246 245 ISSN 2229-547X VIDEHA 'विदेह' ८७ म अंक ०१ अगस्त २०११ (वर्ष ४ मास ४४ अंक ८७) वि दे ह विदेह Videha বিদেহ http://www.videha.co.in विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका Videha Ist Maithili Fortnightly e Magazine नव अंक देखबाक लेल पृष्ठ सभकेँ रिफ्रेश कए देखू। Always refresh the pages for viewing new issue of VIDEHA. Read in your own script Roman(Eng)Gujarati Bangla Oriya Gurmukhi Telugu Tamil Kannada Malayalam Hindi ऐ अंकमे अछि:- १. संपादकीय संदेश २. गद्य २.१.महाप्रकाश- संभावना २.२.शिवकुमार झा ‘टिल्लू’- कथा किरणमे यथार्थवोध ओ नारी विमर्श २.३.१.बेचन ठाकुर- दूटा विहनि कथा २. किशन कारीगर- टाई माने रस्सी- एकटा हास्य कथा २.४.नवेंदु कुमार झा- रिपोर्ताज २.५.बिपिन झा- Maithili Word net: - आवश्यकता, कार्यान्वयन आओर तद्गत समस्याक समीक्षा। २.६.राजदेव मण्डल-उपन्यास- हमर टोल- गतांशसँ आगाँ… २.७.अरविन्द ठाकुर- मिथिलाक संस्कृति:किछु अप्रिय बिन्दु ३. पद्य ३.१.सुबोध झा- चारिटा आर पद्य ३.२.१.जगदीश प्रसाद मण्डल २.रामदेव प्रसाद मण्डल ‘झारूदार’ ३.३.बृषेश चन्द्र लाल-जीवन सपना ३.४.राम विलास साहु- कविता/ हाइकू/ टनका ३.५.१.आशीष अनचिन्हार- दूटा गजल २.गंगेश गुंजन ३.सदरे आलम ’गौहर’ ३.६.गजेन्द्र ठाकुर- गजल ३.७.१.जवाहर लाल कश्यप २.मनोज झा मुक्ति- गामक सावन ३.प्रभात राय भट्ट ४रामकृष्ण मण्डल ‘छोटू’ ४. मिथिला कला-संगीत- १.ज्योति सुनीत चौधरी २.श्वेता झा (सिंगापुर) ३.गुंजन कर्ण ५. गद्य-पद्य भारती: रवि भूषण पाठक निरालाःदेहविदेह -2 (निराला हिन्दीसँ मैथिलीमे) ७. भाषापाक रचना-लेखन -[मानक मैथिली], [विदेहक मैथिली-अंग्रेजी आ अंग्रेजी मैथिली कोष (इंटरनेटपर पहिल बेर सर्च-डिक्शनरी) एम.एस. एस.क्यू.एल. सर्वर आधारित -Based on ms-sql server Maithili-English and English-Maithili Dictionary.] 8.VIDEHA FOR NON RESIDENTS Original Poem in Maithili by Kalikant Jha "Buch" Translated into English by Jyoti Jha Chaudhary विदेह ई-पत्रिकाक सभटा पुरान अंक ( ब्रेल, तिरहुता आ देवनागरी मे ) पी.डी.एफ. डाउनलोडक लेल नीचाँक लिंकपर उपलब्ध अछि। All the old issues of Videha e journal ( in Braille, Tirhuta and Devanagari versions ) are available for pdf download at the following link. विदेह ई-पत्रिकाक सभटा पुरान अंक ब्रेल, तिरहुता आ देवनागरी रूपमे Videha e journal's all old issues in Braille Tirhuta and Devanagari versions विदेह ई-पत्रिकाक पहिल ५० अंक
विदेह ई-पत्रिकाक ५०म सँ आगाँक अंक विदेह आर.एस.एस.फीड। "विदेह" ई-पत्रिका ई-पत्रसँ प्राप्त करू। अपन मित्रकेँ विदेहक विषयमे सूचित करू। ↑ विदेह आर.एस.एस.फीड एनीमेटरकेँ अपन साइट/ ब्लॉगपर लगाऊ। ब्लॉग "लेआउट" पर "एड गाडजेट" मे "फीड" सेलेक्ट कए "फीड यू.आर.एल." मे http://www.videha.co.in/index.xml टाइप केलासँ सेहो विदेह फीड प्राप्त कए सकैत छी। गूगल रीडरमे पढ़बा लेल http://reader.google.com/ पर जा कऽ Add a Subscription बटन क्लिक करू आ खाली स्थानमे http://www.videha.co.in/index.xml पेस्ट करू आ Add बटन दबाउ। Join official Videha facebook group. Join Videha googlegroups विदेह रेडियो:मैथिली कथा-कविता आदिक पहिल पोडकास्ट साइट http://videha123radio.wordpress.com/ Videha Radio मैथिली देवनागरी वा मिथिलाक्षरमे नहि देखि/ लिखि पाबि रहल छी, (cannot see/write Maithili in Devanagari/ Mithilakshara follow links below or contact at ggajendra@videha.com) तँ एहि हेतु नीचाँक लिंक सभ पर जाऊ। संगहि विदेहक स्तंभ मैथिली भाषापाक/ रचना लेखनक नव-पुरान अंक पढ़ू। http://devanaagarii.net/ http://kaulonline.com/uninagari/ (एतए बॉक्समे ऑनलाइन देवनागरी टाइप करू, बॉक्ससँ कॉपी करू आ वर्ड डॉक्युमेन्टमे पेस्ट कए वर्ड फाइलकेँ सेव करू। विशेष जानकारीक लेल ggajendra@videha.com पर सम्पर्क करू।)(Use Firefox 4.0 (from WWW.MOZILLA.COM )/ Opera/ Safari/ Internet Explorer 8.0/ Flock 2.0/ Google Chrome for best view of 'Videha' Maithili e-journal at http://www.videha.co.in/ .) Go to the link below for download of old issues of VIDEHA Maithili e magazine in .pdf format and Maithili Audio/ Video/ Book/ paintings/ photo files. विदेहक पुरान अंक आ ऑडियो/ वीडियो/ पोथी/ चित्रकला/ फोटो सभक फाइल सभ (उच्चारण, बड़ सुख सार आ दूर्वाक्षत मंत्र सहित) डाउनलोड करबाक हेतु नीचाँक लिंक पर जाऊ। VIDEHA ARCHIVE विदेह आर्काइव भारतीय डाक विभाग द्वारा जारी कवि, नाटककार आ धर्मशास्त्री विद्यापतिक स्टाम्प। भारत आ नेपालक माटिमे पसरल मिथिलाक धरती प्राचीन कालहिसँ महान पुरुष ओ महिला लोकनिक कर्मभमि रहल अछि। मिथिलाक महान पुरुष ओ महिला लोकनिक चित्र 'मिथिला रत्न' मे देखू। गौरी-शंकरक पालवंश कालक मूर्त्ति, एहिमे मिथिलाक्षरमे (१२०० वर्ष पूर्वक) अभिलेख अंकित अछि। मिथिलाक भारत आ नेपालक माटिमे पसरल एहि तरहक अन्यान्य प्राचीन आ नव स्थापत्य, चित्र, अभिलेख आ मूर्त्तिकलाक़ हेतु देखू 'मिथिलाक खोज' मिथिला, मैथिल आ मैथिलीसँ सम्बन्धित सूचना, सम्पर्क, अन्वेषण संगहि विदेहक सर्च-इंजन आ न्यूज सर्विस आ मिथिला, मैथिल आ मैथिलीसँ सम्बन्धित वेबसाइट सभक समग्र संकलनक लेल देखू "विदेह सूचना संपर्क अन्वेषण" विदेह जालवृत्तक डिसकसन फोरमपर जाऊ। "मैथिल आर मिथिला" (मैथिलीक सभसँ लोकप्रिय जालवृत्त) पर जाऊ। १. संपादकीय फजलुर रहमान हासमीक आइ २०-०७-२०११ केँ मृत्यु भऽ गेलन्हि। जन्म -पटना जिलाक बराह गाममे। वृत्ति अध्यापक। हिन्दी कविता संग्रह "रश्मि राशि" आ मैथिली कविता संग्रह "निर्मोही" प्रकाशित। १९९६मे अबुलकलाम आजाद- अब्दुलकवी देसनवी, उर्दूसँ मैथिली अनुवादपर साहित्य अकादमीक मैथिली अनुवाद पुरस्कार। (हिनकर एकटा कविता) हे भाइ हे भाइ हमरा जुनि मारह तोँ हमरा दोसर जाति दोसर धर्म्मक बूझि रहल छह- मुदा हम छी तोरे भ्राता अग्रज वा अवरज! हमरा सभकेँ एके माता नहि मारह गैर जानि कऽ संसारक दृष्टिमे तोँ पार्थ आओर हम “राधेय” बनल छी मुदा “पृथा” जानि रहल अछि हदय कानि रहल अछि चुप अछि मजबूरीसँ बेवसीसँ हे भाइ हमरा नहि मारह...। २ दोहा/ रोला/ कुण्डलिया दोहा दोहा मात्रिक छन्द अछि। दोहामे दू पाँती आ चारि चरण होइत अछि। पहिल चरणमे १३,दोसर चरणमे ११,तेसर चरणमे १३आ चारिम चरणमे ११ मात्रा होइत अछि। पहिल आ तेसर चरणक आरम्भ जगणसँ (जगण U। U) नै हएत आ दोसर आ चारिम चरण अन्त हएत दीर्घ-ह्रस्वसँ। रोला रोला सेहो मात्रिक छन्द अछि। रोलामे चारि पाँती आ आठ चरण होइत अछि। पहिल चरणमे ११, दोसर चरणमे १३, तेसर चरणमे ११ आ चारिम चरणमे १३ मात्रा, पाँचम चरणमे ११, छअम चरणमे १३ मात्रा होइत अछि। सभ पाँतीक पहिल चरणक अन्तमे दीर्घ-ह्रस्व, वा ह्रस्व-ह्रस्व-ह्रस्व होइत अछि। सभ पाँतीक दोसर चरणक अन्तमे चारिटा ह्रस्व, वा दूटा दीर्घ, वा दीर्घ-ह्रस्व-ह्रस्व (भगण । U U), वा ह्रस्व-ह्रस्व-दीर्घ (सगण U U ।) होइत अछि। रोलाक प्रारम्भ ह्रस्व-दीर्घ-ह्रस्वसँ नै करू। कुण्डलिया दोहा आ रोलाक कुण्डली (मिश्रण) भेल कुण्डलिया। दोहा लिख दियौ, फेर दोहाक अन्तिम चरणकेँ (११ मात्रा बला) रोलाक पहिल चरण बना दियौ (पुनरावृत्ति) आ फेर रोला जोड़ू। खाली ई ध्यान राखू जे दोहाक पहिल चरणक पहिल शब्द आ रोलाक अन्तिम चरणक अन्तिम शब्द एक्के रहए। कुण्डलियाक पहिल शब्द आ अन्तिम शब्द एक्के होइए। कुण्डलियाक चारिम आ पाँचम चरण सेहो एक्के होइए। कुण्डली छत्ता घुरछा पल्लौसँ, भेल दिने अन्हार। दिन बितलापर घर घुरी, काल भेल विकराल॥ काल भेल विकराल, पोरे-पोर सिहरैए। सुनत केओ सवाल, बोल बगहा लगबैए। ऐरावत बेहाल, बोल कतऽ भेल निपत्ता। घुरियाए बनि काल, पैसि बिच घोरन छत्ता।। छन्द विचार साहित्यक दू विधा अछि गद्य आ पद्य।छन्दोबद्ध रचना पद्य कहबैत अछि-अन्यथा ओ गद्य थीक। छन्द माने भेल-एहन रचना जे आनन्द प्रदान करए। छन्द दू प्रकारक अछि।मात्रिक आ वार्णिक। मात्रिक गणना मैथिलीक उच्चारण निर्देश आ ह्रस्व-दीर्घ विचारपर आउ। शास्त्रमे प्रयुक्त ‘गुरु’ आ ‘लघु’ छंदक परिचय प्राप्त करू।
तेरह टा स्वर वर्णमे अ,इ,उ,ऋ,लृ - ह्र्स्व आर आ,ई,ऊ,ऋ,ए.ऐ,ओ,औ- दीर्घ स्वर अछि।
ई स्वर वर्ण जखन व्यंजन वर्णक संग जुड़ि जाइत अछि तँ ओकरासँ ‘गुणिताक्षर’ बनैत अछि।
क्+अ= क,
क्+आ=का ।
एक स्वर मात्रा आकि एक गुणिताक्षरकेँ एक ‘अक्षर’ कहल जाइत अछि। कोनो व्यंजन मात्रकेँ अक्षर नहि मानल जाइत अछि- जेना ‘अवाक्’ शब्दमे दू टा अक्षर अछि, अ, वा ।
१. सभटा ह्रस्व स्वर आ ह्रस्व युक्त गुणिताक्षर ‘लघु’ मानल जाइत अछि। एकरा ऊपर U लिखि एकर संकेत देल जाइत अछि।
२. सभटा दीर्घ स्वर आर दीर्घ स्वर युक्त गुणिताक्षर ‘गुरु’ मानल जाइत अछि, आ एकर संकेत अछि, ऊपरमे एकटा छोट -।
३. अनुस्वार किंवा विसर्गयुक्त सभ अक्षर गुरू मानल जाइत अछि।
४. कोनो अक्षरक बाद संयुक्ताक्षर किंवा व्यंजन मात्र रहलासँ ओहि अक्षरकेँ गुरु मानल जाइत अछि। जेना- अच्, सत्य। एहिमे अ आ स दुनू गुरु अछि। जेना कहल गेल अछि जे अनुस्वार आ विसर्गयुक्त भेलासँ दीर्घ होएत तहिना आब कहल जा रहल अछि जे चन्द्रबिन्दु आ ह्रस्वक मेल ह्रस्व होएत। माने चन्द्रबिन्दु+ह्रस्व स्वर= एक मात्रा संयुक्ताक्षर: एतए मात्रा गानल जाएत एहि तरहेँ:- क्ति= क् + त् + इ = ०+०+१= १ क्ती= क् + त् + ई = ०+०+२= २ क्ष= क् + ष= ०+१ त्र= त् + र= ०+१ ज्ञ= ज् + ञ= ०+१ श्र= श् + र= ०+१ स्र= स् +र= ०+१ शृ =श् +ऋ= ०+१ त्व= त् +व= ०+१ त्त्व= त् + त् + व= ० + ० + १ ह्रस्व + ऽ = १ + ० अ वा दीर्घक बाद बिकारीक प्रयोग नहि होइत अछि जेना दिअऽ आऽ ओऽ (दोषपूर्ण प्रयोग)। हँ व्यंजन+अ गुणिताक्षरक बाद बिकारी दऽ सकै छी। ह्रस्व + चन्द्रबिन्दु= १+० दीर्घ+ चन्द्रबिन्दु= २+० जेना हँसल= १+१+१ साँस= २+१ बिकारी आ चन्द्रबिन्दुक गणना शून्य होएत। जा कऽ = २+१ क् =० क= क् +अ= ०+१ किएक तँ क केँ क् पढ़बाक प्रवृत्ति मैथिलीमे आबि गेल तेँ बिकारी देबाक आवश्यकता पड़ल, दीर्घ स्वरमे एहन आवश्यकता नहि अछि। U- ह्रस्वक चेन्ह ।- दीर्घक चेन्ह एक दीर्घ । =दूटा ह्रस्व U वार्णिक गणना संयुक्त्ताक्षरकेँ एक गानू आ हलन्तक/ बिकारीक/ इकार आकार आदिक गणना नहि करू। वार्णिक छन्दक परिचय लिअ। एहिमे अक्षर गणना मात्र होइत अछि। हलंतयुक्त अक्षरकेँ नहि गानल जाइत अछि। एकार उकार इत्यादि युक्त अक्षरकेँ ओहिना एक गानल जाइत अछि जेना संयुक्ताक्षरकेँ। संगहि अ सँ ह केँ सेहो एक गानल जाइत अछि।द्विमानक कोनो अक्षर नहि होइछ।मुख्य तीनटा बिन्दु यादि राखू- 1.हलंतयुक्त्त अक्षर-0 2.संयुक्त अक्षर-1 3.अक्षर अ सँ ह -1 प्रत्येक। आब पहिल उदाहरण देखू ई अरदराक मेघ नहि मानत रहत बरसि के=1+5+2+2+3+3+1=17 मात्रा आब दोसर उदाहरण देखू पश्चात्=2 मात्रा आब तेसर उदाहरण देखू आब=2 मात्रा आब चारिम उदाहरण देखू स्क्रिप्ट=2 मात्रा मुख्य वैदिक छन्द सात अछि-गायत्री,उष्णिक् ,अनुष्टुप् ,बृहती,पङ् क्त्ति,त्रिष्टुप् आ जगती। शेष ओकर भेद अछि अतिछन्द आ विच्छन्द। छन्दकेँ अक्षरसँ चिन्हल जाइत अछि। यदि अक्षर पूरा नहि भेलतँ एक आकि दू अक्षर प्रत्येक पादमे बढ़ा लेल जाइत अछि।य आ व केर संयुक्ताक्षरकेँ क्रमशः इ आ उ लगा कय अलग केल जाइत अछि।जेना- वरेण्यम्=वरेणियम् स्वः= सुवः गुण आ वृद्धिकेँ अलग कयकेँ सेहो अक्षर पूर कय सकैत छी। ए= अ + इ ओ= अ + उ ऐ= अ/आ + ए औ= अ/आ + ओ सरल वार्णिक छन्दमे ह्रस्व आ दीर्घक विचार नै राखल जाइए। मुदा वार्णिक छन्दमे ह्रस्व आ दीर्घक विचार राखल जा सकैत अछि, कारण वैदिक वर्णवृत्तमे बादमे वार्णिक छन्दमे ई विचार शुरू भऽ गेल छल:- जेना तकैत रहैत छी ऐ मेघ दिस तकैत (ह्रस्व+दीर्घ+दीर्घ)- वर्णक संख्या-तीन रहैत (ह्रस्व+दीर्घ+ह्रस्व)- वर्णक संख्या-तीन छी (दीर्घ) वर्णक संख्या-एक ऐ (दीर्घ) वर्णक संख्या-एक मेघ (दीर्घ+ह्रस्व) वर्णक संख्या-दू दिस (ह्रस्व+ह्रस्व) वर्णक संख्या-दू मात्रिक छन्दमे द्विकल, त्रिकल, चतुष्कल, पञ्चकल आ षटकल अन्तर्गत एक वर्ण (एकटा दीर्घ) सँ छह वर्ण (छहटा ह्रस्व) धरि भऽ सकैए। द्विकलमे- कुल मात्रा दू हएत, से एकटा दीर्घ वा दूटा ह्रस्व हएत। त्रिकलमे कुल मात्रा तीन हएत- ह्रस्व+दीर्घ, दीर्घ+ह्रस्व आ ह्रस्व+ह्रस्व+ह्रस्व; ऐ तीन क्रममे। चतुष्कलमे कुल मात्रा चारि; पञ्चकलमे पाँच; षटकलमे छह मात्रा हएत। वार्णिक छन्द तीन-तीन वर्णक आठ प्रकारक होइत अछि जे “यमाताराजसलगम्” सूत्रसँ मोन राखि सकै छी। आब कतेक पाद आ कतऽ यति,अन्त्यानुप्रास देबाक अछि; कोन तरहेँ क्रम बनेबाक अछि से अहाँ स्वयं वार्णिक/ मात्रिक आधारपर कऽ सकै छी, आ विविधता आनि सकै छी। वर्ण छन्दमे तीन-तीन अक्षरक समूहकेँ एक गण कहल जाइत अछि। ई आठ टा अछि- यगण U।। रगण ।U। तगण ।। U भगण । U U जगण U। U सगण U U । मगण ।।। नगण U U U एहि आठक अतिरिक्त दूटा आर गण अछि- ग / ल ग- गण एकल दीर्घ । ल- गण एकल ह्रस्व U एक सूत्र- आठो गणकेँ मोन रखबा लेल:- यमाताराजभानसलगम् आब एहि सूत्रकेँ तोड़ू- यमाता U।। = यगण मातारा ।।। = मगण ताराज ।। U = तगण राजभा ।U। = रगण जभान U। U = जगण भानस । U U = भगण नसल U U U = नगण सलगम् U U । = सगण ( विदेह ई पत्रिकाकेँ ५ जुलाइ २००४ सँ एखन धरि ११३ देशक १,८८४ ठामसँ ६४,३३० गोटे द्वारा विभिन्न आइ.एस.पी. सँ ३,१३,७४४ बेर देखल गेल अछि; धन्यवाद पाठकगण। - गूगल एनेलेटिक्स डेटा। ) गजेन्द्र ठाकुर ggajendra@videha.com http://www.maithililekhaksangh.com/2010/07/blog-post_3709.html २. गद्य २.१.महाप्रकाश- संभावना २.२.शिवकुमार झा ‘टिल्लू’- कथा किरणमे यथार्थवोध ओ नारी विमर्श २.३.१.बेचन ठाकुर- दूटा विहनि कथा २. किशन कारीगर- टाई माने रस्सी- एकटा हास्य कथा २.४.नवेंदु कुमार झा- रिपोर्ताज २.५.बिपिन झा- Maithili Word net: - आवश्यकता, कार्यान्वयन आओर तद्गत समस्याक समीक्षा। २.६.राजदेव मण्डल-उपन्यास- हमर टोल- गतांशसँ आगाँ… २.७.अरविन्द ठाकुर- मिथिलाक संस्कृति:किछु अप्रिय बिन्दु महाप्रकाश 1946- जन्म: बनगांव, सहरसा, बिहार । वरिष्ट कवि ओ कथाकार। प्रकाशित कृति: कविता संभवा, संग समय के (कविता संग्रह)। कीर्तिनारायण मिश्र साहित्य सम्मान २०१० ई.- श्री महाप्रकाश (कविता संग्रह “संग समय के”)। संभावना ओ आबिते तपाकसँ पुछलनि- “हाथी देखने छह” अर्थ बूझल छह? ओ अपन एहि प्रश्नक संग टेबुलपर झुकि आएल रहथि। हुनकर चानिपर उम्र आ अनुभव केर चमक रहनि। गज्जोभायक एहि प्रश्नसँ कनेक अकबका गेल रहथि जयवर्द्दन। हुनक आँखिमे देखैत उतारा देलनि जयवर्धन- हँ हौ... हाथीकेँ के पूछय, हम तँ ऐरावत सेहो देखने छी- अर्थ सेहो बूझल अछि। उत्तर सुनैत गज्जोभायक आँखि जेना फाटि गेलनि। विस्मय आ अविश्वाससँ भरि अयलाह- ऐरावत! कतऽ देखलह? -किएक वड़द देखऽ लेल अहाँ पशुपतिनाथक ओतऽ जाउ से भऽ सकैत अछि आ हम ऐरावत देखऽ इन्द्रक ओतऽ जाइ से संभव नै! -इन्द्र तोरा कतऽ भेटलह? गज्जोभायक अविश्वास अस्वभाविक नै रहनि। -“इन्द्र तँ अहाँकेँ कत्तहु भेटत... ध्यानसँ देखहक ने... नै भेटतह तँ विष्णु! वि-शिष्ट अणु –वि-शेष अणु-विलक्षण अणु- बिष्णु नै भेटतह- इन्द्र तँ आब जतऽ ततऽ“ - जयवर्द्धनक स्वरमे विश्वास रहनि। गज्जोभाय जोरसँ हँसलाह- तोँ ज्ञानी लोक छह, आब जँ तोँ इन्द्रकेँ चीन्हैत छह तँ राजाकेँ चीन्हैत छह, जमीन्दार-सरकारकेँ सेहो चीन्हैत छह.. नीक बात..तोहर यएह गुण हमरा विवश करैत अछि जे हम तोरा एकटा कथा सुनाबी.. समय देबहक? बाहर विकट रौद रहैक। कार्यालयसँ अधिकांश कर्मचारी जा चुकल छल। रौदमे थोड़बे काल चललासँ जयवर्द्धनकेँ पेशाब रुकि जाइत छनि। वीर रहथि । अतएव हुनका कथा सुनबेक छल । बजलाह- समय अछि, समय हमरा लेल पोस्ट कार्ड थिक जे जतबा लिखि..। “बस्स-बस्स भऽ गेलैक”.. गज्जोभाय बजलाह- “राजाक मूल होइत अछि भय आ शंका..बूझल छह? ओ उपरका हो अबैत मोंछ राशिकेँ दूअ दिससँ सम्हारैत हाथ फेरलनि- मुस्टंड गवरू छौंड़ा रोज देखैत छल, जमींदारक हाथी सबार, परोपट्टामे घुमैत, दर्पसँ धधकैत जमींदार ओकर हाथीक मस्तान चालि....वाम-दहिन मूड़ी आ झारैत। ओ देखय आ मोन मसोसि कए रहि जाए। ओकरा रहि-रहि कए जमींदारक सूनल, देखल-मोगल कथा वृत्तान्त व्यथित करैक...। मुदा एक दिन... बाहर रौद अखनो प्रचण्ड रहैक आ हवा सेहो उद गेल रहैक, जयवर्द्धन खिड़कीसँ बाहर देखलनि। विमछैत बजलाह-“खिस्सामे मोन नै लागैत छह, ध्यान नै देबहक तँ कहबाक कोन प्रयोजन कोन.. - नै-नै, ....एहेन कोनो बात नै- हबरब नै देखैत छहक.. केना आ कतेक गोंगिया रहल छै.. जयवर्द्धन किंचित म्लान मुख भेलाह। - धूः बुड़ि- हवाक रुख आकि बिगड़ैत पर्यावरणकें की तोँ बदलि देबहक..की हम बदलि सकै छी समयक गतिकेँ, अकानैत रहऽ आ वस्स..पे आ भोगैत रहऽ। वस्स..। जयबर्द्धन के राजनीतिक पर्यावरणक सेहो स्मरण, मुदा आब ओ कथा रसमे व्यतिक्रम नै चाहैत रहथि- आगू कहह... “मुदा एक दिन ओइ गवरु मुस्टंडकेँ नै रहल गेलैक, जहिना ओ हाथीपर सवार दर्पसँ धधकैत जमीदार-सरकारकेँ देखलक,... ओकरा छातीमे जेना लहरि उठलैक...ओकर पहिल इच्छा भेलैक जे ओ सीधे जमींदारपर छड़पय आ हौदाक संगे जमीनपर पटकए.. मुदा एतेक ऊँच ओ फानि नै सकैत छल..अथच ओ हाथीक नाङरि पकड़ि अपन पएर जमीनपर अंगद जकाँ रोपि देलक...वाम दहिन, आजू बाजू देखैत...हाथीपर सवारकेँ आघात भेलैक, हाथीक मस्तान चालिमे व्यवधान अयलैक..हाथी चिंघाड़ कयलक ....महावत जोरसँ बमकल...गज लए छौड़ापर उठल....” भयाक्रान्त जयवर्द्धनक मुँह खुललनि, एकदम्मे अंतिम प्रश्न कयलनि- “छौड़ा बजलैक की नै?” -हँ हौ, जमींदार पढ़ल लिखल लोक रहथि शिक्षित लोक.. हनकर पुरखा सभ सेहो विदेशी विद्यालय आ विश्वविद्यालय सभमे पढ़ने रहनि...अपनो कैबरिज कि हावर्डमे पढ़ने रहथि... हुनका भाषाक महिमा आ वाणीक प्रभावक विशेष ज्ञान रहनि। अतएव क्रोधकेँ घोंटलनि आ शांत स्वरेँ महावतकेँ वरजलनि- “छोड़ह अवूझ छैक..नेदरमति छैक”। किलु हुनक चित्त अशांत रहलनि। किछुए कालक उपरान्त , राज्यक सीमा रेखाकेँ दूरेसँ देखैत, चिंतितमना राजमहलमे घूमि अयलाह। प्रात:काल ओ अपन दीवानसँ पुछलनि –“किनक बालक छल ओ ...? दीवान साहेवकेँ समग्र कथा बूझल छलनि। बजलाह- “श्रीमन् ओतऽ फल्लामांक बेटा थिक- बजाऊ की? किछुए कालक उपरान्त फल्लांमाकेँ उपस्थित काएल गेल। भयाक्रान्त..थरथर कांपैत..धोती प्रायः तीतल। जमींदार साहेवकेँ देखिते मूलुंबित , किंवा शाष्टांग दैत, निहोरा करैत बाजल- “सरकार... अपराध क्षमा कैल जाऊ”। “नै..नै कोनो अपराध नै... बहुत करेजगर छथि अहाँक बालक... बहादुर... वाह रे वाह संभावनासँ भरल... अपार संभावना अछि अहाँक बालकमे...”, जमींदार साहेब शांत किन्तु गम्भीर स्वरमे बजलाह । फल्लांमाकेँ किंचित भरोस भेलैक । हाथ जोड़ने ठाढ़ भेल— “छौड़ा उकपाती छैक.. निश्चये कोनो अपराध केने हएत..हम ओइ अबंडसँ तंग छी सरकार.. जे सजा हो हुकुम...ओ धौना खसौने ठाढ़ रहल। “ नेना सँ कियो तंग हुअए! कोनो अपराध नै कयलक अछि अहाँक बालक, किन्तु आब ओ विहनजोग भेल..ओकर ब्याह कऽ दियौ... व्याह कऽ देबै तँ घर गृहस्थीमे लागत.. चित्त शान्त रहतैक। शांत किन्तु आदेशात्मक स्वरमे बजलाह जमींदार साहेब। “सरकार... के करतैक ओइ अवंडसँ ब्याह... की हैतैक ओकर ब्याह करा कऽ... करमे फूटल छैक...”, विलाप कयलक फल्लामां मर-। “आब अहाँ जाउ, व्याहक मोन बनाउ ..हम देखैत छिऐक-”, जमींदार सरकार आदेश कयलनि। फल्लांमाक गेलाक उपरान्त जमीन्दार साहेब उपस्थित दीवानसँ पुछलनि— “ककर बेटी छैक रानी मुखर्जी आ कैटरीना सन, पता करु तँ... ओकरासँ ऐ छौड़ाकेँ व्याहि देबाक छैक ..।” जयवर्द्धनकेँ अपन हँसी रोकि नै भेलनि... गरीबक बेटी की रानी मुखर्जी आ कैटरीना सन होइत छैक- ओ चकित रहथि । “ऐमे हँसबाक कोन बात... जकरा जे बूझल रहतैक से सएह ने बाजत...तोँ रोटी कहबह ओ ब्रेड बाजत... ओना तोँ बिसरि रहलह अछि जे महाराज शान्तनुकेँ मल्लाहेक बेटी पसिन्न पड़ल रहनि...।” गज्जो भायक उत्तरसँ जयवर्द्धन निरुत्तर भेलाह। चिल्लामांक बेटी बड़ सुन्नरि। बड़ दिव्य। पाकल धान सन-ए। अगहनक दुपहरिया सन चमक। कोशीक धार सन चंचल। प्रायः सभकेँ बूझल रहैक। तेँ... दरबारमे चिल्लामांकेँ बजाओल गेल। अपराध बोघक बोझसँ ठाढ़ नै रहि पावैत छल। हवोढेकार कानैत बाजल— “से बिनु मायक बेटी छैक... जरुरे कोनो अपराध कएने छैहएत, लोकक झाड़ी फानब ओकर आदति भऽ गेलैक अछि.. अवस्से कोनो दिन कएने हएत... हम सरकारेक सोझाँमे ओकरा दोखरि देबैक..चिल्लामांक नोरक कोनो छोर नै रहैक। सरकार ओकरा अपन पाँजमे भरि कऽ उठौलनि। बजलाह- “कोनो बात नै छैक... पहिने नोर पोछह चित्त शांत करऽ, बात किछु नै छैक... हम सुनलहुँ जे तोहर बेटी आब वियाह जोग छह, फल्लांमाक बेटा पट्ठा जवान... कहलक क्यो जे नीक जोड़ी हेतै, तँ से नीक बात... तोँ व्याह लेल तैयार हुअ तेँ खरचाब कोनो चिन्ता नै...हम सभ देखबैक... हम छी..सभटा मददि करबह.. । चिल्लामां किछु बाजऽ चाहलक। मुदा, बाजि नै भेलैक। कदाच जमींदार सरकारक उदारता अ दान सभक स्मरणसँ ओकर कंठनली अवरुद्ध भऽ गेल रहैक। गज्जोभाय आगाँ कहलनि— “भेल... फल्लामांक आ चिल्लामांक बेटीक ब्याह सभहिक सहज सहमतिसँ भेल। सरकार—जमींदार ओकरा सभहिक समाजिक स्थिति अनुकुल खैयाल रखलनि। समाज कतोक बर्ख धरि हुनकर ऐ कथा-व्यवहारक सोहर गावैत रहल। क्यो जमीन्दारक सवारी रोकबाक कोनो हिम्मति नै कयलक। लोक तँ आइयो सरकार जमींदारसँ बहुत रास आस राखैत अछि। संभावनाक आस आकि आसक संभावनामे समाप्त नै होइत छैक.. किछु कुकुर भुकैत अछि, मुदा किछुए.., अधिकांशक गरमे पट्टा लागि गेलैक अछि... कतोककेँ गरदनिमे तँ सोनाक जींजीर छैक, किछु भुकैत मारलो गेल... जानि नै कतेक... ” “ अंय हौ भाय ....ओइ छौड़ा आ छउड़ीक की भेलैक? जयवर्द्धन जिज्ञासा कयलनि । गज्जोभाय एतवा सुनिते क्रुद्ध भऽ गेलाह..? यएह छियह तोहर पाखण्डी रुप.. तोरा की नै बूझल छह।” “हमरा किए बूझल रहत... कथा तोहर..