230 229 ISSN 2229-547X VIDEHA 'विदेह' ८५ म अंक ०१ जुलाइ २०११ (वर्ष ४ मास ४३ अंक ८५) वि दे ह विदेह Videha বিদেহ http://www.videha.co.in विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका Videha Ist Maithili Fortnightly e Magazine नव अंक देखबाक लेल पृष्ठ सभकेँ रिफ्रेश कए देखू। Always refresh the pages for viewing new issue of VIDEHA. Read in your own script Roman(Eng)Gujarati Bangla Oriya Gurmukhi Telugu Tamil Kannada Malayalam Hindi ऐ अंकमे अछि:- १. संपादकीय संदेश २. गद्य २.१.मानेश्वर मनुज- मैथिल दृष्टिक प्रसंग मुम्बइसँ एक चिट्ठी/ बुच्ची दाइक निलामी कोना से देखू २.२.जगदीश प्रसाद मण्डल- कथा- बिहरन २.३.किशन कारीगर- मैथिली सीखू- (एकटा हास्य कथा) २.४.जगदीश प्रसाद मण्डल- नाटक २.५.बिपिन झा- कलौ चण्डी महेश्वरौ २.६.राजदेव मण्डल- उपन्यास- हमर टोल -आगाँ २.७.सुमित आनन्द- रिपोर्ट (कार्यशालाक आयोजन) ३. पद्य ३.१.उमेश मण्डल- कविता- शुभारम्भ ३.२.जितमोहन झा (जितू)- गीत ३.३.जगदीश प्रसाद मण्डल- कविता- माइटक फूल ३.४.रामविलास साहु ३.५.रवि भूषण पाठक- मरणोपरांत ४ ३.६..-बिनोद मिश्र ३.७.विनीत उत्पल -हम नै सुधरब ४. मिथिला कला-संगीत- १.ज्योति सुनीत चौधरी २.श्वेता झा (सिंगापुर) ३.गुंजन कर्ण ५. गद्य-पद्य भारती: मूल भोजपुरी- भिखारी ठाकुर (१८८७-१९७१), मैथिली अनुवाद- गजेन्द्र ठाकुर (१९७१- )- वृद्धाश्रमक पक्षमे ६. बालानां कृते-प्रेमचन्द्र मिश्र- अपन बेटा अभिनव मिश्रकेँ बल दै लेल कविता ७. भाषापाक रचना-लेखन -[मानक मैथिली], [विदेहक मैथिली-अंग्रेजी आ अंग्रेजी मैथिली कोष (इंटरनेटपर पहिल बेर सर्च-डिक्शनरी) एम.एस. एस.क्यू.एल. सर्वर आधारित -Based on ms-sql server Maithili-English and English-Maithili Dictionary.] 8.VIDEHA FOR NON RESIDENTS 8.2.1.Episodes Of The Life - ("Kist-Kist Jeevan" by Smt. shefalika Varma translated into English by Smt. Jyoti Jha Chaudhary ) 2.Original Poem in Maithili by Kalikant Jha "Buch" Translated into English by Jyoti Jha Chaudhary विदेह ई-पत्रिकाक सभटा पुरान अंक ( ब्रेल, तिरहुता आ देवनागरी मे ) पी.डी.एफ. डाउनलोडक लेल नीचाँक लिंकपर उपलब्ध अछि। All the old issues of Videha e journal ( in Braille, Tirhuta and Devanagari versions ) are available for pdf download at the following link. विदेह ई-पत्रिकाक सभटा पुरान अंक ब्रेल, तिरहुता आ देवनागरी रूपमे Videha e journal's all old issues in Braille Tirhuta and Devanagari versions विदेह ई-पत्रिकाक पहिल ५० अंक
विदेह ई-पत्रिकाक ५०म सँ आगाँक अंक विदेह आर.एस.एस.फीड। "विदेह" ई-पत्रिका ई-पत्रसँ प्राप्त करू। अपन मित्रकेँ विदेहक विषयमे सूचित करू। ↑ विदेह आर.एस.एस.फीड एनीमेटरकेँ अपन साइट/ ब्लॉगपर लगाऊ। ब्लॉग "लेआउट" पर "एड गाडजेट" मे "फीड" सेलेक्ट कए "फीड यू.आर.एल." मे http://www.videha.co.in/index.xml टाइप केलासँ सेहो विदेह फीड प्राप्त कए सकैत छी। गूगल रीडरमे पढ़बा लेल http://reader.google.com/ पर जा कऽ Add a Subscription बटन क्लिक करू आ खाली स्थानमे http://www.videha.co.in/index.xml पेस्ट करू आ Add बटन दबाउ। Join official Videha facebook group. Join Videha googlegroups विदेह रेडियो:मैथिली कथा-कविता आदिक पहिल पोडकास्ट साइट http://videha123radio.wordpress.com/ Videha Radio मैथिली देवनागरी वा मिथिलाक्षरमे नहि देखि/ लिखि पाबि रहल छी, (cannot see/write Maithili in Devanagari/ Mithilakshara follow links below or contact at ggajendra@videha.com) तँ एहि हेतु नीचाँक लिंक सभ पर जाऊ। संगहि विदेहक स्तंभ मैथिली भाषापाक/ रचना लेखनक नव-पुरान अंक पढ़ू। http://devanaagarii.net/ http://kaulonline.com/uninagari/ (एतए बॉक्समे ऑनलाइन देवनागरी टाइप करू, बॉक्ससँ कॉपी करू आ वर्ड डॉक्युमेन्टमे पेस्ट कए वर्ड फाइलकेँ सेव करू। विशेष जानकारीक लेल ggajendra@videha.com पर सम्पर्क करू।)(Use Firefox 4.0 (from WWW.MOZILLA.COM )/ Opera/ Safari/ Internet Explorer 8.0/ Flock 2.0/ Google Chrome for best view of 'Videha' Maithili e-journal at http://www.videha.co.in/ .) Go to the link below for download of old issues of VIDEHA Maithili e magazine in .pdf format and Maithili Audio/ Video/ Book/ paintings/ photo files. विदेहक पुरान अंक आ ऑडियो/ वीडियो/ पोथी/ चित्रकला/ फोटो सभक फाइल सभ (उच्चारण, बड़ सुख सार आ दूर्वाक्षत मंत्र सहित) डाउनलोड करबाक हेतु नीचाँक लिंक पर जाऊ। VIDEHA ARCHIVE विदेह आर्काइव भारतीय डाक विभाग द्वारा जारी कवि, नाटककार आ धर्मशास्त्री विद्यापतिक स्टाम्प। भारत आ नेपालक माटिमे पसरल मिथिलाक धरती प्राचीन कालहिसँ महान पुरुष ओ महिला लोकनिक कर्मभमि रहल अछि। मिथिलाक महान पुरुष ओ महिला लोकनिक चित्र 'मिथिला रत्न' मे देखू। गौरी-शंकरक पालवंश कालक मूर्त्ति, एहिमे मिथिलाक्षरमे (१२०० वर्ष पूर्वक) अभिलेख अंकित अछि। मिथिलाक भारत आ नेपालक माटिमे पसरल एहि तरहक अन्यान्य प्राचीन आ नव स्थापत्य, चित्र, अभिलेख आ मूर्त्तिकलाक़ हेतु देखू 'मिथिलाक खोज' मिथिला, मैथिल आ मैथिलीसँ सम्बन्धित सूचना, सम्पर्क, अन्वेषण संगहि विदेहक सर्च-इंजन आ न्यूज सर्विस आ मिथिला, मैथिल आ मैथिलीसँ सम्बन्धित वेबसाइट सभक समग्र संकलनक लेल देखू "विदेह सूचना संपर्क अन्वेषण" विदेह जालवृत्तक डिसकसन फोरमपर जाऊ। "मैथिल आर मिथिला" (मैथिलीक सभसँ लोकप्रिय जालवृत्त) पर जाऊ। Thank you, we have already counted your vote. संग समय के (कविता संग्रह)- महाप्रकाश 2.7% (45 votes) भाग रौ बलचंदा (दू नाटक)-विभारानी 2.4% (40 votes) बनैत बिगड़ैत (कथा संग्रह)-सुभाष चन्द्र यादव 15.47% (258 votes) मैथिली लोकनाट्यक विस्तृत अध्ययन एवं विश्लेषण (शास्त्र) -महेन्द्र मलंगिया 2.46% (41 votes) किस्त किस्त जीवन (आत्मकथा )-शेफालिका वर्मा 18.94% (316 votes) नो एंट्री मा प्रविश (नाटक )- उदय नारायण सिंह "नचिकेता" 16.37% (273 votes) गामक जिनगी (कथा संग्रह)-जगदीश प्रसाद मंडल 21.28% (355 votes) कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक (विविधा)-गजेन्द्र ठाकुर 20.08% (335 votes) Other: 0.3% (5 votes) Total Votes: 1,668 Comments (1)Return To PollShare ThisCreate Your Own Poll Thank you, we have already counted your vote. रामलोचन ठाकुर- पद्मा नदीक माझी (बांग्ला- माणिक वन्दोपाध्याय) 61.28% (220 votes) मेनका मल्लिक- देश आ अन्य कविता सभ (रेमिका थापा- नेपाली) 21.45% (77 votes) कृष्ण कुमार कश्यप आ शशिबाला- मैथिली गीतगोविन्द (जयदेव - संस्कृत) 15.88% (57 votes) Other: 1.39% (5 votes) Total Votes: 359 Comments (0)Return To PollShare ThisCreate Your Own Poll Thank you, we have already counted your vote. प्रीति ठाकुर (गोनू झा आ आन मैथिली चित्रकथा) 52.8% (264 votes) ले.क.मायानाथ झा (जकर नारी चतुर होइ- बालकथा संग्रह) 23.8% (119 votes) जीवकांत - खिखिरक बिअरि- कविता संग्रह) 12% (60 votes) विद्यानाथ झा "विदित" (साते भवतु सुप्रीता- बाल उपन्यास) 11.2% (56 votes) Other: 0.2% (1 votes) Total Votes: 500 Comments (0)Return To PollShare ThisCreate Your Own Poll Thank you, we have already counted your vote. आनंद कुमार झा- हठात् परिवर्त्तन ( नाटक) 50.27% (460 votes) विनीत उत्पल - हम पुछैत छी (कविता संग्रह ) 16.39% (150 votes) उमेश मंडल- निश्तुकी ( कविता संग्रह) 16.72% (153 votes) ज्योति सुनीत चौधरी- अर्चिस (कविता संग्रह ) 15.63% (143 votes) Other: 0.98% (9 votes) Total Votes: 915 १. संपादकीय १ मैथिली लेल एकटा अनुवाद सिद्धान्त: अनुवादक इतिहास बड्ड पुरान छै। कोनो प्राचीन भाषा जेना संस्कृत, अवेस्ता, ग्रीक आ लैटिनक कोनो कालजयी कृति जखन दुरूह हेबऽ लागल तँ ओइपर चाहे तँ भाष्य लिखबाक खगताक अनुभव भेल आ कनेक आर आगाँ ओकरा दोसर भाषामे अनुवाद कऽ बुझबाक खगताक अनुभव भेल। प्राचीन मौर्य साम्राज्यक सम्राट अशोकक पाथरपर कीलित शिलालेख सभ, कएकटा लिपि आ भाषामे, राज्यक आदेशकेँ विभिन्न प्रान्तमे प्रसारित केलक। भाष्य पहिने मूल भाषामे लिखल जाइत छल आ बादमे दोसर भाषामे लिखल जाए लागल। मैथिलीसँ दोसर भाषा आ दोसर भाषासँ मैथिलीमे अनुवाद लेल सिद्धान्त: मैथिलीसँ सोझे दोसर भाषामे अनुवाद अखन धरि संस्कृत, बांग्ला, नेपाली, हिन्दी आ अंग्रेजी धरि सीमित अछि। तहिना ऐ पाँचू भाषाक सोझ अनुवाद मैथिलीमे होइत अछि। ऐ पाँच भाषाक अतिरिक्त मराठी, मलयालम आदि भाषासँ सेहो सोझ मैथिली अनुवाद भेल अछि मुदा से नगण्य अछि। मैथिलीमे अनुवाद आ मैथिलीसँ अन्य भाषामे अनुवाद ऐ पाँचू भाषाकेँ मध्यस्थ भाषाक रूपमे लऽ कऽ होइत अछि। अहू पाँच भाषामे हिन्दी, नेपाली आ अंग्रेजीक अतिरिक्त आन दू भाषाक मध्यस्थ भाषाक रूपमे प्रयोग सीमित अछि। अनुवादसँ कने भिन्न अछि रूपान्तरण, जेना कथाक नाट्य रूपान्तरण वा गद्यक पद्यमे पद्यक गद्यमे रूपान्तरण। ऐ मे मैथिलीसँ मैथिलीमे विधाक रूपान्तरण होइत अछि आ अनुवाद सिद्धान्तक ज्ञान नै रहने रूपान्तरकार अर्थ आ भावक अनर्थ कऽ दैत अछि। मैथिलीमे आ मैथिलीसँ अनुवादमे तँ ई समस्या आर विकट अछि। उत्तम अनुवाद लेल किछु आवश्यक तत्त्व: शब्दशः अनुवाद करबा काल ध्यान राखू जे कहबी आ सन्दर्भक मूल भाव आबि रहल अछि आकि नै। श्ब्द, वाक्य आ भाषाक गढ़नि अक्षुण्ण रहए से ध्यानमे राखू। मूल भाषाक शब्द सभ जँ प्राचीन अछि तँ अनूदित भाषाक शब्द सभकेँ सेहो पुरान आ खाँटी राखू। मूल आ अनूदित भाषाक व्याकरण आ शब्द भण्डारक वृहत् ज्ञान एतए आवश्यक भऽ जाइत अछि। मूल भाषामे मुँह कोचिया कऽ बाजल रामनाथ, उमेशक प्रति सम्बोधनकेँ रामनाथो, उमेशोक बदलामे रामनाथहुँ, उमेशहुँ कऽ अनुवाद कएल जाएब उचित हएत मुदा सामान्य परिस्थितिमे से उचित नै हएत। से शब्द, भाव, प्रारूपमे सेहो आ मूल कृतिक देश-कालक भाषामे सेहो समानता चाही। अनुवादककेँ मूल आ अनूदित कएल जाएबला भाषाक ज्ञान तँ हेबाके चाही संगमे दुनू भाषा क्षेत्र इतिहास, भूगोल, लोककथा, कहबी आ ग्रम्य-वन्य आ नग्रक संस्कृतिक ज्ञान सेहो हेबाक चाही। ई मध्यस्थ भाषासँ अनुवाद करबा काल आर बेसी महत्वपूर्ण भऽ जाइत अछि। ऐ परिस्थितिमे “दुनू भाषा क्षेत्रक इतिहास, भूगोल, लोककथा, कहबी आ ग्रम्य-वन्य आ नग्रक संस्कृतिक ज्ञान” सँ तात्पर्य अनूदित आ मूल भाषा क्षेत्रसँ हएत मध्यस्थ भाषा क्षेत्रसँ नै। कखनो काल मूल भाषाक कोनो भाषासँ सम्बन्धित तत्त्व वा गएर भाषिक तत्व (सांस्कृतिक तत्त्व) क सही-सही उदाहरण अनूदित भाषामे नै भेटैत अछि आ तखन अनुवादक गपकेँ नमराबऽ लगैत छथि वा ओइ लेल एकटा सन्निकट शब्दावली (ओइ नै भेटल तत्त्वक) देमए लगैत छथि। ऐ परिस्थितिमे सन्निकट शब्दावली देबासँ नीक गपकेँ नमरा कऽ बुझाएब वा परिशिष्ट दऽ ओकरा स्पष्ट करब हएत। ऐ सँ मूल भाषासँ मध्यस्थ माषाक माध्यमसँ कएल अनुवादमे होइबला साहित्यिक घाटाकेँ न्यून कएल जा सकत। कथा, कविता, नाटक, उपन्यास, महाकाव्य (गीत-प्रबन्ध), निबन्ध, स्कूल-कॉलेजक पुस्तक, संगणक विज्ञान, समाजशास्त्र, समाज विज्ञान आ प्रकृति विज्ञानक पोथीक अनुवाद करबा काल किछु विशेष तकनीकक आवश्यकता पड़त। निबन्ध, स्कूल-कॉलेजक पुस्तक, संगणक विज्ञान, समाजशास्त्र, समाज विज्ञान आ प्रकृति विज्ञानक अनुवाद ऐ अर्थेँ सरल अछि जे ऐ सभमे विस्तारसँ विषयक चर्चा होइत अछि आ सर्जनात्मक साहित्य {कथा, कविता, नाटक, उपन्यास, महाकाव्य (गीत-प्रबन्ध)} क विपरीत भाव आ संस्कृतिक गुणांक नै रहैत अछि वा कम रहैत अछि। संगे एतए पाठक सेहो कक्षा/ विषयकक अनुसार सजाएल रहैत छथि। केमिकल नाम, बायोलोजिकल आ बोटेनिकल बाइनरी नाम आ आन सभ सिम्बल आदि जे विशिष्ट अन्तर्राष्ट्रीय संस्था सभ द्वारा स्वीकृत अछि तकर परिवर्तन वा अनुवाद अपेक्षित नै अछि। सर्जनात्मक साहित्यमे नाटक सभसँ कठिन अछि, फेर कविता अछि आ तखन कथा, जँ अनुवादकक दृष्टिकोणसँ देखी तखन। नाटकमे नाटकक पृष्ठभूमि आ परोक्ष निहितार्थकेँ चिन्हित करए पड़त संगहि पात्र सभक मनोविज्ञान बूझए पड़त। कवितामे कविताक विधासँ ओकर गढ़निसँ अनुवादकक परिचित भेनाइ आवश्यक, जेना हाइकूक मैथिलीसँ अंग्रेजी अनुवाद करै बेरमे मैथिलीक वार्णिक ५/७/५ क मेल जँ अंग्रेजीक अल्फाबेटसँ करेबै तँ अहाँक अनूदित हाइकू हास्यास्पद भऽ जाएत कारण अंग्रेजीमे ५/७/५ सिलेबलक हाइकू होइ छै आ मैथिलीमे जेना वर्ण आ सिलेबलक समानता होइ छै से अंग्रेजीमे नै होइ छै। ऐ सन्दर्भमे ज्योति सुनीत चौधरीक मैथिलीसँ अंग्रेजी अनुवाद एकटा प्रतिमान प्रस्तुत करैत अछि। कविताक लय, बिम्बपर विचार करए पड़त संगहि कविता खण्डक कविताक मुख्य शरीरसँ मिलान करए पड़त। कथामे कथाकारक आ कथाक पात्रक संग कथाक क्रम, बैकफ्लैशक समय-कालक ज्ञान आ वातावरणक ज्ञान आवश्यक भऽ जाइत अछि। आब महाकाव्यक अनुवाद देखू, रामलोचन शरणक मैथिली रामचरित मानस अव्धीसँ मैथिलीमे अनुवाद अछि मुदा दोहा, चौपाइ, सोरठा सभ शास्त्रीय रूपेँ अनूदित भेल अछि। संस्कृत भाषाक अनुवादक माध्यमसँ पाठन आंग्ल शासक लोकनि द्वारा प्रारम्भ भेल। ऐ विधिसँ ने लैटिनक आ नहिये ग्रीकक अध्यापन कराओल गेल छल। ऐ विधिसँ जँ अहाँ संस्कत वा कोनो भाषा सीखब तँ आचार्य आ कोविद कऽ जाएब मुदा सम्भाषण नै कएल हएत। जँ कोनो भाषाकेँ अहाँ मातृभाषा रूपेँ सीखब तखने सम्भाषण कऽ सकब, संस्कृति आदिक परिचय पाठ्यक्रममे शब्दकोष; आ लोककथा आ इतिहास/ भूगोलक समावेश कऽ कएल जा सकैत अछि। संगणक द्वारा अनुवाद: सर्जनात्मक वा निबन्ध, स्कूल-कॉलेजक पुस्तक, संगणक विज्ञान, समाजशास्त्र, समाज विज्ञान आ प्रकृति विज्ञानक अनुवाद संगणक द्वारा प्रायोगिक रूपमे कएल जाइत अछि मुदा “कोल्ड ब्लडेड एनीमल” क अनुवाद हास्यास्पद रूपेँ “नृशंस जीव” कएल जाइत अछि। मुदा संगणकक द्वारा अनुवाद किछु क्षेत्रमे सफल रूपेँ भेल अछि, जेना विकीपीडियामे ५०० शब्दक एकटा “बेसी प्रयुक्त शब्दावली” आ २६०० शब्दक “शब्दावली”क अनुवाद केलासँ, गूगलक ट्रान्सलेशन अओजार आदिमे आधारभूत शब्दक अनुवाद केलासँ आ आन गवेषक जेना मोजिला फायरफॉक्स आदिमे अंग्रेजीक सभ पारिभाषिक संगणकीय शब्दक अनुवाद केलासँ त्रुटिविहीन स्वतः मैथिली अनुवाद भऽ जाइत अछि। २ रामलोचन शरणक मैथिली राम चरित मानस महाकाव्य वा गीत प्रबन्ध: महाकाव्यक वर्णन जे ई कतेक सर्गमे हुअए, एकर नायक केहन प्रकृतिक हुअए आ ओ उच्च कुल उत्पन्न हुअए आदि आब बुद्धिविलास मात्र कहल जाएत। जेना गद्यमे कथा होइत अछि आ विस्तारक अनुसार लघुकथा, कथा आ उपन्यासमे विभक्त कएल जाइत अछि तइ सन्दर्भमे उपन्यास (वा बीच-बीचमे नाटककक) पद्य रूपान्तरण महाकाव्य कहल जाएत। जँ ऋगवैदिक परम्परामे जाइ तँ महाकाव्यकेँ गीत-प्रबन्ध कहल जएबाक चाही। आचार्य रामलोचन शरणक गीत-प्रबन्ध मैथिली रामचरित मानस: मैथिली साहित्यकेँ पढ़निहारक समक्ष मैथिलीमे रामचरित किंवा रामायण श्री चंदा झा कृत मिथिला भाषा रामायण आ श्री लालदासक रमेश्वर चरित मिथिला रामायण - ऐ दू गोट ग्रंथक रूपमे प्राप्त होइत अछि। पाठ्यक्रमक अंतर्गत स्कूल, कॉलेज-विश्वविद्यालयक मैथिली विषयक पाठ हो किंवा सामान्य आलोचना ग्रंथ आकि पत्र-पत्रिकामे छिड़िआयल लेख सभ, ऐ तेसर रामायणक अस्तित्वो धरि नै स्वीकार कएल गेल अछि। एकर संग ईहो बुझि लिअ जे जनमानस समालोचनाशास्त्रक आधारपर राखल विचारकेँ तखने स्वीकार करैत अछि जखन ओ सत्यताक प्रतीक हो। आइयो मिथिलामे जे अखंड रामायण पाठ होइत अछि से बाल्मीकि रामायणक किंवा तुलसीक रामचरितमानसक। एकर कारणपर हम बहुत दिन धरि विचार करैत रहलहुँ। कैकटा चन्द्र रामायण आ लालदासकृत मिथिला रामायण, रामायण अखंड पाठ केनिहार लोकनिकेँ बँटबो कएलहुँ मुदा सबहक ईएह विचार छल, जे ई दुनू ग्रंथ मैथिली साहित्यक अमूल्य धरोहर अछि, मुदा अखंड पाठक सुर जे तुलसीक मानसमे अछि से दोसर भाषाक रहला उत्तरो संगीतमय अछि। शंकरदेव अपन मातृभाषा असमियाक बदला मैथिली भाषाक प्रयोग संगीतमय भाषा होयबाक द्वारे कएलन्हि तइ भाषामे संगीतमय रामायणक रचना जे अखण्ड पाठमे प्रयोग भऽ सकए, केर निर्माण संभव नै भऽ सकल अछि, से हमर मोन मानबाक हेतु तैयार नै छल, श्री रामलोचनशरण-कृत यथासम्भव पूर्णभावरक्षित समश्लोकी मैथिली श्रीरामचरितमानस एकर प्रमाण अछि। अपन समीक्षक लोकनि ऐ मोतीकेँ चिन्हबामे सफल किए नै भऽ सकलाह, एकर चर्चो तक मैथिलीक उपरोक्त दुनू रामायणक समक्ष किए नै कएल जाइत अछि। स्व.हरिमोहन झाक कोनो पोथी मैथिली अकादमी द्वारा हुनका जिबैत प्रकाशित नै भेल आ साहित्य अकादमी पुरस्कार सेहो हुनका मृत्योपरांत देल गेलन्हि। आचार्य रामलोचन शरण मैथिलीक सभसँ पैघ महाकाव्यक रचयिता छथि आ हमरा विचारे सभसँ संपूर्ण मैथिली रामायणक सेहो। जखन हम ऐ महाकाव्यक फोटोकॉपी पूर्वाँचल मिथिलाक रामायण- अखंड- पाठक संस्थाकेँ देलहुँ, तँ ओ लोकनि एकरा देख कऽ आश्चर्यचकित रहि गेलाह आ अगिला साल ऐ रामायणक अखंड पाठक निर्णय कएलन्हि। एकरा मैथिलीक समालोचनाशास्त्रक विफलता मानल जाए, किएक तँ ई महाकाव्य तँ विफल भैये नै सकैत अछि। आचार्यक मनोहरपोथीक चर्चा हम अपन बाल्येवस्थासँ सुनैत रही, मुदा ऐ पोथीक नै। मैथिलीक सभसँ पैघ महाकाव्यक चर्चा मात्र सीतायनपर आबि किए खतम भऽ जाइत अछि। आचार्य श्री रामलोचनशरणक मैथिली श्री रामचरितमानस सभसँ पैघ महाकाव्य अछि ई एकटा तथ्य अछि आ से समालोचनाकार किंवा मैथिली भाषाक इतिहासकार लोकनिक कृपाक वशीभूत नै अछि। अपन ग्रंथक किञ्चित् पूर्ववृत्तम् मे आचार्य लिखैत छथि- मिथिलाभाषायाः मूर्द्धन्या लेखकाः श्रीहरिमोहनझामहोदया निशम्यैतद् वृत्तं परमाह्लादं गता भूयो भूयश्च मामुत्साहितवन्तः। आँगाँ ओ लिखैत छथि-प्राध्यापकस्य श्री सुरेन्द्रझा ‘सुमन’ तथा सम्पादनविभागस्थ पण्डित श्री शिवशंकरझा-महोदयस्य हृदयेनाहं कृतज़्ज्ञोऽस्मि। से सभकेँ ई देखल गुनल सेहो छलन्हि। आचार्य रामलोचन शरणक गीत-प्रबन्ध मैथिली रामचरित मानसक गेयता: आचार्यजीक सुन्दरकाण्डक प्रारंभ देखू आ एकर गेयताक तुलना चन्दा झाक रामायण आ लालदासक रामयणसँ करू:- जामवंत केर वचन सोहाओल। सुनि हनुमंत हृदय अति भाओल॥1॥ ता धारि बाट देखब सहि सूले। खा कय बंधु कंद फल मूले॥2॥ जाधरि आबी सीतहिँ देखी। होयत काज मन हरख विसेखी॥3॥ ई कहि सबहिँ झुकाकय माथे। चलल हरषि हिय धय रघुनाथे॥4॥ सिंधु तीर एक सुंदर भूधर। कौतुक कूदि चढ़ल तेहि ऊपर॥5॥ पुनु पुनि रघुवीरहिँ उर धारी। फनला पवनतनय बल भारी॥6॥ जहि गिरि चरन देथि हनुमंते। से चल जाय पताल तुरंते॥7॥ सर अमोघ रघुपति केर जहिना। चलला हनूमान झट तहिना॥8॥ जलनिधि रघुपति दूत बिचारी। कह मैनाक हौ श्रम भारी॥9॥ तुलसी अकबरक समकालीन छलाह आ हुनकर भाषा आ अखुनका भाषामे किछु अंतर आबि गेल अछि, मुदा तुलसीक गेयता ओहिनाक ओहिना अछि। आचार्यजी तुलसीक गेयता उठओलन्हि अछि, आ दुरूहता खतम कऽ देने छथि। सभ काण्डक शुरूमे देल संस्कृत पद्य ओ तुलसीक मानससँ लेलन्हि अछि। आचार्यजीक ई मैथिली रामचरितमानस तुलसीक मानसक रूपांतर तँ अछि मुदा ई मैथिलीक मूल महाकाव्यक रूपमे परिगणित होयबाक अधिकारी अछि जेना कंबनक तमिल रामायण आ तुलसीक मानस अपन-अपन भाषामे परिगणित कएल जा रहल अछि। कंबन बाल्मीकि रामायणक रूपांतर तमिलमे कऽ रहल छलाह तखन ओ बाल्मीकि रामायणक विषयमे कहलन्हि जे- ई रामायण एकटा दूधक समुद्र अछि आ हम छी एकटा बिलाड़ि जे मनसूबा बना रहल अछि जे ऐ सभटा दूधकेँ एक्के बेरमे पीबि जाइ। ओना ईहो सत्य जे कंबन कहियो (आचार्यजी सेहो एहिना कएलन्हि) रामायण केँ अपन मौलिक कृति नै कहलन्हि वरन बाल्मीकिक कृतिक रूपांतरे कहलन्हि, जखन कि ओ अपन कृतिमे रामकेँ भगवान बना देलन्हि। बाल्मीकि रामकेँ मर्यादा पुरुष मानैत छलाह। बाल्मीकि सुग्रीवक विवाह बालीक पत्नीसँ बालीक मरबाक पश्चात होयबाक वर्णन करैत छथि मुदा कंबन बालीक पत्नीक आजीवन वैधव्यक वर्णन करैत छथि। आचार्यजीकेँ ई करबाक आवश्यकता नै पड़लन्हि किएक तँ लोकक कंठमे तुलसीक मानस बसि गेल छल, आ हुनका एकर गेयताक निर्वाह मात्र करबाक छलन्हि। आचार्य रामलोचन शरणक गीत-प्रबन्ध मैथिली रामचरित मानस आ एकर नारी आ शूद्र-वन्यजाति विरोध प्रदर्शन: आब मानसक एकटा विवादास्पद पद्यक चर्चा करी। अर्थक अनर्थ कोना होइत अछि से देखू। आचार्यजी सुन्दरकाण्डक अंतमे लिखैत छथि जखन सिंधु (समुद्र)रामकेँ लंका जयबाक रस्ता नहि दैत छथि तखन राम कहैत छथि, लछुमन बान सरासन आनू। सोखब बारिधि बिसिख कृसानू॥1॥ तखन सिंधु कर जोरि बजैत छथि- ढोल गमार सुद्र पसु नारी। सब थिक ताड़न केर अधिकारी॥ एकर अर्थ ई जे सभ -ढोल गमार सुद्र पसु नारी- ई सभ शिक्षा किंवा सबक देबा योग्य अछि, गमार सुद्र आ नारीमे शिक्षाक अभाव अछि तेँ आ पसुमे मनुष्यक अपेक्षा बुद्धि नै छैक तेँ, ढोलक प्रयोग बिना शिक्षाक करब तँ संगीत नै ध्वनि भऽ जाएत। फेर समुद्र ओइ स्थितिमे खलनायक बनि रहल छल आ ओकर वक्त्तव्य कविक आकि रचनाकारक वक्त्तव्य नै भऽ सकैत अछि। रचनाकारक रचनामे नीक अधलाह सभ पात्र रहैत छथि, आ ओइ पात्रक मुँहसँ नीक आ अधलाह दुनू गप निकलत। रचनाकारक सफलता ऐपर निर्भर करैत अछि, जे ओ अपनाकेँ अपन पात्रसँ फराक कऽ पबैत अछि आकि नै। मुदा तुलसी आ तेँ आचार्य रामलोचन शरण सेहो अपनाकेँ पात्रसँ बहुत ठाम फराक नै कऽ पबै छथि। जखन भारतमे सामन्तवादी सरकार छल तखन हुनकर शूद्र आ गएर द्विज जातिपर कएल टिप्पणी अनावश्यक बुझि पड़ैए। मिथिलाक स्मृतिकार लोकनि यएह परम्परा बादोमे रखलन्हि आ आश्चर्य तँ तखन होइए जखन ऐ तरहक गएर जरूरी टिप्पणी अंग्रेजी शासनकालमे प्रणीत संस्कृत ग्रन्थ सभमे मैथिल लोकनि द्वारा कएल देखै छी, ओइ अंग्रेजी शासनमे मे ब्राह्मण आ गएर ब्राह्मण सभकेँ ब्लैक इण्डियन कहै छलाह। तुलसीक प्रासंगिकता वा कट्टरता नै वरण मात्र ओकर दुरूहताकेँ आचार्य खतम कएने छथि। उपरोक्त विवादास्पद पदक अतिरिक्त आनोठाम ई जातिवादिता देखबामे अबैत अछि। मैथिली रामचरित मानस अयोध्याकाण्डक दोहा १२ क बादक तेसर पद देखू:- करय बिचार कुबुद्धि कुजाती। हैत अकाज कोन बिधि राती॥३॥ मैथिली रामचरित मानस अयोध्याकाण्डक दोहा ५९ क बादक पहिल पद देखू:- कोल किरात सुता बन जोगे। विधि रचलनि बंचित सुख भोगे॥१॥ मैथिली रामचरित मानस अयोध्याकाण्डक दोहा १६१ क बादक चारिम पद देखू:- विधियो सकथि न तिय हिय जानी। सकल कपट अघ अबगुन खानी॥४॥ (स्त्रीक हृदैक गति विधातो नै बुझि सकै छथि, ई कपट, पाप आ अवगुणसँ उगडुम अछि!!) मैथिली रामचरित मानस अयोध्याकाण्डक दोहा १९३ क बादक तेसर पद देखू:- लोकवेद सबतरि जे नीचे। छुबि जसु छाह लैछ जल सीचेँ॥३॥ तुलसी आ तेँ आचार्य रामलोचन शरण सेहो अपनाकेँ पात्रसँ बहुत ठाम फराक नै कऽ पबै छथि (कम्बन वाल्मीकिक अनुवाद करैत काल बहुत ठाम नव युगक अनुरूक अपनाकेँ फराक करैत छथि) आ तेँ मैथिली रामचरित मानस अयोध्याकाण्डक दोहा २५० क बादक तेसर पदमे वन्यजातिक मुँहसँ कहबै छथि:- यैह हमर अछि बुझु बड़ सेबे। बासन बसन चोराय न लेबे॥३॥ मैथिली रामचरित मानस बालकाण्डक दोहा ६२ क बादक सातम पद देखू:- जद्यपि जग दारुण दुख नाना। सब सौँ कठिन जाति अपमाना॥७॥ मुदा जखन बीसम शताब्दीमे साहित्य अकादेमीक पोथीमे लोरिकपर मैथिली आलेखमे एकटा सज्जन लिखै छथि जे ब्राह्मणपर कएल शूद्रक अत्याचारक विरुद्ध लोरिक ठाढ़ भेलाह तँ अकबरकालीन तुलसी आ ओकर छन्दोबद्ध अनुवादक आचार्य रामलोचन शरणकेँ की दोष देल जाए! जेना विष्णु शर्मा पंचतंत्रक कथा कहैत-कहैत स्त्री आ शूद्रक पाछाँ अकारण क्रूर भऽ जाइ छथि सएह हाल राम चरित मानसक अछि। आचार्य रामलोचन शरणक गीत-प्रबन्ध मैथिली रामचरित मानसक विशेषता: मैथिली रामचरित मानस बालकाण्ड, अयोध्याकाण्ड, अरण्य़काण्ड, किष्किन्धाकाण्ड, सुन्दरकाण्ड, लंकाकाण्ड आ उत्तरकाण्डमे विभक्त अछि। वाल्मीकि रामायणक सुनियोजित कथ्यमे किछु हेरफेर कएल गेल अछि। एकर शैली आ चरित्रक अंकन उदात्त अछि। श्रृंगार रसक प्राधान्य नै अछि मुदा राम सीताक सन्दर्भमे वियोग आ संयोग दुनू कालमे एकर प्रयोग भेल अछि। मुख्य अंगी रस अछि शान्ति, ओना ई सभटा रामभक्तिमे समाहित अछि। भक्तिक प्रधानता अछि मुदा ज्ञान आ कर्मक महत्व कम नै कएल गेल अछि, सगुणक प्राधान्य रहितहुँ निर्गुण भक्तिक महत्व कम नै भेल अछि, राम ब्रह्म छथि आ हुनकर निर्गुण आ सगुण दू रूप छन्हि। जीव आ ब्रह्म एकहि अछि। वचनक पालन हुअए वा पितृभक्ति, भ्रातृभक्ति वा नारीक प्रेम वा पतिव्रतक मैथिली रामचरित मानस ऐ सभ आदर्शसँ ओतप्रोत अछि। मैथिली रामचरित मानसमे सभ अलंकार प्रयोगमे अछि मुदा मुख्य रूपेँ रूपक आ उपमा प्रयोगमे अछि। प्रेमाख्यानमे प्रयुक्त दोहा आ चौपाइ आधारित प्रबन्ध पद्धतिक कड़वक विधिक प्रयोगक बादो संस्कृत छन्द सभ प्रयुक्त भेल अछि। मैथिली रामचरित मानसमे विद्यापतिक गीत-विधि, वीरगाथा सभक छप्पय विधि, दोहा, सोरठा, भाट सभक कवित्त-सवैया, नीतिवाक्यक सूक्ति, घनाक्षरी, तोमर, त्रिभंगी छन्दक प्रयोग भेल अछि। मनुक्खक बहुत रास टोटमाक सेहो वर्णन यत्र-तत्र भेल अछि। एकर उद्देश्य अछि मोक्ष, लोककल्याण आ रामरायक स्थापना। मुदा ऐमे रामक अतिरिक्त कृष्ण, शिव (सेतुबन्ध कालमे राम द्वारा शिवक पूजा) आ गणेशक स्तुति अछि। प्रकृति आ चरित्र दुनूक चित्रणमे मैथिली रामचरितमानस अद्वितीय अछि। कवि खिस्सा कहि रहल छथि मुदा बीच-बीचमे ई भारद्वाज-याज्ञवल्क्य आ गरुड़ काकभशुण्डीक सम्वादक माध्यमसँ सेहो कहल गेल अछि। सम्वाद शैलीक प्रयोग मैथिली रामचरितमानसमे खूब भेल अछि। लक्ष्मण-परशुराम सम्वाद हुअए वा मंथरा आ कैकेयीक सम्वाद आकि रावण आ अंगदक सम्वाद, सभ ठाम नाटकक सम्वाद शैली सन रोचक पद्य अहाँकेँ भेटत। प्रारम्भक बालकाण्ड आ अन्तक उत्तरकाण्डमे ऐ गीत-प्रबन्धक दूटा ध्रुव दृष्टिमे आएत। उत्तरकाण्डमे गुरु-शिष्यक खराप होइत सम्बन्ध आ ब्राह्मणक वेद बेचबाक आ पतित हेबाक चर्चा भेटैत अछि मुदा उत्तरकाण्डमे रामराज्यक रूपरेसेहो सेहो भेटैत अछि। मैथिली साहित्यक गीत-प्रबन्ध मध्य मैथिली रामचरितमानसक स्थान: मैथिली वा कोनो भाषामे रामक चरित वाल्मीकि रामायणसँ प्रभावित भेने बिना नै रहि सकैए। आचार्य रामलोचन शरणक तुलसीक मानसक समश्लोकी मैथिली अनुवाद ओइ अर्थेँ आर विशिष्ट भऽ जाइत अछि जे आचार्य रामलोचनशरण खाँटी मैथिली तत्वक कतौ अवहेलना नै केने छथि आ ई गीत-प्रबन्ध मैथिलीक अखन धरिक आकारमे (आ गुणात्मक रूपेँ सेहो) मैथिलीक सभसँ पैघ गीत-प्रबन्ध (महाकाव्य) अछि। अंशुमालाक सहायता करू: १.