520 521 ISSN 2229-547X VIDEHA 'विदेह' ९३ म अंक ०१ नवम्बर २०११ (वर्ष ४ मास ४७ अंक ९३) वि दे ह विदेह Videha বিদেহ http://www.videha.co.in विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका Videha Ist Maithili Fortnightly e Magazine नव अंक देखबाक लेल पृष्ठ सभकेँ रिफ्रेश कए देखू। Always refresh the pages for viewing new issue of VIDEHA. Read in your own script Roman(Eng)Gujarati Bangla Oriya Gurmukhi Telugu Tamil Kannada Malayalam Hindi ऐ अंकमे अछि:- १. संपादकीय संदेश २. गद्य २.१.जगदीश प्रसाद मण्डल-वीरांगना २.२.१.परमेश्वर कापड़ि-छठिमाइके आसि आ लोकजीवनमे हिनक महत्व २.अतुलेश्वर- किछु विचार टिप्पणी २.३.सुदीप झा- सामाजिक मूल्य मान्यताकें चोच मारैत ‘चिड़ै’ २.४.दुर्गानन्द मण्डल- पोथी समीक्षा-मौलाइल गाछक फूल २.५.गजेन्द्र ठाकुर- उल्कामुख २.६.जगदीश प्रसाद मण्डल-तामक तमघैल २.७.१.अच्छेलाल शास्त्री-रणभूमि आ कविता नामक शीर्षक कवितापर दू शब्द २.नवेंदु कुमार झा -१.चीनी निगम क मिठास सँ दूर निवेशक, नीलामीक बढ़ल समय सीमा २. केसीसीक लेल लागल शिविर ३.उत्तर बिहार तीन टा रेल लाइनक दोहरीकरणक प्रयास मे आएल तेजी २.८.नवीन ठाकुर-मिथिला उवाच ३. पद्य ३.१.१. झा हेमन्त बापी २.जगदानंद झा 'मनु'३. राहुल राही ४.शांतिलक्ष्मी चौधरी ५. जवाहर लाल कश्यप ३.२.१.इरा मल्लिक २ओमप्रकाश झा ३.उमेश पासवान ३.३. १. जगदीश चन्द्र ठाकुर ’अनिल’ २.मिहिर झा ३.४.१.शिवशंकर सिंह ठाकुर २.अमित मोहन झा ३. राजदेव मण्डल ३.५.१.स्तुति नारायण २.विकास झा रंजन ३.जगदीश प्रसाद मण्डल ३.६.१. प्रभात राय भट्ट २.उमेश मण्डल ३.७.१.डॉ॰ शशिधर कुमर २ पंकज कुमार झा ३.नवीन कुमार "आशा" ३.८.१.रामदेव प्रसाद मण्डल ‘झारूदार’ २.अच्छेलाल शास्त्री ३.शिवकुमार झा ‘टिल्लू’ ४. मिथिला कला-संगीत-१.ज्योति सुनीत चौधरी २.श्वेता झा (सिंगापुर) ३.गुंजन कर्ण ४.राजनाथ मिश्र (चित्रमय मिथिला) ५. उमेश मण्डल (मिथिलाक वनस्पति/ मिथिलाक जीव-जन्तु/ मिथिलाक जिनगी) बालानां कृते-१. डॉ॰ शशिधर कुमर २.संस्कृति वर्मा ३.बिपिन कुमार झा भाषापाक रचना-लेखन -[मानक मैथिली], [विदेहक मैथिली-अंग्रेजी आ अंग्रेजी मैथिली कोष (इंटरनेटपर पहिल बेर सर्च-डिक्शनरी) एम.एस. एस.क्यू.एल. सर्वर आधारित -Based on ms-sql server Maithili-English and English-Maithili Dictionary.] VIDEHA FOR NON RESIDENTS 1.Episodes Of The Life - ("Kist-Kist Jeevan" by Smt. shefalika Varma translated into English by Smt. Jyoti Jha Chaudhary ) Original Poem in Maithili by Kalikant Jha "Buch" Translated into English by Jyoti Jha Chaudhary विदेह ई-पत्रिकाक सभटा पुरान अंक ( ब्रेल, तिरहुता आ देवनागरी मे ) पी.डी.एफ. डाउनलोडक लेल नीचाँक लिंकपर उपलब्ध अछि। All the old issues of Videha e journal ( in Braille, Tirhuta and Devanagari versions ) are available for pdf download at the following link. विदेह ई-पत्रिकाक सभटा पुरान अंक ब्रेल, तिरहुता आ देवनागरी रूपमे Videha e journal's all old issues in Braille Tirhuta and Devanagari versions विदेह ई-पत्रिकाक पहिल ५० अंक
विदेह ई-पत्रिकाक ५०म सँ आगाँक अंक विदेह आर.एस.एस.फीड। "विदेह" ई-पत्रिका ई-पत्रसँ प्राप्त करू। अपन मित्रकेँ विदेहक विषयमे सूचित करू। ↑ विदेह आर.एस.एस.फीड एनीमेटरकेँ अपन साइट/ ब्लॉगपर लगाऊ। ब्लॉग "लेआउट" पर "एड गाडजेट" मे "फीड" सेलेक्ट कए "फीड यू.आर.एल." मे http://www.videha.co.in/index.xml टाइप केलासँ सेहो विदेह फीड प्राप्त कए सकैत छी। गूगल रीडरमे पढ़बा लेल http://reader.google.com/ पर जा कऽ Add a Subscription बटन क्लिक करू आ खाली स्थानमे http://www.videha.co.in/index.xml पेस्ट करू आ Add बटन दबाउ। Join official Videha facebook group. Join Videha googlegroups विदेह रेडियो:मैथिली कथा-कविता आदिक पहिल पोडकास्ट साइट http://videha123radio.wordpress.com/ Videha Radio मैथिली देवनागरी वा मिथिलाक्षरमे नहि देखि/ लिखि पाबि रहल छी, (cannot see/write Maithili in Devanagari/ Mithilakshara follow links below or contact at ggajendra@videha.com) तँ एहि हेतु नीचाँक लिंक सभ पर जाऊ। संगहि विदेहक स्तंभ मैथिली भाषापाक/ रचना लेखनक नव-पुरान अंक पढ़ू। http://devanaagarii.net/ http://kaulonline.com/uninagari/ (एतए बॉक्समे ऑनलाइन देवनागरी टाइप करू, बॉक्ससँ कॉपी करू आ वर्ड डॉक्युमेन्टमे पेस्ट कए वर्ड फाइलकेँ सेव करू। विशेष जानकारीक लेल ggajendra@videha.com पर सम्पर्क करू।)(Use Firefox 4.0 (from WWW.MOZILLA.COM )/ Opera/ Safari/ Internet Explorer 8.0/ Flock 2.0/ Google Chrome for best view of 'Videha' Maithili e-journal at http://www.videha.co.in/ .) Go to the link below for download of old issues of VIDEHA Maithili e magazine in .pdf format and Maithili Audio/ Video/ Book/ paintings/ photo files. विदेहक पुरान अंक आ ऑडियो/ वीडियो/ पोथी/ चित्रकला/ फोटो सभक फाइल सभ (उच्चारण, बड़ सुख सार आ दूर्वाक्षत मंत्र सहित) डाउनलोड करबाक हेतु नीचाँक लिंक पर जाऊ। VIDEHA ARCHIVE विदेह आर्काइव भारतीय डाक विभाग द्वारा जारी कवि, नाटककार आ धर्मशास्त्री विद्यापतिक स्टाम्प। भारत आ नेपालक माटिमे पसरल मिथिलाक धरती प्राचीन कालहिसँ महान पुरुष ओ महिला लोकनिक कर्मभमि रहल अछि। मिथिलाक महान पुरुष ओ महिला लोकनिक चित्र 'मिथिला रत्न' मे देखू। गौरी-शंकरक पालवंश कालक मूर्त्ति, एहिमे मिथिलाक्षरमे (१२०० वर्ष पूर्वक) अभिलेख अंकित अछि। मिथिलाक भारत आ नेपालक माटिमे पसरल एहि तरहक अन्यान्य प्राचीन आ नव स्थापत्य, चित्र, अभिलेख आ मूर्त्तिकलाक़ हेतु देखू 'मिथिलाक खोज' मिथिला, मैथिल आ मैथिलीसँ सम्बन्धित सूचना, सम्पर्क, अन्वेषण संगहि विदेहक सर्च-इंजन आ न्यूज सर्विस आ मिथिला, मैथिल आ मैथिलीसँ सम्बन्धित वेबसाइट सभक समग्र संकलनक लेल देखू "विदेह सूचना संपर्क अन्वेषण" विदेह जालवृत्तक डिसकसन फोरमपर जाऊ। "मैथिल आर मिथिला" (मैथिलीक सभसँ लोकप्रिय जालवृत्त) पर जाऊ। १. संपादकीय दूषण पंजीक स्कैन कएल सिंगल पी.