VIDEHA — Issue 88 / अंक ८८

Publication: VIDEHA · Issue: 88
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184 185 ISSN 2229-547X VIDEHA 'विदेह' ८८ म अंक १५ अगस्त २०११ (वर्ष ४ मास ४४ अंक ८८) वि  दे  ह विदेह Videha বিদেহ http://www.videha.co.in  विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका Videha Ist Maithili Fortnightly e Magazine   नव अंक देखबाक लेल पृष्ठ सभकेँ रिफ्रेश कए देखू। Always refresh the pages for viewing new issue of VIDEHA. Read in your own script Roman(Eng)Gujarati Bangla Oriya Gurmukhi Telugu Tamil Kannada Malayalam Hindi ऐ अंकमे अछि:- १. संपादकीय संदेश २. गद्य २.१.बिपिन झा-यात्राक किछु पश्न २.२.राजदेव मण्‍डल-उपन्‍यास- हमर टोल- गतांशसँ आगाँ… २.३.जगदीश प्रसाद मण्‍डल- दीर्घकथा- शंभूदास ३. पद्य ३.१.१. रामदेव प्रसाद मण्‍डल ‘झारूदार’ २. उमेश पासवान ३.२.१.जगदीश प्रसाद मण्‍डल ३.३.१.राजदेव मण्‍डल २रामकृष्‍ण मण्‍डल ‘छोटू’ ३.४.रवि मिश्र “भारद्वाज” ३.५.जगदीश चन्द्र  ’अनिल’ ३.६.नवीन कुमार आशा ३.७.डॉ॰ शशिधर कुमर ३.८.जवाहर लाल कश्यप ४. मिथिला कला-संगीत- १.ज्योति सुनीत चौधरी २.श्वेता झा (सिंगापुर) ३.गुंजन कर्ण ५. गद्य-पद्य भारती: रवि भूषण पाठक निरालाःदेहविदेह -३ (निराला हिन्दीसँ मैथिलीमे) भाषापाक रचना-लेखन -[मानक मैथिली], [विदेहक मैथिली-अंग्रेजी आ अंग्रेजी मैथिली कोष (इंटरनेटपर पहिल बेर सर्च-डिक्शनरी) एम.एस. एस.क्यू.एल. सर्वर आधारित -Based on ms-sql server Maithili-English and English-Maithili Dictionary.] .VIDEHA FOR NON RESIDENTS .2.1.Episodes Of The Life - ("Kist-Kist Jeevan" by Smt. shefalika Varma translated into English by Smt. Jyoti Jha Chaudhary )  2.Original Poem in Maithili by Kalikant Jha "Buch" Translated into English by Jyoti Jha Chaudhary विदेह ई-पत्रिकाक सभटा पुरान अंक ( ब्रेल, तिरहुता आ देवनागरी मे ) पी.डी.एफ. डाउनलोडक लेल नीचाँक लिंकपर उपलब्ध अछि। All the old issues of Videha e journal ( in Braille, Tirhuta and Devanagari versions ) are available for pdf download at the following link. विदेह ई-पत्रिकाक सभटा पुरान अंक ब्रेल, तिरहुता आ देवनागरी रूपमे Videha e journal's all old issues in Braille Tirhuta and Devanagari versions विदेह ई-पत्रिकाक पहिल ५० अंक

विदेह ई-पत्रिकाक ५०म सँ आगाँक अंक विदेह आर.एस.एस.फीड। "विदेह" ई-पत्रिका ई-पत्रसँ प्राप्त करू। अपन मित्रकेँ विदेहक विषयमे सूचित करू। ↑ विदेह आर.एस.एस.फीड एनीमेटरकेँ अपन साइट/ ब्लॉगपर लगाऊ। ब्लॉग "लेआउट" पर "एड गाडजेट" मे "फीड" सेलेक्ट कए "फीड यू.आर.एल." मे http://www.videha.co.in/index.xml टाइप केलासँ सेहो विदेह फीड प्राप्त कए सकैत छी। गूगल रीडरमे पढ़बा लेल http://reader.google.com/ पर जा कऽ Add a  Subscription बटन क्लिक करू आ खाली स्थानमे http://www.videha.co.in/index.xml पेस्ट करू आ Add  बटन दबाउ। Join official Videha facebook group. Join Videha googlegroups विदेह रेडियो:मैथिली कथा-कविता आदिक पहिल पोडकास्ट साइट http://videha123radio.wordpress.com/ Videha Radio मैथिली देवनागरी वा मिथिलाक्षरमे नहि देखि/ लिखि पाबि रहल छी, (cannot see/write Maithili in Devanagari/ Mithilakshara follow links below or contact at ggajendra@videha.com) तँ एहि हेतु नीचाँक लिंक सभ पर जाऊ। संगहि विदेहक स्तंभ मैथिली भाषापाक/ रचना लेखनक नव-पुरान अंक पढ़ू। http://devanaagarii.net/ http://kaulonline.com/uninagari/  (एतए बॉक्समे ऑनलाइन देवनागरी टाइप करू, बॉक्ससँ कॉपी करू आ वर्ड डॉक्युमेन्टमे पेस्ट कए वर्ड फाइलकेँ सेव करू। विशेष जानकारीक लेल ggajendra@videha.com पर सम्पर्क करू।)(Use Firefox 4.0 (from WWW.MOZILLA.COM )/ Opera/ Safari/ Internet Explorer 8.0/ Flock 2.0/ Google Chrome for best view of 'Videha' Maithili e-journal at http://www.videha.co.in/ .) Go to the link below for download of old issues of VIDEHA Maithili e magazine in .pdf format and Maithili Audio/ Video/ Book/ paintings/ photo files. विदेहक पुरान अंक आ ऑडियो/ वीडियो/ पोथी/ चित्रकला/ फोटो सभक फाइल सभ (उच्चारण, बड़ सुख सार आ दूर्वाक्षत मंत्र सहित) डाउनलोड करबाक हेतु नीचाँक लिंक पर जाऊ। VIDEHA ARCHIVE विदेह आर्काइव भारतीय डाक विभाग द्वारा जारी कवि, नाटककार आ धर्मशास्त्री विद्यापतिक स्टाम्प। भारत आ नेपालक माटिमे पसरल मिथिलाक धरती प्राचीन कालहिसँ महान पुरुष ओ महिला लोकनिक कर्मभमि रहल अछि। मिथिलाक महान पुरुष ओ महिला लोकनिक चित्र 'मिथिला रत्न' मे देखू। गौरी-शंकरक पालवंश कालक मूर्त्ति, एहिमे मिथिलाक्षरमे (१२०० वर्ष पूर्वक) अभिलेख अंकित अछि। मिथिलाक भारत आ नेपालक माटिमे पसरल एहि तरहक अन्यान्य प्राचीन आ नव स्थापत्य, चित्र, अभिलेख आ मूर्त्तिकलाक़ हेतु देखू 'मिथिलाक खोज' मिथिला, मैथिल आ मैथिलीसँ सम्बन्धित सूचना, सम्पर्क, अन्वेषण संगहि विदेहक सर्च-इंजन आ न्यूज सर्विस आ मिथिला, मैथिल आ मैथिलीसँ सम्बन्धित वेबसाइट सभक समग्र संकलनक लेल देखू "विदेह सूचना संपर्क अन्वेषण" विदेह जालवृत्तक डिसकसन फोरमपर जाऊ। "मैथिल आर मिथिला" (मैथिलीक सभसँ लोकप्रिय जालवृत्त) पर जाऊ। १. संपादकीय गजेन्द्र ठाकुर [ अभिनय पाठशाला (रंगमंच आ फिल्म लेल)- विदेह नाट्य (आ फिल्म) उत्सव २०१२ क पूर्वपीठिका] (ऐ आलेखक आधार हमर तीन मासमे देल ४० टा संस्कृतमे अनूदित व्याख्यान अछि जे हम श्री अरविन्द आश्रममे ओड़ीसाक प्राइमरी स्कूल लेल चयनित शिक्षक-शिक्षिका प्रशिक्षुकेँ देने रही। हम जतेक हुनका सभकेँ पढ़ेलौं, तइसँ बेसी हुनका सभसँ सिखलौं। ओ सभ आब ओड़ीसाक सुदूर क्षेत्रमे पढ़ा रहल छथि। ई अलेख हुनके लोकनिकेँ समर्पित अछि।-–गजेन्द्र ठाकुर) १ अभिनय की अछि ? बच्चा सभ अपन समान पसारि किछु-ने-किछु काज करिते रहैत अछि। हमर बेटी फुसियाहींक चाह बनबैत अछि आ हमरा दैत अछि। हम सेहो ओकरा फुसियांहीक घुट-घुट पी जाइ छी। मुदा फेर ओ असली सूप अनैए, हम काज कऽ रहल छी, हम बिन मुँह घुमेने घुट-घुट चाह पीबाक अभिनय करै छी, मुदा बेटी कहैए, “ई असली छी”। हमर भक टूटैए आ हम असली दुनियाँमे आबि जाइ छी। बच्चा नाटकसँ शिक्षा लैए, लोककेँ आ वातावरणकेँ बुझबाक प्रयास करैए। तखन मन्दिरक उत्सव आ राजाक प्रासादमे होइबला नाटक स्वतंत्र भऽ गेल आ एकर उपयोग वा अनुप्रयोग दोसर विषयकेँ पढ़ेबामे सेहो होमए लागल। दोसर विषयक विशेषज्ञक सहभागिता आवश्यक भऽ गेल। स्वतंत्र रूपेँ सेहो ई विषय अछि आ एकर अनुप्रयोग सेहो कएल जाइत अछि। पारम्परिक नाटक पेशेवर नाटकसँ जुड़त, उदाहरण स्वरूप कएल गेल नाटक, मंचक साजसज्जा, आ असल नाटकक मंचन रंगमंचक इतिहास बनत। मुदा ऐ सँ पहिने रंगमंचक प्रारम्भिक ज्ञानक संग नाटक पढ़बाक आदतिक विकसित भेनाइ सेहो आवश्यक अछि। आ से पढ़बा काल एकर मंच प्रबन्धन आ अभिनयक दृष्टिसँ विश्लेषण सेहो आवश्यक अछि। राजनैतिक, सामाजिक आ सांस्कृतिक घटनाक्रमक जानकारी सम्बन्धित प्रस्तुतिक सन्दर्भमे देब आवश्यक होइत अछि। भरतक नाट्यशास्त्रक अतिरिक्त कालिदास, भास आ शूद्रकक नाटकक परिचय सेहो आवश्यक। रंगमंचसँ जुड़ल लोककेँ लिटल आ ग्रेट ट्रेडिशन, दुनूक अनुभव आ जानकारी हेबाक चाही। बच्चा नाटक आ रंगमंचसँ जुड़त तँ जिम्मेवार नागरिक बनत, आर्थिक रूपेँ आत्म-निर्भर बनत आ सक्रिय नागरिक सेहो बनत। २ चैतन्य महाप्रभुकेँ जात्राक संगीत आ नृत्य युक्त वीथी मंचनक प्रयोग संदेशक प्रसार लेल केलन्हि। नाट्य शास्त्रमे वर्णन अछि जे नाटकक उत्पत्ति इन्द्रक ध्वजा उत्सवसँ भेल। नाट्य शास्त्र नाटककेँ दू प्रकारमे १.अमृत मंथन आ २.शिवक त्रिपुरदाह, मानैत अछि। एहेन लगभग दस टा दृश्य वा रूपकक प्रकार भरत लग छलन्हि (दशरूपक) आ ओइमे नृत्य, संगीत आ अभिनय सम्मिलित छल; आ ऐ दशरूपकक अतिरिक्त श्रव्य गीत सभ छल। पाँचम शताब्दी ई. पू. मे पाणिनी शिलालिन् आ कृशाश्वक चर्चा करै छथि जे नट सूत्रक संकलन केने रहथि। नट माने अभिनेता आ रंग माने रंगमंच। नटक पर्यायवाची होइत अछि, भरत, शिलालिन् आ कृशाश्व! मैथिली नाटक जे आइ धरि मात्र नृत्य-संगीतसँ बेशी आ चित्रकला आ दस्तकारीसँ मामूली रूपसँ जुड़ल छल, से आब भौतिकी, जीव विज्ञान, इतिहास, भूगोल, आ साहित्यसँ सेहो जुड़ए, तकर प्रयास हेबाक चाही। ३ अभिनय पाठशाला: विभिन्न औजारकेँ पकड़बाक आ चलेबाक विधि: ओकर ग्रीसिंग आदि केनाइ, ओकरा सुरखित रखनाइ सिखाउ। घरकेँ कोना साफ राखी, साफ आ अव्यवस्थित घरमे अन्तर, कोन चीजकेँ बेर-बेर साफ करऽ पड़ैए, कोनकेँ नै से सिखाउ। कनियाँ-पुतराक निर्माण, तार, फाटल-पुरान कपड़ा, टूटल चूड़ी/ गहना, पुरान साड़ी, रुइया आदिसँ मुँह, आँखि आदिक चित्रण होइत अछि। शरीरक चमड़ा लेल प्लास्टिक आदि वा कपड़ापर रंगक परत लगाउ। ऊन आदिसँ केस बनाएब, वीर, योद्धा आदि बनबैले तलवार लेल काठी आ पैघ जुत्ता, आ फेर मजदूर गुड़िया आदि बनेनाइ सिखाउ। माने सभ तरहक पात्रक निर्माण। मवेशी पन्हेनाइ, दूध दुहनाइ, लथारसँ बचबाक अभिनय, दही पौरनाइ, लस्सी घोटनाइ, आँखि आ हाथक मिलान ई सभ काल्पनिक रूपेँ सिखाउ। खेल जेना करिया झुम्मरि आदिक परिचय दियौ। कागचक नाव आ हवाइ जहाज बनेनाइ आ रेखाचित्र बनेनाइ सिखाउ। लिखलकेँ बुझबाक आ विषयकेँ बुझबाक तरीका अछि रंगमंच। अभिनय- चलनाइ, चलनाइ सेहो कएक प्रकारक होइत अछि, हड़बरा कऽ चलनाइ, कोनो बोझ, कोदारि आदि उठा कऽ चलनाइ, जोशमे, दुखमे चालि आ थाकल ठेहिआयल चालि, नेङरा कऽ चलनाइ, भेड़ चालि, नारा लगबैत चलब, दू-तीन टा संगीक संग चलब, ई सभ बच्चा वा प्रौढ़ अभिनेताकेँ नीक जकाँ सिखाउ। स्पर्श:- गरम वस्तु छूनाइ, ठंढ़ा छूब, कड़गर आ मोलायम वस्तु छूब, फ़ेर तकर प्रतिक्रिया, भय-आसक्ति-तामस-लाज-नै करए बला भाव, जिद्द, दुःख, हँसी (खीखीसँ मुँह बन्न कऽ हँसबा धरि), देखनाइ खुशीसँ, आश्चर्यसँ, विभिन्न प्रकारक दृश्यपर प्रतिक्रिया सेहो देखेबाक आवश्यकता अछि। बजार, स्कूल, घर, सभा आदि कार्य, स्मरण शक्ति, शब्दावली, ध्यान, व्यक्तित्व, क्षमता, विचारधारा, स्वाभिमान, इच्छा, शारीरिक विश्वास प्रदर्शन, उत्साह, स्त्री-पुरुष विमर्श, मनोविज्ञान, कविता, गद्य, गीत, कथा आ प्रहेलिकाक समावेश, तकर स्मरण आ वाचन ऐ सभपर ध्यान देब आवश्यक अछि। अंग प्रचालन, नृत्य, संगीत, हस्त संचालन, कसरत (सम्मिलित रूपेँ), हवाक झोंकाक भीतर आएब, ऐ सँ खिड़की खुजब किछु माथपर खसब आदिक काल्पनिक अनुभव, ऐ सभक अनुभव बच्चा सभकेँ कराउ। वातावरण, गति, रूप, आकार-प्रकारक अनुभव। अपनसँ अलग प्रकारक व्यक्तित्वक अभिनय, ध्वनि आ दृश्यक संबंध आ दुनूक संगे-संग पुनरावृत्ति, वास्तविक आ काल्पनिक दुनूक मंचन, कोनो विषयपर वार्तालाप, किताब, अखबार, वृत्तचित्रक विषय, तात्कालिक विषय, जबरदस्ती यादि कराएब गलत मुदा सुनि-सुनि कऽ मोन राखब नीक। खेल- दूटा दल बना कऽ अभिनय, दल बना कऽ सेहो, एक दल सुतत, दोसर दल नढ़िया/ कौआ बनि उठाएत,श्लोक आदिक समवेत पाठ, ई सभ अभ्यास कराउ। वर्कशॉपमे:- -किनको कोनो काजमे दिक्कत होइन्ह तँ दोसरकेँ ओकर सहायता लेल कहू,  -ककरो सुझावपर आपसमे सलाह लिअ आ मिल कऽ विचार करू, क्षमता अनुसारे काज दियौ, जे नीकसँ काज केलनि तकरा प्रशंसा सेहो भेटबाक चाही, मीठ बाजब सिखाउ, सही बाजब सिखाउ, बजबासँ पहिने अपन बेर अएबा धरि रुकू, निर्देशक पालन करू, बौस्तुकेँ बाँटि कऽ आ मिल कऽ प्रयोग केनाइ सिखाउ, कर्तव्यक बोध कराउ, जिम्मेवारी दियौ, सामूहिक कार्यमे भाग लिअ, अन्य सामाजिक व्यवहार अपनाउ, अवलोकन आ श्रवण द्वारा सम्भाषण आ अभिनय सिखाउ, अनुकरण द्वारा अभिनय सिखाउ, कोनो चीज दोहरा कऽ अभिनय सिखाउ, प्रशंसा/ प्रोत्साहनसँ सिखाउ, मनोरंजन आ आनन्दयुक्त वातावरण बनेने रहू, नमगर व्याख्यान नै दियौ, उदाहरण, अभ्यास आ प्रोत्साहन बेशी कारगर हएत (भाषणक बदला), दण्डसँ बचू, दू बच्चाक तुलनासँ बचू, कोनो बच्चाकेँ दोसर बच्चाक नजरिमे नै खसाउ, बाहरी लोकसँ बच्चा सभक भेँट करबाउ, त्योहार/ उत्सव संग मिल मनाउ, मिलि जुलि कतौ घुमैले जाउ, स्नेहसँ देखू/ मुस्की दियौ/ माथ हिला कऽ समर्थन करू/ पीठ ठोकू/ माता-पिताकेँ ओकर प्रशंसा करू/ मुदा बेर-बेर ओकर प्रशंसा ओकर सोझाँमे नै करू/ चॉकलेट आदिक लालच नै दियौ/ कोनो एहेन चीज नै गछि लिअ जे अहाँ पूर्ण नै कऽ सकी। पाँचसँ कम उमेरक बच्चाकेँ गलतीक कारण नै बताउ- ओतेक बुद्धि ओइ उमेरमे नै होइ छै। मुँहसँ/ इशारासँ, आवाज आ मुँह हिला कऽ गलती करबासँ रोकू, आवश्यकता हुअए तँ छोट-मोट दण्ड, पाँचसँ बेशी उमेरक बच्चाकेँ दियौ, मुदा ओकरा मारियौ नै, लज्जित नै करियौ/ शिकाइत नै करियौ, निर्णय लेबाक आदति दियौ, भागेदारीक सुखक अनुभव कराउ, स्वस्थ प्रतिस्पर्धा सिखबियौ, आत्मनिर्भर भेनाइ सिखबियौ, स्वभावक विषयमे बतबियौ, बात करबाक कला, आपसक सम्बन्ध, सार्वजनिक सम्पत्तिक आदर केनाइ सिखबियौ, पर्यावरणक ध्यान रखनाइ सिखबियौ, भावनाकेँ ठेस नै पहुँचबियौ, प्रश्न करबाक कला सिखबियौ, जीवनक नायक केहेन हेबाक चाही से बतबियौ, आत्मशक्तिक शक्तिक वर्णन करू, अपन गामकेँ बूझब सिखबियौ, धर्म-राजनीतिक-जातिक गुत्थी बुझबियौ। अभिनयक पाठशालाक कार्यशाला लेल आवश्यक तत्व: -शारीरिक आ अभिनय क्षमताक विश्लेषण/ शरीर रचना शास्त्रक ज्ञान/ नाटकक समाजशास्त्रीय दृष्टिसँ भेद/ नाट्य मंचनक जीबाक साधनसँ रहल जुड़ाव आ प्रभाव/ सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक आ राजनैतिक वातावरणक अध्ययनक दृष्टिसँ नाट्य मंचक प्रकारक सम्बन्ध, सिखबाक आ बुझबाक कलाक विकास, कोनो अवधारणाकेँ बनेनाइ आ ओकरा बुझि कऽ मंचन केनाइ, अभिनय लेल चलबाक आ बजबाक अभ्यास आ नाटक संस्कृतिक अंग बनि जाए तकर प्रयास, इतिहासक कालखण्ड आ ओइ कालखण्ड सभक नाटकक परिचय, तखुनका कालकेँ मंचपर स्थापित करब आ ऐ लेल इतिहास, भूगोल आ सामाजिक, सांस्कृतिक, रजनैतिक, आर्थिक अवस्थाक परिचय कराउ। पेशागत रंगकर्मक अवलोकनसँ मंचक पाछाँ होइबला काजक विषयमे जानकारी भेटत। नाटकक कालखण्डक अनुरूप मंच आ पहिराबाक अध्ययन, विभिन्न कालखण्डक नाटकक रेकॉर्डिंग वा मंचनकेँ जा कऽ देखबाक आवश्यकता आ ओइ कालक फोटो, चित्रकला आ आन सूचनाक संकलन। संगीत-नाटक अकादेमी, दिल्लीमे ढेर रास डोक्यूमेन्ट्री देखबा लेल आ ढेर रास सान्द्र मुद्रिका किनबा लेल उपलब्ध अछि। ४ कोलकातामे १८५० ई.क आसपास आधुनिक रंगमंच- ब्रिटिश क्लबमे शुरू भेल, मुदा बाहरी लोकक प्रवेश ओतए नै छलै। जात्रा आधारपर- विद्यासुन्दर (प्रेमी-प्रेमिकाक कथा)- बांग्ला खेलाएल जाइ छल, भारतेन्दु सेहो रासलीलाक आधारपर लिखलन्हि। विष्णुदास भावे- सीता स्वयंवर (१८४३ई.), मराठीमे यक्षगण (कर्णाटक)क आधारपर एकटा प्रयोग छल। हबीब तनवीर- नजीर कविपर- आगरा बाजार आ मृच्छकटिकम् (शूद्रकक संस्कृत नाटकक हिन्दीमे), शम्भु मित्र, बी.वी.कारन्थ, के.एन.पणिक्कर, रतन थियाम (चक्रयुध- अभिमन्यु कथापर, गीत-नृत्य आधारित, किछु लोक एकरा बैले बुझलन्हि।), पणिक्कर आ कारन्थ स्वर आ बोलक प्रयोग केलन्हि। कारन्थ-आलापक सेहो प्रयोग केलन्हि। १९५६ ई. संगीत-नाटक अकादेमी द्वारा प्रथम राष्ट्रीय नाट्य उत्सव- कालिदासक अभिज्ञान शाकुन्तलम् (संस्कृत) सँ उत्सवक प्रारम्भ- गोवा ब्राह्मण सभा द्वारा। पणिक्करक मध्यम व्यायोग- भास (संस्कृत) आ थियाम- भास उरुमुगम (मणिपुरी) केलथि जइमे कलाकार नृत्यशैलीमे आस्तेसँ आबथि आ जाथि। विजय तेन्दुलकरक घासीराम कोतवाल, जकर आधार छल नाना फड़णवीस आ दोसर पुणेक भ्रष्ट ब्राह्मण (दशावतार आधारित पारम्परिक शैलीमे),आ शान्तत- कोर्ट चालू आहे; गिरीश कर्णाडक हयवदन (कथासरित्सागर- यक्षगण आधारित); मोहन राकेशक आषाढ़ का एक दिन, शम्भू मित्र- डायरेक्टर- रवीन्द्रनाथ, इब्सेन (डॉल्स हाउस), उत्पल दत्त- कल्लोल (तरंगक ध्वनि) ई सभ आधुनिक रंगमंचकेँ आगाँ बढ़ेलन्हि। ५ पारसी रंगमंच:- मुम्बइक आर्थिक रूपेँ सम्पन्न पारसी समुदायक, एकरा हाइब्रिड (वर्णशंकर वा मिश्र) रंगमंच कहल जाइत अछि। १८५३ ई. मे एकर प्रारम्भ भेल। १९४० ई .धरि ई नीक-नहाँति चलैत रहल। सिनेमाक आगमनक बाद एकर मृत्यु भऽ गेल। एकरासँ जुड़ल लोक सिनेमाक क्षेत्रमे चलि गेलाह। पारसी नाटकक किछु प्रसिद्ध नाटक जेना इन्दर सभा, आलम आरा आ खोन्ने नहाक (सेक्सपियरक हेमलेट आधारित) सिनेमा बनि सेहो प्रस्तुत भेल। विषय वस्तु: पारसी नाटकक विषय-वस्तु महाकाव्य आ पुराण आधारित छल। एकर विषय ऐतिहासिक आ सामाजिक छल। सभ बेर पर्दा खसबाक बाद हास्य कणिका खेलाएल जाइत छल। देश-विदेशमे पारसी थियेटरक प्रदर्शन होइत छल।रोमांच आ रहस्य एकर मुख्य अंग छल। चित्रित पर्दाक प्रयोग होइ छल। पर्दा कोनो रहस्य एलापर खसै छल। दर्शकक मांगपर रिटेक सेहो भऽ जाइ छलै आ ई रिटेक कोनो दृश्य वा कोनो गीतक पुनः प्रस्तुतिक रूपमे होइ छल, आ तइ लेल पर्दा फेरसँ उठि जाइ छलै। राजा रवि वर्मा आ पारसी थियेटर दुनू एक दोसरासँ प्रभावित छलाह। पारसी थियेटरक कलाकारक पहिराबा आ मंच सज्जापर राजा रवि वर्माक चित्रकलाक प्रभाव छल आ राजा रवि वर्मा अपन चित्रकलाक विषयक प्रेरणा पारसी थियेटरक दृश्यसँ ग्रहण करैत छलाह। ६ भरतक नाट्यशास्त्र: नाटक दू प्रकारक लोकधर्मी आ नाट्यधर्मी, लोकधर्मी भेल ग्राम्य आ नाट्यधर्मी भेल शास्त्रीय उक्ति। ग्राम्य माने भेल कृत्रिमताक अवहेलना मुदा अज्ञानतावश किछु गोटे एकरा गाममे होइबला नाटक बुझै छथि। लोकधर्मीमे स्वभावक अभिनयमे प्रधानता रहैत अछि, लोकक क्रियाक प्रधानता रहैत अछि, सरल आंगिक प्रदर्शन होइत अछि, आ ऐ मे पात्रक से ओ स्त्री हुअए वा पुरुष, तकर संख्या बड्ड बेसी रहैत अछि। नाट्यधर्मीमे वाणी मोने-मोन, संकेतसँ, आकाशवाणी इत्यादि; नृत्यक समावेश, वाक्यमे विलक्षणता, रागबला संगीत, आ साधारण पात्रक अलाबे दिव्य पात्र सेहो रहै छथि। कोनो निर्जीव/ वा जन्तु सेहो संवाद करऽ लगैए, एक पात्रक डबल-ट्रिपल रोल, सुख दुखक आवेग संगीतक माध्यमसँ बढ़ाओल जाइत अछि। नाट्यधर्मक आधार अछि लोकधर्म। लोकधर्मीकेँ परिष्कृत करू आ ओ नाट्यधर्मी भऽ जाएत। लोकधर्मीक दू प्रकारक- चित्तवृत्यर्पिका (आन्तरिक सुख-दुख) आ बाह्यवस्त्वनुकारिणी (बाह्य- पोखरि, कमलदह)। नाट्यधर्मी-सेहो दू प्रकारक कैशिकी शोभा (अंगक प्रदर्शन- विलासिता गीत-नृत्य-संगीत) आ अंशोपजीवनी (पुष्पक विमान, पहाड़ बोन आदिक सांकेतिक प्रदर्शन)। सम्पूर्ण अभिनय- आंगिक (अंगसँ), वाचिक(वाणीसँ), सात्विक(मोनक भावसँ) आ आहार्य (दृश्य आदिक कल्पना साज-सज्जा आधारित)। आंगिक अभिनय- शरीर, मुख आ चेष्टासँ; वाचिक अभिनय- देव, भूपाल, अनार्य आ जन्तु-चिड़ैक भाषामे; सात्विक- स्तम्भ(हर्ष, भय, शोक), स्वेद (स्तम्भक भाव दबबैले माथ नोचऽ लागब आदि), रोमंच (सात्विकक कारण देह भुकुटनाइ आदि), स्वरभंग ( वाणीक भारी भेनाइ, आँखिमे नोर एनाइ), वेपथु (देह थरथरेनाइ आदि), वैवर्ण्य (मुँह पीयर पड़नाइ), अश्रु (नोर ढ़ब-ढ़ब खसनाइ, बेर-बेर आदि), प्रलय (शवासन आदि द्वारा); आ आहार्य- पुस्त (हाथी, बाघ, पहाड़ आदिक मंचपर स्थापन), अलंकार (वस्त्र-अलंकरण), अंगरचना (रंग, मोंछ, वेश आ केश), संजीव (बिना पएर-साँप, दू पएर-मनुक्ख आ चिड़ै आ चारि पएरबला-जन्तु जीव-जन्तुक प्रस्तुति)द्वारा होइत अछि। दूटा आर अभिनय- सामान्य (नाट्यशास्त्र २२म अध्याय) आ चित्राभिनय (नाट्यशास्त्र २२म अध्याय): चतुर्विध अभिनयक बाद सामान्य अभिनयक वर्णन, ई आंगिक, वाचिक आ सात्विक अभिनयक समन्वित रूप अछि आ ऐ मे सात्विक अभिनयक प्रधानता रहैत अछि। चित्राभिनय आंगिकसँ सम्बद्ध- अंगक माध्यसँ चित्र बना कऽ पहाड़, पोखरि चिड़ै आदिक अभिनय विधान। नाट्य-मंचन आ अभिनय: कालिदासक अभिज्ञान शाकुन्तलम् नाट्य निर्देशकक लेल पठनीय नाटक अछि। रंगमंच निर्देश, जेना, रथ वेगं निरूप्य,  सूत पश्यैनं व्यापाद्यमानं, इति शरसंधानम् नाटयति, वृक्ष सेचनम् रुपयति, कलशम् अवरजायति, मुखमस्याः समुन्नमयितुमिच्छति, शकुन्तला परिहरति नाट्येन, नाट्येन प्रसाधयतः, कहि कऽ वास्तविकतामे नै वरन् अभिनयसँ ई कएल जाइत अछि। नाट्येन प्रसाधयतः, एतए अनसूया आ प्रियम्वदा मुद्रासँ अपन सखी शकुन्तलाक प्रसाधन करै छथि कारण से चाहे तँ उपलब्ध नै अछि, चाहे तँ ओतेक पलखति नै अछि। तहिना वृक्ष सेचनम् रुपयति सँ गाछमे पानि पटेबाक अभिनय, कलशम् अवरजायति सँ कलश खाली करबाक काल्पनिक निर्देश, रथ वेगं निरूप्य सँ तेज गतिसँ रथमे यात्राक अभिनय, इति शरसंधानम् नाटयति सँ तीरकेँ धनुषपर चढ़ेबाक निर्णय, सूत पश्यैनं व्यापाद्यमानं सँ हरिणकेँ मारि खसेबाक दृश्य देखबाक निर्देश, मुखमस्याः समुन्नमयितुमिच्छति सँ दुश्यन्तक शकुन्तलाक मुँहकेँ उठेबाक इच्छा, शकुन्तला परिहरति नाट्येन सँ शकुन्तला द्वारा दुश्यन्तक ऐ प्रयासकेँ रोकबाक अभिनयक निर्देश होइत अछि। भरतक रंगमंच: ऐ मे होइत अछि- पाछाँक पर्दा, नेपथ्य (मेकप रूम बुझू), आगमन आ निर्गमनक दरबज्जा, विशेष पर्दा जे आगमन आ निर्गमन स्थलकेँ झाँपैत अछि, वेदिका- रंगमंचक बीचमे वादन-दल लेल बनाओल जाइत अछि, रंगशीर्ष- पाछाँक रंगमंच स्थल; मत्तवर्णी-आगाँ दिस दुनू कोणपर अभिनय लेल होइत अछि आ रंगपीठ अछि सोझाँक मुख्य अभिनय स्थल। अभिनय मूल्यांकन: अध्याय २७ मे भरत सफलताकेँ लक्ष्य बतबै छथि, मंचन सफलतासँ पूर्ण हुअए। दर्शक कहैए, हँ, बाह, कतेक दुखद अन्त, तँ तेहने दर्शक भेलाह सहृदय, भरतक शब्दमे, से ओ नाटककार आ ओकर पात्रक संग एक भऽ जाइत छथि। नाट्य प्रतियोगिता होइत छल आ ओतए निर्णायक लोकनि पुरस्कार सेहो दै छलाह। भरत निर्णायक लोकनि द्वारा धनात्मक आ ऋणात्मक अंक देबाक मानदण्डक निर्धारण करैत कहै छथि जे- १.ध्यानमे कमी, २.दोसर पात्रक सम्वाद बाजब, ३.पात्रक अनुरूप व्यक्तित्व नै हएब, ४.स्मरणमे कमी, ५.पात्रक अभिनयसँ हटि कऽ दोसर रूप धऽ लेब, ६.कोनो वस्तु, पदार्थ खसि पड़ब, ७.बजबा काल लटपटाएब, ८.व्याकरण वा आन दोष, ९.निष्पादनमे कमी, १०.संगीतमे दोष, ११.वाक् मे दोष, १२.दूरदर्शितामे कमी, १३.सामिग्रीमे कमी, १४.मेकप मे कमी, १५. नाटककार वा निर्देशक द्वारा कोनो दोसर नाटकक अंश घोसियाएब, १६.नाटकक भाषा सरल आ साफ नै हएब, ई सभ अभिनय आ मंचनक दोष भेल। निर्णायक सभ क्षेत्रसँ होथि, निरपेक्ष होथि। नाटकक सम्पूर्ण प्रभाव, तारतम्य, विभिन्न गुणक अनुपात, आ भावनात्मक निरूपण ध्यानमे राखल जाए। स्टेजक मैनेजर- सूत्रधार- आ ओकर सहायक –परिपार्श्वक- नाटकक सभ क्षेत्रक ज्ञाता होथि। मुख्य अभिनेत्री संगीत आ नाटकमे निपुण होथि, मुख्य अभिनेता- नायक- अपन क्षमतासँ नाटककेँ सफल बनबै छथि।अभिनेता- नट- क चयन एना करू, जँ छोट कदकाठीक छथि तँ वाणवीर लेल, पातर-दुब्बर होथि तँ नोकर, बकथोथीमे माहिर होथि तँ बिपटा, ऐ तरहेँ पात्रक अभिनेताक निर्धारण करू। संगीत-दलक मुखिया- तौरिक- केँ संगीतक सभ पक्षक ज्ञान हेबाक चाही जइसँ ओ बाजा बजेनहार- कुशीलव- केँ निर्देशित कऽ सकथि। ७ मैथिली नाटक: बड्ड रास भाषण मैथिली आ आन नाटकक प्राचीनसँ आधुनिक काल धरि रहल तारतम्यक विषयमे देल गेल अछि। मुदा सत्य यएह अछि जे भारत वा नेपालक कोनो कोणमे रंगमंच आ रूपकक निर्देश भरतक नाट्यशास्त्रक अनुरूपेँ उपलब्ध नै अछि, ओकर पुनः स्थापन भरिगर काज तँ अछिये, मुदा प्रयास नै भेल सेहो नै अछि। बिनु ज्ञानक कालिदासक नाटकक लघुरूप भयंकर विवाद उत्पन्न करैत अछि। लोक नाट्यक नाट्यशास्त्रक अनुरूप निरूपण कऽ उपरूपकक मंचनक सम्भावना मैथिलीमे अछि। विदेह नाट्य (आ फिल्म) उत्सव २०१२ ऐ दिशामे एकटा प्रयास अछि। गजेन्द्र ठाकुर ggajendra@videha.com http://www.maithililekhaksangh.com/2010/07/blog-post_3709.html २. गद्य २.१.बिपिन झा-यात्राक किछु पश्न २.२.राजदेव मण्‍डल-उपन्‍यास- हमर टोल- गतांशसँ आगाँ… २.३.जगदीश प्रसाद मण्‍डल- दीर्घकथा- शंभूदास बिपिन झा [एहि लेख केर लेखक बिपिन कुमार झा (Senior Research Fellow), IIT मुम्बई मे संगणकीय भाषाविज्ञान (संस्कृत) क्षेत्र मे शोध (Ph. D.) कऽ रहल छथि। ] यात्राक किछु प्रश्न बिपिन कुमार झा रिसर्च स्कालर आई0आई0टी0 मुम्बई

