438 437 ISSN 2229-547X VIDEHA 'विदेह' ८३ म अंक ०१ जून २०११ (वर्ष ४ मास ४२ अंक ८३) वि दे ह विदेह Videha বিদেহ http://www.videha.co.in विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका Videha Ist Maithili Fortnightly e Magazine नव अंक देखबाक लेल पृष्ठ सभकेँ रिफ्रेश कए देखू। Always refresh the pages for viewing new issue of VIDEHA. Read in your own script Roman(Eng)Gujarati Bangla Oriya Gurmukhi Telugu Tamil Kannada Malayalam Hindi ऐ अंकमे अछि:- १. संपादकीय संदेश २. गद्य २.१.जगदीश प्रसाद मण्डल २.२.बेचन ठाकुर- अधिकार २.३. शिवकुमार झा टिल्लू -िनश्तुकी २.४.जगदीश प्रसाद मण्डल- नाटक- कम्प्रोमाइज(पछिला खेपसँ आगाँ) २.५.बिपिन झा- स्तरविहीन स्तर २.६. आशीष-अनचिन्हार- बेचन ठाकुरजीक नाटक- बेटीक अपमान २.७.१.हम पुछैत छी: मुन्नाजीक सोमदेवसँ भेल गपशप २. हम पुछैत छी: मुन्नाजीक अशोकसँ भेल गपशप ३. पद्य ३.१.१.जगदीश चन्द्र अनिल- गजल २. रवि भूषण पाठक- मरणोपरांत-३ ३.२.१.गंगेश गुंजन राधा- ३० म खेप २.जवाहर लाल कश्यप ३.३.ज्योति सुनीत चौधरी- ब्रह्महास्त्र ३.४.उमेश मण्डल ३.५.१. सुनील कुमार झा- सरल वार्णिक छन्दमे दूटा गजल २. प्रभात राय भट्ट ३.६.१. पंकज कुमार झा २.नवीन कुमार आशा ३.७. १.रामविलास साहु २.रामदेव प्रसाद मण्डल 'झारूदार' ३.किशन कारीगर-ग़रीब४.जगदीश प्रसाद मण्डल ३.८. डॉ. शेफालिका वर्मा ४. मिथिला कला-संगीत- १.श्वेता झा चौधरी २.ज्योति सुनीत चौधरी ३.श्वेता झा (सिंगापुर) ४.गुंजन कर्ण ६. बालानां कृते-१.जगदीश चन्द्र अनिल २.प्रेमचन्द्र मिश्र- अपन बेटा अभिनव मिश्रकेँ बल दै लेल कविता ७. भाषापाक रचना-लेखन -[मानक मैथिली], [विदेहक मैथिली-अंग्रेजी आ अंग्रेजी मैथिली कोष (इंटरनेटपर पहिल बेर सर्च-डिक्शनरी) एम.एस. एस.क्यू.एल. सर्वर आधारित -Based on ms-sql server Maithili-English and English-Maithili Dictionary.] 8.VIDEHA FOR NON RESIDENTS 8.2.1.Episodes Of The Life - ("Kist-Kist Jeevan" by Smt. shefalika Varma translated into English by Smt. Jyoti Jha Chaudhary ) 2.Original Poem in Maithili by Kalikant Jha "Buch" Translated into English by Jyoti Jha Chaudhary विदेह ई-पत्रिकाक सभटा पुरान अंक ( ब्रेल, तिरहुता आ देवनागरी मे ) पी.डी.एफ. डाउनलोडक लेल नीचाँक लिंकपर उपलब्ध अछि। All the old issues of Videha e journal ( in Braille, Tirhuta and Devanagari versions ) are available for pdf download at the following link. विदेह ई-पत्रिकाक सभटा पुरान अंक ब्रेल, तिरहुता आ देवनागरी रूपमे Videha e journal's all old issues in Braille Tirhuta and Devanagari versions विदेह ई-पत्रिकाक पहिल ५० अंक
विदेह ई-पत्रिकाक ५०म सँ आगाँक अंक विदेह आर.एस.एस.फीड। "विदेह" ई-पत्रिका ई-पत्रसँ प्राप्त करू। अपन मित्रकेँ विदेहक विषयमे सूचित करू। ↑ विदेह आर.एस.एस.फीड एनीमेटरकेँ अपन साइट/ ब्लॉगपर लगाऊ। ब्लॉग "लेआउट" पर "एड गाडजेट" मे "फीड" सेलेक्ट कए "फीड यू.आर.एल." मे http://www.videha.co.in/index.xml टाइप केलासँ सेहो विदेह फीड प्राप्त कए सकैत छी। गूगल रीडरमे पढ़बा लेल http://reader.google.com/ पर जा कऽ Add a Subscription बटन क्लिक करू आ खाली स्थानमे http://www.videha.co.in/index.xml पेस्ट करू आ Add बटन दबाउ। Join official Videha facebook group. Join Videha googlegroups मैथिली देवनागरी वा मिथिलाक्षरमे नहि देखि/ लिखि पाबि रहल छी, (cannot see/write Maithili in Devanagari/ Mithilakshara follow links below or contact at ggajendra@videha.com) तँ एहि हेतु नीचाँक लिंक सभ पर जाऊ। संगहि विदेहक स्तंभ मैथिली भाषापाक/ रचना लेखनक नव-पुरान अंक पढ़ू। http://devanaagarii.net/ http://kaulonline.com/uninagari/ (एतए बॉक्समे ऑनलाइन देवनागरी टाइप करू, बॉक्ससँ कॉपी करू आ वर्ड डॉक्युमेन्टमे पेस्ट कए वर्ड फाइलकेँ सेव करू। विशेष जानकारीक लेल ggajendra@videha.com पर सम्पर्क करू।)(Use Firefox 4.0 (from WWW.MOZILLA.COM )/ Opera/ Safari/ Internet Explorer 8.0/ Flock 2.0/ Google Chrome for best view of 'Videha' Maithili e-journal at http://www.videha.co.in/ .) Go to the link below for download of old issues of VIDEHA Maithili e magazine in .pdf format and Maithili Audio/ Video/ Book/ paintings/ photo files. विदेहक पुरान अंक आ ऑडियो/ वीडियो/ पोथी/ चित्रकला/ फोटो सभक फाइल सभ (उच्चारण, बड़ सुख सार आ दूर्वाक्षत मंत्र सहित) डाउनलोड करबाक हेतु नीचाँक लिंक पर जाऊ। VIDEHA ARCHIVE विदेह आर्काइव भारतीय डाक विभाग द्वारा जारी कवि, नाटककार आ धर्मशास्त्री विद्यापतिक स्टाम्प। भारत आ नेपालक माटिमे पसरल मिथिलाक धरती प्राचीन कालहिसँ महान पुरुष ओ महिला लोकनिक कर्मभमि रहल अछि। मिथिलाक महान पुरुष ओ महिला लोकनिक चित्र 'मिथिला रत्न' मे देखू। गौरी-शंकरक पालवंश कालक मूर्त्ति, एहिमे मिथिलाक्षरमे (१२०० वर्ष पूर्वक) अभिलेख अंकित अछि। मिथिलाक भारत आ नेपालक माटिमे पसरल एहि तरहक अन्यान्य प्राचीन आ नव स्थापत्य, चित्र, अभिलेख आ मूर्त्तिकलाक़ हेतु देखू 'मिथिलाक खोज' मिथिला, मैथिल आ मैथिलीसँ सम्बन्धित सूचना, सम्पर्क, अन्वेषण संगहि विदेहक सर्च-इंजन आ न्यूज सर्विस आ मिथिला, मैथिल आ मैथिलीसँ सम्बन्धित वेबसाइट सभक समग्र संकलनक लेल देखू "विदेह सूचना संपर्क अन्वेषण" विदेह जालवृत्तक डिसकसन फोरमपर जाऊ। "मैथिल आर मिथिला" (मैथिलीक सभसँ लोकप्रिय जालवृत्त) पर जाऊ। Thank you, we have already counted your vote. संग समय के (कविता संग्रह)- महाप्रकाश 2.72% (44 votes) भाग रौ बलचंदा (दू नाटक)-विभारानी 2.35% (38 votes) बनैत बिगड़ैत (कथा संग्रह)-सुभाष चन्द्र यादव 15.66% (253 votes) मैथिली लोकनाट्यक विस्तृत अध्ययन एवं विश्लेषण (शास्त्र) -महेन्द्र मलंगिया 2.23% (36 votes) किस्त किस्त जीवन (आत्मकथा )-शेफालिका वर्मा 18.94% (306 votes) नो एंट्री मा प्रविश (नाटक )- उदय नारायण सिंह "नचिकेता" 16.65% (269 votes) गामक जिनगी (कथा संग्रह)-जगदीश प्रसाद मंडल 21.1% (341 votes) कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक (विविधा)-गजेन्द्र ठाकुर 20.17% (326 votes) Other: 0.19% (3 votes) Total Votes: 1,616 Comments (0)Return To PollShare ThisCreate Your Own Poll Thank you, we have already counted your vote. रामलोचन ठाकुर- पद्मा नदीक माझी (बांग्ला- माणिक वन्दोपाध्याय) 60.92% (198 votes) मेनका मल्लिक- देश आ अन्य कविता सभ (रेमिका थापा- नेपाली) 22.77% (74 votes) कृष्ण कुमार कश्यप आ शशिबाला- मैथिली गीतगोविन्द (जयदेव - संस्कृत) 14.77% (48 votes) Other: 1.54% (5 votes) Total Votes: 325 Comments (0)Return To PollShare ThisCreate Your Own Poll Thank you, we have already counted your vote. प्रीति ठाकुर (गोनू झा आ आन मैथिली चित्रकथा) 53.45% (248 votes) ले.क.मायानाथ झा (जकर नारी चतुर होइ- बालकथा संग्रह) 23.92% (111 votes) जीवकांत - खिखिरक बिअरि- कविता संग्रह) 11.21% (52 votes) विद्यानाथ झा "विदित" (साते भवतु सुप्रीता- बाल उपन्यास) 11.42% (53 votes) Other: 0% (0 votes) Total Votes: 464 Comments (0)Return To PollShare ThisCreate Your Own Poll Thank you, we have already counted your vote. आनंद कुमार झा- हठात् परिवर्त्तन ( नाटक) 50.28% (442 votes) विनीत उत्पल - हम पुछैत छी (कविता संग्रह ) 16.5% (145 votes) उमेश मंडल- निश्तुकी ( कविता संग्रह) 16.84% (148 votes) ज्योति सुनीत चौधरी- अर्चिस (कविता संग्रह ) 15.59% (137 votes) Other: 0.8% (7 votes) Total Votes: 879 संपादकीय “हमरा मानसपटलपर मैथिलीक सम्मानित आलोचक श्री रमानन्द झा “रमणक” ओ वाक्य औखन ओहिना अंकित अछि जाहिमे ओ मैथिलीक वर्तमान गीत-गजलकेँ मंचीय यश एवं अर्थलाभक औजार कहिकऽ एकर महत्वकेँ एकदम्मे नकारि देने रहथि (सन्दर्भ- मिथिला मिहिर, फरबरी-१९८३); ...कोनो आलोचककेँ एहेन गैर जिम्मेदारीवला वक्तव्य देबाक की अधिकार? भारतीय संविधानमे भाषणक स्वतंत्रता एकटा मौलिक अधिकार छैक तेँ?” (सियाराम झा “सरस”, दीपोत्सव, १८/१०/९०; आमुख, लोकवेद आ लालकिला) वियोगी लोकवेद आ लालकिलाक एकटा दोसर आमुखमे लिखै छथि- “छन्दशास्त्रक नियमपर आधारित होयबाक उपरान्तो एहिमे गजलकारकेँ गणना-नियमक स्वातन्त्र्यक अधिकार रहैत छैक।” (!) गजल कतेको ढंगसँ कतेको बहरमे कतेको छन्दमे लिखल जा सकैए, ई सत्य अछि, मुदा गणना नियमक स्वातन्त्र्यक अधिकार ने मात्रिक गणनामे छैक आ ने वार्णिक गणनामे। देवशंकर नवीन लिखै छथि –“...पुनः डॉ. रामदेव झाक आलेख आएल। एहि निबन्धमे दूटा अनर्गल बात ई भेल, जे गजलक पंक्ति लेल, छन्द जकाँ मात्रा निर्धारण करए लगलाह..”। लोकवेद आ लालकिलामे गजल शुरू हेबासँ पहिने कएकटा आलेख अछि, मैथिली गजलपर कोनो सकारात्मक टिप्पणी तँ नै अछि ऐ सभमे, हँ मुदा समीक्षककेँ लाठी हाथे “ई सभ मैथिली गजल थिक, गजले टा थिक” कहबापर विवश करैत प्रहार सभ अवश्य अछि। हाइकूमे सिलेबल आ वर्णक मिलानी अंग्रेजी हाइकूक आरम्भिक लेखनमे नै भऽ सकल, देखल गेल जे ५/७/५ सिलेबलमे बहुतरास अल्फाबेट आबि गेल, जापानीमे ओतेक अल्फाबेट ५/७/५ सिलेबलमे नै छल। मैथिलीक आरम्भिक हाइकूमे सेहो ५/७/५ सिलेबलक अनुकरण करैत ज्योति चौधरी अपन कविता संग्रह “अर्चिस्” मे बेसी वर्णक प्रयोग केलन्हि। तेँ हम सलाह देलहुँ जे मैथिली हाइकू सरल वार्णिक छन्दक आधारपर लिखल जाए जइमे ह्रस्व-दीर्घक विचार नै हुअए। संस्कृतमे १७ सिलेबलबला वार्णिक छन्दमे नोकमे नोक मिला कऽ १७ टा वर्ण होइ छै- जेना शिखरिणी, वंशपत्र पतितम्, मन्दाक्रान्ता, हरिणी, हारिणी, नरदत्तकम्, कोकिलकम् आ भाराक्रान्ता। से ५/७/५ मे १७ सिलेबल लेल १७ टा वर्ण हाइकू लेल गेल, से आब ज्योतिजी सेहो लऽ रहल छथि, हम सेहो लऽ रहल छी आ सुनील कुमार झा सेहो लऽ रहल छथि। रुबाइमे हमर सलाह छल जे एतए सरल वार्णिक छन्दक प्रयोग सम्भव नै अछि, कारण एकर प्रारम्भ दीर्घ-दीर्घ-दीर्घ वा दीर्घ-दीर्घ-ह्रस्व सँ होइत अछि से चाहे तँ ह्रस्व-दीर्घक मिलानी खाइत वर्णिक छन्दक प्रयोग करू वा मात्रिक छ्न्दक। रुबाइक चतुष्पदीमे पहिल दोसर आ चारिम पाँती काफिया युक्त होइत अछि; आ मात्रा (वा वार्णिकमे वर्ण) २० वा २१ हेबाक चाही। कारण चारू पाँती चारि तरहक बहर (छन्द) मे लिखल जा सकैए से निअमकेँ आगाँ नमरेबाक आवश्यकता नै छै, हँ ई निर्णय करैए पड़त जे चारू पाँतीमे वार्णिक वा मात्रिक गणना पद्धति जे ली, से एक्के हेबाक चाही। गजलमे मुदा अहाँ वार्णिक, सरल वार्णिक वा मात्रिक छन्दक प्रयोग कऽ सकै छी, मुदा एक गजलमे दूटा बौस्तु मिज्झर नै करू। बिन छन्द वा बहरक गजल अहाँ कहि सकै छी, समीक्षककेँ लुलुआ कऽ आ लाठी हाथे; मुदा ओ गजल नै हएत, उर्दू/ फारसीमे तँ मुशायरामे अहाँकेँ ढुकैये नै देत। आ आब जखन सुनील कुमार झा सन युवा गजलकार अन्तर्जालपर एकटा टिप्पणीक बाद सरल वार्णिक छन्दमे गजलकेँ संशोधित कऽ सकै छथि तँ लालकिलावादी गजलकार लोकनि किए नै कऽ सकै छथि ? मायानन्द मिश्र “गीतल” कहि आ गंगेश गुंजन “गजल सन किछु मैथिलीमे” कहि जे गलत परम्पराकेँ जारी रखबाक निर्णय लेने छथि तकरा बाद अजित आजाद आ आशीष अनचिन्हार जँ बिना छन्द/ बहरक गजल लिखै छथि तँ एकरा हम मायानन्द मिश्र, गंगेश गुंजन आ लालकिलावादी अ-गजलकार लोकनिक दुष्प्रभावे बुझै छी। लोकवेद आ लालकिला: आत्ममुग्ध आमुख सभक बाद ऐ संग्रहमे कलानन्द भट्ट, तारानन्द वियोगी, डॉ. देवशंकर नवीन, नरेन्द्र, डॉ. महेन्द्र, रमेश, रामचैतन्य “धीरज”, रामभरोस कापड़ि “भ्रमर”, रवीन्द्र नाथ ठाकुर, विभूति आनन्द, सियाराम झा “सरस” आ सोमदेवक गजल देल गेल अछि। कलानन्द भट्ट भोर आनब हम दोसर उगायब सुरुज करब नूतन निर्माण हम बनायब सुरुज सरल वार्णिकक अनुसारे गणना- पहिल पाँती-१७ वर्ण दोसर पाँती- १८ वर्ण; जखन सरल वार्णिकेमे गणनाक अन्तर अछि तँ ह्रस्व दीर्घ विचारपर जएबाक मेहनति बचि गेल। मात्रिक गणनाक अनुसार- पहिल पाँती-२१ मात्रा, दोसर पाँती- २१ मात्रा, मात्रा मिलि गेलसे आब ह्रस्व दीर्घ पर चली। पहिल पाँती दीर्घ-ह्रस्व-दीर्घ-ह्रस्व-ह्रस्व-ह्रस्व-ह्रस्व-दीर्घ-ह्रस्व-ह्रस्व-ह्रस्व-दीर्घ-ह्रस्व-ह्रस्व-ह्रस्व-ह्रस्व-ह्रस्व (एतए दूटा लगातार ह्रस्वक बदला एकटा दीर्घ दऽ सकै छी, से दोसर पाँतीमे देखब)। दोसर पाँती- ह्रस्व-हस्व-ह्रस्व-दीर्घ-ह्रस्व-ह्रस्व-ह्रस्व-दीर्घ- ह्रस्व-हस्व- ह्रस्व-हस्व-दीर्घ- ह्रस्व-हस्व- ह्रस्व-हस्व-ह्रस्व। मुदा एतए गाढ़ कएल अक्षरक बाद क्रमटूटि गेल। तारानन्द वियोगी दर्द जँ हद केँ टपल जाए तँ आगि जनमै अछि बर्फ अंगार बनल जाए तँ आगि जनमै अछि सरल वार्णिकक अनुसारे गणना- पहिल पाँती-१९ वर्ण दोसर पाँती- १८ वर्ण; जखन सरल वार्णिकेमे गणनाक अन्तर अछि तँ ह्रस्व दीर्घ विचारपर जएबाक मेहनति बचि गेल। मात्रिक गणनाक अनुसार- पहिल पाँती-२५ मात्रा, दोसर पाँती- २५ मात्रा, मात्रा मिलि गेलसे आब ह्रस्व दीर्घ पर चली। दीर्घ (संयुक्ताक्षरकेँ पहिने)-ह्रस्व-ह्रस्व-ह्रस्व-ह्रस्व-दीर्घ-ह्रस्व-ह्रस्व-ह्रस्व-दीर्घ-दीर्घ-ह्रस्व-दीर्घ-ह्रस्व-ह्रस्व-ह्रस्व-दीर्घ-ह्र्अस्व-ह्रस्व।(एतए दूटा लगातार ह्रस्वक बदला एकटा दीर्घ दऽ सकै छी, से दोसर पाँतीमे देखब)। दोसर पाँती- दीर्घ (संयुक्ताक्षरकेँ पहिने)-ह्रस्व-दीर्घ-दीर्घ एतए क्रमभंग भऽ गेल। देवशंकर नवीन अँटा लेब समय-चक्र, सहजहि एहि आँखि बीच नबका प्रभात लेल, क्रान्ति कोनो ठानि लेब सरल वार्णिकक अनुसारे गणना- पहिल पाँती-१९ वर्ण दोसर पाँती- १६ वर्ण; जखन सरल वार्णिकेमे गणनाक अन्तर अछि तँ ह्रस्व दीर्घ विचारपर जएबाक मेहनति बचि गेल। मात्रिक गणनाक अनुसार- पहिल पाँती-२५ मात्रा, दोसर पाँती- २५ मात्रा, मात्रा मिलि गेलसे आब ह्रस्व दीर्घ पर चली। ह्रस्व-दीर्घ-दीर्घ-ह्रस्व-ह्रस्व-ह्रस्व-ह्रस्व-दीर्घ-ह्रस्व-ह्रस्व-ह्रस्व-ह्रस्व-दीर्घ-ह्रस्व-दीर्घ-ह्रस्व-दीर्घ-ह्रस्व (एतए दूटा लगातार ह्रस्वक बदला एकटा दीर्घ दऽ सकै छी, से दोसर पाँतीमे देखब)। दोसर पाँती- ह्रस्व-ह्रस्व-दीर्घ- मुदा एतए गाढ़ कएल अक्षरक बाद क्रमटूटि गेल। नरेन्द्र निकलू तँ सजिकऽ सजाकेँ बासन ली ठोकि बजाकेँ सरल वार्णिकक अनुसारे गणना- पहिल पाँती-१० वर्ण दोसर पाँती- ९ वर्ण; जखन सरल वार्णिकेमे गणनाक अन्तर अछि तँ ह्रस्व दीर्घ विचारपर जएबाक मेहनति बचि गेल। मात्रिक गणनाक अनुसार- पहिल पाँती-१३ मात्रा, दोसर पाँती-१४, मात्रा गणनाक अन्तर अछि तँ ह्रस्व दीर्घ विचारपर जएबाक मेहनति बचि गेल। डॉ महेन्द्र चलैछ आदमी सदिखन चलैत रहबा लए जीबैछ आदमी सदिखन कलेस सहबा लए सरल वार्णिकक अनुसारे गणना- पहिल पाँती-१८ वर्ण दोसर पाँती- १८ वर्ण। मुदा तेसर शेरमे दोसर पाँतीमे १६ वर्ण आबि गेल अछि। मात्रिकमे सेहो उपरका दुनू पाँतीमे क्रमसँ २४ आ २५ वर्ण अछि। रमेश जखन-जखन साओनक ओहास पड़ैए हमर छाती मे गजलक लहास बरैए सरल वार्णिकक अनुसारे गणना- पहिल पाँती-१६ वर्ण दोसर पाँती- १६ वर्ण। मुदा दोसर शेरक पहिल पाँतीमे १५ वर्ण। मात्रिक मे सेहो उपरका दुनू पाँतीमे २२ वर्ण अछि। मुदा ह्रस्व-दीर्घ गणनामे दोसरे शब्दमे ई मारि खा जाइए। ई दोष शेष गजलकारमे सेहो देखबामे अबैए। एकर अतिरिक्त सुरेन्द्रनाथक “गजल हमर हथियार थिक” , सियाराम झा “सरस”क “थोड़े आगि थोड़े पानि”, रमेशक “नागफेनी” आ तारानन्द वियोगीक “अपन युद्धक साक्ष्य” मे सँ किछु किताब लाठी हाथे मैथिली साहित्यमे गजल संग्रहक रूपमे साहित्य अकादेमीक सर्वे ऑफ मैथिली लिटेरेचरक उत्तर जयकान्त मिश्र संस्करणमे आबि गेल अछि, किछु ऐ साहित्यिक इतिहासक अगिला संस्करणमे आबि जाएत! अरविन्द ठाकुरक गजल सेहो पत्र-पत्रिकामे गजल कहि छपि रहल अछि जे अही परम्पराकेँ आगाँ बढ़बैत अछि। जँ ई सभ गजल नै छी तँ पद्य तँ छी आ तइ रूपमे एकर विवेचन तँ हेबाके चाही। ऐ क्रममे रवीन्द्रनाथ ठाकुरक “लेखनी एक रंग अनेक” देखू। मैथिली गजल संग्रहक रूपमे ई पोथी आइसँ २५ बर्ख पूर्व आएल। सोमदेव आ भ्रमरक संग हिनको गजल लालकिलावादक परिभाषामे नै अबैत अछि। गजल नै मुदा पद्यक रूपमे एकर स्थान मैथिली साहित्यमे सुरक्षित छै, मुदा ई आन वर्णित गजलक तथाकथित संकलनक विषयमे नै कहल जा सकैए। एक छन्द, एक बाँसुरी, एक धुन सुनयबालेऽ लियौ ई एक गजल, आई गुनगुनयबालेऽ (रवीन्द्रनाथ ठाकुर “लेखनी एक रंग अनेक”) सूचना: विदेहक तेसर अंक (१ फरबरी २००८)मे हम सूचित केने रही- “विकीपीडियापर मैथिलीपर लेख तँ छल मुदा मैथिलीमे लेख नहि छल,कारण मैथिलीक विकीपीडियाकेँ स्वीकृति नहि भेटल छल। हम बहुत दिनसँ एहिमे लागल रही आ सूचित करैत हर्षित छी जे २७.०१.२००८ केँ (मैथिली) भाषाकेँ विकी शुरू करबाक हेतु स्वीकृति भेटल छैक, मुदा एहि हेतु कमसँ कम पाँच गोटे, विभिन्न जगहसँ एकर एडिटरक रूपमे नियमित रूपेँ कार्य करथि तखने योजनाकेँ पूर्ण स्वीकृति भेटतैक।” आ आब जखन तीन सालसँ बेशी बीति गेल अछि आ मैथिली विकीपीडिया लेल प्रारम्भिक सभटा आवश्यकता पूर्ण कऽ लेल गेल अछि विकीपीडियाक “लैंगुएज कमेटी” आब बुझि गेल अछि जे मैथिली “बिहारी नामसँ बुझल जाएबला” भाषा नै अछि आ ऐ लेल अलग विकीपीडियाक जरूरत अछि। विकीपीडियाक गेरार्ड एम. लिखै छथि ( http://ultimategerardm.blogspot.com/2011/05/bihari-wikipedia-is-actually-written-in.html ) -“ई सूचना मैथिली आ मैथिलीक बिहारी भाषासमूहसँ सम्बन्धक विषयमे उमेश मंडल द्वारा देल गेल अछि- उमेश विकीपीडियापर मैथिलीक स्थानीयकरणक परियोजनामे काज कऽ रहल छथि, ...लैंगुएज कमेटी ई बुझबाक प्रयास कऽ रहल अछि जे की मैथिलीक स्थान बिहारी भाषा समूहक अन्तर्गत राखल जा सकैए ?..मुदा आब उमेश जीक उत्तरसँ पूर्ण स्पष्ट भऽ गेल अछि जे “नै”। ” रामविलास शर्माक लेख (मैथिली और हिन्दी, हिन्दी मासिक पाटल, सम्पादक रामदयाल पांडेय) जइमे मैथिलीकेँ हिन्दीक बोली बनेबाक प्रयास भेल छलै तकर विरोध यात्रीजी अपन हिन्दी लेख द्वारा केने छलाह , जखन हुनकर उमेर ४३ बर्ख छलन्हि (आर्यावर्त १४/ २१ फरबरी १९५४), जकर राजमोहन झा द्वारा कएल मैथिली अनुवाद आरम्भक दोसर अंकमे छपल छल। उमेश मंडलक ई सफल प्रयास ऐ अर्थेँ आर विशिष्टता प्राप्त केने अछि कारण हुनकर उमेर अखन मात्र ३० बर्ख छन्हि। जखन मैथिल सभ हैदराबाद, बंगलोर आ सिएटल धरि कम्प्यूटर साइंसक क्षेत्रमे रहि काज कऽ रहल छथि, ई विरोध वा करेक्शन हुनका लोकनि द्वारा नै वरन मिथिलाक सुदूर क्षेत्रमे रहनिहार ऐ मैथिली प्रेमी युवा द्वारा भेल से की देखबैत अछि? उमेश मंडल मिथिलाक सभ जाति आ धर्मक लोकक कण्ठक गीतकेँ फील्डवर्क द्वारा ऑडियो आ वीडियोमे डिजिटलाइज सेहो कएने छथि जे विदेह आर्काइवमे उपलब्ध अछि। नीचाँक पाँचू साइट विकी मैथिली प्रोजेक्टक अछि, प्रोजेक्टकेँ आगाँ बढ़ाऊ। http://translatewiki.net/wiki/Project:Translator
http://meta.wikimedia.org/wiki/Requests_for_new_languages/Wikipedia_Maithili
http://translatewiki.net/wiki/Special:Translate?task=untranslated&group=core-mostused&limit=2000&language=mai
http://incubator.wikimedia.org/wiki/Wp/mai
http://translatewiki.net/wiki/MediaWiki:Mainpage/mai ( विदेह ई पत्रिकाकेँ ५ जुलाइ २००४ सँ एखन धरि १११ देशक १,७८९ ठामसँ ६१, २६१ गोटे द्वारा विभिन्न आइ.एस.पी. सँ ३,०५,४७५ बेर देखल गेल अछि; धन्यवाद पाठकगण। - गूगल एनेलेटिक्स डेटा। ) गजेन्द्र ठाकुर ggajendra@videha.com http://www.maithililekhaksangh.com/2010/07/blog-post_3709.html २. गद्य २.१.जगदीश प्रसाद मण्डल २.२.बेचन ठाकुर- अधिकार २.३.शिवकुमार झा टिल्लू -िनश्तुकी २.४.जगदीश प्रसाद मण्डल- नाटक- कम्प्रोमाइज(पछिला खेपसँ आगाँ) २.५.बिपिन झा- स्तरविहीन स्तर २.६.आशीष अनचिन्हार- बेचन ठाकुरजीक नाटक - बेटीक अपमान २.७.१.हम पुछैत छी: मुन्नाजीक सोमदेवसँ भेल गपशप २. हम पुछैत छी: मुन्नाजीक अशोकसँ भेल गपशप जगदीश प्रसाद मण्डल १ दीर्घकथा शंभूदास जिनगीक ओइ सीमापर शंभूदास पहुँच गेल छथि जतए पैछला जिनगीक बहुतो विचार आ काज स्वत: छुटि गेलनि। किछु नव जे मनमे उपकि रहल छन्हि ओ करैले जइ शक्ति आ सामर्थक जते जरूरत छन्हि ओ तकनहुँ नै भेट रहल छन्हि। जना आगिक चिनगोरा रसे-रसे पझा-पझा या तँ मैल जकाँ उपर छाड़ने जा रहल छन्हि या झड़ि-झड़ि खसि रहल छन्हि। डंटीसँ टूटल पोखरिक कमल सदृश्य हवाक सिहकी वा पानिक कम्पन्नसँ दहलि रहल छन्हि। जे कहियो कामधेनु, फूल-फड़सँ लदल वृक्ष सदृश्य छलनि वएह आइ ठाँठ वा पत्रहीन ठूठ बुझि पड़ि रहल छन्हि। जे कहियो राजभोगक बीच दिन बितबैत छलाह आइ अन्न-वस्त्र विहीन भीखक घाटपर बैस अपन जिनगीक हिसाब-वारी जोड़ि रहल छथि। मन कहैत छन्हि जे सभ दिन तँ गुनगुनाइत रहलौं- जे बच्चा कनैत ऐ धरतीपर अबैत अछि आ हँसैत जाइक चाहिऐ, मुदा से कहाँ......? जे आत्मा बिनु विवेकक जिनगी टपि विवेकवान लग पहुँचल ओ आगू नै बढ़ि पाछु दिस किअए ढड़कि रहल अछि। सोन-सन उज्जर धप-धप दाढ़ी-मोछक संग माथसँ पएरक अंगुरिक धरिक केश, आमील सन सुखाएल गालक संग अगिला भाग, सामर्थ हीन हाथ-पएरक मुदा आँखिक ज्योति भोरक ध्रुवतारा जकाँ ललौन मन उफनि उठलनि जे देवस्थान जकाँ तिरपेखनि ऐ दुनियाँक करब। जहिना बाध-वोनक ओहन परती जइपर कहियो हर-कोदारि नै चलल सुखि-सुखि गािछ-विरिछ खसि उसर भऽ जाइत, ओइ परतीपर या तँ चिड़ै-चुनमुनीक माध्यमसँ वा हवा-पानिक माध्यमसँ अनेरूआ फूल-फड़क गाछ जनमि रौद-वसात, पानि-पाथर, अन्हर-विहाड़ि सहि अपन जुआनी पाबि छाती खोलि बाट-बटोहीकेँ अपन मीठ सुआदसँ तृप्ति करैत तहिना जमुना नदीक तटपर शंभूदासक जन्म बटाइ-किसान परिवारमे भेलनि। रवि दिन रहने समाजक दाय-माय शुभ दिन मानि शंभू नाओं रखलकनि। परदेशिया जकाँ तँ नै जे जन्मसँ पहिनहि माए-बाप नामकरण कऽ लैत। छठम दिनसँ पूर्वक सभ कष्ट विसरि शंभूदासक माए सुखनी अपन सुखैक निआसा छोड़ि अपन देवस्थानक देवता पूजनमे हराएल। अपन मर्यादा गसि कऽ पकड़ि शंभूक सेवामे जुटि गेलीह। परिवारक बोझक तर पिता, तँए बिलगा कऽ किछु नै सोचथि। पाँच वर्ख पूर्व धरि संतोखीदास अपने बोनिहार सभ जकाँ दुनू परानी संतोखी आ सुखनी, खेतिहर बोनिहार छलाह। खेतियो तँ मौसमेक हाथक खेलौना। बेठेकान। मुदा तैयो तँ सभ बुझैत जे जाड़, गरमी आ बरसात, सालक तीन अवस्था छी। भलहिं गोटे साल शीतलहरी पाबि जाड़ अपन विकाराल रूप देखबैत तँ रौदी पाबि गरमी। बरखा पाबि बसात बाढ़िक संग नंगटे नचैत तँ झाँट पाबि ताण्डव करैत। बजारवादक हवा सिहकल। ओना तँ विहाड़िक रूप हवा उठल मुदा पहाड़, बोनक टाट अँटकौलक। गतिकेँ कम केलक मुदा तैयो बहिते रहल। जाड़-रौदीक मारल किसानो अा बोनिहारो गाम (खेती-पथारी) छोड़ि बजार दिस विदा भेल। जहिना घर बनबैमे पातरसँ मोट खूँटक जरूरत होइत तहिना करखाना चलबैक लेल मजदूर बोनिहारसँ लऽ कऽ संचालक धरिक आवश्यकता भेल। उजड़ल-उपटल गामक रूखिमे बदलाव अबए लगल। खेतमे काज केनिहार बोनिहारकेँ करखन्नाक नव मजदूरी भेटए लगल। जइसँ जिनगीमे हरियरी अबए लगलै। मुदा हवाक गति धीरे-धीरे तेज हुअए लगल। सस्त मजदूर पाबि रंग-विरंगक कारोवार शहरमे जन्म लिअए लगल। जइसँ श्रमिकक मांग बढ़ल। टूटैत गामक जिनगीसँ तंग भऽ वेवस श्रमिक जेर बना-बना बजारक बाट पकड़लक। श्रमक विकरीक कारोवार जोर पकड़लक। खुल्लम-खुल्ला विकरी बट्टा हुअए लगल। गामक श्रमिकक पड़ाइनसँ गामो हलचलाएल। खेतबलाकेँ करखन्ना पहुँचने खेतीमे ठहराव आएल। श्रमिकक अभावमे खेती ठमकल। समाजक विचारधारामे बदलाव आएल। एक विचारधारा -जे अखनो धरि सम्पतिकेँ प्रतिष्ठा बुझैत- जे पहिलुकके खेतीकेँ थोड़-थाड़ अन्न-पानि खुआ-पिआ जीवित रखलनि तँ दोसर विचारधारा (शहरी कारोवार देख) खेत-पथार माने ग्रामीण सम्पत्तिकेँ पूँजी बुझि आमद-खर्चक िहसाब जोड़ि विचारमे बदलाव अनलनि। संग-संग बटाइ खेतीक बीच नव-समस्या सेहो उठल। जइठाम एखन धरि गामक जमीनदार खेतक उपजे बेर-टामे खेतक दर्शन करैत, ओ गामसँ बाहर भेने सालक-साल खेतक दर्शनसँ विमुख भेला। संग-संग गाममे श्रम-शक्तिक अभाव भेल। बटेदारक वर्गक वृद्धि भेल। खेतक बटाइ प्रथामे बदलाव आएल। जइसँ आमक कन (फड़क हसावसँ) उपजाक मनखप आ पोसिया माल-जालमे बदलाव आएल। कोनो धरानी संतोखीदास एकटा बड़द बनौलक। दू परानीक हाथ-पएर आ एकटा बड़द पाबि संतोखीदस बटेदार किसानक रूपमे ठाढ़ भेल। पेट भरने परिवारमे खुशीक बाढ़ि तँ नै मुदा पटवी पानिक खुशी जरूर आबि गेल। बीघा भरिक खेतिहर संतोखीदास बनि गेल। नव आर्थिक विकास भेने परिवरक बच्चो सभमे मौलाहट कमल। जइसँ बच्चाक मृत्युक संख्यामे कमी आएल। ओना एखनो धरि श्रमकि परिवारमे बेट-बेटीमे अन्तर नै बुझल जाइत किएक तँ भगवानक अगम लीलाक बीच हस्तक्षेप् नै करए चहैत मुदा बजारक बिखाएल वयार तँ बहिये रहल अछि। शंभूक तीन बर्ख पुरिते, जहिना शीतलहरीमे पौ फटिते सुरूजक रोशनीक आशा जगैत, बदरीहन समए बादलकेँ छिड़िआइते घरसँ बहराइक आशा जगैत तहिना संतोखियो दास आ सुखनियोकेँ भेल। जिनगी भरिक लेल मनखप खेत भेटने किअए नै दुनू परानीक मनमे आशा आओत। तहूमे बाढ़-रौदीक सालक कोनो देनदरिये नै, रहल सुभ्यस्त समैक देनदारी। ओहो देनदारी कि अन्तैसँ कमा कऽ आनए पड़त। धरती माता कामधेनु। जते करब तते पाएब। जखन मन हएत, तखन खाएब। दिन-राति ओंघराइत रहब। एखन धरि सुखनी शंभूक पाछु आंगनसँ नै निकलि पबैत छलीह मुदा आब तँ शंभू तीन सालक भऽ गेल। अगहन मासमे खेतक आड़िपर धानक खाेंचड़िक घर बना देब ओइमे खेलेबो करत आंेघी लगतै तँ सुतबो करत। गरमी मासमे गाछक छाहरिमे रहत। लऽ दऽ कऽ बरसात रहल। तँ बरखो कि लोककेँ बिना चेतौने अबैए। अबैसँ पहिने राजा-रजवाड़ जकाँ समाद पठा दैत अछि। तहूमे बरखा केहन रूपमे आओत सेहो तँ कहिये दैत अछि। जेठुआ बरखामे जे दुइयो बेर देह धुआ जेतै तँ सालो भरि धुआएले रहतै। बच्चा कि कोनो सियान सैतान होइए जे भरि दिन डौं-डौं करत। ओकरा तँ अन्न-पानि भेट जाए, भरि दिन बौआइत रहत। जहिना नव दाँत जनमने मसुहरि किछु करैले सबसबाइत अछि तहिना बच्चो मन। जेठक दसहारा। बृहस्पति दिन। गिरहस्तीक पतराएल काज। अटूट फड़ल आम-जामुनक गाछ। गामक-गाम लोकक मन गदगद। किअए ने रहत। दू मास जे अमृत फल भेटत। बाधक चौबगली गाम अष्टयाम कीर्तनक मंत्रसँ अकास गनगनाइत। किम्हरो “सीताराम, सीताराम सीताराम जय सीताराम” तँ किम्हरो “काली, गुर्गे राधे श्याम, गौरी शंकर सीताराम।” किम्हरो “हरे राम, हरे राम...।” तँ किम्हरो “हरे कृष्ण हरे कृष्ण।” दसहारा रहने ब्रह्मस्थानमे घोड़ा चढ़ौल सजाओल जाएत। ऐबेर तँ जहिना ब्रह्मबाबा खुशी छथिन तहिना लोकोक मन। आन साल जकाँ कि ऐबेर हल्लुक दामा रंग सुखा घोड़ा लोक चढ़ौत पहिने साय-बेना- दऽ दऽ सरैसो घोड़ासँ निम्मन-निम्मन चढ़ौत। दूध-पीठ खाइत-खाइत ब्रह्मोबाबाक मन अकछा गेल छन्हि तँए ऐबेर सेरही, पनसेरही, दससेरही, अधमनीक संग मनही मंूगाबा सेहो परदेसिया सभ चढ़ौत। दिनक एगारह बजैत। माटि-पानि तबने हबो तबि गेल। खेतक जे खढ़ अछि ओ रोहणि मिरगिसरामे नै सूखत तँ सालो भरि ओकर ओधि थोड़े सुखत। तँए संतोखीदास मरूआ खेत जोतए आ सुखनी खढ़ बिछए गेल। मुदा छोट बच्चा शंभूकेँ असकरे आँगनमे केना छोड़ि दितथि। बच्चोले बाटीमे भात आ भरि डोल पानि नेने खेत गेली। अपनो सभकेँ पियास लगत तँ पीबैक खियालसँ। खेतसँ कट्ठा दुऐक हटि आड़िपर एकटा बज्जर केराइक अनेरूआ गाछ। जकरा निच्चामे सघन छाहरि तँ नै मुदा छाहरि। जतए शंभूकेँ खेलाइले छोड़ि अपने दुनू परानी संतोखीदास खेतमे काज करैत। काज लगिचाएल देख, खाली हड़मड़ी चौकी देब बाकी, हर खोलि चौकी ठेक संतोखीदास पत्नीकेँ कहलखिन- “रौदमे मन तबैध गेल हएत, कनीखान छाहरिमे जीरा लइले चलू।” सुखनी- “सएह कहए चाहै छलौं मुदा काज लगिचाएल देख नै कहै छलौं। जे काज ससरि जाइ छै ओते तँ जाने हल्लुक होइ छै किने।” “हँ से तँ होइ छै। मुदा काजो कि......?” “से की?” गैंचियाह नजरि पत्नीपर दैत संतोखीदास मुस्की दैत कहए लगलखिन- “जहिना भाँग-गांजा अपन सेवककेँ बौरा दैत, बेशिया इश्कबाजकेँ, तहिना ने काजो अपन कर्ताकेँ बाबला बना जान लइपर तुलल रहैत।” “नै बुझलौं?” “देखै नै छिऐ, दोकान सभमे लिख कऽ टांगल रहैए जे, काज करैत चलू फलक आशा नै करू।' जखन मनुख छी रोड-सड़ककेँ नािप मीलक पाथर गारल रहैए तखन कतऽ कोन रास्ता चलक चाही से तँ सोचए पड़तै किने। आकि रस्ते भुतिया जाय। जे बाट नै देखल रहै छै ओही बाटमे ने लोक भुतिआइए। खाइर, छोड़ू ऐ सभकेँ चलू कनी ठंढ़ाइयो लेब दू घोंट पानियो आ तमाकुलो खा लेब।” दुनू परानी बज्जर केराइ गाछसँ फड़िक्के देखलनि जे शंभू पूवारि पारक अष्टयामक मंत्र- “हरे कृष्णा, हरे कृष्णा, कृष्णा-कृष्णा हरे-हरे” एक ताले छठिक ढोल जकाँ थोपड़ी बजबैत गबैत रहए। बेटापर नजरि पड़िते सुखनी अध खिलू फूल जकाँ विहुँसैत पतिकेँ कहलनि- “देखियौ ऐ छौंड़ाकेँ। आन धिया-पूता रहैत तँ माए-माए करैत। केहेन मगन भेल अछि।” पति- “रौदमे तबैध तँ ने गेल अछि?” “तबधल बच्चा थोपड़ी बजा गाओत आकि अँहोछिया काटत।” “हँ से तँ ठीके।” जहिना तत्व चिन्तक आत्माक तार जोड़ि ब्रह्म तत्वक अन्वेषण करैत तहिना शंभू कृष्ण मंत्रसँ अपन मनक तार जोड़ि अष्टयामक धुनमे बेसुधि भेल मीरा जकाँ गाबि रहल अछि। जहिना एक्के फुलबाड़ी वा गाछीमे भिन्न-भिन्न रंगक फूल वा फल ताधरि अपन परिचयसँ हराएल रहैत जाधरि बच्चा सदृश्य पालल-पोसल जाइत, मुदा जखन अपन गुण वा रूप देखबै जोकर भऽ जाइत तखन एकठाम रहितो बेड़ाए लगैत तहिना सात बर्ख अबैत-अबैत शंभूओ बेड़ाए लगल। परिवारमे अनेको रंगक वस्तु-जात रहितो ओतबे सिनेह रखैत जते काजक वस्तु बुझैत। जइ वस्तुक प्रयोजन आन-आन रूपकेँ आन-आन काजमे होइत तइसँ भिन्न ओइ वस्तुक उपयोग अपन काज देख करए लगल। अपना खेत-पथार नै रहितो संतोखीदासक परिवार गामक किसान परिवारक खाड़ीमे आबि चुकल छल। जहिना किसान परिवारमे वाइस-बेरहट कऽ कऽ खाइत अछि तहिना संतोखियो दासक परिवारमे चलए लगलनि। ओना ई गति लगातार नै चलि पबैत, किएक तँ किसान परिवार, डेंगी नाह जकाँ सदति उपर-निच्चा होइत रहैत। जइ साल खरचट्टा वा दहार समए भेल तइ साल सभ धुआ-पोछा गेल। मुदा जइ साल सुभितगर समए भेल तइ साल पुन: नव-पुरानक चालि पकड़ि लैत। नवे-पुरानक चालि ने रसगरो आ सुअदगरो होइए, अगिला-पछिला बाट देख चलबे ने दिशा दैत। जेना एक्के आमक चटनी टटका नीक होइत तँ अचार बसिया। जते-पुरान तते रसगर। मुदा चटनी तँ लगले अरूआ जाइत। तहिना नवका कुरथीक दालि आ पुरान राहड़िक दालि। एखन धरि शंभू, परिवारकेँ खाली खाइ-पीबै, माता-पीताक संग रहैक टा बुझैत। किएक तँ बाल-बोध बुझि, ने माता-पिता किछु करैले अढ़बैत आ ने शंभू परिवारक काजकेँ अपन काज बुझैत। सदति धैनसन। सोलहन्नी बेरागी जकाँ। मुदा तँए कि शंभू भरि दिन ओछाइनेपर ओंघराएल रहैत सेहो बात नै। जँ किछु नै करैत तँ दिन-राति केना कटैत छैक। अखनो धरि गामक िकसान धरतीसँ अकास धरिक स्मरण साँझ-भोर जरूर करैत अछि। भोरमे धरतीक स्मरण तँ साँझमे अकास विचरण जरूर करैत अछि। आने परिवार जकाँ संतोखियो दासक परिवार। परिवारमे शंभूक कोनो मोजरे नै। मात्र खाइ-पीबै आ सुतै बेर माता-पिता सिर चढ़बैत। बाकी समए साँढ़-पारा जकाँ अनेर बौआइत ढहनाइत। तँए कि सींग-नाङरिबला पशु जकाँ कि शंभूकेँ थइर-पगहाक जरूरत होइत। 