डी.एफ.क १७ टा फाइल नीचाँक लिंकपर उपलब्ध अछि। पंजीक हमरा सभक पोथीमे ओना तँ ११००० तालपत्रक जे.पी.जी.इमेज क डी.वी.डी. सेहो अलगसँ किनबाक व्यवस्था रहै आ ओइ डी.वी.डी.केँ कबिलपुरक सगर राति दीप जरएमे हम बाँटनहियो रही, मुदा ओइमे जे दूषण पंजी रहै तकर कारण कतेक पंचैती भेल, कतेक गोटे सोझाँ आ फोनपर गारि पढ़लन्हि। अखनो बहुत गोटे पंजीमे ओकर चर्चासँ भितरे-भितरे गुम्हरैत रहैत छथि आ गपमे तामसे हाँफऽ लगै छथि जेना खून पीबि जेता। ऐ दूषण पंजीमे ब्राह्मणक आन जाति खास कऽ दलित आ मुस्लिमक संग विवाह, वा पतिक मृत्युक बाद सन्तानक जन्मक लिखित दस्तावेज अछि। ओकरामे हेर-फेर केनाइ हमरासँ सम्भव नै छल। पंजीक पोथीमे शब्दशः एकर मिथिलाक्षरसँ देवनागरीमे लिप्यंतरण भेल अछि। एतए हम मूल ताड़पत्र आ बसहा पत्रपर लिखल पंजीक स्कैन कऽ बनाएल पी.डी.एफ. फाइलक लिंक दऽ रहल छी आ संगमे पंजीक लिंक सेहो। कियो नै कहि सकैत अछि जे ऐ मे एक्को रत्ती अशुद्धि अछि। गंगेशक जन्म पिताक मृत्युक ५ बर्ख बाद आ फेर हुनकर चर्मकारिणीसँ भेल विवाहक एतए वर्णित भेटत। ई वएह नव्य-न्यायक जनक गंगेश छथि। आनन्दा चर्मकारिणीसँ विवाह एतए सेहो भेटत जे हमरा द्वारा लिखित प्रेमकथा "शब्दशास्त्रम्"क आधार बनल। दूषण पंजी- मूल मिथिलाक्षर लेख- ताड़पत्र सिंगल पी.डी.एफ. https://docs.google.com/a/videha.com/viewer?a=v&pid=sites&srcid=dmlkZWhhLmNvbXx2aWRlaGEtcG90aGl8Z3g6ZjFiNTA5NGI2YTVlNGEx मोदानन्द झा शाखा पंजी- http://videha123.files.wordpress.com/2011/09/modanand_jha_shakha_panji.pdf मंडार- मरड़े कश्यप-प्राचीन- http://videha123.files.wordpress.com/2011/09/mandar_marare_kashyap_prachin_complete.pdf प्राचीन पंजी (लेमीनेट कएल)- http://videha123.files.wordpress.com/2011/09/laminatedpanji.pdf उतेढ़ पंजी- http://videha123.files.wordpress.com/2011/09/panji_7_uterh_panji.pdf पनिचोभे बीरपुर- https://sites.google.com/a/videha.com/videha-pothi/Home/Panichobhe_Birpur.pdf?attredirects=0 दरभंगा राज आदेश उतेढ आदि https://sites.google.com/a/videha.com/videha-pothi/Home/DARBHANGA_RAJ_ORDER_PANJI_PACHHBARI_ORDER_UTEDH.pdf?attredirects=0 छोटी झा पुस्तक निर्देशिका- http://videha123.files.wordpress.com/2011/09/panji_directory_chotijha_shakha_pustak.pdf पत्र पंजी http://videha123.files.wordpress.com/2011/09/patra_panji.pdf मूलग्राम पंजी http://videha123.files.wordpress.com/2011/09/panji_8_moolgram_panji.pdf मूलग्राम परगना हिसाबे पंजी http://videha123.files.wordpress.com/2011/09/panji_9_moolgram_parganawise_panji.pdf मूल पंजी-2 http://videha123.files.wordpress.com/2011/09/moolpanji_2.pdf मूल पंजी-३- http://videha123.files.wordpress.com/2011/09/mool_panji_3.pdf मूल पंजी-४ http://videha123.files.wordpress.com/2011/09/mool_panji_4.pdf मूल पंजी-५ http://videha123.files.wordpress.com/2011/09/mool_panji_5.pdf मूल पंजी-६ http://videha123.files.wordpress.com/2011/09/moolpanji_6.pdf मूल पंजी-७- http://videha123.files.wordpress.com/2011/09/prachin_panji_last.pdf पंजी-पोथी- http://www.box.net/shared/yx4b9r4kab २. एकटा पोथी आएल छल "मिथिला की सांस्कृतिक लोकचित्रकला",१९६२ (लेखक: चित्रकार श्री लक्ष्मीनाथ झा), आ दोसर पोथी "जीनोम मैपिंग: मिथिलाक पंजी प्रबन्ध- ४५० ए.डी.सँ २००९ ए.डी.), २००९ (गजेन्द्र ठाकुर, नागेन्द्र कुमार झा , पंजीकार विद्यानन्द झा)"पंजी-पोथी- http://www.box.net/shared/yx4b9r4kab आ पंजीक पात सभ https://sites.google.com/a/videha.com/videha-pothi/ पर उपलब्ध अछि। आब ऐ दुनू पोथीक किछु भाग चोरि कऽ दू गोटे अपना नामेँ छपबेलन्हि अछि आ तइमे हुनका लोकनिकेँ सहयोग सेहो भेटल छन्हि। सुशीला झा "अरिपन"२००८ नामसँ "मिथिला की सांस्कृतिक लोकचित्रकला" पोथीक अनुवाद अपना नामे कऽ लेने छथि,फोटो तक स्कैन कऽ चोरा लेने छथि आ तकरा भारतीय भाषा संस्थान, मैसूर प्रकाशन अनुदान देने अछि, जकर विवरण ऐ पोथीपर लिखल अछि। डा. योगनाथ झा तँ सद्यः "जीनोम मैपिंग: मिथिलाक पंजी प्रबन्ध- ४५० ए.डी.सँ २००९ ए.डी.) क एक भागकेँ अपना नामेँ पंजी-प्रबन्ध (वंश परिचय- प्रथमभाग, २०१०) नामसँ छपबा लेलन्हि आ ऐ मे हुनका सहयोग भेटलन्हि श्रोत्रिय समाजक संगठन "महाराजा कामेश्वर सिंह सांस्कृतिक विकास मंच"क। ई श्रोत्रिय समाजक संगठन श्री लक्ष्मीनाथ झा, जे श्रोत्रिय छलाह, केर पोथीक चोरिक विरोध कोना करत? हिनका सभकेँ देख कऽ तँ पुरान चोर पंकज पराशर (http://www.box.net/shared/75xgdy37dr) सेहो लजा जाएत। दस बर्खक मेहनति दस मिनटमे चोरि करैबला ई महानुभाव डा. योगनाथ झा उर्फ योगनाथ "सिन्धु" उर्फ सिन्धुनाथ झा ७० बर्खक छथि!! आ काल्हि जँ हिनकर कियो सी.आइ.आइ.