VIDEHA — Issue 86 / अंक ८६

Publication: VIDEHA · Issue: 86
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366 365 ISSN 2229-547X VIDEHA 'विदेह' ८६ म अंक १५ जुलाइ २०११ (वर्ष ४ मास ४३ अंक ८६) वि  दे  ह विदेह Videha বিদেহ http://www.videha.co.in  विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका Videha Ist Maithili Fortnightly e Magazine   नव अंक देखबाक लेल पृष्ठ सभकेँ रिफ्रेश कए देखू। Always refresh the pages for viewing new issue of VIDEHA. Read in your own script Roman(Eng)Gujarati Bangla Oriya Gurmukhi Telugu Tamil Kannada Malayalam Hindi ऐ अंकमे अछि:- १. संपादकीय संदेश २. गद्य २.१.डॉ. राजीव कुमार वर्मा- कारी  घटा बरसैत मेघ २.२.जगदीश प्रसाद मण्‍डल‍- कथा-मातृभूमि २.३.रवि भूषण पाठक- निरालाःदेह विदेह २.४.डॉ रमानन्द झा "रमण"- मिथिला भाषाक अध्ययन आ डॉ. ग्रिअर्सन कृत मैथिली व्याकरण २.५.बिपिन झा- सहनशीलता मजबूरी अथवा कमजोरी? २.६.बेचन ठाकुर-बाप भेल पित्ती २.७.सुमित आनन्द- रिपोर्ट (अनुवाद कार्यशालाक आयोजन) ३. पद्य ३.१.सुबोध झा ३.२.१.राजदेव मण्‍डल २.रामदेव प्रसाद मण्‍डल ‘झारूदार’ ३.३.१.जगदीश प्रसाद मण्‍डल २. राजेश मोहन झा ‘गुंजन’ ३.उमेश मण्‍डल ३.४.रामविलास साहु ३.५.डॉ. शेफालिका वर्मा- प्रकृति- पुरुष ३.६.नवीन कुमार आशा ३.७.गजेन्द्र ठाकुर- गजल ३.८.जवाहर लाल कश्यप ४. मिथिला कला-संगीत- १.ज्योति सुनीत चौधरी २.श्वेता झा (सिंगापुर) ३.गुंजन कर्ण १. मोहनदास (दीर्घकथा):लेखक: उदय प्रकाश (मूल हिन्दीसँ मैथिलीमे अनुवाद विनीत उत्पल) मोहनदास (मैथिली-देवनागरी) मोहनदास (मैथिली-मिथिलाक्षर) मोहनदास (मैथिली-ब्रेल) २.छिन्नमस्ता- प्रभा खेतानक हिन्दी उपन्यासक सुशीला झा द्वारा मैथिली अनुवाद छिन्नमस्ता ६. बालानां कृते-विनीत उत्पल- गुटू रानी ७. भाषापाक रचना-लेखन -[मानक मैथिली], [विदेहक मैथिली-अंग्रेजी आ अंग्रेजी मैथिली कोष (इंटरनेटपर पहिल बेर सर्च-डिक्शनरी) एम.एस. एस.क्यू.एल. सर्वर आधारित -Based on ms-sql server Maithili-English and English-Maithili Dictionary.] 8.VIDEHA FOR NON RESIDENTS 8.1 to 8.3 MAITHILI LITERATURE IN ENGLISH 8.1.1.The Comet   -GAJENDRA THAKUR translated by Jyoti Jha chaudhary 8.1.2.The_Science_of_Words- GAJENDRA THAKUR translated by the author himself 8.1.3.On_the_dice-board_of_the_millennium- GAJENDRA THAKUR translated by Jyoti Jha chaudhary 8.1.4.NAAGPHANS (IN ENGLISH)- SHEFALIKA VERMA translated by Dr. Rajiv Kumar Verma and Dr. Jaya Verma विदेह ई-पत्रिकाक सभटा पुरान अंक ( ब्रेल, तिरहुता आ देवनागरी मे ) पी.डी.एफ. डाउनलोडक लेल नीचाँक लिंकपर उपलब्ध अछि। All the old issues of Videha e journal ( in Braille, Tirhuta and Devanagari versions ) are available for pdf download at the following link. विदेह ई-पत्रिकाक सभटा पुरान अंक ब्रेल, तिरहुता आ देवनागरी रूपमे Videha e journal's all old issues in Braille Tirhuta and Devanagari versions विदेह ई-पत्रिकाक पहिल ५० अंक

