VIDEHA — Issue 82 / अंक ८२

Publication: VIDEHA · Issue: 82
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244 245 ISSN 2229-547X VIDEHA 'विदेह' ८२ म अंक १५ मई २०११ (वर्ष ४ मास ४१ अंक ८२) वि  दे  ह विदेह Videha বিদেহ http://www.videha.co.in  विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका Videha Ist Maithili Fortnightly e Magazine   नव अंक देखबाक लेल पृष्ठ सभकेँ रिफ्रेश कए देखू। Always refresh the pages for viewing new issue of VIDEHA. Read in your own script Roman(Eng)Gujarati Bangla Oriya Gurmukhi Telugu Tamil Kannada Malayalam Hindi ऐ अंकमे अछि:- १. संपादकीय संदेश २. गद्य २.१.यायावरी- डॉ. कैलाश कुमार मि‍श्र-भावमय, भोगमय, योगमय बृन्‍दावन (पहिल खेपसँ आगाँ) २.२जीवकान्‍त .उत्तराधि‍कारी आ लेखक २.३.शि‍वकुमार झा टि‍ल्‍लू -मैथि‍ली कथाक वि‍कासमे गामक जि‍नगीक योगदान २.४.जगदीश प्रसाद मण्‍डल- नाटक- कम्‍प्रोमाइज(पछिला खेपसँ आगाँ) २.५.बिपिन झा- ग्रन्थ समीक्षा-प्रकृति परिक्रमा २.६.आशीष अनचिन्हार- बेचन ठाकुरजीक नाटक छीनरदेवी २.७.वि‍रेन्‍द्र यादव- कथा- बाबा गाछी ३. पद्य ३.१.रवि भूषण पाठक- मरणोपरांत-२ ३.२.जवाहर लाल कश्यप- खाइ ३.३.किशन कारीगर- गीत ३.४.गजेन्द्र ठाकुर- गजल/ रुबाइ ३.५.प्रभात राय भट्ट ३.६.नवीन कुमार आशा ३.७.गजेन्द्र ठाकुर- हाइकू/ टनका/ शेनर्यू/ हैबून ३.८. डॉ. शेफालिका  वर्मा- कोसी नदी ४. मिथिला कला-संगीत- १.श्वेता झा चौधरी २.ज्योति सुनीत चौधरी ३.श्वेता झा (सिंगापुर) भाषापाक रचना-लेखन -[मानक मैथिली], [विदेहक मैथिली-अंग्रेजी आ अंग्रेजी मैथिली कोष (इंटरनेटपर पहिल बेर सर्च-डिक्शनरी) एम.एस. एस.क्यू.एल. सर्वर आधारित -Based on ms-sql server Maithili-English and English-Maithili Dictionary.] विदेह ई-पत्रिकाक सभटा पुरान अंक ( ब्रेल, तिरहुता आ देवनागरी मे ) पी.डी.एफ. डाउनलोडक लेल नीचाँक लिंकपर उपलब्ध अछि। All the old issues of Videha e journal ( in Braille, Tirhuta and Devanagari versions ) are available for pdf download at the following link. विदेह ई-पत्रिकाक सभटा पुरान अंक ब्रेल, तिरहुता आ देवनागरी रूपमे Videha e journal's all old issues in Braille Tirhuta and Devanagari versions विदेह ई-पत्रिकाक पहिल ५० अंक

विदेह ई-पत्रिकाक ५०म सँ आगाँक अंक विदेह आर.एस.एस.फीड। "विदेह" ई-पत्रिका ई-पत्रसँ प्राप्त करू। अपन मित्रकेँ विदेहक विषयमे सूचित करू। ↑ विदेह आर.एस.एस.फीड एनीमेटरकेँ अपन साइट/ ब्लॉगपर लगाऊ। ब्लॉग "लेआउट" पर "एड गाडजेट" मे "फीड" सेलेक्ट कए "फीड यू.आर.एल." मे http://www.videha.co.in/index.xml टाइप केलासँ सेहो विदेह फीड प्राप्त कए सकैत छी। गूगल रीडरमे पढ़बा लेल http://reader.google.com/ पर जा कऽ Add a  Subscription बटन क्लिक करू आ खाली स्थानमे http://www.videha.co.in/index.xml पेस्ट करू आ Add  बटन दबाउ। Join official Videha facebook group. Join Videha googlegroups मैथिली देवनागरी वा मिथिलाक्षरमे नहि देखि/ लिखि पाबि रहल छी, (cannot see/write Maithili in Devanagari/ Mithilakshara follow links below or contact at ggajendra@videha.com) तँ एहि हेतु नीचाँक लिंक सभ पर जाऊ। संगहि विदेहक स्तंभ मैथिली भाषापाक/ रचना लेखनक नव-पुरान अंक पढ़ू। http://devanaagarii.net/ http://kaulonline.com/uninagari/  (एतए बॉक्समे ऑनलाइन देवनागरी टाइप करू, बॉक्ससँ कॉपी करू आ वर्ड डॉक्युमेन्टमे पेस्ट कए वर्ड फाइलकेँ सेव करू। विशेष जानकारीक लेल ggajendra@videha.com पर सम्पर्क करू।)(Use Firefox 4.0 (from WWW.MOZILLA.COM )/ Opera/ Safari/ Internet Explorer 8.0/ Flock 2.0/ Google Chrome for best view of 'Videha' Maithili e-journal at http://www.videha.co.in/ .) Go to the link below for download of old issues of VIDEHA Maithili e magazine in .pdf format and Maithili Audio/ Video/ Book/ paintings/ photo files. विदेहक पुरान अंक आ ऑडियो/ वीडियो/ पोथी/ चित्रकला/ फोटो सभक फाइल सभ (उच्चारण, बड़ सुख सार आ दूर्वाक्षत मंत्र सहित) डाउनलोड करबाक हेतु नीचाँक लिंक पर जाऊ। VIDEHA ARCHIVE विदेह आर्काइव भारतीय डाक विभाग द्वारा जारी कवि, नाटककार आ धर्मशास्त्री विद्यापतिक स्टाम्प। भारत आ नेपालक माटिमे पसरल मिथिलाक धरती प्राचीन कालहिसँ महान पुरुष ओ महिला लोकनिक कर्मभमि रहल अछि। मिथिलाक महान पुरुष ओ महिला लोकनिक चित्र 'मिथिला रत्न' मे देखू। गौरी-शंकरक पालवंश कालक मूर्त्ति, एहिमे मिथिलाक्षरमे (१२०० वर्ष पूर्वक) अभिलेख अंकित अछि। मिथिलाक भारत आ नेपालक माटिमे पसरल एहि तरहक अन्यान्य प्राचीन आ नव स्थापत्य, चित्र, अभिलेख आ मूर्त्तिकलाक़ हेतु देखू 'मिथिलाक खोज' मिथिला, मैथिल आ मैथिलीसँ सम्बन्धित सूचना, सम्पर्क, अन्वेषण संगहि विदेहक सर्च-इंजन आ न्यूज सर्विस आ मिथिला, मैथिल आ मैथिलीसँ सम्बन्धित वेबसाइट सभक समग्र संकलनक लेल देखू "विदेह सूचना संपर्क अन्वेषण" विदेह जालवृत्तक डिसकसन फोरमपर जाऊ। "मैथिल आर मिथिला" (मैथिलीक सभसँ लोकप्रिय जालवृत्त) पर जाऊ। संपादकीय बाशो जापानक बौद्ध भिक्षु आ हैकू कवि छलाह जापानक यात्राक वर्णन आ फुजी पहाड़ हुनकर कवितामे खूब अबैए। बाशोक किछु हाइकू एतए प्रस्तुत अछि (अनुवाद प्रीति ठाकुर द्वारा):- बाशोक हाइकू १.केराक गाछ लग / जै बौस्तुसँ हम घृणा करै छी तकर चेन्ह/ एकटा मुसकैन्थसक कोढ़ी २.एकटा घोड़ो / हमर आँखिकेँ आकर्षित करैए अइ /बर्फयुक्त काल्हिक भोरमे ३.बीतल एक बर्ख आर / एकटा यात्रीक छाह हमर माथपर, / पुआरक पनही हमर पएरमे ४.आब तखन चलू चली/ बर्फक आनंद लेबाक लेल जाधरि / हम पिछड़ि कऽ खसि पड़ी ५.पहिल झपसी जाड़क/ बानरो चाहैए/ छोट सन पुआरक कोट ६.फुजी पर्वतक बसात/ अपन पंखामे अनलौं/ इडो लोकक उपहार ७.बाशोक अन्तिम कविता जखन ओ मृत्युशय्यापर छलाह- दुखित पड़लौं एकटा यात्रा मध्य/ हमर स्वप्न भोथियाइए/ सुखाएल घासक चौरीक चारूकात सूचना: विदेहक तेसर अंक (१ फरबरी २००८)मे हम सूचित केने रही- “विकीपीडियापर मैथिलीपर लेख तँ छल मुदा मैथिलीमे लेख नहि छल,कारण मैथिलीक विकीपीडियाकेँ स्वीकृति नहि भेटल छल। हम बहुत दिनसँ एहिमे लागल रही आ सूचित करैत हर्षित छी जे २७.०१.२००८ केँ (मैथिली) भाषाकेँ विकी शुरू करबाक हेतु स्वीकृति भेटल छैक, मुदा एहि हेतु कमसँ कम पाँच गोटे, विभिन्न जगहसँ एकर एडिटरक रूपमे नियमित रूपेँ कार्य करथि तखने योजनाकेँ पूर्ण स्वीकृति भेटतैक।” आ आब जखन तीन सालसँ बेशी बीति गेल अछि आ मैथिली विकीपीडिया लेल प्रारम्भिक सभटा आवश्यकता पूर्ण कऽ लेल गेल अछि विकीपीडियाक “लैंगुएज कमेटी” आब बुझि गेल अछि जे मैथिली “बिहारी नामसँ बुझल जाएबला” भाषा नै अछि आ ऐ लेल अलग विकीपीडियाक जरूरत अछि। विकीपीडियाक गेरार्ड एम. लिखै छथि  ( http://ultimategerardm.blogspot.com/2011/05/bihari-wikipedia-is-actually-written-in.html  ) -“ई सूचना मैथिली आ मैथिलीक बिहारी भाषासमूहसँ सम्बन्धक विषयमे उमेश मंडल द्वारा देल गेल अछि- उमेश विकीपीडियापर मैथिलीक स्थानीयकरणक परियोजनामे काज कऽ रहल छथि, ...लैंगुएज कमेटी ई बुझबाक प्रयास कऽ रहल अछि जे की मैथिलीक स्थान बिहारी भाषा समूहक अन्तर्गत राखल जा सकैए ?..मुदा आब उमेश जीक उत्तरसँ पूर्ण स्पष्ट भऽ गेल अछि जे “नै”। ” रामविलास शर्माक लेख (मैथिली और हिन्दी, हिन्दी मासिक पाटल, सम्पादक रामदयाल पांडेय) जइमे मैथिलीकेँ हिन्दीक बोली बनेबाक प्रयास भेल छलै तकर विरोध यात्रीजी अपन हिन्दी लेख द्वारा केने छलाह , जखन हुनकर उमेर ४३ बर्ख छलन्हि (आर्यावर्त १४/ २१ फरबरी १९५४), जकर राजमोहन झा द्वारा कएल मैथिली अनुवाद आरम्भक दोसर अंकमे छपल छल। उमेश मंडलक ई सफल प्रयास ऐ अर्थेँ आर विशिष्टता प्राप्त केने अछि कारण हुनकर उमेर अखन मात्र ३० बर्ख छन्हि। जखन मैथिल सभ हैदराबाद, बंगलोर आ सिएटल धरि कम्प्यूटर साइंसक क्षेत्रमे रहि काज कऽ रहल छथि, ई विरोध वा करेक्शन हुनका लोकनि द्वारा नै वरन मिथिलाक सुदूर क्षेत्रमे रहनिहार ऐ मैथिली प्रेमी युवा द्वारा भेल से की देखबैत अछि? उमेश मंडल मिथिलाक सभ जाति आ धर्मक लोकक कण्ठक गीतकेँ फील्डवर्क द्वारा ऑडियो आ वीडियोमे डिजिटलाइज सेहो कएने छथि जे विदेह आर्काइवमे उपलब्ध अछि। नीचाँक पाँचू साइट विकी मैथिली प्रोजेक्टक अछि, प्रोजेक्टकेँ आगाँ बढ़ाऊ। http://translatewiki.net/wiki/Project:Translator

http://meta.wikimedia.org/wiki/Requests_for_new_languages/Wikipedia_Maithili

http://translatewiki.net/wiki/Special:Translate?task=untranslated&group=core-mostused&limit=2000&language=mai

http://incubator.wikimedia.org/wiki/Wp/mai

http://translatewiki.net/wiki/MediaWiki:Mainpage/mai ( विदेह ई पत्रिकाकेँ ५ जुलाइ २००४ सँ एखन धरि १११ देशक १,७८९ ठामसँ ६०, ३७८ गोटे द्वारा विभिन्न आइ.एस.पी. सँ ३,०२,७७१ बेर देखल गेल अछि; धन्यवाद पाठकगण। - गूगल एनेलेटिक्स डेटा। ) गजेन्द्र ठाकुर ggajendra@videha.com http://www.maithililekhaksangh.com/2010/07/blog-post_3709.html २. गद्य २.१.यायावरी- डॉ. कैलाश कुमार मि‍श्र-भावमय, भोगमय, योगमय बृन्‍दावन (पहिल खेपसँ आगाँ) २.२जीवकान्‍त .उत्तराधि‍कारी आ लेखक २.३.शि‍वकुमार झा टि‍ल्‍लू -मैथि‍ली कथाक वि‍कासमे गामक जि‍नगीक योगदान २.४.जगदीश प्रसाद मण्‍डल- नाटक- कम्‍प्रोमाइज(पछिला खेपसँ आगाँ) २.५.बिपिन झा- ग्रन्थ समीक्षा-प्रकृति परिक्रमा २.६.आशीष अनचिन्हार- बेचन ठाकुरजीक नाटक छीनरदेवी २.७.वि‍रेन्‍द्र यादव- कथा- बाबा गाछी यायावरी डॉ. कैलाश कुमार मि‍श्र भावमय, भोगमय, योगमय बृन्‍दावन (पहिल खेपसँ आगाँ) बृन्‍दावन केर हमर एक विद्यार्थी वि‍भु शर्मा कहलक जे ओर अनुज प्राण्‍जल हमरा लोकनि‍केँ तमाम स्‍थानीय सहायताक व्‍यवस्‍था करता दि‍ल्‍लीसँ स्‍नान-धि‍यान कए हमरा लोकनि‍ 5 बजे भोरे वि‍दा भेलौं। सीधे वृन्‍दावन पहुँलौं। ओतए इस्‍काँन मन्‍दि‍र लग प्रान्‍जल शार्मा हमरा लोकनि‍क पथ हेर रहल छल। प्रान्‍जल संग प्रवीण शर्मा नामक एक स्‍थानीय गाइड छलैक। प्रान्‍जल हमरा कहलक जे ई आहाँकेँ सभ कछु देखोताह। हमर सासु केर इच्‍छा सर्व प्रथम यमुनामे स्‍नान आर गौर वि‍सर्जनक छलन्‍हि‍। प्रवीण कहलक जे बृन्‍दावनक केशी घाट सर्वोत्तम छैक। केशी भगवान श्रीकृष्‍णक घोड़ाक नाम छलन्‍हि‍। ओ बड़ा प्रतापी तथा पूण्‍यात्‍मा घोड़ा छलै। प्रवीण स्‍थानीय होमाक कारण बृन्‍दावन केर एक-एक गलीसँ परि‍चि‍त छल। रमणरेती दि‍ससँ ल' क' जाय लागल। कहलक- “यएह छी रमणरेती।‍” देखैत छी चारू दि‍स गली, मकान, मन्‍दि‍र, मर्धशाला इत्‍यादि‍। एको ईंच धरती खाली नै। एको चम्‍मच रेतक माने बाउलक नामो नि‍शान नै। चहुँ दि‍स तंगी, आ गन्‍दगी। भेल यएह थीक रमणरेती? खाइर! गली-कुच्‍ची होइत अंतत: हमरालोकनि‍ केशी घाट पहुँचलौं। यमुनामे जल कुनो वि‍शेष नै। 15टा नाह कछेरपर लागल। पाँच-सात तीर्थायात्री स्‍नान करैत। मोनमे भेल- चलु चैनसँ स्‍नान करब। यमुनामे गाड़ीसँ उतरि‍ कछेरपर एलौं। कछेरपर अबि‍ते पानि‍सँ दुुर्गन्‍ध आबए लगल। कारीसीयाह पानि‍। तीनठामसँ पूरा शहरक गन्‍ध-भरल पानि‍ यमुनामे हड़ा-हड़ा क' खसैत। मोन धृणासँ भरि‍ गेल। नहेबाक इच्‍छा समाप्‍त भ' गेल। यमुनाक तमाम कल्‍पना आ वर्णन बि‍सरि‍ गेलौं। एकाएक एना बुझना गेल जेना हम दुनि‍याँक सभसँ पैघ गन्‍दा नालामे आबि‍ गेल छी। कृष्‍ण-राधा-गोपी कदम्‍बक गाछ यमुना....। सभ कि‍छु खतम!!! नावबला सभ कहलक- “श्रीमान्, नाहपर चढ़ा, हम यमुनाक ओइपार लए जाइत छी। ओतए नीक जल छै।‍” हमरालोकनि‍ नाहपर चढ़ गेलौं। जलसँ दुर्गन्‍ध अबैत छल। मोन घोर छल। ओइकात जा बालुपर सभ समान रखलौं। एक आंजुर जल उठेलौं। कारी-भीस आ दुर्गन्‍धसँ भरल। दय स्‍नान करैसँ साफ मना क' देलक। मुदा हमर सासु जि‍द्द ठानि‍ देलन्‍हि‍। ओ यमुनाक ओइ जलमे ग्‍यारह डुब्‍बी मारलनि‍। सबहक हेतु आ अपनो लेल। हम कहलि‍यनि‍- “एक डुब्‍बी हमरो लेल मारि‍ लेथि‍।‍” हमरा लग चन्‍दन केर पेस्‍ट छल। हम हुनक माथ एवं हाथमे रगड़लौं आ फेर बृन्‍दावन केर मन्‍दि‍र दि‍स प्रस्‍थान केलाैं। सभसँ पहि‍ने रंगनायक मन्‍दि‍र, तकरबाद एक आर मन्‍दि‍र- जइमे कृष्‍ण जीक बालवस्‍थाक मूर्ति कि‍शोरी जीक संग छलन्‍हि‍। तइमे अएलौं। पण्‍डा सभ नाना तरीकासँ वि‍धबा, कल्‍याण, अनाथ आश्रम, गौसेवा- लोक सभसँ पैसा ऐंठबामे माहि‍र। गली सभ गंदगीसँ भरल। समए बीतल जाइत छल। हम प्रवीणकेँ कहलि‍ऐक- “सीधे हमरा लोकनि‍केँ बांके बि‍हारी जीक मन्‍दि‍र ल' चलु।‍” करण हुनकर दर्शन बि‍ना हमर सासु अन्न-जल ग्रहण नै क' सकै छलीह। प्रवीण संग हमरालोकनि‍ बांके-बि‍हारी मन्‍दि‍र केर प्रांगण दि‍स बढ़लौं। पूरा गलीमे बड्ड भीड़। मनुक्‍ख चुट्टीक धारी जकाँ ससरैत। हरे-कृष्‍ण, राधे-राधेक उच्‍चारणसँ वातावरण गनगनाइत। चारू दि‍स गली सभमे गंदगी। कतौ-वि‍धबा सभ भीख मंगैत तँ कतौ भगवा वस्‍त्रमे साधु! मोन खि‍न्न-खि‍न्न! भेल। कतए आबि‍ गेलौं। प्रवीण स्‍थानीय होबाक कारणे एकटा नुकौका गलीसँ हमरा लोकनि‍केँ मन्‍दि‍रक प्रांगणमे घुसेलन्‍हि‍। मनुक्‍खपर मनुक्‍ख चढ़ैत। हमरा लोकनि‍ कोहुना-कहुना बांके-बि‍हारी जीकेँ एक झलक देख पेलौं। आब मोनमे आबए लगल जे कखन बाहर नि‍कली। जखन वापस अबैत रही तँ कातमे एक भव्‍य साधु जे करीब 65 वर्षक छल के कनैत आ भाव-वि‍भोर होइत देखलऐक। हम कहलऐक‍- “क्‍यो रो रहे हो बाबा?‍” जबाब देलाह- “आज ठाकुर जी का ब्‍याला है।‍” हम ब्‍यालाक अर्थ नै बुझलौं पुछलयनि‍- “ब्‍याला क्‍या होता है?‍” साधु- “जब कि‍सी का मन्नत पूरा हो जाता है तो ठाकुर जीका ब्‍याला करबाता है। ब्‍याला अर्थात् वि‍वाह। इसमे तीन लाख रूपये का खर्च है। फूलों से पूरे मन्‍दि‍र को सजाया जाता है। बरात का आयोजन, पालकी मे बैठाकर ठाकुर जी एवं कि‍शोरी जी को पूरे बृन्‍दावन मे घुमाया जाता है। पालकी पुन: बरसाना ले जाया जाता है और वहाँ से वापस बृन्‍दावन।” हमरा मुँहसँ नि‍कलल- “ठीक है। अच्‍छा है। ये तो उत्‍सव का माहौल है। फि‍र रो क्‍यों रहे हो?‍” साधु- “रोने का ही तो समय है। राधे-राधे इसलि‍ऐ रो रहा हूँ कि‍ राधा मेरी बहन है।‍ अब ठाकुर जी से उसका ब्‍याहला हो रहा है। इसके बाद वह हमसे बि‍छुड़ जाएगी। मैं नहीं रोऊँगा तो कौन रोएगा।” ई कहि‍ ओ भोकासी पारि‍ पुन: कानए लगल। ओकर कानब वास्‍तवि‍क। कुनो माटकि‍एता नै। सहज आ नि‍श्‍छल। ओहि‍ना जेना एक सहोदर भाय अपन वहि‍नक दुरागमनक काल कनैत अछि‍। वहि‍नसँ बि‍छुड़बाक वएह टीस। वएह भावनात्‍मक लगाव। हमर मोन ओकरा प्रति‍ श्रद्धासँ भरि‍ गेल। बृन्‍दावनसँ सि‍नेह बढ़ए लागल। धृणा समाप्‍त होमए लागल। एकाएक नजरि‍ एक लगभग 45 वर्षक युवकपर गेल। फुलपेन्‍ट-शर्ट पहि‍रने, माथामे चानन मुदा त्रि‍पुण्‍ड नै। धरगर-पतरगर। गरदनि‍मे तुलसीक माला लपेटने-बि‍ल्‍कुल गरदनि‍मे सटल आ लपटाएल। ओ बांके-बि‍हारी जीक सामने ठाढ़ भ' कि‍छु बड़बड़ाइत छल। हम अनायास ओकरा लग बढ़लौं। सुनैत छी ओ कि‍छु एना बाजि‍ रहल अछि‍- “बड़ो जीजा जी। क्‍या लीला करते हो। बड़ो-बड़ो को नचाते हो। मैं मस्‍त हो गया। धन्‍य हो गई मेरी बहना। मुझे और क्‍या चाहि‍ए। अगर मेरी बहन और जीजा प्रसन्न तो मैं भी प्रसन्न। लग रहो।‍” हमरा बुझना गेल ई की बाजि‍ रहल अछि‍। हम टोकैत कहलि‍यनि‍- “कि‍ससे बात कर रहे हैं आप?‍” युवक- “बांके-बि‍हारी जी से और कि‍ससे।‍” हम- “फि‍र जीजा जी कि‍से कह रहे थे?‍” युवक- “बि‍हारी जी को।‍” हम- “बि‍हारी जी को?‍” युवक- “जी। मैंने अपने गुरूजी के आदेश से बि‍हारी जी को अपना जीजा बनाया है। इस तरह राधा जी मेरी बहन हुई। मैं अाप लोगों की तरह इनसे कुछ मांगने नहीं आता। भाइ भला अपने जीजा और बहन से क्‍या मांगेगा। वो ताे देगा ना। मैं तो देने आता हूँ। इनके लीला को देखने आता हूँ।‍” हम आश्‍चर्यित होइत‍ बजलौं- “आपका क्‍या नाम है?‍” युवक- “मेरा नाम चोलेश शर्मा है। मैं दि‍ल्‍ली से हूँ। प्रति‍ सप्‍ताह रवि‍वार को यहाँ आता हूँ।‍” हम- “अब यहाँ से कहाँ जाऐंगे?‍” युवक- “आज मथुरा नहीं जाऊँगा। यहाँ से सीधे बरसाने जाऊँगा। अपनी लाडली राधा से मि‍लकर वापस दि‍ल्‍ली चला जाऊँगा।‍” हम- “क्‍या हमलोग भी आपके साथ चल सकते हैं।‍” युवक- “क्‍यों नहीं। आप भी चले। हमारी गाड़ी के साथ-साथ।‍” चोलेश शर्माक भावमे सेहो हमरा सहजता आ समर्पण बुझना गेल। हमरा लोकनि‍ मथुराक यात्रा कुनो आन बेर लेल छोड़ि‍ वरसाना दि‍स वि‍दा भेलौं। बृन्‍दावन केर कि‍छु नगद राशि‍ आ धन्‍यवाद दैत चोलेश शर्माक संग हमरा लोकनि‍ आगाँ बढ़लौं। हम अपन एक आदमीकेँ चोलेश शर्मा गाड़ीमे बैस चोलेश राधा-कृष्णक कथा आर एक-एक स्‍थानक गुणगान करैत रहल। समस्‍त बृन्‍दावन एक भव्‍य लाग'-लागल। अन्‍तत: दू बजे दि‍नमे बरसाने पहुँचलौं। पहाड़पर चढ़ि‍ राधा-रानीक मन्‍दि‍रमे प्रवेश केलाैं। करीब 25मि‍नट चढ़ैमे लागल। पता चलल जे मन्‍दि‍रक पट बन्न छै। साढ़े चारि‍ बजे सांझमे खुजतैक। चोलेशक संग मन्‍दि‍रक बाहरी हि‍स्‍साक आवरणक नि‍रक्षण करए लगलौं। बस्‍सानेकेँ मध्‍यमे ई पहाड़ी बरसानाकेँ माथपर मनटीका जकाँ लागल। एे मन्‍दि‍रकेँ लाड़लीजीक मन्‍दि‍र कहल जाइत छैक। मन्‍दि‍रक ि‍नर्माण राजस्‍थानक राजा वीर सि‍ंह 1675ईं.मे करोलन्‍हि‍। मन्‍दि‍रक स्‍थाप्‍य दक्षि‍ण आर उत्तर भारतक सोहनगर मि‍श्रण केर अनुपन उदाहरण बुझना गेल। मन्‍दि‍र 90फीटक छैक। शि‍खर उजर, नीला ग्रेनाईट पाथर तथा सोनासँ बनल छैक। मन्‍दि‍रक कलाकृति‍क ि‍नर्माण दक्षि‍ण भारतक 15कलाकार केर सहायतासँ कएल गेल छै। मन्‍दि‍रक प्रांगणक चारूकात राजस्‍थान शैलीक पेन्‍टि‍ंगसँ सजाएल। कतौ कृष्‍ण गोपीक चीर हरण करैत, कतौ मत्‍स्‍यावतारक चि‍त्रण, कतौ नटखट कन्‍हैयाकेँ यसोदाजी उखड़ि‍मे बन्‍हने, कतौ कलि‍या नागकेँ नथैत कृष्ण, कतौ कदम्‍बक गाछपर बैस बासुरी हेरैत कृष्‍ण, कतौ गोवर्धन पहाड़केँ आंगुरपर उठेने कृष्‍ण, कतौ यमुनासँ जल भरैत गोपी, कतौ ऐ मंदि‍रक रचनाक उल्‍लेख-चि‍त्रकलाक उत्तम प्रस्‍तुि‍त। चोलेश शर्मा एक स्‍थानीय साधु श्री भोलालाल दासक सहायतासँ एक-एक चीजक दर्शन हमरा लोकनि‍केँ करौलन्‍हि‍। मुख्‍य पट खुजबामे अखनो समए छल। हमरा लोकनि‍ मन्‍दि‍रक पाछाँमे बनल एक छोट करी दि‍स बढ़लौं। एक साधु भेटलाह। चालेश ओइ साधुसँ बात करए लगलाह। बीच-बीच झुण्‍डक-झुण्‍ड स्‍थानीय महि‍ला सभ धधरा-चुनरी पहि‍रने राधा-कृष्‍णक लोकगीत गबैत अबैत रहल। मोन, प्रसन्न भेल। साढ़े चारि‍ बजे पट खुजि‍ गेलैक। राधा-कृष्‍णक बड़ा नि‍श्‍चि‍न्‍ततासँ दर्शन भेल। आब हमरा लोकनि‍ दि‍ल्‍लीक हेतु प्रस्‍थान केलौं। जतए-कतौ खाली स्‍थान रहैक ततय राधे-राधे लीखल। हमहूँ राधे-राधेमे मग्‍न भ' गेलौं। इहो पता चलल जे बरसानाक पूर्व नाम ब्रम्‍हसरीन छैक। दंतकथा ई छैक जे एक बेर ब्रम्‍हाजी भगवान श्रीकृष्‍णसँ धरतीपर ि‍कछु दि‍न रहबाक नि‍वेदन केलथि‍न्‍ह। कृष्‍ण कहलथि‍न्‍ह ब्रम्‍हाजीसँ- “ठीक छैक अहाँ एकटा पहाड़ीमे अपने-आपकेँ परि‍वर्तित करू। ब्रम्‍ह तुस्‍त पहारी भ' गेलाह। तै बरसाने केर चारि‍ पहारी ब्रम्‍हाजीक चारि‍ मस्‍ति‍क या सि‍र मानल जाइत अछि‍। तै ब्रम्‍हाकसि‍रसँ ब्रम्‍हसरीन भेल या ब्रम्‍हसरीन कालान्‍तरमे बरसाने भ' गेल।‍” शेष अगि‍ला अंकमे......। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। जीवकान्‍त (1936- ) नाम- जीवकान्त झा,पिता-गुणानन्द झा, माता-महेश्वरी देवी, जन्म-२५.०७.१९३६ अभुआढ़, जिला-सुपौल। नौकरी-विज्ञान शिक्षक (उ.वि.खजौली १९५७-८१), हिन्दी शिक्षक (उ.वि.डेओढ़ एवं उ.वि.पोखराम १९८१-९८)।पहिल रचना-इजोड़िया आ टिटही (कविता, जनवरी १९६५ मिथिला मिहिर)।पहिल छपल पोथी- दू कुहेसक बाट (उपन्यास १९६८)।नूतन पोथी-खिखिरक बीअरि (२००७ बाल पद्य कथा), अठन्नी खसलइ वनमे (पद्य-कथा संग्रह) आ पंजरि प्रेम प्रकासिया (जीवन-वृत्तक अंश)।पुरस्कार-साहित्य अकादेमी 1998 तकै अछि चिड़ै, पद्य , किरण सम्मान (१९९८), वैदेही सम्मान (१९८५)।प्रकाशित पोथी- कविता संग्रह:नाचू हे पृथ्वी (७१), धार नहि होइछ मुक्त (९१), तकैत अछि चिड़ै (९५), खाँड़ो (१९९६), पानिमे जोगने अछि बस्ती (९८), फुनगी नीलाकाशमे (२०००), गाछ झूल-झूल (२००४), छाह सोहाओन (२००६), खिखिरिक बीअरि (२००७) कथा-संग्रह:एकसरि ठाढ़ि कदम तर रे (७२), सूर्य गलि रहल अछि (७५), वस्तु (८३), करमी झील (९८) उपन्यास:दू कुहेसक बाट(६८), पनिपत(७७), नहि, कतहु नहि (७६), पीयर गुलाब छल (७१), अगिनबान (८१) हिन्दी अनुवाद- निशान्त की चिड़िया (तकैत अछि चिड़ै, साहित्य अकादमी, दिल्ली २००३)। प्रबोध सम्मान 2010 सँ सम्मानित। उत्तराधि‍कारी आ लेखक ओइ दि‍न फोनाचारमे एक अग्रज लेखक कहलनि‍ जे हम मैथि‍लीमे कोनो उत्तराधि‍कारी नै दए सकलौं। हम देखै छी जे हुनक अपेक्षा बहुत जाइज छन्‍हि‍। बहुतो लेखककेँ वंशज लेखक भेल छथि‍ आ से योग्‍यतापूर्वक आ आवेशपूर्वक ऐ काजमे लागल छथि‍। ओकर आगाँ ओ इहो कहलनि‍ जे हुनके परि‍वारमे एक गोटे मैथि‍लीमे लि‍खैत अवश्य छथि‍, मुदा ओ मैथि‍लीमे कोनो वस्‍तु पढ़ैत नै छथि‍। हमरा भेल जे एकर चर्चा होएबाक चाही। लेखक भेनाइ आकस्‍मि‍क बात थि‍कैक। ऐ बातकेँ कोनो नि‍यममे बान्‍हल नै जा सकैत छैक। कतेक लेखक छथि‍ जनि‍क पुरखा लेखक भेल छलथि‍न। मुदा एकर वि‍परीतो बात ओतबे सत्‍य थि‍क जे बहुसंख्‍यक लेखक एहेन परि‍वारक सन्‍तान छथि‍ जइमे कहि‍यो लेखक आ कवि‍ नै भेल छल। संसारमे अनेक वस्‍तुक पढ़ाइ छैक, जेना पढ़ाइ कए लोक डाक्‍टर भए सकैत अछि‍। लेखक बनबा लेल एहेन कोनो शि‍क्षण आ प्रशि‍क्षणक चर्या (पाठ्यक्रम) नै छैक। एमहर पत्रकारि‍ताक पढ़ाइ शुरू भेल अछि‍। मास मीडि‍याक पढ़ाइ शुरू भेल अछि‍। नाटक वि‍द्यालय आ फि‍ल्‍म प्रशि‍क्षण संस्‍थान सभ सोहो अछि‍। लेखक बनएबाक कला आ विज्ञानक चर्चा नै सुनल अछि‍। मैथि‍लीमे जे कि‍यो लेखक अछि‍, से सभ तपस्‍वी जकाँ तपोनि‍ष्‍ठा अछि‍। ऐमे (मैथि‍ली) पाठक नै छैक, अथवा बहुत सीमि‍त पाठक-वर्ग छैक। देासर कारण प्रकाशक नै छैक। अपन पाइ गला कए पोथीक मुँह देखब संभव होइत छैक। कोनो आमदनी नै छैक। बहुत घाटा छैक, अजीवन प्रतिमास कि‍छु धन ऐ भट्ठीमे झोंकए पड़ैत छैक। तखन जतबे छोट होउक, एक लेखक वर्ग छैक जे लि‍ख रहल छैक। यशोलि‍प्‍सा एक कारण कहल जा सकैत अछि‍। प्रत्‍येक आदमीमे ई जन्‍मजात दुर्बलता होइत छैक जे ओ यशस्‍वी होअए। मुदा ऐ प्रेरणाकेँ एकमात्र प्रेरणा नै बूझल जएबाक चाही। एक देखार प्रेरक अछि‍ जे ई सभ लोक भाषा-प्रेमसँ प्रेरि‍त अछि‍ आ चाहैत अछि‍ जे भाषा (आ संस्‍कृति‍)केँ जि‍आ कए राखी आ वि‍परीत परि‍स्‍थि‍ति‍योमे एकरा जि‍एबाक उद्योगमे लागल रही। हमर एक मात्र पौत्र (पि‍ति‍औत भाइक पौत्र) इन्‍कम टैक्‍समे हाकि‍म छथि‍। 2003ईं.मे मैथि‍ली अकस्‍मात संसदसँ अनुमोदि‍त भेल आ संवि‍धानक भाषा-सूचीमे स्थान पाबि‍ गेल। ओ पौत्र ओही दि‍न फोनपर हमरा कहलनि‍ जे हमरे सबहक (मैथि‍ली लेखक) सदुद्योगसँ आइ ई भाषा ऐ गौरवक अधि‍कारी भेल अछि‍। भाषा लेल जाधरि‍ श्रद्धा-भक्‍ति‍ नै होएतैक ताधरि‍ ऐ भाषाकेँ लेखक नै भेटतैक। अनुभव कएल जा रहल अछि‍ जे मैथि‍ली भाषामे जतबा जे काज होइए, से सभ बूझबे सबहक हाथे भए रहल अछि‍। नव लोक ऐ काजमे नै लगैत अछि‍। प्राय: भारतक प्रत्‍येक भाषामे ई गंजन छैक। यद्यपि‍ कि‍छु भाषा देशमे अछि‍ जइमे पोथी आ पत्रि‍काक प्रसार-संख्‍या उत्‍साहजनक छैक, तइ सभमे कि‍छु लेखक भर्ती होइत अछि‍। अधि‍कांश भाषामे मैथि‍लि‍ए जकाँ रौदी-दाही छैक, तँ ई धंधे बि‍लताहु भेल छैक। ऐ कारणसँ केन्‍द्रीय साहि‍त्‍य अकादेमी (दि‍ल्‍ली) सभ भाषामे युवा लेखक पुरस्‍कार आरंभ देलक अछि‍। चालीस बर्खसँ कम वएसक लेखक पहि‍ल पोथी सभमे सँ एकपर ई पुरस्‍कार देल जाएत। ई बात प्रशंसा योग्‍य अछि‍, मुदा चि‍न्‍ताजनक सेहो अछि‍। चि‍न्‍ता ऐ बात लेल जे चालीस बर्खसँ छोट वएसक लोक ऐ क्षेत्रमे आएब कदाचि‍त पसि‍न्न नै करैत अछि‍। नारायणजी एक दि‍न दि‍ल्‍ली मेट्रो रेलसँ पर्यटन कए रहल छलाह, ओहीठामसँ फोन लगा कए कहलनि‍। मेट्रो रेल स्‍टेशनपर पोथी पत्रि‍काक कठघारा छैक। हि‍न्‍दीक एकहु पत्रि‍का आ पोथी नै। मैथि‍ली चर्चा करब व्‍यर्थ। एकर दू अर्थ भए सकैत अछि‍, एक तँ ऐ देशमे लि‍खबा-पढ़बाक भाषा अंग्रेजी अछि‍। आ अंग्रेजि‍ए टा अछि‍। दोसर जे कि‍यो पाठक हि‍न्‍दीमे (तहि‍ना मैथि‍लीमे) कि‍ताब, अखबार आ साप्‍ताहि‍क पत्र नै पढ़ए चाहैत अछि‍। कोंकणीमे एक लेखक छथि‍ रवीन्‍द्र केलेकर। ओ भारतीय भाषा सबहक गंजनक चर्चा करैत एकठाम लि‍खै छथि‍ जे संवि‍धान हि‍न्‍दीक माथपर राजमुकुट राखि‍ देलक, तइसँ कि‍छु लाभ हि‍न्‍दीकेँ नै भेलैक। ओ लि‍खैत छथि‍ जे अंग्रेजीकेँ हाथमे राजदण्‍ड छैक। तँए देशक शहरमे आ जंगलमे अंग्रेजी माध्‍यमक स्‍कूल चलि‍ रहल छैक। (आश्चर्य जे मैथि‍ली माध्‍यमक एकहु स्‍कूल नै फूजल छैक।) पूर्वोक्‍त अंग्रेजी लेखकक बातमे एक बात आर अछि‍ जे मैथि‍ली लेखक हुनक परि‍वारमे छन्‍हि‍, मुदा ओहो मैथि‍लीमे (पोथी) पढ़ब पसि‍न्न नै करै छथि‍। ई कोनो वि‍शेष उदाहरण नै थि‍क। अग्रज महाशय जइ क्‍लशक चर्चा करैत छथि‍, से वि‍रल घटना नै थि‍क, सार्वजनि‍क घटना थि‍क। मैथि‍ली पोथी नै पढ़ल जा रहल अछि‍। कहल जाए जे ऐ पोथीक कोनो महत्‍व नै देल देल जाइत छैक। हम नवंबर 2010ईं.मे अपन प्रकाशि‍त नव पोथीक दस-पन्‍द्रह प्रति‍ पटना लए गेल रही। मोनमे रहए, लेखक सभकेँ देब। कोनो पुस्‍तक व्‍यवसायीकेँ देब। पोथी पटना-सन शहरमे दस प्रति‍ कि‍एक नै खपि‍ जाएत, से धरणा सभ रहय। तीन सप्‍ताह धरि‍ हम पटना रही। दसो गोटेकेँ फोन कएल, पोथी रखने छी, कृपया आउ, लए जाउ आ एकर वि‍तरणमे मदति‍ करू। सभटा व्‍यर्थ भेल। अन्तमे अनेक आमंत्रि‍तमे सँ एक अजि‍त कुमार आजाद अएलाह आ हमर भार हल्‍लुक कए देल, दस प्रति‍ उठा कए ओ अपन मोटर साइकिलक डि‍क्कीमे धए लेल आ लए गेलाह। एक दि‍न प्रसि‍द्ध कवि‍ उदयचन्‍द्र झा वि‍नोद फोनाचारमे कहलनि‍, पोथी की छपाउ? पोथी लेल कि‍यो (माने पाठक आलोचक, इति‍हासकार, अनुसंधि‍त्‍सु आदि‍) प्रतीक्षा कहाँ करैत अछि‍? पोथी छापि‍ देल, तँ वाह-वाह, नै छापल, तैयो वाह-वाह। ने ककरो उत्‍सुकता छैक, ने ककरो ऐ बातक प्रत्‍याशा छैक। पटनाक एक पुस्‍तक व्‍यवसायी पुछलापर कहलनि‍- “मैथि‍लीमे वएह पोथी बि‍काइत अछि‍ जे प्रति‍योगि‍ता परीक्षामे ओकर सि‍लेबसमे लागल छैक। आर कोनो पोथीक पुछारि‍ ग्राहक नै करैत अछि‍।” पूवोक्‍त अग्रज बंधुक चि‍न्‍ता ठीक छन्‍हि‍। हमरा सबहक घरमे लेखकक आ पाठकक जन्‍म नै भए रहल अछि‍। अपने घरसँ पुन: एक उदाहरण लै छी। एकटा पौत्र छथि‍ जे लोहाक कारखानामे नोकरीमे लागल छथि‍। एक दि‍न ओ हमरा पुछलन- “गामपर अंग्रेजीक उपन्‍यास (सभ) अछि‍?” हम कहलि‍यनि‍- “की बात थि‍कै?” ओ कहलनि‍- “अंगेजीक उपन्‍यास उपन्‍यास रहैत तँ गाम जइतौं आ ओइठामसँ कि‍छु छाँटि‍ कए पढ़बा लेल अनि‍तौं, आर की?” ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। शि‍वकुमार झा टि‍ल्‍लू मैथि‍ली कथाक वि‍कासमे गामक जि‍नगीक योगदान अपन जन्‍म कालहि‍सँ “मैथि‍ली‍” समाजक अग्र आसनपर बैसल वाचकगण द्वारा महि‍मामंडि‍त होइत रहलीह। स्‍वाभावि‍क अछि‍ शि‍क्षि‍त लोक ऐ वर्गसँ संबंध रखैत छलथि‍। आर्य परि‍वारक सभ भाषा समूहक जननी संस्‍कृत मानल जाइत अछि‍ तँए मैथि‍ली कोना तत्‍समसँ बचथि‍? सरि‍पहुँ मैथि‍लीक अधि‍ष्‍ठाता ब्राह्मण आ कर्ण-कायस्‍थ रहल छथि‍, तँए काव्‍य, महाकाव्‍य, कथा वा नाटक हुअए सभ साहि‍त्‍य पल्‍लवक उदय तत्‍सम मिश्रि‍त मैथि‍लीसँ भेल। आि‍दकवि वि‍द्यापति‍क पदावली पुरान-रहि‍तौं एे रूपेँ अपवाद अछि‍ मुदा हुनक पुरूष परीक्षा संस्‍कृतक आवरणसँ बाहर नै नि‍कलि‍ सकल। संभवत: मैथि‍लीक कथाक आरंभ पुरूष परीक्षाक मैथि‍ली अनुवाद कऽ चन्‍दा झा कएलनि‍। प्रथम मैथि‍लीक मौलि‍क कथा वि‍द्यासि‍न्‍धुक कथा, कथा संग्रह थि‍क। तत्‍पश्‍चात् स्‍वतंत्र रूपेँ मैथि‍लीमे कथा लि‍खब प्रारंभ भऽ गेल। भुवन जीसँ लऽ कऽ वर्त्तमान युगक कथा यात्रामे कि‍छु एहेन कथाकार भेल छथि‍ जनि‍क यात्रासँ ऐ भाषाकेँ स्‍थायी स्‍तंभ भेटल। ऐमे कुमार गंगानंद सि‍ंह, नगेन्‍द्र कुमर, मनमोहन झा, शैलेन्‍द्र मोहन झा, रामदेव झा, हंसराज, व्‍यास, कि‍रण, रमानंद रेणु, गौरी मि‍श्र, लि‍ली‍ रे, नीरजा रेणु, रूपकान्‍त ठाकुर, रमेश, धीरेन्‍द्र धीर, अशोक, मन्‍त्रेश्वर झा, धूमकेतु, वि‍भूति‍ आनंद, चि‍त्रलेखा देवी, रामभरोस कापड़ि‍ भ्रमर, श्‍यामा देवी, शेफालि‍का वर्मा, कमला चौधरी, कामि‍नी कामायनी, प्रदीप बि‍हारी, हीरेन्‍द्र, ललन प्रसाद ठाकुर, गौरीकान्‍त चौधरी कान्‍त, अरवि‍न्‍द ठाकुर, अशोक मेहता, राजाराम सि‍ंह राठौर, परमेश्वर कापड़ि‍, वि‍जय हरीश, उमानाथ झा, योगानंद झा, सुधांशु शेखर चौधरी, गोवि‍न्‍द झा, राधाकृष्‍ण बहेड़, मणि‍पद्म, मायानंद मि‍श्र, जीवकान्‍त, राजमोहन झा, प्रभास कुमार चौधरी, इन्‍द्रकान्‍त झा, ि‍दनेश कुमार झा, नरेश कुमार वि‍कल, सुभाष चन्‍द्र यादव, केदार कानन, बलराम, अमर, चन्‍द्रेश, रमाकान्‍त राय 'रमा', कुमार पवन, सि‍याराम झा सरस, रामभद्र, रौशन जनकपुरी, राजेन्‍द्र वि‍मल, रमेश रंजन, सुजीत कुमार झा, जि‍तेन्‍द्र जीत, नारायणजी, शैलेन्‍द्र आनन्‍द, अनमोल झा, उग्रनारायण मि‍श्र कनक, राजदेव मण्‍डल, कपि‍लेश्वर राउत, वीणा ठाकुर, कैलाश कुमार मि‍श्र, देवशंकर नवीन, महाप्रकाश, धीरेन्‍द्र नाथ मि‍श्र, साकेतानंद, सोमदेव, अशोक अवि‍चल, रवि‍न्‍द्र चौधरी, वि‍द्यानाथ झा 'वि‍दि‍त', शि‍वशंकर श्रीनि‍वास, मानेश्वर मनूज, अनलकांत, श्रीधरम, सत्‍यानंद पाठक, मि‍थि‍लेश कुमार झा, नवीन चौधरी, आशीष अनचि‍नहार, वि‍रेन्‍द्र यादव, बेचन ठाकुर, गंगेश गुंजन, मनोज कुमार मण्‍डल, अकलेश कुमार मण्‍डल, संजय कुमार मण्‍डल, भारत भूषण झा, लक्ष्‍मी दास, नीता झा, उषा कि‍रण खान, रामकृपाल चौधरी 'राकेश', वि‍द्यापति‍ झा, ज्‍योत्‍सना चंद्रम, सुस्‍सि‍मा पाठक, शुभेन्‍द्र शेखर, कुसुम ठाकुर, दुर्गानन्‍द मण्‍डल, ज्‍योति‍ सुनीत चौधरी, शंकरदेव झा आ गजेन्‍द्र ठाकुर प्रमुख छथि‍। ऐ बीछल कथाकारक समूहसँ वि‍लग कि‍छु एहेन कथाकार भेल छथि‍ जनि‍क सृजनशीलतासँ मैथि‍लीकेँ नव गति‍ भेटल। जइमे प्रो. हरि‍मोहन झा, ललि‍त आ राजकमलकेँ राखल जाए। हरि‍मोहनबाबू हास्‍य आ दर्शनसँ समाजक सत्‍यकेँ नाङट करैत इति‍श्री मर्म वा अनुशासि‍त मजाकसँ कएलनि‍। जइसँ हि‍नक गंभीर कथा बि‍म्‍बपर हास्‍य भारी पड़ि‍ गेल आ ओहीमे समाहि‍त दर्शन दि‍स समान्‍य पाठकक धि‍याने नै गेलनि‍। ललि‍त जीक कथामे सम्‍यक समाजक परि‍कल्‍पना तँ भेटैत अछि‍ मुदा समाजक कात लागल वर्गक वि‍वरण स्‍वातीक बून जकाँ कतौ-कतौ भेटैत अछि‍। राजकमल चौधरी प्रयोगवादी कथाकारक रूपेँ प्रसि‍द्ध छथि‍। जौं एकैसम शताब्‍दीक कथा ि‍वकासक चर्च कएल जाए तँ ऐ वि‍धामे संतान रहि‍तौं मैथि‍‍ली बॉझ जकाँ भऽ गेल छलथि‍। सन् २००१सँ २००८ईं. धरि‍क कथा वि‍कासक चर्च करब प्रासंगि‍क नै अछि‍। सन २००८ईं.क उत्तरार्धमे मैथि‍ली साहि‍त्‍यकेँ एकटा बेछप्‍प कथाकार भेटल। ओ मात्र कलमें वा वाचक रूपे नै वरण जीवनक सभ क्षेत्रमे, सम्‍यक चरि‍त्र रखैबला साम्‍यवादी साहि‍त्‍यकार श्री जगदीश प्रसाद मण्‍डल। हि‍नक पहि‍ल कथा भैंटक लावा आ बि‍साँढ़ घर-बाहरमे आ चूनवाली मि‍थि‍ला दर्शन पत्रि‍कामे प्रकाशि‍त भेल। मुदा घर बाहरमे हि‍नक रचनाक भाषामे तोड़-मरोड़, उनटा-पुनटा आ काट-छाँट सेहो कएल गेल, जइसँ भाषा-प्रदूषणक गंधसँ गनहा गेल। मैथिलीक किछु तथाकथित कथाकार-कवि हिन्दीक शब्द घोसिया-घोसिया कऽ मैथिलीकेँ प्रदूषित करैत रहल छथि, प्रायः जगदीशजीक खाँटी मैथिली हुनका लोकनिकेँ नै अरघलनि। मुदा तत्‍पश्‍चात वि‍देहक सौजन्‍यसँ हि‍नक प्रति‍पाद्य कथा बि‍साँढ़ वास्‍तवि‍क रूपरेखाक संग छपल। हम सेहो पढ़लौं। अनेक पाठकक संग श्रुति‍ प्रकाशनक नजरि‍ सेहो पड़लनि‍ आ तखन अवि‍कल रूपमे ई संग्रह छपल। सन् २००९ईं.मे वि‍देहक संपादक श्री गजेन्‍द्र ठाकुरक प्रयाससँ श्रुति‍प्रकाशन दि‍ल्‍लीक अधि‍ष्‍ठाता श्री नागेन्‍द्र कुमार झा आ हुनक साहि‍त्‍य प्रेमी धर्मपत्नी श्रीमती नीतू कुमारी हि‍नक पहि‍ल कथा संग्रह गामक जि‍नगी प्रकाशि‍त कएलनि‍। संयोगसँ ऐ पोथीक प्रारंभ भैंटक लावा कथासँ कएल गेल। एक सए पैंसठ पृष्‍ठक ऐ संग्रहमे १९ गोट कथा संग्रहीत अछि‍। आमुख देसि‍ल वयनाक सि‍द्धहस्‍त कथाकार सुभाष चन्‍द्र यादव जी लि‍खने छथि‍। जेना-तेना सुभाषबाबू कथाकारक महि‍मामंडन तँ कएलनि‍, परंच ऊपर मोने आ हि‍यासँ लि‍खल आमुखमे भि‍न्नता होइत अछि‍, जेकर ि‍नर्णए प्रबुद्ध पाठकपर छोड़ि‍ देल जाए। बंगभाषीकेँ कोलकाता सन महानगर, मागधीकेँ पाटलि‍पुत्र ऐति‍हासि‍क शहर, भोजपुरी लोकनि‍केँ गोरखपुर आ वाराणसी सन धाम भेटल। मैथि‍ली भाषीकेँ गनि‍-गुथि‍ कऽ दरि‍भंगा आ सहरसा सन ग्राम्‍य नगरी। तखन भाषाक शहरीकरण आ आदान-प्रदानक सपनों देखब उचि‍त नै। भारतवर्ष जौं गामक देश तँ मि‍थि‍ला महागामक भूि‍म। एक वर्ष बाढ़ि‍ तँ दोसर वर्ष सुखाड़। कोनो उद्योगक साधन नै, शि‍क्षा, स्‍वास्‍थ्‍य आ सड़क सन मौलि‍क समस्‍या मकड़जालमे ओझराएल अछि‍। परि‍णाम पलाएन अर्थात पड़ाइनक रूप लऽ रहल। भोजपुरी लोक सेहो पलाएन कएलनि‍ परंच अपन भाषाक संग, दृष्‍टि‍कोण नीक लगैत अछि‍। अपन देशकेँ के कहए माॅरीशस आ फि‍जी धरि‍ अपन बोली धेने छथि‍। अपन जीवन-आचारकेँ हाइटेक बनेबाक क्रममे मैथि‍ल संस्‍कृति‍क दोहन भऽ रहल अछि‍। आनक कोन कथा? कि‍छु एहेन साहि‍त्‍यकार भेलाहेँ जि‍नका साहि‍त्‍य आकादमी पुरस्‍कार तँ मैथि‍ली भाषाक लेल भेटल मुदा हुनक परि‍वारक नेना-भुटका गलति‍योसँ मैथि‍ली नै बजै छथि‍। कथा जगतक प्रयोगवादी शि‍ल्‍पी राजकमल जीक कथा रीति‍-प्रीति‍क समागमसँ ओत-प्रोत छन्‍हि‍। ललका पाग, साँझक गाछ, कादम्‍वरी उपकथा सन बहुत रास कथामे सि‍नेहक मर्मस्‍पर्शी चि‍त्रण कएल गेल अि‍छ। परंच कतौ-कतौ राजकमल जी सेहो भटकि‍ कऽ अनैति‍क प्रेमकेँ चलन्‍त साहि‍त्‍यक रूप देलनि‍। जेना घड़ी शीर्षक कथा कोनो रूपेँ समाजमे नीक संदेशक वाहक नै भऽ सकैत अछि‍। ऐमे उल्‍लेख तँ समाजक एकात लागल जहूरनीक कएल गेल परंच की अनुशासि‍त सि‍नेहक प्रदर्शन राजकमल जी कऽ सकलाह? जखन प्रांजल आ प्रवीण कथाकारक ई दशा तँ आनक वि‍षएमे की लि‍खल जाए। एक अर्थमे कि‍छु जनवादी साहि‍त्‍यकार अपन कथा सोतीमे मैथि‍ली पाठककेँ आनन्‍दि‍त अवश्‍य कएलनि‍ ओइमे प्रभाष कुमार चौधरी, रामदेव झा आ कांचीनाथ झा कि‍रणक संग-संग धूमकेतु, कुमार पवन, कमला चौधरी आ डॉ. शेफालि‍का वर्माकेँ राखल जा सकैछ। जौं सम्‍पूर्णताक चर्च करी तँ जगदीशबाबूकेँ एकैसम शताब्‍दीक सर्वश्रेष्‍ठ कथाकार माननाइ यथोचि‍त। कि‍एक तँ ओलती आ चि‍नुवार बि‍सरैबला मैथि‍ली प्रेमीकेँ भैंटक लावा, बि‍साँढ़, पीरार, करीन आ मरूआसँ परि‍चए करौलनि‍। मैथि‍ली भाषाकेँ नव-नव शब्‍द देलनि‍। पाग पहि‍र कऽ सभामे आगाँ बैसैबला लोकसँ लऽ कऽ मुसहर धरि‍क प्रति‍ सम्‍यक सि‍नेह हि‍नक कथाक वि‍शि‍ष्‍टता अछि‍। जगदीश जी समाजक ओइ वर्गसँ अबै छथि‍ जकरा अखन धरि‍ मंचपर आसन ि‍दअमे हमरा सभकेँ संकोच होइत अछि‍। परंच कतौ हि‍नक कथामे व्‍यक्‍ति‍गत द्वेष आ पूर्वाग्रहक प्रदर्शन नै। जगदीश जी समाजक आगाँक पि‍रहीकेँ सम्‍मानि‍त करैत सम्‍यक ज्‍योति‍ जगेबाक आश अपन कथा सभमे रखने छथि‍। गामक जि‍नगी'क पहि‍ल कथा भैंटक लावा मि‍थि‍लाक बाढ़ि‍क दशाकेँ केन्‍द्रि‍त कऽ कऽ लि‍खल गेल अछि‍। भैंटक लावाक संदर्भमे हमरा सबहक गाम-गाममे एकटा कहबी चर्चित छैक- “बड़-बड़ जनकेँ भैंटक लावा पदनोकेँ मि‍ठाइ।‍” ऐसँ प्रमाणि‍त होइछ जे सोती, मुरदैया, पोखरि‍, धनखेतामे जलमग्‍नक परि‍णाम स्‍वरूप जनमल भैंटक लावा-नि‍घृष्‍ठ भोज्‍य पदार्थ थि‍क। भोज्‍य पदार्थ मात्र समाजमे रहि‍तौं यायावरी जीवन व्‍यतीत करैबला लोक लेल। ऐ कथाकेँ पढ़ि‍ एकर प्रयोजन कनेक वि‍स्‍मि‍त करएबला परंच उपयोगी लागल। कथा मुसना ओकर अर्द्धांगि‍नी जीबछी आ दुनू बच्‍चाकेँ बाढ़ि‍क जीवन दशासँ जोड़ि‍ बि‍‍म्‍बि‍‍त कएल गेल अछि‍। अपना ऐठामक लोक संतान प्राप्‍ति‍क लेल जीबछ घाटमे मनौती मनैत अछि‍। जौं पुत्र लेलक तँ जीबछा आ जौं बेटी आएलि‍ तँ जीबछी। ऐ जीबछीक तँ नेनकाल नै देखाओल गेल, ओहेन मॉगल-चाॅगल छथि‍यो नै मुदा साहस देखनुक। मुसनाकेँ सर्पदंशक काल जीबछी साहस नै छोड़ली। झाड़-फूक सन भ्रांति‍केँ ऐ कथामे देखाओल गेल परंच परि‍णाम सकारात्‍मक- “मुदा ढोढ़ सॉप कटने रहए तेँ बि‍ख लगबे नै‍‍ केलै।‍” ऐसँ रचनाकारक ग्राम्‍य जीवनक मनोदशाकेँ परि‍वर्तन करबाक उद्देश्‍य प्रमाणि‍त होइत अछि‍। श्रीकान्‍त सन गामक छड़ीदारकेँ बाढ़ि‍ उद्देश्‍य पूरा नै करए देलक। जौं अन्न रहि‍तनि‍ तँ सूदि‍खोरी चैलतनि‍ मुदा अपने खएबाक लेल नै तँए आगाँ की सोचथि‍.....? जीवछी हुनके आश्रममे कुटौनी करति‍ छलीह, श्रीकान्‍तबाबूकेँ सोगाएल देख जीबछीक कथन- “एक्केटा बाढ़ि‍मे चि‍न्‍ता करै छथि‍ कक्का, कनी नीक की कनी अधलाह, दि‍न तँ बि‍तबे करतनि‍।‍” मे साहसक संग-संग यथार्थबोध होइत अछि‍। अभावक नाहमे सवार व्‍यक्‍ति‍केँ भासि‍ जएबाक कोनो चि‍न्‍ता नै, ओ तँ ई सोचि‍ कऽ जल-यात्रा करैत अछि‍ जे अथाह पानि‍मे नाह डूबबे करत। तँए हेलबाक कला पहि‍ने सीख लेल जाए। दीन-हीन आ साधन वि‍हीन मानवीय जीवनमे वि‍चलन नै होइत छैक। मुसना अर्थात मकसूदन मूसक तीमन आ धुसरी चाउरक भातमे जीबछीक सि‍नेह आ दुखनीक आश देख अमृत मानि‍ कऽ ग्रहण कऽ लेलक। रातुक कोनो चि‍न्‍ता नै जीबछी साक्षात आर्या बनि‍ ठाढ़ छलीह- “ककरो कि‍छु होउ जकरा लूरि‍ रहतै ओ जीबे करत।” बाढ़ि‍सँ सभ कि‍यो तबाह कमला‍ महरानीकेँ दीप बाड़ि‍ अपन प्रभाव कम करबाक प्रार्थना सभ ि‍कयो करैत छल। यएह थि‍क मि‍थि‍लाक गामक जीवन केर मनोवैज्ञानि‍क रहस्‍य। हम-सभ भगवतीक आगाँ बलि‍ प्रदानो कऽ सकैत छी तँ कखनो प्रकृत पूजन सेहो। जखन पानि‍ कम भेल तँ सभ कि‍यो अपन डूबल खेत-पथारक गलल डाॅटकेँ गनऽ मे लागि‍ गेलाह मुदा जीबछीक पारखी दृष्‍टि‍ भैंटक कोखि‍केँ देखबामे मग्‍न छल। श्रीकान्‍तबाबूसँ आज्ञा लऽ कऽ हुनक खेतसँ भाँटि‍केँ उजाड़ि‍ अन्न नि‍का लऽ लगलीह। लावाक सुगंधसँ जीबछीक कल्‍पनामे चारि‍ चान लागि‍ गेल बाढ़ि‍केँ जीवनक उपहार मानि‍ कमला-कोसीकेँ धन्‍यवाद दि‍अ लगलीह। ऐ प्रकारक सोचसँ कि‍यो वि‍स्‍मि‍त भऽ सकैत अछि‍- बाढ़ि‍ कखनहुँ लाभकारी कोना होएत? मुदा जीबछीकेँ डूबैक लेल तँ कि‍छु रहबे नै करए धास-पातक घर फेर बनि‍ जाएत।‍ महींस नहि‍यो तँ गाइये कीनबाक योजना बनाबऽ लगलीह। स्‍वाभावि‍क अछि‍ कर्मठ लोककेँ दुआरि‍ ताकए नै पड़ैत अछि‍। कथाक सभसँ नीक प्रसंग लागल जे पहि‍लुक भैंटक चाउर श्रीकान्‍तबाबूकेँ देबामे जीबछीक दृष्‍टि‍कोण। गरीब कखनहुँ वि‍श्‍वासधात नै कऽ सकैत अछि‍। संग-संग कथाक आकर्षण घटना चक्रक क्रममे जखन ठेंगी मुसनाक भरि‍ पोख खून पीब लेलक तखन मुसनाक शंकाग्रस्‍त हएब जे जीबछी हुनक मरबाक कामना करैत अछि‍ कि‍एक तँ दोसर पुरूष भेंट जेतनि‍। समाजक दाबल वर्गमे नारी शोषण नै‍, कि‍एक तँ नारी पुरूषक संग-संग जीवनक वाहनकेँ गति‍ देवामे गति‍शील रहैत छथि‍। ओ दोसरो वि‍वाह करबाक लेल स्‍वतंत्र छथि‍। आगाँक जाति‍ तँ नारीकेँ आब अधि‍कार दि‍अ लागल पहि‍ने तँ अो अंगनक लक्ष्‍मी मात्र छलीह। ऐ कथाकेँ पढ़बाक क्रम सोचऽ मे अबैत अछि‍ जे अागाँ कि‍नका मानल जाए मुसना सन मुसहरकेँ वा हमरा सन......। रचनाकारक एकटा आर दृष्‍टि‍कोण नीक मानल जाए जे समाजक दूटा अलग-अलग वर्गक कथा कहि‍तहुँ वर्ग संघर्ष नै वरन् सि‍नेहि‍ल भाव। श्रीकान्‍त लावा तँ स्‍वीकार करै छथि संगहि‍ जीबछीकेँ नव-वस्‍त्रक संग वि‍दाइ सेहो दै छथि‍ ऐमे सामाजि‍क सामंजस्‍यकेँ बढ़ेबाक प्रयास देखएमे आएल।‍ ऐ कथा संग्रहक दोसर कथा “बि‍साँढ़” भैंटक लावाक वि‍परीत सुखारक स्‍थि‍ति‍क मध्‍य घुमैत अछि‍। प्रकृति‍ प्रदत्त वि‍पदामे सभसँ बशी प्रभावि‍त समाजक पेटकान लाधल वर्ग रहै छथि‍। कथाक नायक डोमन चारि‍ बर्खक रौदीसँ तप्‍त छथि‍। हि‍नका खेत-पथार नै। अपन कनि‍याँ सुगि‍याक संग मेहनति‍ मजूरी कऽ कऽ कहुना जीवन वसर करैत छलाह मुदा जखन गि‍रहस्‍ती समाप्‍त भऽ गेल तँ नीक-नहाँति‍ गुजर करबाक कल्‍पनो असंभव। परंच सुगि‍या तँ छथि‍ मैथि‍ल नारी, ओइ समाजक नारी जतए पुरूषसँ बेसी परि‍वारक भार नारि‍येपर रहैछ। हाि‍र कोना मानतीह। डोमनकेँ दुखि‍त देख नूतन ओि‍रयान करबाक लेल अद्यत भऽ गेली। बड़का-बड़का मजाहन जेना नेङरा काका अपन महाजनी बन्न कऽ लेलनि‍। ओ अपन झाँपल अन्न-पानि‍केँ अगि‍ला साल उच्‍च भाउपर बेचबाक तैयारी कऽ रहल छथि‍। गाए-बरदकेँ मरनासन्न देख कि‍सान तँ अरण्‍यरोदन करैत अछि‍ मुदा गि‍द्ध प्रसन्नचि‍त्त मुक्‍त गगनमे मॅडराइत रहैछ, यएह हाल छन्‍हि‍ बौकी काकीकेँ, अपन महाजनीक लेल राखल चाउरकेँ मातृनवमीमे नि‍कालतीह। हाय रे हमरा सबहक संस्‍कृति‍ नेना भूखसँ कल्हाइत छथि‍ मुदा मातृनवमीमे मरल पूर्वजक स्‍मृति‍मे अरबा चाउर पंडि‍त केर पातपर देल जाएत। सरि‍पहुँ यथास्‍थि‍ति‍ जे हुअए परंच दुर्गापूजा, कोजगरा, दीवाली, गोवर्धनपूजा, भरदुति‍या छठि‍‍ आदि‍केँ मि‍थि‍लाक संस्‍कृति‍ पर्व मानि‍ रचनाकार सम्‍यक दृष्‍टि‍कोणक परि‍चय देलनि‍। जगदीशजीक जन्‍म एहेन परि‍वार वा वंशमे भेल जइठाम कोजगरा मनाएब असंभव मुदा ब्रह्मण आ कर्ण कायस्‍थ सन अपेक्षाकृत कम गणनाक जाति‍केँ सेहो आत्‍मसात् कऽ लेलनि‍। ऐसँ पूर्व कोनो ब्राह्मण साहि‍त्‍यकार गोवर्धनपूजा वा सलहेसपूजाकेँ मि‍थि‍लाक पावनि‍ मात्र मंचेटा पर मानने हेताह। कथाक इति‍श्री सुखारक मध्‍य एहेन फलक शोधक रूपमे कएल गेल जकर वि‍षयमे बहुत कम लोक सोचने हेताह। सुक्‍खल पोखरि‍केँ डाँड़ भरि‍ कोरि‍ उज्‍जर-उज्‍जर अल्हुआ सन फर देख सुगि‍याक भुक्‍खल आत्‍मा जुरा गेल ओतऽ पुरान व्‍यथाक मध्‍य वर्त्तमान सुखद अनुभूति‍क तुलना करए लगलीह वि‍कल जीक गजल- “शेषांशपर रोदन करू गीत उदि‍त भानपर....।” उपर बि‍साँढ़ आ नीचाँ सि‍ंगही माछ जौं वनस्‍पति‍ शास्‍त्री रहती छल तँ पुरस्‍कार नि‍श्चि‍त, मुदा गरीबक शोध तँ पेट खाति‍र होइत अछि‍, एकरा अपन समाजमे मोजर नै, आनठाम के देत। धनि‍या आ पि‍चकुनक प्रेम आ वैवाहि‍क जीवनमे भैंटक लावा वा बि‍साँढ़ सन एकटा तेसर उपेक्षि‍त फल- पीरारक फड़ सि‍नेह वृष्‍टि‍ करैत अछि‍। जगदीश जीक कथा सभमे बि‍म्‍ब वि‍स्‍मयकारी, शि‍ल्‍प समाजक जीवन शैलीक वि‍षम परि‍पेक्ष्‍यक वि‍वेचन करैत छन्‍हि‍, मुदा एकटा कमी जे देखल गेल ओ अछि‍ अलंकार आ हास्‍यक अभाव। वास्‍तवमे ऐ कथाक प्रति‍ आकर्षण ओकरामे भऽ सकैत अछि‍ जेकर जीवन अछोप हुअए। जौं पातपर भात नै तँ चटनीक कोन प्रयोजन। हि‍नक कथा ओइठामक समाजकेँ हि‍लकोरि‍ देलक जतए धरि‍ पंडि‍त हरि‍मोहन झा सन मॉजल साहि‍त्‍यकार कहि‍यो नै पहुँच सकलथि‍, आनक कोन गप्‍प? “अनेरूआ बेटा” कथामे एकटा संतानहीन दंपति‍केँ दोसरक फेंकल पूतक पोषण मैथि‍ली साहि‍त्‍यमे क्रांति‍वादकेँ आगाँ बढ़एबाक प्रयास मानल जाए। गंगाराम आ भुलि‍याक वरदपूत मंगल कथानायक छथि‍। ओ मात्र साक्षर भेला उत्तर चाहक दोकानदार बनि‍ गेलाह। मंगल, धर्ममाता आ पालक पि‍ताक मृत्‍युक पश्चात अपन पेटसँ लड़ैत-लड़ैत कोना साहि‍त्‍यकार भऽ गेलथि‍ संभवत: जगदीशजी लेखनी उठबैसँ पहि‍ने नै सोचने हेताह। एकटा प्रसंग कनेक अनसोहाँत लागल जे गंगारामक स्‍त्री अबोध मंगलकेँ दुग्‍धपान करएबाक लेल अपन पि‍ति‍औत दि‍यादि‍नी कबूतरी लग पहुँचै छथि‍। कबूतरी वि‍स्‍मि‍त नै भऽ कऽ भुलि‍यासँ कहलनि‍ जे हि‍नक बुढ़ाढ़ीक नेना कतेक पोरगर। मातृत्‍वक अवधि‍ नौ मासक होइत अछि‍ जखन पहि‍ने भुलि‍यामे कोनो एहेन लक्षण नै तँ कबूतरीक ऐ प्रकारक संवाद रचनामे कल्‍पनाशीलता भरबाक असफल प्रयास मात्र मानल जाए। भऽ सकैछ कथाकार कबूतरीकेँ हँसी-ठठाबला प्रवृत्ति‍क कलाकार बनबैत लि‍खने होथि‍। मंगलकेँ साहि‍त्‍यकार बनेबामे रूपचन सन खि‍सक्करक बड़ पैघ हाथ छल। कहि‍यो राजा-रानी तँ कहि‍यो रानी-सरंगा तँ कहि‍यो रजनी-सजनीसँ लऽ कऽ गोनू झा, डाकक कथा, अल्‍हा रूदल, दीना-भदरी, लोरि‍क आ सलहेसक कथाक संग-संग गामक लोकक मुँहसँ सेहो सुनि‍-सुनि‍ कऽ चाह वि‍क्रेता मंगल कथाकार बनि‍ गेलथि‍‍। ऐ प्रकारक कथा नाट्य रूपमे “भफाइत चाहक जि‍नगी”मे शेखरजी लि‍खने छथि‍। समग्र समाजक प्रति‍ सम्‍यक दृष्‍टि‍कोण रखैत अर्थनीति‍केँ रचनाक मूल वि‍षय वस्‍तु बनएबामे जगदीश जीक कोनो जोड़ मैथि‍ली साहि‍त्‍यमे नै भेटत। कलान्‍तरमे वकील साहेबक पुत्री सुनएना मंगलसँ प्रभावि‍त भऽ हि‍नका अपन जीवन संगी बनएबाक लेल आतुर भऽ गेली। ऐ ि‍नर्णएमे वकील साहेब सुनयनाक संग छथि‍। कथाक अंत धरि‍ ि‍नष्‍कर्ष नै नि‍कलि‍ सकल मुदा एकटा प्रश्न हमरा सबहक माथपर रचनाकर लादि‍ देने छथि‍- ओ अछि‍ जाति‍, धर्मसँ ऊपर उठि‍ कऽ आत्‍मि‍क मि‍लनक आधारपर वि‍वाह करबाक ि‍नर्णए। भऽ सकैत अछि‍ जे कथाकार अपन व्‍यक्‍ति‍गत जीवनमे एहेन क्रांति‍कारी कदमक वि‍रोधी होथि‍, मुदा हम अपन छठम ज्ञानेन्‍द्रि‍य अनुभूति‍क आधारपर कहि‍ सकै छी अगि‍ला पचास वर्षक अंदर हि‍नक रचना आर्यावर्त्तमे क्रांति‍क सूत्रपात करैत बदलैत दृष्‍टि‍कोणक प्रत्‍यक्षदर्शी रहत। समग्र ग्राम्‍य जीवन शैलीकेँ छुबैत एकसँ बढ़ि‍ कऽ एक कथाक संग्रह “गामक जि‍नगी” मैथि‍ली साहि‍त्‍यक लेल बेछप्‍प संकलन थि‍क। “डीहक बटवारा”मे शहरी जीवनकेँ जीबि‍‍ अंति‍म अवस्‍थामे पि‍तृभूमि‍केँ अपन शेखी ओ शानक भूमि‍ बनएबाक अवि‍रल प्रस्‍तुति‍ कएल गेल अछि‍। गामकेँ खराब शहरी लोक कऽ दैत छथि‍। “बाबी”कथामे बाबी मुरूख रहि‍तहुँ गामक पथ प्रदर्शक महि‍ला छथि‍। छठि‍मे एकटा छोट नेना पूजासँ पूर्व पाकल केरा खा गेल सभ ओकरा मारए लागल मुदा बाबी सि‍नेह देखबैत भगवानकेँ श्रद्धासँ प्रसन्न करबाक प्रयास करए लगलीह। आडंवरपर मूर्ख महि‍लाक वि‍जयी उद्घोष ऐसँ नीक शि‍ल्‍प कतए-कतए देखाओल गेल। रहमतक माए बाबीसँ खरनाक बासि‍ प्रसाद लऽ संध्‍या अर्घक लेल फल-फूल देलनि‍ आ बाबी हृदेसँ स्‍वीकार कऽ लेलथि‍न। वास्‍तवमे मि‍थि‍ला यएह छल, मुदा कि‍छु छद्म स्‍वार्थी तत्‍व एकरा जाति‍ धर्मक खाधि‍मे ठाम-ठाम खसा देलक। संध्‍या अर्ध्‍यमे रहमतक माए कि‍छु देरीसँ औतीह कि‍एक तँ हटि‍या जएबाक छन्‍हि‍। “कर्म प्रधान विश्व करि‍ राखा”, बाबी हि‍नक ि‍नर्णएसँ सि‍नेहि‍ल छथि‍ कि‍एक तँ भगवान प्रेमक भुक्‍खल, श्रद्धा कि‍यो अखनहुँ प्रकट कऽ सकैत छथि‍। कामि‍नी कथाक प्रारंभ अर्थक वि‍जय मुदा अंतमे टकासँ कीनल वर द्वारा अर्धांगि‍नीक प्रताड़नासँ भेल। अंतमे प्रश्ने रहि‍ गेल “कामि‍नी कतए गेली?” राजकमल जीक कथा जकाँ जगदीशजी सेहो प्रश्न छोड़ि‍ इति‍श्री कएलनि‍। प्रयोगवादि‍ताकेँ मैथि‍लीक धरातलपर दोसर बेर प्रयोग, मुदा राजकमलजी सँ नीक रूपेँ कएलनि‍। गामक जि‍नगीक कथाकार सभसँ पैघ जे वस्‍तु मैथि‍लीकेँ देलनि‍ ओ थि‍क नव-नव शब्‍द। ऐ प्रकारक शब्‍द कोनो अकाशसँ नै खसल, शोषि‍त समाज आ अगि‍ला पाति‍क गरीब समाजमे एखनो बाजल जाइत अछि‍, मुदा मैथि‍ली साहि‍त्‍यकारक रचना सभमे लुप्‍त। मात्र कि‍रणजी, हरि‍मोहन झा, सोमदेव आ शेखरजी सन कि‍छु कथाकारक कि‍छुए रचनामे एहेन प्रकार शब्‍द भेटैत अछि‍। मुदा ओ सभ शब्‍द ओतेक रूपक नै जतेक जगदीशबाबूक रचनामे ठाम-ठाम प्रयोगमे अबैत अछि‍। आब प्रश्न उठैत अछि‍ जे मैथि‍ली साहि‍त्‍यक सर्वश्रेष्‍ठ कथा संग्रह “गामक जि‍नगी”केँ कि‍एक नै मानल जाए। नि‍:संदेह हरि‍मोहन झा, कि‍रण, राजकमल, धूमकेतु, ललि‍त आदि‍ मैथि‍लीक सि‍द्धहस्‍त कथाकार छथि‍। हरि‍मोहनबाबू हास्‍य, दर्शन ओ मर्मक त्रि‍वेणीसँ कथा सभकेँ बोरैत सभसँ जनप्रि‍य कथाकार मानल गेलाह, मुदा हि‍नक कथामे हास्‍य समागमक क्रममे गंभीर लेखन सुशुप्‍त भऽ गेलनि‍। चर्चरीमे जौं गंभीरता अछि‍ तँ ओ मात्र समाजक अगि‍ला लोकक प्रति‍नि‍धि‍त्‍व करैत छन्‍हि‍, अगि‍ला लोक साहि‍त्‍यक अधि‍कारी तँ छथि‍, मुदा भाषासँ दूर भऽ रहल छथि‍। समाजक अंति‍म पाँति‍ धरि‍ हरि‍मोहनजी अधि‍कांश कथामे नै पहुँचलाह। कि‍रण जीक कि‍छु कथा जेना मधुरमनि‍ ऐ रूपक छन्‍हि‍, मुदा जगदीश जीक कथाक दर्शनसँ हुनको तुलना केनाइ उचि‍त नै। फनीश्वरनाथ रेणु जौं मैथि‍लीमे लि‍खतथि‍ तँ स्‍थि‍ति‍ थोड़े फराक भऽ सकैत छल। रेणुजी उपन्‍यासकारक रूपेँ हि‍न्‍दीक प्रेमचन्‍द्रक पश्चात सर्वश्रेष्‍ठ गद्यकार मानल जा सकैत छथि‍ मुदा कथाकारक रूपेँ हमरा सबहक जगदीश जीसँ आगाँ नै। पाठक जौं आत्‍मीय भऽ कऽ “गामक जि‍नगी” पढ़थि‍ तँ निश्चि‍त रूपेँ हम कहि‍ सकैत छी जे ई पोथी मैथि‍ली साहि‍त्‍यक एखन धरि‍क सर्वश्रेष्‍ठ कथा संग्रह थि‍क। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। जगदीश प्रसाद मण्‍डल नाटक कम्‍प्रोमाइज (पछिला खेपसँ आगाँ) बारहम दृश्‍य (गामक वि‍द्यालयक आंगन। बच्‍चा सभ फील्‍डपर खेलैत। रस्‍ता धऽ कऽ राही सभ चलैत। गोल-मोल बैसार। एकठाम कृष्‍णदेव, मनमोहन आ रघुनाथ बैसल। बगलमे घनश्‍याम, नसीवलाल, सुकदेव आ गामक लोक बैसल।) नसीवलाल-       (ठाढ़ भऽ) आजुक बैसार लेल सभकेँ धन्‍यवाद दइ छि‍यनि‍ जे अपन व्‍यस्‍त समैमे आबि‍ गामक बैसारकेँ शोभा बढ़ौलनि‍। तइ संग होनहार कर्मदेवकेँ आरो बेसी बधाइ दइ छि‍यनि‍ जे जी-तोड़ि‍ मेहनत कऽ बैसार करौलनि‍। मनचन-          भैया, अहाँ कर्मदेवक प्रशंसा बेसी केलि‍यनि‍। नसीवलाल-       कम्मे केलि‍यनि‍। नवयुवक आ बाल-बच्‍चाक (बेटा-बेटीक) बेसी प्रशंसा कतौ-कतौ अधलो होइ छै। कृष्‍णदेव-         (चौंकैत) से केना? नसीवलाल-       मनुष्‍यकेँ घरसँ बाहर धरि‍ प्रशंसा-नि‍न्‍दासँ परहेज करक चाही। कृष्‍णदेव-         तखन? नसीवलाल-       उचि‍त सीमाक उल्‍लंघन होइते बनै-वि‍गड़ैक संभावना बढ़ि‍ जाइत अछि‍। घनश्‍याम-         (मूड़ी डोलबैत) संभव अछि‍। नसीवलाल-       संभव रहि‍तो कठि‍न (भारी) अछि‍। मुदा जाधरि‍ संभव नै हएत ताधरि‍ समाजक गाड़ि‍यो लीख दऽ ससरब कठि‍न अछि‍। घनश्‍याम-         नीक-अधलाक वि‍चार तँ करैके चाही। नसीवलाल-       नि‍श्चि‍त करैक चाही। मुदा हटि‍ कऽ नै सटि‍ कऽ। घनश्‍याम-         की मतलब? नसीवलाल-       मतलब यएह जे जहि‍ना समुद्रक कि‍नछरि‍क पानि‍ कम गहींरमे रहि‍तो अगम पानि‍सँ मि‍लल रहैत, तहि‍ना। (कनडेरि‍ये आँखि‍ये रघुनाथ, मनमोहन नसीवलाल दि‍स देखैत तँ मनचन, सुकदेव कृष्‍णदेव दि‍स। अपन-अपन मनोनुकूल मुँहक रूप सेहो बनबैत) घनश्‍याम-         (ठहाका मारि‍) एखन धरि‍ गामक बैसार कोन रूपे चलैत अछि‍ नसीवलाल भाय? नसीवलाल-       घनश्‍याम बाबू, जहि‍ना बन्‍दूकक अनेको गोली खेनि‍हारकेँ देहक कोनो अंग चि‍न्‍हार नै रहैत तहि‍ना गामो-समाजकेँ भऽ गेल। घनश्‍याम-         कनी फरि‍छा कऽ कहि‍यौ? नसीवलाल-       ओना एखन जइ काजे सभ एकठाम बैसलौं पहि‍ने से काज हेबाक चाही। मुदा ऐ तरहक बैसार पहि‍ल-पहि‍ल अछि‍ तँए कि‍छु आनो बात चलबे करत। मनचन-          भैया, हनुमानजी जकाँ कि‍यो छाती फाड़ि‍ देखबैए आकि‍ पेटक बात आ हाथक काजेसँ देखबैए। (मनचनक बात सुनि‍ कृष्‍णदेव हंसक हि‍लुसैत आँखि‍ जकाँ देख) कृष्‍णदेव-         एखन धरि‍ मनचनकेँ बटेदार बुझै छलौं मुदा से नै ओ समाजक पटेदार (हि‍स्‍सेदार) छी। (कृष्‍णदेवक वि‍चार सुनि‍) नसीवलाल-       जहि‍ना हाथमे पाँचो-आंगुर पाँच लम्‍बाइ-चौड़ाइक होइ छैक मुदा हाथक शोभा तँ बराबरे बढ़बैत छै कि‍ने? कृष्‍णदेव-         हँ से तँ बढ़ैबते छै। नसीवलाल-       तहि‍ना ने सड़क बनौनि‍हारमे पत्‍थर बैसौनि‍हारसँ लऽ कऽ नक्‍शा बनौनि‍हार धरि‍क होइ छै। कृष्‍णदेव-         मुदा? नसीवलाल-       हँ। जहि‍ना सि‍र क्षीणका भगवतीक महत्‍व होइत तहि‍ना ने मुस्‍कुराइत खर्गधारी भगवति‍योक होइत। (बि‍चहि‍मे) घनश्‍याम-         हँ हेबाक चाही। मुदा पहि‍ने दुनूक परि‍चए हएब जरूरी। नसीवलाल-       नि‍श्चि‍त। जहि‍ना भूतपर भवि‍ष्‍य ठाढ़ होइत तहि‍ना ने मनुष्‍योक पैछला जि‍नगी अगि‍ला जि‍नगीकेँ ठाढ़ करैमे मदति‍गार होइत। मनचन-          जँ से नै हुअए, तखन? नसीवलाल-       ओहि‍ना हएत जहि‍ना सत्‍यवादी हरि‍श्चन्‍द्रक पार्ट (स्‍टेजपर) कि‍यो शराबी झुमि‍-झुमि‍ कठही चौकीपर अलापैत। (ठहाका) घनश्‍याम-         हँसी-मजाक छोड़ि‍ बैसारक गरि‍मा बनाउ? नसीवलाल-       (अधहँसी हँसि‍) बहुत नीक वि‍चार घनश्‍यामबाबू, देलनि‍। आइ धरि‍ हृदए तड़पैत रहल जे गामोक नक्‍शा इति‍हासक पन्नामे जोड़ाए। से......? मनचन-          भैया, जइ समाजमे प्रोफेसर, इन्‍जि‍नि‍यर, डॉक्‍टर, बैंक स्‍टाफसँ लऽ कऽ गोबर बीछि‍नि‍हारि‍ धरि‍ छथि‍ तइ समाजक इति‍हारस नै बनै ओ लाजि‍मी छी। नसीवलाल-       कहलह तँ ठीके मुदा.....। मनचन-          मुदा की? नसीवलाल-       यएह जे, ओना आइ धरि‍क समाजक पन्ना-पन्ना पढ़ए पड़त। ओकरा तकैमे कि‍छु मेहनत उठबए पड़त। मुदा जँ ओकरा वि‍चारणीय प्रश्न बना राखि‍ आजुक समाजक अध्‍ययन कऽ ि‍नर्माणक संकल्‍प लेल जाए, तहूसँ काज चलि‍ सकैए। मनचन-          से कोना हएत? घनश्‍याम-         जँ करैक इच्‍छाशक्ति‍ जगा संकल्‍पवद्ध भऽ डेग उठाबी तँ भऽ सकैए। कर्मदेव-          घनश्‍याम काका, अहाँ तँ नारदजी जकाँ छोटका बैंकक मीटि‍ंगसँ लऽ कऽ बड़का बैंकक मीटि‍ंग धरि‍क अनुभव रखने छी तँए नीक हएत जे अपने समाजक एकटा रूप-रेखा बना बजि‍यौ? घनश्‍याम-         बाउ कर्मदेव, कहलह तँ ठीके बाहरी दुि‍नयाँसँ भि‍न्न ग्रामीण दुनि‍याँ अछि‍। तँए जे तरी-घटी गामक नसीवलाल भाय जनैत-बुझैत- छथि‍ से नै बुझै छी। सुकदेव-         ई कोनो बड़ पैघ समस्‍या नै छी। नीक हएत जे दुनू गोरे वि‍चारि‍ कऽ आगूक डेग उठाबी। (सुकदेवक वि‍चारकेँ मनमोहन आ रघुनाथ समर्थन केलनि‍। मुदा कृष्‍णदेव मुँहक बात रोकि‍ लेलनि‍) मनचन-          (मुस्‍की दैत) घनश्‍याम भाइक तेहेन क्‍वीन्‍टलि‍या पेट छन्‍हि‍ जे नसीवलाल भैयाकेँ पीचि‍ये देथि‍न। घनश्‍याम-         (हँसैत) नै मनचन, मोटेलहा पेट रहैत तखन ने फुललाहा छी। कोढ़ि‍लोसँ हल्‍लुक। मनचन-          गणेशजी बला। जे एक-रत्तीक मुसरी मुनहर सन पेटकेँ उठा दौड़ैत रहैए। घनश्‍याम-         हँ। हँ। सएह बुझहक। कृष्‍णदेव-         (रूष्‍ट भऽ) समैक उपयोग करू। घनश्‍याम-         भाय, वि‍चार अछि‍ जे सभ कि‍यो दि‍लसँ अपन-अपन जि‍नगीक अनुभव व्‍यक्‍त करी। जइसँ एक नव समाज बनैक सुदृढ़ नीब पड़त। कृष्‍णदेव-         बहुत बढ़ि‍याँ, बहुत बढ़ि‍याँ। जाधरि‍ गामक दशाक सम्‍यक चर्च नै हएत ताधरि‍ दि‍शा ि‍नर्धारि‍त करैमे कि‍छु कमी रहबे करत। नसीवलाल-       बहुत बढ़ि‍याँ वि‍चार कृष्‍णदेवबाबूक छन्‍हि‍। जाधरि‍ पेटक नीकसँ आ अधलासँ अधला वि‍चार समाजक बीच नै राखब ताधरि‍ समाजक अंतरी मि‍लान कोना हएत? मनचन-          भैया, अंतरी मि‍लान केकरा कहै छै? घनश्‍याम-         (मुस्‍की दैत) छाती मि‍लानकेँ। मनचन-          छाती मि‍लान......। छाती मि‍लान तँ दुइये ठाम......। समैधि‍क संग आ दुनू परानी.......। दू परानी.......? घनश्‍याम-         कोन मंत्र पढ़ए लगलह मनचन? मनचन-          व्‍यासजी आ गनेसजीमे यएह ने शर्त्त रहनि‍ जे बि‍नु बुझने कलम नै बढ़ावी। घनश्‍याम-         अहाँ तँ शास्‍त्रो बुझै छी मनचन। मनचन-          पढ़ि‍ कऽ नै, भागवत सुनि‍ कऽ। तेसरा तक अपनो गामक ब्रह्मस्‍थानमे साले-साल भागवत होइ छलै कि‍ने। नसीवलाल-       एखन धरि‍ बैसारक मूल वि‍षयपर नै एलौंहेँ। अढ़ाइ-तीन घंटा बीत गेल। ओना, भलहि‍ं हम सभ वि‍षयानतरे गप-सप्‍प कि‍अए ने केलौं मुदा बेबुनि‍याद बात तँ नै भेल। घनश्‍याम-         आन काजसँ भि‍न्न बौद्धि‍क काज होइए। हाथ-पएरक काज जकाँ लगातार केने काज छुटैक संभावना बढ़ि‍ जाइत अछि‍। तँए......? मनचन-          घनश्‍याम भाइक वि‍चारकेँ समर्थन करै छी। नसीवलाल-       बीचमे टि‍फीनक आवश्यकता तँ जरूर होइत अछि‍। सुकदेव-         पशुपति‍ नाथक दर्शन आ कि‍छु बनि‍ज हएब, जहि‍ना दोबर लाभ दैत अछि‍ तहि‍ना बाल-भोग भेलासँ हएत। मनचन-          बेस कहलि‍ये भैया। एखन धरि‍ जे हम सभ समाजमे टौहकी संग पहटोमे फँसल छी, तेकरो.......? घनश्‍याम-         मनचनक दृष्‍टि‍कूट नै बुझलौं? नसीवलाल-       दोसराक व्‍याख्‍यासँ नीक मनचनेक व्‍याख्‍या हएत। मनचन-          से कि‍अए भैया? नसीवलाल-       हौ मनचन, जमीन-जाल, शब्‍द-जाल आ वाक्-जालमे सभ ओझराएल छी। तोहर आत्‍मा कि‍ बाजि‍ रहल छह से तोंहीटा बुझै छहक। वाणी होइत जे नि‍कलतह वएह बात तोहर भेलह। मनचन-          भैया, आत्‍मो बोली तँ दुबटि‍या (बुइधि‍क मोड़) पर हरा जाइत अछि‍। एक्के वि‍चारकेँ आमक गाछ जकाँ डारि‍ टि‍टकि‍ जाइ छै। सुकदेव-         मनचन, गप्‍पक छि‍लनि‍ छोड़ह? मनचन-          भैया, जाबे गप्‍पक छि‍लनि‍ नै करब ताबे शीशो जकाँ सुरेब केना हएत। खाएर, जहि‍ना औझका बैसार ऐति‍हाि‍सक भऽ रहल अछि‍ तहि‍ना जे पनपि‍आइ करब तइमे सभ मि‍लि‍ बना, परोसि‍ सभ मि‍लि‍ खाए। घनश्‍याम-         मनचन, जे कहलहक ओ आब नै छै। सभठाम चलै छै। मनचन-          आँखि‍क सोझमे जाइति‍क आ दू सम्‍प्रदायक बीच खानो-पान आ प्रेमसँ वि‍याहो होइत देखै छी। मुदा सर्वसम्‍मति‍सँ कि‍अए ने घोषणा कऽ दइ छै। जखन कि‍ धरतीसँ अकास धरि‍ उड़ि‍आइत अछि‍। पटाक्षेप। तेरहम दृश्‍य (दोसर बैसार) घनश्‍याम-         मनचन, बरी बड़ सुन्‍दर बनल छेलह। नून देनि‍हारकेँ चाबसी दइ छि‍यनि‍। मनचन-          हमरा रि‍झबै छी। दू सालसँ सभ नोनगर भोज वि‍न्‍यासमे हमहीं नोन दइ छी। घनश्‍याम-         कि‍अए? मनचन-          गाममे बारह आना लोक रोगि‍ये-टट्टी अछि‍। कि‍यो नून बाड़ने अछि‍ तँ कि‍यो अधे खाइए। भोज तँ सामुहि‍क छी। एकठाम बैस खाएब। घनश्‍याम-         दोसरो चाबसी दइ छी मनचन। मनचन-          से कि‍अए? घनश्‍याम-         एखन धरि‍ हमहूँ नै गौर केने छलौं जे अहाँ केने छी। मनचन-          भाय, अहाँक सोझमे बजैत संकोच होइए। मुदा अपना घरमे लोक नीकसँ नीक आ अधलाहसँ अधलाह बजैत अछि‍ तँए........? घनश्‍याम-         चुप कि‍अए भेलौं? आइ धरि‍ जे आनन्‍द जि‍नगीमे नै भेटल छल ओ भेट रहल अछि‍। मनचन-          केना? घनश्‍याम-         अपनासँ अगि‍ला लग जी हुजुरी करए पड़ैए आ पैछलाकेँ जी-हुजुरी करबै छि‍ऐ। जि‍नगीक कोनो आड़ि‍ये-धुर नै अछि‍। सुकदेव-         मनचन, मुँह बन्न करह। बैसारक महत्‍व होइत अछि‍। दोसरो गोटेकेँ अवसर दहुन? आभा-           एक तँ उमेरे कते भेल हेन। मुदा जतबे अछि‍ तइमे आइ जते समाजक बीच आएल ओते.......। नसीवलाल-       कोनो गलत कि‍ सही परम्‍परा ओतबे दि‍न चलैत अछि‍ जते दि‍न लोक चलबैत अछि‍। ऐ दि‍स वि‍वेकीकेँ जरूर नजरि‍ देबाक चाहि‍यनि‍। आभा-           कि‍ नजरि‍? नसीवलाल-       यएह जे पाछुसँ अबैत व्‍यवहार आजुक समैमे अनुकूल अछि‍ वा नै। वि‍वेकी मनुष्‍य होइक नाते सबहक दायि‍त्‍व बनै छन्‍हि‍ जे सनातनी व्‍यवहार अछि‍ ओ जीवि‍त रहए। आभा-           सनातनी बेबहार की? नसीवलाल-       परि‍वर्तनशील बेबहार। शान्‍ती-          काका, गलत बेबहार समाजमे पैसल केना? नसीवलाल-       ने एकबेर पैसल आ ने एकदि‍न पैसल। घुसकुनि‍या-आेंघरनि‍या दैत पैस अंकुरि‍त भऽ वि‍शाल वृक्षक रूपमे बदलि‍ गेल। जइसँ लोक, परलोकक संग वि‍श्वक नक्‍शे बदलि‍ गेल। शान्‍ती-          डाॅक्‍टरकाका, अपने कि‍छु......? रघुनाथ-         देखि‍यौ, जहि‍ना रामायणमे तुलसी कहने छथि‍- हरि‍ अनन्‍त हरि‍ कथा अनंता' तहि‍ना अछि‍। ओना, दुनि‍याँक सभ मनुष्‍यकेँ कि‍छु आवश्यकता आ गुन एक तरहक अछि‍, मुदा.....? शान्‍ती-          मुदा की? रघुनाथ-         यएह जे कि‍छु एहनो अछि‍ जे सभकेँ फुटो-फुट-अलगो-अलग- होइत। ओना हमहूँ भगुए भऽ गेल छी। समाज अध्‍ययन तँ वि‍शाल अध्‍ययन छी, तँए......। कृष्‍णदेवबाबू आ मनमोहनबाबू बुझा सकै छथि‍। मनमोहन-         भाय, जहि‍ना अहाँ रोग आ रोगीक बीच रहलौं तहि‍ना छी। मुदा मनक बात छि‍पाइयो कऽ राखब उचि‍न नै बुझै छी। सुकदेव-         हृदेक बात इंजि‍नि‍यर सहाएब बजलाह। मनमोहन-         जेना-जेना समए बीत रहल अछि‍ तेना-तना लोकोक जि‍नगी बदलि‍ रहल अछि‍। पहि‍लुका लोक सोलहो आना शरीरसँ श्रम कऽ शरीरक रक्षा करैत छलाह। सोमन-          जेना आइ देखै छि‍ऐ तेना नै छलै? मनमोहन-         नै। सोमन-          (कि‍छु शंका करैत) इंजीनि‍यर सहाएब, कते दि‍न भेल से तँ नीक जकाँ मन नै अछि‍। मुदा एहि‍ना एक बेर रौदी भेल से मन अछि‍। जहाँ-तहाँ लोक कमाइ-खटाइले लोक भागल। हमहूँ भोलबाकक्का सेने कलकत्ता गेलौं। आभा-           कलकत्ता गेल छी? सोमन-          गेले नै छी दू साल ठेलो चलौने छी। जइसँ सभ गली-कुच्‍ची देखल अछि‍। आभा-           केना ठेला चलबै छेलि‍ऐ? सोमन-          छातीमे ठेलाक अगि‍ला भाग अड़ा दुनू हाथसँ दुनू भागक डंटा पकड़ि‍ ठेलै छलौं। आभा-           इंजीनि‍ गाड़ी सभ नै छलै? सोमन-          छलै। जीपे-कारक कोन बात जे बड़का-बड़का कोठा, करखन्ना, दोकान सभ छलै। जेहेन ओइठीनक दोग-सान्‍हि‍क सड़क अछि‍ तेहन तँ अपना सभ दि‍स अछि‍यो नै। घनश्‍याम-         बात दोसर दि‍स बढ़ल जाइए। मनमोहन-         बड़बढ़ि‍या घनश्‍याम भाय कहलनि‍। एक तँ दैवी प्रकोप-बाढ़ि‍, रौदी-सँ अपन इलाका पछुआएल दोसर मनुक्‍खोक दोख कम नै छै। जे इलाका जते पहि‍ने जागल ओ ओते अगुआएल। आभा-           कनी सोझरा दि‍यौ कक्का? मनमोहन-         (मुस्‍की दैत) पहि‍ने जंगली अवस्‍थामे अपना सबहक पूर्वज रहै छलाह। हाथे-पएरसँ सभ कि‍छु करै छलाह। जेना-जेना बुद्धि‍-अकील बढ़ैत गेल तेना-तेना आगू मुँहेँ ससरैत गेलाह। हथकरघासँ पाँच सीढ़ी आगू बढ़ि‍ कम्‍प्‍यूटर युगमे पहुँच गेल छी। आभा-           ऐसँ आगूओ बढ़त? मनमोहन-         निश्चि‍त बढ़त। नि‍चेनमे कहि‍यो आरो कहब। एखन जइ काजे एकत्रि‍त भेल छी तेकरा आगू बढ़ाउ। सोमन-          भाय, हम सभ ने कहि‍यो काल मासुल दऽ कऽ बस, जीपपर चढ़ै छी। अहाँकेँ तँ अपने अछि‍। मनमोहन-         से तँ अछि‍ये। घनश्‍याम-         ओना बाढ़ि‍ रौदी दुनू जनमारा छी। मुदा आइ रौदीक वि‍चार करू। शान्‍ती-          मैनेजर काका, अहाँ सभ तरहे उपर छी। ओना समाजक कि‍छु भार उपरमे अछि‍। तँए चाहब जे झगड़ा-झंझटसँ नै वि‍चारक रास्‍तासँ समाज आगू बढ़ए। घनश्‍याम-         वि‍चार तँ अपनो सएह अछि‍। मुदा नहि‍यो चाहलासँ पर कते-गोटेकेँ बैंकक लोनमे जहल पठबए पड़ैए आ चौकठि‍-केवाड़ उखाड़ए पड़ैए। शान्‍ती-          से कि‍अए? घनश्‍याम-         (ि‍वस्‍मि‍त होइत) कि‍ कहब बोरि‍ंग-दमकल, गाए पोसैक लोन उठा साद्ध-वि‍याहक भोज कऽ पूँजी नष्‍ट कऽ लैत अछि‍। समैपर आपस नै करैत। शान्‍ती-          तखन? घनश्‍याम-         औझुका बैसार तँए ऐति‍हासि‍क अछि‍ जे समाज अपन कल्‍याणक दि‍शा नि‍श्चि‍त करथि‍। नसीवलाल-       जुग-जुगान्‍तरसँ जे मनोवृत्ति‍ बनि‍ गेल अछि‍ ओकरा एकाएक नै बदलल जा सकैए। मुदा बि‍ना बदलने काजो नै चलत। तँए जरूरी अछि‍ जे उत्‍पादन आ उपभोगकेँ नीक जकाँ सभ बुझी। घनश्‍याम-         जुगक अनुकूल वि‍चार अछि‍। सुकदेव-         घनश्‍यामबाबू, गामक बारहआना जमीन हुनका सबहक छि‍यनि‍ जे गाम छोड़ि‍ अनतए जा नोकरी करै छथि‍। जखन कि‍ खेती केनि‍हारकेँ अपन खेत नै छि‍यनि‍। घनश्‍याम-         (मूड़ी डोलबैत) हँ से तँ अछि‍ये। सुकदेव-         तइ बीच कोनो सामंजस्‍य हएत? घनश्‍याम-         ओना अपना सभ बुझै छी जे अंग्रेजकेँ भगा हम सभ स्‍वराज भेलौं मुदा से नै छी। जखन शासन आ सम्‍पत्ति‍ (देशक) सबहक सझि‍या भए जि‍नगीक समुचि‍त वि‍कास दि‍स बढ़त तखन हएत। रघुनाथ-         (हृदए खोलि‍) मन हल्‍लुक करै दुआरे अपन बात कहै छी। जहि‍ना जुआनीक उमकीमे गाम छोड़ि‍ शहर गेलौं तहि‍ना आइ बुझि‍ पड़ैए जे......? मनमाेहन-         रूकलौं कि‍अए? रघुनाथ-         संकोच होइए। जइठाम छी तइठाम नि‍हत्‍था भऽ गेलौं। जि‍नगीक सभ कि‍छु छीना रहल अछि‍। मुदा गाममे सभ कि‍छु देख रहल छी। मनमोहन-         संकोच कि‍अए होइए। रघुनाथ-         पूँजी नष्‍ट होइत देख रहल छी। जइले जि‍नगी गमेलौं सएह.......? मनमोहन-         डाॅक्‍टर सहाएबसँ कनि‍यो नीक नै छी। ओना डाॅक्‍टर सहाएबकेँ सभकि‍छु भेट जेतनि‍ मुदा......? रघुनाथ-         (मुस्‍की दैत) मुदा की? मनमाेहन-         एग्रीकल्‍चर शि‍क्षा पाबि‍ बेटा गाममे रहत आ अपने शहरमे। बुढ़ाढ़ीमे एकलोटा पोनि‍यो के देत। सोमन-          अहाँक गाम छी। खेत-पथार छी। अहाँक सुआगत अछि‍ जे गाम आबि‍ अपन जि‍नगीक अनुभव अनाड़ी-धुनाड़ीकेँ दि‍ऐक। कृष्‍णदेव-         एखन हम तनावमे चलि‍ रहल छी। मुदा तैयो कहै छी अहाँ सबहक वि‍चारानुसार जीवैक कोशि‍श करब। शान्‍ती-          घनश्‍यामकाका, आगूक भार अहाँ उपर? घनश्‍याम-         गामक भाग जगि‍ गेल। पूँजीक जते जरूरत हएत ओ बैंकसँ दि‍आ देब। भने एग्रीकल्‍चर ग्रेजुएट गाममे रहताह, हुनका माध्‍यमसँ गामक योजना बना उन्नति‍ खेती आ खेतीसँ जुड़ल कल-कारखानाक लेल प्रयासरत रहब। शान्‍ती-          (हँसैत) जि‍नगीक सार्थकता पाबि‍ रहल छी। घनश्‍याम-         कि‍छु करैक संकल्‍प सभ लि‍अ। जखने सामुहि‍क डेग उठट तखने रस्‍ता धड़ैमे देरी नै लागत। नसीवलाल-       सबहक दुख-सुख- सहबहक छी। सबहक इज्‍जत- सबहक छी। पटाक्षेप समाप्‍त। क्रमश: ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। बिपिन झा, IIT Bombay ग्रन्थ समीक्षा-प्रकृति परिक्रमा काव्यप्रकाशकार आचार्य मम्मट ’भारती कवेर्जयति’ क माध्यम सँ रचनाकारक प्रतिभा दिस जे अपन मन्तव्य इंगित कयने छथि ओ आचार्य पुण्यनाथ मिश्रक अनुपम कृति ’प्रकृति-परिक्रमा केर सन्दर्भ मे अक्षरशः चरितार्थ होइत अछि। ई ग्रन्थ ’मिश्रबन्धु प्रकाशन, मधुबनी’ सँ  २००८ मे प्रकाशित भेल अछि एकर लेखक आचार्य पुण्यनाथ मिश्र आ सम्पादक डा० मोहनाथ मिश्र छथि। वर्तमान समय मे संचारक सुगमता अथवा अन्यान्य कारण सँ पुस्तकक प्रकाशन ’असंख्य’ परिमाण मे परिगणित कयल जा सकैत अछि; मुदा किछुए ग्रन्थ एहेन प्राप्त होइत अछि  जे चिरंजीवित्वक प्राप्ति करैत अछि जेकर निकष ओहि ग्रन्थक गहन एवं परिपाक विषयवस्तुक समावेश आओर सहज प्रस्तुती करण प्रभृति स्वीकार कयल जाइत अछि। प्रकृत ग्रन्थ प्रकृतिक यथार्थरूप हमरालोकनिक समक्ष उपस्थापित करैत अछि। ग्रन्थक प्रथम तरंग मन तथा आत्मा केर सन्दर्भ ओ पारस्परिक सम्बन्धक निरूपण, द्वितीय तरंग प्रकृतिक ’आठ’ संख्यात्मक विविध अंगक मीमांसा, चतुर्थ तरंग गर्भ मे विद्यमान सन्तानक गुणादि अभिवृद्धि सन्दर्भ मे माता-पिताक कर्तव्यक चर्चा, पंचम तरंग नवजात, दोहदकर्मक मीमांसा, षष्ठम तरंग प्रकृतिक व्यापक रूप अर्थात ब्रह्माण्ड सन्दर्भ लैत सत्यम शिवम ओ सुन्दरमक विवेचना प्रस्तुत करैत अछि। एहि ग्रन्थक अवलोकन सँ पूर्व पारदशास्त्रक अध्ययन करबाक अवसर प्राप्त भेल छल संगहि  श्रीलंकावासी मित्रक शोधग्रन्थ पढवाक जिज्ञासा आयुर्वेदक गूढ रहस्यक सन्दर्भ मे प्रवृत्त कयलक। ई संयोग कहल जा सकैत अछि जे प्रकृत ग्रन्थ हस्तगत भय सकल। (समीक्षाकार बिपिन झा IIT Mumbai मे Ph. D कय रहल छथि। कोनो टिप्पणी सादर आमन्त्रित अछि- kumarvipin.jha@gmail.com) क्रमशः ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। आशीष अनचिन्हार बेचन ठाकुरजीक नाटक छीनरदेवी ऐ नाटकक मादें किछु कहबासँ पहिने ओ गप्प कही जे प्रायः-प्रायः अंतमे कहल जाइत छैक। श्रुति प्रकाशन एकटा बड़का काज ठानि लेने अछि- हीरा-मोती-माणिककेँ चुनबाक। आ ऐ मे ई कतेक सफल भेल तकर निर्धारण भविष्य करत, वर्तमान नै कारण वर्तमान समयक नीति-निर्धारकक इमान शून्य स्तरपर पहुँचि गेल अछि। मुदा एहन-एहन समस्याक अछैतो हमर शुभकामना ऐ प्रकाशनक संग अछि आ विश्वास अछि जे जेना ई धारक दूरी पार केलक अछि तेनाहिते आब ई समुद्रक दूरी पार करत। आ संगहि-संग ऐ नाटककेँ उपर अनबामे जनिकर कनेकबो योगदान छन्हि से अशेष धन्यवादक पात्र छथि। जहिआ सनातन धर्ममे पुराण-उपनिषद् के आगमन भेल रहैक, तहिआ देवी-देवताक संख्या ३३ करोड़ रहैक। आजुक समयमे जखन कि पौराणिक समय बितला बहुत दिन भए गेल तखन देवी देवताक संख्या कतेक हएत ? हमरा बुझने ३३ करोड़सँ बेसिए। तथापि सुविधाक लेल एकरा यथावत् मानू। आ एतेक देवी-देवताक अछैतो छीनरदेवीक आविर्भाव किएक? उत्तर हम नै देब कारण ई गप्प सभ जनैत छथि मुदा लोक ऐ उत्तरकेँ नुका कऽ रखैत अछि। आ संभवतः छीनरदेवीक ऐ रूपकेँ छिनरधत्त कहल जाइत छैक। ओना एकरा बादमे हम निरुपित करब। ओइसँ पहिने एकटा आरो महत्वपूर्ण प्रश्नपर चली। जँ अहाँ श्री बेचन ठाकुर कृत ऐ नाटककेँ नीकसँ पढ़ब तँ ई बुझबामे कोनो भाँगठ नै रहत जे ऐ नाटकक मूल स्वर अंधविश्वासपर चोट करब छैक। आ जखने अहाँ ऐ निषकर्षपर पहुँचब, अहाँकेँ तुरंते प्रो. हरिमोहन झा मोन पड़ि जेताह से उम्मेद अछि। आ जखने अहाँकेँ प्रो. झा मोन पड़ताह तखने हमरा मोनमे ई प्रश्न उठत जे प्रो. झा जइ प्रबलतासँ अंधविश्वासपर कलम चलेने छलाह तकरा बाबजूदो ६०-७० साल बाद बेचन जीकेँ ऐ पर कलम चलेबाक जरूरति किएक पड़लनि ? एकर दूटा कारण भऽ सकैत अछि पहिल जे प्रो. झाक प्रहारक बाबजूदो अंधविश्वास मेटाएल नै ( हम ई नै कहि रहल छी जे ई प्रो. झाक हारि थिक कारण हरेक लेखकक एकटा सीमा होइत छैक) आ दोसर कारण भऽ सकैत अछि जे बेचन जीकेँ कोनो बिषए नै भेटल होइन्ह आ मजबूरीमे ओ ऐ पर कलम उठेने होथि। मुदा आइ बर्ख २०-११ मे जखन गामे-गाम घूमै छी आ ओकर आंतरिक स्थितिकेँ परखैत छी तँ दोसर कारण अपने-आप खत्म भऽ जाइत अछि। आइयो गाम आ अर्धशहरी इलाकामे एलोपैथीक संगे-संग भस्म-विभूति आ ब्रम्हथानक माटि उपचारमे लाएल जाइत अछि। आ एकरा संगे ईहो स्पष्ट भऽ जाइत अछि जे प्रो. झाक बादो ई अंधविश्वास मरल नै। आ एहने समयमे हमरा लग ई प्रश्न बिकराल रूप धऽ आबि जाइत अछि जे प्रो. झाक बाद जे नाटककार भेलाह ( चूँकि बेचन ठाकुर जीक विधा नाटक छन्हि तँए हम नाटकेक दृष्टिसँ गप्प करब) से एतेक दिन धरि की करैत छलाह ? आब हम ऐ प्रश्न सबहक उत्तर ऐ ठाम नै लिखब। एकर कारण अछि जे हमरा सदासँ विश्वास रहल अछि जे साहित्यिक संदर्भमे वर्तमान समयक उत्तर जँ भविष्यमे प्राप्त हुअए तँ ओ बेसी सटीक आ सार्थक होइत छैक।अस्तु श्री बेचन ठाकुर जीसँ मैथिली मंचकेँ बड्ड आस छैक आ तइ आसकेँ पूरा करबाक तागति भगवान हुनका देथिन्ह तइ आसाक संग चली हम प्रेक्षक समूहमे। कोनो नाटक पहिने लिखल जाइए आ तकर बाद ओ टाइप होइए वा सोझे टाइप कएल जाइए आ तकर बाद कखन छपैए, मंचनक बाद वा मंचनक पहिने; ऐ सभमे आब कोनो अन्तर नै रहलै। जॉर्ज बर्नार्ड सॉ शॉर्टहैण्डमे लिखै छलाह आ हुनकर स्टेनो ओकरा लौंगहैण्डमे टाइप करै छलीह। बिनु छपने मैथिली धूर्तसमागम मैथिलीक पहिल पोस्ट मॉडर्न अबसर्ड नाटक अछि। ई तर्क जे छपलाक पहिने मंचन भेलासँ बहुत रास कमी दूर भऽ जाइए, ऐ सन्दर्भमे मलयालम कथाकार बशीरक उदाहरण अछि जे सभ नव छपल संस्करणमे अपन कथामे नीक तत्व अनबाक दृष्टिसँ संशोधन करै छलाह, ई कथामे सम्भव तँ नाटकमे तँ आर सम्भव। तँ सिद्ध भेल जे लिखल जेबाक वा छपि गेलाक बादे नाटकक मंचन हएत आ मंचनक बाद लिखल वा छपल दुनूमे सुधार सम्भव। बेचन ठाकुरजी रंगमंच निर्देशक सेहो छथि आ विगत २५ बर्खसँ अपन गाममे मैथिली रंगमंचकेँ जियेने छथि बिना कोनो संस्थागत (सरकारी वा गएर सरकारी) सहयोगक। हिनकर रंगमंचपर हिनकर दर्जनसँ बेसी नाटकक अतिरिक्त गजेन्द्र ठाकुर आ जगदीश प्रसाद मण्डलक नाटक, एकांकी आ बाल नाटकक मंचन सेहो भेल अछि। (जारी....) ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। वि‍रेन्‍द्र यादव कथा बाबा गाछी आमक फलसँ लदल गाछ। बि‍नु ओगरबाहक बाबा गाछी, तुलसीया चाँपक कछेरमे। तुलसि‍या गाममे अभि‍जातवर्गक लोक सबहक संगहि‍ एक घर अछोप छल। राजू डोम पढ़ल-लि‍खल छल। सरकार आरक्षणक पक्षमे ओइ ग्राम-पंचायतकेँ आरक्षि‍त कए देलक। गामक प्रमुख लोक सभ मि‍ल वि‍चार कए राजूकेँ मुखि‍या आ मोहि‍नीकेँ प्रति‍नि‍धि‍ चुनलक। मोहि‍नी ओइ गामक पैघ शशि‍बाबूक पुत्रवधु छलीह। मोहि‍नीक पति‍ दि‍न-राति‍ गाजा-भाँग पीब, बि‍नु धीया-पुता जनमोनहि‍ स्‍वर्ग चलि‍ गेल। प्रति‍नि‍धि‍ सबहक सम्‍मेलनि‍ भेल। जइमे पहि‍ल बेर मोहि‍नी आ राजूक भेँट भेल। ई भेँट दुनू गोटेक छातीमे मीलक पाथर जकाँ गड़ि‍ गेल। दुनूक मोनमे एक दोसरकेँ अपनेबाक आगि‍ सुनगए लगल। पि‍परीतक आतुरतामे मोहि‍नी चेतक वेसाखक रौदमे पि‍यासल हि‍रणी जकाँ बाबा गाछीक रास्‍ता पकड़ि‍ लेलक। बापक हुरकुचनि‍पर राजू बाबा-गाछीक बगल चाँपमे सुगर टहलाबए गेल छलए। मोहि‍नीक नजरि‍ राजूपर पड़ि‍तहि‍ पीरीतक लहरि‍ उमड़ि‍ पड़ल। ओ राजूकेँ कहलक- “एम्‍हर गाछक छाँहमे आउ, ओतय रौदमे कि‍अए खून सुखबै छी?” एतेक बात सुनि‍तहि‍ राजू गाछक लग आबि‍ गेल। मोहि‍नी अपन पीरीतक पि‍यास बुझाबए लेल झपटि‍ कऽ राजूकेँ पकड़ि‍ लेलक मुदा राजू अपनाकेँ अछूत बुझि‍ मोहनीसँ हाथ छोड़ौलक। मोहनी पकरा पढ़ैत बाजल- “ओ राजू...।” पि‍यासल मानय धोबी घाट आ प्रीत नै बुझए ओछी जात। राजूक देहपर मोहनीक हाथक स्‍पर्शसँ हृदए शीतल भऽ गेल आ मोनमे भेल जे ई चमत्‍कारि‍क बात छी जे एतेक पैघ घरक पुत्रवधुक लगमे हम बैसल छी। मोहनी बाजल- “ऐ राजू अहाँ हमरा हृदेमे छी, हम अहाँकेँ इश्वरसँ आगा मानै छी। हमर जि‍नगीक संगी बनबाक लेल......।” एतेक बात सुनि‍तहि‍ राजू बाजल- “ई केना हएत? अहाँ पैघ लोक छी आ हम अछूत। ओना तँ अहाँपर नजरि‍ पड़ि‍ते हमहुँ ई सुधि‍ बि‍सरि‍ गेलौं जे हम अछूत छी।” मोहनी बाजल- “इंसान अछूत नै होइछ। कर्मसँ लोक ऊँच-नीच होइत अछि‍। मनुक्‍खक जि‍नगीमे शि‍क्षा आ व्‍यवहारक महत्‍व छैक। डाॅ. भीमराव अम्‍बेदकर जाति‍सँ अछोप छल मुदा अपन शि‍क्षा आ कर्मसँ ऐ समाजकेँ देखौलनि‍ जे समाजक आगूक श्रेणीमे हुनक स्‍थान छन्‍हि‍।” मोहनी आ राजूक प्रेम पंसंगक बीचेमे कलुआ, जे शशि‍बाबूक मुँहलगुआ आ चालि‍सँ चुगला छल, कि‍छु दूरसँ ई खेला देखैत पोखरि‍ दि‍स जाइ छल। कलुआपर नजरि‍ पड़ि‍तहि‍ राजू डेराय गेल आ नुकएबाक चेष्‍टा कएलक। मोहनी राजूकेँ हि‍म्‍मत बन्‍हैत अलग भऽ गेलि‍ आ फेर दोसर बेर भेटबाक नि‍श्चय कएलक। ऐ प्रेम प्रसंगक बीया सौंसे गाम छीटैत कलुआ शशि‍बाबूक दलानपर आबि‍ गेल आ सकपकाइत शि‍शि‍बाबूकेँ कहि‍ बैसल। गामक पैघ लोक सभ शशि‍बाबूक दलानपर आबए लगल। हि‍म्‍मत बान्‍हि‍ कलुआ मोहनी आ राजूक प्रेम प्रसंगक चर्चा शशि‍बाबूकेँ पुन: सुनौलक। गामक लोक सभ चढ़ाव-उतारक बात बाजए लागल। मुदा अधहा जीभे, कि‍एक तँ शशि‍बाबू ओइ जमानाक ग्रेजुएट छथि‍ जइ समैमे बड़ थोड़ लोकसभ पढ़ैत-लि‍खैत छल। शशि‍बाबूक समझदारी आ जमींदारीक दाओ-चाप ओइ इलाकामे छल। शशि‍बाबू बाजलाह- “राजूक बाप रामा डोमकेँ बोलाओल जाए।” धीरू पहलवान रामा ओइठाम पहुँच रामाकेँ सभटा बात बताबैत, रामाकेँ संगे मालि‍कक दलानपर आएल। रामा डोम दारू पीब मस्‍त छल। दुनू हाथ जोड़ि‍ बाजल- “मालि‍क जे हुकुम।” कलुआ बाजल- “रे रामा, दुइ दि‍नमे ऐ गामसँ चलि‍ जो। फेर धुमि‍ कऽ ऐ गाममे नै अबि‍हेँ।” रामा मालि‍कक आदेश सुनि‍ बाजल- “अहाँक हुकुमक पालन करब।” कहि‍ ओइठामसँ वि‍दा भऽ गेल। घर पहुँच रामा, राजूकेँ थप्‍पड़ मारैत कहलक- “तोरा होश-हबास नै। एतेक भारी जुलुम कि‍एक केलँह।” राजू बाजल- “बाउ, हमर कोनो दोख नै छौ।” रामाक गोसा शांत भेल। भोरहरबाक चारि‍ बजि‍ते, बगगलक गामसँ अजानक आबाज सुनि‍ते मोहनी घरसँ बहार भऽ बाबा गाछी आएलि‍, ओतए राजू सेहो छल। दुनू गोटे गाम छोड़ि‍ पड़ाए गेल। भि‍नसर होइते ई खबरि‍ आगि‍ जकाँ सौंसे गाम पसरि‍ गेल। शशि‍बाबू गामक लोकसँ वि‍चार करैत थानामे अपहरणक रपट दर्ज करबौलक जइमे राजूआ रामाक नाम देलक। ओम्‍हर राजू, मोहनीक संगे कोर्ट मैरि‍ज कएलक आ कि‍छु दि‍न अनतय रहबाक नि‍श्चय कएलक। तइ बीच गामक लोक सभ रामा डोमकेँ पुलि‍स पकड़ि‍, मारबो-पि‍टबो केलक आ जहल पठा देलक। राजू ई खबरि‍ सुनि‍ते मोहनीक संगे कोर्ट गेल। बाप रामासँ भेँट कएलाक उपरान्‍त कोर्टमे हाजि‍र भेल। रामाक जमानत करौलक आ तीनू गोटे गाम दि‍स वि‍दा भेल। राति‍मे रामा, राजू आ मोहनी गाम आएल। भोर होइते सौंसे गामक लोक शशि‍बाबूक दलानपर आबए लगल। कि‍यो बाजए- “ई डोमरा छातीपर मुँह दररि‍ देलक।” कि‍यो कहए- “एहन जुलुम कहि‍यो नै भेल छल।” ऐ तरहेँ चुपचाप शशि‍बाबू सबहक बात सुनैत रहल। कि‍छु कालक बाद बाजल- “हे यौ समाज परि‍वर्तन दुनि‍याँक नि‍यम थि‍क। काल्हि‍क ऊँच आइ गहींर, काल्हि‍क पैघ आ बरोबरि‍। बदलैत कालचक्रसँ कि‍छु सि‍खबाक चाही। आब अपना सभकेँ ऐ तथ्‍यकेँ स्‍वीकार करबाक अलाबा कोनो चारा नै अि‍छ। मोहनी वि‍धवा पुत्रवधु छी, जन प्रति‍नि‍धि‍ सेहो बना देलयनि‍। समाजकेँ सही आ नव दि‍शा देबाक लेल प्रति‍नि‍धि‍ होइछ। अपना सभ रूढ़ि‍वादी वि‍चारक ति‍याग करू। वि‍धवा वि‍वाह होएबाक चाही। संगहि‍ ऊँच-नीचक भेद भाव छोड़ू। सभलोक इश्वरक संतान छी। कि‍यो ऊँच-नीक भेद-भाव छोड़ू। सभ लोक इश्वरक संतान छी। अंतरजातीय वि‍याहकेँ सरकार प्रश्रय दैत अछि‍। ऐ अवसरपर अहाँ सभकेँ हम आमंत्रि‍त करै छी जे सांझमे सामाजि‍क रि‍ति‍-रि‍बाजक अनुसार मोहनी आ राजूक वि‍याह होएत।” एतेक बजैत शशि‍बाबू उठि‍ गेलाह आ कलुआक संगे रामा डोमक घर दि‍स वि‍दा भेलाह। साँझमे राजू दुल्हा बनि‍ बरि‍यातीक संगे गाजा-बाजाक संग शशि‍बाबूक दलानपर पहुँचल। मोहनी आ राजूक ि‍वयाह भेल। ि‍वयाहक अवसरपर शशि‍बाबू घोषणा केलथि‍ जे- दोसर टोल गरही कामत परक घर-दुआरि‍ आ चालीस एकड़ जमीन माेहनी आ राजूक भेल। ऐ तरहेँ आधुनि‍क समाजवादी समाजक लोक जकाँ राजू आ मोहनी जीवन-बसर करैत ग्राम पंचायत प्रति‍नि‍धि‍त्‍व करए लगलाह। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। ३. पद्य ३.१.रवि भूषण पाठक- मरणोपरांत-२ ३.२.जवाहर लाल कश्यप- खाइ ३.३.किशन कारीगर- गीत ३.४.गजेन्द्र ठाकुर- गजल/ रुबाइ ३.५.प्रभात राय भट्ट ३.६.नवीन कुमार आशा ३.७.गजेन्द्र ठाकुर- हाइकू/ टनका/ शेनर्यू/ हैबून ३.८. डॉ. शेफालिका  वर्मा- कोसी नदी रवि भूषण पाठक मरणोपरांत-२ की केना मतलब ई जे भोजक कोन व्यवस्था ? गौंआरी वा छगमिया केवल भात कि चूडा या दूनू दिन इस्त्रगने पुरखे वा सबजाना एकजाना क बाते जुनि करू भोज क सब रिकार्ड टूटि जेतइ जकरा घर मे पाँच टा सरकारी मास्टर आधा दरजन इंजीनियर से कि ओहिना मानि जेतइ ओ तऽ गाँववला के पानियो पियेतइ आ पानि पियाए के मानतइ मुदा बात एतबे नइ भात के खायत या नइ एकर निर्णय त अलग अलग खूट लेत ताहि दुआरे हे पंचोभय बुधवारय पगुलवारय आ आनोआन खूटक म्ुाखिया आ ठीकेदार आबू आ निर्णय लिय । 2 जेना जगदीश बाबू कहलथिन्ह “एना त कहियो ने भेलइ घरवारी किछु कहलक आ नौत किछु आर भऽ गेलइ कतेको बेर बात घचपचा गेलइ ताहि दुआरे स्पष्ट कहू ककरा कही आ ककरा छोड़ू सबजाना कि इस्त्रगने पुरखे आ नौत क संगे बिजौ बस हम उतरबाइ टोल क भागी” नौत देला के बाद घामल जगदीश बैसि के धात्री गाछक नीचा कहऽ लागलाह अपन बात “ओ जखने कहलक की कथी क व्यवस्था हम कहलिएन्ह अओ बाबू ओइ घर मे छऽ छऽ टा इंजीनियर चारि टा तरकारी पाँच टा मधुर आ बीस बेशी सौ मन दूधक दही चारि साल पुरनका चाउर राहड़िक दालि बरी सकरौरी घी पापड़ कत्ते खायब उपरो सँ नीचो सँ खुएताह खाउ ने कत्ते खायब ” जगदीश झुठे छाँटैत रहलाह सब बूझैत अछि ओ एत्ते नइ बाजति छथि फेर बिजौ क बात पर कहऽ लागलाह “हम कहि देलिएन्ह आब कून बिजैा आ कोन विनय जेहने खुएनहार तहिना खेनिहार” 3 हे सूर्य हे भास्कर आइ माथ पर नइ आयब बादले मे रहब जोन मजूर खबास भनसीया पनिभरनी सब तपि जेतीह तऽ काज के करत हे पवनदेव आइ मंद मंद बहब खाउ हनूमान सप्पत आइ पूरबे रहब एमहर आयब तऽ तीमन तरकारी भात दालि सब मे माटि बाउल खपटी सना गोजा जायत । हे इंद्रदेव अहाँ क जरूरी आइ खेत मे छैक गाँव मे नहि अहाँ आइ शचीए लग रहू अहाँ आयब ! तखन कोना अओताह गौंआ घरूआ टोल समाज ब््रााहमण महाब्राह्मण । हे देवगण आइ अंतरिक्षे मे व्यस्त रहू आइ लियऽ दियऽ प्रकृति क स्वाद आइ रमऽ दियऽ समाज मे आइ बैसऽ दियऽ जमीन पर आइ माँगऽ दियऽ पानि केरा क पात आइ सूँघऽ दियऽ महकौआ चाउरक भात । 4 जेना मन्नू बाबू कहलखिन्ह तीने बजे पड़ि जाए आलू उसनए लेल चारिए बजे बनऽ लागए चटनी भोरे बनए बरी सकरौरी सात बजे तक जमा भऽ जाए बालटीन डोल गमला करछुल चंगेरा । आठ बजे हुअऽ लागइ तरकारी क सूर सारि दस बजे बीड़ी बनि जाइ बारह बजे तक नौत निमंत्रण एक बजे पत्ता कटा जमा भऽ जाइ दलान पर । दू बजे चढ़ि जाइ भातक पहिल खेप तीने बजे सँ रतरत करए गाँव टोल क नबका बारीक । अइ होटल आ केटरर क जमाना मे अहाँ कोन सामाजिकता क बात करइ छियइ आठ बजे एलियइ आ दूनू बापुत बैसि गेलियइ कोना के निबाहबए गाँव टोल क मरजाद ।