चौसठम स्वाधीनता दिवस। ई चौसठ वर्षक स्वाधीनताक युवा कही अथवा वृद्ध, उत्साहवान कही अथवा थाकल एकटा यक्ष प्रश्न अछि। राष्ट्रक एकटा आँखि आशावादी भविष्यक तेज सँ युक्त पर दोसर निराशाजनक वर्तमान सं मुरझायल। एहि तरहक संयोग कालचक्रक इतिहास मे अनुपम अछि। चौसठवर्षक यात्रा क पिटारी उपलब्धि सँ भरल पड़ल अछि एहि मे कोनो दूमत नहि मुदा जेहितरहक व्यवस्था आई लोकतंत्रक चादर ओढ़ने संविधान कऽ आड़ लय बैसल अछि ओ निरंतर प्रबुद्ध समाज केय झकझोरवाक हेतु पर्याप्त छैक। वर्तमान समयक अनेक प्रश्नक उत्तर हेतु प्रयासरत अछि। पहिल ई जे अपन राष्ट्र के गन्तव्य की थीक? दोसर ई जें राष्ट्रक निर्मल आत्मा भ्रष्टकार्य तंत्र सँ तखन धरि तक संघर्ष करत। दूनूमे के जीतत अथवा पराजित होयत? अपन राष्ट्र ई सुदीर्घ यात्रा मे जो चौराहा पर ठार अछि जयत सँ उत्कर्ष, अपकर्ष, विकास, विनाश सभ दिशा लेल रास्ता फुटैत अछि। नीति नियन्ता वा प्रबुद्ध समाज कोन मार्गक चयन करैत छाथि ई वर्तमान सदीक हेतु लेल गेल सभसँ महत्वपूर्ण निर्णय रहत। निराशा क अन्धकार मे आशा कऽ लुपलुपैत डिबिया बुझल नहि अछि अतः आशा ‘‘बलवती राजन’’ मुदा हाथ पर हाथ धरिकय बैसैक कोनो अर्थ नाहि। प्रबुद्ध समाज हेतु इस समय आत्मचिन्तनक थीक। हुनक ई कर्तव्य छी जे एहि समय अपन भूमिका चिन्हथि यदि ई समय भटकि गेलाह त ई राष्ट्रक लेल दूर्भाग्यजनक होयत।

