VIDEHA — Issue 91 / अंक ९१

Publication: VIDEHA · Issue: 91
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420 419 ISSN 2229-547X VIDEHA 'विदेह' ९१ म अंक ०१ अक्टूबर २०११ (वर्ष ४ मास ४६ अंक ९१) वि  दे  ह विदेह Videha বিদেহ http://www.videha.co.in  विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका Videha Ist Maithili Fortnightly e Magazine   नव अंक देखबाक लेल पृष्ठ सभकेँ रिफ्रेश कए देखू। Always refresh the pages for viewing new issue of VIDEHA. Read in your own script Roman(Eng)Gujarati Bangla Oriya Gurmukhi Telugu Tamil Kannada Malayalam Hindi ऐ अंकमे अछि:- १. संपादकीय संदेश २. गद्य २.१.जगदीश प्रसाद मण्‍डल-एकटा दीर्घकथा आ एकटा एकांकी २.२.- अतुलेश्वर- किछु विचार टिप्पणी २.३.१.नन्‍दवि‍लास राय-कथा-बाबाधाम २.बिपिन झा-जन्मदिनक बदलैत स्वरूप २.४.   जवाहर लाल कश्यप-एक टा विहनि कथा २.५.राजेशकुमार कर्ण- चिरबिर–चिरबिर करैत उडि रहल चिडै २.६.विनीत उत्पल-१.कथा- बेसिक इंस्टिंक्ट (दोसर आ अंतिम भाग) २.आजुक कालमे बाबा २.७.नवेंदु कुमार झा-१.भाजपाक रथ पर सवार भऽ दिल्लीक गद्दी पर पहूचताह नीतीश? २.लाल कृष्ण आडवाणीक महगी भ्रष्टाचारक विरूद्ध प्रस्तावित रथयात्रा ३.बिहारक विकासक लेल प्रदेश मे नव नव उद्योग २.८.किशन कारीगर-मुन्नी बदनाम भेलैए किएक ?-एकटा हास्य कथा। ३. पद्य ३.१.१.शांतिलक्ष्मी चौधरी २.मनोज झा मुक्ति ३.२.१.इरा मल्लिक २ओमप्रकाश झा ३.विनीता झा ४उमेश पासवान ३.३.१.मिहिर झा २.शि‍वकुमार झा ‘टि‍ल्‍लू’ ३.४.१.शिवशंकर सिंह ठाकुर २.रामवि‍लास साहु ३अक्षय कुमार चौधरी ३.५.१.जगदीश चन्द्र  ’अनिल’२.उमेश मण्डल ३.विकास झा रंजन ३.६.डॉ. अजीत मिश्र ३.७.१.डॉ॰ शशिधर कुमर २ आनंद कुमार झा ३नवीन कुमार "आशा" ४.प्रभात राय भट्ट ३.८. १.रामदेव प्रसाद मण्‍डल ‘झारूदार’ २.अमित मोहन झा ४. मिथिला कला-संगीत-१.कैलाश कामत२.ज्योति सुनीत चौधरी ३.श्वेता झा (सिंगापुर) ४.गुंजन कर्ण ५.इरा मल्लिक . बालानां कृते-१.पवनकान्त झा (काश्यप कमल)- बाबूक खिस्सा २.डॉ॰ शशिधर कुमर (बालगीत) ३.सद्रे आलम गौहर-नेना भुटकाक लेल एकटा सुंदर कविता . भाषापाक रचना-लेखन -[मानक मैथिली], [विदेहक मैथिली-अंग्रेजी आ अंग्रेजी मैथिली कोष (इंटरनेटपर पहिल बेर सर्च-डिक्शनरी) एम.एस. एस.क्यू.एल. सर्वर आधारित -Based on ms-sql server Maithili-English and English-Maithili Dictionary.] 8.VIDEHA FOR NON RESIDENTS विदेह ई-पत्रिकाक सभटा पुरान अंक ( ब्रेल, तिरहुता आ देवनागरी मे ) पी.डी.एफ. डाउनलोडक लेल नीचाँक लिंकपर उपलब्ध अछि। All the old issues of Videha e journal ( in Braille, Tirhuta and Devanagari versions ) are available for pdf download at the following link. विदेह ई-पत्रिकाक सभटा पुरान अंक ब्रेल, तिरहुता आ देवनागरी रूपमे Videha e journal's all old issues in Braille Tirhuta and Devanagari versions विदेह ई-पत्रिकाक पहिल ५० अंक

विदेह ई-पत्रिकाक ५०म सँ आगाँक अंक विदेह आर.एस.एस.फीड। "विदेह" ई-पत्रिका ई-पत्रसँ प्राप्त करू। अपन मित्रकेँ विदेहक विषयमे सूचित करू। ↑ विदेह आर.एस.एस.फीड एनीमेटरकेँ अपन साइट/ ब्लॉगपर लगाऊ। ब्लॉग "लेआउट" पर "एड गाडजेट" मे "फीड" सेलेक्ट कए "फीड यू.आर.एल." मे http://www.videha.co.in/index.xml टाइप केलासँ सेहो विदेह फीड प्राप्त कए सकैत छी। गूगल रीडरमे पढ़बा लेल http://reader.google.com/ पर जा कऽ Add a  Subscription बटन क्लिक करू आ खाली स्थानमे http://www.videha.co.in/index.xml पेस्ट करू आ Add  बटन दबाउ। Join official Videha facebook group. Join Videha googlegroups विदेह रेडियो:मैथिली कथा-कविता आदिक पहिल पोडकास्ट साइट http://videha123radio.wordpress.com/ Videha Radio मैथिली देवनागरी वा मिथिलाक्षरमे नहि देखि/ लिखि पाबि रहल छी, (cannot see/write Maithili in Devanagari/ Mithilakshara follow links below or contact at ggajendra@videha.com) तँ एहि हेतु नीचाँक लिंक सभ पर जाऊ। संगहि विदेहक स्तंभ मैथिली भाषापाक/ रचना लेखनक नव-पुरान अंक पढ़ू। http://devanaagarii.net/ http://kaulonline.com/uninagari/  (एतए बॉक्समे ऑनलाइन देवनागरी टाइप करू, बॉक्ससँ कॉपी करू आ वर्ड डॉक्युमेन्टमे पेस्ट कए वर्ड फाइलकेँ सेव करू। विशेष जानकारीक लेल ggajendra@videha.com पर सम्पर्क करू।)(Use Firefox 4.0 (from WWW.MOZILLA.COM )/ Opera/ Safari/ Internet Explorer 8.0/ Flock 2.0/ Google Chrome for best view of 'Videha' Maithili e-journal at http://www.videha.co.in/ .) 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(काशी/ नवंबर १९३६) काशीसँ श्रीलंका प्रयाण, “कर्मक फल भोगथु बूढ़ बाप” ई कहि यात्रीजी अपन पिताक प्रति सभ उद्गार बाहर कऽ दैत छथि। १९४१ ई. मे यात्रीजी अपन पत्नी, अपराजिता,  लग आबि गेलथि। १९४१ ई. मे यात्रीजी दू टा मैथिली कविता लिखलन्हि- “बूढ़ वर”  आ “विलाप” आ एकरा पाम्फलेट रूपमे छपबाए ट्रेनक यात्री लोकनिकेँ बेचलन्हि। जीविकाक ताकिमे सौँसे भारत दुनू प्राणी घुमलाह। पत्नीक जोर  देलापर बीच-बीचमे तरौनी सेहो घुमि कऽ आबथि। आ फेर अएल १९४९ ई., अपना संग लेने यात्रीजीक पहिल मैथिली कविता-संग्रह “चित्रा”। १९५२ ई. धरि पत्नी संगमे घुमैत रहलथिन्ह, फेर तरौनीमे रहए लगलीह। यात्रीजी बीच- बीचमे आबथि। अपराजितासँ यात्रीजीकेँ छह टा सन्तान भेलन्हि, आ सभक भार पत्नी अपना कान्हपर लेने रहलीह। यात्रीजी दमासँ परेशान रहैत रहथि। हम जखन दरभंगामे पढ़ैत रही तँ यात्रीजी ख्वाजा सरायमे रहैत छलाह। हमरा मोन अछि जे मैथिलीक कोनो कार्यक्रममे यात्रीजी आएल छलाह आ कम्युनिस्ट पार्टीबला सभ एजेन्डा छीनि लेने छल। अगिले दिन यात्रीजी अपनाकेँ ओइ धोधा-धोखीमे गेल सभाक कार्यवाहीसँ हटा लेलन्हि। एमर्जेन्सीमे जेल गेलाह तँ आर.एस.एस. क कार्यकर्ता लोकनिसँ जेलमे भेँट भेलन्हि आ जे.पी.क सम्पूर्ण क्रान्तिक विरुद्ध सेहो जेलसँ बाहर अएलाक बाद लिखलन्हि यात्रीजी। यात्रीजी मैथिलीमे बैद्यनाथ मिश्र "यात्री" आ हिन्दीमे “नागार्जुन” क नामसँ रचना लिखलन्हि। “पृथ्वी ते पात्रं” १९५४ ई. मे “वैदेही”मे प्रकाशित भेल छल, हमरा सभक मैट्रिकक सिलेबसमे छल। यात्रीजी लिखैत छथि- “आन पाबनि तिहार तँ जे से। मुदा नबान निर्भूमि परिवारकेँ देखार कए दैत छैक। से कातिक अबैत देरी अपराजिता देवीक घोघ लटकि जाइन्हि। कचोटेँ पपनियो नहि उठा होइन्ह ककरो दिश! बेसाहल अन्नसँ कतउ नबान भेलइए”?

