाए रहल अछि। कर’ गेलाह, वा करय गेलाह वा करए गेलाह।

३. प्राचीन मैथिलीक ‘न्ह’ ध्वनिक स्थानमे ‘न’ लिखल जाय सकैत अछि यथा कहलनि वा कहलन्हि।

४. ‘ऐ’ तथा ‘औ’ ततय लिखल जाय जत’ स्पष्टतः ‘अइ’ तथा ‘अउ’ सदृश उच्चारण इष्ट हो। यथा- देखैत, छलैक, बौआ, छौक इत्यादि।

५. मैथिलीक निम्नलिखित शब्द एहि रूपे प्रयुक्त होयत: जैह, सैह, इएह, ओऐह, लैह तथा दैह।

६. ह्र्स्व इकारांत शब्दमे ‘इ’ के लुप्त करब सामान्यतः अग्राह्य थिक। यथा- ग्राह्य देखि आबह, मालिनि गेलि (मनुष्य मात्रमे)।

७. स्वतंत्र ह्रस्व ‘ए’ वा ‘य’ प्राचीन मैथिलीक उद्धरण आदिमे तँ यथावत राखल जाय, किंतु आधुनिक प्रयोगमे वैकल्पिक रूपेँ ‘ए’ वा ‘य’ लिखल जाय। यथा:- कयल वा कएल, अयलाह वा अएलाह, जाय वा जाए इत्यादि।

८. उच्चारणमे दू स्वरक बीच जे ‘य’ ध्वनि स्वतः आबि जाइत अछि तकरा लेखमे स्थान वैकल्पिक रूपेँ देल जाय। यथा- धीआ, अढ़ैआ, विआह, वा धीया, अढ़ैया, बियाह।

९. सानुनासिक स्वतंत्र स्वरक स्थान यथासंभव ‘ञ’ लिखल जाय वा सानुनासिक स्वर। यथा:- मैञा, कनिञा, किरतनिञा वा मैआँ, कनिआँ, किरतनिआँ।

१०. कारकक विभक्त्तिक निम्नलिखित रूप ग्राह्य:- हाथकेँ, हाथसँ, हाथेँ, हाथक, हाथमे। ’मे’ मे अनुस्वार सर्वथा त्याज्य थिक। ‘क’ क वैकल्पिक रूप ‘केर’ राखल जा सकैत अछि।

११. पूर्वकालिक क्रियापदक बाद ‘कय’ वा ‘कए’ अव्यय वैकल्पिक रूपेँ लगाओल जा सकैत अछि। यथा:- देखि कय वा देखि कए।

१२. माँग, भाँग आदिक स्थानमे माङ, भाङ इत्यादि लिखल जाय।

१३. अर्द्ध ‘न’ ओ अर्द्ध ‘म’ क बदला अनुसार नहि लिखल जाय, किंतु छापाक सुविधार्थ अर्द्ध ‘ङ’ , ‘ञ’, तथा ‘ण’ क बदला अनुस्वारो लिखल जा सकैत अछि। यथा:- अङ्क, वा अंक, अञ्चल वा अंचल, कण्ठ वा कंठ।

१४. हलंत चिह्न निअमतः लगाओल जाय, किंतु विभक्तिक संग अकारांत प्रयोग कएल जाय। यथा:- श्रीमान्, किंतु श्रीमानक।

१५. सभ एकल कारक चिह्न शब्दमे सटा क’ लिखल जाय, हटा क’ नहि, संयुक्त विभक्तिक हेतु फराक लिखल जाय, यथा घर परक।

१६. अनुनासिककेँ चन्द्रबिन्दु द्वारा व्यक्त कयल जाय। परंतु मुद्रणक सुविधार्थ हि समान जटिल मात्रापर अनुस्वारक प्रयोग चन्द्रबिन्दुक बदला कयल जा सकैत अछि। यथा- हिँ केर बदला हिं।

१७. पूर्ण विराम पासीसँ ( । ) सूचित कयल जाय।

१८. समस्त पद सटा क’ लिखल जाय, वा हाइफेनसँ जोड़ि क’ ,  हटा क’ नहि।

१९. लिअ तथा दिअ शब्दमे बिकारी (ऽ) नहि लगाओल जाय।

२०. अंक देवनागरी रूपमे राखल जाय।

२१.किछु ध्वनिक लेल नवीन चिन्ह बनबाओल जाय। जा' ई नहि बनल अछि ताबत एहि दुनू ध्वनिक बदला पूर्ववत् अय/ आय/ अए/ आए/ आओ/ अओ लिखल जाय। आकि ऎ वा ऒ सँ व्यक्त कएल जाय।

