VIDEHA — Issue 84 / अंक ८४

Publication: VIDEHA · Issue: 84
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306 307 ISSN 2229-547X VIDEHA 'विदेह' ८४ म अंक १५ जून २०११ (वर्ष ४ मास ४२ अंक ८४) वि  दे  ह विदेह Videha বিদেহ http://www.videha.co.in  विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका Videha Ist Maithili Fortnightly e Magazine   नव अंक देखबाक लेल पृष्ठ सभकेँ रिफ्रेश कए देखू। Always refresh the pages for viewing new issue of VIDEHA. Read in your own script Roman(Eng)Gujarati Bangla Oriya Gurmukhi Telugu Tamil Kannada Malayalam Hindi ऐ अंकमे अछि:- १. संपादकीय संदेश २. गद्य २.१.मीना झा-कथा-ब्रेस्ट कैंसर २.२.मनोज झा मुक्ति- जनगणनामे मातृभाषा २.३.शि‍वकुमार झा टि‍ल्‍लू -कलानिधि २.४.जगदीश प्रसाद मण्‍डल- नाटक २.५.बिपिन झा- एकटा प्रश्न मीडिया सँ २.६.जगदीश प्रसाद मण्‍डल- कथा २.७. डॉ.  शेफालिका वर्मा- संस्मरण- उड़ीसा-१९८५ २.८.गजेन्द्र ठाकुर- स॒हस्र॑ शीर्षा॒ ३. पद्य ३.१.सत्‍येन्‍द्र कुमार झा- पाँच गोट लघु कवि‍ता ३.२.रामदेव प्रसाद मण्‍डल ‘झारूदार’- चारि‍ गोट गीत ३.३.किशन कारीगर- सेहन्ता ३.४.रामविलास साहु- पाँचटा टनका ३.५.नवीन कुमार आशा ३.६.मनोज कुमार झा-शासक लोकनिसँ (बाढ़िक सन्दर्भमे) ४. मिथिला कला-संगीत- १..ज्योति सुनीत चौधरी २.श्वेता झा (सिंगापुर) ३.गुंजन कर्ण ४.  प्रवीण कुमार ठाकुर . भाषापाक रचना-लेखन -[मानक मैथिली], [विदेहक मैथिली-अंग्रेजी आ अंग्रेजी मैथिली कोष (इंटरनेटपर पहिल बेर सर्च-डिक्शनरी) एम.एस. एस.क्यू.एल. सर्वर आधारित -Based on ms-sql server Maithili-English and English-Maithili Dictionary.] 8.VIDEHA FOR NON RESIDENTS विदेह ई-पत्रिकाक सभटा पुरान अंक ( ब्रेल, तिरहुता आ देवनागरी मे ) पी.डी.एफ. डाउनलोडक लेल नीचाँक लिंकपर उपलब्ध अछि। All the old issues of Videha e journal ( in Braille, Tirhuta and Devanagari versions ) are available for pdf download at the following link. विदेह ई-पत्रिकाक सभटा पुरान अंक ब्रेल, तिरहुता आ देवनागरी रूपमे Videha e journal's all old issues in Braille Tirhuta and Devanagari versions विदेह ई-पत्रिकाक पहिल ५० अंक

