VIDEHA — Issue 92 / अंक ९२

Publication: VIDEHA · Issue: 92
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376 375 ISSN 2229-547X VIDEHA 'विदेह' ९२ म अंक १५ अक्टूबर २०११ (वर्ष ४ मास ४६ अंक ९२) वि  दे  ह विदेह Videha বিদেহ http://www.videha.co.in  विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका Videha Ist Maithili Fortnightly e Magazine   नव अंक देखबाक लेल पृष्ठ सभकेँ रिफ्रेश कए देखू। Always refresh the pages for viewing new issue of VIDEHA. Read in your own script Roman(Eng)Gujarati Bangla Oriya Gurmukhi Telugu Tamil Kannada Malayalam Hindi ऐ अंकमे अछि:- १. संपादकीय संदेश २. गद्य २.१.हम पुछैत छी- देवशंकर नवीनसँ मुन्नाजी पुछैत छथि ढेर रास गप। २.२.- अतुलेश्वर- किछु विचार टिप्पणी २.३.चन्द्रेश-यर्थाथक अनुभुतिमे ऐतिहासिक दिनः झिझिया नृत्य महोत्सव २.४.   जवाहर लाल कश्यप-एक टा विहनि कथा २.५.श्यामसुन्दर शशि- कोजग्रा धूमधाम संग मनाअ‍ोल जा रहल २.६.जगदीश प्रसाद मण्‍डल- १.वीरांगना/ तामक तमघैल २.७.नवेंदु कुमार झा-१.जन चेतना यात्रा मोदी सॅ सचेत अछि भाजपा २.प्रधानमंत्री भाजपा २.८.नवीन ठाकुर-चंदा मामा आ चंद्रमा ३. पद्य ३.१.१.शांतिलक्ष्मी चौधरी २.ज्योति सुनीत चौधरी ३.२.१.इरा मल्लिक २ओमप्रकाश झा ३.उमेश पासवान ३.३.१. जगदीश चन्द्र ठाकुर ’अनिल’ २.मिहिर झा ३.४.१.शिवशंकर सिंह ठाकुर ३.५.१.विकास झा रंजन२.जगदीश प्रसाद मण्डल ३.६.१. नवीन ठाकुर २.रमा कान्त झा ३.७.१.डॉ॰ शशिधर कुमर २ किशन कारीगरनवीन कुमार "आशा" ३.८. १.रामदेव प्रसाद मण्‍डल ‘झारूदार’ २डा0अरुण कुमार सिंह ४. मिथिला कला-संगीत-१.ज्योति सुनीत चौधरी २.श्वेता झा (सिंगापुर) ३.गुंजन कर्ण ४.इरा मल्लिक ५.राजनाथ मिश्र ५. गद्य-पद्य भारती:बिपिन कुमार झा-श्री देवब्रत बसुक संस्कृत कथाक मैथिली अनुवाद- सुख केँ मृगमरीचिका बुझू। ६.बालानां कृते-१. डॉ॰ शशिधर कुमर “विदेह” २. इरा मल्लिक ३.कुन्दन कुमार ४.कैलाश कामत ७. भाषापाक रचना-लेखन -[मानक मैथिली], [विदेहक मैथिली-अंग्रेजी आ अंग्रेजी मैथिली कोष (इंटरनेटपर पहिल बेर सर्च-डिक्शनरी) एम.एस. एस.क्यू.एल. सर्वर आधारित -Based on ms-sql server Maithili-English and English-Maithili Dictionary.] 8.VIDEHA FOR NON RESIDENTS 8.2.1.Episodes Of The Life - ("Kist-Kist Jeevan" by Smt. shefalika Varma translated into English by Smt. Jyoti Jha Chaudhary )  2.Original Poem in Maithili by Kalikant Jha "Buch" Translated into English by Jyoti Jha Chaudhary विदेह ई-पत्रिकाक सभटा पुरान अंक ( ब्रेल, तिरहुता आ देवनागरी मे ) पी.डी.एफ. डाउनलोडक लेल नीचाँक लिंकपर उपलब्ध अछि। All the old issues of Videha e journal ( in Braille, Tirhuta and Devanagari versions ) are available for pdf download at the following link. विदेह ई-पत्रिकाक सभटा पुरान अंक ब्रेल, तिरहुता आ देवनागरी रूपमे Videha e journal's all old issues in Braille Tirhuta and Devanagari versions विदेह ई-पत्रिकाक पहिल ५० अंक