'अनेर गाएकेँ धरम रखवार' होइत। भोरमे जखन संतोखीदास खेत-तमैक विचार करए लगथि तँ नचैत हृदेक घूघड़ूक कम्पन्न ठोठक स्वर होइत खपड़िक मकइ-जनेरक लावा जकाँ कूदि-कूदि निच्चा खसैत तहिना संतोखियो दासक मुँहसँ रंग-विरंगक मौसमक संग मौसमी सिनेह छिड़ियाए लगैत। जकरा बीछ-बीछ शंभू खेलेबो करैत आ तहिया-तहिया सीनाक डायरीमे लिख-लिख रखबो करैत। हृदयंगम करैत। मुदा बच्चाक कचिया डायरी रहने किछु लिखेबो करैत आ किछु नहियो लिखाइत। मुदा प्रति भोर आ साँझक स्वर 'सीताराम-सीताराम, राधेश्याम-राधेश्याम' डायरीक उपरेक पन्नामे लिखा गेल। जकरा भरि दिन शंभू गो-मुखी रूद्राक्षक माला बना जपैत रहैत। कामधेनु गाए जकाँ सदति दूधक ढारसँ नव-नव राग-रागिनी स्वत: अबए लगल। कंठक स्वर-लहरी हाथकेँ थिरकबै लगल। जइसँ कखनो दुनू हाथ मिल ताल मिलबैत तँ कखनो पल्था मारि बैस ठेहुनपर ताल मिलबए लगल। घर-अंगना एक रहने पिताक संग माइयोक पाछु-पाछु आंगन बाहरैत समए, चुल्हि-चिनमार नीपैक समए, जाँत-ढेकी चलबैक समए शंभू नचए-गबए लगल। बेटाक बौराइत मन देख माइयो आत्म-विभोर भऽ झुमि-झुमि शंभूक आँखिमे आँखि गारि फड़ैत-फुलाइत फुलबाड़ीमे हरा जाइत। माता-पिताक उसकैत हाथ देख शंभूओक हाथ खाइबला बाटीपर उसकए लगल। खजुरी जकाँ ओकरा बजाएब शुरू केलक। कोना नै करत? कामेसँ राम आ रामेसँ काम ने चलैत अछि। मुदा भारी द्रव्यक बाटी रहने हाड़-मासुक हाथक ओंगरी कतेखान ठठत। जे बात शंभू तँ नै बुझि सकल मुदा संतोखीदास बुझि गेलखिन। सोचलनि जे जँ खजुरी बना दिअए तँ चौबीसो घंटा शंभू आनन्दमे मगन रहत। बेटाक प्रति पिताक दायित्वे कि? यएह ने जे हँसी-खुखीसँ दिन-राति चलैत रहए। मन मानि गेलनि जे बेटाकेँ खजुरी बना देबै। एकलव्य जकाँ साजमे खजुरियो ने अछि। ने ओकरा दोसर संगीक जरूरत होइत आ ने कखनो अपनाकेँ असगर बुझैत। जहिना हवामे उड़ैत रोग लोककेँ पकड़ि लैत, लगन अबिते बर-कन्याकेँ पकड़ए लगैत, तीर्थ-व्रतक डोरी लगैत तहिना शंभूओकेँ गीत-नादक माने संगीतक रांग पकड़ि लेलक। जइसँ पिताकेँ हर जोतैत, कोदारि पाड़ैत, धान-रोपैत कालक गुनगुनीक संग आंगन बाहरैत, धान कुटैत, जत्ता चलबैत कालक गुनगुनी पकड़ि लेलक। जकरा संग शंभू भरि दिन मगन भऽ गारा-जोड़ी केने बुलए-भंगए लगल। मुदा तँए कि शंभू एतबेमे ओझराएल रहल? नै! ने ओकरा गामक आन घर अनभुआर आ ने लोक अनठिया बुझि पड़ै। तहूमे एकठाम रहने, जखन माए-बापक संग बाध-बोन दिस जाए तँ वएह घर वएह लोक देखए। समाज तँ ओहन सरोबर छी जइमे घोंघा-सितुआसँ लऽ कऽ कमल धरि फुलाइत अछि। देवस्थानमे साँझ-भोर घड़ी-घंट, शंख बजैत खरिहाँनमे धान फटकैत सूपक अवाज अकासमे उड़ैत। काठपर ओंघराइत टेंगारी-कुड़हरि गर्द करैत तँ चुल्हिपर चढ़ल बरतनक अदहन झ-झ-काली करैत रहैत। छह बर्खक बेटा शंभू लेल संतोखीदास खजुरीक ओरियान करैक विचार केलनि। ओना हाट-बजारमे खजुरी तँ नै बिकाइत अछि मुदा हरिहरक्षेत्र, सिहेश्वर, जनकपुर आ देवघरमे तँ बिकाइते अछि। मुदा ओतएसँ आओत कोना? एखन तँ अोम्हर मुँहे जाइक नियार नै अछि। ओना गामोमे बरही लकड़ीक कठरा बनबैए। मघैया सरिसोबा सनगोहि मारि खेबो करैए आ ओकर छाल बेचबो करैए। अगर जँ कठरा बनबा, सनगोहिक छाल कीन लेब तँ तेबखाक बेसनसँ अपनो छाड़ि लेब। हम सभ कि कोनो शहर-बजारक लोक छी जे बेटा-बेटीकेँ पेस्तौल बम-बारूद-छुड़छुडी-फटाका- खेलाइले देबै। जँ खेत-खरिहाँन दिसक मन देखितिऐ तँ खिएलहा हँसुआ-खुरपी खेलाइले दैतिऐ जँ से नै देखै छिऐ तँ एकरा खजुरियेक ओरियान कऽ देबै। सएह केलनि। जहिना हाथमे औजार ऐने श्रमिक बड़का-बड़का इंजीन बना चलबैत तहिना हाथमे खजुरी ऐने शंभूओ परिवारक संग समाजक कीर्तन, भजन, यज्ञ इत्यादिमे शामिल हुअए लगल। छह बर्ख बीतैत-बीतैत शंभूक हाथ खजुरीपर बैस गेल। जइसँ असकरे आंगनक ओसारपर बैस जाधरि हाथक आंगुर नै दुखाए लगै ताधरि एकताले सीता-राम सीता-राम, राधेश्याम, राधेश्याम खजुरिक अवाजक संग अपन कंठक अवाज मिला उन्मत्त भऽ गबैत-रहैत। भगवानोक लीला अजीव छन्हि। एक्के मनुख वा पशु-पक्षीक गोटे बच्चाकेँ उम्रसँ बेसिऐ बना दैत छथिन आ कोनोकेँ कम बना दैत छथिन। कियो पाँचे बर्खमे पनरह बर्खक बुद्धि-ज्ञान अरजि लैत अछि तँ कियो पनरहो बर्खमे पाँचो बर्खसँ निच्चे रहैत अछि। जना शंभुओकेँ भेल। छबे बर्खमे पनरह बर्खक बच्चाक कान काटए लगल। तहूँमे तेहन समाजक स्कूल अछि जे जते मिहनत करए चाहब ओते फलो भेटबे करत। सदिकाल कतौ ने कतौ कोनो ने कोनो उत्सव समाजमे होइते रहैत अछि। देवस्थानसँ परिवार धरि, कतौ अष्टयाम-कीर्तन, तँ कतौ बच्चाक मूड़न, कतौ सत्नारायण भगवानक पूजा तँ कतौ िवयाह-दुरागमन। शुभ काज तँए शुभ वातावरण बनबैक लेल शुभ-शुभ क्रिया-कलाप। शुभ क्रिया-कलापक लेल कतौ ढोलक-झालि हारमोनियमक संग रामधुन चलैत तँ कतौ ढोल-पीपहीक संग गीत-नाद। ततबे नै संग-संग परिवारक उत्सवमे समबेत स्वर माए-वहीनिक गीत-नाद सेहो चलबे करैत अछि। जहिना पाँच बर्खक बच्चा स्कूलमे नाअों लिखा दोसर-तेर बच्चा संग पढ़ैत तहिना शंभूओ समाजमे कतौ ढोलक-झालि वा ढोल-पीपहीक अवाज सुनिते ठोकले ओइ जगहपर पहुँच, बेद पाठी जकाँ आँखि-कान समेट ताधरि देखैत-सुनैत रहैत जाधरि विज्ञाम करैले नै बन्न होइत। शंभूक क्रिया-कलापसँ दुनू परानी संतोखीदास सेहो निचेन भऽ अपन काज करैत रहैत। काजमे मस्त रहैत। किएक तँ दुनू परानी बुझि गेलाह जे जतए ढोल-पीपही बजैत हएत शंभू ओतए जरूर हएत। तँए जखन खेत-पथारसँ काज कए घुमैत तँ ठोकले ओइ स्थानपर पहुँच शंभूकेँ ताकि अनैत। समाजो तँ ओहन बाट बना चलैत जइसँ हँसैत-खिलैत जिनगी बिनु थकनहि सदैत चलैत रहैत। कोना नै चलत? धार ककर आशा-बाटक प्रतिक्षा करैत। जहिना अपना गतिये दिन-राति चलैत रहैत तहिना ने समाजो अपना गतिये सदैत चलैत रहैत। आओर आगाँ शेष अगिला अंकमे......। २ जगदीश प्रसाद मण्डल नाटक झमेलिया बियाह पहिल दृश्य (भागेसर, सुशीला) (रोग सज्जापर सुशीला। दवाइ आ पानि नेने भागेसरक प्रवेश।) भागेसर- केहेन मन लगैए? सुशीला- की कहब। जखन ओछाइनेपर पड़ल छी, तखन भगवानेक हाथ छन्हि। राजा-दैवक कोन ठेकान? भागेसर- से की? सुशीला- उठि कऽ ठाढ़ो भऽ सकै छी, सुतलो रहि सकै छी। भागेसर- एना किअए बजै छी। कखनो मुँहसँ अवाच कथा नै निकाली। दुरभखो विषाइ छै। सुशीला- (ठहाका दऽ) बताह छी, अगर दुरभाखा पड़तै तँ सुभाखा किअए ने पड़ै छै? सभ मन पतिअबैक छी। भागेसर- अच्छा पहिने गोटी खा लिअ। सुशीला- एते दिनसँ दवाइ करै छी कहाँ एकोरत्ती मन नीक होइए? भागेसर- बदलि कऽ डाॅक्टर सहाएब गोटी देलनि। हुनका बुझबेमे फेर भऽ गेल छलनि। सभ बात बुझा कऽ कहलनि। (गोटी खा पानि पीब पुन: सिरहौनीपर माथ रखि।) सुशीला- की सभ बुझा कऽ कहलनि? भागेसर- कहलनि जे एक्के लक्षण-कर्मक कते रंगक बेमारी होइए। बुझैमे दुविधा भऽ गेल। तँए आइसँ दोसर बेमारीक दवाइ दइ छी। सुशीला- (दर्दक आगमन होइत पँजरा पकड़ि।) ओह, नै बाँचब। पेट बड़ दुखाइए। भागेसर- हाथ घुसकाउ ससारि दइ छी। (सुशीला हाथ घुसकबैत। भागेसर पेट ससारए लगैत कनी कालक पछाति।) सुशीला- हँ, हँ। कनी कऽ मन असान भेल। भागेसर- मनसँ सोग-पीड़ा हटाउ। रोगकेँ दवाइ छोड़ाओत। भरिसक दवाइ आ रोगक भिड़ानी भेलै तँए दर्द उपकल। सुशीला- भऽ सकैए। किअए तँ देखै छिऐ जे भुखल पेटमे छुछे पानि पीलासँ पेट ढकर-ढकर करए लगैए। भरिसक सएह होइए। भागेसर- भगवानक दया हेतनि तँ सभ ठीक भऽ जाएत। सुशीला- किअए भगवानो लोके जकाँ विचारि कऽ काज करै छथिन। भागेसर- अखैन तक एतबो नै बुझै छिऐ। सुशीला- हमरा मनमे सदिखन चिन्ते किअए बैसल रहैए। खुशीकेँ कतए नुका कऽ राखि देने छथि। आ कि.....? भागेसर- कि आ कि? सुशीला- नै सएह कहलौं। कियो ठहाका मारि हँसैए आ हमरा सबहक हँसिये हराएल अछि। भागेसर- हराएल ककरो ने अछि। माइटिक तरमे तोपा गेल अछि। सुशीला- ओ निकलत केना? भागेसर- खुनि कऽ। सुशीला- कथीसँ खुनबै? भागेसर- से जे बुझितौं तँ एहिना थाल-पािनमे जिनगी बीतैत। सुशीला- जखन अहाँ एतबो नै बुझै छिऐ तँ पुरूख कोन सपेतक भेलौं। अच्छा ऐले मनमे दुख नै करू। नीक-अधलाक बात-विचार दुनू परानी नै करब तँ आनक आशासँ काज चलत। भागेसर- (मूड़ी डोलबैत जना महसूस करैत, मुँह चिकुरिअबैत।) कहलौं तँ ओहन बात जे आइ धरि हराएल छलै मुदा ई बुझब केना? (भागेसरक मुँहसँ बतीसो दाँत सोझ आएल, जइसँ पत्नी हँसी बुझि।) सुशीला- अहाँक खुशी देख अपनो मन खुशिया गेल। भागेसर- मन कहाँ खुशिआएल अछि। सुशीला- तखन? भागेसर- बतीसयासँ सठिया गेल अछि। वएह कलपि-कलपि, कुहरि-कुहरि कुकुआ रहल अिछ। सुशीला- छोड़ू ऐ लट्टम-पट्टाकेँ। जेकरा पलखैत छै ओ करैत रहह। अपन दुख-सुखक गप करू। भागेसर- कना दुख-सुखक गप अखैन करब। मन जड़ाएल अछि हुअए ने हुअए.......? सुशीला- की? भागेसर- जड़ाएले मनक ताउसँ बौराइ छै। पहिने देहक रोग भगाउ तखैन निचेनसँ विचार करब। सुशीला- बेस कहलौं। भिनसरेसँ झमेलियाकेँ नै देखलिऐ हेन? भागेसर- बाल-बोध छै कतौ खेलाइत हेतै। भुख लगतै अपने ने दौड़ल आओत। सुशीला- ऐ देहक कोनो ठेकान नै अछि। तहूमे बेमारी ओछाइन धरौने अछि। जीता जिनगी पुतोहू देखा दिअए? भागेसर- मन तँ अपनो तीन सालसँ होइए जे बेटा-बेटी करजासँ उरीन रहब तखन जे मरियो जाएब तँ करजासँ उरीन मनकेँ मुक्ति हएत। सुशीला- सएह मनमे उपकल जे बेटीक बियाह कइये नेने छी। जँ परानो छुटि जाएत तँ बिनु बरो-बरियातीक लहछू करा अंगबला अंग लगा लेत। मुदा.....? भागेसर- मुदा की? सुशीला- यएह जे झमेलियोक बियाह कइये लिअ। भागेसर- अखन तँ लगनो-पाती नहिये अछि। समए अबै छै तँ बुझल जेतै। (झमेलियाक प्रवेश।) झमेलिया- माए, माए मन नीक भेलौं किने? सुशीला- बौआ, लाखो रोग मनसँ मेटा जाइए, जखने तोरा देखै िछयह। भिनसरेसँ नै देखलिअ कतए गेल छेलहहेँ? झमेलिया- इसकूलक फीलपर एकटा गुनी आएल छलै। बहुत रास कीदैन-कहाँ सभ झारामे रखने छलै। डमरूओ बजबै छलै आ गाबि-गाबि कहबो करै छलै। सुशीला- कि गबै छलै? झमेलिया- लाख दुखक एक दवाइ। पाँचे रूपैया दामो छलै। सुशीला- एकटा नेने किअए ने एहल? झमेलिया- हमरा पाइ छलए? सुशीला- केमहर गेलै? झमेलिया- मारन बाध दिसक रस्ता पकड़ि चलि गेल। सुशीला- बौआक बियाह करा दियौ? (वियाहक नाआंे सुनि झमेलियाक मुँहसँ खुशी निकलैत।) भागेसर- वियाहैओ जोकर तँ भइये गेल अछि। कहुना-कहुना तँ बारहम बर्ख पार कऽ गेल हएत? सुशीला- पैछला भुमकमकेँ कते दिन भेल हएत। ओही बेर ने जनमल? भागेसर- सेहो कि नीक जकाँ साल जोड़ल अछि। मुदा अपना झमेलियासँ छोट-छोट सभकेँ बियाह भेलै तँ झमेलियो भेइये गेल किने? @ दोसर दृश्य (सुरूज डूबैक समए। बाढ़नि लऽ झमेलिया आंगन बाहरए लगैत। सुशीला आबि बाढ़नि छिनैत।) सुशीला- जाबे जीबै छी ताबे तोरा केना आंगन-घर बहारए दिऔ। झमेलिया- किअए, ककरो अनकर छिऐ? अपन घर-आंगन बहारब कोनो पाप छी। सुशीला- धरम आ पाप नै बुझै छी। मुदा एते तँ जरूर बुझै छी जे भगवानेक बाँटल काज छियनि ने। पुरूख आ स्त्रीगणक काज फुट-फुट अछि। झमेलिया- राजा-दैवक काज ऐसँ फुट अछि। सभ दिन कहाँ बहारए अबै छलौं। अखन तू दुखित छेँ, जखन नीक भऽ जेमे तखन ने तोहर काज हेतौ। सुशीला- सएह बुझै छिही, ई नै बुझै छिही जे काजे पुरूख-सत्रीगणक अन्तर कऽ ठाढ़ रखने अछि। भलहिं बेटा छिऐ एहेन-एहेन बेरमे तू नै देखमे तँ दोसर केकर आशा। मुदा.......? झमेलिया- मुदा की? सुशीला- यएह जे माए-बाप बेटा-बेटीक पहिल गुरू होइ छै। हिनके सिखैलासँ बेटा-बेटी अपन जिनगीक रास्ता धड़ैए। (माइयक आगू झमेलिया ओहिना देखैत अछि जहिना रोगसँ ग्रसित माए अपन दूधमुँह बच्चा देख हुकड़ैत अछि। तहिना हाथक बाढ़नि निच्चा मुँहे केने सुशीला झमेलियाक चेहरापर रखि जना पढ़ि रहल हुअए कि ऐ कुल-खनदान आ परिवारक संग माइयो बापक तँ यएह माइटिक काँच दिआरी छी जे अबैत दोसर दिआरीकेँ लेसि टिमटिमाइत रहत। तइकाल भागेसर आ यशोधरक प्रवेश।) भागेसर- (झमेलियासँ) बौआ साँझ पड़ल जाइ छै, दुआर-दरवज्जाक काज देखहक। झमेलिया- दरबज्जा बहारि आंगन बहारए एलौं कि माए बाढ़नि छीन लेलक। (बिना किछु बजनहि भागेसर नीक-अधला विचार करए लगल।) (कनीकाल बाद।) भागेसर- (पत्नीसँ) मन केहेन अछि? सुशीला- अहूँ बुझिते छी आ अपनो बुझिते छी जे साल भरि दवाइ खाइले डॉक्टर सहाएब कहलनि से निमहत। जइठीन मथटनकीक एकटा गोटी नै भेटै छै तइठीन साल भरि पथ-पानिक संग दवाइ खाएब......? (बहीनक बात सुनि यशोधरकेँ देह घमा गेल। चाइनिक पसीना पोछैत।) यशोधर- बहीन, भगवानो आ कानूनो ऐ परिवार जबाबदेह बनौने छथि। जाबे जीबै छी ताबे एहेन बात किअए बजै छह? सुशीला- भैया, अहाँ किअए.....? खाइर छोड़ू काजक की भेल? यशोधर- बहीन, मने-मन हँसियो लगैए आ मनो कचोटैए। मुदा.......? सुशीला- मुदा की? यशोधर- (मुस्की दैत) पनरह दिनमे पएरक तरबा खिआ गेल मुदा काजक गोरा नै बैसल। एकटा लड़कीक भाँज नवानीमे लागल। गेलौं। दरबज्जापर पहुँच घरवारी अवाज दैते आंगनसँ निकललाह। (बिचहिमे भागेसर मुस्की देलनि।) सुशीला- कथो-कुटुमैतीकेँ हँसियेमे उड़ा दइ छऐ? यशोधर- हँसीबला काजे भेल। तँए हँसी लगलनि। सुशीला- की हँसीबला काज भेल? यशोधर- दरबज्जापर बैस गप चलेलौं कि जहिना हवाक सिहकीमे पाकल आम झड़भड़ा जाइत तहिना स्त्रीगण सभ आबए लगलीह। सुशीला- स्त्रीगणे अबए लगली आ पुरूख नै? यशोधर- स्त्रीगण बेसी पुरूख कम। एकटा स्त्रीगण बिचहिमे टभकि गेलीह। सुशीला- की टपकली? यशोधर- (मुस्की दैत) हँसियो लगैए आ छगुन्तो लगैए। बजली जे बर पेदार अछि कि जे आनठाम कन्यागत जाइत छथि आ अहाँ......? सुनिते मनमे नेसि देलक। उठि कऽ विदा भऽ गेलौं। सुशीला- स्त्रीगणेक बात सुनि अगुता गेलौं। परिवारमे बेटा-बेटीक बियाह पैघ काज छऐ पैघ काजक रास्तामे छोट-छोट हुच्ची-फुच्चीपर नजरि नै देबाक चाहिऐ। यशोधर- एतबे टा नै ने, गामो नीक नै बुझि पड़ल। आमक गाछीसँ बेसी तरबोनी खजुर बोनी। एहेन गामक स्त्रीगण तँ भरि दिन नहाइये आ झुटकासँ पएरे-मजैमे बीता देत। तखन घर-आश्रमक काज केना हएत। सोझे उठि कऽ रास्ता धेलौं। सुशीला- आगू कतए गेलौं? यशोधर- ननौर। गाम तँ नीक बुझाएल। मुदा राजस्थाने जकाँ पानिक दशा। खाइर कोनो कि बेटीक बियाह करब। बेटाक करब। बैसिते गप-सप्प चलल। घरवारी कुल-गोत्र पुछलनि। कहलियनि। सोझे सुहरदे मुँहे कहलनि, कुटुमैती नै हएत। सुशीला- किअए, से नै पुछलियनि? यशोधर- कि पुछितियनि। उठि कऽ विदा भेलौं। सुशीला- भैया, दिन-दुनियाँ एहने अछि। कते दिन छी आ कि नै छी। मन लगले रहि जाएत। यशोधर- कोनो कि बेटीक अकाल पड़ि गेल जे भागिनक बियाह नै हएत। सुशीला- डाॅक्टर सहाएब ऐठाम कते गोटे पेटक बच्चा जँचबए आएल रहए। यशोधर- ओ सभ वियाहक दुआरे खुरछाँही कटैए। मुदा.....? सुशीला- मुदा की? यशोधर- माइयो-बापक सराध छोड़ि देत। वियाहसँ कि हल्लुक काज सराधक छै। सुशीला- ठनका ठनकै छै तँ कियो अपना मत्थापर दइ छै। ई तँ बुझै छी जे, जे 'गाए मारि कऽ जूत्ता दान' कहलो जाइ छै। मुदा बुझनहि कि हएत। आगूओ बढ़लौं? यशोधर- छोड़ि केना देब। तेसर ठाम गेलौं तँ पुछलनि जे लड़का गोर अछि कि कारी? सुशीला- किअए एहेन बात पुछलनि? यशोधर- लोकक माथमे भुस्सा भरि गेल छै। एतबो बुझैले तैयार नै जे मनुक्खक मनुखता गुणमे छिपल छै नै कि रंगमे। सुशीला- (निराश मने) कि झमेलिया ओहिना रहि जाएत। सृष्टि ठमकि जाएत? यशोधर- अखन लगन जोड़ नै केलकै हेन, तँए। जहिना संयोग आबि जेतै तहिया सभ ओहिना मुँह तकैत रहत आ बियाह भऽ जेतै। यशोधर- बहीन, ऐ लेल मनमे दुख करैक काज नै । जखन काजमे भीड़ गेलौं तँ कइये कऽ अंत करब। ओना एकटा लगलगाउ बुझि पड़ल। सुशीला- की लगलगाउ? यशोधर- ओ कहलनि जे अहूठामक परिवार, परिवारक काज देख लियौ आ ओहूठामक देख कऽ, काज सम्हारि लेब। भागेसर- ई काज हेबे करत। अपनो ब्रह्म कहैए जे एक रंगाह परिवार (एक व्यवसायसँ जुड़ल)मे कुटुमैती भेने परिवारमे हड़हड़-खटखट कम हएत? सुशीला- (मूड़ी डोलबैत) हँ, से तँ हएत। मुदा विधताक चूक भेलनि जे मनुक्खोकेँ सींघ नाङ किअए ने देलखिन। @ तेसर दृश्य (राजदेवक घर। पोता श्यामकेँ पढ़बैत।) राजदेव- बौआ, स्कूलमे कते शिक्षक छथि? श्याम- थर्टिन गोरे। राजदेव- ऐ बेर कोनमे जाएब? श्याम- थ्रीमे। (हाथमे अखवार नेने कृष्णानन्दक प्रवेश।) कृष्णानन्द- कक्का, एकटा दुखद समाचार अपनो समाजक अछि? राजदेव- (जिज्ञासासँ) से कि, से कि? कृष्णानन्द- (अखवार उनटबैत। आंगुरसँ देखबैत।) देखियौ। चिन्है छिऐ एकरा? राजदेव- (दुनू आँखि तरहत्थीसँ पोछि गौरसँ देखए लगैत।) ई तँ चिन्हरबे जकाँ बुझि पड़ैए। कनी गौरसँ देखए दाए हाथमे तानल बन्दूक जकाँ बुझि पड़ैए। कृष्णानन्द- हँ, हँ कक्का, पुरानो आँखि अछि तैयो चिन्हि गेलिऐ। राजदेव- कनी आरो नीक जकाँ देखए जाए। गामक तँ एक्के गोरे सीमा चौकीपर रहैए। ब्रह्मदेव। कृष्णानन्द- (दुनू आँखिक नोर पोछैत।) हँ, हँ कक्का। हुनके छातीमे गोली लगलनि। मुँह देखै छिऐ खुजल। देश भक्तिक नारा लगा रहलाहेँ। राजदेव- (तिलमिलाइत।) बौआ, तोरे संगे ने पढ़ै छेलह। कृष्णानन्द- संगिये छेलाह। अपना क्लासमे सभ दिन फस्ट करै छलाह। हाइये स्कूलसँ मनमे रोपि नेने छेलाह जे देश भक्त बनब। से निमाहियो लेलनि। राजदेव- बौआ, देश भक्तक अर्थ संकीर्ण दायरामे नै विस्तृत दयरामे छै। ओना अपन-अपन पसन आ अपन-अपन विचार सभकेँ छै। कृष्णानन्द- कनी फरिछा कऽ कहियौ? राजदेव- देखहक, खेतमे पसीना चुबबैत खेतिहर, सड़कपर पत्थर फोड़ैत बोनिहार, धारमे नाओ खेबैत खेबनिहार सभ देश सेवा करैत अछि, तँए देशभक्त भेलाह। कृष्णानन्द- (नमहर साँस छोड़ैत।) अखन धरि से नै बुझै छलिऐ। राजदेव- नहियो बुझैक कारण अछि। ओना देश सीमाक रक्षा बाहरी दुश्मनक (आन देशक) रक्षाक लेल होइत अछि। मुदा जँ मनुष्यमे एक-दोसराक संग प्रेम जगत तँ ओहुना रक्छा भऽ सकैए। मुदा से नै अछि। कृष्णानन्द- (मूड़ी डोलबैत।) हँ से तँ नहिये अछि। राजदेव- मुदा देशक भीतरो कम दुश्मण नै अछि। एहेन-एहेन रूप बना मासूम जनताक संग कम गद्दारी केनिहारोक कमी नै अछि। कृष्णानन्द- से केना? राजदेव- देखते छहक जे जइ देशमे खाइ बेतरे लोक मरैए, घर दवाइ, पढ़ै-लिखैक तँ बात छोड़ह। तइ देशमे ढोल पीटनिहार देश सेवक सभ अपन सम्पत्ति चोरा-चोरा आन देशमे रखने अछि ओकरा कि बुझै छहक? कृष्णानन्द- हँ, से तँ ठीके कहै छी। राजदेव- केहेन नाटक ठाढ़ केने अछि से देखै छहक। आजुक समैमे सभसँ पैघ आ सभसँ भयंकर प्रश्न देशक सोझा ई अछि जे सभकेँ जीबै आ आगू बढ़ैक समान अवसर भेटै। कृष्णानन्द- हँ, से तँ जरूरिये अछि। राजदेव- एक्के दिस एहेन बात नै ने अछि? कृष्णानन्द- तब? राजदेव- समाजोमे अछि। कनी गौर कऽ कऽ देखहक। पैछले बर्ख ने ब्रहमदेवक बियाह भेल छलै? कृष्णानन्द- एक्कोटा सन्तान तँ नै भेलैक अछि। कृष्णानन्द- नै। हमरा बुझने तँ भरिसक दुनू परानीक भेँटो-घाँट तेना भऽ कऽ नै भेल हेतै। किअए तँ गाम अबिते खबड़ि भेलै जे सीमापर उपद्रव बढ़ि गेल, तँए सबहक छुट्टी केन्सिल भऽ गेल। बेचारा बियाहक भोरे बोरिया-विस्तर समेटि दौड़ल। राजदेव- अखन तँ नव-धब घटना छै तँए जहाँ-तहाँ वाह-वाही हेतै। मुदा प्रश्न वाह-वाहीक नै प्रश्न जिनगीक अछि। बेटाक सोग माए-बापक आ पतिक दुख स्त्रीकेँ नै हेतै? कृष्णानन्द- हेबे करतै। राजदेव- एना किअए कहै छह जे हेबे करतै। जहिना एक दिस मनुष्य कल्याणक धरम हेतै तहिना दोसर दिस माए-बाप अछैत बेटा मृत्युक दोष, समाज सेहो देतनि। कृष्णानन्द- (गुम होइत मूड़ी डोलबए लगैत।) राजदेव- चुप भेने नै हेतह। समस्याकेँ बुझए पड़तह। जे समाजमे केना समस्या ठाढ़ कएल जाइए। तोंही कहह जे ओइ दूध-मुँहाँ बच्चियाक कोन दोख भेलै। कृष्णानन्द- से तँ कोनो नै भेलै। राजदेव- समाज ओकरा कोन नजरिये देखत? कृष्णानन्द- (मूड़ी डोलबैत।) हूँ-अ-अ। राजदेव- हुँहकारी भरने नै हेतह। भारी बखेरा समाज ठाढ़ केने अछि। ओइ, बच्चियाक भविष्य देखनिहार कियो नै अछि, मुदा......? कृष्णानन्द- मुदा की? राजदेव- यएह जे, एक दिस कलंकक मोटरीसँ लादि देत तँ दोसर दिस जीनाइ कठिन कऽ देत। कृष्णानन्द- हँ, से तँ करबे करत। राजदेव- तोही कहह, एहेन समाजमे लोकक इज्जत-आवरू केना बचत? कृष्णानन्द- (मूड़ी डोलबैत। नमहर साँस छोड़ि।) समस्या तँ भारी अछि। राजदेव- नै, कोनो भारी नै अछि। सामाजिक ढर्ड़ाकेँ बदलए पड़त। विघटनकारी सोच आ काजकेँ रोकि कल्याणकारी सोच आ काज करए पड़त। तखने हँसैत-खेलैत जिनगी आ मातृभूमिकेँ देखत। कृष्णानन्द- (मुस्की दैत।) संभव अछि। राजदेव- ई काज केकर छिऐ? कृष्णानन्द- हँ, से तँ अपने सबहक छी। राजदेव- हँ। ऐ दिशामे एक-एक आदमीकेँ डेग बढ़बैक जरूरत अछि। @ चारिम दृश्य (भागेसर दरबज्जा सजबैत। बहाड़ि-सोहाड़ि चारिटा कुरसी लगबैत। कुरसी सजा भागेसर चारूकात निहारि-निहारि गौर करैत। तहीकाल बालगोविन्द आ राधेश्यामक प्रवेश।) भागेसर- (कुरसीपर सँ उठि।) आउ, आउ। (कुरसीपर तीनू गोरे बैसैत।) बालगोविन्द- (राधेश्यामसँ।) बौआ, बेटी हमर छी, वहीन तँ तोरे छिअ। अखन समए अछि तँए......? भागेसर- अपने दुनू बापूत गप-सप्प करू। (उठि कऽ भीतर जाइत।) राधेश्याम- अहाँक परोछ भेने ने......। जाबे अहाँ छिऐ, ताबे हम.....। भागेसर- नै, नै। परिवारमे सभकेँ अपन-अपन मनोरथ होइ छै। चाहे छोट भाए वा बेटाक बियाह होउ आकि बेटी-बहीनक होउ। राधेश्याम- हँ, से तँ होइते अछि। मुदा अहाँ अछैत जते भार अहाँपर अछि ओते थोड़े अछि। तखन तँ बहीन छी, परिवारक काज छी, कोनो तरहक गड़बड़ भेने बदनामी तँ परिवारेक होइत अछि। बालगोविन्द- जाधरि अंजल नै केलौंहेँ ताधरि दरबज्जा खुजल अछि। मुदा से भेलापर बान्ह पड़ि जाइत अछि। तँए......? राधेश्याम- हम तँ परदेश खटै छी। शहरक बेबहार दोसर रंगक अछि। गामक की बेबहार अछि से नीक जकाँ थोड़े बुझै छी। मुदा तैयो......? बालगोविन्द- मुदा तैयो कि? राधेश्याम- ओना तँ बहुत मिलानीक प्रश्न अछि मुदा किछु एहेन अछि जेकर हएब आवश्यक अछि? बालगोविन्द- आब कि तोहूँ बाल बोध छह, जे नै बुझबहक। मनमे जे छह से बाजह। मन जँचत कुटुमैती करब नै जँचत नै करब। यएह तँ गुण अछि जे अल्पसंख्यक नै छी। राधेश्याम- कि अल्पसंख्यक? बालगोविन्द- जइ जातिक संख्या कम छै ओकरा संगे बहुत रंगक बिहंगरा ठाढ़ होइत अछि। मुदा जइ काजे एलौंहेँ तेकरा आगू बढ़ाबह। कि कहलहक? राधेश्याम- कहलौं यएह जे कमसँ कम तीनक मिलानी अवस होइ। पहिल गामक दोसर परिवारक आ तेसर लड़का-लड़कीक। बालगोविन्द- जँ तीनूक नै होइ? राधेश्याम- तँ दुइयोक। बालगोविन्द- अपन परिवारक बेबहार छह तेहने अहू परिवारक अछि। गामो एकरंगाहे बुझि पड़ैए। लड़का-लड़की सोझेमे छह। राधेश्याम- तखन किअए काज रोकब? (जगमे पानि आ गिलास नेने आबि, टेबुलपर गिलास रखि पानि आगू बढ़बैत। गिलास हाथमे रखि।) बालगोविन्द- नीक होइत जे पहिने काजक गप अगुआ लेतौं। भागेसर- अखन धरि अहूँ पुरने विध-बेबहारमे लटकल छी। कुटुमैती हुअए वा नै मुदा दरबज्जापर आबि जँ पानि नै पीब, ई केहन हएत? बालगोविन्द- (पानि पीबैत। तहीकाल झमेलिया चाह नेने अबैत।) पानि पिआ दुनू गोटेकेँ चाहक कप दैत अपनो कुससीपर बैस चाह पीबए लगैत। बालगोविन्द- समए तेहन दुरकाल भऽ गेल जे आब कथा-कुटुमैतीमे कतौ लज्जति नै रहैए। बसीसँ बेसी चारि-आना कुटुमैती कुटुमैती जकाँ होइए। बारह आनामे झगड़े-झंझट होइए। भागेसर- हँ, से तँ देखते छी। मुदा हवा-बिहाड़िमे अपन जान नै बँचाएब तँ उड़ि कऽ कतएसँ कतए चलि जाएब, तेकर ठेकान रहत। बालगोविन्द- पैछला लगनक एकटा घटना कहै छी। हमरे गामक छी। कुल-खनदान तँ दबे छलनि मुदा पढ़ि-लिख परिवार एते उन्नति केने अछि जे इलाकामे कियो कहबै छथि। भागेसर- वाह। बालगोविन्द- लड़को-लड़की उपरा-उपरी। कमसँ कम पचास लाखक िबयाहो भेल छलै। मुदा खाइ-पीबै बेरमे तते मािर-दंगा भेल जे दुनूकेँ मन रहतनि। भागेसर- मारि किअए भेल? बालगोविन्द- पुछलियनि ते कहलनि जे बियाह-दानमे कोनो रसे नै रहि गेल अछि। लड़काबला सदिखन लड़कीबलाकेँ निच्चा देखबए चाहैत तँ सरियाती बरियातीकेँ। अही बीचमे रंग-विरंगक बखेरा ठाढ़ कऽ मारि-पीट होइए। भागेसर- एहेन बरियातीमे जाएबो कठिन। बालगोविन्द- सज्जन लोक सभ छोड़ि देलनि। मुदा तैयो कि बरियाती कम जाइए। तते ने गाड़ी-सवारी भऽ गेल जे हुहुऔने फिरैए। भागेसर- खाइर, छोड़ू दुनियाँ-जहानक बात। अपन गप करू। बालगोविन्द- हमरेसँ पुछै छी। कन्यागत तँ सदति चाहै छथि जे एकटा ऋृण उताड़ैमे दोसर ऋृण ने चढ़ि जाए। अपने लड़काबला छिऐ। कोना दुनू परिवारक कल्याण हएत, से तँ......? भागेसर- दुनियाँ केम्हरो गुड़ैक जाउ। मुदा अपनोले तँ किछु करब। आइ जँ बेटा बेच लेब तँ मुइलापर आगि के देत। बेचलाहा बेटासँ पैठ हएत। बालगोविन्द- कहलिऐ तँ बड़बढ़िया। मुदा समाजक जे कुकुड़चालि छै से मानता दुनू परिवार मिल-जुलि काज ससारि लेब। मुदा नढ़िया जकाँ जे भूकत तेकर कि करबै? भागेसर- हँ से तँ ठीके पैछलो नीक चलनि आ अखुनको नीक चलनि अपना कऽ अधला छोड़ देब। किअए कियो भूकत। जँ भूकबो करत तँ अपन मुँह दुखाओत। क्रमश: ३ कथा बिहरन (पूर्वांश) जहिना चैत-बैशाखक लहकैत धरती गरमाएल वायुमंडलक बीच अनायास हवा कऽ खसने बिहाड़िक प्रतिक्षा कएल जाइत, अनायास सुर्ज मेघक छोट-छीन चद्दरि ओढ़ए लगैत, रेलगाड़ी सदृश्य अवाज दौड़ए लगैत, रहि-रहि कऽ गुलाबी वस्त्र सज्जित ठनका ठुनकए लगैत तँए अनुमानित मन मानैले बेबस भऽ जाइत जे बिहाड़ि पानि पाथर ठनका संग आबि रहल अछि, तहिना रघुनन्दन आ सुलक्षणीक परिवारमे ज्योति कुमारीक जन्मसँ भेलनि। भलहिं आइ-काल्हि बेटीक जन्म भेने माए-बाप अपन सुभाग्यकेँ दुरभाग मानि मनकेँ कतबो किअए ने कोसथि जे परिवारमे बेटीक बाढ़ि हिमालयसँ समुद्र दिस निच्चा मुँहे ससरब छी मुदा से दुनू बेकती सुलक्षणीकेँ नै भेलनि। जहिना गद्दा पाबि कुरसी गदगर होइत तहिना दुनू प्राणी रघुनन्दनक मन गद-गद। से खाली परिवारे धरि नै सर-समाज, कुटुम-परिवार धरि छलनि। ओना आन संगी जकाँ रघुनन्दन नै छलाह जे तीनिये मासक पेटक बच्चाकेँ दुश्मन बनि मोछ पीजबैत आ ने अपन रसगर जुआनी छोलनी धीपा-धीपा दगैत। दुनू परानी बेहद खुशी। किअए नै खुशी रहथि, मन जे मधुमाछी सदृश्य मधुक संग मधुर मुस्कान दैत छलनि। पुरूष अपन वंश बढ़बै पाछु बेहाल आ नारीकेँ हाथ-पएर बान्हि बौगली भरि रौदमे ओंघरा देब कते उचित छी। दुनू प्राणीक वंश बढ़ैत देख दुनू बेहाल। मन तिरपित भऽ तड़ैप-तड़ैप नचैत। आेना तीन भाइक पछाति ज्योतिक जन्म भेल, मुदा तइसँ पहिने आगमनो नै भेल छलनि जे दोखियो बनितथि। भगवानोक किरदानी कि नीक छन्हि, नीको कोना रहतनि काजक तते भार कपारपर रखने छथि जे जखन टनकी धड़ै छन्हि तखन खिसिया कऽ किछुसँ किछु कऽ दैत छथि। मुदा से लोक थोड़े मानतनि, मानबो किअए करतनि जखन अपने अपने हाथ-पएर लाड़ि-चाड़ि जीबैए तखन अनेरे अनका दिस मुँहतक्कीक कोन जरूरत छै। किअए ने कहतनि जे अहाँ िनर्माता छी तखन तराजू एक रंग राखू, किअए ककरो जेरक-जेर बेटा दइ छिऐ आ ककरो जेरक-जेर बेटी। जँ देबे करै छिऐ ते बुद्धि किअए भंगठा दइ छिऐ जे बेटासँ धन अबैत अछि आ बेटीसँ जाइत अछि। जइसँ नीको घरमे चोंगराक जरूरत पड़ि जाइ छै। उच्च अफसरक परिवार तँए परिवारिक स्तर सेहो उच्च। भलहिं किअए ने माए-बाप छाँटि परिवार होइन। खगल परिवार जकाँ सदति गरजू नै। परिवारक खर्च समटल तइसँ खुल्ला बजारक कोनो असरि नै। सरकारी दरपर सभ सुविधा उपलब्ध, जइसँ खाइ-पीबैसँ लऽ कऽ मनोरंजनक ओसार चकमकाइत। भलहिं जेकर अफसर तेकर बात बुझैमे फेर होइन। जइसँ महगी-सस्ती बुझैमे सेहो फेर भऽ गेल होइन। मुदा परोछक बात छी चारू बच्चाक प्रति समान सिनेह रहलनि। परिवारमे सभसँ छोट बच्चा रहने सबहक मनोरंजनक वस्तु। मुदा गुरूआइ तँ ओहिना नै होइ छै, तँए सभ अपन-अपन महिक्का मनक टेमीसँ सदति देखैत, जप करैत। आखिर ऐ धरतीपर ज्ञान दानी नै होथि। भलहिं ओ अधखिजुए वा अधपकुए कियो ने होथि। जहिना कोनो मालीक बच्चा पिताक संग जामंतो (अनेको) रंगक फूलक फुलवारीमे जिनगीक अनेको अवस्था देख चौकैत तहिना भरल-पूरल परिवारमे ज्योतियोकेँ भेलनि। देखलनि जे गुलाबक कलीमे जहिना अबैत-अबैत रंगो, सौन्दर्यो आ महको अबैत अछि तहिना ने जिनगी छी। जँ मनुष्यकेँ डोरीसँ बान्हल जाय तँ डोरी तोड़ैक उपाए तँ हुनको छन्हि। समुचित वातावरण ज्योति संगी-साथीक बीच नीकक श्रेणीमे आबि गेलि। जहिना संगीक सिनेह तहिना शिक्षकोक सिनेह भेटए लगलनि। जहिना टिकट कटाओल यात्री गाड़ीमे सफर करैत तहिना समतल जिनगी पाबि ज्योति आगू बढ़ए लागलि। जिनगीमे बधो अबै छै तइसँ पूर्ण अनभिज्ञ ज्योति। जना कर्म-धर्म बनि जिनगीक बाट बनौने होय। क्रमश: ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। बेचन ठाकुर, गाम चनौरागंज, झंझारपुर, मधुबनी। बेचनजी विगत पचीस बर्खसँ मैथिली नाटकक लेखन आ निर्देशनमे जुटल छथि। हिनकर एक दर्जन नाटक ग्रामीण सभक मोन तँ मोहनहिये छल, हिनकर विदेहमे प्रकाशित छीनरदेवी आ बेटीक अपमान विश्व भरिमे पसरल मैथिली भाषीक बीचमे कएकटा समीक्षात्मक बहस शुरू कऽ देने अछि। जखन मैलोरंग अपन सर्वेक्षण शुरू केलक जे मैथिलीक सर्वश्रेष्ठ नाटक महेन्द्र मलंगियाक ओकर आंगनक बारहमासा वा बेचन ठाकुरक बेटीक अपमान आ आशीष अनचिन्हारक समीक्षापर बहस चलिये रहल छल तँ तारानन्द वियोगीक कथन आबि गेल, ऐ सर्वेक्षणकेँ रोकबाक आग्रह करैत- "हम त चकित छी प्रकाश। की मैथिलीक एहन दुर्दिन आबि गेलै जे आब एना तुलना कएल जेतै? जकरा बल पर सौंसे भारतीय साहित्य मे मैथिलीक झंडा बुलन्द मानल जाइत रहल अछि, तकरा मादे हमर नवतुरिया सब एना बात करता? एतेक सतही आ विवेकहीन पीढी मिथिला पैदा केने छथि यौ? की पं० गोविन्द झाक ओ कथन सत्य होब'बला छै जे तीस-चालीस साल मे मैथिली मरि जाएत। (मैथिली माने मैथिली साहित्य।) एना नहि काज चलत। किछु करियौ बाबू।" मुदा प्रकाश बाबू कहलखिन्ह- "सर ! किछु कारण अछि । सब नवतुरियाक स्थिति एक रंग नहि छनि । सभहक अपन अपन मनतव्य छनि । मुदा अँग्रेजी मे एकटा कहाबत अछि । सरभाइवल ऑफ दी फिटेस्ट.... । जे कियो जे किछु सोचैइथ मुदा मैथिली आ नाटक लेल सोचैत छैथि यैह हमरा लेल जीवन दायी अछि ।" तारानन्द वियोगी फेर लिखलन्हि- "मिथिलाक प्रति जं प्रेम अछि, तं अपन बिरासत कें चिन्हनाइ आ ओहि पर गर्व करनाइ सीखू। हरेक भाषा मे किछु एहन रचना होइ छै जे 'क्लासिक्स' के कोटि मे अबै छै। । (से मैथिलियो मे छै) जखन आगुओ कोनो ओहि टक्कर के रचना आबि जाइ छै तं ओकरा सम्मान दैत पूर्वक क्लासिक्स के बराबर मे राखल जाइ छै। एहि लेल बिरासत कें खारिज करब जरूरी नै छै। मानि लिय' जे गजेन्द्र ठाकुर बड्ड विशिष्ट कवि छथि, तें की अहां ई सर्वेक्षण कराएब पसन्द करब जे 'विद्यापति पैघ कवि की गजेन्द्र ठाकुर?' साहित्य के संस्कृति मे आम तौर पर एना नहि कएल जाइ छै। मुदा 'खास' तौर पर जं करए चाही, तं ताहि सं ककरो के रोकि सकै छै। राजनीति के संस्कृति मे तं से चलन छैके।" तइपर उमेश मंडल जवाब देलखिन्ह जे ई उदाहरण तखन सटीक होइतए जँ बेचन ठाकुर वा महेन्द्र मलंगियाक तुलना ज्योतिरीश्वरसँ कएल जाइत। ऐ डिसकसनक शुरूमे प्रकाशजीक विचार बेचनजीक नाटकक विरुद्ध छलन्हि आ से पुनः सिद्ध भेल जखन बेचन ठाकुरक "अधिकार" नाटक ऐ टिप्पणीक संग पोस्ट कएल गेल तँ ओ ओकरा डिलीट कऽ देलन्हि। एना किए भेल? जखन प्रकाश झा महेन्द्र मलंगियाक नाटक करबै छथि (मैथिलीमे विदेहक एलासँ पूर्व प्रूफरीडरकेँ सम्पादक कहल जाइ छल आ नाटकमे जे कियो कोनो काज नै करथि कुर्सीपर पएर लटका क' बैसथि आ गप छाँटथि तकरा नाटकक निर्देशक कहल जाइ छल) तँ 90 प्रतिशत दर्शक मैथिल ब्राह्मण आ जखन संजय चौधरी मलंगियेक नाटक करै छथि तँ 90 प्रतिशत दर्शक कर्ण कायस्थ; आ दुनू गोटे मैथिलीक नामपर सरकारी संगठनसँ, जे टैक्सपेयरक पाइसँ चलै छै, पाइ ल' नाटक करै छथि, शहरो वएह दिल्ली छिऐ। ई समाज किए तोड़ल जा रहल अछि? आ दु जातिक अतिरिक्त शेष मैथिली भाषी? मुदा तइले वियोगीजीक आह्वान प्रकाशकेँ नै भेटै छन्हि! किए!! आ प्रकाशजी बेचनजीक नामो बेचा ठाकुर लिखै छथि आ पाठकक ऐपर भेल विरोधक बावजूद सुधार नै करै छथि से उच्चारण दोष, ह्रिजै दोष अनायास भेल नै सायास भेल सिद्ध होइत अछि। प्रकाशजी उमेश मंडलकेँ कहै छथि जे ओ हुनकासँ सम्पर्क बढ़ेबामे रुचि नै राखै छथि मात्र फोनपर गप छन्हि से हमहूँ 2008 मे प्रकाशजीक पहिल बेर नाम नाम सुनने रहियन्हि, मिथिलांगनक अभय दास नाम-नम्बर देने रहथि आ तहियासँ दू-तीन बेर 2-3 मिनटक फोनपर गप अछि आ 2-3 बेर ठाढ़े-ठाढ़े गप अछि, अंतिम बेर जखन उमेश मंडल जीक कहलापर जगदीश प्रसाद मण्डल जीक नाटक हुनका देने रहियन्हि आ ओ ओइ बदलामे मलंगियाजीक पोथी कूरियरसँ पठेबाक गप कहने रहथि। वियोगीजी आ प्रकाशजी अखनो धरि "मेडियोक्रिटी" सँ बाहर नै आबि सकल छथि आ सार्थक सम्वाद आ समालोचना सहबामे तत्काल अक्षम छथि। जँ जँ ओ लोकनि आर मेहनति करताह आ "मेडियोक्रिटी"सँ बाहर बहरेताह तँ तँ हुनका लोकनिमे समालोचना सहबाक क्षमता बढ़तन्हि। टैक्सपेयर तँ सभ छथि, ओतए तँ जाति-भेद नै छै। मुदा "अधिकार" नाटक डिलीट नै कएल जा सकल, ई बचि गेल कारण ऐ नाटकक कएक टा बैकप कतेक संगणकपर उपलब्ध छल। से ऐ परिप्रेक्ष्यमे बेचन ठाकुर जीक तेसर नाटक "अधिकार" विदेहमे देल जा रहल अछि आ आशा करैत छी जे आशीष अनचिन्हार फेर ऐ नाटकक समीक्षा करताह आ सूतल लोक जेना आँखि मीड़ैत उठल अछि तहिना ई नाटक ग्रामीणक पहिने आ मैथिली नाटकक किछु ठेकेदार समीक्षक/ निर्देशक लोकनिक पछाति निन्न तोड़त। संगहि जेना मजारपर वार्षिक उर्स होइ छै जतए लोक सालमे एक बेर चद्दरि चढ़ा आ अगरबत्ती जड़ा क' कर्तव्यक इतिश्री मानि लैए, तहिना मैथिलीक नामपर खुजल कागजी संगठन सभक, जे बेसी (95 प्रतिशत) मैथिल ब्राह्मण सम्प्रदाय द्वारा टैक्सपेयरक पाइकेँ लुटबा लेल फर्जी पतापर बनाएल गेल अछि, वार्षिक (बर्खमे ओना एक्के बेर हिनकर सभक निन्न खुजै छन्हि) काजक समीक्षा होएबाक चाही। जखन हम संस्कृत वीथी नाटकक निर्देशन/ अभिनय करै छलहुँ तँ ओतए अभिनय केनिहार सभक आ सह-निर्देशक लोकनिक प्रतिभा आ मेहनति देखि हर्ष होइ छल; मुदा एतए प्रतिभाक दरिद्रता किएक? उत्तर अछि जे एक जातिकेँ लेब आ तहूमे तै जातिकेँ जकरा अभिनयसँ पारम्परिक रूपमे कोनो लेना देना नै छै, आ जकरा लेना-देना छै तकरा अहाँ बारने छी तँ की हएत? जखन हरखा पार्टीमे खतबेजी रावणक अभिनय करै छलाह तँ से आ जखन ओ चन्द्रहास नाटकमे खलनायकक नै वरन चरित्र अभिनेताक अभिनय करै छलाह से, दुनू मे कियो नै कहि पबै छल जे कोन अभिनय बीस! बच्चामे गाममे आँखिसँ देखल अछि। संगहि जे लिस्ट गनाओल जाइत अछि, तैमे खतबे जी कतौ नै!! दसटा मैथिली निर्देशक छथि जे पटना, कलकत्ता, दिल्ली, मुम्बइ, चेन्नइमे (सभटा मिथिलासँ बाहर) निवास करै छथि आ 200 लोकक सोझाँमे ऑडिटोरियममे नाटक करबै छथि आ कलाक न्यूनताक पूर्ति लाल-पीअर-हरियर लाइट-बत्ती जड़ा क' करै छथि (किछु अपवादो छथि), की भरि मिथिलामे एतबे नाटक मैथिलीमे होइए आ की एतबे निर्देशक मैथिलीमे छथि? गाम-गाममे पसरल असली मैथिली नाटकक निर्देशकक सूची आ हुनका द्वारा बिना टैक्सपेयरक फण्डसँ खेलाएल गेल नाटकक अभिलेखनक काज विदेह टीम द्वारा चलि रहल अछि जकर विस्तृत सूची "सर्वे ऑफ मैथिली लिटेरेचर वोल्यूम.2 मे देल जाएत। प्रस्तुत नाटक इन्दिरा आवास योजनाक अनियमितताकेँ आर.