एल. मे जान-पहिचानक हेतन्हि तँ हिनको पोथीकेँ ग्रान्ट भेट जेतन्हि। ३.हम एकटा निबन्ध लिखने रही मिथिलासँ पलायनक विषयमे। ओइमे हम एकटा सिद्धान्त देने रही जे मिथिलाक गाममे पचासो बर्ख रहलाक उत्तरो लोक पलायन केने छथि, मुदा मिथिलासँ बाहर रहियो कऽ मिथिलासँ जुड़ाव सम्भव छै। ऐ सन्दर्भमे हमर एकटा कथा शब्दशास्त्रम् देखल जाए। ओइमे एकटा ब्राह्मण आ चर्मकारिणीक प्रेम विवाहक वर्णन छै आ सात टा गीत ओइमे छै। अजित मिश्र ओइ कथाक प्रशंसा केने रहथि जे ई साहसिक कथा थिक, मुदा ई सत्यकथापर आधारित अछि तँ साहसक गप कतऽ सँ आएल। धीरेन्द्र प्रेमर्षिकेँ कथा नीक लगलन्हि मुदा निम्न वर्गक कथाक भाषा हुनका पाण्डित्यपूर्ण लगलन्हि। कोनो समालोचनाक हम सामान्यतः उत्तर नै दै छी, मुदा एतए ऐ कथाक दूटा वैशिष्ट्य हम अहाँकेँ बता रहल छी। ई कथा पंजीमे उल्लिखित ब्राह्मण आ चर्मकारिणीक विवाहपर आधारित छै, से ५०० साल पहिलुका (एहेन-एहेन लगभग सए अन्तर्जातीय विवाहक विवरण ओइ पोथीमे छै, मूल मिथिलाक्षर पाण्डुलिपि आ पोथीक लिंक ऊपर देल अछि।)। हुनकर वंश आइयो मिथिलामे श्रोत्रिय आ ब्राह्मणक रूपमे विद्यमान छथि, नाम आनन्दा चर्मकारिणी सेहो पंजीयेसँ हम लेने रही। तँ ई मिथिलाक इतिहासमे ५०० साल पहिनहियो मान्य रहै। ओइमे गीत सभ रहै “ पर्वत ऊपर भमरा जे सूतल, मालिन बेटी सूतल फुलवारि हे उठू मालिन राखू गिरिमल हार हे ” शब्दशास्त्रम "पर्वत ऊपर भमरा.."आदि गीत https://sites.google.com/a/videha.com/videha-audio/ ऐ लिंकपर दुनियाँ सुनि रहल अछि आ बनौवा डोमकछ आदिबला गीत जँ अपन समाजसँ जुड़ावक आधारपर लिखल जैतए तँ ओ सामन्तवादी गीत नै बनितए। बृखेश चन्द्र लालक पार्टीक झिझिया लोकनृत्य असली जुड़ावक उदाहरण प्रस्तुत करैत अछि।प्रेमर्षि जी केँ ई पाण्डित्यपूर्ण बुझेलन्हि जे कोना चर्मकारिणी सभ एहेन गीत गबैए,ओहेन भाषा बजैए। कारण हेल्लो मिथिलामे जे डोमरी आदि बला बनौआ गीत सभ बजाओल जाइए ओइमे तँ गएर ब्राह्मणक सभ्यता आ ओकर महिलाक लेल जे गीतमे शब्द प्रयोग कएल जाइ छै् आ ओइमे ब्राह्मण जे निम्न वर्गक महिलासँ छेड़खानी करैए (अथर्ववेदमे सेहो एहेन रेफरेन्स छै, मुदा तीन हजार बर्खक बाद वएह स्थिति!) से भने हुनका ओइ जाति सभकेँ जोड़बाक प्रयास लगैत होइन्ह मुदा ओ ब्राह्मण सामान्तवादी सोचक अगिला कड़ी मात्र अछि। मुदा पालन झा जे गाममे रहै छथि हुनका ई गीत/ कथाक शैली पाण्डित्यपूर्ण नै लगलन्हि ओ कहलन्हि “हमर गामक चर्मकार टोलीक महिलाक गीत सुनब तँ गुम्म पड़ि जाएब, ब्राह्मण महिलासँ नीक गीत ओ सभ गबै छथि।" जीवकान्त गाममे रहै छथि मुदा जगदीश प्रसाद मण्डलक “मौलाइल गाछक फूलक” नायक द्वारा अपन सभटा जमीन बाँटि देब हुनका मैथिल समाजमे अजगुत बुझेलन्हि, असम्भव बुझेलन्हि, काल्पनिक बुझेलन्हि। किए? पंजीमे कमसँ कम तीनटा (कमसँ कम) सर्वस्वदाताक उल्लेख हमरा भेटल जे अपन सभटा सम्पत्तिक दान दऽ देलन्हि। “मास्टर साहेब जीवकान्तकेँ दुख छन्हि जे हुनका भरिया नै भेटै छन्हि, खबास नै भेटै छन्हि” मानेश्वर मनुज जीवकान्तक आत्मकथाक समीक्षाक क्रममे ठीके लिखै छथि। ई किए भेल? कारण जीवकान्त ७० बर्ख गाममे रहलोक उपरान्त ने चर्मकार/ डोमक टोल कोनो उत्सव मे गेलथि आ ने धीरेन्द्र प्रेमर्षि चर्मकार/ डोमक टोलक कोनो उत्सवमे । हमर साहित्यकार मिथिलामे रहियो कऽ, गाममे रहियो कऽ पलायन कऽ गेल छथि, इन्दिरा गाँधीकेँ १९६७ क अकालमे देखाओल गेल जे मुसहर सभ बिसाँढ़ खा कऽ जिन्दा छथि मुदा ओइपर कथा लिखल गेल जगदीश प्रसाद मण्डल द्वारा (गामक जिनगी,२००९ मे), किए ? हमर नाटक उल्कामुख जे विदेह नाट्य उत्सव २०१२ मे मंचित हएत, मे गंगेश (नव्य न्याय तत्वचितामणि कारक) , जिनकर जन्म पिताक मृत्युक ५ बर्ख बाद आ विवाह चर्मकारिणीसँ भेलन्हि, केँ अखुनका हिसाबसँ देखबाक प्रयास कएल गेल अछि। एकटा ई-पत्र बहुत पहिने आएल छल, धीरेन्द्र प्रेमर्षिक। ओ लिखने रहथि जे हम विदेहमे “घोड़ा आ गधा दुनूकेँ संगे घोंसिया दै छिऐ।” संदेश कॉलममे ई संदेश हम अपडेट नै कऽ सकल छी। आब देवशंकर नवीनजीक साक्षात्कारक शब्द जँ गारि छिऐ तँ ई की छिऐ। भीमनाथ झा राधाकृष्ण चौधरीक “अ सर्वे ऑफ मैथिली लिटेरेचर”क विषयमे लिखने रहथि जे राधाकृष्ण चौधरी हड़ही-सुरही लेखकक नाम सेहो ओइ पोथीमे दऽ देने छथि, इतिहासमे मात्र पैघ (कृतिसँ प्रायः हुनकर मतलब होइन्ह) लोकक चर्चा हेबाक चाही। तँ की भीमनाथ झाक बादक प्रेमर्षिक पीढ़ी सेहो ओही पुरान बाटक अनुगामी नै भेल? ई तँ स्वतः सिद्ध छै जे घोड़ा आ पैघ व्यक्तित्व ओ सभ स्वयं छथि मुदा दोसराक विषयमे (अपनासँ सापेक्ष) मूल्यांकन कियो स्वयं कोना कऽ सकैए? ऐ सन्दर्भमे हमर ई कहब अछि जे लिम्बा रामकेँ आर्चेरी ओलम्पिक प्रतियोगिता लेल भारत प्रस्तुत केलक, मुदा ततेक दवाब हुनकापर पड़लन्हि जे आब हुनकर नाम लोक बिसरि गेल। जँ विदेहमे ३०० लेखक छथि तँ ओइमे सँ जगदीश प्रसाद मण्डल, राजदेव मण्डल, बेचन ठाकुर, झाड़ूदार, उमेश पासवान, उमेश मण्डल हमरा सभकेँ मैथिली साहित्यमे प्राप्त भऽ सकलाह। जँ मात्र मुठिया सिंघ, सिलेबी रंग आ अदन्त फलनां बाबू सभ जुड़ल रहितथि तँ विदेहक ९३ टा अंक लगातार नै निकलि पबितए आ ने मैथिली साहित्यकेँ जगदीश प्रसाद मण्डल, राजदेव मण्डल, बेचन ठाकुर, झाड़ूदार, उमेश पासवान, उमेश मण्डल आदिक विराट लेखनीसँ साक्षात्कार भऽ पबितए। ४.