कहलऽ तोँ आ बूझल रहत हमरा?” जयवर्द्धन गज्जोभायकेँ लपेटलनि। “हेतैक की ..दुहू छौड़ा छउड़ीक एक आश्रम भेलैक- आगाँ कालक लीला—विसरा गेल रंग रभस, विसरा गेल छउंड़ी.. तीन चीज यादि रहल, नोन-तेल लकड़ी, से दुनू नोन तेलमे लागल रहल.. बाजारमे व्योपार ये, चौअन्नी-अठन्नीकेँ के पूछय...टाका पचटकही धरि प्रमुख भऽ गेलैक... समय एकदम्मे बदलि गेलैक..देश-काल। मन मोहनी छतरी तर आबि गेलैक... टोपी पर टोपी.... टोपी टोपी... लोक टोपीक रंगे देख कऽ नेहाल, किछु दिनक उपरान्त सुनल जे छौड़ा रोजी रोटीक खोजमे दिल्ली कि हरियाणा कि कुरुक्षेत्र चलि गेलैक, आइ धरि नै घूमलैक-ए।” “कतेक बर्ख भेलैक?”, जयवर्द्धनक स्वर म्लान रहनि। “किएक... हम बड़ बकलेल जे जिनगीक कैलेंडर राखी? तोरे सन मूर्ख जिनगीक कैलैंडर राखैत अछि”, गज्जोभाय किंचित उत्तेजित आ खिन्न भेलाह” “एम्हर फल्लामां आ चिल्लामां बान्ह जे टुटलैक ओही बाढ़िमे कतहु बहि गेल... आब छउंड़ीक दिन पहाड़ भेलैक आ राति प्रेतग्रस्त .हेमनिमे सूनल अछि जे छउड़ी, प्रतिदिन राष्ट्रीय राजयार्ग १९४७ पर जाइत छैक- जतऽ दुनियां जहानक बस-ट्रक आबि कऽ रुकैत छैक छौउड़ी जाइत छैक, ऐ आस आ सम्भावनामे जे ओ छौड़ा औतैक.. कोनो दिन, कोनो दिशासँ औतेक ..” गज्जोभाय अन्ततः मौन भेलाह। जयवर्द्धनकेँ कोनो प्रश्न नै फुरलनि। (गजेन्द्र ठाकुर लेल सस्नेह) ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। शिवकुमार झा ‘टिल्लू’ कथा किरणमे यथार्थवोध ओ नारी विमर्श मैथिली साहित्यमे समग्र विधाक रचनाक आधारपर डाॅ. ब्रज-किशोर वर्मा मणिपद्मकेँ पहिल सम्पूर्ण साहित्यकार मानल जाइत अछि। मुदा जौं जन्म क्रमांकक आधारपर िनर्णए कएल जाए तँ काॅचीनाथ झा ‘किरण’ पहिल सम्पूर्ण साहित्यकार छथि। मणिपद्म जकाँ किरणजी सेहो साहित्यक समग्र विधा उपन्यास, वालकथा, एकांकी, नाटक, कविता संग्रह, महाकाव्य, िनबंध संग्रह आ कथा संग्रहक रचना कएलनि। पराशर महाकाव्य लेल साहित्य अकादमी पुरस्कार आ ‘कथा किरण’ कथा संग्रहक लेल वैदेही सम्मानसँ सम्मानित कएल गेलनि। मूलत: काव्यात्मक प्रवृति ओ अभिरूचि राखएबला ऐ साहित्यकारक पहिल कथा संग्रह ‘कथा किरण’ सन् 1988ईं.मे भाखा प्रकाशन द्वारा प्रकाशित भेल। सन् 1989ईं.मे किरण जीक देहावसान भऽ गेलनि। सन् 1991-92 ईं.मे बिहार सरकार द्वारा मैथिलीकेँ बिहार लोक सेवा आयोगसँ निकालि देल गेल। जइसँ ऐ भाषाक वाचक ओ पाठक लोकनिक मध्य अस्तित्व डगमगाए लागल। फलस्वरूप महाविद्यालय स्तरपर मैथिली पढ़एबला छात्रक कमी भऽ गेल। जकर परिणाम ई भेल जे ऐ अवधिक किछु आगाँ-पाछाँ प्रकाशित रचनाक ओ महत्व नै भेटल जकर ओ अधिकारी छल। ’कथा किरण’ सम्बन्धत: ऐ अर्न्तद्वन्द्वक सभसँ बेशी शिकार भेल। किएक तँ हिनक ऐ संग्रहसँ पहिने प्रकाशित किछु रचनाकेँ छोड़ि समाजक विभिन्न ऊँच-नीच, सिनेह-द्वेष आ समन्वयवादकेँ स्पर्श करएबला कथा साहित्य मैथिलीमे नै लिखल गेल छल। जौं किछु कथाकार ऐ परिधिसँ ऊपर उठबाक प्रयासमे सफल भेलथि तँ मात्र किछुए कथामे। सम्पूर्ण समाजक जर्जर व्यवस्था दिस किनको नजरि पड़बो केलनि तँ कतौ-कतौ। सम्पूर्ण कथा संग्रहमे मानवीय मूल्यक अवलोकन कथा िकरणसँ पहिने हरिमोहन झाक चर्चरी, मनमोहन झाक अश्रुकण, ललितक प्रतिनिधि, रामदेव झाक एक खीरा तीन फाँक, रमानन्द रेणुक कचोट, रमेश नारायणक पाथरक नाव, धूमकेतुक अगुरवान, शेफालिका वर्माक अर्थयुग आदिमे भेटैत अछि परंच ऐ सभ कथा संग्रहक सभटा कथाकेँ ऐ दृष्टिसँ सेहो प्रासंगिक नै मानल जाए। प्रयोगवादी कथाकार राजकमल जीक िकछु कथा जेना ललका पाग, सॉझक गाछ, उपराजिता आदि मैथिली साहित्यमे अपन बेछप्प आधुनिक रूप नेने प्रवेश तँ कएलक मुदा हुनको किछु कथा मैथ्ज्ञिली साहित्यकेँ शिल्प आ प्रयोगवादक विश्लेषणक क्रममे अन्हार घर नेने चलि गेल। कथा किरणमे 19 गोट कथा संकलित अछि, अलग-अलग कालमे िलखल गेल ऐ कथा सभकेँ शिवशंकर श्रीनिवासक प्रयाससँ 1988ईं.मे भाषा प्रकाशन द्वारा प्रकाशित कएल गेल अछि। आमुख शिवशंकरजी लिखने छथि, जइमे एकटा चर्चित समीक्ष समीक्षक द्वारा आमुखसँ बेसी किरण जीक मनोदशा आ रचना प्रकाशन करएबाक क्रममे कथाकारपर श्री निवास जीक उपकार परिलक्षित भेल। वास्तवमे समीक्षा वा आमुख ऐ रूपेँ नै लिखबाक चाही। आमुखमे एकटा कमी आर देखएमे आएल जे श्रीनिवास लिखैत छथि- “किरण जीक प्रारंभिक कथा कथ्यक स्तरपर जतेक धारदार ओतेक सुन्दर शिल्प नहि।” मैथिली साहित्यक संग ई दुर्भाग्यपूर्ण विडंम्बना रहल जे मानसिक विलासिताकेँ स्पर्श करएबला कथाकारकेँ अइठाम शिल्पी मानल जाइत छन्हि। वास्तवमे कथाक दू गोट प्रमुख तत्व िथक- बिम्ब आ शिल्प। बिम्बक अर्थ कोनो घरक नेआें आ शिल्पक अर्थ ओकर चार, कोरो आ श्रंृगार- चून पालिश। जौं बिम्ब काल्पनिक तँ शिल्प कल्पनाशील अवश्य हएत। जखन कल्पने करबाक हएत तँ गामक खोपड़ीक कल्पना नै कऽ कऽ आगराक ताजमहलक कल्पना कएल जाए। किरणजी मात्र यएह अपराध कएने छथि जे आगराक ताज महलकेँ छोड़ि मिथिलाक गामक मचानपर अपन रचनोमे जीवंत रहलाह, तँए ‘शिल्पी’ नै छथि। साहित्यकार कल्पनाशील होइत छैक, मुदा जौं कखनो मोनकेँ धरातलपर आनि कऽ लिखैत अछि तँ यथार्थवोधक बिम्ब समाजक सत्यकेँ वृतिचित्रक रूपमे देखैत अछि। किरणजी संभवत: वएह श्रेणीक ययार्थवोधी कथाकार छथि। पहिलुक कथा ‘करूणा’ करूणाक नैहरमे स्वच्छन्द जीवनसँ प्रारंभ होइत ओइठाम तक पहुँच जाइत अछि जतए धरि साधारण शिल्पी नै पहुँच सकैत छथि। यामिनीकान्त बाबूक सुकन्या करूणाक विवाह सुन्दरबाबू सँ भेल। नैहरक भगजोगिनी कर्त्तव्य पथपर भाटक संग सासुरमे आगाँ बढ़ैत छलि, वृद्ध पितामही सासु आ मातृ पितृ विहीन जाउत नरेन्द्रक संग....। तीन मासक भीतर अजिया सासुक देहावसान आ ओकर दू मास बाद श्वसन ज्वरसँ पतिक देहान्तक पश्चात करूणा टूटि गेलीह। प्राचीन आर्य संस्कृति जकरा जनभाषामे सनातन कहल जाइछ, रूढ़िवादिताक आवरणसँ अखन धरि ओझराएल अछि। जे लोक समाजक मुख्य धारासँ कात लागल छथि, ओ ऐ कथा कथित सनातन संस्कृतिक आधारपर संस्कार तँ करैत छथि, मुदा ओइमे ओझराएल नै। ऐ दृष्टिसँ समाजक पछातिक लोककेँ बेसी विचारवान मानल जाए। अगिला लोकमे बाहरी आडंवरकेँ मनवाक क्रममे किछु कुव्यवस्था उत्पन्न भऽ गेल। संभवत: ई कथा सनातनधर्मी ब्राह्मण परिवारकेँ धियानमे राखि कऽ लिखल गेल। भऽ सकैछ कथाकारक र्इ कल्पना हुअनि, मुदा ऐ प्रकारक घटना वास्तवमे एखन धरि होइत अछि जे सवर्ण परिवारक वाल विधवा सुकन्याकेँ सेहो पुनर्विवाह करबाक समाजमे मान्यता नै गेल, जइ समैमे ई कथा लिखल गेल ओइ समैमे स्थिति तँ आर दयनीय छल। ‘करूणा’ कथा विषम पिरस्थितिमे आगाँ बढ़ैत अछि। एकटा वालिका नरेन्द्रकेँ तकैत करूणा घर पहुँचलि। नरेन्द्र अपन मातृकमे छल। करूणा एकसरि छली। वालिका चकित होइत प्रश्न कएलनि, ‘एकसरि डऽर नहि लगैत अछि। अपन जीवनकेँ जीवन्त लहासक रूपमे करूणा वाजलि- ककर डऽर वास्तवमे भूत-परेत एकटा भावनात्मक रूपसँ शून्य प्रणीक लेल डरक साधन नै बनि सकैछ। की छन्हि जे चोर आओत? मुदा बालिका प्रश्न कएल जे जौं अपने उठा लिए? ऐ प्रकारक प्रश्नसँ करूणा स्तब्ध भऽ गेली। एकटा नारीक मर्यादा समाजक दृष्टिमे जे महत्व राखए, मुदा ओकरा लेल सर्वोपरि। समाजक उदाहरण यएह लेल जे ऐ समाजक नीच लोकसँ लऽ कऽ विचारवान वर्गक किछु लोक सेहो अवलाक चरित्र हननसँ वाज नै आएल अछि। करूणा भविष्यक डरसँ काँपि अपन सुन्नर रूपकेँ भयावह बनएबाक लेल उद्धत भऽ गेली। परिस्थिति सेहो संग देलकनि जे बच्चाबाबूक माथ परक चाम उज्जर देख करण पुछलनि तँ पता चललनि जे सल्फ्यूरिक एसिड अर्थात् तेजाप प्रयोगशालामे पड़ि गेल। बच्चाबाबूकेँ अपन घरसँ विदा करैत देरी तखापर राखल स्ल्फ्यूरिक एसिड अपन मुँहपर ठाढ़ि करूणा रूपवतीसँ जीवित पिचाशक रूपमे आबि गेलीह? आब प्रश्न उठैत अछि जे करूणाकेँ एना कएलासँ की भेटल? भेटबाक प्रश्न तँ नै मुदा हुनक चरित्रहरणक आशंका हुनका मोने समाप्त भऽ गेल। जौं एकटा मातृ-पितृ विहीन बालकक दायित्व नै रहतनि तँ आत्महत्या सेहो कऽ सकैत छलीह। यएह थिक देवी भक्तिक केन्द्र मिथिलामे देवीक दशा। नारी िवमर्शक एकरूपक यथार्थचित्रण किरणजी कएलनि। कनेक कमी जे कथाक प्रारम्भ सरल शब्दमे सेहो कएल जा सकैत छल मुदा साहित्यक पुरा रूपक शब्दमे कथाकेँ प्रवेश करा कऽ किरणजी ओइ विचारवान समीक्षकक दृष्टिमे अपन स्थान बनएलनि जनिक मान्यता छन्हि जे भाषा उच्च कोटिक हुअए, जकर अर्थ सभ मैथिल नै लगा सकथि ओ वास्तविक रचना थिक। भऽ सकैत अछि जे कथाकार ऐ प्रकारक शब्द सभसँ कथाक सहज रूपेँ कएने होथि, वा मूलत: कवि रहनिहार किरण अपन काव्यात्मक प्रवृतिकेँ नै झाँपि कविताक बिम्बकेँ कथाक रूप दऽ देने होथि। जौं ई कथा काव्य रहितए तँ मैथिली साहित्यक लेल विस्मयकारी क्षण होइतए जखन करूणा.... महाकाव्यक नायिका बनि मिथिलाक मानस पटलपर विचरण करितथि। दोसर जे कनेक नकारात्मक विन्दु भेटल ओ अछि करूणाक अपन आभा नष्ट करबाक दृष्टिकोण। यथार्थबोधी कथाकारकेँ अइठाम क्रांतिवादी दृष्टिकोण स्पष्ट करबाक चाहियनि, मुदा किरणजी सन सिद्धहस्त रचनाकारक सोच सेहो समाजमे क्रांति नै सोचि सकल। हम सम मिथिलामे रहैत छी, एकटा उतर आधुनिक सोच की कहल जाए आधुनिक दृष्टिकोणसँ दूर मिथिला.... जइठाम एखनो विधवाकेँ पुनर्विवाह की कहल जाए कोनो आन कन्याक विवाह संस्कारक ऐहब नै बनाओल जाइत अछि। फ्रांसक राज्यक्रांति हुअए वा यूरोपक धर्म सुधार आन्दोलन सभमे साहित्यक अपन महत्व अछि, मुदा ई आर्यावर्त्त थिक अइठाम साहित्य मनोरंजन मात्रक साधन मानल जाइत अछि, प्रेरणाक स्रोत नै। वास्तविकता सेहो छैक जे साहित्यकारकेँ अपन लेखनीक दृष्टिकोणकेँ अपन जीवनमे सेहो जोड़ि देवाक चाही, नै तँ समाज मान्यता कोना देतनि वा ओ साहित्य प्रेरक कोना हएत? किरणजी करूणा सन दृष्टिकोण रखैत हेताह किएक तँ हुनकाे जन्म अही समाजमे तँए क्रांतिवादी नै बनि ‘करूणा’क नाश देखा देलनि। ओइ प्रकारक नाश जे जइसँ नीक मृत्यु। मुदा सम्यक सोचबला किरणजी केँ अइठाम कनेक क्रांतिवादी बनि करूणाक पुनर्विवाह देखएबाक चाहियनि। यथर्थादोषी साहित्यकारकेँ सेहो समाजमे विचार उत्पन्न करएबाक लेल क्रांतिवादी बनब साहित्यक लेल अनिवार्य नै तँ आडंवरकेँ समर्थन करएबला ऐ प्रकारक साहित्यकेँ पढ़निहार लोक दोष साहित्यकारेपर देत। दोसर कथा ‘एहि चारि खूनक खोज केनिहार के?’ अर्थनीतिकेँ धियानमे राखि कऽ लिखल गेल। कथाक प्रारंभमे कथाकार ब्राह्मणवादी व्यवस्थापर कनेक कटाक्ष कएलनि, ‘पंडित जे कहथि से करी मुदा जे करथि से नहि करी’ अर्थात् अग्रसोची समाजक धर्मपालक जातिक कर्म आ कथनमे भिन्नता अछि। वास्तविकता सेहो अछि पंडित विद्याध्ययन आ नीति अध्ययनक आधारपर उचित वचन तँ अपन मुखसँ वजैत छथि, मुदा मात्र होसराक लेल अपन लेल नै। एे कथामे सेहो एकटा सत्कर्मी परेमा अपन स्वाभिमानक संग जीवन तँ प्रांरभ कएलक मुदा सम्पतियासँ विवाहक वाद साधनहीन परेमाक स्वाभिमान परिस्थितिवश डगमगा गेल। अपन नेनाकेँ जीवित रखबाक लेल हलुआइक दोकानमे किछु भोजन सामग्री तकैत पकड़ल गेल। पुलिस अपन काज कएलक एकटा भोजन चोरि करबाक प्रयास करैबला चोरकेँ डकैत बना कऽ सातवर्ष कठोर कारावास दिआ देलक। न्यायालयमे परेमाकेँ न्याय नै भेटल किएक तँ ओकर गप्प सुनत के? परेमा जहलसँ छूटल तँ अर्थहीन परिवारक सभ जन समाप्त......। अर्थनीतिक ई कथा समाजक अंतिम व्यक्तिपर प्रारंभ भऽ ओकर अंतसँ समाप्त भेल। किरण जीक ई कथा यथार्थबोधी मानल जा सकैत अछि। अइमे क्रांतिक कोनो गुंजाइश नै किएक तँ शिक्षा आ भौतिक साधनसँ विहीन मानब सरकारी तंत्रक विरूद्धमे कोना आन्दोलन करए, वादमे परेमा कतए जाए किएक तँ ओ विक्षिप्त भऽ गेल। ‘काल ककरो छोड़त’ एकटा राजपरिवारक कथा थिक। महाराज दीर्घवाहु अपन मृत्युकालमे अपन राज्य आ अपन पाँच वर्षक वालक सुन्दर अपन छोट भाए वीरवाहुकेँ सौंपि ऐ संसारसँ विदा भेलनि। कालान्तरमे वीरवाहु अपने वास्तविक राजा कहएबाक लेल अपन भातिजकेँ मारि देलनि। ई दृश्य वीरवाहुक पुत्र शंकर देखलक आ पितृहन्ता बनि गेल। शंकरक स्त्री राधा दोसर पड़ोसी युवक रमेशसँ प्रेम करैत छलि, ओ सेहो ‘महाजनोयेन गत: स पंथा’क आधारपर शंकरक हत्या कऽ देलथिन। अंतमे कथाकार ई प्रश्न छोड़ि कथाक इतिश्री कएलनि- ‘काल की राधाकेँ छोड़तनि? वास्तवमे एकरा कथा नै मानल जाए ई थिक कथाकारक विराट जीवन दर्शन ओ शैक्षणिक योग्यताक एकटा चित्र। इतिहास साक्षी अछि धनलोलुपता ओ राजपदक आशमे कतेक शासक संबंधक मर्यादाकेँ िवसरि गेल छलथि। लोभ पापक कारण होइछ। लोभ माली अपन फूलवारीक फूलसँ सेहो करैत अछि, एकटा पति अपन पत्नीक सौन्दर्यसँ सेहो करैत अछि मुदा ओ िथक मर्यादापूर्ण अधिकारक लोभ। अमर्यादित ओ अवांछित लोभक परिस्थितिमे लोक अपने नाश करैत अछि। प्रलाप, समाजक चित्र, धर्मरत्नाकर, चनटा, जाति पाँतिक जाड़ू आदि कथा सेहो समाजक अग्रआसनपर बैसल लोकक समाजक अंतिम व्यक्तक प्रति दृष्टिकोणकेँ स्पष्ट करबैत अछि। ऐ प्रकारक कथा जइमे सम्पूर्ण समाजक स्थितिक चर्च हुअए ललित आ जगदीश प्रसाद मंडलकेँ छोड़ि किरण जकाँ केओ नै कएलक। मुदा सभटा कथा यथार्थचित्रण तँए श्रीनिवासजी हिनका शिल्पीक संज्ञा दइमे संकोच कएलनि। वास्तविकता अर्थात् इजोतसँ डर कल्पना अर्थात अन्हारसँ प्रेम मैथिली साहित्यक प्रवृति रहल छैक तँए किरणकेँ ओ स्थान नै भेटल जकर ओ अधिकारी छथि। ऐ संग्रहक सभसँ विलक्षण कथा थिक- मधुरमनि। अपन साहित्यक िकछु चर्चित कथामे एकर स्थान अछि। एकटा निम्नवर्गीय समाजक मुँहजोरि मुदा स्वस्थ आ कर्मशील नारी मधुरमनि अपन शरीरसँ असमर्थ पतिक प्रतिदायित्व रखैत अछि। मधुरमनिक कठोरवाणीसँ उद्विग्न भऽ ओकर पति मोचन घरसँ पड़ा गेल। मधुरमनि पोटि कऽ फेर ओकरा घरमे आनि लेलक। सतना माय जखन मोचनक आलोचना मधुरमनि लग करैत अछि तँ मधुरमनि सतना मायपर तीक्ष्ण शब्दवाण चला कऽ ओकरा चुप करा दैत अछि। ‘पिट्ठा पहलमान लऽ कऽ हम की करब जे भरि दिन डेङविते रहत।’ वास्तवमे सतना मायक शरीरसँ मजगूत पति खूब पिटाइ करैत छल। यएह थिक हमरा सबहक समाजक नारीक पतिक प्रति सिनेह ओ अपन पतिकेँ किछु कहि सकैत छथि, मुदा दोसर किए कहत? अइमे अधिकार आ सिनेह दुनू भेटैत अछि। ऐ प्रकारे विहनि कथाक ऐ संग्रहकेँ युगान्तकारी तँ नै मानल जा सकैत अछि मुदा समाजक वास्तविक दशाक विवेचन आ तर्कपूर्ण शैलीसँ ई संग्रह अपन अलग स्थान रखैत अछि। पोथीक नाअाें- कथा किरण रचनाकार- डाॅ. कान्चीनाथ झा ‘किरण’ प्रकाशक- भाषा प्रकाषन पटना वर्ष- 1988ईं. ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। १.बेचन ठाकुर- दूटा विहनि कथा २. किशन कारीगर- टाई माने रस्सी- एकटा हास्य कथा १ बेचन ठाकुर दूटा विहनि कथा नोमीनेशन रामपुर पंचायतमे मानटूनक नाम नवका सत्रमे सरकार दिससँ अत्यन्त पिछड़ी जातिक लेल महिला आरक्षणक तहत आरक्षित कऽ देल गेल। अइ आरक्षणसँ लाभ पबैक मादे अति प्रसन्न भऽ मानटून घरवाली रामबतीसँ पूछलक- “गै, हमर विचार अछि जे अइ बेर तँू मुखियामे ठाढ़ होइतें। ई मौकी नै छोड़ितें।” रामबती खीसिया कऽ बाजलि- “र्इ बात बजैमे तोरा कनिको संकोच नै भेल।” हम आइ तक कोट-बेलौक नै गेलौं आ कोनो हाकिम-हुकुमसँ गप-सप्प नै केलौं। एत्ते तक जे कोनो बाहरी लोकक आगू मुँह नै उठौलौं। से जनानी जतऽ-ततऽ बौआइत! ई िकनो नै मानब।” बेचारा मानटून गुम्म पड़ि गेल। फेर किछु कालक पछाति हिम्मत कऽ पुचकाइर कऽ कहलक- “तूँ ही कह, जखन सरकार अपना सभकेँ आगू बढ़ैक अधिकार देलक तँ ओइसँ फायदा किअए नै उठाबी। मुखियाक काज समाज सेवा छी। सौंसे पंचायत प्रतिष्ठा भेटतौ।” ई बात सुनि बेचारी तत-मतमे पड़ि गेली। किछु काल पछाति बेचारी मुस्की दैत बाजलि- “तोहर कहल काटियो तँ नै सकै छी। चलऽ देखल जेतै, जे हेतै से हेतै। काल्हि नोमीनेशन कराए दए।” छल-बल मदनपुर पंचायतमे चुनावक सरगर्मी बड़ जोरपर छलै। मुस्की दैत मनोज बाजला- “मुनीलाल भाय, अपन समाजमे मुखिया पदक लेल अहीं जकाँ कर्मठ आ इमानदार लोकक खगता छै।” अइपर खीसिया कऽ मुनीलाल बजला- “से किअए यौ? सभसँ बुरबक दीनेनाथ।” मनोज मुस्का देलनि आ बाजल- “खीसिया गेलौं भाय। सच्चो कहै छी। अपन पंचाइतमे अहाँसँ योग्य आर कियो लोक कहाँ छै। खाली गरीबेटा ने छी।” मुनीलाल गिड़गिड़ा कऽ बजला- “भाय, अहीं ठाढ़ होउ। तन-मनसँ मदति करब। अहाँसँ बुजुर्ग अइ पंचायतमे आर के?” मनोज मुसकियो देलनि आ बजला- “हमरा सभकेँ आरक्षण नै अछि तँए। नै तँ िनश्चिते ठाढ़ होइतौं। मुनीलाल भाय, अहाँकेँ ठाढ़ निश्चित हेबाक अछि। तन-मन धनसँ मदति करब।” किछु सोचि कऽ मुनीलाल बजला- “भाय, अपने गामक मालिक छिऐ। अपनेक कहल हमरा मानए पड़त, जौं अहाँ सहाय छी।” ओही पंचायतक पाँच सए पोलबला सतना गामक प्रत्याशी मनोजक खानगी दोस सोमन आ एकटा आन प्रत्याशी सुकन चुनावसँ एक दिन पहिने रातिमे चोरा कऽ भरि पंचायतमे ख्ूब पाइ बँटलनि। चुनावक पछाति परिणाम आएल। सोमनकेँ दू हजार भोंट भेटलनि, मुनीलालकेँ दू सए आ सुकनकेँ उन्नैस सए। विहान भने पंचायत भवनपर आयोजित सभागारमे िनर्वाचित मुखिया सोमन प्रसन्न मने कहलनि- “धनि बाइस सए पोलबला चन्दनपुर गाम आ मनोज मालिक जे आइ मुखिया बनलौं।” अपन वार्ड सदस्य मोहितसँ ई बात सुनि घरपर मुनीलालकेँ बोम पाड़ि कना कऽ बजा गेलै- “बिना छल-बलक एलेक्शन जीतनाइ असंभव।” २ किशन कारीगर टाई माने रस्सी । एकटा हास्य कथा । ओना त रस्सी जीवन मे बड्ड उपयोगी होइत छैक। गरीब लोक लेल त आओर बेसी टाट फरक बन्है स लके घर छारै माल जाल बन्है स ले के खोपड़ी बन्है तक। मुदा जखन इह रस्सी गाराक फॉस भए जायत अछि तखने लोक बुझहैत अछि रस्सीक महिमा। जेकर गारा फॅसैत अछि वैह बैझहैत अछि जे कि भाव पड़ैत छैक। आई एहने चक्करफॉस मे फॅसल अधमरू भेल रंजन बजलाह। हम पुछलियैन जे कहू टाई माने कथी वो बजलाह रस्सी। एक दिन भिंसरे भिसंरे रंजन फोन केलैन किशन अहॉ के त जे ने से रहता है । हम ओंघाएले रही मोन त भेल जे खूम जोर स गारि परही मुदा ज्येष्ट भ्राता के गारि कोना परिहतौ तहि दुआरे कुशल छेमक गप भेलाक बाद रंजन फेर बजलाह हमरा कहिया से सासुर जाइ लेल मोन छटपटा रहा है आ अहॉ कोनो ओरियान ने नहि करता है। हम बजलहूॅ भैया अहा मंगरौना आउ ने सब ओरियान एक्के मिनट मे हो जाएगा। ई सुनि ओ हरबराएल बजलाह अच्छा किशन हम एक हप्ता बाद गाम आबि रहा है। हम कहलियैन ठिक छैक आ फोन राखि के नित क्रिया मे लागि गेलहू। हमरे पितियौत भाए छथि रंजन पूणे विश्वविद्यालय स इंजीनियरिंग केने रहैथ। परदेश मे जनम आ ओतए प्रारंभिक शिक्षा स उच्च शिक्षा धरि पढ़लाह। एकदम शहरी ठाठ बाठ मैथिलक कोनो दरश नहि हुनका अंग्रेजी मराठी बेसी बजैत छलाह। ओना त हमरो जनम परदेश मे भेल मुदा गाम आबि मैथिली सीखि गेलहु। हमरा जतबाक स्नेह अपना माटि पानि स रंजन के ततबेक बेसी अलगाव एहि सॅ। हमर कक्का बच्चा बाबू के केंद्रिय विद्यालय मे प्राचार्य रहैथ तहि दुआरे परदेश मे धिया पूता के पढौलैन। ओ मैथिली बजैत जहि स रंजनो कने मने मैथिली बुझहैत बाजल त तेरहे बाइस होइत रहैन। बच्चा बाबू के केंद्रिय विद्यालय मे नोकरी भेलैन त कहियो घूरि के मंगरौना नहि एलाह। एबो कोना करितैथ ओ सभ पूर्णिया मे जगह जमीन किनी बसि गेल रहैथ। हुनका घियो पूतो के गाम घर सॅ कोनेा मतलब नहि एकदम अनचिनहार रहैथ ओ सभ। रंजन कोनो अमेरिकी कंपनी मे सॉफटवेयर इंजीनियर रहैथ तहि दुआरे हमरा कक्का के मोन गद गद । संयोग स हुनकर बियाह दरभंगा जिलाक मब्बी गाम मे भेल। लड़की शिक्षामित्र के नोकरी मे रहथिहिन आ हमरा भैयाक ससुर सेहो प्रखणड कृषि पदाधिकारी रहैथ। तहि दुआरे मोन माफिक लेबो देबो भेलैक। लड़की वला सेहो एहि कुटमैति स खूम प्रसन्न रहैथ तहि दुआरे चैनो उड़ल पर दस लाख गनने रहैथ मुदा बियाहक बाद जमाई के सासुर बजौताह से बिसैर गेल रहैथ। एम्हर रंजन सासुर जाइ लेल छटपरटाइत रहैथ मुदा गाम घरक भंाज भुज हुनका एकदम नहि बुझहल तहि दुआरे ओ हमरा डेनवाह बनौलैन। ठीक सातम दिन सात बजे सांझ मे रंजन हमरा गाम मंगरौना अएलाह सूट बूट टाई पहिरने कियो हुनका चिनहैथ नहि। गामक कतेक लोक स पूछैत पूछैत ओ हमरा दरवज्जा पर अएलाह। एम्हर हम गाछि कात स धनरोपनी कए के आएल रहि कि हुनका देखैत मातर स्नेह बस भरि पाज के गारा मिलान केलौह मुदा रंजन रूष्ट होइत बजलाह अहा हमरा टाई मे मिट्टी लगा दिया आब हम सासुर कोना जाएगा। हुनका खिसियाअैत देखि हम बजलहु अहा चिन्ता किएक करता है हमरो लग टाई है ओहि स अहा के काम हो जाएगा। ई सुनि ओ खुशि स मोने मोन नाचए लगलाह जे टाई पहिर के जाएब त सासुर मे खूम मान दान होएत। कुशल छेमक गप भेलाक बाद दूनु गोठे हाथ मुह धो के बैसलहुॅ त माए हमर खाना परोसलीह। भोजन भात कए के राति मे विश्राम केलहु। दोसर दिन भिंसरे पहर फटफटीया पर बैसी क हम आ रंजन हुनकर सासुर मब्बी जाई लेल बिदा भेलहु। हम फटफटिया चलबै मे अपस्यात रहि मुदा रंजन टाई समहारै मे फिरिशान रहैथ। पछिया हबा खूम जोर स बहैत जहा बलुआहा बान्ह लक पहुचलहु की ठक्कन भेंट भए गेलाह आ रंजन के देखि बजलाह अहाक गारा महक रस्सी उधिया रहल अछि बान्हि लियअ नहि त उरिया जाएत। ई सुनि रंजन डरे टाई मे क्लीप लगा लेलैन आ किछू नहि बजलाह। ठक्कन हमरा पुछलैन यौ किशन इ अनठिया के छथि आ एतेक थाल खिचार मे कतए जा रहल छी। हम हुनका कहलियैन हिनका नहि चिन्हलियैन हमरे पूण्रिया वला पितिऔत भाए छथि। एखन हिनके सासुर मब्बी जा रहल छी। ठक्कन बजलाह से त ठीक मुदा कहू त गारा मे एतेक टा रस्सी बन्हबाक कोन काज ज कोनो खूरलूच्ची धिया पूता रस्सी बूझहि एकरा घिची देतै त लगले प्राण सेहो छुटि जेतैन। हम बजलहु यौ महराज इ टाई पहिरने छथि रस्सी नहि। ओ बजलाह धू जी महराज गाम घरक लोक त एहि टाई के रस्सीए बुझहत ने बेस जाउ सासुर अहू बुझिए जेबै जे टाई माने कथि हम बजलहु रस्सी। ठीक 2 बजे दुपहर मे हम आ रंजन मब्बी पहुचलहु ओतए पहुचलाह पर आगत बात भेल मुदा सभ घुरि घुरि के हमरे दिस तकैत किएक त हम धोति कुर्ता पहिरने रहि कतेक के हम अनठिया लगियै किएक त पहिल बेर भैयाक सासुर मब्बी आएल रही। रंजनक बियाह मे हमर कक्का नहि बजौलैन त बियाह मे नहि आएल रहि। एकटा बुरहि दाए बजलीह इ के छेथहिन डेनवाह हम बजलहु सेह बुझियौअ। ताबैत मे रंजन के सारि नीलू अनिला सोन सभ गोटे हेंर बान्हि के हसि मजाक करै लेल एलीह। नीलू बजलीह डूल्हा की हाल चाल अछि त रंजन हसैत बजलाह हाल ठीक नहि है सौंसे देह मे खूम थाल लग गया। एतबाक मे अनिला टाई छुबि बजलीह यौ पाहुन इ कोन अंगरेजिया आंगि अछि। ओकरा हाथ मे माटि सेहो लागल रहै वैह कादो वला माटि टाई मे लागि गेलै। टाई मे माटि लागल देखि रंजन के मोन भिन्न भिना गेलैन आ तामसे अघोर भेल बजलाह हम अखने चलि जाएगा आब। नीलू बजलीह पाहुन अहा एतेक दिन बाद सासु अएलहु त अहा के आई रहैए परत। अहा नहि रहब त हम सौसे देह आ मुहे मे माटि लगा देगा। ई सुनि रंजन सकपक्का गेलाह हम चुपचाप सभठा गप सुनैत रही। खान पिअन भेलाक बाद राति मे ओतए रहलहु मुदा रंजन के आपिस पूर्णिया अबै के रहैन तहि दुआरे भिंसरे पहिर मब्बी स बिदा भेलहु। हम दलान पर सूतल रहि भिंसरे पहर मैदान दिस स आबि मुह हाथ धो के तैयार रहि। मुदा शहरी बाबू रंजन के नीन 7 बजे टूटलैन सेहो हम अंगना जा के हरबरौलियैन तखन उठलाह आ हरबड़ी मे ब्रश केलैन आ तकरा बाद दुनू गोटे जलखै कए बिदा भेलहु मेघौन सेहो लागल रहैक। रस्ता पेरा गुफ अनहार लगैत बरखा सेहो भेल रहैए थाल खिचार सेहो रहैए। सभ स बिदा लैत सासुर स बिदा भेले रही फटफटिया स्टार्ट केने रही रंजन बैसी गेलाह की ताबैत मे केम्हरो स रंजन के छोटकी सारि सोनम दौगल अएलीह यौ पाहुन अहा के एटाइची त छुटिए गेल। ओ बजैत आ दौगल अबैत रहै जहा गाड़ि लक पहुचल की धरफरी मे ओकर पाएर पिछैर गेलैए आ अछैर पिछैर के खसैए लगलै आ हरबरी मे टाई पकरा गेलैए। टाई ततेक जोर स घिचेलैए कि रंजन फटफटिया पर स धबाक दिस खसि परलाह ततेक जोर स पंजरा मे चोट लगलैन जे कुहैर उठलाह । एम्हर हमरा हसी स रहल ने गेल। रंजन कुहरैत बजलाह हमरा एतेक चोट लगा कि देह टूट गया आ अहॉ खाली हॅसने मे लगा है। अहा किछ करेगा की नहि। हम बजलहु करेगा त एक्के मिनट मे मुदा पहिले ई कहिए टाई माने कथि। रंजन कुहरैत बजलाह किशन अहा ठीके कहता था गाम घर मे टाई माने रस्सी। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। नवेंदु कुमार झा- रिपोर्ताज १.अपन कूनबा बचबऽ लेल मैदान मे उतरलाह सुप्रीमो तीरक निषान पर अछि लालटेन।