टी.आइ.सँ देखार करैबला आ रिक्शासँ झंझारपुरसँ दिल्ली जाइबला (आ अभिषेक बच्चनसँ झंझारपुरमे पुरस्कार पाबैबला) असली चरित्र मंजूरक कथा अछि जे डिलीट नै कएल जा सकल मुदा किए डिलीट कएल जा रहल छल, किनकर हितकेँ ऐ नाटकसँ खतरा छन्हि/ छलन्हि आ किए एकर विरोध एतेक तीव्र रूपमे भेल, से सभटा आब फरिच्छ भ' गेल अछि। -गजेन्द्र ठाकुर, सम्पादक, विदेह। अधिकार -श्रीसरस्वत्यै नमः- महान सामाजिक एवं क्रांतिकारी मैथिली लघुनाटक अधिकार दृश्य - एक ( स्थान - मुखिया चन्दनक घर। दलान पर चारि-पाँचटा कुर्सि लागल छै। मुखियाजीक मुहँलगुआ अमरनाथ आ चन्दन कुर्सी पर बैस गपसप क ऽ रहल छथि। ) अमरनाथ - मुखियाजी, आइ-काल्हि कोनो मुल्हा फँसलै की नै। चंदन - फँसिते रहै छै की। ओना दू-तीनि दिनसँ बाहिनीओ नै भेल अमर भाई। अमरनाथ - मुदा बड कसिक ऽ ध ऽ लै छिऐ अहाँ। चंदन - की करबै , अहीं कहु। हमरा सरकार कोनो तनखाह दै छै ? (मंजूरक प्रवेश पूर्ण गरीबी अवस्था में ) मंजूर - मुखियाजी प्रणाम। चंदन - प्रणाम प्रणाम। आउ मंजूर भाई। ( मंजूर भूइया पर बैसि जाइ अछि।) मंजूर भाइ , नीच्चाँमे किआए बैसलहुँ ? कुर्सी पर बैसु ने। मंजूर - हम कुर्सी पर बैसैबला लोके नै छियै। कुर्सि पर हाकिम सभ बैसै छथिन्ह। अमरनाथ भाई , प्रणाम । अमरनाथ - प्रणाम प्रणाम , कहु मंजूर भाई, की हाल चाल ? मंजूर - जीऐ छी नै मरै छी , हुक्कुर-हुक्कुर रिै छीै अहाँ ऐ फाटल-चिटल लोक पर , कोनो ध्याने नै दै छी ।। अमरनाथ - कहु धिया-पुताक हाल-चाल , घरवालीक हालचाल ? मंजूर - की कहब , धिया-पूता चारि-पाँचटा बेसी भ ऽ गेलै। तैसँ अक्कछ रहै छी। कहलनि अपरेशन करा ऽ लिअ त कहलनि अपना सबहक हदीशमे से नै लिखल छै। आ फेर कहलनि हुअ न दियौ कत्ते हेतै अपन-अपन कमा ऽ खेतै। (चन्दन आ अमरनाथ मुस्काए रहल छथि। ) अमरनाथ - मंजूर भाइ , कनियां थेहगर छ से ? मंजूर - की पूछै छी ? आब नै सकै छी तैयो बड हरान क ऽ दै आए। आब छोड़ भाइ मजाक तजाक। ऐ बुढ़बाकेँ की चटै छी ? चन्दन - कह मंजूर केम्हर-केम्हर एलाह ? मंजूर - सरकार, इन्दिरा आवासवला गप हम कहिया कहलौं 2006ए में। कत्ते दिन भ ऽ गोलै ? ताबे कत्ते आदमीकेँ इन्दिरा आवास भेटबो केलै। सरकार हमरोसँ बेसी गरीब कियो छै ? टमटम चलबै छेलौं त ऽ घोड़ीओ खर्च नै निकलै छेलाए। सुखा-टटाक ऽ घोड़ीओ मरि गेल। करजा-बरजा ल ऽ क ऽ एगो पुरना रिक्षा कीनलहुँ। सेहो कहियो चलै बाए कहियो नै। टेम्पू-सवारी रिक्षेवलाक रोजी-रोटी खेलकै। आब हमरो पर ध्यान दियौ सरकार। बरसात में एक्को बुन्नी पानि बाहर लै खसै छै। चन्दन - बीस हजार तोरा नाम सँ ऽ भेटतह । ओइमे की खरचा-बरचा करबहक ? मंजूर - हम त ऽ कहब, एक्को पाइ नै । मुदा अहीं कहियौ की केना लगतै ? चन्दन - अमरनाथ भाइ, कनी बूझाए दियौ। अमरनाथ - मजूर भाइ, ओना सभकेँ छ-सात हजार लगै छै, अहाँकेँ पाँच हजार लागतै। मंजूर - बाप रे बा, तहन हमरा की बचतै ? पनरह हजार मे केहेन घर हेतै ? अमरनाथ - किछु अपनो दिशिसँ लगा देबै। मंजूर - खाइ लाए मरै छी,धिया-पुता पन्नी बिछै आए रोड पर। ओइ मे से एक-दू साए टका खइ-पीऐ लाए द ऽ देब, सरकार। किरपा करियौ। चन्दन - पाँच हजार देबै तहने हाएत। नै त ऽ नै हाएत। बात जानी साफ। मंजूर - हे हे सरकार, पाएर पकड़ै छी। दाढ़ी पकड़ै छी। एगो घर डाइनो बकसै छै। एगो गरीबो केँ कल्सरण करू। नीक हाएत सरकार। चन्दन - बेसी नीक कमरा नै पचै छै। ओत्ते लगबे करत। मंजूर - तहन जाइ छी सरकार। जे करियौ। ओना एगो गरीबकेँ तारितियै ऽ ऽ ऽ ऽ। (प्रस्थान) चन्दन - हम फेर मुखिया हाएब की नै, के जनै छै ? माल बनेबाक बेर अनेक नै अछि। अमरनाथ - से त ऽ ठीके मूखियाजी। काल्हि के देखलकै ? ओना मंजूर वास्तवमें बड गरीब अछि। (पटाक्षेप) दृष्य - दू ( स्थान - मंजूरक सलाहकार विनोदक दलान विनोद कूर्सी पर बैसि पेपर पढ़ि रहल छथि। दीन हीन अवस्था में मंजूरक प्रवेश। ) म्ंाजूर - नेताजी प्रणाम। विनोद - प्रणाम प्रणाम। कह की हाल चाल ? आइ बहुत दिन पर देखलिअ। कह केम्हर-केम्हर एलाह ? म्ंाजूर - की पूछै छी नेताजी। मूखिया बिना घूसे ? इंदिरा आवास नै देम ऽ चाहैय। तहूमे बीस हजार मे कम-सँ-कम पाँच हजार। कहू त ऽ पनरह हजार मे की की करब ? अहूमे आइ चारि-पाँच सालसँ आइ-काल्हि आइ-काल्हि करै य। अखैन कतबो पाएर दाढ़ी पकड़लियैन तैयो उ नै घमलथि। एक्को बेर कहलथि, पाँच हजार देबै तहने हाएत। नै त नै हाएत। बात जानि साफ। अपने हमरा बुधि दिअजे एकर कोनो नियम कानून छै की नै ? विनोद - कानून त छै, मूदा दौड़ा-बढ़ी कर पड़तह। तों गरीब आदमी छह। तोरा सँ पार लागतह ? मंजूर - नेताजी, मरता क्या नहीं करता । मरल त हम छीहे। अहाँ हमरा रस्ता बताए दिअ, देखै छियै कानून मे दम छै की नै। उचितक लेल अहाँ हमरा जे कहब से करै लाए तैयार छी। विनोद - हम एगो आवेदन लिखि दैत छियह। मुखिया लग बखैन चलि जा द ऽ दिहक आ की कहै छह से फेर कहिहह। (विनोद मंजूर के एगो आवेदन लिख दैत छथि आ मंजूर उ ल ऽ क ऽ मुखिया लग तुरंत जाइ अछि। ) (पटाक्षेप) दृष्य - तीन ( स्थान - चन्दन मुखियाक दलान। दलान पर चन्दन आ अमरनाथ कुर्सी पर बैस गपसप क ऽ रहल छथि। मंजूरक प्रवेश। ) म्ंाजूर - मुखिया जी प्रणाम। चन्दन - प्रणाम प्रणाम। मंजूर - अमरनाथ भाइ प्रणाम। अमरनाथ - प्रणाम प्रणाम मंजूर भाइ। बैसू। मंजूर - की बैसब ? बैसलासँ पेट भरतै। मुखिया जी एगो दरखास छै, देखल जाउ। चन्दन - ल ऽ लिअ अमरनाथ। पढ़ियौ की लिखल छै। ( अमरनाथ दरखास्त लऽ कऽ पढ़ै छथि। मंजूर भूइयांमे बैसि जाइत अछि। ) अमरनाथ - सेवा में, श्रीमान् मुखिया महोदय। ग््रााम पंचायत राज रामपूर। महाशय, नम्र निवेदन अछि जे हम अति निर्धन व्यक्ति छी। अपन पंचाइत मे किनको सँ पहिने हमरा कोनो सुविधा भेटक चाही। ओइमे अपने हमरा पाछू छोड़ि दै छियै। इंदिरा आवास लाए चारि-पाँच साल सँ घूमबै छी। जै गरीबकेँ पाँच हजार टाका घुस लाए नै भेटै। ऐ संदर्भ मे अपने सँ करबद्ध प्रार्थना अछि जे एगो महागरीबकेँ निःषुल्क इंदिरा आवास प्रदान कऽ कल्याण काएला जाए। संगहि सूचना अधिकारक तहत पंचाइत सचिव सँ इंदिरा आवासवला आयव्याय फाइल उपलब्ध कराब ऽ मे सहयोग काएल जाए। धन्यवाद। अपनेक विष्वासी - मंजूर चन्दन - जाउ मंजूर, अहाँकेँ जै अधिकारक प्रयोग करबाक अछि करू ग। देख लेबै। नै, जदी पाँच हजार टाका ओइ मे से देबै तऽ अखनो भऽ सकैया। मंजूर - नै मुखियाजी , हमरा कानूनेमे जाए दिअ। चन्दन - जाउ न हम रोकने छी। मंजूर - बेस हम जाइ छी। (मंजूरक प्रस्थान ) अमरनरथ - मुखियाजी एकरा बुते एगो अल्हुआ तऽ उखरबे नै करतै आ आएल छेलाह धमकी दै लाए। केहेन-केहेन गेल्लाह तऽ मोंछवला एल्लाह। चन्दन - हा हा हा ऽ ऽ ऽ ऽ (ठहक्का मरि हँसै छथि। ) जाए दियौ अमरनाथ कत्त जेतै कानून अपना हाथमे छै। (पटाक्षेप) दृष्य - चारि (स्थान - विनोदक दलान। विनोद ससुराइर जाइक तैयारी मे छथि। तखने मंजूरक प्रवेश। ) म्ंाजूर - नेताजी प्रणाम। विनोद - प्रणाम प्रणाम। कह मंजूर, मुखियाजी भेटलखुन। मंजूर - हँ भेटलथि त जरूर। मुदा फेर ओएह गप्प। बिना पाँच हजार घुसे काज नै हाएत। अहाँके जै अधिकारक प्रयोग करबाक हुआए ये करू। विनोद - आब हुनक, किछु नै कहक। हम तोरा तीनिगो आवेदन लिख दै छियह। एगो बी0 डी0 आ0 केँ द ऽ दिहक, एगो एस0 डी0 ओ0 के द ऽ दिहक आ एगो डी0 एम0 केँ द ऽ दिहक। डर नै न हेतह। मंजूर - डर कथीके हेतै नेताजी। कोनो हम चोरी कर जाएव। अहाँ कनी हानिक ऽ लिखि दिअ। (विनोद तीनीगो आवेदन लिखि दै छथि। ) विनोद - मंजूर, ई तीनु आवेदन लाएह। तीनु ऑफिसमे दऽ दिहक। हम आइ ससुराइर जाइ छिसह। एक सप्ताहक बाद एबह। देखहक की होइ छै ? मंजूर - हम एखनइ जाइ छी नेताजी। विनोद - बेस जाह। हमहूँ लाइ छियह। (पहिने मंजूरक प्रस्थान। तकर बाद विनोदक प्रस्थान। )
(पटाक्षेप) दृष्य - पाँच ( बी0 डी0 ओ0 कार्यालय। गेट पर एगो सिपही छथि। बी0 डी0 ओ0 अषोक कार्यालय मे फाइल उनटा रहल छथि। तखने मंजूरक प्रवेश। सिपाही मानसिंह छथि। ) म्ंाजूर - प्रणाम सर। मनसिंह - प्रणाम प्रणाम। का बात हउ ? म्ंाजूर - सर, कनी बी0 डी0 ओ0 सहाएबकें भेंट करबाक छै। मानसिंह - बात का ह, से पहिले बोल न ? सहाएव जरूरी काममे फंसल बा ? म्ंाजूर - सर, हमरो बड जरूरी काज छै। इंदिरा आवासवला एगो दरखास छै। मानसिंह - अच्छा जा। (मंजूर अशोक लग पहुँचलथि।) म्ंाजूर - हाकिम परणाम। अषोक - बाजू की बात अछि ? म्ंाजूर - हाकिम इंदिरा आवासवला एगो दरखास छै। अषोक - अखैन उ सब काज नै होइ छै ब्लॉक मे। उ काज मुखिए करै छै। अपन मुखिए लग जाउ। मंजूर - हाकिम, मुखियासँ अक्कछ भऽ गेलहुँ जहन ने अपनेक शरणमे एलहुँ। चारि-पाँच साल पहिने बाढ़िमे घर दहाए गोल। सिरकी तानि सभ परानी कौहुना जीबै छी। अषोक - मुखिया की कीहलनि ? मंजूर - मुखिया कहलनि जे बीस हजारमे पाँच हजार लेब, तहने हाएत, नै त नै। अषोक - किछु लऽ दऽ के काम क ऽ लैतहुँ न ? मंजूर - हाकिम, हमरा उ बात एक्को रत्ती पसीन नै पड़ल। एक-दू साए वला गप रहितै तऽ सोंचबो करितिऐ। हाकिम, किरपा कऽ ई दरखास लियौ आ एगो गरीबोसँ गरीअ पर विचार करियौ। अषोक - बेस लाउ। ( मंजूर अषोककेँ दरखास दऽ दै छथि। ) मंजूर - परणाम हाकिम। जाइ छी हम। रिक्षा चलबै लाए जाएब। ( प्र स् था न ) अषोक - सेवा मे, श्रीमान् प्रखंड विकास पदाधिकारी महोदय, कार्यालय - भगवानपुर महाशस, सूचना अधिकारक तहत हम पूछै लाए चाहै छी जे इंदिरा आवास पाँच हजार घुसे लऽ किआए भेठत, ओना किआए नै भेटत ? एकर लिखित जवाब दूः दिनक अन्दर चाही। नै त आगू बढ़ब। धन्यवााद, मंजूर, ग्राम पंचाइत राजरामपुर। (अषोक आवेदन पढ़ि कूड़ामे फेंक दै छथि। ) एकर लिखित जबाब दू दिनक अन्दर चाही, नै तऽ आगू बढ़ब। जाउ, जत्त बढ़ब, तत्त बढ़ू। सब ठाम एक्के रंड. भेटत।
प टा क्षे प
दृष्य - छह
( स्थान - अनुमंडल कार्यालय। सुनील एस0 डी0 ओ0 आ बहादुर हुनक सिपाही छथि। सुनील फाइल उनटा रहल छथि। मंजूरक प्रवेश। ) म्ंाजूर - सर प्रणाम। बहादुर - प्रणाम प्रणाम। कत्त हुरार जकँा हुरकल जाइ छी ? रूकू। पहिने एत्त पाँच गो टका दिअ, तहन अन्दर जाएब। मंजूर - ( जोर सँ ) ऐ देहमे करौआ लागल छह की ? सरकार सँ तों तनखाह नै लै छहक ? बहादुर -अच्छा जा। बेसी बाजह नै ( मंजूर सुनील लग पहुँचल। ) मंजूर - परणाम हाकिम। सुनील - की बात ? मजूर - इंदिरा आवासवला एगो दरखास छै। लेल जाउ। सुनील - ( आवेदन लऽ कऽ ) अहाँ जाउ। मुजूर - जाइ छी हाकिम। एगो गरीबोकेँ कल्यााण करबै। परणाम।( मंजूरक प्रस्थान। ) सुनील - सेवा में, श्रीमान् अनुमंडलाधिकारी महोदय, बेनीपुर। महाशय, हम मंजूर ग्राम पंचाइत राज रामपूर स्थाई निवासी छी। चारि-पाँच साल पहिने बाढ़िमें काहि काटि रहल छी। इंदिरा आवास लाए मुखिया चंदन पाँच हजार टाका घुस मांड.ै आए। बी0 डी0 ओ0 साहेब सेहो हमर आवेदन पर कोनो ध्यान नै देलनि। सूचना अधिकारक तहत हम एकर लिखित जबाब दू दिनक अन्दर चाहै छी। अन्यथा आगू बढ़ब। धूः ई बकवासवला आवेदन छै। के माथा पच्ची करतै ऐमे ? ( सुनील आवेदन के कूड़ा मे फेंक दै छथि । )
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दृष्य - सात ( स्थान - समाहरणालय। डी0 एम0 चन्द्रकान्त कार्यालय में फाइल उनटा रहल छथि। गेट पर सिपाही हंसराज ठाढ़ छथि। तखने मंजूरक प्रवेश। ) म्ंाजूर - परणाम हूजूर। अन्दरा कलक्टर सहाएब छथिन्ह ? हंसराज - की बात ? मंजूर - हुनके सँ काज य। हंसराज - कोन काज स ? मंजूर - इंदिरा अवासवला एगो दरखस देबाक स हाकिमकेँ। हंसराज - लाउ ने पाँच हजार टाका, हमही काज कराऽ दै छी। हाथो-हाथ काज भऽ जाएत। मंजूर - खाएब, से ओकाइदे नै आ पाँच हजार टाका हम कत्त सँ देब ? हंसराज - तहन ऑफिसमे नै घुसु। घुरि जाउ। मंजूर - से किआए, अहींक ऑफिस छी लगाएल। हंसराज - बेसी फटर-फटर बाजलौंह तऽ एक्के झापर में ठीक भऽ जाएब। कोनो बाप काज नै देत - 3 मंजूर - बेसी बाप-बाप केलौं तऽ बुझिा लिअ। हंसराज - ( मंजूर के एक थापर मारि ) हरमी कहीं के। आब बाज कोन बाप काज देतौ। मंजूर - ( हंसराज केँ एक थापर मारि ) हरमी सभ, चोट्टा सब गरीबकेँ खाकऽ साँढ़-पारा भऽ गेल। ( हंसराज आ मंजूर में हाथापाई भऽ रहल अछि। हल्ला सुनि चन्द्रकान्त गेट पर एलाह। ) चंद्रकान्त - अहाँसब हल्ला-फसाद किआए करै छी ? हंसराज की भेलै ? हंसराज - सर, ई हमरा बिना मतलबकेँ गाड़ि द ऽ देलक। मंजूर - सर, पहिने इहाए हमरा गाड़ि देलक। तहन हम देलियै। चंद्रकान्त - धिया पुता जेकाँ गाड़ि-गलैज, मारि-पीट करै जाइ छी। छिः! छिः! लेक सब हँसत। बाजू बौआ, की बात अछि ? मंजूर - हूजूर एगो इंदिरा आवासवला दरखास छै। चंद्रकान्त - लाउ अन्दर आउ। ( मंजूर आ चन्द्रकान्त कार्यालस मे जाइ छथि। ) आब बाजू की कश्ट ? मंजूर - हजूर हम रिक्षा चालक छी। कमाइ छी तऽ खाइ छी। नै तऽ उपासे रहै छी। चारि-पाँच साल पहीने बाढ़िमें हमर झोपरी दीहा गोल। इंदिरा आवास लाए मुखियालजीकेँ कहलियन्हि तऽ उ कहलनि जे पाँच हजार टाका घूस देबही तहने हेतौ नै तऽ नै हेतौ। पाएरो दाढ़ीयो पकड़लियनि जे खाइ पीयै लाए, एक-दू साए टाका पेटो काटि कऽ देब। हमरा पर किरपा कएल जाउ। मुदा टस-सँ-मस नै भेलाह। हजूर, एगो हमर दरखास स्वीकार काएल जाउ। चंद्रकान्त - बेस लाउ। ( मंजूर चंद्रकान्तकेँ दरखास्त दऽ दै छथि। ) मंजूर - हजूर, हमरा पंचाइत मे हमरासँ बेसी गरीब कियो नै हाएत। अपने पता कऽ लियौ। एगो गरीब बड आशा सँ अपने लग पहुँचल अछि। किरपा अवस्स कएल जाउ हजुर। आब हम जाइ छी हजुर। तीनि दिनसँ भुखले छी। चंद्रकान्त - सेवा में, श्रीमान् समाहती महोदय , परसा महाशस , नम्र निवेदन अछि जे हम मंजूर ग्राम पंचाइत राज रामपुरक स्थाइ निवासी छी। हम अति निर्धन रिक्षा चालक छी। चारि-पाँच साल पहिने पहिने हमर झोपड़ी बाढ़िा में दहा गेल। हम सब परानी सिरकी तानि पषु जीवन जीबै छी। कृपया एगो इंदिरा आवासक अनुमति प्रदान काएल जाउ। ऐ लेल हम अपनेक आजीवन कृतज्ञ रहब। ओना मुखिया,बी0 डी0 ओ0 आ एस0 डी0 ओ0 के आचरणसँ हम पूर्ण आजीज छी। कृपया हमर अनुमति दू दिनक अंदर देबाक कश्ट करी। अन्यथा हम सूचना अधिकारक तहत घुसखोरीक विरूद्ध आवाज अवस्य उठाएब। धन्यवाद, ( आवेदन पढ़ि चन्द्रकांत कूड़ा में फेक दै छथि। ई तऽ सरासर धमकी भेलै। सूचना अधिकारक हमरा मुट्ठीमें छै। हम कोनो आइरी-गाइरी हाकिम छी, डी0 एम0 छी। ) हंसराज - ( अन्दर कार्यालय जाक ) सर, ई आदमी बड ख्च्चर छेलाह। जाहाँ कहलियै पाँच हजार घूस देबै तऽ हाथो-हाथ काज करा देब। फट सन एक थापर बैसा देलक। तकरे हाथापाई छेलै । चन्द्रकांत - जाए न दियौ। ओकरा कोनो ऑफिस गुदानतै।
प टा क्षे प दृष्य - आठ ( स्थान - विनोदक दलान। विनोद कुट्टी काटि रहल छथि। मंजूरक प्रवेश। ) म्ंाजूर - नेताजी परणाम। विनोद - परणाम परणाम। कह मंजूर, काज भेलह ? मंजूर - आइ पनरह दिन भऽ गोल। काजक कोनो अता-पता नै। बेकार लाए रोजी-रोटी छोड़ि कऽ हरानो भेलहुँ। विनोद - मंजूर, तों जिला तक पहुँचलक। तोहर काजक कोनो सुनबाई भेलै। आब बुझहकं प्रशासन केहेन भ्रश्ट छै। एकटा करह, छोड़ह माथा-पच्ची। जा कमैहह आ खैहह। ऐ सबहक चक्करमें नै पड़ह। ऐ रास्तामे बडा फैदरत छै। मंजूर - नेताजी, परेशानी झेलै लाए हम तैयार छी। अहाँ हमरा उपाइ बताउ। विनोद - हाईकोर्ट छै, सुप्रीम कोर्ट छै। सूचना आयोग छै। मंजूर - नेताजी, हमरा आहाँ जत्त जाइ लाए कहबै ओत्त जाइ लाए तैयार छी। विनोद - बेसी, एगो दरखास्त हम लिख दै छियह। तों जगदीशपुर चलि जाह। ओइ गाममे एगो हमर पुरना मित्र छथिनह। हुनक नाम ष्यामनन्द छियन्हि। पूछैत-पूछैत चलि जइहह। हुनका दरखास्त दऽ दिहक। बड नीक लोक छथिन्ह। गरीबकेँ अपनो दिशसँ मदति करै छथिन्ह। मंजूर - बेस अपने लिखि दियौ। ( विनोद आवेदन लिखै छथि। मंजूर आवेदन लऽ कऽ प्रस्थान करै छथि। ) विनोद - केहेन भ्रश्ट प्रशासन छै जे ओइ बुढ़बाकेँ दौड़बैत-दौड़बैत हरान कऽ देलकै। मुदा बिन घुस एगो इंदिरा आवास नै भेटलै। ( मुँह बिजकाए लै छथि। )
प टा क्षे प दृष्य - न ऽ ( स्थान - नेता ष्यामानन्दक दलान। दलान पर बैस उ पत्रिका उनटा रहल छथि। मंजूरक प्रवेश। ) म्ंाजूर - परणाम सरकार। ष्यामानन्द - परणाम परणाम। नै चिन्हलौंह। म्ंाजूर - सरकार हम मंजूर छी। रामपुरसँ बड़ी आशसँ पाएरे एलहुँहें। ष्यामान्नद - बाप रे बा, एत्ते दूरसँ पाएरे। धन्यवाद अहाँक। म्ंाजूर - सरकार, मजबूरीक मारल छी, बाढ़िक झमारल छी, मुखिया-बी0डी0ओ0-एस0डी0ओ0-कलक्टर सभसँ रिटाइर छी। ष्याामान्नद - कहु की बात अछि। म्ंाजूर - सरकार, एगो हमर दरखास छै। ष्याामान्नद - लाउ दरखास्त। ( ष्यामानंद आवेदन लऽ पढ़ै छथि। )
सेवा मे, श्रीमान् सूचना आयुक्त महोदय, पटना। महाशय, निवेदन अछि जके चारि-पाँच साल पर्व बाढ़िमें हमर झोपड़ी दहा गेल। हम गरीब आदमी छी। रिक्षा चलाकऽ कौहुना गुजर करै छी। कमाइ छी तऽ खाइ छी नै तऽ उपासे रहै छी। आइ पाँच सालसँ सिरकी तानि पषु जेकाँ रहै छी। बरसात में एक्कोटा बुन्नी बाहर नै खसै आए। म्ुखियाजीकेँ पाएर-दढ़ी पकड़लियन्हि त उ कहलनि पाँच हजार घुस देबै तऽ इंदिरा आवास भेट जाएत। नै तऽ कोनो उपाए नै। बी0 डी0 ओ0, एस0 डी0 ओ0 आ डी0 एम लग दरखास्त देलौं आ सूचना अधिकारक तहत दू दिनमे जबाब मांड.लौह। आइ पनरहम दिन छी। कत्तौ कोनो सुनवाइ नै। ऐ संदर्भमे हमर श्रीमान् सँ करबध प्रार्थना अछि जे स्थितिक पूर्ण जाँच करबाए हमर सूचना अधिकारक औचित्य पर गंभीरतापूर्वक विचार काएल जाए आ एगो उजरल अतिदिनकेँ बसाएल जाए। ऐ पुण्यात्मक कार्यक लेल हम अपनेक आजीवन आभारी रहब। धन्यवाद, अपनेक विष्वासी नाम - मंजूर ग्राम - रामपुर प्रखण्ड - भगवानपुर जिला - परसा ( बिहार ) ( ष्याामानंद किछु देर सोंचिकऽ ) टाइ धरि हमरा लग एहेन केस नै आएल छल। ई गंभीर केस अछि। खाइर मंजूर अहाँ जाउ। हम पूर्ण प्रयास करब। म्ंाजूर - हमरा आबो पड़तै पटना। ? ष्यामानंद - एखन नै। जरूरी पड़तै तऽ बजाए लेब। म्ंाजूर - बेस सरकार किरपा अवस्स करबै। ष्यामानंद - अहाँ जाउ। एत्ते दूर जेबाको अछि पाएरे। म्ंाजूर - परणाम सरकार। ष्यामानंद - परणाम परणाम। ( मंजूर प्रस्थान करै छथि। ) प टा क्षे प
दृष्य - दस
(स्थान - मंजूरक घर। मंजूर घरक आगू रस्ता पर माथा-हाथ दऽ बैसल छथि। ) मंजूर - अल्ला सबटा विपत्ति हमरे दऽ देलक। घोड़ीओ मरि गेल। सब दिन रिक्षो नै चलै आए। गाम-घरक कजो सब दिन नै भेटै आए। एम्हर धिया-पुत खोखरै आए। सिरकीयो चुऐ आए। की करी की नैं, किछु नै फाुराइ आए। या अल्लाह, या खुदा। ( ष्यामानंदक नोकर मालिकक प्रवेश। ) मालिक - मंजूर अपने छिऐ ? म्ंाजूर - जी जी, की कहै छी से ? मालिक - हमर नेताजी श्री ष्यामानंद बाबू अपनेकेँ काल्हिु पटना बजौलन्हि। सूचनाअधिकारक प्रयोग में अपनेक बड पैघ प्रतिश्ठा भेटऽ जा रहल अछि। म्ंाजूर - परणाम सर, परणाम सर। धन्यवाद अहाँकेँ। एहेन षुभ समाचार आइ धरि कियो नै देने रहथि। मालिक - बेस हम जाइ छी। अहाँ जरूर जेबै, बिसरबै नै। ( प्रस्थान ) म्ंाजूर - ( घरवाली नजीमा लग जा कऽ ) गै नजीमा काल्हि हम पटना जेबै। आब देखही अल्ला की करै छै ? नजीमा - बटखरचा लाए तऽ घरमे किच्छो नै छै। कनी मुरही हेतै। म्ंाजूर - साहाए दऽ दिहैन। नजीमा - जेबहक केना ? ओत्ते दूर पाएरे हेतह जाएल। म्ंाजूर - टेनमे मांडै.त-चांडै.त चलि जेबै गै। नजीमा - कनी ओरियाके जइहह। सेहो तऽ गाड़ी आइए पकड़बहक तब नऽ काल्हि पटना पहुँचबहक। म्ंाजूर - ठीक कहै छें नजीमा। जो अखने मुरही लेने आ विदे भ जाइ। ओना असडै.सँ टेन छुटि जाएत तहन। हमरा भीखो मांड. पड़तै नजीमा। नजीमा - की करबहक ? मजबूरीक नाम महात्मा गाँधी होइ छै। तोरा अबेरो होइ छह। हैआए मुरही लेने आबै छियह। ( नजीमा एक मुठी मुरही खोंइछामे आनलथि। ) हैआए, एतबे छेलै। म्ंाजूर - ला जे छौ से। ( नजीमा मंजूरक गमछामे देलक ) हम जाइ छियौ। राति विराति कनी जाइगे के सुतीहें। घर बेपरद छौ । नजीमा - बेस, तू जा न अल्ला के नाम लऽ केऽ । म्ंाजूर - या अल्ला, या विस्मिला । प टा क्षे प
दृष्य - एगारह ( स्थान - सूचना आयुक्त कार्यालय पटना। ब्रह्मदेव सुचना आयुक्त, नेताजी ष्यामानंद आ उप सूचना आयुक्त अनजार कार्यालय मे बैसकऽ मंजूरक भूमिका पर समीक्षा कऽ रहल छथि। ) ष्यामानंद - सर, आइ धरि हमरा मंजूर जेकाँ केस कहियो आ कत्तौ नहि टकराएल राहाए। एत्ते गरीब एवं मूर्ख रहैत एहेन कठिन स्टेप। अनजार - साहाएब, वास्तवमे मंजूर धन्यवादक पात्र आछ जेे निच्छछ देहाती आ औंठा छाप रहैत अपन अधिकारक आ कर्त्तव्यक प्रति संघर्शषीलताक प्रदर्षन केलनि। ब्रह्मदेव - हम एते पद देखलहुँ मुदा मंजूर जेकाँ अपन हकक प्रति जागरूक एवं कर्मठ व्यक्ति नै भेटल राहाए। जदी उ अखैन एत्त रहिताए तऽ हम हुनका हार्दिक धन्यवाद दैतहुँ। ष्यामानंद - आइ पटना आबै लाए ओकरा संवाद पठेने रहियै। संवाद भेटलै की नै। आएत की नै पता नै । ( मंजूरक प्रवेश। ) म्ंाजूर - (ष्यामानंद केँ ) परणाम हुजूर। (कर जोड़ि ) ष्यामानंद - परणाम परणाम। म्ंाजूर - ( ब्रह्मदेव केँ ) परणाम हुजूर। ब््राह्ममदेव - परणाम हुजूर। म्ंाजूर - ( अनजारकेँ ) आदाब हुजूर। अनजार - आदाब आदाब। मंजूर - हुजूर सभ, हमरा आबैमे बड देरी भऽ गेल। क्षमा काएल जाउ। हुजूर ?टेने लेट छेलै। ब्रह्मदेव - अच्छा चलू कोनो बात नै। बेसी लेट नै भेल। अहींक नाम मंजूर छी ने ? मंजूर - जी हुजूर। ब्रह्मदेव - हम सूचना आयुक्त छी। हम अहाँकेँ हार्दिक धन्यवाद दै छ। ( वाह! वाह! कहि पीठी ठोकै छथि। ) अहाँ जेकाँ अपन अधिकारक आ कर्त्तव्यक प्रति समर्पित नागरिक देशकेँ उद्धार कऽ देत। अपने केँ बहुत-बहुत धन्यवाद। ( हिन्दुस्तान पत्रकार पवन आ दैनिक-जागरणक पत्रकार महेशक प्रवेश। दुनु मंजूरक फोटो घीचै छथि आ गपसप करै छथि।) पवन - मंजूर, ऐ कार्यालय मं अपनेकेँ की भेटलै ? मंजूर - हुजूर। सूचना आयुक्तक साहाएब हमरा धनवाद देलकै। महेश - जखन धन्यवाद नै दैतथि तहन ? मंजूर - तखन हमरा हाकिम परसँ विशवास हटि जाइताए। हम बुझि जाइतहुँ जे बड़को आपिस बकवास अछि बेमतलब अछिै पवन$महेश - धन्यवाद मंजूर भाइ।
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दृष्य - बारह ( स्थान - आई0 बी0 एन0-7 चैनलक मनेजर अखिलेशक आवास। उ मिथिला समाद पेपर पढ़ि रहल छथि। ) अखिलेश - मंजूर को प्रतिश्ठा मंजूर ग्राम-पंचाइत राज रामपूर, प्रखंड-भगवानपुर, जिला-परसा ( परसा ) क स्थाई निवासी छथि। ओ अतिदीन रिक्शा-चालक छथि जे पूर्ण मुर्ख छथि। ओ इंदिरा आवासमे घुसखोरीक विरूद्ध आवाज उठेबामे सूचना कार्यालयसँ प्रतिष्ठा प्राप्त केलन्हि जइसँ सूचना आयुक्त ब्रह्मदेव हार्दिक धन्यवाद दैत पीठ ठोकलनि। ब्रह्मदेव कहलनि, ऐहेन कर्मठ नागरिक देशक उद्धार करत। ( अखिलेश किछु काल सोचिकऽ पेपर राखि दै छथि। ) म्ंाजूर मूर्ख एवं गरीब रहिकऽ ऐहन कठिन कदम उठौलनि देशक महान प्रेरणादायक काज केलनि। उ देशक अस्सल नागरिक छी। हुनका हमरा तरफसँ हार्दिक धन्यवाद आ अवार्ड परसु दिल्ली में भेटतन्हि। हम हुनका सपरिवार आबै-जाइक भाड़ा पठाए दै छियन्हि। प टा क्षे प
दृष्य - तेरह ( स्थान - मंजूरक झोपड़ी। झोपड़ीमे मंजूर, नजीमा, बेटी सलमा, नाजीनी, खुशबू आ बेटा अजहर, जफर एवं अस्फाक उपस्थित छथिै मंजूर सपरिवार दिल्ली जेबाक विचार-विमर्ष काए रहल छथि। ) म्ंाजूर - गै नजीमा, अखिलेश अपना सभकेँ दिल्ली आबै-जाइक खर्च पठाए देलकौ, से जेबही ? नजीमा - कथी लाए हौ ? म्ंाजूर - से हमरो नै बुझल छौ। एक आदमी कहै छेलाए जे जाह दिल्ली, अखिलेश बड़का अबार देतह। कहाँदुन पेपरमे निकलल छेलै। नजीमा - चल न देखियौ तऽ ओकरा केहेन छै ? हौ हमरा से कुच्छो पूछतै तऽ की कहबै ? म्ंाजूर - जे फुरतौ से कहियै। उ कोनो नै बुझै हेतै जे मंरूख आ गरीबक भनसिया सधारणीमे केहेन होइ छै। गै नजीमा, लोक सभ हमरा बड मजाक करै य जे दिल्ली जा न, रिक्षा पर बैसाक ऽ अन्नपूर्णा के खूम घुमबिहह। नजीमा - हौ, अपना सभकेँ अपने गाम लऽ के नै तऽ चलि जेतै ? मंजूर - नै गै, से तऽ नै बुझााइ छौ। चल नऽ बुझाल जेतै। बड़ बेसी तऽ अपना गाम लऽ जेतै। ऐ सँ बेसी की हेतै ? ओतै खाएब, पीसब आ मौज मस्ती मे रहबै बुझै छी ही, अखिलेश कत्तेक बड़का आदमी छै ? नजीमा - हँ हौ, सुनै छिऐ बड़ीटा लोक छै। बियाह-तियाह करै लाए नै न कहतै। मंजूर - नै गै, तूँ तऽ बूरबक जकाँ गप करै छें। सलमा - बाबा, हमहुँ जेबौ तोरा सँडे. दिल्ली अखिलेश केँ देखै लाए। अस्फाक - बाबा, हमहुँ ओकरेसँ बियाह करबै। मंजूर - केकरासँ अस्फाक - अखिलेशक साइर सँ। मंजूर - धुर बुरबक, लोक हँसतौ। खुशबू - बाबा, सभकेँ दिल्ली लऽ जेबहक आ हम घर पर असगरे रहबै ? म्ंाजूर - सभ कियो चलबै बुच्ची राजधानी एस्प्रेससँ। ओइ टेनमे जाड़मं गरम आ गरममे जाड़ लगै छै। गै नजीमा, तू सभ जल्दी तैयार होइ जो। आइ रातिमे पटनासे ओ टेन छै। फेद एत्ते दूर जेबाको छै न। लेट भऽ रहल छौ। नजीमा - जाइ छियह तैयार होइ लाए। तोंहूँ जा झारा-झपटासँ भऽ आबह। तोरा खुच-खुच झड़े लगैत रहै छह। मंजूर - अच्छा हम ओम्हरसँ अबै छी। तों सभ तैयार रह।
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दृष्य -चौदह ( स्थान - दिल्ली। मंच सजल धजल अछि । दर्षकक भीड़ अछि। अखिलेश आओर अन्नपूर्णा मंच पर उपस्थित छथि। अखिलेश नौकर किसुन मंच पर घुमि रहल छथि। अखिलेश आ अन्नपूर्णा पेपर पढ़ि रहल छथि। किसुन - मालिक, ओ सभ एखन धरि नै पहुँचलथि की कारण भ सकै छै ? अखिलेश - ट्रेनक टाइम आब भऽ गेलै आए। ओ सभ आबिते हाएत। ( सपरिवार मंजूरक प्रवेश ) मंजूर - परणाम हुजूर। ( अखिलश केँ ) अखिलेश - परणाम परणाम मंजूर भाइ। मंजूर - परणाम मैडम। अन्नपूर्णा - परणाम परणाम। बैसे जाइ जाउ। ( सब कियो कुर्सी पर बैसै छथि। ) अखलेश - मंजूर भाइ, सपरिवार नीके ना एलहुँ न ? मंजूर - जी, बड नीकेना एलहुँ। राजधानी में चढ़ि हम सभ तइर गेलहुँ। अन्नपूर्णा - मंजूर भाइ, ई के छथि ? मंजूर - हमरे घरवाली छियै नजीमा। अन्नपूर्णा - नजीमा बहिन, नमस्कार। नजीमा - नमसकार बहिन। अन्नपूर्णा - बहीन, उ सभ के छथि ? नजीमा - सभ हमरे धिया-पुता छथि। अन्नपूर्णा - बहुते धिया-पुता अछि। ऐ पर सुधार करू, बहीन। नजीमा - की करबै, अल्लाक मर्जी। अन्नपमूर्णा - सभकेँ नीक जेकाँ पढ़ाएब-लिखाएब। अखिलेश - मंजूर भाई, आब अपना सबहक आयोजित कार्यक्रम पर ध्यान देल जाए। मंजूर - जी हुजूर। अखिलेश - समस्त दर्षक लोकनि, अखिलेशक नव वर्शक हार्दिक षुभकाना आ अभिनन्दन। आइ ऐ देशक अहोभाग्य अछि जे मंजूर जेकाँ अपन अधिकार आ कर्त्तव्यकेँ बुझ वला प्रथम नागरिक हमरा सभकेँ प्राप्त भेल जे गरीब-गवार रहैत देशक भ्रश्टाचारीक विरूद्ध बीड़ा उठा कऽ अपन इमानदारी आ कर्मठताक परिचय दैत सफलता समस्त जनताक बीच समर्पित केलनि। हम हिनक अहम भूमिकासँ प्रसन्न भऽ कऽ बेस्ट सिटीजन ऑफ द नेशन अवार्डक लेल चुनलहुँ आओर एखन षीघ्र हम हिनका अपन अवार्डसँ सम्मानित करबैन। ( थोपरीक बौछार भऽ जाइ य। ) मंजूर भाइ अपनेक दर्षक लोकनिकेँ किछु कहियौ। म्ंाजूर - हम दर्षक भाइ सभकेँ की कहबैन। हम तऽ मुरूख छी। तहन अपनेक आज्ञा भेलै तऽ किच्छो कहि दै छियै। हम तऽ इहाए कहब जे देशमे भ्रश्टाचारीके जनम जनता देलकै आ ओकर पालन-पोशण से हो जनते करै छै। जदी एकजूट भऽ कऽ सख्ती सँ एकर विरोध काएल जाए तऽ पक्का कहै छी जे ऐ महामारीसँ देशके मुक्ति भेटतै आ हमर देशक कल्याण हेतै तथा दुनिया में एक रनाम हेतै। ऐ से बेसी हमरा किच्छो नै फुराए य। धनवाद। ( फेर थोपरीक बौछार भऽ जाइ छै। ) अखिलेश - आब अपने सबहक समक्ष हम मंजूर भाइकेँ सम्मानित काए रहल छियन्हि। ( अखिलेश मंजूरकेँ फुल-माला अर्पित केलनि। थोपरीक बौछार भेल। अखिलेश मंजूरकेँ अवार्ड देलनि। थोपरीक फेर बौछार भेल। मंजूर अखिलेश केँ पाएर छुबि प्रणाम कर चाहैत छथि। मुदा अखिलेश मंजूरक हाथ पकड़ि लै छथि। ) मंजूर भाइ, सचमुच अपने ऐ देशक महान प्रेरक छियै। हमरा सँ बड पैघ छियै। आ हार्दिक प्रणाम। म्ंाजूर - खुश रहु अखिलेश भाइ। अहाँकेँ हमर उमेर लगि जाए। ( मंजूर अखिलेश सँ गरदनि मिललथि आ नजीमा अन्नपूर्णा केँ पाएर छुबि प्रणाम केलक। थोपरीक बौछार भेल। )
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दृष्य -पनरह ( स्थान - मंजूरक झोपरी। मंजूर अपन भाए रमजानीसँ गपसप कऽ रहल छथि। ) रमजानी - भैया, की केना भेलै दिल्ली मे ? मंजूर - बौआ, अखिलेश हमरा अबार देलकै आ फुल-माला हमरा पहिराकऽ नवाजलकै। लोकक बड भीड़ छेलै। ( चन्दन आ अमरनाथक प्रवेश। ) अमरनाथ - मंजूर भाइ नमस्कार। मंजूर - नमस्कार , नमस्कार। मुखियाजी, परणाम। चन्दन - परणाम , परणाम। मंजूर - बैसल जाउ , सरकार सभ । ( चन्दन आ अमरनाथ पीढ़ीया पर बैसलथि। ) अमरनाथ - मंजूर भाइ, खर्च-बर्च करू। अहाँकेँ इंदिरा आवासवला बीस हजार टाका आबि गेल आ मुखियाजी सेहो अपना तरफसँ पाँच हजार टाका दै छथि। मंजूर - अमरनाथ भाइ, हमरा हरामक पाइ नै चाही हमरा अपन उचित पाइ बीस हजार चाही अप्पन पाइ मुखिया जी अपने रखथि। अमरनाथ - मंजूर भाइ, अहाँकेँ मुखियाजीवला पाँच हजार लेमहि पड़त। उ अहाँकेँ पाँच हजार मदति में दै छथि। मंजूर - एहेन मदति लेबाक मन नै होइ अए। कारण मुखियाजी समाजक संड. बड गददेदारी करै छथि। चंदन - इएह लिय, पच्चीस हजार टाका। मंजूर - लाउ, बड जिद्ध करै छी तऽ। ( चन्दन मंजूरकेँ पच्चीस हजार टाका देलनि। ) चन्दन - मंजूर भाइ, आहाँ सचमुच महान छी। हमर गलती के माफ काएल जाए। मंजूर - गलती तखने माफ करब जखन अपने पब्लिक संड. नीक व्यवहार करब। चन्दन - आब केकरो संडे. गलत व्यवहार नै करब। मंजूर - तहन गलती माफ अछि। अमरनाथ - धन्यवाद मंजूर भाइ। ( चन्दन आ अमरनाथक प्रस्थान। ) रमजानी - भैया, बड चौंसैठ छह मुखियाजी। एहेन घुसखोर नै देखल। मंजूर - तैं न हमरा सनक गरीब आ मुरूख सँ घट्टी मानलनि। रमजानी - भैया, तोरा एत्ते आगू बढ़ाबा मे किनकर यानगदान छै ? मंजूर - बौआ, नेताजी विनोदक किरपा छैन। ओ गुदरीक लाल छथिन्ह। गरीब जरूर छथिनह मुदा सब तरहक बुधि में पारंगत छथिन्ह। गरीबक मसीहा छथि। उचितक लेल जी जान लगा दै छथिन्ह। ( नेताजी विनोदक प्रवेश। ) परणाम नेताजी। विनोद - परणाम, परणाम। कह मंजूर कह रमजानी की हाल-चाल छै ? रमजानी - अपनेक किरपा सँ बड बढ़ियाँ छै। नेताजी, भैयाकेँ खाली अबारेट भेटलै और कहाँ किछु भेटलै। विनोद - कथी भेटतै ? रमजानी - किच्छो पाइ-कौड़ी भेटतै तहन ने ? विनोद - बौआ, प्रतिश्ठा से बढ़ि कऽ किछु नै छै। ओना पाइयो प्रतिश्ठाक सिंड.ार छियै। सेहो मंजूर केँ जरूर भेटतै। मंजूर तों धैर्य राखह सेतोश राखह। सबटा धीरे-धीरे हेतै। बहुत ठाम तोहर सहयोगक चर्चा भऽ रहल छै। मंजूर - नेताजी, अपने जेना कहबै। हम साएह करबै। नेताजी, अपने अपन अनुभव पब्लिककेँ किछु दैतिऐ त बड बढ़िया होइतै। विनोद - हम कोन जोकरक छी जे पब्लिककेँ अपन अनुभव देबै। आइ-काल्हि कियो केकरोसँ कम नै छै। तैयो हम दू शब्द कहि दै छिऐ। अशिक्षे कारण जनता सुयोग्य प्रतिनिधिक चयन नै कऽ पावै अछि, ताड़ीए दारूए पर बीकी जाइ अछि। स्वभाविक छै जे प्रतिनिधि क्षतिपुर्ती मे घुसखोरीक अश्रय लेत। ओइ घुसखोरीकेँ मेटाबऽ लेल हमरा लोकनिकेँ एकजुट भऽ कऽ शिक्षाकेँ सबसँ आगू बढ़ेनाइ अछि। हमरा नजरिमे सबटा अव्यवस्थाक मूल कारण अशिक्षा छै। अशिक्षा हटतै तहने व्यवस्था सुधरतै आ देशक चहुँमुखि विकास हेतै। अंत मे मंजूरकेँ हार्दिक बधाई दैत अपन दू शब्द खत्म करै छी।
