274 275 ISSN 2229-547X VIDEHA 'विदेह' ९० म अंक १५ सितम्बर २०११ (वर्ष ४ मास ४५ अंक ९०) वि दे ह विदेह Videha বিদেহ http://www.videha.co.in विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका Videha Ist Maithili Fortnightly e Magazine नव अंक देखबाक लेल पृष्ठ सभकेँ रिफ्रेश कए देखू। Always refresh the pages for viewing new issue of VIDEHA. Read in your own script Roman(Eng)Gujarati Bangla Oriya Gurmukhi Telugu Tamil Kannada Malayalam Hindi ऐ अंकमे अछि:- ऐ अंकमे अछि:- १. संपादकीय संदेश २. गद्य २.१.जगदीश प्रसाद मण्डल- कथा-भबडाह २.२.१.जवाहर लाल कश्यप २.रामदेव प्रसाद मण्डल झारूदार३. लक्ष्मी दास ४.उमेश मण्डल ५.मिथिलेश मण्डल २.३.हम पुछैत छी विहनि कथाकार एवं निबन्धकार श्री मिथिलेश कुमार झासँमुन्नाजीक गपशप २. मिथिलेश कुमार झा-पजुआरिडीह टोलमे रंगमंच २.४.१.उमेश मण्डल- सगर राति दीप जरए, हजारीबाग २.पूनम मंडल- १.दिल्लीमे गूंजल मैथिली कविता २.५१ साझा पुरस्कारक घोषणा २.५.चन्द्रेश- रचनात्मक बिमर्शक अयनामे ‘चिड़ै’ २.६.विनीत उत्पल- कथा- बेसिक इंस्टिंक्ट २.७.शांतिलक्ष्मी चौधरी- नव-नियोजित शिक्षिका आओर शिक्षक - मिथिला मे बदलैत स्त्री आ पुरुख केर संबंध-जाल २.८.रवि भूषण पाठक- गामक जिनगीक समीक्षा ३. पद्य ३.१.१.अंजनी कुमार वर्मा "दाऊजी" २.डॉ जया वर्मा ३.शांतिलक्ष्मी चौधरी ३.२.१.इरा मल्लिक २ओमप्रकाश झा ३मनीष झा बौआभाई ३.३.१.मिहिर झा २.बिनोद मिश्र ३.४.१.शिवशंकर सिंह ठाकुर २.सुबोध झा ३.५. .सद्रे आलम गौहर’ ३.६.अक्षय कुमार चौधरी- दियाद बलजोर ३.७. १.डॉ॰ शशिधर कुमर २ आनंद कुमार झा ३नवीन कुमार "आशा" ३.८.१.जवाहर लाल कश्यप २.अमित मोहन झा ४. मिथिला कला-संगीत- १.कैलाश कामत २.ज्योति सुनीत चौधरी ३.श्वेता झा (सिंगापुर) ४.गुंजन कर्ण बालानां कृते-बिपिन झा- शरीरक मूल्य- (बालबोधिनी कथा) . भाषापाक रचना-लेखन -[मानक मैथिली], [विदेहक मैथिली-अंग्रेजी आ अंग्रेजी मैथिली कोष (इंटरनेटपर पहिल बेर सर्च-डिक्शनरी) एम.एस. एस.क्यू.एल. सर्वर आधारित -Based on ms-sql server Maithili-English and English-Maithili Dictionary.] विदेह ई-पत्रिकाक सभटा पुरान अंक ( ब्रेल, तिरहुता आ देवनागरी मे ) पी.डी.एफ. डाउनलोडक लेल नीचाँक लिंकपर उपलब्ध अछि। All the old issues of Videha e journal ( in Braille, Tirhuta and Devanagari versions ) are available for pdf download at the following link. विदेह ई-पत्रिकाक सभटा पुरान अंक ब्रेल, तिरहुता आ देवनागरी रूपमे Videha e journal's all old issues in Braille Tirhuta and Devanagari versions विदेह ई-पत्रिकाक पहिल ५० अंक
विदेह ई-पत्रिकाक ५०म सँ आगाँक अंक विदेह आर.एस.एस.फीड। "विदेह" ई-पत्रिका ई-पत्रसँ प्राप्त करू। अपन मित्रकेँ विदेहक विषयमे सूचित करू। ↑ विदेह आर.एस.एस.फीड एनीमेटरकेँ अपन साइट/ ब्लॉगपर लगाऊ। ब्लॉग "लेआउट" पर "एड गाडजेट" मे "फीड" सेलेक्ट कए "फीड यू.आर.एल." मे http://www.videha.co.in/index.xml टाइप केलासँ सेहो विदेह फीड प्राप्त कए सकैत छी। गूगल रीडरमे पढ़बा लेल http://reader.google.com/ पर जा कऽ Add a Subscription बटन क्लिक करू आ खाली स्थानमे http://www.videha.co.in/index.xml पेस्ट करू आ Add बटन दबाउ। Join official Videha facebook group. Join Videha googlegroups विदेह रेडियो:मैथिली कथा-कविता आदिक पहिल पोडकास्ट साइट http://videha123radio.wordpress.com/ Videha Radio मैथिली देवनागरी वा मिथिलाक्षरमे नहि देखि/ लिखि पाबि रहल छी, (cannot see/write Maithili in Devanagari/ Mithilakshara follow links below or contact at ggajendra@videha.com) तँ एहि हेतु नीचाँक लिंक सभ पर जाऊ। संगहि विदेहक स्तंभ मैथिली भाषापाक/ रचना लेखनक नव-पुरान अंक पढ़ू। http://devanaagarii.net/ http://kaulonline.com/uninagari/ (एतए बॉक्समे ऑनलाइन देवनागरी टाइप करू, बॉक्ससँ कॉपी करू आ वर्ड डॉक्युमेन्टमे पेस्ट कए वर्ड फाइलकेँ सेव करू। विशेष जानकारीक लेल ggajendra@videha.com पर सम्पर्क करू।)(Use Firefox 4.0 (from WWW.MOZILLA.COM )/ Opera/ Safari/ Internet Explorer 8.0/ Flock 2.0/ Google Chrome for best view of 'Videha' Maithili e-journal at http://www.videha.co.in/ .) Go to the link below for download of old issues of VIDEHA Maithili e magazine in .pdf format and Maithili Audio/ Video/ Book/ paintings/ photo files. विदेहक पुरान अंक आ ऑडियो/ वीडियो/ पोथी/ चित्रकला/ फोटो सभक फाइल सभ (उच्चारण, बड़ सुख सार आ दूर्वाक्षत मंत्र सहित) डाउनलोड करबाक हेतु नीचाँक लिंक पर जाऊ। VIDEHA ARCHIVE विदेह आर्काइव भारतीय डाक विभाग द्वारा जारी कवि, नाटककार आ धर्मशास्त्री विद्यापतिक स्टाम्प। भारत आ नेपालक माटिमे पसरल मिथिलाक धरती प्राचीन कालहिसँ महान पुरुष ओ महिला लोकनिक कर्मभमि रहल अछि। मिथिलाक महान पुरुष ओ महिला लोकनिक चित्र 'मिथिला रत्न' मे देखू। गौरी-शंकरक पालवंश कालक मूर्त्ति, एहिमे मिथिलाक्षरमे (१२०० वर्ष पूर्वक) अभिलेख अंकित अछि। मिथिलाक भारत आ नेपालक माटिमे पसरल एहि तरहक अन्यान्य प्राचीन आ नव स्थापत्य, चित्र, अभिलेख आ मूर्त्तिकलाक़ हेतु देखू 'मिथिलाक खोज' मिथिला, मैथिल आ मैथिलीसँ सम्बन्धित सूचना, सम्पर्क, अन्वेषण संगहि विदेहक सर्च-इंजन आ न्यूज सर्विस आ मिथिला, मैथिल आ मैथिलीसँ सम्बन्धित वेबसाइट सभक समग्र संकलनक लेल देखू "विदेह सूचना संपर्क अन्वेषण" विदेह जालवृत्तक डिसकसन फोरमपर जाऊ। "मैथिल आर मिथिला" (मैथिलीक सभसँ लोकप्रिय जालवृत्त) पर जाऊ। संपादकीय मैथिली गजलक पहिल दुर्भाग्य तखन देखा पड़ैत अछि जखन एतए गजलकेँ मुस्लिम धर्मसँ जोड़ि कऽ देखल जाए लगलै आ मुस्लिम धर्म आ ओकर साहित्यकेँ अछोप मानि लेल गेलै। गजलक प्रारम्भ इस्लामक आगमनसँ पूर्वक घटना अछि आ अवेस्ता आ वैदिक संस्कृत मध्य ढेर रास साम्य अछि। दोसर दुर्भाग्य मायानंद मिश्रक ओ कथन भेल जाहिमे ओ घोषणा केलथि जे मैथिलीमे गजल लिखले नै जा सकैए, हुनकर तात्पर्य दोसर रहन्हि मुदा लोक अही तरहेँ ओकरा प्रस्तुत करए लागल, कारण ओ स्वयम् गीतल नामसँ गजल लिखलन्हि। मैथिली गजलमे "अनचिन्हार आखर" सन ब्लाग उपस्थित भेल जतए बहर (छन्दयुक्त) गजल आ गजलकारक लाइन लागि गेल। मुदा सभसँ बड़का दुर्भाग्य ई भेलै जे मैथिलीक किछु तथाकथित शाइर सभ रामदेव झा द्वारा बहर संबंधी विचारकेँ नकारि देलन्हि ( देखू- लोकवेद आ लालकिलामे देवशंकर नवीन जीक आलेख)। जँ वर्तमानमे गजलक परिदृश्यकेँ देखी तँ मोटामोटी दूटा रेखा बनैत अछि (जकरा हम दू युगक नाम देने छी) पहिल भेल "जीवन युग" आ दोसर भेल "अनचिन्हार युग"। आब कने दूनू युग पर नजरि फेरल जाए। 1) जीवन युग- ऐ युगक प्रारंभ हम जीवन झासँ केने छी जे आधुनिक मैथिली गजलक पिता मानल जाइ छथि मुदा ओ कम्मे गजल लीख सकला। मुदा हुनका बाद मायानंद, इन्दु, रवीन्द्रनाथ ठाकुर, सरस, रमेश, नरेन्द्र, राजेन्द्र विमल, धीरेन्द्र प्रेमर्षि, रौशन जनकपुरी, अरविन्द ठाकुर, सुरेन्द्र नाथ, तारानंद वियोगी आदि गजलगो सभ भेलाह। रामलोचन ठाकुर जीक बहुत रचना गजल अछि मुदा ओ अपने ओकर क्रम-विन्यास कविता-गीत जकाँ बना देने छथिन्ह मुदा किछु गजलक श्रेणीमे सेहो अबैए। ऐ “जीवन युग”क गजलक प्रमुख विशेषता अछि बे-बहर अर्थात बिन छंदक गजल। ओना बहरकेँ के पूछैए जखन सुरेन्द्रनाथ जी काफियाक ओझरीमे फँसल रहि जाइ छथि। एकर अतिरिक्त आर सभ विशेषता अछि ऐ युगक। आ जँ एकै पाँतिमे हम कहए चाही तँ पाँति बनत---" गजल थिक, ई गजल थिक, आ इएह टा गजल थिक"। 2) आब कने आबी " अनचिन्हार युग" पर। ऐ युगक प्रारंभ तखन भेल जखन इंटरनेटपर मैथिलीक पहिल गजल आ शेरो-शाइरीकेँ समर्पित ब्लाग "अनचिन्हार आखर" ( http://anchinharakharkolkata.blogspot.com ) क जन्म भेल।आ ऐ अन्तर्जालक “अनचिन्हार आखर” जालवृत्तक नामपर हम ऐ युगक नाम "अनचिन्हार युग" रखलहुँ अछि। ऐ युगक किछु विशेषता देखल जाए- · गजलक परिभाषिक शब्द आ बहरक निर्धारण---- ई सौभाग्य एकमात्र "अनचिन्हारे आखर"केँ छैक जे ओ हमरासँ १३ खंडमे (एखन धरि १३ खण्ड) "मैथिली गजल शास्त्र" लिखेलक। आ ई मैथिलीक पहिल एहन शास्त्र भेल जइमे गजलक विवेचन मैथिली भाषाक तत्वपर कएल गेलै। तकरा बाद आशीष अनचिन्हार सेहो "गजलक संक्षिप्त परिचय" लीख ऐ परंपराकेँ पुष्ट केलथि। आ एकरे फल थिक जे सभ नव-गजलकार बहरमे गजल कहि रहल छथि। · स्कूलिंग ---- "अनचिन्हार आखर" गजल कहेबाक परंपरा शुरू केलक आ तइमे सुनील कुमार झा, दीप नारायण "विद्यार्थी", रोशन झा, प्रवीन चौधरी "प्रतीक", त्रिपुरारी कुमार शर्मा, विकास झा "रंजन", सद्रे आलम गौहर, ओमप्रकाश झा, मिहिर झा, उमेश मंडल आदि गजलकार उभरि कए अएलाह। · गजलमे मैथिलीक प्रधानता----"अनचिन्हार युग" सँ पहिने गजलमे उर्दू-हिन्दी शब्दक भरमार छल आ मान्यता छल जे बिना उर्दू-हिन्दी शब्दक गजल कहले नै जा सकैए। मुदा "अनचिन्हार आखर" ऐ कुतर्ककेँ धवस्त केलक आ गजलमे १००% मैथिली शब्दक प्रयोगकेँ सार्वजनिक केलक। · गजलक लेल पुरस्कार योजना--- "अनचिन्हार आखर" मैथिली साहित्य केर इतिहासमे पहिल बेर गजल लेल अलगसँ पुरस्कार देबाक घोषणा केलक। ऐ पुरस्कारक नाम "गजल कमला-कोसी-बागमती-महानंदा" पुरस्कार अछि। · उपर चारू विशेषताक आधारपर एकटा अंतिम मुदा सभसँ बड़का विशेषता जे निकलल ओ थिक मायानंद मिश्रक ओइ कथनक खंडन, जकर अभिप्राय छल जे मैथिलीमे बहरयुक्त गजल लिखल नै जा सकैए। "अनचिन्हार आखर" सरल वार्णिक, वार्णिक आ मात्रिक छन्दक अतिरिक्त फारसी/ उर्दू बहरमे सेहो मैथिली गजल लिखबाक शास्त्र ओ उदाहरण खाँटी मैथिली शब्दावलीमे प्रस्तुत केलक। गजेन्द्र ठाकुर ggajendra@videha.com http://www.maithililekhaksangh.com/2010/07/blog-post_3709.html २. गद्य २.१.जगदीश प्रसाद मण्डल- कथा-भबडाह २.२.१.जवाहर लाल कश्यप २.रामदेव प्रसाद मण्डल झारूदार३. लक्ष्मी दास ४.उमेश मण्डल ५.मिथिलेश मण्डल २.३.हम पुछैत छी विहनि कथाकार एवं निबन्धकार श्री मिथिलेश कुमार झासँमुन्नाजीक गपशप २. मिथिलेश कुमार झा-पजुआरिडीह टोलमे रंगमंच २.४.१.उमेश मण्डल- सगर राति दीप जरए, हजारीबाग २.पूनम मंडल- १.दिल्लीमे गूंजल मैथिली कविता २.५१ साझा पुरस्कारक घोषणा २.५.चन्द्रेश- रचनात्मक बिमर्शक अयनामे ‘चिड़ै’ २.६.विनीत उत्पल- कथा- बेसिक इंस्टिंक्ट २.७.शांतिलक्ष्मी चौधरी- नव-नियोजित शिक्षिका आओर शिक्षक - मिथिला मे बदलैत स्त्री आ पुरुख केर संबंध-जाल २.८.रवि भूषण पाठक- गामक जिनगीक समीक्षा जगदीश प्रसाद मण्डल जन्म- ५.७.१९४७- पिताक नामः स्व. दल्लू मण्डल, माताक नामः स्व. मकोबती देवी, मातृक- मनसारा, घनश्यामपुर, जिला- दरभंगा। गाम-बेरमा, भाया- तमुरिया, जिला-मधुबनी, (बिहार) ८४७४१० Email- jpmandal.berma@gmail.com मो. ०९९३१६५४७४२ प्रकाशित कृति- १ गामक जिनगी (कथा संग्रह), २ मिथिलाक बेटी (नाटक), ३ तरेगन (बाल प्रेरक लघुकथा संग्रह), ४ मौलाइल गाछक फूल (उपन्यास), ५ जिनगीक जीत (उपन्यास), ६ उत्थान-पतन (उपन्यास), ७ जीवनमरण (उपन्यास), ८ जीवन संघर्ष (उपन्यास)। ई-प्रकाशित कृति- १ त्रिफला (एकांकी संग्रह), २ इन्द्रधनुषी अकास (कविता संग्रह), ३ मइटुग्गर (दीर्धकथा संग्रह), ४ कम्प्रोमाइज (नाटक), ५ झमेलिया वियाह (नाटक), ६ ‘अर्द्धांगिनी....सरोजनी....सुभद्रा....भाइक सिनेह इत्यादि’’ कथा संग्रह। सभ पोथी फ्री डॉनलोड हेतु उपलब्ध- https://sites.google.com/a/videha.com/videha-pothi/ कथा- भबडाह चहकैत चिड़ैक चलमली कानमे पड़िते नित्यानन काकाक नीन छिटकलनि। कोनो काज करैसँ पहिने तर्क-वितर्क ओहने महत्व रखैत जेहने निरजन आँखिये दिनमे चलब होइत। ओछाइनेपर पड़ल-पड़ल नजरि आजुक समैपर गेलनि। काल्हि शनि, राखी पाबनि छी। परसू रवि, विदेसर स्थानमे ठसम-ठस मेला हएत। हएबो उचित, एक तँ बैद्यनाथ बाबा साओनक पूर्णिमा विदेसरेमे बितबै छथि, दोसर कमलो उमड़ल अछि, एक संग दुनू काज। भैयारी रहितो जहिना भविष्यद्रष्टा युगद्रष्टासँ उपरक सीढ़ी होइत, तहिना ने औझुकेपर काल्हि ठाढ़ होएत। काल्हुक सुरज केहन उगत ई तँ प्रश्न अछिये। चारिम दिन पनरह अगस्त। भारतक स्वतंत्रताक चौसठिम वर्षगॉठ। साठि बरखक उपरान्त अनाड़ियो-धुनाड़ी लोक वरिष्ट नागरिकक उपहार पबैत तेहनाठाम स्वतंत्रता की आ देश कतए! मुदा लगले मन घुरि गाम दिस बढ़लनि। हिन्दु-मुसलमानक गाम। पनरहियासँ हिन्दु राधा-कृष्णक झूलासँ लऽ कऽ भोला बाबाक जलधरीमे व्यस्त तँ तहिना मुसलमानो दस दिन उपरेसँ रोजा-नबाजमे। एको पाइ लोक नै बाॅचल। सभ धरमक काजमे हृदैसँ जुटल। जखन सोलहन्नी लोक पवित्र मने धरमक काजमे जुटले छथि तखन निश्चित गामक काल्याण हेबे करत! प्रेमिकाक आगू जहिना प्रेमी दुनियाँकेँ निच्चा देख ऊपर भ्रमण करैत तहिना नित्यानन काकाक मन कल्याणक संग टहलए लगलनि। उत्साह जगलनि! फुड़-फुड़ा कऽ ओछाइनसँ उठि कलपर जा माइटियेसँ चारि घूसा दाँतमे लगा, आंगूरेक जीभिया कऽ हाँइ-हाँइ चारि कुड़ा मारि चारि घोंट पानियो पीब लेलनि। आँखि उठा वाड़ी दिस देखलनि तँ पत्नीकेँ मचानपर चठैल तोड़ैत देखलनि। आँखि उताड़ि गाम दिस विदा भेलाह। दरबज्जापर सँ आगू बढ़िते हियाैलनि तँ बुझि पड़लनि जे घर-दुआर छोड़ि लोक चौके दिस आबि गेल हेता तँए नीक हएत जे चौके दिस जाइ। सोचि नित्याननकाका आगू बढ़ैक विचार केलनि। डेग उठिते मन सिहरलनि। भाए-बहीनक ओहन पर्व काल्हि छी जइमे दुनूक प्रगाढ़ प्रेमक, सिनेह-सिक्त जलक उदय हएत। आशाक संग जिनगीक विसवासो जगलनि। डेग बढ़लनि। पनरह-बीसटा डमहाएल चठैल खोंइछामे लेने सुचिताकाकी मुस्की दैत, गद्-गद् होइत जे महीना दिन तँ चलबे करत, तेकर पछाति ने दौंजी हएत। सालमे जँ एक्को पनरहिया चठैलक तरकारी खा लेब तँ कि चीिनया बेमारी लागत। लफड़ल आबि पछबरिया ओसारपर सूपमे चठैल उझलि पुतोहूकेँ पुछलखिन- “कनियाँ, दोकानक काज अछि?” डिब्बा-डूब्बी हड़बड़बैत पुतोहू बजली- “हँ।” “की सब लेब?” “नोन, हरदी।” पुतोहूक साँस किछु गर्म सुचिताकाकीकेँ बुझि पड़लनि। मुदा अनठा देलनि। नोनक पौकेट दस रूपैयामे देत, हरदियो कि कोनो सस्ता अछि। ओकरो पौकेट दस रूपैयासँ कममे कहाँ दइ दइ छै। हाथमे तँ पनरहेटा रूपैया अछि। केना दुनू चीज लेब। मन फुनफुनेलनि। बड़बडाए लगली, केहेन बढ़ियाँ खुदरा-खुदरी नून विकाइ छलै, जतबे जकरा सकड़ता रहै छलै से ततबे लइ छलए। आब तँ तेहेन पोलीथीन पौकेटमे रहैए जे कमो रहत तँ बनियाँ कहत जे घमि गेल हएत। खाएर एक चुटकी नूने ने कम देत। एक-ने-एक दिन सैरियत दिअए पड़तैक। जहिना बच्चा लगले कनैए, लगले हँसैए तहिना सुचिताकाकीकेँ मन लहड़ए लगलनि। जे नून हाथीकेँ गला दइए ओ प्लास्टिककेँ कि नै गलबैत हएत। आब की कोनो नून खाइ- छी आकि प्लास्टिकक रस पीबै छी। हे भगवान तोड़े हाथ-बाठ छह। जते दिन जीबए दइक हुअ से जीबह दिहह, नै जे लऽ जाइक हुअ तँ लऽ जहिहह। कहू जे प्लास्टिके कलमे पानि पीबै छी, दोकानक चीज-वौस अनै छी, खाइ-पीबैक समान रखै छी। जूत्ता-चप्पल, कपड़ा-लत्ता पहिरै छी। मुदा....? लगले मन पुतोहू दिस घुरलनि। कहू जे चारिटा गाछ घरोक दावापर हरदी रोपि लेब तँ साल भरि कीनए पड़त। जाबे माल-जाल नै छलए ताबे बाड़ी झाड़ी करै छलौं। आब तँ मालोक नेकरमसँ नहाइयो-खाइयोक पलखति नै होइत रहैए। कनियाँ सहजहि कनिये छथि। कोनो लूरि-ढंग बाप-माए सिखा कऽ पठौलखिन आकि सोलहो आना सासुरे भरोसे छोड़ि देलखिन। मदुा गलती बुढ़होक छन्हि। कोन दुरमतिया चढ़ि गेलनि चारि कोसी पारक पुतोहू उठा अनलनि। एकेटा वस्तुक चरि-चरि, पँच-पँच तरहक िवन्यास बनैए, जरूरतक हिसावसँ रूप-बदलि उपयोग करब। तइ कालमे कहती जे खाली, अल्लूक, तरूआ, भुजुआ, भुजिया टा बनबैक लूरि अछि। अपसोच करैत बजलीह- “जा हे भगवान, जे पुत हरबाहि गेल, देव-पितर सभ से गेल। कोनो मनोरथ रहए देलह। जखन मनोरथे नै तखन सतयुग, त्रेता, द्वापरे कि।” तइ बीच मोख लागल ठाढ़ पुतोहू बजलीह- “आइ शुक्रवारी छिऐ। जखन चौक दिस जाइते छथि तँ अंगूरो आ केरो फलहार ले लेने अबिहाथि।” पुतोहूक बात सुनि सुचिताकाकी छगुन्तामे पड़ि गेली। मनमे हुअए लगलनि जे एक हजार बात एक्केबेर कहि दियनि मुदा कतौ-कतौ नहियो टोक देब नीक होइत अछि। तँए, किछु नै बजैसँ परहेज केलनि। मुदा, जहिना आगिपर चढ़ल पाइनिक बर्तनमे ताओ लगिते तरसँ बुलकरा उठए लगैत तहिना काकीक मनमे उठए लगलनि। कहू जे अखन पनपिआइक बेर छै, पहिने तेकर ओरियान कऽ पुरूख-पात्रकेँ खुआएब अपने खाएब आकि सौझुका फलहारक ओरियान करब। बीचमे कलौ सेहो अछिये। भगवानो टेबिये कऽ पुतोहू देलनि। एहेन-एहेन गिरथानि बुते कते दिन घर-परिवार चलत। काकीकेँ चुप देख पुतोहू दोहरबैत बजलीह- “नै सुनलखिन। जखन चौक दिस जेबे करती तँ अंगूरो आ केरो नेनहि अबिहाथि।” पुतोहूक बात सुनिते काकीक मनमे तरंग उठलनि। तरंगि कऽ बजए लगली- “अहाँ सब कोन उपास करै छी जे सहैसँ पहिनहि फलहारेक ओरियान करए लगै छी। कहुना-कहुना तँ सातटा हरिबासय केने छी। कहाँ कहियो पहिने फलहारेक ओरियान करै छलौं।” शब्द-वाण जकाँ काकीक बात पुतोहूक हृदैमे लगलनि। तीर बेधल चिड़ै जकाँ छटपटाइत पूतोहू बजलीह- “अपना जे मन फुड़ै छन्हि करै छथि से बड़बढ़िया मुदा हमरा बेरमे भबडाह हुअ लगै छन्हि?” भबडाह सुनि काकियोक मन बेसम्हार भऽ गेलनि। कहलखिन- “कनियाँ, हम भबडाहि नै छी जे ककरोसँ भबडाह करब। अखन आँखि तकै छी तँए चिन्ता अछि। अखने आँखि मूनि देब, घर सम्हारए पड़त। तखन अहूँ यएह बात बुझबै।” भनडार कोणक जेठुआ गड़ै जकाँ दुनूक बीच रसे-रसे अन्हर-विहाड़ि पकड़ए लगल। कियो पाछू हटैले तैयार नै। दुनूक सीमा-सरहद टूटि-एकबट्ट भऽ गेल। एक्के-दुइये धीयो-पूतो आ जनिजातियो सभ अबए लागलि। आंगन भरि गेल। चौकसँ किछु पाछुए नित्याननकाका रहथि कि मनमे उठलनि, चौरंगी हवा बहैक समए अछि। कखन कोन हवा केम्हरसँ उठत आ घर-दुआर खसबैत केम्हर मुहेँ चलि जाएत तेकर ठेकान नै। ठोर बिदकि गेलनि। हुलकी दैत मुस्की बहरेलनि- “एह, अजीब-अजीब करामाती मनुक्खो सभ भऽ गेल। कनिये गलती विधातोक भेलनि जे सींग-नाङरि काटि लेलखिन।” तहिकाल लाडस्पीकरक आवाज कानमे पड़लनि। राधा-कृष्ण मंदिरपर झूला चलि रहल अछि। आवाज सुनि मन पसीज गेलनि। साओन मास। सुहावन। मन भावन। विशाल वसुंधरा, रंग-रंगक वस्त्र पहीिर मधुमय वातावरणक बीच, विहुँसि रहल अछि। कृष्णक कदमसँ कदम मिलबैत राधा विहुँसैत झूला झूलए कदमक गाछ दिस जा रहल छथि। असीम उल्लास। अदम्य साहस दुनूक बीच। कातेसँ गाछमे गोल-गोल, लाल-पीयर झुमका लगल फल-फूलसँ लदल देख राधा कृष्णकेँ पुछलखिन- “डोरी लगा डारिमे झूला लगाएब आकि डारियेपर बैस झूलब?” राधाक प्रश्न सुनि कृष्ण आँखियेक इशारासँ उत्तर देलनि- “जेहेन समए तेहेन काज।” चौकक गनगनाइत अबाज, नित्याननकाकाक धियान अपना दिस खिंचलकनि। तखने एकटा नवयुवककेँ स्कूलमे भेटल बहिनीक साइकिलपर ‘रेशम की डोर’ गुनगुनाइत सुनलनि। चिप्पी सजल विदेशी वस्त्रमे युवक। जहिना दिन-रातिक मध्य जाड़-गरमीक मध्यक संग जिनगियोक मध्य मधुआएल होइत, तहिना काकाक मन सेहो भेलनि। युवककेँ पुछि देलखिन- “बाउ, परिवारमे के सभ छथि?” युवक- “बाबा, हिनका सबहक चरणक दयासँ सब छथि। माइयो-बाबू आ दूटा बहिनो अछि। एक बहीन सासुर बसैए, जतए जा रहल छी आ दोसर पढ़ैए। सोलहम बर्ख छिऐ। दू-तीन साल बाद िवआहो करब।” काका- “अपने?” युवक- “बाबा, ई देवतुल्य छथि, झूठ नै बाजब। अपना खेत-पथार नहिये जकाँ अछि मुदा खेतबला सभकेँ बहरा गेने बटाइ खेत पर्याप्त अछि। एक जोड़ा बड़द रखने छी। बाबू-माए खेते-पथारमे खटै छथि, अपने बम्बईमे रहै छी।” काका- “राखी पावनि तँ काल्हि छिऐ, आइये किअए जाइ छी?” युवक- “साल भरिपर बम्बईसँ एलौंहेँ। एको दिन पहिने जँ बहिनक ऐठाम नै जाएब, से केहेन हएत? भागिनो-भगिनियो ले आ बहीनो-बहनोइले सालो भरिक कपड़ा नेने जाइ छियनि। काल्हि बेरमे घुमब तखन छोटकी बहिनक हाथे राखी पहिरब। अच्छा अखन जाइ छी बाबा। काल्हि फेर घुमती बेर भेँट करब।” काका- “काजे जाइ छी। जाउ?” जेना-जेना ओ युवक साइकिलसँ आगू बढ़ल जाइत तेना-तेना नित्याननोकाकाक मन दौगए लगलनि। मनमे एलनि पैछला सालक मोवाइलिक घटना। कनी मन खुशी भेलनि। बुदबुदेलथि- “अजीव-अजीव मदारी सभ अछि। गर लगा-लगा नचबैए।” मन रूकलनि। पहिनेसँ ने लोक किअए बुझैए जे एहेन-एहेन घटनाकेँ बढ़ए नै देत। मुदा मन ठमकलनि। घटना भेल। राखी पावनि दिन, दस बजे रातिमे बम्बैसँ एक गोटेकेँ मोवाइलसँ समाचार आएल जे बौआ सबहक हाथक राखी जल्दी खोलि दियौ नै तँ अनहोनी घटना हएत! इमहर मुहेँ-मुँह समाचार पसरब शुरू भेल ओमहरसँ मोवाइलिक समाचार दिल्ली, कल्कत्ता, बंगलोर इत्यादिसँ अकासमे गनगनाए लगल। हाँइ-हाँइ राखी हाथसँ उतड़ए लगल। भरि रातिक हलचल दिनक दस बजे धरि चलिते रहल। राति भरिक नीनो दिनेमे बौआ गेल। मुदा दस बजेक पछातिक तीखर रौद पाबि वातावरण शान्त भेल। मनमे उठलनि बाल-बच्चाक संग माए-बापक संबंध। केना मनुष्यक वंश आगू मुहेँ ससरत जतए माइये-बाप दुश्मन बनि ठाढ़ भऽ रहल अछि। तहूमे जिनगीक अंतिम बेलामे नै, उदयक तीनिये मासमे हथियार लऽ आगूमे ठाढ़ भऽ जाइत अछि! मन तुड़छए लगलनि। थूक फेक मन हल्लहुक केलनि। मन पड़लनि भाए-बहीनिक ओ पुरान बात। भाए-बहिन ऐठाम पहुँचल तँ बहिन भायकेँ कहलकनि- भैया जखन अकासक डगर उत्तरे दछिने हएत तखन आएब। मन पड़िते उठलनि सालो भरि तँ प्रकृतक संग खेल होइते रहैत अछि, जिनगीसँ कतेक लग धरि संबंध बनि सकैए, ततबे ने। जना मेघौनमे हवा-सिहकी लगने घुसकैत-फुसकैत तहिना नित्यानन कक्काक मन घुसकलनि। देखलनि जे चकेबा कोन तरहेँ बहिन समाकेँ जरैत वृन्दावनमे संग दऽ रहल छथि। जे मनुष्य चित्ती कौड़ी फेक नागसँ दोस्ती करैत, बाघ-सिंह, भाउल सहित गाए-महींस, बकरीक संग मुनियासँ हंस धरि प्रेमसँ एकठाम रहैत ओकरा मनुष्यसँ एते घृणा किएक छै। जे धी-जमाए-भगिनाक लेल कहल जाइत, ओइमे कियो अपन नै! तहिना भाए-बहिनकेँ महींसक सींग सदृश्य कहल जाइत। एक जातिक संहार कऽ बगीचाक काँट हटाएब कहल जाइत अछि! मन तरंगि गेलनि। तखने एकटा बेदरा आबि कहलकनि- “बाबा, अंगनामे विरड़ो उठल अछि।” बेदरासँ किछु पुछब उचित नै बुझलनि। उड़ैत अकासमे कौआ अपन टाहि थोड़े दोहरबैए। ओ तँ समैक घड़ी छी। मन आंगन पहुँचलनि। पत्नीपर नजरि पड़िते विचार उठलनि। झगड़ी की रगड़ी ओहो छथि। बूढ़ भेलौं, एतबो होश नै रहै छन्हि। होशो केना रहतनि जइ परिवारकेँ फुलवाड़ी सदृश्य जिनगीक कमाइसँ बनौने छथि तेकरा जँ कियो उजाड़ए चाहत से केना उजाड़ए देथिन। मुदा रगड़ी रहितो एकटा गुण तँ छन्हि जे, ने रग्गड़ ठाढ़ करैमे देरी लगै छन्हि आ ने सीढ़ीक भीतर फड़यबैमे। नजरि पुतोहू दिस बढ़लनि अजीव-अजीव लोको सभ फड़ि गेलहेँ। कहत जुगे बदलि गेल। कि जुग बदलल से कहबे ने करत आ कहत जे जुगे बदलि गेल। तहमे तेहेनठाम देखाएत जे अनेरे देहमे झड़क उठत। सासुकेँ उनटा-पुनटा पुतोहू कहथिन तइकाल जुग बदलि गेल। मुदा सासुक लगाओल फुलवाड़ीकेँ कते समृद्ध बनेलौं तइ काल...। जहिना अपन बाप-माए लगसँ कानि कऽ एलौं तहिना अहू परिवारकेँ कनाएब। अनठा चौकपर पहुँचलथि। चौकपर पहुँचते चाहक दोकानमे गदमिशान होइत रहए। चाह पीबनिहार अपना धुनिमे आ दोकानदार अपन धुनिमे। चाहबला आगि-अगोंड़ा होइत जे सभटा फोकटिया आबि बैस पँूजी बुड़बै पाछु अछि। गिलासपर गिलास चाह ढारने जाइए आ पाइक कोनो पते नै। मुदा खुलि कऽ ऐ दुआरे नै बजैत जे अखन दोकानपर सँ थोड़े चलि गेल जे बुझबै पाइ बुड़ि गेल। तँए दम कसि लिअए। ओना भीतर शंका पुन: उठि जाइ। चेहरा मिलानी करै तँ वएह चेहरा बुझि पड़ै जे अधासँ बेसी ओहन अछि जे सौ-पचास पीब-पीब कऽ दोसर दोकान पकड़ि लेने अछि। किछु जे अछि ओकरासँ कोनो नै कोनो काज हेबे करत। तँए पहिलुके उपकार ने पछाति जुआ कऽ नमहर भऽ जाइए। तँए मुस्की दऽ मन माड़ि लिअए। मुदा चाह पीबनिहारक उत्साह भिन्ने रहए तँए चाहबला दिस कियो तकबे ने करैत। खाली एतबे कहैत जे दूध जरा कऽ स्पेशल बनाएब। गप्पोक धारा एहेन रहै जे, जहिना जुलूशमे लोक पएरमे लगैत गंदगीकेँ रास्तापर आरो चारि बेर रगड़ि आगू बढ़ैए। एक संग अनेको पर्व। लोक भलहिं लोकसँ जते हटि जाए, मुदा पावनि थोड़े हटत। कम-बेसी भलहिं भऽ जाए। अजीव-सिनेहक संग राधा-कृष्ण बाँहि-मे-बाँहि जोड़ि झूला झूलैत छथि। भाए-बहिनक बीच एहेन पर्व दोसर कहाँ अछि। भरदुतिया तँ भरदुतिये छी। कमलाक जल सेहो बैद्यनाथ बाबाकेँ विदेसरमे भेटबे करतनि। अजीव उमंग-उत्साहसँ हँसिते-हँसिते महिना दिनक संकल्प निमाहि लैत छथि। नित्यानन काकापर नजरि पड़िते प्रेम कुमार चाहेक दोकानपर सँ कहलकनि- “काका, एतै आउ। सभकेँ-सभ छथि।” मुस्की दैत नित्याननकाका कहलखिन- “खाली लोकेटा नै ने फगुआक रमझौआ होइए। ऐ मे की सुनब आ की बाजब। तइसँ नीक बाहरेमे आबह। चौसठिम स्वतंत्रता दिवसक बरखी छी, नै पान तँ पानक डंटियो लऽ कऽ सुआगत करबे करबनि।” तहीकाल अंगनाक समाचार नेने बेटा पहुँचलनि। हाथसँ आँखि मलि-मलि बलौसँ ललिया-करिया नोर बहबए चाहैत। बेटाकेँ बजैसँ पहिने पूछि देलखिन- “किअए मन मन्हुआएल छह?” “दुनू-गोटे -सासु-पुतोहू- अंगनामे झगड़ा करै छथि।” “झगड़ा शान्त करितह िक कहए एलह?” “हमर बात के सुनत।” मुस्की दैत नित्याननकाका घर दिस विदा भेला। जते घर लग आएल जानि तते झगड़ो नरमाएल जाइत रहए। सुनै दुआरे कक्को छोटकी डेग बनबैत। मुदा जहिना-जहिना डेग छोट होइत जानि तहिना-तहिना अछियाक मुरदा जकाँ झगड़ा शान्त भऽ गेल। दुआरपर पहुँचते देखलनि जे जहिना भारी काज केलापर वा रौदाएल एलापर छाहरिमे ठाढ़ भऽ नमहर-नमहर साँस लैत तहिना अंगना-दलानक कोनचर लग ठाढ़ भऽ साँस छोड़ि रहल छथि। आगू आँखि उठा देखलनि तँ पुतोहू थारी-लोटा मँजैबला ओचौन लग ठंठाइते साँस छोड़ि रहलीहेँ। बजैत कियो नै। जहिना मुकदमाक खलीफा मुद्दालह बनि लड़ैमे प्रतिष्ठा बुझैत, तहिना दुनू गोटे। मनमे उठलनि ककरो प्रतिष्ठाक सीमामे नै जेबाक चाहिऐक। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। १.जवाहर लाल कश्यप २.रामदेव प्रसाद मण्डल झारूदार३. लक्ष्मी दास ४.उमेश मण्डल ५.मिथिलेश मण्डल १ जवाहर लाल कश्यप (१९८१- ), पिता श्री- हेमनारायण मिश्र , गाम फुलकाही- दरभंगा। एक टा विहनि कथा हम्मर माय तोहर माय बेमार बुढ मायक ठीका अहीं लेने छी, औरो बेटा छन्हि ने, हुनकर कनियाँ सभ चैनसँ रहथि आ हम बुढ आ बच्चामे परेशान रहू। ई नै हएत। कनियाँक बात सुनि हम सोचलहुँ जे छोटकाकेँ फोन कऽ कहि देब जे मायकेँ छ महिना अपना लग राखि लहक ,तोरो तँ माय छथुन्ह्। तखने बचपनक एकटा बात मोन पड़ि गेल ,बच्चामे दुनु भाय झगड़ा करैत छलहुँ जे हम्मर माय-हम्मर माय आ आब ओकरासँ पिन्ड छोड़ा रहल छी तोहर माय -तोहर माय। २.रामदेव प्रसाद मण्डल झारूदार अल्लूक चुमौन निरमली बाजारसँ डेढ़ियापर पहुँचले रही कि दुनमाकाका पुछलनि- “झारू, बड़ चलती देखै छियह। कि बात छिऐ?” गोसाँइ डूमि गेल मुदा अन्हार नै भेल रहए। एक तँ, नहेनौ ने रही से खौंत दैत रहए दोसर, चाइनिक झमारसँ सेहो पस्त रही। विचार रहए जे नहा कऽ किछ खाएब तखने मन असथिर हएत। कहलियनि- “कक्का, बजारेसँ अबैमे अबेर भऽ गेल। बरियाती जेबाक अछि।” महिना अजमबैत दुनमाकाका कहलनि- “केकर?” कहलियनि- “अल्लू भायकेँ।” “ओकरा तँ परोड़ियाहीवाली काकी छेबे करै तखैन दोहरा कऽ करत।” “नामे ले ने छन्हि। पकि गेलखिन किनेे?” “पकि गेने क्यो छोड़ि दइ छै?” “से कहलियनि। मुदा ओ मानैले तैयारे नै छथि। कहै छथि जे पुरूखक हड्डी छी किने। चमड़ा घोकचने कि हेतै। अखनो उसैन खोंइचा सोहि कोबीक महफामे बैसा दिअ। तखन जँ उन्नैस भऽ जाएब तब जे कहब मानि लेब।” ३ लक्ष्मी दास अपन सन मुँह नीन टूटि गेल रहए, मुदा विछानपर पड़ले रही आकि मैझला बेटा उठबैत कहलक- “बाबू चितकबरा काकाकेँ खस्सी चोरि भऽ गेल।” पुछलिऐ- “तूँ केना बुझलिही।” कहलक- “एँह, सौंसे गामक सभ बुझलकै।” सगरे यएह गप-सप्प होइ छै। घटनो आ जिगेसोक खियालसँ बिदा भेलौं। चोर-मोट सभ सोझेमे। घटना भेल कते गोटे केसमे फँसल। शुरूमे जमानत-तमानत करा सभ निचेन भऽ गेलौं। बीस बर्ख बाद वारंटक संग चौकीदार पहुँच गेल। बहुत दिन भेने केस फड़ियबैक विचार भेल। विचार इहो भेल जे जेकर घटना छिऐ ओ जँ अपन बूझि खर्च करए तँ नीक बात। अपना सबहक दौड़-बड़हा ओकर खर्च। चितकबड़ाकेँ पुछल गेल। ठोकल मुँहे बाजल- “हमहीं कहने रहिहह।” अपन सन मुँह लेने चलि एलौं। ४ उमेश मण्डल १ कनफेड़सँ मुँहफेड़ बरसपतिबाबाकेँ एहेन दुख जिनगीमे नै भेल छलनि जेहन आइ भेलनि। जखन हुबगर छलाह तखन परोपट्टाक लोक उचित वक्ता मानि ओझराएलसँ ओझराएल पनचैती करबैत छल। मुदा हुबा घटने एहेन दिन देखए पड़लनि। कृष्णदेव मधुबनी कोर्टमे किरानीक नोकरी करैत। जे कियो काजे ओइ ऑफिस गेल सभ बुझैत जे कृष्णदेव केहेन घुसखोर अछि। रेलवे टिकट जकाँ सभ काजक रेट बनौने। संयोगसँ बरसपतिबाबा सेहो एक िदन एकटा काजे गेलाह। मुदा बुझि नै सकलथि जे घुस दऽ कऽ काज भेल। भेलनि जे सरकारी फीस लगल हएत। ऑफिससँ निकलिते एक गोटे पुछि देलकनि- “कते घुस लागल।” “घुस किअए लागत। सरकारी फीस लागल।” एक्के-दुइये जखन चारि-पाँच गोटे कहलकनि तखन मन मानि गेलनि जे फीस नै घुस लागल। मुदा आब उपाए की? कोनो सबूत तँ नै अछि। एकटा उपाए फुड़लनि। ओ ई जे अखनेसँ बाजब शुरू कऽ देब जे कृष्णदेव घुसखोर अछि। सएह केलनि। खूब बदनाम केलनि। समए मोड़ लेलक। बरसपतिबाबाक हूबा सेहो कमलनि। सौ रूपैयाक बेगरता भेलनि। गाममे कृष्णदेवक महाजनी चलैत। बरसपतिबाबा कृष्णदेवकेँ कहलखिन- “किसुन, एक साए रूपैयाक बेगरता अछि, सम्हारि दाए।” मौका पाबि, जहिना बगड़ापर बाझ झपटैत तहिना कृष्णदेव ठोकले मुँहेँ उत्तर देलकनि- “बाबा, जँ अहाँकेँ बजैऐक छल तँ हमरो पुछि लइतौं। हम लेलिऐ तँ चौरासी परचार केलौं आ डेढ़ लाख लऽ कऽ जे नोकरी भेल, आ तइपर सँ महीना-महीने भरए पड़ैए, से के बाजत?” कृष्णदेवक बात सुनि बरसपतिबाबा मने-मन विचार करए लगलथि। ठीके कनफेड़सँ मुँहफेड़ भऽ गेल। २ कुसियारक मारि चैत मास। तीनू गोटे सखरा जाइत रही। तीनू गोटे बच्चेक संगी मुदा तीन जातिक छी। एक सिंहजी दोसर रायजी तेसर अपने। तीख रौद मुदा पूर्वा सह दैत। रास्ता कातेमे कुसियारक खेत। डमहाएल कुसियार रससँ तड़तड़ करैत। पियासो लगि गेल रहए। कुसियार देख मोन डोलि गेल। हुनका दुनू गोटेकेँ कहलियनि एक छड़ कुसियार खाइक मोन होइए। मन हुनको दुनू गोटेकेँ रहनि मुदा आगू भऽ कऽ बजलौं हमहीं। तीन छड़ कुसियार तोड़ैक सहमति भऽ गेल। एक तँ जुआन दोसर तीन गोटे छी। असगर दुसगर बगबार रोकत तँ मारियो खएत। तीनू गोटे तीन छड़ तोड़ि लेलौं। शुरूमे जँ बुझितिऐ जे असगरोमे तागत होइ छै तँ एहन काजे नै करितौं। पछाति बुझलिऐ। कुसियारक खेतसँ निकलिते रही आकि बगबार आबि कऽ आगूमे ठाढ़ भऽ गेल। हियौलक मुदा बाजल किछु नै। रस्तापर आबि गाछक छाहरिमे तीनू गोटे कुसियार खाए लगलौं। बगबारो आबि, कनी हटि कऽ ठाढ़ भऽ सिंहजीकेँ इशारा देलक। कुसियार खाइते सिंहजीक कानमे फुसफुसा कऽ किदैन कहि देलक। तहिना राइयोजीकेँ केलक। हम असगरे छुटि गेलौं। सनकल आबि कुसियार छीनि पच्चीस कुसियार मारलक आ पचास बेर कान पकड़ि कऽ उठौलक बैसौलक। माइरिक चोट ओते नै लागल जेतैक संगीक किरदानी। रूष्ट भऽ असगरे विदा भऽ गेलौं। थोड़े आगू बढ़ि पाछू घुरि तकलौं तँ रायजीक उपरमे तड़ातड़ि कुसियार बरिसति देखलिऐ। हमर मारि तँ सभ देखनहि छल। तँए कहैक जरूरते नै मुदा रायजीक मारि तँ हम नहि देखने। कनैत देख पुछलियनि- “भाय, किअए ठुनकै छी?” मुदा तैयो सोझ डारिये नै चिक्कारियेमे कहलनि- “जएह गति अहाँक सएह अपनो।” एते गप होइते छल आकि फटाक-फटाकक अबाज हुअए लगल। सिंहजी आ बगबारो गाड़ि गड़ौबलि आ ललका-लककी सेहो करैत छल। हम दुनू गोटे वामा कानक बगलमे हाथ लगा ठीकसँ सुनए लगलौं। गाड़ि पढ़ि बगबार बाजल- “बापेक खेत छलह?” सिंहजी जबाब देलखिन- “जेकरा बात नै ओकरा बाप नै। मुँह चुकरियबैत की बाजल रहह?” जहिना मारि खेलापर चोट लागल रहए आ दुखी भेल छलौं तहिना सबहक देख कऽ खुशियो भेल। हँसी-मजाक करैत तीनू गोरे सखरा भगवतीक दर्शन कऽ घुमलौं। ५ मिथिलेश मण्डल मरनी बेटी जिनगीमे पहिल खेप रविया माएकेँ बृद्धा पेन्सन भेटलनि। मन खुब खुशी भेलनि जे सरकारमे हमरो हिस्सा अछि। विडियो सहाएब अपने हाथे बँटता तँए घूस-पेंचक डरे नै। तहुमे गामेक स्कूलपर आबि कऽ बँटता। पता लगल जे विडियो सहाएब बेरादरे छथि। तँए ओढ़ि-पहिर कऽ जाएब जरूरी अछि। पुतौहूबला चपलो आ साड़ियो पहिर विडियो सहाएबक सोझमे बैसलौं। नाओं पुकार भेल। सहाएबक आगूमे ठाढ़ भेलौं। पुछलनि- “कि नाम?” कहलियनि- “मरनी।” सुनिते कहलनि- “समए बदलि रहल छै, नाम बदलि लिअ।” कहलियनि- “हाकिम, ननीक पोसलो छी आ नानीऐक देल नाउअों छी।” चकोना भऽ विडियो सहाएब पुछलनि- “कि नानिक देल?” कहलियनि- “हाकिम, जन्मे दिन माए मरि गेलि। आेही दिनसँ नानीये पोसबो केलनि आ मरनी बेटी कहि नाउओं रखि देलनि। सियान भेलौं। आब लोक मरनियेटा कहैए।” ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। युवा पीढ़ीक दृष्टि फरीछ निश्शन विहनि कथाकार एवं निबन्धकार श्री मिथिलेश कुमार झासँ हुनक साहित्यिक यात्रा मादेँ मुन्नाजीक भेल गप्प सप्पक मुख्य अंशकेँ अहाँ सबहक सोझाँ राखल जा रहल अछि। मुन्नाजी- अहाँ सक्रियताक संग मैथिली विहनि कथाकेँ अपन रचनाक आदर्श मानि रचनारत छी, कहू जे अपन साहित्यिक रचनाक प्रारम्भ कोना कएल? मिथिलेश कुमार झा- सतमामे पढ़ैत रही । हिन्दी सहित्यक कोनो कविताक अंतमे प्रश्नमालाक बाद भाषा-विस्तारक गतिविधिमे एकटा शीर्षक देल रहै-‘आँधी आई-आँधी आई ’ आ ताहिपर कविता बनेबाक रहै। ततहिसँ हमर साहित्यिक रचनाक आरम्भ अछि। नवम-दशममे आबि मातृभाषाक रूपमे मैथिली रखलहुँ आ रचनाक भाषा स्वभावत: मैथिली भऽ गेल । मुन्नाजी- अहाँ विहनि कथाक अतिरिक्त सुन्दर बाल साहित्य सृजन आ निबन्ध लेखन करैत छी। सभसँ बेशी संतुष्टि कोनो विधाक कोन प्रकारक रचनासँ भेटैछ? मिथिलेश कुमार झा- कोनहु रचनाकारकेँ संतुष्टि तखन भैटै छै जखन ओ अपन मोनक बात ठीक-ठीक अपन रचनामे कहबामे सफल भऽ जाइत अछि आ ओहि बातकेँ पाठक ठीक ओही रूपमे बुझि जाइत छैक । विधाक बात कही तँ हमरा बुझने भिन्न-भिन्न बातक हेतु भिन्न-भिन्न विधाक खगता होइत छै । सभटा बात एकहि टा विधामे कहब मोसकिल। तैं, कोन विधा हमरा संतुष्टि दैए से कहब कठिन । हँ तखन , कविता हमर प्रिय विधा अवस्स थिक । ओना हम बहुत कम कविता लिखि पबैत छी। मुन्नाजी- अहाँ वर्तमानमे बांग्ला परिवेशमे गुजर कऽ रहल छी, तँ कहू जे बांग्ला मध्य मैथिलीक की अस्तित्व लगैछ, दुनूमे की घटी बढ़ी देखाइछ? मिथिलेश कुमार झा- मैथिली आ बांग्ला दुनू बहिनि थिकीह । पहिने बंगलाकेँ मैथिलीसँ प्राण भेटल छलै । एखन मैथिलीकेँ बंगलासँ प्रेरणा भेटै छै । सम्प्रति रचनाक मात्राक स्तर पर , पाठकक संख्याक स्तरपर , पत्र-पत्रिकाक संख्याक स्तरपर , मातृभाषाक हेतु समर्पित व्याक्तिक संख्याक स्तरपर बंगला मैथिलीसँ बड्ड बेसी आगाँ ठाढ़ अछि। बंगभाषी आनहु ठाम बसि गेने अपन भाषा नहि छोड़ैत अछि। मैथिलीभाषी अपनहु घरमे हिन्दी छकरै छथि। भाई , कतेक कहब…. बड़ अन्तर छै । मुन्नाजी- अहाँ अपन एकान्त सृजनमे सृजनरत छी, जखन की मैथिली साहित्य मध्य समूहबाजी डेग-डेगपर देखा पड़ैछ। एनामे अहाँक एतेक निश्शन रचना देबाक पछातियो साहित्यपट सँ हेरा जेबाक वा वेरा देबाक सम्भावनाक शंका नै देखाइए? मिथिलेश कुमार झा- हमरा ने तँ गोलैसी करऽ अबैत अछि आ नै ओइमे विश्वास अछि। एकटा सुच्चा रचनाकारकेँ अपन रचनाकर्मसँ सरोकार राखक चाही सन्तकेँ सन्त कहक चाही-बस्स। हेरा जेबाक किंवा वेरा देल जेबाक मादें कोनो शंका हमरा नहि अछि । किएक तँ जे सुच्चा लोक छथि से तँ एना नहिए टा करताह । आ जे गोलैसी केनिहार आ तबेदारी प्रकृतिक स्वार्थी लोक छथि से ककरो नहि, कोन गड़े कखन केम्हर बैसताह से बूझब ब्रह्मो लेल असंभव । तैँ हुनकर चिंता बेकार ! मुन्नाजी- महानगरक व्यस्त जिनगी मध्य अहाँक सोच सामाजिक उकस-पाकसकेँ बड्ड गहींरसँ नापि सृजन करबामे सफल होइत देखार भेल अछि। एकर कोनो विशेष मूल-मंत्र तँ नै अछि। मिथिलेश कुमार झा- महानगरमे रहितो हमर आत्मा गामेमे बसैए । संगहि जीवन-संघर्ष आ सामाजिक सरोकारक अनेक तीत-मीठक अनुभवकेँ हमर मूल-मंत्र अहाँ कहि सकैत छिऐ। मुन्नाजी- अहाँ पत्रकारितामे सेहो अपनाकेँ अजमेलौं मुदा आब ओइसँ विमुखता देखाइछ, ओकर की मूल कारण अछि? मिथिलेश कुमार झा- हम पत्रकारितामे अपनाकेँ एखनहु अजमा रहल छी । के कहलक जे हम ओइसँ विमुख भऽ गेलहुँ ? ‘मिथिला चैम्बरक सनेस’, ‘श्री मिथिला’, ‘मिथिला समाद’, मिथिला दर्शन’, ‘कर्णामृत’ आदि मैथिलीक पत्र-पत्रिकामे हमर आलेख आ रिपोर्ट सभ पत्रकारिता नहि तँ आर की थिक? हँ , तखन वृत्तिक रूपमे सहायक संपादक , रिपोर्टर आदि क्षेत्रमे (हिन्दी पत्रकारितामे) हम फिट नहि भऽ सकलहुँ । श्री संतोष सिंह झा हमरा गौहाटी बजेबो केलाह तँ कतिपय कारणे हम नहि जा सकलहुँ , से बात फराक । मुन्नाजी-मैथिली पत्रकारिताक वर्तमान दशा आ भविष्यक दिशा अहाँक नजरिमे केहेन देखाइछ? मिथिलेश कुमार झा- मैथिलीमे साहित्यिक पत्रिका सभक संगहि ‘समय-साल’ सन समाचार केन्द्रित पत्रिका आ ‘मिथिला दर्शन’ सन पारिवारिक पत्रिका बहार भऽ रहलए । किंतु , बहुत रास रुचि ओ विषय छैक जाहिपर पत्रिका बहार कएल जेबाक चाही –से धरि कोना हो , विचारणीय। सर्वाधिक आवश्यक बाल-पत्रिका अछि जे नहि बहार भऽ रहल अछि । माने, पत्रिकाक स्तरपर पत्रकारिता एक-भगाह अछि । दैनिक पत्रक नाम पर ‘मिथिला समाद’ निकलि तँ रहलए अवस्स उदा मजगूत नहि भऽ सकलए । सभ मिला कऽ मैथिली पत्रकारिताक वर्तमान संतोषजनक नहि कहल जाए । तखन, एकर भविष्यक प्रति आशा राखि सकैत छी । मुन्नाजी- मैथिली विहनि कथा (लघुकथा)पर वर्तमान क्रियाकलापेँ एकर वर्तमान आ भविष्य केहेन देखा पड़ैछ। एकरा फरीछ हेबा लेल आओर की सभ कमी देखाइछ? मिथिलेश कुमार झा- मैथिली विहनिकथाक मोजर आरंभ भऽ गेल अछि । वर्तमानमे ई विधा जड़ि जमा लेलक अछि । एकर भविष्य खूब नीक छै आ ई सर्वाधिक पढ़ल जाएबला साहित्यिक विधि बनि जाएत से हमरा पूर्ण विश्वास अछि । एहि विधाकेँ आओर लोकप्रिय बनेबाक लेल आ निस्सन करबाक लेल रचनाकार लोकनिकेँ सचेत भऽ कऽ मेहनति करक चाहियनि। एकर एक-एकटा शब्दक अपन ओजन होइत छैक, तैं धरफरा कऽ विहनि कथा नहि लिखल जेबाक चाही । धरफरी मे रचना कएने ई चुटुक्का बनि जा सकैछ आकि निंगहेस भऽ फेका जा सकैछ। मुन्नाजी- विहनि कथापर पूर्वक पीढ़ी (पुरान आ मध्य) द्वारा कएल गेल काजकेँ अहाँ कोन रूपेँ मूल्यांकन करब। ओकर निरन्तरतामे नवका पीढ़ीक योगदानकेँ कोना सोझाँ आनऽ चाहब? मिथिलेश कुमार झा- विहनि कथापर पुरनका पीढ़ी जे काज कएलनि से आरंभिक काज छलै। ओ लोकनि न्यो तैयार कएलनि, दाबा जतलनि आ ताहिपर नवका पीढ़ी देबाल ठाढ़ कऽ रहल छथि। आबऽ बला खाढ़ी ओइपर महल बनाओत । पुरनका पीढ़ीक समय आ परिवेशसँ एखनुका पीढ़ीक समय आ परिवेशमे बेस अन्तर एलैए। आ तै’, ई अन्तर विहनिकथाक कथ्यक विविधताक रूपमे सोझाँ देखार भऽ रहलए । एना कही जे एखन एकर कथ्य ओ शैलीमे स्वाभाविक रूपें नवीनता ओ विविधता एलैए । जीवन ओ अनुभवक प्रत्येक क्षेत्रमे हुलकी दैत सन लगैए वर्तमानक विहानिकथा। मुन्नाजी- मैथिली बाल साहित्यक स्थिति केहेन देखाइछ। अकादेमी द्वारा बाल साहित्यक घोषणासँ एकर भविष्य कतेक प्रभावित हएत (घटी-बढ़ी दुनू दृष्टिएँ)? मिथिलेश कुमार झा- मैथिली बाल साहित्यक स्थिति दयनीय ओ चिंतनीय अछि। तथापि एहि क्षेत्रमे ऋषि वशिष्ठ, महाकान्त ठाकुर, जीवकान्त, अनमोल जी, वियोगी जी आदि नीक काज कऽ रहलाहेँ। बाल-साहित्यक क्षेत्रमे हम अपनहुँ सचेष्ट रहैत छी। आर अधिक प्रयासक बेगरता अछि। साहित्य अकादेमी द्वारा बाल साहित्य पुरस्कारक घोषणासँ बाल साहित्यकार प्रोत्साहित होएताह। पोथी सभ प्रकाशित होएत। बाल साहित्यक मोजर बढ़त । बाल साहित्यक रचनाकार अपनाकेँ अबडेरल नहि बुझताह । किंतु ,पुरस्कारक लोभमे बाल साहित्यक नामपर अँकटा-मिसिया ने छपय लागय से चिंता स्वाभाविक रूपें उभरि आयल अछि । एहि हेतु सभ गोटे सतर्क रही । मिथिलेश कुमार झा 1970- पिता- श्री विश्वनाथ झा, जन्म-12-01-1970 केँ मनपौर(मातृक) मे पैतृक-ग्राम-जगति, पो*-बेनीपट्टी,जिला-मधुबनी, मिथिला, पिन*- 847223 शिक्षा :प्राथमिक धरि- गामहिक विद्यालय मे। मध्य विद्यालय धरि- मध्य विद्यालय, बेनीपट्टी सँ। माध्यमिक धरि- श्री लीलाधर उच्च विद्यालय,बेनीपट्टीसँ इतिहास-प्रतिष्ठाक संग स्नातक-कालिदास विद्यापति साइंस काँलेज उच्चैठ सँ, पत्रकारिता मे डिप्लोमा-पत्रकारिता महाविद्यालय(पत्राचार माध्यम) दिल्ली सँ, कम्प्युटर मे डी.टी.पी ओ बेसिक ज्ञान। रचना: कविता, गजल, बाल कविता, बाल कथा,साहित्यिक ओ गैर-साहित्यिक निबंध, ललित निबंध, साक्षात्कार, रिपोर्ताज, फीचर आदि। २ मिथिलेश कुमार झा पजुआरिडीह टोलमे रंगमंच मधुबनी जिलाक पजुआरिडीह टोलमे १५० ई. मे श्री कृष्ण नाट्य समितिक स्थापनाक संग नाट्य मंचन प्रथाक सुदृढ़ परम्पराक प्रारम्भ भेल जे श्री कृष्ण चन्द्र झा "रसिक"क नेतृत्वमे होइत रहल। १९६६ ई. मे "बसात" आ तकर बाद "चिन्नीक लड्डू" १९७० ई. सँ श्री शिवदेव झा एकरा आगाँ बढ़ेलन्हि जे विद्यापति (१९६७), उगना (१९७०), सुखायल डारि नव पल्लव (१९७५), काटर (१९८०), कुहेस (१९८५)सँ आगाँ बढ़ल। १९९० ई.सँ गाममे काली पूजा प्रारम्भ भेल, ओतए चारि रातिमे एक राति मैथिली नाटक श्री गंगा झा क निर्देशनमे हुअए लागल। १९९०- बड़का साहेब - लल्लन प्रसाद ठाकुर १९९२- लेटाइत आँचर- सुधांशु शेखर चौधरी १९९३- कुहेस- बाबू साहेब चौधरी १९९४- समन्ध- कृष्णचन्द्र झा "रसिक" १९९५- बकलेल - लल्लन प्रसाद ठाकुर १९९६- उगना- ईशनाथ झा १९९७- अन्तिम गहना- रोहिणी रमण झा १९९८- आतंक- अरविन्द अक्कू १९९९- प्रायश्चित- मंत्रेश्वर झा २००१- फाँस- मूल बांग्ला एस. गुहा नियोगी, अनुवाद- रामलोचन ठाकुर २००२- राजा शैलेश- कृष्णचन्द्र झा "रसिक" २००३- अन्तिम गहना-- दोहरायल गेल २००४- उगना- - दोहरायल गेल २००५- किशुनजी- किशुनजी- मूल बांग्ला श्री मनोज मित्र अनु. रामलोचन ठाकुर २००६- कालिदासक बखान- ? २००७-लौंगिया मिरचाई- लल्लन प्रसाद ठाकुर २००८- पहिल साँझ- सुधांशु शेखर चौधरी २००९- कुहेस- - दोहरायल गेल २०१०- ताल मुट्ठी- अरविन्द अक्कू ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। १.उमेश मण्डल- सगर राति दीप जरए, हजारीबाग २.पूनम मंडल- १.दिल्लीमे गूंजल मैथिली कविता २.५१ साझा पुरस्कारक घोषणा १ उमेश मण्डल सगर राति दीप जरए, हजारीबाग 10 सितम्बर साँझ 7बजेसँ 11 सितम्बरक भिनसर 6बजे धरि ‘सगर राति दीप जरय’क 74म कथा गोष्ठी श्री श्याम दरिहरे जीक संयोजकत्वमे सिन्दूर कैम्प हजारीबाग (झारखण्ड) मे सु-सम्पन्न भेल। गोष्ठीक अध्यक्षता केलनि- श्री रमानन्द झा ‘रमण’ आ मंच संचालन श्री कमल मोहन चुन्नूजी। झारखण्ड आ बिहार दुनू ठामक कथाकार अपन-अपन नूतन कथा/लघुकथाक पाठ केलनि यथा- सुन्दर भेल मधाई (प्रदीप बिहारी), अपन सन मुँह (लक्ष्मी दास), कचोट (शशिकान्त झा), अल्लूक चुमौन (रामदेव प्रसाद मण्डल ‘झारूदार’), मरनी बेटी (मिथिलेश मण्डल), कनफेरसँ मुँहफेर आ कुसियारक मारि (उमेश मण्डल), सुगन्धा (चौधरी जयंत तुलसी), भवडाह (जगदीश प्रसाद मण्डल), अधिकार (बेचन ठाकुर), एकरा की कहबै (रामविलास साहु), मदिराक प्रभाव (शिवकुमार मिश्र), पोस्टमार्टम (संतोष कुमार झा), महादुखी वा महासुखी (धनाकार ठाकुर), बौआइत मनोभाव (गिरजानन्द ठाकुर), टीश (अशोक) आ गामक सुगंध इन्टरनेट (श्याम दरिहरे)। पठित कथा आ लघुकथापर दू-टप्पी समीक्षा सेहो भेल।
ऐ अवसरपर पाँच गोट मौलिक आ दू गोट अनुदित पोथीक लोकार्पण भेल यथा- (1) मिथिलाक इतिहास (प्रो. राधाकृष्ण चौधरी) लोकार्पण श्री जगदीश प्रसाद मण्डल द्वारा। (2) A survey of Maithili literature (प्रो. राधाकृष्ण चौधरी) लो.- श्री अशोक। (3) कलानिधि (कालीकान्त झा ‘बूच’) लो.- श्री प्रदीप बिहारी। (4) रहए चाहैए गाछ (जीवकान्त) लो.- श्री तुलानन्द मिश्र। (5) धूंध के बावजूद (अजीत कु. आजाद) लो.- श्री जगदीश सिंह। (6) कठिन समय मे शब्द, हिन्दीक मैथिली अनुवाद (अजीत कु. आजाद) लोकार्पण- श्री जीवेन्द्रनाथ झा। (7) परती टूट रही है, मैथिलीक हिन्दी अनुवाद (अजीत कुमार आजाद) लोकार्पण- श्री रमानन्द झा ‘रमण’ द्वारा। सगर राति दीप जरय'क 75म आयोजन श्री अशोक जीक संयोजकत्वमे पटनामे 10 दिस्मबर 2011केँ होएबाक संभावना।