स्वतंत्रता दिवसक हार्दिक शुभकामना। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। राजदेव मण्‍डल हमर टोल उपन्‍यास गतांशसँ आगू.... सुनमसान बाधमे असगरे पीपरक गाछ। कोनो बटोहीकेँ छाँह देबाक लेल ठाढ़ छै। कतेको दि‍नसँ छै। कि‍न्‍तु आइ उ गाछ नै छै जे पहि‍ने रहए। ओइसँ की? गामक सीमानक नि‍रलय तँ गाछे करतै। एकरे धोधहैरमे बैस कऽ प्रेत बोमि‍येतै आ डेरबुक लोक एक कोला हटि‍ कऽ चकोना हैत पड़ैतै। बुधि‍यार लोक सात बेर गोर लागि‍ छाँहमे जि‍रेतै। कौआ जँ छेर दइ तँ तुरत्ते उठि‍ कऽ चलि‍ देतै। असगुन भेलौ भाग....। असगरमे फुनगी दि‍स तकबाक साहस केनाइ बुड़बक सबहक काज छि‍ऐ। दूबज्‍जी गाड़ीक सीटी ऐ गाछ लग ठाेकले चलि‍ अबै छै। अजय गाछक छाँहमे ठाढ़ भेल। तीन बरि‍सक बाद गाछकेँ देख रहल छै। गामक लोग! कहुना कॉलेजक पढ़ाइ पूरा केलक। बी.ए. पास केनाइ कोनो मामूली गप्‍प छि‍ऐ! छाँहक बात मानि‍ ओ रूखगर जगहपर भि‍नभि‍नाइत बैस गेल। सबचीज ओहि‍ना छै। तैयो बदलि‍ गेलै। बहुत दि‍न बि‍तला बाद देखलहो चीज अनचि‍न्‍हार बुझाइ छै। झटकलाल मड़रकेँ लोक सभ झटकू मड़र कहै छै। कारण-कहैमे सुवि‍धा आ झटकू मड़र कोनो तमसाह बेकतीयो नै छै, जे कोनो डर हेतै। झटकलाल मड़र मनमे बड़का-बड़का लीलसा पोसने छल। चाहे जे करए पड़ए। बेटाकेँ पढ़ेबै अजय बेसी पढ़त तँ बड़का हाकि‍म बनत। बापोकेँ नाओं जाति‍-जवारमे चमकैत रहत। खरचा तँ दि‍ऐ पड़तै। आखि‍र बड़का हाकि‍म। जते तेल देबै ततबे ने गाड़ी दौड़तै। नै छै रूपैया। की तकै छी? शीशोक गाछ बेच। नै भेलौ तँ बाँस बेच। बेसी पैसा लगतै। कोनो मूतनार-हगनार खेत बेच ले। की यौ मालि‍क? मालि‍क खेतक जड़सीमनबला रूपैया दैत टि‍टकारी मारने रहए- “बाप बनौरा पुत्त चौतार, तेकर बेटा नेड़हा फौदार। देखि‍हेँ बादमे बापकेँ सरवेन्‍ट ने कहौ।” “कि‍छो करतह कि‍न्‍तु पढ़ावह। पढ़लासँ बुइधगर मनुक्‍ख तँ बनबे करतह।” अजय सुनैत छल- कात-करोटसँ। कि‍छ गप्‍प संगी –साथीयोसँ बुझि‍ लैत छल। बीख-अमरीत पि‍बैत चलैत जि‍नगी! सभ आस तँ पूरे नै होइ छै। कि‍छ बचलो रहै छै तँए ने जि‍नगीक दौड़ा-दौड़ी होइत रहै छै एक दोसरकेँ पछोड़ धेने दौड़ैत रहै छै। फेर नवका आश ठाढ़ भऽ जाइ छै। कते कुद-फान केलक-अजय। कि‍न्‍तु मोन मोताबि‍क नौकरी नै भेट सकलै। ओने झटकलालक अभि‍लाषा! सोचै छै अजय- बाबूजीकेँ कतऽसँ पता चलतै जे अइठाम कोन-कोन खेल चलै छै। भ्रष्‍टाचार आ ति‍कड़म केहेन नाच नचै छै। केना उनटा धुरीसँ हलाल होइ छै- लोक। हमरा जाति‍मे तँ कोनो बड़का नेतो नै छै। एक आध जँ छै तँ ओहो झोरउगहा। फेर तरघुसका रूपैया कतएसँ एतै? ने पैरबी आ ने पैसा तँ सड़कपर टहल लगाउ। नौकरी-चाकरी नै भेल तँ पढ़लौं कथीले? जेना पीपरक धोधरि‍मे सँ कोइ पूछलक- “कतए जाइ छहक- अजय? गाम? गाममे के पूछतह तोरा? कोन काज करबहक तूँ? गमैया कोन काज हेतह तोरा बुत्ते? हड़-कोदारि‍ चला सकै छहक तँू? रौद-बसातमे रोपनी-कटनी कऽ सकै छहक? गामक वि‍द्वानक बीच रहि‍ सकबहक? ऐठाम केकरोसँ कोइ कम नै बुझै छै। लि‍खनाइ-पढ़नाइ भले नै जनैत छै कि‍न्‍तु सभ छै- ज्ञानवान वि‍द्वान। सबहक अपन-अपन वि‍चार आ थ्‍योरी छै। लाठीक सहारासँ चलैबला साँढ़ जकाँ ढेकरैत अछि‍। जेकरा घरमे एक साँझक खरचा नै छै ओकरो गप्‍प करोड़पति‍ जकाँ चलै छै।” अट्टहासक स्‍वर- “हा-हा-हा-हा, गाममे तूँ नै रहि‍ सकबहक। मि‍स्‍टर अजय कुमार, तोरा सभ अजैया कहतह। बी.ए.क डि‍गरी हवामे उड़ि‍ जेतह-फर-फर। ऐठाम शहरी ज्ञान तँ दूरक गप्‍प छै, तोहर कोनो बात कोइ नै सुनतह। ही-ही-ही।” अजय गरजैत बजल- “जरूर सुनतै। तँू चुप रह। हम समाजमे पसरल कुरीतकेँ हटेबाक कोशि‍श करबै। ऐठामक जड़ता आ जि‍दकेँ तोड़ए पड़तै। देशक अंग-अंगकेँ साफ आ स्‍वस्‍थ्‍य करए पड़तै। गाम-गाममे सुधार भेलासँ देशक सुधार हेतै। समाज बदलतै। नव समाज बनबए पड़तै। कि‍छ लोककेँ बीड़ा-पान उठबए पड़तै।” अजय हाथ चमकबैत जोर-जोरसँ बजए लगल। शीला बड़ीकाल पहि‍नेसँ ओइठाम एकटा झोंइझमे नुकाएल अछि‍। ओ अजयकेँ हाथ-देह फड़कौने आ चि‍चि‍या कऽ असगरेमे बजनाइ देख रहल अछि‍। उ डेराएल सन सुरमे अजयकेँ टोकबाक प्रयास केलक। कि‍न्‍तु अजय नै सुनलकै। ओकरा पक्का वि‍श्वास भऽ गेलै जे गाछ परक प्रेत अजयकेँ गरसि‍ लेलकै। वएह एकरा देहपर चढ़ि‍ कऽ बजि‍ रहल छै। ऐठाम तँ कोइ छेबो नै करए। केकरा कहतै। कि‍छो जल्‍दी करए पड़तै। आगि‍-पानि‍सँ तँ भूतो-प्रेतो डेरा जाइ छै। मनमे वि‍चार करैत अगल-बगल देखलक। लगीचेमे एकटा खत्ता छलै। खत्ताक कोरपर एकटा फूटल बालटी सेहो राखल छलै। शीलाकेँ तुरन्‍त फुरेलै। ओ बालटीमे पानि‍ भरलक आ अजयकेँ माथापर उझैल देलकै। अजय चकोना हएत शीला दि‍स दौड़ल। “के छी? एना कि‍एक केलौं। ठाढ़ रहूँ।” शीला उनटि‍ कऽ भागलि‍। जेकरा देहपर भूत चढ़ल छै। से की करत, कोन ठेकान। अजय झपैट कऽ पाछूसँ शीलाकेँ पकड़लक। तैयो शीला छुटबाक प्रयास कऽ रहल छै। जमीन भीजल छलै पकड़-धकड़मे दुनू खसल। तरमे शीला ऊपरसँ अजय चढ़ल। मुँह देखते अजय चौंकैत बजल- “शीला, अहाँ छी। एना ि‍कएक केलौं।” “अहाँ असगरेमे अड़-बड़ बजै छलौं। हमरा तँ बुझाएल जे अहाँपर प्रेत चढ़ि‍ गेल अछि‍। आब बुझाइत अछि‍ अहाँपर सँ उतरि‍ कऽ हमरापर चढ़ि‍ गेल अछि‍।” “तेकर मतलब हम प्रेत छी?” “अहाँ भूत-प्रेत नै चोर छी। तब ने हमरा मनक चोरि‍ केलौं आ नि‍पत्ता भऽ गेल छलौं। आबो देहपर सँ हटू ने।” “नै हटब।” “जल्‍दी हटू। नै तँ धकेल देब। देखै छि‍ऐ कोइ आबि‍ रहल छै।” दुनूक मन कतेक बरि‍स पाछू चलि‍ गेल छलै से पता नै। जेना पछि‍‍ला स्‍वर्गक सरोवर सोझा आबि‍ गेल छलै। आ ओइमे दुनू संगे-संग जल-खेल करए लगल छलै। गाछ परक चि‍ड़ै-चुनमुनी ओइ खेलकेँ देखैत चुन-चुन करैत ओकरा सभक आनन्‍दमे अपन उपस्‍थि‍ति‍ दरज कऽ रहल छलै। वि‍रह आ प्रतीक्षाक कथा चलैत रहल। कतेक देरसँ पता नै। वर्तमान उपस्‍थि‍ति‍ भेल तँ अजय पूछलक- “अहाँ एमहर कतए आएल छलौं?” शीलाकेँ हँसी लागि‍ गेल कि‍न्‍तु ओकरा आँखि‍मे नोर भरल छलै। “हमर काका-काकी जहि‍या झगड़ा करैत छलै तहि‍या-तहि‍या अइठाम सुनहटमे आबि‍ जाइत छलौं आ अहाँक बाट जोहैत रहैत छलौं। कतेक माससँ अहाँक इन्‍तजारी करैत समए काटै छलौं। जखन कोनो चि‍रइयो टा समाद नै दैत छलै तँ कानैत-कानैत आपस घर घुरि‍ जाइत छलौं। आइ सगुनि‍याँ चि‍ड़ैकेँ दरशन भाेरे भेल छलै। भेँट भऽ गेल।” “हम तँ सोचने रही जे अहाँक बि‍याहो भऽ गेल हेतै। कोरमे बच्‍चा खेलाइत हेतै। कि‍न्‍तु आब बुझाइत अछि‍ जे हमहूँ भाग्‍यशाली छी। शाइत दुनू गोटे एक दोसरक लेल बनल छी।” “धुर, बि‍याहक बात की करैत छी। हमर पि‍तयौत बहि‍न लीलीयाक बि‍याह होइबला छै। की हेतै से नै जानि‍। जाति‍क सभटा लोक अरचन रोपै छै।” “अरचन कि‍एक? ऐठाम लोक तँ बि‍याहकेँ यज्ञ बुझै छै तँए एक-दोसरक सहयोग करै छै।” “हँ से तँ ठीके। कि‍न्‍तु हमर पलि‍वार तँ ढाठल छै। बागल छै। हमरा परि‍वारकेँ जाति‍सँ अलग कऽ देने छै।” अजय चौंकैत पूछलक- “जाति‍सँ अलग कि‍एक कऽ देने छै?” मुड़ी झुकौने शीला मन्‍द स्‍वरे बजली- “बाबूजी केँ मरलापर काका सराध-गैतक भोज नै केलकै। कतऽसँ टका लाबि‍तै। ओइ साल फसि‍ल नीक नै उपजल छलै। सभ मुँह पुरूषकेँ कहलकै- जे हमरा घरमे कोनो उपाए नै छै। रोटीयो नै जुमै छै तँ भोज कतएसँ करब। कि‍न्‍तु भोजक नाओंपर सभ जाति‍ एक भऽ गेलै। ओ सभ कहलकै- अकलू मड़र दोसराक भोजमे बड़ फानैत छलै। जे भोज नै करए से दालि‍ बड़ सुरकाए। ओकरा सराधक भोज लगबे करतै। जँ पूरा जाति‍केँ भोज नै देतै तँ जाति‍सँ अलग। आगि‍-पानि‍ सभ बन्न।” “भोजक एतेक महत्‍व छै अपना समाजमे।” “की कहब घरमाबाबूपर घर ढुक्का पंचैती हैत रहए। चट दऽ धरमाबाबू भोज गछि‍ लेलकै आ कहलकै- “उ तँ झूठ-मूठ हमरापर आरोप लगबै छै।” भोजक नाओंपर सभ कुकरम माफ भऽ गेलै। अजय अबाक्! शीलाक मुँह दि‍स ताकि‍ रहल अछि‍। मोनमे बि‍हाड़ि‍ सन उठल छै। जेना ओकरा सौंसे देहमे जाति‍क जाल लटपटा रहल छै। “कोइ आबि‍ रहल छै। अहाँ संगे देख लेत तँ की हेतै पता नै।” कहैत शीला धड़फड़ा कऽ उठल आ टोल दि‍स चलि‍ देलक। वएह बाट छि‍ऐ कि‍न्‍तु लगै छै ऊ नै छि‍ऐ। अजय अपना घर दि‍स बढ़ि‍ रहल अछि‍। ओ स्‍वप्‍नमे छै कि‍ यर्थाथमे पता नै। कि‍न्‍तु गाम दोसर रँगक लगै छै। ओ लवका रँग ओकरा आँखि‍मे छै कि‍.....। (जारी...) ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। जगदीश प्रसाद मण्‍डल दीर्घकथा शंभूदास गतांशसँ आगाँ..... नवम् वर्ख चढ़ैत-चढ़ैत शंभूआ शंभू बनि‍ गेल। कारण भेल जे आन-आन बच्‍चासँ भि‍न्न काजक प्रति‍ झुकाव हुअए लगलै। जहि‍ना जीवनी (जीवनक पारखी) बोन-झाड़ वा गाछी-वि‍रछीमे, बरसातक उपरान्‍त आसीन-काति‍कमे नव-नव गाछकेँ माटि‍सँ उपर होइते डारि‍-पातसँ परेख लैत जे ई फल्‍लां वस्‍तुक गाछ छी मुदा अनाड़ी नै परेख पबैत तहि‍ना समाजोक पारखी शंभूकेँ परखए लगल। छोट बच्‍चा जहि‍ना लत्ती-कत्तीमे फड़ल हरि‍यर चारि‍ पएरबलाकेँ, जेकर मुँह घोड़ा सदृश्‍य नमगर होइत ओकरा घोड़ा मानि‍ पकड़ि‍ अपन खेलक एक भाग, सर्कश जकाँ, बना खेलैत तहि‍ना कीर्तन मंडलीक बीच शंभूओ एक अंग बनि‍ गेल। ओना अदौसँ लोक ि‍कछु समटल कि‍छु बि‍नु समटल, जे लोकक बोन-झाड़मे हराएल रहल, केँ चि‍न्‍हैत आबि‍ रहल अछि‍। जँ से नै रहैत तँ कि‍छु बनैया कि‍अए शि‍कारक पात्र बनैत। मनुष्‍यक लगाओल खेती-बाड़ी वा माल-जालकेँ जँ बोनैया नष्‍ट करए चाहत तँ कि‍अए लगौनि‍हार अपना सोझमे अपन श्रमकेँ नष्‍ट होइत देखत। एहनो-एहनो पारखी लगमे रहनि‍हार अपन (मनुष्‍यक) बच्‍चाकेँ नै परेख पबैत। कोना परखत? मनुष्‍य तँ गाछ-वि‍रीछ नै जे डारि‍क रंग-रूप आ पातक सि‍रखारसँ परेख लेत, मुदा मनुष्‍य तँ जीवक श्रेणी (जि‍नगीक पाँति‍) मे रहि‍तो आनसँ अधि‍क नमगर-चौड़गर, फूल-फलसँ लदल दुनि‍याँबला छी। जे बाहर नै भीतर छि‍पा कऽ रखने रहैत अछि‍। रखने अछि‍ कि‍ राखल छैक ओ भि‍न्न बात। जे शंभू अखन धरि‍ मनुक्‍खक मेलाक बच्‍चाक जेरमे नुकाएल छल ओ नमैर धान-गहूमक गाछ जकाँ बेदरंग हुअए लगल। मुदा रंग-रूप अधि‍क गाढ़ नै भेने ने अपने देखए आ ने आनेक नजरि‍क सोझ पड़ए। भलहि‍ं उम्‍मस भरल भादोमे पूरवा-पछि‍याक लपकी नै बुझि‍ पड़ै मुदा ओहन लपकी तँ माघमे जरूर अपन रूपक दर्शन करवि‍तहि‍ अछि‍। तहि‍ना शंभूओक भेल। एक आँखि‍सँ दोसर आँखि‍, एक कानसँ दोसर कान बीआ-बना हुअए लगल। मुदा बीआ तँ बीआ छी, कोनो फले बीआ, तँ कोनो ऑठि‍ये। कोनो पाते बीआ तँ कोनो डारि‍ये। तहि‍ना जते मन तते खेत। जते खेत तते रंगक गाछ। जते गाछ तते रंगक फल-फूलक आश। मुदा मनुक्‍खक बीआ तँ सभसँ बेढ़ंग (अजीब) अछि‍। जेहन-जते खेत तेहन तते रंगक बीआ खसि‍ तते रंगक गाछ संगे जनमैत। गाछ देख‍ कि‍यो बजैत, “शंभूक सि‍नेह संगीतसँ तते भेल जाइए जे कहीं घर-परि‍वार छोड़ि‍ ओकरे संगे ने चलि‍ जाए।” तँ कि‍यो बजैत, “भगवान अपने बेटा जकाँ लुरि‍-वुद्धि‍ देने जाइ छथि‍न एक-ने-एक दि‍न लगमे बजाइए लेथि‍न।” ज्ञान स्‍वरूप देवत्‍व प्राप्‍त करैक लेल प्रेमास्‍पदक बाट धड़ए पड़त। जे बि‍नु बुझनहि‍ शंभूमे अबए लगल। जहि‍ना एक माटि‍ एक पानि‍ जगह पाबि‍ अपन भि‍न्न-भि‍न्न रूप बना भि‍न्न-भि‍न्न गुण पसारैत तहि‍ना तँ समाजो अछि‍। माटि‍क आँड़ि‍ बनि‍-बनि‍ बाध बँटल अछि‍, घेरा पाबि‍-पाबि‍ पानि‍ बँटल अछि‍ तहि‍ना ने समाजो अछि‍। समाजोक तँ भि‍न्न-भि‍न्न रूप आ भि‍न्न-भि‍न्न अर्थ अछि‍। कतौ गामक सीमान मानि‍ समाज मानल जाइत अछि‍ तँ कतौ जाति‍। कतौ कर्मक हि‍साबसँ समाज बनैत अछि‍ तँ कतौ व्‍यवसायि‍क। कीर्तन मंडलीक समाज ओहन अछि‍ जइमे घर-परि‍वार सम्‍हारि‍ लोक (मंडलीक) भगवानोक दरवार पहुँच अपन नीक-अधला (उचि‍ति‍-वि‍नती) बात सेहो कहैत अछि‍। तइले ने संगी-साथीक जरूरत आ साज-बाजक। थोपड़ी बजा वा चुटकी बजा वा बि‍नु बजेनहुँ मुँह खोलि‍ वा बिनु मुँहो खोलने जतबे समए पबैत ओतबेमे राधा जकाँ कृष्‍णक संग रमि‍ जाइत। नवम् वर्ख खटि‍आइत-खटि‍आइत शंभू गामक कीर्तन मंडलीक सदस्‍य बनि‍ गेल। तइले ने नाओं लि‍खबैक जरूरत भेल आ ने कोनो रजि‍ष्‍टरक। मनक डायरीमे वि‍चारक कलम चलि‍ गेल। मुदा दुनूकेँ (शंभूओ आ मंडलि‍योक) आगू चलैक बाटो आ संगि‍यो भेटल। संगी पाबि‍ जहि‍ना शंभूकेँ, घरक छप्‍परसँ खसैत धरि‍आएल पानि‍ आगू बढ़ि‍ धारमे पहुँच जाइत तहि‍ना भेल। मंडलि‍योक फूलवारीमे एकटा नव फूलक गाछ पोनगल। जहि‍ना नमहर थैरमे नव गाए-महीसि‍केँ जाइति‍क समाज भेटलासँ अपन खुशहाल जि‍नगीक खुशी होइत तहिना शंभूओक संबंध रंग-वि‍रंगक कला-प्रेमीसँ भेल। जहि‍ना टाला-कोदारि‍ लऽ बोनि‍हार, रि‍ंच-हथौरी लऽ मि‍स्‍त्री अपन सेवा दइले जाइत तहि‍ना खजुरीक संग शंभूओ मंडलीक बीच सेवा दि‍अए लगल। अठवारे मंगलकेँ महावीरजी स्‍थान आ अठवारे रवि‍ कऽ महादेव स्‍थानमे साँझू पहर कऽ कीर्तन होइत। जइमे कीर्तन मंडलीक समाजक संग भक्‍त प्रेमी सभ सेहो एकत्रि‍त भऽ खाइ-पीबै राति‍ धरि‍ मगन भऽ भजनो-कीर्तन करैत आ सुनि‍नि‍हारो संगीक संग समुद्रमे दहलाइत-उधि‍आइत। मुदा बाल-बोध शंभू ने दि‍नक ठेकान बुझैत आ ने मासक। मंगल कोना घुमि‍-घुमि‍ अबै छै ने से बुझैत आ ने रवि‍। तँए अन्‍हारमे बौआइत शंभू। मुदा जहि‍ना अगि‍ला बाट भेटने शंकाक समाधान भऽ जाइत तहि‍ना शंभूओ मंगल आ रवि‍केँ भजि‍अबए लगल। खोजनि‍हार जहि‍ना घनगर बोनझारमे सँ कोनो जड़ी वा जरूरतक गाछ ताकि‍ कऽ लऽ अबैत तहि‍ना शंभूओ मंगल आ रविकेँ भजि‍औलक। सातो दि‍न आ बारहो मासक गुण-अवगुण भजि‍आ मनमे रोपि‍ लेलक। जइसँ तीसो दि‍न मासक बीचक तीर्थ आ सातो दि‍नक आठो पहरक बोध भऽ गेलइ। राति‍-दि‍नक बीच घरक काज कखन कएल जाए आ बाहरक कखन, ऐ लेल तँ पहरे पहरा करैत अछि‍। वसन्‍ती-बयार तँ गोटि‍-पङराक लेल नै सबहक लेल समान सोहनगर अछि‍ भलहि‍ं कि‍यो कुम्‍मकर्णी नीनक मस्‍ती लि‍अए आकि‍ ब्रहमलोक पहुँच कुम्‍हारक चाक चलबए। जा धरि‍ चाक नै चलत ता धरि‍ नव बर्तन केना गढ़ल हएत? ओहन खेत वा पोखरि‍ जकाँ शंभूक मन दि‍न-राति‍ छि‍छलए लगल जेहन पोखरि‍क कि‍नछरि‍मे ठाढ़ भऽ चौरगर खपटा वा झुटका पानि‍क उपर फेकलासँ उपरे-उपर छि‍छलैत दूर तक जाइत, जहि‍ना अनगर लबल धानक सीसपर होइत मन छि‍छलैत एक आड़ि‍सँ दोसर धरि‍ छि‍छलि‍-छि‍छलि‍ देख-देख खुशी होइत, तहि‍ना। भोरमे नीन टुटि‍ते शंभू ओछाइनेपर दि‍न भरि‍क जि‍नगीक बाट जोहए लगैत। साँझ परैत परैत जहि‍ना कृष्‍ण संगी-साथीक संग आबि‍ माए जशोदाकेँ अपन लकुटि‍ कमरि‍या सुमझा संध्‍या बंधन करए वि‍दा होथि‍ तहि‍ना शंभूओ उगैत सूर्यक संग दुि‍नयाँ देखैक उपक्रम सोचए लगैत। भगवानक नजरि‍ तँ पहि‍ने ओइ पुजेगरीपर ने पड़ैत जे नव-नव फूल-अछतसँ सजल सीकीक नव फुलडालीमे नव गाछक फूल लऽ रहैत। बाकीकेँ तँ गि‍नती कऽ कऽ रखि‍ लेल जाइत। गाछमे सबुरक फलक सि‍रखार, कटहर जकाँ, देख पड़ैत। दि‍न भरि‍ समए बँचल अछि‍ जखने बाध-बोन दि‍स जाएब तँ कोनो ने कोनो भेटबे करत। जँ भेट गेल तँ बड़बढ़ि‍या नै तँ उचि‍ति‍-वि‍नती कऽ भार्त भऽ थारीमे रूइक बत्ती लेसि‍ कानि‍-कलपि‍ कहबनि‍। अनकर जँ सुनैत हेथि‍न तँ हमरो सुनताह नै तँ ककरो नै सुनथि‍न। अपना-अपना करमे-भागे लोक जीब लेत। चौदहो भुवन (चौदहो लोक) सदृश्‍य समाजमे चि‍त्र-कुटक घाट जकाँ अनेको घाट। कम वा बेसी सभक मनमे भगवानक प्रति‍ आस्‍था भलहि‍ं आत्‍मा, जीव आ मायाक तात्‍वि‍क रूप नै बुझैत हुअए। से सि‍र्फ पुरखेटा मे नै महि‍लोमे। समर्पित भऽ नि‍यम-नि‍ष्‍ठासँ आठ घंटासँ लऽ कऽ बहत्तरि‍ घंटाक तकक उपवास हँसैत-मुस्‍कुराइत कऽ लैत। एहन पत्नि‍ये कि‍ जे अपन पति‍केँ देवालय जाइसँ रोकती। समाजक भीतर समबेत स्‍वरे अष्‍टयाम, नवाहक संग आनो-आन आ नाचोमे सामाजि‍क सेहो होइत जे मंचपर बैस सामूहि‍क रूपे गबैत। तहि‍ना माइयो-बहीनि‍क बीच छन्‍हि‍। मुड़न हुअए वा उपनयन, कुमार गीत हुअए वा बि‍याह, छठि‍ हुअए वा फगुआ, सामूहि‍क रूपे सभ एकठाम भऽ गबैत छथि‍। नव-नव गायि‍काक सृजनो होइत आ अवसरो भेटैत। कि‍एक तँ दादी बाबीक उदारतासँ कहैत छथि‍न जे आब बूढ़ भेलौं, कफ घेरने रहैए, तँए नवतुि‍रयेकेँ गाबए दहक। सामाजि‍क वातावरणमे श्रद्धा, प्रेमक संग भाइचाराक वेवहारि‍क पक्ष अखनो अछि‍। एकर अर्थ इहो नै जे आपराधि‍क वृत्ति‍ दबल अछि‍। अगुआएल छल, बहुत अगुआएल अछि‍। आँखि‍क सोझमे बहीि‍न-बेटीक संग दुरबेबहार बाड़ी-झाड़ीक वस्‍तु बलजोरी तोड़ि‍ लेब, खेतक फसल क्षति‍ कऽ देव इत्‍यादि‍-इत्‍यादि‍। एक नै अनेक आपरधि‍क वृत्त अपन शक्‍ति‍सँ समाजकेँ दबने छल। मुदा तँए कि‍ जि‍नगीक आश नै छलैक, छलैक धरमक संग प्रेमसँ छलैक। जँ नै छलैक तँ बाड़ी-झाड़ी वा खेत-पथारमे काज-करैत कि‍सान कोना गौओं-घड़ुआ आ बाट चलैत बटोहीकेँ दूटा आम खाइले कि‍अए कहैत छलाह। एकटा सजमनि‍ अगुआ कऽ दइ छलाह जे धि‍या-पूताकेँ तरकारी बना देबै। कहाँ मनमे छलनि‍ जे दस रूपैया बुड़ि‍ रहल अछि‍। रोपैइये काल दू-दूटा फलक गाछ लगबै छलाह जे एकटा परि‍वार लेल, दोसर समाज लेल। जँ परि‍वार-परि‍वारमे एहेन वृत्ति‍ अपनाओल गेल रहैत तँ कि‍ सामाजि‍क संबंधमे औझुके टुटान अबैत। रवि‍-मंगलकेँ देवस्‍थानमे कीर्तन अनि‍वार्य रूपे चलि‍ते छल, जहि‍ना वि‍द्यालयक कार्य-दि‍वस। अनदि‍ना सेहो दरबज्‍जे-दरबज्‍जे होइते रहैत छल। जना सभक जि‍नगी बन्‍हाएल चलैत होइ। भरि‍ दि‍न खेत-पथारसँ माल-जालक पाछु लागल रहैत छला आ साँझ पड़ि‍ते कीर्तन-मंडलीक बीच पहुँच जाइत छला जे खेबा-पीबा राति‍ धरि‍ चलैत छल। खेला-पीला बाद सुतै छला। कहाँ कखनो समाजक प्रति‍कूल बात सोचैक समए भेटैत छलनि‍। जे लोकनि‍ मंडलीकेँ हकार दऽ अपना ऐठाम कीर्तन कराबैत ओ अपन वि‍भवक अनुकूल, भोजनो आ साजो-समानक ओरि‍यान कऽ दैत छलाह। पहि‍ल दि‍न शंभूओकेँ सवा हाथ वस्‍त्र आ सवा-आना पाइ भेटल। खा कऽ जखन शंभू वि‍दा हुअए लगल तँ गरे ने अँटै। दू हाथमे तीन समान (पाइ, वस्‍त्र, खजुरी) अन्‍हार राति‍मे केना लऽ कऽ जाएब। पाइकेँ जँ वस्‍त्रमे बान्‍हि‍ एक हाथमे लऽ लेब आ दोसर हाथमे खजुरी लऽ लेब, से भऽ सकैए। मुदा दुनू हाथ अजबाड़ि‍ राति‍मे चलब केना? ढि‍मका-ढि‍मकीक रस्‍तामे कतऽ ठेंस लागत कतऽ नै। जँ घरबारि‍येकेँ संग चलैले कहबनि‍ सेहो उचि‍त नै। हमरा सन-सन कते गोरे छथि‍। कि‍नका-कि‍नका संग पुरथि‍न। जँ कन्‍हापर आकि‍ डाँड़मे वस्‍त्र लगा लेब तँ पहि‍रौठ भऽ जाएत। केना बाबूकेँ पहि‍रोठ वस्‍त्र देवनि‍। गुन-धुनमे पड़ल शंभू एक गोटेकेँ अपना घर दि‍स जाइत देखि‍ पि‍ताकेँ समाद पठौलनि‍- “बाबूकेँ कहि‍ देबनि‍ जे डलना तेहेन चोटगर बनल छलै जे इच्‍छासँ बेसि‍ये खुआ गेल। तइपर तीन-तीनटा वस्‍तु लऽ कऽ अन्‍हारमे केना आएल हएत तँए आबि‍ कऽ लऽ जाथि‍।” एगारहम बर्ख पुरैत-पुरैत शंभूक गि‍नती गामक भजनि‍याक संग भगवानक भक्तोमे हुअए लगल। तहूमे ओहन भक्‍त जे बि‍नु वि‍आहल हुअए। ब्रह्मचारी। ओना शंभूक स्‍वभावमे सेहो सामान्‍य बच्‍चाक अपेछा वि‍शेष गुण छलैक जे सभ देखैत छलाह। जहि‍ना कि‍यो पनरह बर्खक उमेर बि‍तेलाक बादो पाँचो बर्खसँ कम उमेरक बच्‍चासँ पछुआएल (लुरि‍-बुधि‍मे) रहैत आ कोनो-कोनो बच्‍चा दसे बर्खमे सि‍यान जकाँ भऽ जाइत। मुदा समाज तँ अथाह समुद्र छी। जेहेन पारखी तेहेन परख। डोका-काँकोड़सँ लऽ कऽ हीरा-मोती धरि‍ समेटि‍नि‍हार समुद्र सदृश्‍य समाज। एहनो पारखी जे एक तरहक जानवर (गाए-महीस इत्‍यादि‍) पोसि‍ दोसरो-दोसरो तरहक जानवरक जि‍नगीकेँ दूर धरि‍ देखैत आ एहनो जे सभ दि‍न सोझमे रहि‍तो कि‍छु ने (जि‍बैक रास्‍ता) देखैत। तहि‍ना पारखी शंभूओकेँ परखलनि‍। कीर्तन मंडलीक उपर श्रेणीक कीर्तनि‍यामे शंभूक गि‍नती हुअए लगल। गुरू तँ सदति‍ शि‍ष्‍य तकैत। शि‍ष्‍य-गुरूकेँ एकठाम भेनहि‍ ने जि‍नगी आगू ससरैत अछि‍। जाधरि‍ से नै होइत ताधरि‍ मि‍श्री कुसि‍यारक पानि‍मे डूबल रहैत आ शि‍ष्‍य सरपतक श्रेणीक गाछ बुझल जाइत। शंभूकेँ एक संग दू गुरू भेटल। एक अगुआ (वजन्‍त्रीसँ गौनि‍हार) मुरते आ दोसर साज-बाज। जहि‍ना रंग-वि‍रंगक कोठीमे रंग-वि‍रंगक अन्न-पानि‍ देख गृहस्‍वामि‍नीक मन सदति‍ हरि‍आएल रहैत तहि‍ना शंभूओ हरि‍आएल। अखन धरि‍ शंभूक गि‍नती परि‍वारमे (माए-बापक बीच) ओहन बच्‍चा सदृश्‍य छल जेहनकेँ काजक भार तँ नै मुदा जि‍नगीकेँ जि‍या राखब माए-बापक कर्तव्‍य-कर्मक श्रेणीमे रहैत। जइसँ बि‍नु पगहाक पशु जकाँ शंभूओ। तहूमे आब शंभू छेटगर भऽ गेल। जखने भूख लगतै तखने दौड़ल आओत नै तँ भरि‍ दि‍न भुखलो रहि‍ सकैए। तँए कि‍ शंभूक खाइ-पीबैक आ रहैक ठौरो वि‍ला गेल। नै ओ सभ रहबे कएल। हँ एते जरूर भेल जे कखैन आबए आकि‍ जाए से पुछि‍नि‍हार नै रहल। सुखनि‍ये संतोखी दासकेँ कहि‍ देने रहनि‍ जे बाल-बोधकेँ पाछूसँ नै आगूसँ टोकल जाइत अछि‍। जहि‍ना राहड़ि‍क गाछक बुट्टीकेँ चारू भागसँ सि‍र पकड़ने रहैत तहि‍ना तँ मनुक्‍खोक अछि‍। मुदा जीवनी तँ गर लगा कोदारि‍क छह मारैत जे अपन पएरो बँचै आ बुटो उखड़ै। तँए उत्तम कोटि‍क काज वएह ने जे साँपो मरै लाठि‍यो ने टूटए। घरक कोनो काजक भार शंभूक नै रहैक कारण छल जे दुनू बेकतीक हृदए घेराएल जे माए-बाप अछैत जँ बेटा-बेटीकेँ कोनो भार पड़त तँ खि‍च्‍चा गाछ जकाँ वा केराक गाछ जकाँ पिचा कऽ थकुचा भऽ जाएत। जइसँ शरीर खि‍लैच जेतै। जखने शरीर लि‍खचतै तखने जि‍नगी खि‍लैत जेतै। जइसँ रोगाएल गाछ जकाँ सभ दि‍न खि‍द-खि‍द करैत रहत। जँ एहेन जि‍नगी बेटा-बेटीक भेल तँ ओ परि‍वार कते दि‍न आगू मुँहे ससरत। तँए जाधरि‍ बाल-बच्‍चाकेँ नि‍रोग बना नै राखब ताधरि‍ बंशकेँ आगू मुँहे ससारब कोरी-कल्‍पना हएत। जइसँ ने माए-बाप (सुखनी-संतोखी दास) शंभूकेँ कोनो काज अढ़बैत आ ने शंभू कि‍छु करैत सभ कि‍छु अपन रहि‍तो शंभू अपन कि‍छु नै बुझैत। तँए धन्‍य-सन। परि‍वारक काजक तहमे पहुँचलापर ने कि‍यो बुझैत जे ऐ काजकेँ नै भेने परि‍वारमे कि‍ नोकसान हएत। ई जि‍नगीये तँ बरखा-पानि‍क बुल-बुला जकाँ अछि‍। लगले बनत, चमकत आ फुटि‍ जाएत। एहेन जँ क्षणभंगुरोसँ क्षणभंगुर जि‍नगी अछि‍, जेकर कोनो वि‍सवास नै अछि‍ तेकरा पाछु पड़बे नादानी हएत। भने ने जनकजी ऐ बातकेँ बुझि‍ भोगो-वि‍लासकेँ अधला नै बुझैत छलाह। भलहि‍ं षंभूक मनमे जे होय मुदा माए-बापक मनमे जरूर रहनि‍ जे जाबे थेहगर छी ताबे जँ काजसँ देह चोराएब तँ परि‍वारक प्रति‍ अन्‍याय करब हएत। बुढ़ाढ़ीमे झुनाएल धान जकाँ सीसक टूर टूटि‍-टूटि‍ जहि‍ना खसैए तहि‍ना ने शरीरक अंगो (आँखि‍, कान इत्‍यादि‍) खसबे करत। जखन देह भंग हुअए लगत तखन तँ बेटे-बेटी ने श्रवण कुमार जकाँ भारपर टाँगि‍ तीर्थ-स्‍थान घुमौत। एहेन काज तँ ओकरा उपर लधले छै तखन मुर्दा जकाँ नअ मन बोझ लधनाइ उचि‍त नै। कि‍ करत वएह बेचारा एक दि‍स माए-बापक बोझ पड़तै, अपनो जि‍नगी रहतै तइपर सँ बाल-बच्‍चाक कोनो ठेकान छै जे भगवान कते देथि‍न कते नै। हुनका थोड़े बुझल छन्‍हि‍ जे अन्न-पानि‍ कते महग भऽ गेल अछि‍। जतऽ मड़ूआ बराबरि‍ कऽ माछ बि‍कैत छल ओतऽ मड़ूआ धि‍ना कऽ देश छोड़ि‍ देलक मुदा माछ सि‍मटीक चि‍नमारपर गि‍रथानि‍ बनि‍ अजबारि‍ कऽ बैसल अछि‍। ढेरबा बच्‍चा रहि‍तो शंभू समैसँ दोस्‍ती केलक। दोस्‍ती नि‍माहैले मंडलीक संग पूरि‍ जखन सभ सुतए ओछाइनपर जाइत तखन शंभू साइकि‍ल सि‍खैत बच्‍चा जकाँ पहि‍ने हारमोनि‍यम, ढोलक इत्‍यादि‍केँ नि‍हारि‍-नि‍हारि‍ देखए। जहि‍ना युवक युवती पहि‍ल नजरि‍मे पहि‍ल रूप देखैत तहि‍ना शंभूओ देखलक। देखलक जे एक नै अनेको जुगल जोड़ीक संयोगसँ समाज ठाढ़ अछि‍। जइमे अपन-अपन गुणकेँ मि‍ज्‍झर भऽ कऽ मि‍ल-जुलि‍ चलि‍ उकड़ूसँ उकड़ू बाट टपि‍ श्रंृगी ऋृषि‍क फुलवारी देखैत। एक पेरि‍या झालि‍ केना टूक-टूक जोड़क बनल हारमोनि‍यम संग ठि‍ठि‍या-ठि‍ठि‍या चलैत अछि‍। शंभूक सि‍नेह समूहसँ भेल। पचासक दशक (पाँचम दशक) सँ पूर्व, अष्‍टयाम कीर्तनक मूलमंत्र “सीताराम, सीताराम” छल। कारणो स्‍पष्‍ट अछि‍। जगत जननी जानकीक मि‍थि‍ला, जि‍नक संकल्‍प पूर केनि‍हार राम। सीताराम मंत्रमे शंभूकेँ ऋृतानुसार सभसँ भेटए लगल। जहि‍ना जखन जेहेन मन तखन तेहन वि‍चार, तहि‍ना। भोरमे प्रभाती बेर ‘सीताराम’मे शंभूकेँ वसन्‍ती वा ब्रह्मणी रस भेटए जखनि‍ कि‍ दि‍न-राति‍क गति‍ये रसोक रस बदलए लगै। मुदा मंत्रमे कोनो बदलाव नै होइ। बाल-बोध रहि‍तो शंभू जीवनी जकाँ सि‍र सजमनि‍क भाँज बुझैत। हनुमानजी जकाँ नै। जे छोटो काजले नमहर अस्‍त्रक प्रयोग करब। आ ने अनाड़ी-ध्‍ुनाड़ी जकाँ पराती बेर साँझ आ साँझक बेर पराती गबैत। जँ गेबो करैत तँ जहि‍ना हलुआइ जकाँ चीनीक चासनीमे रंग-वि‍रंगक वस्‍तु अना ओइमे बोड़ि‍ मधुर बनबैत। एहने सन शंभूओक मनमे उपजै। ओना जते रंगक मंत्रक जरूरत होइत तते एबो ने करै। नै अबै तहूमे ओकर दोख नै। दोखो कि‍अए हेतै एक तँ बेचारा पशु जकाँ असगरे खूँटा धेने, तइपर बाल-बोध। मुदा तैयो बकरी बच्‍चा जकाँ नै जे दूध पीवि‍ते छड़पए-कुदए लगैत। हड़लै ने फुड़लै शंभू घरसँ पड़ा गेल। दुनू बेकती संतोखी दास खेतमे काज करए गेल रहथि‍। तँए भरि‍ दि‍न कोनो भाँजे नै लगलनि‍। कारणो रहए। दुपहर तक तँ आनो दि‍न हटले-हटले रहैत छलाह। साँझमे खोज करैत छेलखि‍न। दि‍न तँ घुमै-फि‍रैक होइ छै मुदा राति‍ तँ ठौर पकड़ैक होइ छै, तँए। घरसँ नि‍कलि‍तहि‍ शंभू घरक सभ कि‍छु वि‍सरि‍ गेल। खजुरि‍यो वि‍सरि‍ गेल। वि‍सरि‍ नै गेल मनसँ हटि‍ गेलै। तँए कि‍ दुखे मन वि‍छान पकड़ि‍ लेलक? नै। वि‍छान नै पकड़लक। नवका चानक (तीर्थानुसार) नव ज्‍योति‍ भेटलै। जहि‍ना ताड़ी देनि‍हार खजुर लपकि‍ कऽ ताड़ पकड़ि‍ लैत तहि‍ना शंभूक खजुरी तबला पकड़ि‍ लेलक। तबला पकड़ि‍तहि‍ खजुरि‍येक हाथसँ बजबए लगल। बजबैत कते दूर गेल तेकर बोध नै रहलै। दुनि‍याँक बीच हरा गेल। जि‍महर देखे दि‍न छोड़ि‍ कि‍छु ने देखै। बाध-बोन, गाछ-बि‍रीछ, पोखरि‍-झाँखड़ि‍, हल्‍लुक-सुखाएल धार-धुर तँ सभ गाममे रहि‍ते छै। आड़ि-धुर बनौनि‍हार आकि‍ नक्‍शा-खति‍यान देखि‍नि‍हार ने खेत-पथार, गाम-घरक बात बुझैत, जे नै बुझैत ओ दि‍न-राति‍ छोड़ि‍ आरो कि‍ बुझत, तहि‍ना शंभूओ। बीच बाटपर शंभूक मनकेँ हुदि‍काबए लगल। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। ३. पद्य ३.१.१. रामदेव प्रसाद मण्‍डल ‘झारूदार’ २. उमेश पासवान ३.२.१.जगदीश प्रसाद मण्‍डल ३.३.१.राजदेव मण्‍डल २रामकृष्‍ण मण्‍डल ‘छोटू’ ३.४.रवि मिश्र “भारद्वाज” ३.५.जगदीश चन्द्र  ’अनिल’ ३.६.नवीन कुमार आशा ३.७.डॉ॰ शशिधर कुमर ३.८.जवाहर लाल कश्यप १. रामदेव प्रसाद मण्‍डल ‘झारूदार’ २. उमेश पासवान १ रामदेव प्रसाद मण्‍डल ‘झारूदार’ , (मैथिलीक भिखारी ठाकुरक नामसँ प्रसिद्ध मैथिलीक पहिल जनकवि रामदेव प्रसाद मण्‍डल ‘झारूदार’क किछु गीत आ झारु प्रस्तुत अछि।-सम्पादक) गीत अपन देश अपन देश अपन देश, अपन देश मि‍थि‍ला देश। राजा जनककेँ ऐ धरतीपर, रहै नै लेश क्‍लेश। अपन....................। पसरल एतएसँ ज्ञान जगतमे, छै प्रगट भगवान भगतमे। हर नारी अतए पार्वती छै, हर नर अतए महेश। अपन....................। पग-पगपर अतए ति‍रथ धाम छै, झुठ नै अतए सत्यक नाम छै। पर उपकारक खाति‍र मानव, सहै छै भारी क्‍लेश। अपन....................। जगतरनी जतए गंगा धारा, ज्‍योति‍ लि‍ंग केर जतए उज्‍यारा। हजरत तुलसी बाल्‍मि‍कक गुँजि‍ रहल उपदेश। अपन....................। भिन्नतामे जतए भरल छै एकता, भेद मुक्‍त छै अत केर जनता। माला तोरि‍ कऽ जाति‍ धर्मक, सभ कोइ देलकै फेक। अपन....................। सेवा केर जतए परमपरा छै, हर मानव लेने हाथ खड़ा छै। घर आएल मेहमानमे देखै, अल्‍ला ईषू गणेश। अपन....................। खेत बाग हरि‍याली भरल छै, अन्नसँ सभ भण्‍डार भरल छै। बरदकेँ घंटीसँ टि‍कल होय, जतए केर पुरा देश। अपन....................। ऊँच जतए मेहनतक मान छै, खुन पसि‍ना सभक शान छै। हाथ नै फैले ककरो आगू, घर होइ की प्रदेश। अपन....................। ई जननी छै हि‍र वीर केर, सागरसँ गहींर धीर केर मतृभुमि‍ केर रक्षा खाति‍र, गला सजल छै अनेक। अपन....................। सभ होइ जतए केर ज्ञानी ध्‍यानी, सभ होइ जतए सद्गुन वि‍ज्ञानी। मंदि‍र, मस्‍जि‍द, गुरूद्वरासँ बटै अमन संदेश। अपन....................। धूम जतए सेवा केर मचल होइ, भला अइसँ कि‍यो कोना बचल होइ सदि‍योसँ जतए रीत पुरान, जनता सेवक नरेश। अपन....................। जतए होइ कि‍मती आइन जानसँ, झुकै नै बस टुटै शानसँ। नि‍ष्‍ठा, मर्यादा मानवता, जकड़ा लेल होइ नेक। अपन....................। झारू- वन झि‍ल नदि‍ और वनवासी पहार पठार संग रेगि‍स्‍तान। करू सुरक्षा पर्यावरण केर ऐ सँ देश बनत धनवान।। गीत- केमरासँ तस्‍वि‍र बनेबै मि‍थला मैथि‍ल परि‍वर केर। तकरा देखेबै पटना जा कऽ वि‍कास पुत नीि‍तश कुमारकेँ। फोटो बनेबै खेत असि‍ंचि‍त सि‍ंचाइ पानि‍ वि‍जलीसँ वंचि‍त। और बनेबै बाँटल खेतमे दूर-दूर फाटल दरार केर। तँ....। फोटो बनेबै टूटल घरक उखरहा एकताकेँ जोड़ि‍ कऽ। भूख गरि‍बी रोग अशि‍क्षा आगू खड़ा पहारकेँ। तँ.....। अंधवि‍श्वासक महल देखेबै फोटो कुरीतक जहल देखेबै। फोटो बनेबै छुपल लुटेरा ढाेंगी ढोंग ढपारकेँ।। झारू- पहि‍र कऽ माला मानवताकेँ देश वि‍काशक लगाबू होर। अहाँ बनि‍ जाउ चान गगन केर नि‍हारै जनता बनि‍ कऽ चकोर।। गीत- मि‍ल कऽ सजेबै राज पंचायती मेल एकता केर फूलसँ। भूख गरि‍बी रोग अशि‍क्षा तब ने मि‍टतै मूलसँ। युवा वर्ग आबू सभ जागू न्‍याय वि‍काशी फूल खि‍लाबू। शि‍क्षाकेँ नै गारि‍ सुनाबू लोभ लालच केर फूलसँ। भू......। न्‍याय दि‍अबै गामे अन्‍दर लोग नै बनतै कोर्टमे बन्‍दर। सभ मि‍ल झगरा आगि‍ बुतेबै समता मूलक शूलसँ। भू....। सही सही राजकोष चलेबै घर-घर शान्‍ति‍ दीप जरेबै। वि‍कास खोधि‍ धरतीसँ नि‍कालबै शंकर केर त्रि‍शूलसँ। भूख गरि‍बी रोग अशि‍क्षा...। २ उमेश पासवान रचनाकार- श्री उमेश पासवान, गाम- औरहा, पंचायत- उत्तरी बनगामा, भाया- नरहि‍या, थाना- लौकही, जि‍ला- मधुबनी। पहिल विदेह समानान्तर साहित्य अकादेमी मैथिली कवि सम्मेलनक उपलब्धि छथि कवि श्री उमेश पासवान जी। प्रस्तुत अछि हुनकर दूटा मैथिली कविता। कवि‍ता- पलटन लाल केहेन-केहेन माेछबला दरोगा ऐ थानासँ गेले तँ आब एले पलटन लाल ओजन छै हि‍नकर एकसौ कि‍लो चलै छै केना मोकनी हाथीक चालि‍ केहेन-केहेन.....। क्षेत्रमे दि‍ने देखार भ’ रहल छै चोरी, डकैती, अपहरण, हत्‍या खाली ओ कमबैमे लागल छै माल केहेन-केहेन....। घूस लेनाइ जेना छै हि‍नकर पुस्‍तैनी आदति‍ एतएक जनता हि‍नकासँ छै तंगहाल हम-अहाँ कि‍ करबै आब तँ बि‍हारमे ठेकेपर अफसर सभ भ’ रहल छै बहाल केहेन-केहेन मोछ.....। कवि‍ता- बाढ़ि‍ गड़-गड़ चुबि‍ रहल छल छप्‍पड़ काइट रहल छल माछी मच्‍छर राइत भरि‍मे डुबि‍ गेल डबरा आ डगर एक्केबेर आएल एहेन बाढ़ि‍ छन भरि‍मे देलक सभ कि‍छु उजाड़ि‍ नेना-भुटुका सभ छल ठि‍ठुड़ैत पछबा हबा बहि‍ रहल छल गुफड़ैत भगवान कि‍एक मारलक एहेन मारि‍ हाथ जोड़ि‍ करै छी वि‍नती आब नै आनब एहेन बाढ़ि‍। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। जगदीश प्रसाद मण्‍डल कवि‍ता जगदीश प्रसाद मण्‍डल कवि‍ता रणभूमि‍ ओर-छोर बि‍नु भू‍मि‍ कुरूक्षेत्रक एक आबए एक जाए धीर। साधि‍-साधि‍ तड़कस सजा रंग-बि‍रंगी सधए तीर। युद्धभूमि‍ संसार केर भोगि‍नि‍हार योद्धा रण-वीर रसमे डूबल रसि‍क शि‍रोमणि‍ देखए सदि‍खन भऽ थीर। ज्ञान-कर्म बीच बसए धर्म अङेज चलए सदति‍ कर्मवीर जतए बसी सएह भूमि‍ ने मातृभूमि‍क बनैत हीर। मातृभूमि‍ तँ मातृभूमि‍ छी सृजए सदा भऽ गंग। शि‍वसि‍र चढ़ि‍ दुनू गाबए कि‍ गंग कि‍ भंग। मुँह चमकबए ज्ञान सरूपा दोसर पक्ष कहबए कृष्ण तेसर जाल पसारि‍-पसारि‍ दु:शासन, अर्जुन बीच कृष्ण । तीन तीर बेधने दुनि‍याँकेँ दैवि‍क, भौति‍क ओ अध्यात्म। बेरा-बेरा देख तीनू केर धर्म-अधर्म बीच महात्म। तन रोग मन सोग अनि‍वार्य खेल जि‍नगी केर डटए पड़त दुनूसँ मक्खनसँ मि‍सरीक लेल। दैवी दाह तँ चलि‍ते रहत कि‍ राति‍ कि‍ दि‍न। तइ संग चारू कात नचए खीचि‍ बाँहि‍ लेत छीन। सम दृष्टिर‍क हथि‍यार तेज जे देखए तइ लेल। दूधो-लाबा वि‍ष सृजए सदि‍खन देखू जि‍नगीक लेल। बि‍ना प्रेमी प्रेम कतए प्रेमास्पदक पकड़ू बाट। नाचि‍-नाचि‍, वि‍हुँहि‍-वि‍हँसि‍ देखैत प्रेम सरोवर घाट। जेहने मढ़ल संख घाट केर तेहने शीतल सरोबर पानि‍ तन पबि‍त्र मन केर सिंचू सक्कत वि‍वेक बना ठानि‍। करए शुद्ध तन-मन केर पहि‍ल पहर नै छोड़ू जानि‍। दि‍न-राति‍क रहस्य  बुझि‍ हूसू नै कखनो जानि‍। महजाल महजाल पसरि‍ पुरनी पोखरि‍। माटि‍ जलधर कात केचली उड़ि‍ उड़ि‍ सदए चालि‍ बदलए पाबि‍ गदि‍आएल जुआनी नाचि‍-नाचि‍ जि‍नगी बदलए। एक-दोसरकेँ ठोठ दाबि‍ गैंची-अन्‍है रूप धड़ए पाबि‍ प्रकृतक वेढ़ंगी चालि‍ कानि‍यो खीजि‍ जि‍नगी धड़ए। नीकक गुण छी नीक बनबैक अधला कि‍अए पुस्‍तैनी छोड़त अधला जँ चालि‍-वानि‍ बदलए नीक ि‍कअए अभि‍मानी छोड़त। भलहि‍ं भभकि‍ जाए इचना-पाेठी। तेकर नै परवाह करू सजि‍ रूप सरि‍ता सरोवर धीर भऽ धीरज धरू। ससरैत देख महजालकेँ जरैत जाठि‍ चि‍कड़ि‍ कहत गति‍या-गति‍या रूकि‍ ठमकि‍ सभ कि‍छु सुनबैत चलत। बेथा पूछत के केकरा यौ भाय अपने बेथे सभ बेथाएल। घसा-घसा चानी बनि‍ टलहा चीन-पहचीन सभ हेराएल। कोन कष्‍ट कि‍नका पकड़ने देखि‍नि‍हारो बौआएल छथि‍। रंग-बि‍रंगी चश्‍म दृष्‍टि‍ मने-मने हेराएल छथि‍। दि‍अए पड़त दृष्‍टि‍ धरती तीन दि‍शा तीनू चलए। आत्‍मि‍क भौति‍क ओ देवी जगह पाबि‍ तीनू खेलए। एक खेले तन-मन केर भीतर दोसर करए तेज परहार तेसर तीनू बाट घेरने रोकि‍-रोकि‍ बि‍लहए उपहार। तत्‍व कहैत मुँह खोलि‍-खोलि‍ तीनूक तीनू छी तकरार। खोलि‍ आँखि‍ अगात देख फुलाएत अभि‍-मन्‍यु भकरार। कहाँ अछि‍ कठि‍न बाट जि‍नगीक चि‍क्कन चालि‍ चलैत चलू। जि‍नगी तँ पाइनि‍क बुलबुल्‍ला परेख-परेख‍ छाती धड़ू। बाट चलि‍-चलि‍ बाट बनबैत चलू सोचि‍-वि‍चारि‍ चलैत चलू। तीन चास जोति‍ते-जोति‍ते ढेपा फुटि‍-फुटि‍ माटि‍ बनए। चि‍क्कनमे सभ चाहे चलए चलि‍ते-चलि‍ते बाट बनए। मलड़ि‍-मलड़ि‍ ससरैत चलू मखड़ि‍-मखड़ि‍ गबैत चलू। चलि‍-चलि‍ बाट बनबैत चलू। पाँच पएर पड़ि‍ते-पड़ैत चुनमुन माटि‍ करए इशारा। बनि‍ पहरूदार दि‍न-राति‍ हँसि‍-हँसि‍ दैत इशारा। संगी-संग अकड़ैत चलू डेग-डेग मि‍लबैत चलू चलि‍-चलि‍ बाट बनबैत चलू। बाट बनए जहि‍या जतए सोझ-साझक मांग करए अगि‍ला-पैछला मि‍ला-मि‍ला बीचो-बीच बढ़ैत चलए। गीताक गीत गाबि‍-गाबि‍ जि‍नगी परखैत चलू चलि‍-चलि‍ बाट बनबैत चलू। सदि‍खन सनातन सहमि‍-सहमि‍ नव कनि‍याँक सदृश्‍य कहए नव सूत जेबर पाबि‍-पाबि‍ वसन्‍त राग भरैत कहए। जँ कि‍रदानी (कमैनी) नै तँ जुआनी कि‍ जँ जुआनी नै तँ मर्दगानी कि‍ बि‍नु युद्धभूमि‍क मर्दगानी, अछि‍या पड़ल जि‍न्‍दगानी छी। चेत-चेत चि‍त्त चेतन समवैत संगीत बजबैत चलू झूमि‍-झूमि‍ मलड़ैत चलू चलि‍-चलि‍ बाट बनबैत चलू। जि‍नगीक गीत गबैत चलू। नङरकट घोड़ा यज्ञ सजल यज्ञभूमि पहुँचल रंग-बि‍रंगक घोड़। जेहने रंग पानि‍यो तेहने एक-दोसर बीच केलक होड़। हि‍नहि‍ना-हि‍नहि‍ना सभ डाकए जीतब बाजी एे भूमि‍क। बनि‍ तीन अगुआ-अगुआ लीअ भजारि‍ ऐ शक्‍ति‍क। फटकि‍ फटकारि‍ एक-दोसरकेँ मुँह मारि‍ नि‍कालू बात अनसोहांत जखने झमकब धक्कादऽ कऽ देब कात। फूसि‍ बजैक अभ्‍यास पूर्वा सभ दि‍न सि‍खलक गर लगा बेर पाबि‍ वि‍हुँसि‍ बाजल अछि‍ चढ़ल खुमारी नशा। शीतल सि‍हकी सजि‍ सि‍हकै जुनि‍ अलि‍सा करू वि‍श्राम चलए दि‍यौ मि‍ल दुनूक संग बहए दि‍यौ देहक सभ घाम। नै बुझलक सुतल कि‍ जागल गमा चुकल पहि‍ने दुनू सींग ठूठ नाङरि‍ ठि‍ठुरए लगलै सुआस पाबि‍ भेल तल्‍लीन। सीमा-सरहद बि‍नु बुझने तड़कि‍-तड़कि‍ तड़कए लगल। बेहोशी भऽ जखने खसल नङरकट्टा कहबए लगल। चपरासी भाय पाबि‍ पद चपरासी केर खुशी हँसी बनि‍ उठल परि‍वार धरती छोड़ि‍ अकास छि‍टकै सुर्ज-चान संग करत वास। आइ धड़ि‍ खि‍लचल घर समाजक वि‍लटल परि‍वार बसैत मनुख मनुखेक संग चाहे जेहन हो परि‍वार। ओसारेक इस्‍टुलपर भेटलनि‍ काज भाय चपरासी पद गढ़ि‍ अंग आॅफि‍सक रूप सजौलनि‍ दरवाजि‍क। नाचि‍ मन गाबए लगलनि‍ खि‍खि‍या ताल देखबए लगलनि‍ आँखि‍ मारि‍ इशारा करैत सूर-ताल झुमए लगलनि‍। रोब कहाँ रूआब कहाँ गनल दि‍नक पदक छी। लेखा-जोखा सबहक होइ छै नीचा-उपर चाहे कुरसी। नि‍चला कुरसी कखनो कुदि‍ तोड़ि‍-फाड़ि‍ धरतीपर पटकए बति‍या उपरका चीड़ि‍-चाड़ि‍ दोख मढ़ि‍-मढ़ि‍ फँसरी लगबए। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। १.राजदेव मण्‍डल २रामकृष्‍ण मण्‍डल ‘छोटू’ १ राजदेव मण्‍डल देश-गीत आउ बन्‍धु आउ स्‍वतंत्रताक गीत गाउ श्वेत-श्‍याम नर-नार मि‍ल एकता बनाउ ऊसर धरा केँ श्रमसँ सींच उर्वर शीघ्र बनाउ आउ बन्‍धु आउ स्‍वतंत्रताक गीत गाउ संस्‍कृति‍-सभ्‍यताकेँ नभ तक पहुँचाउ सम्‍पन्नताकेँ दि‍यौ आमंत्रण वि‍पन्नताकेँ दूर भगाउ ति‍मि‍र दुर्गकेँ तोड़ि‍ ज्ञानक ति‍रँगा लहराउ भारत भू केँ विश्वक अग्रणी देश बनाउ आउ बन्‍धु आउ स्‍वतंत्रताक गीत गाउ। २ रामकृष्‍ण मण्‍डल ‘छोटू’ १ कवि‍ता माइ यै माइ अहाँ कतए गेलि‍ऐ अहाँकेँ देखैले हम्‍मर, आँखि‍ बरसि‍ रहल ये अहाँसँ बात करैले, हम्‍मर दि‍ल तरसि‍ रहल ये अहाँ तँ पूर्णिमाक चान छी मनमे बसल, एकटा भगवान छी। यै माइ......। बचपनक ओ दि‍न गोदमे खेलल ओ दि‍न लोरी सुनैत ओ दि‍न साँच कहुँ मन नै लगैए आब अहाँ बि‍नु यादि‍ अबै छी जखैन अहाँ आँखि‍सँ मोती गि‍रैए प्‍यार-ममता भरल ओ दि‍न यादि‍ आबैए यै माइ अहाँ बि‍नु..... अहाँ बि‍नु ई जि‍नगी अधूरा अछि‍ सभकुछ रहैत हमर घर सूना अछि‍ अहाँ ममताक ओ मूरत छी देवतोकेँ अहाँ जरूरत छी यै माइ......। मनमे बसल ओ, तस्‍वीर छी अहाँ प्‍यारक ओ जंजीर छी अहाँ दुनि‍याँसँ ठोकर लालग भरि‍ दुनि‍याँ कहलक पागल माइ, हम पागल छी ओ बताह अहाँ, हमरा ओतने प्‍यार देलि‍ऐ यै माइ.....। २ रेल सकरीसँ चलल, ि‍नर्मलीक रेल झंझारपुरमे, लेलक मेल सुनबै छी, आइ ट्रेनक खेल बीमे भाइकम, बोगीमे चोरी भेल मंगलाक कपड़ा, आ पैइसो गेल कि‍नका कहब नि‍क आ चारे बोगीमे मचल अछि‍ शोर चाेर-चारे-चाेर पकड़ चाेर, पकड़ चोर मुदा कत्त गेल चाेर इंजनपर बैसल, तरकारीवाली फटल य जि‍नकर साड़ी बौगलीमे पैसा, मुँहमे पान चलबैए तेज जुबान कि‍ कहब, हि‍नकर कहानी अपनाकेँ बुझैए राजधानी जी.आर.पी आकि‍ सी.आर.पी सभ छथि‍ एकरा आगू फेल ई य सकरीसँ ि‍नर्मलीक रेल। आह! चोर आइ पकड़ा गेल जेल उ भेजल गेल खतम भऽ गेल, चोरीक खेल मुदा, बेलहीमे फेर भाइकम भेल रेल-रेल-रेल, ई कि‍? बोगीमे य ठेलम-ठेल बुदरूक, बच्‍चा, बुढ़बो गेल ई य सकरीसँ ि‍नर्मलीक रेल। ‍ ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। रवि मिश्र “भारद्वाज”, पिता श्री पशुपति मिश्र, गाम- ननौर, जिला- मधुबनी। १. अन्तिम क्षणमे काल्हि किछु काल असगरेमे हम केलौं अपनासँ किछु बात पुछलौं अपनासँ बिना मतलबक की ककरो तोहर छौ आस कियो नै भेटल जे चाहितै, सुनितै हमरासँ हमरा भाव-विभोर कऽ, चाहलक तँ सभ कियो हमरा, मुदा नै देखलक हमर आँखिक नोरकेँ बेचैन भऽ कऽ कानए लागल हमरेपर जखन हमर आँखि हँसि कऽ लोक हमरा देखऽ लागल ऐ उमरोमे एना कि कियो देखावा कऽ सकै छै हँसऽ लगलौं हमहूँ हुनका देखि कऽ दुख अपन हँसीमे नुका कऽ २. मरहम जखन कखनो ककरो दर्द केँ बुझै छी अपन दर्दकेँ जेना हृदै जाइ अछि सहमि आँखिसँ आबि जाइत अछि पानि सोचै छी काश होइत हमरा पास किछु आर देबऽ केर खाली भरोसा आ दिलासाक पाबऽक कनेक अपन सुख आ आराम लोक एना किए बिसरि गेल अपन लोकक पहिचान ओ जे कखनो कहै छल जिनका अहाँ छी हमर जान बिसरि गेल-अइ हुनकर नाम ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। जगदीश चन्द्र  ’अनिल’ गजल १