5.अशोकक गाछ कामकाज मे पाछू मुदा ललकारए मे आगू ओ नमगर छीटधारी युवक आलोक बाबूक सार छथि । चलबा बाजबा क तरीका सँ स्पष्ट रहए ओ कोनो डीएसपीए के बेटा हेथिन्ह चलाकी पकड़ेला पर ईमानदार भऽ गेलाह “हमरा लोकनि भेलहुँ अशोकक गाछ ने फूल देब ने छाया ने फल बीज ने आरोग्यक चीज। मुदा हम दलान पर बनल रहब हम छी शोभा काटबा हटेबा क वस्तु नइ प्रतिष्ठोऽपकरण ।” ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। जवाहर लाल कश्यप (1981- ) पिता श्री- हेमनारायण मिश्र , गाम फुलकाही- दरभंगा। खाइ एकटा लडकी छै लडकी नहि, परी छै रंग ओकर दूधमे केसर मिलायल नैन ओकर रुपमे अछि ओझारयल होइत अछि मोन ओकरा सँ करी बात बहुत रास मीठ मीठ बात मुदा हिम्मत नहि भेल ओहो हमरा रोज देखैत अछि देखि हँसैत अछि किछु कहि दैत अछि मुद हम  किछु कहि नहि सकलहुँ रहैत अछि हम्मर बिल्डींगमे हम्मर बिल्डींग जे हम्मर नहि अछि हम ओहि बिल्डींगमे वाचमैन छी ओतेक टा बेटी अछि हम्मर रहैत अछि गाम मे माय आ बुढी दायक संग हम अप्पन परिवारसँ दुर परदेसमे पेटक आगिमे सब सुख होमादि कऽ जीने जा रहल छी आबैत अछि वएह लड़की लेने एकटा गुडिया कहैत अछि मीठ बोल “अंकल देखो न हमारा डाल कितना प्याला है दस हजार का है” ओतेक सैलरी नहि अछि हम्मर हम ओकरा छू नहि सकलहुँ गोदमे उठा नहि सकलहुँ जे खाइकेँ देवदुत पार कऽ चुकल हम ओकरा पार नहि कऽ सकलहुँ ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। किशन कारीगर गीत हमर दिलकेँ तोड़ि देलहुँ हमरासँ मुँह मोड़ि लेलहुँ छोड़ि कऽ एसगर हमरा अहाँ हमरासँ दूर कतौ चलि गेलहुँ मोनक बात मोनेमे रखलहुँ कहियो अहाँसँ नै कहलहुँ दूइए दिनक भेँट घाँटमे प्रेम अहाँसँ कऽ लेलहुँ बाट अहाँक तकैत रहलहुँ मुदा अहाँ नै अएलहुँ दूर जा कऽ हमरासँ अहाँ हमर मोनकेँ तड़पबैत रहलहुँ याद सताबैए अहाँक तँ मोन पड़ैए ओ सभ दिन जहिया रहैत छलहुँ अहाँ हमरासँ बड्ड खिन्न सपनामे अहींकेँ देखैत रहलहुँ अहींक वियोगमे तड़पैत रहलहुँ मुदा किशन सन प्रेमीकेँ अहाँ अनपढ़ गंवार बुझैत रहलहुँ जहिए देखलहुँ एक नज़र अहाँकेँ तहिए मोनमे बसि गेलहुँ अहाँ मुदा हमरा पवित्र प्रेमकेँ अहाँ नै बुझि सकलहुँ आब बुझबामे आबि रहल अछि हमरा अहाँक प्रेममे हम की नै केलहुँ मुदा तइयो हमरा मधुबनीमे छोड़ि अहाँ हमरासँ दूर कतौ चलि गेलहुँ दिलसँ हम साँचो प्रेम केने रही अहूँ तँ ई गप हमरा एक बेर कहने रही मुदा किएक से अहीं कहू हमरासँ दूर अहाँ कतए चलि गेलहुँ जँ अहूँ साँचो कऽ प्रेम केने होएब तँ मोन पड़ैत होएब हम मोनसँ निकलैत होएत एकटा गप कारीगर अहाँ संगे ई की केलहुँ हम हृदैसँ प्रेम केनिहार बुझत प्रियतमसँ दूर हेबाक वियोग कोना कऽ हम सहलहुँ कनेक अहूँ बुझू निश्छल प्रेम केने रही सभ दिन तेँ कहलहुँ ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। गजेन्द्र ठाकुर गजल/ रुबाइ १ गुमकी लागल राति बुलैत चान झपाइ छी घुरि जाइ गाम मुदा बीचे असकताइ छी चरको परियानि ई बनेलौं कएक बेर उबेरक बाट ताकी आ सुरुज कहाइ छी अकास बिच सतरंगा पनिसोखा उगलैए निराशसँ आगू जाइ बीचेमे लेभराइ छी जे काज होइए पछता से काज ताकी हम अगता काज आबैए जान कोना गमाइ छी ओकरा देखि बुझलहुँ गढ़निक सोपान बनैत- बनैत बनै मूर्ति अहाँ देखाइ छी ढङीला छौरा धरैए भेष रूप बदलैत दोहरी ई नस-नस बुझी हम चिन्हाइ छी जे संगमे अछि सेहो छोड़ने अहाँ जाइ छी राखब की लगैए पकड़ै लेल पड़ाइ छी कानमे ठेकी आँखिमे गेजर मूह दुसैए लेरचुब्बा नै डिग्गा मदारी जे कहै जाइ छी बूझी बाजी करतेबता सँ बढ़ू एक्के सुरे पेटो पानि नै मूह दुसै कनीले हुसाइ छी छोड़ि कऽ चलि गेल छाह, परात, इजोरिया ऐरावत दोसराइत अहाँ की कसाइ छी २ नोर झरैए मोनक दागनि दगै छी तराटक लागलए आ बातो बकै छी कोनटा बचल नै एकान्ती ले एकोटा अन्हरोखे उठै छी आ गनती गनै छी अन्हरियासँ बेसी अन्हार जिनगीमे ई इजोरिया किए अहाँ मुँह दुसै छी पिआ गेलाह देशान्तर दूरस्त देस कियो नै घुरै अछि से आसो नै तकै छी भोरे अहाँ बिनु दिन फेर बजरल ऐरावतसँ भारी ऐ दिनकेँ देखै छी ३ रुबाइ कारी अनहार मेघ, आ नै होइए कत्तौ बलुआ माटि, खा नै होइए दाहीजरती देखि, हिलोरै-ए मेघ भगजोगनी भकरार, जा नै होइए ४ बहरे मुतकारिब मुतकारिब आठ–रुक्न फ ऊ लुन (U।।) – चारि बेर गजल उचरि नव रूप अपन लिखैब तखन किने उतर दछिन डगहर    बहैब तखन किने कनकन करत बनत सदिखन तलिया यौ सुअद पैब जौँ अहँ झखैब तखन किने मनक भूख असगर नुकैब बुझल अछि अपन बोल-वाणी घुरैब तखन किने खधाइ गढ़ अछि भरल सभतरि दहारे जलक धार बिच घर भरैब तखन किने निमहतासँ निभता निभैब सिखल नहि नव युग कनिक उगल बुझैब तखन किने पड़ाइनपर कनैत अछि भाग जँ कतौ गजेन्द्र मन बूझै हियैब तखन किने ५ अहाँ बूझि लै छी जुआरी अनेरे जिबै कोन बैबे नियारी अनेरे हहारो उठेलौं नचारी गबेलौं सिहाबै किए छी मदारी अनेरे जतेको नबारी छबारी बुरैए घुरेबै कियो नै सुतारी अनेरे घरोमे उपासे बहारो निरासे दहारे अकाले हियासीअनेरे चलै छी खटोली उठा ऐ भरोसे भसाठी अबैए डरै छी अनेरे ६ गुम्म भेल जे ठाढ़ भेल छी मुनल मूह मटकुरिए नीक बाट तकै बहार भेल गजर-गजर तकनहिए नीक धन भेल थोड़ बिपत बड़ जोर प्रेमक राग बिसरलौं प्रेम दफानि बिसारै से गदह-पचीसी बुझनहिए नीक जे देखलक बरियारक गाछ कहलक बिरदाबन ईहे उड़कुस्सी लागै दलानपर छै आब उजड़नहिए नीक जकरा कतहु ने छै पुछारी से अछि सौराठक नोतिहारी चन्द्रोगत नै प्रेम अछिञ्जल से आब बिसरनहिए नीक हाथी अपने पएरे भारी चुट्टी अपने पएरे भारी अछि ऐरावत प्रेम-जिंजीरसँ छारल तैं ठोकरेनहिए नीक ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। प्रभात राय भट्ट १ पेट किऐ जरैत जाइ छी  परदेश  धनि छोड़ि कऽ अपन देस, भेजब कमा कऽ धन रुपैया मीठ-मीठ सनेश, जग केर रीत  सजनी आब अहाँ जानु, जिनगीक चौबटियापर एना नै कानु प्रीत सँ जौं चलैत जिनगी तँ पेट किए जरैत, अन्न बिन दुनियाँमे लोग किए मरैत, अहाँ बिन सजनी हम जीब नै सकैत छी, मुदा भूखे  जौँ पेट जरत तँ प्रीतो नै सुहायत, गरीब भऽ कऽ जन्म लेलौं ऐ पत्थरक संसारमे, जिनगीक नाव अटकल रहि गेल मजधारमे, हम नाव बनब अहाँ पतवार बनू, संग संग चलू, हम नवका खोजक राही, अहाँ राय दैत चलू , दुःख सुख केर जीवन साथी अपन साथ दिअ, जिनगीक यात्रामे जौं लड़खरै तँ हिमतक हाथ दिअ, जीवनक कटुसत्य  सजनी आब अहाँ मानु, जिनगी केर चौबटियापर एना नै कानु, लड़ऽ दिअ हमरा जिनगी सँ चलऽ दिअ कर्मपथपर, गन्तव्य स्थान जरुर मिलत चलू दुनु गोटा धर्मपथपर, २ नैन किए भरि गेल अहाँक ठोरक मुस्कान सजनी कतए चलि गेल यै, अहाँक नैनमे नोर सजनी किए भरि गेल यै , नोर नै बहाउ सजनी ई थिक अनमोल मोती, अहाँ हँसि दी तँ जगमग करए हमर जीवनक ज्योति, अहाँक ठोरक मुस्कान सजनी कतए चलि गेल यै, एना नै होउ अहाँ उठास, मोन नै करू उदास, आइ छै दुःख तँ काल्हि सुख हेतै, ई छन भरक विपति सब टरि जेतइ, राखु मोनमे आशा आओर हमरापर भरोसा, पूरा हएत मोनक सभटा अभिलाषा, अहाँक ठोरक मुस्कान सजनी कतए चलि गेल यै, दुःख सुख तँ जीवनमे अबिते रहतै, चाहे हवा जते तेज बहतै, समुन्दरमे लहर जते जोर उठतै, चाहे धरतीसँ ज्वाला फुटतै, मुदा जीवनक यात्रा कखनो नै रुकतै, अहाँक ठोरक मुस्कान सजनी कतऽ चलि गेल यै, अहाँक नैनमे नोर सजनी किए भरि गेल यै, ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। नवीन कुमार आशा हमहूँ  तँ छी  इंसान डोम डोम डोम डोम सभ  कियो हाक लगाबए मोने मोन अपने कही हमहूँ तँ छी इंसान आ हरदम करि भगवानक ध्यान आ हरदम जापि ॐ तँ किए कहै लोक डोम / लोक जखन दूर करै अछि तखन तखन मोन कनै अछि आ सदिखन सोचै मोन की अछि आखिर हमर गलती डोम डोम सभ कियो कहै अछि / डोमोक होएत किछु अरमान ओकरो तँ राखू किछु मान कखनो राखि देखू अपना तखन देखू कोनो सपना फेर बुझि पाएत लोक की अछि डोमक मान डोम .............................../ डोम जे नै होए जग  मे कोना किन्को   आगि जखन करि कोनो करतेबता कोना एतै बासक समान की कखनो सोचल ई जजमान डोम ........................................../ भगवानक अछि अलगे लीला हुनके बनाओल ई मेला डोमो तँ हुनके रचल अछि डोम डोम ............................../ रजा हरिसचंद्र पर जखन आएल विपदा ओहो  पाओल डोमक शरण ओइ समय जे होएतनि मरण नै पओतथि डोमक शरण डोम डोम......................................./ कखनो कखनो मोन कनै अछि की अछि हमर ईहए मान फेर मोन अपने कहै अछि जे तूँ नै देबहीं अपन मान कोना पैमे लोकक मान डोम डोम डोम डोम सभ कियो हाक लगाबए ....................................../ ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। गजेन्द्र ठाकुर हाइकू/ टनका/ शेनर्यू/ हैबून १ संगोर राति दिन राति सन-ए आ राति राति २ दूर क्षितिज मुँह घुरौने सभ अपने भेर ३ दूर क्षितिज वृत्तक नहि अंत लगक छद्म ४ मेघक सीढ़ी अकासक मचान हिम छारल ५ अन्हार जोति कएल प्रकाशित अंतःप्रकाशे ६ सलाढ़ आब अरियालङ्घनक बादक हाल ७ अगरजित खसब नै उठब ओतै रहब ८ साँप घुमैत पहुँचैए शिखर रस्ता बनैए ९ जलपै बेढ़ी बोनाठ धमाउर उपटाएब १० डलबाह नै पंजियार भगता भगैतिया नै ११ केराक बीर काज करब कनी खाएब टुस्सा १२ घुमौआ मोड़ चौबटिया बनि कऽ आनैए आस १३ झरैए पानि बनबैए धार आ बढ़ैए आगाँ १४ उगैतोकेँ ई कुश तिल अक्षत आ डुमैतोकेँ १५ भेड़क जेड़ बहटाबी ओकरा परदेसोमे १६ संस्कृतिक ई गलञ्जर उठल की हम चली १७ कथकिया कि घरदेखिया क्यो नै अबैए एत' १८ देखै छी हम ऊँचगरसँ बनि ब्रह्मा- महेश १९ चढ़ाउतार नै नड़हा फौदार चाही प्रकृति २० पृथ्वीक अंत शुरू भेल प्रारम्भ अकास आब २१ लोक ने गाछ ई आँखिक सौन्दर्य तेँ  तँ अछि ई २२ डगहर ई ऐ उतरे दछिने अगहन छी २३ पथ नभमे सहस्रबाढ़निक अकास घुरै २४ प्रकृति जेना कलमच बैसल सीटल सीढ़ी २५ वृत सन ई पृथ्वी प्रकृति गोल अनंत स्पष्ट २६ छाहक रंग कएक तरहक तहिआएल २७ बलुआ डोह तकर ओइ पार पानि अकास २८ बाढ़ि लगैए समुद्र सन शान्त मुदा ई विद्युत् २९ १. तागि प्रकृति ताकैले भेलौं पार सुखल पात (हाइकू) २. ई फूल फल चढ़ैत जाइ आगाँ कम होइए उनटि देखी फेर लगमे कम दूरे बेशी (टनका/ वाका) ३. रंग छाड़ल पहाड़ आर गाछ मुदा जीवन (शेनर्यू) ४. झझायल रंग कतेक वर्णक। बच्चाक किताबोसँ बेशी चमकैए ई प्रकृति, फूल, पात, बाट आ अकास। आ एकरा सभकेँ तँ छोड़ू ई बरफ, जे रेगिस्ताने ने छी, बालुक बदला बरफ। मुदा नै अछि ऑक्सीजन आ नहिये फूल-पात। मुदा एकर सेहो देखियौ शान। जइ रस्तासँ अबै छलहुँ से ओतेक कहाँ चमकै छलए। जखन ओइ प्रकृतिक लग छलहुँ तँ कहाँ ओकर रूप निङहारि पाबै छलहुँ। कियो दूरसँ देखैत होएत तँ निङहारि पबैत हएत हमरो, प्रकृतिक बीचमे हमहूँ प्रकृति बनल हएब। मुदा ऐ शिखरपर आबि जे सनगर लगैए ई प्रकृति। गाछ भेल छै असगरुआ बौआ पात भेल छै खिलौना प्रकृतिक शिखर देखि मुदा आब ऐ शिखरपर एलाक बाद लगैए जे बेकारे एलहुँ एतऽ। ऐ शिखरकेँ ओइ ठामसँ देखै छलहुँ तँ कतेक सुन्नर लगै छल ई शिखर। मुदा शिखरपर एलाक बाद आब तँ वएह गाम नीक लगैए। तुलना तखने ने हएत जखन गामक प्रकृतिकेँ शिखरसँ देखबै। गामसँ शिखर आ शिखरसँ गाम। मुदा लिलसासँ हाइ रे हाइ। आब चलै छी शिखरक ओइ पार। देखै छी ओइ दिसुका लोक समाज। दूरसँ लगैए दुनू कातक गाम नीक, तराउपड़ी। मुदा ओइ कातक गामसँ शिखर ओतेक सुन्नर लागत जतेक ऐ पारक गामसँ लगैए। नै ठाढ़ होउ चलू चली घुरैले बनिजार छी लोकक बीचमे छी जाइत घुरैत छी (हैबून) ३० २९ प्रकृति रोष कुश तिल जलसँ विधवा बनि सधवा की विभेद दूबि अक्षत जल (टनका/ वाका) करबीरसँ घर गाछ पहाड़ घेरल अछि (हाइकू) बनैया लोक घरक पनिबह बिदति नहि (शेनर्यू) करहड़ उपारि कऽ खाउ, प्रकृतिकेँ घरमे बसाउ, फुलवारी बनाउ, पहाड़क फोटो बना कऽ घरमे लटकाउ। आ भऽ जाउ प्रकृति प्रेमी। गामकेँ नग्रमे लऽ आउ, चित्रकारीसँ, कलाकारीसँ, बुधियारीसँ। खेलाइ हम करियाझुम्मरिमे नीचाँ अकास एकपेड़िया सड़क कतऽ पाबी आब, आब तँ चारि लेन सेहो कम चकरगर मानल जाइए। छह लेन, आठ लेन। अकास मलिछोंह, गाछक हरियरी मलिछोंह। मोन मलिछोंह। मुदा सड़क, घर सभ फोटो सन चिक्कन चुनमुन। लिखी चित्रसँ घरक खाका आइ छी जङलाह (हैबून) ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। डॉ. शेफालिका  वर्मा कोसी नदी हमर मोनक कोमल वृंतसँ अहाँ निज नेह-गेह  निर्माण केलौं हमर भावनाकेँ वरि हमरेपर शर-संधान  केलौं  ! हम तँ छलौं आत्मा  अहाँक नदी  मात्र  हमरा बुझलौं .....!! बेटी हिमालयक हम मस्त अल्हड  चंचल  छलौं छागर  पाठी , सिनुरक पूजा लैत धराक  कोरमे उन्मुक्त   गीत गवैत  छलौं..... मुदा, नहि  सह्य  भेल अहाँकेँ हमर मुक्त हास , अनुपम  विलास बराज   बान्हि  हमर  छातीमे कील अहाँ ठोकि  देलौं दुर्गाक सिंहनाद सन भैरवीक  निनाद सन कट  कट  विकट   ओठ  पुट पाँड़रि जकाँ हुंकार भरैत हम रहि  गेलौं पूर्वी  पश्चिमी  तटबंधक कारामे सिसकैत नारीक  नियति  बुझि मौन भऽ गेलौं .... जहिया कहियो ज्वार  उठैत   छल तामसे   माहुर  भऽ गामक  गाम  बहा  दैत  छलौं कतेको प्राणीकेँ निष्प्राण बेघरबार  बना  दैत छलौं किन्तु, अहाँक  सतत  उपेक्षासँ त्रस्त भऽ उठलौं  हम त्यागि  देलौं लौह भुजपाशकेँ अपन बाट  स्वयं  बनेलौं कुसहा  बांध  तोड़ि अपन मुक्ति स्वयम खोजलौं  , तैं महाविनाशक संहारसँ  सुरुज कारी भऽ गेल .... कत्तो   बौलक  बनल पहाड़ कत्तो जलक  संसार बनि  गेल .... किन्तु, अहाँ तुरत  निर्णय  लेलौं एकटा आर बांध  बान्हि बंदिनी  हमरा  बनेलौं   ........ एकटा   आर महाप्रलयक दंश सहवा लेल हमर क्षेत्रकेँ असहाय  अहाँ  छोडि  गेलौं  ..................... ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। विदेह नूतन अंक मिथिला कला संगीत १.श्वेता झा चौधरी २.ज्योति सुनीत चौधरी ३.श्वेता झा (सिंगापुर) १. श्वेता झा चौधरी गाम सरिसव-पाही, ललित कला आ गृहविज्ञानमे स्नातक। मिथिला चित्रकलामे सर्टिफिकेट कोर्स। कला प्रदर्शिनी: एक्स.एल.आर.आइ., जमशेदपुरक सांस्कृतिक कार्यक्रम, ग्राम-श्री मेला जमशेदपुर, कला मन्दिर जमशेदपुर ( एक्जीवीशन आ वर्कशॉप)। कला सम्बन्धी कार्य: एन.आइ.टी. जमशेदपुरमे कला प्रतियोगितामे निर्णायकक रूपमे सहभागिता, २००२-०७ धरि बसेरा, जमशेदपुरमे कला-शिक्षक (मिथिला चित्रकला), वूमेन कॉलेज पुस्तकालय आ हॉटेल बूलेवार्ड लेल वाल-पेंटिंग। प्रतिष्ठित स्पॉन्सर: कॉरपोरेट कम्युनिकेशन्स, टिस्को; टी.एस.आर.डी.एस, टिस्को; ए.आइ.ए.डी.ए., स्टेट बैंक ऑफ इण्डिया, जमशेदपुर; विभिन्न व्यक्ति, हॉटेल, संगठन आ व्यक्तिगत कला संग्राहक। हॉबी: मिथिला चित्रकला, ललित कला, संगीत आ भानस-भात। २. ज्योति सुनीत चौधरी जन्म तिथि -३० दिसम्बर १९७८; जन्म स्थान -बेल्हवार, मधुबनी ; शिक्षा- स्वामी विवेकानन्द मि‌डिल स्कूल़ टिस्को साकची गर्ल्स हाई स्कूल़, मिसेज के एम पी एम इन्टर कालेज़, इन्दिरा गान्धी ओपन यूनिवर्सिटी, आइ सी डबल्यू ए आइ (कॉस्ट एकाउण्टेन्सी); निवास स्थान- लन्दन, यू.के.; पिता- श्री शुभंकर झा, ज़मशेदपुर; माता- श्रीमती सुधा झा, शिवीपट्टी। ज्योतिकेँwww.poetry.comसँ संपादकक चॉयस अवार्ड (अंग्रेजी पद्यक हेतु) भेटल छन्हि। हुनकर अंग्रेजी पद्य किछु दिन धरि www.poetrysoup.com केर मुख्य पृष्ठ पर सेहो रहल अछि। ज्योति मिथिला चित्रकलामे सेहो पारंगत छथि आ हिनकर मिथिला चित्रकलाक प्रदर्शनी ईलिंग आर्ट ग्रुप केर अंतर्गत ईलिंग ब्रॊडवे, लंडनमे प्रदर्शित कएल गेल अछि। कविता संग्रह ’अर्चिस्’ प्रकाशित। ३.श्वेता झा (सिंगापुर) ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। विदेह नूतन अंक गद्य-पद्य भारती १. मोहनदास (दीर्घकथा):लेखक: उदय प्रकाश (मूल हिन्दीसँ मैथिलीमे अनुवाद विनीत उत्पल) मोहनदास (मैथिली-देवनागरी) मोहनदास (मैथिली-मिथिलाक्षर) मोहनदास (मैथिली-ब्रेल) २.छिन्नमस्ता- प्रभा खेतानक हिन्दी उपन्यासक सुशीला झा द्वारा मैथिली अनुवाद छिन्नमस्ता बालानां कृते बच्चा लोकनि द्वारा स्मरणीय श्लोक १.प्रातः काल ब्रह्ममुहूर्त्त (सूर्योदयक एक घंटा पहिने) सर्वप्रथम अपन दुनू हाथ देखबाक चाही, आ’ ई श्लोक बजबाक चाही। कराग्रे वसते लक्ष्मीः करमध्ये सरस्वती। करमूले स्थितो ब्रह्मा प्रभाते करदर्शनम्॥ करक आगाँ लक्ष्मी बसैत छथि, करक मध्यमे सरस्वती, करक मूलमे ब्रह्मा स्थित छथि। भोरमे ताहि द्वारे करक दर्शन करबाक थीक। २.संध्या काल दीप लेसबाक काल- दीपमूले स्थितो ब्रह्मा दीपमध्ये जनार्दनः। दीपाग्रे शङ्करः प्रोक्त्तः सन्ध्याज्योतिर्नमोऽस्तुते॥ दीपक मूल भागमे ब्रह्मा, दीपक मध्यभागमे जनार्दन (विष्णु) आऽ दीपक अग्र भागमे शङ्कर स्थित छथि। हे संध्याज्योति! अहाँकेँ नमस्कार। ३.सुतबाक काल- रामं स्कन्दं हनूमन्तं वैनतेयं वृकोदरम्। शयने यः स्मरेन्नित्यं दुःस्वप्नस्तस्य नश्यति॥ जे सभ दिन सुतबासँ पहिने राम, कुमारस्वामी, हनूमान्, गरुड़ आऽ भीमक स्मरण करैत छथि, हुनकर दुःस्वप्न नष्ट भऽ जाइत छन्हि। ४. नहेबाक समय- गङ्गे च यमुने चैव गोदावरि सरस्वति। नर्मदे सिन्धु कावेरि जलेऽस्मिन् सन्निधिं कुरू॥ हे गंगा, यमुना, गोदावरी, सरस्वती, नर्मदा, सिन्धु आऽ कावेरी  धार। एहि जलमे अपन सान्निध्य दिअ। ५.उत्तरं यत्समुद्रस्य हिमाद्रेश्चैव दक्षिणम्। वर्षं तत् भारतं नाम भारती यत्र सन्ततिः॥ समुद्रक उत्तरमे आऽ हिमालयक दक्षिणमे भारत अछि आऽ ओतुका सन्तति भारती कहबैत छथि। ६.अहल्या द्रौपदी सीता तारा मण्डोदरी तथा। पञ्चकं ना स्मरेन्नित्यं महापातकनाशकम्॥ जे सभ दिन अहल्या, द्रौपदी, सीता, तारा आऽ मण्दोदरी, एहि पाँच साध्वी-स्त्रीक स्मरण करैत छथि, हुनकर सभ पाप नष्ट भऽ जाइत छन्हि। ७.अश्वत्थामा बलिर्व्यासो हनूमांश्च विभीषणः। कृपः परशुरामश्च सप्तैते चिरञ्जीविनः॥ अश्वत्थामा, बलि, व्यास, हनूमान्, विभीषण, कृपाचार्य आऽ परशुराम- ई सात टा चिरञ्जीवी कहबैत छथि। ८.साते भवतु सुप्रीता देवी शिखर वासिनी उग्रेन तपसा लब्धो यया पशुपतिः पतिः। सिद्धिः साध्ये सतामस्तु प्रसादान्तस्य धूर्जटेः जाह्नवीफेनलेखेव यन्यूधि शशिनः कला॥ ९. बालोऽहं जगदानन्द न मे बाला सरस्वती। अपूर्णे पंचमे वर्षे वर्णयामि जगत्त्रयम् ॥ १०. दूर्वाक्षत मंत्र(शुक्ल यजुर्वेद अध्याय २२, मंत्र २२) आ ब्रह्मन्नित्यस्य प्रजापतिर्ॠषिः। लिंभोक्त्ता देवताः। स्वराडुत्कृतिश्छन्दः। षड्जः स्वरः॥ आ ब्रह्म॑न् ब्राह्म॒णो ब्र॑ह्मवर्च॒सी जा॑यता॒मा रा॒ष्ट्रे रा॑ज॒न्यः शुरे॑ऽइषव्यो॒ऽतिव्या॒धी म॑हार॒थो जा॑यतां॒ दोग्ध्रीं धे॒नुर्वोढा॑न॒ड्वाना॒शुः सप्तिः॒ पुर॑न्धि॒र्योवा॑ जि॒ष्णू र॑थे॒ष्ठाः स॒भेयो॒ युवास्य यज॑मानस्य वी॒रो जा॒यतां निका॒मे-नि॑कामे नः प॒र्जन्यों वर्षतु॒ फल॑वत्यो न॒ऽओष॑धयः पच्यन्तां योगेक्ष॒मो नः॑ कल्पताम्॥२२॥ मन्त्रार्थाः सिद्धयः सन्तु पूर्णाः सन्तु मनोरथाः। शत्रूणां बुद्धिनाशोऽस्तु मित्राणामुदयस्तव। ॐ दीर्घायुर्भव। ॐ सौभाग्यवती भव। हे भगवान्। अपन देशमे सुयोग्य आ’ सर्वज्ञ विद्यार्थी उत्पन्न होथि, आ’ शुत्रुकेँ नाश कएनिहार सैनिक उत्पन्न होथि। अपन देशक गाय खूब दूध दय बाली, बरद भार वहन करएमे सक्षम होथि आ’ घोड़ा त्वरित रूपेँ दौगय बला होए। स्त्रीगण नगरक नेतृत्व करबामे सक्षम होथि आ’ युवक सभामे ओजपूर्ण भाषण देबयबला आ’ नेतृत्व देबामे सक्षम होथि। अपन देशमे जखन आवश्यक होय वर्षा होए आ’ औषधिक-बूटी सर्वदा परिपक्व होइत रहए। एवं क्रमे सभ तरहेँ हमरा सभक कल्याण होए। शत्रुक बुद्धिक नाश होए आ’ मित्रक उदय होए॥ मनुष्यकें कोन वस्तुक इच्छा करबाक चाही तकर वर्णन एहि मंत्रमे कएल गेल अछि। एहिमे वाचकलुप्तोपमालड़्कार अछि। अन्वय- ब्रह्म॑न् - विद्या आदि गुणसँ परिपूर्ण ब्रह्म रा॒ष्ट्रे - देशमे ब्र॑ह्मवर्च॒सी-ब्रह्म विद्याक तेजसँ युक्त्त आ जा॑यतां॒- उत्पन्न होए रा॑ज॒न्यः-राजा शुरे॑ऽ–बिना डर बला इषव्यो॒- बाण चलेबामे निपुण ऽतिव्या॒धी-शत्रुकेँ तारण दय बला म॑हार॒थो-पैघ रथ बला वीर दोग्ध्रीं-कामना(दूध पूर्ण करए बाली) धे॒नुर्वोढा॑न॒ड्वाना॒शुः धे॒नु-गौ वा वाणी र्वोढा॑न॒ड्वा- पैघ बरद ना॒शुः-आशुः-त्वरित सप्तिः॒-घोड़ा पुर॑न्धि॒र्योवा॑- पुर॑न्धि॒- व्यवहारकेँ धारण करए बाली र्योवा॑-स्त्री जि॒ष्णू-शत्रुकेँ जीतए बला र॑थे॒ष्ठाः-रथ पर स्थिर स॒भेयो॒-उत्तम सभामे युवास्य-युवा जेहन यज॑मानस्य-राजाक राज्यमे वी॒रो-शत्रुकेँ पराजित करएबला निका॒मे-नि॑कामे-निश्चययुक्त्त कार्यमे नः-हमर सभक प॒र्जन्यों-मेघ वर्षतु॒-वर्षा होए फल॑वत्यो-उत्तम फल बला ओष॑धयः-औषधिः पच्यन्तां- पाकए योगेक्ष॒मो-अलभ्य लभ्य करेबाक हेतु कएल गेल योगक रक्षा नः॑-हमरा सभक हेतु कल्पताम्-समर्थ होए ग्रिफिथक अनुवाद- हे ब्रह्मण, हमर राज्यमे ब्राह्मण नीक धार्मिक विद्या बला, राजन्य-वीर,तीरंदाज, दूध दए बाली गाय, दौगय बला जन्तु, उद्यमी नारी होथि। पार्जन्य आवश्यकता पड़ला पर वर्षा देथि, फल देय बला गाछ पाकए, हम सभ संपत्ति अर्जित/संरक्षित करी। 8.VIDEHA FOR NON RESIDENTS 8.VIDEHA FOR NON RESIDENTS 8.1 to 8.3 MAITHILI LITERATURE IN ENGLISH 8.1.1.The Comet   -GAJENDRA THAKUR translated by Jyoti Jha chaudhary 8.1.2.The_Science_of_Words- GAJENDRA THAKUR translated by the author himself 8.1.3.On_the_dice-board_of_the_millennium- GAJENDRA THAKUR translated by Jyoti Jha chaudhary 8.1.4.NAAGPHANS (IN ENGLISH)- SHEFALIKA VERMA translated by Dr. Rajiv Kumar Verma and Dr. Jaya Verma Input: (कोष्ठकमे देवनागरी, मिथिलाक्षर किंवा फोनेटिक-रोमनमे टाइप करू। Input in Devanagari, Mithilakshara or Phonetic-Roman.) Output: (परिणाम देवनागरी, मिथिलाक्षर आ फोनेटिक-रोमन/ रोमनमे। Result in Devanagari, Mithilakshara and Phonetic-Roman/ Roman.) English to Maithili Maithili to English इंग्लिश-मैथिली-कोष / मैथिली-इंग्लिश-कोष  प्रोजेक्टकेँ आगू बढ़ाऊ, अपन सुझाव आ योगदान ई-मेल द्वारा ggajendra@videha.com पर पठाऊ। Top of Form विदेहक मैथिली-अंग्रेजी आ अंग्रेजी मैथिली कोष (इंटरनेटपर पहिल बेर सर्च-डिक्शनरी) एम.एस. एस.क्यू.एल. सर्वर आधारित -Based on ms-sql server Maithili-English and English-Maithili Dictionary. १.भारत आ नेपालक मैथिली भाषा-वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक शैली आ २.मैथिलीमे भाषा सम्पादन पाठ्यक्रम १.नेपाल आ भारतक मैथिली भाषा-वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक शैली