विदेह ई-पत्रिकाक ५०म सँ आगाँक अंक विदेह आर.एस.एस.फीड। "विदेह" ई-पत्रिका ई-पत्रसँ प्राप्त करू। अपन मित्रकेँ विदेहक विषयमे सूचित करू। ↑ विदेह आर.एस.एस.फीड एनीमेटरकेँ अपन साइट/ ब्लॉगपर लगाऊ। ब्लॉग "लेआउट" पर "एड गाडजेट" मे "फीड" सेलेक्ट कए "फीड यू.आर.एल." मे http://www.videha.co.in/index.xml टाइप केलासँ सेहो विदेह फीड प्राप्त कए सकैत छी। गूगल रीडरमे पढ़बा लेल http://reader.google.com/ पर जा कऽ Add a  Subscription बटन क्लिक करू आ खाली स्थानमे http://www.videha.co.in/index.xml पेस्ट करू आ Add  बटन दबाउ। Join official Videha facebook group. Join Videha googlegroups मैथिली देवनागरी वा मिथिलाक्षरमे नहि देखि/ लिखि पाबि रहल छी, (cannot see/write Maithili in Devanagari/ Mithilakshara follow links below or contact at ggajendra@videha.com) तँ एहि हेतु नीचाँक लिंक सभ पर जाऊ। संगहि विदेहक स्तंभ मैथिली भाषापाक/ रचना लेखनक नव-पुरान अंक पढ़ू। http://devanaagarii.net/ http://kaulonline.com/uninagari/  (एतए बॉक्समे ऑनलाइन देवनागरी टाइप करू, बॉक्ससँ कॉपी करू आ वर्ड डॉक्युमेन्टमे पेस्ट कए वर्ड फाइलकेँ सेव करू। विशेष जानकारीक लेल ggajendra@videha.com पर सम्पर्क करू।)(Use Firefox 4.0 (from WWW.MOZILLA.COM )/ Opera/ Safari/ Internet Explorer 8.0/ Flock 2.0/ Google Chrome for best view of 'Videha' Maithili e-journal at http://www.videha.co.in/ .) Go to the link below for download of old issues of VIDEHA Maithili e magazine in .pdf format and Maithili Audio/ Video/ Book/ paintings/ photo files. विदेहक पुरान अंक आ ऑडियो/ वीडियो/ पोथी/ चित्रकला/ फोटो सभक फाइल सभ (उच्चारण, बड़ सुख सार आ दूर्वाक्षत मंत्र सहित) डाउनलोड करबाक हेतु नीचाँक लिंक पर जाऊ। VIDEHA ARCHIVE विदेह आर्काइव भारतीय डाक विभाग द्वारा जारी कवि, नाटककार आ धर्मशास्त्री विद्यापतिक स्टाम्प। भारत आ नेपालक माटिमे पसरल मिथिलाक धरती प्राचीन कालहिसँ महान पुरुष ओ महिला लोकनिक कर्मभमि रहल अछि। मिथिलाक महान पुरुष ओ महिला लोकनिक चित्र 'मिथिला रत्न' मे देखू। गौरी-शंकरक पालवंश कालक मूर्त्ति, एहिमे मिथिलाक्षरमे (१२०० वर्ष पूर्वक) अभिलेख अंकित अछि। मिथिलाक भारत आ नेपालक माटिमे पसरल एहि तरहक अन्यान्य प्राचीन आ नव स्थापत्य, चित्र, अभिलेख आ मूर्त्तिकलाक़ हेतु देखू 'मिथिलाक खोज' मिथिला, मैथिल आ मैथिलीसँ सम्बन्धित सूचना, सम्पर्क, अन्वेषण संगहि विदेहक सर्च-इंजन आ न्यूज सर्विस आ मिथिला, मैथिल आ मैथिलीसँ सम्बन्धित वेबसाइट सभक समग्र संकलनक लेल देखू "विदेह सूचना संपर्क अन्वेषण" विदेह जालवृत्तक डिसकसन फोरमपर जाऊ। "मैथिल आर मिथिला" (मैथिलीक सभसँ लोकप्रिय जालवृत्त) पर जाऊ। Thank you, we have already counted your vote. संग समय के (कविता संग्रह)- महाप्रकाश 2.72%  (44 votes) भाग रौ बलचंदा (दू नाटक)-विभारानी 2.35%  (38 votes) बनैत बिगड़ैत (कथा संग्रह)-सुभाष चन्द्र यादव 15.66%  (253 votes) मैथिली लोकनाट्यक विस्तृत अध्ययन एवं विश्लेषण (शास्त्र) -महेन्द्र मलंगिया 2.23%  (36 votes) किस्त किस्त जीवन (आत्मकथा )-शेफालिका वर्मा 18.94%  (306 votes) नो एंट्री मा प्रविश (नाटक )- उदय नारायण सिंह "नचिकेता" 16.65%  (269 votes) गामक जिनगी (कथा संग्रह)-जगदीश प्रसाद मंडल 21.1%  (341 votes) कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक (विविधा)-गजेन्द्र ठाकुर 20.17%  (326 votes) Other: 0.19%  (3 votes) Total Votes: 1,616 Comments (0)Return To PollShare ThisCreate Your Own Poll Thank you, we have already counted your vote. रामलोचन ठाकुर- पद्मा नदीक माझी (बांग्ला- माणिक वन्दोपाध्याय) 60.92%  (198 votes) मेनका मल्लिक- देश आ अन्य कविता सभ (रेमिका थापा- नेपाली) 22.77%  (74 votes) कृष्ण कुमार कश्यप आ शशिबाला- मैथिली गीतगोविन्द (जयदेव - संस्कृत) 14.77%  (48 votes) Other: 1.54%  (5 votes) Total Votes: 325 Comments (0)Return To PollShare ThisCreate Your Own Poll Thank you, we have already counted your vote. प्रीति ठाकुर (गोनू झा आ आन मैथिली चित्रकथा) 53.45%  (248 votes) ले.क.मायानाथ झा (जकर नारी चतुर होइ- बालकथा संग्रह) 23.92%  (111 votes) जीवकांत - खिखिरक बिअरि- कविता संग्रह) 11.21%  (52 votes) विद्यानाथ झा "विदित" (साते भवतु सुप्रीता- बाल उपन्यास) 11.42%  (53 votes) Other: 0%  (0 votes) Total Votes: 464 Comments (0)Return To PollShare ThisCreate Your Own Poll Thank you, we have already counted your vote. आनंद कुमार झा- हठात् परि‍वर्त्तन ( नाटक) 50.28%  (442 votes) विनीत उत्पल - हम पुछैत छी (कविता संग्रह ) 16.5%  (145 votes) उमेश मंडल- निश्तुकी ( कविता संग्रह) 16.84%  (148 votes) ज्योति सुनीत चौधरी- अर्चिस (कविता संग्रह ) 15.59%  (137 votes) Other: 0.8%  (7 votes) Total Votes: 879 संपादकीय १ सिद्ध सरहपाद आ तिब्बती लिपि: राधाकृष्ण चौधरीजीक पोथीक डिजाइनमे हम जखन सिद्ध सरहपादक फोटो देलौं तँ ओकर नीचाँमे लिखल तिब्बती लिपि, जे चीनी लिपिसँ एकदम्मे फराक अछि आ सिक्किमक लेपचा आ लिम्बू (सुब्बाभाषा) सँ लग, दिशि अनायास ध्यान आकृष्ट भेल। सिक्किमक राजा चोग्याल बौद्ध छलाह, ओ सभ आ हुनकर वंशज सभ सिक्किमी कहल जाइ छथि, जेना डेम्जोंगपा, ओ सभ भुटिया भाषा बजै छथि, मुदा जखन भूटान तिब्बत आदिसँ राजा लग भुटिया भाषी सभ एलाह तँ दुनूमे अन्तर देखाबए लेल सिक्किमी आ भुटिया ई दू भेद भेल। मोटा-मोटी सिक्किमक लोकसँ गप करब तँ ओ तिब्बती आदि सभ भाषा जे नेपालीक अतिरिक्त अछि, केँ भुटिया कहि दै छथि। गंगटोकमे भरत सुब्बा कहै छथि जे ओ शुद्ध नेपाली छथि आ सुब्बाभाषा (लिम्बू) लिपि छी, अपन दादाकेँ ओ पढ़ैत देखने छथि मुदा हुनका ई भाषा नै अबै छन्हि। लेपचाक मुदा भाषा आ लिपि दुनू अलग अछि। दिनेश खरका नेपाली ब्राह्मण छथि, ओ कहै छथि जे सिक्किममे नेपाली पढ़ू, भुटिया पढ़ू वा लेपचा पढ़ू, कोनो रोक नै छै। लेपचा एतुक्का आदिवासी छथि। भुटिया पढ़लासँ पर्यटन विभागमे नोकरी भेटबामे आसानी होइ छै। ओ कहै छथि जे नेपालक नेपाली आ एतुक्का नेपालीमे सेहो अन्तर छै। लड़का-लड़की हम सभ कहै छी मुदा नेपालमे लड़काकेँ बाबू आ लड़कीकेँ नानी कहल जाइत अछि। कान्छा-कान्छी घरक सभसँ छोट लड़का-लड़कीकेँ (बाबू-नानीकेँ) कहल जाइत अछि। उरगेन भुटियाक माता नेपाली छथिन्ह से हुनका भुटिया नीक जकाँ नै अबै छन्हि, ओ सिक्किममे नै रहै छथि, दार्जिलिंगमे रहै छथि जे पश्चिम बंगालमे छै, से ओतुक्का शिक्षा व्यवस्था बांग्ला आ नेपालीक अतिरिक्त दोसर भाषाक विषयमे अनुदार अछि, बिहारे सभ जेकाँ जकर शिक्षा व्यवस्था हिन्दीक अतिरिक्त दोसर भाषाक प्रति असहनशील अछि, से भुटिया भाषा एतए खतमे बुझू। सिक्किम मुदा ऐ मामिलामे उदार अछि। छिरिंग पहिने हमरा कहै छथि जे ओ भुटिया (जकरा ओ तिब्बती कहै छथि) बजै छथि, फेर उत्तर सिक्किमक लाचुंगक रस्तामे खेनाइ खाइले एकठाम ओ रुकै छथि, महिला कहै छथि जे ओ तिब्बती छथि। हुनका लग देहरादूनसँ एकटा लामा आएल छथिन्ह जे हमरा तिब्बती लिपि सिखबै छथि। लाचुंगक बगलमे छै लाचेन। आब छेरिंग याककेँ देखि कऽ असल भेद खोलै छथि। ओ कहै छथि जे भेड़पालककेँ डोंगपा कहल जाइ छै। लाचुंगक जे लोक अछि से लाचुंगपा उपाधि राखै छथि आ ओ बगलक लाचेनक छथि आ तेँ हुनकर नाम छन्हि छेरिंग लाचेनपा। सभ लाचुंगपा डोंगपा नै छथि मुदा बेसी डोंगपा लाचुंगपा उपाधिबला छथि। डेंगजोंगपा लोकनि गंगटोकमे रहै छथि, व्यापार करै छथि। टोक माने ऊँचपर, जेना एकटा जगह छै गणेश टोक। ओ कहै छथि जे भुटिया भाषासँ लाचेनपा आ लाचुंगपाक भाषा अलग होइत अछि। ओ बौद्ध छथि। लाचुंगपा आ लाचेनपा भाषामे शॉर्टकट/ लॉन्गकटक अन्तर अछि। लाचुंगसँ आगाँ जीरो धरि सड़क छै जतए गाछ-बृच्छ खतम भऽ जाइ छै आ ऑक्सीजनक कमी भऽ जाइ छै, मुदा एतए मई- आरम्भक जून मास धरि बरफ देखबामे आओत। रस्तामे आ मोनेस्टरी लग सभ ठाम तिब्बती भाषामे मंत्र लिखल “प्रेयर ह्वील” देखबामे आएत। मोनेस्टरी जेबा काल एकटा बाल भिक्षु प्रेयर ह्वील घुमेबासँ मना करै छथि आ कहै छथि जे घुरबा काल एकरा घुमाएल जाइ छै आ सेहो घड़ीक सुइयाक दिशामे। रस्ता सभमे १०८ टा झण्डामे तिब्बती भाषामे मंत्र लिखलभेटत। जँ ई सभटा उज्जर रंगक अछि तँ कोनो मृतकक स्मृतिमे हुनकर परिजन लगेने छथि आ जँ ई सभ विभिन्न रंगक अछि तँ बुझू जे ग्रह शान्ति लेल ई फहराएल गेल अछि। छिरिंग कहै छथि जे जावत झण्डामे लिखल मंत्र नै मेटाइत अछि तावत हवा एकरा नै खसा सकैए, जखन ई मलिच्छ पड़ि जाइए तखने हवा एकरा उड़ा सकैए। सांगू झील जे नाथूला (अकानैबला कानक दर्रा) क रस्तामे अछि (पूर्व सिक्किम), ओतए प्रदीप तमांग याकक संग भेटै छथि, पहाड़क पाछाँ हुनकर गाम छन्हि। ओ कहै छथि जे तिब्बती आ भुटिया भाषामे अन्तर छै, मुदा समानतो छै। नाथूला चौदह हजार फीटपर अछि आ प्राचीन कालसँ भारत-तिब्बतक बीच व्यापार लेल ऐ दर्राक उपयोग होइत रहल अछि। एतौ जीरो जकाँ ऑक्सीजनक कमी अहाँकेँ बुझा पड़त। ऐ दर्रासँ आइयो तिब्बती व्यापारी रेशम लऽ कऽ शेराथांग गामक शेड लागल हाट-बजार अबै छथि आ एतएसँ बदलामे बिस्कुट आ डलडा लऽ जाइ छथि। दिनेश तमांग गंगटोकमे कहै छथि जे ओ नेपाली बौद्ध छथि। मुदा बंगालमे जन्म छन्हि। गोरखालैण्डक मांग नै मानल जाएत से हुनकर कहब छन्हि कारण से मानलासँ जलपाइगुरीक कान्तापुरी (कामतापुरी) आ कूच बिहारक अलग प्रान्तक मांग सेहो मानए पड़तै, ओ ऐ दुनू जगहक भाषाकेँ बांग्लासँ अलग कहै छथि आ ओकरा “वाया बंगाली” (बाहे बंगाली- बंगाली आ बाहे बंगालीमे भाषाक अतिरिक्त शारीरिक गठन सेहो बंगालीसँ भिन्न ओ कहलन्हि, दोसर ओ ईहो कहलन्हि जे सत्य पूछी तँ यएह बाहे बंगाली असली प्रारम्भिक बंगाली छल) कहै छथि। संलग्न चित्रमे तिब्बती लिपि सिखबाक विधि दऽ रहल छी। २ अन्तर्जाल आ मैथिली साहित्य आन्दोलन: मैथिलीपर भऽ रहल अन्तर्जालीय सम्वाद कखनो काल जातिगत स्वरूप लऽ लैत अछि, लोक जोर-जोरसँ चिकड़ऽ लागै छथि आ सम्वादकेँ रोकऽ चाहै छथि। मैथिलीकेँ मारि कऽ पारि दैबला सभ मैथिली मरि जाएत डिसकसन छोड़ि दियौ, सम्वाद बन्न करू, करए लगैत छथि। किछु प्रमुख सम्वाद जे अन्तर्जालपर ऐ बीच चर्चामे रहल: साहित्यिक वर्णसंकरता आ हिन्दीक प्रश्न: आशीष अनचिन्हार मैथिली आ हिन्दी दुनूमे लिखैबला खास कऽ दुनूमे एक्के बौस्तुकेँ मौलिक कहि लिखैबलाक खिलाफ एकटा बहसक आरम्भ केलन्हि। मूल रूपमे ई मुद्दा किरणजीक छियन्हि। सुभाष चन्द्र यादव जीक कथा संग्रह “बनैत बिगड़ैत” क आमुखमे हमहूँ ई मुद्दा उठेने छी। एकर बहसमे विनीत उत्पल सम्बन्धित रचनाकार सभकेँ ऐ पर अपन स्थिति स्पष्ट करबा लेल कहलन्हि। अविनाश दास कहलन्हि जे मुद्दा तँ सही अछि मुदा घृणा आ आक्रोशसँ उठाएल गेल अछि, ओ ऐ नाम सभमे यात्रीजी आ तारानन्द वियोगीकेँ छोड़बाक आग्रह केलन्हि आ कहलन्हि जे ई सभ प्रतिभाक बलसँ हिन्दी-मैथिलीमे आवाजाही करबामे निपुण छथि। हुनकर ईहो धारणा छल जे अमर आ सुमनक कविता दब अछि आ ओइसँ थोथा चनाक अबाज अबैए।  आशीष अनचिन्हार कहलन्हि जे तखन हिन्दीक सेहो सभ छन्दोबद्ध रचनाकेँ खारिज करए पड़त। मुदा तइपर बकथोथी शुरू भऽ गेल। गप घुमैत-घुमैत पहुँचल आ अविनाश कहलन्हि जे अनुवाद-मौलिकता कोनो चीज नै होइ छै। ओइपर हम अपन विचार देलौं जे अनुवादमे किछु कमी होइ छै भलहि ओ अनुवाद स्वयं द्वारा किए नै कएल गेल हुअए। हिन्दीक पाठककेँ ई अधिकार बनै छै जे ओकरा कहल जाए जे ओ हिन्दीमे मौलिक रचना पढ़ि रहल अछि आकि मैथिलीसँ हिन्दीमे कएल अनुवाद। तहिना मैथिलीक पाठककेँ सेहो ई हक बनै छै जे ओकरा कहल जाए जे ओ मूल मैथिली पढ़ि रहल अछि वा हिन्दीसँ मैथिलीमे कएल अनुवाद। अविनाश ऐपर कहलन्हि जे अहाँ जै भाषा (मैथिली) क पाठकक हकक गप कऽ रहल छी ओतए पाठकक संख्या कतेक छै, १०, १००, १०००...। तकर बाद बहस बढ़ैत गेल आ अविनाश जी अनचिन्हारजी केँ कहलन्हि जे जखन तर्क खोखला भऽ जाइए तँ व्यक्तिगत आक्षेप बढ़ऽ लगैए आ ऐ मामिलामे अहाँ आ हम दुनू कमीना छी। बादमे अविनाशक गपक जवाब दैत हम लिखलौं जे ई महानुभाव मैथिलीमे पाठकक संख्यापर गप उठेने छथि आ गनती १० सँ शुरू केने छथि तिनका हम कहऽ चाहै छी जे प्रिंट आ पी.डी.एफ.क तँ गप छोड़ू, हमर उपन्यास सहस्रबाढ़निक ब्रेल संस्करणक पाठक तीन संख्यामे छथि। तकर बाद तारानन्द वियोगी जीक हिन्दीमे रंग-तरंग आ अभद्र भाषा (रे-रे सम्बोधित कएल भाषा) मे पोस्ट दोसर ठाम आएल (विदेहक फेसबुक चौबटियापर) आ अपनाकेँ ओ गएर-मैथिल घोषित कएलन्हि आ सम्वेदनाक गप उठेलन्हि। ओइपर एकटा पाठक हुनका लेल मैथिलीक उपयोगिता पुरस्कार पएबा धरि सीमित बतेलन्हि तँ दोसर पाठक हुनकर सम्वेदनाक स्वरकेँ फूसि बतेलन्हि आ हुनका अपन “समय साल” मे पठाओल लेखक विषयमे मोन पाड़लन्हि जकर चर्चा बहुत दिन धरि मैथिली साहित्य मध्य चलैत रहल छल- ऐ लेखमे ओ विभूति आनन्दकेँ मैथिलीक मूल साहित्य अकादेमी पुरस्कार देल जएबाकेँ सान्त्वना पुरस्कार बतेने रहथि कारण ओइ बर्ख हुनकर जवान बेटाक मृत्यु भऽ गेल छलन्हि। ई पाठक वियोगीजी सँ प्रश्न केलन्हि जे तखन की अहाँक सम्वेदनाकेँ लकवा मारि गेल छल। एकटा पाठक प्रश्नक जवाबमे श्रीधरम कहलन्हि जे जाइ तरहेँ मैथिलीक किछु बेटा सभ यात्रीसँ वियोगी धरिक लेखनीक मौलिकतापर प्रश्न उठेने छथि तँ ओइ स्थितिमे कियो अही तरहेँ सोचि सकैत अछि। ओ ईहो कहलन्हि जे जँ हिनका सभकेँ हटा देल जाए तँ मैथिली साहित्यमे की बचत अण्डा !! बहुत दिनक बाद सुनील कुमार मल्लिक सेहो ऐ पोस्टपर वियोगीजी सँ प्रश्न केलन्हि जे अहाँ मैथिल नै छी तँ अहाँक आइडेन्टिटी की छी? सुभाष चन्द्र मोन पाड़लन्हि जे गंगेश गुंजन कमानी ऑडिटोरियममे मैथिली लेल साहित्य अकादेमी पुरस्कार लैत काल कहने रहथि जे ओ हिन्दीमे लिखै छथि मुदा मैथिलीबला सभ हुनका पुरस्कार दऽ देलकन्हि से ऐ तरहक लेखकक विरोध हेबाक चाही। उमेश मंडल प्रश्न उठेलन्हि जे जखन मूलो मौलिक आ अनुवादो तखन अनुवाद नाम किए भेल? विभा रानी स्वीकार केलन्हि जे हुनकर एकटा कथा मैथिली आ हिन्दी दुनूमे मौलिक अछि। ओ लिखलन्हि जे पहिने शुद्धतावादी सभक दुआरे शोलकन्ह सभ मैथिली छोड़ि चलि गेल आ आब हुनका बजाओल जा रहल अछि जेना उपकार कएल जा रहल हुअए। उमेश मंडल जवाब देलखिन्ह जे अहाँ कएटा शोलकन्हपर पछिला २५ बर्खमे उपकार केलिऐ, अहाँक बच्चा लिखए तँ प्रतिभाशाली आ शोलकन्हक बच्चा लिखए तँ ओकरापर अहसान कएल जा रहल छै। तारानन्द वियोगी लिखलन्हि जे हुनकर “ई भेटल तँ की भेटल” हुनकर “ये पाया तो क्या पाया” क अनुवाद नै छी। वियोगीजी लिखलन्हि जे  “ई भेटल तँ की भेटल” ३२ पृष्ठक पोथी अछि आ  “ये पाया तो क्या पाया” १५० पृष्ठक जे २०११ धरि प्रकाशकक कृपासँ बहार नै भऽ सकल अछि। आशीष अनचिन्हार वियोगजीक कर्मधारयक फ्लैपक स्कैन लगेलन्हि जइमे “ये पाया तो क्या पाया” २००५ ई. मे प्रकाशित कहि वियोगीजी स्वयं देखेने छथि। एकटा पाठकक ई पुछलापर जे ई कोन प्रकाशक छथि आ ई १५० पृष्ठक पाण्डुलिपि हस्तलिखित छल वा टंकित आ की ओ तकर स्कैन १० दिनमे एतए दऽ सकै छथि, तकर जवाब ओ दू मासक बादो नै दऽ सकलाह। जातिक गप फेर आएल आ ईहो जे की ई संयोग अछि जे साहित्यिक वर्णशंकरताक दोषी एकोटा कर्ण कायस्थ लेखक नै छथि। काल्पनिक प्रश्नोत्तरी आधारित मैथिली समीक्षा: काल्पनिक प्रश्नोत्तरी आधारित मैथिली समीक्षा जइमे लेखक/ समीक्षक कोनो मृत लेखकसँ भेल व्यक्तिगत चर्चा जकर कोनो इतिहास ओइ मृत लेखकक लेखनीमे नै भेटैत अछि-क चर्चा करैत अछि आ अपन लेखनी/ समीक्षाकेँ मजगूत बनबैत अछि- क चर्चा भेल आ ऐ मे मोहन भारद्वाज आ तारानन्द वियोगीक चर्चा आएल। बलचनमाक धोधिक सम्बन्धमे एकटा काल्पनिक प्रश्नोत्तरीक चर्चा मोहन भारद्वाजक परिप्रेक्ष्यमे हम विदेह प्रबन्ध-निबन्ध-समालोचनामे कऽ चुकल छी। आशीष अनचिन्हार “तुमि चिर सारथि” मे तारानन्द वियोगी द्वारा स्वयंकेँ दीन-हीन दलित कहबाक मामिला पकड़लन्हि कारण ओ नहिये जातिसँ दलित छथि आ महिषीक लोकक अनुसार बेस जमीन-जत्था, पाइ कौड़ीबला छथि, आशीष अनचिन्हार कहलन्हि जे ई सम्वेदना प्राप्त करबा लेल झूठ तथ्यक प्रयोग अछि। दोसर तथ्य जे ओ अही पोथीसँ उठेलन्हि से छल काल्पनिक प्रश्नोत्तरीबला जइमे वियोगीजी लिखलन्हि जे यात्री जी अविवाहित मातृत्वक पक्षमे छलाह, ई हुनका यात्रीजी कहने छलखिन्ह !! यात्रीजीक स्वयं कएल लेखन एकर पक्षमे नै अछि। एहेने तरहक एकटा अमेरिकीक फेक संस्मरण आएल छल जइमे ओ अपनाकेँ तालिबानी द्वारा पकड़ल जएबाक आ प्रतारणा सहबाक चर्च केने छल, करोड़ों टाका जखन ओ पोथी कमा लेलक तखन एक्सपोजे आएल जइमे सिद्ध कएल गेल छलै जे ऐ तरहक किछु भेले नै छलै आ अफगानिस्तानक ओ गौँवा सभ जतए ओ व्यक्ति आपदाक बाद शरण लेने छल, ओतए ओइ व्यक्तिक नीक सेवा कएने छल। गोविन्द झाक मादेँ अजित आजाद लिखलन्हि जे ओ दुखी छथि जे नव लोक हुनकासँ सलाह नै लैत अछि तँ प्रकाश झा लिखलन्हि जे बड्ड जल्दी हुनका नव लोक मोन पड़ि गेल छन्हि, एहेने हालत ओइ सभ गोटेक हेतन्हि जे नव पीढ़ीक अवहेलना करत। आशीष अनचिन्हार प्रकाश झाकेँ मोन पाड़लखिन्ह जे मैथिली-भोजपुरी अकादेमीक बहन्ने ओ शेफालिका वर्मा आ गंगेश गुंजनपर अनर्गल आरोप किए लगेलन्हि। प्रकाश झा कहलखिन्ह जे ओ आशीष अनचिन्हरकेँ सेमीनारमे नै बजाओल गेलन्हि आ गौरीनाथकेँ सेहो आइ धरि नै बजाओल गेलन्हि, तेँ ओ ई प्रश्न उठेने रहथि। तइपर आशीष अनचिन्हार कहलखिन्ह जे महिला दिवसपर जखन सभ महिलाकेँ बजाओल गेल रहन्हि तखन ओ आ गौरीनाथ की करए जैतथि आ आशीष अनचिन्हार प्रकाश झाकेँ ईहो मोन पाड़लखिन्ह जे ओ अपन अनियमित पत्रिकाक माध्यमसँ छद्मनामसँ गौरीनाथकेँ जे विकट-विकट गारि पढ़ने छलखिन्ह से गौरीनाथकेँ मोने हेतन्हि। शेफालिका  वर्मा आ गंगेश गुंजनक हुनका द्वारा पूर्वमे फज्झति करबाक तथ्य सेहो फेर सोझाँ आएल। वियोगीजी सम्वाद बन्न करबाक आग्रह केलन्हि आ कहलन्हि जे गोविन्द झा ठीके कहने छलाह जे मैथिली (मैथिली साहित्य) ३०-४० सालमे मरि जाएत। राधाकृष्ण चौधरी जीक “अ सर्वे ऑफ मैथिली लिटरेचर” विदेहक सौजन्यसँ श्रुति प्रकाशनसँ आएल आ ओइपर दूटा टिप्पणी सेहो आएल। विभूति आनन्द अपन “भाषा टीका” मे लिखै छथि जे ऐ पोथीक आमुखमे राधाकृष्ण चौधरी जै जतियारेक गप करै छथि ई पोथी तइसँ गछारल अछि। भीमनाथ झा अन्यत्र राधाकृष्ण चौधरीजीपर पोथीक आमुखमे लिखै छथि जे इतिहासमे सभ हरही-सुरहीक चर्चा नै हेबाक चाही, से मुदा राधाकृष्ण चौधरीक ऐ पोथीमे भेल अछि। मुदा विभूति आनन्द आ भीमनाथ झा ऐ सन्दर्भमे देल अपन-अपन एक पाँतीक निर्णयक पक्षमे कोनो उदाहरण नै देलन्हि। धनाकर ठाकुर चर्चा करै छथि जे मैथिलीकेँ पाइ कमेबाक आधार बनाबएबला लोक सभ हुनकर मिथिला राज्यक समर्थन नै करै छथि आ हुनकर ऐ सम्बन्धमे मेल पठेबापर अभद्र मेलसँ प्रत्युत्तर दैत छथि। ओ विदेहपर साहित्य अकादेमी पुरस्कार लेल वोटिंग करेबाक विरोध केलनि आ उमेश मण्डल केँ लिखलन्हि जे अहाँ सभ जे मेहनतिक महल ठाढ़ केने छी तइमे संस्था सभक सेहो योगदान छै। उमेशजी जवाब देलखिन्ह जे ई वोटिंग अगिलो सालसँ जारी रहत आ एकर प्रक्रिया एकरा प्रतिष्ठित बनेने छै आ तकरा अभिलेखित कएल जाएत जखन राधाकृष्ण चौधरी जीक सर्वे ऑफ मैथिली लिटेरेचरक दोसर भाग (लेखक- गजेन्द्र ठाकुर) मे ई वर्णित हएत, जइपर हम अपन सहमति देखेलौं।  उमेश मण्डल ईहो लिखलन्हि जे मेहनतिक जे महल ठाढ़ भेल छै तइमे संस्था सभक कोनो योगदान नै भेटल छै (जातिवादी तत्वक संस्था सभक विरोध अबस्स भेटल छै) आ ने संस्था सभक भविष्यमे कोनो योगदान लेल जेतै। धनाकर ठाकुर कहलन्हि जे रमानन्द झा “रमण”, देवशंकर नवीन आ प्रकाश झा विदेहमे प्रकाशित छथि आ से हिनका लोकनिसँ हम गप करी जे ओ लोकनि किए मैथिली-मैथिली करै छथि आ मिथिला राज्यक मेलक विरोध करै छथि। चन्द्रनाथ मिश्र “अमर”क सौभाग्य मिथिलामे मिथिला राज्यक विरोधक चर्चा करैत ओ कहलन्हि जे ऐ तरहक मैथिली साहित्यकारक बहिष्कार हेबाक चाही। देवशंकर नवीन हुनका लिखने छलखिन्ह जे अहाँक माथमे गोबर भरल अछि आ जँ अहाँ मेल फेर पठाएब तँ अहाँकेँ हम लीगल नोटिस पठाएब, प्रकाश झा लिखलखिन्ह जे हम बाज छी ऐ समाज सेवासँ, हमर ई-मेलकेँ माफ कएल जाए। रमानन्द झा “रमण” अपन ई-मेलकेँ हुनकर मेलिंग लिस्टसँ हटेबाक मांग केलखिन्ह। हम हुनका कहलियन्हि जे अहाँ स्वयं हुनका सभसँ ई-पत्र वा टेलीफोनपर गप करू। जे कियो इन्टरनेट वा ई-पत्रपर छथि भलहि विदेहपर ई-प्रकाशित छथि, अपन जिम्मेवारी हुनकर सभक अपन छन्हि। धनाकर ठाकुर उमेश मंडलकेँ ईहो लिखने रहथिन्ह जे अपन बड़ाइ अपने नै करू दोसर लोक करत, हुनका ईहो शंका रहन्हि जे विदेहसँ जुड़ल लोक हुनकर विकीपीडियाक संशोधनकेँ हटा देलक, बादमे देखलापर पता चलल जे कियो गोटे (आब स्वीकारोक्तिक बाद सिद्ध भेल जे ई धनाकरजी छलाह) हिनका द्वारा कुणालक बादक सभ लेखक, जइमे जगदीश प्रसाद मण्डल आ तारानन्द वियोगी सहित ढेर रास लेखकक नाम छल, क नाम जे ई हटा देलन्हि, केँ रेस्टोर कऽ देलक। संगमे हिनका द्वारा ई तथ्य सभ जे मैथिलीसँ हिन्दी आ बांग्ला निकलल आ मैथिली भाषीक जनसंख्या सम्बन्धी अपुष्ट जानकारी, यूरोप स्थित विकीपीडियाक एडमिन द्वारा हटा देल गेल। जँ ई सभ विदेहसँ जुड़ल लोक छथि तँ बुझू जे मैथिलीक सुदिन आबि गेल। ईरानक एकटा राजा शतरंजक एकटा खिलाड़ीकेँ खुश भऽ कहलखिन्ह जे मांगू की मांगै छी। ओ शतरंजक पहिल घरमे एकक, दोसरमे दूक; आ एहिना एक्सपोनेन्सियल रूपेँ ६४म घरमे तकर एक्सपोनेन्शियल जतेक चाउरक दाना हएत ततेकक चाउरक दानाक मांग केलन्हि। राजा बुझलन्हि जे ई मात्र दू चारि पट्टा हेतै आर कतेक हेतै। मुदा हुनका बताओल गेलन्हि जे ई ततेक हेतै जे हुनकर राज्यक समस्त चाउरक उत्पाद सेहो पूर नै कऽ सकत तँ राजा लज्जित भेलाह। धनाकर जी सेहो विदेहमे छपल छथि आ विदेहक पाठक सेहो छथि, ओइ हिसाबे ओहो विदेहसँ जुड़ल छथि। “विदेहसँ जुड़ल लोक” एक्सपोनेन्सियल रूपेँ बढ़ि रहल छथि आ ई किछु गोटे लेल बुझौअलि बनि गेल अछि। उमेश मण्डल आ प्रकाश झा (आ मुकेश झा सेहो):- मैथिली विकीपीडियामे उमेश मण्डलजीक योगदान किछु लोककेँ नै अरघलनि आ प्रत्यक्ष रूपेँ नै अप्रत्यक्ष रूपेँ ओ लोकनि रोष प्रकट केलन्हि। जखन भाभा एटोमिक रिसर्च सेन्टरक राधामोहन चौधरी कहलन्हि जे बंगलोर, हैदराबाद आ सिएटलमे रहनिहार मैथिल लेल मैथिली टाइमपास छिऐ मुदा उमेश मण्डलजी निर्मलीमे रहि जे काज केलन्हि अछि से मैथिलीक प्रति हुनकर समर्पण देखबैए तँ प्रकाश झा लिखलन्हि जे उमेशजीक बड़ाइ करबाक बहन्ने बंगलोर, हैदराबाद आ सिएटलमे रहनिहार मैथिलक बुराइ नै करबाक चाही। ओ ईहो कहलन्हि जे विकीपीडिया लेल जे लोक काज करैए से अपन ऑफिसक कम्प्यूटरसँ आ ओइसँ ऑफिसक काज हर्जा होइ छै। ओ ईहो लिखलन्हि जे अही सभ दुआरे ई लोकनि मैथिली साहित्यसँ दूर भऽ जाइ छथि आ ओ अपनो विषयमे कहलन्हि जे पाँच साल पहिने अंतिकामे छपल कथाक बाद अही सभ कारणसँ ओ मैथिली कथा लिखनाइ छोड़ि देलखिन्ह आ अही सभ कारणसँ ओ आब मैथिली नाटक सेहो छोड़ि देताह। ऐपर पाठक लोकनि कहलन्हि जे छोड़निहार आ छोड़बेनिहार सभ एक्के जातिक (ब्राह्मण) छथि आ उमेश मण्डल वा कियो आन जातिक लोक ओइ राजनीतिमे शामिल नै हेताह, तखन ई द्वेष किएक? आशीष अनचिन्हार लिखलन्हि जे प्रकाशजी अहाँक कथा छोड़लाक बाद मैथिली कथा आर आगाँ बढ़लैक आ अहाँ द्वारा नाटक छोड़लाक बाद नाटक आर आगाँ बढ़तैक, ओ अपनाकेँ प्रकाशजी द्वारा ग्रुपसँ हटेबाक सेहो विरोध केलन्हि आ कहलन्हि जे हुनकर विचार प्रकाश जी सँ हटि कऽ भऽ सकैए, उग्र भऽ सकैए, मुदा हुनका जकाँ जातिवादी आ ग्रुपवादी विचारक ओ नै छथि। अजित आजाद सेहो प्रकाशजी द्वारा आशीष अनचिन्हारकेँ रजिस्टरसँ हटेबाक विरोध केलन्हि आ कहलन्हि जे आशीष अनचिन्हारक विचारसँ सहमति-असहमति भऽ सकैए मुदा हुनका रजिस्टरसँ हटेबाक ओ विरोध करै छथि आ आहत छथि। उमेश मण्डल जातिवादक परिभाषा देलन्हि जे जातिवाद एकटा जातियोकेँ संग लऽ कऽ नै चलैए आ मात्र जाति मध्य एकटा समूहकेँ संग लऽ चलैए, आ ऐ मे दोसर जातिक सेहो एकटा छोट समूह मौद्रिक आ अन्य लाभ लेल शामिल रहैए, संगे जातिवाद नारीविरोधी सेहो अछि। ओ प्रकाश जीकेँ कहलन्हि जे हुनका (उमेशजीकेँ) नै तँ कोनो सरकारी नोकरी छन्हि आ नहिये कोनो प्राइवेट नोकरी, से कोनो कार्यालयक कम्प्यूटर हुनका नै पइड़ लागल छन्हि, आ जे प्रकाशजीकेँ कथा-नाटक सभ लिखबासँ रोकने छन्हि ओइ समूह सभक संग प्रकाशजी तखन किए छथि? बादमे ई तथ्य सोझाँ आएल जे उन्टे प्रकाशजी अपन ऑफिसक कम्प्यूटरसँ प्रकाश आ मुकेशक नामसँ काज करै छथि आ सम्भावना बनैत अछि जे चाहे तँ मुकेशक आइ.डी.क प्रयोग ओ करै छथि वा मुकेश झा सेहो हुनकर ऑफिसक कम्प्यूटरसँ कार्यकालमे फेसबुकपर लॉग-इन करै छथि। उमेशजी ईहो मोन पाड़लन्हि जे “मिथिला दर्शन” मे रामभरोस कापड़ि भ्रमरक विद्वतापूर्ण आलेखमे मलंगिया जीक प्रति कएल किछु टिप्पणीक विरोध मुकेश झाक पत्र द्वारा मिथिला दर्शनमे भेल छल से ऐ घटनाक बाद ई सम्भावना भऽ सकैए जे ओहो प्रकाशजी वा ककरो आनक कहलापर तँ नै पठबाओल गेल। मैथिली पत्रिका सभमे पाठकीय पत्रक घृणित राजनीतिपर सेहो चर्चा भेल। उमेश मण्डल विदेहसँ जुड़ल लोकक लिस्ट देलन्हि जइमे कतेको देश-विदेशक मैथिली भाषी कम्प्यूटर वैज्ञानिकक नाम छल जे अपना-अपना ढङे मैथिली लेल काज कऽ रहल छथि। मैथिली गजल: गजलपर हमर आलेख तेरह खण्डमे आएल जे बेस चर्चामे रहल। मैथिलीक कथित गजलकार लोकनिक छन्द आ बहरक अज्ञानता मैथिली गजलक विकासमे बाधक भेल, बुझू जे लोकवेद आ लालकिलावाद मे संकलित सभ रचना गजलक परिभाषासँ बाहर अछि। मायानन्द मिश्र आ गंगेश गुंजन ऐ समस्यासँ परिचित रहथि मुदा कोनो समाधान नै ताकि सकलाह आ मायानन्द मिश्र गीतल कहि आ गंगेश गुंजन “गजल सन किछु मैथिलीमे” कहि पलायनक रस्ता चुनलन्हि। श्रीधरमक पुरान कमेन्ट जे साहित्यिक वर्णसंकरताक सम्बन्धमे छल ओतए तँ नै मुदा एतए लागू होइत अछि, मैथिली गजलमे की बचल अण्डा! ठीके अण्डे बचल। आ एतएसँ नव आस जागल जखन सुनील कुमार झा सन युवा गजलकार सरल वार्णिक छन्दमे अपन अ-छन्दोबद्ध गजलकेँ पुनर्लेखित केलन्हि। हमर ई अनुभव रहल अछि जे कम्प्यूटर लेल जँ कोनो प्रोग्राम बनाएल जाए आ ओ गड़बड़ भऽ जाए तँ कतबो सेक्यूरिटी आ अपडेट पैच देल जाए ओइमे कमी रहिये जाइ छै आ मेहनति सेहो बेसी पड़ै छै। ऐ सँ सुविधा आ कम मेहनति नव प्रोग्राम बनेबामे होइ छै। मैथिलीक जर्जर विधा आ संस्था सभक जँ सुधार नै हुअए तँ हमरा सभकेँ ऐ सभक बदलामे एकटा समानान्तर ढाँचा बनबए पड़त आ विश्वास करू जे ओ बेसी कारगर हएत आ ओइमे कम मेहनति लागत। बेचा ठाकुर: बेचन ठाकुरक नामकेँ प्रकाश झा द्वारा बेचा ठाकुर लिखबाक सेहो विरोध भेल। एकटा पाठक लिखलन्हि जे ई टाइपिंग गल्ती भऽ सकैए, तइपर उमेश मण्डल लिखलन्हि जे ई हुनके कहऽ दियन्हु कारण शब्द जालसँ सेहो लोक आक्रमण कऽ रहल छथि। ओ बेचन ठाकुरक नाटकक प्रकाश झा द्वारा डिलीट करबाक चर्चा केलन्हि। गंगेश गुंजनक उपन्यास माहुरबोनक पाण्डुलिपिक मिथिला मिहिर कार्यालयसँ आ लक्ष्मीनाथ झाक पाण्डुलिपिक मैथिली अकादेमी कार्यालयसँ लुप्त हेबाक चर्चा भेल। डॉ. फॉस्टस नाटकक लेखक चार्ल्स मार्लोवेक चर्चा भेल जे सेक्सपीयरसँ सम्भवतः बेशी प्रतिभाशाली रहथि मुदा हुनकर हत्या २९ बर्खक अवस्थामे कऽ देल गेलन्हि, बेचन ठाकुरक नाटकक डिलीट कएल जाएब आ हुनकर नाम बेचा ठाकुर लिखल जाएब आ टाइपिंग मिस्टेक भेल सेहो स्वीकार नै कएल जाएबकेँ ओ बेचन ठाकुरक नाटकक साहित्यिक हत्याक प्रयास कहलन्हि। ऐ सन्दर्भमे ओ विदेह मैथिली साहित्य आन्दोलनक चर्चा केलन्हि आ कहलन्हि जे ई विद्यापति आ चन्दा झाक बाद मैथिलीक तेसर पुनर्जागरण काल छी जे अगिला २०-३० साल धरि चलत आ जँ विदेह नै रहैत तँ जगदीश प्रसाद मण्डल आ बेचन ठाकुरक साहित्यिक हत्या भऽ गेल रहैत। बेचनजी विगत पचीस बर्खसँ मैथिली नाटकक लेखन आ निर्देशनमे जुटल छथि। हिनकर एक दर्जन नाटक ग्रामीण सभक मोन तँ मोहनहिये छल, हिनकर विदेहमे प्रकाशित छीनरदेवी आ बेटीक अपमान विश्व भरिमे पसरल मैथिली भाषीक बीचमे कएकटा समीक्षात्मक बहस शुरू कऽ देने अछि। मुकेश झा लिखलन्हि जे हुनकर कोनो संस्था नटरंग नामसँ छन्हि जे रंगमचक मंचनक लेखा-जोखा रखैत अछि, तकरा लग बेचन ठाकुरजी द्वारा नाटकक मंचनक कोनो सूचना नै छै, तँ बेचन ठाकुर हुनकासँ प्रश्न केलकन्हि जे ई कोनो एन.जी.ओ. छिऐ की, कारण एकर नाम आइ पहिले बेर सोझाँ आएल अछि आ ऐ तरहक एन.जी.ओ. सभ गली-गलीमे खुजल अछि आ तेँ ऐ तरहक संस्था कागजी आ पॉकेट संस्था सभक डेटापर कियो विश्वास नै करैत अछि। जखन प्रकाश झा अपन सर्वेक्षण शुरू केलन्हि जे मैथिलीक सर्वश्रेष्ठ नाटक महेन्द्र मलंगियाक ओकर आंगनक बारहमासा वा बेचन ठाकुरक बेटीक अपमान, आ आशीष अनचिन्हारक समीक्षापर बहस चलिये रहल छल तँ तारानन्द वियोगीक कथन आबि गेल, ऐ सर्वेक्षणकेँ रोकबाक आग्रह करैत- "हम त चकित छी प्रकाश। की मैथिलीक एहन दुर्दिन आबि गेलै जे आब एना तुलना कएल जेतै? जकरा बल पर सौंसे भारतीय साहित्य मे मैथिलीक झंडा बुलन्द मानल जाइत रहल अछि, तकरा मादे हमर नवतुरिया सब एना बात करता? एतेक सतही आ विवेकहीन पीढी मिथिला पैदा केने छथि यौ? की पं० गोविन्द झाक ओ कथन सत्य होब'बला छै जे तीस-चालीस साल मे मैथिली मरि जाएत। (मैथिली माने मैथिली साहित्य।) एना नहि काज चलत। किछु करियौ बाबू।" मुदा प्रकाश बाबू कहलखिन्ह- "सर ! किछु कारण अछि । सब नवतुरियाक स्थिति एक रंग नहि छनि । सभहक अपन अपन मनतव्य छनि । मुदा अँग्रेजी मे एकटा कहाबत अछि । सरभाइवल ऑफ दी फिटेस्ट.... । जे कियो जे किछु सोचैइथ मुदा मैथिली आ नाटक लेल सोचैत छैथि यैह हमरा लेल जीवन दायी अछि ।" तारानन्द वियोगी फेर लिखलन्हि- "मिथिलाक प्रति जं प्रेम अछि, तं अपन बिरासत कें चिन्हनाइ आ ओहि पर गर्व करनाइ सीखू। हरेक भाषा मे किछु एहन रचना होइ छै जे 'क्लासिक्स' के कोटि मे अबै छै। । (से मैथिलियो मे छै) जखन आगुओ कोनो ओहि टक्कर के रचना आबि जाइ छै तं ओकरा सम्मान दैत पूर्वक क्लासिक्स के बराबर मे राखल जाइ छै। एहि लेल बिरासत कें खारिज करब जरूरी नै छै। मानि लिय' जे गजेन्द्र ठाकुर बड्ड विशिष्ट कवि छथि, तें की अहां ई सर्वेक्षण कराएब पसन्द करब जे 'विद्यापति पैघ कवि की गजेन्द्र ठाकुर?' साहित्य के संस्कृति मे आम तौर पर एना नहि कएल जाइ छै। मुदा 'खास' तौर पर जं करए चाही, तं ताहि सं ककरो के रोकि सकै छै। राजनीति के संस्कृति मे तं से चलन छैके।" तइपर उमेश मंडल जवाब देलखिन्ह जे ई उदाहरण तखन सटीक होइतए जँ बेचन ठाकुर वा महेन्द्र मलंगियाक तुलना ज्योतिरीश्वरसँ कएल जाइत। ऐ डिसकसनक शुरूमे प्रकाशजीक विचार बेचनजीक नाटकक विरुद्ध छलन्हि आ से पुनः सिद्ध भेल जखन बेचन ठाकुरक "अधिकार" नाटक ऐ टिप्पणीक संग पोस्ट कएल गेल तँ ओ ओकरा डिलीट कऽ देलन्हि। एना किए भेल? जखन प्रकाश झा महेन्द्र मलंगियाक नाटक करबै छथि (मैथिलीमे विदेहक एलासँ पूर्व प्रूफरीडरकेँ सम्पादक कहल जाइ छल आ नाटकमे जे कियो कोनो काज नै करथि कुर्सीपर पएर लटका कऽ बैसथि आ गप छाँटथि तकरा नाटकक निर्देशक कहल जाइ छल) तँ ९० प्रतिशत दर्शक मैथिल ब्राह्मण आ जखन संजय चौधरी मलंगियेक नाटक करै छथि तँ ९० प्रतिशत दर्शक कर्ण कायस्थ; आ दुनू गोटे मैथिलीक नामपर सरकारी संगठनसँ, जे टैक्सपेयरक पाइसँ चलै छै, पाइ लऽ नाटक करै छथि, शहरो वएह दिल्ली छिऐ। ई समाज किए तोड़ल जा रहल अछि? आ दू जातिक अतिरिक्त शेष मैथिली भाषी? मुदा तइमे सुधारले वियोगीजीक आह्वान प्रकाशकेँ नै भेटै छन्हि! किए!! आ प्रकाशजी बेचनजीक नामो बेचा ठाकुर लिखै छथि आ पाठकक ऐपर भेल विरोधक बावजूद सुधार नै करै छथि से उच्चारण दोष,  ह्रिजै दोष अनायास भेल नै सायास भेल सिद्ध होइत अछि। एकटा पाठक प्रश्न केलखिन्ह जे जँ मुकेश झाक नटरंग संस्थाकेँ नटवरलाल रंग कहल जाए तँ सेहो प्रकाश/ मुकेशकेँ स्वीकार्य हेतन्हि? प्रकाशजी उमेश मंडलकेँ कहै छथि जे ओ हुनकासँ सम्पर्क बढ़ेबामे रुचि नै राखै छथि मात्र फोनपर गप छन्हि से हमहूँ २००८ मे प्रकाशजीक पहिल बेर नाम नाम सुनने रहियन्हि, मिथिलांगनक अभय दास नाम-नम्बर देने रहथि आ तहियासँ दू-तीन बेर २-३ मिनटक फोनपर गप अछि आ २-३ बेर ठाढ़े-ठाढ़े गप अछि, अंतिम बेर भेँट जखन उमेश मंडल जीक कहलापर जगदीश प्रसाद मण्डल जीक नाटक हुनका देने रहियन्हि आ ओ ओइ बदलामे मलंगियाजीक पोथी कूरियरसँ पठेबाक गप कहने रहथि।  वियोगीजी आ प्रकाशजी अखनो धरि "मेडियोक्रिटी" सँ बाहर नै आबि सकल छथि आ सार्थक सम्वाद आ समालोचना सहबामे तत्काल अक्षम छथि। जँ जँ ओ लोकनि आर मेहनति करताह आ "मेडियोक्रिटी"सँ  बाहर बहरेताह तँ तँ हुनका लोकनिमे समालोचना सहबाक क्षमता बढ़तन्हि। टैक्सपेयर तँ सभ छथि, ओतए तँ जाति-भेद नै छै।   मुदा "अधिकार" नाटक डिलीट नै कएल जा सकल, ई बचि गेल कारण ऐ नाटकक कएक टा बैकप कतेक संगणकपर उपलब्ध छल। से ऐ परिप्रेक्ष्यमे बेचन ठाकुर जीक तेसर नाटक "अधिकार" आएल अछि आ आशा करैत छी जे आशीष अनचिन्हार फेर ऐ नाटकक समीक्षा करताह आ सूतल लोक जेना आँखि मीड़ैत उठल अछि तहिना ई नाटक ग्रामीणक पहिने आ मैथिली नाटकक किछु ठेकेदार समीक्षक/ निर्देशक लोकनिक पछाति निन्न तोड़त। संगहि जेना मजारपर वार्षिक उर्स होइ छै जतए लोक सालमे एक बेर चद्दरि चढ़ा आ अगरबत्ती जड़ा क' कर्तव्यक इतिश्री मानि लैए, तहिना मैथिलीक नामपर खुजल कागजी संगठन सभक, जे बेसी (९५ प्रतिशत) मैथिल ब्राह्मण सम्प्रदाय द्वारा टैक्सपेयरक पाइकेँ लुटबा लेल फर्जी पतापर बनाएल गेल अछि, तकर वार्षिक (बर्खमे ओना एक्के बेर हिनकर सभक निन्न खुजै छन्हि) काजक समीक्षा होएबाक चाही।  जखन हम संस्कृत वीथी नाटकक निर्देशन/ अभिनय करै छलहुँ तँ ओतए अभिनय केनिहार सभक आ सह-निर्देशक लोकनिक प्रतिभा आ मेहनति देखि हर्ष होइ छल; मुदा एतए प्रतिभाक दरिद्रता किएक? उत्तर अछि जे एक जातिकेँ लेब आ तहूमे तै जातिकेँ जकरा अभिनयसँ पारम्परिक रूपमे कोनो लेना देना नै छै, आ जकरा लेना-देना छै तकरा अहाँ बारने छी, तँ की हएत? जखन हरखा पार्टीमे खतबेजी रावणक अभिनय करै छलाह तँ से आ जखन ओ चन्द्रहास नाटकमे खलनायकक नै वरन चरित्र अभिनेताक अभिनय करै छलाह से, दुनू मे कियो नै कहि पबै छल जे कोन अभिनय बीस! बच्चामे गाममे आँखिसँ देखल अछि।   संगहि जे लिस्ट गनाओल जाइत अछि, तैमे खतबे जी कतौ नै!! दसटा मैथिली निर्देशक छथि जे पटना, कलकत्ता, दिल्ली, मुम्बइ, चेन्नइमे (सभटा मिथिलासँ बाहर) निवास करै छथि आ २०० लोकक सोझाँमे ऑडिटोरियममे नाटक करबै छथि आ कलाक न्यूनताक पूर्ति लाल-पीअर-हरियर लाइट-बत्ती जड़ा कऽ करै छथि (किछु अपवादो छथि), की भरि मिथिलामे एतबे नाटक मैथिलीमे होइए आ की एतबे निर्देशक मैथिलीमे छथि? गाम-गाममे पसरल असली मैथिली नाटकक निर्देशकक सूची आ हुनका द्वारा बिना टैक्सपेयरक फण्डसँ खेलाएल गेल नाटकक अभिलेखनक काज विदेह टीम द्वारा चलि रहल अछि जकर विस्तृत सूची "सर्वे ऑफ मैथिली लिटेरेचर वोल्यूम.२ मे देल जाएत। नाटक “अधिकार” इन्दिरा आवास योजनाक अनियमितताकेँ आर.टी.आइ.सँ देखार करैबला आ रिक्शासँ झंझारपुरसँ दिल्ली जाइबला (आ अभिषेक बच्चनसँ झंझारपुरमे पुरस्कार पाबैबला) असली चरित्र मंजूरक कथा अछि जे डिलीट नै कएल जा सकल मुदा किए डिलीट कएल जा रहल छल, किनकर हितकेँ ऐ नाटकसँ खतरा छन्हि/ छलन्हि आ किए एकर विरोध एतेक तीव्र रूपमे भेल, से सभटा आब फरिच्छ भऽ गेल अछि। उपेन्द्र भगत नागवंशी आ मैथिलीमे फील्डवर्क- ऐतिहासिक कृतघ्नताक प्रश्न: महेन्द्र मलंगिया जे काज जनकपुरमे कऽ रहल छलाह से काज उपेन्द्र भगत नागवंशी ओतए आइ कऽ रहल छथि, मुदा हुनकर काजक कोनो अभिलेखन किए नै भऽ रहल छल? महेन्द्र मलंगियाकेँ हम मैथिलीक सेक्सपियर लिखने रहियन्हि (नचिकेताक नो एण्ट्री:मा प्रविशक आमुखमे) आ हुनकर आ रामभद्र (कथाकार) क काजक विश्लेषण करबाक आह्वान केने रही। मुदा हुनकर नाटक काठक लोक आ ओकर आंगनक बारहमासाक सन्दर्भमे हमर विचार भिन्न अछि। थोपड़ी पड़ेबाले काठक लोकक मुख्य पात्र एकटा वर्णशंकर हिन्दी भरि नाटकमे बजैए जइसँ नहिये मैथिली नाटककेँ कोनो लाभ भेलै आ नहिये हिन्दी प्रेमी लोकनि प्रसन्न हेताह। ई हिन्दी नाटक छी आकि मैथिली नाटक ऐपर सेहो विवाद चलैत रहत। ओकर आंगनक बारहमासा नाटक आस रखैए जे ओकर दर्शक मैथिल ब्राह्मण हेताह आ ओइमे तथाकथित राड़क मैथिली कहि जे भाषा थोपड़ी पाड़बाक उद्देश्यसँ प्रयुक्त कएल गेल अछि से भाषाशास्त्री रामावतार यादवक ऐ कथनक विपरीत अछि जे भाषाक संधानमे एहेन स्थिति नै आबए देबाक चाही जइसँ एकर मूल विशेषता गौण पड़ि जाए। संगे बेचन ठाकुर, जगदीश प्रसाद मण्डल आ राजदेव मण्डलक क्रमसँ नाटक, कथा आ कविता मलंगियाजीक काल्पनिक राड़क मैथिलीक भ्रमकेँ तोड़ि देने अछि। उमेश मण्डलक डिजिटल रूपमे संरक्षित (देखू विदेह ऑडियो- वीडियो) १७ तथाकथित दलित-पिछड़ा-मुस्लिम जातिक मध्य कएल फील्डवर्क देखू सुनू आ ओइमे बाजल मैथिलीक विश्लेषण करू। ओइमे बाजल मैथिली विद्यापतिक गाम बिस्फीमे बाजल मैथिलीसँ बीस पड़त उन्नैस नै। मलंगियाजीक लेखनीमे ऐ तरहक फील्डवर्कक सर्वथा अभाव छन्हि आ हुनकर फील्डवर्क अपूर्ण छन्हि, भऽ सकैए एकटा छोट क्षेत्रमे कएल गेल होन्हि। संस्कृत नाटक सभ जइमे शूद्र आ स्त्री लेल एहने भाषाक प्रयोग होइ छलै से ऐ २१म शताब्दीमे सम्भव नै। फेर हुनकर हरिमोहन झाक पाँच पत्रक हुनकर कएल नाट्य रूपान्तरण आ ओकर प्रकाश झा द्वारा कएल निर्देशन देखू। थोपड़ीक लेल किछु एहेन समस्याकेँ हास्यास्पद बना देल गेल जकर विरुद्ध हरिमोहन झा भरि जीवन लड़ैत रहलाह। दोसर गप जे मैथिलीक साहित्यकार जे गाममे रहबाक दम्भ भरै छथि ओ गाममे रहितो गामसँ पड़ाइन केने छथि जँ ओही गामक कोनो दोसर जातिक संस्कृतिसँ सम्पर्कक गप कएल जाए तँ ओ पूर्ण अज्ञानी सिद्ध होइ छथि। पंजीक विषयमे बहुत रास भ्रम छल, ओकर स्कैनिंग कऽ इन्टरनेटपर धऽ देल गेल। किछु गोटे ओइमे सँ अन्तर्जातीय विवाह (चर्मकार, रजक, मुस्लिम आदिसँ आ गएर अधिकारक विवाहक चर्चा) केँ हटेबाक मांग केलन्हि। किछु गोटे ओइमे हुनकर एक फरीकक चर्चा नै हेबाक गप उठेलन्हि। किछु गोटेकेँ भ्रम छन्हि जे पंजीक डिजिटल स्कैनिंग आ लिप्यंतरणक उद्देश्य पंजी प्रथाक पुनर्स्थापना अछि, एकर उद्देश्य एकर उलट अछि आ कोनो ब्राह्मण वा श्रोत्रिय सभाक क्षुद्र उद्देश्य पूर्ति लेल ई मेहनति नै कएल गेल अछि। ई स्पष्ट करब एतए आवश्यक अछि जे पंजीक सम्बन्धमे भ्रम जे ई कुलीनता स्थापित करबा लेल स्थापित भेल (हरिसिंहदेव तँ नहिये केलन्हि हँ माधव सिंह केलन्हि) आ जे ई प्रतिभाक आधारपर निर्धारित भेल (हम राजक आदेश लगेने छी जइमे पाइ लऽ कऽ नीचाँसँ ऊपर स्थान निर्धारित भेल आ चूड़ा-दही खुआ कऽ पंजीकार लोकनिक हस्ताक्षर लेल गेल) तकर निवारणार्थ आ ऐ मे सँ ऐतिहासिक आ समाजशास्त्रीय तथ्य बहार करब हमर सभक उद्देश्य छल आ अछि। पंजीमे एक बेर उच्च वर्ग निर्धारित भेलाक बाद महामूर्खाधिराज उच्च कोटिक बनले रहलाह। कतेक उदाहरण अछि जइमे चालीससँ बेसी विवाह लोक केलन्हि आ बाप बेटीसँ विवाह करए पहुँचि गेलाह (मिथिलाक इतिहास, राधाकृष्ण चौधरी)। हमर जवाब ईहो अछि जे ११००० पंजी तालपत्रक जे.पी.जी. इमेजक लिप्यंतरणमे कोनो दोष नै अछि तकर गारन्टी अछि, सौराठक पंजीकार जँ अहाँक फरीकक डेटा अपडेट नै केलनि अछि तँ से हुनकर दोष, शोध आ फील्डवर्कक आधार कहा सुनी आधारित नै अछि, ई पाण्डुलिपि आधारित अछि आ जँ ओइमे कोनो डेटा अछि (जेना अन्तर्जातीय वा अनधिकार विवाह) तँ हम ओकरा हटा नै सकै छी आ ने कोनो एहन बौस्तु हम जोड़ि सकै छी जे ओइमे नै अछि। पंजीक डी.वी.डी. अलगसँ रिलीज सेहो भेल अछि आ अन्तर्जालपर सेहो उपारोपित कएल गेल अछि, एकर लिप्यंतरणक दोसर खण्ड शीघ्र आएत। पंजीक ऐतिहासिक आ समाजशास्त्रीय विश्लेषण पोथीक सए पृष्ठक आमुखमे कऽ देल गेल अछि। दोसर गप ई जे अ-इतिहासाकर लोकनिक जातिगत आधारपर कएल ऐतिहासिक कृतघ्नतापर दू तरहेँ आक्रमण भेल। एक तँ पंजीक हमर सभक पोथीमे ऐतिहासिक आधारपर पंजीक स्थापना हरसिंहदेव द्वारा कएल सिद्ध भेल आ दोसर ईहो जे हरसिंहदेव नै तँ ब्राह्मण आ नहिये कायस्थ मध्य कुलीनताक आधारपर विभेद केने छ्लाह आ श्रोत्रिय नाम्ना ब्राह्मणक उपजाति १७६० ई. मे माध्व सिंह द्वारा किछु चाटुकारक कहलापर शुरू भेल आ सएह कायस्थ मध्य सेहो भेल। मुदा गोविन्द झा बिना कोनो प्रमाणक लिखै छथि जे हरसिंहदेव पंजीक स्थापक नै छलाह। एकटा सत्तरि बर्खक ब्राह्मणक श्रोत्रिय उपजातिक योगनाथ झा प्रसिद्ध सिन्धुनाथ झा हमर सभक पंजीक द्वितीय खण्डक (श्रोत्रिय खण्डक) निर्लज्जतापूर्वक चोरि कऽ एक साल बाद छपबेबे टा नै केलन्हि वरन् ओइमे सँ अन्तर्जातीय विवाहक चर्चा मेटा कऽ आ आमुखमे हरसिंहदेवकेँ पंजी प्रबन्धक संस्थापक नै मानि कऽ अपन ब्राह्मणवादी विद्वेषक परिचत तँ देबे केलन्हि, हुनका ईहो भ्रम छन्हि जे श्रो‘त्रिय १७६० ई. सँ पूर्व जातिक रूपमे मिथिलामे छलाह। हरसिंहदेव-मिथिलाक कर्णाट वंशक। ज्योतिरीश्वर ठाकुरक वर्ण-रत्नाकरमे हरसिंहदेव नायक आकि राजा छलाह। १२९४ ई. मे जन्म आ १३०७ ई. मे राजसिंहासन। घियासुद्दीन तुगलकसँ १३२४-२५ ई. मे हारिक बाद नेपाल पलायन। मिथिलाक पञ्जी-प्रबन्धक ब्राह्मण, कायस्थ आ क्षत्रिय मध्य आधिकारिक स्थापक, मैथिल ब्राह्मणक हेतु गुणाकर झा, कर्ण कायस्थक लेल शंकरदत्त, आ क्षत्रियक हेतु विजयदत्त एहि हेतु प्रथमतया नियुक्त्त भेलाह। हरसिंहदेवक प्रेरणासँ- आ ई हरसिंहदेव नान्यदेवक वंशज छलाह, जे नान्यदेव कार्णाट वंशक १००९ शाकेमे स्थापना केने रहथि- नन्दैद शुन्यं शशि शाक वर्षे (१०१९ शाके)... मिथिलाक पण्डित लोकनि शाके १२४८ तदनुसार १३२६ ई. मे पञ्जी-प्रबन्धक वर्तमान स्वरूपक प्रारम्भक निर्णय कएलन्हि (मुदा ई हरसिंहदेव द्वारा लगभग १३११ ई. मे स्थापित भऽ गेल छल- मिथिलाक इतिहास- राधाकृष्ण चौधरी)। पुनः वर्तमान स्‍वरूपमे थोडे बुद्धि विलासी लोकनि मिथिलेश महाराज माधव सिंहसँ १७६० ई. मे आदेश करबाए पञ्जीकारसँ शाखा पुस्तकक प्रणयन करबओलन्हि। ओकर बाद पाँजिमे (कखनो काल वर्णित १६०० शाके माने १६७८ ई. वास्तवमे माधव सिंहक बादमे १८०० ई.क आसपास, कारण ओइमे वर्णित सभ गोटे माधव सिंहक समकालीन) श्रोत्रिय नामक एकटा नव ब्राह्मण उपजातिक मिथिलामे उत्पत्ति भेल। ई महानुभाव योगनाथ झा प्रसिद्ध सिन्धुनाथ झा प्रसिद्ध योगनाथ सिन्ध अपना नामसँ रीप्रिन्ट करेबामे सेहो अपन पंजीक अज्ञानताक परिचय देलन्हि आ ढेर रास गल्ती छपाइमे केलन्हि। अही तरहक घृणित काज पूर्वमे हिनके सभसँ सम्बन्धित किछु गोटे केने छलाह जखन ओ सभ पंजी तालपत्र सभ पंजीकार सभसँ ठकि कऽ लेने छलाह जे ओकरा फोटोकॉपी/ स्कैन कऽ घुरेताह मुदा तकरा अमेरिकासँ आएल महिला जीनियोलोजिस्ट/ सोशियोलोजिस्टकेँ बेचि देलन्हि आ पंजीकार लोकनिकेँ ५-१० पाइ प्रति तालपत्र हर्जाना देबाक प्रस्ताव राखलन्हि।  मुदा २०१० ई. मे विदेहक सौजन्यसँ तीससँ बेसी बर्खसँ फाइलमे बन्द राधाकृष्ण चौधरी जीक “मिथिलाक इतिहास” श्रुति प्रकाशनसँ आएल आ ओतए ईअकाट्य रूपसँ ऐतिहासिक प्रमाणक आधारपर सिद्ध भेल अछि जे हरसिंहदेव पंजीक स्थापक छथि आ ओ नहिये ब्राह्मण आ नहिये कायस्थ मध्य कोनो कुलीन तंत्रक स्थापना केलन्हि। जातिवादी आ चोर अ-इतिहासकार लोकनिपर ई एकटा अन्तिम मारक प्रहार सिद्ध भेल आ ऐतिहासिक कृतघ्नताक ई अन्त केलक। एक बेर बिल गेट्सकेँ पूछल गेलन्हि जे ओ पाइरेसीक डरसँ “एक्स बॉक्स” भारतमे देरीसँ उतारि रहल छथि तँ हुनकर जवाब छलन्हि जे माइक्रोसॉफ्ट पाइरेसीक डरसँ कहियो कोनो उत्पाद देरीसँ नै उतारने अछि। विदेह सेहो अपन समस्त उत्पाद, (किछु लोककेँ भ्रम छन्हि जे विदेह मात्र कथा-कविता-निबन्ध छपैत अछि) जेना ऑडियो, वीडियो, कला-चित्रकला-संगीत, सॉफ्टवेयर, पंजी, प्राचीन मैथिली तालपत्रक डिजिटल संस्करण, तिरहुता/ वेकीपीडियाक तकनीकी स्वरूप , पोथीक डिजिटल रूप आदि स्वतंत्र उपयोग आ डाउनलोड लेल उपलब्ध करेने अछि आ योगनाथ प्रसिद्ध सिन्धुनाथ झा सन लोकक पाइरेसीक डरसँ विदेह ई काज नै रोकत। राजनन्दल लाल दास जी आ मायानन्द मिश्र प्रारम्भमे तामसमे रहथि, मायानन्द मिश्र ऐ लऽ कऽ जे कुरुक्षत्रम् अन्तर्मनक मे हम स्त्रीधनक ऐतिहासिक विवेचनाक आलोचना केने रही, ओ शेष तीनू पोथी, प्रथमं शैलपुत्री च, पुरोहित आ मंत्रपुत्रक आलोचनासँ मोटामोटी सहमत रहथि आ कहलन्हि जे मंत्रपुत्रमे ओ राहुल सांकृत्यायनसँ प्रभावित रहथि मुदा आब ओ ओकर पुनर्लेखन कऽ रहल छथि। राजनन्दन लालदास जीक मत छलन्हि जे हम सभकेँ एक्के लाठीसँ हाँकि दै छी। मुदा जखन ओ सभ विदेह देखलन्हि तँ अपन प्रसन्नता व्यक्त केलन्हि। ओ ईहो कहलन्हि जे मैथिलीक नामपर बनल संस्था सभ मैथिल ब्राह्मण वर्चस्वक होइत अछि आ बिना कोनो अपवादक ब्राह्मण लोकनि आपसी विवाद करिते टा छथि आ संस्था टुटिते टा अछि आ तेँ कर्ण कायस्थ लोकनिकेँ नै चाहितो मजबूरीमे मैथिलीक कार्य करैत रहबा लेल कर्णगोष्ठी बनाबए पड़लन्हि। गोनू झा आ आन मैथिली चित्रकथा (प्रीति ठाकुर) क एकटा चित्रकथा कालिदास सेहो सम्वादकेँ जन्म देलक। किछु पाठकक कहब छल जे ओ मैथिल ब्राह्मण छलाह आ किछु हुनका कर्ण कायस्थ मानै छलाह। मुदा ई चित्रकथा हुनकर लोककथाक ई तथ्य जे ओ अमरीताकेँ कमलदहमे भेटलखिन्ह आ मिथिलाक यादवक किछु कुलमे हुनकर अखनो अभ्यर्थना होइत अछि, ओइ आधारपर रचल गेल अछि। ई मेघदूतम बला कालिदास नै छथि कारण मेघ गलतीयोसँ मिथिला नै आएल। ई दोसर कालिदास छथि आ उच्चैठमे जे दुर्गापूजा होइए तकरोसँ ई भिन्नता रखैए कारण उच्चैठक भगवती कुण्डलधारी बौद्ध तारा छथि जे बौद्धधर्मक अवसानक बाद सभ ठाम भगवती काली बनि गेलीह, आ एतए कहिया दुर्गा बनि गेलीह से नै जानि। साहित्यिक लठैत आ कालीकान्त झा बूचक साहित्यिक हत्याक ओझरी: कालीकान्त झा बूचक कोनो कविता सरकारी संस्था सभक संकलनमे नै आएल। जँ विदेह नै अबितै तँ की संसारक सभसँ मधुर आ लयात्मक भाषा (येहुदी मेनिहिनक शब्दमे) क विद्यापतिक बादक सभसँ लयात्मक कविक साहित्यिक हत्याक ओझरी नै सुनझितैक। वियोगीजी ककरा विषयमे लिखै छथि जे अहाँ लग पाइ आ लठैत हुअए तँ अहाँ साहित्यकार नै बनि सकै छी, विधायक बनि सकै छी। एकटा पाठक बिना कोट केने ई प्रश्न उठबै छथि जे ई किनकर कथन अछि तँ अविनाश (साहित्यिक वर्णसंकरताक डिसकसनक बाद ओ पुनः अबै छथि) कहै छथि जे ई हमर पैघ भाइ तारानन्द वियोगीक कथन छी आ ऐ उत्तर लेल की पुरस्कार भेटत?। तइपर कृष्णा यादव नाम्ना ई पाठक लिखै छथि जे लठैतकेँ अपन आकाकेँ पैघ भाइ कहबाक तँ अधिकार छै मुदा पुरस्कार पएबाक नै। मुदा राजमोहन झाक ई वक्तव्य जे सभ अपन-अपन चेला पोसने छथि आ ओकरा बढ़ेबामे लागल छथि, की एतए नै सोझाँ अबैत अछि? सरकारी संस्था सभक सर्वकालीन आ स्वातंत्र्योत्तर गद्य-पद्य संकलन देखू आ देखू जे ई साहित्यिक लठैत सभ तँ ऐ संकलनमे शामिल छथि (माने पुरस्कृत कएल गेल छथि, सर्वकालीन कवि बनि गेल छथि, एकर चर्चा हम सुभाष चन्द्र यादव जीक कथा संग्रह “बनैत बिगड़ैत” क आमुखमे सेहो केने छी) मुदा एतए कालीकान्त झा बूचक साहित्यिक हत्या कएल गेल अछि। बूचजीक सए कविताकेँ विदेह द्वारा धारावाहिक रूपेँ ई-प्रकाशित कएल गेल अछि जे आब कलानिधिक रूपमे प्रिंटमे सेहो आएल अछि, आ ऐ साहित्यिक हत्याक ओझरी सुनझा देल गेल अछि। मीठ बाजएबला कायस्थ आ ब्राह्मण समाज किए टूटि गेल अछि? एकर एकटा कारण ईहो सोझाँमे आएल जे कर्ण कायस्थ मैथिलक संस्था सभमे छल मुदा ओ संस्था सभ मैथिल ब्राह्मण बहुल छल आ कोनो संस्था नै बचल जे दू भागमे नै टूटल। से की करितौं, हमरा सभकेँ (कर्ण कायस्थ) अलग संस्था बनबए पड़ल। मुदा ऐ दुनू जातिक झगड़ासँ शेष ९० प्रतिशत मैथिली भाषीकेँ कोन सरोकार। हितेन्द्र गुप्ता मैथिली समाचारक जालवृत्त (बादमे वेबसाइट सेहो) तीन-चारि सालसँ चला रहल छथि, कुमुद सिंह सेहो मैथिली समाचारक जालवृत्त (बादमे वेबसाइट सेहो) तीन-चारि सालसँ चला रहल छथि। एकर अतिरिक्त मैथिलीमे अनचिन्हार आखर (मैथिली गजलक जालवृत्त), रेखा मिश्रक-विनोद झाक मिथिला लोक, पद्मनाभ मिश्रक कतेक रास बात, मिथिला डट कम (जनकपुरक मैथिली दैनिकक जालवृत्त), बिपिन बादलक मैथिली टाइम्स आदि ढेर रास जालवृत्त/ जालस्थल अन्तर्जालपर काज कऽ रहल अछि। फेसबुकपर आब ऐ साइटमे किछु अपन चौबटिया बनेने छथि, मोटा-मोटी सभ चौबटियाक सदस्य कॉमन छथि। किछु अहम् सेहो टकराइ छै, मुदा सभ मैथिली लेल काज कऽ रहल छथि, आ के बेसी मैथिली प्रेमी सेहो कखनो काल सम्वादमे सोझाँ अबैए। अपन कमजोरी लेल बाहरी ताकतिकेँ जिम्मेवार ठहरेबाक प्रवृत्ति सेहो छै। साहित्यमे जाति शब्द नै आबए ऐपर बहस होइ छै मुदा तर्क कमजोर भेलापर वियोगीजी नन-मैथिल बनि जाइ छथि फेर कहै छथि जे मैथिल समाजमे दोसराक कहलासँ ओपिनियन बनाओल जाइ छै लेखककेँ पढ़ला उत्तर नै। किसलय कृष्णक ऐ प्रश्नक उत्तरमे जे सए बेंगकेँ एक तराजूपर तौलब असान मुदा तीन मैथिलकेँ एक ठाम रखनाइ कठिन (ई प्रश्न तीन साल पहिने राज झा सेहो कहने रहथि, अक्सर उठैत रहै छै), एकर जवाब हम देलौं जे इन्टरनेट लोककेँ जिम्मेवार बना रहल छै, लिखलाहा गपपर आब लोककेँ स्टैण्ड लेमए पड़तन्हि, जँ जँ सम्वाद करबाक शक्ति बढ़तन्हि, मेडियोक्रिटीसँ बाहर एताह, सहनशीलता बढ़तन्हि आ ई इन्टरनेटक सभ ग्रुपमे होइ छै मात्र मैथिलक ई विशेषता नै। विदेहसँ जुड़ल लोक: भलहि सम्वादक बीच विषयकेँ मोड़बाक प्रयत्न होइ छै , मुदा ऐ डरसँ ने सम्वाद रोकल जाएत आ ने साहित्यिक समीक्षा। शिव कुमार झा आ मुन्नाजीकेँ फोन आ एस.एम.एस. अबै छन्हि आ हमरा, उमेशजी आ प्रीति ठाकुरकेँ अभद्र ई-मेल। इनारक बेंग ढेपा खसलापर चिन्तित भऽ जाइत अछि  जे दुनियाँमे भूकम्प तँ नै आबि गेल। हमरा टोलमे बदरी भाइक माए एक बेर चिट्ठी लिखबै छलखिन्ह जे हुनकर महीस लागि रहल छन्हि से टोलबैय्या मोने-मोने जरि रहल छन्हि। मोने-मोनेबला गप सब्जेक्टिव अछि आ ऐ सब्जेक्टिव तत्वक साहित्यिक समीक्षामे कोनो स्थान नै। लोक तर्कक अकाल होइतहि मैथिली छोड़बाक आ मैथिल समाजकेँ गरियेबाक जे प्रक्रम शुरू करै छथि से मेडियोक्रिटीक आक्रोश अछि, “विदेहसँ जुड़ल लोक” ऐसँ बाहर छथि, आ जे ऐ मेडियोक्रिटीसँ, जातिवादसँ, ईर्ष्यासँ आ हीन भावनासँ बाहर आबि जएताह से “विदेहसँ जुड़ल लोक” भऽ जेताह। अकासी उपारोपण लेल सभ सदस्य दस सालसँ प्रतिदिन दू घण्टाक औसतसँ जमीनी काज कऽ रहल छथि। सम्वादक परम्परा पुरान अछि आ वैदिक ऋचाक पाठ केनिहारकेँ अथर्ववेद मे “अनेरे टर्र-टर्र करैबला बेंग”कहि मजाक उड़ाएल गेल अछि, से परम्परा सेहो विदेहक संग अछि। उजहियामे धारक दिशामे बहबाक जिनका आदति छन्हि से मैथिलीमे पाठक नै, प्रकाशक नै, मैथिलकेँ मैथिलीसँ प्रेम नै आदि बहन्ना मैथिली छोड़बाक लेल तकैत रहथु, धारक विपरीत हेलबाक आ धार मोड़बाक परम्परा विदेह लग छै। ( विदेह ई पत्रिकाकेँ ५ जुलाइ २००४ सँ एखन धरि १११ देशक १,७८९ ठामसँ ६१, २६१ गोटे द्वारा विभिन्न आइ.एस.पी. सँ ३,०५,४७५ बेर देखल गेल अछि; धन्यवाद पाठकगण। - गूगल एनेलेटिक्स डेटा। ) गजेन्द्र ठाकुर ggajendra@videha.com http://www.maithililekhaksangh.com/2010/07/blog-post_3709.html २. गद्य २.१.मीना झा-कथा-ब्रेस्ट कैंसर २.२.मनोज झा मुक्ति- जनगणनामे मातृभाषा २.३.शि‍वकुमार झा टि‍ल्‍लू -कलानिधि २.४.जगदीश प्रसाद मण्‍डल- नाटक २.५.बिपिन झा- एकटा प्रश्न मीडिया सँ २.६.जगदीश प्रसाद मण्‍डल- कथा २.७. डॉ.  शेफालिका वर्मा- संस्मरण- उड़ीसा-१९८५ २.८.गजेन्द्र ठाकुर- स॒हस्र॑ शीर्षा॒ मीना झा जन्म स्थान:  दरभंगा शिक्षा:   बी.ए (मैथिली ओनोर्से फर्स्ट क्लास) १९७६;  एम. ए  (फर्स्ट क्लास) १९८० कार्य अनुभव: १९८२-१८८७  रा. रा.कैम्पस , जनकपुर (नेपाल) मैथिली विभाग मे ब्याख्यता , प्रकाशन: मैथिली क विभागाध्यक्ष  स्वर्गीय डॉ  धीरेश्वर झा धीरेन्द्र क प्रेरणा सँ हमर पहिल निबंध नेपाल क पत्रिका "सिंहावलोकन" मे प्रकाशित भेल. बर्तमान: हम अपन पति डॉ अरुण कुमार झा तथा पुत्र द्वय संगे सन १९८७ सँ इंग्लैंड मे रहि रहल छी. एहिठाम अपन बच्चा सभक संगे आन आन मैथिल बच्चा सभकेँ सेहो मैथिली भाषा आ संस्कारक प्रति जागरूकता उत्पन्न करवामे  लागल रहैत छी. .  