जँ सुभाष चन्द्र यादव, धीरेन्द्र , परमेश्वर कापड़ि वा बलचनमा (यात्री)क भाषा तथाकथित छोटहाबला छिऐ तँ ओ लेखकक बेछप शैली छिऐ, ओइसँ हमरा कोनो दिक्कत नै अछि, ओइमे ब्राह्मणक आ अब्राह्मणक बीच वार्तालापमे कोनो अपमानक भाव बला दू तरहक मैथिलीक प्रयोग नै कएल जाइ छै। मुदा जँ मलंगिया ब्राह्मण पात्र आ अब्राह्मण पात्र लेल दू तरहक मैथिलीक प्रयोग करै छथि, (मैथिली तँ स्वयं लोकक भाषा अछि,देश-कालक अनुसारे सृजित अछि), ओइमे मलंगियाजी केँ कोन फेँट-फाँट करबाक आवश्यकता पड़ि गेलन्हि?) तँ ओकर कारण अछि हुनकर सामन्तवादी सोच, ओ थोपड़ी सुनबा लेल ब्राह्मण दर्शकक समक्ष (ओ मानि कऽ चलै छथि जे उच्च वर्ग मात्र हुनकर नाटक देखत) अब्राह्मणकेँ हँसीक पात्र बनबै छथि। ऐ तरहक नाटकक निर्देशक थोपड़ी सुनि विभोर भऽ जाइ छथि। ऐ तरहक नाटकक अभिनेता-अभिनेत्री अपन आ अपन निर्देशकक क्षमताक आभास ब्राह्मण-कायस्थ दर्शकक थोपड़ी मध्य देखै छथि आ नाटककार तँ सद्यः सिंहासनपर विराजमान छथिये। मुदा ऐसँ मैथिली भाषीक बहुसंख्यक वर्ग जेना अपनाकेँ अपमानित अनुभव करै छथि तकर कनिको आभास, तकर मनोविज्ञानक कनेकबो ज्ञान जँ नाटककार/ निर्देशक महोदय सभकेँ रहितन्हि तँ ई थोपड़ी हुनकर हृदयकेँ भेद नै दैतन्हि? आ तखन ई कन्नारोहट किए होइए जे मैथिलीक जनसंख्या घटल जा रहल अछि!! तँ ओइ विषयमे हमर कहब अछि जे “नाट्यशास्त्रक दूटा शब्द- "ग्राम्य" आ "भाषा", ई दुनू नाट्यशास्त्रकेँ मूल रूपमे नै पढ़निहार लेल भ्रम उत्पन्न करैए। ग्राम्य नाटक भेल जै मे आकाशवाणी नै होइए, वास्त्विकता होइए (हमर अभिनय पाठशालापर आलेख देखू), नाट्यशास्त्रमे निरूपित भाषाक अनुरूप जे नाटक लिखल गेल (संस्कृतक सन्दर्भमे) ओइमे स्त्री आ शूद्र लेल प्रकृतक प्रयोग कएल गेल (कारण बुझले हएत जे संस्कृतक पंडितक घरमे हुनकर कनियाँ मूर्ख होइत रहथि आ संस्कृत जन सामान्यक भाषा नै रहि गेल छल), मुदा एक्कैसम शताब्दीक दोसर दशकमे मैथिलीमे किछु गोटे तथाकथित निम्न-वर्गक मैथिली इजाद कऽ कऽ घोसिया रहल छथि, मात्र थोपड़ीक उद्देश्य लऽ कऽ, जखनकि अखन जे संस्कृतमे नाटक लिखल जा रहल छै, जकर मंचनमे हम सहभागी रहल छी ओहूमे प्राकृत वा आन कोनो भाषा नै रहै छै। हँ नाट्यशास्त्र मे निरुपित भाषाक अनुरूप बेचन ठाकुर, जगदीश प्रसाद मण्डल आदि असल खाँटी मैथिली, जइमे प्रवाह छै, केर प्रयोग कऽ रहल छथि आ जे ब्राह्मणवादी नाटककार द्वारा इजाद कएल तथाकथित गएर-ब्राह्मणक भाषापर अन्तिम मारक प्रहार अछि। नाट्यशास्त्रमे ग्राम्य नाटकक सेहो चर्चा छै, मुदा लोक गाममे होइबला नाटककेँ गमैय्या नाटक आ शहरमे होइबला नाटककेँ शास्त्रीय नाटक बुझै छथि। शहरमे सेहो वास्तविकता आधारित ग्राम्य नाटक होइत अछि। यूरोपमे सर्कसमे चीनक लोककेँ गधापर आनल जाइ छलै..आब उनटे चीनबला सभ यूरोपियनक से हाल कऽ देतै..से थोपड़ीक उद्देश्यसँ मात्र ब्राह्मण दर्शकक आगमनक आशासँ जे मैथिलीक नाटककार अखनो ई खेल खेला रहल छथि, हुनका नाट्यशास्त्र मूल रूपमे पुनः पढ़बाक चाही। तेँ हुनकर सभक नाटक समीक्षाक उपरान्त , ऐ कारणसँ , अधिकसँ अधिक "मेडियोकर" स्तर धरि पहुँचि पबैत अछि। ५. मुद्दा छै जे किछु गोटे सगर रातिसँ लऽ कऽ सभ ठाम जगदीश प्रसाद मण्डल जीक लेखन शैलीपर सवाल उठा रहल छथि, कथाक स्तरपर गप होइते कहाँ अछि, मात्र जे "करैत" आ "जाइत" क बाद अछि किए नै अछि; रामनाथहुँ किए नै अछि रामनाथो किए अछि, शब्द सभ ई कोड़ि कऽ अनै छथि (एकटा दोसर पाठकक पत्र छल!)। जतेक लेखक छथि ततेक मानकीकरण अछि तखन कथाक स्तरपर गप किए नै होइए? विषय-वस्तुपर गप किए नै होइए? जखन की हुनकर कथा विषय-वस्तु आ भाषा दुनू दृष्टिकोणसँ (मानकीकरण सेहो हुनकामे अछि) श्रेष्ठ अछि, सगर राति दीप जरए, सुपौलमे जे जातिवादी स्वर उठल आ पुरोधा सभ चुप रहलाह, मुन्नाजीक ऐ सम्बन्धमे प्रश्नावलीक अखन धरि पुरोधा लोकनि उत्तर नै देलन्हि, ओइसँ लगैए जे सभटा साजिशक तहत भऽ रहल अछि।सी.आइ.आइ.एल. कएक साल बितलोपर किए मानकीकरणक कोनो खाका नै दऽ सकल, कएकटा मीटिंग टा भेल। जखनकि ओकर कमेटी एकछाहा छै आ ओइमे वएह लोकनि छथि जे सभ सगर राति आदिमे सक्रिय छथि आ मानकीकरणक आधारपर जगदीश प्रसाद मण्डलक आलोचना हास्यास्पद रूपेँ करै छथि! मण्डलजी वा मानकीकरणक लेल कोनो हल्ला नै छै, ई मात्र ओइ अपठित मैथिली साहित्यक साहित्यकारक हल्लाक उत्तर छै जिनका ई सफलता अबूझ बुझाइ छन्हि , जे वास्तविकतासँ दूर छथि आ जे मैथिलीक सरकारी कार्यक्रममे (छद्म धरातली कार्यक्रम!) एक दोसराक ढोल पीटै छथि। जगदीश प्रसाद मण्डलक १३ टा पोथी, मैथिलीक सर्वश्रेष्ठ नाटककार बेचन ठाकुरक एक टा पोथी आ राजदेव मण्डलक अम्बरा (जकरा हम २१म शाताब्दीक पहिल दशकक सर्वश्रेष्ठ कविता संग्रह कहने छी) केँ मैथिली पाठक जे स्थान देबाक छलै इन्टरनेटेपर नै धरातलोपर दऽ देने छै। ई सभ पोथी सभ प्रिन्टक संग ऐ लिंकपर सेहो उपलब्ध छै, देखल जाए https://sites.google.com/a/videha.com/videha-pothi/ । ७४म सगर रातिमे १५ गोट कथा पाठ भेलै जइमे जगदीश प्रसाद मण्लक नेतृत्वमे ९ गोटे गेल रहथि, आ शेष मात्र ६ गोटे रहथि, जेँ जगदीश प्रसाद मण्डल तेँ ई सगर राति आइयो चलि रहल छै। मुदा साहित्य अकादेमी आ सी.आइ.आइ.एल.