छओ मासक मौनक बाद राष्ट्रीय जनता दलक अध्यक्ष लालू प्रसाद अपन दलक पदाधिकारी आ कार्यकर्ताक संग बैसक कऽ प्रदेष में सŸाारूढ़ नीतीष सरकारक विरूद्ध आंदोलन पर करबाक घोषणा कएलनि अछि। सŸाारूढ़ जदयू द्वारा राजदक सहयोगी लोक जनषक्ति पार्टी मे सेधमारी कएलाक बाद अपन दलक एकजूट करबाक लेल श्री प्रसाद क सक्रियता सँ प्रदेष राजनीतिक पारा चढ़बाक संकेत भेटि रहल अछि। दरअसल बिहार विधान परिषद् मे लोजपाक अस्तित्व समाप्त होएब आ बिहार विधान सभा मे लोजपाक अस्तित्व पर संकट के देखि लालू प्रसाद अपन कूनबा बचैबाक लेल डैमेज कंट्रोल अभियान प्रारंभ लऽ कएलनि मुदा हुनक एहि अभियान के हुनक विष्वसनीय दूटा सांसद डा0 रघुवंष प्रसाद सिंह आ जगदानंद हवा निकालि देलनि। दूनू सांसद एहि बैसक मे अनुपस्थित रहि ई संकेत देलनि जे दलक भीतर एखन सभ किछु ठीकठाक नहि अछि। जखन कि तेसर सांसद उमाषंकर सिंह एहि बैसक सूचना नहि होएबा बहाना बना दलक नेतृत्व क सोझा खुलल चुनौती देलनि अछि। लोकसभा चुनाव में राजदक खराब प्रदर्षनक बाद दलक कतेको वरिष्ठ नेताक दल छोड़बाक जे सिलसिला प्रारंभ भेल छल जे विधान सभा चुनाव सँ पहिने धरि चलैत रहल आ ई सिलसिला एखनो जारी अछि। हालहि मे लालूक विष्वसनीय बुझल जाए बाला दल महासचिव राम वचन राय आ प्रवक्ता शकील अहमद खानक राजद के छोड़बाक घटना सँ दलके नोकषान भेल अछि। एहि क्रम मे हुनक सहयोगी लोजपाक अस्तित्व पर आएल संकट के देखि स्थिति के भापि लालू प्रसाद अपन कूनबा के बचैबाक लेल अपन दिल्ली मोह के त्यागि बिहारक रूख कएलनि अछि। श्राजद अध्यक्ष लालू प्रसाद आ लोजपा अध्यक्ष राम विलास पासवानक दिल्ली प्रेम सँ दूनू दलक कार्यकर्ताक उत्साह ठंढा पड़ि गेल छल। एकर असरि विधान परिषद् मे लोजपाक जदयू मे विलयक रूप सोझा आएल। प्रदेष मे राजक कतको कार्यक्रम आ चर्चित फारबिसगंज काण्ड मे राजद सुप्रीमोक निष्क्रियता सँ सरकारक विरूद्ध राजदक हमला कमजोर पड़ल तऽ बियाडा जमीन आवंटन मामिला मे विपक्षक कड़गर रूखक बाद जदयू लोजपा आ झामुमो पर डोरा डालि विपक्षक हमलाबर धार के भोथर बना देलक अछि। राजदक वरिष्ठ नेता सभक मध्य बढ़ैत दूरी सँ दलक संकट गहिर भ्ऽ गेल अछि आ पटना मे भेल बैसक लालू प्रसाद स्वयं संकट मोचकक रूपम े उपस्थित भऽ दलके एकजूट करबाक प्रयास तेज कऽ देलनि अछि। केन्द्र मे मंत्री पदक कुर्सीक जोड़तोड़ मे लागल श्री प्रसाद आ श्री पासवानक स्थिति एखन ‘‘माया मिलि न राम ’’ बाला भऽ गेल अछि। दूनू नेता के कांग्रेस दिल्ली दरबार सँ रास्ता देखा देलक आ इम्हर प्रदेष मे दूनू दलक ऊपर संकटक मेघ घुमि रहल अछि। विधान परिषद् मे बग्ला उजरि गेल अछि तऽ विधानसभा मे जदयूक बिहारि सँ बंग्ला के बचैबाक प्रयास भऽ रहल अछि। दोसर दिस लालू प्रसाद अपन राजनीतिक कौषलक मटिया तेल सँ लालटेन क लौ के तेज करबाक प्रया समे मैदान मे उतरि गेल छथि। श्राजदक आत्मचिंतन बैसक मे कार्यकर्ताक पैघ उपस्थितिक मध्य कतेको वरिष्ठ नेताक अनुपस्थिति सँ पहिल बेर राजद सुप्रीमो के खुलल चुनौती भेटल अछि। लालू प्रसादक परिवार पहिनहि छिरिया गेल अछि आ आब दल पर छिरियैबाक संकट आबि गेल अछि। लालू प्रसादक एहि सक्रियता सँ संभव अछि जे लालटेनक लौ किछु दिन धरि स्थिर रहए मुदा ई कखन मिझा जाएत से नहि कहल जा सकैत अछि। लालू प्रसाद आ राम विलास पासवानक नव दिल्ली मे कांग्रेस सँ दोस्ती बढ़ैबाक छोड़ मे प्रदेष ये दूनू दलक जड़ि हिलि गेल अछि। दूनू नेता अपन ढजनमनाएल घरके सम्हारऽ मे कतेक सफल भऽ सकताह से तऽ आबऽ बाला मे पता चलत। --------------------------------------------------- २.जदयूक वार सँ भोथर भेल विपक्षक धार
बिहार विधान सभा मे लोक जनषक्ति पार्टीक अस्तित्व पर संकट बढ़ि गेल अछि। पार्टीक तीनटा सदस्य मे सँ टूटा सदस्य प्रमोद कुमार सिंह आ नौषाद आलम बिहार विधान सभाक अध्यक्ष उदय नारायण चौधरी के चिट्ठी लिखि पार्टीक जदयू मे विलयक सूचना देलनि अछि। हालांकि नौषाद आलम पार्टी अध्यक्ष राम विलास पासवान सँ गपषप कएलाक बाद लोजपा मे अपन आस्था व्यक्त करैत विलयक अपन सूचना आपस लऽ लोजपा केऽ राहत देलनि अछि। विधान सभा अध्यक्ष एखन विदेषक यात्रा पर छथि। तेँ एहि पर एखन धरि कोनो निर्णय नहि भेल अछि मुदा राजनीतिक क्षेत्र मे चलि रहल चर्चाक अनुसार एकर संभावना एखनो बनल अछि जे विधानसभाध्यक्षक आपस अएलाक बाद विधान परिषद जका विधान सभा मे सेहो लोजपा क बंग्ला उजरि सकैत अछि। चर्चा तऽ इहो अछि जे आबऽ बाला समय मे राजदक संकट सेहो बढ़ि सकैत अछि। एकर संकेत सेहो भेटि रहल अछि। पछिला दिन नव दिल्ली मे बाबा रामदेव पर भेल पुलिसिया कार्रवाई पर राजद सुप्रीमो लालू प्रसादक स्टैण्डक विरोध मे राजदक विधान पार्षद नवल किषोर यादवक बयान एहि बाद क संकेत अछि जे दलक भीतर फुलि रहल। विद्रोहक बैलून कखनो फूटि सकैत अछि। बियाडा जमीन आवंटन मामिला मे विपक्षक एकजूटताक बाद सक्रिय भेल जदयू नेतृत्व विपक्षक हवा निकालबाक जे रणनीति बनौलक ओकर परिणाम तत्काल सोझा आएल अछि। लोजपाक एकटा चक्का पम्चर (विधान परिषद् सँ सफाया) आ दोसर चक्काक हवा (विधानसभा मे संकट) निकलि गेल अछि जे कखनो पम्चर भऽ सकैत अछि तऽ राजदक लालटेन टिमटिमा रहल अछि। जदयूक विपक्षक सर्जरीक अभियान मे ज्यों कांग्रेसक सेहो ऑपरेषन भऽ गेल तऽ कोनो आष्चर्य नहि होएत। ---------------------------------------------------- ३.सरकारक राष्ट्रीय विरूद्ध आंदोलन करत राजद
प्रदेष मे राष्ट्रीय जनता दलक अस्तित्व बनाएल रखबाक लेल राजद अपन संगठन के मजगूत करबा अभियान मे लागि गेल अछि गोटेक छओ मासक मौनक बाद अपन चुप्पी तोड़ैत राजद अध्यक्ष लालू प्रसाद नीतीष सरकारक विरूद्ध आंदोलनक कएलनि अछि। राजद एहि क्रम मे लोक नायक जय प्रकाषक जयंतीक अवसर पर 11 अक्टूबर के पटना मार्चक घोषणा कएलक अछि। एहि सँ पहिने 1 सँ 30 सितम्बर धरि सभ जिला आ प्रमंडल मुख्यालय मे कार्यकर्ता सम्मेलन होएत जाहि मे लालू प्रसाद सेहो उपस्थित रहताह। 1 अक्टूबर मास मे पार्टीक कार्यकर्ताक प्रषिक्षण षिविर बोध गया मे आयोजित कएल जाएत आ नवम्बर-दिसम्बर मास मे सभ प्रखण्ड मुख्यालय मे दू दिवसीय कार्यकर्ता षिविर आयोजित करबाक निर्णय सेहो लेल गेल अछि। ---------------------------------------------------- ४.डेयरी उद्योग मे रूचि देखौलक इंडियन पोटाष लिमिटड
इंडियन पोटाष लिमिटेड प्रदेष मे डेयरी उद्योग लगैबाक प्रति रूचि देखौलक अछि। कम्पनीक अध्यक्ष गोविंद नैयर मुख्यमंत्री नीतीष कुमार सँ भेट कऽ कम्पनी भावी योजना जनतब देलनि। श्री नैयर मुख्यमंत्री भेटक क्रम मे मुजफ्फरपुरक मोतीपुर चीनी मिलक पुर्न संरचना आ विस्तार क जनतब दैत जनौलनि जे एहि मिल मे बिजलीक सह उत्पादन आ बाटलिंगक संग डिस्टलरी प्लांट लगाओल जाएत। एहि पर 350 करोड़ टाकाक निवेष होएत। कम्पनी मुजफ्फरपुर मे अपन कारखानाक एकटा ईकाई केऽ सेहो पुनर्जीवित कएलक अछि जतए प्रतिदिन सय टन सिंगल सुपर फास्पेटक उत्पादन कएल जा रहल अछि। श्री नैयर भेटक दरमियान बिहार मे कम्पनीक डेयरी उद्योग लगैबाक प्रति सेहो रूचि देखौलनि। -------------------------------------- ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। बिपिन झा [एहि लेख केर लेखक बिपिन कुमार झा (Senior Research Fellow), IIT मुम्बई मे संगणकीय भाषाविज्ञान (संस्कृत) क्षेत्र मे शोध (Ph. D.) कय रहल छथि। मैथिली वर्डनेट समाजहितार्थ वैयक्तिक रूप सँ शुरू कयल गेल एकटा कार्य छन्हि जाहि मे समस्त मैथिलीप्रेमी केर सहयोग अपेक्षित अछि। प्रस्तुत लेख केर उद्देश्य अछि एक जनवरी २०१० अंक मे चर्चा कयल गेल मैथिली शब्द तन्त्र केर दिशा मे की प्रगति भेल एकर जानकारी देब आओर एहि कार्य के कोना आगू बढायल जाय एहि सन्दर्भ मेचर्चा करब।] Maithili Word net: - आवश्यकता, कार्यान्वयन आओर तद्गत समस्याक समीक्षा। मैथिली वर्डनेट बनेबाक उद्देश्य अछि एकटा एहेन Lexical Database तैयार करब जे चयनित मैथिली भाषा केर शब्द के अर्थ, आण्टोलोजी (हैरार्की), एहि संग समस्त (चयनित) भारतीय भाषा मे ओहि शब्दक अर्थ, पर्यायपदगण आदि सहजता सँऽ उपलब्ध करा सकय। प्रश्न उठत एहि सँऽ लाभ की होयत? एहि सन्दर्भ कें विविध दृष्टि सँऽ देखल जा सकैत अछि – १. जनसामान्य मैथिलीप्रेमी हेतु २. संगणकीय भाषाविज्ञान हेतु समस्त मैथिल प्रेमी एहि स्वतन्त्र साफ्टवेयर/विकसित टूल द्वारा मैथिली के कोनो शब्द के अर्थ संगहि ओकर विविध भाषा मे अर्थ ओकर आण्टोलोजी[1], विविध भाषा मे ओकर अर्थ विविधता आओर पर्यायपदसमूह सहजता सँऽ देखबा मे समर्थ हेताह। संगणकीय भाषाविज्ञान हेतु ई विशेष उपादेय होयत कियाक तऽ मैथिली आ अन्य भारतीय भाषाक पारस्परिक यान्त्रिक अनुवाद मे ई सहयोग करत। उक्त तीन बिन्दु पर चर्चा करबाक अनन्तर अखनि धरि जे किछु उपलब्ध श्रोत अछि ओकर समीक्षा करब उचित होयत- १. कल्याणी कोश २. विविध शोधपत्र/लेख ३. विदेहक आनलाइन शब्दकोश ४. विविध अन्तर्जाल, विशेष कर संस्कृत वर्डनेट कल्याणी कोश केर उपलब्धता स्क्राइब पर नागेशजी केर सहयोग सँऽ भेटल। ई कोश एकटा मानक ग्रन्थ अछि। यद्यपि एहि शब्दकोश के अपन सीमा छैक, ई शब्दतन्त्र बनेबाक मार्ग मे विशेष उपादेय अछि। विविध शोधपत्र गूगल आ आदरणीय श्री सदन झा द्वारा (एशियाटिक के किछु अंश pdf मे) प्राप्त भेल जे चिन्तन के नवीन दिशा देलक। विदेह मैथिली शब्दकोश केर दिशा मे नीक कार्य अछि मुदा एकर अपन उद्देश्य आ सीमा छैक। ई सेहो एहि कार्य हेतु उपादेय अछि। विविध अन्तर्जाल एहि कार्य के गति प्रदान केलक संगहि प्रस्तुतीकरण के दिशा देलक। अखनिधरि की काज कयल गेल- सम्प्रति डाटा संकलन केर कार्य चलि रहल अछि। संगहि तत्समकोश के प्रारूप आ अपन Ph. D. कार्य के अनुरूप मैथिली शब्दबन्ध/शब्दतन्त्र के संरचना केर प्रारूप बनाओल जा रहल अछि। पाठक सँऽ सहयोगक अपेक्षा- एहि तथ्य सँऽ अपने सभ परिचित होयब जे मैथिली केर क्षेत्र विविधता केर संग उच्चारण (टोन) विविधता विद्यमान अछि। एहि संग अहू तथ्य सँ परिचित होयब जे कारण जे हो एतय (मैथिली भाषी केर मध्य) दू प्रकारक पूर्वाग्रह विद्यमान अछि- पहिल मैथिली बजनाइ पिछडापन के प्रतीक अछि अस्तु बच्चा सभ के तथाकथित पिछडापन सँऽ बचबैत छथि। दोसर मैथिली के उत्थान केर हेतु योगदान करबाक क्रम मे ई बिसरि जाइ छथि जे भाषा केर अन्तर्सम्बन्ध बहुत महत्त्वपूर्ण होइत अछि कोनो भाषा कोनो अन्य भाषा के अहित नहिं करैत छैक। एतय सभ सँऽ निवेदन जे उक्त दुनू पूर्वाग्रह सँऽ ऊपर उठि मैथिली के वास्तविक रूप मे अन्तर्जाल पर उपादेय बना एहि भाषा के सहज बनाबी आ एकर क्षेत्र के बृहत् करी न कि एकर क्षेत्र मे संकुचन आनी। यदि अपने मैथिली वर्डनेट सन्दर्भ मे कोनो सुझाव/श्रोतकेर जानकारी/ अथवा कोनो टिप्पणी दिअ चाहैत छी तऽ kumarvipin.jha@gmail.com पर मेल करू अथवा +9757413505 पर काल करू, ताकि मैथिली वर्डनेट निर्विघ्न एवं परिष्कृत रूप मे यथाशीघ्र लोकार्पित भय सकय। परिशिष्ट इष्ट[2]>संज्ञा 1. ऐसे कर्म जो धर्म से संबंधित हों § सामाजिक कार्य (Social) ( SCL उदाहरण:- विवाह,यज्ञ,तर्पण इत्यादि ) § कार्य (Action) ( ACT उदाहरण:- दौड़,पढ़ाई,चिंतन इत्यादि ) § अमूर्त (Abstract) ( ABS उदाहरण:- मन,हवा,गुण इत्यादि ) § निर्जीव (Inanimate) ( INANI उदाहरण:- पुस्तक,घर,धूप इत्यादि ) § संज्ञा (Noun) ( N उदाहरण :- गाय,दूध,मिठाई इत्यादि ) 2. वह जो सब बातों मे सहायक और शुभचिन्तक हो § संज्ञा (Noun) ( N उदाहरण :- गाय,दूध,मिठाई इत्यादि ) 3. एक पौधा जिसके बीजों से तेल निकाला जाता है § वनस्पति (Flora) ( FLORA उदाहरण:- शैवाल,लता,वृक्ष इत्यादि ) § सजीव (Animate) ( ANIMT उदाहरण:- मानव,जानवर,वृक्ष इत्यादि ) § संज्ञा (Noun) ( N उदाहरण :- गाय,दूध,मिठाई इत्यादि ) 4. वह विचार जिसे पूरा करने के लिए कोई काम किया जाए § अमूर्त (Abstract) ( ABS उदाहरण:- मन,हवा,गुण इत्यादि ) § निर्जीव (Inanimate) ( INANI उदाहरण:- पुस्तक,घर,धूप इत्यादि ) § संज्ञा (Noun) ( N उदाहरण :- गाय,दूध,मिठाई इत्यादि ) 5. वह देवता जिसकी पूजा किसी कुल मे परंपरा से होती आई हो § पौराणिक जीव (Mythological Character) ( MYTHCHR उदाहरण:- बकासुर,पांडु,द्रौपदी इत्यादि ) § जन्तु (Fauna) ( FAUNA उदाहरण:- गाय,मानव,सर्प इत्यादि ) § सजीव (Animate) ( ANIMT उदाहरण:- मानव,जानवर,वृक्ष इत्यादि ) § संज्ञा (Noun) ( N उदाहरण :- गाय,दूध,मिठाई इत्यादि ) 6. ढला हुआ मिट्टी का विशेषकर चौकोर लम्बा टुकड़ा जिसे जोड़कर दीवार बनाई जाती है § मानवकृति (Artifact) ( ARTFCT उदाहरण:- पुस्तक,कुर्सी,नाव इत्यादि ) § वस्तु (Object) ( OBJCT उदाहरण:- पुस्तक,छाता,पत्थर इत्यादि ) § निर्जीव (Inanimate) ( INANI उदाहरण:- पुस्तक,घर,धूप इत्यादि ) § संज्ञा (Noun) ( N उदाहरण :- गाय,दूध,मिठाई इत्यादि ) विशेषण 1. जिसकी इच्छा की गई हो § संबंधसूचक (Relational) ( REL उदाहरण :- चचेरा, मौसेरा, बनारसी इत्यादि ) § विशेषण (Adjective) ( ADJ उदाहरण:- सुंदर,लिखित,अमर इत्यादि ) 2. बहुत निकट का या बहुत करीबी § अवस्थासूचक (Stative) ( STE उदाहरण :- सूखा, तर, जवान इत्यादि ) § विवरणात्मक (Descriptive) ( DES उदाहरण :- लाल, पाँच, सुंदर इत्यादि ) § विशेषण (Adjective) ( ADJ उदाहरण:- सुंदर,लिखित,अमर इत्यादि ) [1] उदाहरण हेतु- परिशिष्ट देखू। [2] Hindi word net IITB ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। राजदेव मण्डल उपन्यास- हमर टोल गतांशसँ आगाँ… स्वार्थक कारणे दुनू परानीमे झगड़ा भेनाय स्वभाविके अछि। झगड़ाक बाद देह आ मन अलग हेबे करतै। वएह सुआरथ फेर दुनूकेँ मिलन करबौतै। से बात साँचे किन्तु झूठे। जे हुए किन्तु झगड़ाक बाद मिलन एक तरहक नव संचार करैत छै, मोनमे। जेना लगैत रहै छै जे सभकिछो अभिनव भऽ गेल हुअए। दमित लीलसा सभ फन-फनाक ठाढ़ भऽ गेल हो। मनक फुलवाड़ीमे नव नव फूलक आगमन। भनभनाइत भ्रमर। आबि जाइ छै- अभिनव प्रीत! धर्मडीहीवाली आपस आबि गेल छै। जागेसर आब डरे किछो नै बजै छै। एक सए झंझटसँ एकेटा झंझट ठीक। ठीके कहै छलै उचितवक्ता- ‘मौगीसँ जे अराड़ि करबें तँ सभ नेबाबी भीतरी घोंसारि देतौ आ बोलती बन्न भऽ जेतौ। धर्मडीहीवालीपर भनभनियाँ भूत सवार भऽ गेल छै। जखैन-तखैन भनभनाइते रहै छै। कोन ठेकान छै। ोग कने हटिए कऽ ओकरासँ गप्प करैत अछि। धर्मडीहीवालीक मोनक बात के बूझत। जखैन ओ असगर होइत अछि तखैने ओकरा अगल-बगलमे सखी, सेहेली, भर-भौजाइ, अड़ोसी-पड़ोसी सभ ठाढ़ भऽ जाइत अछि। जहिना नैहरामे ठाढ़ होइत छलै, तहिना। ओकरा सभकेँ कियो नै देखै छलै। देखतै किएक। मोनक आँखिसँ देखै छलै मात्र धर्मडीहीवाली, आ गप्पो करै छलै। “गे िनरमला, सन्तान कोन भारी चीज छै। चाहनेसँ कोन चीज नै होइ छै। कने दिमाग लड़ा सभ कुछो ठीक भऽ जेतौ। देखै छी दिदियाकेँ। ओकरो सासुरमे एहिना झगड़ा होइत छलै। बेटा जनमैते रानी बनि गेलै।” “है शुरूमे तँ बहुतो हल्ला-फसाद भेलै। बदचलन छै। बेहया छै। किन्तु सभ किछो रसे-रसे दबि गेलै। के केकरा याइद रखै छै, कथी। फुरसैतमे दोसरोक गप्प मोन पड़ैत छै आ काजक बोझ जँ माथपर रहै तँ अपनो विषयमे बिसरि जाइत अछि।” “ई तँ एहेन दुनियाँ अछि। जे जखैन ढोल पिटैक हएत तखैन केकरो सुगबुगाइतो नै देखबै। आ जँ चुप्पी साधि लेबाक बखत तँ बाघ जकाँ गर्जन करए लगत।” “के कथी बजै छै से बात छोड़ू। अपना विषयमे सोचू। अहाँकेँ बच्चा चाही। ओकरा जन्म दिअ पड1त। डागदर-वैघ गहवर-भगत चाहे जतएसँ हुअए।” धर्मडीहीवाली हँसैत अछि भनभनाइत....। फेर तमसा जाइत अछि। डरे खोलि कऽ नै बजैत अछि किन्तु पतिकेँ देखते ओर मान धिरनासँ डुबकि जाइत अछि। कोनो काज मोन लगा कऽ नै करैत अछि। जेना उड़ी-बिड़ी लगले रहैत अछि। आब जागेसरो मनकेँ मारने रहैत अछि- डरे....। फेर ने पर-पंचैती बैस जाए। आ समाज थू-थू करए लगे। समए आबि मुँह दाबि कऽ कखनहुँ काल कहि दैत अछि। “ओहि दिन खेलावन भगतसँ झगड़ि गेलिये। कहू तँ ओकरासँ फेर देखा दी। नै तँ महतो बाबा लग डाली लगबा दी। विसवास नै होइत अछि तँ डागदर-वैध जइठाम चलब ततहि चलू।” किन्तु धर्मडीहीवालीकेँ दिल-मोन तँ भरबे नै करै छै, ऐ गप्पसँ जेना। हरदम देहमे आगि लगले रहै छै। सुतैत-बैसैत बेचैन। सोचैत छै- जँ पति चाहैत अछि तँ आइ भगतसँ भेँट करबै। कौआ, मैना, बगरा सभ एकेठाम खेलाइत छलै। चिल्हौड़क छाँह देखते सभटा एकेबेर फड़फड़ा कऽ उड़ि गेलै, अासमान दिस....। खुला आकाशमे उड़ैत एक खुंडी मेघ। धर्मडीहीवालीक छाती धुकधुका उठल। नै जानि किएक....। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। अरविन्द ठाकुर मिथिलाक संस्कृति:किछु अप्रिय बिन्दु मिथिला वर्तमान मे एकटा मिथक मात्र अछि|आइ ने एकर कोनो भुगोल अछि आ ने कोनो संवैधानिक अस्तित्व|अत्योक्ति नहि होयत,जँ कही जे मिथिले जकाँ मिथिलाक संस्कृति सेहो एकटा मिथके अछि|राज्याश्रयी विद्वतजन द्वारा लिखल आ शिक्षा-व्यवसाय सँ जुड़ल पंडितजन द्वारा बेर-बेर दोहरायल गेल ओहि तथाकथित स्वर्णिमकालक गौरवशाली अध्याय सभक वर्तमान मे कोनो अवशेष-प्रमाण नहि देखाइत अछि|एकांगीए सही,भूत मे जँ आगि रहय त वर्तमान मे छाउर देखाइ पड़बाक चाही ने? विदेह माधवक आगमन आ हुनक पुरोहित गोतम रहुगण द्वारा अग्नि प्रज्ज्वलित कए भूमिक पवित्रीकरण सँ एहि आलोच्य क्षेत्र मे आर्यसंस्कृतिक सूत्रपात मानल जाइत अछि|एहि सँ पूर्व एकरा द्रविड़-किरातक मिश्रित संस्कृतिक स्थल अथवा व्रात्यलोकनिक निवास-स्थल मानल जाइत रहल अछि|व्रात्यलोकनिकेँ आर्य मानबाक आग्रह सेहो किछु इतिहासकारक छनि|एहि आर्यीकरणक पश्चात वर्ण-व्यवस्थासँ जाति-व्यवस्था,समाजसत्ताक प्रभुत्वसँ व्यक्तिसत्ताक प्रभुत्व,परिवर्तनशीलतासँ जड़ता आ उदारतासँ कट्टरता धरि पहुँचैत एहि क्षेत्रक समाज इतिहासक कोन-कोन अन्हार-इजोतक खोह सभमे ढुकैत-बहराइत वर्तमान धरि पहुँचल अछि,ताहिपरसँ एखनो बहुत रास आवरण सभ हटब बांकिए अछि|इतिहास जँ रस्ता देखबैत अछि तँ रस्ता भोतियाबितो अछि|ओहुना इतिहास पर शासक-समाजक वर्चस्व रहल अछि आ कोनो कालमे आम-अवामक की स्थिति छलय ताहिपर इतिहास सभ आन्हरे सदृश्य रहल अछि|राज्याश्रयी विद्वतजन केँ जनसमाजक स्थिति-चित्रणक ने बेगरता रहनि आ ने पलखति|तेँ इतिहासक भूल-भुलैयामे घुसलाक बादो आ बेर-बेर ‘खुल जा सिमसिम’कहलाक बादो कएकटा चोरदरबज्जा अदृश्य आ कएकटा दरबज्जा बन्द भेटैत अछि आ तेँ हमरासभक सोच-विचार एकटा अनिश्चितताक बिरड़ोमे पताबय लागैत अछि,स्थिर नहि भए पबैत अछि|जनसमाजक दुख-सुखक महासागरमे जा डुबकी नहि मारल जाएत,संस्कृतिक मोती कि पाथर कोना भेटत?