यात्री एकटा मिथ छथि? की यात्री एकटा मिथ छथि? ओ मुख्यतः हिन्दीक लेखक रहथि, मैथिलीमे ओ हिन्दीक दशमांशो नै लिखलन्हि। जे लिखबो केलन्हि तइमे सँ बेशी स्वयं द्वारा हिन्दीसँ अनूदित। मैथिली आ मिथिला क्षेत्रक शब्दावली आ संस्कृति हिन्दीक लोककेँ अबूझ आ तेँ रुचिगर लगलै मुदा तइमे सेहो ढेर रास कमी रहै जेना एकटा उदाहरण यात्री समग्रसँ- ।     यात्री समग्र-पृ.२२० जेठ सुदी चतुर्दशी कऽ रहनि पीसाक वर्षी। पहिले वर्षी..पृ.. २२२- ..कहाँ जे एको दिनक खातिर जाइ, कर्ता बना, अषाढ़ बढ़ि तृतियाक तिथिपर पहिल। एहेन बेमारी आनो मैथिली-हिन्दी लेखकमे छन्हि। ई ऐतिहासिक लिखित तथ्य अछि जे गोनू झा १०५०-११५० मे भेलाह मुदा उषा किरण खान विद्यापतिसँ हुनकर शास्त्रार्थ करबै छथि (हिन्दीक ऐतिहासिक उपन्यास सिरजनहार, भारतीय ज्ञानपीठ, मे) वीरेन्द्र झा कहै छथि जे गोनू झा ५०० साल पहिने भेला आ तारानन्द वियोगी गोनू झा केँ ३०० साल पहिने भेल मानै छथि (दुनू गोटेक हिन्दीमे प्रकाशित गोनू झापर पोथी, क्रमसँ राजकमल प्रकाशन आ नेशनल बुक ट्रस्टसँ प्रकाशित) तँ विभा रानीक गोनू झापर हिन्दी पोथी (वाणी प्रकाशन) मे कुणाल गोनू झाकेँ भव सिंहक राज्यमे (१४म शताब्दी) भेल मानैत छथि। जखन पंजीमे उपलब्ध लिखित अभिलेखन गोनू झाकेँ विद्यापतिसँ दस पीढ़ी पहिने अभिलेखित करैत अछि, तखन ई हाल अछि। मिथिला क्षेत्रक शब्दावली आ संस्कृतिक- जे हिन्दीक लोककेँ अबूझ आ तेँ रुचिगर लगैे छै- तथ्यमे ई मैथिली-हिन्दी लेखक सभ अपन अज्ञानतासँ ढेर रास गलत तथ्य पड़सि रहल छथि, साम्प्रदायिक लेखक लोकनि गोनू झाक कथामे मुस्लिम तहसीलदारक अत्याचार घोंसिया रहल छथि (मुस्लिम लोकनि मिथिलामे गोनूक समए मे रहबे नै करथि)! यात्री समग्रमे बलचनमा नै लेल गेल कारण ओ हिन्दीक कृति अछि, ओकर मैथिली अनुवाद सेहो भ्रष्ट अछि लगैए जेना अदहा अनुवाद केलाक बाद मैथिली लेल हुनका लग समयाभाव भऽ गेल होइन्ह। यात्री समग्रमे नवतुरिया लेल गेल, ओहो मूल हिन्दी अछि, किए मूल मैथिली कहि कऽ लेल गेल तकर जबाब सम्पादक देताह। मैथिलीमे प्रूफ रीडरकेँ सम्पादक कहेबाक सख छन्हि आ लोक ग्रियर्सन धरिक रचनाक रिप्रिन्ट अपन सम्पादकत्वमे करबा रहल छथि। एकटा दोसर उदाहरणमे पी.सी.रायचौधुरीक दरभंगा जिला गजेटियरक तेसर अध्यायक चारिटा उपशीर्षकक अंग्रेजी रचनाकेँ मोहन भारद्वाज अपन सम्पादकत्वमे रमानाथ झा रचनावलीमे -किनको कहलासँ सत्य मानि- रमानाथ झाक रचना मानि घोसिया देलन्हि, जखन की लिखित आ वैयाकरणिक शिल्पक आधारपर ओ रचना पी.सी.रायचौधुरीक अछि। यात्री स्वयं कहै छथि जे ओ मैथिली बलचनमा पहिने लिखलन्हि आ तकर हिन्दीमे अनुवाद केलन्हि। मुदा हिन्दी बलचनमामे ओ ई नै लिखै छथि आ ओकरा हिन्दीक पहिल आंचलिक उपन्यास कहै छथि। ई बेमारी आइयो मैथिलीक लेखककेँ गरोसने अछि आ यात्री जीक ऐ मे सायास-अनायास योगदान दुखदायी अछि। राजकमल यात्रीकेँ अमर-सुमन सन पुरान ढर्राक कवि कहै छथि, प्रायः यात्रीक छन्दक प्रति सजगतासँ राजकमलकेँ ई भ्रम भेल छलन्हि। चतुरानन मिश्र आ जगदीश प्रसाद मंडल कम्यूनिस्ट आन्दोलनसँ जुड़ल छथि, प्रायोगिक रूपमे, पार्टी स्तरपर, मुदा हिनकर दुनू गोटेक उपन्यास देखला उत्तर हमरा ई कहबामे कनेको कष्ट नै होइत अछि जे जइ रूपमे यात्री आ धूमकेतु मार्क्सवादक बैशाखी लऽ उपन्यासकेँ ठाढ़ करै छथि तकर बेगरता एहि दुनू उपन्यासकारकेँ नै बुझना जाइत छन्हि। मार्क्सवादक असल अर्थ हिनके दुनूक रचनामे भेटत। कतौ पार्टीक नाम वा विचारधाराक चर्च नै मुदा जे असल डायलेक्टिकल मैटेरियलिज्म छैक तकर पहिचान, जिनगीक महत्वपर विश्वास, द्वन्दात्मक पद्धतिक प्रयोग आ ई तखने सम्भव होइत अछि जखन लेखक दास कैपिटल सहित मार्क्सवादक गहन अध्ययन करत आ प्रायोगिक मार्क्सवादपर कताक दशक चलत। आ अन्तमे यात्रीजीक संस्कृत पद्य:- वासन्ती कनकप्रभा प्रगुणिता पीतारुर्णेः पल्लवैः हेमाम्भोजविलासविभ्रमरता दूरे द्विरेफाः स्ता यैशसण्डलकेलिकानन कथा विस्मरिता भूतले छायाविभ्रमतारतम्यतरलाः तेऽमी “चिनार” द्रुमाः॥ -बसंतक स्वर्णिम आभा द्विगुणित भऽ गेल अछि पीयर-लाल कोपड़सँ। स्वर्णकालक भ्रममे भौरा सभ एकरासँ दूर-दूर रहैत अछि। नन्दनवनक विहारकेँ जे पृथ्वीपर बिसरा दैत अछि, छाह झिलमिल घटैत-बढ़ैत जकर डोलब अछि चंचल आ तरल। ओइ चिनारकेँ हम देखने छी अडिग भेल ठाढ़। २ हिन्दी आ मैथिली आ साहित्यिक शब्दावली हिन्दी जै हिसाबे अपन भूगोल बढेलक अछि ओइ हिसाबे ओकर शब्दावली नै बढ़ल छैक,से हिन्दीसँ डरबाक कोनो प्रश्ने नै। हिन्दीक साम्राज्यवाद अंग्रीजीक साम्राज्यवादक स्थान लऽ लेने अछि आ से सभ हिन्दी दिवसपर छोट भाषाकेँ गिरबाक ओकर प्रवृत्तिपर बहस नै रोकल जा सकत। लैटिन/दक्षिण अमेरिकाक सभटा मूल भाषा खतम भऽ गेल आ ओकर स्थान स्पेनिश आ पोर्तूगीज लेलक। स्पेन अजटेक सभ्यताकेँ खतम केलक, ओकर सभ चेन्हासी मेटा देलक, मुदा मेक्सिको तकर पश्चातापमे विश्वकप फुटबॉलक आयोजन लेल जे स्टेडियम बनेलक तकर नाम अजटेक स्टेडियम रखलक। डेनमार्कक शब्दकोष बड विस्तृत छै, प्रायः २३ वोल्यूम सँ बेशीमे छै,  आप्रवासी प्रायः ओकर नागरिकता लेल लै जाएबला परीक्षामे डेनिस भाषामे अनुत्तीर्ण भऽ जाइ छथि, एकटा महिला जे डेनिससँ विवाह केने रहथि हुनकर बच्चा डेनमार्कक नागरिक भऽ गेल मुदा ओ कहलन्हि जे भाषा पेपर बड्ड कठिन छै, डेनिस सेहो ओइमे अनुत्तीर्ण भऽ जाइ छथि, जनसंख्या वा क्षेत्रफलक छोट रहब डेनिस वोकाबुलेरी लेल हानिकारक नै भेलै। साहित्यकक मूल सरोकार अछि विषय-वस्तुसँ। मुदा शब्दक अकाल जँ साहित्यकारेक मध्य रहत तँ ओ की संप्रेषण करताह, विषय-वस्तुकेँ कोना फरिछा पेताह। जे हाल हिन्दी साहित्यक अछि सएह मैथिलीक भऽ जाएत। शब्दावलीक ग्राह्यता नेटिव स्पीकरक गाममे बाजल जाएबला शब्दावली निर्धारित करत, संस्कृतिसँ दूर प्रवासी द्वारा बाजल जाएबला शब्दावली नै। शब्दावलीक ग्राह्यता नेटिव स्पीकरक गाममे बाजल जाएबला शब्दावली निर्धारित करत, आ जँ संस्कृतिसँ कटल प्रवासी द्वारा बाजल शब्दावलीकेँ आधारभूत बनाएब तँ नीक साहित्य कोड़ि कऽ निकालल बुझाएत आ गोलैसी आधारित समीक्षकक समीक्षित साहित्य नेचुरल बुझाएत। शास्त्रीय अनुशासन लेखक लेल अछि,  पाठक लेल नै। लेखक जँ गजल, रोला, दोहा, कुण्डलिया शास्त्रीय आधारपर लिखताह तखने पाठककेँ नीक लगतै, जँ लेखक मेहनतिसँ दूर भगताह तँ साहित्यिक पाठकीयता घटत। शास्त्रक बान्ह तोड़बाक विधि सेहो शास्त्रक मध्य छैक, सावित्री मंत्र जँ शास्त्रीय कट्टरतासँ देखी तँ ओ गायत्री छन्दमे नै छै, मुदा हम सभ ओकरा गायत्रीमे मानै छी कारण गणना पुरेबालेल स्वः केँ सुवः कएल गेलै। दरभंगाक मजहर इमामकेँ "पिछले मौसम का फूल"पर उर्दू लेल साहित्य अकादेमी पुरस्कार देल गेल। ऐ संग्रहमे गजल (बहरयुक्त) ५५ टा आ आजाद गजल (बे-बहर) ३ टा छै, मुदा पाठक हुनका गजल लेल मोन राखने छन्हि, ओकरा मतलब नै छै जे, जे गजल ओकरा नीक लगलै से बहरमे छै वा नै,  ओकरा तँ नीक लगलै। आ की ई संयोग छी जे बहरयुक्त गजले ओकरा नीक लगलै? लेखकक आइडियोलोजी पानिमे नून सन हेबाक चाही, पानिमे तेल सन नै आ ऐपर हम पहिनहियो लिखने छी। यात्री आ धूमकेतुकेँ कम्यूनिस्ट पार्टीक सोंगरक आवश्यकता पड़लन्हि कारण वामपंथ “नीक सेन्ट” आ “डिजाइनर वीयर”क भाँति हिनका सभ लेल फैशन छल, से बलचनमा कांग्रेस आ समाजवादी पार्टीसँ हटलाक बाद कम्यूनिस्ट आ लालझंडामे सभ समस्याक समाधान तकैए, ओकरा यात्रीजी सभ समाधान ओइमे दै छथिन्ह।  धूमकेतुक पात्र लेल सेहो लाल झंडा लक्षमण बूटी अछि। मुदा ई लोकनि कम्यूनिस्ट मूवमेन्टसँ -फैशनक अतिरिक्त- जुड़ल नै छथि तेँ हिनकर साहित्यमे आइडियोलोजी तेल सन सहसह करैए। आब आउ चतुरानन्द मिश्र आ जगदीश प्रसाद मण्डलक मैथिली साहित्यपर। चतुरानन्द मिश्रक उपन्यासमे वा जगदीश प्रसाद मण्डलक मैथिली साहित्यमे कतौ लालझंडा वा कम्यूनिस्ट पार्टीक चर्च अहाँ देखने छी? एतए जे भेटत से अछि असल वामपंथी द्वन्दात्मक पद्धति, जीवनपर विश्वास, माने आइडियोलोजी नूनसन मिलल। आ की ई मात्र संयोग अछि जे चतुरानन्द मिश्र जीवनक प्रारम्भमे साहित्य लिखै छथि आ जगदीश प्रसाद मण्डल जीवनक उत्तरार्धमे, अन्तिम केस खतम भेलाक बाद? जगदीश प्रसाद मण्डलक गाम बेरमाक जमीन्दार ठाकुर जी हमर पितयौत भाइकेँ कहलखिन्ह जे जगदीश प्रसाद मण्डल सत्य हरिश्चन्द्र छथि, हमर गामक गौरव छथि। आ से तखन, जखन जगदीश प्रसाद मण्डल कम्यूनिस्ट मूवमेन्टक नेतृत्व केलन्हि दसो बेर जेल गेलाह,  केस हुनके सभसँ लड़लन्हि आ तकर परिणाम भेल जे बेरमामे आइ दस बीघासँ पैघ जोत ककरो नै छै। आइयो ओ फूसक घरमे रहै छथि आ तीन बजे उठि कऽ डिबिया लेस कऽ मैथिली साहित्य लिखै छथि आ हुनकर बेटा हुनका आइ धरि लिखैत नै देखने छथिन्ह, जे कखन ओ लिखै छथि, भोगेन्द्र झाक नेतृत्वमे ओ प्रण लेने रहथि जे जखन बाजब, सभ मैथिलीमे बाजब। से हुनकर बेटा हुनका मैथिलीक अतिरिक्त दोसर भाषा बजैत नै सुनने छथिन्ह। आ सएह कारण अछि जे हुनकर विषय-वस्तु नवीन होइत अछि, हुनकर शब्दावली नेटिव स्पीकरक शब्दावली अछि, जे ओइ विषय-वस्तुकेँ फरिछेबामे सफल होइत अछि आ आवश्यक अछि। हुनकर लोक, हुनकर गाछ-बृच्छ, हुनकर फूलपात, हुनकर खेत खलिहान असल अछि, जमीनी अछि, पतालसँ कोड़ि कऽ निकालल नै। आ हुनकासँ प्रेरणा लऽ प्रवासमे रहनिहार नव साहित्यकार मैथिली लिखबासँ पहिने मिथिलाक इतिहास-भूगोल आ संस्कृतिक ज्ञान प्राप्त करथु, तखने हुनकर साहित्य फराक भऽ सकतन्हि। ऐ लिंकसँ राधाकृष्ण चौधरीक “मिथिलाक इतिहास” आ जगदीश प्रसाद मण्डलक “गामक जिनगी” पढ़ू https://sites.google.com/a/videha.com/videha-pothi/  आ मैथिली शब्दावली लेल  ई लिंक देखू http://videha.co.in/new_page_13.htm बेरमाक ठाकुरजी सन लोकक विचार हमरा लेल बेशी महत्व राखैए,बनिस्पत गोलैसी केनिहार साहित्यकारक/ समीक्षकक जिनकर आयातित शब्दावलीबला साहित्य कोना मैथिली पाठक घटेलकै; आ खाँटी शब्दावली कोना मैथिली साहित्यक स्तर ऊँच केलकै, आ पाठक बढ़ेलकै, ई आब ककरोसँ नुकाएल नै अछि। उपन्यास लेल दू-दू बेर बूकर पुरस्कार आ साहित्यक लेल नोबल पुरस्कारसँ सम्मानित जॉन मैक्सवेल कुट्सी भाषाक सन्दर्भमे कहने रहथि जे अफ्रीकान्स आ अंग्रेजी भाषाक द्विभाषिया माहौलमे हुनकर अंग्रेजी लेखन हुनका लेल बहुत रास संप्रेषण सम्बन्धी समस्या सोझाँ अनैत छल। ओ अफ्रीकान्ससँ अंग्रेजीमे तकर प्रतिकार स्वरूप ढेर रास अनुवाद केलन्हि। मुदा मैथिलीक साहित्य अकादेमी पुरस्कार विजेता (आ किछु ऐ पुरस्कार लेल ललाइत आकांक्षी लोकनि), जे तथाकथित साहित्यकार लोकनि छथि, से जइ प्रकारेँ मैथिली आ हिन्दी दुनूक डोरी पकड़ि माहौल खराप करबामे लागल छथि, से जॉन मैक्सवेल कुट्सीसँ किछु शिक्षा ग्रहण करताह, से मात्र आशा कऽ सकै छी। अमेरिकामे ३५० शब्दक अंग्रेजीक "हाइ प्रेक्वेन्सी" आ ३५०० "बेसिक वर्ड लिस्ट" हाइ स्कूलक छात्र लेल छै जे क्रमशः कॉलेज आ ग्रेजुएट स्कूल (ओतए पोस्ट ग्रेजुएटकेँ ग्रेजुएट स्कूल कहल जाइ छै) धरि पहुँचलापर दुगुना (गएर भाषा फेकल्टीक छात्र लेल) भऽ जाइ छै। साहित्यक विद्यार्थी/ साहित्यकार लेल ऐ सँ दस गुणा अपेक्षित होइत अछि। हिन्दीमे -अपवाद स्वरूप आंचलिक पोथी छोड़ि- हिन्दीक कवि आ उपन्यासकार अठमा वर्गक २००० शब्दक शब्दावलीसँ साहित्य (पद्य, उपन्यास) रचै छथि आ मैथिलीक किछु साहित्यकार ऐ बेसिक २००० शब्दक वर्ड लिस्टकेँ मैथिलीमे आयात करए चाहै छथि, आ ओतबे धरि सीमित रहए चाहै छथि, जखन जापानी अल्फाबेटक चेन्ह ५०० धरि पहुँचि जाइ छै। ( विदेह ई पत्रिकाकेँ ५ जुलाइ २००४ सँ अखन धरि ११६ देशक १,९३५ ठामसँ ६७,४५९ गोटे द्वारा विभिन्न आइ.एस.पी. सँ ३,२२,३७७ बेर देखल गेल अछि; धन्यवाद पाठकगण। - गूगल एनेलेटिक्स डेटा। ) गजेन्द्र ठाकुर ggajendra@videha.com http://www.maithililekhaksangh.com/2010/07/blog-post_3709.html २. गद्य २.१.जगदीश प्रसाद मण्‍डल-एकटा दीर्घकथा आ एकटा एकांकी २.२.- अतुलेश्वर- किछु विचार टिप्पणी २.३.१.नन्‍दवि‍लास राय-कथा-बाबाधाम २.बिपिन झा-जन्मदिनक बदलैत स्वरूप २.४.   जवाहर लाल कश्यप-एक टा विहनि कथा २.५.राजेशकुमार कर्ण- चिरबिर–चिरबिर करैत उडि रहल चिडै २.६.विनीत उत्पल-१.कथा- बेसिक इंस्टिंक्ट (दोसर आ अंतिम भाग) २.आजुक कालमे बाबा २.७.नवेंदु कुमार झा-१.भाजपाक रथ पर सवार भऽ दिल्लीक गद्दी पर पहूचताह नीतीश? २.लाल कृष्ण आडवाणीक महगी भ्रष्टाचारक विरूद्ध प्रस्तावित रथयात्रा ३.बिहारक विकासक लेल प्रदेश मे नव नव उद्योग २.८.किशन कारीगर-मुन्नी बदनाम भेलैए किएक ?-एकटा हास्य कथा। जगदीश प्रसाद मण्‍डल  जन्‍म- ५.७.१९४७- पिताक नामः स्व. दल्‍लू मण्‍डल, माताक नामः स्व. मकोबती देवी, मातृक-  मनसारा, घनश्‍यामपुर, जिला- दरभंगा। गाम-बेरमा, भाया- तमुरिया, जिला-मधुबनी, (बि‍हार) ८४७४१० Email- jpmandal.berma@gmail.com मो. ०९९३१६५४७४२ प्रकाशि‍त कृति‍- १ गामक जिनगी (कथा संग्रह), २ मिथिलाक बेटी (नाटक), ३ तरेगन (बाल प्रेरक लघुकथा संग्रह), ४ मौलाइल गाछक फूल (उपन्‍यास), ५ जिनगीक जीत (उपन्यास), ६ उत्थान-पतन (उपन्यास), ७ जीवनमरण (उपन्यास), ८ जीवन संघर्ष (उपन्यास)। ई-प्रकाशि‍त कृति‍- १ त्रि‍फला (एकांकी संग्रह), २ इन्‍द्रधनुषी अकास (कवि‍ता संग्रह), ३ मइटुग्‍गर (दीर्धकथा संग्रह), ४ कम्‍प्रोमाइज (नाटक), ५ झमेलि‍या वि‍याह (नाटक), ६ ‘अर्द्धांगि‍नी....सरोजनी....सुभद्रा....भाइक सि‍नेह इत्‍यादि‍’’ कथा संग्रह। सभ पोथी फ्री डॉनलोड हेतु उपलब्‍ध- https://sites.google.com/a/videha.com/videha-pothi/ एकटा दीर्घकथा आ एकटा एकांकी १ दीर्घकथा शंभूदास जि‍नगीक ओइ सीमापर शंभूदास पहुँच गेल छथि‍ जतए पैछला जि‍नगीक बहुतो वि‍चार आ काज स्‍वत: छुटि‍ गेलनि‍। कि‍छु नव जे मनमे उपकि‍ रहल छन्‍हि‍ ओ करैले जइ शक्‍ति‍ आ सामर्थक जते जरूरत छन्‍हि‍ ओ तकनहुँ नै भेट रहल छन्‍हि‍। जना आगि‍क चि‍नगोरा रसे-रसे पझा-पझा या तँ मैल जकाँ उपर छाड़ने जा रहल छन्‍हि‍ या झड़ि‍-झड़ि‍ खसि‍ रहल छन्हि‍। डंटीसँ टूटल पोखरि‍क कमल सदृश्‍य हवाक सि‍हकी वा पानि‍क कम्‍पन्नसँ दहलि‍ रहल छन्‍हि‍। जे कहि‍यो कामधेनु, फूल-फड़सँ लदल वृक्ष सदृश्‍य छलनि‍ वएह आइ ठाँठ वा पत्रहीन ठूठ बुझि‍ पड़ि‍ रहल छन्‍हि‍। जे कहि‍यो राजभोगक बीच दिन बि‍तबैत छलाह आइ अन्न-वस्‍त्र वि‍हीन भीखक घाटपर बैस अपन जि‍नगीक हि‍साब-वारी जोड़ि‍ रहल छथि‍। मन कहैत छन्‍हि‍ जे सभ दि‍न तँ गुनगुनाइत रहलौं- जे बच्‍चा कनैत ऐ धरतीपर अबैत अछि‍ आ हँसैत जाइक चाहि‍ऐ, मुदा से कहाँ......? जे आत्‍मा बि‍नु वि‍वेकक जि‍नगी टपि‍ वि‍वेकवान लग पहुँचल ओ आगू नै बढ़ि‍ पाछू दि‍स कि‍अए ढड़कि‍ रहल अछि‍। सोन-सन उज्‍जर धप-धप दाढ़ी-मोछक संग माथसँ पएरक अंगुरि‍क धरि‍क केश, आमील सन सुखाएल गालक संग अगि‍ला भाग, सामर्थ हीन हाथ-पएरक मुदा आँखि‍क ज्‍योति‍ भोरक ध्रुवतारा जकाँ ललौन मन उफनि‍ उठलनि‍ जे देवस्‍थान जकाँ ति‍रपेखनि‍ ऐ दुनि‍याँक करब। जहि‍ना बाध-वोनक ओहन परती जइपर कहि‍यो हर-कोदारि‍ नै चलल सुखि‍-सुखि‍ गाि‍छ-वि‍रि‍छ खसि‍ उसर भऽ जाइत, ओइ परतीपर या तँ चि‍ड़ै-चुनमुनीक माध्‍यमसँ वा हवा-पानि‍क माध्‍यमसँ अनेरूआ फूल-फड़क गाछ जनमि‍ रौद-वसात, पानि‍-पाथर, अन्‍हर-वि‍हाड़ि‍ सहि‍ अपन जुआनी पाबि‍ छाती खोलि‍ बाट-बटोहीकेँ अपन मीठ सुआदसँ तृप्‍ति‍ करैत तहि‍ना जमुना नदीक तटपर शंभूदासक जन्‍म बटाइ-कि‍सान परि‍वारमे भेलनि‍। रवि‍ दि‍न रहने समाजक दाय-माय शुभ दि‍न मानि‍ शंभू नाओं रखलकनि‍। परदेशि‍या जकाँ तँ नै जे जन्‍मसँ पहि‍नहि‍ माए-बाप नामकरण कऽ लैत। छठम दि‍नसँ पूर्वक सभ कष्‍ट वि‍सरि‍ शंभूदासक माए सुखनी अपन सुखैक नि‍आसा छोड़ि‍ अपन देवस्‍थानक देवता पूजनमे हराएल। अपन मर्यादा गसि‍ कऽ पकड़ि‍ शंभूक सेवामे जुटि‍ गेलीह। परि‍वारक बोझक तर पि‍ता, तँए बि‍लगा कऽ कि‍छु नै सोचथि‍। पाँच वर्ख पूर्व धरि‍ संतोखीदास अपने बोनि‍हार सभ जकाँ दुनू परानी संतोखी आ सुखनी, खेति‍हर बोनि‍हार छलाह। खेति‍यो तँ मौसमेक हाथक खेलौना। बेठेकान। मुदा तैयो तँ सभ बुझैत जे जाड़, गरमी आ बरसात, सालक तीन अवस्‍था छी। भलहि‍ं गोटे साल शीतलहरी पाबि‍ जाड़ अपन वि‍काराल रूप देखबैत तँ रौदी पाबि‍ गरमी। बरखा पाबि‍ बसात बाढ़ि‍क संग नंगटे नचैत तँ झाँट पाबि‍ ताण्‍डव करैत। बजारवादक हवा सि‍हकल। ओना तँ वि‍हाड़ि‍क रूप हवा उठल मुदा पहाड़, बोनक टाट अँटकौलक। गति‍केँ कम केलक मुदा तैयो बहि‍ते रहल। जाड़-रौदीक मारल कि‍सानो अा बोनि‍हारो गाम (खेती-पथारी) छोड़ि‍ बजार दि‍स वि‍दा भेल। जहि‍ना घर बनबैमे पातरसँ मोट खूँटाक जरूरत होइत तहि‍ना करखाना चलबैक लेल मजदूरसँ लऽ कऽ संचालक धरि‍क आवश्यकता भेल। उजड़ल-उपटल गामक रूखि‍मे बदलाव अबए लगल। खेतमे काज केनि‍हार बोनि‍हारकेँ करखन्नाक नव मजदूरी भेटए लगल। जइसँ जि‍नगीमे हरि‍यरी अबए लगलै। मुदा हवाक गति‍ धीरे-धीरे तेज हुअए लगल। सस्‍त मजदूर पाबि‍ रंग-वि‍रंगक कारोवार शहरमे जन्‍म लि‍अए लगल। जइसँ श्रमि‍कक मांग बढ़ल। टूटैत गामक जि‍नगीसँ तंग भऽ वेवस श्रमि‍क जेर बना-बना बजारक बाट पकड़लक। श्रमक वि‍करीक कारोवार जोर पकड़लक। खुल्‍लम-खुल्‍ला वि‍करी बट्टा हुअए लगल। गामक श्रमि‍कक पड़ाइनसँ गामो हलचलाएल। खेतबलाकेँ करखन्ना पहुँचने खेतीमे ठहराव आएल। श्रमि‍कक अभावमे खेती ठमकल। समाजक वि‍चारधारामे बदलाव आएल। एक वि‍चारधारा -जे अखनो धरि‍ सम्‍पति‍केँ प्रति‍ष्‍ठा बुझैत- जे पहि‍लुकके खेतीकेँ थोड़-थाड़ अन्न-पानि‍ खुआ-पि‍आ जीवि‍त रखलनि‍ तँ दोसर वि‍चारधारा (शहरी कारोवार देख) खेत-पथार माने ग्रामीण सम्‍पत्ति‍केँ पूँजी बुझि‍ आमद-खर्चक ि‍हसाब जोड़ि‍ वि‍चारमे बदलाव अनलनि‍। संग-संग बटाइ खेतीक बीच नव-समस्‍या सेहो उठल। जइठाम एखन धरि‍ गामक जमीनदार खेतक उपजे बेर-टामे खेतक दर्शन करैत, ओ गामसँ बाहर भेने सालक-साल खेतक दर्शनसँ वि‍मुख भेला। संग-संग गाममे श्रम-शक्‍ति‍क अभाव भेल। बटेदारक वर्गक वृद्धि‍ भेल। खेतक बटाइ प्रथामे बदलाव आएल। जइसँ आमक कन (फड़क ि‍हसावसँ) उपजाक मनखप आ पोसि‍या माल-जालमे बदलाव आएल। कोनो धरानी संतोखीदास एकटा बड़द बनौलक। दू परानीक हाथ-पएर आ एकटा बड़द पाबि‍ संतोखीदास बटेदार कि‍सानक रूपमे ठाढ़ भेल। पेट भरने परि‍वारमे खुशीक बाढ़ि‍ तँ नै मुदा पटवी पानि‍क खुशी जरूर आबि‍ गेल। बीघा भरि‍क खेति‍हर संतोखीदास बनि‍ गेल। नव आर्थिक वि‍कास भेने परि‍वारक बच्‍चो सभमे मौलाहट कमल। जइसँ बच्‍चाक मृत्‍युक संख्‍यामे कमी आएल। ओना एखनो धरि‍ श्रमि‍क‍ परि‍वारमे बेट-बेटीमे अन्‍तर नै बुझल जाइत कि‍एक तँ भगवानक अगम लीलाक बीच हस्‍तक्षेप नै करए चाहैत मुदा बजारक बि‍खाएल वयार तँ बहि‍ये रहल अछि‍। शंभूक तीन बर्ख पुरि‍ते, जहि‍ना शीतलहरीमे पौ फटि‍ते सुरूजक रोशनीक आशा जगैत, बदरीहन समए बादलकेँ छि‍ड़ि‍आइते घरसँ बहराइक आशा जगैत तहि‍ना संतोखि‍यो दास आ सुखनि‍योकेँ भेल। जि‍नगी भरि‍क लेल मनखप खेत भेटने कि‍अए नै दुनू परानीक मनमे आशा आओत। तहूमे बाढ़ि‍-रौदीक सालक कोनो देनदरि‍ये नै, रहल सुभ्‍यस्‍त समैक देनदारी। ओहो देनदारी कि‍ अन्‍तैसँ कमा कऽ आनए पड़त। धरती माता कामधेनु। जते करब तते पाएब। जखन मन हएत, तखन खाएब। दि‍न-राति‍ ओंघराइत रहब। एखन धरि‍ सुखनी शंभूक पाछू आंगनसँ नै नि‍कलि‍ पबैत छलीह मुदा आब तँ शंभू तीन सालक भऽ गेल। अगहन मासमे खेतक आड़ि‍पर धानक खाेंचड़ि‍क घर बना देब ओइमे खेलेबो करत आंेघी लगतै तँ सुतबो करत। गरमी मासमे गाछक छाहरि‍मे रहत। लऽ दऽ कऽ बरसात रहल। तँ बरखो कि‍ लोककेँ बि‍ना चेतौने अबैए। अबैसँ पहि‍ने राजा-रजवाड़ जकाँ समाद पठा दैत अछि‍। तहूमे बरखा केहन रूपमे आओत सेहो तँ कहि‍ये दैत अछि‍। जेठुआ बरखामे जे दुइयो बेर देह धुआ जेतै तँ सालो भरि‍ धुआएले रहतै। बच्‍चा कि‍ कोनो सि‍यान सैतान होइए जे भरि‍ दि‍न डौं-डौं करत। ओकरा तँ अन्न-पानि‍ भेट जाए, भरि‍ दि‍न बौआइत रहत। जहि‍ना नव दाँत जनमने मसुहरि‍ कि‍छु करैले सबसबाइत अछि‍ तहि‍ना बच्‍चो मन। जेठक दसहारा। बृहस्‍पति‍ दि‍न। गि‍रहस्‍तीक पतराएल काज। अटूट फड़ल आम-जामुनक गाछ। गामक-गाम लोकक मन गदगद। कि‍अए ने रहत। दू मास जे अमृत फल भेटत। बाधक चौबगली गाम अष्‍टयाम कीर्तनक मंत्रसँ अकास गनगनाइत। कि‍म्‍हरो “सीताराम, सीताराम सीताराम जय सीताराम” तँ कि‍म्‍हरो “काली, दुर्गे राधे श्‍याम, गौरी शंकर सीताराम।” कि‍म्‍हरो “हरे राम, हरे राम...।” तँ कि‍म्‍हरो “हरे कृष्‍ण हरे कृष्‍ण।” दसहारा रहने ब्रह्मस्‍थानमे घोड़ा चढ़ौल सजाओल जाएत। ऐबेर तँ जहि‍ना ब्रह्मबाबा खुशी छथि‍न तहि‍ना लोकोक मन। आन साल जकाँ कि‍ ऐबेर हल्‍लुक दामा टंगसुखा घोड़ा लोक चढ़ौत पहि‍ने सए-पचास बेना दऽ दऽ सरैसो घोड़ासँ नि‍म्‍मन-नि‍म्‍मन चढ़ौत। दूध-पीठ खाइत-खाइत ब्रह्मोबाबाक मन अकछा गेल छन्‍हि‍ तँए ऐबेर सेरही, पनसेरही, दससेरही, अधमनीक संग मनही मुंगबा सेहो परदेसि‍या सभ चढ़ौत। दि‍नक एगारह बजैत। माटि‍-पानि‍ तबने हबो तबि‍ गेल। खेतक जे खढ़ अछि‍ ओ रोहणि‍ मि‍रगि‍सरामे नै सूखत तँ सालो भरि‍ ओकर ओधि‍ थोड़े सुखत। तँए संतोखीदास मरूआ खेत जोतए आ सुखनी खढ़ बि‍छए गेल। मुदा छोट बच्‍चा शंभूकेँ असकरे आँगनमे केना छोड़ि‍ दि‍तथि‍। शंभू लेल बाटीमे भात आ भरि‍ डोल पानि‍ नेने खेत गेली। अपनो सभकेँ पि‍यास लगत तँ पीबैक खि‍यालसँ। खेतसँ कट्ठा दुऐक हटि‍ आड़ि‍पर एकटा बज्‍जर केराइक अनेरूआ गाछ। जकरा नि‍च्‍चामे सघन छाहरि‍ तँ नै मुदा छाहरि‍। जतए शंभूकेँ खेलाइले छोड़ि‍ अपने दुनू परानी संतोखीदास खेतमे काज करैत। काज लगि‍चाएल देख, खाली हड़मड़ी चौकी देब बाकी, हर खोलि‍ चौकी ठेक संतोखीदास पत्नीकेँ कहलखि‍न- “रौदमे मन तबैध गेल हएत, कनीखान छाहरि‍मे जीरा लइले चलू।” सुखनी- “सएह कहए चाहै छलौं मुदा काज लगि‍चाएल देख नै कहै छलौं। जे काज ससरि‍ जाइ छै ओते तँ जाने हल्लुक होइ छै कि‍ने।” “हँ से तँ होइ छै। मुदा काजो कि‍......?” “से की?” गैंचि‍याह नजरि‍ पत्नीपर दैत संतोखीदास मुस्‍की दैत कहए लगलखि‍न- “जहि‍ना भाँग-गांजा अपन सेवककेँ बौरा दैत, बेशि‍या इश्कबाजकेँ, तहि‍ना ने काजो अपन कर्ताकेँ बाबला बना जान लइपर तुलल रहैत।” “नै बुझलौं?” “देखै नै छि‍ऐ, दोकान सभमे लि‍ख कऽ टांगल रहैए जे, काज करैत चलू फलक आशा नै करू।' जखन मनुख छी रोड-सड़ककेँ नाि‍प मीलक पाथर गारल रहैए तखन कतऽ कोन रास्‍ता चलक चाही से तँ सोचए पड़ैत कि‍ने। आकि‍ रस्‍ते भुति‍या जाय। जे बाट नै देखल रहै छै ओही बाटमे ने लोक भुति‍आइए। खाइर, छोड़ू ऐ सभकेँ चलू कनी ठंढ़ाइयो लेब दू घोंट पानि‍यो पीब लेब आ तमाकुलो खा लेब।” दुनू परानी बज्‍जर केराइ गाछसँ फड़ि‍क्के देखलनि‍ जे शंभू पूवारि‍ पारक अष्‍टयामक मंत्र- “हरे कृष्‍णा, हरे कृष्‍णा, कृष्‍णा-कृष्‍णा हरे-हरे” एक ताले छठि‍क ढोल जकाँ थोपड़ी बजबैत गबैत रहए। बेटापर नजरि‍ पड़ि‍ते सुखनी अध खि‍लू फूल जकाँ वि‍हुँसैत पति‍केँ कहलनि‍- “देखि‍यौ ऐ छौंड़ाकेँ। आन धि‍या-पूता रहैत तँ माए-माए करैत। केहेन मगन भेल अछि‍।” पति‍- “रौदमे तबैध तँ ने गेल अछि‍?” “तबधल बच्‍चा थोपड़ी बजा गाओत आकि‍ अँहोछि‍या काटत।” “हँ से तँ ठीके।” जहि‍ना तत्‍व चि‍न्‍तक आत्‍माक तार जोड़ि‍ ब्रह्म तत्‍वक अन्‍वेषण करैत तहि‍ना शंभू कृष्‍ण मंत्रसँ अपन मनक तार जोड़ि‍ अष्‍टयामक धुनमे बेसुधि‍ भेल मीरा जकाँ गाबि‍ रहल अछि‍। जहि‍ना एक्के फुलबाड़ी वा गाछीमे भि‍न्न-भि‍न्न रंगक फूल वा फल ताधरि‍ अपन परि‍चयसँ हराएल रहैत जाधरि‍ बच्‍चा सदृश्‍य पालल-पोसल जाइत, मुदा जखन अपन गुण वा रूप देखबै जोकर भऽ जाइत तखन एकठाम रहि‍तो बेड़ाए लगैत तहि‍ना छह बर्ख अबैत-अबैत शंभूओ बेड़ाए लगल। परि‍वारमे अनेको रंगक वस्‍तु-जात रहि‍तो ओतबे सि‍नेह रखैत जते काजक वस्‍तु बुझैत। जइ वस्‍तुक प्रयोजन आन-आन रूपकेँ आन-आन काजमे होइत तइसँ भि‍न्न ओइ वस्‍तुक उपयोग अपन काज देख करए लगल। अपना खेत-पथार नै रहि‍तो संतोखीदासक परि‍वार गामक कि‍सान परि‍वारक खाड़ीमे आबि‍ चुकल छल। जहि‍ना कि‍सान परि‍वारमे वाइस-बेरहट कऽ कऽ खाइत अछि‍ तहि‍ना संतोखि‍यो दासक परि‍वारमे चलए लगलनि‍। ओना ई गति‍ लगातार नै चलि‍ पबैत, कि‍एक तँ कि‍सान परि‍वार, डेंगी नाह जकाँ सदति‍ उपर-नि‍च्‍चा होइत रहैत। जइ साल खरचट्टा वा दहार समए भेल तइ साल सभ धुआ-पोछा गेल। मुदा जइ साल सुभि‍तगर समए भेल तइ साल पुन: नव-पुरानक चालि‍ पकड़ि‍ लैत। नवे-पुरानक चालि‍ ने रसगरो आ सुअदगरो होइए, अगि‍ला-पछि‍ला बाट देख चलबे ने दि‍शा दैत। जेना एक्के आमक चटनी टटका नीक होइत तँ अचार बसि‍या। जते-पुरान तते रसगर। मुदा चटनी तँ लगले अरूआ जाइत। तहि‍ना नवका कुरथीक दालि‍ आ पुरान राहड़ि‍क दालि‍। एखन धरि‍ शंभू, परि‍वारकेँ खाली खाइ-पीबै, माता-पि‍ताक संग रहैक टा बुझैत। कि‍एक तँ बाल-बोध बुझि‍, ने माता-पि‍ता कि‍छु करैले अढ़बैत आ ने शंभू परि‍वारक काजकेँ अपन काज बुझैत। सदति‍ धैनसन। सोलहन्नी बेरागी जकाँ। मुदा तँए कि‍ शंभू भरि‍ दि‍न ओछाइनेपर ओंघराएल रहैत सेहो बात नै। जँ कि‍छु नै करैत तँ दि‍न-राति‍ केना कटैत छैक। अखनो धरि‍ गामक िकसान धरतीसँ अकास धरि‍क स्‍मरण साँझ-भोर जरूर करैत अछि‍। भोरमे धरतीक स्‍मरण तँ साँझमे अकास वि‍चरण जरूर करैत अछि‍। आने परि‍वार जकाँ संतोखि‍यो दासक परि‍वार। परि‍वारमे शंभूक कोनो मोजरे नै। मात्र खाइ-पीबै आ सुतै बेर माता-पि‍ता सि‍र चढ़बैत। बाकी समए साँढ़-पारा जकाँ अनेर बौआइत ढहनाइत। तँए कि‍ सींग-नाङरि‍बला पशु जकाँ कि‍ शंभूकेँ थइर-पगहाक जरूरत होइत। 'अनेर गाएकेँ धरम रखवार' होइत। भोरमे जखन संतोखीदास खेत-तमैक वि‍चार करए लगथि‍ तँ नचैत हृदेक घूघड़ूक कम्‍पन्न ठोठक स्‍वर होइत खापड़ि‍क मकइ-जनेरक लावा जकाँ कूदि‍-कूदि‍ नि‍च्‍चा खसैत तहि‍ना संतोखि‍यो दासक मुँहसँ रंग-वि‍रंगक मौसमक संग मौसमी सि‍नेह छि‍ड़ि‍याए लगैत। जकरा बीछ-बीछ शंभू खेलेबो करैत आ तहि‍या-तहि‍या सीनाक डायरीमे लि‍ख-लि‍ख रखबो करैत। हृदयंगम करैत। मुदा बच्‍चाक कचि‍या डायरी रहने कि‍छु लि‍खेबो करैत आ कि‍छु नहि‍यो लि‍खाइत। मुदा प्रति‍ भोर आ साँझक स्‍वर 'सीताराम-सीताराम, राधेश्‍याम-राधेश्‍याम' डायरीक उपरेक पन्नामे लि‍खा गेल। जकरा भरि‍ दि‍न शंभू गो-मुखी रूद्राक्षक माला बना जपैत रहैत। कामधेनु गाए जकाँ सदति‍ दूधक ढारसँ नव-नव राग-रागि‍नी स्‍वत: अबए लगल। कंठक स्‍वर-लहरी हाथकेँ थि‍रकबै लगल। जइसँ कखनो दुनू हाथ मि‍ल ताल मि‍लबैत तँ कखनो पल्‍था मारि‍ बैस  ठेहुनपर ताल मि‍लबए लगल। घर-अंगना एक रहने पि‍ताक संग माइयोक पाछू-पाछू आंगन बाहरैत समए, चुल्हि‍-चि‍नमार नीपैक समए, जाँत-ढेकी चलबैक समए शंभू नचए-गबए लगल। बेटाक बौराइत मन देख माइयो आत्‍म-वि‍भोर भऽ झुमि‍-झुमि‍ शंभूक आँखि‍मे आँखि‍ गारि‍ फड़ैत-फुलाइत फुलबाड़ीमे हरा जाइत। माता-पि‍ताक उसकैत हाथ देख शंभूओक हाथ खाइबला बाटीपर उसकए लगल। खजुरी जकाँ ओकरा बजाएब शुरू केलक। कोना नै करत? कामेसँ राम आ रामेसँ काम ने चलैत अछि‍। मुदा भारी द्रव्‍यक बाटी रहने हाड़-मासुक हाथक ओंगरी कतेखान ठठत। जे बात शंभू तँ नै बुझि‍ सकल मुदा संतोखीदास बुझि‍ गेलखि‍न। सोचलनि‍ जे जँ खजुरी बना दि‍अए तँ चौबीसो घंटा शंभू आनन्‍दमे मगन रहत। बेटाक प्रति‍ पि‍ताक दायि‍त्‍वे कि‍? यएह ने जे हँसी-खुखीसँ दि‍न-राति‍ चलैत रहए। मन मानि‍ गेलनि‍ जे बेटाकेँ खजुरी बना देबै। एकलव्‍य जकाँ साजमे खजुरि‍यो ने अछि‍। ने ओकरा दोसर संगीक जरूरत होइत आ ने कखनो अपनाकेँ असगर बुझैत। जहि‍ना हवामे उड़ैत रोग लोककेँ पकड़ि‍ लैत, लगन अबि‍ते बर-कन्‍याकेँ पकड़ए लगैत, तीर्थ-व्रतक डोरी लगैत तहि‍ना शंभूओकेँ गीत-नादक माने संगीतक रांग पकड़ि‍ लेलक। जइसँ पि‍ताकेँ हर जोतैत, कोदारि‍ पाड़ैत, धान-रोपैत कालक गुनगुनीक संग आंगन बाहरैत, धान कुटैत, जत्ता चलबैत कालक गुनगुनी पकड़ि‍ लेलक। जकरा संग शंभू भरि‍ दि‍न मगन भऽ गारा-जोड़ी केने बुलए-भंगए लगल। मुदा तँए कि‍ शंभू एतबेमे ओझराएल रहल? नै! ने ओकरा गामक आन घर अनभुआर आ ने लोक अनठि‍या बुझि‍ पड़ै। तहूमे एकठाम रहने, जखन माए-बापक संग बाध-बोन दि‍स जाए तँ वएह घर वएह लोक देखए। समाज तँ ओहन सरोबर छी जइमे घोंघा-सि‍तुआसँ लऽ कऽ कमल धरि‍ फुलाइत अछि‍। देवस्‍थानमे साँझ-भोर घड़ी-घंट, शंख बजैत खरि‍हाँनमे धान फटकैत सूपक अवाज अकासमे उड़ैत। काठपर ओंघराइत टेंगारी-कुड़हरि‍ गर्द करैत तँ चुल्हि‍पर चढ़ल बरतनक अदहन झ-झ-काली करैत रहैत। छह बर्खक बेटा शंभू लेल संतोखीदास खजुरीक ओरि‍यान करैक वि‍चार केलनि‍। ओना हाट-बजारमे खजुरी तँ नै बि‍काइत अछि‍ मुदा हरि‍हरक्षेत्र, सि‍हेश्वर, जनकपुर आ देवघरमे तँ बि‍काइते अछि‍। मुदा ओतएसँ आओत कोना? एखन तँ अोम्‍हर मुँहे जाइक नि‍यार नै अछि‍। ओना गामोमे बरही लकड़ीक कठरा बनबैए। सरि‍सोबा सनगोहि‍ मारि‍ मघैया खेबो करैए आ ओकर छाल बेचबो करैए। अगर जँ कठरा बनबा, सनगोहि‍क छाल कीन लेब तँ तेबखाक बेसनसँ अपनो छाड़ि‍ लेब। हम सभ कि‍ कोनो शहर-बजारक लोक छी जे बेटा-बेटीकेँ पेस्‍तौल बम-बारूद-छुड़छुडी-फटाका- खेलाइले देबै। जँ खेत-खरि‍हाँन दि‍सक मन देखि‍ति‍ऐ तँ खि‍एलहा हँसुआ-खुरपी खेलाइले दैति‍ऐ जँ से नै देखै छि‍ऐ तँ एकरा खजुरि‍येक ओरि‍यान कऽ देबै। सएह केलनि‍। जहि‍ना हाथमे औजार ऐने श्रमि‍क बड़का-बड़का इंजीन बना चलबैत तहि‍ना हाथमे खजुरी ऐने शंभूओ परि‍वारक संग समाजक कीर्तन, भजन, यज्ञ इत्‍यादि‍मे शामि‍ल हुअए लगल। छह बर्ख बीतैत-बीतैत शंभूक हाथ खजुरीपर बैस गेल। जइसँ असकरे आंगनक ओसारपर बैस जाधरि‍ हाथक आंगुर नै दुखाए लगै ताधरि‍ एकताले सीता-राम सीता-राम, राधेश्‍याम, राधेश्‍याम खजुरि‍क अवाजक संग अपन कंठक अवाज मि‍ला उन्‍मत्त भऽ गबैत-रहैत। भगवानोक लीला अजीव छन्‍हि‍। एक्के मनुख वा पशु-पक्षीक गोटे बच्‍चाकेँ उम्रसँ बेसि‍ऐ बना दैत छथि‍न आ कोनोकेँ कम बना दैत छथि‍न। कि‍यो पाँचे बर्खमे पनरह बर्खक बुद्धि‍-ज्ञान अरजि‍ लैत अछि‍ तँ कि‍यो पनरहो बर्खमे पाँचो बर्खसँ नि‍च्‍चे रहैत अछि‍। जना शंभुओकेँ भेल। छबे बर्खमे पनरह बर्खक बच्‍चाक कान काटए लगल। तहूँमे तेहन समाजक स्‍कूल अछि‍ जे जते मि‍हनत करए चाहब ओते फलो भेटबे करत। सदि‍काल कतौ ने कतौ कोनो ने कोनो उत्‍सव समाजमे होइते रहैत अछि‍। देवस्‍थानसँ परि‍वार धरि‍, कतौ अष्‍टयाम-कीर्तन, तँ कतौ बच्‍चाक मूड़न, कतौ सत्‍यनारायण भगवानक पूजा तँ कतौ ि‍वयाह-दुरागमन। शुभ काज तँए शुभ वातावरण बनबैक लेल शुभ-शुभ क्रि‍या-कलाप। शुभ क्रि‍या-कलापक लेल कतौ ढोलक-झालि‍ हारमोनि‍यमक संग रामधुन चलैत तँ कतौ ढोल-पीपहीक संग गीत-नाद। ततबे नै संग-संग परि‍वारक उत्‍सवमे समबेत स्‍वर माए-वहीनि‍क गीत-नाद सेहो चलबे करैत अछि‍। जहि‍ना पाँच बर्खक बच्‍चा  स्‍कूलमे नाअों लि‍खा दोसर-तेसर बच्‍चा संग पढ़ैत तहि‍ना शंभूओ समाजमे कतौ ढोलक-झालि‍ वा ढोल-पीपहीक अवाज सुनि‍ते ठोकले ओइ जगहपर पहुँच, बेद पाठी जकाँ आँखि‍-कान समेट ताधरि‍ देखैत-सुनैत रहैत जाधरि‍ वि‍श्राम करैले बन्न नै होइत। शंभूक क्रि‍या-कलापसँ दुनू परानी संतोखीदास सेहो नि‍चेन भऽ अपन काज करैत रहैत। काजमे मस्‍त रहैत। कि‍एक तँ दुनू परानी बुझि‍ गेलाह जे जतए ढोल-पीपही बजैत हएत शंभू ओतए जरूर हएत। तँए जखन खेत-पथारसँ काज कए घुमैत तँ ठोकले ओइ स्‍थानपर पहुँच शंभूकेँ ताकि‍ अनैत। समाजो तँ ओहन बाट बना चलैत जइसँ हँसैत-खि‍लैत जि‍नगी बि‍नु थकनहि‍ सदैत चलैत रहैत। कोना नै चलत? धार ककर आशा-बाटक प्रति‍क्षा करैत। जहि‍ना अपना गति‍ये दि‍न-राति‍ चलैत रहैत तहि‍ना ने समाजो अपना गति‍ये सदैत चलैत रहैत। नवम् वर्ख चढ़ैत-चढ़ैत शंभूआ शंभू बनि‍ गेल। कारण भेल जे आन-आन बच्‍चासँ भि‍न्न काजक प्रति‍ झुकाव हुअए लगलै। जहि‍ना जीवनी (जीवनक पारखी) बोन-झाड़ वा गाछी-वि‍रछीमे, बरसातक उपरान्‍त आसीन-काति‍कमे नव-नव गाछकेँ माटि‍सँ उपर होइते डारि‍-पातसँ परेख लैत जे ई फल्‍लां  वस्‍तुक गाछ छी मुदा अनाड़ी नै परेख पबैत तहि‍ना समाजोक पारखी शंभूकेँ परखए लगल। छोट बच्‍चा जहि‍ना लत्ती-फत्तीमे फड़ल हरि‍यर चारि‍ पएरबलाकेँ, जेकर मुँह घोड़ा सदृश्‍य नमगर होइत ओकरा घोड़ा मानि‍ पकड़ि‍ अपन खेलक एक भाग, सर्कश जकाँ, बना खेलैत तहि‍ना कीर्तन मंडलीक बीच शंभूओ एक अंग बनि‍ गेल। ओना अदौसँ लोक ि‍कछु समटल कि‍छु बि‍नु समटल, जे लोकक बोन-झाड़मे हराएल रहल, केँ चि‍न्‍हैत आबि‍ रहल अछि‍। जँ से नै रहैत तँ कि‍छु बनैया कि‍अए शि‍कारक पात्र बनैत। मनुष्‍यक लगाओल खेती-बाड़ी वा माल-जालकेँ जँ बोनैया नष्‍ट करए चाहत तँ कि‍अए लगौनि‍हार अपना सोझमे अपन श्रमकेँ नष्‍ट होइत देखत। एहनो-एहनो पारखी लगमे रहनि‍हार अपन (मनुष्‍यक) बच्‍चाकेँ नै परेख पबैत। कोना परखत? मनुष्‍य तँ गाछ-वि‍रीछ नै जे डारि‍क रंग-रूप आ पातक सि‍रखारसँ परेख लेत, मुदा मनुष्‍य तँ जीवक श्रेणी (जि‍नगीक पाँति‍) मे रहि‍तो आनसँ अधि‍क नमगर-चौड़गर, फूल-फलसँ लदल दुनि‍याँबला छी। जे बाहर नै भीतर छि‍पा कऽ रखने रहैत अछि‍। रखने अछि‍ कि‍ राखल छैक ओ भि‍न्न बात। जे शंभू अखन धरि‍ मनुक्‍खक मेलाक बच्‍चाक जेरमे नुकाएल छल ओ नमैर धान-गहूमक गाछ जकाँ बेदरंग हुअए लगल। मुदा रंग-रूप अधि‍क गाढ़ नै भेने ने अपने देखए आ ने आनेक नजरि‍क सोझ पड़ए। भलहि‍ं उम्‍मस भरल भादोमे पूरवा-पछि‍याक लपकी नै बुझि‍ पड़ै मुदा ओहन लपकी तँ माघमे जरूर अपन रूपक दर्शन करवि‍तहि‍ अछि‍। तहि‍ना शंभूओक भेल। एक आँखि‍सँ दोसर आँखि‍, एक कानसँ दोसर कान बीआ-बान हुअए लगल। मुदा बीआ तँ बीआ छी, कोनो फले बीआ, तँ कोनो ऑठि‍ये। कोनो पाते बीआ तँ कोनो डारि‍ये। तहि‍ना जते मन तते खेत। जते खेत तते रंगक गाछ। जते गाछ तते रंगक फल-फूलक आश। मुदा मनुक्‍खक बीआ तँ सभसँ बेढ़ंग (अजीब) अछि‍। जेहन-जते खेत तेहन तते रंगक बीआ खसि‍ तते रंगक गाछ संगे जनमैत। गाछ देख‍ कि‍यो बजैत, “शंभूक सि‍नेह संगीतसँ तते भेल जाइए जे कहीं घर-परि‍वार छोड़ि‍ ओकरे संगे ने चलि‍ जाए।” तँ कि‍यो बजैत, “भगवान अपने बेटा जकाँ लुरि‍-वुद्धि‍ देने जाइ छथि‍न एक-ने-एक दि‍न लगमे बजाइए लेथि‍न।” ज्ञान स्‍वरूप देवत्‍व प्राप्‍त करैक लेल प्रेमास्‍पदक बाट धड़ए पड़ैत। जे बि‍नु बुझनहि‍ शंभूमे अबए लगल। जहि‍ना एक माटि‍ एक पानि‍ जगह पाबि‍ अपन भि‍न्न-भि‍न्न रूप बना भि‍न्न-भि‍न्न गुण पसारैत तहि‍ना तँ समाजो अछि‍। माटि‍क आँड़ि‍ बनि‍-बनि‍ बाध बँटल अछि‍, घेरा पाबि‍-पाबि‍ पानि‍ बँटल अछि‍ तहि‍ना ने समाजो अछि‍। समाजोक तँ भि‍न्न-भि‍न्न रूप आ भि‍न्न-भि‍न्न अर्थ अछि‍। कतौ गामक सीमान मानि‍ समाज मानल जाइत अछि‍ तँ कतौ जाति‍। कतौ कर्मक हि‍साबसँ समाज बनैत अछि‍ तँ कतौ व्‍यवसायि‍क। कीर्तन मंडलीक समाज ओहन अछि‍ जइमे घर-परि‍वार सम्‍हारि‍ लोक (मंडलीक) भगवानोक दरवार पहुँच अपन नीक-अधला (उचि‍ति‍-वि‍नती) बात सेहो कहैत अछि‍। तइले ने संगी-साथीक जरूरत आ साज-बाजक। थोपड़ी बजा वा चुटकी बजा वा बि‍नु बजेनहुँ मुँह खोलि‍ वा बिनु मुँहो खोलने जतबे समए पबैत ओतबेमे राधा जकाँ कृष्‍णक संग रमि‍ जाइत। नवम् वर्ख खटि‍आइत-खटि‍आइत शंभू गामक कीर्तन मंडलीक सदस्‍य बनि‍ गेल। तइले ने नाओं लि‍खबैक जरूरत भेल आ ने कोनो रजि‍ष्‍टरक। मनक डायरीमे वि‍चारक कलम चलि‍ गेल। मुदा दुनूकेँ (शंभूओ आ मंडलि‍योक) आगू चलैक बाटो आ संगि‍यो भेटल। संगी पाबि‍ जहि‍ना शंभूकेँ, घरक छप्‍परसँ खसैत धरि‍आएल पानि‍ आगू बढ़ि‍ धारमे पहुँच जाइत तहि‍ना भेल। मंडलि‍योक फूलवारीमे एकटा नव फूलक गाछ पोनगल। जहि‍ना नमहर थैरमे नव गाए-महीसि‍केँ जाइति‍क समाज भेटलासँ अपन खुशहाल जि‍नगीक खुशी होइत तहिना शंभूओक संबंध रंग-वि‍रंगक कला-प्रेमीसँ भेल। जहि‍ना टाला-कोदारि‍ लऽ बोनि‍हार, रि‍ंच-हथौरी लऽ मि‍स्‍त्री अपन सेवा दइले जाइत तहि‍ना खजुरीक संग शंभूओ मंडलीक बीच सेवा दि‍अए लगल। अठवारे मंगलकेँ महावीरजी स्‍थान आ अठवारे रवि‍ कऽ महादेव स्‍थानमे साँझू पहर कऽ कीर्तन होइत। जइमे कीर्तन मंडलीक समाजक संग भक्‍त प्रेमी सभ सेहो एकत्रि‍त भऽ खाइ-पीबै राति‍ धरि‍ मगन भऽ भजनो-कीर्तन करैत आ सुनि‍नि‍हारो संगीक संग समुद्रमे दहलाइत-उधि‍आइत। मुदा बाल-बोध शंभू ने दि‍नक ठेकान बुझैत आ ने मासक। मंगल कोना घुमि‍-घुमि‍ अबै छै ने से बुझैत आ ने रवि‍। तँए अन्‍हारमे बौआइत शंभू। मुदा जहि‍ना अगि‍ला बाट भेटने शंकाक समाधान भऽ जाइत तहि‍ना शंभूओ मंगल आ रवि‍केँ भजि‍अबए लगल। खोजनि‍हार जहि‍ना घनगर बोनझारमे सँ कोनो जड़ी वा जरूरतक गाछ ताकि‍ कऽ लऽ अबैत तहि‍ना शंभूओ मंगल आ रविकेँ भजि‍औलक। सातो दि‍न आ बारहो मासक गुण-अवगुण भजि‍आ मनमे रोपि‍ लेलक। जइसँ तीसो दि‍न मासक बीचक तीर्थ आ सातो दि‍नक आठो पहरक बोध भऽ गेलइ। राति‍-दि‍नक बीच घरक काज कखन कएल जाए आ बाहरक कखन, ऐ लेल तँ पहरे पहरा करैत अछि‍। वसन्‍ती-बयार तँ गोटि‍-पङराक लेल नै सबहक लेल समान सोहनगर अछि‍ भलहि‍ं कि‍यो कुम्‍मकर्णी नीनक मस्‍ती लि‍अए आकि‍ ब्रहमलोक पहुँच कुम्‍हारक चाक चलबए। जा धरि‍ चाक नै चलत ता धरि‍ नव बर्तन केना गढ़ल हएत? ओहन खेत वा पोखरि‍ जकाँ शंभूक मन दि‍न-राति‍ छि‍छलए लगल जेहन पोखरि‍क कि‍नछरि‍मे ठाढ़ भऽ चौरगर खपटा वा झुटका पानि‍क उपर फेकलासँ उपरे-उपर छि‍छलैत दूर तक जाइत, जहि‍ना अनगर लबल धानक सीसपर होइत मन छि‍छलैत एक आड़ि‍सँ दोसर धरि‍ छि‍छलि‍-छि‍छलि‍ देख-देख खुशी होइत, तहि‍ना। भोरमे नीन टुटि‍ते शंभू ओछाइनेपर दि‍न भरि‍क जि‍नगीक बाट जोहए लगैत। साँझ परैत परैत जहि‍ना कृष्‍ण संगी-साथीक संग आबि‍ माए जशोदाकेँ अपन लकुटि‍ कमरि‍या सुमझा संध्‍या बंधन करए वि‍दा होथि‍ तहि‍ना शंभूओ उगैत सूर्यक संग दुि‍नयाँ देखैक उपक्रम सोचए लगैत। भगवानक नजरि‍ तँ पहि‍ने ओइ पुजेगरीपर ने पड़ैत जे नव-नव फूल-अछतसँ सजल सीकीक नव फुलडालीमे नव गाछक फूल लऽ रहैत। बाकीकेँ तँ गि‍नती कऽ कऽ रखि‍ लेल जाइत। गाछमे सबुरक फलक सि‍रखार, कटहर जकाँ, देख पड़ैत। दि‍न भरि‍ समए बँचल अछि‍ जखने बाध-बोन दि‍स जाएब तँ कोनो ने कोनो भेटबे करत। जँ भेट गेल तँ बड़बढ़ि‍या नै तँ उचि‍ति‍-वि‍नती कऽ अार्त्त भऽ थारीमे रूइक बत्ती लेसि‍ कानि‍-कलपि‍ कहबनि‍। अनकर जँ सुनैत हेथि‍न तँ हमरो सुनताह नै तँ ककरो नै सुनथि‍न। अपना-अपना करमे-भागे लोक जीब लेत। चौदहो भुवन (चौदहो लोक) सदृश्‍य समाजमे चि‍त्र-कुटक घाट जकाँ अनेको घाट। कम वा बेसी सभक मनमे भगवानक प्रति‍ आस्‍था भलहि‍ं आत्‍मा, जीव आ मायाक तात्‍वि‍क रूप नै बुझैत हुअए। से सि‍र्फ पुरखेटा मे नै महि‍लोमे। समर्पित भऽ नि‍यम-नि‍ष्‍ठासँ आठ घंटासँ लऽ कऽ बहत्तरि‍ घंटाक तकक उपवास हँसैत-मुस्‍कुराइत कऽ लैत। एहन पत्नि‍ये कि‍ जे अपन पति‍केँ देवालय जाइसँ रोकती। समाजक भीतर समबेत स्‍वरे अष्‍टयाम, नवाहक संग आनो-आन आ नाचोमे सामाजि‍क सेहो होइत जे मंचपर बैस सामूहि‍क रूपे गबैत। तहि‍ना माइयो-बहीनि‍क बीच छन्‍हि‍। मुड़न हुअए वा उपनयन, कुमार गीत हुअए वा बि‍याह, छठि‍ हुअए वा फगुआ, सामूहि‍क रूपे सभ एकठाम भऽ गबैत छथि‍। नव-नव गायि‍काक सृजनो होइत आ अवसरो भेटैत। कि‍एक तँ दादी बाबीक उदारतासँ कहैत छथि‍न जे आब बूढ़ भेलौं, कफ घेरने रहैए, तँए नवतुि‍रयेकेँ गाबए दहक। सामाजि‍क वातावरणमे श्रद्धा, प्रेमक संग भाइचाराक वेवहारि‍क पक्ष अखनो अछि‍। एकर अर्थ इहो नै जे आपराधि‍क वृत्ति‍ दबल अछि‍। अगुआएल छल, बहुत अगुआएल अछि‍। आँखि‍क सोझमे बहीि‍न-बेटीक संग दुरबेबहार बाड़ी-झाड़ीक वस्‍तु बलजोरी तोड़ि‍ लेब, खेतक फसल क्षति‍ कऽ देव इत्‍यादि‍-इत्‍यादि‍। एक नै अनेक आपरधि‍क वृत्त अपन शक्‍ति‍सँ समाजकेँ दबने अछि‍। मुदा तँए कि‍ जि‍नगीक आश नै छैक, छैक धरमक संग प्रेमसँ छैक। जँ नै छलैक तँ बाड़ी-झाड़ी वा खेत-पथारमे काज-करैत कि‍सान कोना गौओं-घड़ुआ आ बाट चलैत बटोहीकेँ दूटा आम खाइले कि‍अए कहैत छथि‍। एकटा सजमनि‍ अगुआ कऽ दइ छथि‍ जे धि‍या-पूताकेँ तरकारी बना देबै। कहाँ मनमे छन्हि‍ जे दस रूपैया बुड़ि‍ रहल अछि‍। रोपैइये काल दू-दूटा फलक गाछ लगबै छथि‍ जे एकटा परि‍वार लेल, दोसर समाज लेल। जँ परि‍वार-परि‍वारमे एहेन वृत्ति‍ अपनाओल गेल रहैत तँ कि‍ सामाजि‍क संबंधमे औझुके टुटान अबैत। रवि‍-मंगलकेँ देवस्‍थानमे कीर्तन अनि‍वार्य रूपे चलि‍ते छल, जहि‍ना वि‍द्यालयक कार्य-दि‍वस। अनदि‍ना सेहो दरबज्‍जे-दरबज्‍जे होइते रहैत छल। जना सभक जि‍नगी बन्‍हाएल चलैत होइ। भरि‍ दि‍न खेत-पथारसँ माल-जालक पाछू लागल रहैत छला आ साँझ पड़ि‍ते कीर्तन-मंडलीक बीच पहुँच जाइत छला जे खेबा-पीबा राति‍ धरि‍ चलैत छल। खेला-पीला बाद सुतै छला। कहाँ कखनो समाजक प्रति‍कूल बात सोचैक समए भेटैत छलनि‍। जे लोकनि‍ मंडलीकेँ हकार दऽ अपना ऐठाम कीर्तन कराबैत ओ अपन वि‍भवक अनुकूल, भोजनो आ साजो-समानक ओरि‍यान कऽ दैत छलाह। पहि‍ल दि‍न शंभूओकेँ सवा हाथ वस्‍त्र आ सवा-आना पाइ भेटल। खा कऽ जखन शंभू वि‍दा हुअए लगल तँ गरे ने अँटै। दू हाथमे तीन समान (पाइ, वस्‍त्र, खजुरी) अन्‍हार राति‍मे केना लऽ कऽ जाएब। पाइकेँ जँ वस्‍त्रमे बान्‍हि‍ एक हाथमे लऽ लेब आ दोसर हाथमे खजुरी लऽ लेब, से भऽ सकैए। मुदा दुनू हाथ अजबाड़ि‍ राति‍मे चलब केना? ढि‍मका-ढि‍मकीक रस्‍तामे कतऽ ठेंस लागत कतऽ नै। जँ घरबारि‍येकेँ संग चलैले कहबनि‍ सेहो उचि‍त नै। हमरा सन-सन कते गोरे छथि‍। कि‍नका-कि‍नका संग पुरथि‍न। जँ कन्‍हापर आकि‍ डाँड़मे वस्‍त्र लगा लेब तँ पहि‍रौठ भऽ जाएत। केना बाबूकेँ पहि‍रोठ वस्‍त्र देवनि‍। गुन-धुनमे पड़ल शंभू एक गोटेकेँ अपना घर दि‍स जाइत देखि‍ पि‍ताकेँ समाद पठौलनि‍- “बाबूकेँ कहि‍ देबनि‍ जे डलना तेहेन चोटगर बनल छलै जे इच्‍छासँ बेसि‍ये खुआ गेल। तइपर तीन-तीनटा वस्‍तु लऽ कऽ अन्‍हारमे केना आएल हएत तँए आबि‍ कऽ लऽ जाथि‍।” एगारहम बर्ख पुरैत-पुरैत शंभूक गि‍नती गामक भजनि‍याक संग भगवानक भक्तोमे हुअए लगल। तहूमे ओहन भक्‍त जे बि‍नु वि‍आहल हुअए। ब्रह्मचारी। ओना शंभूक स्‍वभावमे सेहो सामान्‍य बच्‍चाक अपेछा वि‍शेष गुण छलैक जे सभ देखैत छलाह। जहि‍ना कि‍यो पनरह बर्खक उमेर बि‍तेलाक बादो पाँचो बर्खसँ कम उमेरक बच्‍चासँ पछुआएल (लुरि‍-बुधि‍मे) रहैत आ कोनो-कोनो बच्‍चा दसे बर्खमे सि‍यान जकाँ भऽ जाइत। मुदा समाज तँ अथाह समुद्र छी। जेहेन पारखी तेहेन परख। डोका-काँकोड़सँ लऽ कऽ हीरा-मोती धरि‍ समेटि‍नि‍हार समुद्र सदृश्‍य समाज। एहनो पारखी जे एक तरहक जानवर (गाए-महीस इत्‍यादि‍) पोसि‍ दोसरो-दोसरो तरहक जानवरक जि‍नगीकेँ दूर धरि‍ देखैत आ एहनो जे सभ दि‍न सोझमे रहि‍तो कि‍छु ने (जि‍बैक रास्‍ता) देखैत। तहि‍ना पारखी शंभूओकेँ परखलनि‍। कीर्तन मंडलीक उपर श्रेणीक कीर्तनि‍यामे शंभूक गि‍नती हुअए लगल। गुरू तँ सदति‍ शि‍ष्‍य तकैत। शि‍ष्‍य-गुरूकेँ एकठाम भेनहि‍ ने जि‍नगी आगू ससरैत अछि‍। जाधरि‍ से नै होइत ताधरि‍ मि‍श्री कुसि‍यारक पानि‍मे डूबल रहैत आ शि‍ष्‍य सरपतक श्रेणीक गाछ बुझल जाइत। शंभूकेँ एक संग दू गुरू भेटल। एक अगुआ (वजन्‍त्रीसँ गौनि‍हार) मुरते आ दोसर साज-बाज। जहि‍ना रंग-वि‍रंगक कोठीमे रंग-वि‍रंगक अन्न-पानि‍ देख गृहस्‍वामि‍नीक मन सदति‍ हरि‍आएल रहैत तहि‍ना शंभूओ हरि‍आएल। अखन धरि‍ शंभूक गि‍नती परि‍वारमे (माए-बापक बीच) ओहन बच्‍चा सदृश्‍य छल जेहनकेँ काजक भार तँ नै मुदा जि‍नगीकेँ जि‍या राखब माए-बापक कर्तव्‍य-कर्मक श्रेणीमे रहैत। जइसँ बि‍नु पगहाक पशु जकाँ शंभूओ। तहूमे आब शंभू छेटगर भऽ गेल। जखने भूख लगतै तखने दौड़ल आओत नै तँ भरि‍ दि‍न भुखलो रहि‍ सकैए। तँए कि‍ शंभूक खाइ-पीबैक आ रहैक ठौरो वि‍ला गेल। नै ओ सभ रहबे कएल। हँ एते जरूर भेल जे कखैन आबए आकि‍ जाए से पुछि‍नि‍हार नै रहल। सुखनि‍ये संतोखीदासकेँ कहि‍ देने रहनि‍ जे बाल-बोधकेँ पाछूसँ नै आगूसँ टोकल जाइत अछि‍। जहि‍ना राहड़ि‍क गाछक बुट्टीकेँ चारू भागसँ सि‍र पकड़ने रहैत तहि‍ना तँ मनुक्‍खोक अछि‍। मुदा जीवनी तँ गर लगा कोदारि‍क छह मारैत जे अपन पएरो बँचै आ बुटो उखड़ै। तँए उत्तम कोटि‍क काज वएह ने जे साँपो मरै लाठि‍यो ने टूटए। घरक कोनो काजक भार शंभूकेँ नै रहैक कारण छल जे दुनू बेकतीक हृदए घेराएल जे माए-बाप अछैत जँ बेटा-बेटीकेँ कोनो भार पड़त तँ खि‍च्‍चा गाछ जकाँ वा केराक गाछ जकाँ पिचा कऽ थकुचा भऽ जाएत। जइसँ शरीर खि‍लैच जेतै। जखने शरीर लि‍खचतै तखने जि‍नगी खि‍लैच जेतै। जइसँ रोगाएल गाछ जकाँ सभ दि‍न खि‍द-खि‍द करैत रहत। जँ एहेन जि‍नगी बेटा-बेटीक भेल तँ ओ परि‍वार कते दि‍न आगू मुँहे ससरत। तँए जाधरि‍ बाल-बच्‍चाकेँ नि‍रोग बना नै राखब ताधरि‍ वंशकेँ आगू मुँहे ससारब कोरी-कल्‍पना हएत। जइसँ ने माए-बाप -सुखनी-संतोखीदास- शंभूकेँ कोनो काज अढ़बैत आ ने शंभू कि‍छु करैत। सभ कि‍छु अपन रहि‍तो शंभू अपन कि‍छु नै बुझैत। तँए धन्‍य-सन। परि‍वारक काजक तहमे पहुँचलापर ने कि‍यो बुझैत जे ऐ काजकेँ नै भेने परि‍वारमे कि‍ नोकसान हएत। ई जि‍नगीये तँ बरखा-पानि‍क बुल-बुला जकाँ अछि‍। लगले बनत, चमकत आ फुटि‍ जाएत। एहेन जँ क्षणभंगुरोसँ क्षणभंगुर जि‍नगी अछि‍, जेकर कोनो वि‍सवास नै अछि‍ तेकरा पाछू पड़अबे नादानी हएत। भने ने जनकजी ऐ बातकेँ बुझि‍ भोगो-वि‍लासकेँ अधला नै बुझैत छलाह। भलहि‍ं शंभूक मनमे जे होय मुदा माए-बापक मनमे जरूर रहनि‍ जे जाबे थेहगर छी ताबे जँ काजसँ देह चोराएब तँ परि‍वारक प्रति‍ अन्‍याय करब हएत। बुढ़ाढ़ीमे झुनाएल धान जकाँ सीसक टूर टूटि‍-टूटि‍ जहि‍ना खसैए तहि‍ना ने शरीरक अंगो (आँखि‍, कान इत्‍यादि‍) खसबे करत। जखन देह भंग हुअए लगत तखन तँ बेटे-बेटी ने श्रवण कुमार जकाँ भारपर टाँगि‍ तीर्थ-स्‍थान घुमाओत। एहेन काज तँ ओकरा ऊपर लधले छै तखन मुर्दा जकाँ नअ मन बोझ लधनाइ उचि‍त नै। कि‍ करत वएह बेचारा, एक दि‍स माए-बापक बोझ पड़तै अपनो जि‍नगी रहतै तइपर सँ बाल-बच्‍चाक कोनो ठेकान छै जे भगवान कते देथि‍न कते नै। हुनका थोड़े बुझल छन्‍हि‍ जे अन्न-पानि‍ कते महग भऽ गेल अछि‍। जतऽ मड़ूआ बराबरि‍ कऽ माछ बि‍कैत छल ओतऽ मड़ूआ धि‍ना कऽ देश छोड़ि‍ देलक मुदा माछ सि‍मटीक चि‍नमारपर गि‍रथानि‍ बनि‍ अजबारि‍ कऽ बैसल अछि‍। ढेरबा बच्‍चा रहि‍तो शंभू समैसँ दोस्‍ती केलक। दोस्‍ती नि‍माहैले मंडलीक संग पूरि‍ जखन सभ सुतए ओछाइनपर जाइत तखन शंभू साइकि‍ल सि‍खैत बच्‍चा जकाँ पहि‍ने हारमोनि‍यम, ढोलक इत्‍यादि‍केँ नि‍हारि‍-नि‍हारि‍ देखए। जहि‍ना युवक-युवती पहि‍ल नजरि‍मे पहि‍ल रूप देखैत तहि‍ना शंभूओ देखलक। देखलक जे एक नै अनेको जुगल जोड़ीक संयोगसँ समाज ठाढ़ अछि‍। जइमे अपन-अपन गुणकेँ मि‍ज्‍झर भऽ कऽ मि‍ल-जुलि‍ चलि‍ उकड़ूसँ उकड़ू बाट टपि‍ श्रंृगी ऋृषि‍क फुलवारी देखैत। एक पेरि‍या झालि‍ केना टूक-टूक जोड़क बनल हारमोनि‍यम संग ठि‍ठि‍या-ठि‍ठि‍या चलैत अछि‍। शंभूक सि‍नेह समूहसँ भेल। पाँचि‍म दशकसँ पूर्व, अष्‍टयाम कीर्तनक मूलमंत्र “सीताराम, सीताराम” छल। कारणो स्‍पष्‍ट अछि‍। जगत जननी जानकीक मि‍थि‍ला, जि‍नक संकल्‍प पूर केनि‍हार राम। सीताराम मंत्रमे शंभूकेँ ऋृतानुसार सभसँ भेटए लगल। जहि‍ना जखन जेहेन मन तखन तेहन वि‍चार, तहि‍ना। भोरमे प्रभाती बेर ‘सीताराम’मे शंभूकेँ वसन्‍ती वा ब्रह्मणी रस भेटै जखनि‍ कि‍ दि‍न-राति‍क गति‍ये रसोक रस बदलए लगै। मुदा मंत्रमे कोनो बदलाव नै होइ। बाल-बोध रहि‍तो शंभू जीवनी जकाँ सि‍र सजमनि‍क भाँज बुझैत। हनुमानजी जकाँ नै। जे छोटो काज लेल नमहर अस्‍त्रक प्रयोग करब। आ ने अनाड़ी-धुनाड़ी जकाँ पराती बेर साँझ आ साँझक बेर पराती गबैत। जँ गेबो करैत तँ जहि‍ना हलुआइ चीनीक चासनीमे रंग-वि‍रंगक वस्‍तु बना ओइमे बोड़ि‍ मधुर बनबैत। एहने सन शंभूओक मनमे उपजै। ओना जते रंगक मंत्रक जरूरत होइत तते एबो ने करै। नै अबै तहूमे ओकर दोख नै। दोखो कि‍अए हेतै एक तँ बेचारा पशु जकाँ असगरे खूँटा धेने, तइपर बाल-बोध। मुदा तैयो बकरी बच्‍चा जकाँ नै जे दूध पीवि‍ते छड़पए-कुदए लगैत। हड़लै ने फुड़लै शंभू घरसँ पड़ा गेल। दुनू बेकती संतोखीदास खेतमे काज करए गेल रहथि‍। तँए भरि‍ दि‍न कोनो भाँजे नै लगलनि‍। कारणो रहए। दुपहर तक तँ आनो दि‍न हटले-हटले रहैत छलाह। साँझमे खोज करैत छेलखि‍न। दि‍न तँ घुमै-फि‍रैक होइ छै मुदा राति‍ तँ ठौर पकड़ैक होइ छै, तँए। घरसँ नि‍कलि‍ते‍ शंभू घरक सभ कि‍छु बि‍‍सरि‍ गेल। खजुरि‍यो बि‍‍सरि‍ गेल। बि‍‍सरि‍ नै गेल मनसँ हटि‍ गेलै। नवका चानक (तीर्थानुसार) नव ज्‍योति‍ भेटलै। जहि‍ना ताड़ी देनि‍हार खजुर, लपकि‍ कऽ ताड़ पकड़ि‍ लैत तहि‍ना शंभूक खजुरी, तबला पकड़ि‍ लेलक। तबला पकड़ि‍तहि‍ खजुरि‍येक हाथसँ बजबए लगल। बजबैत कते दूर गेल तेकर बोध नै रहलै। दुनि‍याँक बीच हरा गेल। जि‍महर देखे दि‍न छोड़ि‍ कि‍छु ने देखै। बाध-बोन, गाछ-बि‍रीछ, पोखरि‍-झाँखड़ि‍, हल्‍लुक-सुखाएल धार-धुर तँ सभ गाममे रहि‍ते छै। आड़ि-धुर बनौनि‍हार आकि‍ नक्‍शा-खति‍यान देखि‍नि‍हार ने खेत-पथार, गाम-घरक बात बुझैत, जे नै बुझैत ओ दि‍न-राति‍ छोड़ि‍ आरो कि‍ बुझत, तहि‍ना शंभूओ। बीच बाटपर शंभूक मनकेँ हुदकबए लगलै। गामक कीर्तन मंडलीक अगुआकेँ मुँहक बात मन पड़ल जे पचगछि‍यामे बड़का-बड़का बाजो छै आ बजोनि‍हारो। खाइयो पीबैले देल जाइ छै आ रहैयोक बेबस्‍था छै। जहि‍ना कोनो बीज भूमि‍ छेदि‍ अकुर ऊपर आबि‍ अपनाकेँ वृक्षक पूर्व रूप बुझि‍ इतराइत तहि‍ना ने बच्‍चोक वुद्धि‍क अंकुर जगैत तहि‍ना शंभूओकेँ भेल। उत्‍साहि‍त भऽ घरसँ नि‍कलि‍ वि‍दा भऽ गेल मुदा खास जगहपर पहुँचए लेल जानकारीक जरूरत होइत। ओना जँ खास जगह नै, आम जगह देखए चाहब तँ कोनो परि‍चयक जरूरत नै होइत। जएह देखब, जतबे देखब, जतए  देखब सहए दुनि‍याँ। जेहन आँखि‍क ज्‍योति‍ तेहने रंगक दुनि‍याँ। मुदा पंचगछि‍या जेबा लेल तँ जानकारी बनाएब जरूरी अछि‍। मनमे उठलै पूछि‍-पाछि‍ लोक कतएसँ कतए चलि‍ जाइए। तखन कि‍अए ने जा सकै छी। जहि‍ना आन बाट-घाट टपि‍ अपन स्‍थानपर पहुँचैए तहि‍ना कि‍अए ने पहुँचब। पेटक भूखक संग मनोक भूख कमलै। भूख कमि‍तहि‍ संकल्‍प शक्‍ति‍क उदय भेलै। पचगछि‍याक रायबहादुर लक्ष्‍मीनारायणजी जेहन संगीत कलाक मर्मज्ञ तेहने साधको। संगीत कलाक सि‍नेही रहने ‘संगीत कला केन्‍द्र’ स्‍थापि‍त केने छथि‍। जइसँ मि‍थि‍लांचलक अनेको गायक, वादक अन्‍तर्राष्‍ट्रीय ख्‍याति‍ पौने छथि‍। एगारह-बारह बर्खक शंभूकेँ केन्‍द्र लग पहुँचलोपर भीतर जाइक हि‍औए ने डटै। कातमे ओइ भूखल-पि‍यासल मरूभूमि‍क चि‍ड़ै जकाँ दूर-दूर धरि‍ अन्न-पानि‍क छुति‍ नै देखैत। समुद्रक ओइ सीप सदृश्‍य शंभू मुँह बाबि‍ ठाढ़ भेल जे स्‍वाती नक्षत्रक बुन्नक आसमे रहैत। तहीकाल मांगन मण्‍डल नि‍कललाह। अन्‍तर्राष्‍ट्रीय स्‍तरक संगीत ममज्ञ। शंभूपर नजरि‍ पड़ि‍ते आँखि‍ आकर्षित केलकनि‍। मुदा चेहरा अपन भूख देखौलकनि‍। बि‍ना कि‍छु पुछने-आछने शंभूक वामा बाँहि‍ पकड़ि‍ केन्‍द्रक भीतर आनि‍ खुओलनि‍। खेनाइ खेलापर शंभूक मन असथि‍र भेलै। मांगन पुछलखि‍न- “वाउ, की नाओं छी?” “शंभू।” “परि‍वारमे के सभ छथि‍?” “बाबू, माए।” “भाइयो-बहीन छथि‍?” “हँ।” “आइ रहि‍ जाउ काल्हि‍ नि‍चेनसँ गप करब।” “बड़बढ़ि‍या।” दि‍न बीतल साँझ आएल। बाहर दि‍ससँ अन्‍हार अबए लगल। जेना-जेना अबैत तेना-तेना करि‍आएल जाइत। करि‍आइत-करि‍आइत ओते करि‍या गेल जे अपन आँखि‍ हाथो ने देखैत। जे जतए से ततए गबदी मारैक ओरि‍यानमे लगि‍ गेल। मात्र दूटा पि‍पनी लगल कपाट कखनो खुजै कखनो बन्न भऽ जाए। डर सन्हि‍आए लगलै। जेना-जेना डर अपन पैठ बनबैत जाए तेना-तेना शंभूकेँ डरौन लगए लगलै। कनए लगल। कनि‍ते मनमे उठलै माए-बाप, संगी-साथी, गाम-घर। केना नइ मन पड़ैत? माइटि‍क बनल रस्‍तो अन्‍हारमे बजैत- भाय ऐठाम कटारि‍ अछि‍, आगू हुच्‍ची। भलहि‍ं रस्‍ता  हि‍साबसँ ओकाइत कम अछि‍ मुदा खुरलुच्‍ची सबहक खुनल छी तँए रस्‍ता  बगलि‍ कऽ टपब। पुन: उठलै माइक कएल भानस। खेबा-पीबा राति‍ भऽ  गेल। भानस कऽ कऽ माए तकैले बौआइत हएत। मने-मन कहैत हएत साँझ भऽ गेल अखन धरि‍ कोन जंगल-झारमे बौआइत हएत। चारि‍ बेर सोर पाड़ि‍ बाबूओ अकछि‍ कऽ अपनो खेनाइ छोड़ि‍ ओछाइनपर ओंघरा गेल हेता। मन कतौ तन कतौ शंभूक जहलक कैदी जकाँ। हि‍चुकी बढ़ि‍तो गेलै आ जोरो केलक। आगूमे ठाढ़ भेल मांगन असमंजसमे पड़ल। केना नै पड़ि‍तथि‍? जि‍नगीक पहि‍ल दि‍न पहि‍ल दृश्‍य। तँए नाटकक बि‍नु देखल दृश्‍यक सदृश्‍य। सोलहन्नी नव! जहि‍ना परीक्षा फीस नै रहने वि‍द्यार्थीकेँ फार्म भरैक अंति‍म चारि‍ बजे, नम्‍हर बीमारी एने परि‍वारक, जेठुआ दुपहरि‍यामे पीआकक मन बौरा जाइत तहि‍ना मांगनकेँ सेहो भेलनि‍। एक दि‍स हुअएबला जि‍नगीक प्रश्न अछि‍ तँ दोसर दि‍स असकरे ओइ जगहपर पहुँच गेल अछि‍ जतए सभ अपरि‍चि‍ते छैक। मन नाचि‍ भगवान रामपर गेलनि‍। अयोध्‍याक राजक बदला बन भेटलनि‍। मुदा अयोध्‍यासँ ि‍नकलि‍ गंगा पाड़ होइतहि‍ कोनो नै कोनो ऋृषि‍-मुनि‍क आश्रम भेटि‍ते गेलनि‍, तखन वन की भेलनि‍? मुदा लगले मन उनटि‍ गामक बुढ़ि‍ माएपर गेलनि‍। बेचारीकेँ जही दि‍न नातिनक जन्‍म भेल बेटी मरि‍ गेलनि‍। नानीसँ माए बनि‍ बेचारी मरनी बेटी दुलारूक नाओं नाति‍नक रखलनि‍। उत्‍साह जगलनि‍। मन बाजि‍ उठलनि‍- ऐ बच्‍चाकेँ नै बौआए देबै। भलहि‍ं राति‍ कि‍अए ने जागि‍ कऽ बि‍तबए पड़ए। मुदा शंको तँ जीवि‍ते अछि‍। लगले मनमे उठलनि‍ जे हो-न-हो अनचोकेमे नीन चलि‍ आबए आ तहीकाल पड़ा जाए। झाड़ी बोन जकाँ मांगनकेँ रस्‍ता  भेटबे ने करनि‍। जँ भेटबो करनि‍ तँ कोशि‍कन्हाक खट्ठा-पटेरक रस्‍ता।  लगले ओरा जाएत। ओरेबो केना नै करि‍तनि‍? भूख-पिआस, नीन ककरो पूछि‍ कऽ अबैए। भलहि‍ं ओकरा सुति‍ कऽ आकि‍ खा-पी कऽ भगाओल जा सकैए। आगूक बाट भेटि‍ते मांगन कोठरीक केबाड़ कुन्जी सि‍रमामे रखि‍ लेलनि‍। मुदा तैयो शंका दबि‍ते रहनि‍ जे जखन नीनभेर भऽ सुतब आ शंभू पड़ाए चाहत तँ कि‍ सि‍रमाक चाभी नै नि‍कालि‍ सकैए। धीरे-धीरे शंभूक कनैक अवाजमे मि‍ठापन अबए लगल। भरि‍सक नीनक आगमन भऽ रहल अछि‍। मि‍ठासे कानब ने सुखोक एकटा कारण छि‍ऐ। मुदा तैयो मांगनक मन उचैट‍ते जाइत। घर-बाहरक वा तीर्थ यात्रा आ तीर्थस्‍थानक सीमापर जहि‍ना संकल्‍पक उदय होइत तहि‍ना मांगनकेँ सेहो भेलनि‍। तकैत आँखि‍ये काल्‍हुक सुर्ज देखब। मुदा असगर तँ राति‍यो काटब असान नहि‍ये। समुद्रक अगम पानि‍मे डूबए लगलाह। मुदा लगले नाचक ओइ हरही बुढ़ि‍यापर नजरि‍ पड़लनि‍। नजरि‍ पड़ि‍ते उठलनि‍ ओहो बुढ़ि‍या गामक युग पाखरि‍ये छी। आन-आनकेँ देखै छी जे लोकक लाटमे राति‍ बि‍तबए चाहैए ओ आेकरा कि‍यो लाटमे रहए नै दि‍अए चाहैए। मुदा बुढ़ि‍या तँ बुढ़ि‍ये छी, कि‍यो ओकर बात सुनै वा नै‍ सुनै भरि‍ राति‍ बड़बड़ाइते रहैत अछि‍। भलहि‍ं साँझकेँ भोर कहै आकि‍ भोरकेँ साँझ। जखैन जे मन फुड़ैत तखैन से पहरि‍या नोकर जकाँ भरि‍ राति‍ ठाढ़ करैत। अस-वि‍स करैत बरि‍आतीकेँ जहि‍ना खि‍स्‍सकरक रंग-रंगक चसगर चासनीमे डूबबैत तहि‍ना मांगनि‍क मन बड़बड़ा लगलनि‍। बि‍सरए लगला शंभूकेँ अपन कर्तव्‍य-कर्ममे डूबए लगलाह। हाथ-पएर मारि‍ अन्‍हारे-अन्‍हार नीन आबि‍ शंभूकेँ गोति‍ देलक। जहि‍ना अथाह पानि‍क तरमे मुँहक बोल पानि‍येमे वि‍लीन भऽ जाइत तहि‍ना शंभूक कानब भेल। नाकक साँसक अवाजसँ मांगनकेँ वि‍सवास भऽ गेलनि‍ जे शंभूकेँ नीन आबि‍ गेल। असथि‍र भेला। मुदा फेर लगले उठलनि‍ जे चहाएल मन कखनो चहा कऽ उठि‍ सकैए। जँ कहीं शंभूक नीन देख अपनो नीन पड़ि‍ गेलौं तखन तँ सभ चौपट भऽ जाएत। ओना दुनि‍याँ देखैबलाक छी। देखैबला दुनि‍याँक बीच हराएत कि‍अए। जखन सभ मि‍ला दुनि‍याँ अछि‍ तखन हराइक प्रश्न कतऽ अछि‍? मुदा लोककेँ दि‍सासो तँ लगै छै। दि‍सासे लगलापर ने कि‍यो पूबकेँ पछि‍म आ उत्तरकेँ दछि‍न बुझै छै मुदा अकासकेँ पताल आ पतालकेँ अकास कहाँ बुझै छै? लगले ओइ सीमापर पहुँच गेल। जतए बाल-बोधक रक्‍छा  होएत। बाल-बोधक रक्‍छा तखने भऽ सकैए जखन ओकरापर नजरि‍ राखल जाए। तइ बीच मनमे उठलनि‍ अपन आ अपन संगीक संग संस्‍थाक महत्‍व। मन बुदबुदाए लगलनि‍। मनुष्‍यक जीवन तँ तखने ने जीवन जखन जीवनक बोन लगा दि‍अए। ओना एक बारगी एहन शक्‍ति‍क उदय संभव नै, मुदा डारि‍ पात, सि‍र, फड़, फूल इत्‍यादि‍क एक-एक अंगक तात्वि‍क बोध होय। कतेको व्‍यक्‍ति‍ ऐठाम -संगीत केन्‍द्र- सँ गायक, वादक बनि‍-बनि‍ अपन शक्‍ति‍क प्रदर्शन करैत आबि‍ रहल छथि‍। ओइ आम-जामुनकेँ कि‍अए ने सबुर हेतै जे अपन बाल-बच्‍चाक -गाछी- संग शरीर त्‍यागत। जहि‍ना आइ धरि,‍ घर-परि‍वार बसबै पाछू लगल रहलौं तहि‍ना जाबे घटमे घटवार अछि‍ नाओ खेबैत रहब। भि‍नसरमे जखन शंभूक संग गाम पहुँचाबए जाएब तखन सोझे घुरि‍ कऽ चलि‍ नै आएब। बहुत दि‍न भेँट भेना सरि‍या दासीनसँ भऽ गेल। स्‍वर्गक गायि‍का मुदा से नै पाहि‍ लगा एकठामसँ शुरू करब आ सबहक भेँट करबनि‍। हँ, जरूर करबनि‍। मुदा गुरूओजी मानथि‍ तखन ने। जहाँ एकसँ दोसर दि‍न हएत कि‍ हकबाहि‍ करए लगताह। समाद-पर समाद पठबए लगताह। ओहो तँ जरूरि‍ये अछि‍। नै रहने अपन सुन्‍दर फुलवाड़ीक ताम-कोर के करत? खाएर जे होय बाल गोवि‍न्‍द जीक ऐठाम जरूर जाएब। बड़ागामक लहलहाइत बगीचाक ओगरवाही तँ वएह ने कए रहला अछि‍। ओना अपने सीख-लि‍खक समांग महेन्‍द्र सेहो छथि‍। महेन्‍द्र बालानन्‍द, शंकर, संजीव, रामनारायण, वि‍नय, बेचन ऐठामसँ राम प्रसाद महतो ऐठाम होइते आगू बढ़ब। नै जाएब सेहो उचि‍त नहि‍ये हएत। मनुष्‍य तँ कौछ नै छी जे अंडा दैत पड़ाएल जाएब। मुदा काँकोड़ो तँ नहि‍ये छी जे जकरा पेटमे रखलौं ओ पेटे खोखरि‍ खा लि‍अए। शीतनारायण सुरेन्‍द्र आ अजयसँ सेहो भेँट कइये लेब। ओना भेँट हएत कि‍ नै सेहो ठेकान नहि‍ये अछि‍, कि‍अए तँ उ़नबाज सभ ने बनि‍ गेला अछि‍। हदसँ अधिक पीतमरू राम प्रसाद। प्रेमकेँ जहि‍ना प्रेमास्‍पदक बाट भेटि‍ते वि‍श्वास भऽ जाइत जे प्रेमी संगे-संग चलि‍ रहल छथि‍ तहि‍ना राम प्रसादो ने। मुदा बेसी लटारम्‍हमे कतौ नै पड़ब। लटारम्‍हमे पड़ब तखने ने बेसी दि‍न लागत। जँ से नै करब तँ कि‍अए बेसी समए लगत। हँ तखन एकटा करब जे जखन कि‍यो भेँट हेता ते हुनको गुरूजीसँ मोबाइलपर भेँट करा देबनि‍। जखने भेँट हेतनि‍ तखने ने बुझथि‍न जे परि‍वार आ संयास कि‍ छि‍ऐ। जखन ओमहर जाएब तखन हि‍ताइ दास, बेचन मण्‍डल, राम गुलाम दास, रामायणी देवी, छठू दास, दरवारी दास, बतहू मण्‍डल, लखन दास, राधेश्‍यामजी, रामजी दास, बौआ झा, राम भजनसँ भेँट नै करि‍यनि‍ तँ जि‍नगी भरि‍ उपरागक मोटरी कपारपर चढ़ल रहत। जँ कहि‍यो भेँट हेता तखनो आ समदि‍यो दि‍या समाद पठा कहता जे एम्‍हर एलौं हमरा छोड़ि‍ देलौं। मनमे उठलनि‍ माटि‍ये पानि‍क संयोगसँ ने जीवधारीक सृजन होइए। गंगा-ब्रह्मपुरक बीचक धरती मि‍थि‍ला। एकलब्‍य सदृश्‍य एक-सँ-एक याेद्धा कर्म-रत छथि‍। एक लपकन अमतो चलि‍ए जाएब। राधाकृष्‍ण आ कारतारामक लगाओल फुलवाड़ी। ध्रुपदक वि‍शेष चमत्‍कारी शैलीक फुलवाड़ी। पद्मश्री राम चतुरजी, वि‍दुर, अभय, रामकुमार, रमेश आ पाठक जीक भेँट सेहो कइये लेबनि‍। मन बि‍लमलनि‍। राइति‍क बारह बजि‍ गेल। कोठरीसँ नि‍कलि‍ अकास दि‍स देखलनि‍ तँ बुझि‍ पड़लनि‍ जे अन्‍हार ओससँ भऽ शीतल बना रहल अछि‍। साँझसँ दवाएल इजोत अन्‍हारक सोझ आबि‍ ठाढ़ भऽ गेल अछि‍। अधो राति‍ तँ आब जगैक अछि‍। एक दि‍न बीतने तँ माघ सन जाड़केँ पि‍हकारी दऽ भगाओल जा सकैए तँ अधा राति‍केँ एकटा धुनो ठेल सकैए। पुन: कोठरी आबि‍ शंभूकेँ देख ओछाइनपर ओंङठि‍ गेला। ओङठि‍ते मन पड़लनि‍ पानि‍चोभ। जखन अमता जेबे करब तखन एक लपकन पनि‍चोभो चलि‍ये जाएब। ओना जखने पनि‍चोभ जाएब तँ ओ दि‍न गुनैत-गुनैत सात दि‍नसँ पहि‍ने नहि‍ये छोड़ताह मुदा ओते नै अँटकब। एम्‍हर अँटकब तँ अपन बोहि‍यो जाएब। अबध जीक लगाओल गाछी कोन तरहेँ रामचन्‍द्र, दि‍नेश्वर, राजकुमार मंगनू, फुलानन्‍द, भूपेन्‍द्र ओगरबाहि‍ कऽ रहल छथि‍ सेहो बि‍ना गेने केना देखब। ओम्‍हरसँ बनारसक गुरू-शि‍ष्‍य परम्‍पराक जीवि‍त रखनि‍हार खरबान जीक ऐठाम सेहो जेबे करब। मनसा मि‍श्र आ डीही मि‍श्रक लगाओल कृष्‍ण लीला आ रामकथाक वृक्ष कोन तरहेँ सीतू, हीरा, भगत, रामजी, परमेश्वरी, अनन्‍त दम्‍मन, सत्‍यनारायण आ रामवृक्ष सि‍ंह पालि‍-पोसि‍ रहला अछि‍ सेहो देख लेब। ओना बीच बाटपर दरवारी दास सेहो पड़ताह मुदा ओ घुमन्‍तु लोक, भेँट हेता कि‍ नै खाएर गाम तँ कम-सँ-कम देख लेब। आगू कहि‍यो दोखी तँ नै हएब। भोर होइते चारू दि‍सक गाछी-कलम बँसवारि‍सँ चि‍ड़ै सबहक अवाज उठए लगल।  