१.१. नेपालक मैथिली भाषा वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक  उच्चारण आ लेखन शैली (भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक धारणाकेँ पूर्ण रूपसँ सङ्ग लऽ निर्धारित) मैथिलीमे उच्चारण तथा लेखन १.पञ्चमाक्षर आ अनुस्वार: पञ्चमाक्षरान्तर्गत ङ, ञ, ण, न एवं म अबैत अछि। संस्कृत भाषाक अनुसार शब्दक अन्तमे जाहि वर्गक अक्षर रहैत अछि ओही वर्गक पञ्चमाक्षर अबैत अछि। जेना- अङ्क (क वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ङ् आएल अछि।) पञ्च (च वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ञ् आएल अछि।) खण्ड (ट वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ण् आएल अछि।) सन्धि (त वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे न् आएल अछि।) खम्भ (प वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे म् आएल अछि।) उपर्युक्त बात मैथिलीमे कम देखल जाइत अछि। पञ्चमाक्षरक बदलामे अधिकांश जगहपर अनुस्वारक प्रयोग देखल जाइछ। जेना- अंक, पंच, खंड, संधि, खंभ आदि। व्याकरणविद पण्डित गोविन्द झाक कहब छनि जे कवर्ग, चवर्ग आ टवर्गसँ पूर्व अनुस्वार लिखल जाए तथा तवर्ग आ पवर्गसँ पूर्व पञ्चमाक्षरे लिखल जाए। जेना- अंक, चंचल, अंडा, अन्त तथा कम्पन। मुदा हिन्दीक निकट रहल आधुनिक लेखक एहि बातकेँ नहि मानैत छथि। ओ लोकनि अन्त आ कम्पनक जगहपर सेहो अंत आ कंपन लिखैत देखल जाइत छथि। नवीन पद्धति किछु सुविधाजनक अवश्य छैक। किएक तँ एहिमे समय आ स्थानक बचत होइत छैक। मुदा कतोक बेर हस्तलेखन वा मुद्रणमे अनुस्वारक छोट सन बिन्दु स्पष्ट नहि भेलासँ अर्थक अनर्थ होइत सेहो देखल जाइत अछि। अनुस्वारक प्रयोगमे उच्चारण-दोषक सम्भावना सेहो ततबए देखल जाइत अछि। एतदर्थ कसँ लऽ कऽ पवर्ग धरि पञ्चमाक्षरेक प्रयोग करब उचित अछि। यसँ लऽ कऽ ज्ञ धरिक अक्षरक सङ्ग अनुस्वारक प्रयोग करबामे कतहु कोनो विवाद नहि देखल जाइछ। २.ढ आ ढ़ : ढ़क उच्चारण “र् ह”जकाँ होइत अछि। अतः जतऽ “र् ह”क उच्चारण हो ओतऽ मात्र ढ़ लिखल जाए। आन ठाम खाली ढ लिखल जएबाक चाही। जेना- ढ = ढाकी, ढेकी, ढीठ, ढेउआ, ढङ्ग, ढेरी, ढाकनि, ढाठ आदि। ढ़ = पढ़ाइ, बढ़ब, गढ़ब, मढ़ब, बुढ़बा, साँढ़, गाढ़, रीढ़, चाँढ़, सीढ़ी, पीढ़ी आदि। उपर्युक्त शब्द सभकेँ देखलासँ ई स्पष्ट होइत अछि जे साधारणतया शब्दक शुरूमे ढ आ मध्य तथा अन्तमे ढ़ अबैत अछि। इएह नियम ड आ ड़क सन्दर्भ सेहो लागू होइत अछि। ३.व आ ब : मैथिलीमे “व”क उच्चारण ब कएल जाइत अछि, मुदा ओकरा ब रूपमे नहि लिखल जएबाक चाही। जेना- उच्चारण : बैद्यनाथ, बिद्या, नब, देबता, बिष्णु, बंश, बन्दना आदि। एहि सभक स्थानपर क्रमशः वैद्यनाथ, विद्या, नव, देवता, विष्णु, वंश, वन्दना लिखबाक चाही। सामान्यतया व उच्चारणक लेल ओ प्रयोग कएल जाइत अछि। जेना- ओकील, ओजह आदि। ४.य आ ज : कतहु-कतहु “य”क उच्चारण “ज”जकाँ करैत देखल जाइत अछि, मुदा ओकरा ज नहि लिखबाक चाही। उच्चारणमे यज्ञ, जदि, जमुना, जुग, जाबत, जोगी, जदु, जम आदि कहल जाएबला शब्द सभकेँ क्रमशः यज्ञ, यदि, यमुना, युग, यावत, योगी, यदु, यम लिखबाक चाही। ५.ए आ य : मैथिलीक वर्तनीमे ए आ य दुनू लिखल जाइत अछि। प्राचीन वर्तनी- कएल, जाए, होएत, माए, भाए, गाए आदि। नवीन वर्तनी- कयल, जाय, होयत, माय, भाय, गाय आदि। सामान्यतया शब्दक शुरूमे ए मात्र अबैत अछि। जेना एहि, एना, एकर, एहन आदि। एहि शब्द सभक स्थानपर यहि, यना, यकर, यहन आदिक प्रयोग नहि करबाक चाही। यद्यपि मैथिलीभाषी थारू सहित किछु जातिमे शब्दक आरम्भोमे “ए”केँ य कहि उच्चारण कएल जाइत अछि। ए आ “य”क प्रयोगक सन्दर्भमे प्राचीने पद्धतिक अनुसरण करब उपयुक्त मानि एहि पुस्तकमे ओकरे प्रयोग कएल गेल अछि। किएक तँ दुनूक लेखनमे कोनो सहजता आ दुरूहताक बात नहि अछि। आ मैथिलीक सर्वसाधारणक उच्चारण-शैली यक अपेक्षा एसँ बेसी निकट छैक। खास कऽ कएल, हएब आदि कतिपय शब्दकेँ कैल, हैब आदि रूपमे कतहु-कतहु लिखल जाएब सेहो “ए”क प्रयोगकेँ बेसी समीचीन प्रमाणित करैत अछि। ६.हि, हु तथा एकार, ओकार : मैथिलीक प्राचीन लेखन-परम्परामे कोनो बातपर बल दैत काल शब्दक पाछाँ हि, हु लगाओल जाइत छैक। जेना- हुनकहि, अपनहु, ओकरहु, तत्कालहि, चोट्टहि, आनहु आदि। मुदा आधुनिक लेखनमे हिक स्थानपर एकार एवं हुक स्थानपर ओकारक प्रयोग करैत देखल जाइत अछि। जेना- हुनके, अपनो, तत्काले, चोट्टे, आनो आदि। ७.ष तथा ख : मैथिली भाषामे अधिकांशतः षक उच्चारण ख होइत अछि। जेना- षड्यन्त्र (खड़यन्त्र), षोडशी (खोड़शी), षट्कोण (खटकोण), वृषेश (वृखेश), सन्तोष (सन्तोख) आदि। ८.ध्वनि-लोप : निम्नलिखित अवस्थामे शब्दसँ ध्वनि-लोप भऽ जाइत अछि: (क) क्रियान्वयी प्रत्यय अयमे य वा ए लुप्त भऽ जाइत अछि। ओहिमे सँ पहिने अक उच्चारण दीर्घ भऽ जाइत अछि। ओकर आगाँ लोप-सूचक चिह्न वा विकारी (’ / ऽ) लगाओल जाइछ। जेना- पूर्ण रूप : पढ़ए (पढ़य) गेलाह, कए (कय) लेल, उठए (उठय) पड़तौक। अपूर्ण रूप : पढ़’ गेलाह, क’ लेल, उठ’ पड़तौक। पढ़ऽ गेलाह, कऽ लेल, उठऽ पड़तौक। (ख) पूर्वकालिक कृत आय (आए) प्रत्ययमे य (ए) लुप्त भऽ जाइछ, मुदा लोप-सूचक विकारी नहि लगाओल जाइछ। जेना- पूर्ण रूप : खाए (य) गेल, पठाय (ए) देब, नहाए (य) अएलाह। अपूर्ण रूप : खा गेल, पठा देब, नहा अएलाह। (ग) स्त्री प्रत्यय इक उच्चारण क्रियापद, संज्ञा, ओ विशेषण तीनूमे लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना- पूर्ण रूप : दोसरि मालिनि चलि गेलि। अपूर्ण रूप : दोसर मालिन चलि गेल। (घ) वर्तमान कृदन्तक अन्तिम त लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना- पूर्ण रूप : पढ़ैत अछि, बजैत अछि, गबैत अछि। अपूर्ण रूप : पढ़ै अछि, बजै अछि, गबै अछि। (ङ) क्रियापदक अवसान इक, उक, ऐक तथा हीकमे लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना- पूर्ण रूप: छियौक, छियैक, छहीक, छौक, छैक, अबितैक, होइक। अपूर्ण रूप : छियौ, छियै, छही, छौ, छै, अबितै, होइ। (च) क्रियापदीय प्रत्यय न्ह, हु तथा हकारक लोप भऽ जाइछ। जेना- पूर्ण रूप : छन्हि, कहलन्हि, कहलहुँ, गेलह, नहि। अपूर्ण रूप : छनि, कहलनि, कहलौँ, गेलऽ, नइ, नञि, नै। ९.ध्वनि स्थानान्तरण : कोनो-कोनो स्वर-ध्वनि अपना जगहसँ हटि कऽ दोसर ठाम चलि जाइत अछि। खास कऽ ह्रस्व इ आ उक सम्बन्धमे ई बात लागू होइत अछि। मैथिलीकरण भऽ गेल शब्दक मध्य वा अन्तमे जँ ह्रस्व इ वा उ आबए तँ ओकर ध्वनि स्थानान्तरित भऽ एक अक्षर आगाँ आबि जाइत अछि। जेना- शनि (शइन), पानि (पाइन), दालि ( दाइल), माटि (माइट), काछु (काउछ), मासु (माउस) आदि। मुदा तत्सम शब्द सभमे ई निअम लागू नहि होइत अछि। जेना- रश्मिकेँ रइश्म आ सुधांशुकेँ सुधाउंस नहि कहल जा सकैत अछि। १०.हलन्त(्)क प्रयोग : मैथिली भाषामे सामान्यतया हलन्त (्)क आवश्यकता नहि होइत अछि। कारण जे शब्दक अन्तमे अ उच्चारण नहि होइत अछि। मुदा संस्कृत भाषासँ जहिनाक तहिना मैथिलीमे आएल (तत्सम) शब्द सभमे हलन्त प्रयोग कएल जाइत अछि। एहि पोथीमे सामान्यतया सम्पूर्ण शब्दकेँ मैथिली भाषा सम्बन्धी निअम अनुसार हलन्तविहीन राखल गेल अछि। मुदा व्याकरण सम्बन्धी प्रयोजनक लेल अत्यावश्यक स्थानपर कतहु-कतहु हलन्त देल गेल अछि। प्रस्तुत पोथीमे मथिली लेखनक प्राचीन आ नवीन दुनू शैलीक सरल आ समीचीन पक्ष सभकेँ समेटि कऽ वर्ण-विन्यास कएल गेल अछि। स्थान आ समयमे बचतक सङ्गहि हस्त-लेखन तथा तकनीकी दृष्टिसँ सेहो सरल होबऽबला हिसाबसँ वर्ण-विन्यास मिलाओल गेल अछि। वर्तमान समयमे मैथिली मातृभाषी पर्यन्तकेँ आन भाषाक माध्यमसँ मैथिलीक ज्ञान लेबऽ पड़ि रहल परिप्रेक्ष्यमे लेखनमे सहजता तथा एकरूपतापर ध्यान देल गेल अछि। तखन मैथिली भाषाक मूल विशेषता सभ कुण्ठित नहि होइक, ताहू दिस लेखक-मण्डल सचेत अछि। प्रसिद्ध भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक कहब छनि जे सरलताक अनुसन्धानमे एहन अवस्था किन्नहु ने आबऽ देबाक चाही जे भाषाक विशेषता छाँहमे पडि जाए। -(भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक धारणाकेँ पूर्ण रूपसँ सङ्ग लऽ निर्धारित) १.२. मैथिली अकादमी, पटना द्वारा निर्धारित मैथिली लेखन-शैली