ओम्हर हमर सभक शिक्षातन्त्र सेहो इतिहासक पाठ्य-पुस्तक आ अपन बनायल विचार-परिधिसँ बाहर जयबाक अनुमति नहि दैत अछि|सृजनात्मक लेखन यथास्थितिक बैरी मानल जाइत अछि आ तेँ जखन-जखन एहन प्रयास होइत अछि त विरोधीक रुपमे शिक्षातंत्रक संग-संग लाठी-फ़रसा लएकए तैयार मिथिलाक रुढिवादी आ यथास्थितिवादी तत्व ठाड़ भेटाइत अछि|किन्तु सृजनात्मक लेखनक प्रतिनिधि सुच्चा साहित्यकार प्रतिरोध आ असहमतिक संस्कृतिक संवाहक होइत अछि आ तेँ ओकरा शिक्षाव्यवसायी-पन्डितलोकनिक बिरादरीसँ फ़राक अपन सोच आ लेखन दुनूमे रचनात्मक दुस्साहस करैए पड़तै आ मिथिलाकेँ आइ एहने दुस्साहसी सभक बेगरता छै| बेगरता छै जे परम्परा आ लीकसँ हटि इतिहास आ संस्कृतिक अज्ञात-अबूझ पक्षसभक ईमानदार उत्खनन कएल जाय|बेगरता छै जे यथास्थितिक बिषायल सस्सरफ़ानीमे फ़ँसल संस्कृतिक व्यापकताकेँ बाहर आनल जाय आ अभिव्यक्तिक सभटा खतरा मोल लेल जाय|जँ कोशीक रत्न साहित्य-संस्कृतिक अग्रदूत संतकवि लक्ष्मीनाथ गोसाइकेँ राज्याश्रयजीवी सम्पादक-संकलक मैथिली कवि नहि मानैत छथि त बेगरता छै जे एकर विरोधमे बगावत हेबाक चाही-मठ,मठाधीश आ मठसैन्यकेँ धराशायी करबाक हद धरि|बेगरता छै जे संस्कृतिक नव इतिहास लिखल जाय|मिथिलाक महान विभूति राष्ट्रकवि दिनकरक कहब छनि-“साहित्यक ताजगी आ बेधकता जतेक शौखिया लेखकमे होइत अछि,ओतेक पेशेवरमे नहि|कृतिमे प्राण ढारैक दृष्टान्त बरोबरि शौखिया लेखके दैत छथि|थरथराहटि,पुलक आ प्रकम्प,ई गुण शौखिएक रचनामे होइछ|पेशेवर लेखक अपन पेशाक चक्करमे एना महो रहैत छथि जे क्रान्तिकारी विचारकेँ ओ खुलिकए खेलय नहि दैत छथि|मतभेद भेलहु पर ओ हुकुम,अंतत:,परम्परेक मानैत छथि|संस्कृतिक इतिहास शौकिये शैलीमे लिखल जाए सकैत अछि|इतिहासकार,अक्सर,एक वा दू शाखाक प्रमाणिक विद्वान होइत छथि|एहन अनेक रास विद्वानक कृति सभमे पैसिकए घटना आ विचार सभक बीच सम्बन्ध बैसयबाक काज वएह कए सकैत अछि ,जे विशेषज्ञ नहि अछि,जे सिक्का,ठीकरा आ ईंटाक गवाहीक बिना नहि बाजबाक आदतक कारणें मौन नहि रहैछ|सांस्कृतिक इतिहास लिखबाक, हमरा बुझने दूएटा मार्ग अछि|या त वएह बात धरि महदूद रही,जे बीसो बेर कहल जाए चुकल अछि आ,एना,अपनो बोर होउ आ आनोकें बोर करू;अथवा आगामी सत्यक पुर्वाभास दिअओ,ओकर खुलिकए घोषणा करू आ समाजमे नीम-हकीम कहाउ,मूर्ख आ अधकपारीक उपाधि प्राप्त करु|” ई दू-टूक कहल जयबाक चाही जे कोनो क्षेत्रक संस्कृति ओहि क्षेत्रक राजा अथवा शासकक बपौती नहि होइछ|संस्कृति होइछै समाजक,जाहिमे शासक-शासित,राजा-प्रजा सभ सन्निहित छै|दोसर शब्दमे संस्कृतिक मात्र आ एकमात्र श्रोत वा केन्द्र मनुष्य आ ओकर जीवन अछि| मनुष्यक समाज ,ओकर सामाजिक संरचना,ओकर खान-पान,रीति-रिवाज आदिक सम्मिलित स्वरूप एहि संस्कृतिक निर्माण करैत अछि|एकरे पसारसँ एकटा क्षेत्र-विशेष अपन एकटा अलग पहचान विकसित करैत अछि जे ओहि क्षेत्र-विशेषक संस्कृति कहल जाइछ|तेँ कोनो क्षेत्रक संस्कृतिक उत्स ओहि क्षेत्रमे रहनिहार मनुष्य,ओकर समाज आ ओकर सामाजिक संरचनामे खोजल जयबाक चाही| देशक अन्य भूभाग जकाँ एतहु आर्यलोकनि आर्येतर जाति संग मिलि जाहि समाजक रचना कयलनि सएह आर्य अथवा हिन्दूलोकनिक बुनियादी समाज भेल आ आर्य-आर्येतर संस्कृतिक मिलनसँ जे संस्कृति जनमल से एतहुका बुनियादी संस्कृति भेल|ई जे बुनियादी समाज भेल,तकर सुसंचालन लेल वर्णाश्रम-व्यवस्था बनल जे कालान्तरमे जाति-व्यवस्थामे परिणत भेल|तेँ मिथिलाक संस्कृतिक यथार्थकेँ बुझबाक लेल देवालय,पोखरि,माछ,मखान,पान आ पाग आदि-इत्यादिक बाइस्कोप देखयसँ पहिने एहि वर्ण-वर्ग-जाति व्यवस्थाक व्रणकेँ फ़ोड़ब आ निर्ममतासँ एकर खैंटी उतारब बहुत आवश्यक अछि|ई पीड़ा देत,दुर्गन्ध पसारत,मुदा एकरा निर्मूल करबाक लेल अथवा वर्त्तमान सामाजिक-आर्थिक परिस्थितिक आवश्यकतानुसार नवीकृत (renewal)करबाक लेल ई जोखिम लेबहि पड़त|मिथिलाक संस्कृतिक प्राचीन निरन्तरताक खूबी-खामीकेँ बुझबाक लेल आ वर्तमान चुनौती सभसँ जुझैत भावी उत्कर्ष पर लए जएबाक लेल एहि व्यवस्थाक संकल्पना,एकर बीजारोपण व सिंचन सँ लएकए एकर पुष्पित-पल्लवित होइत,मौलाइत,क्षरण दिस जाइत आ रोग-दोषसँ ग्रसित भए वर्त्तमानक निकृष्टतम रूप धरि पहुँचैक सम्पुर्ण प्रक्रियाक वैचारिक शल्य-चिकित्सा(चीड़-फाड़) बहुत अनिवार्य भए गेल अछि|एहि समुद्रमन्थनसँ विष बहरयबाक संभावना सेहो अछि किन्तु सामाजिक सत्यक अमृत प्राप्त करबाक लेल ई जोखिम लेबए पड़त|जाधरि एहि सामाजिक संरचनाक रोग-दोषकेँ नीकसँ बूझल नहि जेतैक ताधरि ने एकर कायाक सम्मानजनक नाश सम्भव छै आ ने एकर कायाकल्पक कोनो सम्भावना छै|मिथिले नहि,सम्पूर्ण भारतीय समाजक सांस्कृतिक उत्थान-पतनक जड़िआठमे इएह वर्ण सँ रुपान्तरित जाति-व्यवस्था अछि| विदेह माधव एलाह,हुनक पुरोहित गोतम रहुगण अग्नि प्रज्ज्वलित कएलनि,आवश्यकतानुसार जंगल-झाड़ जराओल गेल,खेती योग्य समतल भूमि बनाओल गेल,समाज सभ्यता आ विकास दिस अग्रसर भेल|आर्य-अनार्यक सम्मिलन सँ बनल मिनजुमला संस्कृति विकसित भेल|कालक्रममे एकीकृत आ व्यवस्थित समाजक रचनाक्रममे परिवर्तनीय वर्णाश्रम-व्यवस्था विकसित भेल|ई वर्णव्यवस्था अपन समयक सर्वाधिक वैज्ञानिक आ व्यावहारिक समाजव्यवस्था छल जखनकि विश्वक अनेकानेक भूभाग तखनो अविकसित आदिम अवस्थामे पड़ल छल|ई व्यवस्था सामाजिक-आर्थिक-राजनीतिक-सांस्कृतिक चारि खाम्हबला सशक्त अधिरचना छल|एहि वर्णसमाजमे सामाजिक श्रम,सामाजिक रक्त-सम्बन्ध एवम सामाजिक विचारक नियम परिवर्तनीय छल|सामाजिक व्यक्ति अपन योग्यता,क्षमता आ अभिरुचिक अनुसार सामाजिक श्रमकेँ अंगीकार कए अपन जीवनयापन लेल ब्राह्मण-क्षत्रिय-वैश्य-शुद्रक रोजगारमूलक चक्रसँ अपन वर्ण आ श्रम-प्रकार चुनि ओहिमे अपन प्रतिभा आ सामर्थ्यक सदुपयोग आ प्रदर्शन करबाक लेल स्वतन्त्र छल|ओ अपन रागात्मक आकर्षणक आधार पर रक्त-सम्बन्ध स्थापित कए सामाजिक व्यक्ति बनबाक लेल स्वतन्त्र छल|ओ प्रत्येक सामाजिक पहलू पर निर्भीकतापुर्वक अपन विचार व्यक्त करबाक लेल स्वतन्त्र छल|अपन प्रकृतिमे पूर्ण समाजवादी वर्ण-समाज प्राकृतिक सन्साधन पर बेसी आ सामाजिक श्रमसँ अर्जित साधन पर कम निर्भर छल|प्रत्येक व्यक्तिक रोटी आ आजादीक गारन्टी छल|सृजनात्मक संस्कृतिसँ आलोकित ओ काल ताधरि रहल जाधरि ओहि व्यवस्थामे परिवर्तनशीलता रहलै|जँ देखल जाय त सामासिक संस्कृतिक बीजारोपण आ ओकर तीव्र विकासक ओएह कालावधि छल|एहिकालमे सामाजिक श्रम-संस्कृतिक महत्ता त स्थापित भेबे कएल;महासागर,वनप्रदेश,गिरिप्रदेश,मरुप्रदेश,हिमप्रदेश,आकाश आदि पर विजय प्राप्त कए ओकरा अपन अधीन करबाक घातक प्रवृतिक जगह पर ओकरा अपन मित्र बनाए ओकर संरक्षण करबाक संस्कार सेहो जन-जनमे विकसित भेल|देहक नश्वरता आ आत्माक अमरताक सिद्धान्त मनुष्यकेँ अपन भावी पीढीक भविष्यसँ जोड़लक|ई ओ समय छलै जखन विद्यानुरागी आ विद्वानकेँ ब्राह्मणत्व भेटैत छलै,अजुका जँका नहि जे ब्राह्मण वन्शमे जन्म लेलहु त विद्वान होयबे करब|ई ओ समय छलै जखन रणकौशलमे निपुणता क्षत्रियत्वक पैमाना होइत रहय,अजुका जकाँ नहि जे ओहि कुलमे जनमलहुँ त वीर होयबे करब| एकरा जनसंख्याक दबाव कही,वा तत्कालीन समाजक समयगत बाध्यता जे वर्णाश्रम अधिरचनाक परिवर्तनशीलता अपन निरन्तरता कयम नहि राखि सकल आ तकर परिणामस्वरूप अपरिवर्तनीय जन्मना जाति-व्यवस्था अस्तित्व मे आयल|समाज-सत्ताक क्षरणस्वरूप व्यक्ति-सत्ताक बढैत वर्चस्व सेहो एकटा कारण भए सकैत अछि|इएह जन्मना जातीय समाज हमरा सभक वैभवशाली मानवीय संस्कृतिक क्षरणक महत्वपूर्ण कारक भए गेल अछि| जाहि मिथिक नाम पर मिथिला बनल आ जनक वंशक स्थापना भेल,जाहि विदेहकेँ मनु महराज ‘वैश्य द्वारा ब्राह्मणीक गर्भसँ उत्पन्न सन्तान ‘ कहय छथि आ जेकर वर्गीकरण व्रात्यक रुपमे सेहो होइत अछि,ताहि वंशक सीरध्वज जनकक सभामे ‘जनक(वैदेह)वस्तुतः जनक(पिता)छथि’कहैत आ’जनक-जनक‘ उच्चरित करैत ब्रह्मविद्याक ज्ञान लेबाक लेल विद्वतजन सभ दौगैत छलाह|विश्वामित्रक श्रेणी क्षत्रियक छलनि मुदा हुनक प्रबल विद्यालोलुपता अंततः हुनका ब्रह्मर्षिपद उपलब्ध करबैलकनि|अऊँठा कटबाइओकए एकलव्य प्रमाणित कयलनि जे धनुर्विद्यामे पारंगत होएबाक लेल क्षत्रिय होयब त कात जाय दिअ,गुरू आ ब्राह्मणक सदेह उपस्थिति अथवा शिक्षा कतहुसँ आवश्यक वा अनिवार्य नहि अछि|शंबूक अपन घेंट कटबयसँ पहिने विद्वान होएबाक लेल ब्राह्मण होएबाक अनिवार्यताकेँ आधारहीन प्रमाणित कए चुकल छलाह| अपरिवर्तनीय जन्मना जाति-व्यवस्था धरि अबैत-अबैत हमरा सभक समाज कवचमे बन्द घोंघा सदृश्य भए गेल|ई कवच छल पुर्वाग्रहक|जाति-प्रथासँ उपजल एहि स्थितिक मादे समाजविज्ञानी जवाहरलाल नेहरूक कहब छनि जे’भारतमे दुनू बात एके संग बढल|एकदिस त विचार आ सिद्धान्त मे हम सभ बेसी सँ बेसी उदार आ सहिष्णु होएबाक दाबी कएलहुँ|दोसरदिस,हमरसभक सामाजिक आचार अत्यंत संकीर्ण होइत गेल|ई फाटल व्यक्तित्व,सिद्धांत आ आचरणक ई विरोध,आइधरि हमरासभक संग अछि आ आइओ हमसभ ओकर विरुद्ध संघर्ष कए रहल छी|कतेक विचित्र बात अछि जे अपन दृष्टिक संकीर्णता,आदत आ रिवाज आदिक कमजोरीकेँ हमसभ ई कहि अनठिआए देबए चाहैत छी जे हमरासभक पुरखा बड़का लोग छलाह आ हुनकर बड़का-बड़का विचार हमरासभकेँ विरासतमे भेटल अछि|किन्तु,पुरखासभसँ भेटल ज्ञान आ हमरासभक आचरणमे भारी विरोध अछि आ जाधरि हमसभ एहि विरोधक स्थितिकेँ दूर नहि करब,हमरासभक व्यक्तित्व फाटल के फाटले रहि जाएत|’नेहरूक ई कथन मिथिलो पर अक्षरसः लागू होइत अछि|अपरिवर्तनीयता आ जन्मना-एहि दुनू सुरक्षा-कवचसँ संरक्षित मिथिलाक मार्गदर्शक वर्ग आत्ममुग्धता,आलस्य आ मुफ्तखोरीकेँ अपन हक मानि लेलक|श्रेष्टताबोधक पाखंड मिथिलाक ग्रहणशक्तिकेँ गीलि गेल|’जे हम छी,हमरा लग अछि,सएह सर्वश्रेष्ट अछि’क डपोड़शंखी मानसिकता बाहरसँ उत्कृष्टतम चीजहुँकेँ लेब अस्वीकार करए लागल|विदेशी आक्रांतासभक शासनाधीन नहि रहितय त अनेकरास कला,शिल्प,तकनीक,विधा जे विदेशीसभक संग आयल छल,मिथिला समाज तकरोसँ वंचित रहि जैतय|ई मजबूरीमे ग्रहण कएल गुणसभ छल जे हमरासभक गंग-जमुनी संस्कृतिकेँ समृद्ध कयलक,जकरापर आइ हमसभ गर्व करय छी| कोशी नदी मिथिलाक नम्हर भूभागक भाग्यनियंता रहल अछि|एकदिस ई हमरासभक धार्मिक-सांस्कृतिक भौतिक धरोहरसभकेँ नष्ट-भ्रष्ट कयलक अछि त दोसरदिस एकरे चलतबे अपरिग्रह आ संघर्षक संस्कृति निर्मित आ विकसित भेल जेकर सीधा लाभ सामान्य जन-समाजकेँ भेटल|विशिष्ट जन-समाज एहि संस्कृतिसँ अलगे-थलग रहबामे कुशल मानलनि|जँ संघर्ष-संस्कृतिकेँ सर्वस्वीकृति भेटल रहितय त क्षत-विक्षत लोकजीवनक जीजीविषाक परिणामस्वरूप शासनमे आयल खेतिहरसमाजक प्रतिनिधि गोपाल आ सत्ताक निरंकुशताक विरुद्ध जनांदोलन कए शासनमे आयल भीम केवट निर्विवाद नायकक सूचीमे होयतथि| हमसभ जाहि आर्य-आर्येतर सभ्यता-संस्कृतिक संवाहक मानल जाइत छी ओ समन्वयवादी,सामासिक,समावेशी संस्कृति छल|आर्य मनीषी लोकनि हमरासभकेँ ’वसुधैव-कुटुम्बकम’क मंत्रसँ सिक्त कएने छलाह|इएह संस्कृति छल जे सनातन धर्मकेँ एतेक विस्तार देलक|एहि सनातन-सागरमे आबि विदेशी आक्रांतासभक सैकड़ो रक्त-समूह भारतीय भए गेल|सनातन धर्मक विस्तार हमरसभक संस्कृतिओकेँ निरन्तर समृद्ध कयने गेल|सम्पूर्ण मिथिलाकेँ प्रमुखतः सनातनी मानल जाइत अछि|किन्तु,आइ हमसभ ई स्वीकार करी जे हमसभ अपन पूर्वजक नीक,इमानदार आ सुयोग्य उत्तराधिकारी प्रमाणित नहि भए सकलहुँ आ ओहि सनातन-सामासिक संस्कृतिकेँ अक्ष्क्षुण्ण नहि राखि सकलहुँ|जे समाज अपन धूर विरोधी बुद्धकेँ अपन अवतार घोषित करबाक उदारता देखयलक,वएह समाज मैथिल-महासभाक आयोजक भेल|जाहि बौद्धिक वर्ग पर वर्ण-जाति संरचना-संरक्षणक भार छलय सएह वर्ग परम स्वार्थी बनि अपन रक्त-शुद्धताकेँ रेकर्डेड करयबाक उताहुलतामे पंजी-प्रवन्धक व्यवस्था कए लेल|वेदव्यास एतेक ध्यान राखलनि जे’चातुर्वर्ण्य मया सृज्यते’कृष्णावतार-मुखसँ कहबएलनि,मुदा सत्ता-संरक्षणक आत्ममुग्धतामे पंजी-प्रवन्धक औचित्य लेल कोनो लोकलाजक पालन नहि कएल गेल|”मिथिला”आ”मैथिल”शब्दक प्रयोगकेँ हमसभ जतेक विराट आ व्यापक अर्थवत्ता प्रदान करिऔक,एहि दुनू शब्दक अर्थ आम-अवाममे की लगाओल जाइ छै,से ककरोसँ नुकायल नहि अछि|एतय मिथिलाक सामाजिक बुनावटक रग-रग चिन्हयबला साधु-जनकवि वैद्यनाथ मिश्र यात्री जीक एकटा लेखक अंश देब समीचीन बुझाइत अछि-“मैथिल महासभाक सिद्धान्तानुसार मैथिल ब्राह्मण तथा कर्ण कायस्थ(!)मात्र सुच्चा मैथिल थिकाह|मिथिलाक सीमाक भीतर बसैत,मिथिलाक अन्न-जलसँ निर्वाह करैत,विशुद्ध मैथिली बजैत भूमिहार-क्षत्रिय आदि अन्य जातीय यदि क्यो अपनाकें मैथिल कहताह तँ जातीय महासभा नांगरि ठाढ क क हुनका दिस बधुआएत,मुँह विजकौत|परिणामस्वरूप हुनका लोकनि अपना घर-आंगनमे व्यवहृत भाषा-ठेठ मैथिलीकें मैथिली कहबामे अपन हेठी बुझै लागल छथि|’हम मैथिल नहि,बिहारी थिकहुँ’-ई भावना हमरा लोकनिमे जाहि तेजीसँ पसरि रहल अछि,से देखि एहन कोन मैथिल हृदय हैत जे आहत नहि भ रहल हो?मिथिलेश-सुधारक मिथिलेश(?)जाहि संस्थाक कर्णधार होथि,तकर एहि प्रकारक संकुचित सिद्धांत देखि मिथिलाक लाख-लाख अधिवासी-जे मैथिल होइतहुँ मैथिल नहि,क्षुब्ध अछि|चिरकालसँ अपनहि घरमे,अपनहि बन्धु-वर्गक द्वारा ठोंठिऔल गेल मिथिलाक सन्तान आइ यदि आजिज आबि अपनाकें बिहारी कहब आरंभ कैलक अछि तँ एहिमे केकर दोष?’महासभा’क कतोक सदस्यक मनमे घुरि-फिरि ई बात अबैत हेतैन्हि जे मिथिलाक सकल अधिवासीकें मैथिल मानि लेला सँ मैथिलत्वक अग्रगण्य अंगमे धार्मिक वा समाजिक धक्का लगवाक सम्भव|” यात्री जीक ई विचार आइ सँ 73वर्ष पहिने विभूति,फरवरी 1938 अंकमे छपल छल|एहि स्थितिमे आइओ कोनो सकारात्मक परिवर्तन नहि भेल अछि,उन्टे बिगड़ले अछि| वर्ण-व्यवस्थाक बिगड़ल निकृष्ट रूप जाति-व्यवस्थाक औचित्य-अनौचित्य पर घमर्थन होइत रहल छै,होइत रहतै,मुदा एहि यथार्थसँ मुँह नहि मोड़ल जाय सकैत अछि जे मिथिलाक सांस्कृतिक उत्थान-पतनमे ई व्यवस्था अनिवार्य आ महत्वपूर्ण कारक रहल अछि आ रहत|आल्हा-रुदल,नैका-बनिजारा,लोरिकायण,भगैत आदिक जे लोकगायनक संस्कृतिक परम्परा रहय अथवा छै,तकर निर्वहनमे आइ धरि केओ द्विज किऐक नहि एलाह?ई ठेकेदारी की मात्र सोल्हकनक छिअय?मैथिली मैथिल ब्राह्मण आ कर्ण कायस्थक भाषा छै आ एहिसँ सम्बन्धित सभटा संस्था-पुरस्कार पर इएह दुनू जातिक आधिपत्य छै-एहि आरोपक कोनो प्रायोगिक खण्डन आइ धरि किऐक नहि भए सकल?भाषा सेहो संस्कृतिक आवश्यक आ अविभाज्य अंग छै|जँ भाषा समावेशी नहि हएत त समावेशी संस्कृति कोना विकसित हएत? ई प्रसन्नताक गप अछि जे जँ राजनीतीक क्षेत्रकेँ छोड़ि दी त सामाजिक जीवनमे जाति-पातिक महत्ता समाप्त प्रायः छै|एकर कारण खुलल अर्थव्यवस्थाक नीती होअय,भौतिकवादी होड़ होअय वा एहि दुनूक चलतबे बढल जीवन-संघर्ष,किन्तु जाति-पाति अजुका लोकक विचार-सूचीमे बहुत नीचाँ छै आ मात्र चुनावेक बेरमे शीर्ष पर आबय छै|तेँ समरसताक संस्कृतिकेँ फिलबक्त सतह पर कोनो खतरा नहि देखाइत अछि|एहि क्षेत्रक ऊर्वर माटि-पानिमे सामासिक संस्कृतिक बीआ तेहन सघन छीटल छै जे बेमुरव्वत मौसम आ लापरवाह किसानक अछैतहुँ ई पनुकैत रहय छै,फसिल दैत रहय छै आ एतहुका वासीकेँ जीवित आ गतिवान बनेने रहैत छै|किन्तु कतहु गहींरमे आगि भए सकैत छै|तेँ समयक तगादा छै जे वर्त्तमानमे जातीय-व्यवस्थाकेँ कोनो तार्किक आ वैज्ञानिक निष्कर्ष धरि आनल जाय,अन्यथा सांस्कृतिक उत्कर्षक लक्ष्य पायब सन्देहास्पद अछि|जवाहरलाल नेहरु कहने छलाह-“आइ हमरासभक समक्ष जे प्रश्न अछि,ओ मात्र सैद्धांतिक नहि अछि,ओकर सम्बन्ध हमरसभक जीवनक सम्पूर्ण प्रक्रियासँ अछि आ ओकर समुचित समाधान आ निदाने पर हमरसभक भविष्य निर्भर करैत अछि|साधारणतः,एहन समस्यासभकेँ सोझराबयमे नेतृत्व देबाक काज मनीषी लोकनि करैत छथि|किन्तु ओसभ काज नहि एलाह| ओहिमे सँ किछु त एहन छथि,जे एहि समस्याक स्वरुपहिकेँ नहि बूझि पाबि रहल छथि|बकियासभ हारि मानि लेने छथि|ओ सभ बिफलता-बोधसँ पीड़ित आ आत्माक संकटसँ ग्रस्त छथि आ बुझिए नहि पाबि रहल छथि जे जीवनकेँ कोन दिशा दिस मोड़ब उचित होयत|”नेहरुक एहि निराश टिप्पणीक बाद वैश्विक समाजवादी चिन्तक एंजेल्सक ई वक्तव्य विचारणीय अछि-“कोनो खास आर्थिक संरचनाक समस्याक समाधान ओही संरचनाक नियम के अनुसार कएल जायब अनिवार्य अछि,जँ कोनो दोसर संरचनाक नियमसँ ओकर समस्याक समाधान कएल जायत त ओ बेजाय ढंगसँ विद्रूप भए जायत|”एंजेल्सक एहि कथनमे हमरासभक जातीय(आर्थिक)संरचनाक समस्याक समाधानक कुंजी नुकायल अछि|मिथिला आ भारतक लेल सांस्कृतिक संकटक कारण बनल जातिप्रथाक वर्त्तमान संकटक समाधान एहि जातिप्रथाक संरचनाक भीतरे अछि|एकरे नियमसँ एकरा युगानुरूप उपयोगी बनायल जाए सकैत अछि आ ई काज हमरेसभकेँ करए पड़त|मिथिलाक संस्कृतिक इएह तगादा अछि|मिथिला आ एकर संस्कृतिक उत्कर्षक इएह टा मार्ग अछि| ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। ३. पद्य ३.१.सुबोध झा- चारिटा आर पद्य ३.२.१.जगदीश प्रसाद मण्डल २.रामदेव प्रसाद मण्डल ‘झारूदार’ ३.३.बृषेश चन्द्र लाल-जीवन सपना ३.४.राम विलास साहु- कविता/ हाइकू/ टनका ३.५.१.आशीष अनचिन्हार- दूटा गजल २.गंगेश गुंजन ३.सदरे आलम ’गौहर’ ३.६.गजेन्द्र ठाकुर- गजल ३.७.१.जवाहर लाल कश्यप २.मनोज झा मुक्ति- गामक सावन ३.प्रभात राय भट्ट ४रामकृष्ण मण्डल ‘छोटू’ सुबोध झा (१९६६- ), पिता श्री त्रिलोकनाथ झा १ संस्कृति ओ संस्कार पुरूष पातर सभ बिसरि गेलाह सन्ध्यावन्दन एकोदिष्ट ओ तर्पण । ऑंगन दिसि बिसरि गेलीह हरिसों तुसारी सामा ओ अडिपन ।। आजुक छौंडी सभ की बुझतैक बरसाति पचाइक आ भ्रातृद्वितिया । बूढ पुरान सभ टा करैत अछि घॉंटो सपता विपता आ खरजितिया ।।
आब तऽ गामो मे विरलेक भऽ रहल अछि छठि आ चौरचन । घरक लोको केँ मुइला पर ने कटबैत अछि केश आ ने बारैत अछि नोन ।। अष्टमी मे लुप्त भेल जा रहल अछि पातरि आ कुमारिक पूजन । नहि होइत अछि पार्थिव लिंगक पूजन कान तरसि गेल सुनबाक लेल डहकन ।।
सभ होमए चाहैत अछि सामाजिक बन्धन सँ स्वतन्त्र । सभ बिसरल अछि दुर्गाशप्तशती आ दूर्वाक्षतक मन्त्र ।। विलीन भऽ गेल पूजापाठ आ निशापूजाक महक जगरणा । सुखरातीक ऊक फेरब आ जूडशीतलक मॉंथपर पानि लेब भेल सपना ।।
उपनयन चूडाकर्ण आ विवाहक नियम राखल गेल ताक पर । तर्क करबाक लेल नवयुवक सभ बैसल अछि बात बात पर ।। बिलाएल जा रहल अछि सलहेसक पूजा आ भगताक प्रभाव । लहाश पडल अछि आगि देनिहार पुत्र केर अछि सर्वथा अभाव ।।
आब तऽ सत्यनारायण पूजाक शालग्राम लए बौआइत छी भरि गाम । खसैत संस्कार केँ देखि लगैत अछि बिसरब संस्कृति जल्दीए एही ठाम ।। हे भगवान कतए छी दियौक मनुक्ख केँ सदबुद्धि अहॉं तऽ छी अन्तर्यामी । कलयुगक पाप सँ सभ केँ बचाऊ आब तऽ भेला सभ केओ अज्ञानी ।।
इतिहास बनल जा रहल अछि मिथिलाक संस्कृति । जल्एिद पूजब एकरा बनाए माटिक मूर्ति ।। यदि बॉंचि जाएत कतहु कतहु एहि संस्कृतिक भग्नावशेष । तखन तकलहु पर नहिं भेटत कतहु एकर अवशेष ।। जय मिथिला जय मैथिली ।। २ जिनगी
जिनगी छल बड छोट । एहि बातक रहल सतत कचोट ।। यदि कएने रहितहुँ लोकक उपकार । तऽ नाम लितए सगर संसार ।।
पसेनाक पाई जाहि लए रहलहुँ जिनगी भरि बेहाल । बैंकवला सभ भेल रहल ओहि पाई सँ मालामाल ।। आब तऽ घरोवला नहिं करैत अछि चर्च अप्पन जानि । बहा रहल अछि संचित धन जेना बुझि पडैत हो पानि ।।
पाप मे रहलहुँ डूबल बिसरलहुँ देवता पितर । तेँ मुइलाक बादहु घुमैत छी जँहतर पँहतर ।। सब बन्द केलक डिब्बा मे कहलक सूतू भऽ चेन । नरकहु मे नहिं भेल जगह भेल छी बेचेन ।।
यदि कऽ लेने रहितहुँ ओहि पाई केर गरीब मे उपयोग । तऽ नहिं मरितहुँ पाबि एहन असाध्य रोग ।। आब मोन मशोशि केँ की भेटत हृदय पर जे लागल चोट । खाली रहि रहि केँ भऽ रहल अछि कचोट ।।
३
वाह रे कपार
हमरा की चाही……………………… लाल लाल झूड झूड तिलकोर तरल । बारी वला अरिकोंच झोड सँ भरल ।। भुन्ना मॉंछक पलई देखितहिं अबैत अछि मुँह मे पानि । मुदा जर्दा आमक सुगन्ध सब केँ कऽ दैत अछि पानि पानि ।। कनिञॉं हो तऽ “अन्जेलीना जोली” केर रूप लेने । बेटा जनम लए सोनक चमचा मुँह मे लेने । सदिखन रही आकाश मे जहाज मे उडल ।। बैंक हो तऽ गहना आ नोट सँ भडल ।। मुदा वाह रे हमर जडल कपार । एकहु टा सपना नहिं भऽ सकल साकार ।। बनि जैतहुँ नेता कहिबैतहुँ सरकार । गबितहुँ गति वाह रे कपार वाह रे कपार ।।
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शायरी हुनकर कजराएल डोका सन ऑंखि देखितेँ मारलक मोन मे हिलकोर । ताकए लगलहुँ ओहिना जेना चान केँ ताकए लगैत अछि चकोर ।। ओहि ऑंखि केँ हम कोना बिसरब जे बेधि देलक एकहि बेर मे हमर हृदय । जाइतो जाइत नहिं हँसलीह मोन मसोसैत पहुँचि गेलहुँ मदिरालए ।। …………………………………… पहुँचि गेलहुँ मदिरालए ।।