विदेह ई-पत्रिकाक ५०म सँ आगाँक अंक विदेह आर.एस.एस.फीड। "विदेह" ई-पत्रिका ई-पत्रसँ प्राप्त करू। अपन मित्रकेँ विदेहक विषयमे सूचित करू। ↑ विदेह आर.एस.एस.फीड एनीमेटरकेँ अपन साइट/ ब्लॉगपर लगाऊ। ब्लॉग "लेआउट" पर "एड गाडजेट" मे "फीड" सेलेक्ट कए "फीड यू.आर.एल." मे http://www.videha.co.in/index.xml टाइप केलासँ सेहो विदेह फीड प्राप्त कए सकैत छी। गूगल रीडरमे पढ़बा लेल http://reader.google.com/ पर जा कऽ Add a  Subscription बटन क्लिक करू आ खाली स्थानमे http://www.videha.co.in/index.xml पेस्ट करू आ Add  बटन दबाउ। Join official Videha facebook group. 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डिसकसन फोरमपर जाऊ। "मैथिल आर मिथिला" (मैथिलीक सभसँ लोकप्रिय जालवृत्त) पर जाऊ। संपादकीय १. मैथिली कथा संग्रह सभमे १.रमेश नारायणक “पाथरक नाव” २. विनोद बिहारी वर्माक “बलानक बोनिहार ओ पल्लवी (तथा अन्य कथा)” ई दुनू कथा संग्रह अपन किछु खास विशिष्टताक कारण विशेष स्थान रखैत अछि। रमेश नारायणक “पाथरक नाव” १९७२ ई. मे उपासना प्रकाशन, ९०, श्रीकृष्णानगर, पटना-१ सँ छपल। विनोद बिहारी वर्माक “बलानक बोनिहार ओ पल्लवी (तथा अन्य कथा)” १९९४ ए. मे मैथिली प्रतिभा. एल.एफ. १/३, युनिट-३, कोहाउसिङ्ग कालोनी, भुवनेश्वर-७५१००१ सँ छपल। रमेश नारायणक “पाथरक नाव” रमेश नारायण अपन कथा-संग्रहक समर्पण करै छथि  ---अथाहो पानिमे ऐना जकाँ झलकैत/ अपना गामक ओहि थाल-कादोकेँ,/ जाहिमे हमरे लेल/ एक गोट रक्तकमल/ जनमि कए फुलेबाक हमर आस/ अटकल अछि.... आ अपना दिससँ कहै छथि- इएह, जे/ एहि संग्रहक कतेको कथा आकाशवाणीक पटना केन्द्रसँ प्रसारित अछि,/ तैं आकाशवाणीक सौजन्यों सँ। ऐ कथा संग्रहमे ई सभ कथा संकलित अछि:- १.ठेहियायल मोन घुमाओन बाट, २.काजरक रेख, ३.आँजुर भरि नोर, ३.काँच निन्न टुटैत स्वप्न, ४.सइँतल सेज निहुँछल निन्न, ५.तेजि गेल बिदेस..., ६.काँट कुसक छाहरि, ७.एक पोस्टकार्ड: सरोजिनी आ’ हम ८.चीरल पन्ना जोड़ल पाँती। विनोद बिहारी वर्माक “बलानक बोनिहार ओ पल्लवी (तथा अन्य कथा)” विनोद बिहारी वर्मा अपन कथा-संग्रहक समर्पण करै छथि:- बहु विद्या विद् / पूज्य लाल भाइ,/ डा. ब्रज किशोर वर्मा “मणिपद्म” क/ पुण्य स्मृतिमे/ श्रद्धापूर्वक समर्पित- विनोद। ऐ संग्रहमे १४ टा कथा अछि जइमे सँ ३ टा कथा मिथिला मिहिर मे छपल छल आ ११ टा कथा वैदेही मे। ऐ कथा संग्रहमे ई सभ कथा संकलित अछि:- १. बलानक बोनिहार ओ पल्लवी, २. कुन्ती, कर्ण ओ परशुराम, ३.सुलोचनाक चटिसार, ४. साहेब, ५. ब्रह्मा-बिसुन-राति, ६.हम पान खेलहुँ, ७.फूलक कथा, ८.अन्तर्मुखी बसुन्धरा, ९. काशक फूल, १०. माछक पिकनिक, ११.जीवन-नाओ, १२.कापुरुष, १३.गोनौर-बाबू, १४.आकाश-फूल २ दिनांक ९ जुलाइ २०११ केँ सायं ४.४५ बजेसँ राति ७.४५ बजे धरि विदेह द्वारा आयोजित पहिल "समानांतर साहित्य अकादेमी" मैथिली कवि सम्मेलन २०११- निर्मली (जिला सुपौल) सम्पन्न भेल। साहित्य अकादेमी द्वारा आयोजित कोलकाता मैथिली कवि सम्मेलन मे २१म शाताब्दीक पहिल दशकक सर्वश्रेष्ठ मैथिली कविता संग्रह "अम्बरा"क लेखक राजदेव मंडल आन श्रष्ठ कविकें नै बजाओल गेल आ ने कोनो सूचना देल गेल। साहित्य अकादेमीक प्रवेश निषेधक ऐ कृत्यक सुधार लेल विदेह द्वारा पहिल "समानांतर साहित्य अकादेमी" मैथिली कवि सम्मेलन २०११" दिनांक ०९ जुलाइ २०११ केँ निर्मली (जिला सुपौल) मे असर्फी दास साहू समाज महिला इन्टर महाविद्यालय परिसर (निर्मली- जिला सुपौल वार्ड नम्बर ७) आयोजित कएल गेलन । ऐ मे ककरो प्रवेष निषेध नै छल। समारोहक उद्घाटन हरिनारायण कामत आ श्री रामजी मण्डल द्वारा दीप प्रज्वलित कऽ कएल गेल। समारोहक अन्तमे श्री राजदेव मण्डलक २०१० ई. मे प्रकाशित कविता संग्रह “अम्बरा”, जे २१म शाताब्दीक पहिल दशकक सर्वश्रेष्ठ मैथिली कविता संग्रह मानल जा रहल अछि, क लोकार्पण सम्मिलित रूपेँ ६ गोटे (डॉ. बचेश्वर झा, श्री जगदीश प्रसाद मण्डल, श्री रामजी प्रसाद मण्डल, श्री रौशन कुमार गुप्ता, श्री हरिनारायण कामत, श्री नन्द विलास राय)  द्वारा सम्पन्न भेल। ऐ काव्य संध्यामे कविता पाठ केलन्हि- १.श्री राधाकान्त मण्डल (स्वागत गीत), २. उमेश पासवान (गेलहे घर छी, हाल, कबाड़ी), ३. श्री रामकृष्ण मण्डल छोटू (माइ), ४. श्री रामदेव प्रसाद मण्डल “झाड़ूदार” (५ टा गीत), ५. श्री नन्द विलास राय (इन्दिरा आवास), ६.श्री कपिलेश्वर साहु (कोसी), ७.श्री रामविलास साहु (३ टा कविता), ८. श्री उमेश मण्डल (२ टा कविता), ९. श्री राजदेव मण्डल (३ टा कविता), १०. श्री जगदीश प्रसाद मण्डल (२ टा कविता)। सभ कविताक बाद कवितापर दुटप्पी समीक्षा सेहो भेल। कवि-सम्मेलनक अध्यक्षता श्री डॉ. बचेश्वर झा केलनि आ कार्यक्रमक संचालन श्री दुर्गानन्द मण्डल केलनि। ऐ कवि सम्मेलनक विशेषता ई रहल जे ऐ इलाकामे ऐ तरहक कार्यक्रम पहिले बेर आयोजित भेल, से श्रोता लोकनिक कहब छलन्हि। मुख्य अतिथि श्री जगदीश प्रसाद मण्डल कार्यक्रम बीचमे कहलनि जे ऐ कार्यक्रमक एतेक हलतलबीमे आयोजित करबाक कारण ई भऽ गेल जे आइ साहित्य अकादेमी द्वारा कोलकातामे मैथिली कवि गोष्ठी कराओल जा रहल अछि, जे हमरा सभक लेल लाजिमीक बात थिक जे हमरा-अहाँक गाममे होमएबला कार्यक्रम कोलकातामे होइए आ हमरा-अहाँकेँ बुझलो नै अछि। लोक ईहो कहलनि जे आइ धरि कार्यक्रमक सभक संचालन हिन्दीमे होइ छल, ई पहिल बेर भेल अछि जे कोनो कार्यक्रमक संचालन ऐ इकाकामे मैथिलीमे भेल। सूचना: विदेह द्वारा २०१२ क जनवरी-फरवरी मासमे पहिल “ विदेह मैथिली नाट्य महोत्सव २०१२” आयोजित कएल जाएत, संयोजक रहताह श्री बेचन ठाकुरजी। स्थान-समयक जानकारी बादमे देल जाएत। ३ विदेह समानान्तर साहित्य अकादेमी सम्मान (मैथिली) १.विदेह समानान्तर साहित्य अकादेमी फेलो पुरस्कार २०१०-११ २०१० श्री गोविन्द झा (समग्र योगदान लेल) २०११ श्री रमानन्द रेणु (समग्र योगदान लेल) २.विदेह समानान्तर साहित्य अकादेमी पुरस्कार २०११-१२ २०११ मूल पुरस्कार- श्री जगदीश प्रसाद मण्डल (गामक जिनगी, कथा संग्रह) २०११ बाल साहित्य पुरस्कार- ले.क. मायानाथ झा (जकर नारी चतुर होइ, कथा संग्रह) २०११ युवा पुरस्कार- आनन्द कुमार झा (कलह, नाटक) २०१२ अनुवाद पुरस्कार- श्री रामलोचन ठाकुर- (पद्मा नदीक माझी, बांग्ला- माणिक वन्दोपाध्याय, उपन्यास बांग्लासँ मैथिली अनुवाद) नेपाल प्रज्ञा प्रतिष्ठानक सदस्यता (नेपाल देशक भाषा-साहित्य,  दर्शन, संस्कृति आ सामाजिक विज्ञानक क्षेत्रमे  सर्वोच्च सम्मान) नेपाल प्रज्ञा प्रतिष्ठानक सदस्यता श्री राम भरोस कापड़ि 'भ्रमर' (2010) श्री राम दयाल राकेश (1999) श्री योगेन्द्र प्रसाद यादव (1994) नेपाल प्रज्ञा प्रतिष्ठान मानद सदस्यता स्व. सुन्दर झा शास्त्री नेपाल प्रज्ञा प्रतिष्ठान आजीवन सदस्यता श्री योगेन्द्र प्रसाद यादव फूलकुमारी महतो मेमोरियल ट्रष्ट काठमाण्डू, नेपालक सम्मान फूलकुमारी महतो मैथिली साधना सम्मान २०६७ - मिथिला नाट्यकला परिषदकेँ फूलकुमारी महतो मैथिली प्रतिभा पुरस्कार २०६७ - सप्तरी राजविराजनिवासी श्रीमती मीना ठाकुरकेँ फूलकुमारी महतो मैथिली प्रतिभा पुरस्कार २०६७ -बुधनगर मोरङनिवासी दयानन्द दिग्पाल यदुवंशीकेँ साहित्य अकादेमी  फेलो- भारत देशक सर्वोच्च साहित्य सम्मान (मैथिली) १९९४-नागार्जुन (स्व. श्री वैद्यनाथ मिश्र “यात्री” १९११-१९९८ ) , हिन्दी आ मैथिली कवि। २०१०- चन्द्रनाथ मिश्र अमर (१९२५- ) - मैथिली साहित्य लेल। साहित्य अकादेमी भाषा सम्मान ( क्लासिकल आ मध्यकालीन साहित्य आ गएर मान्यताप्राप्त भाषा लेल):- २०००- डॉ. जयकान्त मिश्र (क्लासिकल आ मध्यकालीन साहित्य लेल।) २००७- पं. डॉ. शशिनाथ झा (क्लासिकल आ मध्यकालीन साहित्य लेल।) पं. श्री उमारमण मिश्र साहित्य अकादेमी पुरस्कार- मैथिली १९६६- यशोधर झा (मिथिला वैभव, दर्शन) १९६८- यात्री (पत्रहीन नग्न गाछ, पद्य) १९६९- उपेन्द्रनाथ झा “व्यास” (दू पत्र, उपन्यास) १९७०- काशीकान्त मिश्र “मधुप” (राधा विरह, महाकाव्य) १९७१- सुरेन्द्र झा “सुमन” (पयस्विनी, पद्य) १९७३- ब्रजकिशोर वर्मा “मणिपद्म” (नैका बनिजारा, उपन्यास) १९७५- गिरीन्द्र मोहन मिश्र (किछु देखल किछु सुनल, संस्मरण) १९७६- वैद्यनाथ मल्लिक “विधु” (सीतायन, महाकाव्य) १९७७- राजेश्वर झा (अवहट्ठ: उद्भव ओ विकास, समालोचना) १९७८- उपेन्द्र ठाकुर “मोहन” (बाजि उठल मुरली, पद्य) १९७९- तन्त्रनाथ झा (कृष्ण चरित, महाकाव्य) १९८०- सुधांशु शेखर चौधरी (ई बतहा संसार, उपन्यास) १९८१- मार्कण्डेय प्रवासी (अगस्त्यायिनी, महाकाव्य) १९८२- लिली रे (मरीचिका, उपन्यास) १९८३- चन्द्रनाथ मिश्र “अमर” (मैथिली पत्रकारिताक इतिहास) १९८४- आरसी प्रसाद सिंह (सूर्यमुखी, पद्य) १९८५- हरिमोहन झा (जीवन यात्रा, आत्मकथा) १९८६- सुभद्र झा (नातिक पत्रक उत्तर, निबन्ध) १९८७- उमानाथ झा (अतीत, कथा) १९८८- मायानन्द मिश्र (मंत्रपुत्र, उपन्यास) १९८९- काञ्चीनाथ झा “किरण” (पराशर, महाकाव्य) १९९०- प्रभास कुमार चौधरी (प्रभासक कथा, कथा) १९९१- रामदेव झा (पसिझैत पाथर, एकांकी) १९९२- भीमनाथ झा (विविधा, निबन्ध) १९९३- गोविन्द झा (सामाक पौती, कथा) १९९४- गंगेश गुंजन (उचितवक्ता, कथा) १९९५- जयमन्त मिश्र (कविता कुसुमांजलि, पद्य) १९९६- राजमोहन झा (आइ काल्हि परसू, कथा संग्रह) १९९७- कीर्ति नारायण मिश्र (ध्वस्त होइत शान्तिस्तूप, पद्य) १९९८- जीवकान्त (तकै अछि चिड़ै, पद्य) १९९९- साकेतानन्द (गणनायक, कथा) २०००- रमानन्द रेणु (कतेक रास बात, पद्य) २००१- बबुआजी झा “अज्ञात” (प्रतिज्ञा पाण्डव, महाकाव्य) २००२- सोमदेव (सहस्रमुखी चौक पर, पद्य) २००३- नीरजा रेणु (ऋतम्भरा, कथा) २००४- चन्द्रभानु सिंह (शकुन्तला, महाकाव्य) २००५- विवेकानन्द ठाकुर (चानन घन गछिया, पद्य) २००६- विभूति आनन्द (काठ, कथा) २००७- प्रदीप बिहारी (सरोकार, कथा) २००८- मत्रेश्वर झा (कतेक डारि पर, आत्मकथा) २००९- स्व.मनमोहन झा (गंगापुत्र, कथासंग्रह) २०१०-श्रीमति उषाकिरण खान (भामती, उपन्यास) साहित्य अकादेमी मैथिली अनुवाद पुरस्कार १९९२- शैलेन्द्र मोहन झा (शरतचन्द्र व्यक्ति आ कलाकार-सुबोधचन्द्र सेन, अंग्रेजी) १९९३- गोविन्द झा (नेपाली साहित्यक इतिहास- कुमार प्रधान, अंग्रेजी) १९९४- रामदेव झा (सगाइ- राजिन्दर सिंह बेदी, उर्दू) १९९५- सुरेन्द्र झा “सुमन” (रवीन्द्र नाटकावली- रवीन्द्रनाथ टैगोर, बांग्ला) १९९६- फजलुर रहमान हासमी (अबुलकलाम आजाद- अब्दुलकवी देसनवी, उर्दू) १९९७- नवीन चौधरी (माटि मंगल- शिवराम कारंत, कन्नड़) १९९८- चन्द्रनाथ मिश्र “अमर” (परशुरामक बीछल बेरायल कथा- राजशेखर बसु, बांग्ला) १९९९- मुरारी मधुसूदन ठाकुर (आरोग्य निकेतन- ताराशंकर बंदोपाध्याय, बांग्ला) २०००- डॉ. अमरेश पाठक, (तमस- भीष्म साहनी, हिन्दी) २००१- सुरेश्वर झा (अन्तरिक्षमे विस्फोट- जयन्त विष्णु नार्लीकर, मराठी) २००२- डॉ. प्रबोध नारायण सिंह (पतझड़क स्वर- कुर्तुल ऐन हैदर, उर्दू) २००३- उपेन्द दोषी (कथा कहिनी- मनोज दास, उड़िया) २००४- डॉ. प्रफुल्ल कुमार सिंह “मौन” (प्रेमचन्द की कहानी-प्रेमचन्द, हिन्दी) २००५- डॉ. योगानन्द झा (बिहारक लोककथा- पी.सी.राय चौधरी, अंग्रेजी) २००६- राजनन्द झा (कालबेला- समरेश मजुमदार, बांग्ला) २००७- अनन्त बिहारी लाल दास “इन्दु” (युद्ध आ योद्धा-अगम सिंह गिरि, नेपाली) २००८- ताराकान्त झा (संरचनावाद उत्तर-संरचनावाद एवं प्राच्य काव्यशास्त्र-गोपीचन्द नारंग, उर्दू) २००९- भालचन्द्र झा (बीछल बेरायल मराठी एकाँकी-  सम्पादक सुधा जोशी आ रत्नाकर मतकरी, मराठी) २०१०- डॉ. नित्यानन्द लाल दास ( "इग्नाइटेड माइण्ड्स" - मैथिलीमे "प्रज्वलित प्रज्ञा"- डॉ.ए.पी.जे. कलाम, अंग्रेजी) साहित्य अकादेमी मैथिली बाल साहित्य पुरस्कार २०१०-तारानन्द वियोगीकेँ पोथी "ई भेटल तँ की भेटल"  लेल प्रबोध सम्मान प्रबोध सम्मान 2004- श्रीमति लिली रे (1933- ) प्रबोध सम्मान 2005- श्री महेन्द्र मलंगिया (1946- ) प्रबोध सम्मान 2006- श्री गोविन्द झा (1923- ) प्रबोध सम्मान 2007- श्री मायानन्द मिश्र (1934- ) प्रबोध सम्मान 2008- श्री मोहन भारद्वाज (1943- ) प्रबोध सम्मान 2009- श्री राजमोहन झा (1934- ) प्रबोध सम्मान 2010- श्री जीवकान्त (1936- ) प्रबोध सम्मान 2011- श्री सोमदेव (1934- ) यात्री-चेतना पुरस्कार २००० ई.- पं.सुरेन्द्र झा “सुमन”, दरभंगा; २००१ ई. - श्री सोमदेव, दरभंगा; २००२ ई.- श्री महेन्द्र मलंगिया, मलंगिया; २००३ ई.- श्री हंसराज, दरभंगा; २००४ ई.- डॉ. श्रीमती शेफालिका वर्मा, पटना; २००५ ई.-श्री उदय चन्द्र झा “विनोद”, रहिका, मधुबनी; २००६ ई.-श्री गोपालजी झा गोपेश, मेंहथ, मधुबनी; २००७ ई.-श्री आनन्द मोहन झा, भारद्वाज, नवानी, मधुबनी; २००८ ई.-श्री मंत्रेश्वर झा, लालगंज,मधुबनी २००९ ई.-श्री प्रेमशंकर सिंह, जोगियारा, दरभंगा २०१० ई.- डॉ. तारानन्द वियोगी, महिषी, सहरसा कीर्तिनारायण मिश्र साहित्य सम्मान २००८ ई. - श्री हरेकृष्ण झा (कविता संग्रह “एना त नहि जे”) २००९ ई.-श्री उदय नारायण सिंह “नचिकेता” (नाटक नो एण्ट्री: मा प्रविश) २०१० ई.- श्री महाप्रकाश (कविता संग्रह “संग समय के”) भारतीय भाषा परिषद, कोलकाता युवा पुरस्कार (२००९-१०) गौरीनाथ (अनलकांत) केँ मैथिली लेल। भारतीय भाषा संस्थान (सी.आइ.आइ.एल.) , मैसूर रामलोचन ठाकुर:- अनुवाद लेल भाषा-भारती सम्मान २००३-०४ (सी.आइ.आइ.एल., मैसूर) जा सकै छी, किन्तु किए जाउ- शक्ति चट्टोपाध्यायक बांग्ला कविता-संग्रहक मैथिली अनुवाद लेल प्राप्त।  रमानन्द झा 'रमण':- अनुवाद लेल भाषा-भारती सम्मान २००४-०५ (सी.आइ.आइ.एल., मैसूर) छओ बिगहा आठ कट्ठा- फकीर मोहन सेनापतिक ओड़िया उपन्यासक मैथिली अनुवाद लेल प्राप्त। मैलोरंग, दिल्लीक ज्योतिरीश्वर रंगकर्मी सम्मान 2010- श्रीमति प्रेमलता मिश्र 'प्रेम' विदेह समानान्तर साहित्य अकादेमी पुरस्कार १.विदेह समानान्तर साहित्य अकादेमी फेलो पुरस्कार २०१०-११ २०१० श्री गोविन्द झा (समग्र योगदान लेल) २०११ श्री रमानन्द रेणु (समग्र योगदान लेल) २.विदेह समानान्तर साहित्य अकादेमी पुरस्कार २०११-१२ २०११ मूल पुरस्कार- श्री जगदीश प्रसाद मण्डल (गामक जिनगी, कथा संग्रह) २०११ बाल साहित्य पुरस्कार- ले.क. मायानाथ झा (जकर नारी चतुर होइ, कथा संग्रह) २०११ युवा पुरस्कार- आनन्द कुमार झा (कलह, नाटक) २०१२ अनुवाद पुरस्कार- श्री रामलोचन ठाकुर- (पद्मा नदीक माझी, बांग्ला- माणिक वन्दोपाध्याय, उपन्यास बांग्लासँ मैथिली अनुवाद) गजेन्द्र ठाकुर ggajendra@videha.com http://www.maithililekhaksangh.com/2010/07/blog-post_3709.html २. गद्य २.१.डॉ. राजीव कुमार वर्मा- कारी  घटा बरसैत मेघ २.२.जगदीश प्रसाद मण्‍डल‍- कथा-मातृभूमि २.३.रवि भूषण पाठक- निरालाःदेह विदेह २.४.डॉ रमानन्द झा "रमण"- मिथिला भाषाक अध्ययन आ डॉ. ग्रिअर्सन कृत मैथिली व्याकरण २.५.बिपिन झा- सहनशीलता मजबूरी अथवा कमजोरी? २.६.बेचन ठाकुर-बाप भेल पित्ती २.७.सुमित आनन्द- रिपोर्ट (अनुवाद कार्यशालाक आयोजन) डॉ. राजीव कुमार वर्मा कारी  घटा बरसैत मेघ तीस बरीख भ गेल दिल्ली मे I गामक जिनगी मोन पड़ैत अछि I  शेफालिका जीक पोथी भावांजलि  क कुच्छ पन्ना पलट लौं - हमर अपन गाम सजीव भ गेल -- आम , लताम , सीसो, सपाटू, नारियल वृक्षक फुनगी सँ धरती कें अशीशैत चान सुरुजक किरण I हेमंत-बसंतक सुन्नर प्रसून प्रसन्न I कोसी कछेरक प्रार्थना सदृश मंद मंद सुगन्धित , शीतल बयार हवा सँ अठखेली करैत खेत मे गहुमक बालि अनगिन हीरक जोत पसारैत मोइनक जलधार I नाह पर बैसल हम अहाँ पारिजात सुमन सन शुभ्र तारकक ज्योत्सना परिधान स्वर्गक मन्दाकिनी तीर सँ बरसावैत जीवन-दान ब्रह्मक थान सँ अबैत कीर्तन-गान प्राचीन ऋषि मुनिक आश्रम सन पावन शुभ्र स्निग्ध हमर इ डुमरा गाम बाबूजीक विश्वास  माँ क ममत संभरल इ सुन्दर शुचि- धाम I हमरा मोन पड़ल गामक घनघोर मेघ I हथिया आ कान्हा नक्षत्र I चमकैत बिजुरि I मयूरक नाच I  ऋतुक रानी वर्षा I मोन पड़ल ज्योतिरीश्वर ठाकुरक वर्णन - मेघक गज्ज , आकाशक मेचकता , विदुल्लताक तरंग , कदम्बक सौरभ , विष धरक संसार , ददुरक कोलाहल , धाराक संताप , आदित्यक तुच्छता I हम सभ ग्रीष्म ऋतुक ज्वालासं जखन मृतप्राय भ जायत छी तखन वर्षाक बूंद संजीवनिक काज करैत अछि I मोन पाडू भुवनेश्वर सिंह भुवनक शब्द - आएल आषाढ़ , आएल आषाढ़ I भए गेल तिरोहित ग्रीष्म गाढ़ I झर-झर-झर -झर झहरय फुहार I खुजि गेल प्रकृति-मंदिर-दुआर I विश्वनाथ विषपायी जीक पंक्ति सेहो याद अवैत अछि -- पट पहिरि हरित नव प्रकृति नटी पुनि गरा बान्हि कए बक्क माल I झिंगुर नूपुर पिक गीत गाबि फेकै अछि बिजुरिक नयन-जाल II विद्यापतिक नायिका कारी नुआ पहिरि मुह झाँपि, पएरक कड़ा कें ऊपर ससारि, नूपुरक मुह बंद कए पिच्छर मे अभिसारक निमित्त स्थल पर जाइत छथि जबकि वर्षा भए रहल अछि , मेघ गरैज रहल अछि , सांप सह-सह कए रहल अछि I दिल्ली मे वर्षाक इन्तजार मे आंखि मे दरद आ दिल मे बैचेनी I हथिया आ कान्हा क कोनो चर्चा नहि I झिन्गुरक गीत दुर्लभ आ मानव स्वयं विषधर I रत्ती भरि बूंद आ बाट पर गाड़ीक लम्बा जाम I पाईने- पाइन, गड्ढे -गड्ढा I नालीक यमुना रोड पर I नहि चाही हमरा दिल्ली मे हथिया आ कान्हा I दू  बुन्न से काम चला लेब I गाम जायब ते हथिया - कान्हा देख लेब I खूब देखब कारी घटा आ बरसैत मेघ I लेखनी क विराम द रहल छी शेफालिका जीक भावांजलि क गोटेक शब्द सं - हमर हृदय मरुस्थल बनि जाइत अछि अहाँ मेघ बनि बरैस जाइत छी हम कृतज्ञ भ जाइत छी II ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। जगदीश प्रसाद मण्‍डल‍ १ कथा मातृभूमि जि‍नगीक अंति‍म चरणमे आइ अपन मातृभूमि‍क दर्शन भेल। ओ भूमि‍ जइठामसँ माए सदति‍ नजरि‍ उठा-उठा देखैत रहैत, ओ प्‍यारी, सि‍नेही, प्रेमी, जीवनदायि‍नी, जीवन रक्‍छि‍नी भूमि‍-मातृभूमि‍। दर्शन पबि‍ते कमल मन कलपि‍ उठल मुदा असीम उत्‍साहक संग उमंग संचारि‍त भेल। काल्हि‍ धरि‍क जि‍नगी आँखसँ छि‍पए लागल, ओझल हुए लगल, मुँह नुकबए लगल। जइ दि‍न अपन जीवनदायि‍नी भूमि‍सँ वि‍दा हुअए लगल रही पूर्ण जुवा रही। नस-नसमे नव खूनक संचार होइत रहए। समुद्री जुआर जकाँ जुआनी उठैत रहए। आशा-अभि‍लासाक संग पकड़ैक लेल उत्‍साहि‍त रहए। बाट नहि‍ भेटने मातृभूमि‍क दर्शन लाखो कोस दूर दुर्गमे छि‍पल रहए। मुदा दर्शन पबि‍ते सत्-चि‍त्त-आनन्‍दसँ खेलैत दे‍ख, नमन केलि‍यनि‍। डाक्‍टरीक डि‍ग्री प्राप्‍त करि‍ते वि‍याह भेल। नीक गाम, नीक कन्‍या नीक कुल-मूलक संग नीक दहेज भेटल। कोना नै भेटैत, जइ डि‍ग्रीक मांग देश-वि‍देशमे अछि‍ ओइमे बेकारी कतएसँ आओत। मुदा इंजि‍नि‍यर जकाँ तँ नै जे डि‍ग्री पेलोपर काज नै! तइले तँ साधनक जरूरत अछि‍ से अछि‍ कत्तऽ। जुआनीक उमंग उठि‍ते गेल। संयोगो नीक रहल जे बाइस बर्खक अवस्‍थामे ओइ फ्रान्‍समे जइमे महान्-महान् दार्शनि‍क, तत्‍व चि‍न्‍तक वैज्ञानि‍क, कलाकार, साहि‍त्‍यकार, देशभक्‍त जन्‍म लेने छथि‍, काज करैक अवसर भेटल। रंगीनी दुनि‍याँक स्‍वर्ग, जेहन ओतऽ सड़क तेहन एतऽ घर नै, ओइ पेरि‍समे। बि‍सरि‍ गेलौं अपन भूमि‍-अपन मातृभूमि‍। ओना सोलहन्नी वि‍सरि‍ नै गेल रही, मुदा वि‍चारक आलमारीक पोथी जाकमे, तर जरूर पड़ि‍ गेलैं। अखनो मन अछि‍, गामक वि‍द्यालयक देश वन्‍दना। हृदैमे नै पहुँचल छल गंगा सन पवि‍त्र जलधाराक सरि‍ता, नै जनैत छलौं माटि‍क सुगंध आ गाछी-वि‍रछीक फल-फूलक महमही। अनुकूल हवा पाबि‍ मन मोहि‍त भऽ गेल। जी तोड़ि‍ जि‍नगीक पाछु पड़ि‍ गेलौं। करमेसँ जि‍नगी तँ हमरा कि‍अए नै। नीक स्‍तरक परि‍वार बनेलौं, नीक बैंक बैलेन्‍स अछि‍। अपनोसँ बेसी खुशी परि‍वारक सभ रहै छथि‍। कारणो स्‍पष्‍ट अछि‍। वाल-बच्‍चाक जनमे भेल, पत्नी अनके घरमे रहैवाली। मुदा आइ मन वेकल कि‍अए लगैए। बौराइ कि‍अए अछि‍? एकाग्रचि‍त्त सभ दि‍न रहलौं तखन बान्‍हल मन पड़ाए कतऽ चाहैए। कि‍ ‘आएल पानि‍ गेल पानि‍ बाटे-बि‍लाएल पाि‍न।’ जइ मातृभूमि‍क गुनगान बच्‍चा, वृद्ध सभ करै छथि,‍ तइठाम कतऽ छी। बढ़ैत-बढ़ैत जहि‍ना धन बढ़ैए, गाछ-वि‍रीछ बढ़ैए तहि‍ना ने वि‍चारो बढ़ैए। मुदा एना कि‍अए भऽ रहल अछि‍ जे आब ऐठाम- माने पेरि‍समे, नहि‍ रहब अपन मातृभूमि‍क रजकण बनब। जहि‍ना बाइस बर्खक वएसमे अपन गाम, समाज, भूमि‍-मातृभूमि‍ छोड़ि‍ पेरि‍स आएल रही तहि‍ना आइ छोड़ि‍ अपन प्रेमी मातृभूमि‍, सि‍नेही मातृभूमि‍क कोरामे वि‍श्राम करब। मुदा नहि‍यो बुझैत रही तैयौ अबैकाल सभसँ असि‍रवाद लऽ लेने रही तहि‍ना तँ एतौसँ असीरवाद लइये लि‍अ पड़त। जरूर पड़त। मुदा ककरासँ? ककरोसँ नै! ने अपन गंगा-यमुनाक जलधारा, ने हि‍मालय-कैलाश सन पहार, ने गंगा-ब्रहमपुत्र सन धरती, ने समुद्र सदृश्‍य हृदए। जहि‍ना पत्नीक संग आएल रही तहि‍ना जाएब। जँ ओहो नइ जाथि‍ तखन? ओ नइ जाए चाहती तेकर कारणो तँ कहती। “आब ऐठाम नै रहब।” हम पुछलयनि‍। पत्नी बजलीह- “तखन?” हम कहलि‍यनि‍- “अपन मातृभूमि‍क दर्शन भऽ गेल। ओतए जाएब।” फेर पत्नी उत्तर देलनि‍- “सभ अपन-अपन मालि‍क होइए। जँ अहाँ जाएब तँ जाएब।” पुन: पुछलि‍यनि‍- “अहाँ?” पत्नी बजलीह- “अपन कारोवार अछि‍। बेटा-पुतोहू दुनू फ्रान्‍सक भऽ गेल। दुनि‍याँक स्‍वर्गमे रहि‍ रहल छी। तखन कि?” मन पड़ल ओ दि‍न जइ दि‍न जि‍नगीक हि‍साब जोड़ि‍ आएल रही। पत्नी संगे रहथि‍। मुदा आइ? जुग बीत गेल। जि‍नका सभसँ असीरवाद लऽ आएल रही भरि‍सक मरि‍-हरि‍ गेल हेता, गेलापर के हृदए लगौताह। तखन? तखन कि‍? कि‍छु ने। मुदा जाधरि‍ पहुँचव ता धरि‍क तँ उपाए चाही। वि‍दा भऽ गेलाैं। एक समुद्रसँ मि‍लैत दोसर समुद्रक वि‍शाल जलराशि‍क बीच जहाजसँ मद्रास पहुँचलौं। मद्रास बन्‍दरगाहमे उतड़ि‍ अपन धरती, अपन देश, अपन मातृभूमि‍केँ हृदैसँ नमन केलि‍यनि‍। मन पड़ल रामेश्वरम्। जखन मद्रास आबि‍ गेल छी तखन बि‍नु दर्शने जाएब बचपना...। वि‍दा भेलौं। धरती-समुद्रक बीच बनल रामेश्वरमक मंदि‍र। एक दि‍स वि‍शाल जल-राशि‍क समुद्र तँ दोसर दि‍स खि‍लैत इठलाइत मातृभूमि‍। उपर शून्‍य अकास। समुद्रेक लहड़ि‍मे स्‍नान कऽ दर्शन केलौं। मंदि‍रसँ नि‍कलि‍ते खजुरीपर गबैत एकटा साधु मुँहे सुनलौं, “अवगुन चि‍त्त न धरो।” जना भूखकेँ अन्न, पि‍यासकेँ पानि‍ खेहाि‍र दैत, तहि‍ना मनमे भेल। जलखै कऽ गामक लेल गाड़ी पकड़लौं। जंगल, पहाड़, नदी, मैदानकेँ चि‍ड़ैत गाड़ी गाम लग पहुँचल। जे गाम कहि‍यो नन्‍दन वन सदृश्‍य सजल छल- लहलहाइत खेत, रास्‍ता-पेरा वि‍द्यालयसँ सजल छल, धारक कटावसँ वि‍रान बनि‍ गेल अछि‍। ने एकोटा सतघरि‍या पोखरि‍ बचल अछि‍ आ ने पीपरक गाछक नि‍च्‍चाक वि‍द्यालय। घरारी, खेत बनि‍ गेल अछि‍ आ पोखरि‍-झाँखड़ि‍ घरारी। मुदा तँए कि‍, ने गामक परि‍वार कमल, ने लोक आ ने गामक नाअों।‍ गामक दछि‍नवरि‍या सीमापर पहुँचते एकटा नवयुवककेँ पुछलयनि‍- “बाउ की नाओं छी, अही गाम रहै छी?” नवयुवक बालज- “हँ। रमेश नाम छी।” हम पुछलयनि‍- “गामक की हाल-चाल अछि‍?” प्रश्न सुनि‍ रमेश ठमकि‍ गेल। कि‍अए नै ठमकैत। लम्‍वाइ (नमती) भलहि‍ं नै बढ़ल हुअए मुदा रंग आ चौराइ तँ जरूर चतरि‍ये गेल अछि‍। भरि‍सक चेहरा देख डरा गेल अछि‍। मुदा डर तँ ओतऽ बढ़ैत जतऽ डरनि‍हारकेँ आरो डेराएल जाइत। से तँ नै अछि‍। मधुआएल मन मुस्‍कुराइत मुँह खोलि‍ नि‍कलल- “बौआ, चालीस बर्ख पूर्व अही माटि‍-पानि‍क बीच डॉक्‍टर बनि‍ वि‍देश गेलौं......।” मधुर बोली सुनि‍ रमेश बाजल- “गाममे के सभ छथि‍?” कहलि‍ऐ- “कि‍यो नै। जेहो हेताह, हुनको छोड़ि‍ देलि‍यनि‍। जखन छोड़ि‍ देलि‍यनि‍ तँ वएह कि‍अए पकड़ता।” तखन रमेश पुछलक- “रहबै कतऽ.......।” हम बजलौं- “सएह गुनधुनमे छी।” रमेश बाजल- “हम तँ महि‍सवारि‍ करै छी, आन कि‍छु जनै नै छी। चलु वस्‍तीपर पहुँचा दइ छी।” वस्‍तीपर पहुँचा रमेश चलि‍ गेल। हम ठमकि‍ गेलौं। पूवारि‍ भागक घरवारीक नजरि‍ पड़ि‍ते, ओतैसँ पुछलनि‍- “कतऽ जाएब?” कहलि‍यनि‍- “ब्रह्मपुर।” घरवारी कहलनि‍- “यएह छी। इमहर आउ।” मनमे सवुर भेल। हूबा बढ़ल। अपन गामक चालि‍ बढ़ल। लफड़ि‍ कऽ दरबज्‍जापर पहुँचलौं। घरवारी कहलनि‍- “थाकल-ठहि‍आएल आएल छी, पहि‍ने पएर धोउ। चाह बनौने अबै छी, तावत कपड़ा बदलि‍ आराम करू। आइ भरि‍क तँ अभ्‍यागत भेलौं काल्हि‍क वि‍चार काल्हि‍ करब।” कहि‍ आंगन जा चाह अनलक। दुनू गोटे पीबैत कहलि‍यनि‍- “हमहूँ अही गामक वासी छी। नोकरी करए बाहर गेल रही। अपन घरारि‍यो अछि‍ आ दस वीघा चासो।” ओ बाजल- “हमहूँ आने गामक वासी छी। नानाक दोखतरीपर छी। तँए, ने गामक आँट-पेट जनै छी आ ने पुरना लोक सभकेँ।” कहलि‍यनि‍- “हम डॉक्‍टर छी।” ओ बजलाह- “तखन तँ गामक देवते भेलौं। जाबे अपन ठर नै बनि‍ जाइए ताबे एतै रहू। अति‍थि‍-अभ्‍यागतकेँ खुऔने आरो बढ़ै छै।” ठौर पाबि‍ मन खुशी भेल। जीवैक आशा देख पत्नीकेँ फोन लगेलौं- “हेलो..” पत्नी उत्तर देलनि‍- “हँ, हँ, हेलो।” हम कहलि‍यनि‍- “गामसँ बजै छी। पुन: घुरि‍ कऽ पेरि‍स नै आएब। अहाँ जँ आबए चाही तँ चलि‍ आउ।” पत्नी कहलनि‍- “चूक भेल जे संगे नै गेलौं। जाधरि‍ अहाँ छलौं ताधरि‍ आ अखनमे जीवन-मृत्‍युक अन्‍तर आबि‍ गेल अछि‍।” हम कहलि‍यनि‍- “जखने मन हुअए तखने चलि‍ आएब।” ओ बजलीह- “फोन रखै छी..?” २ झमेलि‍या वि‍याह नाटक जगदीश प्रसाद मण्‍डल पात्र परि‍चय- पुरूष पात्र- (1) भागेसर-       45 बर्ख (2) झमेलि‍या-      12 बर्ख (3) यशोधर-       48 बर्ख (4) राजदेव-      55 बर्ख (5) श्‍याम, (राजदेवक पोता)-     8 बर्ख, (6) कृष्‍णानन्‍द, (बी.ए. पास)- 25 बर्ख (7) बालगोवि‍न्‍द, (लड़कीक पि‍ता)- 55 बर्ख (8) राधेश्‍याम, (लड़कीक भाय)-   35 बर्ख (9) घटकभाय-      60 बर्ख (10) रूपलाल, (समाज)-     40 बर्ख (11) गरीबलाल, (समाज)-    45 बर्ख (12) धीरजलाल, (समाज)- 45 बर्ख (13) पान-सात बच्‍चा-       7-15 बर्ख स्‍त्री पात्र- (1) सुशीला, (भागेसरक पत्नी)-    40 बर्ख (2) दायरानी, (बालगोवि‍न्‍दक पत्नी)-     52 बर्ख (3) घटक भाइक पत्नी-      55 बर्ख (4) सुनीता, (कॉलेजमे पढ़ैत)- 20 बर्ख पहि‍ल दृश्‍य (भागेसर, सुशीला) (रोग सज्‍जापर सुशीला। दवाइ आ पानि‍ नेने भागेसरक प्रवेश।) भागेसर-         केहेन मन लगैए? सुशीला-         की कहब। जखन ओछाइनेपर पड़ल छी, तखन भगवानेक हाथ छन्‍हि‍। राजा-दैवक कोन ठेकान? भागेसर-         से की? सुशीला-         उठि‍ कऽ ठाढ़ो भऽ सकै छी, सुतलो रहि‍ सकै छी। भागेसर-         एना कि‍अए बजै छी। कखनो मुँहसँ अवाच कथा नै नि‍काली। दुरभखो वि‍षाइ छै। सुशीला-         (ठहाका दऽ) बताह छी, अगर दुरभाखा पड़तै तँ सुभाखा कि‍अए ने पड़ै छै? सभ मन पति‍अबैक छी। भागेसर-         अच्‍छा पहि‍ने गोटी खा लि‍अ। सुशीला-         एते दि‍नसँ दवाइ करै छी कहाँ एकोरत्ती मन नीक होइए? भागेसर-         बदलि‍ कऽ डाॅक्‍टर सहाएब गोटी देलनि‍। हुनका बुझबेमे फेर भऽ गेल छलनि‍। सभ बात बुझा कऽ कहलनि‍। (गोटी खा पानि‍ पीब पुन: सि‍रहौनीपर माथ रखि‍।) सुशीला-         की सभ बुझा कऽ कहलनि‍? भागेसर-         कहलनि‍ जे एक्के लक्षण-कर्मक कते रंगक बेमारी होइए। बुझैमे दुवि‍धा भऽ गेल। तँए आइसँ दोसर बेमारीक दवाइ दइ छी। सुशीला-         (दर्दक आगमन होइत पँजरा पकड़ि‍।) ओह, नै बाँचब। पेट बड़ दुखाइए। भागेसर-         हाथ घुसकाउ ससारि‍ दइ छी। (सुशीला हाथ घुसकबैत। भागेसर पेट ससारए लगैत कनी कालक पछाति‍।) सुशीला-         हँ, हँ। कनी कऽ दर्द असान भेल। मन हल्‍लुक लगैए। भागेसर-         मनसँ सोग-पीड़ा हटाउ। रोगकेँ दवाइ छोड़ाओत। भरि‍सक दवाइ आ रोगक भि‍ड़ानी भेलै तँए दर्द उपकल। सुशीला-         भऽ सकैए। कि‍अए तँ देखै छि‍ऐ जे भुखल पेटमे छुछे पानि‍ पीलासँ पेट ढकर-ढकर करए लगैए। भरि‍सक सएह होइए। भागेसर-         भगवानक दया हेतनि‍ तँ सभ ठीक भऽ जाएत। सुशीला-         कि‍अए भगवानो लोके जकाँ वि‍चारि‍ कऽ काज करै छथि‍न। भागेसर-         अखैन तक एतबो नै बुझै छि‍ऐ। सुशीला-         हमरा मनमे सदि‍खन चि‍न्‍ते कि‍अए बैसल रहैए। खुशीकेँ कतए नुका कऽ राखि‍ देने छथि‍। आ कि‍.....? भागेसर-         कि‍, आ कि‍? सुशीला-         नै सएह कहलौं। कि‍यो ठहाका मारि‍ हँसैए आ हमरा सबहक हँसि‍ये हराएल अछि‍। भागेसर-         हराएल ककरो ने अछि‍। माइटि‍क तरमे तोपा गेल अछि‍। सुशीला-         ओ नि‍कलत केना? भागेसर-         खुनि‍ कऽ। सुशीला-         कथीसँ खुनबै? भागेसर-         से जे बुझि‍तौं तँ एहि‍ना थाल-पाि‍नमे जि‍नगी बीतैत। सुशीला-         जखन अहाँ एतबो नै बुझै छि‍ऐ तँ पुरूख कोन सपेतक भेलौं। अच्‍छा ऐले मनमे दुख नै करू। नीक-अधलाक बात-वि‍चार दुनू परानी नै करब तँ आनक आशासँ काज चलत। भागेसर-         (मूड़ी डोलबैत जना महसूस करैत, मुँह चि‍कुरि‍अबैत।) कहलौं तँ ओहन बात जे आइ धरि‍ हराएल छलै मुदा ई बुझब केना? (भागेसरक मुँहसँ अगि‍ला दाँत सोझ आएल, जइसँ पत्नी हँसी बुझि‍।) सुशीला-         अहाँक खुशी देख अपनो मन खुशि‍या गेल। भागेसर-         मन कहाँ खुशि‍आएल अछि‍। सुशीला-         तखन? भागेसर-         बतीसयासँ सठि‍या गेल अछि‍। वएह कलपि‍-कलपि‍, कुहरि‍-कुहरि‍ कुकुआ रहल अि‍छ। सुशीला-         छोड़ू ऐ लट्टम-पट्टाकेँ। जेकरा पलखैत छै ओ करैत रहह। अपन दुख-सुखक गप करू। भागेसर-         कना दुख-सुखक गप अखैन करब। मन पीड़ाएल अछि‍ हुअए ने हुअए.......? सुशीला-         की? भागेसर-         पीड़ाएले मन ताउसँ बौराइ छै। पहि‍ने देहक रोग भगाउ तखैन नि‍चेनसँ वि‍चार करब। सुशीला-         बेस कहलौं। भि‍नसरेसँ झमेलि‍याकेँ नै देखलि‍ऐ हेन? भागेसर-         बाल-बोध छै कतौ खेलाइत हेतै। भुख लगतै अपने ने दौड़ल आओत। सुशीला-         ऐ देहक कोनो ठेकान नै अछि‍। तहूमे बेमारी ओछाइन धरौने अछि‍। जीता जि‍नगी पुतोहू देखा दि‍अए? भागेसर-         मन तँ अपनो तीन सालसँ होइए जे बेटा-बेटी करजासँ उरीन रहब तखन जे मरि‍यो जाएब तँ करजासँ उरीन मनकेँ मुक्‍ति‍ हएत। सुशीला-         सएह मनमे उपकल जे बेटीक वि‍याह कइये नेने छी। जँ परानो छुटि‍ जाएत तँ बि‍नु बरो-बरि‍यातीक लहछू करा अंगबला अंग लगा लेत। मुदा.....? भागेसर-         मुदा की? सुशीला-         यएह जे झमेलि‍योक वि‍याह कइये लइतौं। भागेसर-         अखन तँ लगनो-पाती नहि‍ये अछि‍। समए अबै छै तँ बुझल जेतै। (झमेलि‍याक प्रवेश।) झमेलि‍या-         माए, माए मन नीक भेलौं कि‍ने? सुशीला-         बौआ, लाखो रोग मनसँ मेटा जाइए, जखने तोरा देखै ि‍छयह। भि‍नसरेसँ नै देखलि‍अ कतए गेल छेलहहेँ? झमेलि‍या-         इसकूलक फीलपर एकटा गुनी आएल छलै। बहुत रास कीदैन-कहाँ सभ झाेरामे रखने छलै। डमरूओ बजबै छलै आ गाबि‍-गाबि‍ कहबो करै छलै। सुशीला-         कि‍ गबै छलै? झमेलि‍या-         लाख दुखक एक दवाइ। पाँचे रूपैया दामो छलै। सुशीला-         एकटा कि‍अए नेने एहल? झमेलि‍या-         हमरा पाइ छलए? सुशीला-         केमहर गेलै? झमेलि‍या-         मारन बाध दि‍सक रस्‍ता पकड़ि‍ चलि‍ गेल। सुशीला-         बौआक वि‍याह कऽ दि‍यौ? (वि‍याहक नाआंे सुनि‍ झमेलि‍याक मुँहसँ खुशी नि‍कलैत।) भागेसर-         वि‍याहैयो जोकर तँ भइये गेल अछि‍। कहुना-कहुना तँ बारहम बर्ख पार कऽ गेल हएत? सुशीला-         बड़का भुमकमकेँ कते दि‍न भेल हएत। ओही बेर ने जनमल? भागेसर-         सेहो कि‍ नीक जकाँ साल जोड़ल अछि‍। मुदा अपना झमेलि‍यासँ छोट-छोट सभकेँ वि‍याह भेलै तँ झमेलि‍यो भेइये गेल कि‍ने? पटाक्षेप दोसर दृश्‍य (सुरूज डूबैक समए। बाढ़नि‍ लऽ झमेलि‍या आंगन बाहरए लगैत। सुशीला आबि‍ बाढ़नि‍ छि‍नैत।) सुशीला-         जाबे जीबै छी ताबे तोरा केना आंगन-घर बहारए दि‍औ। झमेलि‍या-         कि‍अए, ककरो अनकर छि‍ऐ? अपन घर-आंगन बहारब कोनो पाप छी। सुशीला-         धरम आ पाप नै बुझै छी। मुदा एते तँ जरूर बुझै छी जे भगवानेक बाँटल काज छि‍यनि‍ ने। पुरूख आ स्‍त्रीगणक काज फुट-फुट अछि‍। झमेलि‍या-         राजा-दैवक काज ऐसँ फुट अछि‍। सभ दि‍न कहाँ बहारए अबै छलौं। अखन तू दुखि‍त छेँ, जखन नीक भऽ जेमे तखन ने तोहर काज हेतौ। सुशीला-         सएह बुझै छि‍ही, ई नै बुझै छि‍ही जे काजे पुरूख-सत्रीगणक अन्‍तर कऽ ठाढ़ रखने अछि‍। भलहि‍ं बेटा छि‍ऐ एहेन-एहेन बेरमे तू नै देखमे तँ दोसर केकर आशा। मुदा.......? झमेलि‍या-         मुदा की? सुशीला-         यएह जे माए-बाप बेटा-बेटीक पहि‍ल गुरू होइ छै। हि‍नके सि‍खैलासँ बेटा-बेटी अपन जि‍नगीक रास्‍ता धड़ैए। (माइयक मुँह झमेलि‍या ओहि‍ना देखैत अछि‍ जहि‍ना रोगसँ ग्रसि‍त गाए अपन दूधमुँह बच्‍चा देख हुकड़ैत अछि‍। तहि‍ना हाथक बाढ़नि‍ नि‍च्‍चा मुँहे केने सुशीला आँखि‍ झमेलि‍याक चेहरापर रखि‍ जना पढ़ि‍ रहल हुअए जे‍ ऐ कुल-खनदान आ परि‍वारक संग माइयो बापक तँ यएह माइटि‍क काँच दि‍आरी छी जे अबैत दोसर दि‍आरीकेँ लेसि‍ टि‍मटि‍माइत रहत। तइकाल भागेसर आ यशोधरक प्रवेश।) भागेसर-         (झमेलि‍यासँ) बौआ साँझ पड़ल जाइ छै, दुआर-दरवज्‍जाक काज देखहक। झमेलि‍या-         दरबज्‍जा बहारि‍ आंगन बहारए एलौं कि‍ माए बाढ़नि‍ छीन लेलक। (बि‍ना कि‍छु बजनहि‍ भागेसर नीक-अधलाक वि‍चार करए लगल।) (कनीकाल बाद।) भागेसर-         (पत्नीसँ) मन केहेन अछि‍? सुशीला-         अहूँ बुझि‍ते छी आ अपनो बुझि‍ते छी जे साल भरि‍ दवाइ खाइले डॉक्‍टर सहाएब कहलनि‍ से नि‍महत। जइठीन मथ-टनकीक एकटा गोटी नै भेटै छै तइठीन साल भरि‍ पथ-पानि‍क संग दवाइ खाएब पार लागत? (बहि‍नक बात सुनि‍ यशोधरकेँ देह पसीज गेल। चाइनि‍क पसीना पोछैत।) यशोधर-         बहि‍न, भगवानो आ कानूनो ऐ परि‍वारक जबाबदेह बनौने छथि‍। जाबे जीबै छी ताबे एहेन बात कि‍अए बजै छह? सुशीला-         भैया, अहाँ कि‍अए.....? खाइर छोड़ू काजक की भेल? यशोधर-         बहि‍न, मने-मन हँसि‍यो लगैए आ मनो कचोटैए। मुदा.......? सुशीला-         मुदा की? यशोधर-         (मुस्‍की दैत) पनरह दि‍नमे पएरक तरबा खि‍आ गेल मुदा काजक गोरा नै बैसल। एकटा लड़कीक भाँज नवानीमे लागल। गेलौं। दरबज्‍जापर पहुँच घरवारीकेँ अवाज दैते आंगनसँ नि‍कललाह। (बि‍चहि‍मे भागेसर मुस्‍की देलनि‍।) सुशीला-         कथो-कुटुमैतीकेँ हँसि‍येमे उड़ा दइ छऐ? यशोधर-         हँसीबला काजे भेल। तँए हँसी लगलनि‍। सुशीला-         की हँसीबला काज भेल? यशोधर-         दरबज्‍जापर बैस गप चलेलौं कि‍ जहि‍ना हवाक सि‍हकीमे पाकल आम भड़भड़ा जाइत तहि‍ना स्‍त्रीगण सभ आबए लगलीह। सुशीला-         स्‍त्रीगणे अबए लगली आ पुरूख नै? यशोधर-         स्‍त्रीगण बेसी पुरूख कम। एकटा स्‍त्रीगण बि‍चहि‍मे टभकि‍ गेलीह। सुशीला-         की टपकली? यशोधर-         (मुस्‍की दैत) हँसि‍यो लगैए आ छगुन्‍तो लगैए। बजली जे बर पेदार अछि‍ कि‍ जे आनठाम कन्‍यागत जाइत छथि‍ आ अहाँ......? सुनि‍ते मनमे नेसि‍ देलक। उठि‍ कऽ वि‍दा भऽ गेलौं। सुशीला-         स्‍त्रीगणेक बात सुनि‍ अगुता गेलौं। परि‍वारमे बेटा-बेटीक वि‍याह पैघ काज छि‍ऐ पैघ काजक रास्‍तामे छोट-छोट हुच्‍ची-फुच्‍चीपर नजरि‍ नै देबाक चाहि‍ऐ। यशोधर-         एतबे टा नै ने, गामो नीक नै बुझि‍ पड़ल। आमक गाछीसँ बेसी तरबोनी खजुर बोनी। एहेन गामक स्‍त्रीगण तँ भरि‍ दि‍न नहाइये आ झुटकेसँ पएरे-मजैमे बीता देत। तखन घर-आश्रमक काज केना हएत। सोझे उठि‍ कऽ रास्‍ता धेलौं। सुशीला-         आगू कतए गेलौं? यशोधर-         ननौर। गाम तँ नीक बुझाएल। मुदा राजस्‍थाने जकाँ पानि‍क दशा। खाइर कोनो कि‍ बेटीक वि‍याह करब। बेटाक करब। बैसि‍ते गप-सप्‍प चलल। घरवारी कुल-गोत्र पुछलनि‍। कहलि‍यनि‍। सोझे सुहरदे मुँहे कहलनि‍, कुटुमैती नै हएत। ‍ सुशीला-         कि‍अए, से नै पुछलि‍यनि‍? यशोधर-         कि‍ पुछि‍ति‍यनि‍। उठि‍ कऽ वि‍दा भेलौं। सुशीला-         भैया, दि‍न-दुनि‍याँ एहने अछि‍। कते दि‍न छी आ कि‍ नै छी। मन लगले रहि‍ जाएत। यशोधर-         कोनो कि‍ बेटीक अकाल पड़ि‍ गेल जे भागि‍नक वि‍याह नै हएत। सुशीला-         डाॅक्‍टर सहाएब ऐठाम कते गोटे पेटक बच्‍चा जँचबए आएल रहए। यशोधर-         ओ सभ वि‍याहक दुआरे खुरछाँही कटैए। मुदा.....? सुशीला-         मुदा की? यशोधर-         माइयो-बापक सराध छोड़ि‍ देत। वि‍याहसँ कि‍ हल्‍लुक काज सराधक छै। सुशीला-         ठनका ठनकै छै तँ कियो अपना मत्‍थापर हाथ दइ छै। ई तँ बुझै छी जे, ‘गाए मारि‍ कऽ जूत्ता दान' करैए। मुदा बुझनहि‍ कि‍ हएत। आगूओ बढ़लौं? यशोधर-         छोड़ि‍ केना देब। तेसर ठाम गेलौं तँ पुछलनि‍ जे लड़का गोर अछि‍ कि‍ कारी? सुशीला-         कि‍अए एहेन बात पुछलनि‍? यशोधर-         लोकक माथमे भुस्‍सा भरि‍ गेल छै। एतबो बुझैले तैयार नै जे मनुक्‍खक मनुखता गुणमे छि‍पल छै नै कि‍ रंगमे। सुशीला-         (नि‍राश मने) कि‍ झमेलि‍या ओहि‍ना रहि‍ जाएत। सृष्‍टि‍ ठमकि‍ जाएत? यशोधर-         अखन लगन जोर नै केलकै हेन, तँए। जहि‍या संयोग आबि‍ जेतै तहि‍या सभ ओहि‍ना मुँह तकैत रहत आ वि‍याह भऽ जेतै। सुशीला-         भैया, दि‍न-राति‍ एहने अछि‍। कखन छी कखन नै छी। यशोधर-         बहि‍न, अइले मनमे दुख करैक काज नै । जखन काजमे भीड़ गेलौं तँ कइये कऽ अंत करब। ओना एकटा लगलगाउ बुझि‍ पड़ल। सुशीला-         की लगलगाउ? यशोधर-         ओ कहलनि‍ जे अहूठामक परि‍वारक काज देख लि‍यौ आ ओहूठामक देख कऽ, काज सम्‍हारि‍ लेब। भागेसर-         ई काज हेबे करत। अपनो ब्रह्म कहैए जे एक रंगाह परि‍वार (एक व्‍यवसायसँ जुड़ल)मे कुटुमैती भेने परि‍वारमे हड़हड़-खटखट कम हएत? सुशीला-         (मूड़ी डोलबैत) हँ, से तँ हएत। मुदा वि‍धाताकेँ चूक भेलनि‍ जे मनुक्‍खोकेँ सींघ-नाङरि‍ कि‍अए ने देलखि‍न। पटाक्षेप तेसर दृश्‍य (राजदेवक घर। पोता श्‍यामकेँ पढ़बैत।) राजदेव-         बौआ, स्‍कूलमे कते शि‍क्षक छथि‍? श्‍याम-           थर्टिन गोरे। राजदेव-         ऐ बेर कोनमे जाएब? श्‍याम-           थ्रीमे। (हाथमे अखवार नेने कृष्‍णानन्‍दक प्रवेश।) कृष्‍णानन्‍द-        कक्का, एकटा दुखद समाचार अपनो गामक अछि‍? राजदेव-         (जि‍ज्ञासासँ) से कि‍, से कि‍? कृष्‍णानन्‍द-        (अखवार उनटबैत। आंगुरसँ देखबैत।) देखि‍यौ। चि‍न्है छि‍ऐ एकरा? राजदेव-         (दुनू आँखि‍ तरहत्‍थीसँ पोछि‍ गौरसँ देखए लगैत।) ई तँ चि‍न्‍हरबे जकाँ बुझि‍ पड़ैए। कनी गौरसँ देखए दाए हाथमे तानल बन्‍दूक जकाँ बुझि‍ पड़ैए। कृष्‍णानन्‍द-        हँ, हँ कक्का, पुरानो आँखि‍ अछि‍ तैयो चि‍न्हि‍ गेलि‍ऐ। राजदेव-         कनी आरो नीक जकाँ देखए दाए। गामक तँ एक्के गोरे सीमा चौकीपर रहैए। ब्रह्मदेव। कृष्‍णानन्‍द-        (दुनू आँखि‍क नोर पोछैत।) हँ, हँ कक्का। हुनके छातीमे गोली लगलनि‍। मुँह देखै छि‍ऐ खुजल। देश भक्‍ति‍क नारा लगा रहलाहेँ। राजदेव-         (ति‍लमि‍लाइत।) बौआ, तोरे संगे ने पढ़ै छेलह। कृष्‍णानन्‍द-        संगि‍ये छेलाह। अपना क्‍लासमे सभ दि‍न फस्‍ट करै छलाह। हाइये स्‍कूलसँ मनमे रोपि‍ नेने छेलाह जे देश भक्‍त बनब। से नि‍माहि‍यो लेलनि‍। राजदेव-         बौआ, देश भक्‍तक अर्थ संकीर्ण दायरामे नै वि‍स्‍तृत दयरामे छै। ओना अपन-अपन पसन आ अपन-अपन वि‍चार सभकेँ छै। कृष्‍णानन्‍द-        कनी फरि‍छा कऽ कहि‍यौ? राजदेव-         देखहक, खेतमे पसीना चुबबैत खेति‍हर, सड़कपर पत्‍थर फोड़ैत बोनि‍हार, धारमे नाओ खेबैत खेबनि‍हार सभ देश सेवा करैत अछि‍, तँए देशभक्‍त भेलाह। कृष्‍णानन्‍द-        (नमहर साँस छोड़ैत।) अखन धरि‍ से नै बुझै छलि‍ऐ। राजदेव-         नहि‍यो बुझैक कारण अछि‍। ओना देशक सीमाक रक्षा बाहरी दुश्मनक (आन देशक) रक्षाक लेल होइत अछि‍। मुदा जँ मनुष्‍यमे एक-दोसराक संग प्रेम जगत तँ ओहुना रक्‍छा भऽ सकैए। मुदा से नै अछि‍। कृष्‍णानन्‍द-        (मूड़ी डोलबैत।) हँ से तँ नहि‍ये अछि‍। राजदेव-         मुदा देशक भीतरो कम दुश्‍मण नै अछि‍। एहेन-एहेन रूप बना मुँह-दुबर लोकक संग कम अत्‍याचार केनि‍हारोक कमी नै अछि‍। कृष्‍णानन्‍द-        से केना? राजदेव-         देखते छहक जे जइ देशमे खाइ बेतरे लोक मरैए, घर दवाइ, पढ़ै-लि‍खैक तँ बात छोड़ह। तइ देशमे ढोल पीटनि‍हार देश सेवक सभ अपन सम्‍पत्ति‍ चोरा-चोरा आन देशमे रखने अछि‍ ओकरा कि‍ बुझै छहक? कृष्‍णानन्‍द-        हँ, से तँ ठीके कहै छी। राजदेव-         केहेन नाटक ठाढ़ केने अछि‍ से देखै छहक। आजुक समैमे सभसँ पैघ आ सभसँ बि‍कराल समस्‍या देशक सोझा ई अछि‍ जे सभकेँ जीबै आ आगू बढ़ैक समान अवसर भेटै। कृष्‍णानन्‍द-        हँ, से तँ जरूरि‍ये अछि‍। राजदेव-         एक्के दि‍स एहेन बात नै ने अछि‍? कृष्‍णानन्‍द-        तब? राजदेव-         समाजोमे अछि‍। कनी गौर कऽ कऽ देखहक। पैछले बर्ख ने ब्रहमदेवक वि‍याह भेल छलै? कृष्‍णानन्‍द-        हँ। बरि‍याति‍यो गेल रही। बड़ आदर-सत्‍कार भेल रहए। राजदेव-         एक्कोटा सन्‍तान तँ नै भेलैक अछि‍। कृष्‍णानन्‍द-        नै। हमरा बुझने तँ भरि‍सक दुनू परानीक भेँटो-घाँट तेना भऽ कऽ नै भेल हेतै। कि‍अए तँ गाम अबि‍ते खबड़ि‍ भेलै जे सीमापर उपद्रव बढ़ि‍ गेल, तँए सबहक छुट्टी केन्‍सि‍ल भऽ गेल। बेचारा वि‍याहक भोरे बोरि‍या-वि‍स्‍तर समेटि‍ दौड़ल। राजदेव-         अखन तँ नव-धब घटना छै तँए जहाँ-तहाँ वाह-वाही हेतै। मुदा प्रश्न वाह-वाहीक नै प्रश्न जि‍नगीक अछि‍। बेटाक सोग माए-बापकेँ आ पति‍क दुख स्‍त्रीकेँ नै हेतै? कृष्‍णानन्‍द-        हेबे करतै। राजदेव-         एना कि‍अए कहै छह जे हेबे करतै। जहि‍ना एक दि‍स मनुष्‍य कल्‍याणक धरम हेतै तहि‍ना दोसर दि‍स माए-बाप अछैत बेटा मृत्‍युक दोष, समाज सेहो देतनि‍। कृष्‍णानन्‍द-        (गुम होइत मूड़ी डोलबए लगैत।) राजदेव-         चुप भेने नै हेतह। समस्‍याकेँ बुझए पड़तह। जे समाजमे केना समस्‍या ठाढ़ कएल जाइए। तोंही कहह जे ओइ दूध-मुँहाँ बच्‍चि‍याक कोन दोख भेलै। कृष्‍णानन्‍द-        से तँ कोनो नै भेलै। राजदेव-         समाज ओकरा कोन नजरि‍ये देखत? कृष्‍णानन्‍द-        (मूड़ी डोलबैत।) हूँ-अ-अ। राजदेव-         हुँहकारी भरने नै हेतह। भारी बखेरा समाज ठाढ़ केने अछि‍। ओइ, बच्‍चि‍याक भवि‍ष्‍य देखनि‍हार कि‍यो नै अछि‍, मुदा......? कृष्‍णानन्‍द-        मुदा की? राजदेव-         यएह जे, एक दि‍स कलंकक मोटरीसँ लादि‍ देत तँ दोसर दि‍स जीनाइ कठि‍न कऽ देत। कृष्‍णानन्‍द-        हँ, से तँ करबे करत। राजदेव-         तोही कहह, एहेन समाजमे लोकक इज्‍जत-आवरू केना बचत? कृष्‍णानन्‍द-        (मूड़ी डोलबैत। नमहर साँस छोड़ि‍।) समस्‍या तँ भारी अछि‍। राजदेव-         नै, कोनो भारी नै अछि‍। सामाजि‍क ढर्ड़ाकेँ बदलए पड़त। वि‍घटनकारी सोच आ काजकेँ रोकि‍ कल्‍याणकारी सोच आ काज करए पड़त। तखने हँसैत-खेलैत जि‍नगी आ मातृभूमि‍केँ देखत। कृष्‍णानन्‍द-        (मुस्‍की दैत।) संभव अछि‍। राजदेव-         ई काज केकर छि‍ऐ? कृष्‍णानन्‍द-        हँ, से तँ अपने सबहक छी। राजदेव-         हँ। ऐ दि‍शामे एक-एक आदमीकेँ डेग बढ़बैक जरूरत अछि‍। पटाक्षेप चारि‍म दृश्‍य (भागेसर दरबज्‍जा सजबैत। बहाड़ि‍-सोहाड़ि‍ चारि‍टा कुरसी लगौलक। कुरसी सजा भागेसर चारूकात नि‍हारि‍-नि‍हारि‍ गौर करैत। तहीकाल बालगोवि‍न्‍द आ राधेश्‍यामक प्रवेश।) भागेसर-         आउ, आउ। कहू कुशल? (कुरसीपर तीनू गोरे बैसैत।) बालगोवि‍न्‍द-       (राधेश्‍यामसँ।) बौआ, बेटी हमर छी, वहीन तँ तोरे छि‍अ। अखन समए अछि‍ तँए......? भागेसर-         अपने दुनू बापूत गप-सप्‍प करू। (कहि‍, उठि‍ कऽ भीतर जाइत।) राधेश्‍याम-        अहाँक परोछ भेने ने......। जाबे अहाँ छि‍ऐ, ताबे हम.....। भागेसर-         नै, नै। परि‍वारमे सभकेँ अपन-अपन मनोरथ होइ छै। चाहे छोट भाए वा बेटाक वि‍याह होउ आकि‍ बेटी- बहि‍नक होउ। राधेश्‍याम-        हँ, से तँ होइते अछि‍। मुदा अहाँ अछैत जते भार अहाँपर अछि‍ ओते थोड़े अछि‍। तखन तँ बहि‍न छी, परि‍वारक काज छी, कोनो तरहक गड़बड़ भेने बदनामी तँ परि‍वारेक हएत। बालगोवि‍न्‍द-       जाधरि‍ अंजल नै केलौंहेँ ताधरि‍ दरबज्‍जा खुजल अछि‍। मुदा से भेलापर बान्ह पड़ि‍ जाइत अछि‍। तँए......? राधेश्‍याम-        हम तँ परदेश खटै छी। शहरक बेबहार दोसर रंगक अछि‍। गामक की बेबहार अछि‍ से नीक जकाँ थोड़े बुझै छी। मुदा तैयो......? बालगोवि‍न्‍द-       मुदा तैयो कि‍? राधेश्‍याम-        ओना तँ बहुत मि‍लानीक प्रश्न अछि‍ मुदा कि‍छु एहेन अछि‍ जेकर हएब आवश्यक अछि‍? बालगोवि‍न्‍द-       आब कि‍ तोहूँ बाल बोध छह, जे नै बुझबहक। मनमे जे छह से बाजह। मन जँचत कुटुमैती करब नै जँचत नै करब। यएह तँ गुण अछि‍ जे अल्‍पसंख्‍यक नै छी। राधेश्‍याम-        कि‍ अल्‍पसंख्‍यक? बालगोवि‍न्‍द-       जइ जाति‍क संख्‍या कम छै ओकरा संगे बहुत रंगक बि‍हंगरा ठाढ़ होइत अछि‍। मुदा जइ काजे एलौंहेँ तेकरा आगू बढ़ाबह। कि‍ कहलहक? राधेश्‍याम-        कहलौं यएह जे कमसँ कम तीनक मि‍लानी अवस होइ। पहि‍ल गामक दोसर परि‍वारक आ तेसर लड़का-लड़कीक। बालगोवि‍न्‍द-       जँ तीनूक नै होइ? राधेश्‍याम-        तँ दुइयोक। बालगोवि‍न्‍द-       जेहने अपन परि‍वारक बेबहार छह तेहने अहू परि‍वारक अछि‍। गामो एकरंगाहे बुझि‍ पड़ैए। लड़का-लड़की सोझेमे छह। राधेश्‍याम-        तखन कि‍अए काज रोकब? (जगमे पानि‍ आ गि‍लास नेने भागेसर आबि‍, टेबुलपर गि‍लास रखि‍ पानि‍ आगू बढ़बैत। गि‍लास हाथमे लऽ।) बालगोवि‍न्‍द-       नीक होइत जे पहि‍ने काजक गप अगुआ लेतौं। भागेसर-         अखन धरि‍ अहूँ पुरने वि‍ध-बेबहारमे लटकल छी। कुटुमैती हुअए वा नै मुदा दरबज्‍जापर आबि‍ जँ पानि‍ नै पीब, ई केहन हएत? (पानि‍ पीबैत। तहीकाल झमेलि‍या चाह नेने अबैत। पानि‍ पि‍आ दुनू गोटेकेँ चाहक कप दैत भागेसर अपनो कुससीपर बैस चाह पीबए लगैत।) बालगोवि‍न्‍द-       समए तेहन दुरकाल भऽ गेल जे आब कथा-कुटुमैतीमे कतौ लज्‍जति‍ नै रहैए। बेसीसँ बेसी चारि‍-आना कुटुमैती कुटुमैती जकाँ होइए। बारह आनामे झगड़े-झंझट होइए। भागेसर-         हँ, से तँ देखते छी। मुदा हवा-बि‍हाड़ि‍मे अपन जान नै बँचाएब तँ उड़ि‍ कऽ कतएसँ कतए चलि‍ जाएब, तेकर ठेकान रहत। बालगोवि‍न्‍द-       पैछला लगनक एकटा बात कहै छी। हमरे गामक छी। कुल-खनदान तँ दबे छन्‍हि‍‍ मुदा पढ़ि‍-लि‍ख परि‍वार एते उन्नति‍ केने अछि‍ जे इलाकामे कि‍यो कहबै छथि‍। भागेसर-         वाह। बालगोवि‍न्‍द-       लड़को-लड़की उपरा-उपरी। कमसँ कम पचास लाखक ि‍बयाहो भेल छलै। मुदा खाइ-पीबै बेरमे तते माि‍र-पीट भेल जे दुनूकेँ मन रहतनि‍। भागेसर-         मारि‍ कि‍अए भेल? बालगोवि‍न्‍द-       पुछलि‍यनि‍ ते कहलनि‍ जे वि‍याह-दानमे कोनो रसे नै रहि‍ गेल अछि‍। बरि‍याती सदि‍खन लड़कीबलाकेँ नि‍च्‍चा देखबए चाहैत तँ सरि‍याती बरि‍यातीकेँ। अही बीचमे रंग-वि‍रंगक बखेरा ठाढ़ कऽ मारि‍-पीट होइए। भागेसर-         एहेन बरि‍यातीमे जाएबो नीक नै‍। बालगोवि‍न्‍द-       सज्‍जन लोक सभ छोड़ि‍ देलनि‍। मुदा तैयो कि‍ बरि‍याती कम जाइए। तते ने गाड़ी-सवारी भऽ गेल जे हुहुऔने फि‍रैए। भागेसर-         खाइर, छोड़ू दुनि‍याँ-जहानक बात। अपन गप करू। बालगोवि‍न्‍द-       हमरेसँ पुछै छी। कन्‍यागत तँ सदति‍ चाहै छथि‍ जे एकटा ऋृण उताड़ैमे दोसर ऋृण ने चढ़ि‍ जाए। अपने लड़काबला छि‍ऐ। कोना दुनू परि‍वारक कल्‍याण हएत, से तँ......? भागेसर-         दुनि‍याँ केम्‍हरो गुड़ैक जाउ। मुदा अपनोले तँ कि‍छु करब। आइ जँ बेटा बेच लेब तँ मुइलापर आगि‍ के देत। बेचलाहा बेटासँ पैठ हएत। बालगोवि‍न्‍द-       कहलि‍ऐ तँ बड़बढ़ि‍या। मुदा समाजक जे कुकुड़चालि‍ छै से मानता दुनू परि‍वार मि‍ल-जुलि‍ काज ससारि‍ लेब। मुदा नढ़ि‍या जकाँ जे भूकत तेकर कि‍ करबै? भागेसर-         हँ से तँ ठीके, पैछलो नीक चलनि‍ आ अखुनको नीक चलनि‍ अपनाए कऽ अधला चलनि‍ छोड़ि‍ देब। कि‍अए कि‍यो भूकत। जँ भूकबो करत तँ अपन मुँह दुखाओत। (बरक रूपमे झमेलि‍याक प्रवेश..) बालगोवि‍न्‍द-       बेटा-बेटीक वि‍याहमे समाजक पाँचो गोटे तँ रहैक चाहि‍ऐ ने? भागेसर-         भने मन पाड़ि‍ देलौं। घरे-अंगना आ दुआरे-दरबज्‍जापर तते काज बढ़ि‍ गेल जे समाज दि‍स नजरि‍ये ने गेल। बालगोवि‍न्‍द-       आबे कि‍ भेल, बजा लि‍औन। समाजकेँ तँ लड़का देखले छन्‍हि‍, हमहूँ दुनू बापूत देखि‍ये लेलौं। भागेसर-         केहन लड़का अछि‍? बालगोवि‍न्‍द-       एते काल बटोही छलौं तँए बटोहि‍क संबंध छल। मुदा आब संबंध जोड़ैक वि‍ध शुरू भऽ गेल तँए संबंधी भेल जा रहल छी। भागेसर-         कि‍ कहू बालगोवि‍न्‍दबाबू, जि‍नगि‍ये तते रि‍या-खि‍या गेल अछि‍ जे बेलक बेली जकाँ बनि‍ गेल छी। बालगोवि‍न्‍द-       (ठहाका मारि‍) समधि एक भग्‍गू कहलि‍ऐ। छोटोसँ पैघ बनैए आ पैघोसँ छोट बनैए। छोट-छोट कीड़ी-मकौरी समैक संग ससरैत-ससरैत नमहर बनि‍ जाइए। तहि‍ना कलकति‍या आकि‍ फैजली आम सरही होइत-होइत तेहन भऽ जाइए जे बि‍सवासे ने हएत जे ई फैजली बंशक बड़वड़ि‍या बीजू छी। भागेसर-         बालगोवि‍न्‍दबाबू, गप-सप्प चलि‍ते रहत समाजोकेँ बजा लइ छि‍यनि‍।