कि‍यो अपन संगीकेँ कहैत जे भोरूका नीन बेसी सोहनगर होइ छै तँए एक नीन ओरो लगा लि‍अ। तँ कि‍यो कहैत सूर्य उगलापर तँ दुनि‍याँक एक-कोनसँ दोसर कोन धरि‍ उड़ैत समए रहैए तँए ओइसँ पहि‍ने जते उड़ि‍ लेब ओते अगुआएल रहब। चि‍ड़ैक अवाज सुनि‍ मांगनक मनमे सवुर भेलनि‍ जे भरि‍सक भोर होइपर अछि‍। राति‍ बीत गेल एकोबरे नीन कहाँ आएल। आब जँ शंभू उठबो करत तँ रौतुका डर थोड़े खेहारतै। मुदा प्रश्न उठलनि‍- भरि‍ राति‍ जगैक प्रयोजन की‍‍? जहि‍ना गाछपर रहैबला चि‍ड़ै-चुनमुनी होय आकि‍ पोखरि‍मे रहैबला, माटि‍मे रहैबला जीव-जन्‍तु होय आकि‍ पाथरमे वास करैबला हुअए, सबहक माए-बाप ताधरि‍ ओगरबाहि‍ करैत जाधरि‍ ओ स्‍वतंत्र भऽ जि‍नगी नै प्राप्‍त कऽ लैत। शंभूकेँ गाम पहुँचा मांगन आगू बढ़ि‍ गेलाह। राति‍ भरि‍क संतोखीदास आ सुखनीक चि‍न्‍ता शंभूपर नजरि‍ पड़ि‍तहि‍ उड़ि‍ गेल। पुछैक प्रयोजने ने बुझि‍ पड़लनि‍ जे पुछि‍ऐ राति‍ कतए रहए। ओना दुनू परानीकेँ पहि‍नेसँ बुझल जे कीर्तन मंडलीक संग रहैए, भगवानक भजन कीर्तन करैए। मुदा तैयो शंभूपर नजरि‍ पड़ि‍ते मन खुशी भेलनि‍। मनमे उठलनि‍ जे माल-जाल जकाँ थोड़े बान्‍हल जा सकैए। जेना-जेना सड़कैत जाएत तेना-तेना अपने ने जि‍नगीक बान्‍ह लगैत जेतै। आह्लादि‍त भऽ संतोखीदास पुछलखि‍न- “बौआ, काल्हि‍येसँ नै देखने छलि‍यह। कतौ अनतए गेल छेलह?” पि‍ताक सि‍नेह शंभूक सि‍नेहकेँ सेहो जगा देलक। बाजल- “बाबू, भोरेसँ काल्हि‍ मन औनाए लगल। कतबो असथि‍र हुअ चाही से हेबे ने करी। घुरि‍-फि‍र पचगछि‍ये मन पड़ि‍ जाए।” संतोखीदास- “पचगछि‍या केना बुझलहक?” शंभू- “कीर्तन मण्‍डलीमे बेसी काल चरचा होइ छै। जना सभ कि‍छु ि‍बसरि‍ गेलौं। हरल ने फुड़ल वि‍दा भऽ गेलौं। ओतए चलि‍ गेल छलौं। बड़का-बड़का गवैया, वजन्‍त्री सभ ओइठीन छै।” संतोखीदास- “अइले एते दूर जाइक कोन खगता अछि‍। सुनै छी अपने गाममे महीना दि‍न रमलीला चलत। कते देखबहक?” शंभू- “कते दि‍नमे आओत?” संतोखीदास- “अगि‍ला मास आओत। अखन आसीन-काति‍क छि‍ऐ ने राजो-महराजक बखारी खलि‍या जाइ छै। तइपर दुनू मास तेहेन अछि‍ जे सभ दि‍न पावनि‍ये-पावनि‍ अछि‍। अगि‍ला मास धानोक लड़ती-चड़ती शुरू भऽ जाएत आ पानि‍यो-बुन्नी ठमकि‍ जाएत।” शंभू- “सि‍नेमा जकाँ एक्के सभ दि‍न हएत?” संतोखीदास- “नइ, जहि‍ना बच्‍चाक जन्‍म होइ छै, आ लागल-लागल ठेहुनि‍या दइ छै, खसैत-पड़ैत उठैए। उठि‍ कऽ चलैए। पढ़ै-लि‍खैए वि‍याह-दुरागमन होइ छै, घर-परि‍वार होइ छै। ताबे माइयो-बाप बूढ़ भऽ जाइ छै। ओकरो सेवा-बरदास करैए। तहि‍ना रमलीलोमे होइ छै। सभ दि‍न सभ रंगक होइ छै। जइसँ बेसी खरचो होइ छै आ समैओ लगै छै। तँए भरि‍ मन देखबो करैए। जइ काजमे जते समए मेहनत आ खर्च लगत ओ काज ओते नम्‍हरो आ नीको होइ छै।” शंभू- “अपना गाममे कहि‍यो भेलो छै?” संतोखीदास- “नइ। रमलीला कोनो अद्दी-गुद्दी छी जे सभ गौआँ कऽ लेत। दुर्गापूजा जकाँ छी। जहि‍ना पावनि‍-ति‍हार, पूजा-पाठ तँ घरे-घर होइए मुदा दुर्गोपूजा करैमे गौआँकेँ डोराडोरि‍ सक्कत कऽ कऽ बान्‍हए पड़ै छै।” छठि‍क परातेसँ झट्टा-पि‍ट्टा शुरू भेल। बाधक रंग बदलए लगल। एक तँ रंग-रंगक धानक चास, तइपरसँ धानक बदलैत रंग। बेरूपहर जँ कि‍सान भरल चास देखैत ओ भि‍नसर सेहो देखैक उदेससँ खुशी होइत घरपर अबैत आ जे भि‍नसरू पहर ओसमे नहाएल देखैत ओ बेरू पहर फेर देखैक आससँ अबैत। जहि‍ना भरल-पूरल परि‍वारमे देहक सभ अंग भरल-पूरल चलैत तहि‍ना सुभ्‍यस्‍त समए भेने शुरूहेसँ धानोक भेल। जहि‍ना खेतमे काज करैकाल कि‍सान हरा जाइत तहि‍ना अगहनमे बोनि‍हार। के ने दुइयो-चारि‍ कट्ठा खेती केने रहैए। काति‍कक पूर्णिमाक प्रातसँ रामलीला शुरू हएत। तँए अबैसँ आठ-नअ दि‍न पहि‍ने रहुआक कमल नारायण, गरीब झा, जलेसर आ दयाकान्‍त बेर टगैत (करीब तीन बजे) गाम पहुँचलाह। ओना गामक लोक पनरह-बीस दि‍न पहि‍नेसँ बुझैत जे रामलीला हएत। मुदा वि‍याह-दुरागमनक लगने जकाँ लोकक मनमे। असल लग्‍न तँ तखन ने शुरू होएत जखन बर-कन्‍याक देखा-सुनी हुअए लगैत। गाम पहुँचते जना हवाक संगे अबैक समाचारो पसड़ल। सीमाकातक आमक गाछक नि‍च्चामे ठाढ़े-ठाढे चारू गोटे वि‍चार करए लगलाह जे गौआँ सभसँ गप-सप केना हएत? बि‍ना गप-सप भेने आगू काज नै ससड़त। मुदा गौआँसँ मुखातीब केना हएत? इहो तँ नान्हि‍टा काज नै अखनो समाजमे ओहन लोकक कमी नै जे बि‍ना आग्रह केने बरो-बीमारी आकि‍ मुरदो डाहए नै जेताह। तइठाम अनगौआँक संग कि‍ करताह ई तँ कठि‍न प्रश्न अछि‍। मुदा एकटा तँ अखनो अछि‍ जे नव लोक वा नव चीज गाममे एने लोक बि‍नु कहनौं देखए जाइत। भलहि‍ं बाधे दि‍स जाइक बहाना कि‍अए ने करैत। कमल नारायण गरीब झाकेँ पुछलखि‍न- “गाम तँ आबि‍ गेलौं, आगू कि‍ सभ हएत?” कमल नारायणक बात सुनि‍ गरीब झा गाम दि‍स आँखि‍ उठौलनि‍ तँ देखलनि‍ जे एक्के-दुइये आगू-पाछू लोक सभ धरि‍आएल आबि‍ रहल छथि‍। लोककेँ देखबैत गरीब झा बजलाह- “जहि‍ना अपना सभ गौआँकेँ रामलीला देखबए चाहै छि‍यनि‍ तहि‍ना ने गौआँ सभ देखैक ओरि‍यान करताह। एहेन-एहेन काज अगुतेने होइ छै।” अखन धरि‍ गाममे रामलीला नै हाेइक कारण रहल जे गाममे ने एक्कोटा जमीन्‍दार आ ने जेठ-रैयत। कम आॅट-पेटक कि‍सान। जि‍नका अपने जि‍नगी पहाड़। बाढ़ि‍-रौदीक इलाका। एक सालक बाढ़ि‍ वा रौदी कि‍सानकेँ पाँच बर्ख पाछू धकेल दैत अछि‍। तइठाम दुर्गापूजा आकि‍ रामलीला लोकक मनमे उठत केना। मुदा एकटा गौरब गामक अछि‍ दू सए बर्ख पहि‍ने जते लोक आ परि‍वार छल ओइमे दस गुणाक वृद्धि‍ भेल अछि‍। ओना ई बात नै जे ओइ गामक लोक बम्‍बै, कलक्ता, दि‍ल्‍लीक आमदनी नै बुझैत, बुझैत मुदा गामक सि‍नेह आ वि‍श्वामि‍त्र सदृश्‍य जि‍बटगर। कि‍अए ने जि‍बटगर रहत? कोनो कि‍ आइये रौदी, बाढ़ि‍ आकि‍ अन्‍हर-बि‍हाड़ि‍, भुमकम भेल अछि‍ सभ दि‍नसँ होइत आएल अछि‍ होइत रहत। तरहस्‍थीक मैल जकाँ दू बेर रगड़ि‍ देबै छुछि‍ जाएत। ततबे नहि‍ गामक इहो गौरव अछि‍ जे बरहबरना (बारह-वरन) गाम रहि‍तो ने कहि‍यो अपनामे लाठी-फराठी नि‍कलल आ ने कोट-कचहरीक दैछना भरए पड़ल अछि‍। रामलीलो पार्टी आ गौआेंक बीच गप-सपक क्रममे तेँए भेल जे ब्रह्मस्‍थान सार्वजनि‍क जगह छी, ओ तँ बैस अगि‍ला गप-सप हुअए। सएह भेल। लोकक बीच कमल जीक हृदए उमड़ि‍ गेलनि‍। कला-सि‍नेही। वि‍ह्वल भऽ बजलाह- “आइ धरि‍ ऐहन गाम नै देखने छलौं जइठाम एहन हृदैक मि‍लान भेल। अखन धरि‍ जेहन-जेहन गाम देखलौं तइसँ भि‍न्न गाम बुझि‍ पड़ैए। एे रूपे कहाँ कोनो गाममे रामलीलाक प्रति‍ आकर्षण छै।” मुदा लगले मन आगू बढ़ि‍ गेलनि‍। भवानक रामक प्रति‍ लोकक वि‍श्वासक कारण अछि‍ आकि‍ मनोरंजनक? मनोरंजनो तँ जीवनक संगे चलैबला सहचरि‍ये छी आकि‍ जि‍नगीसँ अलग चलैबला? कर्म-आनन्‍द मि‍ल लीला करैत अछि‍। सभ सबहक मुँह देखैत जे के कि‍ बजै छथि‍। कारणो अछि‍। सभ अपनकेँ नव बुझि‍ नव फूलक सुगंध लि‍अए चाहैत। सभकेँ चूप देख पुन: कमलजी बजलाह- “अहीबेर टा नै जहि‍या कहि‍यो लीला देखबैक अवसर देब तहि‍या जरूर आगूओ देखबैत रहब।” बजैले आगू रहबे करनि आकि‍ बि‍चेमे गरीब झा टपकि‍ उठलाह। जहि‍ना राज-दरवारमे कि‍छु गोटेकेँ बजैले परमीशन नै लि‍अए पड़ैत तहि‍ना रामलीला मेड़ि‍याक बीच गरीब जीकेँ। जहि‍ना गरीब नाओं तहि‍ना एक चेराक चेहरा। भीतर-बाहर एक्के रंग। ने गमहारि‍क चेरा जकाँ अमेरि‍कन आ ने कटहरक चेरा जकाँ यूरोपीयन। बस-बस सोलहो आना आमक चेरा जकाँ इन्‍डि‍यन। चौबीसो घंटा शरीरसँ कला छि‍टकैत। मुस्‍की दैत बजलाह- “भाय, सर-समाज जहि‍ना कमल भाइक संग पाबि‍ गरीबो झा जलेसरो आ दयाकान्‍तो कलाकारक पात्र बनि‍ सेवाक लेल एलौं तहि‍ना अहूँ सभ गारा-जेाड़ी कए संगी बनब। -हँसैत- जेना हि‍जरा-हि‍जरनि‍या सभकेँ देखै छि‍ऐ जे कोनो-गाम कोनो समाज ओकरा बान्‍हि‍ कऽ नै रखैत तहि‍ना हमरो-सभसँ छि‍पाएब नै।” कहि‍ पुन: बजलाह- “होउ भाय, आब अपन अगि‍ला वि‍चार कहि‍यनु।” गरीब झाक वि‍चारकेँ कमलजी मनमे औंटै-पौड़ैत रहथि‍। मनमे हौंड़ैत रहनि‍ जे भरि‍सक अपना इलाकामे जते रामलीला पार्टी छथि‍ ओ सभ भरि‍सक एक सीमाक भीतरे चक्कर कटैत रहलाह। जइसँ सभकेँ उठैक समान वातावरण नै भेट सकल। भरि‍सक गनल-गूथल गाम आ गनल-गूथल समाजक भीतरे रहि‍ गेलाह। मुदा इहो तँ झूठ नहि‍ये जे जते रामलीला देखै-देखबैक जरूरत अछि‍ ओते मेड़ि‍या अछि‍यो नै। तँए कि‍ लोक नै देखैत अछि‍ सेहो बात नै। जहि‍ना पचमहलो कोठामे मनुखे रहैए आ बाधमे बनल रखवारक खोपड़ीमे सेहो मनुखे रहैए। रामलीलाक अति‍रि‍क्‍तो नाटक, नौटंकी थि‍येटर रास, आॅरकेस्‍ट्रा, लोक नाच, वि‍षय-कीर्तन, कौव्‍वाली, इत्‍यादि‍ तँ चलि‍ते अछि‍। रामलीलामे जहि‍ना रामकथा चलैत अछि‍ तहि‍ना लोको नाचमे तँ चलि‍ते अछि‍। मुस्‍कुराइत कमल बजलाह- “आइ अहाँ सभक अति‍थि‍-अभ्‍यागती भेल। हम सभ गाछी-वि‍रछीमे रहैबला छी तँए भारो कम्‍मे देब। राति‍मे नि‍चेनसँ सभ एकठाम बैस हब-गब करब। अखन एतबे कहू जे हृदैसँ चाहै छी वा नै।” एक तँ गाममे पहि‍ले-पहि‍ल रामलीला हएत तेकर खुशी तइपर उपजल गामक गदगदी। एक स्‍वरे सभ हूँहकारी भरि‍ देलकै। दि‍शा-मैदान दिस टहलि‍ दोसरि‍ साँझमे सभ कि‍यो एकठाम बैसलाह। लोकक खुशीकेँ अपना दि‍स खींचैत गरीब झा ठाढ़ भऽ बजए लगलाह- “अहाँ सभकेँ बुझले हएत जे रामलीलाक स्‍टेज बनत। स्‍टेजक पाछू कलाकारक बेबस्‍था रहत आ आगूमे देखि‍नि‍हारक। स्‍टेज आ स्‍टेजक पाछुक बेबस्‍था ले तँ बासो-बेलन आ परदो अछि‍ये। रहल स्‍टेजक आगूक बेबसथाक। से तँ समाजे करब।” गरीब झाक बात सुनि‍ संतोखीदास दोहरबैत कहलखि‍न- “कनी फड़ि‍छा कऽ कहि‍यौ गरीबबाबू। नीक-नहाँति‍ नै बुझि‍ सकलौं?” गरीब झा- “कते गाममे रामलीला खेलेलौं हन। सभ गाममे कि‍छु-ने-कि‍छु तफड़का रहि‍ते अछि‍। जना कते गाममे पुरूष दर्शकक लेल अलग आ महि‍लाक लेल अलग ढाठ गाड़ि‍ बेबस्‍था कएल जाइए। तँ कोनो-कोनो गाममे से नै होइए।” संतोखीदास मुस्‍कुराइत- “गरीब भाय, देखि‍नि‍हारसँ पहि‍ने खेलेनि‍हारक चर्च करू जे खेलेनि‍हारक बीच ने ते.....?” संतोखीदासक प्रश्न सुनि‍ गरीब झा सकपकेलाह। ओना पेटक बात ओंढ़ मारि‍ गुंगि‍या-गुंगि‍या नि‍कलए चाहनि‍। मुदा अपनाकेँ एक कलाकार मानि‍ सहमि‍ जाइत। दुनू गोटेक बीचक सवाल-जबाब सुनि‍ कमल जीकेँ नै रहल गेलनि‍। मुदा नजरि‍ गाम (समाज) दि‍स नै अपन मेड़ि‍यापर पड़लनि‍। सभ एकठाम बैस खाइ पीबै, सुतै-बैइसै छी। घर-गि‍रहस्‍तीक संग घरवाली बाल-बच्‍चाक संग कला-साहि‍त्‍यपर वि‍चार करैत गति‍-मुक्‍तीक वि‍चार-विमर्श करै छी, तखन एहेन प्रश्न कि‍एक उठल। पचपन-साठि‍ बर्खक, अगि‍ला दाँत टूटल, केशपाकल, छड़गड़ कमलबाबूक मनमे झटका लगलनि‍। मनमे उठलनि‍ जहि‍ना गाए लेल गोशाला तीर्थस्‍थान होइत, वि‍द्यार्थीक लेल वि‍द्यालय, रोगीक लेल अस्‍पताल तहि‍ना ने कला प्रेमीक लेल रंगमंच। यएह गरीब झा छथि‍ जे प्राथमि‍क वि‍द्यालयमे शि‍क्षक छलाह। दरमाहा पाइ कहि‍यो परि‍वारमे नै दै छेलखि‍न। सभ दि‍न सि‍नेमे, नाटकक चक्करमे घुमैत रहलाह। जखन अपन पार्टी ठाढ़ भेल तखन वि‍द्यालय छोड़ि‍ एला। तहि‍ना दयाकान्‍तो छथि‍। बनारसमे रहि‍ शास्‍त्रीय, उपशास्त्रीय संगीत सि‍खने छथि‍। तहि‍ना जलेसर सेहो मन चोभि‍या नाचसँ आएल छथि‍। अपनो पचगछि‍या कुटुमक संसर्गमे रहल छी। अजुनो छकड़वाजीसँ आएल अछि‍। पुन: मनमे उठलनि‍ सच्‍चामे कच्‍चा की। उफनि‍ बजलाह- “सभ काजक सीमा होइ छै। अहाँ सबहक जे सीमा अछि‍ तेकर भार अहाँ सभपर आ हमर सबहक जे सीमा अछि‍ तेकर भार हमरा सभपर। द्वारपाल बनि‍ अपन-अपन सेवा जँ इमानदारीसँ देब तँ कोनो तरहक गंदगी नै आओत।” कमल नारायण जीक वि‍चार सुनि‍ संतोखीदास बाजल- “आइ धरि‍ ऐ गाममे रामलीला भेबे नै कएल अछि‍ तखन अनुमानसँ कि‍छु सोचब आ बुझबमे कतौ-ने-कतौ कमी रहि‍ये जाएत। मुदा इहो नै कहब जे ओ अनि‍वार्ये अछि‍ नहि‍यो भऽ सकैए। ई ि‍नर्भर करैत अछि‍ गामक बेबस्‍थापर। जइ गामक जेहन बेबस्‍था रहत तइ गाममे तेहन काज हएत। ओना गामक भीतर काँकोड़ वा मकड़ा जकाँ गामक जाल पसरल अछि‍। एहनो नाच वा पूजा अछि‍ जे खास जाति‍क प्रवेश आ खास जाति‍क ि‍नषेध अछि‍। जखन कि‍ मूल प्रश्न अछि‍ कला आ धर्मक। तहि‍ना मनुक्‍खक संग देवतो आ कलो बटाएल अछि‍। जइसँ जबरदस टाट लगि‍ गेल अछि‍।” संतोखीदासक बात सुनि‍ गरीब झा ठहाका मारि‍ पुछलखि‍न- “तखन?” गरीब झाक जि‍ज्ञासा देख संतोखीदास मुस्‍की दैत कहलखि‍न- “जेकरा कोनो गाछक जड़ि‍क बोध हएत वएह ओइ गाछक गुण बुझि‍ सकैए। मुदा ऐठाम तँ अखन गाछ जनमैक सुरे-सार भऽ रहल अछि‍ तखन तँ प्रश्न उठैक समयो नै बनल अछि‍।” गरीब झा- “तखन?” संतोखीदास- “हँ, अखन घरसँ बहार धरि‍क छी तँए अखने आगूक लेल रास्‍ताक ि‍नर्माण कऽ लेब, नीक हएत। ओना कोनो नि‍यम अस्‍थाइ नै भऽ सकैए। कारण जे समयक संग समाज चलैए तेँ नि‍यमोक संग चलए पड़त। जइसँ कि‍छु नै कि‍छु सुधार होइते चलत। जे समैक अनुकूल हेतै। हमर समाज ओहन अछि‍ जइमे टोल-टोलक आठ-नअ बर्खक बच्‍चासँ लऽ कऽ चेतन, बूढ़-पुरान धरि‍ संगे बाध-बोनमे एकठाम भऽ घास छि‍लैत तीन-तीन चारि‍-चारि घंटा संगे बि‍तबैए। खेतमे संगे रोपैन-कमठाैन करैए। ढेरबासँ जुआन धरि‍ संगे साइकिलसँ दस-दस कि‍लोमीटर स्‍कूल-कओलेज जाइए। तइठाम रामलीला सन जगहमे खाड़ी बनए, ई केहन.....?‍” संतोखीदासक प्रश्न सुनि‍ कमल गरीब दि‍स कनडेरि‍ये आँखि‍ये झॅकलनि‍। गरीब जलेसर दि‍स। जलेसर कमल दि‍स। तीनूक तीनू वि‍परीत दि‍शामे बौआए लगलाह। एक-दोसरक बीच नजरि‍क मि‍लान हेबे ने करैत। जहि‍ना छोट बच्‍चा केशौरक उपरका भाग देख हाथेसँ खोधि‍या उखाड़ए चाहैत तहि‍ना तीनूक बीच मनमे हुअए लगलनि‍। मुदा से गरे ने लगनि‍। दयाकान्‍त लेल धैन-सन। मने-मन पावसक ि‍वसर्जन करैत समदौन ताल-मात्रा मि‍लबैत। तइकाल कमल नारायण पूछि‍ देलखि‍न- “कि‍ दया?” जहि‍ना अनचोकमे कोनो प्रश्नक उत्तर कि‍छु दऽ दैत तहि‍ना दयाकान्‍त मूड़ीक ताल मि‍लबैत धाँइ दऽ बाजि‍ उठलाह- “हँ, हँ, सभ नीके।” मुदा लगले जखन भक्क टुटलनि‍ तँ मनमे उठए लगलनि‍ जे कि‍ उत्तर भायकेँ दऽ देलि‍यनि‍। ओ राय पूछलनि‍ आ हम ओइ बच्‍चा जकाँ कहि‍ देलि‍यनि‍ जे कोनो भोति‍आइत यात्रीकेँ वि‍सवासक संग बि‍नु देखल रस्‍ता बता दैत। तहि‍ना भेल। अखन समदौन मात्रा मि‍लबैक समए नै छल जे मृत्‍युक पछाति‍क वएह मात्रा जन्‍मकालक केना हएत। कि‍अए ने हएत। जन्‍म–मृत्‍युमे अन्‍तरे कि‍ छै। खेतक आड़ि‍ जकाँ थोड़े अछि‍ जे खेतसँ ऊपर होइमे, आड़ि‍पर चढ़ैमे डाँड़पर हाथ लि‍अए पड़त। ई तँ खरन्जा ईंटाक बाट छी जे फुटल छोड़ि‍-छोड़ि‍ सौंसकापर पएर दैत चली। दयाकान्‍तक उत्तर सुनि‍ कमल आरो भोति‍आए लगलाह। जे सभ नीक तँ अधला कि‍। जँ अधला नै तँ राक्षसक जन्‍म कि‍अए। जँ राक्षस नै तँ मनुखक देहमे मासु-खुन कि‍अए नै? मुदा तइकाल गरीबो झा आ जलेसरो अपन भाँज पुरबैले कमल दि‍स तकलनि‍। बजैले दुनूक मुँह लुसफुसाइत। मुदा पहि‍ने केना बाजब। जलेसरक मनमे गरीब भायकेँ गुरूवार बुझै छि‍यनि‍। अखनो बहुत सि‍खबै छथि‍। जखन कि‍ गरीब झाक मनमे उठैत जे कलाकारक रूपमे भलहि‍ं दुनू गोटेक एक जि‍नगी अछि‍ मुदा गाम-समाजक बंधनमे तँ दू छी। तँए पहि‍ने जलेसरक वि‍चार जरूरी। जँ से नै, अगर पच्‍चीस बीमारीक रोगीक इलाज पहि‍ने नै भऽ एक बीमारीबलाक इलाज हएत तँ नि‍श्चि‍त रूपेँ अधि‍क बीमारीबला रोगी मरबे करत। मुदा से नै, जँ पच्‍चीस बीमारीक इलाज उपलब्‍ध हएत तँ एक बीमारीक इलाज एकटा कोरामि‍नोसँ भऽ जाएत। आँखि‍क इशारासँ जलेसर गरीबकेँ आग्रह केलखि‍न। शि‍क्षक गरीब झा, जे रामलीलाक वि‍दूषककेँ मनमे बि‍जलोका जकाँ तड़कलनि‍ जे रोगीक रोगक इलाज कि‍महरसँ कएल जाए? जालेसर आ गरीब झा, दुनूक तत्-मती देख कमल नारायण जीक मनमे उठलनि‍ जे कतौ जरूर नमहर खाधि‍ अछि‍। वि‍चार बदलैत हँसैत बजलाह- “जि‍नगीक पहि‍ल दि‍न एहन आनन्‍दक अवसर भेटल।” कहि‍ चुप भऽ गेलाह। मनमे उठलनि‍ जहि‍ना घरमे लगल आगि‍ देख कोनो आन्‍हर भगए चाहैत मुदा आँखि‍ नै रहने ढि‍मका-ढि‍मकीमे ठेसि‍-ठेसि‍ खसैत, कोनो टंगटुट्टाक आभास पाबि‍ जान बँचबए कहत तँ ओ टंगटुट्टा यएह ने कहत जे भाय केकरा के देखै छै जे तोरा हम देखबह आकि‍ तूँ हमरा। तोरा आँखि‍ नै छह जे देखि‍ कऽ चलबह आ हमरा टांग नै अछि‍ जे एको डेग चलब। कमल सदृश्‍य खि‍लैत कमल जीकेँ संतोखीदास कहलकनि‍- “भाय, जतेकाल अहाँ स्‍टेजपर रहब ओतेकाल अहाँ राम, हनुमान आकि‍ रावणक रूप बना रहब मुदा तकर बाद जते समए बचत ओ तँ समाजेक भाए-भैयारीमे बनि‍ रहब कि‍ने? बारह-तेरह बर्खक एकटा बेटा हमरो अछि‍। ऐठाम अछि‍यो। जाबे धरि‍ ऐठाम रहब ताबे धरि‍ ओ सेवामे लगल रहत।” हँसैत कमल बजलाह- “सेवाक फल मेवा होइ छै।” जे रोगीकेँ मन भाबए से वैद फरमाबए। अपन नाओं सुनि‍ते शंभू फुड़फुड़ा कऽ उठि‍ कमल जीकेँ गोड़ लगलकनि‍। मुदा जाबे कमलजी असि‍रवाद दि‍तथि‍न तइसँ पहि‍ने गरीबो, जलेसरो आ दयाकान्‍तोकेँ गोड़ लागि‍ समाज दि‍स घुमि‍ पहि‍ने पि‍ता संतोखीदासकेँ गोड़ लागि‍ पाहि‍ लगा सभकेँ गोड़ लगए लगल। मनमे बेहद खुशी! ओहन खुशी जेहन दुरगमनि‍या बहीन, पहि‍लुक समाजसँ आगू बढ़ैत नव समाज दि‍स डेग उठबैत। अखन धरि‍ शंभूकेँ असि‍रवाद दैक वि‍चार कमलजी करि‍ते रहथि‍। कारणो भेल, जखन शंभू गोड़ लगलकनि‍ तखन कमल योगासनमे बैसले रहथि‍। जइसँ दहि‍ना पएर पोन तर दाबल आ वामा बाहर रहनि‍। तँए असीरवाद दइमे पहि‍ल देरी भेलनि‍, दोसर देरी भेलनि‍ जाबे असीरवाद दि‍तथि‍न ताबे शंभू तीनू गोटेकेँ गोड़ि‍ लागि‍ लेलकनि‍। जइसँ कमल असमंजसमे पड़ि‍ गेला। स्‍कूल-कओजेजमे वि‍द्यार्थीक प्रवेश दि‍न जँ शि‍क्षकक बीच हुअए आ ओइ दि‍न शि‍क्षक वि‍द्यार्थीक बीच प्रवेश पर्व हुअए जइ दि‍न सभ वि‍द्यार्थी-शि‍क्षक रंगमंचक कलाकार जकाँ नव-नव चेहरा सजा, नव-नव कला देखबैत। जइसँ एक-कलाकारकेँ जहि‍ना एक संगी भेटलापर नन्‍द रूप आनन्‍दक रूपमे बढ़ैत, तहि‍ना ने ओहू पर्वमे हएत। सभकेँ तत्-मत् करैत देख गरीब टभकि‍ उठलाह- “आइ शंभू ओइ सीमापर आबि‍ अँटकि‍ गेल जइठामसँ दि‍शा बदलैत। बहुत पैघ आश समाजमे भेटल। मुदा सबुर कहाँ भेल। सबुर हएत तखन जखन भरि‍ पोख काज अहाँ सभ लेब। शंभूए कि‍अए, एहेन-एहेन शंभू समाजक फुलवाड़ीमे छि‍ड़ि‍आएल अछि‍।” गरीब झाक वि‍चार सुनि‍ संतोखीदास बजलाह- “गरीब भाय, आन जे होथि‍, नै बूझल अछि‍, मुदा अहाँ प्राइमरी शि‍क्षकसँ कलाकार भेल छी। तँए जहि‍ना देव पूजनक लेल फुलवाड़ीक फूल बर्जित नै अछि‍, पुस्‍तकालयक पुस्‍तक बर्जित नै अछि‍ तहि‍ना नि‍रवि‍कार भऽ अहूँ समाजक फुलवाड़ीमे घुमि‍-फि‍रि अपन पूजाक फूल चुनि‍ पूजा-पाठ -तामि‍-कोड़ि‍- सेवामे लगा सकै छी।‍” छठि‍क तेसरा दि‍न, अकासक चान अपन प्रवेश देख मधुरि‍या मुस्‍की दैत। ठंढ़-गर्मक सीमान जेहने मोहक होइत तेहने मोहक दुनू समाजक मनमे। एकक मनमे जे दस गोटे एकठाम बैस रामलीलाक आनन्‍द लेब तँ दोसराक मनमे नव समाजक बीच जँ नव-कलाक प्रदर्शन नै हएत तँ समाजकेँ जे भेटोन्ह मुदा कलाकार तँ शंखे डोलबैत रहि‍ जेताह। अपन सत्ताइसो मेड़ि‍याक संग दू बजे, बेरू पहर टायरगाड़ीपर, साज-बाज, पर्दा-पोस, बाँस-बेलन नेने पहुँचलाह। स्‍कूलक बगलक गाछीक जगह बूझले रहनि‍। एक्के-दुइये गौआँ सेहो पहुँचए लगलाह। जाबे टायरक सामान उताड़ि‍ परतीपर रखैत ताबे लोको गोलि‍या गेल। देखले गरीब झा आ देखले संतोखीदास। नजरि‍ पड़ि‍ते संतोखीदास पुछलकनि‍- “भाय, शंभूकेँ डटि‍ कऽ पहुँनाइ करौलि‍ऐ?” संतोखीदासक बात सुनि‍ गरीब झा बजलाह- “एते दि‍न शंभूक संग रहि‍तो नै परेखि‍ सकलौं जे शंभू कि‍ चाहैए।” संतोखी- “मतलब?” गरीब- “यएह जे ककरो शुरूहेसँ बाजा दि‍स नजरि‍ रहल तँ ककरो नाच दि‍स तँ ककरो गान दि‍स। ई शंभू तँ अद्भुत अछि‍ जे बाजो ि‍दस ओहने झुकाउ देखै छि‍ऐ आ अवाजोक चर्चे कि‍?” संतोखी- “आब तँ गप-सप होइते रहत। जखन आबि‍ गेलौं तखन-अंङस-मंङस नहि‍ये हएब नीक। कि‍ वि‍चार अछि‍?” गरीब- “अखन धरि‍क यएह रहल जे आइ खुँटा-खुट्टी गारि‍ लेब। काल्हि‍ परदा-पोस लगा लीला शुरू कऽ देब।” “हद करै छी गरीब भाय। अहाँ सभ खाली देखबैत रहि‍यौ गौआँ सभ एक्के घंटामे सभ तैयार कऽ देत। मुदा जखन गाम आबि‍ गेलौं तखन एको दि‍न नागा करब समैक संग धुड़तै हएत?” तइ बीच समाजमे एकटा हवा उठि‍ गेल। हवा ई जे कि‍यो बाजि‍ देलकै जे जइ गौआँकेँ पच्‍चीस-पच्‍चीस अनगौआँ भोज करबैक इज्‍जत छै ओ दसटा ब्राह्मणकेँ भोजन नै करा सकैए। मुदा गामे छी। खड़ौआ जौरक बान्‍हसँ बनल घर-सभ। एहेन खुऔनि‍हार चारि‍ गोटे। चारू तैयार जे असकरे देब। नवका वि‍वाद चारू गोटेक बीच। गरमा-गरमीक हाव वहए लगल। कि‍यो भोजक संग बुद्धि‍यारी जोड़ि‍ बजैत तँ कि‍यो बाप-दादाक खुनेलहा पोखरि‍ जोड़ि‍ बजैत। कि‍यो जाइति‍क भगैत गबैत तँ कि‍यो हाकि‍म बेटाक। चारू बात सुनि‍-सुनि‍ गौआँक मन घोर-मट्ठा। जे ई चारू केहन बेर पड़क भदवा बनि‍ गेल। केहने सुन्‍दर सभ कि‍यो एकठाम बैस रामलीला देखतौं तँ चारू कोट-कचहरीक बाट पकड़ैपर उताहुल। जे गाम कहयो ने देखने छल से देखैले तनफन करैत। मुदा चारू, गौआँ-अनगौआँ मि‍ल, पनचैती मानि‍ लेलक। सबहक बीचमे चारू गोटे पहुँचलाह। गौआँ सभ दोहरी लाभ देख –अनगौआँक आदर आ गौआंमे देखारसँ बाँचब- गरीब झाकेँ मानि‍ लेलनि‍। मने मन गरीब झा सोचलनि‍ जे कोन बड़का पहाड़ अछि‍ जे सभ पाछू ससरि‍ रहल छथि‍। कि‍यो पहाड़ देख डरैत तँ कि‍यो बच्‍चा माए-बापक संग खुरपीसँ खाधि‍ खुनि‍ खेलाएत। मुदा लगले मन घुमलनि‍ जे जँ चारू गोटेकेँ कहि‍ दि‍अनि‍ एक-रंग कऽ सभ चीज दऽ दियौ तखन तँ खीराक फाँक बनि‍ जाएत। उपरसँ चि‍क्कन आ भीतर फाँक। नीक हएत जे हुनके सभकेँ पूछि‍-पूछि‍ बाँटि‍ दि‍यनि‍। मुस्‍की  दैत बजलाह- “भाय, अनगौआँ छी, तँए ई नै कहब जे छठूसँ छठूपाना केलक। जि‍नका जे चीज छन्हि‍ ओ ओ चीज देथुन।” गरीब झा- “अपना खेतमे जि‍नका सतरि‍या-बासमती धान भेल होन्हि‍ ओ चाउर देथुन। जि‍नका बाड़ीमे तरकारी उपजैत होन्हि‍ ओ तरकारी देथुन। जनका खूँटापर गाए-महीसि‍ होन्हि‍ ओ दूध-दही देथुन।” सभ कि‍छुक जोगाड़ घंटे भरि‍मे भऽ गेल। आइसँ रामलीला हएत ई समाचार जेना सभक छाती धड़कबए लगल। जि‍नगी वि‍षयक कथाक रंगमंच मास दि‍न धरि‍ गौआँ देखताह। कि‍एक ने खुशीक हि‍लकोर उठतनि‍। आरती चढ़ौआक बरखा सोहे बरस‍बे करत। मास दि‍नक शंभू संगे-संग खटल। आइ समाप्‍त भऽ रहल अछि‍। काल्हि‍ सभ कि‍यो दोसर गाम चलि‍ जेताह। आड़ि‍पर शंभूक ठाढ़ भेल सोचि‍ रहल अछि‍। समाज बदलि‍ कहाँ रहत अछि‍। समाज बदलि‍ कहाँ रहल अछि‍। बढ़ि‍ रहल अछि‍ संतोखी-दासक मनमे उठैत जे छोटसँ पैघ दुनि‍याेमे प्रवेश केनि‍हार -जाइबला- केँ कि‍छु कहब कठि‍न अछि‍। तहूमे आब तँ सहजहि‍  नेनासँ चफलगर भेल। जेबाकाल कमल जीक नोर टघरि‍ गेल रहल छन्हि‍। वएह नोर जे ससुरारि‍‍ जाइवाली रहै छै। साल भरि‍ बि‍तैत-बि‍तैत शंभू रामलीलाक प्रमुख कलाकारक श्रेणीमे आबि‍ गेल। ओना प्रमुखताक कारण उत्‍कृष्‍टता होइत मुदा शंभूक प्रमुखताक कारण भेल बहुआयामी। जहि‍ना आद्राक पहि‍ल बर्खामे ओहन कि‍सानक मन अधि‍क छटपटाइत जेकरा एक संग अनेको खेती करैक रहै छै। फसल लगबैक लेल मन छटपटाए लगै छै जे अगहनी धानोक बीआ आ चौड़ि‍यो खेत अछि‍, गरमा धानक सहो रंग-रंगक बीआ अछि‍, जे मौसमक हि‍सावसँ नै समैक हि‍साबसँ होइत अछि‍। जौं ओ बि‍आ समैपर नै उखाड़ि‍ लगौल जाएत तँ उपजा प्रभावि‍त हएत। मुदा बर्खा चटकने तँ चौड़ीक खेति‍ये बुड़ि‍ जाएत। मुदा शंभूकेँ से नै भेल। ढोलक, हारमोनि‍यम बजबैसँ लऽ कऽ नचनाइ पार्ट खेलनाइ तकमे शामि‍ल भेल। जइसँ पार्टीक भीतर शंभूक महत्‍व बढ़ि‍ गेल। कोनो आदमीक -कलाकारसँ लऽ कऽ वादक धरि‍क- अनुपस्‍थि‍ति‍क पूर्ति शंभू करए लगल। कमल जीक रामलीला पाटीमे शंभू सात बर्ख रहल। ओना अधि‍क उमेर भेने कमल नरायण पार्टी खसा लेलनि‍। गामोक स्‍थि‍ति‍मे ठनका खसलनि‍। सन्‍मुख कोसीक मुँह पछि‍म मुँहेँ जाेर केलक। जइसँ गामक छि‍ड़ि‍आएल बास समटा कऽ घोदि‍या गेल। खेतबलाक स्‍थि‍ति‍ बि‍गड़ि‍ गेलनि‍। कतेको परि‍वार गाम छोड़ि‍ परदेश  रहए लगलाह। बीस बर्खक शंभू अपन ओकाइत -लम्‍बाई-चौड़ाइ- बुझए लगल। मनमे रंग-रंगक वि‍चार उठए लगलनि‍। मुदा सभ गुण होइतो शंभूक मन उपशास्‍त्रीय संगीत दि‍स अधि‍क झुकल। जेहने स्‍वर तेहने कला। सामंत सबहक टूटैत स्‍थि‍ति‍ शास्‍त्रीय संगीतकेँ प्रभावि‍त केलक। ओना प्रभावि‍त उपशास्‍त्रीय सेहो भेल मुदा कम। दरवारीदासक लाट पकड़ि‍ शंभू राजक गवैया बनि‍ वि‍भूषि‍त भऽ गेल। हजारो लोकक भीड़मे जहि‍ना कि‍यो अपन प्रेमी देख सभ कि‍छु वि‍सरि‍ जाइत तहि‍ना संगीत प्रेमी शंभूदास घर-परि‍वार वि‍सरि‍ वि‍याह नै केलनि‍। ढहैत बेबस्‍थाक तरमे शंभूओदास पड़ि‍ गेलाह। बेबस्‍थाक बेबस्‍था चलैत मि‍थि‍लाक धरति‍ये जकाँ मि‍थि‍लाक कला सेहो राँइ-बाँइ भऽ छि‍ड़ि‍या-बीति‍या टूटि‍-फाटि‍ गेल।    ‍ २ एकांकी तामक तमघैल जगदीश प्रसाद मण्‍डल (पहि‍ल दृश्‍य) (जेठ मास। एगारह बजैत। जेठुआ दृश्‍य।) पीपरावाली     : (माथपर छि‍ट्टामे पुरना पार्ट-पुर्जा साइकिलक नेने) लोहा-लक्कर बेचै जाइ- जाएब ई.. य..अ..अ..ऐ...? (रागि‍नी आ बलाटवाली घरक ओसारपर बैसल गप-सप करैत। कवाड़िनक अवाज सुनि‍..) रागि‍नी        : कनी लोहा-लक्करवालीकेँ एम्‍हरे अबैले कहि‍यौ। (ओछाइनपर सँ उठि‍ बलाटवाली आगू बढ़ि‍..) बलाटवाली     : हइ पीपरावाली, कनी एम्‍हरे आबह। (माथपर छि‍ट्टा नेने पच्‍चीस बर्खक पीपरावाली छपुआ साड़ी, पएरक चप्‍पल फटफटबैत अबैत..।) पीपरावाली     : काकी, कनी पथि‍या टेक दौथ। (दुनू गोटे पथि‍या उताड़ि‍ नि‍च्‍चाँमे रखैत। माथ परक बीरबा नि‍च्‍चाँ राखि‍ आँचरसँ चानि‍पर चुबैत पसीना पोछैत। तइबीच रागि‍नी भीतरसँ -घरसँ- एकटा तमघैल आनि‍ आगूमे रखैत..) रागि‍नी        : कनि‍याँ, हमरा ते बुझले ने छलए जे तहूँ लोहा-लक्करक कारोवार करै छह। नै ते....? पीपरावाली     : दादी, अपने करै छी आकि‍ दीन करबैए? रागि‍नी        : सासु-ससुर आ घरबला नै छह? पीपरावाली     : सासु-ससुर तँ धि‍ना कऽ मुइल जे घरोबला तेहने अछि‍। रागि‍नी        : से की? पीपरावाली     : कि‍ कहबनि‍। पति‍क खि‍घांस केने ते पाप लागत। मुदा छि‍पौनौ तँ जि‍नगि‍ये जाएत। (गुन-धुनमे पीपरावाली पड़ि‍ जाइत..) बलाटवाली     : दीदी, अही बेचारीक की सुनथि‍न। अपने सभक नै देखै छथि‍न। हि‍नके बेटा-पुतोहू छन्‍हि‍, दस-बारह बर्खसँ कम गाम एना भेल हेतनि‍। रागि‍नी        : बाहरम बर्ख छी। बलाटवाली     : हि‍नके कि‍ कहबनि‍, हमरे नै देखै छथि‍न जे जहि‍यासँ घरबला मुइल तहि‍यासँ दुनू बेटा-पुतोहू कोनो गरनामे रहए देने अछि‍। तखन ते अपना लुरि‍ये-बुद्धि‍ये जीबै छी। (रागि‍नी आ बलाटवालीक बात सुनि‍ पीपरावाली..) पीपरावाली     : दादी, ई बड़का छथि‍। हम कहुना भेलौं ते हि‍नकर धि‍ये-पूते भेलि‍यनि‍। धि‍या-पूता जे माए-बाप लग झुठ बाजे सेहो नीक नै। बलाटवाली     : माइये-बाप कि‍अए कहै छहक, लोककेँ झुठ बजबै नै करक चाही। पीपरावाली     : काकी, कहलथि‍ ते बेस बात, मुदा हम सभ ते धंधा करै छी। झूठेक खेती छी। नि‍च्‍चाँ-ऊपर सगतरि‍ एक्के रंग। रागि‍नी        : बलाटवाली जहि‍ना अहाँ भरि‍ दि‍न खुरपीसँ घास छि‍लै छी तहि‍ना जे गपोकेँ छि‍लबै तँ उ घास जकाँ उखड़त कि‍ आरो असुआएल लोक जकाँ छि‍ड़ि‍या कऽ पसरि‍ जाएत। बलाटवाली     : हँ, ते आगू कि‍ कहए लगलहक हइ पीपरावाली? पीपरावाली     : घरबला दे कहए लगलि‍यनि‍। कि‍ कहबनि‍ काकी, बजैत लाज होइए। जहि‍ना  बुढ़बा -ससुर- तड़ि‍पीबा रहए तहि‍ना बेटो छै? (कहि‍ चुप भऽ पुन: आँचरसँ चानि‍ पोछए लगैत..) रागि‍नी        : कमाइ-खटाइ नै छह? पीपरावाली     : से जे कमैते ते एहि‍ना रौदमे वौऐतौं। बापकेँ तँ खेत-पथार रहै बेचि‍-बि‍कीन के पीलक। आब तँ ने खेत पथार अछि‍ आ ने कमाइबला। रागि‍नी        : बच्‍चा कएकटा छह? पीपरावाली     : दू भाए-बहीन अछि‍। जेठका छह बर्खक आ छोटकी चारि‍ बर्खक। रागि‍नी        : अपने जे भौरी करए चलि‍ जाइ छह ते बेटा-बेटीकेँ बाप देखै छै कि‍ने? पीपरावाली     : कि‍ देखते जैन‍पीट्टा। भरि‍ दि‍न पी कऽ अड़-दड़ बजैत रहैए। जहाँ कि‍छ बाजब कि‍ सोहाइ लाठी लगा दइए। बलाटवाली     : तोहूँ कि‍अए ने उनटा दइ छहक? पीपरावाली     : धुर काकी, इहो सएह कहै छथि‍। कुल-खनदान कि‍ पुरखेटा बँचबैए आकि‍ जनि‍जाति‍यो। हमरा जे कतबो देह धुनत ते ओकरा दोख नै लगतै मुदा हम जे उनटा देबै तँ कुल-खनदानक नाक कटतै आकि‍ नै? रागि‍नी        : भरि‍ दि‍नमे कत्ते कमा लइ छहक? पीपरावाली     : दादी, कमाइयेपर ने ठाढ़ छी। दुनू बच्‍चोकेँ पोसै-पालै छी आ घरोबलाकेँ पाँच-दस रूपैया पीऐ लऽ देबे करै छि‍ऐ ने? बलाटवाली     :  एहेन छुतहर घरबला छह ते कि‍अए ने छोड़ि‍ दइ छहक? पीपरावाली     : काकी, मरलो-जड़ल अछि‍ तँ घरेबला छी। यएह कहथु जे जे सुख घरबलासँ होइ छै से दोसरसँ हएत। रागि‍नी        : आब ते हुि‍स गेलह। नै जे पहि‍ने बूझल रहि‍तै जे गाममे तोहूँ लोहा-लक्करक कारवार करै छह ते तोरे दैति‍यह। पीपरावाली     : ककरा हाथे बेचलखि‍न? रागि‍नी        : झंझारपुरक एकटा बेपारी अबैए, ओकरे हाथे। पीपरावाली     : झंझारपुरबला बेपारी ते गरदनि‍ कट सभ छी। रागि‍नी        : से की? पीपरावाली     : अनकर कि‍ कहबनि‍, अपने कहै छि‍यनि‍। आठ बर्ख पहि‍ने हमर बाप खुआ चानीक हँसुली दुरागमनमे देलक। ऐठाम दि‍न घटल। पाँच बर्खक पछाति‍ जखन वएह हँसुली ओही वनीमा ऐठाम बेचए गेलौं ते रूपाा कहि‍ अधि‍ये दाम देलक। रागि‍नी        : छोड़ह दुनि‍याँ-जहानक गप। अपन बाल-बच्‍चा, घर-परि‍वारक गप करह, जे केना ठाढ़ रहत? ककरा कहब भल आ ककरा कहब कुभल। कोइ अपना ले करैए। बलाटवाली     : कनि‍याँ, नैहरोमे यहए काज करै छेलह? पीपरावाली     : (दुनू आँखि‍ मीड़ैत..) काकी, हि‍नकर पएर छुबि‍ कहै छि‍यनि‍, कहुना भेली तँ माइये-पि‍ति‍आइन भेली। गाम मन पड़ैए ते......? बलाटवाली     : चुप कि‍अए भेलह? ऐठाम कि‍ कि‍यो पुरूख-पातर अछि‍ जे धखाइ छह। नैहरामे के ने खेलाइ-धुपाइए। पीपरावाली     : धुर बुढ़ि‍या नहि‍तन। एको पाइ बजैमे संकोच नै होइ छन्हि‍। रागि‍नी        : ओहि‍ना बलाटवाली चौल करै छह। बाजह...? पीपरावाली     : दादी, नैहर मन पड़ैए ते सुमारक होइए। माए-बापक बड़ दुलारू छेलि‍ऐ। चारि‍ चारि‍ भाँइक बीच असकरे बहीन छि‍ऐ। रागि‍नी        : वि‍याह करै काल बाप देखा-सुनी नै केने छेलखुन? पीपरावाली     : अनकर दोख कि‍ देबै दादी। दोख अपन कपारक। जे कपारमे सटि‍ गेल सहए ने हएत। रागि‍नी        : हँ, से ते सएह होइ छै। मुदा तैयो ते लोक लड़का-लड़कीक मि‍लान देख ने वि‍याह करैए। पीपरावाली     : सोझमति‍या बाप ठकहरबा सबहक भाँजमे पड़ि‍ गेल। रागि‍नी        : ऐठामसँ आरो आगू जेबहक कि‍ घुरि‍ जेबहक? पीपरावाली     : भऽ गेल भरि‍ दि‍नक कमाइ। बालो-बच्‍चा देखना बड़ी खान भऽ गेल आ रौदो चंडाल अछि‍। (तमघैल उनटा-पुनटा कऽ देख बलाटवाली..) बलाटवाली     : आब ऐ सबहक कोनो माेल रहल दीदी। घरमे अन्न रहत ते लोक माटि‍यो बरतनमे रान्हि‍-पका खा सकैए। रागि‍नी        : बड़ी खान तोरो भऽ गेलह कनि‍याँ। एकेठाम बैसने काज नै चलतह। बाजह, कते दाम देबहक? पीपरावाली     : दादी, हि‍नका लग झुठ नै बाजब। एक तँ कते दि‍नसँ कारेवार करै छी। तहूमे एहेन तमघैल आइ पहि‍ले दि‍न अभरलहेँ। आइ रखि‍ लथु। भाउ बुझि‍ कऽ दोसर दि‍न लऽ जाएब। रागि‍नी        : एकरा नेने जाह। जतेमे बि‍केतह तइमे तूँ अपन बोनि‍ नि‍कालि‍ दऽ दि‍हह। बलाटवाली     : बड़ नि‍म्‍मन चीज छन्हि‍। रागि‍नी        : जहि‍ना सासु-ससुरक बीचक जि‍नगी, बेटा-पुतहूक बीच बदलि‍ जाइ छै तहि‍ना अहू तमघैलकेँ भेल। पीपरावाली     : से की दादी, से की? रागि‍नी        : (वि‍स्‍मि‍त होइत..) कि‍ कहबह! नैहरमे जहि‍या देलक आ ऐठाम आएल तहि‍या घरक गि‍रथानि‍ भऽ रूपैया-पैसा रखैक ति‍जोरी बनल रहए। मुदा जखन चोर-चहारक उपद्रव भल तखन बुढ़हा -ससुर- झँपना दऽ ओछाइनि‍क तरमे गाड़ि‍ कऽ रखै छलाह। आब तँ सहजहि‍ घरे ढनमना गेल ते एकरा के पूछत। बलाटवाली     : कनि‍याँ, दीदीयोकेँ खगता छन्‍हि‍। ताबे नून-तेल करैले अधो-छि‍धो दऽ दहुन आ लऽ जाह। पीपरावाली     : (पचास रूपैयाक नोट दैत..) दादी, ताबे एते रहए देथुन। एक खेप गामपर सँ रखने अबै छी। एक घोंट पानि‍यो पीब लेब। बलाटवाली     : अखैन खाइ-पीबै बेर भऽ गेल। जँ अखन नहि‍यो आबि‍ हेतह ते ओही बेरमे, बेरू पहर लऽ जइहह। पीपरावाली     : हँ सेहो हएत। जँ आइ नै आबि‍ हएत ते काल्हि‍यो लऽ जाएब। रागि‍नी        : आब तोहर चीज भेलह। देखते छहक चोर-चहारक उपद्रव। तँए नीक हेतह जे साँझो पड़ैत आइयो लऽ जइहह। पीपरावाली     : बड़बढ़ि‍या! (()) ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। अतुलेश्वर किछु विचार टिप्पणी १ समयलाई सलाम आ धीरेन्द्र प्रेमर्षिक अभिमत नेपालीय मैथिली साहित्यक एकटा सशक्त कड़ीक नाम थिक धीरेन्द्र प्रेमर्षि। धीरेन्द्र प्रेमर्षिक रचनाक विशेषता छनि मिथिलाक संग जीयब। मैथिलीमे धीरेन्द्र प्रेमर्षि ‘कोन सुर सजाबी’ लिखलन्हि , आ नेपालीमे समयलाई सलाम। दुनू ठाम मिथिला अछि। दुनू ठाम मिथिलाक चिन्ता अछि। हुनक गजल संग्रह ‘ समयलाई सलाम’ क परिपेक्ष्यमे नेपालक राष्ट्र कवि ‘ माधव धिमिरे ’ कहैत छथि जे ‘ प्रेमर्षिको मातृभाषा मैथिली हो। उनी मैथिलीमा गीत पनि लेख्छन् र मैथिलीमा सपना पनि देख्छनृ। नेपाली भाषामा सपना देख्छन्, उनै जानुन, तर गीत चाहिं नेपालीमा व्यड़्ग्य कविता लेखन र वाचनाबाट नेपाली पाठक सामु परिचित भएका धीरेन्द्र राम्रो उद्धोश गर्ने व्यंितव पनि हुन्।’’ धीरेन्द्र प्रेमर्षिक भाषिक परिपेक्ष्यमे कहैत छथि- ‘‘ गजल सङ्ग्रहको महत्वपूर्ण पक्ष हो- भाषिक संयोजन, नेपाली र मैथिली भाषाका ठेट षब्दहरूको संयोजन अति राम्रोसंग अति राम्रोसंग भएको छ; जुन महत्वपूर्ण पक्ष हो ‘‘ माटोमा नै मन्दिर देख्ने ‘ चलित्तर ’ ले पनि अब बलि दिने ‘ गहबर’ मा रे , साढेसाती कटेपछि ’’ हमर प्रसंगक बीच धीरेन्द्र प्रेमर्षीक चर्च करबाक पाछू किछु अभिप्राय अछि जतऽ भारतीय युवा साहित्यकार (ओ लोकनि जे अपनाकें हिन्दीक साहित्यकार बुझैत छथि) लोकनि कतहु मैथिलीकें मान नै दऽ पबैत छथि, मात्र मैथिलीकेँ क्षीण करब हुनक मंशा रहैत अछि। पूछय चाहैत छी जे ई मानसिकता किएक? एक्के भाषाक लोक आ ई भिन्नता किएक? आ अन्तमे कवि धीरेन्द्र प्रेमर्षीक गजलक ई पाँति हमरा मोन पड़ैत अछि- ‘‘ जोर जुलुमसं जे ने झुकए से भाले लगए पिअरगर यौ इन्द्रधनुषी एहि दुनियामे लाले लगए पिअरगर यौ’’ २ यात्रीक प्रसंग ई साल यात्रीक जन्मशती वर्ष अछि मुदा मिथिला आ मैथिलीक कतेक लोक हुनका मोन पारि रहल छनि जे नै कहि। कारण यात्रीक जन्मदिन मनेबाक अर्थ ई नै अछि जे हमरा लोकनि हुनका नामपर समारोह केलहुँ कि नै ( ओना समारोहक आयोजन करब विशेषतः अपन स्वार्थ रहैत अछि)। यात्रीक विचार कतेक जीवित रखने छी हमरा लोकनि , कारण मैथिली साहित्यक स्थिति ई अछि जे बिसरब आ खिधांस करब मात्र हमरा लोकनिक कर्तव्य छी, तइपर विचारब आवश्यक। आशीष अनचिन्हार , जे हमरा जनैत यात्रीकें बुझबाक चेष्टा नै कएने हेताह यात्रीक ऊपर अंगुरी उठबए लगैत छथि। हमरा तँ आश्चर्य लगैत अछि जे हम सभ आखिर पुरखाकें सम्मान नै दऽ सकैत छियनि तँ कमसँ कम अपमान तँ नै करक चाही। यात्रीक साहित्य आ हुनक मैथिली सेवाक मूल्यांकन करबाक संग ,पहिनें ई सोचि ली जे यात्री मिथिला आ मैथिलक लेल की देलन्हि। विकृतिता आ संर्कीणतासँ भरल मिथिलामे सेहो यात्रीक जन्म भऽ सकैत छल। ऐ सौभाग्यपर सोचू। कारण यात्री सन व्यक्तिक जन्म बेर-बेर नै होइत अछि। अन्ततः , कहबाक - सोचबाक तात्पर्य ई जे हम सभ कतए जा रहल छी, की हमरा सभक मार्ग उचित अछि, एहिना किछु विन्दुपर पहिने सोची आ तखनहि अपन मुँह खोली। कहलो गेल छैक जे - ‘इएह मुँह पान खुआबए आ इएह....... ’ तें मत रखबासँ पूर्व पूर्ण सोचि-विचारि ली आ तखने मत लदबाक प्रयास करी। अहीमे निहित अछि अपन, समाजक आ साहित्यक हित। ३ हिन्दीक दृष्टि आ मैथिली भाषा भारत आ नेपाल दुनू ठाम आइ काल्हि जनगणना भऽ रहल छैक जइ मध्य भाषाक सेहो गणना हएत । जइसँ ज्ञात हएत जे कोन भाषाक कतेक भाषा-भाषी अछि । आ ऐ समयमे हिन्दी भारतक राष्ट्रभाषा अछि ओना सत्य ई अछि जे ओ अखनि धरि अपन समांग बचेबाक लेल कुहि रहल अछि कारण भारतमे जे कोनो काज होइत अछि ओ अंग्रेजीमे। कारण सम्पूर्ण भारतक सम्पर्क भाषाक आधार हिन्दी नै अछि ओकर आधार अंग्रेजी अछि । भारतमे कहल जाइत छैक जे अंग्रेजीक प्रभुत्वक कारण हिन्दी पछुआएल अछि मुदा से सत्य नै थिक । हिन्दी भाषाक प्रति जे लोकक मानसिकता अछि ओ यदि हिन्दी स्वीकार करैत अछि तँ ओकर अपन मातृभाषाक अस्तित्व समाप्‍त भ सकैत अछि। कारण मैथिली भाषा ओकर प्रतिफल भोगि रहल अछि। हम कहि रहल छलहुँ जनगणनाक विषयमे। ऐ जनगणनामे हिन्दी पुनः मैथिलीक अस्तित्व समाप्‍त करबाक लेल अपन राजनीति खेल चलि रहल अछि जेकर प्रश्रय हमर सभक नेता लोकनि दऽ रहल छथि। ऐठाम मैथिलीक प्रति हिन्दीक दृष्टिक मादे नेपालक पत्रकार आ साहित्यकार अभि सुवेदी अपन आलेख ‘ समय रेखाः विद्यापति , प्रेमर्षि र हुसैन’ मध्य लिखने छथि- मैथिली भाषाले मिथिलामा हिन्दी भाषाबाट खेप्नुपरेको यातनाको कथा लामो छ । जनमत भएको बेला अंग्रेज र पछि भारतको कंग्रेस सरकारले मैथिली भाषीलाई हिन्दीभाषी हुँ भनेर परिचय दिने प्रचार आदेश अनि अरू कथाहरू स्व. रिचर्ड बर्गार्ट भन्ने बि्रटिस र एक मित्रको गम्भीर अध्ययनमा हामी राम्ररी पढन पाउँछौँ । नेपाली भाषाको कारणले र अहिले आएर फेरि राजनीतिमा हिन्दी बोल्न नजाने पनि हिन्दीलाई राजनीतिक आधार मानेर प्रचार गरिहिँड्ने नेताहरूका आँखामा मैथिली भाषा ओझेलमा पर्ने डर सिर्जना भएको छ ।’ ऐ उक्ति सँ ई निश्चित भऽ जाइत अछि जे हिन्दीकेँ अपन अस्तित्व रक्षामे सभसँ बेशी डर मैथिलीसँ छैक तँए तँ ओकर भाषाशास्त्री आ साहित्यक आलोचक लोकनि मैथिलीकेँ अपन बोली कहि कहि मैथिलीकेँ दबएबाक चेष्टा करैत छथि । कारण हिन्दी अपन बोलीक संख्या बढा चढाकेँ प्रस्तुत कएने अछि जइसँ लगैत अछि जे हिन्दी कतेक कमजोर अछि। हम भारतक भाषा विषयक एकगोट संस्थामे काज करैत छी आ ओतहि ऐ मुद्दापर चर्चा होइत छैक जे हिन्दी केकर मातृभाषा छी , हिन्दी कतऽ मुख्यतया बाजल जाइत अछि। कियो उत्तर नै दऽ पबैत छथि कारण जे हिन्दी क्षेत्र कहि रहल छथि ओइठामक भाषा हिन्दी नै अछि। हुनक मातृभाषा दोसर थिक हँ हिन्दी भारतीय राजनीतिसँ जुड़ल होएबाक कारण सम्पर्क भाषा थिक । तखन तँ एकर अर्थ भेल जे हिन्दीक निज साहित्य जेकर बलेँ ओ अपनाकेँ प्राचीन कहेबाक चेष्टा करैत अछि ओ सत्य नै थिक । हिन्दी आइ अपन अस्तित्वक लेल जे साम्राज्यवादी मानसिकता पोसने अछि ओ ओकरा लेल नीक नै छैक । तँए हम मिथिलाक लोककेँ हिन्दीक पट्टीक लोक नै कही। ओइ लेल भारत आ नेपालक दुनू मिथिलाक लोककेँ एकटा भाषा आन्दोलनक आवश्यकता छैक किएक तँ जावत धरि हिन्दीक पाँजसँ हमर भाषा, हमर लोकवेद आ हमर साहित्यकार नै मुक्त हेताह तावत धरि हम एहिना हिन्दीक माँझमे दबाएल रहब । ४ वैश्विक सोच ? की, मैथिली साहित्यमे आइ काल्हि एकटा नव संस्कार वैश्विक सोच देखबामे आबि रहल अछि? प्रायः तकरहि सिद्ध करबाक लेल युवा रचनाकार धरि अपन भाषिक मर्यादाकें तोड़ि रहल छथि। सभसं बेसी दुखद पक्ष अछि जातिवादक नारा। हमरा सभकें ज्ञात अछि जे भारतीय राजनीतिमे एहन नारा राममनोहर लोहियाक देन थिक, खास कऽ उत्तर भारतमे। ठीक ओहने सन नारा मैथिली साहित्यमे तारानंद वियोगी लगाएब प्रारम्भ कएलनि अछि। एतय हुनक नाम उद्धृत करबाक प्रयोजन एहि कारणें भेल जे ओ अपनाकें ‘ नन मैथिल’ कहैत छथि। से कोन आधार पर? हमर एकटा मित्र छथि मणिपुरक, जे नेपाली भाषी छथि मुदा अपनाकें मणिपुरी कहाएब पसिन्न करैत छथि। ओ जखन वियोगीजीक उक्त अंश पढ़लनि तँ हमरासँ पूछि बैसलाह जे- अतुल यो लेखक मिथिलाको हो, हम कहलियनि- हो! ओ ई बुझि हँसय लगलाह। हमरा बड्ड खराब लागल। मुदा मोने मोन सोचलहुँ जे ई नव पंडित छथि, आधुनिक समयक नव वर्ग, नव सामंत। एहन वर्गमे अवसरवादिता चरम पर देखल जा सकैत अछि आ ओ सभ कखनो ओकर लाभ लेबासँ चुकए नै चाहैत छथि, ओइ लेल जतेक नीचाँ तक जाए पड़नि। तें एहन चरित्रबला साहित्यकार सभसँ मिथिलाक विषयमे एहिसँ नीक सोचब अकल्पनीय होएत, ठीक तहिना जेना एकटा अंग्रेज भारतक विषयमे सोचैछ। हमरा जनैत वियोगीजीकें ई बुझल छनि जे यदि ओ ई बात मैथिल समाजक विषयमे कहथि जे हम सभ मैथिल नहि छी ( जातिवादक सहारा बिना लेने ) तँ हमरा विश्वास अछि हुनका बड्ड फज्जति हेतनि। तें जातिवादक ढालपर अपनाकें मिथिलासँ दूर देखएबाक प्रयास करैत छथि। ठीक,एहिना मर्यादा तोड़ैत देखाइत छथि किछु नवतुरिया सेहो, जिनका नै तँ मैथिली साहित्यक गम्भीर अध्ययन छनि आ नहिये साहित्यिक मर्यादा बुझल छनि। कारण ई युवा लोकनि साहित्यिक आ मिथिलाक चिंतनसँ बेसी आरोप आ प्रत्यारोपमे समय आ शब्द बर्बाद करैत छथि। जेना आशीष अनचिन्हार अपन विकीलीक्सक खुलासामे शब्द सभक जे प्रयोग कएने छथि जे हुनक साहित्यिक अनुभवहीनताकें देखबैत अछि। हुनक आक्रोश सत्य ओ उचित भऽ सकैत अछि मुदा ओहनो स्थितिमे शब्दक प्रयोगक एकटा सीमा छैक, जकरा लांघब शिष्ट समाजक लेल उचित नै। बहुतो टिप्पणी पढ़बाक क्रममे सेहो  किछु टिप्पणी पढ़ल, लागल जेना ई लोकनि मात्र मैथिली साहित्यक तथाकथित दुर्बल पक्ष पर टिप्पणी कऽ सकैत छथि, आर किछु नै। ओना हुनका लोकनिक टिप्पणीसँ मैथिली साहित्यकें कोनो प्रभाव नै पड़तैक से हुनका बुझक चाही। कारण किछु व्यक्तिक हो-हल्लासँ सार्थक काज रूकि नै सकैछ। ओ सभ एकटा वर्ग आ व्यक्ति धरि मैथिली साहित्यकें राखय चाहैत छथि, जे हुनक संर्कीणताक परिचय दैछ। यदि हुनका लोकनिसँ सार्थक काजक विषयमे पुछल जाएत तँ कहताह मैथिलीमे पाठक नै अछि। तँए ई रिस्क लेब निरर्थक। ओ लोकनि मात्र मैथिली साहित्यक खिधांस करताह, मैथिली साहित्यक सेवा नै। से किएक? ऐ बीच मैथिली साहित्यक लेल किछु सार्थक प्रसंग सेहो दृष्टिगोचर भेल अछि। से थिक विलक्षण दू टा पोथीक प्रकाशन। दुनू पोथी अपन बात रखबामे सफल भेल अछि। जीवकान्तक आत्मकथ्यात्मा पोथी नै मात्र गाम आ खेतीक महत्वकें जगजियार करैछ, अपितु अपन गाम आ धरतीक प्रति अनुराग सेहो उत्पन्न करैत अछि। जीवकान्तक लेखनीक अपन विशेषता छनि जइ कारणें हुनक लेखन सदैव एकटा नव भाव दैत आएल अछि। एहिना डॉ० वीणा ठाकुरक पहिल उपन्यास ‘ भारती’ मिथिलाक नारीक चेतनाक कथा तखन कहैत अछि जखन कि सम्पूर्ण भारतवर्षमे नारी चेतनाक विषयमे सोचलो नै जा रहल छल। ओइ समयमे ओ सम्पूर्ण भारत वर्षक विषयमे सोचि रहल छलीह। उपन्यासक कथा वस्तु नारी चेतना धरि सीमित नै रहि राष्ट्रीय जागरणसँ भरल अछि। अतिशयोक्ति नै हएत जे वर्तमान मिथिला आ भारत वर्षक परिस्थितिकें ई उपन्यास पूर्ण सार्थक आभास दैत अछि। हमर एकटा नेपाली भाषी कवि मित्र, जे दार्जिलिंगक थिकाह, देश, भाषा, समाज आ साहित्यपर चर्चाक क्रममे बहुत दुखी होइत कहैत छथि जे आदमी-आदमीक बीच एक दोसराक प्रति घृणाक भावनाक जन्म किएक भऽ रहल अछि आ ओ ऐपर घंटो अपन अभिमत दैत रहैत छथि, आ हमहूँ सभ हुनक ऐ चिन्तापर सहमत होइत रहैत छी। ई उद्धरण देबाक पाछाँ हमर ई अभिप्राय अछि जे हमरा सभकें जतेक सभ्य होएबाक चाही ओइसँ बेशी हमरा लोकनि असभ्य भऽ रहल छी आखिर किएक? की, एकर पाछाँ विश्व-मंच प्राप्त करबाक सपना अछि? एहन सपना तँ सभकें होएबाक चाही, मुदा सभ्यता-संस्कृतिक बलपर कतेक धरि उचित? लिखबा-पढ़बाक क्रममे सभसँ आगाँ अपन सभ्यता-संस्कृतिकें राखब बड़ आवश्यक ओ उचित सेहो। ....................................................................................................... ....................................................................................................... ........................................................................................................ (अतुलेश्वरजी, तारानन्द जीक जातिवाद दोसरे तरहक छन्हि- ओ लिखै छथि- "एतए तं मैथिलीक दुर्बल काया पर कूडा-कचडाक पहाड ठाढ करबाक सुनियोजित अभियान चलि रहल छै। एकर सफाइ लेल मेहतरक फौज चाही। ठीके तं छै। पहिने कहल जाय जे मैथिली ब्राह्मणक भाषा छी, आगू कहल जाएत जे मैथिली मेहतरक भाषा छी।" ऐ लिंक https://sites.google.com/a/videha.com/videha-audio/ पर मिथिलाक विभिन्न जातिक ऑडियो आ ऐ लिंक https://sites.google.com/a/videha.com/videha-video/  पर  वीडियो रेकॉर्डिंग ऑनलाइन उपलब्ध अछि जइमे डोम-मल्लिक (जकरा वियोगीजी मेहतर कहै छथि आ ओकरा आ ओकर भाषासँ घृणा करै छथि)क रेकॉर्डिंग सेहो श्री उमेश मंडल जीक सौजन्यसँ अछि। महेन्द्र मलंगियाक काठक लोक आ ओकर आंगनक बारहमासा जइ तरहेँ दलितक भाषाक कथित मैथिली (मलंगियाजीक सृजित कएल)क प्रति घृणा आ कुप्रचारक प्रारम्भ केलक तारानन्द वियोगी ओकरा आगाँ बढ़ेलन्हि। ई ऑडियो आ वीडियो रेकार्डिंग अन्तिम रूपसँ ऐ घृणा आ कुप्रचारकेँ खतम कऽ देने अछि आ विश्व ई सुनि आ देख रहल अछि जे जातिगत आधारपर मैथिली कोनो तरहेँ भिन्न नै अछि। वियोगीजी अपन ऊर्जा ऋणात्मक दिशामे लगबै छथि आ तकर कारण अछि हुनक दृष्टि आ आइडियोलोजीक फरिच्छ नै हएब आ तेँ दोसराक समालोचना ओ बर्दास्त नै कऽ सकै छथि। विदेहक सम्पादकीयपर हुनकर ओ टिप्पणी आएल छल जकर जवाब ओ अविनाश (आब अविनाश दास)क फेसबुक वॉलपर देने रहथिन्ह। एकर उत्तर पाठक सभ देने रहथिन्ह जे एतए नीचाँमे , हमर टिप्पणीक बाद) बिना काँट-छाँटक देल जा रहल अछि। ओही सम्पादकीयक रेस्पॉन्समे गंगेश गुंजन जी लिखने रहथि जे युवा सुभाष चन्द्रक ई गप जे "गंगेश गुंजन पाँच साल पहिने कमानी ऑडीटोरियममे कहने रहथि जे ओ हिन्दीमे लिखै छथि मुदा मैथिलीबला सभ हुनका पुरस्कृत कऽ देलकन्हि" सत नै अछि, ओ कहलन्हि जे ओ ई नै बाजल छथि, सुभाष चन्द्र एकर उत्तर नै देलथि से गुंजन जीक गप मानल जाएत। डॉ. धनाकर ठाकुर सेहो साहित्य अकादेमीपर आंगुर उठेबासँ दुखी रहथि आ विदेहक सह-सम्पादक श्री उमेश मण्डल जी केँ कएकटा मेल पठेलन्हि। ओ जगदीश प्रसाद मण्डल आ उमेश मण्डलक असली मानकीकृत भाषाक पक्षमे नै छथि, भाषा विज्ञानपर जखन उमेश मंडल बहसक प्रारम्भ केलन्हि तँ ओ अपनाकेँ डॉक्टर बना लेलन्हि आ बहसमे भाग नै लेलन्हि। मेलक अतिरिक्त हजारीबागक "सगर राति दीप जरय"मे ओ आ बहुतो गोटे कहैत सुनल गेलाह- एना नै लिखू, अशोक-श्रीनिवास आदि सन लिखू, पहिने पढ़ू तखन ओहने लिखू (ई मानि कऽ ओ सभ चलै छथि जे ओ सभ बिन पढ़ने लिखै छथि!)। बेनीपुरीक "अम्बापाली" नाटक हिन्दीमे छै, एन.सी.ई.आर.टी. ओकरा स्कूलक पाठ्यक्रममे लगेलक मुदा सम्पादक कहलन्हि जे "क्रिया ’है’ क अनुपस्थिति" जेना "वह जा रहा",  बेनीपुरीपर स्थानीय क्षेत्रक प्रभावक परिणाम अछि आ तेँ सम्पादक मण्डल ओकर ऐतिहासिकताकेँ देखैत स्कूली पाठ्यक्रममे रहलाक बादो ओकरा सम्पादित नै कऽ रहल अछि। मुदा जखन उमेश मण्डल/ जगदीश प्रसाद मण्डल/ राम विलास साहू लिखै छथ,ि ओ जाइत, ओ खाइत, तँ "सगर राति"मे भाषा-विज्ञानसँ अनभिज्ञ विशेषज्ञ सभ किछु एहेन सलाह दऽ दै छथि जे मैथिलीक मूल विशेषते गौण पड़ि जाए, मैथिलीसँ प्रभावित बेनीपुरीक हिन्दी, एन.सी.ई.आर.टी.क सम्पादकसँ मैथिलीक नामपर बचि जाइत अछि, मुदा मैथिलीमे पसरल जातिवाद ओकरा नै छोड़बापर बिर्त अछि। से जातिवादी मानसिकता सी.आइ.आइ.एल.क अनुवाद मिशनक परिणामकेँ सेहो भयंकर रूपेँ प्रभावित करत, कारण ओइमे छद्म मानकीकरणक आधारपर अनुवाद कार्यशाला आयोजित भऽ रहल अछि। मैथिलीक तथाकथित स्थापित/ पुरस्कृत साहित्यकार यावत असल मानकीकरणकेँ नै पकड़ताह, हुनकर अस्तित्व उपरोक्त राक्षसी प्रतिभा (विषय-वस्तु आ भाषा दुनू दृष्टिकोणसँ) सभक सोझाँमे मलिछौने रहत। १.जातिवादी मानसिकता माने जे केलक से हमर आनुवंशिक जाति केलक, से ककरोमे भऽ सकैए। छद्म मानकीकरण: एकटा खास जातिवादी स्कूलक विचारकेँ प्रश्रय देलाक परिणाम, जे एकाध किताब सी.आइ.आइ.एल. मैथिलीमे निकाललक अछि आ जइ तरहेँ ओकर मानकीकरण प्रोजेक्ट सालक सालसँ बिना परिणामक चलि रहल छै। असल मानकीकरण: मिथिलाक सभ क्षेत्रक सभ जातिक बाजल जाएबला मैथिलीक आधारपर गहन विचार विमर्शसँ बनाओल मानकीकृत मैथिली। एकर बानगी ऐ लिंक https://sites.google.com/a/videha.com/videha-pothi/ पर देल बेचन ठाकुर/ जगदीश प्रसाद मण्डल आदिक रचनामे भेटत। फील्डवर्क ऐ लिंक https://sites.google.com/a/videha.com/videha-audio/ पर देल -मिथिलाक सभ जाति आ धर्मक संस्कार, लोकगीत आ व्यवहार गीत (सौजन्य: उमेश मंडल)- ४६ टा ऑडियो फाइलमे भेटत आ ऐ लिंकक https://sites.google.com/a/videha.com/videha-video/ - मिथिलाक सभ जाति आ धर्मक संस्कार, लोकगीत आ व्यवहार गीत (सौजन्य: उमेश मंडल) - ४४ टा वीडियो फाइलमे भेटत तथा २००० पाठकक विचारपर आधारित सारांश ऐ लिंकपर http://www.videha.co.in/new_page_13.htm भेटत। ऑडियो आ वीडियो फाइल महेन्द्र मलंगिया द्वारा “काठक लोक” आ “ओकर आंगनक बारहमासा” द्वारा प्रचारित शोल्कन्हक कथित (इजाद कएल) मैथिलीपर अन्तिम प्रहार अछि। राक्षसी प्रतिभा: पूरा ब्राह्मणवादी मैथिली साहित्यकारक अपठित दुनियाँ एक दिस आ जगदीश प्रसाद मण्डल, राजदेव मण्डल, बेचन ठाकुरक पठित दुनियाँ दोसर दिस,  जकरा ब्राह्मणवादी मैथिली साहित्यकार लोकनि “राक्षसी प्रतिभा” सम्भवतः आलोचनात्मक रूपमे कहताह/ कहै छथि मुदा हमरा मोने ओ हुनका सभक हारिक शुरुआत अछि। २. धनाकर जीक एकटा विचार छलन्हि (विचार नै निर्णय छलन्हि) जे रामनाथोक बदला रामनाथहुँ हेबाक चाही!! उमेश मण्डल आ धनाकर ठाकुरक पूर्ण बहस विदेहक ८४म अंकक सम्पादकीयमे आएल अछि। ३.विदेहक नूतन अंकमे जगदीश प्रसाद मण्डलक दीर्घ कथा शम्भूदास आएल अछि, ओकर दोसर पारा देखल   जाए:- “जहि‍ना बाध-वोनक ओहन परती जइपर कहि‍यो हर-कोदारि‍ नै चलल सुखि‍-सुखि‍ गाि‍छ-वि‍रि‍छ खसि‍ उसर भऽ जाइत, ओइ परतीपर या तँ चि‍ड़ै-चुनमुनीक माध्‍यमसँ वा हवा-पानि‍क माध्‍यमसँ अनेरूआ फूल-फड़क गाछ जनमि‍ रौद-वसात, पानि‍-पाथर, अन्‍हर-वि‍हाड़ि‍ सहि‍ अपन जुआनी पाबि‍ छाती खोलि‍ बाट-बटोहीकेँ अपन मीठ सुआदसँ तृप्‍ति‍ करैत तहि‍ना जमुना नदीक तटपर शंभूदासक जन्‍म बटाइ-कि‍सान परि‍वारमे भेलनि‍।” की एतए “जाइत” "करैत" क बाद अछि देब आवश्यक छैक? ४.किछु विचार टिप्पणी: मैथिली सम्बन्धी किछु समाचार / घटना/ प्रकाशन पर चारिटा विचार-टिप्पणी—ऐ सन्दर्भमे। सी.आइ.आइ.एल.क अनुवाद मिशनक आरम्भिक मेहनति अपठित मैथिली साहित्यक साहित्यकारक कार्यशाला अछि, ओकरा पाठकसँ कोनो मतलब नै छै आ ने असल पठित साहित्यकारक साहित्यसँ। से ओकर परिणाम वएह हेतै जे साहित्य अकादेमीक छै। अमरजी लिखै छथि- साहित्य अकादेमीक पोथी सभ गोदाममे सड़ि रहल छै। - गजेन्द्र ठाकुर, सम्पादक) [[ मैथिली मे जं फूइसक आंधी चलत, तं कोना बांचत हमर भाखा by Avinash Das on Sunday, June 19, 2011 at 4:52pm तारानंद वियोगी मैथिलीक सुप्रसिद्ध लेखक डा० विभूति आनन्द आइ बहुत दुखी भ' क' हमरा फोन केलनि। भाव-विह्वल छला आ ताहि संगे आक्रोशित जकां सेहो। हम पुछलियनि - भाइ, की बात? ओ बेर-बेर कहथि - 'अहां कें एना नहि बजबाक-लिखबाक चाही।' हम चकित रही जे आखिर एहन कोन बात हम बजलहुं वा लिखलहुं जाहि सं हमर ई आदरणीय लेखक एहि तरहें दुखी छथि। बात जे ओ कहलनि, ताहि सं हम बुझलहुं जे हुनकर क्यो अपेक्षित हुनका कहलकनि जे तारानन्द वियोगी 'विदेह' (मैथिली इन्टरनेट पत्रिका एवं फेसबुक-ग्रुप) मे कहलखिन जे विभूति आनन्द कें जे साहित्य अकादमी पुरस्कार भेटलनि, से बेटाक मृत्युक सान्वना-स्वरूप। हमर देह सिहरि गेल जे हे भगवती, ई लीला। एहि बात सं तं हम निश्चिन्त रहबे करी जे एहि तरहक घटिया बात हम आइ तं की जे कहियो बाजिये नहि सकै छी। मोन मे यैह आएल जे गजेन्द्र ठाकुर हमरा सं दुश्मनी निमाहैत-निमाहैत की आब एते पतित भ' गेला? पछिला तीस बरस सं साहित्य मे हमर बहुत दुश्मन भ' चुकलाह अछि। हमरा खिलाफ मे जते लिखल गेल अछि, तकरा जं पुस्तकाकार छपाओल जाय तं पांच सौ पृष्ठक विशाल ग्रन्थ भ' जेतै। एकरा हम कहियो बेजाय नै मानलियै, उनटे अपन सौभाग्य मानलहुं जे जीबन्त-जागन्त लोक छी तं वैचारिक विरोध तं हेबे करत। तकरा सब कें पढबाको फुरसत हमरा नै रहैए। अपन काज करी कि घून-सून लेने घुरी? मुदा ओ कहलनि तं हम कने ताक-झांक केलहुं। एतबा बात तं प्रायः सब गोटे कें बूझल हएत जे इन्टरनेट पर वा फेसबुक मे सैकडोक संख्या मे फरजी एकाउन्ट छै, जे साइबर-युद्ध मे नकली सेनाक काज करै छै। कतेक बेर तं ई डिसाइड करब कठिन भ' जाइ छै जे के असली आ के नकली। जे किछु। एहने एक कोनो बन्धु बहुत उद्दंड भाषा मे लिखलनि अछि जे ई बात हम तहिया कहने रही, जहिया विभूति जी कें अकादमी पुरस्कार भेटल रहनि आ साक्ष्य के तौर पर 'समय-साल' पत्रिका के उल्लेख कएल गेल छै। गजेन्द्र जी एहि कथन कें अपन स्वीकृति प्रदान केलनि अछि। हम विभूति जी कें सब बात कहलियनि। पुछलियनि---'की अहां कें मोन पडैए जे हम तहिया ई बात कहने रहियै?' मुदा, हुनको ई बात अविश्वसनीय लगलनि। अन्त मे ओ 'समय-साल' निकाललनि। सरिया क' देखलनि। अन्त मे फेर वैह हमरा फोन क' क' सूचित केलनि जे अहांक ई बात कहबाक तं कतहु कोनो जिक्र नहि अछि। ओ हमरा पर दुखी भेल छला, ताहि लेल अपसोच प्रकट केलनि। फेर गप भेल जे हमरा एहि बातक खंडन प्रकाशित करबाक चाही। हम भारी छगुन्ता मे छी जे की खंडन प्रकाशित करी? अनजान मे गलती हो तं आदमी सुधरि सकैए। एतए तं मैथिलीक दुर्बल काया पर कूडा-कचडाक पहाड ठाढ करबाक सुनियोजित अभियान चलि रहल छै। एकर सफाइ लेल मेहतरक फौज चाही। ठीके तं छै। पहिने कहल जाय जे मैथिली ब्राह्मणक भाषा छी, आगू कहल जाएत जे मैथिली मेहतरक भाषा छी। खंडन केने सं की हएत? हम पहिनो खंडन क' चुकल छी। मुदा ओ सब अपन खुट्टा ठामे पर गाडने रहला। उनटे बकथोथनि करए लगलाह। तैयो, विभूति जीक सम्मानार्थ हम इन्टरनेट सं जुडल मैथिलीक पाठक-लेखक-एक्टिविस्ट लोकनि कें सावधान करै छियनि जे 'विदेह' मे छपल कोनो बातक विश्वसनीयता अत्यन्त संदिग्ध होइ छै। ई छौडा-मारडि के खेती छिऐक, नै उपजल तं अथी सती.....। जं कोनो कारण सं विश्वास करब बहुत जरूरी हो तं साक्ष्य के परीक्षण स्वयं क' लेथि। Samrendra Kumar Das kee leekh deliyai yau ? June 19 at 9:08pm ·