१. जे शब्द मैथिली-साहित्यक प्राचीन कालसँ आइ धरि जाहि वर्त्तनीमे प्रचलित अछि, से सामान्यतः ताहि वर्त्तनीमे लिखल जाय- उदाहरणार्थ-

ग्राह्य

एखन ठाम जकर, तकर तनिकर अछि

अग्राह्य अखन, अखनि, एखेन, अखनी ठिमा, ठिना, ठमा जेकर, तेकर तिनकर। (वैकल्पिक रूपेँ ग्राह्य) ऐछ, अहि, ए।

२. निम्नलिखित तीन प्रकारक रूप वैकल्पिकतया अपनाओल जाय: भऽ गेल, भय गेल वा भए गेल। जा रहल अछि, जाय रहल अछि, जाए रहल अछि। कर’ गेलाह, वा करय गेलाह वा करए गेलाह।

३. प्राचीन मैथिलीक ‘न्ह’ ध्वनिक स्थानमे ‘न’ लिखल जाय सकैत अछि यथा कहलनि वा कहलन्हि।

४. ‘ऐ’ तथा ‘औ’ ततय लिखल जाय जत’ स्पष्टतः ‘अइ’ तथा ‘अउ’ सदृश उच्चारण इष्ट हो। यथा- देखैत, छलैक, बौआ, छौक इत्यादि।

५. मैथिलीक निम्नलिखित शब्द एहि रूपे प्रयुक्त होयत: जैह, सैह, इएह, ओऐह, लैह तथा दैह।

६. ह्र्स्व इकारांत शब्दमे ‘इ’ के लुप्त करब सामान्यतः अग्राह्य थिक। यथा- ग्राह्य देखि आबह, मालिनि गेलि (मनुष्य मात्रमे)।

७. स्वतंत्र ह्रस्व ‘ए’ वा ‘य’ प्राचीन मैथिलीक उद्धरण आदिमे तँ यथावत राखल जाय, किंतु आधुनिक प्रयोगमे वैकल्पिक रूपेँ ‘ए’ वा ‘य’ लिखल जाय। यथा:- कयल वा कएल, अयलाह वा अएलाह, जाय वा जाए इत्यादि।

८. उच्चारणमे दू स्वरक बीच जे ‘य’ ध्वनि स्वतः आबि जाइत अछि तकरा लेखमे स्थान वैकल्पिक रूपेँ देल जाय। यथा- धीआ, अढ़ैआ, विआह, वा धीया, अढ़ैया, बियाह।

९. सानुनासिक स्वतंत्र स्वरक स्थान यथासंभव ‘ञ’ लिखल जाय वा सानुनासिक स्वर। यथा:- मैञा, कनिञा, किरतनिञा वा मैआँ, कनिआँ, किरतनिआँ।

१०. कारकक विभक्त्तिक निम्नलिखित रूप ग्राह्य:- हाथकेँ, हाथसँ, हाथेँ, हाथक, हाथमे। ’मे’ मे अनुस्वार सर्वथा त्याज्य थिक। ‘क’ क वैकल्पिक रूप ‘केर’ राखल जा सकैत अछि।

११. पूर्वकालिक क्रियापदक बाद ‘कय’ वा ‘कए’ अव्यय वैकल्पिक रूपेँ लगाओल जा सकैत अछि। यथा:- देखि कय वा देखि कए।

१२. माँग, भाँग आदिक स्थानमे माङ, भाङ इत्यादि लिखल जाय।

१३. अर्द्ध ‘न’ ओ अर्द्ध ‘म’ क बदला अनुसार नहि लिखल जाय, किंतु छापाक सुविधार्थ अर्द्ध ‘ङ’ , ‘ञ’, तथा ‘ण’ क बदला अनुस्वारो लिखल जा सकैत अछि। यथा:- अङ्क, वा अंक, अञ्चल वा अंचल, कण्ठ वा कंठ।

१४. हलंत चिह्न निअमतः लगाओल जाय, किंतु विभक्तिक संग अकारांत प्रयोग कएल जाय। यथा:- श्रीमान्, किंतु श्रीमानक।

१५. सभ एकल कारक चिह्न शब्दमे सटा क’ लिखल जाय, हटा क’ नहि, संयुक्त विभक्तिक हेतु फराक लिखल जाय, यथा घर परक।

१६. अनुनासिककेँ चन्द्रबिन्दु द्वारा व्यक्त कयल जाय। परंतु मुद्रणक सुविधार्थ हि समान जटिल मात्रापर अनुस्वारक प्रयोग चन्द्रबिन्दुक बदला कयल जा सकैत अछि। यथा- हिँ केर बदला हिं।

१७. पूर्ण विराम पासीसँ ( । ) सूचित कयल जाय।

१८. समस्त पद सटा क’ लिखल जाय, वा हाइफेनसँ जोड़ि क’ ,  हटा क’ नहि।

१९. लिअ तथा दिअ शब्दमे बिकारी (ऽ) नहि लगाओल जाय।

२०. अंक देवनागरी रूपमे राखल जाय।

२१.किछु ध्वनिक लेल नवीन चिन्ह बनबाओल जाय। जा' ई नहि बनल अछि ताबत एहि दुनू ध्वनिक बदला पूर्ववत् अय/ आय/ अए/ आए/ आओ/ अओ लिखल जाय। आकि ऎ वा ऒ सँ व्यक्त कएल जाय।