ह./- गोविन्द झा ११/८/७६ श्रीकान्त ठाकुर ११/८/७६ सुरेन्द्र झा "सुमन" ११/०८/७६

  २. मैथिलीमे भाषा सम्पादन पाठ्यक्रम २.१. उच्चारण निर्देश: (बोल्ड कएल रूप ग्राह्य):- दन्त न क उच्चारणमे दाँतमे जीह सटत- जेना बाजू नाम , मुदा ण क उच्चारणमे जीह मूर्धामे सटत (नै सटैए तँ उच्चारण दोष अछि)- जेना बाजू गणेश। तालव्य शमे जीह तालुसँ , षमे मूर्धासँ आ दन्त समे दाँतसँ सटत। निशाँ, सभ आ शोषण बाजि कऽ देखू। मैथिलीमे ष केँ वैदिक संस्कृत जकाँ ख सेहो उच्चरित कएल जाइत अछि, जेना वर्षा, दोष। य अनेको स्थानपर ज जकाँ उच्चरित होइत अछि आ ण ड़ जकाँ (यथा संयोग आ गणेश संजोग आ गड़ेस उच्चरित होइत अछि)। मैथिलीमे व क उच्चारण ब, श क उच्चारण स आ य क उच्चारण ज सेहो होइत अछि। ओहिना ह्रस्व इ बेशीकाल मैथिलीमे पहिने बाजल जाइत अछि कारण देवनागरीमे आ मिथिलाक्षरमे ह्रस्व इ अक्षरक पहिने लिखलो जाइत आ बाजलो जएबाक चाही। कारण जे हिन्दीमे एकर दोषपूर्ण उच्चारण होइत अछि (लिखल तँ पहिने जाइत अछि मुदा बाजल बादमे जाइत अछि), से शिक्षा पद्धतिक दोषक कारण हम सभ ओकर उच्चारण दोषपूर्ण ढंगसँ कऽ रहल छी। अछि- अ इ छ  ऐछ (उच्चारण) छथि- छ इ थ  – छैथ (उच्चारण) पहुँचि- प हुँ इ च (उच्चारण) आब अ आ इ ई ए ऐ ओ औ अं अः ऋ ऐ सभ लेल मात्रा सेहो अछि, मुदा ऐमे ई ऐ ओ औ अं अः ऋ केँ संयुक्ताक्षर रूपमे गलत रूपमे प्रयुक्त आ उच्चरित कएल जाइत अछि। जेना ऋ केँ री  रूपमे उच्चरित करब। आ देखियौ- ऐ लेल देखिऔ क प्रयोग अनुचित। मुदा देखिऐ लेल देखियै अनुचित। क् सँ ह् धरि अ सम्मिलित भेलासँ क सँ ह बनैत अछि, मुदा उच्चारण काल हलन्त युक्त शब्दक अन्तक उच्चारणक प्रवृत्ति बढ़ल अछि, मुदा हम जखन मनोजमे ज् अन्तमे बजैत छी, तखनो पुरनका लोककेँ बजैत सुनबन्हि- मनोजऽ, वास्तवमे ओ अ युक्त ज् = ज बजै छथि। फेर ज्ञ अछि ज् आ ञ क संयुक्त मुदा गलत उच्चारण होइत अछि- ग्य। ओहिना क्ष अछि क् आ ष क संयुक्त मुदा उच्चारण होइत अछि छ। फेर श् आ र क संयुक्त अछि श्र ( जेना श्रमिक) आ स् आ र क संयुक्त अछि स्र (जेना मिस्र)। त्र भेल त+र । उच्चारणक ऑडियो फाइल विदेह आर्काइव  http://www.videha.co.in/ पर उपलब्ध अछि। फेर केँ / सँ / पर पूर्व अक्षरसँ सटा कऽ लिखू मुदा तँ / कऽ हटा कऽ। ऐमे सँ मे पहिल सटा कऽ लिखू आ बादबला हटा कऽ। अंकक बाद टा लिखू सटा कऽ मुदा अन्य ठाम टा लिखू हटा कऽ– जेना छहटा मुदा सभ टा। फेर ६अ म सातम लिखू- छठम सातम नै। घरबलामे बला मुदा घरवालीमे वाली प्रयुक्त करू। रहए- रहै मुदा सकैए (उच्चारण सकै-ए)। मुदा कखनो काल रहए आ रहै मे अर्थ भिन्नता सेहो, जेना से कम्मो जगहमे पार्किंग करबाक अभ्यास रहै ओकरा। पुछलापर पता लागल जे ढुनढुन नाम्ना ई ड्राइवर कनाट प्लेसक पार्किंगमे काज करैत रहए। छलै, छलए मे सेहो ऐ तरहक भेल। छलए क उच्चारण छल-ए सेहो। संयोगने- (उच्चारण संजोगने) केँ/  कऽ केर- क ( केर क प्रयोग गद्यमे नै करू , पद्यमे कऽ सकै छी। ) क (जेना रामक) –रामक आ संगे (उच्चारण राम के /  राम कऽ सेहो) सँ- सऽ (उच्चारण) चन्द्रबिन्दु आ अनुस्वार- अनुस्वारमे कंठ धरिक प्रयोग होइत अछि मुदा चन्द्रबिन्दुमे नै। चन्द्रबिन्दुमे कनेक एकारक सेहो उच्चारण होइत अछि- जेना रामसँ- (उच्चारण राम सऽ)  रामकेँ- (उच्चारण राम कऽ/ राम के सेहो)। केँ जेना रामकेँ भेल हिन्दीक को (राम को)- राम को= रामकेँ क जेना रामक भेल हिन्दीक का ( राम का) राम का= रामक कऽ जेना जा कऽ भेल हिन्दीक कर ( जा कर) जा कर= जा कऽ सँ भेल हिन्दीक से (राम से) राम से= रामसँ सऽ , तऽ , त , केर (गद्यमे) एे चारू शब्द सबहक प्रयोग अवांछित। के दोसर अर्थेँ प्रयुक्त भऽ सकैए- जेना, के कहलक? विभक्ति “क”क बदला एकर प्रयोग अवांछित। नञि, नहि, नै, नइ, नँइ, नइँ, नइं ऐ सभक उच्चारण आ लेखन - नै त्त्व क बदलामे त्व जेना महत्वपूर्ण (महत्त्वपूर्ण नै) जतए अर्थ बदलि जाए ओतहि मात्र तीन अक्षरक संयुक्ताक्षरक प्रयोग उचित। सम्पति- उच्चारण स म्प इ त (सम्पत्ति नै- कारण सही उच्चारण आसानीसँ सम्भव नै)। मुदा सर्वोत्तम (सर्वोतम नै)। राष्ट्रिय (राष्ट्रीय नै) सकैए/ सकै (अर्थ परिवर्तन) पोछैले/ पोछै लेल/ पोछए लेल पोछैए/ पोछए/ (अर्थ परिवर्तन) पोछए/ पोछै ओ लोकनि ( हटा कऽ, ओ मे बिकारी नै) ओइ/ ओहि ओहिले/ ओहि लेल/ ओही लऽ जएबेँ/ बैसबेँ पँचभइयाँ देखियौक/ (देखिऔक नै- तहिना अ मे ह्रस्व आ दीर्घक मात्राक प्रयोग अनुचित) जकाँ / जेकाँ तँइ/ तैँ/ होएत / हएत नञि/ नहि/ नँइ/ नइँ/ नै सौँसे/ सौंसे बड़ / बड़ी (झोराओल) गाए (गाइ नहि), मुदा गाइक दूध (गाएक दूध नै।) रहलेँ/ पहिरतैँ हमहीं/ अहीं सब - सभ सबहक - सभहक धरि - तक गप- बात बूझब - समझब बुझलौं/ समझलौं/ बुझलहुँ - समझलहुँ हमरा आर - हम सभ आकि- आ कि सकैछ/ करैछ (गद्यमे प्रयोगक आवश्यकता नै) होइन/ होनि जाइन (जानि नै, जेना देल जाइन) मुदा जानि-बूझि (अर्थ परिव्र्तन) पइठ/ जाइठ आउ/ जाउ/ आऊ/ जाऊ मे, केँ, सँ, पर (शब्दसँ सटा कऽ) तँ कऽ धऽ दऽ (शब्दसँ हटा कऽ) मुदा दूटा वा बेसी विभक्ति संग रहलापर पहिल विभक्ति टाकेँ सटाऊ। जेना ऐमे सँ । एकटा , दूटा (मुदा कए टा) बिकारीक प्रयोग शब्दक अन्तमे, बीचमे अनावश्यक रूपेँ नै। आकारान्त आ अन्तमे अ क बाद बिकारीक प्रयोग नै (जेना दिअ , आ/ दिय’ , आ’, आ नै ) अपोस्ट्रोफीक प्रयोग बिकारीक बदलामे करब अनुचित आ मात्र फॉन्टक तकनीकी न्यूनताक परिचायक)- ओना बिकारीक संस्कृत रूप ऽ अवग्रह कहल जाइत अछि आ वर्तनी आ उच्चारण दुनू ठाम एकर लोप रहैत अछि/ रहि सकैत अछि (उच्चारणमे लोप रहिते अछि)। मुदा अपोस्ट्रोफी सेहो अंग्रेजीमे पसेसिव केसमे होइत अछि आ फ्रेंचमे शब्दमे जतए एकर प्रयोग होइत अछि जेना raison d’etre एतए सेहो एकर उच्चारण रैजौन डेटर होइत अछि, माने अपोस्ट्रॉफी अवकाश नै दैत अछि वरन जोड़ैत अछि, से एकर प्रयोग बिकारीक बदला देनाइ तकनीकी रूपेँ सेहो अनुचित)। अइमे, एहिमे/ ऐमे जइमे, जाहिमे एखन/ अखन/ अइखन केँ (के नहि) मे (अनुस्वार रहित) भऽ मे दऽ तँ (तऽ, त नै) सँ ( सऽ स नै) गाछ तर गाछ लग साँझ खन जो (जो go, करै जो do) तै/तइ जेना- तै दुआरे/ तइमे/ तइले जै/जइ जेना- जै कारण/ जइसँ/ जइले ऐ/अइ जेना- ऐ कारण/ ऐसँ/ अइले/ मुदा एकर एकटा खास प्रयोग- लालति‍ कतेक दि‍नसँ कहैत रहैत अइ लै/लइ जेना लैसँ/ लइले/ लै दुआरे लहँ/ लौं गेलौं/ लेलौं/ लेलँह/ गेलहुँ/ लेलहुँ/ लेलँ जइ/ जाहि‍/ जै जहि‍ठाम/ जाहि‍ठाम/ जइठाम/ जैठाम एहि‍/ अहि‍/ अइ (वाक्यक अंतमे ग्राह्य) / ऐ अइछ/ अछि‍/ ऐछ तइ/ तहि‍/ तै/ ताहि‍ ओहि‍/ ओइ सीखि‍/ सीख जीवि‍/ जीवी/ जीब भलेहीं/ भलहि‍ं तैं/ तँइ/ तँए जाएब/ जएब लइ/ लै छइ/ छै नहि‍/ नै/ नइ गइ/ गै छनि‍/ छन्‍हि‍  ... समए शब्‍दक संग जखन कोनो वि‍भक्‍ति‍ जुटै छै तखन समै जना समैपर इत्‍यादि‍। असगरमे हृदए आ वि‍भक्‍ति‍ जुटने हृदे जना हृदेसँ, हृदेमे इत्‍यादि‍। जइ/ जाहि‍/ जै जहि‍ठाम/ जाहि‍ठाम/ जइठाम/ जैठाम एहि‍/ अहि‍/ अइ/ ऐ अइछ/ अछि‍/ ऐछ तइ/ तहि‍/ तै/ ताहि‍ ओहि‍/ ओइ सीखि‍/ सीख जीवि‍/ जीवी/ जीब भले/ भलेहीं/ भलहि‍ं तैं/ तँइ/ तँए जाएब/ जएब लइ/ लै छइ/ छै नहि‍/ नै/ नइ गइ/ गै छनि‍/ छन्‍हि‍ चुकल अछि/ गेल गछि २.