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डिसकसन फोरमपर जाऊ। "मैथिल आर मिथिला" (मैथिलीक सभसँ लोकप्रिय जालवृत्त) पर जाऊ। १. संपादकीय स्वीडनक कवि टॉमस ट्रांसट्रोमरकें २०११क साहित्य लेल १.५ मिलियन डॉलरक नोबल पुरस्कार देबाक घोषणा कएल गेल अछि| स्वेडिश एकेडमी कहलक "ओ अपन घनगर पारदर्शी बिम्बसं सत्यक एकटा नव द्वारक परिचय करेलनि"| हुनकर पोथी सबहक अंगरेजी अनुवाद रहनि "द ग्रेट एनिग्मा ", "द हाफ फिनिश्ड हेवेन ", द डिलीटेड वर्ल्ड " | ओ अस्सी बरखक छथि| ओ १५ सं बेशी कविता संग्रह लिखने छथि जे अंगरेजी आ ६० आन भाषामे अनूदित भेल अछि| हुनकर जन्म स्टोकहोममें भेलनि| ओ मनोचिकित्सक रहथि आ हुनकर कवितामे मानवताक गहन मनोविज्ञानिक विश्लेषण भेटैत अछि |हुनकर कविता गूढ़ मुदा सोझ होइत अछि | हुनकर कविता वैयक्तिक आ सार्वत्रिक दुनू अछि| हुनकर कविता एहेन गूढ़ नै होइए जइपर चिंता करैत रहू, वरन ओ धरातलसं अस्तित्वक उच्च शिखर दिस ल' जाइए |हुनकर स्वेडन क नम्हर शीतकालक विवरण , ऋतुक लय, आ प्रकृतिक सौन्दर्य वातावरणक अद्भुत विवरण हुनकर कवितामे भेटैत अछि | हुनकर माता स्कूल शिक्षिका आ पिता पत्रकार रहथि आ ओ साहित्य , इतिहास , धर्मशास्त्र आ मनोविज्ञान पढने छथि | १९९० सं ओ एकटा आघातक बाद बजबामे सक्षम नै छथि| १९९३ का बाद अमेरिका ककरो साहित्यक नोबल नै भेटल छै| १९७४ क बाद आब जा क' कोनो स्वेडिश कें ई पुरस्कार भेटल छै| नोबल समिति आब गएर यूरोपीय भाषाक बेशी साहित्यिक पोथीपर विचार करत| ( विदेह ई पत्रिकाकेँ ५ जुलाइ २००४ सँ अखन धरि ११६ देशक १,९४० ठामसँ ६८,०७२गोटे द्वारा विभिन्न आइ.एस.पी. सँ ३,२४,२३६ बेर देखल गेल अछि; धन्यवाद पाठकगण। - गूगल एनेलेटिक्स डेटा। ) गजेन्द्र ठाकुर ggajendra@videha.com http://www.maithililekhaksangh.com/2010/07/blog-post_3709.html २. गद्य २.१.हम पुछैत छी- देवशंकर नवीनसँ मुन्नाजी पुछैत छथि ढेर रास गप। २.२.- अतुलेश्वर- किछु विचार टिप्पणी २.३.चन्द्रेश-यर्थाथक अनुभुतिमे ऐतिहासिक दिनः झिझिया नृत्य महोत्सव २.४.   जवाहर लाल कश्यप-एक टा विहनि कथा २.५.श्यामसुन्दर शशि- कोजग्रा धूमधाम संग मनाअ‍ोल जा रहल २.६.जगदीश प्रसाद मण्‍डल- १.वीरांगना/ तामक तमघैल २.७.नवेंदु कुमार झा-१.जन चेतना यात्रा मोदी सॅ सचेत अछि भाजपा २.प्रधानमंत्री भाजपा २.८.नवीन ठाकुर-चंदा मामा आ चंद्रमा हम पुछैत छी- देवशंकर नवीनसँ मुन्नाजी पुछैत छथि ढेर रास गप। 1.         अहाँक साहित्यिक लेखन-प्रक्रिया कोना आ कत’ए प्रारम्भ भेल? पहिल बेर कोन विधाक कोन रचना कत’ आ कहिया छपल पूर्ण जनतब दी। नेनमतिएसँ फकड़ा जोड़बाक चसक सवार भ’ गेल छल। एक बेर ओ फकड़ा किनकहु भावनाकें आहत केलकनि, ओ हमर पिता लग शिकायत केलनि। ओइ दिन चमरौधा जूतासँ हमर पिटाइ भेल छल। कैक दिन धरि ज’र लागल रहल।... सन् 1972मे हम अठमा क्लासमे रही। ठीक-ठीक मोन नइँ पड़ै’ए, मुदा ओही लगाति नौमा-दसमा क्लासमे अबैत-अबैत फिल्मी गीतक ओजन पर पैरोडी गीत लिखए लागल रही, जकर गायन हमर गामक कीर्त्‍तन मण्डलीमे भेल करए। ओही क्रममे गाम भरिमे प्रचार होअए लागल। क्रम आगू बढ़ैत गेल। तै समयमे साहित्यक माने कोनो विचित्र आ विलक्षण भाव-बोधक तुकबन्दी बुझैत रही।... सन् 1976मे मैट्रिक पास केलहुँ। सहरसा कॉलेज, सहरसामे नाम लिखाओल। सन् 1978-80 सत्रमें बी.एस-सी.मे पढ़ैत रही। कॉलेज-पत्रिकामे हमर एकटा कविता मैथिलीमे छपल छल। पहिल प्रकाशन ओएह थिक, मुदा ओ कविता कतए गेल, पता नइँ! ता धरि सय के लगाति पैरोडी आ फकड़ा लिखि चुकल रही। ओही दिनमे हमर लिखल एकटा पैरौडी गीत सुनिकए हमर कक्का प्रो.नारायण झा(एखन ओ वीरपुर कॉलेजमे अंग्रेजीक अध्यापक छथि)हमरा महादेवी वर्माक पोथी सब पढ़बाक सलाह देलनि। किछु-किछु पढ़ए लगलौं। सन्1981-82क मध्य सहरसामे पाँच विषयमे एम.ए.क पढ़ौनी शुरुह भेलै। मैथिलीमे एम.ए. करबाक रुचि हमर जागि उठल। मिथिला मिहिर पत्रिका पढ़ए लागल रही। एम.ए.मे नामांकन भ’ गेल। क्लासमे पढ़ौनी शुरुह भ’ गेल। कक्षामे हमर अलावा स’ब गोटए विधिवत् ऑनर्स आ साहित्यक पोथी पढ़ि-पढ़ि आएल छलाह। एकटा हमहीं रही, जकरा किछुटा बोध नइँ छलैक। साइन्सक छात्रकें भाषाक बोध नइँ रहै छै--अइ किम्बदन्तीक आधार पर शुरुह-शुरुहमे आन सहपाठी लोकनि कोनो मानि-मोजर नइँ दैथि, मुदा क्रमे-क्रमे से सहज होअए लागल। ओही बीच सन् 1983मे सहरसा कॉलेजमे विद्यापति समारोह आयोजित भेल छल।‘मैथिली लोकसाहित्य’ पर लेख प्रतियोगिता आयोजित भेल छल। बिहारक तत्कालीन राज्यपाल अखलाख-उर-रहमान किदवईक हाथें पुरस्कृत भेल रही। हौसला बढ़ि गेल छल। सहरसा परिसरक मैथिलीक विद्वान लोकनिक बीच पहचान बनए लागल छल। पैरोडी लेखन पाछू छूटि गेल। साहित्यिक पोथी-पत्रिका पढ़बाक खगता होअए लागल। सन् 1983मे मिथिला मिहिरमे एक टा कविता प्रकाशित भेल--मिथिलाक वासी।...तखनहुँ धरि तुकबन्दी मात्रकें हम कविता बुझैत रही। ओही बीच राजकमल चौधरीक दू टा मैथिली कथा--‘ननदि भाउजि’, ‘एकटा चम्पाकली: एकटा विषधर’ आ एकटा हिन्दी कथा ‘जलते हुए मकान में कुछ लोग’ पढबाक अवसर लागल। ई तीनू कथा हमर दुनियाँ बदलि देलक। यात्री आ राजकमल चौधरी अही समयमे सम्मोहित केलनि। सम्मोहन बढै़त गेल, पाठ्य-पुस्तकक क्षेत्र बढै़त गेल। लिखैत-पढै़त रहलहुँ... इएह कथा अछि। समवयस्की साहित्यिक बन्धु लोकनिमे सबसँ पहिल परिचय आ प्रगाढ़ता तारानन्द वियोगीसँ भेल।... 2.         मैथिलीमे सतरि के दशक वा ओकर पाछू जुड़ल रचनाकार द्वारा बहुत रास विधा(दुनू विधाक बहुत रास प्रकार) पर काज भेल, अहाँ अइ मध्यम पीढ़ीक रचनाकारक क्रियाशीलताकें कोन नजरिएँ देखै छी? अहाँ प्रायः ई पूछए चाहै छी जे बीसम शताब्दीक सातम आ आठम दशकक रचनाकारक क्रियाशीलता केहन रहलनि? जँ सएह सत्य, तँ हम सबसँ पहिने अइ बीस बर्खक अन्तरालमे क्रियाशील प्रमुख रचनाकारक नाम गनबए चाहब। अइ अन्तरालक अमूल्य विशेषता ई छल, जे पछिला पीढ़ीक कतोक रास नव-पुरान(वयस आ विचार दुनूसँ) रचनाकार लोकनि एक संग सक्रिय छलाह। ओहिमेसँ प्रमुख छथि--सीताराम झा, कांचीनाथ झा’ किरण, हरिमोहन झा, तन्‍त्रनाथ झा, काशीकान्त मिश्र ‘मधुप’, सुरेन्द्र झा‘सुमन’, वैद्यनाथ मिश्र ‘यात्री’, आरसी प्रसाद सिंह, ब्रजकिशोर वर्मा ‘मणिपद्म’, गोविन्द झा,रामकृष्ण झा ‘किसुन’, चन्द्रनाथ मिश्र ‘अमर’, राजकमल चौधरी, ललित, मायानन्द, सोमदेव,धीरेन्द्र हंसराज, लिलि रे, बलराम, रामदेव झा आदि। सातम दशकमे अपन प्रखर ऊर्जाक संग जे झमटगर पीढ़ी ठाढ़ भेल, ताहिमे प्रमुख छथि--धूमकेतु, रमानन्द रेणु, राजमोहन झा, गंगेश गुंजन, प्रभास कुमार चौधरी, कीर्तिनारायण मिश्र,वीरेन्द्र मल्लिक, मार्कण्डेय प्रवासी, साकेतानन्द, जीवकान्त, रवीन्द्रनाथ ठाकुर, रामानुग्रह झा,कुलानान्द मिश्र, भीमनाथ झा, मन्त्रेश्वर झा, उदयचन्द्र झा ‘विनोद’, उपेन्द्र दोषी, सुकान्त सोम, महाप्रकाश, महेन्द्र मार्कण्डेय, सुभाष चन्द्र यादव, उषाकिरण खान, रामलोचन ठाकुर,उदयनारायण सिंह ‘नचिकेता’, बुद्धिनाथ मिश्र आदि। अइ पीढ़ीक पाछुए लागल अगिला पीढ़ी ढाढ़ भ’ गेल। अहाँ मानि सकै छी, जे आठम दशकक नामे जाहि पीढ़ीक नामकरण होइत अछि, तकर कतोक रचनाकार सातमे दशकक अन्तिम समयमे चैंचक होइत अपन, ऊर्जाक संकेत देबए लागल छलाह। अइ पीढ़ीक महत्त्वपूर्ण नाम थिक--विभूति आनन्द, शिवशंकर श्रीनिवास, अशोक, पूर्णेन्दु चौधरी, ललितेश मिश्र, विनोद बिहारी लाल, अग्निपुष्प, केदार कानन प्रदीप बिहारी, सियाराम सरस, तारानन्द वियोगी,विभारानी, नारायणजी, शैलेन्द्र आनन्द, रमेश, नीता झा, शैलेन्द्र कुमार झा, ज्योत्स्ना चन्द्रम,सुस्मिता पाठक, आदि। हमर प्रवेश अपेक्षाकृत देरीसँ भेल। अइ अन्तरालक रचना-कर्म पर चर्चा करबा लेल किछु महत्त्वपूर्ण बात पर ध्यान देब आवश्यक होएत। सन् 1947मे भारत देश स्वतन्‍त्र भेल आ सन् 1949मे महाकवि वैद्यनाथ मिश्र ‘यात्री’क कविता संग्रह चित्रा प्रकाशित भेल--ई मात्र संयोग नइँ  थिक। प्रथम स्वाधीनता संग्रामसँ स्वाधीनता प्राप्ति धरिक नब्बे बर्खक अन्तरालमे मैथिलीक पूर्वज रचनाकार लोकनि मातृभाषाक प्रति परम अनुराग रखितहु कोनो क्षेत्रीय धारणासँ प्रेरित नइँ भेलाह, स्वाधीनता संग्रामक लक्ष्य पूर्तिमे लागल छलाह। स्वाभाविक छल जे सन् 1930-35क लगाति रचनारत लोक सभक मुख्य चिन्ता सेहो ओएह बनल। मुदा, ओहि कालक मिथिलाक स्थानीय समस्या सब सेहो प्रबल छल। विद्यापति, गोविन्द दाससँ होइत मनबोध,चन्दा झा धरि मैथिली भाषा साहित्यक स्वरूप तँ बड़ आगू आबि गेल छल, मुदा अंग्रेजी शिक्षाक प्रचार-प्रसार बढ़ि गेने स्थानीय अस्मिता संकटपूर्ण देखाए लागल छल। स्वाधीनता प्राप्तिक बादहु मैथिली कोनहुँ जनपदक राजभाषा नइँ  बनल। मातृभाषाक माध्यमे शिक्षा-दीक्षाक व्यवस्था मैथिल लेल नइँ  भेल। मातृभाषाक प्रति अनुराग आ ममता रखनिहार मिथिलाक जनसाधारण तथा प्रतिबद्ध रचनाकर्मीकें अइ बातक आघात लगलनि। चन्दा झासँ ल’ क’ भुवनेश्वर सिंह ‘भुवन’ आ कांचीनाथ झा ‘किरण’ धरिक जे रचनाकार लोकनि समस्त आग्रह छोड़ि, निष्ठासँ स्वाधीनता संग्राममे अपन योगदान देने छलाह, हुनका आ हुनकर अनुवर्ती पीढ़ीक रचनाकार लोकनिकें ई झटका अत्यधिक आहत केलकनि। एकर अलावा वंशवाद, जातिवाद, आ धार्मिक पाखण्डक कारणें जते कुसंस्कार मिथिलामे ओहि समयमे पोनकि क’ भकरार भ’ गेल छल, से जनजीवनकें एकदमसँ आक्रान्त केने छल। बाल विवाह, बहु विवाह, बेमेल विवाह आदि वंशवादक सहारचरण छल। किशोरावस्था आ युवावस्थामे अंसख्य कन्या विधवा भ’ जाइ छलीह; स्‍त्रीकें स्‍त्रीधन कहल जाइ छल; ओ पुरुख-पात्रक अथवा खानदानक सदस्य नइँ , इज्जत होइ छली; चाही तँ माथ पर, चाही तँ बजारमे, चाही तँ पैर त’र राखि लिअ’। अइ दुरवस्थाक कारणें मिथिलाक सृजनधर्मी वातावरणमे स्तब्धताक माहौल आबि गेल छलै। अइ समयमे मिथिलाक जनपदीय भाषाक रूपमे कमासुत लोकनिक बीच विकासमान भाषा तँ मैथिलीए छल। वैद्यनाथ मिश्र ‘यात्री’ कमासुत आ काजुल लोकनिक अइ विकासमान भाषामे कमासुत लोकनिक स्वप्न देखए लगलाह। सन् 1941मे रचित कविता‘कविक स्वप्न’मे देखल बिम्ब ओही कमासुत लोकनिक स्वप्न थिक। कहि सकै छी जे महाकवि वैद्यनाथ मिश्र ‘यात्री’क कविता संकलन ‘चित्रा’ ओइ कालक सामूहिक भावनाक उद्घोष साबित भेल। यद्यपि, एकर सूत्रपात पहिनहि, हुनकर पूर्ववर्ती कवि सीताराम झा,कांचीनाथ झा ‘किरण’, काशीकान्त मिश्र ‘मधुप’, भुवनेश्वर सिंह ‘भुवन’द्ध हरिमोहन झा आदि क’ चुकल छलाह। देशदशा आ मिथिला समाजक दयनीय स्थिति पर व्यंग्य, धिक्कार आ क्रोधसँ परिपूर्ण अभिव्यक्ति हुनका लोकनिक रचनामे आबि चुकल छल। जीवन झा, यदुनाथ झा ‘यदुवर’, छेदी झा ‘द्विजवर’, पुलकित लाल दास, रघुनन्दन दास, भोला लालदास, ईशनाथ झा आदिक नामोल्लेख सेहो अइ क्रममे उचित थिक, जिनकर रचनाधारामे राष्ट्रीय चिन्ता आ आम नागरिकक सपना अंकित छल। महाकवि यात्रीक सृजनात्मक जीवनक फलक तँ पैघ छनिहें, ओहिसँ बेसी विराट हुनकर रचनाक फलक छनि। स्वातन्त्र्योत्तरकालीन मिथिला समाजक जीवन-क्रमकें जड़तासँ चेतनोन्मुख होइत अपना आँखिएँ देखैत रहलाह। अपन रचनाक प्रभावक परिणाम हुनका क्रमे-क्रमे देखाइत रहलनि। रचनात्मक सन्धानमे ओ योजनाबद्ध पद्धति अपनौने छलाह। सम्मुख ठाढ़ विकराल अन्हारकें मेटएबा लेल हुनकर समकालीन कवि ‘सुमन’ आ ‘आरसी’क अपेक्षा कनेक बेसिए तीक्ष्ण ध्वनिसँ पूर्व पीढ़ीक सीताराम झा आ कांचीनाथ झा ‘किरण’तत्पर रहथिन। हमरा लोकनिक जाहि मानवीय सम्बन्ध-सरोकार आइ जातिसँ चीन्हल जा रहल अछि; आ जाहि वर्गहीन समाजक सपना हम आइयो देखि रहल छी, से सपना सीताराम झा तहिए देखलनि, कहलनि--भेदहीन मानव-समाज एक जाति हएत।...जाहि धर्मान्धता आ पाषाण-मूर्ति पूजनमे मिथिलाक सशक्त हाथ जुटल रहै छल, तकर शक्तिक घोषणा आ अन्धविश्वासक खण्डन कांचीनाथ झा ‘किरण’ तहिए क’ देलनि। पूजा पबैत माटिक महादेवकें कहलनि--बलवान मानवक हाथक बलसँ बैसल छह तों सराइ पर... सुमन आ आरसी ओहि कालक बेस प्रशस्त कवि छथि; प्रगति आ विकासक प्रति, राष्ट्रक उन्नतिक प्रति हिनका लोकनिक बेस आस्था छलनि। श्रमशील लोकनिक प्रति पर्याप्त सम्मान रखै छलाह;मुदा कोनो नव बाट तकबा लेल अथवा बनएबा लेल कोनो सामान्यो उत्साह आ आग्रह नइँ  छलनि। यात्री जकाँ पुरानकें तोड़ियो क’ न’वकें स्थान देबाक उत्साह नइँ  छलनि; अभिप्रेत छलनि जे न’व आबथु, अवश्य आबथु, मुदा पुरानक अधीनता स्वीकार करैत। अकारण नइँ  थिक जे वर्षा ऋतुमे जखन--मेघ पड़ै छै, बुन्न झरै छै तँ आरसी प्रसाद सिंहक ‘मन मोर’ नाच’ लगै छनि आ कोनो प्रियाक कजराएल दृगसँ नोर खसैत बुझाइ छनि, मुदा यात्रीकें जखनहि-- गरजल इन्द्रक हाथीèछाड़ि नचारी गाबए लगला गिरहथ लोकनि मलारप्रमुदित दूबिक सीर-सीरèअछि पुलकित कूशक पेंपी...। अही बीच ब्रजकिशोर‘मणिपद्म’, गोविन्द झा, रामकृष्ण झा ‘किसुन’, चन्द्रनाथ मिश्र ‘अमर’ आदि लोकनि प्राणपणसँ लेखनमे जुटलाह। स्वातन्त्र्योत्तर कालक असन्तोष मुदा किनकहु रास नइँ अएलनि। चन्द्रनाथ मिश्र ‘अमर’, गाँधीजीकें उलहन देबए लगलाह--देखहक हौ गाँधी बाबा तोरो स्वराजमेè...धरती से बाँझ पड़ल बनि परतीèकरती बहुआसिन की चुलहा जरा क’नेना करै’ छनि खाँहि-खाँहि हौ!... ओम्हर रामकृष्ण झा ‘किसुन’ बाँझी लागल वृद्ध जर्जर गाछक उखड़ि गेने आश्वस्त होअए लगलाह। कह’क चाही जे वैद्यनाथ मिश्र ‘यात्री’क चित्रा(1949) आ राजकमल चौधरीकस्वरगन्धा(1959)क बीच रामकृष्ण झा ‘किसुन’ मैथिलीक जबर्दस्त सूत्र रूपमे काएम रहलाह। अगिला पीढ़ीक नायक कवि राजकमल चौधरी भेलाह। एतए धरि अबैत-अबैत मैथिली सकारात्मक रूपसँ बेस मुँहजोर भ’ गेल। जे कहबाक छलै, ताहिमे कोनो धरी-धोखा नइँ । स्वरगन्धाक प्रकाशनसँ पूर्वक मैथिली कविताक विकास-क्रममे आन भाषा जकाँ कोनो टोप-टहंकारसँ घोषणा अथवा दलबन्दी आदि नइँ भेल। मुदा ई बिसरबाक नइँ  थिक जे किरण, भुवन, मधुप, यात्रीक प्रयासें बनल अइ मन्दिरमे भकरार इजोतक टेमी राजकमल चौधरीए लेसलनि। पछाति मायानन्द मिश्रक कविता संग्रह ‘दिशान्तर’क कविता आ ओकर भूमिकासँ, आ फेर राजकमल चौधरीक निबन्ध ‘हमरा लोकनिक युग आ आधुनिक मैथिली कविता’सँ बात आओर फरीछ भेल। सन् 1949सँ सन् 1959 धरि; आ तकर बाद फेर आइ धरिक युगान्तकारी मैथिली साहित्य तकर उदाहरण थिक। एहि अन्तरालक समस्त ऊर्जावान रचनाकार लोकनि अपना-अपना समयक मैथिल नागरिक(स्‍त्री-पुरुष, सवर्ण-अवर्ण,हिन्दू-मुसलमान, शिक्षित-अशिक्षित, पालक-पालित, चाकर-स्वामी, दाता-याचक, भुक्त-भोगी...)कें अपना-अपना पक्ष लेल अर्थ-तन्‍त्र, समाज-व्यवस्थाक व्यूह आ पारम्परिक सम्बन्धक दुर्गसँ टकराइत देखलनि अछि; आ तकरा अंकित केलनि अछि। मोटे कहल जएबाक चाही जे सन् 1931सँ 1959 धरिक समय मैथिलीमे पुनर्जागरणक समय थिक, अही अवधिमे उद्भूत चेतना, समय आ सुविधा पाबि कर्त्ता-धर्त्ता लोकनिक विवेक आ कौशलकें उर्ध्‍वोन्मुखी केलकनि; आ तकरे परिणाम आगू धरिक साहित्यमे परिलक्षित भेल। व्यवस्थाक विरोध करैत, स्थापित काव्यधारासँ पृथक बाट धरैत आगू बढ़बाक उद्यम सब कालक नवोन्मेषमे देखल गेल अछि। अही नवोन्मेषमे विलाप,निस्सहाय, अशक्य अवस्थाक चित्रण छोड़ि रचनाकार लोकनि जनशक्तिक जागृतिक प्रति आस्था व्यक्त केलनि। घोषणा भेल जे--अहिल्याक डरें गौतम ऋषि कँपै छथि थरथरआब नइँ मुनि शापें हेतीह ओ पाथर(राजकमल चौधरी); फूटल घैलक खपटा जकाँ हम अपन अतीतकें इतिहासक गलीमे फेकि आएल छी(मायानन्द मिश्र); चेतना रहल ताकए हमर माथमे घी-दूध नहिओ जुटओèमुदा दालि रोटी के छीनत?(धीरेन्द्र)...सन्1960क बाद देखल गेल जे ई प्रवंचना बढ़ले जा रहल अछि, स्थापित विचार-व्यवस्थाक प्रति विमुखता, व्यवस्थाक निरर्थकता आ व्यर्थताबोध, एसगरमे भीड़ आ भीड़मे एसगर हेबाक जटिल प्रक्रिया, निषेध-नकारक भाव...असीम छल। नव मोहावरा, नव शब्दावाली, जीवन-व्यवस्थाक विविध गतिविधिक नव बिम्ब, जनोन्मुख भाषा विधान, प्रहारोन्मुख ध्वनि,आत्मालोचन धरिमे निर्ममता आदि...अइ कालक रचनाक मुख्य प्रवृत्ति बनल। रचनाकार लोकनिकें विशिष्ट कहएबाक अपन महत्वाकांक्षा केर दाह संस्कार करब उचित(कीर्तिनारायण मिश्र) बुझेलनि; जिनगीक उत्ताप आ मनुष्यक शाश्वतता पर प्रश्न उठेनिहार पर अँगुरी उठेलनि--जिनगीक आगिमेèमृत्यु जरि गेलèके कहलक जे मनुक्ख मरि गेल?(रामकृष्ण झा ‘किसुन’)। घोषणा केलनि जे हम अपन सपना तोड़ि लेलèआब हम ओकर सपना देखए लगलहुँ जे हमरा लेल खेतमे भातक गाछ रोपैत अछि(मायानन्द मिश्र); कहलनि जे इच्छुक छी काल्हि प्रात छीन ली टीन किरासिन दीप बुतबए आओत जे, तै मशालचीसँ(सोमदेव)। अर्थात सन् 1960क पश्चात, पीढ़ीसँ पीढ़ीमे अपन गुण-सूत्र पसारैत मैथिली साहित्य अद्यतन भेल। नक्सलबाड़ी आ तेलंगानामे भेल किसानक जागृतिसँ जे कृषक क्रान्ति भेल, तकर असर भारतक सब भाषाक साहित्य पर पड़ल; नगरोन्मुखक साहित्य ग्रामोन्मुख भ’ गेल; कृषक चेतना पसरि गेल; मैथिलीमे सेहो एकर प्रभाव स्पष्ट हेबाक चाही छल। सातम आ आठम दशकमे क्रियाशील समस्त न’ब आ पुरान पीढ़ीक रचनाकर अपन विषय-बोध आ रचना-कौशलक परिचय देलनि। अपन पूववर्ती पीढ़ीक रचनात्मकतासँ प्रेरणा लैत अइ अन्तरालक रचनाकार लोकनि अइ समस्त दायित्वक संग आगू बढ़लाह। सन् 1966क बिहार, उड़ीसाक दुर्भिक्ष, सन् 1967क चुनावक पश्चातक सम्विद सरकारक गठन, आ सन् 1967क नक्सलबाड़ी आन्दोलनक सफलतासँ भारतक समस्त भाषाक सृजनकर्मीक संग-संग मैथिलीक जाग्रत चेतनाक रचनाकार लोकनि चौंचक भेलाह। सन् 1947सँ 1977 धरिक तीन दशक भारतीय नागरिक लेल छल-प्रपंच, दमन-उत्पीड़न, अभाव-कुभावे टाक नइँ ; अनिश्चय,दिशाहीनता, विचार शून्यता, संशय, पाखण्ड, अराजकता, दानवतासँ सेहो भरल रहल। स्वार्थपूर्ति हेतु देशक विवेकहीन नागरिक, दुनियाँ भरिक दुर्वृत्तिमे फँसैत गेल, प्रभुत्व जुटएबा लेल समस्त शील-सभ्यता, मानवता बिसरैत गेल। बिसरबाक एहि क्रममे लोक इहो बिसरि गेल जे प्रभुत्वक पहिल आ अन्तिम पहचान सभ्यता थिक, मानवता थिक। राजनीतिक-सामाजिक चेतना एतए सूक्ष्मसँ सूक्ष्मतर होअए लागल। बारम्बार पड़ोसी राष्ट्रक संग सीमा-संघर्ष, पार्टी विभाजन भेल, राजनीतिक मतभिन्नता, आपातकालक घोषणा भेल, राजनीतिक पतन, अपराध, आ आपराधिक राजनीतिक शृंखला, मन्दिर मस्जिद विवाद, लूट-पाट, हत्या,राहजनी, अपरहण, बूथ कैप्चरिंग, घपला, घोटाला, साम्प्रदायिक दंगा आ जातीय द्रोह...सबटा अही अवधिक उपज थिक। ई समस्त दुर्वृत्ति रिले रेशक करतब जकाँ बढै़त रहल। आम चुनाव, मध्यावधि चुनावक शृंखलासँ देश पर अपव्ययक बोझ लादैत गेल। अकाल, दुर्भिक्ष,बाढ़ि, सुखाड़, भूकम्प, अतिवृष्टि, अनावृष्टि आदि-आदि प्राकृतिक आपदा सबसँ तँ समाज तबाह छलहे, मनुष्य द्वारा सृजित तबाही लोककें आओर त्रस्त क’ देलक। विज्ञानक विनाश आ विध्वंसकारी परिणति सेहो कम उत्पाती साबित नइँ  भेल। अन्तर्राष्ट्रीय फलक पर आर्थिक उदारीकरण भेल। विश्वग्रामक अवधारणा बढ़ल। बहुराष्ट्रीय कम्पनीक आगमन आ नव शिक्षा नीतिक कारणें व्ययसाध्य रोजगारोन्मुख डिग्री-डिप्लोमा शुरुह भेल, शिक्षाक परिदृश्य बदलि गेल। अन्तर्राष्ट्रीय चिन्तन फलकसँ सम्पर्क भेने साहित्यिक क्षेत्रमे नव-नव विचार पद्धतिक प्रवेश भेल। साहित्यालोचनक उपस्कर समाज-व्यवस्था भ’ गेल। जीवन-क्रम आधुनिकसँ उत्तर आधुनिक भ’ गेल। भारतीय साहित्यमे दलित प्रश्न, स्‍त्री-विमर्श, उत्तर उपनिवेशवाद, वंशवादक विरोध आदि विचार-बिन्दु प्रमुख भ’ गेल। जे विभूति आनन्द ‘चूल्हि महक छाउरसँचिनगी बीछि रहल’ माइकें देखि प्रमुदित’ होइ छलाह, से ‘आस्ते-आस्ते गाममे पक्की सड़क’ अबैत देखि प्रसन्न भेलाह, तहिआ नइँ  बूझि सकल छलाह जे ‘एक दिन एही सड़क द’ क’èहमर अपन गामसँ गाम भागि जाएत ल’ जाएत भगा क’ हमरो...।’तारानन्द वियोगीकें अनुभव भेलनि जे ‘अहीं ठीक कहै छी बाबा, अन्यायक विरुद्ध लड़बाक उमेर कहिओ नइँ बीतै छै...’ मैथिलीमे सातम आ आठम दशकक रचनात्मक उद्यमकें हम अही अभिप्रेरणा आ दायित्वक नजरिसं देखै छी। 3.         सतरि के दशक मध्य मैथिलीमे समाजवादी अवधारणा मूड़ी उठेबाक प्रयास केलक ओकर की स्थिति रहलै, अहाँ सब ओइसँ कतेक प्रभावित-अप्रभावित रहलौं? जेना कि पछिला प्रश्नक उत्तरमे कहलहुँ, कोनहुँ भाषाक साहित्यमे कतबो क्रान्तिधर्मी पीढ़ी आबि जाथु, हुनका अपन पूर्ववर्ती द्वारा कएल-धएल महत्त्वपूर्ण काजक सम्मान करबाक चाहिअनि। परम्परासँ विछिन्न भ’ कए कोनहुँ टा प्रगति व्यवस्थित नइँ होइत अछि। तें हम मानै छी, जे हमरा पीढ़ी द्वारा साहित्यमे जते काज भ’ रहल अछि, ओ पूर्ववर्ती द्वारा कएल गेल महत्त्वपूर्ण काजक विकास-सूत्र थिक। ई पीढ़ी अपन पूर्ववर्तीक तुलनामे जे किछु बेहतर क’ सकल अछि, ताहिमे अइ पीढीक ऊर्जा, प्रतिभा आ रचनात्मकताक संग-संग पूर्ववर्ती पीढ़ीक महत्त्वपूर्ण काजक प्रेरणा आ समय-चक्रक अवदानक महत्त्वपूर्ण भूमिका अछि। हमर अइ धारणासँ सब गोटए सहमत होथु, से कोनहुना आवश्यक नइँ। हम व्यक्तिगत रूपें अपन पूर्ववर्तिए टा नइँ, कतोक बेर अपन समवर्ती आ अनुज पीढ़ीसँ से सेहो प्रेरणा ल’ लै छी। हमर ई दृढ़ मान्यता अछि जे दुनियाक स’बो टा काज हम नइँ क’ सकै छी। खाहे समयक अभावमे, खाहे प्रतिभा आ ऊर्जाक अभावमे। तें कोनो बिन्‍दु पर जँ व्‍यक्ति कोनो महत्त्वपूर्ण काज क' रहलाह अछि, तँ हुनकर सराहना कएल जएबाक चाही। थुक्‍कम-फजहतिमे लागल रहब अपन प्रतिभा आ ऊर्जा दुनूक अपमान थिक। 4.         अहाँ सभक प्रारम्भिक कालमे जुड़ल साहित्यिक मित्र-मण्डलीकें एकटा विशेष समूहबाजी लेल जानल जाइत अछि। किछु गोटए द्वारा ओतबे गोटएक बीच चर्चा परिचर्चा वा सब उकस-पाकस (साहित्यिक) केन्द्रित रहल। किएक? अइ ‘समूहबाजी’क उत्खनन के केलनि, हमरा से नइँ बूझल अछि। समूहबाजीमे के-के लागल छथि, सेहो हमर चिन्ताक विषय नइँ थिक। हम किनकर समूहमे छिअनि, से हमरा ज्ञात नइँ अछि। एतबा जनै छी जे मैथिली साहित्यक वयोवृद्ध रचनाकार पं. गोविन्द झा, पं. चन्द्रनाथ मिश्र ‘अमर’ सँ ल’ कए अजित आजाद, कामिनी, धीरेन्द्र प्रेमर्षि धरिक पीढ़ीक एकटा समूह अछि, हमहूँ ओकर एकटा सदस्य छी। हमर आलोचनात्मक निबन्ध सब पर जँ अहाँक नजरि पड़ल हो, तँ अहाँ अनुभव क’ सकल होएब जे कोनो बाबिएँ हमरा समूहबाजी पसिन नइँ अछि। व्यक्तिक रूपमे किओ फुटली नजरि नइँ सोहाइ छथि, निजी तौर पर हमरा अपूरणीय क्षति दुख पहुँचौने छथि,तथापि साहित्यमे हम से मोन नइँ पाड़ै छी। साहित्यमे हुनकर योगदानकें ईमानदारीसँ अंकित करै छी। अपराधीकें माफ क’ देब हम अशक्यता नइँ मानै छी। अइ माफी लेल नमहर कलेजा चाही। माफी देलासँ शत्रुता आ प्रतिशोधक भावना समाप्त होइ छै। प्रतिशोधक भावनासँ काज करब साहित्‍यकारक नइँ, डकैतक काज होइत अछि। डकैत आ अपराधी स्‍वभावक साहित्यिक जीवकें माफ करब, आ गुटबाजी द्वारा साहित्यमे दाखिल-खारिज करबाक धन्धाक विरोध करब हमर मूल स्वभाव थिक। प्रायः इहो कारण हो, जे परोक्षमे अहाँकें हमर प्रशंसा केनिहार लोक नइँ भेटताह। कोनो खास समूहक करतूत पर किछु पूछए चाहै छी, तँ साफ-साफ पूछू। सत्य कहबामे हमरा कोनो दुविधा नइँ होइ'ए। साहित्य हमरा लेल सुविधा जुटेबाक साधन नइँ थिक। आत्‍मस्‍थापन आ उपलब्‍धि‍क माध्‍यम नइँ थि‍क। तें हमरा किनकहु भय नइँ होइत अछि। 5.         अहाँक पीढ़ीक रचनाकारक मध्य अपनाकें देखार करबा लेल पछिला वा स्थापित रचनाकारकें धकिएबाक वा गरिएबाक(साहित्यिके भाषाक माध्यमे) प्रवृत्ति जगजियार भेल रहै। तकर की उद्देश्य छलै? आ तै माध्यमे कते गोटए सफल भ’ सकलाह? ई आँकड़ा तँ हमरा नइँ बूझल अछि‍ मुन्नाजी, जे के कते सफल भेलाह? के कि‍नका कते धकि‍याबै छनि‍, मैथि‍लीमे इहो नेर्धारि‍त करब बहुत कठि‍न अछि‍। अइ शोध-कार्यसँ हम एख धरि‍ बचैत रहलहुँ अछि‍। जि‍नका ई काज पि‍यरगर लगै छनि‍, से करथु।... दोसर प्रश्नक-उत्तरमे हम स्पष्ट केने छी, जे हमर गनती जाहि पीढ़ीमे होइत अछि, तै मे हमर प्रवेश बहुत बादमे भेल। ता धरि अइ पीढ़ीक करीब-करीब रचनाकार अपन परिचय बना चुकल छलाह। ओहि काल फणीश्वरनाथ रेणुक धारणासँ हम सहमत भेल रही जे साहित्य मनुष्यकें सामाजिक बनबैत अछि, आ समाजकें मानवीय। मुदा क्रमे-क्रमे से धारणा भंग होअए लागल। लक्षण-गन्थ आ आलोचनात्मक पोथी आ आन साहित्यिक कृति पढ़ि कए साहित्य सृजनक उद्देश्य-अभिप्राय पर एक सँ एक वाक्य देखी, आ एम्हर मैथिलीक रचनाकार लोकनिक चर्या देखी, मोन घोर होइत रहए। क’ किछु नइँ पाबी, से तामसें अपनहिमे जरैत रही। अपना तुर’क अधिकांश रचनाधर्मी आ किछु वरिष्ठ लेखक लोकनिक बीच ‘साहित्य अकादेमीमे मैथिली’ प्रकरण पर चर्चा सुनि-सुनि दंग रहैत रही। मुदा सबटा चर्चा मुखविलासे टा होइत छल। देखार भ’ कए सोझाँ अएबाक चेष्टा वा साहस किओ नइँ करथि। सन् 1993मे जखन ‘हंस’ पत्रिकामे ओहि प्रसंग पर हम विरोध दर्ज केलहुँ, त’हरबिरड़ो मचि गेल। हमरासँ कनिष्ठ पीढ़ीक नवगछुली सब हमर प्रशंसक बनि गेल,समवयस्की लोकनि पंचैती करए लगलाह, आ वरिष्ठ लोकनि विरोध। ओएह हमरा जीवनक एहेन घटना थिक, जे हमरा नजरिमे मैथिलीक समस्त रचनाकारक चरित्र स्पष्ट क’ देलक। वस्तुतः हम ओ काज केने रही व्यवस्था-परिवर्तन लेल, मुदा ओकर उपयोग मैथिलीक अग्रमुखी रचनाकार लोकनि अपन लाभ-लोभ लेल करए लगलाह। हमरा हुड़बा बना कए अपन काज सुतारए लगलाह। ओही दिन हम अपनाकें हुनका लोकनिक ओहि आचरणसँ काटि कए अलग करैत ई विचार केलहुँ जे विरोधमे जिआन कर’ बला ऊर्जाकें बचा कए विकासमे लगाबी, तँ सकारात्मक परिणाम सोझाँ आओत। आनक बात हम नइँ कहब, मुदा अपना मादे जनै छी, जे आइ धरि हम किनकहु चरित्र हनन नइँ केलिअनि अछि। किनकहु अधलाह लेखनक प्रशंसा, आ नीक लेखनक निन्दा नइँ केलहुँ अछि। कोनो उदाहरण होअए तँ साफ-साफ कहू। अपन समस्त नेतकें सबसँ पहिने हम अपना नजरिमे ठाढ़ क’ कए आ आनक काज बूझि कए निर्णय करबाक अभ्यासी छी। अपन पूर्ववर्ती पीढ़ीक समर्थ रचनाकारक अवहेलना आइ धरि कोनो समझदार व्यक्ति नइँ केलनि अछि। व्यक्ति-निन्दा आ रचनात्मक मूल्यांकन अलग-अलग बात थिक। महान भक्त कवि रसखान शुरुह-शुरुहमे परम लम्पट छलाह, महाकवि तुलसीदास घनघोर विषयी छलाह, कालिदासक कथा बूझले अछि...जँ हुनका लोकनिक जीवनक अइ प्रसंग पर चर्चा करी, तँ एकर की अर्थ निकालब, जे हुनकर रचना निंहेस थिक? 6.         अहाँ द्वारा एन.बी.टी.क माध्यमे मैथिली भाषा साहित्य लेल बहुत रास निस्सन काज भेलै। मुदा किछु लोक आरोपित करैत रहलाह जे सब काज अहाँ सबहक साहित्य-मित्र मण्डली मध्य घुरियाइत रहल। की सत्य छै एकर? मुन्नाजी, एन.बी.टी.ए टा नइँ प्रकाशन विभाग(भारत सरकार), आ सी.आई.आई.एल, मैसूरमे सेहो मैथिलीक नेंओं हमरे राखल थिक। मैथिल लोकनिक ई सबसँ पैघ समस्या थिक जे सामान्य स्थितिमे नइँ रहताह, अहाँ जिनका लेल हितकारी साबित भेलिअनि से अहाँकें पाग बना लेताह, जिनका लेल नइँ, से पनही। एन.बी.टी.मे अपन सेवाकालमे मैथिलीक चारि गोट पोथी हम प्रकाशित करौलहुँ, चारूक हिन्दी अनुवाद सेहो प्रकाशित अछि। मैथिलीक एकहु टा सम्मानित आ प्रतिभावान नव-पुरान रचनाकार ई नइँ कहि सकताह जे हुनका एन.बी.टी.क राष्ट्रीय मंचसँ आमन्त्रण नइँ देल गेलनि। सोलह बर्ख हम एन.बी.टी.मे हिन्दी लेल काज केलहुँ, हिन्दीक दिग्गज लोकनि आइयो हमर कएल-धएलकें रखांकित करै छथि‍, ओहू समयमे करै छलाह। मैथिलीक रचनाकार लोकनि लेल तीन बर्खमे जे किछु केलहुँ तकर घिर्ता-घिन्न अहाँ देखि चुकल छी। मैथिलकें अइ बातक प्रसन्नता नइँ भेलनि जे मैथिलीमे ई काज भेल,से देवशंकर नवीनक उद्यमक बिना सम्भव नइँ छल। देवशंकर नवीनकें किछु आओर काज करबा लेल सहयोग करिअनि। ओ लोकनि ई देखए लगलाह जे अइ काजसँ व्यक्तिगत रूपें हमरा कोनो लाभ कहाँ भेल? एते धरि जे किछु लाभन्वित व्यक्ति सेहो ओहि दुष्कर्ममे लिप्त भ’ गेलाह। हुनका लोकनिकें प्रायः ई बोधगम्य नइँ भेलनि, जे ओ लोकनि जे किछु प्राप्त क'सकलाह, से हुनकर अधिकार नइँ छलनि, हमर प्रयासक परिणाम छल। ओएह एन.बी.टी. तँ पहि‍नहुँ छल, कए टा मैथि‍ल लेखक चौकठि‍ नाँघि‍ सकल छलाह? दोसर बात जे हमरा रहैत मैथिलीक एकहुटा प्रस्ताव एन.बी.टी.मे आएल हो, तकर कोनो उदाहरण अहाँकें नइँ भेटत। जे किछु भेल, से हमरहि प्रस्ताव छल, सक्षम अधिकारीक स्वीकृति पर काज पूर्ण भेल। ओ नइँ केने रहितहुँ तँ हमर दरमाहा घटा नइँ देल जइतइ आ ओहि काजक संगोरमे जतबा समय लगौलहुँ, आ गारि-गज्जन सुनि कए जतबा व्यथित भेलहुँ, ताहिमे थोड़ेक अपन मौलिक काज क’ सकै छलहुँ। मुदा...ओना एकटा जानकारी अहाँकें द’ दी जे एन.बी.टी.मे हमर काजक निन्दा ओएह लोकनि क’ रहलाह अछि, जे अपनाकें बड़े भारी लेखक बुझै छथि, मुदा हम हुनका मनोनुकूल स्थान नइँ देलिअनि। हमर धारणा अछि जे हम कोनो विधाता तँ छी नइँ,हमर निर्णयसँ कोनो व्‍यक्‍ति‍ किऐ एते तिलमिलाइ छथि‍? दुनियामे एते रास विद्वान छथि, जँ कि‍नकहुमे प्रतिभा छनि‍, तँ कि‍ओ ने कि‍ओ मान्यता देबे करतनि‍! दोसर बात जे जाहि चारि टा पोथीक प्रकाशन एन.बी.टी. द्वारा भेल तकर सम्पादक तँ चारिए गोटए भ’ सकै छलाह! अइ चारिमे एक त’ हम स्वयं छी, शेष तीन गोटएक स्थान पर कोनो दोसर तीन गोटएक नाम राखि कए देखू, तँ की सब सन्तुष्ट भ’जेताह? अहाँकें उदाहरण दी, जे एन.बी.टी. द्वारा डोगरीमे जखन एकटा किताब छापल गेल, तँ महाराजा कर्ण सिंह मंच पर आबि कए कहलखिन जे ‘एन.बी.टी. के अध्यक्ष, निदेशक, सम्पादकों का मैं सम्पूर्ण डोगरा समाज की ओर से आभारी हूँ कि उन्होंने हमारी मातृभाषा को यह सम्मान दिया है।’ मैथिलीक लोककें सबटा चीज अपनहि नामे चाहिअनि। सब ठाम रहए चाहताह, प्रतिभा कथूक नइँ। भ’ सकए तँ पता लगा लिअ’ दिसम्बर 2010मे सी.आई.आई.एल.मैसूर, द्वारा अनुवाद पर पटनामे एकटा आयोजन भेल छल, ओहिमे अधिकांश आमन्‍त्रि‍त विद्वान(?) लोकनि अपन कोन प्रतिभाक प्रदर्शन हेतु आएल छलाह, आ की बाजि-भूकि कए गेलाह, से हुनका स्वयं नइँ बूझल हेतनि। एन.बी.टी.क काजक प्रसंग हमरा पर जे आरोप लगबै छथि, हुनकासँ तीन टा प्रश्न पूछल जाए, जकर उत्तर ओ ईमानदारी सँ दैथ— अइ आरोपक संग अहाँ कोनो स्वार्थसँ तँ प्रेरित नइँ छी? अइ काज लेल नियोजित व्यक्तिकें अहाँ अपना तुलनामे अयोग्य बुझै छी? अहाँक योग्यतासम्मत कोनो प्रस्ताव कहियो एन.बी.टी. द्वारा निरस्त कएल गेल अछि? अइ तीनू प्रश्नक जवाब सम्पूर्ण परिदृश्यकें सोझरा देत।...बात बहुत भ’ सकैत अछि। मैथिल सभाक कोनो नागरिक मंच हो तँ बैसाउ, हम सब बातक खोंइचा छोड़ा देब। ओना के जानत? इएह जे जवाब द’ रहल छी, तकर की परिणाम हएत? कते गोटए पढ़त? अहाँ सन-सन दस गोटए पढ़ि कए बूझि लेताह! से अहाँ लोकनि ओहुना पि‍हनि‍हसँ बुझिते छी! मैथिलीक कए गोटए सकारात्मक दृष्टिएँ कोनो बात पढ़ै छथि? 7.         अहाँ हिन्दी आ मैथिली दुनू भाषामे समान रूपें सृजनरत रहलौं अछि। दुनूक अपन स्वतन्‍त्र  अस्तित्व छै। ककर केहेन अस्तित्व छै? दुनूमे की समानता-भिन्नता देखाइछ? मुन्नाजी, हिन्दीसँ पहिने हम मैथिलीएमे एम.ए., पी.एच-डी.क’ कए बहुत दिन धरि रोजगारक बाट तकैत रहलहुँ। मुदा हिन्दीमे रोजगार भेटल। आत्मस्थापन, अन्न-वस्त्र-आवास-सुविधा-पहचान हिन्दी देलक। मिथिलांचलसँ उपटि गए जखन दिल्ली प्रवास करए लगलौं, ताहिसँ पहिने शुद्ध रूपें मैथिलीएमे लिखैत रही। कहियो कियो एकटा पोस्टकार्डो नइँ लिखलनि।‘स्वान्तः सुखाय’क अपन महत्त्‍व भने होउ भाइ, मुदा जीवन जीबा लेल त’ पाइ चाही। सन्1991-93 धरिक हमर संघर्षमय जीवन हिन्दीमे लेखन, हिन्दीमे अनुवाद, आ दसमसँ बारहम  कक्षाक छात्र-छात्रा लोकनिकें फिजिक्स, कैमेस्ट्री, मैथमैटिक्स पढ़ा कए चलै छल। ओही दौरान एन.बी.टी.मे हिन्दीमे सम्पादनक कार्य हेतु नोकरी भेटि गेल। तकरा अछैत सन्1996मे मैथिलीक अध्यापक बनबा लेल इण्टरव्यू देबए पटना गेल रही; उनटे पैर वापस एलहुँ। मजबूरीमे जीवन-बसर हेतु हिन्दीमे लेखन आ अनुवाद काज शुरुह केने रही, आब ओएह मजबूरी भ’ गेल। बहुत रास सम्पादक लोकनि मित्र भ’ गेलाह अछि। दबाव दैत रहै छथि। सम्बन्ध-रक्षा हेतु लिखए पडै़ए। मोनो लगैए। हिन्दीमे आइ धरि जते चीज छपल अछि, सैकड़ो फोन आ दर्जनो पत्रसँ प्रशंसा होइत अछि, नीक लगैए। मुदा तैयो मातृभाषा तँ मैथिलीए थिक। साहित्यमे प्रवेश तँ ओही बाटए भेल अछि। पहचान मैथिलीएक रचनाकारक रूपमे अछि। सएह रहैयो चाहै छी। हम अपन परिसीमा एतबा अवश्य जनै छी जे जँ कोनो दिन किछु महत्त्‍वपूर्ण लिखि सकलहुँ, तँ से मैथिलीएमे लीखि सकब, कारण, मैथिली हमर मातृभाषा थिक, आ मातृभाषामे कएल काज निर्विवाद रूपें बेहतर होइत अछि। माइकेल मधुसूदन दत्त सेहो चारू दिससँ बौआ कए मातृभाषामे घुरि आएल छलाह। सत्य थिक जे मैथिली हमर मातृभाषा थिक, आ हिन्दी हमर राष्ट्रभाषा। दू मेसँ ककरहु मूल्य पर हम ककरहु प्रति अभद्र कथा नइँ सुनए चाहै छी। हमरा जीवनमे दुनू वरेण्‍य अछि‍, पूजनीय अछि‍। 8.         बहुत रास मैथिलीक रचनाकार हिन्दीमे लेखन क’ कए अपन अस्तित्व तकै छथि, असफल भ’ मैथिली दिस उन्मुख होइ छथि आ मैथिली रचनाकार मध्य अपनाकें पण्डित हेबाक स्वांग रचै छथि। एना किएक? एहेन काज के करै छथि, से हम नइँ जनै छी। हम स्वीकार करै छी जे हम मैथिलीमे लिखै छी। लोक हमरा मैथिलीक लेखक मानै छथि कि नइँ, से लोक जनैत हेताह। लोक मानि-मोजर देताह त’ लेखक कहाएब, अन्यथा अइ आत्मसुखक संग मरि जाएब जे जाहि काल जे नीक लागल, से केलहुँ! हि‍न्‍दीमे रीति‍‍-कालक प्रसि‍द्ध कवि‍ भि‍खारीदासक पद अछि‍--'आगे के सुकवि‍ रीझि‍हैं तो कवि‍ताई, नाही तो राधा कन्‍हाई के सुमि‍रन को बहानो हैं।'एतबा तय अछि रचनाकारक कोनो भाषा नइँ होइत अछि। भाषा तँ अनुवाद क’ कए बदलल जा सकैत अछि, विचार नइँ बदलल जा सकैत अछि। मैथिली कविता पर, कथा पर, आ नाटक पर हिन्दीमे जखन लेख लिखने रही, आ ओहि पर तमिल, तेलुगु, पंजाबी भाषाक लोक अपन-अपन विचार व्यक्त करए लगलाह, तँ प्रसन्नता भेल। आ हम सोचलहुँ जे ई काज हम मैथिली लेल केने छी। कविताबला लेख तँ हू-ब-हू पंजाबीमे केओ अनुवादो केने छलाह।... पाँच टा हिन्दी अंग्रेजीक पोथी पढ़ि कए जँ किओ मैथिलीक रचनाकार मध्य पण्डित कहबए चल जाइ छथि, तँ हुनका अपन ज्ञान-लोकक इलाज करेबाक चाहिअनि। कोनो रचनाकार भाषाक करणें नइँ, अपन रचनाक गुणवत्ताक कारणें पूजल जाइ छथि। कन्नड़ जानने बिना अहाँ यू.आर.अनन्तमूर्तिकें जनै छिअनि, रूसी भाषा जनने बिना अहाँ अन्तोन चेखब,दोस्तोयवस्कीकें जनै छिअनि! किऐ जनै छिअनि?...भाषाक कारणें नइँ। विविध भारतीय भाषा, आ विदेशी भाषामे जतेक अनुवादक मि‍त्र हमर छथि, हम एक रती सुगबुगा उठी, तँ हुनकर सहयोगसँ दुनियाक पचासो भाषामे हमर समस्त रचनाक अनुवाद छपि जाएत। मुदा ताहिसँ हम महत्त्वपूर्ण रचनाकार भ’ जाएब? जे किओ एहेन किरदानी करै छथि, हुनका करए दिअनु, साओन मासमे तँ इनार लग’क नालियो भरि जाइत अछि! समय हुनकर न्याय क’देतनि। 9.         मैथिलीक किछु रचनाकार एके विषय पर एके रचनाकें हिन्दी-मैथिली दुनू भाषामे प्रकाशित करा क’ दुनू भाषामे ओइ रचनाकें ओहि भाषाक मूल रचना कहबाक गौरवक भान करैत छथि। एकरा अहाँ कोन रूपें देखै छी? ई कते उचित वा अनुचित थिक? हमरा जनैत अइ काजमे लेखक आ विवेचक--दुनू गोटएकें विवेक आ मर्यादासँ काज लेबाक चाहिअनि। लेखक जँ हू-ब-हू अपन रचना दोसर भाषामे छपबै छथि, तँ उनका पहिल प्रकाशनक भाषासँ अनूदित हेबाक उल्लेख करबाक चाहिअनि। ई लेखकीय विवेक तँ स’ब रचनाकारमे हेबाक चाहिअनि। मुदा जँ ओही विषय पर दोसर भाषामे ओ पुनर्सृजन थिक, तँ विवेचक लोकनिकें सेहो हंगामासँ बचबाक चाहिअनि। कोनो रचनाक विषये टा महत्त्वपूर्ण नइँ होइत अछि, सब भाषामे ओइ विषयकें उपस्थापित करबाक शिल्प आ वातावरण अलग होइत अछि। द्विभाषी रचनाकारक किछु खास समस्या अवश्य होइत अछि, मुदा तकर अतिरिक्त छूट लेखककें नइँ लेबाक चाहिअनि। विवेचक सेहो थोड़ेक धैर्यवान होथु। हम ओना एहन काज नइँ करै छी।... एकटा महत्त्‍वपूर्ण बात दिश अहूँके विचार करबाक नोत दै छी। रचना-कर्मक कोनो भाषा पहिनेसँ बेराएल नइँ होइ छै। मनुष्यक जीवनमे भाषा, अभिव्यक्तिक साधन मात्र नइँ थिक। जनपदीय संस्कृतिक सरणि आ मनुष्यक सोचबा-बुझबाक साधन सेहो थि‍क। मैथिलीमे जखन अहाँ ‘मातृका-पूजा’ कहै छिऐ, तँ की ओ एकटा शब्द मात्र होइत अछि? अहाँ जखन सोचै छी जे हमरा चिट्ठी लिखबाक अछि, तँ से सोचब कोनो भाषाक बिना सम्भव अछि? तें हमरा लोकनिकें इहो सोच’क चाही जे रचबा काल कोनो रचनाकारक समक्ष जनपदीय जनजीवनक कोनो घटने टा नइँ रहै छनि। आम नागरिकक जीवन-यापन, रीति-रिवाज, सोच-समझ, आहार-व्यवहार, व्यवस्था-संस्कृतिकें अंकित करबाक दायित्व सेहो रहै छनि। स’ब भाषाक अपन निजी वातावरण, आ संस्कार होइत अछि! शीतला माइक कोप, कोशी महरानीक प्रकोप, परशुरामजीक क्रोध, आ भीखन साहुक तामसमे की अन्तर होइत अछि,आजुक रचनाकर्मी नइँ सोचै छथि। अइ समझदारीक संग रचनारत द्विभाषी अथवा बहुभाषी रचनाकार वस्तुतः पशोपेशमे रहै छथि, जे रचना कोन भाषामे करथि? जिनकर रचनाकर्म एतबा सुविचारित नइँ रहै छनि, तिनका लेल चिन्तित हएबाक की प्रयोजन? 10.       मैथिली-भोजपुरी अकादेमीक आयोजनमे मैथिलीकें गरोसि लेल जाइए। एहेनामे भोजपुरीक न’ब उठल बिहारि द्वारा स्थापित भाषा मैथिलीकें उधिया जेबाक सम्भावना त’ नइँ बनि रहल अछि? अइ पर अहाँ सभक समूह अपन कोनो सक्रियता नइँ देखा रहल छथि। की भविष्य हेतै एकर? मुन्नाजी, हमर कोनो समूह नइँ अछि। जाहि दिनमे किछु अपात्र-कुपात्र लोक जहाँ-तहाँ हमरा गरिऔने फिरै छल, एखनहुँ गरिअबै अछि, हमरा विरुद्ध अपमानजनक लेख अमर्यादित भाषामे लिखि कए छपबै छल, आ हमर नियोजक धरि पहुँचबै छल; हमरा पर इन्क्वायरी बैसल, ओ इन्‍क्‍वायरी मैथि‍ली लेल काज करबाक दण्‍ड छल। अन्‍यथा देवशंकर नवीन पर अँगुरी उठएबा काल देवतो-पि‍तरकें सोचए पड़ि‍तनि‍।... ओहू समयमे कोनो व्यक्ति हमरा संगें ठाढ़ नइँ छलाह। जहाँ धरि मैथिली-भोजपुरी अकादेमीक प्रश्न अछि, ओकर शासी निकायक हम प्राथमिक सदस्य मनोनीत कएल गेल रही। अइमे हमर कोनो अपराध नइँ छल, हम अपना दिससँ कोनो टा उद्यम नइँ केने रही। किछु मैथिलीप्रेमी लोकनि अखबारबाजी करए लगलाह जे हम ओतए सचिव बनए चाहै छी। कतेक लज्जास्पद लगैत अछि कहबामे, जे ओहू समयमे हम ओहिसँ अधिक सम्मानित पद पर कार्यरत रही। अकादेमीक बैसकमे जाइत रही, मैथिली भाषा लेल जे अभद्र आचरण होइ छल, तकर विरोध करैत रही। मुदा हमरा कोनो सूचना देने बिना ओकर सदस्यतासँ समयपूर्व मुक्त क’ देल गेल। हम विरोध क’ सकै छलहुँ, मुदा जें कि किछु उत्साही मैथिल अइमे सक्रिय छलाह, हम से काज नइँ केलहुँ। आब ओतए की भ’ रहल अछि, से मैथिलीक ओ उद्धारक लोकनि जानथु। हम त’ मैथिलीमे लिखै छी, लिखैत रहब। मैथिली-भोजपुरी अकादेमीक कोनो कार्यक्रमक सूचना हमरा निमन्‍त्रण-पत्र अथवा फोनादिसँ नइँ, अखबारहिसँ भेटैत अछि। अखबारक सूचना पर दौड़ल जाइ, आ अपना लेल जगह ताकी, तेहेन स्‍वभाव हम वि‍कसि‍त नइँ क' सकल छी। सोन्हिया क’ कतहु बैसबा लेल एक बीत जगह ताकि लेब हमर काम्य नइँ थिक। ‘भोजपुरीक न’ब उठल बिहारि’ पदबन्धक उपयोग अहाँ केने छी। अइसँ अहाँक आवेशक अनुमान होइत अछि। हम अहाँक व्यथाक अनुमान क’ सकै छी, तथापि एकटा निवेदन करै छी, जे एहेन शब्दावलीक प्रयोगसँ बचबाक चाही। उचित लागए तँ अइ सम्वादकें सार्वजनिक करबासँ पूर्व अइ प्रसंगकें सम्पादित क’ लेब। बल्कि ई आक्रोश तँ अहाँकें अपन मैथिल भाइ-बन्धु पर हेबाक चाही, जे आठम अनुसूचीमे जगह पाबि गेलाक बादहु अपन भाषाक गरिमाकें बचा नइँ पाबि रहल छथि‍। भोजपुरीभाषी लोक जँ अपन भाषाक विकास लेल उद्यमशील छथि, अपन लाभ लेल बानर जकाँ लड़ै नइँ छथि, त’ ई हुनकर अपराध थोड़े छिअनि?मैथिलीक लोककें तँ बल्कि प्रेरणा लेबाक चाही जे समृद्ध साहित्यिक विरासतक वंशज भेलाक बावजूद ओ भोजपुरीभाषीक सोझाँ पछलगुआ बनल ठाढ़ छथि। 11.       इग्नूमे बिहारि जकाँ आएल भोजपुरीक स्वतन्‍त्र भाषाक रूपमे पढ़ाइ भ’रहल अछि। मुदा मैथिलीक लेल घोषाणा मात्र भ’ क’ रहि गेल। एकरा लेल किओ सुगबुगेला धरि नइँ? की कारण? मुन्नाजी, हम आब गोनू झाक बिलाड़ि भ’ गेल छी। मैथिलीक भद्र-अभद्र लोक सबसँ तेना ने झड़कि गेल छी, जे कोनो सांस्थानिक काजमे हाथ दैत अबूह लगैत अछि। मैथिलीभाषी हेबाक कारणें हमरा पर टिप्पणी करबाक हक ओहेन-ओहेन लोककें भ’ गेल छनि, जिनकर हैसियत हमर पी.ए., एटेण्डेण्टक बराबरीक नइँ छनि। आर्थिक आ बौद्धिक दुनू तरहें। जखन इग्नू ज्वाइन केलहुँ, तखन हमरा अइ काजक दायित्व-नि‍मन्‍त्रणक संग कहल गेल छल जे मैथिली लेल हम किछु काज करी, मुदा समकुलपतिक सोझाँ हाथ जोड़ि हम माफी माँगि लेलहुँ। ओइ कुण्डमे फेरसँ कथी लए खसि‍तौं। दायि‍त्‍व लेबाक अर्थ छल काज केनाइ, ओइ काजमे मैथि‍लीक कि‍छु वि‍द्वान आ कि‍छु कार्यकर्त्ता लोकनि‍कें काजमे जुटाएब। से जुटान हम अपन पसि‍नसँ करि‍तहुँ आ तखन फेर मैथि‍ल कुकूर सब कुप्‍फर मचबि‍तए, जे हमरा त' ई खैरात भेटबे नइँ कएल, नवीनजी सबटा धन अपन कुटुमकें द' देलि‍खन। अहीं कहू, जे ऐना तलवार पर गरदनि‍ हम कथी लेल रखि‍तहुँ? जाहि‍ दायि‍त्‍व लेल हमर बहाली नइँ छल, तै पर समर्पण-भावसँ काज क' क' एक बेर एन.बी.टी.मे स'ब दुर्गति‍ भोगि‍ चुकल छी। अइ अति‍रि‍क्‍त कार्यभारकें हाथमे ल’ कए अपना लेल मैथिलजनसँ गारि सुनबाक स्रोत फेरसँ किऐ जुटबि‍तहुँ? साफ-साफ कहि‍ देलि‍अनि‍--जे करै छथि, तिनका करए दिअनु, हमर सम्पूर्ण सहयोग हुनका संग रहतनि। जखन जे मदति मँगताह, हम तत्पर रहबनि। ओना अहाँक सूचना लेल ऑफ द’ रिकार्ड कहि दी जे फाउण्डेशन कोर्सक तैयारी पूर्ण भ’ गेल छै, ओ शीघ्रे छपि क’ आबि रहल छै। इग्नूक उत्साही वाइस-चान्सलर बहुत किछु क’ सकै छलाह, अइ बिन्दु पर हुनका कन्विन्स करब बहुत आसान छल, मुदा फेर ओहिमे जा कए मैथिल लोकनिक किरदानीसँ अपन जीवन हम अशान्त किऐ करितहुँ?...लोक अँगुरी उठबै छथि, जे हम अपन पदक दुरुपयोग क’ कए लेखक बनए चाहै छी, हुनका लोकनिकें किओ ई त’पूछनि‍ जे हम जे किछु छी, से अपना बलें, अथवा ओहने कोनो अपात्र-कुपात्र मैथिलक बलें?...अहाँक अनुमान सत्य अछि, इग्नूमे पछिला दू बर्खक समय एतबा अनुकूल अवश्‍य छल जे प्रयास केला पर ‘मैथिली भाषा एवं संस्कृति शोध केन्द्र’ आरामसँ बनाओल जा सकै छल, मुदा...। हमही टा नइँ, अहाँ चाही तँ गजेन्‍द्र ठाकुरसँ पूछि‍ सकै छि‍अनि‍, मैथि‍लक अही स्‍वभावक कारणें एकाध टा एन.आर.आई. सेहो मैथि‍ली-सेवासँ अपन मुँह मोड़ि‍ लेलनि‍। 12.       अहाँ दुनू भाषामे कतेको प्रकारक रचना कएल, जाहिमे बीहनिकथा(लघुकथा)क सेहो प्रमुखता छल। आब अहाँ सब एकरा बेरा किऐ देलौं? वर्तमानमे मैथिली मध्य बीहनिकथा (लघुकथा)क की अस्तित्व अछि,आ एकर केहेन भविष्य अहाँकें देखाइ अछि? एखनुक रचनाकार सबमे किओ अइ पर सक्रिय देखाइ छथि? ठीके कहै छी अहाँ। एक समयमे लघुकथा खूब लिखलहुँ, आब त’ कविता आ कथा सेहो नइँ भ’ पबै’ए। बेसी काल आलोचनात्मक निबन्ध लिखाइत अछि। मैथिलीक सम्पादक लोकनिकें हमर कोनो खगता नइँ बुझाइ छनि, तें ओहो कम्मे लिखाइत अछि। जीवनक तैस बर्ख राजकमल चौधरीक रचनावली तैयार करबामे लागि गेल। हमरा सन निराश्रित लोक लेल आत्मस्थापन लेल स्वावलम्बी शिक्षार्जन करैत-करैत, जीवन-यापनक साँगह जुटबैत एते समय लागब उचिते छलै। कारण, ई काज व्ययसाध्य, श्रमसाध्य आ समयसाध्य छलै। से अहाँ लोकनिक शुभकामनासँ आब पूर्ण भेल अछि। सम्भवतः अगिला दू-चारि मासमे छपि कए आबि जाए।...मुन्नाजी, हमर जीवनक बड़-बड़ समस्या अछि, देखब तँ अजगुत लागत। विज्ञानक छात्र छलहुँ, छिप्पी पर आबि कए साहित्य धेलहुँ। मातृभाषा मैथिलीमे लिखब शुरुह केलहुँ। हिन्दीमे रोजगार भेटल। एन.बी.टी.क काज करैत प्रकाशन-उद्योग आ बाल-साहित्य तथा अनुवादक कार्य पर चिन्तन करब विवशता बनि गेल। आब अनुवाद अध्ययनक आचार्य बना देल गेलहुँ अछि। एते तरहक दायित्वमे ओझराओल व्यक्तिकें कोनो चतुराइ, धूर्त्तता आ कूटनीति नइँ अबै छै, तें मारिते रास कुकूर पाछू-पाछू भूकि रहल छै, किछु नोछरियो लै छै। तें कोनो ठाम सम्पूर्णतासँ नइँ राखि‍ पबै छी। आखिर एक मनुष्यक क्षमताक तँ कोनो सीमा हेतै ने? लघुकथा लेखनकें ओइ समयमे जीवकान्त सनक थोड़ेक बोधगर लोक सब चुटकुला कहने रहथिन। मुदा लोककें बुझबाक चाहिअनि जे लघुकथा लेखन बहुत मेहनति आ जोखिमक काज थिकै। ई कथा कम आ कविता बेसी होइ छै। एकर काया छोट आ व्यंजना विराट होइ छै। नबका पीढ़ीक बहुत रास लोकक बहुत किछु पढ़ब एखन शेष अछि, तें एखनुक रचनाकारमे के-के सक्रिय छथि, से घोषित करबामे हम अक्षम छी। अहाँ चाही त’अइ बातकें हमर आयोग्यता मानि सकै छी। मुदा बहुत रास नवतुरि‍या बहुत उत्‍साहसँ काज क' रहलाह अछि‍। एतबा धरि‍ अवश्‍य अछि‍ जे जे किओ स्तरीय लघुकथा लिखैत हेताह,हुनका अइ बातक अनुमान हेतनि जे लघुकथा लेखनक काज ‘कठिन भूमि कोमल पगगामी’काज थिक। 13.       मैथिलीमे क्रियाशील रहि अहाँ सदिखन किछु नव-नव काज करैत रहलौं,आगामी एहेन कोनो योजना अछि? सोचै छी जे हमरे नइँ, किनकहु प्रयासें ‘रचना: पाठ-प्रक्रिया’, ‘मैथिलीक अनुवाद परम्पराक अध्ययन एवं अनुशीलन(वैश्विक सिद्धान्तक कसौटी पर)’, ‘मैथिली साहित्यक सांस्कृतिक उदग्रता(उत्तर उपनिवेशवाद, उत्तरआधुनिकता, स्‍त्री-विमर्श, दलित-प्रश्नक प्ररिप्रेक्ष्यमे)’ आ‘तुलनात्मक साहित्यक सम्भावना आ स्वरूप’ पर मूल मैथिलीमे पोथी आबए, आ तकरा पढ़ि कए लोक विचार-विमर्श करए। हम यथासाध्य अइ दिशामे काज करैत रही से तय केने छी। अहाँ लोकनि शुभकामना दिअ’ जे सफल भ’ सकी। मैथिल लोकनिक आघातसँ बचल रहलहुँ तँ कदाचित भ’ओ जाइ। मुदा ई बड़ पैघ काज छै, तें अइ दिशामे बेसी लोकक योगदानक अपेक्षा छै। के अग्रसर हेताह से नइँ बूझि रहल छिऐ। ओना आगू अएनिहार कोनो व्यक्तिकें हमर जाहि कोनो मदतिक प्रयोजन पड़तनि, हम तत्पर रहबनि। 14.       अहाँक पीढ़ीक कतेको गोटएकें पुरस्कार सम्मान भेटि गेलनि। मुदा एते काज केलाक पछातियो अहाँ एखन धरि कतिआएल छी। एकरा कोन तरहें देखै छी अहाँ? हमरा जनैत मान्यताक एक मात्र कसौटी पुरस्कारे टा नइँ होइत अछि। आ मैथिलीमे पुरस्कारो त’ एके दू टा देल जाइ छै प्रति वर्ष! कते गोटएकें देल जेतै? ओना एक बात तय अछि जे निर्णायक लोकनिकें हमरासँ बेसी योग्य ओ लोकनि बुझाएल हेथिन। जहिया हुनका लोकनिकें हम सर्वोपरि लगबनि, हमरहु द’ देताह। निर्णय तँ हुनके लोकनिकें करबाक छनि। एकटा पुरस्कार समितिक खिस्सा कहै छी--समितिमे कैकटा सदस्य रहथि। हम मायानन्द मिश्रक नामक प्रस्ताव देलिअनि। किछु गोटए किछु आओर नामक प्रस्ताव केलथि। हम प्रश्न केलि‍अनि, जे अहाँ जिनकर नाम प्रस्तावित करै छी, हुनकर भरि जीवनक रचनात्मकतासँ मायानन्दक रचनात्मकताक तुलना करैत किछु कहू! हुनका मायानन्द मिश्रक कोन कथा, जिनकर नाम प्रस्तावित केने रहथि, हुनकहु पाँच टा कथा, दस टा कविताक शीर्षक मोन नइँ छलनि।...एहेन तरहक निर्णायक समिति जँ अहाँकें कोनो पुरस्कार द’ओ दैथ, तँ कोन प्रसन्नता होएत? 15.       अपन सम्पूर्ण साहित्यिक यात्रामे प्राप्त अनुभवकें नवतुरिया रचनाकारक संग की कहि बाँट’ चाहब? ओना तँ हम एखनहुँ धरि अपनाकें नवतुरिए मानै छी। मुदा तें हमर उमेर तँ घटि नइँ जाएत! अपन अइ तीस-बत्तीस बर्खक साहित्यिक यात्रामे अनुभव केलहुँ अछि(मैथिली, हिन्दी दुनू भाषाक इतिहासकें देखैत कहै छी) जे कोनो पुरस्कार, सम्मान, पद, मद, काज नइँ करै छै, काज करै छै रचना। अहाँक रचनामे अहाँकें जीवित रखबाक औकाति नइँ रहत, तँ सब किछु अहाँक देहावसानक संगहि छाउर भ’ जाएत। आ, अहाँक रचना अहाँकें तखनहि जीवित राखि सकत, जँ ओहिमे कोनो सार्थक जीवन-दृष्टि हो। तें सार्थक किछु रचैत रहबाक प्रयासमे हम लागल रहै छी। रचि पाबै छी कि नइँ, से हम कोना कहू। अपन स’ब मित्र लोकनिसँ आग्रह करबनि जे गहन अध्ययन, चिन्तन, मनन, आदिसँ जे समय बचि जाए ताहिमे अपन रचनाकें ईमानदार, सम्वेदनशील, ठोस, आ प्रभावी बनेबाक चेष्टा करी। आचार्य भवभूति जकाँ ई सोचैत रचना करी ते अइ अनन्त-अपार समय-संसारमे कहियो किओ निश्चये हेताह, जे हमर रचनाक संज्ञान लेताह। 16.       मैथिली साहित्य सब दिन बभनौतीक(बाभनवादक) शिकार भेल रहल। मुदा अहाँ सभक समूह एकर अपवाद बनि सोझाँ आएल। बाभनक समूह मध्य गैरबाभन रचनाकारक स्वतन्‍त्र  अस्तित्व की अछि? एकरा साहित्यिक समरसता कही वा सामाजिक समरसाक प्रतीक वा किछु आओर? असलमे मैथिलीक मध्यकाल आ आधुनिक कालक प्रारम्भिक अन्तरालमे मैथिलीमे जतेक लोक रचनाशील भेलाह, से ब्राह्मण आ कायस्थ छलाह। स्वभावतः रचनामे अही दुनू जातिक जीवन-यापनक सांस्कृतिक वर्चस्व बनल, जे बादक समयमे आबि कए रूढ़ि आ पाखण्डक रूप ध’ लेलक। क्रमे-क्रमे ब्राह्मण आ कायस्थ बूझए लगलाह जे हम जे बजै छी, से मैथिली भाषा भेल, आ आन जे बजैए से छोटहा लोकक बोली। ब्राह्मणेतर आ कायस्थेतर लोक सहजहिं बूझए लगलाह, जे मैथिली वस्तुतः ब्राह्मण आ कायस्थक भाषा थिक। मुदा ई प्रसंग एतेक आसान नइँ अछि। अइ पर गम्भीरतापूर्वक विचार-विमर्श करबाक प्रयोजन छै। हम उल्लेख करए चाहै छी, जे पर्याप्त तर्कक संग प्रो.रमानाथ सिद्ध क’ चुकल छथि, जे भारतीय साहित्यमे कैक भाषाक लोक ‘सिद्धसाहित्य’कें अपन भाषाक प्रारम्भिक सामग्री मानै छथि,मुदा सत्य बात ई थिक, जे ओ मैथिली साहित्यक आदिकालीन सामग्री थिक आ‘सिद्धसाहित्य’क अधिकांश रचनाकार दलित छलाह।... भाषाशास्‍त्रीय दृष्टिसँ देखी, तँ एक देश-राज्य-जिला-गामक बात तँ दूर, एक परिवार धरिक समस्त सदस्यक भाषामे भिन्नता रहैत अछि। ओहिमे कोन सदस्यक भाषा मानक हो, तकर निर्णय करब कठिन होएत। तें कोन जाति आ वर्गक भाषाकें मानक मानि साहित्यमे जगह देल जाए, अइ विवादमे पड़ब उचित नइँ थिक। मुदा ई सत्य थिक जे मैथिलीमे ब्राह्मण आ कायस्थ वर्गक वर्चस्व रहल अछि। हमरा जनैत मैथिली साहित्यमे ब्राह्मणेतर आ कायस्थेतर वर्गक अनुपस्थितिक दू तरहक प्रसंग छल--एक तँ ई जे मिथिलाक अइ विशाल वर्गक लोक अइ भाषामे साहित्य सृजनसँ जुड़ल नइँ छलाह; दोसर जे ओइ वर्गक जीवनक्रमक वाजिब चित्रांकन एतए नइँ होइ छल। सीताराम झा, कांचीनाथ झा ‘किरण’, यात्री, राजकमल होइत किछु आगू धरिक साहित्यमे जँ ओहि वर्गक किछु चित्र अएबो कएल, तँ पर्याप्त ईमानदार चित्रणक अछैत सम्वेदनात्मक स्तर पर ओहि गहन जीवनानुभूतिक चित्रण नइँ भेल। ई बात हम तेना जकाँ नइँ कहि रहल छी जे साहित्यमे मृत्युक वर्णन करबा लेल मरब आवश्यक अछि। मुदा एकटा बाँझ स्‍त्री निःसन्तान हेबाक जाहि सामाजिक तिरस्कारकें भोगैत अछि, तकरा कोनो सन्तानवती स्‍त्री ओहिना नइँ  बूझि सकैत अछि, जेना कोनो बाँझ स्‍त्री प्रसव वेदनाकें नइँ बूझि सकैत अछि। तें, अइ इतर वर्गक सक्षम प्रतिनिधित्वसँ साहित्य सम्पन्न होएत, आ सम्पूर्ण मैथिल समाजक चित्र, मैथिली साहित्य प्रस्तुत क’ सकत, से विश्वास कएल जा सकैए। मुदा समस्या ई अछि मुन्नाजी, जे व्यवस्था-क्रम बड़ विकट अछि। असलमे ब्राह्मणवाद आब कोनो जातिवाद नइँ रहि गेल अछि, ई एकटा व्यवस्था बनि गेल अछि। अहाँ देखैत होएब जे कोनो ब्राह्मणेतर व्यक्तिकें प्रतिपक्षमे ठाढ़ हेबाक इच्छा होइ छै, त’ ओ जनौ पहिरए लगैए, लोककें अइसँ बचबाक चाही। कोनो व्यक्तिकें पहचान उपस्थित करबा लेल काज करब जरूरी होइ छै। काज होइत रहतै, मान्यता भेटबै करतै। अइ स्थापित रहस्य अथवा मिथ अथवा वर्चस्वक गढ़, गत शताब्दीक सातम दशकसँ टुटैत रहल अछि, आगुओ टुटैत रहत। वर्तमान समयमे कतोक रास ब्राह्मणेतर आ कायस्थेतर लोक मैथिलीमे रचना क’रहलाह अछि, आ बढ़िया क’ रहलाह अछि। 17.       अहाँ सब मैथिली समीक्षाकें एकटा न’ब बाट धरौने रही। वर्तमानमे मैथिली समीक्षाक केहेन अस्तित्व छै? किओ-किओ त’ एकरा ओलि सधेबाक साधन जकाँ बुझै छथि। अहाँ की कहब? मैथिली समीक्षे टा नइँ, आनो विधाक हाल-सूरतिमे थोड़-बहुत काँय-कचबच छै। जहिआसँ मैथिलीकें आठम अनुसूचीमे जगह भेटलै, झंझट आओर बढ़ि गेलै। लोककें मैथिली कोनो धन्धा बुझाए लगलै। सी.आई.आई.एल. मैसूरमे आलोचनात्मक पोथी कीनल जाएत, ताहि लेल की कहाँ छापि-छापि लोक तैयार भ’ गेलाह। सालो भरि लोक मैथिलीमे किताब छपबैत रहै छथि, किऐ छपबै छथि, देखि कए छगुन्ता लगैए, आखिर किऐ ई लोकनि कागज दूरि करै छथि? अहाँ लेखनक गप करै छी, ‘आधुनिक साहित्यक परिदृश्य’ शीर्षक अपन पोथीमे हम सन्2000मे मैथिलीक बाइस टा रचनाकारक रचना-संसार पर एक-एक टा लेख लिखने रही,ओहिमे सँ पन्द्रह टा रचनाकार जीवित रहथि आ एखनहुँ छथि। आनक कथा तँ जाए दिअ,ओ आलोच्य रचनाकारो धरि ओहि पोथीक, कम सँ कम अपना पर लिखल लेख’क संज्ञान नइँ लेलनि, निन्दो करबा लेल किओ एकटा पोस्टकार्ड नइँ लिखलनि। हँ, थोड़ेक आन साहित्यप्रेमी ओइ पोथीक पर्याप्त प्रशंसा केलनि। अहाँ जाहि समूहबाजीक गप करै छी, जँ सत्ते हमर कोनो समूह अछि, तँ तकरहु सदस्य सब ओइ पोथीक चर्चा अपन कोनो भाषण,आलेखमे नइँ केलनि, कोनो पत्रिका ओइ पोथीक समीक्षा नइँ छपलक...आओर बहुत रास बात अछि, मुदा से एकालाप भ’ जाएत। ओलि सधेबा लेल जे समीक्षा लिखल जाइत अछि, से हमरा जनैत साहित्य नइँ होइत अछि। पाठक बूरि नइँ होइ छथि। पाठक आ समय के अदालत, रचनाकारक न्याय अवश्य करै अछि। आलोचनाकर्म लेल बहुत बेसी ईमानदारी, मेहनति, आ निर्लिप्तताक प्रयोजन पड़ै छै। हमरा जनैत तत्काल यशःप्रार्थी लोककें साहित्य-कर्ममे नइँ अएबाक चाही। एतए दीर्घ आ निर्लिप्त साधनाक प्रयोजन होइ छै। अन्तमे अहाँक माध्यमे हम अपना पर टिप्पणी केनिहार समस्त लोककें सूचना द’दिअनि जे राजकमल चौधरीक साहित्य पर काज केनिहार देवशंकर नवीनक नेतमे खोट तकनिहारकें सोच’क चाहिअनि, जे हम ओस आ अंगारमे दाग ताकि रहल छी। मारिते रास भाग्य-विधाता सभ साहित्यमे छथि, किनकहु कीर्तन क’ कए हम किछु प्राप्त क’ सकै छलहुँ। सब जनै छथि, जे ई काज हमरा लेल कते सुलभ छल। मुदा मनुष्यकें मरै काल कहाँ दन अपने टा कएल काज शान्ति दै छै। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। अतुलेश्वर किछु विचार टिप्पणी १ भाषाक प्रति एक नव सोच हेमनिमे एकटा गोष्ठीमे गेल छलहुँ जाहि मध्य एक नव बात उड़ीसाक एकटा भाषावैज्ञानिक कहलैथ जे यदि हमर सभक भाषा सभमे कोनो प्रकारक नब शब्द अबैत अछि, तँ ओकर स्वागत होयबाक चाही। हुनक कहब छलन्हि जे कोनो विदेशी शब्द हमर भाषाक वाक्य संरचना मे कोनो प्रकारक परिवर्तन नहि आनि सकैत अछि। ई गप्प ठीक छैक जे वाक्य संरचनामे एहि सँ कोनो प्रभाव नहि पड़त, मुदा एहिसँ भाषाक विकास हमर होयत वा हुनकर? एहि ठाम ई प्रसंग हम एहि कारणेँ उठाओल अछि जे मैथिलक बहुतो पत्रिकामे कथाकारलोकनि एहि सिद्घान्तकें अपनौने छथि। हुनका लोकनिक कथा, जे मिथिलामे रहनिहार लोकक कथा कहैत अछि, मुदा ताहूमे मैथिलीसँ इतर शब्दक प्रयोग निधोख भए कएल जाए रहल अछि। ई किएक?उदाहरणक लेल किछु शब्द अछि जेना बेडरुम, किचेन आदि। आश्चर्यक गप्प ई जे जँ हमसभ ओहन शब्दकेँ आयातित करैत छी जे अपना घरमे नहि अछि तखनि तँ ठीक, मुदा अपन भण्डारमे रहैत अनका लग हाथ पसारब कतए धरि उचित?  हमरा सभकेँ बुझल अछि जे उपर्युक्त शब्दक लेल मिथिला आ मैथिलीमे बहुत सहज शब्द भनसाघर, सुतबाक कोठरी उपलब्ध छैक। अपन शब्दक अछैत ई भीखमंगनी किएक? एहने स्थितिक हेतु आदरणीय गोविन्द बाबू कहने छथिन जे अपन कोठीमे धान रहैत पैंच लेब उचित नहि। की अहिना अपन भाषामे बाहरी शब्द अनैत रहब आ पछाति कहबैक जे भाषाक विकास नहि भ रहल अछि, ई कतय धरि उचित? अपन संस्कृति, अपन भाषाक छोट सँ छोट विषयकेँ अपनायब हमर अहाँक परम कर्त्तव्य बनैत अछि, भाषाक विकासकेर मतलब ई किन्नहुँ नहि थिक जे अपन विषय-वस्तुकेँ रहैत दोसरक वस्तुसँ अपन घर भरि ली। तेँ हम अपन क्षुद्र बुद्धियेँ आजुक सजग साहित्यकारलोकनिसँ आग्रह-अनुरोध करैत छियनि जे आवश्यकता रहले पर हाथ पसारब उचित अन्यथा अपना सङ्ग-सङ्ग भाषाक प्रति अन्याय होयत। २ भाषाक मानकीकरण आ साहित्यक राजनीति- जखनि-जखनि साहित्यक स्तरीयताक विवेचना होइत अछि तखनि-तखनि भाषाक मानकीकरणक प्रश्‍न ठाढ़ क हौआ बना देल जाइछ। हेमनिमे एहि प्रकारक समस्या आयल अछि। विदेह इ पत्रिकाक सम्पादक आदरणीय गजेन्द्र ठाकुरजी सेहो किछु एहने परिदृश्यक निर्माण कएलनि अछि।  प्रसंग छल कथाक स्तर पर आ प्रश्न उठाओल अछि भाषाक मानकीकरण पर। एही परिप्रेक्ष्यमे गजेन्द्रजी भारतीय भाषा संस्थानक द्वारा मैथिली काजक लेल अपनाओल गेल भाषीक स्तरीयता पर प्रश्न चिन्ह लगाओल अछि। ओना गजेन्द्रजीक मानकीकरणक पक्षधर हमहुँ छी मुदा मानकीकरणक नाम पर चलाओल जाएबला गोलैसी सँ आहत आ असहमत सेहो छी। कारण एहि सँ परिणाम तँ किछु नहि आओत मुदा भाषाक गति अवश्य बाधित होएत। मैथिली भाषाक मानकीकरण नहि भेल अछि ई कहब छनि भाषा वैज्ञानिकलोकनिक, तखन मानकीकरणक राजनीति किऐक? एखनुक जे मैथिलीक मानकीकरणक परिस्थिति अछि ओहिमे अहाँ जे लिखैत छी सेहो ठीक आ दोसर जे लिखि रहल छथि सेहो ठीक। तैँ हमर कहब अछि जे सम्प्रति एकरा मैथिली भाषाक विशेषते बुझल जाए आ ओकरा कोनो एक खुंटामे बान्हब ठीक नहि। कारण कोन-कोन परेशानीक बीच केओ बंधुआ मजदूर जेकाँ मैथिलीक काज कए रहल छथि से गजेन्द्रजीकें नीक जकाँ बुझल छनि, मैथिली भाषामे साहित्यकार तँ भरल छथि मुदा अपन रचनाकेँ प्रकाशित करबासँ पूर्व कतेक गोटए प्रकाशनसँ पूर्व ओकर उचित स्व-समीक्षा करैत छथि? अन्तमे जे मानकीकरणक प्रश्‍न अपने उठबैत छियैक ओ मात्र मैथिलीऐमे नहि, अपितु आनो भाषामे समाने रुपकेर छैक आ एकर समाधान जल्दी भए जाएत तकरो दूर-दूर तक सम्भावना नहि बनैत अछि। एही कारणें कहब जे मैथिली भाषाक मानकीकरणक लेल ठोस आ निरपेक्ष भावक आवश्यकता छैक, जाहि हेतु मैथिलकेँ बहुत बेसी संयमी बनबाक आवश्यकता छनि। अन्तत: कहबाक तात्त्पर्य जे भाषाक मानकीकरणक नाम पर राजनीति कएनिहार आ करौनिहार दुनू गोटे अपनाकेँ संयमित करथु, नहि तँ असली स्वर दबले रहि जाएत ठीक ओहिना जहिना बिनु बरखाक खेतक उर्वरता। ३ मैथिली साहित्य आ मुसलमान भाई - मैथिली भाषामध्य मुसलमान जातिक साहित्यकारक उपेक्षा मिथिला आ मैथिली लेल नीक नहि। हेमनिमे देखल जा रहल अछि जे मुसलमान भाई काल्हि धरि मैथिलीकें अपन मातृभाषा स्वीकार कएने रहथि ओ लोकनि शनैःशनैः मैथिलीसँ विमुख भ रहल छथि, तकर सोलहो आना कारण अछि हुनका लोकनिक उपेक्षा। एहि बीच साहित्यकार आ पत्रकार श्याम सुन्दर शशि कहलथि जे काल्हि धरि ओ लोकनि अपन मातृभाषा मैथिली लिखबैत छलाह, ओ लोकनि अपन उपेक्षाक कारणेँ आइ मैथिली भाषासँ मूँह मोड़ि रहल छथि। हुनका अनुसारेँ एकर मुख्य कारण अछि हुनकालोकनिक प्रति उपेक्षा-भाव। ठीक एहने चिन्ता आदरणीय नचिकेताजी सेहो उठौने छथि। हमरा एहि ठाम शशिजी आ नचिकेताजीक चिन्ता एक रंग लागल, कारण एक दिस हमरा लोकनि कहैत छिऐक जे मिथिलामे बसनिहार सभ जातिक भाषा मैथिली थिक आ दोसर दिस एहन उपेक्षा? ई दुनू गप्प कोना भ सकैत अछि। ई प्रसंग एहि कारणेँ उठाओल अछि जे मैथिलीमे के के मुसलमान भाई साहित्यकेर निर्माण कए रहल छथि से आंगुर पर गनल जाए सकैछ। हेमनिमे आदरणीय हाशमीजीक देहावसान भेल मुदा धीरेन्द्र प्रेमर्षि छोड़ि केओ हुनका प्रति लिखबाक घृष्टता नहि कयलनि। एकर कारण की?  मैथिली साहित्य गुट-गोत्र-जाति मात्रक गोलैसी सँ जुड़ल अछि। एहना स्थितिमे आदरणीय नचिकेताजीक शब्द मोन पड़ैत अछि – प्रायः 51,229 मैथिली मुसलमान भाइ छथि जनिका मैथिली सांस्कृतिक आ साहित्यिक जगत मे हमरा सभकें स्थान देमै-टा पड़त, नहि तऽ इतिहास हमरा क्षमा नहि करत। ४ ‘चिड़ै’ आ ओकरे लाथेँ नेपालीय मैथिली कथाक स्वर- नेपालमध्य मैथिली साहित्यमे 1990 ई॰क बादक आयल पीढ़ीमे सँ ककरो कथा संग्रह प्रकाशित नहि भेल छल(ओना एकगोट कथा संग्रह संतोष मिश्रक प्रकाशित भेल छल मुदा ओ चर्चामे नहि आबि सकल, एकर कारण पता नहि)। हेमनिमे सुजीत कुमार झाक कथा संग्रह ‘चिड़ै’ प्रकाशित भेल अछि। जे एहि पीढ़ीक प्रथम कथा संग्रह थिक। सुजीत कुमार झाक कथा संग्रह तखनि प्रकाशित भेल अछि जखनि नेपालक जनता नव नेपालक निर्माणमे लागल छथि, आ एहि क्रममे नव-नव बातक स्थापना हएबाक संभावना अछि। मुदा जखनि ‘चिड़ै’ कथा संग्रह प्रकाशित भेल तँ मिडियामे जे प्रतिक्रियासभ आएल ताहिसँ ई स्पष्ट नहि भए सकल जे ‘चिड़ै’ कथा संग्रह नेपालक परिस्थितिक कथा कहैत अछि वा नहि, मुदा एकर चर्चा बहुत भेल। एहि परिप्रेक्ष्यमे देखला पर पता चलैत अछि जे हुनक कथा संग्रहक शीर्षक कथा ‘चिड़ै’ कथा, जे कथाकार दृष्टिमे एक नव विम्वक कथा थिक, क मूल उद्देश्य नेपालीय मैथिली कथा साहित्यक समकालीन स्वर परिभाषित करब थिक। एकरा पुष्ट करैत अछि नेपालसँ प्रकाशित कथा यात्रा नामक कथा संग्रहमे एकर प्रकाशन होएब। यदि सुजीत कुमार झाक आरो कथा एहि स्वरक अछि तँ ई कथा समकालीन स्वरक कथा नहि भए मात्र वर्त्तमान कालमे लिखल गेल कथामात्र भेल। कारण नेपालीय मैथिली कथामे समकालीन विम्ब आ नव शिल्पक कथा रमेश रंजन आ धीरेन्द्र प्रेमर्षिक कथामे मात्र देखल जाइत अछि। बाद बांकी कथाकारमे एकर अभाव देखल जाइछ कारण एहि पीढ़ीक सभसँ श्रेष्ठ कथाकार रहितहुँ श्याम सुन्दर शशि सेहो समकालीन स्वरमे पाछुऐ छथि, कारण ई कथाकार लोकनि नारी देह धरि अपनाकेँ सीमित कए कथाक शिल्प आ विम्बक निर्माण करैत छथि। तैँ आशा नहि क सकैत छी जे सुजीत कुमार झा एहि सँ फराक हेताह। ओना ‘चिड़ै’ कथा पढ़ि हुनक कथाक समीक्षा करब आसान नहि। तथापि प्रशंसाक पात्र अवश्य छथि अपन पीढ़ीक प्रथम कथा संग्रह प्रकाशित करबाक लेल। (बिन्दु २: अतुलेश्वरजी, अहाँक टिप्पणीपर हमर टिप्पणीपर एकटा मेलमे असहमति आएल छल। तकर जे जवाब हम देने रही  से १/२/३/४ बिन्दुमे नीचाँमे जोड़ने रही, कारण ओ पत्र हमर ई-मेलपर आएल छल तेँ प्रश्नकर्ताक नाम आ प्रश्नावली हम सायास नै देने रही, तेँ प्रायः तारतम्य नै रहल हएत। मुख्य मुद्दा छै जे किछु गोटे सगर रातिसँ लऽ कऽ सभ ठाम जगदीश प्रसाद मण्डल जीक लेखन शैलीपर सवाल उठा रहल छथि, कथाक स्तरपर गप होइते कहाँ अछि, मात्र जे "करैत" आ "जाइत" क बाद अछि किए नै अछि; रामनाथहुँ किए नै अछि रामनाथो किए अछि, शब्द सभ ई कोड़ि कऽ अनै छथि (एकटा दोसर पाठकक पत्र छल!)। मुदा अहाँ सही कहलौं जे जतेक लेखक छथि ततेक मानकीकरण अछि तखन कथाक स्तरपर गप किए नै होइए? विषय-वस्तुपर गप किए नै होइए? जखन की हुनकर कथा विषय-वस्तु आ भाषा दुनू दृष्टिकोणसँ (मानकीकरण सेहो हुनकामे अछि) श्रेष्ठ अछि, सगर राति दीप जरए, सुपौलमे जे जातिवादी स्वर उठल आ पुरोधा सभ चुप रहलाह, मुन्नाजीक ऐ सम्बन्धमे प्रश्नावलीक अखन धरि पुरोधा लोकनि उत्तर नै देलन्हि, ओइसँ लगैए जे सभटा साजिशक तहत भऽ रहल अछि।सी.आइ.आइ.एल. कएक साल बितलोपर किए मानकीकरणक कोनो खाका नै दऽ सकल, कएकटा मीटिंग टा भेल। जखनकि ओकर कमेटी एकछाहा छै आ ओइमे वएह लोकनि छथि जे सभ सगर राति आदिमे सक्रिय छथि आ मानकीकरणक आधारपर जगदीश प्रसाद मण्डलक आलोचना हास्यास्पद रूपेँ करै छथि!--गजेन्द्र ठाकुर, सम्पादक बिन्दु-३: अतुलेश्वरजी, मैथिलीक पहिल दुर्भाग्य तखन देखा पड़ैत अछि जखन एतए गजलकेँ मुस्लिम धर्मसँ जोड़ि कऽ देखल जाए लगलै आ मुस्लिम धर्म आ ओकर साहित्यकेँ अछोप मानि लेल गेलै। आ तखन मुस्लिम अहाँसँ कोना जुड़त। मुदा आब जखन गजलक जीवन युगक समाप्ति भऽ गेल अछि (जीवन युग- ऐ युगक प्रारंभ हम जीवन झासँ केने छी जे आधुनिक मैथिली गजलक पिता मानल जाइ छथि मुदा ओ कम्मे गजल लीख सकला। मुदा हुनका बाद मायानंद, इन्दु, रवीन्द्रनाथ ठाकुर, सरस, रमेश, नरेन्द्र, राजेन्द्र विमल, धीरेन्द्र प्रेमर्षि, रौशन जनकपुरी, अरविन्द ठाकुर, सुरेन्द्र नाथ, तारानंद वियोगी आदि गजलगो सभ भेलाह।) आ अनचिन्हार युगक प्रारम्भ भऽ गेल अछि, जइमे गजलक परिभाषिक शब्द आ बहरक निर्धारणक आधारपर सुनील कुमार झा, दीप नारायण "विद्यार्थी", रोशन झा, प्रवीन चौधरी "प्रतीक", त्रिपुरारी कुमार शर्मा, विकास झा "रंजन", सद्रे आलम गौहर, ओमप्रकाश झा, मिहिर झा, उमेश मंडल आदि गजलकार गजल लिख रहल छथि तखन मुस्लिमक प्रवेश मैथिलीमे हेबे करत। हम शेख मोहम्मद शरीफक तेलुगु कथाक अंग्रेजी माध्यमसँ मैथिलीमे अनुवाद केने रही (जुम्मा - कथा- विदेह:सदेह:१ मे सेहो प्रकाशित) आ विदेहमे सद्रे आलम गौहर आ मो. गुल हसन छपि रहल छथि। संगमे मैथिलीमे आब कसीदा, मसनवी, फर्द, बन्द, कता, रुबाइ, हम्त, नात, मनकबत, मर्सिया, मुस्तजात, नज्म, मुजरा, कौवाली आदिपर लेख (देखल जाए आशीष अनचिन्हार -http://anchinharakharkolkata.blogspot.com/2011/10/blog-post_07.html)क बाद मुस्लिम लेखक मैथिलीसँ कतिआएल अनुभव नै कऽ रहल छथि। मिथिलाक खोजमे मुस्लिम आ क्रिश्चियन धार्मिक स्थलक वर्णन छै (देखू http://www.videha.co.in/favorite.htm ) आ मिथिला रत्नमे सेहो यथासम्भव उल्लेख भेट जाएत (देखू http://www.videha.co.in/photo.htm)। अहाँक टिप्पणी हरबड़ीमे लिखल आ चारि-साल पुरान बुझा रहल अछि । हाशमीजीक विषयमे अहाँक टिप्पणी ओइ गोलैसी, गोत्र, जातिकेँ बढ़ावा दैत लागि रहल अछि जकर अहाँ विरोध केने छी। हुनकरदेहावसानपर विदेहमे सम्पादकीय  आएल छल, आ हुनकर देहावसानपर सैकड़ोक संख्यामे टिप्पणी/ श्रद्धांजलि आएल छल तकर किछु अंश एतए देल जा रहल अछि। आनो मैथिली पत्रिका सभ हुनका श्रद्धांजलि देलक (सरकारी तंत्र छोड़ि कऽ)। लोकमे आब गोलैसी नै छै, हमरा क्षेत्रक राजनेता सेहो आब जाति, गोत्रक आधारपर नै मुदा काजक आधारपर वोट माँगि रहल छै। मुदा ओइ युगक साहित्यकार/ नाटककार जिनका सी.आइ.आइ.एल., साहित्य अकादेमी, एन.एस.डी. आदिसँ मान्यता चाहियन्हि, तखने ओ साहित्यकार कहेताह- से गोलैसी नै करताह तखन हुनकर छद्म अस्तित्व कोना रहतन्हि, कारण जइ युगक ओ छथि से युग तँ कहिया ने खतम भऽ गेलै। फातमी वा कोनो कालजयी लेखकक अस्तित्व ऐ सरकारी संस्था सभक मोहताज नै अछि। -मुसलमानक मातृभाषा उर्दू किए भेलै, आ हिन्दूक मातृभाषा हिन्दी किए से प्रश्न मात्र मैथिलीक नै अछि। बांग्लाआ तमिलकेँ बंगाल आ तमिलनाडुक मुसलमान अपन मातृभाषा किए मानै छथि। मिथिलाक मुसलमानेकेँ मात्रकिए दोष देल जाए? मिथिलाक अधिकांश हिन्दू सेहो मैथिलीकेँ नै हिन्दीकेँ अपन मातृभाषा मानै छथि मुदा हुनकासाम्प्रदायिक नै देशभक्त मानल जाइए! दोसराकेँ छोड़ू, हम तँ दरभंगाक पोथी बेचनिहारसँ मैथिली बाजैत थाकिगेलौं मुदा ओ हिन्दीमे जवाब देलक! प्रश्न ओतेक सरल नै छै जतेक सरलतासँ अहाँ निर्णय दै छी। मिथिलाक तँछोड़ू कर्णाटक , जतए अहाँ रहि रहल छी, ओतुक्का मुसलमान किए कन्नडक बदला उर्दूकेँ अपन मातृभाषा मानिरहल अछि, जखनकि बगलमे तमिलनाडुक मुसलमान अपन मातृभाषा तमिल घोषित करैए (कन्नडकउपन्यासकार भैरप्पाक उपन्यासक संस्कृत अनुवाद "आवरणम" हम पढ़ने छी, ओइमे ऐपर सेहो चर्चा छै,कर्णाटकमे ऐ उपन्यासपर कतेक हंगामा भेल रहै अहाँकेँ बुझले हएत)। मण्डलजी वा मानकीकरणक लेल कोनो हल्ला नै छै, ई मात्र ओइ अपठित मैथिली साहित्यक साहित्यकारकहल्लाक उत्तर छै जिनका ई  सफलता अबूझ बुझाइ छन्हि , जे वास्तविकतासँ दूर छथि आ जे मैथिलीक सरकारीकार्यक्रममे (छद्म धरातली कार्यक्रम!) एक दोसराक ढोल पीटै छथि। जगदीश प्रसाद मण्डलक १३ टा पोथी, मैथिलीक सर्वश्रेष्ठ नाटककार बेचन ठाकुरक एक टा पोथी आ राजदेव मण्डलक अम्बरा (जकरा हम २१मशाताब्दीक पहिल दशकक सर्वश्रेष्ठ कविता संग्रह कहने छी) केँ मैथिली पाठक जे स्थान देबाक छलै इन्टरनेटेपर नैधरातलोपर दऽ देने छै। ई सभ पोथी सभ प्रिन्टक संग ऐ लिंकपर सेहो उपलब्ध छै, देखल जाएhttps://sites.google.com/a/videha.com/videha-pothi/ । ७४म सगर रातिमे १५ गोटेकथा पाठ भेलै जइमे जगदीश प्रसाद मण्लक नेतृत्वमे ९ गोटे गेल रहथि, आ शेष मात्र ६ गोटे रहथि, जेँ जगदीश प्रसाद मण्डल तेँ ई सगर राति आइयो चलि रहल छै। मुदा साहित्य अकादेमी आसी.आइ.आइ.एल.क प्रायोजित धरातली कार्यक्रममे से अनुपात नै छै , किएक? कारण ओ संस्था सभ जमीनीवास्तविकतासँ दूर अछि।