अंशुमालाक ब्लड ग्रुप छन्हि AB+, ओना जँ अहाँक ब्लड ग्रुप दोसरो अछि तँ अहाँ हुनका लेल रक्तदान कऽ सकै छी, अहाँक रक्तक बदलामे हुनका हॉस्पीटल AB+ रक्त दऽ देतन्हि। संयोगसँ हमरो रक्त AB+ छल आ जखन हम ब्लड डोनेट कऽ आइ.जी.आइ.एम.एस.सँ घुरि रहल छलौं तँ अंशुमालाक पितासँ ई सुनि आश्चर्य भेल जे मैथिलीसँ जुड़ल क्यो गोटे (अजित आजाद आ कमल मोहन चुन्नकेँ छोड़िू) नै तँ हुनका सभक कोनो खोज खबरि लेने छलखिन्ह आ जे संस्था सभ मंगनीमे मैथिलीक नामपर हुनका बच्चीसँ बच्चेसँ मंचपर गीत गबबै छल ओ सभ एकटा ज्ञापन वा बयान तक जारी नै केलन्ह अछि। रक्तदान लेल सम्पर्क करू हुनकर पितासँ -ISHWRANAND JHA (मो. 09835492214, 09905326400) २.अंशुमालाक एकाउन्टमे सेहो अपन आस्था अनुसार अहाँ पाइ जमा कऽ सकै छियन्हि, बच्चाक मैगी आ चिप्स आ अहाँक प्रतिदिनक पॉकेट खर्चसँ ई पाइ बहार भऽ सकैत अछि। हुनकर एकाउन्टक विवरण अछि: Name– ANSHU MALA, Bank – State Bank of India, SBI Account Number - 30356321958 Branch – D.U, New Delhi IFSC code - SBIN0010433 फेसबुकपर विनीत उत्पल सेहो अंशुमालाक सहायता लेल ग्रुप बनेने छथि, ओतए अंशुक स्थितिक विषयमे जानकारी अपडेट कएल जा रहल अछि: ग्रुप ज्वाइन करू- http://www.facebook.com/home.php?sk=group_208980722479513 ३.बिहार सरकार अंशुमालाक सहायता करबाक घोषणा केने अछि, मुदा सरकारी प्रक्रियामे कतेक झमेला होइ छै से सभकेँ बुझले हएत। बिहार सरकारक स्वास्थ्य विभागमे जे कियो छथि से प्रक्रियाक अन्तर्गत काजमे तीव्रता अनबामे मदति करथि से आग्रह। हमर जे व्यक्तिगत जान-पहिचान अछि हुनका सभसँ हम सम्पर्क साधने छी, अहाँ सभ सेहो ध्यानमे ई गप राखि आगाँ आउ। सूचना: १. कैथी आ मिथिलाक्षर दुनू लिपिकेँ यूनीवर्सल कैरेक्टर सेट (यूनीकोड) मे एनकोड करबाक अंशुमन पाण्डेय द्वारा देल आवेदन स्वीकृत भಽ गेल अछि। आब ई दुनू लिपिक यूनीकोड फॉन्ट बनेबाक क्रिया क्यूमे लागि गेल अछि आ जखन एकर सभक बेर एतै ऐ दुनू लिपिक आधारभूत फॉन्ट बनेबाक क्रिया शुरू भऽ जाएत। मिथिलाक्षरक आधारभूत फॉन्टक नाम तिरहुता रहत (जेना देवनागरीक आधारभूत फॉन्टक नाम मंगल आ बांग्लाक आधारभूत फॉन्टक नाम वृन्दा अछि)। मिथिलाक्षरक फॉन्ट लेल तेसर बेर संशोधित आवेदन देल गेल रहए, दोसर आ तेसर आवेदनमे विदेहक योगदानक विस्तृत चर्चा भेल अछि, यथा- [Figure 11: Excerpt from a Maithili e-journal published as PDF (from Videha 2011: 22; Videha: A fortnightly Maithili e-journal. Issue 80 (April 15, 2011), Gajendra Thakur [ed]. http://www.videha.co.in/ ."Gajendra Thakur of New Delhi graciously met with me and corresponded at length about Maithili, offered valuable specimens of Maithili manuscripts, printed books, and other records, and provided feedback regarding requirements for the encoding of Maithili in the UCS."-Anshuman Pandey.] । सूचना: २. गूगल मैथिली: गूगल लैंगुएज टूल- http://www.google.com/transconsole/giyl/chooseProject अपन योगदान गूगल ट्रांसलेट लेल करू, आ कएल सम्पादन बदलबा काल कारण मे (अंग्रेजीमे) "बिहारी" नाम्ना कोनो भाषा नै हेबाक चर्चा करू। ऐ लिंकपर अनुवाद करू; गूगल एकाउंट सँ लॉग इन केलाक बाद । http://www.google.com/transconsole/giyl/chooseActivity?project=gws&langcode=bh ऐ लिंक http://www.google.co.in/language_tools?hl=en केँ मैथिलीक उपलब्धता लेल चेक करैत रहू। सूचना: ३.विकीपीडिया मैथिली: मीडियाविकीक २६०० संदेश अंग्रेजीसँ मैथिलीमे विदेहक सदस्यगण द्वारा अनूदित कऽ देल गेल अछि। आब http://translatewiki.net/wiki/Special:Translate?task=untranslated&group=core-mostused&limit=2000&language=mai ऐ लिंकपर Group मे जा कऽ ड्रॉपडाउन मेनूसँ अ-अनूदित मैसेज अनूदित करू। जँ अहाँ विकीपीडियाक ट्रान्सलेटर नै छी तँ http://translatewiki.net/wiki/Project:Translator ऐ लिंकपर मैथिलीमे ट्रान्सलेट करबाक अनुमतिक लेल अनुरोध दियौ, ऐ सँ पहिने ओतै ऊपरमे दहिना कात लॉग-इन (जँ खाता नै अछि तँ क्रिएट अकाउन्ट) कऽ आ प्रेफरेन्समे भाषा मैथिली लऽ अपन प्रयोक्ता खाताक लिंककेँ क्लिक कऽ अपन प्रयोक्ता खात पन्ना बनाउ। किछु कालमे अहाँकेँ ट्रान्सलेट करबाक अनुमति भेट जाएत। तकरा बाद अनुवाद प्रारम्भ करू। विदेहक तेसर अंक (१ फरबरी २००८)मे हम सूचित केने रही- “विकीपीडियापर मैथिलीपर लेख तँ छल मुदा मैथिलीमे लेख नहि छल,कारण मैथिलीक विकीपीडियाकेँ स्वीकृति नहि भेटल छल। हम बहुत दिनसँ एहिमे लागल रही आ सूचित करैत हर्षित छी जे २७.०१.२००८ केँ (मैथिली) भाषाकेँ विकी शुरू करबाक हेतु स्वीकृति भेटल छैक, मुदा एहि हेतु कमसँ कम पाँच गोटे, विभिन्न जगहसँ एकर एडिटरक रूपमे नियमित रूपेँ कार्य करथि तखने योजनाकेँ पूर्ण स्वीकृति भेटतैक।” आ आब जखन तीन सालसँ बेशी बीति गेल अछि आ मैथिली विकीपीडिया लेल प्रारम्भिक सभटा आवश्यकता पूर्ण कऽ लेल गेल अछि विकीपीडियाक “लैंगुएज कमेटी” आब बुझि गेल अछि जे मैथिली “बिहारी नामसँ बुझल जाएबला” भाषा नै अछि आ ऐ लेल अलग विकीपीडियाक जरूरत अछि। विकीपीडियाक गेरार्ड एम. लिखै छथि ( http://ultimategerardm.blogspot.com/2011/05/bihari-wikipedia-is-actually-written-in.html ) -“ई सूचना मैथिली आ मैथिलीक बिहारी भाषासमूहसँ सम्बन्धक विषयमे उमेश मंडल द्वारा देल गेल अछि- उमेश विकीपीडियापर मैथिलीक स्थानीयकरणक परियोजनामे काज कऽ रहल छथि, ...लैंगुएज कमेटी ई बुझबाक प्रयास कऽ रहल अछि जे की मैथिलीक स्थान बिहारी भाषा समूहक अन्तर्गत राखल जा सकैए ?..मुदा आब उमेश जीक उत्तरसँ पूर्ण स्पष्ट भऽ गेल अछि जे “नै”। ” रामविलास शर्माक लेख (मैथिली और हिन्दी, हिन्दी मासिक पाटल, सम्पादक रामदयाल पांडेय) जइमे मैथिलीकेँ हिन्दीक बोली बनेबाक प्रयास भेल छलै तकर विरोध यात्रीजी अपन हिन्दी लेख द्वारा केने छलाह , जखन हुनकर उमेर ४३ बर्ख छलन्हि (आर्यावर्त १४/ २१ फरबरी १९५४), जकर राजमोहन झा द्वारा कएल मैथिली अनुवाद आरम्भक दोसर अंकमे छपल छल। उमेश मंडलक ई सफल प्रयास ऐ अर्थेँ आर विशिष्टता प्राप्त केने अछि कारण हुनकर उमेर अखन मात्र ३० बर्ख छन्हि। जखन मैथिल सभ हैदराबाद, बंगलोर आ सिएटल धरि कम्प्यूटर साइंसक क्षेत्रमे रहि काज कऽ रहल छथि, ई विरोध वा करेक्शन हुनका लोकनि द्वारा नै वरन मिथिलाक सुदूर क्षेत्रमे रहनिहार ऐ मैथिली प्रेमी युवा द्वारा भेल से की देखबैत अछि? उमेश मंडल मिथिलाक सभ जाति आ धर्मक लोकक कण्ठक गीतकेँ फील्डवर्क द्वारा ऑडियो आ वीडियोमे डिजिटलाइज सेहो कएने छथि जे विदेह आर्काइवमे उपलब्ध अछि। नीचाँक पाँचू साइट विकी मैथिली प्रोजेक्टक अछि, प्रोजेक्टकेँ आगाँ बढ़ाऊ। http://translatewiki.net/wiki/Project:Translator
http://meta.wikimedia.org/wiki/Requests_for_new_languages/Wikipedia_Maithili
http://translatewiki.net/wiki/Special:Translate?task=untranslated&group=core-mostused&limit=2000&language=mai
http://incubator.wikimedia.org/wiki/Wp/mai
http://translatewiki.net/wiki/MediaWiki:Mainpage/mai सूचना:४ :: विदेह द्वारा आयोजित पहिल "समानांतर साहित्य अकादेमी" मैथिली कवि सम्मेलन २०११- निर्मली (जिला सुपौल):- साहित्य अकादेमी द्वारा आयोजित कोलकाता मैथिली कवि सम्मेलन मे २१म शाताब्दीक पहिल दशकक सर्वश्रेष्ठ मैथिली कविता संग्रह "अम्बरा"क लेखक राजदेव मंडल आन श्रष्ठ कविकें नै बजाओल गेल आ ने हुनका लोकनिकेँ कोनो सूचना देल गेल। साहित्य अकादेमीक प्रवेश निषेधक ऐ कृत्यक सुधार लेल विदेह द्वारा पहिल "समानांतर साहित्य अकादेमी" मैथिली कवि सम्मेलन २०११" दिनांक ०९ जुलाइ २०११ केँ निर्मली (जिला सुपौल) मे आयोजित कएल जा रहल अछि, समए: ४.१५ (अपराह्न): स्थान असर्फी दास साहू समाज महिला महाविद्यालय परिसर (निर्मली- जिला सुपौल वार्ड नम्बर ७); सम्पर्क-श्री उमश मंडल-०९९३१६५४७४२। ऐ मे ककरो प्रवेष निषेध नै कएल जाएत। साहित्य अकादेमीक प्रवेश निषेधक ऐ कृत्यक सुधार लेल ई कार्यक्रम छै विरोध लेल नै..हमर प्रायोरिटी दिल्लीसँ बेसी मिथिला (भारत+नेपाल) अछि जतए मैथिलीक नेटिव स्पीकर रहै छथि। ई कार्यक्रम मैथिली नाटक आ रंगमंचमे सेहो मिथिला क्षेत्रमे शुरु हएत, आ मात्र साहित्य अकादेमीक गलतीक सुधार लेल नै वरन मैथिली नाटक आ रंगमंचमे शामिल तथाकथित मैथिली रंगमंचीय संस्था/ विद्यापति समिति / चेतना समिति/ मैथिल ब्राह्मण सभा, रहिका आदि सभक सुधार लेल सेहो कएल जाएत। कवि-सम्मेलन तँ मात्र शुरुआत अछि..मैथिली सिनेमा बनेबामे जतेक लोक अपस्याँत छथि ओइसँ कम खर्चामे तेलुगु/ हिन्दी/ तमिलक हिट फिल्म मैथिलीमे डब क' सकै छी, सीरियल/ कार्टून सभ मैथिलीमे डब क' सकै छी, भोजपुरीकेँ देखियौ जे भोजपुरी थानामे दरोगा बजैए सएह ओकर सिनेमाक हीरो सेहो बजैए, ... मुदा मैथिलीक फिल्म आ धारावाहिकमे किदनि मैथिली बाजल जाइए.. कवि-सम्मेलन आ रंगमंच/ नाटकक बादक स्टेज मैथिली फिल्म/ धारावाहिक आ कार्टूनक हएत.. ( विदेह ई पत्रिकाकेँ ५ जुलाइ २००४ सँ एखन धरि ११२ देशक १,८५२ ठामसँ ६२,७३० गोटे द्वारा विभिन्न आइ.एस.पी. सँ ३,०९,४४८ बेर देखल गेल अछि; धन्यवाद पाठकगण। - गूगल एनेलेटिक्स डेटा। ) गजेन्द्र ठाकुर ggajendra@videha.com http://www.maithililekhaksangh.com/2010/07/blog-post_3709.html २. गद्य २.१.मानेश्वर मनुज- मैथिल दृष्टिक प्रसंग मुम्बइसँ एक चिट्ठी/ बुच्ची दाइक निलामी कोना से देखू २.२.जगदीश प्रसाद मण्डल- कथा- बिहरन २.३.किशन कारीगर- मैथिली सीखू- (एकटा हास्य कथा) २.४.जगदीश प्रसाद मण्डल- नाटक २.५.बिपिन झा- कलौ चण्डी महेश्वरौ २.६.राजदेव मण्डल- उपन्यास- हमर टोल -आगाँ २.७.सुमित आनन्द- रिपोर्ट (कार्यशालाक आयोजन) मानेश्वर मनुज- मैथिल दृष्टिक प्रसंग मुम्बइसँ एक चिट्ठी/ बुच्ची दाइक निलामी कोना से देखू १ मुम्बइ ०६ जून २०११-०६-३० आदरणीय भाइ, हमरा पत्रकेँ सम्पादक लोकनि मिथिले-मिहिर टाइमसँ चर्चाक विशय बनबैत रहलन्हि अछि। सोमदेव कहैत छलथि जे पत्र-लेखकक रूपमे मितिला-मिहिरमे अहाँ चर्चित छलहुँ। कतेको सम्पादक हमरा आलेखकेँ पत्रक रूपमे छापि देने छथि आ कतेको एकरा सम्पादकीय बना देने छथि। मुक्तिबोध कविता छोड़ि की डायरी लिखऽ लागल छलथि। हम अप्पन दू-टूक बात बहुतो विद्वान् आ लेखककेँ पत्रसँ आकि फोनपर कहि चुकल छियनि। स्वार्थवश ओ लोकनि ओइपर ध्यान नै दैत छथिन। समीक्षक ओ आलोचककेँ लेखक आ कविक पहचान नै छनि, इतिहासकार लोकनि आलोचक आ समीक्षकक विषय किछु नै जनैत छथि। सभतरि मैथिलीक नामपर निजी स्वार्थ-साधना भऽ रहल अछि। दोसर दिस भाषा-वैज्ञानिक लोकनि डंकाक चोटपर कहि रहल छथि जे किछुये भाषा छोड़ि सभ भाषा मरि जाएत। भाषा मरि जाएत तँ के रोकतैक मुदा साहित्य तँ आनो भाषामे रूपान्तरित भऽ जीबि सकैत अछि। मुदा सभ विधाक विकासक दिशामे कहाँ कतौ निःस्वार्थ प्रयास भऽ रहल अछि। पत्र सेहो साहित्यक एक विधा अछि जे मरल जा रहल अछि। अहींक मानेश्वर मनुज २ मैथिल दृष्टिक प्रसंग मुम्बइसँ एक चिट्ठी जीवकान्त सभ दिन क्षेत्रीयताक पृष्ठ पोषक रहलथि अछि। ओ अप्पन वार्तामे सभ दिन कहैत रहलथि अछि जे जे शक्ति झंझारपुरक माटिमे छैक ओ बेनीपट्टीक माटिमे कतऽ सँ अओतैक आ राजनगरोमे कतऽसँ अओतैक। दोसर दिस ओ हरदम गाम आ शहरक बात करैत रहैत छथि। ओ गामक लेखक छथि। आ बहुतो गोटे शहरक लेखक छथि। हाइ स्कूलसँ बढ़ि कऽ कोनो स्कूल नै होइत छैक तकर ओ अध्यापक छलथि। पढ़बैत तँ विज्ञान छलथि मुदा ओ बी.ए.पास छथि। यानी कलाक ग्रेज्युएट छथि। ओ हाइ स्कूलक पाठ्यपुस्तक यथा अर्थशास्त्र, नागरिकशास्त्र, इतिहास, भूगोल, जीव विज्ञान आ गृह विज्ञानपर जरूर नजरि देने हेताह। ई सभ विषय एक संग बैस कऽ पढ़ि लेलाक बाद मोनक बहुत रास अन्हार हटि जाइत छैक। शहरीकरण आधुनिक सभ्यताक परिणति अछि। जाइ देशक जतेक अधिक लोक शहरमे आबि बसि गेल अछि ओ ओतेक सभ्य कहबैत अछि। विकसित देशमे बीज आ खाद हेलीकोप्टरसँ छीटल जाइत अछि। जोताइ आ कटाइ अत्याधुनिक मशीनसँ होइत अछि। समुन्नत गाँवकेँ शहर कहैत छैक आर शहर आ गाममे किछु अन्तर नै होइत अछि। शहरमे पाँच-पाँच एकड़ जमीनमे एकटा अस्पताल बनल रहैत अछि, दू-तीन एकड़क पार्क रहैत अछि, चौड़ा-चौड़ा सड़क रहैत अछि, नमहर-नमहर वाकिंग-स्पेस रहैत अछि, पैघ-पैघ लिफ्ट मल्टी-स्टोरी बिल्डिंगमे रहैत अछि। मुदा रहबाक लेल छोट-छोट रूम रहैत अछि। मुम्बइ महानगरमे दुपहरियाक समय जे जे होस्पीटलक अगल-बगलमे घुमि कऽ देखियौ- कतेक पिपरक गाछ आ कतेक बड़क गाछक निच्चामे कंगाल सभ बैसल छैक। जइ जगहपर एक रूमक दाम बीस लाखसँ कम नै ओतऽ भिखमंगो गुजर-बसर कऽ रहल छैक। कफ-परेड सन महग एरियामे बिल्डिंग- दोगा-दोगी- मजदूर वर्ग सेहो गुजर कऽ रहल छैक। झोपडपट्टी सभ- सरकारी जमीनक अनाधिकार अधिग्रहण छैक मुदा ओकरा केओ हटा नै पबैत छैक। मुम्बइ महानगरमे कमसँ कम एक लाख स्त्री-पुरुष- बीच शहरमे बनल रेल-लाइनपर खुलेआम मल्ल त्याग करैत रहैत अछि। भोर पाँच बजे जे लोकल ट्रेनसँ यात्रा करी तँ ई दृश्य देखल जा सकैत अछि। जे कोनो स्त्री-पुरुष नै देखने होथि ओ लाख-लाख स्त्री-पुरुषक अंग दर्शन कऽ सकैत छथि। दोसर दिस ओतुक्का जेवन-यापनमे एतेक भागम-दौड़ छैक जे प्रति दिन रेल आ अन्य दुर्घटनामे करीब पचास आदमी मरि जाइत अछि आ ओकर कतौ ओतबो चर्च-बर्च नै होइत छैक जतेक चर्च कतौ छागर वा मुर्गीकेँ कटलाक बाद होइत छैक। शहरमे बिल्डर सभ जमीन्दार भऽ गेल अछि, पैघ व्यापारी सभ जमीनदार भऽ गेल अछि। पैघ नेता आ पदाधिकारी सभ घोटाला कऽ आकि घुसखोरी कऽ जमीन्दार भऽ गेल अछि। ओ सभ समृद्ध (एफलुएन्ट) अछि। ओ सभ शहरक भोग कऽ रहल अछि। बाँकी सभ तँ शहरोमे गामेक दैन्य जीवन जी रहल अछि। दृष्टिक संकीर्णता यात्रासँ समाप्त होइत छैक। योगी लोकनिक दृष्टि विशाल होइत छनि कारण ओ सभ एक ठाम नै रहैत छथि, घुमैत-फिरैत रहैत छथि। कबीर पढ़ल-लिखल नै रहथि मुदा घुमैत-फिरैत रहथि। ओ अप्पन गुरु कतौ अगल-बगलमे नै तकलथि। ओ अप्पन गुरु आधुनिक महाराष्ट्रमे आबि तकलथि। रामकेँ कोन प्रयोजन छलनि जनकपुर अएबाक। कर्णकेँ भागलपुर (आधुनिक) केँ छोड़ि गुजरात जेबाक कोन प्रयोजन छलनि। कालिदास उच्चैठ की करऽ एलथि (लोक कथा आधार)। राजनेता लोकनि घुमैत-फिरैत लोक सभसँ बातचीत करैत लोकक दर्शन करैत अप्पन दृष्टि विकसित कऽ लैत छथि। यात्रीक दृष्टिमे आकि राजकमलक दृष्टिमे जे विस्तार छलन्हि ओ हुनका लोकनिक घुमकड़ी स्वभावक कारणेँ। आइ गौरीनाथ गाम घरसँ दूर दिल्ली महानगरमे पत्रकारिता क्षेत्रमे अप्पन स्थान बना लेलन्हि अछि एकर कारण की अछि? ओ मैथिलीक अलावे हिन्दीक अत्यधिक रचनाकारसँ सम्पर्क बना लेलन्हि अछि। बेनीपट्टीमे कहियो पाँच सौ आदमी एक दरखास्तपर दस्तखत कऽ कलक्टरक जनता दरबारमे नै देने हेतैक मुदा पाँच सौ डीलर अप्पन पक्ष लऽ जनता विरोधी पेटीशन दऽ दैत छैक। दिल्लीमे जे नै रहैत छथि आकि विश्व पुस्तक मेलामे नै जाइत छथि ओ की जानि सकैत छथि जे कतेक प्रकाशक एक ठाम जुटि सकैत अछि। एहन व्यवस्था छैक जे सभ क्षेत्रक कार्यकर्ता आकि नेता आकि साहित्यकार देशक आ विदेशक भ्रमण करथि। एक दोसरासँ हिलथि-मिलथि, मित्रता स्थापित करथि आ बात ओ विचारक आदान-प्रदान करथि। की कहियो मैथिलीक कोनो पत्रकारकेँ आकि लेखककेँ एहन अवसर भेटलन्हि अछि फेर दृष्टिमे विकास कोना हेतन्हि। जीवकान्तजी कहैत छथि जे हमर संस्कृति बाहर नै जाइत अछि। हमर पुस्तक बाहर नै पढ़ल जा रहल अछि। अंग्रेजीक पत्र जे एक दिनक लेल छपैत छैक एक-एक शब्दपर विचार कएल जाइत छैक, दस-दस बेर प्रुफ देखल जाइत छैक मुदा मैथिलीक पत्र-पत्रिका की पुस्तको बिना प्रुफ देखने निकलि जाइत अछि। तँ की चाहैत छी जे ई अन्यत्र पढ़ल जाएत? सरकारक अंग विधायिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका आ राष्ट्रपति अछि। सभक ऊपर राष्ट्रपति अछि जे मात्र एक व्यक्ति अछि। एक-एक व्यक्ति एक राष्ट्र अछि। ऐ आशयसँ साहित्यसँ समाज कहिया ने हटि गेल अछि। मुदा हमरा लोकनि स्कुलिये विद्यार्थी जकाँ तोता-रटन्त कऽ रहल छी- साहित्य समाजक दर्पण होइत अछि। एक यात्रीजी भेट गेला कि सभ हुनके नाङरि पकड़ि पार उतरऽ लागब। स्वयं अपना आपकेँ एक व्यक्तिक रूपमे स्थापित करक कोशिस नै करब। एक अस्त्र बनैत अछि दोसर अस्त्रकेँ निरस्त कऽ देबक हेतु। एक कविता लिखाइत अछि ओइसँ पूर्वक कविताकेँ खारिज कऽ देबक हेतु। एक लेखक जन्म लैत छथि पूर्वक लेखककेँ खारिज कऽ देबक हेतु। एक संग्रह छपैत अछि पूर्वक संग्रहकेँ काटि देबक हेतु। ई स्पर्धा एक-दोसराक धारकेँ देखबाक हेतु व्याकुल करैत छैक। कतौ भोथ हाँसू पड़ल छैक लोक किएक देखत। रवीन्द्रनाथकेँ चिन्ता छलनि जे आइसँ सौ साले बाद कोन कवि जनताक मनोरंजन कराओत। मुदा प्रगतिवादी लेखक मनोरंजनसँ अपन आयकेँ फराक रखैत छथि। कतौ एतेक कल्पना भऽ जाइत अछि जे सत्यक कतौ कोनो स्थाने नै रहि जाइत अछि। कतौ एतेक सत्य/ यथार्थ आबि जाइत अछि कि ओ कथा सत्य-कथा यानी अपराध कथा बनि जाइत अछि। आ परिणाम एहन बिन्दुपर नै चलि जाइक जे उत्तेजनाक संचार होइक। कठिनतम विषयकेँ कलाक माध्यमसँ कहल जाइत छैक। राजमोहन झाक “प्रत्यावर्तन” कथामे पति-पत्नी होटलमे जा एक राति प्रेमी-प्रेमिकाक सुख भोगैत छथि आ जखन घर अबैत छथि तँ पत्नीसँ कहैत छथि जे – आ होटलक रूम लेल जे बीस रुपैया खर्च भऽ गेल ओकर मेक-अप कोना करब? स्वतन्त्रता कथिक लेल होइत छैक- व्यक्तिक सुखक लेल। अपना ओतेक कहब छैक- सुखमे सघौर, अहाँ तँ हमर सुख आ सौख दुनू मारि देलौं, दियरकेँ कहैत छैक छिनरा आ जाउतकेँ खेलड़ा! कलकत्तामे दुर्गापूजाक समय युवक आ युवती स्वतन्त्र भऽ जाइत अछि। जतऽ घुमी जतऽ फिरी। तहिना मुम्बइमे गणेश पूजामे दीआबातीमे पश्चिम भारतमे आ पश्चिम उत्तर भारतमे चान पृथ्वीपर आबि जाइत अछि। गुजराती समाज एक अति समृद्ध समाज अछि। नवरात्रामे डांडिया मुम्बइ, बड़ोदा, सूरत, अहमदाबाद आ आन सभ छोट आ पैघ जगहपर खेलल जाइत अछि। तकर बाद लाइन लागि जाइत अछि गर्भपात केन्द्र सभमे। बंगालमे कहल जाइत छैक जे विवाहसँ पूर्व सात घर देखी आ ओइमे सँ एक चुनि ली। आर बहुत बात अछि जे बंगालक ओपेन फैक्टक रूपमे जानल जाइत अछि जकरा साहित्यकार प्रेमक रूपमे रूपान्तर केने छथि। दक्षिणे मातुली कन्या अपन विस्तार पश्चिम तक लऽ लेने छथि। शिवभक्तिक अर्थमे मिथिला तमिलनाडु आ केरलसँ मिलैत अछि। माछ आ भोजनक अर्थमे मिथिला, बंगाल, उड़ीसा आ केरलसँ मिलैत अछि। वेश-भूषा आ शरीरक आकृतिक अर्थमे मिथिला गुजरातसँ मिलैत अछि। धार्मिक रीति-रेवाज इत्यादिक अर्थमे मिथिला उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान, महाराष्ट्र आ गुजरातसँ मिलैत अछि। आर्थिक दृष्टिसँ ई क्षेत्र सम्पूर्ण देशमे सभसँ पछुआएल अछि। कहैत छैक जे जतऽ दर्शन हेतैक ओतऽ मैनेजमेन्ट हेबे करतैक। जतऽ वैज्ञानिक हेतैक ओतऽ फैक्ट्री हेबे करतैक। जतऽ दवाइक फर्मूला हेतैक ओतऽ दवाइ बनबे करतैक। आइ कोन कारणसँ जाइ भोगेन्द्र झाक बड़हा गाममे सैकड़ों इन्जीनियर, ओइ गाममे एक रस्ता नै। आइ कोन कारण अछि जे जइ स्कूलक अध्यापक जीवकान्तजी ओ स्कूल सभसँ खराप। आइ किएक देशक सभ विश्वविद्यालयसँ पाछाँ मिथिला विश्वविद्यालय आ सभ अस्पतालसँ खराप दरभंगा अस्पताल। एहना स्थितिमे अपनामे सुधार नै आनि हमरा लोकनि मैथिल दृष्टि आ मैथिल दर्शनक बात करैत छी। मिथिलाक पंडित शिक्षक, भनसीया, योगी आ दरबान करीब-करीब अंग्रेजक समयेसँ बंगाल, असाम, राजस्थान आ गुजरात तक पसरल छल। ई क्रम चलिते रहल। हालक वर्षमे राज्यसँ बाहर रोजगारक गति किछु बेसी जोर पकड़लक अछि। नेवीमे देखू, एयर फोर्समे देखू, आर्मीमे देखू, विभिन्न आइ.आइ.टी. मे देखू, बैंकिंग सेवामे देखू, रेल-सेवामे देखू, स्वास्थ्य-विभागमे देखू। एक-एक ठाम बिहारक लोकक प्रतिशत निनानवे प्रतिशत तक पहुँच चुकल अछि। सभ राज्य चिन्तामे अछि जे कोन रस्तासँ दोसर ठामक लोककेँ ओतऽ रोजगार पयबासँ वंचित कएल जाए। जातीयताक बन्धन तँ लगाएले जा चुकल अछि, क्षेत्रीयता आ भाषाक बन्धन सेहो लगेबाक प्रयत्न कएल जा रहल अछि। कतेको ठाम उच्च शिक्षाधारीकेँ कोनो कार्यसँ वंचित राखल जा रहल अछि तँ कतौ अन्य क्षेत्रक लोककेँ वंचित राखल जा रहल अछि आ आब पुनः क्षेत्रीय भाषाक बात उठा दोसराकेँ रोकक प्रयास भऽ रहल अछि। बिहारक छात्रक प्रवेश-पत्र आ उत्तर-पुस्तिकापर असाम, तमिलनाडु, महाराष्ट्र सभतरि प्रहार भेल अछि। एकर अछैतो बेनीपट्टी- बेहटामे केओ युवक लिख देने छलथि- बेहटा हो कि गोहाटी, अपनी मिट्टी अपना पानी। जयकान्त मिश्र सभ दिन इलाहाबादमे रहलथि आ बात मिथिलाक माटि आ पानिक करैत रहलथि। जीवकान्तजी सेहो माटि आ पानि भाषा आ भूगोलक बात करैत रहलथि अछि। मुम्बइमे एक महाराष्ट्रियन एक मैथिलसँ कहैत अछि- झा भाइ, अब मुम्बइ तो आप लोगों का हो गया, अब हम लोगों को तो यहाँ से खुर्दूबारी भागना पड़ेगा। ओतै अपनाकेँ बाकी इन्डियासँ बीस-बर्ख आगाँ कहऽबला बंगाली अधबैसीकेँ पूणाक एक सुसभ्य सुसंस्कृत वृद्ध अंग्रेजीमे डाँटि रहल छलैक- आ ओ युवक बकर-बकर मुँह ताकि रहल छल। तैओ भीड़मेसँ आबि एक “गवाठी” कइएक फाइट ओकरा मुँहपर मारलकैक। चुप्प रहलासँ कि हारि मानि लेलासँ सेहो केओ छोड़ैत नै छैक। पटनाक बसमे एक मुम्बइ ट्रेन पकड़बाक लेल एक यात्री छल। बिपतिक मारले केओ परदेश जाइत अछि। वेश-भूषा वएह रहैक। केओ पुछलकैक, कतऽ जेबैक। तँ कहलकैक- बम्बइ। कोनो सुसभ्य आदमी कहलकैक- कतऽ बममे। किछुए दिनक बाद मुम्बइमे बम विस्फोट भेलैक। मिथिलाक दृष्टि आ व्यवस्था एतेक अकिंचन भऽ गेलैक अछि। किछु स्थानीय उच्च वर्गक भोथ दिमागक नोकरिहारा शिक्षक, बैंक कर्मचारी, राज्य सरकारक विभिन्न कार्यालयक कर्मचारी आ मध्यम वर्गीय किसान तक्षक नाग जकाँ अप्पन आसन जमौने छथि आ ओ आसन अछि सामन्तवादक आसन। सामन्ती सोचसँ मैथिली साहित्य तक भरल अछि। मिथिलाक संस्कृति जकरा कहैत छी ओ किछु अलग संस्कृति नै ओ हिन्दू जीवन पद्धति अछि जे सम्पूर्ण देशमे अछि। जे अमन चैनसँ सुतऽ चाहैत छथि तिनका पेटोकेँ छुट्टी देबऽ पड़तनि। ई पद्धति आलस्यक पद्धति अछि जकरा त्यागक प्रयोजन अछि। कोनो समयमे ऐ पद्धतिक प्रधानता छलै। पैघ-पैघ किसान छलै। लोक बाहरसँ रोजगारक लेल एतऽ अबैत छैक आ “गुहनार”मे अप्पन झोपड़ी-पट्टी बना लैत छल- छोट लोक कहबैत छल। मुम्बइमे तहिना दू अट्टालिकाक बीच आकि नालाक कात, गुहनारक, रेलक पटरीक काते-कात, पोस्ट ऑफिस आकि आन कोनो सरकारी कार्यालयक बगलमे, जकर भार केओ सरकारी कर्मचारी आकि अधिकारी लेबऽ लऽ तैयार नै, झोपड़ पट्टी बनि गेल अछि। पटनेमे गली सभक दुनू कात झोपड़ी ठाढ़ भऽ गेल अछि। ऐ हालातमे मिथिलाक लोक अन्यत्र जीवि रहल अछि। बोली सुन्दर छैक आवाज बहराइत छैक- हे, यौ, अ, अप्पन-पेपर जे छल ओ फेक देलनि। आब कथीपर सूतब। पूणे जाइत एक दम्पत्ति- जकरा देहपर कतौ लत्ता नै, आग्रह करैत छैक मुम्बइ जाएबला यात्रीसँ- जरूर आएब यौ, नासिकमे सेहो देखक बहुत चीज सभ छैक जकरा अही क्षेत्रवादक कारण खेहारि-खेहारि कऽ भगाओल जाइत अछि। मुदा मास्टर साहेबकेँ दुःख छनि- आब भरिया-खबास नै भेटैत छनि। भनसीया नै भेटैत छनि। मुदा ठिकेदार भेट जाइत छनि। ड्राइवर भेट जाइत छनि। ३ बुच्ची दाइक निलामी कोना से देखू विभा रानीक “एहिना एकटा बुच्ची दाइ” घर-बाहर पत्रिकाक अक्टूबर-दिसम्बर २००६ अंकमे छपल छल। फेर ओ “नवनीत” फरवरी २००७ मे हिन्दी कहानीक रूपमे “यूँ ही बुच्ची दाइ” नामसँ सेहो छपल छल। विभा रानीक कथा शुरुहे सँ ओइ सभ अवगुणसँ भरल रहैत अछि जे कोनो कथाकेँ कथा बनऽसँ वंचित करैत छैक। मैथिलीक सम्पादक आ आलोचक लोकनि जतेक प्रोत्साहित हुनका केलखिन्ह ततेक कोनो आन लेखिकाकेँ नै। विभा रानीक कथा आन बहुतो लेखक जकाँ ओइ सभ तत्वसँ शुरुहेसँ भरल रहैत छन्हि जे तत्व कोनो कथाकेँ कथा कहबऽ सँ वंचित करैत छैक। छात्र जीवनमे जखन हुनकर कथा देखैत छलौं तँ सोचैत रही जे हिनका आगाँ जखन बोध हेतन्हि तँ संग्रहमे एकरा सुधारि लेतीह मुदा ओ सभ पूर्ववत “खोहसँ निकसैत” मे आयल अछि। विभा रानी शुद्ध-अशुद्ध रूपमे अनपढ़क बीच प्रयोग होइत जे किछु सुनैत छथि आकि सुनने छथि –सभकेँ मिथिला वा मैथिल वा मैथिलीक संग जोड़ि दैत छथि- आ मिथिला नामक जतेक जे अर्जित क्रेडिट छैक- अपना माथपर लऽ लेबऽ चाहैत छथि। आइ नेता बनक हेतु जेना प्रचुर समय आ प्रचुर पैसा चाही तहिना लेखक बनक लेल सेहो प्रचुर समय आ पैसाक जरूरति पड़ैत छैक। एहन भाग्य दर्जन भरि मैथिलीक प्राध्यापक संग हिनका आ नवीन चौधरीकेँ प्राप्त छन्हि। हिन्दी विभाग सन अमन चैनक जिनगी कोनो नोकरिहारा हेतु दुर्लभ अछि आ ताहूमे हिन्दी पदाधिकारी तँ सोनामे सुगन्धे। हरिमोहन बाबूक बुच्ची दाइकेँ उठा कऽ विभा रानी “एहिना एकटा बुच्ची दाइ”मे लऽ अनलन्हि अछि। मिथिलामे विधवा विवाह आ अन्य समस्या सिर्फ उच्च कुल आ उच्च वर्गमे अछि। बोनिहार लोक वियाह आ तलाकक अर्थमे अमेरिका-इंगलैण्डोसँ आगाँ अछि। विभा रानी जहाँ-तहाँ विद्यापतिक प्रसिद्ध गीत सभक गलत रूपमे उल्लेख करैत छथि। शुद्ध एना अछि:- सर बिनु सरसिज सरसिज बिनु सर की सरसिज..............