(समाज दि‍स नजरि‍ दोड़बैत भागेसर आंगुरपर हि‍साब जोड़ैत..) ओह फल्‍लां दोगला अछि‍। (पुन: आंगुरपर जोड़ि‍) ओह फल्‍लां तँ दुष्‍ट छी दुष्‍ट। फल्‍लां  पक्का दलाल छी। साला बेटी वि‍याहक बात बना रोजगार खोलने अछि‍। परि‍वारक बीच जाति‍ होइए आकि‍ समाजक बीच। जेकर वि‍चार नीक रस्‍ते चलए ओ कि‍अए ने समाज बनाबए। बालगोवि‍न्‍द-       समधि‍, कि‍अए अटकि‍ गेलौं? भागेसर-         बालगोवि‍न्‍दबाबू, लोक तँ समाजेमे रहि‍ समाजक संग चलत मुदा वि‍याह सन पारि‍वारि‍क यज्ञमे जँ समाजक लोक धोखा दइ तखन? बालगोवि‍न्‍द-       समधि‍ कहलौं तँ बेस बात, मुदा जहि‍ना ई समाज अछि‍ तहि‍ना हमरो अछि‍। ठीके कहलौं जे वि‍याह सन काज जइसँ समाजक एक अलंग ठाढ़ होइत तइमे उचक्का सभक उचकपन्नी आरो सुतरैए। बर-कनि‍याँक देखा-सुनीसँ लऽ कऽ सि‍नुरदान धरि‍ कि‍छु ने कि‍छु बि‍गाड़ैक कोशि‍श करबे करैए। भागेसर-         एकटा बात मन पड़ि‍ गेल। भाए-बहीनि‍क बीचक कहै छी। (भागेसरक बात सुनि‍ राधेश्‍याम चौंक गेल..) राधेश्‍याम-        कि‍ कहलखि‍न भाए-बहि‍न‍। भागेसर-         बाउ, अहाँक तँ बहि‍न छी। भाए-बहीनि‍क बीच बरावरीक जि‍नगी हेबाक चाही से तेहन-तेहन वंशक बतौर सभ जन्‍म लेने जाइऐ जे......? राधेश्‍याम-        की जे? भागेसर-         अपन पड़ोसीक कहै छी। सौ-बीघाक परि‍वारमे पाँच भाए-बहीनि‍क भैयारी। बीस बीघा माथपर भेल। बहि‍न सभसँ छोट। सौ बीघा स्‍तरक लड़कीकेँ दू बीघाबला परि‍वारमे भाए सभ वि‍याहि‍ देलक। राधेश्‍याम-        पि‍ता नै बुझलखि‍न? भागेसर-         सएह ने कहै छी। पि‍ता जँ पुत्रपर वि‍सवास नै करथि‍ तँ कि‍नकापर करथि‍। तते चढ़ा-उतड़ी चारू बेटा कहलकनि‍‍ जे पि‍ता अपन भारे सुमझा देलखि‍न। बेटा सभ केहन बेइमान जे बहीनि‍क कोढ़-करेज काटि‍ अपन कनतोड़ी सजबए लगल। राधेश्‍याम-        पछाति‍यो पि‍ता नै बुझलखि‍न? भागेसर-         बुझि‍ये कऽ कि‍ करि‍तथि‍न। मुइने एला बैद तँ कि‍दनकेँ के जेता। राधेश्‍याम-        बड़ अन्‍याय भेल! भागेसर-         अन्‍याय कि‍ भेल अन्‍याय जकाँ। ओही सोगे माए जे ओछाइन धेलखि‍न से धेनेहि‍ रहि‍ गेलखि‍न। पि‍तो बौरा कऽ वृन्‍दावन चलि‍ गेलखि‍न। राधेश्‍याम-        बाबू, जहि‍ना माए-बापक बेटी- छि‍यनि‍ तहि‍ना बहि‍न हमरो छी। ओना खाइ-पीबै आ लत्ता-कपड़ाक दुख अखन धरि‍ नहि‍ये भेलै, मुदा आगूक तँ नै कहि‍ सकै छि‍यनि‍। दि‍न-राति‍ माइयक संग काज उदममे रहैए। माइयक समकश तँ नै भेल मुदा दू-चारि‍ सालमे भइये जाएत। सभ सीख-लि‍ख माइयेक छै। भागेसर-         अहाँ कतऽ रहै छि‍ऐ? राधेश्‍याम-        ओना बाहरे रहै छी। मुदा आन बहरबैया जकाँ नै जे गाम-घर, सर-समाज छोड़ि‍ देलौं। जे कमाइ छी परि‍वारमे दइ छि‍ऐ। बालगोवि‍न्‍द-       समैध अबेर भऽ जाएत। कम-सँ-कम पाँचटा बच्‍चोकेँ शोर पाड़ि‍यौ। अदौसँ अपना ऐठामक चलनि‍ अछि‍। (गुरूकूलक अध्‍ययन समाजक काजक अनुकूल होएत) (दरबज्‍जेपर सँ भागेसर बच्‍चा सभकेँ शोर पाड़लखि‍न..) (पाँच-सातटा बच्‍चा अबैत अछि‍..) एकटा बच्‍चा-      झमेलि‍या भैयाक वि‍याह हेतै कक्का? भागेसर-         हँ। बच्‍चा-           बरि‍याती हमहू जेबे करब। भागेसर-         तोरो लऽ जाए पड़तौ। बच्‍चा-           लऽ जाएब। पटाक्षेप पाँचम दृश्‍य (बालगोवि‍न्‍दक घर। पत्नी दायरानीक संग बालगोवि‍न्‍द बैसल..) बालगोवि‍न्‍द-     ओना जे बात भेल तइसँ कुटुमैती हेबे करत। मुदा समए-साल तेहन भऽ गेल जे वि‍याहो मड़बासँ लड़का रूसि‍-फुलि‍ कऽ चलि‍ जाइए। दायरानी-      हँ, से तँ होइए। मुदा जहि‍ना कुत्ता-बि‍लाइकेँ धि‍या-पुता खेनाइ देखा फुसला कऽ लऽ अनैए तहि‍ना मनुखो फुसलबैक ने.....? बालगोवि‍न्‍द-     नै बुझलौं। कनी फड़ि‍छा दि‍यौ। दायरानी-      कोन काज सि‍रपर अछि‍ आ कोन काज लधऽ चाहै छी। जखने सि‍रपड़क काज छोड़ि‍‍ दोसर काजमे लागब तखने घुरछी लगए लागत। जखने घुड़छी लागत तखने काज ओझरा-पोझरा जाएत। बालगोवि‍न्‍द-     तखन? दायरानी-      जतेटा आ जेहन काज रहए ओइ हि‍साबसँ काज सम्‍हारि‍ ली। अखन वि‍याहक काज अछि‍ तँए घटक भायकेँ बजा सभ गप कहि‍ दि‍यनु। बालगोवि‍न्‍द-     अपनो वि‍चार छल भने अहूँ कहलौं। दायरानी-      युग-जमाना अकानि‍ कऽ चलैक चाही। जँ से नै करब तँ पाओल जाएब। बालगोवि‍न्‍द-     कहलौं तँ बेस बात मुदा एहनो तँ होइ छै जे गाममे जखन चोर चोरी करए अबैए तखन ठेकयौने रहैए कताै आ अपनेसँ हल्‍ला दोसर दि‍स करैए। लोक ओमहर गेल आ खाली पाबि‍ चोर ठेकि‍येलहा घरमे चोरी कऽ लइए। दायरानी-      हँ, से तँ होइए। मुदा बेसी पि‍ंगि‍ल पढ़ने तँ काजो पछुआइये जाइए। तँए ओते अगर-मगर नै करू। एतबो नै आँखि‍ अछि‍ जे देखबै। बालगोवि‍न्‍द-     कि‍ देखबै? दायरानी-      बि‍ना घटक्के केकर वि‍याह होइ छै। समाजमे जखन सभ करैए तखन अपनो नै करब तँ ओहो एकटा खोटि‍करमे हएत कि‍ने। बालगोवि‍न्‍द-     कि‍ खोटि‍करमा? दायरानी-      अनेरे लोक की-कहाँ बाजत। तहूमे जेकर जीवि‍का िछऐ ओ अपन मुँह कि‍अए चुप राखत। छोड़ू ऐ-सभ गपकेँ। जाउ अखने घटक भायकेँ हाथ जोड़ि‍ कहबनि‍ जे बेटी तँ समाजक होइ छै, कोनो तरहेँ समाजक काज पार लगाउ। बालगोवि‍न्‍द-     (बुदबुदाइत) कतऽ नै दलाली अछि‍। एक्के शब्‍दकेँ जगह-जगह बदलि‍-बदलि‍ सभ अपन-अपन हाथ सुतारैए। तखन तँ गरा ढोल पड़ल अछि‍, बजबै पड़त। दायरानी-      बजैत दुख होइए। अगर जँ लोक अपनो दि‍न-दुनि‍याँक बात बुझि‍ जाए तैयौ बहुत हेतइ। खाइर, देरी नै करू, बेरू पहर ओ सभ औता, अखुनका कहल नीक रहत। तँए अखने कहि‍ अबि‍यौन। (घटक भाइक दलानपर बैस जोर-जोरसँ पत्नीकेँ कहै छथि‍। आंगनसँ पत्नी सुनति‍ छथि‍..।) घटक भाय-    समए कतऽ-सँ-कतऽ भागि‍ गेल आ डारि‍क बि‍ढ़नी छत्ता जकाँ समाज ओतै-कऽ-औते लटकल अछि‍। आब ओ जुग-जमाना अछि‍ जे बही-खाता लऽ बैसल रहू आ आमदनी कतऽ तँ सवा रूपैया। बाप रे, समैमे आगि‍ लागि‍ गेल। पत्नी-         (अंगनेसँ) ओहि‍ना डि‍रि‍आएब। रखने ने रहू बेटाकेँ चूड़ा-दही खाइले। जेकर बेटा कमासुत छै ओकरा देखै छि‍ऐ जे कतऽ-सँ-कतऽ आगू चलि‍ गेल। सपनोँ सपनाएल रही जे बड़दक संगे भरि‍ दि‍न बहैबलाक बेटा ट्रेक्‍टरक ड्राइवरी करतै। दू-सेरक जगह दू हजारक परि‍वार बना लेतै। (बालगोवि‍न्‍दकेँ देख घटक भाय दमसि‍ कऽ खखास करैत। घटक भाइक खखास सुनि‍ पत्नी बुझि‍ गेलखि‍न। अपन बातकेँ ओतै रोकि‍ देलनि‍।) बालगोवि‍न्‍द-     गोड़ लगै छी भाय। घटक भाय-    जीबू-जीबू। भगवान खेत-खरि‍हान, घर-दुआर भरने रहथि‍। एहनो समैकेँ अहाँ नहि‍ये गुदानलि‍यनि‍। अहाँ सन-सन लोक जे समाजमे भऽ जाथि‍ तँ कतऽ-सँ-कतऽ समाज पहुँच जाएत। बालगोवि‍न्‍द-     भाय, सि‍रपर काज आबि‍ गेल। तँए बेसी नै अटकब। घटक भाय-    केहन काज? बालगोवि‍न्‍द-     बेटीक वि‍याह करब। उहए लड़की देखए बरपक्ष आबि‍ रहल छथि‍। तहीले....! घटक भाय-    अहाँकेँ नै बुझल अछि‍ जे अही समाज लेल खुन सुखा रहल छी। कि‍ पागल छी। जेकरा लूरि‍ ने भास छै से शहर-बजार जा-जा महंथ बनल अछि‍ आ हम समाज धेने छी। बालगोवि‍न्‍द-     हँ, से तँ देखते छी। तँए ने......। घटक भाय-    अच्‍छा बड़बढ़ि‍या। ओना हम अपनो कानपर राखब मुदा बुझि‍ते छी जे दस-दुआरी छी। जँ कहीं दोसर दि‍स लटपटेलौं तँ वि‍सरि‍यो जा सकै छी। तँए अबैसँ पहि‍ने ककरो पठा देबै। बालगोवि‍न्‍द-     बड़बढ़ि‍या। जाइ छी। घटक भाय-    ऐह, एहि‍ना कना चलि‍ जाएब। एते दि‍न ने लोक तमाकुले बीड़ीपपर दरबज्‍जाक इज्‍जत बनौने छलै मुदा आब ओइसँ काज थोड़बे चलत। िबना चाह-पीने कोना चलि‍ जाएब? बालगोवि‍न्‍द-     अहाँकेँ कि‍ अइले उपराग देब। बहुत काज अछि‍। तँए माफी मंगै छी अखन छुट्टि‍ये दि‍अ। (बालगोवि‍न्‍द वि‍दा भऽ जाइत..) घटक भाय-    (स्‍वयं) भगवान बड़ीटा छथि‍न। जँ से नै रहि‍तथि‍ तँ पहाड़क खोहमे रहैबला कोना जीवैए। अजगरकेँ अहार कतऽ सँ अबै छै। घास-पातमे फूल-फड़ केना लगै छै....। (बालगोवि‍न्‍दक दरब्‍ज्‍जा। चौकीपर ओछाइन ओ‍छाएल। बालगोवि‍न्‍द-     सभ कि‍छु तँ सुढ़ि‍या गेल। कने नजरि‍ उठा कऽ देखहक जे कि‍छु छुटल ने तँ...। राधेश्‍याम-      (चारू कात नजरि‍ खि‍ड़बैत..) नजरि‍पर तँ कि‍छु ने अबैए। (कने बि‍लमि‍) हँ, हँ, एकटा छुटल अछि‍। पएर धोइक बेबस्‍था नै भेल। बालगोवि‍न्‍द-     बेस मन पाड़ि‍ देलह। तँए ने नमहर काज (परि‍वारक अगि‍ला काज) मे बेसी लोकसँ वि‍चार करक चाही। दसेमे ने भगवान वसै छथि‍। जखने दसटा आँखि‍ दस दि‍स घुमै छै तखने ने दसो दि‍शा देख पड़ै छै। (भागेसर आ यशोधरक आगमन..) बालगोवि‍न्‍द-     जहि‍ना समय देलौं तहि‍ना पहुँचि‍ओ गेलौं। पहि‍ने पएर-हाथ धो लि‍अ तखन नि‍चेनसँ बैसब। भागेसर-       तीन-कोस पएरे चलैमे मनो कि‍छु ठेहि‍या जाइ छै। (दुनू गोटेकेँ पएर-हाथ‍ धोइतेकाल घटक भाइक प्रवेश..) घटक भाय-    पाहुन सभ कहाँ रहै छथि‍? बालगोवि‍न्‍द-     भाय, नवका कुटुम छथि‍। ओना अखन रीता (बेटी) वि‍याह करै जोकर नहि‍ये भेल छै, मुदा ऐ देहक कोनो ठेकान अछि‍। बेटा-बेटीक वि‍याह तँ माए-बापक कर्ज छी। अपना जीवैत कतौ अंग लगा देने भगवानो घरमे दोखी नै ने हएब। घटक भाय-    कुटुम, अपना एेठामक जे वुद्धि‍-वि‍चार अछि‍ ओ दुनि‍याँमे कतऽ अछि‍। एक-एक काज ओहन अछि‍ जेहन पत्‍थर-कोइलाक ताउमे धि‍पा लोहाक कोनो समान बनैत अछि‍। भागेसर-       हँ, से तँ अछि‍ये। घटक भाय-    अपने ऐठाम खरही आ ठेंगासँ लड़का-लड़की (वर-कन्‍या)केँ नापि‍ वि‍याह होइत अछि‍। यशोधर-       आब ओ बेबहार उठि‍ गेल। घटक भाय-    हँ, हँ, सएह कहै छी। बेबहार तँ उठि‍ गेल मुदा ओइ पाछु जे वि‍चार छल से नै ने मरि‍ गेल। वि‍चारवानक बखारीक अन्न तँ वएह ने छि‍यनि‍। राधेश्‍याम-      काका, कने फरि‍छा दि‍यौ। एक तँ नव कवरि‍या छी तहूमे परदेशी भेलौं। घटक भाय-    बौआ, तोहूँ बेटे-भतीजे भेलह। बहुत पढ़ल-लि‍खल नहि‍ये छी। लगमे बैसा-बैसा जे बाबा सि‍खौलनि‍ से कहै छि‍अ। तहूँमे बहुत वि‍सरि‍ये गेलौं। राधेश्‍याम-      जे बुझल अछि‍ सएह कहि‍यौ। घटक भाय-    समाजमे दुइओ आना एहन परि‍वार नै अछि‍ जि‍नका परि‍वारमे बच्‍चाक टि‍प्‍पणि‍ बनै छन्‍हि‍। बाकी तँ बाकि‍ये छथि‍। अदौसँ लड़का अपेक्षा लड़की उम्र कम मानल गेल। जकरा तारीख-मड़कूमामे नै नापमे मानल गेल। राधेश्‍याम-      जँ दुनूमे सँ कोनो बढ़नगर आ कोनो भुटारि‍ हुअए, तखन? घटक भाय-    बेस कहलह। तँए ने अव्‍यवहारि‍क भऽ गेल। सदि‍खन समाजकेँ आँखि‍ उठा अहि‍तपर नजरि‍ राखक चाहि‍ये। भागेसर-       हँ, से तँ चाहबे करी। मुदा वि‍चारलो बात तँ नहि‍ये होइ छै। घटक भाय-    बेस बजलौं। ऐमे दुनू दोख अछि‍। वि‍चारनि‍हारोकेँ वि‍चारैमे गड़बड़ होइ छन्‍हि‍ आ राजादैवक (प्रकृति‍ नि‍यम) दोख सेहो होइत अछि‍। अखने दे‍खि‍यौ गोर-कारी रंगक दुआरे कते संबंध नै बनि‍ पबैत अछि‍। एतबो बुझैले लोक तैयार नै जे मनुष्‍य रंगसँ नै गुणसँ बनैत अछि‍। यशोधर-       हँ, से तँ होइते अछि‍। हमरो गाममे हाथमे सि‍नुर लेल बरकेँ बरक बाप गट्टा पकड़ि‍ घि‍चने-घि‍चने गामे चलि‍ गेल। घटक भाय-    की कहू कुटुम नारायण देखैत-देखैत आँखि‍ पथरा रहल अछि‍। मुदा अछैते औरूदे उरीसक दवाइ पीब उरीसे जकाँ मरि‍ये जाएब से नीक हएत। तहि‍ना देखब जे कुल-गोत्रक चलैत कुटुमैती भङठि‍ जाइए। यशोधर-       हँ, से तँ होइए। घटक भाय-    देखि‍यौ, अपना बहुसंख्‍यक समाजमे अखनो धरि‍ मुँहजवानि‍येक कारोबार चलि‍ आबि‍ रहल अछि‍। जे नीक-अधला बेरबैक वि‍चार गड़बड़ा गेल। जते मुँह तते बात। जइठाम जे मुँहगर तइठाम तेकरे बात चलत। चाहे ओ नीक होय कि‍ अधला। यशोधर-       कनी नीक जकाँ बुझा कऽ कहि‍यौ? घटक भाय-    (बालगोवि‍न्‍द दि‍स देख..) बालगोवि‍न्‍द, आइ तँ कुटुम-नारायण सभ रहता कि‍ने? बालगोवि‍न्‍द-     एक तँ अबेर कऽ एलाहेन। तहूमे अखन धरि‍ तँ आने-आने गप-सप्‍प चलल। काज पछुआएले रहि‍ गेल अछि‍। घटक भाय-    आइ तँ कनि‍येँ देखा-सुनी हएत कि‍ने? बालगोवि‍न्‍द-     हँ। मुदा वि‍याहसँ तँ बि‍ध भारी होइए कि‍ने! घटक भाय-    हँ। से तँ होइते छै। अखन जाइ छी। काल्हि‍ सवेरे आएब। तखन जना-जे हेतइ से हेतइ। भागेसर-       काज जँ ससरि‍ जाइत तँ चलि‍ जैतौं। घटक भाय-    एहनो जाएब होइ छै। जखन कुटुमैती जोड़ि‍ रहल छी तखन एना धड़फड़ेने हएत। पटाक्षेप छठम दृश्‍य (राजदेवक दरबज्‍जा। चद्दरि‍ ओढ़ि‍ राजदेव पड़ल) सुनीता-       बाबा, बाबा-यौ। आँखि‍ लागल अछि‍। (एक हाथमे लोटा दोसरमे गोटी) राजदेव-       नै। जगले छी। दवाइ अनलह। सुनीता-       हँ। लि‍अ। राजदेव-       (चौकि‍येपर बैस गोटी खा पानि‍ पीब कऽ) नाहकमे परान गमबै छी। कहू जे जानि‍ कऽ बेसाहब तँ मरब नै। मुदा करबे कि‍ करू। जानि‍ कऽ कि‍यो थोड़े कुत्ता बधि‍या करए जाइए। जखन कुकुड़चालि‍ नाकपर ठेक जाए छै तखने ने कि‍यो जान अबधारि‍ जाइए। सुनीता-       पाकल आम भेलौं। आबो जँ अपन पथ-परहेज नै राखब तँ कते दि‍न जीब? राजदेव-       बुच्‍च्‍ी, तोहूँ आब बच्‍चा नै छह जे बात टारि‍ देबह। मुदा कि‍ करब? जखन समाजमे रहै छी तखन जँ वि‍याहमे बरि‍याती नै जाएब, मरलापर कठि‍आरी नै जाएब, तँ समाज आगू मुँहेँ ससरत केना। सुनीता-       से तँ बुझलौं, मुदा.....? राजदेव-       मुदा यएह ने जे जे जुआन-जहान अछि ओ जाए। से अपना घरमे अछि‍। तोँ बेटि‍ये जाति‍ भेलह, श्‍याम बच्‍चे अछि‍ बाबू परदेशेमे छथुन तखन तोँही कहह जे कि‍ करब? सुनीता-       (कनी गुम्‍म भऽ) हँ, से तँ अछि‍। मुदा समाजो तँ नमहर अछि‍। बूढ़-पुरान जँ नहि‍यो जेताह तैयो कि‍नको काज थोड़े रूकतनि‍। राजदेव-       कहै तँ छह ठीके मुदा तेहेन-तेहेन ढोढ़ाइ-मंगनू सभ समाजमे फड़ि‍ गेल अछि‍ जे अपेक्षा (संबंध) जोड़त कि‍ तोड़ैये पाछू पील पड़ल अछि‍। सुनीता-       से कि‍? राजदेव-       बि‍नु-ि‍वधक वि‍ध सभ आबि‍ रहल अछि‍ आ नीक वि‍ध मेटा रहल अछि‍। देखै छी तँ तामसे शपथ खा लइ छी जे आब बरि‍याती नै जाएब। मुदा फेर सोचै छी जे नै जेवइ तँ अपना बेर के जाएत। सुनीता-       बरि‍याती जाएब कोनो अनि‍वार्ये छै? राजदेव-       छइहो आ नहि‍यो छै। समाजमे दुनू चलै छै। हमरे वि‍याहमे ममे टा बरि‍याती गेल रहथि‍। सेहो बरि‍याती नै घरवारी बनि‍ कऽ। सुनीता-       तखन फेर एते बरि‍याती कि‍अए जाइ छै? राजदेव-       सेहो कहाँ गलती भेलै। जही लग्‍नमे हमर वि‍याह भेल ओहीमे श्‍यामो दोसकेँ भेलनि‍। पचाससँ उपरे बरि‍याती गेल रहनि‍। सुनीता-       गोटी खेलौंहेँ। कनी काल कल मारि‍ लि‍अ। खाइयोक मन होइए? राजदेव-       अखन तँ नै होइए। मुदा गोटी खेलौं हेन तँए कि‍ कहबह?‍ सुनीता-       जे मन फुरए सएह करब। (कृष्‍णानन्‍दक आगमन) कृष्‍णानन्‍द-     बड़ अनखनाएल जकाँ देखै छी कक्का? चद्दरि‍ कि‍अए ओढ़ने छी? राजदेव-       कोनो कि‍ सुखे ओढ़ने छी। मन गड़बड़ अछि‍। कृष्‍णानन्‍द-     की भेल हन? राजदेव-       एक तँ पेट गड़बड़ भेने मन गड़बड़ लगैए। तोहूमे तेहन-तेहन कि‍रदानी सभ लोक करैए जे होइए अनेरे कि‍अए जीवै छी। कृष्‍णानन्‍द-     हँ, भने मन पड़ि‍ गेल। कामेसर भायकेँ पानि‍ चढ़ै छन्‍हि‍। राजदेव-       कि‍अए। केहन बढ़ि‍याँ तँ राति‍मे संगे बरि‍याती पुरलौं। तइ बीच कि‍ भऽ गेलइ। कृष्‍णानन्‍द-     अपने तँ नइ पुछलि‍यनि‍ मुदा कात-करोटसँ भाँज लागल जे बरि‍याती जाइसँ पहि‍ने खूब चढ़ा लेने रहथि‍। ओही नि‍साँमे अढ़ाइ-तीन सय रसगुल्‍ला आ कि‍लो चारि‍एक माछ देलखि‍न। सुनीता-       (खि‍सि‍या कऽ) जि‍नगीमे कहि‍यो देखने छेलखि‍न कि‍ बरि‍याति‍ये भरोसे ओरि‍आएल छलाह। कृष्‍णानन्‍द-     घरवारि‍यो सबहक दोख छै? सुनीता-       से कोना? कृष्‍णानन्‍द-     ओते ओरि‍यान कि‍अए करैए। जँ रहि‍ जे जेतइ तँ बरि‍याती कऽ सवारी कसत जे दुइर भऽ जाएत। तइसँ नीक ने जे दुइर नै हुअए दइ छै। सुनीता-       तखन तँ दवाइयो आ डाक्‍टरोक ओरि‍यान करए पड़तै कि‍ ने? राजदेव-       कोन बातमे ओझरा गेलह। अच्‍छा अखन कि‍ हालत छै? कृष्‍णानन्‍द-     आब तँ बहुत असान भेलनि‍। पहि‍ने तँ दमे नै धरए दैत छलनि‍। डाॅक्‍टर कहलखि‍न जे आँत फाटि‍ जइतनि‍। मुदा समहरलाह। गुण भेलनि‍ जे तीन-चारि‍ बेर छाँट भऽ गेलनि‍। ओहि‍ना सौंसे-सौंसे रसगुल्‍ला खसलनि‍। सुनीता-       ओहने-ओहने लोक समाजकेँ दुइर करैए। कृष्‍णानन्‍द-     से केना? सुनीता-       जे आदमी ओहन पेट बनौत ओ ओते पुराओत कतऽ सँ। जँ पुराइयो लेत तँ ओते पचवइयो लए ने ओते समए चाही। जँ खाइये-पचबैमे समए गमा लेत तँ काज कखन करत। राजदेव-       (कने गरमाइत..) अच्‍छा बुच्‍ची, कृष्‍णानन्‍द कक्काकेँ चाह पीआवहुन? सुनीता-       अहूँ पीबै? राजदेव-       कोना नै पीबै। सुनीता-       अहँूक पेट तँ गड़बड़े अछि‍। जँ कहीं आरो बेसी भऽ जाए? राजदेव-       से तँ ठीके कहै छह। मुदा ई केहन हएत जे दरबज्‍जापर असकरे कृष्‍णानन्‍द चाह पीता आ अपने संग नै दबनि‍। सुनीता-       भाँज पुरबैले कम्‍मे कऽ लेने आएब। सेहो सरा कऽ पीब। (सुनीता चाह आनए जाइत..) कृष्‍णानन्‍द-     कक्का, जेहो काज लोक नीक बुझि‍ करैए, ओकरो तेना ने करए लगैए जे जते नीक बुझि‍ करैए ओइसँ बेसी अधले भऽ जाइ छै। तइपर सँ अचार जकाँ रंग-वि‍रंगक चहटगर नवका-नवका काज। राजदेव-       नै बुझि‍ सकलौं। कृष्‍णानन्‍द-     पहि‍ने दू संझू बरि‍याती होइत छलै। जँ कहीं पहि‍ल दि‍न अबेरो भऽ गेल आ कोनो तरहक गड़बड़ि‍यो होइत छलै तँ दोसर दि‍न सम्‍हारि‍ कऽ सभ समेटि‍ सरि‍या लैत छल। राजेदव-       जँ दू दि‍ना काज एक दि‍नमे भऽ जाए तँ नीके ने भेल। कृष्‍णानन्‍द-     यएह सोचि‍ ने एक संझू भेल। मुदा पाछूसँ तेहन हवा मारलक जे कोसो भरि‍ जाइबला बरि‍याती गाड़ी-सवारी दुआरे लग्‍नक समए टपा-टपा पहुँचैए। राजदेव-       हँ, से तँ होइए। कृष्‍णानन्‍द-     (सह पाबि‍ सहटि‍) एतबो बुझैले लोक तैयार नै जे कोस भरि‍ जाइमे अधा-पौन घंटा पएरे लगत। तइ टपैमे चरि‍-चरि घंटा‍ देरी भेल, कहू जे केहन भेल? राजदेव-       हौ, कि कहबह। ‘इसकी मुइला माघमे।’‍ तेहन-तेहन नवकवि‍रया मनुख सभ भऽ गेलहेँ, जे माघोमे गाम-गमाइत बि‍ना चद्दरि‍ये जाएत। आब कहह जे अपना ऐठामक वि‍चारधारा रहल जे कोनो वस्‍तुक उपयोग जरूरत भरि‍ करी। तइठाम जँ घरवैया अपन चद्दरि‍ दइ छन्‍हि‍ तँ अपने कठुएता, जँ नै दइ छन्‍हि‍ तँ आनकेँ दरबज्‍जापर कठुअाएब उचि‍त हएत। कृष्‍णानन्‍द-     हँ, से तँ देखै छि‍ऐ। राजदेव-       आब बरि‍याति‍येमे देखहक। पहि‍ने दू दि‍ना बरि‍यातीक चलनि‍ छल। जे एक संझू भऽ गेल। मूल प्रश्न अछि‍ जे दुनू पक्षक (बर आ कन्‍या पक्ष) कि‍ सभ क्रि‍या-कलाप (बि‍ध-बेबहार) छै। ककरा सुधारैक, ककरा तोड़ैक आ ककरा बचा कऽ रखैक जरूरत अछि‍ से नै बुझि‍, कवि‍काठी सभ समए नै बँचब वा समैक दुरूपयोग कहि‍ एक दि‍ना चलनि‍ चलौलक। मुदा.....। कृष्‍णानन्‍द-     मुदा की? राजदेव-       तोहू तँ आब बच्‍चा नहि‍ये छह। कते कठि‍आरी गेले हेबह। कृष्‍णानन्‍द-     कक्का, मुरदा जरबए कठि‍आरी जरूर गेलौंहेँ, मुदा मुरदा.....? राजदेव-       हँ, हँ, कठि‍आरी गेलह। मुरदा जरबए नै? कृष्‍णानन्‍द-     एते तँ जरूर करै छी जे शुरूमे खुहरी चढ़ेलौं आ पछाति‍ पँचकठि‍या फेक घरमुँहाँ भेलौं। राजदेव-       तइ बीच? कृष्‍णानन्‍द-     कने बगलि‍ कऽ बैस ताशो खेलाइ छी आ चाहो-पान करै छी। राजदेव-       मुदा, जे मुइलाह हुनकर जीता-जि‍नगीक चर्चक गवाह एकोटा नै रहै छी। कृष्‍णानन्‍द-     नै बुझलौं कक्का? राजदेव-       समाजमे ककरो मुइने लोककेँ सोग होइ छै। सोगक समए मन नीक-अधला बीचक सीमानपर रहैए। जहि‍ना ग्रह-नक्षत्रक बीचक सीमानपर कोनो नव चीज देख पड़ैत तहि‍ना होइए। एकठाम बैस जँ दस गोटेक बीच जीवन-मरणक चर्च भऽ गेल तँ ओ इति‍हास बनि‍ गेल। जइ अनुकूल आगू चर्च हएत। कृष्‍णानन्‍द-     मन थोड़े रहत। राजदेव-       मन रखए चाहबै तखन ने रहत। ओहुना तँ वि‍सरनहि‍ छी। अपना ऐठाम मौखि‍के ज्ञान बेसी अछि‍। जे नीको अछि‍ आ अधलो। अच्‍छा छोड़ह, बहकि‍ गेलह। कृष्‍णानन्‍द-     हँ, तँ मुरदा जरबैबला कहै छेलि‍अ? राजदेव-       मुरदा जरबैकाल देखबहक जे चेरा जारन‍ एक भागसँ चुल्हि‍ जकाँ नै लगाओल जाइत अछि‍, एक्के बेर सौंसे शरीरक तर-ऊपर लगाओल जाइए। मुदा मुर्दा सि‍कुड़ि‍-सि‍कुड़ि‍ छोट होइत अंतमे गेन जकाँ भऽ जाइए। जकरा कि‍छु जरौनि‍हार गेन जकाँ गुरका कऽ छोड़ि‍ दैत अछि‍ आ कि‍छु गोटे ओकरो जरा दैत अछि‍। कृष्‍णानन्‍द-     अखन काजे जाइ छलौं तँ सोचलौं जे कक्काकेँ समाचार सुनौने जाइ छि‍यनि‍। मुदा अहूँ तँ चहकल थारी जकाँ झनझनाइते छी। पटाक्षेप सातम दृश्‍य (बालगोवि‍न्‍दक दरबज्‍जा। चाह-पान, सि‍गरेट चलैत। बालगोवि‍न्‍द आ राधेश्‍याम परसैत। भागेसर यशोधर एकठाम बैसल। बीचमे घटकभाय आ दोसर भाग समाजक रूपलाल, गरीबलाल, धीरजलाल बैसल।) घटकभाय-     कुटुम नारायण जकरा जे जुड़वन लि‍खल रहै छै से भइये कऽ रहै छै। यशोधर-       हँ, से तँ होइ- छै, मुदा.....? रूपलाल-      मुदा कि‍? यशोधर-       लि‍खि‍नि‍हार के छथि‍? गरीबलाल-     एना अनाड़ी जकाँ कि‍अए बजै छी। छठि‍हारे राति‍ वि‍धाता सभ कि‍छु लि‍ख दइ छथि‍न। यशोधर-       जँ वएह लि‍खै छथि‍न तँ एना उटपटांग कि‍अए लि‍खै छथि‍न। धीरजलाल-     कि‍ उटपटांग? (चाहक गि‍लास आ पानक तसतरी लेने राधेश्‍याम जा रखि‍ पुन: आबि‍ बैसैत अछि‍) यशोधर-       एक तँ लेन-देन तते बढ़ि‍ गेल अछि‍ जे जहि‍ना चुमुक लोहा बीचक वस्‍तुकेँ नै पकड़ि‍ लोहेटाकेँ खि‍ंचैत अछि‍ तहि‍ना पाइयेबला नीक पाइ खर्च कऽ नीक घर (सुभ्‍यस्‍त) पकड़ैत अछि‍ भलहि‍ं लड़का-लड़कीक जोड़ा बैइसै कि‍ नै बैइसै। घटकभाय-     (मूड़ी डोलबैत) हँ, से तँ होइ छै। मुदा कि‍छु लाभो तँ होइ छै। यशोधर-       कि‍ लाभ होइ छै? घटकभाय-     जाति‍-पाजि‍‍क (कुल-खनदानक) दवाएल लोक अपनासँ नीक घरमे पाइक बले कुटमैती कऽ लैत अछि‍। यशोधर-       तइ काल वि‍धाता कि‍छु ने सोचलनि‍ जे कान्‍ही लगा जोड़ा लगवि‍‍तथि‍न। जइसँ जाति‍-पाँजि‍क रक्षा सेहो होइत। घटकभाय-     कुटुम नारायण जहि‍ना मनुक्‍खोक मन सदति‍काल एके रंग नै रहैए तहि‍ना ने हुनको (वि‍धतोक) होइत हेतनि‍। जखन असथि‍र रहैत हेता तखन नीक वि‍चार मनमे अबैत हेतनि‍ आ जखन टेन्‍शनमे रहैत हेता तखन कि‍छुसँ कि‍छु कऽ दैत हेताह। गरीबलाल-     घटकभाय, एहेन बात नै छै। कोनो ई औझुका वि‍चार छि‍ऐ कि‍ पुरना वि‍चार छि‍ऐ। कहलो गेल अछि‍- ‘अजा पुत्रं बलि‍ं दत्‍वा देवो दुर्बल घातक:।’ घटकभाय-     छोड़ू ऐ सभ गपकेँ। ई सभ बैसारी कवि‍काठीक गप छी। जइ काजे एकठाम भेल छी पहि‍ने एकरा नि‍पटा लि‍अ। हमहूँ धड़फड़ाएल छी, बजौनि‍हार दुआरपर आशा बाट तकैत हेताह। भागेसर-       जि‍नगीमे पहि‍ल बेर बेटाक वि‍याह करै छी। ओना समाजमे बहुत काज देखलौंहेँ मुदा समाज कि‍ गामक सीमा भरि‍क अछि‍। जाति‍-जाति‍, कुल-खानदान, अड़ोसी-पड़ोसी, कते कहब। फाँकक-फाँक बनल अछि‍ जइसँ एक काज (वि‍याह) होइतो एक रंग बेबहार नै अछि‍। तइसँ सभ दि‍ना काज रहि‍तो अपन बि‍ध-बेबहार नीक-नहाँति‍ नै बुझि‍ पबै छी। घटकभाय-     हँ, से होइते अछि‍। अहाँ तँ अहीं भेलौं जे सालमे दस-बीस काजक अगुआइ करै छी तैयो कतेठाम भसि‍या जाइ छी। खाइर, ऐ सभकेँ छोड़ू। यशोधर-       हँ, हँ। अपने काज आगू बढ़ाउ। घटकभाय-     जहि‍ना शुभ-शुभ कऽ वि‍याहक चर्च उठल, आ अखन धरि‍ चलि‍ रहल अछि‍ तहि‍ना आगूओ चलैत रहए। बालगोवि‍न्‍द-     लाख टकाक गप कहलि‍ऐ घटकभाय। आगूक शुभारम्‍भ अहीं करि‍यौ। घटकभाय-     देखू कि‍छुए मास छोड़ि‍ वि‍याहक दि‍न सभ मास होइए। मुदा सभसँ नीक मास फागुन होइए। रूपलाल-      ठीके कहलि‍अ, शि‍वरात्रि‍क मास सेहो छी। घटकभाय-     कोनो कि‍ धड़फड़ा कऽ कहलौं, से बात नै अछि‍। कि‍छु सोचि‍ये कऽ कहलौं। खरमास (बैसाख-जेठ) मे आगि‍-छाइक डर रहै छै। जाड़मे जाड़ेक आ आन-आन मासमे सहो कि‍छु ने कि‍छु गड़वड़ रहि‍ते अछि‍। यशोधर-       जहि‍ना नीक मौसम रहैए तहि‍ना खेबो-पीवोक समान पर्याप्‍त रहैए। टेन्‍ट-समेनाक बदला गाछि‍यो-कलमसँ काज चलि‍ जाइत अछि‍। घटकभाय-     कि‍ सबहक वि‍चार अछि‍ कि‍ने? (सभ- हँ-हँ) एकटा काज सुढ़ि‍आएल। आब बरि‍यातीक गप उठबै छी। कि‍ बालगोवि‍न्‍द, कुटुम नारायणकेँ कते बरि‍याती अबैले कहै छि‍यनि‍? बालगोवि‍न्‍द-     पाँचो गोटेसँ वएह काज होइए जे पान सए गोटेसँ। तखन देखते छी हम्मर आँट-पेट। कौआसँ खइर लुटाएब तइसँ नीक जे ओते बेटि‍ए-जमाएकेँ अगुआ कऽ देब जे नइ सभ दि‍न तँ कि‍छुओ दि‍न सुख भोग करत। यशोधर-       बड़ सुन्नर बात बालगोवि‍न्‍द बाबूक छन्‍हि‍। मुदा....? गरीबलाल-     कनी खोलि‍ कऽ बजि‍औ। यशोधर-       अहाँ समाजक बात नै जनै छी मुदा हमरा समाजमे एहेन अछि‍ जे जाति‍मे घरही एक गोटे, परजाति‍मे हि‍त-अपेक्षि‍त आ परि‍वारक जे संबंधी छथि‍, से तँ एबे करताह। बालगोवि‍न्‍द-     एते तँ उचि‍ते भेल। गरीबलाल-     उचि‍त तँ कहि‍ देलि‍ऐ भाय, मुदा पैघ घोड़ाक पैघ छानो होइ छै। अहाँ पचघरा छी मुदा जइठाम सए-दू-सए घरक होय तइठाम? यशोधर-       ई तँ ठीके कहलि‍ऐ मुदा छोट-छीन काजक दुआरे समाज टुटि‍ जाए, सेहो नीक नहि‍ये। घटकभाय-     जेहने सवाल ओझराएल अछि‍ तेहने सोझराएलो अछि‍। यशोधर-       से कि‍? घटकभाय-     ओझरी दू रंगक होइ छै। एकटा, जहि‍ना टीक कि‍ झोंटामे चि‍ड़चि‍ड़ी लगने होइत अछि‍ आ  दोसर, डोरीक भीड़ी जकाँ होइए। एकटा ओरी पकड़ि‍ लि‍अ काज करैत चलू। कखनो कथीले ओझराएत। चाहे तँ काजे सम्‍पन्न भऽ जाएत वा डोरि‍ये सठि‍ जाएत। गरीबलाल-     बालगोवि‍न्‍द भाय, उक्‍खरि‍मे मूड़ी देलौं तँ मुसराक डर। समाजक नीकक लेल जँ अपन प्राणो गमबए पड़ै तैयो नीके। वि‍याह तँ समाजक उत्‍सव छी। घटकभाय-     एक लाखक वि‍चार गरीबलालक छन्‍हि‍। एकठाम बैस खेलौं, रहलौं आ नीक-अधलाक गप-सप्‍प केलौं, ई उत्‍सव नै तँ कि‍ भेल। यशोधर-       घटकभाइक ि‍वचार टारैबला नै छन्‍हि‍। (वि‍चहि‍मे) धीरजलाल-     जखन उत्‍सव छी तखन नीक तँ नीक भेल मुदा अधला गप-सप्‍प कि‍अए करत? घटकभाय-     (ठहाका मारि‍) तू अखैन अनाड़ी छह धीरज, मुदा जे बात उठौलह ओ आगूक लेल काज औतह। तँए पहि‍ने तोरे गप कहै छि‍अह। (घटकभाइक वि‍चार सुनि‍ सभ साकांच भऽ घटकभाय दि‍स कतऽ लगैत..) मुँह चटपटबैत धीरजलाल कि‍छु बाजए चाहैत कि‍ गरीबलालक नजरि पड़ल। मुँहक बाेल धीरजलाल रोकि‍ लैत) गरीबलाल-     पहि‍ने एकटा बात सुनि‍ लि‍अ, तखन दोसर पुछहुन। घटकभाय-     बौआ, जहि‍ना नीकक संग-संग अधलो चलैए तहि‍ना अधलाक संग नीको चलैए। तँए दुनू गप चललासँ साधल बात लोक बुझैए। धीरजलाल-     गप झपाएल रहि‍ गेल घटकभाय। घटकभाय-     अपना जनैत तँ कहि‍ देलि‍यह। भऽ सकैए तँू नै बुझने हुअ। देखहक पुरूष नारीक संयोगसँ सृष्‍टि‍क ि‍नर्माण होइए। जेकरा वि‍वेकी मनुष्‍य वि‍वाहक बंधनमे बन्‍हलनि‍। जे सृष्‍टि‍क वि‍कास आ कल्‍याणक लेल उचि‍त अछि‍। धीरजलाल-     हँ, से तँ अछि‍ये। घटकभाय-     मुदा एकरे दोसर भाग देखहक। जे, बंधनसँ बाहर अछि‍ ओकरा अधला बुझि‍ अंकुश लगाओल गेल। मुदा समाजेक लोक ओकरा राँइ-बाँइ कऽ कऽ तोड़ि‍ देलक। धीरजलाल-     नै बुझलौं भाय? घटकभाय-     पुरूष प्रधान बेबस्‍था ओकरा संग अन्‍याय केलक। एक दि‍स पुरूष कतेको नारीकेँ पत्नी बना, संग-संग समाजोमे कुचालि‍ आन-आन नारीक संग चलनि‍ शुरू केलक। जइसँ नरीक डाँड़, टूटि‍ गेल। कते नारी घरसँ ि‍नकालल गेल। जे रने-बने बौआइत अछि‍। धीरजलाल-     भाय, मन तँ आरो गप सुनैक होइए। मुदा जइ काजे एकत्रि‍क भेल छी से काज आगू बढ़ाउ। राधेश्‍याम-      मानि‍ लेलौं, जते बरि‍यातीक खगता होन्‍हि‍ तते लऽ कऽ औताह। घटकभाय-     बौआ राधेश्‍याम, नमहर काज करैमे नै औगताइ आ ने खि‍सि‍आइ। जखने अगुतेबह, खि‍सि‍एबह तखने काजमे खोंच-खाँच बनए लगतह। कोनो रोग असाध होइए तँ मनुखे ने ओकरो साधमे अनैए। बालगोवि‍न्‍द-     बौआ, अखन तँू समाजक तरी-घटी नै बुझबहक। एक तँ नवकवि‍रया छह दोसर गाम छोड़ि‍ परदेश खटै छह। जखन समाजक संग छी तखन वएह ने पारो-घाट लगौताह। बेटी कि‍ कोनो हमरे छी आकि‍ समाजक छि‍यनि‍। घटकभाय-     बालगोवि‍न्‍द भाय, हमरा जे धौंजनि‍ समाजमे होइए से ककरा होइ छै। जँ एहेन धौंजनि‍ दोसराकेँ होइतै तँ पड़ा कऽ जंगल चलि‍ जाइत। मुदा मोह अछि‍ कि‍ने। बालगोवि‍न्‍द-     कि‍ मोह? घटकभाय-     जइ काजे छी पहि‍ने से फड़ि‍आबह। एक समाजक दोसर समाजसँ मि‍लन समाराेह छी। तँए सामाजि‍क काज भेल। तइले समाजो अपन रस्‍ता बनौनहि‍ अछि‍। कि‍यो भार पूरि‍, तँ कि‍यो डाल पूरि‍, तँ कि‍यो असि‍रवादी दऽ काज पूरबैए। भागेसर-       ऐ लेल चि‍न्‍ता करैक नै अछि‍ घटकभाय। अपनो ऐठामसँ तँ डाला भार एबे करत कि‍ने। तइ लेल.....। घटकभाय-     सभ कि‍यो सुनि‍ लेलि‍ऐ कि‍ने जे बरपक्ष जते बरि‍याती अानए चहता से मंजूर केलि‍यनि‍। (सभ हँ, हँ) राधेश्‍याम-      (उछलि‍ कऽ) मुदा एकटा बातक फड़ि‍छौट अखने भऽ जाए। घटकभाय-     कथीक? राधेश्‍याम-      जते खाइ-पीबैक ओरि‍यान करबनि‍ से खा-पी कऽ जाए पड़तनि‍। गरीबलाल-     से पहि‍ने ने कि‍अए बरि‍यातीक हि‍साब जोड़ि‍ लेब। जइ हि‍सावसँ बरि‍याती औताह तइ हि‍साबसँ ओरि‍यान करब। ने बाइस बचत ने कुत्ता खाएत। राधेश्‍याम-      कक्का, दोसर बात कहलौं। गरीबलाल-     कि‍? राधेश्‍याम-      तीन कोसपर गाम छन्‍हि‍। पाँच बजेमे जे पएरो चलताह तैयौ आठ बजे आबि‍ जेताह। सभ काज सम्‍हरल चलतनि‍। घटकभाय-     बेस बजलह। खाइ-पबैक जे समान दूइर हएत से मोटरी बान्‍हि‍ कन्‍हापर लादि‍ देबनि‍। अच्‍छा अखन एतै काजकेँ वि‍राम दि‍यौ। यशोधर-       बहुत समए लगि‍ रहल अछि‍, जते जल्‍दी काजक रूप रेखा बनि‍‍ जाएत तते नीक ि‍कने। घटकभाय-     हँ, हँ। से तँ नीक। मुदा जहि‍ना कोनो वस्‍तुक बोझसँ चानि‍ अगि‍या जाइत अछि‍‍ तहि‍ना ने वि‍चारोक बोझसँ अगि‍या जाइत अछि‍। तँए आगूक वि‍चार बढ़बैसँ पहि‍ने एक बेर चाह-पान भऽ जाए। गरीबलाल-     बेस कहलि‍ऐ घटकभाय। बालगोवि‍न्‍द-     बाउ राधे, चाह बनौने आबह। (राधेश्‍याम चाह अानए जाइत अछि‍।) गरीबलाल-     (मुस्‍की दैत) तइ बीच कि‍छु रमन-चमन भऽ जाए। अँए-औ घटक भाय, मझौरा बरि‍यातीमे परूँका कि‍ भेल रहए? घटकभाय-     बि‍सरलो बात मन पाड़ै छी। नीकक चर्च लोक दोहरा-तेहरा करैए। अधला बात (काज) बि‍सरबे नीक। गरीबलाल-     अखन औपचारि‍क नै अनौपचारि‍क कि‍छु भऽ जाए। घटकभाय-     (मुस्‍की दैत) देखि‍यौ, सालमे दस-बीस वि‍याहक अगुआइ करि‍ते छी मुदा ओहन तँ नै छी जे लुत्ती लगा देव आ ससरि‍ जाएब। जइ काजमे हाथ दइ छी ओइ काजकेँ कइये कऽ छोड़ै छी। यशोधर-       कि‍ भेल रहए? घटकभाय-     जि‍नगीमे पहि‍ल बेर एहेन फेरा लागल। कछुबीक बरि‍याती मझौरा गेल। ठीक आठ बजे बरि‍याती पहुँचल। घरवारि‍यो सतर्क रहथि‍। दरबज्‍जापर पहुँचते शर्बत चलल। शर्बत चलि‍ते रहै कि‍ स्‍त्रीगण सभ चंगेरामे दूबि‍-धान दीप लेने गीत गबैत पहुँचलीह। यशोधर-       से तँ होइते अछि‍। घटकभाय-     एतबे भेल। एक दि‍स बैसारमे बरि‍याती सभ गि‍लासपर गि‍लास शर्बत चढ़बैत तँ दोसर दि‍स गीति‍हाइरो सभ गीतक वाण छोड़ैत। तखने एकटा परदेशि‍या करामात शुरू केलक। यशोधर-       कि‍ करामात? घटकभाय-     पहि‍ने तँ नै बुझलि‍ऐ मुदा पछाति‍ पता लागल जे ओ बरि‍याति‍ये रहए। केलक ई जे गीति‍हारि‍क बीचमे पाइ (एक-दू आ पाँचक सि‍क्का) लुटबए लगल। गीति‍हारि‍क बीच हुड़ भेल। एक्के-ुदुइये चारि‍ बेर पाइ फेकलक। झल-हन्‍हार रहबे करै। यशोधर-       से एना कि‍अए केलक? घटकभाय-     सएह ने, कतऽ सँ सीखि‍ कऽ आएल रहै से नै कहि‍। पाइ बीछैमे गीतो बन्न भऽ गेल। तइपर सँ तना ने तरा-उपरी लोको खसए लगल आ धक्का-ध्ुक्की सेहो हुअए लगल। दूवि‍-धान, दीपबला चंगेरा बरक उपरेमे खसल। गरीबलाल-     जे एहेन कि‍रदानी केने रहै तेकरा पकड़ि‍ कऽ धोलाइ नै देलक। घटकभाय-     ओहो कि‍ अनाड़ी-धुनाड़ी रहै। लुत्ती लगा ससरि‍ कऽ कातमे नुका रहल। घरवाली सभ जखन गीति‍हारि‍ सभकेँ पुछलकनि‍ तँ ओ सभ हरि‍यरका कुरताबला नाओं कहलखि‍न। ओ सभ भजि‍अबए लगल। मुदा कुत्ता कतौ आगि‍मे झरकै। गरीबलाल-     तइमे अहाँ कोना फँसि‍ गेलि‍ऐ? घटकभाय-     हमरो कुर्त्ता हरि‍यरे रहए। मुदा आब बुझै छी जे गलती कनी अपनो रहए। गरीबलाल-     कि‍ गलती अपन रहए? घटकभाय-     अपन गलती यएह रहै जे बरि‍यातीक बीचक नहि‍ कतका कुरसीपर बैसल रही। तीनि‍-चारि‍ गोटे कातेसँ हि‍यबैत रहै। हरि‍यर कुर्ता देख लगमे पहुँच गेल। यशोधर-       अहाँ नै बुझलि‍ऐ। घटकभाय-     से ि‍क कोनो देखि‍लि‍ऐ नै। भेल जे कि‍छु परसऽ आएल अछि‍। यशोधर-       कि‍दु पुछबो ने केलि‍ऐ? घटकभाय-     कि‍ पुछि‍ति‍ऐ, कोनो शंका रहए। ओहो सभ कि पुछलक। हाँइ-हाँइ कऽ ठुस्‍से चलबए लगल। गरीबलाल-     (ठहाका मारि‍..) बेसी ने तँ लागल। घटकभाय-     कोनो कि‍ अनाड़ी-ध्‍ुनाड़ीक ठुस्‍सा रहए। पाँचे-सात ठुस्‍सामे तँ बुझि‍ पड़ल जे दि‍नका तरेगन देखै छी। यशोधर-       बरि‍याती सभ खाइयेटाले गेल रहए। घटकभाय-     नै, परोछक बात छी, झूठ नै बाजब। बरि‍याति‍यो सभ तनलाह। मुदा हमहीं रोकलि‍यनि‍। गरीबलाल-     अहाँ कि‍अए रोकलि‍यनि‍? घट‍कभाय-     मारि‍-दंगा कोनो नीक छी। कोनो ठेकान छै जे कते हएत। जँ एहेन भऽ जाए जे काजे नाश भऽ जाए, तखन। गरीबलाल-     हँ, से तँ ठीके। घटकभाय-     ओना पाँचे-सात ठुस्‍सा ने लागल। जँ दोहराइत तँ बेसि‍यो लगि‍ सकै छलै। तहूमे जहि‍ना हौहटि‍-कलकैल साले-साल ओही आदमीक ऐठाम अबैत जेकरा ऐठाम खाइ-पीबैक आ सुतै-बैसैक नीक जोगार देखैत। तँए सोचलौं जे कनी सहि‍ये लेने नीक रहत। (तस्‍तरीमे चाह लेने राधेश्‍याम आबि‍ चाह परसैत अछि‍..) गरीबलाल-     तरे-तर घटकभाय मुस्‍की मारैत छथि‍। (गरीबलालक बात सुनि‍ सभ घटकभाय दि‍स तकए लगै छथि‍। अपना दि‍स तकैत देख घटकभाइक मुस्‍की-हँसीमे बदलि‍ गेलनि‍। बालगोवि‍न्‍द-     घटकभाय, कि‍छु बजताह। घटकभाय-     एकटा आरो घटना मन पड़ि‍ गेल। बरख पाँचे भेल हएत। तमोरि‍याक कुटुमैती अरड़ि‍यामे भेल रहए। दुनूक अगुआ रही। दुनू चि‍न्‍हार। बालगोवि‍न्‍द-     भेल कि‍ से कहि‍यौ। घटकभाय-     ओइ काजमे दोखी घरबैइये रहए। नाहकमे दोखी बनलौं। गरीबलाल-     कि‍ भेल रहए? घटकभाय-     गरीबलाल एक रत्ती तल-वि‍तल भेने काज वि‍गड़ि‍ कऽ कि‍-सँ-कि भऽ जाइए। एते दि‍न देखै छेलि‍ऐ जे दोकानदार सभ माथपर नूनक मोटरी आनि‍ जीबैले कारोवार करैत छल। आब देखै छी जे कारोवारि‍ये सभ राजा भऽ गेल। जे जना मन फुड़ै छे से तेना करैए। गरीबलाल-     जे बात कहै छेलि‍ऐ, से कहि‍यौ। घटकभाय-     ओइठीन देखौलक कोनो लड़की आ सि‍नुदानक बेर दोसर लड़कीकेँ आनि‍ सि‍नुरदान करबै लगल। गरीबलाल-     ओइठाम तँ बर पक्षक नै रहैत छथि‍ तखन कोना भाँज खुजल। घटकभाय-     सभ गप देखि‍नि‍हार तँ घरपर बाजि‍ चुकल छलाह ने। लड़कीक हुलि‍या भऽ गेल छलै ने। ओही अनुमानसँ लड़का पकड़ि‍ लेलक। कोनो लाथे नि‍कलल आ पि‍त्तीकेँ कहि‍ देलक। गरीबलाल-     तखन तँ बड़का सरेड़ा भेल हएत? घटकभाय-     सरेड़ा कि‍ सरेड़ा जकाँ भेल। मारि‍-पीट जे भेल से तँ भेवे कएल जे तीन बरख तक दुनू गामक सीमा रोका गेल। बि‍याह बेटा-बेटीक खेल नै दुनूक जि‍नगीक छी। ओना तेहन जुग-जमाना आबि‍ गेल अछि‍ जे खेलोसँ खेल जि‍नगी बनि‍ गेल अछि‍। गरीबलाल-     कनी फरि‍छा कऽ कहि‍यो घटकभाय? घटकभाय-     कि‍ फरि‍छा कऽ कहब। अंति‍म समए वि‍द्यापति‍यो लि‍खलनि‍- ‘माधव हम परि‍णाम ि‍नराश।’ तहि‍ना छातीपर हाथ रखि‍ आनो-आन बाजथि‍। अच्‍छा अखन एतै वि‍राम दि‍यौ। खाइ-पीबैक बेरो भऽ गेल आ देहो-हाथ अकड़ि‍ गेल। राधेश्‍याम-      तीमनो-तरकारी ठरि‍ कऽ पानि‍ भऽ गेल हएत। घटकभाय-     कुटुम नारायण तँ ठरलो खा कऽ पेट भरि‍ लेताह मुदा हमरा तँ कोनो गंजन गृहणी नहि‍ये रखतीह। पटाक्षेप आठम दृश्‍य (बालगोवि‍न्‍दक दरबज्‍जा। बालगोवि‍न्‍द, भागेसर आ यशोधर बैस खेती-पथारीक गप करैत..) बालगोवि‍न्‍द-     देखले दि‍नमे दुनि‍याँ कतऽ-सँ-कतऽ भागि‍ गेल। यशोधर-       से कि‍? बालगोवि‍न्‍द-     अपना ऐठामक ि‍कसान खेती-गि‍रहस्‍तीक सभ कथूक बीआ अपने बनबै छलाह खेती करै छलाह। तीन सालसँ जे सुनै छी, से कि‍ कहू। यशोधर-       खोलि‍ कऽ कने कहि‍यौ? बालगोवि‍न्‍द-     तेसर साल हमरा गाममे बहुत गोरे तीन सए रूपैये कि‍लो मकैयोक आ धानोक बीआ, पँचगुना अपजा कहि‍ कऽ अनलनि‍। खेती केलनि‍। शुरूहेमे ढक-बखारी सभ बनबा-बनबा रखलनि‍। ले बलैया मकैमे बाइले ने लागल। यशोधर-       से ि‍क भेलै? बालगोवि‍न्‍द-     जहि‍ना रि‍नि‍या-महाजन अगर-मगर करैत रहताह तहि‍ना सभ गि‍रहस्‍त अपनेमे कहा-कही शुरू केलनि‍। यशोधर-       कि‍ कहा-कही शुरू केलनि‍? बालगोवि‍न्‍द-     कि‍यो कहथि‍न जे खाद जे देलि‍ऐ से माटि‍ जाँच करौलि‍ऐ? तँ कि‍यो बाजथि‍ जे जते पावरक दवाइ फसि‍लमे दइ छलि‍ऐ तइसँ बेसी पावरक देलि‍ऐ कि‍ कम? तँ कि‍यो बाजथि‍ जे बीआ बाग करैसँ पहि‍ने दवाइ मि‍लौलि‍ऐ। कि‍ कहब उपजाक बात वि‍सरि‍ सभ अपनेमे सालो भरि‍ रक्का-टोकी करैत रहलाह। यशोधर-       तब तँ बाढ़ि‍ रौदीक संग तेसरो आफत आबि‍ गेल। बालगोवि‍न्‍द-     तेसरे कि‍अए कहै ि‍छऐ। चारि‍मो ने कहि‍यो। यशाेधर-       चारि‍म की? बालगोवि‍न्‍द-     अहाँ सभ दि‍स नहरि‍ नइए, तँ ने नजरि‍पर आएल हेन। हमरा सभ दि‍स केहन खेल होइए से सुनू। जखन खूब बरखा हएत तखन नहरि‍क मुँह (फाटक) खोलि‍ देत आ जखन रौदी हएत तखन कहत जे नहरि‍मे पानि‍ये ने छइ। यशोधर-       जना अपना ऐठम पढ़ल-लि‍खल लोक छथि‍ तना जँ दसो प्रति‍शत बुधि‍क (ज्ञानक) उपयोग अपना क्षेत्रक लेल लगबि‍तथि‍ तँ कि‍-सँ-कि‍ देखि‍ति‍ऐ। मुदा जेकर कपारे फुटि‍ जाएत तेकर कते भरोस। (राधेश्‍याम चाह लेने अबैत अछि‍। तहि‍काल गरीबलालक संग घटकभाय सेहो अबै छथि‍..) भागेसर-       घटकोभाय आबि‍ये गेलाह। घटकभाय-     चाहमे हमरो अंश छल तँए दुनूक मि‍लानी भेल। दाना-दानामे खेनि‍हारक अंश लि‍खल अछि‍ मुदा.....? गरीबलाल-     घटकभाय, अहाँमे यएह अवगुन अछि‍ जे करैले जाइ छी कोनो काज आ करए लगै छी कोनो काज। जइ काजे एलौं तेकरा पहि‍ने सोझराउ। दोसरो काज करए जाएब। घटकभाय-     अखन तँ सभ जुटबो ने केला अछि‍ तइ बीच काजक चर्च उठाएब नीक हएत। गरीबलाल-     जँ ओ लोकनि‍ नै आबथि‍ तँ छोड़ि‍ देब नीक हएत। घटकभाय-     (मूड़ी डोलबैत) कहलौं तँ बेस बात, मुदा जमात करए करामात। गरीबलाल-     ई तँ ठीके कहलि‍ऐ मुदा जमातसँ पहि‍ने जमात बनैक प्रक्रि‍यापर नजरि‍ दि‍अए पड़त। घटकभाय-     से कि‍? गरीबलाल-     जहि‍ना बड़का आम सरही होइत-होइत बीजू बड़बड़ि‍या भऽ जाइए। तहि‍ना बि‍ज्‍जुओ बनैत-बनैत बड़का फैजली-सजमनि‍या बनि‍ जाइए। तहि‍ना छी जमात। बनैत-बनैत बनत आ मेटाइत-मेटाइत मेटाएत। समाजि‍क काज छोड़ि‍ सभ अपना नून-रोटीमे लगि‍ समाजकेँ तहस-नहस कऽ देने अछि‍ तइठाम जमात तकने काज चलत। घटकभाय-     बेस बजलौं गरीबभाय। एकटा बात मन पड़ल। पड़ोसि‍या गाममे रामरूपक माए मरल। अज-गजबला लोक भोज केलक। गामे-गाम एकघरा-दूघरा जाति‍। एगारह गाममे तीन सए एगारह पंच भेल। गरीबलाल-     फेर अहाँ बौआए लगलौं। घटकभाय-     बौआइ कहाँ छी। अगि‍ला बात सुनि‍ ने लि‍यौ। गेलौं तमोरि‍या स्‍टेशनपर टहलए। रामरूपक बेटाकेँ आ गनोरक बेटाकेँ झगड़ा करैत देखलौं। बच्‍चा बुझि‍ दुनूकेँ छोड़बैत पुछलि‍ऐ जे कि‍अए झगड़ा करै छह। गनोरक दादीक सराधक भोज सेहो भेल। ओकाइत तँ एकरंगाहे दुनूक। ओ दुइये गामक भोज केने रहए। दुइये गाममे तोहर सए पंच भेल। तहीले झगड़ा। गरीबलाल-     (मुस्‍की दैत) अनकर झगड़ा अपना कपारपर लऽ लेलौं। घटकभाय-     लेलौं कि‍ लेला जकाँ। बकार बन्न भऽ गेल। भीतरे-भीतर  मन खि‍सि‍या कऽ कहए जे अनेरे अनकर झगड़ा अपना सि‍र बेसाहि‍ लेलौं। भने अलकतरा बैसाएल प्‍लेट-फार्म छइहे दुनू फरि‍छा लि‍अ। मुदा सेहो आब केना हएत। गरीबलाल-     फेर केलि‍ऐ कि‍? घटकभाय-     कहलि‍ऐ जे बौआ ताबे थमहह। कनी बैंकक काज अछि‍। हूसि‍ जाएत। ई तँ कनी अगाति‍यो-पछाि‍त भऽ सकैए मुदा ओ (बैंक) तँ नै हएत। गरीबलाल-     मानि‍ लेलक दुनू? घटकभाय-     बानरक बटवारा (पनचैती) भऽ गेल। जहि‍ना रोटी बराबर करैमे सौंसे रोटी बानर खा गेल तहि‍ना हुअए लगल। गरीबलाल-     से कि‍? घटकभाय-     एक्के बात एक गोटे मानि‍ लि‍अए तँ दोसर तत्-मत् करैत अगर-मगर करैत, कोना-छि‍न्ना नि‍कालि‍ सवाल उठा दि‍अए। मुदा हमरो बहाना तँ भरि‍गर रहए तँए हड़बड़ करैत कि‍छु कहबो करि‍ऐ कि‍छु नहि‍यो कहि‍ऐ। गरीबलाल-     दुनूक नजरि‍ केहन रहए? घटकभाय-     दुनूक नजरि‍ जते चढ़ल बुझि‍ पड़ै ओतबे उतड़लो। तइसँ शंका हुअए जे परोछ भेलापर कहीं फेर ने फँसि‍ जाए। फेर हुअए जे पनचैती भेने सोलहो आना तँ नहि‍ये फरि‍आएत। ओ जँ फरि‍आएत तँ अपने दुनूसँ। गरीबलाल-     जे नीक होइत से ने कि‍रतौं। घटकभाय-     जाबत बरतन तावत बरतन। गरीबलाल-     से कि‍? घटकभाय-     जाधरि‍ धोती वा साड़ी सीवि‍यो कऽ काज चलैए ताधरि‍ एकटा समस्‍या (धोती कीनैक) तँ हटल रहैए। गरीबलाल-     मुदा धोतीक जरूरत तँ सबदि‍ना छी, कते दि‍न टारल जा सकैए। घटकभाय-     हँ, से तँ छी। मुदा कोनो काजो करैक (धोति‍यो कि‍नैक) तँ अनुकूल समए होइत अछि‍। अच्‍छा छोड़ू ऐ गपकेँ। ओ सभ जँ नहि‍यो एला तँ कि‍ हेतइ। नै पान तँ पानक डंटि‍येसँ तँ काज चलि‍ये जाइ छै। घुमा-फि‍रा कऽ सभ तँ छीहे। गरीबलाल-     हँ, से तँ छी मुदा दाउ-गीरकेँ कोनो गर भेटक चाही। घटकभाय-     से कि‍ कोनो तेहन काज छी। दुइये परि‍वारक काज छी जँ दुनू राजी-खुशी सहमत भऽ करथि‍ तँ तेसरकेँ कि‍ चलत। भागेसर-       हमरो समए बहुत लगि‍ गेल। एक घंटाक काजमे जे दि‍नक दि‍न लगा देब सेहो नीक नै। तहूमे काजक दौर छी सइयो रंगक जोगार-पाती करए पड़त। जँ एहि‍ना समए लगैत गेल तखन बान्‍हल दि‍न (ि‍नर्धारि‍त समए) मे काज केना हएत? गरीबलाल-     हँ, शुरूहे लग्‍नमे काज हेबाक चाही चि‍क्कन-चुनमुन तँ पछाति‍यो भऽ सकै छै। ओना अपनो चलैत-चलैत चि‍क्कन भऽ जाइए। बालगोवि‍न्‍द-     घटकभाय, जखन एते गप भइये गेल तखन एक संझू बरि‍याती रहता कि‍ दू संझू आकि‍ तीन संझू। घटकभाय-     (मूड़ी डोलबैत) हमर नजरि‍ये नै ओम्‍हर गेल छल मुदा इहो तँ दमगरे सवाल अछि‍। राधेश्‍याम-      जखन सगतरि‍ सभठाम एक संझू भऽ गेल तखन दू-संझू तीन संझू अनेरे चलाएब छी। घटकभाय-     बौआ कहलह तँ बड़ सुन्नर बात मुदा तोही कहअ जे जखन बरि‍याती पहुँचैए तखन शर्बत ठंढ़ा-गरम, चाह-पान, सि‍गरेट गुटका चलैए। तइपर सँ पतोरा बान्‍हल जलपान, तइपर सँ पलाउओ आ भातो, पूड़ि‍ओ आ कचौड़ि‍यो, तइपर सँ रंग-वि‍रंगक तरकारि‍यो आ अचारो, तइपर सँ मि‍ठाइयो आ माछो-मासु, तइपर दहि‍यो, सकड़ौड़ि‍ओ आ पनीरो चलैए। राधेश्‍याम-      कि‍अए एते जोड़बै छी? घटकभाय-     जोड़बै कहाँ छि‍अह। जे चलैए से कहै छि‍अह। आब तोहीं कहह जे एक दि‍नक खेनाइ एते भेल? राधेश्‍याम-      नै कोना भेल? कि‍यो कि‍ मोटरी बान्‍हि‍ घरपर लऽ जाइ छथि‍ आकि‍ पेटेमे दइ छथि‍न। घटकभाय-     दइ तँ छथि‍न पेटेमे मुदा जँ सभ दि‍न एहि‍ना देथि‍न तँ कोरोओ-बत्ती घरमे रहतनि‍ आकि‍ ओहो पेटेमे चलि‍ जेतनि‍। नै जँ एहने हाथी सन सभ भऽ जाए तँ हरबहना बड़द कतऽ सँ आनब। हाथीसँ बड़ काज लेब तँ देह-हाथ डोलबैत सवारी करब। गरीबलाल-     (मुस्‍कुराइत) सवारि‍यो तँ जरूरि‍ये अछि‍? घटकभाय-     (खि‍सि‍या कऽ मुदा हँसैत..) सवारि‍यो नीक लगै छै समैये पाबि‍ कऽ। भरि‍ दि‍न जँ खलासी-डरेबर जकाँ सवारि‍ये कसने रही तँ डरेबरे-खलासी हएब कि‍ यात्रा केनि‍हार यात्री। गरीबलाल-     कते दूर यात्रा करैक अछि‍ जे लोक यात्री बनि‍ चलत। ‘मि‍याँ दौर मसजि‍त।’ बालगोवि‍न्‍द-     ‘गरीबलाल अहाँकेँ कचकचबै छथि‍ घटकभाय। अहूँ तेहने छी जे सभ गपकेँ धइये लइ छि‍ऐ। जइ काजे सभ एकत्रि‍त भेलौं तकरा आगू बढ़ाउ। घटकभाय-     (सह पाबि‍..) कतबो गरीबलाल कचकचेता तइसँ कि‍ हम कब-कबा जाएब। गरीबलाल एक घाटक पानि‍क सुआद बुझै छथि‍। हमरा जकाँ सत्तरह घाटक सुआद थोड़े बुझथि‍न। राधेश्‍याम-      एक संझू नीक कि‍ दू संझू आकि‍ ओइसँ बेसी। घटकभाय-     बौआ, संझूकेँ दि‍ना बना दहक। एक दि‍ना कि‍ दू दि‍ना ि‍क तीन दि‍ना। जँ तीन दि‍ना भेल तँ बहत्तरि‍ घंटाक चक्र भेल। चौवीस घंटाक दि‍न होइए तँ एक चक्रमे अनेक अछि‍। कि‍छु छोड़ि‍ कि‍छु जोड़ि‍ आ कि‍छु सुधारि‍ एक चक्रमे आनल जा सकैए। गरीबलाल-     आब कि‍ पहि‍लुका जकाँ लोककेँ ओते पलखति‍ छै जे पएरे बत्तीस-बत्तीस कोस भोज खाइले जाइत। एक दि‍ना बढ़ि‍याँ। घटकभाय-     गरीब लाल, साँपोसँ टेढ़-बौकली लोकक चालि‍ छै। गरीबलाल-     से कि‍? घटकभाय-     एक दि‍नोकेँ एक रौतुक बना देलक। गरीबलाल-     चौबीस घंटाकेँ बारहमे बाँटल जा सकैए कि‍ ने? घटकभाय-     बँटैक तराजुए ढील-ढि‍लाह अछि‍। कखनो कऽ डोरी ओझरा जाइ छै तँ बेसि‍ये जोखा जाइ छै आकि‍ कम्‍मे जोखाइ छै। गरीबलाल-     से कि‍? घटकभाय-     एक तँ भगवानेक काज आ बोलमे अन्‍तर छन्‍हि‍ दोसर मनुख तँ आरो पजि‍या कऽ लि‍ड़ी-बीड़ी करैए। गरीबलाल-     से कि‍? घटकभाय-     कनी नजरि‍ उठा कऽ देखबै तँ बुझि‍ पड़त जे कोनो मासक दि‍न नमहर भऽ जाइए आ कोनो मासक राति‍। तखन केना अधा-अधीमे बँटबै। गरीबलाल-     एकरा छोड़ू। दोसरपर आउ। घटकभाय-     (मुँह बि‍जकबैत..) मनुख तँ मनुखे छी। एतबो होश नै जे रौतुका यज्ञ संध्‍याक गीतसँ शुरू होइत अछि‍ आ दि‍नुका परातीसँ। से होइए कि‍ से तजबीज केलि‍ऐहेँ? गरीबलाल-     नै? घटकभाय-     तेज सवारी भेने तीन कोसक बरि‍याती तीन बजे भोरमे पहुँचैए। आब अहीं कहू जे पराती बेरमे संध्‍या होइ। तइपर सँ दि‍नका यज्ञ मानबै आकि‍ रौतुक। गरीबलाल-     एहन जंगल-पहाड़ काटि‍ सड़क बनाओल हएत। घटकभाय-     (मुस्‍की दैत) नै कि‍अए हएत। अनजान-सुनजान महाकल्‍याण। जे नीक बुझि‍मे आओत सएह ने नीक भेल। तहूमे असगर-दुसगरमे गड़बड़ाइयो सकैए मुदा पाँच गोटे बैस जँ वि‍चार करब तँ कनी-मनी झूस-झास भऽ सकैए। राधेश्‍याम-      जँ शुभ लग्‍नमे ि‍वयाह नै हएत तँ बरि‍याती सभ माि‍र खेता। घटकभाय-     जहि‍ना टायरगाड़ीक बड़दकेँ आनो-आनो गामक खच्‍चा-खुच्‍ची आ बान्‍ह-सड़क टपैक भाँज बुझल रहै छै तहि‍ना ने छी। खाइर शुभ-शुभ कऽ काज सम्‍पन्न हुअए। गरीबलाल-     घटकभाय, अपना सभ समाज छी कि‍ने? समाजि‍क बंधनमे बान्‍हि‍ जि‍नगीक अंग छी। मुदा परि‍वारक काजक भार तँ परि‍वारेपर रहतनि‍। घटकभाय-     रहबे करतनि‍ कि‍ने। समाज परि‍वारक बीच जे संबंध छै तेकरे पहरूदार छी कि‍ने? नीक करता नीक कहबनि‍ अधला कऽ अधलो कहबनि‍ आ सजाएओ देबनि‍। बालगोवि‍न्‍द-     (मुस्‍कुराइत) जहि‍ना अखन धरि‍ सभ काज शुभ-शुभ कऽ चलि‍ रहल अछि‍ तहि‍ना आगूओ चलैत रहए। भागेसर-       नचारि‍ये वि‍याह कऽ रहल छी। तँए......? घटकभाय-     कि‍ नचारि‍ये? मनोहर-       कते दि‍नसँ पत्नी बीमार चलि‍ रहल छथि‍। बाहरक काज अपने सम्‍हारि‍ लइ छी, मुदा घर-अंगनाक काज राइ-छि‍त्ती होइए। घटकभाय-     बालगोवि‍न्‍द, जहि‍ना संगीक काज नीक-अधलामे संग देब छी तहि‍ना ने सरो-समाज आ कुटुमो-परि‍वार छी। जते जल्‍दी सम्‍हारि‍ सकी ओते जल्‍दी सम्‍हारि‍ लि‍अ। आठम दि‍न सेहो नीक लग्‍न अछि‍‍। जँ सम्‍हरि‍ जाए तँ सम्‍हारि‍ लि‍अ। बालगोवि‍न्‍द-     बड़वढ़ि‍या। पटाक्षेप नवम दृश्‍य (राजदेवक दरबज्‍जा। नजरि‍ नि‍च्‍चा केने कुरसीपर राजदेव मने-मन कि‍छु सोचबो करैत आ कखनो कऽ दहि‍ना हाथ उठा आंगुरपर हि‍साब जोड़ए लगैत। बजैत तँ नै मुदा ठोर पटपटबैत।) सुनीता-       बि‍नु दूधेक चाह छी। कहुना कऽ पीब लि‍अ। राजदेव-       दूध नै छेहल। सुनीता-       अमरस्‍साक समए छी, फाटि‍ गेल। राजदेव-       दूध फाटि‍ गेलह तँ नेबोए दऽ देलहक ने। अच्‍छा जे छह सएह नीक। एते दि‍न चाह पेय छल आब तँ अम्‍मल बनि‍ गेल। नै पीने मने ढील भऽ जाइये। उत्तरवारि‍ टोल दि‍ससँ जनीजाति‍क जेर अबैत देखने छेलि‍ऐ। से कतऽ सँ अबै छलइ? सुनीता-       हकार पुरि‍ कऽ। राजदेव-       कथीक हकार। ककरा अइठीनसँ। सुनीता-       भागेसर कक्काक बेटाक वि‍याह भेलनि‍, वएह कनि‍याँ देख-देख अबै छलइ। राजदेव-       वि‍याहै जोकर बेटा कहाँ भेल छलै? सुनीता-       वि‍याहोक कोनो सीमा-नाङरि‍ छै। देखबे करै छि‍ऐ जे कोनो-कोनो जाति‍ छेटगर बेटा-बेटी भेने वि‍याह करैए आ कोनो-कोनो जाति‍ बच्‍चेमे कऽ लइए। राजदेव-       हँ, से तँ देखै छि‍ऐ। तोहू तँ आब बच्‍चा नहि‍ये छह, कओलेजमे पढ़ै छह। दुनूमे नीक कोन? सुनीता-       दुनू नीको अछि‍ आ अधलो। राजदेव-       से केना? सुनीता-       जुआन बेटा-बेटीक वि‍याह ऐ दुआरे नीक अछि‍ जे अपन भार उठा चलै जोकर भेल रहैए। राजदेव-       हँ, से तँ रहैए। फेर अधला केना भेल? सुनीता-       जतेक जे भार उठा कऽ चलैक चाही से नै चलैए, तँए अधला। राजदेव-       तू तँ ि‍कताबक भाषामे बुझबै छह। कनी वि‍लगा कऽ कहह। सुनीता-       एक ध्रुवीय (एक सीमा) देश-दुनि‍याँक अछि‍ आ दोसर ध्रुवीय (दोसर सीमा) परि‍वार आ व्‍यक्‍ति‍क। आजुक जे परि‍वारक रूप-रेखा बनि‍ रहल अछि‍ ओइमे सभ छुटि‍ रहल अछि‍। सि‍कुड़ि‍ कऽ लोक तते छोट परि‍वार बनबए चाहैए जे मनुष्‍यक संबंधे चौराहापर ढेड़ि‍आएल गाड़ी-सवाड़ी जकाँ भेल जा रहल अछि‍। राजदेव-       फेर ि‍कताबेक भाषा बजए लगलह। सुनीता-       नै। परि‍वारमे मनुष्‍यक जन्‍म होइत अछि‍। माए-बाप जन्‍मदाता होइत छथि‍न। मुदा भऽ कि‍ रहल अछि‍ जे या तँ वि‍चारे वा लड़ि‍-झगड़ि‍ माए-बाप छोड़ि‍ परि‍वार फुटा लइए। जहि‍ना सोनक सूत मि‍ला कऽ सक्कत जौड़ बनि‍ जाइए। जइसँ भारी-भारी बोझ बान्‍हल जा सकैए ओइ जौड़केँ उधारि‍ वा तोड़ि‍ एक-एक रेशाकेँ बेड़वि‍तहि‍ एते कमजोर बनि‍ जाइत अछि‍ जे कोनो काजक नै रहैत। तहि‍ना भऽ रहल अछि‍। राजदेव-       (मूड़ी डोलबैत..) कहै तँ छह ठीके, मुदा.....? सुनीता-       मुदा-तुदा कि‍छु ने। सोझ रास्‍ता बनि‍ रहल अछि‍। जे बेटा-माए-बाप, परि‍वार छोड़ि‍ सकैए ओ समाज, देश-दुनि‍याँकेँ कोना पकड़ि‍ सकैए। जँ से तँ मातृभक्‍त, पि‍तृभक्‍त, समाजभक्‍त, देशभक्‍त बनि‍ कोना सकैए। राजदेव-       (मूड़ि‍यो डोलबैत आ कनडेरि‍ये आँखि‍ये सुनीताकेँ देखबो करैत..) ठीके कहै छह। अच्‍छा बाल-वि‍वाहकेँ केना-नीक आ केना अधला कहै छहक। सुनीता-       बाल-वि‍वाहक परि‍स्‍थि‍ति‍ भि‍न्न अछि‍। जे परि‍वार सम्‍पन्नताक (आर्थिक) दृष्‍टि‍ये जते अगुआएल अछि‍ ओ ओते बाल-वि‍वाहसँ दूरो अछि‍। मुदा जे परि‍वार जते पछुआएल (आर्थिक दृष्‍टि‍ये) अछि‍ ओइमे ओते बेसी छै। राजदेव-       कि‍अए? सुनीता-       अपना सबहक समाजो, परि‍वारो आ व्‍यक्‍ति‍यो वैदि‍क रीति‍-नीति‍सँ बनि‍ चलैत आबि‍ रहल अछि‍। जइमे ढेरो दाउ-घाउक संग हवो-वि‍हाड़ि‍ लगैत आएल अछि‍। बालो-वि‍वाहक पाछु सएह कारण अछि‍। राजदेव-       कनी बि‍लगा कऽ कहह। सुनीता-       जि‍नगीक उताड़-चढ़ाव होइत छै। जना बच्‍चाक सेवा माए-बाप करैत अछि‍ तखन ओ अपन जि‍नगी सम्‍हारै जोकर नै रहैए। जखन बेटा-बेटी जुआन (कमाइ-खटाइबला) होइत अछि‍ आ माए-बापक लौटानी अबैत अछि‍। तखन सहाराक जरूरत होइ छै। जहि‍ना दुनि‍याँमे मनुष्‍यकेँ एबाकाल (बच्‍चा) दोसराक सहाराक जरूरत होइत अछि‍ तहि‍ना जेबोकाल होइत अछि‍। राजदेव-       (मूड़ी डोलबैत..) हँ, से तँ होइते अछि‍। हमहीं छी जँ तू सभ नै देखबह तँ कतेक दि‍न जीब। सुनीता-       वएह माए-बाप अपन आचार-वि‍चार नि‍माहैत बेटा-बेटीकेँ दोसराक अंग (संगी) लगा अपन भार ढील कऽ लैत अपनाकेँ बेटा-बेटीक रीनसँ उरीन हुअए चाहैत। राजदेव-       एते धड़फड़ा कऽ कि‍अए उरीन हुअए चाहैत। जखन कि‍ दुनू अखन आश्रि‍ते अछि‍। सुनीता-       जइठाम जि‍नगी जीवैक ने साधन अछि‍ आ ने खोज-खबड़ि‍ लेनि‍हार तइठाम लोक अपनापर कते भरोस करत। कि‍यो सुखे (सुख रोग भेने) उपास कऽ देवमंदि‍रमे पूजा करए जाइए तँ कि‍यो दुखे (नइ रहने) साँझक-साँझ, दि‍नक-दि‍न उपास करैत भोलाबाबाकेँ नचारी सुनबैए। खाइर छोड़ू। अपन दुख-धंधा सोचू। राजदेव-       तेहू दुनू माए-धी जा कऽ देख अबि‍हह। सुनीता-       हकार अबैत तब ने जइतौं। बि‍नु हकारे.....। जँ पुछि‍ दि‍अए जे.....? (कृष्‍णानन्‍दक प्रवेश) कृष्‍णानन्‍द-     कक्का, नजरि‍ उतड़ल (सोगाएल) बुझि‍ पड़ैए। कि‍छु होइए कि‍? राजदेव-       बौआ कृष्‍ण, ककरा कहबै के सुनत। अपने दुनू गोटेक परि‍वार अछि‍, सात पुस्‍तसँ अपेछा अछि‍। मन रखैबला एकोटा बात नै भेल। तोरा देख कऽ खुशी होइए। मुदा.....। कृष्‍णानन्‍द-     नि‍राश जकाँ कि‍अए बजै छी कक्का? राजदेव-       तीर जकाँ पोतीक बात छेदने अछि‍। मन कलपि‍ रहल अछि‍ जे आब कि‍छु करै जोकर नै रहलौं आ जखन करैबला छलौं तखन....। कृष्‍णानन्‍द-     कि‍ तखन? राजदेव-       कि‍ कहबह। एक्के बेर कहि‍ दइ छि‍अ जे अपन गाछी भुताहि‍ भऽ गेल। कृष्‍णानन्‍द-     कनी खोलि‍ कऽ कहबै तखन ने बुझबै। चि‍क्कारी तँ कबि‍काठीक भाषा छि‍ऐ। भलहि‍ं उनटे कि‍अए ने बुझि‍ऐ। राजदेव-       भागेसर बेटाक ि‍वयाह केलक। एते दि‍न कनि‍याँ देखैक हकार अांगनमे अबैत छलनि‍। जाइत छलीह आ असीरवादो दैत छेलखि‍न। कि‍यो तँ अपना भाग-तकदीरे जन्‍म लइए। तइ सूत्रे सामाजि‍क संबंध तँ छल। मुदा अनका-अनका हकार देलक आ......। कृष्‍णानन्‍द-     कक्का, भागेसर भैया कोनो सुखे बेटाक वि‍याह केलनि‍। राजदेव-       (धड़फड़ा कऽ) तँ......? कृष्‍णान्‍नद-     कते माससँ भौजी ओछाइन पकड़ने छथि‍न। भानसो-भातमे दि‍कते होइ छन्‍हि‍। ई तँ ओही बेचाराकेँ धन्‍यवाद दि‍यनि‍ जे भौजीकेँ जि‍आ कऽ रखने छथि‍। हमरा अहाँ घरमे होइत तँ टाँग पकड़ि‍ फेक गंगा लाभ कऽ अबि‍तौं। राजदेव-       जखन समाजसँ टुटि‍ रहल छी तखन.....। (एकाएक चुप भऽ जाइत। आँखि‍ उठा कखनो सुनीतापर तँ कखनो कृष्‍णानन्‍दपर दैत। तहि‍ना कृष्‍णानन्‍दो कखनो राजदेवपर तँ कखनो सुनीतापर आ कखनो मेघ दि‍स ऊपर देखैत तँ कखनो नि‍च्‍चा दि‍स। तहि‍ना सुनीताे।) सुनीता-       बाबा, बाबा!! (आँखि‍ उठा राजदेव सुनीतापर दऽ पुन: नि‍च्‍चा धरती दि‍स देखए लगैत। दुनू हाथसँ आँखि‍ पोछैत, भड़ि‍आएल अवाजमे..) राजदेव-       बुच्‍ची सुनीता आ बौआ कृष्‍ण, दुखे कि‍ सुखे जते दि‍नक दाना-पानी लि‍खल अछि‍ से तँ भोगबे करब। मुदा.....। सुनीता-       मुदा कि‍? राजदेव-       आन कि‍यो कि‍अए मन राखत मुदा तूँ दुनू गोरे तँ लगक भेलह। तँए कि‍छु कहि‍ दइ छि‍अह। कृष्‍णानन्‍द-     बि‍तलेहे जि‍नगीक कथा ने इति‍हास छी। राजदेव-       हमरा जकाँ बाबाकेँ एते अज-गज नै रहनि‍। मुदा समाजमे एहेन प्रति‍ष्‍ठा बनल रहनि‍ जे जहि‍ना कोनो पाखरि‍ वा इनारक पानि‍ सटल रहैए, तहि‍ना रहनि‍। खेत-पथार, बाड़ी-झाड़ीसँ काज कऽ आबथि‍ आ लोटा लेने मैदान दि‍स वि‍दा होथि‍। जइठाम जेत्तै कि‍यो भेट जान्‍हि‍ तेत्तै गामक चर्च उठा बैस जाि‍थ। जना सौंसे गाम इस्‍कूले होइ। सुनीता-       की चर्च उठबथि‍हि‍न। राजदेव-       से कि‍ बुझल अछि‍। ताबे हमर उदइयो-पड़लए भेल रहए कि‍ नहि‍। सुनीता-       तखन कना बुझलि‍ऐ। राजदेव-       साँझू पहरकेँ दादी अंगनामे बि‍छान बि‍‍छा दइ छेलखि‍न आ बाबाक खि‍स्‍सा कहै छेलखि‍न। एक दि‍न पूछि‍ देलि‍यनि‍ जे बाबी बाबासँ झगड़ो करि‍यनि‍? सुनीता-       की कहलनि‍? राजदेव-       पहि‍ने तँ भभा कऽ हँसली। मुदा जहि‍ना तेल वा दूध हरा जाइ छै जेकरा आंगुर-तरहस्‍थीसँ हि‍लोरि‍-हि‍लोरि‍ बासनमे राखल जाइए। तहि‍ना दादि‍यो हँसीकेँ ि‍हलोरि‍-हि‍लोरि‍ राखि‍ बजलीह। सुनीता-       बजैकाल मन केहन रहनि‍? राजदेव-       जहि‍ना सूर्यास्‍तक समए सुर्जक कि‍रि‍ण (रश्‍मि‍) बोरि‍या-वि‍स्‍तर समेटि‍-समेटि‍ समटाइत तहि‍ना दादीक दुनि‍याँ पाछू छुटि‍ गेलनि‍। बजलीह- बुरहामे आदति‍ रहनि‍ जे साँझू पहरकेँ जे लोटा लऽ कऽ वि‍दा होथि‍ तँ कखन धुरि‍ कऽ अवि‍तथि‍ तेकर ठीक नै। सुनीता-       कतऽ चलि‍ जाइ छेलखि‍न? राजदेव-       कतऽ जाइ छेलखि‍न से दादि‍योकेँ नै ने कहथि‍न। सुनीता-       तँए ने झगड़ा होन्‍हि? कृष्‍णानन्‍द-     नै, दुनू कारण भऽ सकैए। सुनीता-       कि? कृष्‍णानन्‍द-     जँ चारि‍ घंटा बोनाएल रहलापर जते काज भेल ओते जँ परि‍वारोमे दोहराओल जाए तँ ओतेक समए आरो चाही। जँ ओते आरो समए लगाओल जाए तँ परि‍वारक काज आ व्‍यक्‍ति‍गत जीवन (खेनाइ-सुनताइ) प्रभावि‍त हएत। सुनीता-       तखन तँ समाजोक (काज) बातसँ परि‍वारक सदस्‍य हटल रहत? कृष्‍णानन्‍द-     एक अर्थमे हटल रहबो नीक, आ दोसरमे नहि‍यो। व्‍यक्‍ति‍ आ समाजक बीच परि‍वारक सीमा अछि‍। जहि‍ना लोकक समूह परि‍वार होइत तहि‍ना परि‍वारक समूह समाज होइत। सुनीता-       हँ, से तँ होइत, मुदा एक दोसरमे सटल केना रहत। आकि‍ नल-नीलक पाथर जकाँ भसि‍आइत रहत। कृष्‍णानन्‍द-     जँ भसि‍आइत रहत तँ अनेरे हवा-वि‍हाड़ि‍मे एक-दोसरसँ टकरा-टकरा, फुटि‍-फुटि‍ पानि‍मे डूबैत रहत। सुनीता-       तखन, कि‍ उपाय छै? कृष्‍णानन्‍द-     यएह तँ प्रकृतक अद्भुत खेल अछि‍। जेतइ दुखक जनम होइत अछि‍ ओतइ सुखोक होइत। सुख-दुख जौंआ सहोदर छी। सुनीता-       नीक जकाँ नै बुझि‍ पाबि‍ रहल छी। कृष्‍णानन्‍द-     जहि‍ना धरती अकासकेँ शीतल-गर्म हवा जोड़ि‍ कऽ रखने अछि‍‍ तहि‍ना मनुष्‍य-परि‍वार आ समाजक बीच अछि‍। समाप्‍त ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। रवि भूषण पाठक निरालाःदेह विदेह हिन्दी भाषा आ साहित्य क केन्द्रीयता स्वातंत्रयोत्तर भारतक एकटा महत्वपूर्ण सांस्कृतिक घटना ।एकर मूल कारण राजनीतिक आ वाणिज्यिक रहितहु परिणाम बहुआयामी अछि ।हिंदी साहित्यक आ विशेषतः कविता के सौंदर्यात्मक ,वैचारिक आ शैल्पिक वैविध्य सँ पूर्ण करबा मे कवि निराला क योगदान अप्रतिम ।ने केवल कविता बल्कि ईमानदारी मे सेहो निराला क व्यक्तित्व क चर्चा क सेहो कतिपय आयाम । आधुनिक साहित्यिक व्यक्तित्व मे निराला अग्रणी छथि ,जनिकर व्यक्तित्व आ कृतित्व क हरेक अंश सँ ईमानदारी,रचनात्मकता,आलोचना आ अफवाहक मार्ग प्रशस्त होइत अछि ।निराला काव्य क अनुवादक महत्व विभिन्न प्रसंग आ संदर्भ सँ अछि ।प्राचीन संस्कार आ आधुनिकता क आंदोलनमयी धारा कें आत्मसात करबाक जतेक सामर्थ्य निराला साहित्य मे अछि ,ओतेक अन्यत्र नइ ।दोसर बात ई जे निराला काव्य क माध्यम सँ हिन्दी साहित्य मैथिली आ बांग्ला सँ जुड़ैत अछि ।निराला पर विद्यापति आ रवीन्द्रनाथक प्रभाव अत्यंत स्पष्ट अछि ।हिंदी आलोचक निराला पर विद्यापतिक प्रभाव पर बहुत नइ लिखने छथि ,मुदा ई प्रभाव देखबा क हो तखन ‘वर दे वीणा वादिनी वर दे‘ क तुलना विद्यापति लिखित वसंत गीत ‘नव नव विकसित फूल ‘सँ करू ।