-नेट मध्य एशियामे की केलकै अहाँकेँ बुझले हएत। जमीनी स्तरपर निर्मलीमे जे "विदेह समानान्तर साहित्यअकादेमी मैथिली कवि सम्मेलन" आयोजित भेल छलै ओकर सफलतासँ अहाँ भिज्ञ हएब, तहिना विदेह द्वारा जेसमानान्तर साहित्य अकादेमी पुरस्कारक घोषणा भेलै से काल्हि धरि अपठित मैथिली साहित्यक साहित्यकारक मध्य जे अहलदिली अनने छै तहूसँ अहाँ भिज्ञ हएब। -मिथिलाक आ मैथिलीक विकासक जे वातावरण अखुनका सरकारमे छै की ओ दरभंगा आ आन जमीन्दारी राजवा मैथिल मुख्यमंत्रीक कालमे कहियो रहै? १४ अक्टूबर २०११ केँ मुख्यमंत्री नीतिश कुमारकेँ निर्मलीमे जगदीश प्रसाद मण्डलक ५ टा आ राजदेव मण्डलक एकटा पोथी देल गेलन्हि, मुदा जखन चेतना समितिक बैसकीमे श्रीकृष्ण मेमोरियल हॉल, पटनामे ओ मैथिलीक ऐ संस्थाकेँ मैथिल ब्राह्मणक संस्था बुझने रहथि आ बाजलो रहथि (बड़ाइयेमे सही, वोटक उद्देश्येसँ सही) तँ कियो सांकेतिको करेक्शन नै केने रहथि?  १४ अक्टूबर २०११ धरि ओ  मैथिलीकेँ मैथिल ब्राह्मणक भाषा बुझै छलाह!!  -नवीनजीकेँ नवारम्भ पत्रिकामे चांग्ला कहल गेल छलन्हि, श्रीनिवासजी आ नवीनजीकेँ "हम पियाला हमनिवाला" आ आर की-की कहल गेल छलन्हि। की हुनका प्रत्युत्तर देबाक हक नै छन्हि? नवीन जीक कोन पाँतीमेगारि छै से बताएल जाए, तखन हम आर फरिछा कऽ ओकर सन्दर्भ दऽ सकब। -अहाँक ई कथन जे हम ए.सी.मे रहि कऽ मिथिलाकेँ नै बुझि पाबि रहल छी आदिपर हमर यएह उत्तर अछि जे ऐ सभसँ हम भविष्यमे "असत्यकेँ सत्य" कहनाइ नै शुरू कऽ देब। - सी.आइ.एल.एल.क सभ निअम वेबसाइटपर उपलब्ध छै, आ ओकर कोन प्रावधान लक्ष्मीनाथ झा द्वारालिखित हिन्दीक पोथी "बिहार की सांस्कृतिक चित्रकला"क निर्लज्ज चोरि कएल पोथी सुशीला झाक "अरिपन"केँपूर्वप्रकाशन ग्रान्ट दै छै से हमरा नै बुझल अछि। अहाँ तँ मुस्लिमक गप उठेने छी मुदा हिन्दूक मात्र एक जातिएकर सभ कार्यशालासँ लऽ कऽ सभ ग्रान्ट/ असाइनमेन्ट प्राप्त कऽ रहल छै, ओ कोन प्रावधानक अन्तर्गत छै?निअममे कोनो कमी नै होइ छै, यएह निअम तँ दोसरो भाषामे छै, ओतए किए एतेक समस्या नै छै?  -गजेन्द्र ठाकुर, सम्पादक)  videha me shradhanjalik ansh..http://www.facebook.com/photo.php?fbid=105536526210456&set=o.104458109632326&type=3&theater 

फजलुर रहमान हासमीक आइ २०-०७-२०११ केँ मृत्यु भऽ गेलन्हि। जन्म -पटना जिलाक बराह गाममे। वृत्ति अध्यापक। हिन्दी कविता संग्रह "रश्मि राशि" आ मैथिली कविता संग्रह "निर्मोही" प्रकाशित। १९९६मे अबुलकलाम आजाद- अब्दुलकवी देसनवी, उर्दूसँ मैथिली अनुवादपर साहित्य अकादमीक मैथिली अनुवाद पुरस्कार।

(हिनकर एकटा कविता)

हे भाइ

हे भाइ

हमरा जुनि मारह

तोँ हमरा

दोसर जाति

दोसर धर्म्मक बूझि रहल छह-

मुदा हम छी

तोरे भ्राता

अग्रज वा अवरज!

हमरा सभकेँ एके माता

नहि मारह

गैर जानि कऽ

संसारक दृष्टिमे

तोँ पार्थ

आओर

हम “राधेय” बनल छी

मुदा “पृथा” जानि रहल अछि

हदय कानि रहल अछि

चुप अछि

मजबूरीसँ

बेवसीसँ

हे भाइ हमरा नहि मारह...।

(साभार:by Gajendra Thakur) By: Kumar Umesh Mahto Like · · Share · See Friendship · 16 minutes ago ·  Gajendra Thakur July 20 You, Ramashankar Jamayyar, रवि भूषण पाठक, Om Prakash Jha and 27 others like this.

Vijay Kumar Jha shradhanjali.. July 20 at 9:21pm · Unlike · 10 people

Ranjeet Jha humar sader pranam July 20 at 9:26pm · Unlike · 10 people

Raman Dutt Jha फोटो में कविता से रूबरू करावै लेल बहुत बहुत धन्यवाद | July 20 at 9:27pm · Unlike · 9 people

Dhirendra Premarshi हाशमीजीक प्रति हमर हार्दिक श्रद्धासुमन। हम अपन गीत एतबए दुआ मङै छी अल्लाह एकरा कबूल कइए लिहऽ मे हुनकर सन्दर्भ राखि हुनक ई कविता सेहो रखने छियनि-प्रलयंकारी भूकम्पसरकारक दिससँ राहतठीक ओसक बुन्नजकाँहाथी तँ ठाढेठाढ नहा गेलआ चिडइपिआसलक पिआसले रहि गेल

कृपया हुनक जीवनी रखबाक प्रयत्न करब उमेशजी। धीरेन्द्र प्रेमर्षि July 20 at 9:31pm via · Unlike · 11 people

Nagendra Kumar Jha hamro dis se shradhanjali July 20 at 9:35pm · Unlike · 11 people

Shiv Kumar Jha हमर जन्म मातृक मालीपुर मोड़तरमे भेल, हाशमीजी ओइ गामक बगलमे शिक्षक छला, मालीयेपुर गाममे रहै छला, हमर बाबूजी स्व. कालीकान्त झा बूच सँ साहित्य साधनाक क्रममे बड्ड अन्तरंगता भऽ गेल छलनि, पारिवारिक सम्बन्ध जकाँ, हमर बाल्यकालक उपनाम "टिल्लू" हिनके राखल छलनि, जखन हम नेना छलौं (४-५ बर्खक) तँ ओ हमरा कहै छला- "टिल्लू मियाँ राही, पेटमे कराही, आ दौरऽ हो सिपाही"-- हुनका हमरादिससँ श्रद्धांजलि.. July 20 at 9:44pm · Unlike · 9 people

Rajdeo Mandal shradhanjali July 20 at 10:04pm · Unlike · 6 people

Manoj Kumar Mandal ekta sunya..ee sunya bharat? July 20 at 10:11pm · Unlike · 4 people

Nand Vilas Roy dukhad ,, muda jeevanak satya July 20 at 10:14pm · Unlike · 5 people

Priyanka Jha ekta maithilik lel samarpit vyaktitvak nidhan July 20 at 11:36pm · Unlike · 4 people

Kaushal Kumar Karej paigh bh' gel het maithili ke dushmansab ke July 21 at 12:42pm · Like · 1 person

Binit Thakur dukhak ghot pibi har 1 gyani badhe jeevan ke or. jakhan apan keo teje duniya shradha sa bahe nor. e sansar maaya ke nagri kahait achhi shastra puran. shradh suman rahamaaj jee k. hamar apan kichh pait sa. BINIT THAKUR July 21 at 2:41pm · Unlike · 2 people

Sanjay Kumar Mandal श्रधान्‍जली.... July 21 at 11:50pm · Unlike · 1 person

Shiv Kumar Jha HASMEE JEEK DEHANT SAN MAITHILI KEN JE KSHATI BHEL OKAR VIVECHAN SAMBHAV NAH. July 22 at 2:54pm · Like 14 minutes ago · Like Arvind Ranjan Das Atyant prabhaavkaari prashn ....  Gajendra Thakur fatmijik mrityuk baad hunka del shradhanjali..मैथिली साहित्यक प्रसिद्ध हस्ताक्षर फज़लु रहमान हासमीक आइ दिनक ३ बजे देहावसान भ' गेलनि...बेगुसराय निवासी हासमी जी कें मैथिली मे अनुवाद लेल साहित्य अकादेमी पुरस्कार सेहो भेट चुकल छनि....हिनक कविता सभ बाद चर्चित रहल अछि....हुनके पांति सँ हुनका श्रद्धांजलि .... सरकारी रिलीफ ...हाथी नहा गेल आ छुट्टी पियासले रहि गेल.... Unlike · · Unfollow Post · July 20 at 4:28pm You, Prabhat Ray Bhatt Uyfm, Deepak Ranjan, Sanjay Jha and 20 others like this.

Pradeep Chaudhary mata rani hunka aatma ke shantee pradan karaith July 20 at 11:11am · Unlike · 5 people

Ashish Anchinhar dukhad samachar......... July 20 at 4:30pm · Unlike · 5 people

Bhaskar Jha maithili sahitya ke bhari kshati!!!!! July 20 at 4:30pm · Unlike · 6 people

Umesh Mandal दुखद समाचार... July 20 at 4:31pm · Unlike · 5 people

Vinit Utpal श्रद्धांजलि July 20 at 4:31pm via · Unlike · 5 people

Pawan Jha दु:ख भेल... मैथिली के एक्टा और क्षति ................ July 20 at 4:32pm · Unlike · 5 people

Shefalika Verma Fajlu rahman Hashmi jik dehawsan s Maithili sahitya ker apurniya kshati bhel....MAITHILIK EKTA STAMBHA..... HARDIK SHRADHANJALI.... July 20 at 4:34pm · Unlike · 5 people

Daya Jha Mithilanchali ati dukhad samachar. July 20 at 4:37pm · Unlike · 5 people

Pankaj Jha श्रद्धांजलि. July 20 at 4:38pm · Unlike · 5 people

Poonam Mandal दुखद समाचार... श्रद्धांजलि‍... July 20 at 4:39pm · Unlike · 6 people

Sanjay Kumar Mandal बहुत दु:ख भेल...... July 20 at 4:41pm · Unlike · 5 people

Raman Dutt Jha Hardik sardhanjali... July 20 at 4:49pm · Unlike · 5 people

Dhanakar Thakur हमर सभक श्रद्धानाजली हस्मीजी  के धनाकर ठाकुर 

Dr. Dhanakar Thakur Spokesman, Antarrashtriya Maithili Parishad July 20 at 4:50pm via · Unlike · 6 people

Amarendra Yadav ke karat ehi kshati ke purti ? July 20 at 4:51pm · Unlike · 5 people

Kumar Shailendra Hasmiji Succha maithilipremi rahathi.Hunak vinamrata aakarsit karaet chal aa aakhi me ekta ajeeb san dard rahaet chal. Allaha hunak samasta prijan ke e dukh sahabak sahas dethu.Hunka Jannat nasib honi.Hardik SRADHANJALI. July 20 at 5:00pm · Unlike · 5 people

Arvind Thakur जाहि किछु लोकक उपस्थितिसँ मैथिलीक उदार छवि बनैत छल,ओहिमे सँ हासमी एक छलाह|एहि क्षति आ शुन्यक पुर्ति नहि भए सकत|सृजन-यात्राक एक सहयात्री घटि गेल|अश्रुपुर्ण श्रद्धांजलि…।| July 20 at 5:48pm · Unlike · 7 people

Daya Jha Mithilanchali aai ekata aar kurshi sunn bha gel,hamar manak vina ke tar tuti gel. July 20 at 5:55pm · Unlike · 5 people

Daya Jha Mithilanchali shradhanjali arpit. July 20 at 5:56pm · Unlike · 5 people

Kumar Umesh Mahto dukhad samachar July 20 at 8:08pm · Unlike · 5 people

Daman Kumar Jha hamro ekhene pata lagal achhi,hunak chehara pratyksha bha aayal achhi,katek din hunka lel ....... anane chhi.shradhanjali July 20 at 8:23pm · Unlike · 8 people

Prity Thakur shradhanjali July 20 at 8:31pm · Unlike · 7 people  Gajendra Thakur फजलुर रहमान हासमीक जन्म -पटना जिलाक बराह गाममे। वृत्ति अध्यापक। हिन्दी कविता संग्रह "रश्मि राशि" आ मैथिली कविता संग्रह "निर्मोही" प्रकाशित। १९९६मे अबुलकलाम आजाद- अब्दुलकवी देसनवी, उर्दूसँ मैथिली अनुवादपर साहित्य अकादमीक मैथिली अनुवाद पुरस्कार।

(हिनकर एकटा कविता)

हे भाइ

हे भाइ

हमरा जुनि मारह

तोँ हमरा

दोसर जाति

दोसर धर्म्मक बूझि रहल छह-

मुदा हम छी

तोरे भ्राता

अग्रज वा अवरज!

हमरा सभकेँ एके माता

नहि मारह

गैर जानि कऽ

संसारक दृष्टिमे

तोँ पार्थ

आओर

हम “राधेय” बनल छी

मुदा “पृथा” जानि रहल अछि

हदय कानि रहल अछि

चुप अछि

मजबूरीसँ

बेवसीसँ

हे भाइ हमरा नहि मारह...। July 20 at 8:53pm · Like · 8 people

Vijay Kumar Jha fazlur ji ke aatma ke khuda jannat dai..shradhanjali July 20 at 9:19pm · Unlike · 8 people

Daman Kumar Jha HAASHMIJIk prasidha kavita thik THARMASAK CHAAH"' E THARMAS ACHHI/AEHI ME CHAAH ACHHI/GARAM-GARAM CHAAH/EYAH ACHHI HAMMAR JEEVAN/EYAH BHA-SAKAIT ACHHI/HAMMAR MREETYU/ JKHAN DHARI BHARAL RAHAIT ACHHI/THARMAS ME CHAAH/TA DHARI BHEER RAHAIT ACHHI MEETRAK/THARMAS RIKT HOITE /BHEER CHHANTI JAITACHHI/HAMRA RAAKHA PARAIT ACHHI/DHIYAN/DEG DEG PAR/THARMASK/MEETRAK/THARMASAK RIKT HOITANHI/HAMAR MEETRA BANI JAYIT/DOSARAK MEETRA............'' HAASHMI July 20 at 9:23pm · Unlike · 7 people

Vijay Kumar Jha bah daman bhai,,ahank nebok chah seho achhi... July 20 at 9:24pm · Unlike · 6 people

Vijay Kumar Jha hashmi ji nnek lok rahathi, bahute gote ke maithili me anlanhi July 20 at 9:25pm · Unlike · 6 people

Nagendra Kumar Jha neek kavita raakhlahu daman ji, he bhai bala kavita hamra sabhak class x maithili me rahay, hashmi ji ke shradhanjali July 20 at 9:36pm · Unlike · 7 people

Shiv Kumar Jha हमर जन्म मातृक मालीपुर मोड़तरमे भेल, हाशमीजी ओइ गामक बगलमे शिक्षक छला, मालीयेपुर गाममे रहै छला, हमर बाबूजी स्व. कालीकान्त झा बूच सँ साहित्य साधनाक क्रममे बड्ड अन्तरंगता भऽ गेल छलनि, पारिवारिक सम्बन्ध जकाँ, हमर बाल्यकालक उपनाम "टिल्लू" हिनके राखल छलनि, जखन हम नेना छलौं (४-५ बर्खक) तँ ओ हमरा कहै छला- "टिल्लू मियाँ राही, पेटमे कराही, आ दौरऽ हो सिपाही"-- हुनका हमरादिससँ श्रद्धांजलि.. July 20 at 9:42pm · Unlike · 8 people

Bechan Thakur fazlur ji ke hamar shradhanjali July 20 at 10:00pm · Unlike · 5 people

Dhirendra Kumar fazlur bhai nai rahlah sahsa vishwas nai hoiye..naman oei aatma ke July 20 at 10:02pm · Unlike · 5 people

Durganand Mandal hashmi ji ke aatmak sadgati lel parmatma se prarthana July 20 at 10:07pm · Unlike · 4 people

Kapileshwar Raut mrit aatma ke shradhanjali July 20 at 10:16pm · Unlike · 4 people

Avinash Jha bahut dukhad samachar, hasmi jee k nidhan s maithali bhasha aa sahitya k bahut paigh aaghat July 20 at 10:27pm · Unlike · 4 people

Priyanka Jha hashmi ji ke shraddha suman arpit karai chhi July 20 at 11:36pm · Like · 2 people

Anshuman Satyaketu Ekta setu je jorait chhal du ta dhara k , je banhait chhal samanantar baanh k . Tuti gel. Kshati ehi lel je sambhav vishmigat bha' gel. July 21 at 7:30am via mobile · Unlike · 2 people

Anshuman Satyaketu Ekta setu je jorait chhal du ta dhara k , je banhait chhal samanantar baanh k . Tuti gel. Kshati ehi lel je sambhav vishmigat bha' gel. July 21 at 7:30am via mobile · Unlike · 2 people

Anshuman Satyaketu Ekta setu je jorait chhal du ta dhara k , je banhait chhal samanantar baanh k . Tuti gel. Kshati ehi lel je sambhav vishmigat bha' gel. July 21 at 7:30am via mobile · Unlike · 2 people

Shiv Kumar Jha VIDEHA SAMPOONA GROUPAK DISH SAN MAHAAN KAVI KEN SHRADHANJALI. July 21 at 3:10pm · Unlike · 2 people

Sanjay Kumar Mandal अफसोस...! July 21 at 11:48pm · Unlike · 1 person  about an hour ago ·  Amit Jha bahoot nik jaankaqri delau apne.,,........ mithila samagra maithil evm vishwa ke kuno bhi bhag me rahai bala maithil premi lokak chhi, hamra taraf se har maithil sapoot je sat sat naman 43 minutes ago via mobile ·  Amit Jha haasim jee ke hunak yogdaan ke kaaran samagra maithil sasradha naman kay rahal chhainh 40 minutes ago via mobile · ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। चन्द्रेश, मनमीत कुटीर , राजपुत कलाँनी, मौलागंज दरभंगा। यर्थाथक अनुभुतिमे ऐतिहासिक दिनः झिझिया नृत्य महोत्सव