२. मैथिलीमे भाषा सम्पादन पाठ्यक्रम नीचाँक सूचीमे देल विकल्पमेसँ लैंगुएज एडीटर द्वारा कोन रूप चुनल जेबाक चाही: बोल्ड कएल रूप ग्राह्य: १.होयबला/ होबयबला/ होमयबला/ हेब’बला, हेम’बला/ होयबाक/होबएबला /होएबाक २. आ’/आऽ आ ३. क’ लेने/कऽ लेने/कए लेने/कय लेने/ल’/लऽ/लय/लए ४. भ’ गेल/भऽ गेल/भय गेल/भए गेल ५. कर’ गेलाह/करऽ गेलह/करए गेलाह/करय गेलाह ६. लिअ/दिअ लिय’,दिय’,लिअ’,दिय’/ ७. कर’ बला/करऽ बला/ करय बला करैबला/क’र’ बला / करैवाली ८. बला वला (पुरूष), वाली (स्‍त्री) ९ . आङ्ल आंग्ल १०. प्रायः प्रायह ११. दुःख दुख १ २. चलि गेल चल गेल/चैल गेल १३. देलखिन्ह देलकिन्ह, देलखिन १४. देखलन्हि देखलनि/ देखलैन्ह १५. छथिन्ह/ छलन्हि छथिन/ छलैन/ छलनि १६. चलैत/दैत चलति/दैति १७. एखनो अखनो १८. बढ़नि‍ बढ़इन बढ़न्हि १९. ओ’/ओऽ(सर्वनाम) ओ २० . ओ (संयोजक) ओ’/ओऽ २१. फाँगि/फाङ्गि फाइंग/फाइङ २२. जे जे’/जेऽ २३. ना-नुकुर ना-नुकर २४. केलन्हि/केलनि‍/कयलन्हि २५. तखनतँ/ तखन तँ २६. जा रहल/जाय रहल/जाए रहल २७. निकलय/निकलए लागल/ लगल बहराय/ बहराए लागल/ लगल निकल’/बहरै लागल २८. ओतय/ जतय जत’/ ओत’/ जतए/ ओतए २९. की फूरल जे कि फूरल जे ३०. जे जे’/जेऽ ३१. कूदि / यादि(मोन पारब) कूइद/याइद/कूद/याद/ यादि (मोन) ३२. इहो/ ओहो ३३. हँसए/ हँसय हँसऽ ३४. नौ आकि दस/नौ किंवा दस/ नौ वा दस ३५. सासु-ससुर सास-ससुर ३६. छह/ सात छ/छः/सात ३७. की  की’/ कीऽ (दीर्घीकारान्तमे ऽ वर्जित) ३८. जबाब जवाब ३९. करएताह/ करेताह करयताह ४०. दलान दिशि दलान दिश/दलान दिस ४१ . गेलाह गएलाह/गयलाह ४२. किछु आर/ किछु और/ किछ आर ४३. जाइ छल/ जाइत छल जाति छल/जैत छल ४४. पहुँचि/ भेट जाइत छल/ भेट जाइ छलए पहुँच/ भेटि‍ जाइत छल ४५. जबान (युवा)/ जवान(फौजी) ४६. लय/ लए क’/ कऽ/ लए कए / लऽ कऽ/ लऽ कए ४७. ल’/लऽ कय/ कए ४८. एखन / एखने / अखन / अखने ४९. अहींकेँ अहीँकेँ ५०. गहींर गहीँर ५१. धार पार केनाइ धार पार केनाय/केनाए ५२. जेकाँ जेँकाँ/ जकाँ ५३. तहिना तेहिना ५४. एकर अकर ५५. बहिनउ बहनोइ ५६. बहिन बहिनि ५७. बहिन-बहिनोइ बहिन-बहनउ ५८. नहि/ नै ५९. करबा / करबाय/ करबाए ६०. तँ/ त ऽ तय/तए ६१. भैयारी मे छोट-भाए/भै/, जेठ-भाय/भाइ, ६२. गि‍नतीमे दू भाइ/भाए/भाँइ ६३. ई पोथी दू भाइक/ भाँइ/ भाए/ लेल। यावत जावत ६४. माय मै / माए मुदा माइक ममता ६५. देन्हि/ दइन दनि‍/ दएन्हि/ दयन्हि दन्हि/ दैन्हि ६६. द’/ दऽ/ दए ६७. ओ (संयोजक) ओऽ (सर्वनाम) ६८. तका कए तकाय तकाए ६९. पैरे (on foot) पएरे  कएक/ कैक ७०. ताहुमे/ ताहूमे ७१. पुत्रीक ७२. बजा कय/ कए / कऽ ७३. बननाय/बननाइ ७४. कोला ७५. दिनुका दिनका ७६. ततहिसँ ७७. गरबओलन्हि/ गरबौलनि‍/ गरबेलन्हि/ गरबेलनि‍ ७८. बालु बालू ७९. चेन्ह चिन्ह(अशुद्ध) ८०. जे जे’ ८१ . से/ के से’/के’ ८२. एखुनका अखनुका ८३. भुमिहार भूमिहार ८४. सुग्गर / सुगरक/ सूगर ८५. झठहाक झटहाक ८६. छूबि ८७. करइयो/ओ करैयो ने देलक /करियौ-करइयौ ८८. पुबारि पुबाइ ८९. झगड़ा-झाँटी झगड़ा-झाँटि ९०. पएरे-पएरे पैरे-पैरे ९१. खेलएबाक ९२. खेलेबाक ९३. लगा ९४. होए- हो – होअए ९५. बुझल बूझल ९६. बूझल (संबोधन अर्थमे) ९७. यैह यएह / इएह/ सैह/ सएह ९८. तातिल ९९. अयनाय- अयनाइ/ अएनाइ/ एनाइ १००. निन्न- निन्द १०१. बिनु बिन १०२. जाए जाइ १०३. जाइ (in different sense)-last word of sentence १०४. छत पर आबि जाइ १०५. ने १०६. खेलाए (play) –खेलाइ १०७. शिकाइत- शिकायत १०८. ढप- ढ़प १०९ . पढ़- पढ ११०. कनिए/ कनिये कनिञे १११. राकस- राकश ११२. होए/ होय होइ ११३. अउरदा- औरदा ११४. बुझेलन्हि (different meaning- got understand) ११५. बुझएलन्हि/बुझेलनि‍/ बुझयलन्हि (understood himself) ११६. चलि- चल/ चलि‍ गेल ११७. खधाइ- खधाय ११८. मोन पाड़लखिन्ह/ मोन पाड़लखि‍न/ मोन पारलखिन्ह ११९. कैक- कएक- कइएक १२०. लग ल’ग १२१. जरेनाइ १२२. जरौनाइ जरओनाइ- जरएनाइ/ जरेनाइ १२३. होइत १२४. गरबेलन्हि/ गरबेलनि‍ गरबौलन्हि/ गरबौलनि‍ १२५. चिखैत- (to test)चिखइत १२६. करइयो (willing to do) करैयो १२७. जेकरा- जकरा १२८. तकरा- तेकरा १२९. बिदेसर स्थानेमे/ बिदेसरे स्थानमे १३०. करबयलहुँ/ करबएलहुँ/ करबेलहुँ करबेलौं १३१. हारिक (उच्चारण हाइरक) १३२. ओजन वजन आफसोच/ अफसोस कागत/ कागच/ कागज १३३. आधे भाग/ आध-भागे १३४. पिचा / पिचाय/पिचाए १३५. नञ/ ने १३६. बच्चा नञ (ने) पिचा जाय १३७. तखन ने (नञ) कहैत अछि। कहै/ सुनै/ देखै छल मुदा कहैत-कहैत/ सुनैत-सुनैत/ देखैत-देखैत १३८. कतेक गोटे/ कताक गोटे १३९. कमाइ-धमाइ/ कमाई- धमाई १४० . लग ल’ग १४१. खेलाइ (for playing) १४२. छथिन्ह/ छथिन १४३. होइत होइ १४४. क्यो कियो / केओ १४५. केश (hair) १४६. केस (court-case) १४७ . बननाइ/ बननाय/ बननाए १४८. जरेनाइ १४९. कुरसी कुर्सी १५०. चरचा चर्चा १५१. कर्म करम १५२. डुबाबए/ डुबाबै/ डुमाबै डुमाबय/ डुमाबए १५३. एखुनका/ अखुनका १५४. लए/ लिअए (वाक्यक अंतिम शब्द)- लऽ १५५. कएलक/ केलक १५६. गरमी गर्मी १५७ . वरदी वर्दी १५८. सुना गेलाह सुना’/सुनाऽ १५९. एनाइ-गेनाइ १६०. तेना ने घेरलन्हि/ तेना ने घेरलनि‍ १६१. नञि / नै १६२. डरो ड’रो १६३. कतहु/ कतौ कहीं १६४. उमरिगर-उमेरगर उमरगर १६५. भरिगर १६६. धोल/धोअल धोएल १६७. गप/गप्प १६८. के के’ १६९. दरबज्जा/ दरबजा १७०. ठाम १७१. धरि तक १७२. घूरि लौटि १७३. थोरबेक १७४. बड्ड १७५. तोँ/ तूँ १७६. तोँहि( पद्यमे ग्राह्य) १७७. तोँही / तोँहि १७८. करबाइए करबाइये १७९. एकेटा १८०. करितथि /करतथि १८१. पहुँचि/ पहुँच १८२. राखलन्हि रखलन्हि/ रखलनि‍ १८३. लगलन्हि/ लगलनि‍ लागलन्हि १८४. सुनि (उच्चारण सुइन) १८५. अछि (उच्चारण अइछ) १८६. एलथि गेलथि १८७. बितओने/ बि‍तौने/ बितेने १८८. करबओलन्हि/ करबौलनि‍/ करेलखिन्ह/ करेलखि‍न १८९. करएलन्हि/ करेलनि‍ १९०. आकि/ कि १९१. पहुँचि/ पहुँच १९२. बत्ती जराय/ जराए जरा (आगि लगा) १९३. से से’ १९४. हाँ मे हाँ (हाँमे हाँ विभक्त्तिमे हटा कए) १९५. फेल फैल १९६. फइल(spacious) फैल १९७. होयतन्हि/ होएतन्हि/ होएतनि‍/हेतनि‍/ हेतन्हि १९८. हाथ मटिआएब/ हाथ मटियाबय/हाथ मटियाएब १९९. फेका फेंका २००. देखाए देखा २०१. देखाबए २०२. सत्तरि सत्तर २०३. साहेब साहब २०४.गेलैन्ह/ गेलन्हि/ गेलनि‍ २०५. हेबाक/ होएबाक २०६.केलो/ कएलहुँ/केलौं/ केलुँ २०७. किछु न किछु/ किछु ने किछु २०८.घुमेलहुँ/ घुमओलहुँ/ घुमेलौं २०९. एलाक/ अएलाक २१०. अः/ अह २११.लय/ लए (अर्थ-परिवर्त्तन) २१२.कनीक/ कनेक २१३.सबहक/ सभक २१४.मिलाऽ/ मिला २१५.