Ajit Azad oh...bashir badra ji ahan aai fer mon parlahun.......DUSHMANI JAM KE KARO, MAGAR ITNI GUNJAAISH RAHE...KI JAB KABHI HAM DOST BANE TO SHARMINDA NA HON. June 19 at 10:01pm ·

Prabhat Jha Kabe kis muh se jaaoge ghalib Sharm tumko magar nahi aati June 19 at 10:06pm ·

Priyanka Jha Ajay Karn परम आदरनिये तारानंद जी, अपनेक टिपण्णी फेश बुक पर अध्यन करबाक सुअवसर भेटल त हम अपनाके धन्य बुझलौं. एही टिपण्णी में अपने मुख्य रूप सं आदरनिये डा० विभूति आनन्द सं वार्तालाप करीत जाइन परेत छी मुदा छोट मुह आ पैघ बात ...किछु संदर्भित उल्लेख सं वक्तिगत रुपें हम असहमत छी .(1) अपनेक अनुसार "मैथिलीक दुर्बल काया पर कूडा-कचडाक पहाड ठाढ करबाक सुनियोजित अभियान चलि रहल छै। एकर सफाइ लेल मेहतरक फौज चाही। " सब मैथिल अपनेक ई बात सं सहमत होयता मुदा प्रश्न जे ई "सुनियोजित अभियान" चला के रहल छथि? ..... हमर वक्तिगत विचार जे ई अभियान हम सब मैथिल बंधू समलित रूप सं संचालित क रहल छी. ( ख़राब नें मानब मुदा जखन अपनेक पुत्रक फेश बुक देखल तं भाषाक स्तम्भ में मैथालिक कोनो चर्चा नै छल) तै एकर सफाइ लेल मेहतरक फौजक नै अपन कर्तब्यक मांग थिक जाहि सं एकरा बजबूत आ समृद्ध कैल जाए.(2) भाषा कोनो उपजातिक ( अपने उध्ह्रित केने छी जे " पहिने कहल जाय जे मैथिली ब्राह्मणक भाषा छी, आगू कहल जाएत जे मैथिली मेहतरक भाषा छी। ") संपत्ति व एकाधिकारक चीज कदापि नें भ सकित अछी आ मैथिलि त एकदमे नै | ई त कोनो बिसेष प्रान्त, स्थान व् देसक अलंकार थिक . अइयो ब्राह्मण या मेहतर सं कही बेसी आन उपजतिकलोकक भाषा मैथली थिक .(3) अपने कहलों जे " 'विदेह' मे छपल कोनो बातक विश्वसनीयता अत्यन्त संदिग्ध होइ छै" मुदा हम विदेहक नियमित पाठक छी आ लगभग विदेह में छपल सब बात हमरा त विश्वसनीय लागल.अंत में कहब जे छौडा-मारडि के खेती छिऐक तहिलेल विश्वसनीय छिऐक..!!!विदा लेबं सं पाहिले अपने सं निवेदन जे जं हमर उपुक्त कोनो बात सं ज अपनेक असुबिधा वा कष्ट पहुंचल होए त हम छमाप्रार्थी छी ... June 20 at 8:03am ·

Priyanka Jha Aman Thakur baar nik vichhar apneke,aanhake vichhar saa aanha katek sresth log hoyab e baatak pata chaliye yeah... sresth log par katbo kiyo anguli utheta lekin sresthta ehen chij chai k oo apna adhigrahit vyaqti k saath kahiyo nai chorrai chhai !!! aahan apan kaaj nik dhang saa karu baki duniya k je kara k chhai se kara diyaw.. hum sab aanhke saath hamesha deba lel taayar chhi.... about an hour ago · Like · 1 person Dhirendra Kumar लत्तड -फत्तड ककाका जे खिस्सा समय सालमे अबै छै ओइमे लिखल छलै (वियोगीजी-अहाँकेँ संकेत क') जे विभूतिजीक पुरस्कारकेँ अहाँ सांत्वना पुरस्कार लइखि क' पठेने रहियन्हि आलेखमे जे ओ नै छपलनि मुदा लत्तड -फत्तड ककाक खिस्सामे लिखि देलन्हि। आ जखन अहाँक ऐ आलेख (विदेह फेसबुक) पर एकटा पाठक ई प्रश्न उठेलन्हि तकर दू मासक बाद अहाँकेँ एकर जवाबक खगता की पड़ल:- .. June 20 at 8:05am ·

Priyanka Jha Taranand Viyogi मिथिला के कुछ लडके इनदिनों फेसबुक पर मैथिली लेखकों से लड रहे हैं। मुझे तो पता भी नहीं था, देवेश ने आग्रह किया तो लडाई देखने मैं भी उनके आंगन गया था। मजा नहीं आया। लडके इस तरह विवस्त्र होकर लड रहे थे कि शामिल होने का मन भी नहीं किया।

लडाई की कुल जमा वजह यही दिखी कि लडके (और, उनके बुजुर्ग) मैथिली साहित्य में अपना स्थान चाहते हैं। यश और सम्मान। वाजिब बात है। यह उनको मिलना चाहिए। इसके लिए कई तरीके आजमाए जाते रहे हैं। एक पुराना तरीका है--सही-गलत मुद्दे खोज-खोजकर अपने सीनियर की कटु आलोचना करना और जहां तक बन पडे उन्हें गालियां देना। ये हर जगह होता है, हर पीढी में होता है।

लेकिन, इसके साथ-साथ अच्छा लिखना भी पडता है। ये लडके इन्टरनेट की विस्तृति और व्यापकता का गहरा ज्ञान रखते हैं। हथियार के तौर पर इसके उपयोग की समझ भी उनमें है। पर, ये अच्छा लिख नहीं पा रहे हैं। गहराई इनमें नहीं है। न संवेदना के स्तर पर न ज्ञान के स्तर पर। इसका जतन भी वे नहीं कर पा रहे हैं। पर, हडबडी है।............देखकर दुख होता है।

सीनियर के तौर पर गलियाने के लिए मुझे भी चुना गया है। खुशी हुई कि चलो, इस लायक समझा गया, 'नन-मैथिल' होने के बावजूद। मगर, दुख भी हुआ कि ये लडके ब्रह्म-वाक्य भाखने का दम्भ तो रखते हैं पर वास्तविक तथ्यों के बारे में कितना कम और अधूरा जानते हैं।देखिए, मुझे गाली देने के लिए ये 'जमीन्दार' शब्द चुनते हैं।

मेरी पुरस्कृत किताब 'ई भेटल तं की भेटल' के बारे में बहुत अद्भुत जानकारी इसमें दी गई है। समझें, मेरा भी 'ज्ञान-वर्द्धन' हुआ, खुद अपने बारे में। लिखा है कि ये किताब मेरी हिन्दी किताब 'यह पाया तो क्या पाया' का मैथिली रूपान्तर है। अबे यार, पूछ तो लिया होता। 'यह पाया.....' १५० पृष्ठों का कहानी-संग्रह है जो २००५ में प्रेस गया पर प्रकाशक के महिमा-वश अब तक भी बाहर न आ सका। इसलिए लिखनेवाले ने इस किताब को कहीं देखा भी न होगा। पर, लिख दिया मजे से। और, इसी बिना पर मुझे गलियाये जा रहे हैं।

अरे पंडित, कुछ तो स्तर निभाना सीख। कुछ तो गहरा हो यार। कुछ तो खयाल कर कि 'साहित्य' के क्षेत्र में काम करने आए हो, और वो भी विद्यापति की भाषा में। क्या होगा कल तुम्हारी 'मां मैथिली' का?.. Shyam Shekhar Jha, Bhaskar Jha, Dinanand Mishra and 11 others like this.

Pradeep Chaudhary bilkul shaee kaha aap ne Taranand babu April 14 at 12:05pm ·

Avinash Das Great View! Congrats!! Salaam!!! April 14 at 12:06pm ·

Kumud Singh आरोप लगानेवालों की चुप्‍पी परेशान करनेवाली है, आखिर वो तेवर दिखानेवाले गायब कहां हो गए April 15 at 10:50am ·

Prakash Jha मुझे अत्यंत ही आश्चर्य हुआ इस जानकारी से कि ये कौन लोग हैं । तारानन्द वियोगी जी द्वारा लिखित पुस्तक ई भेटल त' की भेटल मैलोरंग प्रकाशन से प्रकाशित है । और मुझे अपने पुस्तक के बारे में अच्छी जानकारी है । इस तरह के विवादों को उठाने वाले लोग सच...See More April 15 at 10:56am ·

Manoj Karn ai nab ukas pakasak darsnarth dhanyabad.-munnajee. April 15 at 7:34pm via ·

Vikash Jha taranand sire....main ek baat ye puchna chahta hun ki aapne apne aapko non-maithil kyun likha hai..ye baat mujhe pachi nahi...jara khulasa kijiyega... April 15 at 7:41pm ·

Shri Dharam ‎@Vikash ji maithilik tathakthit beta sab yatree je son la ka viyogi ji dhari jahi tarhen gariya rahal chathi tehna men keo ahi tarhen sochi sakait achi. jahi lekhak lokani ken gari del jarahal chani tinka jo maithili sn nikalidel jay t banchat kee ANNDA???? April 15 at 11:22pm ·

Vikash Jha ‎Shri Dharam...tain ne kahlaun ..jakahn sir kahalkhin hum non maithil chi bada dukh lagal...kiyek t e sab jaun naie rahthin t kona kaaj chaltaie...e t uchit naie ne ki kakro saun 2 ta gaier sunla per ham apna aap ke oie community saun alag k li??? April 16 at 1:28pm ·

Mihir Kirti ‎@ taranand--------------- vah main to kayal ho gaya aapki samvedna kaa jab hamre sahitykar vibhuti ji ko putrashok hua tha aur unnko akademi purskar mila tha to aapne samy -saal me main use santavna purskar kaha ----- us samay aapki samvedna ko kya lakva maar gaya thaa.......... April 16 at 1:48pm ·

Mihir Kirti ‎@prakash---------- kaysthvad ke virodh me aapka jo bramhanvadi chehra saamne aane ke bad shayd is tarh ka comment aapki prakaskiya majboori ho sakati hain. April 16 at 1:55pm ·

Kumud Singh वाह, यह बहस बता रहा है कि मैथिली साहित्‍य का स्‍तर कितना उपर चला गया है, सभी से निवेदन है कि सभी गाली दे कर अपनी भडास निकाल लें, इससे आरोपी और आरोपित दोनों मैथिली के सेवक कहलाएंगे, शर्म किजिए यह सार्वजनिक मंच है April 16 at 2:03pm ·

Mihir Kirti ‎@kumud jI mafi chahi. April 16 at 7:40pm ·

Mihir Kirti ‎Vikash Jha---- neek masla uthebak lel dhnyvad. bhai jena kichu saal phine bhartak cricket team ke captain par match fixing ke aarop lagal rahaik aa pramanit seho bhelaik. takar baad o captain bayan delkai je ham alpsankhayk chii aa sampradayik tatav sabh hamra virudh me kahdyantra kelk achi. vartman ghatna ehne san achi. April 16 at 7:45pm ·

Sunil Kumar Mallick Viyogi G Pranam Bahut dinak bad aahank kalam sa likhal Sabda sab bhetal khusi lagal. Sange dukh seho je kichh nenpani dekhaba balak chalte aahan maithili pratik aahank apan yogdan ke kyo bisair nai sakaiye. Dosar aahan apna ke Maithil Nai kahai chhi ta apne ki chhi ? what's your identity? Tesar aahank Jawab hindi me aayael kiye apan bhasa maithilike Kakro sa kam bujhai chhiyai? Abhivyaktik Madhyam ke roop me maithili ke lag sabda Bhandarak kami chhaik ki? charim aa antim wakya je aahan likhne chhi je

'साहित्य' के क्षेत्र में काम करने आए हो, और वो भी विद्यापति की भाषा में। क्या होगा कल तुम्हारी 'मां मैथिली' का? ki Maa maithili aahank Nai ? Viyogi san sidhasta writer aa maithili Pratik Dharna katau ne katau Bad taklif detai maithili me kaj kenihar lok sab ke. Besi Bajal hoi ta chhama kayal jetai. Sunil Mallick President Mithila Natyakala parishad, janakpurdham, Nepal May 13 at 8:51pm via ·

Bechan Thakur monak gap kahalau mallik ji..maithili par ehsan karaibalak kami nai chhai, kaj sutari gel aa maithili ke tata bye-bye kahai chhathi..hamahoo gair dvij chhi muda garv se kahai chhi je ham maithil chhi..muda tamase me te lokak asali vichardhara abaiye sonjha me..je karathu.. May 13 at 8:58pm ·

Bechan Thakur poora bahas etai achhi sunil kumar llikji http://www.facebook.com/notes/ashish-anchinhar/%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%B9%E0%A4%BF%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BF%E0%A4%95-%E0%A4%B5%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%A3-%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%95%E0%A...See More May 13 at 9:05pm ·

Bechan Thakur blog par seho achhi http://www.ashantprashant.blogspot.com/ ee sampoorna bahas, otai javab delak baad ai maithilik group par hatasha vyakt karbak kono aavashyakta nai chhal.. May 13 at 9:07pm ·

Sunil Kumar Mallick Bechan ji hatas sa besi ee taklif dai chhai khas ka ka Viyogi ji san Majal maithili abhiyani sa. Sunil Mallick May 13 at 9:10pm via ·

Bechan Thakur maajal lok sabh jan chhorthinh takhane asali groundwork lok sabh sojha ayatah aa maithili bachat.. May 13 at 9:11pm ·

Sunil Kumar Mallick Etta chhorbak Baat kyo gote nai karu, sametbak baat karu. maithili ke aab bachaba ke jaruri nai chhai. bachayael ta ooi ke jai chhai je Rogiyah wa mair rahal hoi. hamra janait Maithili samridhik dis ja Rahal aaichh aab matra kukur kataunjh sa kanek bachbak jarurat chhai. May 13 at 9:16pm via ·

Bechan Thakur sahi kahalau, muda gulchharra urabaibala sabh se bachebako jaroori parite chhai, ek gaal me thapar kha ka dosar gaal sojha dai bala jamana gelai.. May 13 at 9:18pm ·

Rajdeo Mandal samay aabi gel achhi je maithili aa hindi dunu me ekke rachna ke maulik kahay bala par aa false biodata denihar par lagam kasal jay, sametabak baat karait karai katek black-sheep maithili me ghusi gel achhi je hindi bala sabh maithili ke barbad karaile ghusene achhi.. May 13 at 9:29pm ·

Dhirendra Kumar ‎14 april 2011 se 23 june bhay gel adhai maas me, type kayal, va hastlikhit va kono roop me 150 panna ye paya to kya paya nai aayal, prakashak je 6 saal se kitab nai chhaplani takro naam nai aayal, daso panna te day ditiyai viyogiji scan kay ke.. June 23 at 5:38pm ·

Dhirendra Kumar Nitesh Jha ji ham galat chhalau, ee gari sabh ke ekatrit karoo te ek dedh nai doo-adhai say pannak pothi viyogi ji chhapba sakai chhathi.. June 23 at 5:39pm ·

Priyanka Jha Dhirendra Kumar विदेह सभ गपकेँ सोझाँ अनैत अछि, जे अहाँ सभ सन साहित्यकार गुपचुप कनफुसकी करैत रहैत छथि, ओतए मात्र सभ सम्वादक अभिलेखन कएल गेल छै जै सँ सभकेँ अपन करनीक जिम्मेवारी लेमए पड़तन्हि, गपाष्टकक गप खतमे बुझू.. 20 minutes ago · Like · 1 person Vinit Utpal 'samay sal' me ' lattar kaka' ke ohi sal i gap chapa chal jahi sal hunka puraskar bhetal. hamun padhne rahi.sanket del gel chhal. 20 minutes ago · Unlike · 2 people Dhirendra Kumar http://ashantprashant.blogspot.com/ 15 minutes ago · Unlike · 1 person Priyanka Jha viyogiji , je charcha ahank videha par del gel aalekh me uthal chhal kee o charcha maithili sahityakar madhya nai chhal, sabh ek dosra ke kahait rahait chhathi je shardindu ke ahan ee patra va aalekh pathene rahiyanhi, je vinit ji likhne chhathi se sanket hamhoo samay saal me dekhne chhii, kono satya va jhooth je ek kaan se dosar kaan aa aab facebook par aabi gel takar javab te maangale jayat, videhak jatek dushman badhtai o tatek aagan badhat..gajendra thakur se ahan ke kon dushmani achhi? ee spasht nai kay saklau.... June 20 at 8:08am ·

Avinash Das Priyanka Jha जी, केओ केकरो आलेख पठेलकय, नइं छपलइ, घुरा देल गेलय, ओइ आलेख मे एहन कोनो बात रहय, जो अशोभनीय छलइ - की ई सभ गप मैथिली साहित्‍य के उच्‍च विमर्शक कोनो माहौल बनबय छई? अफवाह आ कानाफूसी कि साहित्‍यक विमर्शक केंद्र मे हेबाक चाही? गजेंद्र ठाकुर नीक काज कए रहल छथि ... मुदा अपने काज मे अइ स्‍तरक बातचीत लाबि क ओ अपन सभटा उल्‍लेखनीय काज के मिटा देब' चाहैत छथि - तं दोसर की क' सकैत छैक!!! June 20 at 8:14am ·

Avinash Das खोजी पत्रकारिता उ हएत जखनि वियोगी जी के उक्‍त आलेख अहां सब प्रकाशित क' सकी। June 20 at 8:16am ·

Priyanka Jha अविनाशजी , अहाँकेँ कियो कहत जे कौआ कान ल' गेल तँ कौआ केँ खेहारब आकि कान ताकब.. June 20 at 8:21am ·

Priyanka Jha जै सम्पादकीयक आधारपर तारानन्द जी गप उठेने छथि ओ देखू. http://www.videha.co.in/aboutme.htm June 20 at 8:21am

Priyanka Jha विदेह फेसबुकमे हम पहिनहिये (अहाँक कहबासँ पहिने) ई आलेख कमेंटक संग पेस्ट क' देने छी,.. June 20 at 8:22am ·

Priyanka Jha ऐ सम्पादकीयमे वियोगीजीक कथनक विपरीत (जे सम्पादक अपन सहमति देखेने छथि) मात्र तथ्यक निरूपण कएल गेल छै..कानाफूसी बड्ड दिन भेलै आ तकर कोन ग्रुप जिम्मेवार अछि से अहाँकेँ बुझले हएत.. सम्पादकीयक अंश द' रहल छी.."तकर बाद तारानन्द वियोगी जीक हिन्दीमे रंग-तरंग आ अभद्र भाषा (रे-रे सम्बोधित कएल भाषा) मे पोस्ट दोसर ठाम आएल (विदेहक फेसबुक चौबटियापर) आ अपनाकेँ ओ गएर-मैथिल घोषित कएलन्हि आ सम्वेदनाक गप उठेलन्हि। ओइपर एकटा पाठक हुनका लेल मैथिलीक उपयोगिता पुरस्कार पएबा धरि सीमित बतेलन्हि तँ दोसर पाठक हुनकर सम्वेदनाक स्वरकेँ फूसि बतेलन्हि आ हुनका अपन “समय साल” मे पठाओल लेखक विषयमे मोन पाड़लन्हि जकर चर्चा बहुत दिन धरि मैथिली साहित्य मध्य चलैत रहल छल- ऐ लेखमे ओ विभूति आनन्दकेँ मैथिलीक मूल साहित्य अकादेमी पुरस्कार देल जएबाकेँ सान्त्वना पुरस्कार बतेने रहथि कारण ओइ बर्ख हुनकर जवान बेटाक मृत्यु भऽ गेल छलन्हि। ई पाठक वियोगीजी सँ प्रश्न केलन्हि जे तखन की अहाँक सम्वेदनाकेँ लकवा मारि गेल छल। एकटा पाठक प्रश्नक जवाबमे श्रीधरम कहलन्हि जे जाइ तरहेँ मैथिलीक किछु बेटा सभ यात्रीसँ वियोगी धरिक लेखनीक मौलिकतापर प्रश्न उठेने छथि तँ ओइ स्थितिमे कियो अही तरहेँ सोचि सकैत अछि। ओ ईहो कहलन्हि जे जँ हिनका सभकेँ हटा देल जाए तँ मैथिली साहित्यमे की बचत अण्डा !! बहुत दिनक बाद सुनील कुमार मल्लिक सेहो ऐ पोस्टपर वियोगीजी सँ प्रश्न केलन्हि जे अहाँ मैथिल नै छी तँ अहाँक आइडेन्टिटी की छी? "... June 20 at 8:26am ·

Priyanka Jha वियोगी डिसकसन सुरू केलन्हि, ओइपर अविनाशजी अहूँक कमेंट छल wow great views क' कय, आ ओइ पाठकक जवाब वियोगी जी नै देलन्हि..किए.. आ आब दू मासक बाद फोन एलापर आलेख लिखलन्हि..किए? फेर समय-साल मे ओ आएख पठेलन्हि आ ओ नै छपलै वा जे भेलै..मुदा ओही पत्रिका मे चुटकुलानन्द जेकाँ कोनो लत्तर कॉलममे ई बात एलै.. तकर की जवाब अछि. कियो कहय कौआ कान ल' गेल तँ पहिने कान देखबाक चाही..विदेह फेसबुकपर ई आलेख हम छपि देने छी..मुदा wow.great क बाद अहाँ प्रयः ग्रुप छोड़ि देने ask to join group क्लिक करू..हम रिक्वेस्ट एक्सेप्ट क' लेब, तखन अहाँ ओ पढि सकब.. June 20 at 8:32am ·