Mithila Cultural Society, UK क २०११ वार्षिक अधिवेशनक  प्रमुख अतिथि  डाक्टर  श्रीमती  शेफालिका वर्माक प्रोत्साहन पावि पुन: मैथिलीमे लिखबाक सौभाग्य प्राप्त भेल अछि... कथा ब्रेस्ट कैंसर लन्दनक थेम्स नदीक पश्चिम किनारपर नवनिर्मित सेंट थोमस अस्पतालक पाँचम मंजिलपर कैंसर वार्ड रहैक। खिरकी लगक कोनाबला बेड रहनि  मनोरमा सिंघक। खिरकीक पैघ शीशासँ मनोरमाक आँखि बिग बेनक पैघ घड़ीपर अटकल छलनि। सूर्यास्तक समयमे सूरजक किरण बिग बेनकेँ मनोरम बना रहल छल मुदा मनोरमाक आँखि ऐ मनोरम दृश्यक आनंद नै लऽ घड़ीक सुइपर लागल छल जे आब ६ बाजि ३५ मिनट देखा रहल छल। हुनकर पति सुरेश आ जौंवा बेटी रश्मि आ किरणकेँ तँ अखन तक आबि जायके चाही छलन्हि। पति अपन न्यूज़ एजेंटक दोकान साढ़े ५ तक बंद कऽ दैत छथिन आ बेटी सभ सेहो स्कूलसँ आबि जाइत छन्हि। ६ बजे नर्स हुनका रातुक भोजन दऽ गेलनि, ओ नै खयली, ओ अपन परिवार संगे भोजन करए चाहैत छलीह। कैंसर वार्डमे १२ टा बेड रहैक, पुरुख आ स्त्रिगनक वार्ड अलग-अलग। स्त्रिगनक वार्डक सभटा बेड भरल रहैक। ओना सबहक बेडक चारू कात हरियर पर्दा लागल रहैक तैँ के की कऽ रहल छल से नै पता चलैक। नर्स मनोरमाक टेबलसँ भरल प्लेट लऽ गेलन्हि आ आइसक्रीम दऽ गेलन्हि, आब आइसक्रीम सेहो पिघलि कऽ चुबय लागल, जेना मनोरमाक आँखिसँ नोर। मनोरमा पिछला ३ सालमे १३  बेर अस्पतालमे भर्ती भेल छथि। जखने दर्द तेज होइन्ह वा उलटी नै रुकन्हि, अस्पतालमे भर्ती भऽ जाथि। कखनो कोनो समय ९९९ नंबर घुमाबथि, अम्बुलेंस  लेबय लेल आबि जानि। ओहू दिन किछु एहिना भेल रहैक। मनोरमा अपन पतिक पसंदक भोजन मकइक रोटी आ सरिसौंक साग बनौने छलीह। दुनु बेटी भोजन कऽ बैठकमे टीवी देखि रहल छलन्हि आ पति देव मुँह हाथ धोअ लेल बाथरूममे गेल छलखिन्ह। एम्हर मनोरमा दुकान बंद होबय कऽ आवाज सुनिते  टेबलपर २ टा थारीमे सरिसोंक साग हरियर मिर्चीक संगे, २टा कटोरीमे दही, आ तवा चूल्हापर राखी मकइक रोटी हाथपर गोल-गोल घुमाबऽ लगलीह, तवा गर्म होइते रोटी राख देलखिन्ह। अपन पसंदक लाल रंगक सलवार कुरता पहिरने मनोरमा चूल्हा लग ठाढ़ छलीह, मुदा हुनकर आटा लागल दहिना हाथ रोटीके उनटाबय लेल उठि नै रहल छलन्हि। अचानक हुनका दहिना छातीमे दर्द उठल जे बाहींसँ होइत हाथ धरि पहुँचि गेल। दर्दसँ छटपटा उठलीह मनोरमा। भानस घरमे सौंसे धुँयासँ भरि गेलैक, स्मोक अलार्म बजे लागल। घरक सभ लोक भानस घर दिस दौड़लाह। रोटीसँ धधरा निकलि रहल छल। मनोरमा अपन बामा हाथसँ दहिना हाथ पकड़ने चिचिया रहल छलीह। ओही दिन अम्बुलेंस संगे फायर ब्रिगेड सेहो आएल छल। ३ बरख पहिने मनोरमाकेँ कैंसर डैगनोस भेल रहनि, बामा ब्रेस्टमे, जे ६ मासक इलाजक बाद ठीक नै भेलन्हि, तैँ डॉक्टरकेँ हुनकर ब्रेस्ट काटि हटाबय पड़लन्हि, जइसँ शरीरक आर भागमे कैंसरक कीटाणु नै फैलैक। मुदा हुनका रेडिओ थेरापी भेलन्हि आ कतेक तरहक दवाइ सेहो खाइत छलीह, तइ सभसँ कैंसर कण्ट्रोलमे छलन्हि। नव दवाइ आ दवाइक खुराकमे फेर बदल कएलापर साइड इफेक्ट बढ़ि जाइत छलन्हि तैँ अस्पतालक बेर-बेर चक्कर लगाबय पड़ैत छलन्हि। ऐबेर ओ तेरहम बेर अस्पतालमे भर्ती भेल छलीह। डॉक्टर सबहक अथक प्रयासक बादो मनोरमाक दहिना ब्रेस्टमे सेहो कैंसर भऽ गेल रहनि। हुनकर सबहक सलाह रहैक जे दवाइसँ ठीक नै हएत। ओइ लेल ओपरेसन मात्र उपाय अछि। मनोरमा बड्ड असमंजसमे छलीह। ओपरेसन करा लेने हुनका किछु दिन आर जिनगी भेट जयतनि मुदा की ओ जिनगी मृत्युसँ कम भयावह हेतन्हि। मनोरमा लेल निर्णय लेब बहुत कठिन लागि रहल छलन्हि। जौँ ओ ओपरेसन नै करोतीह तँ कैंसर सौंसे शरीरमे पसरि जेतन्हि आ जौं करोतीह तँ हुनकर स्त्रीत्व समाप्त भऽ जेतन्हि। मोनमे उथुल-पुथल मचल छन्हि। पहिल बेर ओपरेसन करौने  छलीह तहियासँ सुरेश शराब पीयब शुरू कऽ देलखिन। शराबक लत तेहन लगलन्हि जे आब भोरका चाहक बदला शराबक गलास हाथमे रहए लगलन्हि। आमदनीक एक मात्र जरिया न्यूज़ एजेंटक दुकान रहनि, तकर आधा कमाइ ओ अपन सिगरेट आ शराबमे खर्च कऽ दैत छलखिन। शराब पिला बाद हुनका तामस सेहो बहुत होइत छलन्हि।,बेटी सभपर सेहो कहियो काल हाथ उठा दैत छलखिन। ओपरेसनक बादसँ सुरेश बेडरूममे मनोरमा संगे सुतब छोड़ि देलन्हि, बेशी काल शराब पिबैत-पिबैत बैठकमे लुढ़कि जाइत छलाह। अपना लेल नै तँ अपन दुनो बेटी लेल तँ जीबय पड़तन्हि। दुनु बेटी “ए” लेवलक रहल छलन्हि, आगाँ साल एकटा बेटी मेडिकल कॉलेजमे जेतन्हि आ दोसर ला पढ़तनि। मनोरमा ओपरेसन करा लेलीह। बेटीक भविष्यक लेल ओ अपन भविष्य दावपर लगा लेलीह। ममताक आगू सभ बात छोड़ि देलखिन, बेटी सभकेँ कॉलेज जाइत देखी से सपना रहनि। मनोरमाक आधा खुजल आँखिसँ नोर झर-झर बहि रहल छल। माँ-बाप, भाइ-बहिन सबसँ एतेक दूर अपनाकेँ बहुत असगर महसूस कऽ रहल छलीह। बिग बेनक घड़ीमे ७ क घंटा बाजल। मनोरमाक मोन आशंकित भऽ रहल छन्हि जे अखन धरि बेटी आ पति किए नै अएलखिन। मनोरमा आइ भोरेसँ अस्पतालसँ डिस्चार्ज भऽ घर जाय लेल व्यग्र रहथि, जइ घरमे पिछला २० सालसँ एक-एक टा वस्तु कीनि सजौने रहथि। आगूमे पैघ दुकान रहनि आ पाछूमे भंडार घर,भानस घर आ स्नान घर रहनि। ऊपरमे २ टा सुतयबला घर, एकटा स्नान घर आ एकटा पैघ बैठक आ तइसँ लागल  छोट सनक बालकोनी। मनोरमाकेँ ई घर बड्ड पसिन्न छलन्हि कारण इंग्लैंडमे बालकोनीबला घर बहुत कम भेटैत छैक। ओहुना आब जीवाक इच्छा जेना समाप्त भऽ गेल रहनि, बेटी सभक खातिर ओ घर जाय चाहैत छलीह। जइ कोठरीमे ओ पति संगे कतेओक मधुर पल बितौने छलीह, आब ओ कोठरी हुनका काटय दौड़ैत छलनि। मनोरमा अपनाकेँ पति द्वारा तिरस्कृत महसूस करैत छलीह। सुरेशक सहयोगक बदला उदासीनता हुनकर मोनकेँ आर आहत करैत छलन्हि। मनोरमाक विवाह बड्ड धूमधामसँ बनारसमे भेल रहनि। माँ-बापक बड्ड दुलारू रहथि। पिता अपने आइ.ए.एस. ऑफिसर रहथिन। चारु भाइ बहिनक शिछा दीक्षा कॉन्वेंटमे भेल रहनि। मनोरमा देखे-सुने मे निक, मुदा चंचल रहथि। मनोरमा ७-८ सालक रहथि, तइ बेर दिवाली दिन फटाका छोड़य कालमे छुरछुरी घूमि गेलैक जइसँ हुनकर दहिना बाँही केहुनी तक आ दहिना गाल निक जकाँ पाकि गेलन्हि, कतेक दिनक इलाजक बाद ठीक भेलथि मुदा दाग नै छुटलनि। ऐ दागक कारण सर्वगुण संपन्न होइतो मनोरमाक विवाह नै भऽ रहल छलनि जइसँ माँ-बाप बड्ड चिंतित रहैत छलखिन। मनोरमाक उम्र सेहो ३० पार कऽ गेल छलनि, सुरेशसँ हुनका अपन एकटा दोस्तक घरमे भेँट करायल गेलनि। सुरेशक अपन अंग्रेज पत्नीसँ तलाक भऽ गेल रहनि, ओहो सुशील कनियाक खोजमे इंडिया आएल रहथि। दुनो गोटाक बात मिलि गेलन्हि। चट मंगनी आ पट विवाह भऽ गेलनि। विवाहक बाद मनोरमा अपन घर गृहस्थीसँ बड्ड प्रसन्न छलीह। बेटी भेला बाद दुनो गोटा आर प्रसन्न रहए लगलाह। काजक बाद सुरेशकेँ जे समय भेटन्हि ओ अपन बचिया संगे बिताबथि। कहियो काल बेटी सभकेँ लेगोलैंड, डिजनीलैंड घुमाबथि आ कहियो मेला सभमे। बेटी पैघ भेलन्हि तखन पेरिस आ स्विटजरलैंड सेहो घुमा देलखिन। ३ साल पहिने हिनका सबहक ख़ुशीमे जेना ग्रहण लागि गेलन्हि। जहियासँ मनोरमाकेँ कैंसर डैगनोस भेलन्हि, सभ बात उलट-पुलट भऽ गेलनि। मनोरमा ऐ बातसँ बड्ड आहत महसूस करैत छलीह जे सुरेश हुनकर व्यथा कोना नै बुझि रहल छथिन। हुनका लागैत छलन्हि जे ओ हुनकासँ नै हुनकर शरीर मात्रसँ प्रेम करैत छलखिन। ककरो पदचाप सुनि मनोरमाक आँखि खुजि गेलनि। बाहर अन्हार भऽ गेल रहैक, हुनकर आँखिक नोर सुखा गेल रहनि। हुनका आगू हुनकर दुनो बेटी नोराएल आँखिये मुँह लटकौने ठाढ़ छलखिन। मनोरमा धरफरा कऽ बैसैत पुछलखिन  “अहाँ  सभ कखन अएलहुँ?” “अखने मम्मी” - दुनु बेटी धीरेसँ जवाब देलकन्हि। मनोरमा चारू कात तकैत पुछलखिन- “अहाँक पापा कतए छथि?” दुनु बेटी एक दोसराक मुँह ताकए लागल। “की बात छैक बेटा? अहाँ सभ एना गम सुम किए छी?” मनोरमा व्याकुल होइत बजलीह। “मम्मी ......................... पापा.................” “हाँ बेटा पापा के की भेलनि?” मनोरमा आतुर होइत बजलीह। हुनकर चिंता बढ़ि गेलनि। की बात भेलैक? बच्चा सभ कानि किए रहल अछि? हुनकर आँखि सुरेशकेँ ताकि रहल छलनि। तखने दुनु बेटी हुनकर गर पकड़ि काने लगलनि। ओ दुनु बेटीक पीठपर हाथ फेरैत पुचाकरैत कहलखिन,- “अहाँ सभ एना बच्चा जकाँ किए कानि रहल छी?” रश्मि कनैत बाजल- “मम्मी-पापा हमरा सभकेँ छोड़ि चलि गेलाह?” “कतए चलि गेलाह बेटा।” हतप्रभ होइत मनोरमा बजलीह। हुनकर करेजक धड़कन तेज भऽ गेलनि। “हम सभ जखन स्कूलसँ अएलहुँ तँ पापा दोकानक भीतर खसल छलाह। ओ नींदक दवाइ खा आत्म हत्या कऽ लेलनि।” किरण सिसकैत बजलीह। “की............”- मनोरमा चिचिया उठलीह। “निचाँ इमरजेंसी रूममे पापाकेँ रखने छन्हि। हम सभ अम्बुलेंसमे पापाक संगे अएलहुँ।” किरण हिचकैत बाजल। मनोरमा अवाक रहि गेलीह। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। मनोज झा मुक्ति जनगणनामे मातृभाषा – देशमे जनगणनाक काज शुरु भऽ गेल अछि । देशक सभ जिला आ गाममे जनगणना हेतु सरकार गणक सबके खटादेने अछि । सब भाषिक लडाइय बीड़ा उठौने संस्थासब जनगणनामे अपन–अपन मातृभाषा लिखयबाकलेल विभिन्न प्रकारक अभियानसब शुरु कऽ देने अछि । मुदा मधेशक जनता अखन भ्रमित भेल जकाँ बुझना जाइत अछि । ओ दिग्भ्रमीत बनेवाक काज कएने अछि अपनाके मधेशक कर्णधार कहेनिहार नेतासब । मधेशमे सबठाम अपन–अपन मातृभाषा रहल अछि । सब भाषा सबहक अपन–अपन प्राचीन इतिहास रहल अछि । जकरा बले अपनाके मधेशक नेता कहएवामे जे सब गर्व करैछथि, वएह नेतागण आई ओहि संस्कृति आ भाषाके कमजोर कऽरहल छथि । अपना आपके मधेशवादीदलक नेता कहेनिहार सब अपन–अपन मातृभाषाके छोडि मधेशक सम्पर्क भाषाक रुपमे रहल हिन्दी भषापर बेसी जोड दऽरहल छथि । मनुष्यक जीवनमें भाषा बहुत पैघ महत्व रखैत अछि । भाषाक कारणे पाकिस्तानसँ अपनाके अलग क कऽ बंगलादेशक निर्माण भेल उदाहरण हमरा सबहक आगा अछि । फेर मधेशवादी दलक नेतासब एहि बातके किया बिसरि रहल छथि ? किछुए दिन पहिने काठमाण्डूक एकटा प्रत्यक्ष टेलिभीजन कार्यक्रममे तमलोपा नेपालक अध्यक्ष महेन्द्र यादव अपन आ मधेशक मातृभाषा हिन्दी कहने रहथि । कि महेन्द्र यादवक माय हिन्दीमें हूनका लोरी सुनाकऽ सुतवैत छलन्हि ? हूनक माय हूनका–‘मुन्ना सो जाओ’ कहिकऽ सुतवैत छलखिन्ह कि–‘बौआ सुत रहु’ कहिकऽ सुतवैत छलखिन्ह ? जौं मुन्ना सो जाओ’ कहिकऽ सुतवैत छलखिन्ह होएत त निश्चित रुपसँ हूनकर मातृभाषा हिन्दी छैन्हि । मुदा से बात नहि अछि हूनकर माय हूनका–‘बौआ सुत रहु’ कहिकऽ सुतवैत छलखिन्ह ताँए हूनक मातृभाषा मैथिली छन्हि, ताइमे कोनो शंका नहि । महेन्द्र यादव त मात्र एकटा उदाहरण छथि, अपनाके मधेशवादी दलक नेता कहएनिहार सबके याह स्थिति छैन्हि । किनको मातृभाष मैथिली छन्हि त किनको भोजपुरी, अवधी आ आन आन । मुदा, सबकियो वकालत करैछथि हिन्दी भाषाके । हुनका सब प्रति सहजहिँ एकटा प्रश्न उठैत अछि जे कि मधेश आन्दोलनमें लागल सबकियो आन्दोलन केनिहारक मातृभाष हिन्दी छलन्हि ? कि मैथिली, भोजपुरी, अवधी, थारु या उर्दू भाषा जे अपना मातृभाषामे लिखौता ओ मधेशी नहिं रहताह ? जौं से बात नहिं, तहन अपना–अपना कार्यकर्ताके ओसब अपना–अपना मातृभाषामे मैथिली, भोजपुरी, अवधी, थारु आ जिनकर जिनकर जे मातृभाषा छन्हि ओ लिखेवा लेल निर्देशन देवऽमे किया हिचकि रहल छथि ? हँ एतेक त ध्रुव सत्य अछि कि मधेशक सम्पर्क भाषा हिन्दी अछि, तहन हिन्दीके बढेबा खातीर आन–आन मातृभाषाक सँगे सौतिनियाँ व्यवहार किया ? मधेशवादी दलक नेता आ कार्यकर्तासब एहि बातके नहिं बिसरथु जे मातृभाषामे मैथिली, भोजपुरी, अवधी, थारु, उर्दु, राजवंशी लगायतक भाषा लिखौनिहारसब मधेशी मात्र भऽ सकैछथि । किया त मातृभाषासँ सहजहिं बुझल जासकैया कि अमुक व्यक्ति मधेशी अछि कि नहिं । बहुतके कहब अछि जे मधेशवादी दलसब भारतमुखी अछि आ हिन्दी भारतक भाषा अछि, ताँए ओसब हिन्दीके स्थापित करबामे लागल छथि । जौं याह बातके सत्य मानल जाए त कि भारतक सब प्रदेशमे हिन्दी बुझल जाइत अछि ? हमरासबके निक जकाँ देखल अछि कि भारतक एच.डी.देबेगौड़ा सन–सन बहुतो एहन प्रधानमन्त्री भेल छथि जिनका हिन्दी त की अन्तराष्ट्रिय भाषाक रुपमे मानलगेल अंग्रेजीधरि नहि अवैत छलनि । ओसब घर स लऽ कऽ कोनो मञ्च आ विदेशक मञ्च किया नई हुए अपन मातृभाषाक प्रयोग मात्र करैत छलाह आ अखनो करैत आएल अछि । त कि एहिसँ भारतमे हिन्दी कमजोर भऽगेलैया ? कथमपि नहि । एहि कटु सत्यके मनन सब मधेशवादी दलके क कऽ शिघ्रातिशिघ्र अपना–अपना कार्यकर्ताके, भऽ रहल जनगणनामें हिन्दी भाषाके सम्पर्क भाषक लेल आ अपन–अपन मातृभाषामे मधेशक माइयक बोलीक रुपमे रहल मैथिली, भोजपुरी, अवधी, थारु, उर्दू या आन....के े लिखएवाकलेल जागरण अभियानक निर्णय करब आवश्य अछि । तहिना मातृभाषाक नामपर बहुत रासे संघ–संस्थासब खुलल अछि । बहुत गोटेक दालिरोटी मातृभाषासँ चलैत छन्हि । मातृभाषाक नामपर खुजल संघ–संस्थासब आ मातृभाषाक नाममर अपन बाल–बच्चाके पालनिहारसबहकलेल जनगणना बहुत पैघ मौका लऽ कऽ आएल अछि । अपना–अपना दिसिसँ मातृभाषामें अपन माइयक बोली लिखेबाकलेल गाम–गाममे अभियान करबाक समय चलि आएल अछि । गाम–गाममे मातृभाषासँ प्रेम केनिहार युवासब संगठीत भऽ अपना गाममे गणक सँगे घुमिकऽ विवरणमे अपन मातृभाषा लिखएवाक काजमे जुटि जाएव आवश्यक अछि । सबकियोके अपना–अपना ठामसँ जनगणनाक विवरणमे मातृभाषाप्रति सजग रहब जरुरी अछि । राज्य आ सरकारमे रहल बहुतो लोक एहन अछि जे सबहक मातृभाषामे नेपाली या हिन्दी लिखएवालेल चाहैत अछि । जौं एहि समयमे हमसब सजग नहि रहलहुँ त इतिहास ककरो माफ नई करत । माइयक दूध धिक्कारैत रहत सबके....। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। शि‍वकुमार झा टि‍ल्‍लू समीक्षा आशु कवि‍त्‍वक हृदयांतरि‍क कि‍लोल- कलानि‍धि‍ :: शि‍व कुमार झा ‘टि‍ल्‍लू’ महााकवि‍ वि‍द्यापति‍क वाद मैथि‍ली साहि‍त्‍यमे आशु कवि‍क जे श्रृंखला काव्‍य साहि‍त्‍यकेँ गति‍मान केलक ओइमे वि‍वि‍ध कारणसँ कि‍छु काव्‍य प्रति‍भा झाॅपले रहि‍ गेल। ओहेन आशु कवि‍मे कालीकान्‍त झा ‘बूच’ सेहो एकटा नाअों अछि‍। सन् 1934ईं.मे महान दार्शनि‍क उदयनाचार्यक जन्‍म ओ कर्मस्‍थली समस्‍तीपुर जि‍लाक करि‍यन गाममे जन्‍म नेनि‍हार कवि‍ कालीकान्‍त झा ‘बूच’ अपन काव्‍य साधनाक श्रीगणेश हि‍न्‍दी साहि‍त्‍यसँ कएलनि‍, परंच कि‍छुए हि‍न्‍दी कवि‍ताक रचनाक पश्श्चात अपन मातृभाषामे लि‍खए लगलथि‍, फेर हि‍न्‍दीमे लि‍खबाक कोनो जि‍ज्ञासा नै, कोनो योजना नै। कवि‍ आ पाठकक मध्‍य रचनाक अभि‍व्‍यक्‍ति‍क साधन मि‍थि‍ला मि‍हि‍र, माटि‍-पानि‍ आ मैथि‍ली भाषा सन पत्रि‍का छल। ऐ पत्रि‍का सभकेँ बन्न भेलापर कवि‍क कवि‍ता गामक कि‍छु लोकक मध्‍य मनोरंजन मात्रक साधन रहि‍ गेल, कवि‍ता पन्ना फाटल आ कवि‍क रचना गुम्‍म। बहुत रास रचना अप्रकाशि‍त रहि‍ लुप्‍त भऽ गेलनि‍। जे कि‍छु उपलब्‍ध भऽ सकल ओकरा वि‍देहक सौजन्‍यसँ श्रुति‍ प्रकाशन द्वारा प्रकाशि‍त कएल गेल। दुभाग्‍य अछि‍ जे कवि‍क मृत्‍यु 2009ईं.मे आ कवि‍ता संग्रह 2010ईं.मे। एकरा ककर दुर्भाग्‍य मानल जाए मैथि‍ली साहि‍त्‍य वा कवि‍क एकर ि‍नर्णए पाठक कऽ सकैत छथि‍। कि‍एक तँ सन् 1970ईं.सँ 1984र्इं.क मध्‍य मि‍थि‍ला मि‍हि‍रक लोक प्रि‍य कवि‍मे जनि‍क गणना होइत छल ओकर रचनाक केतौ कोनो चर्च नै, कोनो प्रोत्‍साहन नै। एे सभ उपहासक दंशसँ आकुल भऽ कवि‍ गंभीर आ वि‍चारमूलक रचना लि‍खब छोड़ि‍ भक्‍ति‍, हास्‍य आ चुटुक्काक संग-संग गामक वि‍याह सबहक अभि‍नंदन पत्र लि‍खए लगलथि‍। जइ कवि‍केँ कहि‍ओ मधुपजी सन कवि‍ चूड़ामणि‍क प्रशंसा पत्र भेटैत छल ओ मैथि‍लीक लेल अछोप बनि‍ गेल। मात्र डाॅ. दुर्गानाथ झा श्रीश, डाॅ. वि‍द्यापति‍ झा, डाॅ. नरेश कुमार वि‍कल सन कि‍छु साहि‍त्‍यकार कतौ-कतौ हि‍नक चर्च केने छथि‍, जइ लेल मैथि‍ली साहि‍त्‍य हि‍नका सभसँ कृतज्ञ रहत। श्री गजेन्‍द्र ठाकुरक वि‍शेष प्रयाससँ जे हि‍नक कवि‍ता संग्रह प्रकाशि‍त भेल, ओकर नाओं अछि‍- ‘कलानि‍धि‍’ कलानि‍धि‍क अर्थ होइछ चन्‍द्रमा, ऐ संसारकेँ छोड़ि‍ देलाक बाद संग्रह आएल तँए अाकाशीय पि‍ंड जकाँ मात्र दर्शनीय नाओं देल गेल। आशु कवि‍क कोनो बंधन नै छैक आ ने ओ अतुकांत कवि‍ता जकाँ योजना बना कऽ कवि‍ता लि‍खैत अछि‍ तँए समीक्षक लोकनि‍क दृष्‍टि‍मे कि‍छु कवि‍ता अप्रासंगि‍क भऽ सकैत अछि‍। कवि‍ ‘बूच’ कवि‍ताक रचना प्राय: गाबि‍ कऽ करैत छलाह, जखन जे फुरेलनि‍ गीत जकाँ लि‍खि‍ देलनि‍। तँए गोष्‍ठीक मंचपर सेहो मात्र गबैए  रहि‍ गेला। श्रृंगार, हास्‍य, वि‍रह, भक्‍ति‍ ओ वि‍चार मूलक कवि‍ता सभमे कोनो कालक बंधन नै अछि‍। भक्‍ति‍काल, रीति‍कालसँ लऽ कऽ उत्तर आधुनि‍क साहि‍त्‍यकाल धरि‍क परि‍वेशकेँ बूच अपन कवि‍ता सभमे समेटने छथि‍। तँए कि‍छु रचनाकेँ घसल-पि‍टल सेहो मानल जा सकैछ। अपन काव्‍य रचनाक श्री गणेश कवि‍ गंभीर लेखनसँ कएने छलाह, मुदा ऐठाम ‘सरस्‍वती वंदना’सँ कएल गेल। भक्‍ति‍ रसमे कवि‍ बहुत रास कवि‍ता लि‍खने छथि‍। रामचरि‍त मानसक हि‍नका वि‍शेष ज्ञान छलनि‍ तँए भक्‍ति‍ मूलक कवि‍तामे ओइ युगक घटना स्‍वभावि‍क अछि‍, मुदा मि‍थि‍लाक भक्‍ति‍ शक्‍ति‍ अराधना तँ मातृगीतकेँ वि‍शेष महत्‍व देल गेल। भऽ सकैछ ऐ प्रकारक वकि‍ता उत्तर आधुनि‍क मैथि‍ली साहि‍त्‍यक लेल वि‍शेष महत्‍वपूर्ण नै हुअए मुदा जइठाम भाषा सुशुप्‍त भऽ गेल हो ओइठाम भक्‍ति‍ मूलक गीत भाषाक समृद्धि‍क लेल अनि‍वार्य, कि‍एक तँ आर्य परि‍वारक सभ लग्‍नमे स्‍त्रीगण देवोपराधनाकेँ वि‍शेष महत्‍व दैत छथि‍। यएह कारण अछि‍ जे मैथि‍ली साहि‍त्‍यमे सभसँ लोकप्रि‍य पद्य वि‍द्यापति‍क बाप प्रदीप मैथि‍ली पुत्र जीक ‘जगदम्‍ब अहीं अवलम्‍ब हमर’ भेल अछि‍। कवि‍श्चकेँ सीताराम झा वा प्रदीप मैथि‍लीपुत्र जकाँ लोकप्रि‍यता नै भेटल मुदा हि‍नक भक्‍ति‍ पद्य सभमे जे झंकार अछि‍ ओकर अपन अलग अस्‍ति‍त्‍व मानल जाए- “सद्य: सुधा सि‍न्‍धु स्‍नात, मॉजल गंगा जलसँ गात सेवक खाति‍र तजलनि‍ नवरतनक रजधानी अय मणि‍द्वीपक महरानी अय ना.....।” जेना रवि‍ भूषण जी आमुखमे लि‍खने छथि‍ जे कवि‍ रामकेँ प्रवासी कहलनि‍ बनवसी नहि‍, ऐ प्रकारक दृष्‍टि‍कोण पि‍तृ: आज्ञा पालनाय अर्थात पि‍तृभक्‍ति‍ आ संबंधक मर्यादामे क्रांति‍कारी दृष्‍टि‍कोणकेँ वि‍शेष महत्‍व देवाक लेल आदरनीय मानल जाए- भ्‍क्‍ति‍ मूलक एकटा गजलमे राधा कृष्‍णक सि‍नेह केर अनुशासि‍त चि‍त्रण गजलमे भक्‍ति‍क बोर मैथि‍ली साहि‍त्‍यमे वि‍रले भेटैछ- श्‍याम होइछ परक प्रेम अधलाह हे, तेँ वि‍सरि‍ जाह हमरा वि‍सरि‍ जाह हे। कवि‍क श्रृंगार मूलक पद्यमे वि‍चार, अनुशासि‍त सि‍नेह, वैराग्‍य आ जीवन दर्शन मर्म स्‍पर्शी अछि‍। कतौ कोनो अवांछि‍त प्रेमकेँ प्रोत्‍साहन नै, कतौ अशोभनीय शब्‍द नै। भाषा सरल आशुगीत मुदा लोकप्रि‍यता लेल लि‍खल गेल चलन्‍त नै। अतुकांत कवि‍तामे बि‍म्‍ब वि‍श्लेषण करबाक लेल व्‍यवधान नै होइत छैक कि‍एक तँ ताल-मात्राक बंधन नै। आशु कवि‍तामे बंधन रहि‍तो जौं बि‍म्‍ब वि‍श्‍लेषण बोधगम्‍य आ हृदयान्‍तरि‍क स्‍पर्श करैत हुअए तँ कवि‍ता आर लोकप्रि‍य कि‍एक नै मानल जाए- “जाहि‍ बाटकेँ नित्‍य बहारी हम तीतल ऑचरसँ झारी जकरा अपनामे रखने अछि‍ हमर आँखि‍ ई कारी-कारी आइ ताहि‍ पर कि‍एक अलासि‍त गति‍सँ आबै छी रातु बीच चान पर तपि‍-तपि‍ ध्‍यान लगाबै छी...।” दोसर पद्य ‘वि‍रहि‍नी’मे कृष्‍णक अवाहनक आशमे अश्रुउच्‍छवाससँ आकुल राधाक “व्‍यथा रीति‍-प्रीति‍क हि‍लकोरसँ भरल मानल जाए- अहँक रूप राखि‍ नैन युग-युगसँ जागलि‍ छी मुरलीक मधुर बैन गुनि‍-गुनि‍ कऽ पागलि‍ छी परकीया पति‍ता हम प्रेमक पुजारि‍नकेँ नहि‍ चाही गीताक ज्ञान आऊ-आऊ रूसल हमर भगवान....।” एकदि‍श कवि‍ ‘तोहर ठोर’ कवि‍ताक माध्‍यमसँ प्रेमि‍काक सौन्‍दर्यक गुणगान ठोरकेँ केन्‍द्र बि‍न्‍दु बना कऽ करैत अछि‍। प्रेमी प्रेमि‍काक ठोरकेँ स्‍पर्थ जौं नैति‍क रूपसँ नै कऽ सकत तँ राहुक रूप धारण कऽ जबरदस्‍ती करत एहूमे जौं सफलता नै तँ भगवानसँ प्रार्थना कऽ कऽ पुर्नजन्‍ममे धान बनि‍ प्रेमि‍का पातपर चि‍ष्‍टान्न अर्थात् भात वा खीरक रूपेँ पड़त आ प्रेमि‍का स्‍वत: प्रेमी रूपी भातकेँ ठोरसँ सटा लेतीह- “बनव हम पुर्नजन्‍ममे धान, धानसँ भऽ जाएब चि‍ष्‍टान्न पड़ब पुनि‍ अहँक प्रतीक्षापात अछि‍ंजलसँ सद्य: स्‍नात....।” दोसर दि‍स कवि‍ समाजकेँ सि‍नेहमे मर्यादाक सीमा नै लंघबाक ि‍नर्देश सेहो दैत छथि‍- “नहि‍ श्रंृगार रौद्र हुंकारे हम एहि‍ पार अहाँ ओहि‍ पारे दुहूक बीच कठोर कर्तव्‍यक भरल अथाह भयंकार नाला सुरभि‍त अहँक सि‍नेहक माला...।” वि‍रह, श्रंृगारक स्‍पंदन होइत छैक, जौं वि‍रह नै हुअए तँ मि‍लन आनंदक अनुभूि‍त कोना कराएत। ऋृतु वर्णनकेँ मूलाधार बना कऽ कवि‍ ‘वसन्‍ते-वि‍रहि‍नी’ कवि‍ता लि‍खलक, अचल जीव अर्थात् गाछ-वृक्ष वसंतक नशामे मॉतलि‍ छथि‍ मुदा पति‍सँ दूर वि‍रहि‍नीक लेल वसंतक कोन प्रयोजन- “रहलहुँ शेष राति‍ भरि‍ जागलि‍, हुनक दोष की हम अभागलि‍ रसक अथाह सि‍न्‍धु छल उछलल प्राण मुदा बुन्ने लय वि‍ह्वल घर-घर अकाशे चन्ना धरती अन्‍हार गय.....।” अर्न्‍तमनक जुआरि‍केँ कि‍यो झाँपि‍ सकैत अछि‍, कवि‍क दृष्‍टि‍ भनहि‍ रवि‍क प्रकाशसँ दूर चालि‍ जाए, मुदा कवि‍ता जौं शान्‍तचि‍त्त भऽ कऽ पढ़ल जाए तँ अपन व्‍यक्‍ति‍गत जीवनकेँ कवि‍सँ झाँपब असंभव। ‘उदासी’ शीर्षक कवि‍तामे कवि‍ कि‍ए उदास अछि‍, चानक मुख ि‍कए मलीन भऽ गेल ई तँ नहि‍ कहल जा सकैत मुदा ककरो देल व्‍यथासँ कवि‍क मोन अवश्‍य हहरि‍ गेल छन्‍हि‍- “ककरा पर रूपसि‍ करी आश ई कल्‍पो वि‍टप बबूर भेल रोपल अभि‍सि‍चि‍ंत वर प्रवाल बढ़ि‍ जेठक ठुट्ठ खजूर भेल...।” यात्री, आरसी आ चन्‍द्रभानु जकाँ कवि‍ भौति‍कतामे अपन समाजक मध्‍य शि‍खर स्‍थान नै रखलक, अर्थयुगक देल पीड़ा एकरा इमानदार साधारण कर्मचारी लेल असहनीय तँए ‘करूण गीत’ बनि‍ उपटि‍ गेल- “कटि‍ रहल कि‍ए ई कला इन्‍दु घटि‍ रहल कि‍ए जीवन प्रकाश रजनीक रूदन वि‍गलि‍त प्रभात कऽ रहल कि‍ए अति‍शय उदास.....।” हि‍नक वि‍चार मूलक कवि‍ता सभमे सेहो सि‍नेहसँ वेशी वैराग्‍यक बोध होइत अछि‍। जीवनक अंति‍म अवस्‍था धरि‍ कवि‍ पारि‍वारि‍क र्धमे बान्‍हल रहल कोनो दबाबमे नै, अपन आत्‍मीयतासँ समाजकेँ सर्वे भवन्‍तु नि‍रामया रूपेँ ेदेखलक मुदा व्‍यक्‍ति‍गत जीवनमे ‘ठोप-ठोप चारक चुआठकेँ ऑगुरसँ उपछैत रहल छी’ लि‍खबाक कि‍ए आवश्‍यकता पड़ल? हास्‍य कवि‍ता पाठ सुनि‍ पाठक हँसैत छथि‍, वा मर्म स्‍पर्शी रचनापर कनैत छथि‍ परंच कवि‍सँ कि‍यो नै पुछैत अछि‍ जे ओ ऐ प्रकारक पद्य कि‍ए लि‍खलनि‍। बूचक व्‍यथा सेहो झॉपले चलि‍ गेल मुदा एतेक तँ हम नि‍श्‍चि‍त रूपेँ कहि‍ सकैत छी जे अपन जीवनक व्‍यक्‍ति‍गत संघर्षक संग-संग कवि‍ साहि‍त्‍यकार मंडलीमे अपन महत्‍व नै देख- ‘एकला चलो रे’क आधारपर अपन साहि‍त्‍यि‍क कृति‍केँ सेहो एकात कऽ लेलक- “दुनि‍या हमर एकातक गहवर भेल जीअत मुरूतक स्‍थापना एहि‍ जीवनमे...।” एकर परि‍णाम स्‍वरूप कवि‍ मैथि‍लीक अस्‍ति‍त्‍वपर सेाहे प्रश्नचि‍न्‍ह लगा देलक- “चन्‍दा सुमन यात्री मधुपक जुनि‍ करू ओ आबि‍ रहल अछि‍ हेती मैथि‍ली सभसँ कात......।” वास्‍तवमे कवि‍ मि‍थि‍ला-मैथि‍लीमे जाति‍, क्षेत्र आदि‍क आधारपर परसल भेदभावसँ आहत अछि‍, जाति‍वाद तँ सम्‍पूर्ण आर्यावत्तक अस्‍तत्‍वक कलंकि‍त कएने अछि‍, मुदा कोनो भाषामे जौं जाति‍क आधारपर भेद हएत तँ एकरा की कहल जाए? मैथि‍ली ऐ भंवरजालमे एना ओझरा गेल छथि‍ जे ब्राह्मणोमे भलमानुष आ जयवारक मध्‍य अभि‍व्‍यक्‍ति‍क अंतर आन जाति‍केँ रूढ़ि‍वादी भाषाधि‍कारी लोकनि‍ कोना मोजर देथि‍।  कवि‍ 1978ईं.मे जागरणगान लि‍ख अपन वयनानुरागकेँ पसरबाक प्रयास कएलनि‍- “असम वंग पंजाव गुजरात जागल अहीं टा पड़ल छी उठू औ अभागल हरण भऽ रहल अछि‍ हमर मीठ वयना कोना कऽ सि‍खत आन बोली ई मयना....।” स्‍वागत गानक वि‍षयमे आमुखमे रि‍व भूषणजी आ गजेन्‍द्र ठाकुरजी वि‍शेष चर्च केनहि‍ छथि‍। संभवत: ऐ प्रकारक स्‍वागतगान जकरा व्‍यथागान सेहो कहल जा सकैत छैक मैथि‍लीमे तँ नि‍श्चि‍त नै लि‍खल गेल हएत। गजेन्‍द्रजी कवि‍ बूचकेँ वि‍द्यापति‍क बाद सभसँ लयात्‍मक कवि‍ मानलनि‍ ऐ गप्‍पपर समालोचक लोकनि‍ नि‍श्चि‍त प्रश्न ठाढ़ करताह मुदा एतेक तँ अवश्‍य सत्‍य अछि‍ जे आरसी आ यात्रीक पश्चात एहेन समन्‍ववादी आशुकवि‍ मैथि‍ली साहि‍त्‍यमे नै भेटत। एखन कि‍छु लोक मि‍थि‍ला राज्‍यक लेल पगहा तोड़ि‍ कऽ चि‍चि‍आ रहल छथि‍। समाजक मध्‍य समन्‍वयवाद नै रहत तँ मि‍थि‍ला राज्‍यक कल्‍पना करब सेहो असंभव। अगि‍ला आसनपर बैसल लोककेँ समाजक कात लागल वर्ग जकर संख्‍या बारह आना अछि‍, मि‍थि‍ला राज्‍यक पुरौधा कोना मानत, कि‍एक तँ ऐ उपेक्षि‍त लोक सभकेँ मैथि‍ल मानले नै गेल। ऐ वि‍षयपर कवि‍ 30 वर्ष पहि‍नहि‍ ‘मि‍थि‍ला दु:दशा’ नाओंसँ कवि‍ता लि‍खलक- “राज्‍यक की बात कठि‍न पाॅचोटा गाॅव गय....।” कवि‍क पोटरीमे पलायनवादक वि‍रोध सेहो अछि‍। बाल साहि‍त्‍य सन वि‍षयपर ‘दीनक नेना’ सन मर्म स्‍पर्शी आ ‘पोताक अट्ठाहास’ सन हास्‍य कवि‍ता लि‍ख कवि‍ प्रमाणि‍त केलक जे बाल साहि‍त्‍य ओछ वि‍षय बि‍म्‍ब नै थि‍क। भऽ सकैछ कि‍छु हास्‍य कवि‍ताकेँ लोक मात्र मंचक गबैयाक गीत बुझथु मुदा ओहू सभमे गंभीर दृष्‍टि‍कोण झापल छैक- मात्र अपन संस्‍कृति‍क वि‍स्‍मयकारी वि‍षय दृष्‍टि‍कोणपर कवि‍ प्रहारेटा नै केलक आ मात्र काटर प्रथा सन कलंककेँ उघारे नै केलक संग-संग अपन संस्‍कृति‍क सि‍क्कड़ि‍केँ सेहो ‘अप्‍पन मि‍थि‍ला’ कवि‍तामे पि‍जौलक, परंच ओइमे लागल जगपर कवि‍ व्‍यथि‍त सेहो भेल- “गंगो दीदी चाह बनावथि‍, कमला बेटी पान लगावथि‍ कोशी वहि‍ना धान कुटै छथि‍ वागमती सि‍दहा फटकै छथि‍ घऽरक लक्ष्‍मी वि‍हुंसथि‍ मॉझ ओसार अप्‍पन मि‍थि‍ला.....।” ओना ई गप्‍प ओतबे सत्‍य सेहो अछि‍ जे कवि‍ कि‍दु नि‍रर्थक कवि‍ता सेहो लि‍खने छथि‍। जकर देशकालक दशासँ कोनो संबंध नै। जेना डहकन, हमर गाम अादि‍। ऐ प्रकारक कवि‍ताकेँ साहि‍त्‍यक वि‍कासमे कोनो योगदान नै, वरन् व्‍यर्थ अपन कवि‍त्‍वकेँ नष्‍ट करब मानल जाए, मुदा इहो गप्‍प ओतबे सत्‍य जे आशु कवि‍क कोनो सीमा नै होइत छैक। बहिर्मुखी व्‍यक्‍ति‍त्‍वक बूच अपन रचनामे अर्न्‍तमुखी बनि‍ वि‍शेष अर्थ राखएबला कवि‍ता सभ लि‍खैत छलाह। मुदा हि‍नक अन्‍तर्तममे स्‍वांग नै अछि‍ कतौ कि‍लोल नै कएलनि‍ जे हमहूँ कवि‍ छी, मुदा अपन समन्‍वयवादी दृष्‍टि‍कोणकेँ अात्‍मामे नुका कऽ नै राखि‍ सकलथि‍‍ आ हृदयांतरि‍क कि‍लोल कवि‍ताक माध्‍यमेँ बाहर नि‍कलि‍ गेल। वि‍देहक सम्‍पादक गजेन्‍द्र ठाकुर, सह सम्‍पादक उमेश मण्‍डल आ श्रुति‍ प्रकाशन धन्‍यवादक पात्र छथि‍ जे ऐ उपेक्षि‍त अभि‍शप्‍त कवि‍क बचल-खुचल रचनाकेँ प्रकाशमे अनलनि‍, नै तँ अगि‍ला पीढ़ीक गप्‍प के कहए वर्तमान पीढ़ीक कि‍छु लोकेँ छोड़ि‍ ई कि‍यो नै जनैत अछि‍ जे ‘बूच’ मैथि‍लीक कवि‍ छलाह। ऐ लेल ककरा दोष देल जाए कवि‍क अथवा साहि‍त्‍यक हथि‍यार नेने मैथि‍लीक रथपर सवार महारथी लोकनि‍केँ? एकर ि‍नर्णय पाठक कऽ सकै छथि‍। पोथीक नाअों- कलानि‍धि‍ रचनाकार- कालीकान्‍त झा ‘बूच’ प्रकाशक- श्रुति‍ प्रकाशन प्रकाशन वर्ष- 2010 दाम- 150 टाका मात्र। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। जगदीश प्रसाद मण्‍डल नाटक जगदीश प्रसाद मण्‍डल नाटक झमेलि‍या बि‍याह पहि‍ल दृश्‍य (भागेसर, सुशीला) (रोग सज्‍जापर सुशीला। दवाइ आ पानि‍ नेने भागेसरक प्रवेश।) भागेसर-         केहेन मन लगैए? सुशीला-         की कहब। जखन ओछाइनेपर पड़ल छी, तखन भगवानेक हाथ छन्‍हि‍। राजा-दैवक कोन ठेकान? भागेसर-         से की? सुशीला-         उठि‍ कऽ ठाढ़ो भऽ सकै छी, सुतलो रहि‍ सकै छी। भागेसर-         एना कि‍अए बजै छी। कखनो मुँहसँ अवाच कथा नै नि‍काली। दुरभखो वि‍षाइ छै। सुशीला-         (ठहाका दऽ) बताह छी, अगर दुरभाखा पड़तै तँ सुभाखा कि‍अए ने पड़ै छै? सभ मन पति‍अबैक छी। भागेसर-         अच्‍छा पहि‍ने गोटी खा लि‍अ। सुशीला-         एते दि‍नसँ दवाइ करै छी कहाँ एकोरत्ती मन नीक होइए? भागेसर-         बदलि‍ कऽ डाॅक्‍टर सहाएब गोटी देलनि‍। हुनका बुझबेमे फेर भऽ गेल छलनि‍। सभ बात बुझा कऽ कहलनि‍। (गोटी खा पानि‍ पीब पुन: सि‍रहौनीपर माथ रखि‍।) सुशीला-         की सभ बुझा कऽ कहलनि‍? भागेसर-         कहलनि‍ जे एक्के लक्षण-कर्मक कते रंगक बेमारी होइए। बुझैमे दुवि‍धा भऽ गेल। तँए आइसँ दोसर बेमारीक दवाइ दइ छी। सुशीला-         (दर्दक आगमन होइत पँजरा पकड़ि‍।) ओह, नै बाँचब। पेट बड़ दुखाइए। भागेसर-         हाथ घुसकाउ ससारि‍ दइ छी। (सुशीला हाथ घुसकबैत। भागेसर पेट ससारए लगैत कनी कालक पछाति‍।) सुशीला-         हँ, हँ। कनी कऽ मन असान भेल। भागेसर-         मनसँ सोग-पीड़ा हटाउ। रोगकेँ दवाइ छोड़ाओत। भरि‍सक दवाइ आ रोगक भि‍ड़ानी भेलै तँए दर्द उपकल। सुशीला-         भऽ सकैए। कि‍अए तँ देखै छि‍ऐ जे भुखल पेटमे छुछे पानि‍ पीलासँ पेट ढकर-ढकर करए लगैए। भरि‍सक सएह होइए। भागेसर-         भगवानक दया हेतनि‍ तँ सभ ठीक भऽ जाएत। सुशीला-         कि‍अए भगवानो लोके जकाँ वि‍चारि‍ कऽ काज करै छथि‍न। भागेसर-         अखैन तक एतबो नै बुझै छि‍ऐ। सुशीला-         हमरा मनमे सदि‍खन चि‍न्‍ते कि‍अए बैसल रहैए। खुशीकेँ कतए नुका कऽ राखि‍ देने छथि‍। आ कि‍.....? भागेसर-         कि‍ आ कि‍? सुशीला-         नै सएह कहलौं। कि‍यो ठहाका मारि‍ हँसैए आ हमरा सबहक हँसि‍ये हराएल अछि‍। भागेसर-         हराएल ककरो ने अछि‍। माइटि‍क तरमे तोपा गेल अछि‍। सुशीला-         ओ नि‍कलत केना? भागेसर-         खुनि‍ कऽ। सुशीला-         कथीसँ खुनबै? भागेसर-         से जे बुझि‍तौं तँ एहि‍ना थाल-पाि‍नमे जि‍नगी बीतैत। सुशीला-         जखन अहाँ एतबो नै बुझै छि‍ऐ तँ पुरूख कोन सपेतक भेलौं। अच्‍छा ऐले मनमे दुख नै करू। नीक-अधलाक बात-वि‍चार दुनू परानी नै करब तँ आनक आशासँ काज चलत। भागेसर-         (मूड़ी डोलबैत जना महसूस करैत, मुँह चि‍कुरि‍अबैत।) कहलौं तँ ओहन बात जे आइ धरि‍ हराएल छलै मुदा ई बुझब केना? (भागेसरक मुँहसँ बतीसो दाँत सोझ आएल, जइसँ पत्नी हँसी बुझि‍।) सुशीला-         अहाँक खुशी देख अपनो मन खुशि‍या गेल। भागेसर-         मन कहाँ खुशि‍आएल अछि‍। सुशीला-         तखन? भागेसर-         बतीसयासँ सठि‍या गेल अछि‍। वएह कलपि‍-कलपि‍, कुहरि‍-कुहरि‍ कुकुआ रहल अि‍छ। सुशीला-         छोड़ू ऐ लट्टम-पट्टाकेँ। जेकरा पलखैत छै ओ करैत रहह। अपन दुख-सुखक गप करू। भागेसर-         कना दुख-सुखक गप अखैन करब। मन जड़ाएल अछि‍ हुअए ने हुअए.......? सुशीला-         की? भागेसर-         जड़ाएले मनक ताउसँ बौराइ छै। पहि‍ने देहक रोग भगाउ तखैन नि‍चेनसँ वि‍चार करब। सुशीला-         बेस कहलौं। भि‍नसरेसँ झमेलि‍याकेँ नै देखलि‍ऐ हेन? भागेसर-         बाल-बोध छै कतौ खेलाइत हेतै। भुख लगतै अपने ने दौड़ल आओत। सुशीला-         ऐ देहक कोनो ठेकान नै अछि‍। तहूमे बेमारी ओछाइन धरौने अछि‍। जीता जि‍नगी पुतोहू देखा दि‍अए? भागेसर-         मन तँ अपनो तीन सालसँ होइए जे बेटा-बेटी करजासँ उरीन रहब तखन जे मरि‍यो जाएब तँ करजासँ उरीन मनकेँ मुक्‍ति‍ हएत। सुशीला-         सएह मनमे उपकल जे बेटीक बि‍याह कइये नेने छी। जँ परानो छुटि‍ जाएत तँ बि‍नु बरो-बरि‍यातीक लहछू करा अंगबला अंग लगा लेत। मुदा.....? भागेसर-         मुदा की? सुशीला-         यएह जे झमेलि‍योक बि‍याह कइये लि‍अ। भागेसर-         अखन तँ लगनो-पाती नहि‍ये अछि‍। समए अबै छै तँ बुझल जेतै। (झमेलि‍याक प्रवेश।) झमेलि‍या-         माए, माए मन नीक भेलौं कि‍ने? सुशीला-         बौआ, लाखो रोग मनसँ मेटा जाइए, जखने तोरा देखै ि‍छयह। भि‍नसरेसँ नै देखलि‍अ कतए गेल छेलहहेँ? झमेलि‍या-         इसकूलक फीलपर एकटा गुनी आएल छलै। बहुत रास कीदैन-कहाँ सभ झारामे रखने छलै। डमरूओ बजबै छलै आ गाबि‍-गाबि‍ कहबो करै छलै। सुशीला-         कि‍ गबै छलै? झमेलि‍या-         लाख दुखक एक दवाइ। पाँचे रूपैया दामो छलै। सुशीला-         एकटा नेने कि‍अए ने एहल? झमेलि‍या-         हमरा पाइ छलए? सुशीला-         केमहर गेलै? झमेलि‍या-         मारन बाध दि‍सक रस्‍ता पकड़ि‍ चलि‍ गेल। सुशीला-         बौआक बि‍याह करा दि‍यौ? (वि‍याहक नाआंे सुनि‍ झमेलि‍याक मुँहसँ खुशी नि‍कलैत।) भागेसर-         वि‍याहैओ जोकर तँ भइये गेल अछि‍। कहुना-कहुना तँ बारहम बर्ख पार कऽ गेल हएत? सुशीला-         पैछला भुमकमकेँ कते दि‍न भेल हएत। ओही बेर ने जनमल? भागेसर-         सेहो कि‍ नीक जकाँ साल जोड़ल अछि‍। मुदा अपना झमेलि‍यासँ छोट-छोट सभकेँ बि‍याह भेलै तँ झमेलि‍यो भेइये गेल कि‍ने? @ दोसर दृश्‍य (सुरूज डूबैक समए। बाढ़नि‍ लऽ झमेलि‍या आंगन बाहरए लगैत। सुशीला आबि‍ बाढ़नि‍ छि‍नैत।) सुशीला-         जाबे जीबै छी ताबे तोरा केना आंगन-घर बहारए दि‍औ। झमेलि‍या-         कि‍अए, ककरो अनकर छि‍ऐ? अपन घर-आंगन बहारब कोनो पाप छी। सुशीला-         धरम आ पाप नै बुझै छी। मुदा एते तँ जरूर बुझै छी जे भगवानेक बाँटल काज छि‍यनि‍ ने। पुरूख आ स्‍त्रीगणक काज फुट-फुट अछि‍। झमेलि‍या-         राजा-दैवक काज ऐसँ फुट अछि‍। सभ दि‍न कहाँ बहारए अबै छलौं। अखन तू दुखि‍त छेँ, जखन नीक भऽ जेमे तखन ने तोहर काज हेतौ। सुशीला-         सएह बुझै छि‍ही, ई नै बुझै छि‍ही जे काजे पुरूख-सत्रीगणक अन्‍तर कऽ ठाढ़ रखने अछि‍। भलहि‍ं बेटा छि‍ऐ एहेन-एहेन बेरमे तू नै देखमे तँ दोसर केकर आशा। मुदा.......? झमेलि‍या-         मुदा की? सुशीला-         यएह जे माए-बाप बेटा-बेटीक पहि‍ल गुरू होइ छै। हि‍नके सि‍खैलासँ बेटा-बेटी अपन जि‍नगीक रास्‍ता धड़ैए। (माइयक आगू झमेलि‍या ओहि‍ना देखैत अछि‍ जहि‍ना रोगसँ ग्रसि‍त माए अपन दूधमुँह बच्‍चा देख हुकड़ैत अछि‍। तहि‍ना हाथक बाढ़नि‍ नि‍च्‍चा मुँहे केने सुशीला झमेलि‍याक चेहरापर रखि‍ जना पढ़ि‍ रहल हुअए कि‍ ऐ कुल-खनदान आ परि‍वारक संग माइयो बापक तँ यएह माइटि‍क काँच दि‍आरी छी जे अबैत दोसर दि‍आरीकेँ लेसि‍ टि‍मटि‍माइत रहत। तइकाल भागेसर आ यशोधरक प्रवेश।) भागेसर-         (झमेलि‍यासँ) बौआ साँझ पड़ल जाइ छै, दुआर-दरवज्‍जाक काज देखहक। झमेलि‍या-         दरबज्‍जा बहारि‍ आंगन बहारए एलौं कि‍ माए बाढ़नि‍ छीन लेलक। (बि‍ना कि‍छु बजनहि‍ भागेसर नीक-अधला वि‍चार करए लगल।) (कनीकाल बाद।) भागेसर-         (पत्नीसँ) मन केहेन अछि‍? सुशीला-         अहूँ बुझि‍ते छी आ अपनो बुझि‍ते छी जे साल भरि‍ दवाइ खाइले डॉक्‍टर सहाएब कहलनि‍ से नि‍महत। जइठीन मथटनकीक एकटा गोटी नै भेटै छै तइठीन साल भरि‍ पथ-पानि‍क संग दवाइ खाएब......? (बहीनक बात सुनि‍ यशोधरकेँ देह घमा गेल। चाइनि‍क पसीना पोछैत।) यशोधर-         बहीन, भगवानो आ कानूनो ऐ परि‍वार जबाबदेह बनौने छथि‍। जाबे जीबै छी ताबे एहेन बात कि‍अए बजै छह? सुशीला-         भैया, अहाँ कि‍अए.....? खाइर छोड़ू काजक की भेल? यशोधर-         बहीन, मने-मन हँसि‍यो लगैए आ मनो कचोटैए। मुदा.......? सुशीला-         मुदा की? यशोधर-         (मुस्‍की दैत) पनरह दि‍नमे पएरक तरबा खि‍आ गेल मुदा काजक गोरा नै बैसल। एकटा लड़कीक भाँज नवानीमे लागल। गेलौं। दरबज्‍जापर पहुँच घरवारी अवाज दैते आंगनसँ नि‍कललाह। (बि‍चहि‍मे भागेसर मुस्‍की देलनि‍।) सुशीला-         कथो-कुटुमैतीकेँ हँसि‍येमे उड़ा दइ छऐ? यशोधर-         हँसीबला काजे भेल। तँए हँसी लगलनि‍। सुशीला-         की हँसीबला काज भेल? यशोधर-         दरबज्‍जापर बैस गप चलेलौं कि‍ जहि‍ना हवाक सि‍हकीमे पाकल आम झड़भड़ा जाइत तहि‍ना स्‍त्रीगण सभ आबए लगलीह। सुशीला-         स्‍त्रीगणे अबए लगली आ पुरूख नै? यशोधर-         स्‍त्रीगण बेसी पुरूख कम। एकटा स्‍त्रीगण बि‍चहि‍मे टभकि‍ गेलीह। सुशीला-         की टपकली? यशोधर-         (मुस्‍की दैत) हँसि‍यो लगैए आ छगुन्‍तो लगैए। बजली जे बर पेदार अछि‍ कि‍ जे आनठाम कन्‍यागत जाइत छथि‍ आ अहाँ......? सुनि‍ते मनमे नेसि‍ देलक। उठि‍ कऽ वि‍दा भऽ गेलौं। सुशीला-         स्‍त्रीगणेक बात सुनि‍ अगुता गेलौं। परि‍वारमे बेटा-बेटीक बि‍याह पैघ काज छऐ पैघ काजक रास्‍तामे छोट-छोट हुच्‍ची-फुच्‍चीपर नजरि‍ नै देबाक चाहि‍ऐ। यशोधर-         एतबे टा नै ने, गामो नीक नै बुझि‍ पड़ल। आमक गाछीसँ बेसी तरबोनी खजुर बोनी। एहेन गामक स्‍त्रीगण तँ भरि‍ दि‍न नहाइये आ झुटकासँ पएरे-मजैमे बीता देत। तखन घर-आश्रमक काज केना हएत। सोझे उठि‍ कऽ रास्‍ता धेलौं। सुशीला-         आगू कतए गेलौं? यशोधर-         ननौर। गाम तँ नीक बुझाएल। मुदा राजस्‍थाने जकाँ पानि‍क दशा। खाइर कोनो कि‍ बेटीक बि‍याह करब। बेटाक करब। बैसि‍ते गप-सप्‍प चलल। घरवारी कुल-गोत्र पुछलनि‍। कहलि‍यनि‍। सोझे सुहरदे मुँहे कहलनि‍, कुटुमैती नै हएत। ‍ सुशीला-         कि‍अए, से नै पुछलि‍यनि‍? यशोधर-         कि‍ पुछि‍ति‍यनि‍। उठि‍ कऽ वि‍दा भेलौं। सुशीला-         भैया, दि‍न-दुनि‍याँ एहने अछि‍। कते दि‍न छी आ कि‍ नै छी। मन लगले रहि‍ जाएत। यशोधर-         कोनो कि‍ बेटीक अकाल पड़ि‍ गेल जे भागि‍नक बि‍याह नै हएत। सुशीला-         डाॅक्‍टर सहाएब ऐठाम कते गोटे पेटक बच्‍चा जँचबए आएल रहए। यशोधर-         ओ सभ वि‍याहक दुआरे खुरछाँही कटैए। मुदा.....? सुशीला-         मुदा की? यशोधर-         माइयो-बापक सराध छोड़ि‍ देत। वि‍याहसँ कि‍ हल्‍लुक काज सराधक छै। सुशीला-         ठनका ठनकै छै तँ कियो अपना मत्‍थापर दइ छै। ई तँ बुझै छी जे, जे 'गाए मारि‍ कऽ जूत्ता दान' कहलो जाइ छै। मुदा बुझनहि‍ कि‍ हएत। आगूओ बढ़लौं? यशोधर-         छोड़ि‍ केना देब। तेसर ठाम गेलौं तँ पुछलनि‍ जे लड़का गोर अछि‍ कि‍ कारी? सुशीला-         कि‍अए एहेन बात पुछलनि‍? यशोधर-         लोकक माथमे भुस्‍सा भरि‍ गेल छै। एतबो बुझैले तैयार नै जे मनुक्‍खक मनुखता गुणमे छि‍पल छै नै कि‍ रंगमे। सुशीला-         (नि‍राश मने) कि‍ झमेलि‍या ओहि‍ना रहि‍ जाएत। सृष्‍टि‍ ठमकि‍ जाएत? यशोधर-         अखन लगन जोड़ नै केलकै हेन, तँए। जहि‍ना संयोग आबि‍ जेतै तहि‍या सभ ओहि‍ना मुँह तकैत रहत आ बि‍याह भऽ जेतै। यशोधर-         बहीन, ऐ लेल मनमे दुख करैक काज नै । जखन काजमे भीड़ गेलौं तँ कइये कऽ अंत करब। ओना एकटा लगलगाउ बुझि‍ पड़ल। सुशीला-         की लगलगाउ? यशोधर-         ओ कहलनि‍ जे अहूठामक परि‍वार, परि‍वारक काज देख लि‍यौ आ ओहूठामक देख कऽ, काज सम्‍हारि‍ लेब। भागेसर-         ई काज हेबे करत। अपनो ब्रह्म कहैए जे एक रंगाह परि‍वार (एक व्‍यवसायसँ जुड़ल)मे कुटुमैती भेने परि‍वारमे हड़हड़-खटखट कम हएत? सुशीला-         (मूड़ी डोलबैत) हँ, से तँ हएत। मुदा वि‍धताक चूक भेलनि‍ जे मनुक्‍खोकेँ सींघ नाङ कि‍अए ने देलखि‍न। @ तेसर दृश्‍य (राजदेवक घर। पोता श्‍यामकेँ पढ़बैत।) राजदेव-         बौआ, स्‍कूलमे कते शि‍क्षक छथि‍? श्‍याम-           थर्टिन गोरे। राजदेव-         ऐ बेर कोनमे जाएब? श्‍याम-           थ्रीमे। (हाथमे अखवार नेने कृष्‍णानन्‍दक प्रवेश।) कृष्‍णानन्‍द-        कक्का, एकटा दुखद समाचार अपनो समाजक अछि‍? राजदेव-         (जि‍ज्ञासासँ) से कि‍, से कि‍? कृष्‍णानन्‍द-        (अखवार उनटबैत। आंगुरसँ देखबैत।) देखि‍यौ। चि‍न्है छि‍ऐ एकरा? राजदेव-         (दुनू आँखि‍ तरहत्‍थीसँ पोछि‍ गौरसँ देखए लगैत।) ई तँ चि‍न्‍हरबे जकाँ बुझि‍ पड़ैए। कनी गौरसँ देखए दाए हाथमे तानल बन्‍दूक जकाँ बुझि‍ पड़ैए। कृष्‍णानन्‍द-        हँ, हँ कक्का, पुरानो आँखि‍ अछि‍ तैयो चि‍न्हि‍ गेलि‍ऐ। राजदेव-         कनी आरो नीक जकाँ देखए जाए। गामक तँ एक्के गोरे सीमा चौकीपर रहैए। ब्रह्मदेव। कृष्‍णानन्‍द-        (दुनू आँखि‍क नोर पोछैत।) हँ, हँ कक्का। हुनके छातीमे गोली लगलनि‍। मुँह देखै छि‍ऐ खुजल। देश भक्‍ति‍क नारा लगा रहलाहेँ। राजदेव-         (ति‍लमि‍लाइत।) बौआ, तोरे संगे ने पढ़ै छेलह। कृष्‍णानन्‍द-        संगि‍ये छेलाह। अपना क्‍लासमे सभ दि‍न फस्‍ट करै छलाह। हाइये स्‍कूलसँ मनमे रोपि‍ नेने छेलाह जे देश भक्‍त बनब। से नि‍माहि‍यो लेलनि‍। राजदेव-         बौआ, देश भक्‍तक अर्थ संकीर्ण दायरामे नै वि‍स्‍तृत दयरामे छै। ओना अपन-अपन पसन आ अपन-अपन वि‍चार सभकेँ छै। कृष्‍णानन्‍द-        कनी फरि‍छा कऽ कहि‍यौ? राजदेव-         देखहक, खेतमे पसीना चुबबैत खेति‍हर, सड़कपर पत्‍थर फोड़ैत बोनि‍हार, धारमे नाओ खेबैत खेबनि‍हार सभ देश सेवा करैत अछि‍, तँए देशभक्‍त भेलाह। कृष्‍णानन्‍द-        (नमहर साँस छोड़ैत।) अखन धरि‍ से नै बुझै छलि‍ऐ। राजदेव-         नहि‍यो बुझैक कारण अछि‍। ओना देश सीमाक रक्षा बाहरी दुश्मनक (आन देशक) रक्षाक लेल होइत अछि‍। मुदा जँ मनुष्‍यमे एक-दोसराक संग प्रेम जगत तँ ओहुना रक्‍छा भऽ सकैए। मुदा से नै अछि‍। कृष्‍णानन्‍द-        (मूड़ी डोलबैत।) हँ से तँ नहि‍ये अछि‍। राजदेव-         मुदा देशक भीतरो कम दुश्‍मण नै अछि‍। एहेन-एहेन रूप बना मासूम जनताक संग कम गद्दारी केनि‍हारोक कमी नै अछि‍। कृष्‍णानन्‍द-        से केना? राजदेव-         देखते छहक जे जइ देशमे खाइ बेतरे लोक मरैए, घर दवाइ, पढ़ै-लि‍खैक तँ बात छोड़ह। तइ देशमे ढोल पीटनि‍हार देश सेवक सभ अपन सम्‍पत्ति‍ चोरा-चोरा आन देशमे रखने अछि‍ ओकरा कि‍ बुझै छहक? कृष्‍णानन्‍द-        हँ, से तँ ठीके कहै छी। राजदेव-         केहेन नाटक ठाढ़ केने अछि‍ से देखै छहक। आजुक समैमे सभसँ पैघ आ सभसँ भयंकर प्रश्न देशक सोझा ई अछि‍ जे सभकेँ जीबै आ आगू बढ़ैक समान अवसर भेटै। कृष्‍णानन्‍द-        हँ, से तँ जरूरि‍ये अछि‍। राजदेव-         एक्के दि‍स एहेन बात नै ने अछि‍? कृष्‍णानन्‍द-        तब? राजदेव-         समाजोमे अछि‍। कनी गौर कऽ कऽ देखहक। पैछले बर्ख ने ब्रहमदेवक बि‍याह भेल छलै? कृष्‍णानन्‍द-        एक्कोटा सन्‍तान तँ नै भेलैक अछि‍। कृष्‍णानन्‍द-        नै। हमरा बुझने तँ भरि‍सक दुनू परानीक भेँटो-घाँट तेना भऽ कऽ नै भेल हेतै। कि‍अए तँ गाम अबि‍ते खबड़ि‍ भेलै जे सीमापर उपद्रव बढ़ि‍ गेल, तँए सबहक छुट्टी केन्‍सि‍ल भऽ गेल। बेचारा बि‍याहक भोरे बोरि‍या-वि‍स्‍तर समेटि‍ दौड़ल। राजदेव-         अखन तँ नव-धब घटना छै तँए जहाँ-तहाँ वाह-वाही हेतै। मुदा प्रश्न वाह-वाहीक नै प्रश्न जि‍नगीक अछि‍। बेटाक सोग माए-बापक आ पति‍क दुख स्‍त्रीकेँ नै हेतै? कृष्‍णानन्‍द-        हेबे करतै। राजदेव-         एना कि‍अए कहै छह जे हेबे करतै। जहि‍ना एक दि‍स मनुष्‍य कल्‍याणक धरम हेतै तहि‍ना दोसर दि‍स माए-बाप अछैत बेटा मृत्‍युक दोष, समाज सेहो देतनि‍। कृष्‍णानन्‍द-        (गुम होइत मूड़ी डोलबए लगैत।) राजदेव-         चुप भेने नै हेतह। समस्‍याकेँ बुझए पड़तह। जे समाजमे केना समस्‍या ठाढ़ कएल जाइए। तोंही कहह जे ओइ दूध-मुँहाँ बच्‍चि‍याक कोन दोख भेलै। कृष्‍णानन्‍द-        से तँ कोनो नै भेलै। राजदेव-         समाज ओकरा कोन नजरि‍ये देखत? कृष्‍णानन्‍द-        (मूड़ी डोलबैत।) हूँ-अ-अ। राजदेव-         हुँहकारी भरने नै हेतह। भारी बखेरा समाज ठाढ़ केने अछि‍। ओइ, बच्‍चि‍याक भवि‍ष्‍य देखनि‍हार कि‍यो नै अछि‍, मुदा......? कृष्‍णानन्‍द-        मुदा की? राजदेव-         यएह जे, एक दि‍स कलंकक मोटरीसँ लादि‍ देत तँ दोसर दि‍स जीनाइ कठि‍न कऽ देत। कृष्‍णानन्‍द-        हँ, से तँ करबे करत। राजदेव-         तोही कहह, एहेन समाजमे लोकक इज्‍जत-आवरू केना बचत? कृष्‍णानन्‍द-        (मूड़ी डोलबैत। नमहर साँस छोड़ि‍।) समस्‍या तँ भारी अछि‍। राजदेव-         नै, कोनो भारी नै अछि‍। सामाजि‍क ढर्ड़ाकेँ बदलए पड़त। वि‍घटनकारी सोच आ काजकेँ रोकि‍ कल्‍याणकारी सोच आ काज करए पड़त। तखने हँसैत-खेलैत जि‍नगी आ मातृभूमि‍केँ देखत। कृष्‍णानन्‍द-        (मुस्‍की दैत।) संभव अछि‍। राजदेव-         ई काज केकर छि‍ऐ? कृष्‍णानन्‍द-        हँ, से तँ अपने सबहक छी। राजदेव-         हँ। ऐ दि‍शामे एक-एक आदमीकेँ डेग बढ़बैक जरूरत अछि‍। @ चारि‍म दृश्‍य (भागेसर दरबज्‍जा सजबैत। बहाड़ि‍-सोहाड़ि‍ चारि‍टा कुरसी लगबैत। कुरसी सजा भागेसर चारूकात नि‍हारि‍-नि‍हारि‍ गौर करैत। तहीकाल बालगोवि‍न्‍द आ राधेश्‍यामक प्रवेश।) भागेसर-         (कुरसीपर सँ उठि‍।) आउ, आउ। (कुरसीपर तीनू गोरे बैसैत।) बालगोवि‍न्‍द-       (राधेश्‍यामसँ।) बौआ, बेटी हमर छी, वहीन तँ तोरे छि‍अ। अखन समए अछि‍ तँए......? भागेसर-         अपने दुनू बापूत गप-सप्‍प करू। (उठि‍ कऽ भीतर जाइत।) राधेश्‍याम-        अहाँक परोछ भेने ने......। जाबे अहाँ छि‍ऐ, ताबे हम.....। भागेसर-         नै, नै। परि‍वारमे सभकेँ अपन-अपन मनोरथ होइ छै। चाहे छोट भाए वा बेटाक बि‍याह होउ आकि‍ बेटी-बहीनक होउ। राधेश्‍याम-        हँ, से तँ होइते अछि‍। मुदा अहाँ अछैत जते भार अहाँपर अछि‍ ओते थोड़े अछि‍। तखन तँ बहीन छी, परि‍वारक काज छी, कोनो तरहक गड़बड़ भेने बदनामी तँ परि‍वारेक होइत अछि‍। बालगोवि‍न्‍द-       जाधरि‍ अंजल नै केलौंहेँ ताधरि‍ दरबज्‍जा खुजल अछि‍। मुदा से भेलापर बान्ह पड़ि‍ जाइत अछि‍। तँए......? राधेश्‍याम-        हम तँ परदेश खटै छी। शहरक बेबहार दोसर रंगक अछि‍। गामक की बेबहार अछि‍ से नीक जकाँ थोड़े बुझै छी। मुदा तैयो......? बालगोवि‍न्‍द-       मुदा तैयो कि‍? राधेश्‍याम-        ओना तँ बहुत मि‍लानीक प्रश्न अछि‍ मुदा कि‍छु एहेन अछि‍ जेकर हएब आवश्यक अछि‍? बालगोवि‍न्‍द-       आब कि‍ तोहूँ बाल बोध छह, जे नै बुझबहक। मनमे जे छह से बाजह। मन जँचत कुटुमैती करब नै जँचत नै करब। यएह तँ गुण अछि‍ जे अल्‍पसंख्‍यक नै छी। राधेश्‍याम-        कि‍ अल्‍पसंख्‍यक? बालगोवि‍न्‍द-       जइ जाति‍क संख्‍या कम छै ओकरा संगे बहुत रंगक बि‍हंगरा ठाढ़ होइत अछि‍। मुदा जइ काजे एलौंहेँ तेकरा आगू बढ़ाबह। कि‍ कहलहक? राधेश्‍याम-        कहलौं यएह जे कमसँ कम तीनक मि‍लानी अवस होइ। पहि‍ल गामक दोसर परि‍वारक आ तेसर लड़का-लड़कीक। बालगोवि‍न्‍द-       जँ तीनूक नै होइ? राधेश्‍याम-        तँ दुइयोक। बालगोवि‍न्‍द-       अपन परि‍वारक बेबहार छह तेहने अहू परि‍वारक अछि‍। गामो एकरंगाहे बुझि‍ पड़ैए। लड़का-लड़की सोझेमे छह। राधेश्‍याम-        तखन कि‍अए काज रोकब? (जगमे पानि‍ आ गि‍लास नेने आबि‍, टेबुलपर गि‍लास रखि‍ पानि‍ आगू बढ़बैत। गि‍लास हाथमे रखि‍।) बालगोवि‍न्‍द-       नीक होइत जे पहि‍ने काजक गप अगुआ लेतौं। भागेसर-         अखन धरि‍ अहूँ पुरने वि‍ध-बेबहारमे लटकल छी। कुटुमैती हुअए वा नै मुदा दरबज्‍जापर आबि‍ जँ पानि‍ नै पीब, ई केहन हएत? बालगोवि‍न्‍द-       (पानि‍ पीबैत। तहीकाल झमेलि‍या चाह नेने अबैत।) पानि‍ पि‍आ दुनू गोटेकेँ चाहक कप दैत अपनो कुससीपर बैस चाह पीबए लगैत। बालगोवि‍न्‍द-       समए तेहन दुरकाल भऽ गेल जे आब कथा-कुटुमैतीमे कतौ लज्‍जति‍ नै रहैए। बसीसँ बेसी चारि‍-आना कुटुमैती कुटुमैती जकाँ होइए। बारह आनामे झगड़े-झंझट होइए। भागेसर-         हँ, से तँ देखते छी। मुदा हवा-बि‍हाड़ि‍मे अपन जान नै बँचाएब तँ उड़ि‍ कऽ कतएसँ कतए चलि‍ जाएब, तेकर ठेकान रहत। बालगोवि‍न्‍द-       पैछला लगनक एकटा घटना कहै छी। हमरे गामक छी। कुल-खनदान तँ दबे छलनि‍ मुदा पढ़ि‍-लि‍ख परि‍वार एते उन्नति‍ केने अछि‍ जे इलाकामे कि‍यो कहबै छथि‍। भागेसर-         वाह। बालगोवि‍न्‍द-       लड़को-लड़की उपरा-उपरी। कमसँ कम पचास लाखक ि‍बयाहो भेल छलै। मुदा खाइ-पीबै बेरमे तते माि‍र-दंगा भेल जे दुनूकेँ मन रहतनि‍। भागेसर-         मारि‍ कि‍अए भेल? बालगोवि‍न्‍द-       पुछलि‍यनि‍ ते कहलनि‍ जे बि‍याह-दानमे कोनो रसे नै रहि‍ गेल अछि‍। लड़काबला सदि‍खन लड़कीबलाकेँ नि‍च्‍चा देखबए चाहैत तँ सरि‍याती बरि‍यातीकेँ। अही बीचमे रंग-वि‍रंगक बखेरा ठाढ़ कऽ मारि‍-पीट होइए। भागेसर-         एहेन बरि‍यातीमे जाएबो कठि‍न। बालगोवि‍न्‍द-       सज्‍जन लोक सभ छोड़ि‍ देलनि‍। मुदा तैयो कि‍ बरि‍याती कम जाइए। तते ने गाड़ी-सवारी भऽ गेल जे हुहुऔने फि‍रैए। भागेसर-         खाइर, छोड़ू दुनि‍याँ-जहानक बात। अपन गप करू। बालगोवि‍न्‍द-       हमरेसँ पुछै छी। कन्‍यागत तँ सदति‍ चाहै छथि‍ जे एकटा ऋृण उताड़ैमे दोसर ऋृण ने चढ़ि‍ जाए। अपने लड़काबला छि‍ऐ। कोना दुनू परि‍वारक कल्‍याण हएत, से तँ......? भागेसर-         दुनि‍याँ केम्‍हरो गुड़ैक जाउ। मुदा अपनोले तँ कि‍छु करब। आइ जँ बेटा बेच लेब तँ मुइलापर आगि‍ के देत। बेचलाहा बेटासँ पैठ हएत। बालगोवि‍न्‍द-       कहलि‍ऐ तँ बड़बढ़ि‍या। मुदा समाजक जे कुकुड़चालि‍ छै से मानता दुनू परि‍वार मि‍ल-जुलि‍ काज ससारि‍ लेब। मुदा नढ़ि‍या जकाँ जे भूकत तेकर कि‍ करबै? भागेसर-         हँ से तँ ठीके पैछलो नीक चलनि‍ आ अखुनको नीक चलनि‍ अपना कऽ अधला छोड़ देब। कि‍अए कि‍यो भूकत। जँ भूकबो करत तँ अपन मुँह दुखाओत। क्रमश: ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। बिपिन झा, IIT Bombay एकटा प्रश्न मीडिया सँ भारत विविधता सँ परिपूर्ण देश अछि। सर्वत्र विविधता गप्प-सप, वेश-भूषा, खान-पान, रहन-सहन  सभ किछु अलग-अलग किन्तु एकटा जे समान देखैत छी ओ अछि राष्ट्र केर प्रति सम्मान। ई अलग बात अछि जे लोक सभ अपन तुच्छ स्वार्थ हेतु अपन धर्म (कर्तव्य) के विसरि के धनादि केर दास भय जाइत छथि। हम वर्तमानकालीन राष्ट्र केर शुभचिन्तक आ हुनक नेतृत्वकर्ता केर गप्प कय रहल छी। ई सभ मीडिया केर लेल आकर्षण केर केन्द्र रहलथि। नीक बात। हुनक योगदान मे मीडिया केर सहयोग नितान्त आवश्यक छैक मुदा एतय मीडिया सँ असन्तोष तखनि होमय लगैत अछि जखनि गंगा एहेन पावन नदी केर रक्षण हेतु लगातार चारि पाँच मास सँ आमरण अनशन पर बैसल निगमानन्द एहेन देशभक्त कें मरबाक उत्तरे मीडिया चर्चा केर विषय बनबैत अछि। बाबा निगमानन्द गंगा वचाव हेतु चारि-पाँच मास स अनशन पर छलाह मई मे ओ कोमा मे आबि गेलाह। ओही हास्पीटल मे बाबा रामदेब के प्रत्येक बुलेटीन के परिचर्चा केर विषय बनाओल गेल मुदा.... निगमानन्द के पोस्टमार्टम के बादे समाचार भेटल्!! एतय हम नेता सभ स कोनो शिकायत नहि करैत छी कियाक त ओ अभ्यस्त छथि मुदा मीडिया आ जनसामान्य जेकर पहुँच मे ओ (निगमानन्द) छलाह ओ (मीडिया) कदाचित कर्तव्य मे स्खलन नहि करितथि तऽ एहेन दुखद समाचार नहिं सुनय पडितय। अस्तु हमर निवेदन जे जे कोइ मीडिया स जुडल होइ अथवा जनसामान्ये कियाक नहि होई एहेन घटना के पुनरावृत्ति स रोकी....। एतय विशद नहि देल जा रहल अछि विशद चर्चा हेतु देखी- http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2011/06/110614_nigmanand_death_fma.shtml ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। जगदीश प्रसाद मण्‍डल जगदीश प्रसाद मण्‍डल कथा बि‍हरन (पूर्वांश) जहि‍ना चैत-बैशाखक लहकैत धरती गरमाएल वायुमंडलक बीच अनायास हवा कऽ खसने बि‍हाड़ि‍क प्रति‍क्षा कएल जाइत, अनायास सुर्ज मेघक छोट-छीन चद्दरि‍ ओढ़ए लगैत, रेलगाड़ी सदृश्‍य अवाज दौड़ए लगैत, रहि‍-रहि‍ कऽ गुलाबी वस्‍त्र सज्‍जि‍त ठनका ठुनकए लगैत तँए अनुमानि‍त मन मानैले बेबस भऽ जाइत जे बि‍हाड़ि‍ पानि‍ पाथर ठनका संग आबि‍ रहल अछि‍, तहि‍ना रघुनन्दन आ सुलक्षणीक परि‍वारमे ज्‍योति‍ कुमारीक जन्‍मसँ भेलनि‍। भलहि‍ं आइ-काल्हि‍ बेटीक जन्‍म भेने माए-बाप अपन सुभाग्‍यकेँ दुरभाग मानि‍ मनकेँ कतबो कि‍अए ने कोसथि‍ जे परि‍वारमे बेटीक बाढ़ि‍ हि‍मालयसँ समुद्र दि‍स नि‍च्‍चा मुँहे ससरब छी मुदा से दुनू बेकती सुलक्षणीकेँ नै भेलनि‍। जहि‍ना गद्दा पाबि‍ कुरसी गदगर होइत तहि‍ना दुनू प्राणी रघुनन्‍दनक मन गद-गद। से खाली परि‍वारे धरि‍ नै सर-समाज, कुटुम-परि‍वार धरि‍ छलनि‍। ओना आन संगी जकाँ रघुनन्‍दन नै छलाह जे तीनि‍ये मासक पेटक बच्‍चाकेँ दुश्‍मन बनि‍ मोछ पीजबैत आ ने अपन रसगर जुआनी छोलनी धीपा-धीपा दगैत। दुनू परानी बेहद खुशी। कि‍अए नै खुशी रहथि‍, मन जे मधुमाछी सदृश्‍य मधुक संग मधुर मुस्‍कान दैत छलनि‍। पुरूष अपन वंश बढ़बै पाछु बेहाल आ नारीकेँ हाथ-पएर बान्‍हि‍ बौगली भरि‍ रौदमे ओंघरा देब कते उचि‍त छी। दुनू प्राणीक वंश बढ़ैत देख दुनू बेहाल। मन ति‍रपि‍त भऽ तड़ैप-तड़ैप नचैत। आेना तीन भाइक पछाति‍ ज्‍योति‍क जन्‍म भेल, मुदा तइसँ पहि‍ने आगमनो नै भेल छलनि‍ जे दोखि‍यो बनि‍तथि‍। भगवानोक कि‍रदानी कि‍ नीक छन्‍हि‍, नीको कोना रहतनि‍ काजक तते भार कपारपर रखने छथि‍ जे जखन टनकी धड़ै छन्‍हि‍ तखन खि‍सि‍या कऽ कि‍छुसँ कि‍छु कऽ दैत छथि‍। मुदा से लोक थोड़े मानतनि‍, मानबो कि‍अए करतनि‍ जखन अपने अपने हाथ-पएर लाड़ि‍-चाड़ि‍ जीबैए तखन अनेरे अनका दि‍स मुँहतक्कीक कोन जरूरत छै। कि‍अए ने कहतनि‍ जे अहाँ ि‍नर्माता छी तखन तराजू एक रंग राखू, कि‍अए ककरो जेरक-जेर बेटा दइ छि‍ऐ आ ककरो जेरक-जेर बेटी। जँ देबे करै छि‍ऐ ते बुद्धि‍ कि‍अए भंगठा दइ छि‍ऐ जे बेटासँ धन अबैत अछि‍ आ बेटीसँ जाइत अछि‍। जइसँ नीको घरमे चोंगराक जरूरत पड़ि‍ जाइ छै। उच्‍च अफसरक परि‍वार तँए परि‍वारि‍क स्‍तर सेहो उच्‍च। भलहि‍ं कि‍अए ने माए-बाप छाँटि‍ परि‍वार होइन। खगल परि‍वार जकाँ सदति‍ गरजू नै। परि‍वारक खर्च समटल तइसँ खुल्‍ला बजारक कोनो असरि‍ नै। सरकारी दरपर सभ सुवि‍धा उपलब्‍ध, जइसँ खाइ-पीबैसँ लऽ कऽ मनोरंजनक ओसार चकमकाइत। भलहि‍ं जेकर अफसर तेकर बात बुझैमे फेर होइन। जइसँ महगी-सस्‍ती बुझैमे सेहो फेर भऽ गेल होइन। मुदा परोछक बात छी चारू बच्‍चाक प्रति‍ समान सि‍नेह रहलनि‍। परि‍वारमे सभसँ छोट बच्‍चा रहने सबहक मनोरंजनक वस्‍तु। मुदा गुरूआइ तँ ओहि‍ना नै होइ छै, तँए सभ अपन-अपन महि‍क्का मनक टेमीसँ सदति‍ देखैत, जप करैत। आखि‍र ऐ धरतीपर ज्ञान दानी नै होथि‍। भलहि‍ं ओ अधखि‍जुए वा अधपकुए कि‍यो ने होथि‍। जहि‍ना कोनो मालीक बच्‍चा पि‍ताक संग जामंतो (अनेको) रंगक फूलक फुलवारीमे जि‍नगीक अनेको अवस्‍था देख चौकैत तहि‍ना भरल-पूरल परि‍वारमे ज्‍योति‍योकेँ भेलनि‍। देखलनि‍ जे गुलाबक कलीमे जहि‍ना अबैत-अबैत रंगो, सौन्‍दर्यो आ महको अबैत अछि‍ तहि‍ना ने जि‍नगी छी। जँ मनुष्‍यकेँ डोरीसँ बान्‍हल जाय तँ डोरी तोड़ैक उपाए तँ हुनको छन्‍हि‍। समुचि‍त वातावरण ज्‍योति‍ संगी-साथीक बीच नीकक श्रेणीमे आबि‍ गेलि‍। जहि‍ना संगीक सि‍नेह तहि‍ना शि‍क्षकोक सि‍नेह भेटए लगलनि‍। जहि‍ना टि‍कट कटाओल यात्री गाड़ीमे सफर करैत तहि‍ना समतल जि‍नगी पाबि‍ ज्‍योति‍ आगू बढ़ए लागलि‍। जि‍नगीमे बधो अबै छै तइसँ पूर्ण अनभि‍ज्ञ ज्‍योति‍। जना कर्म-धर्म बनि‍ जि‍नगीक बाट बनौने होय। क्रमश: जगदीश प्रसाद मण्‍डल दीर्घकथा शंभूदास जि‍नगीक ओइ सीमापर शंभूदास पहुँच गेल छथि‍ जतए पैछला जि‍नगीक बहुतो वि‍चार आ काज स्‍वत: छुटि‍ गेलनि‍। कि‍छु नव जे मनमे उपकि‍ रहल छन्‍हि‍ ओ करैले जइ शक्‍ति‍ आ सामर्थक जते जरूरत छन्‍हि‍ ओ तकनहुँ नै भेट रहल छन्‍हि‍। जना आगि‍क चि‍नगोरा रसे-रसे पझा-पझा या तँ मैल जकाँ उपर छाड़ने जा रहल छन्‍हि‍ या झड़ि‍-झड़ि‍ खसि‍ रहल छन्हि‍। डंटीसँ टूटल पोखरि‍क कमल सदृश्‍य हवाक सि‍हकी वा पानि‍क कम्‍पन्नसँ दहलि‍ रहल छन्‍हि‍। जे कहि‍यो कामधेनु, फूल-फड़सँ लदल वृक्ष सदृश्‍य छलनि‍ वएह आइ ठाँठ वा पत्रहीन ठूठ बुझि‍ पड़ि‍ रहल छन्‍हि‍। जे कहि‍यो राजभोगक बीच दिन बि‍तबैत छलाह आइ अन्न-वस्‍त्र वि‍हीन भीखक घाटपर बैस अपन जि‍नगीक हि‍साब-वारी जोड़ि‍ रहल छथि‍। मन कहैत छन्‍हि‍ जे सभ दि‍न तँ गुनगुनाइत रहलौं- जे बच्‍चा कनैत ऐ धरतीपर अबैत अछि‍ आ हँसैत जाइक चाहि‍ऐ, मुदा से कहाँ......? जे आत्‍मा बि‍नु वि‍वेकक जि‍नगी टपि‍ वि‍वेकवान लग पहुँचल ओ आगू