कऽ/ क २१६.जाऽ/ जा २१७.आऽ/ आ २१८.भऽ /भ’ (’ फॉन्टक कमीक द्योतक) २१९.निअम/ नियम २२० .हेक्टेअर/ हेक्टेयर २२१.पहिल अक्षर ढ/ बादक/ बीचक ढ़ २२२.तहिं/तहिँ/ तञि/ तैं २२३.कहिं/ कहीं २२४.तँइ/ तैं / तइँ २२५.नँइ/ नइँ/  नञि/ नहि/नै २२६.है/ हए / एलीहेँ/ २२७.छञि/ छै/ छैक /छइ २२८.दृष्टिएँ/ दृष्टियेँ २२९.आ (come)/ आऽ(conjunction) २३०. आ (conjunction)/ आऽ(come) २३१.कुनो/ कोनो, कोना/केना २३२.गेलैन्ह-गेलन्हि-गेलनि‍ २३३.हेबाक- होएबाक २३४.केलौँ- कएलौँ-कएलहुँ/केलौं २३५.किछु न किछ- किछु ने किछु २३६.केहेन- केहन २३७.आऽ (come)-आ (conjunction-and)/आ। आब'-आब' /आबह-आबह २३८. हएत-हैत २३९.घुमेलहुँ-घुमएलहुँ- घुमेलाें २४०.एलाक- अएलाक २४१.होनि- होइन/ होन्हि/ २४२.ओ-राम ओ श्यामक बीच(conjunction), ओऽ कहलक (he said)/ओ २४३.की हए/ कोसी अएली हए/ की है। की हइ २४४.दृष्टिएँ/ दृष्टियेँ २४५ .शामिल/ सामेल २४६.तैँ / तँए/ तञि/ तहिं २४७.जौं / ज्योँ/ जँ/ २४८.सभ/ सब २४९.सभक/ सबहक २५०.कहिं/ कहीं २५१.कुनो/ कोनो/ कोनहुँ/ २५२.फारकती भऽ गेल/ भए गेल/ भय गेल २५३.कोना/ केना/ कन्‍ना/कना २५४.अः/ अह २५५.जनै/ जनञ २५६.गेलनि‍/ गेलाह (अर्थ परिवर्तन) २५७.केलन्हि/ कएलन्हि/ केलनि‍/ २५८.लय/ लए/ लएह (अर्थ परिवर्तन) २५९.कनीक/ कनेक/कनी-मनी २६०.पठेलन्हि‍ पठेलनि‍/ पठेलइन/ पपठओलन्हि/ पठबौलनि‍/ २६१.निअम/ नियम २६२.हेक्टेअर/ हेक्टेयर २६३.पहिल अक्षर रहने ढ/ बीचमे रहने ढ़ २६४.आकारान्तमे बिकारीक प्रयोग उचित नै/ अपोस्ट्रोफीक प्रयोग फान्टक तकनीकी न्यूनताक परिचायक ओकर बदला अवग्रह (बिकारी) क प्रयोग उचित २६५.केर (पद्यमे ग्राह्य) / -क/ कऽ/ के २६६.छैन्हि- छन्हि २६७.लगैए/ लगैये २६८.होएत/ हएत २६९.जाएत/ जएत/ २७०.आएत/ अएत/ आओत २७१ .खाएत/ खएत/ खैत २७२.पिअएबाक/ पिएबाक/पि‍येबाक २७३.शुरु/ शुरुह २७४.शुरुहे/ शुरुए २७५.अएताह/अओताह/ एताह/ औताह २७६.जाहि/ जाइ/ जइ/ जै/ २७७.जाइत/ जैतए/ जइतए २७८.आएल/ अएल २७९.कैक/ कएक २८०.आयल/ अएल/ आएल २८१. जाए/ जअए/ जए (लालति‍ जाए लगलीह।) २८२. नुकएल/ नुकाएल २८३. कठुआएल/ कठुअएल २८४. ताहि/ तै/ तइ २८५. गायब/ गाएब/ गएब २८६. सकै/ सकए/ सकय २८७.सेरा/सरा/ सराए (भात सरा गेल) २८८.कहैत रही/देखैत रही/ कहैत छलौं/ कहै छलौं- अहिना चलैत/ पढ़ैत (पढ़ै-पढ़ैत अर्थ कखनो काल परिवर्तित) - आर बुझै/ बुझैत (बुझै/ बुझै छी, मुदा बुझैत-बुझैत)/ सकैत/ सकै। करैत/ करै। दै/ दैत। छैक/ छै। बचलै/ बचलैक। रखबा/ रखबाक । बिनु/ बिन। रातिक/ रातुक बुझै आ बुझैत केर अपन-अपन जगहपर प्रयोग समीचीन अछि‍। बुझैत-बुझैत आब बुझलि‍ऐ। हमहूँ बुझै छी। २८९. दुआरे/ द्वारे २९०.भेटि/ भेट/ भेँट २९१. खन/ खीन/  खुना (भोर खन/ भोर खीन) २९२.तक/ धरि २९३.गऽ/ गै (meaning different-जनबै गऽ) २९४.सऽ/ सँ (मुदा दऽ, लऽ) २९५.त्त्व,(तीन अक्षरक मेल बदला पुनरुक्तिक एक आ एकटा दोसरक उपयोग) आदिक बदला त्व आदि। महत्त्व/ महत्व/ कर्ता/ कर्त्ता आदिमे त्त संयुक्तक कोनो आवश्यकता मैथिलीमे नै अछि। वक्तव्य २९६.बेसी/ बेशी २९७.बाला/वाला बला/ वला (रहैबला) २९८ .वाली/ (बदलैवाली) २९९.वार्त्ता/ वार्ता ३००. अन्तर्राष्ट्रिय/ अन्तर्राष्ट्रीय ३०१. लेमए/ लेबए ३०२.लमछुरका, नमछुरका ३०२.लागै/ लगै ( भेटैत/ भेटै) ३०३.लागल/ लगल ३०४.हबा/ हवा ३०५.राखलक/ रखलक ३०६.आ (come)/ आ (and) ३०७. पश्चाताप/ पश्चात्ताप ३०८. ऽ केर व्यवहार शब्दक अन्तमे मात्र, यथासंभव बीचमे नै। ३०९.कहैत/ कहै ३१०. रहए (छल)/ रहै (छलै) (meaning different) ३११.तागति/ ताकति ३१२.खराप/ खराब ३१३.बोइन/ बोनि/ बोइनि ३१४.जाठि/ जाइठ ३१५.कागज/ कागच/ कागत ३१६.गिरै (meaning different- swallow)/ गिरए (खसए) ३१७.राष्ट्रिय/ राष्ट्रीय Festivals of Mithila DATE-LIST (year- 2010-11) (१४१८ साल) Marriage Days: Nov.2010- 19 Dec.2010- 3,8 January 2011- 17, 21, 23, 24, 26, 27, 28 31 Feb.2011- 3, 4, 7, 9, 18, 20, 24, 25, 27, 28 March 2011- 2, 7 May 2011- 11, 12, 13, 18, 19, 20, 22, 23, 29, 30 June 2011- 1, 2, 3, 8, 9, 10, 12, 13, 19, 20, 26, 29 Upanayana Days: February 2011- 8 March 2011- 7 May 2011- 12, 13 June 2011- 6, 12 Dviragaman Din: November 2010- 19, 22, 25, 26 December 2010- 6, 8, 9, 10, 12 February 2011- 20, 21 March 2011- 6, 7, 9, 13 April 2011- 17, 18, 22 May 2011- 5, 6, 8, 13 Mundan Din: November 2010- 24, 26 December 2010- 10, 17 February 2011- 4, 16, 21 March 2011- 7, 9 April 2011- 22 May 2011- 6, 9, 19 June 2011- 3, 6, 10, 20 FESTIVALS OF MITHILA Mauna Panchami-31 July Somavati Amavasya Vrat- 1 August Madhushravani-12 August Nag Panchami- 14 August Raksha Bandhan- 24 Aug Krishnastami- 01 September Kushi Amavasya- 08 September Hartalika Teej- 11 September ChauthChandra-11 September Vishwakarma Pooja- 17 September Karma Dharma Ekadashi-19 September Indra Pooja Aarambh- 20 September Anant Caturdashi- 22 Sep Agastyarghadaan- 23 Sep Pitri Paksha begins- 24 Sep Jimootavahan Vrata/ Jitia-30 Sep Matri Navami- 02 October Kalashsthapan- 08 October Belnauti- 13 October Patrika Pravesh- 14 October Mahastami- 15 October Maha Navami - 16-17 October Vijaya Dashami- 18 October Kojagara- 22 Oct Dhanteras- 3 November Diyabati, shyama pooja- 5 November Annakoota/ Govardhana Pooja-07 November Bhratridwitiya/ Chitragupta Pooja-08 November Chhathi- -12 November Akshyay Navami- 15 November Devotthan Ekadashi- 17 November Kartik Poornima/ Sama Bisarjan- 21 Nov Shaa. ravivratarambh- 21 November Navanna parvan- 24 -26 November Vivaha Panchmi- 10 December Naraknivaran chaturdashi- 01 February Makara/ Teela Sankranti-15 Jan Basant Panchami/ Saraswati Pooja- 08 Februaqry Achla Saptmi- 10 February Mahashivaratri-03 March Holikadahan-Fagua-19 March Holi-20 Mar Varuni Yoga- 31 March va.navaratrarambh- 4 April vaa. Chhathi vrata- 9 April Ram Navami- 12 April Mesha Sankranti-Satuani-14 April Jurishital-15 April Somavati Amavasya Vrata- 02 May Ravi Brat Ant- 08 May Akshaya Tritiya-06 May Janaki Navami- 12 May Vat Savitri-barasait- 01 June Ganga Dashhara-11 June Jagannath Rath Yatra- 3 July Hari Sayan Ekadashi- 11 Jul Aashadhi Guru Poornima-15 Jul VIDEHA ARCHIVE १.विदेह ई-पत्रिकाक सभटा पुरान अंक ब्रेल, तिरहुता आ देवनागरी रूपमे Videha e journal's all old issues in Braille Tirhuta and Devanagari versions विदेह ई-पत्रिकाक पहिल ५० अंक