बिनु सूरे यौवन बिनु तन तन बिनु यौवन की यौवन.......पिये दूरे “एहिना एकटा बुच्ची दाइ” कथाक अन्तिम तीन पाँति “दुःखहि जनम लेल, दुखहि गमाओल नयन न तिरपित भेल हे भोलानाथ कखन हरब दुःख मोर!” क कतेक गलत प्रयोग भेल अछि, जे देखल जा सकैत अछि। ध्यानाकर्षणार्थ:- दुःखहि जनम भेल, दुःखहि गमाओल सुख सपनहुँ नहि भेल, हे भोला दानी कखन हरब दुःख मोर! “नयन न तिरपित भेल” अनावश्यक शिव स्तुतिमे मिला देल गेल अछि। शुद्ध रूप एना अछि:- “कत मधुआमिनी रभसि गमाओल नहि बुझि कैसन केलि सैहो मधुबोल श्रवणहि सूनल श्रुतिपथ नहि भेल जनम अवधि हम रूप निहारल नयन न तिरपित भेल।” विभा रानी शुरुहेसँ शब्दक प्रति अल्हड़पन देखबैत अएलथि अछि मुदा तैयो हुनकर कथा सभ ऐ नोटक संग आन सभ लेखिकाकेँ अपमानित करैत छपल अछि:- आन लेखिका जकाँ विभा रानीक कथा महिला कोटाक अन्तर्गत नै छापल जा रहल अछि।” “यूँ ही बुच्चीदाइ”क किछु शब्द देखू- माँ-बाउजी, कहाना-वहानी, लोग-वाग, पता नहीं, पारा-पारी, घास-पुआल, जैसी बढ़ती हो चली जाती, अगर ब्राह्मण की बहु रहतीन आपकी माँ तो वे भी एक के बाद एक के बाद एक लेद-गेद जनमाती रहती, पुरुषों का होता है हमारे में, लड़कियों का नहीं। मिथिला की बेटियाँ, तिलकोर के बेल की तरह चतर गयी, अलच्छा, रंडापा, सिद्धा, आज मगर कानून बन जाने के बाद भी कहाँ कोई जयदाद देता है।” ई सभ शब्द विभारानी ककरा लेल रचने छथि। हिनका मंडन मिश्रक पनिभरनी याद नै अबैत छन्हि जे शंकराचार्यसँ संस्कृतमे बात कएने छलथि। कथाक बहन्ने, लोक कथाक बहन्ने वा संस्कार ओ उत्सवक बहन्ने कतेको ठाम विभा रानी बिहार कि मिथिला कि मधुबनीक प्रयोग गलत अर्थमे कएने छथि। कोनो कथा थूक फेकक लेल वा गूँ-मूतक बात करक लेल नै लिखल जाइत छैक। कथा सभ्यताक पहिल डेग अछि। कथाकार रामधारी सिंह “दिवाकर” जीवन भरि दरभंगामे रहि कहानी लिखैत रहलथि मुदा ओ कतौ दरभंगा वा मिथिलाक नाम नै लेलन्हि। “जखन तखन” जनवरी-मार्च ०७ अंकमे पुनः विद्यापतिक पाँति गलत रूपमे दोहराएल गेल अछि। “बड़ रे जतन सँ सिया दाइकेँ पोसलहुँ सेहो रघुवंशी नेने जाय।” हेबाक चाही। पंडित लोकनि बड़ प्रयत्नसँ मैथिलीकेँ बचौने छथि। मैथिलीक बड़प्पन अष्टम अनुसूचीमे अएलासँ नै भेल अछि। मैथिली जहिया ज्ञानक भाषा बनत तहिया मैथिलीक बड़प्पन हएत। मैथिली अनपढ़क भाषा बनल रहत तँ कि ज्ञानक कोनो विषय मैथिलीक भरोसे बैसल रहत। जीवकान्त जी कहैत छलथि जे मैथिलीक लेखक कुंठित लोकक बीच रहैत छथि तँ कुंठा नै तँ की लिखताह। जिनका कोनो विषयक ज्ञान नै ओ शिक्षक बनैत छथि, जिनका कोनो अध्ययन नै ओ लेखक बनैत छथि, कारण ओ सुविधा जीवी छथि। जँ केओ अयोग्य व्यक्ति सम्पादक बनैत छथि कि पुरस्कारक हेतु जूरी बनैत छथि तँ ओ मैथिलीक टांग घीचि रहल छथि। किछु आलोचक लोकनि आब कथा आ कविता लिखऽ लगलथि अछि आ किछु कथाकार लोकनि आलोचना। हम जखन ककरो लाठी भँजैत देखैत छिऐक कि नचैत देखैत छिऐक कि गबैत देखैत छिऐक वा सर्कस-सिनेमामे अपन “करतब” करैत देखैत छिऐक तँ सोचैत छी जे ओ गुण मैथिलीक लेखक लोकनिमे किएक नै छैक। फुटबल, क्रिकेट कि सर्कसमे किछुओ गलती भऽ जाइत छैक तँ सभकेँ देखाइ दैत छैक मुदा साहित्यपर गवार राज्य कऽ रहल छैक से किएक ने केओ देख रहल छैक। एक गोटे कहैत छथि जे: देखैत तँ सभ छैक मुदा ककरो कोन मतलब। जेना राजमोहन झा कहलनि- लोकक सम्पर्कमे नै अएबैक तँ लोककेँ कोन मतलब जे अहाँ नीक लिखैत छी कि बेजाए। एतद्धि। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। जगदीश प्रसाद मण्डल कथा बिहरन जहिना बैशाख-जेठक लहकैत धरती अगिआएल वायुमंडलक बीच हवाकेँ खसने, अनायास मेघक छोट-छोट चद्दरि सूर्ज ओढ़ए लगैत, रेलगाड़ीक हुमड़ैत अवाज दौड़ए लगैत, रहि-रहि कऽ गुलाबी इजोतक संग छिटकए लगैत, तँ अनुमानित मन मानैले बेबस भऽ जाइत जे पानि-पाथर, ठनका संग बिहाड़ि आबि रहल अछि, तहिना रघुनन्दन आ सुलक्षणीक परिवारमे ज्योति कुमारीक जन्मसँ भेलनि। भलहिं आइ-काल्हि बेटीक जन्म भेने माए-बाप अपन सुभाग्यकेँ दुर्भाग्य मानि मनकेँ कतबो किअए ने कोसथि जे परिवारमे बेटीक आगमन हिमालयसँ समुद्र दिस निच्चा मुँहे ससरब छी मुदा से दुनू बेकती सुलक्षणीकेँ नै भेलनि। जहिना गद्दा पाबि कुरसी गदगर होइत तहिना खुशीसँ दुनू प्राणी रघुनन्दनक मन गद-गद। से खाली परिवारे धरि नहि सर-समाज, कुटुम-परिवार धरि सेहो छलनि। ओना आन संगी जकाँ रघुनन्दन नै छलाह जे तीनिये मासक पेटक बच्चाकेँ दुश्मन बनि पुरूषार्थक मोछ पीजबैत आ ने अपन रसगर जुआनी छोलनी धीपा-धीपा दगैत। दुनू परानी बेहद खुशी! किअए नै खुशी रहितथि, मन जे मधुमाछी सदृश्य मधुक संग मधुर मुस्कान दैत छलनि। पुरूष अपन वंश बढ़बै पाछू बेहाल आ नारीकेँ हाथ-पएर बान्हि बौगली भरि रौदमे ओंघरा देब कते उचित छी? दुनू प्राणीक वंश बढ़ैत देख दुनू बेहाल। मन तिरपित भऽ तड़ैप-तड़ैप नचैत। आेना तीन भाँइक पछाति ज्योतिक जन्म भेल, मुदा तइसँ पहिने बेटीक आगमनो नै भेल छलनि जे दोखियो बनितथि। भगवानोक किरदानी कि नीक छन्हि? नीको कोना रहतनि, काजक तते भार कपारपर रखने छथि जे जखन टनकी धड़ै छन्हि तखन खिसिया कऽ किछुसँ किछु कऽ दैत छथि। मुदा से लोक थोड़े मानतनि, मानबो किअए करतनि जखन अपने अपने हाथ-पएर लाड़ि-चाड़ि जीबैए तखन अनेरे अनका दिस मुँहतक्कीक कोन जरूरत छै। किअए ने कहतनि जे अहाँ िनर्माता छी तखन तराजूक पलड़ा एक रंग राखू, किअए ककरो जेरक-जेर बेटा दइ छिऐ आ ककरो जेरक-जेर बेटी। जँ देबे करै छिऐ ते बुद्धि किअए भंगठा दइ छिऐ जे बेटासँ धन अबै छै आ बेटीसँ जाइ छै। जइसँ नीको घरमे चोंगराक जरूरत पड़ि जाइ छै। उच्च अफसरक परिवार तँए परिवारिक स्तर सेहो उच्च। भलहिं किअए ने माए-बाप छाँटि परिवार होन्हि। खगल परिवार जकाँ सदति गरजू नै। परिवारक खर्च समटल तइसँ खुलल बजारक कोनो असरि नै। सरकारी दरपर सभ सुविधा उपलब्ध, जइसँ खाइ-पीबैसँ लऽ कऽ मनोरंजनक ओसार चकमकाइत। भलहिं जेकर अफसर तेकर बात बुझैमे फेर होन्हि। जइसँ महगी-सस्ती बुझैमे सेहो फेर भऽ जाइत होन्हि। मुदा परोछक बात छी चारू बच्चाक प्रति समान सिनेह रहलनि। परिवारमे सभसँ छोट बच्चा रहने ज्योति सबहक मनोरंजनक वस्तु। मुदा गुरूआइ तँ ओहिना नै होइ छै, तँए सभ अपन-अपन महिक्का मनक टेमीसँ सदति देखथि, जप करथि। आखिर के एहन छथि जे ऐ धरतीपर ज्ञान दानी नै छथि। भलहिं ओ अधखिजुए वा अधपकुए किअए ने होथि। जहिना कोनो माली केर बच्चा पिताक संग जामंतो रंगक फूलक फुलवारीमे जिनगीक अनेको अवस्था देख चमकैत तहिना भरल-पूरल परिवारमे ज्योतियोकेँ भेलि। देखलनि कलीमे जहिना अबैत-अबैत रंगो, सौन्दर्यो आ महको अबैत अछि, तहिना ने जिनगी छी। जँ मनुष्यकेँ डोरीसँ बान्हल जाय तँ डोरी तोड़ैक उपायो तँ हुनके करए पड़तनि। समुचित वातावरण रहने ज्योति संगी-साथीक बीच नीकक श्रेणीमे आबि गेलि। जहिना संगीक सिनेह तहिना शिक्षकोक सिनेह भेटए लगलनि। टिकट कटाओल यात्री जहिना निश्चिन्तसँ गाड़ीमे सफर करैत तहिना समतल जिनगी पाबि ज्योति आगू बढ़ए लागलि। जिनगीमे बधो अबै छै तइसँ पूर्ण अनभिज्ञ ज्योति। जना कर्मकेँ धर्म बना जिनगीक बाट बनौने हुअए। थम्हसँ निकलैत केराक कोसा, जहिना अपन घौड़क संग हत्थो आ छीमियोक अनुमानित परिचय दैत, फूलक कोढ़ी फूलक दैत तहिना बच्चेसँ कुमारी ज्योति सुफल जिनगीक अनुमानित परिचय दिअए लागलि। जेना-जेना बौद्धिक विकास होइत गेलनि तेना-तेना तीनू भाँइयो बुझए लगलाह जे ज्योति तेहन चन्सगर अछि जे आगू किछु जरूर करत। जइसँ भैयारिये जकाँ ज्योतिक संग बेबहार करए लगलाह। लैंगिक प्रभाव ओतए अधिक देख पड़ैत जतए भाए-बहीनिक दूरी जते अधिक रहै छै। से रघुनन्दनक परिवारमे नै छलनि दोसर कारण इहो छलनि जे वैचारिक दूरी जेना आन-आन परिवारमे रहैत तेना सेहो नहिये जकाँ छलनि। परिवारक सभ अपन-अपन दायित्व बुझि अपन-अपन काजमे दिन-राति लागल रहैत। ओना ज्योतिकेँ सभ अपना-अपना नजरिये देखैत। गुरूक रूप रघुनन्दन देखथि तँ जगत-जननी जानकीक सुनैनापुर रूप माए देखथि। जइसँ एक-एक लूरि-बुद्धिकेँ धरोहर जकाँ सजबैत छलीह। भाइक मन सामा-चकेबाक संबंधमे ओझराएल। केना नै ओझराइत? आइ धरिक इतिहासक दूरी जे मेटाइत देखथि! कतेक प्रतिशत परिवार एखन धरि इतिहासक पन्नामे लिखाएल अछि जइमे भाए-बहीनिक शिक्षाक दूरी समतल हुअए। तँए सबहक सिनेहक अपन-अपन कारण। जनकपुरमे जहिना रामकेँ आ मथुरामे कृष्णकेँ देख, देखिनिहारकेँ भेलनि तहिना ज्योतियोक परिवारमे। बाल-बोध जहिना अपन मनोनुकूल वस्तु पाबि छाती लगबैत हृदैसँ खुशी होइत तहिना विज्ञान विषयसँ ज्योति सटि गेलि। नीक -विज्ञानक विषयमे- नम्बर आनि बिजलोका जकाँ ज्योति संगियो-साथी, शिक्षको आ मातो-पिताकेँ चमकबए लगली। हाइ स्कूल पएर दैते जेना अपन आँट-पेट बुझि कोनो विद्यार्थी साइंस तँ कोनो कामर्स तँ कोनो आर्ट विषय चुनि आगू बढ़ैत तहिना ज्योतियो साइंस चुनि नेने रहए। घरसँ बाहर धरि सर्वत्र बहारे-बहार। ऋृषि-मुनिक लेल दुनियाँ जहिना समतल देख पड़ैत, तहिना स्कूलक शिक्षकक संग दू-दूटा भाए पाबि ज्योतिक दुनियाँ सेहो समतल। जइसँ कोनो तरहक असोकर्ज घरसँ बाहर धरि नहिये। असोकर्ज तँ ओइठाम होइत जतए एकपेरिया चरि पेरियाक-चौवट्टी-मिलैक भौक होउ। भौक तँ ओतए ने बेसी बुझि पड़ैत जतए जेहन चलनिहार होइत। जइठाम बेसी चलनिहार रहैत ओतए कच्चियो सड़क पक्किये जकाँ सक्कत आ पक्कियो कच्चिये जकाँ बनि जाइत। साइंस कओलेजसँ ज्योति फिजिक्ससँ नीक नम्वर पाबि एम.एस.सी. केलक। जहिना अखराहापर लपटैत-लपटैत पहलवानक कश बनि जाइत तहिना ज्योतियोकेँ भेलि। ‘नारी मुक्ति संघ’क स्थापित अध्यक्ष होइक नाते पिता रघुनन्दनक सिनेह आरो बेसी ज्योतिपर। ज्योतिकेँ कओलेज पहुँचैत-पहुँचैत तेसरो भाय नोकरी पकड़ि लेलनि जइसँ आरो बेसी सुविधा भेटलनि। ओना काजकेँ कर्म बना करैक अभ्यास सुलक्षणी बच्चेसँ लगबैत आएल रहनि। जइसँ घरक काजक जहनि ज्योतिक जेहन तक पकड़ि लेने तँए जहिनगर। सदति कर्मकेँ सहयोगी प्रेमी जकाँ दुलरबैत, प्रेम करैत। तँए कि ज्योति सुलक्षणीक बेटी नै?, परिवारक सभसँ बेसी सिनेही बेटी छियनि। मुदा सुलक्षनीक मनमे सदति एक कचोट कचोटिते रहनि जे कुल कन्या की? कुल तँ अनेको अछि- गुरूकुल, पितृकुल, मातृकुल इत्यादि। जे पश्न अखनो धरि नै सोझरेलनि। एम.एस.सी. करिते दुनू बेकती रघुनन्दनकेँ जहिना बिनु हवोक पीपरक पात डोलए लगैत, तहिना ज्योतिक प्रति सिनेह डोलए लगलनि। अनायास दुनूक मनमे प्रश्नपर प्रश्न उठए लगलनि। बीस बर्खक बेटी भऽ गेलि, वियाह करब माए-बापक कर्तव्य कर्म छी। कओलेजक अंतिम सीढ़ीक आगू टपि चुकलि, संग इहो जे पारदर्शी सीसा जकाँ ज्योतिक शरीर देखथि जे जुआनीक रंग सगतरि चमकि रहल छै। ओना कओलेजक आन छात्रा जकाँ नै, मिथिलाक धरोहर कुल-कन्या। जे गुरूकुलमे विद्याध्ययन करैत। दुनू प्राणीक दायित्व बुझि रघुनन्दन पत्नीकेँ पुछलनि- “ज्योति वियाहै जोकर भेल जाइए से कि विचार?” संयासिनी जकाँ सुलक्षणी उत्तर देलखिन- “अपन कोनो काज पछुआ कऽ नै रखने छी, जे बाकी अछि अहाँक छी। तइ बीच कि विचार देब।” पत्नीक उत्तर सुनि रघुनन्दन तिलमिलाइत विचार करए लगलाह। एहेन उटपटांग उत्तर किअए देलनि? मुदा सोलहो आना तँ अनुमानोसँ कोनो बात नै बुझल जा सकैत अछि। नीक हएत जे पुन: प्रश्न उठा आगू बजबाबी। ई तँ निश्चित जे एको परिवारमे काजक हिसाबे सबहक सोचै-विचारै आ बुझैक ढंग फुट-फुट भऽ जाइ छै। भलहिं सासुसँ ऊपर किअए ने जेठ सासु मानल जाए, मुदा सासु तँ सासु होइत। जहिना देवालयक कपाट लग ठाढ़ भक्त हाथ जोड़ि अपन दुखड़ा भगवानसँ सुनबैत तहिना तड़पैत रघुनन्दन पत्नीकेँ पुछलखिन- “संयासिनी जकाँ किअए घरसँ पड़ाए चाहै छी। कि बिसरि रहल छी जे घरनी सेहो छी?” पतिक गंभीर विचारकेँ अँकिते सुलक्षणीक करेज कलपि गेलनि मुदा पानिक बहैत बेगमे जहिना गोरसँ गोरिया-गोरिया गोर उठाओल जाइत तहिना सुलक्षणी ज्योतिक जिनगीक धारामे ठाढ़ भऽ बजली- “अहूँ कोनो हूसल नै छी, सभ माए-बाप बेटा-बेटीकेँ बच्चे बुझैए। मुदा एतऽ से बात नै छै। अहाँ लिये भलहिं ज्योति बच्चा हुअए मुदा ओ आेइ सीढ़ीपर पहुँच गेलि अछि जतऽ मनुष्य अपन जिनगीक बाट चुनैक गुण प्राप्त कऽ लैत अछि। तँए दुइये प्राणी नै, बेटाे-पुतोहूसँ विचारि लिअ।” सेनट्रल बैंकक ब्रान्च मैनेजर भोगेश्वरक संग ज्योतिक वियाहक बात पक्का भऽ गेल। जहिना ज्योति तहिना भोगेश्वर। अद्भुत मिलानी। विषुवत रेखाक समान दूरीपर जहिना उत्तरो आ दछिनो समान मौसम समान उपजा-बाड़ी होइत अछि, तहिना दुनूक बीच। अलेल कमाइ तँए छिड़िआएल जिनगी भोगेश्वरक। हजारो कोस हटि भोगेश्वर अपन परिवारसँ रहैत। नव-नव वस्तुसँ भरल बजार, जे दुनियाँक एक कोणसँ दोसर कोण पहुँचैत, भोगेश्वर चकाचौंधमे हरा अपन माइयो-बाप आ भाइयो-भौजाइसँ दूर भऽ गेल। किअए ने हएत? जखन सभकेँ अपन कर्मक फल भोगैक अधिकार छै तँ भोगेश्वर किअए ने भोगत। एक तँ दिन राति रूपैयाक पेंच-पाँचक गुत्थी खोलैक क्षमता तइपर जेकरे माए मरै तेकरे पात नै भात?’ नीक बर पाबि रघुनन्दन चंदाक तिजोरी -नारी मुक्ति संघक कोष- खोलि देलनि। कोनो अनचितो तँ नहिये केलनि। चंदो तँ मुक्तियेक लेल अछि। एक तँ मनी-ग्रुप अर्थशास्त्रसँ पी.चए.डी. तइपर सँ सेन्ट्रल बैकक शाखा-प्रबंधक, किअए नै भोगेश्वर अपन अधिकारक उपयोग करत। वियाहक दिन तँइ भऽ गेल। तइ बीच ज्योतिकेँ, मास दिन पूर्व देल आवेदनक, इन्टर-भ्यूक चिट्ठी भेटल। तहूमे वियाहक दिनसँ तीन दिन पूर्वक। दोहरी काज परिवारमे बजरि गेल। छोड़ैबला कोनो नै। तइपर ज्योति सेहो वियाहकेँ माइनस आ इन्टर-भ्यूकेँ पलसमे हिसाब लगबैत। वियाहक ओरियानक धुमसाही परिवारमे। मुदा ज्योति विपरीत दिशामे मुड़ि इन्टर-भ्यू दइले अड़ि गेलीह। इन्टर-भ्यूओ तँ लगमे नहिये जे दू-चारि घंटा समय लगा पुराओल जा सकैए। दछिन भारत लऽग नै। केतबो तेज दौड़ैबला गाड़ी भेल तैयो चौबीस घंटासँ पहिने नै पहुँच सकैए। तहूमे वियाह सन शुभ काजमे बर-कन्याकेँ सुरक्षित रहब जरूरी अछि। सीमा कोना पार कएल जा सकैए। गाड़ी-सवारीक कोन ठेकान। ज्योतिक प्रश्न परिवारकेँ स्तब्ध केने। जेठ भाय प्रेमकुमारक सिनेह ज्योतिपर उमड़ि पड़लनि। हिसाब लगबैत पिताकेँ कहलखिन- “वियाहक दिनसँ चौबीस घंटा पहिने अवश्य पहुँच जाएब। अहाँ सभ वियाहक ओरियान करू ज्योतिक संग जाइ छी।” प्रेम कुमारक विचारसँ रघुनन्दन दुनू काज होइत देख खुशी भेलाह। मुदा सुलक्षणीक मन आरो बेसी कडुआए लगलनि। खोलि कऽ बजती कोना? एक तँ पुरूष-प्रधान परिवार तइपर सभ बापूतक एक विचार। स्त्रीगणक कोनो ठेकाने नै। कहैले ने चारि गोरे परिवारमे छी मुदा ननदि-भौजाइक संबंध केहन होइ छै से कि ककरोसँ छिपल छै। नीक हएत जे पोल्हा कऽ बेटियेकेँ पुछि ली। मुदा विध-बेबहारपर नजरि पड़िते पुन: मन भगंठि गेलनि। बिनु विधि-बेबहारक वियाह केहन हएत। रस्ते पेरे तँ सेहो लोक वियाह कऽ लइए मुदा परिवार केहन बनै छै। आठो दिन तँ कमसँ कम विध-बेबहारमे लगबे करत। ज्योतिक इन्टर-भ्यूओ आ वियाहो भऽ गेलनि। अद्भुत वियाह तँए समाजमे चर्चक विषय। चर्चो मुँह देख मुंगबा परसैत। जेहन मुँह तेहन मुंगबा। कियो दुनू बेकतीक -बर-कन्याक- शिक्षाक चर्च करैत तँ कियो युगक अनुकूल बर-कन्याक जोड़ाक। कियो विध-बेबहारक लहासक चर्च करैत तँ कियो समाजक अगुआएल नारी जाितक। कतौ भोज-भातक चर्च चलैत, तँ कतौ गमैया बरियातीक संग बजरूआ बरियातीक। मेल-पाँच बरियाती तँए सबहक बात दमगर। इनार पोखरिक घाटसँ लऽ कऽ दुआर-दरबज्जा धरि संसद चलैत। मुदा सबहक मन ओइ िबन्दुपर अँटकि जाइत जतऽ भोगेश्वर आ ज्योतिक वैवाहिक बंधन रहए। वियाहक तीन दिन पछाति भोगेश्वर दुरागमन प्रस्ताव केलनि। प्रस्ताव सुनि परिवारमे सबहक मनमे सभ रंगक विचारक संग उत्तरो उठलनि। मुदा आगू बढ़ि कियो बजैले तैयार नै। मने-मन सुलक्षणी सोचथि जे वियाहक साल तँ बर-कन्याक विध-बेबहार होइत। जँ विध-बेबहारक कारण नै होइत तँ किअए साओन-भादो आ पूस-माघ बेटीक विदागरी नै होइत। बिनु विधि-बेबहारक वियाह तँ ओहने होइत जेहन बिनु मसल्लाक तरकारी। कहैले ने लोक बजैत अछि जे फल्लां चीजक तरकारी खेलौं मुदा कि बिनु मसल्लेक बनल छलै। जँ मसल्लोक सागिरदीसँ तरकारी बनल तँ ओकर चर्च किअए ने होइ छै। तर-उपर मनकेँ होइतो कंठसँ निच्चे सुलक्षणी िवचारकेँ अँटका रखलीह। रघुनन्दनक मनमे भिन्ने विचार औंढ़ मारैत रहनि। मुदा गारजनक हैसियतसँ धड़-फड़ा कऽ बाजबो उचित नै बुझि सुरखुराइत मनकेँ रोकने रहलाह। मुदा तैयो होन्हि जे बिनु कहने बुझता कोना? भीतरे-भीतर मन बजैत रहनि जे जहिना बीजू -आँठीसँ जनमल साल-दू सालक आमक गाछ- गाछ कलमी डारिमे छीलि कऽ डोरीसँ बान्हि किछु मास जुटैले छोड़ि देल जाइत तहिना ने वियाहो छी। फागुनक कन्या जँ फागुनेमे सासुर चलि जाथि तँ समन जरब देखब सासुरमे नीक हएत? चैताबरक टाहि सासुरमे नव-कन्याक देब उचित हएत? आमक गाछीक मचकीक बारहमासा आ साओनक राधा-कृष्णक कदमक गाछक झूलाक अर्थे कि रहत? तहीले ने वियाह-दुरागमनक बीच समय रहैत अछि। भलहिं नै बनैबला रहत तँ पान-साल, तीन साल नै मुदा सालो तँ टपबए पड़त। जँ से नै टपत तँ केना सासु-ससुर, सारि-सरहोजि, सार-बहिनोइ, सर-समाजक बीच संबंध बनत। परिवारक बीच कम्मो दिनमे संबंध स्थापित भऽ सकैए मुदा समाज तँ नमहरो आ गहींरगरो होइत अछि। कोनो धारक पानिक पैमाना तँ तखन ने नापल जाएत जखन भादोक बढ़ल आ जेठक सटकल पेटक पानि नापल जाए। तहिना ने समाजो छी। अपना गरजे लोक थोड़े जुरशीतल आ फगुआ आन मासमे कऽ लेत। जँ से करत तँ चरि टंगा आ दू टंगामे कि अनतर भेलै? एतबे ने बिनु सिंग-नाङरिक रहत। मुदा मन ममोड़ि कऽ रहि गेला। अनेको कारण अनेको मनकेँ घेर लेलकनि। ज्योतिक भाए-भौजाइ अखन धरि धर्मसूत्र आ गृहसूत्र पढ़नहि नै तँए कोनो िचन्ता मनमे रहबे ने करनि। नोकरिया रहने होइत जे जते जल्दी काज फरिया जाएत ओते जान हल्लुक हएत। अनेरे सी.एल. दुइर हएत? मुदा से सारेक मनमे नै रहनि भोगेश्वरक मनमे सेहो रहनि। बैंकमे घंटाक कोन बात जे मिनटोक महत्व छैक। सदिखन पाइयेक बरखा। अनेरे पा-भरि खाइले दिन-राति सासुर ओगरब कोन कबिलती हएत। स्त्रिये लऽ कऽ ने सासुर, आ जे संगे रहत तँ सबदिना सासुर नै भेल? जरूर भेल। अपना परिवारकेँ जँ सासुर बना सौंसे गाम जे ओझे बनि जाएत तँ ककरा सोझा जाइक आँखि-मुँह रहत। मुदा तीनू भाँइ प्रेमकुमार चुप्पी लाधि लेलनि जे अखन घरक गारजन माए-बाबू छथि तखन किछु बाजब उचित नै। मुदा मनमे तीनू भाँइकेँ शंका जरूर होन्हि जे स्त्रीगणक स्वभाव होइत अछि जे पुरूखक टीकपर चढ़ि कऽ मुरगीक बाँग देब। तइ संग समाजोक डर। समाज तँ ओहन शक्ति छी जे बिनु डोरि-पगहाक रहनौं चपरासीसँ लाट सहाएब धरि सजौने अछि। हाकिम-हुकुम आ रिनिया-महाजन रहै वा नै। भलहिं बिलाइ बाझकेँ खाए वा बिलाइकेँ बाझ। जखनसँ जमाइबाबूक दुरागमनक प्रस्ताव परिवारमे आएल तखनसँ सभ सकदम! चुप्पा-चुप, धुप्पा-धुप। जइसँ धारक पानि जकाँ बहैत बोल ठमकि कऽ भौर दिअए लगल। ओना बन्न मुँह रहितो आँखिक नाच जोर पकड़नहि, मुदा िसर्फ मूक नाच। जेठुआ गरेक सूर-सार देखते जहिना सचेत लोक पहिने बाल-बच्चा आ माल-जालक उपाय सोचि आगू डेग उठबैत तहिना रघुनन्दनकेँ अपन भार परिवारक बीच उठबैक विचार भेलनि। फुरलनि- ‘संग मिल करी काज हारने-जीतने कोनो ने लाज।’ जाधरि नीक-अधलाक बीचक सीमा-सरहद नै बुझल जाएत ताधरि हारि-जीतक चर्चे बचकानी। मुदा समाजो आ परिवारोक तँ चलैक रास्ता अछिये। मनमे खुशी उपकलनि। खुशी उपकिते मुँह कलसलनि। मुदा पत्नी सुलक्षणीक मन महुराएले! किअए ने महुराएल रहतनि? जकरा मुँहमे ने थाल-कादो लागल अछि आ ने पसीनाक सुखाएल टगहार अछि ओ किअए ने रूमालेसँ काज-चला लेत। मुदा जकरा मुँहमे थालो आ तह-दर-तह सुखल पसीनोक टगहार छै ओ कोना बिनु पानिये धोनहुँ चिक्कन हएत। कि अपनो मन मानत? सहमत भऽ परिवारक सभ सुलक्षणीकेँ बजैक भार देलकनि। सुलक्षणी बजलीह- “ओना साल भरि नै तँ छओ मास, जँ सेहो नै तँ तीनिओ मास, जँ सेहो नै तँ एको पनरहिया नै रूकताह तँ कोना हेतनि। जँ से नै मानताह तँ हमहूँ नै मानबनि।” सासुक िनर्णए सुनि अपन शक्तिक प्रयोग करैत भोगेश्वर बजलाह- “अपन अधिकार क्षेत्रसँ अनचिन्ह भऽ बाजि रहल छथि। तँए......?” भोगेश्वरक बात सुनि ज्योतिक हृदैमे तरंग उठलनि। तरंगित होइत मुँह तोड़ि उत्तर दिअए चाहलनि। मुदा इन्टर-भ्यू मन पड़िते ठमकि गेली। मुँह तँ बन्न रहलनि मुदा मनमे तीन परिवारक टक्कर उठलनि। रूइ सदृश्य बादलक टक्करसँ ठनका बनि सकैए तँ तीन परिवारक तीन जिनगीक रग्गर कते शक्तिशाली भऽ सकैए! दिन-रातिक सीमा-सरहद तोड़ि ज्योति पतिकेँ कहलनि- “अधिकार आ कर्तव्य हर मनुष्यक धरोहर सम्पत्ति छिऐ नै कि खास-व्यक्तिक खास....?” ज्योतिक विचार सुनि भोगेश्वरक देह सिहरि गेलनि। मुदा तैयो मनकेँ थीर करैत बजलाह- “साते दिनक छुट्टी अछि। एक तँ अहुना आन-आन विभागसँ कम छुट्टी बैंकमे होइ छै, तहूमे एते सुविधा भेटै छै जे काज केनिहार ओहो छुट्टी काजेमे लगबए चाहैए।” तइ बीच ज्योतिक मोबाइलिक घंटी टुनटुनाएल। मोवाइलिक अनभुआर नम्बर देख सावधानीसँ ज्योति रिसीभ करैत बजलीह- “हेलो।” “हेलो।” “अपने कतएसँ बजै छी?” “विज्ञान शोध संस्थानसँ। सात दिनक भीतर आबि ज्वाइन कऽ लिअ। ओना चिट्ठिओ पठा देने छी।” ज्वाइनिंगक समाचार सुनि ज्योतिक मन ओहिना खिल उठलनि जहिना फूलक कली कोनो वस्तुसँ दवा तरेतर तँ खिलैत रहैत, जे समए पाबि फुड़फुड़ा कऽ फूलक रूपमे आबि जाइत। अखन धरिक विचार ज्योतिक तर पड़ि गेलनि आ नव दुनियाँक नव विचार उपर चढ़ि गेलनि। रघुनन्दनकेँ कहलनि- “बाबूजी, अपन कर्तव्य जइ रूपे अपने निमाहलौं बहुत कम लोक निमाहि पबैए। आग्रह करब जे ककरो जिनगीक रास्ताक बाधक नै बनिऐ।” ज्योतिक बात सुनि जिज्ञासा करैत जेठ भाय प्रेमकुमार प्रश्न उठौलनि- “कि रास्ताक बाधा?” ज्योति- “भाय सहाएब, अखन जबाबक उचित समए नै अछि। अखन एतबे जे काल्हि चलि कऽ हमरा शोध संस्थान पहुँचा दिअ।” ज्योतिक बात सुनि सुलक्षणी पुछलखिन- “आइ तीनिये दिन वियाहक भेलह हेन, बहुत विध-बेबहार पछुआएल छह?” “जे पछुआएल अछि ओ पाछु हएत। मुदा कोनो हालतमे काल्हि जेबे करब। चाहे......?” ज्योतिक संकल्पित विचार सुनि भोगेश्वर बजलाह- “भाय-सहाएब, काल्हिये हमहूँ चलि जाएब। सभ संगे चलब, हम हाबड़ामे उतड़ि जाएब आ ई सभ आगू बढ़ि जइहथि।” सएह भेल। ज्योतिकेँ शोध संस्थान पहुँचा तीनू भाँइ प्रेमकुमार घुरि कऽ घर आबि गेलाह। उर्वर भूमिक बनल परतीमे जहिना जोत-कोर, नमीक संग बीआ पड़िते, किछुए दिन पछाति हरिया उठैत तहिना ज्योतिक उर्वर शक्तिमे अनुसंधानक नव-नव अंकुर पानिक हिलकोर जकाँ उठए लगलनि। एक नै अनेक। जहिना पोखरिमे झिझरी जकाँ पानिक हिलकोर चलैत रहैत तहिना ज्योतिक मनमे सेहो चलए लगलनि। भूखल व्यक्तिकेँ अपन अन्नक भंडार भेने, वस्त्रहीनकेँ वस्त्र भेने, गृहविहीनकेँ गृह भेने जहिना विशाल जल-राशि पाबि नदी उफनि जाइत तहिना ज्योतिक मन उफनि गेलनि आइ धरिक दुनियाँ। नव दुनियाँ, नव-नव सुर्ज-चान, ग्रह-नक्षत्र, नव-नव वस्तुसँ सजल दुिनयाँ। ओ दुिनयाँ जइठाम पहुँच मनुष्य सृजन शक्ति प्राप्त कऽ सृजक बनि सृजन करए लगैत। ज्योति-ज्योति नै सृजक बनि गेलीह। नन्दन बनक माली जहिना अपन जिनगी ओइ वनकेँ उत्सर्ग कऽ नव-नव फूल-फलक गाछ आन-आन जगहसँ जोहि आनि फुलवारी सृजैत, जकरा देख माली पुत्र अपन भविष्य बुझि एक संग छिड़िआएल जामंतो जिनगी लोढ़ि, फुलडाली सजा, देवमंदिरक लेल रखए चाहैत तहिना ज्योतिकेँ, श्रृंगी ऋृषिक विशाल उपवन भेट गेलनि। जइसँ ओइ माली पुत्र जकाँ अपन भविष्य देखए लगली। दू धारक बीच महारपर ठाढ़ भऽ, एक दिस तड़ा-उपड़ी गिरल मनुष्य तँ दोसर दिस जिनगीक खेलौना हाथमे लेने समुद्र दिस पीह-पाह करैत धारमे उधिआएल जाइत। उगैत-डूबैत देखलनि जे कियो मात्र पति-पत्नीक जीवन लीलाकेँ जिनगी बुझि तँ कियो अमरलत्ती सदृश्य वंश-वृक्षपर लतड़बकेँ, कियो धार-समुद्रक बीच धरतीकेँ तँ कियो अकास-पतालक बीचक विशाल वसुदेवकेँ। देखैत-देखैत ज्योतिक मन बेसम्हार भऽ गेलनि। अपन जुआनीक खिलैत कलीक संग चढ़ैत तन, ऊफनैत मनकेँ सम्हारि धारमे कुदए चाहली। मुदा मनमे नचलनि माए-बाप! धरतीक प्रथम गुरू! जहिना शिक्षक सिलेटपर खांत लिख शिष्यकेँ सिखबैत तहिना शिष्यो ने लिख शिक्षकसँ शुद्ध करबैत। शुद्ध होइते ओहो खांत ने खांत बनि जाइत। रील जकाँ माता-पिताक सटले पति देखलनि। मुदा किछुए क्षण धरि मनमे अंटकलनि। वियाहक विधो तँ पछुआएले अछि! लगले फेर माता-पिता आबि आगूमे ठाढ़ भऽ गेलनि! राति-दिन ज्योतिक मन साओनक मेघ जकाँ उमड़ए-घुमड़ए लगलनि। धारमे चलैत नाह जकाँ डोलि-पत्ता हुअए लगलनि। आँखि उठा तकलनि तँ देखलनि जे माता-पिता छोड़ि कहाँ कियो छथि। फेर लगले मन घुरलनि तँ सभ किछु देखलनि। कि नै अछि? मातृभूमिक संग पितृभूमि सेहो अछि। मनमे खुशी एलनि। होइत भोर कागज-कलम निकालि पिताकेँ पत्र लिखए लगलीह- “माता-पिता, सहस्र कोटि प्रणाम। एक जिनगीक आखरी आ दोसरक पहिल पत्र लिखैत मन उमकि रहल अछि। तँए कतौ शुद्ध-अशुद्ध लिखा जाए, से माफ करब। सुधारि कऽ पढ़ि लेब। अपने लोकनिक सेवा, शिखर सदृश्य शिष्य जकाँ शिरोधार्य केने रहब। जहिना बादलक बुन्न धरतीपर अबिते धरिया धार होइत समुद्र दिस बढ़ैत तहिना अपने दुनू धरिया देलौं। कुल-कन्या वा कुल-कलंकनी बनब हमर कर्म छी। मुदा बेटी तँ अहींक छी। हमहूँ तँ एतै बसब। तँए ताधरिक छुट्टी असीरवादक संग दिअ जे वास बना बसए लगी। ज्योति।” पत्र पहुँचते अह्लादसँ दुनू बेकती रघुनन्दन आ सुलक्षणी, बेटी ज्योतिक पत्र पढ़ैक सुर-सार केलनि। पत्रपर नजरि दौड़ैबते दुनू बेकती अलिसा गेलाह। आगूमे अन्हार पसरि गेलनि। मुदा मन लगले भक्क खोलि रघुनन्दन पत्नीकेँ कहलखिन- “पत्रक उत्तर देब