ह./- गोविन्द झा ११/८/७६ श्रीकान्त ठाकुर ११/८/७६ सुरेन्द्र झा "सुमन" ११/०८/७६

  २. मैथिलीमे भाषा सम्पादन पाठ्यक्रम २.१. उच्चारण निर्देश: (बोल्ड कएल रूप ग्राह्य):- दन्त न क उच्चारणमे दाँतमे जीह सटत- जेना बाजू नाम , मुदा ण क उच्चारणमे जीह मूर्धामे सटत (नै सटैए तँ उच्चारण दोष अछि)- जेना बाजू गणेश। तालव्य शमे जीह तालुसँ , षमे मूर्धासँ आ दन्त समे दाँतसँ सटत। निशाँ, सभ आ शोषण बाजि कऽ देखू। मैथिलीमे ष केँ वैदिक संस्कृत जकाँ ख सेहो उच्चरित कएल जाइत अछि, जेना वर्षा, दोष। य अनेको स्थानपर ज जकाँ उच्चरित होइत अछि आ ण ड़ जकाँ (यथा संयोग आ गणेश संजोग आ गड़ेस उच्चरित होइत अछि)। मैथिलीमे व क उच्चारण ब, श क उच्चारण स आ य क उच्चारण ज सेहो होइत अछि। ओहिना ह्रस्व इ बेशीकाल मैथिलीमे पहिने बाजल जाइत अछि कारण देवनागरीमे आ मिथिलाक्षरमे ह्रस्व इ अक्षरक पहिने लिखलो जाइत आ बाजलो जएबाक चाही। कारण जे हिन्दीमे एकर दोषपूर्ण उच्चारण होइत अछि (लिखल तँ पहिने जाइत अछि मुदा बाजल बादमे जाइत अछि), से शिक्षा पद्धतिक दोषक कारण हम सभ ओकर उच्चारण दोषपूर्ण ढंगसँ कऽ रहल छी। अछि- अ इ छ  ऐछ (उच्चारण) छथि- छ इ थ  – छैथ (उच्चारण) पहुँचि- प हुँ इ च (उच्चारण) आब अ आ इ ई ए ऐ ओ औ अं अः ऋ ऐ सभ लेल मात्रा सेहो अछि, मुदा ऐमे ई ऐ ओ औ अं अः ऋ केँ संयुक्ताक्षर रूपमे गलत रूपमे प्रयुक्त आ उच्चरित कएल जाइत अछि। जेना ऋ केँ री  रूपमे उच्चरित करब। आ देखियौ- ऐ लेल देखिऔ क प्रयोग अनुचित। मुदा देखिऐ लेल देखियै अनुचित। क् सँ ह् धरि अ सम्मिलित भेलासँ क सँ ह बनैत अछि, मुदा उच्चारण काल हलन्त युक्त शब्दक अन्तक उच्चारणक प्रवृत्ति बढ़ल अछि, मुदा हम जखन मनोजमे ज् अन्तमे बजैत छी, तखनो पुरनका लोककेँ बजैत सुनबन्हि- मनोजऽ, वास्तवमे ओ अ युक्त ज् = ज बजै छथि। फेर ज्ञ अछि ज् आ ञ क संयुक्त मुदा गलत उच्चारण होइत अछि- ग्य। ओहिना क्ष अछि क् आ ष क संयुक्त मुदा उच्चारण होइत अछि छ। फेर श् आ र क संयुक्त अछि श्र ( जेना श्रमिक) आ स् आ र क संयुक्त अछि स्र (जेना मिस्र)। त्र भेल त+र । उच्चारणक ऑडियो फाइल विदेह आर्काइव  http://www.videha.co.in/ पर उपलब्ध अछि। फेर केँ / सँ / पर पूर्व अक्षरसँ सटा कऽ लिखू मुदा तँ / कऽ हटा कऽ। ऐमे सँ मे पहिल सटा कऽ लिखू आ बादबला हटा कऽ। अंकक बाद टा लिखू सटा कऽ मुदा अन्य ठाम टा लिखू हटा कऽ– जेना छहटा मुदा सभ टा। फेर ६अ म सातम लिखू- छठम सातम नै। घरबलामे बला मुदा घरवालीमे वाली प्रयुक्त करू। रहए- रहै मुदा सकैए (उच्चारण सकै-ए)। मुदा कखनो काल रहए आ रहै मे अर्थ भिन्नता सेहो, जेना से कम्मो जगहमे पार्किंग करबाक अभ्यास रहै ओकरा। पुछलापर पता लागल जे ढुनढुन नाम्ना ई ड्राइवर कनाट प्लेसक पार्किंगमे काज करैत रहए। छलै, छलए मे सेहो ऐ तरहक भेल। छलए क उच्चारण छल-ए सेहो। संयोगने- (उच्चारण संजोगने) केँ/  कऽ केर- क ( केर क प्रयोग गद्यमे नै करू , पद्यमे कऽ सकै छी। ) क (जेना रामक) –रामक आ संगे (उच्चारण राम के /  राम कऽ सेहो) सँ- सऽ (उच्चारण) चन्द्रबिन्दु आ अनुस्वार- अनुस्वारमे कंठ धरिक प्रयोग होइत अछि मुदा चन्द्रबिन्दुमे नै। चन्द्रबिन्दुमे कनेक एकारक सेहो उच्चारण होइत अछि- जेना रामसँ- (उच्चारण राम सऽ)  रामकेँ- (उच्चारण राम कऽ/ राम के सेहो)। केँ जेना रामकेँ भेल हिन्दीक को (राम को)- राम को= रामकेँ क जेना रामक भेल हिन्दीक का ( राम का) राम का= रामक कऽ जेना जा कऽ भेल हिन्दीक कर ( जा कर) जा कर= जा कऽ सँ भेल हिन्दीक से (राम से) राम से= रामसँ सऽ , तऽ , त , केर (गद्यमे) एे चारू शब्द सबहक प्रयोग अवांछित। के दोसर अर्थेँ प्रयुक्त भऽ सकैए- जेना, के कहलक? विभक्ति “क”क बदला एकर प्रयोग अवांछित। नञि, नहि, नै, नइ, नँइ, नइँ, नइं ऐ सभक उच्चारण आ लेखन - नै त्त्व क बदलामे त्व जेना महत्वपूर्ण (महत्त्वपूर्ण नै) जतए अर्थ बदलि जाए ओतहि मात्र तीन अक्षरक संयुक्ताक्षरक प्रयोग उचित। सम्पति- उच्चारण स म्प इ त (सम्पत्ति नै- कारण सही उच्चारण आसानीसँ सम्भव नै)। मुदा सर्वोत्तम (सर्वोतम नै)। राष्ट्रिय (राष्ट्रीय नै) सकैए/ सकै (अर्थ परिवर्तन) पोछैले/ पोछै लेल/ पोछए लेल पोछैए/ पोछए/ (अर्थ परिवर्तन) पोछए/ पोछै ओ लोकनि ( हटा कऽ, ओ मे बिकारी नै) ओइ/ ओहि ओहिले/ ओहि लेल/ ओही लऽ जएबेँ/ बैसबेँ पँचभइयाँ देखियौक/ (देखिऔक नै- तहिना अ मे ह्रस्व आ दीर्घक मात्राक प्रयोग अनुचित) जकाँ / जेकाँ तँइ/ तैँ/ होएत / हएत नञि/ नहि/ नँइ/ नइँ/ नै सौँसे/ सौंसे बड़ / बड़ी (झोराओल) गाए (गाइ नहि), मुदा गाइक दूध (गाएक दूध नै।) रहलेँ/ पहिरतैँ हमहीं/ अहीं सब - सभ सबहक - सभहक धरि - तक गप- बात बूझब - समझब बुझलौं/ समझलौं/ बुझलहुँ - समझलहुँ हमरा आर - हम सभ आकि- आ कि सकैछ/ करैछ (गद्यमे प्रयोगक आवश्यकता नै) होइन/ होनि जाइन (जानि नै, जेना देल जाइन) मुदा जानि-बूझि (अर्थ परिव्र्तन) पइठ/ जाइठ आउ/ जाउ/ आऊ/ जाऊ मे, केँ, सँ, पर (शब्दसँ सटा कऽ) तँ कऽ धऽ दऽ (शब्दसँ हटा कऽ) मुदा दूटा वा बेसी विभक्ति संग रहलापर पहिल विभक्ति टाकेँ सटाऊ। जेना ऐमे सँ । एकटा , दूटा (मुदा कए टा) बिकारीक प्रयोग शब्दक अन्तमे, बीचमे अनावश्यक रूपेँ नै। आकारान्त आ अन्तमे अ क बाद बिकारीक प्रयोग नै (जेना दिअ , आ/ दिय’ , आ’, आ नै ) अपोस्ट्रोफीक प्रयोग बिकारीक बदलामे करब अनुचित आ मात्र फॉन्टक तकनीकी न्यूनताक परिचायक)- ओना बिकारीक संस्कृत रूप ऽ अवग्रह कहल जाइत अछि आ वर्तनी आ उच्चारण दुनू ठाम एकर लोप रहैत अछि/ रहि सकैत अछि (उच्चारणमे लोप रहिते अछि)। मुदा अपोस्ट्रोफी सेहो अंग्रेजीमे पसेसिव केसमे होइत अछि आ फ्रेंचमे शब्दमे जतए एकर प्रयोग होइत अछि जेना raison d’etre एतए सेहो एकर उच्चारण रैजौन डेटर होइत अछि, माने अपोस्ट्रॉफी अवकाश नै दैत अछि वरन जोड़ैत अछि, से एकर प्रयोग बिकारीक बदला देनाइ तकनीकी रूपेँ सेहो अनुचित)। अइमे, एहिमे/ ऐमे जइमे, जाहिमे एखन/ अखन/ अइखन केँ (के नहि) मे (अनुस्वार रहित) भऽ मे दऽ तँ (तऽ, त नै) सँ ( सऽ स नै) गाछ तर गाछ लग साँझ खन जो (जो go, करै जो do) तै/तइ जेना- तै दुआरे/ तइमे/ तइले जै/जइ जेना- जै कारण/ जइसँ/ जइले ऐ/अइ जेना- ऐ कारण/ ऐसँ/ अइले/ मुदा एकर एकटा खास प्रयोग- लालति‍ कतेक दि‍नसँ कहैत रहैत अइ लै/लइ जेना लैसँ/ लइले/ लै दुआरे लहँ/ लौं गेलौं/ लेलौं/ लेलँह/ गेलहुँ/ लेलहुँ/ लेलँ जइ/ जाहि‍/ जै जहि‍ठाम/ जाहि‍ठाम/ जइठाम/ जैठाम एहि‍/ अहि‍/ अइ (वाक्यक अंतमे ग्राह्य) / ऐ अइछ/ अछि‍/ ऐछ तइ/ तहि‍/ तै/ ताहि‍ ओहि‍/ ओइ सीखि‍/ सीख जीवि‍/ जीवी/ जीब भलेहीं/ भलहि‍ं तैं/ तँइ/ तँए जाएब/ जएब लइ/ लै छइ/ छै नहि‍/ नै/ नइ गइ/ गै छनि‍/ छन्‍हि‍  ... समए शब्‍दक संग जखन कोनो वि‍भक्‍ति‍ जुटै छै तखन समै जना समैपर इत्‍यादि‍। असगरमे हृदए आ वि‍भक्‍ति‍ जुटने हृदे जना हृदेसँ, हृदेमे इत्‍यादि‍। जइ/ जाहि‍/ जै जहि‍ठाम/ जाहि‍ठाम/ जइठाम/ जैठाम एहि‍/ अहि‍/ अइ/ ऐ अइछ/ अछि‍/ ऐछ तइ/ तहि‍/ तै/ ताहि‍ ओहि‍/ ओइ सीखि‍/ सीख जीवि‍/ जीवी/ जीब भले/ भलेहीं/ भलहि‍ं तैं/ तँइ/ तँए जाएब/ जएब लइ/ लै छइ/ छै नहि‍/ नै/ नइ गइ/ गै छनि‍/ छन्‍हि‍ चुकल अछि/ गेल गछि २.२. मैथिलीमे भाषा सम्पादन पाठ्यक्रम नीचाँक सूचीमे देल विकल्पमेसँ लैंगुएज एडीटर द्वारा कोन रूप चुनल जेबाक चाही: बोल्ड कएल रूप ग्राह्य: १.होयबला/ होबयबला/ होमयबला/ हेब’बला, हेम’बला/ होयबाक/होबएबला /होएबाक २. आ’/आऽ आ ३. क’ लेने/कऽ लेने/कए लेने/कय लेने/ल’/लऽ/लय/लए ४. भ’ गेल/भऽ गेल/भय गेल/भए गेल ५. कर’ गेलाह/करऽ गेलह/करए गेलाह/करय गेलाह ६. लिअ/दिअ लिय’,दिय’,लिअ’,दिय’/ ७. कर’ बला/करऽ बला/ करय बला करैबला/क’र’ बला / करैवाली ८. बला वला (पुरूष), वाली (स्‍त्री) ९ . आङ्ल आंग्ल १०. प्रायः प्रायह ११. दुःख दुख १ २. चलि गेल चल गेल/चैल गेल १३. देलखिन्ह देलकिन्ह, देलखिन १४. देखलन्हि देखलनि/ देखलैन्ह १५. छथिन्ह/ छलन्हि छथिन/ छलैन/ छलनि १६. चलैत/दैत चलति/दैति १७. एखनो अखनो १८. बढ़नि‍ बढ़इन बढ़न्हि १९. ओ’/ओऽ(सर्वनाम) ओ २० . ओ (संयोजक) ओ’/ओऽ २१. फाँगि/फाङ्गि फाइंग/फाइङ २२. जे जे’/जेऽ २३. ना-नुकुर ना-नुकर २४. केलन्हि/केलनि‍/कयलन्हि २५. तखनतँ/ तखन तँ २६. जा रहल/जाय रहल/जाए रहल २७. निकलय/निकलए लागल/ लगल बहराय/ बहराए लागल/ लगल निकल’/बहरै लागल २८. ओतय/ जतय जत’/ ओत’/ जतए/ ओतए २९. की फूरल जे कि फूरल जे ३०. जे जे’/जेऽ ३१. कूदि / यादि(मोन पारब) कूइद/याइद/कूद/याद/ यादि (मोन) ३२. इहो/ ओहो ३३. हँसए/ हँसय हँसऽ ३४. नौ आकि दस/नौ किंवा दस/ नौ वा दस ३५. सासु-ससुर सास-ससुर ३६. छह/ सात छ/छः/सात ३७. की  की’/ कीऽ (दीर्घीकारान्तमे ऽ वर्जित) ३८. जबाब जवाब ३९. करएताह/ करेताह करयताह ४०. दलान दिशि दलान दिश/दलान दिस ४१ . गेलाह गएलाह/गयलाह ४२. किछु आर/ किछु और/ किछ आर ४३. जाइ छल/ जाइत छल जाति छल/जैत छल ४४. पहुँचि/ भेट जाइत छल/ भेट जाइ छलए पहुँच/ भेटि‍ जाइत छल ४५. जबान (युवा)/ जवान(फौजी) ४६. लय/ लए क’/ कऽ/ लए कए / लऽ कऽ/ लऽ कए ४७. ल’/लऽ कय/ कए ४८. एखन / एखने / अखन / अखने ४९. अहींकेँ अहीँकेँ ५०. गहींर गहीँर ५१. धार पार केनाइ धार पार केनाय/केनाए ५२. जेकाँ जेँकाँ/ जकाँ ५३. तहिना तेहिना ५४. एकर अकर ५५. बहिनउ बहनोइ ५६. बहिन बहिनि ५७. बहिन-बहिनोइ बहिन-बहनउ ५८. नहि/ नै ५९. करबा / करबाय/ करबाए ६०. तँ/ त ऽ तय/तए ६१. भैयारी मे छोट-भाए/भै/, जेठ-भाय/भाइ, ६२. गि‍नतीमे दू भाइ/भाए/भाँइ ६३. ई पोथी दू भाइक/ भाँइ/ भाए/ लेल। यावत जावत ६४. माय मै / माए मुदा माइक ममता ६५. देन्हि/ दइन दनि‍/ दएन्हि/ दयन्हि दन्हि/ दैन्हि ६६. द’/ दऽ/ दए ६७. ओ (संयोजक) ओऽ (सर्वनाम) ६८. तका कए तकाय तकाए ६९. पैरे (on foot) पएरे  कएक/ कैक ७०. ताहुमे/ ताहूमे ७१. पुत्रीक ७२. बजा कय/ कए / कऽ ७३. बननाय/बननाइ ७४. कोला ७५. दिनुका दिनका ७६. ततहिसँ ७७. गरबओलन्हि/ गरबौलनि‍/ गरबेलन्हि/ गरबेलनि‍ ७८. बालु बालू ७९. चेन्ह चिन्ह(अशुद्ध) ८०. जे जे’ ८१ . से/ के से’/के’ ८२. एखुनका अखनुका ८३. भुमिहार भूमिहार ८४. सुग्गर / सुगरक/ सूगर ८५. झठहाक झटहाक ८६. छूबि ८७. करइयो/ओ करैयो ने देलक /करियौ-करइयौ ८८. पुबारि पुबाइ ८९. झगड़ा-झाँटी झगड़ा-झाँटि ९०. पएरे-पएरे पैरे-पैरे ९१. खेलएबाक ९२. खेलेबाक ९३. लगा ९४. होए- हो – होअए ९५. बुझल बूझल ९६. बूझल (संबोधन अर्थमे) ९७. यैह यएह / इएह/ सैह/ सएह ९८. तातिल ९९. अयनाय- अयनाइ/ अएनाइ/ एनाइ १००. निन्न- निन्द १०१. बिनु बिन १०२. जाए जाइ १०३. जाइ (in different sense)-last word of sentence १०४. छत पर आबि जाइ १०५. ने १०६. खेलाए (play) –खेलाइ १०७. शिकाइत- शिकायत १०८. ढप- ढ़प १०९ . पढ़- पढ ११०. कनिए/ कनिये कनिञे १११. राकस- राकश ११२. होए/ होय होइ ११३. अउरदा- औरदा ११४. बुझेलन्हि (different meaning- got understand) ११५. बुझएलन्हि/बुझेलनि‍/ बुझयलन्हि (understood himself) ११६. चलि- चल/ चलि‍ गेल ११७. खधाइ- खधाय ११८. मोन पाड़लखिन्ह/ मोन पाड़लखि‍न/ मोन पारलखिन्ह ११९. कैक- कएक- कइएक १२०. लग ल’ग १२१. जरेनाइ १२२. जरौनाइ जरओनाइ- जरएनाइ/ जरेनाइ १२३. होइत १२४. गरबेलन्हि/ गरबेलनि‍ गरबौलन्हि/ गरबौलनि‍ १२५. चिखैत- (to test)चिखइत १२६. करइयो (willing to do) करैयो १२७. जेकरा- जकरा १२८. तकरा- तेकरा १२९. बिदेसर स्थानेमे/ बिदेसरे स्थानमे १३०. करबयलहुँ/ करबएलहुँ/ करबेलहुँ करबेलौं १३१. हारिक (उच्चारण हाइरक) १३२. ओजन वजन आफसोच/ अफसोस कागत/ कागच/ कागज १३३. आधे भाग/ आध-भागे १३४. पिचा / पिचाय/पिचाए १३५. नञ/ ने १३६. बच्चा नञ (ने) पिचा जाय १३७. तखन ने (नञ) कहैत अछि। कहै/ सुनै/ देखै छल मुदा कहैत-कहैत/ सुनैत-सुनैत/ देखैत-देखैत १३८. कतेक गोटे/ कताक गोटे १३९. कमाइ-धमाइ/ कमाई- धमाई १४० . लग ल’ग १४१. खेलाइ (for playing) १४२. छथिन्ह/ छथिन १४३. होइत होइ १४४. क्यो कियो / केओ १४५. केश (hair) १४६. केस (court-case) १४७ . बननाइ/ बननाय/ बननाए १४८. जरेनाइ १४९. कुरसी कुर्सी १५०. चरचा चर्चा १५१. कर्म करम १५२. डुबाबए/ डुबाबै/ डुमाबै डुमाबय/ डुमाबए १५३. एखुनका/ अखुनका १५४. लए/ लिअए (वाक्यक अंतिम शब्द)- लऽ १५५. कएलक/ केलक १५६. गरमी गर्मी १५७ . वरदी वर्दी १५८. सुना गेलाह सुना’/सुनाऽ १५९. एनाइ-गेनाइ १६०. तेना ने घेरलन्हि/ तेना ने घेरलनि‍ १६१. नञि / नै १६२. डरो ड’रो १६३. कतहु/ कतौ कहीं १६४. उमरिगर-उमेरगर उमरगर १६५. भरिगर १६६. धोल/धोअल धोएल १६७. गप/गप्प १६८. के के’ १६९. दरबज्जा/ दरबजा १७०. ठाम १७१. धरि तक १७२. घूरि लौटि १७३. थोरबेक १७४. बड्ड १७५. तोँ/ तूँ १७६. तोँहि( पद्यमे ग्राह्य) १७७. तोँही / तोँहि १७८. करबाइए करबाइये १७९. एकेटा १८०. करितथि /करतथि १८१. पहुँचि/ पहुँच १८२. राखलन्हि रखलन्हि/ रखलनि‍ १८३. लगलन्हि/ लगलनि‍ लागलन्हि १८४. सुनि (उच्चारण सुइन) १८५. अछि (उच्चारण अइछ) १८६. एलथि गेलथि १८७. बितओने/ बि‍तौने/ बितेने १८८. करबओलन्हि/ करबौलनि‍/ करेलखिन्ह/ करेलखि‍न १८९. करएलन्हि/ करेलनि‍ १९०. आकि/ कि १९१. पहुँचि/ पहुँच १९२. बत्ती जराय/ जराए जरा (आगि लगा) १९३. से से’ १९४. हाँ मे हाँ (हाँमे हाँ विभक्त्तिमे हटा कए) १९५. फेल फैल १९६. फइल(spacious) फैल १९७. होयतन्हि/ होएतन्हि/ होएतनि‍/हेतनि‍/ हेतन्हि १९८. हाथ मटिआएब/ हाथ मटियाबय/हाथ मटियाएब १९९. फेका फेंका २००. देखाए देखा २०१. देखाबए २०२. सत्तरि सत्तर २०३. साहेब साहब २०४.गेलैन्ह/ गेलन्हि/ गेलनि‍ २०५. हेबाक/ होएबाक २०६.केलो/ कएलहुँ/केलौं/ केलुँ २०७. किछु न किछु/ किछु ने किछु २०८.घुमेलहुँ/ घुमओलहुँ/ घुमेलौं २०९. एलाक/ अएलाक २१०. अः/ अह २११.लय/ लए (अर्थ-परिवर्त्तन) २१२.कनीक/ कनेक २१३.सबहक/ सभक २१४.मिलाऽ/ मिला २१५.कऽ/ क २१६.जाऽ/ जा २१७.आऽ/ आ २१८.भऽ /भ’ (’ फॉन्टक कमीक द्योतक) २१९.निअम/ नियम २२० .हेक्टेअर/ हेक्टेयर २२१.पहिल अक्षर ढ/ बादक/ बीचक ढ़ २२२.तहिं/तहिँ/ तञि/ तैं २२३.कहिं/ कहीं २२४.तँइ/ तैं / तइँ २२५.नँइ/ नइँ/  नञि/ नहि/नै २२६.है/ हए / एलीहेँ/ २२७.छञि/ छै/ छैक /छइ २२८.दृष्टिएँ/ दृष्टियेँ २२९.आ (come)/ आऽ(conjunction) २३०. आ (conjunction)/ आऽ(come) २३१.कुनो/ कोनो, कोना/केना २३२.गेलैन्ह-गेलन्हि-गेलनि‍ २३३.हेबाक- होएबाक २३४.केलौँ- कएलौँ-कएलहुँ/केलौं २३५.किछु न किछ- किछु ने किछु २३६.केहेन- केहन २३७.आऽ (come)-आ (conjunction-and)/आ। आब'-आब' /आबह-आबह २३८. हएत-हैत २३९.घुमेलहुँ-घुमएलहुँ- घुमेलाें २४०.एलाक- अएलाक २४१.होनि- होइन/ होन्हि/ २४२.ओ-राम ओ श्यामक बीच(conjunction), ओऽ कहलक (he said)/ओ २४३.की हए/ कोसी अएली हए/ की है। की हइ २४४.दृष्टिएँ/ दृष्टियेँ २४५ .शामिल/ सामेल २४६.तैँ / तँए/ तञि/ तहिं २४७.जौं / ज्योँ/ जँ/ २४८.सभ/ सब २४९.सभक/ सबहक २५०.कहिं/ कहीं २५१.कुनो/ कोनो/ कोनहुँ/ २५२.फारकती भऽ गेल/ भए गेल/ भय गेल २५३.कोना/ केना/ कन्‍ना/कना २५४.अः/ अह २५५.जनै/ जनञ २५६.गेलनि‍/ गेलाह (अर्थ परिवर्तन) २५७.केलन्हि/ कएलन्हि/ केलनि‍/ २५८.लय/ लए/ लएह (अर्थ परिवर्तन) २५९.कनीक/ कनेक/कनी-मनी २६०.पठेलन्हि‍ पठेलनि‍/ पठेलइन/ पपठओलन्हि/ पठबौलनि‍/ २६१.निअम/ नियम २६२.हेक्टेअर/ हेक्टेयर २६३.पहिल अक्षर रहने ढ/ बीचमे रहने ढ़ २६४.आकारान्तमे बिकारीक प्रयोग उचित नै/ अपोस्ट्रोफीक प्रयोग फान्टक तकनीकी न्यूनताक परिचायक ओकर बदला अवग्रह (बिकारी) क प्रयोग उचित २६५.केर (पद्यमे ग्राह्य) / -क/ कऽ/ के २६६.छैन्हि- छन्हि २६७.लगैए/ लगैये २६८.होएत/ हएत २६९.जाएत/ जएत/ २७०.आएत/ अएत/ आओत २७१ .खाएत/ खएत/ खैत २७२.पिअएबाक/ पिएबाक/पि‍येबाक २७३.शुरु/ शुरुह २७४.शुरुहे/ शुरुए २७५.अएताह/अओताह/ एताह/ औताह २७६.जाहि/ जाइ/ जइ/ जै/ २७७.जाइत/ जैतए/ जइतए २७८.आएल/ अएल २७९.कैक/ कएक २८०.आयल/ अएल/ आएल २८१. जाए/ जअए/ जए (लालति‍ जाए लगलीह।) २८२. नुकएल/ नुकाएल २८३. कठुआएल/ कठुअएल २८४. ताहि/ तै/ तइ २८५. गायब/ गाएब/ गएब २८६. सकै/ सकए/ सकय २८७.सेरा/सरा/ सराए (भात सरा गेल) २८८.कहैत रही/देखैत रही/ कहैत छलौं/ कहै छलौं- अहिना चलैत/ पढ़ैत (पढ़ै-पढ़ैत अर्थ कखनो काल परिवर्तित) - आर बुझै/ बुझैत (बुझै/ बुझै छी, मुदा बुझैत-बुझैत)/ सकैत/ सकै। करैत/ करै। दै/ दैत। छैक/ छै। बचलै/ बचलैक। रखबा/ रखबाक । बिनु/ बिन। रातिक/ रातुक बुझै आ बुझैत केर अपन-अपन जगहपर प्रयोग समीचीन अछि‍। बुझैत-बुझैत आब बुझलि‍ऐ। हमहूँ बुझै छी। २८९. दुआरे/ द्वारे २९०.भेटि/ भेट/ भेँट २९१. खन/ खीन/  खुना (भोर खन/ भोर खीन) २९२.तक/ धरि २९३.गऽ/ गै (meaning different-जनबै गऽ) २९४.सऽ/ सँ (मुदा दऽ, लऽ) २९५.त्त्व,(तीन अक्षरक मेल बदला पुनरुक्तिक एक आ एकटा दोसरक उपयोग) आदिक बदला त्व आदि। महत्त्व/ महत्व/ कर्ता/ कर्त्ता आदिमे त्त संयुक्तक कोनो आवश्यकता मैथिलीमे नै अछि। वक्तव्य २९६.बेसी/ बेशी २९७.बाला/वाला बला/ वला (रहैबला) २९८ .वाली/ (बदलैवाली) २९९.वार्त्ता/ वार्ता ३००. अन्तर्राष्ट्रिय/ अन्तर्राष्ट्रीय ३०१. लेमए/ लेबए ३०२.लमछुरका, नमछुरका ३०२.लागै/ लगै ( भेटैत/ भेटै) ३०३.लागल/ लगल ३०४.हबा/ हवा ३०५.राखलक/ रखलक ३०६.आ (come)/ आ (and) ३०७. पश्चाताप/ पश्चात्ताप ३०८. ऽ केर व्यवहार शब्दक अन्तमे मात्र, यथासंभव बीचमे नै। ३०९.कहैत/ कहै ३१०. रहए (छल)/ रहै (छलै) (meaning different) ३११.तागति/ ताकति ३१२.खराप/ खराब ३१३.बोइन/ बोनि/ बोइनि ३१४.जाठि/ जाइठ ३१५.कागज/ कागच/ कागत ३१६.गिरै (meaning different- swallow)/ गिरए (खसए) ३१७.राष्ट्रिय/ राष्ट्रीय Festivals of Mithila DATE-LIST (year- 2010-11) (१४१८ साल) Marriage Days: Nov.2010- 19 Dec.2010- 3,8 January 2011- 17, 21, 23, 24, 26, 27, 28 31 Feb.2011- 3, 4, 7, 9, 18, 20, 24, 25, 27, 28 March 2011- 2, 7 May 2011- 11, 12, 13, 18, 19, 20, 22, 23, 29, 30 June 2011- 1, 2, 3, 8, 9, 10, 12, 13, 19, 20, 26, 29 Upanayana Days: February 2011- 8 March 2011- 7 May 2011- 12, 13 June 2011- 6, 12 Dviragaman Din: November 2010- 19, 22, 25, 26 December 2010- 6, 8, 9, 10, 12 February 2011- 20, 21 March 2011- 6, 7, 9, 13 April 2011- 17, 18, 22 May 2011- 5, 6, 8, 13 Mundan Din: November 2010- 24, 26 December 2010- 10, 17 February 2011- 4, 16, 21 March 2011- 7, 9 April 2011- 22 May 2011- 6, 9, 19 June 2011- 3, 6, 10, 20 FESTIVALS OF MITHILA Mauna Panchami-31 July Somavati Amavasya Vrat- 1 August Madhushravani-12 August Nag Panchami- 14 August Raksha Bandhan- 24 Aug Krishnastami- 01 September Kushi Amavasya- 08 September Hartalika Teej- 11 September ChauthChandra-11 September Vishwakarma Pooja- 17 September Karma Dharma Ekadashi-19 September Indra Pooja Aarambh- 20 September Anant Caturdashi- 22 Sep Agastyarghadaan- 23 Sep Pitri Paksha begins- 24 Sep Jimootavahan Vrata/ Jitia-30 Sep Matri Navami- 02 October Kalashsthapan- 08 October Belnauti- 13 October Patrika Pravesh- 14 October Mahastami- 15 October Maha Navami - 16-17 October Vijaya Dashami- 18 October Kojagara- 22 Oct Dhanteras- 3 November Diyabati, shyama pooja- 5 November Annakoota/ Govardhana Pooja-07 November Bhratridwitiya/ Chitragupta Pooja-08 November Chhathi- -12 November Akshyay Navami- 15 November Devotthan Ekadashi- 17 November Kartik Poornima/ Sama Bisarjan- 21 Nov Shaa. ravivratarambh- 21 November Navanna parvan- 24 -26 November Vivaha Panchmi- 10 December Naraknivaran chaturdashi- 01 February Makara/ Teela Sankranti-15 Jan Basant Panchami/ Saraswati Pooja- 08 Februaqry Achla Saptmi- 10 February Mahashivaratri-03 March Holikadahan-Fagua-19 March Holi-20 Mar Varuni Yoga- 31 March va.navaratrarambh- 4 April vaa. Chhathi vrata- 9 April Ram Navami- 12 April Mesha Sankranti-Satuani-14 April Jurishital-15 April Somavati Amavasya Vrata- 02 May Ravi Brat Ant- 08 May Akshaya Tritiya-06 May Janaki Navami- 12 May Vat Savitri-barasait- 01 June Ganga Dashhara-11 June Jagannath Rath Yatra- 3 July Hari Sayan Ekadashi- 11 Jul Aashadhi Guru Poornima-15 Jul VIDEHA ARCHIVE १.विदेह ई-पत्रिकाक सभटा पुरान अंक ब्रेल, तिरहुता आ देवनागरी रूपमे Videha e journal's all old issues in Braille Tirhuta and Devanagari versions विदेह ई-पत्रिकाक पहिल ५० अंक

विदेह ई-पत्रिकाक ५०म सँ आगाँक अंक २.मैथिली पोथी डाउनलोड Maithili Books Download ३.मैथिली ऑडियो संकलन Maithili Audio Downloads ४.मैथिली वीडियोक संकलन Maithili Videos ५.मिथिला चित्रकला/ आधुनिक चित्रकला आ चित्र Mithila Painting/ Modern Art and Photos "विदेह"क एहि सभ सहयोगी लिंकपर सेहो एक बेर जाऊ। ६.विदेह मैथिली क्विज  :  http://videhaquiz.blogspot.com/ ७.विदेह मैथिली जालवृत्त एग्रीगेटर : http://videha-aggregator.blogspot.com/ ८.विदेह मैथिली साहित्य अंग्रेजीमे अनूदित http://madhubani-art.blogspot.com/ ९.विदेहक पूर्व-रूप "भालसरिक गाछ"  : http://gajendrathakur.blogspot.com/ १०.विदेह इंडेक्स  : http://videha123.blogspot.com/ ११.विदेह फाइल : http://videha123.wordpress.com/ १२. विदेह: सदेह : पहिल तिरहुता (मिथिला़क्षर) जालवृत्त (ब्लॉग) http://videha-sadeha.blogspot.com/ १३. विदेह:ब्रेल: मैथिली ब्रेलमे: पहिल बेर विदेह द्वारा http://videha-braille.blogspot.com/ १४.VIDEHA IST MAITHILI  FORTNIGHTLY EJOURNAL ARCHIVE http://videha-archive.blogspot.com/ १५. विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका मैथिली पोथीक आर्काइव http://videha-pothi.blogspot.com/ १६. विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका ऑडियो आर्काइव http://videha-audio.blogspot.com/ १७. विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका वीडियो आर्काइव http://videha-video.blogspot.com/ १८. विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका मिथिला चित्रकला, आधुनिक कला आ चित्रकला http://videha-paintings-photos.blogspot.com/ १९. मैथिल आर मिथिला (मैथिलीक सभसँ लोकप्रिय जालवृत्त) http://maithilaurmithila.blogspot.com/ २०.श्रुति प्रकाशन http://www.shruti-publication.com/ २१.http://groups.google.com/group/videha VIDEHA केर सदस्यता लिअ Top of Form Bottom of Form ईमेल : एहि समूहपर जाऊ २२.http://groups.yahoo.com/group/VIDEHA/ Top of Form Subscribe to VIDEHA Powered by us.groups.yahoo.com Bottom of Form २३.गजेन्द्र ठाकुर इ‍डेक्स http://gajendrathakur123.blogspot.com २४.विदेह रेडियो:मैथिली कथा-कविता आदिक पहिल पोडकास्ट साइट http://videha123radio.wordpress.com/ २५. नेना भुटका http://mangan-khabas.blogspot.com/ महत्त्वपूर्ण सूचना:(१) 'विदेह' द्वारा धारावाहिक रूपे ई-प्रकाशित कएल गेल गजेन्द्र ठाकुरक  निबन्ध-प्रबन्ध-समीक्षा, उपन्यास (सहस्रबाढ़नि) , पद्य-संग्रह (सहस्राब्दीक चौपड़पर), कथा-गल्प (गल्प-गुच्छ), नाटक(संकर्षण), महाकाव्य (त्वञ्चाहञ्च आ असञ्जाति मन) आ बाल-किशोर साहित्य विदेहमे संपूर्ण ई-प्रकाशनक बाद प्रिंट फॉर्ममे। कुरुक्षेत्रम्–अन्तर्मनक खण्ड-१ सँ ७ Combined ISBN No.978-81-907729-7-6 विवरण एहि पृष्ठपर नीचाँमे आ प्रकाशकक साइट http://www.shruti-publication.com/ पर । महत्त्वपूर्ण सूचना (२):सूचना: विदेहक मैथिली-अंग्रेजी आ अंग्रेजी मैथिली कोष (इंटरनेटपर पहिल बेर सर्च-डिक्शनरी) एम.एस. एस.क्यू.एल. सर्वर आधारित -Based on ms-sql server Maithili-English and English-Maithili Dictionary. विदेहक भाषापाक- रचनालेखन स्तंभमे। कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक- गजेन्द्र ठाकुर गजेन्द्र ठाकुरक निबन्ध-प्रबन्ध-समीक्षा, उपन्यास (सहस्रबाढ़नि) , पद्य-संग्रह (सहस्राब्दीक चौपड़पर), कथा-गल्प (गल्प गुच्छ), नाटक(संकर्षण), महाकाव्य (त्वञ्चाहञ्च आ असञ्जाति मन) आ बालमंडली-किशोरजगत विदेहमे संपूर्ण ई-प्रकाशनक बाद प्रिंट फॉर्ममे। कुरुक्षेत्रम्–अन्तर्मनक, खण्ड-१ सँ ७ Ist edition 2009 of Gajendra Thakur’s KuruKshetram-Antarmanak (Vol. I to VII)- essay-paper-criticism, novel, poems, story, play, epics and Children-grown-ups literature in single binding: Language:Maithili ६९२ पृष्ठ : मूल्य भा. रु. 100/-(for individual buyers inside india) (add courier charges Rs.50/-per copy for Delhi/NCR and Rs.100/- per copy for outside Delhi)