शब्दार्थचिंतामणिकार अनुवादक दू टा अर्थ लिखैत छथिन्ह ।प्रथम ‘प्राप्तस्य पुनःकथने ’आ दोसर ‘ज्ञातार्थस्य प्रतिपादने ‘ एकर अर्थ भेल पहिले कहल गेल कथन के फेर सँ कहनए आ ज्ञात अर्थ के प्रतिपादित केनए ।प्रसिद्ध भाषावैज्ञानिक रोमन याकोबसन एकरा ‘एक भाषा के शाब्दिक प्रतीक के अन्य भाषा के शाब्दिक प्रतीक के द्वारा व्याख्या‘ मानैत छथिन्ह ।नाइडा आ टेबर कनेक विस्तृत करैत कहैत छथिन्ह कि ई मूल भाषा क संदेशक समतूल्य संदेश के लक्ष्य भाषा मे प्रस्तुत करबा क क्रिया अछि जाहि मे संदेशक सममूल्यता पहिले अर्थ आ फेर शैली क दृष्टिकोण सँ निकटतम आ स्वाभाविक होइत अछि ।

भाषिक प्रक्रिया होएबा क कारणें अनुवाद क सम्बन्ध भाषेटा सँ नइ बल्कि भाषाविज्ञानो सँ अछि ।ध्वनि ,शब्द,रूप,वाक्य आदि विभिन्न स्तर मिलि के अर्थक संसार रचैत अछि ,ताहि दुआरे ऐ सब स्तर क प्रति सजगता अनिवार्य अछि ।प्रत्येक भाषाक अपन विशिष्ट ध्वनि ,शब्द भंडार आ रूप व्यवस्था होइत अछि ,ताहि दुआरे ऐ स्तर मे निहित अंतर के कारणें समान लागए वला प्रसंग सेहो वास्तविक अर्थ मे अर्थान्तर क संभावना सँ युक्त होइत अछि ।

ऐ ठाम ई तथ्य उल्लेखनीय अछि कि मैथिली आ खड़ीबोली हिन्दी कोनो दू ध्रुवीय भाषा नइ अछि ।दूनू दू टा प्रादेशिक अपभ्रंशक संतान आ ताहि दुआरे संस्कृत ,पालि आ प्राकृतिक विरासत पर समान रूप सँ अधिकारिणी अछि ।ध्वनि ,शब्द आ रूप क स्तर पर अनगिन साम्य अछि ।संस्कृत क रात्रि मैथिलीए टा मे नइ अवधी,ब्रजभाषा,भोजपुरी सहित कतेको उत्तर भारतीय भाषा मे ‘राति‘ अछि आ ‘दिन‘ त‘ सर्वत्र ‘दिन‘े अछि ।तहिना भोर आ दुपहर अपन विभिन्न ध्वनिभेद क संग विद्यमान अछि ।उदाहरण केवल एक या दू शब्दक नइ अछि ,सुधी पाठक ऐ उभयनिष्ठ आधारक जटिल उपस्थिति सँ परिचित छथि ।

ई उभयनिष्ठ आधार अनुवाद मे सुविधा लऽ के आबैत अछि,मुदा ऐ ठाम आलस्य आ अनुकरण क खतरा मौलिक अनुवाद के समक्ष चुनौती दैत अछि ।सबसँ बेशी शब्द तद्भव के आ ओहि पर सब भाषा क तेहनें अधिकार तखन ई नबका शब्द कत‘ सँ आनी ,देशज शब्दक प्रयोग प्रचलन आ स्वीकृति क आधारे पर स्वीकार्य होयत ।मिथिला क व्यापक भूभाग मे पजेबा सँ बेशी स्वीकृत शब्द ईंटा अछि तखन ककर व्यवहार करी आ ककर नइ करी ? वैज्ञानिक तथ्य वा गद्यात्मक सूचना क प्रस्थापन अभिधात्मक भाषा मे सुगमता मे संभव अछि ,मुदा भावप्रधान रचना मे अर्थ क अनेक स्तर आ कथनक बहुविधि व्यंजना होइछ,परिणामतः प्रत्यक्ष भाषिक प्रतिस्थापन संभव नइ, ताहि दुआरे अनुवादक के परकाय प्रवेश करऽ पड़ैत अछि ।अनुवादक मूल कृति आ रचनाकार क मनोजगत मे घुसि के भाव आ ओकर अर्थच्छाया के समझैत अछि तथा फेर ओइ भाव के यथासंभव लक्ष्यकृति मे अभिव्यक्त करैत अछि ।कलाकृति के एहन समझ आ फेर ओकर कलात्मक संप्रेषण क लेल सर्जनात्मक प्रज्ञा क विद्यमानता अनिवार्य अछि ।ई प्रज्ञा सर्वत्र एकरूप मे उपस्थित नइ अछि ,ई देखबा क अछि तखन उमर खय्याम क रूबाई क अनुवाद क्रमशः फिट्जराल्ड (अंग्रेजी) आ मैथिली शरण गुप्त, बच्चन जी ,केशव प्रसाद पाठक आ सुमित्रा नंदन पंत(सब हिंदी)क अनुवाद मे निहित भावभंगिमा आ गुणवत्ता क अंतर देखि सकैत छी ।गीतांजलि क अनुवाद मैथिली मे सुमन जी केने छथि आ हिंदी मे अज्ञेय आ अन्य कतेको विद्वान मुदा बांग्ला विद्वानजन सुमन जी द्वारा अनुदित ‘अनुगीतांजलि‘ के ह्रदय खोलि के प्रशंसा केने छथि ।

ऐ ठाम हम परकायप्रवेशक वांछित योग्यता क साथ उपस्थित नइ छी ।हम निराला काव्य मे निहित व्यंजना क महान शक्ति के स्वीकार करैत छी आ निराला काव्य मे ,ओकर शब्द आ शब्द योजना मे निहित उदात्त के मानैत छी ।ई उदात्त किछ किछ संस्कृतक तत्सम शब्द,सघन वर्णमैत्री,वर्णक ध्वन्यात्मकता मे निहित अछि ,ताहि दुआरे मैथिली पाठक के हम शब्द आ अर्थक अइ स्वर्गिक संसार सँ वंचित नइ करऽ चाहैत छी ।हम अपन अनुवादक सीमा के सहज स्वीकारैत छी

अनुवादक एकाधिक रूप मे प्रचलित अछि ।शब्दानुवाद(लिटरल) या मूलनिष्ठ अनुवाद सामान्यतः अभिधात्मक होइत अछि ,ऐ अनुवाद मे श्रोत भाषाक प्रत्येक शब्द आ अभिव्यक्ति क प्रतिस्थापन लक्ष्यकृति क शब्दावली,अभिव्यक्ति तथा संरचना मे होइछ । भावानुवाद मे मूल भाषा क अभिव्यक्ति क स्थान पर ओइ मे निहित आशय के स्पष्ट कएल जाइत अछि ।ई मूलकृति क ढ़ाँचा सँ स्वतंत्र होइत अछि,ताहि दुआरे लक्ष्यकृति क दृष्टि सँ ई बेशी सहज आ स्वाभाविक होइत अछि ।सुरेन्द्र झा सुमन द्वारा ‘गीतांजलि‘ क अनुवाद ‘अनुगीतांजलि‘ भावानुवादक श्रेष्ठ उदाहरण अछि । रूपांतरण कथा साहित्य क क्षेत्र मे लोकप्रिय अछि ।अइ मे अनुवादक मूलकृति क परिवेश ,चरित्र ,आदि के देश-कालानुसार परिवर्तित करैत अछि ।शेक्सपीयर रचित ‘द मर्चेंट ऑफ वेनिस‘ क हिंदी अनुवाद भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ‘दुर्लभ बन्धु‘ नाम सँ केलाह ।एइ मे एंटोनियो क नाम अनंत ,बसानियो क नाम वसंत आ शायलॉक क नाम शैलाक्ष अछि ।घटना वेनिस नगरक स्थान पर काशी(भारत) मे घटैत अछि ।

‘छायानुवाद‘रूपांतरणक एकटा प्रकार अछि ,अइ मे मूलकृति क आधार पर मूल कथ्य के संप्रेषित करबा क लेल स्वतंत्र कृति क निर्माण संपन्न होइत अछि ।अइ मे बिंब विधान ,प्रस्तुतिकरण आदि मूलकृति क प्रतिबिंब होइत अछि ।भगवती चरण वर्मा क उपन्यास चित्रलेखा अनातोले फ्रांस क उपन्यास ‘थाया‘ पर आधारित अछि ।विदेशी फिल्म आ साहित्य क अनधिकृत अनुवाद आ रूपांतरणक लेल अइ विधि क बहुत प्रयोग होइत अछि । ‘सारानुवाद‘ मे मूलकृति क सार लक्ष्य भाषा मे प्रस्तुत कयल जायत अछि ।संप्रेषण केंद्रित अनुवाद क्लासिकी रचना के बच्चा आ किशोर सब के पढ़बा क लेल रूपांतरण मे सहयोगी होइत अछि ।जेना महाभारत वा रामायण पर आधारित संक्षिप्त कथा । ‘टीकापरक अनुवाद‘ मे अनुवाद क साथ ओकर व्याख्या रहैत अछि ।गीताप्रेस क किताब मे एहन अनुवाद प्रचूर मात्रा मे उपलब्ध अछि ।किछु दिन पहिले विद्यापति पदावली क किछु पदक अनुवाद यात्री जी द्वारा कयल गेल दिल्ली विश्वविद्यालयक प्रोफेसर प्रभात रंजन जी क ब्लॉग पर उपलब्ध छल ।

अंत मे फेर काव्यानुवाद पर आबी ।कविता क अनुवाद नमहर चुनौती अइ दुआरे छैक कि कविता मात्र शब्दार्थ तक नइ सीमित छैक ।ई शब्द सँ आगू वाक्यगठन,लय,छंद,बिंब,प्रतीक,अलंकारयोजना,शैली आदि क मिल जुलल परिणामी काव्यात्मक पर्यावरण पर आधारित अछि ।ताहि दुआरे दाँते आ सर फिलीप सिडनी सन विद्वान काव्यानुवाद के असंभव मानैत छथिन्ह ।कविता क समग्र प्रभाव वा व्यंग्यार्थ ध्वनि ,लय ,बलाघात आ बिंब योजना के माध्यम सँ अभिव्यक्त होइत अछि ।ताहि दुआरे निराला क शब्द चयन ‘विजन-वन वल्लरी‘‘पुलिन पर प्रियतमा‘मैथिली मे यथावत अछि ।

कविता क दृश्य आ श्रव्य बिंब बहुधा शब्द क नादात्मकता सँ नियंत्रित होइत अछि ।एहिना शब्दालंकार आ अर्थालंकार क विकल्प लक्ष्यभाषा मे सृजित कएनए कठिन अछि ।काव्यानुवाद क सबसँ नमहर समस्या छंद आ लय अछि ।मूल रचना क लेल प्रभावी छंद आ लय के खोजनए अनुवादक लेल सबसँ पैघ समस्या अछि ।यदि कविता क अनुवाद गद्य मे आबैत अछि तखन अनुवाद मात्र शब्दार्थ तक सीमित रहत आ अइ मे कविता क पूरा अर्थ निकलि के बाहर नइ आयत ।अनुवाद सम्बन्धी अइ अवधारणा क लेल हम सर्वश्री/सुश्री रवीन्द्र नाथ श्रीवास्तव ,कृष्ण कुमार गोस्वामी ,कुसुम बांठिया ,गजेन्द्र ठाकुर ,रवीन्द्र कुमार दास जी क आभारी छी ।मैथिलीःदेह-विदेह क अइ पहिल किश्त मे निराला जी क दू टा लोकप्रिय कविता क अनुवाद प्रस्तुत क‘ रहल छी ।सहज सँ जटिल आ जटिल सँ जटिलतर दिश ‘‘क्रम क्रम सँ भेल पार राघवक पंचदिवस चक्र सँ चक्र चढ़ि गेेल भेल उर्ध्व निरलस ‘‘(रामक शक्ति पूजा)