जरूरी अछि मुदा कि लिखब से फुरबे ने करैए।” जेहने गर्म-ठंढ़क बीचक सीमा असथिर रहैत तेहने चित्ते सुलक्षणी पतिकेँ विचार देलखिन- “कोन लपौरीमे पड़ल छी। माए-बाप ककरो जन्म दइ छै। जीबैले अपने ने रौद-वसात सहए पड़तै। आब अहीं कहू जे एहनो बात पत्रमे लिख बेचारीक पढ़ैक समए बड़देबै? रहल असीरवादक तँ एतैसँ दुनू प्राणी मिल दऽ दियौ।” (ई कथा युवा साहित्कार- श्री आशीष अनचिनहार लेल) ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। किशन कारीगर मैथिली सीखू (एकटा हास्य कथा) कोइलख वाली काकी खिसियाअैत बजलीह भरि दिन बैसल फुसियांहिक गप नाद मे लागल रहैत छी एहि स नीक जे किछू काज-राज करब से किएक नहि करैत छी। इ सुनि गजानन बाबू गरजैत बजलाह हम की करू हम त मैथिली पढ़ने छी काज राज त करैते छी त आब की करू। काकी खोंजाइत बजलीह किएक अई इ टीशन पढ़ाएब से नहि जे किछू आमदनी होइत त गाम मे कनेक खेत पथार सेहो कीन लेब। देखैत छियैक रमानन बाबू टीशन पढ़ा संपैत ढ़ेरिया लेलैन आ अहा गप नाद मे ओझराएल रहैत छी। गजानन बजलाह हे यै कोइलख वाली अहा सपना तपना देखैत छीएक टीशन तहू मे मैथिली के। इ सुनि काकी मुह चमकबैत बजलीह हे महादेव कनि अहि हिनका मति दियऔन। एतबाक मे गजनान बाबू फुफकार छोरैत बजलाह अईं यै अहा महादेव के किएक कहैत छियैन देखैत छियै महादेवक कृपा सॅ हम मैथिली स फस्ट डीविजन मे बी ए पास केने छी त आब की। काकी बजलीह यौ बाबू सोझहे डिग्री टा लेला स की होइत की ओकर किछू सार्थक काज सेहो हेबाक चाहि। देखैत छियैक आब लोग मैथिलियो पढ़ि कल्कटर लेखक भाषाविद् बनि रहल अछि मुदा अहॉ के मैथिली पढ़ाएब मे कोन मासचरज लगैए से नहि जानि। गजानन बाबू गमछा स देह कुरियबैत बजलाह यै कोइलख वाली ज अहा कहैत छी त हम कनेक रमानन बाबू स विचार पूछने अबैत छी ओ एतेक दिन स टीशन पढ़ा रहल छथि हुनका स परमार्श लेनै नीक रहत। काकी बजलीह जाउ अहॉ यै जल्दी जेब्बो टा करू अहॉ बड्ड ठेलीयाह आ कोंरहियाठ भ गेलहू। गजानन हॅफैत हा हा हा क बजलाह हइए हम एखने जा रहल छी कहू त नीक काज मे एतेक देरी किएक। रमानन बाबू विद्यार्थी सभ के पढ़बैत रहैथ की तखने गजानन धरफराएल ओतए पहुचलाह आ बजलाह कि औ सर किछू हमरो जोगार धरा दियअ। हुनका देखैत मातर रमानन बाबू बजलाह ओ हो मिस्टर गजानन कम कम मोस्ट वेलकम। गजानन पानक पीक फेकि बजलाह अपन लंगोटिया यार भ मैथिली मे बजबह त अंग्रेजी झारै मे लागल छह। इ सुनि रमानन बाबू बजलाह ओ मिस्टर गजानन प्लीज स्लोली स्टूडेंट इज हियअर सो प्लीज वेट। गजानन बजलाह रौ दोस इ वेट फेट छोड़ आ हमरो गप पर घियान दहि। इ गप सुनि रमानन बाबू विद्यार्थी सभ के ज्िल्दए छुट्टी दए देलखिहिन ओ सभ चल गेल। तकरा बाद रमानन बाबू रमानन बाबू बजलाह अई रौ गजानन तहू हरदम धरफराएल अबैत छैं कह की गप किएक एतेक अपसिंयात छैं। गजानन बजलाह रौ भाइ की कहियौह तोहर भाउज कहिया स हुरपेट रहल अछि जे टीशन किएक नहि पढ़बैत छी मुदा हमरा त किछू ने फुरा रहल अछि की करू। ओ बजलाह भाउज ठीके त कहि रहल छौ रौ दोस। गजानन बजलाह तोहि कह ने भाइ एखुनका एडभांस युग मे अगबे मैथिली के पढ़त एखन त जतए देखहि अंग्रेजी सीखू के बोर्ड लागल रहैत छैक तहू मे पहिने सीख लियअ फिस 15 दिन बाद दियौअ सेहो स्कीम रहैत छै । एना मे छौड़ा मारेर सेहो खाली अंग्रेजी स्पोकन मे नााम लिखा रहल अछि अपना भाषा स कोन काज छैक ओकरा। रमानन बाबू बजलाह से त ठीके मुदा भाइ तू चिता जूनि कर मैथिली संगे अंग्रेजी फ्री क दिहैक त तोरो बिक्री बट्टा भ जेतौह। गजानन हफैत बजलाह भाइ फरिछा के कह हम अपसियात भेल छी आ तू गप मारि रहल छैं। तखन रमानन बजलाह नहि रौ भाइ ठीके कहि रहल छियौ देखहि आइ काल्हि त देखते छिहि एकटा समान संगे एकटा फ्री देबही तबे किछु बिक्री हेतौह। तू मैथिली पढ़बहिए आ हम तोरे कोचिग मे आबि के फ्री मे अंग्रेजी पढ़ा देबै त तोरो काज हलूक भए जेतौ। ई सुनि गजानन खुशि स मोने मोन नाचए लगलाह आ हॅफैत हा हा के हसैत बजलाह हइए हम एखने चललियौ रौ भाइ जाइत छियैक हम आइए अपना घर के आगू मे मैथिली स्पोक मे बरका टा बोर्ड टांगि देबै आ ओहि बोर्ड मे लिख देबै मैथिली संगे अंग्रेजी फ्री मे सीखू। गजानन ओतए स आपीस आबि घरक आगू मे बरिका टा बोर्ड लगौलैन। सलीम आ डैनी दुनू गोटे कपरा किनबाक लेल फटफटिया पर बैसी बजार जाइत रहै की सलीम बाजल भाइ हमरा त मैथिली सीखने का मन करैत अछि। एतबाक सुनि डैनी खूम जोर स हसैत बाजल ए भाइ अहा के दिमाग सठिया गया है की भगैठ गया है। कहू त सभ अंग्रेजी सीखता है आ बम्बई जैसन शहर मे अहा मैथिली सीखेगा। सलीम बाजल भाई अहा एतेक देरी स कोनो गप किएक बुझता है। हम सभ परदेश मे रहकर कमाइत छी लेकिन अप्पन भाषा ठीक से नहि बोलता है। कहू हम अहा यदि नहि बजेगा त आन लोक सभ केना बुझहेगा। फेर अप्पन भाषा संस्कृति के बिकास केना होगा। देखिए त मराठी सभ ओ अपना भाषा पहिने बजता है तब दोसर ठाम के भाषा। ई सुनि डैनी बाजल भाई अहा ठीके कहता है आब त हमरो मन होता ह ैजे मैथिली सीखेगा आ अपना धिया पूता के सेहो कहेगा जे मैथिली सीखू। फेर ओ सीविल सेवा के तैयारी सेहो कर सकता है। सलीम बाजल त देरी किएक करता है भाइ चलू ने अभिए मैथिली वला मामू के ताकि लेता है। दुनू गोटे फटफटिया फटफटबैत बिदा भेल। सलीम फटफटीय चलबै मे मगन रहैए आ डैनी तकैए मे डैनी अचके खूम जोर स हसैए लागल ओ हो भाइ मैथिली वला मामू के त देख लिया। सलीम बाजल कतए कतए जल्दी देखाउ। डैनी फेर हॅसैत बाजल भाइ अहा के आखि चोनहरा गया है कि हइए अपने आखि से देखू ने मैथिली स्पोकन के बोर्ड। सलीम तुरंत फटफयिा बंद कए उतरल बोर्ड देखि के बाजल ठीके मे भाइ अई ठाम त मैथिली संगे अंग्रेजी सेहो फ्री है त चलिए ने मामू के खोज पूछारी करिए लेता है। गजानन बाबू कतेक दिन स विद्यार्थी सबहक बाट देखि रहल छलाह बैसल बैसल आंेघहि स झुकि रहल छलाह कि तखने सलीम आ डैनी हरबराएल पहुचल। सलीम बाजल ओ मामू ओ मामू कि एतबाक मे गजानन अकचकाइत चहाक दिस उठलाह। सलीम बाजल हमरा मैथिली सीखने का मन है इ कहू मैथिली सीखाने वला मामू अहि है की। गजानन हरबड़ाइत बजलाह हम कोनो मामू वामू नहि छी हम त मैथिलीक मास्टर छी। डैनी बाजल अच्छा ठीक छै अहॉ कतेक पाई लेगा से कहू। गजानन बजलाह अहा दुनू गोटे पढ़नाइ शुरू करू तकरा बाद फीस अपना मन स दए देबै। इ सुनि सलीम बाजल भाई मामू त बड्ड नीक आदमी है जे बम्बई मे मैथिली सीखा पढ़ा देगा। अच्छा हम दुनू गोटे काल्हि स टीशन पढने आएगा। एतबाक मे गजानन बजलाह रूकू ने चाह पी लियअ त जाएब। डैनी बाजल नहि मामू हम सभ काल्हि स पढने आएगा त अहॉ के लिए चाह बिस्कुट सेहो नेने आएगा। बेस अखैन हम सभ चलता है प्रणाम। ओ दुनू गोटे चलि गेल कि एतबाक मे कोइलख वाली काकी बजार स तीमन तरकारी किनने आपीस एलीह की गजानन चौअनिया मुसकान बजलाह आइ त कि कहू कमाल भए गेलैए। काकी बजलीह मारे मुह धके अईं यै कोन खजाना हाथ लागि गेल जे खुशि स एक्के टागे नाचि रहल छी। हे यै कि कहू आइ दू टा विद्यार्थी मैथिली पढ़बाक गप कए के गेल काल्हि स ओ सभ टीशन पढ़ै लेल आउत। काकी आश्चर्य स अकचकैत बजलीह गे माए गे अहॉक कोचिग मे विद्यार्थी कहिया स यै। इ सुनि गजानन गरजैत बजलाह विद्यार्थी हमरा कोचिंग मे नहि त की अहाक रसोइ मे चाह बनेबाक लेल औतैह। काकी बजलीह हे यै हमही बिचाार देलहू आ अहा हमरे पर खउंझा रहल छी। एतबाक मे गजनान खूम जोर स हा हा के हसैत बजलाह यै कोइलख वाली आब अहा देखैत जाउ मैथिली स्पोकन के कमाल आब कनि अहू टीशन पढ़ि लेब। काकी बजलीह ह यै किएक नहि हम त कहैत छी मैथिली पढ़ू लोके के सिखाउ आ अपनो मैथिली सीखू। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। जगदीश प्रसाद मण्डल झमेलिया बियाह (नाटक) चारिम दृश्य (भागेसर दरबज्जा सजबैत। बहाड़ि-सोहाड़ि चारिटा कुरसी लगौलक। कुरसी सजा भागेसर चारूकात निहारि-निहारि गौर करैत। तहीकाल बालगोविन्द आ राधेश्यामक प्रवेश।) भागेसर- आउ, आउ। (कुरसीपर तीनू गोरे बैसैत।) बालगोविन्द- (राधेश्यामसँ।) बौआ, बेटी हमर छी, वहीन तँ तोरे छिअ। अखन समए अछि तँए......? भागेसर- अपने दुनू बापूत गप-सप्प करू। (उठि कऽ भीतर जाइत।) राधेश्याम- अहाँक परोछ भेने ने......। जाबे अहाँ छिऐ, ताबे हम.....। भागेसर- नै, नै। परिवारमे सभकेँ अपन-अपन मनोरथ होइ छै। चाहे छोट भाए वा बेटाक वियाह होउ आकि बेटी-बहीनक होउ। राधेश्याम- हँ, से तँ होइते अछि। मुदा अहाँ अछैत जते भार अहाँपर अछि ओते थोड़े अछि। तखन तँ बहीन छी, परिवारक काज छी, कोनो तरहक गड़बड़ भेने बदनामी तँ परिवारेक हएत। बालगोविन्द- जाधरि अंजल नै केलौंहेँ ताधरि दरबज्जा खुजल अछि। मुदा से भेलापर बान्ह पड़ि जाइत अछि। तँए......? राधेश्याम- हम तँ परदेश खटै छी। शहरक बेबहार दोसर रंगक अछि। गामक की बेबहार अछि से नीक जकाँ थोड़े बुझै छी। मुदा तैयो......? बालगोविन्द- मुदा तैयो कि? राधेश्याम- ओना तँ बहुत मिलानीक प्रश्न अछि मुदा किछु एहेन अछि जेकर हएब आवश्यक अछि? बालगोविन्द- आब कि तोहूँ बाल बोध छह, जे नै बुझबहक। मनमे जे छह से बाजह। मन जँचत कुटुमैती करब नै जँचत नै करब। यएह तँ गुण अछि जे अल्पसंख्यक नै छी। राधेश्याम- कि अल्पसंख्यक? बालगोविन्द- जइ जातिक संख्या कम छै ओकरा संगे बहुत रंगक बिहंगरा ठाढ़ होइत अछि। मुदा जइ काजे एलौंहेँ तेकरा आगू बढ़ाबह। कि कहलहक? राधेश्याम- कहलौं यएह जे कमसँ कम तीनक मिलानी अवस होइ। पहिल गामक दोसर परिवारक आ तेसर लड़का-लड़कीक। बालगोविन्द- जँ तीनूक नै होइ? राधेश्याम- तँ दुइयोक। बालगोविन्द- जेहने अपन परिवारक बेबहार छह तेहने अहू परिवारक अछि। गामो एकरंगाहे बुझि पड़ैए। लड़का-लड़की सोझेमे छह। राधेश्याम- तखन किअए काज रोकब? (जगमे पानि आ गिलास नेने भागेसर आबि, टेबुलपर गिलास रखि पानि आगू बढ़बैत। गिलास हाथमे लऽ।) बालगोविन्द- नीक होइत जे पहिने काजक गप अगुआ लेतौं। भागेसर- अखन धरि अहूँ पुरने विध-बेबहारमे लटकल छी। कुटुमैती हुअए वा नै मुदा दरबज्जापर आबि जँ पानि नै पीब, ई केहन हएत? (पानि पीबैत। तहीकाल झमेलिया चाह नेने अबैत। पानि पिआ दुनू गोटेकेँ चाहक कप दैत भागेसर अपनो कुससीपर बैस चाह पीबए लगैत।) बालगोविन्द- समए तेहन दुरकाल भऽ गेल जे आब कथा-कुटुमैतीमे कतौ लज्जति नै रहैए। बेसीसँ बेसी चारि-आना कुटुमैती कुटुमैती जकाँ होइए। बारह आनामे झगड़े-झंझट होइए। भागेसर- हँ, से तँ देखते छी। मुदा हवा-बिहाड़िमे अपन जान नै बँचाएब तँ उड़ि कऽ कतएसँ कतए चलि जाएब, तेकर ठेकान रहत। बालगोविन्द- पैछला लगनक एकटा बात कहै छी। हमरे गामक छी। कुल-खनदान तँ दबे छलनि मुदा पढ़ि-लिख परिवार एते उन्नति केने अछि जे इलाकामे कियो कहबै छथि। भागेसर- वाह। बालगोविन्द- लड़को-लड़की उपरा-उपरी। कमसँ कम पचास लाखक िबयाहो भेल छलै। मुदा खाइ-पीबै बेरमे तते मािर-दंगा भेल जे दुनूकेँ मन रहतनि। भागेसर- मारि किअए भेल? बालगोविन्द- पुछलियनि ते कहलनि जे वियाह-दानमे कोनो रसे नै रहि गेल अछि। लड़काबला सदिखन लड़कीबलाकेँ निच्चा देखबए चाहैत तँ सरियाती बरियातीकेँ। अही बीचमे रंग-विरंगक बखेरा ठाढ़ कऽ मारि-पीट होइए। भागेसर- एहेन बरियातीमे जाएबो नीक नहि। बालगोविन्द- सज्जन लोक सभ छोड़ि देलनि। मुदा तैयो कि बरियाती कम जाइए। तते ने गाड़ी-सवारी भऽ गेल जे हुहुऔने फिरैए। भागेसर- खाइर, छोड़ू दुनियाँ-जहानक बात। अपन गप करू। बालगोविन्द- हमरेसँ पुछै छी। कन्यागत तँ सदति चाहै छथि जे एकटा ऋृण उताड़ैमे दोसर ऋृण ने चढ़ि जाए। अपने लड़काबला छिऐ। कोना दुनू परिवारक कल्याण हएत, से तँ......? भागेसर- दुनियाँ केम्हरो गुड़ैक जाउ। मुदा अपनोले तँ किछु करब। आइ जँ बेटा बेच लेब तँ मुइलापर आगि के देत। बेचलाहा बेटासँ पैठ हएत। बालगोविन्द- कहलिऐ तँ बड़बढ़िया। मुदा समाजक जे कुकुड़चालि छै से मानता दुनू परिवार मिल-जुलि काज ससारि लेब। मुदा नढ़िया जकाँ जे भूकत तेकर कि करबै? भागेसर- हँ से तँ ठीके, पैछलो नीक चलनि आ अखुनको नीक चलनि अपना कऽ अधला चलनि छोड़ देब। किअए कियो भूकत। जँ भूकबो करत तँ अपन मुँह दुखाओत। (बरक रूपमे झमेलिया) बालगोविन्द- बेटा-बेटीक वियाहमे समाजक पाँचो गोटे तँ रहैक चाहिऐ ने? भागेसर- भने मन पाड़ि देलौं। घरे-अंगना आ दुआरे-दरबज्जापर तते काज बढ़ि गेल जे समाज दिस नजरिये ने गेल। बालगोविन्द- आबे कि भेल, बजा लिऔन। समाजकेँ तँ लड़का देखले छन्हि, हमहूँ दुनू बापूत देखिये लेलौं। भागेसर- केहन लड़का अछि? बालगोविन्द- एते काल बटोही छलौं तँए बटोहिक संबंध छल। मुदा आब संबंध जोड़ैक विध शुरू भऽ गेल तँए संबंधी भेल जा रहल छी। भागेसर- कि कहू बालगोविन्दबाबू, जिनगिये तते रिया-खिया कऽ बेलक जकाँ बनि गेल छी। बालगोविन्द- (ठहाका मारि) समधि एक भग्गू कहलिऐ। छोटोसँ पैघ बनैए आ पैघोसँ छोट बनैए। छोट-टोट कीड़ी-मकौरी समैक संग ससरैत-ससरैत नमहर बनि जाइए। तहिना कलकतिया आकि फैजली आम सरही होइत-होइत तेहन भऽ जाइए जे बिसवासे ने हएत जे ई फैजली बंशक बड़वड़िया बीजू छी। भागेसर- बालगोविन्दबाबू, गप-सप्प चलिते रहत समाजोकेँ बजा लइ छियनि।(समाज दिस नजरि दोड़बैत भागेसर आंगुरपर हिसाब जोड़ैत..) ओह फल्लां दोगला अछि। (पुन: आंगुरपर जोड़ि) ओह फल्लां तँ दुष्ट छी दुष्ट। फल्लां पक्का दलाल छी। साला बेटी वियाहक बात बना रोजगार खोलने अछि। परिवारक बीच जाति होइए आकि समाजक बीच। जेकर विचर नीक बाटे चलै ओ किअए ने समाज बनावे। बालगोविन्द- समधि, किअए अटकि गेलौं? भागेसर- बालगोविन्दबाबू, लोक तँ समाजेमे रहि समाजक संग चलत मुदा वियाह सन पारिवारिक यज्ञमे जँ समाजक लोक धोखा दइ तखन? बालगोविन्द- समधि कहलौं तँ बेस बात, मुदा जहिना ई समाज अछि तहिना ने ओहो अछि। ठीके कहलौं जे वियाह सन काज जइसँ समाज एक अलंग ठाढ़ होइत तइमे उचक्का सभक उचकपन्नी आरो सुतरैए। बड़-कनियाँक देखा-सुनीसँ लऽ कऽ सिनुरदान धरि किछु ने किछु बिगाड़ैक कोशिश करबे करैए। भागेसर- एकटा बात मन पड़ि गेल। भाए-बहीनिक बीचक कहै छी। (भागेसरक बात सुनि राधेश्याम चौंक गेल..) राधेश्याम- कि कहलखिन भाए-बहीनि। भागेसर- बाउ, अहाँक तँ बहीन छी। भाए-बहीनिक बीच बरावरीक जिनगी हेबाक चाही से तेहन-तेहन वंशक बतौर सभ जन्म लेने जाइऐ जे......? राधेश्याम- की जे? भागेसर- अपन पड़ोसीक कहै छी। सौ-बीघाक परिवारमे पाँच भाए-बहीनिक भैयारी। बीस बीघा माथपर भेल। बहीन सभसँ छोट। सौ बीघा स्तरक लड़कीकेँ दू बीघाबला परिवारमे भाए सभ वियाहि देलक। राधेश्याम- पिता नै बुझलखिन? भागेसर- सएह ने कहै छी। पिता जँ पुत्रपर विसवास नै करथि तँ किनकापर करथि। तते चढ़ा-उतड़ी चारू बेटा देलकनि जे पिता अपन भारे सुमझा देलखिन। बेटा सभ केहन बेइमान जे बहीनिक कोढ़-करेज काटि अपन कनतोड़ी सजबए लगल। राधेश्याम- पछातियो पिता नै बुझलखिन? भागेसर- बुझिये कऽ कि करथिन। मुइने एला बैद तँ किदनकेँ के जेता। राधेश्याम- बड़ अन्याय भेल! भागेसर- अन्याय कि भेल अन्याय जकाँ। ओही सोगे माए जे ओछाइन धेलखिन से धेनेहि रहि गेलखिन। पितो बौरा कऽ वृन्दावन चलि गेलखिन। राधेश्याम- बाबू, जहिना माए-बापक बेटी- छियनि तहिना बहीन हमरो छी। ओना खाइ-पीबै आ लत्ता-कपड़ाक दुख अखन धरि नहिये भेलै, मुदा आगूक तँ नै कहि सकै छियनि। दिन-राति माइयक संग काज उदम रहैए। माइयक समकशत नै भेल मुदा दू-चारि सालमे भइये जाएत। सभ सीख-लिख माइयेक छै। भागेसर- अहाँ कतऽ रहै छिऐ? राधेश्याम- ओना बाहरे रहै छी। मुदा आन बहरबैया जकाँ नै जे गाम-घर, सर-समाज छोड़ि देलौं। जे कमाइ छी परिवारमे दइ छिऐ। बालगोविन्द- समैध अबेर भऽ जाएत। कम-सँ-कम पाँचटा बच्चोकेँ शोर पाड़ियौ। अदौसँ अपना ऐठामक चलनि अछि। (गुरूकूलक अध्ययन समाजक काजक अनुकूल होएत) (दरबज्जेपर सँ भागेसर बच्चा सभकेँ शोर पाड़लखिन..) (पाँच सातटा बच्चा अबैत अछि..) एकटा बच्चा- झमेलिया भैयाक वियाह हेतै कक्का? भागेसर- हँ। बच्चा- बरियाती हमहू जेबे करब। भागेसर- तोरो लऽ जाए पड़तौ। बच्चा- लऽ जाएब। पटाक्षेप @ पाँचम दृश्य (बालगोविन्दक घर। पत्नी दायरानीक संग बालगोविन्द बैसल..) बालगोविन्द- ओना जे बात भेल तइसँ कुटुमैती हेबे करत। मुदा समए-साल तेहन भऽ गेल जे वियाहो मड़बासँ लड़का रूसि-फुलि कऽ चलि जाइए। दायरानी- हँ, से तँ होइए। मुदा जहिना कुत्ता-बिलाइकेँ धिया-पुता खेनाइ देखा फुसला कऽ लऽ अनैए तहिना मनुखो फुसलबैक ने.....? बालगोविन्द- नै बुझलौं। कनी फड़िछा दियौ। दायरानी- कोन काज सिरपर अछि आ कोन काज लधए चाहै छी। जखने सिरपड़क काज छोड़ि छोड़ि दोसर काजमे लागब तखने घुरछी लगए लागत। जखने घुड़छी लागत तखने काज ओझरा-पोझरा जाएत। बालगोविन्द- तखन? दायरानी- जतेटा आ जेहन काज रहए ओइ हिसाबसँ काज सम्हारि ली। अखन वियाहक काज अछि तँए घटक भायकेँ बजा सभ गप कहि दियनु। बालगोविन्द- अपनो विचार छल भने अहूँ कहलौं। दायरानी- युग-जमाना अकानि कऽ चलैक चाही। जँ से नै करब तँ पाओल जाएब। बालगोविन्द- कहलौं तँ बेस बात मुदा एहनो तँ होइ छै जे गाममे जखन चोर चोरी करए अबैए तखन ठेकयौने रहैए कताै आ अपनेसँ हल्ला दोसर दिस करैए। लोक ओमहर गेल आ खाली पाबि चोर ठेकियेलहा घरमे चोरी कऽ लइए। दायरानी- हँ, से तँ होइए। मुदा बेसी पिंगिल पदने तँ काजो पछुआइये जाइए। तँए ओते अगर-मगर नै करू। एतबो नै आँखि अछि जे देखबै। बालगोविन्द- कि देखबै? दायरानी- बिना घटक्के केकर वियाह होइ छै। समाजमे जखन सभ करैए तखन अपनो नै करब तँ ओहो एकटा खोटिकरमे हएत किने। बालगोविन्द- कि खोटिकरमा? दायरानी- अनेरे लोक की-कहाँ बाजत। तहूमे जेकर जीविका िछऐ ओ अपन मुँह किअए चुप राखत। छोड़ू ऐ-सभ गपकेँ। जाउ अखने घटक भायकेँ हाथ जोड़ि कहबनि जे बेटी तँ समाजक होइ छै, कोनो तरहेँ समाजक काज पार लगाउ। बालगोविन्द- (बुदबुदाइत) कतऽ नै दलाली अछि। एक्के शब्दकेँ जगह-जगह बदलि-बदलि सभ अपन-अपन हाथ सुतारैए। तखन तँ गरा ढोल पड़ल अछि, बजबै पड़त। दायरानी- बजैत दुख होइए। अगर जँ लोक अपनो दिन-दुनियाँक बात बुझि जाए तैयौ बहुत हेतइ। खाइर, देरी नै करू, बेरू पहर ओ सभ औता, अखुनका कहल नीक रहत। तँए अखने कहि अबियौन। (घटक भाइक दलानपर बैस जोर-जोरसँ पत्नीकेँ कहै छथि। आंगनसँ पत्नी सुनति छथि..।) घटक भाय- समए कतऽ-सँ-कतऽ भागि गेल आ डारिक बिढ़नी छत्ता जकाँ समाज ओतै-कऽ-औते लटकल अछि। आब ओ जुग-जमाना अछि जे बही-खाता लऽ बैसल रहू आ आमदनी कतऽ तँ सवा रूपैया। बाप रे, समैमे आगि लागि गेल। पत्नी- (अंगनेसँ) ओहिना डिरिआएब। रखने ने रहू बेटाकेँ चूड़ा-दही खाइले। जेकर बेटा कमासुत छै ओकरा देखै छिऐ जे कतऽ-सँ-कतऽ आगू चलि गेल। सपनोँ सपनाएल रही जे बड़दक संगे भरि दिन बहैबलाक बेटा ट्रेक्टरक ड्राइवरी करतै। दू-सेरक जगह दू हजारक परिवार बना लेतै। (बालगोविन्दकेँ देख घटक भाय दमसि कऽ खखास करैत। घटक भाइक खखास सुनि पत्नी बुझि गेलखिन। अपन बातकेँ ओतै रोकि देलनि।) बालगोविन्द- गोड़ लगै छी भाय। घटक भाय- जीबू-जीबू। भगवान खेत-खरिहान, घर-दुआर भरने रहथि। एहनो समैकेँ अहाँ नहिये गुदानलियनि। अहाँ सन-सन लोक जे समाजमे भऽ जाथि तँ कतऽ-सँ-कतऽ समाज पहुँच जाएत। बालगोविन्द- भाय, सिरपर काज आबि गेल। तँए बेसी नै अटकब। घटक भाय- केहन काज? बालगोविन्द- बेटीक वियाह करब। वए लड़की देखए वरपक्ष आबि रहल छथि। तहीले....! घटक भाय- अहाँकेँ नै बुझल अछि जे अही समाज लेल खुन सुखा रहल छी। कि पागल छी। जेकरा लूरि ने भास छै से शहर-बजार जा-जा महंथ बनल अछि आ हम समाज धेने छी। बालगोविन्द- हँ, से तँ देखते छी। तँए ने......। घटक भाय- अच्छा बड़बढ़िया। ओना हम अपनो कानपर राखब मुदा बुझिते छी जे दस-दुआरी छी। जँ कहीं दोसर दिस लटपटेलौं तँ विसरियो जा सकै छी। तँए अबैसँ पहिने ककरो पठा देबै। बालगोविन्द- बड़बढ़िया। जाइ छी। घटक भाय- ऐह, एहिना कना चलि जाएब। एते दिन ने लोक तमाकुले बीड़ीपपर दरबज्जाक इज्जत बनौने छलै मुदा आब ओइसँ काज थोड़बे चलत। िबना चाह-पीने कोना चलि जाएब? बालगोविन्द- अहाँकेँ कि अइले उपराग देब। बहुत काज अछि। तँए माफी मंगै छी अखन छुट्टिये दिअ। (बालगोविन्द विदा भऽ जाइत..) घटक भाय- (स्वयं) भगवान बड़ीटा छथिन। जँ से नै रहितथि तँ पहाड़क खोहमे रहैबला कोनो जीवैए। अजगरकेँ अहाार कतऽ सँ अबै छै। घास-पातमे फूल-फड़ केना लगै छै....। (बालगोविन्दक दरब्ज्जा। चौकीपर ओछाइन बिछाएल। बालगोविन्द- सभ किछु तँ सुढ़िया गेल। कने नजरि उठा कऽ देखहक जे किछु छुटल ने तँ...। राधेश्याम- (चारू कात नजरि खिड़बैत..) नजरिपर तँ किछु ने अबैए। (कने बिलमि) हँ, हँ, एकटा छुटल अछि। पएर धोइक बेबस्था नै भेल। बालगोविन्द- बेस मन पाड़ि देलह। तँए ने नमहर काज (परिवारक अगिला काज) मे बेसी लोकसँ विचार करक चाही। दसेमे ने भगवान वसै छथि। जखने दसटा आँखि दस दिस घुमै छै तखने ने दसो दिशा देख पड़ै छै। (भागेसर आ यशोधरक आगमन..) बालगोविन्द- हिना समय देलौं तहिना पहुँचिओ गेलौं। पहिने पएर-हाथ धो लिअ तखन निचेनसँ बैसब। भागेसर- तीन-कोस पएरे अबैमे मनो किछु ठेहिया जाइ छै। (दुनू गोटे पएर-हाथि धोइतेकाल घटक भाइक प्रवेश..) घटक भाय- पाहुन सभ कहाँ रहै छथि? बालगोविन्द- भाय, नवका कुटुम छथि। ओना अखन रीता (बेटी) वियाह करै जोकर नहिये भेल छै, मुदा ऐ देहक कोनो ठेकान अछि। बेटा-बेटीक वियाह तँ माए-बापक कर्ज छी। अपना जीवैत कतौ अंग लगा देने भगवानो घरमे दोखी नै ने हएब। घटक भाय- कुटुम, अपना एेठामक जे वुद्धि-विचार अछि ओ दुनियाँमे कतऽ अछि। एक-एक काज ओहन अछि जेहन पत्थर-कोइलाक ताउमे धिपा लोहाक कोनो समान बनैत अछि। भागेसर- हँ, से तँ अछिये। घटक भाय- अपने ऐठाम खरही आ ठेंगासँ लड़का-लड़की (वर-कन्या)केँ नापि वियाह होइत अछि। यशोधर- आब ओ बेबहार उठि गेल। घटक भाय- हँ, हँ, सएह करै छी। बेबहार तँ उठि गेल मुदा ओइ पाछु जे विचार छल से नै ने मरि गेल। विचारवानक बराबरीक अन्न तँ वएह ने छियनि। राधेश्याम- काका, कने फरिछा दियौ। एक तँ नव कवरिया छी तहूमे परदेशी भेलौं। घटक भाय- बौआ, तोहूँ बेटे-भतीजे भेलह। बहुत पढ़ल-लिखल नहिये छी। लगमे बैसा-बैसा जे बाबा सिखौलनि से कहै छिअ। तहूँमे बहुत विसरिये गेलौं। राधेश्याम- जे बुझल अछि सएह कहियौ। घटक भाय- समाजमे दुइओ आना एहन परिवार नै अछि जिनका परिवारमे बच्चाक टिप्पणि बनै छन्हि। बाकी तँ बाकिये छथि। अदौसँ लड़का अपेक्षा लड़की उम्र कम मानल गेल। जकरा तारीख-मड़कूमामे नै नापमे मानल गेल। राधेश्याम- जँ दुनूमे सँ कोनो बढ़नगर आ कोनो भुटारि हुअए, तखन? घटक भाय- बेस कहलह। तँए ने अव्यवहारिक भऽ गेल। सदिखन समाजकेँ आँखि उठा अहितपर नजरि राखक चाहिये। भागेसर- हँ, से तँ चाहबे करी। मुदा विचारलो बात तँ नहिये होइ छै। घटक भाय- बेस बजलौं। ऐमे दुनू दोख अछि। विचारनिहारोकेँ विचारैमे गड़बड़ होइ छन्हि आ राजादैवक (प्रकृति नियम) दोख सेहो होइत अछि। अखने दिखियौ गोर-कारी रंगक दुआरे कते संबंध नै बनि पबैत अछि। एतबो बुझैले लोक तैयार नै जे मनुष्य रंगसँ नै गुणसँ बनैत अछि। यशोधर- हँ, से तँ होइते अछि। हमरो गाममे हाथमे सिनुर लेल बरकेँ बरक बाप गट्टा पकड़ि घिचने-घिचने गामे चलि गेल। घटक भाय- की कहू कुटुम नारायण देखैत-देखैत आँखि पथरा रहल अछि। मुदा अछैते औरूदे उरीसक दवाइ पीब उरीसे जकाँ मरिये जाएब से नीक हएत। तहिना देखब जे कुल-गोत्रक चलैत कुटुमैती भङठि जाइए। यशोधर- हँ, से तँ होइए। घटक भाय- देखियौ, अपना बहुसंख्यक समाजमे अखनो धरि मुँहजवानियेक कारोबार चलि आबि रहल अछि। जइ नीक-अधला बेरबैक विचार गड़बड़ा गेल। जते मुँह तते बात। जइठाम जे मुँहगर तइठाम तेकरे बात चलत। चाहे ओ नीक होय कि अधला। यशोधर- कनी नीक जकाँ बुझा कऽ कहियौ? घटक भाय- (बालगोविन्द दिस देख..) बालगोविन्द, आइ तँ कुटुम-नारायण सभ रहता किने? बालगोविन्द- एक तँ अबेर कऽ एलाहेन। तहूमे अखन धरि तँ आने-आने गप-सप्प चलल। काज पछुआएले रहि गेल अछि। घटक भाय- आइ तँ कनियेँ देखा-सुनी हएत किने? बालगोविन्द- हँ। मुदा वियाहसँ तँ बिध भारी होइए किने! घटक भाय- हँ। से तँ होइते छै। अखन जाइ छी। काल्हि सवेरे आएब। तखन जना-जे हेतइ से हेतै। भागेसर- काज जँ ससरि जाइत तँ चलि जैतौं। घटक भाय- एहनो जाएब होइ छै। जखन कुटुमैती जोड़ि रहल छी तखन एना धड़फड़ेने हएत। पटाक्षेप क्रमश: ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। बिपिन झा, IIT Bombay कलौ चण्डी महेश्वरौ Bipin Kumar Jha Senior Research Fellow, Teaching Assistant Cell for Indian Science and Technology in Sanskrit HSS, IIT, Bombay https://sites.google.com/site/bipinsnjha/home मिथिलांचल सतत सर्वदेवोपासक रहल अछि एतय कोनो देवता के कम महत्त्व नहिं देल जाइत छन्हि चाहे ओ अग्नि होइथ अथवा लक्ष्मी। एहि लीक सँऽ किछु हटि के हम दुर्गा आ महादेब के किछु विशेष स्थान भेटल छन्हि। कदाचित् कलयुग ई दुनू देवता जनसामान्य के पीडा जल्दी दूर करैत छथिन्ह। खैर जे हो ई तऽ बच्चहिं सँ सुनैत रहल छी “पढो भई चण्डी जैह से हण्डी” मैथिली साहित्यो एकर बहुत नीक टिप्पणी केने अछि-“जे सभ दुर्गापाठ अशुद्धो रटि कें गेल कलकत्ता, गाम अबैत देरी ओ लगबय लागल कित्ता॥” एहि संग गाम में माटिक महादेब केर पूजा तऽ कदाचिते कोनो एहेन घर होयत जत नहिं होइत हो। हम एतय मधुबनी जिला केर लखनौर गाम में बस्ती सँऽ लगभग डेढ कि०मी० दूर निर्जन में लगभग चौदह सीढी नींचा में करमहे झांझारपुर मूलक वत्सगोत्रीय मैथिलश्रोत्रिय सभक आराध्यदेव अंकुशी महादेब केर चर्चा कय रहल छी। ई स्थान आब तऽ सडक मार्ग सऽ जुडि गेल अछि मुदा अखनहु ओतय सायंकाल देबाक समय पंडा केर अतिरिक्त कोई नहि भेटैत अछि। एहि महादेब के योगीश्वर बाबा लक्ष्मीनाथ गोसाईं लखनौर में राधाकृष्ण मन्दिर प्रांगण में स्थापित करय चाहैत छलाह अस्तु ओहि निर्जन सँ शिवलिंग के उखारबाक प्रयास करय लगलाह। भरि हाथ कोरथि मुदा महादेब पीडी भरि मात्र। फेर कोरथि फेर ओहने हाल। ओ अन्त में लगभग १०-१५ हाथ कोरने हेता कि महादेब कहलखिन्ह जुनि कोर हम त निर्जन में रहनहार छी हम एतहि संऽ गामक रक्षा करबह। ओहि दिन सँऽ लखनौर गाम पूर्व स राधाकृष्ण पश्चिम स बाबा डिहबार दक्षिण स अंकुशी महादेब केर द्वारा सतत सुरक्षित अछि। बहुत बेर आपात स्थिति आयल (बाढि आदि) मुदा गामक बस्ती सुरक्षित रहल। ई गप्प अलग अछि जे नव पीढी के “विशेष पुण्य” केर प्रभावक कारण देवतो के गामक संरक्षणकार्य कदाचित भारे बुझना जाइत हेतन्हि। करमहे झांझारपुर मूलक वत्सगोत्रीय मैथिलश्रोत्रिय केर समस्त परिवारक पुरुष बच्चा के मूडन आइयो अही महादेब कें सामने होइत अछि चाहे ओ विदेश में कियाक नहिं हो। आस्था एवं तर्क दूनू केर देखि ई कहल जा सकैत अछि जे एहि प्रोफेशनल युग में सेहो त्रैलोक्य जननी भगवती दुर्गा आ अढरंढरन आशुतोष भोलेनाथ अपन प्रासंगिकता बनाके रखबाक मशक्कत करैत सफलता प्राप्त कयलथि। पुष्पदन्त अनुचित नहिं कहने छथि- जे असितगिरि समान काजर लय, समुद्ररूपी पात्र लय, देवतरुशाखा केर कलम लय, समस्त पृथ्वी रूपी पत्र पर यदि साक्षात सरस्वती सदिखनि अहाँ केर गुणगान करथि तैयो अहाँ के पार नहिं पाओल जा सकैत अछि। (आस्था आ तर्क केर अन्तर्द्वंद्व में देवताक प्रति श्रद्धाऽभाव नहिं बुझल जाय) ॥