जय हिन्द ! जय भारत !! जय शिक्षा !!! पटाक्षेप ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। शिवकुमार झा टिल्लू समीक्षा िनश्तुकी निश्तुकीक अर्थ होइछ- “निश्चित”, निश्चित माने परम सत्य। कोनो साहित्यक कृतिक नाओं ओइमे निहित तत्वक विश्लेषणक हेतु मौलिक रूपरेखाक भान करबैत छैक। आधुनिक मैथिलीक नवतुरिया कवि श्री उमेश मण्डल रचित कविता संग्रह “निश्तुकी”केँ पढ़लाक बाद ई ज्ञात भेल जे ऐ छोट-छीन कृतिमे मिथिलाक सांस्कृतिक ओ समाजिक पराभव केर दशो दिशा निश्चित कएल गेल अछि। उमेशजी शिल्पी नै छथि आ ने हुनक कविता सभमे अलंकारक दर्शन होइत अछि कतौ कोनो भंगिमा नै, लयात्मक धार नै तखन ऐमे कोन प्रकारक “तात्विक विवेचन” अछि जकर समीक्षा कएल जाए? वास्तवमे मिथिलाक ग्राम्य जीवनमे रमि, ऊँच-नीचक अनुभव हिनक रचनामे अलग-अलग बिम्ब रूपेँ यथार्थक बोध करबैत अछि। विराट जीवन अनुभव नै रहलाक बादो नवतुरिया कवि अपन दैनन्दिनीकेँ काव्यात्मक रूप देलक, ऐ लेल कविक पहिल रचनामे कतौ अपन भाषा-संस्कृति ओ साहित्यसँ विश्वासघात नै देखएमे आएल। उपेक्षित समाजक मध्य जन्म नेनिहार कवि प्रांजल रूपेँ उपेक्षासँ आकुल छथि मुदा मात्र अपन नै, समाजमे व्याप्त विषय जीवन शैली ओ श्रमक संग-संग श्रमजीवीक अधोगति हिनक कविता सभमे नव रूपेँ परिलक्षित भेल। ऐ उपेक्षामे कोनो क्रांतिक वा उन्मादक आश नै, मात्र अधोगतिक पराभव चाहैत छथि। ऐ प्रकारक विषमता कोना दूर हएत ई तँ समाजपर िनर्भर करैत अछि। मूलत: अर्थनीतिक अपन दृष्टिकोण कविक महत्ता थिक। ऐमे सन्निहित साम्यवाद लेलिन ओ स्टालिनक साम्यवादी विचारधारा नै, हमर अपन मिथिलाक उमेश मण्डलक विचारधारा थिक, जे जगदीश प्रसाद मण्डलक अवतारवादसँ प्रभावित तँ छथि, मुदा कतौ-हुनक रचनाकेँ नै चोरौलनि। पहिल कविता “हँसैत लहास”मे कोनो लहासक वर्णन नै, जे मनुक्ख जीवित रहितो साधनहीन आ ग्लानिसँ भरल यायावरी जीवन िजबैत-जिबैत थाकि गेल अछि ओइ जीवित रहितौ लहास बनल मनुक्खमे आब ज्ञानेंद्रीय तन्त्र सक्रिय भऽ गेल आ ओ बजवाक लेल उद्यत अछि। वास्तवमे एकरा क्रांति मानल जाए। ऐ प्रकारक क्रांतिसँ हमरा देशमे विभिन्न प्रकारक आन्दोलन भेल, मुदा अइठाम ओ लहास कोनो आन्दोलन नै करत। आ ने नक्सलवादक जन्म हएत, ऐ लेल समाज निश्चिन्त रहि सकैत अछि, मुदा आन्दोलन हएत तँ वाह्य आडंवर ओ अपन संस्कृतिक विरूद्ध। परंच ओहूठाम लहास कोनो लाठी-गड़ाँस नै उठाएत, मात्र हँसत। दस पाँतीक ऐ लघुकवितामे सांस्कृतिक अधोगतिपर कवि तेज शब्दवाण चला कऽ मिथिलेटा नै, सम्पूर्ण आर्यावर्तमे व्याप्त समाजिक विषमताकेँ झकझोड़ि देलनि। कतेक समाजिक आन्दोलन भेल मुदा स्थिति यथावत्, नै जानि कहिया धरि ऐ प्रकारक विषमता हमरा सबहक समाजकेँ कोढ़ि बनि गलबैत रहत। एकटा कनेक कमी ऐ कवितामे देखएमे आएल ओ अछि पराभवसँ मुक्तिक उपाए, कवि नै प्रकट कऽ सकलनि जे लहासक हँसीक परिणाम की हएत। “फाँट” एकटा एहन शब्द थिक जे लोककेँ लोकसँ फराक कऽ रहल। श्राद्ध-कर्मक अंतिम दिन ज्येष्ठ संतानक माॅथमे पगड़ी बान्हि उतराधिकारी बनाएल जाइत अछि, मुदा क्षणहिमे मृतकक खड़ाम छोड़ि सभटा आन वस्तु लेल परिवारक आन लोक ओइ उतराधिकारीक आदेश केर प्रतीक्षा सेहो नै करैत अछि। वास्तवमे “फाँट” शब्द बौद्धिकतापर भारी पड़ि रहल, लोक अपन आचार-विचारकेँ ताखपर राखि देआद बनि गेल छथि, मात्र कुल-वंशक अधिकार लेल नै, जीवनक समस्त “कर्मस्थली”मे ऐ प्रकारक प्रवृति अछि। “कविता” शीर्षक कवितामे कवि देआदकेँ मित्र बनाबए चाहै छथि। “बाधा”गरीबक जीवनमे सहचरी बनि कऽ कखनो नै संग छोड़ए चाहै छथि। मंगला पूव भर जा तँ रहल अछि, नदी पार करबाक क्रममे प्रसन्नो भेल जे नदीमे पानि नै मात्र बालु तँए बिनु घटखेबा देने पार भऽ जाएब। मुदा......। ओतौ किछु लंठ लोक घटखेबा लऽ रहल, मंगलाक जेबीमे कैंचा नै वापस पश्चिमे रहि गेल। ऐ प्रकारक घटना पलायनवादकेँ रोकैत अछि। एकर शिकार मिथिलाक महान दार्शनिक उदयनाचार्य सेहो भेल छलाह जकर परिणाम भेल जे ओ गंडक पार नै कऽ सकलनि आ आपस अपन जन्मभूमि करियनमे आबि अपन नाओंक संग पूर्ण मैथिल लगा लेलनि। भोजपुरी साहित्यक आदि कवि भिखारी ठाकुर अर्थोपार्जनक लेल पलायन तँ केलनि मुदा कटुफल भेटलनि आ पुनि भोजपुर आबि गेलाह, जकर परिणाम सोझाँ अछि, भोजपुरी साहित्य आर्य परिवारक भाषा समूहमे अपन स्थान बना लेलक। ई तँ भेल “मंगला”केँ भेटल व्यथाकेँ रोकबाक प्रयास, मुदा जौं ओ पू-भर मात्र मिथिलेमे जाइत हएत तँ एकरा की मानबाक चाही, गरीबक बाटमे काँट रोपबाक प्रयास नै? सम्यक अर्थनीतिक आश धएने एकटा आर कविता लिखल गेल अछि- “भाेगी”। भाेगी आ योगी समाजिक जीवन रूपी नदीक दू कछेर थिक मुदा अइठाम योगीक अर्थ श्रमजीवी आ भोगीक अर्थ अनैतिक रूपसँ धनोपार्जन कऽ अंत धरि समाजपर अपन अधिकार रखनिहार मनुक्ख। अइठाम आबि कऽ कवि कालीकान्त झा बूचक उक्ति- “भोगीकेँ देहोक मोह नै, योगी तम कथि तुम्मा रहि-रहि...” उनटा पड़ि गेलनि। ओइकालसँ वर्त्तमान समए केर तुलनामे भोगी बेसी भारी पड़ि गेल छथि। “छठि” कविता सूर्यकेँ उपासनासँ बेसी कर्जक प्रति कृतज्ञताक बोध करबैत अछि। मुदा कोन प्रकारक कर्ज कवि स्पष्ट नै कऽ सकलनि। कविक फुलवारीमे फूलक डंटी वयस्क नै भेल छन्हि किएक तँ नवतुरिया छथि, एखन मात्र प्रांजल माली छथि, प्रवीण नै। तँए बेसी नकारात्मक अंश निकालब हतोत्साहित कऽ सकैत छन्हि। ऐ कविता संग्रहक आन कविता सभ सेहो बोधगम्य अछि मुदा एकटा आर कविता जे एे संग्रहकेँ वैशिष्ठ्यता प्रदान करैत अछि ओ थिक- “के मैथिल” वास्तवमे बेर-बेर समाजक कात लागल वर्गकेँ आगाँक लोक कहैत छथि- “अहूँ मैथिले थिकौं” ऐसँ कवि मर्माहित भऽ अपन तर्कसँ प्रमाणित करवाक प्रयास कएलनि जे मिथिलाक कात लागल वर्ग अान लोकसँ वेसी मैथिल कहेबाक योग्य छथि। कात कऽ देल गेल समाजक लोक जौं कवि भऽ जाइत छथि तँ लेखनीमे अपन व्यथाकेँ झाँपब असंभव। फजलुर रहमान हासमीक कविता- “हे भाई” जकाँ उमेश मण्डलक कविता- “के मैथिल” भविष्यमे मैथिली साहित्यकेँ क्रांतिवादी दृष्टिकोणसँ अवश्य प्रकाशित करत- “डोका काँकोर बीछ हम भैंटक लावा चिबाकऽ उफनैत शोणितकेँ जरा रहल छी मिथिलामे बैसल........। मुदा प्रश्न रहिये गेल के मैथिल?” कवि आशु कवि नै अछि, आ ने आत्मासँ कविता लिखलक, मुदा मिथिलाक समाजमे रमल कवि अपन जीवन दर्शनकेँ झाँपि नै सकल आ कविता सभक रूपेँ मिथिलामे परसि देलक। िनष्कर्षत: पहिल प्रयास सराहनीय मानल जाए। कोनो आन कविक कविता सभसँ एकर तुलना करब अनुचित हएत। किएक तँ ऐमे ने तँ श्रृंगार आ ने वैराग्य, ने कतौ भक्तिक हिलकोरि, कतौ हास्यक समागम नै परंच बिम्बित अर्थनीति ओ विचारमूलक कविताक आधुनिक श्रंृखला। धन्यवादक पात्र छथि विदेहक संपादक गजेन्द्र ठाकुर जे गामक वैध बनल उमेशमे कवित्व गुण देख आगाँ बढ़एलनि, ई मात्र उमेशपर उपकार नै सम्पूर्ण मिथिलाक प्रति गजेन्द्र जीक सिनेह थिक। ऐ लेल विदेह परिवारक संग-संग श्रुति प्रकाशन सेहो धन्यवादक पात्र छथि जे मात्र भाॅज पुड़एबाक लेल समाजक कात लागल वर्गक संग्रह प्रकाशित नै करै छथि, वरन् आत्मीय रूपेँ सम्पूर्ण मिथिला-मैथिलमे उपेक्षित नीक रचनाकेँ प्रकाशित करबाक योजना श्रुति प्रकाशनकेँ आधुनिक मैथिलीमे शीर्ष स्थानपर बैसा देलक। पोथीक नाओं- िनश्तुकी रचनाकार- उमेश मण्डल प्रकाशक- श्रुति प्रकाशन, दिल्ली दाम- १०० प्रकाशन वर्ष- २००९ ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। जगदीश प्रसाद मण्डल नाटक कम्प्रोमाइज (पछिला खेपसँ आगाँ) बारहम दृश्य (गामक विद्यालयक आंगन। बच्चा सभ फील्डपर खेलैत। रस्ता धऽ कऽ राही सभ चलैत। गोल-मोल बैसार। एकठाम कृष्णदेव, मनमोहन आ रघुनाथ बैसल। बगलमे घनश्याम, नसीवलाल, सुकदेव आ गामक लोक बैसल...) नसीवलाल- (ठाढ़ भऽ...) आजुक बैसार लेल सभकेँ धन्यवाद दइ छियनि जे अपन व्यस्त समैमे आबि गामक बैसारकेँ शोभा बढ़ौलनि। तइ संग होनहार कर्मदेवकेँ आरो बेसी बधाइ दइ छियनि जे जी-तोड़ि मेहनत कऽ बैसार करौलनि। मनचन- भैया, अहाँ कर्मदेवक प्रशंसा बेसी केलियनि। नसीवलाल- कम्मे केलियनि। नवयुवक आ बाल-बच्चाक (बेटा-बेटीक) बेसी प्रशंसा कतौ-कतौ अधलो होइ छै। कृष्णदेव- (चौंकैत...) से केना? नसीवलाल- मनुष्यकेँ घरसँ बाहर धरि प्रशंसा-निन्दासँ परहेज करक चाही। कृष्णदेव- तखन? नसीवलाल- उचित सीमाक उल्लंघन होइते बनै-विगड़ैक संभावना बढ़ि जाइत अछि। घनश्याम- (मूड़ी डोलबैत...) संभव अछि। नसीवलाल- संभव रहितो कठिन (भारी) अछि। मुदा जाधरि संभव नै हएत ताधरि समाजक गाड़ियो लीख दऽ ससरब कठिन अछि। घनश्याम- नीक-अधलाक विचार तँ करैके चाही। नसीवलाल- निश्चित करैक चाही। मुदा हटि कऽ नै सटि कऽ। घनश्याम- की मतलब? नसीवलाल- मतलब यएह जे जहिना समुद्रक किनछरिक पानि कम गहींरमे रहितो अगम पानिसँ मिलल रहैत, तहिना। (कनडेरिये आँखिये रघुनाथ, मनमोहन नसीवलाल दिस देखैत तँ मनचन, सुकदेव कृष्णदेव दिस। अपन-अपन मनोनुकूल मुँहक रूप सेहो बनबैत...) घनश्याम- (ठहाका मारि...) एखन धरि गामक बैसार कोन रूपे चलैत अछि नसीवलाल भाय? नसीवलाल- घनश्याम बाबू, जहिना बन्दूकक अनेको गोली खेनिहारकेँ देहक कोनो अंग चिन्हार नै रहैत तहिना गामो-समाजकेँ भऽ गेल। घनश्याम- कनी फरिछा कऽ कहियौ? नसीवलाल- ओना एखन जइ काजे सभ एकठाम बैसलौं पहिने से काज हेबाक चाही। मुदा ऐ तरहक बैसार पहिल-पहिल अछि तँए किछु आनो बात चलबे करत। मनचन- भैया, हनुमानजी जकाँ कियो छाती फाड़ि देखबैए आकि पेटक बात आ हाथक काजेसँ देखबैए। (मनचनक बात सुनि कृष्णदेव हंसक हिलुसैत आँखि जकाँ देख...) कृष्णदेव- एखन धरि मनचनकेँ बटेदार बुझै छलौं मुदा से नै ओ समाजक पटेदार (हिस्सेदार) छी। (कृष्णदेवक विचार सुनि...) नसीवलाल- जहिना हाथमे पाँचो-आंगुर पाँच लम्बाइ-चौड़ाइक होइ छैक मुदा हाथक शोभा तँ बराबरे बढ़बैत छै किने? कृष्णदेव- हँ से तँ बढ़ैबते छै। नसीवलाल- तहिना ने सड़क बनौनिहारमे पत्थर बैसौनिहारसँ लऽ कऽ नक्शा बनौनिहार धरिक होइ छै। कृष्णदेव- मुदा? नसीवलाल- हँ। जहिना सिर क्षीणका भगवतीक महत्व होइत तहिना ने मुस्कुराइत खर्गधारी भगवतियोक होइत। (बिचहिमे...) घनश्याम- हँ हेबाक चाही। मुदा पहिने दुनूक परिचए हएब जरूरी। नसीवलाल- निश्चित। जहिना भूतपर भविष्य ठाढ़ होइत तहिना ने मनुष्योक पैछला जिनगी अगिला जिनगीकेँ ठाढ़ करैमे मदतिगार होइत। मनचन- जँ से नै हुअए, तखन? नसीवलाल- ओहिना हएत जहिना सत्यवादी हरिश्चन्द्रक पार्ट (स्टेजपर) कियो शराबी झुमि-झुमि कठही चौकीपर अलापैत। (ठहाका...) घनश्याम- हँसी-मजाक छोड़ि बैसारक गरिमा बनाउ? नसीवलाल- (अधहँसी हँसि...) बहुत नीक विचार घनश्यामबाबू, देलनि। आइ धरि हृदए तड़पैत रहल जे गामोक नक्शा इतिहासक पन्नामे जोड़ाए। से......? मनचन- भैया, जइ समाजमे प्रोफेसर, इन्जिनियर, डॉक्टर, बैंक मैनेजर लऽ कऽ गोबर बीछिनिहारि धरि छथि तइ समाजक इतिहारस नै बनै ओ लाजिमी छी। नसीवलाल- कहलह तँ ठीके मुदा.....। मनचन- मुदा की? नसीवलाल- यएह जे, ओना आइ धरिक समाजक पन्ना-पन्ना पढ़ए पड़त। ओकरा तकैमे किछु मेहनत उठबए पड़त। मुदा जँ ओकरा विचारणीय प्रश्न बना राखि आजुक समाजक अध्ययन कऽ िनर्माणक संकल्प लेल जाए, तहूसँ काज चलि सकैए। मनचन- से कोना हएत? घनश्याम- जँ करैक इच्छाशक्ति जगा संकल्पवद्ध भऽ डेग उठाबी तँ भऽ सकैए। कर्मदेव- घनश्याम काका, अहाँ तँ नारदजी जकाँ छोटका बैंकक मीटिंगसँ लऽ कऽ बड़का बैंकक मीटिंग धरिक अनुभव रखने छी तँए नीक हएत जे अपने समाजक एकटा रूप-रेखा बना बजियौ? घनश्याम- बाउ कर्मदेव, कहलह तँ ठीके बाहरी दुिनयाँसँ भिन्न ग्रामीण दुनियाँ अछि। तँए जे तरी-घटी गामक नसीवलाल भाय जनैत-बुझैत- छथि से नै बुझै छी। सुकदेव- ई कोनो बड़ पैघ समस्या नै छी। नीक हएत जे दुनू गोरे विचारि कऽ आगूक डेग उठाबी। (सुकदेवक विचारकेँ मनमोहन आ रघुनाथ समर्थन केलनि। मुदा कृष्णदेव मुँहक बात रोकि लेलनि...) मनचन- (मुस्की दैत...) घनश्याम भाइक तेहेन पटपेटा पेट छन्हि जे नसीवलाल भैयाकेँ पीचिये देथिन। घनश्याम- (हँसैत...) नै मनचन, मोटेलहा पेट रहैत तखन ने फुललाहा छी। कोढ़िलोसँ हल्लुक। मनचन- गणेशजी बला। जे एक-रत्तीक मुसरी मुनहर सन पेटकेँ उठा दौड़ैत रहैए। घनश्याम- हँ। हँ। सएह बुझहक। कृष्णदेव- (रूष्ट भऽ...) समैक उपयोग करू। घनश्याम- भाय, विचार अछि जे सभ कियो दिलसँ अपन-अपन जिनगीक अनुभव व्यक्त करी। जइसँ एक नव समाज बनैक सुदृढ़ नीब पड़त। कृष्णदेव- बहुत बढ़ियाँ, बहुत बढ़ियाँ। जाधरि गामक दशाक सम्यक चर्च नै हएत ताधरि दिशा िनर्धारित करैमे किछु कमी रहबे करत। नसीवलाल- बहुत बढ़ियाँ विचार कृष्णदेवबाबूक छन्हि। जाधरि पेटक नीकसँ अधला धरिक विचार समाजक बीच नै राखब ताधरि समाजक अंतरी मिलान कोना हएत? मनचन- भैया, अंतरी मिलान केकरा कहै छै? घनश्याम- (मुस्की दैत...) छाती मिलानकेँ। मनचन- छाती मिलान......। छाती मिलान तँ दुइये ठाम......। समैधिक संग आ दुनू परानी.......। दू परानी.......? घनश्याम- कोन मंत्र पढ़ए लगलह मनचन? मनचन- व्यासजी आ गनेसजीमे यएह ने शर्त्त रहनि जे बिनु बुझने कलम नै बढ़ावी। घनश्याम- अहाँ तँ शास्त्रो बुझै छी मनचन। मनचन- पढ़ि कऽ नै, भागवत सुनि कऽ। तेसरा तक अपनो गामक ब्रह्मस्थानमे साले-साल भागवत होइ छलै किने। नसीवलाल- एखन धरि बैसारक मूल विषयपर नै एलौंहेँ। अढ़ाइ-तीन घंटा बीत गेल। ओना, भलहिं हम सभ विषयानतरे गप-सप्प किअए ने केलौं मुदा बेबुनियाद बात तँ नै भेल। घनश्याम- आन काजसँ भिन्न बौद्धिक काज होइए। हाथ-पएरक काज जकाँ लगातार केने काज छुटैक संभावना बढ़ि जाइत अछि। तँए......? मनचन- घनश्याम भाइक विचारकेँ समर्थन करै छी। नसीवलाल- बीचमे टिफीनक आवश्यकता तँ जरूर होइत अछि। सुकदेव- पशुपति नाथक दर्शन आ किछु बनिज हएब, जहिना दोबर लाभ दैत अछि तहिना बाल-भोग भेलासँ हएत। मनचन- बेस कहलिये भैया। एखन धरि जे हम सभ समाजमे टौहकी संग पहटोमे फँसल छी, तेकरो.......? घनश्याम- मनचनक दृष्टिकूट नै बुझलौं? नसीवलाल- दोसराक व्याख्यासँ नीक मनचनेक व्याख्या हएत। मनचन- से किअए भैया? नसीवलाल- हौ मनचन, जमीन-जाल, शब्द-जाल आ वाक्-जालमे सभ ओझराएल छी। तोहर आत्मा कि बाजि रहल छह से तोंहीटा बुझै छहक। वाणी होइत जे निकलतह वएह बात तोहर भेलह। मनचन- भैया, आत्मो बोली तँ दुबटिया (बुइधिक मोड़) पर हरा जाइत अछि। एक्के विचारकेँ आमक गाछ जकाँ डारि छिटकि जाइ छै। सुकदेव- मनचन, गप्पक छिलनि छोड़ह? मनचन- भैया, जाबे गप्पक छिलनि नै करब ताबे शीशो जकाँ सुरेब केना हएत। खाएर, जहिना औझका बैसार ऐतिहािसक भऽ रहल अछि तहिना जे पनपिआइ करब तइमे सभ मिलि बना, परोसि सभ मिलि खाए। घनश्याम- मनचन, जे कहलक ओ आब नै छै। सभठाम चलै छै। मनचन- आँखिक सोझमे जाइतिक आ दू सम्प्रदायक बीच खानो-पान आ प्रेमसँ वियाहो होइत देखै छी। मुदा सर्वसम्मतिसँ किअए ने घोषणा कऽ दइ छै। जखन कि धरतीसँ अकास धरि उड़िआइत अछि। पटाक्षेप। तेरहम दृश्य (दोसर बैसार...) घनश्याम- मनचन, बरी बड़ सुन्दर बनल छेलह। नून देनिहारकेँ चाबसी दइ छियनि। मनचन- हमरा रिझबै छी। दू सालसँ सभ नोनगर भोज विन्यासमे हमहीं नोन दइ छी। घनश्याम- किअए? मनचन- गाममे बारह आना लोक रोगिये-टट्टी अछि। कियो नून बाड़ने अछि तँ कियो अधे खाइए। भोज तँ सामुहिक छी। एकठाम बैस खाएब। घनश्याम- दोसरो चाबसी दइ छी मनचन। मनचन- से किअए? घनश्याम- एखन धरि हमहूँ नै गौर केने छलौं जे अहाँ केने छी। मनचन- भाय, अहाँक सोझमे बजैत संकोच होइए। मुदा अपना घरमे लोक नीकसँ नीक आ अधलाहसँ अधलाह बजैत अछि तँए........? घनश्याम- चुप किअए भेलौं? आइ धरि जे आनन्द जिनगीमे नै भेटल छल ओ भेट रहल अछि। मनचन- केना? घनश्याम- अपनासँ अगिला लग जी हुजुरी करए पड़ैए आ पैछलाकेँ जी-हुजुरी करबै छिऐ। जिनगीक कोनो आड़िये-धुर नै अछि। सुकदेव- मनचन, मुँह बन्न करह। बैसारक महत्व होइत अछि। दोसरो गोटेकेँ अवसर दहुन? आभा- एक तँ उमेरे कते भेल हेन। मुदा जतबे अछि तइमे आइ जते समाजक बीच आएल ओते.......। नसीवलाल- कोनो गलत कि सही परम्परा ओतबे दिन चलैत अछि जते दिन लोक चलबैत अछि। ऐ दिस विवेकीकेँ जरूर नजरि देबाक चाहियनि। आभा- कि नजरि? नसीवलाल- यएह जे पाछुसँ अबैत व्यवहार आजुक समैमे अनुकूल अछि वा नै। विवेकी मनुष्य होइक नाते सबहक दायित्व बनै छन्हि जे सनातनी व्यवहार अछि ओ जीवित रहए। आभा- सनातनी बेबहार की? नसीवलाल- परिवर्तनशील बेबहार। शान्ती- काका, गलत बेबहार समाजमे पैसल केना? नसीवलाल- ने एकबेर पैसल आ ने एकदिन पैसल। घुसकुनिया-आेंघरनिया दैत पैस अंकुरित भऽ विशाल वृक्षक रूपमे बदलि गेल। जइसँ लोक, परलोकक संग विश्वक नक्शे बदलि गेल। शान्ती- डाॅक्टरकाका, अपने किछु......? रघुनाथ- देखियौ, जहिना रामायणमे तुलसी कहने छथि- हरि अनन्त हरि कथा अनंता' तहिना अछि। ओना, दुनियाँक सभ मनुष्यकेँ किछु आवश्यकता आ गुन एक तरहक अछि, मुदा.....? शान्ती- मुदा की? रघुनाथ- यएह जे किछु एहनो अछि जे सभकेँ फुटो-फुट-अलगो-अलग- होइत। ओना हमहूँ एक भगुए भऽ गेल छी। समाज अध्ययन तँ विशाल अध्ययन छी, तँए......। कृष्णदेवबाबू आ मनमोहनबाबू बुझा सकै छथि। मनमोहन- भाय, जहिना अहाँ रोग आ रोगीक बीच रहलौं तहिना छी। मुदा मनक बात छिपाइयो कऽ राखब उचिन नै बुझै छी। सुकदेव- हृदेक बात इंजिनियर सहाएब बजलाह। मनमोहन- जेना-जेना समए बीत रहल अछि तेना-तना लोकोक जिनगी बदलि रहल अछि। पहिलुका लोक सोलहो आना शरीरसँ श्रम कऽ शरीरक रक्षा करैत छलाह। सोमन- जेना आइ देखै छिऐ तेना नै छलै? मनमोहन- नै। सोमन- (किछु शंका करैत...) इंजीनियर सहाएब, कते दिन भेल से तँ नीक जकाँ मन नै अछि। मुदा एहिना एक बेर रौदी भेल से मन अछि। जहाँ-तहाँ लोक कमाइ-खटाइले लोक भागल। हमहूँ भोलबाकक्का सेने कलकत्ता गेलौं। आभा- कलकत्ता गेल छी? सोमन- गेले नै छी दू साल ठेलो चलौने छी। जइसँ सभ गली-कुच्ची देखल अछि। आभा- केना ठेला चलबै छेलिऐ? सोमन- छातीमे ठेलाक अगिला भाग अड़ा दुनू हाथसँ दुनू भागक डंटा पकड़ि ठेलै छलौं। आभा- इंजीनि गाड़ी सभ नै छलै? सोमन- छलै। जीपे-कारक कोन बात जे बड़का-बड़का कोठा, करखन्ना, दोकान सभ छलै। जेहेन ओइठीनक दोग-सान्हिक सड़क अछि तेहन तँ अपना सभ दिस अछियो नै। घनश्याम- बात दोसर दिस बढ़ल जाइए। मनमोहन- बड़बढ़िया घनश्याम भाय कहलनि। एक तँ दैवी प्रकोप-बाढ़ि, रौदी-सँ अपन इलाका पछुआएल दोसर मनुक्खोक दोख कम नै छै। जे इलाका जते पहिने जागल ओ ओते अगुआएल। आभा- कनी सोझरा दियौ कक्का? मनमोहन- (मुस्की दैत...) पहिने जंगली अवस्थामे अपना सबहक पूर्वज रहै छलाह। हाथे-पएरसँ सभ किछु करै छलाह। जेना-जेना बुद्धि-अकील बढ़ैत गेल तेना-तेना आगू मुँहेँ ससरैत गेलाह। हथकरघासँ पाँच सीढ़ी आगू बढ़ि कम्प्यूटर युगमे पहुँच गेल छी। आभा- ऐसँ आगूओ बढ़त? मनमोहन- निश्चित बढ़त। निचेनमे कहियो आरो कहब। एखन जइ काजे एकत्रित भेल छी तेकरा आगू बढ़ाउ। सोमन- भाय, हम सभ ने कहियो काल मासुल दऽ कऽ बस, जीपपर चढ़ै छी। अहाँकेँ तँ अपने अछि। मनमोहन- से तँ अछिये। घनश्याम- ओना बाढ़ि रौदी दुनू जनमारा छी। मुदा आइ रौदीक विचार करू। शान्ती- मैनेजर काका, अहाँ सभ तरहे उपर छी। ओना समाजक किछु भार उपरमे अछि। तँए चाहब जे झगड़ा-झंझटसँ नै विचारक रास्तासँ समाज आगू बढ़ए। घनश्याम- विचार तँ अपनो सएह अछि। मुदा नहियो चाहलापर कते-गोटेकेँ बैंकक लोनमे जहल पठबए पड़ैए आ चौकठि-केवाड़ उखाड़ए पड़ैए। शान्ती- से किअए? घनश्याम- (िवस्मित होइत...) कि कहब बोरिंग-दमकल, गाए पोसैक लोन उठा सराध-वियाहक भोज कऽ पूँजी नष्ट कऽ लैत अछि। समैपर आपस नै करैत। शान्ती- तखन? घनश्याम- औझुका बैसार तँए ऐतिहासिक अछि जे समाज अपन कल्याणक दिशा निश्चित करथि। नसीवलाल- जुग-जुगान्तरसँ जे मनोवृत्ति बनि गेल अछि ओकरा एकाएक नै बदलल जा सकैए। मुदा बिना बदलने काजो नै चलत। तँए जरूरी अछि जे उत्पादन आ उपभोगकेँ नीक जकाँ सभ बुझी। घनश्याम- जुगक अनुकूल विचार अछि। सुकदेव- घनश्यामबाबू, गामक बारहआना जमीन हुनका सबहक छियनि जे गाम छोड़ि अनतए जा नोकरी करै छथि। जखन कि खेती केनिहारकेँ अपन खेत नै छियनि। घनश्याम- (मूड़ी डोलबैत...) हँ से तँ अछिये। सुकदेव- तइ बीच कोना सामंजस्य हएत? घनश्याम- ओना अपना सभ बुझै छी जे अंग्रेजकेँ भगा हम सभ स्वतंत्र भेलौं मुदा से नै छी। जखन शासन आ सम्पत्ति (देशक) सबहक सझिया भए जिनगीक समुचित विकास दिस बढ़त तखन हएत। रघुनाथ- (हृदए खोलि...) मन हल्लुक करै दुआरे अपन बात कहै छी। जहिना जुआनीक उमकीमे गाम छोड़ि शहर गेलौं तहिना आइ बुझि पड़ैए जे......? मनमाेहन- रूकलौं किअए? रघुनाथ- संकोच होइए। जइठाम छी तइठाम निहत्था भऽ गेलौं। जिनगीक सभ किछु छीना रहल अछि। मुदा गाममे सभ किछु देख रहल छी। मनमोहन- संकोच किअए होइए। रघुनाथ- पूँजी नष्ट होइत देख रहल छी। जइले जिनगी गमेलौं सएह.......? मनमोहन- डाॅक्टर सहाएबसँ कनियो नीक नै छी। ओना डाॅक्टर सहाएबकेँ सभकिछु भेट जेतनि मुदा......? रघुनाथ- (मुस्की दैत...) मुदा की? मनमाेहन- एग्रीकल्चर शिक्षा पाबि बेटा गाममे रहत आ अपने शहरमे। बुढ़ाढ़ीमे एकलोटा पोनियो के देत। सोमन- अहाँक गाम छी। खेत-पथार छी। अहाँक सुआगत अछि जे गाम आबि अपन जिनगीक अनुभव अनाड़ी-धुनाड़ीकेँ दिऐक। कृष्णदेव- एखन हम तनावमे चलि रहल छी। मुदा तैयो कहै छी अहाँ सबहक विचारानुसार जीवैक कोशिश करब। शान्ती- घनश्यामकाका, आगूक भार अहाँ उपर? घनश्याम- गामक भाग जगि गेल। पूँजीक जते जरूरत हएत ओ बैंकसँ दिआ देब। भने एग्रीकल्चर ग्रेजुएट गाममे रहताह, हुनका माध्यमसँ गामक योजना बना उन्नति खेती आ खेतीसँ जुड़ल कल-कारखानाक लेल प्रयासरत रहब। शान्ती- (हँसैत...) जिनगीक सार्थकता पाबि रहल छी। घनश्याम- किछु करैक संकल्प सभ लिअ। जखने सामुहिक डेग उठत तखने रस्ता धड़ैमे देरी नै लागत। नसीवलाल- सबहक दुख-सुख- सहबहक छी। सबहक इज्जत- सबहक छी। पटाक्षेप समाप्त। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। बिपिन झा, IIT Bombay स्तरविहीन स्तर (’अप्पन युनिभरसीटी’ केर हाल) {लेखक बिपिन कुमार झा, IIT मुम्बई मे Ph. D शोधरत छथि। टिप्पणी bipinjhajnu@iitb.ac.in पर सादर आमन्त्रित।} लालबुझक्कर मन्त्री जयराम रमेशक भारतीय वि्वविद्यालय के स्तर केर सम्बन्ध मे कयल गेल टिप्पणी बुद्धिजीवी वर्गक बीच में पुनः चर्चा केर विषय बनि गेल ।आरोप प्रत्यारोप आ पूर्वाग्रह सँऽ ऊपर उठि यदि चिन्तन कयल जाय तऽ निश्चित रूप सँऽ अपन सभक वास्तविकता अछि। देश भरि में 200 सँऽ अधिक विश्वविद्यालय अछि। मुदा गिनती केर किछु विश्वविद्यालय छोडि अधिकांश डिग्री केर प्रिंटिंग प्रेस मात्र अछि। कहल जाइत छैक जे अंग्र्ज सभ विश्वविद्यालयीय शिक्षा केर माध्यम सँऽ भारत में शासन चलेबाक हेतु कलर्क तैयार करैत छलाह मुदा आजु क विश्वविद्यालय के उच्च शिक्षा प्राप्त औसत युवा एहियो योग्य नहि छथि। आजुक विश्वविद्यालय केर प्रक्रिया थीक येन केन प्रकारेण प्रवेश लिया, फीस भरू, साल भरि अपन सांसारिक क्रिया कलाप में व्यस्त रहू, जखनि परीक्षा केर प्रवेश पत्र आ सिड्यूल आबि जाय तखनि गेस पेपर श्योर सिरीज एवं अन्यान्य साधन सँऽ परीक्षा रूपी वैतरणी पार करू। कोनो कक्षा, कोनो लेक्चर, कोनो सेमिनार केर आवश्यकता नहिं। कतहु कतहु तऽ ’लक्ष्मीजी’ सेहो ’सरस्वतीजी’ केर प्रमाणपत्र दैत छथीन्ह। विशेष उदाहरण अप्पन स्वनामधन्य मिथिला विश्वविद्यालय कऽ लिआ। षड्वर्षीय योजना, पंचवर्षीय योजना वला ऐतिहासिक गौरव रखनिहार ई विश्वविद्यालय ओहि स्थान पर अछि जे स्थान भारतवर्ष में बौद्धिक रूप सँऽ सर्वाधिक ऊर्वर अछि। जकर परीक्षा कैलेण्डर कें भगवाने मालिक छथि किया कि हाल में हमर एकटा अनुज सेकेण्ड ईयर पास कयलाके मात्र दू महिना बाद थर्ड ईयर कें परीक्षा देलथि! आ पूर्व में हमर परिचित साढे पाँच वर्ष में स्नातक बिना फेल केने उत्तीर्ण कयलथि। जाहि तरहें एकटा भातक दाना पूरा वर्तन केर भातक परिचय दैत अछि ओहि तरहें ई उदाहरण पूरा देश कें सर्वव्यापी उदाहरण अछि। आब बात करी शोधक स्थिति। ई अपने आप में एकटा ’शोध’ केर विषय अछि कियाक तऽ अधिकांश विश्वविद्या लय के रिसर्च वर्क आ रिसर्च थिसिस के की हालात अछि एहि से अपने सभ परिचित होयब। मात्र दस हजार रुपया में थिसिस लिखबा के जमा करू आ “डाक्टर” केर उपाधि धारण करू। दुर्भाग्यवश हमहूं भारत केर सर्वश्रेष्ठ तीन टा संस्थानक (Allahabad University, Jawaharlal Nehru University, IIT Mumbai) छात्र रहलहुं हुनकर वास्तविकता कहि हम मर्यादा केर उल्लंघन नहिं करब। एहि लेल हम क्षमाप्रार्थी छी। दस हजार रुपया खर्च कय Ph. D उपाधि हासिल करू आ बोरा भरि पैसा अथवा झोडा भरि पैरबी केर माध्यम सँऽ कतहु “असिस्टेण्ट प्रोफेश्वर” कें पद प्राप्त करू और अपनहिं सदृश “रक्तबीज” केर निर्माण करू। वेतन पचास हजार सँऽ सवा लाख रुपया मासिक और कार्यभार ’स्वेच्छानुसार’। चर्चा में प्रोफेशनल कालेज केर चर्चा छुटि गेल। जे व्यक्ति इण्टरमीडियेट केर कैल्कुलस क सवाल हल नहि कय सकैत छथि ओ इंजीनियरिंग कालेज (सामान्यतया प्राइवेट) के डाइरेक्टर आ फैकेल्टी आदि बनि गेल छथि। मध्यम आ निम्न वर्ग के माता पिता अपन बच्चा सभ के ऊपर जिन्दगी भरि के पूंजी खर्च करि एहि कालेज सभ सं बी. टेक आ एम.बी. ए करबैत छथि। हुनक हाल ई पंक्ति पर चरितार्थ होइत छन्हि “बडे बेआबरू होकर तेरे कूंचे से हम निकले”। यद्यपि ई निराशाजनक तस्वीर एकटा वास्तविकता अवश्य छी मुदा एहि अन्हार में किछु चमकैत नक्षत्र सेहो अछि। आवश्यकता एहि गप्प के अछि जे शिक्षा प्रणाली में सस्थागत रूप सँऽ व्यापक परिवर्तन हेबाक चाही। शिक्षा हेतु अधिक धन आबण्टन, उच्चशिक्षाऽधिकारी के पद पर ईमानदार व्यक्ति कें नियुक्ति योग्य व्यक्ति के फैकल्टी के नियुक्ति, आ संगहि यदि पूर्ण पारदर्शी व्यवस्था अगर होइत छैक तऽ निश्चित रूप सँ तस्वीर किछु भिन्न होयत। आशा अछि जे समाज बुद्धिजीवीवर्ग एवं नीतिनियन्ता उच्चशिक्षा केर सर्वोच्च प्राथमिकता देताह। तखनि एकटा ज्ञान आधारित समाज केर निर्माण अवश्य हेतैक। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। आशीष अनचिन्हार बेचन ठाकुरजीक नाटक बेटीक अपमान हम व्यत्तिगत रुपेँ हरियाणाक प्रायः-प्रायः प्रत्येक कोणमे रहल-बसल छी आ तँए स्थानीय जनताक रुपमे हरियाणामे कत्तौ घुसि जाइत छी। एकर हानि हमरा जे भेल हुअए मुदा लाभ एतेक तँ जरुर भेल जे हम स्थानीय परेशानी बुझए लागल छिऐक। ओना हरियाणाक नाम सुनिते मोनमे समृद्धिक नजारा देखाए लगैत छैक। भरल-पुरल खेत सुझाए लगैत छैक। मुदा एहिठामक स्थानीय समस्या बहरिआ लोककेँ नै बुझल छैक। ऐठाम हरेक साल १००-१५० लड़काक बिआह दोसर राज्यक लड़कीसँ होइत छैक। जँ सोझ ढ़ंगे कही तँ हरियाणाक सेक्स रेशिओ (लिंगानुपात) असमान अछि। अर्थात १००० लड़कापर ८५०-९०० लड़की। आब अहाँ सभ हमरा हूट करबाक सोचि रहल हएब। प्रस्तुत पोथी मैथिलीक अछि आ हम हरियाणाक गप्प कऽ रहल छी से अहाँ सभकेँ उन्टा लागि रहल हएत। मुदा ऐठाम हम ई कहए चाहब जे मात्र स्थान आ मनुख बदलि जाइत छैक, मनोवृति आ समस्या वएह रहैत छैक। आब हम अही समस्याकेँ मिथिलाक परिप्रेक्ष्यमे सोची। बेसी अंतर नै भेटत आ से ऐ द्वारे जे नेपालमे सेहो मिथिला छैक। आ भारतक मिथिला आ नेपालक मिथिला दुनूमे बिआह प्रचलित छैक। तथापि जँ भारतक हिसाबे सोची तँ बिहारमे १००० लड़कापर ९२१ लड़की छैक ( ओना जँ २०११ क जनगणनाक प्रोविजनल रिपोर्ट देखब तँ संपूर्ण भारतमे १००० लड़कापर ९४० लड़की छैक)। आ जँ ऐ समस्याक परिप्रेक्ष्यमे विकसित हरियाणा आ अविकसित मिथिलाकेँ देखी तँ कोनो बेसी अंतर नै बुझाएत। अर्थात ऐ समस्यासँ दुनू क्षेत्र ग्रसित अछि। मुदा ई आब बिचारए पड़त जे ई समस्या कहाँसँ निकलैत छैक? कोन मनोवृतिसँ ई समस्या परचालित होइत छैक ? आखिर ई कोन दृष्टिकोण छैक जइ तहत लोक बेटी नै चाहैत अछि आ ऐ लेल भ्रूण हत्या सन पाप करबासँ सेहो नै हिचकैत अछि ? मिथिलाक हिसाबे गप्प करी तँ दहेज प्रथाकेँ एकर जिम्मेदार ठहराओल जा सकैए मुदा हरियाणाक हिसाबें ई कारण ओतेक प्रभावी नै कारण हरियाणामे दहेज प्रथा नै कऽ बराबर छैक। तँए हम दहेजकेँ भ्रूण हत्याक एकटा कारण मानैत छी मुदा प्रमुख कारण नै। हमरा हिसाबे ऐ समस्याक प्रमुख कारण एखनो आधुनिक कालमे बेटाकेँ अनिवार्य मानब अछि। एकर समाजिक आ आर्थिक, दुनू पक्षमे बाँटए पड़त। समस्या आ साहित्य दुनू एकै चीजक अलग-अलग नाम थिक। बिना समस्या कोनो साहित्य नै भऽ सकैत छैक। आ अंततः साहित्ये कोनो समस्याक समाधान तकैत छैक। मुदा मैथिली साहित्य एकर अपवाद अछि। ऊपर हम देखिए चुकल छी जे कोना मिथिला भ्रूण हत्याक समस्यासँ ग्रसित अछि। तथापि ऐठामक साहित्यकार ऐपर कलम नै चलौलन्हि। घोर आशचर्यक बिषए। आशचर्यक बिषए ईहो जे एहने-एहने समस्यासँ कतिआएल साहित्यकारकेँ आलोचक आ मठाधीश सभ बढ़ाबा देलथि। कोनो समाज कोनो समस्यासँ कतिआ कऽ बेसी दिन नै रहि सकैत अछि। एकर अनुभव हमरा श्री बेचन ठाकुर लिखित नाटक " बेटीक अपमान" पढ़लापर बुझाएल। आ संगहि-संग ईहो बुझाएल जे आब बेसी दिन मिथिला सूतल नै रहत आ ने बेटीकेँ खराप बुझल जाएत । श्री बेचन ठाकुर ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। १.हम पुछैत छी: मुन्नाजीक सोमदेवसँ भेल गपशप २. हम पुछैत छी: मुन्नाजीक अशोकसँ भेल गपशप १ हिन्दी-मैथिलीक विज्ञ कवि आचार्य श्री सोमदेवजीसँ हुनक दीर्घकालीन सृजन निरन्तरताक मादे विहनि कथाकार मुन्नाजीसँ सोझाँ-सोझी भेल विस्तृत गप्पक सारांश: मुन्नाजी: सर्वप्रथम अपनेकेँ प्रबोध सम्मान प्राप्ति हेतु बधाइ। सामान्यतः मैथिली रचनाकार किछु कालावधिमे रचनारत रहि पुरस्कारक व्योंत वा प्राप्तिक प्रतीक्षारत रहि सुस्ताए लगैत छथि। मुदा अपने ऐ सभसँ ऊपर उठि प्रारम्भसँ एखन धरि एक्के सक्रियताक संग जुड़ल छी। ऐ निरन्तरताक पाछाँ की सोच वा कोन रहस्य! वा ई विशेष ऊर्जावान हेबाक परिणाम अछि? सोमदेव:पुरस्कार आत्मबल दैत छैक। मुदा हमर माथमे सदिखन नव विचार घुरघुराइत रहैए, जकरा हम अपन लेखनीमे उतारलाक पछातिये संतुष्टि पबै छी। सम्प्रति लिख नै पबै छी, शारीरिक अक्षमताक कारणसँ। मुदा लिखबाक उद्देश्य अपन विचारकेँ दोसर धरि पहुँचेबाक रहैए। मुन्नाजी: अपने अपन प्रारम्भिक रचनाकालक क्रियाकलाप वा मैथिली साहित्य सृजनमे प्रवेशक जनतब दी। सोमदेव:हम लिखब हिन्दीमे प्रारम्भ केने रही। समयान्तरे हिन्दीमे हेरा जेबाक डर आ माइक भाषाक प्रति प्रेम हमरा मैथिली दिस अनलक आ ऐ भाषामे रचनारत रहि टिकल रहि गेलौं। संगहि अपन स्पष्ट विचारकेँ संप्रेषणीयताक स्तरपर मैथिलीमे बेसी फरीछ कऽ पबैत छी, हिन्दीमे नै। मुन्नाजी:अहाँ हिन्दी आ मैथिली दुनू भाषामे समान रूपेँ सृजनरत रही, एकर की कारण? उपरोक्त दुनूक अस्तित्वक फराकसँ कोना चिवेचन करब? सोमदेव:रचनाक आरम्भमे दुनू भाषामे रचना केलौं मुदा बादमे मैथिली मात्रमे लिखलौं। दुनू उपरओँजक भाषामे गिरल जा रहल अछि। मैथिलीकेँ हिन्दीक आच्छादन आ हिन्दी अंग्रेजीक घोघ काढ़ल कनियाँ जकाँ भऽ घोंटल जा रहल अछि। बेगरता छै अपन अस्तित्वक रक्षार्थ अपन भाषा मात्रक रचना होइत रहए। दोसरा भाषाक देखाऊँसे वा वैशाखीक बलेँ ठाढ़ हेबाक चेष्टा नै हुअए। मुन्नाजी:अहाँ अपन प्रारम्भिक रचना कालसँ आजुक अवधि धरि ऐ भाषाक रचनाकारमे रचनामे वा भाषा मध्य केहेन परिवर्तन वा टकरावक अनुभव केलौं आ से की सभ छल? सोमदेव:प्रारम्भमे छन्दक प्राथमिकता छलै। बादमे छन्दमुक्त काव्य सभ एलै। हमहूँ एहेन रचना केलौं। मुदा पहिलुका जे स्तर छलै से अर्थपूर्ण छलै, आब अर्थहीन रचना बेसी आबि कऽ भरि गेलैए, जइसँ स्तर नीचाँ जा रहल छै। तकर मूल कारण रचनाकार द्वारा अध्ययन आ अध्यापनक अभाव छैक। मुन्नाजी:मैथिली भाषाक एतेक प्राचीन आ स्वतंत्र अस्तित्व रहितो ओ आइयो अपन अस्तित्ववास्ते घैहैर काटि रहल अछि। एकर की मूल कारण वा अवरोध अछि? सोमदेव:सत्य अछि जे दक्षिण एशिया, विशेष कऽ भारतमे संस्कृतक समकक्ष जँ कोनो भाषा छै तँ से अछि मैथिली भाषा आ तिरहुता लिपि (बादमे कैथी लिपि सेहो)। मुदा शास्सकक वैविध्यताक संग एकरो भौगोलिक रूपेँ टुकड़ी कऽ देल गेलै। आइ गुजराती, बांग्ला, असमी, ओड़िया,कुमाऊँ-गढ़वाली आदि एकरे टुकड़ी अछि, बेगरता छै एकाकार देबाक से भऽ जाए तँ एकरापन अस्तित्व छै से मरतै नै। मुन्नाजी: अहाँ सबहक प्रारम्भिक रचनाकालमे गद्य आ पद्य दुनू विधाक जे स्वरूप से आजुक सन्दर्भमे बहुत बदलल अछि। समयान्तरे ऐ दुनू विधाक किछु आओर प्रतिरूप सोझाँ आएल यथा गजल आ विहनि कथा। ऐ सबहक भविष्य केहेन देखाइए? सोमदेव:देखियौ मुन्नाजी, व्यक्ति, स्थान, भाषा वा रचना सबहक बदलाव समयानुसार स्वाभाविक छै। गजलकेँ कोनो भाषाक मूलमे निहित कएल जा सकैए, बशर्ते कि रचनाकार ओकर जड़िमे डूमल होथि। वर्तमान रचनामे एकर अभावे फूहड़पन वा गीजल चीज बेसी देखा पड़ैए। लघुकथामे अहाँ किछु गोटे नीक काज कऽ रहलौं अछि, से ठाम-ठीम देखै छी। भविष्यमे बदलैत समयानुसार पाठकक श्रेष्ठ खोराक बनत से विश्वास अछि। मुन्नाजी: छठम-सातम दशकमे मैथिली साहित्यमे साम्यवादी विचारधाराक बिरड़ो उठलरहै। ओकर की प्रभाव भेलै आ आइ ओ कतऽ छै? सोमदेव:यौ बौआ, कहियो एहेन बिरड़ो नै उठलै। तहिया कांग्रेसक शासन रहै आ ओ सभ मैथिलीकेँ दबौने रहलै। ऐ मे कोनो स्वतंत्र विचार वा वादतँ सपना मात्र रहै। हँ किछु गोटे अपनाकेँ हाइलाइट करबा लेल एहने विचारे उधियेबाक प्रयास केलनि। हमहूँ समाजवादी विचारक समर्थक रही, मुदा की गरीब वा गरीबीपर लिख देने समाजवादी कहाए लागब, किन्नहुँ नै। रूसक मार्क्सवादी विचार मिथिलाक कठकोकांइड़ बाभनवादमे कतौ सन्हिया सकै छै। नै, कहियो नै। मार्क्सवाद वा कोनो वादमे हमर समकक्ष वा श्रेष्ठ रचनाकार सेहो वादसँ जुड़बाक नामपर विचारहीन देखाइत रहलाह। मुन्नाजी: मैथिली-हिन्दी मध्य साहित्यिक वर्णसंकरता पसरलै। मुदा मैथिलीकेँ पूर्णतःजातिवादिता गरोसने रहलै आ ई जाति विशेषक मुट्ठीक बौस्तु भऽ गेल। की ऐ सँ कहियो अहूँ सभ आच्छादित वा प्रभावित भेलौं? ऐ सँ रचनाकार वा साहित्यकेँ कोनो नोकसान भेल? सोमदेव:ई किछु (मात्र किछुए) लोकक, जे रचनाकार नहियो छथि, तिनकर कुटिचालि अछि जे अदौसँ आबि रहल अछि। हँ ई सत्य जे कमाइक आस देखेलापर बाभन लोकनि अपन मूल भाषा संस्कृत छोड़ि गएर बाभनक मूलभाषा मैथिलीकेँ गरोसि लेलनि। तइमे गएर बाभन लोकनि ओतबे जिम्मेवार छथि, जे अपनाकेँ पूर्णतः कतियौने रहलाह। मुन्नाजी: अहाँ निस्वार्थ सृजना वा साधनारत रहलौं। आ समय-समयपर ऐ सेवाक हेतु पुरस्कृत होइत रहलौं, एकर केहेन अनुभूति भेल? सोमदेव:यौ , पहिनहियेँ कहलौंहेँ जे ऐ सँ आत्मबल भेटैछ। हमर अपन विचार लेब तँ जहिया जे पुरस्कार भेटल ओ राशि धीया-पुताकेँ दैत रहलौं। अकादेमी पुरस्कारक राशि बेटाकेँ पढ़बामे आ प्रबोध सम्मानक पाइ नातिनकेँ दऽ अपनाकेँ कृतार्थ बुझै छी। हँ एकटा बात जे सभ संतान, बेटा-जमाए, पोता-पोती, नाति-नातिन नीक पदपर छथि। हमर जीवनक सर्वश्रेष्ठ पुरस्कारक सर्वस्व अनुभूतिक रूपमे ईएह अछि। मुन्नाजी: नवका दशकमे गएर बाभनक झुण्डक सक्रिय साहित्यिक प्रवेशकेँ मैथिली साहित्यक नजरिये कोना देखै छी। एकर भविष्यक संकेत की अछि? सोमदेव: आब किछु लोक जे सक्रिय छथि से संघर्षमे पाछाँ नै होथि तँ सफल अपनो हेता आ भाषाक भविष्य सेहो उज्जवल हएत, जै हेतु धैर्य आ सक्रियता चाही (दू-तीन दशकधरि), नै तँ ई भाषा पूर्णतः मरि जाएत। मुन्नाजी: मैथिली आब कागज मोइससँ बहरा अन्तर्जालपर आबि वैश्विक स्तरपर पसरि गेल अछि, एकरा मैथिलीक वर्तमान वा भविष्यसँ कोन रूपे जोड़ि कऽ देखऽ चाहब? सोमदेव:ई प्रसन्नताक बात अछि जे आब ककरो कोनो विचार (प्रत्यक्ष वा अप्रत्यक्ष) सेकेण्डेमे सभक सोझाँ अबैए आ अहाँ पाछाँ अपन वक्तव्यसँ मुँह नै मोड़ि सकै छी। दोसर जे अहाँक विचारकेँ वैश्विक मंच भेटल अछि, अगिला समएमे ओ जगजियार हएत। मुदा कागज मोइसक जमाना लदल नै अछि, ऐ मे सक्रिय रहबे करू। मुन्नाजी: मैथिली साहित्यमे ललनाक प्रवेश निषिद्धता वा महिला रचनाकारक अभावक की मूल कारण अछि? एकर निदानार्थ की कहब? भविष्यमे एकर की प्रभाव भऽ सकैए? सोमदेव:अहाँक ई सुन्दर सोचक प्रश्न अछि, तै लेल धन्यवाद। पहिने नारी घोघ तरक बहुरिया आ चहरदिवारीमे नुकाएल बान्हल मुट्ठीक चीज मात्र छल, तेँ ओकर विचार दबल रहि जाइत छल। आइ मैथिल ललना सभ मानसिक, शारीरिक आ तकनीकी सभ स्तरपर उच्च भऽ रहल अछि। विचार सेहो सद्भावपूर्ण,ठोस, राग-द्वेष रहित छै। ई पीढ़ी जुड़ि गेल तँ ई आर फरिछाएत, जे स्वच्छ चिन्तन आ चित्रण सोझाँ आओत। मुन्नाजी: अन्तमे अपने नवका धीया-पुता (रचनाकार) केँ उज्जवल साहित्यिक भविष्यक वास्ते की सनेस देबऽ चाहब? सोमदेव: नवका धीया-पुताक मगज थोरेक आर आगू छै। एकर रचनात्मक विचार ठोस आ दिशा सूचक अछि। ई सभ जुड़थि तँ मैथिलीक कल्याण हएत। हँ, अपन संस्कार नै बिसरथि बस ! एतबे। अहाँ आ गजेन्द्रजी दुनू गोटेकेँ अन्तर्जालक जालमे हमरो लपेट अपन विचार रखबाक अवसर देबालेल हृदैसँ धन्यवाद। मुन्नाजी: हार्दिक आभार! बहुमूल्य समय आ विचार देबाक वास्ते। २ त्रिकोणक एक कोणसँ अशोकसँ साक्षात्कार मुन्नाजी: अपने मैथिली रचना प्रारम्भक प्रेरणा कतऽ सँ पौलहुँ। एकर प्रारम्भ कहिया आ कोना भेल? अशोक: हम मैथिलीमे रचनाक प्रेरणा काशीमे ग्रहण केलहुँ। साते वर्षक अवस्था सँ पिता संग काशीमे रहऽ लगलहुँ, पढ़बाक लेल। मायाअ भाइ-भाउज लोकनि गाममे रहैत रहथि। काशीमे राम मन्दिरपर रही। ओतऽ हमर पिता स्व. उमापति झा मन्दिरक व्यवस्थापक रहथि। राममन्दिरपर मैथिल छात्र संघ द्वारा अनेक साहित्यिक ओ सांस्कृतिक कार्यक्रम होइ। नेनेसँ सभ देखऽ सुनऽ लगलहुँ। कानमे मिथिला, मैथिल ओ मैथिली शब्द सभ जाय लागल। एही क्रममे हमहूँ कविता सभ लिखऽ लगलहुँ। वर्ष १९६८ मे “वटुक” पत्रिका मे डॉ. सुधाकान्त मिश्र (जे “वटुक” पत्रिकाक सम्पादक रहथि) हमर पहिल कविता “शशि चन्दाके समान” छपने रहथि। ई कविता हम चन्दा झा जयन्तीक अवसरपर लिखने ओ पढ़ने रही। ओहि जयन्तीक अध्यक्षता मैथिलीक प्रसिद्ध कवि चन्द्रनाथ मिश्र “अमर” केने रहथि। तकर बाद कविता सभ लिखऽ लगलहुँ। जखन दर्जन भरि कविता लिखल भऽ गेल तँ अपन जेठ भाइ स्व. सुशील झा (प्रधानाचार्य, एल.