लोक जते छथि गाम पर सभहक मोन लताम पर।

शिक्षा,शील,स्वभाव स्वर्ण थिक लोक मरैए’ चाम पर।

भारी पड़ि गेल बर्गर-पिज्जा मुरही आर बदाम पर।

कनिते भागि गेला कन्यागत बात अटकि गेल दाम पर।

देव विराजथि बाध-बोनमे मेला होइए धाम पर।

दुर्वाक्षत केर मंत्र पढथि सभ गांधी-सेतुक जाम पर।

यश,अपयश आ हानि-लाभ सभ छोड़ि देलहुं हम राम पर।

सुन्दर सपना सभ क्यो देखू मोती बरसत घाम पर। २ आगूमे इनार भ्रष्टाचार के पाछूमे पहाड़ भ्रष्टाचार के।

भूखल छी अहां, किरकेट देखू मनमोहक संसार भ्रष्टाचार के।

जल- थल-नभमे शोर मचल अछि सभठां जय -जयकार भ्रष्टाचार के।

सभ गााछ पर लतरल - चतरल बड़का कारोबार भ्रष्टाचार के।

एक दीस बाबा आ अन्ना केर अनशन दोसर दिस सरकार, भ्रष्टाचार के।

प्रेम,शांति,सुख,सत्य आर आनंदक क्षण सभटा भेल आहार भ्रष्टाचार के। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। नवीन कुमार आशा कि जीवनक ई अछि सत्य जागल सूतल सदिखन सोचि जीवनक की अछि सत्य ताकैत फिरी प्रश्नक उत्तर जतय ततय सर्वोत्तर जखन नहि भेटल उत्तर तखन कखनो कखनो सोची सुख वा हो दुख आँखि भरि आबए नोर की ई अछि जीवनक सत्य ? बच्चामे जकरा भेटए दुलार माए बापक भेटनि प्यार जखन ओ होथि सियान माए बापसँ लगाबथि जुबान कि ईएह अछि जीवनक सत्य ? पढि-लिखि जखन लेबए बच्चा आ नीक पाबि जाए नोकरी तखन वएह धिया-पुता माता पिताक नहि करथि सम्मान कि ईएह भेटलन्हि हुनका ज्ञान की ई अछि जीवनक सत्य ? घुमै छलौं पश्न्नक उत्तर लेल तखन मोन भेल आर विचलित पुतोहु करथि सास-ससुरपर वार आ बेटा करथि आगु-पाछु करैत रहथि हुनक अपमान ने देथि हुनका सम्मान की ईएह अछि जीवनक सत्य ? कत्तौ-कत्तौ देखै लेल भेटल जिबैत किए नहि करथि अपमान जँ मरि गेलाह ओ व्यक्ति हुनक समाज करए गुणगान की जीवनक अछि ई सत्य ? आशाक छनि विनती सभकेँ दियौन मान किए ने ओ होथि अज्ञान जीवनक ई बनि पाओत सत्य ? (अपन मामाजी डा. रमानंद झा "रमण" केँ समर्पित, जिनक हमर जीवनमे एकटा अलग स्थान अछि।) ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। डॉ॰ शशिधर कुमर,                                    एम॰डी॰(आयु॰) – कायचिकित्सा, कॉलेज ऑफ आयुर्वेद एण्ड रिसर्च सेण्टर, निगडी – प्राधिकरण, पूणा (महाराष्ट्र) - ४११०४४ १ मेघ हम मेघ थिकहुँ, धरतीवासी ! ई  जीवन  हमरहि  आनल  अछि । नञि गोर जदपि हम छी कारी, पर स्नेह सुधा संग आनल अछि ।। जखन – जखन  एहि भूतल पर, रविकिरणक साहस  बढ़ैत गेल । सभ जीव जन्तु , गाछी बिरछी, जल विन्दु-विन्दु ले तरसि गेल । एहि दारुण दुःख मे संग तोहर, हर बेर हृदय मोर कानल अछि । हम मेघ थिकहुँ, धरतीवासी ! ई  जीवन हमरहि  आनल अछि ।। हर आह हमर शीतल बसात , नोरक हर बुन्न बनल अमृत । लहलहा उठल खेतक जजाति, हर जीव तृप्त, धरती संसृत । स्वागत मे सदिखन आदिकाल सँ मोर मुदित मन नाचल अछि । हम मेघ थिकहुँ, धरतीवासी ! ई  जीवन हमरहि  आनल अछि ।। हर सड़सि  ताल सरिता निर्झर, वन उपवन हमरहि सँ शोभित । हर जड़ि चेतन केर प्राण हमहि, छी रग मे हमहीं बनि शोणित । हमरहि निर्मित ई सकल स्वर्ग , हमरहि वसन्त ई आनल अछि । हम मेघ थिकहुँ, धरतीवासी ! ई  जीवन हमरहि  आनल अछि ।। नञि दोष हमर, जँ हो अनिष्‍ट, आ नाचथि ताण्डव  महाकाल । जलमग्न धरा,  बाढ़िक कारण, आ देखि पड़य  कत्तहु अकाल । सोचू एहि मे अछि दोष ककर ? की नियम अहाँ सभ मानल अछि ? हम मेघ थिकहुँ, धरतीवासी !  ई  जीवन   हमरहि  आनल अछि ।। २ हम  मैथिल ! मिथिला केर सन्तान । हम  मैथिल ! मिथिला केर सन्तान । नञि  दुनिञा  केर  कनिञो ध्यान । की होयत सोचि भविष्य विषय, हम तऽ अतीत केर करी गान । हम  मैथिल ! मिथिला केर सन्तान ।। नञि  दुनिञा  सँ, कनिञो घबड़ायब । नञि प्रगति देखि कऽ हम ललचायब । छल  हमर  अतीत  बहुत   सुन्नर , तेँ   रहत  भविष्यहु  नीक   हमर । की अजगर करइत अछि चिन्ता ? अरे सबहक दाता , अपनहि राम । हम  मैथिल ! मिथिला केर सन्तान ।। विग्यानक द्वारि, अशान्तिक द्वारि । एहि  सँ   नीक,  बैसी  चौपाड़ि । करी   अराड़ि  आ  पढ़ी  गारि । नञि  ताहि सँ जीती, करी मारि । अछि  फॉर्मूला - परिभाषा व्यर्थ । चान – विजय  अभिलाषा  व्यर्थ । की धरती’क चान अलोपित अछि , जे करी गगन चानक अभियान ? हम  मैथिल ! मिथिला केर सन्तान ।। हम मानि लेल  अहँ  सर्वश्रजष्ठ । लाठी  भाँजए  मे  छी  यथेष्ठ । अहँ  शूरवीर,  अहँ  परम वीर । अहँ   कर्मवीर,  अहँ  धर्मवीर । अहँ माए मैथिलीक पुत्र धीर, जे सहि सकलहुँ माएक अपमान । अहँ मैथिल , मिथिला केर सन्तान ।। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। जवाहर लाल कश्यप (१९८१- ), पिता श्री- हेमनारायण मिश्र , गाम फुलकाही- दरभंगा। स्नेह-सूत्र टुटि गेल स्नेह-सूत्र टुटि गेल सब कियौ छुटि गेल माला के एक-एक मोती छिडिया गेल चिडिया के ऑखि भेलै अप्पन-अप्पन पॉखि भेलै सब कियौ उडि गेल खोंता विरान भेल स्नेह-सूत्र टुटि गेल आपस के प्रेम मे वैर कोना आबि गेल हंसी-मजाक बीच व्यंग्य ठौर पाबि गेल कि भेल के नहि जानि ककर नजर लागि गेल स्नेह-सूत्र टुटि गेल किछु दिन पहिले तक परिवारक मान छल सब किछु अप्पन छल कियौ नहि आन  छल सब किछु खाख भेल कोन आगि लागि गेल स्नेह-सूत्र टुटि गेल ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। विदेह नूतन अंक मिथिला कला संगीत १.ज्योति सुनीत चौधरी २.श्वेता झा (सिंगापुर) ३.गुंजन कर्ण १. ज्योति सुनीत चौधरी जन्म तिथि -३० दिसम्बर १९७८; जन्म स्थान -बेल्हवार, मधुबनी ; शिक्षा- स्वामी विवेकानन्द मि‌डिल स्कूल़ टिस्को साकची गर्ल्स हाई स्कूल़, मिसेज के एम पी एम इन्टर कालेज़, इन्दिरा गान्धी ओपन यूनिवर्सिटी, आइ सी डबल्यू ए आइ (कॉस्ट एकाउण्टेन्सी); निवास स्थान- लन्दन, यू.के.; पिता- श्री शुभंकर झा, ज़मशेदपुर; माता- श्रीमती सुधा झा, शिवीपट्टी। ज्योतिकेँwww.poetry.comसँ संपादकक चॉयस अवार्ड (अंग्रेजी पद्यक हेतु) भेटल छन्हि। हुनकर अंग्रेजी पद्य किछु दिन धरि www.poetrysoup.com केर मुख्य पृष्ठ पर सेहो रहल अछि। ज्योति मिथिला चित्रकलामे सेहो पारंगत छथि आ हिनकर मिथिला चित्रकलाक प्रदर्शनी ईलिंग आर्ट ग्रुप केर अंतर्गत ईलिंग ब्रॊडवे, लंडनमे प्रदर्शित कएल गेल अछि। कविता संग्रह ’अर्चिस्’ प्रकाशित। २.श्वेता झा (सिंगापुर) ३.गुंजन कर्ण राँटी मधुबनी, सम्प्रति यू.के.मे रहै छथि। www.madhubaniarts.co.uk पर हुनकर कलाकृति देखि सकै छी। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। विदेह नूतन अंक गद्य-पद्य भारती १. मोहनदास (दीर्घकथा):लेखक: उदय प्रकाश (मूल हिन्दीसँ मैथिलीमे अनुवाद विनीत उत्पल) मोहनदास (मैथिली-देवनागरी) मोहनदास (मैथिली-मिथिलाक्षर) मोहनदास (मैथिली-ब्रेल) २.छिन्नमस्ता- प्रभा खेतानक हिन्दी उपन्यासक सुशीला झा द्वारा मैथिली अनुवाद छिन्नमस्ता ३. रवि भूषण पाठक निरालाःदेहविदेह -३ (निराला हिन्दीसँ मैथिलीमे) रंगि गेल धरा ,भेल धन्य धरा जगमग ई जग भेल मनोहरा धरि रंग सुगन्ध भरि मौध मकरन्द गाछक लाली भऽ गेल गाढ़ फुजि पत्रपुष्प केर राग ठाढ़ भेल डेग डेग हरियर पूरा। रंगि.......... ग्ुंाजल कोयली केर पंचम स्वर कुचरइ कौआ मैना मृदुतर सुख सँ कँपैत रमि प्रणय केरि वनश्री चारूतरा । रंगि.......... 2 सखि वसन्त आयल भरल सिनेह जंगल केर मन मे नवोत्थान पसरल । पल्लव पहिरि कोंपरक लत्ती मिलल मधुर प्रिय गाछक पत्ती भंउरा गावइ कोयली सिहकइ नव नव स्वर भावल । कोंपर कल्ली हार बनल हन मद्धिम मद्धिम बहथि पवन सन जागि गेल प्रियवर के नयन मे मधुर प्रकृति अभरल । फैलल गोट पीयर कमलदल तहिना पसरल केशर कलकल खेत पथार सोना सन सुन्दर धरती पर फैलल । ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। बालानां कृते बच्चा लोकनि द्वारा स्मरणीय श्लोक १.प्रातः काल ब्रह्ममुहूर्त्त (सूर्योदयक एक घंटा पहिने) सर्वप्रथम अपन दुनू हाथ देखबाक चाही, आ’ ई श्लोक बजबाक चाही। कराग्रे वसते लक्ष्मीः करमध्ये सरस्वती। करमूले स्थितो ब्रह्मा प्रभाते करदर्शनम्॥ करक आगाँ लक्ष्मी बसैत छथि, करक मध्यमे सरस्वती, करक मूलमे ब्रह्मा स्थित छथि। भोरमे ताहि द्वारे करक दर्शन करबाक थीक। २.संध्या काल दीप लेसबाक काल- दीपमूले स्थितो ब्रह्मा दीपमध्ये जनार्दनः। दीपाग्रे शङ्करः प्रोक्त्तः सन्ध्याज्योतिर्नमोऽस्तुते॥ दीपक मूल भागमे ब्रह्मा, दीपक मध्यभागमे जनार्दन (विष्णु) आऽ दीपक अग्र भागमे शङ्कर स्थित छथि। हे संध्याज्योति! अहाँकेँ नमस्कार। ३.सुतबाक काल- रामं स्कन्दं हनूमन्तं वैनतेयं वृकोदरम्। शयने यः स्मरेन्नित्यं दुःस्वप्नस्तस्य नश्यति॥ जे सभ दिन सुतबासँ पहिने राम, कुमारस्वामी, हनूमान्, गरुड़ आऽ भीमक स्मरण करैत छथि, हुनकर दुःस्वप्न नष्ट भऽ जाइत छन्हि। ४. नहेबाक समय- गङ्गे च यमुने चैव गोदावरि सरस्वति। नर्मदे सिन्धु कावेरि जलेऽस्मिन् सन्निधिं कुरू॥ हे गंगा, यमुना, गोदावरी, सरस्वती, नर्मदा, सिन्धु आऽ कावेरी  धार। एहि जलमे अपन सान्निध्य दिअ। ५.उत्तरं यत्समुद्रस्य हिमाद्रेश्चैव दक्षिणम्। वर्षं तत् भारतं नाम भारती यत्र सन्ततिः॥ समुद्रक उत्तरमे आऽ हिमालयक दक्षिणमे भारत अछि आऽ ओतुका सन्तति भारती कहबैत छथि। ६.अहल्या द्रौपदी सीता तारा मण्डोदरी तथा। पञ्चकं ना स्मरेन्नित्यं महापातकनाशकम्॥ जे सभ दिन अहल्या, द्रौपदी, सीता, तारा आऽ मण्दोदरी, एहि पाँच साध्वी-स्त्रीक स्मरण करैत छथि, हुनकर सभ पाप नष्ट भऽ जाइत छन्हि। ७.अश्वत्थामा बलिर्व्यासो हनूमांश्च विभीषणः। कृपः परशुरामश्च सप्तैते चिरञ्जीविनः॥ अश्वत्थामा, बलि, व्यास, हनूमान्, विभीषण, कृपाचार्य आऽ परशुराम- ई सात टा चिरञ्जीवी कहबैत छथि। ८.साते भवतु सुप्रीता देवी शिखर वासिनी उग्रेन तपसा लब्धो यया पशुपतिः पतिः। सिद्धिः साध्ये सतामस्तु प्रसादान्तस्य धूर्जटेः जाह्नवीफेनलेखेव यन्यूधि शशिनः कला॥ ९. बालोऽहं जगदानन्द न मे बाला सरस्वती। अपूर्णे पंचमे वर्षे वर्णयामि जगत्त्रयम् ॥ १०. दूर्वाक्षत मंत्र(शुक्ल यजुर्वेद अध्याय २२, मंत्र २२) आ ब्रह्मन्नित्यस्य प्रजापतिर्ॠषिः। लिंभोक्त्ता देवताः। स्वराडुत्कृतिश्छन्दः। षड्जः स्वरः॥ आ ब्रह्म॑न् ब्राह्म॒णो ब्र॑ह्मवर्च॒सी जा॑यता॒मा रा॒ष्ट्रे रा॑ज॒न्यः शुरे॑ऽइषव्यो॒ऽतिव्या॒धी म॑हार॒थो जा॑यतां॒ दोग्ध्रीं धे॒नुर्वोढा॑न॒ड्वाना॒शुः सप्तिः॒ पुर॑न्धि॒र्योवा॑ जि॒ष्णू र॑थे॒ष्ठाः स॒भेयो॒ युवास्य यज॑मानस्य वी॒रो जा॒यतां निका॒मे-नि॑कामे नः प॒र्जन्यों वर्षतु॒ फल॑वत्यो न॒ऽओष॑धयः पच्यन्तां योगेक्ष॒मो नः॑ कल्पताम्॥२२॥ मन्त्रार्थाः सिद्धयः सन्तु पूर्णाः सन्तु मनोरथाः। शत्रूणां बुद्धिनाशोऽस्तु मित्राणामुदयस्तव। ॐ दीर्घायुर्भव। ॐ सौभाग्यवती भव। हे भगवान्। अपन देशमे सुयोग्य आ’ सर्वज्ञ विद्यार्थी उत्पन्न होथि, आ’ शुत्रुकेँ नाश कएनिहार सैनिक उत्पन्न होथि। अपन देशक गाय खूब दूध दय बाली, बरद भार वहन करएमे सक्षम होथि आ’ घोड़ा त्वरित रूपेँ दौगय बला होए। स्त्रीगण नगरक नेतृत्व करबामे सक्षम होथि आ’ युवक सभामे ओजपूर्ण भाषण देबयबला आ’ नेतृत्व देबामे सक्षम होथि। अपन देशमे जखन आवश्यक होय वर्षा होए आ’ औषधिक-बूटी सर्वदा परिपक्व होइत रहए। एवं क्रमे सभ तरहेँ हमरा सभक कल्याण होए। शत्रुक बुद्धिक नाश होए आ’ मित्रक उदय होए॥ मनुष्यकें कोन वस्तुक इच्छा करबाक चाही तकर वर्णन एहि मंत्रमे कएल गेल अछि। एहिमे वाचकलुप्तोपमालड़्कार अछि। अन्वय- ब्रह्म॑न् - विद्या आदि गुणसँ परिपूर्ण ब्रह्म रा॒ष्ट्रे - देशमे ब्र॑ह्मवर्च॒सी-ब्रह्म विद्याक तेजसँ युक्त्त आ जा॑यतां॒- उत्पन्न होए रा॑ज॒न्यः-राजा शुरे॑ऽ–बिना डर बला इषव्यो॒- बाण चलेबामे निपुण ऽतिव्या॒धी-शत्रुकेँ तारण दय बला म॑हार॒थो-पैघ रथ बला वीर दोग्ध्रीं-कामना(दूध पूर्ण करए बाली) धे॒नुर्वोढा॑न॒ड्वाना॒शुः धे॒नु-गौ वा वाणी र्वोढा॑न॒ड्वा- पैघ बरद ना॒शुः-आशुः-त्वरित सप्तिः॒-घोड़ा पुर॑न्धि॒र्योवा॑- पुर॑न्धि॒- व्यवहारकेँ धारण करए बाली र्योवा॑-स्त्री जि॒ष्णू-शत्रुकेँ जीतए बला र॑थे॒ष्ठाः-रथ पर स्थिर स॒भेयो॒-उत्तम सभामे युवास्य-युवा जेहन यज॑मानस्य-राजाक राज्यमे वी॒रो-शत्रुकेँ पराजित करएबला निका॒मे-नि॑कामे-निश्चययुक्त्त कार्यमे नः-हमर सभक प॒र्जन्यों-मेघ वर्षतु॒-वर्षा होए फल॑वत्यो-उत्तम फल बला ओष॑धयः-औषधिः पच्यन्तां- पाकए योगेक्ष॒मो-अलभ्य लभ्य करेबाक हेतु कएल गेल योगक रक्षा नः॑-हमरा सभक हेतु कल्पताम्-समर्थ होए ग्रिफिथक अनुवाद- हे ब्रह्मण, हमर राज्यमे ब्राह्मण नीक धार्मिक विद्या बला, राजन्य-वीर,तीरंदाज, दूध दए बाली गाय, दौगय बला जन्तु, उद्यमी नारी होथि। पार्जन्य आवश्यकता पड़ला पर वर्षा देथि, फल देय बला गाछ पाकए, हम सभ संपत्ति अर्जित/संरक्षित करी। 8.VIDEHA FOR NON RESIDENTS 8.1 to 8.3 MAITHILI LITERATURE IN ENGLISH 8.1.1.The Comet   -GAJENDRA THAKUR translated by Jyoti Jha chaudhary 8.1.2.The_Science_of_Words- GAJENDRA THAKUR translated by the author himself 8.1.3.On_the_dice-board_of_the_millennium- GAJENDRA THAKUR translated by Jyoti Jha chaudhary 8.1.4.NAAGPHANS (IN ENGLISH)- SHEFALIKA VERMA translated by Dr. Rajiv Kumar Verma and Dr. Jaya Verma 1. Episodes Of The Life - ("Kist-Kist Jeevan" by Smt. shefalika Varma translated into English by Smt. Jyoti Jha Chaudhary )  2.Original Poem in Maithili by Kalikant Jha "Buch" Translated into English by Jyoti Jha Chaudhary १ Episodes Of The Life - ("Kist-Kist Jeevan" by Smt. shefalika Varma translated into English by Smt. Jyoti Jha Chaudhary ) Shefalika Verma has written two outstanding books in Maithili; one a book of poems titled “BHAVANJALI”, and the other, a book of short stories titled “YAYAVARI”. Her Maithili Books have been translated into many languages including Hindi, English, Oriya, Gujarati, Dogri and others. She is frequently invited to the India Poetry Recital Festivals as her fans and friends are important people.

Translator:Jyoti Jha Chaudhary, Date of Birth: December 30 1978,Place of Birth- Belhvar (Madhubani District), Education: Swami Vivekananda Middle School, Tisco Sakchi Girls High School, Mrs KMPM Inter College, IGNOU, ICWAI (COST ACCOUNTANCY); Residence- LONDON, UK; Father- Sh. Shubhankar Jha, Jamshedpur; Mother- Smt. Sudha Jha- Shivipatti. Jyoti received editor's choice award from www.poetry.comand her poems were featured in front page of www.poetrysoup.com for some period.She learnt Mithila Painting under Ms. Shveta Jha, Basera Institute, Jamshedpur and Fine Arts from Toolika, Sakchi, Jamshedpur (India). Her Mithila Paintings have been displayed by Ealing Art Group at Ealing Broadway, London."ARCHIS"- COLLECTION OF MAITHILI HAIKUS AND POEMS. Episodes Of The Life : The Time Was Cruel: “Everybody loves in his life I will love you even after my death.” The melody of the song is spread and I am feeling his existence even in the darkness. I am seeking the singer with my wide open eyes- he must be somewhere nearby – I am lying shocked –I am listening to my own heartbeats – the fear of loneliness left me standing alone in the Sunami – one who passed away is gone and the left one is left like a log – the flood throws him like a thrash in the sand of the world. Get up Ranno! You are a courageous person. The whole world is in front of you, move ahead and face the world. Come into the reality- like he is holding me in his arms- enchanting me with his words – you will have to create a new world, will have to live by yourself. I am in each breath you inhale – I am not away from you- I will love you even after my death- after my death – this is thrilling- why had he sung this song to me-  why? Where he was singing this song by holding me whole night? Somebody takes you away from my arms my love is not so insecure, then my love is so insecure that the Goddess took him away from me.  I read in news papers that the seminars of the heart specialists are going on, that different equipments are being installed in the Indira Gandhi Institute of Heart Diseases.  Is the disease cured by seminars and equipments? As long as the doctors are not dedicated, they don’t have humanity and they lack the attitude of rendering duty- the equipments and machines cannot do anything. २ Kalikant Jha "Buch" 1934-2009, Birth place- village Karian, District- Samastipur (Karian is birth place of famous Indian Nyaiyyayik philosopher Udayanacharya), Father Late Pt. Rajkishor Jha was first headmaster of village middle school. Mother Late Kala Devi was housewife. After completing Intermediate education started job block office of Govt. of Bihar.published in Mithila Mihir, Mati-pani, Bhakha, and Maithili Akademi magazine. Jyoti Jha Chaudhary, Date of Birth: December 30 1978,Place of Birth- Belhvar (Madhubani District), Education: Swami Vivekananda Middle School, Tisco Sakchi Girls High School, Mrs KMPM Inter College, IGNOU, ICWAI (COST ACCOUNTANCY); Residence- LONDON, UK; Father- Sh. Shubhankar Jha, Jamshedpur; Mother- Smt. Sudha Jha- Shivipatti. Jyoti received editor's choice award from www.poetry.comand her poems were featured in front page of www.poetrysoup.com for some period.She learnt Mithila Painting under Ms. Shveta Jha, Basera Institute, Jamshedpur and Fine Arts from Toolika, Sakchi, Jamshedpur (India). Her Mithila Paintings have been displayed by Ealing Art Group at Ealing Broadway, London. Conversation Between  Ram And  Kewat We have been waiting on the bank of the river for a long time Please drop us to the other side Accompanied with the new family The Ganges River is flowing vigorously Kewat, hold your oars carefully Please drop us to the other side I recognised you my lord You are the prince of Avadh I have heard about the effect of your feet a lot I won’t drop you to the other side You still have soil in your feet My boat will vanish when you will touch it You tell me what my family will eat I won’t drop you to the other side First let your feet be cleaned Then go to the boat and sit If you want to cross the river before the day ends Please drop us to the other side Hearing the ado so lovable The God found it adorable Smile spread on face and heart filled with coddle Please drop us to the other side Happiness was overwhelming, heart was glad, The lotus like feet of the God was washed by the lad After drinking that water he got the destiny Raghuwar crossed the river finally Send your comments to ggajendra@videha.com Input: (कोष्ठकमे देवनागरी, मिथिलाक्षर किंवा फोनेटिक-रोमनमे टाइप करू। Input in Devanagari, Mithilakshara or Phonetic-Roman.) Output: (परिणाम देवनागरी, मिथिलाक्षर आ फोनेटिक-रोमन/ रोमनमे। Result in Devanagari, Mithilakshara and Phonetic-Roman/ Roman.) English to Maithili Maithili to English इंग्लिश-मैथिली-कोष / मैथिली-इंग्लिश-कोष  प्रोजेक्टकेँ आगू बढ़ाऊ, अपन सुझाव आ योगदान ई-मेल द्वारा ggajendra@videha.com पर पठाऊ। Top of Form विदेहक मैथिली-अंग्रेजी आ अंग्रेजी मैथिली कोष (इंटरनेटपर पहिल बेर सर्च-डिक्शनरी) एम.एस. एस.क्यू.एल. सर्वर आधारित -Based on ms-sql server Maithili-English and English-Maithili Dictionary. १.भारत आ नेपालक मैथिली भाषा-वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक शैली आ २.मैथिलीमे भाषा सम्पादन पाठ्यक्रम १.नेपाल आ भारतक मैथिली भाषा-वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक शैली