शुभमस्तु॥ ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। राजदेव मण्डल उपन्यास हमर टोल आगाँ- पंचायत! हँ, हँ बुझलौं गामक पंचैती। जातिक सरदार, मैनजन-देमान। करत छान-बान्हि। मुँहपुरूष आ सरपंचक शान। पंच भगवान। धुर, भगवान नहि बेमान। मुँह देखल पंचैती। जेकर लाठी तेकर जोर। निरबलक आँखिमे भरल नोर। कमजोरे लेल सभटा कड़ी। आब गामे-गाम बनि रहल छै-कचहरी। तैयो पंचैती होइते छै। हँ जातिक पंचैती। परजातिक पंचैती। जाति तँ जातिसँ साइंग होइत छै। दस लोकक निरणय तँ मानहि पड़तै। नै तँ समाजक नँगटाहा सभ नाँगटे नाचत। समाज, कानून, बन्धन, डण्ड जरिमाना। इनसाफक उपाए। सभकेँ निसाफ मिलबाक चाही। नै तँ कहियो गाड़ीपर नाह आ कहियो नाहपर गाड़ी। सएह यौ मड़र। कालू मड़रक दुआरिपर पंचैती भऽ रहल छै। जातिक मैनजन। हँ हँ बीचेमे बैसल छै। आँखि केना नचै छै- मुँहदुसी जकाँ। धरमडीहीयोसँ पंच सभ आएल छै। की बुझाइत छै, जगेसराकेँ, छोड़ि देतै ओहिना। ओहिदिन मारैत-मारैत थकचुन्ना कऽ देने रहै, अपना घरवारीकेँ। घरसँ भगा देलकै। आ पाछूसँ समादो पठा देलकै। जे तोहर बेटी बदचलन छौ। चोरनी छै। बाँझ छै। राखह अपना बेटीकेँ कपारपर। आ रे तोरी कऽ, एहेन डकलीलामी। धर्मडीहीवालीक बाप तीन-चारि महिना धरि टकटकी लगौने इन्तजार केलकै। कोनो कौओ-पंछी सुइध-बुइध लेबाक लेल नै पहुँचलै। अंतमे ओकर बाप जातिक मैनजनकेँ खबैर देलकै। पूरा टोलक लोक जमा भेल छै। धनुखधारी मड़र, उचितवक्ता, ढोढ़ाइ गुरूजी भुटाइ वैद, फतींगा, बिडियो साहेब, चंतनजी जेकरा सभ चोतबा कहै छै। आर बहुत गोटे कनेक पाछू दाबि कऽ बैसल छै। पाछूसँ बीख उगलि मुँह चोरा लेबामे असान होइ छै। टाटक पाछाँ स्त्रीगण कान पाथने अछि। ओ सभ आँखि नचबैत फुसुर-फुसुर कऽ रहल अछि। कालू मड़रक नजरि ओतऽ तक पहुँच गेल। “आब मौगी सभ पंचैती करत। एस.पी., डी.एस.पी. मंतरी-संतरी सभ बैनते छै। आब कोनो कम पावर छै, ओकरो पास।” दुनू हाथ जोड़ैत आगू बजल- “तब ने ओहि राित जोकरबा दुनू हाथ जोड़ि कऽ नाचमे कहैत रहै- तुम्ही हो माता, तुम्ही पिता हो।” छोड़ा सभ खिखिया कऽ हँसैत अछि। “बुढ़वा बहुत दिन धरि लात तरमे राखि राज केलहक आब सभटा पाछू दऽ कऽ बोकरेतह। धनुखधारी मड़र रपटैत अछि- “चुप, गामक इज्जत झाँपि कऽ रखबाक चाही। दोसरो गामसँ पंच सभ आएल छै। की कहतौ।” ई काल कतएसँ आबि गेलै। की हौ, कथीक धोलफच्चका भऽ रहल छै। हे रौ जा रहल छै तँ जाए दही दोसर जातिक मैनजन किएक रहतै। हँ हँ, जाउ अहाँ हमरा जातिक मामला छै। जय भगवान। ढोढ़ाइ गुरूजी घूस लेने छै। हँ-हँ, जगेसरासँ पाँच बोरा भुस्सा। विल्कुल फ्री। कतेक दिन फोकटमे चाह पीतै आ खेतै, से तँ अलगे। बजतै नै तँ घूस केना पचतै। ढोढ़ाय गुरूजी बीचमे जोरसँ गरजैत अछि- “जोरू-जमीन जोरकेँ, नै तैक किसी औरकेँ। अपना औरतियाकेँ पाँजमे रखबाक लेल जगेसरा चारि-पाँच लाठी खींचे देलकै तँ कोन जुलूम भऽ गेलै। के सभ ताजनकेँ अधिकारी होइ छै से तँ सभ जनिते छिऐ।” धरमडीहीसँ आएल कन्हैया मैनजनक कनहा आँखि जखैन चमकै छै तँ सबहक सिटी-पिटी गुम भऽ जाइ छै। ओ अपन छिड़िआएल मोंछकेँ सिटिया रहल अछि। ढोढ़ाय गुरूजीपर जखैन ओकर ललिआएल नजरि पड़ैत छै तँ तत्काल गुरूजी चुप्पी साधि लैत अछि। पाँच बोरी भुस्सा हवामे उड़ि जाइत छै। आ पेटमे बसात औनाए लगैत छै। उचितवक्तासँ नै रहल गेलै तँ टोन कसि देलकै। “धुर ई ढोढ़बा की बजत। एकरा बहूकेँ तँ दोसर जातिक धरमीलाल पंजाब लऽ कऽ भागि गेल आ अइठाम लबर-लबर करै छै।” “ई उचितवक्ता फेर टें-टें करए लगल चुप रहबें की नै।” “हे, आइ जे पंचैतीमे खचरपन्नी करबें तँ मुँह थकचुन्ना कऽ देबो।” “रौ तोरी कऽ। हमर बाप कहने रहै जे पंचैतीमे उचित बात ढेकैर कऽ बजिहेँ। आ तू मुँह थकुच देबही तँ बजबै केना। ऐ सँ नी। हम अइठामसँ चलि जाए।” बेंगाय बाबा आइ गाँजा नै पीने छै। नै तँ लौडिसपीकर जकाँ बजितै। ऊ तँ धरमडीहीवालीकेँ तरफसँ छै। जागेसर दिससँ ढेकैरतै तब ने फ्रीमे गाँजा भेटतै। धुर नै बुझबहक। ओकर नजरि गड़ल छै। जगेसराक डीहबला जमीनपर। साेचै छै कहुना झगड़ा बढ़तै तँ कम दरपर ई ढाव सुतरि जाएत। हँ आबि गेलौं खिस्सा कहैबला खिस्सकर। ई तँ खिस्सेपर पंचैती कऽ देतौ। ऊ जमाना गेलै। आब तँ जेकरा पासमे साम-दम भय-भेद छै आकरे बुत्ते पंचैती हेतै। पंचैती कारणे कते पंच बिलटि जाइत छै। जे दसगोटेमे नै बजल अछि। ठाढ़ भऽ कऽ बजैत काल ओकरा थरथरी छुबि दैत छै। “हँ तँ, आब घोंकले गप्पकेँ कतेक घोंकैत रही। सभ बात जानले अछि। करू तसफिया।” सुनियौ झटकलाल मड़रकेँ गप्प। अपन बेटी ककरा संगे भागि गेलै। तकर पत्तो नै लगलै। अच्छा छोड़ू गप्प सुन। “यादि अछि ने मड़र। पुबरिया टोलपर चुनचुन पहिलुका स्त्री पहुँच गेलै- थाना। तुरतेमे पुलिस पहुँच गेलै- दरबज्जापर। वर आ वरक बापकेँ ततेक पीठपर डण्टा बरसौलकै जे छर-छर नुआ-बस्त्रे... की कहब आब तँ वैह पहिलुकी स्त्री महरानी बनि कऽ घरमे बैसल छै।” आब तँ औरतकेँ जमाना आबि गेलै। तैयो आकरो किछु दाबि-चापि कऽ तँ राखहि पड़तै। नै तँ ऊ सनकि कऽ किछाे बनि सकै छै। एकर मतलब गाए-भैंस जकाँ आेकरा डेंगा देबै। नै हिसाब-किताबसँ। साँपो मरि जाए आ लाठियो नै टूटै। अइठाम तँ मारैत-मारैत लाठी टूटि गेलै। अपना घरवालीकेँ नै राखै चाहै छै। जागेसरसँ पूछल जाए। किछु विशेष गप्प छै। आखिर, किएक नै राखए चाहै छै, अपना स्त्रीकेँ। कारण तँ दरपन जकाँ साफे छै। चारि सालसँ बेसी भऽ गेलै आ एकोटा बच्चा नै जनमा सकलै। यएह गप्प छै ने हौ जागेसर? हँ-हँ बात तँ यएह छै, असलमे। दोसर वियाह करबाक लेल पंचायतसँ औडर भेट जाए। दोसर अपाए तँ छै नै। आखिर खनदान आ सम्पतिक रखबार तँ चाही। गुँर कतौ आ भूर कतौ। ऐ बातक कारणे झगड़ा होइत छलै। आब बुझलौं तरका गप्प। ऐमे धर्मडीहीवालीक कोन कसूर? सभ कसूर ओकरे। जखन खेत खराब छै तँ.....। फेर चुप। एक आदमी तँ दस-दसटा वियाह करै छै। यएह, डाँरमे ने डोरा बहू करत जोड़ा। सार सभकेँ खाइले तँ जुमै नै छै। आ राजा जकाँ हजार गो रानी रखत। तू गारि देबही। मार सारकेँ। हँ बाजि नै सकै छेँ। आन गामसँ आबि कऽ रँगदारी। पंच छी की डकैत। हड़कंप मचि गेलै। सभ गोटे उठि कऽ ठाढ़ भऽ गेलै। किछु लोग सभकेँ शान्त कऽ रहल अछि। भाय एनामे काज नै चलतौ। पाँचटा पंच एकान्तमे विचार कर। ने तँ महाभारत भऽ जेतौ। देखियौ पंच भगवान, ऐ छौड़ाक किरदानी। सभटा हमर लताम तोड़ि लेलक। लिअ पंचक बेटा चोर। आब करू फैसला। अच्छा चुप रहू। एकर निरलय दोसर दिन हएत। यएह करै छै केना। जेना छोटका जातिक पंचैती भऽ रहल हुअए। अइसँ नीक तँ ओकरे सभ। इह, हमरा सभसँ बहुत नीचो जाति तँ अछि! तइसँ की। आखिर छी तँ शूद्रे। चुपू हमर छूबल सभ खाइत अछि। हँ हँ छूछे ढेसी। एकान्तमे विचारि कऽ पंच सभ आबि गेल। सुनल जाए। की कहै छै। “सुनू, जागेसरसँ गलती भेलै। ओकरा औरतियाकेँ एतेक नै पिटबाक चाही। बाल-बच्चा नै होइ छै तँ ओझा-गुणीसँ देखाबौ। डागदर वैदसँ इलाज कराबौ। तैयो नै हेतैक तँ दोसर वियाह कऽ सकैत अछि। किंतु धरमडीहीवालीकेँ राखहि पड़तै। निरणय सभकेँ मंजूर अछि?” हँ-हँ, दसक निरणय, भगवानक निरणय। मंजूर अछि। सभ मानि लिऔ। ढोढ़ाय गुरूजी सोचै छै भुस्सा मिलत की नै। खेलावन भगत मोंछ पिजा रहल अछि। गाममे भगत तँ हमहींटा छी। धर्मडीहीवालीक बाप कनहा मैनजनकेँ कहने छै। “जँ अहाँ ऐ सम्बन्धकेँ नै टूटए देबै तँ जोड़ा भरि धोती देब।” ओकर बामा आँखि फड़कि रहल छै। उचितवक्ता दौड़ल आएल आ बजल- “हे यौ धर्मडीहकेँ कन्हैया मैनजन! अहाँकेँ चौबटियापर पुलिस खोजि रहल अछि। कोनो मोकदमामे नाम अछि की?” “आऍं।” मैनजन धोती सम्हारैत पड़ेलाह। एकाएकी सभ उठऽ लगल। डरक पंजा जेना बढ़ऽ लगल। सबहक अन्तरक दोख जेना ठाढ़ भऽ गेल हुअए। स्वर जेना हवामे अलोपित भऽ गेल हो किंतु पएरक गतिमे तीव्रता आबि गेल छलै। धोनाह भऽ गेल असमान दिस तकबाक ककरा फुरसति छै। क्रमश:................ ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। सुमित आनन्द कार्यशालाक आयोजन भारतीय भाषा संस्थान मैसूर तथा विश्वविद्यालय मैथिली विभाग, ल॰ ना॰ मिथिला विश्वविद्यालय, दरभंगाक संयुक्त तत्वावधानमे विश्वविद्यालय मैथिली विभागमे नेशनल ट्रांसलेशन मिशनक अन्तर्गत द्वि- दिवसीय ट्रांसलेशन ओरियेंटेशन प्रोग्रामक कार्यशालाक आयोजन 28-06-2011 तथा 29-06-2011 केँ भेल। कार्यक्रमक शुभारम्भ प्रतिभागीमेसँ श्री सुमित आनन्द एवं डॉ. लालति कुमारी द्वारा प्रस्तुत ‘जय जय भैरविसँ’ कयल गेल। एहि अवसरपर प्रो. वीणा ठाकुरक समीक्षात्मक ग्रंथ ‘वाणिनी’क लोकार्पण करैत डॉ. सुरेश्वर झा हिनका उत्कृष्ट समालोचकक रूपमे चित्रित कयलनि। कर्यक्रमक रूपरेखा प्रस्तुत करैत मैसूरसँ आयल नेशनल ट्रांसलेशन मिशनक मैथिली भाषाक मुख्य शैक्षिक सलाहकार डॉ. अजीत मिश्र कहलनि जे राष्ट्रीय स्तरपर 63 पोथीक अनुवादक निर्णय भेल अछि जाहिमे नओ गोट अंग्रेजीसँ मैथिलीमे अनुवाद कयल जायत। एहि अवसरपर चारि गोट विशेषज्ञ 28-06-11 केँ तथा चारि गोटए 29-06-11 केँ अपन-अपन विचार प्रतिभागी लोकनिक समक्ष रखलनि। एहि क्रममे डॉ. भीमनाथ झा कहलनि जे पाठ्यक्रमक पोथीक अनुवादक हेतु टीमवर्क होयब आवश्यक अछि। मैथिली, अंग्रेजीक विशेषज्ञक संग-संग विषयक विशेषज्ञ सेहो रहथि से आवश्यक। डॉ. प्रभात नारायण झा कहलनि जे अनुवाद नव खिड़की खोलैत अछि किन्तु एकरा सहज रखबाक थिक जाहिसँ मूल गप्प पाठक धरि पहुँचि सकए। एहि अवसरपर अन्य विशेषज्ञ लोकनि सेहो अपन अपन विचार रखलनि जाहिमे प्रमुख छलाह- डॉ. विजय मिश्र, ई. अशोक ठाकुर, डॉ. अरुण कुमार झा एवं अन्य। एहि क्रममे बीस गोट प्रतिभागी लोकनि उपस्थित छलाह जाहिमे प्रमुख छलाह-डॉ. नवोनाथ झा, डॉ उषा चौधरी, डॉ. अशोक कुमार मेहता, श्री अमलेंदु शेखर पाठक, श्री अमित आनन्द, श्रीमती शालिनी झा, डॉ. दुर्गानन्द ठाकुर, श्री मिथिलेश कुमार झा इत्यादि। डॉ. वीणा ठाकुरक अघ्यक्षतामे सम्पन्न समारोहमे मुख्य सहयोगी छलाह डॉ. रमण झा। कार्यक्रमक संबंधमे मैसूरसँ आयल श्री पवन कुमार चौधरी सेहो एहि ट्रांसलेशन मिशनक उद्देश्यपर प्रकाश देलनि। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। ३. पद्य ३.१.उमेश मण्डल- कविता- शुभारम्भ ३.२.जितमोहन झा (जितू)- गीत ३.३.जगदीश प्रसाद मण्डल- कविता- माइटक फूल ३.४.रामविलास साहु ३.५.रवि भूषण पाठक- मरणोपरांत ४ ३.६.-बिनोद मिश्र ३.७.विनीत उत्पल -हम नै सुधरब उमेश मण्डल कविता- शुभारम्भ साँझक समए छल फुही सेहो पड़ै छल हालहिमे सिनेमाक हाँल जे थप्प भेल छल अबैत रहथि ओम्हरसँ ओ लखन पान दोकानदारकेँ देखिते पुछि देलखिन हाल-चाल करिते “की यौ लखन, दोकान तँ आब चलैत हएत खन-खन?” लखन करए लागल भन-भन “आबे गड़बड़ अछि पहिनहि ठीक छल।” ओ वेचारे सोचए लगलाह- जहियेसँ हाँल चालू भेल हएत दोकानदार सबहक विक्री चौगुना भेल हएत तखन ई किअए बजैए पहिनुके विक्रीकेँ नीक कहैए ओ, सोचए लगलाह हठात भीतरमे आखिर अछि किछु बात लखनसँ पुछि बैसलाह तड़ाक “केना पहिनहि ठीक छल अहाँक समाचार नीक छल?” “यौ भाय हम अपन विक्रीसँ जतै नै खुशी छी विक्रमक विक्री बढ़ि गेने दुखी छी।” लखन किछु एहिना सोचलक किंतु मोनक बात नै उगललक। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। जितमोहन झा (जितू) गीत हेयो भैया, हे गइ बहिना, हेयो भैया, हम सभ मिथिलाक संतान, करू अहाँ अपन मातृभूमिपर गुमान, हेयो भैया............... सगर दुनियाँमे नै हमरा सभ एहेन संस्कार, अछि कृपा भवानीक हमरा सभपर अपार, करू नै अपन मातृभूमिक आब अपमान, हेयो भैया, हे गइ बहिना, हेयो भैया, हम सभ मिथिलाक संतान, करू अहाँ अपन मातृभूमिपर गुमान, जते जन्म लेलनि गोसाँइ लक्ष्मीनाथ महान, कवि विद्यापतिक सगर सुनु बखान, ऐ पावन भूमिक मंडन मिश्र संतान, हेयो भैया............... कहैत अछि "जितू" खोलू अहाँ अपन कान, आबू सभ मिल कऽ छेरी एक नव अभियान, अछि वादा...... अछि वादा..... अछि वादा, माँ मिथिलाकेँ देब सम्मान, हेयो भैया, हे गइ बहिना, हेयो भैया, हम सभ मिथिलाक संतान, करू अहाँ अपन मातृभूमिपर गुमान, हेयो भैया............... ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। जगदीश प्रसाद मण्डल कविता- माइटक फूल हँसि-फूलि चढ़ए देव ऊपर कली फलकि वक्ष ऊपर भूख-पियास मिल आफन तोड़ए जड़ि जनमए धरतीपर लिला अजीव अछि दुनियाँ के धरती-अकास छिड़याबए क्षीर भीर-कुभीर देख-देख ससरए सदति संग समीर एक फूल शोभा सुख पाबए दोसर बाल-बोध सिर ढाबए सृष्टि सृरजि तेसर हँसि गाबए राग-िवरागक ताल मिलाबए उड़ए सुगंध समा धरतीसँ चालि चलाबए चाक कुम्हार मृत कुआँ तर-ऊपर वसुधा सानि-बाटि लगबए अम्बार पड़िते-फुहार चढ़िते अखाढ़ महमहबए दिन-राति सुगंध कोन-कोन चारू कोन पसरए निसाँ नचति बनि मदान्ध जे कहियो रोदियाह रौदमे ठोंठ सुखाबए भूखै-पियास धरि-धरती धीर हृदए पीब, पाबि जिनगीक आस उठि-बैस ओंघराइत छिछलए कानि-कलपि दए दंड-प्रणाम अश्रुधार बीच डुबकी लगा जमुनिया धार बीच प्रणाम सदिखन प्रेमी बाट जोहि-जोहि छन-छन छनछनाइत मन दाबानल-बड़बानल लहरिमे जठरानल बीच तड़पए मन। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। राम विलास साहु दूटा कविता- 1) भारत माता हमर भारत भूमि हमर माता छी विशाल क्षेत्रमे अहाँ पसरल छी ऋृषि-मुनिकेँ अपने हृदैमे बसौने छी देवता आ मनुक्खक तीर्थ-स्थल बनलि छी छोट-पैघ सभ जीवकेँ अपने हृदैमे समौने छी अन्न, जल, फल आदिसँ हमरा सबहक जीवन पालै छी अनेको खनिज सम्पतिकेँ अहाँ हृदैमे छिपौने छी अपन संतानकेँ धनवान बनौने छी अनेको नदी-झील झरनासँ सभ फसलकेँ सिंचै छी प्रसाद रूपमे हमरा सभकेँ अन्न-जल-फूल-फल दइ छी वन-उपवन-वाग-बगिचाक शोभा नित रँग-विरँग फूलसँ सजबै छी अनेको तीर्थ-स्थलसँ पवित्र बनलि छी सूर-वीर पुत्र-पुत्रीसँ अहाँक गोद सभ दिन भरल अछि साहित्य,दर्शन,विज्ञान,ज्योतिष क्षेत्रमे अपन इतिहासक प्रकाश दुनियाँकेँ दइ छी हम सभ अहाँ अहाँक पुत्र-पुत्री अहाँ हमर माता छी सभ धर्म, सभ जातिक आदर अहाँ करै छी अपन माटि-पानिसँ सबहक पालन करै छी अपनोकेँ नै दुश्मनोकेँ शरण अहाँ दइ छी अहाँक रक्छा हमसभ सदासँ करै छी हम सभ देशवासी अपन माताकेँ नित चरणपर सुमन अर्पित करै छी हमर भारत भूमि हमर माता छी। 2) परदेशी किएक परदेशी बनल छी अहाँ किएक कलंकित बनल छी अहाँ अपन मिथिलाक महिमा अछि अपार अइठाम मिलैत अछि सबहक रोजगार आब नै रहत कोइ बेरोजगार मिथिला राज्यमे अछि काम अपार माटि-पानिसँ उपजे अन्नक भंडार कियो नै भूखल सुतल रहत सबहक बनत राटी-दालि बाल-बच्चा मिल विकसित राज्य बनाएब राज्यक खुशहाली आ हरियाली बढ़ाएब अपनो खाएब आ दोसरोकेँ खुआएब अपने राज्यक माटि-पानि सदासँ अछि अमृत समान राखब दुनियाँक मान-सम्मान।। पाँचटा टनका 1) पछताइ छी पथपर चलैत मौतक संग नरको नहि बास कोना करब आस। 2) टूटल खाट सुतल छी चैनसँ पहरा नहि करबट फेड़ैत पेटकुनिया दैत। 3) पानिक बुन्न मोती सन चमकै धरतीपर माइटसँ िमलैत नदी रूप बनैत। 4) चिड़ै चहकै चुनमुन फुदकै पंख खोइल नव पथ बनाबै आजादीसँ भ्रमऐ। 5) गंगा भरल अमृत सन जल जिनगी दैत अपने सेवककेँ गोदमे बसाबैत। दूटा हाइकू 1) नीमक गाछ करैत हवा साफ दवा कऽ साथ। 2) गंगा किनार तीर्थक जेना धाम पवित्र स्नान। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। रवि भूषण पाठक मरणोपरांत 4 कविता कऽ माने की ? ओइ सांझ मे छोटका बाबू अचानक कविता पर बाज‘ लागलखिन्ह “हओ वौआ कविता कोनो सुस्पष्ट सुनिर्धारित मकान क नाम नइ जेकरा मे दस बाइ बारह क कतेको घर होइत होए आ ने कविता कोनो एहन घर जेकरा बनएबा क लेल ईंटा क लंबाई,चौड़ाई,रंग आ ब्रांड निश्चित होए बात आराम आ आनन्द क छैक तें जेंहने ईंटा तेहने फूसि आ माटि पाथर बात खुलल टटका हवा के छैक तें घर केहनो होए होए खुलल आ हवादार जेहन कि कविता होइत छैक । ओकरा रस कही वा घ्वनि बात त एहने होए कि अंदर तक झनझना जाए । हं हमहूं मानैत छी रंग आ पच्चाकारी के हमरो खीचैत अछि चुम्मक जँका अलंकार हमहूँ भसिया जाइत छी कखनो शब्दक जाल मे मुदा वौआ एहन घर कोन काज के जे बाहर खूब झालदार आ अंदर झोलझाल गेन्हायल गरमी मे गरम आ ठंडी मे बसात बहय एहन घर ल‘ के की करब ” ई कहि छोटका बाबू शांत भऽ गेलखिन्ह । पहिल छाया क दिन आगंतुक पंडितगण बैसि गेला सामने बेलवूक्ष नबका हरियर खिज्जा बेलपात सब ओहने छल ओकरा केओ नइ तोड़ैत छल तहिना मंदिर परक दूबि सब बिना खोंटल बरहल अपन ओकादि भर अरहुल सब फुला फुला गिरि गेल छल नीचा सूखल फूलक ढ़ेरी छलए मंदिर सेहो उदास छलए आ देवी सेहो लोराएल मुदा भैया सब कहऽ लागलखिन्ह देवी क ई नोर बड प्राचीन ई मूर्तिकार क अंतिम कृति छल आ बनाबिते बनाबिते गिरि गेल छलए आ अंतिम मरिया देवी क आँखिक कोर पर लागलइ ई नोर तहिए सँ अछि । ई कहिते कहिते एक भाए झारू लऽ के बहार‘ लागलखिन्ह दोसर भाए पानि लऽ के धोब‘ लागलखिन्ह तेसर फूल तोड़बा क लेल विदा भेला चारिम कोनाक झोल झार‘ लागला पाँचम भैया भगवती क समक्ष नतमस्तक भेला । मंदिर पहिले जँका चकाचक भऽ गेलइ आइ अभ्यागत आबइ वला छथि काल्हि सेहो केओ आर कोना रोकल जाइ विवाह ओना त एक साल तक शोक समारोह चलैत छैक मुदा वौआ क चेन्नई मे खेबा पीबाक बड दिकदारी । बाबूजी खूब प्रसन्न छथि “लोक सब कहैत छल जे अहाँ क बेटा सब बड़ दूर अहाँ क की हाल हेतइ आ हमरा मून मे आबऽ लागल लहास के गेनहाइ क गंध नाक दबैत लोक आ परेशान परिजन मुदा हमर दूनू बेटा हीरा अछि पहिले बड़की काकी फेर बड़का बाबू मझिला कक्का काकी आ छोटका बाबू सबक अंतिम संस्कार मे दूनू पहुँचल हम निराश नइ छी हमरो लहास क नीके गति होयत” भाई जी क व्यवस्था टंच छनि भाइ जी काकी आ छोटका बाबू क श्राद्वक व्यवस्था के आदर्श मानैत छथिन्ह छगमिया भोज दसदिनिया गरूड पुरान आ गाम परोपट्टा क बरबरना भोज एक दिन नइ तीन दिन आ अंतिम संस्कारे सँ वैदिक रीति सँ दान प्रदान ताहि दुआरे बाबूजी क सब पैसा जे रिटायर भेला पर मिललेन्ह जमा छैक नीक रेट पर ताकि बाबूजी क मरला पर पैसाकौड़ी ताकऽ नइ पड़ए सब किछु पहिले सँ व्यवस्थित रहए ओना बाबूजी स्वस्थ छथिन्ह आ ऐ बेर एक बीघा खेत मे हाइब्रिड बासमती क खेती केने छथिन्ह आ बरसा खूब भेला सँ प्रसन्न छथि ओमहर भाइजी खूब प्रसन्न छथिन्ह काल के बान्हल नइ जा सकैत छैक काल के पूजबा क अलावा कोनो रस्ता नइ कोनेा मंतर कोनो जादू टोना नइ बाबूजी क पैसा डेली बढ़ि रहल अछि । ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। बिनोद मिश्र , डॉ. बिनोद मिश्र सम्प्रति आइ. आइ. टी. रूड़की, उत्तराखंडमे अंग्रेजी पढ़बैत छथि आ हिनक रचना सभ अंग्रेजी आ हिंदीमे प्रकाशित भेल छन्हि। ऐ वर्ष हिनक कविता संग्रह Silent Steps and Other Poems प्रकाशित भेल छन्हि। एकर अतिरिक्त ई अंग्रेजीमे आलोचनाक क्षेत्रमे आठ टा पोथी संपादित केने छथि। हिनक पोथी Communication Skills for Engineers and Scientists बहुतो इंजीनियरिंग संस्थानमे पाठ्य पुस्तक केर रूपमे पढ़ाओल जाइत अछि। गामक सनेस ऐ बेर गाम सँ एलौं तँ बच्चा सभ नै पुछलक पापा , की अनलौं अछि सनेस ? बुझल छन्हि आब सभ भऽ गेल छथि भिन्न चूल्हा भऽ गेल छल तीन फाक कहलियैन खेत सब खासले छल नै भेलन्हि मंगनू केँ फेर होस कोसिक कहर सँ उबड़बाक हिम्मत आब कहाँ पुछैत छन्हि भौजी कोनो दिक्कत तँ नै अछि बाऊ ? कनिया ठीके देल्थिन्ह सद्बुद्धि ओहो पांच सेर कथी लेल करब नाश रहत तँ धिया पुता केँ होयत दू सन्झाक आश आब कोनो आओत मासे मासे ड्राफ्ट नै जानि ककर लागि गेल नजरि हमर धियो पुताक कपार अछि फुटले कतेक धुनब हम सभ कहने रही राखी लिअ हमर अशर्फी बन्हक आ फोली लिअ एक टा किराना हमहूँ कहुखन - कहुखन कऽ देब संग आब कतेक दिन हम रहब घोघक तर मे नुकायल ? बच्चा मात्र पुछलक की मुन्नू भेला पास हम कहलियन्हि आब छन्हि कोन आस हम रही उदास मोंनं परल छल; मुन्नूक लटकल मुँह आ मैझ्लीक घोघ तरक सिस्कब जहिना छल बेग सिरागू लग तहिना उठा लेने रही फेर कहैलियन्हि बौआ नै अनलौं किछु सनेश ककरो नै भेलन्हि विश्वास हम तँ छोड़िये देने रही आस भऽ गेल शुरू हमर बेग उकटबाक प्रयास कनिया कहलैन्ह ई कथिक छी पोटरी ? आ भरभरा गेल अदौरी, तिलौरी, मुरौरी, खुद्दिक, मरुआक चिक्कस आ अनन्तक डोर झरझरा लागल सम्हारल सनेस कखनहुँ माय केर मौलाय्ल मुँह कखनहुँ मंगनूक उतरल देह मैझ्लीक चुप्पी आ मुन्नु -चुन्नुक धधकैत भविष्य ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। विनीत उत्पल हम नै सुधरब
नै हम सुधरब नै हमरा सुधारू हम छी बिगड़ल अप्पन मन पारू
नेता अछि भ्रष्ट अफसर सँ छी त्रस्त चोर-छिनारक राज हम किए करब काज नै हम सुधरब नै हमरा सुधारू हम छी बिगड़ल अप्पन मन पारू
फुइस बजैत छी,धूर्त बनल छी नै आबैत अछि शर्म कामचोर छी, मौगियाहा छी यएह छी हमर धर्म
नै हम सुधरब नै हमरा सुधारू हम छी बिगड़ल अप्पन मन पारू
हमहू छी बड़ नीक बजैत छी बड़ तीत खाइ जइमे छी हाथ ओहीमे धोइत छी
नै हम सुधरब नै हमरा सुधारू हम छी बिगड़ल अप्पन मन पारू
घर सँ लऽ कऽ आफिस धरि फूइसक ठेका लेने छी जतए जे भेटायल आइ धरि धुरमुस जरूर देने छी
नै हम सुधरब नै हमरा सुधारू हम छी बिगड़ल अप्पन मन पारू
रामराजक परिभाषा भऽ रहल छै साकार कांग्रेस हुअए वा भाजपा भ्रष्ट छै सभ सरकार