जूनि बान्ह नाव ऐ ठाम बन्धु (बाँधो न नाव इस ठाँव,बन्धु!) जूनि बान्ह नाव ऐ ठाम बन्ध पूछतओ पूरा गाम बन्धु ई घाट छलए जइ पर हँसि के ओ रहए नहाबति रे! धसि के रहि जाइत छलए आँखि फसि के कांपैत रहए दूनू पैर बन्धु ! ओ हँसी बहुत किछु कहए छलए तैयो अपने मे रहए छलए सबके सुनैत सबके सहैत दैत ओ सबके दाँव बन्धु । हमरा सँ किनारा केने जा रहल छथि (किनारा वह हमसे किये जा रहे हैं ।) हमरा सँ किनारा केने जा रहल छथि दिखाबे टा दर्शन देेेने जा रहल छथि जुड़ल छल सुहागिन केर मोती क दाना ओएह सूत तोड़ने लेने जा रहल छथि छिपल चोट के बात पूछलउं त बजलीह निराशा क डोरी सीने जा रहल छथि ई दुनिया के चक्कर मे केहन अन्हर मरल जा रहल छथि जियल जा रहल छथि खुलल भेद एहि ठां ,जे विजयी कहायल। ओ खूं दोसरा के ,पीने जा रहल छथि । ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। डॉ रमानन्द झा "रमण" मिथिला भाषाक अध्ययन आ डॉ. ग्रिअर्सन कृत मैथिली व्याकरण मैथिलीमे साहित्य-सर्जनाक परम्परा सुदीर्घ एवं अविच्छिन्न अछि। एक भाषाक रूपमे मैथिलीक अध्ययनक इतिहास सुदीर्घ नहि अछि। सन् 1801 ई. मे एच.टी. कोलब्रृूक भाषाक रूपमे ‘मैथिली’ शब्दक पहिले पहिल प्रयोग कएलनि। संगहि, ओ इहो लिखल जे व्यापक क्षेत्रामे मैथिलीक प्रयोग नहि अछि। कोनो महान कवि नहि भेलाह अछि। एहिसँ बेसी लिखब अनावश्यक अछि। जॉन बिम्स2(1872 ई.) एवं हॉर्नल3े3 (1880 ई.) भाषाक लेल मैथिली शब्दक प्रयोग करैत, हिन्दीक एक भाषिकाक रूपमे मैथिलीक विवेचन कएलनि। सर जॉर्ज कैम्पबेल, सन् 1874 ई. मे भारतक विभिन्न भाषा कुलक नमूनाक संकलन करैत बिहारक भाषा (Dialects of Behar)समूहमे Vernacular of Patna, vernacular of Gya,vernacular of Champaran, vernacular of West Tirhoot, vernacular of East Tirhoot, vernacular of West Purnea (Hindee), तथा vernacular of East Purnea (Bengali) 4 राखल। संकलित प्रत्येक शब्द एवं मोहाबराक अङरेजी पर्याय देखि प्रतीत होइछ जे हुनक लक्ष्य भारतक भाषाक अध्ययन नहि छल। अपितु, स्थानीय भाषासँ अपरिचित अङरेज पदाधिकारी सभके ँ दैनिक जीवनमे सुविधाक हेतु विभिन्न क्षेत्राीय भाषाक शब्द आ’ मोहाबरासँ परिचय एवं अभ्यास कराएब छलनि। अतएव, कैम्पबेलक संकलनके ँभाषाक अध्ययन मानब उचित नहि होएत। बेसीसँ बेसी नमूना संकलन कहि सकैत छी। एस.एच. केलौग5 तिरहुतक भाषाक उल्लेख पूर्वी हिन्दीक एक बोलीक रूपमे प्रसंगात कएने छथि। ओ अपन व्याकरणमे मैथिलीक क्रियापद-रूपावली विस्तारपूर्वक देखऔने छथि। हॉर्नले ई अनुभव कएल जे पश्चिमी एवं पूर्वी हिन्दी एक नहि थिक, दूनूमे पर्याप्त अन्तर छकै । हानॅ र्ल े पर्वू ी हिन्दीक आठ टा भाषिका मानल जाहिम े सातम स्थानपर मैि थली6 अछि। हुनक स्पष्ट मत अछि जे पूर्वी हिन्दीक अपेक्षा मैथिलीमे अपन पड़ोसी बंगला एवं नेपालीसँ बेसी समानता छैक, भूतकालक निर्माणमे मैथिली विशेषतः बंगलाक अत्यन्त सन्निकट अछि।7 एहि प्रकारसँ कहि सकैत छी जे मैथिली भाषाक अध्ययन कएनिहार पहिल व्यक्ति जॉन बिम्स आ’ दोसर हॉर्नले भेलाह अछि। जॉर्ज अब्राहम ग्रिअर्सन एक स्वतन्त्रा भाषाक रूपमे मैथिलीक विस्तृत अध्ययन एवं स्थापना कएलनि। मैथिलीक व्याकरण लिखल। एहिमे हिनका जॉन बिम्सक क्रियारूपाली पर्याप्त सहायक भेल छनि।मैथिलीमे साहित्य-सर्जनाक परम्परा सुदीर्घ एवं अविच्छिन्न रहितहु तिरहुतक भाषा, मिथिला भाषा वा मैथिलीक अध्ययन नहि होएबाक की कारण छल होएत, ओहि पर दृष्टिपात करबासँ पूर्व किछु अन्य भाषाक भेल अध्ययनक स्थिति पर नजरि देब अपेक्षित अछि। ए. एच. सेसीक8 अनुसार आधुनिक भारतीय आर्यभाषाक व्याकरण 1872 ई., बंगला भाषाक व्याकरण 1862 ई, ओड़िआ भाषाक व्याकरण 1831 ई., सिन्धी भाषाक व्याकरण 1872 ई., पंजाबी भाषाक व्याकरण 1851 ई., गुजरातीक व्याकरण 1867 ई., मराठीक व्याकरण 1868 ई. तथा हिन्दुस्तानीक व्याकरण 1845 ई. मे लिखल गेल। विश्वम्भर विद्यासागर 1841 ई. मे ओड़ियामे ओड़ियाक पहिल व्याकरण प्रकाशित कएल। BANGLAPEDIA: Grammar9 9 क अनुसार बंगलाक पहिल व्याकरण पुर्तगीज मिशनरी द्वारा पुर्तगालीमे1734 एवं 1742क बीच लिखाएल तथा लिबसनसँ प्रकाशित भेल। बंगलामे पहिल व्याकरण कलकत्ता स्कूल सोसाइटीक सदस्य राधाकान्त देव लिखल जकर दोसर संस्करण 1821 ई. मे भेलैक। असमीक पहिल व्याकरण मिशनरी नाथ ब्राउन 1848 ई. मे प्रकाशित कएलनि। पछाति असमी भाषा पर हुनक विस्तृत पोथी आएल। असमी भाषी पर राजकाजक भाषाक रूपमे थोपल गेल बंगलाक स्थान पर असमीके ँ कामकाजक भाषा होएबामे मिशनरी नाथ ब्राउनक उक्त पोथी बहुत सहायक भेल छलैक। भाषाक लेल ‘नेपाली’ शब्दक प्रयोग पहिले पहिल आयटोन ; (Ayton) 1820 ई. मे कएलनि आ’ । A Grammar of the Nepali Language लिखल। एहि परिप्रेक्षमे मैथिलीक व्याकरण-लेखनक इतिहास पर दृष्टिपात कएल जाए। यद्यपि मैथिलीक सान्दर्भिक चर्चा किछु-किछु रूपसँ पहिनहिसँ होइत छल, किन्तु एक स्वतन्त्रा भाषाक रूपमे मैथिलीक पहिल व्याकरण ; (An Introduction To The Maithili Dialect Of The Bihari Language As Spoken In North Bihar) एक विदेशी विद्वान जॉर्ज अब्राहम ग्रिअर्सन 1881 ई. मे लिखलनि। हली झा द्वारा मैथिली व्याकरण लिखल जएबाक जे उल्लेख अम्बिकादत्त व्यास कएने छथि, तकर कोनहु पता नहि अछि। मैथिली व्याकरण सम्बन्धी छिट-फुट लेख ‘मिथिलामोद’क किछु आरम्भिक अंकमे भेटैत अछि। पण्डित जीवनाथ रायक लिखल ‘मैथिलीक स्वरूप ओ लेख शैली’ ‘मिथिला मिहिर’ मे प्रकाशित होइत छल10 जे पछाति अखिल भारतीय मैथिली साहित्य परिषद द्वारा पुस्तकाकार भेल। मैथिलीक पहिल व्याकरण टंकनाथ मैथिली व्याख्याता गंगापति सिंह ‘बाल व्याकरण’ लिखि 1922 ई. मे प्रकाशित कएल जकर दोसर संस्करण मैथिली साहित्य परिषद द्वारा 1937 ई. मे भेलैक। एकर बाद हीरालाल झा ‘हेम’ लिखित ‘मैथिली भाषा व्याकरण भास्कर’ लिखल जएबाक उल्लेख भेटैत अछि जकर प्रकाशन 1926 ई. मे श्रीरमेश्वर प्रेस, दरभंगासँ भेल। एहि इतिवृत्तिसँ स्पष्ट अछि जे भारोपीय आर्यभाषाक मागधी अपभ्रंशक प्राच्य समूहक एक प्रमुख भाषा मैथिलीमे साहित्य-सर्जनाक सुदीर्घ परम्पराक पर्याप्त साक्ष्य रहितहु सबसँ पछाति एकर व्याकरण लिखल गेल। तकर कारण की? भाषा प्रयोजन सिद्धिक माध्यम थिक। अतएव, भाषाक महत्त्व एहि बात पर निर्भर अछि जे ओ कतेक प्रक्षेत्रामे समाजक प्रयोजनक सिद्धिक माध्यम अछि। एकर परिमापनक दू टा आधार अछि - कार्यभार ; (Functional load) आ’ कार्य पारदर्शिता, ; (Functional Transparency) अर्थात् कार्यमे अपेक्षित स्पष्ट अभिव्यक्ति-क्षमता। भाषाक कार्यभार कम अछि वा अधिक, तकर निर्धारण एहि बातपर होइछ जे ओ कतेक प्रक्षेत्रामे कार्यशील अछि। उदाहरणार्थ अङरेजीके ँ देखि सकैत छी। ओ प्रायः सभ पैघ सार्वजनिक प्रक्षेत्रा जेना व्यापार, शिक्षा, राष्ट्रीय-अन्तरराष्ट्रीय संवाद, प्रौद्योगिकी, सरकार, कानून आदि मे पसरल अछि। अतएव, मिथिला भाषाक अध्ययन ध्1 मिथिला भाषाक अध्ययन- मिथिला भाषाक अध्ययन एवं डा. ग्रिअर्सनकृत मैथिली व्याकरण डा. रमानन्द झा ‘रमण’अङरेजीक कार्यभार बेसी मानल जाएत। कार्य पारदर्शिता एहि बात पर निर्भर अछि जे भाषाक खास प्रक्षेत्रामे ओकर स्वायत्तता आ’ नियन्त्राण छैक वा नहि। यदि एकभाषा दोसर भाषाक प्रयोगक आरि छंटैत अछि तँ ओहि भाषाक कार्यभार उच्च मानल जाइत छैक। दोसर शब्दमे, भाषा कार्यमे पारदर्शी बूझल जाइत अछि, यदि ओ अत्यधिक नीक जकाँ खास कार्य करैत अछि। जेना, संस्कृत भारतीय सस्ं कृि त एव ं हिन्दुत्वक व्याख्या करबाम े अत्यधिक पारदर्शी रूपे ँ कार्य करतै अछि। मुदा आधुनिकताक कार्यमे पारदर्शी नहि अछि। ओहिना मैथिलीक कतेको प्रक्षेत्रामे हिन्दी सन्हिआ गेल अछि, जाहिसँ मैथिलीक कार्यभार एवं पारदर्शिता - दूनू घटि गेलैक अछि। कमल जाइत अछि। कहि सकैत छी भाषा आ’ कार्यमे स्थिर साहचार्य छैक। पारदर्शिता घटल तँ कार्यभार कमल आ’ प्रक्षेत्राक संख्या बेसी, तँ कार्यभार उच्च। कार्यभार आ’ कार्यपारदर्शिताक दृष्टिसँ मैथिली पर विचार कएल जाए। ई अनेकहु अभिलेखसँ प्रमाणित अछि जे भारोपीय आर्यभाषाक मागधी अपभ्रंशक प्राच्य समूहक भाषामे अन्यतम स्थान प्राप्त मैथिलीमे साहित्य-सर्जनाक सुदीर्घ एवं अविच्छिन्न परम्परा छैक। सिम्रौनगढ़क कर्णाटवंशक सभ राजालोकनि मैथिली भाषाके ँप्रोत्साहन देलनि एवं ओहिठामक राजा रामसिंहदेवक समयक प्राप्त शिलालेखक आधार पर इतिहासज्ञ डा. हरिकान्त लाल दासक11 निष्कर्ष अछि जे कर्णाट शासन कालमे राजकाजक भाषा मैथिली छल। प्रो. दासक इहो निष्कर्ष अछि जे मोरंग, मकवानपुर, विजयपुर, पाल्पा आदि राजालोकनिक समयक अभिलेख, स्याहा मोहर, जमीनक हस्तान्तरण सम्बर्न्धी अिभलेखसँ सेन राजालोकनिक राजकाजक भाषा मैथिली होएब प्रमाणित हाइे छ।12 एहि एेि तहासिक तथ्यस ँ निष्पन्न हाइे छ ज े मैि थलीक पय्र ागे विभिन्न पक्ष््र ात्रे ाम े हाइे त छल। साहित्य-सर्जना, दैनिक व्यावहारिक जीवन एवं राजकाजक भाषा रहने मैथिली उच्च कार्यभारक भाषा छल। किन्तु, नेपालमे राणाशाही स्थापित भेलाक बादसँ मैथिलीक प्रक्षेत्रा क्रमशः घटैत गेल। मिथिलामे तुर्क, अफगानक आक्रमण एवं आधिपत्यक बाद जखन मुगल बादशाहसँ खंडबला कुलके ँ मिथिलाक राज प्राप्त भेलनि तँ जैतुकमे अरबी, फारसी एवं उर्दू सेहो अएलैक। संगहि, लोकनि×ाा सभ सेहो मैथिली भाषीक्षेत्रामे बसय लागल। एहिसँ मैथिलीक प्रक्षेत्रापर संघातिक आघात भेलैक। मैथिलीक प्रयोगक प्रक्षेत्रा घोंकचए लागल। मैथिली भाषीक घनत्व तरल होइत गेल। कोलब्रूकक अभिमतसँ स्पष्टे अछि जे साहित्य-सर्जनाक क्षेत्रामे सक्रियता ठमकल छल। परिणामतः मैथिलीक प्रक्षेत्रा दैनिक जीवन आ’ मनोरंजक साहित्यक सर्जना धरि सीमित रहल। अतएव, जखन ईस्ट इन्डिया कम्पनीक हाथमे तिरहुतक शासन-सूत्रा अएलैक, तँ कम्पनी सरकारक लेल मैथिली कोनो समस्या नहि बनल। तखन समाधानक चिन्ता ओ किएक करैत? जेना आन कतेको भारतीय भाषाक पढ़ौनीक व्यवस्था अपन कर्मचारी-अधिकारी वा सेना-सिपाही लेल ओ कएलक, से मैथिलीक लेल किएक करैत? लार्ड मेकाले (1835 ई.) प्रायः एहनहि स्थितिमे रिपोर्ट कएने छल होएताह जे जाहि भाषासँ (अरबी, फारसी एवं संस्कृतक सन्दर्भमे लिखल) ने हमर प्रशासनके ँकोनो लाभ छैक आ’ ने ओहि भाषाके ँ केओ बिना सरकारी पाइक पढ़ेबाक लेल तैआर छथि, ताहि भाषापर किएक खर्च कएल जाए?13 भारतक प्रथम स्वाधीनता संग्रामक असफलताक उपरान्त 1857 ई. मे भारतक शासन-सूत्र ईस्ट इंडिया कम्पनीक हाथसँ ब्रिटिश साम्राज्ञीक हाथमे आएल तँ ओ अपन उपनिवेशक लोक सभसँ सामीप्य स्थापित करबाक हेतु क्षेत्रा विशेषक भाषाक अध्ययन एवं विकासक प्रसंग नीतिगत निर्णय कएलनि। भारत सहित ब्रिटिशक विभिन्न उपनिवेशक भाषाक शिक्षणक व्यवस्था भेल। व्याकरण लिखाएल। शब्द एवं लोक-साहित्यक संग्रह आरम्भ भेल। अध्ययन तथा प्रकाशन होअए लागल तथा अधिकारी सभके ँ स्थानीय भाषामे प्रवीणता प्राप्त करबाक हेतु ओहिना प्रोत्साहित कएल गेलनि14, जेना भारत सरकार सम्प्रति अपन कर्मचारी-अधिकारीके ँ हिन्दीक कार्यसाधक ज्ञान अर्जित करेबाक लेल प्रोत्साहित करैत अछि। जाहि भाषाक कार्यभार बेसी छलैक, ओहि भाषामे काज पहिने आरम्भ भेल। मैथिलीक कार्यभार अल्पतम छल। ध्यान पछाति गेलैक। जॉर्ज अब्राहम ग्रिअर्सन मैथिलीके ँ भारोपीय आर्यभाषाक मागधी अपभ्रंशक प्राच्य समूहक एक भाषा मानैत छथि। हिनक प्राच्य समूहमे 1. ओड़िआ, 2. बिहारी (मैथिली, मगही एवं भोजपुरी), 3. बंगला, आ’ 4. असमिआ अछि। हॉर्नले उपयुक्त नामकरणक अभावमे संस्कृतसँ सवं द्ध भाषाक े सँ ुविधाक हते ु गाैि डअन 15 कहलनि। सम्भव थिक हानॅ र्ल के मागर्क अनुसरण करतै उपयुक्त नामकरणक अभावमे ग्रिअर्सन सेहो बिहारक भाषा मैथिली, मगही एवं भोजपुरीक लेल ‘बिहारी’ नामकरण कए देने होथि। ओना ओहिसँ पहिने राममोहन राय बंगलामे बंगलाक पूर्ण व्याकरण ‘गौड़ीय व्याकरण’ 1833 ई.मे लिखने छलाह। ग्रिअर्सनक ई वर्गीकरण, विशेषतः बिहारक भाषा मैथिली, मगही एवं भोजपुरीक लेल ‘बिहारी’ नामकरण, पर्याप्त विवादक कारण भेल अछि। ओना साम्प्रतिक राजनीतिक परिदृश्यमे जँ एकर विवेचन करी तँ कहि सकैत छी जे ‘बिहारी अस्मिता’क पहिल उद्भावक जॉर्ज अब्राहम ग्रिअर्सन भेलाह। मैथिलीक औपभाषिक विभाजन सेहो विवादक कारण भेल अछि। जार्ज ग्रिअर्सन र्मैिथलीक औपभाषिक विभाजन छओ भागमे कएने छथि -1. मानक मैथिली, 2. दक्षिणी मानक मैथिली, 3. पूर्बी मैथिली वा गॅंवारी, 4. छिकाछिकी बोली, 5. पश्चिमी मैथिली एवं 6. जोलहा बोली। पण्डित गोविन्द झा16 वर्गीकरणक तीन आधार मानल अछि- 1. क्षेत्रा, 2. सामाजिक वा शैक्षणिक स्तर तथा 3. जाति। क्षेत्राक अनुसार ओ 1. पूर्वी( नव क्षेत्राीय नामकरण अंगिका, ग्रिअर्सन - छिकाछिकी एवं गँवारी), 2. दक्षिणी, पश्चिर्मी (नव क्षेत्राीय नामकरण बज्जिका, ग्रिअर्सन - पश्चिमी मैथिली), 4. उत्तरी वा नेपाल तथा 5. केन्द्रीय। एहि विभाजनक आधार अछि मैथिलीक भाषायिक चौहद्दी। पूर्बमे बंगला, पश्चिममे भोजपुरी, दक्षिणमे मगही आ’ उत्तरमे नेपाली। अभिसरण ; (Convergence) सिद्धान्तक अनुसार सम्पर्कसँ भाषा प्रभावित होइत छैक। एहि हेतु केन्द्रीय मैथिलीके ँछोड़ि चारू कातक मैथिली अपन समीपस्थ भाषा सभसँ प्रभावित भेल आ’ जे अप्रभावित रहल मानक मैथिली कहल गेल अछि। भाषा वैज्ञानिक तथ्यक आधार पर एहि तथ्यके ँ फरिछबैत डा. रामावतार यादव17 बिहारमे मधुबनी तथा नेपालमे राजबिराजमे बाजल जाइत मैथिलीके ँमानक मैथिली कहल अछि। सामाजिक स्तरक अनुसार सभ क्षेत्रामे मैथिलीक दू स्वरूप गोविन्द झा मानैत छथि - शिक्षित एवं सुसंस्कृत उच्चवर्गक आ’ दोसर समाजक अशिक्षित एवं निम्नस्तरक लोकक भाषिका। शिक्षित वर्गक अभिरुचि मैथिलीक मानक स्वरूपक दिशि होइत छनि एवं परिष्कृत भाषा बजबामे ओ गौरवक अनुभव करैत छथि। अशिक्षित वा नीचला स्तरक लोकक भाषिकामे स्थानीय एवं जातीय विशेषता विशेष सुरक्षित रहैत अछि। जातिक अनुसार मैथिलीक तीन स्वरूप पण्डित मिथिला भाषाक अध्ययन ध्3 मिथिला भाषाक अध्ययन 4गोविन्द झा मानल अछि - 1. विद्याजीवीक भाषिका, 2. कृषिजीवी जातिक भाषिका तथा 3. व्यवसाय जीवीक भाषिका। कोन परिस्थितिमे विभिन्न भाषा-भाषी एवं सांस्कृतिक समुदायक लोकक स्थायी निवास मिथिला बनैत गेल तकर चर्च ऊपर कएलहुँ अछि। मिथिलाक प्रशासनिक क्षेत्रामे ओहि वर्गक वर्चस्व, सेहो घटैत-बढ़ैत रहल। भारतक कतेको प्रान्तमे भाषाक प्रयोगजन्य जे समरूपता देखैत छी एवं प्रयोगजन्य समरूपताक कारणे ँभाषाक नामपर जे एकजुटता अनुभव होइत अछि, तकर घोर अभाव मिथिलामे उक्त कारण सभसँ छल एवं अद्यावधि अछि। एहन कोनो केन्द्रीय राजनीतिक शक्ति वा सामाजिक संगठन नहि छलैक जे मैथिलीक प्रचार-प्रसार वा मैथिलीक पठन-पाठनक मार्गमे अबैत अवरोधक तत्त्वक निराकरण कए, सर्वव्यापी प्रभावकारी निर्णय लए सकैत छल। मैथिलीक औपभाषिक विभाजन सर्वग्राह्य तँ नहिएं भेलैक, अपितु किछु अंश धरि दूरत्वक ओ कारण सेहो भए गेल। एहि दूरत्वके ँबढ़ेबामे बिहार विभाजनक अगुआ एवं पटना विश्वविद्यालयक पूर्व उपकुलपति डा. सच्चिदानन्द सिंहा सन लोकक मैथिली भाषा-संस्कृति विरोधी मानसिकता सहायक भेलैक। पटना विश्वविद्यालयक पाठ्यक्रममे मैथिलीक स्वीकृतिक प्रस्तावक समय ओ बाबू भोलालाल दासके ँकहने छलथिन्ह -‘बंगालसँ बिहारके ँअलग कएल हम अपना सभक निमित्त, अहाँलोकनिक लेल नहि। मैथिलीके ँस्वीकृत कएने मिथिला जीबि उठत। मिथिला जीबि उठत तँ हमरालोकनिके ँयू. पी. चल जाए पड़त। ते ँजावत हम जीअब मैथिलीके ँस्वीकृत नहि होअए देब।’18 जखन मैथिलीक अध्ययन-अध्यापने नहि, तखन व्याकरण कोना लिखाइत? प्रयोजनक दृष्टिसँ व्याकरणक दू कोटि अछि19 - पारम्परिक एवं शिक्षा शास्त्राीय व्याकरण; (Traditional and Pedagogical Grammar)A। पारम्परिक व्याकरणक आधार साहित्य होइत अछि। ओ पोथी तथा अन्य उपलब्ध साहित्यक आधार पर भाषाक संरचनात्मक परिचय करबैत अछि। ओ इहो सुझबैत अछि जे कोना लिखी आ’ कोना नहि लिखी। कोना बाजी आ’ कोना नहि बाजी। तदनुसार, ई अनुशासनात्मक व्याकरण ; (Prescriptive) सेहो कहबैत अछि। पारम्परिक व्याकरण वर्तमान एवं भविष्य - दूनूक लेल मार्ग-दर्शक होइत अछि। एकर विपरीत, शिक्षा शास्त्राीय व्याकरण मानक भाषिका एवं लिखित समकालीन भाषाक संरचनात्मक स्वरूपक परिचय करबैत अछि। मानक भाषा लिखब आ’ बाजबमे व्याकरणक कोन नियमक कखन प्रयोजन होइत छैक आ’ तकर अनुसरण कोना कएल जाए, शिक्षा शास्त्राीय व्याकरण सीखबैत अछि। कहि सकैत छी जे भाषा विशेषक लोकक बीच उक्त समूहक भाषा कोना बाजल जाए, जाहिसँ वक्ताक अभिप्रायक सम्प्रेषण वाधित नहि रहए, वक्ता की कहैत छथि, से उक्त भाषा समूहक लोक बूझि जाथि। एकरा सम्वाद-भाषा सेहो कहि सकैत छी। पारम्परिक व्याकरणक नियम बेसी कठोर होइत अछि किन्तु शिक्षा शास्त्राीय व्याकरण वा सम्वाद-भाषाक व्याकरणमे तारता होइत छैक। ओ भाषाक विभिन्न स्वरूपक प्रयोग सफल सम्वाद-स्थापन लेल करैत अछि। ठाम-ठाम जँ व्याकरणिक नियम भंगो होइत रहैछ तँ ओहि पर ध्यान नहि दैत अछि। भाषाक परिचयमे शिक्षा शास्त्राीय व्याकरण पाँच स्तर पर सहायक होइत अछि - 1. शब्द स्तर ; ( Vocabulary level) - एहि स्तरपर व्याकरण शिक्षार्थीके ँ शब्द एवं ओकर विभिन्न स्वरूपक परिचय करबैत अछि। ओकर प्रयोगके ँ तेना विश्लेषित करैछ जाहिसँ शिक्षार्थी पुरुष-वचन-लिंग प्रणालीसँ परिचित भए जाथि। 2. रूपात्मक स्तर ; ( Morphological level) - एहि स्तरपर व्याकरण शब्द निर्माण,एकवचनसँ बहुवचन, समास, रूपावली, विभक्ति आदिसँ परिचय करबैत अछि। कारक तथा ओकर प्रयोग कोना कएल जाए, से सिखबैत अछि। 3. रूपस्वनिमिकी स्तर; Morphophonemic level)  - एहि स्तरपर व्याकरण सन्धि तथा व्याकरणक कारणे ँ होइत स्वन-परिवर्तनसँ परिचय करबैत अछि। 4. वाक्य स्तरपर ; ( Syntactic level) - एहि स्तरपर व्याकरण वाक्य-निर्माण कोना कएल जाए, से सिखबैत अछि। शिक्षार्थी जँ अन्य भाषा-भाषी रहैत छथि तँ हुनक भाषाक वाक्यसँ तुलना करैत विश्लेषण एहि प्रकारे ँकएल जाइछ जाहिसँ काल, वचन, संयुक्त वाक्य, वाक्य-बन्ध, वाक्य परिवर्तन, समास आदिक परिचय हुनका नीक जकाँ भए जाइन। 5. डिसकोर्स स्तरपर ;( Discourse level)  - भाषामे विचार कोना उतरैत अछि तथा विभिन्न वाक्य कोना सम्वद्ध भए जाइत अछि, से एहि स्तरक व्याकरण सिखबैत अछि। ग्रिअर्सनक प्रस्तुत मैथिली व्याकरणके ँजखन पारम्परिक एवं शिक्षा शास्त्राीय व्याकरणक दृष्टिसँ देखैत छी तँ दूनू व्याकरणक अधिकांश विशेषताक लाभ अध्येताके ँ एकहिठाम भेटल सन लगैत अछि। अङरेज विद्वान तँ उचिते, पाश्चात्य शिक्षा-प्रणालीमे शिक्षित अधिकांश मैथिल विद्वान सेहो,जेना, डा. सुभद्र झा, डा. रामावतार यादव, डा. उदयनारायण सिंह ‘नचिकेता’, डा. योगेन्द्र प्रसाद यादव, डा. सुनील कुमार झा, डा. बालकृष्ण झा प्रभृति, मैथिलीक भाषाशास्त्राीय अध्ययन अङरेजी माध्यमे ँकएलनि अछि। एहिसँ मिथिला भाषाक विशेषताक व्यापक प्रचार-प्रसार अन्तरराष्ट्रीय स्तरपर भेलैक अछि। हिनकालोकनिक विद्वता एवं परिश्रमसँ विद्वत् समाजमे मैथिलीक स्वीकार्यता बढ़ल एवं मिथिला भाषाक विशेषज्ञक रूपमे ई लोकनि प्रख्यात भेलाह अछि। ई सभक लेल गौरवक बात थिक। आह्लादकारी अछि। किन्तु भाषा विज्ञानक क्षेत्रामे नित प्रति होइत नव-नव सिद्धान्तक स्थापना तथा तदनुसार मिथिला भाषाक अध्ययन-विवेचनसँ मैथिलीक लोक वा मैथिलीक माध्यमे ँ अध्ययन-अध्यापन कएनिहार- वा करओनिहार मैथिलीक शिक्षार्थी, जे लाभक वास्तविक अधिकारी छथि एवं डेग-डेग पर प्रयोजन होइत छनि, लाभान्वित होएबासँ वंचित छथि। अतएव, मैथिली व्याकरण वा मैथिलीक भाषावैज्ञानिक अध्ययन सम्बन्धी सामग्री वा आकर ग्रन्थक मैथिलीमे अनुपलब्धिक स्थिति अवश्य आह्लादक नहि अछि। मैथिली लिखबामे सम्प्रति अनेकहु स्तर पर अस्तव्यस्तता अछि। ओ पसरि रहल अछि। एहि अस्तव्यस्तताक प्रमुख कारण पण्डित गोविन्द झा20 आजुक परम्परा भंजनी प्रवृत्तिके ँमानल अछि। ई परम्परा भंजनी प्रवृत्ति भाषाहुक क्षेत्रामे प्रवेश कए गेल अछि। दीर्घकालीन परिमार्जन, मिथिला भाषाक अध्ययन ध्5 मिथिला भाषाक अध्ययन ध्6परिष्करण ओ परिपोषणसँ जे स्तरीयता आएल छलैक तकरा ई स्वेच्छाचारी प्रवृत्ति अस्तव्यस्त करबामे मस्त अछि। भारतक संविधानक आठम अनुसूचीमे मैथिलीके ँसम्मिलित कएल गेलाक बाद मैथिलीक प्रक्षेत्रामे व्याप्ति आएल अछि। भारत सरकार भिन्न भाषा-भाषीके ँ मैथिली पढ़बा रहल अछि। मैथिली भाषा साहित्यक प्रचार-प्रसार लेल अनेक प्रकारे ँ प्रोत्साहित कए रहल अछि तथा मैथिली केवल ‘बुच्ची दाइ’ लोकनिक भाषा नहि रहि, ज्ञान-विज्ञानक भाषा बनए, ताहि लेल प्रयासरत अछि। दोसर दिशि मैथिलीक माध्यमे ँप्राथमिक एवं माध्यमिक शिक्षाक अभाव तथा मैथिलीक भाषाक जे भूगोल छैक, ओहिसँ मैथिली भाषा-भाषीक पलायन एवं सम्पर्क क्रमशः कमल जएबाक कारणे ँमैथिलीक दृष्टिसँ अशिक्षित मैथिलक संख्या निरन्तर बढ़ल जाइत अछि। मैथिलीक पारदर्शिताक क्षेत्राक आरिके ँ छपटबामे ई स्थिति सहायक अछि। एहना स्थितिमे व्याकरणक, जे भाषाक अस्तव्यस्तताके ँसरिअएबैत भाषामे अनुशासन अनैत अछि, प्रयोजन बेसी होइत छैक। भाषा-शिक्षण लेल सेहो व्याकरणक महत्त्व सर्वोपरि अछि। अङरेजीअहुमे आब दुर्लभ एवं सामान्यजनक लेल अबोधगम्य जॉर्ज अब्राहम ग्रिअर्सनकृत मैथिली व्याकरणक पण्डित गोविन्द झा द्वारा भेल मैथिली अनुवाद एवं प्रकाशनसँ बेसी लाभक सम्भावना अछि। एहिसँ मिथिला भाषाक अध्ययनक क्षेत्रामे ग्रिअर्सनक की अवदान छनि, तकरहु मूल्यांकन भाषा अनुरागी सुधीसमाज कए सकताह। सन्दर्भ - 1. H.T.Colebrooke - On the Sansktit and Prakrit Languages- Asiatic Researches,1801, Misc. Essays, P.No.225 - Mait'híla, or Tirhútia, is the language used in Mit'hílà, that is, in the Sircár of Tirhút, and in some adjoining districts, limited however by the river Cusí(Causící,) and Gandhac( Gandhací,) and by the mountains of Népál; it has great affinity with Bengálí; and the character in which it is written differs little from that which is employed throughout Bengal. In Tirhút, too, the learned write Sanscrít in the Tirhutíya character and pronounce it after their own inelegant manner. As the dialect of Mit'hilà has no existensive use, and does not appear to have been at any time cultivated by elegant poets, it is unnecessary to notice it further in this place. 2. Beames -A Comparative Grammar of the Modern Aryan Languages of India, 1872. - Introduction, page No. 96 - " Crossing the Kusi river, and going westwards, we come into the region of Maithila, the modern Tirhut, where the Language is Hindi in type, though in many of its phonetic details it leans towards Bengali." 3. A. F. Rudolf Hoernle- A Grammar of the Eastern Hindi Compared with the other Gaudian Languages,1880, Introduction page V. 4. Sir George Campbell - Languages of India, including those of the Aboriginal Tribes of Bengal,1874, Page No.60. 5. Rev. S.H.Kellogg, A Grammar of the Hindi Language, para 450, page No. 230,1876.- In the dialects of Bhojpur and Tirhut we have a still wider divergence; from High Hindi type conjugation and a close approximation, in the y of the perfect and, in Tirhut in the substantive verb Nh to the Bengali system. 6. A. F. Rudolf Hoernle, A Grammar of the Eastern Hindi Compared with the other Gaudian Languages,1880, page.V. - Seventhly, the Maithili or the dialect of the district of Tirhút, spoken about Muzaffarpur and Darbhanga. It is called so after the ancient city of Mithila, the capital of Videh or modern Tirhút((Tírabhukti). 7. A. F. Rudolf Hoernle, A Grammar of the Eastern Hindi Compared with the other Gaudian Languages,1880, Page No..VI.- the Maithili especially exhibits unmistakable similiarities to the neighbouring Bengali and Nepali. Indeed, I am doubtful, whether it is not more correct to class the Maithili as a Bengali dialect rather than as a E.H one. Thus in the formation of past tense, Maithili agrees very closely with Bengali, while it differ widely from E.H. 8.. A.H. Sayce, Introduction to the Science of Language, 4th Ed. 1900, page No. 39. - (I). Beames - A Comparative Grammar of the Modern Aryan ... ... Languages of India, 1872, (II). Forbes - A Grammar of the Bengali Language, 1862, (III). Sutton - An Introductory Grammar of the Oriya Language,1831, (IV.) Trumpp- Grammar of the Sindhi Language,1872, (V) Lodiana A Grammar of the Panjabi Language, 1851,( VI)), Yates- Introduction to the Hindustani Language, 1845, (VII) , Shapunji Edalji- A Grammar of the Gujarati Lanugage, 1867, (VIII). do - The Student's Manual of Marathi Grammar, 1868. 9. BANGLAPEDIA: Grammar - first Bangla grammar, Vocabolario em idioma Bengalla, e Portuguez dividido emduas partes, written by Manoel da Assumpcam, a Portuguese missionary, in Portuguese. Assumpcam wrote this grammar between 1734 and 1742 while he was serving in Bhawal.One of the members of the calcutta school society was Radhakanta Deb who believed that without the knowledge of Sanskrit it was not possible to read, write or speak Bangla correctly. His Bangala Shiksagrantha (second edition, 1821) was essentially tied to Sanskrit grammar. Radhakanta was the first Bengali to write a Bangla grammar in Bangla.The first full-fledged Bangla grammar by a Bengali was Gaudiya Vyakaran (1833) by Rammohun Roy who wrote it in 1830 at the request of the School Society. 10ण् जीवनाथ राय, मैि थलीक स्वरूप आ े लख्े ा शलै ी, मिथिला मिहिर, 11 दिसम्बर 191र्5 इ. 11. डा. हरिकान्त लाल दास - नेपालमे मैथिली भाषा प्रति सेन राजालोकनिक दृष्टिकोण - सयपत्राी, राजकीय प्रज्ञा प्रतिष्ठान, काठमांडू, वर्ष 4, 2055 साल - मैथिली विशेषांक, पृ.सं. 69 - सिम्रौनगढ़क कर्णाटवंशक सभ राजालोकनि मैथिली भाषाके ँप्रोत्साहन देलनि। तकर प्रमाण ओतए एक खण्डहरसँ प्राप्त किछु खण्डित शिलालेख अछि। खण्डहर निरीक्षणक क्रममे एकटा शिक्षकके ँ राजा रामसिंहदेवक समयक Slab inscription  भेटलनि जकर लिपि मैथिली अछि। गत वर्ष त्रिभुवन विश्वविद्यालयक इतिहास विषयक एकटा सेमिनार सिम्रौनगढ़मे भेल छल। ओतए इतिहास विषयक प्राध्यापक डा.तुलसी रामबैद्यक नेतृत्वमे अनुसन्ध्ाान टोलीके ँ एकटा खण्डित शिलालेख प्राप्त भेलनि जकर भाषा सेहो मैथिली अछि। एहि तरहे ँ अनुमान लगाएल जाइत अछि जे कर्णाट शासनकालमे मैथिली राजकाजक भाषा छल।’ 12. डा. हरिकान्तलाल दास - ओएह, पृ.सं. 70 - कर्णाटकालमे मैथिली भाषाके ँ जे स्थान प्राप्त छलैक ताहिसँ कम महत्त्वपूर्ण सेन राजालोकनिक नहि छलैक। मोरङसँ मकवानपुर तक अभिलेखकक भाषा होएबाक अनेको कारण प्रमाण भेटैत अछि। एहि सम्बन्धमे पुरातत्त्वविद् जनकलाल शर्मा लिखैत छथि जे पूरबमे विजयपुर आ’ पश्चिममे पाल्पाक सेन राजालोकनिक स्याहा मोहर आ’ ताम्रपत्रा मैथिली भाषामे भेटब कोनो आश्चर्यक गप्प नहि थिक। मोरङ पदावलीसँ ज्ञात होइत अछि जे मैथिली भाषाक साहित्यकार सभके ँ मकवानपुर दरबारक अतिरिक्त विजयपुर आ’ पाल्पा दरबारमे सेहो निर्वाह होइत छलनि। विजयपुर राज्यक बोलचालक भाषा मैथिली छल। ते ँराजकाजक भाषा मैथिली बनाओल गेल होएत। दन्तकाली मन्दिरक पुजारीेके ँ विजयपुरक सेन राजा द्वारा देल गेल आदेश पत्राक भाषा प्रमाणित... ... करैत अछि जे ताहि समयमे मैथिली राजकाजक भाषा छल। पण्डित तुलारामके ँकोशी क्षेत्राक जमीन जागीरस्वरूपमे देल गेल छलनि, तकर भाषा सेहो मैथिली अछि। नेपालक एकटा इतिहासकार प्रेमबहादुर लिम्बूक कथन अछि जे सेनराजा लोहाग सेन किरात प्रदेश पर विजय कएलाक बाद ओहि क्षेत्रामे किराताक्षरक स्थानमे मिथिलाक्षरके ँ प्रचारित करौलनि। फलस्वरूप, किरात संस्कृतिमे मिथिलाक संस्कृतिक प्रभाव बहुत दिन धरि रहल। एहि सभ बातक अध्ययन कएलाक बाद कहल जा सकैछ, सेनराजा सभ द्वारा मैथिली भाषाके ँ नीक संरक्षण भेटलैक। ओलोकनि अपन काम कारबाइ तक मैथिली भाषामे कएलनि। ई बहुत महत्त्वपूर्ण बात छल।’ 13. Qouted in Languages in India,p.n.71, Mysore,Vol. 2: 8 Nov., 2002 14. Minute by the Hon'ble Sir C.E.Travelyan K.C.B., on the tests to be passed in the Native Language by the Junior Civil Servants/ Military Officers in the Nothern India. Calcutta the 25th July, 1864. - Quoted - Languages in India, page No.95, Mysore,Vol. 2: 8 Nov., 2002 - 'If we wish to encourage our officers to become good practical lingiusts, we ought to make it as easy as possible to them, and to give them the same facilities as we have at home in learning French, Italian, or any other language in which there are many dialects but only on standard.' 15. A. F. Rudolf Hoernle, A Grammar of the Eastern Hindi Compared with the others Gaudian Languages,1880, Introduction - I have adopted the term Gaudian to designate collectively all North-Indian vernaculars of Sanskrit affinity, for want of a word; not as 16. गोविन्द झा - मैथिली भाषा का विकास, 1974, पृ.सं. 50 17. Dr. Ramawatar Yadav- Maithili Lingiustic Research : State-of-the-Art -Contributions to Nepalese Studies, Vol. 27, No.1 - The standard of spoken Maithili is tacitly identified with the speech of the towns of Madhubani in Bihar and Rajbiraj in Nepal. 18. किरण समग्र, 2007, पृ. सं.266। 19. Kasturi Viswanatham - New Horizons in Language and Linguistics, page No.312, CIIL, Mysore 20. गोविन्द झा, घर बाहर, जनवरी-मार्च, 2005 - ‘आजुक परम्परा भंजनी प्रवृत्ति बड़ आयासे ँबान्हल ओहि पुरान घरके ँमानू धाराशायी करबा पर लागल अछि। की समाज, की संस्कृति, की भाषा सर्वत्रा दीर्घकालीन परिमार्जन, परिष्करण ओ परिपोषणसँ जे स्तरीयता प्राप्त भेल छल, आइ तकर भारी अवमूल्यन भए गेल अछि आ’ स्वेच्छाचार बढ़ैत गेल अछि। पण्डितक लेखनीसँ बहराएल भाषा निकृष्ट मानल जाइत अछि, निरक्षरक मुहसँ बहराएल भाषा श्रेष्ठ। एहि वैचारिक क्रान्तिक प्रभावमे पड़ि मैथिलीक बहुतो नबतुरिया लेखक ई मानि बैसलाह अछि जे सर्वसाधारणक मुहसँ जेना सुनैत छी तहिना लिखब शुद्ध थिक। एहि धारणाक कारणे ँ मैथिलीक वर्तनीमे जे किछु एकरूपता आएल छल, सेहो ध्वस्त भए रहल अछि। स्वच्छन्दतावादी लोकनिके ँई बुझबाक चाहिअनि जे उच्चारणक अनुरूप लिखब कोनो प्रचलित लिपिमे नहि छैक।’ ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। बिपिन झा, IIT Bombay सहनशीलता मजबूरी अथवा कमजोरी? सतत ई सुनैत एलहुँ- सहनशीलता एकटा गुण अछि जे प्रत्येक व्यक्ति हेतु जरूरी अछि। मुदा ई गप्प वर्तमान में कते तक सत्य अछि ई परीक्षणक आवश्यकता अछि। सहनशीलता यदि कोनो व्यक्ति अथवा समाज कें अभिशप्त करय लागय तऽ ओ कतऽ तक उचित ई स्वयं चिन्तन कय सकैत छी। आय जतहु कतहु समस्या देखैत छी चाहे ओ भ्रष्ट आचरण सन्दर्भित हो अथवा आतंकी गतिविधि या कोनो दुर्घटना विशेष। सर्वत्र हमर सभक अभिव्यक्ति रहैत अछि ’सकार एहि लेल दोषी अछि’ ,अमुक व्यक्ति केर कारण ई भय रहल अछि’। आ नेता सभक प्रतिक्रिया रहैत अछि- ’दोषी के नहिं छोडल जायत’, ’जाँच हेतु टीम बनाओल जायत’...। संगहि जनता जनार्दन सँऽ निवेदन जे सहनशीलता केर परिचय देथि, शान्ति बनौने रहथु’। जनता अर्थात् हम अहाँ एहि सभ सँऽ अलग आर्प प्रत्यारोप केर् बाण चलबैत अपना के स्वच्छ चरित्रबला हेबाक स्वयं प्रमाणपत्र लैत छी। कहियो ई सोचलियैक जे ओ नेता हमरे सभ म स एकटा व्यक्ति छथि जे नियमक कमजोर पक्ष के अपन सबलपक्ष बना शासन करैत छथि। अपराध छोट हो वा पैघ दूनू अपराधे होइत अछि। लगभग सर्वत्र पारदर्शिता केर अभाव भ्रष्टाचरण के प्रश्रय दैत अछि। हम सभ अपन  तुच्छ स्वार्थ, भय आदि हेतु पैघ भ्रष्टाचार एवं आतंकी गतिविधि के हिस्सा बनैत छी। हमरा सभ के सुविधा चाही। रेल टिकट चाही तऽ दलाल के अतिरिक्त १४००/- देब अपराध नै बुझना जाइत अछि। DL बनेबाक हेतु २०००/- देब अपराध नै बुझना जाइत अछि। कोनो सरकारी नौकरी हेतु १० लाख देब अपराध नै बुझना जाइत अछि। कोनो गलत आचरण के बर्दाश्त करब  अपराध नै बुझना जाइत अछि। सरकारी फण्ड अगर भेटैत अछि ओकर अपन सुविधा आ करियर पर खर्च करब अपराध नै बुझना जाइत अछि। उक्त चर्चा तऽ नमूना मात्र अछि। आगू स्वयं जोडि लिय। एहेन स्थिति मे केकरा दोष देल जाय ई विचार करी। क्रमशः... ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। बेचन ठाकुर श्रीसरस्वत्यै नमः महान सामाजिक मैथिली नाटक ( बाप भेल पित्ती ) अंक - पहिल ढृश्य - एक ( स्थान - लखनक घर। दलान पर लखन, लखनक कक्का मोतिलाल, भए बौहरू बड़का बेटा संतोष उपस्थित छथि। लखन चिन्तित मुद्रा मे छथि। सभ कियो चौकी पर बैस विचार-विमर्श कए रहलाह अछि। बारह वर्षीय मनोज आ दस वर्षीय संतोष दलान पर माटि-माटि खेल रहल आछ। ) मेतिलाल - लखन, चिन्ता फीकीर छोड़ू। की करबै ? भागवान के जे मर्जी होइत अछि, ओकरा के बदलि सकैत अछि ? अहाँक कनियां केँ एतबे दिनका भोग छेलै। आब अहाँक की विचार भऽ रहल अछि ? लखन - कक्का, अपने सभ जे जेना विचार देबै। मेतिलाल - हम सभ की विचार देब ? पहीने तऽ अहाँक अपन इच्छा। लखन - दुटा छोट-छोट बौआ अछि। ओकर प्रतिपाल कोना हाएत ? जँ कुल कनियां नीक भेटत तऽ दोसर कऽ लइतहुँ। मोतिलाल - भातीज, अहाँक नीक विचार अछि। ऐ उमर मे अहाँक निर्णय हमरो उचित बुझना जाइत अछि। बौहरू - कक्का, एगो कहबी जे छै ‘‘ सतौत भगवानो के नै भेलै ‘‘ से ? मोतिलाल - बौआ, तोहर की कहब छह ? लखनकेँ बियाह नै करबाक चाही की ? बौहरू - हँ, हमर सएह कहब रहाए। भैया कने त्याग कऽ दुनु छोंराकेँ पढ़-लिखाकऽ बुधियार बनाबतथि। ओना भैयाकेँ कनियां केहेन भेटतनि केहेन नै। मोतिलाल - हमरा विचार सँ लखनक परिस्थिति बियाह कर‘ वाला अवस्य अछि। लखन - कक्का, नजरिमे दऽ देलौंह जदी सुर-पता लागए तऽ जोगार लगाएब। मोतिलाल - बेस देखबै। पटाक्षेप दृष्य - दू ( स्थान - मदनक घर। ओ अपन बियाहल बेटीक बियाहक चिन्तामे लीन छथि। कातमे पत्नी गीता दलान झााड़ि रहल छथि। मोतिलालक समधिक समधि हरिचन मोतीलालकेँ मदनक ऐठाम कुटमैतीक संबंधमे लऽ जाए रहल छथि। हरिचन मदनक ग्रामीण छथि । हिनका दुनुक पहुँचैत मारत गीता घोघ तानि अन्दर चलि जाइत छथि। दलान पर तीन-चारि टा कुर्सी लागल छैन। मोतिलाल आ हरिचनक प्रवेश ) हरिचन - नमस्कार मदन भाइ। ( कर जोड़ि ) मदन - नमस्कार नमस्कार। मोतिलाल - नमस्कार कुटुम। मदन - नमस्कार नमस्कार । बैसै जाइ जाउ।  ( दुनु जन बैसलाह। ) संजाय, संजय बेटा संजय, संजय। संजय - ( अन्दरसँ ) जी पिताजी, इएह अएलहुँ। ( संजयक प्रवेश ) जी पीताजी। मदन - अन्दर जाउ, दू लोटा पानि लेने आउ। ( संजय अन्दर जाक ‘ दू लोटा पानि आनैत छथि। ) हरिचन भाइ, कहु की हाल-चाल ? हरिचन - बड्ड बढ़िया बड्ड बेस। सब उपरवालाक किरपा अछि। आओर अपना दिसुका। बाल बच्चा आनन्द ? मदन - आओर सभ ठीके छै। खाली कहने जे रही बहुत पहिने। ओही चिंतामे डुमल रहै छी। भाइ हिनका नै चिन्हलियै। हरिचन - ई छथि मोतिलाल बाबू, हमरे कुटुम छथि। अहींजे कहने रही; ओही संबंधमे अएलाह अछि। ई अपन भतिजकेँ अपने ऐठाम कुटमैती कर चाहैत छथि। हमही कहलियनि। मदन - बेस, होनी हेतै, जूड़-बंधन हेतै तऽ अवस्स हेतै । लड़िकाके अपने देखने छियै ? हरिचन - हँ हँ, किछुए दिन पहिने हमरा ओइठाम आएल रहथि। मदन - लड़िका केहेन छथि ? अहाँके पसीन छैथ। हरिचन - हँ हँ, लड़िका-लड़िकी जोगम-जोग अछि। खाली लड़िकाकेँ दूगो छोट-छोट बेटा छनि आ‘ पत्नी डिलेभरीए कालमे हॉस्पीटले दम तोड़ि देलखिन । मदन - भाइ, अहाँकेँ ई कुटमैती केहेन लागैत अछि ? हरिचन - जदी हमरा पूछै छी तऽ हम इएह कहब जे कुटमैती बढ़िया हाएत। अहाँक लड़िकीयो तऽ विधबे छै। ओना ऐ सँ नीक कतौ नजरिमंे अछि तऽ हम के रोकनिहार ? मदन - हम चाहैत रही कुमार लड़िका करै लाए। मोतिलाल - हमहुँ चाहैत रही कूमारि लड़िकी करै लाए। हरिचन - तहन ऐ दुनुके जीवन बेकार भऽ जाए; से नीक की ने ? जदी कुमार लड़िका नै भेटाए तहन ? मदन - अपन कोशिश तऽ करबाक चाही। हरिचन - से तऽ सत्ते। खाइर हमरा लोकनि चललहुँ।  ( मोतिलाल आ‘ हरिचन जेबाक लेल तैयार भेलाह। ) मदन - हाँ, हाँ, हाँ, हाँ, ( मुस्कुराइत ) औगतैयौ नै। कने अन्दर चलू।  ( हरिचनकेँ मदन पकड़िकऽ अन्दर लऽ जाइत छथि । ) मदन - लड़िकाके बेटा दुगो छै। अपना भैरि कोनो दिक्कत नै छै आ‘ अस्था-पाती ? हरिचन - गोटेक बीघाक अन्दरे छै। अपना भरि कोनो दिक्कत नै छै। मदन - की करी की नै, किछु नै फुराइ आए। हरिचन - हमरा सभकेँ लेट होइ आए। यदि विचार हुआए तऽ हुनका लड़िकी देखाए दियौन। नै तऽ कोनो बात नै । मदन - बेस अपने दलान पर चलू। हम बुच्चीकेँ लेने आबैत छी।  ( हरिचन दलान पर आबि गेलाह किछुए काल बाद मदन सेहो आबि गेलाह। ) मदन - चलू, देखल जेतै। कऽ लेबै। आगू भगवानक मर्जी। हम लड़िकी के बाप छियै तें हमरा लड़िका देखबाके चाही। मुदा हम सब िदन अहाँ पर विष्वास करैम रहलहुँ। आइ कोना नै करब ? हरिचन - हम अहाँक संड. विष्वासघात कएलहुँ ? मदन - से तऽ कहिसो नै। ओना दूनिया विष्वासे पर चलै छै।  ( वीणाक संग मीनाक प्रवेश मीना सभकेँ पाएर छुबि गोर लागैत आछि। ) हरिचन - कुर्सी पर बैसु बुच्ची।  ( मीना कुर्सी पर बैसैत अछि। वीणा ठाढ़े अछि। ) मोतिलाल बाबू , लड़िकीकेँ किछु पूछबो करबैन , त पुछियौ। मोतिलाल - की पूछबैन , किछु नै। हरिचन - बुच्ची अहाँ चलि जाउ।  ( मीना सभकेँ गोर लागि अन्दर गेलीह। ) मदन - हरिचन भाइ , लड़िकी अपने सभकेँ पसीन भेलीह ? मोतिलाल - हँ लड़िकी हमरा लोकनिकेँ पसीन अछि। मदन - तहन अगिला कार्यक्रम की हेतै ? हरिचन - जे जेना करीयै। ओना हम विचार दैतहुँ जे बियाह मंदिरमे कऽ लैतहुँ। चीप एण्ड बेस्ट। मदन - कहिया तक ? हरिचन - कहिया तक , चट मंड.नी पट बियाह। काल्हिए कऽ लिअ। बढ़िया दिन छै। कुटमैती लगाकऽ नै रखबाक चाही। मदन - भाइ , ओरियान कहाँ किच्छो छै ? हरिचन - जे भेलै सेहो बढ़िया , जे नै भेलै सेहो बढ़ियां। आदर्शो मे आदर्श । मदन - बेस काल्हुके रह दियौ। हरिचन - जाउ , जे भऽ सकाए , ओरियान करू। हम सभ सेहो जाइ छी। जय रामजी की। मदन - जय रामजी की। मोतिलाल - जय रामजी की कुटुम। मदन - जय रामजी की।   ( हरिचन आ मोतिलालक प्रस्थान। ) होनी जे हेबाक हेतै; सएह न हेतै। आप इच्छा सर्वनाशी , देव इच्छा परमबलः। पटाक्षेप दृष्य - तीन (दृष्य - लखनक वरियातीक तैयारी। वर लखन , मोतीलाल , बौहरू , मनोज आ संतोश मदनक ओइठाम जा रहल छथि। मदन अपन घरक कातमे एकटा षिव मंदिर क प्रांगणमे बियाहक पूर्ण तैयारी कएने छथि। सात गोट कुर्सी आ एक गोट टेबूल लागल अछि। पंडीजी गणेश महादेवक पूजा कए रहल छथि। मदन,मीना,गीता,हरिचन,संजय आ वीणा मंदिरक प्रांगणमे थाहाथाही कए रहल छथि तथा वरियातीक प्रतिक्षा कए रहल छथि। मीना कनिया के रूप मे पर्ण सजल अछि। वरियाती पहुँचलाह डोलमे राखल पानि सँ सब बरायाती हाथ-पाएर धोइ कऽ कुर्सी पर बैसलाह आ लखन वरवाला कूर्सी पर बैसलाह। बापेक कातमंे एक्के कुर्सी पर मनोज आ संतोस बैसलाह। मदन प्रागणमे आबि जलखैक व्यवस्था केलनि। सभ कियो जलखै कऽ रहल छथि। ) मनोज - पापा , पापा , नाच कखैन सुरू हेतै ? लखन - धूर बूरबक अखैन किछु नै बाज। लोक हँसतौ। मनोज  - किआए हौ , लोक हँसतै तऽ हमहुँ हँसबै। कह न नटुआ कखैन औतै ? लखन -चुप चुप, नटुआ नै कही । लड़िकी औतै। मनोज - काए गो लड़िकी औतइ ? आर्केस्ट्रा कखैन सुरू हेतै ? लड़िकी संड.े हमहुँ नचबै, गेबै आ रूमाल फाड़िके उड़ेबै। पापा हौ , लड़िकीके कहबै खाली रेकॉर्डिंग डांस करै लाए अगबे भोजपूरीए पर। लखन - चूप बड खच्चर छें रौ। आर्केस्ट्रा नै हेतै डांस नै हेतै । मनोज - तखन एत की हेतै  हौ पापा ? लखन - हमर बियाह हेतै बियाह। स्ंातोष - पापा हौ , तोहर बियाह हेतै आ हमर नै लखन - हँ हँ , तोरो हेतै । स्ंातोष - कहिया हेतै। लखन - नमहर हेबहीन तहन हेतौ। स्ंातोष - हम नमहर नै छिऐे। एतेटा तऽ भऽ गेलिऐ। आब बियाह कहिया हेतै ? लखन - बीस साल बाद हेतौ। स्ंातोष - बीस साल बाद बूढ़े भऽ जेबै तऽ बियाह क के की  हेतै ? हम आइए करब। लखन - आइ तोरा लाए लड़िकी कहां छै ? स्ंातोष - आइं हौ पापा तोरा लाए लड़िकी छै आ हमरा लाए नै छै। केकरोसे कऽ लेबै। लखन - केकरासे करबिहीन ? स्ंातोष - मौगी सब औतै न तऽ ओइमे जे सबसे मोटकी मौगी हेतै ; ओकरेसे करबै। दूधो खूब पीबै , नम्हरो हेबै आ मोटेबो करबै। पापा हौ , हमरा लोकनियामे तोरे रह पड़तह। लखन - बेस रहबौ बौआ।      ( जगमे पानि आ गिलास लऽ कऽ संजयक प्रवेश। सभ कियो पानि पीलनि आ हाथ-मूँह धोइ अपन-अपन जगह पर बैसलनि। पंडीजी पूजा पूर्णाहुतिक पश्चात वर लग बैस जलखै कएलाह। ) गणेश - अहाँ सभ विलंब किएक करै छी ? बियाहक मुहुर्त हुसि रहल अछि । हौ हौ  जल्दी चलै चलू। कोनो चीजक टेम होइ छै की ने ? ( लड़िकी संड. सरयातीक प्रवेश फेर सभ कियो मंदिर पर गेलाह। सतह पर बिछाएल दरी पर बैसलाह। ) गणेश - आउ लड़िका-लड़िकी, हमरा लग बैसु।  ( लखन आ मीना पंडीजी लग बैसैत छथि। पंडिजी दुनुकेँ अपन रमनामा वला चददरि ओढ़ा दैत छथिन्ह। दुन्नुके हाथमे आर्बा चाउर आओर कुश दै छथिन्ह ।) गणेश - लड़िका - लड़िकी पढु -- मंगलम्् भगवान विष्णु , मंगलम गरूड़ध्वज: ! मंगलम् पुण्डरीकाक्ष , मंगलाय मनोऽहरि: !! लखन $ मीना - मंगलम्् भगवान विष्णु , मंगलम गरूड़ध्वज: ! मंगलम् पुण्डरीकाक्ष , मंगलाय मनोऽहरि: !! ( पंडीजी तीनि बेर ई मंत्र पढ़ाकऽ अपन बगल मे राखल सेनुरक पुड़िया मे से एक चुटकी सेनूर लड़िकाक हाथ मे देलनि। ) गणेश - बियाहक मुहुर्त बीत रहल छल। तें हम एक्केटा मंत्र सँ बियाह कराए दैत छी। आब सिन्दुरदान होइ य ।  लड़िका , लड़िकीक मांड. मे सेनूर दियौन । ( लखन मीनाक मांड. मे सेनूर देलनि। ) आब अपने सभ दुर्वाक्षत दियौन।  ( पंडीजी पैध सबहक हाथ मे दुर्वाक्षत देलखिन । ) म्ंात्र - 0 आब्रह्मन ब्राह्मणो मित्राणामुदयस्तव। ( मंत्रक बाद सभ कियो लड़िका-लड़िकी केँ दुर्वाक्षत देलखिन। )  लाउ , दुनु समधि दक्षिणा-पाती। सस्ते मे अहाँ सभ निमहि गेलौं। ( दुनु सतधि एकावन-एकावन टका दक्षिणा देलनि। ) इएह यौ एक्को किलो रौहक दाम नै । खइर जाउ। मदन - पंडीजी लड़िका - लड़िकीकेँ आशीर्वाद दियौन । ( लड़िका - लड़िकी पंडीजीके पाएर छुबि प्रणाम करैत छथि। पंडीजी आशीर्वाद दैत छथिन्ह । ) मोतिलाल - पंडीजी मोनसँ आशीर्वाद देबै। गणेश - हँ यौ , दक्षिणे गुणे न आशीर्वाद भेटत। ( सभ कियो जा रहल छथि। ) पटाक्षेप दृष्य - चार (स्थान - रामलालक घर । रामलालक दुनु पत्नी लक्ष्मी आ संतोषी घरमे हुनका सेवा कऽ रहल छथि। लक्ष्मी पक्षमे दूगो बेटी-एगो बेटा छैन। छओ भए-बहिन एक्के पब्लिक इस्कूलमे पढ़ै गेल छथि।) रामलाल - लडकी , सभ धिया-पुता नीक जकाँ घर पर पढ़ै लिखै अछि न ? हम तऽ हम तऽ भिनसर जाइ छी से रातिमे आबै छी। पेटक पूजा तऽ बड पैघ पूजा छै की ने ? हम नै पढ़लहुँ से अखैन पछताइ छी। लक्ष्मी - छउटाक लक्षण अखैन बड नीक देखै छियै ; अग्रिम जे हुुआए। हमरा  सभकेँ पढ़ै कह नै पढ़ै अछि। रामलाल - छोटकी , अहाँ किछु नै बाजै छी। संतोषी - दुनु गोटे एक्के बेर देब त ऽ आहाँ की सुनबै आ की बुझाबै ? रामलाल - कोनो तकलीफ अछि की ? संतोषी - जेकरा आहाँ सन घरवाला रहतै ; तेकरा तकलीफो हेतै आ अहुँसँ होशगर कड़की छथि। स्वामी , एगो गप्प पूछी ? रामलाल - एक्के गो किआए , हजारगो पूछिते रहू। संतोशी - अहाँ , एहेन चिक्कन घरवालीके रहैत दोसर बियाह किआए केलियै ? रामलाल - बड़कीसँ बेटा होइमे किछु विलंब देखलियै तैं दोसर केलियै। संतोशी - नै यौ , दोसर गप्प भऽ सकै छै। रामलाल - हमरा तऽ नै बुझल अछि ; अहीं बाजू दोसर की भ सकै छै ? संतोशी - अहाँकेँ अहाँकेँ अहाँकेँ एगोसे मोन नै भरल । रामलाल - बस करू , बस करू , अहाँ तऽ लाल बुझक्करिछी। अहाँ त अंतर्यामी छी । ओना मोनकेँ जत्त दौड़ेबै ; ओत्त दौड़तै। मन नही देवता ; मन नही ईष्वर, मन से बड़ा न कोय । मन उजियारा जब जब फैले, जग उजियारा होय ।।   ( इसकुल पोषाकमे सोनिक प्रवेश । ) सोनी - पापा , पापा , इसकुलक फीस दियौ। रामलाल - माएकेँ कहियौ बुच्ची। सोनी - माए , इसकूलक फीस दहिन । लक्ष्मी - कत्ते फीस लगतौ ? सोनी - तों नै बुझै छीही छ गो विधार्थीक छ साए टका । लक्ष्मी - छोटकी , जाउ ; दऽ दियौ ग। संतोशी - बेस लेने अबै छी। ( संतोशी अन्दर जाक छ साए टाका आनि सोनीकेँ देलनि आ फेर पति सेवामे भीर गेलीह। ) रामलाल - छोड़ै जाइ जाउ आब । अंगना-घर देखियौ। अहुँ सभकेँ कनी काज होइ छै। ( दुनु पत्नी चलि गेलीह। ) पटाक्षेप दृष्य - पाँच ( स्थान - रामलालक घर । रामकान्तक संड. बलदेव वार्ड सदस्यक प्रवेश । ) बलदेव - ( दलान पर सँ ) रामलाला भाई , रामलाल भाई। रामलाल - ( अन्दरे सँ ) इएह अएलहुँ भाई । दलान पर ताबे बैसु । जलखै काएल भए गेल बलदेव - मुखियोजी अएलाह , कने जल्दीए एबै । रामलाल - तहन तुरन्त अएलहुँ।    ( हाथ - मुँह पोइछते प्रवेश । प्रणाम-पाती कऽ अन्दर सँ दूटा कुर्सी आनलनि । रामकान्त आ बलदेव कुर्सी  पर बैसलनि मुदा रामलाल ठाढ़े छथि । ) रामलाल - मुखियाजी , आइ केमहर सूरूज उगलै ? आइ रामलाल तरि गेल सरकार। कहियौ सरकार हम कोना मोन पड़लहूँ । इनरा आवासवला कोनो गप्प छै की ? बलदेव - गप्प तऽ इएह छै । मुदा पहिने कुशल-छेम , तहन ने अगिला गप सप। कहु अपन हाल-समाचार । रामलाल - अपने सबहक किरपासँ हमर हाल-समाचार बड्ड बढ़ियां अछि। भइ , अपन हाल-चाल कहु। बलदेव - भाइ एकदम दनदनाई छै। रामलाल - आ मुखियाजी दिषिका । रमाकान्त - हमरो हाल-चाल बड बढ़ियां अछि। ओएह एलेकसन नजदीक छै तें पंचायतमे घुमनाई आवष्यक बुझलहुँ । संडे. संड. अहुँक काज राहाए। रामलाल - तहन अपने किआए एलियै हमही चलि आबितहुँ । रमाकान्त - देखियौ , जनता जनार्दन होइ छै । पहिने जनता तहन न हम। जनता मुखियाकेँ बड आषासँ चुनै छै। रामलाल - अपने महान छियै । अपनेक आगू हम की बजबै ? बलदेव - मुखियाजी , कने ओकरो ऐठाम जाइके छै। हिनकर काज जल्दी कऽ दियौन । रमाकान्त - तहन दऽ दियौन।      ( बलदेव बेगसँ बीस हजार टाका निकालि रामलालकेँ देलखिन । ) रामलाल - ( पाँच साए टाका निकालि ) मुखियाजी , ई अपने राखि लियौ । रमाकान्त - नै , ई नै भऽ सकै आए। ई अपने रखियौ । हमरा पेट लाए बहुत फंड छै । कहबी छै - ओएबे खइ जइसे मोंछमे नै ठेकाए । रामलाल - भगवान , एहेन मुखिया सगतर होइ। बलदेव - रामलाल भाइ , जत्त-तत्त सुनै छी अहाँक परिवार चलेनाई आइ-काल्हि असंभव अछि। रामलाल - सब भबवानक किरपा छैन आ अपन करतब तऽ चाहबे करी। रमाकान्त - हमरा लोकनि जाइ छी। जाउ , अहुँ अपन काम-काज देखियौ । ( रमाकान्त आ बलदेवक प्रस्थान ) रामलाल - धन्यवाद बलदेव भाइ , धन्यावाद मुखियाजी एहिना सभ जनता पर खिआल रखबै। पटाक्षेप दृष्य - छह ( स्थान - लखनक घर । मीना अपन बेटी रामपरी आ बेटा कृश्णा संड. बैडमिंटन खेल रहल अछि। ) रामपरी - मम्मी , कसिके मारहीन न । कॉर्क नै उड़ै छै । मीना - बेसी कसिके मारबौ तऽ कॉर्क पोखिरि मे चलि जेतौ। रामपरी - मम्मी , मन नै लगै छै। कम-से-कम बौओ जकाँ बमकाही न ? ( मनोजक प्रवेश ) मीना - ओएह , एलौ सरधुआ भाँड़ै लाए । रामपरी - आब , दहीन न मम्मी । भाइजी छथिन्ह । मीना - भाइजी छथिन्ह । कप्पार छथिन्ह । कॉर्क फुटि जेतौ तऽ आनिके देतौ ? रामपरी - मम्मी , भाइजी कत्तसँ आनिके देतौ तोंही कह तऽ । आकी पापा आनि देथहीन । मीना - पापाकेँ हम जे कहबै से करथुन्ह। तोहर कहल नै करथुन्ह । रामपरी - मम्मी , ई गप्प तोहर नीक नै भेलौ आ पापोकेँ नीक नै भेलनि । मीना - तों पंचैती करै लाए एलें की बैडमिंटन खेलै लाए एलें ? खेलबाक छौ तऽ खेल नै तऽ जो एत्तसे। रामपरी - तोंही सब खेल , हमज ाइ छी। ( खीसियाक रामपरीक प्रस्थान रामपरीवला बैटसँ मनोज बैडमिंटन खेल लगै अछि। मीना बैटसँ ओकर मारै लाए छुटै अछि। मनोज बैट छोड़ि कऽ भागि जाइ अछि। फेर दुनु माय-पुत बैटमिंटन खेल लगैत अछि। ) कृश्णा - मम्मी , तोरा दीदी जेकाँ खलल नै होइ छौ। कने पापाकेँ कहबीन सीखा दै लाए से नै। मीना - बौआ , पापा हमरा की सीखेथुन्ह हमही सीखा दै छियै। कृश्णा - तेकर माने तों पापा से जेठ छीही ? मीना - उमरमे भलेंही छोट हाएब मुदा अकलमे निष्चित जेठ। ( संतोशक प्रवेश ) स्ंातोश - हमहुँ खेलबै कृश्णा । ( बैट लऽ कऽ खेल लगै अछि। झटसे मीना संतोशक हाथसँ हाथ मोचरिकऽ बैट लऽ लैत अछि। टुनकीवाला आ मुड़ीमचरूआ कहि बैटसँ मारि लाए दौड़ैम अछि। संतोश भागि जाइ अछि। ओइ पर खीसियाकऽ कृश्णा एक बैट मम्मीकेँ बैसा दैत अछि। ) कृश्णा - तों बड खच्चर छें मम्मी । खेलल-तेलल होइ छौ नहिए आ जमबै छें । अखैन संतोश भाइजी रहितै तऽ खूम बैडमिंटन खेलतौं की नै। मीना - संतोशबा तोहर भाइजी नै छियौ। जेकर छिऐ से बुझतै । तोरा ओकरासे कोनो मतलब नै। कृश्णा - किआए मम्मी ? उहो तऽ हमरे पापा के बेटा छिऐ न ? ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। सुमित आनन्द अनुवाद कार्यशालाक आयोजन भारतीय भाषा संस्थान मैसूर दिससँ नेशनल ट्रांसलेशन मिशनक अन्तर्गत दिनांक 01-07-2011 सँ 08-07-2011 धरि ल. ना. मिथिला विष्वविद्यालय, दरभंगाक विश्वविद्यालय मैथिली विभागमे सप्त-दिवसीय अनुवाद कार्यशालाक आयोजन भेल। एहि अवसरपर जी. ऑस्टीनक राजनीति शास्त्रक पोथी कन्स्टीच्यूशन ऑफ इण्डिया: फॉर्मर स्टोन ऑफ ए नेशनसँ चयनित 1100 तकनीकी शब्द तथा एम. हरियम्माक दर्शन शास्त्रक पोथी आउट लाइन्स ऑफ इण्डियन फिलॉसाफीक 700 तकनीकी शब्दक मैथिलीमे अनुवाद कयल गेल। एहि कार्य मे छओ गोट विषेषज्ञ रहथि डॉ. वीणा ठाकुर, डॉ. रमण झा, डॉ. दीप नारायण मिश्र, डॉ. योगानन्द सुधीर, डॉ. अमर नाथ झा एवं डॉ. राजनन्दन यादव। विशेषज्ञक अनुसार एहन-एहन कार्यसँ मैथिली साहित्य आओर समृद्ध होयत। विषेषज्ञ लोकनि कतोक नव शब्दावलीक निर्माण सेहो कयलनि अछि। मैसूरसँ आयल मैथिली भाषाक मुख्य शैक्षिक सलाहकार डॉ. अजित मिश्र, पवन कुमार चौधरी एवं डॉ. शम्भू कुमार सिंह कहलनि जे विभिन्न विषयक 63 गोट पोथीक अनुवाद होयबाक छैक जाहिमे एखन नओ गोट एहि कार्यक हेतु देल गेल छैक। ओ लोकनि ईहो कहलनि जे नओ मे सँ छओ गोट पोथीक तकनीकी शब्दक अनुवाद भए चुकल अछि। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। ३. पद्य ३.१.सुबोध झा ३.२.१.राजदेव मण्‍डल २.रामदेव प्रसाद मण्‍डल ‘झारूदार’ ३.३.१.जगदीश प्रसाद मण्‍डल २. राजेश मोहन झा ‘गुंजन’ ३.उमेश मण्‍डल ३.४.रामविलास साहु ३.५.डॉ. शेफालिका वर्मा- प्रकृति- पुरुष ३.६.नवीन कुमार आशा ३.७.गजेन्द्र ठाकुर- गजल ३.८.जवाहर लाल कश्यप सुबोध झा (१९६६- ), पिता श्री त्रिलोकनाथ झा १ बतहिया साँझ भेलैक भोर हेबै करतैक़ । ऑंखि छैक नोर हेबै करतैक़ ।। पिया विरह मे छैक मोन दग्ध । की करतैक मनःरोग हेबै करतैक़ ।।