नै बढ़ि‍ पाछु दि‍स कि‍अए ढड़कि‍ रहल अछि‍। सोन-सन उज्‍जर धप-धप दाढ़ी-मोछक संग माथसँ पएरक अंगुरि‍क धरि‍क केश, आमील सन सुखाएल गालक संग अगि‍ला भाग, सामर्थ हीन हाथ-पएरक मुदा आँखि‍क ज्‍योति‍ भोरक ध्रुवतारा जकाँ ललौन मन उफनि‍ उठलनि‍ जे देवस्‍थान जकाँ ति‍रपेखनि‍ ऐ दुनि‍याँक करब। जहि‍ना बाध-वोनक ओहन परती जइपर कहि‍यो हर-कोदारि‍ नै चलल सुखि‍-सुखि‍ गाि‍छ-वि‍रि‍छ खसि‍ उसर भऽ जाइत, ओइ परतीपर या तँ चि‍ड़ै-चुनमुनीक माध्‍यमसँ वा हवा-पानि‍क माध्‍यमसँ अनेरूआ फूल-फड़क गाछ जनमि‍ रौद-वसात, पानि‍-पाथर, अन्‍हर-वि‍हाड़ि‍ सहि‍ अपन जुआनी पाबि‍ छाती खोलि‍ बाट-बटोहीकेँ अपन मीठ सुआदसँ तृप्‍ति‍ करैत तहि‍ना जमुना नदीक तटपर शंभूदासक जन्‍म बटाइ-कि‍सान परि‍वारमे भेलनि‍। रवि‍ दि‍न रहने समाजक दाय-माय शुभ दि‍न मानि‍ शंभू नाओं रखलकनि‍। परदेशि‍या जकाँ तँ नै जे जन्‍मसँ पहि‍नहि‍ माए-बाप नामकरण कऽ लैत। छठम दि‍नसँ पूर्वक सभ कष्‍ट वि‍सरि‍ शंभूदासक माए सुखनी अपन सुखैक नि‍आसा छोड़ि‍ अपन देवस्‍थानक देवता पूजनमे हराएल। अपन मर्यादा गसि‍ कऽ पकड़ि‍ शंभूक सेवामे जुटि‍ गेलीह। परि‍वारक बोझक तर पि‍ता, तँए बि‍लगा कऽ कि‍छु नै सोचथि‍। पाँच वर्ख पूर्व धरि‍ संतोखीदास अपने बोनि‍हार सभ जकाँ दुनू परानी संतोखी आ सुखनी, खेति‍हर बोनि‍हार छलाह। खेति‍यो तँ मौसमेक हाथक खेलौना। बेठेकान। मुदा तैयो तँ सभ बुझैत जे जाड़, गरमी आ बरसात, सालक तीन अवस्‍था छी। भलहि‍ं गोटे साल शीतलहरी पाबि‍ जाड़ अपन वि‍काराल रूप देखबैत तँ रौदी पाबि‍ गरमी। बरखा पाबि‍ बसात बाढ़ि‍क संग नंगटे नचैत तँ झाँट पाबि‍ ताण्‍डव करैत। बजारवादक हवा सि‍हकल। ओना तँ वि‍हाड़ि‍क रूप हवा उठल मुदा पहाड़, बोनक टाट अँटकौलक। गति‍केँ कम केलक मुदा तैयो बहि‍ते रहल। जाड़-रौदीक मारल कि‍सानो अा बोनि‍हारो गाम (खेती-पथारी) छोड़ि‍ बजार दि‍स वि‍दा भेल। जहि‍ना घर बनबैमे पातरसँ मोट खूँटक जरूरत होइत तहि‍ना करखाना चलबैक लेल मजदूर बोनि‍हारसँ लऽ कऽ संचालक धरि‍क आवश्यकता भेल। उजड़ल-उपटल गामक रूखि‍मे बदलाव अबए लगल। खेतमे काज केनि‍हार बोनि‍हारकेँ करखन्नाक नव मजदूरी भेटए लगल। जइसँ जि‍नगीमे हरि‍यरी अबए लगलै। मुदा हवाक गति‍ धीरे-धीरे तेज हुअए लगल। सस्‍त मजदूर पाबि‍ रंग-वि‍रंगक कारोवार शहरमे जन्‍म लि‍अए लगल। जइसँ श्रमि‍कक मांग बढ़ल। टूटैत गामक जि‍नगीसँ तंग भऽ वेवस श्रमि‍क जेर बना-बना बजारक बाट पकड़लक। श्रमक वि‍करीक कारोवार जोर पकड़लक। खुल्‍लम-खुल्‍ला वि‍करी बट्टा हुअए लगल। गामक श्रमि‍कक पड़ाइनसँ गामो हलचलाएल। खेतबलाकेँ करखन्ना पहुँचने खेतीमे ठहराव आएल। श्रमि‍कक अभावमे खेती ठमकल। समाजक वि‍चारधारामे बदलाव आएल। एक वि‍चारधारा -जे अखनो धरि‍ सम्‍पति‍केँ प्रति‍ष्‍ठा बुझैत- जे पहि‍लुकके खेतीकेँ थोड़-थाड़ अन्न-पानि‍ खुआ-पि‍आ जीवि‍त रखलनि‍ तँ दोसर वि‍चारधारा (शहरी कारोवार देख) खेत-पथार माने ग्रामीण सम्‍पत्ति‍केँ पूँजी बुझि‍ आमद-खर्चक ि‍हसाब जोड़ि‍ वि‍चारमे बदलाव अनलनि‍। संग-संग बटाइ खेतीक बीच नव-समस्‍या सेहो उठल। जइठाम एखन धरि‍ गामक जमीनदार खेतक उपजे बेर-टामे खेतक दर्शन करैत, ओ गामसँ बाहर भेने सालक-साल खेतक दर्शनसँ वि‍मुख भेला। संग-संग गाममे श्रम-शक्‍ति‍क अभाव भेल। बटेदारक वर्गक वृद्धि‍ भेल। खेतक बटाइ प्रथामे बदलाव आएल। जइसँ आमक कन (फड़क हसावसँ) उपजाक मनखप आ पोसि‍या माल-जालमे बदलाव आएल। कोनो धरानी संतोखीदास एकटा बड़द बनौलक। दू परानीक हाथ-पएर आ एकटा बड़द पाबि‍ संतोखीदस बटेदार कि‍सानक रूपमे ठाढ़ भेल। पेट भरने परि‍वारमे खुशीक बाढ़ि‍ तँ नै मुदा पटवी पानि‍क खुशी जरूर आबि‍ गेल। बीघा भरि‍क खेति‍हर संतोखीदास बनि‍ गेल। नव आर्थिक वि‍कास भेने परि‍वरक बच्‍चो सभमे मौलाहट कमल। जइसँ बच्‍चाक मृत्‍युक संख्‍यामे कमी आएल। ओना एखनो धरि‍ श्रमकि‍ परि‍वारमे बेट-बेटीमे अन्‍तर नै बुझल जाइत कि‍एक तँ भगवानक अगम लीलाक बीच हस्‍तक्षेप्‍ नै करए चहैत मुदा बजारक बि‍खाएल वयार तँ बहि‍ये रहल अछि‍। शंभूक तीन बर्ख पुरि‍ते, जहि‍ना शीतलहरीमे पौ फटि‍ते सुरूजक रोशनीक आशा जगैत, बदरीहन समए बादलकेँ छि‍ड़ि‍आइते घरसँ बहराइक आशा जगैत तहि‍ना संतोखि‍यो दास आ सुखनि‍योकेँ भेल। जि‍नगी भरि‍क लेल मनखप खेत भेटने कि‍अए नै दुनू परानीक मनमे आशा आओत। तहूमे बाढ़-रौदीक सालक कोनो देनदरि‍ये नै, रहल सुभ्‍यस्‍त समैक देनदारी। ओहो देनदारी कि‍ अन्‍तैसँ कमा कऽ आनए पड़त। धरती माता कामधेनु। जते करब तते पाएब। जखन मन हएत, तखन खाएब। दि‍न-राति‍ ओंघराइत रहब। एखन धरि‍ सुखनी शंभूक पाछु आंगनसँ नै नि‍कलि‍ पबैत छलीह मुदा आब तँ शंभू तीन सालक भऽ गेल। अगहन मासमे खेतक आड़ि‍पर धानक खाेंचड़ि‍क घर बना देब ओइमे खेलेबो करत आंेघी लगतै तँ सुतबो करत। गरमी मासमे गाछक छाहरि‍मे रहत। लऽ दऽ कऽ बरसात रहल। तँ बरखो कि‍ लोककेँ बि‍ना चेतौने अबैए। अबैसँ पहि‍ने राजा-रजवाड़ जकाँ समाद पठा दैत अछि‍। तहूमे बरखा केहन रूपमे आओत सेहो तँ कहि‍ये दैत अछि‍। जेठुआ बरखामे जे दुइयो बेर देह धुआ जेतै तँ सालो भरि‍ धुआएले रहतै। बच्‍चा कि‍ कोनो सि‍यान सैतान होइए जे भरि‍ दि‍न डौं-डौं करत। ओकरा तँ अन्न-पानि‍ भेट जाए, भरि‍ दि‍न बौआइत रहत। जहि‍ना नव दाँत जनमने मसुहरि‍ कि‍छु करैले सबसबाइत अछि‍ तहि‍ना बच्‍चो मन। जेठक दसहारा। बृहस्‍पति‍ दि‍न। गि‍रहस्‍तीक पतराएल काज। अटूट फड़ल आम-जामुनक गाछ। गामक-गाम लोकक मन गदगद। कि‍अए ने रहत। दू मास जे अमृत फल भेटत। बाधक चौबगली गाम अष्‍टयाम कीर्तनक मंत्रसँ अकास गनगनाइत। कि‍म्‍हरो “सीताराम, सीताराम सीताराम जय सीताराम” तँ कि‍म्‍हरो “काली, गुर्गे राधे श्‍याम, गौरी शंकर सीताराम।” कि‍म्‍हरो “हरे राम, हरे राम...।” तँ कि‍म्‍हरो “हरे कृष्‍ण हरे कृष्‍ण।” दसहारा रहने ब्रह्मस्‍थानमे घोड़ा चढ़ौल सजाओल जाएत। ऐबेर तँ जहि‍ना ब्रह्मबाबा खुशी छथि‍न तहि‍ना लोकोक मन। आन साल जकाँ कि‍ ऐबेर हल्‍लुक दामा रंग सुखा घोड़ा लोक चढ़ौत पहि‍ने साय-बेना- दऽ दऽ सरैसो घोड़ासँ नि‍म्‍मन-नि‍म्‍मन चढ़ौत। दूध-पीठ खाइत-खाइत ब्रह्मोबाबाक मन अकछा गेल छन्‍हि‍ तँए ऐबेर सेरही, पनसेरही, दससेरही, अधमनीक संग मनही मंूगाबा सेहो परदेसि‍या सभ चढ़ौत। दि‍नक एगारह बजैत। माटि‍-पानि‍ तबने हबो तबि‍ गेल। खेतक जे खढ़ अछि‍ ओ रोहणि‍ मि‍रगि‍सरामे नै सूखत तँ सालो भरि‍ ओकर ओधि‍ थोड़े सुखत। तँए संतोखीदास मरूआ खेत जोतए आ सुखनी खढ़ बि‍छए गेल। मुदा छोट बच्‍चा शंभूकेँ असकरे आँगनमे केना छोड़ि‍ दि‍तथि‍। बच्‍चोले बाटीमे भात आ भरि‍ डोल पानि‍ नेने खेत गेली। अपनो सभकेँ पि‍यास लगत तँ पीबैक खि‍यालसँ। खेतसँ कट्ठा दुऐक हटि‍ आड़ि‍पर एकटा बज्‍जर केराइक अनेरूआ गाछ। जकरा नि‍च्‍चामे सघन छाहरि‍ तँ नै मुदा छाहरि‍। जतए शंभूकेँ खेलाइले छोड़ि‍ अपने दुनू परानी संतोखीदास खेतमे काज करैत। काज लगि‍चाएल देख, खाली हड़मड़ी चौकी देब बाकी, हर खोलि‍ चौकी ठेक संतोखीदास पत्नीकेँ कहलखि‍न- “रौदमे मन तबैध गेल हएत, कनीखान छाहरि‍मे जीरा लइले चलू।” सुखनी- “सएह कहए चाहै छलौं मुदा काज लगि‍चाएल देख नै कहै छलौं। जे काज ससरि‍ जाइ छै ओते तँ जाने हल्लुक होइ छै कि‍ने।” “हँ से तँ होइ छै। मुदा काजो कि‍......?” “से की?” गैंचि‍याह नजरि‍ पत्नीपर दैत संतोखीदास मुस्‍की दैत कहए लगलखि‍न- “जहि‍ना भाँग-गांजा अपन सेवककेँ बौरा दैत, बेशि‍या इश्कबाजकेँ, तहि‍ना ने काजो अपन कर्ताकेँ बाबला बना जान लइपर तुलल रहैत।” “नै बुझलौं?” “देखै नै छि‍ऐ, दोकान सभमे लि‍ख कऽ टांगल रहैए जे, काज करैत चलू फलक आशा नै करू।' जखन मनुख छी रोड-सड़ककेँ नाि‍प मीलक पाथर गारल रहैए तखन कतऽ कोन रास्‍ता चलक चाही से तँ सोचए पड़तै कि‍ने। आकि‍ रस्‍ते भुति‍या जाय। जे बाट नै देखल रहै छै ओही बाटमे ने लोक भुति‍आइए। खाइर, छोड़ू ऐ सभकेँ चलू कनी ठंढ़ाइयो लेब दू घोंट पानि‍यो आ तमाकुलो खा लेब।” दुनू परानी बज्‍जर केराइ गाछसँ फड़ि‍क्के देखलनि‍ जे शंभू पूवारि‍ पारक अष्‍टयामक मंत्र- “हरे कृष्‍णा, हरे कृष्‍णा, कृष्‍णा-कृष्‍णा हरे-हरे” एक ताले छठि‍क ढोल जकाँ थोपड़ी बजबैत गबैत रहए। बेटापर नजरि‍ पड़ि‍ते सुखनी अध खि‍लू फूल जकाँ वि‍हुँसैत पति‍केँ कहलनि‍- “देखि‍यौ ऐ छौंड़ाकेँ। आन धि‍या-पूता रहैत तँ माए-माए करैत। केहेन मगन भेल अछि‍।” पति‍- “रौदमे तबैध तँ ने गेल अछि‍?” “तबधल बच्‍चा थोपड़ी बजा गाओत आकि‍ अँहोछि‍या काटत।” “हँ से तँ ठीके।” जहि‍ना तत्‍व चि‍न्‍तक आत्‍माक तार जोड़ि‍ ब्रह्म तत्‍वक अन्‍वेषण करैत तहि‍ना शंभू कृष्‍ण मंत्रसँ अपन मनक तार जोड़ि‍ अष्‍टयामक धुनमे बेसुधि‍ भेल मीरा जकाँ गाबि‍ रहल अछि‍। जहि‍ना एक्के फुलबाड़ी वा गाछीमे भि‍न्न-भि‍न्न रंगक फूल वा फल ताधरि‍ अपन परि‍चयसँ हराएल रहैत जाधरि‍ बच्‍चा सदृश्‍य पालल-पोसल जाइत, मुदा जखन अपन गुण वा रूप देखबै जोकर भऽ जाइत तखन एकठाम रहि‍तो बेड़ाए लगैत तहि‍ना सात बर्ख अबैत-अबैत शंभूओ बेड़ाए लगल। परि‍वारमे अनेको रंगक वस्‍तु-जात रहि‍तो ओतबे सि‍नेह रखैत जते काजक वस्‍तु बुझैत। जइ वस्‍तुक प्रयोजन आन-आन रूपकेँ आन-आन काजमे होइत तइसँ भि‍न्न ओइ वस्‍तुक उपयोग अपन काज देख करए लगल। अपना खेत-पथार नै रहि‍तो संतोखीदासक परि‍वार गामक कि‍सान परि‍वारक खाड़ीमे आबि‍ चुकल छल। जहि‍ना कि‍सान परि‍वारमे वाइस-बेरहट कऽ कऽ खाइत अछि‍ तहि‍ना संतोखि‍यो दासक परि‍वारमे चलए लगलनि‍। ओना ई गति‍ लगातार नै चलि‍ पबैत, कि‍एक तँ कि‍सान परि‍वार, डेंगी नाह जकाँ सदति‍ उपर-नि‍च्‍चा होइत रहैत। जइ साल खरचट्टा वा दहार समए भेल तइ साल सभ धुआ-पोछा गेल। मुदा जइ साल सुभि‍तगर समए भेल तइ साल पुन: नव-पुरानक चालि‍ पकड़ि‍ लैत। नवे-पुरानक चालि‍ ने रसगरो आ सुअदगरो होइए, अगि‍ला-पछि‍ला बाट देख चलबे ने दि‍शा दैत। जेना एक्के आमक चटनी टटका नीक होइत तँ अचार बसि‍या। जते-पुरान तते रसगर। मुदा चटनी तँ लगले अरूआ जाइत। तहि‍ना नवका कुरथीक दालि‍ आ पुरान राहड़ि‍क दालि‍। एखन धरि‍ शंभू, परि‍वारकेँ खाली खाइ-पीबै, माता-पीताक संग रहैक टा बुझैत। कि‍एक तँ बाल-बोध बुझि‍, ने माता-पि‍ता कि‍छु करैले अढ़बैत आ ने शंभू परि‍वारक काजकेँ अपन काज बुझैत। सदति‍ धैनसन। सोलहन्नी बेरागी जकाँ। मुदा तँए कि‍ शंभू भरि‍ दि‍न ओछाइनेपर ओंघराएल रहैत सेहो बात नै। जँ कि‍छु नै करैत तँ दि‍न-राति‍ केना कटैत छैक। अखनो धरि‍ गामक िकसान धरतीसँ अकास धरि‍क स्‍मरण साँझ-भोर जरूर करैत अछि‍। भोरमे धरतीक स्‍मरण तँ साँझमे अकास वि‍चरण जरूर करैत अछि‍। आने परि‍वार जकाँ संतोखि‍यो दासक परि‍वार। परि‍वारमे शंभूक कोनो मोजरे नै। मात्र खाइ-पीबै आ सुतै बेर माता-पि‍ता सि‍र चढ़बैत। बाकी समए साँढ़-पारा जकाँ अनेर बौआइत ढहनाइत। तँए कि‍ सींग-नाङरि‍बला पशु जकाँ कि‍ शंभूकेँ थइर-पगहाक जरूरत होइत। 'अनेर गाएकेँ धरम रखवार' होइत। भोरमे जखन संतोखीदास खेत-तमैक वि‍चार करए लगथि‍ तँ नचैत हृदेक घूघड़ूक कम्‍पन्न ठोठक स्‍वर होइत खपड़ि‍क मकइ-जनेरक लावा जकाँ कूदि‍-कूदि‍ नि‍च्‍चा खसैत तहि‍ना संतोखि‍यो दासक मुँहसँ रंग-वि‍रंगक मौसमक संग मौसमी सि‍नेह छि‍ड़ि‍याए लगैत। जकरा बीछ-बीछ शंभू खेलेबो करैत आ तहि‍या-तहि‍या सीनाक डायरीमे लि‍ख-लि‍ख रखबो करैत। हृदयंगम करैत। मुदा बच्‍चाक कचि‍या डायरी रहने कि‍छु लि‍खेबो करैत आ कि‍छु नहि‍यो लि‍खाइत। मुदा प्रति‍ भोर आ साँझक स्‍वर 'सीताराम-सीताराम, राधेश्‍याम-राधेश्‍याम' डायरीक उपरेक पन्नामे लि‍खा गेल। जकरा भरि‍ दि‍न शंभू गो-मुखी रूद्राक्षक माला बना जपैत रहैत। कामधेनु गाए जकाँ सदति‍ दूधक ढारसँ नव-नव राग-रागि‍नी स्‍वत: अबए लगल। कंठक स्‍वर-लहरी हाथकेँ थि‍रकबै लगल। जइसँ कखनो दुनू हाथ मि‍ल ताल मि‍लबैत तँ कखनो पल्‍था मारि‍ बैस  ठेहुनपर ताल मि‍लबए लगल। घर-अंगना एक रहने पि‍ताक संग माइयोक पाछु-पाछु आंगन बाहरैत समए, चुल्हि‍-चि‍नमार नीपैक समए, जाँत-ढेकी चलबैक समए शंभू नचए-गबए लगल। बेटाक बौराइत मन देख माइयो आत्‍म-वि‍भोर भऽ झुमि‍-झुमि‍ शंभूक आँखि‍मे आँखि‍ गारि‍ फड़ैत-फुलाइत फुलबाड़ीमे हरा जाइत। माता-पि‍ताक उसकैत हाथ देख शंभूओक हाथ खाइबला बाटीपर उसकए लगल। खजुरी जकाँ ओकरा बजाएब शुरू केलक। कोना नै करत? कामेसँ राम आ रामेसँ काम ने चलैत अछि‍। मुदा भारी द्रव्‍यक बाटी रहने हाड़-मासुक हाथक ओंगरी कतेखान ठठत। जे बात शंभू तँ नै बुझि‍ सकल मुदा संतोखीदास बुझि‍ गेलखि‍न। सोचलनि‍ जे जँ खजुरी बना दि‍अए तँ चौबीसो घंटा शंभू आनन्‍दमे मगन रहत। बेटाक प्रति‍ पि‍ताक दायि‍त्‍वे कि‍? यएह ने जे हँसी-खुखीसँ दि‍न-राति‍ चलैत रहए। मन मानि‍ गेलनि‍ जे बेटाकेँ खजुरी बना देबै। एकलव्‍य जकाँ साजमे खजुरि‍यो ने अछि‍। ने ओकरा दोसर संगीक जरूरत होइत आ ने कखनो अपनाकेँ असगर बुझैत। जहि‍ना हवामे उड़ैत रोग लोककेँ पकड़ि‍ लैत, लगन अबि‍ते बर-कन्‍याकेँ पकड़ए लगैत, तीर्थ-व्रतक डोरी लगैत तहि‍ना शंभूओकेँ गीत-नादक माने संगीतक रांग पकड़ि‍ लेलक। जइसँ पि‍ताकेँ हर जोतैत, कोदारि‍ पाड़ैत, धान-रोपैत कालक गुनगुनीक संग आंगन बाहरैत, धान कुटैत, जत्ता चलबैत कालक गुनगुनी पकड़ि‍ लेलक। जकरा संग शंभू भरि‍ दि‍न मगन भऽ गारा-जोड़ी केने बुलए-भंगए लगल। मुदा तँए कि‍ शंभू एतबेमे ओझराएल रहल? नै! ने ओकरा गामक आन घर अनभुआर आ ने लोक अनठि‍या बुझि‍ पड़ै। तहूमे एकठाम रहने, जखन माए-बापक संग बाध-बोन दि‍स जाए तँ वएह घर वएह लोक देखए। समाज तँ ओहन सरोबर छी जइमे घोंघा-सि‍तुआसँ लऽ कऽ कमल धरि‍ फुलाइत अछि‍। देवस्‍थानमे साँझ-भोर घड़ी-घंट, शंख बजैत खरि‍हाँनमे धान फटकैत सूपक अवाज अकासमे उड़ैत। काठपर ओंघराइत टेंगारी-कुड़हरि‍ गर्द करैत तँ चुल्हि‍पर चढ़ल बरतनक अदहन झ-झ-काली करैत रहैत। छह बर्खक बेटा शंभू लेल संतोखीदास खजुरीक ओरि‍यान करैक वि‍चार केलनि‍। ओना हाट-बजारमे खजुरी तँ नै बि‍काइत अछि‍ मुदा हरि‍हरक्षेत्र, सि‍हेश्वर, जनकपुर आ देवघरमे तँ बि‍काइते अछि‍। मुदा ओतएसँ आओत कोना? एखन तँ अोम्‍हर मुँहे जाइक नि‍यार नै अछि‍। ओना गामोमे बरही लकड़ीक कठरा बनबैए। मघैया सरि‍सोबा सनगोहि‍ मारि‍ खेबो करैए आ ओकर छाल बेचबो करैए। अगर जँ कठरा बनबा, सनगोहि‍क छाल कीन लेब तँ तेबखाक बेसनसँ अपनो छाड़ि‍ लेब। हम सभ कि‍ कोनो शहर-बजारक लोक छी जे बेटा-बेटीकेँ पेस्‍तौल बम-बारूद-छुड़छुडी-फटाका- खेलाइले देबै। जँ खेत-खरि‍हाँन दि‍सक मन देखि‍ति‍ऐ तँ खि‍एलहा हँसुआ-खुरपी खेलाइले दैति‍ऐ जँ से नै देखै छि‍ऐ तँ एकरा खजुरि‍येक ओरि‍यान कऽ देबै। सएह केलनि‍। जहि‍ना हाथमे औजार ऐने श्रमि‍क बड़का-बड़का इंजीन बना चलबैत तहि‍ना हाथमे खजुरी ऐने शंभूओ परि‍वारक संग समाजक कीर्तन, भजन, यज्ञ इत्‍यादि‍मे शामि‍ल हुअए लगल। छह बर्ख बीतैत-बीतैत शंभूक हाथ खजुरीपर बैस गेल। जइसँ असकरे आंगनक ओसारपर बैस जाधरि‍ हाथक आंगुर नै दुखाए लगै ताधरि‍ एकताले सीता-राम सीता-राम, राधेश्‍याम, राधेश्‍याम खजुरि‍क अवाजक संग अपन कंठक अवाज मि‍ला उन्‍मत्त भऽ गबैत-रहैत। भगवानोक लीला अजीव छन्‍हि‍। एक्के मनुख वा पशु-पक्षीक गोटे बच्‍चाकेँ उम्रसँ बेसि‍ऐ बना दैत छथि‍न आ कोनोकेँ कम बना दैत छथि‍न। कि‍यो पाँचे बर्खमे पनरह बर्खक बुद्धि‍-ज्ञान अरजि‍ लैत अछि‍ तँ कि‍यो पनरहो बर्खमे पाँचो बर्खसँ नि‍च्‍चे रहैत अछि‍। जना शंभुओकेँ भेल। छबे बर्खमे पनरह बर्खक बच्‍चाक कान काटए लगल। तहूँमे तेहन समाजक स्‍कूल अछि‍ जे जते मि‍हनत करए चाहब ओते फलो भेटबे करत। सदि‍काल कतौ ने कतौ कोनो ने कोनो उत्‍सव समाजमे होइते रहैत अछि‍। देवस्‍थानसँ परि‍वार धरि‍, कतौ अष्‍टयाम-कीर्तन, तँ कतौ बच्‍चाक मूड़न, कतौ सत्नारायण भगवानक पूजा तँ कतौ ि‍वयाह-दुरागमन। शुभ काज तँए शुभ वातावरण बनबैक लेल शुभ-शुभ क्रि‍या-कलाप। शुभ क्रि‍या-कलापक लेल कतौ ढोलक-झालि‍ हारमोनि‍यमक संग रामधुन चलैत तँ कतौ ढोल-पीपहीक संग गीत-नाद। ततबे नै संग-संग परि‍वारक उत्‍सवमे समबेत स्‍वर माए-वहीनि‍क गीत-नाद सेहो चलबे करैत अछि‍। जहि‍ना पाँच बर्खक बच्‍चा स्‍कूलमे नाअों लि‍खा दोसर-तेर बच्‍चा संग पढ़ैत तहि‍ना शंभूओ समाजमे कतौ ढोलक-झालि‍ वा ढोल-पीपहीक अवाज सुनि‍ते ठोकले ओइ जगहपर पहुँच, बेद पाठी जकाँ आँखि‍-कान समेट ताधरि‍ देखैत-सुनैत रहैत जाधरि‍ वि‍ज्ञाम करैले नै बन्न होइत। शंभूक क्रि‍या-कलापसँ दुनू परानी संतोखीदास सेहो नि‍चेन भऽ अपन काज करैत रहैत। काजमे मस्‍त रहैत। कि‍एक तँ दुनू परानी बुझि‍ गेलाह जे जतए ढोल-पीपही बजैत हएत शंभू ओतए जरूर हएत। तँए जखन खेत-पथारसँ काज कए घुमैत तँ ठोकले ओइ स्‍थानपर पहुँच शंभूकेँ ताकि‍ अनैत। समाजो तँ ओहन बाट बना चलैत जइसँ हँसैत-खि‍लैत जि‍नगी बि‍नु थकनहि‍ सदैत चलैत रहैत। कोना नै चलत? धार ककर आशा-बाटक प्रति‍क्षा करैत। जहि‍ना अपना गति‍ये दि‍न-राति‍ चलैत रहैत तहि‍ना ने समाजो अपना गति‍ये सदैत चलैत रहैत। आओर आगाँ ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। डॉ.  शेफालिका वर्मा संस्मरण ---------- मैथिली   ( उड़ीसा-१९८५) जिनगी एकटा सफर थीक जे हमरा चलनाय अछ, सफर यानि यात्रा -- सफरिंग  यानि पीड़ा .  उर्दुक सफर आ अंग्रेजीक  में विचित्र अर्थ सम्बन्ध अछ. जिनगीक सफर तय करवा में हमरा सब के शारीरिक स्तर पर कतेक 'सफर' करय पडैत अछ आ ओहि क्रिया में मानसिक प्रक्रियाक कतेक 'सफरिंग' भोग पडैत अछ, ई अंग्रेजी शब्द  सफरिंग   सफरक  पीड़ा के व्यक्त करैत अछ . विचित्र अछ सफर  करैत इ मानसिकता---हमर जीवनों में सफरिंग  स जुडल सफर.... सहरसा क  जुआन  दुपहरिया -खिड़की स अवैत आकाशक एक टा खंड के निहारी रहल छलों ,मुदा निलाकाशक रंग  मैल्छाहन छल. निश्छल हृदयक सत्यता पर ओढना जकां .हृदयक  सत्यता पर लोक कें सहजहि विश्वास नै होयत छैक --असत्य में जीवाक प्रक्रिया से त्रस्त मानव...डाकिया आबि चिठी सब द गेल..डूबल मोन किनार पर आबि गेल .एकटा आमंत्रण छल अर्थ सहित - संबलपुर, उड़ीसा में  पूर्व भारत कवि सम्मेलन  आ सेमीनारक आयोजन ४--५ जून के छल. , तीन तीन टा  आय.ए. एस. आफिसर क निमंत्रण छल समास प्रकाशनक  दिस सँ.. की करी की नै करी क तारतम्य  में छलों १जुने '८५ के वंदना क मेडिकल टेस्ट परीक्षा दिल्ली में छल  ४-५ जून के उड़ीसा में , हम सहरसा में..सहरसा स पटना ,पटना स दिल्ली आ दिल्ली स उड़ीसा..पूरा त्रिपेक्ष्ण छल.मुदा सब समस्याक हल वर्मा जी लग रहैत छल . हम दिल्ली जायब !  १ तारीख के वन्दना के परीक्षा दिआय, वन्दना के राजीव लग दिल्ली में छोड़ी हम सब २ जून के कलिंग एक्सप्रेस स दिल्ली स उड़ीसा लेल विदा भ गेलों. ,राजस्थान,हरियाणा, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश  आदि कतेको राज्य के पार करैत ,स्पर्श करैत  झरसुगुडा पहुन्च्लों ..२४ घंटा अनवरत ट्रेन पर बैस्वाक हिस्स्क नै रहलाक कारण अप्स्यांत भ गेल छलों. झर्सुगुडा स संबलपुर लेल दोसर ट्रेन पकडलों..मनुख की पंछी सँ कम अछ ! बरगढ़ क सब स पैघ होटल ' 'ओरियंटल ' में  सब आमंत्रित कवि लोकनिक व्यवस्था छल..  २३ न. क सूट हमरा सब लेल रिजर्व छल. आगू पाछू वेटर ,२--२ -टा एम्बेसडर कार ,स्वागत समितिक सदस्य सभ पाइन क लहरि जकां उधियावैत .... कखनो काल सोचैत छी.संस्मरण हो व आत्मकथा आकी जीवनक बितैत पल  हम कोनो चीजक वर्णन  इतिवृत्तात्मक  किएक नै क पवैत छी ? हम एक एक शहर के, स्थान के एक एक क्षण के भोगैत छी ,ओही मे सांस लेत छी ,सबटा के अपन  अंतर मे उतारि लैत छी,  तखने  किछ लिख सकैत छी..कतेक कल्पना क लैत छी...की नीक थीक..?.............. ४ जून के १२ बजे दिन में उद्घाटन समारोह आरम्भ भेल. गर्मी आ ताप स  बरगढ़ जरि रहल छल. उद्घाटन समारोह ,केनेल रेस्ट हाउस में छल. ओहि ठाम पुरान परिचित कवि लोकनि स भेंट भ गेल. १९८१ में साहित्य अकादेमी द्वारा आयोजित 'पोएट्स वोर्कशोप', कलकता   में उड़िया कवि राजेंद्र पंधा ,आय.ए. एस., प्रोफ. हरिप्रसाद परीच्छ पटनायक , अश्विनी कुमार मिश्र,  मणिपुरी कवि इबोमेहा सिंह, आर. के. मधुवीर आदि कतेको कवि लोकनी स फेरो भेंट भ गेल.,परिचित मुस्कांक आदान प्रदान भेल. जरैत दुपहरिया ,सुरुजक  ताप तप्त यौवनक प्रखर किरन सब के अप्स्यांत केने छल. शामियाना क नीचा छः भाषाई प्रांतक कवि सम्मेलंक उद्घाटन क आयोजन छल. सभक मोन आ तन गर्मी स बरकि बरकी  गलि रहल छल. अचक्के सामने में टांगल बडका बैनर पर दृष्टि पडल , छहों भाषाक नाम बडका बडका आखर में लिखल छल जाहि में पहिलुक नाम छल मैथिली,  तकर  बाद आसामी, मणिपुरी, बंगाली,हिंदी आ उडिया , मैथिली देखतही  ताप जेना चानन भ गेल, उड़ीसा में अपन मैथिली शब्द ऐना लगैत छल जेना कोनो प्रेमी के अपन प्रियतमा स अनायासे   साक्षात्कार भ गेल हो..बिहार स यानी मैथिली स हम असगर छलों याने आब  मैथिलीक आन ,बान आ  सान जेना हमरे हाथ होई , हम मैथिली के अपन अंक में सटाई फुसफुसाई देलों. ' अहाँ घबराबू नै, उड़ीसा क एहि कार्यक्रम में अहांक स्थान सर्वोच्च रहत , हम   स्वर्ण मुकुट पहिराई  अहांके एहिठाम से विदा करब. आ सरिपों, साँझ में जखन दोसर सिटिंग  आरम्भ भेल हम सलाह देलों जे  सब केओ अपन अपन भाषा में बजता जाहि से एक दोसरा के भाषा के चीन्ही सकी, नहि बुझितो  बुझ्वाक आनंद ल सकी. ,उडियाक कवि सब हमरा बड आदर दैत छलाह..सहर्ष हमर बात स्वीकार क लेल गेल. सान्झुक सेमीनार, बरगढ़क  रोशनाई  खसल  सियाह साँझ , जरैत दुपहरिया स कम नै . हवा नै बह्वाक प्रण क मानिनी  नायिका जकां कत्तो रुसल छलीह..लोक कोना  ज जिवैत अछ एहि पाथर क नगरी में सेमिनार् क  अध्यक्षता उडिया क प्रख्यात कवि आ प्रिंसिपल क रहल छलाह, संचालन  रेडियो स्टेशन क प्रोग्राम  executive  अभय शंकर पंधा क रहल छलाह , विषय छल 'समकालीन कविता '.बिहार स हमर नामक घोषणा भेल ,थपडी  पहिन्ही बाजि उठल 'पोएट्स वोर्क्शोप क आत्मीयता  आर सुदृढ़ भेल.हम सब स पहिने उड़ीयाक कवि आ बरगढ़ क बीडीओ अश्विनी  जी के धन्यवाद देलों जे आयोजक छलाह. मैथिली भाषा सुनतही सब श्रोता लोकनिक चेहरा पर अद्भुद पुलक आबी गेल ,हम साक्षात् देखि रहल छलों .हम बाज्लों...होटेस्ट स्टेट आ होटेस्ट डे ,ताहि मे १२ बजे दुपहरिया मे प्रखर रौद आ जरैत सुरुजक  निचा हम सब गप कविताक कय रहल छी , कतेक विरोधाभास अछ . कविता इजोरियाक भाषा  थीक ,कोमलता ,मृदुताक सफल संचरण रहितो हम सब एही जरैत रौद मे कविताक गप करैत छी..इयैह थीक आजुक कविता - कुंठा , संत्रास ,हाहाकार क मध्य कवि जीवित अछ ते इजोरिया कते..?? पुनह आगू बढैत हम मैथिली क सब कवि लोगनीक  नाम, कविता सब क चर्च केलों ,फेरो---जहिना कोनो  यग्य  वा अनुष्ठान  बिना महिलाक सम्पन्न नै होयत अछ वोहिना कोनो साहित्य ताधरी पूर्ण नै जाधरी महिला साहित्यकारक योगदान नै होय , आ तकर  बाद हम महिला  लेखिका गनक   चर्च विस्तृत रुपे केलों..---------' मैथिली विजयी छलीह थपडी आ वाहवाही क नव स्पन्दन नेने....अभय पंधा  हमर भाषण के हिंदी, उड़िया आ अंग्रेजी मे सम्झावैत कहलनि ..मिसेज वर्मा , हम मानैत छ जे मैथिली मे महिला साहित्यकारक बाहुल्य अछ, उडिया मे सेहो महिला लेखिकाक अभाव नै , महिला के बाहर जेवा मे परेशानी भ जायत छैक . अहाँ मि. वर्माक संग  आयल छी,  ,कतेक लोक के ई संजोग भेटैत छैक ? ....... किन्तु सेमीनारक समाप्ति क उपरान्त हमर मोने एकटा प्रश्न उभरल ..सब कवि अपन भाषण मे सभक चर्च केलनी किन्तु, अपन भाषाक कोनो महिला रचनाकारक  चर्च  नै केलनि..ई भ सकैत छैक मैथिली भाषा मे केओ पुरुख रचनाकार रहितैक तं ओ सेहो महिला क लेखनक चर्च नै करितैथ....आखिर इ वैमात्रिक व्यवहार महिला संग किएक ? महिलाक चर्च सं की हुनक  अहम पर चोट पहुँचैत छैक , आकी अपना के छोट बुझ लागैत छैथ..?जाहि ठाम सम्मान देवाक गप ओहिठाम इन्फिरीयोरिटी कम्प्लेक्स  किएक  ?..एकर उत्तर दुनियाक कोनो पुरुख लग नै अछ.. गर्मी बड़ जोर, मंच पर उडिया कवि रवि सिंह क स्वर आर आगि उगलि रहल छल---..उड़िया क कवि लोगनिके आय धरी कोनो रचना पर पारिश्रमिक  नै भेटल अछ......इ ते मैथिलिक संग सेहो छल..प्रोफ.दीपक मिश्रा ,उडिया कवि हमरा कहलैथ .जे रवि जे के लोग आगि कहैत छैथ..' उडिया कवि लोग् क  मात्र दुई वर्ग छल , एकटा पदाधिकारी लोकनी दोसर प्रोफेसर  सब.  रातुक १० बाजी गेल, मंच पर मणिपुरी कवि इबोमेहा सिंह क  वक्तव्य चली रहल छल....दीपक मिश्रा के मंच पर एवा लेल  निमंत्रित कयल गेल,ओ क्ह्लनी.'हम कविता क सकैत छी ,ओही पर बाजी नै सकैत छी ....दीपक मिश्राक संग हम सब पार्क मे हवा खोज गेलों जे कत्तो मन्हुआय्ल सुतल हेतीह.... बाड़ी में घुमैत हम दीपक स कहलों ..जनैत छी हमर मिथिला में जखन बड गरम लगैत अछ, हवा नहि चलैत अछ ते हम सब एकटा फकड़ा पढैत  छी ---सुषा के धोकड़ी मुसा के कान,  धोकड़ी  धोकड़ी हवा आन ओते से बक गेला कते......आ तकर  बाद क स लक ह धरि  एकटा कविता पढ़ पडैत छैक, जेना बक गेला कते..कमलपुर आगत स्वागत के केल्कानी ,किशोर बाबु, ,बैसलैथ कदम्ब क गाछ पर , पानि पिव्लैथ कोसी नदी में, माछ खेलैथ कबई, ....एहिना सब आखर से सही गाछ, सही,माछ, सही नदीक नाम कहैत 'ह'  पर खत्म होइय्त अछ आ बसात बह लगैत छैक.....दीपक हँसैत बजलाह ..तखन भ जाय शुरू.... हमहूँ सब हँसे लगलों ..बहुत समय आ धैर्यक  आवश्यकता छैक दीपक जी..कोनो चीज सहजही नहि भेटैत छैक... रातुक भोजन में पुलाव, मीट, ३--४ प्रकारक  तीमन, नीचा में  दरी  पर पात में खेलों. एकटा बारीक बाजल  --दालि पात पर स बहि रहल छैक..हम चोंकि गेलों, पहिल बेर बरगढ़ में मैथिली सुन्लों..बाल्टी हाथ में नेने एकटा युवा ..हम मैथिली जनैत छी , सीतामढ़ी घर अछ. एहिठाम बिजली विभाग में छी. आय अहांक मैथिली में भाषण सुनि अपन भाषा मोन पड़ी आयल.. दोसर दिन १० बजे दिन में कवि सम्मेलन आरम्भ भेल. अभय पंधा संचालन क रहल छलाह, हुनक व्यक्तित्व में मैथिली, उड़िया, मणिपुरी, बंगाली, असामी,हिंदी,अंग्रेजी  सबटा भाषा भरल छल ,भव्य आ प्रतिभा संपन्न व्यक्तित्व ..देवी दास मिश्र क कविता भ  रहल छल जिनका ले सब कहैत छलाह जे ओ आशु कवि छैथ ,ओ कविता लिखैत नै छैथ, कविता  बजैत छैथ .. सिगरेट क धुइयाँ सँ घेरल हम बैसल छलों. राजेंद्र पंधा ,हरिप्रसाद ,आ सौभाग्य मिश्र  तीनो क ठोर में सिगरेट .....राजेंद्र पंधा क कविता क भाव --' the entire world is devided into two camps , one to love ,the another which preaches hatred....I am for love ..'  ....मनुख पर ओकर नामक असर अवस्य होइत छैक ..डॉ. प्रसन्न मिश्र गुलाबी शर्ट  में सदिखन अपन प्रसन्न आनन स सब के उल्लसित करैत छलाह. ओ उड़ीसा सरकारक पत्रिका 'शिशुलेखा' क सम्पादक क संगे प्रोफेसर सेहो छलाह .प्रख्यात उड़िया कवि डॉ.सौभाग्य मिश्रक  व्यक्तित्व स भाग्यक रेख छलकी र्झ्ल छल---'सुने पाखी उड़े जाय ,डेना  फड फड करी ....'...नरसिंह प्रसाद त्रिपाठी कविता 'निजस्थिति' क बाद मैथिलीक कविता 'मधुगंधी वासात'  नेने हम मंच पर एलों..फेर विद्यापतिक भाषा गूंजी गेल पाथरक देश मे...हरिप्रसाद जीक कविता -'सून सून आगि बेढ़ कुसुम लागि छे मते बारम्बार  ईश्वर हसंते......' --------उडिया - कविता सब नम्हर नम्हर होइत अछ, मुदा, प्रसन्न कुमार प्रत्स्नी एम्.एल.ए. बड छोट कविता पढ्लनी 'चिलिका' ....मणिपुरी कवि इबोमेहा सिंह..'  देबोय  देबोय  ( डान्स डांस  ) ' सुनोलनी ते दोसर कविता जस्ट टू डे, जस्ट टू डे .....डेड जगन्नाथ डेड जगन्नाथ..... 'मोन के आक्रांत क देलक.. गर्म गर्म हवा चलि रहल छल. बीच बीच में कोंफी आ पानि सेहो..विचित्र आ सम्मोहक लागल..कवि सम्मलेन  १ बजे दिन स ४ बजे तक चलल, मुदा सब जेना कवि सब के सुनवा ले आकुल व्याकुल..मोन पड़ी आयल अपन चेतना समितिक  विद्यापति पर्व समारोह '७३-७४  इसवी  सभक..मिलर  स्कूल केर कैम्पस  में १०,०००, श्रोता  राति भरि  खाली  कविता सुनवा लेल मन्त्र मुग्ध बैसल रहैत छल .. सम्मेलन ख़त्म हेवाक उपरान्त  सब भोजनक ओरियाओन  में लागि गेलाह. सब अफसर लोकनि अपने स कुर्सी घिच घिच के सामने आन ल्ग्लैठ. अफसरशाही क कोनो घमंड नै.  भात ,दालि, दू टा तीमन आ रोहू माछक बडका बडका कुटीया..दही चीनी ..लगैत छल अपने मिथिला में छी.. हरिप्रसाद जी वर्मा  जी के पुछलनी--डू यु स्मोक ? जबाब हम देलों --नो स्मोकिंग , नो ड्रिंकिंग ....वर्मा जीक हाथ पकड़ी वो बजलाह ' बेचारा '  .देन यु हँव मेड हिज लाइफ  मीजरेबुल....हमरो पत्नी हमरा पिव नै दैत छलीह ,तखन हम ओकरा स पुछ्लों. अहाँ कवि स ब्याह केलों कि प्रोफेसर स..? ओ बजलीह -निश्चित रुपे कवि से ....तखन हमरा पिव दिय..हम पिअब नै ते कविता नै क सकब..फेर ओ हमरा  कविता करैत काल शराब  पिवाक अनुमति द देलनि..'  कविता करवाक विचित्र परिभाषा पर हंसी लागि गेल. ५ बजे प्रोफ. अशोक चन्दन होटल आबि  बजलाह--शेफालिका जी, १० मिनट लेल रेस्ट हाउस चलू.  उडिया क  नव कवि आ छात्रगण अहांक इंटरव्यू लेताह ... भरि दिनक थाकल छलों किन्तु वर्माजीक एके डांट में ..कोनो कार्यक्रम  में नै नहि कहियोक..एहि लेल आयल छी  ने..'  आ अपना पलंग स दोस्ती क लेलनी हम चंदन जी संग रेस्ट हाउस एलों..बडका मजमा लागल छल --बीच में टेप रेकॉर्डर  राखल छल..' कविताक सृजन कोना होयत छैक..?' सोझ प्रश्न लगले दिल दिमाग पर लागल--कि अहाँ जहिना कविता बनवैत छी ओहिना प्रकाशित करैत छी, @...हम हुनक समस्या आ बहसक कारण बुझि गेलों..-----देखू, जहिना प्रसव पीड़ाक  काल लेबर पेन होइत छैक, ठीक ओहिना   कोनो भाव शिशु   हृदय में हिलकोर  करैत अछ अछ   . जाधरी ओकरा कागज पर नै उतरैत छी    ताधरी प्रसव पीड़ा स छटपटावैत रहैत छी.. बच्चाक जन्मक बाद माता के कतेक शान्ति भेटैत छैक वैह शान्ति कवि के कविताक जन्मक बाद भेटैत छैक. ई दोसर गप थीक जे जन्म क बाद बच्चा के केश,माथ,नाक सब के ठोकी ठाक  नीक बनवैत अछ ओहिना कविता के पढि पढि  नीक आर नीक  ले कवि  सोचैत अछ. ..' सब विस्मित  विमुग्ध छलाह ..'एक  टा गप आर अपन कोन रचना अहाँ के बेसी नीक लगैत अछ..'  हम हांसी देलों..' आब हमरा ई  नै पुछू जे अहांक अपन बाल बच्चा में के सब स नीक लगैत अछ, रचनाकार के अपन कोनो सन्तान अधलाह नै लगैत छैक , लोग जे बुझे.....' अभय जी बजलाह..अहांक भाषण आ इंटरव्यू ८ जून के राति में रेडिओ स प्रसारित होयत , जरुर सुनब.. .....ट्रेन पकड़बा लेल होटल स निकलैत छलों कि रोहिणीकान्त  मुकर्जी ,सोवेनिर क सम्पादक पत्रिका ल पहुँचलाह--एहि में अहाँक  मैथिली कविताक अंग्रेजी रूपान्तर  छपल छैक, अगुला बेर उडिया रूपान्तर प्रकाशित होयत.-------- आ फेर एकटा बिछुड्वाक दर्द नेने, सब स मिलैत  सनत कुमार आ अशोक महापात्र क संग स्टेशन ले विदा भ गेलों ..मैडम ,अहाँ हमरा सब के पत्रक जबाब देब ने...? एतेक आत्मीय स्वर में तीति भीजि गेल छलों. ....हं हं जरुर देब..शर्त एकेटा अहाँ सब हमरा मैडम नै दीदी  कहू.........हं दीदी, हम सब कहियो अहाँ के नै बिसरब. आ हमर मोन ट्रेनक गति संग भगैत रहल. मणिपद्म जी एक बेर मंच पर कहने छलाह--शेफाली, अहांक मोन ते सेमरक फूल जकां उडैत रहैत अछ ....हमर मोन सांचे उडि रहल छल, उडिया लोकक सम्पर्क भाषा उडिया छल, बंगाली सभक बँगला ....आ हम सब की करैत छी..हिंदी हमर राष्ट्र भाषा थीक , मैथिली मातृभाषा ,   --अपन माय के आदर देब तखन त राष्ट्र के आदर द सकैत छी , जननी के पूजब तखन त जन्मभूमि के.... ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। गजेन्द्र ठाकुर स॒हस्र॑ शीर्षा॒ गजेन्द्र ठाकुरक जन्म भागलपुरमे सन् १९७१ मे भेलन्हि आ आइ काल्हि ओ दिल्लीमे रहै छथि। मणिरत्नम लेल, जिनकर हिन्दुस्तानी हमरा अपन पिताक स्मरण करबैत रहैत अछि। तेसर कल्लोल गढ़ नारिकेलक मिलू। डोमटोलीक। बड़का गबैय्या। सरकारी कार्यक्रम शुरू होइ छै कनेक देरीयेसँ। गौरीशंकर स्थानमे जखन आस पड़ोसक गामक लोक सभ जुमए लगलाह तखन सरकार सेहो माटिक सड़क बनबा देलक आ जोन मजूर आसपासक गाम सभसँ एतए बोनिपर खटए लागल। आ बोनि एकदम्मे भेटै। मुदा कतेक लोककेँ कतेक बोनि भेटत से ककरो नै पता रहै। ठेकेदार सभ धाँइ-धाँइ एक्के औँठासँ कतेको लोकक बोनिपर दस्खत कऽ दै। नव-नव कार्यक्रम सभ आएल छै सरकारक। जे भेटै छौ बड्ड भेटै छौ। मोहना- दलित गबैय्या। मजदूरी न्य्योन दरसँ, सरकारी स्कीममे मजदूरीक दरमे अन्तर किए? कागज नै भेटत, किए नै भेटत? ने कहियो देखल आ नै सुनल, बजा कऽ काज कियो देने छल आइ तक, आ पाइ नकद भेटै अछि। बेसी मेन-मीख निकालमे तँ जे भेटै छौ सेहो बन्न भऽ जेतौ। एकटा संगठन खुजल छै झा आ यादव बाबू सभक, से धरना देलकै। असफल रहलै। पाइ नकद भेटै अछि, बेसी मेन-मीख निकालमे तँ जे भेटै छौ सेहो बन्न भऽ जेतौ। उठलाह मिलू गबैय्या- ओइ दस्तावेजमे किछु जादू छै- हमरा सभकेँ ओ लेबाक चाही, तखने ठीक मजदूरी हमरा सभकेँ भेटत। जादू!! हे किछु गप छै। जादू!! मिलू गबैय्यक गप छिऐ बाबू। हमर अधिकार- हमरा की भेट रहल अछि वा भेटबाक चाही, की हक अछि। मिलू गबैय्याक गप छिऐ बाबू, आब जादूसँ आगाँ बढ़ल छै। जीबाक साधन आ ओकर सुरक्षा लेल जन सुनबाहीक प्रारम्भ केलन्हि परमानन्द पासवान, झंझारपुरक बी.डी.ओ. साहेब। सुनबाहीमे तँ सभ मानिये जाइ छलै, ठेकेदार, दलाल सभ। मुदा बादमे फेर वएह होइ छलै। आइ कम मजूर चाही, आइ बच्चा, जनी-जाति नै चाही। आइ पुरुखोमे कम्मे लोक चाही। ई ठिठरा कमजोर अछि, ई नै चाही। ओ फुलेसरा मजगूत अछि मुदा कोढ़िया अछि, ओहो नै चाही। एतेक काज बाँकीए छै आ मजूर चाहबे नै करी। फेर जन सुनबाही बजेलन्हि परमानन्द पासवान। सभ नेता, ठीकेदार, दलाल सभ जुटल। बड़ा मारुख सभ। एह परमानन्द पासवान जी, की कहि देलिऐ। अहाँक गप के उठाएत? आहि रे बा!! मुदा फेर वएह; जनी-जाति, कमजोर, बच्चा, कोढ़िया। छोड़; ई मोहना गबैय्याक फेरामे पड़ि कऽ भुक्खे मरि जाएब गऽ। चारिम कल्लोल गढ़ नारिकेलसँ किशनगढ़ आएल दूटा चिट्ठी। मुकेश पासवानक समधि बिन्देश्वर पासवानक ददा गढ़ नारिकेलक पुरान बसिन्दा रहथि। मुदा फेर ओतएसँ रोसड़ाक लेल पलायन कऽ गेल रहथि। हुनकर पत्नी बेटाक दिल्ली बसलासँ बड़ दुखी छथिन्ह। आ तकर दोष अपन समधिकेँ सेहो दै छथिन्ह। बिन्देश्वरजी अपन पत्नीक पुत्रक नाम लिखल चिट्ठी मुकेशजीकेँ लिखै छथि। डाक सेवापर हुनका भरोस नै छन्हि। गढ़ नारिकेलक ढेर रास लोक दिल्लीमे रहै छथि से हथौटी ई चिट्ठी बेटा लग पहुँचि जेतन्हि, तइ द्वारे। दोसर चिट्ठी सत्यनारायण यादवक पत्नी अपन बेटा बिपिनक नामे लिखने छथिन्ह। बरइ कपिलेश्वर राउतक बेटा पालन दुनू चिट्ठी गढ़ नारिकेलसँ किशनगढ़ अनलन्हि अछि। १ पहिल चिट्ठी शुभाशीष। हम एतए कुशल छी। अहाँ सबहक कुशलक हेतु सतत् भगवानसँ प्रार्थी रहैत छी। आगाँ समाचार ई जे अहाँ सभ हमर खोज खबरि लेनाइ बिल्कुले बिसरि गेल छी। फोन तँ छोड़ू, चिट्ठीयो सँ गप्प केना महिनो बीति जाइत अछि। कमसँ कम सप्ताहमे नै तँ महिनोमे एको बेर तँ माएक लेल गप्प करबाक समए निकालू। एतेक मोटका-मोटका किताब अहाँ लिखैत छी, किन्तु माएसँ गप्प करबाक फुर्सत नै अछि। अहाँक किताबक खिस्सा आ कविता सभ दीदी सुनेलक अछि। बहुत मार्मिक लगैत अछि। परन्तु अपन माँक प्रति कोनो जिज्ञासा नै होइत अछि, जे कतए रहैत अछि आ कोना अछि। भाएसँ अहाँ अपने समए-समएपर गप्प करू जे हम कतऽ कतेक दिन रहब। गाममे आब हमरा नै रहल होएत कारण एतए कोनो व्यवस्था नै अछि आ कियो जवान पुरुख-पात नै रहैत छथिन्ह। अहाँ सभ भाए-बहिनमे छोट छी किन्तु घरमे अहींकेँ घरक व्यवस्था आ इन्तजामक भार शुरुहेसँ अछि। किन्तु एम्हर अहाँ ध्यान नै दैत छिऐक। फोनपर अहाँसँ गप्प करबाक बड्ड मोन होइत रहैत अछि। बच्चा सभसँ सेहो गप करबाक मोन होइत रहैत अछि। बच्चा सभकेँ दू-तीन दिनपर बासँ गप करबा लेल कहबै। जमाएकेँ देखैत रहै छियन्हि जे सभ दू-तीन दिनपर अपन माँसँ गप करैत रहैत छथिन्ह, से हमरो सौख लगैत रहैत अछि जे हमर बेटा सभ केहेन अछि जे कहियो माँसँ गप्प करबाक मोन नै होइत छैक। सभ कहैत अछि जे अहाँकेँ कोन चीजक कमी अछि, से हमरो चीजक कमी तँ नै अछि मुदा धिया- पुताक हम प्रेमक भूखल छी। पुतोहु अहाँकेँ एखन घरक सभटा काज करए पड़ैत होएत। बड्ड मेहनति होइय होएत, मुदा तैयो हमरोपर ध्यान राखब। हम बड्ड घबराएल रहै छी तेँ जे फुराएल से हम चिट्ठीमे लिखा देलहुँ। अहाँ सभक प्रेमक भूखल- अहींक माँ। २ दोसर चिट्ठी बेटा, -महींस दूध दऽ रहल अछि, मुदा टोलबैय्या सभ जड़ि रहल अछि। बिपिन चिट्ठी पढ़िते रहै छथि आकि कपिलेश्वर राउतक बेटा पालन बीचेमे बाजि उठै छथि- “अएँ यौ , अहाँक दूध होइये तँ टोलबैय्या सभ किएक जड़त? आ से ओ कोना बुझै छथि से पुछियन्हु”। मुदा बेटा —बिपिन- केँ देखू ओ आगाँ बजै छथि- “अएँ यौ, सएह ने हमहूँ पुछै छी। हमरा दूध होइये तँ लोक सभ किए जड़ैए”? माएपर बेटाकेँ कतेक विश्वास छै? बिपिन फेर बजै छथि- “से जे ओ सभ मोने-मोने जड़ैए, से हम सभटा बुझै छिऐ”। चिट्ठीमे आर बहुत रास गप छै। -हमर नैहराक हालति बड्ड खराप। बड़का भाएक बच्चा सभ तँ तैयो ठीके छै, छोटकेक हालत बड्ड दब। मिदनापुरमे क्रेन चलबै छलै। मोन खराप भेलै तँ छह मास गामेमे रहि गेलै। फेर घुरि कऽ गेलै तँ क्रेनपर हाथ थरथराए लगै। हियाउ नै होइ छै। बच्चा सभ टुग्गर जेकाँ करै छै। जे कोनो जोगार हुअए तँ देखबै। नै भाए लेल नै। ओकर तँ आब बएस भेलै, गामेमे रहथि सएह नीक होएत। ओकर दूमे सँ एक्को टा बेटाक जे जोगार लागि जाइ तँ। बड़का भाउज पहिने माएकेँ देखए नै चाहै आ आब छोटकाक सिरपर लागल छै। साझ-सझियामे चौठारी फसिल दैत रहै से तँ बुझलिऐ मुदा आमक मासमे तँ छोटकोक बच्चा सभ कलम ओगरै छै। मुदा आमो चौठारी दै छै, छोटकी भाउज तामसे सेहो नै लेलकै। हम नै किछु बजलिऐ, हमरा तँ सभ कहिते अछि जे छोटकाक पक्ष लै छिऐ, तेँ। -सभ दिल्लीसँ गाम अबैए तँ अहाँक घरक शानक चर्चा करैए, से नीक तँ लगैए, मुदा डरो लगैए जे नजरि ने लागि जाए। -आर सभ ठीके अछि। अहाँक माँ मुदा मिलू गबैय्या जे कहलक जे कागज सभमे छै जादू से! ...... ...... ...... ...... (आगाँ....) ...... ...... ...... अन्तिम (पचासम) कल्लोल पटवा जगदीश माइलक बेटा महेश गामेमे रहै छन्हि। भरि दिन कपड़ा बुनबाक लेल खद्धामे पैसैत आ तानी आ भरनी मिला कऽ कपड़ा बूनि पेटलरदीपर लपेटैत जगदीश माइल अपनामे भेर रहै छथि। औंटि कऽ निकालल बाङक बङौरा जगदीश माइलक घरक चारूकात एत्तऽ–ओत्तऽ पसरल रहैत अछि। भदैया कोकटीक बूनल वस्त्रक लेल जगदीश माइल नामी छथि। एक बेर भदैया कोकटीक जगदीश माइल द्वारा बूनल वस्त्र कीनू आ भरि जनम पहिरू। जगदीश आ महेश फिटलूम, किसान चरखा आ अमर चरखा सेहो चलबैत छथि। मुदा जगदीशक सूत घुरिआइत नै अछि, एकदम गफ्स। मुदा महेशक सूतक जोड़मे घुरछी खूबे भेटत। अढ़ाइ हाथ चाकर धोती-साड़ी धनिक आ गरीबक हिसाबे छोट-पैघ भेटैत अछि। से पाइबला लेल दसहत्थी धोती मुदा गरिबहा लेल सतहत्थी धोती। तहिना साड़ी सेहो धनिक गरीबक हिसाबे बनबै छथि जगदीश माइल। बहुआसीन लेल बिसहत्थी तँ गरिबनी लेल नओ हत्थी। हँ, मुदा नओहत्थीसँ छोट साड़ी आ सतहत्थीसँ छोट धोती कहियो नै बनेलन्हि जगदीश माइल। मुदा ई खादी-भण्डारबला सभ आब पहिने जेकाँ हृदएसँ सेवा नै कऽ रहल अछि। मारते रास दलाल सभ राखि लेने अछि आ जगदीश माइलक बेटाकेँ कोनो ठाम नोकरी करबा लेल पोल्हा रहल अछि। नबी बकस आ ओकर माए। पहिने ईहो सभ धुनियाँ आ जोलहागिरी करै जाइ छल मुदा आब नै। आब नबी बकस राजमिस्त्री बनि गेल अछि। गबैया धरि दुनू गोटा.... मुदा तेँ की, मिलू मेघ मुरलीबला सन के गाओत ? प्रसिद्ध मोहना- चर्मकार टोलक पिपहीबला गबैय्याक बेटा। लोक पिपहीबलाक बदलामे मुरलीबला कहै छै। हाइ रे हइ। बापो एहने गाबै छलै। तोँ कोना बुझलहीं ? बुढ़ा सभ कहै छथिन्ह। हाइ रे हइ। ई गाम गढ़ नारिकेल, हाइ रे हइ। घर सभ बुझू सुगरक खोभारीये सन। मुदा कोनो खोभारी नै छै जतए कोनो ने कोनो कलामी नै रहैत होथि। ई मिलू मेघ मुरलीबला। बड़का चकरका बान्हपर जे माटि पड़ि रहल छलै तँ ठिकेदार सभ मजदूरी न्यून दरसँ कम सरकारी बोनि दऽ रहल छलै। एह, कहलकै जे। दस्खत आ औंठा। घुटराक औंठा रोशनाइमे भिजले रहै छलै। दे औंठा, दे औंठा, धांइ- धांइ घण्टा मे तीन सए मजूरक बोनिपर एक्के औंठाक चेन्हासी। सरकारी स्कीममे मजदूरीक दरमे अन्तर किए? मिलू मेघ मुरलीबला उठा देलकै तान। बड्ड देखलिऐ सरकारी इजलास गौरीशंकर थानपर। मोंछबला सभ ने कनफुसकी करऽ जानै जाइए। ई मिलू मेघ मुरलीबला से ने तान उठेलन्हि जे की कियो बुझबो केलकै फरिछा कऽ। सभकेँ भेलै जे गबैय्याक तान छिऐ। मुदा ओइ तानमे जे बाबू तागति रहै से परमानन्द पासवान बी.डी.ओ. साहेबकेँ लऽ अनलकै गढ़ नारिकेल। कागज नै भेटत, आहि रे बा। बी.डी.ओ. साहेब तँ तैय्यारे छथि मुदा एस.डी.ओ. तँ जुलुम केलक। मोंछबला सभ कोन कोन झण्डा लऽ कऽ आबि गेल, भूख हड़ताल आ धरना। “मजदूर, किसान, गरीब, भूमिहीन आदि-आदि संघर्ष संगठन”- बाबू बड़बरिया रॉयक धरना असफल। उठलाह मोहन गबैय्या। दादाके दुअरपर बाजैए बजना उतारब सजना हाइ रे हाइ मोहन मेघ वंशीबला। मैया के आसन डोललै हे नबी बकसक माए कत्तऽ सँ नै हरलै ने फुरलै, आबि गेलै। अम्मा रोबे रोबे ला बहिनियाँ रोबे दुलहिन रोबै हय हाय खटिया के पौवा सैयद जाइ छै आजु दिन लड़ैले हो हाइ हाइ गाछ के रिरितिया रोबै डारीके कोइलिया कुहकै मयुरनी हो हाइ हाइ एकर दिस लड़ै दुनु भैयेँ हो हाय हाय..... गामक स्त्रीगण सभ आबि गेली... बिना तारतमक गीत सभ शुरू, फुसियाहींक घोल फचक्का शुरू भेल। मुदा फुसियाहींक कहाँ रहल ओ.. घर पछुअरबामे बसए मा मलमल सारिया बिसाइ हे सेहो सरिय खरीदऽ गेल बौआ दुल्हा पेहेनिये चललि ससुरारि हे दादा अलारी दादी दुलारु सारी रात हे भरि दिन गमेलियौ दादी रातो चलल ससुरारि हे .... पलंग उछाय हे ....................................................................... -ओइ दस्तावेजमे किछु जादू छै। ई की बाजि गेल फेर मिलू गबैय्या। ओइ कागचमे जादू होइ नै होइ, ऐ गपमे बड्ड जादू छै। बाजि गेल कहाँ, बाजिये रहल अछि। -हमरा सभकेँ ओ दस्तावेज लेबाक चाही, तखने ठीक मजूरी हमरा सभकेँ भेटत। कोनो फुसियाहींक जादू-टोनाक गीत फेर शुरू करत ई। काली, बन्दी, गोरैया, बरहम आ बिसहाराक गीत शुरू करत। बिजुबोन शिकार हे एक पूत गेल हे भैरव दुइ कोस गैल बाबू केकर बिजूबोन शिकार हो एक कोस गैल भै दुइ कोस गेलहो बाबू तेसर कोस बिजू बोन शिकार हो एक बोन झोरलओ हो भैर तेसर बोन झोरल हो बाबू तेसर बोन उठल शिकार हो एक बोन झरलहो हे भैरऽ दुइ बोन झोरललऽ ह तेसर बोन उठल शिकार हो कारिया कुकुर हो बिसहर गेलऽ बाबू खोरियेलऽ तेसर बोन एक बोन खोजलहो बिसहर दुइ बोन खोजलह तेसर बोन उठल शिकार हो हरिण हो मरल हो भैरव तितिरो ने मारलऽ हो बाबू बिछि बिछि मारलऽ मयूर हो कहाँ गेल बोन के मयूरनी दाइ कहर ले सेन्दूर गए तितिरो ने मारलऽ हो भैर बिछि बिछि मारलऽ मयूर हो एकबे उमेले भैर सेनूर जे हरि लेल बाबू भेल हो हे, ई गोरिलक गीत गबैत-गबैत मजूरीक गप कखन शुरू कऽ देताह से कहब मोश्किल। आ फेर गप उठबे करत, गप अधिकारक। परमानन्द पासवान बी.डी.ओ. साहैब, हाइ रे हाइ। बभनीकेँ पुत्र तोहें बाल गोरैय्या, पोथी नेने पढ़न जाइ हे पोथिया नेरौलनि गोरिल जार बिरिछ तर हलुआइ घर पैसल धपाइ हे किछु मधुर खेलनि गोरिल किछो छिरियौला किछु देल लंका पठाइ हे बभनीक पुत्र तोहेँ बाल गोरैय्या ग्वालिन घर पैसल धपाइ हे किछु दूध पीलनि गोरिल किछु ढ़रकओला किछु देल लंका पठाइ हे बभनीक पुत्र तोहेँ बाल गोरैय्या बड़इ घर पैसल धपाइ हे किछु पान खेलनि गोरिल किछु छिड़िऔला किछु देल लंका पठाइ हे बभनीक पुत्र तोहेँ बाल गोरैय्या डोमिन घर पैसल धपाइ हे नीक नीक पाहुर गोरिल अपने चढ़ाओलऽ काना पातर देल हड़काइ हे बभनीक पुत्र तोहेँ बाल गोरैय्या ब्राह्मण घर पैसल धपाइ हे नीक-नीक जनौ गोरिल अपने पहिरलनि औरो देलनि ओझराइ हे हकन कनै छै गोरिल ब्राह्मणीक बेटिया ब्राह्मण बाबू बड़ दुख देल हे भनहि विद्यापति सुनू बाबू गोरिल गहवर पैसिये जस लेल हे -हमर अधिकार। हमरा की भेट रहल अछि वा भेटबाक चाही, की हक अछि। परमानन्द बाबू गपकेँ बुझलन्हि। औ बाबू- “ई अरदराक मेघ नै मानत रहत बरसि कऽ” आरसी प्रसाद सिंह आ मिलू मेघ मुरलीबला। ई किछु खेला हेबे करत। ओम्हर मुसहर टोलीसँ दीना भदरी बाबा आ सलहेस महराज पूजब शुरू भेल। फेर परमवीर, काली, भगवती, कमला, गांगोक गीत शुरू भऽ गेल। हे परमवीर, काली, भगवती, कमला, गांगोकेँ घरमे पूजल जाइ छै, एतऽ कतौ ई गाओल जाइ। दीना भदरी बाबा आ सलहेस महराजक गीत गाबऽ ने जे बाहरमे गाओल जाइ छै। गांगो गहिल आ जन सुनबाही आ मजूरी! गांगोदेवी के अंगनामे अरहुल के गछिया फर-फूल लोधल ठाढ़ि यै ..राजा सुगा एक आएल बैसल सूगा यै अरहुल फूल गाछ हे बैठल सूगा अरहुल फूल गाछ हे डाढ़िपात केलक क-कचून हे नीक नीक फूलबर सुगबा चुनि चुनि खाय डाढ़ि पात देलक कचून हे कहाँ गेल कियर भेल गाम के बहेलिया मारू सूगा के धनुष चलाइ हे घर से एकसर मरल बहेलिया दोसर मारल तेसर शर सूगा उड़ि जाइ हे घर से बहार भेलि गोसाउन नै मारिय सुगबा के रहत एना सुगबा छोट भाइ हे जौँआ आम दियौ बहेलिया सूगा के केर कान सुगबा सुगा छिऐ छोट भाइ हे जीबाक साधन आ ओकर सुरक्षा लेल जन सुनबाहीक एस.डी.ओ. शुरू केलन्हि, मोने-मोन तमसाइत। एस.डी.ओ. कहाँदन आइ.ए.एस. छथि, मुदा परमानन्द पासवान, हाइ रे हइ। एस.डी.ओ. हुनका कहबो केलखिन्ह जे अहाँ स्थानीय छी तेँ जखन जे होइए कऽ दै छी, जखन जकरा होइए भड़का दै छी। जन सुनबाहीक प्रारम्भ भेल। मजूरी सभकेँ नीक-नहाँति भेटऽ लगलै। आ ई तखन भेलै जखन सूचनाक अधिकार एतुक्का लोककेँ नै भेटल रहै। २००५ ई. मे सूचनाक अधिकार भेटलै मुदा मिलू गबैय्या जे जन सुनबाही शुरू करबेने रहथि, ओहो तँ सरकारी हाकिमे सभ द्वारा शुरू करबेने रहथि। ई जे सभ ठामक हाकिममे भाव रहितै तँ की दिक्कत रहै। कतेक ठाम कतेक मिलू गबैय्या भेल हेतै आ परमानन्द पासवान सेहो, हाइ रे हइ। आ तखन ई २००५ ई. मे सूचनाक अधिकारमे बदलल अछि। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com  पर पठाउ। ३. पद्य ३.१.सत्‍येन्‍द्र कुमार झा- पाँच गोट लघु कवि‍ता ३.२.रामदेव प्रसाद मण्‍डल ‘झारूदार’- चारि‍ गोट गीत ३.३.किशन कारीगर- सेहन्ता ३.४.रामविलास साहु- पाँचटा टनका ३.५.नवीन कुमार आशा ३.६.मनोज कुमार झा-शासक लोकनिसँ (बाढ़िक सन्दर्भमे) सत्‍येन्‍द्र कुमार झा पाँच गोट लघु कवि‍ता 1 पाि‍नक खर्च तँ छैहे लोककेँ बि‍नु पानि‍ बहुतो काज नै छै संभव, मुदा तैयो कि‍छु पानि‍ राखि‍ लि‍अ बचा कऽ अपनाकेँ बेपानि‍ होएबासँ बचेबाक लेल। 2 अकासमे मेघ/ कारी-कारी मेघ झहरतै मोती सन बुन्न कखनो अवश्‍ये पृथ्‍वीक धधकैत करेज भऽ जेतै शीतल मुदा भूखल आगि‍ कोना हेतै ठंढ़? सोचि‍ रहल छै, रमुआ रि‍क्‍शाबला बरखामे कोना भेटतै सवारी। 3 एकटा स्‍थायी सरकारक कामना ओ भि‍खमंगा सेहो करै छै चुनावक दि‍न जेकरा जीबए पड़ै छै मात्र पानि‍क संग। 4 क सँ कबुतर देखने छि‍ही? नै ख सँ खरगोश देखने छि‍ही? नै प सँ पेस्‍तौल देखने छि‍ही? हँ.... काल्हि‍ये देखिऐ- गामक्काक उपर तानि‍ देने छलै गामभैया पेस्‍तौल जमीनक कोनो टुकड़ीक लेल। सुतैत काल माए खि‍स्‍सा कहने छल जे ओइ पेस्‍तौलसँ मारि‍ देने छलै गाम भैया सभटा खरगोश आ तहि‍ये उड़ि‍ गेल छलै गामसँ सभटा कबूतर। 5 अहाँ नै पढ़बै तैयो लि‍खले जेतै कवि‍ता अहाँ नै सुनबै तैयो पढ़ले जेतै कवि‍ता अहाँ नै रूकबै तैयो चलि‍ते रहतै कवि‍ता एखन धरि‍ अहींक लेल लि‍खल, पढ़ल आ चलल जा रहल अछि‍ कवि‍ता भवि‍ष्‍यक कवि‍ता लेल जुनि‍ बनाउ स्‍वयंकेँ अप्रासंगि‍क। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। रामदेव प्रसाद मण्‍डल ‘झारूदार’ चारि‍ गोट गीत 1 परबस जि‍बै छै अखनो, मि‍थि‍ला देशक नारी यौ तँए फाटल छै साड़ी यौ ना। नारी कोना कऽ हेतै सख्‍त, कोइ नै दै छै कनि‍यो वक्‍त। दुर हेतै कोना कऽ अबला के लाचारी यौ। तँए......। गाम छै अखनो पुरूष प्रधान, नारी बनल छै चुसक आम। चुप रहि‍ कऽ सहै छै, पुरूषक अत्‍याचारी यौ। तँए.....। नारी नेतो जौं बनै छै, कुर्सी पुरूष ओकर धुनै छै। कानुन कसै नै छै राजा, राजक छी बेमारी यौ। तँए.....। नारी सीता राधा अंश, पुरूष बनल छै रावण कंश। फेर कोना कऽ चलतै, ई घर दुनि‍याँदारी यौ। तँए......। 2 देखि‍यौ यौ सभ बाबू भैया, ई सभ की देखाइ छै। ज्ञान बि‍ना ई अल्‍हर मानव, सुखलेमे नहाइ छै। दल बनेलकै सभ ठकपंथी, एकटाकेँ देने छै महन्‍थी। अन्न पानि‍ की खेतै बाबा, दहि‍एमे नहाइ छै। ज्ञान....। मंदि‍रमे खुब चढ़बु चढ़ाबा, धन पुतकेँ खुब हेतै बढ़ाबा। ठकपंथीकेँ फेरमे मानव, पढ़ने ई पढ़ाइ छै। ज्ञान.....। मॉगनेसँ जब देवता दैइतै, ि‍नर्धन नि‍पुत कोइ कि‍ए रहि‍तै। अंधवि‍श्वासकमे अखनो मानव, जंगलमे बौआइ छै। ज्ञान....। 3 मेल एकता बड्ड सुख दै छै, गाबै वेद-पुराण यौ। सभ भाँइमे जौं एकता रहि‍तै, बम-बम रहि‍तै मकान यौ।। छोड़ि‍ दियौ जाति‍ पाति‍क झगड़ा, ति‍यागि‍ दि‍यौ सम्‍प्रदाइक रगड़ा। कंधासँ कंधाकेँ जोड़ि‍ कऽ, रोपु वि‍काशी धान यौ। सभ....। कुवुद्धि‍मे जौं ओझरेबै, कोना दु:खक गुत्‍थी सोझरेबै। भुख-गरि‍बी रोग अशि‍क्षा, कोना कऽ हेतै नि‍दान यौ। सभ....। राष्‍ट्रहि‍त लऽ सबकि‍यो सोचु, एकता जलसँ एकरा सि‍ंचु देश जौं संकटमे फसेबै, बचतै नै ककरो शान यौ। सभ....। 4 हम मि‍थलानी मि‍थि‍ला के नारी, रहबै नै कमजोड़ यौ। नव डगर अपनेसँ गढ़बै, धरबै शि‍क्षा के डोर यौ। हक हमर जे आब कि‍यो छि‍नतै, अपना लऽ दु:ख अपने कि‍नतै। आब नै नारी रहब अनारी, बनबै सख्‍त कठोर यौ। ना....। आब नै सहबै हम दुर्दशा, करबै नै आब ककरो आशा तोरि‍ फेकबै जंजि‍र गुलामी, चाहे लगतै जे जोड़ यौ। ना....। सभ नारीमे एकता बनेबै, नारी ससख्‍ती सभकेँ जनेबै जे कि‍यो आब हमरा सतेतै, झुटका दऽ मलबै ठोर यौ। ना....। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। किशन कारीगर सेहन्ता हमरो छल एकटा सेहन्ता औ बाबू कहियो त उठी कहब अहाँ आब उठू यौ बौआ भेलैए भोर अहाँक दोस महीम कए रहल छथि सोड़।। हिचुकै हिंचुकै एसगर हम कनैत छलहु देखितहुँ अहाँ से छुटि नहि भेल हालो चाल त पुछितहुँ हमर मुदा कहियो अहाँ के सेहन्तो नहि भेल।। हमर सेहन्ता एकटा सपने रहि गेल कहियो अहाँक हृदय मे हमर स्नेह नहि भेल कहियो ने दुलार कए उठेलहु हमरा औ बाबू विधतो केलैन किस्मतक केहेन खेल।। सोझहे पाईए टा दए देला सँ बापक फर्ज़ नहि पूरा भए जायत छैक हमरो बाप केखनो दुलार करितैथ हमरा अहिं कहू केकरा ने सेहन्ता होइत छैक।। एहेन विरान जिनगी सँ नीक हमरा जनमैते किएक नहि मारि देलहु अपने मगन मे रहलहुँ सब दिन कुहसैत एसगर हमरा किएक छोड़ि देलहुँ।। माएक आँचर बापक साया दूनू गोटे कोनो छोट नेनाक होइत अछि छाया मुदा केहेन निष्ठुर भेलहु अहाँ आई धधकि रहल अछि हमर काया।। हमर किलकारीक गूँज सुनि कहियो दौगल अबितहुँ अहाँ कोरा मे लए हमरा दुलार करितहुँ मुदा कहियो ऐहेन सेहन्ता भेल कहाँ।। नेनापन के हमर सबटा सेहन्ता एकटा सपने रहि गेल मुदा आबो बिचार कए देखू कहियो अहाँक मुहो मलीन नहि भेल।। किएक से अहि कहू हम कोन अपराध केने रही हमर सबटा सख मनोरथ के बिसैर अहाँ अपने मगन मे रही।। हमरा सँ नीक कोनो अनाथ सँ पूछु केहेन बेबस होइत छैक ओकर जिनगी अहाँक जिबैतो हम छी अनाथ एहने बेबस भए गेल हमर जिनगी।। केहेन वीरान जिनगी भए गेल आब नहि अछि कोनो सेहन्ता सबहक बाप सभ केँ  दुलार पुचकार करैथ आब एतबाक अछि कारीगर के सेहन्ता।। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। राम वि‍लास साहु पाँच गोट टनका 1 भरल नदी नाह खेबै खेबैया पानि‍ बहैत बाढ़ि‍ पानि‍ भरल कोना प्राण बचत। 2 मोर नाचैत मोरनी संग-संग बादल बून्न प्रेमक दृश्‍य दैत मन हर्षित करै। 3 कारी बादल बरखा बरसैत बून्न गि‍रैत बि‍जली चमकैत राति‍-दि‍न झरैत। 4 आम रंगीला स्‍वाद छै अलवेला पीला रसीला लालौन सि‍नुरि‍या सभकेँ ललचाबै। 5 लाल गुलाब संगे काँट लागल रूप गंधसँ सभक दि‍ल बसै भौंराकेँ ललचाबै। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। नवीन कुमार आशा एक दिन बाबु कहला हमरा ............................................. एक दिन बाबु कहला हमरा नुनु आवे तोहर  कथा की आखिर छो तोहर विचार आब हमहू भेलो लाचार जल्दी कह तू अपन विचार एक .................................. नुनु हम छालो लाचार आरिज़ भे कलो एकटा विचार आ कलो तोहर विवाह स्थिर पहिने पूरा गप सुनिहे तखन दियहे कोनो जवाब गप  के आब आगू  करी एक............................. नुनु की कहू आगुक हाल जिनाये भे गेल छल बेहाल भोरे भोरे जखन जागी पहुच  जै छलाह घटक घटक कहति हमरा से कि करथि अपनेक बालक कि अपनेक बालक छति तैयार कि छन्हि दहेज़ क विचार ? जे अपनेक अछी कोनो मांग ते देल जै ओकर ज्ञान एक .................................. जखन सुनल हुनक विचार तखन देल हुनका ज्ञान कहल हुनका से हम ने सोचल जै अहेन कुटुम्बा अहेन ने अछी हमर विचार अपने स विनती छे कुटुम्बा ने हुएयों अपने तंग अपने आब दिन तकबियो हमरा किछु ने चाही बस एकटा कपरा मे करबे विदा ने करबे कोनो चिंता बाबु के गप सुनी भरी आयल आखी मे नोर जे अगर हो अहेने सबहक विचार ते कि होएए विवाह बाद अत्याचार एक................................................. बाबु के देल हम वचन आहाक माथ शदा राखब उपर करब सबहक सम्मान ने छोरब ओकर ध्यान एक....................................... ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। मनोज कुमार झा जन्म- 07 सितम्बर 1976 ई0। बिहारक दरभंगा जिलाक शंकरपुर-माँऊबेहट गाममे। शिक्षा - विज्ञानमे स्नातकोत्तर। लेखन: विभिन्न प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकामे कविता-आलेख प्रकाशित। चॉम्सकी, जेमसन, ईगलटन, फूको, जिजेक इत्यादि बौद्धिकक लेखक अनुवाद प्रकाशित। एजाज अहमदक किताब ‘रिफ्लेक्शन ऑन ऑवर टाइम्स’ क हिन्दी अनुवाद प्रकाशित। सराय/ सी. एस. डी. एस. लेल ‘विक्षिप्तों की दिखन’ पर शोध। शासक लोकनिसँ (बाढ़िक सन्दर्भमे)