Avinash Das फुरसति मे आराम सं पढ़ब अहां सभके गप... June 20 at 8:52am · ]] ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। १.नन्‍दवि‍लास राय-कथा-बाबाधाम २.बिपिन झा-जन्मदिनक बदलैत स्वरूप १. नन्‍दवि‍लास राय, जन्‍म- 02.01.1957ईं.मे, शि‍क्षा- बी.एस.सी. (गणि‍त), आइ.टी.आइ. (टर्नर)।गाम, पोस्‍ट- भपटि‍याही, टोला- सखुआ, वाया- नरहि‍या, जि‍ला- मधुबनी, ि‍बहार। कथा- बाबाधाम बोल-बम बोल-बम। बोलबम-बोलबम ई आवाज कमलीक कानमे पड़ल तँ ओ घास काटव छोड़ि‍ सड़क दि‍स‍ तकलक। एकटा बसमे पीयर-लाल कपड़ा पहि‍रि‍ने लोक सभकेँ देखलक। बसक भीतर आ छतपर लोक सभ बैस कऽ बोलबम-बोलबमक नारा लगवैत छल। बस तेजीसँ सड़कपर दौड़ रहल छल। कमलीक खेत सड़कक कातेमे छल। ओ खेतक आरि‍पर घास काटि‍ रहल छलि‍। कमली सोचए लगली- कतेक लोक बाबा धाम जाइत अछि‍ मुदा हमर तँ भागे खराप अछि‍। कतेक दि‍नसँ वि‍कलाक बापकेँ कहैत छी मुदा ओ अछि‍ जे धि‍याने ने दैत अछि‍। कमली आ लखन दू परानी। एकटा बेटा ि‍वकला। वि‍कला सातमे पढ़ैत। लखनक माए-बापक सत्तर अस्‍सी बर्खक बूढ़। लखनकेँ पाँच बि‍घा खेत। एक जोड़ा बड़द आ एकटा महीसो। लखनकेँ कतौ जइक लेल सोचए पड़ए। कि‍एक तँ सत्तर बर्खक बूढ़ माए आ अस्‍सी बर्खक अथवल बापकेँ छोड़ि‍ कतए जाएत। तइपर सँ एक जोड़ा बरद आ महीसोकेँ देख-रेख। पाँच बि‍घा खेतमे लागल फसलक ओगरवाही। असगरे कमलीसँ कोना पार लागत। तैं कमलीक बाबाधामबला बातपर लखन धि‍यान नै दैत छल। लखन सोचए कमलीकेँ गामक लाेक संगे बाबा धाम भेज देव तँ भानस के करत? धास के आनत। असगरे हम की सभ करब। बेटा वि‍कला पढ़ते अछि‍। ओकरा स्‍कूलसँ छुट्टी होइत अछि‍ तँ ओ टीशन पढ़ै लए चलि‍ जाइत अछि‍। बि‍ना टीशन पढ़ने कोना परीक्षा पास करत। सरकारी स्‍कूलमे की आब पढ़ाइ होइत अछि‍। मास्‍टर सभ बैस कऽ गप लड़बैत रहैत अछि‍। चटि‍या सभ कोठरीमे बैस कऽ गप करैए अथवा लड़ाइ-झगड़ा। मास्‍टर सबहक लेल धनि‍ सन। लखन अपन खेती गृहस्‍थीक संगे माए-बापकेँ सेवा नीकसँ करैत अछि‍। माए तँ थोड़े थेहगरो छथि‍न मुदा बापकेँ उठवो-बैसवोमे दि‍क्‍कते छन्‍हि। हुनका पैखाना-पैशाव लखनेकेँ कराबए पड़ैत अछि‍। पौरकाँसाल फगुनमे लखनक पि‍ताजीकेँ लकबा मारि‍ देलकनि‍। मश्रा पॉली क्‍लि‍नीक दरभंगामे इलाज करेलासँ जान तँ बचि‍ गेलनि‍ मुदा अथवल भऽ गेलाह। भगवान लखन जकाॅँ बेटा सभकेँ देथुन। ओ तन मन आ धनसँ माए-बापकेँ सेवा करैत अछि‍। लखनक एकटा संगी अछि‍। नाम छी सुकन। सुकन लखनसँ वसी धनीक अछि‍। दूटा बेटा अछि‍ सुकनकेँ। दुनू बेटा सातवाँ तक पढ़ि‍ दि‍ल्लीमे नौकरी करैत अछि‍। मासे-मासे बेटा सबहक भेजलाहा ढौआ सुकनकेँ भेट जाइत अछि‍। सुकनोक माए-बाबू जीवते छथि‍न। सुकनक माए कम देखैत छथि‍न। हुनका राति‍केँ सुझवे नै करैत छन्‍हि। एक दि‍न सुकनक माए राति‍केँ ओसारपर सँ गि‍र गेलखि‍न हुनका पएरमे मोच पड़ि‍ गेलन्‍हि‍। लखनकेँ पता चलल ते ओ सुकनक माएक जि‍ज्ञासा करै लए गेल। सुकनक माए लखनकेँ अपने बेटा जाहि‍त मानैत छेलखि‍न। लखन सुकनक माएसँ पुछलक- “‍माए कोना कऽ ओसारपर सँ गि‍र गेले।” सुकनक माए बाजलि‍- “बौआ, आब हमरा सुझै नइ अछि‍। राति‍ कऽ तँ साफे नै देखैत छी। बेचू बाबूक छोटका कनटीरबा दरभंगामे डाकडरी पढ़ैत अछि‍ ओ फगुआमे गाम आएल छल हुनाक कहलि‍ऐ तँ ओ हमर दुनू आँखि‍ देखलक आ कहलक जे दुनू आँखि‍मे मोति‍यावि‍न भऽ गेलौहेँ। कहलक जे ऑपरेशन करेलासँ ठीक भऽ जाएत आ नीक जहाति‍ सुझए लगत।” हम सुकनकेँ कहलि‍ऐ तँ ओ कहलक जे एखन ढौआ नै अछि‍। ढौआ हएत तँ लहान लऽ जा कऽ ऑपरेशन करा अनबै। मुदा फागुनसँ भादो आबि‍ गेल, ऑपरेशन नै करा आनलक। सुनै छि‍ऐ चौठचन्‍द्रक परात दुनू परानी बाबाधाम जएत। सुकनक बाबूजी सत्तरि‍ बर्खक छथि‍न। ओ नामी गि‍रहत छलाह। तरकारी उपजा कऽ बेचै छलाह। तरकारी बेचि‍ कऽ पाँच बि‍गहा खेत कीनलाह। आब उमर बेसी भेलासँ काज करै जोकर नै रहलाह। हुनका चाह पीबाक आदति‍ भऽ गेल छन्‍हि‍। भोर आ साँझ चाह हेबाके ताकी। एकटा आदति‍ आओर छन्‍हि‍, खैनी खाइक। सुकन अपनाबाबू जीकेँ चाह आ खैनी नै जुमाबैत अछि‍। केहैत छन्‍हि‍- कैंसर भऽ जेतह। मुदा अपना पान-पराग, सि‍गरेट, दारू सबहक सेवन करैत अछि‍। एक दि‍न लखन सुकनक दलानक पाछाँसँ जाइत छल तँ सुकन जोर-जोरसँ बाजब सुनि‍ कऽ ठाढ़ भऽ गेल। सुकनक दलानक पाछाँसँ सड़क गुरजै छै। सड़केपर सँ लखन सुनए लागल। सुकन बजै छल- “हरदम चाह-चाह रटैत रहैत छहक। कि‍छु बुझबो करै छहक। चीनी चालीस टके कि‍लो भऽ गेल। चाहपत्ती जे बारह टाकामे भेटै छलै आब बीस टाकामे भेटै छै। पानि‍बला दुध पन्‍द्रह रूपैये गि‍लास। के जुमत चाहमे। आ तोरा भोर-साँझ चाह हेबाके चाही। हम न‍ सकब-तोरा चाहजुमबैमे।” बूढ़ा कि‍छु नै बजैत रहथि‍। लखनकेँ कोनो जरूरी काज रहै तँए ओ आगाँ बढ़ि‍ गेल। सुकन अपना पड़ोसि‍या ओइठाम माए-बाबूक भोजनक जोगार लगा कऽ चौठचन्‍द्रक वि‍हाने दुनू परानी बाबाधाम वि‍दा भऽ गेल। सुलतानगंजमे गंगाजल भरि‍ कामौर लऽ बाबाधाम पहुँचल। एकादशीकेँ बाबाधकेँ जल चढ़ा वासकीनाथ, तरापीठ होइत ओतएसँ कलकत्ता चलि‍ गेल। एमहर एे बीच सुकनक बाबूजी बेमार पड़ि‍ गेलखि‍न। हुनका बोखर लाग गेलनि। लखनकेँ संमाद भेटल जे सुकनक बाबूजी दुखि‍त छथि‍न। लखन ओइठाम जा डाक्‍टरकेँ बजा कऽ अपना दि‍ससँ खर्च कऽ बूढ़ाक इलाज करौलक। जाबे धरि‍ सुकन दुनू परानी बाबाधमसँ आपस नै आएल ताबे धरि‍ लखन दि‍नमे एकबेर सुकनक माए-बाबूक भेँट करबाक लेल नि‍श्चि‍त जाए। दुनू गोटेक लेल अपना दि‍ससँ चाहरे आ खैनीयोक जोगार लखन कऽ देने छल। सुकन जि‍ति‍या पावनि‍सँ तीन दि‍न पहि‍ने गाम आएल। सुकनकेँ बाबाधाम आ कलकत्तासँ आपस अएलाक दोसर दि‍न भि‍नसरे चौकपर चाहक दोकानपर लखनक भेँट सुकनसँ भऽ गेल। सुकन चाहक दोकानपर बैस कलकत्ताक वर्णन करैत छल। लखन सुकनसँ रास्‍ता-पेराक समाचार पुछलक। तँ सुकन कहलक- “रौ दोस, बाबाक कृपासँ सभ कि‍छु नीके रहलौ। दुनू पानी कलकत्तो घुमि‍ये लेलि‍यो। तोँ खाली बैंकमे ढौआ राख ने। तोँ की बुझबेँ धरम-करम। तोरा जँ ढौआक आमदनी हेतौ तँ तोँ खेत भरना लेमे नै तँ बैंकमे रखमे। हम दुनू परानी दस बर्खसँ कामोर लऽ कऽ बाबाधाम जाइत छी।” सुकनक बात लखनकेँ नै सोहाएल। ओ सोचलक जे एखन एकरा जबाब देनाइ ठीक नै हएत। लखन- “रौ दोस, से तँ ठीके कहै छी। हम धरम-करम की बूझब। मुदा हम अपन माए-बापक सेवा तन-मन-धनसँ करै छी। हमरा लेल तँ बाबाधाम हमर माइये-बाबू छथि‍। हमरा लेल तँ हमर बाबूजी साक्षात् महादेव आ माए पार्वती छथि‍। हुनके दुनू गोटेक सेवा करब बाबाधाम कामोर लऽ कऽ जाएबसँ बेसी नीक बुझै छी। ककरो अधलाहो नै सोचैत छी आ ने करै छी। तोँ कह जे माइक मोति‍यावि‍न्‍दक ऑपरेशनक लेल तोरा ढौआ नै छौ। बाबूजीक चाह पि‍याबैक लेल तोरा ढौआ नै छौ। मुदा बाबाधाम जेबाक लेल ढौआ छौ। कलकत्ता घुमैक लेल ढौआ छौ। दारू पीबैले ढौआ छौ। माएकेँ सुझै नै छौ। राति‍ कऽ ओसारापर खसलखि‍न तँ पैरमे मोच पड़ि‍ गेलनि‍। जँ तोँ अपन माइक मोि‍तयावि‍न्‍दक ऑरोशन करा आनने रहि‍तेँ तँ ओ ओसारापर सँ नै खसि‍तथि‍न। अपने दुनू परानी बाबाधाम गेलाह मुदा माए-बाबूक भोजनक जोगार पड़ाेसि‍या ओतए लगा कऽ गेलेँ। तोहर बाबूजी बेमार पड़ि‍ गेलखुन तँ डॉक्‍टर बजा हम इलाज करौलि‍यनि‍। तोँ बूढ़ माए-बाबूकेँ एकोटा टाका नै देने गेल रहेँ। अपना दुनू परानी बापक अरजलहा सम्‍पत्ति‍ आ बेटा सभक कमाइसँ एश-मौज करै छेँ। मुदा माए-बाप एक कप चाहक लेल काहि‍ कटै छौ। धुर बूरि‍ तोँ की बजमेँ।” लखनक बात सुनि‍ सुकन गुम्‍म पड़ि‍ गेल। ओकरा कोनो जबाबे नै फुराएल। ओरका भेल जेना बीच बाजारमे कि‍यो नंगट कऽ देलक। २ बिपिन झा जन्मदिनक बदलैत स्वरूप [एकर लेखक बिपिन कुमार झा (Senior Research Fellow), IIT मुम्बई मे संगणकीय भाषाविज्ञान (संस्कृत) क्षेत्र मे शोध (Ph. D.) कऽ रहल छथि। ] सालो बीत गेल ओहि गप्पक मुदा अखनहुँ ओहिना स्मरण अछि। जन्मदिन केर अवसर पर कदाचिते कोई एहेन होयत जेकरा आनन्द नहिं हो। मुदा पारम्परिक रूप सँ मनाओल जाई बला जन्मदिवसोत्सव आ आजुक समय मे मनाओल जाइ बला जन्मदिवसोत्सव केर स्वरूप में बहुत अन्तर् आबि गेल। एहि पत्रक में हम  उचित आ अनुचित केर गप्प नहिं कय रहल छी। पारम्परिक रूप सँऽ जन्मदिन तिथि केर् अनुरूप मनाओल जाइत छल। किन्तु आई काल्हि प्रचलित कैलेण्डर केर अनुसार मनाओल जाइत अछि। कारण स्पष्ट अछि। अपन समाज में जन्मक पंजीकरणस्वरूप भारतीय माह आतिथि छल जन्मक समयानुसार राशि आदि केर निर्धारण होइत छल। मुदा वर्तमान समाज में जन्मतिथिक मान्य प्रमाण पत्र आदि ग्रेगेरियन कैलेण्डर केर अनुसार होइत अछि। अस्तु जन्मदिन स्वाभाविक रूप सँऽ दिनांकानुरूप मनेबाक प्रथा चलल। ई द्वैधीभाव कखनहु के बहुत असुविधा दैत अछि। यदि देखल जाय तऽ दिनांकानुरूप हो अथवा तिथिक अनुरूप कतहु समस्या नहिं अछि। समस्या त अछि जन्मदिवसोत्सव मनेबाक स्वरूप में। ओहि समय जन्मदिन उपलक्ष्य मॆं तिल लगायब छीटब आ संगहि मारकण्डेय पूजा आदि केर प्रावधान छल। मुदा आई केक काटब बाह्याडम्बर केर संग गिफ्ट केर आदान प्रदान, नाच-गान, मांस-मदिरा आदि केर कदाचित प्रावधान बनल जा रहल अछि। आवश्यकता अछि जे आगू क पीढी कें एहि सन्दर्भ में नीक आ अधलाह क जानकारी देलजाय। जन्मदिन के मात्र एकटा पिकनिक केर दिन नहिं बनय देलजाय। अपितु आगू केर वर्ष में उत्कर्षदायक कार्य हेतु प्रोत्साहन हेबाक चाही। दीर्घायु हेबाक हेतु यथोचित आचरण निमित्त कार्य हेबाक चाही। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। जवाहर लाल कश्यप (१९८१- ), पिता श्री- हेमनारायण मिश्र , गाम फुलकाही- दरभंगा। एक टा विहनि कथा लहास सड़कक बीचो-बीच एकटा लहास राखल छै / ओ कोनो सुनसान बाट नै अछि , मोहल्लाक ओइ रोडपर कतेक रास दोकान आ घर अछि / किछु लोक ओइ लहासकेँ घेरने ठाढ़ अछि, आ बहुत लोक अगल-बगल ठाढ़ भऽ घटनाक अंदाज लगा रहल अछि / अंदाज  कि लगायत सच तँ सभकेँ बुझले छै / मात्र एक घंटा पहिले ओकर हत्या रोडपर सभक सामने भेलै / चारि आदमी , कियो लाठी आ कियो रड सँ  मारि रहल छल / ओ बचावमे हाथ उठेलक, ओकर हाथ तोड़ि देल गेलै /ओ भागैक कोशिश केलक ओकर पएर तोड़ि देलक / ओ अपाहिज भऽ लोकसँ गुहार केलक मुदा कियो नैह आएल / सभ चारुकेँ चिन्हैत छल , ओ टुन्ना सिंहक आदमी छल आ ककरोमे ओकरासँ अराड़ि लेबाक हिम्मत नै छलै / ओ  रोडपर खसि पड़ल /चारु रडसँ मारि ओकर कपार फाड़ि देलक / ओ चित्कार कऽ उठल ,पूरा रोड  खुने-खुनामे भऽ गेल / गोटेक सय आदमी देखि रहल छल , चारि टा हत्यारा ओकरा मारि रहल छल  , मारने जा रह्ल छल आ ताबत धरि मारलक जाबत ओ मरि नै गेल आ  गोटाक सय आदमी लहास बनि देखि रहल छल / ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। राजेशकुमार कर्ण चिरबिर–चिरबिर करैत उडि रहल चिडै बुंद–बुंद टपकैत पानिसँ प्यासल पंक्षीकँे प्यास नहि बुझि सकैत अछि । हमरो तहिना भेल अछि । बहुत दिनसँ मैथिली किताब सभ पढबाक प्यास हमरा छल आ एखनो अछि मुदा बहुत कम किताब पढि पौने छी । ताहिसँ सुजीत कुमार झाक लिखित चिड़ै कथा संग्रहसँ मात्र सेहो हमर प्यास नहि बुझि सकैत अछि । मुदा पानिक ई ११ टा बुंद हमर करेजकेँ ठण्डक नहि द सकल लेकिन एकटा बात तऽ अवश्य भेल अछि कि एहि पानिक बुंदसँ हमर जीव आ कण्ठमे ठण्डक अवश्य प्राप्त भेल अछि । मैथिली साहित्यकँे कखरा तक नहि जानएवाला व्यक्ति ककरो कथा संग्रहक बारेमे किछु समीक्षा, समालोचना आ टिप्पणी कि करताह । मुदा सुजीत जी हमर मित्र भेलाक कारणे आ कथा संग्रह चिडैÞ कँे बारेमे अपन विचार लिख देबाक लेल कहलाक कारणे अहि कथा संग्रहक बारेमे हम किछु प्रस्तुत करबाक चेष्टा कऽ रहल छी । मैथिली भाषामे सुजीतक ई प्रथम कृति चिड़ै कथा संग्रह हमरा बड निक लागल । एकर मुख्य पृष्ठ आर्कषक अछि आ किताबक बाहर आ भितरकँे प्रिन्ट सेहो स्पष्ट अछि । ७८ पृष्ठमे समेटल गेल ११ टा कथाकेँ संग्रह अलमी पाठक एकहि बैठानमे पढि सकैत अछि तऽ बेफुसर्दी लोकसभ सेहो ११ बैठानमे तऽ अवश्य पढि लेताह । ताहि दृष्टि सँ सेहो निकेँ कह पड़त नहि बेसी पैघ आ नहि छोट । सुजीतक कथा संग्रह चिडैÞ कँे ११ टा कथामे सँ ९ टा कथाकँे प्रमुख पात्र महिला छथि । जाहिमे हमरा अहाँक समाजमे महिलाकँे विभिन्न चरित्र आ रुपकँे चर्चा कायल गेल अछि । महिलावादी पहिल कथा “एकटा अधिकार”मे विमान दुर्घटना सँ सुरुवात कऽ एहिमे मृत भेल लोकसभकँे खोजबाक उपक्रमकेँ वर्णन करैत एकटा विवाहित महिला सँ एकटा नवयुवककेँ प्रेमक बारेमे जिज्ञासा आ उत्सुकता सँ भड़ल बातचीतकेँ प्रस्तुत कायल गेल अछि । जाहिमे महिलाक पतिसंग ओ अपरिचित युवक अपन प्रेमक बारेमे बखान करैत अछि आ ओकर प्रेमकँे देखि ओ महिलाक पति दुर्घटनामे मृत भेल अपन पत्नीकेँ दाहसंस्कारक जिम्मा ओहि नवयुवक प्रेमीकेँ दऽ दैत अछि । अहि कथामे महिलाक बारेमे मात्रे वार्तालाप भेलाक कारणे एकटा मृत महिला एकर प्रमुख भऽ गेली अछि । दोसर कथा “धधकैत आगि आ फुटैत कन्जोरि” मे सेहो एकटा नवयुवती बलत्कारक अनुभव पएबाक लेल कऽ रहल विभिन्न प्रयासक बारेमे लिखल गेल अछि तऽ तेसर कथा “भौजी”मे नन्द आ विधवा भौजीकेँ एकहिटा युवकसंगक प्रेम प्रसंगक बारेमे चर्चा कायल गेल अछि तऽ चारिम कथा “चिडैÞ” मे दू टा महिला पत्नी आ प्रेमिकाक बारेमे केन्द्रित अछि । अपन पत्नीसँ असन्तुष्ट एकटा पुरुष कोना दोसर महिलाप्रति आर्कषित होइत अछि आ महिलाकेँ कोन रुपमे उपयोग करैत छथि ताहिकँे वर्णन अछि । पाँचम कथा “प्रियन्का” मे एकटा एहन बचियाकँे बारेमे चर्चा कायल गेल अछि जे जीवनमे किछु विशेष करबाक लेल गामसँ भागि शहर जाइत छथि ओतए ओ अपन उद्देश्य प्राप्त करितो सभक खेलौना भऽ कऽ रहि जाइत छथि । ताहि प्रकारे सातम कथा “वंश” मे सेहो एकटा एहन बचियाकँे चर्चा अछि जे डाक्टर बनि अपन माई बाबुकेँ नाम मात्रे नहि रोशन करैत छथि कि लडकीसभक बारेमे समाजमे व्याप्त गलत धारणाकँे सेहो तोड़ि दैत अछि । आठम कथा “बाबाजी” मे हमरा अहाँक समाजमे साउस ससुरके कोन प्रकारे पुतहुसभ दुख दैत अछि ताहिक वर्णन कायल गेल अछि । तहिना दशम कथा “ढोल” मे सेहो एकटा नवयुवतीकँे विवाहक बाद पुरुषकँे पत्नीक रुपमे नहि भऽ ढोलकँे रुपमे कोना भऽ जाइत अछि ताहि कँे देखाओल गेल अछि । तऽ अन्तिम कथा “शुन्यताक प्रवेश” मे सेहो एकटा महिला जे ककरो माइ छथि तऽ ककरो पत्नी ओकर पीडा देखाओल गेल अछि । एहि प्रकारे देखल जाइ तऽ ११ टा कथामे सँ ९ टा कथाक प्रमुख पात्र महिला छथि । ताहिसँ सुजीतक ई कथा संग्रह महिलावादी कथा संग्रहके रुपमे चित्रित कायल जा सकैत अछि । दोसर दिस सातम कथा वर्खीक भोजमे भिखमंगोसं बेसी दुर्दशा आ आर्थिक दरिद्रता मध्यम वर्गीय परिवारके व्यक्तिसभमे रहल बातके बहुत चतुराईपूर्ण ढंगसं प्रस्तुत कायल गेल अछि त ९ अम् कथा “बनैत बिगरैत” मे हमरा अहांक समाजमे भइयारीक अंश आ पुर्खाक सम्पति पर सन्तान सभक कुदृष्टिक बारेमे चर्चा अछि । ताहि सं महिलावादी कथा संग्रह भेलाक बावजूदो अहि कथामे समाजक जनजीवनके सूक्ष्म चर्चा सेहो अछि । जाहि कारणे समाजके दर्पणके रुपमे सेहो अहि कथा संग्रहके लेल जा सकैत अछि । त दोसर दिस कथा “धधकैत आगि आ फुटैत कनोजरि” मे एकटा एहन नवयुवती जे एकटा बलात्कारके अनभुव प्राप्त करबाक लेल स्वयंके बलात्कृत करबाक लेल सेहो तैयार छथि आ एहिके लेल बसक ड्राइभर खलासी, पुलिस आ विभिन्न युवकसभक बीचमे जाइ छथि । नव श्रृजना परम्परागत कथासं हटि क ई एकटा अलग कथा अछि जाहिमे समाजक बहुत विषय वस्तुक बारेमे व्यक्तिक जिज्ञासा कोन प्रकारे उधेलित होइत अछि तकर वर्णन अछि । ताहिसं नवखोजी आ श्रृजक व्यक्तिके रुपमे सेहो लेखकके देखल जा सकैत अछि । एहि कथामे एतबहि मात्र नहि सपनाक बारेमे किछु दार्शनिक बातके चर्चा करबाक प्रयास सेहो कायल गेल अछि ताहिसं भविष्यमे जौं लेखक चिन्तन निरन्तर रखताह त ओ विशेष दर्शनयुक्त कथा सेहो लिखए सकैत अछि । ताहिके संकेत सेहो एहि कथा मादे प्रष्ट होइत अछि । विभेद पर प्रहार तहिना भौजी कथामे प्रेमक द्वन्दबीच विधवा महिलाक प्रेम प्रस्तुतिसं लेखक समाजमे महिलाक अधिकारके लेल सेहो वकालत कयने अछि । जौ विदुर पुरुष दोसर विवाह कऽ सकैत अछि तऽ विधवा महिला किया नहि ? तहिना प्रियन्कामे निक करबाक आ जीवनमे समाजक लेल किछु विशेष करबाक उत्साहसं आगू बढल बचियासभके कोन प्रकारे समाजक विकृतिके चक्र घेर लैत अछि ताहिके प्रस्तुत क हमरा आहांक समाज पर व्ययंग सेहो लेखक कथा मादे कयने छथि । बेटा मात्र नहि बेटियो मायबापके नामके रौशन कऽ सकैत अछि ताहि बातके वंश कथा मादे प्रस्तुत कऽ बेटा आ बेटी बीचक भेद हटेबाक लेल जोडदार ढंगसँ अपन बात के लेखक प्रस्तुत करबामे सक्षम भेल अछि । एहि प्रकारे देखल जाइ तऽ सुजीतक कथा संग्रह चिड़ै समाजक विभिन्न पक्षके वर्णन करएमे सर्मथ अछि आ ई चिड़ै समाजक विभिन्न पक्ष पर उड़ि रहल अछि । ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। विनीत उत्पल १.कथा- बेसिक इंस्टिंक्ट (दोसर आ अंतिम भाग) २.आजुक कालमे बाबा १ कथा- बेसिक इंस्टिंक्ट (दोसर आ अंतिम भाग) ओइ छौंड़ीक कतेक दोस्तसँ परेशान आत्माक सेहो दोस्ती छल। ओ सभ कहैत छल जे दिल्ली विश्वविद्यालयक साउथ कैंपसमे जखन ओ पढ़ैत छलि, तखन ओकर अफेयर प्रकाश झाजी सँ छल। एक बेर तँ प्रकाश झा सेहो हुनका ई गप कहलनि। फेर 'बाबा" बला 'सर" आ ओकरा, कतेक बेर संगे खाइ-पीबसँ लऽ कऽ घुमैत-फिरैत देखल गेल। ओम्हर, ऑफिस आ ओकरासँ फराक ठामपर सेहो गॉसिप होइत छल, लोक-बेद मिर्च-मसल्ला लगा कऽ गप करैत छल। आब तँ दैनिक भारतमे बॉससँ लऽ कऽ छोटो स्टॉफ सभ ओकरे दुनूक गप करैत छल।  फेर 'हाइली टेंपर"क नाम आ चेहरा-मोहरा कनीटा दैनिक भारतक संपादक सँ मिलैत छल तइसँ ओ ओकर फाएदा सेहो उठा लैत छल। आखिरमे, 'हाइली टेंपर"क मेहनति रंग अनलक आ 'परेशान आत्माक" ट्रांसफर इलाहाबाद कऽ देल गेल। जकर कन्हापर सवार भऽ कऽ ओइ बीस मंजिल बला दफ्तरमे नोकरी पेने छल, ओकर पत्ता साफ करै मे ओ कोनो कसरि नै छोड़ने छल। आब तँ बॉस सेहो खुलि कऽ 'हाइली टेंपर" क संग दिअ लागल छल। ऑफिसक दाढ़ी बला बाबाक चमचासँ आब ओकर लटाढ़म शुरू भऽ गेल छलै। लड़कीकेँ लागै छलै जे आब  ओ हुनका पार लगाएत। परेशान आत्माकेँ जतेक तंग करैक छल ओ कोनो कसरि नै छोड़ने छल। जतेक बदनाम करबाक छलै, ओ कऽ देने छल। इलाहाबादसँ परेशान आत्माकेँ जे खबर अबैत छलै ओकरामे कतेक रास गलती निकालैक काज ओ शुरू कऽ देने छल आ बॉससँ सेहो फूइस शिकाइत करैत छल। दोसर दिस ओ छौड़ा छल जे ओकर सभ गलतीकेँ माफ कऽ रहल छल। किछु दिन बाद बॉस बदलि गेल आ आब फेर पलटी मारैक बेर हाइली टेंपरक छल। नबका बॉसक कान पहिनेसँ भरल जा चुकल छल। एक दिन इलाहाबादसँ परेशान आत्मा केँ दिल्ली आबैक छलै। हुनका हाइली टेंपरक खेरहा नै बूझल छलै। ओ हाइली टेंपरक मोबाइलपर मैसेज पठेलक- "केन यू मीट मी वन्स!' गप तँ पांच शब्दक छल मुदा ओकर इलाहाबादसँ दिल्ली पहुंचैत-पहुंचैत ई आगि बनि गेल छल। कनॉट प्लेसक ओइ दफ्तरमे ओ सभसँ भेंट केलक, नबका बॉससँ सेहो। मुदा जखन ओ ट्रेन पकड़ि कऽ आपस आबि रहल छल, तखन ओकर मोबाइलपर घंटी बजलै। पॉकेटसँ मोबाइल निकालि कऽ देखलक तँ ओ नंबर दिल्ली ऑफिसक छल। "हेलो'। "हेलो...।' ओम्हर नबका बॉस छल। "एहन अछि जे आजुक बाद अहाँ कहियो ओइ लड़कीकेँ फोन नै करब।' जाधरि ओ किछु बुझिछि सकतिऐ ताधरि बॉस बाजल, "बिना हमर आज्ञाक अहाँ फेर कहियो ऑफिस एलौं तँ हम अहाँकेँ पांच दिनक भीतर निकालि देब।' ताधरि परेशान आत्मा परेशान भऽ चुकल छल आ ओ रकम सँ कहलक, "सर, एहन कोनो गप आब नै हएत आ हम कतए जाएब आ कतए नै जाएब, तकर मालिक अहाँ नै छी। रहल नोकरीक गप आ अहाँ जे धमकी दऽ रहल छी जे पाँच दिनक अंदर निकालि देब तँ हमहीं आजुक पांच दिनक भीतर ई नौकरी छोड़ि रहल छी।' ओ एक्के सांसमे सौंसे गप कहि कऽ फोन काटि देलक। मुँह लाल-लाल भऽ गेल छलै। आगू वएह भेल जे परेशान आत्मा बाजल छल। पांच दिनक भीतर ओ दोसर अखबारमे सीधा स्ट्रींगर सँ सीनियर सब एडिटरक नोकरी करए लागल। दरमाहा सेहो तीन गुना बढि़ गेल छलै। कतेक जिम्मेदारी सेहो आबि गेल छलै। बियाह भऽ गेलै। बीबी-बच्चामे ओ रमि गेल छल। धीरे-धीरे बच्चा पैघ भऽ कऽ सेट्ल सेहो भऽ गेलै आ आब ओ परेशान आत्मा परेशानीसँ मुक्ति पाबि राजधानीसँ करीब १५०० किलोमीटर दूर अप्पन खेतमे काज करैत छल आ ओहनो उमेरमे देशक सभटा पत्र-पत्रिकामे लिखैत छल। ओना ई गप अलग अछि जे हाइली टेंपरक पागल होएबाक खबर आ सड़कपर लावारिस हाललिमे भेटबाक जानकारी अखबारसँ पता चलल मुदा एकर बादक गप ओकरा नै बुझल हैतिऐ जँ ओकर दोस्त ओकरा मेलसँ चिट्ठी नै लिखतिऐ। ई मेल मोटामोटी एना अछि: "डियर फ्रेंड, हम दुनू गोटे कतेको बरखसँ दोस्त छी। ई आर गप अछि जे हम दिल्लीक चकाचौंधमे फंसि कऽ रहि गेलौं आ नेना-भुटका सभ बिगड़ि गेल मुदा अहाँ हरदम सही समयपर सही कदम उठेलौं। हम तँ अहाँकेँ मेल करैएबला रही मुदा अहाँक पुरान प्रेयसीक खबरि सुनि कऽ आइ मेल करबा लेल विवश भऽ गेलौं। अहाँक दिल्लीक ओइ संस्थाकेँ छोड़ब करीब तीस साल भऽ गेल मुदा अहाँक प्रेयसीक खिस्सा सुनि कऽ नै अहाँ चकित हएब मुदा ई कहब जे भगवान दुश्मनक संग सेहो ई नै करथि। अहाँ तँ दैनिक भारतक ओइ दाढ़ीबला बाबाकेँ तँ जानैत छलौं जे अहाँकेँ अजमेरसँ दिल्ली आबैक लेल मना केने छल। ओ ओकर चमचामे फँसि गेल छल। ओकरे संग घूमब, शॉपिंग करब ओकरा नीक लगैत छलै। ओ नशाक सेहो शिकार भऽ गेल छल। लोक तँ एते धरि कहैत छल जे मीडियाक गंदगी ओकरा लील लेलक। कतऽ ओ बरखा दत्त बनबाक स्वप्न लऽ कऽ दिल्ली आएल छलि आ अब कॉल गर्लमे बदलि गेल छलि। दाढ़ीबला बाबा ओइ दफ्तरमे बड़ पैघ पदपर छल आ अहाँक पुरान प्रेयसी करियरमे एकटा स्थान लेबऽ चाहै छलि। दोसराकेँ नीचाँ देखाबैक शौक तँ ओकरा शुरूहेसँ छलै, तइसँ ओ दाढ़ी बला बाबाक झांसामे आबि गेल। एतबे टा नै, किछु साल बाद ओ आफिस कहैक लेल टा आबए लागल छलि आ दारूक नशा ओकर आँखिसँ बाजैत छल, ठेग लटपटाइत छल। एनामे ओकरा जे कियो कोनो नीक सलाह दैत छल, ओकरा ओ खराप लागैत छल। अहाँकेँ बुझले हएत जे ओकरा बाजारमे ठेलापर बिकाइबला सस्ता साहित्य आ ३०-४० टाकाक ब्लू फिल्मक सी.डी .देखैमे कतेक नीक लागैत छलै। ऑफिसक स्टाफ कहैत छल जे एहने कियो हएत जकरासँ ओ सी.डी. नै मंगने हएत। चाहे ओ पालिका बाजारमे भेटैत होअए, सराय काले खां दिससँ निजामुद्दीन रेलवे स्टेशन दिस जाइ बला रोडक कातक दोकान वा फेर लक्ष्मीनगरमे कैसेटक दोकानमे। लोक-बेद कहैत छल जे ओ जे पैघ नामक पाछू दौडि़ रहल छली, ओकर कारी चेहराकेँ ओ नै जानैत छलि। डियर, अहाँ तँ जानिते होएब जे आइयो अप्पन गाम-घरक स्त्रीगन आ छौड़ी सभ कतबो एडवांस भऽ जाए मुदा जबर्दस्ती शीलभंग भेलापर ओकरापर की बितैत अछि, ई ओकरासँ बेसी नीकसँ कियो नै जानि सकैत अछि। अहाँक प्रेयसीक संग से भेल। हाइली टेंपरसँ हमदर्दी जताबैक संग करियरमे आगू बढ़ाबैक झांसा दऽ कऽ के-के लोक ओकर संग की-की केलक, एकरा भगवती टा जानैत हेती। अति सर्वत्र वर्जयेत। यएह तँ भेल ओकरा संग। फिल्म "टर्निंग-३०' अहाँ देखने हएब वा नै। वएह हालत भऽ गेल छल अहाँक अंतरंग मित्रक। घरक लोक बियाह करै लेल कहैत छल आ दोसर कात मीडिया आफिसक लोक ओकरा धोखा दऽ रहल छल। एनामे ओ अहाँक बड़ मोन पाड़ैत छल मुदा अहाँ तँ ओकर दुनियासँ बड़ दूर चलि गेल छलौं। एनामे ओ की करितए? दाढ़ीबला बाबाक एकटा चमचा छल, अमित अमन। ओ ओकरासँ बियाह कऽ लेलक। ओ बाभने छल। लोक कहैत छल जे हाइली टेंपर ओकर तेसर कनिया अछि। पहिलुक भूकंपमे मरल, दोसरकेँ ओ तलाक दऽ देलक आ आब ई तेसर अछि। गोसाँइ जानै जे आब एकर की हएत। ई गप आर छल जे जखन-तखन ओ आब दलित आ स्त्रीवादी लेखिकाक तौरपर लेख लिखऽ लागल छलि जइमे दलित आ बाकी स्त्रीगणसँ बेसी ओकर दर्द आगू अबैत छल। मुदा, ई आरो गप छल जे कियो ओकरासँ ई गप नै पुछलक जे दलित आ स्त्रीगणक हमदर्द बनि कऽ घुरैवाली हाइली टेंपर कोनो दलित छौड़ासँ बियाह किए नै केलक। सभ कियो बौक भऽ गेल छल। मुदा लोक कहैत छल जे बियाहक बादो ओकर रामेंद्रसँ संबंध छल आ आफिसमे होइ बला गप आ गासिप्स ओकरा नै बुझल छलै। फेर एक दिन एहन भेल जे ओकर वर अमित अमन ओकरा रामेंद्रक संग आपत्तिजनक स्थितिमे पकड़ि लेलक। आ फेर की छल, दुनूक संबंधमे खटास आबऽ लगलै। हम अहाँकेँ की बताबी। आब तँ जखन ओ आफिस आबैत छल तँ ओकर चेहरापर मारि-पीटक दाग होइत छलै। दोसर स्त्रीगणक दर्दकेँ लोकक आगू राखैवाली स्त्रीवादी अपने पुरुष प्रताड़नाक शिकार भऽ रहल छलि। जखन एक दिन धैर्य चुकि गेलै तँ अमित अमन ओकरा छोड़बाक निश्चिय कऽ लेलक। अहाँ तँ दिल्लीमे नै रहिऐ आ अहाँकेँ दूर-दूरसँ ओकरासँ कोनो मतलब नै छल। एनामे हुनका फेर रामेंद्रक मोन पड़लन्हि। ओ हुनका लग गेल छली, निहोरा सेहो केने छली मुदा रामेंद्र नै पिघलल। ओ सोझे कहि देलक जे अहाँ जेना अप्पन करियर लेल हमरा यूज केलहुँ तहिना हम अप्पन दैहिक भूख लेल अहाँक शरीरक यूज केलहुँ। अपना-दुनूक हिसाब-किताब बराबर। आब अहाँक हाइली टेंपरक लग कोनो चारा नै छलै। घरक लोक सभ पहिनेसँ ओकरासँ दूर भऽ गेल छल। ओ अप्पन भाइ-बहीन लेल मरि गेल छली। बहिनोइ आ भाइ लग बिहारमे बड़ जमीन छलन्हि आ जातिक बाभन हेबाक कारण जमीन बचाबै लेल कम्युनिस्ट बनबाक अलाबे कोनो विकल्प नै छलन्हि। बाहरक दुनियामे ओकर परिवारक सभ गोटे दलितक मसीहा बनैत छल मुदा घरमे अप्पन जाति-बिरादरीमे बियाह करैसँ लऽ कऽ खेत बचेबाक हुलिमालि चलैत छल। मां-बाप आब ऐ दुनियामे नै छलन्हि। फरीदाबादमे जे ओ अप्पन घर लेने छलि ओइपर कहिया ने अमित अमन अप्पन कब्जा कऽ लेने छल आ फेर ओ तँ ओकरा पागल सेहो घोषित कऽ देने छल। लोक केँ अप्पन बेसिक इंस्टिंक्ट सँ सरोकार कहियो नै छुटैत छै। आ अहाँकेँ एतेक पैघ मेल लिख कऽ अहाँकेँ पुरनका बात मोन पाड़ि देलौं। मुदा एक बेर जरूर सोचब ऐपर जे भारतक मीडियाक अंदरूनी हालत की अछि, जतऽ हम ठाढ़ छी। कोना छौड़ी सभकेँ प्रताड़ित कएल जाइत अछि। जाति पुछलाक बाद प्रेम कएल जाइत अछि। जाति पुछलाक बाद प्रमोशन भेटैत अछि। छौड़ा आ छौड़ी प्रभाष जोशी, पुण्य प्रसून वाजपेयी, आशुतोष, राजदीप सरदेसाइ, दिलीप पडगांवकर, प्रणव राय आदि केँ देखि दरभंगा, मधुबनी, सहरसा, मधेपुरा, सुपौल, कटिहार, पूर्णिया आदि ठामसँ दिल्ली तँ आबि जाइत अछि मुदा एतुक्का चमक ओकरा एहन दलदलमे ठाढ़ कऽ दैत अछि जतए नहिये ओकर अप्पन माटि रहि जाइत अछि आ नहिये एतुक्का माटिपर ठाढ़ रहबा योग्य ओ बनि सकैत अछि। आशा अछि जे अहाँ अप्पन परिवारक संग निकेना हएब। अहींक...।' २ आजुक कालमे बाबा आइ जखन देशमे भ्रष्टाचारक विरोधमे आवाज बुलंद भऽ रहल अछि तइसँ बाबा मने नागार्जुन केर कविताक मोन पड़ि रहल अछि। ओ जहिना अप्पन कालमे प्रासंगिक रहथि तहिना आइयो छथि। मैथिली साहित्य सँ लऽ कऽ भारतीय साहित्य, संस्कृति, राजनीतिक आ  सामाजिक परिदृश्य केँ देखैत ई कहैमे कोनो शंका नै अछि जे बाबा आधुनिक आ गहींर संवेदनासँ जुडल रहथि। ओ अप्पन कविता तखन लिखने रहथि जखन राजनीतिक- संवैधानिक हालातकेँ लऽ कऽ गम्भीर प्रश्न लागि रहल छल। जहिना ओ मैथिलीमे लिखने  छलाह तहिना हुनकर हिन्दी कविता सेहो एक अलग रंगमे रंगल अछि। एखन धरि मैथिली साहित्यमे हुनकर मैथिली कविताकेँ देखल गेल अछि आ हिन्दी साहित्यमे हिन्दी कविताकेँ। मुदा दुनू भाषामे लिखने तँ वएह रहथिन। एनामे ई आवश्यक अछि जे हुनकर हिन्दी कविता दिस ध्यान देल जाए, ओना ई अलग अध्ययनक गप अछि जे दुनू भाषामे लिखल कवितामे कतेक तारतम्य अछि। देशक  स्थितिकेँ लऽ कऽ हुनकर चिंता हिन्दीमे कोना छल, एकरे अध्ययन एतऽ हम कऽ रहल छी। जखन पूरा देश इमरजेंसीसँ त्रस्त छल, तइ कालमे ओ अप्पन प्रतिबद्धताक घोषणा करैत छथि - 'प्रतिबद्ध हूं, जी हां, प्रतिबद्ध हूं- बहुजन समाज की अनुपल प्रगति के निमित्त- संकुचित 'स्व' की आपाधापी के निषेधार्थ अविवेकी भीड़ की 'भेड़िया-धसान' के खिलाफ अंध-बधिर 'व्यक्तियों' को सही रास्ता बतलाने के लिए अपने आपको भी 'व्यामोह' से बारम्बार उबारने की खातिर प्रतिबद्ध हूं; जी हां, शतधा प्रतिबद्ध हूं!' जहिना लोकपालक नामपर अन्नाक आन्दोलनमे नवजुबक सभ आगू आएल, तखन ई लागैत अछि जे खाली ठाम बदलि गेल अछि। इमरजेंसी कालमे जगह पटनाक गाँधी मैदान छल आ आजुक मैदान दिल्ली केर राम लीला मैदान बनि गेल छल। ताहि सँ बाबा कहैत अछि- 'बार-बार खचाखच भरा गांधी मैदान बार-बार प्रदर्शन में आए लाखों-लाख नौजवान बार-बार वापस गए हवा में भर उठी इंकलाब के कपूर की खुशबू बार-बार गूंजा आसमान बार-बार उमड़ आए नौजवान बार-बार लौट आए नौजवान..।' ताहि सँ बाबा गर्जित अछि- 'जनता तुझसे पूछ रही है, क्या बतलाऊं जनकवि हूं मैं साफ कहूंगा, क्यों हकलाऊं?' बिना लटपटाएल बाबा जे गप तहिया कहलखिन, की ओकरामे आइ कोनो अंतर भेलो अछि, ई सवाल अछि। ओ नीक जना नेता आ नौकरशाही पर चोट करै छथि, ‘आज की तारीख वाले पन्ने पर मैं लिखूँगा एक कविता कुछ इस तरह कि मैं पहुँच जाऊँगा वहाँ जहाँ तुमने एक कुर्सी के बराबर जगह छोड़ रखी है।’ हुनका आगू कतेक रास प्रश्न अछि जे सैद्धांतिक आ व्यवहारिक रूपमे लोकक दिमागमे बड़कैत रहैत अछि आ ऐमे नागार्जुनक स्थिति स्पष्ट भऽ जाइत अछि। हुनकर एक-एक कविता आ एक-एक शब्द क्रांतिक अलख जगबैत अछि, कामन वेल्थी दुनियां क्या है, बूचड़ का बाजार है, प्रजातन्त्र पर्दा है लेकिन खूनी कारोबार है। भुखमरी आ तंगहाली से परेशान भ के 1961 में जखन जमीनक बंटवाराक लेल किसानक अन्दोलन चलल, तखन नागार्जुन ‘करोड़ों हाथों’ के फेर सें ख्याल करलक, नभ से संघ बद्ध जनता का गूँज उठा हुँकार। बाबाक कवितामे यथार्थक वर्तमान रहल अछि आ गप-सपमे बड़का गप कहि दैत छथि। हुनकर हिन्दी कवितामे तात्कालिकता तँ अछि मुदा व्यंग्यक विदग्धता हुनकर शब्दकेँ कालजयी बना देने अछि। भूख, बेरोजगारी, अकाल सन विषयपर लिखल हुनकर कविता जते संवेदनासँ भरल अछि, ओतए नीतिक व्यंग्य कतेक रास मारक क्षमता राखैत अछि। आइ कतेक रास घोटालाक खबर आबि रहल अछि, लोक-वेद त्रस्त अछि, रामराज्यक परिकल्पना कतेक लोक कऽ रहल अछि, लोक पाइ आ सत्ताक पाछू भागि रहल अछि, एनामे नागार्जुनक ई गप याद अबैत अछि, 'रामराज्य में अब की रावण नंगा होकर नाचा है सूरत शकल वही है भइया, बदला केवल ढांचा है लाज- शर्म रह गई है बाकी, गांधीजी के चेलों में फूल नहीं लाठियां बरसती रामराज्य के जेलों में।' नागार्जुन हुअए वा हुनकर कविता, आम लोक सभ लेल ओ सहज अछि। राजनीतिक उत्थर स्वाद हुनकर कवितामे जइ तरहेँ भेटैत अछि, हिन्दी हुअए वा मैथिली, एहन स्वाद आन ठाम नै भेटैत अछि- नागार्जुन, 'सियासत में न अड़ाओं अपनी ये कांपतीं टांगें हां, महाराज राजनीतिक फतवेबाजी से अलग ही रक्खो अपने को माला तो है ही तुम्हारे पास नाम-वाम जपने का भूख जाओ पुराने सपने को'. ओ एहन लोक अछि जे अप्पन तँ एहन-ओहेन करैत अछि, आगूसँ बैसल रहैत अछि, तकरो नै छोडैत अछि। 'जपाकर' कविता मे संविधानक सेहो एहन मजाक बनाबैत अछि, जे आइयो धरगर अछि- 'जपाकर दिन-रात जै जै जै संविधान मूं द ले आंख- कान उनका ही दर ध्यान मान ले अध्यादेश मूंद ले आंख-कान सफल होगी मेधा खिचेंगे अनुदान उनके माथे पर छींटा कर दूब-धान करता जा पूजा-पाठ उनका ही धर ध्यान जै जै जै छिन्नमस्ता जै जै जै कृपाण सध गया शवासन मिलेगा सिंहासन।' एहन गप नै अछि जे नागार्जुनक सोचक सीमा एक्कै दिस अछि। हुनकासँ कियो नै छुटल अछि, वोटकेँ लऽ कऽ जे राजनीति भऽ रहल अछि, ओकर चिंता हुनका सेहो छल- 'बेच-बेचकर गांधीजी का नाम बटोरो वोट बैंक बैलेंस बढ़ाओ राजघाट पर बापू की वेदी के आगे अश्रु बहाओ।' आइ जहिना सड़कपर उतरल लोक सत्ताक मदहोशमे डूबल लोकपर व्यंग कऽ रहल छै, कहियो एकरासँ नागार्जुन पाछुओ नै छल। नेताकेँ लऽ कऽ ओ कहै छथिन, 'कुर्सी-कुर्सी गद्दी-गद्दे खेल रहे हैं घटक तंत्र का भ्रूणपात ही खेल रहे हैं जोड़-तोड़ के सौ-सौ पापड़ बेल रहे हैं भारत माता को खादी में ठेल रहे हैं।' सत्तासँ डरब तँ ओ सिखने नै छथिन, तइ सँ इंदिरा गांधी केँ ओ सोझे कहि देलखिन, 'इन्दुजी, इन्दुजी, क्या हुआ आपको? सत्ता की मस्ती में, भूल गई बाप को? बेटे को तार दिया, बोर दिया बाप को! क्या हुआ आपको? क्या हुआ आपको?' ऐना कहै बला आजुक काल मे कियो अछि, ई सोचबाक विषय अछि. नागार्जुनक कविता आ हुनकर फक्कड़नुमा अंदाजकेँ आजुक जुगमे अलग नजरिमे देखबाक आवश्यकता अछि। ओ राजनीति संदर्भमे भऽ सकैत अछि, सामाजिक संदर्भमे भऽ सकैत अछि तँ आर्थिक संदर्भमे सेहो।  क्रांति आ एकर विचारधाराक गहींर प्रभाव बाबाक लेखनीमे छल। एकटा कविता नक्सल आन्दोलनक छाहमे ओ लिखने छल जे आजुक हालतपर सटीक अछि, 'बुद्ध का दिल तो कहता है अबकी भारी गहन लगेगा बुद्ध का दिल तो कहता है अबके संसद भवन ढहेगा बुद्ध का दिल तो कहता है बच्चा-बच्चा अस्त्र गहेगा बुद्ध का तो दिल कहता है कोई अब न तटस्थ रहेगा।' बाबा नागार्जुन सामाजिक, राजनीतिक विद्रूपतापर वार करैत आगू निकलि जाइत अछि। ताहिसँ ओ कहैत अछि, 'ऊपर-ऊपर मूक क्रांति, विचार क्रांति, संपूर्ण क्रांति कंचन क्रांति, मंचन क्रांति, वंचन क्रांति, किंचन क्रांति फल्गु सी प्रवाहित होगी, भीतर-भीतर तरल क्रांति. एनामे जाहिर सन गप अछि जे बाबा नागार्जुन कहै लेल कवि टा नहि छल, हुनकर सोच आ शब्दमे एकटा धार अछि। हुनकर एक-एकटा शब्द एहन अछि जे सुतल मुर्दाकेँ जगाबैक क्षमता राखैत अछि। लोकतंत्र मे हुनकर सहमति अछि मुदा छल-प्रपंच आ आडम्बरसँ ओ दूर रहै बला लोक छला। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। नवेंदु कुमार झा १.भाजपाक रथ पर सवार भऽ दिल्लीक गद्दी पर पहूचताह नीतीश? २.लाल कृष्ण आडवाणीक महगी भ्रष्टाचारक विरूद्ध प्रस्तावित रथयात्रा ३.बिहारक विकासक लेल प्रदेश मे नव नव उद्योग १ भाजपाक रथ पर सवार भऽ दिल्लीक गद्दी पर पहूचताह नीतीश?

(पटना ब्यूरो) भाजपा सँ दोस्ती का मोदी सँ दूरी, ई अछि सत्ताक लेल राजनीतिक मजबूरी देश मे विपक्षीक राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन सहयोगी जनता दल यूनाइटेड पर सटीक बैसि रहल अछि। भ्रष्टाचार आ महगीक विरूद्ध भाजपाक वरिष्ठ नेता पीएम इन वेटिंग लाल कृष्ण आडवाणीक प्रारंभ होमए बाला रथ यात्रा के बिहारक मुख्यमंत्री नीतीश कुमार द्वारा विदा करबाक निर्णयक जदयूक घोषणा सँ भाजपा राहतक सांस लेलक अछि। हालांकि जदयूक एहि निर्णय सँ राजगक भीतर प्रधानमंत्री पदक लेल संशय बढ़ि गेल अछि। एक दिस उपासक बहन्ने गुजरातक मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी प्रधानमंत्री पदक मजगूत दाबेदारी प्रस्तुत कएलनि अछि। मुदा भाजपाक भीतर मोदी विरोधी खेमा एहि रथ यात्रा लेल जदयूक समर्थन लऽ प्रधानमंत्रीक रूप मे श्री आडवाणीक दावेदारी के मजगूत करैबा मे सफल भेलाह अछि। रथ यात्राक लऽ कऽ भाजपा आ जदयू मे चलि रहल खीचतान के विराम दैत नीतीश कुमार एक बेर फेर अपना आप के कुशल राजनीतिक रंजिनियरक रूप मे सोझा अएलाह अछि। मोदीक संग पटना मे लागल पोस्टर पर नाराज होमय बाला श्री कुमारक आडवाणीक रथ पर सवार होएब दूरगामी राजनीतिक सोचक परिचायक अछि। नीतीश कुमार के एहि बादक अंदाज अछि जे केन्द्र के सत्ताक मे राजगक संभावना बनला पर प्रधानमंत्री पदक वास्ते भाजपा मे घमासान भऽ सकैत अछि आ एहि स्थिति मे आडवाणी खेमाक ओ पसिन्न बनि सकैत छथि। एखन राजग मे हुनक शासन व्यवस्था के लोहा मानल जा रहल अछि आ ओ एकर लाभ लेबाक सभ संभव प्रयास करताह। श्री कुमारक दूरगामी राजनीतिक कौशल विधान सभा चुनाव मे सेहो देखल गेल छला। विधानसभाक पहिल चरणक चुनाव अल्पसंख्यक बहुल क्षे मे छल आ जद यू साझा प्रचार अभियानक बादो पहिल चरणक चुनाव प्रचार मे लाल कृष्ण आडवाणी सँ दूरी बनौने छल। ओना लोक सभा चुनाव मे एखन समय अछि मुदा महगी आ भ्रष्टाचारक मामिला पर लाचार कांग्रेसक नेतृत्व वाला डा0 मनमोहन सिंह सरकारक विरूद्ध बनल वातावरण के भजैबाक लेल एखनहि सँ कसरत कऽ रहल अछि। हालांकि भाजपा दिस सँ एखन धरि प्रधानमंत्रीक उम्मीदवारक नाम पर अंतिम सहमति नहिल बनल अछि मुदा जदयू राजगक प्रधानमंत्रीक उम्मीदवारक नामक घोषणा लेल अपना स्तर सँ दबाब बनाएब प्रारंभ कऽ देलक अछि। जदयूक नेता सभ एहि लेल नीतीश कुमारक नाम बेर-बेर उछालि रहल छथि हालांकि श्री कुमार बेर-बेर एहि पर सफाई दऽ अपन उम्मीदवारी के नकारि रहल छथि। तथापि आडवाणीक रथ यात्रा मे हुनक भागीदारीक घोषणा सँ प्रधानमंत्री पदक उम्मीदवारी राजगक लेल हॉट केक बनि गेल अछि। आडवाणी भाजपाक रथ यात्राक कुशल सारथि छथि। राम मंदिर आंदोलनक रथ पर सवार भऽ ओ भाजपा केऽ सत्ताक प्रमुख दावेदारक रूप मे स्थापित कएलनि अछि। देशक वर्तमान राजनीति कांग्रेस आ भाजपा के नेतृत्व मे ध्रुवीकरण भऽ गेल अछि। भाजपा महारथी एखन धरि राम रथ यात्रा जनादेश रथ यात्रा, स्वर्ण जयंती रथ यात्रा भारत उदय रथ याथ आ भारत सुरक्षा रथ यात्राक सारथी बनि चूकल छथि मुदा राम रथ यात्राक बाद रथ या़ाक बढ़ैत संख्याक संगहि जन समर्थन कम होईत गेल आब 11 अक्टूबर सँ जय प्रकाश जन्म भूमि सिताब दियारा सँ प्रारंभ होमए बाला रथ यात्राक सभ पर नजरि अछि। ओना महगी आ भ्रष्टाचार विरूद्ध भाजपाक भेल शंखनाद सम्मेलन कतेको ठाम भेल छल जे फ्लॉप शो साबित भेल छला। २ लाल कृष्ण आडवाणीक महगी भ्रष्टाचारक विरूद्ध प्रस्तावित रथयात्रा भारतीय जनता पार्टीक वरिष्ठ नेता लाल कृष्ण आडवाणीक महगी भ्रष्टाचारक विरूद्ध प्रस्तावित रथ यात्रा 11 अक्टूबर के सम्पूर्ण क्रान्तिक प्रणेता जय प्रकाशक जन्म स्थली उत्तर प्रदेशक सिताब दियारा सँ प्रारंभ भऽ छपरा होइत ओहि दिन राजधानी पटना पहूचत। 11 अक्टूबर के रात्रि विश्रामक बाद ई यात्रा 12 अक्टूबर के गयाक लेल विदा भऽ जाएत आ ओहि रास्ता सँ साझ मे झारखंडक सीमा मे प्रवेश करता। 11 अक्टूबर के एहि यात्रा के बिहारक मुख्यमंत्री नीतीश कुमार झण्डी देखा कऽ विदा करताह। एहि अवसर पर लोकसभा मे विपक्षक नेता सुषमा स्वराज आ राज्य सभा मे विपक्षक नेता अरूण जेटली सेहो उपस्थित रहताह। भाजपाक रथ यात्राक सारथी श्री आडवाणीक ई छठम रथ यात्रा होएत। एहि सँ पहिने ओ राम रथ यात्रा, जनादेश रथ यात्रा, स्वर्ण जयंती रथ यात्रा, भारत उदय रथ यात्रा आ भारत सुरक्षा रथ यात्रा कऽ चूकल छथि मुदा राम रथ यागा सन जन समर्थन आर कोनो यात्रा के नहि भेटल छल। ३\ बिहारक विकासक लेल प्रदेश मे नव नव उद्योग बिहारक विकासक लेल प्रदेश मे नव नव उद्योग लगैबाग नीतीश सरकार प्रयास लगातार चलि रहल अछि एहि कड़ी मे सरकार आब एफएमसीजी कम्पनी दिस ध्यान देलक अछि। आईटीसी, नस्ले आदि कम्पनी द्वारा प्रदेश मे निवेश करबाक योजनाक बाद आब डिटर्जेंट आ साबूनक क्षेत्र मे बहुराष्ट्रीय कम्पनी के टक्कर दऽ रहल घड़ी डिटर्जेंट आ साबून के इकाई प्रदेश मे लगैबाक योजना अछि। कानपुरक आरएसपीएलक ई उत्पाद बिहार मे बनैबाक लेल कम्पनी सरकारक संग गपसप कऽ रहल अछि। सरकारी सूत्रक अनुसार कम्पनी एहि योजनाक लऽकऽ गंभीर अछिआ गोटेक 100 करोड़ टाका निवेश करत। उद्योग विभाग प्रधान सचिव सी.के. मिश्रा जनतब देलनि अछि जे निवेशक के आकर्षित करबाक लेल सरकारक रणनीति सफल भऽ रहल अछि। पैघ कम्पनी दिस सेहो ध्यान देल जा रहल अछि। घड़ी डिटर्जेन्ट बनबऽ बाला आरएसपीएल पटना सँ सटल फतुहा लऽग जमीन पसिन्न कएलक अछि। आशा अछि जे एहि मासक अंत धरि एहि पर अंतिम निर्णय भऽ जाएत आ विस्तृत प्रस्ताव सरकार धरि पठा देल जाएत। दोसर दिस आईटीसी सेहो अपन कारोबार बढ़ा रहल अछि। कम्पनी मूंगेर मे स्थापित अपन इकाईक लऽग-पास मे नव डेयरी इकाई खोलबाक निर्णय लेल अछि। एहि इकाई मे 100 सँ 200 करोड़ टाकाक मध्य निवेश करत। एहि मध्य बहुराष्ट्रीय कम्पनी नेस्ले बिहार मे प्रस्तावित योजनाक संदर्भ मे तऽ किछु स्पष्ट नहि कएलक अछि मुदा सरकारी सूत्रक अनुसार कम्पनीक संग गप-सप चलि रहल अछि। कम्पनी के पटनाक लऽग-पास मे ऊंच जगह पर जमीनक खोज कएल जा रहल अछि। कम्पनीक एहि प्रस्तावित इकाई सँ चॉकलेट आ मैगी नूडल्सक उत्पादन होएत। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। किशन कारीगर मुन्नी बदनाम भेलैए किएक ? एकटा हास्य कथा। इंडिया टी वि मे एकटा संगी सँ भेंट केने फिल्म सिटी नोएडा स अबैत रही। समाचार बूलेटिन क समय भ गेल रहै तही दुआरे हरबड़ाएल आकाशवाणी अबैत रही। हम सेक्टर 16 मेटो स्टेशन लक आएले रही  की ओतए एकटा मित्र मदन भेंट भए गेलाह कुशल छेमक गप भेलाक बाद हम बजलहू भाए एखन हमरा जाए दियअ फेर कहियो गप नाद करब । ओ बजलाह यौ किशन अहू हरबड़ाएल नोएडा अबैत छी आ फूर सिन पड़ा जायत छी कहियो भेंटो घांट ने पहिन हमरा एकटा गप समझा दियअ तखन जाएब ।हम बजलहु  जल्दी कहू त ओ बजलाह ई कहू त मुन्नी बदनाम भेलैए किएक ? हम किछु बजितहु कि ताबैत डमरू डूगडूग क अवाज सुनलियै ओतए मेटो सीढ़ि लक बाबा भेंट भए गेलाह हमरा देखैत मातर ओ बजलाह हौ कारीगर बच्चा तोरे तकैत तकैत अई ठाम अएलहू पहिने हमरा जल्दी स एकटा गप बुझहाए दैए। हम बजलहू कोन गप यौ बाबा की ओ बजलाह हौ बच्चा एकटा गप कहअ त मुन्नी बदनाम भेलैए किएक ? हम बजलहु इ त हमरो नहि बुझहल अछि मुदा अहॉ कोन मुन्नी क गप कहि रहल छी। बाबा हॅसैत बजलाह हौ कारीगर तहू बड्ड अनठा अनठा क पुछैत छह कहअ त सौंसे दुनिया अनघोल भेल छै जे मुन्नी बदनाम भेलै शिला क जवानी तेरे हाथ न आनी। तई मे तोंही मीडियावला सभ और बेसी हल्ला केने छहक मुन्नी फिर से बदनाम हुई मुन्नी को देख डोला इमान। एतबाक नहि चैनलो मे बचिया सभ देहदेखौआ कपड़ा पहिर खालि एहने समाचार सभ पढ़ैत छैक देखू वालीवुड मसल्ला मुन्नी बदनाम भेलै देखैत छहक इ समाचार देख सुनि दोसरो मुन्नी सभ बदनाम होइ लेल एखने स आतुर भेल छै। तहि दुआरे त हम पुछलियअ जे मुन्नी बदनाम भेलै किएक ? बाबाक प्रशन सुनि त हम गुम भए गेलहु किछु ने फुरा रहल छहल आ हॅसी सेहो लागि रहल छह। बाबा फेर बजलाह हौ एतेक कथि सौचै मे लागल छह ज कहि दिमाग तिमाग भंगैठ जेतह त  कोन ठिक तहू बदनाम भ जहियअ। देखहक एकटा गप त हम बुझहलियै जे जेबी मे एक्को टा पाइ नहि रहतह आ थूथून निक नहि रहतह त कतबो नाक रगरब त बापो जिनगी मे शिला क जवानी हाथ न आनी मुदा ई दोसर गप हमरा दिमागे मे ने घूसी रहल अछि जे मुन्नी बदनाम हुई। तहि दुआरे तोरा पुछलियअ जे मुन्नी बदनाम भेलै किएक ?हम बजलहु अच्छा बाबा एकटा गप कहू त अहा केना बुझहलियै जे मुन्नी बदनाम भेलै। बाबा बजलाह कहअ त सौंसे दुनिया ई गप अनघोल भेल छै तहू मे त आब शहर बजार स ल क गाम घर तक ई मुन्नी बदनाम ने भेलै कि हमरा रहनाई मुशकिल भए गेल। आब त कान दै जोग नहि रहलै जतै देखहक ततै मुन्नी बदनाम। हम बजलहू अई यौ बाबा मुन्नी बदनाम भेलै त अहा किएक अकक्ष भेल छी। बाबा बजलाह हौ कारीगर अकक्ष की जान बचाएब मुशकिल भए गेल अछि देखैत छहक छौंडा मारेर सभ पूजा करैत काल मंदिरे मे गाबअ लगतह मुन्नी बदनाम भेलै हेतै  यै मुन्नी अहा क गली गली मे चर्चा किदैन कहा । ततबेक नहि यै छौंडी सभ मंदिरे मे सप्पत खा खा बदनाम होइए क फिराक मे लागल रहतह। कहतह हे भोला बाबा तोंही जान बचबिहअ तोरा दू लोटा बेसी क जल चढ़ेबह। मुदा गारजियन सभ हमरा आबि आबि पुछतह यौ बाबा एतए कोनो मुन्ना मुन्नी क देखलियैए। आब त हमरा डरो होइए जे कहिं बदनाम होइ क झोंक मे कोइ हमरो लेल ने बदनाम भए जाय। तहू मे नबका तूरक धिया पूताक कोनो भरोस नहि एकरा सभ क पढ़नाइ लिखनाई मे कम आ बदनाम होइ मे बेसी मोन लगैत छैक। औग ने पौछ देखतह आ खाली बदनाम होइए क फिराक मे लागल रहतह। हम बजलहू अई यौ बाबा अहा लेल के बदनाम होइए। बाबा बजलाह हौ बच्चा जूनि पूछह कि कहियअ पछिला कोजगरा मे हम अप्पन सासुर हरीपुर गेल रही कुशल छेमक गप भेलाक बाद हमर छोटकी सारि टुन्नी बजलीह यौ पाहुन एकटा गप कहू । हम कहलियैन कहू ने की एतबाक मे केम्हरो स हमर बीरपुर वाली सरहोइज चाह पान नेने दौगल अएलीह। हम एक घोंट चाह पीनैहे रही की बीरपुर वाली बजलीह पाहुन एकटा गप बुझहलियैए हम हुनका पुछलियैन कोन गप यै त ओ बाजल चुपू अनठिया कहि क बुरहारी मे खाली गप अनठा अनठा बजैत छी आ हमर सरहोइज सारि खूम जोर सॅ हा हा क हसैए लगलीह। फेर बीरपुर वाली खिखिआ क हसैत बजलीह टुन्नी बदनाम हेतै यै बुरहबा पाहुन अहि क लिए। टुन्नी ताली बजा बजा सुल मे ताल मिला गाबए लागल टुन्नी बदनाम हेतै यौ बुरहबा पाहुन अहि क लिए । हौ बच्चा टुन्नी क गप सुनी त कि कहियअ हम असमंजस मे परि गेलहु जे इ अपनो बदनाम होएत आ बुरहारी मे हमरा गंजन टा कराउत। डरे हम दोसर घोंट चाहो नहि पिलहु चाह सेरा क पानि भ गेल। फेर कि भेल यौ हम उत्सुकतावस बाबा स पुछलियैन त ओ बजलाह हौ बच्चा सभटा गप तोरा कि कहियअ टुन्नी क हम कहलियै अई यै टुन्नी एतेक छौंडा मारेर सभ साइकिल ल क ओइ बाध स ओई बाध शहर स बजार मुन्नी क तकने फिरै छै तेकरा सभ लेल बदनाम हएब से नहि त फुसियाहि क हमरा पाछु लागल छी। टुन्नी बजलीह नहि यौ पाहुन हम त अहि लेल बदनाम होएब तब ने लोको हमरा चिनहत जे हमहू बदनाम होइ लेल आतुर भेल छी। भने मीडियावला सभ क एकटा खबर सेहो भेट जेतैए जे मुन्नी फिर बदनाम हुई आ हमरो कोनो धारावाहिक मे झगरलगौन माउगी वा कि कोनो फिल्म मे आइटम गर्ल क काज भेट जाएत। कि कहियअ टुन्नी क बदनाम हेबाक प्रबल इच्छा देखि हम फुर दिस अपना सासुर स बिदा भगलहु आ फेर कहियो हरीपुर नहि गेलहु। ओकर गप सुनि त डरे हमरा हुकहुकी धए लेलक जे कहि ठीके मे टुन्नी बदनाम भेलै आ कि एना केलकै त हमहू बदनाम भए जाएब। तहि दुआरे त कहलियअ  हौ बच्चा जे कहिं कोई हमरो लेल ने बदनाम भए जाए तहू मे आबक धिया पूता क कोनो ठेकान नहि बदनाम होइ दुआरे फिलमी फंडा अपनौतह। गारजिअन के इ कहतह जे हम टीशन पढ़ै लेल जाइत छी आ पढ़नाइ छोड़ि क पार्क कॉफि हाउस घूमै लेल चलि जेतह आ बदनाम होइ क फिराक मे लागल रहतह। जेना ओकरा सभ के और कोनो काजे नहि रहै तहिना। बाबा बजलाह हौ बच्चा तू ख़बर लेल हाट बजार स ल क शहर गाम सभ ठाम जाइत छह मुदा हमरा एकटा गप नहि बुझहा देलह। हम पुछलियैन कोन गप यौ बाबा की ओ बजलाह अईं हौ कारीगर तहू बड्ड अनठाह भ गेलह तोरा त ई गप बुझहले हेतह जे मुन्नी भेलै आ तहू मे मीडियावला सभ और बेसी हल्ला केने छहक। कतए कोन मुन्नी बदनाम भेलै सेहो ख़बर रखैत छह मुदा हमरा सिरिफ एक्के टा गप बुझहा दए ने जे मुन्नी बदनाम भेलै किएक ? ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com  पर पठाउ। ३. पद्य ३.१.१.शांतिलक्ष्मी चौधरी २.मनोज झा मुक्ति ३.२.१.इरा मल्लिक २ओमप्रकाश झा ३.विनीता झा ४उमेश पासवान ३.३.१.मिहिर झा २.शि‍वकुमार झा ‘टि‍ल्‍लू’ ३.४.१.शिवशंकर सिंह ठाकुर २.रामवि‍लास साहु ३अक्षय कुमार चौधरी ३.५.१.जगदीश चन्द्र  ’अनिल’२.उमेश मण्डल ३.विकास झा रंजन ३.६.डॉ. अजीत मिश्र ३.७.१.डॉ॰ शशिधर कुमर २ आनंद कुमार झा ३नवीन कुमार "आशा" ४.प्रभात राय भट्ट ३.८. १.रामदेव प्रसाद मण्‍डल ‘झारूदार’ २.अमित मोहन झा १.शांतिलक्ष्मी चौधरी २.मनोज झा मुक्ति १ श्रीमति शांतिलक्ष्मी चौधरी, ग्राम गोविन्दपुर, जिला सुपौल निवासी आ राजेन्द्र मिश्र महाविद्यालय, सहरसा मे कार्यरत पुस्तकालयाध्यक्ष श्री श्यामानन्द झाक जेष्ठ सुपुत्री, आओर ग्राम महिषी (पुनर्वास आरापट्टी), जिला सहरसा निवासी आ दिल्ली स्कूल ऑफ इकानोमिक्स सँ जुड़ल अन्वेषक आ समाजशास्त्री श्री अक्षय कुमार चौधरीक अर्धांगिनी छथि। प्राणीशास्त्र सँ स्नातकोत्तर रहितो शिक्षाशास्त्रक स्नातक शिक्षार्थी आ एकटा समाजशास्त्री सँ सानिध्यक चलिते आम जीवनक सामाजिक बिषय-बौस्तु आ खास कऽ महिलाजन्य सामाजिक समस्या आ प्रघटनामे हिनक विशेष अभिरूचि स्वभाविक। १ बरखा रानी

ओलतीक पानि तँ छर-छर झहरैत छै! बरखा रानी आइ छम छम बरसैत छै!!