क प्रायोजित धरातली कार्यक्रम (!) मे से अनुपात नै छै , किएक? कारण ओ संस्था सभ जमीनी वास्तविकतासँ दूर अछि। तारानन्द जीक जातिवाद दोसरे तरहक छन्हि- ओ लिखै छथि- "एतए तं मैथिलीक दुर्बल काया पर कूडा-कचडाक पहाड ठाढ करबाक सुनियोजित अभियान चलि रहल छै। एकर सफाइ लेल मेहतरक फौज चाही। ठीके तं छै। पहिने कहल जाय जे मैथिली ब्राह्मणक भाषा छी, आगू कहल जाएत जे मैथिली मेहतरक भाषा छी।" ऐ लिंक https://sites.google.com/a/videha.com/videha-audio/ पर मिथिलाक विभिन्न जातिक ऑडियो आ ऐ लिंक https://sites.google.com/a/videha.com/videha-video/ पर वीडियो रेकॉर्डिंग ऑनलाइन उपलब्ध अछि जइमे डोम-मल्लिक (जकरा वियोगीजी मेहतर कहै छथि आ ओकरा आ ओकर भाषासँ घृणा करै छथि)क रेकॉर्डिंग सेहो श्री उमेश मंडल जीक सौजन्यसँ अछि। महेन्द्र मलंगियाक काठक लोक आ ओकर आंगनक बारहमासा जइ तरहेँ दलितक भाषाक कथित मैथिली (मलंगियाजीक सृजित कएल)क प्रति घृणा आ कुप्रचारक प्रारम्भ केलक तारानन्द वियोगी ओकरा आगाँ बढ़ेलन्हि। ई ऑडियो आ वीडियो रेकार्डिंग अन्तिम रूपसँ ऐ घृणा आ कुप्रचारकेँ खतम कऽ देने अछि आ विश्व ई सुनि आ देख रहल अछि जे जातिगत आधारपर मैथिली कोनो तरहेँ भिन्न नै अछि। वियोगीजी अपन ऊर्जा ऋणात्मक दिशामे लगबै छथि आ तकर कारण अछि हुनक दृष्टि आ आइडियोलोजीक फरिच्छ नै हएब आ तेँ दोसराक समालोचना ओ बर्दास्त नै कऽ सकै छथि। विदेहक सम्पादकीयपर हुनकर ई टिप्पणी आएल छल जकर जवाब ओ अविनाश (आब अविनाश दास)क फेसबुक वॉलपर देने रहथि। ओही सम्पादकीयक रेस्पॉन्समे गंगेश गुंजन जी लिखने रहथि जे युवा सुभाष चन्द्रक ई गप जे "गंगेश गुंजन पाँच साल पहिने कमानी ऑडीटोरियममे कहने रहथि जे ओ हिन्दीमे लिखै छथि मुदा मैथिलीबला सभ हुनका पुरस्कृत कऽ देलकन्हि" सत नै अछि, ओ कहलन्हि जे ओ ई नै बाजल छथि, सुभाष चन्द्र एकर उत्तर नै देलथि से गुंजन जीक गप मानल जाएत। डॉ. धनाकर ठाकुर सेहो साहित्य अकादेमीपर आंगुर उठेबासँ दुखी रहथि आ विदेहक सह-सम्पादक श्री उमेश मण्डल जी केँ कएकटा मेल पठेलन्हि। ओ जगदीश प्रसाद मण्डल आ उमेश मण्डलक असली मानकीकृत भाषाक पक्षमे नै छथि, भाषा विज्ञानपर जखन उमेश मंडल बहसक प्रारम्भ केलन्हि तँ ओ अपनाकेँ डॉक्टर बना लेलन्हि आ बहसमे भाग नै लेलन्हि। मेलक अतिरिक्त हजारीबागक "सगर राति दीप जरय"मे ओ आ बहुतो गोटे कहैत सुनल गेलाह- एना नै लिखू, अशोक-श्रीनिवास आदि सन लिखू, पहिने पढ़ू तखन ओहने लिखू (ई मानि कऽ ओ सभ चलै छथि जे ओ सभ बिन पढ़ने लिखै छथि!)। बेनीपुरीक "अम्बापाली" नाटक हिन्दीमे छै, एन.सी.ई.आर.टी. ओकरा स्कूलक पाठ्यक्रममे लगेलक मुदा सम्पादक कहलन्हि जे "क्रिया ’है’ क अनुपस्थिति" जेना "वह जा रहा", बेनीपुरीपर स्थानीय क्षेत्रक प्रभावक परिणाम अछि आ तेँ सम्पादक मण्डल ओकर ऐतिहासिकताकेँ देखैत स्कूली पाठ्यक्रममे रहलाक बादो ओकरा सम्पादित नै कऽ रहल अछि। मुदा जखन उमेश मण्डल/ जगदीश प्रसाद मण्डल/ राम विलास साहू लिखै छथि, ओ जाइत, ओ खाइत, तँ "सगर राति"मे भाषा-विज्ञानसँ अनभिज्ञ विशेषज्ञ सभ किछु एहेन सलाह दऽ दै छथि जे मैथिलीक मूल विशेषते गौण पड़ि जाए, मैथिलीसँ प्रभावित बेनीपुरीक हिन्दी, एन.सी.ई.आर.टी.क सम्पादकसँ मैथिलीक नामपर बचि जाइत अछि, मुदा मैथिलीमे पसरल जातिवाद ओकरा नै छोड़बापर बिर्त अछि। से जातिवादी मानसिकता सी.आइ.आइ.एल.क अनुवाद मिशनक परिणामकेँ सेहो भयंकर रूपेँ प्रभावित करत, कारण ओइमे छद्म मानकीकरणक आधारपर अनुवाद कार्यशाला आयोजित भऽ रहल अछि। मैथिलीक तथाकथित स्थापित/ पुरस्कृत साहित्यकार यावत असल मानकीकरणकेँ नै पकड़ताह, हुनकर अस्तित्व उपरोक्त राक्षसी प्रतिभा (विषय-वस्तु आ भाषा दुनू दृष्टिकोणसँ) सभक सोझाँमे मलिछौने रहत। जातिवादी मानसिकता माने जे केलक से हमर आनुवंशिक जाति केलक, से ककरोमे भऽ सकैए। छद्म मानकीकरण: एकटा खास जातिवादी स्कूलक विचारकेँ प्रश्रय देलाक परिणाम, जे एकाध किताब सी.आइ.आइ.एल. मैथिलीमे निकाललक अछि आ जइ तरहेँ ओकर मानकीकरण प्रोजेक्ट सालक सालसँ बिना परिणामक चलि रहल छै, से सी.आइ.आइ.एल.क मैथिलीक छद्म मानकीकरण देखा रहल अछि। असल मानकीकरण: मिथिलाक सभ क्षेत्रक सभ जातिक बाजल जाएबला मैथिलीक आधारपर गहन विचार विमर्शसँ बनाओल मानकीकृत मैथिली। एकर बानगी ऐ लिंक https://sites.google.com/a/videha.com/videha-pothi/ पर देल बेचन ठाकुर/ जगदीश प्रसाद मण्डल/ राजदेव मण्डल आदिक रचनामे भेटत। फील्डवर्क ऐ लिंक https://sites.google.com/a/videha.com/videha-audio/ पर देल -मिथिलाक सभ जाति आ धर्मक संस्कार, लोकगीत आ व्यवहार गीत (सौजन्य: उमेश मंडल)- ४६ टा ऑडियो फाइलमे भेटत आ ऐ लिंकक https://sites.google.com/a/videha.com/videha-video/ - मिथिलाक सभ जाति आ धर्मक संस्कार, लोकगीत आ व्यवहार गीत (सौजन्य: उमेश मंडल) - ४४ टा वीडियो फाइलमे भेटत तथा २००० पाठकक विचारपर आधारित मानकीकरणक सारांश ऐ लिंकपर http://www.videha.co.in/new_page_13.htm भेटत। ऑडियो आ वीडियो फाइल महेन्द्र मलंगिया द्वारा “काठक लोक” आ “ओकर आंगनक बारहमासा” द्वारा प्रचारित शोल्कन्हक कथित (हुनका द्वारा इजाद कएल) मैथिलीपर अन्तिम प्रहार अछि। राक्षसी प्रतिभा: पूरा ब्राह्मणवादी मैथिली साहित्यकारक अपठित दुनियाँ एक दिस आ जगदीश प्रसाद मण्डल, राजदेव मण्डल, बेचन ठाकुरक पठित दुनियाँ दोसर दिस, जकरा ब्राह्मणवादी मैथिली साहित्यकार लोकनि “राक्षसी प्रतिभा” सम्भवतः आलोचनात्मक रूपमे कहताह/ कहै छथि मुदा हमरा मोने ओ हुनका सभक हारिक शुरुआत अछि। धनाकर जीक एकटा विचार छलन्हि (विचार नै निर्णय छलन्हि) जे रामनाथोक बदला रामनाथहुँ हेबाक चाही!! उमेश मण्डल आ धनाकर ठाकुरक पूर्ण बहस विदेहक ८४म अंकक सम्पादकीयमे आएल अछि।सी.आइ.आइ.एल.क अनुवाद मिशनक आरम्भिक मेहनति अपठित मैथिली साहित्यक साहित्यकारक कार्यशाला अछि, ओकरा पाठकसँ कोनो मतलब नै छै आ ने असल पठित साहित्यकारक साहित्यसँ। से ओकर परिणाम वएह हेतै जे साहित्य अकादेमीक छै। अमरजी लिखै छथि- साहित्य अकादेमीक पोथी सभ गोदाममे सड़ि रहल छै।