२ पूनम मंडल - १ दिल्लीमे गूंजल मैथिली कविता देशक राजधानी दिल्लीमे साहित्यिक, सांस्कृतिक आ सामाजिक संस्था 'मिथिलांगन" द्वारा आयोजित कवि गोष्ठीमे मैथिली कविता आ गीत खूब गूंजल। अवसर छल साहित्य अकादमी पुरस्कारसँ सम्मानित डॉ. ब्रजकिशोर वर्मा 'मणिपद्म" क जयंतीक। आयोजन रविवार, 11 सितम्बर, 2011 केँ राजघाट स्थित सत्याग्रह मंडपमे कएल गेल। विशाल मैथिली कवि गोष्ठीमे मैथिली भाषाक युवासँ लऽ कऽ मूर्धन्य कवि अप्पन विशिष्ट कविताक पाठ कऽ उपस्थित श्रोताकेँ मंत्रमुग्ध कऽ देलन्हि। कवि गोष्ठीक अध्यक्षता पटनासँ पधारल वरिष्ठ हिन्दी-मैथिली कवि डॉ. ललित कुमुद आ संचालन प्रख्यात कवि-नाटककार कुमार शैलेन्द्र केलनि। ऐ कवि सम्मलेनमे कविता पाठक आरंभ युवा कवि विनीत उत्पल अप्पन दू टा कवितासँ केलखिन। एक्कर बाद युवा कवि किशन कारीगर, स्तुति नारायण, विनीता मल्लिक, रमण कुमार सिंह, गीतकार मानवर्धन कंठ, शारदा नन्द दास 'परिमल", 'तुरंता" लेल जानल जाएबला वरिष्ठ कवि रवींद्र लाल दास 'सुमन", रवी-वीन्द्र-महेंद्रक जोड़ीक रवींन्द्र नाथ ठाकुर, कुमार शैलेन्द्र आ शेफालिका वर्मा अप्पन कविताक पाठ पढ़लनि। ब्रह्मदेव लाल दासक मोन ठीक नै छल तेँ ओ उपस्थित नै भऽ सकलाह आ हुनकर कविताक पाठ हुनकर पुतोहु सरिता दास केलनि। समारोहक आरंभ प्रसिद्ध मैथिली गायक सुंदरमक नेतृत्वमे मिथिलांगन सांस्कृतिक दलक स्वागत गानसँ भेल। तकर बाद डॉ. शेफालिका वर्मा आ डॉ. ललित कुमुद मणिपद्मजीक व्यक्तित्व आ कृतित्व केँ लोकक आगू राखलखिन। समारोहमे मैथिली भाषाक विशिष्ट साहित्यकार रमानंद रेणु, मार्कण्डेय प्रवासी, फजलुर रहमान हासमी हिनका सभक निधन केँ लऽ कऽ शोक व्यक्त सेहो कएल गेल। संगे-संग दिल्ली उच्च न्यायालय लग भेल बम विस्फोटमे घायल भेल आ मारल गेल निर्दोष लोकक आत्माक शांति लेल दू मिनटक मौन सेहो राखल गेल। कवि गोष्ठीमे शामिल सभटा कविकेँ मिथिलांगनक स्मृति चिन्ह देल गेल आ हुनका सभसँ संस्थाक सचिव अभय कुमार लाल दास आभार व्यक्त केलनि। २ ५१ साझा पुरस्कारक घोषणा नेपालक साझा प्रकाशन २०६७ सालक विभिन्न विधाक पुरस्कारक घोषणा केलक अछि। -“ थारू लोककथा १’ कृति लेल रु. १५ हजार राशिक लोक-साहित्य पुरस्कार लेखक कृष्णराज सर्वहारीकेँ -रु १५ हजार राशिक “‘नयाँ साझा लोक संस्कृति पुरस्कार “‘तराईको फाँटदेखि हिमालको काखसम्म” कृति लेल “रामभरोस कापडी “‘भ्रमर”केँ - २०६७ सालक रु १५ हजार राशिक साझा बाल-साहित्य पुरस्कार- “अन्तरिक्ष र गाउँघरका कथा” कृति लेल साहित्यकार विजय चालिसेलाई केँ -रु. १०–१० हजार राशिक गरिमा सम्मान पुरस्कार–२०६७ पद्य विधा “ ‘समर्पण” शीर्षक कविताक लेल कवि निभा शाह, गद्य विधा “युग” शीर्षक कथाक लेल कथाकार वैजयन्ती मिश्र आ “‘चकछिन्ना” शीर्षक कथाक लेल कथाकार इन्द्रिस सायललाई केँ। - प्रकाशनक अध्यक्ष तथा महाप्रबन्धक ममता झाले जानकारी देलन्हि। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। चन्द्रेश रचनात्मक बिमर्शक अयनामे ‘चिड़ै’ सुजीत कुमार झाक कथा संग्रह ‘चिड़ै’ पढलहुँ । जुआनीक उन्मादमे भावुक रोमानीपनक गन्ध नेने कतिपय कथा आएल अछि । अल्हड़ जुआनी आ प्रेमक उन्मादमे लिखल गेल कथा अबस्से युवा मोनकेँ गुदगुदी लगबैत छुवैत अछि, तन–मनकेँ झंकृत करैत अछि । सहज सहानुभूतिमे उपजैत हृदयक टीस मोनमे उभरि अवैत अछि । एक दिस व्यथा–कथाक उपजामे टीसैत करुणा अछि तँ दोसर दिस पीड़ित ताप । खौंझाइत मोनक बौद्धिक चेतना जाग्रतावस्थामे अपन दम–खम रखैत अछि । मानबीय मूल्य बोधक प्रति कथाकार सतर्क, सचढ ओ सम्वेदनशील छथि । निस्सन्देह कथाक दुआरि पर सुजीतकुमार झा क ‘चिड़ै’ कथा–संग्रहक स्वागत अछि । स्वागत एहि द्वारे नहि जे ओ भावुक मोनक कथाकार छथि । ओ अवस्से भावुक मोनक कथाकार छथि । भावुकतामे प्रवहित होइत हिनक कथा आवेशी स्वर नेने अछि । मुदा, जतेक दूर धरि ओ भाव प्रवणतामे संवेदनशील मोनक संवेदनाकेँ छुवैत छथि से हमरा नीक लगैत अछि । संगहि, सरलता ओ सहजतामे वैचारिक भाव–भूमि पर उतरैत स्त्री–पुरुष दूनु वर्गक संकुचित दृष्टिकोणकेँ बेरबैत छथि से विशेष कऽ आह्लादित करैत अछि । भनहि हिनक अजोह मोनमे भोगबादी दृष्टिकोणक प्रति आक्रोशक ज्वारि किएक नेँ वेसिए छिटकैत होअय । ओ लिखैत छथि सिखवाक चाही । अहिमे परिपक्वता चाहवे करी । जेना जेना लेखन–संसारमे ओ कलम चलओताह तेना–तेना शिल्प आ कथ्यमे तालमेल होयवे करत, ठोस बैचारिकतामे सूक्ष्मताक संगे नव दृष्टि प्रदान करवे करत । सुप्रसिद्ध साहित्यकार डा. धीरेन्द्र सँ प्रभावित भऽ नेपालक आधुनिक मैथिली साहित्य अवश्य भरखार भऽ रहल अछि । अहिमे निर्विवाद रुपे कथाक क्षेत्रमे सर्वश्री रामभरोस कापडि ‘भ्रमर’, डा. रेवती रमण लाल, डा. राजेन्द्र प्रसाद ‘बिमल’, अयोध्यानाथ चौधरी, भुवनेश्वर पाथेय आदि अपन औकादि देखा चुकल छथि । इ हम गछि ली जे डा. धीरेन्द्रक दू कोटिक रचना अछि । उत्मकोटी आ निम्न कोटीक । ओ जँ निम्नकोटीक रचना करवो कएलन्हि तँ ओहनो रचना आइ रचनाकारक हेतु चुनौती थिक । डा धीरेन्द्रक रचना संसारकेँ कखनो अवडेरल नहि जा सकैत अछि । जेकी सुजीत कुमार झाक कथाकार विशेषतः प्रेम ओ काम वासना विषयक कथावस्तुकँे आधार बनौलन्हि अछि से हिनक डा. धीरेन्द्र ओ हुनक परवर्ती कथाकार भ्रमर, विमल आ थोड़ अंशमे रेवती रमण लालक परम्परामे लऽ अवैत अछि । ओना सुजीत कुमार झा सँ पूर्वक पीढीक कथाकार यथा सुरेन्द्र लाभ, श्यामसुन्दर कामति ‘शशि’ रमेश रञ्जन आदिक रचनात्मक धारा निर्विवाद रुपे डा. धीरेन्द्रक परम्परा सँ प्रभावित होइतो अछिए किछ हटि कऽ अपन विषय बस्तुकेँ प्रतिपादित करैत अछि जे भरिसक भुवनेश्वर पाथेयक परम्परामे कहि सकैत छी जे अनैत अछि । जेकी सुजीत कुमार झा संघर्षरत कथाकार छथि । तएँ हिनक ठोस आ सूक्ष्म दृष्टिक प्रतीक्षा अछि जे कोन धार लऽ भविष्यमे अपनाकेँ प्रतिष्ठापित करताह । ओना परम्परा सँ उद्धृत भऽ आधुनिकताक संग नव दिशा दृष्टि सँ कऽ आयव अवश्य स्वागत योग्य थिक । आजुक युगमे कथा वेस पढल जाइत अछि । कथा लिखब ततेक सहज ओ सरल नहि अछि । आर किछु नहि तँ कथाकारकेँ एतेक ध्यान रखैये पडैत अछि जे कथा मूल्यबोध बनय । मुदा, देखवाक थिक जे मूल्य सोझे कथ्य पर ने हावी भऽ जाय । तएँ परिवेश ओ वातावरणक माध्यमे कालगत चेतनाक संग जँ मूल्यबोध कथ्यमे रचि–पचि कऽ आवय तँ निश्चिते कथाक चमक किछ खास होयत अछि । एकर अर्थ ईहो नहि लेवाक अछि जे परिवेश ओ वातावरणक धोन्हि लगा कऽ तेनाकऽ बोझिल बनाओल जाय जे ओहि तरमे कथ्य दवि कऽ रहि जाय अर्थात खुजि ने पावय । प्रेम जीवनक अहम हिस्सा थिक जकरा नकारब सरासर बेइमानी होयत । प्रेमक दंश ततेक मारुक होयत अछि जे आत्महत्या धरि करबाक लेल लोक उद्यत भऽ जाइत अछि, करितो अछि । अर्थात अहि दंशमे पीड़ित लोककेँ एको घोंट जलो पीबक सुअवसर नहि भेटैत अछि । कतिपय प्रेम परक कथा उदाहरण परक थिक । तएँ प्रेम अमर थिक । प्रेमक अनुभूति स्वतः होइत अछि । प्रेम ओ बासना दूनु दू बस्तु थिक, एक दोसर सँ अलगहे फराक । एहि बातकेँ सुजीत कुमार झाक कथाकार नीक जकाँ जनैत–बुझैत अछि । ओ ‘चिड़ै’ कथामे प्रेमक सार्थक अनुभूति करवैत अछि । एहिमे त्रिशंकु बनल ‘मनोज’ क चित्रण कऽ प्रेमक रुपकेँ बासना सँ फुटकाओल अछि । मोनकेँ बहटारबाक हेतु मोन मिलानी करब फरक बात थिक तएँ सिद्धान्तकेँ व्यावहारिकतामे उतारब दोसर बात । कारण, सामाजिक मर्यादा ओ व्यवस्थाक अंकुश लगले रहैत अछि । तएँ तऽ उषाक कामुकताकेँ अनदेख कऽ ‘नलिनी’ क मर्यादित छविमे अपनाकेँ समंजस्य स्थापित कऽ मनोजक व्यवहारिक वुद्धि जे अपन असली छवि प्रकट कयलक अछि से अवस्से उषा सन नारीक लेल सबक थिक । ‘प्रियंका’ मे दैहिक भोग आ नाम ओ यशक लेल ‘प्रियंका’क मृग मरीचिकामे बौआइत – भटकैत रहब अवस्से नारीक चरित्रगत सामाजिक पतन थिक । ‘बरखीक भोज’ मे माधुरीक अपन पिता सदृश बुढकेँ खुआयव से पिताक बरखी पर आत्मतृप्ति मूलक थिक । ‘बाबाजी’ मे अपन माय–बापक जीवैतमे तिरस्कार आ मृत्योपरान्त बेटा–पुतहुक नोर चुआवय आम बात थिक । एकरे कथाकार आधार बना कऽ ‘रुवी’ अर्थात पोतीक सूक्ष्म दृष्टि ओ बुद्धिक माध्यमे अपन बातकेँ आगा रखलन्हि अछि । रुवी सभ किछ जनै बुझैत अछि तएँ बजैत अछि जे ‘बेकारमे सभ गोटे अपन नोर बरवाद कऽ रहल अछि ’ । ‘बंश’ मे बेटीक महत्ता पर जोर दऽ चरित्रगत संस्कार पर विशेष बल देलगेल अछि । एहिमे कथाकार ओहि बनल–बनाओल धारणाकेँ तोड़ल अछि जे आजुक समाजमे जतय बेटी आभिशाप बनल अछि से बात शत–प्रतिशत असत्य थिक । नारीक चेतनापरक कथाकेँ उभारल गेल अछि । ‘बनैत–बिगरैत’ मे शिक्षक ‘महेन्द्र बाबु’ क माध्यमे हिनक स्थिति–परिस्थितिगत चित्रण कऽ मानसिक ऊहा पोहकेँ उभारल गेल अछि । हिनक दूनु पुत्र ‘नागेश्वर’ आ ‘सुरेश्वर’क बीचक भैयारीगत मनोमालिन्यकेँ उभारैत बीचक सम्वन्ध देखाओल गेल अछि । जेठ पुत्र ‘नागेश्वर’ केँ महत्वकाँक्षा कहैत छैक तँ सुरेश्वरक व्यवहारिक वुद्धि फलित होइत छैक तकर चित्रण भेल अछि । नागेश्वरक स्त्री ‘हिरा’ केँ तीक्ष्ण बुद्धि ओ चातुरीक कुशलताक संग चित्रित कऽ कथाकार कोनो परिवारमे सामंजस्य राखवामे नारीक वुद्धि ओ कौशलक महता प्रतिपादित कयल अछि । ‘ढोल’ मे तएँ नारी व्यथाक चिक्कन–चुनमुन चित्रण भेल अछि । इज्जतिक खातिर डलीक स्थानपर ‘प्रतिमा’ कनियाँ बनलि ओहि कर्नलक जे जीवन भरि पतिक गारि–मारि सहैत रहलि । नारीक विवशताकेँ उदघाटिक कऽ ओकर औनाइत–छटपटाइत मोनक भावकेँ प्रकट कएल अछि । ‘शुन्यताक प्रवेश’ मे आत्मग्लानिवोध देखाओल गेल अछि । ‘भौजी’ मे नारी मोनक पीडा उभरि कऽ ओकर मोनक सार्थक परिणिति देखाओल गेल अछि । ‘धधकैत आगि ः फुटैत कनोजरि’ मे बलात्कारक रंगीन सपना देखव–देखयवाक माध्ययमे सपनाक सत्यता पर प्रश्न चिन्ह लगवैत सपनाकेँ पूmसि मानल गेल अछि । ‘एकटा अधिकार’ मे प्रेमक महता देखा कऽ ओहि अनुभूतिक आँच सँ जीबन आ संघर्षकेँ देखाओल गेल अछि । खास कऽ अन्तिम परिणतिमे देहक रोइया भुटका की दैत अछि जे स्वभाव, बुद्धि आ ऐन्द्रिकताक संगम धरि पहुँचा कऽ अमिट प्रभाव छोडि जाइत अछि । जँ कथाकार कनेक साकांक्ष रहितथि आ साधल कलम सँ लिखल जाइत तँ निश्चिते इ कथा रोमानीयपन चेतनाक उदाहरण बनि अपन स्वरुप महत्तम ऊँचाइ धरि अनबामे सफल होइतय जकर बीज तत्व अहिमे सन्निहित अछि । तैयो ई कथा अबस्से अपन दम–खमक बुत्ता पर फराक स्थान ठमिअवैत अछि । इहो कहि सकैत छी जे हमरा जनैत संग्रहक ई नीक कथा थिक जे नेपालीय मैथिली कथा–साहित्यमे अपन भूमिका निःसन्देह निमाहत । आइ जखन की नेपालमे राजनीतिक उथल–पाथल मचल अछि, हिसां ओ जनक्रान्तिक इतिहास रचल गेल अछि ताहि संकटापन्न विषम परिस्थितिमे सुजीत कुमार झाक कथाकार जे पे्रम ओ सिनेहकेँ जोगा कऽ रखवाक प्रयास भेल अछि से प्रशंसनीय थिक । कारण स्थिति–परिस्थिगत विषम दुःस्थितिमे एहि परिवेशक साहित्यकार क्रान्ति विशेष कऽ रचनामे तल्लीन भऽ एकरे मुख्य धाराक विषय बनयबामे सक्रिय छथि ततय हिनक कथाकार मानवीय प्रेमकेँ बचयबाक प्रयासमे समानान्तर धारा रचवामे तल्लीन भऽ ‘चिड़ै’ कथा संग्रह सृजित कयल अछि । मात्र आशा नहि विश्वास अछि जे सुजीत कुमार झा नेपालक आधुनिक मौथिली साहित्यक एकटा एहन युवा हस्ताक्षर छथि जे समयक संग अनुभवक परिपथ्तामे निश्चिते जटिल यथार्थकेँ आरो गतिशील बना कऽ पाठकक सोझामे प्रस्तुत करताह । निश्चिते भविष्य हिनक छन्हि आ कथाक कुन्जी हाथहिमे छन्हि । हमरा तँ सुजीत कुमार झाक कथाकार पर खौँझी उठैत अछि जे ‘एकटा अधिकार’ सन कथा लिख कऽ कनेक हडवडी किएक केलन्हि ? एहन कथा कहियो काल लिखाइत अछि जे नेपालीय मैथिली कथा साहित्यमे प्रेम जगतक निम्मन उदाहरण बनितय आ बनिते अछि । हमरा जनैत एही एक कथाक बुता पर सुजीत कुमार झा कथाकारक रुपमे जानल –पहचानल जयताह । जखन की हिनकामे जे ऊर्जा छन्हि से आरो कथा लिखवाक उत्स जोगाओले छन्हि । तैयो जाहिया कहियो वा जखन कखनो नेपाली मैथिली कथा साहित्यक चर्चा होयत, कथा जगतक विमर्श होयत, हठात् सुजीत कुमार झाक कथा कोनो ने कोनो रुपमे चर्चाक केन्द्र विन्दु बनवे करत । ओ अपन संगतुरिया कथाकारक रुपमे तँ सहजहि जे अग्रिम पीढीक कथाकारक रुपमे भनहि आइ अचर्चित छथि से अहि पोथी ‘चिड़ै’ केँ लऽ कऽ अपन सार्थक भूमिका निमाहवे करताह । अहि आशा ओ विश्वासक संग हम एतेक अवश्य कहबन्हि जे सीमित अनुभव क्षेत्रकेँ विस्तृत बना कऽ युगक आहटिमे बेस परिपक्वता ओ सन्तुलित ढङ्गे कथा–सृजन करथि । कथा लिखायत, चर्च होयवे करत आ दोसर पोथी नीक, आरो नीक भऽ प्रकाशित होयत । एखन तँ जीरा खसवे कएल अछि, हिलकोर उठवे कएल अछि आ विस्तृत आकाशकेँ हिलोरित करवाक अछिए तँ किएक ने जटिल यथार्थक युगमे नव सनेष लेने सत्यताक दस्तावेज प्रस्तुत कऽ कथा साहित्यक दस्तावेजी साक्ष्य बनी ? यैह बनवाक जे सम्भावना एहि संग्रहमे आएल अछि तएँ हमरा विशेष आह्लादित करैत अछि । ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। विनीत उत्पल कथा- बेसिक इंस्टिंक्ट मामला तँ तखने तूल पकड़ि लेलक जखन ग्वालियरक एकटा बाभन फेसबुकपर कबीरक एकटा दोहा पोस्ट कऽ देलक, "एक बूंद, एकै मलमूतर, एक चाम, एक गूदा/ एक रकत से सबहीं बने हैं को बाभन को सूदा'। मुदा गप पोस्ट करबे टाक नै छल। गप छल जातिवादकेँ लऽ कऽ झगड़ाक। यएह ओ दौर छल जखन कारगिल युद्ध भेल छल आ बरखा दत्त नामक पत्रकार राइते-राति युद्धक रिर्पोटिंग कऽ सभ छौड़ींक 'आइडियल" बनि गेल छल। ओहिनो पत्रकार बनाबैक लेल सभ कोनटामे कुकुरमुत्ता सन मीडिया संस्थान खुजि गेल अछि आ सभटा लड़की ओतएसँ डिग्री लेबाक लेल परेशान रहैत अछि। ई ओ काल अछि जखन नोएडामे आयल अप्पन बरियातीकेँ निशा दहेजक लेल घुरा दैत अछि। ऐ कालमे झारखंडक कोडरमाक रहैवाली पत्रकार निरुपमाक मरब हत्या वा आत्महत्याक बीच झुलले रहि जाइत अछि। फेर मंडल आयोगकेँ लागू करएबला प्रधानमंत्री कैंसरसँ लड़ैत दम तँ तोड़ि दैत अछि मुदा तखन धरि समाजक लोक जागि गेल छल। मंडल-कमंडलक नामपर कतेक लोक मरि गेल मुदा लोकक सपना देखबासँ आ ओकरा यथार्थमे बदलबाक मेहनत करबासँ कियो रोकि नै सकल। ऐ कालमे कतेक सवर्ण एहन आएल जे सार्वजनिक जीवनमे दलितक हिमायती, स्त्रीगणक पैरोकार बनैत छल मुदा वास्तविक धरातलसँ ओ एहन मामलासँ दूरे रहैत छल। नै तँ एहन कखनो नै होइए जे हम जइ संस्कारक गप करैत छी आ कहैत छी जे ई संस्कार घरसँ अबैत अछि आ ओ ओइ घरमे नै हुअए। यएह हाल तँ ओइ छौड़ीक छल जकर बहनोइ सभटा तामझामक संग दलितक पैरोकार बनैत छल। ओकरो सपना 'बरखा दत्त-टू" बनैक छल आ लंदनमे रहैबला लड़कासँ शादीक लेल मना कऽ ओ दिल्ली भागि कऽ आबि गेल छल। दिल्ली तँ ओ अप्पन करियरकेँ नव मंजिल दै लेल आएल छल। पूरा खिस्सा तँ हमरा पतो नै चलतिऐ जौँ ओइ दिन ओकर पागल हइक खबर राष्ट्रीय अखबारमे नै पढ़ितिऐ। फेर दिल्ली राजधानीसँ करीब १५०० किलोमीटर दूर जखन हम मिथिलामे अप्पन खेतमे काज कऽ रहल छी तखन दिल्लीक गप एतए कतएसँ आबि सकैत अछि। हमहू कहियो बड़ पैघ-पैघ सपना देखने रही आ दिल्ली आएल छलहुँ मुदा ओतुक्का रौनक, मंडी हाउस, मेट्रो ट्रेन, कनॉट प्लेस, हैबिटेट सेंटर, प्रेस क्लब सन जगह हमरा प्रभावित नै कऽ सकल। आ फेर हमरा सनक लोककेँ ठामे-ठाम धोखा भेटब, ई कतएसँ बान्हि कऽ राखि सकैत छल। फेर 'बेसिक इंस्टिंक्स" केँ कियो नकारि सकैत अछि की? ओ नवम्बरक मास छल जखन दिल्ली विश्वविद्यालयक दक्षिणी परिसरमे तीन दिनक मीडिया वर्कशॉप भेल छल आ ओइमे हम सेहो हिस्सा लऽ रहल रही। ओ वएह तँ छौड़ी छल जे दरबज्जाक कोनटा लग ठाढ़ि छल, पीयर रंगक टी-शर्टमे ओ गुड़िया जेहन लागैत छल। हमर मित्र कमलनाथ सिंह हमरा ओकरासँ भेँट करौने छल। फेर तँ कखन हम सभ एक-दोसराक दोस्त बनि गेलौं, से पतो नै चलल। गप-शप, भेँट-घाँट रोज हुअए लागल। एक दिन पता चलल जे ओ 'राष्ट्रीय उदय" मे इंटर्नशिप कऽ रहल अछि मुदा ताधरि हम एकटा राष्ट्रीय अखबारमे नोकरी करै लेल अजमेर जा चुकल रही। हँ, हम तँ ओकर नाम बताबैक गप बिसरि गेलौं। छोड़ू, ओहिनो नाममे राखल की अछि? मुदा खिस्साकेँ आगू बढ़ाबैक लेल तँ ओकर नाम बताबैये पड़त। अहाँ सभ किछु सोचै लेल स्वतंत्र छी मुदा हम ओकर असली नाम नै बताएब। एतबेटा जानि लिअ जे ओकर मोबाइलमे हमर नंबर 'परेशान आत्मा" आ हमर मोबाइलमे ओकर नंबर 'हाइली टेंपर" क नामसँ सुरक्षित छल। तँ साहेबान, कद्रदान, पूरा मामला “परेशान आत्मा" आ “हाइली टेंपर" क बीचक गप छल आ सौंसे दिल्लीक मीडिया हुनका दुनूकेँ देखि रहल छल। एक दिन “परेशान आत्मा" केँ मालूम चलल जे ओकर गर्ल फ्रेंड जे ताधरि फ्रेंड टा छल, रांचीसँ छपैबला छोट-सन अखबारमे काज करए लागल अछि। ओ ओतए 'अंगूठीबला बाबा" क पैरवीसँ नोकरीपर लागल छल आ हुनका कहै तँ ओ 'सर" छल मुदा दुनूक सरसँ कतेक कोसीक पानि बहि चुकल छलै। दरभंगासँ आएल ओ छौड़ी दिल्लीक चकाचौंधमे डुमि चुकल छल, सांझसँ देर राति धरि इंडिया गेटपर “अप्पन सर"क संग आइसक्रीम खाएब ओकरा बड़ नीक लगैत छलै। आफिसमे ओकर भेँट रामेंद्र अशेषसँ भेल छल। ओ बड़ शांत छल आ सुसंस्कारवान सेहो। संगहि साहित्यक अनुरागी सेहो छल। “हाइली टेंपर"क नजरि ओकरापर पड़ल आ ओ सोचि लेलक जे ओ अशेषक कान्हपर चढ़ि कऽ दिल्लीक जत्रा पूरा करत। रामेंद्र अशेष अत्ते भद्र पुरुख छल जे ओकरा पते नै चलैत छलै जे के ओकरा यूज कऽ रहल अछि आ के नै। अशेषजी चुपचाप ओकर “लेख”क शब्दकेँ ठीक कऽ दैत छल आ लोक “हाइली टेंपर" क वाहवाही करैत छल। ओकर एवजमे ओ प्यारक झांसा दैत छल। तइसँ जहिया जोशीजीक निधनपर गांधी शांति प्रतिष्ठानमे दिल्ली जर्नलिस्ट एसोसिएशन एकटा सभा आयोजिक केने छल तँ रामेंद्र ओइ छौड़ी लग ताधरि नै बैसल जाधरि ओकर बहनोइ ओकरा लग बैसल रहल। ओकर बहनोइ जहिना बीच सभामे लघुशंका लेल हॉलसँ बाहर गेल तखने हाइली टेंपरक दोसर कातक खाली कुर्सीपर ओ अप्पन आसन जमा लेलक। जखन ओकर बहनोइ अबैत अछि तखन नमस्ते करैत अछि आ कहैत अछि जे अखने आयल छी। हमहूँ अलग लोक छी। कतएसँ कतए चलि अएलहुँ आ अहाँसँ कोन गप करए लगलहुँ। रांचीक लोकल अखबारक ई दफ्तर दिल्लीक कनाट प्लेसक एकटा बिल्डिंगक पाँचम तल्लापर छल। ओकर आगूमे दैनिक भारतक बिल्डिंग अप्पन चमक-दमकक संग लोककेँ आकर्षित कऽ रहल छल। मुदा ओतए बाभन सभक बड़ रास भीड़ छल। ओतए जाइतक नाम देखि कऽ लोककेँ राखल जाइत छल आकि फेर ओकरा जे कोनो पैघ अधिकारीक थूक चाटैत छल। एहनामे परेशान आत्माकेँ नोकरी भेटबामे मुश्किल नै भेलै किएकि अजमेरमे जइ पैघ पत्रकारसँ ओकरा भेँट भेल छलै ओ दैनिक भारतमे पैघ पोस्टपर आएल छल। मुदा आब हाइली टेंपरकेँ लगलै जे जौं ओतए ओकरा नोकरी नै भेटत तँ ई बड्ड पैघ हारि हएत। ओ अप्पन परिवारकेँ ई देखाबैले चाहैत छल जे ओ अप्पन भरोसे किछु कऽ सकैत अछि। किएकि ओकरा दर्द छलै जे राष्ट्रीय उदयमे इंटर्नशिपक लेल ओकर बहनोइ बड़ पैरवी केने छल, तकर बाद ओकरा इंटर्नशिप भेटल छलै। अन्तमे ओ दिन आबि गेलै जखन नवसिखुआ स्त्रीवादी लेखिकाक चोंगा पहीर कऽ ओ छौंड़ी, बाइस मंजिलक ओइ बिल्डिंगमे आएल, ई वएह स्था रहै जतए ओ बाबाक संग नोकरी ताकऽ लेल आएल छल , ई वएह “बाबा"छल जकरा ओ “सर" कहैत छल। ऐ बाबाक जीवनक परिभाषा “बाभन आपन करैं बड़ाई, गागर छुअन न देहिं/वैस्या के पायन तर सोवैं, यह देखो हिंदुआई” दोहामे सिमटल छल। एतय "परेशान आत्मा” ओकरा लेल आधार तैयार कऽ चुकल छल आ बिना टेस्ट, बिना रिज्यूमे जमा केने ओकरा नौकरी भेट गेलै। पहिने तँ कहल गेल जे अहाँ दुनू गोटेकेँ जूनियर कॉपी एडिटर बनाओल जाएत मुदा जखन पत्र भेटलै तँ ओइमे "स्ट्रींगर' लिखल छलै। कहल गेल छल जे सात हजार टका सेलरी भेटत मुदा पत्रमे लिखल छल पाँच हजार। आपत्ति केलापर बॉस कहलक जे अहाँ सभ गोटे फीचर सेहो लिखू आ ओइ लेल अहाँ सभकेँ दू हजार टका भेट जाएत। ओइ काल परेशान आत्माक संग हाइली टेंपर सेहो छल मुदा बादमे हाइली टेंपर ओकरा धोखामे राखि कऽ ज्वाइनिंग लेटर राखि लेलक। मीडिया भलहि दोसरक खामीकेँ लोकक आगू राखैत अछि मुदा एकर खामीकेँ कियो कोना आगू राखत? ओइ कालमे “मोहल्ला" आकि “भड़ास"क जन्म नै भेल छल जे मीडियामे काज करैबला लोकक दर्दकेँ आगू राखि सकए। अहिनामे जतए उच्च पदपर काज करैबला तेरह टा पदपर बाभन अप्पन आसन जमौने छल ओतए निचला स्तरपर कतेक के होएत एकर अंदाजा केकरो नै छलै। अहिनामे दलित, स्त्रीवादीक खोल “हाइली टेंपर" उतारि कऽ फेंकि देलक आ सभ लोकक आगू कहि देलक जे हमहूँ तँ “'ब्राह्मण" छी। फेर तँ किछु ने किछु छल-प्रपंच करब आवश्यक छल। अहिमे कोनो संदेह नै छल जे ओकरा अप्पन दलित आ स्त्रीवादीक खोलसाकेँ उतारबाक छलै, अप्पन भेदियाकेँ सेहो खत्म करबाक छलै। अहाँ तँ जनिते छिऐ जे भेदिया वएह “परेशान आत्मा" छल। तेँ ओ अप्पन मोबाइलमे ओकर नंबर अहि नामसँ सुरक्षित राखने छल। ओकरा डर छलै जे कहियो ओ ओकर पोल ने खोलि दिअए। एनामे एक दिस ओ परेशान आत्माक संग प्रेम बढ़ेबाक ढोंग करए लागल आ दोसर दिस लोक लग ई कहैमे कनियो टा नै सकुचाएल जे परेशान आत्मा ओकरा परेशान कऽ रहल अछि। जखन कखनो परेशान आत्मा कोनो काजसेँ ओकरा फोन करैत छल तँ ओ अप्पन मोबाइल दोसर गोटेकेँ पकड़ा दैत छल आ ई देखेबाक प्रयत्न करैत छल जे ओ ओकरा परेशान करैत अछि। ओतए असगरे भेटलापर परेशान आत्मासँ कहैत छल, “अहां कतेक भागमन्त छी जे गर्लफ्रेंड अहाँक संग अछि, संगे-संग ऑफिसमे काज करैत अछि आ फेर एकहि संग सांझमे घर दिस अहाँ सभ घुरैत छी।" अहिनामे एक दिन दुनू अंग्रेजी फिल्म “बेसिक इंस्टिंक्ट" देखऽ गेल छल। हम एना नै कहि सकैत छी जे ओइ छौरामे हृदए नै छलै, ओ तँ एहन चिक्कन-चुनमुन गपमे रहि जाइत छल मुदा ओकरा लगैत छलै जे कत्तौ ने कत्तौ कोनो गड़बड़ जरूर अछि। क्रमश: ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। शांतिलक्ष्मी चौधरी (शांति), ग्राम गोविन्दपुर, जिला सुपौल निवासी आ राजेन्द्र मिश्र महाविद्यालय, सहरसा मे कार्यरत पुस्तकालयाध्यक्ष श्री श्यामानन्द झाक जेष्ठ सुपुत्री, आओर ग्राम महिषी (पुनर्वास आरापट्टी), जिला सहरसा निवासी आ दिल्ली स्कूल ऑफ इकानोमिक्स सँ जुड़ल अन्वेषक आ समाजशास्त्री श्री अक्षय कुमार चौधरीक अर्धांगिनी छथि। प्राणीशास्त्र सँ स्नातकोत्तर रहितो शिक्षाशास्त्रक स्नातक शिक्षार्थी आ एकटा समाजशास्त्री सँ सानिध्यक चलिते आम जीवनक सामाजिक बिषय-बौस्तु आ खास कऽ महिलाजन्य सामाजिक समस्या आ प्रघटनामे हिनक विशेष अभिरूचि स्वभाविक। नव-नियोजित शिक्षिका आओर शिक्षक - मिथिला मे बदलैत स्त्री आ पुरुख केर संबंध-जाल युनेस्को आ केन्द्र सरकार के सहयोग सँ बिहार राज्य मे चलायल जा रहल सर्वशिक्षा अभियान केर तहत नीतिश सरकार द्वारा शिक्षक नियोजन मे महिलाक लेल पचास प्रतिशत आरक्षणक बाद नारी सशक्तीकरण केर लक्ष्य पर ओकर नीक असर धरातल पर देखल जा सकैत छैक. आइ दूई-चारि साल सँ सुपौल आओर सहरसा शहर केर टेम्पू वा मेक्सी स्टैंड पर आठ सँ साढ़े नौ बजे धैरक बीच बेसी नवतुरीया आ किछु प्रोढ़ महिला लोकनि पर्स लटकौने, अपना केँ एकटा सुभ्यत शिक्षिकाक ‘लूक’ मे स्कूल पकड़वाक लेल अस्त-व्यस्त भेट जाइत छथि. आँखिक देखल तँ नहि अछि मुदा अंदाज करै छी जे कि मिथिला अंचलक कोनो आन शहर वा एकर कोनो पैघ गाम केर स्टैंडक स्थिति सेहो एकरा सँ भिन्न नहि हेतैक. शुरूआति मे तँ ई सभ शिक्षिका लोकनि अपन अपन वर, दिअर, भाइ, पिता, चाचा वा अपन कोनो निकटतम संबंधीक सँग पाछु लागल ओहिना लजैल-धखैल अपन गनतव्य स्कूल दिस मुँहयाल चलि जायल करैत छलिह. मुदा आइ स्थिति बदललैक. एक तँ हिनका सभ मे आब गाम-घर सँ असगर बहरैवाक आत्मविश्वास बढ़लैक आ तेँ हिनका सभक