बैसलखीन पालथि बदलि दादी चुक्कुमाली! आँचर सम्हारि ओढ़लैन्हि भरि देह साड़ी!! देह सिहरैत जनु हुनका जरौन लगैत छै! बरखा रानी आइ छम छम बरसैत छै!!

गोलियेल दियादिन चारू ओसार केँ धेनै! अलसायल मोन एहेन कियो उठै कहै नहि!! हाफी पर हाफी, मोनक बात बतबैत छै! बरखा रानी आइ छम छम बरसैत छै!!

बड़का कक्का ओतय ओढ़ना ले औनाइत! कहियो दिनेस केँ कनि तौनी दs जाइत!! दूआरे सँ रहि-रहि बहिया केँ चिकड़ैत छथि! बरखा रानी आइ छम छम बरसैत छै!!

भाय हमर करैत छथि कखनै सँ कछमछ! मुत्तवास केने हिनका कखने सँ अक्कछ!! बुन्नी तँ कनियो छैको नहि करैत छै! बरखा रानी आइ छम छम बरसैत छै!!

चुल्हा लग भौजी काज छैन्हि पसरल! घोघरी लs लालबहिन अइघर ओईघर!! तरल-तरल माछ रोटी जलखै बनैत छै! बरखा रानी आइ छम छम बरसैत छै!!

घर भरि छिटल डाबा, दोल, कठौत, कप! खपड़ा केर घर सगर चुबैत छैक टपटप!! छोटका कक्का कारकौआ पर कुढ़ैत छथि! बरखा रानी आइ छम छम बरसैत छै!!

ओलतीक सीरही पर चाली करैत सहसह! चुटकी सँ नून छिटै नेनतूर उखमज सभ!! कोनटा मे जोंक देखु कोना नमरैत छै! बरखा रानी आइ छम छम बरसैत छै!!

धीया-पुता केँ जेना उनमत्ति छै चढ़ल! खोपरिक नाह लेल कागज फारै चर-चर!! लिखनाक पन्ना लेल किओ ठुनकैत छै! बरखा रानी आइ छम छम बरसैत छै!!

भादव केर बरखा तैयपर वर कोवर घर! रति केँ लग पावि कामदेव छथि रसगर!! पुरवा वयार वहै मदन मोन रमकैत छै! बरखा रानी आइ छम छम बरसैत छै!!

ओलतीक पानि तँ छर-छर झहरैत छै! बरखा रानी आइ छम छम बरसैत छै!!

२ तिलकोर

छी विदेह बाड़ीक ई अखंड सोहाग भाग मिथिला-संस्कृति पर पलरल अमरलत्ती घरक पछुआर मे ओहिना कचरैत भेटैत तरूआपातक तिरहुतिया तिलकोर लत्ती

बलबूत बाला महराजा दरभंगा होइ कि गाम समाजक किओ कमजोर सभक लिलसा पुरेवाक उदार-दानी भरिसाल सुलभ रहताह ई तिलकोर

चौंका मे तरूआ अल्लुक होइ आकि कदीमाफूल, तग्गर, कुम्हर-सिस्कोढ़ रमतोरय, भाटा, वा कि मिरचाइ होइ बुझु सब छै सुन बिन एक तिलकोर

गरम गरम करूगर माछक तीमन होइ की कबकब ओल, बुटक-बड़ी, कुम्हरोर सभहक स्वाद तखने शोभय उत्तम सन जखन संग उपलब्ध होइ एक तिलकोर

सुन्दर हींग देल कदीमाक तरकारी होइ वा कि सरिसौं देल अरिकंचनक झोर चिकना देल सजमैनि खाहे केहनो बनै सभक सुलाज राखै छथि एक तिलकोर

समधि, जमाय सन गरिष्ठ पाहुन होइथ वा कि मुहल्ग्गु भोजीक भाय मुँह्चोर मामा, मोसा, पीसा, सभक सुमान अधुर पाहुन केँ जँ नै परसलियै गरम तिलकोर

गरम गरम लोहिये मे तरूआ टुभटुभ सुगंधे सँ मोन मे होएत रहत हिलकोर मिथिलावासीक छैक ई खोज अनुप-सन नै पता मिथिला ऐला कोना ई तिलकोर

नीम-हकीमी के तँ आब गप्पे छोड़ु आब तँ पहुँचलाह ई ’एम्स’-आरोग्य बड़का पढ़लका एम.डी. केर कान काटै बाड़ी-बैसल चीनीक डाक्टर ई तिलकोर

३ बथुआक तीमन

मिथिला बाधक अनेर मोथा-बथुआ, शहरी तरकारी बजारक अनमोल! जर-जजातक हरमुठ हरमादी, पोष्टिक आहारक छथि सिरमोर!!

गामक भनसाघरक चीज अनुप, परदेसी धीयापुताक किलोल! केहनो मरल भुख केँ जगा दिये, आमील देल बथुआक सग्ग्भट्टा झोर!! २ –मनोज झा मुक्ति ककरा करु विश्वास !

केओ भुखे मरैछ, केओ मरैछ खुब खा–खा कऽ ककरो परल लल केओ जरबैछ अन्न सड़ा–सड़ा कऽ ।

दिनराति कटैत अछि गरदनि खुल्लम खुल्ला जे, पाप अपन कट्बैत अछि मन्दिरमे जा–जा कऽ ।

दोसरके उन्नतिमे घुसक गन्ध सुँघनिहार सब, पुरस्कृत अपने होइत अछि चाकरी बजा–बजा कऽ ।

कहैछ जे छी सच्चा सदिखन भूmठक विछहन छिटैत अछि, जेब ओ अपन भरैत अछि, बोली भजा–भजा कऽ ।

ककरा कहियै भल, भगवान सेहो तेहने छई, केओ पानि बिनु सुखाइत, केओ मरैछ दहा–दहा कऽ । ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। १.इरा मल्लिक २ओमप्रकाश झा ३.विनीता झा ४उमेश पासवान १ इरा मल्लिक, पिता स्व. शिवनन्दन मल्लिक, गाम- महिसारि, दरभंगा। पति श्री कमलेश कुमार, भरहुल्ली, दरभंगा। १ भोर भेलै भोर भेलै, घरनीक तँ हाल बड़ा बेहाल छै, तहियो ओ नेहाल छै। घरनी धुरी छैथ गृहस्थी के। आँखि मिरैत उठि पुठि भोरे, भनसाघर ओ दौड़ै छथि, चाय बनाब के छैन्ह हुनका, केतली चूल्हा पर चढ़बै छथि, नास्ता संग तैयार करैत छथि, दिनभरि के दिनचर्या, घरनी धुरी छथि गृहस्थी के। घर भरि कान मे तूर तेल लेने, एखनो निसभरि सूतल छथि, पतिदेव आ नेना के, जगेनाय एखैन तँ बाँकि छै, ऑफिस आ स्कूल भेजवाक, सरंजाम केनाइ तँ बाँकिये छै, तहियो भोरतरँगक खुशियाँ, समेटि आँचर मे बान्है छथि, घरनी धुरी छैथ गृहस्थी के। जीवनक अइ आपाधापी मे, खुशी के फूल लोढ़य छथि, ओहि फूलक सुरभित माला सँ, परिवारक बगिया सजबै छथि, जीवन के सृँगार बसल, सुँदर हिनक गृहस्थी मे, सँगीतक सुर तान बसल अछि, मनभावन हिनक गृहस्थी मे, घरनी धुरी छथि गृहस्थी के! २ आँखि सुतल नहि रातिभर आँखि सुतल नहि रातिभरि, मोन भटकैत रहल जिनगी के, बितल पल पर ,कखनो आइ पर! मोनक गति विचित्र छैक, छन मे अहिठाम, पल मेँ ओइठाम, यादि अबैत अछि ,अपन बचपन के, मधुर, सुँदर, सोहनगर बात, माँ के लोरी,बाबी के प्यार, दुलार भैया के,बहिनक नेह, कनियाँ पुतरा के ब्याह, देर तक, दूर तक, बस खेलहि खेल, निर्बाध स्वच्छँद!!!!! किताबक बस्ता, स्कूलक रस्ता, सब यादि अछि। बरसा के पानि, कागज के नाव, गरमीक रौद, आमक टिकोल, जाड़ के मास, थरथराइत गात, सबकिछ पाछू छुटि गेल। छुटि गेल ओ मेला ठेला, पावैन तिहारक अपनत्व रंग, बाग बगीचा, अँगना झूला, सब किछ अछि ओहिना अंकित, हमर मोन के कोना मेँ, किँतु एकहि पल मेँ जी उठैछ, अंतर्मनक शिशु आइ, मचलि उठल, आँखि मे भरि लैत छी, कतेको सुँदर रँग, आ समेट लैत छी, अपन आँखि मे, पलक मे बँद क दै छी, अपन बचपन! अपन नेनपन!! २ ओमप्रकाश झा थान केँ नपबाक फेर मे गज छूटल जाइ ए। आकाश छूबाक फेर मे जमीन छूटल जाइ ए।

भाँति-भाँति के सुन्नर फूल लागल फुलवारी मे, कमल लगेबाक फेर मे गेंदा टूटल जाइ ए।

चानी सँ संतोख भेल नै, आब सोनक पाँछा भागू, सोन कीनबाक फेर मे इ चानी रूसल जाइ ए।

दूरक चमकैत वस्तु अंगोरा भय सकै अछि, मृगतृष्णाक फेर मे देखू मृग कूदल जाइ ए।

चानक इजोरिया मे काज "ओम"क होइते छल, भोर-इजोरियाक फेर मे चान डूबल जाइ ए। ३ विनीता झा, पति-श्री गंगानाथ झा, धानेरामपुर, पो.लोहनारोड, जिला दरभंगा। हम छी बुद्धिक थोड़ हे मैया हम छी बुद्धिक थोड़ हे मैया हम छी बुद्धिक थोड़ एलौं शरणमे माँ जगदम्बे झुकबैले अपन शीष जँ भेल मैया गलती हमरासँ क्षमा करू अपराध हे मैया .. मैया नै जानी पूजा जप-तप नै करी अहाँक ध्यान हे मैया नै करी अहाँक ध्यान तैयो मैया पूरा करू हमर मनोरथ लऽ कऽ एलौं आस हे मैया लऽ कऽ एलौं आस बहुत बिपति पड़ल अछि मैया नैय्या डूबि रहल अछि हे काली हे जगजननी मैया हमरो नैय्या पार लगाउ जे फँसल अछि बीच मझधार हे मैया.. असुर संहारिनी दुष्ट विनाशिनी हे भवतारिणी मैया आस लगेलौं एलौं मैया छोड़ि अपन घर संसार हे मैया छोड़ि घर संसार विनीता करै अछि विनती हे मैया करू ओकर विनति स्वीकार हे मैया करू विनति स्वीकार हे मैया हम छी बुद्धिक थोड़ ४. उमेश पासवान कवि‍ता भि‍तरसँ कारी कतेक लि‍खब दलि‍तक व्‍यथा हम कतेक लि‍खब समाजक वि‍डम्‍बना शलहेशक गाम सनेंुश आब नीक, कि‍छु नै रहल, बस रहि‍ गेल भरल अछि‍ एतए दुख: आ कलेश कतेक लि‍खब.... केकरासँ कही के बूझत कि‍ अछि‍ झुठ आ कि‍ अछि‍ साँच टि‍क-मे-टि‍क जोड़ि‍ रहैए बुझैए अपनाकेँ बड़का भि‍तरसँ कारी अछि‍ दलि‍तक दुश्‍मन अछि‍ तरका कतेक लि‍खब दलि‍तक व्‍यथा दलि‍तक अधि‍कारक हल करैए बड़-बड़ करैए नाँच कतेक लि‍खब। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। १.मिहिर झा २.शि‍वकुमार झा ‘टि‍ल्‍लू’ १. मिहिर झा हे भगीरथ, पुनः आउ ई सडल गलल धरा के मरल मानवीय संस्कार के आबि अहां फेर जियाउ हे भगीरथ, पुनः आउ

एक भागीरथी अहां आनल अपन संतति अहां जियाओल रक्तबीज सन पसरल ओ पूर्ण धरा मे छाओल अपन कर्म रत निरंतर गंगा श्वेत रूप गमाओल आब अहां भागीरथी बचाउ हे भगीरथ, पुनः आउ

दिनचर्या हो वा राजनीति साहित्य हो वा वाणिज्य क्रीडा हो वा हो शिक्षा सगरे पाओल एके दीक्षा लालच अहां मेटाओ हे भगीरथ, पुनः आउ

पसरल अधर्म सब जाग जानी मिथ्या भेल आब कृष्ण वाणी कतय छथि भगवती से ने जानी खूने आब ने रंगाओ हे भगीरथ, पुनः आउ २ असमंजस

बॅंटल छी दू टुकड़ा मे आधा एम्हर आधा उम्हर संघर्षरत अछि सतत मोन हमर एम्हर - उम्हर की छोडी की राखी हम लालच अछि फैलल सगर ग़ामे जन्म बचपन बीतल व्यवसाय विदेश डगर सुख सुविधा रहितो सदिखन मोन बसल स्वदेश अपन किया जाउ गाम हम वापस उन्नति छोडि अवनति डगर दिया सलाई फेक के नेसी पाथर घसि चुल्हि भन्साघर इंटरनेट छोडि ली समाचार बैसि दलान चौपाडि पर नोत पुरै के नाम पर अपन टांगी नौकरी खुट्टी पर ई सब बुझितो मोन गडल अछि गड्चुन्नि के झोरे पर बाधक ताज़ा बसात भोरूकबे की भेटत ओ पार्क मे ? गपास्टक अध्याय दलान पर की भेटत ई मीटिंग मे ? फेन्टब तास जमा चौकड़ी की भेटत ई पार्टी मे ? घूर मे पाकल अल्हुआ अल्लू स्वाद भेटत ई ओवेन मे ? सोचि सोचि हम बिखरल छी आधा एम्हर आधा उम्हर | २ शि‍वकुमार झा ‘टि‍ल्‍लू’ कवि‍ता मुरूदा जगाउ इजोतमे तँ सभ चलै छै अन्‍हारमे चलि‍ कऽ देखाउ स्‍वान सुनि‍ पदचाप जागय चचरी चढ़ल मुरूदा जगाउ पृपक मीठ दर्द सुनि‍ बौराएल पटरानी-मंत्री-सेनापति‍-चाकर ओइ अभागल दि‍स के तकलकै जे सर्ववि‍हि‍न जकर देह जर्जर भरल पेट हाफी करैत पहुँचल महाजन दुआरि‍ जखने स्‍वार्थक दुग्‍धसँ बनल पयस भरि‍ थारी आगाँ रखलौं तखने ऑत चटचट कंठ सूखल पानि‍ नै जे घोंटि‍ पाबय सुक्‍खल अछोप मद्यम जनकेँ झाॅटि‍ ‘चंडाल’ कहि‍ भगाबए देवध्‍वनि‍मे नि‍पुण वाचक पंचतत्‍व देहे भरल छै पि‍रही नै केओ दैत ओकरा छुद्र कुलमे ओ जनमल छै देव धर्मकेँ पीस रहलै झपटल सोन बोरि‍ कऽ बटोरल केहेन वि‍कराल मृगतृष्‍णा ई सभ घोंटि‍ उन्‍मत्त जहर घोरल अंति‍म आग्रह ि‍थक सुनू बौआ ऐ फेरमे कखनौं परब नहि‍ अपना संग सभकेँ जगाएब कुमार्ग कहि‍यो धरब नै।। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। १.शिवशंकर सिंह ठाकुर २.रामवि‍लास साहु ३अक्षय कुमार चौधरी १ शिवशंकर सिंह ठाकुर १ आँजन सँ आंजित आंखि हुनकर, सोन सँ बढ़ी क रूप हुनकर , सिनुर भरल माँग हुनकर , ललका साडी में लिपटल देह हुनकर !!!!!

लाज भरल मुस्कान अधर पर , फूल सँ कोमल काया हुनकर, प्रेम सँ छालकैत नयन हुनकर, मेंहदी रचल हथेली हुनकर !!!!!!

छम-चम् बाजैत पायल हुनकर, मिसरी सनक बोल हुनकर, गुलाबक पंखुरी सन ठोर हुनकर, खिलल यौवन मदमाईत हुनकर !!!!!!!

मोन के लुभाईत नजरि हुनकर, अविरल धार प्रेमक हुनकर, रमैत शिव शंकर देखि क हुनका, रसपान करैत रूप हुनकर !!!!!!! २ लुटा गेलौंह हम त रस्ते मे यौ

रहि-रहि क हमरा सताबय छथि, यौवन अपन ओ देखाबय छथि, हम विवश छि अपने हाथें , प्रेम ओ हमरा पर लुटाबई छथि !!!!!!! यौवन अपन ओ ............

कखनो ओ कहती जे चलु सिनेमा, कखनो ओ मेला देखाबै छथि, कखनो क हमरा गाडी में घुमाबैत, कखनो ओ बाईस्कोप देखाबै छथि !!!!!! यौवन अपन ओ ..........

कखनो कहती जे मांथ दुखाईये, कखनो क पैर ओ दबवाईत छथि, कहियो कहियो जाँ प्रसन्न रहै छथि, रस्गुल्लो ओ हमरा खुआबई छथि !!!!!!!!! यौवन अपन ओ ...........

हमहू सोचै छि जे हर्जे की अई , प्रेमो त हमरा सँ ओ करै छथि, कखनो कहै छथि 'हम केहन लगई छि', कखनो ओ ठेंगा देखाबै छथि !!!!! यौवन अपन ओ .............

कखनो ओ कहती जे बाड़ी मे चलु, कखनो ओ गाछी घुमावई छथि, मने मने हमहूँ त राजिये रहै छि, की की ने हमरा देखाबै छथि !!!!!! यौवन अपन ओ ..........

एक दिन भेँट गेली रस्ते मे ओ , पईत गेली बुझु सस्ते मे ओ , फेर की की भेल से कहलो ने जाय , लुटा गेलौंह हम त रस्ते मे यौ !!!!!!!!! ठका गेलौंह हम त सस्ते मे यौ,

यौवन अपन ओ देखावै छथि, प्रेम ओ हमरा पर लुटाबई छथि, गूड़क माईर बुझु धोकरे जनैया, की की ने हमरा संग करइ छथि !!!!!!!!!! २ रामवि‍लास साहु कवि‍ता धनरोपनी सावनक राति‍ इजोरि‍या जरैत पूरबा हवा दोमैत आसन लगौने बैस अकास नि‍हारैत सोचैत छल आश लगेने सावनक बून्न कहि‍यो खसत जे भरि‍ खेत धनरोपनी हएत कि‍छु दुर नवमे बि‍जली चमकैत ढनमनाइत दस्‍तक दैत बादल उमरि‍ गेल धरतीपर बेंगक बाजा नि‍रंतर बजैत झि‍ंगुरक झनकारसँ धरती धमकाबैत मेघक बरि‍याती सजए लागल कारी काजर सन मेघ उमरि‍ पड़ल बि‍जली छि‍टकैत छि‍टकैत मेघक रास्‍ता देखबैत पसरि‍ गेल चारूकात घनघोर बर्खा भेल डबरा-खत्ता भरि‍ गेल खेत चानी सन चमैक गेल खेतक पानि‍सँ धूर तड़पैत उछलैत इचना-पोठी-टेंगरा चाल दैत कुदकैत देख गामक बच्‍चा बेदरू कूदि‍-कूदि‍ माछ पकड़ैत बि‍हानेसँ गजार कदबा हुअए लगल खेत हर जोतैत हरबाह बि‍रहा गाबैत गामक माए-बहि‍न धानक बीज उपारैत भूलल बि‍सरल सोहर समदाउन गबैत धनरोपनी करैत खेत हर्षित मनसँ कहैत- “हरक नाश आ खेतक चासपर पेट भरबाक अछि‍ सभकेँ आश।” ३ अक्षय कुमार चौधरी पिता राजनारायण चौधरी, ग्राम+पोस्ट: महिषी (पुनर्वास आरापट्टी), जिला: सहरसा. संप्रति दिल्ली स्कुल आ‌‍फ इकोनोमिक्स मे अन्वेषक आ समाजशास्त्री छथि. हिनक "Dowary among the Maithil Brahmins: aspects of Change and contitunity" बिषय पर पी. एच. डी. आओर "Marriage among the Maithil Brahmins" बिषय पर एम. फ़ील. केर अन्वेषन काज छैन्हि. अन्य बिषय पर प्रकाशित आ अप्रकाशित सेमिनार पेपर के अतिरिक्त वर्ष २००९ मे जापानक क्यो़टो विश्वविद्यालय केर 1st Next Generation Glowal Workshop मे हिनका द्वारा प्रस्तुत कैल आ छपल लेख "Gender and Heterosexsual Relationship in Intimate and Public Sphere: Ethnography of Maithil Brahmin Community" विषय पर लिखल गेल अछि। वाणिक लैस

उत्तराहा कहलथिन दखिनाहा कैं- रौ, तोरा माटि मे लैस छौ मुदा वाणि मे लैस नहि. ...उत्तराहा? ...दखिनाहा? वाणिक ऐव तँ ऐव छैक! ...कैव तँ कैव छथि!! ओलक कब-कब ऊपजै छै गंगोतिओ माटि-पानि पर! कोशिकन्हो माटि-पानि पर!! बोल, भाव, स्वभाव, केर मिठास कि मोल भेटय बजार में? वाणिक लैस कें कि मतलब उत्तर, दखिन, शिक्षा, विदूता सँ! वाणिक तेख तँ तेख छैक! ... कैव तँ कैव छथि!! ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। १.जगदीश चन्द्र  ’अनिल’२.उमेश मण्डल ३.विकास झा रंजन १. जगदीश चन्द्र  ’अनिल’ गजल १

मन्दिर सं हम उतरि गेलहुं सत-सत बाजब बिसरि गेलहुं।

दू टा कन्यादान शेष अछि एकहिटामे उजड़ि गेलहुं।

आबि रहल छल चन्दा मांग’ बाध दीस हम ससरि गेलहुं।

कजरी लागल छलै बाट पर नहि देखलियै, पिछड़ि गेलहुं।

अहांक आंखि केर नोर भेलहुं हम अहंक गाल पर टघरि गेलहुं।

हमहूं हाट छलहुं भरि गामक सांझ पड़ल तं उसरि गेलहुं।

आएब नीक लागल, छिड़ियैब नीक लागल दू-चारि दिन बिताक’ घुरि जैब नीक लागल।

सत्य बाजि क’ कियो मुइल कहां कहियो ईशा जकां शूली चढि जैब नीक लागल।

जहां-तहां गहुमन सोझांमे ठाढ़ भेटल कात द’ क’ आगां बढ़ि जैब नीक लागल।

भाफ जकां कखनहुं सागर सं उड़ि गेलहुं मेघे जकां कखनहुं झड़ि जैब नीक लागल।

हंसिए क’ कटलहुं पताल केर जीवन आकाश जखन भेटल, उड़ि जैब नीक लागल।

ओम्हर छल परसल छप्पन प्रकार व्यंजन एम्हर अहांक चिट्ठी, पढ़ि जैब नीक लागल। २ उमेश मण्डल 1 एतऽ माथ चकराइए चलू घुरि‍ चली तनोसँ तन छुबाइए चलू घुरि‍ चली

कि‍यो ककरो नहि‍ देखैए ऐ समाजमे मोने मन झगड़ाइए चलू घुरि‍ चली

गोर मौगी गौरवे आन्हर भेलि‍ अड़ल करि‍या बाट बुझाइए चलू घुरि‍ चली

कोन उपाए लगाबी तौड़ैले ऐ फानीकेँ टूटि‍ मन जे कनाइए चलू घुरि‍ चली

करब नै कोनो आस ऐ समाजसँ हम उमेशो जे घुरियाइए चलू घुरि‍ चली 2 कल्‍याणक बाट नै पकड़तै लगैए ई भाँड़ि‍-भाँड़ि‍ सभकेँ झपटतै लगैए ई अकालोमे काल बनि‍ बौएलक सभकेँ कि‍छु बाजी तँ और मखड़तै लगैए ई ‍कोनो आंगुर कटने अपने होइ घा भेद नै करबै तँ झगड़तै लगैए ई मुँह सीब कऽ रहब तँ रहि‍ सकैत छी लोक गीत जँ गेबै चहकतै लगैए ई छोड़ि‍ देने टूटि‍ जाएत समाज अपन उमेश जोड़तै तँ चहकतै लगैए ई‍ ३ विकास झा रंजन गीत नजरि

नजरि बचा कऽ नजरिसँ देखै छी, देखी ने अहाँ डेरा कऽ देखै छी!

जखनो देखै छी मुदा नवे लगै छी, तैं नित नजरिसँ नुका कऽ देखै छी!

सोझाँमे अबितौं बाटे तकै छी, नजरिमे अहींक छाही देखै छी!

नजरिसँ सभटा खेरहा करैत छी, चुप्पे मुदा हम सभटा देखै छी!

अहाँ रूपक किताबो पढ़ै छी,  जुनि सोचू गलत नजरिसँ देखै छी! रुबाइ १ ईशा आ पैगम्बरक झगरा सुनलौं, अन्हरा जिहादक फतबा सुनलौं, सुनलौं निछा गेलइ लादेन परसू , आइ फेर केदन लादेन भेल ई की सुनलौं ! २ हुनक सोह टीसइए काँट बबूर जेना , आँखि भिजैए तारी खजूर जेना , हुनके रूपक चिप्पी लगेलौं करेजमे, ओ अघाइ छथि कछहरिक हजूर जेना ! ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। डॉ. अजीत मिश्र, जन्म स्थान- नबटोल(मात्रिक), पैत्रिक- ‘आदित्य वास’, पाहीटोल, सरिसब-पाही, मधुबनी। ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय दड़िभङ्गासँ स्नातकोत्तर(मैथिली) कएलाह बाद 1994 सँ 2006 धरि आकाशवाणी, दड़िभङ्गामे आकस्मिक मैथिली अन्तरवार्ताकार ओ समाचार-वाचक रुपमे कार्य। पछाति भारत सरकारक अन्तर्गत भारतीय भाषा संस्थान, मैसूरमे मैथिलीक प्रवेशक उपरान्त मैथिलीक पहिल प्रतिनिधिक रुपमे पूर्वी प्रादेशिक केन्द्र, भुवनेश्वरमे पाहुन प्राध्यापक  भए 10 जूलाइ, 2006सँ कार्य प्रारम्भ। एतए लगातार तीन वर्ष धरि कार्य सम्पादनक बाद भारत सरकारक राष्ट्रीय ज्ञान आयोगक अनुशंसा पर राष्ट्रीय अनुवाद मिशनकेर गठनक उपरान्त मैथिलीक मुख्य शैक्षिक सलाहकारक रुपमे मइ, 2009सँ भारतीय भाषा केन्द्र, मैसूरमे कार्यरत। दुर्गा चालीसा वन्दन-अभिनन्दन गुरुक चरणमे, जनिक कृपासँ सभ मतिमान। मनमे इच्छा करी प्रार्थना, माँ भगवतिकेर चपल चरण प्रणमान।। शक्ति-दायिनी, बल-बुद्धि प्रदायिनी, कए कृपा सदा बढ़ाबी मान। अछि मन करी अभ्यर्थना, जनिक कृपासँ सब किछु गतिमान।। 1 जय-जय-जय दुर्गा महरानी, दुख-दारिद्र-विपत्ति हारिणी। 2. सकल मनोरथ पूर्ण कारिणी, शंख-चक्र-त्रिशुल धारिणी। 3 कर कृपाण आ ढाल हाथमे, दस भुजा शोभय साथमे। 5. ताकए चहु दिस अपनेक आस, करी ने ककरो कहिओ निरास। 7. बाजल चहु दिस जनिकर डंका, रहल ने ककरो शक्तिक शंका। 9. अपरुप सुन्दर जनिकर रुप, शोभए सबहक हृदय स्वरुप। 4 जन-जन मांग वास हृदयमे, सभ पूरन हो सैह माथमे। 6. सुर-असुरकेर आस बनल जे, महिषासुरकेर नास कएल से। 8. जन-जन मनमे जनिक निवास, बहए सगर दिस सुन्दर सुवास। 10. मनमे बास पूरत सभ आस, जन-जन हो ने कतहु निरास। 11. हे भगवति! छी अहँ अपरुप, करए आ पाबए से समरुप। 13. जगभरि जकरा आस ने कोनो, भरि आबए सुख तकरा मोनो। 15. धवल नवल नव नित सयानी, हरए-पूरए सब हित कल्याणी। 17. मुनहर नहि कहिओ मुरझार, परतन रहए सगरो धुरझार। 12 गहल चरण मनसँ जे तोर, पाओल धन-जन तोरे कोर। 14. हे माँ-ममता जगत भवानी, मोर उर वास करह शर्वाणी। 16. चीवर वसन नयन सिनेह, दीघर सपन भरल मुड़ेर। 18. हे भगवति! अहँ रही सहाय, सकल मनोरथ संग पुराय। 19. आस-वास हो सकल जहान, जहिना जहनि बनए महान। 21. क्षोणी मौनीसँ,   हो  परिपूर्ण, जन-मन नहि हो, घमंडे चूर्ण। 23. करी कृपा आ सदा सहाय, भरी धरा माँ, सभे समाय। 25. शक्ति-भक्तिसँ हो न विभक्त, जन-मनमे हो  तोरहि भक्त। 27. पूजए चहु दिस आस लगाए, रहए सबे नित हँसी भभाए। 20. चलए मस्त भए जेना कुरंग, मन मयूर भए बाजए मृदंग। 22. कृपा आशमे नति मति भए, हम धएल आइ ई बेना माए। 24. माँ केर ममता पाबि सकल, दीन-हीनकेर मिटए विकल। 26. धएने रही सब दिन ई धामा, पड़ए ने कहिओ ककरो बामा। 28. ईशक दृष्टिसँ पूर्ण धरा ई, सृष्टि रक्षा चढ़ि करू करी। 29. ई धरा धारसँ हो परिपूर्ण, मुदा धारकेर गर्व हो चूर्ण। 31. हे मैया! तोँ सबहक रक्षक, नजरि टेढ़ करए ने भक्षक। 33. ई जीवन जबूर ने लागे, हीन भावना दूरे भागे। 35. रहि-रहि मनमे भरए भावना, नहि कहिओ क्षीण कामना। 30. हम पतित तेँ ई पतिकिरनी, चलए ने आबए अंगने घिरनी। 32. जप-तप हमरा नहि ने आबए, नहि मन हमरा थीर उपजाबए। 34. वन्दन-अभिनन्दन नित्यनूतना, करी कृपा जे, सफल साधना। 36. तारा- तारिणी- रुद्राणीसन, शर्वाणी- नारायणी मनेमन। 37. माँ केर ममता चहुदिस भाबए, सगर समाजमे हित्तहि साजए। 39. हे मैया अछि तोरहि आस, करह ने कहिओ हमे निरास। 38. नित-नित नूतन हे भवानी, हित-हित जीवन कहे पिहानी। 40. जन-गण-मनमे तोरहि वास, रहए सगरभरि सुन्दर सुवास। शिवप्रिया हे रुप भवानी, करहु कृपा भए हित-कल्याणी, जन-मन बसए रुप मसानी, तोहेँ मैया ने बनह मानिनी। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। १.डॉ॰ शशिधर कुमर २ आनंद कुमार झा ३नवीन कुमार "आशा" ४.प्रभात राय भट्ट १. डॉ॰ शशिधर कुमर एम॰डी॰(आयु॰) – कायचिकित्सा कॉलेज ऑफ आयुर्वेद एण्ड रिसर्च सेण्टर, निगडी – प्राधिकरण, पूणा (महाराष्ट्र) – ४११०४४ डॉ॰ शशिधर कुमर एम॰डी॰(आयु॰) – कायचिकित्सा कॉलेज ऑफ आयुर्वेद एण्ड रिसर्च सेण्टर, निगडी – प्राधिकरण, पूणा (महाराष्ट्र) – ४११०४४ सभ सँ रसगर माएक भाषा (गीत) सभ  सँ  रसगर  माएक  भाषा, भाषा सँ मीठ  नञि हो मिसरी । करी ज्ञानार्जन पढ़ि बहुत विधा, पर निज भाषा केँ जुनि बिसरी ।। भाषा जे  पशु सँ  भिन्न केलक, भावाभिव्यक्ति केर चिन्ह देलक । रटि  दोसर  बोली, बनि  सुग्गा, अहँ ओहि भाषा केँ जुनि बिसरी । सभ  सँ  रसगर  माएक  भाषा, भाषा सँ मीठ नञि हो मिसरी ।। हो सारि  प्रिय,  सरहोजि  प्रिय, पत्नी  केँ  राखी  सटा   हृदय । पर अछि अस्तित्व जनिक कारण, अहँ ओहि माता केँ जुनि बिसरी । सभ  सँ  रसगर  माएक  भाषा, भाषा सँ मीठ नञि हो मिसरी ।। माएक  भाषा , अप्पन  भाषा । मिथिला – भाषा, अप्पन भाषा । परहेज  किए  एहि  भाषा सँ ? आउ एहि पर हम सभ गर्व करी । सभ  सँ  रसगर  माएक  भाषा, भाषा सँ मीठ नञि हो मिसरी ।। गे सजनी !  फोल कने फेर ठोर (गीत) कमल नयन लखि, मधुर वयन सुनि, हुलसित मन ई चकोर । गे सजनी !  फोल कने फेर ठोर ।। हमरा  एते  तोँ जुनि तरसा गे । अपन अधर मधु रस बरिसा दे । जुनि बन तोँ एतेक कठोर । गे सजनी !  फोल कने फेर ठोर ।। बोल - सुबोल  हृदय  उद्‌बेधल । तोहर सरिस दोसर नञि देखल । उर – अन्तर उठय हिलोर । गे सजनी !  फोल कने फेर ठोर ।। कोयली जदपि सातहु सुर सीखल । तदपि सखी , तोहरा नहि जीतल । मधु भरल छौ पोरे पोर । गे सजनी !  फोल कने फेर ठोर ।। हम नञि कहब कि ......... (गीत) हम नञि कहब कि  फूल  मे गुलाब  छी अहाँ, हमर जिनगी केर स्वप्न ओ “ताज”  छी अहाँ । मुदा जिनगीक एकसरि  अन्हरिया मे विकसित, सुन्नर   ओ   सुमधुर   प्रभात   छी  अहाँ ।। हम नञि कहब कि “सुष्मिता” सँ नीक छी अहाँ, “ऐश्वर्या”  केर   जेरॉक्स   प्रतीप   छी  अहाँ । अहाँ  नञि  चाही  हमरा,  ई   इच्छा   अहँक, मुदा अहीं  हमर  अन्तरा , ओ गीत छी अहाँ ।। किछु  अन्यथा  ने    सोचब,  से  आग्रह  हमर, एक  कवि  केर   दुस्साहस  केँ  कऽ  देब क्षमा । अहाँ    अँऽही    रहब,   हऽम    हमही   रहब, अहँक   चाहत    रखबाक    हमर   हस्ती    कहाँ  !! २ आनंद कुमार झा आनंद झा "मैथिल" पंचैती

एक बेरक बात कहै छी गाममे होइत रहै पंचैती अप्पन खुट्टा एतै गारब तइ ले भेल फरिछैती

सुखु बाबु अध्यक्ष बनला पुछलनि की भेल बात टुनमा - मुनमा चला रहल छल एक दोसरपर हाथ

मंगरू कहलक यौ पंडी जी कोना कऽ छुटतै झगरा एकरा दुनुमे मुन्मा सदिखन करैत रहै छै रगरा

मंकुआ केँ  रहल नै गेलै कहलक मंगरुआ चुप रह मुनमा संग तोरो झगरा छौ अखन कने तों गुम्म रह

भोला बाबू झट दऽ  बजला कोन काजमे लागल छी बहत्रम साल हमर चढि रहल अछि बिन बियाह हम अभागल छी

कोरियानी सँ छप्पन महतो हरबर हरबर आयल सब पञ्च केँ कल जोड़ि कऽ बैसल छल सरियाएल

मोती काका जोर सँ बजला टुनमा मुनमा सुनि ले जत्तऽ जत्तऽ खुट्टा गारबें दुन्नू खद्धा खुनि ले

अहजव शाहू चट दऽ बजला दुन्नू बंद करू ई नाटक हमरो टोलमे सुनरी काकी चला रहल छै टाटक

केम्हरो सँ  पहलमान जी केँ  देखलौं लाठी लेने दौड़ला सुखु बाबू लंक लऽ कऽ देखते ओतऽ सँ भगला पंचैती टूटि गेल तखने टुनमा-मुनमा देखलक छोड़ ई झगड़ा बंद ई रगरा दुनू भैयारी सोचलक

टुनमा कहलक सुन रौ मुनमा खंती आ खुट्टा लऽ कऽ आबए जतए मोन छौ छोट भाइ छें खुट्टा ओतए धसाबए

मुनमा केँ रहल नै गेलै कहलक, भैय्या.. हम सभ की करै छलहुँ , एक ठाम जँ नै जीबै तँ कोन जहर पीबै छलहुँ

छुटल झगड़ा मिटा गेल रगरा दुन्नू हाथ मिलेलक अंतमे बाजल यएह छै मिथिला सबहक नाम बढेलक ३ नवीन कुमार "आशा" कोना बिसरू तोरा तोहर यादमे गै सजनी एकटा गीत पेश करै छी जहिया तूँ गेलेँ दूर नै लागए किछु नीक तोहर यादमे पेश करै छी दिलसँ एकटा गीत आ आ आ आ आ सजनी सजनी सजनी गै सजनी के कहत हमरा साजन ककरा लेल बजाउ बाजन आब बस रहलौ तोहर इयाद ककरासँ करू फरियाद के कहत हमरा साजन ककरा लेल बजाउ बाजन सजनी सजनी गै सजनी ४ प्रभात राय भट्ट चुनमुन चुनमुन करैत चिड़िया बैसल अपना खोतामे ऊपर सं मूत्र प्रवाह केलक हमर जल भरल लोटामे तामस सं हम मातल आइग लगेलौं खोतामें फुर सं चिड़ैया उड़ीगेल आइग लागल हमरा कोठामें चीं चीं करैत चिड़ैया खोता जरैत देख ब्याकुल भेल लहलहैत आइगमें चिड़ैयाक बच्चा जैरक मईरगेल मनाबरूपी दानव तोई केले किये एहन दुष्कर्म रिस रागक वशीभूत मनुख कतय गमैले दया धर्म हमरा खोतामे आइग लगेले अपनो घर जरैले तू बुझैत छे इ कोठा तोहर हम बुझैत छि इ खोता हमर ईर्ष्या  दोष  लोभ  क्रोध  मोह त्याग  देख  कने दूरदृष्टि मुदा नै किछ तोहर नै हमर इ थिक  ईस्वरक श्रृष्टि खाली  हाथ  येले  जगमे खाली  हाथ तोई जएबे कर्निक धरनी मालिक कें दरवारमे तोई पएबे २ गरीबक जिनगी भेल पहार दुनिया सगरो लगैया अन्हार -- २ भूखल पेट जेकर टूटल घरदुवार वर्षा में भीत गिरल हवा उरौलक चनवार फाटल अंगा झलकैया अंग उघार सर्दी सं थर थर कापिं बहैय पूर्वाबयार गरीबक जिनगी भेल पहार ..............2 दुनिया सगरो लगैया अन्हार ............2 दिन दू;खी पैर हुकुम करैया नेता आर सरकार गरीबक बच्चा कोना जिबैय केकरो नै कुनु दरकार गरीबक जिनगी भेल पहार ..............2 दुनिया सगरो लगैया अन्हार ............2 बड़का माछ छोटका माछके बनौलक अपन  आहार धनवान बनल अछि शिकारी निर्धन के करेय शिकार गरीबक जिनगी भेल पहार ..............2 दुनिया सगरो लगैया अन्हार ............2 अन्न अन्न लय जी तर्सैया भेटे नै किछु आहार के बुझत मर्म गरीबक साहू महाजन नै दैय उधार गरीबक जिनगी भेल पहार ..............2 दुनिया सगरो लगैया अन्हार ............2 माए बाबु रोग सं ग्रसित कोना करी हुनक उपचार तंग आबिगेलहूँ हम देख इ दुनियाक व्यवहार गरीबक जिनगी भेल पहार ..............2 दुनिया सगरो लगैया अन्हार ............2 ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। १.रामदेव प्रसाद मण्‍डल ‘झारूदार’ २.अमित मोहन झा १ रामदेव प्रसाद मण्‍डल ‘झारूदार’, मैथिलीक पहिल जनकवि आ मैथिलीक भिखारी ठाकुर रामदेव प्रसाद मण्‍डल ‘झारूदार’क गीत आ झारु। गीत- झारू- डूबल हि‍न्‍द अज्ञान के सागर। तैप रहल अछि‍ लोभ बुखार।। शाशको तँ बंचि‍त नै देखाबै। के करतै एक्कर उपचार।। झारू- फेर कऽ गेल ऐपर सभटा। एण्‍टि‍वायोटि‍क धरम इमान।। नि‍ष्‍ठा नैति‍कता मर्यादा। दया मानवता नीि‍त ज्ञान।। तर्ज- मानव मारै छै मानवताकेँ चढ़ि‍ गेल छै अज्ञान यौ-2 सभा लगा कऽ सभ कि‍यो सोचू देशक सभ वि‍द्वान यौ-2 गीत- सभ बनल छै पैसा रोगी, अन्‍धवि‍श्वास, कुरीतक जोगी सि‍र चढ़ल परवान यौ। सभा......। जनता राजा सभ अन्‍हरेलै न्‍याय वि‍कासी काम बनरेलै साहि‍त बनि‍ कऽ ठक लुटेरा लुटै शान्‍ति‍ ज्ञान यौ। सभा......। अहाँ बि‍ना के ई दुख हरतै अहींसँ ई सभ दानव मरतै कलमकेँ एक बेर फेर बनाबू रामक तीर कमान यौ। सभा......। दू दर्जन ‘झारू’ 1 ताज मि‍लै सम्‍पूर्ण जगतकेँ आ बनि‍ जीबए झारूदार मानवमे मानवता होइ तँ बदलै नै ओकर अवतार।। 2 रंगू नै जीवन जाइत धरमसँ। सभकेँ मानू अप्‍पन मीत।। नीच ऊँचक भेद भुलि‍ कऽ। गबैत रहु मानवता गीत।। 3 सत्ता हमर सारे जगतपर। मानवता हमर मेघा वि‍धान।। पालनमे जे करए ढि‍ठाइ। स्‍वीकारए ओ नरकक खान।। 4 जन-जनपर हम्‍मर शासन छै। हर चि‍जपर हम्‍मर अधि‍कार।। कोनो प्रप्‍त अप्राप्‍त कहाँ छै। तर्क लगा करू स्‍वीकार।। 5 हर अेा मानव हमर सि‍पाही। जि‍नका छन्‍हि‍ मानवता ज्ञान।। मारू कुचलि‍ दियौ बेमानवता। बढ़ाउ जगमे अपन नाम।। 6 हमरासँ पहि‍ले कोनो नै शासन। नै छै कोनो धर्मक वि‍धान।। हमरा बि‍नु जगत सूना छै। हटैबला छै पशु समान।। 7 हमरा लेल छै कि‍यो नै ऊँच। नहि‍ कि‍यो नीच नादान।। जे बरतलक ऐ धर्मकेँ। अटल जगतमे हुनकर नाम।। 8 हम मानवक मूलाधार छी। सभ धरमक पि‍ता समान।। पाप पुण्‍यसँ अति‍ परे छी। देवतो छी हम्‍मर संतान।। 9 मानव वास्‍ते सीमा सरहद मानवताकेँ सक्कर खेद।। जाति‍ धरम सरहदसँ अलग छै। मानवतामे कोनो नै भेद।। 10 जब धरै मानवता मानव। रहै नै भीतर जाइत धरम।। नि‍ष्‍ठा इमान कऽ करए आदर। और पुजै नि‍त्‍य सत् कर्म।। 11 जब मानव धरै मानवता। तब बढ़ै जन-जनसँ मेल।। दूर रहै घरसँ सभ टेन्‍शन। ब्‍यापै नै कोनो झगड़ा झेल।। 12 जब धरै मानवता मानव। पक्का होइ ओकर इमान।। डर लगै छै असत् कर्मसँ। कि‍न्‍नौं नै बदलै ओकर जुवान।। 13 जब मानवता धरै मानव। तब उपजै मन लाज लेहाज।। आदर दीली बड़ा पाबै छै। रहै नै छोट प्‍यारसँ बाज।। 14 मानव जब धरै मानवता। ओकरासँ कोइ दुखै नै जीव। और नै दुनि‍याँ ओकरा सताबै। जीवमे देखै अल्‍ला शि‍व।। 15 मानव जब मानवता धरै। तन पहि‍र नैति‍क परि‍धान।। धरम इमानक रक्षा खाति‍र। करै न्‍यौछावर धन आ जान।। 16 मानवता जब धरै मानव। मि‍ट जाए नि‍च ऊँचक शान।। दुनि‍याँ देखाबै सम बराबर। देखै ने कि‍यो अप्‍पन आन।। 17 धरै जब मानवता मानव। ब्‍यापै नै ओकरा त्रि‍वि‍ध ताप।। काम क्रोध ने लोभ सताबै। अन्‍धवि‍श्वासमे करै नै जाप।। 18 मानवता जब शासक धरै। सुख सम्‍पन्न होइ जनता तमाम।। मि‍टै मूलसँ भूख गरीबी। रहै नै पाछाँ वि‍काशी काम।। 19 मानवता जौं न्‍याय कर्मी धरै। कम हेतै केश फाइलक थान।। कहल मुक्‍त भऽ साड़ी जनता। देखतै फेरसँ नया बि‍हान।। 20 जौं मानवता धरै सि‍पाही। शुद्ध शासन कऽ रचै वि‍धान।। झगड़ै नै जन-जनसँ कि‍यो। शान्‍ति‍ होएत सबहक परि‍धान।। 21 मानव जब मानवता धरै। प्रगट होइ भीतर नीत इमान।। नि‍ष्‍ठा मर्यादा नैति‍कता। दया धरम सतकरम वि‍धान।। 22 जब त्‍यागै मानवता मानव। भऽ गेल ओकर शान्‍ति‍ भंग।। जकरा अखन तक कहै छल अप्‍पन। ओकरेसँ भऽ गेल भारी जंग।। 23 मानवता जब छोरै मानव। भऽ गेल अेाकर बेड़ा गर्क।। चि‍क्कारे जगवासी ओकरा। जीबै जीवन बना कऽ नर्क।। 24 अमूल रत्न मानवता मानू। जे पाॅलक ई जनहि‍त भाव।। दुख तँ हुनका रहि‍ते नै छन्हि‍। रहै नै कोनो सुक्खक अभाव।। २ अमित मोहन झा, ग्राम-भंडारिसम (वाणेश्वरी स्थान), मनीगाछी, दरभंगा, बिहार, भारत। कोना जीवन बिततै

ताकै छी नैना भरि भरि, काटै छी अहुरिया, हाँ बिन तड़पइत बीतए, कोना कऽ उमरिया, कोना जीवन बिततै , यौ कोना जीवन बिततै, बाटपर लागल अछि नजरिया, कोना जीवन बिततै।

जखने सँ सोलह चढ़लै, पिया निर्मोहिया बनलै, कोना कऽ हमरा बिसरलै, कोना कऽ नेहा टुटलै, कोना जीवन बिततै, यौ कोना जीवन बिततै, एलै यौवनक दुपहरिया, कोना जीवन बिततै।