१.१. नेपालक मैथिली भाषा वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक  उच्चारण आ लेखन शैली (भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक धारणाकेँ पूर्ण रूपसँ सङ्ग लऽ निर्धारित) मैथिलीमे उच्चारण तथा लेखन १.पञ्चमाक्षर आ अनुस्वार: पञ्चमाक्षरान्तर्गत ङ, ञ, ण, न एवं म अबैत अछि। संस्कृत भाषाक अनुसार शब्दक अन्तमे जाहि वर्गक अक्षर रहैत अछि ओही वर्गक पञ्चमाक्षर अबैत अछि। जेना- अङ्क (क वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ङ् आएल अछि।) पञ्च (च वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ञ् आएल अछि।) खण्ड (ट वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ण् आएल अछि।) सन्धि (त वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे न् आएल अछि।) खम्भ (प वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे म् आएल अछि।) उपर्युक्त बात मैथिलीमे कम देखल जाइत अछि। पञ्चमाक्षरक बदलामे अधिकांश जगहपर अनुस्वारक प्रयोग देखल जाइछ। जेना- अंक, पंच, खंड, संधि, खंभ आदि। व्याकरणविद पण्डित गोविन्द झाक कहब छनि जे कवर्ग, चवर्ग आ टवर्गसँ पूर्व अनुस्वार लिखल जाए तथा तवर्ग आ पवर्गसँ पूर्व पञ्चमाक्षरे लिखल जाए। जेना- अंक, चंचल, अंडा, अन्त तथा कम्पन। मुदा हिन्दीक निकट रहल आधुनिक लेखक एहि बातकेँ नहि मानैत छथि। ओ लोकनि अन्त आ कम्पनक जगहपर सेहो अंत आ कंपन लिखैत देखल जाइत छथि। नवीन पद्धति किछु सुविधाजनक अवश्य छैक। किएक तँ एहिमे समय आ स्थानक बचत होइत छैक। मुदा कतोक बेर हस्तलेखन वा मुद्रणमे अनुस्वारक छोट सन बिन्दु स्पष्ट नहि भेलासँ अर्थक अनर्थ होइत सेहो देखल जाइत अछि। अनुस्वारक प्रयोगमे उच्चारण-दोषक सम्भावना सेहो ततबए देखल जाइत अछि। एतदर्थ कसँ लऽ कऽ पवर्ग धरि पञ्चमाक्षरेक प्रयोग करब उचित अछि। यसँ लऽ कऽ ज्ञ धरिक अक्षरक सङ्ग अनुस्वारक प्रयोग करबामे कतहु कोनो विवाद नहि देखल जाइछ। २.ढ आ ढ़ : ढ़क उच्चारण “र् ह”जकाँ होइत अछि। अतः जतऽ “र् ह”क उच्चारण हो ओतऽ मात्र ढ़ लिखल जाए। आन ठाम खाली ढ लिखल जएबाक चाही। जेना- ढ = ढाकी, ढेकी, ढीठ, ढेउआ, ढङ्ग, ढेरी, ढाकनि, ढाठ आदि। ढ़ = पढ़ाइ, बढ़ब, गढ़ब, मढ़ब, बुढ़बा, साँढ़, गाढ़, रीढ़, चाँढ़, सीढ़ी, पीढ़ी आदि। उपर्युक्त शब्द सभकेँ देखलासँ ई स्पष्ट होइत अछि जे साधारणतया शब्दक शुरूमे ढ आ मध्य तथा अन्तमे ढ़ अबैत अछि। इएह नियम ड आ ड़क सन्दर्भ सेहो लागू होइत अछि। ३.व आ ब : मैथिलीमे “व”क उच्चारण ब कएल जाइत अछि, मुदा ओकरा ब रूपमे नहि लिखल जएबाक चाही। जेना- उच्चारण : बैद्यनाथ, बिद्या, नब, देबता, बिष्णु, बंश, बन्दना आदि। एहि सभक स्थानपर क्रमशः वैद्यनाथ, विद्या, नव, देवता, विष्णु, वंश, वन्दना लिखबाक चाही। सामान्यतया व उच्चारणक लेल ओ प्रयोग कएल जाइत अछि। जेना- ओकील, ओजह आदि। ४.य आ ज : कतहु-कतहु “य”क उच्चारण “ज”जकाँ करैत देखल जाइत अछि, मुदा ओकरा ज नहि लिखबाक चाही। उच्चारणमे यज्ञ, जदि, जमुना, जुग, जाबत, जोगी, जदु, जम आदि कहल जाएबला शब्द सभकेँ क्रमशः यज्ञ, यदि, यमुना, युग, यावत, योगी, यदु, यम लिखबाक चाही। ५.ए आ य : मैथिलीक वर्तनीमे ए आ य दुनू लिखल जाइत अछि। प्राचीन वर्तनी- कएल, जाए, होएत, माए, भाए, गाए आदि। नवीन वर्तनी- कयल, जाय, होयत, माय, भाय, गाय आदि। सामान्यतया शब्दक शुरूमे ए मात्र अबैत अछि। जेना एहि, एना, एकर, एहन आदि। एहि शब्द सभक स्थानपर यहि, यना, यकर, यहन आदिक प्रयोग नहि करबाक चाही। यद्यपि मैथिलीभाषी थारू सहित किछु जातिमे शब्दक आरम्भोमे “ए”केँ य कहि उच्चारण कएल जाइत अछि। ए आ “य”क प्रयोगक सन्दर्भमे प्राचीने पद्धतिक अनुसरण करब उपयुक्त मानि एहि पुस्तकमे ओकरे प्रयोग कएल गेल अछि। किएक तँ दुनूक लेखनमे कोनो सहजता आ दुरूहताक बात नहि अछि। आ मैथिलीक सर्वसाधारणक उच्चारण-शैली यक अपेक्षा एसँ बेसी निकट छैक। खास कऽ कएल, हएब आदि कतिपय शब्दकेँ कैल, हैब आदि रूपमे कतहु-कतहु लिखल जाएब सेहो “ए”क प्रयोगकेँ बेसी समीचीन प्रमाणित करैत अछि। ६.हि, हु तथा एकार, ओकार : मैथिलीक प्राचीन लेखन-परम्परामे कोनो बातपर बल दैत काल शब्दक पाछाँ हि, हु लगाओल जाइत छैक। जेना- हुनकहि, अपनहु, ओकरहु, तत्कालहि, चोट्टहि, आनहु आदि। मुदा आधुनिक लेखनमे हिक स्थानपर एकार एवं हुक स्थानपर ओकारक प्रयोग करैत देखल जाइत अछि। जेना- हुनके, अपनो, तत्काले, चोट्टे, आनो आदि। ७.ष तथा ख : मैथिली भाषामे अधिकांशतः षक उच्चारण ख होइत अछि। जेना- षड्यन्त्र (खड़यन्त्र), षोडशी (खोड़शी), षट्कोण (खटकोण), वृषेश (वृखेश), सन्तोष (सन्तोख) आदि। ८.ध्वनि-लोप : निम्नलिखित अवस्थामे शब्दसँ ध्वनि-लोप भऽ जाइत अछि: (क) क्रियान्वयी प्रत्यय अयमे य वा ए लुप्त भऽ जाइत अछि। ओहिमे सँ पहिने अक उच्चारण दीर्घ भऽ जाइत अछि। ओकर आगाँ लोप-सूचक चिह्न वा विकारी (’ / ऽ) लगाओल जाइछ। जेना- पूर्ण रूप : पढ़ए (पढ़य) गेलाह, कए (कय) लेल, उठए (उठय) पड़तौक। अपूर्ण रूप : पढ़’ गेलाह, क’ लेल, उठ’ पड़तौक। पढ़ऽ गेलाह, कऽ लेल, उठऽ पड़तौक। (ख) पूर्वकालिक कृत आय (आए) प्रत्ययमे य (ए) लुप्त भऽ जाइछ, मुदा लोप-सूचक विकारी नहि लगाओल जाइछ। जेना- पूर्ण रूप : खाए (य) गेल, पठाय (ए) देब, नहाए (य) अएलाह। अपूर्ण रूप : खा गेल, पठा देब, नहा अएलाह। (ग) स्त्री प्रत्यय इक उच्चारण क्रियापद, संज्ञा, ओ विशेषण तीनूमे लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना- पूर्ण रूप : दोसरि मालिनि चलि गेलि। अपूर्ण रूप : दोसर मालिन चलि गेल। (घ) वर्तमान कृदन्तक अन्तिम त लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना- पूर्ण रूप : पढ़ैत अछि, बजैत अछि, गबैत अछि। अपूर्ण रूप : पढ़ै अछि, बजै अछि, गबै अछि। (ङ) क्रियापदक अवसान इक, उक, ऐक तथा हीकमे लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना- पूर्ण रूप: छियौक, छियैक, छहीक, छौक, छैक, अबितैक, होइक। अपूर्ण रूप : छियौ, छियै, छही, छौ, छै, अबितै, होइ। (च) क्रियापदीय प्रत्यय न्ह, हु तथा हकारक लोप भऽ जाइछ। जेना- पूर्ण रूप : छन्हि, कहलन्हि, कहलहुँ, गेलह, नहि। अपूर्ण रूप : छनि, कहलनि, कहलौँ, गेलऽ, नइ, नञि, नै। ९.ध्वनि स्थानान्तरण : कोनो-कोनो स्वर-ध्वनि अपना जगहसँ हटि कऽ दोसर ठाम चलि जाइत अछि। खास कऽ ह्रस्व इ आ उक सम्बन्धमे ई बात लागू होइत अछि। मैथिलीकरण भऽ गेल शब्दक मध्य वा अन्तमे जँ ह्रस्व इ वा उ आबए तँ ओकर ध्वनि स्थानान्तरित भऽ एक अक्षर आगाँ आबि जाइत अछि। जेना- शनि (शइन), पानि (पाइन), दालि ( दाइल), माटि (माइट), काछु (काउछ), मासु (माउस) आदि। मुदा तत्सम शब्द सभमे ई निअम लागू नहि होइत अछि। जेना- रश्मिकेँ रइश्म आ सुधांशुकेँ सुधाउंस नहि कहल जा सकैत अछि। १०.हलन्त(्)क प्रयोग : मैथिली भाषामे सामान्यतया हलन्त (्)क आवश्यकता नहि होइत अछि। कारण जे शब्दक अन्तमे अ उच्चारण नहि होइत अछि। मुदा संस्कृत भाषासँ जहिनाक तहिना मैथिलीमे आएल (तत्सम) शब्द सभमे हलन्त प्रयोग कएल जाइत अछि। एहि पोथीमे सामान्यतया सम्पूर्ण शब्दकेँ मैथिली भाषा सम्बन्धी निअम अनुसार हलन्तविहीन राखल गेल अछि। मुदा व्याकरण सम्बन्धी प्रयोजनक लेल अत्यावश्यक स्थानपर कतहु-कतहु हलन्त देल गेल अछि। प्रस्तुत पोथीमे मथिली लेखनक प्राचीन आ नवीन दुनू शैलीक सरल आ समीचीन पक्ष सभकेँ समेटि कऽ वर्ण-विन्यास कएल गेल अछि। स्थान आ समयमे बचतक सङ्गहि हस्त-लेखन तथा तकनीकी दृष्टिसँ सेहो सरल होबऽबला हिसाबसँ वर्ण-विन्यास मिलाओल गेल अछि। वर्तमान समयमे मैथिली मातृभाषी पर्यन्तकेँ आन भाषाक माध्यमसँ मैथिलीक ज्ञान लेबऽ पड़ि रहल परिप्रेक्ष्यमे लेखनमे सहजता तथा एकरूपतापर ध्यान देल गेल अछि। तखन मैथिली भाषाक मूल विशेषता सभ कुण्ठित नहि होइक, ताहू दिस लेखक-मण्डल सचेत अछि। प्रसिद्ध भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक कहब छनि जे सरलताक अनुसन्धानमे एहन अवस्था किन्नहु ने आबऽ देबाक चाही जे भाषाक विशेषता छाँहमे पडि जाए। -(भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक धारणाकेँ पूर्ण रूपसँ सङ्ग लऽ निर्धारित) १.२. मैथिली अकादमी, पटना द्वारा निर्धारित मैथिली लेखन-शैली

१. जे शब्द मैथिली-साहित्यक प्राचीन कालसँ आइ धरि जाहि वर्त्तनीमे प्रचलित अछि, से सामान्यतः ताहि वर्त्तनीमे लिखल जाय- उदाहरणार्थ-

ग्राह्य

एखन ठाम जकर, तकर तनिकर अछि

अग्राह्य अखन, अखनि, एखेन, अखनी ठिमा, ठिना, ठमा जेकर, तेकर तिनकर। (वैकल्पिक रूपेँ ग्राह्य) ऐछ, अहि, ए।

२. निम्नलिखित तीन प्रकारक रूप वैकल्पिकतया अपनाओल जाय: भऽ गेल, भय गेल वा भए गेल। जा रहल अछि, जाय रहल अछि, जाए रहल अछि। कर’ गेलाह, वा करय गेलाह वा करए गेलाह।

३. प्राचीन मैथिलीक ‘न्ह’ ध्वनिक स्थानमे ‘न’ लिखल जाय सकैत अछि यथा कहलनि वा कहलन्हि।

४. ‘ऐ’ तथा ‘औ’ ततय लिखल जाय जत’ स्पष्टतः ‘अइ’ तथा ‘अउ’ सदृश उच्चारण इष्ट हो। यथा- देखैत, छलैक, बौआ, छौक इत्यादि।

५. मैथिलीक निम्नलिखित शब्द एहि रूपे प्रयुक्त होयत: जैह, सैह, इएह, ओऐह, लैह तथा दैह।

६. ह्र्स्व इकारांत शब्दमे ‘इ’ के लुप्त करब सामान्यतः अग्राह्य थिक। यथा- ग्राह्य देखि आबह, मालिनि गेलि (मनुष्य मात्रमे)।

७. स्वतंत्र ह्रस्व ‘ए’ वा ‘य’ प्राचीन मैथिलीक उद्धरण आदिमे तँ यथावत राखल जाय, किंतु आधुनिक प्रयोगमे वैकल्पिक रूपेँ ‘ए’ वा ‘य’ लिखल जाय। यथा:- कयल वा कएल, अयलाह वा अएलाह, जाय वा जाए इत्यादि।

८. उच्चारणमे दू स्वरक बीच जे ‘य’ ध्वनि स्वतः आबि जाइत अछि तकरा लेखमे स्थान वैकल्पिक रूपेँ देल जाय। यथा- धीआ, अढ़ैआ, विआह, वा धीया, अढ़ैया, बियाह।

९. सानुनासिक स्वतंत्र स्वरक स्थान यथासंभव ‘ञ’ लिखल जाय वा सानुनासिक स्वर। यथा:- मैञा, कनिञा, किरतनिञा वा मैआँ, कनिआँ, किरतनिआँ।

१०. कारकक विभक्त्तिक निम्नलिखित रूप ग्राह्य:- हाथकेँ, हाथसँ, हाथेँ, हाथक, हाथमे। ’मे’ मे अनुस्वार सर्वथा त्याज्य थिक। ‘क’ क वैकल्पिक रूप ‘केर’ राखल जा सकैत अछि।

११. पूर्वकालिक क्रियापदक बाद ‘कय’ वा ‘कए’ अव्यय वैकल्पिक रूपेँ लगाओल जा सकैत अछि। यथा:- देखि कय वा देखि कए।

१२. माँग, भाँग आदिक स्थानमे माङ, भाङ इत्यादि लिखल जाय।

१३. अर्द्ध ‘न’ ओ अर्द्ध ‘म’ क बदला अनुसार नहि लिखल जाय, किंतु छापाक सुविधार्थ अर्द्ध ‘ङ’ , ‘ञ’, तथा ‘ण’ क बदला अनुस्वारो लिखल जा सकैत अछि। यथा:- अङ्क, वा अंक, अञ्चल वा अंचल, कण्ठ वा कंठ।

१४. हलंत चिह्न निअमतः लगाओल जाय, किंतु विभक्तिक संग अकारांत प्रयोग कएल जाय। यथा:- श्रीमान्, किंतु श्रीमानक।

१५. सभ एकल कारक चिह्न शब्दमे सटा क’ लिखल जाय, हटा क’ नहि, संयुक्त विभक्तिक हेतु फराक लिखल जाय, यथा घर परक।

१६. अनुनासिककेँ चन्द्रबिन्दु द्वारा व्यक्त कयल जाय। परंतु मुद्रणक सुविधार्थ हि समान जटिल मात्रापर अनुस्वारक प्रयोग चन्द्रबिन्दुक बदला कयल जा सकैत अछि। यथा- हिँ केर बदला हिं।

१७. पूर्ण विराम पासीसँ ( । ) सूचित कयल जाय।

१८. समस्त पद सटा क’ लिखल जाय, वा हाइफेनसँ जोड़ि क’ ,  हटा क’ नहि।

१९. लिअ तथा दिअ शब्दमे बिकारी (ऽ) नहि लगाओल जाय।

२०. अंक देवनागरी रूपमे राखल जाय।

२१.किछु ध्वनिक लेल नवीन चिन्ह बनबाओल जाय। जा' ई नहि बनल अछि ताबत एहि दुनू ध्वनिक बदला पूर्ववत् अय/ आय/ अए/ आए/ आओ/ अओ लिखल जाय। आकि ऎ वा ऒ सँ व्यक्त कएल जाय।