एन. जनता कॉलेज, झंझारपुर) केँ देखौलियनि। ओ हमरा ओहि कविता सभकेँ डॉ. धीरेन्द्र (हमरे गामक प्रसिद्ध साहित्यकार) केँ देखेबाक लेल निर्देश देलनि। डॉ. धीरेन्द्र कविता सभ देखलनि आ ओहिमे सँ किछुकेँ मिथिला मिहिरमे पठेबाक लेल कहलनि। ओहि कवितामे सँ दूटा कविता मिहिर मे छपल। जाहिमे पहिल “ई न्यू लाइटक फैसन थिक” वर्ष १९६९ मे मिहिरमे छपल रहय। मुन्नाजी: त्रिकोणक शेष दू कोण माने शिवशंकरजी/ शैलेन्द्रजी संग कोना जुड़लौं? पहिल संग्रह त्रिकोणक प्रकाशनक नियार कोना भेल? अशोक:काशीसँ गरमीक छुट्टीमे गाम आबी। अही क्रममे वर्ष १९६७-७० मे गाममे दुनू गोटेसँ भेँट भेल। दुनू गाममे रहैत छला आ दुनूमे नेनेसँ मित्रता रहनि। तीनूकेँ जखन भेँट भेल तँ बुझलहुँ जे तीनू एक्के रस्ताक पथिक छी। तीनू कविता आ गीत लिखैत छी। कविता लिखब हमरा तीनूकेँ एक-दोसरासँ जोड़ि देलक। तकर बादसँ तँ तेहेन मिलान भेल जे लगबे नहि करय जे कहियो अपरिचित छलहुँ। कविताक संग तीनू गोटे हम, शिवशंकर आ शैल (शैलेन्द्र आनन्द) कथा सेहो लिखऽ लगलहुँ। कथा सभ पत्रिका सभमे छपऽ लागल। शैल गामेसँ “आहुति” पत्रिका सेहो निकालऽ लगलाह। तखन नियार भेल जे तीनूक एक कथा-संग्रह निकलय। हम तावत् नोकरीमे पटना आबि गेल रही। पटनेसँ तीनू कथाकारक पाँच-पांच टा कथाक संग्रह निकलल “त्रिकोण” नामसँ। मुन्नाजी: त्रिकोणसँ कतेक पूर्व अहाँ सभ लेखन प्रारम्भ केलहुँ। फेर एक पटलपर कोना एलौं आ तकर की फाएदा आ नोकसान भेल? अशोक: मोटामोटी कही तँ हमरा तीनू गोटे एक्के संग लेखन प्रारम्भ केलहुँ। हम काशीमे रही। ओतहि कविता लिखऽ लगलहुँ १९६७-६८ ई. सँ। शिवशंकर श्रीनिवास आ शैलेन्द्र आनन्द गाम लोहनामे रहथि। ओही ठाम रहि ओही समयसँ लिखऽ लगला। लिखब शुरू करबाक बाद करीब दू-तीन बरखक भीतरे तीनूकेँ गाममे भेँट भऽ गेल। तकर बाद तँ संग-संग तँ संग-संग साहित्यमे जीबऽ लगलहुँ। हम १९७१ ई. मे गाम चल अयलहुँ। सरिसब कॉलेजमे आइ.एस.सी. करबाक लेल। १९७२ ई. मे आइ.एस.सी. केलहुँ। ओहो दुनू सरिसबे कॉलेजमे पढ़थि। तीनू लगभग संगहि कॉलेज जाइ आ आबी। मित्रता प्रगाढ़ होइत गेल। बी.एस.सी. करबाक लेल हम सीतामढ़ी गेलहुँ १९७२ ई. मे। मुदा फेर १९७५ मे गाम चल अयलहुँ। दू वर्ष गामे रहलहुँ। बी.पी.एस.सी. क प्रतियोगिता परीक्षाक तैयारीक क्रममे। फेर एक संग तीनूक जुटान भऽ गेल। कोनो नव रचना करी तँ तीनू एक दोसराकेँ सुनाबी। तकर बाद हमरा नोकरी लागि गेल। पटना आ अररिया, बक्सरमे रहलहुँ। वर्ष १९८३ मे पटना आबि गेलहुँ। त्रिकोण १९८७ मे छपल। ई सहयोगी प्रकाशन तीनूकेँ कथाकार रूपमे परिचय स्थापित करबामे सहायक भेल। कथाकारक रूपमे लोक चीन्हय लागल। एहिसँ नोकसान नहि फाएदे भेल। मुन्नाजी: अहाँ जहिया लेखन प्रारम्भ केलहुँ तहिया आ आजुक परिस्थिति (साहित्यिक) मे की समानता वा भिन्नता देखाइछ? अशोक:हमरा लोकनि जहिया १९६७-६८ मे लेखन प्रारम्भ केलहुँ तकरा आइ चालीस वर्षसँ बेसी भऽ गेल अछि। एहि चालीस वर्षमे बहुत परिवर्तन भेल अछि। से परिवर्तन व्यक्तिगत आ साहित्यिक दुनू रूपमे भेल अछि। तीनू आब एक संग नहि रहैत छी। भेंटो-घाँट कमेकाल भऽ पबैत अछि। मुदा साहित्य लेखन चलि रहल अछि। तीनूक पोथी सभ प्रकाशित भेल अछि। तखन जे जोश-खरोश ओहि समय रहय से आब नहि रहि गेल अछि। से दुनू स्तरपर। व्यक्तिगत रूपमे पारिवारिक कारण सभसँ आ साहित्यिक परिदृश्यमे सामाजिक कारण सभसँ। जँ जँ मैथिलीकेँ सुविधा प्राप्त भऽ रहलैक अछि तँ तँ साहित्यकारमे लगनशीलता घटि रहलैक अछि। मैथिली लेल ओ जोश खरोस नहि देखाइत अछि जे तीस-चालीस वर्ष पहिने छल। आइ मैथिलीक लेल सभसँ पैघ समस्या नव-नव प्रतिभाशाली लोकक साहित्य क्षेत्रमे नहि जायब थिक। एहन बात नहि छैक जे नव लोक आबि नहि रहल छथि, आबि तँ रहल छथि मुदा जे लगाओ, जे निष्ठा चाही से नहि देखाइत अछि। एहि बातक अनुभव ओहि सभ व्यक्तिकेँ भऽ रहलनि अछि जे कोनो पत्रिका निकालि रहल छथि वा साहित्यक विकास लेल प्रयत्नशील छथि। मुन्नाजी:अहाँक लेखनक मध्य साम्यवादी विचारधाराकहवा मैथिलीयो साहित्यमे बहलै। की मैथिली साहित्यमे कोनो एहन स्वतंत्र विचारधारा बनि पौलै। अहाँ ओइसँ कतेक लग वा दूर रहलौं! अशोक:साम्यवादी विचारधाराक प्रभाव तँ मैथिली साहित्यमे एकदम देखार अछि। से यदि नहि देखार भेल रहैत तँ ओहिपर एतेक आक्रमण जे बढ़लैक अछि से नहि बढ़ितैक। साम्यवादी विचारक प्रभाव तँ मैथिलीमे कंचीनाथ झा “किरण” आ यात्रीक साहित्येसँ दृष्टिगोचर हुअ लगैत अछि। १९६०क बाद ओहिमे तेजी अयलैक। १९७१ ई.सँ १९८० क दशकमे वातावरणमे पसरल नक्सलवाड़ी आन्दोलनक प्रभाव मैथिली साहित्यमे पुरजोर रूपेँ पड़लैक। अनेकानेक कविता, कथामे एकरा देखल आ चिन्हल जा सकैत अछि। बादमे ई विचारधारा क्रमशः महीन होइत गेल छलैक। तैं आब, जेना अहाँ कहलौं, हवा जकाँ नहि लगैत अछि। आब ई विचारधारा कोनो फैसन जकाँ नहि अछि, जीवनक अंग भऽ कऽ आबि रहल अछि साहित्यमे। मुन्नाजी:अहाँ गद्यक लेखनमे लघुकथा सेहो लिखलहुँ। लघुकथा लिखब केहेन लागल, एकर सोच कतऽ सँ आयल? अशोक: लघुकथा हम मित्र विभूति आनन्दक कहलापर लिखलहुँ। ओ माटि-पानि पत्रिकाक सम्पादक रहथि। वएह पत्रिका लेल लघुकथा लीखि कऽ देबाक लेल कहलनि। किछु लघुकथा माटि-पानि आ आन पत्रिकामे छपबो कयल। सगर रातिमे सेहो किछु लघुकथा पढ़लहुँ। एम्हर बहुत दिनसँ कोनो लघुकथा नहि लिखलहुँ अछि। जहिया लिखलहुँ तहिया लिखबामे खूब आनन्द आयल। मुन्नाजी: अहाँक नजरिमे आजुक परिप्रेक्ष्यमे मैथिली लघुकथाक की स्थिति छै? की मैथिलीमे ओ स्वतंत्र स्थान पाबि सकत? अशोक:मैथिलीमे आइयो लघुकथा खूबे लिखा रहल अछि। लघुकथाक पोथी सेहो प्रकाशित भेल अछि। तारानन्द वियोगी, प्रदीप बिहारी, मधुकर भारद्वाज, अनमोल आ अहाँक लघुकथा सभ हम पढ़ने सुनने छी। मोन पड़ैत अछि जे श्रीधरम सगर रातिमे पहिले पहिल अपन लघुकथासँ हमरा सभकेँ आकर्षित केने रहथि। लघुकथाक एक संग्रह स्व. ए.सी.दीपकजी बहार केने रहथि। मैथिलीमे लघुकथाक तँ स्वतंत्र स्थान छैके। तखन एक संग्रहक प्रयोजन तत्काल हमरा अवश्य बुझा रहल अछि। मुन्नाजी:वर्तमानमे अन्यान्य भाषा-साहित्य मध्य मैथिली साहित्यक की स्थिति देखा पड़ैछ। अशोक:मैथिलीमे कविता आ कथा आन भाषा साहित्यसँ पाछू नहि अछि। उपन्यास अवश्य पछुआएल अछि। उपन्यासक खगता अवश्य मैथिलीकेँ छैक। एहन उपन्यासक जे आन भाषाक उपन्याससँ टक्कर लऽ सकय। आन अनेक विधामे सेहो स्तरीय पोथी नहि आबि रहल अछि। आन भाषा साहित्य सन वैचारिक लेखन सेहो नहि भऽ रहल अछि। हँ, तारानन्द वियोगीक “तुमि चिर सारथि” हिन्दीमे अनुवाद भऽ खूब धूम मचौलक अछि। चर्चित प्रशंसित भेल अछि। मैथिलीकेँ एहिसँ गौरव भेटलैक अछि। मुन्नाजी:एखन धरि अहाँ द्वारा जतेक काज भेल ताहि हेतु कोनो ठोस मूल्यांकन वा पुरस्कारसँ वंचित रहि केहेन अनुभूति होइए? अशोक: वस्तुतः पूछी तँ हम जतेक काज केलहुँ अछि तकर खूबे मूल्यांकन भेल अछि। हमरा मूल्यांकनक कोनो अभाव नहि बुझाइत अछि। काजे नहि कऽ पाबि रहल छी जते करबाक चाही। आन अनेक प्रकारक व्यस्तता लेखन नहि करऽ दैत अछि। तकर अनुभूति बरोबरि होइत रहैत अछि। जहाँ धरि पुरस्कारक गप अछि तँ तेहेन कोनो काजे हम आइ धरि नहि केलहुँ अछि। एखन तँ बहुत काज करबाक अछि। बहुत लिखबाक अछि। मुन्नाजी:अपन तीनू कोणक मध्य अहाँ अपनाकेँ कतऽ पबै छी? अशोक:तीनू कोणक अपन फूट-फूट महत्व आ विशिष्टता होइत छैक। मुदा तीनू मिलिए कऽ त्रिकोण बनैत अछि। तखन आइ एकटा कोण लोहनामे, एकटा कोण दरभंगामे आ एकटा कोण पटनामे अछि, एहि स्थानक भिन्नताक प्रभाव तँ पड़िए रहल छैक। तीनू कोण जखन फेरसँ एक संग लोहनामे जुटब तँ सोचब जे के, कोना आ कतऽ छी। त्रिकोणक यात्रा तँ एखन चलिये रहल अछि। मुन्नाजी:नव पीढ़ीक रचनाकार वास्ते अपन विचार की देब? अशोक: औ मुन्नाजी, हम तँ एखनहुँ अपनाकेँ नबे मानैत छी। किछु लिखैत छी तँ होइत रहैत अछि जे बनलैक की नहि। कोंढ़ कपैत रहैत अछि। हमरा तँ अपने बेर-बेर विचारक आवश्यकता होइत रहैत अछि। एहनामे हम विचार की देब? ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। ३. पद्य ३.१.१.जगदीश चन्द्र अनिल- गजल २. रवि भूषण पाठक- मरणोपरांत-३ ३.२.१.गंगेश गुंजन राधा- ३० म खेप २.जवाहर लाल कश्यप ३.३.ज्योति सुनीत चौधरी- ब्रह्महास्त्र ३.४.उमेश मण्डल ३.५.१. सुनील कुमार झा- सरल वार्णिक छन्दमे दूटा गजल २. प्रभात राय भट्ट ३.६.१. पंकज कुमार झा २.नवीन कुमार आशा ३.७. १.रामविलास साहु २.रामदेव प्रसाद मण्डल 'झारूदार' ३.किशन कारीगर-ग़रीब४.जगदीश प्रसाद मण्डल ३.८. डॉ. शेफालिका वर्मा १.जगदीश चन्द्र अनिल- गजल २. रवि भूषण पाठक- मरणोपरांत-३ १ जगदीश चन्द्र अनिल (मूल नाम- जगदीश चन्द्र ठाकुर, जन्म: 27.11.1950,शंभुआर, मधुबनी । सेवा निवृत बैंक अधिकारी। मैथिलीमे प्रकाशित पोथी-1. तोरा अडनामे -गीत संग्रह-1978 2. धारक ओइ पार-दीर्घ कविता-1999 गजल - जगदीश चन्द्र अनिल
पोखरिमे मखान गामे-गामे दारू के दोकान गामे-गामे।
दिनमे पूजा राति बिताबय चोरीमे रावण के खरुहान गामे-गामे।
कबुला केलक, पूर मनोरथ भेलै लोकक गेल छागर के जान गामे-गामे।
लोक मुतैए ठाढे-ठाढे माथे पर टाका केर मचान गामे-गामे।
ब्याहक दू दिन बाद एलैए वर-वरियाती सभ रस्ता पर जाम गामे-गामे। २ रवि भूषण पाठक मरणोपरांत-३ मरनाहर के यादि करू हे चन्द्रदेव ,राम ,भूषण आ कृष्णमोहन मरनाहर के यादि करू जेेना मंदिरक निरमाल बीतल सम्मेलनक पोस्टर आरती पूजाक बाद शालिग्राम । ई नइ कि ई देलाह आ ई नइ देलाह रोड पर अपने घर बनेलाह आ हमरा बँसबिट्टी देलाह अपने भीठा आ हमरा उसरौठी देलाह भाइ पर कम आ बेटा पर बेशी ध्यान देलाह ई आहक तुकबन्दी बंद करू मरनाहर ककरो सँ किछु नइ लेलक भले ककरो किछु कम देने होए । ताहि दुआरे आबू आ काज मे रमि जाउ जमीन जाल खेत मकान गाछी बाँस रहबे करतइ काल्हि सँ बाँटब आ बाँटिते रहब । हयओ इंजीनियर साहेब बजाबू खुआबू विनय सँ ई धरती हरदम नीचा आ अकाश हरदम ऊपरे रहैत छैक अहाँक पुरूषार्थ सँ अविचलित मूड़ी कनि नीचा आ छाती बिन उतान केने आनू मुँह पर कनि विज्ञापित नकली मुसकान गौंआ घरूआ निमंत्रित छथिन्ह ई नइ छथिन्ह खबास आ जोन ई नइ छथिन्ह पुल बान्हक ठीकेदार बिसरि अपन नाम पद स्वागत करू सब के । चाहे केओ कतबो खगल कपड़ा लत्ता फाटल चीटल झुकि जाउ स्वागत मे सम्मान,मर्यादा क तमघैल कहिया ले राखब खुलि के खर्च करू संचित प्रतिष्ठा के बेन बनाउ आउ ,झुकि जाउ भोज काल पसरि गेलइ सुअन्नक गंध आब‘ लागलाह निमंत्रित घुसक‘ लागलइ बिलाइ कुकुर चौकस कौआ उल्लू बनबिलाइ बैस‘ लागलइ पांति क पांति आब‘ लागलइ जेरि क जेर विदा भेलाह गौंआ दियाद नून तीमन क मीमांसा करैत सुपारी चून लैत कुरता खोलि गरदनि पर राखैत साफ कर‘ लागलइ जोन खबास पांति मे गिरल पत्ता भात दालि दही बरी फाटल पात छिट्टा मे जाइतो जाइत गिरि जाइ किछु भात किछु दही दही क विषेन गंध दालि तरकारी मे मिलि बना देलकए भोजेन !भोजेन ! भोजगंध अलसियाब‘ लागलइ दौड़‘ लागलइ गोला करिया कुकुर हा हा कर‘ लागलाह दामो सुरेश चिकर‘ लागलाह बैजू बाबू गंगेश जी मन्नू बाबू “जल्दी ला रे खर्रा पानि झारू उठाबू अओ पात लाबू भात कहाँ गेलइ तरकारी दालि दूनू तरकारी एक साथ उठाबू आब बरी भ गेलइ बस दही उठाउ ओमहर सँ के उठि रहल अछि बैसू !बैसू !बैसू ! देखब कुकुर पांति मे नइ घुसए हओ एमहर दही छूटि गेलइ चलू आब पातिल राखू भंडार घर बन्द करू ” ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। १.गंगेश गुंजन राधा- ३० म खेप २. जवाहर लाल कश्यप (1981- ) १. गंगेश गुंजन राधा- ३० म खेप कोनो प्रसंग मे की क' जाइछ मनुष्य कोनो प्रसंगें की भ' जाइछ मनुष्य सेहो एकटा विचित्र प्रहेलिका थिक देखबा मे जे यथार्थ बुझाइत अछि बेशी काल से नितान्त अपूर्ण आ भ्रामक निकलैत अछि तें तर्क निष्कर्ष प्रयत्न बड़ सार्थक कम संदेहास्पद अधिक होइत अछि ई सबटा मनुक्खेक द्वारा मनुक्खेक होइत अछि एही दशा दिशा मे लोक पर पीड़न सँ ल' आत्म पीड़नक रोगी बनि जाइत अछि उपचारक उपहास कर' लागि जाइत अछि आ दुःखक उपभोग कर' लगैत अछि। भोग नहि, उपभोग। सात रंग सुन्दर सृष्टि कें एक रंग पीयर-पीयर आ रुग्ण देख'-बूझ' आ कह' लगैत अछि, मनुक्ख नितांत अपन झीवन-भोगक आँखियें, भरि समाज संसार कें देख' आ बूझ' लगैत अछि, अपन सैह नियति बना लैत अछि, सबटा ओहन यथार्थ जे ओकरा अतिरिक्तो सौंसे समाजक लोकक किछु यथार्थ सेहो होइत छैक-भ' सकैत छैक तकरा पर ध्यान देब तँ भिन्न ओकर अस्तित्वे सँ अनभिज्ञ होइत चलि जाइत अछि प्रति पल,दिन,मास वर्ष, आयु स्वयं अपना चतुर्दिक एकटा रोगाह परिवेश निर्मित कर' लगैत अछि आ बाँचल अपन समस्त जिजीविषा-ऊर्जा कें एहि बुद्धिये दिशा मे सक्रिय क' लैत अछि मनुख्ख अपने विरुद्ध अपना चारू कात बन्धन बान्हि लैत अछि। अपन गति, अपन सहज जीवन-प्रवाह कें अनेरेक अवरोधक पहाड़ी चेखान सभक अपनहि निर्मित बाधा सब सँ कुंठित क' लैत अछि। अपन से कुंठा अपन स्नेही,संबंधी, सौंसे समाज पर उगलैत रहैत अछि। जत'-जत'सृजन छैक ओत' ओत' संहारक ब्यौंत-वातावरण बनब' लगैत अछि। अपन, नितांत अपन कुंठाक माहुर - मनें ओ अपना अतिरिक्त सभकें कलुषित, जीवन विरोधी आ अमानुष बुझबाक तदनुरूपे आचरण करबाक एकटा दुःस्वभाव बना लैत अछि, सबकें व्यर्थ ,बाहरी लोक बना देबाक अपनहि सक्रिय मनोदशा मे, अपनहि असकर एकान्त तथा दयनीय बनि क' रहि जाइछ, से ओकरा बुझबा मे अबैत नहिं छैक। नहि बुझबा मे अबैत छैक जे ओ भ' चुकल अछि -रोगी, मनोरोगी ! देह-रोग सँ बहुत बेशी, बहुत गंभीर मनोरोग... -' तँ कि हम मनोरोगी भ' गेलौंहें, हम ?' अकस्मात् राधाक प्राण चौंकल। स्वयं के पूछ' लागल यैह टा प्रश्न ! गुंजित-अनुगुंजित-प्रति गुंजित... बड़ आर्त स्मरण कएलनि -' हे कृष्ण !' किछु नहि हएत, कृष्ण कें बजौलहु सँ हएत नहि किछु, आने जेकाँ हुनको छनि आब कम्मे फुरसति बहुत रास छनि कपार पर काज, उत्तर दायित्वक पैघ संसार हुनको आखिर चाहियनि अपन काज-कर्तव्य सँ अवकाश हुनको संसार मे बहुत किछु घटित भ' रहलनिहें न'व हुनको मोनक स्थिति आब नहि छनि स्वाधीन, ने छनि किछुओ नितांत मनमौजी-अपनहि सुखक संग रहब संभव नहि छनि हुनको लेल ओहो अपना प्रकार सँ फिफियाइत रहैत छथि, छुच्छ गाय चरायब आ बँसुरी बजायब नहि रहि गेलनिहें हुनक एकमात्र काज। माखन चोरायब भ' रहल छनि दुर्घट ! गाम मे कम दूध देब' लगलैक अछि सभ घरक गाय, दुब्बर भ' रहलैए नेरू-बाछी, गायक हुकड़ब नहि रहलै आब असंभव, भ' रहल छैक आइ काल्हि बेसी काल । सुन्नर कोमल गुड़कुनियाँ लैत नेरू पर्यन्त भ' रहलैक अकाल काल कवलित अपना मायेक सोझाँ देखैत गाय माय होइछ मनुक्ख नहि, मनुक्कक माय कें पर्यन्त यद्यपि सह' पड़ि रहलैक अछि-संतान शोक ! चर-चाँचर सभक हरियरी जानि नहि कोन अदृश्य महापशु अन्हरिया, चरि क' चलि गेलय केकरो नहि ज्ञात। सौंसे फाटल शुष्क माटिक धरती पर पीयर-पीयर सुखएल खुट्टी-खुट्टी चलैत पएर सभक तरबा मे गड़ैत जे यमुना अपना कंठ धरि ऊपर आबि क' द' देत छलीह समय-समय पर हुलकी, स्वयं दूबरि गता, स्थिर भेलि स्तब्ध छथि। धार-कातक सघन रंग लता-वृक्ष ? केहन भेल श्रीहीन तट ! स्तब्धे अछि बेसी बस्तु। मथुराक बेशी घटना स्थल, लोक लोकक आचार-व्यवहार स्तब्ध' । कोनो परोक्ष बोझक त'र प्रतिपल दबायल जाइत .. ककरो नहि भ' पाबि रहलैये अंटकर एकर कोनो अनुमान। अपना-अपना घर मे सब क्षुब्ध बैसल। हेराएल छैक ज्ञान ! पूछ' चाहैत अछि सब एक दोसरा कें मुदा पड़ितहि ओकर आकृति अपना सोझाँ, बदलि जाइत अछि लोकक मन ओकर उदासीक ध्यान भम पड़ैत अछि मोन,मोनक उदासी सँ भरल सब दलान कृष्ण एही सब मे छथि ओझरायल करैत आवश्यक अनुसंधान कृष्ण छथि किन्तु अन्यथा सेहो हरन-फिरीसान जेना साँस कोनो आन देह ल' रहल हो अन्त' जेना देह कोनो आन नाक सँ घिचि रहल हो साँस जेना देह हो कतहु, क्रिया आ स्पंदन होइत हो कतहु अन्त' जेना राधा छथि अपना आँगन एकान्त मे कृष्ण अपना कर्म, क्रिया-कलापक संसार मे अपस्यांत होइत परस्पर एक दोसरा सन करैत क्रिया अप्पन-अप्पन काज कतहु कारण कतहु ओतहु सेह, सैह एतहु ककरा लेल के अछि विकल-बचैन ककरा लेल ककरा ननहि अबैत छैक कतेक दिन सँ चैन निर्णय करब अछि असंभव। एना किएक एहि समय मे बेसी रास बात जे, नितांत छल सहज संभव, भ' गेलय निठ्ठाहे असंभव, हाथ सँबाहर, बेहाथ ! स्थिति यैह यैह स्थिति दू टा पीठ दू टा विरुद्ध बेशी किछु विरुद्ध किएक भ' रहलय एहि युगक बेसी विषय भाव आ वस्तु एना विरुद्ध... (जारी...) २ जवाहर लाल कश्यप (1981- ) पिता श्री- हेमनारायण मिश्र , गाम फुलकाही- दरभंगा। समयक धार अहॉके याद होयत , वा नहि एकटा आमक गाछ छलै रस्ता कात मे, पोखरि पर खुब झमटगर ओकरे छॉह मे खेलै छलैं भोड आ सॉझ, कबड्डी वा किरकेट मोन परैत अछि ,बहुत रास बात पूसक शीतलहर, माघक मज्जर कोयलक कू, होलीके पू कलम गाछी, बरद बाछी फ़ुलही थाडी, कटही गाडी चौरचन आ जीतिया, ठकुया पीडिकिया बाध बोन ,तीतली के पाछा उडैत मोन धानक लावा, दुधक डावा वियाहक चुमान ,कोजगराके मखान विधक गीत,बचपनक मीत पुरहर आ पाती, दीयाबाती छैठक पूजा, चाउरक भुसबा गामक भोज ,याद आवय रोज समयक धार मे भसिया गेलै बहुत रास बात देखैत रहि गेलँहु हम मुक दर्शक, निरीह प्राणी जकॉ समयक संग भसिया गेलँहु हम आब ने ओ गाछ अछि, ने बहुत रास बात ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। ज्योति सुनीत चौधरी ब्रह्महास्त्र
अन्तर्जालक सुविधा छल तऽ बड़ी नीक ई मेल सऽ दुनिया भऽ गेल छल नजदीक प््रातिद्वंदतामे दामो भऽ गेल छल ठीक ऑनलाइन ज्योतिष धेने पाखंडीक टीक
समाचार होय वा होय मनोरंजनक बात वेबसाईट देने छल टीवी रेडीयो के मात मोनक माफित घरे बैसल करू बजार हाट शौक सऽ सीखू आ सिखाऊ भानसभात
मुदा अवगुणक मेल रहिते अछि गुणक संग हैकरक उद्दण्डता सऽ व्याकुल रहल मन उपाय बड़नीक सूझल फेर ब्रह्महास्त्र सन पासवर्ड मे लिखलहुँ हैकरके नामपर डहकन।। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। उमेश मण्डल संस्कार गीत (संकलन) गोसाइ गीत (मल्लाह) कमला कमला-कमला सुनै छलौं कमला बड़ दूर हेऽऽ गहबर पहसैत कमला भए गेल कसहूर हे, अन देलौं धन देलौं लक्ष्मी बहुत हे एकेटा जे माइ बिनु लागै य सुनऽ हे। कोयल-कोयला सनै छलौं कोयला बड़ी दूर हेऽऽ गोबर पहसैते कोयला भऽ गेल मसहूर हे अन देलौं धन देलौं लक्ष्मी बहुत हे जे भातिज बिनु लागै य सुन हे कोयला-कोयला.....। मातैर-मातैर सुनै छलौं मातैर बड़ी दूर हे अन देलौं धन देलौं, लक्ष्मी बहुत हे एकेटा जे स्वमी बिनु लागै य सुन हे मातैर-मातैर.....। ससिया-ससिया सुनै छलौं, ससिया बड़ी दूर हे अन देलौं धन देलौं, लक्ष्मी बहुत हे एकेटा जे बालक बिनु लागै य सुन हे कमला-कमला......। 2 कमला मैया बसत बड़ी दूर गमक लागे गेंदा फूल कथी डालि लोरहब बेली-चमेली कथी डालि लोरहब अरहूल हे गमक लागे गेंदा फूल कमला मैया..... किनका चढ़ाएब बेली-चमेली किनका चढ़ाएब अरहूल गमक लागे गेंदा फूल-2 कमला चढ़ाएब बेली-चमेली कोयला चढ़ाएब अरहूल, गमक लागे गेंदा फूल हे कमला...किनका सँ मांगब अन-धन सोनमा किनकासँ मांगब सोहाग गे सोहाग गे मलहिनयाँ देखै मे फूल वर लाल हे ससिया सँ मांगब अन-धन सोनमा मातैर सँ मांगब सोहाग गे मलहिनयाँ देखै मे फूल वर लाल....। 3 कटबै मे सोना सुतरिया बिनबै झुमरि जाल हे जाल फरि-फरि कमला एलखिन सन-झुन लागै गोहबरिया कहाँ गेली परलोभिया सेवक सुन लगै गोहबरिया हेऽऽ कटबै...... जाल फरि-फरि गांगो एलखिन रून-झुन लगै गोहबरिया हे कहाँ गेली परलोभिया सेवक, सुन लगै गोहबरिया हे-2 कटबै......... जाल फरि-फरि मातैर एलखिन रून-झुन लगै गोहबरिया हे कहाँ गेली परलोभिया सेवक सुन लगै गोहबरिया हे कटबै..... बिनबै झुमरि जाल हे। 4 जग मग जग मग ज्योति जलै मंदिरमे देखियौ कमला के श्रृंगर कमला के लट मे तेल सोभे हुनका सेंदुर के अधिकार जग मग जलै मंदिर मे देखियौ मातैर के नाक मे नथिया सोभे हुनका झुमका के अधिकार जग मग जलै मंदिर मे ससिया के मांग मे टिका सोभे हुनका होसली के अधिकार जग मग जग मग ज्योति जलै मंदिर मे कमला श्रृंगार.....। गोसाइ (डोमीन) करिया कुखा हे काली माय लेलनि जोरि आइ हे मैया एक कोस गेलऽ हे काली माय दुइ कोस गेलऽ हे काली माइ तेसर कोस उठल शिकार हे हकन कनै छै काली बन के मयुर हे बकसि दियौ सीर के सिन्दुर हे सारी रात नटुआ नचाबऽ हे होइत भोर मे उसारब हे......। 2 एक मूड़ी तुलसी जल साजि के रखिहेँ गै मलहीनियाँ हमरा पानि सेब देवता अरैध के लबिहेँ गै एक मूड़ी तुलसी जल साजि के रखिहेँ गै मलहीनियाँऽ? हमरा गौरध्या सन अरैध के लबिहेँ गै एक मूड़ी तुलसी जल साजि के रखिहेँ गै मलहीनियाँ हमरा गहील सन देवता अरैध के लबिहेँ गै.....। संकलन, मूड़न गीत गोसाउनि नोतक गीत बट्टा भरि चानन रगड़ल पाने पत्र लिखल हे। ताहि पान नोतब गोसाउनि जे नित पूजि थिकि हे। ताहि पान नोतब पितर लोक जे निज आशिष देथि हे ताहि पान नोतब ऐहब लोक जाहि स मंगल हएत हे। मूड़न बेरक- कौने बाबा दिनमा गुनाय जग ठानल हे। कौने बाबी पड़िछथि केश िक होड़िया के मूड़न हे। लाल पीयर चीर पहिरब केश परीछब हे बाँस पुरैन लेल खोंइछ कि होड़िलाक मूड़न हे देबउ हजमा बड़ इनाम कि होड़िलाक मूड़न हे। शुभ-शुभ काट हजमा केश कि होड़िलाक मूड़न हे। लावा भुजै कालक लाव भूजय बैसली बहिनिया चुलहा दहिनिया हे। हे सुन्दरि मंगल आगि पजारल हे सात्री पत्र मे राखल लावा पुनि भूजल हे। दुलहिन गृह मे बैसि जे ब्याहल हे। कहय हे सखि सभ आनन्द मनाविय प्रभु गोहराविय हे। जुगे-जुगे बढ़ू अहिबात कि अइहब गाबिय हे। गोसाउनिक गीत अहाँ जगजननी सकल दुख मन्जनि हमरा बिसरि किये देल। हमहूँ अबोध बोध नै हमरो िकये उसह दुख देल। कियेक चरण तब हटल अम्ब हे कियेक ऐहेन मन हम अपराध कएल बड़ जननी मातु क्षमा कय देल मूस कवि कर जोड़ि विनय करू हमरा बिसरि किय देल। 2 हे भवानी दुख हरू माँ पुत्र अपनो जािन केँ। दय रहल छी दुख भारी बीच भँवर आन केँ। आबि आशा मे पड़ल छी की करू हम कानि केँ विश्वमाता छी अहाँ माँ आह! से हम मानि केँ। कोटियो ने पएर छोड़ब हाथ राखब छानि केँ। दीन प्रभु हम नित्य पूजब नेम व्रत केँ ठानि केँ। हे भवानी। 3 अम्बे-अम्बे जय जगदम्बे, जय-जयकार करै छी हे। तिनू भुवन के माय अहाँ छी तीन नयन से तकै छी हे। सिंह पर एक कमल राजित, ताहि पर बैसल छी हे। भूत प्रेत सब झालि बजाबै योगिन के नचबै छी हे। राक्षस के संहार करै छी दुनियाँ के जुड़बै छी हे। 4 कतेक दुख सुनाएब हे जननी कतेक दुख....... तंत्र-मंत्र एको नै जानल की कहि अहाँ के सुनाएब हे जननी मूर्ख पुत्र एक अहाँ के भुतिआएल रखबनि संग लगाए, हे जननी सूरदास अधम जग मूरख तारा नाम तोहार, हे जननी दुर्गा नाम तोहार। 5 मैया दुआर अड़हुल फुल गछिया माँ हे फड़-फुल लुबधल डािर दछिन पछिम स सूगा एक आएल माँ हे बैस गेल अड़हुल फूल गाछ फड़ो ने खाय सुगा फूलो ने खाय माँ हे पाते पाते खेलय पतझार कहाँ गेल किए भेल डीहवार ठाकुर माँ हे अपन सूगा लीअ सुमझाय भनहिं विद्यापति सुनू जगदम्बा हे माँ हे सेवक पर रहबइ सहाय। विषहरिक गीत 1 विषहरि सेब मोरा किछुओ ने भेल बाँझिन पद मोरा रहिये गेल कियो नीपय अगुआर, कियो पछुआर हमहुँ अभागलि दुआर धेने ठार िकयो लोढ़ै बेली फूल कियो अढ़ूल हमहुँ अभागलि तिरिया खोदू नामी दुबि कियो मांगय अन-धन, कियो पूत हमहुँ अभागलि कर जोड़ि ठार। भनहिं विद्यापति विषहरि माय सभ दिन सभ ठाम रहब सहाय। 2 साओन विषहरि लेल प्रवेश भादव विषहरि खेलल झिलहोरि। आसिन विषहरि भगता लेल पान कतिक विषहरि नयना झरू नोर। अगहन विषहरि हेती अनमोल। 3 ऊँच रे अटरिया पर विषहरि माय राम, नीची रे अटरिया पर सोनरा के माय देबौ रे सोनरा भाइ डाला भरि सोन राम, गढ़ि विषहरि के कलस पचास बाट रे बटोहिया कि तोहें मोर भाइ राम, कहबनि विषहरि के कलसा लय जाइ तोहरो विषहरि के चिन्हियो ने जानि राम, कहबनि कोना के कलस लए जाय हमरो विषहरि के नामी-नामी केश राम, मुठी एक डाँर छनि अल्प बएस। महेशवाणी 1 दुर-दुर छीया ए छीया, एहन बौराहा बर संग जयती कोना धीया पाँच मुख बीच शोभनि तीन अंखिया सह-सह नचै छनि सांप सखिया दुर-दुर.....। काँख तर झोरी शोभनि, धथूर के बीया दिगम्बर के रूप देख साले मैना के हीया दुर-दुर.....। जँ धिया के विष देथिन पिआ कोहबर मे मरती धीया भनहि विद्यापति सुनू धीया के माय बैसले ठाम गौरी के गुजरिया दुर-दुर......। 2 ना जाएब, ना जाएब ना जाएब हे सखि गौरी अंगनमा गौरी अंगना सखि, पारवती अंगनमा बहिरा साँपक माड़ब बनाओल तेलिया देल बन्हनमा हे धामन साँपक कोरो बनाओल, अजगर के देल धरनमा हे सखि गौरी अंगनमा हरहरा के काड़ा-छाड़ा, कड़ैत के लाओल कंगनमा पनियादरार के पहुँची लाओल ढरबा के लौल ढोलनमा हे, सखि गौरी........ सुगवा साँप के लौल जशनमा हे, चान्द तारा के शीशा लाओल मछगिद्धि के अभरनमा हे, सखि गौरी.........। 3 सखि जोगी एक ठाढ़ अंगनमामे अंगनमामे, हे भवनमामे साँपहि-साँप बामदहिन छल चित्र-विचित्र वसनमामे नित दिन भीख कतए सँ लायब घुरि फिरि जाहु अंगनमामे भीखो ने लिअए जोगी, घुरियो ने जाइ गौरी हे निकलू अंगनमामे भनहिं विद्यापति सुनू हे मनाइन शिव सन दानी के भुवनमामे। 4 डर लगैए हे डेराओन लगैए गौरी हम नहि जाएब तोरा अंगना, भयाओन लगैए हे अजगर के सम्हा पर धामिन के बरेड़िया गहुमन के कोरो फुफकार मारैए, गौरी हम.... कड़ेत के बत्ती पर सांखड़ के बन्हनमा बिढ़नी के खोता घनघन करैए। गौरी......... सुगबा के पाढ़ि पर ढोरबा के ढोलनमा पनिया के जीभ हनहन करैए गौरी......... तेहि घर मे बैसल छथि अपने महादेव बिछुआ के कुण्डल सनसन करैए। गौरी.......... 5 हम नहि गौरी शिव सँ बिआहब मोर गौरी रहत कुमारि हे भूत-प्रेत बरियाति अनलनि मोर जिया गेल डेराइ गे। गे माइ गालो चोकटल, मोछो पाकल पएरो मे फाटल बेमाइ गे गौरी लए भागव, गौरी लए जाएब गौरी ले पड़ाएब नैहर हे। भनहिं विद्यापति सुनू हे मनाइनि इहो थिक त्रिभुवननाथ हे शुभ-शुभ कए गौरी के बिआह, तारू होउ सनाथ गे माइ। नचारी बम-बम भैरो हो भूपाल अपनी नगरिया भोला खेबि लगाबऽ पार कथी केर नाव-नवेरिया कथी करूआरि कोने लाला खेबनहारे, कोने उतारे पार सोने केर नाव-नवेरिया रूपे करूआरि भैरो लाला खेबनहारे, भोला उतारे पार जँ तोहें भैरो लाला खेबि लगाएब पार मोतीचूर के लड़ुआ चढ़ाएब परसाद हाथी चलै, घोड़ा चलै, पड़ै निशान बाबा के कमरथुआ चलै, उठै घमसान 2 भोला नेने चलू हमरो अपन नगरी अपन नगरी यो कैलास पुरी पारबती के हम टल बजाएब नित उठि नीर भरब गगरी बेलक पतिया फूल चढ़ाएब िनत उठि भांग पीसब रगड़ी भनहिं विद्यापति सुनू हे मनाइनि इहो थिक दानीक माथक पगड़ी। 3 जय शिवशंकर भोले दानी क्षमा मंगै छी तोरे सँ अपराधी पातक हम भारी तैं कनै छी भोरे से। तोहर शरण छोड़ि ककरा शरण मे जाएब हे शंकरदानी दयावान दाता तोरा सन के त्रिलोक मे नहि जानि। जाधरि नहि ताकब बमभोले हम चिचिआएब जोरे सँ अपना ले फक्कर भंगिया िकन्तु तोहर अनुचर भरले कोसे-कोसे नामी तूँ शंकर सेवक पर सदिखन ढरले। जनम भेल माया तृष्णा मे से तृष्णा नहि पूर भेलै। कामना के लहरि मे बाबा जीवन एहिना दूरि भेलै। हे दुखमोचन पार लगाबऽ हम दुखिया छी ओरे सँ पूजन विधि नहि जानी हम हे यएह जपि-जपि कऽ धियान धरी कर्म चक्र के जीवन भरि हम पेटे ले ओरियान करी जे ज्योतिश्वर पार लगाबह हम दुखिया छी ओरे सँ। 4 हटलो ने मानय त्रिपुरारी हो विपत्ति बड़ भारी खूजल बसहा के डोरी कोना पकड़ब चड़ि गेल फूल-फूलवारी, हो विपत्ति बड़ भारी अंगने-अंगने सखि सभ उलहन दै छथि कतेक सहब अति गारी, हो विपत्ति बड़ भारी भनहिं विद्यापति सुनू हे गौरी दाइ इहो छथि त्रिशुलधारी, हो विपत्ति बड़ भारी। सोहर- 1 धन धन राज अयोध्या धन्य राजा दशरथ रे। धन रे कौशल्या के भाग कि राम जनम लेल रे। देखैत पण्डित पुरोहित पोथी कर नेने रे ललना रे बालक होयत सगेआन वनहि सिधारत रे। से सुनि रानी विकल भेल राजा मुरक्षित रे। ललना रे राम जनम लेल जौं बन जायत रे। मन गुनी रानी हरखित भेली राजा मुदित भेल रे। ललना रे....... भल भेल राम जनम लेल, बाँझी पद छुटल रे। 