आब अप्पनो सभ तऽ कहैक छिऐ ओकरा विक्षिप्त । ओकर मोन नहि भऽ सकलैक कहियो प्रेम सँ तृप्त ।। ऑंखि जोहैत छैक बाट सदिखन। मोन पड़ैत छैक बीतल दिन भरि क्षण ।।

हमरा नहि अछि आशा घूरि केँ औतैक ओ । फेर सँ ओकर प्रेमक दीप जरौतैक ओ ।। मुदा ककरा बूझल छैक ओहो घूमि रहल अछि भेल विक्षिप्त । के मिलौतैक दुनू केँ सभ अछि अपनहिं आप मे लिप्त ।।

ककरा छैक एकरा दुनूक लेल खाली समय । सभ लागल अछि खाली करबा मे धन संचय ।। जीअब तऽ देखबैक कतेको सामाजिक अन्याय । माय बाप भाई बहिन केओ नहि हेतैक सहाय ।।

हे समाजक कर्ता धर्ता छोडू ई ताण्डव नृत्य ओ कुकर्म । जीबऽ दियौक सभ केँ अपना ढंग सँ आ करू सुकर्म ।। सभ कहैत अछि भऽ गेलैक आब प्रजातन्त्र । हमरा जनें ई थीक पाइ वलाक षडयन्त्र ।। पाइ वलाक षडयन्त्र पाइ वलाक षडयन्त्र ।।।। २ शायरी 1 हमरा नहि देखल छल हुनक गाल परहक तिल आ ठोढ परहक लाली । कहियो नहि देखलियैन्हि हुनक कान मे लटकैत सोनक बाली ।। घोघ उठल ऑंखि मिलल लागल जे ओ तिल छल हुनक सुन्दरताक प्रहरी । ठोढ छल मदिरा आ बाली केँ देखितें खसि परलहुँ लागल दिल्लीक शीतलहरी ।। दिल्लीक शीतलहरी दिल्लीक शीतलहरी………………………………………।।

2 नारी कण्ठ सुनतहिं अनायसे बढि जाइत अछि डेग ओमहर । चूडीक खनकब सुनतहिं ताकए लगैत छी जेमहर तेमहर ।। आब तऽ कान मे स्वतः बजैत अछि पायलक खनकब । रहि रहि कें मोन परैत अछि प्रथम स्पर्श मे चूडीक चनकब ।।

3 निहारैत रहलहुँ जनम भरि हुनक मुखमण्डल । तैओ नहि भऽ सकल जिनग्ी हमर सफल ।। हम तऽ भऽ गेल हुनकर मुदा ओ नहिं छथि हमर । की दोष छल हमरा मे से नहिं जानि आब जीअब भेल दूभर ।। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। १.राजदेव मण्‍डल २.रामदेव प्रसाद मण्‍डल ‘झारूदार’ १ राजदेव मण्‍डल कवि‍ता- १ जुलूसक पछुआ हजारक-हजार टाँग-हाथ कि‍न्‍तु एकेटा अछि‍ माथ ठमकैत आ बमकैत बढ़ि‍ रहल अछि‍ आब गरजैत सड़कपर इनकि‍लाब नै अछि‍ कान-आँखि‍ तैयो लगल अछि‍ जेना पाँखि‍ एकगोटे केलक बकटेटी अखैन केना सुनत अपन हेठी केना सुनतै एखन गारि‍ बात जखैन छै हजार साथ पकड़ि‍ ओकर तोड़ि‍ देलक गात तोड़य लगल तान कंठ मोंकि‍ लऽ लेलक प्राण बढ़ि‍ गेल सभ आगाँ जेना लगल हो धागा नै छै पता आगू की भेल बात पाछूसँ सभ देने संग साथ लहाशकेँ फेंकि‍ देलक बाटक कात हम तँ खरीदुआ अंग मात्र चलैक छै संग-संग बनल छी पछि‍ला हि‍स्‍सा चलि‍ रहल छै आपसी खि‍स्‍सा ओकरा कुकृत्‍यकेँ हम जानि‍ रहल छी नचार भऽ मने-मन कानि‍ रहल छी बि‍ना जरि‍माना केना भेटत माफी भीड़क अंग छी तँए हमहूँ पापी। २ कनेक सुनू 1 खेतक ऊपर उधि‍याएत लगनी गीत मोन पड़ल जि‍नगीक गीत गमकि‍ उठल मनक दुआरि‍ ठाढ़ छी सम्‍हारि‍ ओइ आरि‍। 2 बैसल रहि‍ गेलौं पछताइत जि‍नगी भऽ गेल अन्‍हरि‍या राति‍। 3 प्रेम नै केलौं केलौं चोइर हमरा जि‍नगीमे देलौं जहर घोइर 4 जि‍नगी नै अछि‍ कि‍छु तैयो अछि‍ सभ कि‍छु कतबो काँट गड़े तैयो फूल बि‍छु। ३ असल मरद अंगना गारि‍ पढ़ैत अछि‍ कानि‍-कानि‍ जेना बि‍लमि‍-बि‍लमि‍ गाबैत हो गैन आगू की हएत से नै जानि‍ सुनि‍ कुबैन देहकेँ तानि‍ अपन गलती केना लेबै मानि‍ सींगमे लगौने खून गरैज रहल छी अपने धुन जेना करैत अछि‍ खुनि‍याँ बड़द तामसे करैत गरद आइसँ बनलौं असल मरद। ४ पोसा परबा परबा मानि‍ लेलक आब पोस पूरा परि‍वार बनि‍ गेल दाेस सभसँ भऽ गेल जान-पहि‍चान दाना दऽ कऽ राखऽ मान खाइत अछि‍ आब बासमती चाउर ठामहि‍-ठाम मारैत अछि‍ भाउर लग आबैत छल धीया-पुताक बातपर बैस जाइत छल हाथ-आ-माथपर कालक गति‍शील आँखि‍, दौड़ैत-फड़फड़ाइत परबाक पाँखि‍ मांसक माँगपर बजए पड़ल “परबाक छै भाग्‍ये जरल एहेन अति‍थि‍ जँ पहुँचल दुआरी पोसा परबाकेँ दि‍यौ आइ मारि‍ एहेन लोक कहि‍या आएत से नै जानि‍ फेर हेतै परबा बात लि‍अ मानि‍।” पानि‍मे डूबाकेँ जखैन लेलक जान परबाकेँ भेल मनुक्‍खक पहचान। २ रामदेव प्रसाद मण्‍डल ‘झारूदार’ पाँच गोट गीत- 1. लोभी लालची राज करै छै फुहर गाल बजाबै छै लुटि‍-लुटि‍ भोली जनताकेँ अप्‍पन घर सजाबै छै। 2 पग-पग पसरल हेरा फेरी काम छै काला मुँह छै गोरी काला धनपर उजड़ा पॉलि‍स। थुथुन जोड़ि‍ सौ लगाबै छै। लुटि‍..... ककरा कहबै नीक छै बाबू बोरा लटकल छै सबहक आगू के करतै जनता केर सेवा दुर-दुर तक नै देखाइ छै। लुटि‍..... राजकर्मी छै लोभ लहरमे जनता मरै छै लुटि‍ कहरमे राजा पहि‍रने चदरा चश्मा कि‍छो नै एकरा देखाइ छै। लुटि‍.... 2. मि‍थि‍ला रहि‍ गेल बनि‍ ई सि‍थला दुक्‍खक भरल गोदाम यौ रोऐ छै मि‍थि‍ला केर धरती लऽ लऽ जनक जीक नाम यौ-2 आइ हर घरमे सीता रोऐ छै राइत-राइत भरि‍ नै जनक सुतै छै कतए सँ एतै दहेजक पैसा हेतै केना कन्‍यादान यौ। रोऐ..... दया धरम के गाछ सुखाइ छै नि‍ष्‍ठा नीति‍ हाट बि‍काइ छै इमानक कोनो मोल नै रहलै सेवा भेलै लोभक गुलाम यौ रोऐ......... जनता हि‍त लऽ कोइ लड़ै छै अपने पेट लऽ सभ कोइ मरै छै कहि‍यो देखतै गरीब आजादी हेतै कोना नवका वि‍हान यौ रोऐ..........। 3. नेता अफसर मौज करै छै शाशक आँखि‍मे छि‍ट कऽ छाउर जनता नै एकता बनबै छै तँए चाटै छै मामक घौड़ एकताकेँ जँ नै अपनेबै जीवन भरि‍ सुख लऽ सपनेबै लुच्‍चा लम्‍पट खुि‍न कऽ खाइ छै नीचाँ ऊपर सभ खमहौर। जन.... अपने पेट लऽ सभ बेहाल छै तँए तँ देशक एहन हाल छै मात्र औपचारि‍क राज चलै छै मि‍डि‍या खाली लै छै घमहाउर। जन..... एकता बनैले सहऽ पड़ै छै घटो लगा कऽ बहऽ पड़ै छै अपना गलत पर लहऽ पड़ै छै जलै छै खुन पसि‍ना और। जन..... 4. देखि‍यौ यौ सभ बाबू भैया हमरा ई की देखाइ छै गट्टा पकड़ने लोभ लोककेँ नरकमे लेने जाइ छै लोभी करबै छै सभ पाप चाहे जते छै त्रि‍वि‍ध ताप ई धऽ लेलकै जकड़ा बाबू से दुखमे बौआइ छै गट्टा......... लोभ सभकेँ करै छै अंधा चाहे छै कतनो कवि‍ल बन्‍दा नीत धरम नि‍ष्‍ठा मर्यादा कि‍छाे नै सुझाइ छै गट्टा....... जकड़ा चढ़लै लोभक पाप से नै बुझै छै माए-बाप दुनि‍याँ दारी के बताबए भाइयो नै सोहाइ छै। गट्टा..........। 5. पढ़ै लि‍ख कऽ सभ टेढ़ भेल छै ज्ञान कि‍छो नै बुझै छै जइसँ पॉकेट बम-बम रहतै तनै माथे सुझै छै पैसे लऽ वि‍द्या पढ़ै छै पैसे लऽ मंदि‍र गढ़ै छै पैसे लऽ सभ जप-तप हइ छै पैसे लऽ देवतो पुजै छै। जइसँ............। पैसेसँ राजबर्दी चलै छै पैसेसँ आशि‍ष मि‍लै छै वेदो मंत्र पैसेसँ तौले छै सभ अज्ञानमे जुझै छै। जइ..........। भुलि‍ गेलै सेवा के रीती पैसेमे सभकेँ छै प्रीति‍ नीत धरम इमान ज्ञानकेँ नै कि‍छो कोइ बुझै छै। जइ...........। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। १.जगदीश प्रसाद मण्‍डल २. राजेश मोहन झा ‘गुंजन’ ३.उमेश मण्‍डल १ जगदीश प्रसाद मण्‍डल कवि‍ता- दूटा कवि‍ता- १ मधुरस जंगल जे बास करए बनफुल-फल से खाए इच्‍छति‍ मन लोढ़ि‍-बीछि‍ मधुरस सतति‍ बनाए। एक बन पसरि‍ वि‍श्व काटि‍-छाँटि‍ देश बनाबए अपना-अपनी बाट गढ़ि‍ सभ चाहे मधुरस पाबए। कटुरस मधुरस बीच भेद कि‍ मात्र सीमा पार करब टपि‍ते-टपान दुर्गकेँ खटरस बनि‍-बनि‍ रूप धड़ब। नजरि‍ तानि‍ वि‍श्वरूपा केर बि‍ष-रस बाट बॅटैए अपना-अपनी हथि‍आबए चाहै बाटे-बाट झगड़ैए। पौरूष पाबि‍ पुरूषार्थ जगे नहि‍ तँ कुंभकरणी सुतै सि‍रजि‍ वंश सरबा रावणक सखा-सखा सटि‍ वृक्ष बनए। पाबि‍ पुरूषार्थ पौरूष केर रोके नहि‍ ककरो बाट जि‍न्‍ह भाव सदि‍ पाबि‍-पाबि‍ सृजै नि‍त नूतन घाट। देश अनेक लोक अनेक भाव अनेक भावना अनेक बीच रचि‍ चालि‍ मायाकेँ भाव दुरभावना बनबैत। सृजै मधुरस अमृतरस केर नहि‍ तँ दुरभावना जगए अंध भऽ अन्‍हरा अन्‍हारमे अमृत रस कोना पाबए। २ बीआ बीआ खसए जेहन धरती तेहने तँ गाछो उगैत रौद-बसातक सह पाबि‍ संगे-संग चलबो करैत। लइते जन्‍म धरतीमे डेग उठा चढ़ए अकास काले-क्रमे घुसुकि‍-घुसुकि‍ दुनू बीच करए-चाहए बास। सि‍रजि‍त भऽ स्‍वयं सृजक बनि‍ हँसि‍-खि‍ल बि‍लहए सनेस भक्‍तक आह सुनि‍ जना पकड़ि‍ भगवन सि‍नेही भेष। चक्रक चक्का पकड़ि‍ चुहुटि‍ लगबे आस जि‍नगी केर धरती-अकासक ओर दू नहि‍ अछि‍ सोझ बाट भूमा केर। धार अनेक धारी अनेक वि‍शाल वक्ष धरती केर खोलि‍ हृदए सेवा ि‍नमि‍त अलि‍सा टगैत प्रेमीपर। दुर्ग अनेक ढाल अनेक दुर्गम बाट धरती केर शक्‍ति‍सँ शक्‍ति‍ सटि‍ सृजै शक्‍ति‍ शक्‍ती केर। अकास बीच देख सदति‍ सूर्यज संग-संग चान अनेक तरेगन बीच एक गबए सदा गीत तानि‍। खेल अजीव एहि‍ सृष्‍टि‍क सनेही सि‍नेह गुड़काबए गेन हारि‍-जीति‍ कऽ मान न माने बना रखै सदति‍ प्रेम। जोग भोग सि‍रजै सदा एक-दोसराक वि‍परीत चलै दू पाटनक मध्‍य-बीच सि‍रजि‍ सृष्‍टि‍ आगू बढ़ए। २ राजेश मोहन झा ‘गुंजन’ कवि‍ता ज्‍योति‍षी जीक तांडव ज्‍योति‍षी जी तांडव करैत चलला लऽ लोटा हाथ गामक सीमान पार करि‍ते राति‍ बीतल भेल प्रभात करि‍यन आ बलहाक मध्‍य लघु टोल भररि‍या तामसे मुँह लाल छलनि‍ नचैत जेना पमरि‍या बैशाखक बि‍हाड़ि‍ जकाँ बहैत वाचल्‍य कोण कोसीक भदैया धार जेना हहाइत पहुँचल खगड़ि‍या भेटला जुगेबाबू मकइक खरि‍हानमे “कतऽ चलल छी ज्‍योति‍षीजी ब्रह्म बेरूक वि‍हानमे?” लाेहछैत बजलनि‍ नै पुछू की भेल औ हमर ढोढ़बाकेँ गंगेश बलजोरी लऽ गेल औ पहुँचला खगन दुआरि‍ हाथ नेने दंड-भंग पुछारि‍ केलनि‍ गेल कतऽ टि‍ल्‍लू गंगेश संग औ बूच तों ई की कऽ देलह ऐ उमेरमे बेचलह बि‍नु मोले हमर सोन कुंवरकेँ कहलनि‍ औ भैया क्रोधकेँ ति‍यागि‍ दियौ कन्‍यादान तँ भऽ गेलै आब अपने घोघट दि‍यौ क्रोधांध आँखि‍सँ तकला पंडि‍त दि‍स तों छह अपन लोक कि‍ए कटलह बनि‍ उड़ीस? पड़ाएल सभ बरि‍याती भागलि‍ धोबि‍नि‍याँ काँपय लगला खगन, देख ई अजीब दृश्‍य हसनपुरक हँसेरी पहुँचल दलानपर टि‍ल्‍लूकेँ देखि‍ते हँसेरी बाजल- “औ पंडीजी अपने पुरोहि‍त छी ई हमर कुलगुरू चाह पीब सभ गेल वि‍वाहक पूर्णाहुति‍ भेल” क्रोध ठेकान नै छलनि‍ पंडि‍त कक्काकेँ गामेमे फरि‍आएब नै छोड़ब उचक्काकेँ कहलनि‍ वि‍भो ‘खगना मामा पकड़ू हि‍नक चरण कर जोड़ि‍ माफ करू एलौं अहँक शरण कम करू क्रोधकेँ पीब लि‍अ चाह औ ’ऑफर’ कौशल झाक सुनि‍ भेला बताह औ अन्‍हर बनि‍ उठला, खगन पीपरक पात बनल क्रोधक भुजि‍या बनल दुखक कराह औ गरमीक दुपहरि‍या खराम भीजल घाममे चमकैत ताड़ि‍क संग बरसलनि‍ ओ गाममे भेल पंचैती मानि‍ गेलथि‍ बीस हजार गहनामे यवनि‍का पतन भेल प्रबुद्ध जनक कहलामे बरख बीस बीत गेल ऐ कथाकेँ बि‍सरब नै घटना सभ सत्ते थि‍क फूसि‍ कि‍छु बूझब नै श्रद्धा सुमन अर्पित करैत ज्‍योति‍षी कक्काकेँ अंति‍म दृश्‍य इति‍ भेल जेठक रौद कड़क्कामे। ३ उमेश मण्‍डल कि‍छु हाइकू/टनका 1 परहेजसँ रहलासँ भेटैछ पैघ जि‍नगी। 2 झुठ बाजब पाप होइत अछि‍ स्‍वयं छोड़ि‍ नै। 3 एकटा चान सातटा देखाइत मोति‍याबि‍न। 4 कनैलक बीआ घुच्‍ची बना खेलैत कि‍ष्‍कारमे। 5 कि‍ष्‍कार मास लताम लुबधल इसरगद। 6 माछक चटनी मरूआ रोटी जोड़ी चहटगर। 7 अगम पानि‍ जीवक जि‍जीवि‍षा उहापोहसँ बनल स्‍थि‍ति‍ अछि‍ अप्‍पन आन भेल। 8 दुर्गा पूजाक मतलब होइछ शक्‍ति‍पूजा। 9 अन्‍हार गुप्‍प हाथो-हाथ ने सुझै हवा बहैत। 10 राजनेतासँ नीक मानल ऐछ काजनेता। 11 गेंदा पातक घा हाथ-पएरक सरसँ छुटै। 12 खेती-वाड़ीकेँ कि‍सान लचारीकेँ कोन महत्‍व। 13 सबल साँच दुर्बल भेल झुठ दुनूमे फाँट। 14 खेरही दालि‍ नेबो रस मि‍लल हृदै खि‍लल। 15 चौमास-वाड़ी दालि‍ खेसारी गाए-बरदले। 16 पीपड़ पात बि‍हरन आप्‍त छै तौयो डोलैत। 17 शान्‍त हवासँ अन्‍हर तुफानक आगम होइ। 18 हरि‍यरसँ तेज भऽ जाइत छै आँखि‍क ज्‍योति‍। 19 वनमे बास वनफूलक आस अमलतास। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। राम वि‍लास साहु १ टनका (1) बेटा-बेटीमे नहि‍ कोनो अंतर परेशानी कि‍ नहि‍ लेब जंतर कि‍ये हएत अंतर (2) दूजक चाँद घीरे चढ़े अकास ओहि‍ना सि‍खू पुर्णिमाक चाँदसँ बेसी करू वि‍कास। (3) खेतक काज राखै जगक मान नै अपमान खूब कमाउ नाम धान-पान-सम्मान। (4) गायक दूध दही-गोत-गोबर घी छै अमृत मि‍लते पंचामृत जे पि‍बै बनै देव। (5) चैतक रौद तपाबै माटि‍-पानि‍ पछि‍या हवा पकाबै चना-गहुम बहारै धूर-कण। (6) फूलक डाढ़ि‍ भौरा चढ़ै दू-चारि‍ गमकै बाग वसन्ती हवा बहै कोइली गाबै गीत। (7) कारी काजर आँखि‍ देत सुखाय कारी बादल बरखासँ डुबाय मुखरा देत बि‍गाड़ि‍। (8) सत्‍य वचन अपन हुऐ हानि मि‍ले सम्‍मान नहि‍ छोड़ब बानि‍ दोसरक कल्‍याण। (9) झाड़ू बहारै कूड़ा-कचड़ा धूर सत्‍य भगाबै मन बसल मैल पाप नै धुले पानि‍। (10) धर्मक शोर पताल पसरल वीरक यश तीनू लोक पहुँचै अधर्मसँ अहि‍त।‍ २ कवि‍ता- लफंगा- फाटल धोती फाटल अंगा पएरक जूता टुटल फाटल आँखि‍क चश्‍मा दूरंगा चौंकैत चलैत अछि‍ बेढ़ंगा बात करैत जना लफंगा लफड़ैत चलि‍ दरि‍भंगा बात-बातमे फॅसाबए दंगा सवाल-जबाब करैत अरंगा जखैन भऽ जाइत दंगा मौका पाबि‍ फनैत नंगा बात-बातमे कहैत लफंगा मन चंगा तँ कठौतीमे गंगा साँच झूठक दोहरी अंगा एकरंगा पहि‍र बनाबै फंदा झूठक खेतीमे उपजाबए बूटी फाटल जेबीमे रखलक मोती राम-नाम रटलासँ नै मि‍लत रौटी नीक काज कऽ बनाएब कसौटी जखन कि‍नब माेट-मोट पोथी ज्ञानक प्रकाश मि‍लत अनोखी वि‍कासक गंगा बहत चौमुखी। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। डॉ. शेफालिका वर्मा प्रकृति- पुरुष .सागरक  शांत लहरि देखी किछ किछ होयत अछ मोन में की सरिपों  नुकायल अछ सुनामी एकर अंतर में ?? कखनो  कोसी क हुँकार कखनो  गंगाक  आर्तनाद ....... हिमालयक  चंचला बेटी सब सागरक छाती  सँ लागि जायत अछ मुदा, कोन वेदना  सागरक  सुनामी बनि जायत  अछ .. मोन होयत  अछ चीरी दी एहि रहस्य के देखि ली  सागरक  छाती में बैसल उपास्य के किएक बेकल अछ पल पल प्रतिपल नै मेटैत  अछ तरास जकर की अकास स मिलवाक आस एकर.. आतुर  अधीर की व्यर्थहि  रहल  एकर पीर नहि ते केकरो  पिआस मेटा पवैत अछ नहि ते स्वयम अपन तरास बुझि   पवैत अछ युग युग सँ  तटक निर्मम रेत कें भिजावैत  अछ मुदा, किनार ओहिना  निर्विकार निर्लेप  रही जायत  अछ की ई  नियति प्रकृतिक  थीक पुरुष  अपना के किनार बना  लैत छैक भिजैत  अछ, तितैत  अछ किछ बाजि  नहि पवैत  अछ जीवनक   अर्थ   खोजिते रहि  जायत छैक............................. ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। नवीन कुमार आशा माँ छिन्नमस्तिका मैया मैया मैया मैया मैया मैया हे माँ छिन्नमस्ते धन्य ओ उजानक नगरी जेतऽ अहाँ विराजी माँ लोककेँ जखन रहए कोनो दुविधा माता अहा सँ करए फरियाद मैया मैया हे माँ छिन्नमस्ते पुत्र नवीनक सुनू फरियाद पुत्र फँसल अछि बीच भँवरमे ओकरो पार लगाबू माँ मैया मैया हे माँ छिन्नमस्ते पुत्र करै अछि दंड प्रणाम जँ माता नहि दिखायब पथ जँ माता नहि विनति सुनब पुत्र एतै दऽ देत प्राण मैया मैया हे माँ छिन्नमस्ते पुत्र करै अछि प्रणाम माता जँ अहाँ रुसि जायब तँ केकरा अपन विनति सुनायब जँ भेल अछि हमरा सँ गलती सजा हमरा सुनाबू माँ पुत्र फँसल अछि बीच भँवरमे ओकरो पार लगाबू माँ मैया मैया हे माँ छिन्नमस्ते पुत्र करै अछि दंड प्रणाम जखनो हम आबय छी गाम माता रहैए अहाँकं ध्यान माता कोना हेती हमर हुनका नहि केलौं प्रणाम जा धरि नहि करी दर्शन माता लागए जेना छूटल प्राण मैया मैया हे माँ छिन्नमस्ते पुत्र करै अछि प्रणाम माँ छिन्नमस्ते माँ छिन्नमस्ते राखि सभपर धियान मैया मैया हे माँ छिन्नमस्ते नवीन करै अछि दंड प्रणाम ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। गजेन्द्र ठाकुर गजल १ छोड़ि कऽ हमरा ई जे ओ जा रहल अछि हृदैकेँ चीरैत जे सुनगा रहल अछि नीक लगै छल ओकर बोलक संगोर जाइए आइ हृदए कना रहल अछि नै बुझलिऐ ई एते बढ़ल अछि बात देखल आइ जे ओ भँसिया रहल अछि हमरासँ कते की माँगै छल रहरहाँ जे जुमल ओ बिनु लेने जा रहल अछि ओकर हाक्रोस हमर चुप्पी सुनै छल बाजब से बिनु सुनने जा रहल अछि बात तँ छलै जड़िआएल तहिआयल बीझ काटि बिनु पढ़ने जा रहल अछि ककरा कहबै ई जे पतिआएत आइ उपरागो बिनु सुनेने जा रहल अछि घुरत नै देखैल अपनैती अपन ओ आँखि शून्य हृदए हहारो देखाबै अछि के टोकत एको बेर रुकि जाउ कहत मुँह सीयल सभक शून्य बढ़ल अछि २ की कहबै, कोना कहबै, जे बुझतै ओ लुझतै ओ आँखिक नोर खसतै,    खन रूसतै-बिहुसतै ओ दाबी देखेतै आ हम देखबै नुका कऽ अँचरासँ बहरा जाइ छी घबरा कऽ, नै ताकै ओ ने बाजै ओ देखितिऐ अँचरासँ, आ बहरा जैतौं दुअरासँ मोनसँ बेसी उड़ै चिड़ै, चिड़ैक मोन बनतै ओ बनि माँछ अकुलाइ छी बाझब जालमे कक्खन जँ फँसि त्राण पाएब आँखि बओने से देखतै ओ चम्मन फूल भमरा, गुम्म, जब्बर, छै सोझाँ ठाढ़ जलबाह सोझाँ  माँछ, ऐरावत बनल, देखै ओ ३ ओङठल आँखि ताकैए कहू की करी नै बुझलौं तमसाइए कहू की करी ज्ञानी बनै लेल जाइए देश छोड़ने ई मोन जे पथराइए कहू की करी धानी रंगक आगि पियासल किए छै धाना निश्छल हिलोरैए कहू की करी धान छै खखरी बनल अहिठाम आ धानी आगि जे लहकैए कहू की करी आगिक संगी पानि अजगुत देखल धौरबी बनल सोचैए कहू की करी ऐरावत धोधराह धुधुनमुहाँ नै जरि फाहा बनि बजैए कहू की करी ४ मिरदङियाक तरंग भँसियाइए अङेजब कोना सुनि मोन घुरमाइए अकुलाइए अङेजब कोना आँखिक नोर झरलै बनलै अजस्र धार झझाइए पियासल छी ठाढ़, जी हदबदाइए अङेजब कोना सगुन बान्हसँ बान्हल ऐ मोनक उछाही बिच ठाढ़ सगुनियाँ बनल उसरगाइए अङेजब कोना हरसट्ठे अपने अपन चेन्हासी मेटा लेलक आइ मुरुत हरपटाहि बनेने जाइए अङेजब कोना छरछर बहल छै धार मोनक, देखू चलल अछि धेने बनल बाट उधोरनि बनैए अङेजब कोना उड़ैए चिड़ै आ बहैए अनेरे ऐ नील अकाश बिच ऐरावत-मन जखन उधियाइए अङेजब कोना ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। जवाहर लाल कश्यप (१९८१- ), पिता श्री- हेमनारायण मिश्र , गाम फुलकाही- दरभंगा। परदेसक ओर लाल साडी के कारी कोर पोछने रही काजर लागल ऑखिक नोर देखने रही ऑखि डबडबायल नोर स भरल जेना पुछि रहल पिया कहिया आयब बीतत कोना जारक राति-दिन खेलब कोना होली अहॉ बिन बसन्त अहॉ बिन नीक नहि लागत सावनक झडी देह मे आगि लगायत दिन बितनाइ पहाड भेल पिया साल अहॉ बिन कोन बितायब कनियॉ के नोर देखि ह्रिदय फाटि गेल पैर थम्हि गेल मुदा सत्यक धरातल छल किछु कठोर पैर बढैत गेल परदेसक ओर परदेसक ओर ................ ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। विदेह नूतन अंक मिथिला कला संगीत १.ज्योति सुनीत चौधरी २.श्वेता झा (सिंगापुर) ३.गुंजन कर्ण १. ज्योति सुनीत चौधरी जन्म तिथि -३० दिसम्बर १९७८; जन्म स्थान -बेल्हवार, मधुबनी ; शिक्षा- स्वामी विवेकानन्द मि‌डिल स्कूल़ टिस्को साकची गर्ल्स हाई स्कूल़, मिसेज के एम पी एम इन्टर कालेज़, इन्दिरा गान्धी ओपन यूनिवर्सिटी, आइ सी डबल्यू ए आइ (कॉस्ट एकाउण्टेन्सी); निवास स्थान- लन्दन, यू.के.; पिता- श्री शुभंकर झा, ज़मशेदपुर; माता- श्रीमती सुधा झा, शिवीपट्टी। ज्योतिकेँwww.poetry.comसँ संपादकक चॉयस अवार्ड (अंग्रेजी पद्यक हेतु) भेटल छन्हि। हुनकर अंग्रेजी पद्य किछु दिन धरि www.poetrysoup.com केर मुख्य पृष्ठ पर सेहो रहल अछि। ज्योति मिथिला चित्रकलामे सेहो पारंगत छथि आ हिनकर मिथिला चित्रकलाक प्रदर्शनी ईलिंग आर्ट ग्रुप केर अंतर्गत ईलिंग ब्रॊडवे, लंडनमे प्रदर्शित कएल गेल अछि। कविता संग्रह ’अर्चिस्’ प्रकाशित। २.श्वेता झा (सिंगापुर) ३.गुंजन कर्ण राँटी मधुबनी, सम्प्रति यू.के.मे रहै छथि। www.madhubaniarts.co.uk पर हुनकर कलाकृति देखि सकै छी। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। विदेह नूतन अंक गद्य-पद्य भारती १. मोहनदास (दीर्घकथा):लेखक: उदय प्रकाश (मूल हिन्दीसँ मैथिलीमे अनुवाद विनीत उत्पल) मोहनदास (मैथिली-देवनागरी) मोहनदास (मैथिली-मिथिलाक्षर) मोहनदास (मैथिली-ब्रेल) २.छिन्नमस्ता- प्रभा खेतानक हिन्दी उपन्यासक सुशीला झा द्वारा मैथिली अनुवाद छिन्नमस्ता ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। बालानां कृते विनीत उत्पल गुटू रानी गुटू रानी, गुटू रानी, गुटू रानी पी लिअ नारियल पानी आबैत होयत अहांक नानी गुटू रानी, गुटू रानी, गुटू रानी नै कानी, नै कानी, नै कानी चाकलेट खायब, खायब नेमनचूस मामा अछि अहां कऽ कंजूस गुटिया पियत खाली जूस गुटू रानी, गुटू रानी, गुटू रानी नै कानी, नै कानी, नै कानी पढए लिखय मे मन न लागए खेलय-धूपय मे सभसँ आगए दादा-दादी के आंखिक तारा  गुटू रानी, गुटू रानी, गुटू रानी नै कानी, नै कानी, नै कानी कियो बजै तँ कसि कऽ कानी  मम्मी, मम्मी, गरजे मम्मी  कियो नै सुनए ओकर बानी गुटू रानी, गुटू रानी, गुटू रानी नै कानी, नै कानी, नै कानी ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com  पर पठाउ। बच्चा लोकनि द्वारा स्मरणीय श्लोक १.प्रातः काल ब्रह्ममुहूर्त्त (सूर्योदयक एक घंटा पहिने) सर्वप्रथम अपन दुनू हाथ देखबाक चाही, आ’ ई श्लोक बजबाक चाही। कराग्रे वसते लक्ष्मीः करमध्ये सरस्वती। करमूले स्थितो ब्रह्मा प्रभाते करदर्शनम्॥ करक आगाँ लक्ष्मी बसैत छथि, करक मध्यमे सरस्वती, करक मूलमे ब्रह्मा स्थित छथि। भोरमे ताहि द्वारे करक दर्शन करबाक थीक। २.संध्या काल दीप लेसबाक काल- दीपमूले स्थितो ब्रह्मा दीपमध्ये जनार्दनः। दीपाग्रे शङ्करः प्रोक्त्तः सन्ध्याज्योतिर्नमोऽस्तुते॥ दीपक मूल भागमे ब्रह्मा, दीपक मध्यभागमे जनार्दन (विष्णु) आऽ दीपक अग्र भागमे शङ्कर स्थित छथि। हे संध्याज्योति! अहाँकेँ नमस्कार। ३.सुतबाक काल- रामं स्कन्दं हनूमन्तं वैनतेयं वृकोदरम्। शयने यः स्मरेन्नित्यं दुःस्वप्नस्तस्य नश्यति॥ जे सभ दिन सुतबासँ पहिने राम, कुमारस्वामी, हनूमान्, गरुड़ आऽ भीमक स्मरण करैत छथि, हुनकर दुःस्वप्न नष्ट भऽ जाइत छन्हि। ४. नहेबाक समय- गङ्गे च यमुने चैव गोदावरि सरस्वति। नर्मदे सिन्धु कावेरि जलेऽस्मिन् सन्निधिं कुरू॥ हे गंगा, यमुना, गोदावरी, सरस्वती, नर्मदा, सिन्धु आऽ कावेरी  धार। एहि जलमे अपन सान्निध्य दिअ। ५.उत्तरं यत्समुद्रस्य हिमाद्रेश्चैव दक्षिणम्। वर्षं तत् भारतं नाम भारती यत्र सन्ततिः॥ समुद्रक उत्तरमे आऽ हिमालयक दक्षिणमे भारत अछि आऽ ओतुका सन्तति भारती कहबैत छथि। ६.अहल्या द्रौपदी सीता तारा मण्डोदरी तथा। पञ्चकं ना स्मरेन्नित्यं महापातकनाशकम्॥ जे सभ दिन अहल्या, द्रौपदी, सीता, तारा आऽ मण्दोदरी, एहि पाँच साध्वी-स्त्रीक स्मरण करैत छथि, हुनकर सभ पाप नष्ट भऽ जाइत छन्हि। ७.अश्वत्थामा बलिर्व्यासो हनूमांश्च विभीषणः। कृपः परशुरामश्च सप्तैते चिरञ्जीविनः॥ अश्वत्थामा, बलि, व्यास, हनूमान्, विभीषण, कृपाचार्य आऽ परशुराम- ई सात टा चिरञ्जीवी कहबैत छथि। ८.साते भवतु सुप्रीता देवी शिखर वासिनी उग्रेन तपसा लब्धो यया पशुपतिः पतिः। सिद्धिः साध्ये सतामस्तु प्रसादान्तस्य धूर्जटेः जाह्नवीफेनलेखेव यन्यूधि शशिनः कला॥ ९. बालोऽहं जगदानन्द न मे बाला सरस्वती। अपूर्णे पंचमे वर्षे वर्णयामि जगत्त्रयम् ॥ १०. दूर्वाक्षत मंत्र(शुक्ल यजुर्वेद अध्याय २२, मंत्र २२) आ ब्रह्मन्नित्यस्य प्रजापतिर्ॠषिः। लिंभोक्त्ता देवताः। स्वराडुत्कृतिश्छन्दः। षड्जः स्वरः॥ आ ब्रह्म॑न् ब्राह्म॒णो ब्र॑ह्मवर्च॒सी जा॑यता॒मा रा॒ष्ट्रे रा॑ज॒न्यः शुरे॑ऽइषव्यो॒ऽतिव्या॒धी म॑हार॒थो जा॑यतां॒ दोग्ध्रीं धे॒नुर्वोढा॑न॒ड्वाना॒शुः सप्तिः॒ पुर॑न्धि॒र्योवा॑ जि॒ष्णू र॑थे॒ष्ठाः स॒भेयो॒ युवास्य यज॑मानस्य वी॒रो जा॒यतां निका॒मे-नि॑कामे नः प॒र्जन्यों वर्षतु॒ फल॑वत्यो न॒ऽओष॑धयः पच्यन्तां योगेक्ष॒मो नः॑ कल्पताम्॥२२॥ मन्त्रार्थाः सिद्धयः सन्तु पूर्णाः सन्तु मनोरथाः। शत्रूणां बुद्धिनाशोऽस्तु मित्राणामुदयस्तव। ॐ दीर्घायुर्भव। ॐ सौभाग्यवती भव। हे भगवान्। अपन देशमे सुयोग्य आ’ सर्वज्ञ विद्यार्थी उत्पन्न होथि, आ’ शुत्रुकेँ नाश कएनिहार सैनिक उत्पन्न होथि। अपन देशक गाय खूब दूध दय बाली, बरद भार वहन करएमे सक्षम होथि आ’ घोड़ा त्वरित रूपेँ दौगय बला होए। स्त्रीगण नगरक नेतृत्व करबामे सक्षम होथि आ’ युवक सभामे ओजपूर्ण भाषण देबयबला आ’ नेतृत्व देबामे सक्षम होथि। अपन देशमे जखन आवश्यक होय वर्षा होए आ’ औषधिक-बूटी सर्वदा परिपक्व होइत रहए। एवं क्रमे सभ तरहेँ हमरा सभक कल्याण होए। शत्रुक बुद्धिक नाश होए आ’ मित्रक उदय होए॥ मनुष्यकें कोन वस्तुक इच्छा करबाक चाही तकर वर्णन एहि मंत्रमे कएल गेल अछि। एहिमे वाचकलुप्तोपमालड़्कार अछि। अन्वय- ब्रह्म॑न् - विद्या आदि गुणसँ परिपूर्ण ब्रह्म रा॒ष्ट्रे - देशमे ब्र॑ह्मवर्च॒सी-ब्रह्म विद्याक तेजसँ युक्त्त आ जा॑यतां॒- उत्पन्न होए रा॑ज॒न्यः-राजा शुरे॑ऽ–बिना डर बला इषव्यो॒- बाण चलेबामे निपुण ऽतिव्या॒धी-शत्रुकेँ तारण दय बला म॑हार॒थो-पैघ रथ बला वीर दोग्ध्रीं-कामना(दूध पूर्ण करए बाली) धे॒नुर्वोढा॑न॒ड्वाना॒शुः धे॒नु-गौ वा वाणी र्वोढा॑न॒ड्वा- पैघ बरद ना॒शुः-आशुः-त्वरित सप्तिः॒-घोड़ा पुर॑न्धि॒र्योवा॑- पुर॑न्धि॒- व्यवहारकेँ धारण करए बाली र्योवा॑-स्त्री जि॒ष्णू-शत्रुकेँ जीतए बला र॑थे॒ष्ठाः-रथ पर स्थिर स॒भेयो॒-उत्तम सभामे युवास्य-युवा जेहन यज॑मानस्य-राजाक राज्यमे वी॒रो-शत्रुकेँ पराजित करएबला निका॒मे-नि॑कामे-निश्चययुक्त्त कार्यमे नः-हमर सभक प॒र्जन्यों-मेघ वर्षतु॒-वर्षा होए फल॑वत्यो-उत्तम फल बला ओष॑धयः-औषधिः पच्यन्तां- पाकए योगेक्ष॒मो-अलभ्य लभ्य करेबाक हेतु कएल गेल योगक रक्षा नः॑-हमरा सभक हेतु कल्पताम्-समर्थ होए ग्रिफिथक अनुवाद- हे ब्रह्मण, हमर राज्यमे ब्राह्मण नीक धार्मिक विद्या बला, राजन्य-वीर,तीरंदाज, दूध दए बाली गाय, दौगय बला जन्तु, उद्यमी नारी होथि। पार्जन्य आवश्यकता पड़ला पर वर्षा देथि, फल देय बला गाछ पाकए, हम सभ संपत्ति अर्जित/संरक्षित करी। 8.VIDEHA FOR NON RESIDENTS 8.1 to 8.3 MAITHILI LITERATURE IN ENGLISH 8.1.1.The Comet   -GAJENDRA THAKUR translated by Jyoti Jha chaudhary 8.1.2.The_Science_of_Words- GAJENDRA THAKUR translated by the author himself 8.1.3.On_the_dice-board_of_the_millennium- GAJENDRA THAKUR translated by Jyoti Jha chaudhary 8.1.4.NAAGPHANS (IN ENGLISH)- SHEFALIKA VERMA translated by Dr. Rajiv Kumar Verma and Dr. Jaya Verma Input: (कोष्ठकमे देवनागरी, मिथिलाक्षर किंवा फोनेटिक-रोमनमे टाइप करू। Input in Devanagari, Mithilakshara or Phonetic-Roman.) Output: (परिणाम देवनागरी, मिथिलाक्षर आ फोनेटिक-रोमन/ रोमनमे। Result in Devanagari, Mithilakshara and Phonetic-Roman/ Roman.) English to Maithili Maithili to English इंग्लिश-मैथिली-कोष / मैथिली-इंग्लिश-कोष  प्रोजेक्टकेँ आगू बढ़ाऊ, अपन सुझाव आ योगदान ई-मेल द्वारा ggajendra@videha.com पर पठाऊ। Top of Form विदेहक मैथिली-अंग्रेजी आ अंग्रेजी मैथिली कोष (इंटरनेटपर पहिल बेर सर्च-डिक्शनरी) एम.एस. एस.क्यू.एल. सर्वर आधारित -Based on ms-sql server Maithili-English and English-Maithili Dictionary. १.भारत आ नेपालक मैथिली भाषा-वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक शैली आ २.मैथिलीमे भाषा सम्पादन पाठ्यक्रम १.नेपाल आ भारतक मैथिली भाषा-वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक शैली