विदेहमे जगदीश प्रसाद मण्डलक दीर्घ कथा शम्भूदास आएल अछि, ओकर दोसर पारा देखल जाए:- “जहिना बाध-वोनक ओहन परती जइपर कहियो हर-कोदारि नै चलल सुखि-सुखि गािछ-विरिछ खसि उसर भऽ जाइत, ओइ परतीपर या तँ चिड़ै-चुनमुनीक माध्यमसँ वा हवा-पानिक माध्यमसँ अनेरूआ फूल-फड़क गाछ जनमि रौद-वसात, पानि-पाथर, अन्हर-विहाड़ि सहि अपन जुआनी पाबि छाती खोलि बाट-बटोहीकेँ अपन मीठ सुआदसँ तृप्ति करैत तहिना जमुना नदीक तटपर शंभूदासक जन्म बटाइ-किसान परिवारमे भेलनि।” की एतए “जाइत” "करैत" क बाद अछि देब आवश्यक छैक? ६.लोकमे आब गोलैसी नै छै, हमरा क्षेत्रक राजनेता सेहो आब जाति, गोत्रक आधारपर नै मुदा काजक आधारपर वोट माँगि रहल छथि। मुदा ओइ युगक साहित्यकार/ नाटककार - जिनका सी.आइ.आइ.एल., साहित्य अकादेमी, एन.एस.डी. आदिसँ मान्यता चाहियन्हि, तखने ओ साहित्यकार/ नाटककार कहेताह- से गोलैसी नै करताह तखन हुनकर छद्म अस्तित्व कोना रहतन्हि? कारण जइ युगक ओ छथि से युग तँ कहिया ने खतम भऽ गेलै। कोनो कालजयी लेखक/ नाटककारकक अस्तित्व ऐ सरकारी संस्था सभक मोहताज नै अछि। ७.मैथिलीक पहिल दुर्भाग्य तखन देखा पड़ैत अछि जखन एतए गजलकेँ मुस्लिम धर्मसँ जोड़ि कऽ देखल जाए लगलै आ मुस्लिम धर्म आ ओकर साहित्यकेँ अछोप मानि लेल गेलै। आ तखन मुस्लिम अहाँसँ कोना जुड़त। मुदा आब जखन गजलक जीवन युगक समाप्ति भऽ गेल अछि (जीवन युग- ऐ युगक प्रारंभ हम जीवन झासँ केने छी जे आधुनिक मैथिली गजलक पिता मानल जाइ छथि मुदा ओ कम्मे गजल लीख सकला। मुदा हुनका बाद मायानंद, इन्दु, रवीन्द्रनाथ ठाकुर, सरस, रमेश, नरेन्द्र, राजेन्द्र विमल, धीरेन्द्र प्रेमर्षि, रौशन जनकपुरी, अरविन्द ठाकुर, सुरेन्द्र नाथ, तारानंद वियोगी आदि गजलगो सभ भेलाह।) आ अनचिन्हार युगक प्रारम्भ भऽ गेल अछि, जइमे गजलक परिभाषिक शब्द आ बहरक निर्धारणक आधारपर सुनील कुमार झा, दीप नारायण "विद्यार्थी", रोशन झा, प्रवीन चौधरी "प्रतीक", त्रिपुरारी कुमार शर्मा, विकास झा "रंजन", सद्रे आलम गौहर, ओमप्रकाश झा, मिहिर झा, उमेश मंडल, शान्तिलक्ष्मी चौधरी आदि गजलकार गजल लिख रहल छथि तखन मुस्लिमक प्रवेश मैथिलीमे हेबे करत।हम शेख मोहम्मद शरीफक तेलुगु कथाक अंग्रेजी माध्यमसँ मैथिलीमे अनुवाद केने रही (जुम्मा - कथा- विदेह:सदेह:१ मे सेहो प्रकाशित) आ विदेहमे सद्रे आलम गौहर आ मो. गुल हसन छपि रहल छथि। संगमे मैथिलीमे आब कसीदा, मसनवी, फर्द, बन्द, कता, रुबाइ, हम्त, नात, मनकबत, मर्सिया, मुस्तजात, नज्म, मुजरा, कौवाली आदिपर लेख (देखल जाए आशीष अनचिन्हार -http://anchinharakharkolkata.blogspot.com/2011/10/blog-post_07.html )क बाद मुस्लिम लेखक मैथिलीसँ कतिआएल अनुभव नै कऽ रहल छथि। मिथिलाक खोजमे मुस्लिम आ क्रिश्चियन धार्मिक स्थलक वर्णन छै (देखू http://www.videha.co.in/favorite.htm ) आ मिथिला रत्नमे सेहो यथासम्भव उल्लेख भेट जाएत (देखू http://www.videha.co.in/photo.htm )। मिथिलाक तँ छोड़ू कर्णाटकक मुसलमान सेहो किए कन्नडक बदला उर्दूकेँ अपन मातृभाषा मानि रहल अछि, जखनकि बगलमे तमिलनाडुक मुसलमान अपन मातृभाषा तमिल घोषित करैए (कन्नडक उपन्यासकार भैरप्पाक उपन्यासक संस्कृत अनुवाद "आवरणम" हम पढ़ने छी, ओइमे ऐपर सेहो चर्चा छै, कर्णाटकमे ऐ उपन्यासपर कतेक हंगामा भेल रहै । मुस्लिम मैथिलीसँ दूर भागल से तमिल, मलयालम आ बांग्लाक (आ काश्मीरीक) अतिरिक्त सभ भाषामे भेल। काश्मीरमे तँ लोक बजैए काश्मीरी आ पढ़ाओल जाइ छै उर्दू- (बिहार मे पढ़ाओल जाइ छै जेना हिन्दी) , मुदा एकटा छोट राज्य सिक्किम नेपालीक अतिरिक्त लेपचा / भुटिया सेहो पढ़बै छै (लेपचा लिपि सेहो इंटैक्ट छै),मुदा बगले मे दार्जिलिंगमे से नै छै। ओकर कारण अछि सिक्किमक भाषायी उदारता जे बिहारमे (आइये नै जमीन्दारी राजेसँ) मैथिली आ मिथिलाक्षरक विरुद्ध अछि/ छल। मुसलमानक मातृभाषा उर्दू किए भेलै, आ हिन्दूक मातृभाषा हिन्दी किए से प्रश्न मात्र मैथिलीक नै अछि। बांग्ला आ तमिलकेँ बंगाल आ तमिलनाडुक मुसलमान अपन मातृभाषा किए मानै छथि। मिथिलाक मुसलमानेकेँ मात्र किए दोष देल जाए? मिथिलाक अधिकांश हिन्दू सेहो मैथिलीकेँ नै हिन्दीकेँ अपन मातृभाषा मानै छथि मुदा हुनका साम्प्रदायिक नै देशभक्त मानल जाइए! दोसराकेँ छोड़ू, हम तँ दरभंगाक पोथी बेचनिहारसँ मैथिली बाजैत थाकि गेलौं मुदा ओ सभ हिन्दीमे जवाब देलक! प्रश्न ओतेक सरल नै छै । ८.नेट मध्य एशियामे की केलकै सभकेँ बुझले अछि। जमीनी स्तरपर निर्मलीमे जे "विदेह समानान्तर साहित्य अकादेमी मैथिली कवि सम्मेलन" आयोजित भेल छलै ओकर सफलतासँ सभ भिज्ञ छथि, तहिना विदेह द्वारा जे समानान्तर साहित्य अकादेमी पुरस्कारक घोषणा भेलै से काल्हि धरि अपठित मैथिली साहित्यक साहित्यकारक मध्य जे अहलदिली अनने अछिै तहूसँ सभ भिज्ञ छथि। ९.मिथिलाक आ मैथिलीक विकासक जे वातावरण अखुनका सरकारमे छै की ओ दरभंगा आ आन जमीन्दारी राज वा मैथिल मुख्यमंत्रीक कालमे कहियो रहै? १४ अक्टूबर २०११ केँ मुख्यमंत्री नीतिश कुमारकेँ निर्मलीमे जगदीश प्रसाद मण्डलक ५ टा आ राजदेव मण्डलक एकटा पोथी देल गेलन्हि, मुदा जखन चेतना समितिक बैसकीमे श्रीकृष्ण मेमोरियल हॉल, पटनामे ओ मैथिलीक ऐ संस्थाकेँ मैथिल ब्राह्मणक संस्था बुझने रहथि आ बाजलो रहथि (बड़ाइयेमे सही, वोटक उद्देश्येसँ सही) तँ कियो सांकेतिको करेक्शन किए नै केने रहथि? १४ अक्टूबर २०११ धरि ओ मैथिलीकेँ मैथिल ब्राह्मणक भाषा बुझै छलाह!!