विदेह ई-पत्रिकाक ५०म सँ आगाँक अंक २.मैथिली पोथी डाउनलोड Maithili Books Download ३.मैथिली ऑडियो संकलन Maithili Audio Downloads ४.मैथिली वीडियोक संकलन Maithili Videos ५.मिथिला चित्रकला/ आधुनिक चित्रकला आ चित्र Mithila Painting/ Modern Art and Photos "विदेह"क एहि सभ सहयोगी लिंकपर सेहो एक बेर जाऊ। ६.विदेह मैथिली क्विज  :  http://videhaquiz.blogspot.com/ ७.विदेह मैथिली जालवृत्त एग्रीगेटर : http://videha-aggregator.blogspot.com/ ८.विदेह मैथिली साहित्य अंग्रेजीमे अनूदित http://madhubani-art.blogspot.com/ ९.विदेहक पूर्व-रूप "भालसरिक गाछ"  : http://gajendrathakur.blogspot.com/ १०.विदेह इंडेक्स  : http://videha123.blogspot.com/ ११.विदेह फाइल : http://videha123.wordpress.com/ १२. विदेह: सदेह : पहिल तिरहुता (मिथिला़क्षर) जालवृत्त (ब्लॉग) http://videha-sadeha.blogspot.com/ १३. विदेह:ब्रेल: मैथिली ब्रेलमे: पहिल बेर विदेह द्वारा http://videha-braille.blogspot.com/ १४.VIDEHA IST MAITHILI  FORTNIGHTLY EJOURNAL ARCHIVE http://videha-archive.blogspot.com/ १५. विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका मैथिली पोथीक आर्काइव http://videha-pothi.blogspot.com/ १६. विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका ऑडियो आर्काइव http://videha-audio.blogspot.com/ १७. विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका वीडियो आर्काइव http://videha-video.blogspot.com/ १८. विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका मिथिला चित्रकला, आधुनिक कला आ चित्रकला http://videha-paintings-photos.blogspot.com/ १९. मैथिल आर मिथिला (मैथिलीक सभसँ लोकप्रिय जालवृत्त) http://maithilaurmithila.blogspot.com/ २०.श्रुति प्रकाशन http://www.shruti-publication.com/ २१.http://groups.google.com/group/videha VIDEHA केर सदस्यता लिअ Top of Form Bottom of Form ईमेल : एहि समूहपर जाऊ २२.http://groups.yahoo.com/group/VIDEHA/ Top of Form Subscribe to VIDEHA Powered by us.groups.yahoo.com Bottom of Form २३.गजेन्द्र ठाकुर इ‍डेक्स http://gajendrathakur123.blogspot.com २४.विदेह रेडियो:मैथिली कथा-कविता आदिक पहिल पोडकास्ट साइट http://videha123radio.wordpress.com/ २५. नेना भुटका http://mangan-khabas.blogspot.com/ महत्त्वपूर्ण सूचना:(१) 'विदेह' द्वारा धारावाहिक रूपे ई-प्रकाशित कएल गेल गजेन्द्र ठाकुरक  निबन्ध-प्रबन्ध-समीक्षा, उपन्यास (सहस्रबाढ़नि) , पद्य-संग्रह (सहस्राब्दीक चौपड़पर), कथा-गल्प (गल्प-गुच्छ), नाटक(संकर्षण), महाकाव्य (त्वञ्चाहञ्च आ असञ्जाति मन) आ बाल-किशोर साहित्य विदेहमे संपूर्ण ई-प्रकाशनक बाद प्रिंट फॉर्ममे। कुरुक्षेत्रम्–अन्तर्मनक खण्ड-१ सँ ७ Combined ISBN No.978-81-907729-7-6 विवरण एहि पृष्ठपर नीचाँमे आ प्रकाशकक साइट http://www.shruti-publication.com/ पर । महत्त्वपूर्ण सूचना (२):सूचना: विदेहक मैथिली-अंग्रेजी आ अंग्रेजी मैथिली कोष (इंटरनेटपर पहिल बेर सर्च-डिक्शनरी) एम.एस. एस.क्यू.एल. सर्वर आधारित -Based on ms-sql server Maithili-English and English-Maithili Dictionary. विदेहक भाषापाक- रचनालेखन स्तंभमे। कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक- गजेन्द्र ठाकुर गजेन्द्र ठाकुरक निबन्ध-प्रबन्ध-समीक्षा, उपन्यास (सहस्रबाढ़नि) , पद्य-संग्रह (सहस्राब्दीक चौपड़पर), कथा-गल्प (गल्प गुच्छ), नाटक(संकर्षण), महाकाव्य (त्वञ्चाहञ्च आ असञ्जाति मन) आ बालमंडली-किशोरजगत विदेहमे संपूर्ण ई-प्रकाशनक बाद प्रिंट फॉर्ममे। कुरुक्षेत्रम्–अन्तर्मनक, खण्ड-१ सँ ७ Ist edition 2009 of Gajendra Thakur’s KuruKshetram-Antarmanak (Vol. I to VII)- essay-paper-criticism, novel, poems, story, play, epics and Children-grown-ups literature in single binding: Language:Maithili ६९२ पृष्ठ : मूल्य भा. रु. 100/-(for individual buyers inside india) (add courier charges Rs.50/-per copy for Delhi/NCR and Rs.100/- per copy for outside Delhi)