लजैल, धकैल आ डरैल चालि-ढालि मे सेहो परिवर्तन एलैक. दोसर जे एही शिक्षिका-वर्ग मध्य जाति-धरम सँ ऊपर उठि कय सहकर्मी संग बहिनपाक नव संबंधक विस्तार भेला उपरान्त घर सँ स्कूलक बीचक हिनकर वाट सेहो आब निरस नहि रहलैक. बहिनपाक ई संबंध बढ़ला सँ पहिने जे मैथिल स्त्रीगण मे स्व-गाम, सम-जाति, वा स्व-धरम केर पुरान सूत मे बुनल अपनत्वक जटिल जाल देखल जाइत रहैक, तकर गुत्थी मे फेर सँ, एकटा अलग नवका सूत जकाँ सहकर्मी बहिनपाक अपनत्व-संबंध जाल सेहो बेधल गेलैक. आई शहर वा गाम केर एहि स्टैंड पर ई सभ शिक्षिका बहिनपाक मध्य मुस्कियावैत वा हाथ हिलवैत अभिवादन, एक-दोसर लेल जगह राखैक व्यवहार, वा एक दोसरक लेल भाड़ा देवाक जिद्द भरल आग्रह, केर घटना आम रूपे देखल जाइत छैक, जकर की पहिने मिथिलाक गाम-शहर मे अभाव देखल जाइत रहैक. आब जेना लागैत छैक जे घर सँ बाहरो मैथिल स्त्रीगणक उपस्थिती छैक. टेम्पु आ मेक्सी वाला जे निछछ पुरूखे होइत अछि सेहो प्रायः एहि शिक्षिका लोकनि केँ आब नाम, मुहल्ला आ स्कुल सँ चिन्हैत छथिन. एहि पुरूखक लेल ’ऑफ़िस ऑवर’क ई समय सबसे बेसी व्यस्तम, चुटकी भरल, आ मधुरतम होवय लागल छैक जकर चर्चा मास्टरनी वर्गक लोक करैत रहैत छथि. मुदा आई घर सँ बाहर सड़क पर एहि मे सँ किओ महिला एसकर नहि छथि बल्कि हुनका संग हिनक एकटा सम्पूर्ण वर्ग अछि आ संजोगे सभ गोटय मास्टरीये पेशाधारी. तेँ हिनका सभ के आइ सड़क पर निधोख निकलवा मे आत्मविश्वास आ सुरक्षा-भाव बेसी छैन्हि. सँबंधक ई नवका जालक ताना-बाना खाली महिला महिलाक बीच पसरलैक अछि सेहो बात नहि छैक. एकर पसार महिला आ पुरूखक मध्य सेहो भेलैक. अपन वर, दिअर, भाइ, पिता, चाचा वा अपन कोनो निकटतम संबंधीक उपस्थिति सँ स्वतंत्र भेला सँ एहि नवतूरिया शिक्षिका लोकनिक लाज-धाक सेहो टुटलैक. ताहि सँ मैथिल समाज मे परस्त्री आ परपुरूख वर्ग केर बीचक अनेर दूरी राखय वाला जे पुरानपंथी बन्हन रहैक सेहो ढ़ील होइत बुझाइत छैक. एके विभागक कर्मी होवाक चलिते शिक्षा विभागक कोनो नव वा प्रस्तावित नियम, शिक्षा अधिकारिक औचक निरीक्षण आ तकर वादक घटनाक्रम, वा एक-दोसरक स्कूलक रोचक घटना मे दिलचस्पी, एहि स्त्री आ पुरूख शिक्षका-शिक्षक केँ आपसी संबंधक जाल केँ पसारै मे महत्वपुर्ण कारक बनलैक. एक तँ मिथिला संस्कृति मे नारी केँ उचित सम्मान देवाक विचार आओर दोसर केर माय-बहीन केँ अपन माय-बहिन बुझबाक पुरातनी व्यवहार पुरूख वर्ग केँ टेम्पू/मैक्सी पर महिला लेल सीट छोड़वाक लेल आ महिला वर्ग केँ आभार करै लेल बरवेश रहैक. ओतही दोसर दिस, बिपरीत लिंगक प्रति स्वाभाविक मानवीय आकर्षन किछु रसगर शिक्षक लोकनि केँ महिला लोकनि केँ चहटगर गप्प-सप, किस्सा-पिहानी, चुटकुला-मनोरंजन सुना क’ वा कोनो आन तरहक सहयोग क’ क अपना दिस आकर्षित करवाक अवसर आनैत रहैत छैक. खास कय कोशी दियरा प्रदेश केर अनेक पंचायतक विद्यालय मे काज केनिहार शिक्षका/शिक्षक सभ जखन बलुआहा, महिषी, मैना आदि कोशी घाट वाट टपैय जाइत छथि तखन नाह पर चढवा काल जनि-जाति केँ पुरूख लोकनि केर सहयोगक बेसी जरुरति होइत छन्हि. जेना कि पानि मे ठार भय नाह पकड़नाय, नाह पर स्त्रीगण केँ बैसैक जगह देनाइ, आ सबसे बेसी महिला वृन्दक संग सहानुभुति आ सभ्यताक संग व्यवहार, जनि-जाति वर्ग के प्रभावित करवाक लेल बड्ड महत्वपूर्ण होइत छैक. जे अन्ततः एहि नव नियुक्त शिक्षक- शिक्षिकाक बीच मित्रताक संबंध केँ गाढ़ बना रहल छैक. मानल जाइत अछि जे नवनियुक्त पखंड आ पंचायत शिक्षकगण मे बेसी गोटय समृद्ध घर के छथि. एहि लोकनि मे नौकरी सँ पहिने बेरोजगारी तँ छल मुदा हुनका सभ केँ खाइ-पिवाक वा ऐस-मोज करवा केर साधनक पहिनो कमी नय छल. गाम घर मे रहनिहार एहन लोकनि केँ जखन गामे-घरक आस-पास केर स्कूल मे नौकरी भेट गेलन्हि तँ ई बुझु जे हिनकर भाग्य फ़ुजि गेलन्हि. एक तँ घर सँ खाइते पीते रहथि, दोसर आब ई सभ अपन बूढ़ माय बाप केँ देख रेख केर अतिरिक्त अपन जमीन जथा केँ बटेदारी लगा केँ ओकर देख-रेख सेहो करै छथि, आ तेसर जे दरमाहा मे जे किछ पाँच छौ हजार महिना पाइ-कौड़ी होइत छनि ओ सभ बैंक खाता मे अक्षैत राखल रहैत छन्हि. ई सभ मास्टर साहैब लोकनि एकहक टा के मोटर-साईकिल ल’ लेने छथि आ अपन योवनक मस्ती मे जेना पहिया लगा लेने छथि. नाह मल्लाह वाला रस्ता मे यदपि तरदूत छैक मुदा एहि तरदूतक उपरान्तो गाड़ी रहला सँ मास्टर साहेव लोकनि केँ ई लाभ छन्हि जे कोशी दियरा प्रदेश सनक अबूहो जगह पर समय पर पहुँच जाइत छथि आओर दुर्गम प्रदेशक बच्चा लोकनि केँ दू अक्षरक बोध दैत देस निर्माण मे सहभागी बनल छथि. तखन कोनो मास्टर साहेबजी केँ जँ कहिओ साइत-संयोगें मनपसंद मास्टरनी साहेब केँ अपन गाड़ी पर बैसा केँ हुनका स्कुल तक छोड़वाक अवसर भेट जाइत छनि तेँ ओ, हमर एकटा संबंधक दियर मास्टर साहेबक शब्द मे, अपन जीवनक बड्ड अनमोल आ भावुक समय होइत छन्हि. हिनका शब्द मे, ओहि मे काम-वासनाक बोध तँ बहुतो कम छैक परंच ओही स बेशी एकटा महिला केँ सहयोग क’ क’ हुनका इम्प्रेस करैक आत्माभिमान केर मनोबोध बेसी प्रबल छैक. महिला पुरूखक मध्य मनोभावनात्मक संबंधक ई विस्तार वास्तव मे हिनका सभक मानसिकता मे छुपल प्रेम संबंध आ प्रेम विवाह केर संभावना आ सामर्थ्य केँ सेहो परिलक्षित करैत छैक. अपन दिअर मास्टर साहेबक गप्प सुनि एकटा गप्प मोन मे आबैत अछि. मिथिलाक गाम-घर मे जँ श्रमिक वर्गक जनि-जाति केँ छोरि देल जाइ तँ कोनो भी जाति, धरमक कनियो टा सुभ्यस्त परिवार मे नवतूरे सँ स्त्रीगण केँ अँगना सँ बहरेवाक प्रचलन कम भ’ जाइत अछि आ ई व्यवहार ता बुढ़ापा चलैत रहैत अछि. हाँ, शहर मे ओ जे किछु करै छथि ओतय हुनका पर सामाजिक अंकुश कम होइत छन्हि. मुदा जा धरि ओ गाम घरक छहरदेवाली मे रहैत छथि ता धरि स्त्रीगण केँ अपना व्यवहार मे अपन यौन सदाचार आ परपुरुष सँ दुरी देखवैत रहय पड़ैत छैक. एकर अनदेखी भेला सँ समस्त पुरखा आ खानदान के नाक कटय लगैत छैक. तेँ गाम-घरक परिसीमा मे एखनहुँ प्रेम वा प्रेम विवाहक संभावना नगण्य रहैत छैक. मैथिल समाज मे प्रेम विवाह पर ई रोक खाली अपन स्त्रीगणेक आचरण पर अंकुस राखि नहि करैत अछि बल्कि अपन पुरूख पात्र द्वारा कोनो महिलाक संग कयल गेल छेड़खानी, वदतमीजी, वा घरढ़ुक्की केँ कुकर्मक श्रेणीक बुझैत छथि. पुरूखो पात्र द्वारा कयल गेल कोनो एहन अपराध समस्त पुरखा आ खानदानक पाग नीचा गिरावैत बुझल जाइत छैक. खास क क मैथिल ब्राह्मण आ करण कायस्थ समाज मे जा धरि पाँजि व्यवस्था प्रचलन मे रहलैक ता धरि तँ पुरुख पात्रक एहन सभ यौन अपराध समुचा खानदान केर पाँजि के पतीत करेवा मे महत्वपुर्ण रहलैक. मुदा पाँजि व्यवस्था कमजोर भेलाक बाद मैथिल समाज अपन पुरूख वर्गक एहन व्यवहार पर तँ बहुत ढ़ील द देल बुझाइत छथि मुदा अपन स्त्रीगणक सदाचारक व्यवहार पर बेसी दृढ़ आ शंकालु रहि गेलखिन. स्त्री आ पुरूख संग असमानताक ई व्यवहार केर चलितवे पुरूख लोकनि तँ समय अनुकूल आगु बढ़तै चलि गेलाह मुदा स्त्रीगण समय केर संग डेग नहि बढ़ा सकलीह. आइ जखन मास्टरी पेशा मे मैथिल स्त्रीगण केँ आरक्षण द क व्यापक संख्या मे गाम-घरक महिला वर्ग केँ घर सँ बाहर निकलवाक अवसर भेटलैक तँ हिनका लोकनि केर नीजी जीवन सेहो सर-संबंधीक पुरूख पात्र केर तीछ्ण नजरि सँ कनेकटा दूर भेलैक. जतय ओ पुरूख वर्गक संग बैस कय अन्य आधुनिक समाज जकाँ प्रेम, प्रेम विवाह, अन्तर्जातिय विवाह, पुरूखक शोषण, स्त्रीक दोयम दर्जा, आदि विषय पर खुलि कय बात कय सकैत छथि. एकर स्वीकृति हुनका पहिने घर-आँगन केर छहरदेवालीक अंदर नहिये केर बराबर छल. हमरा विचारे जे एतय ई ध्यान राखव जरूरी कि प्रखण्ड/पंचायत शिक्षिका मे बेसीतर वोएह महिला छथि जे वेसी काल गामे घर मे रहलीह आ आइयो तक गाम घरक सामाजिक जीवन सँ समायोजित भ’ रहल छथि. दोसर दिस स्त्री-पुरूखक भावनात्मक, कल्पनात्मक आ दैहिक संबंध केर अनुभवहीन युवक-पुरूख पात्र छथि जे मैथिल समाज मे स्त्री पर एहेन अंकुशक कारण आइ धरि अपन माय-बहिन, भगिनी-भतीजी, वा अन्य कोनो निकट संबंधी सँ वेसी दुर केर एहने अनुभवहीनता वाली स्त्रीगणक संपर्क मे नहि एलाह. एहन युवक युवतीक मन मे भावनात्मक आ कल्पनात्मक प्रेम केर ’इड’ दबि केँ रहि गेलैक. स्त्रीगण पर तँ बहुत बेसी सामाजिक दबाब रहलैक. मुदा पुरूख पात्र मे एहन लोक बेसी काल अपन विपरित लिंगी आकर्षन केर फ़्रसट्रेशन केँ कोनो असगरूआ पकड़ैल स्त्रीगण पर अस्लील फ़ब्ती कसि कसि क’ वितेलाह. तखन एहने वा कोनो नीको सदाचारी आ भावुक युवक मास्टर साहेव के आइ जखन कोनो मनपसंद मास्टरनी सँ सानिध्य भेटैत छैक, हुनका इम्प्रेस करैक मोका भेटैत छैक, हुनका सँग भावनात्मक लगावक गप्प होइत छैक, तँ हुनका सभ गोटय लेल ई क्षण अनमोल आ भावुक जरूर बुझेतैन्हि जाहि मे काम-वासनाक बोध कम छैक आ परस्त्री केँ सहयोग क’ हुनका इम्प्रेस करवाक आत्माभिमानक मनोबोध बेसी छैक. एक अर्थे ई मैथिल समाज लेल शुभक सूचक छियैक. अभिवावक गण ई बुझथु सँ पुरूष गण स्त्रीगणक प्रति हरदम आक्रमके नहि होइत छैक. नीक भवना, परस्त्रीक प्रति आदर भाव, स्त्रीक सहयोग केर मनोवृति सेहो पुरूष मानसिकताक एकटा अंश छियैक. शिक्षक नियोजनक बाद शिक्षक आ शिक्षिकाक मध्य वैवाहिक संबंधक कैकटा उदाहरण हमहूँ देखलियैक. एहि मे सँ दूइ टा उदाहरण "Love Cum Arrange" विवाहक आ शेष सभटा पुर्ण रूपेन "Arrange" विवाहक छलैक. "Love Cum Arrange" विवाहक हमर मतलव अछि जे, विवाहक एहि प्रक्रिया मे सबसे पहिने दूई हृदयक मध्य प्रेम भेलैक आ तखन माता-पिता वियाहक तय-तपेसिया केलन्हि. जखन की "Arrange" विवाह मे माता-पिता ही परंपरागत ढ़ंग सँ विवाह तय केलखिन जाहि मे नवदम्पत्तिक कोनो महत्वपुर्ण भुमिका नय भेलैक. "Love marriage" अर्थात माता-पिताक बिना कोनो महत्वपूर्ण योगदान वाला प्रेमीगणक विवाह जँ कतहुँ भेलो हेतैक तँ ओ हमरा नजरि मे नहि छैक. उपर्युक्त दूनू तरहक वियाह मे हम एकटा नव गप्प ई देखलिये जे अधिकांश कथाक उत्थान मे पहिने लड़के वाला लड़की वालाक ओहि ठाम गुप्त रूप सँ संबंधक प्रस्ताव पठेलखिन. जखन लड़की वाला तैयार भ गेलाह तखन लड़की वाला अपना शर्त पर अन्य बातक निराकरण करवे मे सफल रहलाह. हमर कहैक मतलब ई जे शिक्षिकाक नौकरी भेटलाक बाद नौकरी-पेशा स्त्रीगणक सामाजिक स्थिती मे बड्ड बदलाव एलैक. एक दिस जतय ओकर आर्थिक आ सामाजिक महत्व वरक घर आ नैहरक घर मे समान्य रूप स बुझल गेलैक ओतही ओकर सामाजिक स्वतंत्रता, सामाजिक संबंध, आ सामाजिक सम्मान केँ सेहो बृद्धितर केलकैक. ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। रवि भूषण पाठक गामक जिनगीक समीक्षा भैंटक फड़ देख बिहुसैत नर-नारी, बिसाँढ़क लेल पताल कोरैत मैथिलजन, चुन बनएबा आ बेचबाक कठिन उपक्रम करैत लोक आ बदलैत तकनीकीसँ तालमेल बैसबैत, उपार्जनक लेल गाम, राज्य छोड़ैत जनसमुद्र। संयुक्त परिवार, वर्णव्यवस्था आ गामक पारंपरिक अर्थव्यवस्थाकेँ छेदैत विभिन्न कोटिक परिवर्तन। कोनो ब्राहमण आ कुम्हारक ढहैत जजमानी। ताड़ी कीनए बेचए आ पीबैक अनंत अंर्तकथा। पोखरि, गाछी, खेत आ गाममे पसरल मिथिलाक अनंत आ दिव्य सौंदर्यक एकसाथ दर्शन। इतिहासक प्रश्न ‘गामक जिनगी’क पहिल तीनटा कथा ‘भैंटक लावा’, ‘बिसाँढ़’, ‘पीरारक फड़ ‘अकालक समैमे मिथिलावासीकेँ पेट भरबाक साधन रहैत अछि, आ ई बात लेखकक सजग दृष्टि आ सामाजिक प्रतिबद्धताकेँ स्पष्ट करैत अछि। पुस्तकक संग उपलब्ध संक्षिप्त टिप्पणीमे गजेन्द्र ठाकुर जगदीश जीक कथाक ऐतिहासिक भूमिकाकेँ रेखांकित करैत छथिन्ह। बात केवल विषय चयनक दृष्टिसँ नइ अछि, बल्कि समग्र पुस्तकमे मिथिलाक निम्न मध्यवर्गक जिनगीक जतेक गहराइसँ देखल गेल अछि, ओ अन्यत्र दुर्लभ अछि। कथाकार मिथिलाक गाममे जइ गंभीरतासँ भ्रमण करैत छथिन्ह, ई साहित्येटाक लेल नै अपितु इतिहास आ अर्थशास्त्रक लेल सेहो प्रामाणिक सामग्री उपलब्ध करैत अछि। नॉस्टेल्जियाक सच की जगदीशजी अतीत मोहसँ ग्रस्त छथि। प्रस्तुत संग्रहमे लेखक मिथिलाक ग्राम आ ग्राम्य जीवनक प्रति खास अनुराग व्यक्त करैत छथि। एतबे धरि नै ओ शहरीकरण, शहरमे प्रवास आदिक प्रति खास वितृष्णा व्यक्त करैत छथि। ‘भैयारी’ कथामे कुसुमलाल कोर्टमे नौकरी करैत छथि आ मधुबनीमे रहैत छथि। आ हुनकर पैघ भाय दीनानाथ गामेमे रहैत छथिन्ह। आ गामोमे रहैत दीनानाथ अपन जिनगीक गाड़ी नीक जकाँ चलबैत छथि, मुदा कुसुमलालक गाड़ी लसकि जाइत छैक। शराब पीबैत-पीबैत हुनकर लीवर गलि गेलै। सौंसे देहमे घाव भऽ गेलै। आ घरवाली सेवा करए केर बदला गरियाबै आ बड़का बेटा कहए- ‘पप्पा जी, महकता है’।’ निस्संदेह गामक सहजता, सरलताक प्रति लेखकमे एकटा खास किस्मक सिनेह अछि, ताहि दुआरे ओ डेग-डेगपर गाममे रहनाइ, गामक धन्धा-पानिकेँ गौरवान्वित केनाइ नै बिसरैत छथिन्ह। क्लासिकी परम्पराक पृष्ठभूमि कोनो भाषाक प्रतिनिधि कथाकार भाषा, साहित्य आ समाजक वर्तमानक दबाव ग्रहण करितहुँ प्रतिकारक व्यक्तित्व राखैत अछि, आ ऐ प्रतिकारेमे मौलिकता छैक। वरिष्ठ कथाकार सुभाषचन्द्र यादव ‘गामक जिनगी’पर संक्षिप्त टिप्पणी करैत कहैत छथिन्ह- ‘हुनक कथा घटना बहुलता आ ऋजुसँ युक्त अछि। ‘आब प्रश्न ई अछि जे घटना बहुलता तँ कथाक नीक लक्षण नै मानल गेलइ तखन ऐ टिप्पणीक की मतलब? कहानी वा कथा जखन घटना केंद्रित संरचना त्यागि कऽ मनोवैज्ञानिकता वा मनोविश्लेषण दिस प्रस्थान केलक तखन ई मानल गेलइ जे कथाक पहिल चरण समाप्त भेलइ आ कथा विकासक दोसर सोपन दिस बढ़ल। मुदा ऐ विकासक साँचाकेँ जगदीशजी सँ जोड़नइ जगदीशजीक संग अन्याय होयत, कारण जे जगदीशजी घटना बहुलतापर निर्भर नै छथि। बहुतो कहानी लेखकक कवितामयी व्यक्तित्व, हुनकर गंभीर मनोविश्लेषण आ सक्कत विचारसँ लैश अछि ‘पिछला बाढ़ि मोन पड़तहि देह भुटुकि जाइत अछि। रोइयाँ-रोइयाँ ठाढ़ भऽ जाइत अछि। बाढ़िक विकराल दृश्य आँखिक आगू नाचए लगैत अछि। घोड़ोसँ तेज गतिसँ पानि दौगैत। बािढ़यो छोटकी नहि, जुअनकी नहि, बुिढ़या। बुिढ़या रुप बना नृत्य करैत। ककरा कहू बड़की धार आ ककरा कहू छोटकी, सभ अपन-अपन चिन्ह-पहचिन्ह मेटा समुद्र जेकाँ बनि गेल। जेम्हर देखू तेम्हर पाँक घोराएल पानि, निछोहे दछिन मँुहे दौगल जाइत। कतेक गाम-घर पजेबाक नहि रहने घर-विहीन भऽ गेल। इनार, पोखरि, बोरिंग, चापाकल, पानिक तरमे डुबकुनियाँ काटए लगल।’ ऐ प्रकृति दृश्यकेँ देखल जाओ, प्रकृतिक स्वाभाविक लीलादर्पणमे मानवक कठिन भविष्य देखाओल गेल अछि। कथामे आगू बाढ़िजनित भुख आ दरिद्रताक मर्मस्पर्शी चित्रण अछि। निश्चित रूपेण जगदीशजी मैथिली कथाकेँ क्लासिकी परम्परा दिस बढ़बैत छथिन्ह आ मैथिली कथा एकटा गौरवशाली युगक दुआरिपर अछि। आंचलिकताक भ्रम कथा संग्रहमे ग्राम्य जीवनक विराट उपस्थिति ऐ भ्रमकेँ उत्पन्न करैत अछि, कि जगदीश जी आंचलिक शैलीक लेखक छथि। तद्भव आ देशज शब्दक बाहुल्य, एक खास वर्ग वा जातिक ग्राम्य जीवनक प्रसंगक बहुविधि चर्चा। ‘चुनवाली’मे चुन बनबएबला मिथिलाक एकटा जातिक संघर्षक चर्चा अछि। डाॅ. धीरेन्द्र वर्मा कहैत छथिन्ह- ‘आंचलिकताक सिद्धिक लेल स्थानीय दृश्य, प्रकृति, जलवायु, पाबनि, लोकगीत, बातचितक विशेष ढ़ंग, मुहावरा, लोकोक्ति, उच्चारणक विकृति, आमजनक स्वभावगत आ व्यवहारगत विशेषता, हुनकर अपन रोमांस, नैतिक मान्यता आदिक समावेश अत्यंत सतर्कता आ सावधानीसँ कएल जाइछ।’ यदि ऐ मानकपर देखी तखन गामक जिनगीक अधिकांश कथा आंचलिकता दिस झुकाव देखबैत अछि। मुदा ई बात सदिखन स्पष्ट रहबाके चाही कि मिथिलाक प्रति अनुरक्ति देखेबाक बावजूद ऐ संग्रहक कथा आंचलिक नै अछि। किएक तँ लेखक कोनो कथामे मिथिला अंचलक नायक नै बनेने छथि आ ई विशेषता हिनका किछु-किछु यात्री जीसँ जोड़ैत अछि आ रेणुसँ अलग करैत अछि। ई बात उल्लेखनीय अछि कि लेखक मिथिला क्षेत्रक परंपरा, लोकोक्ति, गीत-नाद, नाच –तमाशाक वर्णनक प्रति कोनो अतिरिक्त राग प्रदर्शित नै करैत छथि। अर्थात ई तत्व कथामे ओतबे अछि जते कि कोनो प्रगतिशील लेखकक कृतिमे होइछ। आंचलिकताक एकटा अन्य पहलू विचारनीय अछि। मिथिलाक निम्न आयवर्ग जीवनक जते प्रभावशाली चित्रण अइठाम अछि, ओ अन्यत्र दुर्लभ अछि। आ ई चित्रण जत्ते पूर्ण अछि ततबे प्रामाणिक। ऐ दृष्टिसँ ‘चुनवाली’ ‘रिक्साबला’ हारि-जीत’क विश्लेषण आवश्यक अछि। जीवन संघर्षक कथाकार सुभाषचन्द्रजी जगदीशजीकेँ जनवादी आ प्रकृतिवादी कथाकार नै मानैत छथिन्ह, बल्कि जीवन-संघर्षक कथाकार मानैत छथिन्ह। ऐ विचारमे निहित जनवाद आ प्रकृतिवाद सन पारिभाषिक शब्दक विवेचनसँ बचैत ई कहब आवश्यक अछि जे जगदीश जीक यथार्थवाद कोनो सुपरिभाषित यथार्थवादक साँचामे सेट नै होइत छैक आ सेट करबाक प्रयासो नै करबाक चाही। भारतीय साहित्यमे यथार्थवादक एकाधिक मॉडल उपलब्ध अछि, आ जगदीश जी ककरो अनुकरण करबाक स्थानपर नव मार्ग बनेबाक लेल प्रयासरत छथि। ग्रामीण जीवनकेँ विषय बनेबाक लेल ‘पाथेर पांचाली’ ‘गणदेवता’आ ‘मैला आँचल ‘गोदान’ सन कतेको क्लासिक उपलब्ध अछि। ई स्पष्ट नै अछि कि ओ ऐ मे कोन पढ़ने छथि आ कोन नै, मुदा ई स्पष्ट अछि कि ओ अपन विशेष दृष्टिसँ स्वीकृतकेँ अतिक्रमणक लेल कटिबद्ध छथि। जगदीशजी दुखकेँ गौरवान्वित करबामे विश्वास नै करैत छथिन्ह, ओ अनंत दुख आ दुखमयी विश्वक धारणामे विश्वास नै करैत छथिन्ह। ओ प्रचण्ड आशावादक लेखक छथि, ताहि दुआरे बाढि़, सुखार, अकाल, महामारी आ विभिन्न व्यक्तिगत आपदाक बीच आदमी जीवैत आ जीतैत छथि। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। ३. पद्य ३.१.१.अंजनी कुमार वर्मा "दाऊजी" २.डॉ जया वर्मा ३.शांतिलक्ष्मी चौधरी ३.२.१.इरा मल्लिक २ओमप्रकाश झा ३मनीष झा बौआभाई ३.३.१.मिहिर झा २.बिनोद मिश्र ३.४.१.शिवशंकर सिंह ठाकुर २.सुबोध झा ३.५. .सद्रे आलम गौहर ३.६.अक्षय कुमार चौधरी- दियाद बलजोर ३.७. १.डॉ॰ शशिधर कुमर २ आनंद कुमार झा ३नवीन कुमार "आशा" ३.८.१.जवाहर लाल कश्यप २.अमित मोहन झा १.अंजनी कुमार वर्मा "दाऊजी" २.डॉ जया वर्मा ३.शांतिलक्ष्मी चौधरी १ अंजनी कुमार वर्मा "दाऊजी" १ सुखायल अतीत
दीप तँ लेसैत छी मुदा बातीये सुखायल अछि हमर ख़ुशी तँ हुनक उदासीमे नुकायल अछि.... कतेको बसंत आयल आ चलि गेल वयसकेँ समेटि आशा-अभिलाषाक पूनम लऽ लेलनि अमा समेटि गीत तँ गाबऽ चाहैत छी मुदा राग भोथियायल अछि हमर ख़ुशी तँ हुनक उदासीमे नुकायल अछि........ मृगतृष्णा केर पाछू तँ हम सदिखन दौगि रहल छी श्वेत वसन केर कारीखकेँ सदिखन ढोइ रहल छी डेगहि डेगपर अछि शंका मुदा संगी हमर पछुआयल अछि हमर ख़ुशी तँ हुनक उदासीमे नुकायल अछि.....!
२ बेरोजगारक आत्मा
आँखि खुजतहि हेरए लगलौं छाँह सरकारी शासन सँ मारवाड़ीक बासन धरि मुदा सा्ँस स्थिर होइतहि हमरा भेट गेल ओइ बहुरंगी अश्मशानक आगिमे...... ३ प्रजा आ तंत्र
लोहा सँ लोहा कटै अछि विष काटै अछि विष कें, मुदा भ्रष्ट सँ कहाँ उखड़ै अछि भ्रष्टाचारक ओइध ...? निज स्वार्थ हेतु आश्वासन सँ सागर मे सेतु बना दै अछि, रामक दूत स्वयं बनि सभ मर्यादा कें दर्शाबै अछि, जनमत केर हार पहीर कऽ ओ रावण दरबार सजाबै अछि, जौं करब विरोध तँ शंकर बनि ओ तेसर नेत्र देखाबै अछि, थिक प्रजातंत्र तें रावणों केँ भेटल अछि समता केर अधिकार, हमरे सबहिक शोणित-पोषित थिक प्रजातंत्रक सरकार.....
४ कोसी
हिमगिरीक आँचर सँ ससरि, मिथिला केर माटिमे पसरि दुहु कूल बनल सिकटाक ढेर, पसरल अछि झौआ कास पटेर मरू प्रान्त बनल कोसी कछार, निस्सिम बनल महिमा अपार सावन भादो केर विकराल रूप, पाबि अहाँ यौवन अनूप उन्मत्त मन ,मदमस्त चालि, भयभीत भेल मानव बेहाल की गाम-घर, की फसल-खेत, की बंजर भू ,लय छी समेटि प्रलयलीन छी अविराम, मानव बुद्धि नै करए काम कतय कखन टूटै पहाड़, भीषण गर्जन अछि आर-पार तहियो हम सभ संतोष राखि, कर्तव्यलीन भेल दिन-राति वर्षा बीतल हर्षित किसान, खेतीमे लागल गाम-गाम लहलहाइत खेत देखै किसान, कोसी मैयाकेँ शत-शत प्रणाम ....... २ डॉ जया वर्मा सागर आ मोन सागरक लहरि कखनो उद्वेलित कखनो उन्मादित एकटा सुनामी समेटने अंतर मे कतेक मौन मूक मुदा लहरिक ओइ पार की अछि ?? अनिश्चित , अपरिचित .... मोन उद्विग्न भऽ उठैत अछि / बेर बेर ओ लहरि हमरा बजा रहल अछि सपनो मे आबि बजैत अछि भयभीत नै होउ हम अभेद्य नै छी.. हमरा छुबि कऽ तँ देखू हमहूँ अहीं सन छी प्रतिपल बेचैन मुदा खुश छी हम जहिना अहाँ खुश छी मुदा बेचैन चैन हेराय बेचैन भऽ जाइत अछि चैन पाबि बेचैन भऽ जाइत अछि ई मोन.......रहस्यमय मोन // ३ श्रीमति शांतिलक्ष्मी चौधरी, ग्राम गोविन्दपुर, जिला सुपौल निवासी आ राजेन्द्र मिश्र महाविद्यालय, सहरसा मे कार्यरत पुस्तकालयाध्यक्ष श्री श्यामानन्द झाक जेष्ठ सुपुत्री, आओर ग्राम महिषी (पुनर्वास आरापट्टी), जिला सहरसा निवासी आ दिल्ली स्कूल ऑफ इकानोमिक्स सँ जुड़ल अन्वेषक आ समाजशास्त्री श्री अक्षय कुमार चौधरीक अर्धांगिनी छथि। प्राणीशास्त्र सँ स्नातकोत्तर रहितो शिक्षाशास्त्रक स्नातक शिक्षार्थी आ एकटा समाजशास्त्री सँ सानिध्यक चलिते आम जीवनक सामाजिक बिषय-बौस्तु आ खास कऽ महिलाजन्य सामाजिक समस्या आ प्रघटनामे हिनक विशेष अभिरूचि स्वभाविक। १ दरीदरी
ई गरीबी, दरीदरी निसरर, जखन घुसय छै ककरो घर ओ पुछै की तू हो-- रैजपूत छिअ की मुसहर? बाभन छिअ की मेहतर?
काल्हियेसँ छी छिछियाइत, दू तम्बा आटा ले बेकल; ठारो जाइये नञ आब रहल भासयै देह... डेग करै डगमग,
दू दिन सँ निरभुक्त, छी भुखल, दू धीया सेहो निसूआयल सुतल. कोरलगुआ घिचैये सुखल दूध, चिलका चिचियावै अनहद.
धीया-पूताक देखि आंखिक नोर आब हहरै जिया, मन इन्होर. पैचो नञ भेटय, नय उधार; भगवानो के कहाँ छै कत्तो ठौर.
भीखमंगनी बभिनियाँ विधवा सँ, टोल-पड़ोसक लोक छै आजीज. नोतो-उपकार मे कतैक खुओथिन बातो तँ छै ईहो एकदम वाजीव.
दू पाई बचबैक छै जमाना, तै पर दूनियाँ भरिक महगाई. सदावर्त मे कतय सँ खुओथिन वस्तूक दाम फेकय छै आगि.
ई सरकारो जुआएल सियार, कुरसीक भुक्खा, छपकछोर. सुनय छै निछछ बस तकरे जे लड़ै, अड़दर करे अनघोल
.रोहियारक ’अगिता’ ’पछिता’ मिलि अपन गरीब लेल उठाबै छै आवाज. ई ’अगिता’ केर ’बड़का’ केँ कियै अपन दरीदर लेल बाजे मे लागे लाज?
ई ’पछिता’ केर ’छोटका’-’बड़का’ केँ कियै हर दरीदर लेल बाजे मे लागे लाज? २ बथुआ
जेना गामक जीमीदार सरकार, उजारि दैत छथि जकरा मोन तकरा. गहूँम, सरसौं, रैंचीक किसान, उपाड़ि दैत छथि समुल-जड़ि हमरा.
तैयो हम अस्तित्व बचौने छी ओलती, कोनटा, बाड़ी मे. मिथिला केर तरकारी मे.
बाधबन मे जगह अछि मुस्किल गहुम सरसौं छथि बोल वला पाक-सुकला मे जगह मुदा ऐहन के छथि ओतय सँ भगवै वला
सम्मान पेनै छी हम एखनो सग्ग-भट्टा, सतसग्गा, झुरी मे मिथिला केर तरकारी मे.