हुनक तीतल केश सँ चुबैत पानि सँ मेघो केँ भऽ रहल छैक लाज । हुनक गौरवर्ण स्वरूप देखि चन्द्रमा कहथि इजेरियाक कोन आब छैक काज । हुनक ऑंखिक पीपनी खसब उटब सँ होइत अछि सॉंझ आ भोर । जिनगीक दुइयो डेग चलिताथि हमर सँग तऽ भरए दितहुँ एहि मे नोर ।। ……… खाइत छथि सप्पत नहिं खसए दितहुँ एकहु ठोप नोर एकहु ठोप नोर।। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। १.जगदीश प्रसाद मण्डल २.रामदेव प्रसाद मण्डल ‘झारूदार’ १ जगदीश प्रसाद मण्डल कविता मिथिला केहेन अहीं कहू भाय मिथिला केहेन? सभ दिन कमला-कोसी डुबलौं अन्हर-बिहारि, दानो-दुख सहलौं कानि-खीजि संगे-संग रहलाैं। किसान-बोनिहारक वंश गढ़ि धरती-अकासक बीच खेलेलौं। आबो बुझियो मिथिला केहेन अहीं कहू भाय मिथिला केहेन? पसरि चौर करमीक लत्ती वुद्धिक वृक्ष सजौलक। नैतिकताक फल-फूल सजा हँसि-गाबि जीवन पौलक। जगत-जननी, जनक-जानकीक मिथिलाक तस्वीर जेहेन आबो कहू भाय मिथिला केहेन अहीं कहू भाय मिथिला केहेन? मौसमक मुस्की दिन घतट कि राति यौ भैया मौसम मुस्की दैत छै। साले दिनक समए कत्ते होइए लीलाक रंग बदलैत छै। अपन-अपन सनेस बिलहि सुरभि-सुगंध पसरैत छै खसल-पड़लमे जान फूकि-फूकि सोग मुक्त बनबैत छै। समए ने ककरो संग छोड़ैए ने ककरो संग दैत छै अपन-अपन कुटल-पीसल दुनू हाथ समटैत छै। देखल दिन केना बितै छै देखते देखि ससरैत छै मृत्यु सय्यापर मोन तड़पै छै बेरथक बाट पकड़ैत छै। खेल-खेलए चाहलौं जिनगी केर बनि खेलौंना गुड़कि गेलौं अन्तिम सॉस बिड़हाएल होइ छै नोर छोड़ि किछुअो ने पेलौं। तरंग सभतरि जगबए प्रेम एकचित्त दोसर सदति विवाद करए एम्हर-ओम्हर छोड़ि-छाड़ि बीचका बाट पकड़ि रहए। रंग-रूप, चेहरा अनेक चेतन-चित्त तँ एक रहैत। मुदा वृत्तिक किरदानीसँ सदिखन तँ उगैत-डुमैत। सत् बनि कखनो राज-बिराजए रज बनि-बनि शासन करए धरिते धारण तम तम-तमा झहरि-झहरि फुनगीसँ गिरए। खेलक खेल काल सृजैए अपनो तँ खेले बनैए कहाँ रखि पाबए दिन-राति गतियेकेँ मतियो बदलैए। सृष्टिक तँ खेले विचित्र सुख-दुख संग दिन-राति चलए खेलए जेहेन खेल खेलाड़ी ओहने ओ खेलौना पाबए। कोनो खेल धरती बीच खेलए खेलए कोनो सतरंगी अकास कोनो सत् सागर खेलए चुटकी बजा-बजा रनबास। विवेकसँ पुछए जखन चित्त थीसिस एन्टीथीसिसक बीच पड़ए सिनथीसिस तँ सिनथीसिस छी अ, उ, मक विचार करए। आशा खुशीक जिनगी बनबैत चलू मगन भऽ जीबैत चलू सोग ने सुधरए वचनसँ रोग नइ उपदेशसँ कर्तव्य कर्म तड़कस उठा आशाक जिनगी बनबैत चलू मगन भऽ जीबैत चलू कण-कणसँ पहाड़ बनै छै बुन्न-बुन्न सत् सागर अणु-अणु सोग उपजाबए कारी घटा बनि बादर सभ समैट अङेजति चलू मगन भऽ चलैत चलू। दिन-रातिक बीच संसार ससरि-ससरि ससरैत चलए खने मेघौन खने उग्रास भऽ पाबि-पाबि चलैत चलए। तीत-मीठक भेद भूला पानिआे पानि पीबैत चलू मगन भऽ चलैत चलू। आँखि छलकि आँखि बादल तरंगि कोन रचैता देखलनि मोर निवस्त्र कऽ कय केलनि सृजन कानि अखौंसी पोछए नोर नाक नचए पहरि नकौसी चक्र टकड़ाबए चढ़ि-चढ़ि सिर केहेन भेल ई बीच मधुरक सटि गेल तौलाक बीचक हीर। सदिखन दोहरी खेल रचि रखलनि सेहन्तगर नाओं चेहरा-मोहरा काटि-छाटि ठाढ़ भेल बनि-बनि गाआें सुनि कान सनसना कुकि पकड़ि सुगंधित बाट सु-आन गुण दऽ गुणी बना-बना कालचक्र संग गाबए गाण।। २ रामदेव प्रसाद मण्डल ‘झारूदार’ झंडा गीत झंडा तीरंगा सभसँ चंगा, छै दुनियाँमे ई बेमिशाल एकर ऊँचाइ हीमगिरी सन, छुइ नै सकल कियो एकर भाल अइमे सागरक गहराइ, पाइब नै सकल कियो एकर पार करतै जे कियो एहन ढिठाइ, निश्चित हेतै तेकर हार हरा रंग छै जीवन हम्मर, कऽ रहलै झंडा एलान हरा हमर छै बाग बगिचा, हरा हमर छै खेत खलिहान रंग केशरिया गजब के पुरिया, ई खोललनि रणवाँकुड़ा वीर देखलनि नै किछु आगू-पाछू, रँइग देलनि अपन सीना चीर श्वेत रंग तँ दयावान छै, ई सच्चाइक पहिचान नीत धरम धीरज के उपमा, अहीसँ छै भारतक शान चक्र सिखबै छै हम सभकेँ, ठहरू नै सुनि मिठी बात राह कठिन होइ चाहे कतनो, बढ़ु विकासक पथपर दिन राति सत्यमेव जयतेक अर्थ छै, सत्यक होइ छै हरदम जीत सभकोइ पकरू सत्यक डोरी, एकरा मानू अपन मीत लालच नै होइ मनमे ओहन सीमा पार होइ अप्पन राज रहै अछुत अप्पन सीमा, तकरा खातिर कसु आवाज शारनाथक अशोक स्तम्भसँ, लेलनि हिन्दी तीन बाघ निशान ट्रिपुल शेर अहाँ हिन्द निवासी, भरल रहै मन एतए शान सिक्का नोट सरकारी पुस्तक, दस्तावेजपर शोभित निशान समृद्ध छै प्रभुत्व हमर ई, सुना रहल दुनियाक गाण दायाँ बैल और वायाँ घोड़ा, बीच विराजैत चक्र निशान हाथ मिला दुनू गाबै छै, जय जय जवान और जय जय किसान दया धरमकेँ ऐ धरतीपर, लेलनि बुद्ध गाँधी अकार गंगा यमुना कृष्णा कॉवेरी, बहै छै जतए पावन धार जन-जनमे छै सच्ची श्रधा, जनता सेवक जतए नरेश हजरत, तुलसी बालमिकीकेँ, गुइन्ज रहल घर घर अपदेश जिनकर चरण पखारै सागर, हीमगिरी जेकर िसरमौर हृदैमे जकड़ा पावण गंगा, जलै दीप सुज्ञानकेँ और जागु-जागु बाबू। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। बृषेश चन्द्र लाल जीवन सपना किछु सपना एहन होइत अछि ने छोडैत अछि ने जोडैत अछि । निन्नमे आबि मुदा देखू नव आश जीवनमे कोरैत अछि ।।
जौं टुटि जाइछ जीवनधारा सपने जीवनकेँ ढोइत अछि । कहुँ लोरीसँ कहुँ होरीसँ जीवनकेँ सपना धोइत अछि ।।
मगन प्रेममे सपनामे कहुँ खिलखिल क' मुस्काइत छी । कहुँ डरसँ थरथर कनैत–कनैत कहुँ तपमे खूब भफामइत छी ।।
सपना जीवन की जीवन सपना ई भेद बड अछि भेदी भैया । ने एतए नाओ मझधार विकट ने ओतए केओ अछि खेवैया ।।
चलू सपनामे जीबू मनसँ जीवन सपनेसन भ' जाओ । ई सुख दर्दकेर सागरमे दुनू अपनेसन भ' जाओ ।।
ने भेद रहए सपनासँ जौँ जीवन अनन्त भ' जाइत अछि । ने रहैछ तखन सीमा बन्धन । ई 'हम' दिगन्त बनि जाइत अछि ।। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। राम विलास साहु कविता/ हाइकू/ टनका प्रेमक भूखल हे उधो कियो हरत दुख मोर पएर पकड़ि हम अहाँकेँ कहै छी दुखक नै कोनो ओर दिलक दुख हम कोना ककरो कहबै श्याम बनल चित्तचाेर हे उधो कियो हरत दुख मोर चढ़ल यौवन उमरल सन दरिया प्रेम वीरहसँ मन भेल मजबूर थर-थर काँपए देह हमर कलेजा भेल कमजोर भरल यमुना लेलक कोर आँखियासँ बहए हमरा नोर हे उधो कियो हरत दुख मोर डगर बहारि हम अङना निपलौं मुरि-मुरि देखैत चहु ओर सोलह श्रृंगार सजि बाट जोहै छी बनसी धून सुनि हम भेलौं विभोर कहिया भेटत श्याम चित्तचाेर हे उधो कियो हरत दुख मोर सभ गोपियन प्रेमक भूखल कन्हैया किएक अछि रूसल प्रेम वीरहमे हम छी सुतल सात जनम तक आस करब हम कन्हैयासँ दिलक बात कहब हम कोन कसूर भेल हमरासँ जल्दीसँ कहियौ कन्हैयासँ विनती सुनियौ दुखक मोर कन्हैया हरत दुख मोर कहिया मिलत श्याम चित्तचोर हे उधो कियो हरत दुख मोर। (2) मरूआक मान अन्नमे मरूआ बड़ अनमोल रूपसँ कारी बड़ गुणकारी उपजे ऊसर खेत मुदा हितकारी राजा रंक खाइतो लजाइ गरीबक बचाबै प्राण विपत्ती समैमे मरूआ अतिथिओकेँ राखए मान मरूआक रोटी तोरीक तेल नोन मरिचाइ चटनीसँ मेल नहि कोनो खर्चा खाइतो चर्चा इचना, पाेठी माछक चटनी संगे जे खाइ मरूआ रोटी नहि बनत रोगी मोटी रक्तचाप, मधुमेह, जलोदर भागल रहत देहसँ कहियो नहि हएत कफ खांसी मरूआ औषधि गुणक खान आदिकालसँ रखने अछि मान मरूआ होइत अछि टिकाउ कोठीमे वर्षो तक रहए बन्द सभ दिन होइत अछि बिकाउ मरूआक खेती बड़ असान अन्नमे मरूआक बड़ मान सभ दिन राखए गरीबक मान। हाइकू/ टंका 1 अतिथि सेवा/ देव धर्मसँ पैघ/ मधुर सेवा। 2 सभ दिन नै/ होइत छै समान/ राजा आ रंक। 3 अमृत पान/ जिनगी दैत अछि/ अमर दान। 4 मोरक पंख/ चमकै चटकिली/ प्रेम जगाबै। 5 धनी बनब/ सभकेँ इच्छा अछि/ दीन किएक नै। 6 चौबीस घंटा/ दिन राति बनैत/ सात दिनक/ सप्ताह बनैत छै/ बारह मास वर्ष। 7 फूलक बाग/ सिंचैत अछि माली/ इन्द्र सिंचैत/ धरती उपवन/ अन्न उपजै खेत। 8 टूटल दिल/ प्रेमसँ जुटैत छै/ सूखल नदी/ जलसँ जिवैत छै/ क्षने आगू बढ़ै छै। 9 चहकै चिड़ै/ वन-उपवनमे/ गमकै फूल/ वागमे झुलि-झुलि/ देखै चान हँसैत। 10 नेना-भुटका/ खेलै गुड़िया खेल/ पानिसँ मेल/ जाित भेद भुलि/ पढ़ै एकता पाठ। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। १.आशीष अनचिन्हार- दूटा गजल २.गंगेश गुंजन ३.सदरे आलम ’गौहर’ १ आशीष अनचिन्हार गजल १ देह केराक थंब सन गोर-नार लगैए अड़हूलक फूल सन भकरार लगैए नोर अँहाक तँ बेली-चमेली,गेंदा-गुलाब मुदा हँसी तँ अँहाक सिंगरहार लगैए मरनाइ तँ एकै होइ छै सभहँक लेल लहासे सन तँ कटल कचनार लगैए सीसोक सीस कटल,चऽहुक चऽहु टुटल आमक नव पल्लव तँ अंगार लगैए आम-जाम,कुम्हर-कदीमा,लताम-सरीफा आब तँ जकरे देखू अनचिन्हार लगैए २ अँहा तँ असगरें मे कानब मोन पाड़ि कए करेजक बाकस के घाँटब मोन पाड़ि कए आइ भने विछोह नीक लागि रहल अँहा के काल्हि अहुरिआ काटि ताकब मोन पाड़ि कए मिझरा गेलैक नीक-बेजाए दोगलपनी सँ कहिओ एकरा अँहा छाँटब मोन पाड़ि कए अँहा जते नुका सकब नुका लिअ भरिपोख फेर तँ अँही एकरा बाँटब मोन पाड़ि कए आइ जते फाड़बाक हुअए फाड़ि दिऔ अहाँ मुदा फेर तँ इ अँही साटब मोन पाड़ि कए (उपरका दुनू गजल बहर (सरल वार्णिक छन्द) मे अछि। पहिल गजलमे गाछ-बृच्छ सभक बिम्ब अद्भुत अछि।) २ गंगेश गुंजन किछु गजल सन अपन १ कवि भीमनाथ झा कें समर्पित ई कविता अक्षर किएक भेल निस्तेज तेहनो तं नहि भेल अछि एज सद्यः जात अतीत- स्मृति मने अछि हरियरीक डेज़ मानल जे जीवन मे अबैछ ईहो अनुभव एहनो फेज़ काल्हि रहल जे सुपर स्टार लुप्त होइत छैक तकरो क्रेज़ ओना अवश्य युगक यैह रंग सब तरहें रफ्तार अछि तेज़ अनुभूतिके चमक संभव कम भेलए ई टुटल करेज करय ओना अभिभूत एखनो वैह सिंगार ओहने सुखसेज खयलक नहि खयलक दुनू पछताएबे जीवन केर फेज़ आइ समाजक भय सं भेंट क’ रहलौंहें तकरे प्रेज़ गुंजन रहला सतत विकल बचब’ मे बेकार इमेज़ २. कवि रामलोचन ठाकुर कें समर्पित यत्लब्धम् तत्लब्धम् दुनिया एके रती बेशी-कम दुनिया क्यो कत्तहु पूरय नहि जाय भने हकार पड़ल सबजनिया कनियां बड़क बर बनल अछि बड़ बनल कनियांकेर कनियां पलंगक युग मे खाट नेवाड़क के चीन्हय चैकी एक जनिया पुरना लोकक करैत उपेक्षा नबका पीढ़ी अछि बड़ बढ़िया बूढ़ि सासु कें कतिया-धकिया नवतुरिया निचैन नव कनिया बेशी तं बरियात भंगेरी भंगपीबे त्रिकाल लोकनिया ब्रह्मज्ञान औकाति पर उतरल एहि बजार मे छथि सब बनिया गंुजन दुःख बेकार करै छी ई संसार चलत किछु एहिना ३. कवि.पत्रकार अजित आज़ाद कें समर्पित अद्भुत हल्ला गुल्ला अछि नेता गणक मोहल्ला अछि झुग्गी -झोपड़ी यमुना मे हिनकर घर चरितल्ला अछि टोपी तं पहिरथि नहि आब भोटक मोन बेलल्ला अछि एहन समय एहि समाज मे बापो-माय तेहल्ला अछि मछहट्टाक विसाइन माहौल की संसद मे हल्ला अछि गंुजन खेलनि तेना शपथ जनु पिन्टुक रसगुल्ला अछि ४. शेफालिका वर्मा जी कें समर्पित बात किछु तं ज़रूर गुमसुम छी से थीक की बाजू की भेलय अछि बूझल हमर पछिला खिस्सा कोनो दोसर तं ने शुरू भेलय केना हेराएल कते चुप छी उदास फेर कहियो क’ ओ नै आएलए जे भेल भेल से बिसरी ने किए ओ अतीतक प्रसंग आब किए एहन व्यवस्थाक समाजो सएह घेंट काटय आ भभा क’ हंसए देत के आजुक संसार मे किछु उन्टे अहींक जे हड़पि लैए ई कोनो आब ने उदासीक बात बात जे फेर ने सस्नेह लिखय एतेक चलिक’ जीवनक सफर आब अंते मे ने चलल होइअए सब गछल कें करै मे पूरा ध्यान नै गेल लोक की दैए दैत जाएब हरदम देबेक सुख सेहो निसें आब बुझल भेलए एना उजड़ल-उपटल सन अहंक छोड़ि संसार ई के चलि गेलए भेल बड़ बेर राति बीति रहल आब की आओत ओ जे चलि गेलए कोन चैबट्टी पर गंुजन ठाढ़ बाट अपनो ने कएल तय होइअए ५. प्रिय सकेतानंद कें समर्पित ई कविता एक बेर फेर सं जैतौं ओम्हरे चैन जाहि बाट मे हेराएल तिम्हरे ओ कतहु ठाढ़ हो एखनो ओहिना ओ कहीं ताकि रहल हो हमरे हमहूं निबाहि ने सकलौं जकरा ई कलेशो तं हमर अछि तकरे कत’ कहांक याद आएल बसात जाइ ओत्तहि आ श्वांस ली तकरे ओना सिलेट पर लीखल अक्षर से मेटाएल तं सेहो अछि तकरे बजा रहल छथि फेर अपना गाम एक बेर गाम जं जइतौं हुनके (ऐ गजल सभमे बहर/ छन्दक कमी अछि।) ३ सदरे आलम "गौहर" व्याख्याता:-एस.एम.जे.कालेज खाजेडीह, ग्राम पो:- पुरसौलिया.मधुबनी गजल दाम एतय सभ चीजक देब' पड़ै छै। अधिकारक लेल झग्गड़ क'र' पड़ै छै।
गज भरि जमीन जौँ कौरव नहि देब' चाहै। पाँडव के फेर लोहा लेब' पड़ै छै।
कर्बला केर खिस्सा त' दुनिया जानै छै। धर्मक खातिर शीश कटाब' पड़ै छै।
झग्गड़ झँझट मानलौँ नीक नहि होइ छै मुदा। जीब' खातिर ईहो क'र' पड़ै छै।
"गौहर" साधु ब'न' लए चाहैत अछि मुदा। दुर्जन केँ जे पाठ पढ़ाब' पड़ै छै। (ऐ गजलमे बहर/ छन्दक कमी अछि।) ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। गजेन्द्र ठाकुर गजल १ बाट तकैत दिन बीति जाएत बुझलिऐ आस तकैत जिनगी बिताएत बुझलिऐ आफन तोड़ब अहाँ सुनबै तखन की की बीतत बेर उदासी कहाएत बुझलिऐ ऊँह ई टीस उठल फेर वेदना सहै छी आदति बनल बनि बुझाएत बुझलिऐ सहबाक शक्ति जे खतम भेल काल्हियेसँ सम्वेदना अदौसँ जँ हराएत बुझलिऐ गढ़ुआरि छी पहिने दर्द नै छल कनेको दुख सहैक सुभावे कहाएत बुझलिऐ करऽ पड़त मेहनति तिगुना कैक गुना गोनरिपर बैसल सोचाएत बुझलिऐ गभछब ऐ मालक जिरतिआ कहबैत गोरहन्नी लऽ खपड़िआ गाएत बुझलिऐ गतायात बन्न, भाव गोपलखत्ता गेलैए गच्छ बना कऽ गोधियाँ बनाएत बुझलिऐ ऐरावतक गोधिआँ बनत के असगर हाथी-हेंज बिसरत हराएत बुझलिऐ २ छोड़ि कऽ जे बिनु बजने जा रहल अछि हृदै चिरैत आगि सुनगा रहल अछि नीक लगै छल ओकर बोलक संगोर जाइए आइ हृदैकेँ कना रहल अछि नै बुझलिऐ ई एते बढ़ल अछि बात देखल आइ जे ओ भँसिया रहल अछि हमरासँ कते की माँगै छल रहरहाँ जे जुमल ओ बिनु लेने जा रहल अछि ओकर हाक्रोस हमर चुप्पी सुनै छल बाजब से बिनु सुनने जा रहल अछि ऐरावत पटा देलक अपन लहास नेसुआ कऽ नेढ़िया सृष्टि खा रहल अछि ३ घिसियाइत सहसह करैत अधसर अबैए भगलो नै होइए बात फुराइए घुरियाइए टनटनाइए मुदा बजलो नै होइए जड़िआएल तहिआयल बात टोइआ दैत अछि दगधल मोनमे बीझ काटि साफ केलक आ बिनु पढ़ने जाइए ओ रोकलो नै होइए ककरा कहबै जे पतिआएत आइ ह्रिदै लगैए छै सीयल सभक सभ बोल वचन उपरागो बिनु सुनेने जाइए सहलो नै होइए घुरत नै देखेलक अपनैती अपन ओ घुमि रहल छी ऐ शून्यमे अछि आँखिक झोँझक शून्य असगर हहराइए रहलो नै होइए आफदी-आसमानी आएल अछि ऐमे के टोकत ठाढ़ होइले कहत सभ मुँह सीयल शून्य-परिधि बढ़ैत देखाइए देखलो नै होइए थितगर कौआठारि बनल छी ऐरावतक गत्र-गत्र सिहरै अछि करजनी सन आँखि बिन बजने जे कहि जाइए सुनलो नै होइए ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। १.जवाहर लाल कश्यप २.मनोज झा मुक्ति- गामक सावन ३.प्रभात राय भट्ट ४रामकृष्ण मण्डल ‘छोटू’ १ जवाहर लाल कश्यप (१९८१- ), पिता श्री- हेमनारायण मिश्र , गाम फुलकाही- दरभंगा। उद्वेलित केने अछि / एकटा प्रश्न उद्वेलित केने अछि एकटा प्रश्न व्याकुल भेल अछि हम्मर मोन कलिकाल मे ठाढ हम खोजि रहल छी एकटा युद्धिष्ठिर के जे सत्यवादी , तत्वदर्शी, परमग्यानी हो , जे सक्छम हो जीवनक आलोचना मे हम यक्छ बनि पुछि सकि एकटा प्रश्न आखिर जीवनक नीयति की छै? २ मनोज झा मुक्ति गामक सावन
हवा रे लऽ चल तों हमरा मोनके गाम तु लऽजो । सावनमे झूला लगतै ना देखाकऽ हमरा तों दऽजो ।।
देखाकऽ हमरा तों दऽजो ओ, खेतक कादो आ रोपनी आरिपर बैसर गिरहथवा गजारैत खेतके हरबाहा कोदारिसँ आरि–धूर बन्हैत गवैत–झूमैत– रोपैत जनी कखनो मेघके गरजन कखनो टिपटिपाइत बुन्नी देखैला तरसि रहल नैना खेतक बादमे तों धऽजो । हवा रे लऽ चल तों हमरा मोनके गाम तु लऽजो ।।
बितैत ओ नेनपन सावनमें बनल पोखरि सब आँगनमें भिजैत डोका बिछैछ ओ हूँज केओ कागजक नाओके बहबैत रातिमें बेंगक टरटों–टरटों सुनैला मोन ई व्याकूल अछि हमर ई कष्ट निदानकलेल मोनके सँग उड़ाकऽजो । हवा रे लऽ चल तों हमरा मोनके गाम तु लऽजो ।।
सावन त सगरो आएल छै मूदा ओ दृश्य कतऽ भेटत ? निकलैत सजि–धजिकऽ यूवती लोढैला फूल संगीक संग गुञ्जैत चहुदिस बटगवनी देखैला दृश्य गामक ई हमरापर कृपा तों कऽजो । हवा रे लऽ चल तों हमरा मोनके गाम तु लऽजो ।। ३. प्रभात राय भट्ट १ बाबुजी छथि बड होसियार हमर बाबुजी छथि बड होसियार, हुनका सन कियो नै बुधियार, लेनदेनमे छथि ओ बड माहिर , भला अर्थ स: संसार चलैय, ई बातों छै जग जाहिर, हम कहैछी बी.ए.एम्.ए.पढ़दीय, बाबु कहैछथि बस आब रहदीय, आई.ए.पैढ़ लेलौ ई की कम अछि? हम कोण पढ़ल लिखल ? मुदा शिक्षा मंत्री बनल अछि, पि.ए. स:सभटा काज कराबैछी, साइनके जगह औठाछाप लगाबैछी, काज करू एहन जैमे पाए नै लागे, बैसल बैसल अपार धन सम्पति घर आबे, बात हमर सुन बेट्टा,बन तहूँ हमरा सन नेता, फेर देख जिन्दगी मे चमत्कार भजेतौं, हमरा संग संग तोरो उधार भजेतौं, जो मंदिर,मस्जिद मे आईग लग्बादे, गिरजा घर,बौध गुम्बा पर डोजर चल्बादे ई सब करिहे राईत के अन्हार मे, दू चाईर गो हिन्दू के गिरादीहे ईनारमे, फेर देख हिन्दू मुस्लिम मे लडाई भजेतई, हमरा नेता सभक बड़का कमाई भजेतई, भलेही मंदिर मस्जिद के आईग बुईझ जेतई, मुदा धर्म मजहब केर आईग लागले रहतई, अनेरो घुमैत रहिहे गामेगाम टोला टोला, साथ वोकरे दिहे जेकर छै बोलबाला, वोट बैंक बैढ़ जेतौं भजेबें तहूँ हमरा सन नेता, २.६०१ सभासद महान जे नै देखलौं कतय दुनियां मे ओ सभटा देखलौं नेपाल देस मे चोर डाका घुसल शिंहदरवार मे लोकतान्त्रिक नेता क भेष मे लूटपाट मे सभ लागल अछि देसक मालखजाना भिखमंगा कह्बैय अपना के आब उच्च राजघराना साईकल जे चलबैछल बिनु ब्रेक के ओ करैय लैंडक्रूजर के सवारी, जे पेनहैछल फाटलपुरान अंगा ओ पेन्हैय आब सुटसफारी उज्जर केश रैंग करैय कारी खाई मे जेकरा छल आफद चायपान ओ बियर वार मे करैय मधुपान गाम मे जेकर छल टुटलफूटल मकान राजधानीमे बनौलक महल आलीशान देखू यी चोर नेता सभक शान सय मे अछि पचासी बेईमान तैयो अछि ६०१ सभासद महान जे नै देखलौं कतय दुनियां मे ओ सभटा देखलौं नेपाल देस मे दू वर्ष मे नै बनौलक संविधान संविधानसभाक समय केलक अवसान फेर एक वर्ष ललक अनुदान ओकरो यी ६०१ केलक अपमान फेर लेलक ३ महीनाक अनुदान दिन बितल जाईय देखू कहिया बनत संबिधान गिद्ध जिका करैय सभ घिचातानी नेता सभक पोषण मे देसक टाका बनल पानी तिन पार्टी मे तेरह गुट स्वार्थलोलुपतामे भेल फुट करैय मे लागल अछि सभ ब्रम्ह्लुट सावधान!! सावधान!! सावधान!! भलेही तू नेता जो स्वार्थमे फुट मुदा हम जनता अखनो अछी एकजुट शाही तंत्र के हम जनता केलौं अंत जुनी बुझिहें अपनाक बलबंत जौं तिन महिनामे संविधान नै बनलौं हेतौ ६०१ सभासद्क शर्मनाक अंत !!! ४ रामकृष्ण मण्डल ‘छोटू’ कविता रेल सकरीसँ चलल, िनर्मलीक रेल झंझारपुरमे, लेलक मेल सुनबै छी, आइ ट्रेनक खेल बीमे भाइकम, बोगीमे चोरी भेल मंगलाक कपड़ा, आ पैइसो गेल किनका कहब निक आ चारे बोगीमे मचल अछि शोर चाेर-चारे-चाेर पकड़ चाेर, पकड़ चोर मुदा कत्त गेल चाेर इंजनपर बैसल, तरकारीवाली फटल य जिनकर साड़ी बौगलीमे पैसा, मुँहमे पान चलबैए तेज जुबान कि कहब, हिनकर कहानी अपनाकेँ बुझैए राजधानी जी.आर.पी आकि सी.आर.पी सभ छथि एकरा आगू फेल ई य सकरीसँ िनर्मलीक रेल। आह! चोर आइ पकड़ा गेल जेल उ भेजल गेल खतम भऽ गेल, चोरीक खेल मुदा, बेलहीमे फेर भाइकम भेल रेल-रेल-रेल, ई कि? बोगीमे य ठेलम-ठेल बुदरूक, बच्चा, बुढ़बो गेल ई य सकरीसँ िनर्मलीक रेल। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। विदेह नूतन अंक मिथिला कला संगीत १.ज्योति सुनीत चौधरी २.श्वेता झा (सिंगापुर) ३.गुंजन कर्ण १.ज्योति सुनीत चौधरी २.श्वेता झा (सिंगापुर) ३.गुंजन कर्ण १. ज्योति सुनीत चौधरी जन्म तिथि -३० दिसम्बर १९७८; जन्म स्थान -बेल्हवार, मधुबनी ; शिक्षा- स्वामी विवेकानन्द मिडिल स्कूल़ टिस्को साकची गर्ल्स हाई स्कूल़, मिसेज के एम पी एम इन्टर कालेज़, इन्दिरा गान्धी ओपन यूनिवर्सिटी, आइ सी डबल्यू ए आइ (कॉस्ट एकाउण्टेन्सी); निवास स्थान- लन्दन, यू.के.; पिता- श्री शुभंकर झा, ज़मशेदपुर; माता- श्रीमती सुधा झा, शिवीपट्टी। ज्योतिकेँwww.poetry.comसँ संपादकक चॉयस अवार्ड (अंग्रेजी पद्यक हेतु) भेटल छन्हि। हुनकर अंग्रेजी पद्य किछु दिन धरि www.poetrysoup.com केर मुख्य पृष्ठ पर सेहो रहल अछि। ज्योति मिथिला चित्रकलामे सेहो पारंगत छथि आ हिनकर मिथिला चित्रकलाक प्रदर्शनी ईलिंग आर्ट ग्रुप केर अंतर्गत ईलिंग ब्रॊडवे, लंडनमे प्रदर्शित कएल गेल अछि। कविता संग्रह ’अर्चिस्’ प्रकाशित। २.श्वेता झा (सिंगापुर) ३.गुंजन कर्ण राँटी मधुबनी, सम्प्रति यू.के.मे रहै छथि। www.madhubaniarts.co.uk पर हुनकर कलाकृति देखि सकै छी। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। विदेह नूतन अंक गद्य-पद्य भारती १. मोहनदास (दीर्घकथा):लेखक: उदय प्रकाश (मूल हिन्दीसँ मैथिलीमे अनुवाद विनीत उत्पल) मोहनदास (मैथिली-देवनागरी) मोहनदास (मैथिली-मिथिलाक्षर) मोहनदास (मैथिली-ब्रेल) २.छिन्नमस्ता- प्रभा खेतानक हिन्दी उपन्यासक सुशीला झा द्वारा मैथिली अनुवाद छिन्नमस्ता ३. रवि भूषण पाठक निरालाःदेहविदेह -2 (निराला हिन्दीसँ मैथिलीमे) स्नेह निर्झर बहि गेलइ (स्नेह निर्झर बह गया है) स्नेह निर्झर बहि गेलइ देह बाउल सन रहि गेलइ डारि आमक ई जे सूखल दिखल कहि रहल“ने आब छइ ,कोनो कोयल के आयत ,ई पांति मे हमही कहल अर्थ नइ छइ एकर- जीवन जरि गेलइ” “देने छी हम जगत के ,जे फूल फल केने छी अपन प्रभा सँ,चकित-पल छल अनश्वर सकल पल्लवित पल- जीवनक ऐश्वर्य सब ढहि गेलइ ” आब नइ आबइ पुलिन पर प्रियतमा श्यामतृण पर बैसबा ले निरूपमा बहि रहल अछि हृदय पर केवल अमा हम अलक्षित छी ,इएह कवि कहि गेलइ ”