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Details for purchase available at print-version publishers's site website: http://www.shruti-publication.com/ or you may write to e-mail:shruti.publication@shruti-publication.com विदेह: सदेह : १: २: ३: ४ तिरहुता : देवनागरी "विदेह" क, प्रिंट संस्करण :विदेह-ई-पत्रिका (http://www.videha.co.in/) क चुनल रचना सम्मिलित। विदेह:सदेह:१: २: ३: ४ सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। Details for purchase available at print-version publishers's site http://www.shruti-publication.com  or you may write to shruti.publication@shruti-publication.com २. संदेश- [ विदेह ई-पत्रिका, विदेह:सदेह मिथिलाक्षर आ देवनागरी आ गजेन्द्र ठाकुरक सात खण्डक- निबन्ध-प्रबन्ध-समीक्षा,उपन्यास (सहस्रबाढ़नि) , पद्य-संग्रह (सहस्राब्दीक चौपड़पर), कथा-गल्प (गल्प गुच्छ), नाटक (संकर्षण), महाकाव्य (त्वञ्चाहञ्च आ असञ्जाति मन) आ बाल-मंडली-किशोर जगत- संग्रह कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक मादेँ। ] १.श्री गोविन्द झा- विदेहकेँ तरंगजालपर उतारि विश्वभरिमे मातृभाषा मैथिलीक लहरि जगाओल, खेद जे अपनेक एहि महाभियानमे हम एखन धरि संग नहि दए सकलहुँ। सुनैत छी अपनेकेँ सुझाओ आ रचनात्मक आलोचना प्रिय लगैत अछि तेँ किछु लिखक मोन भेल। हमर सहायता आ सहयोग अपनेकेँ सदा उपलब्ध रहत। २.श्री रमानन्द रेणु- मैथिलीमे ई-पत्रिका पाक्षिक रूपेँ चला कऽ जे अपन मातृभाषाक प्रचार कऽ रहल छी, से धन्यवाद । आगाँ अपनेक समस्त मैथिलीक कार्यक हेतु हम हृदयसँ शुभकामना दऽ रहल छी। ३.श्री विद्यानाथ झा "विदित"- संचार आ प्रौद्योगिकीक एहि प्रतिस्पर्धी ग्लोबल युगमे अपन महिमामय "विदेह"केँ अपना देहमे प्रकट देखि जतबा प्रसन्नता आ संतोष भेल, तकरा कोनो उपलब्ध "मीटर"सँ नहि नापल जा सकैछ? ..एकर ऐतिहासिक मूल्यांकन आ सांस्कृतिक प्रतिफलन एहि शताब्दीक अंत धरि लोकक नजरिमे आश्चर्यजनक रूपसँ प्रकट हैत। ४. प्रो. उदय नारायण सिंह "नचिकेता"- जे काज अहाँ कए रहल छी तकर चरचा एक दिन मैथिली भाषाक इतिहासमे होएत। आनन्द भए रहल अछि, ई जानि कए जे एतेक गोट मैथिल "विदेह" ई जर्नलकेँ पढ़ि रहल छथि।...विदेहक चालीसम अंक पुरबाक लेल अभिनन्दन। ५. डॉ. गंगेश गुंजन- एहि विदेह-कर्ममे लागि रहल अहाँक सम्वेदनशील मन, मैथिलीक प्रति समर्पित मेहनतिक अमृत रंग, इतिहास मे एक टा विशिष्ट फराक अध्याय आरंभ करत, हमरा विश्वास अछि। अशेष शुभकामना आ बधाइक सङ्ग, सस्नेह...अहाँक पोथी कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक प्रथम दृष्टया बहुत भव्य तथा उपयोगी बुझाइछ। मैथिलीमे तँ अपना स्वरूपक प्रायः ई पहिले एहन  भव्य अवतारक पोथी थिक। हर्षपूर्ण हमर हार्दिक बधाई स्वीकार करी। ६. श्री रामाश्रय झा "रामरंग"(आब स्वर्गीय)- "अपना" मिथिलासँ संबंधित...विषय वस्तुसँ अवगत भेलहुँ।...शेष सभ कुशल अछि। ७. श्री ब्रजेन्द्र त्रिपाठी- साहित्य अकादमी- इंटरनेट पर प्रथम मैथिली पाक्षिक पत्रिका "विदेह" केर लेल बधाई आ शुभकामना स्वीकार करू। ८. श्री प्रफुल्लकुमार सिंह "मौन"- प्रथम मैथिली पाक्षिक पत्रिका "विदेह" क प्रकाशनक समाचार जानि कनेक चकित मुदा बेसी आह्लादित भेलहुँ। कालचक्रकेँ पकड़ि जाहि दूरदृष्टिक परिचय देलहुँ, ओहि लेल हमर मंगलकामना। ९.डॉ. शिवप्रसाद यादव- ई जानि अपार हर्ष भए रहल अछि, जे नव सूचना-क्रान्तिक क्षेत्रमे मैथिली पत्रकारिताकेँ प्रवेश दिअएबाक साहसिक कदम उठाओल अछि। पत्रकारितामे एहि प्रकारक नव प्रयोगक हम स्वागत करैत छी, संगहि "विदेह"क सफलताक शुभकामना। १०. श्री आद्याचरण झा- कोनो पत्र-पत्रिकाक प्रकाशन- ताहूमे मैथिली पत्रिकाक प्रकाशनमे के कतेक सहयोग करताह- ई तऽ भविष्य कहत। ई हमर ८८ वर्षमे ७५ वर्षक अनुभव रहल। एतेक पैघ महान यज्ञमे हमर श्रद्धापूर्ण आहुति प्राप्त होयत- यावत ठीक-ठाक छी/ रहब। ११. श्री विजय ठाकुर- मिशिगन विश्वविद्यालय- "विदेह" पत्रिकाक अंक देखलहुँ, सम्पूर्ण टीम बधाईक पात्र अछि। पत्रिकाक मंगल भविष्य हेतु हमर शुभकामना स्वीकार कएल जाओ। १२. श्री सुभाषचन्द्र यादव- ई-पत्रिका "विदेह" क बारेमे जानि प्रसन्नता भेल। ’विदेह’ निरन्तर पल्लवित-पुष्पित हो आ चतुर्दिक अपन सुगंध पसारय से कामना अछि। १३. श्री मैथिलीपुत्र प्रदीप- ई-पत्रिका "विदेह" केर सफलताक भगवतीसँ कामना। हमर पूर्ण सहयोग रहत। १४. डॉ. श्री भीमनाथ झा- "विदेह" इन्टरनेट पर अछि तेँ "विदेह" नाम उचित आर कतेक रूपेँ एकर विवरण भए सकैत अछि। आइ-काल्हि मोनमे उद्वेग रहैत अछि, मुदा शीघ्र पूर्ण सहयोग देब।कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक देखि अति प्रसन्नता भेल। मैथिलीक लेल ई घटना छी। १५. श्री रामभरोस कापड़ि "भ्रमर"- जनकपुरधाम- "विदेह" ऑनलाइन देखि रहल छी। मैथिलीकेँ अन्तर्राष्ट्रीय जगतमे पहुँचेलहुँ तकरा लेल हार्दिक बधाई। मिथिला रत्न सभक संकलन अपूर्व। नेपालोक सहयोग भेटत, से विश्वास करी। १६. श्री राजनन्दन लालदास- "विदेह" ई-पत्रिकाक माध्यमसँ बड़ नीक काज कए रहल छी, नातिक अहिठाम देखलहुँ। एकर वार्षिक अ‍ंक जखन प्रिं‍ट निकालब तँ हमरा पठायब। कलकत्तामे बहुत गोटेकेँ हम साइटक पता लिखाए देने छियन्हि। मोन तँ होइत अछि जे दिल्ली आबि कए आशीर्वाद दैतहुँ, मुदा उमर आब बेशी भए गेल। शुभकामना देश-विदेशक मैथिलकेँ जोड़बाक लेल।.. उत्कृष्ट प्रकाशन कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक लेल बधाइ। अद्भुत काज कएल अछि, नीक प्रस्तुति अछि सात खण्डमे।  मुदा अहाँक सेवा आ से निःस्वार्थ तखन बूझल जाइत जँ अहाँ द्वारा प्रकाशित पोथी सभपर दाम लिखल नहि रहितैक। ओहिना सभकेँ विलहि देल जइतैक। (स्पष्टीकरण-  श्रीमान्, अहाँक सूचनार्थ विदेह द्वारा ई-प्रकाशित कएल सभटा सामग्री आर्काइवमे https://sites.google.com/a/videha.com/videha-pothi/ पर बिना मूल्यक डाउनलोड लेल उपलब्ध छै आ भविष्यमे सेहो रहतैक। एहि आर्काइवकेँ जे कियो प्रकाशक अनुमति लऽ कऽ प्रिंट रूपमे प्रकाशित कएने छथि आ तकर ओ दाम रखने छथि ताहिपर हमर कोनो नियंत्रण नहि अछि।- गजेन्द्र ठाकुर)...   अहाँक प्रति अशेष शुभकामनाक संग। १७. डॉ. प्रेमशंकर सिंह- अहाँ मैथिलीमे इंटरनेटपर पहिल पत्रिका "विदेह" प्रकाशित कए अपन अद्भुत मातृभाषानुरागक परिचय देल अछि, अहाँक निःस्वार्थ मातृभाषानुरागसँ प्रेरित छी, एकर निमित्त जे हमर सेवाक प्रयोजन हो, तँ सूचित करी। इंटरनेटपर आद्योपांत पत्रिका देखल, मन प्रफुल्लित भऽ गेल। १८.श्रीमती शेफालिका वर्मा- विदेह ई-पत्रिका देखि मोन उल्लाससँ भरि गेल। विज्ञान कतेक प्रगति कऽ रहल अछि...अहाँ सभ अनन्त आकाशकेँ भेदि दियौ, समस्त विस्तारक रहस्यकेँ तार-तार कऽ दियौक...। अपनेक अद्भुत पुस्तक कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक विषयवस्तुक दृष्टिसँ गागरमे सागर अछि। बधाई। १९.श्री हेतुकर झा, पटना-जाहि समर्पण भावसँ अपने मिथिला-मैथिलीक सेवामे तत्पर छी से स्तुत्य अछि। देशक राजधानीसँ भय रहल मैथिलीक शंखनाद मिथिलाक गाम-गाममे मैथिली चेतनाक विकास अवश्य करत। २०. श्री योगानन्द झा, कबिलपुर, लहेरियासराय- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पोथीकेँ निकटसँ देखबाक अवसर भेटल अछि आ मैथिली जगतक एकटा उद्भट ओ समसामयिक दृष्टिसम्पन्न हस्ताक्षरक कलमबन्द परिचयसँ आह्लादित छी। "विदेह"क देवनागरी सँस्करण पटनामे रु. 