ह./- गोविन्द झा ११/८/७६ श्रीकान्त ठाकुर ११/८/७६ सुरेन्द्र झा "सुमन" ११/०८/७६

  २. मैथिलीमे भाषा सम्पादन पाठ्यक्रम २.१. उच्चारण निर्देश: (बोल्ड कएल रूप ग्राह्य):- दन्त न क उच्चारणमे दाँतमे जीह सटत- जेना बाजू नाम , मुदा ण क उच्चारणमे जीह मूर्धामे सटत (नै सटैए तँ उच्चारण दोष अछि)- जेना बाजू गणेश। तालव्य शमे जीह तालुसँ , षमे मूर्धासँ आ दन्त समे दाँतसँ सटत। निशाँ, सभ आ शोषण बाजि कऽ देखू। मैथिलीमे ष केँ वैदिक संस्कृत जकाँ ख सेहो उच्चरित कएल जाइत अछि, जेना वर्षा, दोष। य अनेको स्थानपर ज जकाँ उच्चरित होइत अछि आ ण ड़ जकाँ (यथा संयोग आ गणेश संजोग आ गड़ेस उच्चरित होइत अछि)। मैथिलीमे व क उच्चारण ब, श क उच्चारण स आ य क उच्चारण ज सेहो होइत अछि। ओहिना ह्रस्व इ बेशीकाल मैथिलीमे पहिने बाजल जाइत अछि कारण देवनागरीमे आ मिथिलाक्षरमे ह्रस्व इ अक्षरक पहिने लिखलो जाइत आ बाजलो जएबाक चाही। कारण जे हिन्दीमे एकर दोषपूर्ण उच्चारण होइत अछि (लिखल तँ पहिने जाइत अछि मुदा बाजल बादमे जाइत अछि), से शिक्षा पद्धतिक दोषक कारण हम सभ ओकर उच्चारण दोषपूर्ण ढंगसँ कऽ रहल छी। अछि- अ इ छ  ऐछ (उच्चारण) छथि- छ इ थ  – छैथ (उच्चारण) पहुँचि- प हुँ इ च (उच्चारण) आब अ आ इ ई ए ऐ ओ औ अं अः ऋ ऐ सभ लेल मात्रा सेहो अछि, मुदा ऐमे ई ऐ ओ औ अं अः ऋ केँ संयुक्ताक्षर रूपमे गलत रूपमे प्रयुक्त आ उच्चरित कएल जाइत अछि। जेना ऋ केँ री  रूपमे उच्चरित करब। आ देखियौ- ऐ लेल देखिऔ क प्रयोग अनुचित। मुदा देखिऐ लेल देखियै अनुचित। क् सँ ह् धरि अ सम्मिलित भेलासँ क सँ ह बनैत अछि, मुदा उच्चारण काल हलन्त युक्त शब्दक अन्तक उच्चारणक प्रवृत्ति बढ़ल अछि, मुदा हम जखन मनोजमे ज् अन्तमे बजैत छी, तखनो पुरनका लोककेँ बजैत सुनबन्हि- मनोजऽ, वास्तवमे ओ अ युक्त ज् = ज बजै छथि। फेर ज्ञ अछि ज् आ ञ क संयुक्त मुदा गलत उच्चारण होइत अछि- ग्य। ओहिना क्ष अछि क् आ ष क संयुक्त मुदा उच्चारण होइत अछि छ। फेर श् आ र क संयुक्त अछि श्र ( जेना श्रमिक) आ स् आ र क संयुक्त अछि स्र (जेना मिस्र)। त्र भेल त+र । उच्चारणक ऑडियो फाइल विदेह आर्काइव  http://www.videha.co.in/ पर उपलब्ध अछि। फेर केँ / सँ / पर पूर्व अक्षरसँ सटा कऽ लिखू मुदा तँ / कऽ हटा कऽ। ऐमे सँ मे पहिल सटा कऽ लिखू आ बादबला हटा कऽ। अंकक बाद टा लिखू सटा कऽ मुदा अन्य ठाम टा लिखू हटा कऽ– जेना छहटा मुदा सभ टा। फेर ६अ म सातम लिखू- छठम सातम नै। घरबलामे बला मुदा घरवालीमे वाली प्रयुक्त करू। रहए- रहै मुदा सकैए (उच्चारण सकै-ए)। मुदा कखनो काल रहए आ रहै मे अर्थ भिन्नता सेहो, जेना से कम्मो जगहमे पार्किंग करबाक अभ्यास रहै ओकरा। पुछलापर पता लागल जे ढुनढुन नाम्ना ई ड्राइवर कनाट प्लेसक पार्किंगमे काज करैत रहए। छलै, छलए मे सेहो ऐ तरहक भेल। छलए क उच्चारण छल-ए सेहो। संयोगने- (उच्चारण संजोगने) केँ/  कऽ केर- क ( केर क प्रयोग गद्यमे नै करू , पद्यमे कऽ सकै छी। ) क (जेना रामक) –रामक आ संगे (उच्चारण राम के /  राम कऽ सेहो) सँ- सऽ (उच्चारण) चन्द्रबिन्दु आ अनुस्वार- अनुस्वारमे कंठ धरिक प्रयोग होइत अछि मुदा चन्द्रबिन्दुमे नै। चन्द्रबिन्दुमे कनेक एकारक सेहो उच्चारण होइत अछि- जेना रामसँ- (उच्चारण राम सऽ)  रामकेँ- (उच्चारण राम कऽ/ राम के सेहो)। केँ जेना रामकेँ भेल हिन्दीक को (राम को)- राम को= रामकेँ क जेना रामक भेल हिन्दीक का ( राम का) राम का= रामक कऽ जेना जा कऽ भेल हिन्दीक कर ( जा कर) जा कर= जा कऽ सँ भेल हिन्दीक से (राम से) राम से= रामसँ सऽ , तऽ , त , केर (गद्यमे) एे चारू शब्द सबहक प्रयोग अवांछित। के दोसर अर्थेँ प्रयुक्त भऽ सकैए- जेना, के कहलक? विभक्ति “क”क बदला एकर प्रयोग अवांछित। नञि, नहि, नै, नइ, नँइ, नइँ, नइं ऐ सभक उच्चारण आ लेखन - नै त्त्व क बदलामे त्व जेना महत्वपूर्ण (महत्त्वपूर्ण नै) जतए अर्थ बदलि जाए ओतहि मात्र तीन अक्षरक संयुक्ताक्षरक प्रयोग उचित। सम्पति- उच्चारण स म्प इ त (सम्पत्ति नै- कारण सही उच्चारण आसानीसँ सम्भव नै)। मुदा सर्वोत्तम (सर्वोतम नै)। राष्ट्रिय (राष्ट्रीय नै) सकैए/ सकै (अर्थ परिवर्तन) पोछैले/ पोछै लेल/ पोछए लेल पोछैए/ पोछए/ (अर्थ परिवर्तन) पोछए/ पोछै ओ लोकनि ( हटा कऽ, ओ मे बिकारी नै) ओइ/ ओहि ओहिले/ ओहि लेल/ ओही लऽ जएबेँ/ बैसबेँ पँचभइयाँ देखियौक/ (देखिऔक नै- तहिना अ मे ह्रस्व आ दीर्घक मात्राक प्रयोग अनुचित) जकाँ / जेकाँ तँइ/ तैँ/ होएत / हएत नञि/ नहि/ नँइ/ नइँ/ नै सौँसे/ सौंसे बड़ / बड़ी (झोराओल) गाए (गाइ नहि), मुदा गाइक दूध (गाएक दूध नै।) रहलेँ/ पहिरतैँ हमहीं/ अहीं सब - सभ सबहक - सभहक धरि - तक गप- बात बूझब - समझब बुझलौं/ समझलौं/ बुझलहुँ - समझलहुँ हमरा आर - हम सभ आकि- आ कि सकैछ/ करैछ (गद्यमे प्रयोगक आवश्यकता नै) होइन/ होनि जाइन (जानि नै, जेना देल जाइन) मुदा जानि-बूझि (अर्थ परिव्र्तन) पइठ/ जाइठ आउ/ जाउ/ आऊ/ जाऊ मे, केँ, सँ, पर (शब्दसँ सटा कऽ) तँ कऽ धऽ दऽ (शब्दसँ हटा कऽ) मुदा दूटा वा बेसी विभक्ति संग रहलापर पहिल विभक्ति टाकेँ सटाऊ। जेना ऐमे सँ । एकटा , दूटा (मुदा कए टा) बिकारीक प्रयोग शब्दक अन्तमे, बीचमे अनावश्यक रूपेँ नै। आकारान्त आ अन्तमे अ क बाद बिकारीक प्रयोग नै (जेना दिअ , आ/ दिय’ , आ’, आ नै ) अपोस्ट्रोफीक प्रयोग बिकारीक बदलामे करब अनुचित आ मात्र फॉन्टक तकनीकी न्यूनताक परिचायक)- ओना बिकारीक संस्कृत रूप ऽ अवग्रह कहल जाइत अछि आ वर्तनी आ उच्चारण दुनू ठाम एकर लोप रहैत अछि/ रहि सकैत अछि (उच्चारणमे लोप रहिते अछि)। मुदा अपोस्ट्रोफी सेहो अंग्रेजीमे पसेसिव केसमे होइत अछि आ फ्रेंचमे शब्दमे जतए एकर प्रयोग होइत अछि जेना raison d’etre एतए सेहो एकर उच्चारण रैजौन डेटर होइत अछि, माने अपोस्ट्रॉफी अवकाश नै दैत अछि वरन जोड़ैत अछि, से एकर प्रयोग बिकारीक बदला देनाइ तकनीकी रूपेँ सेहो अनुचित)। अइमे, एहिमे/ ऐमे जइमे, जाहिमे एखन/ अखन/ अइखन केँ (के नहि) मे (अनुस्वार रहित) भऽ मे दऽ तँ (तऽ, त नै) सँ ( सऽ स नै) गाछ तर गाछ लग साँझ खन जो (जो go, करै जो do) तै/तइ जेना- तै दुआरे/ तइमे/ तइले जै/जइ जेना- जै कारण/ जइसँ/ जइले ऐ/अइ जेना- ऐ कारण/ ऐसँ/ अइले/ मुदा एकर एकटा खास प्रयोग- लालति‍ कतेक दि‍नसँ कहैत रहैत अइ लै/लइ जेना लैसँ/ लइले/ लै दुआरे लहँ/ लौं गेलौं/ लेलौं/ लेलँह/ गेलहुँ/ लेलहुँ/ लेलँ जइ/ जाहि‍/ जै जहि‍ठाम/ जाहि‍ठाम/ जइठाम/ जैठाम एहि‍/ अहि‍/ अइ (वाक्यक अंतमे ग्राह्य) / ऐ अइछ/ अछि‍/ ऐछ तइ/ तहि‍/ तै/ ताहि‍ ओहि‍/ ओइ सीखि‍/ सीख जीवि‍/ जीवी/ जीब भलेहीं/ भलहि‍ं तैं/ तँइ/ तँए जाएब/ जएब लइ/ लै छइ/ छै नहि‍/ नै/ नइ गइ/ गै छनि‍/ छन्‍हि‍  ... समए शब्‍दक संग जखन कोनो वि‍भक्‍ति‍ जुटै छै तखन समै जना समैपर इत्‍यादि‍। असगरमे हृदए आ वि‍भक्‍ति‍ जुटने हृदे जना हृदेसँ, हृदेमे इत्‍यादि‍। जइ/ जाहि‍/ जै जहि‍ठाम/ जाहि‍ठाम/ जइठाम/ जैठाम एहि‍/ अहि‍/ अइ/ ऐ अइछ/ अछि‍/ ऐछ तइ/ तहि‍/ तै/ ताहि‍ ओहि‍/ ओइ सीखि‍/ सीख जीवि‍/ जीवी/ जीब भले/ भलेहीं/ भलहि‍ं तैं/ तँइ/ तँए जाएब/ जएब लइ/ लै छइ/ छै नहि‍/ नै/ नइ गइ/ गै छनि‍/ छन्‍हि‍ चुकल अछि/ गेल गछि २.२. मैथिलीमे भाषा सम्पादन पाठ्यक्रम नीचाँक सूचीमे देल विकल्पमेसँ लैंगुएज एडीटर द्वारा कोन रूप चुनल जेबाक चाही: बोल्ड कएल रूप ग्राह्य: १.होयबला/ होबयबला/ होमयबला/ हेब’बला, हेम’बला/ होयबाक/होबएबला /होएबाक २. आ’/आऽ आ ३. क’ लेने/कऽ लेने/कए लेने/कय लेने/ल’/लऽ/लय/लए ४. भ’ गेल/भऽ गेल/भय गेल/भए गेल ५. कर’ गेलाह/करऽ गेलह/करए गेलाह/करय गेलाह ६. लिअ/दिअ लिय’,दिय’,लिअ’,दिय’/ ७. कर’ बला/करऽ बला/ करय बला करैबला/क’र’ बला / करैवाली ८. बला वला (पुरूष), वाली (स्‍त्री) ९ . आङ्ल आंग्ल १०. प्रायः प्रायह ११. दुःख दुख १ २. चलि गेल चल गेल/चैल गेल १३. देलखिन्ह देलकिन्ह, देलखिन १४. देखलन्हि देखलनि/ देखलैन्ह १५. छथिन्ह/ छलन्हि छथिन/ छलैन/ छलनि १६. चलैत/दैत चलति/दैति १७. एखनो अखनो १८. बढ़नि‍ बढ़इन बढ़न्हि १९. ओ’/ओऽ(सर्वनाम) ओ २० . ओ (संयोजक) ओ’/ओऽ २१. फाँगि/फाङ्गि फाइंग/फाइङ २२. जे जे’/जेऽ २३. ना-नुकुर ना-नुकर २४. केलन्हि/केलनि‍/कयलन्हि २५. तखनतँ/ तखन तँ २६. जा रहल/जाय रहल/जाए रहल २७. निकलय/निकलए लागल/ लगल बहराय/ बहराए लागल/ लगल निकल’/बहरै लागल २८. ओतय/ जतय जत’/ ओत’/ जतए/ ओतए २९. की फूरल जे कि फूरल जे ३०. जे जे’/जेऽ ३१. कूदि / यादि(मोन पारब) कूइद/याइद/कूद/याद/ यादि (मोन) ३२. इहो/ ओहो ३३. हँसए/ हँसय हँसऽ ३४. नौ आकि दस/नौ किंवा दस/ नौ वा दस ३५. सासु-ससुर सास-ससुर ३६. छह/ सात छ/छः/सात ३७. की  की’/ कीऽ (दीर्घीकारान्तमे ऽ वर्जित) ३८. जबाब जवाब ३९. करएताह/ करेताह करयताह ४०. दलान दिशि दलान दिश/दलान दिस ४१ . गेलाह गएलाह/गयलाह ४२. किछु आर/ किछु और/ किछ आर ४३. जाइ छल/ जाइत छल जाति छल/जैत छल ४४. पहुँचि/ भेट जाइत छल/ भेट जाइ छलए पहुँच/ भेटि‍ जाइत छल ४५. जबान (युवा)/ जवान(फौजी) ४६. लय/ लए क’/ कऽ/ लए कए / लऽ कऽ/ लऽ कए ४७. ल’/लऽ कय/ कए ४८. एखन / एखने / अखन / अखने ४९. अहींकेँ अहीँकेँ ५०. गहींर गहीँर ५१. धार पार केनाइ धार पार केनाय/केनाए ५२. जेकाँ जेँकाँ/ जकाँ ५३. तहिना तेहिना ५४. एकर अकर ५५. बहिनउ बहनोइ ५६. बहिन बहिनि ५७. बहिन-बहिनोइ बहिन-बहनउ ५८. नहि/ नै ५९. करबा / करबाय/ करबाए ६०. तँ/ त ऽ तय/तए ६१. भैयारी मे छोट-भाए/भै/, जेठ-भाय/भाइ, ६२. गि‍नतीमे दू भाइ/भाए/भाँइ ६३. ई पोथी दू भाइक/ भाँइ/ भाए/ लेल। यावत जावत ६४. माय मै / माए मुदा माइक ममता ६५. देन्हि/ दइन दनि‍/ दएन्हि/ दयन्हि दन्हि/ दैन्हि ६६. द’/ दऽ/ दए ६७. ओ (संयोजक) ओऽ (सर्वनाम) ६८. तका कए तकाय तकाए ६९. पैरे (on foot) पएरे  कएक/ कैक ७०. ताहुमे/ ताहूमे ७१. पुत्रीक ७२. बजा कय/ कए / कऽ ७३. बननाय/बननाइ ७४. कोला ७५. दिनुका दिनका ७६. ततहिसँ ७७. गरबओलन्हि/ गरबौलनि‍/ गरबेलन्हि/ गरबेलनि‍ ७८. बालु बालू ७९. चेन्ह चिन्ह(अशुद्ध) ८०. जे जे’ ८१ . से/ के से’/के’ ८२. एखुनका अखनुका ८३. भुमिहार भूमिहार ८४. सुग्गर / सुगरक/ सूगर ८५. झठहाक झटहाक ८६. छूबि ८७. करइयो/ओ करैयो ने देलक /करियौ-करइयौ ८८. पुबारि पुबाइ ८९. झगड़ा-झाँटी झगड़ा-झाँटि ९०. पएरे-पएरे पैरे-पैरे ९१. खेलएबाक ९२. खेलेबाक ९३. लगा ९४. होए- हो – होअए ९५. बुझल बूझल ९६. बूझल (संबोधन अर्थमे) ९७. यैह यएह / इएह/ सैह/ सएह ९८. तातिल ९९. अयनाय- अयनाइ/ अएनाइ/ एनाइ १००. निन्न- निन्द १०१. बिनु बिन १०२. जाए जाइ १०३. जाइ (in different sense)-last word of sentence १०४. छत पर आबि जाइ १०५. ने १०६. खेलाए (play) –खेलाइ १०७. शिकाइत- शिकायत १०८. ढप- ढ़प १०९ . पढ़- पढ ११०. कनिए/ कनिये कनिञे १११. राकस- राकश ११२. होए/ होय होइ ११३. अउरदा- औरदा ११४. बुझेलन्हि (different meaning- got understand) ११५. बुझएलन्हि/बुझेलनि‍/ बुझयलन्हि (understood himself) ११६. चलि- चल/ चलि‍ गेल ११७. खधाइ- खधाय ११८. मोन पाड़लखिन्ह/ मोन पाड़लखि‍न/ मोन पारलखिन्ह ११९. कैक- कएक- कइएक १२०. लग ल’ग १२१. जरेनाइ १२२. जरौनाइ जरओनाइ- जरएनाइ/ जरेनाइ १२३. होइत १२४. गरबेलन्हि/ गरबेलनि‍ गरबौलन्हि/ गरबौलनि‍ १२५. चिखैत- (to test)चिखइत १२६. करइयो (willing to do) करैयो १२७. जेकरा- जकरा १२८. तकरा- तेकरा १२९. बिदेसर स्थानेमे/ बिदेसरे स्थानमे १३०. करबयलहुँ/ करबएलहुँ/ करबेलहुँ करबेलौं १३१. हारिक (उच्चारण हाइरक) १३२. ओजन वजन आफसोच/ अफसोस कागत/ कागच/ कागज १३३. आधे भाग/ आध-भागे १३४. पिचा / पिचाय/पिचाए १३५. नञ/ ने १३६. बच्चा नञ (ने) पिचा जाय १३७. तखन ने (नञ) कहैत अछि। कहै/ सुनै/ देखै छल मुदा कहैत-कहैत/ सुनैत-सुनैत/ देखैत-देखैत १३८. कतेक गोटे/ कताक गोटे १३९. कमाइ-धमाइ/ कमाई- धमाई १४० . लग ल’ग १४१. खेलाइ (for playing) १४२. छथिन्ह/ छथिन १४३. होइत होइ १४४. क्यो कियो / केओ १४५. केश (hair) १४६. केस (court-case) १४७ . बननाइ/ बननाय/ बननाए १४८. जरेनाइ १४९. कुरसी कुर्सी १५०. चरचा चर्चा १५१. कर्म करम १५२. डुबाबए/ डुबाबै/ डुमाबै डुमाबय/ डुमाबए १५३. एखुनका/ अखुनका १५४. लए/ लिअए (वाक्यक अंतिम शब्द)- लऽ १५५. कएलक/ केलक १५६. गरमी गर्मी १५७ . वरदी वर्दी १५८. सुना गेलाह सुना’/सुनाऽ १५९. एनाइ-गेनाइ १६०. तेना ने घेरलन्हि/ तेना ने घेरलनि‍ १६१. नञि / नै १६२. डरो ड’रो १६३. कतहु/ कतौ कहीं १६४. उमरिगर-उमेरगर उमरगर १६५. भरिगर १६६. धोल/धोअल धोएल १६७. गप/गप्प १६८. के के’ १६९. दरबज्जा/ दरबजा १७०. ठाम १७१. धरि तक १७२. घूरि लौटि १७३. थोरबेक १७४. बड्ड १७५. तोँ/ तूँ १७६. तोँहि( पद्यमे ग्राह्य) १७७. तोँही / तोँहि १७८. करबाइए करबाइये १७९. एकेटा १८०. करितथि /करतथि १८१. पहुँचि/ पहुँच १८२. राखलन्हि रखलन्हि/ रखलनि‍ १८३. लगलन्हि/ लगलनि‍ लागलन्हि १८४. सुनि (उच्चारण सुइन) १८५. अछि (उच्चारण अइछ) १८६. एलथि गेलथि १८७. बितओने/ बि‍तौने/ बितेने १८८. करबओलन्हि/ करबौलनि‍/ करेलखिन्ह/ करेलखि‍न १८९. करएलन्हि/ करेलनि‍ १९०. आकि/ कि १९१. पहुँचि/ पहुँच १९२. बत्ती जराय/ जराए जरा (आगि लगा) १९३. से से’ १९४. हाँ मे हाँ (हाँमे हाँ विभक्त्तिमे हटा कए) १९५. फेल फैल १९६. फइल(spacious) फैल १९७. होयतन्हि/ होएतन्हि/ होएतनि‍/हेतनि‍/ हेतन्हि १९८. हाथ मटिआएब/ हाथ मटियाबय/हाथ मटियाएब १९९. फेका फेंका २००. देखाए देखा २०१. देखाबए २०२. सत्तरि सत्तर २०३. साहेब साहब २०४.गेलैन्ह/ गेलन्हि/ गेलनि‍ २०५. हेबाक/ होएबाक २०६.केलो/ कएलहुँ/केलौं/ केलुँ २०७. किछु न किछु/ किछु ने किछु २०८.घुमेलहुँ/ घुमओलहुँ/ घुमेलौं २०९. एलाक/ अएलाक २१०. अः/ अह २११.लय/ लए (अर्थ-परिवर्त्तन) २१२.कनीक/ कनेक २१३.सबहक/ सभक २१४.मिलाऽ/ मिला २१५.कऽ/ क २१६.जाऽ/ जा २१७.आऽ/ आ २१८.भऽ /भ’ (’ फॉन्टक कमीक द्योतक) २१९.निअम/ नियम २२० .हेक्टेअर/ हेक्टेयर २२१.पहिल अक्षर ढ/ बादक/ बीचक ढ़ २२२.तहिं/तहिँ/ तञि/ तैं २२३.कहिं/ कहीं २२४.तँइ/ तैं / तइँ २२५.नँइ/ नइँ/  नञि/ नहि/नै २२६.है/ हए / एलीहेँ/ २२७.छञि/ छै/ छैक /छइ २२८.दृष्टिएँ/ दृष्टियेँ २२९.आ (come)/ आऽ(conjunction) २३०. आ (conjunction)/ आऽ(come) २३१.कुनो/ कोनो, कोना/केना २३२.गेलैन्ह-गेलन्हि-गेलनि‍ २३३.हेबाक- होएबाक २३४.केलौँ- कएलौँ-कएलहुँ/केलौं २३५.किछु न किछ- किछु ने किछु २३६.केहेन- केहन २३७.आऽ (come)-आ (conjunction-and)/आ। आब'-आब' /आबह-आबह २३८. हएत-हैत २३९.घुमेलहुँ-घुमएलहुँ- घुमेलाें २४०.एलाक- अएलाक २४१.होनि- होइन/ होन्हि/ २४२.ओ-राम ओ श्यामक बीच(conjunction), ओऽ कहलक (he said)/ओ २४३.की हए/ कोसी अएली हए/ की है। की हइ २४४.दृष्टिएँ/ दृष्टियेँ २४५ .शामिल/ सामेल २४६.तैँ / तँए/ तञि/ तहिं २४७.जौं / ज्योँ/ जँ/ २४८.सभ/ सब २४९.सभक/ सबहक २५०.कहिं/ कहीं २५१.कुनो/ कोनो/ कोनहुँ/ २५२.फारकती भऽ गेल/ भए गेल/ भय गेल २५३.कोना/ केना/ कन्‍ना/कना २५४.अः/ अह २५५.जनै/ जनञ २५६.गेलनि‍/ गेलाह (अर्थ परिवर्तन) २५७.केलन्हि/ कएलन्हि/ केलनि‍/ २५८.लय/ लए/ लएह (अर्थ परिवर्तन) २५९.कनीक/ कनेक/कनी-मनी २६०.पठेलन्हि‍ पठेलनि‍/ पठेलइन/ पपठओलन्हि/ पठबौलनि‍/ २६१.निअम/ नियम २६२.हेक्टेअर/ हेक्टेयर २६३.पहिल अक्षर रहने ढ/ बीचमे रहने ढ़ २६४.आकारान्तमे बिकारीक प्रयोग उचित नै/ अपोस्ट्रोफीक प्रयोग फान्टक तकनीकी न्यूनताक परिचायक ओकर बदला अवग्रह (बिकारी) क प्रयोग उचित २६५.केर (पद्यमे ग्राह्य) / -क/ कऽ/ के २६६.छैन्हि- छन्हि २६७.लगैए/ लगैये २६८.होएत/ हएत २६९.जाएत/ जएत/ २७०.आएत/ अएत/ आओत २७१ .खाएत/ खएत/ खैत २७२.पिअएबाक/ पिएबाक/पि‍येबाक २७३.शुरु/ शुरुह २७४.शुरुहे/ शुरुए २७५.अएताह/अओताह/ एताह/ औताह २७६.जाहि/ जाइ/ जइ/ जै/ २७७.जाइत/ जैतए/ जइतए २७८.आएल/ अएल २७९.कैक/ कएक २८०.आयल/ अएल/ आएल २८१. जाए/ जअए/ जए (लालति‍ जाए लगलीह।) २८२. नुकएल/ नुकाएल २८३. कठुआएल/ कठुअएल २८४. ताहि/ तै/ तइ २८५. गायब/ गाएब/ गएब २८६. सकै/ सकए/ सकय २८७.सेरा/सरा/ सराए (भात सरा गेल) २८८.कहैत रही/देखैत रही/ कहैत छलौं/ कहै छलौं- अहिना चलैत/ पढ़ैत (पढ़ै-पढ़ैत अर्थ कखनो काल परिवर्तित) - आर बुझै/ बुझैत (बुझै/ बुझै छी, मुदा बुझैत-बुझैत)/ सकैत/ सकै। करैत/ करै। दै/ दैत। छैक/ छै। बचलै/ बचलैक। रखबा/ रखबाक । बिनु/ बिन। रातिक/ रातुक बुझै आ बुझैत केर अपन-अपन जगहपर प्रयोग समीचीन अछि‍। बुझैत-बुझैत आब बुझलि‍ऐ। हमहूँ बुझै छी। २८९. दुआरे/ द्वारे २९०.भेटि/ भेट/ भेँट २९१. खन/ खीन/  खुना (भोर खन/ भोर खीन) २९२.तक/ धरि २९३.गऽ/ गै (meaning different-जनबै गऽ) २९४.सऽ/ सँ (मुदा दऽ, लऽ) २९५.त्त्व,(तीन अक्षरक मेल बदला पुनरुक्तिक एक आ एकटा दोसरक उपयोग) आदिक बदला त्व आदि। महत्त्व/ महत्व/ कर्ता/ कर्त्ता आदिमे त्त संयुक्तक कोनो आवश्यकता मैथिलीमे नै अछि। वक्तव्य २९६.बेसी/ बेशी २९७.बाला/वाला बला/ वला (रहैबला) २९८ .वाली/ (बदलैवाली) २९९.वार्त्ता/ वार्ता ३००. अन्तर्राष्ट्रिय/ अन्तर्राष्ट्रीय ३०१. लेमए/ लेबए ३०२.लमछुरका, नमछुरका ३०२.लागै/ लगै ( भेटैत/ भेटै) ३०३.लागल/ लगल ३०४.हबा/ हवा ३०५.राखलक/ रखलक ३०६.आ (come)/ आ (and) ३०७. पश्चाताप/ पश्चात्ताप ३०८. ऽ केर व्यवहार शब्दक अन्तमे मात्र, यथासंभव बीचमे नै। ३०९.कहैत/ कहै ३१०. रहए (छल)/ रहै (छलै) (meaning different) ३११.तागति/ ताकति ३१२.खराप/ खराब ३१३.बोइन/ बोनि/ बोइनि ३१४.जाठि/ जाइठ ३१५.कागज/ कागच/ कागत ३१६.गिरै (meaning different- swallow)/ गिरए (खसए) ३१७.राष्ट्रिय/ राष्ट्रीय Festivals of Mithila DATE-LIST (year- 2011-12) (१४१९ साल) Marriage Days: Nov.2011- 20,21,23,25,27,30 Dec.2011- 1,5,9 January 2012- 18,19,20,23,25,27,29 Feb.2012- 2,3,8,9,10,16,17,19,23,24,29 March 2012- 1,8,9,12 April 2012- 15,16,18,25,26 June 2012- 8,13,24,25,28,29 Upanayana Days: February 2012- 2,3,24,26 March 2012- 4 April 2012- 1,2,26 June 2012- 22 Dviragaman Din: November 2011- 27,30 December 2011- 1,2,5,7,9,12 February 2012- 22,23,24,26,27,29 March 2012- 1,2,4,5,9,11,12 April 2012- 23,25,26,29 May 2012- 2,3,4,6,7 Mundan Din: December 2011- 1,5 January 201225,26,30 March 2012- 12 April 2012- 26 May 2012- 23,25,31 June 2012- 8,21,22,29 FESTIVALS OF MITHILA Mauna Panchami-20 July Madhushravani- 2 August Nag Panchami- 4 August Raksha Bandhan- 13 Aug Krishnastami- 21 August Kushi Amavasya / Somvari Vrat- 29 August Hartalika Teej- 31 August ChauthChandra-1 September Karma Dharma Ekadashi-8 September Indra Pooja Aarambh- 9 September Anant Caturdashi- 11 Sep Agastyarghadaan- 12 Sep Pitri Paksha begins- 13 Sep Mahalaya Aarambh- 13 September Vishwakarma Pooja- 17 September Jimootavahan Vrata/ Jitia-20 September Matri Navami- 21September Kalashsthapan- 28 September Belnauti- 2 October Patrika Pravesh- 3 October Mahastami- 4 October Maha Navami - 5 October Vijaya Dashami- 6 October Kojagara- 11 Oct Dhanteras- 24 October Diyabati, shyama pooja-26 October Annakoota/ Govardhana Pooja-27  October Bhratridwitiya/ Chitragupta Pooja-28 October Chhathi-kharna -31 October Chhathi- sayankalik arghya - 1 November Devotthan Ekadashi- 17 November Sama poojarambh- 2 November Kartik Poornima/ Sama Bisarjan- 10 Nov ravivratarambh- 27 November Navanna parvan- 29 November Vivaha Panchmi- 29 November Makara/ Teela Sankranti-15 Jan Naraknivaran chaturdashi- 21 January Basant Panchami/ Saraswati Pooja- 28 January Achla Saptmi- 30 January Mahashivaratri-20 February Holikadahan-Fagua-7 March Holi-9 Mar Varuni Yoga-20 March Chaiti  navaratrarambh- 23 March Chaiti Chhathi vrata-29 March Ram Navami- 1 April Mesha Sankranti-Satuani-13 April Jurishital-14 April Akshaya Tritiya-24 April Ravi Brat Ant- 29 April Janaki Navami- 30 April Vat Savitri-barasait- 20 May Ganga Dashhara-30 May Somavati Amavasya Vrata- 18 June Jagannath Rath Yatra- 21 June Hari Sayan Ekadashi- 30 June Aashadhi Guru Poornima-3 Jul 8.VIDEHA FOR NON RESIDENTS 8.1 to 8.3 MAITHILI LITERATURE IN ENGLISH 8.1.1.The Comet   -GAJENDRA THAKUR translated by Jyoti Jha chaudhary 8.1.2.The_Science_of_Words- GAJENDRA THAKUR translated by the author himself 8.1.3.On_the_dice-board_of_the_millennium- GAJENDRA THAKUR translated by Jyoti Jha chaudhary 8.1.4.NAAGPHANS (IN ENGLISH)- SHEFALIKA VERMA translated by Dr. Rajiv Kumar Verma and Dr. Jaya Verma Original Poem in Maithili by Kalikant Jha "Buch" Translated into English by Jyoti Jha Chaudhary Kalikant Jha "Buch" 1934-2009, Birth place- village Karian, District- Samastipur (Karian is birth place of famous Indian Nyaiyyayik philosopher Udayanacharya), Father Late Pt. Rajkishor Jha was first headmaster of village middle school. Mother Late Kala Devi was housewife. After completing Intermediate education started job block office of Govt. of Bihar.published in Mithila Mihir, Mati-pani, Bhakha, and Maithili Akademi magazine. Jyoti Jha Chaudhary, Date of Birth: December 30 1978,Place of Birth- Belhvar (Madhubani District), Education: Swami Vivekananda Middle School, Tisco Sakchi Girls High School, Mrs KMPM Inter College, IGNOU, ICWAI (COST ACCOUNTANCY); Residence- LONDON, UK; Father- Sh. Shubhankar Jha, Jamshedpur; Mother- Smt. Sudha Jha- Shivipatti. Jyoti received editor's choice award from www.poetry.comand her poems were featured in front page of www.poetrysoup.com for some period.She learnt Mithila Painting under Ms. Shveta Jha, Basera Institute, Jamshedpur and Fine Arts from Toolika, Sakchi, Jamshedpur (India). Her Mithila Paintings have been displayed by Ealing Art Group at Ealing Broadway, London. Kavi Kokil Vidyapati Because of whom our native language got a life That world-renowned nightingale poet’s name is Vidyapati A new hope in the Mithilanchal Our language is spread in each house Kind emotions and colourful thoughts Stability in mind and woman in the vision Created the God Shiva under the veil That world-renowned nightingale poet’s name is Vidyapati The shade of yoga in the bed of enjoyment The illusion of personality is immeasurable The triveni is immerged in the belly The shrine resides with the beauty The sun of creation shined in the kaalratri of rituals That world-renowned nightingale poet’s name is Vidyapati Face is like spring, bhado (rainy season) in eyes The flow is pure, bank is muddy Like leaves of lotus in the water Like flow of nectar in the desert Singing the song for Radha but keeping Madhav in the mind That world-renowned nightingale poet’s name is Vidyapati Vidyapati nagaram is blessed With Visfisut, Truth, Shiva and Virtue Remnant after being burnt out Mahesh is immortal after death The entrance is adorned with gold but inside is crematorium That world-renowned nightingale poet’s name is Vidyapati Send your comments to ggajendra@videha.com VIDEHA ARCHIVE १.विदेह ई-पत्रिकाक सभटा पुरान अंक ब्रेल, तिरहुता आ देवनागरी रूपमे Videha e journal's all old issues in Braille Tirhuta and Devanagari versions विदेह ई-पत्रिकाक पहिल ५० अंक

विदेह ई-पत्रिकाक ५०म सँ आगाँक अंक २.मैथिली पोथी डाउनलोड Maithili Books Download ३.मैथिली ऑडियो संकलन Maithili Audio Downloads ४.मैथिली वीडियोक संकलन Maithili Videos ५.मिथिला चित्रकला/ आधुनिक चित्रकला आ चित्र Mithila Painting/ Modern Art and Photos "विदेह"क एहि सभ सहयोगी लिंकपर सेहो एक बेर जाऊ। ६.विदेह मैथिली क्विज  :  http://videhaquiz.blogspot.com/ ७.विदेह मैथिली जालवृत्त एग्रीगेटर : http://videha-aggregator.blogspot.com/ ८.विदेह मैथिली साहित्य अंग्रेजीमे अनूदित http://madhubani-art.blogspot.com/ ९.विदेहक पूर्व-रूप "भालसरिक गाछ"  : http://gajendrathakur.blogspot.com/ १०.विदेह इंडेक्स  : http://videha123.blogspot.com/ ११.विदेह फाइल : http://videha123.wordpress.com/ १२. विदेह: सदेह : पहिल तिरहुता (मिथिला़क्षर) जालवृत्त (ब्लॉग) http://videha-sadeha.blogspot.com/ १३. विदेह:ब्रेल: मैथिली ब्रेलमे: पहिल बेर विदेह द्वारा http://videha-braille.blogspot.com/ १४.VIDEHA IST MAITHILI  FORTNIGHTLY EJOURNAL ARCHIVE http://videha-archive.blogspot.com/ १५. विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका मैथिली पोथीक आर्काइव http://videha-pothi.blogspot.com/ १६. विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका ऑडियो आर्काइव http://videha-audio.blogspot.com/ १७. विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका वीडियो आर्काइव http://videha-video.blogspot.com/ १८. विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका मिथिला चित्रकला, आधुनिक कला आ चित्रकला http://videha-paintings-photos.blogspot.com/ १९. मैथिल आर मिथिला (मैथिलीक सभसँ लोकप्रिय जालवृत्त) http://maithilaurmithila.blogspot.com/ २०.श्रुति प्रकाशन http://www.shruti-publication.com/ २१.http://groups.google.com/group/videha VIDEHA केर सदस्यता लिअ Top of Form Bottom of Form ईमेल : एहि समूहपर जाऊ २२.http://groups.yahoo.com/group/VIDEHA/ Top of Form Subscribe to VIDEHA Powered by us.groups.yahoo.com Bottom of Form २३.गजेन्द्र ठाकुर इ‍डेक्स http://gajendrathakur123.blogspot.com २४.विदेह रेडियो:मैथिली कथा-कविता आदिक पहिल पोडकास्ट साइट http://videha123radio.wordpress.com/ २५. नेना भुटका http://mangan-khabas.blogspot.com/ महत्त्वपूर्ण सूचना:(१) 'विदेह' द्वारा धारावाहिक रूपे ई-प्रकाशित कएल गेल गजेन्द्र ठाकुरक  निबन्ध-प्रबन्ध-समीक्षा, उपन्यास (सहस्रबाढ़नि) , पद्य-संग्रह (सहस्राब्दीक चौपड़पर), कथा-गल्प (गल्प-गुच्छ), नाटक(संकर्षण), महाकाव्य (त्वञ्चाहञ्च आ असञ्जाति मन) आ बाल-किशोर साहित्य विदेहमे संपूर्ण ई-प्रकाशनक बाद प्रिंट फॉर्ममे। कुरुक्षेत्रम्–अन्तर्मनक खण्ड-१ सँ ७ Combined ISBN No.978-81-907729-7-6 विवरण एहि पृष्ठपर नीचाँमे आ प्रकाशकक साइट http://www.shruti-publication.com/ पर । महत्त्वपूर्ण सूचना (२):सूचना: विदेहक मैथिली-अंग्रेजी आ अंग्रेजी मैथिली कोष (इंटरनेटपर पहिल बेर सर्च-डिक्शनरी) एम.एस. एस.क्यू.एल. सर्वर आधारित -Based on ms-sql server Maithili-English and English-Maithili Dictionary. विदेहक भाषापाक- रचनालेखन स्तंभमे। कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक- गजेन्द्र ठाकुर गजेन्द्र ठाकुरक निबन्ध-प्रबन्ध-समीक्षा, उपन्यास (सहस्रबाढ़नि) , पद्य-संग्रह (सहस्राब्दीक चौपड़पर), कथा-गल्प (गल्प गुच्छ), नाटक(संकर्षण), महाकाव्य (त्वञ्चाहञ्च आ असञ्जाति मन) आ बालमंडली-किशोरजगत विदेहमे संपूर्ण ई-प्रकाशनक बाद प्रिंट फॉर्ममे। कुरुक्षेत्रम्–अन्तर्मनक, खण्ड-१ सँ ७ Ist edition 2009 of Gajendra Thakur’s KuruKshetram-Antarmanak (Vol. I to VII)- essay-paper-criticism, novel, poems, story, play, epics and Children-grown-ups literature in single binding: Language:Maithili ६९२ पृष्ठ : मूल्य भा. रु. 100/-(for individual buyers inside india) (add courier charges Rs.50/-per copy for Delhi/NCR and Rs.100/- per copy for outside Delhi)