नै हम सुधरब नै हमरा सुधारू हम छी बिगड़ल अप्पन मन पारू. ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। विदेह नूतन अंक मिथिला कला संगीत १.ज्योति सुनीत चौधरी २.श्वेता झा (सिंगापुर) ३.गुंजन कर्ण १ ज्योति सुनीत चौधरी जन्म तिथि -३० दिसम्बर १९७८; जन्म स्थान -बेल्हवार, मधुबनी ; शिक्षा- स्वामी विवेकानन्द मिडिल स्कूल़ टिस्को साकची गर्ल्स हाई स्कूल़, मिसेज के एम पी एम इन्टर कालेज़, इन्दिरा गान्धी ओपन यूनिवर्सिटी, आइ सी डबल्यू ए आइ (कॉस्ट एकाउण्टेन्सी); निवास स्थान- लन्दन, यू.के.; पिता- श्री शुभंकर झा, ज़मशेदपुर; माता- श्रीमती सुधा झा, शिवीपट्टी। ज्योतिकेँwww.poetry.comसँ संपादकक चॉयस अवार्ड (अंग्रेजी पद्यक हेतु) भेटल छन्हि। हुनकर अंग्रेजी पद्य किछु दिन धरि www.poetrysoup.com केर मुख्य पृष्ठ पर सेहो रहल अछि। ज्योति मिथिला चित्रकलामे सेहो पारंगत छथि आ हिनकर मिथिला चित्रकलाक प्रदर्शनी ईलिंग आर्ट ग्रुप केर अंतर्गत ईलिंग ब्रॊडवे, लंडनमे प्रदर्शित कएल गेल अछि। कविता संग्रह ’अर्चिस्’ प्रकाशित। ३.श्वेता झा (सिंगापुर) ४.गुंजन कर्ण राँटी मधुबनी, सम्प्रति यू.के.मे रहै छथि। www.madhubaniarts.co.uk पर हुनकर कलाकृति देखि सकै छी। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। विदेह नूतन अंक गद्य-पद्य भारती १. मोहनदास (दीर्घकथा):लेखक: उदय प्रकाश (मूल हिन्दीसँ मैथिलीमे अनुवाद विनीत उत्पल) मोहनदास (मैथिली-देवनागरी) मोहनदास (मैथिली-मिथिलाक्षर) मोहनदास (मैथिली-ब्रेल) २.छिन्नमस्ता- प्रभा खेतानक हिन्दी उपन्यासक सुशीला झा द्वारा मैथिली अनुवाद छिन्नमस्ता ३ भिखारी ठाकुर (१८८७-१९७१)- लोकलाकार, छपरा जिला (बिहार)मे जन्म। प्रारम्भक रचना सभ मौखिक मुदा बादमे कैथी लिपिमे सेहो हिनकर हस्तलिखित भोजपुरी रचना प्राप्त भेल। भोजपुरीसँ मैथिली अनुवाद मूल भोजपुरी- भिखारी ठाकुर (१८८७-१९७१), मैथिली अनुवाद- गजेन्द्र ठाकुर (१९७१- ) वृद्धाश्रमक पक्षमे बिरहा १ कुतुबपुर अछि गाम, भिखारी ठाकुर अछि नाम। बाबू सभ गोटेकेँ करै छी प्रणाम॥ सभ गोटेकेँ करै छी प्रणाम हे राजा। उपरेसँ चिक्कन अछि चामक ओहरन॥ तीन दिनक सेखीमे, उड़बै छी मज्जा। बूढ़ा-बूढ़ीकेँ दुख भेल छनि, लगैए नै लाज॥ बाबू-भइया एकमत भऽ कऽ सभ मिलिये कऽ समाज। एक अरजीपर मोन आनू, मोनकेँ करू ताजा॥ महाबीरक नाम सुमरि लिअ, जइसँ बाजत बाजा। वृद्धाश्रम बनबाउ नै तँ हएत अकाज॥ सभ बाबूक पएर पड़ै छी, भिखारी ठाकुर नाम छी॥ वृद्धाश्रमक पक्षमे बिरहा २ हिन्दू-मुसलमान, सभ हमर कहलपर दियौ कान। नै तँ होइए बूढ़क अपमान॥ होइए बूढ़क अपमान हमर भाइ। नेनपनेसँ जकरा तूँ कहैत एलेँहेँ माय॥ तकराले किए भऽ गेल छेँ तूँ कसाइ। बड़का हाकिम लग जखन जेमेँ तँ पुछल जेतौ हिसाब-किताब॥ जल्दीसँ बता हमरा की केलेँ तूँ कमाइ। नह जखन झारतौ तखन ओइ काल की करमे उपाय। आँखिसँ नोर खसतौ किछु ने हेतौ बाजल। कहैए भिखारी अखने दे तूँ वृद्धाश्रम बनबाय।। नै तँ होइए बूढ़क अपमान॥ ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। बालानां कृते प्रेमचन्द्र मिश्र अपन बेटा अभिनव मिश्रकेँ बल दै लेल कविता २ डरा गेलासँ नाविक कहियो समुद्र पार नै होइ छै कोशिश करैबलाक कहियो हारि नै होइ छै छोटकी चुट्टी जखन मुँहमे रोटी लऽ कऽ चलैत छै नै जानि असंखो बेर नीचाँ खसैत छै मोनक बिसबास जेहनमे रंग भरैत छै खसि कऽ ऊपर गेनाइ ओकरा कखनो नै अखड़ैत छै अन्तमे ओकर मेहनति बेकार नै होइत छै कोशिश करैबलाक कहियो हारि नै होइत छै जंगलरूपी संसारमे पहाड़ बनू माए-बापक लेल हुनक माथक सरताज बनू किछु केने बिना झुट्ठो जय-जयकार नै होइ छै कोशिश करैबलाक कहियो हारि नै होइ छै विफलता एकटा चुनौती छै तकरा स्वीकार करू की कमी अछि तकरा देखू, चिन्हू, सोचू आ ओकर सुधार करू जाधरि जीत नै होइ ताधरि चैनक निन्नकेँ तियागू अहाँ संघर्षक रणभूमिसँ नै भागू अहाँ पैघ भलाइमे छोट नोकसान कखनो अपराध नै होइ छै कोशिश करैबलाक कहियो हारि नै होइ छै बच्चा लोकनि द्वारा स्मरणीय श्लोक १.प्रातः काल ब्रह्ममुहूर्त्त (सूर्योदयक एक घंटा पहिने) सर्वप्रथम अपन दुनू हाथ देखबाक चाही, आ’ ई श्लोक बजबाक चाही। कराग्रे वसते लक्ष्मीः करमध्ये सरस्वती। करमूले स्थितो ब्रह्मा प्रभाते करदर्शनम्॥ करक आगाँ लक्ष्मी बसैत छथि, करक मध्यमे सरस्वती, करक मूलमे ब्रह्मा स्थित छथि। भोरमे ताहि द्वारे करक दर्शन करबाक थीक। २.संध्या काल दीप लेसबाक काल- दीपमूले स्थितो ब्रह्मा दीपमध्ये जनार्दनः। दीपाग्रे शङ्करः प्रोक्त्तः सन्ध्याज्योतिर्नमोऽस्तुते॥ दीपक मूल भागमे ब्रह्मा, दीपक मध्यभागमे जनार्दन (विष्णु) आऽ दीपक अग्र भागमे शङ्कर स्थित छथि। हे संध्याज्योति! अहाँकेँ नमस्कार। ३.सुतबाक काल- रामं स्कन्दं हनूमन्तं वैनतेयं वृकोदरम्। शयने यः स्मरेन्नित्यं दुःस्वप्नस्तस्य नश्यति॥ जे सभ दिन सुतबासँ पहिने राम, कुमारस्वामी, हनूमान्, गरुड़ आऽ भीमक स्मरण करैत छथि, हुनकर दुःस्वप्न नष्ट भऽ जाइत छन्हि। ४. नहेबाक समय- गङ्गे च यमुने चैव गोदावरि सरस्वति। नर्मदे सिन्धु कावेरि जलेऽस्मिन् सन्निधिं कुरू॥ हे गंगा, यमुना, गोदावरी, सरस्वती, नर्मदा, सिन्धु आऽ कावेरी धार। एहि जलमे अपन सान्निध्य दिअ। ५.उत्तरं यत्समुद्रस्य हिमाद्रेश्चैव दक्षिणम्। वर्षं तत् भारतं नाम भारती यत्र सन्ततिः॥ समुद्रक उत्तरमे आऽ हिमालयक दक्षिणमे भारत अछि आऽ ओतुका सन्तति भारती कहबैत छथि। ६.अहल्या द्रौपदी सीता तारा मण्डोदरी तथा। पञ्चकं ना स्मरेन्नित्यं महापातकनाशकम्॥ जे सभ दिन अहल्या, द्रौपदी, सीता, तारा आऽ मण्दोदरी, एहि पाँच साध्वी-स्त्रीक स्मरण करैत छथि, हुनकर सभ पाप नष्ट भऽ जाइत छन्हि। ७.अश्वत्थामा बलिर्व्यासो हनूमांश्च विभीषणः। कृपः परशुरामश्च सप्तैते चिरञ्जीविनः॥ अश्वत्थामा, बलि, व्यास, हनूमान्, विभीषण, कृपाचार्य आऽ परशुराम- ई सात टा चिरञ्जीवी कहबैत छथि। ८.साते भवतु सुप्रीता देवी शिखर वासिनी उग्रेन तपसा लब्धो यया पशुपतिः पतिः। सिद्धिः साध्ये सतामस्तु प्रसादान्तस्य धूर्जटेः जाह्नवीफेनलेखेव यन्यूधि शशिनः कला॥ ९. बालोऽहं जगदानन्द न मे बाला सरस्वती। अपूर्णे पंचमे वर्षे वर्णयामि जगत्त्रयम् ॥ १०. दूर्वाक्षत मंत्र(शुक्ल यजुर्वेद अध्याय २२, मंत्र २२) आ ब्रह्मन्नित्यस्य प्रजापतिर्ॠषिः। लिंभोक्त्ता देवताः। स्वराडुत्कृतिश्छन्दः। षड्जः स्वरः॥ आ ब्रह्म॑न् ब्राह्म॒णो ब्र॑ह्मवर्च॒सी जा॑यता॒मा रा॒ष्ट्रे रा॑ज॒न्यः शुरे॑ऽइषव्यो॒ऽतिव्या॒धी म॑हार॒थो जा॑यतां॒ दोग्ध्रीं धे॒नुर्वोढा॑न॒ड्वाना॒शुः सप्तिः॒ पुर॑न्धि॒र्योवा॑ जि॒ष्णू र॑थे॒ष्ठाः स॒भेयो॒ युवास्य यज॑मानस्य वी॒रो जा॒यतां निका॒मे-नि॑कामे नः प॒र्जन्यों वर्षतु॒ फल॑वत्यो न॒ऽओष॑धयः पच्यन्तां योगेक्ष॒मो नः॑ कल्पताम्॥२२॥ मन्त्रार्थाः सिद्धयः सन्तु पूर्णाः सन्तु मनोरथाः। शत्रूणां बुद्धिनाशोऽस्तु मित्राणामुदयस्तव। ॐ दीर्घायुर्भव। ॐ सौभाग्यवती भव। हे भगवान्। अपन देशमे सुयोग्य आ’ सर्वज्ञ विद्यार्थी उत्पन्न होथि, आ’ शुत्रुकेँ नाश कएनिहार सैनिक उत्पन्न होथि। अपन देशक गाय खूब दूध दय बाली, बरद भार वहन करएमे सक्षम होथि आ’ घोड़ा त्वरित रूपेँ दौगय बला होए। स्त्रीगण नगरक नेतृत्व करबामे सक्षम होथि आ’ युवक सभामे ओजपूर्ण भाषण देबयबला आ’ नेतृत्व देबामे सक्षम होथि। अपन देशमे जखन आवश्यक होय वर्षा होए आ’ औषधिक-बूटी सर्वदा परिपक्व होइत रहए। एवं क्रमे सभ तरहेँ हमरा सभक कल्याण होए। शत्रुक बुद्धिक नाश होए आ’ मित्रक उदय होए॥ मनुष्यकें कोन वस्तुक इच्छा करबाक चाही तकर वर्णन एहि मंत्रमे कएल गेल अछि। एहिमे वाचकलुप्तोपमालड़्कार अछि। अन्वय- ब्रह्म॑न् - विद्या आदि गुणसँ परिपूर्ण ब्रह्म रा॒ष्ट्रे - देशमे ब्र॑ह्मवर्च॒सी-ब्रह्म विद्याक तेजसँ युक्त्त आ जा॑यतां॒- उत्पन्न होए रा॑ज॒न्यः-राजा शुरे॑ऽ–बिना डर बला इषव्यो॒- बाण चलेबामे निपुण ऽतिव्या॒धी-शत्रुकेँ तारण दय बला म॑हार॒थो-पैघ रथ बला वीर दोग्ध्रीं-कामना(दूध पूर्ण करए बाली) धे॒नुर्वोढा॑न॒ड्वाना॒शुः धे॒नु-गौ वा वाणी र्वोढा॑न॒ड्वा- पैघ बरद ना॒शुः-आशुः-त्वरित सप्तिः॒-घोड़ा पुर॑न्धि॒र्योवा॑- पुर॑न्धि॒- व्यवहारकेँ धारण करए बाली र्योवा॑-स्त्री जि॒ष्णू-शत्रुकेँ जीतए बला र॑थे॒ष्ठाः-रथ पर स्थिर स॒भेयो॒-उत्तम सभामे युवास्य-युवा जेहन यज॑मानस्य-राजाक राज्यमे वी॒रो-शत्रुकेँ पराजित करएबला निका॒मे-नि॑कामे-निश्चययुक्त्त कार्यमे नः-हमर सभक प॒र्जन्यों-मेघ वर्षतु॒-वर्षा होए फल॑वत्यो-उत्तम फल बला ओष॑धयः-औषधिः पच्यन्तां- पाकए योगेक्ष॒मो-अलभ्य लभ्य करेबाक हेतु कएल गेल योगक रक्षा नः॑-हमरा सभक हेतु कल्पताम्-समर्थ होए ग्रिफिथक अनुवाद- हे ब्रह्मण, हमर राज्यमे ब्राह्मण नीक धार्मिक विद्या बला, राजन्य-वीर,तीरंदाज, दूध दए बाली गाय, दौगय बला जन्तु, उद्यमी नारी होथि। पार्जन्य आवश्यकता पड़ला पर वर्षा देथि, फल देय बला गाछ पाकए, हम सभ संपत्ति अर्जित/संरक्षित करी। 8.VIDEHA FOR NON RESIDENTS 8.1 to 8.3 MAITHILI LITERATURE IN ENGLISH 8.1.1.The Comet -GAJENDRA THAKUR translated by Jyoti Jha chaudhary 8.1.2.The_Science_of_Words- GAJENDRA THAKUR translated by the author himself 8.1.3.On_the_dice-board_of_the_millennium- GAJENDRA THAKUR translated by Jyoti Jha chaudhary 8.1.4.NAAGPHANS (IN ENGLISH)- SHEFALIKA VERMA translated by Dr. Rajiv Kumar Verma and Dr. Jaya Verma 1. Episodes Of The Life - ("Kist-Kist Jeevan" by Smt. shefalika Varma translated into English by Smt. Jyoti Jha Chaudhary ) 2.Original Poem in Maithili by Kalikant Jha "Buch" Translated into English by Jyoti Jha Chaudhary १ Episodes Of The Life - ("Kist-Kist Jeevan" by Smt. shefalika Varma translated into English by Smt. Jyoti Jha Chaudhary ) Shefalika Verma has written two outstanding books in Maithili; one a book of poems titled “BHAVANJALI”, and the other, a book of short stories titled “YAYAVARI”. Her Maithili Books have been translated into many languages including Hindi, English, Oriya, Gujarati, Dogri and others. She is frequently invited to the India Poetry Recital Festivals as her fans and friends are important people.
Translator:Jyoti Jha Chaudhary, Date of Birth: December 30 1978,Place of Birth- Belhvar (Madhubani District), Education: Swami Vivekananda Middle School, Tisco Sakchi Girls High School, Mrs KMPM Inter College, IGNOU, ICWAI (COST ACCOUNTANCY); Residence- LONDON, UK; Father- Sh. Shubhankar Jha, Jamshedpur; Mother- Smt. Sudha Jha- Shivipatti. Jyoti received editor's choice award from www.poetry.comand her poems were featured in front page of www.poetrysoup.com for some period.She learnt Mithila Painting under Ms. Shveta Jha, Basera Institute, Jamshedpur and Fine Arts from Toolika, Sakchi, Jamshedpur (India). Her Mithila Paintings have been displayed by Ealing Art Group at Ealing Broadway, London."ARCHIS"- COLLECTION OF MAITHILI HAIKUS AND POEMS. Episodes Of The Life : Preface: An autobiography is not merely a story of a life but this rotates around the chronology of philosophical thoughts, ideological revolutions and the ups and downs of the emotions. This is also an analysis of a situation. For writing a full autobiography, even if the entire land on the Earth becomes the paper and the oceans become the ink, the story would remain incomplete. In this way the ‘Episodes of the Life’ was written in six to seven hundreds of pages. I had never thought about its publishing. Suddenly, the five headed moon emerged in the treasure of the nature. Pressure for the publishing arose. I was requested to summarise the story. In this process, where someone left, where I missed some event, I left all these to be judged by the readers. I am not a role model whose autobiography would be desired by the readers, neither am I a litterateur to know whom, people would be enthusiastic. This is a story of a very emotional ordinary girl who, although, born and brought up in the facility and luxury of a city life, rendered her duty regarding family, social and traditional front in the orthodoxy of village-life with her utmost patience. How she could at least reach the doorway of the Maithili literature. How the earth is filled three fourth with water and one fourth with land, likewise, my life is also filled three fourth with emotions and imaginations and one fourth with the reality - but apart from all these, my whole life is made up of compromises and adjustments with situation, family and society. ‘Episodes of life’ is because everything in this book has come from the pages of my diary. I don’t remember when I got habit of writing diary – perhaps from my childhood, because I achieved my youth with Sarat, Bankim, Ageya etc. and coloured my heart with Amrita, Agyeya, Jainendra, Mahadevi thereafter. There was a pile of diaries from 1958 to 2001 in my almirah. Varma ji had been saying “I am publishing your diaries in a book. I also became excited as the diary doesn’t merely bear a list of good and bad incidents; rather the emotions associated are also reflected through it. Collecting the past, a diary serves as a stone of foundation of the strong building of the future. Writing diary is capturing a period of time. This is a creation of a new direction, a new morrow of future in the light of past, an attempt to progress the society. Vermaji passed away. The pages of the diary were kept serially. First I made my mind to hand over this treasure to my children but when I had to live without Vermaji then I started trying to recollect all scattered pages of my past. Specially, the dialogues of Vermaji came out time to time. In the race of life whenever he was telling something I was writing that down. He used to say, note it down Ranno, write it down, don’t consider what I say a dialogue. If those will be noted and you will be revising then you will find them useful in life. I was always looking for paper and pen or newspaper so that I can write down his statements. Now, in the loneliness of life, I am looking for those pieces of notes insanely. If I get something somewhere it seems I found the most precious treasure of the world. The courage is awakened in me. This autobiography is an effort to join the various part of the past life. Vermaji is not alive anymore but I couldn’t dare to publish the pages of diaries in original form because ‘Man ko kintu samjhane wala phir aisa man na milega’ (That heart who can console the heart will not be found anymore) We were more like lovers than spouses. My life began with his songs and platonic love and ended up at his songs. Whatever happened that was felt in the corner of my heart- hence sometimes pain, sometimes contemplations and sometimes preaching is exposed in excess in these episodes being the clippings of my diary. Barnardsh said that if everyone started writing autobiography then there would not be any lack of good novels. Memories are coming into mind one upon other. Which one happened earlier and which one later that was hard to determine. Everything is messed up in remembrance and memories. All incidents are coming by overtaking each other. This book is to organise them in the sequence as they came into my mind. The efficient reader and critics will solve them by themselves and won’t wait even for me. The statue of bodhgaya is copied in Chinese and Thiland version by the people having different visions, likewise, all see the reflection of their mind in a biography. Otherwise what is the interest of people in other’s life. Every reader of a biography possess different mentality and gets the theme in their frame of understanding. I would like to say sorry to my readers and critiques because I have opted the scripture just in the way I lived- for example, I used to call my dad as ‘papa’ and my uncle as ‘babuji’. Had I changed the titles, entire meaning could be falsified. This emotional biography should be understood in terms of emotions only considering that there is someone in this world who lives in the world of her mind. To understand an emotional lady any logical or sceptical mind is not needed, a sentimental analytical mind is rather desired. Yes I have strong faith for the profession of advocacy. That is why I had explained the story of obstacles, difficulties and struggles of an advocate who was a person of principles. I will consider my writing successful if anyone living in the same lifestyle gets help from this. I do acknowledge my gratitude to my family, my readers, my all literal inspirers, and also to my friend Jeevkantji who had encouraged me for this twenty years ago. I do appreciate Shekar Prakashan family with Madhukant, Shankardev, Chandresh, Azad, especially Panchanan-shanradindu very heart fully whose affection helped this book to exist. (to be continued..................) २ Kalikant Jha "Buch" 1934-2009, Birth place- village Karian, District- Samastipur (Karian is birth place of famous Indian Nyaiyyayik philosopher Udayanacharya), Father Late Pt. Rajkishor Jha was first headmaster of village middle school. Mother Late Kala Devi was housewife. After completing Intermediate education started job block office of Govt. of Bihar.published in Mithila Mihir, Mati-pani, Bhakha, and Maithili Akademi magazine. Jyoti Jha Chaudhary, Date of Birth: December 30 1978,Place of Birth- Belhvar (Madhubani District), Education: Swami Vivekananda Middle School, Tisco Sakchi Girls High School, Mrs KMPM Inter College, IGNOU, ICWAI (COST ACCOUNTANCY); Residence- LONDON, UK; Father- Sh. Shubhankar Jha, Jamshedpur; Mother- Smt. Sudha Jha- Shivipatti. Jyoti received editor's choice award from www.poetry.comand her poems were featured in front page of www.poetrysoup.com for some period.She learnt Mithila Painting under Ms. Shveta Jha, Basera Institute, Jamshedpur and Fine Arts from Toolika, Sakchi, Jamshedpur (India). Her Mithila Paintings have been displayed by Ealing Art Group at Ealing Broadway, London. Today’s Girl I am a girl of today More curious in all ways You look for the opportunities I am going abroad You keep stove, pots and this house Do evening prayer by yourself and enlighten the diya Roof of your barn is dry and I am ignited match stick The sindoordan became worthless, the kohbar is bare The door of cage is broken, birds flied away I am eating the earning of my wings on the tree You will be called dear or dearer, the dearest is the money I got the divine knowledge now that money is the paramount That is why I am alone fulfilled in myself Send your comments to ggajendra@videha.com Input: (कोष्ठकमे देवनागरी, मिथिलाक्षर किंवा फोनेटिक-रोमनमे टाइप करू। Input in Devanagari, Mithilakshara or Phonetic-Roman.) Output: (परिणाम देवनागरी, मिथिलाक्षर आ फोनेटिक-रोमन/ रोमनमे। Result in Devanagari, Mithilakshara and Phonetic-Roman/ Roman.) English to Maithili Maithili to English इंग्लिश-मैथिली-कोष / मैथिली-इंग्लिश-कोष प्रोजेक्टकेँ आगू बढ़ाऊ, अपन सुझाव आ योगदान ई-मेल द्वारा ggajendra@videha.com पर पठाऊ। Top of Form विदेहक मैथिली-अंग्रेजी आ अंग्रेजी मैथिली कोष (इंटरनेटपर पहिल बेर सर्च-डिक्शनरी) एम.एस. एस.क्यू.एल. सर्वर आधारित -Based on ms-sql server Maithili-English and English-Maithili Dictionary. १.भारत आ नेपालक मैथिली भाषा-वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक शैली आ २.मैथिलीमे भाषा सम्पादन पाठ्यक्रम १.नेपाल आ भारतक मैथिली भाषा-वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक शैली
१.१. नेपालक मैथिली भाषा वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक उच्चारण आ लेखन शैली (भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक धारणाकेँ पूर्ण रूपसँ सङ्ग लऽ निर्धारित) मैथिलीमे उच्चारण तथा लेखन १.पञ्चमाक्षर आ अनुस्वार: पञ्चमाक्षरान्तर्गत ङ, ञ, ण, न एवं म अबैत अछि। संस्कृत भाषाक अनुसार शब्दक अन्तमे जाहि वर्गक अक्षर रहैत अछि ओही वर्गक पञ्चमाक्षर अबैत अछि। जेना- अङ्क (क वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ङ् आएल अछि।) पञ्च (च वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ञ् आएल अछि।) खण्ड (ट वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ण् आएल अछि।) सन्धि (त वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे न् आएल अछि।) खम्भ (प वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे म् आएल अछि।) उपर्युक्त बात मैथिलीमे कम देखल जाइत अछि। पञ्चमाक्षरक बदलामे अधिकांश जगहपर अनुस्वारक प्रयोग देखल जाइछ। जेना- अंक, पंच, खंड, संधि, खंभ आदि। व्याकरणविद पण्डित गोविन्द झाक कहब छनि जे कवर्ग, चवर्ग आ टवर्गसँ पूर्व अनुस्वार लिखल जाए तथा तवर्ग आ पवर्गसँ पूर्व पञ्चमाक्षरे लिखल जाए। जेना- अंक, चंचल, अंडा, अन्त तथा कम्पन। मुदा हिन्दीक निकट रहल आधुनिक लेखक एहि बातकेँ नहि मानैत छथि। ओ लोकनि अन्त आ कम्पनक जगहपर सेहो अंत आ कंपन लिखैत देखल जाइत छथि। नवीन पद्धति किछु सुविधाजनक अवश्य छैक। किएक तँ एहिमे समय आ स्थानक बचत होइत छैक। मुदा कतोक बेर हस्तलेखन वा मुद्रणमे अनुस्वारक छोट सन बिन्दु स्पष्ट नहि भेलासँ अर्थक अनर्थ होइत सेहो देखल जाइत अछि। अनुस्वारक प्रयोगमे उच्चारण-दोषक सम्भावना सेहो ततबए देखल जाइत अछि। एतदर्थ कसँ लऽ कऽ पवर्ग धरि पञ्चमाक्षरेक प्रयोग करब उचित अछि। यसँ लऽ कऽ ज्ञ धरिक अक्षरक सङ्ग अनुस्वारक प्रयोग करबामे कतहु कोनो विवाद नहि देखल जाइछ। २.ढ आ ढ़ : ढ़क उच्चारण “र् ह”जकाँ होइत अछि। अतः जतऽ “र् ह”क उच्चारण हो ओतऽ मात्र ढ़ लिखल जाए। आन ठाम खाली ढ लिखल जएबाक चाही। जेना- ढ = ढाकी, ढेकी, ढीठ, ढेउआ, ढङ्ग, ढेरी, ढाकनि, ढाठ आदि। ढ़ = पढ़ाइ, बढ़ब, गढ़ब, मढ़ब, बुढ़बा, साँढ़, गाढ़, रीढ़, चाँढ़, सीढ़ी, पीढ़ी आदि। उपर्युक्त शब्द सभकेँ देखलासँ ई स्पष्ट होइत अछि जे साधारणतया शब्दक शुरूमे ढ आ मध्य तथा अन्तमे ढ़ अबैत अछि। इएह नियम ड आ ड़क सन्दर्भ सेहो लागू होइत अछि। ३.व आ ब : मैथिलीमे “व”क उच्चारण ब कएल जाइत अछि, मुदा ओकरा ब रूपमे नहि लिखल जएबाक चाही। जेना- उच्चारण : बैद्यनाथ, बिद्या, नब, देबता, बिष्णु, बंश, बन्दना आदि। एहि सभक स्थानपर क्रमशः वैद्यनाथ, विद्या, नव, देवता, विष्णु, वंश, वन्दना लिखबाक चाही। सामान्यतया व उच्चारणक लेल ओ प्रयोग कएल जाइत अछि। जेना- ओकील, ओजह आदि। ४.य आ ज : कतहु-कतहु “य”क उच्चारण “ज”जकाँ करैत देखल जाइत अछि, मुदा ओकरा ज नहि लिखबाक चाही। उच्चारणमे यज्ञ, जदि, जमुना, जुग, जाबत, जोगी, जदु, जम आदि कहल जाएबला शब्द सभकेँ क्रमशः यज्ञ, यदि, यमुना, युग, यावत, योगी, यदु, यम लिखबाक चाही। ५.ए आ य : मैथिलीक वर्तनीमे ए आ य दुनू लिखल जाइत अछि। प्राचीन वर्तनी- कएल, जाए, होएत, माए, भाए, गाए आदि। नवीन वर्तनी- कयल, जाय, होयत, माय, भाय, गाय आदि। सामान्यतया शब्दक शुरूमे ए मात्र अबैत अछि। जेना एहि, एना, एकर, एहन आदि। एहि शब्द सभक स्थानपर यहि, यना, यकर, यहन आदिक प्रयोग नहि करबाक चाही। यद्यपि मैथिलीभाषी थारू सहित किछु जातिमे शब्दक आरम्भोमे “ए”केँ य कहि उच्चारण कएल जाइत अछि। ए आ “य”क प्रयोगक सन्दर्भमे प्राचीने पद्धतिक अनुसरण करब उपयुक्त मानि एहि पुस्तकमे ओकरे प्रयोग कएल गेल अछि। किएक तँ दुनूक लेखनमे कोनो सहजता आ दुरूहताक बात नहि अछि। आ मैथिलीक सर्वसाधारणक उच्चारण-शैली यक अपेक्षा एसँ बेसी निकट छैक। खास कऽ कएल, हएब आदि कतिपय शब्दकेँ कैल, हैब आदि रूपमे कतहु-कतहु लिखल जाएब सेहो “ए”क प्रयोगकेँ बेसी समीचीन प्रमाणित करैत अछि। ६.हि, हु तथा एकार, ओकार : मैथिलीक प्राचीन लेखन-परम्परामे कोनो बातपर बल दैत काल शब्दक पाछाँ हि, हु लगाओल जाइत छैक। जेना- हुनकहि, अपनहु, ओकरहु, तत्कालहि, चोट्टहि, आनहु आदि। मुदा आधुनिक लेखनमे हिक स्थानपर एकार एवं हुक स्थानपर ओकारक प्रयोग करैत देखल जाइत अछि। जेना- हुनके, अपनो, तत्काले, चोट्टे, आनो आदि। ७.ष तथा ख : मैथिली भाषामे अधिकांशतः षक उच्चारण ख होइत अछि। जेना- षड्यन्त्र (खड़यन्त्र), षोडशी (खोड़शी), षट्कोण (खटकोण), वृषेश (वृखेश), सन्तोष (सन्तोख) आदि। ८.ध्वनि-लोप : निम्नलिखित अवस्थामे शब्दसँ ध्वनि-लोप भऽ जाइत अछि: (क) क्रियान्वयी प्रत्यय अयमे य वा ए लुप्त भऽ जाइत अछि। ओहिमे सँ पहिने अक उच्चारण दीर्घ भऽ जाइत अछि। ओकर आगाँ लोप-सूचक चिह्न वा विकारी (’ / ऽ) लगाओल जाइछ। जेना- पूर्ण रूप : पढ़ए (पढ़य) गेलाह, कए (कय) लेल, उठए (उठय) पड़तौक। अपूर्ण रूप : पढ़’ गेलाह, क’ लेल, उठ’ पड़तौक। पढ़ऽ गेलाह, कऽ लेल, उठऽ पड़तौक। (ख) पूर्वकालिक कृत आय (आए) प्रत्ययमे य (ए) लुप्त भऽ जाइछ, मुदा लोप-सूचक विकारी नहि लगाओल जाइछ। जेना- पूर्ण रूप : खाए (य) गेल, पठाय (ए) देब, नहाए (य) अएलाह। अपूर्ण रूप : खा गेल, पठा देब, नहा अएलाह। (ग) स्त्री प्रत्यय इक उच्चारण क्रियापद, संज्ञा, ओ विशेषण तीनूमे लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना- पूर्ण रूप : दोसरि मालिनि चलि गेलि। अपूर्ण रूप : दोसर मालिन चलि गेल। (घ) वर्तमान कृदन्तक अन्तिम त लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना- पूर्ण रूप : पढ़ैत अछि, बजैत अछि, गबैत अछि। अपूर्ण रूप : पढ़ै अछि, बजै अछि, गबै अछि। (ङ) क्रियापदक अवसान इक, उक, ऐक तथा हीकमे लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना- पूर्ण रूप: छियौक, छियैक, छहीक, छौक, छैक, अबितैक, होइक। अपूर्ण रूप : छियौ, छियै, छही, छौ, छै, अबितै, होइ। (च) क्रियापदीय प्रत्यय न्ह, हु तथा हकारक लोप भऽ जाइछ। जेना- पूर्ण रूप : छन्हि, कहलन्हि, कहलहुँ, गेलह, नहि। अपूर्ण रूप : छनि, कहलनि, कहलौँ, गेलऽ, नइ, नञि, नै। ९.ध्वनि स्थानान्तरण : कोनो-कोनो स्वर-ध्वनि अपना जगहसँ हटि कऽ दोसर ठाम चलि जाइत अछि। खास कऽ ह्रस्व इ आ उक सम्बन्धमे ई बात लागू होइत अछि। मैथिलीकरण भऽ गेल शब्दक मध्य वा अन्तमे जँ ह्रस्व इ वा उ आबए तँ ओकर ध्वनि स्थानान्तरित भऽ एक अक्षर आगाँ आबि जाइत अछि। जेना- शनि (शइन), पानि (पाइन), दालि ( दाइल), माटि (माइट), काछु (काउछ), मासु (माउस) आदि। मुदा तत्सम शब्द सभमे ई निअम लागू नहि होइत अछि। जेना- रश्मिकेँ रइश्म आ सुधांशुकेँ सुधाउंस नहि कहल जा सकैत अछि। १०.हलन्त(्)क प्रयोग : मैथिली भाषामे सामान्यतया हलन्त (्)क आवश्यकता नहि होइत अछि। कारण जे शब्दक अन्तमे अ उच्चारण नहि होइत अछि। मुदा संस्कृत भाषासँ जहिनाक तहिना मैथिलीमे आएल (तत्सम) शब्द सभमे हलन्त प्रयोग कएल जाइत अछि। एहि पोथीमे सामान्यतया सम्पूर्ण शब्दकेँ मैथिली भाषा सम्बन्धी निअम अनुसार हलन्तविहीन राखल गेल अछि। मुदा व्याकरण सम्बन्धी प्रयोजनक लेल अत्यावश्यक स्थानपर कतहु-कतहु हलन्त देल गेल अछि। प्रस्तुत पोथीमे मथिली लेखनक प्राचीन आ नवीन दुनू शैलीक सरल आ समीचीन पक्ष सभकेँ समेटि कऽ वर्ण-विन्यास कएल गेल अछि। स्थान आ समयमे बचतक सङ्गहि हस्त-लेखन तथा तकनीकी दृष्टिसँ सेहो सरल होबऽबला हिसाबसँ वर्ण-विन्यास मिलाओल गेल अछि। वर्तमान समयमे मैथिली मातृभाषी पर्यन्तकेँ आन भाषाक माध्यमसँ मैथिलीक ज्ञान लेबऽ पड़ि रहल परिप्रेक्ष्यमे लेखनमे सहजता तथा एकरूपतापर ध्यान देल गेल अछि। तखन मैथिली भाषाक मूल विशेषता सभ कुण्ठित नहि होइक, ताहू दिस लेखक-मण्डल सचेत अछि। प्रसिद्ध भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक कहब छनि जे सरलताक अनुसन्धानमे एहन अवस्था किन्नहु ने आबऽ देबाक चाही जे भाषाक विशेषता छाँहमे पडि जाए। -(भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक धारणाकेँ पूर्ण रूपसँ सङ्ग लऽ निर्धारित) १.२. मैथिली अकादमी, पटना द्वारा निर्धारित मैथिली लेखन-शैली