2 कौने मास मेघबा गरजि गेल कोने मास बेंगवा बाजू रे ललना रे कोने मासे होरिला जनम लेल कि गोतिनक हिया सालू रे। सावन मेघवा गरजि गेल, भादव बेंग बाजू रे। आसिन होरिला जनम लेल कि गोतिनक हिया सालू रे। कोने तेल देव सासु के कोने ननदि जी के रे। ललना रे, करू तेल देबैन सासु जी के गरी ननदि जी के रे। ललना रे अमला दबैन गोतिन के हुनकर पैंच हेतनि रे। दसमासी सोहर पहिल मास चढ़ु अगहन, देवकी गरम संओ रे ललना रे.... मूंगक दाल नहि सोहाय, केहन गरम संओ रे ललना रे.... दोसर मास चढ़ु पूस, देवकी गरम संओ रे ललना रे..... पूसक माछी ने सोहाय, कि देवकी गरम संओ रे ललना रे..... तेसर मास चढ़ु माघ, देवकी गरम संओ रे ललना रे..... पौरल खीर ने सोहाय, कि केहन गरम संओ रे ललना रे.... चारिम मास चढ़ु फागुन, देवकी गरम संओ रे ललना रे.... फगुआक पूआ ने सोहाय, कि देवकी गरम संओ रे ललना रे..... पाँचम मास चढ़ु चैत, देवकी गरम संओ रे चैत के माछ ने सोहाय, कि केहन गरम संओ रे छठम मास चढ़ु वैशाक, देवकी गरम संओ रे ललना रे..... आम के टिकोला ने सोहाय, कि केहन गरम सेओ रे सातम मास चढ़ु जेठ, देवकी गरम संओ रे ललना रे..... खुजल केश ने सोहाय, कि केहन गरम संओ रे आठम मास चढ़ु अखाढ़, देवकी गरम संओ रे ललना रे..... पाकल आम ने सोहाय, कि केहन गरम संओ रे नवम मास चढ़ु साओन, देवकी गरम संओ रे ललना रे.... पिया के सेज ने सोहाय, कि केहन गरम संओ रे दसम मास चढ़ु भादव, कि देवकी गरम संओ रे ललना रे.... देवकी दरदे बेयाकुल दगरिन बजायब रे जब जनमल जदुनन्दन, खुजि गेल बंधन रे ललना रे..... खुजि गेल बज्र केबार पहरू सभ सूतल रे। 4 यशोमति अद्भुत लेखल, बालक देखल रे सुन्दर हुनकर गात, कि बात पकठोसल रे कंस केँ जी थर-थर काँपय, अपन घर पहुँचल रे पूतनाकेँ देल विचार, जाहु तौहें गोकुल रे। पूतना थन विष लेल घोरि विदा भेल गोकुल रे घर स बहार भेली यशुमती, बालक लइली रे देलनि पूतना केँ कोर, बालक बड़ सुन्दर रे। पूतना दूध पिआओल, आओर विष पसारल रे हरि देलनि दरसन बैसाइ खसल मुरछाइ रे। खेलौना 1 हाथक कंगना ननदी के दलनि से नहि मन भाबय हो लाल। फूल के घड़ी ननदिया माँगय, सेहो कहाँ पाएब हो लाल। डाँड़ के डरकस ननदी के दलिएनि से नहि मन भावय हो लल पियबा देलियनि ननदोसिया देलिएनि, से नहि मन भावय हो लाल। ई सभ किछु नहि हुनका चाही ओ मांगथि पठनमे हो लाल। 2 सोठौरा नइ खाएब राजा तीत लगैए सासु जे बजती बाजि कऽ की करती छठियारी पुजाबऽ लए माय अबैए सोठौरा ने खाएब...... गोतनो ने बजती बाजि कऽ की करती हलुआ बनाबए लए भौजी अबैए। सोठौरा ने....... ननदो जे बजती बाजि कऽ की करती कजरा सेदै लए बहिन अबैए। सोठौरा ने....... देओर जे बजता बाजि कऽ की करता दगरिन बजबै ले भाय अबैए। सोठौरा ने....... उमेश मण्डल कविता के मैथिल? जहानक परम सत्य जेकरा अंग्रेजीया युनिभर्सल ट्रुथ कहै छथि- “सुरूज पूवमे उगैछ।” जौं बेर-बेर आदित्यसँ पूछल जाए तँ की हएत, ओहो भऽ जेताह भक् कि देखबए चाहै छथि संसारक लोक की हम कर्तव्य पथसँ विमुख छी? प्रत्यक्षकेँ प्रमाण की? किअए देतीह वैदेहीकेँ बेर-बेर अग्नि परीक्षा। दशानन जौं सीयासँ करितथि सम्पर्कक प्रयास भस्मीभूत हएब निश्चित छल भगवानोकेँ बूझल छलनि तखन रघुवर किअए लेलनि सीताक अग्नि परीक्षा? मिथिलाक बेटी कतए गेलीह दोख ककर, राजधर्म वा कर्तव्यबोध भरिगर पड़ल लोकक अविश्वास जकरा लेल सुखसँ विमुख भेलथि रघुवर ओकरे आँखिमे नोर नै तँए, दूर नै भगाउ जौं मिथिलाकेँ बचेबाक इच्छा रखै छी बेर-बेर किअए कहै छी “हमहूँ मैथिल” कखनो तँ अपन मोनसँ पुछू “अहाँ मैथिल, कि हम मैथिल?” फूलबाबूकेँ भेटलनि पुरस्कार वयनाक धेने हथियार मुदा, हुनक नेना-भुटका मैथिलीसँ अनभुआर फूलबा मैथिलीक नै अछि साहित्यकार मुदा हाथमे भाषाक पतवार धेने घुमि रहल अपन खेत-पथार डोका-काकाेर बीछ हम भैंटक लाबा चिबा कऽ उफनैत सोनितकेँ जरा रहल छी मिथिलामे बैसल.....। मुदा, प्रश्न रहिये गेल के मैथिल? किछु नै फुराइए की कही कहल नै जाइए देखै छी रहल नै जाइए सुनै छी तँ आश्चर्य लगैए हवाइ लड्डू सगतरि बिकाइए हाथीक बदला सिक्कड़ि लेने साँझ-परात घुमैए लेलहा, लुल्हा, लुटलाहा बंचित भऽ कऽ अपन भाग्यपर कनैए बेबस्था केर होइत नाच साँझ-परात सभ देखैए निनाएल आँखि, भकुआएल मोन नैसर्गिक प्रतिभाक टोना करैए विश्वक आहटि पाबि विज्ञानक सुगबुगाहटि देख किछु क्षणले सभ एक होइए मुदा, ओ सिक्कड़ि कखनो जातिक तँ कखनो धर्मक माला पिन्हबैए कखनो झालिक धून तँ कखनो मृदंगक अपन धूनक धुनिमे सभ अंध भेल बौअाइए किछु नै फुराइए। अपन गाम उड़ैत-उड़ैत उठि नै सकलौं उजड़ि गेलौं उपटि गेलौं केरा आ अड़िकंचनक पात कलक बगलक खत्ता बले दुनूक लहलहाइत वीर देख िवश्वस्त भऽ आश्वस्त भऽ हम उड़ि गेलौं बीना जड़ि-मूड़ीक भऽ गेलौं ठुठ गाछ सन, नव पेंपी खोजैक लिलसा मनमे अछि हमरा व्याप्त मुदा, खत्ताकेँ हम बुझै छी अधला जे हमर करत कल्याण संभवत: तँए हमरा नै अछि विश्वास उड़ैत-उड़ैत उठि नै सकलौं बौराए गेल छी अकासे-अकास। हे यौ अहाँ केलौं किछु अहाँ जे केलौं अपनेले अहाँ तइले दुख हमरा अछि कहाँ। सुन्नर िनर्मल छोड़ि अहाँ अकल्याणक बाट पकड़ि अहाँ खुरछाही कटैत रहलौं बदलैत रूप ओ स्थितिकेँ चिन्ह-जानि तैयो अहाँ ढेका पकड़ि टहलैत अहाँ आइ जौं हम, किछु बजै छी किछु करै छी ऐमे केना मास्टरी करै छी अहाँ काल्हि अहाँकेँ हमर कोनो ज्ञान नै छल कन्निको धियान नै छल मुदा, भुखलकेँ पेट भरबाक जगह तेल, फुलैलक फेरमे धकलैत ओइ जेरमे रहलौं अहाँ आब गाम गाम नै रहल विश्वक गाम भऽ गेल अहाँक बजोरोसँ पैघ, सघन जतए इमानदार, कर्मठ, उदार रहैत आएल अछि आइसँ नै सदिओंसँ, जेकर साक्षी अछि इतिहास संभवत: अहुँक चपचपी सघन भऽ जाइत अछि गामेक नक्शामे। गाओल जाइत अछि अपन गीतनाद, मनाओल जाइत अछि अपन विध-बेबहार कएल जाइत अछि अपन काज-राज खाएल जाइत अछि अपन कमाएल। घाम घाम चुबा-चुबा तमैत अछि कोला-कोला किसानक हृदैमे होइत अछि गर्दमगोला। अपनो खाएब आ दोसरोकेँ खिआएब यएह तँ एकर छिऐ सरोकार मुदा ऐ सरोकारकेँ कियो नै दैत अछि.........। हैकू/ टंनका 1 तोरा पएरे हम नै जेबो आब किएक तँ तूँ भेलेँ लापड़बाह चऽल कोढ़िक चालि। 2 अहाँक आखि चपेट लैत अछि हमर हृदे औनाए लगैत छी चारू भूवन हम। 3 मेघ बादल दुनू चलै साधल पहाड़ी दिस। 4 नदी गोंगिऐ कमल केर फूल रँग बदलै रौद लगलापर उज्जरो भऽ जाइत। 5 इन्द्र कमल होइत अछि फूल उज्जर धप् 6 थल कमल गाएक घंटी सन होइत अछि 7 बैंग बजैए टर्र-टर्र रटैत घोघ फल्का कऽ उछलि-उछलि कऽ तड़ैप-तड़ैप कऽ 8 कदम फूल सभरँगा रँगसँ शोभित छै झड़ैत रहैत छै समए समैपर। 9 बोनिहारिन केर सोिनतक छै सड़कपर देल अलकतड़ा नै छै ककरो पता। 10 सोनित दान महादान होइछ जीवन लेल 11 हरियरका डग-डगीसँ भरि जाइत अछि 12 कनैल फूल पत्तामे नुकाएल रहैत अछि 13 एतुक्का गिद्ध पड़ाइन करैए मनुक्खे जाकाँ 14 अंडी छाहरि दैत अछि राहति कोशिकन्हामे 15 उज्जर मेघ टिकरी बनि-बनि जेना चलैए 16 केराक वीर अपन वीरताकेँ घोकचौअने 17 मोड़-मोड़नी वादलक सह पाबि नाचै लगैत 18 गुफाक गुंज श्वेत वादलक सह अनुगुंजित 19 रँगल कोसा नेने अबैत संग केरा घौड़केँ 20 चम्पा-चमेली रोहनिक नक्षत्र करक रौद 21 मरूआ बीआ रोहनि आम दुनू उमझै पकै 22 तिक्खर रौद बलुक जहाजकेँ तेजी अनैत 23 सुरेब सिसो ऋृगवैदिक सन कठमकठ 24 पहार पार उत्तरवारि कात किछु अवश्य 25 पाथर उगै पानि सटकै छैक मेघ लटकै 26 गोल-मोल छै धप्-धप् चान छै दाग लागल 27 सुग्गा बैसल सोचि रहल अछि पाछू लोक ले 28 सुग्गा बैसल चिन्तामे डूबल छै दीन-हीन ले ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। १. सुनील कुमार झा- सरल वार्णिक छन्दमे दूटा गजल २. प्रभात राय भट्ट १ सुनील कुमार झा सरल वार्णिक छन्दमे दूटा गजल (१) हुनका सों हँसि के बाजलों ते हल्ला मचि गेल हुनक मुँह दिस ताकलों तs हल्ला मचि गेल
रूपक चन्द्रमा के कारी अमावस केने रही चमकैत पूर्णिमा के देलों तs हल्ला मचि गेल
ओ नैनक कटार से सबके ये घायल केने हम नजैर से जे ताकलों तs हल्ला मचि गेल
हुनक रूपक लाइट भक्क-भक्क जरैत ये सबहक डिबिया मिझेलों तs हल्ला मचि गेल
ओ आँखिक इशारा जे मारलक मुंडेर पर हम फाँदि गेलों जे देबार तs हल्ला मचि गेल
अहों लिखूं ग़ज़ल ओ कहैत रहे सदिखन करिया कलम जेs उठेलों तs हल्ला मचि गेल (२)
चमरपट्टी में गाय मरल ते कोनो बात नै बभनपट्टी में बेंग मरल हल्ला मचि गेल
हमर झोपड़ी खसाs के ओ महल बना लेलाs फेर से दुछत्ती जे बनेलों ते हल्ला मचि गेल
ओ नोटक जोड़ पर बड़का नेता बनि गेल हमर ईमान नै बिकल ते हल्ला मचि गेल
विदेशो में रहि, नै बिसरल अपन माँटि के एता गामों में बाजलों मैथिली हल्ला मचि गेल
नै बिसरब अपन माँटि के करियों ई प्रण जे सुनलक हमर ई गोप हल्ला मचि गेल २ प्रभात राय भट्ट १ जन्म लेलौं हम जतय सीता माए के अछि गाम, म्या गै हमरा एतेक बतादे की अछि हमार नाम, किया कहैय हमरा सीसी बोतल आर बिहारी धोती, आफद भगेल ख्यामे हमरा अपने देशमें दू छाक रोटी, अपने देश बुझाईय परदेश शासक बुझैय हमरा बिदेशी, नए छौ तोहर कोनो नागरिक अधिकार तू भेले मधेसी, भूख स मोन छटपट करैय भेटे नए किछु आहार, दया धर्म इमान नए छै शासक के किया करैय तिरस्कार, की यी हमर राष्ट्र नए अछि? या हम सुकुम्बासी थिक? बौआ हमर नुनु ययौ कान खोइलक दुनु सुनु ययौ, अहाँ थिक मधेशक धरतीपुत्र हम अहाँक मधेस माए, निठुर शासक के हाथ बन्धकी परलछि देलौं सब्किछ गमाए, तन मन धन सब लुट्लक आब करैय खून पसीना शोषण, आशा केर दीप अहिं अछि हमर वीरपुत्र करू मधेस रोशन , मधेसमे जन्म लेली जे कियो फर्ज तेकरा निभाव परत , नेपाल स मधेस माए के मुक्त कराब परत , सुन्दर शांत स्वतंत्र एक मधेस एक परदेश बनाब परत, मंगला स त भेटल नए आब छीन क लेब परत , लड़ पडत आजादी के लड़ाई देब परत बलिदान , तखने भेटत मान समानं आ बनत मधेस महान २ यात्रा मरलोउपरांत रहैय ओ आत्मा जीवंत, जिनकर यात्रा होइत अछि अनन्त, अनबरत चलैत रहू लक्ष्यक डगर पैर, मिलय नए मंजिलक ठेगाना जाधैर, पाछू कखनो घुईर नए ताकू, डेग पैर डेग बढ़ाऊ आगू, पाथैर कंकर पैर चल परत, कांट क चुभन सहपरत, भसकैय संगी सेहो साथ नएदिए, एसगर जिनगी क यात्रामें चल पड़य, रही रही मोनमें उठ्य जोर टिस, जुनी कियो नए ताकत अहाँदिस, भसकैय अपनों सम्बन्ध पराया, साथ छोइड सकैय स्वस्थ काया, मुदा टूटे नए अटल विस्वास, एक दिन बुझत मोनक प्यास, भेटत अहांके अपन मंजिलके ठेगाना, जिनगी अनंत यात्रा छै बुझत जमाना, मरलोउपरांत रहैय ओ आत्मा जिवंत, जिनकर यात्रा होइत अछि अनन्त, ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। १. पंकज कुमार झा २.नवीन कुमार आशा १ पंकज कुमार झा, सम्प्रति- एच.सी.एल. मे अभियन्ता छथि। ओझरैल हमर बौद्धिक मोन (1) एक अबोध ह्रदय के शूल बिना कोनो कारने अई जन्मक भूल बिना जहन भोगी रहल अई दंड पूर्व जन्म के तहनेटा पता चलैत अई जन्मांतरक् खेल ओना त सबटा मिथ्या लगैत अई विज्ञानक सोच में ओझरैल हमर बौद्धिक मोन ईस्वरक लीला मानैक लेल तैयार नै अई मुदा ! जन्मे स रजा आ जन्मे स रंक जीवन के अनन्त रंग में ऐना सनैल अई कि सब किछ माया अई वर्षाक बुलबुला जँका रंगीन मुदा ! फुटलाक बाद कतौ किछ नै (आर एम एल हॉस्पिटल में एक बच्चा ह्रदय रोग स पीड़ित छल) आनंदक रहस्य (2) देखलहुं आदमीक स्वभावक स्वरुप जहन जहन बिपत्ति अबै छैन मोनक कटुता दूर हटै छैन मीठ बोल सहयोगी बनै छैथ आ पुनः समय अनुकूल होइते मोन जहर स भैर जैत छैन अजब गजब परिवर्तन तुरंत तुरंत एके व्यक्ति के अलग अलग व्यबहार समय के अंतराल में केना रक्त के प्रवाह बदैल देत छैक भावनाक स्वरुप के समझ स परे छैक बुझैत समझैत जनैत मुदा ! समय स हरैत व्यक्ति स्वयं घुटन महशुश करैत छैथ मुदा ! अभ्यास हावी होइत छैन आ ओ अभ्यासक परिहास मुदा ! ई सब निर्माण ईश्वर के कैल छैन प्रिज्म जँका भावनाओ के अलग अलग रूप में परावर्तित करैक छमता मनुष्यक ह्रदय में बनौने छैथ विस्मित त करैया मुदा ! ई कोनो व्यक्ति विशेष नई निर्माण कर्ता के निर्माण अई स्वभावक सच स्वरुप तैं समझनाई थोड़ेक कठिन अई आ तैं एकरा माईन लेला मात्र स प्रसन्नता सहजे भेटनाईये अई सृष्टिक खेल (3) बड़ा अद्भुत अई राम एला कृष्ण एला गंगा सेहो अवतरित भेलीह ग्रंथो सब लिखैल एखैन धैर पूजन वाचन चलैत अई मुदा ! कोनो परिवर्तन नई भेल मानव स्वाभाव स वैह रही गेल कियाकि ? मानव के रचना अहि लेल भेल अई ई मात्र एक टा लुकाछिपीक खेल अई सृष्टि आ श्रष्टाक अनंत चक्र अई सचक पथ (4) सच त याह अई कि सचक पथ पर शुले टा गड़त मोन भीतरे भीतर सबटा सहत कियाकि सच स सहनायियेटाक ज्ञान भेटल अई एकर बिपरीत चालला स शूल ने गड़त कियाकि असहनशीलताक ज्ञान पहिले स शूल के उखाड़वाक प्रयत्न करत संतुलन आ असंतुलन के खेल (5) अजब ई देहक संरचना अई मैट पैन स बनल मुदा ! संतुलनेटा में जीवन अई थोड़बे असंतुलन स पुनः मैट पैन स अलग भै जैत अई जीवन जड़ संग बिना देह ख़त्म भै जैत अई बड़ा कठिन अई देहक संतुलन के बनौनाई आ देह के बचा क रैख पौनाई हर छन देहक प्रकृति बदलैत छैक संतुलन असंतुलन के क्रम चलैत छैक मैट के पैन स पैन के मैट स जुड़नाई बिछरनाई चलैत रहैत छैक देहक निर्माण आ देहक अबसान संतुलन आ असंतुलन के खेल छैक ६ ठाढ़ छी ठाढ़ छी समयक-शेषनाग स बन्हैल छी सत्य आ असत्यक बिच मथनी जँका मथाई छी मंदराचल जँका तटस्थ कच्छप पर देवता दिश एक बेर आ असुरक दिश एक बेर खींचल जैत छी अपने धुरी पर पृथ्वी जँका दिन आ राइत में बंटैल छी २ नवीन कुमार आशा अनाथ माए बाबू अहाक आवे याद जे पबितो दूनूक साथ कि लोक कहिते अनाथ जखन देखि अहाक छाया ने रूकि पाबे तखन नीर माए .................................... कखनो कखनो मोन करे हमहू पाबि कोनो कनहा ने भेटे जखन कोनो कनहा तखन लागे हम छी अनाथ माए.......................................... अहा दूनू जे रहितो निक खराबक पहिचान करेतो कखनो हमरा डटितो कखनो करतो दुलार ने पेलौ ओ दुलार जे म रहे सभक संसार माए...................................... जखन करि बदमाशी लोक कहे हमरा यो बाबू कियाक ने हेते ऐहन ने छे ककरो साया कियाक ने करे कुसंग ने छे ककरो साया माए................................... भगवान ने ककरो ऐहन दिन देखाबे ने ककरो अनाथ बनाबथि भेटे सबके माए बापक प्यार जे मे अछि सभक संसार माए................................................... ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। १.रामविलास साहु २. रामदेव प्रसाद मण्डल 'झारूदार'३.किशन कारीगर- ग़रीब ४.जगदीश प्रसाद मण्डल १. रामविलास साहु कविता बेरोजगारी हम छी बेरोगार काम करै छी लाचार हमरासँ करबैत अछि बेगार भुखल पेट बनल छी दुखारी दुखक मारल सुतल छी उपरसँ परिवारक बोझ भारी जहिना लकड़ीकेँ चीरैत आरी खेबाक नै भेटैत उधारी बाल-बच्चा बनल अछि भीखारी हमरा देख लोक मारैए किलकारी की करब नै अछि समझदारी आसा नै कहिया बनब रोजगारी की प्राण लेत अत्याचारी देशमे कहिया मेटाएत बेरोजगारी सरकारकेँ नै अछि सभसँ सरोकार हम छी बेरोजगार। प्रीतक गीत फागुन मास हमर बितए यौवनमा हमर दुख कहिया हरत सजनमा गौना कराए लिअ एबकी फगुनमा आमक गाछपर बैसल कोइली प्रीतक गीत सुनबए एबकी फगुनमा चैत मास जेना टपकै महुआ ओहिना टपकै हमर यौवनमा सावनक मेघ भिजबए बदनमा बिजली चमकए बादल बरसै देहसँ छुटै पसिनमा बरखा बरसै घनघनमा पिया बनल अछि बैमनमा ऊमरल नदिया, दरद जगाबए दरदक दुख केना केकरो कहबै आबिते सजनमा दरद हरि लैत फगुनमा गौना कराए लिअ एबकी फगुनमा प्रीतक गीत सुनबै छी सजनमा। रूपैआक ढेरी रूपैआक ढेरीपर करैए खेल दुनियाँकेँ नचबैए ठेल-ठेल रूपयाक लालचमे बनल अछि पागल दानव बनि मानवपर करैत राज सुखक भुख मिटबैए रूपैआसँ दीन दुखियाक तौलैए रूपैआसँ मनुक्खक चालि छोड़ि चलैए नाच करैए खंजन चिड़ै सन सुखक चाहमे भटकि गेल राह सोमरसमे समाए गेल मन विचार नंगा नाच करैए रूपैआ ढेरीपर जोशमे होश उड़ि गेल नचबैयाकेँ जखन रूपैआक ढेरी अंत भऽ गेल जिनगीक दू किनारा बीच पिसाए गेल दुखक धारमे बहि गेल रूपैआक ढेरी जहिना मनुख मुठ्ठी बन्न जनमैए हाथ पसारि संसारसँ चलि जाइए रूपैआक ढेरी ओहिना रहि जाइए। भ्रष्टाचारी जागु-जागु यौ देशक भैयारी देशमे घुसल पैघ-पैघ चोर चोर केहेन पहिचान नै आबए देशमे घुसि सभकेँ सतौनेए देशक भैयारी, जागु, करू तैयारी देशक करू रखबारी आब अापसमे करू नै कोनो बेपारी। चोर देशकेँ करैत अछि कमजोर चोरक नाओं छी भ्रष्टाचारी सभ विभागमे जमैने अछि अधिकार मंत्री-संत्री एकरे बलपर भेल अछि मालो-माल। बड़का महलबलाक दिल अछि कारी सभ भ्रष्टाचारी, बनल अछि अधिकारी देशक धन विदेशमे करैत अछि बिकवाली सभ भ्रष्टाचारी, बनल अछि अत्याचारी जनताक सोनित बेचबाक करैत अछि रोज तैयारी केना भागत देशसँ ई भ्रष्टाचारी तेकर करू तैयारी जागु-जागु यौ देशक भैयारी। २ रामदेव प्रसाद मण्डल 'झारूदार' जन्म- 13. 07. 1967 पता- गाम- रसुआर भाया- मुंगराहा (िनर्मली) थाना- मरौना जिला- सुपौल पीन- 847452 1 जागू बाबू आबू आगू जीयापर करू विचार यौ कोना जीयब अइ प्रदूषणमे श्रृजनहार बेमार यौ भू जल वायु घ्वनि प्रदूषण दुख दुनियामे अपार यौ। कोना बँचब एे काल गालसँ सभ मिल करू विचार यौ। विज्ञानक ई देन प्रदूषण बनि घर घुसल चुहार यौ। बाघ बनि ई मुँह बौने अछि दुिनयाँ बनल सिकार यौ। इंजन हो पूरा कंडीसन धुआँ नै छोड़ै बेकार यौ। करू खियाल किछु अगिला पिढ़ी कोना रचत संसार यौ। होयत कोना दुिनयामे पावन घरतीपर नर नारि यौ जगत पावनि गंगा मैया, खुद शुद्धिकेँ िभखाइर यौ। 2 दया धरम निष्ठा मानवता ज्ञान भरल भरपुर गै बोल गै दैया कोना नै हेतै देशक गरिबी दूर गै। काम क्रोघ आओर लोभ भगेतै, घर-घर ज्ञानक दीप जरेतै। आब नै राज अज्ञानक रहतै, घरतीपर दूर दूर गै बोल..... हिनसा छोड़ि आब शान्ति घरतै, बसुदेव कुटुम कम गढ़तै। जग अमनक पोथी पढ़तै, साँझ भोर दुपहर गै बोल... झारूदारक सभ झारू पढ़तै दया मानवता मनमे भरतै। सेवा केना आगाँ बढ़बै छै सोचतै सभ जरूर गै बोल..... सेवा कर्मकेँ पूजा बुझतै असत छुटै कऽ युक्ति सुझतै असत तियागि सभ सुख अपनेतै आब बेसी नै दूर गै बोल....। 3 सभपर छै अज्ञानक छाया सतसँ भेलै दूर हौ। अपने भाएकेँ लहु चाटै छै बनि कऽ महिषा सूर हौ। जाति धर्म मानवता भेदी लोग बनल सभ अही केर कैदी धर्मक आगिमे जड़ै ई जनता बनि गेल छह सभ क्रुड़ हौ। धर्म इमानसँ लोक छै बंचित काम क्रोध आओर लोभ छे संचित निष्ठा नीति मानवताकेँ, सभ तपै छै घूर हौ अंध विश्वास छै सभकेँ धएने कुरीतिसँ घर छै भरने अज्ञानक अागिमे जड़लै सबहक करम कपुर हौ। ३ किशन कारीगर ग़रीब । हम छी गरीब नहि आब दैत छथि हमरा कियो अपना करीब किएक त हम छी गरीब।। भरि दिन भूखले रहि केँ किछु काज राज करैत छी मुदा तइयो दू टा रोटी लिखल नहिं अछि हमरा नसीब।। जेकरे मौका भेटैत छन्हि वैह हमर शोषण करैत अछि किछु बाजब त बोइनो नहि भेटत डरे हम किछु नहि बजैत छी।। डेग डेग पर भ्रष्टाचार एसगर हम केकरा सँ लड़ब धिया पूता अन्न बिनू बिलैख रहल अछि कहू कोना के हम जिअब।। ठिकेदारो हमरे कमाई लूटि रहल अछि जेबी मे नहि अछि एक्को टा टाका नून रोटी खा कहूना के रहि जइतहुँ मुदा बढ़ल मँहगाई गरीबक घर देलक डाका।। टाकाक अभाव मे आब हम बनि गेलहुँ अस्पतालक मरीज डॉक्टरो हमरा देखी कहैत छथि तू दूरे रह नहि आ हमरा करीब।। विधाता केहेन रचना केलैन जे हमरा बनौलन्हि गरीब नहि आब दैति छथि हमरा कियो अपना करीब।। आब अहिं कहू यौ समाजक लोक अधपेटे कोनो जीबैत छी हम गरीबिक दुशचक्र अछि घेरेने जिनगी जीबाक आस भेल आब कम।। जी तोड़ मेहनत करैए चाहैत छी मुदा कतए भेटत सब दिन काज काज भेटलो पर होइत अछि शोषण एना मे कोना करब धीया पूताक पालन पोषण।। साँझ भिंसर दू टा रोटी भेटैए एतबाक आस लगेने अछि गरीब निक निकौत सेहन्तो नहि सोचैत छी किएक त हम छी गरीब।। ४ जगदीश प्रसाद मण्डल कविता जुआनी समए संग चढ़ैत जवानी सुति-जागि चलैत अछि। नट-नटीक रंगमंच गढ़ि घर-अंगना नचैत अछि। चैत चित्त चढ़िते चढ़ैत योग-वियोग बीच मरड़ाइत। लहलहाइत, फन-फन फानति दन-दन-दनाइत तड़पैत। कात-करोट देख-देख सोलहो श्रृंगार सजबैत। योगी-वियोगी बनि-बनि राग-तान, सुर मिलबैत। हपैत हवा थरड़ाएल ज्योति बीच वेदनक वाणसँ बेथित तन्नुक तन अधखिल्लू मन टुकड़ी-पुरजा भऽ उड़ैत। शीतल समीर सिहरैत सज्जा कलपि कलसि कोमन कली हँसि-कािन झर-झर झहरि नयन-नीर कोमल डली। कड़कि जुआनी झड़कि-झड़कि हियबै राह जिनगी केर बैंकिंग बौल बना-बना खिल पकड़ि फेक साधि केर। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। डॉ. शेफालिका वर्मा १ इजोरियाक भाषा चलू, परछाहींक पार हम घूमी आबि लिखल जे सांसक गाथा मौनक भाषा मे ओकरे हम गुनगुनाबी...... दर्द प्राण मे अहाँक स्मृतिक विलाखि विलाखि छटपटा रहल आहत गीत उमड़ी उमड़ी बैसी अधर पर कुहैरी रहल ! साँझक दम तोडैत बेला चैती बयारक कम्पन चाँदनी बैसि हमर अहाँक लिखि रहल ओ भाषा जे नहि कहि सक्लों हम अहांके नहि कहि सक्लों अहाँ हमरा ... चलू तखन इजोरिया स अपन अहाँक मौन गाथा पुछि आबि मौनक भाषा मे ओकरे हम गुनगुनाबी .............. २ बीतल इतिहास हम पलक पाँखि मे पोसि रहल छी बीतल युगक नीरव इतिहास ! नयन-पथ सं सांस मे मिलि शिखी चुनैत जलजात रहल 'आह ' सं निकलि 'चाह' में खिली टूटल आस-पारिजात रहल ! ओ चंचल सपना पुलक भरल ई स्पंदन चिर व्यथा केर सुधि सं सुरभित स्नेह घुलल आखर तितल हमर कथाक ! नयन में अनगिन चुम्बन सजग स्मिति रहल उन्मद सांस में सुरभि, वेदनक क्षण चातकी सन तकैत प्रिये -पद ! आय तं सब सांस में भरल मरण त्योहारक निस्सीम जय मौन में प्रानक तार टूटल निसांस भेल पिआस में लय गहन तम-सिन्धु में उमड़ल अधर पर अंगारक हास बीतल युगक नीरव इतिहास.... ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। विदेह नूतन अंक मिथिला कला संगीत १.श्वेता झा चौधरी २.ज्योति सुनीत चौधरी ३.श्वेता झा (सिंगापुर) ४.गुंजन कर्ण १. श्वेता झा चौधरी गाम सरिसव-पाही, ललित कला आ गृहविज्ञानमे स्नातक। मिथिला चित्रकलामे सर्टिफिकेट कोर्स। कला प्रदर्शिनी: एक्स.एल.आर.आइ., जमशेदपुरक सांस्कृतिक कार्यक्रम, ग्राम-श्री मेला जमशेदपुर, कला मन्दिर जमशेदपुर ( एक्जीवीशन आ वर्कशॉप)। कला सम्बन्धी कार्य: एन.आइ.टी. जमशेदपुरमे कला प्रतियोगितामे निर्णायकक रूपमे सहभागिता, २००२-०७ धरि बसेरा, जमशेदपुरमे कला-शिक्षक (मिथिला चित्रकला), वूमेन कॉलेज पुस्तकालय आ हॉटेल बूलेवार्ड लेल वाल-पेंटिंग। प्रतिष्ठित स्पॉन्सर: कॉरपोरेट कम्युनिकेशन्स, टिस्को; टी.एस.आर.डी.एस, टिस्को; ए.आइ.ए.डी.ए., स्टेट बैंक ऑफ इण्डिया, जमशेदपुर; विभिन्न व्यक्ति, हॉटेल, संगठन आ व्यक्तिगत कला संग्राहक। हॉबी: मिथिला चित्रकला, ललित कला, संगीत आ भानस-भात। २. ज्योति सुनीत चौधरी जन्म तिथि -३० दिसम्बर १९७८; जन्म स्थान -बेल्हवार, मधुबनी ; शिक्षा- स्वामी विवेकानन्द मिडिल स्कूल़ टिस्को साकची गर्ल्स हाई स्कूल़, मिसेज के एम पी एम इन्टर कालेज़, इन्दिरा गान्धी ओपन यूनिवर्सिटी, आइ सी डबल्यू ए आइ (कॉस्ट एकाउण्टेन्सी); निवास स्थान- लन्दन, यू.के.; पिता- श्री शुभंकर झा, ज़मशेदपुर; माता- श्रीमती सुधा झा, शिवीपट्टी। ज्योतिकेँwww.poetry.comसँ संपादकक चॉयस अवार्ड (अंग्रेजी पद्यक हेतु) भेटल छन्हि। हुनकर अंग्रेजी पद्य किछु दिन धरि www.poetrysoup.com केर मुख्य पृष्ठ पर सेहो रहल अछि। ज्योति मिथिला चित्रकलामे सेहो पारंगत छथि आ हिनकर मिथिला चित्रकलाक प्रदर्शनी ईलिंग आर्ट ग्रुप केर अंतर्गत ईलिंग ब्रॊडवे, लंडनमे प्रदर्शित कएल गेल अछि। कविता संग्रह ’अर्चिस्’ प्रकाशित। ३.श्वेता झा (सिंगापुर) ४.गुंजन कर्ण राँटी मधुबनी, सम्प्रति यू.के.मे रहै छथि। www.madhubaniarts.co.uk पर हुनकर कलाकृति देखि सकै छी। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। विदेह नूतन अंक गद्य-पद्य भारती १. मोहनदास (दीर्घकथा):लेखक: उदय प्रकाश (मूल हिन्दीसँ मैथिलीमे अनुवाद विनीत उत्पल) मोहनदास (मैथिली-देवनागरी) मोहनदास (मैथिली-मिथिलाक्षर) मोहनदास (मैथिली-ब्रेल) २.छिन्नमस्ता- प्रभा खेतानक हिन्दी उपन्यासक सुशीला झा द्वारा मैथिली अनुवाद छिन्नमस्ता बालानां कृते १.जगदीश चन्द्र अनिल २.प्रेमचन्द्र मिश्र- अपन बेटा अभिनव मिश्रकेँ बल दै लेल कविता १ जगदीश चन्द्र अनिल (मूल नाम) जगदीश चन्द्र ठाकुर, जन्म: 27.11.1950,शंभुआर, मधुबनी । सेवा निवृत बैंक अधिकारी। मैथिलीमे प्रकाशित पोथी-1. तोरा अडनामे -गीत संग्रह-1978 2. धारक ओइ पार-दीर्घ कविता-1999 गीत १
बुच्ची बढती, लिखती-पढती हमरा चिन्ता कथी के।
तिलक-दहेजक दानव केर उत्पात मचल अछि मिथिलामे, तै लए बुच्ची खडग उठौती हमरा चिन्ता कथी के।
ज्ञान आर विज्ञानक संपति अर्जित करती जीवनमे, नव सुरुज आ चान बनौती हमरा चिन्ता कथी के।
लोकक मोल बुझैछै एखनहुं लोक बहुत छै दुनियामे, संगी अप्पन अपनहि चुनती हमरा चिन्ता कथी के।
अपनहि श्रम सं बाट बनौती एहि बबूर केर जंगलमे, दुख सं लडती आगां बढती हमरा चिन्ता कथी के। २ जगदीश चन्द्र ‘अनिल’ मैथिली गीत-
मम्मी, तो चिंता जुनि कर, तों तं हमरा पढ़ा-लिखादे कर नहि कनियों कथूक डर । तिलक-दहेजक बल पर किन्नहु हम कतहु नहि करब बियाह, अज्ञानी, ढोंगी, पाखंडीक संग नहि जीवन करब तबाह अपन पयर पर ठाढ़ होयब हम होयब अपनहि पर निर्भर, मम्मी, तों चिंता जुनि कर । संपति अर्जित करब सतत हम ज्ञान आर विज्ञान केर नाम बढ़ायब हम दुनिया मे सगरो हिन्दुस्तान केर हमर स्वप्नमे ‘किरण’, ‘कल्पना’ सतत कानमे हुनकहि स्वर, मम्मी, तांे चिंता जुनि कर । हम्मर गहना होयत मम्मी हमर आत्म-विश्वास टा विजय अंध-विश्वासक उपर सत्यक दिव्य प्रकाश टा जीयब स्वामिभमान केर संगहि एतबहि अछि अभिलाष हमर, मम्मी, तों चिंता जुनि कर ।
२ प्रेमचन्द्र मिश्र अपन बेटा अभिनव मिश्रकेँ बल दै लेल कविता नुका नुका कऽ कानय बाला, व्यर्थ समय बिताबय बाला!! किछु सपनाकेँ मरि गेलासँ, जीवन नहि मरैत छै!! सपना की अछि, अहींक ओछाइनपर, सूतलमे आँखिक पानि। आओर टूटल तँ की भऽ गेल, जेना जागए काँचे नीन्न जवानी॥ भीजल उमर बनाबय बाला, डुबकी बिना नहाबए बाला॥ कनी पानिकेँ बहि गेलासँ सावन नहि मरैत छै। माला टूटि गेल तँ की भेल अपने हल भऽ जाएत समस्या। नोर जा लिलाम हुअए तँ बुझू पूरा भेल तपस्या। रूसल दिन मनाबय बाला, फाटल अंगा सियाबय बाला। एक आध दीपकेँ मिझा गेलासँ अंगना नै मरैत छै। हराइत नहि छै किछु एतए, बस सिर्फ जिल्द बदलैत अछि पोथी जेना रातिकेँ उतरिकेँ चान्दनी, भोरे पहिरैत अछि रौदक धोती कपड़ा बदलि कऽ आबए बाला, चालि बदलि कऽ जाइ बाला कनी खेलौनाक हेरा गेलासँ नेनपन नहि मरैत अछि लुटि लेलक जे मलिया उपवनकेँ, लुटलक नै ओ गन्ध फूलकेँ बिहाइरो तक नै छोड़लक पर, खिड़की बन्द ने भेल धूलकेँ नफरत आलिंगन करैबाला, सभपर गर्दा उड़बैबाला किछु मुखड़ाक नाराजगीसँ अएना नै मरैत अछि लाखो बेर घैला फूटल, चीछो तक नै आएल पनघटपर लाखो बेर नाह सभ डूबल, चहल-पहल ओहिना अछि पनघटपर अपन उमर बढ़ाबय बाला, लौ कऽ उमर घटाबय बाला लाख करए पतझर कोशिश पर फुलवाड़ी नै मरैत छै ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। बच्चा लोकनि द्वारा स्मरणीय श्लोक १.प्रातः काल ब्रह्ममुहूर्त्त (सूर्योदयक एक घंटा पहिने) सर्वप्रथम अपन दुनू हाथ देखबाक चाही, आ’ ई श्लोक बजबाक चाही। कराग्रे वसते लक्ष्मीः करमध्ये सरस्वती। करमूले स्थितो ब्रह्मा प्रभाते करदर्शनम्॥ करक आगाँ लक्ष्मी बसैत छथि, करक मध्यमे सरस्वती, करक मूलमे ब्रह्मा स्थित छथि। भोरमे ताहि द्वारे करक दर्शन करबाक थीक। २.संध्या काल दीप लेसबाक काल- दीपमूले स्थितो ब्रह्मा दीपमध्ये जनार्दनः। दीपाग्रे शङ्करः प्रोक्त्तः सन्ध्याज्योतिर्नमोऽस्तुते॥ दीपक मूल भागमे ब्रह्मा, दीपक मध्यभागमे जनार्दन (विष्णु) आऽ दीपक अग्र भागमे शङ्कर स्थित छथि। हे संध्याज्योति! अहाँकेँ नमस्कार। ३.सुतबाक काल- रामं स्कन्दं हनूमन्तं वैनतेयं वृकोदरम्। शयने यः स्मरेन्नित्यं दुःस्वप्नस्तस्य नश्यति॥ जे सभ दिन सुतबासँ पहिने राम, कुमारस्वामी, हनूमान्, गरुड़ आऽ भीमक स्मरण करैत छथि, हुनकर दुःस्वप्न नष्ट भऽ जाइत छन्हि। ४. नहेबाक समय- गङ्गे च यमुने चैव गोदावरि सरस्वति। नर्मदे सिन्धु कावेरि जलेऽस्मिन् सन्निधिं कुरू॥ हे गंगा, यमुना, गोदावरी, सरस्वती, नर्मदा, सिन्धु आऽ कावेरी धार। एहि जलमे अपन सान्निध्य दिअ। ५.उत्तरं यत्समुद्रस्य हिमाद्रेश्चैव दक्षिणम्। वर्षं तत् भारतं नाम भारती यत्र सन्ततिः॥ समुद्रक उत्तरमे आऽ हिमालयक दक्षिणमे भारत अछि आऽ ओतुका सन्तति भारती कहबैत छथि। ६.अहल्या द्रौपदी सीता तारा मण्डोदरी तथा। पञ्चकं ना स्मरेन्नित्यं महापातकनाशकम्॥ जे सभ दिन अहल्या, द्रौपदी, सीता, तारा आऽ मण्दोदरी, एहि पाँच साध्वी-स्त्रीक स्मरण करैत छथि, हुनकर सभ पाप नष्ट भऽ जाइत छन्हि। ७.अश्वत्थामा बलिर्व्यासो हनूमांश्च विभीषणः। कृपः परशुरामश्च सप्तैते चिरञ्जीविनः॥ अश्वत्थामा, बलि, व्यास, हनूमान्, विभीषण, कृपाचार्य आऽ परशुराम- ई सात टा चिरञ्जीवी कहबैत छथि। ८.साते भवतु सुप्रीता देवी शिखर वासिनी उग्रेन तपसा लब्धो यया पशुपतिः पतिः। सिद्धिः साध्ये सतामस्तु प्रसादान्तस्य धूर्जटेः जाह्नवीफेनलेखेव यन्यूधि शशिनः कला॥ ९. बालोऽहं जगदानन्द न मे बाला सरस्वती। अपूर्णे पंचमे वर्षे वर्णयामि जगत्त्रयम् ॥ १०. दूर्वाक्षत मंत्र(शुक्ल यजुर्वेद अध्याय २२, मंत्र २२) आ ब्रह्मन्नित्यस्य प्रजापतिर्ॠषिः। लिंभोक्त्ता देवताः। स्वराडुत्कृतिश्छन्दः। षड्जः स्वरः॥ आ ब्रह्म॑न् ब्राह्म॒णो ब्र॑ह्मवर्च॒सी जा॑यता॒मा रा॒ष्ट्रे रा॑ज॒न्यः शुरे॑ऽइषव्यो॒ऽतिव्या॒धी म॑हार॒थो जा॑यतां॒ दोग्ध्रीं धे॒नुर्वोढा॑न॒ड्वाना॒शुः सप्तिः॒ पुर॑न्धि॒र्योवा॑ जि॒ष्णू र॑थे॒ष्ठाः स॒भेयो॒ युवास्य यज॑मानस्य वी॒रो जा॒यतां निका॒मे-नि॑कामे नः प॒र्जन्यों वर्षतु॒ फल॑वत्यो न॒ऽओष॑धयः पच्यन्तां योगेक्ष॒मो नः॑ कल्पताम्॥२२॥ मन्त्रार्थाः सिद्धयः सन्तु पूर्णाः सन्तु मनोरथाः। शत्रूणां बुद्धिनाशोऽस्तु मित्राणामुदयस्तव। ॐ दीर्घायुर्भव। ॐ सौभाग्यवती भव। हे भगवान्। अपन देशमे सुयोग्य आ’ सर्वज्ञ विद्यार्थी उत्पन्न होथि, आ’ शुत्रुकेँ नाश कएनिहार सैनिक उत्पन्न होथि। अपन देशक गाय खूब दूध दय बाली, बरद भार वहन करएमे सक्षम होथि आ’ घोड़ा त्वरित रूपेँ दौगय बला होए। स्त्रीगण नगरक नेतृत्व करबामे सक्षम होथि आ’ युवक सभामे ओजपूर्ण भाषण देबयबला आ’ नेतृत्व देबामे सक्षम होथि। अपन देशमे जखन आवश्यक होय वर्षा होए आ’ औषधिक-बूटी सर्वदा परिपक्व होइत रहए। एवं क्रमे सभ तरहेँ हमरा सभक कल्याण होए। शत्रुक बुद्धिक नाश होए आ’ मित्रक उदय होए॥ मनुष्यकें कोन वस्तुक इच्छा करबाक चाही तकर वर्णन एहि मंत्रमे कएल गेल अछि। एहिमे वाचकलुप्तोपमालड़्कार अछि। अन्वय- ब्रह्म॑न् - विद्या आदि गुणसँ परिपूर्ण ब्रह्म रा॒ष्ट्रे - देशमे ब्र॑ह्मवर्च॒सी-ब्रह्म विद्याक तेजसँ युक्त्त आ जा॑यतां॒- उत्पन्न होए रा॑ज॒न्यः-राजा शुरे॑ऽ–बिना डर बला इषव्यो॒- बाण चलेबामे निपुण ऽतिव्या॒धी-शत्रुकेँ तारण दय बला म॑हार॒थो-पैघ रथ बला वीर दोग्ध्रीं-कामना(दूध पूर्ण करए बाली) धे॒नुर्वोढा॑न॒ड्वाना॒शुः धे॒नु-गौ वा वाणी र्वोढा॑न॒ड्वा- पैघ बरद ना॒शुः-आशुः-त्वरित सप्तिः॒-घोड़ा पुर॑न्धि॒र्योवा॑- पुर॑न्धि॒- व्यवहारकेँ धारण करए बाली र्योवा॑-स्त्री जि॒ष्णू-शत्रुकेँ जीतए बला र॑थे॒ष्ठाः-रथ पर स्थिर स॒भेयो॒-उत्तम सभामे युवास्य-युवा जेहन यज॑मानस्य-राजाक राज्यमे वी॒रो-शत्रुकेँ पराजित करएबला निका॒मे-नि॑कामे-निश्चययुक्त्त कार्यमे नः-हमर सभक प॒र्जन्यों-मेघ वर्षतु॒-वर्षा होए फल॑वत्यो-उत्तम फल बला ओष॑धयः-औषधिः पच्यन्तां- पाकए योगेक्ष॒मो-अलभ्य लभ्य करेबाक हेतु कएल गेल योगक रक्षा नः॑-हमरा सभक हेतु कल्पताम्-समर्थ होए ग्रिफिथक अनुवाद- हे ब्रह्मण, हमर राज्यमे ब्राह्मण नीक धार्मिक विद्या बला, राजन्य-वीर,तीरंदाज, दूध दए बाली गाय, दौगय बला जन्तु, उद्यमी नारी होथि। पार्जन्य आवश्यकता पड़ला पर वर्षा देथि, फल देय बला गाछ पाकए, हम सभ संपत्ति अर्जित/संरक्षित करी। 8.VIDEHA FOR NON RESIDENTS 8.VIDEHA FOR NON RESIDENTS 8.1 to 8.3 MAITHILI LITERATURE IN ENGLISH 8.1.1.The Comet -GAJENDRA THAKUR translated by Jyoti Jha chaudhary 8.1.2.The_Science_of_Words- GAJENDRA THAKUR translated by the author himself 8.1.3.On_the_dice-board_of_the_millennium- GAJENDRA THAKUR translated by Jyoti Jha chaudhary 8.1.4.NAAGPHANS (IN ENGLISH)- SHEFALIKA VERMA translated by Dr. Rajiv Kumar Verma and Dr. Jaya Verma 1. Episodes Of The Life - ("Kist-Kist Jeevan" by Smt. shefalika Varma translated into English by Smt. Jyoti Jha Chaudhary ) 2.Original Poem in Maithili by Kalikant Jha "Buch" Translated into English by Jyoti Jha Chaudhary १ Episodes Of The Life - ("Kist-Kist Jeevan" by Smt. shefalika Varma translated into English by Smt. Jyoti Jha Chaudhary ) Shefalika Verma has written two outstanding books in Maithili; one a book of poems titled “BHAVANJALI”, and the other, a book of short stories titled “YAYAVARI”. Her Maithili Books have been translated into many languages including Hindi, English, Oriya, Gujarati, Dogri and others. She is frequently invited to the India Poetry Recital Festivals as her fans and friends are important people.