छौंकल मूर-भाटा-अदौरी तीमन लs स्त्रीगन सुनै छी गिरवै छथि लहास सग्गभट्टाक तीमन केँ तँ सेहो बाँटी खाइ छथि पड़ोसिया दियाद
स्वादु व्यंजन छी हम एखनो खेनिहारक आगुक थारी मे मिथिला केर तरकारी मे ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। १.इरा मल्लिक २ओमप्रकाश झा ३मनीष झा बौआभाई १ इरा मल्लिक, पिता स्व. शिवनन्दन मल्लिक, गाम- महिसारि, दरभंगा। पति श्री कमलेश कुमार, भरहुल्ली, दरभंगा। १ भौजी लाल साड़ी पहिरने भौजी, मिथिला आँचर ओढ़ने, चिक्कन चुनमुन गोर माथ पर, लाल टिकुली छथि सटने। छनछन पएरक नेपुर बाजे, हाथक चूड़ी खनकए , भौजी शोभा छथि , हमर घर के। बाजब हुनकर मधुर मधुर छन्हि, अधर मुस्कैत सदिखन, घर मे सभक ध्यान रखै छथि, थकैत नहि छथि कौखन, घरक साज सँभार करैत, गृहिणी बनि मान बढ़ाबथि, भौजी शोभा छथि, हमर घर के। बाबीक छथि चित्रसुन्नैर, माँजीक भव्यारानी, भोर भिनसर उठि , भौजी पहिने, बाबी आ माँ क, चरण छुबै छथि। हमसभ भाइ बहिन ले भौजी, जननी रुप धरै छथि, भौजी शोभा छथि हमर घर के। स्वजन बन्धु सर कुटुंब मे भौजी, मैथिल बेबहार खूब निभाबथि, पावनि तिहारमे हम्मर भौजी, नीक नीक पकवान पकाबथि, भार्यारुपमे ओ तँ , भैयाक मान बढ़ाबथि, घरमे प्राण संचार करै छथि, भौजी शोभा छथि हमर घरक। २ बड़ अजीब मँहगाइ छै!
आटा चाउर तेल शक्कर, मँहगी केँ छूलक आसमान, गृहिणी भनसाघर मे देखू, कतेक भऽ गेलि परेशान, बड़ अजीब मँहगाइ छै!
एतेक मोट तनखाक गड्डी, मासांत पति घर अनै छथि, दस दिनमे हालत गड्डीक देखू, कतेक पातर दुब्बर भs जाइ छै, बाँकी महिनाक बीस दिन, कोना चलत, की करथि उपाय, बड़ अजीब मँहगाइ छै!
पनपियाइ बेरहटक व्यंजन, सुनु! सभ फीका फीका भऽ गेल, भोर साँझक चाह संग बिसकुट, सेहो गिनतीमे कम भेल, एतेक कतर व्योँतमे घरनी, अतिथि केँ कोना करती सत्कार, बड़ अजीब मँहगाई छै!
पावनि तिहारक बात नै पूछू, घरनी कोना करती ओरिआन, कपड़ा सियेती या उपहारमँगेती, कोना पकेती पुआ पकवान, बड़ अजीब मँहगाइ छै!!! २ ओमप्रकाश झा १ सून मोनक अन्हार कोनमे दीप कोना कऽ बरत? छूछे बोल-भरोस अहाँ के दुख कोना के चूरत?
ठोढ चुप हृदय स्पन्दित सदिखन राग गाबैत अछि, ई राग जे अहाँ नहि बूझब, तँ सरगम कोनाकेँ गूँजत?
बिना बजेने चानन गाछसँ भुजंग रहैत अछि लपटल, मूक संकेत अहाँ नहि जनबै, तँ प्रेम लता कोना केँ लतरत?
कौआ कुचरै भोरे सँ आँगनमे अनघोल केने अछि, अहाँ साँझ धरि सूतले रहबै तँ सनेस कोना केँ पँहुचत?
कस्तूरी मृग मे, सर मे सरसिज, सुगंध सुमन मे सदिखन, ऒहिना "ऒम" अहीं मे बसला, कतौ और कोना केँ भेटत? २ हमर जिनगीक सागरमे तूफान बनल छी लूटि कऽ हमर चैन अनजान बनल छी आब हमरा बुझाइत अछि सभ पाथरक मुरुत अहींकेँ तकैत हम सदिखन बेजान बनल छी यै प्रेम तँ पवित्र छै जेना मन्दिरक पूजा मुदा अहाँ किए प्रेमक दोकान बनल छी नेनाक खेल जकाँ अहाँ खेला कऽ हमरा संग कात कऽ देलिऐ, आब हम मसान बनल छी “ओम”क मोनक पोथीक आखर अहीं छी चारू कात हम अहींक गुणगान बनल छी ३ मनीष झा बौआभाई ग्रा+पो-बड़हारा,भाया-अंधरा ठाढी जिला-मधुबनी(बिहार) हम ऋणी छी (कविता) मुँह लटकल छल फूलल गाल पोन छल सगरो छौंकी स' लाल माय कहली बाऊ कि भेल आइ भोक्कासी पारि कहल सब हाल कब्बिर काने क' कान्चुन का' नै छल याद तैं देलक डेंगा' एहि मस्टरबा स' आब नै पढ़बौ नहि त' काल्हि स' मारत ठेंगा भावुक भेली माइओ सुनि क' कहली बाउ अहाँ जुनि कानू रूसी नहि कखनो अन्न छोडि क' खा' लिय' आ बात हम्मर मानू बाबू आइ साँझ में जाकय हुनका बुझा देथिन्ह नै मारता आब अहूँ पनपियाय क' बैसू पढबा लेल काल्हि देखा देबन्हि सब बनल हिसाब हिचकि-हिचकि क' क'र उठाबी भ' गेल ए'क भात आ नोर माइअक आश्वासन सुनि हम्मर अपनहि सटि गेल दुन्नू ठोर जहिना जहिना भेलौं गिअनगर तहिना तहिना पढ़लौ इस्कूल कॉलेज मास्टर डांटथि प्रोफ़ेसर बुझबथि हुनकहि प्रसाद स' जे किछु अछि नॉलेज ऋण नहि सधा सकब हे गुरुजन अपनें लोकनि देल उधार जे "मनीषक" श्रद्धा सुमन स्वीकारू नहि बिसरब एहि उपकार के शिक्षक दिवस पर हम अपन प्रथम गुरु (बाबा-बाबूजी-माँ), शैक्षिक गुरु (जिनका स' प्रत्यक्ष ज्ञान/शिक्षा लेने छी) आ आदर्श गुरु (जिनकर अनुसरण करैत जीवन के समस्त यश-कीर्ति-ख्याति के आकांक्षा रखैत अग्रसर भ' रहल छी) ओहि सभ गुरुजन कें श्रद्धा सुमन रुपी ई एक छोट आ अदना सन रचना समर्पित क' रहल छी I ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। १.मिहिर झा २.बिनोद मिश्र १ मिहिर झा १ हृदयक उमंग-दर्द निकलल बनि गजल एहेन गजल पर तेँ वाह वाह हेबाक चाही | अनकर लिखल पाँति यदि खूब नीक लागल ओहि कृति केँ सदिखन "साभार" लिखबाक चाही | ज्ञान प्रसार छैक धर्म एहि मे तृप्ति छै भरल किंतु एहि अंजाम लेल ज्ञान, ज्ञान हेबाक चाही | --वर्ण ९ २ चक्रव्यूह
निर्विकार निराकार उन्मुक्त पदार्थ रंग रूप जातिसँ विमुक्त यथार्थ मनुष्य हमरा कहै प्रेत हम घुमै छी खेते खेत |
भेल एक टा जोरगर प्रहार जन्म लेलहुँ करैत चीत्कार देव ! जखन उठाएल मुँह देलहुँ हमरा ई चक्रव्यूह
पढ़ल लिखल भूजा फाँकी पहिल व्यूह टूटल पेट झाँकि हँसैत छल सुनि हमर कथा के बूझत मोनक व्यथा ?
व्याह भेल परिवार भेल उत्तरदायित्व साकार भेल बन्लहुँ हम कोलहुक बरद कोनो कष्ट आब की गरत तोड़ल दोसर व्यूहक तार हे भगवान लगाउ पार।
धीया पुता पढि लिख गेल व्याह दान सँ फुर्सत भेल राम राम हम पढि रहल छी अंतिम व्यूह सँ लड़ि रहल छी फेर सँ आब हम भेलहुँ चेत भनहि छलहुँ हम बनल प्रेत। ३ (१) गुलाबक फूल लाल सुंदरिक ठोढ लाल कनियाँक लाज लाल प्रेमक रंग लाल
(२) क्रोधक मुँह लाल रक्तक वर्ण लाल आतंक सँ नभ लाल हृदयक घाव लाल
(३) क्रांतिक रंग लाल रणक माटि लाल योद्धाक तरुआरि लाल विजेताक तिलक लाल ४ देह क आगि पुरबा मिझबय मोनक आगि सत्संग हृदय के आगि पिया मिझबय जखन होथि ओ संग | ५ बौद्धिक प्यास मिझाइत छैक आबि साहित्य केर शरण अलग अलग पेय छैक पीबू जे होइए मन संतुष्टि उद्देश्य छैक भिड़ू नै छने छन आत्म सात करू प्रेमकेँ छोड़ू रंज ओ रण ६ जमींदारी गेल राइयाई गेल/ सभटा गेल सोतियाइ नै गेल जमींदारी गेल राइयाई गेल भोजन कय दिन विश्राम गेल खेत गेल खलिहान गेल बचल आमक गाछी गेल गाम छोरि कएल शहर बसेरा नौकरी कऽ करै छी गुजारा चिड़िया चुनमुन सपना भेल माछ मासिक भोजन भेल गप्प दै छी अछि नई मेल सभटा गेल सोतियाइ नै गेल ७ भोज बदरी बाबू आयल छलाह केश अपन कटेने छलाह कहलन्हि बाबूक बरखी छी नोत देमऽ आयल छी नोत पूरा बहरी केँ अछि चूड़ा दहीक व्यवस्था अछि। भेलै सांझ पड़ै छल बुन्नी बिदा भेलहुँ लऽ लोटा टुकनी उप्पर मेघ नीचाँ थाल अनहरियाक पसरल जाल कहुना पहुँचलहुँ पुबरिआ टोल बुझि गेलहुँ हम भोजक मोल पएर धोलहुँ पाँतिमे बैसलहुँ चूड़ा पड़साइत देखैत रहलहुँ तावत आएल जोरक बसात उड़ि गेल हमर असगर पात लोटा उठा अन्तह बैसलहुँ चूड़ा दही सँ शुरुआत केलहुँ।| खाइते छलहुँ फछक्का भेल पड़सनिहारक मटकूडी फूटि गेल सौंसे देह दही लेभरायल हँसैत हँसैत कानब बहरायल गोर लागि हम पकड़ल कान भोजपर नहि देब कहियो ध्यान। ८ पत्रहीन नग्न वृक्ष प्रकृति बहुरंग कलाकारक ई कूची की करैत अछि व्यंग ? २ बिनोद मिश्र, आई आई टी रूडकी, उत्तराखंड डॉ. बिनोद मिश्र सम्प्रति आई आई टी रूडकी, उत्तराखंडमे अंग्रेजी पढ़बैत छथि आ हिनक रचनाb अंग्रेजी आ हिंदी मे प्रकाशित भेल छन्हि। अहि वर्ष हिनक कविता संग्रह Silent Steps and Other Poems प्रकाशित भेल छन्हि। एकर अतिरिक्त ई अंग्रेजीमे आलोचनाक क्षेत्रमे आठ टा पोथी संपादित केने छथि। हिनक पोथी Communication Skills for Engineers and Scientists बहुतो इंजीनियरिंग संस्थानमे पाठ्य पुस्तक रूपमे पढ़ाओल जाइत अछि। प्रेम पुष्प सैंतैत अछि ओ नित- दिन अपन एयरबैग ओना काजमे अनैछ अपन सभ वस्तु तैयो सरिअबैत अछि अपन एयरबैग जेना अभ्यास कऽ रहल हो घर गृहस्तीक प्रारम्भिक पाठ । ओकर एयरबैग पर्याय अछि संतुलन आ आर्थिक समायोजनक ओकर एकमात्र सहचर छात्रावासक घुरती यात्रामे । ओकर एयरबैगक एक खलमे छैक पोथी आ दोसरमे पाथेय एक टा छोट खलमे छैक ओकर साज-सज्जाक सामग्री जे बढ़ा देत ओकर सौंदर्य ओकर लैपटॉप छैक एक टा टैरो कार्ड जे घटा सकैछ ओकर दहेज---- की ई सभ ताकि सकैछ ओकरा लेल एक टा सुयोग्य वर ? मूक अछि ओकर उच्च आ बहुमूल्य शिक्षा विवाह केर बाज़ारमे ताकि रहल अछि बेसीसँ बेसी द्रव्य दान आ दहेज। असहाय ओकर शिक्षित मोन पूछि रहल अपन अस्तित्वक अर्थ की प्रेम पुष्प भऽ सकत प्रस्फुटित ऐ क्रय-विक्रय केर बाज़ार मे ? मौलायल पुष्प हुकहुकी भरैत की निभा सकत वेदीक शपथ ? ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। १.शिवशंकर सिंह ठाकुर २.सुबोध झा १ शिवशंकर सिंह ठाकुर किए दूरेसँ झांकि कऽ देखै छी यै कनियाँ, किए हीया हमर अहाँ सालइ छी यै कनियाँ ,
हमर तकलीफ अहाँ कनिको ने बुझी , रहि -रहि अहाँ किए तड़पाबै छी यै कनियाँ ,
साथी संगतिया सभ हरदम चिढाबय , दूरे सँ अहाँ प्रीत जगाबै छी यै कनियाँ,
मोन मारि कऽ हरदम निठुरले रहै छी, किए अहाँ हमरा सताबै छी यै कनियाँ ,
जिनगी हमर आब निरर्थक बुझाइए , प्रेमक दरस आबो देखाबू यै कनियाँ,
कतेक बुझाऊ हम एहि पागल दिल केँ , बेर -बेर अहीँ पर आबै अइ यै कनियाँ,
हमर अहाँक मिलन बुझु कतेक खुशी देत , प्रेमसँ अहाँक आंचर भरि देब यै कनियाँ,
प्रेम तँ मूल अइ एहि जीवन केर , प्रेम बिना सभ निरर्थक यै कनियाँ,
कहथि शिव शंकर बुझू ई सत्ते , जिनगी बना देब अहाँकेँ यै कनियाँ। 2 हे स्वर्णमयी, अहाँ छी कतऽ अहाँक बिना हमर अन्तःस्थल जानि किए रूसि गेल हमरा सँ आर हमर कलम ने जानि किए शब्द उगलनाइ बंद कऽ देलक।
मूक,उदास आ क्षुब्ध भेल छी, जानि कोन सोच मे उलझल छी, हमर अन्तरात्मा ने जाने किए, सुतल अछि ,रूसल अछि अओर गीत हमर बन्द भऽ गेल अछि I
छन -छन अहाँक पायलक गूंज , धड़कि रहल अछि हमर धड़कनमे, आ अहींक स्वर्णमयी आभामे कतऽ बिलुप्त भऽ गेल छी हम I
रहि-रहि कऽ अहींक स्वर बेर बेर कान मे गुंजि रहल अछि, मानू मिसरी घुलल अहँक वाणीमे, हमर जड़ता केँ झंकृत कऽ रहल अछि I
मोन हमर उद्विग्न अइ तैयो अहँक हाथ हमर छाती पर धीरे -धीरे सरकि रहल अइ आ हमर उद्विग्न मोन केँ शान्त करबाक प्रयास कऽ रहल अइ , हमर सहिष्णुता केँ ललकारि रहल अइ I
हम शान्त रहितो अधीर भऽ जाइ छी, एहन बुझाइत अछि जेना की अहाँ एतहि कतौ छी, आ शून्य दिशि ताकैत अहाँकेँ चिन्हबाक प्रयासमे लागल छी, अहँक भीतरक ब्यथा मानू हमरा सँ किछु कहि रहल अइ I
हँ , ई अवश्य अछि जे कहियो हम अहाँ एक दोसराक लेल जन्म- जन्मान्तारक शपथ खेने रही, एक दोसराक प्रति सत्य आ सनेह सँ प्रेमक बंधन मे बन्हि गेल रही, से की हम बिसरि जाएब ?? कथमपि नहि , कथमपि नहि, ईएह तँ हमर प्रेमक आधार अइ I
मुदा एक दिन ! एहन की भेल जे अहाँ अपने सँ ओइ शपथ केँ तोड़ि देलौंह , आ हमरा अइ मर्त्यलोकमे डरल ,सहमल घुटि -घुटि कऽ जीबाक लेल विवश छोड़ि देलौंह हम कोना कऽ जिबू ? किए जिबू ?
कोना हम बिसरि जाउ जे अहाँ हमर कन्हा पर अपन माथ राखि कऽ अपन वेदना केँ प्रकट केने रही आ हमहूँ तँ अहाँ केँ भरोसा देने रही, तखन हमर कन्हा मजबूत छल I
ओ सामर्थ्य आब हमरा मे नहि रहि गेल, हम मजबूर भऽ गेल छी, विवश भऽ गेल छी, अहँक शपथक खातिर हम कहुना कऽ जीब रहल छी I
कहियो कहियो जखन हम बड़ दुखी भऽ जाइ छी, अहँक कन्हा पर माथ राखि कऽ कनबाक मोन करैए , मुदा किछु नहि कऽ सकैत छी, की करू ? कतऽ जाउ ? अहाँ ई सभ तँ देखते हैब , हमर ब्यथा केँ बुझिते हैब I
कहियो कहियो अहँक फोटो दिस देखि लैत छी , अहँक छवि केँ मानू निहारि लैत छी, फेर हम शून्य दिस देखऽ लगैत छी, अनन्त कल्पनालोक मे डूबि जाइत छी.........I २ सुबोध झा मनबतिया मनबतियाक छल बड सुन्नरि आ सुकुमारि सभ देखैत छलैक गिद्ध जकॉं ऑंखि फारि फारि कतेको दिन पश्चात मनबतियाक घर बसल हमरा पर तऽ जेना हडहडी वज्र खसल ।
अन्हार होएतहिं अनायसे उठि जाइत छल डेग फेर भेटत ओ मोन मे बढि जाइत छल उद्वेग डर हौइत छल तेँ सतत इ बात नुकबैत रहलहुँ अपना बुझैत जेना जाति आ पॉंजि बचबैत रहलहुँ ।
सामाजिक बन्धन जॉंत जकॉं बान्हल छल ओकरहि पर हरदम मोन टॉंगल छल सोचिते रहलहुँ आई ओ जाऽ रहल अछि नहिं भेल हम्मर ओ ई बात खाऽ रहल अछि ।
कहिया हटत ई जातिक भेदभाव से नहि जानि कतेको मनबतिया मरत आ जीअऽत कानि कानि ओकरा की दोख देबैक हमहिं जातिक देबाल नहि खसाएलहुँ आब कनने की होएत अप्पन जिनगी अपनहि मेटाएलहुँ ।
हमहीं नहि कतेको एहिना अन्हारक चुप्पीक बाट तकैत छथि अप्पन सभ किछु उजरलाक बादहु बौक बनि बैसैत छथि सिनेहक दीप मिझाएल जनिकर ओ भेल विक्षिप्त घूमैत छथि विरहक आगि मे झरकाएल मोन मनबतिया केँ ताकैत छथि ।
कतेको भेटत जकर करेज जातिवादक भार सॅें थकुचाएल हो ठोढ केँ रहए सीने करैत जेना अपनहि सँ सवाल जबाब हो पढला लिखला सँ की जखैन ऊँच नीचक देबाल मनुक्खे बनबैत अछि बिसरि जाईत अछि जे सभ मनुक्ख माईए केर कोख सँ जनमैत अछि । ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। १.सद्रे आलम गौहर २.जगदीश चन्द्र ’अनिल’ १ सद्रे आलम गौहर गजल १ चलि गेली ओ आब सपना देखु चित्र बनाउ कल्पना देखू
मुद्रा सँ तौलल जाए मनुक्ख आब आई काल्हि के नपना देखू
भीतर कारी तेँ ने महकारी उपर सँ ललका झपना देखू
जीति एलक्शन ठाठ करै ओ जनता अपना अपना देखू
महंगाई आकाश चढ़ल आब सस्ता होयत ई सपना देखू २ दाम एतय सभ चीजक देब पड़ै छै अधिकारक लेल झगड़ा कर' पड़ै छै
गज भरि जमीन जौ कौरव नहि देब' चाहय पांडव के फेर लोहा लेब' पड़ै छै
कर्बला केर खिस्सा त' दुनियाँ जानै छै धर्मक खातिर शीश कटाब' पड़ै छै
झगड़ा झंझट मानलहुँ नीक नहि होइ छै मुदा जीब' खातिर ईहो कर' पड़ै छै
"गौहर" साधु ब'न' चाहैत अछि मुदा दुर्जन के जे पाठ पढ़ाब' पड़ै छै ३ रुबाइ हरल भरल रहे देश अपन ई हरित बनाबी भेस अपन ई
हरियाली लाबै खुशियाली गौहरक अछि उपदेश अपन ई ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। अक्षय कुमार चौधरी दियाद बलजोर
नाम तँ मिठगर मोतीचूर बाबू स्वाद तीत-माहुर नीम जकाँ ज्ञानक तँ छथि फोंक बतासा बलधकेली करताह भीम जकाँ
छोटका भाय हाकिम-हुकुम छिछ्छा कातिकक कुकुर जकाँ माय बेटी दुनूक दैहिक संसर्गी निरलज थुकचट्ट थुथुर जकाँ
फरीकक सभटा डीह हड़पलन्हि दवारि देनै छथि दुर्योधन जकाँ बाप धृतराष्ट्र पुत्रमोह जालमे भाय अबंड-निपट दुःशासन जकाँ
लठीधर घरमे बेटा बियाहलन्हि लाठी भजै छथि खमपाड़ा जकाँ फटेदार सभकेँ गामसँ हाँकि कऽ खेत चड़ै छथि अनेर पाड़ा जकाँ
भाय-बन्धु परहेज केने छन्हि पहलमानी करै छथि लंठ जकाँ लोक परोछमे थूक फेकै छन्हि तैयो तनि चलै छथि कंस जकाँ
दियाद-वादक डाह लऽ किछु लोक समाजमे पसरल छै कोढ़ि जकाँ राति-दिन महादेवकेँ कबुलथिन दियाद गलैथ राहरिक दालि जकाँ। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। १.डॉ॰ शशिधर कुमर २ आनंद कुमार झा ३नवीन कुमार "आशा" १. डॉ॰ शशिधर कुमर एम॰डी॰(आयु॰) – कायचिकित्सा कॉलेज ऑफ आयुर्वेद एण्ड रिसर्च सेण्टर, निगडी – प्राधिकरण, पूणा (महाराष्ट्र) – ४११०४४ १ बसात (हवा) ओ शिल्पकार छी एहि धरतीक, नञि जानि कते की रचने अछि । स्पर्श मात्र कए सकइत छी , निज आँखि सँ देखब सपने अछि ।। ब्रम्हा बनि कखनहु सृजन करय, कहुखन हर रूप कराल धरय । कहुखन हरि सम पालनकर्त्ता, कहुखन यम - सद्यः काल बनय । ओ जिनगी छी एहि धरती केर, सभ जीवक साँस समाहित अछि । एहि धरती पर जे रिक्त लगय, ओहि शुन्यक बीच प्रवाहित अछि। नञि मूर्त रूप पओलक कहियो, पर दिव्य शक्ति संवरने अछि । ओ शिल्पकार छी एहि धरतीक, नञि जानि कते की रचने अछि ।। ओ योगवाहि, की नञि बुझल ? ओ कऽ सकैछ ककरो संगति । जकरा संग, जा धरि मीत रहय, तकरे सन गुण, तकरे रंगति । के नञि जनैछ पुरिबा – पछिबा, मलयक बसात के नञि जनइछ । ककरा नञि अनुभव चक्रवात, लू – जेठक दुपहरिया तपइत । अनल, अनिल केर संग पाबि, सोनक लंका केँ डहने अछि । ओ शिल्पकार छी एहि धरतीक, नञि जानि कते की रचने अछि ।। कहुखन एकसरि सरिता जल पर, जनु जलतरंग ओ बजा रहल । कखनहु मरु मे वा सागर तट, लीखि बालु सँ अपने मेटा रहल । ओकरा सोझाँ, के रहल अडिग, बिनु दर्प – दलित, के रहल ठाढ़ ? कत विटप उखाड़ल, सिन्धु मथित, भासित पहाड़, अपचित पठार । अगनित पाथर केँ काटि – छाँटि, कत रूप - अनूप ओ गढ़ने अछि । ओ शिल्पकार छी एहि धरतीक, नञि जानि कते की रचने अछि ।। २ हे प्रिय ! अहँक सुन्नर मुखड़ा हे प्रिय ! अहँक सुन्नर मुखड़ा, गहुमक रोटी सन गोल गोल । ने रक्त अधिक, ने श्याम प्रबल, गहुमहि सन सुन्नर गोड़ गोड़ ।। अछि मोन लोभाइत देखि – देखि, दू टा फाँरा आमक अचार । संगहि राखल सुन्नर - सुन्नर, मिरचाइक फर दू गोट लाल ।। की काज अहाँ केँ एहि रोटीक, दऽ दियऽ सखी हम भूखल छी । आपस कए जुनि सिर पाप धरू, हम छी अतीथि हम भूखल छी ।। ३ गजल * जे गाबि सकी, से गीत भेल, की गजल - छन्द - कविता - मुक्तक ? जँ हो जजाति, तऽ खेत भेल, की आढ़ि – धूर – हत्ता - टटहड़ि ?? हम अंगहीन, कोनो अंग विना, पर देह सिमित नञि, अछि व्यापक । मुँह – नाक - कान आ पएर - हाथ, छी हमरहि, पर ने हमर पड़तर ।। कोँढ़ी जँ फुलायल, फूल बनल, गेना – गुलाब – जूही - चम्पक । जे फड़य गाछ पर, फऽल कहल, हो आम – लताम – लकुच – कटहड़ ।। छी वारि एक, पर विविध रूप, अछि जलधि धरा, नभ मे जलधर । खन शान्त कूप – पोखड़ि – डबरा, खन चंचल सिन्धु – सरित – निर्झर ।। कर कलम हाथ लिखबाक लेल, पर मोन पता नञि की लीखत । अहँ कहलहुँ “गजल” लिखू - लिखलहुँ, पर गाबि सकब तेँ गीत कहब ।। अहँ “अनचिन्हार”, परिचित भेलहुँ, पर हम “विदेह” सौंसे सञ्चर ? उन्मुक्त बसात - चिड़ै सन मन, नहि गजल - गीत, खिस्सो लीखत ।। *श्री आशीष “अनचिन्हार” जी केर आग्रह पर तथा हुनिकहि समर्पित । २ आनंद कुमार झा याद आयल
आइ फेर याद आयल किएक मिथिला देश के छोड़ि देने छी जहन हम सभ अप्पन खेत केँ माय केँ कोना बिसरलौं, की भेल ई की कहू चलि पड़ल छी लऽ पिपासा छोड़ी अप्पन भेषकेँ भाइ छुटल , मित्र छुटल छुटि गेल सभ याद सभ हम तड़पि कऽ रहि गेलौं बस हाथ धेने कसि कऽ आइ फेर याद आयल ........ नया जमाना आबि गेलैए पाइ टा भगवन छै जकरा देखू एक्के रस्ता पाइ केर इन्सान छै सखी छुटल मीत छुटल रुसि गेल सभटा कोना आब तँ बिसरि रहल छी नेनपनक खेल केँ आइ........................... . गाम पर पीपर तरमे खेलाइत रहिऐ कोना कहू रोज एतए परदेश मे दिन खुजिते रोज बहु मोन कानल आँखि कानल देखि कऽ कोना सहू केना कऽ सभटा मेटायल सपना अपने सोचि कऽ आइ............. ३ नवीन कुमार "आशा" आस नै छल हमरा ई आस तोरा पाएब की अपना पास आँखिमे बसै छल तोहर मुखड़ा जखन-तखन दिन-दुपहरिया जखन कखनो मिलैए तोरासँ नैन नै आबैए ओइ दिन चैन नै छल हमरा ई आस तोरा पाएब अपना पास पूरा दू बरख बाद देखल तोरा मुदा नै किछु कहि पाओल तोरा अखनो देखि तोहर चंचलता मोन करैए सदिखन तोरा देखी तोहर देखी मन्द मन्द मुस्कान बनेलकौ हमर दिलमे मकान तोहर की करू आरती जे अपने होअए पूर्णिमाक चान जेकर होअए अपन पहिचान ओकर की करू व्याख्यान बस एकटा गप कहियौ गए तोहर हृदैमे बसए आशाक जान कहियो नै छल हमरा आस पायब तोरा अपना पास ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। १.जवाहर लाल कश्यप २.अमित मोहन झा १ जवाहर लाल कश्यप (१९८१- ), पिता श्री- हेमनारायण मिश्र , गाम फुलकाही- दरभंगा। ई की भेल ? अखनो नाचि रहल अछि वएह शीन मानसपटल पर घटना जे घटल छल स्टेशन पर् एकटा सुन्दर सुशील संभ्रान्त महिला दोसर दीन दुखी दरिद्र महिला केँ दान कऽ रहल छलीह अप्पन फेरल कपडा किछु एना अपना आप केँ ओकरा सँ बचा कहीं टच ने भऽ जाय ओकर देह मे हम अवाक रहि गेलहुँ ई कि भेल ? पाप वा पुण्य दया वा घृणा २ अमित मोहन झा, ग्राम-भंडारिसम (वाणेश्वरी स्थान), मनीगाछी, दरभंगा, बिहार, भारत। आयल राखीक त्योहार छायल खुशीक संसार, बहिनी मिल-जुलि चलियौ, भैयाक नगरियामे, हे बहिनी मिल-जुलि चलियौ, भैयाक नगरियामे। रोली कुमकुम तिलक सजायब, माथ भैयाकेँ लगायब, उठल स्नेह तरंग मोर मनमा मे, बहिनी मिल-जुलि चलियौ, भैयाक नगरियामे। अरिपन अँगनामे बनायब, ठाँव पीढ़ीसँ सजायब, प्रेम अश्रु भरि आओत, नयनमामे, बहिनी मिल-जुलि चलियौ, भैयाक नगरिया मे। सोनक थारमे राखि लायब, भाइ-बहिनीक उरकेँ जुड़ायब, पीढ़ी भैयाकेँ बैसायब, अंगनमामे, बहिनी मिल-जुलि चलियौ, भैयाक नगरियामे। भाईजी हाथमे राखी बानह्ब, हुनकर आरती उतारब, संगहि मुँह मिठायब, भवनमा मे, बहिनी मिल-जुलि चलियौ, भैयाक नगरिया मे। भैया जीबहु लाख बरीष, दै छी हृदयसँ आशीष, सावन लऽ कऽ आयल प्रेम, परनमा मे, बहिनी मिल-जुलि चलियौ, भैयाक नगरिया मे। भाई-बहिनक ई त्योहार, महिमा एकर अपार, अमिट राखब बहिनक लाज, त्रिभुवनमा मे, बहिनी मिल-जुलि चलियौ, भैयाक नगरिया मे। भाईजी बहिन केँ जुनि बिसरायब, अपन हृदयसँ जुनि बिलगायब, अमित राखी मे फेर आयब, सावनमा मे, बहिनी मिल-जुलि चलियौ, भैयाक नगरिया मे। हे बहिनी मिल-जुलि चलियौ, भैयाक नगरिया मे। (ऐ गीतक रचनाक श्रेय हम दुनु छोट बहिन कल्याणी एवं कल्पना केँ दऽ रहल छियन्हि, जिनकासँ हमरा अमूल्य भावनात्मक सहायता भेटल आ ई गीत लिखबाक आमंत्रण हमरा श्रीयुत दीपक जी सँ भेटल तइ लेल हम हुनकर अपन हृदयक अंतर्तम बिन्दुसँ आभारी छी। ऐ रचनाकेँ वर्तमान रूपमे प्रस्तुत करबामे पूज्यनीय श्याम शेखर झा भाई जीक अहम योगदान छन्हि। विश्वक समस्त भाइ- बहिनक अमर प्रेमपर लिखल हमर एक लघु प्रयास एक टा गीतक रूपमे अपने सबहक समक्ष प्रस्तुत अछि एवं विश्वक समस्त भाइ-बहिनकेँ हमरा दिससँ ई छोट उपहार।) ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। विदेह नूतन अंक मिथिला कला संगीत १.कैलाश कामत२.ज्योति सुनीत चौधरी ३.श्वेता झा (सिंगापुर) ४.गुंजन कर्ण १.कैलाश कुमार कामत, पिताक नाओं- श्री गंगाराम कामत , माताक नाओं- श्रीमती सुनीता देवी, गाम- बेरमा, भाया- तमुरिया , थाना- मधेपुर, जिला- मधुबनी , (बिहार) मधुबनी जिलाक बेरमा गामक मध्य विद्यालयमे पढ़ैत कैलाश कामत, सातमाक छात्र छथि बड़ लगनसँ फोटो बनबै छथि। २. ज्योति सुनीत चौधरी जन्म तिथि -३० दिसम्बर १९७८; जन्म स्थान -बेल्हवार, मधुबनी ; शिक्षा- स्वामी विवेकानन्द मिडिल स्कूल़ टिस्को साकची गर्ल्स हाई स्कूल़, मिसेज के एम पी एम इन्टर कालेज़, इन्दिरा गान्धी ओपन यूनिवर्सिटी, आइ सी डबल्यू ए आइ (कॉस्ट एकाउण्टेन्सी); निवास स्थान- लन्दन, यू.के.; पिता- श्री शुभंकर झा, ज़मशेदपुर; माता- श्रीमती सुधा झा, शिवीपट्टी। ज्योतिकेँwww.poetry.comसँ संपादकक चॉयस अवार्ड (अंग्रेजी पद्यक हेतु) भेटल छन्हि। हुनकर अंग्रेजी पद्य किछु दिन धरि www.poetrysoup.com केर मुख्य पृष्ठ पर सेहो रहल अछि। ज्योति मिथिला चित्रकलामे सेहो पारंगत छथि आ हिनकर मिथिला चित्रकलाक प्रदर्शनी ईलिंग आर्ट ग्रुप केर अंतर्गत ईलिंग ब्रॊडवे, लंडनमे प्रदर्शित कएल गेल अछि। कविता संग्रह ’अर्चिस्’ प्रकाशित। ३.श्वेता झा (सिंगापुर) ४.गुंजन कर्ण राँटी मधुबनी, सम्प्रति यू.के.मे रहै छथि। www.madhubaniarts.co.uk पर हुनकर कलाकृति देखि सकै छी। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। विदेह नूतन अंक गद्य-पद्य भारती १. मोहनदास (दीर्घकथा):लेखक: उदय प्रकाश (मूल हिन्दीसँ मैथिलीमे अनुवाद विनीत उत्पल) मोहनदास (मैथिली-देवनागरी) मोहनदास (मैथिली-मिथिलाक्षर) मोहनदास (मैथिली-ब्रेल) २.छिन्नमस्ता- प्रभा खेतानक हिन्दी उपन्यासक सुशीला झा द्वारा मैथिली अनुवाद छिन्नमस्ता बालानां कृते बिपिन झा [एहि लेख केर लेखक बिपिन कुमार झा (Senior Research Fellow), IIT मुम्बई मे संगणकीय भाषाविज्ञान (संस्कृत) क्षेत्र मे शोध (Ph. D.) कऽ रहल छथि। ] शरीरक मूल्य (बालबोधिनी कथा) {चन्दमामा (संस्कृत), जून २०१० अंक क शरीरस्य मूल्यम् केर अनुवाद। अनुवादक बिपिन कुमार झा (Senior Research Fellow), IIT मुम्बई मे संगणकीय भाषाविज्ञान (संस्कृत) क्षेत्र मे शोध (Ph. D.) कऽ रहल छथि। टिप्पणी सादर आमन्त्रित अछि- kumarvipin.jha@gmail.com ]} उदयगिरिनगरक राजा छलाह उदयसेन। ओ धर्मात्मा आ प्रजावत्सल छलाह।ओ प्रजा केर् हित में भाँति भातिक जीविका के उद्योग केने छलाह। और ओहि प्रकार सँ आर्थिक व्यवस्था सेहो कयने छलाहह अस्तु सभ प्रजा अपन योग्यता क अनुरूप जीविका प्राप्त करैत छलाह ओतय दरिद्रता क नामोनिशान नै छल।कतहु कतहु वृद्ध अथवा विकलांगे टा भिक्षाटन करैत भेटि सकैत छल ओहि ठाम। ओहि देश में एकटा भिखमंगा युवक छल।