१. जे शब्द मैथिली-साहित्यक प्राचीन कालसँ आइ धरि जाहि वर्त्तनीमे प्रचलित अछि, से सामान्यतः ताहि वर्त्तनीमे लिखल जाय- उदाहरणार्थ-
ग्राह्य
एखन ठाम जकर, तकर तनिकर अछि
अग्राह्य अखन, अखनि, एखेन, अखनी ठिमा, ठिना, ठमा जेकर, तेकर तिनकर। (वैकल्पिक रूपेँ ग्राह्य) ऐछ, अहि, ए।
२. निम्नलिखित तीन प्रकारक रूप वैकल्पिकतया अपनाओल जाय: भऽ गेल, भय गेल वा भए गेल। जा रहल अछि, जाय रहल अछि, जाए रहल अछि। कर’ गेलाह, वा करय गेलाह वा करए गेलाह।
३. प्राचीन मैथिलीक ‘न्ह’ ध्वनिक स्थानमे ‘न’ लिखल जाय सकैत अछि यथा कहलनि वा कहलन्हि।
४. ‘ऐ’ तथा ‘औ’ ततय लिखल जाय जत’ स्पष्टतः ‘अइ’ तथा ‘अउ’ सदृश उच्चारण इष्ट हो। यथा- देखैत, छलैक, बौआ, छौक इत्यादि।
५. मैथिलीक निम्नलिखित शब्द एहि रूपे प्रयुक्त होयत: जैह, सैह, इएह, ओऐह, लैह तथा दैह।
६. ह्र्स्व इकारांत शब्दमे ‘इ’ के लुप्त करब सामान्यतः अग्राह्य थिक। यथा- ग्राह्य देखि आबह, मालिनि गेलि (मनुष्य मात्रमे)।
७. स्वतंत्र ह्रस्व ‘ए’ वा ‘य’ प्राचीन मैथिलीक उद्धरण आदिमे तँ यथावत राखल जाय, किंतु आधुनिक प्रयोगमे वैकल्पिक रूपेँ ‘ए’ वा ‘य’ लिखल जाय। यथा:- कयल वा कएल, अयलाह वा अएलाह, जाय वा जाए इत्यादि।
८. उच्चारणमे दू स्वरक बीच जे ‘य’ ध्वनि स्वतः आबि जाइत अछि तकरा लेखमे स्थान वैकल्पिक रूपेँ देल जाय। यथा- धीआ, अढ़ैआ, विआह, वा धीया, अढ़ैया, बियाह।
९. सानुनासिक स्वतंत्र स्वरक स्थान यथासंभव ‘ञ’ लिखल जाय वा सानुनासिक स्वर। यथा:- मैञा, कनिञा, किरतनिञा वा मैआँ, कनिआँ, किरतनिआँ।
१०. कारकक विभक्त्तिक निम्नलिखित रूप ग्राह्य:- हाथकेँ, हाथसँ, हाथेँ, हाथक, हाथमे। ’मे’ मे अनुस्वार सर्वथा त्याज्य थिक। ‘क’ क वैकल्पिक रूप ‘केर’ राखल जा सकैत अछि।
११. पूर्वकालिक क्रियापदक बाद ‘कय’ वा ‘कए’ अव्यय वैकल्पिक रूपेँ लगाओल जा सकैत अछि। यथा:- देखि कय वा देखि कए।
१२. माँग, भाँग आदिक स्थानमे माङ, भाङ इत्यादि लिखल जाय।
१३. अर्द्ध ‘न’ ओ अर्द्ध ‘म’ क बदला अनुसार नहि लिखल जाय, किंतु छापाक सुविधार्थ अर्द्ध ‘ङ’ , ‘ञ’, तथा ‘ण’ क बदला अनुस्वारो लिखल जा सकैत अछि। यथा:- अङ्क, वा अंक, अञ्चल वा अंचल, कण्ठ वा कंठ।
१४. हलंत चिह्न निअमतः लगाओल जाय, किंतु विभक्तिक संग अकारांत प्रयोग कएल जाय। यथा:- श्रीमान्, किंतु श्रीमानक।
१५. सभ एकल कारक चिह्न शब्दमे सटा क’ लिखल जाय, हटा क’ नहि, संयुक्त विभक्तिक हेतु फराक लिखल जाय, यथा घर परक।
१६. अनुनासिककेँ चन्द्रबिन्दु द्वारा व्यक्त कयल जाय। परंतु मुद्रणक सुविधार्थ हि समान जटिल मात्रापर अनुस्वारक प्रयोग चन्द्रबिन्दुक बदला कयल जा सकैत अछि। यथा- हिँ केर बदला हिं।
१७. पूर्ण विराम पासीसँ ( । ) सूचित कयल जाय।
१८. समस्त पद सटा क’ लिखल जाय, वा हाइफेनसँ जोड़ि क’ , हटा क’ नहि।
१९. लिअ तथा दिअ शब्दमे बिकारी (ऽ) नहि लगाओल जाय।
२०. अंक देवनागरी रूपमे राखल जाय।
२१.किछु ध्वनिक लेल नवीन चिन्ह बनबाओल जाय। जा' ई नहि बनल अछि ताबत एहि दुनू ध्वनिक बदला पूर्ववत् अय/ आय/ अए/ आए/ आओ/ अओ लिखल जाय। आकि ऎ वा ऒ सँ व्यक्त कएल जाय।
ह./- गोविन्द झा ११/८/७६ श्रीकान्त ठाकुर ११/८/७६ सुरेन्द्र झा "सुमन" ११/०८/७६
२. मैथिलीमे भाषा सम्पादन पाठ्यक्रम २.१. उच्चारण निर्देश: (बोल्ड कएल रूप ग्राह्य):- दन्त न क उच्चारणमे दाँतमे जीह सटत- जेना बाजू नाम , मुदा ण क उच्चारणमे जीह मूर्धामे सटत (नै सटैए तँ उच्चारण दोष अछि)- जेना बाजू गणेश। तालव्य शमे जीह तालुसँ , षमे मूर्धासँ आ दन्त समे दाँतसँ सटत। निशाँ, सभ आ शोषण बाजि कऽ देखू। मैथिलीमे ष केँ वैदिक संस्कृत जकाँ ख सेहो उच्चरित कएल जाइत अछि, जेना वर्षा, दोष। य अनेको स्थानपर ज जकाँ उच्चरित होइत अछि आ ण ड़ जकाँ (यथा संयोग आ गणेश संजोग आ गड़ेस उच्चरित होइत अछि)। मैथिलीमे व क उच्चारण ब, श क उच्चारण स आ य क उच्चारण ज सेहो होइत अछि। ओहिना ह्रस्व इ बेशीकाल मैथिलीमे पहिने बाजल जाइत अछि कारण देवनागरीमे आ मिथिलाक्षरमे ह्रस्व इ अक्षरक पहिने लिखलो जाइत आ बाजलो जएबाक चाही। कारण जे हिन्दीमे एकर दोषपूर्ण उच्चारण होइत अछि (लिखल तँ पहिने जाइत अछि मुदा बाजल बादमे जाइत अछि), से शिक्षा पद्धतिक दोषक कारण हम सभ ओकर उच्चारण दोषपूर्ण ढंगसँ कऽ रहल छी। अछि- अ इ छ ऐछ (उच्चारण) छथि- छ इ थ – छैथ (उच्चारण) पहुँचि- प हुँ इ च (उच्चारण) आब अ आ इ ई ए ऐ ओ औ अं अः ऋ ऐ सभ लेल मात्रा सेहो अछि, मुदा ऐमे ई ऐ ओ औ अं अः ऋ केँ संयुक्ताक्षर रूपमे गलत रूपमे प्रयुक्त आ उच्चरित कएल जाइत अछि। जेना ऋ केँ री रूपमे उच्चरित करब। आ देखियौ- ऐ लेल देखिऔ क प्रयोग अनुचित। मुदा देखिऐ लेल देखियै अनुचित। क् सँ ह् धरि अ सम्मिलित भेलासँ क सँ ह बनैत अछि, मुदा उच्चारण काल हलन्त युक्त शब्दक अन्तक उच्चारणक प्रवृत्ति बढ़ल अछि, मुदा हम जखन मनोजमे ज् अन्तमे बजैत छी, तखनो पुरनका लोककेँ बजैत सुनबन्हि- मनोजऽ, वास्तवमे ओ अ युक्त ज् = ज बजै छथि। फेर ज्ञ अछि ज् आ ञ क संयुक्त मुदा गलत उच्चारण होइत अछि- ग्य। ओहिना क्ष अछि क् आ ष क संयुक्त मुदा उच्चारण होइत अछि छ। फेर श् आ र क संयुक्त अछि श्र ( जेना श्रमिक) आ स् आ र क संयुक्त अछि स्र (जेना मिस्र)। त्र भेल त+र । उच्चारणक ऑडियो फाइल विदेह आर्काइव http://www.videha.co.in/ पर उपलब्ध अछि। फेर केँ / सँ / पर पूर्व अक्षरसँ सटा कऽ लिखू मुदा तँ / कऽ हटा कऽ। ऐमे सँ मे पहिल सटा कऽ लिखू आ बादबला हटा कऽ। अंकक बाद टा लिखू सटा कऽ मुदा अन्य ठाम टा लिखू हटा कऽ– जेना छहटा मुदा सभ टा। फेर ६अ म सातम लिखू- छठम सातम नै। घरबलामे बला मुदा घरवालीमे वाली प्रयुक्त करू। रहए- रहै मुदा सकैए (उच्चारण सकै-ए)। मुदा कखनो काल रहए आ रहै मे अर्थ भिन्नता सेहो, जेना से कम्मो जगहमे पार्किंग करबाक अभ्यास रहै ओकरा। पुछलापर पता लागल जे ढुनढुन नाम्ना ई ड्राइवर कनाट प्लेसक पार्किंगमे काज करैत रहए। छलै, छलए मे सेहो ऐ तरहक भेल। छलए क उच्चारण छल-ए सेहो। संयोगने- (उच्चारण संजोगने) केँ/ कऽ केर- क ( केर क प्रयोग गद्यमे नै करू , पद्यमे कऽ सकै छी। ) क (जेना रामक) –रामक आ संगे (उच्चारण राम के / राम कऽ सेहो) सँ- सऽ (उच्चारण) चन्द्रबिन्दु आ अनुस्वार- अनुस्वारमे कंठ धरिक प्रयोग होइत अछि मुदा चन्द्रबिन्दुमे नै। चन्द्रबिन्दुमे कनेक एकारक सेहो उच्चारण होइत अछि- जेना रामसँ- (उच्चारण राम सऽ) रामकेँ- (उच्चारण राम कऽ/ राम के सेहो)। केँ जेना रामकेँ भेल हिन्दीक को (राम को)- राम को= रामकेँ क जेना रामक भेल हिन्दीक का ( राम का) राम का= रामक कऽ जेना जा कऽ भेल हिन्दीक कर ( जा कर) जा कर= जा कऽ सँ भेल हिन्दीक से (राम से) राम से= रामसँ सऽ , तऽ , त , केर (गद्यमे) एे चारू शब्द सबहक प्रयोग अवांछित। के दोसर अर्थेँ प्रयुक्त भऽ सकैए- जेना, के कहलक? विभक्ति “क”क बदला एकर प्रयोग अवांछित। नञि, नहि, नै, नइ, नँइ, नइँ, नइं ऐ सभक उच्चारण आ लेखन - नै त्त्व क बदलामे त्व जेना महत्वपूर्ण (महत्त्वपूर्ण नै) जतए अर्थ बदलि जाए ओतहि मात्र तीन अक्षरक संयुक्ताक्षरक प्रयोग उचित। सम्पति- उच्चारण स म्प इ त (सम्पत्ति नै- कारण सही उच्चारण आसानीसँ सम्भव नै)। मुदा सर्वोत्तम (सर्वोतम नै)। राष्ट्रिय (राष्ट्रीय नै) सकैए/ सकै (अर्थ परिवर्तन) पोछैले/ पोछै लेल/ पोछए लेल पोछैए/ पोछए/ (अर्थ परिवर्तन) पोछए/ पोछै ओ लोकनि ( हटा कऽ, ओ मे बिकारी नै) ओइ/ ओहि ओहिले/ ओहि लेल/ ओही लऽ जएबेँ/ बैसबेँ पँचभइयाँ देखियौक/ (देखिऔक नै- तहिना अ मे ह्रस्व आ दीर्घक मात्राक प्रयोग अनुचित) जकाँ / जेकाँ तँइ/ तैँ/ होएत / हएत नञि/ नहि/ नँइ/ नइँ/ नै सौँसे/ सौंसे बड़ / बड़ी (झोराओल) गाए (गाइ नहि), मुदा गाइक दूध (गाएक दूध नै।) रहलेँ/ पहिरतैँ हमहीं/ अहीं सब - सभ सबहक - सभहक धरि - तक गप- बात बूझब - समझब बुझलौं/ समझलौं/ बुझलहुँ - समझलहुँ हमरा आर - हम सभ आकि- आ कि सकैछ/ करैछ (गद्यमे प्रयोगक आवश्यकता नै) होइन/ होनि जाइन (जानि नै, जेना देल जाइन) मुदा जानि-बूझि (अर्थ परिव्र्तन) पइठ/ जाइठ आउ/ जाउ/ आऊ/ जाऊ मे, केँ, सँ, पर (शब्दसँ सटा कऽ) तँ कऽ धऽ दऽ (शब्दसँ हटा कऽ) मुदा दूटा वा बेसी विभक्ति संग रहलापर पहिल विभक्ति टाकेँ सटाऊ। जेना ऐमे सँ । एकटा , दूटा (मुदा कए टा) बिकारीक प्रयोग शब्दक अन्तमे, बीचमे अनावश्यक रूपेँ नै। आकारान्त आ अन्तमे अ क बाद बिकारीक प्रयोग नै (जेना दिअ , आ/ दिय’ , आ’, आ नै ) अपोस्ट्रोफीक प्रयोग बिकारीक बदलामे करब अनुचित आ मात्र फॉन्टक तकनीकी न्यूनताक परिचायक)- ओना बिकारीक संस्कृत रूप ऽ अवग्रह कहल जाइत अछि आ वर्तनी आ उच्चारण दुनू ठाम एकर लोप रहैत अछि/ रहि सकैत अछि (उच्चारणमे लोप रहिते अछि)। मुदा अपोस्ट्रोफी सेहो अंग्रेजीमे पसेसिव केसमे होइत अछि आ फ्रेंचमे शब्दमे जतए एकर प्रयोग होइत अछि जेना raison d’etre एतए सेहो एकर उच्चारण रैजौन डेटर होइत अछि, माने अपोस्ट्रॉफी अवकाश नै दैत अछि वरन जोड़ैत अछि, से एकर प्रयोग बिकारीक बदला देनाइ तकनीकी रूपेँ सेहो अनुचित)। अइमे, एहिमे/ ऐमे जइमे, जाहिमे एखन/ अखन/ अइखन केँ (के नहि) मे (अनुस्वार रहित) भऽ मे दऽ तँ (तऽ, त नै) सँ ( सऽ स नै) गाछ तर गाछ लग साँझ खन जो (जो go, करै जो do) तै/तइ जेना- तै दुआरे/ तइमे/ तइले जै/जइ जेना- जै कारण/ जइसँ/ जइले ऐ/अइ जेना- ऐ कारण/ ऐसँ/ अइले/ मुदा एकर एकटा खास प्रयोग- लालति कतेक दिनसँ कहैत रहैत अइ लै/लइ जेना लैसँ/ लइले/ लै दुआरे लहँ/ लौं गेलौं/ लेलौं/ लेलँह/ गेलहुँ/ लेलहुँ/ लेलँ जइ/ जाहि/ जै जहिठाम/ जाहिठाम/ जइठाम/ जैठाम एहि/ अहि/ अइ (वाक्यक अंतमे ग्राह्य) / ऐ अइछ/ अछि/ ऐछ तइ/ तहि/ तै/ ताहि ओहि/ ओइ सीखि/ सीख जीवि/ जीवी/ जीब भलेहीं/ भलहिं तैं/ तँइ/ तँए जाएब/ जएब लइ/ लै छइ/ छै नहि/ नै/ नइ गइ/ गै छनि/ छन्हि ... समए शब्दक संग जखन कोनो विभक्ति जुटै छै तखन समै जना समैपर इत्यादि। असगरमे हृदए आ विभक्ति जुटने हृदे जना हृदेसँ, हृदेमे इत्यादि। जइ/ जाहि/ जै जहिठाम/ जाहिठाम/ जइठाम/ जैठाम एहि/ अहि/ अइ/ ऐ अइछ/ अछि/ ऐछ तइ/ तहि/ तै/ ताहि ओहि/ ओइ सीखि/ सीख जीवि/ जीवी/ जीब भले/ भलेहीं/ भलहिं तैं/ तँइ/ तँए जाएब/ जएब लइ/ लै छइ/ छै नहि/ नै/ नइ गइ/ गै छनि/ छन्हि चुकल अछि/ गेल गछि २.२. मैथिलीमे भाषा सम्पादन पाठ्यक्रम नीचाँक सूचीमे देल विकल्पमेसँ लैंगुएज एडीटर द्वारा कोन रूप चुनल जेबाक चाही: बोल्ड कएल रूप ग्राह्य: १.होयबला/ होबयबला/ होमयबला/ हेब’बला, हेम’बला/ होयबाक/होबएबला /होएबाक २. आ’/आऽ आ ३. क’ लेने/कऽ लेने/कए लेने/कय लेने/ल’/लऽ/लय/लए ४. भ’ गेल/भऽ गेल/भय गेल/भए गेल ५. कर’ गेलाह/करऽ गेलह/करए गेलाह/करय गेलाह ६. लिअ/दिअ लिय’,दिय’,लिअ’,दिय’/ ७. कर’ बला/करऽ बला/ करय बला करैबला/क’र’ बला / करैवाली ८. बला वला (पुरूष), वाली (स्त्री) ९ . आङ्ल आंग्ल १०. प्रायः प्रायह ११. दुःख दुख १ २. चलि गेल चल गेल/चैल गेल १३. देलखिन्ह देलकिन्ह, देलखिन १४. देखलन्हि देखलनि/ देखलैन्ह १५. छथिन्ह/ छलन्हि छथिन/ छलैन/ छलनि १६. चलैत/दैत चलति/दैति १७. एखनो अखनो १८. बढ़नि बढ़इन बढ़न्हि १९. ओ’/ओऽ(सर्वनाम) ओ २० . ओ (संयोजक) ओ’/ओऽ २१. फाँगि/फाङ्गि फाइंग/फाइङ २२. जे जे’/जेऽ २३. ना-नुकुर ना-नुकर २४. केलन्हि/केलनि/कयलन्हि २५. तखनतँ/ तखन तँ २६. जा रहल/जाय रहल/जाए रहल २७. निकलय/निकलए लागल/ लगल बहराय/ बहराए लागल/ लगल निकल’/बहरै लागल २८. ओतय/ जतय जत’/ ओत’/ जतए/ ओतए २९. की फूरल जे कि फूरल जे ३०. जे जे’/जेऽ ३१. कूदि / यादि(मोन पारब) कूइद/याइद/कूद/याद/ यादि (मोन) ३२. इहो/ ओहो ३३. हँसए/ हँसय हँसऽ ३४. नौ आकि दस/नौ किंवा दस/ नौ वा दस ३५. सासु-ससुर सास-ससुर ३६. छह/ सात छ/छः/सात ३७. की की’/ कीऽ (दीर्घीकारान्तमे ऽ वर्जित) ३८. जबाब जवाब ३९. करएताह/ करेताह करयताह ४०. दलान दिशि दलान दिश/दलान दिस ४१ . गेलाह गएलाह/गयलाह ४२. किछु आर/ किछु और/ किछ आर ४३. जाइ छल/ जाइत छल जाति छल/जैत छल ४४. पहुँचि/ भेट जाइत छल/ भेट जाइ छलए पहुँच/ भेटि जाइत छल ४५. जबान (युवा)/ जवान(फौजी) ४६. लय/ लए क’/ कऽ/ लए कए / लऽ कऽ/ लऽ कए ४७. ल’/लऽ कय/ कए ४८. एखन / एखने / अखन / अखने ४९. अहींकेँ अहीँकेँ ५०. गहींर गहीँर ५१. धार पार केनाइ धार पार केनाय/केनाए ५२. जेकाँ जेँकाँ/ जकाँ ५३. तहिना तेहिना ५४. एकर अकर ५५. बहिनउ बहनोइ ५६. बहिन बहिनि ५७. बहिन-बहिनोइ बहिन-बहनउ ५८. नहि/ नै ५९. करबा / करबाय/ करबाए ६०. तँ/ त ऽ तय/तए ६१. भैयारी मे छोट-भाए/भै/, जेठ-भाय/भाइ, ६२. गिनतीमे दू भाइ/भाए/भाँइ ६३. ई पोथी दू भाइक/ भाँइ/ भाए/ लेल। यावत जावत ६४. माय मै / माए मुदा माइक ममता ६५. देन्हि/ दइन दनि/ दएन्हि/ दयन्हि दन्हि/ दैन्हि ६६. द’/ दऽ/ दए ६७. ओ (संयोजक) ओऽ (सर्वनाम) ६८. तका कए तकाय तकाए ६९. पैरे (on foot) पएरे कएक/ कैक ७०. ताहुमे/ ताहूमे ७१. पुत्रीक ७२. बजा कय/ कए / कऽ ७३. बननाय/बननाइ ७४. कोला ७५. दिनुका दिनका ७६. ततहिसँ ७७. गरबओलन्हि/ गरबौलनि/ गरबेलन्हि/ गरबेलनि ७८. बालु बालू ७९. चेन्ह चिन्ह(अशुद्ध) ८०. जे जे’ ८१ . से/ के से’/के’ ८२. एखुनका अखनुका ८३. भुमिहार भूमिहार ८४. सुग्गर / सुगरक/ सूगर ८५. झठहाक झटहाक ८६. छूबि ८७. करइयो/ओ करैयो ने देलक /करियौ-करइयौ ८८. पुबारि पुबाइ ८९. झगड़ा-झाँटी झगड़ा-झाँटि ९०. पएरे-पएरे पैरे-पैरे ९१. खेलएबाक ९२. खेलेबाक ९३. लगा ९४. होए- हो – होअए ९५. बुझल बूझल ९६. बूझल (संबोधन अर्थमे) ९७. यैह यएह / इएह/ सैह/ सएह ९८. तातिल ९९. अयनाय- अयनाइ/ अएनाइ/ एनाइ १००. निन्न- निन्द १०१. बिनु बिन १०२. जाए जाइ १०३. जाइ (in different sense)-last word of sentence १०४. छत पर आबि जाइ १०५. ने १०६. खेलाए (play) –खेलाइ १०७. शिकाइत- शिकायत १०८. ढप- ढ़प १०९ . पढ़- पढ ११०. कनिए/ कनिये कनिञे १११. राकस- राकश ११२. होए/ होय होइ ११३. अउरदा- औरदा ११४. बुझेलन्हि (different meaning- got understand) ११५. बुझएलन्हि/बुझेलनि/ बुझयलन्हि (understood himself) ११६. चलि- चल/ चलि गेल ११७. खधाइ- खधाय ११८. मोन पाड़लखिन्ह/ मोन पाड़लखिन/ मोन पारलखिन्ह ११९. कैक- कएक- कइएक १२०. लग ल’ग १२१. जरेनाइ १२२. जरौनाइ जरओनाइ- जरएनाइ/ जरेनाइ १२३. होइत १२४. गरबेलन्हि/ गरबेलनि गरबौलन्हि/ गरबौलनि १२५. चिखैत- (to test)चिखइत १२६. करइयो (willing to do) करैयो १२७. जेकरा- जकरा १२८. तकरा- तेकरा १२९. बिदेसर स्थानेमे/ बिदेसरे स्थानमे १३०. करबयलहुँ/ करबएलहुँ/ करबेलहुँ करबेलौं १३१. हारिक (उच्चारण हाइरक) १३२. ओजन वजन आफसोच/ अफसोस कागत/ कागच/ कागज १३३. आधे भाग/ आध-भागे १३४. पिचा / पिचाय/पिचाए १३५. नञ/ ने १३६. बच्चा नञ (ने) पिचा जाय १३७. तखन ने (नञ) कहैत अछि। कहै/ सुनै/ देखै छल मुदा कहैत-कहैत/ सुनैत-सुनैत/ देखैत-देखैत १३८. कतेक गोटे/ कताक गोटे १३९. कमाइ-धमाइ/ कमाई- धमाई १४० . लग ल’ग १४१. खेलाइ (for playing) १४२. छथिन्ह/ छथिन १४३. होइत होइ १४४. क्यो कियो / केओ १४५. केश (hair) १४६. केस (court-case) १४७ . बननाइ/ बननाय/ बननाए १४८. जरेनाइ १४९. कुरसी कुर्सी १५०. चरचा चर्चा १५१. कर्म करम १५२. डुबाबए/ डुबाबै/ डुमाबै डुमाबय/ डुमाबए १५३. एखुनका/ अखुनका १५४. लए/ लिअए (वाक्यक अंतिम शब्द)- लऽ १५५. कएलक/ केलक १५६. गरमी गर्मी १५७ . वरदी वर्दी १५८. सुना गेलाह सुना’/सुनाऽ १५९. एनाइ-गेनाइ १६०. तेना ने घेरलन्हि/ तेना ने घेरलनि १६१. नञि / नै १६२. डरो ड’रो १६३. कतहु/ कतौ कहीं १६४. उमरिगर-उमेरगर उमरगर १६५. भरिगर १६६. धोल/धोअल धोएल १६७. गप/गप्प १६८. के के’ १६९. दरबज्जा/ दरबजा १७०. ठाम १७१. धरि तक १७२. घूरि लौटि १७३. थोरबेक १७४. बड्ड १७५. तोँ/ तूँ १७६. तोँहि( पद्यमे ग्राह्य) १७७. तोँही / तोँहि १७८. करबाइए करबाइये १७९. एकेटा १८०. करितथि /करतथि १८१. पहुँचि/ पहुँच १८२. राखलन्हि रखलन्हि/ रखलनि १८३. लगलन्हि/ लगलनि लागलन्हि १८४. सुनि (उच्चारण सुइन) १८५. अछि (उच्चारण अइछ) १८६. एलथि गेलथि १८७. बितओने/ बितौने/ बितेने १८८. करबओलन्हि/ करबौलनि/ करेलखिन्ह/ करेलखिन १८९. करएलन्हि/ करेलनि १९०. आकि/ कि १९१. पहुँचि/ पहुँच १९२. बत्ती जराय/ जराए जरा (आगि लगा) १९३. से से’ १९४. हाँ मे हाँ (हाँमे हाँ विभक्त्तिमे हटा कए) १९५. फेल फैल १९६. फइल(spacious) फैल १९७. होयतन्हि/ होएतन्हि/ होएतनि/हेतनि/ हेतन्हि १९८. हाथ मटिआएब/ हाथ मटियाबय/हाथ मटियाएब १९९. फेका फेंका २००. देखाए देखा २०१. देखाबए २०२. सत्तरि सत्तर २०३. साहेब साहब २०४.गेलैन्ह/ गेलन्हि/ गेलनि २०५. हेबाक/ होएबाक २०६.केलो/ कएलहुँ/केलौं/ केलुँ २०७. किछु न किछु/ किछु ने किछु २०८.घुमेलहुँ/ घुमओलहुँ/ घुमेलौं २०९. एलाक/ अएलाक २१०. अः/ अह २११.लय/ लए (अर्थ-परिवर्त्तन) २१२.कनीक/ कनेक २१३.सबहक/ सभक २१४.मिलाऽ/ मिला २१५.कऽ/ क २१६.जाऽ/ जा २१७.आऽ/ आ २१८.भऽ /भ’ (’ फॉन्टक कमीक द्योतक) २१९.निअम/ नियम २२० .हेक्टेअर/ हेक्टेयर २२१.पहिल अक्षर ढ/ बादक/ बीचक ढ़ २२२.तहिं/तहिँ/ तञि/ तैं २२३.कहिं/ कहीं २२४.तँइ/ तैं / तइँ २२५.नँइ/ नइँ/ नञि/ नहि/नै २२६.है/ हए / एलीहेँ/ २२७.छञि/ छै/ छैक /छइ २२८.दृष्टिएँ/ दृष्टियेँ २२९.आ (come)/ आऽ(conjunction) २३०. आ (conjunction)/ आऽ(come) २३१.कुनो/ कोनो, कोना/केना २३२.गेलैन्ह-गेलन्हि-गेलनि २३३.हेबाक- होएबाक २३४.केलौँ- कएलौँ-कएलहुँ/केलौं २३५.किछु न किछ- किछु ने किछु २३६.केहेन- केहन २३७.आऽ (come)-आ (conjunction-and)/आ। आब'-आब' /आबह-आबह २३८. हएत-हैत २३९.घुमेलहुँ-घुमएलहुँ- घुमेलाें २४०.एलाक- अएलाक २४१.होनि- होइन/ होन्हि/ २४२.ओ-राम ओ श्यामक बीच(conjunction), ओऽ कहलक (he said)/ओ २४३.की हए/ कोसी अएली हए/ की है। की हइ २४४.दृष्टिएँ/ दृष्टियेँ २४५ .शामिल/ सामेल २४६.तैँ / तँए/ तञि/ तहिं २४७.जौं / ज्योँ/ जँ/ २४८.सभ/ सब २४९.सभक/ सबहक २५०.कहिं/ कहीं २५१.कुनो/ कोनो/ कोनहुँ/ २५२.फारकती भऽ गेल/ भए गेल/ भय गेल २५३.कोना/ केना/ कन्ना/कना २५४.अः/ अह २५५.जनै/ जनञ २५६.गेलनि/ गेलाह (अर्थ परिवर्तन) २५७.केलन्हि/ कएलन्हि/ केलनि/ २५८.लय/ लए/ लएह (अर्थ परिवर्तन) २५९.कनीक/ कनेक/कनी-मनी २६०.पठेलन्हि पठेलनि/ पठेलइन/ पपठओलन्हि/ पठबौलनि/ २६१.निअम/ नियम २६२.हेक्टेअर/ हेक्टेयर २६३.पहिल अक्षर रहने ढ/ बीचमे रहने ढ़ २६४.आकारान्तमे बिकारीक प्रयोग उचित नै/ अपोस्ट्रोफीक प्रयोग फान्टक तकनीकी न्यूनताक परिचायक ओकर बदला अवग्रह (बिकारी) क प्रयोग उचित २६५.केर (पद्यमे ग्राह्य) / -क/ कऽ/ के २६६.छैन्हि- छन्हि २६७.लगैए/ लगैये २६८.होएत/ हएत २६९.जाएत/ जएत/ २७०.आएत/ अएत/ आओत २७१ .खाएत/ खएत/ खैत २७२.पिअएबाक/ पिएबाक/पियेबाक २७३.शुरु/ शुरुह २७४.शुरुहे/ शुरुए २७५.अएताह/अओताह/ एताह/ औताह २७६.जाहि/ जाइ/ जइ/ जै/ २७७.जाइत/ जैतए/ जइतए २७८.आएल/ अएल २७९.कैक/ कएक २८०.आयल/ अएल/ आएल २८१. जाए/ जअए/ जए (लालति जाए लगलीह।) २८२. नुकएल/ नुकाएल २८३. कठुआएल/ कठुअएल २८४. ताहि/ तै/ तइ २८५. गायब/ गाएब/ गएब २८६. सकै/ सकए/ सकय २८७.सेरा/सरा/ सराए (भात सरा गेल) २८८.कहैत रही/देखैत रही/ कहैत छलौं/ कहै छलौं- अहिना चलैत/ पढ़ैत (पढ़ै-पढ़ैत अर्थ कखनो काल परिवर्तित) - आर बुझै/ बुझैत (बुझै/ बुझै छी, मुदा बुझैत-बुझैत)/ सकैत/ सकै। करैत/ करै। दै/ दैत। छैक/ छै। बचलै/ बचलैक। रखबा/ रखबाक । बिनु/ बिन। रातिक/ रातुक बुझै आ बुझैत केर अपन-अपन जगहपर प्रयोग समीचीन अछि। बुझैत-बुझैत आब बुझलिऐ। हमहूँ बुझै छी। २८९. दुआरे/ द्वारे २९०.भेटि/ भेट/ भेँट २९१. खन/ खीन/ खुना (भोर खन/ भोर खीन) २९२.तक/ धरि २९३.गऽ/ गै (meaning different-जनबै गऽ) २९४.सऽ/ सँ (मुदा दऽ, लऽ) २९५.त्त्व,(तीन अक्षरक मेल बदला पुनरुक्तिक एक आ एकटा दोसरक उपयोग) आदिक बदला त्व आदि। महत्त्व/ महत्व/ कर्ता/ कर्त्ता आदिमे त्त संयुक्तक कोनो आवश्यकता मैथिलीमे नै अछि। वक्तव्य २९६.बेसी/ बेशी २९७.बाला/वाला बला/ वला (रहैबला) २९८ .वाली/ (बदलैवाली) २९९.वार्त्ता/ वार्ता ३००. अन्तर्राष्ट्रिय/ अन्तर्राष्ट्रीय ३०१. लेमए/ लेबए ३०२.लमछुरका, नमछुरका ३०२.लागै/ लगै ( भेटैत/ भेटै) ३०३.लागल/ लगल ३०४.हबा/ हवा ३०५.राखलक/ रखलक ३०६.आ (come)/ आ (and) ३०७. पश्चाताप/ पश्चात्ताप ३०८. ऽ केर व्यवहार शब्दक अन्तमे मात्र, यथासंभव बीचमे नै। ३०९.कहैत/ कहै ३१०. रहए (छल)/ रहै (छलै) (meaning different) ३११.तागति/ ताकति ३१२.खराप/ खराब ३१३.बोइन/ बोनि/ बोइनि ३१४.जाठि/ जाइठ ३१५.कागज/ कागच/ कागत ३१६.गिरै (meaning different- swallow)/ गिरए (खसए) ३१७.राष्ट्रिय/ राष्ट्रीय Festivals of Mithila DATE-LIST (year- 2010-11) (१४१८ साल) Marriage Days: Nov.2010- 19 Dec.2010- 3,8 January 2011- 17, 21, 23, 24, 26, 27, 28 31 Feb.2011- 3, 4, 7, 9, 18, 20, 24, 25, 27, 28 March 2011- 2, 7 May 2011- 11, 12, 13, 18, 19, 20, 22, 23, 29, 30 June 2011- 1, 2, 3, 8, 9, 10, 12, 13, 19, 20, 26, 29 Upanayana Days: February 2011- 8 March 2011- 7 May 2011- 12, 13 June 2011- 6, 12 Dviragaman Din: November 2010- 19, 22, 25, 26 December 2010- 6, 8, 9, 10, 12 February 2011- 20, 21 March 2011- 6, 7, 9, 13 April 2011- 17, 18, 22 May 2011- 5, 6, 8, 13 Mundan Din: November 2010- 24, 26 December 2010- 10, 17 February 2011- 4, 16, 21 March 2011- 7, 9 April 2011- 22 May 2011- 6, 9, 19 June 2011- 3, 6, 10, 20 FESTIVALS OF MITHILA Mauna Panchami-31 July Somavati Amavasya Vrat- 1 August Madhushravani-12 August Nag Panchami- 14 August Raksha Bandhan- 24 Aug Krishnastami- 01 September Kushi Amavasya- 08 September Hartalika Teej- 11 September ChauthChandra-11 September Vishwakarma Pooja- 17 September Karma Dharma Ekadashi-19 September Indra Pooja Aarambh- 20 September Anant Caturdashi- 22 Sep Agastyarghadaan- 23 Sep Pitri Paksha begins- 24 Sep Jimootavahan Vrata/ Jitia-30 Sep Matri Navami- 02 October Kalashsthapan- 08 October Belnauti- 13 October Patrika Pravesh- 14 October Mahastami- 15 October Maha Navami - 16-17 October Vijaya Dashami- 18 October Kojagara- 22 Oct Dhanteras- 3 November Diyabati, shyama pooja- 5 November Annakoota/ Govardhana Pooja-07 November Bhratridwitiya/ Chitragupta Pooja-08 November Chhathi- -12 November Akshyay Navami- 15 November Devotthan Ekadashi- 17 November Kartik Poornima/ Sama Bisarjan- 21 Nov Shaa. ravivratarambh- 21 November Navanna parvan- 24 -26 November Vivaha Panchmi- 10 December Naraknivaran chaturdashi- 01 February Makara/ Teela Sankranti-15 Jan Basant Panchami/ Saraswati Pooja- 08 Februaqry Achla Saptmi- 10 February Mahashivaratri-03 March Holikadahan-Fagua-19 March Holi-20 Mar Varuni Yoga- 31 March va.navaratrarambh- 4 April vaa. Chhathi vrata- 9 April Ram Navami- 12 April Mesha Sankranti-Satuani-14 April Jurishital-15 April Somavati Amavasya Vrata- 02 May Ravi Brat Ant- 08 May Akshaya Tritiya-06 May Janaki Navami- 12 May Vat Savitri-barasait- 01 June Ganga Dashhara-11 June Jagannath Rath Yatra- 3 July Hari Sayan Ekadashi- 11 Jul Aashadhi Guru Poornima-15 Jul VIDEHA ARCHIVE १.विदेह ई-पत्रिकाक सभटा पुरान अंक ब्रेल, तिरहुता आ देवनागरी रूपमे Videha e journal's all old issues in Braille Tirhuta and Devanagari versions विदेह ई-पत्रिकाक पहिल ५० अंक