80/- मे उपलब्ध भऽ सकल जे विभिन्न लेखक लोकनिक छायाचित्र, परिचय पत्रक ओ रचनावलीक सम्यक प्रकाशनसँ ऐतिहासिक कहल जा सकैछ। २१. श्री किशोरीकान्त मिश्र- कोलकाता- जय मैथिली, विदेहमे बहुत रास कविता, कथा, रिपोर्ट आदिक सचित्र संग्रह देखि आ आर अधिक प्रसन्नता मिथिलाक्षर देखि- बधाई स्वीकार कएल जाओ। २२.श्री जीवकान्त- विदेहक मुद्रित अंक पढ़ल- अद्भुत मेहनति। चाबस-चाबस। किछु समालोचना मरखाह..मुदा सत्य। २३. श्री भालचन्द्र झा- अपनेक कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक देखि बुझाएल जेना हम अपने छपलहुँ अछि। एकर विशालकाय आकृति अपनेक सर्वसमावेशताक परिचायक अछि। अपनेक रचना सामर्थ्यमे उत्तरोत्तर वृद्धि हो, एहि शुभकामनाक संग हार्दिक बधाई। २४.श्रीमती डॉ नीता झा- अहाँक कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़लहुँ। ज्योतिरीश्वर शब्दावली, कृषि मत्स्य शब्दावली आ सीत बसन्त आ सभ कथा, कविता, उपन्यास, बाल-किशोर साहित्य सभ उत्तम छल। मैथिलीक उत्तरोत्तर विकासक लक्ष्य दृष्टिगोचर होइत अछि। २५.श्री मायानन्द मिश्र- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक मे हमर उपन्यास स्त्रीधनक जे विरोध कएल गेल अछि तकर हम विरोध करैत छी।... कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पोथीक लेल शुभकामना।(श्रीमान् समालोचनाकेँ विरोधक रूपमे नहि लेल जाए।-गजेन्द्र ठाकुर) २६.श्री महेन्द्र हजारी- सम्पादक श्रीमिथिला- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़ि मोन हर्षित भऽ गेल..एखन पूरा पढ़यमे बहुत समय लागत, मुदा जतेक पढ़लहुँ से आह्लादित कएलक। २७.श्री केदारनाथ चौधरी- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक अद्भुत लागल, मैथिली साहित्य लेल ई पोथी एकटा प्रतिमान बनत। २८.श्री सत्यानन्द पाठक- विदेहक हम नियमित पाठक छी। ओकर स्वरूपक प्रशंसक छलहुँ। एम्हर अहाँक लिखल - कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक देखलहुँ। मोन आह्लादित भऽ उठल। कोनो रचना तरा-उपरी। २९.श्रीमती रमा झा-सम्पादक मिथिला दर्पण। कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक प्रिंट फॉर्म पढ़ि आ एकर गुणवत्ता देखि मोन प्रसन्न भऽ गेल, अद्भुत शब्द एकरा लेल प्रयुक्त कऽ रहल छी। विदेहक उत्तरोत्तर प्रगतिक शुभकामना। ३०.श्री नरेन्द्र झा, पटना- विदेह नियमित देखैत रहैत छी। मैथिली लेल अद्भुत काज कऽ रहल छी। ३१.श्री रामलोचन ठाकुर- कोलकाता- मिथिलाक्षर विदेह देखि मोन प्रसन्नतासँ भरि उठल, अंकक विशाल परिदृश्य आस्वस्तकारी अछि। ३२.श्री तारानन्द वियोगी- विदेह आ कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक देखि चकबिदोर लागि गेल। आश्चर्य। शुभकामना आ बधाई। ३३.श्रीमती प्रेमलता मिश्र “प्रेम”- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़लहुँ। सभ रचना उच्चकोटिक लागल। बधाई। ३४.श्री कीर्तिनारायण मिश्र- बेगूसराय- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक बड्ड नीक लागल, आगांक सभ काज लेल बधाई। ३५.श्री महाप्रकाश-सहरसा- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक नीक लागल, विशालकाय संगहि उत्तमकोटिक। ३६.श्री अग्निपुष्प- मिथिलाक्षर आ देवाक्षर विदेह पढ़ल..ई प्रथम तँ अछि एकरा प्रशंसामे मुदा हम एकरा दुस्साहसिक कहब। मिथिला चित्रकलाक स्तम्भकेँ मुदा अगिला अंकमे आर विस्तृत बनाऊ। ३७.श्री मंजर सुलेमान-दरभंगा- विदेहक जतेक प्रशंसा कएल जाए कम होएत। सभ चीज उत्तम। ३८.श्रीमती प्रोफेसर वीणा ठाकुर- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक उत्तम, पठनीय, विचारनीय। जे क्यो देखैत छथि पोथी प्राप्त करबाक उपाय पुछैत छथि। शुभकामना। ३९.श्री छत्रानन्द सिंह झा- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़लहुँ, बड्ड नीक सभ तरहेँ। ४०.श्री ताराकान्त झा- सम्पादक मैथिली दैनिक मिथिला समाद- विदेह तँ कन्टेन्ट प्रोवाइडरक काज कऽ रहल अछि। कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक अद्भुत लागल। ४१.डॉ रवीन्द्र कुमार चौधरी- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक बहुत नीक, बहुत मेहनतिक परिणाम। बधाई। ४२.श्री अमरनाथ- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक आ विदेह दुनू स्मरणीय घटना अछि, मैथिली साहित्य मध्य। ४३.श्री पंचानन मिश्र- विदेहक वैविध्य आ निरन्तरता प्रभावित करैत अछि, शुभकामना। ४४.श्री केदार कानन- कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक लेल अनेक धन्यवाद, शुभकामना आ बधाइ स्वीकार करी। आ नचिकेताक भूमिका पढ़लहुँ। शुरूमे तँ लागल जेना कोनो उपन्यास अहाँ द्वारा सृजित भेल अछि मुदा पोथी उनटौला पर ज्ञात भेल जे एहिमे तँ सभ विधा समाहित अछि। ४५.श्री धनाकर ठाकुर- अहाँ नीक काज कऽ रहल छी। फोटो गैलरीमे चित्र एहि शताब्दीक जन्मतिथिक अनुसार रहैत तऽ नीक। ४६.श्री आशीष झा- अहाँक पुस्तकक संबंधमे एतबा लिखबा सँ अपना कए नहि रोकि सकलहुँ जे ई किताब मात्र किताब नहि थीक, ई एकटा उम्मीद छी जे मैथिली अहाँ सन पुत्रक सेवा सँ निरंतर समृद्ध होइत चिरजीवन कए प्राप्त करत। ४७.श्री शम्भु कुमार सिंह- विदेहक तत्परता आ क्रियाशीलता देखि आह्लादित भऽ रहल छी। निश्चितरूपेण कहल जा सकैछ जे समकालीन मैथिली पत्रिकाक इतिहासमे विदेहक नाम स्वर्णाक्षरमे लिखल जाएत। ओहि कुरुक्षेत्रक घटना सभ तँ अठारहे दिनमे खतम भऽ गेल रहए मुदा अहाँक कुरुक्षेत्रम् तँ अशेष अछि। ४८.डॉ. अजीत मिश्र- अपनेक प्रयासक कतबो प्रश‍ंसा कएल जाए कमे होएतैक। मैथिली साहित्यमे अहाँ द्वारा कएल गेल काज युग-युगान्तर धरि पूजनीय रहत। ४९.श्री बीरेन्द्र मल्लिक- अहाँक कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक आ विदेह:सदेह पढ़ि अति प्रसन्नता भेल। अहाँक स्वास्थ्य ठीक रहए आ उत्साह बनल रहए से कामना। ५०.श्री कुमार राधारमण- अहाँक दिशा-निर्देशमे विदेह पहिल मैथिली ई-जर्नल देखि अति प्रसन्नता भेल। हमर शुभकामना। ५१.श्री फूलचन्द्र झा प्रवीण-विदेह:सदेह पढ़ने रही मुदा कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक देखि बढ़ाई देबा लेल बाध्य भऽ गेलहुँ। आब विश्वास भऽ गेल जे मैथिली नहि मरत। अशेष शुभकामना। ५२.श्री विभूति आनन्द- विदेह:सदेह देखि, ओकर विस्तार देखि अति प्रसन्नता भेल। ५३.श्री मानेश्वर मनुज-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक एकर भव्यता देखि अति प्रसन्नता भेल, एतेक विशाल ग्रन्थ मैथिलीमे आइ धरि नहि देखने रही। एहिना भविष्यमे काज करैत रही, शुभकामना। ५४.श्री विद्यानन्द झा- आइ.आइ.एम.कोलकाता- कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक विस्तार, छपाईक संग गुणवत्ता देखि अति प्रसन्नता भेल। ५५.श्री अरविन्द ठाकुर-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक मैथिली साहित्यमे कएल गेल एहि तरहक पहिल प्रयोग अछि, शुभकामना। ५६.श्री कुमार पवन-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक पढ़ि रहल छी। किछु लघुकथा पढ़ल अछि, बहुत मार्मिक छल। ५७. श्री प्रदीप बिहारी-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक देखल, बधाई। ५८.डॉ मणिकान्त ठाकुर-कैलिफोर्निया- अपन विलक्षण नियमित सेवासँ हमरा लोकनिक हृदयमे विदेह सदेह भऽ गेल अछि। ५९.