ओ बच्चहि सँ भिक्षावृत्ति अपनेने छल। अस्तु ओ परिश्रम नै करय चाहैत छल। महराजक शासन सं भिखमंगा त कम भ गेल छल। लोक सेहो भीख नै दिय चाहैत छल। अस्तु ओकर जीवन कष्टमय भय गेल। एकदिन ओ भोर स दुपहरिया तक भीख मंगलक किन्तु किछु नहि भेटलैक। दोपहरिया में रौद स त्रस्त भ ओ गाछक निच्चा में बैस गेल आ बटोही सभ स दैन्य भाव स मांग लागल। किन्तु कोई ध्यानो नै देलकैक। सोचलक जे भगवान के नामे स किछु भेटजायत ई सोचि ओ कहलक ’हे भगबान भूखल के अन्न दियौक हमर एहेन गरीबक उद्धार करू।’ लोक अपन अपन काज मे व्यस्त छल कोई ऐ पर ध्यान नै देलकैक। तखै ओ छौडा भगबान पर तमसा गेल। कहलक हौ भगवान तों त ठक छ। तोही हमरा बनेलह आ हम भुखल छी तों चुप छह। तो न जगदीश्वर् छ न जगत्पालक। ओ मोन भरि भगबान क निन्दा कयलक। ओही समय ओ राजा ओहि रास्ता स गुजरलाह। भिखमंगा के बकर बकर सुनि के घोडा के रोकलथि।ओकर नजदीक आबि के पुछलथि अहा केकरा आ कियाक निन्दा करैत छियैक? ओ कहलक भगबान के । ओ धूर्त अछि बहीर अछि…। राजा पुछलथि भगवान कोन अपराध कयलन्हि? भोर स घुमलहुं तैय्यो खेनाइ त छोरू वराटिका तक नै भेटल। रजा कहलथि अहाँ पैसा चाहैत छी कि? हम ऐ देशक राजा छी। एकटा हाथ दिय हम एक हजार रुपया दैत छी। हाथ द के हम केना जियब्- ओ बाजल।रजा फ़ेर कहलथि अच्छा एकटा काज करू अहाँ एकटा पैर दिअ हम दू हजार रुपया दैत छी। दुनू आंखि दिय आदहा राज दैत छी। ओ बाजल अंग केना द सकैत छी?ओ त हमर प्राण छी। एहेन धन स कोन् अलाभ? राजा कहलथि तखनि त अहा भाग्यशाली छी।एक् एक टा अंग हजातर सं बेसी महत्त्व रखिअत अछि।दुनू आंखि अदहा राज स बेसी महत्त्व के अछि। ई सभटा भगवाने क दया सँऽ। ओ त पूजनीय छथि उपकार बिसरि के निन्दा कियाक? पशु सेहो कयल गेल उपकार नै बिसरैत अछि। अहा पशु स सेहो बेकार छी? उठू। अनमोल हाथ पैर के सहायता सँऽ आहार क इन्तजाम करू। ओही काल सँ ओ बिखमंगा भीख मंगनाई छोडि देलक। परिश्रम कय जीविकोपार्जन करय लागल। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। बच्चा लोकनि द्वारा स्मरणीय श्लोक १.प्रातः काल ब्रह्ममुहूर्त्त (सूर्योदयक एक घंटा पहिने) सर्वप्रथम अपन दुनू हाथ देखबाक चाही, आ’ ई श्लोक बजबाक चाही। कराग्रे वसते लक्ष्मीः करमध्ये सरस्वती। करमूले स्थितो ब्रह्मा प्रभाते करदर्शनम्॥ करक आगाँ लक्ष्मी बसैत छथि, करक मध्यमे सरस्वती, करक मूलमे ब्रह्मा स्थित छथि। भोरमे ताहि द्वारे करक दर्शन करबाक थीक। २.संध्या काल दीप लेसबाक काल- दीपमूले स्थितो ब्रह्मा दीपमध्ये जनार्दनः। दीपाग्रे शङ्करः प्रोक्त्तः सन्ध्याज्योतिर्नमोऽस्तुते॥ दीपक मूल भागमे ब्रह्मा, दीपक मध्यभागमे जनार्दन (विष्णु) आऽ दीपक अग्र भागमे शङ्कर स्थित छथि। हे संध्याज्योति! अहाँकेँ नमस्कार। ३.सुतबाक काल- रामं स्कन्दं हनूमन्तं वैनतेयं वृकोदरम्। शयने यः स्मरेन्नित्यं दुःस्वप्नस्तस्य नश्यति॥ जे सभ दिन सुतबासँ पहिने राम, कुमारस्वामी, हनूमान्, गरुड़ आऽ भीमक स्मरण करैत छथि, हुनकर दुःस्वप्न नष्ट भऽ जाइत छन्हि। ४. नहेबाक समय- गङ्गे च यमुने चैव गोदावरि सरस्वति। नर्मदे सिन्धु कावेरि जलेऽस्मिन् सन्निधिं कुरू॥ हे गंगा, यमुना, गोदावरी, सरस्वती, नर्मदा, सिन्धु आऽ कावेरी धार। एहि जलमे अपन सान्निध्य दिअ। ५.उत्तरं यत्समुद्रस्य हिमाद्रेश्चैव दक्षिणम्। वर्षं तत् भारतं नाम भारती यत्र सन्ततिः॥ समुद्रक उत्तरमे आऽ हिमालयक दक्षिणमे भारत अछि आऽ ओतुका सन्तति भारती कहबैत छथि। ६.अहल्या द्रौपदी सीता तारा मण्डोदरी तथा। पञ्चकं ना स्मरेन्नित्यं महापातकनाशकम्॥ जे सभ दिन अहल्या, द्रौपदी, सीता, तारा आऽ मण्दोदरी, एहि पाँच साध्वी-स्त्रीक स्मरण करैत छथि, हुनकर सभ पाप नष्ट भऽ जाइत छन्हि। ७.अश्वत्थामा बलिर्व्यासो हनूमांश्च विभीषणः। कृपः परशुरामश्च सप्तैते चिरञ्जीविनः॥ अश्वत्थामा, बलि, व्यास, हनूमान्, विभीषण, कृपाचार्य आऽ परशुराम- ई सात टा चिरञ्जीवी कहबैत छथि। ८.साते भवतु सुप्रीता देवी शिखर वासिनी उग्रेन तपसा लब्धो यया पशुपतिः पतिः। सिद्धिः साध्ये सतामस्तु प्रसादान्तस्य धूर्जटेः जाह्नवीफेनलेखेव यन्यूधि शशिनः कला॥ ९. बालोऽहं जगदानन्द न मे बाला सरस्वती। अपूर्णे पंचमे वर्षे वर्णयामि जगत्त्रयम् ॥ १०. दूर्वाक्षत मंत्र(शुक्ल यजुर्वेद अध्याय २२, मंत्र २२) आ ब्रह्मन्नित्यस्य प्रजापतिर्ॠषिः। लिंभोक्त्ता देवताः। स्वराडुत्कृतिश्छन्दः। षड्जः स्वरः॥ आ ब्रह्म॑न् ब्राह्म॒णो ब्र॑ह्मवर्च॒सी जा॑यता॒मा रा॒ष्ट्रे रा॑ज॒न्यः शुरे॑ऽइषव्यो॒ऽतिव्या॒धी म॑हार॒थो जा॑यतां॒ दोग्ध्रीं धे॒नुर्वोढा॑न॒ड्वाना॒शुः सप्तिः॒ पुर॑न्धि॒र्योवा॑ जि॒ष्णू र॑थे॒ष्ठाः स॒भेयो॒ युवास्य यज॑मानस्य वी॒रो जा॒यतां निका॒मे-नि॑कामे नः प॒र्जन्यों वर्षतु॒ फल॑वत्यो न॒ऽओष॑धयः पच्यन्तां योगेक्ष॒मो नः॑ कल्पताम्॥२२॥ मन्त्रार्थाः सिद्धयः सन्तु पूर्णाः सन्तु मनोरथाः। शत्रूणां बुद्धिनाशोऽस्तु मित्राणामुदयस्तव। ॐ दीर्घायुर्भव। ॐ सौभाग्यवती भव। हे भगवान्। अपन देशमे सुयोग्य आ’ सर्वज्ञ विद्यार्थी उत्पन्न होथि, आ’ शुत्रुकेँ नाश कएनिहार सैनिक उत्पन्न होथि। अपन देशक गाय खूब दूध दय बाली, बरद भार वहन करएमे सक्षम होथि आ’ घोड़ा त्वरित रूपेँ दौगय बला होए। स्त्रीगण नगरक नेतृत्व करबामे सक्षम होथि आ’ युवक सभामे ओजपूर्ण भाषण देबयबला आ’ नेतृत्व देबामे सक्षम होथि। अपन देशमे जखन आवश्यक होय वर्षा होए आ’ औषधिक-बूटी सर्वदा परिपक्व होइत रहए। एवं क्रमे सभ तरहेँ हमरा सभक कल्याण होए। शत्रुक बुद्धिक नाश होए आ’ मित्रक उदय होए॥ मनुष्यकें कोन वस्तुक इच्छा करबाक चाही तकर वर्णन एहि मंत्रमे कएल गेल अछि। एहिमे वाचकलुप्तोपमालड़्कार अछि। अन्वय- ब्रह्म॑न् - विद्या आदि गुणसँ परिपूर्ण ब्रह्म रा॒ष्ट्रे - देशमे ब्र॑ह्मवर्च॒सी-ब्रह्म विद्याक तेजसँ युक्त्त आ जा॑यतां॒- उत्पन्न होए रा॑ज॒न्यः-राजा शुरे॑ऽ–बिना डर बला इषव्यो॒- बाण चलेबामे निपुण ऽतिव्या॒धी-शत्रुकेँ तारण दय बला म॑हार॒थो-पैघ रथ बला वीर दोग्ध्रीं-कामना(दूध पूर्ण करए बाली) धे॒नुर्वोढा॑न॒ड्वाना॒शुः धे॒नु-गौ वा वाणी र्वोढा॑न॒ड्वा- पैघ बरद ना॒शुः-आशुः-त्वरित सप्तिः॒-घोड़ा पुर॑न्धि॒र्योवा॑- पुर॑न्धि॒- व्यवहारकेँ धारण करए बाली र्योवा॑-स्त्री जि॒ष्णू-शत्रुकेँ जीतए बला र॑थे॒ष्ठाः-रथ पर स्थिर स॒भेयो॒-उत्तम सभामे युवास्य-युवा जेहन यज॑मानस्य-राजाक राज्यमे वी॒रो-शत्रुकेँ पराजित करएबला निका॒मे-नि॑कामे-निश्चययुक्त्त कार्यमे नः-हमर सभक प॒र्जन्यों-मेघ वर्षतु॒-वर्षा होए फल॑वत्यो-उत्तम फल बला ओष॑धयः-औषधिः पच्यन्तां- पाकए योगेक्ष॒मो-अलभ्य लभ्य करेबाक हेतु कएल गेल योगक रक्षा नः॑-हमरा सभक हेतु कल्पताम्-समर्थ होए ग्रिफिथक अनुवाद- हे ब्रह्मण, हमर राज्यमे ब्राह्मण नीक धार्मिक विद्या बला, राजन्य-वीर,तीरंदाज, दूध दए बाली गाय, दौगय बला जन्तु, उद्यमी नारी होथि। पार्जन्य आवश्यकता पड़ला पर वर्षा देथि, फल देय बला गाछ पाकए, हम सभ संपत्ति अर्जित/संरक्षित करी। 8.VIDEHA FOR NON RESIDENTS 8.1 to 8.3 MAITHILI LITERATURE IN ENGLISH 8.1.1.The Comet -GAJENDRA THAKUR translated by Jyoti Jha chaudhary 8.1.2.The_Science_of_Words- GAJENDRA THAKUR translated by the author himself 8.1.3.On_the_dice-board_of_the_millennium- GAJENDRA THAKUR translated by Jyoti Jha chaudhary 8.1.4.NAAGPHANS (IN ENGLISH)- SHEFALIKA VERMA translated by Dr. Rajiv Kumar Verma and Dr. Jaya Verma 1. Episodes Of The Life - ("Kist-Kist Jeevan" by Smt. shefalika Varma translated into English by Smt. Jyoti Jha Chaudhary ) 2.Original Poem in Maithili by Kalikant Jha "Buch" Translated into English by Jyoti Jha Chaudhary Input: (कोष्ठकमे देवनागरी, मिथिलाक्षर किंवा फोनेटिक-रोमनमे टाइप करू। Input in Devanagari, Mithilakshara or Phonetic-Roman.) Output: (परिणाम देवनागरी, मिथिलाक्षर आ फोनेटिक-रोमन/ रोमनमे। Result in Devanagari, Mithilakshara and Phonetic-Roman/ Roman.) English to Maithili Maithili to English इंग्लिश-मैथिली-कोष / मैथिली-इंग्लिश-कोष प्रोजेक्टकेँ आगू बढ़ाऊ, अपन सुझाव आ योगदान ई-मेल द्वारा ggajendra@videha.com पर पठाऊ। Top of Form विदेहक मैथिली-अंग्रेजी आ अंग्रेजी मैथिली कोष (इंटरनेटपर पहिल बेर सर्च-डिक्शनरी) एम.एस. एस.क्यू.एल. सर्वर आधारित -Based on ms-sql server Maithili-English and English-Maithili Dictionary. १.भारत आ नेपालक मैथिली भाषा-वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक शैली आ २.मैथिलीमे भाषा सम्पादन पाठ्यक्रम १.नेपाल आ भारतक मैथिली भाषा-वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक शैली
१.१. नेपालक मैथिली भाषा वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक उच्चारण आ लेखन शैली (भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक धारणाकेँ पूर्ण रूपसँ सङ्ग लऽ निर्धारित) मैथिलीमे उच्चारण तथा लेखन १.पञ्चमाक्षर आ अनुस्वार: पञ्चमाक्षरान्तर्गत ङ, ञ, ण, न एवं म अबैत अछि। संस्कृत भाषाक अनुसार शब्दक अन्तमे जाहि वर्गक अक्षर रहैत अछि ओही वर्गक पञ्चमाक्षर अबैत अछि। जेना- अङ्क (क वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ङ् आएल अछि।) पञ्च (च वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ञ् आएल अछि।) खण्ड (ट वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ण् आएल अछि।) सन्धि (त वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे न् आएल अछि।) खम्भ (प वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे म् आएल अछि।) उपर्युक्त बात मैथिलीमे कम देखल जाइत अछि। पञ्चमाक्षरक बदलामे अधिकांश जगहपर अनुस्वारक प्रयोग देखल जाइछ। जेना- अंक, पंच, खंड, संधि, खंभ आदि। व्याकरणविद पण्डित गोविन्द झाक कहब छनि जे कवर्ग, चवर्ग आ टवर्गसँ पूर्व अनुस्वार लिखल जाए तथा तवर्ग आ पवर्गसँ पूर्व पञ्चमाक्षरे लिखल जाए। जेना- अंक, चंचल, अंडा, अन्त तथा कम्पन। मुदा हिन्दीक निकट रहल आधुनिक लेखक एहि बातकेँ नहि मानैत छथि। ओ लोकनि अन्त आ कम्पनक जगहपर सेहो अंत आ कंपन लिखैत देखल जाइत छथि। नवीन पद्धति किछु सुविधाजनक अवश्य छैक। किएक तँ एहिमे समय आ स्थानक बचत होइत छैक। मुदा कतोक बेर हस्तलेखन वा मुद्रणमे अनुस्वारक छोट सन बिन्दु स्पष्ट नहि भेलासँ अर्थक अनर्थ होइत सेहो देखल जाइत अछि। अनुस्वारक प्रयोगमे उच्चारण-दोषक सम्भावना सेहो ततबए देखल जाइत अछि। एतदर्थ कसँ लऽ कऽ पवर्ग धरि पञ्चमाक्षरेक प्रयोग करब उचित अछि। यसँ लऽ कऽ ज्ञ धरिक अक्षरक सङ्ग अनुस्वारक प्रयोग करबामे कतहु कोनो विवाद नहि देखल जाइछ। २.ढ आ ढ़ : ढ़क उच्चारण “र् ह”जकाँ होइत अछि। अतः जतऽ “र् ह”क उच्चारण हो ओतऽ मात्र ढ़ लिखल जाए। आन ठाम खाली ढ लिखल जएबाक चाही। जेना- ढ = ढाकी, ढेकी, ढीठ, ढेउआ, ढङ्ग, ढेरी, ढाकनि, ढाठ आदि। ढ़ = पढ़ाइ, बढ़ब, गढ़ब, मढ़ब, बुढ़बा, साँढ़, गाढ़, रीढ़, चाँढ़, सीढ़ी, पीढ़ी आदि। उपर्युक्त शब्द सभकेँ देखलासँ ई स्पष्ट होइत अछि जे साधारणतया शब्दक शुरूमे ढ आ मध्य तथा अन्तमे ढ़ अबैत अछि। इएह नियम ड आ ड़क सन्दर्भ सेहो लागू होइत अछि। ३.व आ ब : मैथिलीमे “व”क उच्चारण ब कएल जाइत अछि, मुदा ओकरा ब रूपमे नहि लिखल जएबाक चाही। जेना- उच्चारण : बैद्यनाथ, बिद्या, नब, देबता, बिष्णु, बंश, बन्दना आदि। एहि सभक स्थानपर क्रमशः वैद्यनाथ, विद्या, नव, देवता, विष्णु, वंश, वन्दना लिखबाक चाही। सामान्यतया व उच्चारणक लेल ओ प्रयोग कएल जाइत अछि। जेना- ओकील, ओजह आदि। ४.य आ ज : कतहु-कतहु “य”क उच्चारण “ज”जकाँ करैत देखल जाइत अछि, मुदा ओकरा ज नहि लिखबाक चाही। उच्चारणमे यज्ञ, जदि, जमुना, जुग, जाबत, जोगी, जदु, जम आदि कहल जाएबला शब्द सभकेँ क्रमशः यज्ञ, यदि, यमुना, युग, यावत, योगी, यदु, यम लिखबाक चाही। ५.ए आ य : मैथिलीक वर्तनीमे ए आ य दुनू लिखल जाइत अछि। प्राचीन वर्तनी- कएल, जाए, होएत, माए, भाए, गाए आदि। नवीन वर्तनी- कयल, जाय, होयत, माय, भाय, गाय आदि। सामान्यतया शब्दक शुरूमे ए मात्र अबैत अछि। जेना एहि, एना, एकर, एहन आदि। एहि शब्द सभक स्थानपर यहि, यना, यकर, यहन आदिक प्रयोग नहि करबाक चाही। यद्यपि मैथिलीभाषी थारू सहित किछु जातिमे शब्दक आरम्भोमे “ए”केँ य कहि उच्चारण कएल जाइत अछि। ए आ “य”क प्रयोगक सन्दर्भमे प्राचीने पद्धतिक अनुसरण करब उपयुक्त मानि एहि पुस्तकमे ओकरे प्रयोग कएल गेल अछि। किएक तँ दुनूक लेखनमे कोनो सहजता आ दुरूहताक बात नहि अछि। आ मैथिलीक सर्वसाधारणक उच्चारण-शैली यक अपेक्षा एसँ बेसी निकट छैक। खास कऽ कएल, हएब आदि कतिपय शब्दकेँ कैल, हैब आदि रूपमे कतहु-कतहु लिखल जाएब सेहो “ए”क प्रयोगकेँ बेसी समीचीन प्रमाणित करैत अछि। ६.हि, हु तथा एकार, ओकार : मैथिलीक प्राचीन लेखन-परम्परामे कोनो बातपर बल दैत काल शब्दक पाछाँ हि, हु लगाओल जाइत छैक। जेना- हुनकहि, अपनहु, ओकरहु, तत्कालहि, चोट्टहि, आनहु आदि। मुदा आधुनिक लेखनमे हिक स्थानपर एकार एवं हुक स्थानपर ओकारक प्रयोग करैत देखल जाइत अछि। जेना- हुनके, अपनो, तत्काले, चोट्टे, आनो आदि। ७.ष तथा ख : मैथिली भाषामे अधिकांशतः षक उच्चारण ख होइत अछि। जेना- षड्यन्त्र (खड़यन्त्र), षोडशी (खोड़शी), षट्कोण (खटकोण), वृषेश (वृखेश), सन्तोष (सन्तोख) आदि। ८.ध्वनि-लोप : निम्नलिखित अवस्थामे शब्दसँ ध्वनि-लोप भऽ जाइत अछि: (क) क्रियान्वयी प्रत्यय अयमे य वा ए लुप्त भऽ जाइत अछि। ओहिमे सँ पहिने अक उच्चारण दीर्घ भऽ जाइत अछि। ओकर आगाँ लोप-सूचक चिह्न वा विकारी (’ / ऽ) लगाओल जाइछ। जेना- पूर्ण रूप : पढ़ए (पढ़य) गेलाह, कए (कय) लेल, उठए (उठय) पड़तौक। अपूर्ण रूप : पढ़’ गेलाह, क’ लेल, उठ’ पड़तौक। पढ़ऽ गेलाह, कऽ लेल, उठऽ पड़तौक। (ख) पूर्वकालिक कृत आय (आए) प्रत्ययमे य (ए) लुप्त भऽ जाइछ, मुदा लोप-सूचक विकारी नहि लगाओल जाइछ। जेना- पूर्ण रूप : खाए (य) गेल, पठाय (ए) देब, नहाए (य) अएलाह। अपूर्ण रूप : खा गेल, पठा देब, नहा अएलाह। (ग) स्त्री प्रत्यय इक उच्चारण क्रियापद, संज्ञा, ओ विशेषण तीनूमे लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना- पूर्ण रूप : दोसरि मालिनि चलि गेलि। अपूर्ण रूप : दोसर मालिन चलि गेल। (घ) वर्तमान कृदन्तक अन्तिम त लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना- पूर्ण रूप : पढ़ैत अछि, बजैत अछि, गबैत अछि। अपूर्ण रूप : पढ़ै अछि, बजै अछि, गबै अछि। (ङ) क्रियापदक अवसान इक, उक, ऐक तथा हीकमे लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना- पूर्ण रूप: छियौक, छियैक, छहीक, छौक, छैक, अबितैक, होइक। अपूर्ण रूप : छियौ, छियै, छही, छौ, छै, अबितै, होइ। (च) क्रियापदीय प्रत्यय न्ह, हु तथा हकारक लोप भऽ जाइछ। जेना- पूर्ण रूप : छन्हि, कहलन्हि, कहलहुँ, गेलह, नहि। अपूर्ण रूप : छनि, कहलनि, कहलौँ, गेलऽ, नइ, नञि, नै। ९.ध्वनि स्थानान्तरण : कोनो-कोनो स्वर-ध्वनि अपना जगहसँ हटि कऽ दोसर ठाम चलि जाइत अछि। खास कऽ ह्रस्व इ आ उक सम्बन्धमे ई बात लागू होइत अछि। मैथिलीकरण भऽ गेल शब्दक मध्य वा अन्तमे जँ ह्रस्व इ वा उ आबए तँ ओकर ध्वनि स्थानान्तरित भऽ एक अक्षर आगाँ आबि जाइत अछि। जेना- शनि (शइन), पानि (पाइन), दालि ( दाइल), माटि (माइट), काछु (काउछ), मासु (माउस) आदि। मुदा तत्सम शब्द सभमे ई निअम लागू नहि होइत अछि। जेना- रश्मिकेँ रइश्म आ सुधांशुकेँ सुधाउंस नहि कहल जा सकैत अछि। १०.हलन्त(्)क प्रयोग : मैथिली भाषामे सामान्यतया हलन्त (्)क आवश्यकता नहि होइत अछि। कारण जे शब्दक अन्तमे अ उच्चारण नहि होइत अछि। मुदा संस्कृत भाषासँ जहिनाक तहिना मैथिलीमे आएल (तत्सम) शब्द सभमे हलन्त प्रयोग कएल जाइत अछि। एहि पोथीमे सामान्यतया सम्पूर्ण शब्दकेँ मैथिली भाषा सम्बन्धी निअम अनुसार हलन्तविहीन राखल गेल अछि। मुदा व्याकरण सम्बन्धी प्रयोजनक लेल अत्यावश्यक स्थानपर कतहु-कतहु हलन्त देल गेल अछि। प्रस्तुत पोथीमे मथिली लेखनक प्राचीन आ नवीन दुनू शैलीक सरल आ समीचीन पक्ष सभकेँ समेटि कऽ वर्ण-विन्यास कएल गेल अछि। स्थान आ समयमे बचतक सङ्गहि हस्त-लेखन तथा तकनीकी दृष्टिसँ सेहो सरल होबऽबला हिसाबसँ वर्ण-विन्यास मिलाओल गेल अछि। वर्तमान समयमे मैथिली मातृभाषी पर्यन्तकेँ आन भाषाक माध्यमसँ मैथिलीक ज्ञान लेबऽ पड़ि रहल परिप्रेक्ष्यमे लेखनमे सहजता तथा एकरूपतापर ध्यान देल गेल अछि। तखन मैथिली भाषाक मूल विशेषता सभ कुण्ठित नहि होइक, ताहू दिस लेखक-मण्डल सचेत अछि। प्रसिद्ध भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक कहब छनि जे सरलताक अनुसन्धानमे एहन अवस्था किन्नहु ने आबऽ देबाक चाही जे भाषाक विशेषता छाँहमे पडि जाए। -(भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक धारणाकेँ पूर्ण रूपसँ सङ्ग लऽ निर्धारित) १.२. मैथिली अकादमी, पटना द्वारा निर्धारित मैथिली लेखन-शैली
१. जे शब्द मैथिली-साहित्यक प्राचीन कालसँ आइ धरि जाहि वर्त्तनीमे प्रचलित अछि, से सामान्यतः ताहि वर्त्तनीमे लिखल जाय- उदाहरणार्थ-
ग्राह्य
एखन ठाम जकर, तकर तनिकर अछि
अग्राह्य अखन, अखनि, एखेन, अखनी ठिमा, ठिना, ठमा जेकर, तेकर तिनकर। (वैकल्पिक रूपेँ ग्राह्य) ऐछ, अहि, ए।
२. निम्नलिखित तीन प्रकारक रूप वैकल्पिकतया अपनाओल जाय: भऽ गेल, भय गेल वा भए गेल। जा रहल अछि, जाय रहल अछि, जाए रहल अछि। कर’ गेलाह, वा करय गेलाह वा करए गेलाह।
३. प्राचीन मैथिलीक ‘न्ह’ ध्वनिक स्थानमे ‘न’ लिखल जाय सकैत अछि यथा कहलनि वा कहलन्हि।
४. ‘ऐ’ तथा ‘औ’ ततय लिखल जाय जत’ स्पष्टतः ‘अइ’ तथा ‘अउ’ सदृश उच्चारण इष्ट हो। यथा- देखैत, छलैक, बौआ, छौक इत्यादि।
५. मैथिलीक निम्नलिखित शब्द एहि रूपे प्रयुक्त होयत: जैह, सैह, इएह, ओऐह, लैह तथा दैह।
६. ह्र्स्व इकारांत शब्दमे ‘इ’ के लुप्त करब सामान्यतः अग्राह्य थिक। यथा- ग्राह्य देखि आबह, मालिनि गेलि (मनुष्य मात्रमे)।
७. स्वतंत्र ह्रस्व ‘ए’ वा ‘य’ प्राचीन मैथिलीक उद्धरण आदिमे तँ यथावत राखल जाय, किंतु आधुनिक प्रयोगमे वैकल्पिक रूपेँ ‘ए’ वा ‘य’ लिखल जाय। यथा:- कयल वा कएल, अयलाह वा अएलाह, जाय वा जाए इत्यादि।
८. उच्चारणमे दू स्वरक बीच जे ‘य’ ध्वनि स्वतः आबि जाइत अछि तकरा लेखमे स्थान वैकल्पिक रूपेँ देल जाय। यथा- धीआ, अढ़ैआ, विआह, वा धीया, अढ़ैया, बियाह।
९. सानुनासिक स्वतंत्र स्वरक स्थान यथासंभव ‘ञ’ लिखल जाय वा सानुनासिक स्वर। यथा:- मैञा, कनिञा, किरतनिञा वा मैआँ, कनिआँ, किरतनिआँ।
१०. कारकक विभक्त्तिक निम्नलिखित रूप ग्राह्य:- हाथकेँ, हाथसँ, हाथेँ, हाथक, हाथमे। ’मे’ मे अनुस्वार सर्वथा त्याज्य थिक। ‘क’ क वैकल्पिक रूप ‘केर’ राखल जा सकैत अछि।
११. पूर्वकालिक क्रियापदक बाद ‘कय’ वा ‘कए’ अव्यय वैकल्पिक रूपेँ लगाओल जा सकैत अछि। यथा:- देखि कय वा देखि कए।
१२. माँग, भाँग आदिक स्थानमे माङ, भाङ इत्यादि लिखल जाय।
१३. अर्द्ध ‘न’ ओ अर्द्ध ‘म’ क बदला अनुसार नहि लिखल जाय, किंतु छापाक सुविधार्थ अर्द्ध ‘ङ’ , ‘ञ’, तथा ‘ण’ क बदला अनुस्वारो लिखल जा सकैत अछि। यथा:- अङ्क, वा अंक, अञ्चल वा अंचल, कण्ठ वा कंठ।
१४. हलंत चिह्न निअमतः लगाओल जाय, किंतु विभक्तिक संग अकारांत प्रयोग कएल जाय। यथा:- श्रीमान्, किंतु श्रीमानक।
१५. सभ एकल कारक चिह्न शब्दमे सटा क’ लिखल जाय, हटा क’ नहि, संयुक्त विभक्तिक हेतु फराक लिखल जाय, यथा घर परक।
१६. अनुनासिककेँ चन्द्रबिन्दु द्वारा व्यक्त कयल जाय। परंतु मुद्रणक सुविधार्थ हि समान जटिल मात्रापर अनुस्वारक प्रयोग चन्द्रबिन्दुक बदला कयल जा सकैत अछि। यथा- हिँ केर बदला हिं।
१७. पूर्ण विराम पासीसँ ( । ) सूचित कयल जाय।
१८. समस्त पद सटा क’ लिखल जाय, वा हाइफेनसँ जोड़ि क’ , हटा क’ नहि।
१९. लिअ तथा दिअ शब्दमे बिकारी (ऽ) नहि लगाओल जाय।
२०. अंक देवनागरी रूपमे राखल जाय।
२१.किछु ध्वनिक लेल नवीन चिन्ह बनबाओल जाय। जा' ई नहि बनल अछि ताबत एहि दुनू ध्वनिक बदला पूर्ववत् अय/ आय/ अए/ आए/ आओ/ अओ लिखल जाय। आकि ऎ वा ऒ सँ व्यक्त कएल जाय।
ह./- गोविन्द झा ११/८/७६ श्रीकान्त ठाकुर ११/८/७६ सुरेन्द्र झा "सुमन" ११/०८/७६
२. मैथिलीमे भाषा सम्पादन पाठ्यक्रम २.१. उच्चारण निर्देश: (बोल्ड कएल रूप ग्राह्य):- दन्त न क उच्चारणमे दाँतमे जीह सटत- जेना बाजू नाम , मुदा ण क उच्चारणमे जीह मूर्धामे सटत (नै सटैए तँ उच्चारण दोष अछि)- जेना बाजू गणेश। तालव्य शमे जीह तालुसँ , षमे मूर्धासँ आ दन्त समे दाँतसँ सटत। निशाँ, सभ आ शोषण बाजि कऽ देखू। मैथिलीमे ष केँ वैदिक संस्कृत जकाँ ख सेहो उच्चरित कएल जाइत अछि, जेना वर्षा, दोष। य अनेको स्थानपर ज जकाँ उच्चरित होइत अछि आ ण ड़ जकाँ (यथा संयोग आ गणेश संजोग आ गड़ेस उच्चरित होइत अछि)। मैथिलीमे व क उच्चारण ब, श क उच्चारण स आ य क उच्चारण ज सेहो होइत अछि। ओहिना ह्रस्व इ बेशीकाल मैथिलीमे पहिने बाजल जाइत अछि कारण देवनागरीमे आ मिथिलाक्षरमे ह्रस्व इ अक्षरक पहिने लिखलो जाइत आ बाजलो जएबाक चाही। कारण जे हिन्दीमे एकर दोषपूर्ण उच्चारण होइत अछि (लिखल तँ पहिने जाइत अछि मुदा बाजल बादमे जाइत अछि), से शिक्षा पद्धतिक दोषक कारण हम सभ ओकर उच्चारण दोषपूर्ण ढंगसँ कऽ रहल छी। अछि- अ इ छ ऐछ (उच्चारण) छथि- छ इ थ – छैथ (उच्चारण) पहुँचि- प हुँ इ च (उच्चारण) आब अ आ इ ई ए ऐ ओ औ अं अः ऋ ऐ सभ लेल मात्रा सेहो अछि, मुदा ऐमे ई ऐ ओ औ अं अः ऋ केँ संयुक्ताक्षर रूपमे गलत रूपमे प्रयुक्त आ उच्चरित कएल जाइत अछि। जेना ऋ केँ री रूपमे उच्चरित करब। आ देखियौ- ऐ लेल देखिऔ क प्रयोग अनुचित। मुदा देखिऐ लेल देखियै अनुचित। क् सँ ह् धरि अ सम्मिलित भेलासँ क सँ ह बनैत अछि, मुदा उच्चारण काल हलन्त युक्त शब्दक अन्तक उच्चारणक प्रवृत्ति बढ़ल अछि, मुदा हम जखन मनोजमे ज् अन्तमे बजैत छी, तखनो पुरनका लोककेँ बजैत सुनबन्हि- मनोजऽ, वास्तवमे ओ अ युक्त ज् = ज बजै छथि। फेर ज्ञ अछि ज् आ ञ क संयुक्त मुदा गलत उच्चारण होइत अछि- ग्य। ओहिना क्ष अछि क् आ ष क संयुक्त मुदा उच्चारण होइत अछि छ। फेर श् आ र क संयुक्त अछि श्र ( जेना श्रमिक) आ स् आ र क संयुक्त अछि स्र (जेना मिस्र)। त्र भेल त+र । उच्चारणक ऑडियो फाइल विदेह आर्काइव http://www.videha.co.in/ पर उपलब्ध अछि। फेर केँ / सँ / पर पूर्व अक्षरसँ सटा कऽ लिखू मुदा तँ / कऽ हटा कऽ। ऐमे सँ मे पहिल सटा कऽ लिखू आ बादबला हटा कऽ। अंकक बाद टा लिखू सटा कऽ मुदा अन्य ठाम टा लिखू हटा कऽ– जेना छहटा मुदा सभ टा। फेर ६अ म सातम लिखू- छठम सातम नै। घरबलामे बला मुदा घरवालीमे वाली प्रयुक्त करू। रहए- रहै मुदा सकैए (उच्चारण सकै-ए)। मुदा कखनो काल रहए आ रहै मे अर्थ भिन्नता सेहो, जेना से कम्मो जगहमे पार्किंग करबाक अभ्यास रहै ओकरा। पुछलापर पता लागल जे ढुनढुन नाम्ना ई ड्राइवर कनाट प्लेसक पार्किंगमे काज करैत रहए। छलै, छलए मे सेहो ऐ तरहक भेल। छलए क उच्चारण छल-ए सेहो। संयोगने- (उच्चारण संजोगने) केँ/ कऽ केर- क ( केर क प्रयोग गद्यमे नै करू , पद्यमे कऽ सकै छी। ) क (जेना रामक) –रामक आ संगे (उच्चारण राम के / राम कऽ सेहो) सँ- सऽ (उच्चारण) चन्द्रबिन्दु आ अनुस्वार- अनुस्वारमे कंठ धरिक प्रयोग होइत अछि मुदा चन्द्रबिन्दुमे नै। चन्द्रबिन्दुमे कनेक एकारक सेहो उच्चारण होइत अछि- जेना रामसँ- (उच्चारण राम सऽ) रामकेँ- (उच्चारण राम कऽ/ राम के सेहो)। केँ जेना रामकेँ भेल हिन्दीक को (राम को)- राम को= रामकेँ क जेना रामक भेल हिन्दीक का ( राम का) राम का= रामक कऽ जेना जा कऽ भेल हिन्दीक कर ( जा कर) जा कर= जा कऽ सँ भेल हिन्दीक से (राम से) राम से= रामसँ सऽ , तऽ , त , केर (गद्यमे) एे चारू शब्द सबहक प्रयोग अवांछित। के दोसर अर्थेँ प्रयुक्त भऽ सकैए- जेना, के कहलक? विभक्ति “क”क बदला एकर प्रयोग अवांछित। नञि, नहि, नै, नइ, नँइ, नइँ, नइं ऐ सभक उच्चारण आ लेखन - नै त्त्व क बदलामे त्व जेना महत्वपूर्ण (महत्त्वपूर्ण नै) जतए अर्थ बदलि जाए ओतहि मात्र तीन अक्षरक संयुक्ताक्षरक प्रयोग उचित। सम्पति- उच्चारण स म्प इ त (सम्पत्ति नै- कारण सही उच्चारण आसानीसँ सम्भव नै)। मुदा सर्वोत्तम (सर्वोतम नै)। राष्ट्रिय (राष्ट्रीय नै) सकैए/ सकै (अर्थ परिवर्तन) पोछैले/ पोछै लेल/ पोछए लेल पोछैए/ पोछए/ (अर्थ परिवर्तन) पोछए/ पोछै ओ लोकनि ( हटा कऽ, ओ मे बिकारी नै) ओइ/ ओहि ओहिले/ ओहि लेल/ ओही लऽ जएबेँ/ बैसबेँ पँचभइयाँ देखियौक/ (देखिऔक नै- तहिना अ मे ह्रस्व आ दीर्घक मात्राक प्रयोग अनुचित) जकाँ / जेकाँ तँइ/ तैँ/ होएत / हएत नञि/ नहि/ नँइ/ नइँ/ नै सौँसे/ सौंसे बड़ / बड़ी (झोराओल) गाए (गाइ नहि), मुदा गाइक दूध (गाएक दूध नै।) रहलेँ/ पहिरतैँ हमहीं/ अहीं सब - सभ सबहक - सभहक धरि - तक गप- बात बूझब - समझब बुझलौं/ समझलौं/ बुझलहुँ - समझलहुँ हमरा आर - हम सभ आकि- आ कि सकैछ/ करैछ (गद्यमे प्रयोगक आवश्यकता नै) होइन/ होनि जाइन (जानि नै, जेना देल जाइन) मुदा जानि-बूझि (अर्थ परिव्र्तन) पइठ/ जाइठ आउ/ जाउ/ आऊ/ जाऊ मे, केँ, सँ, पर (शब्दसँ सटा कऽ) तँ कऽ धऽ दऽ (शब्दसँ हटा कऽ) मुदा दूटा वा बेसी विभक्ति संग रहलापर पहिल विभक्ति टाकेँ सटाऊ। जेना ऐमे सँ । एकटा , दूटा (मुदा कए टा) बिकारीक प्रयोग शब्दक अन्तमे, बीचमे अनावश्यक रूपेँ नै। आकारान्त आ अन्तमे अ क बाद बिकारीक प्रयोग नै (जेना दिअ , आ/ दिय’ , आ’, आ नै ) अपोस्ट्रोफीक प्रयोग बिकारीक बदलामे करब अनुचित आ मात्र फॉन्टक तकनीकी न्यूनताक परिचायक)- ओना बिकारीक संस्कृत रूप ऽ अवग्रह कहल जाइत अछि आ वर्तनी आ उच्चारण दुनू ठाम एकर लोप रहैत अछि/ रहि सकैत अछि (उच्चारणमे लोप रहिते अछि)। मुदा अपोस्ट्रोफी सेहो अंग्रेजीमे पसेसिव केसमे होइत अछि आ फ्रेंचमे शब्दमे जतए एकर प्रयोग होइत अछि जेना raison d’etre एतए सेहो एकर उच्चारण रैजौन डेटर होइत अछि, माने अपोस्ट्रॉफी अवकाश नै दैत अछि वरन जोड़ैत अछि, से एकर प्रयोग बिकारीक बदला देनाइ तकनीकी रूपेँ सेहो अनुचित)। अइमे, एहिमे/ ऐमे जइमे, जाहिमे एखन/ अखन/ अइखन केँ (के नहि) मे (अनुस्वार रहित) भऽ मे दऽ तँ (तऽ, त नै) सँ ( सऽ स नै) गाछ तर गाछ लग साँझ खन जो (जो go, करै जो do) तै/तइ जेना- तै दुआरे/ तइमे/ तइले जै/जइ जेना- जै कारण/ जइसँ/ जइले ऐ/अइ जेना- ऐ कारण/ ऐसँ/ अइले/ मुदा एकर एकटा खास प्रयोग- लालति कतेक दिनसँ कहैत रहैत अइ लै/लइ जेना लैसँ/ लइले/ लै दुआरे लहँ/ लौं गेलौं/ लेलौं/ लेलँह/ गेलहुँ/ लेलहुँ/ लेलँ जइ/ जाहि/ जै जहिठाम/ जाहिठाम/ जइठाम/ जैठाम एहि/ अहि/ अइ (वाक्यक अंतमे ग्राह्य) / ऐ अइछ/ अछि/ ऐछ तइ/ तहि/ तै/ ताहि ओहि/ ओइ सीखि/ सीख जीवि/ जीवी/ जीब भलेहीं/ भलहिं तैं/ तँइ/ तँए जाएब/ जएब लइ/ लै छइ/ छै नहि/ नै/ नइ गइ/ गै छनि/ छन्हि ... समए शब्दक संग जखन कोनो विभक्ति जुटै छै तखन समै जना समैपर इत्यादि। असगरमे हृदए आ विभक्ति जुटने हृदे जना हृदेसँ, हृदेमे इत्यादि। जइ/ जाहि/ जै जहिठाम/ जाहिठाम/ जइठाम/ जैठाम एहि/ अहि/ अइ/ ऐ अइछ/ अछि/ ऐछ तइ/ तहि/ तै/ ताहि ओहि/ ओइ सीखि/ सीख जीवि/ जीवी/ जीब भले/ भलेहीं/ भलहिं तैं/ तँइ/ तँए जाएब/ जएब लइ/ लै छइ/ छै नहि/ नै/ नइ गइ/ गै छनि/ छन्हि चुकल अछि/ गेल गछि २.