फूसि कहैछी - बाढ़ि प्राकृतिक कोप थिक । वस्तुतः ई; हमरासभक सीना पर दागबा लेल तोड़बा लेल हमर सबहक आत्मबल कें लूटबा लेल हमर श्रमसिंचित संसाधन अहाँ सभक शस्त्रागारक बेस जोरगर तोप छी । किन्तु जानू , भूख लगला पर मनुख टूटबे टा नहि करे छै, लड़बौ करै छै, कते एफ. सी. आई, कते बाजार समितिक दुर्गद्वार तोड़बो करै छै । रक्त केर जे विन्दु गिड़ै छै एहि धरापर ओ कतेको स्वप्नदर्र्शी रक्तबीज रचबो करै छै,

कोनो राजा, कोनो रानी कोनो जैक वा को कोनो जोकर डरा के वा हँसा कें कतेक दिन धरि लाखो करोड़ो पृथ्वी संतति कें कत्र्तव्यपथ सँ विमुख राखत।

चूड़ा दही बैसी खेला सँ शोणित ठंढ़ा कतौ भेलैये ! मानि ली, ई बात सत्यो सत्य त इहो छै विज्ञानसम्मत वस्तु जे जतेक ठंडा वातावरणकेर ताप के असरि ओकरा पर ओतबिये ज्यादा पड़ै छै ।