श्री धीरेन्द्र प्रेमर्षि- अहाँक समस्त प्रयास सराहनीय। दुख होइत अछि जखन अहाँक प्रयासमे अपेक्षित सहयोग नहि कऽ पबैत छी। ६०.श्री देवशंकर नवीन- विदेहक निरन्तरता आ विशाल स्वरूप- विशाल पाठक वर्ग, एकरा ऐतिहासिक बनबैत अछि। ६१.श्री मोहन भारद्वाज- अहाँक समस्त कार्य देखल, बहुत नीक। एखन किछु परेशानीमे छी, मुदा शीघ्र सहयोग देब। ६२.श्री फजलुर रहमान हाशमी-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक मे एतेक मेहनतक लेल अहाँ साधुवादक अधिकारी छी। ६३.श्री लक्ष्मण झा "सागर"- मैथिलीमे चमत्कारिक रूपेँ अहाँक प्रवेश आह्लादकारी अछि।..अहाँकेँ एखन आर..दूर..बहुत दूरधरि जेबाक अछि। स्वस्थ आ प्रसन्न रही। ६४.श्री जगदीश प्रसाद मंडल-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक पढ़लहुँ । कथा सभ आ उपन्यास सहस्रबाढ़नि पूर्णरूपेँ पढ़ि गेल छी। गाम-घरक भौगोलिक विवरणक जे सूक्ष्म वर्णन सहस्रबाढ़निमे अछि, से चकित कएलक, एहि संग्रहक कथा-उपन्यास मैथिली लेखनमे विविधता अनलक अछि। समालोचना शास्त्रमे अहाँक दृष्टि वैयक्तिक नहि वरन् सामाजिक आ कल्याणकारी अछि, से प्रशंसनीय। ६५.श्री अशोक झा-अध्यक्ष मिथिला विकास परिषद- कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक लेल बधाई आ आगाँ लेल शुभकामना। ६६.श्री ठाकुर प्रसाद मुर्मु- अद्भुत प्रयास। धन्यवादक संग प्रार्थना जे अपन माटि-पानिकेँ ध्यानमे राखि अंकक समायोजन कएल जाए। नव अंक धरि प्रयास सराहनीय। विदेहकेँ बहुत-बहुत धन्यवाद जे एहेन सुन्दर-सुन्दर सचार (आलेख) लगा रहल छथि। सभटा ग्रहणीय- पठनीय। ६७.बुद्धिनाथ मिश्र- प्रिय गजेन्द्र जी,अहाँक सम्पादन मे प्रकाशित ‘विदेह’आ ‘कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक’ विलक्षण पत्रिका आ विलक्षण पोथी! की नहि अछि अहाँक सम्पादनमे? एहि प्रयत्न सँ मैथिली क विकास होयत,निस्संदेह। ६८.श्री बृखेश चन्द्र लाल- गजेन्द्रजी, अपनेक पुस्तक कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक पढ़ि मोन गदगद भय गेल , हृदयसँ अनुगृहित छी । हार्दिक शुभकामना । ६९.श्री परमेश्वर कापड़ि - श्री गजेन्द्र जी । कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक पढ़ि गदगद आ नेहाल भेलहुँ। ७०.श्री रवीन्द्रनाथ ठाकुर- विदेह पढ़ैत रहैत छी। धीरेन्द्र प्रेमर्षिक मैथिली गजलपर आलेख पढ़लहुँ। मैथिली गजल कत्तऽ सँ कत्तऽ चलि गेलैक आ ओ अपन आलेखमे मात्र अपन जानल-पहिचानल लोकक चर्च कएने छथि। जेना मैथिलीमे मठक परम्परा रहल अछि। (स्पष्टीकरण- श्रीमान्, प्रेमर्षि जी ओहि आलेखमे ई स्पष्ट लिखने छथि जे किनको नाम जे छुटि गेल छन्हि तँ से मात्र आलेखक लेखकक जानकारी नहि रहबाक द्वारे, एहिमे आन कोनो कारण नहि देखल जाय। अहाँसँ एहि विषयपर विस्तृत आलेख सादर आमंत्रित अछि।-सम्पादक) ७१.श्री मंत्रेश्वर झा- विदेह पढ़ल आ संगहि अहाँक मैगनम ओपस कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक सेहो, अति उत्तम। मैथिलीक लेल कएल जा रहल अहाँक समस्त कार्य अतुलनीय अछि। ७२. श्री हरेकृष्ण झा- कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक मैथिलीमे अपन तरहक एकमात्र ग्रन्थ अछि, एहिमे लेखकक समग्र दृष्टि आ रचना कौशल देखबामे आएल जे लेखकक फील्डवर्कसँ जुड़ल रहबाक कारणसँ अछि। ७३.श्री सुकान्त सोम- कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक मे  समाजक इतिहास आ वर्तमानसँ अहाँक जुड़ाव बड्ड नीक लागल, अहाँ एहि क्षेत्रमे आर आगाँ काज करब से आशा अछि। ७४.प्रोफेसर मदन मिश्र- कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक सन किताब मैथिलीमे पहिले अछि आ एतेक विशाल संग्रहपर शोध कएल जा सकैत अछि। भविष्यक लेल शुभकामना। ७५.प्रोफेसर कमला चौधरी- मैथिलीमे कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक सन पोथी आबए जे गुण आ रूप दुनूमे निस्सन होअए, से बहुत दिनसँ आकांक्षा छल, ओ आब जा कऽ पूर्ण भेल। पोथी एक हाथसँ दोसर हाथ घुमि रहल अछि, एहिना आगाँ सेहो अहाँसँ आशा अछि। ७६.श्री उदय चन्द्र झा "विनोद": गजेन्द्रजी, अहाँ जतेक काज कएलहुँ अछि से मैथिलीमे आइ धरि कियो नहि कएने छल। शुभकामना। अहाँकेँ एखन बहुत काज आर करबाक अछि। ७७.श्री कृष्ण कुमार कश्यप: गजेन्द्र ठाकुरजी, अहाँसँ भेँट एकटा स्मरणीय क्षण बनि गेल। अहाँ जतेक काज एहि बएसमे कऽ गेल छी ताहिसँ हजार गुणा आर बेशीक आशा अछि। ७८.श्री मणिकान्त दास: अहाँक मैथिलीक कार्यक प्रशंसा लेल शब्द नहि भेटैत अछि। अहाँक कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक सम्पूर्ण रूपेँ पढ़ि गेलहुँ। त्वञ्चाहञ्च बड्ड नीक लागल। ७९. श्री हीरेन्द्र कुमार झा- विदेह ई-पत्रिकाक सभ अंक ई-पत्रसँ भेटैत रहैत अछि। मैथिलीक ई-पत्रिका छैक एहि बातक गर्व होइत अछि। अहाँ आ अहाँक सभ सहयोगीकेँ हार्दिक शुभकामना। विदेह मैथिली साहित्य आन्दोलन (c)२००४-११. सर्वाधिकार लेखकाधीन आ जतय लेखकक नाम नहि अछि ततय संपादकाधीन। विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। सह-सम्पादक: उमेश मंडल। सहायक सम्पादक: शिव कुमार झा आ मुन्नाजी (मनोज कुमार कर्ण)। भाषा-सम्पादन: नागेन्द्र कुमार झा आ पञ्जीकार विद्यानन्द झा। कला-सम्पादन: ज्योति सुनीत चौधरी आ रश्मि रेखा सिन्हा। सम्पादक-शोध-अन्वेषण: डॉ. जया वर्मा आ डॉ. राजीव कुमार वर्मा। रचनाकार अपन मौलिक आ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि) ggajendra@videha.com केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx, .rtf वा .txt फॉर्मेटमे पठा सकैत छथि। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेताह, से आशा करैत छी। रचनाक अंतमे टाइप रहय, जे ई रचना मौलिक अछि, आ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। मेल प्राप्त होयबाक बाद यथासंभव शीघ्र ( सात दिनक भीतर) एकर प्रकाशनक अंकक सूचना देल जायत। ’विदेह' प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका अछि आ एहिमे मैथिली, संस्कृत आ अंग्रेजीमे मिथिला आ मैथिलीसँ संबंधित रचना प्रकाशित कएल जाइत अछि। एहि ई पत्रिकाकेँ श्रीमति लक्ष्मी ठाकुर द्वारा मासक ०१ आ १५ तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि। (c) 2004-11 सर्वाधिकार सुरक्षित। विदेहमे प्रकाशित सभटा रचना आ आर्काइवक सर्वाधिकार रचनाकार आ संग्रहकर्त्ताक लगमे छन्हि। रचनाक अनुवाद आ पुनः प्रकाशन किंवा आर्काइवक उपयोगक अधिकार किनबाक हेतु ggajendra@videha.co.in पर संपर्क करू। एहि साइटकेँ प्रीति झा ठाकुर, मधूलिका चौधरी आ रश्मि प्रिया द्वारा डिजाइन कएल गेल। सिद्धिरस्तु वि दे ह विदेह Videha বিদেহ  विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका Videha Ist Maithili Fortnightly e Magazine  विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका 'विदेह' ८१ म अंक ०१ मइ २०११ (वर्ष ४ मास ४१ अंक ८१)http://www.videha.co.in/ मानुषीमिह संस्कृताम् ISSN 2229-547X VIDEHA वि दे ह विदेह Videha বিদেহ  विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका Videha Ist Maithili Fortnightly e Magazine  विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका 'विदेह' ८१ म अंक ०१ मइ २०११ (वर्ष ४ मास ४१ अंक ८१)http://www.videha.co.in/ मानुषीमिह संस्कृताम् ISSN 2229-547X VIDEHA

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