२०६८ साल आसीन १४ गते , नेपाल प्रज्ञा प्रतिष्ठान आ जनचेतना अभियान नेपालक संयुक्त अभियानमे झिझिया महोत्सव मनाओल गेल । एहि कार्यक्रमक सभापति रहथि श्री रामभरोस कापडि भ्रमर, उद्घाटक श्री विमलेन्द्र निधि, नेपाली कांग्रेसक केन्द्रिय सदस्य एवं सभासद आ मंच संचालक श्रीअशोक दत्त । उद्घाटन भाषण करैत प्रमुख अतिथि श्रीविमलेन्द्र निधि कहलनि जे डाइन जोगिन प्रथा पर आधारित झिझिया मुख्यत ः महिला लोकनिक थिक । मैथिली भाषा ओ साहित्यमे संस्कृतिक संरक्षण आवश्यक अछि । एहिसं सामाजिक समरसत्ता बढैत अछि । आइ जे झिझिया नृत्य संस्कृति विलुप्तक कगार पर अछि तकरा बचयबाक ओ अस्मिताके ई जगयबाक सार्थक प्रयास थिक । ओ एहि कार्यक्रमक उद्घाटन दीप प्रज्वलित क कयलनि । विषय प्रवर्तनक क्रममे स्वागत भाषण करैत श्रीराम भरोस कापडि भ्रमर , नेपाल प्रज्ञा प्रतिष्ठानक परिषद सदस्य, प्राज्ञ कहलनि जे झिझिया नृत्य आइ सं बारह–तेरह सय वर्ष पहिने शुरु भेल होयत । डाइन जोगिनसं बच्चा बुतरुके बचयबाक हेतु मिथिलाक महिला लोकनि द्धारा ई नृत्य होइत छल । जेकि ई हमरा लोकनिक सभ्यता संस्कृतिक अंग थिक तें आइ एकरा बचयबाक बेगरता अछि । नेपाल प्रज्ञा प्रतिष्ठानद्धारा आयोजित ई कार्यक्रम वस्तुतः अपन संस्कृतिके बचयबाक ओरियाओन थिक । आई सात गोट टीम झिझिया नृत्य प्रस्तुत करत आ एहि सभ संस्थाके कोनो ने कोनो रुपमे प्रोत्साहित करबाक एवं सम्मानार्थ पुरस्कृत करबाक अछि । विभिन्न स्थानक पुरस्कार राशि भिन्न भिन्न अछि । अंक पत्रक आधार पर क्रमश ः प्रथम, द्धितीय ओ तृतीय श्रेणीक बिजेता टीम घोषीत कयल जायत । निर्णायक मण्डलमे तीन गोट व्यक्तित्वक चयन कयल अछि –सर्वश्री डा. प्रफुल्ल कुमारसिंह मौन, डा. रेवती रमणलाल आ अयोध्यानाथ चौधरी । अंक पत्रमे पचास अंक विभिन्न क्षेत्र–वेश–भुषा मौलिक नृत्य, मौलिक गीत, घैलक बनावटि आ समग्र । जनकपुरमे एहि तरहक आयोजन पहिल थिक । ओ नेपाल प्रज्ञा प्रष्ठिानद्धारा कयल गेल काजके सविस्तार उल्लेख कयलनि । डा. राजेन्द्र प्रसाद विमल जनाओल जे तन्त्र मन्त्रक परम्परा वैदिक कालसं अछि । ई झिझिया नृत्य वैदिक ऋचासं लेल गेल अछि । ई एकटा आनुष्ठानिक यज्ञ बुझी तं थिक । एक तरहे लोक जागरणक प्रभाव थिक । डाइनक विभिन्न मुद्रा आ क्रिया–कलाप होइत अछि । मुइल बच्चाके जिया क नंगटे नाचब, नगर कोतबालके देखब अर्थात तन्त्र मन्त्रक प्रभाव कोनो ने कोनो रुपमे पड्तिे अछि । एहिसं लोक मुक्ति चाहैत अछि । समष्टि चेतनाक अन्तर्गत व्यक्ति चेतना समाहित भ जाइत अछि । शिव स्वयं अनादिक देवता छथि । परम्पराक निरंतरता तंत्र थिक । पितृपक्षमे पितरक बौआइत आत्मा सभ अबैत रहैत छथि ताहि क्षुधित आत्माक तृप्ति एहि झिझिया नृत्यमे होइत अछि । वैदिक परम्पराक निरंतरता घट नृत्यमे होइत अछि । इन्द्रियक ओ भाग जे पकडमे नहि अबैक से चेतना आ चेतनाक ओ भाग जे पकड्मे नहि अबैक से देव आ एहि दुनुक मध्य थिक तन्त्र । चेतनाक उध्र्वीकरणक लेल समाजक आवश्यकता छैक । झिझिया नृत्य बुझी त वैदिक, तान्त्रिक आ लौकिक परम्पराक समन्वित रुप थिक । एहिमे समयक अनुकुल परिष्कार आ भविष्यके देखैत वर्तमान स्तर पर विकासक रुप देबाक थिक । प्रो. परमेश्वर कापडिक कथन छल जे झिझिया मात्र नृत्येटामे नहि अछि आ ने गीत मे । ई जीवन सं जुडल बात थिक । तें मनुख्खक जीवन केन्द्रित ई नृत्य अक्षुण्ण रहबाक चाही ।  मंच संचालक अशोक दत्त जनाओल जे ई नृत्य महिला सशक्तिकरणक घोतक थिक । विशिष्ट अतिथि डा. प्रफुल्ल कुमारसिंह अपन आलेख प्रस्तुत करैत झिझिया नृत्यक परम्परा, विकास ओ सम्भावना पर अपन विचार प्रस्तुत करैत अतीतक कथा उदाहरणक रुपमे प्रकट कयलनि । ओ जनौलनि जे एहिमे दू तरहक भावना प्रकट होइत अछि – पहिल जे डानिके डानिपनक विरोधस्वरुप गारि पढब आ दोसर डाइनपनसं मुक्तिक बाट । सहस्र छेदबला घैलके लऽ कऽ नृत्य करव जाहिमे दीप बरैत होअय । ओ इहो स्पष्ट कयलनि जे बखरीक बकरियो डाइन होइत अछि । बाल रुच कथा ( चित्र सेन महाराजक भागिन ) माध्यमे ओ अपन बातके सिद्ध करैत एहि अनुष्ठानिक यज्ञके सामाजिक समरसताक आधार पर सिद्ध कयलनि । ओ व्यक्त कयलनि जे आलेखमे बहुत किछ झिझियाक विषयक विचारक उल्लेख अछि जे पढित भेला पर बहुत किछु शंकाक समाधान होयत । डा.रेवती रमणलाल जनाओल जे झिझिया नृत्य लोक पारम्परिक थिक । एहिमे महिला वर्गक सक्रियता होइत अछि । ई महिला जागरणक प्रतीक थिक आ संस्कृतिक आस्था पर्व ।  तदुपरान्त झिझिया नृत्य हेतु सात गोट टीमक प्रदर्शन भेल जाहिमे छल १. मां जानकी झिझिया टीम २. भैरव झिझिया टीम ३. जन चेतना अभियान झिझिया टीम ४.मिथिला मीडिया हाउस झिझिया टीम ५. नारी विकास केन्द्र झिझिया टीम ६.मां जानकी झिझिया टीम जानकी नगर ७. ज्वालामुखी झिझिया टीम सिनुरजोडा । निर्णायक मंडलद्धारा निर्णीत परिणामके घोषित कयलनि श्री रामभरोस कापडि भ्रमर सभापति जे प्रथम स्थान जन चेतना अभियान झिझिया टीम, द्धितीय भैरव झिझिया टीम आ तृतीय मिथिला मिडिया हाउस आ क्रमशः प्राप्त अंक छल १०१, ९९ एवं ९४ आ चारिटा टीमके सान्त्वना पुरस्कार सं पुरस्कृत कयल गेल । प्रथम पुरस्कार ३००० टाका, द्धितीय २००० टाका एवं तृतीय १००० टाका आ सान्त्वना पुरस्कार ५०० टाकाक छल । तदुपरान्त श्री रामभरोस कापडि भ्रमर लिखित भैया अएलै अपन सोराज नाटक जनचेतना अभियान मुजेलियाद्धारा मंचित भेल । एहिमे भाग लेलनि सर्वश्री राम विहारी राय–दीना, नरेश मण्डल– भद्री, सुनिल कुमार यादव–जोरावर सिंह, हरबाह–मिथुन यादव, रेविया–सुनिल राउत, लठैत–भोला मण्डल आ जयकरन, बुढी–पुष्पा यादव, कहार–सुरज मण्डल, महेश धनकार, पाश्र्व गायक–रामदेव सदा, बेचन सदा, भोला मण्डल, प्रकाश–नरेश मण्डल, ध्वनि विस्तार– संजय झा, रुप–सज्जा–भोला मण्डल, निर्देशक सुनिल कुमार यादव अछि ।  एकि कायक्रम पर टिप्पणी करैत राजेश्वर नेपाली कहलनि जे कार्यक्रमक जतेक प्रशंसा कयल जायत थोड होयत । ई बहुत पैघ काज भेल अछि । संस्कृतिके बचयबाक प्रयास भेल अछि । नाटकक सफल मंचन भेल अछि जे हृदयके छुलक अछि । सामाजिक जागरण होयत से विश्वास झलकैत अछि ।  समग्रतामे टिप्पणी करैत चन्द्रेश स्पष्ट कयल जे धर्म–अधर्म ओ अन्ध विश्वाससं जुडल तन्त्र मन्त्र पर आधारित ई झिझिया नृत्य महिला चेतनाक प्रतीक थिक । एहिमे शारीरिक ओ मानसिक स्तर पर विकास होइत अछि । ई गतिशील मुद्रामे होइत अछि । देहक नसमे शोणितक प्रवाह आ एकाग्रतामे ध्यान केन्द्रित कऽ ई नृत्य अवस्से मानसिक चेतनाके जगबैत अछि आ स्नायुतन्त्रके झंकृत कऽ स्वस्थ्य मानसिकताक विकास करैत अछि ।  ओ नाटक पर विचार केन्द्रित करैत जनाओल जे सामन्ती शोषणक विरोध स्वरुप ई नाटक सामाजिक–राजनैतिक चेतनाक संग लोक चेतनाके जगबैत अछि । वस्तुतः ई नाटक ओ लुत्ती थिक जकर पसाहीमे धु–धु जरैत सामन्ती मनोवृतिक नाश होयत आ नव उमंगमे लोक जीवनक नव संस्कार होयत । खासकऽ अभिनयकर्ता लोकनि अपन–अपन स्वभाविक ओ यथार्थ अभिनयमे रंगमंचक सार्थकता सिद्ध कयल अछि से एहि नाटकक सफलता ओ सबलता थिक । हमरा विशेषकऽ मिथुन यादव, हरबाहक अभिनय ततेक निक लागल अछि जे आनो आन कलाकार गणसं एहिसं सीखबाक थिक जे अभिनयक सजीवता मर्म स्थल धरि उतरि सकय । ओना कोनो पात्रक अभिनय ककरो सं कम नहि, सभ उपरा–उपरी । मुदा बुढी–पुष्पा यादवक अभिनयमे आरो निखार होयबाक थिक ।  श्री अयोध्यानाथ चौधरी कहलनि जे स्वाभाविकतामे पनुगैत ई नाटक वस्तुतः समाजमे लोकजागरण आनत । डा.रेवती रमणलाल एहि नाटकक भरपुर प्रशंसा कयलनि । ओ एहन–एहन नाटक खेलयबा पर जोड देलनि । डा. प्रफुल्ल कुमारसिंह मौन कहलनि जे भैया अएलै अपन सोराज नाटकक कथानक ओ उदेश्य पूर्णतः जीवन्त अछि । अभिनयकर्ताक अभिनयमे बुझायल जे सभ केओ स्वयं भोक्ता छथि । एहिमे सामन्तवादक प्रखर विरोध भेल अछि ।  डा. राजेन्द्र प्रसाद विमलक कथन जे ई नाटक दलित चेतनाक प्रतीक थिक । अन्र्राष्ट्रिय जगतमे एहन नाटकक मांग अछि तें एकरा अंग्रेजीमे अनुदित होयबाक चाही । संगहि ओ एहि नाटकके काठमाण्डुक गुरुकुलमे प्रदर्शन पर जोड देलनि । नाटकमे किछ एहन दृश्यक संयोजन अछि जे जीवन्तताक प्रतीक थिक आ हम ई नाटक देखि भाव विभोर भऽ गेलहु । अन्तमे सभापति भ्रमर जनाओल जे एहि कार्यक्रमके सम्पादित कऽ आ दर्शकक उत्साह देखि हम गौरवान्वित बोध करैत छी आ नेपाल प्रज्ञा प्रतिष्ठानसं आरो काज करबाक लेल हम संकल्पित छी ।  निष्कर्ष – १. कार्यक्रम पूर्ण रुपेण सफल रहल ।  २.सयोसं बेसी महिलाक उपस्थिति दर्शक वृन्दमे महिला जागरणक प्रतीक बनि उभरिकऽ आयल । ३. झिझिया नृत्यक संयोजन पहिल बेर जनकपुर की नेपाल परिसरमे भेल खासकऽ नृत्य प्रतिगागिताक रुपमे सम्पादित ।  ४.ई एतिहासिक महत्वक दिन कहल जायत जे अपन अस्मिता ओ संस्कृतिक उत्थानक लेल भेल ।  ५. सात गोट झिझिया टीमक उपस्थितिबोध अवस्से महिला वर्गके पहिल खेप मंचपर आयब आ अपन नृत्य प्रस्तुत करब अबस्से महिला वर्गक प्रतिनिधित्वक सुूचक बनल । खासकऽ निम्नेतर महिला वर्गक प्रतिनिधित्व होयब समाजमे नारी जागरणक प्रतीक थिक ।  ६. उद्योग वाणिज्य संघक हाँल खचाखच भरल रहल । झिझिया नृत्य आ नाटक होयबा धरि दर्शकगण नहि हिलल–डोलल ।  ७. भैया अएलै अपन सोराजक प्रस्तुत कैक ठाम भेल अछि । मुदा एहि ठामक प्रस्तुतिमे सजीवता ओ जीवन्तता प्रदर्शित भेल ।  ८. सभ वयसक लोकके ई कार्यक्रम प्रभावित कयलक ।  ९. एहिमे निम्नेतर वर्गक प्रतिनिधित्व त भेवे कयल आ विशेष कऽ ओहि वर्गक लोकके अपन समारोह जे बुझायल से सभक मोनके जीति लेलक । खासकऽ बुढ पुराणक संगहि बूढि महिला सभ सेहो खुशीमे उठि बैसल ।  १०. नाटकमे किछु विसंगति अबस्से खटकल खासकऽ संगीत पक्षक क्रमबद्धतामे, मुदा अभिनय पक्ष ओ गीतक माधुर्यमे सभटा बिला गेल ।  ११. अभिनयकर्ताके आरो अभिनयके उचाई पर कलात्मकतामे लऽ जायब आवश्यक । मुदा प्रस्तुतिक सफलता निस्सन्देह सफल थिक ।  १२. कार्यक्रम सुस्थिर, सुनियोजित आ व्यावहारिक रहल ।  १३. ई सत्य थिक जे एहि नाटकक गमैया परिवेशमे जे अभिनयकर्ताद्धारा सजीवता प्रस्तुत कयल गेल अछि से प्रशंसनीय थिक ।  १४. झिझिया नृत्यमे महिला वर्ग प्रदर्शित कऽ अपन उद्गार व्यक्त कयलनि से देखिते बनैत छल । कारण नृत्यकर्मी वर्गक मनुहार स्पष्ट झलकि उठल । खासकऽ पुरस्कृत होयबाक काल महिला वर्गक उत्साह देखवायोग्य छल ।  १५. जे महिला वर्ग भाग नहि लेलनि से अगिला महोत्सवमे भाग लेबाक हेतु उत्साहित भाव प्रकट कयलनि । १६. समग्रतामे लोक कल्याणपरक कार्यक्रम उध्र्वमुखी भेल आ अपन विशिष्टतामे अमिट तिथि साबित केलक । ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। जवाहर लाल कश्यप (१९८१- ), पिता श्री- हेमनारायण मिश्र , गाम फुलकाही- दरभंगा। एक टा विहनि कथा भगवानक भाग्य हम आ हम्मर दोस्त चौक पर चाह पिबैत रही / बात पर बात चलैत रहै / कर्म आभाग्य पर बात चललै / कर्म प्रधान विश्व रचि राखा ,जो जस करहि सो तस फल चाखा /तुलसी दासक पंक्ति कहि एकटा बुढा कर्मक प्रशंसा केलथि / हम्मर दोस्त कहलक -एकर मतलब अहां भाग्य के नहि मानैत छी ? नहि / बुढा कह्लथि। दोस्त कहलक - मानयौ बा नहि , भाग्य त भगवानो के होयत छैन्ह / अपनो गाम मेएकटा हनुमान जी छथि जे पाखैर गाछ केर नीचा मे वरखा मे भीजैत, जाड़मे ठिठुरैत आगर्मी मे अपस्यांत भेल रहैत छथि / चाउर मे दुटा दाना चिनी मिला भोग लगैत छन्हि /एकटा पटना मे हनुमानजी के मन्दिर अछि जिनका सवामन लड्डु एक दिन मे भोगलागैत छैन्ह / हुनकर गप्प सुनि सब चुप भऽ गेलाह/ ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। श्यामसुन्दर शशि,जनकपुरधाम कोजग्रा धूमधाम संग मनाअ‍ोल जा रहल

पान एलैए । मखान एलैए । धिया पूताके खायके सामान एलैए । आई कोजाग्रत पूर्णिमा । नव दम्पतिक घरमे हर्ष वधाई भ रहल अछि । पान मखान आ मिष्ठान्नक खर्च बढि गेल अछि । सन्ध्या वतासा लुटाओल जाएत । एहि अवसरपर जानकी मन्दिरमे एक सय एक भाड आएल । असलमे रतौलीक महेन्द्रप्रसाद ठाकुरके परिवार विगत एक सय छ वर्षस‘ कोजाग्रत पूर्णीमाक दिन जानकी मन्दिरमे भाड पठवैत आएल छथि । असलमे ठाकुर परिवार भगवती सीताके बेटी मानैत अछि आ बेटिए जकॉ आजुक दिन पान,मखान,मिष्ठान्न आ कपडा लत्ताक भाड पठवैत आएल छथि । आई सन्ध्या जानकी मन्दिरमे सेहो भव्यताकसग कोजाग्रत पूर्णिमा मनाओल जाएत । मैथिलानीलोकनि राम सीताक चुमाओन करौतीह । महन्थ रामतपेश्वर दास वैष्णव सीताक पिताक रुपमे मखान आ बतासा लूटौताह । 

(चित्र श्यामसुन्दर शशि) ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। जगदीश प्रसाद मण्‍डल- १.वीरांगना तामक तमघैल १ वीरांगना एकांकी जगदीश प्रसाद मण्‍डल पहि‍ल दृश्‍य- (अपन-अपन आंगनसँ नि‍कलि‍ रस्‍ताक भकमोड़ीपर ठाढ़ भऽ...) सोमना काका   : सुनै छी जे रमफलबा आएल हेन? रूपनी दादी    : सएह ते सुनलौं मुदा तेहन लोकक मुँहे सुनलौ जे सुनि‍यो कऽ अनवि‍सवासे अछि‍। तँए दोसर गोटेसँ भाँज लगबए वि‍दा भेलौं। चेथरू        : नै-नै बात ठीके छि‍ऐ। सोनमा काका   : से तूँ केना बुझै छहक? चेथरू        : ओहन लेाकक मुँहे सुनलौं जेकरा मुँहसँ असत् बात नि‍कलि‍ते ने छै। सोनमा काका   : जेकरा मुँहे ओ सुनने हएत वएह जँ असत् कहने होय, तखन? रूपनी दादी    : से तँ भऽ सकै छै। मुदा तहूमे भाँज छै। सोनमा काका   : से की भाँज छै? चेथरू        : से अहाँ नै बुझै छि‍ऐ काका, जे देखलाहा बजैए ओ सत होइ ैछ आ जे सुनलाहा रहै छै ओइमे दुनू होइ छै। सोनमा काका   : हँ से भऽ सकैए। केहेन लोकक मुँहे सुनने छेलह? चेथरू        : दूधवाली मुँहे सुनने छलौं। वएह जे दूध बेचि‍ कऽ ओइ टोलसँ आएल छलै, बाजलि‍ रहए। सोनमा काका   : उ ते दूध बेचैमे लागल हएत आकि‍ बात बुझै पाछू। चेथरू        : ओकरा अहाँ नीक जकाँ नै चि‍न्‍है छि‍ऐ। कोनो की माछ-कौछ बेचैवाली छी जे पएरक औंठासँ पलड़ा दाबि‍ उठा देबै आ घट्टी जोखि‍ देबै। सोनमा काका   : दूधो बेचैवाली तँ पोखरि‍क पानि‍ये मि‍ला दै छै, से। चेथरू        : हँ, से तँ होइ छै। मुदा ओकर कारोवार रहै छै कएक दि‍न। बाढ़ि‍क पानि‍ जकाँ आएल आ पड़ाएल। रूपनी दादी    : हँ, से तँ देखै छि‍ऐ जे जहि‍यासँ काज धेलक तहि‍यासँ ने ओकर दूध नप्‍पा फुच्‍ची फुटल आ ने नाप-जोखक बदनामी कहि‍यो लगलै। चेथरू        : (अपन पक्ष मजबूत होइत देखि‍, मुसकि‍या..) दादी, बुढ़ि‍या देखैमे ने एक चेराक बुझि‍ पड़ैए मुदा गामेक नै, घर-घरक रत्ती-बत्ती बात बुझैए। सोनमा काका   : की सभ कहलकह? चेथरू        : बाजलि‍ जे दि‍ल्‍लीसँ मालि‍क अपना गाड़ीपर लादि‍ कऽ पहुूँचा गेलहेँ। सोनमा काका   : एतबे कहलकह आकि‍ आगूओ कि‍छु बजलह? चेथरू        : एतबे बजैमे तँ ओ अपन डाबासँ दूध नापि‍ लोटामे दऽ“” देलक आ उठि‍ कऽ“”वि‍दा भेि‍ल। सोनमा काका   : एहेन-एहेन बात तँ सरि‍या कऽ ने बुझि‍ लेबाक चाही। चेथरू        : जाइत काल एते बात भनभनाइत सुनलि‍ऐ जे एकटा टाँग काटि‍ कऽ पठा देलकै आ पान साउ रूपैयासँ नोइस हेतै? सोनमा काका   : एते पैघ बात आ कनि‍यो अॅटका कऽ नै पुछि‍ लेलहक? चेथरू        : काका, ओइ बुढ़ि‍याकेँ की बुझै छि‍ऐ, कोनो की हमरे ऐठामटा अबैए जे नि‍चेनसँ गप-सप्‍प करब। सोनमा काका   : तखन? चेथरू        : ओ बुढ़ि‍या फुच्‍चि‍ये-फुच्‍ची दूधेटा लोककेँ दइ छै आकि‍ मि‍सरि‍यो घोड़ै छै। सोनमा काका   : से की? चेथरू        : हम की ओते बूझै छी जे तेना भऽ कऽ बुढ़ि‍याक सभ बात बुझि‍ लेबै, तखन तँ जते काज रहैए ओते तँ भइये जाइए दादी लगमे सभ दि‍न बैसैत देखै छि‍ऐ। रूपनी दादी    : हँ, से तँ बैसबो करैए आ गामक तीत-मीठ गपो कहैए। मुदा घुरैकाल बैसैए, तँए अखन भेँट नै केलकहेँ। सोनमा काका   : ऐ तत-मतीसँ नीक जे ओकरा घरेपर पहुँच मुँहा-मुँही गप कऽ ली। चेथरू        : काका, तइले तीनू गोरे कि‍अए जाएब। असकरे जाइ छी, सभ बात बुझि‍ कऽ सुनाओ देब? रूपनी दादी    : सभ दि‍न तोँ चेथरू-के-चेथरूऐ रहि‍ गेलेँ। पोता-पोती भेलौ से होश नै छौ। चेथरू        : दादी, एक ढाकीक के कहए जे सत्तरह ढाकी पोता-पोती भऽ जाएत तैयो अहाँ लगमे चेथरूए रहब। कोनो बात-वि‍चारक जे जरूरत हएत तँ अहाँसँ नै पुछब, सोनमा काकासँ नै पुछबनि‍ तँ की बगुरक गाछ आ पसीद काँटक गाछसँ पुछबै? रूपनी दादी    : देखहक चेथरू, हम अपना नजरि‍ये देखबो करब आ पुछबो करबै, तहि‍ना तोहूँ सोनाइ भेलह कि‍ने? चेथरू        : तइ नजरि‍ये कहाँ कहलौं। तीनू गोटे जे एकेटा काजमे बड़दैतौं, तइ दुआरे कहलौं। रूपनी दादी    : से बड़ बेस। मुदा काजक आँट-पेट नै बुझै छहक। कहैले सभ काजे छी, मुदा ओहूमे छोट-पैघ, नीक-अधला होइ छै। चेथरू        : कनी परि‍छा कऽ कहि‍यौ? सोनमा काका   : ठीके चेथरू, तूँ कहि‍यो पुरूख नै हेबह? चेथरू        : काका, अहाँ सने जे कोनो पुरूखपना काज करबै तइसँ पुरूख नै हेबै। सोनमा काका   : पुरूखक संगी हेबहक। पुरूख तखन हेबह जखन अपने ठाढ़ भऽ आगूक डेग बढ़ेबह। अखन दोसर-तेसर बात छोड़ह आ रमरूपाक भाँज नीक-नहाँति‍ लगावह। चेथरू        : जखन अहाँ सबहक वि‍चार अछि‍ तखन तीनू गोरे चलू। (तहीकाल आगूसँ जुगेसर अबैत..) सोनमा काका   : जुगे कि‍महर-कि‍महरसँ एलह? जुगेसर       : काका, की कहब (गुम्‍म होइत...) चेथरू        : मुँहक बात दबलह कि‍अए? कि‍छु भेलौं तँ हम सभ समाज भेलौं। न्‍यायालय भेलौं। अगर हमरा समाजक अंगक संग कोनो अन्‍याय दोसर समाज करत तँ ओ बरदाससँ बाहर अछि‍। की सोनमा काका..? सोनमा काका   : चेथरू जे बात तूँ बजलह वएह गामक प्रति‍ष्‍ठा छी। मुदा, पाकल आम भेलि‍यह, सभ दारो-मदार तँ तोरे सभपर छह। चेथरू        : जुगे भाय, अहाँ तँ आँखि‍क देखल बाजब। रामरूपक कि‍...? जुगेसर       : देखैबला दृश्‍य नइए। अपने रामरूप ओछाइनपर ओंघराएल अछि‍ आ घरवाली ओछाइनि‍क नि‍च्‍चाँमे ओंघरनि‍या दऽ रहल अछि‍। तीन सालक बच्‍चा झाँपल कपड़ा हटा-हटा पएर तकैए। रूपनी दादी    : बाप रे बाप! समाजक एकटा घर उजड़ि‍ गेल। जुगेसर       : दादी, अहाँ नै जाउ। सोनमा काका अहूँ नै जाउ। सोनमा काका   : कि‍अए? जुगेसर       : ओहन दृश्‍य देखैक करेज आब नै रहल। हो-न-हो पहि‍लुके नजरि‍मे ने अपने...? चेथरू        : दादी, कहने तँ पहि‍ने छलौं, मुदा हमरा गपक मोजरे ने देलौं। आब कहू जे कोनो अनरगल कहने रही? सोनमा काका   : हँ, से तँ बात मि‍लि‍ऐ गेलह। मुदा एते बात बुझि‍ कऽ तँ नै बाजल छलह?अच्‍छा, एतै बैस कऽ सभ बात कहह। जुगेसर       : एतए तँ लोकक करमान लागल छै। तहूमे धि‍या-पूता आ आ झोटहा भरि‍ देने अछि‍। चुट्टी ससरैक जगह नै छै। सोनमा काका   : गप कि‍छु कहह ने? जुगेसर       : कोनो बात की सोझ डारि‍ये चलए दइए। एक तँ कारकौआक जेर जकाँ धि‍या-पूता काँइ-काँइ करैए तइपर सँ जनि‍जाति‍ भि‍न्ने छाती पीटैए। चेथरू        : तैयो तँ भाँजपर कि‍छु गप चढ़ले हेतह? जुगेसर       : हँ, एते उड़नति‍ये सुनलौं जे डरेवर जाइ काल बाजल जे कारखाना मालि‍क इलाजमे तीन लाख रूपैया खर्च केलखि‍न। पाँच सए खाइ-पीऐले, आ लत्ता-कपड़ा सेहो देलखि‍न। रूपनी दादी    : पान सए रूपैआ कते दि‍न चलतै। तहूमे सभटा लोथे भेल। जहि‍ना रामरूप तहि‍ना बच्‍चाक संग बच्‍चाक माइयो। केना बेचारी दुनूकेँ छोड़ बोनि‍-दुख करए जाएत। चेथरू        : से तँ ठीके। मुदा दादी झोटहा सबहक वि‍सवास कोन। बेटाकेँ जहर-माहूर खुआ देत आ घरबलाकेँ छोड़ि‍ पड़ा दोसर घर चलि‍ जाएत। रूपनी दादी    : सेहो होइए चेथरू। तोरो बात कटैबला नहि‍ये छह मुदा एक्के दाबि‍ये केना खि‍चड़ि‍यो रान्‍हवह आ खीरो। एकटामे नून पड़त एकटामे चि‍न्नी। चेथरू        : से तँ ठीके कहै छि‍ऐ दादी। एहि‍ना ने भालेसरोकेँ भेल। ओहो जे जौमक गाछपर सँ खसि‍ जाँघ तोड़लक आ डाक्‍टरो बुट्टी भि‍ड़ा कऽ काटि‍ देलकै। फेर ओ बेचारी (भालेसरक पत्नी) केना छह मसुआ बेटीक संग रहि‍ ता जि‍नगी घरबलाक सेवा केलक। सोनमा काका   : सोझे सभ गप खि‍स्‍सा जकाँ सुनने नै हेतह चेथरू। ओना जुगेसर ठीके कहलकह। अखन छोड़ि‍ दहक। बेरू पहरमे चलब। रूपनी दादी    : हँ, हँ, एहेन-एहेन जगहपर नै गेने समाजक रसे की रहत। समाज तँ तखने ने समाज जखन सबहक सुख-दुख सेगे पोखरि‍मे नहाइ। चेथरू        : कनि‍ये-कनि‍ये जे सोचै छी दादी तँ बुझि‍ पड़ैए जे समाजपर एकटा भार पड़ि‍ गेल। (()) क्रमशः.. २ गतांशसँ आगाँ... एकांकी तामक तमघैल जगदीश प्रसाद मण्‍डल दोसर दृश्‍य- (खैर-चून मि‍ला, रागि‍नी अल्‍मुनि‍यम डेकचीक पेनमे लगबैत..) रागि‍नी        : कपार फुटने लोकक सभ कि‍छु फुटए लगै छै आ जुटने सभ कि‍छु जुटए लगै छै। जखन नूनो-तेल जोड़ैमे भीड़ पड़ैए तखन डेकची कीनब असान अछि‍। कत्ते दि‍न चून-खैर साटि‍ काज चलत। जखन फुटि‍ गेल तखन आरो बेसि‍ये होइत जाएत की दढ़ हएत। (बाड़ि‍ये देने झटकल बलाटवाली अबैत...) रागि‍नी        : कि‍अए सि‍ताएल नढ़ि‍या जकाँ बाड़ि‍ये-बाड़ी पड़ाएल एलह हेन? बलाटवाली     : (हँफैत) की कहबनि‍ दीदी, ई की कोनो नै जनै छथि‍न जे जेहने बेटा अछि‍ तेहने पुतोहू। बीचमे हम दुश्‍मन। रागि‍नी        : की करबहक, जखन बेटे माएकेँ नै चि‍न्हलक, जेकरा नअ मास पेटमे रखलक तखन पुतोहू तँ सहजहि‍ दोसराक बेटी छी। बलाटवाली     : कहै तँ दीदी ठीके छथि‍न, मुदा होइए इहए कहथु जे ओइ घर-दुआरमे हमर कि‍छाे ने अछि‍। हम कतौसँ दहा-भसा कऽ आएल छी। रागि‍नी        : से के कहै छह! लोकक मति‍ये मरा गेल अछि‍। जे माए-बाप दादा-दादी एतेटा जि‍नगी बि‍ता एते देखलक ओ कि‍छु ने आ छौड़ा-छौड़ी कि‍छु ने देखलक ओ बुिद्धयार भऽ गेल अछि‍। से नै देखै छहक। बलाटवाली     : हँ, से तँ देखै छि‍ऐ। सभ कहैए जे जुग-जमाना बदलि‍ गेल आ कि‍छो देखबे ने करै छि‍ऐ तँ केना वि‍सवास हएत। रागि‍नी        : जहि‍ना दि‍शांस लगने लोक पूबकेँ पछि‍म आ उत्तरकेँ दछि‍न बुझए लगैए तहि‍ना भऽ गेल अछि‍। बलाटवाली     : नै बुझलि‍यनि‍? रागि‍नी        : जुग-जमाना बदलल नै आगू डेग बढ़ौलक हेन। बदलैक माने होइ छै एकटाकेँ हटा दोसर आनब। से नै भेलहेँ। जँ से होइते तँ देखतहक सभ कि‍छु आगि‍मे जड़ि‍ गेल आ बाढ़ि‍मे दहा गेल आ फेरसँ सभ कि‍छु नवका भऽ गेल। बलाटवाली     : छोड़थु ऐ मगजमारी गपकेँ। अपन बात वि‍सरि‍ जाएब। अनकर गप सुनने मगज भरि‍येबे करै छै। जाबे अपन बात नै बुझब ताबे माथ हल्‍लुक केना हएत? रागि‍नी        : की भेलह हेन जे एते....? बलाटवाली     : ि‍क कहबनि‍ खेलरा-खेलरीक गप, दुनू एके रंग अछि‍। एते दि‍न मौगीक गप नीक लगै छलै, आब जे हुकुम चलबए लगलै तँ बकछुहुल लगै छै। रागि‍नी        : तूँ तँ केहन बढ़ि‍या जीबै छह। दुनू पहर दू पथि‍या घास अनै छह आ दुनू साँझ खाइ छह। बेटा-पुतोहू जे घर दफानि‍ये लेलक तँ आते जाने हल्‍लुक केलकह कि‍ने? बलाटवाली     : हँ, से तँ भेल। मुदा से देखल जाइए। जते काल बाधमे रहै छी ततबे काल ने, जखन अंगनामे रहै छी तखैन केना देखल जाएत। (तही बीच सुनरलाल ललकैत अबैए..) सुनरलाल      : दादी, ऐ बुझ़ि‍याकेँ पूछि‍यौ जे कि‍अए छि‍टकल घुरैए। बलाटवाली     : दीदी, ऐ छौड़बाकेँ पूछि‍यौ जे हमरा माए बुझैए। तखन ते अपन बनाओल घर छी, लछमीक (गाए) सेवा करै छी वएह पार लगौताह। सुनरलाल      : हम तोरा माए नै बुझलि‍यौ आकि‍ अपने पुतोहूकेँ कपारपर चढ़ा लेलेँ। जे तोरा कपारपर चढलौ ओ कुदि‍ कऽ हमरा कपारपर नै चढ़ि‍ जाएत। बलाटवाली     : हँ रौ, चारू कातसँ हारलेँ हेँ तखैन तूँ हमरा बुझबै छेँ। आइ तक एक्को दि‍न भेलौ जे माएकेँ कोनो तीरथ करा दि‍ऐ। ई तँ धैन दीदी जे लाटमे जनाकोपुर, सि‍ंहेसरो आ कुशेसरो देखलौं। रागि‍नी        : (बलाटवालीकेँ चोहटैत) तोहूँ बेड़े बजै छह, अखैन तक अपन उमेरोक ठेकान नै छह। कि‍अए बुढ़ि‍यापर बि‍गड़ल छहक बौआ? सुनरलाल      : माएपर कि‍अए बि‍गड़ब। देखि‍यौ जे हाथपर ओते पाइ नइए जे पनरहम दि‍न बेटाक नाआें कोचि‍ंगमे लि‍खाएब तइपर सँ कन्‍यादानी नौत सासुरसँ चलि‍ आएल हेन? बलाटवाली     : दीदी, बात छि‍पा कऽ बजै छन्‍हि। ई दुनूटा चाहैए जे गाए बेचि‍ भोज खा आबी। रागि‍नी        : कनी फरि‍छा कऽ कहह? बलाटवाली     : ऐ धड़कटहाकेँ पुछथुन जे मात्रि‍क उसरि‍ गेल आकि‍ अछि‍। इज्‍जत बँचबै दुआरे भाति‍ज सभकेँ कहि‍ देलि‍ऐ जे बौआ, आब ओते चलि‍-फि‍र नै होइए जे आएब-जाएब करब। ओहो सभ परदेशि‍या, गाम अबैए तँ दस-बीस रूपैइयौ आ लत्तो-कपड़ा दऽ जाइए। एकरा पुछथुन जे एक बीत नुओ कीन कऽ दइए। रागि‍नी        : तोहूँ बड़ रगड़ी छह बलाटवाली। कनी फरि‍छा कऽ कहह बौआ? सुनरलाल      : दादी, ननौरवालीक बहीन बेटीक बेटीकेँ वि‍आह छी। सभटा परदेशि‍या भऽ गेल नवका-नवका वि‍धि‍ बेबहार सभ करैए। पुरना गामक लोक लए छोड़ि‍ देने अछि‍। रमेशक सभ संगी झंझारपुर कोचि‍ंगमे नाअों लि‍खाओत, ओकरा हम नै लि‍खेबै से केहेन हएत? रागि‍नी        : ऐ काजमे के मुहछी मारतह। भगवान करथुन चारि‍यो अक्षर जे पढ़ि‍ लेतह ओते नीके हेतह कि‍ने। अहूना लोक बजैए जे पढ़ल-लि‍खल हरो जोतत तँ सि‍रौर सोझ हेतै। कनि‍याँक की वि‍चार छन्हि‍? सुनरलाल      : ओ कहैए जे सबहक ठाठ-बाठ बजरूआ रहतै तइठीन जे हम जाएब से केना जाएब। हमरा देख ओ सभ हँसत नै। रागि‍नी        : बौआ, जाबे असथि‍र मनसँ घरक नीक-अधला नै बुझबहक ताबे एहि‍ना हेतह। तोरा जे कहबह से अपने नै देखै छह। बेटा-पुतोहू शरहमे खेत कीनलहेँ। घर बनाओत। आ हम ऐठाम नून-तेल ले मरै छी। सुनरलाल      : अखनो जे एक रती चुहचुही अछि‍ से अही बुढ़ि‍यापर। खेत-पथारक कोनो लज्‍जति‍ अछि‍। गोटे बेर बाढ़ि‍ये चलि‍ अबैए तँ गोटे बेर रौदि‍ये भऽ जाइए। गोटे साल हबे तेहेन बहैए जे दने भौर भऽ जाइ छै। कीड़ी-फतीगि‍ंक चरचे कोन। रागि‍नी        : बौआ, घरक पुरूख तँ तोंही ने छहक? तोंही ने गारजन भेलहक? सुनरलाल      : हँ, से तँ छि‍ऐ मुदा कि‍यो मोजर देत तखैन ने। ई बुढ़ि‍या अखनो बेदरे बुझैए तँ घरवाली की बुझत? बलाटवाली     : थूक देथुन एहेन छौंड़बाकेँ? रागि‍नी        : दुनि‍याँमे माइयक सेवा बेटाक लेल ओहन होइत जेकर जोड़ा नै छै। तखन रंग-बि‍रंगक माए-बाप, बेटा-बेटी भऽ गेल अछि‍। तँए दुनि‍याँ दि‍स नै देख अपन ऐनामे माएकेँ देखि‍ हृदैमे समुचि‍त जगह देबाक चाही। बलाटवाली     : दीदी, पैघ फड़क पैघ लत्ती होइ छै, मुदा छोटक तँ छोटे होइ छै। रागि‍नी        : हँ से तँ होइ छै। अच्‍छा बौआ, एते दूरक लत्ती केना पकड़ि‍ लेलकह। नैरह-सासुर धरि‍क लत्ती तँ ठीक छै मुदा नोनी साग जकाँ केना एते चतरि‍ गेलह। सुनरलाल      : दादी, की कहब। ई सार मोबाइल जे ने करए। मोबाइलेपर नौत-पि‍हान, ए.टी.एम.सँ लेन-देन तेहन रस्‍ता धड़ा देलक हेन जे फुदि‍योसँ बेसी लोक उड़ए लगल हेन। रागि‍नी        : बौआ, अनकर की कहबह, अपना पोताकेँ दस बर्ख भऽ गेल अछि‍, अखैन तक एक नैन देखलौं तक नै। तखन ते छातीमे मुक्का मारनहि‍ छी जे जखैन बेटे नै तखन पुतोहुए आ पोते-पोती कतए। सुनरलाल      : तखन की करी दादी? रागि‍नी        : बौआ, कि‍छु जे धाँइ दे कहि‍ देबह से नीक नै हएत। कि‍अए तँ घरमे (परि‍वारमे कते) कते रंगक लोक रहैए। अपना रंगे सभ देखै छै। तँए एके बात एककेँ नीक लगै छै दोसरकेँ अधला। जेकरा अधला लगतै ओ तँ अधले कहत। सुनरलाल      : दादी, अहाँक बात माइयो मानैए। अहाँ जे कहब सएह करब। रागि‍नी        : बौआ, देखहक जखने कमाएत कोइ आ खर्च करत कोइ तखने कि‍छु-ने-कि‍छु गड़बड़ हेबे करत। सुनरलाल      : तखन? रागि‍नी        : यएह जे परि‍वारकेँ सभ संस्‍था बुझि‍ इमनदारीसँ जीबाक चाही। सुनरलाल      : ननौरवाली केना सुढ़ि‍आएत? रागि‍नी        : बौआ, बेटा तोरे नै ननौरोवालीक छि‍ऐक। स्‍कूलमे की खर्च होइ छै से तँ तूँ बुझै छहक। मुदा माए नै बुझै छै। तँए कहक जे रमेशक नाओं स्‍कूल जा लि‍खा दि‍औ। बलाटवाली     : बेस कहलि‍ऐ दीदी। बैसल-बैसल देह पोसैए आ बात गढ़ैए। भने कहलि‍ऐ? सुनरलाल      : कहने थोड़े चलि‍ जाएत। कहत जे बुझले ने अछि‍ बौआ जाएब। रागि‍नी        : (मुस्‍कुराइत) बौआ, यएह बात सभकेँ बुझए पड़तै। सोझे कौआ जकाँ अकासमे कुचड़ने नै हेतै। बलाटवाली     : दादी कहथुन ने, जे हाटपर दू सेर सीम भट्टा कीनत तँ सेगे दुनू गोरे जाएत। आ स्‍कूलमे जा कऽ नाओं लि‍खा देतै, से नै हेतै। तइकाल पाग उतड़ि‍ जेतै। रागि‍नी        : बेस तँ कहलहक। (()) क्रमश: ....... ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। नवेंदु कुमार झा १.जन चेतना यात्रा मोदी सॅ सचेत अछि भाजपा २.प्रधानमंत्री भाजपा १ जन चेतना यात्रा मोदी सॅ सचेत अछि भाजपा

भारतीय जनता पार्टीक वरिष्ठ नेत लाल कृष्ण आडवाणीक जन चेतना यात्राक लऽकऽ पार्टीक प्रदेश इकाई दिन-राति एक कएने अछि। सिताबदियारा सॅ लऽ कऽ बक्सरक उŸार प्रदेश सॅ सरल सीमा धरि श्री आडवाणीक स्वागत मे कोनो कसरि नहि नहि छोड़लक अछि। छोट सॅ पैघ सभ नेताक पोस्टर आब नजरि आबए लागल अछि। भाजपाक एहि पोस्टर मे सभ नेताक फाटो तऽ अछि मुदा प्रधानमंत्रीक दावेदार मानल जाए बाला गुजरातक मुख्य मंत्री नरेन्द्र मोदीक फोटो एहि पोस्टर मे नजरि नहि आबि रहल अछि। पार्टीक सूत्र सॅ भेटल जनतबक अनुसार पार्टी नेतृत्व एहि वास्ते सभके कड़गर निर्देश देने अछि जे एहि मात्रा मे कोनो तरहक विवाद नहि हो ते श्री मोदीक फोटो सॅ नेता आ कार्यकर्ता परहेज करथि। ओना गुजरातक विकास आ मोदी सरकारक कामकाज पर गर्व करऽ बाला भाजपाक अपन कार्यक्रम मे अपन नेता सॅ परहेज करबा सॅ भाजपा कार्यकर्ता भीतरे-भीतर मायूस छलाह।  दरअसल भाजपा सॅ दोस्ती हाथ मिलौने बिहारक मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के नीक लगैत अछि मुदा नरेन्द्र मोदी संग हाथ मिलैबा सॅ हुनका रंज भऽ जाइत अछि ते नीतीश कुमार के खुश रखबाक लेल बिहार भाजपा श्री मोदी सॅ दूरी बना कऽ राखऽ चाहैत अछि। नरेन्द्र मोदी आ नीतीश कुमारक विवाद बिहार मे भेल पार्टीक राष्ट्रीय कार्यकारिणीक भेल बैसक मे खुलिक सोझा आएल छल आ मुख्यमंत्री द्वारा भाजपा नेता सभके देल गेल भोजक न्योत बिजो होमए सॅ पहिनहि रद्द कऽ डेग उठौनेरहल अछि। जन चेतना यात्रा सॅ पहिनहि भाजपा अचेत नहि भऽ जाए ते मोदीक फोटो सॅ परहेज कऽ हुनका सचेत करबाक प्रयास पार्टी कएलक अछि। ओना श्री आडवाणीक एहि प्रस्तावित यात्रा सॅ मोदी नाराज बुझि पड़ैत छथि। राष्ट्रीय कार्यकारिणीक बैसक मे नवरात्राक बहन्ने अनुपस्थित भऽ एकर स्पष्ट संकेत दऽ देलनि अछि। मोदीक नाराजगीक कारण आडवाणी गुजरात सॅ यात्रा प्रारंभ करबाक योजना के बदलि सम्पूर्ण क्रान्तिक प्रणेता जय प्रकाश जन्म भूमि सिताबदियारा सॅ यात्रा प्रारंभ करबा पर विवश भेलाह अछि।  नीतीश कुमारक नरेन्द्र मोदी सॅ दूरी बनाएल रखबाक बीत लऽ बुझि पड़ैत अछि मुदा भाजपाक मोदी सॅ परहेज करब कार्यकर्ता सभके सेहो नहि गला सॅ नहि उतरि रहल अछि, मुदा पार्टी नेतृत्वक निर्देश मानब हुनक मजबूरि अछि। ओना पार्टीक एकटा आर वरिष्ठ नेता मुरली मनोहर जोशी आ बिहार मे भाजपाक मजगूत स्तम्भ कैलाशपति मिश्र सेहो एहि बेर पोस्टर सॅ गायब छलाह। कहियो पार्टीक नारा छल भारत मॉ के तीन धरोहर अटल आडवाणी मुरली मनोहर। हालांकि अटल आ आडवाणीक प्रासंगिकता पार्टीक एखनो बुझा रहल अछि मुदा जोशी पार्टीक पेटारक धरोहर बनि गेल छथि।  वास्तव मे नरेन्द्र मोदी पार्टीक कतेको नेताक लेल खतरा बनि गेल छथि। तें वातानुकूलित कमरा मे बैसि भाजपाक राजनीति कएनिहार दिल्ली ब्रान्ड नेता सभ हुनका राष्ट्रीय राजनीति मे दखल सॅ रोकबाक लेल एकजूट छथि। हालांकि पार्टी लग मोदीक फोटो नहि देबाक मजगूत तर्क सेहो अछि। ई तर्क अछि जे पार्टीक पोस्टर मे भाजपा शासित प्रदेशक कोनो मुख्यमंत्रीक फोटो नहि अछि तें मोदीक फोटो सेहो नहि अछि। यानि भाजपा मोदी के मात्र मुख्यमंत्री मनैत अछि। पार्टीक राष्ट्रीय नेताक रूप मे मान्यता देबाक साहस नहि कऽ रहल अछि कि एक तऽ एहि सॅ दिल्लीक कुर्सी पर कब्जा करबा मे बाधा आबि सकैत अछि। मोदीक भाजपाक पोस्टर बाय बनला सॅ राजगक कूनबा ठनमना जयबाक आशंका भाजपा के सेहो अछि। २ प्रधानमंत्री भाजपा भाजपाक वरिष्ठ नेता लाल कृष्ण आडवाणीक जन चेतना यात्रा प्रदेश सॅ बिदा भऽ उत्तरप्रदेश मे प्रवेश कऽ गेल अछि। दू दिवसीय ई यात्रा बिना कोनो विवाद सफलतापूर्वक सम्पन्न भेला पर प्रदेशक भाजपाई चैनक सांस लेलनि अछि। यात्राक विरोध करबाक घोषणा मात्र घोषणा साबित भेल आ प्रधानमंत्री पदक उम्मीदवारी आ नरेन्द्र मोदी प्रकरण पर सेहो कोनो विवाद नहि आएब पार्टीक लेल राहत देबऽ बाला रहल। स्वयं आडवाणी सहित भाजपाक कोनो नेता सिताबादि यारा सॅ लऽ कऽ उŸार प्रदेशक सीमा धरि गोटेक 298 किलोमीटर यात्राक दरमियान नरेन्द्र मोदी शब्द धरि मूॅह सॅ नहि निकाललनि। हालाकि श्री आडवाणी प्रधानमंत्री पद पर अपन दावेदारीके खारिज करैत सफाई देलनि जे एकर निर्णय पार्टी करत मुदा उत्तर प्रदेश मे यात्रा प्रारंभ भेलाक संगहि प्रधानमंत्री पदक मामिला एक बेर फेर गर्म भऽ गेल अछि। महादेवक नगरी वाराणसी मे भाजपाक फायर ब्रान्ड नेत्री उमा भारती एहि मामिला पर अपन मूॅह कि खोललनि। पार्टीक भीतर घमासान प्रारंभ भऽ गेल।  उत्तर प्रदेश मे भाजपाक जड़ि मजगूत करऽ मे लागत उमा भारती वाराणसी मे कहलनि जे जन जागरण यात्रा श्री आडवाणी के प्रधानमंत्री बनाओत आ देशक अगिला प्रधानमंत्री होएब तय अछि। आडवाणीक मतभेदक बाद पार्टी दोड़ि अपन अलग पार्टी बना राजनीतिक हैसियत बुझि चूकल सुश्री भारती एहि बेर आडवाणीक समर्थन मे मैदान मे कूछि गेला सॅ आडवाणी विरोधी खेमाक निन्द उड़ि गेल अछि। जखन बात प्रधानमंत्रीक हो तऽ भला केओ कोना चुप रहि सकैत अछि। राजनीति कोनो तपस्या नहि अछि। एहि मे सभक हित छोड़त अछि। ते देशक सर्वोच्च राजनीतिक पदक उम्मीदवारीक बाजार जखन खुजि गेल अछि तऽ सभ अपन-अपन शेयरक भाव बढ़बऽ मे लागि गेल छथि। सुश्री भारतीक आडवाणीक समर्थन मे देल गेल बयानक बाद वरिष्ठ भाजपा नेता यशवंत सिन्हाक सक्रियता ई संकेत दडरहल अछि जे पार्टीक भीतर एक अनार सय बिमार क स्थिति अछि। श्री सिन्हा स्पष्ट कएलनि जे पार्टी मे प्रधानमंत्री पदक लेल कतेको योग्य नेता छथि। एहिये ओ अपना आपके सेहो सम्मिलित करैत कहलनि जे एहि पर अंतिम निर्णय पार्टी करत। हालाकि जन चेतना यात्रा के हरियर झण्डी देखा विदा करऽ बाला बिहारक मुख्यमंत्री नीतीश कुमारक राजनीतिक इंजीनियरिंग सेहो तेजी सॅ चलि रहल अछि।  संसदक चुनाव मे एखन दू वर्ष अछि मुदा पदक लेल शह-मात करवेल एसनहि सॅ प्रारंभ भऽ गेल अछि। हिरेन पण्ड्या, संजीव भट्ट आ लोक पालक मामिला पर आलोचना सहि रहल गुजरातक मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी के सद्भावना मिशन मे खुलि कऽ समर्थन देबऽ बाला कतेको भाजपाईक आडवाणीक यात्राक समर्थन मे उतरला सॅ मोदीक दावेदारी एखन कमजोर भेल अछि आ शायद एहि कारण यात्रा पूर्व संध्या पर मोदी आडवाणीक समर्थन कऽ एखन तत्काल एहि विवाद पर विराम लगैबाक संकेत देलनि अछि मुदा आडवाणीक यात्राक सफलता स ॅप्रधानमंत्री पदक लेल हुनक दावेदारी मजगूत होएत। एहि वास्ते आडवाणीक पारिवारिक कूनबा सेहो मैदान मे उतरल अछि। श्री आडवाणीक बेटी प्रतिभा आडवाणी यात्राक संग-संग चलि पूरा व्यवस्था पर गहिर नजरि रखने अछि। आडवाणी एण्ड कम्पनी एहि बेर कोनो चूक नहि होमए देबऽ चाहैत अछि आ पीएम इन वोटिंगक सीट जनताक न्यायालयक माध्यम सॅ कान्फार्म करैबाक बेचैन अछि तऽ दोसर दिस राजगक दोसर घटक जदयू सेहो एहि पर नजरि रखने अछि। ज्यो राजग सताक लऽग पहूंचल तऽ भाजपाक भीतर आडवाणी मोदीक संघर्ष मे नीतीश कुमार राजगक सर्वसम्मति पसंद भऽ सकैत छथि। आ एहि मे आडवाणी खेमाक समर्थन सेहो भेटि सकैत अछि। ओना भाजपाक दशा आ दिशा ओकर मातृ संगठन राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ तय करैत अछि ओहि दशा मे संघक पहिलआ अंतिम पसंद भाजपाक राष्ट्रीय अध्यक्ष नीतीन गडकरी भऽ सकैत अछि। श्री गडकरी पार्टीक नेता सभ के जोड़क झटका धीरे सॅ ओजन बढ़ैबाक तैयारी मे लागि गेल छथि। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। नवीन ठाकुर, गाम- लोहा (मधुबनी ) बिहार, जन्म -१५-०५-१९८४, सिक्षा - बी .कॉम (मुंबई विद्यापीठ), रूचि - कविता ,साहित्यक अध्यापन एवं अपन मैथिल सांस्कृतिक कार्यकममे रूचि। कार्यरत - Comfort Intech Limited (malad) (R.M. ) चंदा मामा - आ - चंद्रमा चंदा मामा दूर के , पूरी पकाए गुर के अपने खाए थारी में ...............! ई कोनो नया मुहाबरा नै अछि, मुदा एकर अर्थो किछु आब जिनगीमे बाँचल नै रहल......नेना सभकेँ बहकाबऽ आ फुसलाबऽ केँ छोड़ि कऽ !  किएक ठकैत छिऐ बचबा केँ, हमरो ठकने रही बच्चामे सभ मिल कऽ , नै-नै, ई बच्चासभकेँ चुप करबाक रामबाण इलाज छै........, के कहलक अहाँकेँ आ की अनुभव अछि....अंजाद नै अछि ठीक –ठीक।  शायद दुनु भऽ सकैत अछि ! मुदा चंदा मामा कहिया चंद्रमा भऽ गेल बुझल नै अछि , शायदनमहर भऽ गेलौं हम , नै तँ ई वैज्ञानिक दृष्टिकोणक दोष छै ...!  जहिया सँ बुझलिऐ जे चंदा मामा एगो ग्रह छै तहिया सँ रिश्ता टूइट गेल मामा भगिनाक ....!चौरचनक दिन जे हृदय कोणमे कनी श्रद्धा बाँचल रहैत अछि ओ उमरि अबैए ! वैज्ञानिकदृष्टिकोणक तर्कसँ बहुत व्यक्तिक आस्था सेहो डगमगाइत देखलियेए जिनगीमे ! भौतिकज्ञानसँ मोनमे जोर -घटा चलऽ लागैत छै ......किछु शेष बचलापर दौर गेलौं मंदिर दिस नै तँत भरि जिनगी टाइम रहितो सबहक पास टाइमक अभाव होइ छै............!