चिठ्ठियो नै पाँती पेलौं, रातियो तरेगन गनलौं, यादिमे कुहकैत कुहकैत , गाछीक कोयली बनलौं, कोना जीवन बिततै, यौ कोना जीवन बिततै, नहिये एला हमर साँवरिया, कोना जीवन बिततै, सुनू अमित आनंदक नजरिया, कोना जीवन बिततै। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। विदेह नूतन अंक मिथिला कला संगीत १.कैलाश कामत२.ज्योति सुनीत चौधरी ३.श्वेता झा (सिंगापुर) ४.गुंजन कर्ण ५.इरा मल्लिक १. कैलाश कुमार कामत,  पि‍ताक नाओं- श्री गंगाराम कामत , माताक नाओं- श्रीमती सुनीता देवी, गाम- बेरमा, भाया- तमुरि‍या , थाना- मधेपुर, जि‍ला- मधुबनी , (बि‍हार) मधुबनी जि‍लाक बेरमा गामक मध्‍य वि‍द्यालयमे पढ़ैत कैलाश कामत, सातमाक छात्र छथि‍ बड़ लगनसँ फोटो बनबै छथि‍। २. ज्योति सुनीत चौधरी जन्म तिथि -३० दिसम्बर १९७८; जन्म स्थान -बेल्हवार, मधुबनी ; शिक्षा- स्वामी विवेकानन्द मि‌डिल स्कूल़ टिस्को साकची गर्ल्स हाई स्कूल़, मिसेज के एम पी एम इन्टर कालेज़, इन्दिरा गान्धी ओपन यूनिवर्सिटी, आइ सी डबल्यू ए आइ (कॉस्ट एकाउण्टेन्सी); निवास स्थान- लन्दन, यू.के.; पिता- श्री शुभंकर झा, ज़मशेदपुर; माता- श्रीमती सुधा झा, शिवीपट्टी। ज्योतिकेँwww.poetry.comसँ संपादकक चॉयस अवार्ड (अंग्रेजी पद्यक हेतु) भेटल छन्हि। हुनकर अंग्रेजी पद्य किछु ३.श्वेता झा (सिंगापुर) ४.गुंजन कर्ण राँटी मधुबनी, सम्प्रति यू.के.मे रहै छथि। www.madhubaniarts.co.uk पर हुनकर कलाकृति देखि सकै छी। ५. इरा मल्लिक, पिता स्व. शिवनन्दन मल्लिक, गाम- महिसारि, दरभंगा। पति श्री कमलेश कुमार, भरहुल्ली, दरभंगा। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। विदेह नूतन अंक गद्य-पद्य भारती १. मोहनदास (दीर्घकथा):लेखक: उदय प्रकाश (मूल हिन्दीसँ मैथिलीमे अनुवाद विनीत उत्पल) मोहनदास (मैथिली-देवनागरी) मोहनदास (मैथिली-मिथिलाक्षर) मोहनदास (मैथिली-ब्रेल) २.छिन्नमस्ता- प्रभा खेतानक हिन्दी उपन्यासक सुशीला झा द्वारा मैथिली अनुवाद छिन्नमस्ता बालानां कृते १.पवनकान्त झा (काश्यप कमल)- बाबूक खिस्सा २.डॉ॰ शशिधर कुमर (बालगीत) ३.सद्रे आलम गौहर-नेना भुटकाक लेल एकटा सुंदर कविता १. पवनकान्त झा (काश्यप कमल), नाटककार, रंगमंच अभिनेता। विदेह बाल अंकमे ज्योति चौधरीक नानीक सुनाएल किछु खिस्सा आएल छल। प्रस्तुत अछि पवनजीक बाबूक सुनाएल छहटा खिस्सा। बाबूक सुनाएल छह टा खिस्सा १ एक टा राजा छलाह । ओ अपन प्रजाक बड नीक जेकाँ ध्यान रखैत छलाह । राजा साहेब रोज़ राति कऽ भेष बदलि कऽ अपन राज्यमे घुमैत छलाह । एक राति राजा घुमैत छलाह तँ देखलखिन जे – एकटा गरीब आदमी घूर तपैत रहै तखने ओकर पत्नी अबि कऽ कहलकै.... चलु भोजन कऽ लिअ । पति पुछलकै – पैंचा लगेलहुँ ? पत्नी कहलखिन – हॅं । पति पुछलकै – पैंचा सधेलहुँ ? पत्नी कहलखिन – हॅं । पति कहलकै – तँ चलू, सहस्त्रमुखक दीप जराउ गऽ, हम अबैत छी । पत्नी चलि गेलीह । राजा नुका कऽ सभटा गप्प सुनैत रहथि। राजा सोचलन्हि जे ई गरीब आदमी पैंचा लगबैतो अछि, पैंचा सधैबतो अछि आ सहस्त्रमुखक दीप बारि कऽ खाइत अछि... हम राजा छी से एक-दू नहि तँ पाँच मुखक दीप जरबैत छी... आ ई सहस्त्रमुखक दीप जरबैत अछि आ ई सभ दिन पैंचा लगबैत-सधबैत अछि... एकरा एतेक धन कतएसँ अबैत छैक ? अवश्य ई कतहु चोरि करैत होएत । एकरा सजा भेटबाक चाही । भोरे राजा दरबारमे ओइ आदमीकेँ बजेलन्हि | दरबारमे राजा ओकरा पुछलखिन्ह – तोँ कोन काज करैत छें? ओ कहलकन्हि – महाराज, हम मजदूरी करैत छी । राजा बजलाह – तोँ झूठ बजैत छेँ। ओ कहलकन्हि –नै महाराज, हम झूठ नै बजैत छी। राजा तमसा कऽ पुछलखिन्ह -  तहन तोरा रोज कतऽसँ पैंचा लगबैत आ सधबैत छेँ? सहस्त्रमुखक दीप बारि कऽ भोजन कतए सँ करैत छेँ? ओ मजदूर विनती कऽ कऽ पुछलकन्हि तँ राजा रातुक सभ वृत्तान्त कहलथिन्ह ... ओ मजदूर हॅंसए लागल आ बाजल – महाराज हम सभ मजदूरी कऽ कऽ गुजर करैत छी तैयो अपन संस्कारसँ हटि नै सकलहुँ... राति जे हम अपन पत्नीसँ कहलिऐ से पैंचा लगेबाक अर्थ भेलै जे – हमर दू टा छोट धिया-पूता अछि तकरा भोजन करेनाइ आ पैंचा सधेबाक माने भेलै जे बूढ माए-बापकेँ भोजन करेनाइ। हमर घरवाली जखन कहलक हॅं, तकर बाद हम कहलिऐ सहस्त्रमुखक दीप जरबै लेल । सरकार, हमरा सभकेँ लालटेम-डिबिया कतएसँ एतै? हम सभ तँ एक मुट्ठी पुआर जरा कऽ ओकरे इजोतमे खा लैत छी। हमरा सभ लेल वएह सहस्त्रमुखक दीप भेलै। सभ दरबारी ओकर जय-जयकार केलक आ राजा ओकरा बहुते रास इनाम देलखिन्ह । २ गप्पक अर्थ एक बेर एकटा राज दरबारमे नाच होइत रहैक, ताइ दिन नाच भरि रातुक होइ, ब्रह्ममुहुर्त सँ कनी पहिने नटुआकेँ औंघी लागि गेलै, ई देखि नाचमे जे मूलगैन रहैक से इशारामे कहलकै - गये रे बहुतरे काले संजनम मन रंजनम.......आ नटुआ गाबए लागल ...... ई सुनि राजकुमार अपन गलाक हार नटुआकेँ इनाममे दऽ देलकै ..... राजकुमारी अपन गिरमोहार नटुआकेँ इनाममे दऽ देलकै ..... सभकेँ आश्चर्य भेलैक.... जहन पुछल गेलै तँ राजकुमार कहलकै ... 'हमर बाबु (राजा) ८० बरखक बूढ भऽ गेलाह तैयो एखन तक हमरा राजा नै बनेलन्हि, आइ हम सोचने रही जे रातिमे तलवारसँ काटि दितियन्हि... किन्तु अहि नटुवाक शब्दक अर्थ हमरा लागि गेल'। तकर बाद राजकुमारीसँ पुछल गेल तँ ओ कहलथि 'हमरा मंत्रीक बेटासँ प्रेम अछि परंतु हमर बाबू (राजा), हमर विवाहक विरुद्ध छथि आ आइ हम दुनू गोटा भागि जैतौं मुदा ई नटुआ हमरा कहलक ....... हमरा अर्थ लागि गेल'। तें किछु लोक केँ गप्पक अर्थ आ लक्ष्मीनाथ गोसाँइक पाँतिक जे बुझाए, से ने मनुख...... ३ जहियासँ काल धेलक एक टा जोतखी जी रहथि।  प्रकाण्ड विद्वान। विद्वतामे समस्त राज्यमे हुनकर धाख छलन्हि.... । भादव मास ... सन्ध्या काल...  जोतखी जी लोटा लऽ कऽ पैखाना दिस विदा भेलाह... बुनछेक भेल रहै परंचु मेघ लागल रहै... गामक बाहर रस्ता कातमे मिरचैया गाछक झाँखुर लग धोती खोलि बैसि गेलाह ..... जहाँ बैसला कि बोनमे नुकाएल साँप पाछुमे काटि लेलकन्हि... जोतखी जी धरफराएल गामक कन्हा भगता लग गेलाह .... ताइ दिन तँ गामक भगता सभ बेसी मुर्खे होइत छल.... भगता झाड़य लगलन्हि आ कहन्हि.... केहेन बेकूफ छी .... कुठाममे साँप काटि लेलक .....  जोतखी जी चुप रहला .... भगता फेर हँसैत कहलकन्हि.... धुर जोतखी जी केहेन बेवकूफ छी...... जोतखी जी फेर चुप.... ...... तेसर बेर भगता फेर कहलकन्हि.... अहि बेर जोतखी जीकेँ नहि रहल गेलन्हि......... कहलखिन्ह "हमरा सन विद्वान अहि राजमे नै छौ ....... परंचु जहनसँ ई काल धऽ लेलक-ए तहनसँ ठीके हम बेवकूफ भऽ गेलहुँ" कहैत.... जोतखी जी विदा भऽ गेलाह ............. ४ नीक करी तँ पैघ के? बेजाए करी तँ पैघ के? एक टा पण्डितजी रहथि, ओइ रज्यक राज कुमारकेँ शिक्षा देनाइ सेहो हुनके काज रहन्हि। पण्डितजी अपन बेटाकेँ सिखबथिन्ह जे - नीक करी तँ पैघ के, बेजाए करी तँ पैघ के। छोट बुद्धि बलासँ संगत नै करी आ जनानीकेँ सभ गप्प नै कहिऐ......... जहन पण्डितजी बूढ भऽ कऽ मरि गेलाह तँ हुनकर बेटा राज पण्डित भेलाह । ओइ राजाकेँ बुढारीमे एकटा बेटा भेलन्हि। राजकुमार जहन ५-६ बरखक भेलाह तँ पण्डितजीसँ शिक्षा ग्रहण करए लगलाह... एक दिन पण्डितजीकेँ बुझेलन्हि जे बाबू सभ दिन कहैत छलाह जे - नीक करी तँ पैघ के, बेजाए करी तँ पैघ के, छोट बुद्धि बलासँ संगत नै करी आ जनानीकेँ सभ गप्प नै कहिऐ...... से एकरा भजेबाक चाही .... एक दिन ओ एकटा बड़का टा सन्दूक लेलन्हि ओइमे खेबा-पिबाक व्यवस्था कऽ देलखिन्ह आ राजा बेटाकेँ कहलखिन्ह जे अहाँ अहि सन्दूकमे बन्द भऽ जाउ आ कतबो कियो सोर पाड़ए तँ नै बाजब... जाबे हम नै कही तावत नै निकलब....... पण्डितजी बाहर एलाह आ एकटा चक्कू लेलन्हि आ चक्कूक संग अपन हाथमे लाल रंग लगा लेलन्हि आ हड़बड़ाइत पंडिताइनकेँ कहलथिन्ह जे हमरा बुते जुलूम भऽ गेलै, चक्कूसँ करचिकलम बनबैत काल उछट्टि कऽ राजकुमारक नरेटी कटा गैलै...... ई सुनि पंडिताइन छाती पीटऽ लगली..... हरेलन्हि ने फुरेलन्हि पंडिताइन अपन पड़ोसिया चौकीदारक कनियाँ, जिनकासँ पंडिताइनकेँ बड़ अपेछितारे छलन्हि, दौड़ कऽ कहऽ गेलखिन्ह.... चौकीदारनी दौड़ कऽ खेतमे हर जोतैत चौकीदारकेँ कहलकै....... चौकीदार ने यएह सोचलक ने वएह... सोझे आबि पंडितजीक डांड़मे रस्सा लगेलक आ राजदरबारमे लऽ गेल। चौकीदारकेँ भेलै जे अहि माथे प्रोमोसन भऽ जाएत..... राजदरबारमे सभ आश्चर्यचकित भऽ गेल.... राजा कहलखिन्ह जे गुरुकेँ रस्सामे बान्हि अनर्थ केलैं.. तुरत हिनकर रस्सा खोल...... चौकीदार – महाराज, ई बड़का पैघ गलती केलन्हि..... राजा – कतबो पैघ गलतीक लेल गुरुकेँ रस्सासँ बान्हल नै जा सकैत छै ... जल्दी हिनका खोल .... चौकीदार खोलि देलकन्हि, तहन राजा कहलखिन्ह - आब कहऽ जे ई की केलन्हि? चौकीदार बाजल जे ई राजकुमारक हत्या कऽ देलन्हि.. सभ सन्न..... सभ दरबारीमे खुसुर-फुसुर होमए लागल..... कियो कहै जे हिनका शूलीपर चढा दे तँ कियो कहै जे भकसी झोंका दियन्हु.... राजा बड़ी काल सोचलन्हि आ अंतमे फैसला लेलन्हि आ पण्डितजी केँ कहलखिन्ह – हमरा जीवनमे अहिसँ पैघ अनर्थ नै हएत.... अहाँ बड़ पैघ अपराध केलहुँ परंतु अहाँ गुरु छी..... तथापि अहाँकेँ सजा भेटत.... हम अहाँकेँ सजा दैत छी जे अहाँ सपरिवार चौबीस घंटाक भीतर हमर राज्यसँ निकलि जाउ...... सभा समाप्त भऽ गेल ........... सभ दरबारीमे खुसुर-फुसुर शुरु भऽ गेल...... समूचा राज्यमे हाहाकार मचि गेल .... पण्डित जी गामपर एलाह आ बक्सामे सँ राजकुमारकेँ निकालि आंगुर पकड़ि राजदरबार दिस बिदा भेलाह.... सभ आश्चर्यचकित भऽ गेल......... पण्डित जी राजदरबार पहुँचलाह । सभ अचम्भित। राजा पुछलखिन्ह – की बात छिऐ पण्डित जी ? पण्डित जी बजलाह – सरकार हमरा जनमहिसँ बाबू कहैत छलाह जे – नीक करी तँ पैघ के, बेजाए करी तँ पैघ के, छोट बुद्धि बलासँ संगत नै करी आ जनानीकेँ सभ गप्प नै कहिऐ......... से गप्पकेँ हम भजेलहुँ अछि। राजा बजला – तँ की प्राप्ति भेल ? अहि राज्यमे सभसँ पैघ अहाँ आ अहाँक अहिसँ पैघ अनर्थ किछु नै भऽ सकैत अछि तथापि अहाँ हमरा मर्यादानुकूल दण्ड देलहुँ... तें ई तँ ठीके जे नीक करी तँ पैघ के आ बेजाए करी तँ पैघ के..... दोसर -  अहि चौकीदारनीसँ पण्डिताइनकेँ बड़ अपेक्षितारे छलन्हि आ चौकीदार सेहो हमरा बड नमस्कार पात करैत छल । समय पड़लापर ई बात नै बुझऽ लागल, सोझे पकड़ि लेलक बुझलक जे अही माथे प्रोमोशन भऽ जाएत... तेँ ठीके बाबू कहैत छलाह जे छोट बुद्धिबलासँ संगत नै करी। तेसर – हमर पण्डिताइन किछु सोचऽ नै लगली आ सोझे चौकीदारनीकेँ कहए गेलखिन्ह.... तेँ ईहो ठीक जे जनानीकेँ सभ गप्प नै कहिऐ.... बाबूक सभ गप्प मील गेल । लिअ अपन बेटा आ हम चललहुँ....... ५ पढ़बे टा नै करी ओकरा गुनबो करी एक टा आदमी छलाह । हुनका आध्यात्मिक किताब पढैमे बड़ मोन लगैत रहन्हि। आस्ते-आस्ते ओ बाबाजी भऽ गेलाह। हुनका नाइन्हिये टा मे किताब मे पढल रहन्हि जे कण-कण मे भगवान बसैत छथि आ सएह सत मानि कऽ ओ जीवन कटैत रहलाह। एक बेर एक टा गाममे बड़ मरखाह साँढ आबि गेलै। भरि गाममे तेहेन ने उछन्नर देने छल जे गामक लोक ओइ साँढक डरे ओ रास्ता छोड़ि देने छल। एक दिन ई महात्मा जी ओइ गाम गेलाह। भरि दिन घुमलाक बाद साँझमे जखन घुमल जाइत रहथि तँ वएह रस्ता धरऽ लगलाह। ओहू ठाम नेना भुटका सभ खेलाइत रहै.... बाबाजीकेँ ओइ रस्ते जाइत देखि नेना भुटका सभ मना केलकन्हि। बाबाजी कहखिन्ह जे रे बच्चा तूँ सभ की जाने गिया, कण-कण मे भगवान बास करता है – हमरा मे, तोरा मे, ओइ साँढ़मे, सभमे भगवान रहता है ... आ जखन साँढ़मे भगवान हैं तँ भगवान हमरा कोना मारेगा? हम तँ ओकर भक्त है... नेना भुटका सभ कहलकन्हि- तहन जा तोरा भगवान बचेथुन्ह..... बाबाजी आगू बढ़लाह ...साँढ दुरेसँ देखि नांगरि उठा दौड़ल आ बाबाजीकेँ सिंघपर उठा आरिक कात मे रगड़ऽ लागल.... बाबाजी बाप-बाप करए लगलाह..... जावत लोक सभ लाठी-भाला आदि लऽ कऽ दौगल तावत बाबाजी बेदम भऽ गेलाह.... हुनकर मृत्यु भऽ गेल छलन्हि.... मुइलाक बाद जहन भगवानसँ भेँट भेलन्हि, ओ बाबाजी भगवानसँ पुछलखिन्ह तँ भगवान जबाब देलखिन्ह – बाउ, किताबमे पढ़बे टा नै करू ओकरा गुनबो करियौ....जँ सभमे हम (भगवान) रहैत छी तँ ओ नेना भुटका सभ जे अहाँकेँ मना केलक ओकरोमे तँ हम (भगवान) छलिऐ... तेँ खाली पढ़बे टा नै करियौ, ओकरा गुनबो करियौ..... ६ अकिलक मोल एकटा राज्यमे वृद्ध राजा छलाह। हुनकर मंत्रीमण्डलमे सभसँ बेसी दरमाहा एक टा बुरहा मंत्रीजीकेँ छलन्हि। दरबारक किछु अपेक्षाकृत युवा मंत्रीगणकेँ एकटा बात अखरैत छलन्हि जे - सभटा काज हम सभ करैत छी तैयो हमरा सभक कम दरमाहा आ ई बुरहा मंत्री कोनो काज नै करैत छथि, खाली राजा साहेब लग गप्प दैत रहैत छथिन्ह, तैयो ओ सभसँ बेसी दरमाहा पबैत छथि संगहि राजा साहैब हुनकर गप्प बेसी मानबो करैत छथिन्ह। अहि बातपर सभ दरबारी सभमे घोल-फचक्का होमए लागल । एक दिन सभ मिलि कऽ भरल राजदरबारमे अहि प्रश्नकेँ उठौलक..... राजा साहेब बड़ गम्भीर भऽ कहलथिन्ह जे काल्हि अहि हम एकर प्रमाण देब । दरबार खतम भऽ गेल। भोर भेने दरबार लागल । राजा प्रतिवादी युवा मंत्रीकेँ आ बुरहा मंत्रीकेँ अलग अलग कमरामे बैसा देलथिन्ह । सभसँ पहिने प्रतिवादी युवा मंत्रीकेँ बजेलाह आ कहलखिन जे जाउ आ राजमहलक पछुआरमे नारक टाल छै ओइमे एकटा पिलिनियाकेँ बच्चा भेल छै,  कने देखने अबियौ । युवा मंत्री गेलाह आ कने कालमे घुमि कऽ आपस एलाह। राजा पुछलखिन्ह- ‘देखलिऐ?’ युवा मंत्री – जी महाराज, ठीके कुक्कूरकेँ बच्चा भेल छै महाराज। राजा – कएक टा छै? युवा मंत्री –जा से तँ गनबे नै केलिऐ। युवा मंत्री फेर दौड़ कऽ गेलाह आ आबि कऽ कहलखिन – महराज, तीन टा चितकबरा, दू टा गोला आ एक टा उज्जर छै। राजा – ओइमे कएक टा पिलिनिया आ कएक टा पिल्ला छै ? युवा मंत्री – जा से फरिछा कऽ देखबे नै केलिऐ। युवा मंत्री फेर दौड़ कऽ गेलाह आ आबि कऽ कहलखिन – महाराज, पाँच टा पिलिनियाँ आ एक टा पिल्ला छै। राजा – बिख लगै बला कएक टा छै आ बिना बिख बला कएक टा छै ? युवा मंत्री फेर दौड़ कऽ गेलाह आ आबि कऽ कहलखिन – महाराज, तीन टाकेँ बिख लगतै आ तीन टाकेँ बिख नै लगतै । राजा – कएक टा पिल्लाकेँ बिख लगतै आ कएक टा पिलिनियाकेँ बिख लगतै ? युवा मंत्री फेर दौड़ कऽ जेबाक लेल बढ़ए लगला तँ राजा रोकि देलखिन आ कहलखिन- बैस जाउ। युवा मंत्री बैस गेलाह। तकर बाद राजा बुरहा मंत्रीकेँ दरबारमे बजेलन्हि आ कहलखिन जे मंत्रीजी राजमहलक पछुवारमे जे नारक टाल छै ओइमे एकटा पिलिनियाँकेँ बच्चा भेल छै, कने देखने अबियौ। बुरहा मंत्री गेलाह आ कने कालमे घुमि कऽ आपस एलाह। राजा पुछलखिन्ह – मंत्री जी देखलिऐ? बुरहा मंत्री – जी महाराज, देखलिऐ। गोला पिलिनियाकेँ करीब पांच-छ: दिन पहिने बच्चा भेल हेतैक । तीन टा चितकबरा, दू टा गोला आ एक टा उज्जर रंगक छै ।  पांच टा पिलिनियाँ आ एक टा पिल्ला छै। तीन टाकेँ बिख लगतै जइमे दू टा पिल्ला आ एक टा पिलिनिया आ बाँकी तीन टाकेँ बिख नै लगतै। लगैत अछि जे कोनो विदेशी कुक्कूरसँ अहि पिलिनियाँकेँ ......... राजा बीचमे रोकि देलखिन आ दरबारी सभसँ पुछलखिन जे अहाँ आब बुझलिऐ जे बुरहा मंत्रीजी केँ सभसँ बेसी दरमाहा किएक छै? आबो ककरो कोनो कोनो प्रश्न? सभ दरबारी महाराजक जयकार कऽ उठल आ युवा मंत्रीक मुँह लटकि गेलन्हि....

२ डॉ॰ शशिधर कुमर एम॰डी॰(आयु॰) – कायचिकित्सा कॉलेज ऑफ आयुर्वेद एण्ड रिसर्च सेण्टर, निगडी – प्राधिकरण, पूणा (महाराष्ट्र) – ४११०४४ धिया – पुता जनकक वंशज हम (बालगीत) चलितहि रहब अछि काज हमर, लगातार अविराम । जा धरि भेटय ने लक्ष्य जीवनक, चाही ने विश्राम ।। प्रगतिक पथ पर बढ़ैत रहब हम, हरैत विघ्न - बाधा सभ केँ । चलितहि रहब जीवनक पथ पर, नाँघैत सरिता गिरि गह्वर केँ । सहैत चलब हम सुख – दुःख सभटा, कनिञो  नञि घबड़ायब । माए  मैथिलीक  आँचर  पर  नहि, कोनहु  कलंक  लगायब । कनक रेख सञो लिखब भारतक विश्व पटल पर नाँव । जा धरि भेटय ने लक्ष्य जीवनक, चाही ने विश्राम ।। चलैत  रहब  हम अडिग सुपथ पर, नव - नव लय जिज्ञासा । प्रेम – स्वतंत्रता - ज्ञानक   भूखल,  रत्नक  नञि  अभिलाषा । धिया – पुता जनकक वंशज हम, स्वर्णिम भविष्य केर आशा । अथक  परिश्रम  काज हमर, बिनु  स्वार्थक  कोनहु  पिपासा। विश्व पटल पर फेर बनायब मिथिला केर नव पहिचान । जा धरि भेटय ने लक्ष्य जीवनक, चाही ने विश्राम ।। ३ सद्रे आलम गौहर नेना भुटकाक लेल एकटा सुंदर कविता झट स्कूल जो हाथ मे ल'ले पोथी स्लेट आ भट्ठा, बौआ घी लेबे की मट्ठा। पढ़बेँ लिखबैँ साहेब बनबेँ बढ़िया बढ़िया सूट बूट अनबेँ नहित' सभ दिन पहिर' पड़तौ मोट झोट आ लठ्ठा बैआ... सरस्वती सँ लक्ष्मी भेटतौ घर भरि मे संपन्नता औतौ दड़िभंगा मे कीन देबौ, तोरो जमीन दू कठ्ठा बौआ... देखही जे ने पढ़लक लिखलक अ आ इ ई सहो ने  सिखलक ओकरा आइ धरि जाय पड़ै छै, कान्ह पर हर  लऽ हठ्ठा बौआ... ललुआ चुनुआ रबिया  गुड़िया स्कूल जाई छौ संगी तुरिया पढ़कऽ अबिहैँ त संगी संग, करिहैँ हँसी ठठ्ठा बौआ... ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com  पर पठाउ। बच्चा लोकनि द्वारा स्मरणीय श्लोक १.प्रातः काल ब्रह्ममुहूर्त्त (सूर्योदयक एक घंटा पहिने) सर्वप्रथम अपन दुनू हाथ देखबाक चाही, आ’ ई श्लोक बजबाक चाही। कराग्रे वसते लक्ष्मीः करमध्ये सरस्वती। करमूले स्थितो ब्रह्मा प्रभाते करदर्शनम्॥ करक आगाँ लक्ष्मी बसैत छथि, करक मध्यमे सरस्वती, करक मूलमे ब्रह्मा स्थित छथि। भोरमे ताहि द्वारे करक दर्शन करबाक थीक। २.संध्या काल दीप लेसबाक काल- दीपमूले स्थितो ब्रह्मा दीपमध्ये जनार्दनः। दीपाग्रे शङ्करः प्रोक्त्तः सन्ध्याज्योतिर्नमोऽस्तुते॥ दीपक मूल भागमे ब्रह्मा, दीपक मध्यभागमे जनार्दन (विष्णु) आऽ दीपक अग्र भागमे शङ्कर स्थित छथि। हे संध्याज्योति! अहाँकेँ नमस्कार। ३.सुतबाक काल- रामं स्कन्दं हनूमन्तं वैनतेयं वृकोदरम्। शयने यः स्मरेन्नित्यं दुःस्वप्नस्तस्य नश्यति॥ जे सभ दिन सुतबासँ पहिने राम, कुमारस्वामी, हनूमान्, गरुड़ आऽ भीमक स्मरण करैत छथि, हुनकर दुःस्वप्न नष्ट भऽ जाइत छन्हि। ४. नहेबाक समय- गङ्गे च यमुने चैव गोदावरि सरस्वति। नर्मदे सिन्धु कावेरि जलेऽस्मिन् सन्निधिं कुरू॥ हे गंगा, यमुना, गोदावरी, सरस्वती, नर्मदा, सिन्धु आऽ कावेरी  धार। एहि जलमे अपन सान्निध्य दिअ। ५.उत्तरं यत्समुद्रस्य हिमाद्रेश्चैव दक्षिणम्। वर्षं तत् भारतं नाम भारती यत्र सन्ततिः॥ समुद्रक उत्तरमे आऽ हिमालयक दक्षिणमे भारत अछि आऽ ओतुका सन्तति भारती कहबैत छथि। ६.अहल्या द्रौपदी सीता तारा मण्डोदरी तथा। पञ्चकं ना स्मरेन्नित्यं महापातकनाशकम्॥ जे सभ दिन अहल्या, द्रौपदी, सीता, तारा आऽ मण्दोदरी, एहि पाँच साध्वी-स्त्रीक स्मरण करैत छथि, हुनकर सभ पाप नष्ट भऽ जाइत छन्हि। ७.अश्वत्थामा बलिर्व्यासो हनूमांश्च विभीषणः। कृपः परशुरामश्च सप्तैते चिरञ्जीविनः॥ अश्वत्थामा, बलि, व्यास, हनूमान्, विभीषण, कृपाचार्य आऽ परशुराम- ई सात टा चिरञ्जीवी कहबैत छथि। ८.साते भवतु सुप्रीता देवी शिखर वासिनी उग्रेन तपसा लब्धो यया पशुपतिः पतिः। सिद्धिः साध्ये सतामस्तु प्रसादान्तस्य धूर्जटेः जाह्नवीफेनलेखेव यन्यूधि शशिनः कला॥ ९. बालोऽहं जगदानन्द न मे बाला सरस्वती। अपूर्णे पंचमे वर्षे वर्णयामि जगत्त्रयम् ॥ १०. दूर्वाक्षत मंत्र(शुक्ल यजुर्वेद अध्याय २२, मंत्र २२) आ ब्रह्मन्नित्यस्य प्रजापतिर्ॠषिः। लिंभोक्त्ता देवताः। स्वराडुत्कृतिश्छन्दः। षड्जः स्वरः॥ आ ब्रह्म॑न् ब्राह्म॒णो ब्र॑ह्मवर्च॒सी जा॑यता॒मा रा॒ष्ट्रे रा॑ज॒न्यः शुरे॑ऽइषव्यो॒ऽतिव्या॒धी म॑हार॒थो जा॑यतां॒ दोग्ध्रीं धे॒नुर्वोढा॑न॒ड्वाना॒शुः सप्तिः॒ पुर॑न्धि॒र्योवा॑ जि॒ष्णू र॑थे॒ष्ठाः स॒भेयो॒ युवास्य यज॑मानस्य वी॒रो जा॒यतां निका॒मे-नि॑कामे नः प॒र्जन्यों वर्षतु॒ फल॑वत्यो न॒ऽओष॑धयः पच्यन्तां योगेक्ष॒मो नः॑ कल्पताम्॥२२॥ मन्त्रार्थाः सिद्धयः सन्तु पूर्णाः सन्तु मनोरथाः। शत्रूणां बुद्धिनाशोऽस्तु मित्राणामुदयस्तव। ॐ दीर्घायुर्भव। ॐ सौभाग्यवती भव। हे भगवान्। अपन देशमे सुयोग्य आ’ सर्वज्ञ विद्यार्थी उत्पन्न होथि, आ’ शुत्रुकेँ नाश कएनिहार सैनिक उत्पन्न होथि। अपन देशक गाय खूब दूध दय बाली, बरद भार वहन करएमे सक्षम होथि आ’ घोड़ा त्वरित रूपेँ दौगय बला होए। स्त्रीगण नगरक नेतृत्व करबामे सक्षम होथि आ’ युवक सभामे ओजपूर्ण भाषण देबयबला आ’ नेतृत्व देबामे सक्षम होथि। अपन देशमे जखन आवश्यक होय वर्षा होए आ’ औषधिक-बूटी सर्वदा परिपक्व होइत रहए। एवं क्रमे सभ तरहेँ हमरा सभक कल्याण होए। शत्रुक बुद्धिक नाश होए आ’ मित्रक उदय होए॥ मनुष्यकें कोन वस्तुक इच्छा करबाक चाही तकर वर्णन एहि मंत्रमे कएल गेल अछि। एहिमे वाचकलुप्तोपमालड़्कार अछि। अन्वय- ब्रह्म॑न् - विद्या आदि गुणसँ परिपूर्ण ब्रह्म रा॒ष्ट्रे - देशमे ब्र॑ह्मवर्च॒सी-ब्रह्म विद्याक तेजसँ युक्त्त आ जा॑यतां॒- उत्पन्न होए रा॑ज॒न्यः-राजा शुरे॑ऽ–बिना डर बला इषव्यो॒- बाण चलेबामे निपुण ऽतिव्या॒धी-शत्रुकेँ तारण दय बला म॑हार॒थो-पैघ रथ बला वीर दोग्ध्रीं-कामना(दूध पूर्ण करए बाली) धे॒नुर्वोढा॑न॒ड्वाना॒शुः धे॒नु-गौ वा वाणी र्वोढा॑न॒ड्वा- पैघ बरद ना॒शुः-आशुः-त्वरित सप्तिः॒-घोड़ा पुर॑न्धि॒र्योवा॑- पुर॑न्धि॒- व्यवहारकेँ धारण करए बाली र्योवा॑-स्त्री जि॒ष्णू-शत्रुकेँ जीतए बला र॑थे॒ष्ठाः-रथ पर स्थिर स॒भेयो॒-उत्तम सभामे युवास्य-युवा जेहन यज॑मानस्य-राजाक राज्यमे वी॒रो-शत्रुकेँ पराजित करएबला निका॒मे-नि॑कामे-निश्चययुक्त्त कार्यमे नः-हमर सभक प॒र्जन्यों-मेघ वर्षतु॒-वर्षा होए फल॑वत्यो-उत्तम फल बला ओष॑धयः-औषधिः पच्यन्तां- पाकए योगेक्ष॒मो-अलभ्य लभ्य करेबाक हेतु कएल गेल योगक रक्षा नः॑-हमरा सभक हेतु कल्पताम्-समर्थ होए ग्रिफिथक अनुवाद- हे ब्रह्मण, हमर राज्यमे ब्राह्मण नीक धार्मिक विद्या बला, राजन्य-वीर,तीरंदाज, दूध दए बाली गाय, दौगय बला जन्तु, उद्यमी नारी होथि। पार्जन्य आवश्यकता पड़ला पर वर्षा देथि, फल देय बला गाछ पाकए, हम सभ संपत्ति अर्जित/संरक्षित करी। 8.VIDEHA FOR NON RESIDENTS 8.1 to 8.3 MAITHILI LITERATURE IN ENGLISH 8.1.1.The Comet   -GAJENDRA THAKUR translated by Jyoti Jha chaudhary 8.1.2.The_Science_of_Words- GAJENDRA THAKUR translated by the author himself 8.1.3.On_the_dice-board_of_the_millennium- GAJENDRA THAKUR translated by Jyoti Jha chaudhary 8.1.4.NAAGPHANS (IN ENGLISH)- SHEFALIKA VERMA translated by Dr. Rajiv Kumar Verma and Dr. Jaya Verma 1. Episodes Of The Life - ("Kist-Kist Jeevan" by Smt. shefalika Varma translated into English by Smt. Jyoti Jha Chaudhary )  2.Original Poem in Maithili by Kalikant Jha "Buch" Translated into English by Jyoti Jha Chaudhary Input: (कोष्ठकमे देवनागरी, मिथिलाक्षर किंवा फोनेटिक-रोमनमे टाइप करू। Input in Devanagari, Mithilakshara or Phonetic-Roman.) Output: (परिणाम देवनागरी, मिथिलाक्षर आ फोनेटिक-रोमन/ रोमनमे। Result in Devanagari, Mithilakshara and Phonetic-Roman/ Roman.) English to Maithili Maithili to English इंग्लिश-मैथिली-कोष / मैथिली-इंग्लिश-कोष  प्रोजेक्टकेँ आगू बढ़ाऊ, अपन सुझाव आ योगदान ई-मेल द्वारा ggajendra@videha.com पर पठाऊ। Top of Form विदेहक मैथिली-अंग्रेजी आ अंग्रेजी मैथिली कोष (इंटरनेटपर पहिल बेर सर्च-डिक्शनरी) एम.एस. एस.क्यू.एल. सर्वर आधारित -Based on ms-sql server Maithili-English and English-Maithili Dictionary. १.भारत आ नेपालक मैथिली भाषा-वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक शैली आ २.मैथिलीमे भाषा सम्पादन पाठ्यक्रम १.नेपाल आ भारतक मैथिली भाषा-वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक शैली

१.१. नेपालक मैथिली भाषा वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक  उच्चारण आ लेखन शैली (भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक धारणाकेँ पूर्ण रूपसँ सङ्ग लऽ निर्धारित) मैथिलीमे उच्चारण तथा लेखन १.पञ्चमाक्षर आ अनुस्वार: पञ्चमाक्षरान्तर्गत ङ, ञ, ण, न एवं म अबैत अछि। संस्कृत भाषाक अनुसार शब्दक अन्तमे जाहि वर्गक अक्षर रहैत अछि ओही वर्गक पञ्चमाक्षर अबैत अछि। जेना- अङ्क (क वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ङ् आएल अछि।) पञ्च (च वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ञ् आएल अछि।) खण्ड (ट वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ण् आएल अछि।) सन्धि (त वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे न् आएल अछि।) खम्भ (प वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे म् आएल अछि।) उपर्युक्त बात मैथिलीमे कम देखल जाइत अछि। पञ्चमाक्षरक बदलामे अधिकांश जगहपर अनुस्वारक प्रयोग देखल जाइछ। जेना- अंक, पंच, खंड, संधि, खंभ आदि। व्याकरणविद पण्डित गोविन्द झाक कहब छनि जे कवर्ग, चवर्ग आ टवर्गसँ पूर्व अनुस्वार लिखल जाए तथा तवर्ग आ पवर्गसँ पूर्व पञ्चमाक्षरे लिखल जाए। जेना- अंक, चंचल, अंडा, अन्त तथा कम्पन। मुदा हिन्दीक निकट रहल आधुनिक लेखक एहि बातकेँ नहि मानैत छथि। ओ लोकनि अन्त आ कम्पनक जगहपर सेहो अंत आ कंपन लिखैत देखल जाइत छथि। नवीन पद्धति किछु सुविधाजनक अवश्य छैक। किएक तँ एहिमे समय आ स्थानक बचत होइत छैक। मुदा कतोक बेर हस्तलेखन वा मुद्रणमे अनुस्वारक छोट सन बिन्दु स्पष्ट नहि भेलासँ अर्थक अनर्थ होइत सेहो देखल जाइत अछि। अनुस्वारक प्रयोगमे उच्चारण-दोषक सम्भावना सेहो ततबए देखल जाइत अछि। एतदर्थ कसँ लऽ कऽ पवर्ग धरि पञ्चमाक्षरेक प्रयोग करब उचित अछि। यसँ लऽ कऽ ज्ञ धरिक अक्षरक सङ्ग अनुस्वारक प्रयोग करबामे कतहु कोनो विवाद नहि देखल जाइछ। २.ढ आ ढ़ : ढ़क उच्चारण “र् ह”जकाँ होइत अछि। अतः जतऽ “र् ह”क उच्चारण हो ओतऽ मात्र ढ़ लिखल जाए। आन ठाम खाली ढ लिखल जएबाक चाही। जेना- ढ = ढाकी, ढेकी, ढीठ, ढेउआ, ढङ्ग, ढेरी, ढाकनि, ढाठ आदि। ढ़ = पढ़ाइ, बढ़ब, गढ़ब, मढ़ब, बुढ़बा, साँढ़, गाढ़, रीढ़, चाँढ़, सीढ़ी, पीढ़ी आदि। उपर्युक्त शब्द सभकेँ देखलासँ ई स्पष्ट होइत अछि जे साधारणतया शब्दक शुरूमे ढ आ मध्य तथा अन्तमे ढ़ अबैत अछि। इएह नियम ड आ ड़क सन्दर्भ सेहो लागू होइत अछि। ३.व आ ब : मैथिलीमे “व”क उच्चारण ब कएल जाइत अछि, मुदा ओकरा ब रूपमे नहि लिखल जएबाक चाही। जेना- उच्चारण : बैद्यनाथ, बिद्या, नब, देबता, बिष्णु, बंश, बन्दना आदि। एहि सभक स्थानपर क्रमशः वैद्यनाथ, विद्या, नव, देवता, विष्णु, वंश, वन्दना लिखबाक चाही। सामान्यतया व उच्चारणक लेल ओ प्रयोग कएल जाइत अछि। जेना- ओकील, ओजह आदि। ४.य आ ज : कतहु-कतहु “य”क उच्चारण “ज”जकाँ करैत देखल जाइत अछि, मुदा ओकरा ज नहि लिखबाक चाही। उच्चारणमे यज्ञ, जदि, जमुना, जुग, जाबत, जोगी, जदु, जम आदि कहल जाएबला शब्द सभकेँ क्रमशः यज्ञ, यदि, यमुना, युग, यावत, योगी, यदु, यम लिखबाक चाही। ५.ए आ य : मैथिलीक वर्तनीमे ए आ य दुनू लिखल जाइत अछि। प्राचीन वर्तनी- कएल, जाए, होएत, माए, भाए, गाए आदि। नवीन वर्तनी- कयल, जाय, होयत, माय, भाय, गाय आदि। सामान्यतया शब्दक शुरूमे ए मात्र अबैत अछि। जेना एहि, एना, एकर, एहन आदि। एहि शब्द सभक स्थानपर यहि, यना, यकर, यहन आदिक प्रयोग नहि करबाक चाही। यद्यपि मैथिलीभाषी थारू सहित किछु जातिमे शब्दक आरम्भोमे “ए”केँ य कहि उच्चारण कएल जाइत अछि। ए आ “य”क प्रयोगक सन्दर्भमे प्राचीने पद्धतिक अनुसरण करब उपयुक्त मानि एहि पुस्तकमे ओकरे प्रयोग कएल गेल अछि। किएक तँ दुनूक लेखनमे कोनो सहजता आ दुरूहताक बात नहि अछि। आ मैथिलीक सर्वसाधारणक उच्चारण-शैली यक अपेक्षा एसँ बेसी निकट छैक। खास कऽ कएल, हएब आदि कतिपय शब्दकेँ कैल, हैब आदि रूपमे कतहु-कतहु लिखल जाएब सेहो “ए”क प्रयोगकेँ बेसी समीचीन प्रमाणित करैत अछि। ६.हि, हु तथा एकार, ओकार : मैथिलीक प्राचीन लेखन-परम्परामे कोनो बातपर बल दैत काल शब्दक पाछाँ हि, हु लगाओल जाइत छैक। जेना- हुनकहि, अपनहु, ओकरहु, तत्कालहि, चोट्टहि, आनहु आदि। मुदा आधुनिक लेखनमे हिक स्थानपर एकार एवं हुक स्थानपर ओकारक प्रयोग करैत देखल जाइत अछि। जेना- हुनके, अपनो, तत्काले, चोट्टे, आनो आदि। ७.ष तथा ख : मैथिली भाषामे अधिकांशतः षक उच्चारण ख होइत अछि। जेना- षड्यन्त्र (खड़यन्त्र), षोडशी (खोड़शी), षट्कोण (खटकोण), वृषेश (वृखेश), सन्तोष (सन्तोख) आदि। ८.ध्वनि-लोप : निम्नलिखित अवस्थामे शब्दसँ ध्वनि-लोप भऽ जाइत अछि: (क) क्रियान्वयी प्रत्यय अयमे य वा ए लुप्त भऽ जाइत अछि। ओहिमे सँ पहिने अक उच्चारण दीर्घ भऽ जाइत अछि। ओकर आगाँ लोप-सूचक चिह्न वा विकारी (’ / ऽ) लगाओल जाइछ। जेना- पूर्ण रूप : पढ़ए (पढ़य) गेलाह, कए (कय) लेल, उठए (उठय) पड़तौक। अपूर्ण रूप : पढ़’ गेलाह, क’ लेल, उठ’ पड़तौक। पढ़ऽ गेलाह, कऽ लेल, उठऽ पड़तौक। (ख) पूर्वकालिक कृत आय (आए) प्रत्ययमे य (ए) लुप्त भऽ जाइछ, मुदा लोप-सूचक विकारी नहि लगाओल जाइछ। जेना- पूर्ण रूप : खाए (य) गेल, पठाय (ए) देब, नहाए (य) अएलाह। अपूर्ण रूप : खा गेल, पठा देब, नहा अएलाह। (ग) स्त्री प्रत्यय इक उच्चारण क्रियापद, संज्ञा, ओ विशेषण तीनूमे लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना- पूर्ण रूप : दोसरि मालिनि चलि गेलि। अपूर्ण रूप : दोसर मालिन चलि गेल। (घ) वर्तमान कृदन्तक अन्तिम त लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना- पूर्ण रूप : पढ़ैत अछि, बजैत अछि, गबैत अछि। अपूर्ण रूप : पढ़ै अछि, बजै अछि, गबै अछि। (ङ) क्रियापदक अवसान इक, उक, ऐक तथा हीकमे लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना- पूर्ण रूप: छियौक, छियैक, छहीक, छौक, छैक, अबितैक, होइक। अपूर्ण रूप : छियौ, छियै, छही, छौ, छै, अबितै, होइ। (च) क्रियापदीय प्रत्यय न्ह, हु तथा हकारक लोप भऽ जाइछ। जेना- पूर्ण रूप : छन्हि, कहलन्हि, कहलहुँ, गेलह, नहि। अपूर्ण रूप : छनि, कहलनि, कहलौँ, गेलऽ, नइ, नञि, नै। ९.ध्वनि स्थानान्तरण : कोनो-कोनो स्वर-ध्वनि अपना जगहसँ हटि कऽ दोसर ठाम चलि जाइत अछि। खास कऽ ह्रस्व इ आ उक सम्बन्धमे ई बात लागू होइत अछि। मैथिलीकरण भऽ गेल शब्दक मध्य वा अन्तमे जँ ह्रस्व इ वा उ आबए तँ ओकर ध्वनि स्थानान्तरित भऽ एक अक्षर आगाँ आबि जाइत अछि। जेना- शनि (शइन), पानि (पाइन), दालि ( दाइल), माटि (माइट), काछु (काउछ), मासु (माउस) आदि। मुदा तत्सम शब्द सभमे ई निअम लागू नहि होइत अछि। जेना- रश्मिकेँ रइश्म आ सुधांशुकेँ सुधाउंस नहि कहल जा सकैत अछि। १०.हलन्त(्)क प्रयोग : मैथिली भाषामे सामान्यतया हलन्त (्)क आवश्यकता नहि होइत अछि। कारण जे शब्दक अन्तमे अ उच्चारण नहि होइत अछि। मुदा संस्कृत भाषासँ जहिनाक तहिना मैथिलीमे आएल (तत्सम) शब्द सभमे हलन्त प्रयोग कएल जाइत अछि। एहि पोथीमे सामान्यतया सम्पूर्ण शब्दकेँ मैथिली भाषा सम्बन्धी निअम अनुसार हलन्तविहीन राखल गेल अछि। मुदा व्याकरण सम्बन्धी प्रयोजनक लेल अत्यावश्यक स्थानपर कतहु-कतहु हलन्त देल गेल अछि। प्रस्तुत पोथीमे मथिली लेखनक प्राचीन आ नवीन दुनू शैलीक सरल आ समीचीन पक्ष सभकेँ समेटि कऽ वर्ण-विन्यास कएल गेल अछि। स्थान आ समयमे बचतक सङ्गहि हस्त-लेखन तथा तकनीकी दृष्टिसँ सेहो सरल होबऽबला हिसाबसँ वर्ण-विन्यास मिलाओल गेल अछि। वर्तमान समयमे मैथिली मातृभाषी पर्यन्तकेँ आन भाषाक माध्यमसँ मैथिलीक ज्ञान लेबऽ पड़ि रहल परिप्रेक्ष्यमे लेखनमे सहजता तथा एकरूपतापर ध्यान देल गेल अछि। तखन मैथिली भाषाक मूल विशेषता सभ कुण्ठित नहि होइक, ताहू दिस लेखक-मण्डल सचेत अछि। प्रसिद्ध भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक कहब छनि जे सरलताक अनुसन्धानमे एहन अवस्था किन्नहु ने आबऽ देबाक चाही जे भाषाक विशेषता छाँहमे पडि जाए। -(भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक धारणाकेँ पूर्ण रूपसँ सङ्ग लऽ निर्धारित) १.२. मैथिली अकादमी, पटना द्वारा निर्धारित मैथिली लेखन-शैली

१. जे शब्द मैथिली-साहित्यक प्राचीन कालसँ आइ धरि जाहि वर्त्तनीमे प्रचलित अछि, से सामान्यतः ताहि वर्त्तनीमे लिखल जाय- उदाहरणार्थ-

ग्राह्य

एखन ठाम जकर, तकर तनिकर अछि

अग्राह्य अखन, अखनि, एखेन, अखनी ठिमा, ठिना, ठमा जेकर, तेकर तिनकर। (वैकल्पिक रूपेँ ग्राह्य) ऐछ, अहि, ए।

२. निम्नलिखित तीन प्रकारक रूप वैकल्पिकतया अपनाओल जाय: भऽ गेल, भय गेल वा भए गेल। जा रहल अछि, जाय रहल अछि, जाए रहल अछि। कर’ गेलाह, वा करय गेलाह वा करए गेलाह।

३. प्राचीन मैथिलीक ‘न्ह’ ध्वनिक स्थानमे ‘न’ लिखल जाय सकैत अछि यथा कहलनि वा कहलन्हि।

४. ‘ऐ’ तथा ‘औ’ ततय लिखल जाय जत’ स्पष्टतः ‘अइ’ तथा ‘अउ’ सदृश उच्चारण इष्ट हो। यथा- देखैत, छलैक, बौआ, छौक इत्यादि।

५. मैथिलीक निम्नलिखित शब्द एहि रूपे प्रयुक्त होयत: जैह, सैह, इएह, ओऐह, लैह तथा दैह।

६. ह्र्स्व इकारांत शब्दमे ‘इ’ के लुप्त करब सामान्यतः अग्राह्य थिक। यथा- ग्राह्य देखि आबह, मालिनि गेलि (मनुष्य मात्रमे)।

७. स्वतंत्र ह्रस्व ‘ए’ वा ‘य’ प्राचीन मैथिलीक उद्धरण आदिमे तँ यथावत राखल जाय, किंतु आधुनिक प्रयोगमे वैकल्पिक रूपेँ ‘ए’ वा ‘य’ लिखल जाय। यथा:- कयल वा कएल, अयलाह वा अएलाह, जाय वा जाए इत्यादि।

८. उच्चारणमे दू स्वरक बीच जे ‘य’ ध्वनि स्वतः आबि जाइत अछि तकरा लेखमे स्थान वैकल्पिक रूपेँ देल जाय। यथा- धीआ, अढ़ैआ, विआह, वा धीया, अढ़ैया, बियाह।

९. सानुनासिक स्वतंत्र स्वरक स्थान यथासंभव ‘ञ’ लिखल जाय वा सानुनासिक स्वर। यथा:- मैञा, कनिञा, किरतनिञा वा मैआँ, कनिआँ, किरतनिआँ।

१०. कारकक विभक्त्तिक निम्नलिखित रूप ग्राह्य:- हाथकेँ, हाथसँ, हाथेँ, हाथक, हाथमे। ’मे’ मे अनुस्वार सर्वथा त्याज्य थिक। ‘क’ क वैकल्पिक रूप ‘केर’ राखल जा सकैत अछि।

११. पूर्वकालिक क्रियापदक बाद ‘कय’ वा ‘कए’ अव्यय वैकल्पिक रूपेँ लगाओल जा सकैत अछि। यथा:- देखि कय वा देखि कए।

१२. माँग, भाँग आदिक स्थानमे माङ, भाङ इत्यादि लिखल जाय।

१३. अर्द्ध ‘न’ ओ अर्द्ध ‘म’ क बदला अनुसार नहि लिखल जाय, किंतु छापाक सुविधार्थ अर्द्ध ‘ङ’ , ‘ञ’, तथा ‘ण’ क बदला अनुस्वारो लिखल जा सकैत अछि। यथा:- अङ्क, वा अंक, अञ्चल वा अंचल, कण्ठ वा कंठ।

१४. हलंत चिह्न निअमतः लगाओल जाय, किंतु विभक्तिक संग अकारांत प्रयोग कएल जाय। यथा:- श्रीमान्, किंतु श्रीमानक।

१५. सभ एकल कारक चिह्न शब्दमे सटा क’ लिखल जाय, हटा क’ नहि, संयुक्त विभक्तिक हेतु फराक लिखल जाय, यथा घर परक।

१६. अनुनासिककेँ चन्द्रबिन्दु द्वारा व्यक्त कयल जाय। परंतु मुद्रणक सुविधार्थ हि समान जटिल मात्रापर अनुस्वारक प्रयोग चन्द्रबिन्दुक बदला कयल जा सकैत अछि। यथा- हिँ केर बदला हिं।

१७. पूर्ण विराम पासीसँ ( । ) सूचित कयल जाय।

१८. समस्त पद सटा क’ लिखल जाय, वा हाइफेनसँ जोड़ि क’ ,  हटा क’ नहि।

१९. लिअ तथा दिअ शब्दमे बिकारी (ऽ) नहि लगाओल जाय।

२०. अंक देवनागरी रूपमे राखल जाय।

२१.किछु ध्वनिक लेल नवीन चिन्ह बनबाओल जाय। जा' ई नहि बनल अछि ताबत एहि दुनू ध्वनिक बदला पूर्ववत् अय/ आय/ अए/ आए/ आओ/ अओ लिखल जाय। आकि ऎ वा ऒ सँ व्यक्त कएल जाय।