१०.सी.आइ.एल.एल.क सभ निअम वेबसाइटपर उपलब्ध छै, आ ओकर कोन प्रावधान लक्ष्मीनाथ झा द्वारा लिखित हिन्दीक पोथी "बिहार की सांस्कृतिक चित्रकला"क निर्लज्ज चोरि कएल पोथी सुशीला झाक "अरिपन"केँ पूर्वप्रकाशन ग्रान्ट दै छै से हमरा नै बुझल अछि। मुस्लिमक गप तँ छोड़ू हिन्दूक मात्र एक जाति एकर सभ कार्यशालासँ लऽ कऽ सभ ग्रान्ट/ असाइनमेन्ट प्राप्त कऽ रहल अछिै, ओ कोन प्रावधानक अन्तर्गत छै? निअममे कोनो कमी नै होइ छै, यएह निअम तँ दोसरो भाषामे छै, ओतए किए एतेक समस्या नै छै? ११.साहित्य अकादेमीक मैथिलीक युवा पुरस्कार २०११ लेल भऽ रहल षडयंत्रक अन्तर्गत किछु एहेन पोथी सभ रेस मे अछि जे छपबे नै कएल, मात्र किछु प्रकाशकक लोगो आ आइ.एस.बी.एन. आ एक कॉपी साहित्य अकादेमीक देल अखबारी विज्ञापनक आलोकमे ३१ जुलाइ २०११ क अन्तिम तिथिकेँ मंगबाओल गेल (माने ओ पोथी मात्र ओ लेखक आ साहित्य अकादेमी टा पढ़ने अछि)। मुदा ई तथ्य सभकेँ बुझल छै जे कोन पोथी बजारमे अछि आ कोन मात्र पुरस्कार लेल एक कॉपी आएल अछि। साहित्य अकादेमीक युवा पुरस्कारक प्रारम्भिक लिस्टमे पंकज पराशरक चोरिक कविताक संग्रह सेहो अछि, धन्य साहित्य अकादेमी आ ओ कवि/ साहित्यकार लोकनि सेहो जे ऐ चोर महराजसँ अपन मैथिली कविता अनूदित करबा कऽ साहित्य अकादेमीक पत्रिकामे छपबै छथि आ तेकर एवजमे ओइ चोरकेँ पोसै छथि। १२.श्रीनिवास जीक "बदलैत स्वर"मे कोनो कमी नै अछि, बशर्ते ओकर टाइटल जँ रहितै "बदलैत स्वर-मैथिली कथा श्रीनिवास-अशोक-विभूति-बिहारी-वियोगी-नवीनक विशेष सन्दर्भमे"; मुदा ई पोथी सम्पूर्ण मैथिली कथा साहित्यक स्वर हेबाक दावा करैत अछि। से एकर सीमामे ने नक्सलवाद आबि सकत, ने बिसाँढ़ आ ने पइठ। जै ग्रुपक हेबाक बातसँ नवीनजी बेर-बेर अपन साक्षात्कारमे मना केलन्हि अछि, से ग्रुप "बदलैत स्वर"क स्वर अछि। ( विदेह ई पत्रिकाकेँ ५ जुलाइ २००४ सँ अखन धरि ११६ देशक १,९५० ठामसँ ६८,९७२ गोटे द्वारा विभिन्न आइ.एस.पी. सँ ३,२७,२१२ बेर देखल गेल अछि; धन्यवाद पाठकगण। - गूगल एनेलेटिक्स डेटा। ) गजेन्द्र ठाकुर ggajendra@videha.com http://www.maithililekhaksangh.com/2010/07/blog-post_3709.html २. गद्य २.१.जगदीश प्रसाद मण्डल-वीरांगना २.२.१.परमेश्वर कापड़ि-छठिमाइके आसि आ लोकजीवनमे हिनक महत्व २.अतुलेश्वर- किछु विचार टिप्पणी २.३.सुदीप झा- सामाजिक मूल्य मान्यताकें चोच मारैत ‘चिड़ै’ २.४.दुर्गानन्द मण्डल- पोथी समीक्षा-मौलाइल गाछक फूल २.५.गजेन्द्र ठाकुर- उल्कामुख २.६.जगदीश प्रसाद मण्डल-तामक तमघैल २.७.१.अच्छेलाल शास्त्री-रणभूमि आ कविता नामक शीर्षक कवितापर दू शब्द २.नवेंदु कुमार झा -१.चीनी निगम क मिठास सँ दूर निवेशक, नीलामीक बढ़ल समय सीमा २. केसीसीक लेल लागल शिविर ३.उत्तर बिहार तीन टा रेल लाइनक दोहरीकरणक प्रयास मे आएल तेजी २.८.नवीन ठाकुर-मिथिला उवाच जगदीश प्रसाद मण्डल एकांकी वीरांगना जगदीश प्रसाद मण्डल पात्र परिचए... पुरूष पात्र- 1. सोनमा काका ६५ वर्ष 2. चेथरू ४५ वर्ष 3. जुगेसर ५० वर्ष 4. अयोधी ३० वर्ष 5. जीवन ३५ वर्ष 6. स्त्री पात्र- 1. रूपनी ६० वर्ष 2. कुशेसरी ५० वर्ष 3. कोशिला २२ वर्ष पहिल दृश्य- (अपन-अपन आंगनसँ निकलि रस्ताक भकमोड़ीपर ठाढ़ भऽ...) सोनमा काका : सुनै छी जे रमफलबा आएल हेन? रूपनी दादी : सएह ते सुनलौं मुदा तेहन लोकक मुँहे सुनलौ जे सुनियो कऽ अनविसवासे अछि। तँए दोसर गोटेसँ भाँज लगबए विदा भेलौं। चेथरू : नै-नै बात ठीके छिऐ। सोनमा काका : से तूँ केना बुझै छहक? चेथरू : ओहन लेाकक मुँहे सुनलौं जेकरा मुँहसँ असत् बात निकलिते ने छै। सोनमा काका : जेकरा मुँहे ओ सुनने हएत वएह जँ असत् कहने होय, तखन? रूपनी दादी : से तँ भऽ सकै छै। मुदा तहूमे भाँज छै। सोनमा काका : से की भाँज छै? चेथरू : से अहाँ नै बुझै छिऐ काका, जे देखलाहा बजैए ओ सत होइ छै आ जे सुनलाहा रहै छै ओइमे दुनू होइ छै। सोनमा काका : हँ से भऽ सकैए। केहेन लोकक मुँहे सुनने छेलह? चेथरू : दूधवाली मुँहे सुनने छलौं। वएह जे दूध बेचि कऽ ओइ टोलसँ आएल छलै, बाजलि रहए। सोनमा काका : उ ते दूध बेचैमे लागल हएत आकि बात बुझै पाछू। चेथरू : ओकरा अहाँ नीक जकाँ नै चिन्है छिऐ। कोनो की माछ-कौछ बेचैवाली छी जे पएरक औंठासँ पलड़ा दाबि उठा देबै आ घट्टी जोखि देबै। सोनमा काका : दूधो बेचैवाली तँ पोखरिक पानिये मिला दै छै, से। चेथरू : हँ, से तँ होइ छै। मुदा ओकर कारोवार रहै छै कएक दिन। बाढ़िक पानि जकाँ आएल आ पड़ाएल। रूपनी दादी : हँ, से तँ देखै छिऐ जे जहियासँ काज धेलक तहियासँ ने ओकर दूध नप्पा फुच्ची फुटल आ ने नाप-जोखक बदनामी कहियो लगलै। चेथरू : (अपन पक्ष मजबूत होइत देखि, मुसकिया..) दादी, बुढ़िया देखैमे ने एक चेराक बुझि पड़ैए मुदा गामेक नै, घर-घरक रत्ती-बत्ती बात बुझैए। सोनमा काका : की सभ कहलकह? चेथरू : बाजलि जे दिल्लीसँ मालिक अपना गाड़ीपर लादि कऽ पहुूँचा गेलहेँ। सोनमा काका : एतबे कहलकह आकि आगूओ किछु बजलह? चेथरू : एतबे बजैमे तँ ओ अपन डाबासँ दूध नापि लोटामे दऽ देलक आ उठि कऽ विदा भेल। सोनमा काका : एहेन-एहेन बात तँ सरिया कऽ ने बुझि लेबाक चाही। चेथरू : जाइत काल एते बात भनभनाइत सुनलिऐ जे एकटा टाँग काटि कऽ पठा देलकै आ पान साउ रूपैयासँ नोइस हेतै? सोनमा काका : एते पैघ बात आ कनियो अॅटका कऽ नै पुछि लेलहक? चेथरू : काका, ओइ बुढ़ियाकेँ की बुझै छिऐ, कोनो की हमरे ऐठामटा अबैए जे निचेनसँ गप-सप्प करब। सोनमा काका : तखन? चेथरू : ओ बुढ़िया फुच्चिये-फुच्ची दूधेटा लोककेँ दइ छै आकि मिसरियो घोड़ै छै। सोनमा काका : से की? चेथरू : हम की ओते बुझै छी जे तेना भऽ कऽ बुढ़ियाक सभ बात बुझि लेबै, तखन तँ जते काज रहैए ओते तँ भइये जाइए। दादी लगमे सभ दिन बैसैत देखै छिऐ। रूपनी दादी : हँ, से तँ बैसबो करैए आ गामक तीत-मीठ गपो कहैए। मुदा घुरैकाल बैसैए, तँए अखन भेँट नै केलकहेँ। सोनमा काका : ऐ तत-मतीसँ नीक जे ओकरा घरेपर पहुँच मुँहा-मुँही