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Details for purchase available at print-version publishers's site website: http://www.shruti-publication.com/ or you may write to e-mail:shruti.publication@shruti-publication.com विदेह: सदेह : १: २: ३: ४ तिरहुता : देवनागरी "विदेह" क, प्रिंट संस्करण :विदेह-ई-पत्रिका (http://www.videha.co.in/) क चुनल रचना सम्मिलित। विदेह:सदेह:१: २: ३: ४ सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। Details for purchase available at print-version publishers's site http://www.shruti-publication.com  or you may write to shruti.publication@shruti-publication.com २. संदेश- [ विदेह ई-पत्रिका, विदेह:सदेह मिथिलाक्षर आ देवनागरी आ गजेन्द्र ठाकुरक सात खण्डक- निबन्ध-प्रबन्ध-समीक्षा,उपन्यास (सहस्रबाढ़नि) , पद्य-संग्रह (सहस्राब्दीक चौपड़पर), कथा-गल्प (गल्प गुच्छ), नाटक (संकर्षण), महाकाव्य (त्वञ्चाहञ्च आ असञ्जाति मन) आ बाल-मंडली-किशोर जगत- संग्रह कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक मादेँ। ] १.श्री गोविन्द झा- विदेहकेँ तरंगजालपर उतारि विश्वभरिमे मातृभाषा मैथिलीक लहरि जगाओल, खेद जे अपनेक एहि महाभियानमे हम एखन धरि संग नहि दए सकलहुँ। सुनैत छी अपनेकेँ सुझाओ आ रचनात्मक आलोचना प्रिय लगैत अछि तेँ किछु लिखक मोन भेल। हमर सहायता आ सहयोग अपनेकेँ सदा उपलब्ध रहत। २.श्री रमानन्द रेणु- मैथिलीमे ई-पत्रिका पाक्षिक रूपेँ चला कऽ जे अपन मातृभाषाक प्रचार कऽ रहल छी, से धन्यवाद । आगाँ अपनेक समस्त मैथिलीक कार्यक हेतु हम हृदयसँ शुभकामना दऽ रहल छी। ३.श्री विद्यानाथ झा "विदित"- संचार आ प्रौद्योगिकीक एहि प्रतिस्पर्धी ग्लोबल युगमे अपन महिमामय "विदेह"केँ अपना देहमे प्रकट देखि जतबा प्रसन्नता आ संतोष भेल, तकरा कोनो उपलब्ध "मीटर"सँ नहि नापल जा सकैछ? ..एकर ऐतिहासिक मूल्यांकन आ सांस्कृतिक प्रतिफलन एहि शताब्दीक अंत धरि लोकक नजरिमे आश्चर्यजनक रूपसँ प्रकट हैत। ४. प्रो. उदय नारायण सिंह "नचिकेता"- जे काज अहाँ कए रहल छी तकर चरचा एक दिन मैथिली भाषाक इतिहासमे होएत। आनन्द भए रहल अछि, ई जानि कए जे एतेक गोट मैथिल "विदेह" ई जर्नलकेँ पढ़ि रहल छथि।...विदेहक चालीसम अंक पुरबाक लेल अभिनन्दन। ५. डॉ. गंगेश गुंजन- एहि विदेह-कर्ममे लागि रहल अहाँक सम्वेदनशील मन, मैथिलीक प्रति समर्पित मेहनतिक अमृत रंग, इतिहास मे एक टा विशिष्ट फराक अध्याय आरंभ करत, हमरा विश्वास अछि। अशेष शुभकामना आ बधाइक सङ्ग, सस्नेह...अहाँक पोथी कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक प्रथम दृष्टया बहुत भव्य तथा उपयोगी बुझाइछ। मैथिलीमे तँ अपना स्वरूपक प्रायः ई पहिले एहन  भव्य अवतारक पोथी थिक। हर्षपूर्ण हमर हार्दिक बधाई स्वीकार करी। ६. श्री रामाश्रय झा "रामरंग"(आब स्वर्गीय)- "अपना" मिथिलासँ संबंधित...विषय वस्तुसँ अवगत भेलहुँ।...शेष सभ कुशल अछि। ७. श्री ब्रजेन्द्र त्रिपाठी- साहित्य अकादमी- इंटरनेट पर प्रथम मैथिली पाक्षिक पत्रिका "विदेह" केर लेल बधाई आ शुभकामना स्वीकार करू। ८. श्री प्रफुल्लकुमार सिंह "मौन"- प्रथम मैथिली पाक्षिक पत्रिका "विदेह" क प्रकाशनक समाचार जानि कनेक चकित मुदा बेसी आह्लादित भेलहुँ। कालचक्रकेँ पकड़ि जाहि दूरदृष्टिक परिचय देलहुँ, ओहि लेल हमर मंगलकामना। ९.डॉ. शिवप्रसाद यादव- ई जानि अपार हर्ष भए रहल अछि, जे नव सूचना-क्रान्तिक क्षेत्रमे मैथिली पत्रकारिताकेँ प्रवेश दिअएबाक साहसिक कदम उठाओल अछि। पत्रकारितामे एहि प्रकारक नव प्रयोगक हम स्वागत करैत छी, संगहि "विदेह"क सफलताक शुभकामना। १०. श्री आद्याचरण झा- कोनो पत्र-पत्रिकाक प्रकाशन- ताहूमे मैथिली पत्रिकाक प्रकाशनमे के कतेक सहयोग करताह- ई तऽ भविष्य कहत। ई हमर ८८ वर्षमे ७५ वर्षक अनुभव रहल। एतेक पैघ महान यज्ञमे हमर श्रद्धापूर्ण आहुति प्राप्त होयत- यावत ठीक-ठाक छी/ रहब। ११. श्री विजय ठाकुर- मिशिगन विश्वविद्यालय- "विदेह" पत्रिकाक अंक देखलहुँ, सम्पूर्ण टीम बधाईक पात्र अछि। पत्रिकाक मंगल भविष्य हेतु हमर शुभकामना स्वीकार कएल जाओ। १२. श्री सुभाषचन्द्र यादव- ई-पत्रिका "विदेह" क बारेमे जानि प्रसन्नता भेल। ’विदेह’ निरन्तर पल्लवित-पुष्पित हो आ चतुर्दिक अपन सुगंध पसारय से कामना अछि। १३. श्री मैथिलीपुत्र प्रदीप- ई-पत्रिका "विदेह" केर सफलताक भगवतीसँ कामना। हमर पूर्ण सहयोग रहत। १४. डॉ. श्री भीमनाथ झा- "विदेह" इन्टरनेट पर अछि तेँ "विदेह" नाम उचित आर कतेक रूपेँ एकर विवरण भए सकैत अछि। आइ-काल्हि मोनमे उद्वेग रहैत अछि, मुदा शीघ्र पूर्ण सहयोग देब।कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक देखि अति प्रसन्नता भेल। मैथिलीक लेल ई घटना छी। १५. श्री रामभरोस कापड़ि "भ्रमर"- जनकपुरधाम- "विदेह" ऑनलाइन देखि रहल छी। मैथिलीकेँ अन्तर्राष्ट्रीय जगतमे पहुँचेलहुँ तकरा लेल हार्दिक बधाई। मिथिला रत्न सभक संकलन अपूर्व। नेपालोक सहयोग भेटत, से विश्वास करी। १६. श्री राजनन्दन लालदास- "विदेह" ई-पत्रिकाक माध्यमसँ बड़ नीक काज कए रहल छी, नातिक अहिठाम देखलहुँ। एकर वार्षिक अ‍ंक जखन प्रिं‍ट निकालब तँ हमरा पठायब। कलकत्तामे बहुत गोटेकेँ हम साइटक पता लिखाए देने छियन्हि। मोन तँ होइत अछि जे दिल्ली आबि कए आशीर्वाद दैतहुँ, मुदा उमर आब बेशी भए गेल। शुभकामना देश-विदेशक मैथिलकेँ जोड़बाक लेल।.. उत्कृष्ट प्रकाशन कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक लेल बधाइ। अद्भुत काज कएल अछि, नीक प्रस्तुति अछि सात खण्डमे।  मुदा अहाँक सेवा आ से निःस्वार्थ तखन बूझल जाइत जँ अहाँ द्वारा प्रकाशित पोथी सभपर दाम लिखल नहि रहितैक। ओहिना सभकेँ विलहि देल जइतैक। (स्पष्टीकरण-  श्रीमान्, अहाँक सूचनार्थ विदेह द्वारा ई-प्रकाशित कएल सभटा सामग्री आर्काइवमे https://sites.google.com/a/videha.com/videha-pothi/ पर बिना मूल्यक डाउनलोड लेल उपलब्ध छै आ भविष्यमे सेहो रहतैक। एहि आर्काइवकेँ जे कियो प्रकाशक अनुमति लऽ कऽ प्रिंट रूपमे प्रकाशित कएने छथि आ तकर ओ दाम रखने छथि ताहिपर हमर कोनो नियंत्रण नहि अछि।- गजेन्द्र ठाकुर)...   अहाँक प्रति अशेष शुभकामनाक संग। १७. डॉ. प्रेमशंकर सिंह- अहाँ मैथिलीमे इंटरनेटपर पहिल पत्रिका "विदेह" प्रकाशित कए अपन अद्भुत मातृभाषानुरागक परिचय देल अछि, अहाँक निःस्वार्थ मातृभाषानुरागसँ प्रेरित छी, एकर निमित्त जे हमर सेवाक प्रयोजन हो, तँ सूचित करी। इंटरनेटपर आद्योपांत पत्रिका देखल, मन प्रफुल्लित भऽ गेल। १८.श्रीमती शेफालिका वर्मा- विदेह ई-पत्रिका देखि मोन उल्लाससँ भरि गेल। विज्ञान कतेक प्रगति कऽ रहल अछि...अहाँ सभ अनन्त आकाशकेँ भेदि दियौ, समस्त विस्तारक रहस्यकेँ तार-तार कऽ दियौक...। अपनेक अद्भुत पुस्तक कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक विषयवस्तुक दृष्टिसँ गागरमे सागर अछि। बधाई। १९.श्री हेतुकर झा, पटना-जाहि समर्पण भावसँ अपने मिथिला-मैथिलीक सेवामे तत्पर छी से स्तुत्य अछि। देशक राजधानीसँ भय रहल मैथिलीक शंखनाद मिथिलाक गाम-गाममे मैथिली चेतनाक विकास अवश्य करत। २०. श्री योगानन्द झा, कबिलपुर, लहेरियासराय- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पोथीकेँ निकटसँ देखबाक अवसर भेटल अछि आ मैथिली जगतक एकटा उद्भट ओ समसामयिक दृष्टिसम्पन्न हस्ताक्षरक कलमबन्द परिचयसँ आह्लादित छी। "विदेह"क देवनागरी सँस्करण पटनामे रु. 80/- मे उपलब्ध भऽ सकल जे विभिन्न लेखक लोकनिक छायाचित्र, परिचय पत्रक ओ रचनावलीक सम्यक प्रकाशनसँ ऐतिहासिक कहल जा सकैछ। २१. श्री किशोरीकान्त मिश्र- कोलकाता- जय मैथिली, विदेहमे बहुत रास कविता, कथा, रिपोर्ट आदिक सचित्र संग्रह देखि आ आर अधिक प्रसन्नता मिथिलाक्षर देखि- बधाई स्वीकार कएल जाओ। २२.श्री जीवकान्त- विदेहक मुद्रित अंक पढ़ल- अद्भुत मेहनति। चाबस-चाबस। किछु समालोचना मरखाह..मुदा सत्य। २३. श्री भालचन्द्र झा- अपनेक कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक देखि बुझाएल जेना हम अपने छपलहुँ अछि। एकर विशालकाय आकृति अपनेक सर्वसमावेशताक परिचायक अछि। अपनेक रचना सामर्थ्यमे उत्तरोत्तर वृद्धि हो, एहि शुभकामनाक संग हार्दिक बधाई। २४.श्रीमती डॉ नीता झा- अहाँक कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़लहुँ। ज्योतिरीश्वर शब्दावली, कृषि मत्स्य शब्दावली आ सीत बसन्त आ सभ कथा, कविता, उपन्यास, बाल-किशोर साहित्य सभ उत्तम छल। मैथिलीक उत्तरोत्तर विकासक लक्ष्य दृष्टिगोचर होइत अछि। २५.श्री मायानन्द मिश्र- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक मे हमर उपन्यास स्त्रीधनक जे विरोध कएल गेल अछि तकर हम विरोध करैत छी।... कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पोथीक लेल शुभकामना।(श्रीमान् समालोचनाकेँ विरोधक रूपमे नहि लेल जाए।-गजेन्द्र ठाकुर) २६.श्री महेन्द्र हजारी- सम्पादक श्रीमिथिला- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़ि मोन हर्षित भऽ गेल..एखन पूरा पढ़यमे बहुत समय लागत, मुदा जतेक पढ़लहुँ से आह्लादित कएलक। २७.श्री केदारनाथ चौधरी- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक अद्भुत लागल, मैथिली साहित्य लेल ई पोथी एकटा प्रतिमान बनत। २८.श्री सत्यानन्द पाठक- विदेहक हम नियमित पाठक छी। ओकर स्वरूपक प्रशंसक छलहुँ। एम्हर अहाँक लिखल - कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक देखलहुँ। मोन आह्लादित भऽ उठल। कोनो रचना तरा-उपरी। २९.श्रीमती रमा झा-सम्पादक मिथिला दर्पण। कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक प्रिंट फॉर्म पढ़ि आ एकर गुणवत्ता देखि मोन प्रसन्न भऽ गेल, अद्भुत शब्द एकरा लेल प्रयुक्त कऽ रहल छी। विदेहक उत्तरोत्तर प्रगतिक शुभकामना। ३०.श्री नरेन्द्र झा, पटना- विदेह नियमित देखैत रहैत छी। मैथिली लेल अद्भुत काज कऽ रहल छी। ३१.श्री रामलोचन ठाकुर- कोलकाता- मिथिलाक्षर विदेह देखि मोन प्रसन्नतासँ भरि उठल, अंकक विशाल परिदृश्य आस्वस्तकारी अछि। ३२.श्री तारानन्द वियोगी- विदेह आ कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक देखि चकबिदोर लागि गेल। आश्चर्य। शुभकामना आ बधाई। ३३.श्रीमती प्रेमलता मिश्र “प्रेम”- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़लहुँ। सभ रचना उच्चकोटिक लागल। बधाई। ३४.श्री कीर्तिनारायण मिश्र- बेगूसराय- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक बड्ड नीक लागल, आगांक सभ काज लेल बधाई। ३५.श्री महाप्रकाश-सहरसा- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक नीक लागल, विशालकाय संगहि उत्तमकोटिक। ३६.श्री अग्निपुष्प- मिथिलाक्षर आ देवाक्षर विदेह पढ़ल..ई प्रथम तँ अछि एकरा प्रशंसामे मुदा हम एकरा दुस्साहसिक कहब। मिथिला चित्रकलाक स्तम्भकेँ मुदा अगिला अंकमे आर विस्तृत बनाऊ। ३७.श्री मंजर सुलेमान-दरभंगा- विदेहक जतेक प्रशंसा कएल जाए कम होएत। सभ चीज उत्तम। ३८.श्रीमती प्रोफेसर वीणा ठाकुर- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक उत्तम, पठनीय, विचारनीय। जे क्यो देखैत छथि पोथी प्राप्त करबाक उपाय पुछैत छथि। शुभकामना। ३९.श्री छत्रानन्द सिंह झा- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़लहुँ, बड्ड नीक सभ तरहेँ। ४०.श्री ताराकान्त झा- सम्पादक मैथिली दैनिक मिथिला समाद- विदेह तँ कन्टेन्ट प्रोवाइडरक काज कऽ रहल अछि। कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक अद्भुत लागल। ४१.डॉ रवीन्द्र कुमार चौधरी- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक बहुत नीक, बहुत मेहनतिक परिणाम। बधाई। ४२.श्री अमरनाथ- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक आ विदेह दुनू स्मरणीय घटना अछि, मैथिली साहित्य मध्य। ४३.श्री पंचानन मिश्र- विदेहक वैविध्य आ निरन्तरता प्रभावित करैत अछि, शुभकामना। ४४.श्री केदार कानन- कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक लेल अनेक धन्यवाद, शुभकामना आ बधाइ स्वीकार करी। आ नचिकेताक भूमिका पढ़लहुँ। शुरूमे तँ लागल जेना कोनो उपन्यास अहाँ द्वारा सृजित भेल अछि मुदा पोथी उनटौला पर ज्ञात भेल जे एहिमे तँ सभ विधा समाहित अछि। ४५.श्री धनाकर ठाकुर- अहाँ नीक काज कऽ रहल छी। फोटो गैलरीमे चित्र एहि शताब्दीक जन्मतिथिक अनुसार रहैत तऽ नीक। ४६.श्री आशीष झा- अहाँक पुस्तकक संबंधमे एतबा लिखबा सँ अपना कए नहि रोकि सकलहुँ जे ई किताब मात्र किताब नहि थीक, ई एकटा उम्मीद छी जे मैथिली अहाँ सन पुत्रक सेवा सँ निरंतर समृद्ध होइत चिरजीवन कए प्राप्त करत। ४७.श्री शम्भु कुमार सिंह- विदेहक तत्परता आ क्रियाशीलता देखि आह्लादित भऽ रहल छी। निश्चितरूपेण कहल जा सकैछ जे समकालीन मैथिली पत्रिकाक इतिहासमे विदेहक नाम स्वर्णाक्षरमे लिखल जाएत। ओहि कुरुक्षेत्रक घटना सभ तँ अठारहे दिनमे खतम भऽ गेल रहए मुदा अहाँक कुरुक्षेत्रम् तँ अशेष अछि। ४८.डॉ. अजीत मिश्र- अपनेक प्रयासक कतबो प्रश‍ंसा कएल जाए कमे होएतैक। मैथिली साहित्यमे अहाँ द्वारा कएल गेल काज युग-युगान्तर धरि पूजनीय रहत। ४९.श्री बीरेन्द्र मल्लिक- अहाँक कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक आ विदेह:सदेह पढ़ि अति प्रसन्नता भेल। अहाँक स्वास्थ्य ठीक रहए आ उत्साह बनल रहए से कामना। ५०.श्री कुमार राधारमण- अहाँक दिशा-निर्देशमे विदेह पहिल मैथिली ई-जर्नल देखि अति प्रसन्नता भेल। हमर शुभकामना। ५१.श्री फूलचन्द्र झा प्रवीण-विदेह:सदेह पढ़ने रही मुदा कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक देखि बढ़ाई देबा लेल बाध्य भऽ गेलहुँ। आब विश्वास भऽ गेल जे मैथिली नहि मरत। अशेष शुभकामना। ५२.श्री विभूति आनन्द- विदेह:सदेह देखि, ओकर विस्तार देखि अति प्रसन्नता भेल। ५३.श्री मानेश्वर मनुज-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक एकर भव्यता देखि अति प्रसन्नता भेल, एतेक विशाल ग्रन्थ मैथिलीमे आइ धरि नहि देखने रही। एहिना भविष्यमे काज करैत रही, शुभकामना। ५४.श्री विद्यानन्द झा- आइ.आइ.एम.कोलकाता- कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक विस्तार, छपाईक संग गुणवत्ता देखि अति प्रसन्नता भेल। अहाँक अनेक धन्यवाद; कतेक बरखसँ हम नेयारैत छलहुँ जे सभ पैघ शहरमे मैथिली लाइब्रेरीक स्थापना होअए, अहाँ ओकरा वेबपर कऽ रहल छी, अनेक धन्यवाद। ५५.श्री अरविन्द ठाकुर-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक मैथिली साहित्यमे कएल गेल एहि तरहक पहिल प्रयोग अछि, शुभकामना। ५६.श्री कुमार पवन-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक पढ़ि रहल छी। किछु लघुकथा पढ़ल अछि, बहुत मार्मिक छल। ५७. श्री प्रदीप बिहारी-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक देखल, बधाई। ५८.डॉ मणिकान्त ठाकुर-कैलिफोर्निया- अपन विलक्षण नियमित सेवासँ हमरा लोकनिक हृदयमे विदेह सदेह भऽ गेल अछि। ५९.श्री धीरेन्द्र प्रेमर्षि- अहाँक समस्त प्रयास सराहनीय। दुख होइत अछि जखन अहाँक प्रयासमे अपेक्षित सहयोग नहि कऽ पबैत छी। ६०.श्री देवशंकर नवीन- विदेहक निरन्तरता आ विशाल स्वरूप- विशाल पाठक वर्ग, एकरा ऐतिहासिक बनबैत अछि। ६१.श्री मोहन भारद्वाज- अहाँक समस्त कार्य देखल, बहुत नीक। एखन किछु परेशानीमे छी, मुदा शीघ्र सहयोग देब। ६२.श्री फजलुर रहमान हाशमी-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक मे एतेक मेहनतक लेल अहाँ साधुवादक अधिकारी छी। ६३.श्री लक्ष्मण झा "सागर"- मैथिलीमे चमत्कारिक रूपेँ अहाँक प्रवेश आह्लादकारी अछि।..अहाँकेँ एखन आर..दूर..बहुत दूरधरि जेबाक अछि। स्वस्थ आ प्रसन्न रही। ६४.श्री जगदीश प्रसाद मंडल-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक पढ़लहुँ । कथा सभ आ उपन्यास सहस्रबाढ़नि पूर्णरूपेँ पढ़ि गेल छी। गाम-घरक भौगोलिक विवरणक जे सूक्ष्म वर्णन सहस्रबाढ़निमे अछि, से चकित कएलक, एहि संग्रहक कथा-उपन्यास मैथिली लेखनमे विविधता अनलक अछि। समालोचना शास्त्रमे अहाँक दृष्टि वैयक्तिक नहि वरन् सामाजिक आ कल्याणकारी अछि, से प्रशंसनीय। ६५.श्री अशोक झा-अध्यक्ष मिथिला विकास परिषद- कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक लेल बधाई आ आगाँ लेल शुभकामना। ६६.श्री ठाकुर प्रसाद मुर्मु- अद्भुत प्रयास। धन्यवादक संग प्रार्थना जे अपन माटि-पानिकेँ ध्यानमे राखि अंकक समायोजन कएल जाए। नव अंक धरि प्रयास सराहनीय। विदेहकेँ बहुत-बहुत धन्यवाद जे एहेन सुन्दर-सुन्दर सचार (आलेख) लगा रहल छथि। सभटा ग्रहणीय- पठनीय। ६७.बुद्धिनाथ मिश्र- प्रिय गजेन्द्र जी,अहाँक सम्पादन मे प्रकाशित ‘विदेह’आ ‘कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक’ विलक्षण पत्रिका आ विलक्षण पोथी! की नहि अछि अहाँक सम्पादनमे? एहि प्रयत्न सँ मैथिली क विकास होयत,निस्संदेह। ६८.श्री बृखेश चन्द्र लाल- गजेन्द्रजी, अपनेक पुस्तक कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक पढ़ि मोन गदगद भय गेल , हृदयसँ अनुगृहित छी । हार्दिक शुभकामना । ६९.श्री परमेश्वर कापड़ि - श्री गजेन्द्र जी । कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक पढ़ि गदगद आ नेहाल भेलहुँ। ७०.श्री रवीन्द्रनाथ ठाकुर- विदेह पढ़ैत रहैत छी। धीरेन्द्र प्रेमर्षिक मैथिली गजलपर आलेख पढ़लहुँ। मैथिली गजल कत्तऽ सँ कत्तऽ चलि गेलैक आ ओ अपन आलेखमे मात्र अपन जानल-पहिचानल लोकक चर्च कएने छथि। जेना मैथिलीमे मठक परम्परा रहल अछि। (स्पष्टीकरण- श्रीमान्, प्रेमर्षि जी ओहि आलेखमे ई स्पष्ट लिखने छथि जे किनको नाम जे छुटि गेल छन्हि तँ से मात्र आलेखक लेखकक जानकारी नहि रहबाक द्वारे, एहिमे आन कोनो कारण नहि देखल जाय। अहाँसँ एहि विषयपर विस्तृत आलेख सादर आमंत्रित अछि।-सम्पादक) ७१.श्री मंत्रेश्वर झा- विदेह पढ़ल आ संगहि अहाँक मैगनम ओपस कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक सेहो, अति उत्तम। मैथिलीक लेल कएल जा रहल अहाँक समस्त कार्य अतुलनीय अछि। ७२. श्री हरेकृष्ण झा- कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक मैथिलीमे अपन तरहक एकमात्र ग्रन्थ अछि, एहिमे लेखकक समग्र दृष्टि आ रचना कौशल देखबामे आएल जे लेखकक फील्डवर्कसँ जुड़ल रहबाक कारणसँ अछि। ७३.श्री सुकान्त सोम- कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक मे  समाजक इतिहास आ वर्तमानसँ अहाँक जुड़ाव बड्ड नीक लागल, अहाँ एहि क्षेत्रमे आर आगाँ काज करब से आशा अछि। ७४.प्रोफेसर मदन मिश्र- कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक सन किताब मैथिलीमे पहिले अछि आ एतेक विशाल संग्रहपर शोध कएल जा सकैत अछि। भविष्यक लेल शुभकामना। ७५.प्रोफेसर कमला चौधरी- मैथिलीमे कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक सन पोथी आबए जे गुण आ रूप दुनूमे निस्सन होअए, से बहुत दिनसँ आकांक्षा छल, ओ आब जा कऽ पूर्ण भेल। पोथी एक हाथसँ दोसर हाथ घुमि रहल अछि, एहिना आगाँ सेहो अहाँसँ आशा अछि। ७६.श्री उदय चन्द्र झा "विनोद": गजेन्द्रजी, अहाँ जतेक काज कएलहुँ अछि से मैथिलीमे आइ धरि कियो नहि कएने छल। शुभकामना। अहाँकेँ एखन बहुत काज आर करबाक अछि। ७७.श्री कृष्ण कुमार कश्यप: गजेन्द्र ठाकुरजी, अहाँसँ भेँट एकटा स्मरणीय क्षण बनि गेल। अहाँ जतेक काज एहि बएसमे कऽ गेल छी ताहिसँ हजार गुणा आर बेशीक आशा अछि। ७८.श्री मणिकान्त दास: अहाँक मैथिलीक कार्यक प्रशंसा लेल शब्द नहि भेटैत अछि। अहाँक कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक सम्पूर्ण रूपेँ पढ़ि गेलहुँ। त्वञ्चाहञ्च बड्ड नीक लागल। ७९. श्री हीरेन्द्र कुमार झा- विदेह ई-पत्रिकाक सभ अंक ई-पत्रसँ भेटैत रहैत अछि। मैथिलीक ई-पत्रिका छैक एहि बातक गर्व होइत अछि। अहाँ आ अहाँक सभ सहयोगीकेँ हार्दिक शुभकामना। विदेह मैथिली साहित्य आन्दोलन (c)२००४-११. सर्वाधिकार लेखकाधीन आ जतय लेखकक नाम नहि अछि ततय संपादकाधीन। विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। सह-सम्पादक: उमेश मंडल। सहायक सम्पादक: शिव कुमार झा आ मुन्नाजी (मनोज कुमार कर्ण)। भाषा-सम्पादन: नागेन्द्र कुमार झा आ पञ्जीकार विद्यानन्द झा। कला-सम्पादन: ज्योति सुनीत चौधरी आ रश्मि रेखा सिन्हा। सम्पादक-शोध-अन्वेषण: डॉ. जया वर्मा आ डॉ. राजीव कुमार वर्मा। रचनाकार अपन मौलिक आ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि) ggajendra@videha.com केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx, .rtf वा .txt फॉर्मेटमे पठा सकैत छथि। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेताह, से आशा करैत छी। रचनाक अंतमे टाइप रहय, जे ई रचना मौलिक अछि, आ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। मेल प्राप्त होयबाक बाद यथासंभव शीघ्र ( सात दिनक भीतर) एकर प्रकाशनक अंकक सूचना देल जायत। ’विदेह' प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका अछि आ एहिमे मैथिली, संस्कृत आ अंग्रेजीमे मिथिला आ मैथिलीसँ संबंधित रचना प्रकाशित कएल जाइत अछि। एहि ई पत्रिकाकेँ श्रीमति लक्ष्मी ठाकुर द्वारा मासक ०१ आ १५ तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि। (c) 2004-11 सर्वाधिकार सुरक्षित। विदेहमे प्रकाशित सभटा रचना आ आर्काइवक सर्वाधिकार रचनाकार आ संग्रहकर्त्ताक लगमे छन्हि। रचनाक अनुवाद आ पुनः प्रकाशन किंवा आर्काइवक उपयोगक अधिकार किनबाक हेतु ggajendra@videha.co.in पर संपर्क करू। एहि साइटकेँ प्रीति झा ठाकुर, मधूलिका चौधरी आ रश्मि प्रिया द्वारा डिजाइन कएल गेल। सिद्धिरस्तु वि दे ह विदेह Videha বিদেহ  विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका Videha Ist Maithili Fortnightly e Magazine  विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका 'विदेह' ८२ म अंक १५ मई २०११ (वर्ष ४ मास ४१ अंक ८२)http://www.videha.co.in/ मानुषीमिह संस्कृताम् ISSN 2229-547X VIDEHA वि दे ह विदेह Videha বিদেহ  विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका Videha Ist Maithili Fortnightly e Magazine  विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका 'विदेह' ८२ म अंक १५ मई २०११ (वर्ष ४ मास ४१ अंक ८२)http://www.videha.co.in/ मानुषीमिह संस्कृताम् ISSN 2229-547X VIDEHA

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