Translator:Jyoti Jha Chaudhary, Date of Birth: December 30 1978,Place of Birth- Belhvar (Madhubani District), Education: Swami Vivekananda Middle School, Tisco Sakchi Girls High School, Mrs KMPM Inter College, IGNOU, ICWAI (COST ACCOUNTANCY); Residence- LONDON, UK; Father- Sh. Shubhankar Jha, Jamshedpur; Mother- Smt. Sudha Jha- Shivipatti. Jyoti received editor's choice award from www.poetry.comand her poems were featured in front page of www.poetrysoup.com for some period.She learnt Mithila Painting under Ms. Shveta Jha, Basera Institute, Jamshedpur and Fine Arts from Toolika, Sakchi, Jamshedpur (India). Her Mithila Paintings have been displayed by Ealing Art Group at Ealing Broadway, London."ARCHIS"- COLLECTION OF MAITHILI HAIKUS AND POEMS. Episodes Of The Life : Episodes Of The Life : Preface 2: ‘Episodes of life’ is because everything in this book has come from the pages of my diary. I don’t remember when I got habit of writing diary – perhaps from my childhood, because I achieved my youth with Sarat, Bankim, Ageya etc. and coloured my heart with Amrita, Agyeya, Jainendra, Mahadevi thereafter. There was a pile of diaries from 1958 to 2001 in my almirah. Varma ji had been saying “I am publishing your diaries in a book. I also became excited as the diary doesn’t merely bear a list of good and bad incidents; rather the emotions associated are also reflected through it. Collecting the past, a diary serves as a stone of foundation of the strong building of the future. Writing diary is capturing a period of time. This is a creation of a new direction, a new morrow of future in the light of past, an attempt to progress the society. Vermaji passed away. The pages of the diary were kept serially. First I made my mind to hand over this treasure to my children but when I had to live without Vermaji then I started trying to recollect all scattered pages of my past. Specially, the dialogues of Vermaji came out time to time. In the race of life whenever he was telling something I was writing that down. He used to say, note it down Ranno, write it down, don’t consider what I say a dialogue. If those will be noted and you will be revising then you will find them useful in life. I was always looking for paper and pen or newspaper so that I can write down his statements. Now, in the loneliness of life, I am looking for those pieces of notes insanely. If I get something somewhere it seems I found the most precious treasure of the world. The courage is awakened in me. This autobiography is an effort to join the various part of the past life. Vermaji is not alive anymore but I couldn’t dare to publish the pages of diaries in original form because ‘Man ko kintu samjhane wala phir aisa man na milega’ (That heart who can console the heart will not be found anymore) (to be continued..................) २ Kalikant Jha "Buch" 1934-2009, Birth place- village Karian, District- Samastipur (Karian is birth place of famous Indian Nyaiyyayik philosopher Udayanacharya), Father Late Pt. Rajkishor Jha was first headmaster of village middle school. Mother Late Kala Devi was housewife. After completing Intermediate education started job block office of Govt. of Bihar.published in Mithila Mihir, Mati-pani, Bhakha, and Maithili Akademi magazine. Jyoti Jha Chaudhary, Date of Birth: December 30 1978,Place of Birth- Belhvar (Madhubani District), Education: Swami Vivekananda Middle School, Tisco Sakchi Girls High School, Mrs KMPM Inter College, IGNOU, ICWAI (COST ACCOUNTANCY); Residence- LONDON, UK; Father- Sh. Shubhankar Jha, Jamshedpur; Mother- Smt. Sudha Jha- Shivipatti. Jyoti received editor's choice award from www.poetry.comand her poems were featured in front page of www.poetrysoup.com for some period.She learnt Mithila Painting under Ms. Shveta Jha, Basera Institute, Jamshedpur and Fine Arts from Toolika, Sakchi, Jamshedpur (India). Her Mithila Paintings have been displayed by Ealing Art Group at Ealing Broadway, London. One Upon The Other Who is inferior among each other All have high show off style The short one holds the teek The new comer grabs the neck Son engaged in one sirsasan Father knows eighty two aasan Daughter-in-law having handful food Mother-in-law gets an empty pan The simplest one creates the tune And lame is dancing on that rhythm Getting madua flour for one rupee I balance my pocket money Wheat is prasaad, oil is holywater, The dealer is worshipped like a God Let bygones of previous year be bygones The reality is about the current year The general public is loosing life Leader claims improved quality of life After serving food again and again The cook puts himself on the stove Fools can accept it as development But this is a shine of fever Workers are costly, masters are cheap Forbidding the meal, snacking jalebi The front of the house is being cemented The back side is scattered all over With the strutting of the mistress The maids start dancing too The grandson holds the juicy sinuriya The granddad wants juice of mango He misses the sweet kheer of kohwar He will get pind of kheer in funeral On his cemetery inviting ants The old women have long locks The young women cut their hair. Send your comments to ggajendra@videha.com Input: (कोष्ठकमे देवनागरी, मिथिलाक्षर किंवा फोनेटिक-रोमनमे टाइप करू। Input in Devanagari, Mithilakshara or Phonetic-Roman.) Output: (परिणाम देवनागरी, मिथिलाक्षर आ फोनेटिक-रोमन/ रोमनमे। Result in Devanagari, Mithilakshara and Phonetic-Roman/ Roman.) English to Maithili Maithili to English इंग्लिश-मैथिली-कोष / मैथिली-इंग्लिश-कोष प्रोजेक्टकेँ आगू बढ़ाऊ, अपन सुझाव आ योगदान ई-मेल द्वारा ggajendra@videha.com पर पठाऊ। Top of Form विदेहक मैथिली-अंग्रेजी आ अंग्रेजी मैथिली कोष (इंटरनेटपर पहिल बेर सर्च-डिक्शनरी) एम.एस. एस.क्यू.एल. सर्वर आधारित -Based on ms-sql server Maithili-English and English-Maithili Dictionary. १.भारत आ नेपालक मैथिली भाषा-वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक शैली आ २.मैथिलीमे भाषा सम्पादन पाठ्यक्रम १.नेपाल आ भारतक मैथिली भाषा-वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक शैली
१.१. नेपालक मैथिली भाषा वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक उच्चारण आ लेखन शैली (भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक धारणाकेँ पूर्ण रूपसँ सङ्ग लऽ निर्धारित) मैथिलीमे उच्चारण तथा लेखन १.पञ्चमाक्षर आ अनुस्वार: पञ्चमाक्षरान्तर्गत ङ, ञ, ण, न एवं म अबैत अछि। संस्कृत भाषाक अनुसार शब्दक अन्तमे जाहि वर्गक अक्षर रहैत अछि ओही वर्गक पञ्चमाक्षर अबैत अछि। जेना- अङ्क (क वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ङ् आएल अछि।) पञ्च (च वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ञ् आएल अछि।) खण्ड (ट वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ण् आएल अछि।) सन्धि (त वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे न् आएल अछि।) खम्भ (प वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे म् आएल अछि।) उपर्युक्त बात मैथिलीमे कम देखल जाइत अछि। पञ्चमाक्षरक बदलामे अधिकांश जगहपर अनुस्वारक प्रयोग देखल जाइछ। जेना- अंक, पंच, खंड, संधि, खंभ आदि। व्याकरणविद पण्डित गोविन्द झाक कहब छनि जे कवर्ग, चवर्ग आ टवर्गसँ पूर्व अनुस्वार लिखल जाए तथा तवर्ग आ पवर्गसँ पूर्व पञ्चमाक्षरे लिखल जाए। जेना- अंक, चंचल, अंडा, अन्त तथा कम्पन। मुदा हिन्दीक निकट रहल आधुनिक लेखक एहि बातकेँ नहि मानैत छथि। ओ लोकनि अन्त आ कम्पनक जगहपर सेहो अंत आ कंपन लिखैत देखल जाइत छथि। नवीन पद्धति किछु सुविधाजनक अवश्य छैक। किएक तँ एहिमे समय आ स्थानक बचत होइत छैक। मुदा कतोक बेर हस्तलेखन वा मुद्रणमे अनुस्वारक छोट सन बिन्दु स्पष्ट नहि भेलासँ अर्थक अनर्थ होइत सेहो देखल जाइत अछि। अनुस्वारक प्रयोगमे उच्चारण-दोषक सम्भावना सेहो ततबए देखल जाइत अछि। एतदर्थ कसँ लऽ कऽ पवर्ग धरि पञ्चमाक्षरेक प्रयोग करब उचित अछि। यसँ लऽ कऽ ज्ञ धरिक अक्षरक सङ्ग अनुस्वारक प्रयोग करबामे कतहु कोनो विवाद नहि देखल जाइछ। २.ढ आ ढ़ : ढ़क उच्चारण “र् ह”जकाँ होइत अछि। अतः जतऽ “र् ह”क उच्चारण हो ओतऽ मात्र ढ़ लिखल जाए। आन ठाम खाली ढ लिखल जएबाक चाही। जेना- ढ = ढाकी, ढेकी, ढीठ, ढेउआ, ढङ्ग, ढेरी, ढाकनि, ढाठ आदि। ढ़ = पढ़ाइ, बढ़ब, गढ़ब, मढ़ब, बुढ़बा, साँढ़, गाढ़, रीढ़, चाँढ़, सीढ़ी, पीढ़ी आदि। उपर्युक्त शब्द सभकेँ देखलासँ ई स्पष्ट होइत अछि जे साधारणतया शब्दक शुरूमे ढ आ मध्य तथा अन्तमे ढ़ अबैत अछि। इएह नियम ड आ ड़क सन्दर्भ सेहो लागू होइत अछि। ३.व आ ब : मैथिलीमे “व”क उच्चारण ब कएल जाइत अछि, मुदा ओकरा ब रूपमे नहि लिखल जएबाक चाही। जेना- उच्चारण : बैद्यनाथ, बिद्या, नब, देबता, बिष्णु, बंश, बन्दना आदि। एहि सभक स्थानपर क्रमशः वैद्यनाथ, विद्या, नव, देवता, विष्णु, वंश, वन्दना लिखबाक चाही। सामान्यतया व उच्चारणक लेल ओ प्रयोग कएल जाइत अछि। जेना- ओकील, ओजह आदि। ४.य आ ज : कतहु-कतहु “य”क उच्चारण “ज”जकाँ करैत देखल जाइत अछि, मुदा ओकरा ज नहि लिखबाक चाही। उच्चारणमे यज्ञ, जदि, जमुना, जुग, जाबत, जोगी, जदु, जम आदि कहल जाएबला शब्द सभकेँ क्रमशः यज्ञ, यदि, यमुना, युग, यावत, योगी, यदु, यम लिखबाक चाही। ५.ए आ य : मैथिलीक वर्तनीमे ए आ य दुनू लिखल जाइत अछि। प्राचीन वर्तनी- कएल, जाए, होएत, माए, भाए, गाए आदि। नवीन वर्तनी- कयल, जाय, होयत, माय, भाय, गाय आदि। सामान्यतया शब्दक शुरूमे ए मात्र अबैत अछि। जेना एहि, एना, एकर, एहन आदि। एहि शब्द सभक स्थानपर यहि, यना, यकर, यहन आदिक प्रयोग नहि करबाक चाही। यद्यपि मैथिलीभाषी थारू सहित किछु जातिमे शब्दक आरम्भोमे “ए”केँ य कहि उच्चारण कएल जाइत अछि। ए आ “य”क प्रयोगक सन्दर्भमे प्राचीने पद्धतिक अनुसरण करब उपयुक्त मानि एहि पुस्तकमे ओकरे प्रयोग कएल गेल अछि। किएक तँ दुनूक लेखनमे कोनो सहजता आ दुरूहताक बात नहि अछि। आ मैथिलीक सर्वसाधारणक उच्चारण-शैली यक अपेक्षा एसँ बेसी निकट छैक। खास कऽ कएल, हएब आदि कतिपय शब्दकेँ कैल, हैब आदि रूपमे कतहु-कतहु लिखल जाएब सेहो “ए”क प्रयोगकेँ बेसी समीचीन प्रमाणित करैत अछि। ६.हि, हु तथा एकार, ओकार : मैथिलीक प्राचीन लेखन-परम्परामे कोनो बातपर बल दैत काल शब्दक पाछाँ हि, हु लगाओल जाइत छैक। जेना- हुनकहि, अपनहु, ओकरहु, तत्कालहि, चोट्टहि, आनहु आदि। मुदा आधुनिक लेखनमे हिक स्थानपर एकार एवं हुक स्थानपर ओकारक प्रयोग करैत देखल जाइत अछि। जेना- हुनके, अपनो, तत्काले, चोट्टे, आनो आदि। ७.ष तथा ख : मैथिली भाषामे अधिकांशतः षक उच्चारण ख होइत अछि। जेना- षड्यन्त्र (खड़यन्त्र), षोडशी (खोड़शी), षट्कोण (खटकोण), वृषेश (वृखेश), सन्तोष (सन्तोख) आदि। ८.ध्वनि-लोप : निम्नलिखित अवस्थामे शब्दसँ ध्वनि-लोप भऽ जाइत अछि: (क) क्रियान्वयी प्रत्यय अयमे य वा ए लुप्त भऽ जाइत अछि। ओहिमे सँ पहिने अक उच्चारण दीर्घ भऽ जाइत अछि। ओकर आगाँ लोप-सूचक चिह्न वा विकारी (’ / ऽ) लगाओल जाइछ। जेना- पूर्ण रूप : पढ़ए (पढ़य) गेलाह, कए (कय) लेल, उठए (उठय) पड़तौक। अपूर्ण रूप : पढ़’ गेलाह, क’ लेल, उठ’ पड़तौक। पढ़ऽ गेलाह, कऽ लेल, उठऽ पड़तौक। (ख) पूर्वकालिक कृत आय (आए) प्रत्ययमे य (ए) लुप्त भऽ जाइछ, मुदा लोप-सूचक विकारी नहि लगाओल जाइछ। जेना- पूर्ण रूप : खाए (य) गेल, पठाय (ए) देब, नहाए (य) अएलाह। अपूर्ण रूप : खा गेल, पठा देब, नहा अएलाह। (ग) स्त्री प्रत्यय इक उच्चारण क्रियापद, संज्ञा, ओ विशेषण तीनूमे लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना- पूर्ण रूप : दोसरि मालिनि चलि गेलि। अपूर्ण रूप : दोसर मालिन चलि गेल। (घ) वर्तमान कृदन्तक अन्तिम त लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना- पूर्ण रूप : पढ़ैत अछि, बजैत अछि, गबैत अछि। अपूर्ण रूप : पढ़ै अछि, बजै अछि, गबै अछि। (ङ) क्रियापदक अवसान इक, उक, ऐक तथा हीकमे लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना- पूर्ण रूप: छियौक, छियैक, छहीक, छौक, छैक, अबितैक, होइक। अपूर्ण रूप : छियौ, छियै, छही, छौ, छै, अबितै, होइ। (च) क्रियापदीय प्रत्यय न्ह, हु तथा हकारक लोप भऽ जाइछ। जेना- पूर्ण रूप : छन्हि, कहलन्हि, कहलहुँ, गेलह, नहि। अपूर्ण रूप : छनि, कहलनि, कहलौँ, गेलऽ, नइ, नञि, नै। ९.ध्वनि स्थानान्तरण : कोनो-कोनो स्वर-ध्वनि अपना जगहसँ हटि कऽ दोसर ठाम चलि जाइत अछि। खास कऽ ह्रस्व इ आ उक सम्बन्धमे ई बात लागू होइत अछि। मैथिलीकरण भऽ गेल शब्दक मध्य वा अन्तमे जँ ह्रस्व इ वा उ आबए तँ ओकर ध्वनि स्थानान्तरित भऽ एक अक्षर आगाँ आबि जाइत अछि। जेना- शनि (शइन), पानि (पाइन), दालि ( दाइल), माटि (माइट), काछु (काउछ), मासु (माउस) आदि। मुदा तत्सम शब्द सभमे ई निअम लागू नहि होइत अछि। जेना- रश्मिकेँ रइश्म आ सुधांशुकेँ सुधाउंस नहि कहल जा सकैत अछि। १०.हलन्त(्)क प्रयोग : मैथिली भाषामे सामान्यतया हलन्त (्)क आवश्यकता नहि होइत अछि। कारण जे शब्दक अन्तमे अ उच्चारण नहि होइत अछि। मुदा संस्कृत भाषासँ जहिनाक तहिना मैथिलीमे आएल (तत्सम) शब्द सभमे हलन्त प्रयोग कएल जाइत अछि। एहि पोथीमे सामान्यतया सम्पूर्ण शब्दकेँ मैथिली भाषा सम्बन्धी निअम अनुसार हलन्तविहीन राखल गेल अछि। मुदा व्याकरण सम्बन्धी प्रयोजनक लेल अत्यावश्यक स्थानपर कतहु-कतहु हलन्त देल गेल अछि। प्रस्तुत पोथीमे मथिली लेखनक प्राचीन आ नवीन दुनू शैलीक सरल आ समीचीन पक्ष सभकेँ समेटि कऽ वर्ण-विन्यास कएल गेल अछि। स्थान आ समयमे बचतक सङ्गहि हस्त-लेखन तथा तकनीकी दृष्टिसँ सेहो सरल होबऽबला हिसाबसँ वर्ण-विन्यास मिलाओल गेल अछि। वर्तमान समयमे मैथिली मातृभाषी पर्यन्तकेँ आन भाषाक माध्यमसँ मैथिलीक ज्ञान लेबऽ पड़ि रहल परिप्रेक्ष्यमे लेखनमे सहजता तथा एकरूपतापर ध्यान देल गेल अछि। तखन मैथिली भाषाक मूल विशेषता सभ कुण्ठित नहि होइक, ताहू दिस लेखक-मण्डल सचेत अछि। प्रसिद्ध भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक कहब छनि जे सरलताक अनुसन्धानमे एहन अवस्था किन्नहु ने आबऽ देबाक चाही जे भाषाक विशेषता छाँहमे पडि जाए। -(भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक धारणाकेँ पूर्ण रूपसँ सङ्ग लऽ निर्धारित) १.२. मैथिली अकादमी, पटना द्वारा निर्धारित मैथिली लेखन-शैली
१. जे शब्द मैथिली-साहित्यक प्राचीन कालसँ आइ धरि जाहि वर्त्तनीमे प्रचलित अछि, से सामान्यतः ताहि वर्त्तनीमे लिखल जाय- उदाहरणार्थ-
ग्राह्य
एखन ठाम जकर, तकर तनिकर अछि
अग्राह्य अखन, अखनि, एखेन, अखनी ठिमा, ठिना, ठमा जेकर, तेकर तिनकर। (वैकल्पिक रूपेँ ग्राह्य) ऐछ, अहि, ए।
२. निम्नलिखित तीन प्रकारक रूप वैकल्पिकतया अपनाओल जाय: भऽ गेल, भय गेल वा भए गेल। जा रहल अछि, जाय रहल अछि, जाए रहल अछि। कर’ गेलाह, वा करय गेलाह वा करए गेलाह।
३. प्राचीन मैथिलीक ‘न्ह’ ध्वनिक स्थानमे ‘न’ लिखल जाय सकैत अछि यथा कहलनि वा कहलन्हि।
४. ‘ऐ’ तथा ‘औ’ ततय लिखल जाय जत’ स्पष्टतः ‘अइ’ तथा ‘अउ’ सदृश उच्चारण इष्ट हो। यथा- देखैत, छलैक, बौआ, छौक इत्यादि।
५. मैथिलीक निम्नलिखित शब्द एहि रूपे प्रयुक्त होयत: जैह, सैह, इएह, ओऐह, लैह तथा दैह।
६. ह्र्स्व इकारांत शब्दमे ‘इ’ के लुप्त करब सामान्यतः अग्राह्य थिक। यथा- ग्राह्य देखि आबह, मालिनि गेलि (मनुष्य मात्रमे)।
७. स्वतंत्र ह्रस्व ‘ए’ वा ‘य’ प्राचीन मैथिलीक उद्धरण आदिमे तँ यथावत राखल जाय, किंतु आधुनिक प्रयोगमे वैकल्पिक रूपेँ ‘ए’ वा ‘य’ लिखल जाय। यथा:- कयल वा कएल, अयलाह वा अएलाह, जाय वा जाए इत्यादि।
८. उच्चारणमे दू स्वरक बीच जे ‘य’ ध्वनि स्वतः आबि जाइत अछि तकरा लेखमे स्थान वैकल्पिक रूपेँ देल जाय। यथा- धीआ, अढ़ैआ, विआह, वा धीया, अढ़ैया, बियाह।
९. सानुनासिक स्वतंत्र स्वरक स्थान यथासंभव ‘ञ’ लिखल जाय वा सानुनासिक स्वर। यथा:- मैञा, कनिञा, किरतनिञा वा मैआँ, कनिआँ, किरतनिआँ।
१०. कारकक विभक्त्तिक निम्नलिखित रूप ग्राह्य:- हाथकेँ, हाथसँ, हाथेँ, हाथक, हाथमे। ’मे’ मे अनुस्वार सर्वथा त्याज्य थिक। ‘क’ क वैकल्पिक रूप ‘केर’ राखल जा सकैत अछि।
११. पूर्वकालिक क्रियापदक बाद ‘कय’ वा ‘कए’ अव्यय वैकल्पिक रूपेँ लगाओल जा सकैत अछि। यथा:- देखि कय वा देखि कए।
१२. माँग, भाँग आदिक स्थानमे माङ, भाङ इत्यादि लिखल जाय।
१३. अर्द्ध ‘न’ ओ अर्द्ध ‘म’ क बदला अनुसार नहि लिखल जाय, किंतु छापाक सुविधार्थ अर्द्ध ‘ङ’ , ‘ञ’, तथा ‘ण’ क बदला अनुस्वारो लिखल जा सकैत अछि। यथा:- अङ्क, वा अंक, अञ्चल वा अंचल, कण्ठ वा कंठ।
१४. हलंत चिह्न निअमतः लगाओल जाय, किंतु विभक्तिक संग अकारांत प्रयोग कएल जाय। यथा:- श्रीमान्, किंतु श्रीमानक।
१५. सभ एकल कारक चिह्न शब्दमे सटा क’ लिखल जाय, हटा क’ नहि, संयुक्त विभक्तिक हेतु फराक लिखल जाय, यथा घर परक।
१६. अनुनासिककेँ चन्द्रबिन्दु द्वारा व्यक्त कयल जाय। परंतु मुद्रणक सुविधार्थ हि समान जटिल मात्रापर अनुस्वारक प्रयोग चन्द्रबिन्दुक बदला कयल जा सकैत अछि। यथा- हिँ केर बदला हिं।
१७. पूर्ण विराम पासीसँ ( । ) सूचित कयल जाय।
१८. समस्त पद सटा क’ लिखल जाय, वा हाइफेनसँ जोड़ि क’ , हटा क’ नहि।
१९. लिअ तथा दिअ शब्दमे बिकारी (ऽ) नहि लगाओल जाय।
२०. अंक देवनागरी रूपमे राखल जाय।
२१.किछु ध्वनिक लेल नवीन चिन्ह बनबाओल जाय। जा' ई नहि बनल अछि ताबत एहि दुनू ध्वनिक बदला पूर्ववत् अय/ आय/ अए/ आए/ आओ/ अओ लिखल जाय। आकि ऎ वा ऒ सँ व्यक्त कएल जाय।
ह./- गोविन्द झा ११/८/७६ श्रीकान्त ठाकुर ११/८/७६ सुरेन्द्र झा "सुमन" ११/०८/७६
२. मैथिलीमे भाषा सम्पादन पाठ्यक्रम २.१. उच्चारण निर्देश: (बोल्ड कएल रूप ग्राह्य):- दन्त न क उच्चारणमे दाँतमे जीह सटत- जेना बाजू नाम , मुदा ण क उच्चारणमे जीह मूर्धामे सटत (नै सटैए तँ उच्चारण दोष अछि)- जेना बाजू गणेश। तालव्य शमे जीह तालुसँ , षमे मूर्धासँ आ दन्त समे दाँतसँ सटत। निशाँ, सभ आ शोषण बाजि कऽ देखू। मैथिलीमे ष केँ वैदिक संस्कृत जकाँ ख सेहो उच्चरित कएल जाइत अछि, जेना वर्षा, दोष। य अनेको स्थानपर ज जकाँ उच्चरित होइत अछि आ ण ड़ जकाँ (यथा संयोग आ गणेश संजोग आ गड़ेस उच्चरित होइत अछि)। मैथिलीमे व क उच्चारण ब, श क उच्चारण स आ य क उच्चारण ज सेहो होइत अछि। ओहिना ह्रस्व इ बेशीकाल मैथिलीमे पहिने बाजल जाइत अछि कारण देवनागरीमे आ मिथिलाक्षरमे ह्रस्व इ अक्षरक पहिने लिखलो जाइत आ बाजलो जएबाक चाही। कारण जे हिन्दीमे एकर दोषपूर्ण उच्चारण होइत अछि (लिखल तँ पहिने जाइत अछि मुदा बाजल बादमे जाइत अछि), से शिक्षा पद्धतिक दोषक कारण हम सभ ओकर उच्चारण दोषपूर्ण ढंगसँ कऽ रहल छी। अछि- अ इ छ ऐछ (उच्चारण) छथि- छ इ थ – छैथ (उच्चारण) पहुँचि- प हुँ इ च (उच्चारण) आब अ आ इ ई ए ऐ ओ औ अं अः ऋ ऐ सभ लेल मात्रा सेहो अछि, मुदा ऐमे ई ऐ ओ औ अं अः ऋ केँ संयुक्ताक्षर रूपमे गलत रूपमे प्रयुक्त आ उच्चरित कएल जाइत अछि। जेना ऋ केँ री रूपमे उच्चरित करब। आ देखियौ- ऐ लेल देखिऔ क प्रयोग अनुचित। मुदा देखिऐ लेल देखियै अनुचित। क् सँ ह् धरि अ सम्मिलित भेलासँ क सँ ह बनैत अछि, मुदा उच्चारण काल हलन्त युक्त शब्दक अन्तक उच्चारणक प्रवृत्ति बढ़ल अछि, मुदा हम जखन मनोजमे ज् अन्तमे बजैत छी, तखनो पुरनका लोककेँ बजैत सुनबन्हि- मनोजऽ, वास्तवमे ओ अ युक्त ज् = ज बजै छथि। फेर ज्ञ अछि ज् आ ञ क संयुक्त मुदा गलत उच्चारण होइत अछि- ग्य। ओहिना क्ष अछि क् आ ष क संयुक्त मुदा उच्चारण होइत अछि छ। फेर श् आ र क संयुक्त अछि श्र ( जेना श्रमिक) आ स् आ र क संयुक्त अछि स्र (जेना मिस्र)। त्र भेल त+र । उच्चारणक ऑडियो फाइल विदेह आर्काइव http://www.videha.co.in/ पर उपलब्ध अछि। फेर केँ / सँ / पर पूर्व अक्षरसँ सटा कऽ लिखू मुदा तँ / कऽ हटा कऽ। ऐमे सँ मे पहिल सटा कऽ लिखू आ बादबला हटा कऽ। अंकक बाद टा लिखू सटा कऽ मुदा अन्य ठाम टा लिखू हटा कऽ– जेना छहटा मुदा सभ टा। फेर ६अ म सातम लिखू- छठम सातम नै। घरबलामे बला मुदा घरवालीमे वाली प्रयुक्त करू। रहए- रहै मुदा सकैए (उच्चारण सकै-ए)। मुदा कखनो काल रहए आ रहै मे अर्थ भिन्नता सेहो, जेना से कम्मो जगहमे पार्किंग करबाक अभ्यास रहै ओकरा। पुछलापर पता लागल जे ढुनढुन नाम्ना ई ड्राइवर कनाट प्लेसक पार्किंगमे काज करैत रहए। छलै, छलए मे सेहो ऐ तरहक भेल। छलए क उच्चारण छल-ए सेहो। संयोगने- (उच्चारण संजोगने) केँ/ कऽ केर- क ( केर क प्रयोग गद्यमे नै करू , पद्यमे कऽ सकै छी। ) क (जेना रामक) –रामक आ संगे (उच्चारण राम के / राम कऽ सेहो) सँ- सऽ (उच्चारण) चन्द्रबिन्दु आ अनुस्वार- अनुस्वारमे कंठ धरिक प्रयोग होइत अछि मुदा चन्द्रबिन्दुमे नै। चन्द्रबिन्दुमे कनेक एकारक सेहो उच्चारण होइत अछि- जेना रामसँ- (उच्चारण राम सऽ) रामकेँ- (उच्चारण राम कऽ/ राम के सेहो)। केँ जेना रामकेँ भेल हिन्दीक को (राम को)- राम को= रामकेँ क जेना रामक भेल हिन्दीक का ( राम का) राम का= रामक कऽ जेना जा कऽ भेल हिन्दीक कर ( जा कर) जा कर= जा कऽ सँ भेल हिन्दीक से (राम से) राम से= रामसँ सऽ , तऽ , त , केर (गद्यमे) एे चारू शब्द सबहक प्रयोग अवांछित। के दोसर अर्थेँ प्रयुक्त भऽ सकैए- जेना, के कहलक? विभक्ति “क”क बदला एकर प्रयोग अवांछित। नञि, नहि, नै, नइ, नँइ, नइँ, नइं ऐ सभक उच्चारण आ लेखन - नै त्त्व क बदलामे त्व जेना महत्वपूर्ण (महत्त्वपूर्ण नै) जतए अर्थ बदलि जाए ओतहि मात्र तीन अक्षरक संयुक्ताक्षरक प्रयोग उचित। सम्पति- उच्चारण स म्प इ त (सम्पत्ति नै- कारण सही उच्चारण आसानीसँ सम्भव नै)। मुदा सर्वोत्तम (सर्वोतम नै)। राष्ट्रिय (राष्ट्रीय नै) सकैए/ सकै (अर्थ परिवर्तन) पोछैले/ पोछै लेल/ पोछए लेल पोछैए/ पोछए/ (अर्थ परिवर्तन) पोछए/ पोछै ओ लोकनि ( हटा कऽ, ओ मे बिकारी नै) ओइ/ ओहि ओहिले/ ओहि लेल/ ओही लऽ जएबेँ/ बैसबेँ पँचभइयाँ देखियौक/ (देखिऔक नै- तहिना अ मे ह्रस्व आ दीर्घक मात्राक प्रयोग अनुचित) जकाँ / जेकाँ तँइ/ तैँ/ होएत / हएत नञि/ नहि/ नँइ/ नइँ/ नै सौँसे/ सौंसे बड़ / बड़ी (झोराओल) गाए (गाइ नहि), मुदा गाइक दूध (गाएक दूध नै।) रहलेँ/ पहिरतैँ हमहीं/ अहीं सब - सभ सबहक - सभहक धरि - तक गप- बात बूझब - समझब बुझलौं/ समझलौं/ बुझलहुँ - समझलहुँ हमरा आर - हम सभ आकि- आ कि सकैछ/ करैछ (गद्यमे प्रयोगक आवश्यकता नै) होइन/ होनि जाइन (जानि नै, जेना देल जाइन) मुदा जानि-बूझि (अर्थ परिव्र्तन) पइठ/ जाइठ आउ/ जाउ/ आऊ/ जाऊ मे, केँ, सँ, पर (शब्दसँ सटा कऽ) तँ कऽ धऽ दऽ (शब्दसँ हटा कऽ) मुदा दूटा वा बेसी विभक्ति संग रहलापर पहिल विभक्ति टाकेँ सटाऊ। जेना ऐमे सँ । एकटा , दूटा (मुदा कए टा) बिकारीक प्रयोग शब्दक अन्तमे, बीचमे अनावश्यक रूपेँ नै। आकारान्त आ अन्तमे अ क बाद बिकारीक प्रयोग नै (जेना दिअ , आ/ दिय’ , आ’, आ नै ) अपोस्ट्रोफीक प्रयोग बिकारीक बदलामे करब अनुचित आ मात्र फॉन्टक तकनीकी न्यूनताक परिचायक)- ओना बिकारीक संस्कृत रूप ऽ अवग्रह कहल जाइत अछि आ वर्तनी आ उच्चारण दुनू ठाम एकर लोप रहैत अछि/ रहि सकैत अछि (उच्चारणमे लोप रहिते अछि)। मुदा अपोस्ट्रोफी सेहो अंग्रेजीमे पसेसिव केसमे होइत अछि आ फ्रेंचमे शब्दमे जतए एकर प्रयोग होइत अछि जेना raison d’etre एतए सेहो एकर उच्चारण रैजौन डेटर होइत अछि, माने अपोस्ट्रॉफी अवकाश नै दैत अछि वरन जोड़ैत अछि, से एकर प्रयोग बिकारीक बदला देनाइ तकनीकी रूपेँ सेहो अनुचित)। अइमे, एहिमे/ ऐमे जइमे, जाहिमे एखन/ अखन/ अइखन केँ (के नहि) मे (अनुस्वार रहित) भऽ मे दऽ तँ (तऽ, त नै) सँ ( सऽ स नै) गाछ तर गाछ लग साँझ खन जो (जो go, करै जो do) तै/तइ जेना- तै दुआरे/ तइमे/ तइले जै/जइ जेना- जै कारण/ जइसँ/ जइले ऐ/अइ जेना- ऐ कारण/ ऐसँ/ अइले/ मुदा एकर एकटा खास प्रयोग- लालति कतेक दिनसँ कहैत रहैत अइ लै/लइ जेना लैसँ/ लइले/ लै दुआरे लहँ/ लौं गेलौं/ लेलौं/ लेलँह/ गेलहुँ/ लेलहुँ/ लेलँ जइ/ जाहि/ जै जहिठाम/ जाहिठाम/ जइठाम/ जैठाम एहि/ अहि/ अइ (वाक्यक अंतमे ग्राह्य) / ऐ अइछ/ अछि/ ऐछ तइ/ तहि/ तै/ ताहि ओहि/ ओइ सीखि/ सीख जीवि/ जीवी/ जीब भलेहीं/ भलहिं तैं/ तँइ/ तँए जाएब/ जएब लइ/ लै छइ/ छै नहि/ नै/ नइ गइ/ गै छनि/ छन्हि ... समए शब्दक संग जखन कोनो विभक्ति जुटै छै तखन समै जना समैपर इत्यादि। असगरमे हृदए आ विभक्ति जुटने हृदे जना हृदेसँ, हृदेमे इत्यादि। जइ/ जाहि/ जै जहिठाम/ जाहिठाम/ जइठाम/ जैठाम एहि/ अहि/ अइ/ ऐ अइछ/ अछि/ ऐछ तइ/ तहि/ तै/ ताहि ओहि/ ओइ सीखि/ सीख जीवि/ जीवी/ जीब भले/ भलेहीं/ भलहिं तैं/ तँइ/ तँए जाएब/ जएब लइ/ लै छइ/ छै नहि/ नै/ नइ गइ/ गै छनि/ छन्हि चुकल अछि/ गेल गछि २.२. मैथिलीमे भाषा सम्पादन पाठ्यक्रम नीचाँक सूचीमे देल विकल्पमेसँ लैंगुएज एडीटर द्वारा कोन रूप चुनल जेबाक चाही: बोल्ड कएल रूप ग्राह्य: १.होयबला/ होबयबला/ होमयबला/ हेब’बला, हेम’बला/ होयबाक/होबएबला /होएबाक २. आ’/आऽ आ ३. क’ लेने/कऽ लेने/कए लेने/कय लेने/ल’/लऽ/लय/लए ४. भ’ गेल/भऽ गेल/भय गेल/भए गेल ५. कर’ गेलाह/करऽ गेलह/करए गेलाह/करय गेलाह ६. लिअ/दिअ लिय’,दिय’,लिअ’,दिय’/ ७. कर’ बला/करऽ बला/ करय बला करैबला/क’र’ बला / करैवाली ८. बला वला (पुरूष), वाली (स्त्री) ९ . आङ्ल आंग्ल १०. प्रायः प्रायह ११. दुःख दुख १ २. चलि गेल चल गेल/चैल गेल १३. देलखिन्ह देलकिन्ह, देलखिन १४. देखलन्हि देखलनि/ देखलैन्ह १५. छथिन्ह/ छलन्हि छथिन/ छलैन/ छलनि १६. चलैत/दैत चलति/दैति १७. एखनो अखनो १८. बढ़नि बढ़इन बढ़न्हि १९. ओ’/ओऽ(सर्वनाम) ओ २० . ओ (संयोजक) ओ’/ओऽ २१. फाँगि/फाङ्गि फाइंग/फाइङ २२. जे जे’/जेऽ २३. ना-नुकुर ना-नुकर २४. केलन्हि/केलनि/कयलन्हि २५. तखनतँ/ तखन तँ २६. जा रहल/जाय रहल/जाए रहल २७. निकलय/निकलए लागल/ लगल बहराय/ बहराए लागल/ लगल निकल’/बहरै लागल २८. ओतय/ जतय जत’/ ओत’/ जतए/ ओतए २९. की फूरल जे कि फूरल जे ३०. जे जे’/जेऽ ३१. कूदि / यादि(मोन पारब) कूइद/याइद/कूद/याद/ यादि (मोन) ३२. इहो/ ओहो ३३. हँसए/ हँसय हँसऽ ३४. नौ आकि दस/नौ किंवा दस/ नौ वा दस ३५. सासु-ससुर सास-ससुर ३६. छह/ सात छ/छः/सात ३७. की की’/ कीऽ (दीर्घीकारान्तमे ऽ वर्जित) ३८. जबाब जवाब ३९. करएताह/ करेताह करयताह ४०. दलान दिशि दलान दिश/दलान दिस ४१ . गेलाह गएलाह/गयलाह ४२. किछु आर/ किछु और/ किछ आर ४३. जाइ छल/ जाइत छल जाति छल/जैत छल ४४. पहुँचि/ भेट जाइत छल/ भेट जाइ छलए पहुँच/ भेटि जाइत छल ४५. जबान (युवा)/ जवान(फौजी) ४६. लय/ लए क’/ कऽ/ लए कए / लऽ कऽ/ लऽ कए ४७. ल’/लऽ कय/ कए ४८. एखन / एखने / अखन / अखने ४९. अहींकेँ अहीँकेँ ५०. गहींर गहीँर ५१. धार पार केनाइ धार पार केनाय/केनाए ५२. जेकाँ जेँकाँ/ जकाँ ५३. तहिना तेहिना ५४. एकर अकर ५५. बहिनउ बहनोइ ५६. बहिन बहिनि ५७. बहिन-बहिनोइ बहिन-बहनउ ५८. नहि/ नै ५९. करबा / करबाय/ करबाए ६०. तँ/ त ऽ तय/तए ६१. भैयारी मे छोट-भाए/भै/, जेठ-भाय/भाइ, ६२. गिनतीमे दू भाइ/भाए/भाँइ ६३. ई पोथी दू भाइक/ भाँइ/ भाए/ लेल। यावत जावत ६४. माय मै / माए मुदा माइक ममता ६५. देन्हि/ दइन दनि/ दएन्हि/ दयन्हि दन्हि/ दैन्हि ६६. द’/ दऽ/ दए ६७. ओ (संयोजक) ओऽ (सर्वनाम) ६८. तका कए तकाय तकाए ६९. पैरे (on foot) पएरे कएक/ कैक ७०. ताहुमे/ ताहूमे ७१. पुत्रीक ७२. बजा कय/ कए / कऽ ७३. बननाय/बननाइ ७४. कोला ७५. दिनुका दिनका ७६. ततहिसँ ७७. गरबओलन्हि/ गरबौलनि/ गरबेलन्हि/ गरबेलनि ७८. बालु बालू ७९. चेन्ह चिन्ह(अशुद्ध) ८०. जे जे’ ८१ . से/ के से’/के’ ८२. एखुनका अखनुका ८३. भुमिहार भूमिहार ८४. सुग्गर / सुगरक/ सूगर ८५. झठहाक झटहाक ८६. छूबि ८७. करइयो/ओ करैयो ने देलक /करियौ-करइयौ ८८. पुबारि पुबाइ ८९. झगड़ा-झाँटी झगड़ा-झाँटि ९०. पएरे-पएरे पैरे-पैरे ९१. खेलएबाक ९२. खेलेबाक ९३. लगा ९४. होए- हो – होअए ९५. बुझल बूझल ९६. बूझल (संबोधन अर्थमे) ९७. यैह यएह / इएह/ सैह/ सएह ९८. तातिल ९९. अयनाय- अयनाइ/ अएनाइ/ एनाइ १००. निन्न- निन्द १०१. बिनु बिन १०२. जाए जाइ १०३. जाइ (in different sense)-last word of sentence १०४. छत पर आबि जाइ १०५. ने १०६. खेलाए (play) –खेलाइ १०७. शिकाइत- शिकायत १०८. ढप- ढ़प १०९ . पढ़- पढ ११०. कनिए/ कनिये कनिञे १११. राकस- राकश ११२. होए/ होय होइ ११३. अउरदा- औरदा ११४. बुझेलन्हि (different meaning- got understand) ११५. बुझएलन्हि/बुझेलनि/ बुझयलन्हि (understood himself) ११६. चलि- चल/ चलि गेल ११७. खधाइ- खधाय ११८. मोन पाड़लखिन्ह/ मोन पाड़लखिन/ मोन पारलखिन्ह ११९. कैक- कएक- कइएक १२०. लग ल’ग १२१. जरेनाइ १२२. जरौनाइ जरओनाइ- जरएनाइ/ जरेनाइ १२३. होइत १२४. गरबेलन्हि/ गरबेलनि गरबौलन्हि/ गरबौलनि १२५. चिखैत- (to test)चिखइत १२६. करइयो (willing to do) करैयो १२७. जेकरा- जकरा १२८. तकरा- तेकरा १२९. बिदेसर स्थानेमे/ बिदेसरे स्थानमे १३०. करबयलहुँ/ करबएलहुँ/ करबेलहुँ करबेलौं १३१. हारिक (उच्चारण हाइरक) १३२. ओजन वजन आफसोच/ अफसोस कागत/ कागच/ कागज १३३. आधे भाग/ आध-भागे १३४. पिचा / पिचाय/पिचाए १३५. नञ/ ने १३६. बच्चा नञ (ने) पिचा जाय १३७. तखन ने (नञ) कहैत अछि। कहै/ सुनै/ देखै छल मुदा कहैत-कहैत/ सुनैत-सुनैत/ देखैत-देखैत १३८. कतेक गोटे/ कताक गोटे १३९. कमाइ-धमाइ/ कमाई- धमाई १४० . लग ल’ग १४१. खेलाइ (for playing) १४२. छथिन्ह/ छथिन १४३. होइत होइ १४४. क्यो कियो / केओ १४५. केश (hair) १४६. केस (court-case) १४७ . बननाइ/ बननाय/ बननाए १४८. जरेनाइ १४९. कुरसी कुर्सी १५०. चरचा चर्चा १५१. कर्म करम १५२. डुबाबए/ डुबाबै/ डुमाबै डुमाबय/ डुमाबए १५३. एखुनका/ अखुनका १५४. लए/ लिअए (वाक्यक अंतिम शब्द)- लऽ १५५. कएलक/ केलक १५६. गरमी गर्मी १५७ . वरदी वर्दी १५८. सुना गेलाह सुना’/सुनाऽ १५९. एनाइ-गेनाइ १६०. तेना ने घेरलन्हि/ तेना ने घेरलनि १६१. नञि / नै १६२. डरो ड’रो १६३. कतहु/ कतौ कहीं १६४. उमरिगर-उमेरगर उमरगर १६५. भरिगर १६६. धोल/धोअल धोएल १६७. गप/गप्प १६८. के के’ १६९. दरबज्जा/ दरबजा १७०. ठाम १७१. धरि तक १७२. घूरि लौटि १७३. थोरबेक १७४. बड्ड १७५. तोँ/ तूँ १७६. तोँहि( पद्यमे ग्राह्य) १७७. तोँही / तोँहि १७८. करबाइए करबाइये १७९. एकेटा १८०. करितथि /करतथि १८१. पहुँचि/ पहुँच १८२. राखलन्हि रखलन्हि/ रखलनि १८३. लगलन्हि/ लगलनि लागलन्हि १८४. सुनि (उच्चारण सुइन) १८५. अछि (उच्चारण अइछ) १८६. एलथि गेलथि १८७. बितओने/ बितौने/ बितेने १८८. करबओलन्हि/ करबौलनि/ करेलखिन्ह/ करेलखिन १८९. करएलन्हि/ करेलनि १९०. आकि/ कि १९१. पहुँचि/ पहुँच १९२. बत्ती जराय/ जराए जरा (आगि लगा) १९३. से से’ १९४. हाँ मे हाँ (हाँमे हाँ विभक्त्तिमे हटा कए) १९५. फेल फैल १९६. फइल(spacious) फैल १९७. होयतन्हि/ होएतन्हि/ होएतनि/हेतनि/ हेतन्हि १९८. हाथ मटिआएब/ हाथ मटियाबय/हाथ मटियाएब १९९. फेका फेंका २००. देखाए देखा २०१. देखाबए २०२. सत्तरि सत्तर २०३. साहेब साहब २०४.गेलैन्ह/ गेलन्हि/ गेलनि २०५. हेबाक/ होएबाक २०६.केलो/ कएलहुँ/केलौं/ केलुँ २०७. किछु न किछु/ किछु ने किछु २०८.घुमेलहुँ/ घुमओलहुँ/ घुमेलौं २०९. एलाक/ अएलाक २१०. अः/ अह २११.लय/ लए (अर्थ-परिवर्त्तन) २१२.कनीक/ कनेक २१३.सबहक/ सभक २१४.मिलाऽ/ मिला २१५.कऽ/ क २१६.जाऽ/ जा २१७.आऽ/ आ २१८.भऽ /भ’ (’ फॉन्टक कमीक द्योतक) २१९.निअम/ नियम २२० .हेक्टेअर/ हेक्टेयर २२१.पहिल अक्षर ढ/ बादक/ बीचक ढ़ २२२.तहिं/तहिँ/ तञि/ तैं २२३.कहिं/ कहीं २२४.तँइ/ तैं / तइँ २२५.नँइ/ नइँ/ नञि/ नहि/नै २२६.है/ हए / एलीहेँ/ २२७.छञि/ छै/ छैक /छइ २२८.दृष्टिएँ/ दृष्टियेँ २२९.आ (come)/ आऽ(conjunction) २३०. आ (conjunction)/ आऽ(come) २३१.कुनो/ कोनो, कोना/केना २३२.गेलैन्ह-गेलन्हि-गेलनि २३३.हेबाक- होएबाक २३४.केलौँ- कएलौँ-कएलहुँ/केलौं २३५.किछु न किछ- किछु ने किछु २३६.केहेन- केहन २३७.आऽ (come)-आ (conjunction-and)/आ। आब'-आब' /आबह-आबह २३८. हएत-हैत २३९.