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Details for purchase available at print-version publishers's site website: http://www.shruti-publication.com/ or you may write to e-mail:shruti.publication@shruti-publication.com विदेह: सदेह : १: २: ३: ४ तिरहुता : देवनागरी "विदेह" क, प्रिंट संस्करण :विदेह-ई-पत्रिका (http://www.videha.co.in/) क चुनल रचना सम्मिलित। विदेह:सदेह:१: २: ३: ४ सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। Details for purchase available at print-version publishers's site http://www.shruti-publication.com  or you may write to shruti.publication@shruti-publication.com २. संदेश- [ विदेह ई-पत्रिका, विदेह:सदेह मिथिलाक्षर आ देवनागरी आ गजेन्द्र ठाकुरक सात खण्डक- निबन्ध-प्रबन्ध-समीक्षा,उपन्यास (सहस्रबाढ़नि) , पद्य-संग्रह (सहस्राब्दीक चौपड़पर), कथा-गल्प (गल्प गुच्छ), नाटक (संकर्षण), महाकाव्य (त्वञ्चाहञ्च आ असञ्जाति मन) आ बाल-मंडली-किशोर जगत- संग्रह कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक मादेँ। ] १.श्री गोविन्द झा- विदेहकेँ तरंगजालपर उतारि विश्वभरिमे मातृभाषा मैथिलीक लहरि जगाओल, खेद जे अपनेक एहि महाभियानमे हम एखन धरि संग नहि दए सकलहुँ। सुनैत छी अपनेकेँ सुझाओ आ रचनात्मक आलोचना प्रिय लगैत अछि तेँ किछु लिखक मोन भेल। हमर सहायता आ सहयोग अपनेकेँ सदा उपलब्ध रहत। २.श्री रमानन्द रेणु- मैथिलीमे ई-पत्रिका पाक्षिक रूपेँ चला कऽ जे अपन मातृभाषाक प्रचार कऽ रहल छी, से धन्यवाद । आगाँ अपनेक समस्त मैथिलीक कार्यक हेतु हम हृदयसँ शुभकामना दऽ रहल छी। ३.श्री विद्यानाथ झा "विदित"- संचार आ प्रौद्योगिकीक एहि प्रतिस्पर्धी ग्लोबल युगमे अपन महिमामय "विदेह"केँ अपना देहमे प्रकट देखि जतबा प्रसन्नता आ संतोष भेल, तकरा कोनो उपलब्ध "मीटर"सँ नहि नापल जा सकैछ? ..एकर ऐतिहासिक मूल्यांकन आ सांस्कृतिक प्रतिफलन एहि शताब्दीक अंत धरि लोकक नजरिमे आश्चर्यजनक रूपसँ प्रकट हैत। ४. प्रो. उदय नारायण सिंह "नचिकेता"- जे काज अहाँ कए रहल छी तकर चरचा एक दिन मैथिली भाषाक इतिहासमे होएत। आनन्द भए रहल अछि, ई जानि कए जे एतेक गोट मैथिल "विदेह" ई जर्नलकेँ पढ़ि रहल छथि।...विदेहक चालीसम अंक पुरबाक लेल अभिनन्दन। ५. डॉ. गंगेश गुंजन- एहि विदेह-कर्ममे लागि रहल अहाँक सम्वेदनशील मन, मैथिलीक प्रति समर्पित मेहनतिक अमृत रंग, इतिहास मे एक टा विशिष्ट फराक अध्याय आरंभ करत, हमरा विश्वास अछि। अशेष शुभकामना आ बधाइक सङ्ग, सस्नेह...अहाँक पोथी कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक प्रथम दृष्टया बहुत भव्य तथा उपयोगी बुझाइछ। मैथिलीमे तँ अपना स्वरूपक प्रायः ई पहिले एहन  भव्य अवतारक पोथी थिक। हर्षपूर्ण हमर हार्दिक बधाई स्वीकार करी। ६. श्री रामाश्रय झा "रामरंग"(आब स्वर्गीय)- "अपना" मिथिलासँ संबंधित...विषय वस्तुसँ अवगत भेलहुँ।...शेष सभ कुशल अछि। ७. श्री ब्रजेन्द्र त्रिपाठी- साहित्य अकादमी- इंटरनेट पर प्रथम मैथिली पाक्षिक पत्रिका "विदेह" केर लेल बधाई आ शुभकामना स्वीकार करू। ८. श्री प्रफुल्लकुमार सिंह "मौन"- प्रथम मैथिली पाक्षिक पत्रिका "विदेह" क प्रकाशनक समाचार जानि कनेक चकित मुदा बेसी आह्लादित भेलहुँ। कालचक्रकेँ पकड़ि जाहि दूरदृष्टिक परिचय देलहुँ, ओहि लेल हमर मंगलकामना। ९.डॉ. शिवप्रसाद यादव- ई जानि अपार हर्ष भए रहल अछि, जे नव सूचना-क्रान्तिक क्षेत्रमे मैथिली पत्रकारिताकेँ प्रवेश दिअएबाक साहसिक कदम उठाओल अछि। पत्रकारितामे एहि प्रकारक नव प्रयोगक हम स्वागत करैत छी, संगहि "विदेह"क सफलताक शुभकामना। १०. श्री आद्याचरण झा- कोनो पत्र-पत्रिकाक प्रकाशन- ताहूमे मैथिली पत्रिकाक प्रकाशनमे के कतेक सहयोग करताह- ई तऽ भविष्य कहत। ई हमर ८८ वर्षमे ७५ वर्षक अनुभव रहल। एतेक पैघ महान यज्ञमे हमर श्रद्धापूर्ण आहुति प्राप्त होयत- यावत ठीक-ठाक छी/ रहब। ११. श्री विजय ठाकुर- मिशिगन विश्वविद्यालय- "विदेह" पत्रिकाक अंक देखलहुँ, सम्पूर्ण टीम बधाईक पात्र अछि। पत्रिकाक मंगल भविष्य हेतु हमर शुभकामना स्वीकार कएल जाओ। १२. श्री सुभाषचन्द्र यादव- ई-पत्रिका "विदेह" क बारेमे जानि प्रसन्नता भेल। ’विदेह’ निरन्तर पल्लवित-पुष्पित हो आ चतुर्दिक अपन सुगंध पसारय से कामना अछि। १३. श्री मैथिलीपुत्र प्रदीप- ई-पत्रिका "विदेह" केर सफलताक भगवतीसँ कामना। हमर पूर्ण सहयोग रहत। १४. डॉ. श्री भीमनाथ झा- "विदेह" इन्टरनेट पर अछि तेँ "विदेह" नाम उचित आर कतेक रूपेँ एकर विवरण भए सकैत अछि। आइ-काल्हि मोनमे उद्वेग रहैत अछि, मुदा शीघ्र पूर्ण सहयोग देब।कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक देखि अति प्रसन्नता भेल। मैथिलीक लेल ई घटना छी। १५. श्री रामभरोस कापड़ि "भ्रमर"- जनकपुरधाम- "विदेह" ऑनलाइन देखि रहल छी। मैथिलीकेँ अन्तर्राष्ट्रीय जगतमे पहुँचेलहुँ तकरा लेल हार्दिक बधाई। मिथिला रत्न सभक संकलन अपूर्व। नेपालोक सहयोग भेटत, से विश्वास करी। १६. श्री राजनन्दन लालदास- "विदेह" ई-पत्रिकाक माध्यमसँ बड़ नीक काज कए रहल छी, नातिक अहिठाम देखलहुँ। एकर वार्षिक अ‍ंक जखन प्रिं‍ट निकालब तँ हमरा पठायब। कलकत्तामे बहुत गोटेकेँ हम साइटक पता लिखाए देने छियन्हि। मोन तँ होइत अछि जे दिल्ली आबि कए आशीर्वाद दैतहुँ, मुदा उमर आब बेशी भए गेल। शुभकामना देश-विदेशक मैथिलकेँ जोड़बाक लेल।.. उत्कृष्ट प्रकाशन कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक लेल बधाइ। अद्भुत काज कएल अछि, नीक प्रस्तुति अछि सात खण्डमे।  मुदा अहाँक सेवा आ से निःस्वार्थ तखन बूझल जाइत जँ अहाँ द्वारा प्रकाशित पोथी सभपर दाम लिखल नहि रहितैक। ओहिना सभकेँ विलहि देल जइतैक। (स्पष्टीकरण-  श्रीमान्, अहाँक सूचनार्थ विदेह द्वारा ई-प्रकाशित कएल सभटा सामग्री आर्काइवमे https://sites.google.com/a/videha.com/videha-pothi/ पर बिना मूल्यक डाउनलोड लेल उपलब्ध छै आ भविष्यमे सेहो रहतैक। एहि आर्काइवकेँ जे कियो प्रकाशक अनुमति लऽ कऽ प्रिंट रूपमे प्रकाशित कएने छथि आ तकर ओ दाम रखने छथि ताहिपर हमर कोनो नियंत्रण नहि अछि।- गजेन्द्र ठाकुर)...   अहाँक प्रति अशेष शुभकामनाक संग। १७. डॉ. प्रेमशंकर सिंह- अहाँ मैथिलीमे इंटरनेटपर पहिल पत्रिका "विदेह" प्रकाशित कए अपन अद्भुत मातृभाषानुरागक परिचय देल अछि, अहाँक निःस्वार्थ मातृभाषानुरागसँ प्रेरित छी, एकर निमित्त जे हमर सेवाक प्रयोजन हो, तँ सूचित करी। इंटरनेटपर आद्योपांत पत्रिका देखल, मन प्रफुल्लित भऽ गेल। १८.श्रीमती शेफालिका वर्मा- विदेह ई-पत्रिका देखि मोन उल्लाससँ भरि गेल। विज्ञान कतेक प्रगति कऽ रहल अछि...अहाँ सभ अनन्त आकाशकेँ भेदि दियौ, समस्त विस्तारक रहस्यकेँ तार-तार कऽ दियौक...। अपनेक अद्भुत पुस्तक कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक विषयवस्तुक दृष्टिसँ गागरमे सागर अछि। बधाई। १९.श्री हेतुकर झा, पटना-जाहि समर्पण भावसँ अपने मिथिला-मैथिलीक सेवामे तत्पर छी से स्तुत्य अछि। देशक राजधानीसँ भय रहल मैथिलीक शंखनाद मिथिलाक गाम-गाममे मैथिली चेतनाक विकास अवश्य करत। २०. श्री योगानन्द झा, कबिलपुर, लहेरियासराय- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पोथीकेँ निकटसँ देखबाक अवसर भेटल अछि आ मैथिली जगतक एकटा उद्भट ओ समसामयिक दृष्टिसम्पन्न हस्ताक्षरक कलमबन्द परिचयसँ आह्लादित छी। "विदेह"क देवनागरी सँस्करण पटनामे रु. 80/- मे उपलब्ध भऽ सकल जे विभिन्न लेखक लोकनिक छायाचित्र, परिचय पत्रक ओ रचनावलीक सम्यक प्रकाशनसँ ऐतिहासिक कहल जा सकैछ। २१. श्री किशोरीकान्त मिश्र- कोलकाता- जय मैथिली, विदेहमे बहुत रास कविता, कथा, रिपोर्ट आदिक सचित्र संग्रह देखि आ आर अधिक प्रसन्नता मिथिलाक्षर देखि- बधाई स्वीकार कएल जाओ। २२.श्री जीवकान्त- विदेहक मुद्रित अंक पढ़ल- अद्भुत मेहनति। चाबस-चाबस। किछु समालोचना मरखाह..मुदा सत्य। २३. श्री भालचन्द्र झा- अपनेक कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक देखि बुझाएल जेना हम अपने छपलहुँ अछि। एकर विशालकाय आकृति अपनेक सर्वसमावेशताक परिचायक अछि। अपनेक रचना सामर्थ्यमे उत्तरोत्तर वृद्धि हो, एहि शुभकामनाक संग हार्दिक बधाई। २४.श्रीमती डॉ नीता झा- अहाँक कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़लहुँ। ज्योतिरीश्वर शब्दावली, कृषि मत्स्य शब्दावली आ सीत बसन्त आ सभ कथा, कविता, उपन्यास, बाल-किशोर साहित्य सभ उत्तम छल। मैथिलीक उत्तरोत्तर विकासक लक्ष्य दृष्टिगोचर होइत अछि। २५.श्री मायानन्द मिश्र- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक मे हमर उपन्यास स्त्रीधनक जे विरोध कएल गेल अछि तकर हम विरोध करैत छी।... कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पोथीक लेल शुभकामना।(श्रीमान् समालोचनाकेँ विरोधक रूपमे नहि लेल जाए।-गजेन्द्र ठाकुर) २६.श्री महेन्द्र हजारी- सम्पादक श्रीमिथिला- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़ि मोन हर्षित भऽ गेल..एखन पूरा पढ़यमे बहुत समय लागत, मुदा जतेक पढ़लहुँ से आह्लादित कएलक। २७.श्री केदारनाथ चौधरी- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक अद्भुत लागल, मैथिली साहित्य लेल ई पोथी एकटा प्रतिमान बनत। २८.श्री सत्यानन्द पाठक- विदेहक हम नियमित पाठक छी। ओकर स्वरूपक प्रशंसक छलहुँ। एम्हर अहाँक लिखल - कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक देखलहुँ। मोन आह्लादित भऽ उठल। कोनो रचना तरा-उपरी। २९.श्रीमती रमा झा-सम्पादक मिथिला दर्पण। कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक प्रिंट फॉर्म पढ़ि आ एकर गुणवत्ता देखि मोन प्रसन्न भऽ गेल, अद्भुत शब्द एकरा लेल प्रयुक्त कऽ रहल छी। विदेहक उत्तरोत्तर प्रगतिक शुभकामना। ३०.श्री नरेन्द्र झा, पटना- विदेह नियमित देखैत रहैत छी। मैथिली लेल अद्भुत काज कऽ रहल छी। ३१.श्री रामलोचन ठाकुर- कोलकाता- मिथिलाक्षर विदेह देखि मोन प्रसन्नतासँ भरि उठल, अंकक विशाल परिदृश्य आस्वस्तकारी अछि। ३२.श्री तारानन्द वियोगी- विदेह आ कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक देखि चकबिदोर लागि गेल। आश्चर्य। शुभकामना आ बधाई। ३३.श्रीमती प्रेमलता मिश्र “प्रेम”- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़लहुँ। सभ रचना उच्चकोटिक लागल। बधाई। ३४.श्री कीर्तिनारायण मिश्र- बेगूसराय- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक बड्ड नीक लागल, आगांक सभ काज लेल बधाई। ३५.श्री महाप्रकाश-सहरसा- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक नीक लागल, विशालकाय संगहि उत्तमकोटिक। ३६.श्री अग्निपुष्प- मिथिलाक्षर आ देवाक्षर विदेह पढ़ल..ई प्रथम तँ अछि एकरा प्रशंसामे मुदा हम एकरा दुस्साहसिक कहब। मिथिला चित्रकलाक स्तम्भकेँ मुदा अगिला अंकमे आर विस्तृत बनाऊ। ३७.श्री मंजर सुलेमान-दरभंगा- विदेहक जतेक प्रशंसा कएल जाए कम होएत। सभ चीज उत्तम। ३८.श्रीमती प्रोफेसर वीणा ठाकुर- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक उत्तम, पठनीय, विचारनीय। जे क्यो देखैत छथि पोथी प्राप्त करबाक उपाय पुछैत छथि। शुभकामना। ३९.श्री छत्रानन्द सिंह झा- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़लहुँ, बड्ड नीक सभ तरहेँ। ४०.श्री ताराकान्त झा- सम्पादक मैथिली दैनिक मिथिला समाद- विदेह तँ कन्टेन्ट प्रोवाइडरक काज कऽ रहल अछि। कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक अद्भुत लागल। ४१.डॉ रवीन्द्र कुमार चौधरी- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक बहुत नीक, बहुत मेहनतिक परिणाम। बधाई। ४२.श्री अमरनाथ- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक आ विदेह दुनू स्मरणीय घटना अछि, मैथिली साहित्य मध्य। ४३.श्री पंचानन मिश्र- विदेहक वैविध्य आ निरन्तरता प्रभावित करैत अछि, शुभकामना। ४४.श्री केदार कानन- कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक लेल अनेक धन्यवाद, शुभकामना आ बधाइ स्वीकार करी। आ नचिकेताक भूमिका पढ़लहुँ। शुरूमे तँ लागल जेना कोनो उपन्यास अहाँ द्वारा सृजित भेल अछि मुदा पोथी उनटौला पर ज्ञात भेल जे एहिमे तँ सभ विधा समाहित अछि। ४५.श्री धनाकर ठाकुर- अहाँ नीक काज कऽ रहल छी। फोटो गैलरीमे चित्र एहि शताब्दीक जन्मतिथिक अनुसार रहैत तऽ नीक। ४६.श्री आशीष झा- अहाँक पुस्तकक संबंधमे एतबा लिखबा सँ अपना कए नहि रोकि सकलहुँ जे ई किताब मात्र किताब नहि थीक, ई एकटा उम्मीद छी जे मैथिली अहाँ सन पुत्रक सेवा सँ निरंतर समृद्ध होइत चिरजीवन कए प्राप्त करत। ४७.श्री शम्भु कुमार सिंह- विदेहक तत्परता आ क्रियाशीलता देखि आह्लादित भऽ रहल छी। निश्चितरूपेण कहल जा सकैछ जे समकालीन मैथिली पत्रिकाक इतिहासमे विदेहक नाम स्वर्णाक्षरमे लिखल जाएत। ओहि कुरुक्षेत्रक घटना सभ तँ अठारहे दिनमे खतम भऽ गेल रहए मुदा अहाँक कुरुक्षेत्रम् तँ अशेष अछि। ४८.डॉ. अजीत मिश्र- अपनेक प्रयासक कतबो प्रश‍ंसा कएल जाए कमे होएतैक। मैथिली साहित्यमे अहाँ द्वारा कएल गेल काज युग-युगान्तर धरि पूजनीय रहत। ४९.श्री बीरेन्द्र मल्लिक- अहाँक कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक आ विदेह:सदेह पढ़ि अति प्रसन्नता भेल। अहाँक स्वास्थ्य ठीक रहए आ उत्साह बनल रहए से कामना। ५०.श्री कुमार राधारमण- अहाँक दिशा-निर्देशमे विदेह पहिल मैथिली ई-जर्नल देखि अति प्रसन्नता भेल। हमर शुभकामना। ५१.श्री फूलचन्द्र झा प्रवीण-विदेह:सदेह पढ़ने रही मुदा कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक देखि बढ़ाई देबा लेल बाध्य भऽ गेलहुँ। आब विश्वास भऽ गेल जे मैथिली नहि मरत। अशेष शुभकामना। ५२.श्री विभूति आनन्द- विदेह:सदेह देखि, ओकर विस्तार देखि अति प्रसन्नता भेल। ५३.श्री मानेश्वर मनुज-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक एकर भव्यता देखि अति प्रसन्नता भेल, एतेक विशाल ग्रन्थ मैथिलीमे आइ धरि नहि देखने रही। एहिना भविष्यमे काज करैत रही, शुभकामना। ५४.श्री विद्यानन्द झा- आइ.आइ.एम.कोलकाता- कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक विस्तार, छपाईक संग गुणवत्ता देखि अति प्रसन्नता भेल। अहाँक अनेक धन्यवाद; कतेक बरखसँ हम नेयारैत छलहुँ जे सभ पैघ शहरमे मैथिली लाइब्रेरीक स्थापना होअए, अहाँ ओकरा वेबपर कऽ रहल छी, अनेक धन्यवाद। ५५.श्री अरविन्द ठाकुर-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक मैथिली साहित्यमे कएल गेल एहि तरहक पहिल प्रयोग अछि, शुभकामना। ५६.श्री कुमार पवन-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक पढ़ि रहल छी। किछु लघुकथा पढ़ल अछि, बहुत मार्मिक छल। ५७. श्री प्रदीप बिहारी-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक देखल, बधाई। ५८.डॉ मणिकान्त ठाकुर-कैलिफोर्निया- अपन विलक्षण नियमित सेवासँ हमरा लोकनिक हृदयमे विदेह सदेह भऽ गेल अछि। ५९.श्री धीरेन्द्र प्रेमर्षि- अहाँक समस्त प्रयास सराहनीय। दुख होइत अछि जखन अहाँक प्रयासमे अपेक्षित सहयोग नहि कऽ पबैत छी। ६०.श्री देवशंकर नवीन- विदेहक निरन्तरता आ विशाल स्वरूप- विशाल पाठक वर्ग, एकरा ऐतिहासिक बनबैत अछि। ६१.श्री मोहन भारद्वाज- अहाँक समस्त कार्य देखल, बहुत नीक। एखन किछु परेशानीमे छी, मुदा शीघ्र सहयोग देब। ६२.श्री फजलुर रहमान हाशमी-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक मे एतेक मेहनतक लेल अहाँ साधुवादक अधिकारी छी। ६३.श्री लक्ष्मण झा "सागर"- मैथिलीमे चमत्कारिक रूपेँ अहाँक प्रवेश आह्लादकारी अछि।..अहाँकेँ एखन आर..दूर..बहुत दूरधरि जेबाक अछि। स्वस्थ आ प्रसन्न रही। ६४.श्री जगदीश प्रसाद मंडल-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक पढ़लहुँ । कथा सभ आ उपन्यास सहस्रबाढ़नि पूर्णरूपेँ पढ़ि गेल छी। गाम-घरक भौगोलिक विवरणक जे सूक्ष्म वर्णन सहस्रबाढ़निमे अछि, से चकित कएलक, एहि संग्रहक कथा-उपन्यास मैथिली लेखनमे विविधता अनलक अछि। समालोचना शास्त्रमे अहाँक दृष्टि वैयक्तिक नहि वरन् सामाजिक आ कल्याणकारी अछि, से प्रशंसनीय। ६५.श्री अशोक झा-अध्यक्ष मिथिला विकास परिषद- कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक लेल बधाई आ आगाँ लेल शुभकामना। ६६.श्री ठाकुर प्रसाद मुर्मु- अद्भुत प्रयास। धन्यवादक संग प्रार्थना जे अपन माटि-पानिकेँ ध्यानमे राखि अंकक समायोजन कएल जाए। नव अंक धरि प्रयास सराहनीय। विदेहकेँ बहुत-बहुत धन्यवाद जे एहेन सुन्दर-सुन्दर सचार (आलेख) लगा रहल छथि। सभटा ग्रहणीय- पठनीय। ६७.बुद्धिनाथ मिश्र- प्रिय गजेन्द्र जी,अहाँक सम्पादन मे प्रकाशित ‘विदेह’आ ‘कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक’ विलक्षण पत्रिका आ विलक्षण पोथी! की नहि अछि अहाँक सम्पादनमे? एहि प्रयत्न सँ मैथिली क विकास होयत,निस्संदेह। ६८.श्री बृखेश चन्द्र लाल- गजेन्द्रजी, अपनेक पुस्तक कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक पढ़ि मोन गदगद भय गेल , हृदयसँ अनुगृहित छी । हार्दिक शुभकामना । ६९.श्री परमेश्वर कापड़ि - श्री गजेन्द्र जी । कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक पढ़ि गदगद आ नेहाल भेलहुँ। ७०.श्री रवीन्द्रनाथ ठाकुर- विदेह पढ़ैत रहैत छी। धीरेन्द्र प्रेमर्षिक मैथिली गजलपर आलेख पढ़लहुँ। मैथिली गजल कत्तऽ सँ कत्तऽ चलि गेलैक आ ओ अपन आलेखमे मात्र अपन जानल-पहिचानल लोकक चर्च कएने छथि। जेना मैथिलीमे मठक परम्परा रहल अछि। (स्पष्टीकरण- श्रीमान्, प्रेमर्षि जी ओहि आलेखमे ई स्पष्ट लिखने छथि जे किनको नाम जे छुटि गेल छन्हि तँ से मात्र आलेखक लेखकक जानकारी नहि रहबाक द्वारे, एहिमे आन कोनो कारण नहि देखल जाय। अहाँसँ एहि विषयपर विस्तृत आलेख सादर आमंत्रित अछि।-सम्पादक) ७१.श्री मंत्रेश्वर झा- विदेह पढ़ल आ संगहि अहाँक मैगनम ओपस कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक सेहो, अति उत्तम। मैथिलीक लेल कएल जा रहल अहाँक समस्त कार्य अतुलनीय अछि। ७२. श्री हरेकृष्ण झा- कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक मैथिलीमे अपन तरहक एकमात्र ग्रन्थ अछि, एहिमे लेखकक समग्र दृष्टि आ रचना कौशल देखबामे आएल जे लेखकक फील्डवर्कसँ जुड़ल रहबाक कारणसँ अछि। ७३.श्री सुकान्त सोम- कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक मे  समाजक इतिहास आ वर्तमानसँ अहाँक जुड़ाव बड्ड नीक लागल, अहाँ एहि क्षेत्रमे आर आगाँ काज करब से आशा अछि। ७४.प्रोफेसर मदन मिश्र- कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक सन किताब मैथिलीमे पहिले अछि आ एतेक विशाल संग्रहपर शोध कएल जा सकैत अछि। भविष्यक लेल शुभकामना। ७५.प्रोफेसर कमला चौधरी- मैथिलीमे कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक सन पोथी आबए जे गुण आ रूप दुनूमे निस्सन होअए, से बहुत दिनसँ आकांक्षा छल, ओ आब जा कऽ पूर्ण भेल। पोथी एक हाथसँ दोसर हाथ घुमि रहल अछि, एहिना आगाँ सेहो अहाँसँ आशा अछि। ७६.श्री उदय चन्द्र झा "विनोद": गजेन्द्रजी, अहाँ जतेक काज कएलहुँ अछि से मैथिलीमे आइ धरि कियो नहि कएने छल। शुभकामना। अहाँकेँ एखन बहुत काज आर करबाक अछि। ७७.श्री कृष्ण कुमार कश्यप: गजेन्द्र ठाकुरजी, अहाँसँ भेँट एकटा स्मरणीय क्षण बनि गेल। अहाँ जतेक काज एहि बएसमे कऽ गेल छी ताहिसँ हजार गुणा आर बेशीक आशा अछि। ७८.श्री मणिकान्त दास: अहाँक मैथिलीक कार्यक प्रशंसा लेल शब्द नहि भेटैत अछि। अहाँक कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक सम्पूर्ण रूपेँ पढ़ि गेलहुँ। त्वञ्चाहञ्च बड्ड नीक लागल। ७९. श्री हीरेन्द्र कुमार झा- विदेह ई-पत्रिकाक सभ अंक ई-पत्रसँ भेटैत रहैत अछि। मैथिलीक ई-पत्रिका छैक एहि बातक गर्व होइत अछि। अहाँ आ अहाँक सभ सहयोगीकेँ हार्दिक शुभकामना। विदेह मैथिली साहित्य आन्दोलन (c)२००४-११. सर्वाधिकार लेखकाधीन आ जतय लेखकक नाम नहि अछि ततय संपादकाधीन। विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। सह-सम्पादक: उमेश मंडल। सहायक सम्पादक: शिव कुमार झा आ मुन्नाजी (मनोज कुमार कर्ण)। भाषा-सम्पादन: नागेन्द्र कुमार झा आ पञ्जीकार विद्यानन्द झा। कला-सम्पादन: ज्योति सुनीत चौधरी आ रश्मि रेखा सिन्हा। सम्पादक-शोध-अन्वेषण: डॉ. जया वर्मा आ डॉ. राजीव कुमार वर्मा। सम्पादक- नाटक-रंगमंच-चलचित्र- बेचन ठाकुर। सम्पादक-सूचना-सम्पर्क-समाद पूनम मंडल आ प्रियंका झा। रचनाकार अपन मौलिक आ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि) ggajendra@videha.com केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx, .rtf वा .txt फॉर्मेटमे पठा सकैत छथि। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेताह, से आशा करैत छी। रचनाक अंतमे टाइप रहय, जे ई रचना मौलिक अछि, आ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। मेल प्राप्त होयबाक बाद यथासंभव शीघ्र ( सात दिनक भीतर) एकर प्रकाशनक अंकक सूचना देल जायत। ’विदेह' प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका अछि आ एहिमे मैथिली, संस्कृत आ अंग्रेजीमे मिथिला आ मैथिलीसँ संबंधित रचना प्रकाशित कएल जाइत अछि। एहि ई पत्रिकाकेँ श्रीमति लक्ष्मी ठाकुर द्वारा मासक ०१ आ १५ तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि। (c) 2004-11 सर्वाधिकार सुरक्षित। विदेहमे प्रकाशित सभटा रचना आ आर्काइवक सर्वाधिकार रचनाकार आ संग्रहकर्त्ताक लगमे छन्हि। रचनाक अनुवाद आ पुनः प्रकाशन किंवा आर्काइवक उपयोगक अधिकार किनबाक हेतु ggajendra@videha.co.in पर संपर्क करू। एहि साइटकेँ प्रीति झा ठाकुर, मधूलिका चौधरी आ रश्मि प्रिया द्वारा डिजाइन कएल गेल। सिद्धिरस्तु वि दे ह विदेह Videha বিদেহ  विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका Videha Ist Maithili Fortnightly e Magazine  विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका 'विदेह' ८८ म अंक १५ अगस्त २०११ (वर्ष ४ मास ४४ अंक ८८)http://www.videha.co.in/ मानुषीमिह संस्कृताम् ISSN 2229-547X VIDEHA वि दे ह विदेह Videha বিদেহ  विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका Videha Ist Maithili Fortnightly e Magazine  विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई 'विदेह' ८८ म अंक १५ अगस्त २०११ (वर्ष ४ मास ४४ अंक ८८)http://www.videha.co.in/ मानुषीमिह संस्कृताम् ISSN 2229-547X VIDEHA

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