2 हम अकेला देख रहलहुँ ,आबि रहलइ हमर दिनक ,ई सांध्य बेला। सूखल पाकल ,आधछिद ई केश हम्मर भेल निष्प्रभ गाल हम्मर मन्द भेलइ चालि हम्मर हटि रहल मेला नदी झरना जानि रहलहुँ छल जे बाँकी पार केनए क‘ चुकल ई देखि हँसलहुँ नाव ल‘ केओ ने एला देख रहलहुँ ,आबि रहलइ हमर दिनक ,ई सांध्य बेला। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। बालानां कृते बच्चा लोकनि द्वारा स्मरणीय श्लोक १.प्रातः काल ब्रह्ममुहूर्त्त (सूर्योदयक एक घंटा पहिने) सर्वप्रथम अपन दुनू हाथ देखबाक चाही, आ’ ई श्लोक बजबाक चाही। कराग्रे वसते लक्ष्मीः करमध्ये सरस्वती। करमूले स्थितो ब्रह्मा प्रभाते करदर्शनम्॥ करक आगाँ लक्ष्मी बसैत छथि, करक मध्यमे सरस्वती, करक मूलमे ब्रह्मा स्थित छथि। भोरमे ताहि द्वारे करक दर्शन करबाक थीक। २.संध्या काल दीप लेसबाक काल- दीपमूले स्थितो ब्रह्मा दीपमध्ये जनार्दनः। दीपाग्रे शङ्करः प्रोक्त्तः सन्ध्याज्योतिर्नमोऽस्तुते॥ दीपक मूल भागमे ब्रह्मा, दीपक मध्यभागमे जनार्दन (विष्णु) आऽ दीपक अग्र भागमे शङ्कर स्थित छथि। हे संध्याज्योति! अहाँकेँ नमस्कार। ३.सुतबाक काल- रामं स्कन्दं हनूमन्तं वैनतेयं वृकोदरम्। शयने यः स्मरेन्नित्यं दुःस्वप्नस्तस्य नश्यति॥ जे सभ दिन सुतबासँ पहिने राम, कुमारस्वामी, हनूमान्, गरुड़ आऽ भीमक स्मरण करैत छथि, हुनकर दुःस्वप्न नष्ट भऽ जाइत छन्हि। ४. नहेबाक समय- गङ्गे च यमुने चैव गोदावरि सरस्वति। नर्मदे सिन्धु कावेरि जलेऽस्मिन् सन्निधिं कुरू॥ हे गंगा, यमुना, गोदावरी, सरस्वती, नर्मदा, सिन्धु आऽ कावेरी धार। एहि जलमे अपन सान्निध्य दिअ। ५.उत्तरं यत्समुद्रस्य हिमाद्रेश्चैव दक्षिणम्। वर्षं तत् भारतं नाम भारती यत्र सन्ततिः॥ समुद्रक उत्तरमे आऽ हिमालयक दक्षिणमे भारत अछि आऽ ओतुका सन्तति भारती कहबैत छथि। ६.अहल्या द्रौपदी सीता तारा मण्डोदरी तथा। पञ्चकं ना स्मरेन्नित्यं महापातकनाशकम्॥ जे सभ दिन अहल्या, द्रौपदी, सीता, तारा आऽ मण्दोदरी, एहि पाँच साध्वी-स्त्रीक स्मरण करैत छथि, हुनकर सभ पाप नष्ट भऽ जाइत छन्हि। ७.अश्वत्थामा बलिर्व्यासो हनूमांश्च विभीषणः। कृपः परशुरामश्च सप्तैते चिरञ्जीविनः॥ अश्वत्थामा, बलि, व्यास, हनूमान्, विभीषण, कृपाचार्य आऽ परशुराम- ई सात टा चिरञ्जीवी कहबैत छथि। ८.साते भवतु सुप्रीता देवी शिखर वासिनी उग्रेन तपसा लब्धो यया पशुपतिः पतिः। सिद्धिः साध्ये सतामस्तु प्रसादान्तस्य धूर्जटेः जाह्नवीफेनलेखेव यन्यूधि शशिनः कला॥ ९. बालोऽहं जगदानन्द न मे बाला सरस्वती। अपूर्णे पंचमे वर्षे वर्णयामि जगत्त्रयम् ॥ १०. दूर्वाक्षत मंत्र(शुक्ल यजुर्वेद अध्याय २२, मंत्र २२) आ ब्रह्मन्नित्यस्य प्रजापतिर्ॠषिः। लिंभोक्त्ता देवताः। स्वराडुत्कृतिश्छन्दः। षड्जः स्वरः॥ आ ब्रह्म॑न् ब्राह्म॒णो ब्र॑ह्मवर्च॒सी जा॑यता॒मा रा॒ष्ट्रे रा॑ज॒न्यः शुरे॑ऽइषव्यो॒ऽतिव्या॒धी म॑हार॒थो जा॑यतां॒ दोग्ध्रीं धे॒नुर्वोढा॑न॒ड्वाना॒शुः सप्तिः॒ पुर॑न्धि॒र्योवा॑ जि॒ष्णू र॑थे॒ष्ठाः स॒भेयो॒ युवास्य यज॑मानस्य वी॒रो जा॒यतां निका॒मे-नि॑कामे नः प॒र्जन्यों वर्षतु॒ फल॑वत्यो न॒ऽओष॑धयः पच्यन्तां योगेक्ष॒मो नः॑ कल्पताम्॥२२॥ मन्त्रार्थाः सिद्धयः सन्तु पूर्णाः सन्तु मनोरथाः। शत्रूणां बुद्धिनाशोऽस्तु मित्राणामुदयस्तव। ॐ दीर्घायुर्भव। ॐ सौभाग्यवती भव। हे भगवान्। अपन देशमे सुयोग्य आ’ सर्वज्ञ विद्यार्थी उत्पन्न होथि, आ’ शुत्रुकेँ नाश कएनिहार सैनिक उत्पन्न होथि। अपन देशक गाय खूब दूध दय बाली, बरद भार वहन करएमे सक्षम होथि आ’ घोड़ा त्वरित रूपेँ दौगय बला होए। स्त्रीगण नगरक नेतृत्व करबामे सक्षम होथि आ’ युवक सभामे ओजपूर्ण भाषण देबयबला आ’ नेतृत्व देबामे सक्षम होथि। अपन देशमे जखन आवश्यक होय वर्षा होए आ’ औषधिक-बूटी सर्वदा परिपक्व होइत रहए। एवं क्रमे सभ तरहेँ हमरा सभक कल्याण होए। शत्रुक बुद्धिक नाश होए आ’ मित्रक उदय होए॥ मनुष्यकें कोन वस्तुक इच्छा करबाक चाही तकर वर्णन एहि मंत्रमे कएल गेल अछि। एहिमे वाचकलुप्तोपमालड़्कार अछि। अन्वय- ब्रह्म॑न् - विद्या आदि गुणसँ परिपूर्ण ब्रह्म रा॒ष्ट्रे - देशमे ब्र॑ह्मवर्च॒सी-ब्रह्म विद्याक तेजसँ युक्त्त आ जा॑यतां॒- उत्पन्न होए रा॑ज॒न्यः-राजा शुरे॑ऽ–बिना डर बला इषव्यो॒- बाण चलेबामे निपुण ऽतिव्या॒धी-शत्रुकेँ तारण दय बला म॑हार॒थो-पैघ रथ बला वीर दोग्ध्रीं-कामना(दूध पूर्ण करए बाली) धे॒नुर्वोढा॑न॒ड्वाना॒शुः धे॒नु-गौ वा वाणी र्वोढा॑न॒ड्वा- पैघ बरद ना॒शुः-आशुः-त्वरित सप्तिः॒-घोड़ा पुर॑न्धि॒र्योवा॑- पुर॑न्धि॒- व्यवहारकेँ धारण करए बाली र्योवा॑-स्त्री जि॒ष्णू-शत्रुकेँ जीतए बला र॑थे॒ष्ठाः-रथ पर स्थिर स॒भेयो॒-उत्तम सभामे युवास्य-युवा जेहन यज॑मानस्य-राजाक राज्यमे वी॒रो-शत्रुकेँ पराजित करएबला निका॒मे-नि॑कामे-निश्चययुक्त्त कार्यमे नः-हमर सभक प॒र्जन्यों-मेघ वर्षतु॒-वर्षा होए फल॑वत्यो-उत्तम फल बला ओष॑धयः-औषधिः पच्यन्तां- पाकए योगेक्ष॒मो-अलभ्य लभ्य करेबाक हेतु कएल गेल योगक रक्षा नः॑-हमरा सभक हेतु कल्पताम्-समर्थ होए ग्रिफिथक अनुवाद- हे ब्रह्मण, हमर राज्यमे ब्राह्मण नीक धार्मिक विद्या बला, राजन्य-वीर,तीरंदाज, दूध दए बाली गाय, दौगय बला जन्तु, उद्यमी नारी होथि। पार्जन्य आवश्यकता पड़ला पर वर्षा देथि, फल देय बला गाछ पाकए, हम सभ संपत्ति अर्जित/संरक्षित करी। 8.VIDEHA FOR NON RESIDENTS 8.1 to 8.3 MAITHILI LITERATURE IN ENGLISH 8.1.1.The Comet -GAJENDRA THAKUR translated by Jyoti Jha chaudhary 8.1.2.The_Science_of_Words- GAJENDRA THAKUR translated by the author himself 8.1.3.On_the_dice-board_of_the_millennium- GAJENDRA THAKUR translated by Jyoti Jha chaudhary 8.1.4.NAAGPHANS (IN ENGLISH)- SHEFALIKA VERMA translated by Dr. Rajiv Kumar Verma and Dr. Jaya Verma Input: (कोष्ठकमे देवनागरी, मिथिलाक्षर किंवा फोनेटिक-रोमनमे टाइप करू। Input in Devanagari, Mithilakshara or Phonetic-Roman.) Output: (परिणाम देवनागरी, मिथिलाक्षर आ फोनेटिक-रोमन/ रोमनमे। Result in Devanagari, Mithilakshara and Phonetic-Roman/ Roman.) English to Maithili Maithili to English इंग्लिश-मैथिली-कोष / मैथिली-इंग्लिश-कोष प्रोजेक्टकेँ आगू बढ़ाऊ, अपन सुझाव आ योगदान ई-मेल द्वारा ggajendra@videha.com पर पठाऊ। Top of Form विदेहक मैथिली-अंग्रेजी आ अंग्रेजी मैथिली कोष (इंटरनेटपर पहिल बेर सर्च-डिक्शनरी) एम.एस. एस.क्यू.एल. सर्वर आधारित -Based on ms-sql server Maithili-English and English-Maithili Dictionary. १.भारत आ नेपालक मैथिली भाषा-वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक शैली आ २.मैथिलीमे भाषा सम्पादन पाठ्यक्रम १.नेपाल आ भारतक मैथिली भाषा-वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक शैली
१.१. नेपालक मैथिली भाषा वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक उच्चारण आ लेखन शैली (भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक धारणाकेँ पूर्ण रूपसँ सङ्ग लऽ निर्धारित) मैथिलीमे उच्चारण तथा लेखन १.पञ्चमाक्षर आ अनुस्वार: पञ्चमाक्षरान्तर्गत ङ, ञ, ण, न एवं म अबैत अछि। संस्कृत भाषाक अनुसार शब्दक अन्तमे जाहि वर्गक अक्षर रहैत अछि ओही वर्गक पञ्चमाक्षर अबैत अछि। जेना- अङ्क (क वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ङ् आएल अछि।) पञ्च (च वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ञ् आएल अछि।) खण्ड (ट वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ण् आएल अछि।) सन्धि (त वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे न् आएल अछि।) खम्भ (प वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे म् आएल अछि।) उपर्युक्त बात मैथिलीमे कम देखल जाइत अछि। पञ्चमाक्षरक बदलामे अधिकांश जगहपर अनुस्वारक प्रयोग देखल जाइछ। जेना- अंक, पंच, खंड, संधि, खंभ आदि। व्याकरणविद पण्डित गोविन्द झाक कहब छनि जे कवर्ग, चवर्ग आ टवर्गसँ पूर्व अनुस्वार लिखल जाए तथा तवर्ग आ पवर्गसँ पूर्व पञ्चमाक्षरे लिखल जाए। जेना- अंक, चंचल, अंडा, अन्त तथा कम्पन। मुदा हिन्दीक निकट रहल आधुनिक लेखक एहि बातकेँ नहि मानैत छथि। ओ लोकनि अन्त आ कम्पनक जगहपर सेहो अंत आ कंपन लिखैत देखल जाइत छथि। नवीन पद्धति किछु सुविधाजनक अवश्य छैक। किएक तँ एहिमे समय आ स्थानक बचत होइत छैक। मुदा कतोक बेर हस्तलेखन वा मुद्रणमे अनुस्वारक छोट सन बिन्दु स्पष्ट नहि भेलासँ अर्थक अनर्थ होइत सेहो देखल जाइत अछि। अनुस्वारक प्रयोगमे उच्चारण-दोषक सम्भावना सेहो ततबए देखल जाइत अछि। एतदर्थ कसँ लऽ कऽ पवर्ग धरि पञ्चमाक्षरेक प्रयोग करब उचित अछि। यसँ लऽ कऽ ज्ञ धरिक अक्षरक सङ्ग अनुस्वारक प्रयोग करबामे कतहु कोनो विवाद नहि देखल जाइछ। २.ढ आ ढ़ : ढ़क उच्चारण “र् ह”जकाँ होइत अछि। अतः जतऽ “र् ह”क उच्चारण हो ओतऽ मात्र ढ़ लिखल जाए। आन ठाम खाली ढ लिखल जएबाक चाही। जेना- ढ = ढाकी, ढेकी, ढीठ, ढेउआ, ढङ्ग, ढेरी, ढाकनि, ढाठ आदि। ढ़ = पढ़ाइ, बढ़ब, गढ़ब, मढ़ब, बुढ़बा, साँढ़, गाढ़, रीढ़, चाँढ़, सीढ़ी, पीढ़ी आदि। उपर्युक्त शब्द सभकेँ देखलासँ ई स्पष्ट होइत अछि जे साधारणतया शब्दक शुरूमे ढ आ मध्य तथा अन्तमे ढ़ अबैत अछि। इएह नियम ड आ ड़क सन्दर्भ सेहो लागू होइत अछि। ३.व आ ब : मैथिलीमे “व”क उच्चारण ब कएल जाइत अछि, मुदा ओकरा ब रूपमे नहि लिखल जएबाक चाही। जेना- उच्चारण : बैद्यनाथ, बिद्या, नब, देबता, बिष्णु, बंश, बन्दना आदि। एहि सभक स्थानपर क्रमशः वैद्यनाथ, विद्या, नव, देवता, विष्णु, वंश, वन्दना लिखबाक चाही। सामान्यतया व उच्चारणक लेल ओ प्रयोग कएल जाइत अछि। जेना- ओकील, ओजह आदि। ४.य आ ज : कतहु-कतहु “य”क उच्चारण “ज”जकाँ करैत देखल जाइत अछि, मुदा ओकरा ज नहि लिखबाक चाही। उच्चारणमे यज्ञ, जदि, जमुना, जुग, जाबत, जोगी, जदु, जम आदि कहल जाएबला शब्द सभकेँ क्रमशः यज्ञ, यदि, यमुना, युग, यावत, योगी, यदु, यम लिखबाक चाही। ५.ए आ य : मैथिलीक वर्तनीमे ए आ य दुनू लिखल जाइत अछि। प्राचीन वर्तनी- कएल, जाए, होएत, माए, भाए, गाए आदि। नवीन वर्तनी- कयल, जाय, होयत, माय, भाय, गाय आदि। सामान्यतया शब्दक शुरूमे ए मात्र अबैत अछि। जेना एहि, एना, एकर, एहन आदि। एहि शब्द सभक स्थानपर यहि, यना, यकर, यहन आदिक प्रयोग नहि करबाक चाही। यद्यपि मैथिलीभाषी थारू सहित किछु जातिमे शब्दक आरम्भोमे “ए”केँ य कहि उच्चारण कएल जाइत अछि। ए आ “य”क प्रयोगक सन्दर्भमे प्राचीने पद्धतिक अनुसरण करब उपयुक्त मानि एहि पुस्तकमे ओकरे प्रयोग कएल गेल अछि। किएक तँ दुनूक लेखनमे कोनो सहजता आ दुरूहताक बात नहि अछि। आ मैथिलीक सर्वसाधारणक उच्चारण-शैली यक अपेक्षा एसँ बेसी निकट छैक। खास कऽ कएल, हएब आदि कतिपय शब्दकेँ कैल, हैब आदि रूपमे कतहु-कतहु लिखल जाएब सेहो “ए”क प्रयोगकेँ बेसी समीचीन प्रमाणित करैत अछि। ६.हि, हु तथा एकार, ओकार : मैथिलीक प्राचीन लेखन-परम्परामे कोनो बातपर बल दैत काल शब्दक पाछाँ हि, हु लगाओल जाइत छैक। जेना- हुनकहि, अपनहु, ओकरहु, तत्कालहि, चोट्टहि, आनहु आदि। मुदा आधुनिक लेखनमे हिक स्थानपर एकार एवं हुक स्थानपर ओकारक प्रयोग करैत देखल जाइत अछि। जेना- हुनके, अपनो, तत्काले, चोट्टे, आनो आदि। ७.ष तथा ख : मैथिली भाषामे अधिकांशतः षक उच्चारण ख होइत अछि। जेना- षड्यन्त्र (खड़यन्त्र), षोडशी (खोड़शी), षट्कोण (खटकोण), वृषेश (वृखेश), सन्तोष (सन्तोख) आदि। ८.ध्वनि-लोप : निम्नलिखित अवस्थामे शब्दसँ ध्वनि-लोप भऽ जाइत अछि: (क) क्रियान्वयी प्रत्यय अयमे य वा ए लुप्त भऽ जाइत अछि। ओहिमे सँ पहिने अक उच्चारण दीर्घ भऽ जाइत अछि। ओकर आगाँ लोप-सूचक चिह्न वा विकारी (’ / ऽ) लगाओल जाइछ। जेना- पूर्ण रूप : पढ़ए (पढ़य) गेलाह, कए (कय) लेल, उठए (उठय) पड़तौक। अपूर्ण रूप : पढ़’ गेलाह, क’ लेल, उठ’ पड़तौक। पढ़ऽ गेलाह, कऽ लेल, उठऽ पड़तौक। (ख) पूर्वकालिक कृत आय (आए) प्रत्ययमे य (ए) लुप्त भऽ जाइछ, मुदा लोप-सूचक विकारी नहि लगाओल जाइछ। जेना- पूर्ण रूप : खाए (य) गेल, पठाय (ए) देब, नहाए (य) अएलाह। अपूर्ण रूप : खा गेल, पठा देब, नहा अएलाह। (ग) स्त्री प्रत्यय इक उच्चारण क्रियापद, संज्ञा, ओ विशेषण तीनूमे लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना- पूर्ण रूप : दोसरि मालिनि चलि गेलि। अपूर्ण रूप : दोसर मालिन चलि गेल। (घ) वर्तमान कृदन्तक अन्तिम त लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना- पूर्ण रूप : पढ़ैत अछि, बजैत अछि, गबैत अछि। अपूर्ण रूप : पढ़ै अछि, बजै अछि, गबै अछि। (ङ) क्रियापदक अवसान इक, उक, ऐक तथा हीकमे लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना- पूर्ण रूप: छियौक, छियैक, छहीक, छौक, छैक, अबितैक, होइक। अपूर्ण रूप : छियौ, छियै, छही, छौ, छै, अबितै, होइ। (च) क्रियापदीय प्रत्यय न्ह, हु तथा हकारक लोप भऽ जाइछ। जेना- पूर्ण रूप : छन्हि, कहलन्हि, कहलहुँ, गेलह, नहि। अपूर्ण रूप : छनि, कहलनि, कहलौँ, गेलऽ, नइ, नञि, नै। ९.ध्वनि स्थानान्तरण : कोनो-कोनो स्वर-ध्वनि अपना जगहसँ हटि कऽ दोसर ठाम चलि जाइत अछि। खास कऽ ह्रस्व इ आ उक सम्बन्धमे ई बात लागू होइत अछि। मैथिलीकरण भऽ गेल शब्दक मध्य वा अन्तमे जँ ह्रस्व इ वा उ आबए तँ ओकर ध्वनि स्थानान्तरित भऽ एक अक्षर आगाँ आबि जाइत अछि। जेना- शनि (शइन), पानि (पाइन), दालि ( दाइल), माटि (माइट), काछु (काउछ), मासु (माउस) आदि। मुदा तत्सम शब्द सभमे ई निअम लागू नहि होइत अछि। जेना- रश्मिकेँ रइश्म आ सुधांशुकेँ सुधाउंस नहि कहल जा सकैत अछि। १०.हलन्त(्)क प्रयोग : मैथिली भाषामे सामान्यतया हलन्त (्)क आवश्यकता नहि होइत अछि। कारण जे शब्दक अन्तमे अ उच्चारण नहि होइत अछि। मुदा संस्कृत भाषासँ जहिनाक तहिना मैथिलीमे आएल (तत्सम) शब्द सभमे हलन्त प्रयोग कएल जाइत अछि। एहि पोथीमे सामान्यतया सम्पूर्ण शब्दकेँ मैथिली भाषा सम्बन्धी निअम अनुसार हलन्तविहीन राखल गेल अछि। मुदा व्याकरण सम्बन्धी प्रयोजनक लेल अत्यावश्यक स्थानपर कतहु-कतहु हलन्त देल गेल अछि। प्रस्तुत पोथीमे मथिली लेखनक प्राचीन आ नवीन दुनू शैलीक सरल आ समीचीन पक्ष सभकेँ समेटि कऽ वर्ण-विन्यास कएल गेल अछि। स्थान आ समयमे बचतक सङ्गहि हस्त-लेखन तथा तकनीकी दृष्टिसँ सेहो सरल होबऽबला हिसाबसँ वर्ण-विन्यास मिलाओल गेल अछि। वर्तमान समयमे मैथिली मातृभाषी पर्यन्तकेँ आन भाषाक माध्यमसँ मैथिलीक ज्ञान लेबऽ पड़ि रहल परिप्रेक्ष्यमे लेखनमे सहजता तथा एकरूपतापर ध्यान देल गेल अछि। तखन मैथिली भाषाक मूल विशेषता सभ कुण्ठित नहि होइक, ताहू दिस लेखक-मण्डल सचेत अछि। प्रसिद्ध भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक कहब छनि जे सरलताक अनुसन्धानमे एहन अवस्था किन्नहु ने आबऽ देबाक चाही जे भाषाक विशेषता छाँहमे पडि जाए। -(भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक धारणाकेँ पूर्ण रूपसँ सङ्ग लऽ निर्धारित) १.२. मैथिली अकादमी, पटना द्वारा निर्धारित मैथिली लेखन-शैली
१. जे शब्द मैथिली-साहित्यक प्राचीन कालसँ आइ धरि जाहि वर्त्तनीमे प्रचलित अछि, से सामान्यतः ताहि वर्त्तनीमे लिखल जाय- उदाहरणार्थ-
ग्राह्य
एखन ठाम जकर, तकर तनिकर अछि
अग्राह्य अखन, अखनि, एखेन, अखनी ठिमा, ठिना, ठमा जेकर, तेकर तिनकर। (वैकल्पिक रूपेँ ग्राह्य) ऐछ, अहि, ए।
२. निम्नलिखित तीन प्रकारक रूप वैकल्पिकतया अपनाओल जाय: भऽ गेल, भय गेल वा भए गेल। जा रहल अछि, जाय रहल अछि, जाए रहल अछि। कर’ गेलाह, वा करय गेलाह वा करए गेलाह।
३. प्राचीन मैथिलीक ‘न्ह’ ध्वनिक स्थानमे ‘न’ लिखल जाय सकैत अछि यथा कहलनि वा कहलन्हि।
४. ‘ऐ’ तथा ‘औ’ ततय लिखल जाय जत’ स्पष्टतः ‘अइ’ तथा ‘अउ’ सदृश उच्चारण इष्ट हो। यथा- देखैत, छलैक, बौआ, छौक इत्यादि।
५. मैथिलीक निम्नलिखित शब्द एहि रूपे प्रयुक्त होयत: जैह, सैह, इएह, ओऐह, लैह तथा दैह।
६. ह्र्स्व इकारांत शब्दमे ‘इ’ के लुप्त करब सामान्यतः अग्राह्य थिक। यथा- ग्राह्य देखि आबह, मालिनि गेलि (मनुष्य मात्रमे)।
७. स्वतंत्र ह्रस्व ‘ए’ वा ‘य’ प्राचीन मैथिलीक उद्धरण आदिमे तँ यथावत राखल जाय, किंतु आधुनिक प्रयोगमे वैकल्पिक रूपेँ ‘ए’ वा ‘य’ लिखल जाय। यथा:- कयल वा कएल, अयलाह वा अएलाह, जाय वा जाए इत्यादि।
८. उच्चारणमे दू स्वरक बीच जे ‘य’ ध्वनि स्वतः आबि जाइत अछि तकरा लेखमे स्थान वैकल्पिक रूपेँ देल जाय। यथा- धीआ, अढ़ैआ, विआह, वा धीया, अढ़ैया, बियाह।
९. सानुनासिक स्वतंत्र स्वरक स्थान यथासंभव ‘ञ’ लिखल जाय वा सानुनासिक स्वर। यथा:- मैञा, कनिञा, किरतनिञा वा मैआँ, कनिआँ, किरतनिआँ।
१०. कारकक विभक्त्तिक निम्नलिखित रूप ग्राह्य:- हाथकेँ, हाथसँ, हाथेँ, हाथक, हाथमे। ’मे’ मे अनुस्वार सर्वथा त्याज्य थिक। ‘क’ क वैकल्पिक रूप ‘केर’ राखल जा सकैत अछि।
११. पूर्वकालिक क्रियापदक बाद ‘कय’ वा ‘कए’ अव्यय वैकल्पिक रूपेँ लगाओल जा सकैत अछि। यथा:- देखि कय वा देखि कए।
१२. माँग, भाँग आदिक स्थानमे माङ, भाङ इत्यादि लिखल जाय।
१३. अर्द्ध ‘न’ ओ अर्द्ध ‘म’ क बदला अनुसार नहि लिखल जाय, किंतु छापाक सुविधार्थ अर्द्ध ‘ङ’ , ‘ञ’, तथा ‘ण’ क बदला अनुस्वारो लिखल जा सकैत अछि। यथा:- अङ्क, वा अंक, अञ्चल वा अंचल, कण्ठ वा कंठ।
१४. हलंत चिह्न निअमतः लगाओल जाय, किंतु विभक्तिक संग अकारांत प्रयोग कएल जाय। यथा:- श्रीमान्, किंतु श्रीमानक।
१५. सभ एकल कारक चिह्न शब्दमे सटा क’ लिखल जाय, हटा क’ नहि, संयुक्त विभक्तिक हेतु फराक लिखल जाय, यथा घर परक।
१६. अनुनासिककेँ चन्द्रबिन्दु द्वारा व्यक्त कयल जाय। परंतु मुद्रणक सुविधार्थ हि समान जटिल मात्रापर अनुस्वारक प्रयोग चन्द्रबिन्दुक बदला कयल जा सकैत अछि। यथा- हिँ केर बदला हिं।
१७. पूर्ण विराम पासीसँ ( । ) सूचित कयल जाय।
१८. समस्त पद सटा क’ लिखल जाय, वा हाइफेनसँ जोड़ि क’ , हटा क’ नहि।
१९. लिअ तथा दिअ शब्दमे बिकारी (ऽ) नहि लगाओल जाय।
२०. अंक देवनागरी रूपमे राखल जाय।
२१.किछु ध्वनिक लेल नवीन चिन्ह बनबाओल जाय। जा' ई नहि बनल अछि ताबत एहि दुनू ध्वनिक बदला पूर्ववत् अय/ आय/ अए/ आए/ आओ/ अओ लिखल जाय। आकि ऎ वा ऒ सँ व्यक्त कएल जाय।
ह./- गोविन्द झा ११/८/७६ श्रीकान्त ठाकुर ११/८/७६ सुरेन्द्र झा "सुमन" ११/०८/७६
२. मैथिलीमे भाषा सम्पादन पाठ्यक्रम २.१. उच्चारण निर्देश: (बोल्ड कएल रूप ग्राह्य):- दन्त न क उच्चारणमे दाँतमे जीह सटत- जेना बाजू नाम , मुदा ण क उच्चारणमे जीह मूर्धामे सटत (नै सटैए तँ उच्चारण दोष अछि)- जेना बाजू गणेश। तालव्य शमे जीह तालुसँ , षमे मूर्धासँ आ दन्त समे दाँतसँ सटत। निशाँ, सभ आ शोषण बाजि कऽ देखू। मैथिलीमे ष केँ वैदिक संस्कृत जकाँ ख सेहो उच्चरित कएल जाइत अछि, जेना वर्षा, दोष। य अनेको स्थानपर ज जकाँ उच्चरित होइत अछि आ ण ड़ जकाँ (यथा संयोग आ गणेश संजोग आ गड़ेस उच्चरित होइत अछि)। मैथिलीमे व क उच्चारण ब, श क उच्चारण स आ य क उच्चारण ज सेहो होइत अछि। ओहिना ह्रस्व इ बेशीकाल मैथिलीमे पहिने बाजल जाइत अछि कारण देवनागरीमे आ मिथिलाक्षरमे ह्रस्व इ अक्षरक पहिने लिखलो जाइत आ बाजलो जएबाक चाही। कारण जे हिन्दीमे एकर दोषपूर्ण उच्चारण होइत अछि (लिखल तँ पहिने जाइत अछि मुदा बाजल बादमे जाइत अछि), से शिक्षा पद्धतिक दोषक कारण हम सभ ओकर उच्चारण दोषपूर्ण ढंगसँ कऽ रहल छी। अछि- अ इ छ ऐछ (उच्चारण) छथि- छ इ थ – छैथ (उच्चारण) पहुँचि- प हुँ इ च (उच्चारण) आब अ आ इ ई ए ऐ ओ औ अं अः ऋ ऐ सभ लेल मात्रा सेहो अछि, मुदा ऐमे ई ऐ ओ औ अं अः ऋ केँ संयुक्ताक्षर रूपमे गलत रूपमे प्रयुक्त आ उच्चरित कएल जाइत अछि। जेना ऋ केँ री रूपमे उच्चरित करब। आ देखियौ- ऐ लेल देखिऔ क प्रयोग अनुचित। मुदा देखिऐ लेल देखियै अनुचित। क् सँ ह् धरि अ सम्मिलित भेलासँ क सँ ह बनैत अछि, मुदा उच्चारण काल हलन्त युक्त शब्दक अन्तक उच्चारणक प्रवृत्ति बढ़ल अछि, मुदा हम जखन मनोजमे ज् अन्तमे बजैत छी, तखनो पुरनका लोककेँ बजैत सुनबन्हि- मनोजऽ, वास्तवमे ओ अ युक्त ज् = ज बजै छथि। फेर ज्ञ अछि ज् आ ञ क संयुक्त मुदा गलत उच्चारण होइत अछि- ग्य। ओहिना क्ष अछि क् आ ष क संयुक्त मुदा उच्चारण होइत अछि छ। फेर श् आ र क संयुक्त अछि श्र ( जेना श्रमिक) आ स् आ र क संयुक्त अछि स्र (जेना मिस्र)। त्र भेल त+र । उच्चारणक ऑडियो फाइल विदेह आर्काइव http://www.videha.co.in/ पर उपलब्ध अछि। फेर केँ / सँ / पर पूर्व अक्षरसँ सटा कऽ लिखू मुदा तँ / कऽ हटा कऽ। ऐमे सँ मे पहिल सटा कऽ लिखू आ बादबला हटा कऽ। अंकक बाद टा लिखू सटा कऽ मुदा अन्य ठाम टा लिखू हटा कऽ– जेना छहटा मुदा सभ टा। फेर ६अ म सातम लिखू- छठम सातम नै। घरबलामे बला मुदा घरवालीमे वाली प्रयुक्त करू। रहए- रहै मुदा सकैए (उच्चारण सकै-ए)। मुदा कखनो काल रहए आ रहै मे अर्थ भिन्नता सेहो, जेना से कम्मो जगहमे पार्किंग करबाक अभ्यास रहै ओकरा। पुछलापर पता लागल जे ढुनढुन नाम्ना ई ड्राइवर कनाट प्लेसक पार्किंगमे काज करैत रहए। छलै, छलए मे सेहो ऐ तरहक भेल। छलए क उच्चारण छल-ए सेहो। संयोगने- (उच्चारण संजोगने) केँ/ कऽ केर- क ( केर क प्रयोग गद्यमे नै करू , पद्यमे कऽ सकै छी। ) क (जेना रामक) –रामक आ संगे (उच्चारण राम के / राम कऽ सेहो) सँ- सऽ (उच्चारण) चन्द्रबिन्दु आ अनुस्वार- अनुस्वारमे कंठ धरिक प्रयोग होइत अछि मुदा चन्द्रबिन्दुमे नै। चन्द्रबिन्दुमे कनेक एकारक सेहो उच्चारण होइत अछि- जेना रामसँ- (उच्चारण राम सऽ) रामकेँ- (उच्चारण राम कऽ/ राम के सेहो)। केँ जेना रामकेँ भेल हिन्दीक को (राम को)- राम को= रामकेँ क जेना रामक भेल हिन्दीक का ( राम का) राम का= रामक कऽ जेना जा कऽ भेल हिन्दीक कर ( जा कर) जा कर= जा कऽ सँ भेल हिन्दीक से (राम से) राम से= रामसँ सऽ , तऽ , त , केर (गद्यमे) एे चारू शब्द सबहक प्रयोग अवांछित। के दोसर अर्थेँ प्रयुक्त भऽ सकैए- जेना, के कहलक? विभक्ति “क”क बदला एकर प्रयोग अवांछित। नञि, नहि, नै, नइ, नँइ, नइँ, नइं ऐ सभक उच्चारण आ लेखन - नै त्त्व क बदलामे त्व जेना महत्वपूर्ण (महत्त्वपूर्ण नै) जतए अर्थ बदलि जाए ओतहि मात्र तीन अक्षरक संयुक्ताक्षरक प्रयोग उचित। सम्पति- उच्चारण स म्प इ त (सम्पत्ति नै- कारण सही उच्चारण आसानीसँ सम्भव नै)। मुदा सर्वोत्तम (सर्वोतम नै)। राष्ट्रिय (राष्ट्रीय नै) सकैए/ सकै (अर्थ परिवर्तन) पोछैले/ पोछै लेल/ पोछए लेल पोछैए/ पोछए/ (अर्थ परिवर्तन) पोछए/ पोछै ओ लोकनि ( हटा कऽ, ओ मे बिकारी नै) ओइ/ ओहि ओहिले/ ओहि लेल/ ओही लऽ जएबेँ/ बैसबेँ पँचभइयाँ देखियौक/ (देखिऔक नै- तहिना अ मे ह्रस्व आ दीर्घक मात्राक प्रयोग अनुचित) जकाँ / जेकाँ तँइ/ तैँ/ होएत / हएत नञि/ नहि/ नँइ/ नइँ/ नै सौँसे/ सौंसे बड़ / बड़ी (झोराओल) गाए (गाइ नहि), मुदा गाइक दूध (गाएक दूध नै।) रहलेँ/ पहिरतैँ हमहीं/ अहीं सब - सभ सबहक - सभहक धरि - तक गप- बात बूझब - समझब बुझलौं/ समझलौं/ बुझलहुँ - समझलहुँ हमरा आर - हम सभ आकि- आ कि सकैछ/ करैछ (गद्यमे प्रयोगक आवश्यकता नै) होइन/ होनि जाइन (जानि नै, जेना देल जाइन) मुदा जानि-बूझि (अर्थ परिव्र्तन) पइठ/ जाइठ आउ/ जाउ/ आऊ/ जाऊ मे, केँ, सँ, पर (शब्दसँ सटा कऽ) तँ कऽ धऽ दऽ (शब्दसँ हटा कऽ) मुदा दूटा वा बेसी विभक्ति संग रहलापर पहिल विभक्ति टाकेँ सटाऊ। जेना ऐमे सँ । एकटा , दूटा (मुदा कए टा) बिकारीक प्रयोग शब्दक अन्तमे, बीचमे अनावश्यक रूपेँ नै। आकारान्त आ अन्तमे अ क बाद बिकारीक प्रयोग नै (जेना दिअ , आ/ दिय’ , आ’, आ नै ) अपोस्ट्रोफीक प्रयोग बिकारीक बदलामे करब अनुचित आ मात्र फॉन्टक तकनीकी न्यूनताक परिचायक)- ओना बिकारीक संस्कृत रूप ऽ अवग्रह कहल जाइत अछि आ वर्तनी आ उच्चारण दुनू ठाम एकर लोप रहैत अछि/ रहि सकैत अछि (उच्चारणमे लोप रहिते अछि)। मुदा अपोस्ट्रोफी सेहो अंग्रेजीमे पसेसिव केसमे होइत अछि आ फ्रेंचमे शब्दमे जतए एकर प्रयोग होइत अछि जेना raison d’etre एतए सेहो एकर उच्चारण रैजौन डेटर होइत अछि, माने अपोस्ट्रॉफी अवकाश नै दैत अछि वरन जोड़ैत अछि, से एकर प्रयोग बिकारीक बदला देनाइ तकनीकी रूपेँ सेहो अनुचित)। अइमे, एहिमे/ ऐमे जइमे, जाहिमे एखन/ अखन/ अइखन केँ (के नहि) मे (अनुस्वार रहित) भऽ मे दऽ तँ (तऽ, त नै) सँ ( सऽ स नै) गाछ तर गाछ लग साँझ खन जो (जो go, करै जो do) तै/तइ जेना- तै दुआरे/ तइमे/ तइले जै/जइ जेना- जै कारण/ जइसँ/ जइले ऐ/अइ जेना- ऐ कारण/ ऐसँ/ अइले/ मुदा एकर एकटा खास प्रयोग- लालति कतेक दिनसँ कहैत रहैत अइ लै/लइ जेना लैसँ/ लइले/ लै दुआरे लहँ/ लौं गेलौं/ लेलौं/ लेलँह/ गेलहुँ/ लेलहुँ/ लेलँ जइ/ जाहि/ जै जहिठाम/ जाहिठाम/ जइठाम/ जैठाम एहि/ अहि/ अइ (वाक्यक अंतमे ग्राह्य) / ऐ अइछ/ अछि/ ऐछ तइ/ तहि/ तै/ ताहि ओहि/ ओइ सीखि/ सीख जीवि/ जीवी/ जीब भलेहीं/ भलहिं तैं/ तँइ/ तँए जाएब/ जएब लइ/ लै छइ/ छै नहि/ नै/ नइ गइ/ गै छनि/ छन्हि ... समए शब्दक संग जखन कोनो विभक्ति जुटै छै तखन समै जना समैपर इत्यादि। असगरमे हृदए आ विभक्ति जुटने हृदे जना हृदेसँ, हृदेमे इत्यादि। जइ/ जाहि/ जै जहिठाम/ जाहिठाम/ जइठाम/ जैठाम एहि/ अहि/ अइ/ ऐ अइछ/ अछि/ ऐछ तइ/ तहि/ तै/ ताहि ओहि/ ओइ सीखि/ सीख जीवि/ जीवी/ जीब भले/ भलेहीं/ भलहिं तैं/ तँइ/ तँए जाएब/ जएब लइ/ लै छइ/ छै नहि/ नै/ नइ गइ/ गै छनि/ छन्हि चुकल अछि/ गेल गछि २.