२. मैथिलीमे भाषा सम्पादन पाठ्यक्रम नीचाँक सूचीमे देल विकल्पमेसँ लैंगुएज एडीटर द्वारा कोन रूप चुनल जेबाक चाही: बोल्ड कएल रूप ग्राह्य: १.होयबला/ होबयबला/ होमयबला/ हेब’बला, हेम’बला/ होयबाक/होबएबला /होएबाक २. आ’/आऽ आ ३. क’ लेने/कऽ लेने/कए लेने/कय लेने/ल’/लऽ/लय/लए ४. भ’ गेल/भऽ गेल/भय गेल/भए गेल ५. कर’ गेलाह/करऽ गेलह/करए गेलाह/करय गेलाह ६. लिअ/दिअ लिय’,दिय’,लिअ’,दिय’/ ७. कर’ बला/करऽ बला/ करय बला करैबला/क’र’ बला / करैवाली ८. बला वला (पुरूष), वाली (स्त्री) ९ . आङ्ल आंग्ल १०. प्रायः प्रायह ११. दुःख दुख १ २. चलि गेल चल गेल/चैल गेल १३. देलखिन्ह देलकिन्ह, देलखिन १४. देखलन्हि देखलनि/ देखलैन्ह १५. छथिन्ह/ छलन्हि छथिन/ छलैन/ छलनि १६. चलैत/दैत चलति/दैति १७. एखनो अखनो १८. बढ़नि बढ़इन बढ़न्हि १९. ओ’/ओऽ(सर्वनाम) ओ २० . ओ (संयोजक) ओ’/ओऽ २१. फाँगि/फाङ्गि फाइंग/फाइङ २२. जे जे’/जेऽ २३. ना-नुकुर ना-नुकर २४. केलन्हि/केलनि/कयलन्हि २५. तखनतँ/ तखन तँ २६. जा रहल/जाय रहल/जाए रहल २७. निकलय/निकलए लागल/ लगल बहराय/ बहराए लागल/ लगल निकल’/बहरै लागल २८. ओतय/ जतय जत’/ ओत’/ जतए/ ओतए २९. की फूरल जे कि फूरल जे ३०. जे जे’/जेऽ ३१. कूदि / यादि(मोन पारब) कूइद/याइद/कूद/याद/ यादि (मोन) ३२. इहो/ ओहो ३३. हँसए/ हँसय हँसऽ ३४. नौ आकि दस/नौ किंवा दस/ नौ वा दस ३५. सासु-ससुर सास-ससुर ३६. छह/ सात छ/छः/सात ३७. की की’/ कीऽ (दीर्घीकारान्तमे ऽ वर्जित) ३८. जबाब जवाब ३९. करएताह/ करेताह करयताह ४०. दलान दिशि दलान दिश/दलान दिस ४१ . गेलाह गएलाह/गयलाह ४२. किछु आर/ किछु और/ किछ आर ४३. जाइ छल/ जाइत छल जाति छल/जैत छल ४४. पहुँचि/ भेट जाइत छल/ भेट जाइ छलए पहुँच/ भेटि जाइत छल ४५. जबान (युवा)/ जवान(फौजी) ४६. लय/ लए क’/ कऽ/ लए कए / लऽ कऽ/ लऽ कए ४७. ल’/लऽ कय/ कए ४८. एखन / एखने / अखन / अखने ४९. अहींकेँ अहीँकेँ ५०. गहींर गहीँर ५१. धार पार केनाइ धार पार केनाय/केनाए ५२. जेकाँ जेँकाँ/ जकाँ ५३. तहिना तेहिना ५४. एकर अकर ५५. बहिनउ बहनोइ ५६. बहिन बहिनि ५७. बहिन-बहिनोइ बहिन-बहनउ ५८. नहि/ नै ५९. करबा / करबाय/ करबाए ६०. तँ/ त ऽ तय/तए ६१. भैयारी मे छोट-भाए/भै/, जेठ-भाय/भाइ, ६२. गिनतीमे दू भाइ/भाए/भाँइ ६३. ई पोथी दू भाइक/ भाँइ/ भाए/ लेल। यावत जावत ६४. माय मै / माए मुदा माइक ममता ६५. देन्हि/ दइन दनि/ दएन्हि/ दयन्हि दन्हि/ दैन्हि ६६. द’/ दऽ/ दए ६७. ओ (संयोजक) ओऽ (सर्वनाम) ६८. तका कए तकाय तकाए ६९. पैरे (on foot) पएरे कएक/ कैक ७०. ताहुमे/ ताहूमे ७१. पुत्रीक ७२. बजा कय/ कए / कऽ ७३. बननाय/बननाइ ७४. कोला ७५. दिनुका दिनका ७६. ततहिसँ ७७. गरबओलन्हि/ गरबौलनि/ गरबेलन्हि/ गरबेलनि ७८. बालु बालू ७९. चेन्ह चिन्ह(अशुद्ध) ८०. जे जे’ ८१ . से/ के से’/के’ ८२. एखुनका अखनुका ८३. भुमिहार भूमिहार ८४. सुग्गर / सुगरक/ सूगर ८५. झठहाक झटहाक ८६. छूबि ८७. करइयो/ओ करैयो ने देलक /करियौ-करइयौ ८८. पुबारि पुबाइ ८९. झगड़ा-झाँटी झगड़ा-झाँटि ९०. पएरे-पएरे पैरे-पैरे ९१. खेलएबाक ९२. खेलेबाक ९३. लगा ९४. होए- हो – होअए ९५. बुझल बूझल ९६. बूझल (संबोधन अर्थमे) ९७. यैह यएह / इएह/ सैह/ सएह ९८. तातिल ९९. अयनाय- अयनाइ/ अएनाइ/ एनाइ १००. निन्न- निन्द १०१. बिनु बिन १०२. जाए जाइ १०३. जाइ (in different sense)-last word of sentence १०४. छत पर आबि जाइ १०५. ने १०६. खेलाए (play) –खेलाइ १०७. शिकाइत- शिकायत १०८. ढप- ढ़प १०९ . पढ़- पढ ११०. कनिए/ कनिये कनिञे १११. राकस- राकश ११२. होए/ होय होइ ११३. अउरदा- औरदा ११४. बुझेलन्हि (different meaning- got understand) ११५. बुझएलन्हि/बुझेलनि/ बुझयलन्हि (understood himself) ११६. चलि- चल/ चलि गेल ११७. खधाइ- खधाय ११८. मोन पाड़लखिन्ह/ मोन पाड़लखिन/ मोन पारलखिन्ह ११९. कैक- कएक- कइएक १२०. लग ल’ग १२१. जरेनाइ १२२. जरौनाइ जरओनाइ- जरएनाइ/ जरेनाइ १२३. होइत १२४. गरबेलन्हि/ गरबेलनि गरबौलन्हि/ गरबौलनि १२५. चिखैत- (to test)चिखइत १२६. करइयो (willing to do) करैयो १२७. जेकरा- जकरा १२८. तकरा- तेकरा १२९. बिदेसर स्थानेमे/ बिदेसरे स्थानमे १३०. करबयलहुँ/ करबएलहुँ/ करबेलहुँ करबेलौं १३१. हारिक (उच्चारण हाइरक) १३२. ओजन वजन आफसोच/ अफसोस कागत/ कागच/ कागज १३३. आधे भाग/ आध-भागे १३४. पिचा / पिचाय/पिचाए १३५. नञ/ ने १३६. बच्चा नञ (ने) पिचा जाय १३७. तखन ने (नञ) कहैत अछि। कहै/ सुनै/ देखै छल मुदा कहैत-कहैत/ सुनैत-सुनैत/ देखैत-देखैत १३८. कतेक गोटे/ कताक गोटे १३९. कमाइ-धमाइ/ कमाई- धमाई १४० . लग ल’ग १४१. खेलाइ (for playing) १४२. छथिन्ह/ छथिन १४३. होइत होइ १४४. क्यो कियो / केओ १४५. केश (hair) १४६. केस (court-case) १४७ . बननाइ/ बननाय/ बननाए १४८. जरेनाइ १४९. कुरसी कुर्सी १५०. चरचा चर्चा १५१. कर्म करम १५२. डुबाबए/ डुबाबै/ डुमाबै डुमाबय/ डुमाबए १५३. एखुनका/ अखुनका १५४. लए/ लिअए (वाक्यक अंतिम शब्द)- लऽ १५५. कएलक/ केलक १५६. गरमी गर्मी १५७ . वरदी वर्दी १५८. सुना गेलाह सुना’/सुनाऽ १५९. एनाइ-गेनाइ १६०. तेना ने घेरलन्हि/ तेना ने घेरलनि १६१. नञि / नै १६२. डरो ड’रो १६३. कतहु/ कतौ कहीं १६४. उमरिगर-उमेरगर उमरगर १६५. भरिगर १६६. धोल/धोअल धोएल १६७. गप/गप्प १६८. के के’ १६९. दरबज्जा/ दरबजा १७०. ठाम १७१. धरि तक १७२. घूरि लौटि १७३. थोरबेक १७४. बड्ड १७५. तोँ/ तूँ १७६. तोँहि( पद्यमे ग्राह्य) १७७. तोँही / तोँहि १७८. करबाइए करबाइये १७९. एकेटा १८०. करितथि /करतथि १८१. पहुँचि/ पहुँच १८२. राखलन्हि रखलन्हि/ रखलनि १८३. लगलन्हि/ लगलनि लागलन्हि १८४. सुनि (उच्चारण सुइन) १८५. अछि (उच्चारण अइछ) १८६. एलथि गेलथि १८७. बितओने/ बितौने/ बितेने १८८. करबओलन्हि/ करबौलनि/ करेलखिन्ह/ करेलखिन १८९. करएलन्हि/ करेलनि १९०. आकि/ कि १९१. पहुँचि/ पहुँच १९२. बत्ती जराय/ जराए जरा (आगि लगा) १९३. से से’ १९४. हाँ मे हाँ (हाँमे हाँ विभक्त्तिमे हटा कए) १९५. फेल फैल १९६. फइल(spacious) फैल १९७. होयतन्हि/ होएतन्हि/ होएतनि/हेतनि/ हेतन्हि १९८. हाथ मटिआएब/ हाथ मटियाबय/हाथ मटियाएब १९९. फेका फेंका २००. देखाए देखा २०१. देखाबए २०२. सत्तरि सत्तर २०३. साहेब साहब २०४.गेलैन्ह/ गेलन्हि/ गेलनि २०५. हेबाक/ होएबाक २०६.केलो/ कएलहुँ/केलौं/ केलुँ २०७. किछु न किछु/ किछु ने किछु २०८.घुमेलहुँ/ घुमओलहुँ/ घुमेलौं २०९. एलाक/ अएलाक २१०. अः/ अह २११.लय/ लए (अर्थ-परिवर्त्तन) २१२.कनीक/ कनेक २१३.सबहक/ सभक २१४.मिलाऽ/ मिला २१५.कऽ/ क २१६.जाऽ/ जा २१७.आऽ/ आ २१८.भऽ /भ’ (’ फॉन्टक कमीक द्योतक) २१९.निअम/ नियम २२० .हेक्टेअर/ हेक्टेयर २२१.पहिल अक्षर ढ/ बादक/ बीचक ढ़ २२२.तहिं/तहिँ/ तञि/ तैं २२३.कहिं/ कहीं २२४.तँइ/ तैं / तइँ २२५.नँइ/ नइँ/ नञि/ नहि/नै २२६.है/ हए / एलीहेँ/ २२७.छञि/ छै/ छैक /छइ २२८.दृष्टिएँ/ दृष्टियेँ २२९.आ (come)/ आऽ(conjunction) २३०. आ (conjunction)/ आऽ(come) २३१.कुनो/ कोनो, कोना/केना २३२.गेलैन्ह-गेलन्हि-गेलनि २३३.हेबाक- होएबाक २३४.केलौँ- कएलौँ-कएलहुँ/केलौं २३५.किछु न किछ- किछु ने किछु २३६.केहेन- केहन २३७.आऽ (come)-आ (conjunction-and)/आ। आब'-आब' /आबह-आबह २३८. हएत-हैत २३९.घुमेलहुँ-घुमएलहुँ- घुमेलाें २४०.एलाक- अएलाक २४१.होनि- होइन/ होन्हि/ २४२.ओ-राम ओ श्यामक बीच(conjunction), ओऽ कहलक (he said)/ओ २४३.की हए/ कोसी अएली हए/ की है। की हइ २४४.दृष्टिएँ/ दृष्टियेँ २४५ .शामिल/ सामेल २४६.तैँ / तँए/ तञि/ तहिं २४७.जौं / ज्योँ/ जँ/ २४८.सभ/ सब २४९.सभक/ सबहक २५०.कहिं/ कहीं २५१.कुनो/ कोनो/ कोनहुँ/ २५२.फारकती भऽ गेल/ भए गेल/ भय गेल २५३.कोना/ केना/ कन्ना/कना २५४.अः/ अह २५५.जनै/ जनञ २५६.गेलनि/ गेलाह (अर्थ परिवर्तन) २५७.केलन्हि/ कएलन्हि/ केलनि/ २५८.लय/ लए/ लएह (अर्थ परिवर्तन) २५९.कनीक/ कनेक/कनी-मनी २६०.पठेलन्हि पठेलनि/ पठेलइन/ पपठओलन्हि/ पठबौलनि/ २६१.निअम/ नियम २६२.हेक्टेअर/ हेक्टेयर २६३.पहिल अक्षर रहने ढ/ बीचमे रहने ढ़ २६४.आकारान्तमे बिकारीक प्रयोग उचित नै/ अपोस्ट्रोफीक प्रयोग फान्टक तकनीकी न्यूनताक परिचायक ओकर बदला अवग्रह (बिकारी) क प्रयोग उचित २६५.केर (पद्यमे ग्राह्य) / -क/ कऽ/ के २६६.छैन्हि- छन्हि २६७.लगैए/ लगैये २६८.होएत/ हएत २६९.जाएत/ जएत/ २७०.आएत/ अएत/ आओत २७१ .खाएत/ खएत/ खैत २७२.पिअएबाक/ पिएबाक/पियेबाक २७३.शुरु/ शुरुह २७४.शुरुहे/ शुरुए २७५.अएताह/अओताह/ एताह/ औताह २७६.जाहि/ जाइ/ जइ/ जै/ २७७.जाइत/ जैतए/ जइतए २७८.आएल/ अएल २७९.कैक/ कएक २८०.आयल/ अएल/ आएल २८१. जाए/ जअए/ जए (लालति जाए लगलीह।) २८२. नुकएल/ नुकाएल २८३. कठुआएल/ कठुअएल २८४. ताहि/ तै/ तइ २८५. गायब/ गाएब/ गएब २८६. सकै/ सकए/ सकय २८७.सेरा/सरा/ सराए (भात सरा गेल) २८८.कहैत रही/देखैत रही/ कहैत छलौं/ कहै छलौं- अहिना चलैत/ पढ़ैत (पढ़ै-पढ़ैत अर्थ कखनो काल परिवर्तित) - आर बुझै/ बुझैत (बुझै/ बुझै छी, मुदा बुझैत-बुझैत)/ सकैत/ सकै। करैत/ करै। दै/ दैत। छैक/ छै। बचलै/ बचलैक। रखबा/ रखबाक । बिनु/ बिन। रातिक/ रातुक बुझै आ बुझैत केर अपन-अपन जगहपर प्रयोग समीचीन अछि। बुझैत-बुझैत आब बुझलिऐ। हमहूँ बुझै छी। २८९. दुआरे/ द्वारे २९०.भेटि/ भेट/ भेँट २९१. खन/ खीन/ खुना (भोर खन/ भोर खीन) २९२.तक/ धरि २९३.गऽ/ गै (meaning different-जनबै गऽ) २९४.सऽ/ सँ (मुदा दऽ, लऽ) २९५.त्त्व,(तीन अक्षरक मेल बदला पुनरुक्तिक एक आ एकटा दोसरक उपयोग) आदिक बदला त्व आदि। महत्त्व/ महत्व/ कर्ता/ कर्त्ता आदिमे त्त संयुक्तक कोनो आवश्यकता मैथिलीमे नै अछि। वक्तव्य २९६.बेसी/ बेशी २९७.बाला/वाला बला/ वला (रहैबला) २९८ .वाली/ (बदलैवाली) २९९.वार्त्ता/ वार्ता ३००. अन्तर्राष्ट्रिय/ अन्तर्राष्ट्रीय ३०१. लेमए/ लेबए ३०२.लमछुरका, नमछुरका ३०२.लागै/ लगै ( भेटैत/ भेटै) ३०३.लागल/ लगल ३०४.हबा/ हवा ३०५.राखलक/ रखलक ३०६.आ (come)/ आ (and) ३०७. पश्चाताप/ पश्चात्ताप ३०८. ऽ केर व्यवहार शब्दक अन्तमे मात्र, यथासंभव बीचमे नै। ३०९.कहैत/ कहै ३१०. रहए (छल)/ रहै (छलै) (meaning different) ३११.तागति/ ताकति ३१२.खराप/ खराब ३१३.बोइन/ बोनि/ बोइनि ३१४.जाठि/ जाइठ ३१५.कागज/ कागच/ कागत ३१६.गिरै (meaning different- swallow)/ गिरए (खसए) ३१७.राष्ट्रिय/ राष्ट्रीय Festivals of Mithila DATE-LIST (year- 2011-12) (१४१९ साल) Marriage Days: Nov.2011- 20,21,23,25,27,30 Dec.2011- 1,5,9 January 2012- 18,19,20,23,25,27,29 Feb.2012- 2,3,8,9,10,16,17,19,23,24,29 March 2012- 1,8,9,12 April 2012- 15,16,18,25,26 June 2012- 8,13,24,25,28,29 Upanayana Days: February 2012- 2,3,24,26 March 2012- 4 April 2012- 1,2,26 June 2012- 22 Dviragaman Din: November 2011- 27,30 December 2011- 1,2,5,7,9,12 February 2012- 22,23,24,26,27,29 March 2012- 1,2,4,5,9,11,12 April 2012- 23,25,26,29 May 2012- 2,3,4,6,7 Mundan Din: December 2011- 1,5 January 201225,26,30 March 2012- 12 April 2012- 26 May 2012- 23,25,31 June 2012- 8,21,22,29 FESTIVALS OF MITHILA Mauna Panchami-20 July Madhushravani- 2 August Nag Panchami- 4 August Raksha Bandhan- 13 Aug Krishnastami- 21 August Kushi Amavasya / Somvari Vrat- 29 August Hartalika Teej- 31 August ChauthChandra-1 September Karma Dharma Ekadashi-8 September Indra Pooja Aarambh- 9 September Anant Caturdashi- 11 Sep Agastyarghadaan- 12 Sep Pitri Paksha begins- 13 Sep Mahalaya Aarambh- 13 September Vishwakarma Pooja- 17 September Jimootavahan Vrata/ Jitia-20 September Matri Navami- 21September Kalashsthapan- 28 September Belnauti- 2 October Patrika Pravesh- 3 October Mahastami- 4 October Maha Navami - 5 October Vijaya Dashami- 6 October Kojagara- 11 Oct Dhanteras- 24 October Diyabati, shyama pooja-26 October Annakoota/ Govardhana Pooja-27 October Bhratridwitiya/ Chitragupta Pooja-28 October Chhathi-kharna -31 October Chhathi- sayankalik arghya - 1 November Devotthan Ekadashi- 17 November Sama poojarambh- 2 November Kartik Poornima/ Sama Bisarjan- 10 Nov ravivratarambh- 27 November Navanna parvan- 29 November Vivaha Panchmi- 29 November Makara/ Teela Sankranti-15 Jan Naraknivaran chaturdashi- 21 January Basant Panchami/ Saraswati Pooja- 28 January Achla Saptmi- 30 January Mahashivaratri-20 February Holikadahan-Fagua-7 March Holi-9 Mar Varuni Yoga-20 March Chaiti navaratrarambh- 23 March Chaiti Chhathi vrata-29 March Ram Navami- 1 April Mesha Sankranti-Satuani-13 April Jurishital-14 April Akshaya Tritiya-24 April Ravi Brat Ant- 29 April Janaki Navami- 30 April Vat Savitri-barasait- 20 May Ganga Dashhara-30 May Somavati Amavasya Vrata- 18 June Jagannath Rath Yatra- 21 June Hari Sayan Ekadashi- 30 June Aashadhi Guru Poornima-3 Jul 8.VIDEHA FOR NON RESIDENTS 8.1 to 8.3 MAITHILI LITERATURE IN ENGLISH 8.1.1.The Comet -GAJENDRA THAKUR translated by Jyoti Jha chaudhary 8.1.2.The_Science_of_Words- GAJENDRA THAKUR translated by the author himself 8.1.3.On_the_dice-board_of_the_millennium- GAJENDRA THAKUR translated by Jyoti Jha chaudhary 8.1.4.NAAGPHANS (IN ENGLISH)- SHEFALIKA VERMA translated by Dr. Rajiv Kumar Verma and Dr. Jaya Verma Original Poem in Maithili by Kalikant Jha "Buch" Translated into English by Jyoti Jha Chaudhary Kalikant Jha "Buch" 1934-2009, Birth place- village Karian, District- Samastipur (Karian is birth place of famous Indian Nyaiyyayik philosopher Udayanacharya), Father Late Pt. Rajkishor Jha was first headmaster of village middle school. Mother Late Kala Devi was housewife. After completing Intermediate education started job block office of Govt. of Bihar.published in Mithila Mihir, Mati-pani, Bhakha, and Maithili Akademi magazine. Jyoti Jha Chaudhary, Date of Birth: December 30 1978,Place of Birth- Belhvar (Madhubani District), Education: Swami Vivekananda Middle School, Tisco Sakchi Girls High School, Mrs KMPM Inter College, IGNOU, ICWAI (COST ACCOUNTANCY); Residence- LONDON, UK; Father- Sh. Shubhankar Jha, Jamshedpur; Mother- Smt. Sudha Jha- Shivipatti. Jyoti received editor's choice award from www.poetry.comand her poems were featured in front page of www.poetrysoup.com for some period.She learnt Mithila Painting under Ms. Shveta Jha, Basera Institute, Jamshedpur and Fine Arts from Toolika, Sakchi, Jamshedpur (India). Her Mithila Paintings have been displayed by Ealing Art Group at Ealing Broadway, London. Kavi Kokil Vidyapati Because of whom our native language got a life That world-renowned nightingale poet’s name is Vidyapati A new hope in the Mithilanchal Our language is spread in each house Kind emotions and colourful thoughts Stability in mind and woman in the vision Created the God Shiva under the veil That world-renowned nightingale poet’s name is Vidyapati The shade of yoga in the bed of enjoyment The illusion of personality is immeasurable The triveni is immerged in the belly The shrine resides with the beauty The sun of creation shined in the kaalratri of rituals That world-renowned nightingale poet’s name is Vidyapati Face is like spring, bhado (rainy season) in eyes The flow is pure, bank is muddy Like leaves of lotus in the water Like flow of nectar in the desert Singing the song for Radha but keeping Madhav in the mind That world-renowned nightingale poet’s name is Vidyapati Vidyapati nagaram is blessed With Visfisut, Truth, Shiva and Virtue Remnant after being burnt out Mahesh is immortal after death The entrance is adorned with gold but inside is crematorium That world-renowned nightingale poet’s name is Vidyapati Send your comments to ggajendra@videha.com VIDEHA ARCHIVE १.विदेह ई-पत्रिकाक सभटा पुरान अंक ब्रेल, तिरहुता आ देवनागरी रूपमे Videha e journal's all old issues in Braille Tirhuta and Devanagari versions विदेह ई-पत्रिकाक पहिल ५० अंक
विदेह ई-पत्रिकाक ५०म सँ आगाँक अंक २.मैथिली पोथी डाउनलोड Maithili Books Download ३.मैथिली ऑडियो संकलन Maithili Audio Downloads ४.मैथिली वीडियोक संकलन Maithili Videos ५.मिथिला चित्रकला/ आधुनिक चित्रकला आ चित्र Mithila Painting/ Modern Art and Photos "विदेह"क एहि सभ सहयोगी लिंकपर सेहो एक बेर जाऊ। ६.विदेह मैथिली क्विज : http://videhaquiz.blogspot.com/ ७.विदेह मैथिली जालवृत्त एग्रीगेटर : http://videha-aggregator.blogspot.com/ ८.विदेह मैथिली साहित्य अंग्रेजीमे अनूदित http://madhubani-art.blogspot.com/ ९.विदेहक पूर्व-रूप "भालसरिक गाछ" : http://gajendrathakur.blogspot.com/ १०.विदेह इंडेक्स : http://videha123.blogspot.com/ ११.विदेह फाइल : http://videha123.wordpress.com/ १२. विदेह: सदेह : पहिल तिरहुता (मिथिला़क्षर) जालवृत्त (ब्लॉग) http://videha-sadeha.blogspot.com/ १३. विदेह:ब्रेल: मैथिली ब्रेलमे: पहिल बेर विदेह द्वारा http://videha-braille.blogspot.com/ १४.VIDEHA IST MAITHILI FORTNIGHTLY EJOURNAL ARCHIVE http://videha-archive.blogspot.com/ १५. विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका मैथिली पोथीक आर्काइव http://videha-pothi.blogspot.com/ १६. विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका ऑडियो आर्काइव http://videha-audio.blogspot.com/ १७. विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका वीडियो आर्काइव http://videha-video.blogspot.com/ १८. विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका मिथिला चित्रकला, आधुनिक कला आ चित्रकला http://videha-paintings-photos.blogspot.com/ १९. मैथिल आर मिथिला (मैथिलीक सभसँ लोकप्रिय जालवृत्त) http://maithilaurmithila.blogspot.com/ २०.श्रुति प्रकाशन http://www.shruti-publication.com/ २१.http://groups.google.com/group/videha VIDEHA केर सदस्यता लिअ Top of Form Bottom of Form ईमेल : एहि समूहपर जाऊ २२.http://groups.yahoo.com/group/VIDEHA/ Top of Form Subscribe to VIDEHA Powered by us.groups.yahoo.com Bottom of Form २३.गजेन्द्र ठाकुर इडेक्स http://gajendrathakur123.blogspot.com २४.विदेह रेडियो:मैथिली कथा-कविता आदिक पहिल पोडकास्ट साइट http://videha123radio.wordpress.com/ २५. नेना भुटका http://mangan-khabas.blogspot.com/ महत्त्वपूर्ण सूचना:(१) 'विदेह' द्वारा धारावाहिक रूपे ई-प्रकाशित कएल गेल गजेन्द्र ठाकुरक निबन्ध-प्रबन्ध-समीक्षा, उपन्यास (सहस्रबाढ़नि) , पद्य-संग्रह (सहस्राब्दीक चौपड़पर), कथा-गल्प (गल्प-गुच्छ), नाटक(संकर्षण), महाकाव्य (त्वञ्चाहञ्च आ असञ्जाति मन) आ बाल-किशोर साहित्य विदेहमे संपूर्ण ई-प्रकाशनक बाद प्रिंट फॉर्ममे। कुरुक्षेत्रम्–अन्तर्मनक खण्ड-१ सँ ७ Combined ISBN No.978-81-907729-7-6 विवरण एहि पृष्ठपर नीचाँमे आ प्रकाशकक साइट http://www.shruti-publication.com/ पर । महत्त्वपूर्ण सूचना (२):सूचना: विदेहक मैथिली-अंग्रेजी आ अंग्रेजी मैथिली कोष (इंटरनेटपर पहिल बेर सर्च-डिक्शनरी) एम.एस. एस.क्यू.एल. सर्वर आधारित -Based on ms-sql server Maithili-English and English-Maithili Dictionary. विदेहक भाषापाक- रचनालेखन स्तंभमे। कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक- गजेन्द्र ठाकुर गजेन्द्र ठाकुरक निबन्ध-प्रबन्ध-समीक्षा, उपन्यास (सहस्रबाढ़नि) , पद्य-संग्रह (सहस्राब्दीक चौपड़पर), कथा-गल्प (गल्प गुच्छ), नाटक(संकर्षण), महाकाव्य (त्वञ्चाहञ्च आ असञ्जाति मन) आ बालमंडली-किशोरजगत विदेहमे संपूर्ण ई-प्रकाशनक बाद प्रिंट फॉर्ममे। कुरुक्षेत्रम्–अन्तर्मनक, खण्ड-१ सँ ७ Ist edition 2009 of Gajendra Thakur’s KuruKshetram-Antarmanak (Vol. I to VII)- essay-paper-criticism, novel, poems, story, play, epics and Children-grown-ups literature in single binding: Language:Maithili ६९२ पृष्ठ : मूल्य भा. रु. 100/-(for individual buyers inside india) (add courier charges Rs.50/-per copy for Delhi/NCR and Rs.100/- per copy for outside Delhi)
For Libraries and overseas buyers $40 US (including postage)
The book is AVAILABLE FOR PDF DOWNLOAD AT
https://sites.google.com/a/videha.com/videha/
http://videha123.wordpress.com/