आइयो वएह चाँद छै मुदा ओइमे कोनो बुढ़िया चरखा चलबैत नजरि नै आबि रहल अछि !बौवाकेँ खेलबैत रही ....एना ता अनचिन्हारक कोरामे नै जाएत जल्दी , जावत तक चंदामामाक रेफेरेंस नै देबै ! चांदनीक शीतल आ शांतिक परिवेशमे बैसल रही छत पर,वास्तविकतासँ दूर ..........कने दू -चारि डेग आगाँ बढेने रही ..........तखने लागल जेपाछाँसँ कियो टीक पकड़ि कऽ झीक देलक ........!

सुनैत छिऐ............नीचाँ आउ -कनियाँ सोर पारलक।

लागल जे कियो चंद्रलोकसँ मृत्युलोकमे बजा रहल अछि .......मोनक तराजूपर बटखरा राखिदेलक कियो ....डगमगा गेल कनी काल लेल एकबैग मोन ! असलियत जनलाक बाद कतेक चीजसँ लोकक नाता टूइट जाइ छै .....किछु सजीवसँ, किछुनिर्जीवसँ ......., कतेक ज्ञानवस् कतेक अज्ञानतावस् ........., समयपर जरूरत पड़लापरकमी खलै छै ! ओ ज्ञान कोन काजक जेकरा जनितो आदमी जिनगी भरि अज्ञानी बनल रहैए , मोनमेअंतर्द्वन्द्व रहैत छै भरि जीवन , सही गलतक फैसला लेबऽ मे असमर्थ रहैत अछि ! सभ कहैत छै जे बच्चाकेँ भगवान देखाइ दैत छै ....किए ? हम बच्चा नै बनि सकैत छी ,मुदा बचपना तँ राखि सकैत छी........कखनो काल कऽ अज्ञानी बनबोमे बहुत बड़का फायदाहोइ छै खाली सामंजस्य स्थापित करक कला एबाक चाही। भऽ सकैत अछि जे समाजक दृष्टि बदलि जाएत अहाँ प्रति। शायद नीक बुझत की ख़राब ई कहि नै सकैत छी, ई तँ दृष्टि आव्यवहारक बात छिऐक ! मुदा समयक संग फायदा हएत ई निश्चित अछि ! समयक अनुसार चलबामे नफ्फा छैक ,चंदा मामा रहथि आकि चंद्रमा, की फरक पड़ैत छै ! छिऐ तँ एकैगो ! ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com  पर पठाउ। ३. पद्य ३.१.१.शांतिलक्ष्मी चौधरी २.ज्योति सुनीत चौधरी ३.२.१.इरा मल्लिक २ओमप्रकाश झा ३.उमेश पासवान ३.३. १. जगदीश चन्द्र ठाकुर ’अनिल’ २.मिहिर झा ३.४.१.शिवशंकर सिंह ठाकुर ३.५.१.विकास झा रंजन२.जगदीश प्रसाद मण्डल ३.६.१. नवीन ठाकुर २.रमा कान्त झा ३.७.१.डॉ॰ शशिधर कुमर २ किशन कारीगरनवीन कुमार "आशा" ३.८. १.रामदेव प्रसाद मण्‍डल ‘झारूदार’ २डा0अरुण कुमार सिंह १.शांतिलक्ष्मी चौधरी २.ज्योति सुनीत चौधरी १ श्रीमति शांतिलक्ष्मी चौधरी, ग्राम गोविन्दपुर, जिला सुपौल निवासी आ राजेन्द्र मिश्रमहाविद्यालय, सहरसा मे कार्यरत पुस्तकालयाध्यक्ष श्री श्यामानन्द झाक जेष्ठ सुपुत्री,आओर ग्राम महिषी (पुनर्वास आरापट्टी), जिला सहरसा निवासी आ दिल्ली स्कूल ऑफइकानोमिक्स सँ जुड़ल अन्वेषक आ समाजशास्त्री श्री अक्षय कुमार चौधरीक अर्धांगिनीछथि। प्राणीशास्त्र सँ स्नातकोत्तर रहितो शिक्षाशास्त्रक स्नातक शिक्षार्थी आ एकटासमाजशास्त्री सँ सानिध्यक चलिते आम जीवनक सामाजिक बिषय-बौस्तु आ खास कऽमहिलाजन्य सामाजिक समस्या आ प्रघटनामे हिनक विशेष अभिरूचि स्वभाविक। गज़ल १ क्षणे मे एना कोना अजबे क्षनाँक भऽ गेलय  सुतली बुढ़ी क्षणे मे कोना टनाँक भऽ गेलय 

ई देह आकि प्राणोक छैक गजवे महत्तम  हँसैत-खेलैत साँस क्षणे मे जाँक भऽ गेलय 

निरोग बुढ़ीकेँ मरै मे छैक किछु गरबर की कहुँ जखन जनमले बुराँक भऽ गेलय 

कुटौन-पिसौन कैय बुढ़ी बेटाकेँ पोसलैनि  वैह माय बेटाक लेल दम नाँक भऽ गेलय 

बच्चा मे बेटा सभ तेँ रहै बड़ सुसंसगर आंखि-पांखि भेलै बेटा सभ उराँक भऽ गेलय 

बुढ़ी केँ बेटा सभ सेँ रहै बड़ बड़ सेहन्ता  हुनक सभटा लिलसा फाँक -फाँक भऽ गेलय 

"शांतिलक्ष्मी"केँ शंके भेनय कहियौ की बजती  दुनियाँ बड्ड दुष्ट जालीम चलाँक भऽ गेलय २ पुत कपुत एना हेबै तँ कोना चलतै माय विदेह केँ कनेवै तँ कोना चलतै

माय मरै भुक्खे, पड़ै अहाँकेँ की अंतर मोन केँ ऐना जँ बौरेबै तँ कोना चलतै

परदेस भल्हौं होइ अहाँ मुँहपुरुख निजदेस सँ जँ परेलै तँ कोना चलतै

मानलौं माय भेली पिछिता अहाँ अधुना माय केँ तेँ दुतकरवै तँ कोना चलतै

पड़ोसी भेली धनुखैनि माय दलिदर तेँकि माय केँ जँ छोड़वै तँ कोना चलतै

अपनाकेँ खोरनाठी अनका सिक्कीपंखा ई दुई रीत जँ चलेबै तँ कोना चलतै

माय-बापे सँ होइ छै सुजन परिचय माय-देसक नै ठेकानै तँ कोना चलतै

बुझलौ जे रोटी लेल छै ई सभ चटुता कर्ज दुधेक नै चुकेवै तँ कोना चलतै

अपना मोने मे छै नीति अनीतिक रीत पुत सुमातेक बोहेतै तँ कोना चलतै

"सभ्य"केर कुभाखा मोन केँ लागै सुन्दर भाखा मैयेक जँ हरेलै तँ कोना चलतै

भाखा आन खेलकै कतै सरकारी टाका मैथिलि खैरातो बिलोलै तँ कोना चलतै

"शांतिलक्ष्मी" कहती अहाँसँ बस एतबे स्वगौरव अहीं दबेबै तँ कोना चलतै

.................वर्ण १५............... ३ मैथिलिये केँ सभ दिन तँ खोरि-खोरि खाइत छी  तैयौ हुनके सेवा मे एना कियै नितराइत छी 

जे दिये दही-चुरा दिस तकरे के राखै छी नीति  अपना मुंहेँ सैह बाजय मे किये चोराइत छी 

जाधरि खेलौ ताधरि गेलौ के रखने छी नियत  राखिकेँ भरि मुंह मधुर कियै गोंगियाइत छी 

बुझलौ जे पाग बदलै मे अछि बड्ड चट्टकैति  अछि सभ तेँ बुझिते तखन कियै औनाइत छी 

पैर छुबि-छुबि सभ दिन बढ़लौ ये अहाँ आगु  सत कही तेँ हमरा पर कियै खिसियाइत छी 

निकाललौ बेगरता तँ टीक पकड़ै के आदत  कियै घाट-घाटक पानि पिवै एना बौवाइत छी 

"शांतिलक्ष्मी" बुझैत अछि अहाँक सभटा अस्सल  झटकल डेग मे कोना आगु बढ़ल जाइत छी 

.......................वर्ण १८.................. ४ बेरोजगारी 

एहि शहर मे छथि सभ व्यस्त l लोक एहिना अपने काजे पस्त ll

अहाँ जीबु आकि भs जाउ नष्ट l ककरो छैन्हि क्षणिके तै लै कष्ट ll

माय बाप नित दिन हरकैलैन्हि l मामा-मौसी सभ सेहो उबियेलैन्हि ll 

घरक जीनगी सँ जखन ओगतेलौह l देस-कोस छोड़ि शहर दिस एलौ्ह ll

लs कs एतय आइल छलौ बड़ आस l मुदा भेटैये कहाँ कत्तो कोनो निसास ll

दै ये सभकिओ ओएह एक्के अश्वासन l थम्हु नै आइ लगवै छी कोनो आसन ll

गेलौ जतय कतहुँ लोक बुझेयै भार l दू महिना सँ तैयो घुमै छी द्वारे द्वार ll

कैलिये सभ जनतव केर जा जा भैट l कत्तौ कियो लगेता कोनो-नै-कोनो बैंत ll

फाइल मे भरि केँ सभ कागत जात l भरि-भरि दिन घुमै छी घाटे घाट ll

नित दिन मरै छी हम दुःखै-ग्लानि l दैख केँ ओतैक नमहर-नमहर लाइन ll

हजार-पाँच सौ केर आब तँ करजो भेल l जेबीक टाका कहिये-नै-कहिये उड़ि गेल ll

जँ ली हम कत्तौ कोनो टेकनीकल ज्ञान l फ़ीसे सुनि केँ छुटैयै बचल-खुचल प्राण ll

इतस-तीतस मे पड़ल छी तेहन नै आइ l मोन होइये घुमि फेरि गामे चलि जाइ ll

मुदा सोचि केँ फेर वोएह गारि आ बात l मोनक मोने दबि जाइये सब टा बात ll

मोनक मोने दबि जाइये सब टा बात l मोनक मोने दबि जाइये सब टा बात ll ५ कुम्हर

एकटा छौरी केँ भरि देह चून, जल्दी सँ कहु ओ फर कूनl

कुम्हरक फर छी हमर नाम, गठुल्लाक छप्पर हमर ठामl

हरियर पात पीयर फुल, तरकारीक लत्ती हमर कुलl

बातबोली के बड़ सुकुमरि, अंगुरी देखेने बातिये सड़िl

शहर-बजार मे काँचो खाय, गाम घर मे छोड़य जुआयl

कलायदालि मे बनी कुम्हरौरी, किछुठाम कहे सिसकोढ-बड़ीl

मिठगर हम मुरब्बा़ मिठाइ, दर-दोकान मे राखे सजायl

गभासकरैति मे फ़ुलक उद्योग, गायगोवर पर साटैयक योगl

भरदुतियाक परतर नै दुज, नौत लिये हमरे पाँच फुलl २ ज्योति सुनीत चौधरी जन्म स्थान -बेल्हवार, मधुबनी ; ज्योति मिथिला चित्रकलामे सेहो पारंगत छथि आ हिनकर मिथिला चित्रकलाकप्रदर्शनी ईलिंग आर्ट ग्रुप केर अंतर्गत ईलिंग ब्रॊडवे, लंडनमे प्रदर्शित कएल गेल अछि। कविता संग्रह ’अर्चिस्’ प्रकाशित। ज्योति सम्प्रति लंदनमे रहै छथि। जीवनक सिद्धान्त 

तितलीक के पाछा भागैत बच्चा रंगके पकड़ि क राखक ईच्छा तितली डोलैत फूल फूल पर  बच्चाक धमगज्जर धूल पर

फेर कैशोर्य के आबैत दिन स्वयम् सबकिछ भेल रंगीन अपन बनैत अलग पहचान स्वयं के विशिष्टताक ज्ञान

जगत स साक्षात्कार शुरू यौवनमे  जीवन विभाजित श्वेत श्याम मे क्षमा आ धैर्य के योगक कमी परिभाषा बुझल मुदा उपयोगक कमी

प््राौढ़ावस्था संतोषक अभिव्यक्ति बुद्धिक स्थिरता आ सीमाक प््रााप्ति  संसार देखलेल भेटल अनुभव क दृष्टि किछु बदलल किछु दुहराएल स्थिति

जेहेन गाछ लगेने जीवन भरि भोग कर पड़ैत तेहेने फरि फेर किछु पिछला जन्मक बकियौता वृद्धावस्था सबटा दर्पण जकॉं देखौता ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। १.इरा मल्लिक २ओमप्रकाश झा ३.उमेश पासवान १ इरा मल्लिक, पिता स्व. शिवनन्दन मल्लिक, गाम- महिसारि, दरभंगा। पति श्री कमलेश कुमार, भरहुल्ली, दरभंगा। छम छम बरसा छम छम बरसा, छम छम पानि, चम चम बिजली,  चमकै आइ, चम चम बिजली चमकै छै, जियरामे आगि लगावै छै। कारी कारी घटा घिर आओल, मनक मोर शोर मचाओल, बिजली चमकै जियरा हहरै, कारि अन्हरिया राति भयाओन, पिया केँ सन्देश सुना दिअ आइ, चम चम बिजली चमकै छै। संग सहेली घर चलि गेलि, सून भवनमे छी हम अकेली, सनननन बड़ी जोर पवन अछि,  घन घमंड देखावै आइ, चम चम बिजली चमकै छै। मन के मोर सुनु इक बैन, पाओत मोन कोना कहु चैन, किछ ते जतन करु अहाँ इहो रैन, छोड़ू मचेनाय शोर किलोल, पहुँ के सन्देश सुना दिअ मोर, चम चम बिजली चमकै छै। २ ओमप्रकाश झा जखन मोन मे प्रेमक आँकुर फूटल, तखन प्रेमक गाछ निकलबे करत। जखन जवानीक ककरो लुत्ती लागल, तखन प्रेमक धधरा उठबे करत।

प्रेम छै रामायण, प्रेम छै गीता पुराण, प्रेम छै पूजा-पाठ, प्रेम ईश-भगवान, जखन इ मोन पवित्र मंदिर बनल, तखन प्रेमक मुरूत बसबे करत।

जिनगी कछेर बनल इ प्रेम छै धार, प्रेम इ समाज बनबै प्रेम परिवार, जखन हिय सिनेहक संगम रचल, तखन प्रेमक इ गंगा बहबे करत।

प्रेम केँ बान्हत डोरी एखन नै बनल, प्रेम मुक्त छै सदिखन सहज सरल, जखन जिनगी-आकाशक सीमा हटल, तखन प्रेमक चिडैयाँ उडबे करत।

"ओम"क निवेदन अहाँ कते नै सुनब, एना अहाँ चुप रहि कते मूक बनब, जखन याचना अहाँक मोन मे ढुकल, तखन प्रेमक भिक्षा त' भेटबे करत। २ ताकलौं एना किया कोनो पैघ बात भय गेलै। मोन डोलै हमर पीपरिक पात भय गेलै।

बिन पीने इ निशाँ किया हमरा लागै लागल, हमरा बूझि केँ शराबी लोक कात भय गेलै।

हमरा हमरे सँ चोरी अहाँ कोना कय लेलौं, बन्न छल हिय-खिडकी कोनो घात भय गेलै।

प्रेमक सींचल जिनगी आब भेलै रसगर, सुखायल चाउर छलै मीठ भात भय गेलै।

सभ ओझरी सँ हम भिन्ने नीक रहैत रही, नैन-ओझरी लागल "ओम"क मात भय गेलै। ३ आगि लागल मोनक धाह केँ रोकि देलियै। कोनो दुख गहीर छल, मुस्की मोकि देलियै।

अपन मोनक धार कियो कोना के रोकत, इयाद जे हमरा करेज मे भोकि देलियै।

आँखिक कोर भीजल नोर किया नै खसल, कृपणक सोन जकाँ ओकरा झोकि देलियै।

नोर इन्होर होइ छै एहि सँ बाँचि के रहू, फेर कहब नै अहाँ किया नै टोकि देलियै।

"ओम"क फाटल छाती कियो देख नै सकल, कोनो जतन सँ ओकरा हम सोपि देलियै। ३. उमेश पासवान कवि‍ता भि‍तरसँ कारी कतेक लि‍खब दलि‍तक व्‍यथा हम कतेक लि‍खब समाजक वि‍डम्‍बना शलहेशक गाम सनेंुश आब नीक, कि‍छु नै रहल, बस रहि‍ गेल भरल अछि‍ एतए दुख: आ कलेश कतेक लि‍खब.... केकरासँ कही के बूझत कि‍ अछि‍ झुठ आ कि‍ अछि‍ साँच टि‍क-मे-टि‍क जोड़ि‍ रहैए बुझैए अपनाकेँ बड़का भि‍तरसँ कारी अछि‍ दलि‍तक दुश्‍मन अछि‍ तरका कतेक लि‍खब दलि‍तक व्‍यथा दलि‍तक अधि‍कारक हल करैए बड़-बड़ करैए नाँच कतेक लि‍खब। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। १. जगदीश चन्द्र ठाकुर ’अनिल’ २.मिहिर झा १

जगदीश चन्द्र ठाकुर ’अनिल’ गजल १

हमर-अहांक कसूर बहुत अछि दिल्ली एखनहुं दूर बहुत अछि।

कीट नियंत्रण अछि आवश्यक एहि घरमे झिंगूर बहुत अछि।

डाकनि द’ क’ सुनब’ पड़तै  बहुत कानमे तूर बहुत अछि।

बास सांप केर निष्चित बूझू एहि कोठलीमे भूर बहुत अछि।

जहां-तहां सोहरल अछि चुट्टी घरमे छीटल गूर बहुत अछि।

नोर भरल मैथिलीक आंखिमे एखनहुं महग सिन्दूर गहुत अछि।

आगि बोनमे पसरि गेल अछि लोक सड़क पर उतरि गेल अछि।

कुरूक्षेत्रमे देव, दनुज छथि उठापट्टक बजरि गेल अछि।

रंग विरंगक छल फुलवारी असमय सभटा उजरि गेल अछि।

चौंसठि बरखक वरक गाछ ई झखड़ि गेल अछि,हहरि गेल अछि।

नौजवान चौहत्तरि बरखक थाकब, सूतब बिसरि गेल अछि।

भारत मां केर आंखि नोरायल नोर गाल पर टघरि गेल अछि।

२ मिहिर झा गजल १ मिलत जखन आन्खि से आन्खि तखन पता चलत हिलत जखन करेज कनी तखन पता चलत

एखन त बौराई टौवाइ छी मदमस्त भेल रहू कन्छी मुस्की जे बेधत हृदय तखन पता चलत

दियौ गप उडाउ खिल्ली अहां छी मनमत्त अबूझ आन्खि से जखन निन्न उडत तखन पता चलत

मुस्काई छी उधियाय छी त अबढन्ग बनल रहू  अधर से जे अधर मिलत तखन पता चलत

बिसरब दुनिया ओ भज़ार ई ठीक सत्य वचन जखन होएत वाक हरण तखन पता चलत २ बात जे झंपबै त ओ जडिएबे करत चुल्हि चढल खापडि करिएबे करत

कतबहु दाबब गप के दबत नहि लोक त लोक छैक ओ चरिएबे करत

तनला से सहो चलत नहि कोनो काज मुस्टंडा मानत नहि फरिएबे करत

नहि पडू मुखिया ओ पंचक चक्कर मे ओकर त काज छैक भरिएबे करत

आपस मे गप करू करू राफ ओ साफ धीरज धरू मामिला सरिएबे करत ३ फेर से ओ जिनगी घुरि आयल फेर अहां क याद घुरि आयल

छोडल छल सबटा याद अदौ विस्मृत स्मृति फेर जुडि आयल

लकधक साड़ी खनखन हँसी लाजक लाली कोना मुडि आयल

आमक गाछी चुप चुप अधर डभ्कैत आन्खि मोन चुडि आयल

छल विदा करेज पर पाथर बिसरब सब से फुरि आयल

किएक भेटल ओ पुरना पोथी आखर देखि याद घुरि आयल ४ नहि जाएब परदेश, अहाँ एहिना तकैत रहू खोलब हृदय के तार अह एहिना तकैत रहू

सखा भजार चुटकी लय के करैथ हँसी ठिठोली अहां लेल दुनिया बिसरब एहिना तकैत रहू

सर समाजक कोनो चिंता ने अहाँक रूपक आगू दीन ईमान सेहो बिसरब एहिना तकैत रहू

गीत ग़ज़ल छन्द ओ कविता लिखब देखैत रहू प्रणय निवेदन करू स्वीकार नैना तकैत रहू

ज़मीन जथा किछु नहि चाही नहि चाही रंजो-द्वेष सुगम सिनेह केर पावन महिना तकैत रहू ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। शिवशंकर सिंह ठाकुर श्रद्धान्जलि 

आइ पुनः आयल ई दिवस अछि , हमर अहाँक आइ मिलन अछि, आइयेक दिन हम अहाँ एक सूत्रमे बन्हल रही  प्रेमक फूल अहाँक बाड़ीक  हमर जीवनमे आइ खिलल छल , आ हमर मिलन सेहो तँ प्रिय  आजुक पावस दिवसमे कतेको साल पहिने खिलल छल !!!!!!!!

कतेक बढ़िया छल ओ दिन  आ अहसास हमर मिलनक , जखन अग्नि केँ साक्षी मानि कऽ, हम अहाँ आइये प्रणय-सूत्रमे बन्हल रही , ओ राति किछु खास छल , चांदनी मे नहायल छल , हमर अहाँक मिलनक गवाह बनल छल !!!!!!!!!!

हम समर्पित भऽ गेल रही अहाँक अंकमे ओइ राति , आ अहूँ तँ अपना आपकेँ हमरा समर्पित कऽ देने रही प्रेमक रसमे हम दुहु गोटे सराबोर भऽ गेल रही, ओइ राति हमर दिल कतेक जोड़ सँ धड़कि रहल छल , आ धौंकनी जकाँ धधकि रहल छल हमर सम्पूर्ण देह , घाम सँ लथपथ ,एक दोसराक बाहुपास मे सिमटल रहि, ओइ राति हम हम नै रही,अहाँ अहाँ नै रही, दुहू गोटा एक भऽ गेल रही !!!!!!!!!!!!!!!!

हमर बाड़ीक तीनू फूल आइ पैघ भऽ गेल, कतेक सुन्दर लागि रहल अइ , अहाँ रहितौंह तँ देखितौंह आ हमरा चिकौटी काटितौंह, ई तीनों तँ अहींक 'प्रेम 'गाछक फूल अइ , एकरा देखबाक खुशी कते पैघ होइत छैक , से तँ अहाँ बुझबे करैत छी, एकरा तँ व्यक्त नै कएल जा सकैछ, ई तँ अव्यक्त होइत अछि, आखिर मे ई शरीर तँ सेहो स्थूल भऽ जाइत अछि !!!!!!!!!!!!

आइ अहाँ नै छी तैओ हमरा लगैए , जे अहाँ किम्हरो सँ हमरा देखि रहल छी , हमर खुशी आइ अपूर्ण लागि रहल अछि, तैयो हमर खुशी मे मानू अहाँ अपन खुशी ताकि रहल होइ, आइ हम कतेक असगर लागि रहल छी, रहि-रहि अहाँक स्मरण मे कोर कांपि रहल अइ , हमर मोनक भावना केँ कियो अनुभव कऽ सकैछ , हमरा लेल आइयो अहाँ ओतबे स्नेहपूर्ण छी !!!!!!!!!!!

अहाँ दऽ जखन हम सोचै छी , अहाँक संग बितायल एक एक क्षण ,एक एक पल  के स्मरण कऽ कऽ हम प्रफुल्लित भऽ जाइ छी, कोना कऽ अनझोके सँ हम अहाँ टकरा गेल रही , अहाँ कनी बेशी तमसा गेल रही , ओकर बाद तँ हमर अहाँक भेंट - घांट होइते रहल, आ हमर अहाँक प्रेम बढिते गेल , फेर दुहु गोटे प्रणय -सूत्र मे बन्हि गेलौंह !!!!!!!!!!!!!!!

आजुक ई दिन अति पावन अइ , आब जखन की अहाँ नै रहलौंह, हम की करू ,आजुक दिन केँ कोना कऽ मनाउ,  से नै फुरा रहल अछि, पहिने तँ दुहु गोटा मिल कऽ आजुक दिन केँ मनबैत रही , अही दिन के विशेष रूप सँ यादगार बनबैत रही , ओतेक हिम्मत आब हमरा नै रहि गेल !!!!!!!!!!

हम धीरे धीरे आब टूटऽ लग्लौंह अछि , आब जखन कखनो अहाँक याद अबै अछि  हम चुप्पे सँ कानि लै छी,फेर बच्चा सभ केँ देख कऽ  अपन काननाइ रोकि लैत छी,मोन मे गबधी मारि लैत छी, भीतर सँ अशान्ते रहैत छी ,मोन मे लललाहा आगि के देखैए? अहाँ तँ सदिखन हमर मोने मे रहब , तैयो आइ अहाँक बहुत याद अबैए , अकुलाइतो हम चुप छी , बुझाइए जे ई चुप्पी हमर सांसक संगे टटि पाएत , मोनक बात मनहि रहि जाएत,  अपन बात आइ एतेहि सम्पन्न करैत छी , आजुक ई कलम अहींकेँ समर्पित करै छी!!!!!!!!!!!!!

हमर ई फूल अहाँ स्वीकार करू , हमर ई नोर ,ईएह शद्धांजलि अइ , गलती केँ माफ करैत , एकरा स्वीकार करू !!!!!!!! ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। १.विकास झा रंजन २.जगदीश प्रसाद मण्डल १ विकास झा रंजन गजल मोन मुंगबा फुटइए मीत हमर , सोझा अबैथ जखन प्रीत हमर !

हुनक जूट्टीमे गूहल भबित हमर , हुनक गजरा गछेरने अतीत हमर !

खाम्ह कोरो बनल मोन चीत हमर , हुनक लेपट सौं छारल अइ भीत हमर !

हुनक नख शिखमे नेह निहीत हमर , हुनक कोबरे करत मोन तिरपित हमर !