२. मैथिलीमे भाषा सम्पादन पाठ्यक्रम नीचाँक सूचीमे देल विकल्पमेसँ लैंगुएज एडीटर द्वारा कोन रूप चुनल जेबाक चाही: बोल्ड कएल रूप ग्राह्य: १.होयबला/ होबयबला/ होमयबला/ हेब’बला, हेम’बला/ होयबाक/होबएबला /होएबाक २. आ’/आऽ आ ३. क’ लेने/कऽ लेने/कए लेने/कय लेने/ल’/लऽ/लय/लए ४. भ’ गेल/भऽ गेल/भय गेल/भए गेल ५. कर’ गेलाह/करऽ गेलह/करए गेलाह/करय गेलाह ६. लिअ/दिअ लिय’,दिय’,लिअ’,दिय’/ ७. कर’ बला/करऽ बला/ करय बला करैबला/क’र’ बला / करैवाली ८. बला वला (पुरूष), वाली (स्त्री) ९ . आङ्ल आंग्ल १०. प्रायः प्रायह ११. दुःख दुख १ २. चलि गेल चल गेल/चैल गेल १३. देलखिन्ह देलकिन्ह, देलखिन १४. देखलन्हि देखलनि/ देखलैन्ह १५. छथिन्ह/ छलन्हि छथिन/ छलैन/ छलनि १६. चलैत/दैत चलति/दैति १७. एखनो अखनो १८. बढ़नि बढ़इन बढ़न्हि १९. ओ’/ओऽ(सर्वनाम) ओ २० . ओ (संयोजक) ओ’/ओऽ २१. फाँगि/फाङ्गि फाइंग/फाइङ २२. जे जे’/जेऽ २३. ना-नुकुर ना-नुकर २४. केलन्हि/केलनि/कयलन्हि २५. तखनतँ/ तखन तँ २६. जा रहल/जाय रहल/जाए रहल २७. निकलय/निकलए लागल/ लगल बहराय/ बहराए लागल/ लगल निकल’/बहरै लागल २८. ओतय/ जतय जत’/ ओत’/ जतए/ ओतए २९. की फूरल जे कि फूरल जे ३०. जे जे’/जेऽ ३१. कूदि / यादि(मोन पारब) कूइद/याइद/कूद/याद/ यादि (मोन) ३२. इहो/ ओहो ३३. हँसए/ हँसय हँसऽ ३४. नौ आकि दस/नौ किंवा दस/ नौ वा दस ३५. सासु-ससुर सास-ससुर ३६. छह/ सात छ/छः/सात ३७. की की’/ कीऽ (दीर्घीकारान्तमे ऽ वर्जित) ३८. जबाब जवाब ३९. करएताह/ करेताह करयताह ४०. दलान दिशि दलान दिश/दलान दिस ४१ . गेलाह गएलाह/गयलाह ४२. किछु आर/ किछु और/ किछ आर ४३. जाइ छल/ जाइत छल जाति छल/जैत छल ४४. पहुँचि/ भेट जाइत छल/ भेट जाइ छलए पहुँच/ भेटि जाइत छल ४५. जबान (युवा)/ जवान(फौजी) ४६. लय/ लए क’/ कऽ/ लए कए / लऽ कऽ/ लऽ कए ४७. ल’/लऽ कय/ कए ४८. एखन / एखने / अखन / अखने ४९. अहींकेँ अहीँकेँ ५०. गहींर गहीँर ५१. धार पार केनाइ धार पार केनाय/केनाए ५२. जेकाँ जेँकाँ/ जकाँ ५३. तहिना तेहिना ५४. एकर अकर ५५. बहिनउ बहनोइ ५६. बहिन बहिनि ५७. बहिन-बहिनोइ बहिन-बहनउ ५८. नहि/ नै ५९. करबा / करबाय/ करबाए ६०. तँ/ त ऽ तय/तए ६१. भैयारी मे छोट-भाए/भै/, जेठ-भाय/भाइ, ६२. गिनतीमे दू भाइ/भाए/भाँइ ६३. ई पोथी दू भाइक/ भाँइ/ भाए/ लेल। यावत जावत ६४. माय मै / माए मुदा माइक ममता ६५. देन्हि/ दइन दनि/ दएन्हि/ दयन्हि दन्हि/ दैन्हि ६६. द’/ दऽ/ दए ६७. ओ (संयोजक) ओऽ (सर्वनाम) ६८. तका कए तकाय तकाए ६९. पैरे (on foot) पएरे कएक/ कैक ७०. ताहुमे/ ताहूमे ७१. पुत्रीक ७२. बजा कय/ कए / कऽ ७३. बननाय/बननाइ ७४. कोला ७५. दिनुका दिनका ७६. ततहिसँ ७७. गरबओलन्हि/ गरबौलनि/ गरबेलन्हि/ गरबेलनि ७८. बालु बालू ७९. चेन्ह चिन्ह(अशुद्ध) ८०. जे जे’ ८१ . से/ के से’/के’ ८२. एखुनका अखनुका ८३. भुमिहार भूमिहार ८४. सुग्गर / सुगरक/ सूगर ८५. झठहाक झटहाक ८६. छूबि ८७. करइयो/ओ करैयो ने देलक /करियौ-करइयौ ८८. पुबारि पुबाइ ८९. झगड़ा-झाँटी झगड़ा-झाँटि ९०. पएरे-पएरे पैरे-पैरे ९१. खेलएबाक ९२. खेलेबाक ९३. लगा ९४. होए- हो – होअए ९५. बुझल बूझल ९६. बूझल (संबोधन अर्थमे) ९७. यैह यएह / इएह/ सैह/ सएह ९८. तातिल ९९. अयनाय- अयनाइ/ अएनाइ/ एनाइ १००. निन्न- निन्द १०१. बिनु बिन १०२. जाए जाइ १०३. जाइ (in different sense)-last word of sentence १०४. छत पर आबि जाइ १०५. ने १०६. खेलाए (play) –खेलाइ १०७. शिकाइत- शिकायत १०८. ढप- ढ़प १०९ . पढ़- पढ ११०. कनिए/ कनिये कनिञे १११. राकस- राकश ११२. होए/ होय होइ ११३. अउरदा- औरदा ११४. बुझेलन्हि (different meaning- got understand) ११५. बुझएलन्हि/बुझेलनि/ बुझयलन्हि (understood himself) ११६. चलि- चल/ चलि गेल ११७. खधाइ- खधाय ११८. मोन पाड़लखिन्ह/ मोन पाड़लखिन/ मोन पारलखिन्ह ११९. कैक- कएक- कइएक १२०. लग ल’ग १२१. जरेनाइ १२२. जरौनाइ जरओनाइ- जरएनाइ/ जरेनाइ १२३. होइत १२४. गरबेलन्हि/ गरबेलनि गरबौलन्हि/ गरबौलनि १२५. चिखैत- (to test)चिखइत १२६. करइयो (willing to do) करैयो १२७. जेकरा- जकरा १२८. तकरा- तेकरा १२९. बिदेसर स्थानेमे/ बिदेसरे स्थानमे १३०. करबयलहुँ/ करबएलहुँ/ करबेलहुँ करबेलौं १३१. हारिक (उच्चारण हाइरक) १३२. ओजन वजन आफसोच/ अफसोस कागत/ कागच/ कागज १३३. आधे भाग/ आध-भागे १३४. पिचा / पिचाय/पिचाए १३५. नञ/ ने १३६. बच्चा नञ (ने) पिचा जाय १३७. तखन ने (नञ) कहैत अछि। कहै/ सुनै/ देखै छल मुदा कहैत-कहैत/ सुनैत-सुनैत/ देखैत-देखैत १३८. कतेक गोटे/ कताक गोटे १३९. कमाइ-धमाइ/ कमाई- धमाई १४० . लग ल’ग १४१. खेलाइ (for playing) १४२. छथिन्ह/ छथिन १४३. होइत होइ १४४. क्यो कियो / केओ १४५. केश (hair) १४६. केस (court-case) १४७ . बननाइ/ बननाय/ बननाए १४८. जरेनाइ १४९. कुरसी कुर्सी १५०. चरचा चर्चा १५१. कर्म करम १५२. डुबाबए/ डुबाबै/ डुमाबै डुमाबय/ डुमाबए १५३. एखुनका/ अखुनका १५४. लए/ लिअए (वाक्यक अंतिम शब्द)- लऽ १५५. कएलक/ केलक १५६. गरमी गर्मी १५७ . वरदी वर्दी १५८. सुना गेलाह सुना’/सुनाऽ १५९. एनाइ-गेनाइ १६०. तेना ने घेरलन्हि/ तेना ने घेरलनि १६१. नञि / नै १६२. डरो ड’रो १६३. कतहु/ कतौ कहीं १६४. उमरिगर-उमेरगर उमरगर १६५. भरिगर १६६. धोल/धोअल धोएल १६७. गप/गप्प १६८. के के’ १६९. दरबज्जा/ दरबजा १७०. ठाम १७१. धरि तक १७२. घूरि लौटि १७३. थोरबेक १७४. बड्ड १७५. तोँ/ तूँ १७६. तोँहि( पद्यमे ग्राह्य) १७७. तोँही / तोँहि १७८. करबाइए करबाइये १७९. एकेटा १८०. करितथि /करतथि १८१. पहुँचि/ पहुँच १८२. राखलन्हि रखलन्हि/ रखलनि १८३. लगलन्हि/ लगलनि लागलन्हि १८४. सुनि (उच्चारण सुइन) १८५. अछि (उच्चारण अइछ) १८६. एलथि गेलथि १८७. बितओने/ बितौने/ बितेने १८८. करबओलन्हि/ करबौलनि/ करेलखिन्ह/ करेलखिन १८९. करएलन्हि/ करेलनि १९०. आकि/ कि १९१. पहुँचि/ पहुँच १९२. बत्ती जराय/ जराए जरा (आगि लगा) १९३. से से’ १९४. हाँ मे हाँ (हाँमे हाँ विभक्त्तिमे हटा कए) १९५. फेल फैल १९६. फइल(spacious) फैल १९७. होयतन्हि/ होएतन्हि/ होएतनि/हेतनि/ हेतन्हि १९८. हाथ मटिआएब/ हाथ मटियाबय/हाथ मटियाएब १९९. फेका फेंका २००. देखाए देखा २०१. देखाबए २०२. सत्तरि सत्तर २०३. साहेब साहब २०४.गेलैन्ह/ गेलन्हि/ गेलनि २०५. हेबाक/ होएबाक २०६.केलो/ कएलहुँ/केलौं/ केलुँ २०७. किछु न किछु/ किछु ने किछु २०८.घुमेलहुँ/ घुमओलहुँ/ घुमेलौं २०९. एलाक/ अएलाक २१०. अः/ अह २११.लय/ लए (अर्थ-परिवर्त्तन) २१२.कनीक/ कनेक २१३.सबहक/ सभक २१४.मिलाऽ/ मिला २१५.कऽ/ क २१६.जाऽ/ जा २१७.आऽ/ आ २१८.भऽ /भ’ (’ फॉन्टक कमीक द्योतक) २१९.निअम/ नियम २२० .हेक्टेअर/ हेक्टेयर २२१.पहिल अक्षर ढ/ बादक/ बीचक ढ़ २२२.तहिं/तहिँ/ तञि/ तैं २२३.कहिं/ कहीं २२४.तँइ/ तैं / तइँ २२५.नँइ/ नइँ/ नञि/ नहि/नै २२६.है/ हए / एलीहेँ/ २२७.छञि/ छै/ छैक /छइ २२८.दृष्टिएँ/ दृष्टियेँ २२९.आ (come)/ आऽ(conjunction) २३०. आ (conjunction)/ आऽ(come) २३१.कुनो/ कोनो, कोना/केना २३२.गेलैन्ह-गेलन्हि-गेलनि २३३.हेबाक- होएबाक २३४.केलौँ- कएलौँ-कएलहुँ/केलौं २३५.किछु न किछ- किछु ने किछु २३६.केहेन- केहन २३७.आऽ (come)-आ (conjunction-and)/आ। आब'-आब' /आबह-आबह २३८. हएत-हैत २३९.घुमेलहुँ-घुमएलहुँ- घुमेलाें २४०.एलाक- अएलाक २४१.होनि- होइन/ होन्हि/ २४२.ओ-राम ओ श्यामक बीच(conjunction), ओऽ कहलक (he said)/ओ २४३.की हए/ कोसी अएली हए/ की है। की हइ २४४.दृष्टिएँ/ दृष्टियेँ २४५ .शामिल/ सामेल २४६.तैँ / तँए/ तञि/ तहिं २४७.जौं / ज्योँ/ जँ/ २४८.सभ/ सब २४९.सभक/ सबहक २५०.कहिं/ कहीं २५१.कुनो/ कोनो/ कोनहुँ/ २५२.फारकती भऽ गेल/ भए गेल/ भय गेल २५३.कोना/ केना/ कन्ना/कना २५४.अः/ अह २५५.जनै/ जनञ २५६.गेलनि/ गेलाह (अर्थ परिवर्तन) २५७.केलन्हि/ कएलन्हि/ केलनि/ २५८.लय/ लए/ लएह (अर्थ परिवर्तन) २५९.कनीक/ कनेक/कनी-मनी २६०.पठेलन्हि पठेलनि/ पठेलइन/ पपठओलन्हि/ पठबौलनि/ २६१.निअम/ नियम २६२.हेक्टेअर/ हेक्टेयर २६३.पहिल अक्षर रहने ढ/ बीचमे रहने ढ़ २६४.आकारान्तमे बिकारीक प्रयोग उचित नै/ अपोस्ट्रोफीक प्रयोग फान्टक तकनीकी न्यूनताक परिचायक ओकर बदला अवग्रह (बिकारी) क प्रयोग उचित २६५.केर (पद्यमे ग्राह्य) / -क/ कऽ/ के २६६.छैन्हि- छन्हि २६७.लगैए/ लगैये २६८.होएत/ हएत २६९.जाएत/ जएत/ २७०.आएत/ अएत/ आओत २७१ .खाएत/ खएत/ खैत २७२.पिअएबाक/ पिएबाक/पियेबाक २७३.शुरु/ शुरुह २७४.शुरुहे/ शुरुए २७५.अएताह/अओताह/ एताह/ औताह २७६.जाहि/ जाइ/ जइ/ जै/ २७७.जाइत/ जैतए/ जइतए २७८.आएल/ अएल २७९.कैक/ कएक २८०.आयल/ अएल/ आएल २८१. जाए/ जअए/ जए (लालति जाए लगलीह।) २८२. नुकएल/ नुकाएल २८३. कठुआएल/ कठुअएल २८४. ताहि/ तै/ तइ २८५. गायब/ गाएब/ गएब २८६. सकै/ सकए/ सकय २८७.सेरा/सरा/ सराए (भात सरा गेल) २८८.कहैत रही/देखैत रही/ कहैत छलौं/ कहै छलौं- अहिना चलैत/ पढ़ैत (पढ़ै-पढ़ैत अर्थ कखनो काल परिवर्तित) - आर बुझै/ बुझैत (बुझै/ बुझै छी, मुदा बुझैत-बुझैत)/ सकैत/ सकै। करैत/ करै। दै/ दैत। छैक/ छै। बचलै/ बचलैक। रखबा/ रखबाक । बिनु/ बिन। रातिक/ रातुक बुझै आ बुझैत केर अपन-अपन जगहपर प्रयोग समीचीन अछि। बुझैत-बुझैत आब बुझलिऐ। हमहूँ बुझै छी। २८९. दुआरे/ द्वारे २९०.भेटि/ भेट/ भेँट २९१. खन/ खीन/ खुना (भोर खन/ भोर खीन) २९२.तक/ धरि २९३.गऽ/ गै (meaning different-जनबै गऽ) २९४.सऽ/ सँ (मुदा दऽ, लऽ) २९५.त्त्व,(तीन अक्षरक मेल बदला पुनरुक्तिक एक आ एकटा दोसरक उपयोग) आदिक बदला त्व आदि। महत्त्व/ महत्व/ कर्ता/ कर्त्ता आदिमे त्त संयुक्तक कोनो आवश्यकता मैथिलीमे नै अछि। वक्तव्य २९६.बेसी/ बेशी २९७.बाला/वाला बला/ वला (रहैबला) २९८ .वाली/ (बदलैवाली) २९९.वार्त्ता/ वार्ता ३००. अन्तर्राष्ट्रिय/ अन्तर्राष्ट्रीय ३०१. लेमए/ लेबए ३०२.लमछुरका, नमछुरका ३०२.लागै/ लगै ( भेटैत/ भेटै) ३०३.लागल/ लगल ३०४.हबा/ हवा ३०५.राखलक/ रखलक ३०६.आ (come)/ आ (and) ३०७. पश्चाताप/ पश्चात्ताप ३०८. ऽ केर व्यवहार शब्दक अन्तमे मात्र, यथासंभव बीचमे नै। ३०९.कहैत/ कहै ३१०. रहए (छल)/ रहै (छलै) (meaning different) ३११.तागति/ ताकति ३१२.खराप/ खराब ३१३.बोइन/ बोनि/ बोइनि ३१४.जाठि/ जाइठ ३१५.कागज/ कागच/ कागत ३१६.गिरै (meaning different- swallow)/ गिरए (खसए) ३१७.राष्ट्रिय/ राष्ट्रीय Festivals of Mithila DATE-LIST (year- 2011-12) (१४१९ साल) Marriage Days: Nov.2011- 20,21,23,25,27,30 Dec.2011- 1,5,9 January 2012- 18,19,20,23,25,27,29 Feb.2012- 2,3,8,9,10,16,17,19,23,24,29 March 2012- 1,8,9,12 April 2012- 15,16,18,25,26 June 2012- 8,13,24,25,28,29 Upanayana Days: February 2012- 2,3,24,26 March 2012- 4 April 2012- 1,2,26 June 2012- 22 Dviragaman Din: November 2011- 27,30 December 2011- 1,2,5,7,9,12 February 2012- 22,23,24,26,27,29 March 2012- 1,2,4,5,9,11,12 April 2012- 23,25,26,29 May 2012- 2,3,4,6,7 Mundan Din: December 2011- 1,5 January 201225,26,30 March 2012- 12 April 2012- 26 May 2012- 23,25,31 June 2012- 8,21,22,29 FESTIVALS OF MITHILA Mauna Panchami-20 July Madhushravani- 2 August Nag Panchami- 4 August Raksha Bandhan- 13 Aug Krishnastami- 21 August Kushi Amavasya / Somvari Vrat- 29 August Hartalika Teej- 31 August ChauthChandra-1 September Karma Dharma Ekadashi-8 September Indra Pooja Aarambh- 9 September Anant Caturdashi- 11 Sep Agastyarghadaan- 12 Sep Pitri Paksha begins- 13 Sep Mahalaya Aarambh- 13 September Vishwakarma Pooja- 17 September Jimootavahan Vrata/ Jitia-20 September Matri Navami- 21September Kalashsthapan- 28 September Belnauti- 2 October Patrika Pravesh- 3 October Mahastami- 4 October Maha Navami - 5 October Vijaya Dashami- 6 October Kojagara- 11 Oct Dhanteras- 24 October Diyabati, shyama pooja-26 October Annakoota/ Govardhana Pooja-27 October Bhratridwitiya/ Chitragupta Pooja-28 October Chhathi-kharna -31 October Chhathi- sayankalik arghya - 1 November Devotthan Ekadashi- 17 November Sama poojarambh- 2 November Kartik Poornima/ Sama Bisarjan- 10 Nov ravivratarambh- 27 November Navanna parvan- 29 November Vivaha Panchmi- 29 November Makara/ Teela Sankranti-15 Jan Naraknivaran chaturdashi- 21 January Basant Panchami/ Saraswati Pooja- 28 January Achla Saptmi- 30 January Mahashivaratri-20 February Holikadahan-Fagua-7 March Holi-9 Mar Varuni Yoga-20 March Chaiti navaratrarambh- 23 March Chaiti Chhathi vrata-29 March Ram Navami- 1 April Mesha Sankranti-Satuani-13 April Jurishital-14 April Akshaya Tritiya-24 April Ravi Brat Ant- 29 April Janaki Navami- 30 April Vat Savitri-barasait- 20 May Ganga Dashhara-30 May Somavati Amavasya Vrata- 18 June Jagannath Rath Yatra- 21 June Hari Sayan Ekadashi- 30 June Aashadhi Guru Poornima-3 Jul 8.VIDEHA FOR NON RESIDENTS 8.1 to 8.3 MAITHILI LITERATURE IN ENGLISH 8.1.1.The Comet -GAJENDRA THAKUR translated by Jyoti Jha chaudhary 8.1.2.The_Science_of_Words- GAJENDRA THAKUR translated by the author himself 8.1.3.On_the_dice-board_of_the_millennium- GAJENDRA THAKUR translated by Jyoti Jha chaudhary 8.1.4.NAAGPHANS (IN ENGLISH)- SHEFALIKA VERMA translated by Dr. Rajiv Kumar Verma and Dr. Jaya Verma Original Poem in Maithili by Kalikant Jha "Buch" Translated into English by Jyoti Jha Chaudhary Kalikant Jha "Buch" 1934-2009, Birth place- village Karian, District- Samastipur (Karian is birth place of famous Indian Nyaiyyayik philosopher Udayanacharya), Father Late Pt. Rajkishor Jha was first headmaster of village middle school. Mother Late Kala Devi was housewife. After completing Intermediate education started job block office of Govt. of Bihar.published in Mithila Mihir, Mati-pani, Bhakha, and Maithili Akademi magazine. Jyoti Jha Chaudhary, Date of Birth: December 30 1978,Place of Birth- Belhvar (Madhubani District), Education: Swami Vivekananda Middle School, Tisco Sakchi Girls High School, Mrs KMPM Inter College, IGNOU, ICWAI (COST ACCOUNTANCY); Residence- LONDON, UK; Father- Sh. Shubhankar Jha, Jamshedpur; Mother- Smt. Sudha Jha- Shivipatti. Jyoti received editor's choice award from www.poetry.comand her poems were featured in front page of www.poetrysoup.com for some period.She learnt Mithila Painting under Ms. Shveta Jha, Basera Institute, Jamshedpur and Fine Arts from Toolika, Sakchi, Jamshedpur (India). Her Mithila Paintings have been displayed by Ealing Art Group at Ealing Broadway, London. Kavi Kokil Vidyapati Because of whom our native language got a life That world-renowned nightingale poet’s name is Vidyapati A new hope in the Mithilanchal Our language is spread in each house Kind emotions and colourful thoughts Stability in mind and woman in the vision Created the God Shiva under the veil That world-renowned nightingale poet’s name is Vidyapati The shade of yoga in the bed of enjoyment The illusion of personality is immeasurable The triveni is immerged in the belly The shrine resides with the beauty The sun of creation shined in the kaalratri of rituals That world-renowned nightingale poet’s name is Vidyapati Face is like spring, bhado (rainy season) in eyes The flow is pure, bank is muddy Like leaves of lotus in the water Like flow of nectar in the desert Singing the song for Radha but keeping Madhav in the mind That world-renowned nightingale poet’s name is Vidyapati Vidyapati nagaram is blessed With Visfisut, Truth, Shiva and Virtue Remnant after being burnt out Mahesh is immortal after death The entrance is adorned with gold but inside is crematorium That world-renowned nightingale poet’s name is Vidyapati Send your comments to ggajendra@videha.com VIDEHA ARCHIVE १.विदेह ई-पत्रिकाक सभटा पुरान अंक ब्रेल, तिरहुता आ देवनागरी रूपमे Videha e journal's all old issues in Braille Tirhuta and Devanagari versions विदेह ई-पत्रिकाक पहिल ५० अंक
विदेह ई-पत्रिकाक ५०म सँ आगाँक अंक २.मैथिली पोथी डाउनलोड Maithili Books Download ३.मैथिली ऑडियो संकलन Maithili Audio Downloads ४.मैथिली वीडियोक संकलन Maithili Videos ५.मिथिला चित्रकला/ आधुनिक चित्रकला आ चित्र Mithila Painting/ Modern Art and Photos "विदेह"क एहि सभ सहयोगी लिंकपर सेहो एक बेर जाऊ। ६.विदेह मैथिली क्विज : http://videhaquiz.blogspot.com/ ७.विदेह मैथिली जालवृत्त एग्रीगेटर : http://videha-aggregator.blogspot.com/ ८.विदेह मैथिली साहित्य अंग्रेजीमे अनूदित http://madhubani-art.blogspot.com/ ९.विदेहक पूर्व-रूप "भालसरिक गाछ" : http://gajendrathakur.blogspot.com/ १०.विदेह इंडेक्स : http://videha123.blogspot.com/ ११.विदेह फाइल : http://videha123.wordpress.com/ १२. विदेह: सदेह : पहिल तिरहुता (मिथिला़क्षर) जालवृत्त (ब्लॉग) http://videha-sadeha.blogspot.com/ १३. विदेह:ब्रेल: मैथिली ब्रेलमे: पहिल बेर विदेह द्वारा http://videha-braille.blogspot.com/ १४.VIDEHA IST MAITHILI FORTNIGHTLY EJOURNAL ARCHIVE http://videha-archive.blogspot.com/ १५. विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका मैथिली पोथीक आर्काइव http://videha-pothi.blogspot.com/ १६. विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका ऑडियो आर्काइव http://videha-audio.blogspot.com/ १७. विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका वीडियो आर्काइव http://videha-video.blogspot.com/ १८. विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका मिथिला चित्रकला, आधुनिक कला आ चित्रकला http://videha-paintings-photos.blogspot.com/ १९. मैथिल आर मिथिला (मैथिलीक सभसँ लोकप्रिय जालवृत्त) http://maithilaurmithila.blogspot.com/ २०.श्रुति प्रकाशन http://www.shruti-publication.com/ २१.http://groups.google.com/group/videha VIDEHA केर सदस्यता लिअ Top of Form Bottom of Form ईमेल : एहि समूहपर जाऊ २२.http://groups.yahoo.com/group/VIDEHA/ Top of Form Subscribe to VIDEHA Powered by us.groups.yahoo.com Bottom of Form २३.गजेन्द्र ठाकुर इडेक्स http://gajendrathakur123.blogspot.com २४.विदेह रेडियो:मैथिली कथा-कविता आदिक पहिल पोडकास्ट साइट http://videha123radio.wordpress.com/ २५. नेना भुटका http://mangan-khabas.blogspot.com/ महत्त्वपूर्ण सूचना:(१) 'विदेह' द्वारा धारावाहिक रूपे ई-प्रकाशित कएल गेल गजेन्द्र ठाकुरक निबन्ध-प्रबन्ध-समीक्षा, उपन्यास (सहस्रबाढ़नि) , पद्य-संग्रह (सहस्राब्दीक चौपड़पर), कथा-गल्प (गल्प-गुच्छ), नाटक(संकर्षण), महाकाव्य (त्वञ्चाहञ्च आ असञ्जाति मन) आ बाल-किशोर साहित्य विदेहमे संपूर्ण ई-प्रकाशनक बाद प्रिंट फॉर्ममे। कुरुक्षेत्रम्–अन्तर्मनक खण्ड-१ सँ ७ Combined ISBN No.978-81-907729-7-6 विवरण एहि पृष्ठपर नीचाँमे आ प्रकाशकक साइट http://www.shruti-publication.com/ पर । महत्त्वपूर्ण सूचना (२):सूचना: विदेहक मैथिली-अंग्रेजी आ अंग्रेजी मैथिली कोष (इंटरनेटपर पहिल बेर सर्च-डिक्शनरी) एम.एस. एस.क्यू.एल. सर्वर आधारित -Based on ms-sql server Maithili-English and English-Maithili Dictionary. विदेहक भाषापाक- रचनालेखन स्तंभमे। कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक- गजेन्द्र ठाकुर गजेन्द्र ठाकुरक निबन्ध-प्रबन्ध-समीक्षा, उपन्यास (सहस्रबाढ़नि) , पद्य-संग्रह (सहस्राब्दीक चौपड़पर), कथा-गल्प (गल्प गुच्छ), नाटक(संकर्षण), महाकाव्य (त्वञ्चाहञ्च आ असञ्जाति मन) आ बालमंडली-किशोरजगत विदेहमे संपूर्ण ई-प्रकाशनक बाद प्रिंट फॉर्ममे। कुरुक्षेत्रम्–अन्तर्मनक, खण्ड-१ सँ ७ Ist edition 2009 of Gajendra Thakur’s KuruKshetram-Antarmanak (Vol. I to VII)- essay-paper-criticism, novel, poems, story, play, epics and Children-grown-ups literature in single binding: Language:Maithili ६९२ पृष्ठ : मूल्य भा. रु. 100/-(for individual buyers inside india) (add courier charges Rs.50/-per copy for Delhi/NCR and Rs.100/- per copy for outside Delhi)