१.१. नेपालक मैथिली भाषा वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक  उच्चारण आ लेखन शैली (भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक धारणाकेँ पूर्ण रूपसँ सङ्ग लऽ निर्धारित) मैथिलीमे उच्चारण तथा लेखन १.पञ्चमाक्षर आ अनुस्वार: पञ्चमाक्षरान्तर्गत ङ, ञ, ण, न एवं म अबैत अछि। संस्कृत भाषाक अनुसार शब्दक अन्तमे जाहि वर्गक अक्षर रहैत अछि ओही वर्गक पञ्चमाक्षर अबैत अछि। जेना- अङ्क (क वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ङ् आएल अछि।) पञ्च (च वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ञ् आएल अछि।) खण्ड (ट वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ण् आएल अछि।) सन्धि (त वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे न् आएल अछि।) खम्भ (प वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे म् आएल अछि।) उपर्युक्त बात मैथिलीमे कम देखल जाइत अछि। पञ्चमाक्षरक बदलामे अधिकांश जगहपर अनुस्वारक प्रयोग देखल जाइछ। जेना- अंक, पंच, खंड, संधि, खंभ आदि। व्याकरणविद पण्डित गोविन्द झाक कहब छनि जे कवर्ग, चवर्ग आ टवर्गसँ पूर्व अनुस्वार लिखल जाए तथा तवर्ग आ पवर्गसँ पूर्व पञ्चमाक्षरे लिखल जाए। जेना- अंक, चंचल, अंडा, अन्त तथा कम्पन। मुदा हिन्दीक निकट रहल आधुनिक लेखक एहि बातकेँ नहि मानैत छथि। ओ लोकनि अन्त आ कम्पनक जगहपर सेहो अंत आ कंपन लिखैत देखल जाइत छथि। नवीन पद्धति किछु सुविधाजनक अवश्य छैक। किएक तँ एहिमे समय आ स्थानक बचत होइत छैक। मुदा कतोक बेर हस्तलेखन वा मुद्रणमे अनुस्वारक छोट सन बिन्दु स्पष्ट नहि भेलासँ अर्थक अनर्थ होइत सेहो देखल जाइत अछि। अनुस्वारक प्रयोगमे उच्चारण-दोषक सम्भावना सेहो ततबए देखल जाइत अछि। एतदर्थ कसँ लऽ कऽ पवर्ग धरि पञ्चमाक्षरेक प्रयोग करब उचित अछि। यसँ लऽ कऽ ज्ञ धरिक अक्षरक सङ्ग अनुस्वारक प्रयोग करबामे कतहु कोनो विवाद नहि देखल जाइछ। २.ढ आ ढ़ : ढ़क उच्चारण “र् ह”जकाँ होइत अछि। अतः जतऽ “र् ह”क उच्चारण हो ओतऽ मात्र ढ़ लिखल जाए। आन ठाम खाली ढ लिखल जएबाक चाही। जेना- ढ = ढाकी, ढेकी, ढीठ, ढेउआ, ढङ्ग, ढेरी, ढाकनि, ढाठ आदि। ढ़ = पढ़ाइ, बढ़ब, गढ़ब, मढ़ब, बुढ़बा, साँढ़, गाढ़, रीढ़, चाँढ़, सीढ़ी, पीढ़ी आदि। उपर्युक्त शब्द सभकेँ देखलासँ ई स्पष्ट होइत अछि जे साधारणतया शब्दक शुरूमे ढ आ मध्य तथा अन्तमे ढ़ अबैत अछि। इएह नियम ड आ ड़क सन्दर्भ सेहो लागू होइत अछि। ३.व आ ब : मैथिलीमे “व”क उच्चारण ब कएल जाइत अछि, मुदा ओकरा ब रूपमे नहि लिखल जएबाक चाही। जेना- उच्चारण : बैद्यनाथ, बिद्या, नब, देबता, बिष्णु, बंश, बन्दना आदि। एहि सभक स्थानपर क्रमशः वैद्यनाथ, विद्या, नव, देवता, विष्णु, वंश, वन्दना लिखबाक चाही। सामान्यतया व उच्चारणक लेल ओ प्रयोग कएल जाइत अछि। जेना- ओकील, ओजह आदि। ४.य आ ज : कतहु-कतहु “य”क उच्चारण “ज”जकाँ करैत देखल जाइत अछि, मुदा ओकरा ज नहि लिखबाक चाही। उच्चारणमे यज्ञ, जदि, जमुना, जुग, जाबत, जोगी, जदु, जम आदि कहल जाएबला शब्द सभकेँ क्रमशः यज्ञ, यदि, यमुना, युग, यावत, योगी, यदु, यम लिखबाक चाही। ५.ए आ य : मैथिलीक वर्तनीमे ए आ य दुनू लिखल जाइत अछि। प्राचीन वर्तनी- कएल, जाए, होएत, माए, भाए, गाए आदि। नवीन वर्तनी- कयल, जाय, होयत, माय, भाय, गाय आदि। सामान्यतया शब्दक शुरूमे ए मात्र अबैत अछि। जेना एहि, एना, एकर, एहन आदि। एहि शब्द सभक स्थानपर यहि, यना, यकर, यहन आदिक प्रयोग नहि करबाक चाही। यद्यपि मैथिलीभाषी थारू सहित किछु जातिमे शब्दक आरम्भोमे “ए”केँ य कहि उच्चारण कएल जाइत अछि। ए आ “य”क प्रयोगक सन्दर्भमे प्राचीने पद्धतिक अनुसरण करब उपयुक्त मानि एहि पुस्तकमे ओकरे प्रयोग कएल गेल अछि। किएक तँ दुनूक लेखनमे कोनो सहजता आ दुरूहताक बात नहि अछि। आ मैथिलीक सर्वसाधारणक उच्चारण-शैली यक अपेक्षा एसँ बेसी निकट छैक। खास कऽ कएल, हएब आदि कतिपय शब्दकेँ कैल, हैब आदि रूपमे कतहु-कतहु लिखल जाएब सेहो “ए”क प्रयोगकेँ बेसी समीचीन प्रमाणित करैत अछि। ६.हि, हु तथा एकार, ओकार : मैथिलीक प्राचीन लेखन-परम्परामे कोनो बातपर बल दैत काल शब्दक पाछाँ हि, हु लगाओल जाइत छैक। जेना- हुनकहि, अपनहु, ओकरहु, तत्कालहि, चोट्टहि, आनहु आदि। मुदा आधुनिक लेखनमे हिक स्थानपर एकार एवं हुक स्थानपर ओकारक प्रयोग करैत देखल जाइत अछि। जेना- हुनके, अपनो, तत्काले, चोट्टे, आनो आदि। ७.ष तथा ख : मैथिली भाषामे अधिकांशतः षक उच्चारण ख होइत अछि। जेना- षड्यन्त्र (खड़यन्त्र), षोडशी (खोड़शी), षट्कोण (खटकोण), वृषेश (वृखेश), सन्तोष (सन्तोख) आदि। ८.ध्वनि-लोप : निम्नलिखित अवस्थामे शब्दसँ ध्वनि-लोप भऽ जाइत अछि: (क) क्रियान्वयी प्रत्यय अयमे य वा ए लुप्त भऽ जाइत अछि। ओहिमे सँ पहिने अक उच्चारण दीर्घ भऽ जाइत अछि। ओकर आगाँ लोप-सूचक चिह्न वा विकारी (’ / ऽ) लगाओल जाइछ। जेना- पूर्ण रूप : पढ़ए (पढ़य) गेलाह, कए (कय) लेल, उठए (उठय) पड़तौक। अपूर्ण रूप : पढ़’ गेलाह, क’ लेल, उठ’ पड़तौक। पढ़ऽ गेलाह, कऽ लेल, उठऽ पड़तौक। (ख) पूर्वकालिक कृत आय (आए) प्रत्ययमे य (ए) लुप्त भऽ जाइछ, मुदा लोप-सूचक विकारी नहि लगाओल जाइछ। जेना- पूर्ण रूप : खाए (य) गेल, पठाय (ए) देब, नहाए (य) अएलाह। अपूर्ण रूप : खा गेल, पठा देब, नहा अएलाह। (ग) स्त्री प्रत्यय इक उच्चारण क्रियापद, संज्ञा, ओ विशेषण तीनूमे लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना- पूर्ण रूप : दोसरि मालिनि चलि गेलि। अपूर्ण रूप : दोसर मालिन चलि गेल। (घ) वर्तमान कृदन्तक अन्तिम त लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना- पूर्ण रूप : पढ़ैत अछि, बजैत अछि, गबैत अछि। अपूर्ण रूप : पढ़ै अछि, बजै अछि, गबै अछि। (ङ) क्रियापदक अवसान इक, उक, ऐक तथा हीकमे लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना- पूर्ण रूप: छियौक, छियैक, छहीक, छौक, छैक, अबितैक, होइक। अपूर्ण रूप : छियौ, छियै, छही, छौ, छै, अबितै, होइ। (च) क्रियापदीय प्रत्यय न्ह, हु तथा हकारक लोप भऽ जाइछ। जेना- पूर्ण रूप : छन्हि, कहलन्हि, कहलहुँ, गेलह, नहि। अपूर्ण रूप : छनि, कहलनि, कहलौँ, गेलऽ, नइ, नञि, नै। ९.ध्वनि स्थानान्तरण : कोनो-कोनो स्वर-ध्वनि अपना जगहसँ हटि कऽ दोसर ठाम चलि जाइत अछि। खास कऽ ह्रस्व इ आ उक सम्बन्धमे ई बात लागू होइत अछि। मैथिलीकरण भऽ गेल शब्दक मध्य वा अन्तमे जँ ह्रस्व इ वा उ आबए तँ ओकर ध्वनि स्थानान्तरित भऽ एक अक्षर आगाँ आबि जाइत अछि। जेना- शनि (शइन), पानि (पाइन), दालि ( दाइल), माटि (माइट), काछु (काउछ), मासु (माउस) आदि। मुदा तत्सम शब्द सभमे ई निअम लागू नहि होइत अछि। जेना- रश्मिकेँ रइश्म आ सुधांशुकेँ सुधाउंस नहि कहल जा सकैत अछि। १०.हलन्त(्)क प्रयोग : मैथिली भाषामे सामान्यतया हलन्त (्)क आवश्यकता नहि होइत अछि। कारण जे शब्दक अन्तमे अ उच्चारण नहि होइत अछि। मुदा संस्कृत भाषासँ जहिनाक तहिना मैथिलीमे आएल (तत्सम) शब्द सभमे हलन्त प्रयोग कएल जाइत अछि। एहि पोथीमे सामान्यतया सम्पूर्ण शब्दकेँ मैथिली भाषा सम्बन्धी निअम अनुसार हलन्तविहीन राखल गेल अछि। मुदा व्याकरण सम्बन्धी प्रयोजनक लेल अत्यावश्यक स्थानपर कतहु-कतहु हलन्त देल गेल अछि। प्रस्तुत पोथीमे मथिली लेखनक प्राचीन आ नवीन दुनू शैलीक सरल आ समीचीन पक्ष सभकेँ समेटि कऽ वर्ण-विन्यास कएल गेल अछि। स्थान आ समयमे बचतक सङ्गहि हस्त-लेखन तथा तकनीकी दृष्टिसँ सेहो सरल होबऽबला हिसाबसँ वर्ण-विन्यास मिलाओल गेल अछि। वर्तमान समयमे मैथिली मातृभाषी पर्यन्तकेँ आन भाषाक माध्यमसँ मैथिलीक ज्ञान लेबऽ पड़ि रहल परिप्रेक्ष्यमे लेखनमे सहजता तथा एकरूपतापर ध्यान देल गेल अछि। तखन मैथिली भाषाक मूल विशेषता सभ कुण्ठित नहि होइक, ताहू दिस लेखक-मण्डल सचेत अछि। प्रसिद्ध भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक कहब छनि जे सरलताक अनुसन्धानमे एहन अवस्था किन्नहु ने आबऽ देबाक चाही जे भाषाक विशेषता छाँहमे पडि जाए। -(भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक धारणाकेँ पूर्ण रूपसँ सङ्ग लऽ निर्धारित) १.२. मैथिली अकादमी, पटना द्वारा निर्धारित मैथिली लेखन-शैली

१. जे शब्द मैथिली-साहित्यक प्राचीन कालसँ आइ धरि जाहि वर्त्तनीमे प्रचलित अछि, से सामान्यतः ताहि वर्त्तनीमे लिखल जाय- उदाहरणार्थ-

ग्राह्य

एखन ठाम जकर, तकर तनिकर अछि

अग्राह्य अखन, अखनि, एखेन, अखनी ठिमा, ठिना, ठमा जेकर, तेकर तिनकर। (वैकल्पिक रूपेँ ग्राह्य) ऐछ, अहि, ए।

२. निम्नलिखित तीन प्रकारक रूप वैकल्पिकतया अपनाओल जाय: भऽ गेल, भय गेल वा भए गेल। जा रहल अछि, जाय रहल अछि, जाए रहल अछि। कर’ गेलाह, वा करय गेलाह वा करए गेलाह।

३. प्राचीन मैथिलीक ‘न्ह’ ध्वनिक स्थानमे ‘न’ लिखल जाय सकैत अछि यथा कहलनि वा कहलन्हि।

४. ‘ऐ’ तथा ‘औ’ ततय लिखल जाय जत’ स्पष्टतः ‘अइ’ तथा ‘अउ’ सदृश उच्चारण इष्ट हो। यथा- देखैत, छलैक, बौआ, छौक इत्यादि।

५. मैथिलीक निम्नलिखित शब्द एहि रूपे प्रयुक्त होयत: जैह, सैह, इएह, ओऐह, लैह तथा दैह।

६. ह्र्स्व इकारांत शब्दमे ‘इ’ के लुप्त करब सामान्यतः अग्राह्य थिक। यथा- ग्राह्य देखि आबह, मालिनि गेलि (मनुष्य मात्रमे)।

७. स्वतंत्र ह्रस्व ‘ए’ वा ‘य’ प्राचीन मैथिलीक उद्धरण आदिमे तँ यथावत राखल जाय, किंतु आधुनिक प्रयोगमे वैकल्पिक रूपेँ ‘ए’ वा ‘य’ लिखल जाय। यथा:- कयल वा कएल, अयलाह वा अएलाह, जाय वा जाए इत्यादि।

८. उच्चारणमे दू स्वरक बीच जे ‘य’ ध्वनि स्वतः आबि जाइत अछि तकरा लेखमे स्थान वैकल्पिक रूपेँ देल जाय। यथा- धीआ, अढ़ैआ, विआह, वा धीया, अढ़ैया, बियाह।

९. सानुनासिक स्वतंत्र स्वरक स्थान यथासंभव ‘ञ’ लिखल जाय वा सानुनासिक स्वर। यथा:- मैञा, कनिञा, किरतनिञा वा मैआँ, कनिआँ, किरतनिआँ।

१०. कारकक विभक्त्तिक निम्नलिखित रूप ग्राह्य:- हाथकेँ, हाथसँ, हाथेँ, हाथक, हाथमे। ’मे’ मे अनुस्वार सर्वथा त्याज्य थिक। ‘क’ क वैकल्पिक रूप ‘केर’ राखल जा सकैत अछि।

११. पूर्वकालिक क्रियापदक बाद ‘कय’ वा ‘कए’ अव्यय वैकल्पिक रूपेँ लगाओल जा सकैत अछि। यथा:- देखि कय वा देखि कए।

१२. माँग, भाँग आदिक स्थानमे माङ, भाङ इत्यादि लिखल जाय।

१३. अर्द्ध ‘न’ ओ अर्द्ध ‘म’ क बदला अनुसार नहि लिखल जाय, किंतु छापाक सुविधार्थ अर्द्ध ‘ङ’ , ‘ञ’, तथा ‘ण’ क बदला अनुस्वारो लिखल जा सकैत अछि। यथा:- अङ्क, वा अंक, अञ्चल वा अंचल, कण्ठ वा कंठ।

१४. हलंत चिह्न निअमतः लगाओल जाय, किंतु विभक्तिक संग अकारांत प्रयोग कएल जाय। यथा:- श्रीमान्, किंतु श्रीमानक।

१५. सभ एकल कारक चिह्न शब्दमे सटा क’ लिखल जाय, हटा क’ नहि, संयुक्त विभक्तिक हेतु फराक लिखल जाय, यथा घर परक।

१६. अनुनासिककेँ चन्द्रबिन्दु द्वारा व्यक्त कयल जाय। परंतु मुद्रणक सुविधार्थ हि समान जटिल मात्रापर अनुस्वारक प्रयोग चन्द्रबिन्दुक बदला कयल जा सकैत अछि। यथा- हिँ केर बदला हिं।

१७. पूर्ण विराम पासीसँ ( । ) सूचित कयल जाय।

१८. समस्त पद सटा क’ लिखल जाय, वा हाइफेनसँ जोड़ि क’ ,  हटा क’ नहि।

१९. लिअ तथा दिअ शब्दमे बिकारी (ऽ) नहि लगाओल जाय।

२०. अंक देवनागरी रूपमे राखल जाय।

२१.किछु ध्वनिक लेल नवीन चिन्ह बनबाओल जाय। जा' ई नहि बनल अछि ताबत एहि दुनू ध्वनिक बदला पूर्ववत् अय/ आय/ अए/ आए/ आओ/ अओ लिखल जाय। आकि ऎ वा ऒ सँ व्यक्त कएल जाय।

ह./- गोविन्द झा ११/८/७६ श्रीकान्त ठाकुर ११/८/७६ सुरेन्द्र झा "सुमन" ११/०८/७६

  २. मैथिलीमे भाषा सम्पादन पाठ्यक्रम २.१. उच्चारण निर्देश: (बोल्ड कएल रूप ग्राह्य):- दन्त न क उच्चारणमे दाँतमे जीह सटत- जेना बाजू नाम , मुदा ण क उच्चारणमे जीह मूर्धामे सटत (नै सटैए तँ उच्चारण दोष अछि)- जेना बाजू गणेश। तालव्य शमे जीह तालुसँ , षमे मूर्धासँ आ दन्त समे दाँतसँ सटत। निशाँ, सभ आ शोषण बाजि कऽ देखू। मैथिलीमे ष केँ वैदिक संस्कृत जकाँ ख सेहो उच्चरित कएल जाइत अछि, जेना वर्षा, दोष। य अनेको स्थानपर ज जकाँ उच्चरित होइत अछि आ ण ड़ जकाँ (यथा संयोग आ गणेश संजोग आ गड़ेस उच्चरित होइत अछि)। मैथिलीमे व क उच्चारण ब, श क उच्चारण स आ य क उच्चारण ज सेहो होइत अछि। ओहिना ह्रस्व इ बेशीकाल मैथिलीमे पहिने बाजल जाइत अछि कारण देवनागरीमे आ मिथिलाक्षरमे ह्रस्व इ अक्षरक पहिने लिखलो जाइत आ बाजलो जएबाक चाही। कारण जे हिन्दीमे एकर दोषपूर्ण उच्चारण होइत अछि (लिखल तँ पहिने जाइत अछि मुदा बाजल बादमे जाइत अछि), से शिक्षा पद्धतिक दोषक कारण हम सभ ओकर उच्चारण दोषपूर्ण ढंगसँ कऽ रहल छी। अछि- अ इ छ  ऐछ (उच्चारण) छथि- छ इ थ  – छैथ (उच्चारण) पहुँचि- प हुँ इ च (उच्चारण) आब अ आ इ ई ए ऐ ओ औ अं अः ऋ ऐ सभ लेल मात्रा सेहो अछि, मुदा ऐमे ई ऐ ओ औ अं अः ऋ केँ संयुक्ताक्षर रूपमे गलत रूपमे प्रयुक्त आ उच्चरित कएल जाइत अछि। जेना ऋ केँ री  रूपमे उच्चरित करब। आ देखियौ- ऐ लेल देखिऔ क प्रयोग अनुचित। मुदा देखिऐ लेल देखियै अनुचित। क् सँ ह् धरि अ सम्मिलित भेलासँ क सँ ह बनैत अछि, मुदा उच्चारण काल हलन्त युक्त शब्दक अन्तक उच्चारणक प्रवृत्ति बढ़ल अछि, मुदा हम जखन मनोजमे ज् अन्तमे बजैत छी, तखनो पुरनका लोककेँ बजैत सुनबन्हि- मनोजऽ, वास्तवमे ओ अ युक्त ज् = ज बजै छथि। फेर ज्ञ अछि ज् आ ञ क संयुक्त मुदा गलत उच्चारण होइत अछि- ग्य। ओहिना क्ष अछि क् आ ष क संयुक्त मुदा उच्चारण होइत अछि छ। फेर श् आ र क संयुक्त अछि श्र ( जेना श्रमिक) आ स् आ र क संयुक्त अछि स्र (जेना मिस्र)। त्र भेल त+र । उच्चारणक ऑडियो फाइल विदेह आर्काइव  http://www.videha.co.in/ पर उपलब्ध अछि। फेर केँ / सँ / पर पूर्व अक्षरसँ सटा कऽ लिखू मुदा तँ / कऽ हटा कऽ। ऐमे सँ मे पहिल सटा कऽ लिखू आ बादबला हटा कऽ। अंकक बाद टा लिखू सटा कऽ मुदा अन्य ठाम टा लिखू हटा कऽ– जेना छहटा मुदा सभ टा। फेर ६अ म सातम लिखू- छठम सातम नै। घरबलामे बला मुदा घरवालीमे वाली प्रयुक्त करू। रहए- रहै मुदा सकैए (उच्चारण सकै-ए)। मुदा कखनो काल रहए आ रहै मे अर्थ भिन्नता सेहो, जेना से कम्मो जगहमे पार्किंग करबाक अभ्यास रहै ओकरा। पुछलापर पता लागल जे ढुनढुन नाम्ना ई ड्राइवर कनाट प्लेसक पार्किंगमे काज करैत रहए। छलै, छलए मे सेहो ऐ तरहक भेल। छलए क उच्चारण छल-ए सेहो। संयोगने- (उच्चारण संजोगने) केँ/  कऽ केर- क ( केर क प्रयोग गद्यमे नै करू , पद्यमे कऽ सकै छी। ) क (जेना रामक) –रामक आ संगे (उच्चारण राम के /  राम कऽ सेहो) सँ- सऽ (उच्चारण) चन्द्रबिन्दु आ अनुस्वार- अनुस्वारमे कंठ धरिक प्रयोग होइत अछि मुदा चन्द्रबिन्दुमे नै। चन्द्रबिन्दुमे कनेक एकारक सेहो उच्चारण होइत अछि- जेना रामसँ- (उच्चारण राम सऽ)  रामकेँ- (उच्चारण राम कऽ/ राम के सेहो)। केँ जेना रामकेँ भेल हिन्दीक को (राम को)- राम को= रामकेँ क जेना रामक भेल हिन्दीक का ( राम का) राम का= रामक कऽ जेना जा कऽ भेल हिन्दीक कर ( जा कर) जा कर= जा कऽ सँ भेल हिन्दीक से (राम से) राम से= रामसँ सऽ , तऽ , त , केर (गद्यमे) एे चारू शब्द सबहक प्रयोग अवांछित। के दोसर अर्थेँ प्रयुक्त भऽ सकैए- जेना, के कहलक? विभक्ति “क”क बदला एकर प्रयोग अवांछित। नञि, नहि, नै, नइ, नँइ, नइँ, नइं ऐ सभक उच्चारण आ लेखन - नै त्त्व क बदलामे त्व जेना महत्वपूर्ण (महत्त्वपूर्ण नै) जतए अर्थ बदलि जाए ओतहि मात्र तीन अक्षरक संयुक्ताक्षरक प्रयोग उचित। सम्पति- उच्चारण स म्प इ त (सम्पत्ति नै- कारण सही उच्चारण आसानीसँ सम्भव नै)। मुदा सर्वोत्तम (सर्वोतम नै)। राष्ट्रिय (राष्ट्रीय नै) सकैए/ सकै (अर्थ परिवर्तन) पोछैले/ पोछै लेल/ पोछए लेल पोछैए/ पोछए/ (अर्थ परिवर्तन) पोछए/ पोछै ओ लोकनि ( हटा कऽ, ओ मे बिकारी नै) ओइ/ ओहि ओहिले/ ओहि लेल/ ओही लऽ जएबेँ/ बैसबेँ पँचभइयाँ देखियौक/ (देखिऔक नै- तहिना अ मे ह्रस्व आ दीर्घक मात्राक प्रयोग अनुचित) जकाँ / जेकाँ तँइ/ तैँ/ होएत / हएत नञि/ नहि/ नँइ/ नइँ/ नै सौँसे/ सौंसे बड़ / बड़ी (झोराओल) गाए (गाइ नहि), मुदा गाइक दूध (गाएक दूध नै।) रहलेँ/ पहिरतैँ हमहीं/ अहीं सब - सभ सबहक - सभहक धरि - तक गप- बात बूझब - समझब बुझलौं/ समझलौं/ बुझलहुँ - समझलहुँ हमरा आर - हम सभ आकि- आ कि सकैछ/ करैछ (गद्यमे प्रयोगक आवश्यकता नै) होइन/ होनि जाइन (जानि नै, जेना देल जाइन) मुदा जानि-बूझि (अर्थ परिव्र्तन) पइठ/ जाइठ आउ/ जाउ/ आऊ/ जाऊ मे, केँ, सँ, पर (शब्दसँ सटा कऽ) तँ कऽ धऽ दऽ (शब्दसँ हटा कऽ) मुदा दूटा वा बेसी विभक्ति संग रहलापर पहिल विभक्ति टाकेँ सटाऊ। जेना ऐमे सँ । एकटा , दूटा (मुदा कए टा) बिकारीक प्रयोग शब्दक अन्तमे, बीचमे अनावश्यक रूपेँ नै। आकारान्त आ अन्तमे अ क बाद बिकारीक प्रयोग नै (जेना दिअ , आ/ दिय’ , आ’, आ नै ) अपोस्ट्रोफीक प्रयोग बिकारीक बदलामे करब अनुचित आ मात्र फॉन्टक तकनीकी न्यूनताक परिचायक)- ओना बिकारीक संस्कृत रूप ऽ अवग्रह कहल जाइत अछि आ वर्तनी आ उच्चारण दुनू ठाम एकर लोप रहैत अछि/ रहि सकैत अछि (उच्चारणमे लोप रहिते अछि)। मुदा अपोस्ट्रोफी सेहो अंग्रेजीमे पसेसिव केसमे होइत अछि आ फ्रेंचमे शब्दमे जतए एकर प्रयोग होइत अछि जेना raison d’etre एतए सेहो एकर उच्चारण रैजौन डेटर होइत अछि, माने अपोस्ट्रॉफी अवकाश नै दैत अछि वरन जोड़ैत अछि, से एकर प्रयोग बिकारीक बदला देनाइ तकनीकी रूपेँ सेहो अनुचित)। अइमे, एहिमे/ ऐमे जइमे, जाहिमे एखन/ अखन/ अइखन केँ (के नहि) मे (अनुस्वार रहित) भऽ मे दऽ तँ (तऽ, त नै) सँ ( सऽ स नै) गाछ तर गाछ लग साँझ खन जो (जो go, करै जो do) तै/तइ जेना- तै दुआरे/ तइमे/ तइले जै/जइ जेना- जै कारण/ जइसँ/ जइले ऐ/अइ जेना- ऐ कारण/ ऐसँ/ अइले/ मुदा एकर एकटा खास प्रयोग- लालति‍ कतेक दि‍नसँ कहैत रहैत अइ लै/लइ जेना लैसँ/ लइले/ लै दुआरे लहँ/ लौं गेलौं/ लेलौं/ लेलँह/ गेलहुँ/ लेलहुँ/ लेलँ जइ/ जाहि‍/ जै जहि‍ठाम/ जाहि‍ठाम/ जइठाम/ जैठाम एहि‍/ अहि‍/ अइ (वाक्यक अंतमे ग्राह्य) / ऐ अइछ/ अछि‍/ ऐछ तइ/ तहि‍/ तै/ ताहि‍ ओहि‍/ ओइ सीखि‍/ सीख जीवि‍/ जीवी/ जीब भलेहीं/ भलहि‍ं तैं/ तँइ/ तँए जाएब/ जएब लइ/ लै छइ/ छै नहि‍/ नै/ नइ गइ/ गै छनि‍/ छन्‍हि‍  ... समए शब्‍दक संग जखन कोनो वि‍भक्‍ति‍ जुटै छै तखन समै जना समैपर इत्‍यादि‍। असगरमे हृदए आ वि‍भक्‍ति‍ जुटने हृदे जना हृदेसँ, हृदेमे इत्‍यादि‍। जइ/ जाहि‍/ जै जहि‍ठाम/ जाहि‍ठाम/ जइठाम/ जैठाम एहि‍/ अहि‍/ अइ/ ऐ अइछ/ अछि‍/ ऐछ तइ/ तहि‍/ तै/ ताहि‍ ओहि‍/ ओइ सीखि‍/ सीख जीवि‍/ जीवी/ जीब भले/ भलेहीं/ भलहि‍ं तैं/ तँइ/ तँए जाएब/ जएब लइ/ लै छइ/ छै नहि‍/ नै/ नइ गइ/ गै छनि‍/ छन्‍हि‍ चुकल अछि/ गेल गछि २.२. मैथिलीमे भाषा सम्पादन पाठ्यक्रम नीचाँक सूचीमे देल विकल्पमेसँ लैंगुएज एडीटर द्वारा कोन रूप चुनल जेबाक चाही: बोल्ड कएल रूप ग्राह्य: १.होयबला/ होबयबला/ होमयबला/ हेब’बला, हेम’बला/ होयबाक/होबएबला /होएबाक २. आ’/आऽ आ ३. क’ लेने/कऽ लेने/कए लेने/कय लेने/ल’/लऽ/लय/लए ४. भ’ गेल/भऽ गेल/भय गेल/भए गेल ५. कर’ गेलाह/करऽ गेलह/करए गेलाह/करय गेलाह ६. लिअ/दिअ लिय’,दिय’,लिअ’,दिय’/ ७. कर’ बला/करऽ बला/ करय बला करैबला/क’र’ बला / करैवाली ८. बला वला (पुरूष), वाली (स्‍त्री) ९ . आङ्ल आंग्ल १०. प्रायः प्रायह ११. दुःख दुख १ २. चलि गेल चल गेल/चैल गेल १३. देलखिन्ह देलकिन्ह, देलखिन १४. देखलन्हि देखलनि/ देखलैन्ह १५. छथिन्ह/ छलन्हि छथिन/ छलैन/ छलनि १६. चलैत/दैत चलति/दैति १७. एखनो अखनो १८. बढ़नि‍ बढ़इन बढ़न्हि १९. ओ’/ओऽ(सर्वनाम) ओ २० . ओ (संयोजक) ओ’/ओऽ २१. फाँगि/फाङ्गि फाइंग/फाइङ २२. जे जे’/जेऽ २३. ना-नुकुर ना-नुकर २४. केलन्हि/केलनि‍/कयलन्हि २५. तखनतँ/ तखन तँ २६. जा रहल/जाय रहल/जाए रहल २७. निकलय/निकलए लागल/ लगल बहराय/ बहराए लागल/ लगल निकल’/बहरै लागल २८. ओतय/ जतय जत’/ ओत’/ जतए/ ओतए २९. की फूरल जे कि फूरल जे ३०. जे जे’/जेऽ ३१. कूदि / यादि(मोन पारब) कूइद/याइद/कूद/याद/ यादि (मोन) ३२. इहो/ ओहो ३३. हँसए/ हँसय हँसऽ ३४. नौ आकि दस/नौ किंवा दस/ नौ वा दस ३५. सासु-ससुर सास-ससुर ३६. छह/ सात छ/छः/सात ३७. की  की’/ कीऽ (दीर्घीकारान्तमे ऽ वर्जित) ३८. जबाब जवाब ३९. करएताह/ करेताह करयताह ४०. दलान दिशि दलान दिश/दलान दिस ४१ . गेलाह गएलाह/गयलाह ४२. किछु आर/ किछु और/ किछ आर ४३. जाइ छल/ जाइत छल जाति छल/जैत छल ४४. पहुँचि/ भेट जाइत छल/ भेट जाइ छलए पहुँच/ भेटि‍ जाइत छल ४५. जबान (युवा)/ जवान(फौजी) ४६. लय/ लए क’/ कऽ/ लए कए / लऽ कऽ/ लऽ कए ४७. ल’/लऽ कय/ कए ४८. एखन / एखने / अखन / अखने ४९. अहींकेँ अहीँकेँ ५०. गहींर गहीँर ५१. धार पार केनाइ धार पार केनाय/केनाए ५२. जेकाँ जेँकाँ/ जकाँ ५३. तहिना तेहिना ५४. एकर अकर ५५. बहिनउ बहनोइ ५६. बहिन बहिनि ५७. बहिन-बहिनोइ बहिन-बहनउ ५८. नहि/ नै ५९. करबा / करबाय/ करबाए ६०. तँ/ त ऽ तय/तए ६१. भैयारी मे छोट-भाए/भै/, जेठ-भाय/भाइ, ६२. गि‍नतीमे दू भाइ/भाए/भाँइ ६३. ई पोथी दू भाइक/ भाँइ/ भाए/ लेल। यावत जावत ६४. माय मै / माए मुदा माइक ममता ६५. देन्हि/ दइन दनि‍/ दएन्हि/ दयन्हि दन्हि/ दैन्हि ६६. द’/ दऽ/ दए ६७. ओ (संयोजक) ओऽ (सर्वनाम) ६८. तका कए तकाय तकाए ६९. पैरे (on foot) पएरे  कएक/ कैक ७०. ताहुमे/ ताहूमे ७१. पुत्रीक ७२. बजा कय/ कए / कऽ ७३. बननाय/बननाइ ७४. कोला ७५. दिनुका दिनका ७६. ततहिसँ ७७. गरबओलन्हि/ गरबौलनि‍/ गरबेलन्हि/ गरबेलनि‍ ७८. बालु बालू ७९. चेन्ह चिन्ह(अशुद्ध) ८०. जे जे’ ८१ . से/ के से’/के’ ८२. एखुनका अखनुका ८३. भुमिहार भूमिहार ८४. सुग्गर / सुगरक/ सूगर ८५. झठहाक झटहाक ८६. छूबि ८७. करइयो/ओ करैयो ने देलक /करियौ-करइयौ ८८. पुबारि पुबाइ ८९. झगड़ा-झाँटी झगड़ा-झाँटि ९०. पएरे-पएरे पैरे-पैरे ९१. खेलएबाक ९२. खेलेबाक ९३. लगा ९४. होए- हो – होअए ९५. बुझल बूझल ९६. बूझल (संबोधन अर्थमे) ९७. यैह यएह / इएह/ सैह/ सएह ९८. तातिल ९९. अयनाय- अयनाइ/ अएनाइ/ एनाइ १००. निन्न- निन्द १०१. बिनु बिन १०२. जाए जाइ १०३. जाइ (in different sense)-last word of sentence १०४. छत पर आबि जाइ १०५. ने १०६. खेलाए (play) –खेलाइ १०७. शिकाइत- शिकायत १०८. ढप- ढ़प १०९ . पढ़- पढ ११०. कनिए/ कनिये कनिञे १११. राकस- राकश ११२. होए/ होय होइ ११३. अउरदा- औरदा ११४. बुझेलन्हि (different meaning- got understand) ११५. बुझएलन्हि/बुझेलनि‍/ बुझयलन्हि (understood himself) ११६. चलि- चल/ चलि‍ गेल ११७. खधाइ- खधाय ११८. मोन पाड़लखिन्ह/ मोन पाड़लखि‍न/ मोन पारलखिन्ह ११९. कैक- कएक- कइएक १२०. लग ल’ग १२१. जरेनाइ १२२. जरौनाइ जरओनाइ- जरएनाइ/ जरेनाइ १२३. होइत १२४. गरबेलन्हि/ गरबेलनि‍ गरबौलन्हि/ गरबौलनि‍ १२५. चिखैत- (to test)चिखइत १२६. करइयो (willing to do) करैयो १२७. जेकरा- जकरा १२८. तकरा- तेकरा १२९. बिदेसर स्थानेमे/ बिदेसरे स्थानमे १३०. करबयलहुँ/ करबएलहुँ/ करबेलहुँ करबेलौं १३१. हारिक (उच्चारण हाइरक) १३२. ओजन वजन आफसोच/ अफसोस कागत/ कागच/ कागज १३३. आधे भाग/ आध-भागे १३४. पिचा / पिचाय/पिचाए १३५. नञ/ ने १३६. बच्चा नञ (ने) पिचा जाय १३७. तखन ने (नञ) कहैत अछि। कहै/ सुनै/ देखै छल मुदा कहैत-कहैत/ सुनैत-सुनैत/ देखैत-देखैत १३८. कतेक गोटे/ कताक गोटे १३९. कमाइ-धमाइ/ कमाई- धमाई १४० . लग ल’ग १४१. खेलाइ (for playing) १४२. छथिन्ह/ छथिन १४३. होइत होइ १४४. क्यो कियो / केओ १४५. केश (hair) १४६. केस (court-case) १४७ . बननाइ/ बननाय/ बननाए १४८. जरेनाइ १४९. कुरसी कुर्सी १५०. चरचा चर्चा १५१. कर्म करम १५२. डुबाबए/ डुबाबै/ डुमाबै डुमाबय/ डुमाबए १५३. एखुनका/ अखुनका १५४. लए/ लिअए (वाक्यक अंतिम शब्द)- लऽ १५५. कएलक/ केलक १५६. गरमी गर्मी १५७ . वरदी वर्दी १५८. सुना गेलाह सुना’/सुनाऽ १५९. एनाइ-गेनाइ १६०. तेना ने घेरलन्हि/ तेना ने घेरलनि‍ १६१. नञि / नै १६२. डरो ड’रो १६३. कतहु/ कतौ कहीं १६४. उमरिगर-उमेरगर उमरगर १६५. भरिगर १६६. धोल/धोअल धोएल १६७. गप/गप्प १६८. के के’ १६९. दरबज्जा/ दरबजा १७०. ठाम १७१. धरि तक १७२. घूरि लौटि १७३. थोरबेक १७४. बड्ड १७५. तोँ/ तूँ १७६. तोँहि( पद्यमे ग्राह्य) १७७. तोँही / तोँहि १७८. करबाइए करबाइये १७९. एकेटा १८०. करितथि /करतथि १८१. पहुँचि/ पहुँच १८२. राखलन्हि रखलन्हि/ रखलनि‍ १८३. लगलन्हि/ लगलनि‍ लागलन्हि १८४. सुनि (उच्चारण सुइन) १८५. अछि (उच्चारण अइछ) १८६. एलथि गेलथि १८७. बितओने/ बि‍तौने/ बितेने १८८. करबओलन्हि/ करबौलनि‍/ करेलखिन्ह/ करेलखि‍न १८९. करएलन्हि/ करेलनि‍ १९०. आकि/ कि १९१. पहुँचि/ पहुँच १९२. बत्ती जराय/ जराए जरा (आगि लगा) १९३. से से’ १९४. हाँ मे हाँ (हाँमे हाँ विभक्त्तिमे हटा कए) १९५. फेल फैल १९६. फइल(spacious) फैल १९७. होयतन्हि/ होएतन्हि/ होएतनि‍/हेतनि‍/ हेतन्हि १९८. हाथ मटिआएब/ हाथ मटियाबय/हाथ मटियाएब १९९. फेका फेंका २००. देखाए देखा २०१. देखाबए २०२. सत्तरि सत्तर २०३. साहेब साहब २०४.गेलैन्ह/ गेलन्हि/ गेलनि‍ २०५. हेबाक/ होएबाक २०६.केलो/ कएलहुँ/केलौं/ केलुँ २०७. किछु न किछु/ किछु ने किछु २०८.घुमेलहुँ/ घुमओलहुँ/ घुमेलौं २०९. एलाक/ अएलाक २१०. अः/ अह २११.लय/ लए (अर्थ-परिवर्त्तन) २१२.कनीक/ कनेक २१३.सबहक/ सभक २१४.मिलाऽ/ मिला २१५.कऽ/ क २१६.जाऽ/ जा २१७.आऽ/ आ २१८.भऽ /भ’ (’ फॉन्टक कमीक द्योतक) २१९.निअम/ नियम २२० .हेक्टेअर/ हेक्टेयर २२१.पहिल अक्षर ढ/ बादक/ बीचक ढ़ २२२.तहिं/तहिँ/ तञि/ तैं २२३.कहिं/ कहीं २२४.तँइ/ तैं / तइँ २२५.नँइ/ नइँ/  नञि/ नहि/नै २२६.है/ हए / एलीहेँ/ २२७.छञि/ छै/ छैक /छइ २२८.दृष्टिएँ/ दृष्टियेँ २२९.आ (come)/ आऽ(conjunction) २३०. आ (conjunction)/ आऽ(come) २३१.कुनो/ कोनो, कोना/केना २३२.गेलैन्ह-गेलन्हि-गेलनि‍ २३३.हेबाक- होएबाक २३४.केलौँ- कएलौँ-कएलहुँ/केलौं २३५.किछु न किछ- किछु ने किछु २३६.केहेन- केहन २३७.आऽ (come)-आ (conjunction-and)/आ। आब'-आब' /आबह-आबह २३८. हएत-हैत २३९.घुमेलहुँ-घुमएलहुँ- घुमेलाें २४०.एलाक- अएलाक २४१.होनि- होइन/ होन्हि/ २४२.ओ-राम ओ श्यामक बीच(conjunction), ओऽ कहलक (he said)/ओ २४३.की हए/ कोसी अएली हए/ की है। की हइ २४४.दृष्टिएँ/ दृष्टियेँ २४५ .शामिल/ सामेल २४६.तैँ / तँए/ तञि/ तहिं २४७.जौं / ज्योँ/ जँ/ २४८.सभ/ सब २४९.सभक/ सबहक २५०.कहिं/ कहीं २५१.कुनो/ कोनो/ कोनहुँ/ २५२.फारकती भऽ गेल/ भए गेल/ भय गेल २५३.कोना/ केना/ कन्‍ना/कना २५४.अः/ अह २५५.जनै/ जनञ २५६.गेलनि‍/ गेलाह (अर्थ परिवर्तन) २५७.केलन्हि/ कएलन्हि/ केलनि‍/ २५८.लय/ लए/ लएह (अर्थ परिवर्तन) २५९.कनीक/ कनेक/कनी-मनी २६०.पठेलन्हि‍ पठेलनि‍/ पठेलइन/ पपठओलन्हि/ पठबौलनि‍/ २६१.निअम/ नियम २६२.हेक्टेअर/ हेक्टेयर २६३.पहिल अक्षर रहने ढ/ बीचमे रहने ढ़ २६४.आकारान्तमे बिकारीक प्रयोग उचित नै/ अपोस्ट्रोफीक प्रयोग फान्टक तकनीकी न्यूनताक परिचायक ओकर बदला अवग्रह (बिकारी) क प्रयोग उचित २६५.केर (पद्यमे ग्राह्य) / -क/ कऽ/ के २६६.छैन्हि- छन्हि २६७.लगैए/ लगैये २६८.होएत/ हएत २६९.जाएत/ जएत/ २७०.आएत/ अएत/ आओत २७१ .खाएत/ खएत/ खैत २७२.पिअएबाक/ पिएबाक/पि‍येबाक २७३.शुरु/ शुरुह २७४.शुरुहे/ शुरुए २७५.अएताह/अओताह/ एताह/ औताह २७६.जाहि/ जाइ/ जइ/ जै/ २७७.जाइत/ जैतए/ जइतए २७८.आएल/ अएल २७९.कैक/ कएक २८०.आयल/ अएल/ आएल २८१. जाए/ जअए/ जए (लालति‍ जाए लगलीह।) २८२. नुकएल/ नुकाएल २८३. कठुआएल/ कठुअएल २८४. ताहि/ तै/ तइ २८५. गायब/ गाएब/ गएब २८६. सकै/ सकए/ सकय २८७.सेरा/सरा/ सराए (भात सरा गेल) २८८.कहैत रही/देखैत रही/ कहैत छलौं/ कहै छलौं- अहिना चलैत/ पढ़ैत (पढ़ै-पढ़ैत अर्थ कखनो काल परिवर्तित) - आर बुझै/ बुझैत (बुझै/ बुझै छी, मुदा बुझैत-बुझैत)/ सकैत/ सकै। करैत/ करै। दै/ दैत। छैक/ छै। बचलै/ बचलैक। रखबा/ रखबाक । बिनु/ बिन। रातिक/ रातुक बुझै आ बुझैत केर अपन-अपन जगहपर प्रयोग समीचीन अछि‍। बुझैत-बुझैत आब बुझलि‍ऐ। हमहूँ बुझै छी। २८९. दुआरे/ द्वारे २९०.भेटि/ भेट/ भेँट २९१. खन/ खीन/  खुना (भोर खन/ भोर खीन) २९२.तक/ धरि २९३.गऽ/ गै (meaning different-जनबै गऽ) २९४.सऽ/ सँ (मुदा दऽ, लऽ) २९५.त्त्व,(तीन अक्षरक मेल बदला पुनरुक्तिक एक आ एकटा दोसरक उपयोग) आदिक बदला त्व आदि। महत्त्व/ महत्व/ कर्ता/ कर्त्ता आदिमे त्त संयुक्तक कोनो आवश्यकता मैथिलीमे नै अछि। वक्तव्य २९६.बेसी/ बेशी २९७.बाला/वाला बला/ वला (रहैबला) २९८ .वाली/ (बदलैवाली) २९९.वार्त्ता/ वार्ता ३००. अन्तर्राष्ट्रिय/ अन्तर्राष्ट्रीय ३०१. लेमए/ लेबए ३०२.लमछुरका, नमछुरका ३०२.लागै/ लगै ( भेटैत/ भेटै) ३०३.लागल/ लगल ३०४.हबा/ हवा ३०५.राखलक/ रखलक ३०६.आ (come)/ आ (and) ३०७. पश्चाताप/ पश्चात्ताप ३०८. ऽ केर व्यवहार शब्दक अन्तमे मात्र, यथासंभव बीचमे नै। ३०९.कहैत/ कहै ३१०. रहए (छल)/ रहै (छलै) (meaning different) ३११.तागति/ ताकति ३१२.खराप/ खराब ३१३.बोइन/ बोनि/ बोइनि ३१४.जाठि/ जाइठ ३१५.कागज/ कागच/ कागत ३१६.गिरै (meaning different- swallow)/ गिरए (खसए) ३१७.राष्ट्रिय/ राष्ट्रीय Festivals of Mithila DATE-LIST (year- 2011-12) (१४१९ साल) Marriage Days: Nov.2011- 20,21,23,25,27,30 Dec.2011- 1,5,9 January 2012- 18,19,20,23,25,27,29 Feb.2012- 2,3,8,9,10,16,17,19,23,24,29 March 2012- 1,8,9,12 April 2012- 15,16,18,25,26 June 2012- 8,13,24,25,28,29 Upanayana Days: February 2012- 2,3,24,26 March 2012- 4 April 2012- 1,2,26 June 2012- 22 Dviragaman Din: November 2011- 27,30 December 2011- 1,2,5,7,9,12 February 2012- 22,23,24,26,27,29 March 2012- 1,2,4,5,9,11,12 April 2012- 23,25,26,29 May 2012- 2,3,4,6,7 Mundan Din: December 2011- 1,5 January 201225,26,30 March 2012- 12 April 2012- 26 May 2012- 23,25,31 June 2012- 8,21,22,29 FESTIVALS OF MITHILA Mauna Panchami-20 July Madhushravani- 2 August Nag Panchami- 4 August Raksha Bandhan- 13 Aug Krishnastami- 21 August Kushi Amavasya / Somvari Vrat- 29 August Hartalika Teej- 31 August ChauthChandra-1 September Karma Dharma Ekadashi-8 September Indra Pooja Aarambh- 9 September Anant Caturdashi- 11 Sep Agastyarghadaan- 12 Sep Pitri Paksha begins- 13 Sep Mahalaya Aarambh- 13 September Vishwakarma Pooja- 17 September Jimootavahan Vrata/ Jitia-20 September Matri Navami- 21September Kalashsthapan- 28 September Belnauti- 2 October Patrika Pravesh- 3 October Mahastami- 4 October Maha Navami - 5 October Vijaya Dashami- 6 October Kojagara- 11 Oct Dhanteras- 24 October Diyabati, shyama pooja-26 October Annakoota/ Govardhana Pooja-27  October Bhratridwitiya/ Chitragupta Pooja-28 October Chhathi-kharna -31 October Chhathi- sayankalik arghya - 1 November Devotthan Ekadashi- 17 November Sama poojarambh- 2 November Kartik Poornima/ Sama Bisarjan- 10 Nov ravivratarambh- 27 November Navanna parvan- 29 November Vivaha Panchmi- 29 November Makara/ Teela Sankranti-15 Jan Naraknivaran chaturdashi- 21 January Basant Panchami/ Saraswati Pooja- 28 January Achla Saptmi- 30 January Mahashivaratri-20 February Holikadahan-Fagua-7 March Holi-9 Mar Varuni Yoga-20 March Chaiti  navaratrarambh- 23 March Chaiti Chhathi vrata-29 March Ram Navami- 1 April Mesha Sankranti-Satuani-13 April Jurishital-14 April Akshaya Tritiya-24 April Ravi Brat Ant- 29 April Janaki Navami- 30 April Vat Savitri-barasait- 20 May Ganga Dashhara-30 May Somavati Amavasya Vrata- 18 June Jagannath Rath Yatra- 21 June Hari Sayan Ekadashi- 30 June Aashadhi Guru Poornima-3 Jul VIDEHA ARCHIVE १.विदेह ई-पत्रिकाक सभटा पुरान अंक ब्रेल, तिरहुता आ देवनागरी रूपमे Videha e journal's all old issues in Braille Tirhuta and Devanagari versions विदेह ई-पत्रिकाक पहिल ५० अंक