हम हुनके सिनेह ओ सरीत हमर , हुनक मुस्की सौं जागे कबीत हमर ! रुबाइ १ अहाँ रूपक भेरिया-धसान लागल अइ, छौड़ा संग बुढबोक आन जान लागल अइ आबो समेटू अपन भाभट दसगरदा आँगनमे घट्कक दलान लागल अइ ! २ जिनगी अमोल तोहर कोंख भेटल माँ, तोरे आँचरमे हमरा भरोस भेटल माँ, सब आफद अनेरे उड़ल कपूर सन , तोहर ममता केँ जखने बसात भेटल माँ २ जगदीश प्रसाद मण्‍डलक एक दर्जन कवि‍ता- परदेशी नै बुझि‍ पेलौं एखन धरि‍ दाही-रौदीक औरूदा कते। एक दि‍न जाड़ माघक बीतने उनतीस दि‍न पड़ाएत जते। बारह मासक साल बनै छै एक करोटि‍या ऋृतुओ लइ छै केंचुआ छोड़ि‍ नव रूप पाबि‍ जेना नव जीवनक नूतन चालि‍ धड़ै छै। अपन-अपनी रूप गढ़ि‍-गढ़ि‍ नव सृष्‍टि‍क बाट धड़ै छै नव सि‍रजि‍ नव युगक नव वि‍चारक लोक गढ़ै छै। सृष्‍टि‍क भीतर सृष्‍टि‍ सि‍रजि‍ मौसमक सुर-तान भरै छै। पवि‍ते हवा श्रृंगार सौरभक ठठा-ठठा मुसकान भरै छै। पेटक खाति‍र लुटा रहल छी इज्‍जत-आबरू ओ सन-मान हारल नटुआक संग पकड़ि‍ गाबै छी प्रभाती वि‍हान। देखए पड़त मातृभूमि‍ मि‍थि‍लाकेँ माटि‍-पानि‍ ओ बसात। अंगेजि‍ अंग जखन बनब देख पएब सोन्‍हगर अकास। जे कहि‍यो सातम अकास चढ़ि‍ मुरलीक तान भरैए कुरेड़क कुरहरि‍ कटि‍-कटि‍ दूरेसँ ढोल बजबैए। बाल गीत सुनू बौआ यौ सुनू नूनू यौ चेहरा देख मन झहरै-ए तरे-तरे देह सि‍हरै-ए तड़पि‍-तड़पि‍ ओ कुहरि‍-कुहरि‍ बेथि‍त भऽ बेथा सुनबै-ए बि‍रड़ोमे उड़ि‍-उड़ि‍ अहाँ दोगे सान्हि‍ये पड़ा रहल छी मातृभूमि‍क रस पीब बि‍ना पुरूखाक पुरूषत्‍व हरा रहल छी। मनुष्‍यक जि‍नगी आँकि‍-आँकि‍ अपनाकेँ अँकए पड़त। ने ते गंगा-जमुना जकाँ बोहि‍ आएत जि‍नगी चलत। ककरो मेटेने कि‍ कहि‍यो गंगा आकि‍ कोसी मरतै धारक पेट सदए धारा संग-संग चलि‍ते रहत। मनुख-मनुखमे भेद कतए देखए पड़त ओइ‍ दुर्गकेँ ढाहि‍ ढुहि‍ ओइ आड़ि‍ धुर नव जि‍नगीक नव दुनि‍याँ बना कऽ। बाल कवि‍ता पुत्र- बाबू यौ, पनि‍या दूध कि‍अए बेचै छी एकरे ने पाप कहै छै? जानि‍-बुझि‍ जे करए ढि‍ठाइ तेकरे जमदुत पकड़ै छै? पि‍ता- कहलह बौआ मधुर बात, सि‍हरि‍-सि‍हरि‍ हृदए सि‍हरि‍ गेल। अजीव खेल धर्म-पापक हँसि‍-हँसि‍ जि‍नगी टूटैत गेल। पुत्र- की अजीब खेल धर्म-पापक गुरूवर-गि‍रवर बनि‍ कहू। कर्म, अकर्म, वि‍कर्म, सुकर्म, बि‍लगा-बि‍लगा बुझा कहू। पि‍ता- बाल-बोध रहि‍तो अहाँ जि‍नगीक रहस्‍य-रस तकलौं समए पाबि‍ आनि‍ देब जि‍ज्ञासाक उठैक बाट। अगहन ठोर रंगि‍ तड़-तड़ करै छै प्रेमी देख-देख मुँह दुसै छै। लगनक आशा छोड़ि‍-छाड़ि‍ कुदि‍-फानि‍ घर अबए चाहै छै। कहि‍या धार कुटाएब हाँसूमे कहि‍या धारक सान बनाएब काति‍कक पुरनि‍मो बीतल आठ अगहन अबैमे देरी हएत। धीरजसँ सभ कि‍छु होइ छै आठ पुरैमे तीन दि‍न अछि‍ जुनि‍ अधीर होउ हे प्रीतम मन फुला दि‍ल कलशैत अछि‍, संगे मि‍लि‍ चलब दुनू संगी बच्‍चोकेँ कन्‍हा लगा लेब। लोटा भरि‍ पानि‍यो नै बि‍सरब पनबट्टी सेहो लऽ लेब। रौतुका नाच बनौआ होइ छै दि‍न-दुपहरि‍या नचब मैदान चौकीक तँ स्‍टेज नै छि‍ऐ हँसबै गेबै मान-सम्‍मान। केना मेटत गरीबी केना कऽ मेटत गरीबी हो भैया केना कऽ......। अछि‍ भरल सोना मि‍ट्टीमे भरल अछि‍ हीरा-मोती। खुनैक ओजारे अछि‍ गजपट केना कऽ पेबै मोती। सोन बि‍ना कानक जहि‍ना तहि‍ना ने माटि‍यो छै ने अछि‍ पान आ ने श्रम छै ने खाद आ ने बीआ छै तखन कोन आस करबै हो भैया.... सत्ते कहै छी ओजारो बनलै नहर खुनेलै कोसीसँ धारक तँ चालि‍ये अजीब बि‍नु बरखे पानि‍ आओत कतएसँ। खादक बदला माटि‍ अबै छै बोरि‍ंगक पाइपो तेहने नकली छै पम्‍पि‍ंग सेटक कथे की कहब तीन बेर साले सि‍सकै छै अहीं कहूँ केना हेतै यौ भैया केना कऽ...। बि‍नु खेतक आकार देखने फसि‍लक केना पहचान करब उपजल दाही जखने हेतै कोठीक कि‍अए जोगार करब। वि‍ज्ञान बहुत उन्नैत केलकहेँ सच्‍चे कहै छी यौ भैया घासे बि‍खाह उपजि‍ खेतक-खेत कोन मनसूबे दुहबै गैया केना कऽ.....। ललो-चपोसँ काज नै चलत इमनदारीक नेत बनाएब। फुलल-फड़ल खेत चमकत देख वसन्‍ती तखन गीत गाएब। ता धरि‍ नै चलतै यौ भैया, ललकारा कतबो देबै। टाल ठोकि‍ कतबो कुदब खलीफा नै बनि‍ पेबै। सएह कहै छी सुनू यौ भैया केना कऽ......। बाढ़ि‍क सनेस जइ नहाए कोसी जाइ छी जाइ छी कमला घाट। अपने फुड़ने आबि‍-आबि‍ धो-धा देखा दैत बाट। हँसि‍-हँसि‍ घरसँ नि‍कलि‍ खोंछि‍ भरने एली। मुट्ठि‍ये-मुट्ठी बाँटि‍-बाँटि‍ गामे-गाम बि‍लहि‍ देली। खोंछि‍क सनेसो तेहने ठेंगी, खच्‍चरलत्ती ओ हराशंख। हराशंखो तेहने गढ़ल छै ने छी डोकी ने छी शंख। खच्‍चरलत्तीक खचरपनीसँ तंग-तंग होइए कि‍सान। काटि‍ फेकब जतए ततएसँ मोछ टेरैत देखबए शान। गाछी-वि‍रछी, दि‍शा मैदानक रोकैक ठीका ठेंगी लेलक। खेत-पथार टहलि‍-टहलि‍ बोन-झाड़ सेहो अपनौलक। पू-भर माए‍ गे, सभ कोइ पू-भर जाइ छै संगी संग हमहू जेबै। गामक दशा देखते छीही ऐठाम रहने की खेबै? बौआ हौ, हम कि‍ कहबह धीगर-पुतगर तोहूँ भेलह। सुख-दुख तँ देखते छहक आब की कोनो नेना छह। एकटा बात बता दाए करए जेबहक कोन काज? से काज तँ एतै जगेबह कि‍अए जेबह आन राज। भ्रम-जालमे सभ फँसल, माए के केकरासँ कम जनैत। धन छोड़ि‍ धनवान बनल सभ अपन बात बुझबे ने करैत। पू-भर कतए कतए जेबह तँू से कनि‍ये हमरो कहि‍ दाए। मन हएत तँ पत्रो पठेबह नाओं-ठेकान दि‍हह पठाए। भभूत लगि‍ते चाइन बाबाक भभूत चेलबा हँसि‍-हँसि‍ बाजल। छाउर केना भभूत बनि‍ छजनीपर जा अँटकल। सुनि‍ते चेलबाक पेटक बात पेट खोलि‍ आसन लगौलनि‍। आँखि‍ खोलि‍ नजरि‍ मि‍ला प्रभुता दर्शन करौलनि‍। जि‍द्दी चेलबा मानता ओहि‍ना प्रभुता परमान मंगलकनि‍? पैरूख नाअों प्रभुताक कहि‍ झटपट अपन जान छोड़ैलनि‍। जि‍द्दी कि‍ जि‍द्दी चेलबा छी पैरूखक परमान मंगलकनि‍? सामर्थ कहि‍ आँखि‍ घुमा चटपट अपन काज ससारलनि‍। नमड़ी जि‍द्दी जेहन चेलबा हुअए तइसँ कम की बाबाक चेलबा तड़पि‍-चेलबा लग आबि‍ समर्थकक परमान पुछलकनि‍। शक्ति‍ समर्थकक उत्तर दऽ मुँह मारि‍ बाबा बैसलाह। बोलती बन्न देख बाबाक डुबकी दैत चेला डुबलाह। पि‍तृपक्षक भोज अमावास्‍या आसीन केर बीतते भोजक लगल ढबाहि‍। आन-आन ओरि‍यानक संग महाजनी चाउरक लगैत सवाइ। गाम-गामक महाजनोक रंग-वि‍रंगक हुकूम चलैत। कतौ सवाइ तँ कतौ डेरही, पौन-दोबर चलैत। जेकर लाठी तेकर भैंस खाली ई खि‍स्‍से नै छी। पइस नहाएब जखन पोखरि‍ तखैन बुझब अपने ने कि‍छु छी। मुदा गुन भेल, भाय हमरा जाति‍-जाति‍क रग्‍गड़ मचल। काटि‍-छाँटि‍ एकबाहि‍ केलक मनमे खुशीक तूफान मचल। जाइति‍यो तँ जाइति‍ये छी दि‍न-राति‍ रग्‍गड़ करैत। समए पाबि‍ जहि‍ना सि‍ंगरहार खुशी-खुशी अपने झड़ैत। गाममे जाति‍ असकर असकर अछि‍ दि‍यादी। बि‍नु भोजे उद्धार सभकि‍यो बाबा, काका, भैया आदि‍। ऐ पढ़बसँ मुरखे रहि‍तौं ऐ पढ़बसँ मुरखे रहि‍तौं हरे जोति‍तौं, कोदारि‍ये पाड़ि‍तौं। रि‍क्‍शे चलैबतौं, ठेले ठेलतौं उपहासक पात्रो तँ नहि‍ये बनि‍तौं। ऐ पढ़बसँ मुरखे रहि‍तौं। कि‍यो कहए भुसकौलहा हमरा कि‍यो कहैत चोरि‍ पास। कि‍यो कहैत कि‍नुआ डि‍ग्री छी चारू दि‍स होइए उपहास। धौना खसा तँ नहि‍ये चलि‍तौं ऐ पढ़बसँ मुरखे रहि‍तौं। नै पढ़ने नहि‍ये होइतए पढ़ुआ कनि‍याँसँ वि‍याह। नै जोड़ए पड़ैत खर्च सि‍नेमाक नै जोड़ए पड़ैत साजो श्रृंगार सीना तानि‍ गामोमे चलि‍तौं ऐ पढ़बसँ मुरखे रहि‍तौं। कतएसँ पुराएब खर्च बच्‍चाकेँ कतएसँ आनब कनभेंट खर्च। कतएसँ पुराएब इंग्‍लीस ड्रेस कतएसँ आनब आवासीय खर्च। भाग-भरोसे जे ठेलि‍ पइतौं ऐ पढ़बसँ मुरखे रहि‍तौं कोठीक नोकरी कोठि‍ये करि‍तौं चोरा-नुका कऽ खुब कमैतौं। अंग्रेजि‍या फैशनमे सजि‍-धजि‍ बम्‍बैया हीरो कहैबतौं ऐ पढ़बसँ मुरखे रहि‍तौं। अगो-लोरहा हे गे बेटी गे, हे गे धीया गे आइ धरि‍ दुखक दि‍न कटलौं काल्हि‍सँ आओत समए सुखक। राति‍ भरि‍ जागि‍ मन पाड़ि‍हेँ बीतल साल, मास दि‍न दुखक। कोन नक्षत्र अाबि‍ रहल छै कनि‍ये दे हमरो बुझा। कोन सुख काल्हि‍सँ आओत सेहो दे नीकसँ सुझा धनकटनीमे हाथ लगेबै हाँसू धार कुटौने छी। संग मि‍ल तोहूँ लोढ़ि‍हेँ लोढ़ा बीछा तोरे ने छी। चारि‍ साल जते जे लोढ़लौं अगो तँ तोहूँ दैत एलँह। भुरकुरी ढन-ढन करैए कुटि‍-चुड़ि‍ तोहीं खेलँह। समए पाबि‍ खेलि‍यौ बुच्‍ची सुदि‍ दऽ पूरा करबौ। अगो-लोढ़ा जोड़ि‍-जाड़ि‍ मुइरि‍क संग सुदि‍यो देबौ। एहन अलछनी हमहीं हेबौ। माए-बापसँ सुदि‍ लेब। महाजनीक कारोबार कऽ कऽ महाजनीक भार देब। नै बेटी नै बुच्‍ची, नूनू मुँह दाबि‍ एना नै बाजह। जते गहन लगल बीच अछि‍ दोबरा-दोबरा मुड़ घुरेबह। सुनि‍-सुनि‍ मन तड़पैए माए-बाप की हम्‍मर नै। बेटा-बेटी भेद कतए अछि‍ सेवा की हम्‍मर नै। हथि‍याक झटकी चढ़ि‍ते चैत पतरा कीनलौं सालक हाथक रेखा देखलौं। देखते नजरि‍ दौड़ल राशि‍पर नाओं अक्षर तेकरा बीछलौं। तेतरि‍ सदृश्‍य राशि‍ देख पाछु दि‍स उनटि‍ ताकल। तीन नामे लोक जनैए देखि‍ये कऽ मन थाकल। आगू बढ़ि‍ उपजा लग गेलौं पानि‍सँ बेसी धाने देखलौं। हवा-वि‍हाड़ि‍, ठनका भुमकमक चर्च-बर्च कतौ ने देखलौं। मन खुशी भेल, घरहट बाँचल भगवान भरोसे ई साल चलतै। घरनीक तगेदा अनठबैत एको घर नै ऐ साल छाड़लौं। हथि‍या तँ उनाड़ी बरखाक झटकी कतएसँ दौड़ल आएल। मनक सभ खुशी मनेमे सभटा रहि‍ गेल धएले-धाएल। एकटा घर माटि‍ पकड़लक दोसर चोंगरा बले ठाढ़। तेसरक कोनचारी लटकल चारि‍म भीतक भरे ठाढ़। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। १. नवीन ठाकुर २.रमा कान्त झा १ नवीन ठाकुर, गाम- लोहा (मधुबनी ) बिहार, जन्म -१५-०५-१९८४, सिक्षा - बी .कॉम (मुंबई विद्यापीठ) रूचि - कविता , साहित्यक अध्यापन एवं अपन मैथिल सांस्कृतिक कार्यकममेरूचि। कार्यरत - Comfort Intech Limited (malad) (R.M. ) (१) अंत --------(एक अनुभूति ) आब कतऽ अछि जिनगी कतऽ अछि जान आब किएक नै करैत अछि कियो हरान थमि गेल सभटा उजड़ि गेल सभटा रुधिरक प्रवाह रुकल छूटल प्राण आब कतऽ अछि जिनगी कतऽ अछि जान ! देहक पीड़ा , अस्थिक जकरण नै छी आब कथू सँ परेशान अछि ने अन्हार आ नै इजोत सभटा बुझी पड़ैए एकै सामान आब कतऽ अछि जिनगी कतऽ अछि जान ! व्यंजन नाना प्रकारक बनल तैयो बुझी पड़ैए मोन अछि भरल नै कोनो ललसा नै कोनो लोभ कथी पर करब आब ओतेक शान आब कतऽ अछि जिनगी कतऽ अछि जान ! कतऽ अछि आब लहर ओ उमंग ठहरि गेल जिनगी शिथिलताक संग नै कोनो लाज नै कोनो शर्म नै कोनो हकीकत नै कोनो भ्रम नै अछि अंगना हमर नै अछि दलान आब कतऽ अछि जिनगी कतऽ अछि जान ! ( २ ) अनुभव .......... जे कियो नै रहल हेता असगर हुनका की मालूम जे की छिऐ डर- ओ अनुभव की छिऐ सम्वेदना की छिऐ अकेलापन ख़ामोशी , सरसराहट , आहट, सूनापन भरोसा कोना हेतैन अपना आप पर जे कियो नै रहल हेता असगर ! ऐनामे मुँह नै देखने हेता ओही रुपे नै पहचान हेतैन अपन स्वरुप के..... एक जिन्दा सुगबुगाहटक तलाशमे सुतलोमे.... नै जगेने हेतैन ....बिस्तर जे कियो नै रहल हेता असगर ! हुनका की मालूम जे की छिऐक दूर सँ अबैत आटा चक्कीक ह्र्द्य- कम्पन .... पुक-पुक, ओ जेठक दुपहरियामे चिल्का के.. हकरब टुक -टुक तकैत बगरा केँ देखैत ....आकि अंगनामे पथार गौह्मक - मरुवाक पसरल जे कियो नै रहल हेता असगर ! हुनका की मालूम जे की छिऐ डर- ओ अनुभव ! ! ३ एखुनका मास्टरक व्यथा सोचलहुँ अध्यपक बनि कऽ हमहू ड़ेंगाएब दिन राति...!  मुदा मोनक भरम छल ई जखने स्कूल पहुचलौं  देख विद्यार्थी हँसऽ लागल पुछलक कोन गृह सँ एलौं! एगो विद्यार्थी ठाढ़ भऽकऽ सुनबऽ लागल खिस्सा ........! अहाँसँ पहिने जे मास्टर छल हुनकर की भेल दशा !! एगो विद्यार्थीक गलती पर देलखिन डंडा मारि .....  तेहन उछन्नर देलियनि हुनका भगलथि मानि कऽ हारि!  अहाँ जनि एहन गलती करब नै करब एहन शैतानी  नै तँ दइये दिनमे सभ मिल कऽ याद परा देब नानी ...!  कल जोरि कहिलिऐ, बौआ नै अहाँक कोनो दोख ई परिवर्तन पहिने लवितहुँ तँ हमहूँ रहितौं निधोख .....! हमहूँ रहितौं निधोक लितौं  डंडा चारि  बीत.....! तोड़ितहूँ दुनु टांग मॉसटरबा क फेर जिनगी मंगबितहूँ भीख...!! २ रमा कान्त झा, सौराठ मधुबनी (बिहार ) !!!देखू भ्रष्टाचारक बहल बसात !!! देखू भ्रष्टाचारक बहल बसात, चारा खा गेल मानुस कुपात, हवा पीगेल राजा ,कोना बहत बसात , खेल बना देल तमासा , सिनेमा घरमे लागि गेल सिला के जबानी , ओ  बनि सर्वस्व, जेल के बनि बसी , नर्तक भेल  जनता , गैस तेलपर चालक डंडा , बिजली रानी बरी सियानी , चूपेसँ लगेलक झटका , देखू भ्रष्टाचारक बहल बसात!! देलही बनल ददल के आड़ा , राजनीत के खोदल खड़ा , जनता नोर पोछि रखत दुपट , टोकी कपार सौँसे राखी सिलबटिआ , राजनीतिक नेता सभक अपना बाटा, देखू भर्ष्टाचारक बहल बसात , ओकर किसानसँ नाता , लोनइहर सभ कटै बैंकक चक्र , भासल जनता बनल मुँह तक , मुख्य मंत्री बनि , नेनोमे देल टाटा केँ  टकर , भाषण देय भऽ गेली महरानी , सिंगुर केँ बना देल सुन्दुर क कहानी , रोजगार सभ भेल चौपट , भाषण देल फटाफट  फेर टाटा , आब ने आयत फेर टाटा , ओ बनल फ़िल्मी एक्टर , आ बनल फ़िल्मी डाइरेक्टर , दुनु कहल एक्सन बनल तिहार जेल सलेक्सन , सुन बन जीवन हमर , बाबूक नै चलल कुनु कनेक्सन देखू भ्रष्टाचारक बहल बसात !! ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। १.डॉ॰ शशिधर कुमर २ किशन कारीगरनवीन कुमार "आशा" १. डॉ॰ शशिधर कुमर एम॰डी॰(आयु॰) – कायचिकित्सा कॉलेज ऑफ आयुर्वेद एण्ड रिसर्च सेण्टर, निगडी – प्राधिकरण, पूणा (महाराष्ट्र) – ४११०४४ डॉ॰ शशिधर कुमर एम॰डी॰(आयु॰) – कायचिकित्सा कॉलेज ऑफ आयुर्वेद एण्ड रिसर्च सेण्टर, निगडी – प्राधिकरण, पूणा (महाराष्ट्र) – ४११०४४ १ सभ सँ रसगर माएक भाषा (गीत) सभ  सँ  रसगर  माएक  भाषा, भाषा सँ मीठ  नञि हो मिसरी । करी ज्ञानार्जन पढ़ि बहुत विधा, पर निज भाषा केँ जुनि बिसरी ।। भाषा जे  पशु सँ  भिन्न केलक, भावाभिव्यक्ति केर चिन्ह देलक । रटि  दोसर  बोली, बनि  सुग्गा, अहँ ओहि भाषा केँ जुनि बिसरी । सभ  सँ  रसगर  माएक  भाषा, भाषा सँ मीठ नञि हो मिसरी ।। हो सारि  प्रिय,  सरहोजि  प्रिय, पत्नी  केँ  राखी  सटा   हृदय । पर अछि अस्तित्व जनिक कारण, अहँ ओहि माता केँ जुनि बिसरी । सभ  सँ  रसगर  माएक  भाषा, भाषा सँ मीठ नञि हो मिसरी ।। माएक  भाषा , अप्पन  भाषा । मिथिला – भाषा, अप्पन भाषा । परहेज  किए  एहि  भाषा सँ ? आउ एहि पर हम सभ गर्व करी । सभ  सँ  रसगर  माएक  भाषा, भाषा सँ मीठ नञि हो मिसरी ।। २ गे सजनी !  फोल कने फेर ठोर (गीत) कमल नयन लखि, मधुर वयन सुनि, हुलसित मन ई चकोर । गे सजनी !  फोल कने फेर ठोर ।। हमरा  एते  तोँ जुनि तरसा गे । अपन अधर मधु रस बरिसा दे । जुनि बन तोँ एतेक कठोर । गे सजनी !  फोल कने फेर ठोर ।। बोल - सुबोल  हृदय  उद्‌बेधल । तोहर सरिस दोसर नञि देखल । उर – अन्तर उठय हिलोर । गे सजनी !  फोल कने फेर ठोर ।। कोयली जदपि सातहु सुर सीखल । तदपि सखी , तोहरा नहि जीतल । मधु भरल छौ पोरे पोर । गे सजनी !  फोल कने फेर ठोर ।। ३ हम नञि कहब कि ......... (गीत) हम नञि कहब कि  फूल  मे गुलाब  छी अहाँ, हमर जिनगी केर स्वप्न ओ “ताज”  छी अहाँ । मुदा जिनगीक एकसरि  अन्हरिया मे विकसित, सुन्नर   ओ   सुमधुर   प्रभात   छी  अहाँ ।। हम नञि कहब कि “सुष्मिता” सँ नीक छी अहाँ, “ऐश्वर्या”  केर   जेरॉक्स   प्रतीप   छी  अहाँ । अहाँ  नञि  चाही  हमरा,  ई   इच्छा   अहँक, मुदा अहीं  हमर  अन्तरा , ओ गीत छी अहाँ ।। किछु  अन्यथा  ने    सोचब,  से  आग्रह  हमर, एक  कवि  केर   दुस्साहस  केँ  कऽ  देब क्षमा । अहाँ    अँऽही    रहब,   हऽम    हमही   रहब, अहँक   चाहत    रखबाक    हमर   हस्ती    कहाँ  !! ४ बनि जयतहुँ हम बच्चा (गीत) आइ  अनायस,  हमर  मोन  मे, सुन्नर  सनि  एक  इच्छा । ओ बीतल दिन आपिस चलि अबितय, बनि जयतहुँ हम बच्चा ।। सरस  बसन्तक अबितहि  भोरे,  बीछय जयतहुँ  टिकुला । बिनु  मजड़ल, आमक झाँखुड़ तर, टाँगि लगबितहुँ हिड़ला । दैत्यक  पहड़ा,  जेठ - दुपहरिया,  पर  लोभेँ  बम्बईय्या । बौअइतहुँ  गाछी – कलमेँ, पाबितहुँ  मालदह – कलकतिया । पाकल पीयर – लाल  बैड़ हम, जेबी भरि – भरि  अनितहुँ । लिच्ची जामुन आओर जिलेबी, किछु खयतहुँ, संग लबितहुँ । भूत – पड़ेतक डऽर तऽ, चलि  जयतय   पड़ाय  कलकत्ता । ओ बीतल दिन आपिस चलि अबितय, बनि जयतहुँ हम बच्चा ।। साओन मास - पहिल वर्खा , बम्मा  सँ खसइत झड़ – झड़ । जाय  नहयतहुँ, जेना  पहाड़क, कल - कल सुन्नर – निर्झर । सण्ठी  केँ  धुधुआय   बनबितहुँ,   सिगरेटक  हम  नाना । घूर  मे  दऽ  अधखिज्जू  आलू ,  तकर  बनबितहुँ  साना । चोड़ा – नुका,  निज माए – बाप सँ,  जयतहुँ  दौड़ल भोड़हा । कोमल - हरियर - कञ्च – बदाम, उखाड़ि  बनबितहुँ ओड़हा । फलना  केँ  रखबाड़  पकड़लक,  भेल  गाम  भरि  चर्चा । ओ बीतल दिन आपिस चलि अबितय, बनि जयतहुँ हम बच्चा ।। दुर्गापूजा – छठि - दिवाली,   पावनि   तीन   सहोदरि । मास दिवस इस्कूल दरस नञि, पावनि सम नञि दोसर । की भसान केर  छल उमंग,  की सुन्नर हुक्का – लोली । खेल  कबड्डी – किरकेट - गोली,  खेली  नुक्का – चोरी । चौठ – चन्द्र, मिथिलाक विशेषीकृत पावनि अति अनुपम । भाँति – भाँति पकवान देखि,  बढ़ि जाय  हृदय स्पन्दन । घण्टा – घण्टा बन्शी  पाथितहुँ,  रोहुक  आश  लगओने । रोहु – बोआरि ने, पोठी  दू टा,  अबितहुँ  हाथ डोलओने । बन्शी लऽ घुमितहुँ भरि दिन,  पोखड़ि – डाबर ओ खत्ता । ओ बीतल दिन आपिस चलि अबितय, बनि जयतहुँ हम बच्चा ।। ५ आबहु मिता छोड़ू (गीत) गोल – गोलैसी, पर – पञ्चैती । गप्प  अनेरोक,  कानाफुसकी । आबहु मिता छोड़ू । दुनिञा देखू दौड़ि रहल अछि, अपने घसड़ब छोड़ू । हे यौ , अपने घसड़ब छोड़ू ।। कमजोरहा  पर  देखबी  धाही । पुस्त - पुस्त केर करी उखाही । बात – बात  पर लट्ठ - लठैती । घऽरे  फनफन,  बाहर   लाही । बड़ बुत्ता जँ, अहँक देह मे,  नूतन सर्जन कऽरू । हे यौ ,  नूतन सर्जन कऽरू ।। ओ केलन्हि, से नीक ने कएलन्हि । फलना जिनगी व्यर्थ गमओलन्हि । मुइलहा   सारा   कोरि  भर्त्सना । सकल  अकारथ   हुनक  सर्जना । आनक कृत्य अकृत्य अतीते, अहीं नीक नव गऽढ़ू । हे यौ , अहीं नीक नव गऽढ़ू ।। ओ जिनगी भरि  कयल ऊकाठी । आम  खेलक  आ देलक  आँठी । आब  नरक सँ  देखथु  टकटक । हम्मर   बोझा , हुनिकर  आँटी । रोपल आन बबूड़, गलत छल, अहीँ काँट जुनि रोपू । हे यौ , अहीँ काँट जुनि रोपू ।। दऽड़ दड़बज्जा, चौक चौबटिया । व्यर्थक  गप्प, अनर्गल  चर्चा । एकर फूसि, ओकरा केँ लाड़णि । अपन मजा लेऽ अनका चाड़णि । अपन समय बहुमुल्य नाश कय, अनका दोष ने मऽढ़ू । हे यौ , अनका दोष ने मऽढ़ू ।। ६ अरिकोंच (कविता) हरियर  बड़का – बड़का पात,  देखू  कत्तेक सुन्नर लाग । ऊगय  अपनहि – आप,  पनिगर  खत्ता - बाड़ी - झाड़ी ।। केओ  “अरिकञ्चन”  कहय,   हऽम  कही  “अरिकोंच” । अहाँ   “अरकान्चू”   बुझू,  स्वाद  एक्कहि  मनोहारी ।। पात पिठार  संग बान्हल, सरिसो  तेल चक्का  छानल । नेबो  खूब दए झोड़ाओल, पड़िसल तीमन  सोझाँ थारी ।। संगहि भात  वा  सोहारी, झँसगर अरिकोंचक  तरकारी । लागय  भकभक तइयो नीक,  एकर  महिमा छी भारी ।। गामक बच्चा – बच्चा  जान, शहरक  अलखक   चान । जे अछि खएने - सएह बूझय,  आन तीमन पर  भारी ।। लागय  किनको  जँ  फूसि,  वा हो मन मे  जँ  झूसि । चीखि   देखू   एक  बेर ,  लागत   मन  मे  पसारी ।। २ किशन कारीगर नोर झहरि रहल छल। बहिन उठि नैहर सँ सासुर बिदा भेलीह बपहारि काटि कानि रहल छलीह हमहू बाप बाप कानि रहल छलहुँ आखि सँ टप टप नोर झहरि रहल छल। माए गे माए भैया औ भैया एसगर हम आब जा रहल छी भरदुतिया मे आएब अहाँ एतबाक आस लगेने हम जा रहल छी। छूटल नैहर केर सखी बहिनपा आब मोन पड़त सब साँझ भिंसरबा छूटल बाबू केर दुअरिया डोली उठा ल चल हो कहरबा। जाउ जाउ बहिन जाउ अहाँ अपना गाम भरदुतिया मे आएब हम अहाँक गाम माए हमर पुरी पका कए देतीह हम नेने आएब चिनीया बदाम । जुनि कानू बहिन पोछू आखिक नोर आब सासुर भेल अहाँक अप्पन गाम सास ससुर केर सेबा करब व्यर्थ समय गमा नहि करब अराम। जेहने अप्पन माए बाप तेहने सास ससुर नहि करब कहियो झग्गर दन लोक लाज केर राखब धियान। भैया यौ भैया अहाँ ठीके कहैत छी नहि करब हम केकरो स झगरदन सभ सँ मिली जुलि के हम रहब गृहलक्ष्मीक दायित्व केर करब निरवहन। मुदा कोना क कहू औ भैया छूटल नैहर बिदा भेल छी सासुर माए कनैत अछि बाबू के लगलैन बुकोर टप टप झहरि रहल अछि आखि सँ नोर। धैरज राखू बहिन जाउ एखन अपना गाम राखि मे चलि आएब नैहर बाबू केर गाम हसी खुशी सँ गीत गाएब सभ सखी मिली समा चकेबा खेलाएब। सभ के प्रणाम क बहिन बिदा भेलीह मुदा स्नेह स कानि रहल छलीह दुनू भाए बहिन कानि रहल छलहु आखि सँ टप टप नोर झहरि रहल छल। ३ नवीन कुमार "आशा" करेजक प्यास करेजक तूँ छँ प्यास ने जँ देखि तोरा प्रिय ने लागे किछु नीक तोरा लेल जतबा कहू ओ होयत कम ! ने हमरा छल आस जकर करी आरती ओ बनत प्राणप्रिय करेजक ...............! ने करेज कहल माने प्रिय , ने चित अछि स्थिर  आजुक राति जुनि करु लाज बस बनि जउ एक दोसरक साज  करेजक तूँ.............! सजनी जुनि मुनियौ अपन नयन आशा बनाओत ओकरा दरपण , ठोर जखन ठोरमे मिलै मौधक ओ एहसास देइत अछि करेजक... मृगनयनी हे रुपवती कते कहू अहाँक बारमे, आजुक राति जे देखल तोरा नवीन अंग गेलौं सिहरि  करेजक..............! आब कते करु तोहर बखान प्रिय चलू करी मिलान , आजुक राति ली हम कसम देब अहँक जीवन धरि संग करेजक तूँ छँ प्यास २ परी छी परी छी अहाँ नील गगनक नैन छी चैन.. इजोरियाक छी चाँद दीपक छी ज्योति .. तनक छी खुशबु होंठक छी मौध सदिखन देखि अहींक स्वप्न कि हमर बनब दर्पण.. प्रियशी कखन आएब अहाँ कहिया तक सताएब अहाँ परी छी अहाँ ..... ... नैनमे अछि अहींक स्वप्न अहाँ बिनु जीवन अछि तंग.. करुणा संग विनति करियो गे ने तुँ पहुँचबिए ठेस ... ने तँय आशा जिबैत मरि जाएत मरलो बाद घुरि ओ आओत  तोरा अपन सजनी बनाओत...परी छी अहाँ नील गगनक.... ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। १.रामदेव प्रसाद मण्‍डल ‘झारूदार’ २डा0अरुण कुमार सिंह १ रामदेव प्रसाद मण्‍डल ‘झारूदार’, मैथिलीक पहिल जनकवि आ मैथिलीक भिखारी ठाकुर रामदेव प्रसाद मण्‍डल ‘झारूदार’क गीत आ झारु। रामदेव प्रसाद मण्‍डल ‘झारूदार’ झारू- सत् कर्मसँ ऐ दुनि‍याँमे। शान्‍ति‍क संग सुख छै कुल।। असत् संग संगति‍ करबै तँ। जीवन गुजरत बनि‍ कऽ शूल।। गीत-1 सत् मे अटल रहू बाबू। सत्तक सुखमे देर छै।। असत् अज्ञान नरक केर भागी। ई जीवन अन्‍धेर छै।। जीवन डगरमे सत् करू संि‍चत। बि‍तै नै पल सतसँ वंचि‍त।। छोड़ि‍ असत जे सतमे जीबए। से दुनि‍याँमे शेर छै।। असत.....................। असत छोड़ि‍ जे सत् नै धरै छै। दुक्‍खक घर नरकमे परै छै।। सत छोड़ि‍ असतमे जीबए तकरा तँ दुख ढेड़ छै।। असत...................। सत डगरमे फुले-फूल छै। डगर असतमे भरल शूल छै।। जे परल अज्ञान अंधेरा। ई बुझैमे फेर छै।। असत.................। झारू हि‍न्‍दु मुश्‍लि‍म सि‍क्‍ख इशाई। एके गाछक सभ फूल यौ।। एके प्रकृति‍ सभकेँ रचलकै। दु बुझनाइ छी भूल यौ।। गीत- जाइत धर्मक सीमा तोरू। मानवसँ मानवकेँ जोरू।। जब एकटामे सभ मि‍ल जुड़बै। देश हेतै मृदुल यौ।। एके................। जगत गुरूवार सभ रचना केलकै। मेल एकताक मंतर देलकै।। जन जोरू जन फोरू बैनक। सभकेँ चटाबै धुल यौ।। एके..........। झुठ-फुसक आइर बनल छै। अपनो भैया गैर बनल छै।। अर्थक अनर्थ लगा कऽ। देशकेँ भोंकै छी शूल यौ। एके.........। २ डा0अरुण कुमार सिंह प्रियवर सम्पादकजी प्रियवर सम्पादकजी यथोचित अहिना सम्पादकीय लिखैत रही मने-मन हर्षित होइत रही सत्यसँ भेंट करैत रही शब्दक अर्थ बुझैत रही गरल मुर्दाकेँ उखारैत रही नव-नव इतिहास बनाबैत रही मिथिला,मैथिली एवं मैथिलकेँ परिभाषित करैत रही युग-युगसँ परिव्याप्त गलतफहमीकेँ सुधारैत रही परिवारवादसँ मैथिलीक रक्षा करैत रही वर्त्तमान् क कुचक्र चालिक पर्दाफाश करैत रही मैथिलीक हत्याराकेँ सजा दियाबैत रही मैथिल,ननमैथिल एवं सोइतक झगड़ाक फरिच्छोंठ करैत रही मैथिलीक आवाजकेँ जनता-अदालत धरि पहुँचाबैत रही आक्रोषितक आक्रोषकेँ आशीर्वचण बुझि अपनाबैत रही मैथिलीकेँ लहटा दिस जएबामे मदति करैत रही मैथिलीक प्रकाण्ड विद्वान प्रोफेसरकेँ शुद्ध- शुद्ध उच्चारण सिखाबैत रही कब्रमे लटकल पाइरकेँ अपन प्रतिष्ठा बचैबाक पाठ पढबैत रही अवसरवादीक अवसरवादिताकेँ बाँचैत रही वैशाखी छोड़ि अपना बलेँ खाड़ होइत रही मिथिलाक्षरकेँ पुनरस्थापित करबाक प्रयास करैत रही विधि, विज्ञान,वाणिज्य एवं नव-नव प्रौद्योगिकीक संग मैथिलीकेँ जौड़ैत रही मिथिला,मैथिलीक विकासमे सदति लागल रही सम्पूर्ण विश्वमे अपन स्थान निर्धारित करैत रही ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। विदेह नूतन अंक मिथिला कला संगीत १.ज्योति सुनीत चौधरी २.श्वेता झा (सिंगापुर) ३.गुंजन कर्ण४.इरा मल्लिक ५.राजनाथ मिश्र १. ज्योति सुनीत चौधरी जन्म स्थान -बेल्हवार, मधुबनी। ज्योति मिथिला चित्रकलामे सेहो पारंगत छथि आ हिनकर मिथिला चित्रकलाक प्रदर्शनी ईलिंग आर्ट ग्रुप केर अंतर्गत ईलिंग ब्रॊडवे, लंडनमे प्रदर्शित कएल गेल अछि। कविता संग्रह ’अर्चिस्’ प्रकाशित। ज्योति सम्प्रति लन्दनमे रहै छथि। दीयाबाती २.श्वेता झा (सिंगापुर) ३.गुंजन कर्ण  राँटी मधुबनी, सम्प्रति यू.के.मे रहै छथि।www.madhubaniarts.co.uk पर हुनकर कलाकृति देखि सकै छी। ४. इरा मल्लिक, पिता स्व. शिवनन्दन मल्लिक, गाम- महिसारि, दरभंगा। पति श्री कमलेश कुमार, भरहुल्ली, दरभंगा। ५. राजनाथ मिश्र चित्रमय मिथिला स्लाइड शो चित्रमय मिथिला (https://sites.google.com/a/videha.com/videha-paintings-photos/  ) ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। विदेह नूतन अंक गद्य-पद्य भारती १. मोहनदास (दीर्घकथा):लेखक: उदय प्रकाश (मूल हिन्दीसँ मैथिलीमे अनुवाद विनीत उत्पल) मोहनदास (मैथिली-देवनागरी) मोहनदास (मैथिली-मिथिलाक्षर) मोहनदास (मैथिली-ब्रेल) २.छिन्नमस्ता- प्रभा खेतानक हिन्दी उपन्यासक सुशीला झा द्वारा मैथिली अनुवाद छिन्नमस्ता ३. बिपिन कुमार झा-श्री देवब्रत बसुक संस्कृत कथाक मैथिली अनुवाद सुख केँ मृगमरीचिका बुझू। [एहि कथा[1] केर अनुवादक बिपिन कुमार झा राष्ट्रिय संस्कृत संस्थान, मानितविश्वविद्यालय, श्री सदाशिव परिसर पुरी, ओडिशा केर साहित्य विभाग मे अध्यापनरत छथि। कोनो प्रकारक टिप्पणी kumarvipin.jha@gmail.com पर सादर अपेक्षित] [1] बालबोधिनी, अनूदित कथा, मूल संस्कृत लेखक श्री देवब्रत बसु कोनो राजा अपन वृद्धावस्था मे अपन बेटा के राज्यक भार दय के स्स्वयं जंगल दिस तपस्या करबाक हेतुअ प्रस्थान कयलथि। बाटहि मे कोनो तेजस्वी पुरुष सऽ भेंट भेलन्हि। राजा हुनका नम्रता पूर्वक नमस्कार केलथि। ओ तेजस्वी पुरुष पुछलथि हे राजा ! आई नहिं  त अहाँक संग कोनो सैइक अछि नहि तऽ कोनो राजचिह्न! न रक्षक , न घोडा। एना असगरेअ कतय जाइत छी? राजा बजलाह- महोदय! संसारमोह के छोडि कें जंगल जाइत छी। तेजस्वी कहलथि- की अहाँ केर निश्चय दृढ अछि? क्रोध सँ, अपमानित भय के, उपेक्षित भय के, पराजय मे अधिक हानि प्राप्त कय के कदाचित् संसार त्याग करबाक मन करैत अछि। किन्तु बितैत समय केर संग स्वयं के संसार मे सामंजस्य बनेबाक लोक प्रयास करैत अछि। अहाँ तऽ ओहि प्रकारक नहि छी जे हारि मानि ली? हे महात्मा! हम उत्तम राजवंश मे उत्पन्न भेलहुँ। हमर बहुतो रानी सन्तान छथि। हम बहुतो इनार आ पोखरि खुनाओल। पूजा व्रत आदि बहुत कयल। बहुतो  देश जितलहुँ। विद्यालय आ चिकित्सालय सेहो प्रतिष्ठापित करायल। किन्तु कतहु हमरा सुख नहिं भेटल। एकर की कारण? कनिक काल रुकि के ओ तेजस्वी नजदीके मे विद्यमान नीमक गाछ देखा के बजलाह- हे राजा! ई नीमक गाछ  तीते टा होइत अछि। प्रार्थना सँ, दान सँ, पूजा सँ की एकर मधुर फल प्राप्त कयल जा सकैत अछि? संसारो अही नीमक गाछ जँका अछि। ओ मृगमरीचिका अपना सभ के एम्हर स ओम्हर  घुमबैत अछि। मृत्यु नजदीक एलाओ पर सुख नहि भेटैत अछि। सत्कर्म आ अनुष्ठान सँ, भगवान केर धान सँ, शरणागति सँ सुखक आशा रखबाक चाही न कि अन्य प्रकार सँ। दोसरे क्षण ओ तेजस्वी नहिं देखाई देलथि। भगवाने वस्तुतः हुनक तत्त्व बुझेबाक हेतु एहि रूप आयल छलाह ई सोचि राजा डेग आगू बढवैत भगवान केर स्मरण करैत बढि गेलाह। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। बालानां कृते १. डॉ॰ शशिधर कुमर “विदेह” २. इरा मल्लिक ३.कुन्दन कुमार ४.कैलाश कामत १ डॉ॰ शशिधर कुमर “विदेह” एम॰डी॰(आयु॰) – कायचिकित्सा कॉलेज ऑफ आयुर्वेद एण्ड रिसर्च सेण्टर, निगडी – प्राधिकरण, पूणा (महाराष्ट्र)– ४११०४४, चन्ना मामा (बालगीत) दियाबातीक समय थिक । किछु छोट – क्षिण धिया – पुता केर मित्र मण्डली जमा अछि । ओ सभ एतबहु छोट नहि कि किछु नञि बुझल होइ । ओकरा सभ केँ ई तऽ बुझल छै कि रॉकेट नामक कोनो चीज़ होइत छै जे चान पर जा सकैत अछि आ मनुक्खो केँ लऽ जा सकैत अछि । ओकरा सभ केँ ईहो बुझल छै कि फटक्का मे रॉकेट नामक एकटा फटक्का होइत छै जे अकाश मे उड़ैत छै । पर ओ सभ एतबो पैघ नञि कि सभटा बात बुझले होइ । ओकरा सभ केँ ई नञि बूझल जे फटक्का वला रॉकेट नञि तऽ अपनहि चान पर जा सकैत अछि आ नहिञे ककरो चान धरि लऽ जा सकैत अछि । अपन घऽरक पैघ सदस्य द्वारा आनल फटक्का वला रॉकेट केँ देखि कऽ ई अबोध धिया – पुता सभ की की कल्पनाक उड़ान भरैत अछि से एहि बाल – गीत मे वर्णित अछि । देखल जाए :- चल रॉकेट !  उड़ान भर । लऽ चल हमरा चान पर । चन्ना मामा शोर करै छथि, बैसल आसमान पर ।। मामा भेटथिन्ह, मामी भेटथिन्ह । नाना भेटथिन्ह, नानी भेटथिन्ह । नाना सँ खूब खिस्सा सुनबै, सूतए काल दलान पर ।। मामा  संगे  सौंसे  घुमबै । दुर्गा - पूजा  मेला  देखबै । नटुआ नाच, सिनेमा, नाटक, देखबै दुर्गा – थान तर ।। कचड़ी खएबै, मुरही खएबै । रसगुल्ला  बलुसाही खएबै । चूड़ा – दऽही – गरम जिलेबी, नथुनी साव दोकान पर ।। ओहि ठाँ माएक दूध भात नञि । ओहि ठाँ बाबू, बहिन, भाए नञि । ओहि ठाँ हम ने रहबै हरदम, घुरि फेर अएबै गाम पर ।। २ इरा मल्लिक, पिता स्व. शिवनन्दन मल्लिक, गाम- महिसारि, दरभंगा। पति श्री कमलेश कुमार, भरहुल्ली, दरभंगा। माँ!!!! माँ हमरो कीनि दिअ खिलौना! खेलब मोन भरि, नहि उत्पात मचायब, नहि पसारब आब, हम कोनो घेउना, माँ हमरो कीनि दिअ खिलौना। ना ना नहि करू, जिद अहाँ छोड़ू,  आनि दिअ कनी सुंदर सुन्दर,  भालू, बन्दर, खग, मृग छौना, माँ हमरो कीनि दिअ खिलौना। जाउ बजार अहाँ जल्दी सँ, करु नहि देर , हमरो सँग लS लिय, रिमोटवाSल्ला ओ मोटर गाड़ी, हवाइ जहाज किनू, होइ महग या भारी, बैटरीवाला मोटर-बोट हो, हाथी .घोड़ा,या गुड़िया छोट हो, ढोल, मजीरा,ड्रम, कैसियो, जे पसंद हुअए अहाँकेँ मैया, कीनि दिअ नहि ताकु रुपैया, माँ हमरो कीनि दिअ खिलौना। लेकिन माँSS! नहि चाहि हमरा, बंदूक ,रायफल, तीर, कमान, खेल खेल मे हम नहि सीखी, हिंसा सनके पाप , हम छी भारतमाँक सपूत, हमरा भरS के अछि , बड्ड ऊँच उडान , जन जनक रच्छा कS सकी, देशक कय सकी कल्यण, देश मे आनी खुशहाली,  बालपन क, खेल खेल मे. पूर्वाभ्यास एकर कS ली, माँ! हमरो कीनि दिअ खिलौना। ३ कुन्दन कुमार आँखि झूठ नै बजैत अछि, राज हृदयक आँखि खोलैत अछि। पुछलिऐ कतेको बेर,  ऐ दिल! कनी बताउ हमरा, ओ कोन घड़ी छल, ओ केहेन पल छल! जहि पल मे , हम दS देने छलहुँ, अहाँ केँ, आन क हाथ, करु नै धोखा, नहि करु प्रपंच, बता दिअ हमरा,  हृदय हारैक कारण! नीलामी तेँ नै लगा कऽ, बैसल छलहुँ हम, हाय लटकि गेलहुँ हम, ई केहेन फंदा मे, अनजान सफर अछि. अनजान अछि रास्ता, मंजिलक कोनो ठेकान नै, चलल जा रहल छी हम कतय, तैयो! हमरा लए, तीख रौद रहितो, मस्त पवनक झकोर बुझि. मोन सँ कहैत छी, सुहाना सफर अछि अपन, कहैत छैक, चलनाइ जीवन थिक, निरन्तर, लगातार, अनवरत! ४. कैलाश कुमार कामत,  पि‍ताक नाओं- श्री गंगाराम कामत , माताक नाओं- श्रीमती सुनीता देवी, गाम- बेरमा, भाया- तमुरि‍या , थाना- मधेपुर, जि‍ला- मधुबनी , (बि‍हार) मधुबनी जि‍लाक बेरमा गामक मध्‍य वि‍द्यालयमे पढ़ैत कैलाश कामत, सातमाक छात्र छथि‍ बड़ लगनसँ फोटो बनबै छथि‍। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com  पर पठाउ। बच्चा लोकनि द्वारा स्मरणीय श्लोक १.प्रातः काल ब्रह्ममुहूर्त्त (सूर्योदयक एक घंटा पहिने) सर्वप्रथम अपन दुनू हाथ देखबाक चाही, आ’ ई श्लोक बजबाक चाही। कराग्रे वसते लक्ष्मीः करमध्ये सरस्वती। करमूले स्थितो ब्रह्मा प्रभाते करदर्शनम्॥ करक आगाँ लक्ष्मी बसैत छथि, करक मध्यमे सरस्वती, करक मूलमे ब्रह्मा स्थित छथि। भोरमे ताहि द्वारे करक दर्शन करबाक थीक। २.संध्या काल दीप लेसबाक काल- दीपमूले स्थितो ब्रह्मा दीपमध्ये जनार्दनः। दीपाग्रे शङ्करः प्रोक्त्तः सन्ध्याज्योतिर्नमोऽस्तुते॥ दीपक मूल भागमे ब्रह्मा, दीपक मध्यभागमे जनार्दन (विष्णु) आऽ दीपक अग्र भागमे शङ्कर स्थित छथि। हे संध्याज्योति! अहाँकेँ नमस्कार। ३.सुतबाक काल- रामं स्कन्दं हनूमन्तं वैनतेयं वृकोदरम्। शयने यः स्मरेन्नित्यं दुःस्वप्नस्तस्य नश्यति॥ जे सभ दिन सुतबासँ पहिने राम, कुमारस्वामी, हनूमान्, गरुड़ आऽ भीमक स्मरण करैत छथि, हुनकर दुःस्वप्न नष्ट भऽ जाइत छन्हि। ४. नहेबाक समय- गङ्गे च यमुने चैव गोदावरि सरस्वति। नर्मदे सिन्धु कावेरि जलेऽस्मिन् सन्निधिं कुरू॥ हे गंगा, यमुना, गोदावरी, सरस्वती, नर्मदा, सिन्धु आऽ कावेरी  धार। एहि जलमे अपन सान्निध्य दिअ। ५.उत्तरं यत्समुद्रस्य हिमाद्रेश्चैव दक्षिणम्। वर्षं तत् भारतं नाम भारती यत्र सन्ततिः॥ समुद्रक उत्तरमे आऽ हिमालयक दक्षिणमे भारत अछि आऽ ओतुका सन्तति भारती कहबैत छथि। ६.अहल्या द्रौपदी सीता तारा मण्डोदरी तथा। पञ्चकं ना स्मरेन्नित्यं महापातकनाशकम्॥ जे सभ दिन अहल्या, द्रौपदी, सीता, तारा आऽ मण्दोदरी, एहि पाँच साध्वी-स्त्रीक स्मरण करैत छथि, हुनकर सभ पाप नष्ट भऽ जाइत छन्हि। ७.अश्वत्थामा बलिर्व्यासो हनूमांश्च विभीषणः। कृपः परशुरामश्च सप्तैते चिरञ्जीविनः॥ अश्वत्थामा, बलि, व्यास, हनूमान्, विभीषण, कृपाचार्य आऽ परशुराम- ई सात टा चिरञ्जीवी कहबैत छथि। ८.साते भवतु सुप्रीता देवी शिखर वासिनी उग्रेन तपसा लब्धो यया पशुपतिः पतिः। सिद्धिः साध्ये सतामस्तु प्रसादान्तस्य धूर्जटेः जाह्नवीफेनलेखेव यन्यूधि शशिनः कला॥ ९. बालोऽहं जगदानन्द न मे बाला सरस्वती। अपूर्णे पंचमे वर्षे वर्णयामि जगत्त्रयम् ॥ १०. दूर्वाक्षत मंत्र(शुक्ल यजुर्वेद अध्याय २२, मंत्र २२) आ ब्रह्मन्नित्यस्य प्रजापतिर्ॠषिः। लिंभोक्त्ता देवताः। स्वराडुत्कृतिश्छन्दः। षड्जः स्वरः॥ आ ब्रह्म॑न् ब्राह्म॒णो ब्र॑ह्मवर्च॒सी जा॑यता॒मा रा॒ष्ट्रे रा॑ज॒न्यः शुरे॑ऽइषव्यो॒ऽतिव्या॒धी म॑हार॒थो जा॑यतां॒ दोग्ध्रीं धे॒नुर्वोढा॑न॒ड्वाना॒शुः सप्तिः॒ पुर॑न्धि॒र्योवा॑ जि॒ष्णू र॑थे॒ष्ठाः स॒भेयो॒ युवास्य यज॑मानस्य वी॒रो जा॒यतां निका॒मे-नि॑कामे नः प॒र्जन्यों वर्षतु॒ फल॑वत्यो न॒ऽओष॑धयः पच्यन्तां योगेक्ष॒मो नः॑ कल्पताम्॥२२॥ मन्त्रार्थाः सिद्धयः सन्तु पूर्णाः सन्तु मनोरथाः। शत्रूणां बुद्धिनाशोऽस्तु मित्राणामुदयस्तव। ॐ दीर्घायुर्भव। ॐ सौभाग्यवती भव। हे भगवान्। अपन देशमे सुयोग्य आ’ सर्वज्ञ विद्यार्थी उत्पन्न होथि, आ’ शुत्रुकेँ नाश कएनिहार सैनिक उत्पन्न होथि। अपन देशक गाय खूब दूध दय बाली, बरद भार वहन करएमे सक्षम होथि आ’ घोड़ा त्वरित रूपेँ दौगय बला होए। स्त्रीगण नगरक नेतृत्व करबामे सक्षम होथि आ’ युवक सभामे ओजपूर्ण भाषण देबयबला आ’ नेतृत्व देबामे सक्षम होथि। अपन देशमे जखन आवश्यक होय वर्षा होए आ’ औषधिक-बूटी सर्वदा परिपक्व होइत रहए। एवं क्रमे सभ तरहेँ हमरा सभक कल्याण होए। शत्रुक बुद्धिक नाश होए आ’ मित्रक उदय होए॥ मनुष्यकें कोन वस्तुक इच्छा करबाक चाही तकर वर्णन एहि मंत्रमे कएल गेल अछि। एहिमे वाचकलुप्तोपमालड़्कार अछि। अन्वय- ब्रह्म॑न् - विद्या आदि गुणसँ परिपूर्ण ब्रह्म रा॒ष्ट्रे - देशमे ब्र॑ह्मवर्च॒सी-ब्रह्म विद्याक तेजसँ युक्त्त आ जा॑यतां॒- उत्पन्न होए रा॑ज॒न्यः-राजा शुरे॑ऽ–बिना डर बला इषव्यो॒- बाण चलेबामे निपुण ऽतिव्या॒धी-शत्रुकेँ तारण दय बला म॑हार॒थो-पैघ रथ बला वीर दोग्ध्रीं-कामना(दूध पूर्ण करए बाली) धे॒नुर्वोढा॑न॒ड्वाना॒शुः धे॒नु-गौ वा वाणी र्वोढा॑न॒ड्वा- पैघ बरद ना॒शुः-आशुः-त्वरित सप्तिः॒-घोड़ा पुर॑न्धि॒र्योवा॑- पुर॑न्धि॒- व्यवहारकेँ धारण करए बाली र्योवा॑-स्त्री जि॒ष्णू-शत्रुकेँ जीतए बला र॑थे॒ष्ठाः-रथ पर स्थिर स॒भेयो॒-उत्तम सभामे युवास्य-युवा जेहन यज॑मानस्य-राजाक राज्यमे वी॒रो-शत्रुकेँ पराजित करएबला निका॒मे-नि॑कामे-निश्चययुक्त्त कार्यमे नः-हमर सभक प॒र्जन्यों-मेघ वर्षतु॒-वर्षा होए फल॑वत्यो-उत्तम फल बला ओष॑धयः-औषधिः पच्यन्तां- पाकए योगेक्ष॒मो-अलभ्य लभ्य करेबाक हेतु कएल गेल योगक रक्षा नः॑-हमरा सभक हेतु कल्पताम्-समर्थ होए ग्रिफिथक अनुवाद- हे ब्रह्मण, हमर राज्यमे ब्राह्मण नीक धार्मिक विद्या बला, राजन्य-वीर,तीरंदाज, दूध दए बाली गाय, दौगय बला जन्तु, उद्यमी नारी होथि। पार्जन्य आवश्यकता पड़ला पर वर्षा देथि, फल देय बला गाछ पाकए, हम सभ संपत्ति अर्जित/संरक्षित करी। 8.VIDEHA FOR NON RESIDENTS 8.1 to 8.3 MAITHILI LITERATURE IN ENGLISH 8.1.1.The Comet   -GAJENDRA THAKUR translated by Jyoti Jha chaudhary 8.1.2.The_Science_of_Words- GAJENDRA THAKUR translated by the author himself 8.1.3.On_the_dice-board_of_the_millennium- GAJENDRA THAKUR translated by Jyoti Jha chaudhary 8.1.4.NAAGPHANS (IN ENGLISH)- SHEFALIKA VERMA translated by Dr. Rajiv Kumar Verma and Dr. Jaya Verma 1. Episodes Of The Life - ("Kist-Kist Jeevan" by Smt. shefalika Varma translated into English by Smt. Jyoti Jha Chaudhary )  2.Original Poem in Maithili by Kalikant Jha "Buch" Translated into English by Jyoti Jha Chaudhary १ Episodes Of The Life - ("Kist-Kist Jeevan" by Smt. shefalika Varma translated into English by Smt. Jyoti Jha Chaudhary ) Shefalika Verma has written two outstanding books in Maithili; one a book of poems titled “BHAVANJALI”, and the other, a book of short stories titled “YAYAVARI”. Her Maithili Books have been translated into many languages including Hindi, English, Oriya, Gujarati, Dogri and others. She is frequently invited to the India Poetry Recital Festivals as her fans and friends are important people. 