तैं कहे छी कान दी गंगा, कोसी, कमला केर संतति सभक हुंकार दिस तात्कालिक लाभ-हानिक छोड़ि चिन्ता आक्रोश-प्लावित भेला सँ पूर्वेहिं शासक लोकनि बाढ़िक निदानक करथु चिन्ता लोक सभ चहुँ दिस कहै छै । फुसि कहैछी बाढ़ि प्राकृतिक कोप थिक। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। विदेह नूतन अंक मिथिला कला संगीत १.ज्योति सुनीत चौधरी २.श्वेता झा (सिंगापुर) ३.गुंजन कर्ण ४.  प्रवीण कुमार ठाकुर ज्योति सुनीत चौधरी जन्म तिथि -३० दिसम्बर १९७८; जन्म स्थान -बेल्हवार, मधुबनी ; शिक्षा- स्वामी विवेकानन्द मि‌डिल स्कूल़ टिस्को साकची गर्ल्स हाई स्कूल़, मिसेज के एम पी एम इन्टर कालेज़, इन्दिरा गान्धी ओपन यूनिवर्सिटी, आइ सी डबल्यू ए आइ (कॉस्ट एकाउण्टेन्सी); निवास स्थान- लन्दन, यू.के.; पिता- श्री शुभंकर झा, ज़मशेदपुर; माता- श्रीमती सुधा झा, शिवीपट्टी। ज्योतिकेँwww.poetry.comसँ संपादकक चॉयस अवार्ड (अंग्रेजी पद्यक हेतु) भेटल छन्हि। हुनकर अंग्रेजी पद्य किछु दिन धरि www.poetrysoup.com केर मुख्य पृष्ठ पर सेहो रहल अछि। ज्योति मिथिला चित्रकलामे सेहो पारंगत छथि आ हिनकर मिथिला चित्रकलाक प्रदर्शनी ईलिंग आर्ट ग्रुप केर अंतर्गत ईलिंग ब्रॊडवे, लंडनमे प्रदर्शित कएल गेल अछि। कविता संग्रह ’अर्चिस्’ प्रकाशित। ३.श्वेता झा (सिंगापुर) ४.गुंजन कर्ण राँटी मधुबनी, सम्प्रति यू.के.मे रहै छथि। www.madhubaniarts.co.uk पर हुनकर कलाकृति देखि सकै छी। ५. प्रवीण कुमार ठाकुर जन्म तिथि -31 दिसम्बर 1977; जन्म स्थान -कन्हौली , सकरी , मधुबनी ; शिक्षा- सूर्य नारायण हाई स्कूल - नरपतिनगर , बी . एस . सी - मेमोरिअल कॉलेज - दरभंगा , डिप्लोमा इन फैशन डिजाईन (नेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ़ फैशन डिजाईन - नयी दिल्ली ) , चित्रकला  आओर फैशन पूर्वानुमानमे विशेष योग्यता, निवास स्थान- दिल्ली , इंडिया; पिता- श्री सत्य नारायण ठाकुर , सकरी - कन्हौली  ; माता- श्रीमती मालती ठाकुर , सकरी - कन्हौली । वर्तमानमे अपन एक्सपोर्ट बिज़नस एस्थेट  ( Aesthete By Pravin - aesthetepravin@gmail.com )  क नामसँ शुरुआत , पूर्वमे प्रोडक्ट डेवेलोप्मेंट आओर मर्चंटक रूपमे कार्यरत। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। विदेह नूतन अंक गद्य-पद्य भारती १. मोहनदास (दीर्घकथा):लेखक: उदय प्रकाश (मूल हिन्दीसँ मैथिलीमे अनुवाद विनीत उत्पल) मोहनदास (मैथिली-देवनागरी) मोहनदास (मैथिली-मिथिलाक्षर) मोहनदास (मैथिली-ब्रेल) २.छिन्नमस्ता- प्रभा खेतानक हिन्दी उपन्यासक सुशीला झा द्वारा मैथिली अनुवाद छिन्नमस्ता बालानां कृते बच्चा लोकनि द्वारा स्मरणीय श्लोक १.प्रातः काल ब्रह्ममुहूर्त्त (सूर्योदयक एक घंटा पहिने) सर्वप्रथम अपन दुनू हाथ देखबाक चाही, आ’ ई श्लोक बजबाक चाही। कराग्रे वसते लक्ष्मीः करमध्ये सरस्वती। करमूले स्थितो ब्रह्मा प्रभाते करदर्शनम्॥ करक आगाँ लक्ष्मी बसैत छथि, करक मध्यमे सरस्वती, करक मूलमे ब्रह्मा स्थित छथि। भोरमे ताहि द्वारे करक दर्शन करबाक थीक। २.संध्या काल दीप लेसबाक काल- दीपमूले स्थितो ब्रह्मा दीपमध्ये जनार्दनः। दीपाग्रे शङ्करः प्रोक्त्तः सन्ध्याज्योतिर्नमोऽस्तुते॥ दीपक मूल भागमे ब्रह्मा, दीपक मध्यभागमे जनार्दन (विष्णु) आऽ दीपक अग्र भागमे शङ्कर स्थित छथि। हे संध्याज्योति! अहाँकेँ नमस्कार। ३.सुतबाक काल- रामं स्कन्दं हनूमन्तं वैनतेयं वृकोदरम्। शयने यः स्मरेन्नित्यं दुःस्वप्नस्तस्य नश्यति॥ जे सभ दिन सुतबासँ पहिने राम, कुमारस्वामी, हनूमान्, गरुड़ आऽ भीमक स्मरण करैत छथि, हुनकर दुःस्वप्न नष्ट भऽ जाइत छन्हि। ४. नहेबाक समय- गङ्गे च यमुने चैव गोदावरि सरस्वति। नर्मदे सिन्धु कावेरि जलेऽस्मिन् सन्निधिं कुरू॥ हे गंगा, यमुना, गोदावरी, सरस्वती, नर्मदा, सिन्धु आऽ कावेरी  धार। एहि जलमे अपन सान्निध्य दिअ। ५.उत्तरं यत्समुद्रस्य हिमाद्रेश्चैव दक्षिणम्। वर्षं तत् भारतं नाम भारती यत्र सन्ततिः॥ समुद्रक उत्तरमे आऽ हिमालयक दक्षिणमे भारत अछि आऽ ओतुका सन्तति भारती कहबैत छथि। ६.अहल्या द्रौपदी सीता तारा मण्डोदरी तथा। पञ्चकं ना स्मरेन्नित्यं महापातकनाशकम्॥ जे सभ दिन अहल्या, द्रौपदी, सीता, तारा आऽ मण्दोदरी, एहि पाँच साध्वी-स्त्रीक स्मरण करैत छथि, हुनकर सभ पाप नष्ट भऽ जाइत छन्हि। ७.अश्वत्थामा बलिर्व्यासो हनूमांश्च विभीषणः। कृपः परशुरामश्च सप्तैते चिरञ्जीविनः॥ अश्वत्थामा, बलि, व्यास, हनूमान्, विभीषण, कृपाचार्य आऽ परशुराम- ई सात टा चिरञ्जीवी कहबैत छथि। ८.साते भवतु सुप्रीता देवी शिखर वासिनी उग्रेन तपसा लब्धो यया पशुपतिः पतिः। सिद्धिः साध्ये सतामस्तु प्रसादान्तस्य धूर्जटेः जाह्नवीफेनलेखेव यन्यूधि शशिनः कला॥ ९. बालोऽहं जगदानन्द न मे बाला सरस्वती। अपूर्णे पंचमे वर्षे वर्णयामि जगत्त्रयम् ॥ १०. दूर्वाक्षत मंत्र(शुक्ल यजुर्वेद अध्याय २२, मंत्र २२) आ ब्रह्मन्नित्यस्य प्रजापतिर्ॠषिः। लिंभोक्त्ता देवताः। स्वराडुत्कृतिश्छन्दः। षड्जः स्वरः॥ आ ब्रह्म॑न् ब्राह्म॒णो ब्र॑ह्मवर्च॒सी जा॑यता॒मा रा॒ष्ट्रे रा॑ज॒न्यः शुरे॑ऽइषव्यो॒ऽतिव्या॒धी म॑हार॒थो जा॑यतां॒ दोग्ध्रीं धे॒नुर्वोढा॑न॒ड्वाना॒शुः सप्तिः॒ पुर॑न्धि॒र्योवा॑ जि॒ष्णू र॑थे॒ष्ठाः स॒भेयो॒ युवास्य यज॑मानस्य वी॒रो जा॒यतां निका॒मे-नि॑कामे नः प॒र्जन्यों वर्षतु॒ फल॑वत्यो न॒ऽओष॑धयः पच्यन्तां योगेक्ष॒मो नः॑ कल्पताम्॥२२॥ मन्त्रार्थाः सिद्धयः सन्तु पूर्णाः सन्तु मनोरथाः। शत्रूणां बुद्धिनाशोऽस्तु मित्राणामुदयस्तव। ॐ दीर्घायुर्भव। ॐ सौभाग्यवती भव। हे भगवान्। अपन देशमे सुयोग्य आ’ सर्वज्ञ विद्यार्थी उत्पन्न होथि, आ’ शुत्रुकेँ नाश कएनिहार सैनिक उत्पन्न होथि। अपन देशक गाय खूब दूध दय बाली, बरद भार वहन करएमे सक्षम होथि आ’ घोड़ा त्वरित रूपेँ दौगय बला होए। स्त्रीगण नगरक नेतृत्व करबामे सक्षम होथि आ’ युवक सभामे ओजपूर्ण भाषण देबयबला आ’ नेतृत्व देबामे सक्षम होथि। अपन देशमे जखन आवश्यक होय वर्षा होए आ’ औषधिक-बूटी सर्वदा परिपक्व होइत रहए। एवं क्रमे सभ तरहेँ हमरा सभक कल्याण होए। शत्रुक बुद्धिक नाश होए आ’ मित्रक उदय होए॥ मनुष्यकें कोन वस्तुक इच्छा करबाक चाही तकर वर्णन एहि मंत्रमे कएल गेल अछि। एहिमे वाचकलुप्तोपमालड़्कार अछि। अन्वय- ब्रह्म॑न् - विद्या आदि गुणसँ परिपूर्ण ब्रह्म रा॒ष्ट्रे - देशमे ब्र॑ह्मवर्च॒सी-ब्रह्म विद्याक तेजसँ युक्त्त आ जा॑यतां॒- उत्पन्न होए रा॑ज॒न्यः-राजा शुरे॑ऽ–बिना डर बला इषव्यो॒- बाण चलेबामे निपुण ऽतिव्या॒धी-शत्रुकेँ तारण दय बला म॑हार॒थो-पैघ रथ बला वीर दोग्ध्रीं-कामना(दूध पूर्ण करए बाली) धे॒नुर्वोढा॑न॒ड्वाना॒शुः धे॒नु-गौ वा वाणी र्वोढा॑न॒ड्वा- पैघ बरद ना॒शुः-आशुः-त्वरित सप्तिः॒-घोड़ा पुर॑न्धि॒र्योवा॑- पुर॑न्धि॒- व्यवहारकेँ धारण करए बाली र्योवा॑-स्त्री जि॒ष्णू-शत्रुकेँ जीतए बला र॑थे॒ष्ठाः-रथ पर स्थिर स॒भेयो॒-उत्तम सभामे युवास्य-युवा जेहन यज॑मानस्य-राजाक राज्यमे वी॒रो-शत्रुकेँ पराजित करएबला निका॒मे-नि॑कामे-निश्चययुक्त्त कार्यमे नः-हमर सभक प॒र्जन्यों-मेघ वर्षतु॒-वर्षा होए फल॑वत्यो-उत्तम फल बला ओष॑धयः-औषधिः पच्यन्तां- पाकए योगेक्ष॒मो-अलभ्य लभ्य करेबाक हेतु कएल गेल योगक रक्षा नः॑-हमरा सभक हेतु कल्पताम्-समर्थ होए ग्रिफिथक अनुवाद- हे ब्रह्मण, हमर राज्यमे ब्राह्मण नीक धार्मिक विद्या बला, राजन्य-वीर,तीरंदाज, दूध दए बाली गाय, दौगय बला जन्तु, उद्यमी नारी होथि। पार्जन्य आवश्यकता पड़ला पर वर्षा देथि, फल देय बला गाछ पाकए, हम सभ संपत्ति अर्जित/संरक्षित करी। 8.VIDEHA FOR NON RESIDENTS 8.1 to 8.3 MAITHILI LITERATURE IN ENGLISH 8.1.1.The Comet   -GAJENDRA THAKUR translated by Jyoti Jha chaudhary 8.1.2.The_Science_of_Words- GAJENDRA THAKUR translated by the author himself 8.1.3.On_the_dice-board_of_the_millennium- GAJENDRA THAKUR translated by Jyoti Jha chaudhary 8.1.4.NAAGPHANS (IN ENGLISH)- SHEFALIKA VERMA translated by Dr. Rajiv Kumar Verma and Dr. Jaya Verma Input: (कोष्ठकमे देवनागरी, मिथिलाक्षर किंवा फोनेटिक-रोमनमे टाइप करू। Input in Devanagari, Mithilakshara or Phonetic-Roman.) Output: (परिणाम देवनागरी, मिथिलाक्षर आ फोनेटिक-रोमन/ रोमनमे। Result in Devanagari, Mithilakshara and Phonetic-Roman/ Roman.) English to Maithili Maithili to English इंग्लिश-मैथिली-कोष / मैथिली-इंग्लिश-कोष  प्रोजेक्टकेँ आगू बढ़ाऊ, अपन सुझाव आ योगदान ई-मेल द्वारा ggajendra@videha.com पर पठाऊ। Top of Form विदेहक मैथिली-अंग्रेजी आ अंग्रेजी मैथिली कोष (इंटरनेटपर पहिल बेर सर्च-डिक्शनरी) एम.एस. एस.क्यू.एल. सर्वर आधारित -Based on ms-sql server Maithili-English and English-Maithili Dictionary. १.भारत आ नेपालक मैथिली भाषा-वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक शैली आ २.मैथिलीमे भाषा सम्पादन पाठ्यक्रम १.नेपाल आ भारतक मैथिली भाषा-वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक शैली