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Details for purchase available at print-version publishers's site website: http://www.shruti-publication.com/ or you may write to e-mail:shruti.publication@shruti-publication.com विदेह: सदेह : १: २: ३: ४ तिरहुता : देवनागरी "विदेह" क, प्रिंट संस्करण :विदेह-ई-पत्रिका (http://www.videha.co.in/) क चुनल रचना सम्मिलित। विदेह:सदेह:१: २: ३: ४ सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। Details for purchase available at print-version publishers's site http://www.shruti-publication.com or you may write to shruti.publication@shruti-publication.com २. संदेश- [ विदेह ई-पत्रिका, विदेह:सदेह मिथिलाक्षर आ देवनागरी आ गजेन्द्र ठाकुरक सात खण्डक- निबन्ध-प्रबन्ध-समीक्षा,उपन्यास (सहस्रबाढ़नि) , पद्य-संग्रह (सहस्राब्दीक चौपड़पर), कथा-गल्प (गल्प गुच्छ), नाटक (संकर्षण), महाकाव्य (त्वञ्चाहञ्च आ असञ्जाति मन) आ बाल-मंडली-किशोर जगत- संग्रह कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक मादेँ। ] १.श्री गोविन्द झा- विदेहकेँ तरंगजालपर उतारि विश्वभरिमे मातृभाषा मैथिलीक लहरि जगाओल, खेद जे अपनेक एहि महाभियानमे हम एखन धरि संग नहि दए सकलहुँ। सुनैत छी अपनेकेँ सुझाओ आ रचनात्मक आलोचना प्रिय लगैत अछि तेँ किछु लिखक मोन भेल। हमर सहायता आ सहयोग अपनेकेँ सदा उपलब्ध रहत। २.श्री रमानन्द रेणु- मैथिलीमे ई-पत्रिका पाक्षिक रूपेँ चला कऽ जे अपन मातृभाषाक प्रचार कऽ रहल छी, से धन्यवाद । आगाँ अपनेक समस्त मैथिलीक कार्यक हेतु हम हृदयसँ शुभकामना दऽ रहल छी। ३.श्री विद्यानाथ झा "विदित"- संचार आ प्रौद्योगिकीक एहि प्रतिस्पर्धी ग्लोबल युगमे अपन महिमामय "विदेह"केँ अपना देहमे प्रकट देखि जतबा प्रसन्नता आ संतोष भेल, तकरा कोनो उपलब्ध "मीटर"सँ नहि नापल जा सकैछ? ..एकर ऐतिहासिक मूल्यांकन आ सांस्कृतिक प्रतिफलन एहि शताब्दीक अंत धरि लोकक नजरिमे आश्चर्यजनक रूपसँ प्रकट हैत। ४. प्रो. उदय नारायण सिंह "नचिकेता"- जे काज अहाँ कए रहल छी तकर चरचा एक दिन मैथिली भाषाक इतिहासमे होएत। आनन्द भए रहल अछि, ई जानि कए जे एतेक गोट मैथिल "विदेह" ई जर्नलकेँ पढ़ि रहल छथि।...विदेहक चालीसम अंक पुरबाक लेल अभिनन्दन। ५. डॉ. गंगेश गुंजन- एहि विदेह-कर्ममे लागि रहल अहाँक सम्वेदनशील मन, मैथिलीक प्रति समर्पित मेहनतिक अमृत रंग, इतिहास मे एक टा विशिष्ट फराक अध्याय आरंभ करत, हमरा विश्वास अछि। अशेष शुभकामना आ बधाइक सङ्ग, सस्नेह...अहाँक पोथी कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक प्रथम दृष्टया बहुत भव्य तथा उपयोगी बुझाइछ। मैथिलीमे तँ अपना स्वरूपक प्रायः ई पहिले एहन भव्य अवतारक पोथी थिक। हर्षपूर्ण हमर हार्दिक बधाई स्वीकार करी। ६. श्री रामाश्रय झा "रामरंग"(आब स्वर्गीय)- "अपना" मिथिलासँ संबंधित...विषय वस्तुसँ अवगत भेलहुँ।...शेष सभ कुशल अछि। ७. श्री ब्रजेन्द्र त्रिपाठी- साहित्य अकादमी- इंटरनेट पर प्रथम मैथिली पाक्षिक पत्रिका "विदेह" केर लेल बधाई आ शुभकामना स्वीकार करू। ८. श्री प्रफुल्लकुमार सिंह "मौन"- प्रथम मैथिली पाक्षिक पत्रिका "विदेह" क प्रकाशनक समाचार जानि कनेक चकित मुदा बेसी आह्लादित भेलहुँ। कालचक्रकेँ पकड़ि जाहि दूरदृष्टिक परिचय देलहुँ, ओहि लेल हमर मंगलकामना। ९.डॉ. शिवप्रसाद यादव- ई जानि अपार हर्ष भए रहल अछि, जे नव सूचना-क्रान्तिक क्षेत्रमे मैथिली पत्रकारिताकेँ प्रवेश दिअएबाक साहसिक कदम उठाओल अछि। पत्रकारितामे एहि प्रकारक नव प्रयोगक हम स्वागत करैत छी, संगहि "विदेह"क सफलताक शुभकामना। १०. श्री आद्याचरण झा- कोनो पत्र-पत्रिकाक प्रकाशन- ताहूमे मैथिली पत्रिकाक प्रकाशनमे के कतेक सहयोग करताह- ई तऽ भविष्य कहत। ई हमर ८८ वर्षमे ७५ वर्षक अनुभव रहल। एतेक पैघ महान यज्ञमे हमर श्रद्धापूर्ण आहुति प्राप्त होयत- यावत ठीक-ठाक छी/ रहब। ११. श्री विजय ठाकुर- मिशिगन विश्वविद्यालय- "विदेह" पत्रिकाक अंक देखलहुँ, सम्पूर्ण टीम बधाईक पात्र अछि। पत्रिकाक मंगल भविष्य हेतु हमर शुभकामना स्वीकार कएल जाओ। १२. श्री सुभाषचन्द्र यादव- ई-पत्रिका "विदेह" क बारेमे जानि प्रसन्नता भेल। ’विदेह’ निरन्तर पल्लवित-पुष्पित हो आ चतुर्दिक अपन सुगंध पसारय से कामना अछि। १३. श्री मैथिलीपुत्र प्रदीप- ई-पत्रिका "विदेह" केर सफलताक भगवतीसँ कामना। हमर पूर्ण सहयोग रहत। १४. डॉ. श्री भीमनाथ झा- "विदेह" इन्टरनेट पर अछि तेँ "विदेह" नाम उचित आर कतेक रूपेँ एकर विवरण भए सकैत अछि। आइ-काल्हि मोनमे उद्वेग रहैत अछि, मुदा शीघ्र पूर्ण सहयोग देब।कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक देखि अति प्रसन्नता भेल। मैथिलीक लेल ई घटना छी। १५. श्री रामभरोस कापड़ि "भ्रमर"- जनकपुरधाम- "विदेह" ऑनलाइन देखि रहल छी। मैथिलीकेँ अन्तर्राष्ट्रीय जगतमे पहुँचेलहुँ तकरा लेल हार्दिक बधाई। मिथिला रत्न सभक संकलन अपूर्व। नेपालोक सहयोग भेटत, से विश्वास करी। १६. श्री राजनन्दन लालदास- "विदेह" ई-पत्रिकाक माध्यमसँ बड़ नीक काज कए रहल छी, नातिक अहिठाम देखलहुँ। एकर वार्षिक अंक जखन प्रिंट निकालब तँ हमरा पठायब। कलकत्तामे बहुत गोटेकेँ हम साइटक पता लिखाए देने छियन्हि। मोन तँ होइत अछि जे दिल्ली आबि कए आशीर्वाद दैतहुँ, मुदा उमर आब बेशी भए गेल। शुभकामना देश-विदेशक मैथिलकेँ जोड़बाक लेल।.. उत्कृष्ट प्रकाशन कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक लेल बधाइ। अद्भुत काज कएल अछि, नीक प्रस्तुति अछि सात खण्डमे। मुदा अहाँक सेवा आ से निःस्वार्थ तखन बूझल जाइत जँ अहाँ द्वारा प्रकाशित पोथी सभपर दाम लिखल नहि रहितैक। ओहिना सभकेँ विलहि देल जइतैक। (स्पष्टीकरण- श्रीमान्, अहाँक सूचनार्थ विदेह द्वारा ई-प्रकाशित कएल सभटा सामग्री आर्काइवमे https://sites.google.com/a/videha.com/videha-pothi/ पर बिना मूल्यक डाउनलोड लेल उपलब्ध छै आ भविष्यमे सेहो रहतैक। एहि आर्काइवकेँ जे कियो प्रकाशक अनुमति लऽ कऽ प्रिंट रूपमे प्रकाशित कएने छथि आ तकर ओ दाम रखने छथि ताहिपर हमर कोनो नियंत्रण नहि अछि।- गजेन्द्र ठाकुर)... अहाँक प्रति अशेष शुभकामनाक संग। १७. डॉ. प्रेमशंकर सिंह- अहाँ मैथिलीमे इंटरनेटपर पहिल पत्रिका "विदेह" प्रकाशित कए अपन अद्भुत मातृभाषानुरागक परिचय देल अछि, अहाँक निःस्वार्थ मातृभाषानुरागसँ प्रेरित छी, एकर निमित्त जे हमर सेवाक प्रयोजन हो, तँ सूचित करी। इंटरनेटपर आद्योपांत पत्रिका देखल, मन प्रफुल्लित भऽ गेल। १८.श्रीमती शेफालिका वर्मा- विदेह ई-पत्रिका देखि मोन उल्लाससँ भरि गेल। विज्ञान कतेक प्रगति कऽ रहल अछि...अहाँ सभ अनन्त आकाशकेँ भेदि दियौ, समस्त विस्तारक रहस्यकेँ तार-तार कऽ दियौक...। अपनेक अद्भुत पुस्तक कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक विषयवस्तुक दृष्टिसँ गागरमे सागर अछि। बधाई। १९.श्री हेतुकर झा, पटना-जाहि समर्पण भावसँ अपने मिथिला-मैथिलीक सेवामे तत्पर छी से स्तुत्य अछि। देशक राजधानीसँ भय रहल मैथिलीक शंखनाद मिथिलाक गाम-गाममे मैथिली चेतनाक विकास अवश्य करत। २०. श्री योगानन्द झा, कबिलपुर, लहेरियासराय- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पोथीकेँ निकटसँ देखबाक अवसर भेटल अछि आ मैथिली जगतक एकटा उद्भट ओ समसामयिक दृष्टिसम्पन्न हस्ताक्षरक कलमबन्द परिचयसँ आह्लादित छी। "विदेह"क देवनागरी सँस्करण पटनामे रु. 80/- मे उपलब्ध भऽ सकल जे विभिन्न लेखक लोकनिक छायाचित्र, परिचय पत्रक ओ रचनावलीक सम्यक प्रकाशनसँ ऐतिहासिक कहल जा सकैछ। २१. श्री किशोरीकान्त मिश्र- कोलकाता- जय मैथिली, विदेहमे बहुत रास कविता, कथा, रिपोर्ट आदिक सचित्र संग्रह देखि आ आर अधिक प्रसन्नता मिथिलाक्षर देखि- बधाई स्वीकार कएल जाओ। २२.श्री जीवकान्त- विदेहक मुद्रित अंक पढ़ल- अद्भुत मेहनति। चाबस-चाबस। किछु समालोचना मरखाह..मुदा सत्य। २३. श्री भालचन्द्र झा- अपनेक कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक देखि बुझाएल जेना हम अपने छपलहुँ अछि। एकर विशालकाय आकृति अपनेक सर्वसमावेशताक परिचायक अछि। अपनेक रचना सामर्थ्यमे उत्तरोत्तर वृद्धि हो, एहि शुभकामनाक संग हार्दिक बधाई। २४.श्रीमती डॉ नीता झा- अहाँक कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़लहुँ। ज्योतिरीश्वर शब्दावली, कृषि मत्स्य शब्दावली आ सीत बसन्त आ सभ कथा, कविता, उपन्यास, बाल-किशोर साहित्य सभ उत्तम छल। मैथिलीक उत्तरोत्तर विकासक लक्ष्य दृष्टिगोचर होइत अछि। २५.श्री मायानन्द मिश्र- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक मे हमर उपन्यास स्त्रीधनक जे विरोध कएल गेल अछि तकर हम विरोध करैत छी।... कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पोथीक लेल शुभकामना।(श्रीमान् समालोचनाकेँ विरोधक रूपमे नहि लेल जाए।-गजेन्द्र ठाकुर) २६.श्री महेन्द्र हजारी- सम्पादक श्रीमिथिला- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़ि मोन हर्षित भऽ गेल..एखन पूरा पढ़यमे बहुत समय लागत, मुदा जतेक पढ़लहुँ से आह्लादित कएलक। २७.श्री केदारनाथ चौधरी- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक अद्भुत लागल, मैथिली साहित्य लेल ई पोथी एकटा प्रतिमान बनत। २८.श्री सत्यानन्द पाठक- विदेहक हम नियमित पाठक छी। ओकर स्वरूपक प्रशंसक छलहुँ। एम्हर अहाँक लिखल - कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक देखलहुँ। मोन आह्लादित भऽ उठल। कोनो रचना तरा-उपरी। २९.श्रीमती रमा झा-सम्पादक मिथिला दर्पण। कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक प्रिंट फॉर्म पढ़ि आ एकर गुणवत्ता देखि मोन प्रसन्न भऽ गेल, अद्भुत शब्द एकरा लेल प्रयुक्त कऽ रहल छी। विदेहक उत्तरोत्तर प्रगतिक शुभकामना। ३०.श्री नरेन्द्र झा, पटना- विदेह नियमित देखैत रहैत छी। मैथिली लेल अद्भुत काज कऽ रहल छी। ३१.श्री रामलोचन ठाकुर- कोलकाता- मिथिलाक्षर विदेह देखि मोन प्रसन्नतासँ भरि उठल, अंकक विशाल परिदृश्य आस्वस्तकारी अछि। ३२.श्री तारानन्द वियोगी- विदेह आ कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक देखि चकबिदोर लागि गेल। आश्चर्य। शुभकामना आ बधाई। ३३.श्रीमती प्रेमलता मिश्र “प्रेम”- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़लहुँ। सभ रचना उच्चकोटिक लागल। बधाई। ३४.श्री कीर्तिनारायण मिश्र- बेगूसराय- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक बड्ड नीक लागल, आगांक सभ काज लेल बधाई। ३५.श्री महाप्रकाश-सहरसा- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक नीक लागल, विशालकाय संगहि उत्तमकोटिक। ३६.श्री अग्निपुष्प- मिथिलाक्षर आ देवाक्षर विदेह पढ़ल..ई प्रथम तँ अछि एकरा प्रशंसामे मुदा हम एकरा दुस्साहसिक कहब। मिथिला चित्रकलाक स्तम्भकेँ मुदा अगिला अंकमे आर विस्तृत बनाऊ। ३७.श्री मंजर सुलेमान-दरभंगा- विदेहक जतेक प्रशंसा कएल जाए कम होएत। सभ चीज उत्तम। ३८.श्रीमती प्रोफेसर वीणा ठाकुर- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक उत्तम, पठनीय, विचारनीय। जे क्यो देखैत छथि पोथी प्राप्त करबाक उपाय पुछैत छथि। शुभकामना। ३९.श्री छत्रानन्द सिंह झा- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़लहुँ, बड्ड नीक सभ तरहेँ। ४०.श्री ताराकान्त झा- सम्पादक मैथिली दैनिक मिथिला समाद- विदेह तँ कन्टेन्ट प्रोवाइडरक काज कऽ रहल अछि। कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक अद्भुत लागल। ४१.डॉ रवीन्द्र कुमार चौधरी- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक बहुत नीक, बहुत मेहनतिक परिणाम। बधाई। ४२.श्री अमरनाथ- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक आ विदेह दुनू स्मरणीय घटना अछि, मैथिली साहित्य मध्य। ४३.श्री पंचानन मिश्र- विदेहक वैविध्य आ निरन्तरता प्रभावित करैत अछि, शुभकामना। ४४.श्री केदार कानन- कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक लेल अनेक धन्यवाद, शुभकामना आ बधाइ स्वीकार करी। आ नचिकेताक भूमिका पढ़लहुँ। शुरूमे तँ लागल जेना कोनो उपन्यास अहाँ द्वारा सृजित भेल अछि मुदा पोथी उनटौला पर ज्ञात भेल जे एहिमे तँ सभ विधा समाहित अछि। ४५.श्री धनाकर ठाकुर- अहाँ नीक काज कऽ रहल छी। फोटो गैलरीमे चित्र एहि शताब्दीक जन्मतिथिक अनुसार रहैत तऽ नीक। ४६.श्री आशीष झा- अहाँक पुस्तकक संबंधमे एतबा लिखबा सँ अपना कए नहि रोकि सकलहुँ जे ई किताब मात्र किताब नहि थीक, ई एकटा उम्मीद छी जे मैथिली अहाँ सन पुत्रक सेवा सँ निरंतर समृद्ध होइत चिरजीवन कए प्राप्त करत। ४७.श्री शम्भु कुमार सिंह- विदेहक तत्परता आ क्रियाशीलता देखि आह्लादित भऽ रहल छी। निश्चितरूपेण कहल जा सकैछ जे समकालीन मैथिली पत्रिकाक इतिहासमे विदेहक नाम स्वर्णाक्षरमे लिखल जाएत। ओहि कुरुक्षेत्रक घटना सभ तँ अठारहे दिनमे खतम भऽ गेल रहए मुदा अहाँक कुरुक्षेत्रम् तँ अशेष अछि। ४८.डॉ. अजीत मिश्र- अपनेक प्रयासक कतबो प्रशंसा कएल जाए कमे होएतैक। मैथिली साहित्यमे अहाँ द्वारा कएल गेल काज युग-युगान्तर धरि पूजनीय रहत। ४९.श्री बीरेन्द्र मल्लिक- अहाँक कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक आ विदेह:सदेह पढ़ि अति प्रसन्नता भेल। अहाँक स्वास्थ्य ठीक रहए आ उत्साह बनल रहए से कामना। ५०.श्री कुमार राधारमण- अहाँक दिशा-निर्देशमे विदेह पहिल मैथिली ई-जर्नल देखि अति प्रसन्नता भेल। हमर शुभकामना। ५१.श्री फूलचन्द्र झा प्रवीण-विदेह:सदेह पढ़ने रही मुदा कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक देखि बढ़ाई देबा लेल बाध्य भऽ गेलहुँ। आब विश्वास भऽ गेल जे मैथिली नहि मरत। अशेष शुभकामना। ५२.श्री विभूति आनन्द- विदेह:सदेह देखि, ओकर विस्तार देखि अति प्रसन्नता भेल। ५३.श्री मानेश्वर मनुज-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक एकर भव्यता देखि अति प्रसन्नता भेल, एतेक विशाल ग्रन्थ मैथिलीमे आइ धरि नहि देखने रही। एहिना भविष्यमे काज करैत रही, शुभकामना। ५४.श्री विद्यानन्द झा- आइ.आइ.एम.कोलकाता- कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक विस्तार, छपाईक संग गुणवत्ता देखि अति प्रसन्नता भेल। अहाँक अनेक धन्यवाद; कतेक बरखसँ हम नेयारैत छलहुँ जे सभ पैघ शहरमे मैथिली लाइब्रेरीक स्थापना होअए, अहाँ ओकरा वेबपर कऽ रहल छी, अनेक धन्यवाद। ५५.श्री अरविन्द ठाकुर-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक मैथिली साहित्यमे कएल गेल एहि तरहक पहिल प्रयोग अछि, शुभकामना। ५६.श्री कुमार पवन-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक पढ़ि रहल छी। किछु लघुकथा पढ़ल अछि, बहुत मार्मिक छल। ५७. श्री प्रदीप बिहारी-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक देखल, बधाई। ५८.डॉ मणिकान्त ठाकुर-कैलिफोर्निया- अपन विलक्षण नियमित सेवासँ हमरा लोकनिक हृदयमे विदेह सदेह भऽ गेल अछि। ५९.श्री धीरेन्द्र प्रेमर्षि- अहाँक समस्त प्रयास सराहनीय। दुख होइत अछि जखन अहाँक प्रयासमे अपेक्षित सहयोग नहि कऽ पबैत छी। ६०.श्री देवशंकर नवीन- विदेहक निरन्तरता आ विशाल स्वरूप- विशाल पाठक वर्ग, एकरा ऐतिहासिक बनबैत अछि। ६१.श्री मोहन भारद्वाज- अहाँक समस्त कार्य देखल, बहुत नीक। एखन किछु परेशानीमे छी, मुदा शीघ्र सहयोग देब। ६२.श्री फजलुर रहमान हाशमी-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक मे एतेक मेहनतक लेल अहाँ साधुवादक अधिकारी छी। ६३.श्री लक्ष्मण झा "सागर"- मैथिलीमे चमत्कारिक रूपेँ अहाँक प्रवेश आह्लादकारी अछि।..अहाँकेँ एखन आर..दूर..बहुत दूरधरि जेबाक अछि। स्वस्थ आ प्रसन्न रही। ६४.श्री जगदीश प्रसाद मंडल-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक पढ़लहुँ । कथा सभ आ उपन्यास सहस्रबाढ़नि पूर्णरूपेँ पढ़ि गेल छी। गाम-घरक भौगोलिक विवरणक जे सूक्ष्म वर्णन सहस्रबाढ़निमे अछि, से चकित कएलक, एहि संग्रहक कथा-उपन्यास मैथिली लेखनमे विविधता अनलक अछि। समालोचना शास्त्रमे अहाँक दृष्टि वैयक्तिक नहि वरन् सामाजिक आ कल्याणकारी अछि, से प्रशंसनीय। ६५.श्री अशोक झा-अध्यक्ष मिथिला विकास परिषद- कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक लेल बधाई आ आगाँ लेल शुभकामना। ६६.श्री ठाकुर प्रसाद मुर्मु- अद्भुत प्रयास। धन्यवादक संग प्रार्थना जे अपन माटि-पानिकेँ ध्यानमे राखि अंकक समायोजन कएल जाए। नव अंक धरि प्रयास सराहनीय। विदेहकेँ बहुत-बहुत धन्यवाद जे एहेन सुन्दर-सुन्दर सचार (आलेख) लगा रहल छथि। सभटा ग्रहणीय- पठनीय। ६७.बुद्धिनाथ मिश्र- प्रिय गजेन्द्र जी,अहाँक सम्पादन मे प्रकाशित ‘विदेह’आ ‘कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक’ विलक्षण पत्रिका आ विलक्षण पोथी! की नहि अछि अहाँक सम्पादनमे? एहि प्रयत्न सँ मैथिली क विकास होयत,निस्संदेह। ६८.श्री बृखेश चन्द्र लाल- गजेन्द्रजी, अपनेक पुस्तक कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़ि मोन गदगद भय गेल , हृदयसँ अनुगृहित छी । हार्दिक शुभकामना । ६९.श्री परमेश्वर कापड़ि - श्री गजेन्द्र जी । कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़ि गदगद आ नेहाल भेलहुँ। ७०.श्री रवीन्द्रनाथ ठाकुर- विदेह पढ़ैत रहैत छी। धीरेन्द्र प्रेमर्षिक मैथिली गजलपर आलेख पढ़लहुँ। मैथिली गजल कत्तऽ सँ कत्तऽ चलि गेलैक आ ओ अपन आलेखमे मात्र अपन जानल-पहिचानल लोकक चर्च कएने छथि। जेना मैथिलीमे मठक परम्परा रहल अछि। (स्पष्टीकरण- श्रीमान्, प्रेमर्षि जी ओहि आलेखमे ई स्पष्ट लिखने छथि जे किनको नाम जे छुटि गेल छन्हि तँ से मात्र आलेखक लेखकक जानकारी नहि रहबाक द्वारे, एहिमे आन कोनो कारण नहि देखल जाय। अहाँसँ एहि विषयपर विस्तृत आलेख सादर आमंत्रित अछि।-सम्पादक) ७१.श्री मंत्रेश्वर झा- विदेह पढ़ल आ संगहि अहाँक मैगनम ओपस कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक सेहो, अति उत्तम। मैथिलीक लेल कएल जा रहल अहाँक समस्त कार्य अतुलनीय अछि। ७२. श्री हरेकृष्ण झा- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक मैथिलीमे अपन तरहक एकमात्र ग्रन्थ अछि, एहिमे लेखकक समग्र दृष्टि आ रचना कौशल देखबामे आएल जे लेखकक फील्डवर्कसँ जुड़ल रहबाक कारणसँ अछि। ७३.श्री सुकान्त सोम- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक मे समाजक इतिहास आ वर्तमानसँ अहाँक जुड़ाव बड्ड नीक लागल, अहाँ एहि क्षेत्रमे आर आगाँ काज करब से आशा अछि। ७४.प्रोफेसर मदन मिश्र- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक सन किताब मैथिलीमे पहिले अछि आ एतेक विशाल संग्रहपर शोध कएल जा सकैत अछि। भविष्यक लेल शुभकामना। ७५.प्रोफेसर कमला चौधरी- मैथिलीमे कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक सन पोथी आबए जे गुण आ रूप दुनूमे निस्सन होअए, से बहुत दिनसँ आकांक्षा छल, ओ आब जा कऽ पूर्ण भेल। पोथी एक हाथसँ दोसर हाथ घुमि रहल अछि, एहिना आगाँ सेहो अहाँसँ आशा अछि। ७६.श्री उदय चन्द्र झा "विनोद": गजेन्द्रजी, अहाँ जतेक काज कएलहुँ अछि से मैथिलीमे आइ धरि कियो नहि कएने छल। शुभकामना। अहाँकेँ एखन बहुत काज आर करबाक अछि। ७७.श्री कृष्ण कुमार कश्यप: गजेन्द्र ठाकुरजी, अहाँसँ भेँट एकटा स्मरणीय क्षण बनि गेल। अहाँ जतेक काज एहि बएसमे कऽ गेल छी ताहिसँ हजार गुणा आर बेशीक आशा अछि। ७८.श्री मणिकान्त दास: अहाँक मैथिलीक कार्यक प्रशंसा लेल शब्द नहि भेटैत अछि। अहाँक कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक सम्पूर्ण रूपेँ पढ़ि गेलहुँ। त्वञ्चाहञ्च बड्ड नीक लागल। ७९. श्री हीरेन्द्र कुमार झा- विदेह ई-पत्रिकाक सभ अंक ई-पत्रसँ भेटैत रहैत अछि। मैथिलीक ई-पत्रिका छैक एहि बातक गर्व होइत अछि। अहाँ आ अहाँक सभ सहयोगीकेँ हार्दिक शुभकामना। विदेह मैथिली साहित्य आन्दोलन (c)२००४-११. सर्वाधिकार लेखकाधीन आ जतय लेखकक नाम नहि अछि ततय संपादकाधीन। विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। सह-सम्पादक: उमेश मंडल। सहायक सम्पादक: शिव कुमार झा आ मुन्नाजी (मनोज कुमार कर्ण)। भाषा-सम्पादन: नागेन्द्र कुमार झा आ पञ्जीकार विद्यानन्द झा। कला-सम्पादन: ज्योति सुनीत चौधरी आ रश्मि रेखा सिन्हा। सम्पादक-शोध-अन्वेषण: डॉ. जया वर्मा आ डॉ. राजीव कुमार वर्मा। सम्पादक- नाटक-रंगमंच-चलचित्र- बेचन ठाकुर। सम्पादक-सूचना-सम्पर्क-समाद पूनम मंडल आ प्रियंका झा। रचनाकार अपन मौलिक आ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि) ggajendra@videha.com केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx, .rtf वा .txt फॉर्मेटमे पठा सकैत छथि। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेताह, से आशा करैत छी। रचनाक अंतमे टाइप रहय, जे ई रचना मौलिक अछि, आ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। मेल प्राप्त होयबाक बाद यथासंभव शीघ्र ( सात दिनक भीतर) एकर प्रकाशनक अंकक सूचना देल जायत। ’विदेह' प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका अछि आ एहिमे मैथिली, संस्कृत आ अंग्रेजीमे मिथिला आ मैथिलीसँ संबंधित रचना प्रकाशित कएल जाइत अछि। एहि ई पत्रिकाकेँ श्रीमति लक्ष्मी ठाकुर द्वारा मासक ०१ आ १५ तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि। (c) 2004-11 सर्वाधिकार सुरक्षित। विदेहमे प्रकाशित सभटा रचना आ आर्काइवक सर्वाधिकार रचनाकार आ संग्रहकर्त्ताक लगमे छन्हि। रचनाक अनुवाद आ पुनः प्रकाशन किंवा आर्काइवक उपयोगक अधिकार किनबाक हेतु ggajendra@videha.co.in पर संपर्क करू। एहि साइटकेँ प्रीति झा ठाकुर, मधूलिका चौधरी आ रश्मि प्रिया द्वारा डिजाइन कएल गेल। सिद्धिरस्तु वि दे ह विदेह Videha বিদেহ विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका Videha Ist Maithili Fortnightly e Magazine विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका 'विदेह' ८७ म अंक ०१ अगस्त २०११ (वर्ष ४ मास ४४ अंक ८७)http://www.videha.co.in/ मानुषीमिह संस्कृताम् ISSN 2229-547X VIDEHA वि दे ह विदेह Videha বিদেহ विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका Videha Ist Maithili Fortnightly e Magazine विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई 'विदेह' ८७ म अंक ०१ अगस्त २०११ (वर्ष ४ मास ४४ अंक ८७)http://www.videha.co.in/ मानुषीमिह संस्कृताम् ISSN 2229-547X VIDEHA
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