Translator:Jyoti Jha Chaudhary, Place of Birth- Belhvar (Madhubani District), She learnt Mithila Painting under Ms. Shveta Jha, Basera Institute, Jamshedpur and Fine Arts from Toolika, Sakchi, Jamshedpur (India). Her Mithila Paintings have been displayed by Ealing Art Group at Ealing Broadway, London.published work: "ARCHIS"- COLLECTION OF MAITHILI HAIKUS AND POEMS. She currently lives in London. Episodes Of The Life : Dear Shefalikaji, I can’t get what to write.  I am deeply hurt. I had heard that sad news from some senior person that Lalanji is no more. I couldn’t believe but I understood that bad news were not false. I always think about you- how you are. My evening in Saharsa and Lalan bhaiya’s words –‘Some love is left yet’- Can this vanish? Again in Prayag, our meeting in the birth centenary of Amarnath Jha – how had he left the world so soon leaving these things away? According to him you are soft hearted as well as firm. May God strengthen your capability! Because, you have dual responsibility as your children would like to see their father in your eyes, so don’t keep them filled with tears. May the goddess Shree 108 Jagdamba give the entire house to bear this sorrow! Yours (Neerja Renu) 03-01-2002 Reverend Shefalikaji, Pranaam, I always felt that I should be away from that family but I am the closest person to that intellectual (Saraswat) family. The first thing to be remembered in the morning and adorable brother‘s inspirational personality was our strength. The village of the bank of river can be destroyed but the fame of the people of that village is spread all over- I was spreading these words getting from him only. When I  suddenly came to know this I was shocked. I felt anger for myself because the struggle of University made me so detached from you I couldn’t realise. I had been to your place in Patna. You were visiting Delhi at that time. I know your sad heart that how an ever intellectual lady, absorbing meditation, a scholar like you, is left alive being inspirational for us, for your children,  for protecting society ,literature and culture. Satyaprakash’s mother is very worried about you. My family is always dedicated to follow your instructions. We will be obliged if you instruct us to do anything any time. Please bless us by informing about your well being. Asking for wellbeing of  you and your family to the Goddess Tara Manoranjan Jha PG Department (Maithili) Saharsa 02-01-2002 २ Kalikant Jha "Buch" 1934-2009, Birth place- village Karian, District- Samastipur (Karian is birth place of famous Indian Nyaiyyayik philosopher Udayanacharya), Father Late Pt. Rajkishor Jha was first headmaster of village middle school. Mother Late Kala Devi was housewife. After completing Intermediate education started job block office of Govt. of Bihar.published in Mithila Mihir, Mati-pani, Bhakha, and Maithili Akademi magazine. Translator:Jyoti Jha Chaudhary, Place of Birth- Belhvar (Madhubani District), She learnt Mithila Painting under Ms. Shveta Jha, Basera Institute, Jamshedpur and Fine Arts from Toolika, Sakchi, Jamshedpur (India). Her Mithila Paintings have been displayed by Ealing Art Group at Ealing Broadway, London.published work: "ARCHIS"- COLLECTION OF MAITHILI HAIKUS AND POEMS. She currently lives in London. The Young Sister-In-Law The sister-in-law got new salwar brother is in his old dress Husband stays at home wife got job in Ranchi In the morning, the crows caw in the courtyard Brother is laying peace less Found his wife in dreams Revising his past in love The thirsty eyes are closed with eyelashes stuck with dried tears Husband stays at home wife got job in Ranchi Safeguarding the courtyard Cooking was tough for him Whenever his right side quivered His heart started beating faster Sometimes he expressed his agony by singing Husband stays at home wife got job in Ranchi He couldn’t learn rolling chapattis So happy in cooking dalpitthi Death is sure because of such life This is my last letter The life is stuck in desire of meeting being hung in separation Husband stays at home wife got job in Ranchi Sister-in-law reached home in the evening With toned body and tied hair By virtue of brother’s good luck This summer vacation will be cool The wife is pleasing the upset husband with scented cloves and cardamom Husband stays at home wife got job in Ranchi Send your comments to ggajendra@videha.com Gadgets powered by Google Input: (कोष्ठकमे देवनागरी, मिथिलाक्षर किंवा फोनेटिक-रोमनमे टाइप करू। Input in Devanagari, Mithilakshara or Phonetic-Roman.) Output: (परिणाम देवनागरी, मिथिलाक्षर आ फोनेटिक-रोमन/ रोमनमे। Result in Devanagari, Mithilakshara and Phonetic-Roman/ Roman.) English to Maithili Maithili to English इंग्लिश-मैथिली-कोष / मैथिली-इंग्लिश-कोष  प्रोजेक्टकेँ आगू बढ़ाऊ, अपन सुझाव आ योगदान ई-मेल द्वारा ggajendra@videha.com पर पठाऊ। Top of Form विदेहक मैथिली-अंग्रेजी आ अंग्रेजी मैथिली कोष (इंटरनेटपर पहिल बेर सर्च-डिक्शनरी) एम.एस. एस.क्यू.एल. सर्वर आधारित -Based on ms-sql server Maithili-English and English-Maithili Dictionary. १.भारत आ नेपालक मैथिली भाषा-वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक शैली आ २.मैथिलीमे भाषा सम्पादन पाठ्यक्रम १.नेपाल आ भारतक मैथिली भाषा-वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक शैली

१.१. नेपालक मैथिली भाषा वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक  उच्चारण आ लेखन शैली (भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक धारणाकेँ पूर्ण रूपसँ सङ्ग लऽ निर्धारित) मैथिलीमे उच्चारण तथा लेखन १.पञ्चमाक्षर आ अनुस्वार: पञ्चमाक्षरान्तर्गत ङ, ञ, ण, न एवं म अबैत अछि। संस्कृत भाषाक अनुसार शब्दक अन्तमे जाहि वर्गक अक्षर रहैत अछि ओही वर्गक पञ्चमाक्षर अबैत अछि। जेना- अङ्क (क वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ङ् आएल अछि।) पञ्च (च वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ञ् आएल अछि।) खण्ड (ट वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ण् आएल अछि।) सन्धि (त वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे न् आएल अछि।) खम्भ (प वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे म् आएल अछि।) उपर्युक्त बात मैथिलीमे कम देखल जाइत अछि। पञ्चमाक्षरक बदलामे अधिकांश जगहपर अनुस्वारक प्रयोग देखल जाइछ। जेना- अंक, पंच, खंड, संधि, खंभ आदि। व्याकरणविद पण्डित गोविन्द झाक कहब छनि जे कवर्ग, चवर्ग आ टवर्गसँ पूर्व अनुस्वार लिखल जाए तथा तवर्ग आ पवर्गसँ पूर्व पञ्चमाक्षरे लिखल जाए। जेना- अंक, चंचल, अंडा, अन्त तथा कम्पन। मुदा हिन्दीक निकट रहल आधुनिक लेखक एहि बातकेँ नहि मानैत छथि। ओ लोकनि अन्त आ कम्पनक जगहपर सेहो अंत आ कंपन लिखैत देखल जाइत छथि। नवीन पद्धति किछु सुविधाजनक अवश्य छैक। किएक तँ एहिमे समय आ स्थानक बचत होइत छैक। मुदा कतोक बेर हस्तलेखन वा मुद्रणमे अनुस्वारक छोट सन बिन्दु स्पष्ट नहि भेलासँ अर्थक अनर्थ होइत सेहो देखल जाइत अछि। अनुस्वारक प्रयोगमे उच्चारण-दोषक सम्भावना सेहो ततबए देखल जाइत अछि। एतदर्थ कसँ लऽ कऽ पवर्ग धरि पञ्चमाक्षरेक प्रयोग करब उचित अछि। यसँ लऽ कऽ ज्ञ धरिक अक्षरक सङ्ग अनुस्वारक प्रयोग करबामे कतहु कोनो विवाद नहि देखल जाइछ। २.ढ आ ढ़ : ढ़क उच्चारण “र् ह”जकाँ होइत अछि। अतः जतऽ “र् ह”क उच्चारण हो ओतऽ मात्र ढ़ लिखल जाए। आन ठाम खाली ढ लिखल जएबाक चाही। जेना- ढ = ढाकी, ढेकी, ढीठ, ढेउआ, ढङ्ग, ढेरी, ढाकनि, ढाठ आदि। ढ़ = पढ़ाइ, बढ़ब, गढ़ब, मढ़ब, बुढ़बा, साँढ़, गाढ़, रीढ़, चाँढ़, सीढ़ी, पीढ़ी आदि। उपर्युक्त शब्द सभकेँ देखलासँ ई स्पष्ट होइत अछि जे साधारणतया शब्दक शुरूमे ढ आ मध्य तथा अन्तमे ढ़ अबैत अछि। इएह नियम ड आ ड़क सन्दर्भ सेहो लागू होइत अछि। ३.व आ ब : मैथिलीमे “व”क उच्चारण ब कएल जाइत अछि, मुदा ओकरा ब रूपमे नहि लिखल जएबाक चाही। जेना- उच्चारण : बैद्यनाथ, बिद्या, नब, देबता, बिष्णु, बंश, बन्दना आदि। एहि सभक स्थानपर क्रमशः वैद्यनाथ, विद्या, नव, देवता, विष्णु, वंश, वन्दना लिखबाक चाही। सामान्यतया व उच्चारणक लेल ओ प्रयोग कएल जाइत अछि। जेना- ओकील, ओजह आदि। ४.य आ ज : कतहु-कतहु “य”क उच्चारण “ज”जकाँ करैत देखल जाइत अछि, मुदा ओकरा ज नहि लिखबाक चाही। उच्चारणमे यज्ञ, जदि, जमुना, जुग, जाबत, जोगी, जदु, जम आदि कहल जाएबला शब्द सभकेँ क्रमशः यज्ञ, यदि, यमुना, युग, यावत, योगी, यदु, यम लिखबाक चाही। ५.ए आ य : मैथिलीक वर्तनीमे ए आ य दुनू लिखल जाइत अछि। प्राचीन वर्तनी- कएल, जाए, होएत, माए, भाए, गाए आदि। नवीन वर्तनी- कयल, जाय, होयत, माय, भाय, गाय आदि। सामान्यतया शब्दक शुरूमे ए मात्र अबैत अछि। जेना एहि, एना, एकर, एहन आदि। एहि शब्द सभक स्थानपर यहि, यना, यकर, यहन आदिक प्रयोग नहि करबाक चाही। यद्यपि मैथिलीभाषी थारू सहित किछु जातिमे शब्दक आरम्भोमे “ए”केँ य कहि उच्चारण कएल जाइत अछि। ए आ “य”क प्रयोगक सन्दर्भमे प्राचीने पद्धतिक अनुसरण करब उपयुक्त मानि एहि पुस्तकमे ओकरे प्रयोग कएल गेल अछि। किएक तँ दुनूक लेखनमे कोनो सहजता आ दुरूहताक बात नहि अछि। आ मैथिलीक सर्वसाधारणक उच्चारण-शैली यक अपेक्षा एसँ बेसी निकट छैक। खास कऽ कएल, हएब आदि कतिपय शब्दकेँ कैल, हैब आदि रूपमे कतहु-कतहु लिखल जाएब सेहो “ए”क प्रयोगकेँ बेसी समीचीन प्रमाणित करैत अछि। ६.हि, हु तथा एकार, ओकार : मैथिलीक प्राचीन लेखन-परम्परामे कोनो बातपर बल दैत काल शब्दक पाछाँ हि, हु लगाओल जाइत छैक। जेना- हुनकहि, अपनहु, ओकरहु, तत्कालहि, चोट्टहि, आनहु आदि। मुदा आधुनिक लेखनमे हिक स्थानपर एकार एवं हुक स्थानपर ओकारक प्रयोग करैत देखल जाइत अछि। जेना- हुनके, अपनो, तत्काले, चोट्टे, आनो आदि। ७.ष तथा ख : मैथिली भाषामे अधिकांशतः षक उच्चारण ख होइत अछि। जेना- षड्यन्त्र (खड़यन्त्र), षोडशी (खोड़शी), षट्कोण (खटकोण), वृषेश (वृखेश), सन्तोष (सन्तोख) आदि। ८.ध्वनि-लोप : निम्नलिखित अवस्थामे शब्दसँ ध्वनि-लोप भऽ जाइत अछि: (क) क्रियान्वयी प्रत्यय अयमे य वा ए लुप्त भऽ जाइत अछि। ओहिमे सँ पहिने अक उच्चारण दीर्घ भऽ जाइत अछि। ओकर आगाँ लोप-सूचक चिह्न वा विकारी (’ / ऽ) लगाओल जाइछ। जेना- पूर्ण रूप : पढ़ए (पढ़य) गेलाह, कए (कय) लेल, उठए (उठय) पड़तौक। अपूर्ण रूप : पढ़’ गेलाह, क’ लेल, उठ’ पड़तौक। पढ़ऽ गेलाह, कऽ लेल, उठऽ पड़तौक। (ख) पूर्वकालिक कृत आय (आए) प्रत्ययमे य (ए) लुप्त भऽ जाइछ, मुदा लोप-सूचक विकारी नहि लगाओल जाइछ। जेना- पूर्ण रूप : खाए (य) गेल, पठाय (ए) देब, नहाए (य) अएलाह। अपूर्ण रूप : खा गेल, पठा देब, नहा अएलाह। (ग) स्त्री प्रत्यय इक उच्चारण क्रियापद, संज्ञा, ओ विशेषण तीनूमे लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना- पूर्ण रूप : दोसरि मालिनि चलि गेलि। अपूर्ण रूप : दोसर मालिन चलि गेल। (घ) वर्तमान कृदन्तक अन्तिम त लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना- पूर्ण रूप : पढ़ैत अछि, बजैत अछि, गबैत अछि। अपूर्ण रूप : पढ़ै अछि, बजै अछि, गबै अछि। (ङ) क्रियापदक अवसान इक, उक, ऐक तथा हीकमे लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना- पूर्ण रूप: छियौक, छियैक, छहीक, छौक, छैक, अबितैक, होइक। अपूर्ण रूप : छियौ, छियै, छही, छौ, छै, अबितै, होइ। (च) क्रियापदीय प्रत्यय न्ह, हु तथा हकारक लोप भऽ जाइछ। जेना- पूर्ण रूप : छन्हि, कहलन्हि, कहलहुँ, गेलह, नहि। अपूर्ण रूप : छनि, कहलनि, कहलौँ, गेलऽ, नइ, नञि, नै। ९.ध्वनि स्थानान्तरण : कोनो-कोनो स्वर-ध्वनि अपना जगहसँ हटि कऽ दोसर ठाम चलि जाइत अछि। खास कऽ ह्रस्व इ आ उक सम्बन्धमे ई बात लागू होइत अछि। मैथिलीकरण भऽ गेल शब्दक मध्य वा अन्तमे जँ ह्रस्व इ वा उ आबए तँ ओकर ध्वनि स्थानान्तरित भऽ एक अक्षर आगाँ आबि जाइत अछि। जेना- शनि (शइन), पानि (पाइन), दालि ( दाइल), माटि (माइट), काछु (काउछ), मासु (माउस) आदि। मुदा तत्सम शब्द सभमे ई निअम लागू नहि होइत अछि। जेना- रश्मिकेँ रइश्म आ सुधांशुकेँ सुधाउंस नहि कहल जा सकैत अछि। १०.हलन्त(्)क प्रयोग : मैथिली भाषामे सामान्यतया हलन्त (्)क आवश्यकता नहि होइत अछि। कारण जे शब्दक अन्तमे अ उच्चारण नहि होइत अछि। मुदा संस्कृत भाषासँ जहिनाक तहिना मैथिलीमे आएल (तत्सम) शब्द सभमे हलन्त प्रयोग कएल जाइत अछि। एहि पोथीमे सामान्यतया सम्पूर्ण शब्दकेँ मैथिली भाषा सम्बन्धी निअम अनुसार हलन्तविहीन राखल गेल अछि। मुदा व्याकरण सम्बन्धी प्रयोजनक लेल अत्यावश्यक स्थानपर कतहु-कतहु हलन्त देल गेल अछि। प्रस्तुत पोथीमे मथिली लेखनक प्राचीन आ नवीन दुनू शैलीक सरल आ समीचीन पक्ष सभकेँ समेटि कऽ वर्ण-विन्यास कएल गेल अछि। स्थान आ समयमे बचतक सङ्गहि हस्त-लेखन तथा तकनीकी दृष्टिसँ सेहो सरल होबऽबला हिसाबसँ वर्ण-विन्यास मिलाओल गेल अछि। वर्तमान समयमे मैथिली मातृभाषी पर्यन्तकेँ आन भाषाक माध्यमसँ मैथिलीक ज्ञान लेबऽ पड़ि रहल परिप्रेक्ष्यमे लेखनमे सहजता तथा एकरूपतापर ध्यान देल गेल अछि। तखन मैथिली भाषाक मूल विशेषता सभ कुण्ठित नहि होइक, ताहू दिस लेखक-मण्डल सचेत अछि। प्रसिद्ध भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक कहब छनि जे सरलताक अनुसन्धानमे एहन अवस्था किन्नहु ने आबऽ देबाक चाही जे भाषाक विशेषता छाँहमे पडि जाए। -(भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक धारणाकेँ पूर्ण रूपसँ सङ्ग लऽ निर्धारित) १.२. मैथिली अकादमी, पटना द्वारा निर्धारित मैथिली लेखन-शैली

१. जे शब्द मैथिली-साहित्यक प्राचीन कालसँ आइ धरि जाहि वर्त्तनीमे प्रचलित अछि, से सामान्यतः ताहि वर्त्तनीमे लिखल जाय- उदाहरणार्थ-

ग्राह्य

एखन ठाम जकर, तकर तनिकर अछि

अग्राह्य अखन, अखनि, एखेन, अखनी ठिमा, ठिना, ठमा जेकर, तेकर तिनकर। (वैकल्पिक रूपेँ ग्राह्य) ऐछ, अहि, ए।

२. निम्नलिखित तीन प्रकारक रूप वैकल्पिकतया अपनाओल जाय: भऽ गेल, भय गेल वा भए गेल। जा रहल अछि, जाय रहल अछि, जाए रहल अछि। कर’ गेलाह, वा करय गेलाह वा करए गेलाह।

३. प्राचीन मैथिलीक ‘न्ह’ ध्वनिक स्थानमे ‘न’ लिखल जाय सकैत अछि यथा कहलनि वा कहलन्हि।

४. ‘ऐ’ तथा ‘औ’ ततय लिखल जाय जत’ स्पष्टतः ‘अइ’ तथा ‘अउ’ सदृश उच्चारण इष्ट हो। यथा- देखैत, छलैक, बौआ, छौक इत्यादि।

५. मैथिलीक निम्नलिखित शब्द एहि रूपे प्रयुक्त होयत: जैह, सैह, इएह, ओऐह, लैह तथा दैह।

६. ह्र्स्व इकारांत शब्दमे ‘इ’ के लुप्त करब सामान्यतः अग्राह्य थिक। यथा- ग्राह्य देखि आबह, मालिनि गेलि (मनुष्य मात्रमे)।

७. स्वतंत्र ह्रस्व ‘ए’ वा ‘य’ प्राचीन मैथिलीक उद्धरण आदिमे तँ यथावत राखल जाय, किंतु आधुनिक प्रयोगमे वैकल्पिक रूपेँ ‘ए’ वा ‘य’ लिखल जाय। यथा:- कयल वा कएल, अयलाह वा अएलाह, जाय वा जाए इत्यादि।

८. उच्चारणमे दू स्वरक बीच जे ‘य’ ध्वनि स्वतः आबि जाइत अछि तकरा लेखमे स्थान वैकल्पिक रूपेँ देल जाय। यथा- धीआ, अढ़ैआ, विआह, वा धीया, अढ़ैया, बियाह।

९. सानुनासिक स्वतंत्र स्वरक स्थान यथासंभव ‘ञ’ लिखल जाय वा सानुनासिक स्वर। यथा:- मैञा, कनिञा, किरतनिञा वा मैआँ, कनिआँ, किरतनिआँ।

१०. कारकक विभक्त्तिक निम्नलिखित रूप ग्राह्य:- हाथकेँ, हाथसँ, हाथेँ, हाथक, हाथमे। ’मे’ मे अनुस्वार सर्वथा त्याज्य थिक। ‘क’ क वैकल्पिक रूप ‘केर’ राखल जा सकैत अछि।

११. पूर्वकालिक क्रियापदक बाद ‘कय’ वा ‘कए’ अव्यय वैकल्पिक रूपेँ लगाओल जा सकैत अछि। यथा:- देखि कय वा देखि कए।

१२. माँग, भाँग आदिक स्थानमे माङ, भाङ इत्यादि लिखल जाय।

१३. अर्द्ध ‘न’ ओ अर्द्ध ‘म’ क बदला अनुसार नहि लिखल जाय, किंतु छापाक सुविधार्थ अर्द्ध ‘ङ’ , ‘ञ’, तथा ‘ण’ क बदला अनुस्वारो लिखल जा सकैत अछि। यथा:- अङ्क, वा अंक, अञ्चल वा अंचल, कण्ठ वा कंठ।

१४. हलंत चिह्न निअमतः लगाओल जाय, किंतु विभक्तिक संग अकारांत प्रयोग कएल जाय। यथा:- श्रीमान्, किंतु श्रीमानक।

१५. सभ एकल कारक चिह्न शब्दमे सटा क’ लिखल जाय, हटा क’ नहि, संयुक्त विभक्तिक हेतु फराक लिखल जाय, यथा घर परक।

१६. अनुनासिककेँ चन्द्रबिन्दु द्वारा व्यक्त कयल जाय। परंतु मुद्रणक सुविधार्थ हि समान जटिल मात्रापर अनुस्वारक प्रयोग चन्द्रबिन्दुक बदला कयल जा सकैत अछि। यथा- हिँ केर बदला हिं।

१७. पूर्ण विराम पासीसँ ( । ) सूचित कयल जाय।

१८. समस्त पद सटा क’ लिखल जाय, वा हाइफेनसँ जोड़ि क’ ,  हटा क’ नहि।

१९. लिअ तथा दिअ शब्दमे बिकारी (ऽ) नहि लगाओल जाय।

२०. अंक देवनागरी रूपमे राखल जाय।

२१.किछु ध्वनिक लेल नवीन चिन्ह बनबाओल जाय। जा' ई नहि बनल अछि ताबत एहि दुनू ध्वनिक बदला पूर्ववत् अय/ आय/ अए/ आए/ आओ/ अओ लिखल जाय। आकि ऎ वा ऒ सँ व्यक्त कएल जाय।

ह./- गोविन्द झा ११/८/७६ श्रीकान्त ठाकुर ११/८/७६ सुरेन्द्र झा "सुमन" ११/०८/७६

  २. मैथिलीमे भाषा सम्पादन पाठ्यक्रम २.१. उच्चारण निर्देश: (बोल्ड कएल रूप ग्राह्य):- दन्त न क उच्चारणमे दाँतमे जीह सटत- जेना बाजू नाम , मुदा ण क उच्चारणमे जीह मूर्धामे सटत (नै सटैए तँ उच्चारण दोष अछि)- जेना बाजू गणेश। तालव्य शमे जीह तालुसँ , षमे मूर्धासँ आ दन्त समे दाँतसँ सटत। निशाँ, सभ आ शोषण बाजि कऽ देखू। मैथिलीमे ष केँ वैदिक संस्कृत जकाँ ख सेहो उच्चरित कएल जाइत अछि, जेना वर्षा, दोष। य अनेको स्थानपर ज जकाँ उच्चरित होइत अछि आ ण ड़ जकाँ (यथा संयोग आ गणेश संजोग आ गड़ेस उच्चरित होइत अछि)। मैथिलीमे व क उच्चारण ब, श क उच्चारण स आ य क उच्चारण ज सेहो होइत अछि। ओहिना ह्रस्व इ बेशीकाल मैथिलीमे पहिने बाजल जाइत अछि कारण देवनागरीमे आ मिथिलाक्षरमे ह्रस्व इ अक्षरक पहिने लिखलो जाइत आ बाजलो जएबाक चाही। कारण जे हिन्दीमे एकर दोषपूर्ण उच्चारण होइत अछि (लिखल तँ पहिने जाइत अछि मुदा बाजल बादमे जाइत अछि), से शिक्षा पद्धतिक दोषक कारण हम सभ ओकर उच्चारण दोषपूर्ण ढंगसँ कऽ रहल छी। अछि- अ इ छ  ऐछ (उच्चारण) छथि- छ इ थ  – छैथ (उच्चारण) पहुँचि- प हुँ इ च (उच्चारण) आब अ आ इ ई ए ऐ ओ औ अं अः ऋ ऐ सभ लेल मात्रा सेहो अछि, मुदा ऐमे ई ऐ ओ औ अं अः ऋ केँ संयुक्ताक्षर रूपमे गलत रूपमे प्रयुक्त आ उच्चरित कएल जाइत अछि। जेना ऋ केँ री  रूपमे उच्चरित करब। आ देखियौ- ऐ लेल देखिऔ क प्रयोग अनुचित। मुदा देखिऐ लेल देखियै अनुचित। क् सँ ह् धरि अ सम्मिलित भेलासँ क सँ ह बनैत अछि, मुदा उच्चारण काल हलन्त युक्त शब्दक अन्तक उच्चारणक प्रवृत्ति बढ़ल अछि, मुदा हम जखन मनोजमे ज् अन्तमे बजैत छी, तखनो पुरनका लोककेँ बजैत सुनबन्हि- मनोजऽ, वास्तवमे ओ अ युक्त ज् = ज बजै छथि। फेर ज्ञ अछि ज् आ ञ क संयुक्त मुदा गलत उच्चारण होइत अछि- ग्य। ओहिना क्ष अछि क् आ ष क संयुक्त मुदा उच्चारण होइत अछि छ। फेर श् आ र क संयुक्त अछि श्र ( जेना श्रमिक) आ स् आ र क संयुक्त अछि स्र (जेना मिस्र)। त्र भेल त+र । उच्चारणक ऑडियो फाइल विदेह आर्काइव  http://www.videha.co.in/ पर उपलब्ध अछि। फेर केँ / सँ / पर पूर्व अक्षरसँ सटा कऽ लिखू मुदा तँ / कऽ हटा कऽ। ऐमे सँ मे पहिल सटा कऽ लिखू आ बादबला हटा कऽ। अंकक बाद टा लिखू सटा कऽ मुदा अन्य ठाम टा लिखू हटा कऽ– जेना छहटा मुदा सभ टा। फेर ६अ म सातम लिखू- छठम सातम नै। घरबलामे बला मुदा घरवालीमे वाली प्रयुक्त करू। रहए- रहै मुदा सकैए (उच्चारण सकै-ए)। मुदा कखनो काल रहए आ रहै मे अर्थ भिन्नता सेहो, जेना से कम्मो जगहमे पार्किंग करबाक अभ्यास रहै ओकरा। पुछलापर पता लागल जे ढुनढुन नाम्ना ई ड्राइवर कनाट प्लेसक पार्किंगमे काज करैत रहए। छलै, छलए मे सेहो ऐ तरहक भेल। छलए क उच्चारण छल-ए सेहो। संयोगने- (उच्चारण संजोगने) केँ/  कऽ केर- क ( केर क प्रयोग गद्यमे नै करू , पद्यमे कऽ सकै छी। ) क (जेना रामक) –रामक आ संगे (उच्चारण राम के /  राम कऽ सेहो) सँ- सऽ (उच्चारण) चन्द्रबिन्दु आ अनुस्वार- अनुस्वारमे कंठ धरिक प्रयोग होइत अछि मुदा चन्द्रबिन्दुमे नै। चन्द्रबिन्दुमे कनेक एकारक सेहो उच्चारण होइत अछि- जेना रामसँ- (उच्चारण राम सऽ)  रामकेँ- (उच्चारण राम कऽ/ राम के सेहो)। केँ जेना रामकेँ भेल हिन्दीक को (राम को)- राम को= रामकेँ क जेना रामक भेल हिन्दीक का ( राम का) राम का= रामक कऽ जेना जा कऽ भेल हिन्दीक कर ( जा कर) जा कर= जा कऽ सँ भेल हिन्दीक से (राम से) राम से= रामसँ सऽ , तऽ , त , केर (गद्यमे) एे चारू शब्द सबहक प्रयोग अवांछित। के दोसर अर्थेँ प्रयुक्त भऽ सकैए- जेना, के कहलक? विभक्ति “क”क बदला एकर प्रयोग अवांछित। नञि, नहि, नै, नइ, नँइ, नइँ, नइं ऐ सभक उच्चारण आ लेखन - नै त्त्व क बदलामे त्व जेना महत्वपूर्ण (महत्त्वपूर्ण नै) जतए अर्थ बदलि जाए ओतहि मात्र तीन अक्षरक संयुक्ताक्षरक प्रयोग उचित। सम्पति- उच्चारण स म्प इ त (सम्पत्ति नै- कारण सही उच्चारण आसानीसँ सम्भव नै)। मुदा सर्वोत्तम (सर्वोतम नै)। राष्ट्रिय (राष्ट्रीय नै) सकैए/ सकै (अर्थ परिवर्तन) पोछैले/ पोछै लेल/ पोछए लेल पोछैए/ पोछए/ (अर्थ परिवर्तन) पोछए/ पोछै ओ लोकनि ( हटा कऽ, ओ मे बिकारी नै) ओइ/ ओहि ओहिले/ ओहि लेल/ ओही लऽ जएबेँ/ बैसबेँ पँचभइयाँ देखियौक/ (देखिऔक नै- तहिना अ मे ह्रस्व आ दीर्घक मात्राक प्रयोग अनुचित) जकाँ / जेकाँ तँइ/ तैँ/ होएत / हएत नञि/ नहि/ नँइ/ नइँ/ नै सौँसे/ सौंसे बड़ / बड़ी (झोराओल) गाए (गाइ नहि), मुदा गाइक दूध (गाएक दूध नै।) रहलेँ/ पहिरतैँ हमहीं/ अहीं सब - सभ सबहक - सभहक धरि - तक गप- बात बूझब - समझब बुझलौं/ समझलौं/ बुझलहुँ - समझलहुँ हमरा आर - हम सभ आकि- आ कि सकैछ/ करैछ (गद्यमे प्रयोगक आवश्यकता नै) होइन/ होनि जाइन (जानि नै, जेना देल जाइन) मुदा जानि-बूझि (अर्थ परिव्र्तन) पइठ/ जाइठ आउ/ जाउ/ आऊ/ जाऊ मे, केँ, सँ, पर (शब्दसँ सटा कऽ) तँ कऽ धऽ दऽ (शब्दसँ हटा कऽ) मुदा दूटा वा बेसी विभक्ति संग रहलापर पहिल विभक्ति टाकेँ सटाऊ। जेना ऐमे सँ । एकटा , दूटा (मुदा कए टा) बिकारीक प्रयोग शब्दक अन्तमे, बीचमे अनावश्यक रूपेँ नै। आकारान्त आ अन्तमे अ क बाद बिकारीक प्रयोग नै (जेना दिअ , आ/ दिय’ , आ’, आ नै ) अपोस्ट्रोफीक प्रयोग बिकारीक बदलामे करब अनुचित आ मात्र फॉन्टक तकनीकी न्यूनताक परिचायक)- ओना बिकारीक संस्कृत रूप ऽ अवग्रह कहल जाइत अछि आ वर्तनी आ उच्चारण दुनू ठाम एकर लोप रहैत अछि/ रहि सकैत अछि (उच्चारणमे लोप रहिते अछि)। मुदा अपोस्ट्रोफी सेहो अंग्रेजीमे पसेसिव केसमे होइत अछि आ फ्रेंचमे शब्दमे जतए एकर प्रयोग होइत अछि जेना raison d’etre एतए सेहो एकर उच्चारण रैजौन डेटर होइत अछि, माने अपोस्ट्रॉफी अवकाश नै दैत अछि वरन जोड़ैत अछि, से एकर प्रयोग बिकारीक बदला देनाइ तकनीकी रूपेँ सेहो अनुचित)। अइमे, एहिमे/ ऐमे जइमे, जाहिमे एखन/ अखन/ अइखन केँ (के नहि) मे (अनुस्वार रहित) भऽ मे दऽ तँ (तऽ, त नै) सँ ( सऽ स नै) गाछ तर गाछ लग साँझ खन जो (जो go, करै जो do) तै/तइ जेना- तै दुआरे/ तइमे/ तइले जै/जइ जेना- जै कारण/ जइसँ/ जइले ऐ/अइ जेना- ऐ कारण/ ऐसँ/ अइले/ मुदा एकर एकटा खास प्रयोग- लालति‍ कतेक दि‍नसँ कहैत रहैत अइ लै/लइ जेना लैसँ/ लइले/ लै दुआरे लहँ/ लौं गेलौं/ लेलौं/ लेलँह/ गेलहुँ/ लेलहुँ/ लेलँ जइ/ जाहि‍/ जै जहि‍ठाम/ जाहि‍ठाम/ जइठाम/ जैठाम एहि‍/ अहि‍/ अइ (वाक्यक अंतमे ग्राह्य) / ऐ अइछ/ अछि‍/ ऐछ तइ/ तहि‍/ तै/ ताहि‍ ओहि‍/ ओइ सीखि‍/ सीख जीवि‍/ जीवी/ जीब भलेहीं/ भलहि‍ं तैं/ तँइ/ तँए जाएब/ जएब लइ/ लै छइ/ छै नहि‍/ नै/ नइ गइ/ गै छनि‍/ छन्‍हि‍  ... समए शब्‍दक संग जखन कोनो वि‍भक्‍ति‍ जुटै छै तखन समै जना समैपर इत्‍यादि‍। असगरमे हृदए आ वि‍भक्‍ति‍ जुटने हृदे जना हृदेसँ, हृदेमे इत्‍यादि‍। जइ/ जाहि‍/ जै जहि‍ठाम/ जाहि‍ठाम/ जइठाम/ जैठाम एहि‍/ अहि‍/ अइ/ ऐ अइछ/ अछि‍/ ऐछ तइ/ तहि‍/ तै/ ताहि‍ ओहि‍/ ओइ सीखि‍/ सीख जीवि‍/ जीवी/ जीब भले/ भलेहीं/ भलहि‍ं तैं/ तँइ/ तँए जाएब/ जएब लइ/ लै छइ/ छै नहि‍/ नै/ नइ गइ/ गै छनि‍/ छन्‍हि‍ चुकल अछि/ गेल गछि २.२. मैथिलीमे भाषा सम्पादन पाठ्यक्रम नीचाँक सूचीमे देल विकल्पमेसँ लैंगुएज एडीटर द्वारा कोन रूप चुनल जेबाक चाही: बोल्ड कएल रूप ग्राह्य: १.होयबला/ होबयबला/ होमयबला/ हेब’बला, हेम’बला/ होयबाक/होबएबला /होएबाक २. आ’/आऽ आ ३. क’ लेने/कऽ लेने/कए लेने/कय लेने/ल’/लऽ/लय/लए ४. भ’ गेल/भऽ गेल/भय गेल/भए गेल ५. कर’ गेलाह/करऽ गेलह/करए गेलाह/करय गेलाह ६. लिअ/दिअ लिय’,दिय’,लिअ’,दिय’/ ७. कर’ बला/करऽ बला/ करय बला करैबला/क’र’ बला / करैवाली ८. बला वला (पुरूष), वाली (स्‍त्री) ९ . आङ्ल आंग्ल १०. प्रायः प्रायह ११. दुःख दुख १ २. चलि गेल चल गेल/चैल गेल १३. देलखिन्ह देलकिन्ह, देलखिन १४. देखलन्हि देखलनि/ देखलैन्ह १५. छथिन्ह/ छलन्हि छथिन/ छलैन/ छलनि १६. चलैत/दैत चलति/दैति १७. एखनो अखनो १८. बढ़नि‍ बढ़इन बढ़न्हि १९. ओ’/ओऽ(सर्वनाम) ओ २० . ओ (संयोजक) ओ’/ओऽ २१. फाँगि/फाङ्गि फाइंग/फाइङ २२. जे जे’/जेऽ २३. ना-नुकुर ना-नुकर २४. केलन्हि/केलनि‍/कयलन्हि २५. तखनतँ/ तखन तँ २६. जा रहल/जाय रहल/जाए रहल २७. निकलय/निकलए लागल/ लगल बहराय/ बहराए लागल/ लगल निकल’/बहरै लागल २८. ओतय/ जतय जत’/ ओत’/ जतए/ ओतए २९. की फूरल जे कि फूरल जे ३०. जे जे’/जेऽ ३१. कूदि / यादि(मोन पारब) कूइद/याइद/कूद/याद/ यादि (मोन) ३२. इहो/ ओहो ३३. हँसए/ हँसय हँसऽ ३४. नौ आकि दस/नौ किंवा दस/ नौ वा दस ३५. सासु-ससुर सास-ससुर ३६. छह/ सात छ/छः/सात ३७. की  की’/ कीऽ (दीर्घीकारान्तमे ऽ वर्जित) ३८. जबाब जवाब ३९. करएताह/ करेताह करयताह ४०. दलान दिशि दलान दिश/दलान दिस ४१ . गेलाह गएलाह/गयलाह ४२. किछु आर/ किछु और/ किछ आर ४३. जाइ छल/ जाइत छल जाति छल/जैत छल ४४. पहुँचि/ भेट जाइत छल/ भेट जाइ छलए पहुँच/ भेटि‍ जाइत छल ४५. जबान (युवा)/ जवान(फौजी) ४६. लय/ लए क’/ कऽ/ लए कए / लऽ कऽ/ लऽ कए ४७. ल’/लऽ कय/ कए ४८. एखन / एखने / अखन / अखने ४९. अहींकेँ अहीँकेँ ५०. गहींर गहीँर ५१. धार पार केनाइ धार पार केनाय/केनाए ५२. जेकाँ जेँकाँ/ जकाँ ५३. तहिना तेहिना ५४. एकर अकर ५५. बहिनउ बहनोइ ५६. बहिन बहिनि ५७. बहिन-बहिनोइ बहिन-बहनउ ५८. नहि/ नै ५९. करबा / करबाय/ करबाए ६०. तँ/ त ऽ तय/तए ६१. भैयारी मे छोट-भाए/भै/, जेठ-भाय/भाइ, ६२. गि‍नतीमे दू भाइ/भाए/भाँइ ६३. ई पोथी दू भाइक/ भाँइ/ भाए/ लेल। यावत जावत ६४. माय मै / माए मुदा माइक ममता ६५. देन्हि/ दइन दनि‍/ दएन्हि/ दयन्हि दन्हि/ दैन्हि ६६. द’/ दऽ/ दए ६७. ओ (संयोजक) ओऽ (सर्वनाम) ६८. तका कए तकाय तकाए ६९. पैरे (on foot) पएरे  कएक/ कैक ७०. ताहुमे/ ताहूमे ७१. पुत्रीक ७२. बजा कय/ कए / कऽ ७३. बननाय/बननाइ ७४. कोला ७५. दिनुका दिनका ७६. ततहिसँ ७७. गरबओलन्हि/ गरबौलनि‍/ गरबेलन्हि/ गरबेलनि‍ ७८. बालु बालू ७९. चेन्ह चिन्ह(अशुद्ध) ८०. जे जे’ ८१ . से/ के से’/के’ ८२. एखुनका अखनुका ८३. भुमिहार भूमिहार ८४. सुग्गर / सुगरक/ सूगर ८५. झठहाक झटहाक ८६. छूबि ८७. करइयो/ओ करैयो ने देलक /करियौ-करइयौ ८८. पुबारि पुबाइ ८९. झगड़ा-झाँटी झगड़ा-झाँटि ९०. पएरे-पएरे पैरे-पैरे ९१. खेलएबाक ९२. खेलेबाक ९३. लगा ९४. होए- हो – होअए ९५. बुझल बूझल ९६. बूझल (संबोधन अर्थमे) ९७. यैह यएह / इएह/ सैह/ सएह ९८. तातिल ९९. अयनाय- अयनाइ/ अएनाइ/ एनाइ १००. निन्न- निन्द १०१. बिनु बिन १०२. जाए जाइ १०३. जाइ (in different sense)-last word of sentence १०४. छत पर आबि जाइ १०५. ने १०६. खेलाए (play) –खेलाइ १०७. शिकाइत- शिकायत १०८. ढप- ढ़प १०९ . पढ़- पढ ११०. कनिए/ कनिये कनिञे १११. राकस- राकश ११२. होए/ होय होइ ११३. अउरदा- औरदा ११४. बुझेलन्हि (different meaning- got understand) ११५. बुझएलन्हि/बुझेलनि‍/ बुझयलन्हि (understood himself) ११६. चलि- चल/ चलि‍ गेल ११७. खधाइ- खधाय ११८. मोन पाड़लखिन्ह/ मोन पाड़लखि‍न/ मोन पारलखिन्ह ११९. कैक- कएक- कइएक १२०. लग ल’ग १२१. जरेनाइ १२२. जरौनाइ जरओनाइ- जरएनाइ/ जरेनाइ १२३. होइत १२४. गरबेलन्हि/ गरबेलनि‍ गरबौलन्हि/ गरबौलनि‍ १२५. चिखैत- (to test)चिखइत १२६. करइयो (willing to do) करैयो १२७. जेकरा- जकरा १२८. तकरा- तेकरा १२९. बिदेसर स्थानेमे/ बिदेसरे स्थानमे १३०. करबयलहुँ/ करबएलहुँ/ करबेलहुँ करबेलौं १३१. हारिक (उच्चारण हाइरक) १३२. ओजन वजन आफसोच/ अफसोस कागत/ कागच/ कागज १३३. आधे भाग/ आध-भागे १३४. पिचा / पिचाय/पिचाए १३५. नञ/ ने १३६. बच्चा नञ (ने) पिचा जाय १३७. तखन ने (नञ) कहैत अछि। कहै/ सुनै/ देखै छल मुदा कहैत-कहैत/ सुनैत-सुनैत/ देखैत-देखैत १३८. कतेक गोटे/ कताक गोटे १३९. कमाइ-धमाइ/ कमाई- धमाई १४० . लग ल’ग १४१. खेलाइ (for playing) १४२. छथिन्ह/ छथिन १४३. होइत होइ १४४. क्यो कियो / केओ १४५. केश (hair) १४६. केस (court-case) १४७ . बननाइ/ बननाय/ बननाए १४८. जरेनाइ १४९. कुरसी कुर्सी १५०. चरचा चर्चा १५१. कर्म करम १५२. डुबाबए/ डुबाबै/ डुमाबै डुमाबय/ डुमाबए १५३. एखुनका/ अखुनका १५४. लए/ लिअए (वाक्यक अंतिम शब्द)- लऽ १५५. कएलक/ केलक १५६. गरमी गर्मी १५७ . वरदी वर्दी १५८. सुना गेलाह सुना’/सुनाऽ १५९. एनाइ-गेनाइ १६०. तेना ने घेरलन्हि/ तेना ने घेरलनि‍ १६१. नञि / नै १६२. डरो ड’रो १६३. कतहु/ कतौ कहीं १६४. उमरिगर-उमेरगर उमरगर १६५. भरिगर १६६. धोल/धोअल धोएल १६७. गप/गप्प १६८. के के’ १६९. दरबज्जा/ दरबजा १७०. ठाम १७१. धरि तक १७२. घूरि लौटि १७३. थोरबेक १७४. बड्ड १७५. तोँ/ तूँ १७६. तोँहि( पद्यमे ग्राह्य) १७७. तोँही / तोँहि १७८. करबाइए करबाइये १७९. एकेटा १८०. करितथि /करतथि १८१. पहुँचि/ पहुँच १८२. राखलन्हि रखलन्हि/ रखलनि‍ १८३. लगलन्हि/ लगलनि‍ लागलन्हि १८४. सुनि (उच्चारण सुइन) १८५. अछि (उच्चारण अइछ) १८६. एलथि गेलथि १८७. बितओने/ बि‍तौने/ बितेने १८८. करबओलन्हि/ करबौलनि‍/ करेलखिन्ह/ करेलखि‍न १८९. करएलन्हि/ करेलनि‍ १९०. आकि/ कि १९१. पहुँचि/ पहुँच १९२. बत्ती जराय/ जराए जरा (आगि लगा) १९३. से से’ १९४. हाँ मे हाँ (हाँमे हाँ विभक्त्तिमे हटा कए) १९५. फेल फैल १९६. फइल(spacious) फैल १९७. होयतन्हि/ होएतन्हि/ होएतनि‍/हेतनि‍/ हेतन्हि १९८. हाथ मटिआएब/ हाथ मटियाबय/हाथ मटियाएब १९९. फेका फेंका २००. देखाए देखा २०१. देखाबए २०२. सत्तरि सत्तर २०३. साहेब साहब २०४.गेलैन्ह/ गेलन्हि/ गेलनि‍ २०५. हेबाक/ होएबाक २०६.केलो/ कएलहुँ/केलौं/ केलुँ २०७. किछु न किछु/ किछु ने किछु २०८.घुमेलहुँ/ घुमओलहुँ/ घुमेलौं २०९. एलाक/ अएलाक २१०. अः/ अह २११.लय/ लए (अर्थ-परिवर्त्तन) २१२.कनीक/ कनेक २१३.सबहक/ सभक २१४.मिलाऽ/ मिला २१५.कऽ/ क २१६.जाऽ/ जा २१७.आऽ/ आ २१८.भऽ /भ’ (’ फॉन्टक कमीक द्योतक) २१९.निअम/ नियम २२० .हेक्टेअर/ हेक्टेयर २२१.पहिल अक्षर ढ/ बादक/ बीचक ढ़ २२२.तहिं/तहिँ/ तञि/ तैं २२३.कहिं/ कहीं २२४.तँइ/ तैं / तइँ २२५.नँइ/ नइँ/  नञि/ नहि/नै २२६.है/ हए / एलीहेँ/ २२७.छञि/ छै/ छैक /छइ २२८.दृष्टिएँ/ दृष्टियेँ २२९.आ (come)/ आऽ(conjunction) २३०. आ (conjunction)/ आऽ(come) २३१.कुनो/ कोनो, कोना/केना २३२.गेलैन्ह-गेलन्हि-गेलनि‍ २३३.हेबाक- होएबाक २३४.केलौँ- कएलौँ-कएलहुँ/केलौं २३५.किछु न किछ- किछु ने किछु २३६.केहेन- केहन २३७.आऽ (come)-आ (conjunction-and)/आ। आब'-आब' /आबह-आबह २३८. हएत-हैत २३९.घुमेलहुँ-घुमएलहुँ- घुमेलाें २४०.एलाक- अएलाक २४१.होनि- होइन/ होन्हि/ २४२.ओ-राम ओ श्यामक बीच(conjunction), ओऽ कहलक (he said)/ओ २४३.की हए/ कोसी अएली हए/ की है। की हइ २४४.दृष्टिएँ/ दृष्टियेँ २४५ .शामिल/ सामेल २४६.तैँ / तँए/ तञि/ तहिं २४७.जौं / ज्योँ/ जँ/ २४८.सभ/ सब २४९.सभक/ सबहक २५०.कहिं/ कहीं २५१.कुनो/ कोनो/ कोनहुँ/ २५२.फारकती भऽ गेल/ भए गेल/ भय गेल २५३.कोना/ केना/ कन्‍ना/कना २५४.अः/ अह २५५.जनै/ जनञ २५६.गेलनि‍/ गेलाह (अर्थ परिवर्तन) २५७.केलन्हि/ कएलन्हि/ केलनि‍/ २५८.लय/ लए/ लएह (अर्थ परिवर्तन) २५९.कनीक/ कनेक/कनी-मनी २६०.पठेलन्हि‍ पठेलनि‍/ पठेलइन/ पपठओलन्हि/ पठबौलनि‍/ २६१.निअम/ नियम २६२.हेक्टेअर/ हेक्टेयर २६३.पहिल अक्षर रहने ढ/ बीचमे रहने ढ़ २६४.आकारान्तमे बिकारीक प्रयोग उचित नै/ अपोस्ट्रोफीक प्रयोग फान्टक तकनीकी न्यूनताक परिचायक ओकर बदला अवग्रह (बिकारी) क प्रयोग उचित २६५.केर (पद्यमे ग्राह्य) / -क/ कऽ/ के २६६.छैन्हि- छन्हि २६७.लगैए/ लगैये २६८.होएत/ हएत २६९.जाएत/ जएत/ २७०.आएत/ अएत/ आओत २७१ .खाएत/ खएत/ खैत २७२.पिअएबाक/ पिएबाक/पि‍येबाक २७३.शुरु/ शुरुह २७४.शुरुहे/ शुरुए २७५.अएताह/अओताह/ एताह/ औताह २७६.जाहि/ जाइ/ जइ/ जै/ २७७.जाइत/ जैतए/ जइतए २७८.आएल/ अएल २७९.कैक/ कएक २८०.आयल/ अएल/ आएल २८१. जाए/ जअए/ जए (लालति‍ जाए लगलीह।) २८२. नुकएल/ नुकाएल २८३. कठुआएल/ कठुअएल २८४. ताहि/ तै/ तइ २८५. गायब/ गाएब/ गएब २८६. सकै/ सकए/ सकय २८७.सेरा/सरा/ सराए (भात सरा गेल) २८८.कहैत रही/देखैत रही/ कहैत छलौं/ कहै छलौं- अहिना चलैत/ पढ़ैत (पढ़ै-पढ़ैत अर्थ कखनो काल परिवर्तित) - आर बुझै/ बुझैत (बुझै/ बुझै छी, मुदा बुझैत-बुझैत)/ सकैत/ सकै। करैत/ करै। दै/ दैत। छैक/ छै। बचलै/ बचलैक। रखबा/ रखबाक । बिनु/ बिन। रातिक/ रातुक बुझै आ बुझैत केर अपन-अपन जगहपर प्रयोग समीचीन अछि‍। बुझैत-बुझैत आब बुझलि‍ऐ। हमहूँ बुझै छी। २८९. दुआरे/ द्वारे २९०.भेटि/ भेट/ भेँट २९१. खन/ खीन/  खुना (भोर खन/ भोर खीन) २९२.तक/ धरि २९३.गऽ/ गै (meaning different-जनबै गऽ) २९४.सऽ/ सँ (मुदा दऽ, लऽ) २९५.त्त्व,(तीन अक्षरक मेल बदला पुनरुक्तिक एक आ एकटा दोसरक उपयोग) आदिक बदला त्व आदि। महत्त्व/ महत्व/ कर्ता/ कर्त्ता आदिमे त्त संयुक्तक कोनो आवश्यकता मैथिलीमे नै अछि। वक्तव्य २९६.बेसी/ बेशी २९७.बाला/वाला बला/ वला (रहैबला) २९८ .वाली/ (बदलैवाली) २९९.वार्त्ता/ वार्ता ३००. अन्तर्राष्ट्रिय/ अन्तर्राष्ट्रीय ३०१. लेमए/ लेबए ३०२.लमछुरका, नमछुरका ३०२.लागै/ लगै ( भेटैत/ भेटै) ३०३.लागल/ लगल ३०४.हबा/ हवा ३०५.राखलक/ रखलक ३०६.आ (come)/ आ (and) ३०७. पश्चाताप/ पश्चात्ताप ३०८. ऽ केर व्यवहार शब्दक अन्तमे मात्र, यथासंभव बीचमे नै। ३०९.कहैत/ कहै ३१०. रहए (छल)/ रहै (छलै) (meaning different) ३११.तागति/ ताकति ३१२.खराप/ खराब ३१३.बोइन/ बोनि/ बोइनि ३१४.जाठि/ जाइठ ३१५.कागज/ कागच/ कागत ३१६.गिरै (meaning different- swallow)/ गिरए (खसए) ३१७.राष्ट्रिय/ राष्ट्रीय Festivals of Mithila DATE-LIST (year- 2011-12) (१४१९ साल) Marriage Days: Nov.2011- 20,21,23,25,27,30 Dec.2011- 1,5,9 January 2012- 18,19,20,23,25,27,29 Feb.2012- 2,3,8,9,10,16,17,19,23,24,29 March 2012- 1,8,9,12 April 2012- 15,16,18,25,26 June 2012- 8,13,24,25,28,29 Upanayana Days: February 2012- 2,3,24,26 March 2012- 4 April 2012- 1,2,26 June 2012- 22 Dviragaman Din: November 2011- 27,30 December 2011- 1,2,5,7,9,12 February 2012- 22,23,24,26,27,29 March 2012- 1,2,4,5,9,11,12 April 2012- 23,25,26,29 May 2012- 2,3,4,6,7 Mundan Din: December 2011- 1,5 January 201225,26,30 March 2012- 12 April 2012- 26 May 2012- 23,25,31 June 2012- 8,21,22,29 FESTIVALS OF MITHILA Mauna Panchami-20 July Madhushravani- 2 August Nag Panchami- 4 August Raksha Bandhan- 13 Aug Krishnastami- 21 August Kushi Amavasya / Somvari Vrat- 29 August Hartalika Teej- 31 August ChauthChandra-1 September Karma Dharma Ekadashi-8 September Indra Pooja Aarambh- 9 September Anant Caturdashi- 11 Sep Agastyarghadaan- 12 Sep Pitri Paksha begins- 13 Sep Mahalaya Aarambh- 13 September Vishwakarma Pooja- 17 September Jimootavahan Vrata/ Jitia-20 September Matri Navami- 21September Kalashsthapan- 28 September Belnauti- 2 October Patrika Pravesh- 3 October Mahastami- 4 October Maha Navami - 5 October Vijaya Dashami- 6 October Kojagara- 11 Oct Dhanteras- 24 October Diyabati, shyama pooja-26 October Annakoota/ Govardhana Pooja-27  October Bhratridwitiya/ Chitragupta Pooja-28 October Chhathi-kharna -31 October Chhathi- sayankalik arghya - 1 November Devotthan Ekadashi- 17 November Sama poojarambh- 2 November Kartik Poornima/ Sama Bisarjan- 10 Nov ravivratarambh- 27 November Navanna parvan- 29 November Vivaha Panchmi- 29 November Makara/ Teela Sankranti-15 Jan Naraknivaran chaturdashi- 21 January Basant Panchami/ Saraswati Pooja- 28 January Achla Saptmi- 30 January Mahashivaratri-20 February Holikadahan-Fagua-7 March Holi-9 Mar Varuni Yoga-20 March Chaiti  navaratrarambh- 23 March Chaiti Chhathi vrata-29 March Ram Navami- 1 April Mesha Sankranti-Satuani-13 April Jurishital-14 April Akshaya Tritiya-24 April Ravi Brat Ant- 29 April Janaki Navami- 30 April Vat Savitri-barasait- 20 May Ganga Dashhara-30 May Somavati Amavasya Vrata- 18 June Jagannath Rath Yatra- 21 June Hari Sayan Ekadashi- 30 June Aashadhi Guru Poornima-3 Jul 8.VIDEHA FOR NON RESIDENTS 8.1 to 8.3 MAITHILI LITERATURE IN ENGLISH 8.1.1.The Comet   -GAJENDRA THAKUR translated by Jyoti Jha chaudhary 8.1.2.The_Science_of_Words- GAJENDRA THAKUR translated by the author himself 8.1.3.On_the_dice-board_of_the_millennium- GAJENDRA THAKUR translated by Jyoti Jha chaudhary 8.1.4.NAAGPHANS (IN ENGLISH)- SHEFALIKA VERMA translated by Dr. Rajiv Kumar Verma and Dr. Jaya Verma Original Poem in Maithili by Kalikant Jha "Buch" Translated into English by Jyoti Jha Chaudhary Kalikant Jha "Buch" 1934-2009, Birth place- village Karian, District- Samastipur (Karian is birth place of famous Indian Nyaiyyayik philosopher Udayanacharya), Father Late Pt. Rajkishor Jha was first headmaster of village middle school. Mother Late Kala Devi was housewife. After completing Intermediate education started job block office of Govt. of Bihar.published in Mithila Mihir, Mati-pani, Bhakha, and Maithili Akademi magazine. Jyoti Jha Chaudhary, Date of Birth: December 30 1978,Place of Birth- Belhvar (Madhubani District), Education: Swami Vivekananda Middle School, Tisco Sakchi Girls High School, Mrs KMPM Inter College, IGNOU, ICWAI (COST ACCOUNTANCY); Residence- LONDON, UK; Father- Sh. Shubhankar Jha, Jamshedpur; Mother- Smt. Sudha Jha- Shivipatti. Jyoti received editor's choice award from www.poetry.comand her poems were featured in front page of www.poetrysoup.com for some period.She learnt Mithila Painting under Ms. Shveta Jha, Basera Institute, Jamshedpur and Fine Arts from Toolika, Sakchi, Jamshedpur (India). Her Mithila Paintings have been displayed by Ealing Art Group at Ealing Broadway, London. Kavi Kokil Vidyapati Because of whom our native language got a life That world-renowned nightingale poet’s name is Vidyapati A new hope in the Mithilanchal Our language is spread in each house Kind emotions and colourful thoughts Stability in mind and woman in the vision Created the God Shiva under the veil That world-renowned nightingale poet’s name is Vidyapati The shade of yoga in the bed of enjoyment The illusion of personality is immeasurable The triveni is immerged in the belly The shrine resides with the beauty The sun of creation shined in the kaalratri of rituals That world-renowned nightingale poet’s name is Vidyapati Face is like spring, bhado (rainy season) in eyes The flow is pure, bank is muddy Like leaves of lotus in the water Like flow of nectar in the desert Singing the song for Radha but keeping Madhav in the mind That world-renowned nightingale poet’s name is Vidyapati Vidyapati nagaram is blessed With Visfisut, Truth, Shiva and Virtue Remnant after being burnt out Mahesh is immortal after death The entrance is adorned with gold but inside is crematorium That world-renowned nightingale poet’s name is Vidyapati Send your comments to ggajendra@videha.com VIDEHA ARCHIVE १.विदेह ई-पत्रिकाक सभटा पुरान अंक ब्रेल, तिरहुता आ देवनागरी रूपमे Videha e journal's all old issues in Braille Tirhuta and Devanagari versions विदेह ई-पत्रिकाक पहिल ५० अंक