Details for purchase available at print-version publishers's site website: http://www.shruti-publication.com/ or you may write to e-mail:shruti.publication@shruti-publication.com विदेह: सदेह : १: २: ३: ४ तिरहुता : देवनागरी "विदेह" क, प्रिंट संस्करण :विदेह-ई-पत्रिका (http://www.videha.co.in/) क चुनल रचना सम्मिलित। विदेह:सदेह:१: २: ३: ४ सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। Details for purchase available at print-version publishers's site http://www.shruti-publication.com or you may write to shruti.publication@shruti-publication.com २. संदेश- [ विदेह ई-पत्रिका, विदेह:सदेह मिथिलाक्षर आ देवनागरी आ गजेन्द्र ठाकुरक सात खण्डक- निबन्ध-प्रबन्ध-समीक्षा,उपन्यास (सहस्रबाढ़नि) , पद्य-संग्रह (सहस्राब्दीक चौपड़पर), कथा-गल्प (गल्प गुच्छ), नाटक (संकर्षण), महाकाव्य (त्वञ्चाहञ्च आ असञ्जाति मन) आ बाल-मंडली-किशोर जगत- संग्रह कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक मादेँ। ] १.श्री गोविन्द झा- विदेहकेँ तरंगजालपर उतारि विश्वभरिमे मातृभाषा मैथिलीक लहरि जगाओल, खेद जे अपनेक एहि महाभियानमे हम एखन धरि संग नहि दए सकलहुँ। सुनैत छी अपनेकेँ सुझाओ आ रचनात्मक आलोचना प्रिय लगैत अछि तेँ किछु लिखक मोन भेल। हमर सहायता आ सहयोग अपनेकेँ सदा उपलब्ध रहत। २.श्री रमानन्द रेणु- मैथिलीमे ई-पत्रिका पाक्षिक रूपेँ चला कऽ जे अपन मातृभाषाक प्रचार कऽ रहल छी, से धन्यवाद । आगाँ अपनेक समस्त मैथिलीक कार्यक हेतु हम हृदयसँ शुभकामना दऽ रहल छी। ३.श्री विद्यानाथ झा "विदित"- संचार आ प्रौद्योगिकीक एहि प्रतिस्पर्धी ग्लोबल युगमे अपन महिमामय "विदेह"केँ अपना देहमे प्रकट देखि जतबा प्रसन्नता आ संतोष भेल, तकरा कोनो उपलब्ध "मीटर"सँ नहि नापल जा सकैछ? ..एकर ऐतिहासिक मूल्यांकन आ सांस्कृतिक प्रतिफलन एहि शताब्दीक अंत धरि लोकक नजरिमे आश्चर्यजनक रूपसँ प्रकट हैत। ४. प्रो. उदय नारायण सिंह "नचिकेता"- जे काज अहाँ कए रहल छी तकर चरचा एक दिन मैथिली भाषाक इतिहासमे होएत। आनन्द भए रहल अछि, ई जानि कए जे एतेक गोट मैथिल "विदेह" ई जर्नलकेँ पढ़ि रहल छथि।...विदेहक चालीसम अंक पुरबाक लेल अभिनन्दन। ५. डॉ. गंगेश गुंजन- एहि विदेह-कर्ममे लागि रहल अहाँक सम्वेदनशील मन, मैथिलीक प्रति समर्पित मेहनतिक अमृत रंग, इतिहास मे एक टा विशिष्ट फराक अध्याय आरंभ करत, हमरा विश्वास अछि। अशेष शुभकामना आ बधाइक सङ्ग, सस्नेह...अहाँक पोथी कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक प्रथम दृष्टया बहुत भव्य तथा उपयोगी बुझाइछ। मैथिलीमे तँ अपना स्वरूपक प्रायः ई पहिले एहन भव्य अवतारक पोथी थिक। हर्षपूर्ण हमर हार्दिक बधाई स्वीकार करी। ६. श्री रामाश्रय झा "रामरंग"(आब स्वर्गीय)- "अपना" मिथिलासँ संबंधित...विषय वस्तुसँ अवगत भेलहुँ।...शेष सभ कुशल अछि। ७. श्री ब्रजेन्द्र त्रिपाठी- साहित्य अकादमी- इंटरनेट पर प्रथम मैथिली पाक्षिक पत्रिका "विदेह" केर लेल बधाई आ शुभकामना स्वीकार करू। ८. श्री प्रफुल्लकुमार सिंह "मौन"- प्रथम मैथिली पाक्षिक पत्रिका "विदेह" क प्रकाशनक समाचार जानि कनेक चकित मुदा बेसी आह्लादित भेलहुँ। कालचक्रकेँ पकड़ि जाहि दूरदृष्टिक परिचय देलहुँ, ओहि लेल हमर मंगलकामना। ९.डॉ. शिवप्रसाद यादव- ई जानि अपार हर्ष भए रहल अछि, जे नव सूचना-क्रान्तिक क्षेत्रमे मैथिली पत्रकारिताकेँ प्रवेश दिअएबाक साहसिक कदम उठाओल अछि। पत्रकारितामे एहि प्रकारक नव प्रयोगक हम स्वागत करैत छी, संगहि "विदेह"क सफलताक शुभकामना। १०. श्री आद्याचरण झा- कोनो पत्र-पत्रिकाक प्रकाशन- ताहूमे मैथिली पत्रिकाक प्रकाशनमे के कतेक सहयोग करताह- ई तऽ भविष्य कहत। ई हमर ८८ वर्षमे ७५ वर्षक अनुभव रहल। एतेक पैघ महान यज्ञमे हमर श्रद्धापूर्ण आहुति प्राप्त होयत- यावत ठीक-ठाक छी/ रहब। ११. श्री विजय ठाकुर- मिशिगन विश्वविद्यालय- "विदेह" पत्रिकाक अंक देखलहुँ, सम्पूर्ण टीम बधाईक पात्र अछि। पत्रिकाक मंगल भविष्य हेतु हमर शुभकामना स्वीकार कएल जाओ। १२. श्री सुभाषचन्द्र यादव- ई-पत्रिका "विदेह" क बारेमे जानि प्रसन्नता भेल। ’विदेह’ निरन्तर पल्लवित-पुष्पित हो आ चतुर्दिक अपन सुगंध पसारय से कामना अछि। १३. श्री मैथिलीपुत्र प्रदीप- ई-पत्रिका "विदेह" केर सफलताक भगवतीसँ कामना। हमर पूर्ण सहयोग रहत। १४. डॉ. श्री भीमनाथ झा- "विदेह" इन्टरनेट पर अछि तेँ "विदेह" नाम उचित आर कतेक रूपेँ एकर विवरण भए सकैत अछि। आइ-काल्हि मोनमे उद्वेग रहैत अछि, मुदा शीघ्र पूर्ण सहयोग देब।कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक देखि अति प्रसन्नता भेल। मैथिलीक लेल ई घटना छी। १५. श्री रामभरोस कापड़ि "भ्रमर"- जनकपुरधाम- "विदेह" ऑनलाइन देखि रहल छी। मैथिलीकेँ अन्तर्राष्ट्रीय जगतमे पहुँचेलहुँ तकरा लेल हार्दिक बधाई। मिथिला रत्न सभक संकलन अपूर्व। नेपालोक सहयोग भेटत, से विश्वास करी। १६. श्री राजनन्दन लालदास- "विदेह" ई-पत्रिकाक माध्यमसँ बड़ नीक काज कए रहल छी, नातिक अहिठाम देखलहुँ। एकर वार्षिक अंक जखन प्रिंट निकालब तँ हमरा पठायब। कलकत्तामे बहुत गोटेकेँ हम साइटक पता लिखाए देने छियन्हि। मोन तँ होइत अछि जे दिल्ली आबि कए आशीर्वाद दैतहुँ, मुदा उमर आब बेशी भए गेल। शुभकामना देश-विदेशक मैथिलकेँ जोड़बाक लेल।.. उत्कृष्ट प्रकाशन कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक लेल बधाइ। अद्भुत काज कएल अछि, नीक प्रस्तुति अछि सात खण्डमे। मुदा अहाँक सेवा आ से निःस्वार्थ तखन बूझल जाइत जँ अहाँ द्वारा प्रकाशित पोथी सभपर दाम लिखल नहि रहितैक। ओहिना सभकेँ विलहि देल जइतैक। (स्पष्टीकरण- श्रीमान्, अहाँक सूचनार्थ विदेह द्वारा ई-प्रकाशित कएल सभटा सामग्री आर्काइवमे https://sites.google.com/a/videha.com/videha-pothi/ पर बिना मूल्यक डाउनलोड लेल उपलब्ध छै आ भविष्यमे सेहो रहतैक। एहि आर्काइवकेँ जे कियो प्रकाशक अनुमति लऽ कऽ प्रिंट रूपमे प्रकाशित कएने छथि आ तकर ओ दाम रखने छथि ताहिपर हमर कोनो नियंत्रण नहि अछि।- गजेन्द्र ठाकुर)... अहाँक प्रति अशेष शुभकामनाक संग। १७. डॉ. प्रेमशंकर सिंह- अहाँ मैथिलीमे इंटरनेटपर पहिल पत्रिका "विदेह" प्रकाशित कए अपन अद्भुत मातृभाषानुरागक परिचय देल अछि, अहाँक निःस्वार्थ मातृभाषानुरागसँ प्रेरित छी, एकर निमित्त जे हमर सेवाक प्रयोजन हो, तँ सूचित करी। इंटरनेटपर आद्योपांत पत्रिका देखल, मन प्रफुल्लित भऽ गेल। १८.श्रीमती शेफालिका वर्मा- विदेह ई-पत्रिका देखि मोन उल्लाससँ भरि गेल। विज्ञान कतेक प्रगति कऽ रहल अछि...अहाँ सभ अनन्त आकाशकेँ भेदि दियौ, समस्त विस्तारक रहस्यकेँ तार-तार कऽ दियौक...। अपनेक अद्भुत पुस्तक कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक विषयवस्तुक दृष्टिसँ गागरमे सागर अछि। बधाई। १९.श्री हेतुकर झा, पटना-जाहि समर्पण भावसँ अपने मिथिला-मैथिलीक सेवामे तत्पर छी से स्तुत्य अछि। देशक राजधानीसँ भय रहल मैथिलीक शंखनाद मिथिलाक गाम-गाममे मैथिली चेतनाक विकास अवश्य करत। २०. श्री योगानन्द झा, कबिलपुर, लहेरियासराय- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पोथीकेँ निकटसँ देखबाक अवसर भेटल अछि आ मैथिली जगतक एकटा उद्भट ओ समसामयिक दृष्टिसम्पन्न हस्ताक्षरक कलमबन्द परिचयसँ आह्लादित छी। "विदेह"क देवनागरी सँस्करण पटनामे रु. 80/- मे उपलब्ध भऽ सकल जे विभिन्न लेखक लोकनिक छायाचित्र, परिचय पत्रक ओ रचनावलीक सम्यक प्रकाशनसँ ऐतिहासिक कहल जा सकैछ। २१. श्री किशोरीकान्त मिश्र- कोलकाता- जय मैथिली, विदेहमे बहुत रास कविता, कथा, रिपोर्ट आदिक सचित्र संग्रह देखि आ आर अधिक प्रसन्नता मिथिलाक्षर देखि- बधाई स्वीकार कएल जाओ। २२.श्री जीवकान्त- विदेहक मुद्रित अंक पढ़ल- अद्भुत मेहनति। चाबस-चाबस। किछु समालोचना मरखाह..मुदा सत्य। २३. श्री भालचन्द्र झा- अपनेक कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक देखि बुझाएल जेना हम अपने छपलहुँ अछि। एकर विशालकाय आकृति अपनेक सर्वसमावेशताक परिचायक अछि। अपनेक रचना सामर्थ्यमे उत्तरोत्तर वृद्धि हो, एहि शुभकामनाक संग हार्दिक बधाई। २४.श्रीमती डॉ नीता झा- अहाँक कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़लहुँ। ज्योतिरीश्वर शब्दावली, कृषि मत्स्य शब्दावली आ सीत बसन्त आ सभ कथा, कविता, उपन्यास, बाल-किशोर साहित्य सभ उत्तम छल। मैथिलीक उत्तरोत्तर विकासक लक्ष्य दृष्टिगोचर होइत अछि। २५.श्री मायानन्द मिश्र- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक मे हमर उपन्यास स्त्रीधनक जे विरोध कएल गेल अछि तकर हम विरोध करैत छी।... कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पोथीक लेल शुभकामना।(श्रीमान् समालोचनाकेँ विरोधक रूपमे नहि लेल जाए।-गजेन्द्र ठाकुर) २६.श्री महेन्द्र हजारी- सम्पादक श्रीमिथिला- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़ि मोन हर्षित भऽ गेल..एखन पूरा पढ़यमे बहुत समय लागत, मुदा जतेक पढ़लहुँ से आह्लादित कएलक। २७.श्री केदारनाथ चौधरी- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक अद्भुत लागल, मैथिली साहित्य लेल ई पोथी एकटा प्रतिमान बनत। २८.श्री सत्यानन्द पाठक- विदेहक हम नियमित पाठक छी। ओकर स्वरूपक प्रशंसक छलहुँ। एम्हर अहाँक लिखल - कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक देखलहुँ। मोन आह्लादित भऽ उठल। कोनो रचना तरा-उपरी। २९.श्रीमती रमा झा-सम्पादक मिथिला दर्पण। कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक प्रिंट फॉर्म पढ़ि आ एकर गुणवत्ता देखि मोन प्रसन्न भऽ गेल, अद्भुत शब्द एकरा लेल प्रयुक्त कऽ रहल छी। विदेहक उत्तरोत्तर प्रगतिक शुभकामना। ३०.श्री नरेन्द्र झा, पटना- विदेह नियमित देखैत रहैत छी। मैथिली लेल अद्भुत काज कऽ रहल छी। ३१.श्री रामलोचन ठाकुर- कोलकाता- मिथिलाक्षर विदेह देखि मोन प्रसन्नतासँ भरि उठल, अंकक विशाल परिदृश्य आस्वस्तकारी अछि। ३२.श्री तारानन्द वियोगी- विदेह आ कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक देखि चकबिदोर लागि गेल। आश्चर्य। शुभकामना आ बधाई। ३३.श्रीमती प्रेमलता मिश्र “प्रेम”- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़लहुँ। सभ रचना उच्चकोटिक लागल। बधाई। ३४.श्री कीर्तिनारायण मिश्र- बेगूसराय- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक बड्ड नीक लागल, आगांक सभ काज लेल बधाई। ३५.श्री महाप्रकाश-सहरसा- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक नीक लागल, विशालकाय संगहि उत्तमकोटिक। ३६.श्री अग्निपुष्प- मिथिलाक्षर आ देवाक्षर विदेह पढ़ल..ई प्रथम तँ अछि एकरा प्रशंसामे मुदा हम एकरा दुस्साहसिक कहब। मिथिला चित्रकलाक स्तम्भकेँ मुदा अगिला अंकमे आर विस्तृत बनाऊ। ३७.श्री मंजर सुलेमान-दरभंगा- विदेहक जतेक प्रशंसा कएल जाए कम होएत। सभ चीज उत्तम। ३८.श्रीमती प्रोफेसर वीणा ठाकुर- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक उत्तम, पठनीय, विचारनीय। जे क्यो देखैत छथि पोथी प्राप्त करबाक उपाय पुछैत छथि। शुभकामना। ३९.श्री छत्रानन्द सिंह झा- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़लहुँ, बड्ड नीक सभ तरहेँ। ४०.श्री ताराकान्त झा- सम्पादक मैथिली दैनिक मिथिला समाद- विदेह तँ कन्टेन्ट प्रोवाइडरक काज कऽ रहल अछि। कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक अद्भुत लागल। ४१.डॉ रवीन्द्र कुमार चौधरी- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक बहुत नीक, बहुत मेहनतिक परिणाम। बधाई। ४२.श्री अमरनाथ- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक आ विदेह दुनू स्मरणीय घटना अछि, मैथिली साहित्य मध्य। ४३.श्री पंचानन मिश्र- विदेहक वैविध्य आ निरन्तरता प्रभावित करैत अछि, शुभकामना। ४४.श्री केदार कानन- कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक लेल अनेक धन्यवाद, शुभकामना आ बधाइ स्वीकार करी। आ नचिकेताक भूमिका पढ़लहुँ। शुरूमे तँ लागल जेना कोनो उपन्यास अहाँ द्वारा सृजित भेल अछि मुदा पोथी उनटौला पर ज्ञात भेल जे एहिमे तँ सभ विधा समाहित अछि। ४५.श्री धनाकर ठाकुर- अहाँ नीक काज कऽ रहल छी। फोटो गैलरीमे चित्र एहि शताब्दीक जन्मतिथिक अनुसार रहैत तऽ नीक। ४६.श्री आशीष झा- अहाँक पुस्तकक संबंधमे एतबा लिखबा सँ अपना कए नहि रोकि सकलहुँ जे ई किताब मात्र किताब नहि थीक, ई एकटा उम्मीद छी जे मैथिली अहाँ सन पुत्रक सेवा सँ निरंतर समृद्ध होइत चिरजीवन कए प्राप्त करत। ४७.श्री शम्भु कुमार सिंह- विदेहक तत्परता आ क्रियाशीलता देखि आह्लादित भऽ रहल छी। निश्चितरूपेण कहल जा सकैछ जे समकालीन मैथिली पत्रिकाक इतिहासमे विदेहक नाम स्वर्णाक्षरमे लिखल जाएत। ओहि कुरुक्षेत्रक घटना सभ तँ अठारहे दिनमे खतम भऽ गेल रहए मुदा अहाँक कुरुक्षेत्रम् तँ अशेष अछि। ४८.डॉ. अजीत मिश्र- अपनेक प्रयासक कतबो प्रशंसा कएल जाए कमे होएतैक। मैथिली साहित्यमे अहाँ द्वारा कएल गेल काज युग-युगान्तर धरि पूजनीय रहत। ४९.श्री बीरेन्द्र मल्लिक- अहाँक कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक आ विदेह:सदेह पढ़ि अति प्रसन्नता भेल। अहाँक स्वास्थ्य ठीक रहए आ उत्साह बनल रहए से कामना। ५०.श्री कुमार राधारमण- अहाँक दिशा-निर्देशमे विदेह पहिल मैथिली ई-जर्नल देखि अति प्रसन्नता भेल। हमर शुभकामना। ५१.श्री फूलचन्द्र झा प्रवीण-विदेह:सदेह पढ़ने रही मुदा कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक देखि बढ़ाई देबा लेल बाध्य भऽ गेलहुँ। आब विश्वास भऽ गेल जे मैथिली नहि मरत। अशेष शुभकामना। ५२.श्री विभूति आनन्द- विदेह:सदेह देखि, ओकर विस्तार देखि अति प्रसन्नता भेल। ५३.श्री मानेश्वर मनुज-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक एकर भव्यता देखि अति प्रसन्नता भेल, एतेक विशाल ग्रन्थ मैथिलीमे आइ धरि नहि देखने रही। एहिना भविष्यमे काज करैत रही, शुभकामना। ५४.श्री विद्यानन्द झा- आइ.आइ.एम.कोलकाता- कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक विस्तार, छपाईक संग गुणवत्ता देखि अति प्रसन्नता भेल। अहाँक अनेक धन्यवाद; कतेक बरखसँ हम नेयारैत छलहुँ जे सभ पैघ शहरमे मैथिली लाइब्रेरीक स्थापना होअए, अहाँ ओकरा वेबपर कऽ रहल छी, अनेक धन्यवाद। ५५.श्री अरविन्द ठाकुर-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक मैथिली साहित्यमे कएल गेल एहि तरहक पहिल प्रयोग अछि, शुभकामना। ५६.श्री कुमार पवन-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक पढ़ि रहल छी। किछु लघुकथा पढ़ल अछि, बहुत मार्मिक छल। ५७. श्री प्रदीप बिहारी-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक देखल, बधाई। ५८.डॉ मणिकान्त ठाकुर-कैलिफोर्निया- अपन विलक्षण नियमित सेवासँ हमरा लोकनिक हृदयमे विदेह सदेह भऽ गेल अछि। ५९.श्री धीरेन्द्र प्रेमर्षि- अहाँक समस्त प्रयास सराहनीय। दुख होइत अछि जखन अहाँक प्रयासमे अपेक्षित सहयोग नहि कऽ पबैत छी। ६०.श्री देवशंकर नवीन- विदेहक निरन्तरता आ विशाल स्वरूप- विशाल पाठक वर्ग, एकरा ऐतिहासिक बनबैत अछि। ६१.श्री मोहन भारद्वाज- अहाँक समस्त कार्य देखल, बहुत नीक। एखन किछु परेशानीमे छी, मुदा शीघ्र सहयोग देब। ६२.श्री फजलुर रहमान हाशमी-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक मे एतेक मेहनतक लेल अहाँ साधुवादक अधिकारी छी। ६३.श्री लक्ष्मण झा "सागर"- मैथिलीमे चमत्कारिक रूपेँ अहाँक प्रवेश आह्लादकारी अछि।..अहाँकेँ एखन आर..दूर..बहुत दूरधरि जेबाक अछि। स्वस्थ आ प्रसन्न रही। ६४.श्री जगदीश प्रसाद मंडल-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक पढ़लहुँ । कथा सभ आ उपन्यास सहस्रबाढ़नि पूर्णरूपेँ पढ़ि गेल छी। गाम-घरक भौगोलिक विवरणक जे सूक्ष्म वर्णन सहस्रबाढ़निमे अछि, से चकित कएलक, एहि संग्रहक कथा-उपन्यास मैथिली लेखनमे विविधता अनलक अछि। समालोचना शास्त्रमे अहाँक दृष्टि वैयक्तिक नहि वरन् सामाजिक आ कल्याणकारी अछि, से प्रशंसनीय। ६५.श्री अशोक झा-अध्यक्ष मिथिला विकास परिषद- कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक लेल बधाई आ आगाँ लेल शुभकामना। ६६.श्री ठाकुर प्रसाद मुर्मु- अद्भुत प्रयास। धन्यवादक संग प्रार्थना जे अपन माटि-पानिकेँ ध्यानमे राखि अंकक समायोजन कएल जाए। नव अंक धरि प्रयास सराहनीय। विदेहकेँ बहुत-बहुत धन्यवाद जे एहेन सुन्दर-सुन्दर सचार (आलेख) लगा रहल छथि। सभटा ग्रहणीय- पठनीय। ६७.बुद्धिनाथ मिश्र- प्रिय गजेन्द्र जी,अहाँक सम्पादन मे प्रकाशित ‘विदेह’आ ‘कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक’ विलक्षण पत्रिका आ विलक्षण पोथी! की नहि अछि अहाँक सम्पादनमे? एहि प्रयत्न सँ मैथिली क विकास होयत,निस्संदेह। ६८.श्री बृखेश चन्द्र लाल- गजेन्द्रजी, अपनेक पुस्तक कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़ि मोन गदगद भय गेल , हृदयसँ अनुगृहित छी । हार्दिक शुभकामना । ६९.श्री परमेश्वर कापड़ि - श्री गजेन्द्र जी । कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़ि गदगद आ नेहाल भेलहुँ। ७०.श्री रवीन्द्रनाथ ठाकुर- विदेह पढ़ैत रहैत छी। धीरेन्द्र प्रेमर्षिक मैथिली गजलपर आलेख पढ़लहुँ। मैथिली गजल कत्तऽ सँ कत्तऽ चलि गेलैक आ ओ अपन आलेखमे मात्र अपन जानल-पहिचानल लोकक चर्च कएने छथि। जेना मैथिलीमे मठक परम्परा रहल अछि। (स्पष्टीकरण- श्रीमान्, प्रेमर्षि जी ओहि आलेखमे ई स्पष्ट लिखने छथि जे किनको नाम जे छुटि गेल छन्हि तँ से मात्र आलेखक लेखकक जानकारी नहि रहबाक द्वारे, एहिमे आन कोनो कारण नहि देखल जाय। अहाँसँ एहि विषयपर विस्तृत आलेख सादर आमंत्रित अछि।-सम्पादक) ७१.श्री मंत्रेश्वर झा- विदेह पढ़ल आ संगहि अहाँक मैगनम ओपस कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक सेहो, अति उत्तम। मैथिलीक लेल कएल जा रहल अहाँक समस्त कार्य अतुलनीय अछि। ७२. श्री हरेकृष्ण झा- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक मैथिलीमे अपन तरहक एकमात्र ग्रन्थ अछि, एहिमे लेखकक समग्र दृष्टि आ रचना कौशल देखबामे आएल जे लेखकक फील्डवर्कसँ जुड़ल रहबाक कारणसँ अछि। ७३.श्री सुकान्त सोम- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक मे समाजक इतिहास आ वर्तमानसँ अहाँक जुड़ाव बड्ड नीक लागल, अहाँ एहि क्षेत्रमे आर आगाँ काज करब से आशा अछि। ७४.प्रोफेसर मदन मिश्र- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक सन किताब मैथिलीमे पहिले अछि आ एतेक विशाल संग्रहपर शोध कएल जा सकैत अछि। भविष्यक लेल शुभकामना। ७५.प्रोफेसर कमला चौधरी- मैथिलीमे कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक सन पोथी आबए जे गुण आ रूप दुनूमे निस्सन होअए, से बहुत दिनसँ आकांक्षा छल, ओ आब जा कऽ पूर्ण भेल। पोथी एक हाथसँ दोसर हाथ घुमि रहल अछि, एहिना आगाँ सेहो अहाँसँ आशा अछि। ७६.श्री उदय चन्द्र झा "विनोद": गजेन्द्रजी, अहाँ जतेक काज कएलहुँ अछि से मैथिलीमे आइ धरि कियो नहि कएने छल। शुभकामना। अहाँकेँ एखन बहुत काज आर करबाक अछि। ७७.श्री कृष्ण कुमार कश्यप: गजेन्द्र ठाकुरजी, अहाँसँ भेँट एकटा स्मरणीय क्षण बनि गेल। अहाँ जतेक काज एहि बएसमे कऽ गेल छी ताहिसँ हजार गुणा आर बेशीक आशा अछि। ७८.श्री मणिकान्त दास: अहाँक मैथिलीक कार्यक प्रशंसा लेल शब्द नहि भेटैत अछि। अहाँक कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक सम्पूर्ण रूपेँ पढ़ि गेलहुँ। त्वञ्चाहञ्च बड्ड नीक लागल। ७९. श्री हीरेन्द्र कुमार झा- विदेह ई-पत्रिकाक सभ अंक ई-पत्रसँ भेटैत रहैत अछि। मैथिलीक ई-पत्रिका छैक एहि बातक गर्व होइत अछि। अहाँ आ अहाँक सभ सहयोगीकेँ हार्दिक शुभकामना। विदेह मैथिली साहित्य आन्दोलन (c)२००४-११. सर्वाधिकार लेखकाधीन आ जतय लेखकक नाम नहि अछि ततय संपादकाधीन। विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। सह-सम्पादक: उमेश मंडल। सहायक सम्पादक: शिव कुमार झा आ मुन्नाजी (मनोज कुमार कर्ण)। भाषा-सम्पादन: नागेन्द्र कुमार झा आ पञ्जीकार विद्यानन्द झा। कला-सम्पादन: ज्योति सुनीत चौधरी आ रश्मि रेखा सिन्हा। सम्पादक-शोध-अन्वेषण: डॉ. जया वर्मा आ डॉ. राजीव कुमार वर्मा। सम्पादक- नाटक-रंगमंच-चलचित्र- बेचन ठाकुर। सम्पादक-सूचना-सम्पर्क-समाद पूनम मंडल आ प्रियंका झा। रचनाकार अपन मौलिक आ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि) ggajendra@videha.com केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx, .rtf वा .txt फॉर्मेटमे पठा सकैत छथि। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेताह, से आशा करैत छी। रचनाक अंतमे टाइप रहय, जे ई रचना मौलिक अछि, आ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। मेल प्राप्त होयबाक बाद यथासंभव शीघ्र ( सात दिनक भीतर) एकर प्रकाशनक अंकक सूचना देल जायत। ’विदेह' प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका अछि आ एहिमे मैथिली, संस्कृत आ अंग्रेजीमे मिथिला आ मैथिलीसँ संबंधित रचना प्रकाशित कएल जाइत अछि। एहि ई पत्रिकाकेँ श्रीमति लक्ष्मी ठाकुर द्वारा मासक ०१ आ १५ तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि। (c) 2004-11 सर्वाधिकार सुरक्षित। विदेहमे प्रकाशित सभटा रचना आ आर्काइवक सर्वाधिकार रचनाकार आ संग्रहकर्त्ताक लगमे छन्हि। रचनाक अनुवाद आ पुनः प्रकाशन किंवा आर्काइवक उपयोगक अधिकार किनबाक हेतु ggajendra@videha.co.in पर संपर्क करू। एहि साइटकेँ प्रीति झा ठाकुर, मधूलिका चौधरी आ रश्मि प्रिया द्वारा डिजाइन कएल गेल। सिद्धिरस्तु वि दे ह विदेह Videha বিদেহ विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका Videha Ist Maithili Fortnightly e Magazine विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका 'विदेह' ९० म अंक १५ सितम्बर २०११ (वर्ष ४ मास ४५ अंक ९०)http://www.videha.co.in/ मानुषीमिह संस्कृताम् ISSN 2229-547X VIDEHA वि दे ह विदेह Videha বিদেহ विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका Videha Ist Maithili Fortnightly e Magazine विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई 'विदेह' ८९ म अंक ०१ सितम्बर २०११ (वर्ष ४ मास ४५ अंक ८९)http://www.videha.co.in/ मानुषीमिह संस्कृताम् ISSN 2229-547X VIDEHA
é ‘/- y
5 a हर < Co = A डे J — : A
हो न नह कह ¢ a 7: sy fa KGS
ही | भर : . ~*~ 4 *
™ a + mee ei
प्र कि | > @. 6 AO) |) o\\ AE Om Om Ox@ दे शक्ल Ni | ! y a < wy NWT डर कि न JN | \\| 0 डे | sea dl jot I दा | HHH] HII || WS aN l |oponoone ZiINUN AN MUI
ice बल: जा | | aa - "| el । : a ey ett = , i! ri है | शो ? ti, - 2 = कै dt = 7 5 36 é ae” j है =| . fi जे. = : i, i a = sc = S 4 3 = = \
— कि कि ae " q j a = fai - युग "न = ' | ला a eae ee , . oe = न
या खा , — ‘lah - £ —_ | : =~ a oe on eh A ms - कर 7 4 fi 4 ya 7 sure . न \ , ae oe 4 . a iy eal & = J हे कस ना sap से eit SSS = स्ल्ल्ल Hh Bey Say Pie > “. ER Pee = eee SSS SSCA Rea Hes * (0 WN 5 २४. ला ऑड Lae: ¥ SSS Sse गा ish! 2 Be) MORRIS Sh) लीन! ae SSS उसके a tk ESS) oe } Hi ea Hees co at 9१३ रे Fe 2-२३: She ay fy Pd eS ay 24% aut HES Cia SES "राव: =] SSS ER AM IDE SS aS co Brat. “g ij Re SOMO eee Se = SSH eH hf {ssISoe jee ee ee 26 कि.” कि कि | ~Seeee Ss SES PL ARS od eet Oe ie i orks Teco RP नि mo) 9 Mit oo Sees Sea ih i cite «tapers atom ip । ates is sme tS Ait \ gee के See FA i App src Memes ote pet (४ Ap’ eel On . 5 Se Ses Sit Phas ise. See ie rae his ERs ab piety या * Ve oe SS न पक मय Oe i fea Sel tly q ES SSR So ry ae / IT sa Rey hee i) pie mt ot |e a bite: Stee eM HS i css SS 0h) '/4) i, न ae) hile S60; ue पक, Ha amen aa SS SS Ah पर मिल ०. : Myr. L* oh 298 ie oath leu Hh cw, नगर SSS SORT MAY gt see ks aS) See जे ihe हर बरी पक, SSS उन ie ifs Wa Ss oro Say 4०. an 4 a coe a fi thos रू ty बी pre Ube) i wie”
का का गा ना स्व ba, Pe he Ot \ भी | धिएि a | Ak a i oe V7 वी आह ! 5 ee 7 20 Cig 3 fe vig i \ ra | A} i ft AM H 4 / Is fei है हू | be Nip == UF <o 7 Cie ae | p= A Ze ns, ON . = ‘ = Re “4 i} डर by Foe et Lig Bie 5 | ee RY EN i Neate लक cast P| ‘ Pa pik ye ped) ही न््न्जड । = NE ms og Gi it pe int i) ‘ia La = SR gy iy ही Bell f 2 IN SN हि hy ih दि tilietovidd << Be oe Shahi 4 nn anna थि hie: A WN \o Sh ५. Sey ye | i Bl eae p 7 Wend ji Bit iy BG a | Sy ae y MW} |... नस जे का = Te, ae ee ए-.. या he ae al tt ae । NY r ok दर की न ey = a hy ही rw aie WF aS आ | we है a q i = \ Ul. “e © T- AS q [irae