विदेह ई-पत्रिकाक ५०म सँ आगाँक अंक २.मैथिली पोथी डाउनलोड Maithili Books Download ३.मैथिली ऑडियो संकलन Maithili Audio Downloads ४.मैथिली वीडियोक संकलन Maithili Videos ५.मिथिला चित्रकला/ आधुनिक चित्रकला आ चित्र Mithila Painting/ Modern Art and Photos "विदेह"क एहि सभ सहयोगी लिंकपर सेहो एक बेर जाऊ। ६.विदेह मैथिली क्विज : http://videhaquiz.blogspot.com/ ७.विदेह मैथिली जालवृत्त एग्रीगेटर : http://videha-aggregator.blogspot.com/ ८.विदेह मैथिली साहित्य अंग्रेजीमे अनूदित http://madhubani-art.blogspot.com/ ९.विदेहक पूर्व-रूप "भालसरिक गाछ" : http://gajendrathakur.blogspot.com/ १०.विदेह इंडेक्स : http://videha123.blogspot.com/ ११.विदेह फाइल : http://videha123.wordpress.com/ १२. विदेह: सदेह : पहिल तिरहुता (मिथिला़क्षर) जालवृत्त (ब्लॉग) http://videha-sadeha.blogspot.com/ १३. विदेह:ब्रेल: मैथिली ब्रेलमे: पहिल बेर विदेह द्वारा http://videha-braille.blogspot.com/ १४.VIDEHA IST MAITHILI FORTNIGHTLY EJOURNAL ARCHIVE http://videha-archive.blogspot.com/ १५. विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका मैथिली पोथीक आर्काइव http://videha-pothi.blogspot.com/ १६. विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका ऑडियो आर्काइव http://videha-audio.blogspot.com/ १७. विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका वीडियो आर्काइव http://videha-video.blogspot.com/ १८. विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका मिथिला चित्रकला, आधुनिक कला आ चित्रकला http://videha-paintings-photos.blogspot.com/ १९. मैथिल आर मिथिला (मैथिलीक सभसँ लोकप्रिय जालवृत्त) http://maithilaurmithila.blogspot.com/ २०.श्रुति प्रकाशन http://www.shruti-publication.com/ २१.http://groups.google.com/group/videha VIDEHA केर सदस्यता लिअ Top of Form Bottom of Form ईमेल : एहि समूहपर जाऊ २२.http://groups.yahoo.com/group/VIDEHA/ Top of Form Subscribe to VIDEHA Powered by us.groups.yahoo.com Bottom of Form २३.गजेन्द्र ठाकुर इडेक्स http://gajendrathakur123.blogspot.com २४.विदेह रेडियो:मैथिली कथा-कविता आदिक पहिल पोडकास्ट साइट http://videha123radio.wordpress.com/ २५. नेना भुटका http://mangan-khabas.blogspot.com/ महत्त्वपूर्ण सूचना:(१) 'विदेह' द्वारा धारावाहिक रूपे ई-प्रकाशित कएल गेल गजेन्द्र ठाकुरक निबन्ध-प्रबन्ध-समीक्षा, उपन्यास (सहस्रबाढ़नि) , पद्य-संग्रह (सहस्राब्दीक चौपड़पर), कथा-गल्प (गल्प-गुच्छ), नाटक(संकर्षण), महाकाव्य (त्वञ्चाहञ्च आ असञ्जाति मन) आ बाल-किशोर साहित्य विदेहमे संपूर्ण ई-प्रकाशनक बाद प्रिंट फॉर्ममे। कुरुक्षेत्रम्–अन्तर्मनक खण्ड-१ सँ ७ Combined ISBN No.978-81-907729-7-6 विवरण एहि पृष्ठपर नीचाँमे आ प्रकाशकक साइट http://www.shruti-publication.com/ पर । महत्त्वपूर्ण सूचना (२):सूचना: विदेहक मैथिली-अंग्रेजी आ अंग्रेजी मैथिली कोष (इंटरनेटपर पहिल बेर सर्च-डिक्शनरी) एम.एस. एस.क्यू.एल. सर्वर आधारित -Based on ms-sql server Maithili-English and English-Maithili Dictionary. विदेहक भाषापाक- रचनालेखन स्तंभमे। कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक- गजेन्द्र ठाकुर गजेन्द्र ठाकुरक निबन्ध-प्रबन्ध-समीक्षा, उपन्यास (सहस्रबाढ़नि) , पद्य-संग्रह (सहस्राब्दीक चौपड़पर), कथा-गल्प (गल्प गुच्छ), नाटक(संकर्षण), महाकाव्य (त्वञ्चाहञ्च आ असञ्जाति मन) आ बालमंडली-किशोरजगत विदेहमे संपूर्ण ई-प्रकाशनक बाद प्रिंट फॉर्ममे। कुरुक्षेत्रम्–अन्तर्मनक, खण्ड-१ सँ ७ Ist edition 2009 of Gajendra Thakur’s KuruKshetram-Antarmanak (Vol. I to VII)- essay-paper-criticism, novel, poems, story, play, epics and Children-grown-ups literature in single binding: Language:Maithili ६९२ पृष्ठ : मूल्य भा. रु. 100/-(for individual buyers inside india) (add courier charges Rs.50/-per copy for Delhi/NCR and Rs.100/- per copy for outside Delhi)
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Details for purchase available at print-version publishers's site website: http://www.shruti-publication.com/ or you may write to e-mail:shruti.publication@shruti-publication.com विदेह: सदेह : १: २: ३: ४ तिरहुता : देवनागरी "विदेह" क, प्रिंट संस्करण :विदेह-ई-पत्रिका (http://www.videha.co.in/) क चुनल रचना सम्मिलित। विदेह:सदेह:१: २: ३: ४ सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। Details for purchase available at print-version publishers's site http://www.shruti-publication.com or you may write to shruti.publication@shruti-publication.com २. संदेश- [ विदेह ई-पत्रिका, विदेह:सदेह मिथिलाक्षर आ देवनागरी आ गजेन्द्र ठाकुरक सात खण्डक- निबन्ध-प्रबन्ध-समीक्षा,उपन्यास (सहस्रबाढ़नि) , पद्य-संग्रह (सहस्राब्दीक चौपड़पर), कथा-गल्प (गल्प गुच्छ), नाटक (संकर्षण), महाकाव्य (त्वञ्चाहञ्च आ असञ्जाति मन) आ बाल-मंडली-किशोर जगत- संग्रह कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक मादेँ। ] १.श्री गोविन्द झा- विदेहकेँ तरंगजालपर उतारि विश्वभरिमे मातृभाषा मैथिलीक लहरि जगाओल, खेद जे अपनेक एहि महाभियानमे हम एखन धरि संग नहि दए सकलहुँ। सुनैत छी अपनेकेँ सुझाओ आ रचनात्मक आलोचना प्रिय लगैत अछि तेँ किछु लिखक मोन भेल। हमर सहायता आ सहयोग अपनेकेँ सदा उपलब्ध रहत। २.श्री रमानन्द रेणु- मैथिलीमे ई-पत्रिका पाक्षिक रूपेँ चला कऽ जे अपन मातृभाषाक प्रचार कऽ रहल छी, से धन्यवाद । आगाँ अपनेक समस्त मैथिलीक कार्यक हेतु हम हृदयसँ शुभकामना दऽ रहल छी। ३.श्री विद्यानाथ झा "विदित"- संचार आ प्रौद्योगिकीक एहि प्रतिस्पर्धी ग्लोबल युगमे अपन महिमामय "विदेह"केँ अपना देहमे प्रकट देखि जतबा प्रसन्नता आ संतोष भेल, तकरा कोनो उपलब्ध "मीटर"सँ नहि नापल जा सकैछ? ..एकर ऐतिहासिक मूल्यांकन आ सांस्कृतिक प्रतिफलन एहि शताब्दीक अंत धरि लोकक नजरिमे आश्चर्यजनक रूपसँ प्रकट हैत। ४. प्रो. उदय नारायण सिंह "नचिकेता"- जे काज अहाँ कए रहल छी तकर चरचा एक दिन मैथिली भाषाक इतिहासमे होएत। आनन्द भए रहल अछि, ई जानि कए जे एतेक गोट मैथिल "विदेह" ई जर्नलकेँ पढ़ि रहल छथि।...विदेहक चालीसम अंक पुरबाक लेल अभिनन्दन। ५. डॉ. गंगेश गुंजन- एहि विदेह-कर्ममे लागि रहल अहाँक सम्वेदनशील मन, मैथिलीक प्रति समर्पित मेहनतिक अमृत रंग, इतिहास मे एक टा विशिष्ट फराक अध्याय आरंभ करत, हमरा विश्वास अछि। अशेष शुभकामना आ बधाइक सङ्ग, सस्नेह...अहाँक पोथी कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक प्रथम दृष्टया बहुत भव्य तथा उपयोगी बुझाइछ। मैथिलीमे तँ अपना स्वरूपक प्रायः ई पहिले एहन भव्य अवतारक पोथी थिक। हर्षपूर्ण हमर हार्दिक बधाई स्वीकार करी। ६. श्री रामाश्रय झा "रामरंग"(आब स्वर्गीय)- "अपना" मिथिलासँ संबंधित...विषय वस्तुसँ अवगत भेलहुँ।...शेष सभ कुशल अछि। ७. श्री ब्रजेन्द्र त्रिपाठी- साहित्य अकादमी- इंटरनेट पर प्रथम मैथिली पाक्षिक पत्रिका "विदेह" केर लेल बधाई आ शुभकामना स्वीकार करू। ८. श्री प्रफुल्लकुमार सिंह "मौन"- प्रथम मैथिली पाक्षिक पत्रिका "विदेह" क प्रकाशनक समाचार जानि कनेक चकित मुदा बेसी आह्लादित भेलहुँ। कालचक्रकेँ पकड़ि जाहि दूरदृष्टिक परिचय देलहुँ, ओहि लेल हमर मंगलकामना। ९.डॉ. शिवप्रसाद यादव- ई जानि अपार हर्ष भए रहल अछि, जे नव सूचना-क्रान्तिक क्षेत्रमे मैथिली पत्रकारिताकेँ प्रवेश दिअएबाक साहसिक कदम उठाओल अछि। पत्रकारितामे एहि प्रकारक नव प्रयोगक हम स्वागत करैत छी, संगहि "विदेह"क सफलताक शुभकामना। १०. श्री आद्याचरण झा- कोनो पत्र-पत्रिकाक प्रकाशन- ताहूमे मैथिली पत्रिकाक प्रकाशनमे के कतेक सहयोग करताह- ई तऽ भविष्य कहत। ई हमर ८८ वर्षमे ७५ वर्षक अनुभव रहल। एतेक पैघ महान यज्ञमे हमर श्रद्धापूर्ण आहुति प्राप्त होयत- यावत ठीक-ठाक छी/ रहब। ११. श्री विजय ठाकुर- मिशिगन विश्वविद्यालय- "विदेह" पत्रिकाक अंक देखलहुँ, सम्पूर्ण टीम बधाईक पात्र अछि। पत्रिकाक मंगल भविष्य हेतु हमर शुभकामना स्वीकार कएल जाओ। १२. श्री सुभाषचन्द्र यादव- ई-पत्रिका "विदेह" क बारेमे जानि प्रसन्नता भेल। ’विदेह’ निरन्तर पल्लवित-पुष्पित हो आ चतुर्दिक अपन सुगंध पसारय से कामना अछि। १३. श्री मैथिलीपुत्र प्रदीप- ई-पत्रिका "विदेह" केर सफलताक भगवतीसँ कामना। हमर पूर्ण सहयोग रहत। १४. डॉ. श्री भीमनाथ झा- "विदेह" इन्टरनेट पर अछि तेँ "विदेह" नाम उचित आर कतेक रूपेँ एकर विवरण भए सकैत अछि। आइ-काल्हि मोनमे उद्वेग रहैत अछि, मुदा शीघ्र पूर्ण सहयोग देब।कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक देखि अति प्रसन्नता भेल। मैथिलीक लेल ई घटना छी। १५. श्री रामभरोस कापड़ि "भ्रमर"- जनकपुरधाम- "विदेह" ऑनलाइन देखि रहल छी। मैथिलीकेँ अन्तर्राष्ट्रीय जगतमे पहुँचेलहुँ तकरा लेल हार्दिक बधाई। मिथिला रत्न सभक संकलन अपूर्व। नेपालोक सहयोग भेटत, से विश्वास करी। १६. श्री राजनन्दन लालदास- "विदेह" ई-पत्रिकाक माध्यमसँ बड़ नीक काज कए रहल छी, नातिक अहिठाम देखलहुँ। एकर वार्षिक अंक जखन प्रिंट निकालब तँ हमरा पठायब। कलकत्तामे बहुत गोटेकेँ हम साइटक पता लिखाए देने छियन्हि। मोन तँ होइत अछि जे दिल्ली आबि कए आशीर्वाद दैतहुँ, मुदा उमर आब बेशी भए गेल। शुभकामना देश-विदेशक मैथिलकेँ जोड़बाक लेल।.. उत्कृष्ट प्रकाशन कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक लेल बधाइ। अद्भुत काज कएल अछि, नीक प्रस्तुति अछि सात खण्डमे। मुदा अहाँक सेवा आ से निःस्वार्थ तखन बूझल जाइत जँ अहाँ द्वारा प्रकाशित पोथी सभपर दाम लिखल नहि रहितैक। ओहिना सभकेँ विलहि देल जइतैक। (स्पष्टीकरण- श्रीमान्, अहाँक सूचनार्थ विदेह द्वारा ई-प्रकाशित कएल सभटा सामग्री आर्काइवमे https://sites.google.com/a/videha.com/videha-pothi/ पर बिना मूल्यक डाउनलोड लेल उपलब्ध छै आ भविष्यमे सेहो रहतैक। एहि आर्काइवकेँ जे कियो प्रकाशक अनुमति लऽ कऽ प्रिंट रूपमे प्रकाशित कएने छथि आ तकर ओ दाम रखने छथि ताहिपर हमर कोनो नियंत्रण नहि अछि।- गजेन्द्र ठाकुर)... अहाँक प्रति अशेष शुभकामनाक संग। १७. डॉ. प्रेमशंकर सिंह- अहाँ मैथिलीमे इंटरनेटपर पहिल पत्रिका "विदेह" प्रकाशित कए अपन अद्भुत मातृभाषानुरागक परिचय देल अछि, अहाँक निःस्वार्थ मातृभाषानुरागसँ प्रेरित छी, एकर निमित्त जे हमर सेवाक प्रयोजन हो, तँ सूचित करी। इंटरनेटपर आद्योपांत पत्रिका देखल, मन प्रफुल्लित भऽ गेल। १८.श्रीमती शेफालिका वर्मा- विदेह ई-पत्रिका देखि मोन उल्लाससँ भरि गेल। विज्ञान कतेक प्रगति कऽ रहल अछि...अहाँ सभ अनन्त आकाशकेँ भेदि दियौ, समस्त विस्तारक रहस्यकेँ तार-तार कऽ दियौक...। अपनेक अद्भुत पुस्तक कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक विषयवस्तुक दृष्टिसँ गागरमे सागर अछि। बधाई। १९.श्री हेतुकर झा, पटना-जाहि समर्पण भावसँ अपने मिथिला-मैथिलीक सेवामे तत्पर छी से स्तुत्य अछि। देशक राजधानीसँ भय रहल मैथिलीक शंखनाद मिथिलाक गाम-गाममे मैथिली चेतनाक विकास अवश्य करत। २०. श्री योगानन्द झा, कबिलपुर, लहेरियासराय- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पोथीकेँ निकटसँ देखबाक अवसर भेटल अछि आ मैथिली जगतक एकटा उद्भट ओ समसामयिक दृष्टिसम्पन्न हस्ताक्षरक कलमबन्द परिचयसँ आह्लादित छी। "विदेह"क देवनागरी सँस्करण पटनामे रु. 80/- मे उपलब्ध भऽ सकल जे विभिन्न लेखक लोकनिक छायाचित्र, परिचय पत्रक ओ रचनावलीक सम्यक प्रकाशनसँ ऐतिहासिक कहल जा सकैछ। २१. श्री किशोरीकान्त मिश्र- कोलकाता- जय मैथिली, विदेहमे बहुत रास कविता, कथा, रिपोर्ट आदिक सचित्र संग्रह देखि आ आर अधिक प्रसन्नता मिथिलाक्षर देखि- बधाई स्वीकार कएल जाओ। २२.श्री जीवकान्त- विदेहक मुद्रित अंक पढ़ल- अद्भुत मेहनति। चाबस-चाबस। किछु समालोचना मरखाह..मुदा सत्य। २३. श्री भालचन्द्र झा- अपनेक कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक देखि बुझाएल जेना हम अपने छपलहुँ अछि। एकर विशालकाय आकृति अपनेक सर्वसमावेशताक परिचायक अछि। अपनेक रचना सामर्थ्यमे उत्तरोत्तर वृद्धि हो, एहि शुभकामनाक संग हार्दिक बधाई। २४.श्रीमती डॉ नीता झा- अहाँक कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़लहुँ। ज्योतिरीश्वर शब्दावली, कृषि मत्स्य शब्दावली आ सीत बसन्त आ सभ कथा, कविता, उपन्यास, बाल-किशोर साहित्य सभ उत्तम छल। मैथिलीक उत्तरोत्तर विकासक लक्ष्य दृष्टिगोचर होइत अछि। २५.श्री मायानन्द मिश्र- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक मे हमर उपन्यास स्त्रीधनक जे विरोध कएल गेल अछि तकर हम विरोध करैत छी।... कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पोथीक लेल शुभकामना।(श्रीमान् समालोचनाकेँ विरोधक रूपमे नहि लेल जाए।-गजेन्द्र ठाकुर) २६.श्री महेन्द्र हजारी- सम्पादक श्रीमिथिला- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़ि मोन हर्षित भऽ गेल..एखन पूरा पढ़यमे बहुत समय लागत, मुदा जतेक पढ़लहुँ से आह्लादित कएलक। २७.श्री केदारनाथ चौधरी- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक अद्भुत लागल, मैथिली साहित्य लेल ई पोथी एकटा प्रतिमान बनत। २८.श्री सत्यानन्द पाठक- विदेहक हम नियमित पाठक छी। ओकर स्वरूपक प्रशंसक छलहुँ। एम्हर अहाँक लिखल - कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक देखलहुँ। मोन आह्लादित भऽ उठल। कोनो रचना तरा-उपरी। २९.श्रीमती रमा झा-सम्पादक मिथिला दर्पण। कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक प्रिंट फॉर्म पढ़ि आ एकर गुणवत्ता देखि मोन प्रसन्न भऽ गेल, अद्भुत शब्द एकरा लेल प्रयुक्त कऽ रहल छी। विदेहक उत्तरोत्तर प्रगतिक शुभकामना। ३०.श्री नरेन्द्र झा, पटना- विदेह नियमित देखैत रहैत छी। मैथिली लेल अद्भुत काज कऽ रहल छी। ३१.श्री रामलोचन ठाकुर- कोलकाता- मिथिलाक्षर विदेह देखि मोन प्रसन्नतासँ भरि उठल, अंकक विशाल परिदृश्य आस्वस्तकारी अछि। ३२.श्री तारानन्द वियोगी- विदेह आ कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक देखि चकबिदोर लागि गेल। आश्चर्य। शुभकामना आ बधाई। ३३.श्रीमती प्रेमलता मिश्र “प्रेम”- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़लहुँ। सभ रचना उच्चकोटिक लागल। बधाई। ३४.श्री कीर्तिनारायण मिश्र- बेगूसराय- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक बड्ड नीक लागल, आगांक सभ काज लेल बधाई। ३५.श्री महाप्रकाश-सहरसा- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक नीक लागल, विशालकाय संगहि उत्तमकोटिक। ३६.श्री अग्निपुष्प- मिथिलाक्षर आ देवाक्षर विदेह पढ़ल..ई प्रथम तँ अछि एकरा प्रशंसामे मुदा हम एकरा दुस्साहसिक कहब। मिथिला चित्रकलाक स्तम्भकेँ मुदा अगिला अंकमे आर विस्तृत बनाऊ। ३७.श्री मंजर सुलेमान-दरभंगा- विदेहक जतेक प्रशंसा कएल जाए कम होएत। सभ चीज उत्तम। ३८.श्रीमती प्रोफेसर वीणा ठाकुर- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक उत्तम, पठनीय, विचारनीय। जे क्यो देखैत छथि पोथी प्राप्त करबाक उपाय पुछैत छथि। शुभकामना। ३९.श्री छत्रानन्द सिंह झा- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़लहुँ, बड्ड नीक सभ तरहेँ। ४०.श्री ताराकान्त झा- सम्पादक मैथिली दैनिक मिथिला समाद- विदेह तँ कन्टेन्ट प्रोवाइडरक काज कऽ रहल अछि। कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक अद्भुत लागल। ४१.डॉ रवीन्द्र कुमार चौधरी- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक बहुत नीक, बहुत मेहनतिक परिणाम। बधाई। ४२.श्री अमरनाथ- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक आ विदेह दुनू स्मरणीय घटना अछि, मैथिली साहित्य मध्य। ४३.श्री पंचानन मिश्र- विदेहक वैविध्य आ निरन्तरता प्रभावित करैत अछि, शुभकामना। ४४.श्री केदार कानन- कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक लेल अनेक धन्यवाद, शुभकामना आ बधाइ स्वीकार करी। आ नचिकेताक भूमिका पढ़लहुँ। शुरूमे तँ लागल जेना कोनो उपन्यास अहाँ द्वारा सृजित भेल अछि मुदा पोथी उनटौला पर ज्ञात भेल जे एहिमे तँ सभ विधा समाहित अछि। ४५.श्री धनाकर ठाकुर- अहाँ नीक काज कऽ रहल छी। फोटो गैलरीमे चित्र एहि शताब्दीक जन्मतिथिक अनुसार रहैत तऽ नीक। ४६.श्री आशीष झा- अहाँक पुस्तकक संबंधमे एतबा लिखबा सँ अपना कए नहि रोकि सकलहुँ जे ई किताब मात्र किताब नहि थीक, ई एकटा उम्मीद छी जे मैथिली अहाँ सन पुत्रक सेवा सँ निरंतर समृद्ध होइत चिरजीवन कए प्राप्त करत। ४७.श्री शम्भु कुमार सिंह- विदेहक तत्परता आ क्रियाशीलता देखि आह्लादित भऽ रहल छी। निश्चितरूपेण कहल जा सकैछ जे समकालीन मैथिली पत्रिकाक इतिहासमे विदेहक नाम स्वर्णाक्षरमे लिखल जाएत। ओहि कुरुक्षेत्रक घटना सभ तँ अठारहे दिनमे खतम भऽ गेल रहए मुदा अहाँक कुरुक्षेत्रम् तँ अशेष अछि। ४८.डॉ. अजीत मिश्र- अपनेक प्रयासक कतबो प्रशंसा कएल जाए कमे होएतैक। मैथिली साहित्यमे अहाँ द्वारा कएल गेल काज युग-युगान्तर धरि पूजनीय रहत। ४९.श्री बीरेन्द्र मल्लिक- अहाँक कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक आ विदेह:सदेह पढ़ि अति प्रसन्नता भेल। अहाँक स्वास्थ्य ठीक रहए आ उत्साह बनल रहए से कामना। ५०.श्री कुमार राधारमण- अहाँक दिशा-निर्देशमे विदेह पहिल मैथिली ई-जर्नल देखि अति प्रसन्नता भेल। हमर शुभकामना। ५१.श्री फूलचन्द्र झा प्रवीण-विदेह:सदेह पढ़ने रही मुदा कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक देखि बढ़ाई देबा लेल बाध्य भऽ गेलहुँ। आब विश्वास भऽ गेल जे मैथिली नहि मरत। अशेष शुभकामना। ५२.श्री विभूति आनन्द- विदेह:सदेह देखि, ओकर विस्तार देखि अति प्रसन्नता भेल। ५३.श्री मानेश्वर मनुज-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक एकर भव्यता देखि अति प्रसन्नता भेल, एतेक विशाल ग्रन्थ मैथिलीमे आइ धरि नहि देखने रही। एहिना भविष्यमे काज करैत रही, शुभकामना। ५४.श्री विद्यानन्द झा- आइ.आइ.एम.कोलकाता- कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक विस्तार, छपाईक संग गुणवत्ता देखि अति प्रसन्नता भेल। अहाँक अनेक धन्यवाद; कतेक बरखसँ हम नेयारैत छलहुँ जे सभ पैघ शहरमे मैथिली लाइब्रेरीक स्थापना होअए, अहाँ ओकरा वेबपर कऽ रहल छी, अनेक धन्यवाद। ५५.श्री अरविन्द ठाकुर-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक मैथिली साहित्यमे कएल गेल एहि तरहक पहिल प्रयोग अछि, शुभकामना। ५६.श्री कुमार पवन-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक पढ़ि रहल छी। किछु लघुकथा पढ़ल अछि, बहुत मार्मिक छल। ५७. श्री प्रदीप बिहारी-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक देखल, बधाई। ५८.डॉ मणिकान्त ठाकुर-कैलिफोर्निया- अपन विलक्षण नियमित सेवासँ हमरा लोकनिक हृदयमे विदेह सदेह भऽ गेल अछि। ५९.श्री धीरेन्द्र प्रेमर्षि- अहाँक समस्त प्रयास सराहनीय। दुख होइत अछि जखन अहाँक प्रयासमे अपेक्षित सहयोग नहि कऽ पबैत छी। ६०.श्री देवशंकर नवीन- विदेहक निरन्तरता आ विशाल स्वरूप- विशाल पाठक वर्ग, एकरा ऐतिहासिक बनबैत अछि। ६१.श्री मोहन भारद्वाज- अहाँक समस्त कार्य देखल, बहुत नीक। एखन किछु परेशानीमे छी, मुदा शीघ्र सहयोग देब। ६२.श्री फजलुर रहमान हाशमी-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक मे एतेक मेहनतक लेल अहाँ साधुवादक अधिकारी छी। ६३.श्री लक्ष्मण झा "सागर"- मैथिलीमे चमत्कारिक रूपेँ अहाँक प्रवेश आह्लादकारी अछि।..अहाँकेँ एखन आर..दूर..बहुत दूरधरि जेबाक अछि। स्वस्थ आ प्रसन्न रही। ६४.श्री जगदीश प्रसाद मंडल-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक पढ़लहुँ । कथा सभ आ उपन्यास सहस्रबाढ़नि पूर्णरूपेँ पढ़ि गेल छी। गाम-घरक भौगोलिक विवरणक जे सूक्ष्म वर्णन सहस्रबाढ़निमे अछि, से चकित कएलक, एहि संग्रहक कथा-उपन्यास मैथिली लेखनमे विविधता अनलक अछि। समालोचना शास्त्रमे अहाँक दृष्टि वैयक्तिक नहि वरन् सामाजिक आ कल्याणकारी अछि, से प्रशंसनीय। ६५.श्री अशोक झा-अध्यक्ष मिथिला विकास परिषद- कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक लेल बधाई आ आगाँ लेल शुभकामना। ६६.श्री ठाकुर प्रसाद मुर्मु- अद्भुत प्रयास। धन्यवादक संग प्रार्थना जे अपन माटि-पानिकेँ ध्यानमे राखि अंकक समायोजन कएल जाए। नव अंक धरि प्रयास सराहनीय। विदेहकेँ बहुत-बहुत धन्यवाद जे एहेन सुन्दर-सुन्दर सचार (आलेख) लगा रहल छथि। सभटा ग्रहणीय- पठनीय। ६७.बुद्धिनाथ मिश्र- प्रिय गजेन्द्र जी,अहाँक सम्पादन मे प्रकाशित ‘विदेह’आ ‘कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक’ विलक्षण पत्रिका आ विलक्षण पोथी! की नहि अछि अहाँक सम्पादनमे? एहि प्रयत्न सँ मैथिली क विकास होयत,निस्संदेह। ६८.श्री बृखेश चन्द्र लाल- गजेन्द्रजी, अपनेक पुस्तक कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़ि मोन गदगद भय गेल , हृदयसँ अनुगृहित छी । हार्दिक शुभकामना । ६९.श्री परमेश्वर कापड़ि - श्री गजेन्द्र जी । कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़ि गदगद आ नेहाल भेलहुँ। ७०.श्री रवीन्द्रनाथ ठाकुर- विदेह पढ़ैत रहैत छी। धीरेन्द्र प्रेमर्षिक मैथिली गजलपर आलेख पढ़लहुँ। मैथिली गजल कत्तऽ सँ कत्तऽ चलि गेलैक आ ओ अपन आलेखमे मात्र अपन जानल-पहिचानल लोकक चर्च कएने छथि। जेना मैथिलीमे मठक परम्परा रहल अछि। (स्पष्टीकरण- श्रीमान्, प्रेमर्षि जी ओहि आलेखमे ई स्पष्ट लिखने छथि जे किनको नाम जे छुटि गेल छन्हि तँ से मात्र आलेखक लेखकक जानकारी नहि रहबाक द्वारे, एहिमे आन कोनो कारण नहि देखल जाय। अहाँसँ एहि विषयपर विस्तृत आलेख सादर आमंत्रित अछि।-सम्पादक) ७१.श्री मंत्रेश्वर झा- विदेह पढ़ल आ संगहि अहाँक मैगनम ओपस कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक सेहो, अति उत्तम। मैथिलीक लेल कएल जा रहल अहाँक समस्त कार्य अतुलनीय अछि। ७२. श्री हरेकृष्ण झा- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक मैथिलीमे अपन तरहक एकमात्र ग्रन्थ अछि, एहिमे लेखकक समग्र दृष्टि आ रचना कौशल देखबामे आएल जे लेखकक फील्डवर्कसँ जुड़ल रहबाक कारणसँ अछि। ७३.श्री सुकान्त सोम- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक मे समाजक इतिहास आ वर्तमानसँ अहाँक जुड़ाव बड्ड नीक लागल, अहाँ एहि क्षेत्रमे आर आगाँ काज करब से आशा अछि। ७४.प्रोफेसर मदन मिश्र- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक सन किताब मैथिलीमे पहिले अछि आ एतेक विशाल संग्रहपर शोध कएल जा सकैत अछि। भविष्यक लेल शुभकामना। ७५.प्रोफेसर कमला चौधरी- मैथिलीमे कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक सन पोथी आबए जे गुण आ रूप दुनूमे निस्सन होअए, से बहुत दिनसँ आकांक्षा छल, ओ आब जा कऽ पूर्ण भेल। पोथी एक हाथसँ दोसर हाथ घुमि रहल अछि, एहिना आगाँ सेहो अहाँसँ आशा अछि। ७६.श्री उदय चन्द्र झा "विनोद": गजेन्द्रजी, अहाँ जतेक काज कएलहुँ अछि से मैथिलीमे आइ धरि कियो नहि कएने छल। शुभकामना। अहाँकेँ एखन बहुत काज आर करबाक अछि। ७७.श्री कृष्ण कुमार कश्यप: गजेन्द्र ठाकुरजी, अहाँसँ भेँट एकटा स्मरणीय क्षण बनि गेल। अहाँ जतेक काज एहि बएसमे कऽ गेल छी ताहिसँ हजार गुणा आर बेशीक आशा अछि। ७८.श्री मणिकान्त दास: अहाँक मैथिलीक कार्यक प्रशंसा लेल शब्द नहि भेटैत अछि। अहाँक कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक सम्पूर्ण रूपेँ पढ़ि गेलहुँ। त्वञ्चाहञ्च बड्ड नीक लागल। ७९. श्री हीरेन्द्र कुमार झा- विदेह ई-पत्रिकाक सभ अंक ई-पत्रसँ भेटैत रहैत अछि। मैथिलीक ई-पत्रिका छैक एहि बातक गर्व होइत अछि। अहाँ आ अहाँक सभ सहयोगीकेँ हार्दिक शुभकामना। विदेह मैथिली साहित्य आन्दोलन (c)२००४-११. सर्वाधिकार लेखकाधीन आ जतय लेखकक नाम नहि अछि ततय संपादकाधीन। विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। सह-सम्पादक: उमेश मंडल। सहायक सम्पादक: शिव कुमार झा आ मुन्नाजी (मनोज कुमार कर्ण)। भाषा-सम्पादन: नागेन्द्र कुमार झा आ पञ्जीकार विद्यानन्द झा। कला-सम्पादन: ज्योति सुनीत चौधरी आ रश्मि रेखा सिन्हा। सम्पादक-शोध-अन्वेषण: डॉ. जया वर्मा आ डॉ. राजीव कुमार वर्मा। रचनाकार अपन मौलिक आ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि) ggajendra@videha.com केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx, .rtf वा .txt फॉर्मेटमे पठा सकैत छथि। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेताह, से आशा करैत छी। रचनाक अंतमे टाइप रहय, जे ई रचना मौलिक अछि, आ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। मेल प्राप्त होयबाक बाद यथासंभव शीघ्र ( सात दिनक भीतर) एकर प्रकाशनक अंकक सूचना देल जायत। ’विदेह' प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका अछि आ एहिमे मैथिली, संस्कृत आ अंग्रेजीमे मिथिला आ मैथिलीसँ संबंधित रचना प्रकाशित कएल जाइत अछि। एहि ई पत्रिकाकेँ श्रीमति लक्ष्मी ठाकुर द्वारा मासक ०१ आ १५ तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि। (c) 2004-11 सर्वाधिकार सुरक्षित। विदेहमे प्रकाशित सभटा रचना आ आर्काइवक सर्वाधिकार रचनाकार आ संग्रहकर्त्ताक लगमे छन्हि। रचनाक अनुवाद आ पुनः प्रकाशन किंवा आर्काइवक उपयोगक अधिकार किनबाक हेतु ggajendra@videha.co.in पर संपर्क करू। एहि साइटकेँ प्रीति झा ठाकुर, मधूलिका चौधरी आ रश्मि प्रिया द्वारा डिजाइन कएल गेल। सिद्धिरस्तु वि दे ह विदेह Videha বিদেহ विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका Videha Ist Maithili Fortnightly e Magazine विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका 'विदेह' ८५ म अंक ०१ जुलाइ २०११ (वर्ष ४ मास ४३ अंक ८५)http://www.videha.co.in/ मानुषीमिह संस्कृताम् ISSN 2229-547X VIDEHA वि दे ह विदेह Videha বিদেহ विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका Videha Ist Maithili Fortnightly e Magazine विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका'विदेह' ८५ म अंक ०१ जुलाइ २०११ (वर्ष ४ मास ४३ अंक ८५)http://www.videha.co.in/ मानुषीमिह संस्कृताम् ISSN 2229-547X VIDEHA
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