विदेह ई-पत्रिकाक ५०म सँ आगाँक अंक २.मैथिली पोथी डाउनलोड Maithili Books Download ३.मैथिली ऑडियो संकलन Maithili Audio Downloads ४.मैथिली वीडियोक संकलन Maithili Videos ५.मिथिला चित्रकला/ आधुनिक चित्रकला आ चित्र Mithila Painting/ Modern Art and Photos "विदेह"क एहि सभ सहयोगी लिंकपर सेहो एक बेर जाऊ। ६.विदेह मैथिली क्विज  :  http://videhaquiz.blogspot.com/ ७.विदेह मैथिली जालवृत्त एग्रीगेटर : http://videha-aggregator.blogspot.com/ ८.विदेह मैथिली साहित्य अंग्रेजीमे अनूदित http://madhubani-art.blogspot.com/ ९.विदेहक पूर्व-रूप "भालसरिक गाछ"  : http://gajendrathakur.blogspot.com/ १०.विदेह इंडेक्स  : http://videha123.blogspot.com/ ११.विदेह फाइल : http://videha123.wordpress.com/ १२. विदेह: सदेह : पहिल तिरहुता (मिथिला़क्षर) जालवृत्त (ब्लॉग) http://videha-sadeha.blogspot.com/ १३. विदेह:ब्रेल: मैथिली ब्रेलमे: पहिल बेर विदेह द्वारा http://videha-braille.blogspot.com/ १४.VIDEHA IST MAITHILI  FORTNIGHTLY EJOURNAL ARCHIVE http://videha-archive.blogspot.com/ १५. विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका मैथिली पोथीक आर्काइव http://videha-pothi.blogspot.com/ १६. विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका ऑडियो आर्काइव http://videha-audio.blogspot.com/ १७. विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका वीडियो आर्काइव http://videha-video.blogspot.com/ १८. विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका मिथिला चित्रकला, आधुनिक कला आ चित्रकला http://videha-paintings-photos.blogspot.com/ १९. मैथिल आर मिथिला (मैथिलीक सभसँ लोकप्रिय जालवृत्त) http://maithilaurmithila.blogspot.com/ २०.श्रुति प्रकाशन http://www.shruti-publication.com/ २१.http://groups.google.com/group/videha VIDEHA केर सदस्यता लिअ Top of Form Bottom of Form ईमेल : एहि समूहपर जाऊ २२.http://groups.yahoo.com/group/VIDEHA/ Top of Form Subscribe to VIDEHA Powered by us.groups.yahoo.com Bottom of Form २३.गजेन्द्र ठाकुर इ‍डेक्स http://gajendrathakur123.blogspot.com २४.विदेह रेडियो:मैथिली कथा-कविता आदिक पहिल पोडकास्ट साइट http://videha123radio.wordpress.com/ २५. नेना भुटका http://mangan-khabas.blogspot.com/ महत्त्वपूर्ण सूचना:(१) 'विदेह' द्वारा धारावाहिक रूपे ई-प्रकाशित कएल गेल गजेन्द्र ठाकुरक  निबन्ध-प्रबन्ध-समीक्षा, उपन्यास (सहस्रबाढ़नि) , पद्य-संग्रह (सहस्राब्दीक चौपड़पर), कथा-गल्प (गल्प-गुच्छ), नाटक(संकर्षण), महाकाव्य (त्वञ्चाहञ्च आ असञ्जाति मन) आ बाल-किशोर साहित्य विदेहमे संपूर्ण ई-प्रकाशनक बाद प्रिंट फॉर्ममे। कुरुक्षेत्रम्–अन्तर्मनक खण्ड-१ सँ ७ Combined ISBN No.978-81-907729-7-6 विवरण एहि पृष्ठपर नीचाँमे आ प्रकाशकक साइट http://www.shruti-publication.com/ पर । महत्त्वपूर्ण सूचना (२):सूचना: विदेहक मैथिली-अंग्रेजी आ अंग्रेजी मैथिली कोष (इंटरनेटपर पहिल बेर सर्च-डिक्शनरी) एम.एस. एस.क्यू.एल. सर्वर आधारित -Based on ms-sql server Maithili-English and English-Maithili Dictionary. विदेहक भाषापाक- रचनालेखन स्तंभमे। कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक- गजेन्द्र ठाकुर गजेन्द्र ठाकुरक निबन्ध-प्रबन्ध-समीक्षा, उपन्यास (सहस्रबाढ़नि) , पद्य-संग्रह (सहस्राब्दीक चौपड़पर), कथा-गल्प (गल्प गुच्छ), नाटक(संकर्षण), महाकाव्य (त्वञ्चाहञ्च आ असञ्जाति मन) आ बालमंडली-किशोरजगत विदेहमे संपूर्ण ई-प्रकाशनक बाद प्रिंट फॉर्ममे। कुरुक्षेत्रम्–अन्तर्मनक, खण्ड-१ सँ ७ Ist edition 2009 of Gajendra Thakur’s KuruKshetram-Antarmanak (Vol. I to VII)- essay-paper-criticism, novel, poems, story, play, epics and Children-grown-ups literature in single binding: Language:Maithili ६९२ पृष्ठ : मूल्य भा. रु. 100/-(for individual buyers inside india) (add courier charges Rs.50/-per copy for Delhi/NCR and Rs.100/- per copy for outside Delhi)

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Details for purchase available at print-version publishers's site website: http://www.shruti-publication.com/ or you may write to e-mail:shruti.publication@shruti-publication.com विदेह: सदेह : १: २: ३: ४ तिरहुता : देवनागरी "विदेह" क, प्रिंट संस्करण :विदेह-ई-पत्रिका (http://www.videha.co.in/) क चुनल रचना सम्मिलित। विदेह:सदेह:१: २: ३: ४ सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। Details for purchase available at print-version publishers's site http://www.shruti-publication.com  or you may write to shruti.publication@shruti-publication.com २. संदेश- [ विदेह ई-पत्रिका, विदेह:सदेह मिथिलाक्षर आ देवनागरी आ गजेन्द्र ठाकुरक सात खण्डक- निबन्ध-प्रबन्ध-समीक्षा,उपन्यास (सहस्रबाढ़नि) , पद्य-संग्रह (सहस्राब्दीक चौपड़पर), कथा-गल्प (गल्प गुच्छ), नाटक (संकर्षण), महाकाव्य (त्वञ्चाहञ्च आ असञ्जाति मन) आ बाल-मंडली-किशोर जगत- संग्रह कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक मादेँ। ] १.श्री गोविन्द झा- विदेहकेँ तरंगजालपर उतारि विश्वभरिमे मातृभाषा मैथिलीक लहरि जगाओल, खेद जे अपनेक एहि महाभियानमे हम एखन धरि संग नहि दए सकलहुँ। सुनैत छी अपनेकेँ सुझाओ आ रचनात्मक आलोचना प्रिय लगैत अछि तेँ किछु लिखक मोन भेल। हमर सहायता आ सहयोग अपनेकेँ सदा उपलब्ध रहत। २.श्री रमानन्द रेणु- मैथिलीमे ई-पत्रिका पाक्षिक रूपेँ चला कऽ जे अपन मातृभाषाक प्रचार कऽ रहल छी, से धन्यवाद । आगाँ अपनेक समस्त मैथिलीक कार्यक हेतु हम हृदयसँ शुभकामना दऽ रहल छी। ३.श्री विद्यानाथ झा "विदित"- संचार आ प्रौद्योगिकीक एहि प्रतिस्पर्धी ग्लोबल युगमे अपन महिमामय "विदेह"केँ अपना देहमे प्रकट देखि जतबा प्रसन्नता आ संतोष भेल, तकरा कोनो उपलब्ध "मीटर"सँ नहि नापल जा सकैछ? ..एकर ऐतिहासिक मूल्यांकन आ सांस्कृतिक प्रतिफलन एहि शताब्दीक अंत धरि लोकक नजरिमे आश्चर्यजनक रूपसँ प्रकट हैत। ४. प्रो. उदय नारायण सिंह "नचिकेता"- जे काज अहाँ कए रहल छी तकर चरचा एक दिन मैथिली भाषाक इतिहासमे होएत। आनन्द भए रहल अछि, ई जानि कए जे एतेक गोट मैथिल "विदेह" ई जर्नलकेँ पढ़ि रहल छथि।...विदेहक चालीसम अंक पुरबाक लेल अभिनन्दन। ५. डॉ. गंगेश गुंजन- एहि विदेह-कर्ममे लागि रहल अहाँक सम्वेदनशील मन, मैथिलीक प्रति समर्पित मेहनतिक अमृत रंग, इतिहास मे एक टा विशिष्ट फराक अध्याय आरंभ करत, हमरा विश्वास अछि। अशेष शुभकामना आ बधाइक सङ्ग, सस्नेह...अहाँक पोथी कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक प्रथम दृष्टया बहुत भव्य तथा उपयोगी बुझाइछ। मैथिलीमे तँ अपना स्वरूपक प्रायः ई पहिले एहन  भव्य अवतारक पोथी थिक। हर्षपूर्ण हमर हार्दिक बधाई स्वीकार करी। ६. श्री रामाश्रय झा "रामरंग"(आब स्वर्गीय)- "अपना" मिथिलासँ संबंधित...विषय वस्तुसँ अवगत भेलहुँ।...शेष सभ कुशल अछि। ७. श्री ब्रजेन्द्र त्रिपाठी- साहित्य अकादमी- इंटरनेट पर प्रथम मैथिली पाक्षिक पत्रिका "विदेह" केर लेल बधाई आ शुभकामना स्वीकार करू। ८. श्री प्रफुल्लकुमार सिंह "मौन"- प्रथम मैथिली पाक्षिक पत्रिका "विदेह" क प्रकाशनक समाचार जानि कनेक चकित मुदा बेसी आह्लादित भेलहुँ। कालचक्रकेँ पकड़ि जाहि दूरदृष्टिक परिचय देलहुँ, ओहि लेल हमर मंगलकामना। ९.डॉ. शिवप्रसाद यादव- ई जानि अपार हर्ष भए रहल अछि, जे नव सूचना-क्रान्तिक क्षेत्रमे मैथिली पत्रकारिताकेँ प्रवेश दिअएबाक साहसिक कदम उठाओल अछि। पत्रकारितामे एहि प्रकारक नव प्रयोगक हम स्वागत करैत छी, संगहि "विदेह"क सफलताक शुभकामना। १०. श्री आद्याचरण झा- कोनो पत्र-पत्रिकाक प्रकाशन- ताहूमे मैथिली पत्रिकाक प्रकाशनमे के कतेक सहयोग करताह- ई तऽ भविष्य कहत। ई हमर ८८ वर्षमे ७५ वर्षक अनुभव रहल। एतेक पैघ महान यज्ञमे हमर श्रद्धापूर्ण आहुति प्राप्त होयत- यावत ठीक-ठाक छी/ रहब। ११. श्री विजय ठाकुर- मिशिगन विश्वविद्यालय- "विदेह" पत्रिकाक अंक देखलहुँ, सम्पूर्ण टीम बधाईक पात्र अछि। पत्रिकाक मंगल भविष्य हेतु हमर शुभकामना स्वीकार कएल जाओ। १२. श्री सुभाषचन्द्र यादव- ई-पत्रिका "विदेह" क बारेमे जानि प्रसन्नता भेल। ’विदेह’ निरन्तर पल्लवित-पुष्पित हो आ चतुर्दिक अपन सुगंध पसारय से कामना अछि। १३. श्री मैथिलीपुत्र प्रदीप- ई-पत्रिका "विदेह" केर सफलताक भगवतीसँ कामना। हमर पूर्ण सहयोग रहत। १४. डॉ. श्री भीमनाथ झा- "विदेह" इन्टरनेट पर अछि तेँ "विदेह" नाम उचित आर कतेक रूपेँ एकर विवरण भए सकैत अछि। आइ-काल्हि मोनमे उद्वेग रहैत अछि, मुदा शीघ्र पूर्ण सहयोग देब।कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक देखि अति प्रसन्नता भेल। मैथिलीक लेल ई घटना छी। १५. श्री रामभरोस कापड़ि "भ्रमर"- जनकपुरधाम- "विदेह" ऑनलाइन देखि रहल छी। मैथिलीकेँ अन्तर्राष्ट्रीय जगतमे पहुँचेलहुँ तकरा लेल हार्दिक बधाई। मिथिला रत्न सभक संकलन अपूर्व। नेपालोक सहयोग भेटत, से विश्वास करी। १६. श्री राजनन्दन लालदास- "विदेह" ई-पत्रिकाक माध्यमसँ बड़ नीक काज कए रहल छी, नातिक अहिठाम देखलहुँ। एकर वार्षिक अ‍ंक जखन प्रिं‍ट निकालब तँ हमरा पठायब। कलकत्तामे बहुत गोटेकेँ हम साइटक पता लिखाए देने छियन्हि। मोन तँ होइत अछि जे दिल्ली आबि कए आशीर्वाद दैतहुँ, मुदा उमर आब बेशी भए गेल। शुभकामना देश-विदेशक मैथिलकेँ जोड़बाक लेल।.. उत्कृष्ट प्रकाशन कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक लेल बधाइ। अद्भुत काज कएल अछि, नीक प्रस्तुति अछि सात खण्डमे।  मुदा अहाँक सेवा आ से निःस्वार्थ तखन बूझल जाइत जँ अहाँ द्वारा प्रकाशित पोथी सभपर दाम लिखल नहि रहितैक। ओहिना सभकेँ विलहि देल जइतैक। (स्पष्टीकरण-  श्रीमान्, अहाँक सूचनार्थ विदेह द्वारा ई-प्रकाशित कएल सभटा सामग्री आर्काइवमे https://sites.google.com/a/videha.com/videha-pothi/ पर बिना मूल्यक डाउनलोड लेल उपलब्ध छै आ भविष्यमे सेहो रहतैक। एहि आर्काइवकेँ जे कियो प्रकाशक अनुमति लऽ कऽ प्रिंट रूपमे प्रकाशित कएने छथि आ तकर ओ दाम रखने छथि ताहिपर हमर कोनो नियंत्रण नहि अछि।- गजेन्द्र ठाकुर)...   अहाँक प्रति अशेष शुभकामनाक संग। १७. डॉ. प्रेमशंकर सिंह- अहाँ मैथिलीमे इंटरनेटपर पहिल पत्रिका "विदेह" प्रकाशित कए अपन अद्भुत मातृभाषानुरागक परिचय देल अछि, अहाँक निःस्वार्थ मातृभाषानुरागसँ प्रेरित छी, एकर निमित्त जे हमर सेवाक प्रयोजन हो, तँ सूचित करी। इंटरनेटपर आद्योपांत पत्रिका देखल, मन प्रफुल्लित भऽ गेल। १८.श्रीमती शेफालिका वर्मा- विदेह ई-पत्रिका देखि मोन उल्लाससँ भरि गेल। विज्ञान कतेक प्रगति कऽ रहल अछि...अहाँ सभ अनन्त आकाशकेँ भेदि दियौ, समस्त विस्तारक रहस्यकेँ तार-तार कऽ दियौक...। अपनेक अद्भुत पुस्तक कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक विषयवस्तुक दृष्टिसँ गागरमे सागर अछि। बधाई। १९.श्री हेतुकर झा, पटना-जाहि समर्पण भावसँ अपने मिथिला-मैथिलीक सेवामे तत्पर छी से स्तुत्य अछि। देशक राजधानीसँ भय रहल मैथिलीक शंखनाद मिथिलाक गाम-गाममे मैथिली चेतनाक विकास अवश्य करत। २०. श्री योगानन्द झा, कबिलपुर, लहेरियासराय- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पोथीकेँ निकटसँ देखबाक अवसर भेटल अछि आ मैथिली जगतक एकटा उद्भट ओ समसामयिक दृष्टिसम्पन्न हस्ताक्षरक कलमबन्द परिचयसँ आह्लादित छी। "विदेह"क देवनागरी सँस्करण पटनामे रु. 80/- मे उपलब्ध भऽ सकल जे विभिन्न लेखक लोकनिक छायाचित्र, परिचय पत्रक ओ रचनावलीक सम्यक प्रकाशनसँ ऐतिहासिक कहल जा सकैछ। २१. श्री किशोरीकान्त मिश्र- कोलकाता- जय मैथिली, विदेहमे बहुत रास कविता, कथा, रिपोर्ट आदिक सचित्र संग्रह देखि आ आर अधिक प्रसन्नता मिथिलाक्षर देखि- बधाई स्वीकार कएल जाओ। २२.श्री जीवकान्त- विदेहक मुद्रित अंक पढ़ल- अद्भुत मेहनति। चाबस-चाबस। किछु समालोचना मरखाह..मुदा सत्य। २३. श्री भालचन्द्र झा- अपनेक कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक देखि बुझाएल जेना हम अपने छपलहुँ अछि। एकर विशालकाय आकृति अपनेक सर्वसमावेशताक परिचायक अछि। अपनेक रचना सामर्थ्यमे उत्तरोत्तर वृद्धि हो, एहि शुभकामनाक संग हार्दिक बधाई। २४.श्रीमती डॉ नीता झा- अहाँक कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़लहुँ। ज्योतिरीश्वर शब्दावली, कृषि मत्स्य शब्दावली आ सीत बसन्त आ सभ कथा, कविता, उपन्यास, बाल-किशोर साहित्य सभ उत्तम छल। मैथिलीक उत्तरोत्तर विकासक लक्ष्य दृष्टिगोचर होइत अछि। २५.श्री मायानन्द मिश्र- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक मे हमर उपन्यास स्त्रीधनक जे विरोध कएल गेल अछि तकर हम विरोध करैत छी।... कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पोथीक लेल शुभकामना।(श्रीमान् समालोचनाकेँ विरोधक रूपमे नहि लेल जाए।-गजेन्द्र ठाकुर) २६.श्री महेन्द्र हजारी- सम्पादक श्रीमिथिला- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़ि मोन हर्षित भऽ गेल..एखन पूरा पढ़यमे बहुत समय लागत, मुदा जतेक पढ़लहुँ से आह्लादित कएलक। २७.श्री केदारनाथ चौधरी- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक अद्भुत लागल, मैथिली साहित्य लेल ई पोथी एकटा प्रतिमान बनत। २८.श्री सत्यानन्द पाठक- विदेहक हम नियमित पाठक छी। ओकर स्वरूपक प्रशंसक छलहुँ। एम्हर अहाँक लिखल - कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक देखलहुँ। मोन आह्लादित भऽ उठल। कोनो रचना तरा-उपरी। २९.श्रीमती रमा झा-सम्पादक मिथिला दर्पण। कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक प्रिंट फॉर्म पढ़ि आ एकर गुणवत्ता देखि मोन प्रसन्न भऽ गेल, अद्भुत शब्द एकरा लेल प्रयुक्त कऽ रहल छी। विदेहक उत्तरोत्तर प्रगतिक शुभकामना। ३०.श्री नरेन्द्र झा, पटना- विदेह नियमित देखैत रहैत छी। मैथिली लेल अद्भुत काज कऽ रहल छी। ३१.श्री रामलोचन ठाकुर- कोलकाता- मिथिलाक्षर विदेह देखि मोन प्रसन्नतासँ भरि उठल, अंकक विशाल परिदृश्य आस्वस्तकारी अछि। ३२.श्री तारानन्द वियोगी- विदेह आ कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक देखि चकबिदोर लागि गेल। आश्चर्य। शुभकामना आ बधाई। ३३.श्रीमती प्रेमलता मिश्र “प्रेम”- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़लहुँ। सभ रचना उच्चकोटिक लागल। बधाई। ३४.श्री कीर्तिनारायण मिश्र- बेगूसराय- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक बड्ड नीक लागल, आगांक सभ काज लेल बधाई। ३५.श्री महाप्रकाश-सहरसा- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक नीक लागल, विशालकाय संगहि उत्तमकोटिक। ३६.श्री अग्निपुष्प- मिथिलाक्षर आ देवाक्षर विदेह पढ़ल..ई प्रथम तँ अछि एकरा प्रशंसामे मुदा हम एकरा दुस्साहसिक कहब। मिथिला चित्रकलाक स्तम्भकेँ मुदा अगिला अंकमे आर विस्तृत बनाऊ। ३७.श्री मंजर सुलेमान-दरभंगा- विदेहक जतेक प्रशंसा कएल जाए कम होएत। सभ चीज उत्तम। ३८.श्रीमती प्रोफेसर वीणा ठाकुर- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक उत्तम, पठनीय, विचारनीय। जे क्यो देखैत छथि पोथी प्राप्त करबाक उपाय पुछैत छथि। शुभकामना। ३९.श्री छत्रानन्द सिंह झा- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़लहुँ, बड्ड नीक सभ तरहेँ। ४०.श्री ताराकान्त झा- सम्पादक मैथिली दैनिक मिथिला समाद- विदेह तँ कन्टेन्ट प्रोवाइडरक काज कऽ रहल अछि। कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक अद्भुत लागल। ४१.डॉ रवीन्द्र कुमार चौधरी- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक बहुत नीक, बहुत मेहनतिक परिणाम। बधाई। ४२.श्री अमरनाथ- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक आ विदेह दुनू स्मरणीय घटना अछि, मैथिली साहित्य मध्य। ४३.श्री पंचानन मिश्र- विदेहक वैविध्य आ निरन्तरता प्रभावित करैत अछि, शुभकामना। ४४.श्री केदार कानन- कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक लेल अनेक धन्यवाद, शुभकामना आ बधाइ स्वीकार करी। आ नचिकेताक भूमिका पढ़लहुँ। शुरूमे तँ लागल जेना कोनो उपन्यास अहाँ द्वारा सृजित भेल अछि मुदा पोथी उनटौला पर ज्ञात भेल जे एहिमे तँ सभ विधा समाहित अछि। ४५.श्री धनाकर ठाकुर- अहाँ नीक काज कऽ रहल छी। फोटो गैलरीमे चित्र एहि शताब्दीक जन्मतिथिक अनुसार रहैत तऽ नीक। ४६.श्री आशीष झा- अहाँक पुस्तकक संबंधमे एतबा लिखबा सँ अपना कए नहि रोकि सकलहुँ जे ई किताब मात्र किताब नहि थीक, ई एकटा उम्मीद छी जे मैथिली अहाँ सन पुत्रक सेवा सँ निरंतर समृद्ध होइत चिरजीवन कए प्राप्त करत। ४७.श्री शम्भु कुमार सिंह- विदेहक तत्परता आ क्रियाशीलता देखि आह्लादित भऽ रहल छी। निश्चितरूपेण कहल जा सकैछ जे समकालीन मैथिली पत्रिकाक इतिहासमे विदेहक नाम स्वर्णाक्षरमे लिखल जाएत। ओहि कुरुक्षेत्रक घटना सभ तँ अठारहे दिनमे खतम भऽ गेल रहए मुदा अहाँक कुरुक्षेत्रम् तँ अशेष अछि। ४८.डॉ. अजीत मिश्र- अपनेक प्रयासक कतबो प्रश‍ंसा कएल जाए कमे होएतैक। मैथिली साहित्यमे अहाँ द्वारा कएल गेल काज युग-युगान्तर धरि पूजनीय रहत। ४९.श्री बीरेन्द्र मल्लिक- अहाँक कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक आ विदेह:सदेह पढ़ि अति प्रसन्नता भेल। अहाँक स्वास्थ्य ठीक रहए आ उत्साह बनल रहए से कामना। ५०.श्री कुमार राधारमण- अहाँक दिशा-निर्देशमे विदेह पहिल मैथिली ई-जर्नल देखि अति प्रसन्नता भेल। हमर शुभकामना। ५१.श्री फूलचन्द्र झा प्रवीण-विदेह:सदेह पढ़ने रही मुदा कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक देखि बढ़ाई देबा लेल बाध्य भऽ गेलहुँ। आब विश्वास भऽ गेल जे मैथिली नहि मरत। अशेष शुभकामना। ५२.श्री विभूति आनन्द- विदेह:सदेह देखि, ओकर विस्तार देखि अति प्रसन्नता भेल। ५३.श्री मानेश्वर मनुज-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक एकर भव्यता देखि अति प्रसन्नता भेल, एतेक विशाल ग्रन्थ मैथिलीमे आइ धरि नहि देखने रही। एहिना भविष्यमे काज करैत रही, शुभकामना। ५४.श्री विद्यानन्द झा- आइ.आइ.एम.कोलकाता- कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक विस्तार, छपाईक संग गुणवत्ता देखि अति प्रसन्नता भेल। अहाँक अनेक धन्यवाद; कतेक बरखसँ हम नेयारैत छलहुँ जे सभ पैघ शहरमे मैथिली लाइब्रेरीक स्थापना होअए, अहाँ ओकरा वेबपर कऽ रहल छी, अनेक धन्यवाद। ५५.श्री अरविन्द ठाकुर-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक मैथिली साहित्यमे कएल गेल एहि तरहक पहिल प्रयोग अछि, शुभकामना। ५६.श्री कुमार पवन-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक पढ़ि रहल छी। किछु लघुकथा पढ़ल अछि, बहुत मार्मिक छल। ५७. श्री प्रदीप बिहारी-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक देखल, बधाई। ५८.डॉ मणिकान्त ठाकुर-कैलिफोर्निया- अपन विलक्षण नियमित सेवासँ हमरा लोकनिक हृदयमे विदेह सदेह भऽ गेल अछि। ५९.श्री धीरेन्द्र प्रेमर्षि- अहाँक समस्त प्रयास सराहनीय। दुख होइत अछि जखन अहाँक प्रयासमे अपेक्षित सहयोग नहि कऽ पबैत छी। ६०.श्री देवशंकर नवीन- विदेहक निरन्तरता आ विशाल स्वरूप- विशाल पाठक वर्ग, एकरा ऐतिहासिक बनबैत अछि। ६१.श्री मोहन भारद्वाज- अहाँक समस्त कार्य देखल, बहुत नीक। एखन किछु परेशानीमे छी, मुदा शीघ्र सहयोग देब। ६२.श्री फजलुर रहमान हाशमी-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक मे एतेक मेहनतक लेल अहाँ साधुवादक अधिकारी छी। ६३.श्री लक्ष्मण झा "सागर"- मैथिलीमे चमत्कारिक रूपेँ अहाँक प्रवेश आह्लादकारी अछि।..अहाँकेँ एखन आर..दूर..बहुत दूरधरि जेबाक अछि। स्वस्थ आ प्रसन्न रही। ६४.श्री जगदीश प्रसाद मंडल-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक पढ़लहुँ । कथा सभ आ उपन्यास सहस्रबाढ़नि पूर्णरूपेँ पढ़ि गेल छी। गाम-घरक भौगोलिक विवरणक जे सूक्ष्म वर्णन सहस्रबाढ़निमे अछि, से चकित कएलक, एहि संग्रहक कथा-उपन्यास मैथिली लेखनमे विविधता अनलक अछि। समालोचना शास्त्रमे अहाँक दृष्टि वैयक्तिक नहि वरन् सामाजिक आ कल्याणकारी अछि, से प्रशंसनीय। ६५.श्री अशोक झा-अध्यक्ष मिथिला विकास परिषद- कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक लेल बधाई आ आगाँ लेल शुभकामना। ६६.श्री ठाकुर प्रसाद मुर्मु- अद्भुत प्रयास। धन्यवादक संग प्रार्थना जे अपन माटि-पानिकेँ ध्यानमे राखि अंकक समायोजन कएल जाए। नव अंक धरि प्रयास सराहनीय। विदेहकेँ बहुत-बहुत धन्यवाद जे एहेन सुन्दर-सुन्दर सचार (आलेख) लगा रहल छथि। सभटा ग्रहणीय- पठनीय। ६७.बुद्धिनाथ मिश्र- प्रिय गजेन्द्र जी,अहाँक सम्पादन मे प्रकाशित ‘विदेह’आ ‘कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक’ विलक्षण पत्रिका आ विलक्षण पोथी! की नहि अछि अहाँक सम्पादनमे? एहि प्रयत्न सँ मैथिली क विकास होयत,निस्संदेह। ६८.श्री बृखेश चन्द्र लाल- गजेन्द्रजी, अपनेक पुस्तक कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक पढ़ि मोन गदगद भय गेल , हृदयसँ अनुगृहित छी । हार्दिक शुभकामना । ६९.श्री परमेश्वर कापड़ि - श्री गजेन्द्र जी । कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक पढ़ि गदगद आ नेहाल भेलहुँ। ७०.श्री रवीन्द्रनाथ ठाकुर- विदेह पढ़ैत रहैत छी। धीरेन्द्र प्रेमर्षिक मैथिली गजलपर आलेख पढ़लहुँ। मैथिली गजल कत्तऽ सँ कत्तऽ चलि गेलैक आ ओ अपन आलेखमे मात्र अपन जानल-पहिचानल लोकक चर्च कएने छथि। जेना मैथिलीमे मठक परम्परा रहल अछि। (स्पष्टीकरण- श्रीमान्, प्रेमर्षि जी ओहि आलेखमे ई स्पष्ट लिखने छथि जे किनको नाम जे छुटि गेल छन्हि तँ से मात्र आलेखक लेखकक जानकारी नहि रहबाक द्वारे, एहिमे आन कोनो कारण नहि देखल जाय। अहाँसँ एहि विषयपर विस्तृत आलेख सादर आमंत्रित अछि।-सम्पादक) ७१.श्री मंत्रेश्वर झा- विदेह पढ़ल आ संगहि अहाँक मैगनम ओपस कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक सेहो, अति उत्तम। मैथिलीक लेल कएल जा रहल अहाँक समस्त कार्य अतुलनीय अछि। ७२. श्री हरेकृष्ण झा- कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक मैथिलीमे अपन तरहक एकमात्र ग्रन्थ अछि, एहिमे लेखकक समग्र दृष्टि आ रचना कौशल देखबामे आएल जे लेखकक फील्डवर्कसँ जुड़ल रहबाक कारणसँ अछि। ७३.श्री सुकान्त सोम- कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक मे  समाजक इतिहास आ वर्तमानसँ अहाँक जुड़ाव बड्ड नीक लागल, अहाँ एहि क्षेत्रमे आर आगाँ काज करब से आशा अछि। ७४.प्रोफेसर मदन मिश्र- कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक सन किताब मैथिलीमे पहिले अछि आ एतेक विशाल संग्रहपर शोध कएल जा सकैत अछि। भविष्यक लेल शुभकामना। ७५.प्रोफेसर कमला चौधरी- मैथिलीमे कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक सन पोथी आबए जे गुण आ रूप दुनूमे निस्सन होअए, से बहुत दिनसँ आकांक्षा छल, ओ आब जा कऽ पूर्ण भेल। पोथी एक हाथसँ दोसर हाथ घुमि रहल अछि, एहिना आगाँ सेहो अहाँसँ आशा अछि। ७६.श्री उदय चन्द्र झा "विनोद": गजेन्द्रजी, अहाँ जतेक काज कएलहुँ अछि से मैथिलीमे आइ धरि कियो नहि कएने छल। शुभकामना। अहाँकेँ एखन बहुत काज आर करबाक अछि। ७७.श्री कृष्ण कुमार कश्यप: गजेन्द्र ठाकुरजी, अहाँसँ भेँट एकटा स्मरणीय क्षण बनि गेल। अहाँ जतेक काज एहि बएसमे कऽ गेल छी ताहिसँ हजार गुणा आर बेशीक आशा अछि। ७८.श्री मणिकान्त दास: अहाँक मैथिलीक कार्यक प्रशंसा लेल शब्द नहि भेटैत अछि। अहाँक कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक सम्पूर्ण रूपेँ पढ़ि गेलहुँ। त्वञ्चाहञ्च बड्ड नीक लागल। ७९. श्री हीरेन्द्र कुमार झा- विदेह ई-पत्रिकाक सभ अंक ई-पत्रसँ भेटैत रहैत अछि। मैथिलीक ई-पत्रिका छैक एहि बातक गर्व होइत अछि। अहाँ आ अहाँक सभ सहयोगीकेँ हार्दिक शुभकामना। विदेह मैथिली साहित्य आन्दोलन (c)२००४-११. सर्वाधिकार लेखकाधीन आ जतय लेखकक नाम नहि अछि ततय संपादकाधीन। विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। सह-सम्पादक: उमेश मंडल। सहायक सम्पादक: शिव कुमार झा आ मुन्नाजी (मनोज कुमार कर्ण)। भाषा-सम्पादन: नागेन्द्र कुमार झा आ पञ्जीकार विद्यानन्द झा। कला-सम्पादन: ज्योति सुनीत चौधरी आ रश्मि रेखा सिन्हा। सम्पादक-शोध-अन्वेषण: डॉ. जया वर्मा आ डॉ. राजीव कुमार वर्मा। सम्पादक- नाटक-रंगमंच-चलचित्र- बेचन ठाकुर। सम्पादक-सूचना-सम्पर्क-समाद पूनम मंडल आ प्रियंका झा। रचनाकार अपन मौलिक आ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि) ggajendra@videha.com केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx, .rtf वा .txt फॉर्मेटमे पठा सकैत छथि। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेताह, से आशा करैत छी। रचनाक अंतमे टाइप रहय, जे ई रचना मौलिक अछि, आ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। मेल प्राप्त होयबाक बाद यथासंभव शीघ्र ( सात दिनक भीतर) एकर प्रकाशनक अंकक सूचना देल जायत। ’विदेह' प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका अछि आ एहिमे मैथिली, संस्कृत आ अंग्रेजीमे मिथिला आ मैथिलीसँ संबंधित रचना प्रकाशित कएल जाइत अछि। एहि ई पत्रिकाकेँ श्रीमति लक्ष्मी ठाकुर द्वारा मासक ०१ आ १५ तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि। (c) 2004-11 सर्वाधिकार सुरक्षित। विदेहमे प्रकाशित सभटा रचना आ आर्काइवक सर्वाधिकार रचनाकार आ संग्रहकर्त्ताक लगमे छन्हि। रचनाक अनुवाद आ पुनः प्रकाशन किंवा आर्काइवक उपयोगक अधिकार किनबाक हेतु ggajendra@videha.co.in पर संपर्क करू। एहि साइटकेँ प्रीति झा ठाकुर, मधूलिका चौधरी आ रश्मि प्रिया द्वारा डिजाइन कएल गेल। सिद्धिरस्तु वि दे ह विदेह Videha বিদেহ  विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका Videha Ist Maithili Fortnightly e Magazine  विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका 'विदेह' ९२ म अंक १५ अक्टूबर २०११ (वर्ष ४ मास ४६ अंक ९२)http://www.videha.co.in/ मानुषीमिह संस्कृताम् ISSN 2229-547X VIDEHA वि दे ह विदेह Videha বিদেহ  विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका Videha Ist Maithili Fortnightly e Magazine  विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक 'विदेह' ९२ म अंक १५ अक्टूबर २०११ (वर्ष ४ मास ४६ अंक ९२)http://www.videha.co.in/ मानुषीमिह संस्कृताम् ISSN 2229-547X VIDEHA

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