विदेह ई-पत्रिकाक ५०म सँ आगाँक अंक २.मैथिली पोथी डाउनलोड Maithili Books Download ३.मैथिली ऑडियो संकलन Maithili Audio Downloads ४.मैथिली वीडियोक संकलन Maithili Videos ५.मिथिला चित्रकला/ आधुनिक चित्रकला आ चित्र Mithila Painting/ Modern Art and Photos "विदेह"क एहि सभ सहयोगी लिंकपर सेहो एक बेर जाऊ। ६.विदेह मैथिली क्विज  :  http://videhaquiz.blogspot.com/ ७.विदेह मैथिली जालवृत्त एग्रीगेटर : http://videha-aggregator.blogspot.com/ ८.विदेह मैथिली साहित्य अंग्रेजीमे अनूदित http://madhubani-art.blogspot.com/ ९.विदेहक पूर्व-रूप "भालसरिक गाछ"  : http://gajendrathakur.blogspot.com/ १०.विदेह इंडेक्स  : http://videha123.blogspot.com/ ११.विदेह फाइल : http://videha123.wordpress.com/ १२. विदेह: सदेह : पहिल तिरहुता (मिथिला़क्षर) जालवृत्त (ब्लॉग) http://videha-sadeha.blogspot.com/ १३. विदेह:ब्रेल: मैथिली ब्रेलमे: पहिल बेर विदेह द्वारा http://videha-braille.blogspot.com/ १४.VIDEHA IST MAITHILI  FORTNIGHTLY EJOURNAL ARCHIVE http://videha-archive.blogspot.com/ १५. विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका मैथिली पोथीक आर्काइव http://videha-pothi.blogspot.com/ १६. विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका ऑडियो आर्काइव http://videha-audio.blogspot.com/ १७. विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका वीडियो आर्काइव http://videha-video.blogspot.com/ १८. विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका मिथिला चित्रकला, आधुनिक कला आ चित्रकला http://videha-paintings-photos.blogspot.com/ १९. मैथिल आर मिथिला (मैथिलीक सभसँ लोकप्रिय जालवृत्त) http://maithilaurmithila.blogspot.com/ २०.श्रुति प्रकाशन http://www.shruti-publication.com/ २१.http://groups.google.com/group/videha VIDEHA केर सदस्यता लिअ Top of Form Bottom of Form ईमेल : एहि समूहपर जाऊ २२.http://groups.yahoo.com/group/VIDEHA/ Top of Form Subscribe to VIDEHA Powered by us.groups.yahoo.com Bottom of Form २३.गजेन्द्र ठाकुर इ‍डेक्स http://gajendrathakur123.blogspot.com २४.विदेह रेडियो:मैथिली कथा-कविता आदिक पहिल पोडकास्ट साइट http://videha123radio.wordpress.com/ २५. नेना भुटका http://mangan-khabas.blogspot.com/ महत्त्वपूर्ण सूचना:(१) 'विदेह' द्वारा धारावाहिक रूपे ई-प्रकाशित कएल गेल गजेन्द्र ठाकुरक  निबन्ध-प्रबन्ध-समीक्षा, उपन्यास (सहस्रबाढ़नि) , पद्य-संग्रह (सहस्राब्दीक चौपड़पर), कथा-गल्प (गल्प-गुच्छ), नाटक(संकर्षण), महाकाव्य (त्वञ्चाहञ्च आ असञ्जाति मन) आ बाल-किशोर साहित्य विदेहमे संपूर्ण ई-प्रकाशनक बाद प्रिंट फॉर्ममे। कुरुक्षेत्रम्–अन्तर्मनक खण्ड-१ सँ ७ Combined ISBN No.978-81-907729-7-6 विवरण एहि पृष्ठपर नीचाँमे आ प्रकाशकक साइट http://www.shruti-publication.com/ पर । महत्त्वपूर्ण सूचना (२):सूचना: विदेहक मैथिली-अंग्रेजी आ अंग्रेजी मैथिली कोष (इंटरनेटपर पहिल बेर सर्च-डिक्शनरी) एम.एस. एस.क्यू.एल. सर्वर आधारित -Based on ms-sql server Maithili-English and English-Maithili Dictionary. विदेहक भाषापाक- रचनालेखन स्तंभमे। कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक- गजेन्द्र ठाकुर गजेन्द्र ठाकुरक निबन्ध-प्रबन्ध-समीक्षा, उपन्यास (सहस्रबाढ़नि) , पद्य-संग्रह (सहस्राब्दीक चौपड़पर), कथा-गल्प (गल्प गुच्छ), नाटक(संकर्षण), महाकाव्य (त्वञ्चाहञ्च आ असञ्जाति मन) आ बालमंडली-किशोरजगत विदेहमे संपूर्ण ई-प्रकाशनक बाद प्रिंट फॉर्ममे। कुरुक्षेत्रम्–अन्तर्मनक, खण्ड-१ सँ ७ Ist edition 2009 of Gajendra Thakur’s KuruKshetram-Antarmanak (Vol. I to VII)- essay-paper-criticism, novel, poems, story, play, epics and Children-grown-ups literature in single binding: Language:Maithili ६९२ पृष्ठ : मूल्य भा. रु. 100/-(for individual buyers inside india) (add courier charges Rs.50/-per copy for Delhi/NCR and Rs.100/- per copy for outside Delhi)

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Details for purchase available at print-version publishers's site website: http://www.shruti-publication.com/ or you may write to e-mail:shruti.publication@shruti-publication.com विदेह: सदेह : १: २: ३: ४ तिरहुता : देवनागरी "विदेह" क, प्रिंट संस्करण :विदेह-ई-पत्रिका (http://www.videha.co.in/) क चुनल रचना सम्मिलित। विदेह:सदेह:१: २: ३: ४ सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। Details for purchase available at print-version publishers's site http://www.shruti-publication.com  or you may write to shruti.publication@shruti-publication.com २. संदेश- [ विदेह ई-पत्रिका, विदेह:सदेह मिथिलाक्षर आ देवनागरी आ गजेन्द्र ठाकुरक सात खण्डक- निबन्ध-प्रबन्ध-समीक्षा,उपन्यास (सहस्रबाढ़नि) , पद्य-संग्रह (सहस्राब्दीक चौपड़पर), कथा-गल्प (गल्प गुच्छ), नाटक (संकर्षण), महाकाव्य (त्वञ्चाहञ्च आ असञ्जाति मन) आ बाल-मंडली-किशोर जगत- संग्रह कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक मादेँ। ] १.श्री गोविन्द झा- विदेहकेँ तरंगजालपर उतारि विश्वभरिमे मातृभाषा मैथिलीक लहरि जगाओल, खेद जे अपनेक एहि महाभियानमे हम एखन धरि संग नहि दए सकलहुँ। सुनैत छी अपनेकेँ सुझाओ आ रचनात्मक आलोचना प्रिय लगैत अछि तेँ किछु लिखक मोन भेल। हमर सहायता आ सहयोग अपनेकेँ सदा उपलब्ध रहत। २.श्री रमानन्द रेणु- मैथिलीमे ई-पत्रिका पाक्षिक रूपेँ चला कऽ जे अपन मातृभाषाक प्रचार कऽ रहल छी, से धन्यवाद । आगाँ अपनेक समस्त मैथिलीक कार्यक हेतु हम हृदयसँ शुभकामना दऽ रहल छी। ३.श्री विद्यानाथ झा "विदित"- संचार आ प्रौद्योगिकीक एहि प्रतिस्पर्धी ग्लोबल युगमे अपन महिमामय "विदेह"केँ अपना देहमे प्रकट देखि जतबा प्रसन्नता आ संतोष भेल, तकरा कोनो उपलब्ध "मीटर"सँ नहि नापल जा सकैछ? ..एकर ऐतिहासिक मूल्यांकन आ सांस्कृतिक प्रतिफलन एहि शताब्दीक अंत धरि लोकक नजरिमे आश्चर्यजनक रूपसँ प्रकट हैत। ४. प्रो. उदय नारायण सिंह "नचिकेता"- जे काज अहाँ कए रहल छी तकर चरचा एक दिन मैथिली भाषाक इतिहासमे होएत। आनन्द भए रहल अछि, ई जानि कए जे एतेक गोट मैथिल "विदेह" ई जर्नलकेँ पढ़ि रहल छथि।...विदेहक चालीसम अंक पुरबाक लेल अभिनन्दन। ५. डॉ. गंगेश गुंजन- एहि विदेह-कर्ममे लागि रहल अहाँक सम्वेदनशील मन, मैथिलीक प्रति समर्पित मेहनतिक अमृत रंग, इतिहास मे एक टा विशिष्ट फराक अध्याय आरंभ करत, हमरा विश्वास अछि। अशेष शुभकामना आ बधाइक सङ्ग, सस्नेह...अहाँक पोथी कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक प्रथम दृष्टया बहुत भव्य तथा उपयोगी बुझाइछ। मैथिलीमे तँ अपना स्वरूपक प्रायः ई पहिले एहन  भव्य अवतारक पोथी थिक। हर्षपूर्ण हमर हार्दिक बधाई स्वीकार करी। ६. श्री रामाश्रय झा "रामरंग"(आब स्वर्गीय)- "अपना" मिथिलासँ संबंधित...विषय वस्तुसँ अवगत भेलहुँ।...शेष सभ कुशल अछि। ७. श्री ब्रजेन्द्र त्रिपाठी- साहित्य अकादमी- इंटरनेट पर प्रथम मैथिली पाक्षिक पत्रिका "विदेह" केर लेल बधाई आ शुभकामना स्वीकार करू। ८. श्री प्रफुल्लकुमार सिंह "मौन"- प्रथम मैथिली पाक्षिक पत्रिका "विदेह" क प्रकाशनक समाचार जानि कनेक चकित मुदा बेसी आह्लादित भेलहुँ। कालचक्रकेँ पकड़ि जाहि दूरदृष्टिक परिचय देलहुँ, ओहि लेल हमर मंगलकामना। ९.डॉ. शिवप्रसाद यादव- ई जानि अपार हर्ष भए रहल अछि, जे नव सूचना-क्रान्तिक क्षेत्रमे मैथिली पत्रकारिताकेँ प्रवेश दिअएबाक साहसिक कदम उठाओल अछि। पत्रकारितामे एहि प्रकारक नव प्रयोगक हम स्वागत करैत छी, संगहि "विदेह"क सफलताक शुभकामना। १०. श्री आद्याचरण झा- कोनो पत्र-पत्रिकाक प्रकाशन- ताहूमे मैथिली पत्रिकाक प्रकाशनमे के कतेक सहयोग करताह- ई तऽ भविष्य कहत। ई हमर ८८ वर्षमे ७५ वर्षक अनुभव रहल। एतेक पैघ महान यज्ञमे हमर श्रद्धापूर्ण आहुति प्राप्त होयत- यावत ठीक-ठाक छी/ रहब। ११. श्री विजय ठाकुर- मिशिगन विश्वविद्यालय- "विदेह" पत्रिकाक अंक देखलहुँ, सम्पूर्ण टीम बधाईक पात्र अछि। पत्रिकाक मंगल भविष्य हेतु हमर शुभकामना स्वीकार कएल जाओ। १२. श्री सुभाषचन्द्र यादव- ई-पत्रिका "विदेह" क बारेमे जानि प्रसन्नता भेल। ’विदेह’ निरन्तर पल्लवित-पुष्पित हो आ चतुर्दिक अपन सुगंध पसारय से कामना अछि। १३. श्री मैथिलीपुत्र प्रदीप- ई-पत्रिका "विदेह" केर सफलताक भगवतीसँ कामना। हमर पूर्ण सहयोग रहत। १४. डॉ. श्री भीमनाथ झा- "विदेह" इन्टरनेट पर अछि तेँ "विदेह" नाम उचित आर कतेक रूपेँ एकर विवरण भए सकैत अछि। आइ-काल्हि मोनमे उद्वेग रहैत अछि, मुदा शीघ्र पूर्ण सहयोग देब।कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक देखि अति प्रसन्नता भेल। मैथिलीक लेल ई घटना छी। १५. श्री रामभरोस कापड़ि "भ्रमर"- जनकपुरधाम- "विदेह" ऑनलाइन देखि रहल छी। मैथिलीकेँ अन्तर्राष्ट्रीय जगतमे पहुँचेलहुँ तकरा लेल हार्दिक बधाई। मिथिला रत्न सभक संकलन अपूर्व। नेपालोक सहयोग भेटत, से विश्वास करी। १६. श्री राजनन्दन लालदास- "विदेह" ई-पत्रिकाक माध्यमसँ बड़ नीक काज कए रहल छी, नातिक अहिठाम देखलहुँ। एकर वार्षिक अ‍ंक जखन प्रिं‍ट निकालब तँ हमरा पठायब। कलकत्तामे बहुत गोटेकेँ हम साइटक पता लिखाए देने छियन्हि। मोन तँ होइत अछि जे दिल्ली आबि कए आशीर्वाद दैतहुँ, मुदा उमर आब बेशी भए गेल। शुभकामना देश-विदेशक मैथिलकेँ जोड़बाक लेल।.. उत्कृष्ट प्रकाशन कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक लेल बधाइ। अद्भुत काज कएल अछि, नीक प्रस्तुति अछि सात खण्डमे।  मुदा अहाँक सेवा आ से निःस्वार्थ तखन बूझल जाइत जँ अहाँ द्वारा प्रकाशित पोथी सभपर दाम लिखल नहि रहितैक। ओहिना सभकेँ विलहि देल जइतैक। (स्पष्टीकरण-  श्रीमान्, अहाँक सूचनार्थ विदेह द्वारा ई-प्रकाशित कएल सभटा सामग्री आर्काइवमे https://sites.google.com/a/videha.com/videha-pothi/ पर बिना मूल्यक डाउनलोड लेल उपलब्ध छै आ भविष्यमे सेहो रहतैक। एहि आर्काइवकेँ जे कियो प्रकाशक अनुमति लऽ कऽ प्रिंट रूपमे प्रकाशित कएने छथि आ तकर ओ दाम रखने छथि ताहिपर हमर कोनो नियंत्रण नहि अछि।- गजेन्द्र ठाकुर)...   अहाँक प्रति अशेष शुभकामनाक संग। १७. डॉ. प्रेमशंकर सिंह- अहाँ मैथिलीमे इंटरनेटपर पहिल पत्रिका "विदेह" प्रकाशित कए अपन अद्भुत मातृभाषानुरागक परिचय देल अछि, अहाँक निःस्वार्थ मातृभाषानुरागसँ प्रेरित छी, एकर निमित्त जे हमर सेवाक प्रयोजन हो, तँ सूचित करी। इंटरनेटपर आद्योपांत पत्रिका देखल, मन प्रफुल्लित भऽ गेल। १८.श्रीमती शेफालिका वर्मा- विदेह ई-पत्रिका देखि मोन उल्लाससँ भरि गेल। विज्ञान कतेक प्रगति कऽ रहल अछि...अहाँ सभ अनन्त आकाशकेँ भेदि दियौ, समस्त विस्तारक रहस्यकेँ तार-तार कऽ दियौक...। अपनेक अद्भुत पुस्तक कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक विषयवस्तुक दृष्टिसँ गागरमे सागर अछि। बधाई। १९.श्री हेतुकर झा, पटना-जाहि समर्पण भावसँ अपने मिथिला-मैथिलीक सेवामे तत्पर छी से स्तुत्य अछि। देशक राजधानीसँ भय रहल मैथिलीक शंखनाद मिथिलाक गाम-गाममे मैथिली चेतनाक विकास अवश्य करत। २०. श्री योगानन्द झा, कबिलपुर, लहेरियासराय- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पोथीकेँ निकटसँ देखबाक अवसर भेटल अछि आ मैथिली जगतक एकटा उद्भट ओ समसामयिक दृष्टिसम्पन्न हस्ताक्षरक कलमबन्द परिचयसँ आह्लादित छी। "विदेह"क देवनागरी सँस्करण पटनामे रु. 80/- मे उपलब्ध भऽ सकल जे विभिन्न लेखक लोकनिक छायाचित्र, परिचय पत्रक ओ रचनावलीक सम्यक प्रकाशनसँ ऐतिहासिक कहल जा सकैछ। २१. श्री किशोरीकान्त मिश्र- कोलकाता- जय मैथिली, विदेहमे बहुत रास कविता, कथा, रिपोर्ट आदिक सचित्र संग्रह देखि आ आर अधिक प्रसन्नता मिथिलाक्षर देखि- बधाई स्वीकार कएल जाओ। २२.श्री जीवकान्त- विदेहक मुद्रित अंक पढ़ल- अद्भुत मेहनति। चाबस-चाबस। किछु समालोचना मरखाह..मुदा सत्य। २३. श्री भालचन्द्र झा- अपनेक कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक देखि बुझाएल जेना हम अपने छपलहुँ अछि। एकर विशालकाय आकृति अपनेक सर्वसमावेशताक परिचायक अछि। अपनेक रचना सामर्थ्यमे उत्तरोत्तर वृद्धि हो, एहि शुभकामनाक संग हार्दिक बधाई। २४.श्रीमती डॉ नीता झा- अहाँक कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़लहुँ। ज्योतिरीश्वर शब्दावली, कृषि मत्स्य शब्दावली आ सीत बसन्त आ सभ कथा, कविता, उपन्यास, बाल-किशोर साहित्य सभ उत्तम छल। मैथिलीक उत्तरोत्तर विकासक लक्ष्य दृष्टिगोचर होइत अछि। २५.श्री मायानन्द मिश्र- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक मे हमर उपन्यास स्त्रीधनक जे विरोध कएल गेल अछि तकर हम विरोध करैत छी।... कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पोथीक लेल शुभकामना।(श्रीमान् समालोचनाकेँ विरोधक रूपमे नहि लेल जाए।-गजेन्द्र ठाकुर) २६.श्री महेन्द्र हजारी- सम्पादक श्रीमिथिला- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़ि मोन हर्षित भऽ गेल..एखन पूरा पढ़यमे बहुत समय लागत, मुदा जतेक पढ़लहुँ से आह्लादित कएलक। २७.श्री केदारनाथ चौधरी- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक अद्भुत लागल, मैथिली साहित्य लेल ई पोथी एकटा प्रतिमान बनत। २८.श्री सत्यानन्द पाठक- विदेहक हम नियमित पाठक छी। ओकर स्वरूपक प्रशंसक छलहुँ। एम्हर अहाँक लिखल - कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक देखलहुँ। मोन आह्लादित भऽ उठल। कोनो रचना तरा-उपरी। २९.श्रीमती रमा झा-सम्पादक मिथिला दर्पण। कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक प्रिंट फॉर्म पढ़ि आ एकर गुणवत्ता देखि मोन प्रसन्न भऽ गेल, अद्भुत शब्द एकरा लेल प्रयुक्त कऽ रहल छी। विदेहक उत्तरोत्तर प्रगतिक शुभकामना। ३०.श्री नरेन्द्र झा, पटना- विदेह नियमित देखैत रहैत छी। मैथिली लेल अद्भुत काज कऽ रहल छी। ३१.श्री रामलोचन ठाकुर- कोलकाता- मिथिलाक्षर विदेह देखि मोन प्रसन्नतासँ भरि उठल, अंकक विशाल परिदृश्य आस्वस्तकारी अछि। ३२.श्री तारानन्द वियोगी- विदेह आ कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक देखि चकबिदोर लागि गेल। आश्चर्य। शुभकामना आ बधाई। ३३.श्रीमती प्रेमलता मिश्र “प्रेम”- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़लहुँ। सभ रचना उच्चकोटिक लागल। बधाई। ३४.श्री कीर्तिनारायण मिश्र- बेगूसराय- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक बड्ड नीक लागल, आगांक सभ काज लेल बधाई। ३५.श्री महाप्रकाश-सहरसा- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक नीक लागल, विशालकाय संगहि उत्तमकोटिक। ३६.श्री अग्निपुष्प- मिथिलाक्षर आ देवाक्षर विदेह पढ़ल..ई प्रथम तँ अछि एकरा प्रशंसामे मुदा हम एकरा दुस्साहसिक कहब। मिथिला चित्रकलाक स्तम्भकेँ मुदा अगिला अंकमे आर विस्तृत बनाऊ। ३७.श्री मंजर सुलेमान-दरभंगा- विदेहक जतेक प्रशंसा कएल जाए कम होएत। सभ चीज उत्तम। ३८.श्रीमती प्रोफेसर वीणा ठाकुर- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक उत्तम, पठनीय, विचारनीय। जे क्यो देखैत छथि पोथी प्राप्त करबाक उपाय पुछैत छथि। शुभकामना। ३९.श्री छत्रानन्द सिंह झा- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़लहुँ, बड्ड नीक सभ तरहेँ। ४०.श्री ताराकान्त झा- सम्पादक मैथिली दैनिक मिथिला समाद- विदेह तँ कन्टेन्ट प्रोवाइडरक काज कऽ रहल अछि। कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक अद्भुत लागल। ४१.डॉ रवीन्द्र कुमार चौधरी- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक बहुत नीक, बहुत मेहनतिक परिणाम। बधाई। ४२.श्री अमरनाथ- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक आ विदेह दुनू स्मरणीय घटना अछि, मैथिली साहित्य मध्य। ४३.श्री पंचानन मिश्र- विदेहक वैविध्य आ निरन्तरता प्रभावित करैत अछि, शुभकामना। ४४.श्री केदार कानन- कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक लेल अनेक धन्यवाद, शुभकामना आ बधाइ स्वीकार करी। आ नचिकेताक भूमिका पढ़लहुँ। शुरूमे तँ लागल जेना कोनो उपन्यास अहाँ द्वारा सृजित भेल अछि मुदा पोथी उनटौला पर ज्ञात भेल जे एहिमे तँ सभ विधा समाहित अछि। ४५.श्री धनाकर ठाकुर- अहाँ नीक काज कऽ रहल छी। फोटो गैलरीमे चित्र एहि शताब्दीक जन्मतिथिक अनुसार रहैत तऽ नीक। ४६.श्री आशीष झा- अहाँक पुस्तकक संबंधमे एतबा लिखबा सँ अपना कए नहि रोकि सकलहुँ जे ई किताब मात्र किताब नहि थीक, ई एकटा उम्मीद छी जे मैथिली अहाँ सन पुत्रक सेवा सँ निरंतर समृद्ध होइत चिरजीवन कए प्राप्त करत। ४७.श्री शम्भु कुमार सिंह- विदेहक तत्परता आ क्रियाशीलता देखि आह्लादित भऽ रहल छी। निश्चितरूपेण कहल जा सकैछ जे समकालीन मैथिली पत्रिकाक इतिहासमे विदेहक नाम स्वर्णाक्षरमे लिखल जाएत। ओहि कुरुक्षेत्रक घटना सभ तँ अठारहे दिनमे खतम भऽ गेल रहए मुदा अहाँक कुरुक्षेत्रम् तँ अशेष अछि। ४८.डॉ. अजीत मिश्र- अपनेक प्रयासक कतबो प्रश‍ंसा कएल जाए कमे होएतैक। मैथिली साहित्यमे अहाँ द्वारा कएल गेल काज युग-युगान्तर धरि पूजनीय रहत। ४९.श्री बीरेन्द्र मल्लिक- अहाँक कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक आ विदेह:सदेह पढ़ि अति प्रसन्नता भेल। अहाँक स्वास्थ्य ठीक रहए आ उत्साह बनल रहए से कामना। ५०.श्री कुमार राधारमण- अहाँक दिशा-निर्देशमे विदेह पहिल मैथिली ई-जर्नल देखि अति प्रसन्नता भेल। हमर शुभकामना। ५१.श्री फूलचन्द्र झा प्रवीण-विदेह:सदेह पढ़ने रही मुदा कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक देखि बढ़ाई देबा लेल बाध्य भऽ गेलहुँ। आब विश्वास भऽ गेल जे मैथिली नहि मरत। अशेष शुभकामना। ५२.श्री विभूति आनन्द- विदेह:सदेह देखि, ओकर विस्तार देखि अति प्रसन्नता भेल। ५३.श्री मानेश्वर मनुज-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक एकर भव्यता देखि अति प्रसन्नता भेल, एतेक विशाल ग्रन्थ मैथिलीमे आइ धरि नहि देखने रही। एहिना भविष्यमे काज करैत रही, शुभकामना। ५४.श्री विद्यानन्द झा- आइ.आइ.एम.कोलकाता- कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक विस्तार, छपाईक संग गुणवत्ता देखि अति प्रसन्नता भेल। अहाँक अनेक धन्यवाद; कतेक बरखसँ हम नेयारैत छलहुँ जे सभ पैघ शहरमे मैथिली लाइब्रेरीक स्थापना होअए, अहाँ ओकरा वेबपर कऽ रहल छी, अनेक धन्यवाद। ५५.श्री अरविन्द ठाकुर-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक मैथिली साहित्यमे कएल गेल एहि तरहक पहिल प्रयोग अछि, शुभकामना। ५६.श्री कुमार पवन-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक पढ़ि रहल छी। किछु लघुकथा पढ़ल अछि, बहुत मार्मिक छल। ५७. श्री प्रदीप बिहारी-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक देखल, बधाई। ५८.डॉ मणिकान्त ठाकुर-कैलिफोर्निया- अपन विलक्षण नियमित सेवासँ हमरा लोकनिक हृदयमे विदेह सदेह भऽ गेल अछि। ५९.श्री धीरेन्द्र प्रेमर्षि- अहाँक समस्त प्रयास सराहनीय। दुख होइत अछि जखन अहाँक प्रयासमे अपेक्षित सहयोग नहि कऽ पबैत छी। ६०.श्री देवशंकर नवीन- विदेहक निरन्तरता आ विशाल स्वरूप- विशाल पाठक वर्ग, एकरा ऐतिहासिक बनबैत अछि। ६१.श्री मोहन भारद्वाज- अहाँक समस्त कार्य देखल, बहुत नीक। एखन किछु परेशानीमे छी, मुदा शीघ्र सहयोग देब। ६२.श्री फजलुर रहमान हाशमी-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक मे एतेक मेहनतक लेल अहाँ साधुवादक अधिकारी छी। ६३.श्री लक्ष्मण झा "सागर"- मैथिलीमे चमत्कारिक रूपेँ अहाँक प्रवेश आह्लादकारी अछि।..अहाँकेँ एखन आर..दूर..बहुत दूरधरि जेबाक अछि। स्वस्थ आ प्रसन्न रही। ६४.श्री जगदीश प्रसाद मंडल-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक पढ़लहुँ । कथा सभ आ उपन्यास सहस्रबाढ़नि पूर्णरूपेँ पढ़ि गेल छी। गाम-घरक भौगोलिक विवरणक जे सूक्ष्म वर्णन सहस्रबाढ़निमे अछि, से चकित कएलक, एहि संग्रहक कथा-उपन्यास मैथिली लेखनमे विविधता अनलक अछि। समालोचना शास्त्रमे अहाँक दृष्टि वैयक्तिक नहि वरन् सामाजिक आ कल्याणकारी अछि, से प्रशंसनीय। ६५.श्री अशोक झा-अध्यक्ष मिथिला विकास परिषद- कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक लेल बधाई आ आगाँ लेल शुभकामना। ६६.श्री ठाकुर प्रसाद मुर्मु- अद्भुत प्रयास। धन्यवादक संग प्रार्थना जे अपन माटि-पानिकेँ ध्यानमे राखि अंकक समायोजन कएल जाए। नव अंक धरि प्रयास सराहनीय। विदेहकेँ बहुत-बहुत धन्यवाद जे एहेन सुन्दर-सुन्दर सचार (आलेख) लगा रहल छथि। सभटा ग्रहणीय- पठनीय। ६७.बुद्धिनाथ मिश्र- प्रिय गजेन्द्र जी,अहाँक सम्पादन मे प्रकाशित ‘विदेह’आ ‘कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक’ विलक्षण पत्रिका आ विलक्षण पोथी! की नहि अछि अहाँक सम्पादनमे? एहि प्रयत्न सँ मैथिली क विकास होयत,निस्संदेह। ६८.श्री बृखेश चन्द्र लाल- गजेन्द्रजी, अपनेक पुस्तक कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक पढ़ि मोन गदगद भय गेल , हृदयसँ अनुगृहित छी । हार्दिक शुभकामना । ६९.श्री परमेश्वर कापड़ि - श्री गजेन्द्र जी । कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक पढ़ि गदगद आ नेहाल भेलहुँ। ७०.श्री रवीन्द्रनाथ ठाकुर- विदेह पढ़ैत रहैत छी। धीरेन्द्र प्रेमर्षिक मैथिली गजलपर आलेख पढ़लहुँ। मैथिली गजल कत्तऽ सँ कत्तऽ चलि गेलैक आ ओ अपन आलेखमे मात्र अपन जानल-पहिचानल लोकक चर्च कएने छथि। जेना मैथिलीमे मठक परम्परा रहल अछि। (स्पष्टीकरण- श्रीमान्, प्रेमर्षि जी ओहि आलेखमे ई स्पष्ट लिखने छथि जे किनको नाम जे छुटि गेल छन्हि तँ से मात्र आलेखक लेखकक जानकारी नहि रहबाक द्वारे, एहिमे आन कोनो कारण नहि देखल जाय। अहाँसँ एहि विषयपर विस्तृत आलेख सादर आमंत्रित अछि।-सम्पादक) ७१.श्री मंत्रेश्वर झा- विदेह पढ़ल आ संगहि अहाँक मैगनम ओपस कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक सेहो, अति उत्तम। मैथिलीक लेल कएल जा रहल अहाँक समस्त कार्य अतुलनीय अछि। ७२. श्री हरेकृष्ण झा- कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक मैथिलीमे अपन तरहक एकमात्र ग्रन्थ अछि, एहिमे लेखकक समग्र दृष्टि आ रचना कौशल देखबामे आएल जे लेखकक फील्डवर्कसँ जुड़ल रहबाक कारणसँ अछि। ७३.श्री सुकान्त सोम- कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक मे  समाजक इतिहास आ वर्तमानसँ अहाँक जुड़ाव बड्ड नीक लागल, अहाँ एहि क्षेत्रमे आर आगाँ काज करब से आशा अछि। ७४.प्रोफेसर मदन मिश्र- कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक सन किताब मैथिलीमे पहिले अछि आ एतेक विशाल संग्रहपर शोध कएल जा सकैत अछि। भविष्यक लेल शुभकामना। ७५.प्रोफेसर कमला चौधरी- मैथिलीमे कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक सन पोथी आबए जे गुण आ रूप दुनूमे निस्सन होअए, से बहुत दिनसँ आकांक्षा छल, ओ आब जा कऽ पूर्ण भेल। पोथी एक हाथसँ दोसर हाथ घुमि रहल अछि, एहिना आगाँ सेहो अहाँसँ आशा अछि। ७६.श्री उदय चन्द्र झा "विनोद": गजेन्द्रजी, अहाँ जतेक काज कएलहुँ अछि से मैथिलीमे आइ धरि कियो नहि कएने छल। शुभकामना। अहाँकेँ एखन बहुत काज आर करबाक अछि। ७७.श्री कृष्ण कुमार कश्यप: गजेन्द्र ठाकुरजी, अहाँसँ भेँट एकटा स्मरणीय क्षण बनि गेल। अहाँ जतेक काज एहि बएसमे कऽ गेल छी ताहिसँ हजार गुणा आर बेशीक आशा अछि। ७८.श्री मणिकान्त दास: अहाँक मैथिलीक कार्यक प्रशंसा लेल शब्द नहि भेटैत अछि। अहाँक कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक सम्पूर्ण रूपेँ पढ़ि गेलहुँ। त्वञ्चाहञ्च बड्ड नीक लागल। ७९. श्री हीरेन्द्र कुमार झा- विदेह ई-पत्रिकाक सभ अंक ई-पत्रसँ भेटैत रहैत अछि। मैथिलीक ई-पत्रिका छैक एहि बातक गर्व होइत अछि। अहाँ आ अहाँक सभ सहयोगीकेँ हार्दिक शुभकामना। विदेह मैथिली साहित्य आन्दोलन (c)२००४-११. सर्वाधिकार लेखकाधीन आ जतय लेखकक नाम नहि अछि ततय संपादकाधीन। विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। सह-सम्पादक: उमेश मंडल। सहायक सम्पादक: शिव कुमार झा आ मुन्नाजी (मनोज कुमार कर्ण)। भाषा-सम्पादन: नागेन्द्र कुमार झा आ पञ्जीकार विद्यानन्द झा। कला-सम्पादन: ज्योति सुनीत चौधरी आ रश्मि रेखा सिन्हा। सम्पादक-शोध-अन्वेषण: डॉ. जया वर्मा आ डॉ. राजीव कुमार वर्मा। रचनाकार अपन मौलिक आ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि) ggajendra@videha.com केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx, .rtf वा .txt फॉर्मेटमे पठा सकैत छथि। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेताह, से आशा करैत छी। रचनाक अंतमे टाइप रहय, जे ई रचना मौलिक अछि, आ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। मेल प्राप्त होयबाक बाद यथासंभव शीघ्र ( सात दिनक भीतर) एकर प्रकाशनक अंकक सूचना देल जायत। ’विदेह' प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका अछि आ एहिमे मैथिली, संस्कृत आ अंग्रेजीमे मिथिला आ मैथिलीसँ संबंधित रचना प्रकाशित कएल जाइत अछि। एहि ई पत्रिकाकेँ श्रीमति लक्ष्मी ठाकुर द्वारा मासक ०१ आ १५ तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि। (c) 2004-11 सर्वाधिकार सुरक्षित। विदेहमे प्रकाशित सभटा रचना आ आर्काइवक सर्वाधिकार रचनाकार आ संग्रहकर्त्ताक लगमे छन्हि। रचनाक अनुवाद आ पुनः प्रकाशन किंवा आर्काइवक उपयोगक अधिकार किनबाक हेतु ggajendra@videha.co.in पर संपर्क करू। एहि साइटकेँ प्रीति झा ठाकुर, मधूलिका चौधरी आ रश्मि प्रिया द्वारा डिजाइन कएल गेल। सिद्धिरस्तु वि दे ह विदेह Videha বিদেহ  विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका Videha Ist Maithili Fortnightly e Magazine  विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका 'विदेह' ८६ म अंक १५ जुलाइ २०११ (वर्ष ४ मास ४३ अंक ८६)http://www.videha.co.in/ मानुषीमिह संस्कृताम् ISSN 2229-547X VIDEHA वि दे ह विदेह Videha বিদেহ  विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका Videha Ist Maithili Fortnightly e Magazine  विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई 'विदेह' ८६ म अंक १५ जुलाइ २०११ (वर्ष ४ मास ४३ अंक ८६)http://www.videha.co.in/ मानुषीमिह संस्कृताम् ISSN 2229-547X VIDEHA

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