१.१. नेपालक मैथिली भाषा वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक  उच्चारण आ लेखन शैली (भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक धारणाकेँ पूर्ण रूपसँ सङ्ग लऽ निर्धारित) मैथिलीमे उच्चारण तथा लेखन १.पञ्चमाक्षर आ अनुस्वार: पञ्चमाक्षरान्तर्गत ङ, ञ, ण, न एवं म अबैत अछि। संस्कृत भाषाक अनुसार शब्दक अन्तमे जाहि वर्गक अक्षर रहैत अछि ओही वर्गक पञ्चमाक्षर अबैत अछि। जेना- अङ्क (क वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ङ् आएल अछि।) पञ्च (च वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ञ् आएल अछि।) खण्ड (ट वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ण् आएल अछि।) सन्धि (त वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे न् आएल अछि।) खम्भ (प वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे म् आएल अछि।) उपर्युक्त बात मैथिलीमे कम देखल जाइत अछि। पञ्चमाक्षरक बदलामे अधिकांश जगहपर अनुस्वारक प्रयोग देखल जाइछ। जेना- अंक, पंच, खंड, संधि, खंभ आदि। व्याकरणविद पण्डित गोविन्द झाक कहब छनि जे कवर्ग, चवर्ग आ टवर्गसँ पूर्व अनुस्वार लिखल जाए तथा तवर्ग आ पवर्गसँ पूर्व पञ्चमाक्षरे लिखल जाए। जेना- अंक, चंचल, अंडा, अन्त तथा कम्पन। मुदा हिन्दीक निकट रहल आधुनिक लेखक एहि बातकेँ नहि मानैत छथि। ओ लोकनि अन्त आ कम्पनक जगहपर सेहो अंत आ कंपन लिखैत देखल जाइत छथि। नवीन पद्धति किछु सुविधाजनक अवश्य छैक। किएक तँ एहिमे समय आ स्थानक बचत होइत छैक। मुदा कतोक बेर हस्तलेखन वा मुद्रणमे अनुस्वारक छोट सन बिन्दु स्पष्ट नहि भेलासँ अर्थक अनर्थ होइत सेहो देखल जाइत अछि। अनुस्वारक प्रयोगमे उच्चारण-दोषक सम्भावना सेहो ततबए देखल जाइत अछि। एतदर्थ कसँ लऽ कऽ पवर्ग धरि पञ्चमाक्षरेक प्रयोग करब उचित अछि। यसँ लऽ कऽ ज्ञ धरिक अक्षरक सङ्ग अनुस्वारक प्रयोग करबामे कतहु कोनो विवाद नहि देखल जाइछ। २.ढ आ ढ़ : ढ़क उच्चारण “र् ह”जकाँ होइत अछि। अतः जतऽ “र् ह”क उच्चारण हो ओतऽ मात्र ढ़ लिखल जाए। आन ठाम खाली ढ लिखल जएबाक चाही। जेना- ढ = ढाकी, ढेकी, ढीठ, ढेउआ, ढङ्ग, ढेरी, ढाकनि, ढाठ आदि। ढ़ = पढ़ाइ, बढ़ब, गढ़ब, मढ़ब, बुढ़बा, साँढ़, गाढ़, रीढ़, चाँढ़, सीढ़ी, पीढ़ी आदि। उपर्युक्त शब्द सभकेँ देखलासँ ई स्पष्ट होइत अछि जे साधारणतया शब्दक शुरूमे ढ आ मध्य तथा अन्तमे ढ़ अबैत अछि। इएह नियम ड आ ड़क सन्दर्भ सेहो लागू होइत अछि। ३.व आ ब : मैथिलीमे “व”क उच्चारण ब कएल जाइत अछि, मुदा ओकरा ब रूपमे नहि लिखल जएबाक चाही। जेना- उच्चारण : बैद्यनाथ, बिद्या, नब, देबता, बिष्णु, बंश, बन्दना आदि। एहि सभक स्थानपर क्रमशः वैद्यनाथ, विद्या, नव, देवता, विष्णु, वंश, वन्दना लिखबाक चाही। सामान्यतया व उच्चारणक लेल ओ प्रयोग कएल जाइत अछि। जेना- ओकील, ओजह आदि। ४.य आ ज : कतहु-कतहु “य”क उच्चारण “ज”जकाँ करैत देखल जाइत अछि, मुदा ओकरा ज नहि लिखबाक चाही। उच्चारणमे यज्ञ, जदि, जमुना, जुग, जाबत, जोगी, जदु, जम आदि कहल जाएबला शब्द सभकेँ क्रमशः यज्ञ, यदि, यमुना, युग, यावत, योगी, यदु, यम लिखबाक चाही। ५.ए आ य : मैथिलीक वर्तनीमे ए आ य दुनू लिखल जाइत अछि। प्राचीन वर्तनी- कएल, जाए, होएत, माए, भाए, गाए आदि। नवीन वर्तनी- कयल, जाय, होयत, माय, भाय, गाय आदि। सामान्यतया शब्दक शुरूमे ए मात्र अबैत अछि। जेना एहि, एना, एकर, एहन आदि। एहि शब्द सभक स्थानपर यहि, यना, यकर, यहन आदिक प्रयोग नहि करबाक चाही। यद्यपि मैथिलीभाषी थारू सहित किछु जातिमे शब्दक आरम्भोमे “ए”केँ य कहि उच्चारण कएल जाइत अछि। ए आ “य”क प्रयोगक सन्दर्भमे प्राचीने पद्धतिक अनुसरण करब उपयुक्त मानि एहि पुस्तकमे ओकरे प्रयोग कएल गेल अछि। किएक तँ दुनूक लेखनमे कोनो सहजता आ दुरूहताक बात नहि अछि। आ मैथिलीक सर्वसाधारणक उच्चारण-शैली यक अपेक्षा एसँ बेसी निकट छैक। खास कऽ कएल, हएब आदि कतिपय शब्दकेँ कैल, हैब आदि रूपमे कतहु-कतहु लिखल जाएब सेहो “ए”क प्रयोगकेँ बेसी समीचीन प्रमाणित करैत अछि। ६.हि, हु तथा एकार, ओकार : मैथिलीक प्राचीन लेखन-परम्परामे कोनो बातपर बल दैत काल शब्दक पाछाँ हि, हु लगाओल जाइत छैक। जेना- हुनकहि, अपनहु, ओकरहु, तत्कालहि, चोट्टहि, आनहु आदि। मुदा आधुनिक लेखनमे हिक स्थानपर एकार एवं हुक स्थानपर ओकारक प्रयोग करैत देखल जाइत अछि। जेना- हुनके, अपनो, तत्काले, चोट्टे, आनो आदि। ७.ष तथा ख : मैथिली भाषामे अधिकांशतः षक उच्चारण ख होइत अछि। जेना- षड्यन्त्र (खड़यन्त्र), षोडशी (खोड़शी), षट्कोण (खटकोण), वृषेश (वृखेश), सन्तोष (सन्तोख) आदि। ८.ध्वनि-लोप : निम्नलिखित अवस्थामे शब्दसँ ध्वनि-लोप भऽ जाइत अछि: (क) क्रियान्वयी प्रत्यय अयमे य वा ए लुप्त भऽ जाइत अछि। ओहिमे सँ पहिने अक उच्चारण दीर्घ भऽ जाइत अछि। ओकर आगाँ लोप-सूचक चिह्न वा विकारी (’ / ऽ) लगाओल जाइछ। जेना- पूर्ण रूप : पढ़ए (पढ़य) गेलाह, कए (कय) लेल, उठए (उठय) पड़तौक। अपूर्ण रूप : पढ़’ गेलाह, क’ लेल, उठ’ पड़तौक। पढ़ऽ गेलाह, कऽ लेल, उठऽ पड़तौक। (ख) पूर्वकालिक कृत आय (आए) प्रत्ययमे य (ए) लुप्त भऽ जाइछ, मुदा लोप-सूचक विकारी नहि लगाओल जाइछ। जेना- पूर्ण रूप : खाए (य) गेल, पठाय (ए) देब, नहाए (य) अएलाह। अपूर्ण रूप : खा गेल, पठा देब, नहा अएलाह। (ग) स्त्री प्रत्यय इक उच्चारण क्रियापद, संज्ञा, ओ विशेषण तीनूमे लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना- पूर्ण रूप : दोसरि मालिनि चलि गेलि। अपूर्ण रूप : दोसर मालिन चलि गेल। (घ) वर्तमान कृदन्तक अन्तिम त लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना- पूर्ण रूप : पढ़ैत अछि, बजैत अछि, गबैत अछि। अपूर्ण रूप : पढ़ै अछि, बजै अछि, गबै अछि। (ङ) क्रियापदक अवसान इक, उक, ऐक तथा हीकमे लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना- पूर्ण रूप: छियौक, छियैक, छहीक, छौक, छैक, अबितैक, होइक। अपूर्ण रूप : छियौ, छियै, छही, छौ, छै, अबितै, होइ। (च) क्रियापदीय प्रत्यय न्ह, हु तथा हकारक लोप भऽ जाइछ। जेना- पूर्ण रूप : छन्हि, कहलन्हि, कहलहुँ, गेलह, नहि। अपूर्ण रूप : छनि, कहलनि, कहलौँ, गेलऽ, नइ, नञि, नै। ९.ध्वनि स्थानान्तरण : कोनो-कोनो स्वर-ध्वनि अपना जगहसँ हटि कऽ दोसर ठाम चलि जाइत अछि। खास कऽ ह्रस्व इ आ उक सम्बन्धमे ई बात लागू होइत अछि। मैथिलीकरण भऽ गेल शब्दक मध्य वा अन्तमे जँ ह्रस्व इ वा उ आबए तँ ओकर ध्वनि स्थानान्तरित भऽ एक अक्षर आगाँ आबि जाइत अछि। जेना- शनि (शइन), पानि (पाइन), दालि ( दाइल), माटि (माइट), काछु (काउछ), मासु (माउस) आदि। मुदा तत्सम शब्द सभमे ई निअम लागू नहि होइत अछि। जेना- रश्मिकेँ रइश्म आ सुधांशुकेँ सुधाउंस नहि कहल जा सकैत अछि। १०.हलन्त(्)क प्रयोग : मैथिली भाषामे सामान्यतया हलन्त (्)क आवश्यकता नहि होइत अछि। कारण जे शब्दक अन्तमे अ उच्चारण नहि होइत अछि। मुदा संस्कृत भाषासँ जहिनाक तहिना मैथिलीमे आएल (तत्सम) शब्द सभमे हलन्त प्रयोग कएल जाइत अछि। एहि पोथीमे सामान्यतया सम्पूर्ण शब्दकेँ मैथिली भाषा सम्बन्धी निअम अनुसार हलन्तविहीन राखल गेल अछि। मुदा व्याकरण सम्बन्धी प्रयोजनक लेल अत्यावश्यक स्थानपर कतहु-कतहु हलन्त देल गेल अछि। प्रस्तुत पोथीमे मथिली लेखनक प्राचीन आ नवीन दुनू शैलीक सरल आ समीचीन पक्ष सभकेँ समेटि कऽ वर्ण-विन्यास कएल गेल अछि। स्थान आ समयमे बचतक सङ्गहि हस्त-लेखन तथा तकनीकी दृष्टिसँ सेहो सरल होबऽबला हिसाबसँ वर्ण-विन्यास मिलाओल गेल अछि। वर्तमान समयमे मैथिली मातृभाषी पर्यन्तकेँ आन भाषाक माध्यमसँ मैथिलीक ज्ञान लेबऽ पड़ि रहल परिप्रेक्ष्यमे लेखनमे सहजता तथा एकरूपतापर ध्यान देल गेल अछि। तखन मैथिली भाषाक मूल विशेषता सभ कुण्ठित नहि होइक, ताहू दिस लेखक-मण्डल सचेत अछि। प्रसिद्ध भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक कहब छनि जे सरलताक अनुसन्धानमे एहन अवस्था किन्नहु ने आबऽ देबाक चाही जे भाषाक विशेषता छाँहमे पडि जाए। -(भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक धारणाकेँ पूर्ण रूपसँ सङ्ग लऽ निर्धारित) १.२. मैथिली अकादमी, पटना द्वारा निर्धारित मैथिली लेखन-शैली

१. जे शब्द मैथिली-साहित्यक प्राचीन कालसँ आइ धरि जाहि वर्त्तनीमे प्रचलित अछि, से सामान्यतः ताहि वर्त्तनीमे लिखल जाय- उदाहरणार्थ-

ग्राह्य

एखन ठाम जकर, तकर तनिकर अछि

अग्राह्य अखन, अखनि, एखेन, अखनी ठिमा, ठिना, ठमा जेकर, तेकर तिनकर। (वैकल्पिक रूपेँ ग्राह्य) ऐछ, अहि, ए।

२. निम्नलिखित तीन प्रकारक रूप वैकल्पिकतया अपनाओल जाय: भऽ गेल, भय गेल वा भए गेल। जा रहल अछि, जाय रहल अछि, जाए रहल अछि। कर’ गेलाह, वा करय गेलाह वा करए गेलाह।

३. प्राचीन मैथिलीक ‘न्ह’ ध्वनिक स्थानमे ‘न’ लिखल जाय सकैत अछि यथा कहलनि वा कहलन्हि।

४. ‘ऐ’ तथा ‘औ’ ततय लिखल जाय जत’ स्पष्टतः ‘अइ’ तथा ‘अउ’ सदृश उच्चारण इष्ट हो। यथा- देखैत, छलैक, बौआ, छौक इत्यादि।

५. मैथिलीक निम्नलिखित शब्द एहि रूपे प्रयुक्त होयत: जैह, सैह, इएह, ओऐह, लैह तथा दैह।

६. ह्र्स्व इकारांत शब्दमे ‘इ’ के लुप्त करब सामान्यतः अग्राह्य थिक। यथा- ग्राह्य देखि आबह, मालिनि गेलि (मनुष्य मात्रमे)।

७. स्वतंत्र ह्रस्व ‘ए’ वा ‘य’ प्राचीन मैथिलीक उद्धरण आदिमे तँ यथावत राखल जाय, किंतु आधुनिक प्रयोगमे वैकल्पिक रूपेँ ‘ए’ वा ‘य’ लिखल जाय। यथा:- कयल वा कएल, अयलाह वा अएलाह, जाय वा जाए इत्यादि।

८. उच्चारणमे दू स्वरक बीच जे ‘य’ ध्वनि स्वतः आबि जाइत अछि तकरा लेखमे स्थान वैकल्पिक रूपेँ देल जाय। यथा- धीआ, अढ़ैआ, विआह, वा धीया, अढ़ैया, बियाह।

९. सानुनासिक स्वतंत्र स्वरक स्थान यथासंभव ‘ञ’ लिखल जाय वा सानुनासिक स्वर। यथा:- मैञा, कनिञा, किरतनिञा वा मैआँ, कनिआँ, किरतनिआँ।

१०. कारकक विभक्त्तिक निम्नलिखित रूप ग्राह्य:- हाथकेँ, हाथसँ, हाथेँ, हाथक, हाथमे। ’मे’ मे अनुस्वार सर्वथा त्याज्य थिक। ‘क’ क वैकल्पिक रूप ‘केर’ राखल जा सकैत अछि।

११. पूर्वकालिक क्रियापदक बाद ‘कय’ वा ‘कए’ अव्यय वैकल्पिक रूपेँ लगाओल जा सकैत अछि। यथा:- देखि कय वा देखि कए।

१२. माँग, भाँग आदिक स्थानमे माङ, भाङ इत्यादि लिखल जाय।

१३. अर्द्ध ‘न’ ओ अर्द्ध ‘म’ क बदला अनुसार नहि लिखल जाय, किंतु छापाक सुविधार्थ अर्द्ध ‘ङ’ , ‘ञ’, तथा ‘ण’ क बदला अनुस्वारो लिखल जा सकैत अछि। यथा:- अङ्क, वा अंक, अञ्चल वा अंचल, कण्ठ वा कंठ।

१४. हलंत चिह्न निअमतः लगाओल जाय, किंतु विभक्तिक संग अकारांत प्रयोग कएल जाय। यथा:- श्रीमान्, किंतु श्रीमानक।

१५. सभ एकल कारक चिह्न शब्दमे सटा क’ लिखल जाय, हटा क’ नहि, संयुक्त विभक्तिक हेतु फराक लिखल जाय, यथा घर परक।

१६. अनुनासिककेँ चन्द्रबिन्दु द्वारा व्यक्त कयल जाय। परंतु मुद्रणक सुविधार्थ हि समान जटिल मात्रापर अनुस्वारक प्रयोग चन्द्रबिन्दुक बदला कयल जा सकैत अछि। यथा- हिँ केर बदला हिं।

१७. पूर्ण विराम पासीसँ ( । ) सूचित कयल जाय।

१८. समस्त पद सटा क’ लिखल जाय, वा हाइफेनसँ जोड़ि क’ ,  हटा क’ नहि।

१९. लिअ तथा दिअ शब्दमे बिकारी (ऽ) नहि लगाओल जाय।

२०. अंक देवनागरी रूपमे राखल जाय।

२१.किछु ध्वनिक लेल नवीन चिन्ह बनबाओल जाय। जा' ई नहि बनल अछि ताबत एहि दुनू ध्वनिक बदला पूर्ववत् अय/ आय/ अए/ आए/ आओ/ अओ लिखल जाय। आकि ऎ वा ऒ सँ व्यक्त कएल जाय।

ह./- गोविन्द झा ११/८/७६ श्रीकान्त ठाकुर ११/८/७६ सुरेन्द्र झा "सुमन" ११/०८/७६

  २. मैथिलीमे भाषा सम्पादन पाठ्यक्रम २.१. उच्चारण निर्देश: (बोल्ड कएल रूप ग्राह्य):- दन्त न क उच्चारणमे दाँतमे जीह सटत- जेना बाजू नाम , मुदा ण क उच्चारणमे जीह मूर्धामे सटत (नै सटैए तँ उच्चारण दोष अछि)- जेना बाजू गणेश। तालव्य शमे जीह तालुसँ , षमे मूर्धासँ आ दन्त समे दाँतसँ सटत। निशाँ, सभ आ शोषण बाजि कऽ देखू। मैथिलीमे ष केँ वैदिक संस्कृत जकाँ ख सेहो उच्चरित कएल जाइत अछि, जेना वर्षा, दोष। य अनेको स्थानपर ज जकाँ उच्चरित होइत अछि आ ण ड़ जकाँ (यथा संयोग आ गणेश संजोग आ गड़ेस उच्चरित होइत अछि)। मैथिलीमे व क उच्चारण ब, श क उच्चारण स आ य क उच्चारण ज सेहो होइत अछि। ओहिना ह्रस्व इ बेशीकाल मैथिलीमे पहिने बाजल जाइत अछि कारण देवनागरीमे आ मिथिलाक्षरमे ह्रस्व इ अक्षरक पहिने लिखलो जाइत आ बाजलो जएबाक चाही। कारण जे हिन्दीमे एकर दोषपूर्ण उच्चारण होइत अछि (लिखल तँ पहिने जाइत अछि मुदा बाजल बादमे जाइत अछि), से शिक्षा पद्धतिक दोषक कारण हम सभ ओकर उच्चारण दोषपूर्ण ढंगसँ कऽ रहल छी। अछि- अ इ छ  ऐछ (उच्चारण) छथि- छ इ थ  – छैथ (उच्चारण) पहुँचि- प हुँ इ च (उच्चारण) आब अ आ इ ई ए ऐ ओ औ अं अः ऋ ऐ सभ लेल मात्रा सेहो अछि, मुदा ऐमे ई ऐ ओ औ अं अः ऋ केँ संयुक्ताक्षर रूपमे गलत रूपमे प्रयुक्त आ उच्चरित कएल जाइत अछि। जेना ऋ केँ री  रूपमे उच्चरित करब। आ देखियौ- ऐ लेल देखिऔ क प्रयोग अनुचित। मुदा देखिऐ लेल देखियै अनुचित। क् सँ ह् धरि अ सम्मिलित भेलासँ क सँ ह बनैत अछि, मुदा उच्चारण काल हलन्त युक्त शब्दक अन्तक उच्चारणक प्रवृत्ति बढ़ल अछि, मुदा हम जखन मनोजमे ज् अन्तमे बजैत छी, तखनो पुरनका लोककेँ बजैत सुनबन्हि- मनोजऽ, वास्तवमे ओ अ युक्त ज् = ज बजै छथि। फेर ज्ञ अछि ज् आ ञ क संयुक्त मुदा गलत उच्चारण होइत अछि- ग्य। ओहिना क्ष अछि क् आ ष क संयुक्त मुदा उच्चारण होइत अछि छ। फेर श् आ र क संयुक्त अछि श्र ( जेना श्रमिक) आ स् आ र क संयुक्त अछि स्र (जेना मिस्र)। त्र भेल त+र । उच्चारणक ऑडियो फाइल विदेह आर्काइव  http://www.videha.co.in/ पर उपलब्ध अछि। फेर केँ / सँ / पर पूर्व अक्षरसँ सटा कऽ लिखू मुदा तँ / कऽ हटा कऽ। ऐमे सँ मे पहिल सटा कऽ लिखू आ बादबला हटा कऽ। अंकक बाद टा लिखू सटा कऽ मुदा अन्य ठाम टा लिखू हटा कऽ– जेना छहटा मुदा सभ टा। फेर ६अ म सातम लिखू- छठम सातम नै। घरबलामे बला मुदा घरवालीमे वाली प्रयुक्त करू। रहए- रहै मुदा सकैए (उच्चारण सकै-ए)। मुदा कखनो काल रहए आ रहै मे अर्थ भिन्नता सेहो, जेना से कम्मो जगहमे पार्किंग करबाक अभ्यास रहै ओकरा। पुछलापर पता लागल जे ढुनढुन नाम्ना ई ड्राइवर कनाट प्लेसक पार्किंगमे काज करैत रहए। छलै, छलए मे सेहो ऐ तरहक भेल। छलए क उच्चारण छल-ए सेहो। संयोगने- (उच्चारण संजोगने) केँ/  कऽ केर- क ( केर क प्रयोग गद्यमे नै करू , पद्यमे कऽ सकै छी। ) क (जेना रामक) –रामक आ संगे (उच्चारण राम के /  राम कऽ सेहो) सँ- सऽ (उच्चारण) चन्द्रबिन्दु आ अनुस्वार- अनुस्वारमे कंठ धरिक प्रयोग होइत अछि मुदा चन्द्रबिन्दुमे नै। चन्द्रबिन्दुमे कनेक एकारक सेहो उच्चारण होइत अछि- जेना रामसँ- (उच्चारण राम सऽ)  रामकेँ- (उच्चारण राम कऽ/ राम के सेहो)। केँ जेना रामकेँ भेल हिन्दीक को (राम को)- राम को= रामकेँ क जेना रामक भेल हिन्दीक का ( राम का) राम का= रामक कऽ जेना जा कऽ भेल हिन्दीक कर ( जा कर) जा कर= जा कऽ सँ भेल हिन्दीक से (राम से) राम से= रामसँ सऽ , तऽ , त , केर (गद्यमे) एे चारू शब्द सबहक प्रयोग अवांछित। के दोसर अर्थेँ प्रयुक्त भऽ सकैए- जेना, के कहलक? विभक्ति “क”क बदला एकर प्रयोग अवांछित। नञि, नहि, नै, नइ, नँइ, नइँ, नइं ऐ सभक उच्चारण आ लेखन - नै त्त्व क बदलामे त्व जेना महत्वपूर्ण (महत्त्वपूर्ण नै) जतए अर्थ बदलि जाए ओतहि मात्र तीन अक्षरक संयुक्ताक्षरक प्रयोग उचित। सम्पति- उच्चारण स म्प इ त (सम्पत्ति नै- कारण सही उच्चारण आसानीसँ सम्भव नै)। मुदा सर्वोत्तम (सर्वोतम नै)। राष्ट्रिय (राष्ट्रीय नै) सकैए/ सकै (अर्थ परिवर्तन) पोछैले/ पोछै लेल/ पोछए लेल पोछैए/ पोछए/ (अर्थ परिवर्तन) पोछए/ पोछै ओ लोकनि ( हटा कऽ, ओ मे बिकारी नै) ओइ/ ओहि ओहिले/ ओहि लेल/ ओही लऽ जएबेँ/ बैसबेँ पँचभइयाँ देखियौक/ (देखिऔक नै- तहिना अ मे ह्रस्व आ दीर्घक मात्राक प्रयोग अनुचित) जकाँ / जेकाँ तँइ/ तैँ/ होएत / हएत नञि/ नहि/ नँइ/ नइँ/ नै सौँसे/ सौंसे बड़ / बड़ी (झोराओल) गाए (गाइ नहि), मुदा गाइक दूध (गाएक दूध नै।) रहलेँ/ पहिरतैँ हमहीं/ अहीं सब - सभ सबहक - सभहक धरि - तक गप- बात बूझब - समझब बुझलौं/ समझलौं/ बुझलहुँ - समझलहुँ हमरा आर - हम सभ आकि- आ कि सकैछ/ करैछ (गद्यमे प्रयोगक आवश्यकता नै) होइन/ होनि जाइन (जानि नै, जेना देल जाइन) मुदा जानि-बूझि (अर्थ परिव्र्तन) पइठ/ जाइठ आउ/ जाउ/ आऊ/ जाऊ मे, केँ, सँ, पर (शब्दसँ सटा कऽ) तँ कऽ धऽ दऽ (शब्दसँ हटा कऽ) मुदा दूटा वा बेसी विभक्ति संग रहलापर पहिल विभक्ति टाकेँ सटाऊ। जेना ऐमे सँ । एकटा , दूटा (मुदा कए टा) बिकारीक प्रयोग शब्दक अन्तमे, बीचमे अनावश्यक रूपेँ नै। आकारान्त आ अन्तमे अ क बाद बिकारीक प्रयोग नै (जेना दिअ , आ/ दिय’ , आ’, आ नै ) अपोस्ट्रोफीक प्रयोग बिकारीक बदलामे करब अनुचित आ मात्र फॉन्टक तकनीकी न्यूनताक परिचायक)- ओना बिकारीक संस्कृत रूप ऽ अवग्रह कहल जाइत अछि आ वर्तनी आ उच्चारण दुनू ठाम एकर लोप रहैत अछि/ रहि सकैत अछि (उच्चारणमे लोप रहिते अछि)। मुदा अपोस्ट्रोफी सेहो अंग्रेजीमे पसेसिव केसमे होइत अछि आ फ्रेंचमे शब्दमे जतए एकर प्रयोग होइत अछि जेना raison d’etre एतए सेहो एकर उच्चारण रैजौन डेटर होइत अछि, माने अपोस्ट्रॉफी अवकाश नै दैत अछि वरन जोड़ैत अछि, से एकर प्रयोग बिकारीक बदला देनाइ तकनीकी रूपेँ सेहो अनुचित)। अइमे, एहिमे/ ऐमे जइमे, जाहिमे एखन/ अखन/ अइखन केँ (के नहि) मे (अनुस्वार रहित) भऽ मे दऽ तँ (तऽ, त नै) सँ ( सऽ स नै) गाछ तर गाछ लग साँझ खन जो (जो go, करै जो do) तै/तइ जेना- तै दुआरे/ तइमे/ तइले जै/जइ जेना- जै कारण/ जइसँ/ जइले ऐ/अइ जेना- ऐ कारण/ ऐसँ/ अइले/ मुदा एकर एकटा खास प्रयोग- लालति‍ कतेक दि‍नसँ कहैत रहैत अइ लै/लइ जेना लैसँ/ लइले/ लै दुआरे लहँ/ लौं गेलौं/ लेलौं/ लेलँह/ गेलहुँ/ लेलहुँ/ लेलँ जइ/ जाहि‍/ जै जहि‍ठाम/ जाहि‍ठाम/ जइठाम/ जैठाम एहि‍/ अहि‍/ अइ (वाक्यक अंतमे ग्राह्य) / ऐ अइछ/ अछि‍/ ऐछ तइ/ तहि‍/ तै/ ताहि‍ ओहि‍/ ओइ सीखि‍/ सीख जीवि‍/ जीवी/ जीब भलेहीं/ भलहि‍ं तैं/ तँइ/ तँए जाएब/ जएब लइ/ लै छइ/ छै नहि‍/ नै/ नइ गइ/ गै छनि‍/ छन्‍हि‍  ... समए शब्‍दक संग जखन कोनो वि‍भक्‍ति‍ जुटै छै तखन समै जना समैपर इत्‍यादि‍। असगरमे हृदए आ वि‍भक्‍ति‍ जुटने हृदे जना हृदेसँ, हृदेमे इत्‍यादि‍। जइ/ जाहि‍/ जै जहि‍ठाम/ जाहि‍ठाम/ जइठाम/ जैठाम एहि‍/ अहि‍/ अइ/ ऐ अइछ/ अछि‍/ ऐछ तइ/ तहि‍/ तै/ ताहि‍ ओहि‍/ ओइ सीखि‍/ सीख जीवि‍/ जीवी/ जीब भले/ भलेहीं/ भलहि‍ं तैं/ तँइ/ तँए जाएब/ जएब लइ/ लै छइ/ छै नहि‍/ नै/ नइ गइ/ गै छनि‍/ छन्‍हि‍ चुकल अछि/ गेल गछि २.२. मैथिलीमे भाषा सम्पादन पाठ्यक्रम नीचाँक सूचीमे देल विकल्पमेसँ लैंगुएज एडीटर द्वारा कोन रूप चुनल जेबाक चाही: बोल्ड कएल रूप ग्राह्य: १.होयबला/ होबयबला/ होमयबला/ हेब’बला, हेम’बला/ होयबाक/होबएबला /होएबाक २. आ’/आऽ आ ३. क’ लेने/कऽ लेने/कए लेने/कय लेने/ल’/लऽ/लय/लए ४. भ’ गेल/भऽ गेल/भय गेल/भए गेल ५. कर’ गेलाह/करऽ गेलह/करए गेलाह/करय गेलाह ६. लिअ/दिअ लिय’,दिय’,लिअ’,दिय’/ ७. कर’ बला/करऽ बला/ करय बला करैबला/क’र’ बला / करैवाली ८. बला वला (पुरूष), वाली (स्‍त्री) ९ . आङ्ल आंग्ल १०. प्रायः प्रायह ११. दुःख दुख १ २. चलि गेल चल गेल/चैल गेल १३. देलखिन्ह देलकिन्ह, देलखिन १४. देखलन्हि देखलनि/ देखलैन्ह १५. छथिन्ह/ छलन्हि छथिन/ छलैन/ छलनि १६. चलैत/दैत चलति/दैति १७. एखनो अखनो १८. बढ़नि‍ बढ़इन बढ़न्हि १९. ओ’/ओऽ(सर्वनाम) ओ २० . ओ (संयोजक) ओ’/ओऽ २१. फाँगि/फाङ्गि फाइंग/फाइङ २२. जे जे’/जेऽ २३. ना-नुकुर ना-नुकर २४. केलन्हि/केलनि‍/कयलन्हि २५. तखनतँ/ तखन तँ २६. जा रहल/जाय रहल/जाए रहल २७. निकलय/निकलए लागल/ लगल बहराय/ बहराए लागल/ लगल निकल’/बहरै लागल २८. ओतय/ जतय जत’/ ओत’/ जतए/ ओतए २९. की फूरल जे कि फूरल जे ३०. जे जे’/जेऽ ३१. कूदि / यादि(मोन पारब) कूइद/याइद/कूद/याद/ यादि (मोन) ३२. इहो/ ओहो ३३. हँसए/ हँसय हँसऽ ३४. नौ आकि दस/नौ किंवा दस/ नौ वा दस ३५. सासु-ससुर सास-ससुर ३६. छह/ सात छ/छः/सात ३७. की  की’/ कीऽ (दीर्घीकारान्तमे ऽ वर्जित) ३८. जबाब जवाब ३९. करएताह/ करेताह करयताह ४०. दलान दिशि दलान दिश/दलान दिस ४१ . गेलाह गएलाह/गयलाह ४२. किछु आर/ किछु और/ किछ आर ४३. जाइ छल/ जाइत छल जाति छल/जैत छल ४४. पहुँचि/ भेट जाइत छल/ भेट जाइ छलए पहुँच/ भेटि‍ जाइत छल ४५. जबान (युवा)/ जवान(फौजी) ४६. लय/ लए क’/ कऽ/ लए कए / लऽ कऽ/ लऽ कए ४७. ल’/लऽ कय/ कए ४८. एखन / एखने / अखन / अखने ४९. अहींकेँ अहीँकेँ ५०. गहींर गहीँर ५१. धार पार केनाइ धार पार केनाय/केनाए ५२. जेकाँ जेँकाँ/ जकाँ ५३. तहिना तेहिना ५४. एकर अकर ५५. बहिनउ बहनोइ ५६. बहिन बहिनि ५७. बहिन-बहिनोइ बहिन-बहनउ ५८. नहि/ नै ५९. करबा / करबाय/ करबाए ६०. तँ/ त ऽ तय/तए ६१. भैयारी मे छोट-भाए/भै/, जेठ-भाय/भाइ, ६२. गि‍नतीमे दू भाइ/भाए/भाँइ ६३. ई पोथी दू भाइक/ भाँइ/ भाए/ लेल। यावत जावत ६४. माय मै / माए मुदा माइक ममता ६५. देन्हि/ दइन दनि‍/ दएन्हि/ दयन्हि दन्हि/ दैन्हि ६६. द’/ दऽ/ दए ६७. ओ (संयोजक) ओऽ (सर्वनाम) ६८. तका कए तकाय तकाए ६९. पैरे (on foot) पएरे  कएक/ कैक ७०. ताहुमे/ ताहूमे ७१. पुत्रीक ७२. बजा कय/ कए / कऽ ७३. बननाय/बननाइ ७४. कोला ७५. दिनुका दिनका ७६. ततहिसँ ७७. गरबओलन्हि/ गरबौलनि‍/ गरबेलन्हि/ गरबेलनि‍ ७८. बालु बालू ७९. चेन्ह चिन्ह(अशुद्ध) ८०. जे जे’ ८१ . से/ के से’/के’ ८२. एखुनका अखनुका ८३. भुमिहार भूमिहार ८४. सुग्गर / सुगरक/ सूगर ८५. झठहाक झटहाक ८६. छूबि ८७. करइयो/ओ करैयो ने देलक /करियौ-करइयौ ८८. पुबारि पुबाइ ८९. झगड़ा-झाँटी झगड़ा-झाँटि ९०. पएरे-पएरे पैरे-पैरे ९१. खेलएबाक ९२. खेलेबाक ९३. लगा ९४. होए- हो – होअए ९५. बुझल बूझल ९६. बूझल (संबोधन अर्थमे) ९७. यैह यएह / इएह/ सैह/ सएह ९८. तातिल ९९. अयनाय- अयनाइ/ अएनाइ/ एनाइ १००. निन्न- निन्द १०१. बिनु बिन १०२. जाए जाइ १०३. जाइ (in different sense)-last word of sentence १०४. छत पर आबि जाइ १०५. ने १०६. खेलाए (play) –खेलाइ १०७. शिकाइत- शिकायत १०८. ढप- ढ़प १०९ . पढ़- पढ ११०. कनिए/ कनिये कनिञे १११. राकस- राकश ११२. होए/ होय होइ ११३. अउरदा- औरदा ११४. बुझेलन्हि (different meaning- got understand) ११५. बुझएलन्हि/बुझेलनि‍/ बुझयलन्हि (understood himself) ११६. चलि- चल/ चलि‍ गेल ११७. खधाइ- खधाय ११८. मोन पाड़लखिन्ह/ मोन पाड़लखि‍न/ मोन पारलखिन्ह ११९. कैक- कएक- कइएक १२०. लग ल’ग १२१. जरेनाइ १२२. जरौनाइ जरओनाइ- जरएनाइ/ जरेनाइ १२३. होइत १२४. गरबेलन्हि/ गरबेलनि‍ गरबौलन्हि/ गरबौलनि‍ १२५. चिखैत- (to test)चिखइत १२६. करइयो (willing to do) करैयो १२७. जेकरा- जकरा १२८. तकरा- तेकरा १२९. बिदेसर स्थानेमे/ बिदेसरे स्थानमे १३०. करबयलहुँ/ करबएलहुँ/ करबेलहुँ करबेलौं १३१. हारिक (उच्चारण हाइरक) १३२. ओजन वजन आफसोच/ अफसोस कागत/ कागच/ कागज १३३. आधे भाग/ आध-भागे १३४. पिचा / पिचाय/पिचाए १३५. नञ/ ने १३६. बच्चा नञ (ने) पिचा जाय १३७. तखन ने (नञ) कहैत अछि। कहै/ सुनै/ देखै छल मुदा कहैत-कहैत/ सुनैत-सुनैत/ देखैत-देखैत १३८. कतेक गोटे/ कताक गोटे १३९. कमाइ-धमाइ/ कमाई- धमाई १४० . लग ल’ग १४१. खेलाइ (for playing) १४२. छथिन्ह/ छथिन १४३. होइत होइ १४४. क्यो कियो / केओ १४५. केश (hair) १४६. केस (court-case) १४७ . बननाइ/ बननाय/ बननाए १४८. जरेनाइ १४९. कुरसी कुर्सी १५०. चरचा चर्चा १५१. कर्म करम १५२. डुबाबए/ डुबाबै/ डुमाबै डुमाबय/ डुमाबए १५३. एखुनका/ अखुनका १५४. लए/ लिअए (वाक्यक अंतिम शब्द)- लऽ १५५. कएलक/ केलक १५६. गरमी गर्मी १५७ . वरदी वर्दी १५८. सुना गेलाह सुना’/सुनाऽ १५९. एनाइ-गेनाइ १६०. तेना ने घेरलन्हि/ तेना ने घेरलनि‍ १६१. नञि / नै १६२. डरो ड’रो १६३. कतहु/ कतौ कहीं १६४. उमरिगर-उमेरगर उमरगर १६५. भरिगर १६६. धोल/धोअल धोएल १६७. गप/गप्प १६८. के के’ १६९. दरबज्जा/ दरबजा १७०. ठाम १७१. धरि तक १७२. घूरि लौटि १७३. थोरबेक १७४. बड्ड १७५. तोँ/ तूँ १७६. तोँहि( पद्यमे ग्राह्य) १७७. तोँही / तोँहि १७८. करबाइए करबाइये १७९. एकेटा १८०. करितथि /करतथि १८१. पहुँचि/ पहुँच १८२. राखलन्हि रखलन्हि/ रखलनि‍ १८३. लगलन्हि/ लगलनि‍ लागलन्हि १८४. सुनि (उच्चारण सुइन) १८५. अछि (उच्चारण अइछ) १८६. एलथि गेलथि १८७. बितओने/ बि‍तौने/ बितेने १८८. करबओलन्हि/ करबौलनि‍/ करेलखिन्ह/ करेलखि‍न १८९. करएलन्हि/ करेलनि‍ १९०. आकि/ कि १९१. पहुँचि/ पहुँच १९२. बत्ती जराय/ जराए जरा (आगि लगा) १९३. से से’ १९४. हाँ मे हाँ (हाँमे हाँ विभक्त्तिमे हटा कए) १९५. फेल फैल १९६. फइल(spacious) फैल १९७. होयतन्हि/ होएतन्हि/ होएतनि‍/हेतनि‍/ हेतन्हि १९८. हाथ मटिआएब/ हाथ मटियाबय/हाथ मटियाएब १९९. फेका फेंका २००. देखाए देखा २०१. देखाबए २०२. सत्तरि सत्तर २०३. साहेब साहब २०४.गेलैन्ह/ गेलन्हि/ गेलनि‍ २०५. हेबाक/ होएबाक २०६.केलो/ कएलहुँ/केलौं/ केलुँ २०७. किछु न किछु/ किछु ने किछु २०८.घुमेलहुँ/ घुमओलहुँ/ घुमेलौं २०९. एलाक/ अएलाक २१०. अः/ अह २११.लय/ लए (अर्थ-परिवर्त्तन) २१२.कनीक/ कनेक २१३.सबहक/ सभक २१४.मिलाऽ/ मिला २१५.कऽ/ क २१६.जाऽ/ जा २१७.आऽ/ आ २१८.भऽ /भ’ (’ फॉन्टक कमीक द्योतक) २१९.निअम/ नियम २२० .हेक्टेअर/ हेक्टेयर २२१.पहिल अक्षर ढ/ बादक/ बीचक ढ़ २२२.तहिं/तहिँ/ तञि/ तैं २२३.कहिं/ कहीं २२४.तँइ/ तैं / तइँ २२५.नँइ/ नइँ/  नञि/ नहि/नै २२६.है/ हए / एलीहेँ/ २२७.छञि/ छै/ छैक /छइ २२८.दृष्टिएँ/ दृष्टियेँ २२९.आ (come)/ आऽ(conjunction) २३०. आ (conjunction)/ आऽ(come) २३१.कुनो/ कोनो, कोना/केना २३२.गेलैन्ह-गेलन्हि-गेलनि‍ २३३.हेबाक- होएबाक २३४.केलौँ- कएलौँ-कएलहुँ/केलौं २३५.किछु न किछ- किछु ने किछु २३६.केहेन- केहन २३७.आऽ (come)-आ (conjunction-and)/आ। आब'-आब' /आबह-आबह २३८. हएत-हैत २३९.घुमेलहुँ-घुमएलहुँ- घुमेलाें २४०.एलाक- अएलाक २४१.होनि- होइन/ होन्हि/ २४२.ओ-राम ओ श्यामक बीच(conjunction), ओऽ कहलक (he said)/ओ २४३.की हए/ कोसी अएली हए/ की है। की हइ २४४.दृष्टिएँ/ दृष्टियेँ २४५ .शामिल/ सामेल २४६.तैँ / तँए/ तञि/ तहिं २४७.जौं / ज्योँ/ जँ/ २४८.सभ/ सब २४९.सभक/ सबहक २५०.कहिं/ कहीं २५१.कुनो/ कोनो/ कोनहुँ/ २५२.फारकती भऽ गेल/ भए गेल/ भय गेल २५३.कोना/ केना/ कन्‍ना/कना २५४.अः/ अह २५५.जनै/ जनञ २५६.गेलनि‍/ गेलाह (अर्थ परिवर्तन) २५७.केलन्हि/ कएलन्हि/ केलनि‍/ २५८.लय/ लए/ लएह (अर्थ परिवर्तन) २५९.कनीक/ कनेक/कनी-मनी २६०.पठेलन्हि‍ पठेलनि‍/ पठेलइन/ पपठओलन्हि/ पठबौलनि‍/ २६१.निअम/ नियम २६२.हेक्टेअर/ हेक्टेयर २६३.पहिल अक्षर रहने ढ/ बीचमे रहने ढ़ २६४.आकारान्तमे बिकारीक प्रयोग उचित नै/ अपोस्ट्रोफीक प्रयोग फान्टक तकनीकी न्यूनताक परिचायक ओकर बदला अवग्रह (बिकारी) क प्रयोग उचित २६५.केर (पद्यमे ग्राह्य) / -क/ कऽ/ के २६६.छैन्हि- छन्हि २६७.लगैए/ लगैये २६८.होएत/ हएत २६९.जाएत/ जएत/ २७०.आएत/ अएत/ आओत २७१ .खाएत/ खएत/ खैत २७२.पिअएबाक/ पिएबाक/पि‍येबाक २७३.शुरु/ शुरुह २७४.शुरुहे/ शुरुए २७५.अएताह/अओताह/ एताह/ औताह २७६.जाहि/ जाइ/ जइ/ जै/ २७७.जाइत/ जैतए/ जइतए २७८.आएल/ अएल २७९.कैक/ कएक २८०.आयल/ अएल/ आएल २८१. जाए/ जअए/ जए (लालति‍ जाए लगलीह।) २८२. नुकएल/ नुकाएल २८३. कठुआएल/ कठुअएल २८४. ताहि/ तै/ तइ २८५. गायब/ गाएब/ गएब २८६. सकै/ सकए/ सकय २८७.सेरा/सरा/ सराए (भात सरा गेल) २८८.कहैत रही/देखैत रही/ कहैत छलौं/ कहै छलौं- अहिना चलैत/ पढ़ैत (पढ़ै-पढ़ैत अर्थ कखनो काल परिवर्तित) - आर बुझै/ बुझैत (बुझै/ बुझै छी, मुदा बुझैत-बुझैत)/ सकैत/ सकै। करैत/ करै। दै/ दैत। छैक/ छै। बचलै/ बचलैक। रखबा/ रखबाक । बिनु/ बिन। रातिक/ रातुक बुझै आ बुझैत केर अपन-अपन जगहपर प्रयोग समीचीन अछि‍। बुझैत-बुझैत आब बुझलि‍ऐ। हमहूँ बुझै छी। २८९. दुआरे/ द्वारे २९०.भेटि/ भेट/ भेँट २९१. खन/ खीन/  खुना (भोर खन/ भोर खीन) २९२.तक/ धरि २९३.गऽ/ गै (meaning different-जनबै गऽ) २९४.सऽ/ सँ (मुदा दऽ, लऽ) २९५.त्त्व,(तीन अक्षरक मेल बदला पुनरुक्तिक एक आ एकटा दोसरक उपयोग) आदिक बदला त्व आदि। महत्त्व/ महत्व/ कर्ता/ कर्त्ता आदिमे त्त संयुक्तक कोनो आवश्यकता मैथिलीमे नै अछि। वक्तव्य २९६.बेसी/ बेशी २९७.बाला/वाला बला/ वला (रहैबला) २९८ .वाली/ (बदलैवाली) २९९.वार्त्ता/ वार्ता ३००. अन्तर्राष्ट्रिय/ अन्तर्राष्ट्रीय ३०१. लेमए/ लेबए ३०२.लमछुरका, नमछुरका ३०२.लागै/ लगै ( भेटैत/ भेटै) ३०३.लागल/ लगल ३०४.हबा/ हवा ३०५.राखलक/ रखलक ३०६.आ (come)/ आ (and) ३०७. पश्चाताप/ पश्चात्ताप ३०८. ऽ केर व्यवहार शब्दक अन्तमे मात्र, यथासंभव बीचमे नै। ३०९.कहैत/ कहै ३१०. रहए (छल)/ रहै (छलै) (meaning different) ३११.तागति/ ताकति ३१२.खराप/ खराब ३१३.बोइन/ बोनि/ बोइनि ३१४.जाठि/ जाइठ ३१५.कागज/ कागच/ कागत ३१६.गिरै (meaning different- swallow)/ गिरए (खसए) ३१७.राष्ट्रिय/ राष्ट्रीय Festivals of Mithila DATE-LIST (year- 2010-11) (१४१८ साल) Marriage Days: Nov.2010- 19 Dec.2010- 3,8 January 2011- 17, 21, 23, 24, 26, 27, 28 31 Feb.2011- 3, 4, 7, 9, 18, 20, 24, 25, 27, 28 March 2011- 2, 7 May 2011- 11, 12, 13, 18, 19, 20, 22, 23, 29, 30 June 2011- 1, 2, 3, 8, 9, 10, 12, 13, 19, 20, 26, 29 Upanayana Days: February 2011- 8 March 2011- 7 May 2011- 12, 13 June 2011- 6, 12 Dviragaman Din: November 2010- 19, 22, 25, 26 December 2010- 6, 8, 9, 10, 12 February 2011- 20, 21 March 2011- 6, 7, 9, 13 April 2011- 17, 18, 22 May 2011- 5, 6, 8, 13 Mundan Din: November 2010- 24, 26 December 2010- 10, 17 February 2011- 4, 16, 21 March 2011- 7, 9 April 2011- 22 May 2011- 6, 9, 19 June 2011- 3, 6, 10, 20 FESTIVALS OF MITHILA Mauna Panchami-31 July Somavati Amavasya Vrat- 1 August Madhushravani-12 August Nag Panchami- 14 August Raksha Bandhan- 24 Aug Krishnastami- 01 September Kushi Amavasya- 08 September Hartalika Teej- 11 September ChauthChandra-11 September Vishwakarma Pooja- 17 September Karma Dharma Ekadashi-19 September Indra Pooja Aarambh- 20 September Anant Caturdashi- 22 Sep Agastyarghadaan- 23 Sep Pitri Paksha begins- 24 Sep Jimootavahan Vrata/ Jitia-30 Sep Matri Navami- 02 October Kalashsthapan- 08 October Belnauti- 13 October Patrika Pravesh- 14 October Mahastami- 15 October Maha Navami - 16-17 October Vijaya Dashami- 18 October Kojagara- 22 Oct Dhanteras- 3 November Diyabati, shyama pooja- 5 November Annakoota/ Govardhana Pooja-07 November Bhratridwitiya/ Chitragupta Pooja-08 November Chhathi- -12 November Akshyay Navami- 15 November Devotthan Ekadashi- 17 November Kartik Poornima/ Sama Bisarjan- 21 Nov Shaa. ravivratarambh- 21 November Navanna parvan- 24 -26 November Vivaha Panchmi- 10 December Naraknivaran chaturdashi- 01 February Makara/ Teela Sankranti-15 Jan Basant Panchami/ Saraswati Pooja- 08 Februaqry Achla Saptmi- 10 February Mahashivaratri-03 March Holikadahan-Fagua-19 March Holi-20 Mar Varuni Yoga- 31 March va.navaratrarambh- 4 April vaa. Chhathi vrata- 9 April Ram Navami- 12 April Mesha Sankranti-Satuani-14 April Jurishital-15 April Somavati Amavasya Vrata- 02 May Ravi Brat Ant- 08 May Akshaya Tritiya-06 May Janaki Navami- 12 May Vat Savitri-barasait- 01 June Ganga Dashhara-11 June Jagannath Rath Yatra- 3 July Hari Sayan Ekadashi- 11 Jul Aashadhi Guru Poornima-15 Jul VIDEHA ARCHIVE १.विदेह ई-पत्रिकाक सभटा पुरान अंक ब्रेल, तिरहुता आ देवनागरी रूपमे Videha e journal's all old issues in Braille Tirhuta and Devanagari versions विदेह ई-पत्रिकाक पहिल ५० अंक