घुमेलहुँ-घुमएलहुँ- घुमेलाें २४०.एलाक- अएलाक २४१.होनि- होइन/ होन्हि/ २४२.ओ-राम ओ श्यामक बीच(conjunction), ओऽ कहलक (he said)/ओ २४३.की हए/ कोसी अएली हए/ की है। की हइ २४४.दृष्टिएँ/ दृष्टियेँ २४५ .शामिल/ सामेल २४६.तैँ / तँए/ तञि/ तहिं २४७.जौं / ज्योँ/ जँ/ २४८.सभ/ सब २४९.सभक/ सबहक २५०.कहिं/ कहीं २५१.कुनो/ कोनो/ कोनहुँ/ २५२.फारकती भऽ गेल/ भए गेल/ भय गेल २५३.कोना/ केना/ कन्ना/कना २५४.अः/ अह २५५.जनै/ जनञ २५६.गेलनि/ गेलाह (अर्थ परिवर्तन) २५७.केलन्हि/ कएलन्हि/ केलनि/ २५८.लय/ लए/ लएह (अर्थ परिवर्तन) २५९.कनीक/ कनेक/कनी-मनी २६०.पठेलन्हि पठेलनि/ पठेलइन/ पपठओलन्हि/ पठबौलनि/ २६१.निअम/ नियम २६२.हेक्टेअर/ हेक्टेयर २६३.पहिल अक्षर रहने ढ/ बीचमे रहने ढ़ २६४.आकारान्तमे बिकारीक प्रयोग उचित नै/ अपोस्ट्रोफीक प्रयोग फान्टक तकनीकी न्यूनताक परिचायक ओकर बदला अवग्रह (बिकारी) क प्रयोग उचित २६५.केर (पद्यमे ग्राह्य) / -क/ कऽ/ के २६६.छैन्हि- छन्हि २६७.लगैए/ लगैये २६८.होएत/ हएत २६९.जाएत/ जएत/ २७०.आएत/ अएत/ आओत २७१ .खाएत/ खएत/ खैत २७२.पिअएबाक/ पिएबाक/पियेबाक २७३.शुरु/ शुरुह २७४.शुरुहे/ शुरुए २७५.अएताह/अओताह/ एताह/ औताह २७६.जाहि/ जाइ/ जइ/ जै/ २७७.जाइत/ जैतए/ जइतए २७८.आएल/ अएल २७९.कैक/ कएक २८०.आयल/ अएल/ आएल २८१. जाए/ जअए/ जए (लालति जाए लगलीह।) २८२. नुकएल/ नुकाएल २८३. कठुआएल/ कठुअएल २८४. ताहि/ तै/ तइ २८५. गायब/ गाएब/ गएब २८६. सकै/ सकए/ सकय २८७.सेरा/सरा/ सराए (भात सरा गेल) २८८.कहैत रही/देखैत रही/ कहैत छलौं/ कहै छलौं- अहिना चलैत/ पढ़ैत (पढ़ै-पढ़ैत अर्थ कखनो काल परिवर्तित) - आर बुझै/ बुझैत (बुझै/ बुझै छी, मुदा बुझैत-बुझैत)/ सकैत/ सकै। करैत/ करै। दै/ दैत। छैक/ छै। बचलै/ बचलैक। रखबा/ रखबाक । बिनु/ बिन। रातिक/ रातुक बुझै आ बुझैत केर अपन-अपन जगहपर प्रयोग समीचीन अछि। बुझैत-बुझैत आब बुझलिऐ। हमहूँ बुझै छी। २८९. दुआरे/ द्वारे २९०.भेटि/ भेट/ भेँट २९१. खन/ खीन/ खुना (भोर खन/ भोर खीन) २९२.तक/ धरि २९३.गऽ/ गै (meaning different-जनबै गऽ) २९४.सऽ/ सँ (मुदा दऽ, लऽ) २९५.त्त्व,(तीन अक्षरक मेल बदला पुनरुक्तिक एक आ एकटा दोसरक उपयोग) आदिक बदला त्व आदि। महत्त्व/ महत्व/ कर्ता/ कर्त्ता आदिमे त्त संयुक्तक कोनो आवश्यकता मैथिलीमे नै अछि। वक्तव्य २९६.बेसी/ बेशी २९७.बाला/वाला बला/ वला (रहैबला) २९८ .वाली/ (बदलैवाली) २९९.वार्त्ता/ वार्ता ३००. अन्तर्राष्ट्रिय/ अन्तर्राष्ट्रीय ३०१. लेमए/ लेबए ३०२.लमछुरका, नमछुरका ३०२.लागै/ लगै ( भेटैत/ भेटै) ३०३.लागल/ लगल ३०४.हबा/ हवा ३०५.राखलक/ रखलक ३०६.आ (come)/ आ (and) ३०७. पश्चाताप/ पश्चात्ताप ३०८. ऽ केर व्यवहार शब्दक अन्तमे मात्र, यथासंभव बीचमे नै। ३०९.कहैत/ कहै ३१०. रहए (छल)/ रहै (छलै) (meaning different) ३११.तागति/ ताकति ३१२.खराप/ खराब ३१३.बोइन/ बोनि/ बोइनि ३१४.जाठि/ जाइठ ३१५.कागज/ कागच/ कागत ३१६.गिरै (meaning different- swallow)/ गिरए (खसए) ३१७.राष्ट्रिय/ राष्ट्रीय Festivals of Mithila DATE-LIST (year- 2010-11) (१४१८ साल) Marriage Days: Nov.2010- 19 Dec.2010- 3,8 January 2011- 17, 21, 23, 24, 26, 27, 28 31 Feb.2011- 3, 4, 7, 9, 18, 20, 24, 25, 27, 28 March 2011- 2, 7 May 2011- 11, 12, 13, 18, 19, 20, 22, 23, 29, 30 June 2011- 1, 2, 3, 8, 9, 10, 12, 13, 19, 20, 26, 29 Upanayana Days: February 2011- 8 March 2011- 7 May 2011- 12, 13 June 2011- 6, 12 Dviragaman Din: November 2010- 19, 22, 25, 26 December 2010- 6, 8, 9, 10, 12 February 2011- 20, 21 March 2011- 6, 7, 9, 13 April 2011- 17, 18, 22 May 2011- 5, 6, 8, 13 Mundan Din: November 2010- 24, 26 December 2010- 10, 17 February 2011- 4, 16, 21 March 2011- 7, 9 April 2011- 22 May 2011- 6, 9, 19 June 2011- 3, 6, 10, 20 FESTIVALS OF MITHILA Mauna Panchami-31 July Somavati Amavasya Vrat- 1 August Madhushravani-12 August Nag Panchami- 14 August Raksha Bandhan- 24 Aug Krishnastami- 01 September Kushi Amavasya- 08 September Hartalika Teej- 11 September ChauthChandra-11 September Vishwakarma Pooja- 17 September Karma Dharma Ekadashi-19 September Indra Pooja Aarambh- 20 September Anant Caturdashi- 22 Sep Agastyarghadaan- 23 Sep Pitri Paksha begins- 24 Sep Jimootavahan Vrata/ Jitia-30 Sep Matri Navami- 02 October Kalashsthapan- 08 October Belnauti- 13 October Patrika Pravesh- 14 October Mahastami- 15 October Maha Navami - 16-17 October Vijaya Dashami- 18 October Kojagara- 22 Oct Dhanteras- 3 November Diyabati, shyama pooja- 5 November Annakoota/ Govardhana Pooja-07 November Bhratridwitiya/ Chitragupta Pooja-08 November Chhathi- -12 November Akshyay Navami- 15 November Devotthan Ekadashi- 17 November Kartik Poornima/ Sama Bisarjan- 21 Nov Shaa. ravivratarambh- 21 November Navanna parvan- 24 -26 November Vivaha Panchmi- 10 December Naraknivaran chaturdashi- 01 February Makara/ Teela Sankranti-15 Jan Basant Panchami/ Saraswati Pooja- 08 Februaqry Achla Saptmi- 10 February Mahashivaratri-03 March Holikadahan-Fagua-19 March Holi-20 Mar Varuni Yoga- 31 March va.navaratrarambh- 4 April vaa. Chhathi vrata- 9 April Ram Navami- 12 April Mesha Sankranti-Satuani-14 April Jurishital-15 April Somavati Amavasya Vrata- 02 May Ravi Brat Ant- 08 May Akshaya Tritiya-06 May Janaki Navami- 12 May Vat Savitri-barasait- 01 June Ganga Dashhara-11 June Jagannath Rath Yatra- 3 July Hari Sayan Ekadashi- 11 Jul Aashadhi Guru Poornima-15 Jul VIDEHA ARCHIVE १.विदेह ई-पत्रिकाक सभटा पुरान अंक ब्रेल, तिरहुता आ देवनागरी रूपमे Videha e journal's all old issues in Braille Tirhuta and Devanagari versions विदेह ई-पत्रिकाक पहिल ५० अंक
विदेह ई-पत्रिकाक ५०म सँ आगाँक अंक २.मैथिली पोथी डाउनलोड Maithili Books Download ३.मैथिली ऑडियो संकलन Maithili Audio Downloads ४.मैथिली वीडियोक संकलन Maithili Videos ५.मिथिला चित्रकला/ आधुनिक चित्रकला आ चित्र Mithila Painting/ Modern Art and Photos "विदेह"क एहि सभ सहयोगी लिंकपर सेहो एक बेर जाऊ। ६.विदेह मैथिली क्विज : http://videhaquiz.blogspot.com/ ७.विदेह मैथिली जालवृत्त एग्रीगेटर : http://videha-aggregator.blogspot.com/ ८.विदेह मैथिली साहित्य अंग्रेजीमे अनूदित http://madhubani-art.blogspot.com/ ९.विदेहक पूर्व-रूप "भालसरिक गाछ" : http://gajendrathakur.blogspot.com/ १०.विदेह इंडेक्स : http://videha123.blogspot.com/ ११.विदेह फाइल : http://videha123.wordpress.com/ १२. विदेह: सदेह : पहिल तिरहुता (मिथिला़क्षर) जालवृत्त (ब्लॉग) http://videha-sadeha.blogspot.com/ १३. विदेह:ब्रेल: मैथिली ब्रेलमे: पहिल बेर विदेह द्वारा http://videha-braille.blogspot.com/ १४.VIDEHA IST MAITHILI FORTNIGHTLY EJOURNAL ARCHIVE http://videha-archive.blogspot.com/ १५. विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका मैथिली पोथीक आर्काइव http://videha-pothi.blogspot.com/ १६. विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका ऑडियो आर्काइव http://videha-audio.blogspot.com/ १७. विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका वीडियो आर्काइव http://videha-video.blogspot.com/ १८. विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका मिथिला चित्रकला, आधुनिक कला आ चित्रकला http://videha-paintings-photos.blogspot.com/ १९. मैथिल आर मिथिला (मैथिलीक सभसँ लोकप्रिय जालवृत्त) http://maithilaurmithila.blogspot.com/ २०.श्रुति प्रकाशन http://www.shruti-publication.com/ २१.http://groups.google.com/group/videha VIDEHA केर सदस्यता लिअ Top of Form Bottom of Form ईमेल : एहि समूहपर जाऊ २२.http://groups.yahoo.com/group/VIDEHA/ Top of Form Subscribe to VIDEHA Powered by us.groups.yahoo.com Bottom of Form २३.गजेन्द्र ठाकुर इडेक्स http://gajendrathakur123.blogspot.com २४.विदेह रेडियो:मैथिली कथा-कविता आदिक पहिल पोडकास्ट साइट http://videha123radio.wordpress.com/ २५. नेना भुटका http://mangan-khabas.blogspot.com/ महत्त्वपूर्ण सूचना:(१) 'विदेह' द्वारा धारावाहिक रूपे ई-प्रकाशित कएल गेल गजेन्द्र ठाकुरक निबन्ध-प्रबन्ध-समीक्षा, उपन्यास (सहस्रबाढ़नि) , पद्य-संग्रह (सहस्राब्दीक चौपड़पर), कथा-गल्प (गल्प-गुच्छ), नाटक(संकर्षण), महाकाव्य (त्वञ्चाहञ्च आ असञ्जाति मन) आ बाल-किशोर साहित्य विदेहमे संपूर्ण ई-प्रकाशनक बाद प्रिंट फॉर्ममे। कुरुक्षेत्रम्–अन्तर्मनक खण्ड-१ सँ ७ Combined ISBN No.978-81-907729-7-6 विवरण एहि पृष्ठपर नीचाँमे आ प्रकाशकक साइट http://www.shruti-publication.com/ पर । महत्त्वपूर्ण सूचना (२):सूचना: विदेहक मैथिली-अंग्रेजी आ अंग्रेजी मैथिली कोष (इंटरनेटपर पहिल बेर सर्च-डिक्शनरी) एम.एस. एस.क्यू.एल. सर्वर आधारित -Based on ms-sql server Maithili-English and English-Maithili Dictionary. विदेहक भाषापाक- रचनालेखन स्तंभमे। कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक- गजेन्द्र ठाकुर गजेन्द्र ठाकुरक निबन्ध-प्रबन्ध-समीक्षा, उपन्यास (सहस्रबाढ़नि) , पद्य-संग्रह (सहस्राब्दीक चौपड़पर), कथा-गल्प (गल्प गुच्छ), नाटक(संकर्षण), महाकाव्य (त्वञ्चाहञ्च आ असञ्जाति मन) आ बालमंडली-किशोरजगत विदेहमे संपूर्ण ई-प्रकाशनक बाद प्रिंट फॉर्ममे। कुरुक्षेत्रम्–अन्तर्मनक, खण्ड-१ सँ ७ Ist edition 2009 of Gajendra Thakur’s KuruKshetram-Antarmanak (Vol. I to VII)- essay-paper-criticism, novel, poems, story, play, epics and Children-grown-ups literature in single binding: Language:Maithili ६९२ पृष्ठ : मूल्य भा. रु. 100/-(for individual buyers inside india) (add courier charges Rs.50/-per copy for Delhi/NCR and Rs.100/- per copy for outside Delhi)
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Details for purchase available at print-version publishers's site website: http://www.shruti-publication.com/ or you may write to e-mail:shruti.publication@shruti-publication.com विदेह: सदेह : १: २: ३: ४ तिरहुता : देवनागरी "विदेह" क, प्रिंट संस्करण :विदेह-ई-पत्रिका (http://www.videha.co.in/) क चुनल रचना सम्मिलित। विदेह:सदेह:१: २: ३: ४ सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। Details for purchase available at print-version publishers's site http://www.shruti-publication.com or you may write to shruti.publication@shruti-publication.com २. संदेश- [ विदेह ई-पत्रिका, विदेह:सदेह मिथिलाक्षर आ देवनागरी आ गजेन्द्र ठाकुरक सात खण्डक- निबन्ध-प्रबन्ध-समीक्षा,उपन्यास (सहस्रबाढ़नि) , पद्य-संग्रह (सहस्राब्दीक चौपड़पर), कथा-गल्प (गल्प गुच्छ), नाटक (संकर्षण), महाकाव्य (त्वञ्चाहञ्च आ असञ्जाति मन) आ बाल-मंडली-किशोर जगत- संग्रह कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक मादेँ। ] १.श्री गोविन्द झा- विदेहकेँ तरंगजालपर उतारि विश्वभरिमे मातृभाषा मैथिलीक लहरि जगाओल, खेद जे अपनेक एहि महाभियानमे हम एखन धरि संग नहि दए सकलहुँ। सुनैत छी अपनेकेँ सुझाओ आ रचनात्मक आलोचना प्रिय लगैत अछि तेँ किछु लिखक मोन भेल। हमर सहायता आ सहयोग अपनेकेँ सदा उपलब्ध रहत। २.श्री रमानन्द रेणु- मैथिलीमे ई-पत्रिका पाक्षिक रूपेँ चला कऽ जे अपन मातृभाषाक प्रचार कऽ रहल छी, से धन्यवाद । आगाँ अपनेक समस्त मैथिलीक कार्यक हेतु हम हृदयसँ शुभकामना दऽ रहल छी। ३.श्री विद्यानाथ झा "विदित"- संचार आ प्रौद्योगिकीक एहि प्रतिस्पर्धी ग्लोबल युगमे अपन महिमामय "विदेह"केँ अपना देहमे प्रकट देखि जतबा प्रसन्नता आ संतोष भेल, तकरा कोनो उपलब्ध "मीटर"सँ नहि नापल जा सकैछ? ..एकर ऐतिहासिक मूल्यांकन आ सांस्कृतिक प्रतिफलन एहि शताब्दीक अंत धरि लोकक नजरिमे आश्चर्यजनक रूपसँ प्रकट हैत। ४. प्रो. उदय नारायण सिंह "नचिकेता"- जे काज अहाँ कए रहल छी तकर चरचा एक दिन मैथिली भाषाक इतिहासमे होएत। आनन्द भए रहल अछि, ई जानि कए जे एतेक गोट मैथिल "विदेह" ई जर्नलकेँ पढ़ि रहल छथि।...विदेहक चालीसम अंक पुरबाक लेल अभिनन्दन। ५. डॉ. गंगेश गुंजन- एहि विदेह-कर्ममे लागि रहल अहाँक सम्वेदनशील मन, मैथिलीक प्रति समर्पित मेहनतिक अमृत रंग, इतिहास मे एक टा विशिष्ट फराक अध्याय आरंभ करत, हमरा विश्वास अछि। अशेष शुभकामना आ बधाइक सङ्ग, सस्नेह...अहाँक पोथी कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक प्रथम दृष्टया बहुत भव्य तथा उपयोगी बुझाइछ। मैथिलीमे तँ अपना स्वरूपक प्रायः ई पहिले एहन भव्य अवतारक पोथी थिक। हर्षपूर्ण हमर हार्दिक बधाई स्वीकार करी। ६. श्री रामाश्रय झा "रामरंग"(आब स्वर्गीय)- "अपना" मिथिलासँ संबंधित...विषय वस्तुसँ अवगत भेलहुँ।...शेष सभ कुशल अछि। ७. श्री ब्रजेन्द्र त्रिपाठी- साहित्य अकादमी- इंटरनेट पर प्रथम मैथिली पाक्षिक पत्रिका "विदेह" केर लेल बधाई आ शुभकामना स्वीकार करू। ८. श्री प्रफुल्लकुमार सिंह "मौन"- प्रथम मैथिली पाक्षिक पत्रिका "विदेह" क प्रकाशनक समाचार जानि कनेक चकित मुदा बेसी आह्लादित भेलहुँ। कालचक्रकेँ पकड़ि जाहि दूरदृष्टिक परिचय देलहुँ, ओहि लेल हमर मंगलकामना। ९.डॉ. शिवप्रसाद यादव- ई जानि अपार हर्ष भए रहल अछि, जे नव सूचना-क्रान्तिक क्षेत्रमे मैथिली पत्रकारिताकेँ प्रवेश दिअएबाक साहसिक कदम उठाओल अछि। पत्रकारितामे एहि प्रकारक नव प्रयोगक हम स्वागत करैत छी, संगहि "विदेह"क सफलताक शुभकामना। १०. श्री आद्याचरण झा- कोनो पत्र-पत्रिकाक प्रकाशन- ताहूमे मैथिली पत्रिकाक प्रकाशनमे के कतेक सहयोग करताह- ई तऽ भविष्य कहत। ई हमर ८८ वर्षमे ७५ वर्षक अनुभव रहल। एतेक पैघ महान यज्ञमे हमर श्रद्धापूर्ण आहुति प्राप्त होयत- यावत ठीक-ठाक छी/ रहब। ११. श्री विजय ठाकुर- मिशिगन विश्वविद्यालय- "विदेह" पत्रिकाक अंक देखलहुँ, सम्पूर्ण टीम बधाईक पात्र अछि। पत्रिकाक मंगल भविष्य हेतु हमर शुभकामना स्वीकार कएल जाओ। १२. श्री सुभाषचन्द्र यादव- ई-पत्रिका "विदेह" क बारेमे जानि प्रसन्नता भेल। ’विदेह’ निरन्तर पल्लवित-पुष्पित हो आ चतुर्दिक अपन सुगंध पसारय से कामना अछि। १३. श्री मैथिलीपुत्र प्रदीप- ई-पत्रिका "विदेह" केर सफलताक भगवतीसँ कामना। हमर पूर्ण सहयोग रहत। १४. डॉ. श्री भीमनाथ झा- "विदेह" इन्टरनेट पर अछि तेँ "विदेह" नाम उचित आर कतेक रूपेँ एकर विवरण भए सकैत अछि। आइ-काल्हि मोनमे उद्वेग रहैत अछि, मुदा शीघ्र पूर्ण सहयोग देब।कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक देखि अति प्रसन्नता भेल। मैथिलीक लेल ई घटना छी। १५. श्री रामभरोस कापड़ि "भ्रमर"- जनकपुरधाम- "विदेह" ऑनलाइन देखि रहल छी। मैथिलीकेँ अन्तर्राष्ट्रीय जगतमे पहुँचेलहुँ तकरा लेल हार्दिक बधाई। मिथिला रत्न सभक संकलन अपूर्व। नेपालोक सहयोग भेटत, से विश्वास करी। १६. श्री राजनन्दन लालदास- "विदेह" ई-पत्रिकाक माध्यमसँ बड़ नीक काज कए रहल छी, नातिक अहिठाम देखलहुँ। एकर वार्षिक अंक जखन प्रिंट निकालब तँ हमरा पठायब। कलकत्तामे बहुत गोटेकेँ हम साइटक पता लिखाए देने छियन्हि। मोन तँ होइत अछि जे दिल्ली आबि कए आशीर्वाद दैतहुँ, मुदा उमर आब बेशी भए गेल। शुभकामना देश-विदेशक मैथिलकेँ जोड़बाक लेल।.. उत्कृष्ट प्रकाशन कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक लेल बधाइ। अद्भुत काज कएल अछि, नीक प्रस्तुति अछि सात खण्डमे। मुदा अहाँक सेवा आ से निःस्वार्थ तखन बूझल जाइत जँ अहाँ द्वारा प्रकाशित पोथी सभपर दाम लिखल नहि रहितैक। ओहिना सभकेँ विलहि देल जइतैक। (स्पष्टीकरण- श्रीमान्, अहाँक सूचनार्थ विदेह द्वारा ई-प्रकाशित कएल सभटा सामग्री आर्काइवमे https://sites.google.com/a/videha.com/videha-pothi/ पर बिना मूल्यक डाउनलोड लेल उपलब्ध छै आ भविष्यमे सेहो रहतैक। एहि आर्काइवकेँ जे कियो प्रकाशक अनुमति लऽ कऽ प्रिंट रूपमे प्रकाशित कएने छथि आ तकर ओ दाम रखने छथि ताहिपर हमर कोनो नियंत्रण नहि अछि।- गजेन्द्र ठाकुर)... अहाँक प्रति अशेष शुभकामनाक संग। १७. डॉ. प्रेमशंकर सिंह- अहाँ मैथिलीमे इंटरनेटपर पहिल पत्रिका "विदेह" प्रकाशित कए अपन अद्भुत मातृभाषानुरागक परिचय देल अछि, अहाँक निःस्वार्थ मातृभाषानुरागसँ प्रेरित छी, एकर निमित्त जे हमर सेवाक प्रयोजन हो, तँ सूचित करी। इंटरनेटपर आद्योपांत पत्रिका देखल, मन प्रफुल्लित भऽ गेल। १८.श्रीमती शेफालिका वर्मा- विदेह ई-पत्रिका देखि मोन उल्लाससँ भरि गेल। विज्ञान कतेक प्रगति कऽ रहल अछि...अहाँ सभ अनन्त आकाशकेँ भेदि दियौ, समस्त विस्तारक रहस्यकेँ तार-तार कऽ दियौक...। अपनेक अद्भुत पुस्तक कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक विषयवस्तुक दृष्टिसँ गागरमे सागर अछि। बधाई। १९.श्री हेतुकर झा, पटना-जाहि समर्पण भावसँ अपने मिथिला-मैथिलीक सेवामे तत्पर छी से स्तुत्य अछि। देशक राजधानीसँ भय रहल मैथिलीक शंखनाद मिथिलाक गाम-गाममे मैथिली चेतनाक विकास अवश्य करत। २०. श्री योगानन्द झा, कबिलपुर, लहेरियासराय- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पोथीकेँ निकटसँ देखबाक अवसर भेटल अछि आ मैथिली जगतक एकटा उद्भट ओ समसामयिक दृष्टिसम्पन्न हस्ताक्षरक कलमबन्द परिचयसँ आह्लादित छी। "विदेह"क देवनागरी सँस्करण पटनामे रु. 80/- मे उपलब्ध भऽ सकल जे विभिन्न लेखक लोकनिक छायाचित्र, परिचय पत्रक ओ रचनावलीक सम्यक प्रकाशनसँ ऐतिहासिक कहल जा सकैछ। २१. श्री किशोरीकान्त मिश्र- कोलकाता- जय मैथिली, विदेहमे बहुत रास कविता, कथा, रिपोर्ट आदिक सचित्र संग्रह देखि आ आर अधिक प्रसन्नता मिथिलाक्षर देखि- बधाई स्वीकार कएल जाओ। २२.श्री जीवकान्त- विदेहक मुद्रित अंक पढ़ल- अद्भुत मेहनति। चाबस-चाबस। किछु समालोचना मरखाह..मुदा सत्य। २३. श्री भालचन्द्र झा- अपनेक कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक देखि बुझाएल जेना हम अपने छपलहुँ अछि। एकर विशालकाय आकृति अपनेक सर्वसमावेशताक परिचायक अछि। अपनेक रचना सामर्थ्यमे उत्तरोत्तर वृद्धि हो, एहि शुभकामनाक संग हार्दिक बधाई। २४.श्रीमती डॉ नीता झा- अहाँक कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़लहुँ। ज्योतिरीश्वर शब्दावली, कृषि मत्स्य शब्दावली आ सीत बसन्त आ सभ कथा, कविता, उपन्यास, बाल-किशोर साहित्य सभ उत्तम छल। मैथिलीक उत्तरोत्तर विकासक लक्ष्य दृष्टिगोचर होइत अछि। २५.श्री मायानन्द मिश्र- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक मे हमर उपन्यास स्त्रीधनक जे विरोध कएल गेल अछि तकर हम विरोध करैत छी।... कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पोथीक लेल शुभकामना।(श्रीमान् समालोचनाकेँ विरोधक रूपमे नहि लेल जाए।-गजेन्द्र ठाकुर) २६.श्री महेन्द्र हजारी- सम्पादक श्रीमिथिला- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़ि मोन हर्षित भऽ गेल..एखन पूरा पढ़यमे बहुत समय लागत, मुदा जतेक पढ़लहुँ से आह्लादित कएलक। २७.श्री केदारनाथ चौधरी- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक अद्भुत लागल, मैथिली साहित्य लेल ई पोथी एकटा प्रतिमान बनत। २८.श्री सत्यानन्द पाठक- विदेहक हम नियमित पाठक छी। ओकर स्वरूपक प्रशंसक छलहुँ। एम्हर अहाँक लिखल - कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक देखलहुँ। मोन आह्लादित भऽ उठल। कोनो रचना तरा-उपरी। २९.श्रीमती रमा झा-सम्पादक मिथिला दर्पण। कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक प्रिंट फॉर्म पढ़ि आ एकर गुणवत्ता देखि मोन प्रसन्न भऽ गेल, अद्भुत शब्द एकरा लेल प्रयुक्त कऽ रहल छी। विदेहक उत्तरोत्तर प्रगतिक शुभकामना। ३०.श्री नरेन्द्र झा, पटना- विदेह नियमित देखैत रहैत छी। मैथिली लेल अद्भुत काज कऽ रहल छी। ३१.श्री रामलोचन ठाकुर- कोलकाता- मिथिलाक्षर विदेह देखि मोन प्रसन्नतासँ भरि उठल, अंकक विशाल परिदृश्य आस्वस्तकारी अछि। ३२.श्री तारानन्द वियोगी- विदेह आ कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक देखि चकबिदोर लागि गेल। आश्चर्य। शुभकामना आ बधाई। ३३.श्रीमती प्रेमलता मिश्र “प्रेम”- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़लहुँ। सभ रचना उच्चकोटिक लागल। बधाई। ३४.श्री कीर्तिनारायण मिश्र- बेगूसराय- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक बड्ड नीक लागल, आगांक सभ काज लेल बधाई। ३५.श्री महाप्रकाश-सहरसा- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक नीक लागल, विशालकाय संगहि उत्तमकोटिक। ३६.श्री अग्निपुष्प- मिथिलाक्षर आ देवाक्षर विदेह पढ़ल..ई प्रथम तँ अछि एकरा प्रशंसामे मुदा हम एकरा दुस्साहसिक कहब। मिथिला चित्रकलाक स्तम्भकेँ मुदा अगिला अंकमे आर विस्तृत बनाऊ। ३७.श्री मंजर सुलेमान-दरभंगा- विदेहक जतेक प्रशंसा कएल जाए कम होएत। सभ चीज उत्तम। ३८.श्रीमती प्रोफेसर वीणा ठाकुर- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक उत्तम, पठनीय, विचारनीय। जे क्यो देखैत छथि पोथी प्राप्त करबाक उपाय पुछैत छथि। शुभकामना। ३९.श्री छत्रानन्द सिंह झा- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़लहुँ, बड्ड नीक सभ तरहेँ। ४०.श्री ताराकान्त झा- सम्पादक मैथिली दैनिक मिथिला समाद- विदेह तँ कन्टेन्ट प्रोवाइडरक काज कऽ रहल अछि। कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक अद्भुत लागल। ४१.डॉ रवीन्द्र कुमार चौधरी- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक बहुत नीक, बहुत मेहनतिक परिणाम। बधाई। ४२.श्री अमरनाथ- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक आ विदेह दुनू स्मरणीय घटना अछि, मैथिली साहित्य मध्य। ४३.श्री पंचानन मिश्र- विदेहक वैविध्य आ निरन्तरता प्रभावित करैत अछि, शुभकामना। ४४.श्री केदार कानन- कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक लेल अनेक धन्यवाद, शुभकामना आ बधाइ स्वीकार करी। आ नचिकेताक भूमिका पढ़लहुँ। शुरूमे तँ लागल जेना कोनो उपन्यास अहाँ द्वारा सृजित भेल अछि मुदा पोथी उनटौला पर ज्ञात भेल जे एहिमे तँ सभ विधा समाहित अछि। ४५.श्री धनाकर ठाकुर- अहाँ नीक काज कऽ रहल छी। फोटो गैलरीमे चित्र एहि शताब्दीक जन्मतिथिक अनुसार रहैत तऽ नीक। ४६.श्री आशीष झा- अहाँक पुस्तकक संबंधमे एतबा लिखबा सँ अपना कए नहि रोकि सकलहुँ जे ई किताब मात्र किताब नहि थीक, ई एकटा उम्मीद छी जे मैथिली अहाँ सन पुत्रक सेवा सँ निरंतर समृद्ध होइत चिरजीवन कए प्राप्त करत। ४७.श्री शम्भु कुमार सिंह- विदेहक तत्परता आ क्रियाशीलता देखि आह्लादित भऽ रहल छी। निश्चितरूपेण कहल जा सकैछ जे समकालीन मैथिली पत्रिकाक इतिहासमे विदेहक नाम स्वर्णाक्षरमे लिखल जाएत। ओहि कुरुक्षेत्रक घटना सभ तँ अठारहे दिनमे खतम भऽ गेल रहए मुदा अहाँक कुरुक्षेत्रम् तँ अशेष अछि। ४८.डॉ. अजीत मिश्र- अपनेक प्रयासक कतबो प्रशंसा कएल जाए कमे होएतैक। मैथिली साहित्यमे अहाँ द्वारा कएल गेल काज युग-युगान्तर धरि पूजनीय रहत। ४९.श्री बीरेन्द्र मल्लिक- अहाँक कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक आ विदेह:सदेह पढ़ि अति प्रसन्नता भेल। अहाँक स्वास्थ्य ठीक रहए आ उत्साह बनल रहए से कामना। ५०.श्री कुमार राधारमण- अहाँक दिशा-निर्देशमे विदेह पहिल मैथिली ई-जर्नल देखि अति प्रसन्नता भेल। हमर शुभकामना। ५१.श्री फूलचन्द्र झा प्रवीण-विदेह:सदेह पढ़ने रही मुदा कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक देखि बढ़ाई देबा लेल बाध्य भऽ गेलहुँ। आब विश्वास भऽ गेल जे मैथिली नहि मरत। अशेष शुभकामना। ५२.श्री विभूति आनन्द- विदेह:सदेह देखि, ओकर विस्तार देखि अति प्रसन्नता भेल। ५३.श्री मानेश्वर मनुज-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक एकर भव्यता देखि अति प्रसन्नता भेल, एतेक विशाल ग्रन्थ मैथिलीमे आइ धरि नहि देखने रही। एहिना भविष्यमे काज करैत रही, शुभकामना। ५४.श्री विद्यानन्द झा- आइ.आइ.एम.कोलकाता- कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक विस्तार, छपाईक संग गुणवत्ता देखि अति प्रसन्नता भेल। अहाँक अनेक धन्यवाद; कतेक बरखसँ हम नेयारैत छलहुँ जे सभ पैघ शहरमे मैथिली लाइब्रेरीक स्थापना होअए, अहाँ ओकरा वेबपर कऽ रहल छी, अनेक धन्यवाद। ५५.श्री अरविन्द ठाकुर-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक मैथिली साहित्यमे कएल गेल एहि तरहक पहिल प्रयोग अछि, शुभकामना। ५६.श्री कुमार पवन-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक पढ़ि रहल छी। किछु लघुकथा पढ़ल अछि, बहुत मार्मिक छल। ५७. श्री प्रदीप बिहारी-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक देखल, बधाई। ५८.डॉ मणिकान्त ठाकुर-कैलिफोर्निया- अपन विलक्षण नियमित सेवासँ हमरा लोकनिक हृदयमे विदेह सदेह भऽ गेल अछि। ५९.श्री धीरेन्द्र प्रेमर्षि- अहाँक समस्त प्रयास सराहनीय। दुख होइत अछि जखन अहाँक प्रयासमे अपेक्षित सहयोग नहि कऽ पबैत छी। ६०.श्री देवशंकर नवीन- विदेहक निरन्तरता आ विशाल स्वरूप- विशाल पाठक वर्ग, एकरा ऐतिहासिक बनबैत अछि। ६१.श्री मोहन भारद्वाज- अहाँक समस्त कार्य देखल, बहुत नीक। एखन किछु परेशानीमे छी, मुदा शीघ्र सहयोग देब। ६२.श्री फजलुर रहमान हाशमी-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक मे एतेक मेहनतक लेल अहाँ साधुवादक अधिकारी छी। ६३.श्री लक्ष्मण झा "सागर"- मैथिलीमे चमत्कारिक रूपेँ अहाँक प्रवेश आह्लादकारी अछि।..अहाँकेँ एखन आर..दूर..बहुत दूरधरि जेबाक अछि। स्वस्थ आ प्रसन्न रही। ६४.श्री जगदीश प्रसाद मंडल-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक पढ़लहुँ । कथा सभ आ उपन्यास सहस्रबाढ़नि पूर्णरूपेँ पढ़ि गेल छी। गाम-घरक भौगोलिक विवरणक जे सूक्ष्म वर्णन सहस्रबाढ़निमे अछि, से चकित कएलक, एहि संग्रहक कथा-उपन्यास मैथिली लेखनमे विविधता अनलक अछि। समालोचना शास्त्रमे अहाँक दृष्टि वैयक्तिक नहि वरन् सामाजिक आ कल्याणकारी अछि, से प्रशंसनीय। ६५.श्री अशोक झा-अध्यक्ष मिथिला विकास परिषद- कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक लेल बधाई आ आगाँ लेल शुभकामना। ६६.श्री ठाकुर प्रसाद मुर्मु- अद्भुत प्रयास। धन्यवादक संग प्रार्थना जे अपन माटि-पानिकेँ ध्यानमे राखि अंकक समायोजन कएल जाए। नव अंक धरि प्रयास सराहनीय। विदेहकेँ बहुत-बहुत धन्यवाद जे एहेन सुन्दर-सुन्दर सचार (आलेख) लगा रहल छथि। सभटा ग्रहणीय- पठनीय। ६७.बुद्धिनाथ मिश्र- प्रिय गजेन्द्र जी,अहाँक सम्पादन मे प्रकाशित ‘विदेह’आ ‘कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक’ विलक्षण पत्रिका आ विलक्षण पोथी! की नहि अछि अहाँक सम्पादनमे? एहि प्रयत्न सँ मैथिली क विकास होयत,निस्संदेह। ६८.श्री बृखेश चन्द्र लाल- गजेन्द्रजी, अपनेक पुस्तक कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़ि मोन गदगद भय गेल , हृदयसँ अनुगृहित छी । हार्दिक शुभकामना । ६९.श्री परमेश्वर कापड़ि - श्री गजेन्द्र जी । कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़ि गदगद आ नेहाल भेलहुँ। ७०.श्री रवीन्द्रनाथ ठाकुर- विदेह पढ़ैत रहैत छी। धीरेन्द्र प्रेमर्षिक मैथिली गजलपर आलेख पढ़लहुँ। मैथिली गजल कत्तऽ सँ कत्तऽ चलि गेलैक आ ओ अपन आलेखमे मात्र अपन जानल-पहिचानल लोकक चर्च कएने छथि। जेना मैथिलीमे मठक परम्परा रहल अछि। (स्पष्टीकरण- श्रीमान्, प्रेमर्षि जी ओहि आलेखमे ई स्पष्ट लिखने छथि जे किनको नाम जे छुटि गेल छन्हि तँ से मात्र आलेखक लेखकक जानकारी नहि रहबाक द्वारे, एहिमे आन कोनो कारण नहि देखल जाय। अहाँसँ एहि विषयपर विस्तृत आलेख सादर आमंत्रित अछि।-सम्पादक) ७१.श्री मंत्रेश्वर झा- विदेह पढ़ल आ संगहि अहाँक मैगनम ओपस कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक सेहो, अति उत्तम। मैथिलीक लेल कएल जा रहल अहाँक समस्त कार्य अतुलनीय अछि। ७२. श्री हरेकृष्ण झा- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक मैथिलीमे अपन तरहक एकमात्र ग्रन्थ अछि, एहिमे लेखकक समग्र दृष्टि आ रचना कौशल देखबामे आएल जे लेखकक फील्डवर्कसँ जुड़ल रहबाक कारणसँ अछि। ७३.श्री सुकान्त सोम- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक मे समाजक इतिहास आ वर्तमानसँ अहाँक जुड़ाव बड्ड नीक लागल, अहाँ एहि क्षेत्रमे आर आगाँ काज करब से आशा अछि। ७४.प्रोफेसर मदन मिश्र- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक सन किताब मैथिलीमे पहिले अछि आ एतेक विशाल संग्रहपर शोध कएल जा सकैत अछि। भविष्यक लेल शुभकामना। ७५.प्रोफेसर कमला चौधरी- मैथिलीमे कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक सन पोथी आबए जे गुण आ रूप दुनूमे निस्सन होअए, से बहुत दिनसँ आकांक्षा छल, ओ आब जा कऽ पूर्ण भेल। पोथी एक हाथसँ दोसर हाथ घुमि रहल अछि, एहिना आगाँ सेहो अहाँसँ आशा अछि। ७६.श्री उदय चन्द्र झा "विनोद": गजेन्द्रजी, अहाँ जतेक काज कएलहुँ अछि से मैथिलीमे आइ धरि कियो नहि कएने छल। शुभकामना। अहाँकेँ एखन बहुत काज आर करबाक अछि। ७७.श्री कृष्ण कुमार कश्यप: गजेन्द्र ठाकुरजी, अहाँसँ भेँट एकटा स्मरणीय क्षण बनि गेल। अहाँ जतेक काज एहि बएसमे कऽ गेल छी ताहिसँ हजार गुणा आर बेशीक आशा अछि। ७८.श्री मणिकान्त दास: अहाँक मैथिलीक कार्यक प्रशंसा लेल शब्द नहि भेटैत अछि। अहाँक कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक सम्पूर्ण रूपेँ पढ़ि गेलहुँ। त्वञ्चाहञ्च बड्ड नीक लागल। ७९. श्री हीरेन्द्र कुमार झा- विदेह ई-पत्रिकाक सभ अंक ई-पत्रसँ भेटैत रहैत अछि। मैथिलीक ई-पत्रिका छैक एहि बातक गर्व होइत अछि। अहाँ आ अहाँक सभ सहयोगीकेँ हार्दिक शुभकामना। विदेह मैथिली साहित्य आन्दोलन (c)२००४-११. सर्वाधिकार लेखकाधीन आ जतय लेखकक नाम नहि अछि ततय संपादकाधीन। विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। सह-सम्पादक: उमेश मंडल। सहायक सम्पादक: शिव कुमार झा आ मुन्नाजी (मनोज कुमार कर्ण)। भाषा-सम्पादन: नागेन्द्र कुमार झा आ पञ्जीकार विद्यानन्द झा। कला-सम्पादन: ज्योति सुनीत चौधरी आ रश्मि रेखा सिन्हा। सम्पादक-शोध-अन्वेषण: डॉ. जया वर्मा आ डॉ. राजीव कुमार वर्मा। रचनाकार अपन मौलिक आ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि) ggajendra@videha.com केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx, .rtf वा .txt फॉर्मेटमे पठा सकैत छथि। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेताह, से आशा करैत छी। रचनाक अंतमे टाइप रहय, जे ई रचना मौलिक अछि, आ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। मेल प्राप्त होयबाक बाद यथासंभव शीघ्र ( सात दिनक भीतर) एकर प्रकाशनक अंकक सूचना देल जायत। ’विदेह' प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका अछि आ एहिमे मैथिली, संस्कृत आ अंग्रेजीमे मिथिला आ मैथिलीसँ संबंधित रचना प्रकाशित कएल जाइत अछि। एहि ई पत्रिकाकेँ श्रीमति लक्ष्मी ठाकुर द्वारा मासक ०१ आ १५ तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि। (c) 2004-11 सर्वाधिकार सुरक्षित। विदेहमे प्रकाशित सभटा रचना आ आर्काइवक सर्वाधिकार रचनाकार आ संग्रहकर्त्ताक लगमे छन्हि। रचनाक अनुवाद आ पुनः प्रकाशन किंवा आर्काइवक उपयोगक अधिकार किनबाक हेतु ggajendra@videha.co.in पर संपर्क करू। एहि साइटकेँ प्रीति झा ठाकुर, मधूलिका चौधरी आ रश्मि प्रिया द्वारा डिजाइन कएल गेल। सिद्धिरस्तु वि दे ह विदेह Videha বিদেহ विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका Videha Ist Maithili Fortnightly e Magazine विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका 'विदेह' ८३ म अंक ०१ जून २०११ (वर्ष ४ मास ४२ अंक ८३)http://www.videha.co.in/ मानुषीमिह संस्कृताम् ISSN 2229-547X VIDEHA वि दे ह विदेह Videha বিদেহ विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका Videha Ist Maithili Fortnightly e Magazine विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका 'विदेह' ८३ म अंक ०१ जून २०११ (वर्ष ४ मास ४२ अंक ८३)http://www.videha.co.in/ मानुषीमिह संस्कृताम् ISSN 2229-547X VIDEHA
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