ह./- गोविन्द झा ११/८/७६ श्रीकान्त ठाकुर ११/८/७६ सुरेन्द्र झा "सुमन" ११/०८/७६

  २. मैथिलीमे भाषा सम्पादन पाठ्यक्रम २.१. उच्चारण निर्देश: (बोल्ड कएल रूप ग्राह्य):- दन्त न क उच्चारणमे दाँतमे जीह सटत- जेना बाजू नाम , मुदा ण क उच्चारणमे जीह मूर्धामे सटत (नै सटैए तँ उच्चारण दोष अछि)- जेना बाजू गणेश। तालव्य शमे जीह तालुसँ , षमे मूर्धासँ आ दन्त समे दाँतसँ सटत। निशाँ, सभ आ शोषण बाजि कऽ देखू। मैथिलीमे ष केँ वैदिक संस्कृत जकाँ ख सेहो उच्चरित कएल जाइत अछि, जेना वर्षा, दोष। य अनेको स्थानपर ज जकाँ उच्चरित होइत अछि आ ण ड़ जकाँ (यथा संयोग आ गणेश संजोग आ गड़ेस उच्चरित होइत अछि)। मैथिलीमे व क उच्चारण ब, श क उच्चारण स आ य क उच्चारण ज सेहो होइत अछि। ओहिना ह्रस्व इ बेशीकाल मैथिलीमे पहिने बाजल जाइत अछि कारण देवनागरीमे आ मिथिलाक्षरमे ह्रस्व इ अक्षरक पहिने लिखलो जाइत आ बाजलो जएबाक चाही। कारण जे हिन्दीमे एकर दोषपूर्ण उच्चारण होइत अछि (लिखल तँ पहिने जाइत अछि मुदा बाजल बादमे जाइत अछि), से शिक्षा पद्धतिक दोषक कारण हम सभ ओकर उच्चारण दोषपूर्ण ढंगसँ कऽ रहल छी। अछि- अ इ छ  ऐछ (उच्चारण) छथि- छ इ थ  – छैथ (उच्चारण) पहुँचि- प हुँ इ च (उच्चारण) आब अ आ इ ई ए ऐ ओ औ अं अः ऋ ऐ सभ लेल मात्रा सेहो अछि, मुदा ऐमे ई ऐ ओ औ अं अः ऋ केँ संयुक्ताक्षर रूपमे गलत रूपमे प्रयुक्त आ उच्चरित कएल जाइत अछि। जेना ऋ केँ री  रूपमे उच्चरित करब। आ देखियौ- ऐ लेल देखिऔ क प्रयोग अनुचित। मुदा देखिऐ लेल देखियै अनुचित। क् सँ ह् धरि अ सम्मिलित भेलासँ क सँ ह बनैत अछि, मुदा उच्चारण काल हलन्त युक्त शब्दक अन्तक उच्चारणक प्रवृत्ति बढ़ल अछि, मुदा हम जखन मनोजमे ज् अन्तमे बजैत छी, तखनो पुरनका लोककेँ बजैत सुनबन्हि- मनोजऽ, वास्तवमे ओ अ युक्त ज् = ज बजै छथि। फेर ज्ञ अछि ज् आ ञ क संयुक्त मुदा गलत उच्चारण होइत अछि- ग्य। ओहिना क्ष अछि क् आ ष क संयुक्त मुदा उच्चारण होइत अछि छ। फेर श् आ र क संयुक्त अछि श्र ( जेना श्रमिक) आ स् आ र क संयुक्त अछि स्र (जेना मिस्र)। त्र भेल त+र । उच्चारणक ऑडियो फाइल विदेह आर्काइव  http://www.videha.co.in/ पर उपलब्ध अछि। फेर केँ / सँ / पर पूर्व अक्षरसँ सटा कऽ लिखू मुदा तँ / कऽ हटा कऽ। ऐमे सँ मे पहिल सटा कऽ लिखू आ बादबला हटा कऽ। अंकक बाद टा लिखू सटा कऽ मुदा अन्य ठाम टा लिखू हटा कऽ– जेना छहटा मुदा सभ टा। फेर ६अ म सातम लिखू- छठम सातम नै। घरबलामे बला मुदा घरवालीमे वाली प्रयुक्त करू। रहए- रहै मुदा सकैए (उच्चारण सकै-ए)। मुदा कखनो काल रहए आ रहै मे अर्थ भिन्नता सेहो, जेना से कम्मो जगहमे पार्किंग करबाक अभ्यास रहै ओकरा। पुछलापर पता लागल जे ढुनढुन नाम्ना ई ड्राइवर कनाट प्लेसक पार्किंगमे काज करैत रहए। छलै, छलए मे सेहो ऐ तरहक भेल। छलए क उच्चारण छल-ए सेहो। संयोगने- (उच्चारण संजोगने) केँ/  कऽ केर- क ( केर क प्रयोग गद्यमे नै करू , पद्यमे कऽ सकै छी। ) क (जेना रामक) –रामक आ संगे (उच्चारण राम के /  राम कऽ सेहो) सँ- सऽ (उच्चारण) चन्द्रबिन्दु आ अनुस्वार- अनुस्वारमे कंठ धरिक प्रयोग होइत अछि मुदा चन्द्रबिन्दुमे नै। चन्द्रबिन्दुमे कनेक एकारक सेहो उच्चारण होइत अछि- जेना रामसँ- (उच्चारण राम सऽ)  रामकेँ- (उच्चारण राम कऽ/ राम के सेहो)। केँ जेना रामकेँ भेल हिन्दीक को (राम को)- राम को= रामकेँ क जेना रामक भेल हिन्दीक का ( राम का) राम का= रामक कऽ जेना जा कऽ भेल हिन्दीक कर ( जा कर) जा कर= जा कऽ सँ भेल हिन्दीक से (राम से) राम से= रामसँ सऽ , तऽ , त , केर (गद्यमे) एे चारू शब्द सबहक प्रयोग अवांछित। के दोसर अर्थेँ प्रयुक्त भऽ सकैए- जेना, के कहलक? विभक्ति “क”क बदला एकर प्रयोग अवांछित। नञि, नहि, नै, नइ, नँइ, नइँ, नइं ऐ सभक उच्चारण आ लेखन - नै त्त्व क बदलामे त्व जेना महत्वपूर्ण (महत्त्वपूर्ण नै) जतए अर्थ बदलि जाए ओतहि मात्र तीन अक्षरक संयुक्ताक्षरक प्रयोग उचित। सम्पति- उच्चारण स म्प इ त (सम्पत्ति नै- कारण सही उच्चारण आसानीसँ सम्भव नै)। मुदा सर्वोत्तम (सर्वोतम नै)। राष्ट्रिय (राष्ट्रीय नै) सकैए/ सकै (अर्थ परिवर्तन) पोछैले/ पोछै लेल/ पोछए लेल पोछैए/ पोछए/ (अर्थ परिवर्तन) पोछए/ पोछै ओ लोकनि ( हटा कऽ, ओ मे बिकारी नै) ओइ/ ओहि ओहिले/ ओहि लेल/ ओही लऽ जएबेँ/ बैसबेँ पँचभइयाँ देखियौक/ (देखिऔक नै- तहिना अ मे ह्रस्व आ दीर्घक मात्राक प्रयोग अनुचित) जकाँ / जेकाँ तँइ/ तैँ/ होएत / हएत नञि/ नहि/ नँइ/ नइँ/ नै सौँसे/ सौंसे बड़ / बड़ी (झोराओल) गाए (गाइ नहि), मुदा गाइक दूध (गाएक दूध नै।) रहलेँ/ पहिरतैँ हमहीं/ अहीं सब - सभ सबहक - सभहक धरि - तक गप- बात बूझब - समझब बुझलौं/ समझलौं/ बुझलहुँ - समझलहुँ हमरा आर - हम सभ आकि- आ कि सकैछ/ करैछ (गद्यमे प्रयोगक आवश्यकता नै) होइन/ होनि जाइन (जानि नै, जेना देल जाइन) मुदा जानि-बूझि (अर्थ परिव्र्तन) पइठ/ जाइठ आउ/ जाउ/ आऊ/ जाऊ मे, केँ, सँ, पर (शब्दसँ सटा कऽ) तँ कऽ धऽ दऽ (शब्दसँ हटा कऽ) मुदा दूटा वा बेसी विभक्ति संग रहलापर पहिल विभक्ति टाकेँ सटाऊ। जेना ऐमे सँ । एकटा , दूटा (मुदा कए टा) बिकारीक प्रयोग शब्दक अन्तमे, बीचमे अनावश्यक रूपेँ नै। आकारान्त आ अन्तमे अ क बाद बिकारीक प्रयोग नै (जेना दिअ , आ/ दिय’ , आ’, आ नै ) अपोस्ट्रोफीक प्रयोग बिकारीक बदलामे करब अनुचित आ मात्र फॉन्टक तकनीकी न्यूनताक परिचायक)- ओना बिकारीक संस्कृत रूप ऽ अवग्रह कहल जाइत अछि आ वर्तनी आ उच्चारण दुनू ठाम एकर लोप रहैत अछि/ रहि सकैत अछि (उच्चारणमे लोप रहिते अछि)। मुदा अपोस्ट्रोफी सेहो अंग्रेजीमे पसेसिव केसमे होइत अछि आ फ्रेंचमे शब्दमे जतए एकर प्रयोग होइत अछि जेना raison d’etre एतए सेहो एकर उच्चारण रैजौन डेटर होइत अछि, माने अपोस्ट्रॉफी अवकाश नै दैत अछि वरन जोड़ैत अछि, से एकर प्रयोग बिकारीक बदला देनाइ तकनीकी रूपेँ सेहो अनुचित)। अइमे, एहिमे/ ऐमे जइमे, जाहिमे एखन/ अखन/ अइखन केँ (के नहि) मे (अनुस्वार रहित) भऽ मे दऽ तँ (तऽ, त नै) सँ ( सऽ स नै) गाछ तर गाछ लग साँझ खन जो (जो go, करै जो do) तै/तइ जेना- तै दुआरे/ तइमे/ तइले जै/जइ जेना- जै कारण/ जइसँ/ जइले ऐ/अइ जेना- ऐ कारण/ ऐसँ/ अइले/ मुदा एकर एकटा खास प्रयोग- लालति‍ कतेक दि‍नसँ कहैत रहैत अइ लै/लइ जेना लैसँ/ लइले/ लै दुआरे लहँ/ लौं गेलौं/ लेलौं/ लेलँह/ गेलहुँ/ लेलहुँ/ लेलँ जइ/ जाहि‍/ जै जहि‍ठाम/ जाहि‍ठाम/ जइठाम/ जैठाम एहि‍/ अहि‍/ अइ (वाक्यक अंतमे ग्राह्य) / ऐ अइछ/ अछि‍/ ऐछ तइ/ तहि‍/ तै/ ताहि‍ ओहि‍/ ओइ सीखि‍/ सीख जीवि‍/ जीवी/ जीब भलेहीं/ भलहि‍ं तैं/ तँइ/ तँए जाएब/ जएब लइ/ लै छइ/ छै नहि‍/ नै/ नइ गइ/ गै छनि‍/ छन्‍हि‍  ... समए शब्‍दक संग जखन कोनो वि‍भक्‍ति‍ जुटै छै तखन समै जना समैपर इत्‍यादि‍। असगरमे हृदए आ वि‍भक्‍ति‍ जुटने हृदे जना हृदेसँ, हृदेमे इत्‍यादि‍। जइ/ जाहि‍/ जै जहि‍ठाम/ जाहि‍ठाम/ जइठाम/ जैठाम एहि‍/ अहि‍/ अइ/ ऐ अइछ/ अछि‍/ ऐछ तइ/ तहि‍/ तै/ ताहि‍ ओहि‍/ ओइ सीखि‍/ सीख जीवि‍/ जीवी/ जीब भले/ भलेहीं/ भलहि‍ं तैं/ तँइ/ तँए जाएब/ जएब लइ/ लै छइ/ छै नहि‍/ नै/ नइ गइ/ गै छनि‍/ छन्‍हि‍ चुकल अछि/ गेल गछि २.२. मैथिलीमे भाषा सम्पादन पाठ्यक्रम नीचाँक सूचीमे देल विकल्पमेसँ लैंगुएज एडीटर द्वारा कोन रूप चुनल जेबाक चाही: बोल्ड कएल रूप ग्राह्य: १.होयबला/ होबयबला/ होमयबला/ हेब’बला, हेम’बला/ होयबाक/होबएबला /होएबाक २. आ’/आऽ आ ३. क’ लेने/कऽ लेने/कए लेने/कय लेने/ल’/लऽ/लय/लए ४. भ’ गेल/भऽ गेल/भय गेल/भए गेल ५. कर’ गेलाह/करऽ गेलह/करए गेलाह/करय गेलाह ६. लिअ/दिअ लिय’,दिय’,लिअ’,दिय’/ ७. कर’ बला/करऽ बला/ करय बला करैबला/क’र’ बला / करैवाली ८. बला वला (पुरूष), वाली (स्‍त्री) ९ . आङ्ल आंग्ल १०. प्रायः प्रायह ११. दुःख दुख १ २. चलि गेल चल गेल/चैल गेल १३. देलखिन्ह देलकिन्ह, देलखिन १४. देखलन्हि देखलनि/ देखलैन्ह १५. छथिन्ह/ छलन्हि छथिन/ छलैन/ छलनि १६. चलैत/दैत चलति/दैति १७. एखनो अखनो १८. बढ़नि‍ बढ़इन बढ़न्हि १९. ओ’/ओऽ(सर्वनाम) ओ २० . ओ (संयोजक) ओ’/ओऽ २१. फाँगि/फाङ्गि फाइंग/फाइङ २२. जे जे’/जेऽ २३. ना-नुकुर ना-नुकर २४. केलन्हि/केलनि‍/कयलन्हि २५. तखनतँ/ तखन तँ २६. जा रहल/जाय रहल/जाए रहल २७. निकलय/निकलए लागल/ लगल बहराय/ बहराए लागल/ लगल निकल’/बहरै लागल २८. ओतय/ जतय जत’/ ओत’/ जतए/ ओतए २९. की फूरल जे कि फूरल जे ३०. जे जे’/जेऽ ३१. कूदि / यादि(मोन पारब) कूइद/याइद/कूद/याद/ यादि (मोन) ३२. इहो/ ओहो ३३. हँसए/ हँसय हँसऽ ३४. नौ आकि दस/नौ किंवा दस/ नौ वा दस ३५. सासु-ससुर सास-ससुर ३६. छह/ सात छ/छः/सात ३७. की  की’/ कीऽ (दीर्घीकारान्तमे ऽ वर्जित) ३८. जबाब जवाब ३९. करएताह/ करेताह करयताह ४०. दलान दिशि दलान दिश/दलान दिस ४१ . गेलाह गएलाह/गयलाह ४२. किछु आर/ किछु और/ किछ आर ४३. जाइ छल/ जाइत छल जाति छल/जैत छल ४४. पहुँचि/ भेट जाइत छल/ भेट जाइ छलए पहुँच/ भेटि‍ जाइत छल ४५. जबान (युवा)/ जवान(फौजी) ४६. लय/ लए क’/ कऽ/ लए कए / लऽ कऽ/ लऽ कए ४७. ल’/लऽ कय/ कए ४८. एखन / एखने / अखन / अखने ४९. अहींकेँ अहीँकेँ ५०. गहींर गहीँर ५१. धार पार केनाइ धार पार केनाय/केनाए ५२. जेकाँ जेँकाँ/ जकाँ ५३. तहिना तेहिना ५४. एकर अकर ५५. बहिनउ बहनोइ ५६. बहिन बहिनि ५७. बहिन-बहिनोइ बहिन-बहनउ ५८. नहि/ नै ५९. करबा / करबाय/ करबाए ६०. तँ/ त ऽ तय/तए ६१. भैयारी मे छोट-भाए/भै/, जेठ-भाय/भाइ, ६२. गि‍नतीमे दू भाइ/भाए/भाँइ ६३. ई पोथी दू भाइक/ भाँइ/ भाए/ लेल। यावत जावत ६४. माय मै / माए मुदा माइक ममता ६५. देन्हि/ दइन दनि‍/ दएन्हि/ दयन्हि दन्हि/ दैन्हि ६६. द’/ दऽ/ दए ६७. ओ (संयोजक) ओऽ (सर्वनाम) ६८. तका कए तकाय तकाए ६९. पैरे (on foot) पएरे  कएक/ कैक ७०. ताहुमे/ ताहूमे ७१. पुत्रीक ७२. बजा कय/ कए / कऽ ७३. बननाय/बननाइ ७४. कोला ७५. दिनुका दिनका ७६. ततहिसँ ७७. गरबओलन्हि/ गरबौलनि‍/ गरबेलन्हि/ गरबेलनि‍ ७८. बालु बालू ७९. चेन्ह चिन्ह(अशुद्ध) ८०. जे जे’ ८१ . से/ के से’/के’ ८२. एखुनका अखनुका ८३. भुमिहार भूमिहार ८४. सुग्गर / सुगरक/ सूगर ८५. झठहाक झटहाक ८६. छूबि ८७. करइयो/ओ करैयो ने देलक /करियौ-करइयौ ८८. पुबारि पुबाइ ८९. झगड़ा-झाँटी झगड़ा-झाँटि ९०. पएरे-पएरे पैरे-पैरे ९१. खेलएबाक ९२. खेलेबाक ९३. लगा ९४. होए- हो – होअए ९५. बुझल बूझल ९६. बूझल (संबोधन अर्थमे) ९७. यैह यएह / इएह/ सैह/ सएह ९८. तातिल ९९. अयनाय- अयनाइ/ अएनाइ/ एनाइ १००. निन्न- निन्द १०१. बिनु बिन १०२. जाए जाइ १०३. जाइ (in different sense)-last word of sentence १०४. छत पर आबि जाइ १०५. ने १०६. खेलाए (play) –खेलाइ १०७. शिकाइत- शिकायत १०८. ढप- ढ़प १०९ . पढ़- पढ ११०. कनिए/ कनिये कनिञे १११. राकस- राकश ११२. होए/ होय होइ ११३. अउरदा- औरदा ११४. बुझेलन्हि (different meaning- got understand) ११५. बुझएलन्हि/बुझेलनि‍/ बुझयलन्हि (understood himself) ११६. चलि- चल/ चलि‍ गेल ११७. खधाइ- खधाय ११८. मोन पाड़लखिन्ह/ मोन पाड़लखि‍न/ मोन पारलखिन्ह ११९. कैक- कएक- कइएक १२०. लग ल’ग १२१. जरेनाइ १२२. जरौनाइ जरओनाइ- जरएनाइ/ जरेनाइ १२३. होइत १२४. गरबेलन्हि/ गरबेलनि‍ गरबौलन्हि/ गरबौलनि‍ १२५. चिखैत- (to test)चिखइत १२६. करइयो (willing to do) करैयो १२७. जेकरा- जकरा १२८. तकरा- तेकरा १२९. बिदेसर स्थानेमे/ बिदेसरे स्थानमे १३०. करबयलहुँ/ करबएलहुँ/ करबेलहुँ करबेलौं १३१. हारिक (उच्चारण हाइरक) १३२. ओजन वजन आफसोच/ अफसोस कागत/ कागच/ कागज १३३. आधे भाग/ आध-भागे १३४. पिचा / पिचाय/पिचाए १३५. नञ/ ने १३६. बच्चा नञ (ने) पिचा जाय १३७. तखन ने (नञ) कहैत अछि। कहै/ सुनै/ देखै छल मुदा कहैत-कहैत/ सुनैत-सुनैत/ देखैत-देखैत १३८. कतेक गोटे/ कताक गोटे १३९. कमाइ-धमाइ/ कमाई- धमाई १४० . लग ल’ग १४१. खेलाइ (for playing) १४२. छथिन्ह/ छथिन १४३. होइत होइ १४४. क्यो कियो / केओ १४५. केश (hair) १४६. केस (court-case) १४७ . बननाइ/ बननाय/ बननाए १४८. जरेनाइ १४९. कुरसी कुर्सी १५०. चरचा चर्चा १५१. कर्म करम १५२. डुबाबए/ डुबाबै/ डुमाबै डुमाबय/ डुमाबए १५३. एखुनका/ अखुनका १५४. लए/ लिअए (वाक्यक अंतिम शब्द)- लऽ १५५. कएलक/ केलक १५६. गरमी गर्मी १५७ . वरदी वर्दी १५८. सुना गेलाह सुना’/सुनाऽ १५९. एनाइ-गेनाइ १६०. तेना ने घेरलन्हि/ तेना ने घेरलनि‍ १६१. नञि / नै १६२. डरो ड’रो १६३. कतहु/ कतौ कहीं १६४. उमरिगर-उमेरगर उमरगर १६५. भरिगर १६६. धोल/धोअल धोएल १६७. गप/गप्प १६८. के के’ १६९. दरबज्जा/ दरबजा १७०. ठाम १७१. धरि तक १७२. घूरि लौटि १७३. थोरबेक १७४. बड्ड १७५. तोँ/ तूँ १७६. तोँहि( पद्यमे ग्राह्य) १७७. तोँही / तोँहि १७८. करबाइए करबाइये १७९. एकेटा १८०. करितथि /करतथि १८१. पहुँचि/ पहुँच १८२. राखलन्हि रखलन्हि/ रखलनि‍ १८३. लगलन्हि/ लगलनि‍ लागलन्हि १८४. सुनि (उच्चारण सुइन) १८५. अछि (उच्चारण अइछ) १८६. एलथि गेलथि १८७. बितओने/ बि‍तौने/ बितेने १८८. करबओलन्हि/ करबौलनि‍/ करेलखिन्ह/ करेलखि‍न १८९. करएलन्हि/ करेलनि‍ १९०. आकि/ कि १९१. पहुँचि/ पहुँच १९२. बत्ती जराय/ जराए जरा (आगि लगा) १९३. से से’ १९४. हाँ मे हाँ (हाँमे हाँ विभक्त्तिमे हटा कए) १९५. फेल फैल १९६. फइल(spacious) फैल १९७. होयतन्हि/ होएतन्हि/ होएतनि‍/हेतनि‍/ हेतन्हि १९८. हाथ मटिआएब/ हाथ मटियाबय/हाथ मटियाएब १९९. फेका फेंका २००. देखाए देखा २०१. देखाबए २०२. सत्तरि सत्तर २०३. साहेब साहब २०४.गेलैन्ह/ गेलन्हि/ गेलनि‍ २०५. हेबाक/ होएबाक २०६.केलो/ कएलहुँ/केलौं/ केलुँ २०७. किछु न किछु/ किछु ने किछु २०८.घुमेलहुँ/ घुमओलहुँ/ घुमेलौं २०९. एलाक/ अएलाक २१०. अः/ अह २११.लय/ लए (अर्थ-परिवर्त्तन) २१२.कनीक/ कनेक २१३.सबहक/ सभक २१४.मिलाऽ/ मिला २१५.कऽ/ क २१६.जाऽ/ जा २१७.आऽ/ आ २१८.भऽ /भ’ (’ फॉन्टक कमीक द्योतक) २१९.निअम/ नियम २२० .हेक्टेअर/ हेक्टेयर २२१.पहिल अक्षर ढ/ बादक/ बीचक ढ़ २२२.तहिं/तहिँ/ तञि/ तैं २२३.कहिं/ कहीं २२४.तँइ/ तैं / तइँ २२५.नँइ/ नइँ/  नञि/ नहि/नै २२६.है/ हए / एलीहेँ/ २२७.छञि/ छै/ छैक /छइ २२८.दृष्टिएँ/ दृष्टियेँ २२९.आ (come)/ आऽ(conjunction) २३०. आ (conjunction)/ आऽ(come) २३१.कुनो/ कोनो, कोना/केना २३२.गेलैन्ह-गेलन्हि-गेलनि‍ २३३.हेबाक- होएबाक २३४.केलौँ- कएलौँ-कएलहुँ/केलौं २३५.किछु न किछ- किछु ने किछु २३६.केहेन- केहन २३७.आऽ (come)-आ (conjunction-and)/आ। आब'-आब' /आबह-आबह २३८. हएत-हैत २३९.घुमेलहुँ-घुमएलहुँ- घुमेलाें २४०.एलाक- अएलाक २४१.होनि- होइन/ होन्हि/ २४२.ओ-राम ओ श्यामक बीच(conjunction), ओऽ कहलक (he said)/ओ २४३.की हए/ कोसी अएली हए/ की है। की हइ २४४.दृष्टिएँ/ दृष्टियेँ २४५ .शामिल/ सामेल २४६.तैँ / तँए/ तञि/ तहिं २४७.जौं / ज्योँ/ जँ/ २४८.सभ/ सब २४९.सभक/ सबहक २५०.कहिं/ कहीं २५१.कुनो/ कोनो/ कोनहुँ/ २५२.फारकती भऽ गेल/ भए गेल/ भय गेल २५३.कोना/ केना/ कन्‍ना/कना २५४.अः/ अह २५५.जनै/ जनञ २५६.गेलनि‍/ गेलाह (अर्थ परिवर्तन) २५७.केलन्हि/ कएलन्हि/ केलनि‍/ २५८.लय/ लए/ लएह (अर्थ परिवर्तन) २५९.कनीक/ कनेक/कनी-मनी २६०.पठेलन्हि‍ पठेलनि‍/ पठेलइन/ पपठओलन्हि/ पठबौलनि‍/ २६१.निअम/ नियम २६२.हेक्टेअर/ हेक्टेयर २६३.पहिल अक्षर रहने ढ/ बीचमे रहने ढ़ २६४.आकारान्तमे बिकारीक प्रयोग उचित नै/ अपोस्ट्रोफीक प्रयोग फान्टक तकनीकी न्यूनताक परिचायक ओकर बदला अवग्रह (बिकारी) क प्रयोग उचित २६५.केर (पद्यमे ग्राह्य) / -क/ कऽ/ के २६६.छैन्हि- छन्हि २६७.लगैए/ लगैये २६८.होएत/ हएत २६९.जाएत/ जएत/ २७०.आएत/ अएत/ आओत २७१ .खाएत/ खएत/ खैत २७२.पिअएबाक/ पिएबाक/पि‍येबाक २७३.शुरु/ शुरुह २७४.शुरुहे/ शुरुए २७५.अएताह/अओताह/ एताह/ औताह २७६.जाहि/ जाइ/ जइ/ जै/ २७७.जाइत/ जैतए/ जइतए २७८.आएल/ अएल २७९.कैक/ कएक २८०.आयल/ अएल/ आएल २८१. जाए/ जअए/ जए (लालति‍ जाए लगलीह।) २८२. नुकएल/ नुकाएल २८३. कठुआएल/ कठुअएल २८४. ताहि/ तै/ तइ २८५. गायब/ गाएब/ गएब २८६. सकै/ सकए/ सकय २८७.सेरा/सरा/ सराए (भात सरा गेल) २८८.कहैत रही/देखैत रही/ कहैत छलौं/ कहै छलौं- अहिना चलैत/ पढ़ैत (पढ़ै-पढ़ैत अर्थ कखनो काल परिवर्तित) - आर बुझै/ बुझैत (बुझै/ बुझै छी, मुदा बुझैत-बुझैत)/ सकैत/ सकै। करैत/ करै। दै/ दैत। छैक/ छै। बचलै/ बचलैक। रखबा/ रखबाक । बिनु/ बिन। रातिक/ रातुक बुझै आ बुझैत केर अपन-अपन जगहपर प्रयोग समीचीन अछि‍। बुझैत-बुझैत आब बुझलि‍ऐ। हमहूँ बुझै छी। २८९. दुआरे/ द्वारे २९०.भेटि/ भेट/ भेँट २९१. खन/ खीन/  खुना (भोर खन/ भोर खीन) २९२.तक/ धरि २९३.गऽ/ गै (meaning different-जनबै गऽ) २९४.सऽ/ सँ (मुदा दऽ, लऽ) २९५.त्त्व,(तीन अक्षरक मेल बदला पुनरुक्तिक एक आ एकटा दोसरक उपयोग) आदिक बदला त्व आदि। महत्त्व/ महत्व/ कर्ता/ कर्त्ता आदिमे त्त संयुक्तक कोनो आवश्यकता मैथिलीमे नै अछि। वक्तव्य २९६.बेसी/ बेशी २९७.बाला/वाला बला/ वला (रहैबला) २९८ .वाली/ (बदलैवाली) २९९.वार्त्ता/ वार्ता ३००. अन्तर्राष्ट्रिय/ अन्तर्राष्ट्रीय ३०१. लेमए/ लेबए ३०२.लमछुरका, नमछुरका ३०२.लागै/ लगै ( भेटैत/ भेटै) ३०३.लागल/ लगल ३०४.हबा/ हवा ३०५.राखलक/ रखलक ३०६.आ (come)/ आ (and) ३०७. पश्चाताप/ पश्चात्ताप ३०८. ऽ केर व्यवहार शब्दक अन्तमे मात्र, यथासंभव बीचमे नै। ३०९.कहैत/ कहै ३१०. रहए (छल)/ रहै (छलै) (meaning different) ३११.तागति/ ताकति ३१२.खराप/ खराब ३१३.बोइन/ बोनि/ बोइनि ३१४.जाठि/ जाइठ ३१५.कागज/ कागच/ कागत ३१६.गिरै (meaning different- swallow)/ गिरए (खसए) ३१७.राष्ट्रिय/ राष्ट्रीय Festivals of Mithila DATE-LIST (year- 2011-12) (१४१९ साल) Marriage Days: Nov.2011- 20,21,23,25,27,30 Dec.2011- 1,5,9 January 2012- 18,19,20,23,25,27,29 Feb.2012- 2,3,8,9,10,16,17,19,23,24,29 March 2012- 1,8,9,12 April 2012- 15,16,18,25,26 June 2012- 8,13,24,25,28,29 Upanayana Days: February 2012- 2,3,24,26 March 2012- 4 April 2012- 1,2,26 June 2012- 22 Dviragaman Din: November 2011- 27,30 December 2011- 1,2,5,7,9,12 February 2012- 22,23,24,26,27,29 March 2012- 1,2,4,5,9,11,12 April 2012- 23,25,26,29 May 2012- 2,3,4,6,7 Mundan Din: December 2011- 1,5 January 201225,26,30 March 2012- 12 April 2012- 26 May 2012- 23,25,31 June 2012- 8,21,22,29 FESTIVALS OF MITHILA Mauna Panchami-20 July Madhushravani- 2 August Nag Panchami- 4 August Raksha Bandhan- 13 Aug Krishnastami- 21 August Kushi Amavasya / Somvari Vrat- 29 August Hartalika Teej- 31 August ChauthChandra-1 September Karma Dharma Ekadashi-8 September Indra Pooja Aarambh- 9 September Anant Caturdashi- 11 Sep Agastyarghadaan- 12 Sep Pitri Paksha begins- 13 Sep Mahalaya Aarambh- 13 September Vishwakarma Pooja- 17 September Jimootavahan Vrata/ Jitia-20 September Matri Navami- 21September Kalashsthapan- 28 September Belnauti- 2 October Patrika Pravesh- 3 October Mahastami- 4 October Maha Navami - 5 October Vijaya Dashami- 6 October Kojagara- 11 Oct Dhanteras- 24 October Diyabati, shyama pooja-26 October Annakoota/ Govardhana Pooja-27  October Bhratridwitiya/ Chitragupta Pooja-28 October Chhathi-kharna -31 October Chhathi- sayankalik arghya - 1 November Devotthan Ekadashi- 17 November Sama poojarambh- 2 November Kartik Poornima/ Sama Bisarjan- 10 Nov ravivratarambh- 27 November Navanna parvan- 29 November Vivaha Panchmi- 29 November Makara/ Teela Sankranti-15 Jan Naraknivaran chaturdashi- 21 January Basant Panchami/ Saraswati Pooja- 28 January Achla Saptmi- 30 January Mahashivaratri-20 February Holikadahan-Fagua-7 March Holi-9 Mar Varuni Yoga-20 March Chaiti  navaratrarambh- 23 March Chaiti Chhathi vrata-29 March Ram Navami- 1 April Mesha Sankranti-Satuani-13 April Jurishital-14 April Akshaya Tritiya-24 April Ravi Brat Ant- 29 April Janaki Navami- 30 April Vat Savitri-barasait- 20 May Ganga Dashhara-30 May Somavati Amavasya Vrata- 18 June Jagannath Rath Yatra- 21 June Hari Sayan Ekadashi- 30 June Aashadhi Guru Poornima-3 Jul 8.VIDEHA FOR NON RESIDENTS 8.1 to 8.3 MAITHILI LITERATURE IN ENGLISH 8.1.1.The Comet   -GAJENDRA THAKUR translated by Jyoti Jha chaudhary 8.1.2.The_Science_of_Words- GAJENDRA THAKUR translated by the author himself 8.1.3.On_the_dice-board_of_the_millennium- GAJENDRA THAKUR translated by Jyoti Jha chaudhary 8.1.4.NAAGPHANS (IN ENGLISH)- SHEFALIKA VERMA translated by Dr. Rajiv Kumar Verma and Dr. Jaya Verma Original Poem in Maithili by Kalikant Jha "Buch" Translated into English by Jyoti Jha Chaudhary Kalikant Jha "Buch" 1934-2009, Birth place- village Karian, District- Samastipur (Karian is birth place of famous Indian Nyaiyyayik philosopher Udayanacharya), Father Late Pt. Rajkishor Jha was first headmaster of village middle school. Mother Late Kala Devi was housewife. After completing Intermediate education started job block office of Govt. of Bihar.published in Mithila Mihir, Mati-pani, Bhakha, and Maithili Akademi magazine. Jyoti Jha Chaudhary, Date of Birth: December 30 1978,Place of Birth- Belhvar (Madhubani District), Education: Swami Vivekananda Middle School, Tisco Sakchi Girls High School, Mrs KMPM Inter College, IGNOU, ICWAI (COST ACCOUNTANCY); Residence- LONDON, UK; Father- Sh. Shubhankar Jha, Jamshedpur; Mother- Smt. Sudha Jha- Shivipatti. Jyoti received editor's choice award from www.poetry.comand her poems were featured in front page of www.poetrysoup.com for some period.She learnt Mithila Painting under Ms. Shveta Jha, Basera Institute, Jamshedpur and Fine Arts from Toolika, Sakchi, Jamshedpur (India). Her Mithila Paintings have been displayed by Ealing Art Group at Ealing Broadway, London. Kavi Kokil Vidyapati Because of whom our native language got a life That world-renowned nightingale poet’s name is Vidyapati A new hope in the Mithilanchal Our language is spread in each house Kind emotions and colourful thoughts Stability in mind and woman in the vision Created the God Shiva under the veil That world-renowned nightingale poet’s name is Vidyapati The shade of yoga in the bed of enjoyment The illusion of personality is immeasurable The triveni is immerged in the belly The shrine resides with the beauty The sun of creation shined in the kaalratri of rituals That world-renowned nightingale poet’s name is Vidyapati Face is like spring, bhado (rainy season) in eyes The flow is pure, bank is muddy Like leaves of lotus in the water Like flow of nectar in the desert Singing the song for Radha but keeping Madhav in the mind That world-renowned nightingale poet’s name is Vidyapati Vidyapati nagaram is blessed With Visfisut, Truth, Shiva and Virtue Remnant after being burnt out Mahesh is immortal after death The entrance is adorned with gold but inside is crematorium That world-renowned nightingale poet’s name is Vidyapati Send your comments to ggajendra@videha.com VIDEHA ARCHIVE १.विदेह ई-पत्रिकाक सभटा पुरान अंक ब्रेल, तिरहुता आ देवनागरी रूपमे Videha e journal's all old issues in Braille Tirhuta and Devanagari versions विदेह ई-पत्रिकाक पहिल ५० अंक

विदेह ई-पत्रिकाक ५०म सँ आगाँक अंक २.मैथिली पोथी डाउनलोड Maithili Books Download ३.मैथिली ऑडियो संकलन Maithili Audio Downloads ४.मैथिली वीडियोक संकलन Maithili Videos ५.मिथिला चित्रकला/ आधुनिक चित्रकला आ चित्र Mithila Painting/ Modern Art and Photos "विदेह"क एहि सभ सहयोगी लिंकपर सेहो एक बेर जाऊ। ६.विदेह मैथिली क्विज  :  http://videhaquiz.blogspot.com/ ७.विदेह मैथिली जालवृत्त एग्रीगेटर : http://videha-aggregator.blogspot.com/ ८.विदेह मैथिली साहित्य अंग्रेजीमे अनूदित http://madhubani-art.blogspot.com/ ९.विदेहक पूर्व-रूप "भालसरिक गाछ"  : http://gajendrathakur.blogspot.com/ १०.विदेह इंडेक्स  : http://videha123.blogspot.com/ ११.विदेह फाइल : http://videha123.wordpress.com/ १२. विदेह: सदेह : पहिल तिरहुता (मिथिला़क्षर) जालवृत्त (ब्लॉग) http://videha-sadeha.blogspot.com/ १३. विदेह:ब्रेल: मैथिली ब्रेलमे: पहिल बेर विदेह द्वारा http://videha-braille.blogspot.com/ १४.VIDEHA IST MAITHILI  FORTNIGHTLY EJOURNAL ARCHIVE http://videha-archive.blogspot.com/ १५. विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका मैथिली पोथीक आर्काइव http://videha-pothi.blogspot.com/ १६. विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका ऑडियो आर्काइव http://videha-audio.blogspot.com/ १७. विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका वीडियो आर्काइव http://videha-video.blogspot.com/ १८. विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका मिथिला चित्रकला, आधुनिक कला आ चित्रकला http://videha-paintings-photos.blogspot.com/ १९. मैथिल आर मिथिला (मैथिलीक सभसँ लोकप्रिय जालवृत्त) http://maithilaurmithila.blogspot.com/ २०.श्रुति प्रकाशन http://www.shruti-publication.com/ २१.http://groups.google.com/group/videha VIDEHA केर सदस्यता लिअ Top of Form Bottom of Form ईमेल : एहि समूहपर जाऊ २२.http://groups.yahoo.com/group/VIDEHA/ Top of Form Subscribe to VIDEHA Powered by us.groups.yahoo.com Bottom of Form २३.गजेन्द्र ठाकुर इ‍डेक्स http://gajendrathakur123.blogspot.com २४.विदेह रेडियो:मैथिली कथा-कविता आदिक पहिल पोडकास्ट साइट http://videha123radio.wordpress.com/ २५. नेना भुटका http://mangan-khabas.blogspot.com/ महत्त्वपूर्ण सूचना:(१) 'विदेह' द्वारा धारावाहिक रूपे ई-प्रकाशित कएल गेल गजेन्द्र ठाकुरक  निबन्ध-प्रबन्ध-समीक्षा, उपन्यास (सहस्रबाढ़नि) , पद्य-संग्रह (सहस्राब्दीक चौपड़पर), कथा-गल्प (गल्प-गुच्छ), नाटक(संकर्षण), महाकाव्य (त्वञ्चाहञ्च आ असञ्जाति मन) आ बाल-किशोर साहित्य विदेहमे संपूर्ण ई-प्रकाशनक बाद प्रिंट फॉर्ममे। कुरुक्षेत्रम्–अन्तर्मनक खण्ड-१ सँ ७ Combined ISBN No.978-81-907729-7-6 विवरण एहि पृष्ठपर नीचाँमे आ प्रकाशकक साइट http://www.shruti-publication.com/ पर । महत्त्वपूर्ण सूचना (२):सूचना: विदेहक मैथिली-अंग्रेजी आ अंग्रेजी मैथिली कोष (इंटरनेटपर पहिल बेर सर्च-डिक्शनरी) एम.एस. एस.क्यू.एल. सर्वर आधारित -Based on ms-sql server Maithili-English and English-Maithili Dictionary. विदेहक भाषापाक- रचनालेखन स्तंभमे। कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक- गजेन्द्र ठाकुर गजेन्द्र ठाकुरक निबन्ध-प्रबन्ध-समीक्षा, उपन्यास (सहस्रबाढ़नि) , पद्य-संग्रह (सहस्राब्दीक चौपड़पर), कथा-गल्प (गल्प गुच्छ), नाटक(संकर्षण), महाकाव्य (त्वञ्चाहञ्च आ असञ्जाति मन) आ बालमंडली-किशोरजगत विदेहमे संपूर्ण ई-प्रकाशनक बाद प्रिंट फॉर्ममे। कुरुक्षेत्रम्–अन्तर्मनक, खण्ड-१ सँ ७ Ist edition 2009 of Gajendra Thakur’s KuruKshetram-Antarmanak (Vol. I to VII)- essay-paper-criticism, novel, poems, story, play, epics and Children-grown-ups literature in single binding: Language:Maithili ६९२ पृष्ठ : मूल्य भा. रु. 100/-(for individual buyers inside india) (add courier charges Rs.50/-per copy for Delhi/NCR and Rs.100/- per copy for outside Delhi)

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Details for purchase available at print-version publishers's site website: http://www.shruti-publication.com/ or you may write to e-mail:shruti.publication@shruti-publication.com विदेह: सदेह : १: २: ३: ४ तिरहुता : देवनागरी "विदेह" क, प्रिंट संस्करण :विदेह-ई-पत्रिका (http://www.videha.co.in/) क चुनल रचना सम्मिलित। विदेह:सदेह:१: २: ३: ४ सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। Details for purchase available at print-version publishers's site http://www.shruti-publication.com  or you may write to shruti.publication@shruti-publication.com २. संदेश- [ विदेह ई-पत्रिका, विदेह:सदेह मिथिलाक्षर आ देवनागरी आ गजेन्द्र ठाकुरक सात खण्डक- निबन्ध-प्रबन्ध-समीक्षा,उपन्यास (सहस्रबाढ़नि) , पद्य-संग्रह (सहस्राब्दीक चौपड़पर), कथा-गल्प (गल्प गुच्छ), नाटक (संकर्षण), महाकाव्य (त्वञ्चाहञ्च आ असञ्जाति मन) आ बाल-मंडली-किशोर जगत- संग्रह कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक मादेँ। ] १.श्री गोविन्द झा- विदेहकेँ तरंगजालपर उतारि विश्वभरिमे मातृभाषा मैथिलीक लहरि जगाओल, खेद जे अपनेक एहि महाभियानमे हम एखन धरि संग नहि दए सकलहुँ। सुनैत छी अपनेकेँ सुझाओ आ रचनात्मक आलोचना प्रिय लगैत अछि तेँ किछु लिखक मोन भेल। हमर सहायता आ सहयोग अपनेकेँ सदा उपलब्ध रहत। २.श्री रमानन्द रेणु- मैथिलीमे ई-पत्रिका पाक्षिक रूपेँ चला कऽ जे अपन मातृभाषाक प्रचार कऽ रहल छी, से धन्यवाद । आगाँ अपनेक समस्त मैथिलीक कार्यक हेतु हम हृदयसँ शुभकामना दऽ रहल छी। ३.श्री विद्यानाथ झा "विदित"- संचार आ प्रौद्योगिकीक एहि प्रतिस्पर्धी ग्लोबल युगमे अपन महिमामय "विदेह"केँ अपना देहमे प्रकट देखि जतबा प्रसन्नता आ संतोष भेल, तकरा कोनो उपलब्ध "मीटर"सँ नहि नापल जा सकैछ? ..एकर ऐतिहासिक मूल्यांकन आ सांस्कृतिक प्रतिफलन एहि शताब्दीक अंत धरि लोकक नजरिमे आश्चर्यजनक रूपसँ प्रकट हैत। ४. प्रो. उदय नारायण सिंह "नचिकेता"- जे काज अहाँ कए रहल छी तकर चरचा एक दिन मैथिली भाषाक इतिहासमे होएत। आनन्द भए रहल अछि, ई जानि कए जे एतेक गोट मैथिल "विदेह" ई जर्नलकेँ पढ़ि रहल छथि।...विदेहक चालीसम अंक पुरबाक लेल अभिनन्दन। ५. डॉ. गंगेश गुंजन- एहि विदेह-कर्ममे लागि रहल अहाँक सम्वेदनशील मन, मैथिलीक प्रति समर्पित मेहनतिक अमृत रंग, इतिहास मे एक टा विशिष्ट फराक अध्याय आरंभ करत, हमरा विश्वास अछि। अशेष शुभकामना आ बधाइक सङ्ग, सस्नेह...अहाँक पोथी कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक प्रथम दृष्टया बहुत भव्य तथा उपयोगी बुझाइछ। मैथिलीमे तँ अपना स्वरूपक प्रायः ई पहिले एहन  भव्य अवतारक पोथी थिक। हर्षपूर्ण हमर हार्दिक बधाई स्वीकार करी। ६. श्री रामाश्रय झा "रामरंग"(आब स्वर्गीय)- "अपना" मिथिलासँ संबंधित...विषय वस्तुसँ अवगत भेलहुँ।...शेष सभ कुशल अछि। ७. श्री ब्रजेन्द्र त्रिपाठी- साहित्य अकादमी- इंटरनेट पर प्रथम मैथिली पाक्षिक पत्रिका "विदेह" केर लेल बधाई आ शुभकामना स्वीकार करू। ८. श्री प्रफुल्लकुमार सिंह "मौन"- प्रथम मैथिली पाक्षिक पत्रिका "विदेह" क प्रकाशनक समाचार जानि कनेक चकित मुदा बेसी आह्लादित भेलहुँ। कालचक्रकेँ पकड़ि जाहि दूरदृष्टिक परिचय देलहुँ, ओहि लेल हमर मंगलकामना। ९.डॉ. शिवप्रसाद यादव- ई जानि अपार हर्ष भए रहल अछि, जे नव सूचना-क्रान्तिक क्षेत्रमे मैथिली पत्रकारिताकेँ प्रवेश दिअएबाक साहसिक कदम उठाओल अछि। पत्रकारितामे एहि प्रकारक नव प्रयोगक हम स्वागत करैत छी, संगहि "विदेह"क सफलताक शुभकामना। १०. श्री आद्याचरण झा- कोनो पत्र-पत्रिकाक प्रकाशन- ताहूमे मैथिली पत्रिकाक प्रकाशनमे के कतेक सहयोग करताह- ई तऽ भविष्य कहत। ई हमर ८८ वर्षमे ७५ वर्षक अनुभव रहल। एतेक पैघ महान यज्ञमे हमर श्रद्धापूर्ण आहुति प्राप्त होयत- यावत ठीक-ठाक छी/ रहब। ११. श्री विजय ठाकुर- मिशिगन विश्वविद्यालय- "विदेह" पत्रिकाक अंक देखलहुँ, सम्पूर्ण टीम बधाईक पात्र अछि। पत्रिकाक मंगल भविष्य हेतु हमर शुभकामना स्वीकार कएल जाओ। १२. श्री सुभाषचन्द्र यादव- ई-पत्रिका "विदेह" क बारेमे जानि प्रसन्नता भेल। ’विदेह’ निरन्तर पल्लवित-पुष्पित हो आ चतुर्दिक अपन सुगंध पसारय से कामना अछि। १३. श्री मैथिलीपुत्र प्रदीप- ई-पत्रिका "विदेह" केर सफलताक भगवतीसँ कामना। हमर पूर्ण सहयोग रहत। १४. डॉ. श्री भीमनाथ झा- "विदेह" इन्टरनेट पर अछि तेँ "विदेह" नाम उचित आर कतेक रूपेँ एकर विवरण भए सकैत अछि। आइ-काल्हि मोनमे उद्वेग रहैत अछि, मुदा शीघ्र पूर्ण सहयोग देब।कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक देखि अति प्रसन्नता भेल। मैथिलीक लेल ई घटना छी। १५. श्री रामभरोस कापड़ि "भ्रमर"- जनकपुरधाम- "विदेह" ऑनलाइन देखि रहल छी। मैथिलीकेँ अन्तर्राष्ट्रीय जगतमे पहुँचेलहुँ तकरा लेल हार्दिक बधाई। मिथिला रत्न सभक संकलन अपूर्व। नेपालोक सहयोग भेटत, से विश्वास करी। १६. श्री राजनन्दन लालदास- "विदेह" ई-पत्रिकाक माध्यमसँ बड़ नीक काज कए रहल छी, नातिक अहिठाम देखलहुँ। एकर वार्षिक अ‍ंक जखन प्रिं‍ट निकालब तँ हमरा पठायब। कलकत्तामे बहुत गोटेकेँ हम साइटक पता लिखाए देने छियन्हि। मोन तँ होइत अछि जे दिल्ली आबि कए आशीर्वाद दैतहुँ, मुदा उमर आब बेशी भए गेल। शुभकामना देश-विदेशक मैथिलकेँ जोड़बाक लेल।.. उत्कृष्ट प्रकाशन कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक लेल बधाइ। अद्भुत काज कएल अछि, नीक प्रस्तुति अछि सात खण्डमे।  मुदा अहाँक सेवा आ से निःस्वार्थ तखन बूझल जाइत जँ अहाँ द्वारा प्रकाशित पोथी सभपर दाम लिखल नहि रहितैक। ओहिना सभकेँ विलहि देल जइतैक। (स्पष्टीकरण-  श्रीमान्, अहाँक सूचनार्थ विदेह द्वारा ई-प्रकाशित कएल सभटा सामग्री आर्काइवमे https://sites.google.com/a/videha.com/videha-pothi/ पर बिना मूल्यक डाउनलोड लेल उपलब्ध छै आ भविष्यमे सेहो रहतैक। एहि आर्काइवकेँ जे कियो प्रकाशक अनुमति लऽ कऽ प्रिंट रूपमे प्रकाशित कएने छथि आ तकर ओ दाम रखने छथि ताहिपर हमर कोनो नियंत्रण नहि अछि।- गजेन्द्र ठाकुर)...   अहाँक प्रति अशेष शुभकामनाक संग। १७. डॉ. प्रेमशंकर सिंह- अहाँ मैथिलीमे इंटरनेटपर पहिल पत्रिका "विदेह" प्रकाशित कए अपन अद्भुत मातृभाषानुरागक परिचय देल अछि, अहाँक निःस्वार्थ मातृभाषानुरागसँ प्रेरित छी, एकर निमित्त जे हमर सेवाक प्रयोजन हो, तँ सूचित करी। इंटरनेटपर आद्योपांत पत्रिका देखल, मन प्रफुल्लित भऽ गेल। १८.श्रीमती शेफालिका वर्मा- विदेह ई-पत्रिका देखि मोन उल्लाससँ भरि गेल। विज्ञान कतेक प्रगति कऽ रहल अछि...अहाँ सभ अनन्त आकाशकेँ भेदि दियौ, समस्त विस्तारक रहस्यकेँ तार-तार कऽ दियौक...। अपनेक अद्भुत पुस्तक कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक विषयवस्तुक दृष्टिसँ गागरमे सागर अछि। बधाई। १९.श्री हेतुकर झा, पटना-जाहि समर्पण भावसँ अपने मिथिला-मैथिलीक सेवामे तत्पर छी से स्तुत्य अछि। देशक राजधानीसँ भय रहल मैथिलीक शंखनाद मिथिलाक गाम-गाममे मैथिली चेतनाक विकास अवश्य करत। २०. श्री योगानन्द झा, कबिलपुर, लहेरियासराय- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पोथीकेँ निकटसँ देखबाक अवसर भेटल अछि आ मैथिली जगतक एकटा उद्भट ओ समसामयिक दृष्टिसम्पन्न हस्ताक्षरक कलमबन्द परिचयसँ आह्लादित छी। "विदेह"क देवनागरी सँस्करण पटनामे रु. 80/- मे उपलब्ध भऽ सकल जे विभिन्न लेखक लोकनिक छायाचित्र, परिचय पत्रक ओ रचनावलीक सम्यक प्रकाशनसँ ऐतिहासिक कहल जा सकैछ। २१. श्री किशोरीकान्त मिश्र- कोलकाता- जय मैथिली, विदेहमे बहुत रास कविता, कथा, रिपोर्ट आदिक सचित्र संग्रह देखि आ आर अधिक प्रसन्नता मिथिलाक्षर देखि- बधाई स्वीकार कएल जाओ। २२.श्री जीवकान्त- विदेहक मुद्रित अंक पढ़ल- अद्भुत मेहनति। चाबस-चाबस। किछु समालोचना मरखाह..मुदा सत्य। २३. श्री भालचन्द्र झा- अपनेक कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक देखि बुझाएल जेना हम अपने छपलहुँ अछि। एकर विशालकाय आकृति अपनेक सर्वसमावेशताक परिचायक अछि। अपनेक रचना सामर्थ्यमे उत्तरोत्तर वृद्धि हो, एहि शुभकामनाक संग हार्दिक बधाई। २४.श्रीमती डॉ नीता झा- अहाँक कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़लहुँ। ज्योतिरीश्वर शब्दावली, कृषि मत्स्य शब्दावली आ सीत बसन्त आ सभ कथा, कविता, उपन्यास, बाल-किशोर साहित्य सभ उत्तम छल। मैथिलीक उत्तरोत्तर विकासक लक्ष्य दृष्टिगोचर होइत अछि। २५.श्री मायानन्द मिश्र- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक मे हमर उपन्यास स्त्रीधनक जे विरोध कएल गेल अछि तकर हम विरोध करैत छी।... कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पोथीक लेल शुभकामना।(श्रीमान् समालोचनाकेँ विरोधक रूपमे नहि लेल जाए।-गजेन्द्र ठाकुर) २६.श्री महेन्द्र हजारी- सम्पादक श्रीमिथिला- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़ि मोन हर्षित भऽ गेल..एखन पूरा पढ़यमे बहुत समय लागत, मुदा जतेक पढ़लहुँ से आह्लादित कएलक। २७.श्री केदारनाथ चौधरी- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक अद्भुत लागल, मैथिली साहित्य लेल ई पोथी एकटा प्रतिमान बनत। २८.श्री सत्यानन्द पाठक- विदेहक हम नियमित पाठक छी। ओकर स्वरूपक प्रशंसक छलहुँ। एम्हर अहाँक लिखल - कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक देखलहुँ। मोन आह्लादित भऽ उठल। कोनो रचना तरा-उपरी। २९.श्रीमती रमा झा-सम्पादक मिथिला दर्पण। कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक प्रिंट फॉर्म पढ़ि आ एकर गुणवत्ता देखि मोन प्रसन्न भऽ गेल, अद्भुत शब्द एकरा लेल प्रयुक्त कऽ रहल छी। विदेहक उत्तरोत्तर प्रगतिक शुभकामना। ३०.श्री नरेन्द्र झा, पटना- विदेह नियमित देखैत रहैत छी। मैथिली लेल अद्भुत काज कऽ रहल छी। ३१.श्री रामलोचन ठाकुर- कोलकाता- मिथिलाक्षर विदेह देखि मोन प्रसन्नतासँ भरि उठल, अंकक विशाल परिदृश्य आस्वस्तकारी अछि। ३२.श्री तारानन्द वियोगी- विदेह आ कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक देखि चकबिदोर लागि गेल। आश्चर्य। शुभकामना आ बधाई। ३३.श्रीमती प्रेमलता मिश्र “प्रेम”- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़लहुँ। सभ रचना उच्चकोटिक लागल। बधाई। ३४.श्री कीर्तिनारायण मिश्र- बेगूसराय- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक बड्ड नीक लागल, आगांक सभ काज लेल बधाई। ३५.श्री महाप्रकाश-सहरसा- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक नीक लागल, विशालकाय संगहि उत्तमकोटिक। ३६.श्री अग्निपुष्प- मिथिलाक्षर आ देवाक्षर विदेह पढ़ल..ई प्रथम तँ अछि एकरा प्रशंसामे मुदा हम एकरा दुस्साहसिक कहब। मिथिला चित्रकलाक स्तम्भकेँ मुदा अगिला अंकमे आर विस्तृत बनाऊ। ३७.श्री मंजर सुलेमान-दरभंगा- विदेहक जतेक प्रशंसा कएल जाए कम होएत। सभ चीज उत्तम। ३८.श्रीमती प्रोफेसर वीणा ठाकुर- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक उत्तम, पठनीय, विचारनीय। जे क्यो देखैत छथि पोथी प्राप्त करबाक उपाय पुछैत छथि। शुभकामना। ३९.श्री छत्रानन्द सिंह झा- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़लहुँ, बड्ड नीक सभ तरहेँ। ४०.श्री ताराकान्त झा- सम्पादक मैथिली दैनिक मिथिला समाद- विदेह तँ कन्टेन्ट प्रोवाइडरक काज कऽ रहल अछि। कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक अद्भुत लागल। ४१.डॉ रवीन्द्र कुमार चौधरी- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक बहुत नीक, बहुत मेहनतिक परिणाम। बधाई। ४२.श्री अमरनाथ- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक आ विदेह दुनू स्मरणीय घटना अछि, मैथिली साहित्य मध्य। ४३.श्री पंचानन मिश्र- विदेहक वैविध्य आ निरन्तरता प्रभावित करैत अछि, शुभकामना। ४४.श्री केदार कानन- कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक लेल अनेक धन्यवाद, शुभकामना आ बधाइ स्वीकार करी। आ नचिकेताक भूमिका पढ़लहुँ। शुरूमे तँ लागल जेना कोनो उपन्यास अहाँ द्वारा सृजित भेल अछि मुदा पोथी उनटौला पर ज्ञात भेल जे एहिमे तँ सभ विधा समाहित अछि। ४५.श्री धनाकर ठाकुर- अहाँ नीक काज कऽ रहल छी। फोटो गैलरीमे चित्र एहि शताब्दीक जन्मतिथिक अनुसार रहैत तऽ नीक। ४६.श्री आशीष झा- अहाँक पुस्तकक संबंधमे एतबा लिखबा सँ अपना कए नहि रोकि सकलहुँ जे ई किताब मात्र किताब नहि थीक, ई एकटा उम्मीद छी जे मैथिली अहाँ सन पुत्रक सेवा सँ निरंतर समृद्ध होइत चिरजीवन कए प्राप्त करत। ४७.श्री शम्भु कुमार सिंह- विदेहक तत्परता आ क्रियाशीलता देखि आह्लादित भऽ रहल छी। निश्चितरूपेण कहल जा सकैछ जे समकालीन मैथिली पत्रिकाक इतिहासमे विदेहक नाम स्वर्णाक्षरमे लिखल जाएत। ओहि कुरुक्षेत्रक घटना सभ तँ अठारहे दिनमे खतम भऽ गेल रहए मुदा अहाँक कुरुक्षेत्रम् तँ अशेष अछि। ४८.डॉ. अजीत मिश्र- अपनेक प्रयासक कतबो प्रश‍ंसा कएल जाए कमे होएतैक। मैथिली साहित्यमे अहाँ द्वारा कएल गेल काज युग-युगान्तर धरि पूजनीय रहत। ४९.श्री बीरेन्द्र मल्लिक- अहाँक कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक आ विदेह:सदेह पढ़ि अति प्रसन्नता भेल। अहाँक स्वास्थ्य ठीक रहए आ उत्साह बनल रहए से कामना। ५०.श्री कुमार राधारमण- अहाँक दिशा-निर्देशमे विदेह पहिल मैथिली ई-जर्नल देखि अति प्रसन्नता भेल। हमर शुभकामना। ५१.श्री फूलचन्द्र झा प्रवीण-विदेह:सदेह पढ़ने रही मुदा कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक देखि बढ़ाई देबा लेल बाध्य भऽ गेलहुँ। आब विश्वास भऽ गेल जे मैथिली नहि मरत। अशेष शुभकामना। ५२.श्री विभूति आनन्द- विदेह:सदेह देखि, ओकर विस्तार देखि अति प्रसन्नता भेल। ५३.श्री मानेश्वर मनुज-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक एकर भव्यता देखि अति प्रसन्नता भेल, एतेक विशाल ग्रन्थ मैथिलीमे आइ धरि नहि देखने रही। एहिना भविष्यमे काज करैत रही, शुभकामना। ५४.श्री विद्यानन्द झा- आइ.आइ.एम.कोलकाता- कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक विस्तार, छपाईक संग गुणवत्ता देखि अति प्रसन्नता भेल। अहाँक अनेक धन्यवाद; कतेक बरखसँ हम नेयारैत छलहुँ जे सभ पैघ शहरमे मैथिली लाइब्रेरीक स्थापना होअए, अहाँ ओकरा वेबपर कऽ रहल छी, अनेक धन्यवाद। ५५.श्री अरविन्द ठाकुर-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक मैथिली साहित्यमे कएल गेल एहि तरहक पहिल प्रयोग अछि, शुभकामना। ५६.श्री कुमार पवन-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक पढ़ि रहल छी। किछु लघुकथा पढ़ल अछि, बहुत मार्मिक छल। ५७. श्री प्रदीप बिहारी-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक देखल, बधाई। ५८.डॉ मणिकान्त ठाकुर-कैलिफोर्निया- अपन विलक्षण नियमित सेवासँ हमरा लोकनिक हृदयमे विदेह सदेह भऽ गेल अछि। ५९.श्री धीरेन्द्र प्रेमर्षि- अहाँक समस्त प्रयास सराहनीय। दुख होइत अछि जखन अहाँक प्रयासमे अपेक्षित सहयोग नहि कऽ पबैत छी। ६०.श्री देवशंकर नवीन- विदेहक निरन्तरता आ विशाल स्वरूप- विशाल पाठक वर्ग, एकरा ऐतिहासिक बनबैत अछि। ६१.श्री मोहन भारद्वाज- अहाँक समस्त कार्य देखल, बहुत नीक। एखन किछु परेशानीमे छी, मुदा शीघ्र सहयोग देब। ६२.श्री फजलुर रहमान हाशमी-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक मे एतेक मेहनतक लेल अहाँ साधुवादक अधिकारी छी। ६३.श्री लक्ष्मण झा "सागर"- मैथिलीमे चमत्कारिक रूपेँ अहाँक प्रवेश आह्लादकारी अछि।..अहाँकेँ एखन आर..दूर..बहुत दूरधरि जेबाक अछि। स्वस्थ आ प्रसन्न रही। ६४.श्री जगदीश प्रसाद मंडल-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक पढ़लहुँ । कथा सभ आ उपन्यास सहस्रबाढ़नि पूर्णरूपेँ पढ़ि गेल छी। गाम-घरक भौगोलिक विवरणक जे सूक्ष्म वर्णन सहस्रबाढ़निमे अछि, से चकित कएलक, एहि संग्रहक कथा-उपन्यास मैथिली लेखनमे विविधता अनलक अछि। समालोचना शास्त्रमे अहाँक दृष्टि वैयक्तिक नहि वरन् सामाजिक आ कल्याणकारी अछि, से प्रशंसनीय। ६५.श्री अशोक झा-अध्यक्ष मिथिला विकास परिषद- कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक लेल बधाई आ आगाँ लेल शुभकामना। ६६.श्री ठाकुर प्रसाद मुर्मु- अद्भुत प्रयास। धन्यवादक संग प्रार्थना जे अपन माटि-पानिकेँ ध्यानमे राखि अंकक समायोजन कएल जाए। नव अंक धरि प्रयास सराहनीय। विदेहकेँ बहुत-बहुत धन्यवाद जे एहेन सुन्दर-सुन्दर सचार (आलेख) लगा रहल छथि। सभटा ग्रहणीय- पठनीय। ६७.बुद्धिनाथ मिश्र- प्रिय गजेन्द्र जी,अहाँक सम्पादन मे प्रकाशित ‘विदेह’आ ‘कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक’ विलक्षण पत्रिका आ विलक्षण पोथी! की नहि अछि अहाँक सम्पादनमे? एहि प्रयत्न सँ मैथिली क विकास होयत,निस्संदेह। ६८.श्री बृखेश चन्द्र लाल- गजेन्द्रजी, अपनेक पुस्तक कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक पढ़ि मोन गदगद भय गेल , हृदयसँ अनुगृहित छी । हार्दिक शुभकामना । ६९.श्री परमेश्वर कापड़ि - श्री गजेन्द्र जी । कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक पढ़ि गदगद आ नेहाल भेलहुँ। ७०.श्री रवीन्द्रनाथ ठाकुर- विदेह पढ़ैत रहैत छी। धीरेन्द्र प्रेमर्षिक मैथिली गजलपर आलेख पढ़लहुँ। मैथिली गजल कत्तऽ सँ कत्तऽ चलि गेलैक आ ओ अपन आलेखमे मात्र अपन जानल-पहिचानल लोकक चर्च कएने छथि। जेना मैथिलीमे मठक परम्परा रहल अछि। (स्पष्टीकरण- श्रीमान्, प्रेमर्षि जी ओहि आलेखमे ई स्पष्ट लिखने छथि जे किनको नाम जे छुटि गेल छन्हि तँ से मात्र आलेखक लेखकक जानकारी नहि रहबाक द्वारे, एहिमे आन कोनो कारण नहि देखल जाय। अहाँसँ एहि विषयपर विस्तृत आलेख सादर आमंत्रित अछि।-सम्पादक) ७१.श्री मंत्रेश्वर झा- विदेह पढ़ल आ संगहि अहाँक मैगनम ओपस कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक सेहो, अति उत्तम। मैथिलीक लेल कएल जा रहल अहाँक समस्त कार्य अतुलनीय अछि। ७२. श्री हरेकृष्ण झा- कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक मैथिलीमे अपन तरहक एकमात्र ग्रन्थ अछि, एहिमे लेखकक समग्र दृष्टि आ रचना कौशल देखबामे आएल जे लेखकक फील्डवर्कसँ जुड़ल रहबाक कारणसँ अछि। ७३.श्री सुकान्त सोम- कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक मे  समाजक इतिहास आ वर्तमानसँ अहाँक जुड़ाव बड्ड नीक लागल, अहाँ एहि क्षेत्रमे आर आगाँ काज करब से आशा अछि। ७४.प्रोफेसर मदन मिश्र- कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक सन किताब मैथिलीमे पहिले अछि आ एतेक विशाल संग्रहपर शोध कएल जा सकैत अछि। भविष्यक लेल शुभकामना। ७५.प्रोफेसर कमला चौधरी- मैथिलीमे कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक सन पोथी आबए जे गुण आ रूप दुनूमे निस्सन होअए, से बहुत दिनसँ आकांक्षा छल, ओ आब जा कऽ पूर्ण भेल। पोथी एक हाथसँ दोसर हाथ घुमि रहल अछि, एहिना आगाँ सेहो अहाँसँ आशा अछि। ७६.श्री उदय चन्द्र झा "विनोद": गजेन्द्रजी, अहाँ जतेक काज कएलहुँ अछि से मैथिलीमे आइ धरि कियो नहि कएने छल। शुभकामना। अहाँकेँ एखन बहुत काज आर करबाक अछि। ७७.श्री कृष्ण कुमार कश्यप: गजेन्द्र ठाकुरजी, अहाँसँ भेँट एकटा स्मरणीय क्षण बनि गेल। अहाँ जतेक काज एहि बएसमे कऽ गेल छी ताहिसँ हजार गुणा आर बेशीक आशा अछि। ७८.श्री मणिकान्त दास: अहाँक मैथिलीक कार्यक प्रशंसा लेल शब्द नहि भेटैत अछि। अहाँक कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक सम्पूर्ण रूपेँ पढ़ि गेलहुँ। त्वञ्चाहञ्च बड्ड नीक लागल। ७९. श्री हीरेन्द्र कुमार झा- विदेह ई-पत्रिकाक सभ अंक ई-पत्रसँ भेटैत रहैत अछि। मैथिलीक ई-पत्रिका छैक एहि बातक गर्व होइत अछि। अहाँ आ अहाँक सभ सहयोगीकेँ हार्दिक शुभकामना। विदेह मैथिली साहित्य आन्दोलन (c)२००४-११. सर्वाधिकार लेखकाधीन आ जतय लेखकक नाम नहि अछि ततय संपादकाधीन। विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। सह-सम्पादक: उमेश मंडल। सहायक सम्पादक: शिव कुमार झा आ मुन्नाजी (मनोज कुमार कर्ण)। भाषा-सम्पादन: नागेन्द्र कुमार झा आ पञ्जीकार विद्यानन्द झा। कला-सम्पादन: ज्योति सुनीत चौधरी आ रश्मि रेखा सिन्हा। सम्पादक-शोध-अन्वेषण: डॉ. जया वर्मा आ डॉ. राजीव कुमार वर्मा। सम्पादक- नाटक-रंगमंच-चलचित्र- बेचन ठाकुर। सम्पादक-सूचना-सम्पर्क-समाद पूनम मंडल आ प्रियंका झा। रचनाकार अपन मौलिक आ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि) ggajendra@videha.com केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx, .rtf वा .txt फॉर्मेटमे पठा सकैत छथि। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेताह, से आशा करैत छी। रचनाक अंतमे टाइप रहय, जे ई रचना मौलिक अछि, आ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। मेल प्राप्त होयबाक बाद यथासंभव शीघ्र ( सात दिनक भीतर) एकर प्रकाशनक अंकक सूचना देल जायत। ’विदेह' प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका अछि आ एहिमे मैथिली, संस्कृत आ अंग्रेजीमे मिथिला आ मैथिलीसँ संबंधित रचना प्रकाशित कएल जाइत अछि। एहि ई पत्रिकाकेँ श्रीमति लक्ष्मी ठाकुर द्वारा मासक ०१ आ १५ तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि। (c) 2004-11 सर्वाधिकार सुरक्षित। विदेहमे प्रकाशित सभटा रचना आ आर्काइवक सर्वाधिकार रचनाकार आ संग्रहकर्त्ताक लगमे छन्हि। रचनाक अनुवाद आ पुनः प्रकाशन किंवा आर्काइवक उपयोगक अधिकार किनबाक हेतु ggajendra@videha.co.in पर संपर्क करू। एहि साइटकेँ प्रीति झा ठाकुर, मधूलिका चौधरी आ रश्मि प्रिया द्वारा डिजाइन कएल गेल। सिद्धिरस्तु वि दे ह विदेह Videha বিদেহ  विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका Videha Ist Maithili Fortnightly e Magazine  विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका 'विदेह' ९१ म अंक ०१ अक्टूबर २०११ (वर्ष ४ मास ४६ अंक ९१)http://www.videha.co.in/ मानुषीमिह संस्कृताम् ISSN 2229-547X VIDEHA वि दे ह विदेह Videha বিদেহ  विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका Videha Ist Maithili Fortnightly e Magazine  विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक 'विदेह' ९१ म अंक ०१ अक्टूबर २०११ (वर्ष ४ मास ४६ अंक ९१)http://www.videha.co.in/ मानुषीमिह संस्कृताम् ISSN 2229-547X VIDEHA

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