विदेह ई-पत्रिकाक ५०म सँ आगाँक अंक २.मैथिली पोथी डाउनलोड Maithili Books Download ३.मैथिली ऑडियो संकलन Maithili Audio Downloads ४.मैथिली वीडियोक संकलन Maithili Videos ५.मिथिला चित्रकला/ आधुनिक चित्रकला आ चित्र Mithila Painting/ Modern Art and Photos "विदेह"क एहि सभ सहयोगी लिंकपर सेहो एक बेर जाऊ। ६.विदेह मैथिली क्विज  :  http://videhaquiz.blogspot.com/ ७.विदेह मैथिली जालवृत्त एग्रीगेटर : http://videha-aggregator.blogspot.com/ ८.विदेह मैथिली साहित्य अंग्रेजीमे अनूदित http://madhubani-art.blogspot.com/ ९.विदेहक पूर्व-रूप "भालसरिक गाछ"  : http://gajendrathakur.blogspot.com/ १०.विदेह इंडेक्स  : http://videha123.blogspot.com/ ११.विदेह फाइल : http://videha123.wordpress.com/ १२. विदेह: सदेह : पहिल तिरहुता (मिथिला़क्षर) जालवृत्त (ब्लॉग) http://videha-sadeha.blogspot.com/ १३. विदेह:ब्रेल: मैथिली ब्रेलमे: पहिल बेर विदेह द्वारा http://videha-braille.blogspot.com/ १४.VIDEHA IST MAITHILI  FORTNIGHTLY EJOURNAL ARCHIVE http://videha-archive.blogspot.com/ १५. विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका मैथिली पोथीक आर्काइव http://videha-pothi.blogspot.com/ १६. विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका ऑडियो आर्काइव http://videha-audio.blogspot.com/ १७. विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका वीडियो आर्काइव http://videha-video.blogspot.com/ १८. विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका मिथिला चित्रकला, आधुनिक कला आ चित्रकला http://videha-paintings-photos.blogspot.com/ १९. मैथिल आर मिथिला (मैथिलीक सभसँ लोकप्रिय जालवृत्त) http://maithilaurmithila.blogspot.com/ २०.श्रुति प्रकाशन http://www.shruti-publication.com/ २१.http://groups.google.com/group/videha VIDEHA केर सदस्यता लिअ Top of Form Bottom of Form ईमेल : एहि समूहपर जाऊ २२.http://groups.yahoo.com/group/VIDEHA/ Top of Form Subscribe to VIDEHA Powered by us.groups.yahoo.com Bottom of Form २३.गजेन्द्र ठाकुर इ‍डेक्स http://gajendrathakur123.blogspot.com २४.विदेह रेडियो:मैथिली कथा-कविता आदिक पहिल पोडकास्ट साइट http://videha123radio.wordpress.com/ २५. नेना भुटका http://mangan-khabas.blogspot.com/ महत्त्वपूर्ण सूचना:(१) 'विदेह' द्वारा धारावाहिक रूपे ई-प्रकाशित कएल गेल गजेन्द्र ठाकुरक  निबन्ध-प्रबन्ध-समीक्षा, उपन्यास (सहस्रबाढ़नि) , पद्य-संग्रह (सहस्राब्दीक चौपड़पर), कथा-गल्प (गल्प-गुच्छ), नाटक(संकर्षण), महाकाव्य (त्वञ्चाहञ्च आ असञ्जाति मन) आ बाल-किशोर साहित्य विदेहमे संपूर्ण ई-प्रकाशनक बाद प्रिंट फॉर्ममे। कुरुक्षेत्रम्–अन्तर्मनक खण्ड-१ सँ ७ Combined ISBN No.978-81-907729-7-6 विवरण एहि पृष्ठपर नीचाँमे आ प्रकाशकक साइट http://www.shruti-publication.com/ पर । महत्त्वपूर्ण सूचना (२):सूचना: विदेहक मैथिली-अंग्रेजी आ अंग्रेजी मैथिली कोष (इंटरनेटपर पहिल बेर सर्च-डिक्शनरी) एम.एस. एस.क्यू.एल. सर्वर आधारित -Based on ms-sql server Maithili-English and English-Maithili Dictionary. विदेहक भाषापाक- रचनालेखन स्तंभमे। कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक- गजेन्द्र ठाकुर गजेन्द्र ठाकुरक निबन्ध-प्रबन्ध-समीक्षा, उपन्यास (सहस्रबाढ़नि) , पद्य-संग्रह (सहस्राब्दीक चौपड़पर), कथा-गल्प (गल्प गुच्छ), नाटक(संकर्षण), महाकाव्य (त्वञ्चाहञ्च आ असञ्जाति मन) आ बालमंडली-किशोरजगत विदेहमे संपूर्ण ई-प्रकाशनक बाद प्रिंट फॉर्ममे। कुरुक्षेत्रम्–अन्तर्मनक, खण्ड-१ सँ ७ Ist edition 2009 of Gajendra Thakur’s KuruKshetram-Antarmanak (Vol. I to VII)- essay-paper-criticism, novel, poems, story, play, epics and Children-grown-ups literature in single binding: Language:Maithili ६९२ पृष्ठ : मूल्य भा. रु. 100/-(for individual buyers inside india) (add courier charges Rs.50/-per copy for Delhi/NCR and Rs.100/- per copy for outside Delhi)

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Details for purchase available at print-version publishers's site website: http://www.shruti-publication.com/ or you may write to e-mail:shruti.publication@shruti-publication.com विदेह: सदेह : १: २: ३: ४ तिरहुता : देवनागरी "विदेह" क, प्रिंट संस्करण :विदेह-ई-पत्रिका (http://www.videha.co.in/) क चुनल रचना सम्मिलित। विदेह:सदेह:१: २: ३: ४ सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। Details for purchase available at print-version publishers's site http://www.shruti-publication.com  or you may write to shruti.publication@shruti-publication.com २. संदेश- [ विदेह ई-पत्रिका, विदेह:सदेह मिथिलाक्षर आ देवनागरी आ गजेन्द्र ठाकुरक सात खण्डक- निबन्ध-प्रबन्ध-समीक्षा,उपन्यास (सहस्रबाढ़नि) , पद्य-संग्रह (सहस्राब्दीक चौपड़पर), कथा-गल्प (गल्प गुच्छ), नाटक (संकर्षण), महाकाव्य (त्वञ्चाहञ्च आ असञ्जाति मन) आ बाल-मंडली-किशोर जगत- संग्रह कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक मादेँ। ] १.श्री गोविन्द झा- विदेहकेँ तरंगजालपर उतारि विश्वभरिमे मातृभाषा मैथिलीक लहरि जगाओल, खेद जे अपनेक एहि महाभियानमे हम एखन धरि संग नहि दए सकलहुँ। सुनैत छी अपनेकेँ सुझाओ आ रचनात्मक आलोचना प्रिय लगैत अछि तेँ किछु लिखक मोन भेल। हमर सहायता आ सहयोग अपनेकेँ सदा उपलब्ध रहत। २.श्री रमानन्द रेणु- मैथिलीमे ई-पत्रिका पाक्षिक रूपेँ चला कऽ जे अपन मातृभाषाक प्रचार कऽ रहल छी, से धन्यवाद । आगाँ अपनेक समस्त मैथिलीक कार्यक हेतु हम हृदयसँ शुभकामना दऽ रहल छी। ३.श्री विद्यानाथ झा "विदित"- संचार आ प्रौद्योगिकीक एहि प्रतिस्पर्धी ग्लोबल युगमे अपन महिमामय "विदेह"केँ अपना देहमे प्रकट देखि जतबा प्रसन्नता आ संतोष भेल, तकरा कोनो उपलब्ध "मीटर"सँ नहि नापल जा सकैछ? ..एकर ऐतिहासिक मूल्यांकन आ सांस्कृतिक प्रतिफलन एहि शताब्दीक अंत धरि लोकक नजरिमे आश्चर्यजनक रूपसँ प्रकट हैत। ४. प्रो. उदय नारायण सिंह "नचिकेता"- जे काज अहाँ कए रहल छी तकर चरचा एक दिन मैथिली भाषाक इतिहासमे होएत। आनन्द भए रहल अछि, ई जानि कए जे एतेक गोट मैथिल "विदेह" ई जर्नलकेँ पढ़ि रहल छथि।...विदेहक चालीसम अंक पुरबाक लेल अभिनन्दन। ५. डॉ. गंगेश गुंजन- एहि विदेह-कर्ममे लागि रहल अहाँक सम्वेदनशील मन, मैथिलीक प्रति समर्पित मेहनतिक अमृत रंग, इतिहास मे एक टा विशिष्ट फराक अध्याय आरंभ करत, हमरा विश्वास अछि। अशेष शुभकामना आ बधाइक सङ्ग, सस्नेह...अहाँक पोथी कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक प्रथम दृष्टया बहुत भव्य तथा उपयोगी बुझाइछ। मैथिलीमे तँ अपना स्वरूपक प्रायः ई पहिले एहन  भव्य अवतारक पोथी थिक। हर्षपूर्ण हमर हार्दिक बधाई स्वीकार करी। ६. श्री रामाश्रय झा "रामरंग"(आब स्वर्गीय)- "अपना" मिथिलासँ संबंधित...विषय वस्तुसँ अवगत भेलहुँ।...शेष सभ कुशल अछि। ७. श्री ब्रजेन्द्र त्रिपाठी- साहित्य अकादमी- इंटरनेट पर प्रथम मैथिली पाक्षिक पत्रिका "विदेह" केर लेल बधाई आ शुभकामना स्वीकार करू। ८. श्री प्रफुल्लकुमार सिंह "मौन"- प्रथम मैथिली पाक्षिक पत्रिका "विदेह" क प्रकाशनक समाचार जानि कनेक चकित मुदा बेसी आह्लादित भेलहुँ। कालचक्रकेँ पकड़ि जाहि दूरदृष्टिक परिचय देलहुँ, ओहि लेल हमर मंगलकामना। ९.डॉ. शिवप्रसाद यादव- ई जानि अपार हर्ष भए रहल अछि, जे नव सूचना-क्रान्तिक क्षेत्रमे मैथिली पत्रकारिताकेँ प्रवेश दिअएबाक साहसिक कदम उठाओल अछि। पत्रकारितामे एहि प्रकारक नव प्रयोगक हम स्वागत करैत छी, संगहि "विदेह"क सफलताक शुभकामना। १०. श्री आद्याचरण झा- कोनो पत्र-पत्रिकाक प्रकाशन- ताहूमे मैथिली पत्रिकाक प्रकाशनमे के कतेक सहयोग करताह- ई तऽ भविष्य कहत। ई हमर ८८ वर्षमे ७५ वर्षक अनुभव रहल। एतेक पैघ महान यज्ञमे हमर श्रद्धापूर्ण आहुति प्राप्त होयत- यावत ठीक-ठाक छी/ रहब। ११. श्री विजय ठाकुर- मिशिगन विश्वविद्यालय- "विदेह" पत्रिकाक अंक देखलहुँ, सम्पूर्ण टीम बधाईक पात्र अछि। पत्रिकाक मंगल भविष्य हेतु हमर शुभकामना स्वीकार कएल जाओ। १२. श्री सुभाषचन्द्र यादव- ई-पत्रिका "विदेह" क बारेमे जानि प्रसन्नता भेल। ’विदेह’ निरन्तर पल्लवित-पुष्पित हो आ चतुर्दिक अपन सुगंध पसारय से कामना अछि। १३. श्री मैथिलीपुत्र प्रदीप- ई-पत्रिका "विदेह" केर सफलताक भगवतीसँ कामना। हमर पूर्ण सहयोग रहत। १४. डॉ. श्री भीमनाथ झा- "विदेह" इन्टरनेट पर अछि तेँ "विदेह" नाम उचित आर कतेक रूपेँ एकर विवरण भए सकैत अछि। आइ-काल्हि मोनमे उद्वेग रहैत अछि, मुदा शीघ्र पूर्ण सहयोग देब।कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक देखि अति प्रसन्नता भेल। मैथिलीक लेल ई घटना छी। १५. श्री रामभरोस कापड़ि "भ्रमर"- जनकपुरधाम- "विदेह" ऑनलाइन देखि रहल छी। मैथिलीकेँ अन्तर्राष्ट्रीय जगतमे पहुँचेलहुँ तकरा लेल हार्दिक बधाई। मिथिला रत्न सभक संकलन अपूर्व। नेपालोक सहयोग भेटत, से विश्वास करी। १६. श्री राजनन्दन लालदास- "विदेह" ई-पत्रिकाक माध्यमसँ बड़ नीक काज कए रहल छी, नातिक अहिठाम देखलहुँ। एकर वार्षिक अ‍ंक जखन प्रिं‍ट निकालब तँ हमरा पठायब। कलकत्तामे बहुत गोटेकेँ हम साइटक पता लिखाए देने छियन्हि। मोन तँ होइत अछि जे दिल्ली आबि कए आशीर्वाद दैतहुँ, मुदा उमर आब बेशी भए गेल। शुभकामना देश-विदेशक मैथिलकेँ जोड़बाक लेल।.. उत्कृष्ट प्रकाशन कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक लेल बधाइ। अद्भुत काज कएल अछि, नीक प्रस्तुति अछि सात खण्डमे।  मुदा अहाँक सेवा आ से निःस्वार्थ तखन बूझल जाइत जँ अहाँ द्वारा प्रकाशित पोथी सभपर दाम लिखल नहि रहितैक। ओहिना सभकेँ विलहि देल जइतैक। (स्पष्टीकरण-  श्रीमान्, अहाँक सूचनार्थ विदेह द्वारा ई-प्रकाशित कएल सभटा सामग्री आर्काइवमे https://sites.google.com/a/videha.com/videha-pothi/ पर बिना मूल्यक डाउनलोड लेल उपलब्ध छै आ भविष्यमे सेहो रहतैक। एहि आर्काइवकेँ जे कियो प्रकाशक अनुमति लऽ कऽ प्रिंट रूपमे प्रकाशित कएने छथि आ तकर ओ दाम रखने छथि ताहिपर हमर कोनो नियंत्रण नहि अछि।- गजेन्द्र ठाकुर)...   अहाँक प्रति अशेष शुभकामनाक संग। १७. डॉ. प्रेमशंकर सिंह- अहाँ मैथिलीमे इंटरनेटपर पहिल पत्रिका "विदेह" प्रकाशित कए अपन अद्भुत मातृभाषानुरागक परिचय देल अछि, अहाँक निःस्वार्थ मातृभाषानुरागसँ प्रेरित छी, एकर निमित्त जे हमर सेवाक प्रयोजन हो, तँ सूचित करी। इंटरनेटपर आद्योपांत पत्रिका देखल, मन प्रफुल्लित भऽ गेल। १८.श्रीमती शेफालिका वर्मा- विदेह ई-पत्रिका देखि मोन उल्लाससँ भरि गेल। विज्ञान कतेक प्रगति कऽ रहल अछि...अहाँ सभ अनन्त आकाशकेँ भेदि दियौ, समस्त विस्तारक रहस्यकेँ तार-तार कऽ दियौक...। अपनेक अद्भुत पुस्तक कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक विषयवस्तुक दृष्टिसँ गागरमे सागर अछि। बधाई। १९.श्री हेतुकर झा, पटना-जाहि समर्पण भावसँ अपने मिथिला-मैथिलीक सेवामे तत्पर छी से स्तुत्य अछि। देशक राजधानीसँ भय रहल मैथिलीक शंखनाद मिथिलाक गाम-गाममे मैथिली चेतनाक विकास अवश्य करत। २०. श्री योगानन्द झा, कबिलपुर, लहेरियासराय- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पोथीकेँ निकटसँ देखबाक अवसर भेटल अछि आ मैथिली जगतक एकटा उद्भट ओ समसामयिक दृष्टिसम्पन्न हस्ताक्षरक कलमबन्द परिचयसँ आह्लादित छी। "विदेह"क देवनागरी सँस्करण पटनामे रु. 80/- मे उपलब्ध भऽ सकल जे विभिन्न लेखक लोकनिक छायाचित्र, परिचय पत्रक ओ रचनावलीक सम्यक प्रकाशनसँ ऐतिहासिक कहल जा सकैछ। २१. श्री किशोरीकान्त मिश्र- कोलकाता- जय मैथिली, विदेहमे बहुत रास कविता, कथा, रिपोर्ट आदिक सचित्र संग्रह देखि आ आर अधिक प्रसन्नता मिथिलाक्षर देखि- बधाई स्वीकार कएल जाओ। २२.श्री जीवकान्त- विदेहक मुद्रित अंक पढ़ल- अद्भुत मेहनति। चाबस-चाबस। किछु समालोचना मरखाह..मुदा सत्य। २३. श्री भालचन्द्र झा- अपनेक कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक देखि बुझाएल जेना हम अपने छपलहुँ अछि। एकर विशालकाय आकृति अपनेक सर्वसमावेशताक परिचायक अछि। अपनेक रचना सामर्थ्यमे उत्तरोत्तर वृद्धि हो, एहि शुभकामनाक संग हार्दिक बधाई। २४.श्रीमती डॉ नीता झा- अहाँक कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़लहुँ। ज्योतिरीश्वर शब्दावली, कृषि मत्स्य शब्दावली आ सीत बसन्त आ सभ कथा, कविता, उपन्यास, बाल-किशोर साहित्य सभ उत्तम छल। मैथिलीक उत्तरोत्तर विकासक लक्ष्य दृष्टिगोचर होइत अछि। २५.श्री मायानन्द मिश्र- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक मे हमर उपन्यास स्त्रीधनक जे विरोध कएल गेल अछि तकर हम विरोध करैत छी।... कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पोथीक लेल शुभकामना।(श्रीमान् समालोचनाकेँ विरोधक रूपमे नहि लेल जाए।-गजेन्द्र ठाकुर) २६.श्री महेन्द्र हजारी- सम्पादक श्रीमिथिला- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़ि मोन हर्षित भऽ गेल..एखन पूरा पढ़यमे बहुत समय लागत, मुदा जतेक पढ़लहुँ से आह्लादित कएलक। २७.श्री केदारनाथ चौधरी- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक अद्भुत लागल, मैथिली साहित्य लेल ई पोथी एकटा प्रतिमान बनत। २८.श्री सत्यानन्द पाठक- विदेहक हम नियमित पाठक छी। ओकर स्वरूपक प्रशंसक छलहुँ। एम्हर अहाँक लिखल - कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक देखलहुँ। मोन आह्लादित भऽ उठल। कोनो रचना तरा-उपरी। २९.श्रीमती रमा झा-सम्पादक मिथिला दर्पण। कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक प्रिंट फॉर्म पढ़ि आ एकर गुणवत्ता देखि मोन प्रसन्न भऽ गेल, अद्भुत शब्द एकरा लेल प्रयुक्त कऽ रहल छी। विदेहक उत्तरोत्तर प्रगतिक शुभकामना। ३०.श्री नरेन्द्र झा, पटना- विदेह नियमित देखैत रहैत छी। मैथिली लेल अद्भुत काज कऽ रहल छी। ३१.श्री रामलोचन ठाकुर- कोलकाता- मिथिलाक्षर विदेह देखि मोन प्रसन्नतासँ भरि उठल, अंकक विशाल परिदृश्य आस्वस्तकारी अछि। ३२.श्री तारानन्द वियोगी- विदेह आ कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक देखि चकबिदोर लागि गेल। आश्चर्य। शुभकामना आ बधाई। ३३.श्रीमती प्रेमलता मिश्र “प्रेम”- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़लहुँ। सभ रचना उच्चकोटिक लागल। बधाई। ३४.श्री कीर्तिनारायण मिश्र- बेगूसराय- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक बड्ड नीक लागल, आगांक सभ काज लेल बधाई। ३५.श्री महाप्रकाश-सहरसा- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक नीक लागल, विशालकाय संगहि उत्तमकोटिक। ३६.श्री अग्निपुष्प- मिथिलाक्षर आ देवाक्षर विदेह पढ़ल..ई प्रथम तँ अछि एकरा प्रशंसामे मुदा हम एकरा दुस्साहसिक कहब। मिथिला चित्रकलाक स्तम्भकेँ मुदा अगिला अंकमे आर विस्तृत बनाऊ। ३७.श्री मंजर सुलेमान-दरभंगा- विदेहक जतेक प्रशंसा कएल जाए कम होएत। सभ चीज उत्तम। ३८.श्रीमती प्रोफेसर वीणा ठाकुर- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक उत्तम, पठनीय, विचारनीय। जे क्यो देखैत छथि पोथी प्राप्त करबाक उपाय पुछैत छथि। शुभकामना। ३९.श्री छत्रानन्द सिंह झा- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़लहुँ, बड्ड नीक सभ तरहेँ। ४०.श्री ताराकान्त झा- सम्पादक मैथिली दैनिक मिथिला समाद- विदेह तँ कन्टेन्ट प्रोवाइडरक काज कऽ रहल अछि। कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक अद्भुत लागल। ४१.डॉ रवीन्द्र कुमार चौधरी- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक बहुत नीक, बहुत मेहनतिक परिणाम। बधाई। ४२.श्री अमरनाथ- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक आ विदेह दुनू स्मरणीय घटना अछि, मैथिली साहित्य मध्य। ४३.श्री पंचानन मिश्र- विदेहक वैविध्य आ निरन्तरता प्रभावित करैत अछि, शुभकामना। ४४.श्री केदार कानन- कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक लेल अनेक धन्यवाद, शुभकामना आ बधाइ स्वीकार करी। आ नचिकेताक भूमिका पढ़लहुँ। शुरूमे तँ लागल जेना कोनो उपन्यास अहाँ द्वारा सृजित भेल अछि मुदा पोथी उनटौला पर ज्ञात भेल जे एहिमे तँ सभ विधा समाहित अछि। ४५.श्री धनाकर ठाकुर- अहाँ नीक काज कऽ रहल छी। फोटो गैलरीमे चित्र एहि शताब्दीक जन्मतिथिक अनुसार रहैत तऽ नीक। ४६.श्री आशीष झा- अहाँक पुस्तकक संबंधमे एतबा लिखबा सँ अपना कए नहि रोकि सकलहुँ जे ई किताब मात्र किताब नहि थीक, ई एकटा उम्मीद छी जे मैथिली अहाँ सन पुत्रक सेवा सँ निरंतर समृद्ध होइत चिरजीवन कए प्राप्त करत। ४७.श्री शम्भु कुमार सिंह- विदेहक तत्परता आ क्रियाशीलता देखि आह्लादित भऽ रहल छी। निश्चितरूपेण कहल जा सकैछ जे समकालीन मैथिली पत्रिकाक इतिहासमे विदेहक नाम स्वर्णाक्षरमे लिखल जाएत। ओहि कुरुक्षेत्रक घटना सभ तँ अठारहे दिनमे खतम भऽ गेल रहए मुदा अहाँक कुरुक्षेत्रम् तँ अशेष अछि। ४८.डॉ. अजीत मिश्र- अपनेक प्रयासक कतबो प्रश‍ंसा कएल जाए कमे होएतैक। मैथिली साहित्यमे अहाँ द्वारा कएल गेल काज युग-युगान्तर धरि पूजनीय रहत। ४९.श्री बीरेन्द्र मल्लिक- अहाँक कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक आ विदेह:सदेह पढ़ि अति प्रसन्नता भेल। अहाँक स्वास्थ्य ठीक रहए आ उत्साह बनल रहए से कामना। ५०.श्री कुमार राधारमण- अहाँक दिशा-निर्देशमे विदेह पहिल मैथिली ई-जर्नल देखि अति प्रसन्नता भेल। हमर शुभकामना। ५१.श्री फूलचन्द्र झा प्रवीण-विदेह:सदेह पढ़ने रही मुदा कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक देखि बढ़ाई देबा लेल बाध्य भऽ गेलहुँ। आब विश्वास भऽ गेल जे मैथिली नहि मरत। अशेष शुभकामना। ५२.श्री विभूति आनन्द- विदेह:सदेह देखि, ओकर विस्तार देखि अति प्रसन्नता भेल। ५३.श्री मानेश्वर मनुज-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक एकर भव्यता देखि अति प्रसन्नता भेल, एतेक विशाल ग्रन्थ मैथिलीमे आइ धरि नहि देखने रही। एहिना भविष्यमे काज करैत रही, शुभकामना। ५४.श्री विद्यानन्द झा- आइ.आइ.एम.कोलकाता- कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक विस्तार, छपाईक संग गुणवत्ता देखि अति प्रसन्नता भेल। अहाँक अनेक धन्यवाद; कतेक बरखसँ हम नेयारैत छलहुँ जे सभ पैघ शहरमे मैथिली लाइब्रेरीक स्थापना होअए, अहाँ ओकरा वेबपर कऽ रहल छी, अनेक धन्यवाद। ५५.श्री अरविन्द ठाकुर-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक मैथिली साहित्यमे कएल गेल एहि तरहक पहिल प्रयोग अछि, शुभकामना। ५६.श्री कुमार पवन-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक पढ़ि रहल छी। किछु लघुकथा पढ़ल अछि, बहुत मार्मिक छल। ५७. श्री प्रदीप बिहारी-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक देखल, बधाई। ५८.डॉ मणिकान्त ठाकुर-कैलिफोर्निया- अपन विलक्षण नियमित सेवासँ हमरा लोकनिक हृदयमे विदेह सदेह भऽ गेल अछि। ५९.श्री धीरेन्द्र प्रेमर्षि- अहाँक समस्त प्रयास सराहनीय। दुख होइत अछि जखन अहाँक प्रयासमे अपेक्षित सहयोग नहि कऽ पबैत छी। ६०.श्री देवशंकर नवीन- विदेहक निरन्तरता आ विशाल स्वरूप- विशाल पाठक वर्ग, एकरा ऐतिहासिक बनबैत अछि। ६१.श्री मोहन भारद्वाज- अहाँक समस्त कार्य देखल, बहुत नीक। एखन किछु परेशानीमे छी, मुदा शीघ्र सहयोग देब। ६२.श्री फजलुर रहमान हाशमी-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक मे एतेक मेहनतक लेल अहाँ साधुवादक अधिकारी छी। ६३.श्री लक्ष्मण झा "सागर"- मैथिलीमे चमत्कारिक रूपेँ अहाँक प्रवेश आह्लादकारी अछि।..अहाँकेँ एखन आर..दूर..बहुत दूरधरि जेबाक अछि। स्वस्थ आ प्रसन्न रही। ६४.श्री जगदीश प्रसाद मंडल-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक पढ़लहुँ । कथा सभ आ उपन्यास सहस्रबाढ़नि पूर्णरूपेँ पढ़ि गेल छी। गाम-घरक भौगोलिक विवरणक जे सूक्ष्म वर्णन सहस्रबाढ़निमे अछि, से चकित कएलक, एहि संग्रहक कथा-उपन्यास मैथिली लेखनमे विविधता अनलक अछि। समालोचना शास्त्रमे अहाँक दृष्टि वैयक्तिक नहि वरन् सामाजिक आ कल्याणकारी अछि, से प्रशंसनीय। ६५.श्री अशोक झा-अध्यक्ष मिथिला विकास परिषद- कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक लेल बधाई आ आगाँ लेल शुभकामना। ६६.श्री ठाकुर प्रसाद मुर्मु- अद्भुत प्रयास। धन्यवादक संग प्रार्थना जे अपन माटि-पानिकेँ ध्यानमे राखि अंकक समायोजन कएल जाए। नव अंक धरि प्रयास सराहनीय। विदेहकेँ बहुत-बहुत धन्यवाद जे एहेन सुन्दर-सुन्दर सचार (आलेख) लगा रहल छथि। सभटा ग्रहणीय- पठनीय। ६७.बुद्धिनाथ मिश्र- प्रिय गजेन्द्र जी,अहाँक सम्पादन मे प्रकाशित ‘विदेह’आ ‘कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक’ विलक्षण पत्रिका आ विलक्षण पोथी! की नहि अछि अहाँक सम्पादनमे? एहि प्रयत्न सँ मैथिली क विकास होयत,निस्संदेह। ६८.श्री बृखेश चन्द्र लाल- गजेन्द्रजी, अपनेक पुस्तक कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक पढ़ि मोन गदगद भय गेल , हृदयसँ अनुगृहित छी । हार्दिक शुभकामना । ६९.श्री परमेश्वर कापड़ि - श्री गजेन्द्र जी । कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक पढ़ि गदगद आ नेहाल भेलहुँ। ७०.श्री रवीन्द्रनाथ ठाकुर- विदेह पढ़ैत रहैत छी। धीरेन्द्र प्रेमर्षिक मैथिली गजलपर आलेख पढ़लहुँ। मैथिली गजल कत्तऽ सँ कत्तऽ चलि गेलैक आ ओ अपन आलेखमे मात्र अपन जानल-पहिचानल लोकक चर्च कएने छथि। जेना मैथिलीमे मठक परम्परा रहल अछि। (स्पष्टीकरण- श्रीमान्, प्रेमर्षि जी ओहि आलेखमे ई स्पष्ट लिखने छथि जे किनको नाम जे छुटि गेल छन्हि तँ से मात्र आलेखक लेखकक जानकारी नहि रहबाक द्वारे, एहिमे आन कोनो कारण नहि देखल जाय। अहाँसँ एहि विषयपर विस्तृत आलेख सादर आमंत्रित अछि।-सम्पादक) ७१.श्री मंत्रेश्वर झा- विदेह पढ़ल आ संगहि अहाँक मैगनम ओपस कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक सेहो, अति उत्तम। मैथिलीक लेल कएल जा रहल अहाँक समस्त कार्य अतुलनीय अछि। ७२. श्री हरेकृष्ण झा- कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक मैथिलीमे अपन तरहक एकमात्र ग्रन्थ अछि, एहिमे लेखकक समग्र दृष्टि आ रचना कौशल देखबामे आएल जे लेखकक फील्डवर्कसँ जुड़ल रहबाक कारणसँ अछि। ७३.श्री सुकान्त सोम- कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक मे  समाजक इतिहास आ वर्तमानसँ अहाँक जुड़ाव बड्ड नीक लागल, अहाँ एहि क्षेत्रमे आर आगाँ काज करब से आशा अछि। ७४.प्रोफेसर मदन मिश्र- कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक सन किताब मैथिलीमे पहिले अछि आ एतेक विशाल संग्रहपर शोध कएल जा सकैत अछि। भविष्यक लेल शुभकामना। ७५.प्रोफेसर कमला चौधरी- मैथिलीमे कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक सन पोथी आबए जे गुण आ रूप दुनूमे निस्सन होअए, से बहुत दिनसँ आकांक्षा छल, ओ आब जा कऽ पूर्ण भेल। पोथी एक हाथसँ दोसर हाथ घुमि रहल अछि, एहिना आगाँ सेहो अहाँसँ आशा अछि। ७६.श्री उदय चन्द्र झा "विनोद": गजेन्द्रजी, अहाँ जतेक काज कएलहुँ अछि से मैथिलीमे आइ धरि कियो नहि कएने छल। शुभकामना। अहाँकेँ एखन बहुत काज आर करबाक अछि। ७७.श्री कृष्ण कुमार कश्यप: गजेन्द्र ठाकुरजी, अहाँसँ भेँट एकटा स्मरणीय क्षण बनि गेल। अहाँ जतेक काज एहि बएसमे कऽ गेल छी ताहिसँ हजार गुणा आर बेशीक आशा अछि। ७८.श्री मणिकान्त दास: अहाँक मैथिलीक कार्यक प्रशंसा लेल शब्द नहि भेटैत अछि। अहाँक कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक सम्पूर्ण रूपेँ पढ़ि गेलहुँ। त्वञ्चाहञ्च बड्ड नीक लागल। ७९. श्री हीरेन्द्र कुमार झा- विदेह ई-पत्रिकाक सभ अंक ई-पत्रसँ भेटैत रहैत अछि। मैथिलीक ई-पत्रिका छैक एहि बातक गर्व होइत अछि। अहाँ आ अहाँक सभ सहयोगीकेँ हार्दिक शुभकामना। विदेह मैथिली साहित्य आन्दोलन (c)२००४-११. सर्वाधिकार लेखकाधीन आ जतय लेखकक नाम नहि अछि ततय संपादकाधीन। विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। सह-सम्पादक: उमेश मंडल। सहायक सम्पादक: शिव कुमार झा आ मुन्नाजी (मनोज कुमार कर्ण)। भाषा-सम्पादन: नागेन्द्र कुमार झा आ पञ्जीकार विद्यानन्द झा। कला-सम्पादन: ज्योति सुनीत चौधरी आ रश्मि रेखा सिन्हा। सम्पादक-शोध-अन्वेषण: डॉ. जया वर्मा आ डॉ. राजीव कुमार वर्मा। रचनाकार अपन मौलिक आ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि) ggajendra@videha.com केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx, .rtf वा .txt फॉर्मेटमे पठा सकैत छथि। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेताह, से आशा करैत छी। रचनाक अंतमे टाइप रहय, जे ई रचना मौलिक अछि, आ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। मेल प्राप्त होयबाक बाद यथासंभव शीघ्र ( सात दिनक भीतर) एकर प्रकाशनक अंकक सूचना देल जायत। ’विदेह' प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका अछि आ एहिमे मैथिली, संस्कृत आ अंग्रेजीमे मिथिला आ मैथिलीसँ संबंधित रचना प्रकाशित कएल जाइत अछि। एहि ई पत्रिकाकेँ श्रीमति लक्ष्मी ठाकुर द्वारा मासक ०१ आ १५ तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि। (c) 2004-11 सर्वाधिकार सुरक्षित। विदेहमे प्रकाशित सभटा रचना आ आर्काइवक सर्वाधिकार रचनाकार आ संग्रहकर्त्ताक लगमे छन्हि। रचनाक अनुवाद आ पुनः प्रकाशन किंवा आर्काइवक उपयोगक अधिकार किनबाक हेतु ggajendra@videha.co.in पर संपर्क करू। एहि साइटकेँ प्रीति झा ठाकुर, मधूलिका चौधरी आ रश्मि प्रिया द्वारा डिजाइन कएल गेल। सिद्धिरस्तु वि दे ह विदेह Videha বিদেহ  विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका Videha Ist Maithili Fortnightly e Magazine  विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका 'विदेह' ८४ म अंक १५ जून २०११ (वर्ष ४ मास ४२ अंक ८४)http://www.videha.co.in/ मानुषीमिह संस्कृताम् ISSN 2229-547X VIDEHA वि दे ह विदेह Videha বিদেহ  विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका Videha Ist Maithili Fortnightly e Magazine  विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका 'विदेह' ८४ म अंक १५ जून २०११ (वर्ष ४ मास ४२ अंक ८४)http://www.videha.co.in/ मानुषीमिह संस्कृताम् ISSN 2229-547X VIDEHA

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