गप कऽ ली। चेथरू : काका, तइले तीनू गोरे किअए जाएब। असकरे जाइ छी, सभ बात बुझि कऽ सुनाओ देब? रूपनी दादी : सभ दिन तोँ चेथरू-के-चेथरूऐ रहि गेलेँ। पोता-पोती भेलौ से होश नै छौ। चेथरू : दादी, एक ढाकीक के कहए जे सत्तरह ढाकी पोता-पोती भऽ जाएत तैयो अहाँ लगमे चेथरूए रहब। कोनो बात-विचारक जे जरूरत हएत तँ अहाँसँ नै पुछब, सोनमा काकासँ नै पुछबनि तँ की बगुरक गाछ आ पसीद काँटक गाछसँ पुछबै? रूपनी दादी : देखहक चेथरू, हम अपना नजरिये देखबो करब आ पुछबो करबै, तहिना तोहूँ सोनाइ भेलह किने? चेथरू : तइ नजरिये कहाँ कहलौं। तीनू गोटे जे एकेटा काजमे बड़दैतौं, तइ दुआरे कहलौं। रूपनी दादी : से बड़ बेस। मुदा काजक आँट-पेट नै बुझै छहक। कहैले सभ काजे छी, मुदा ओहूमे छोट-पैघ, नीक-अधला होइ छै। चेथरू : कनी परिछा कऽ कहियौ? सोनमा काका : ठीके चेथरू, तूँ कहियो पुरूख नै हेबह? चेथरू : काका, अहाँ सने जे कोनो पुरूखपना काज करबै तइसँ पुरूख नै हेबै। सोनमा काका : पुरूखक संगी हेबहक। पुरूख तखन हेबह जखन अपने ठाढ़ भऽ आगूक डेग बढ़ेबह। अखन दोसर-तेसर बात छोड़ह आ रमरूपाक भाँज नीक-नहाँति लगावह। चेथरू : जखन अहाँ सबहक विचार अछि तखन तीनू गोरे चलू। (तहीकाल आगूसँ जुगेसर अबैत..) सोनमा काका : जुगे, किमहर-किमहरसँ एलह? जुगेसर : काका, की कहब (गुम्म होइत...) चेथरू : मुँहक बात दबलह किअए? किछु भेलौं तँ हम सभ समाज भेलौं। न्यायालय भेलौं। अगर हमरा समाजक अंगक संग कोनो अन्याय दोसर समाज करत तँ ओ बरदाससँ बाहर अछि। की सोनमा काका..? सोनमा काका : चेथरू, जे बात तूँ बजलह वएह गामक प्रतिष्ठा छी। मुदा, पाकल आम भेलियह, सभ दारो-मदार तँ तोरे सभपर छह। चेथरू : जुगे भाय, अहाँ तँ आँखिक देखल बाजब। रामरूपक कि...? जुगेसर : देखैबला दृश्य नइए। अपने रामरूप ओछाइनपर ओंघराएल अछि आ घरवाली ओछाइनिक निच्चाँमे ओंघरनिया दऽ रहल अछि। तीन सालक बच्चा झाँपल कपड़ा हटा-हटा पएर तकैए। रूपनी दादी : बाप रे बाप! समाजक एकटा घर उजड़ि गेल। जुगेसर : दादी, अहाँ नै जाउ। सोनमा काका अहूँ नै जाउ। सोनमा काका : किअए? जुगेसर : ओहन दृश्य देखैक करेज आब नै रहल। हो-न-हो पहिलुके नजरिमे ने अपने...? चेथरू : दादी, कहने तँ पहिने छलौं, मुदा हमरा गपक मोजरे ने देलौं। आब कहू जे कोनो अनरगल कहने रही? सोनमा काका : हँ, से तँ बात मिलिऐ गेलह। मुदा एते बात बुझि कऽ तँ नै बाजल छलह? अच्छा, एतै बैस कऽ सभ बात कहह। जुगेसर : ओतए तँ लोकक करमान लागल छै। तहूमे धिया-पूता आ झोटहा भरि देने अछि। चुट्टी ससरैक जगह नै छै। सोनमा काका : गप किछु कहह ने? जुगेसर : कोनो बात की सोझ डारिये चलए दइए। एक तँ कारकौआक जेर जकाँ धिया-पूता काँइ-काँइ करैए तइपर सँ जनिजाति भिन्ने छाती पीटैए। चेथरू : तैयो तँ भाँजपर किछु गप चढ़ले हेतह? जुगेसर : हँ, एते उड़नतिये सुनलौं जे डरेवर जाइ काल बाजल जे कारखाना मालिक इलाजमे तीन लाख रूपैया खर्च केलखिन। पाँच सए खाइ-पीऐले, आ लत्ता-कपड़ा सेहो देलखिन। रूपनी दादी : पान सए रूपैआ कते दिन चलतै। तहूमे सभटा लोथे भेल। जहिना रामरूप तहिना बच्चाक संग बच्चाक माइयो। केना बेचारी दुनूकेँ छोड़ बोनि-दुख करए जाएत। चेथरू : से तँ ठीके। मुदा दादी झोटहा सबहक विसवास कोन। बेटाकेँ जहर-माहूर खुआ देत आ घरबलाकेँ छोड़ि पड़ा दोसर घर चलि जाएत। रूपनी दादी : सेहो होइए चेथरू। तोरो बात कटैबला नहिये छह मुदा एक्के दाबिये केना खिचड़ियो रान्हवह आ खीरो। एकटामे नून पड़त एकटामे चिन्नी। चेथरू : से तँ ठीके कहै छिऐ दादी। एहिना ने भालेसरोकेँ भेल। ओहो जे जौमक गाछपर सँ खसि जाँघ तोड़लक आ डाक्टरो बुट्टी भिड़ा कऽ काटि देलकै। फेर ओ बेचारी (भालेसरक पत्नी) केना छह मसुआ बेटीक संग रहि ता जिनगी घरबलाक सेवा केलक। सोनमा काका : सोझे सभ गप खिस्सा जकाँ सुनने नै हेतह चेथरू। ओना जुगेसर ठीके कहलकह। अखन छोड़ि दहक। बेरू पहरमे चलब। रूपनी दादी : हँ, हँ, एहेन-एहेन जगहपर नै गेने समाजक रसे की रहत। समाज तँ तखने ने समाज जखन सबहक सुख-दुख सेगे पोखरिमे नहाइ। चेथरू : कनिये-कनिये जे सोचै छी दादी तँ बुझि पड़ैए जे समाजपर एकटा भार पड़ि गेल। (()) दोसर दृश्य (अयोधीक दरबज्जा। दरबज्जाक ओछाइनिक एक कोनपर अयोधी बैसल दोसर कोनपर अयोधीक माए कुशेसरी बैसल..) अयोधी : माए, आब की करब? कुशेसरी : बौआ, आब छाती बदलि गेल। (आँखि मीड़ैत) धरमागती बात तोरा कहै छिअ। अयोधी : अखैन जे तत्-खनात बेगरता आबि गेल पहिने से विचार दे। तखैन दोसर-तेसर सोखर सुनबिहेँ। कुशेसरी : बौआ, सएह कहै छिअ। लोकेक बेगरता लोककेँ होइ छै। मुदा.....? अयोधी : चुप किअए भेलेँ? कुशेसरी : लोकक बोन अफ्रिकनो बोनसँ घनगर अछि। तँू ई नै बुझिहह जे माए हमरा भाएकेँ खून दइसँ रोकत। मुदा तइसँ पहिने जँ बुझैक जरूरत छह से कहए चाहै छिअ। अयोधी : माए, जाबे पेटक बात निकालि नै फेकब, ताबे गौस्टिकक रोगी जकाँ छुटैए। जइसँ कोनो बात सुनैक मने ने होइए। कुशेसरी : बाजह, पहिने तँू अपने कोठी खलिया कऽ झाड़ि लैह तखन जे आनो अन्न ओइमे देबहक तँ तैयो एकछहे रहत। अयोधी : खनदान दिस तकै छी तँ सुमारक लगैए। जहिना परबाबा आन गामसँ आबि बसलाह तहिना एकघराक घर अखनो छीहे। कुशेसरी : जहियासँ ऐ गाममे पएर रखलौं तहियासँ तँ गामो आ परिवारोकेँ देखते-सुनते एलौं। मुदा तइसँ पहिलुका बात तँ बुझल नइए। बाजह? अयोधी : परबाबा मात्रिकमे आबि कऽ बसल रहथि। मात्रिकक डीह नीक डीह बुझलनि। गामक भागीन, तँए गामक बाट चिक्कन। कतौ खाधि पीछड़ नै। कुशेसरी : आगूक पीढ़ी केना बढ़ल? अयोधी : हुनका (परबाबाकेँ) दूटा बेटा आ दूटा बेटी भेलनि। परिवार गेना फूलक गाछ जकाँ झमटगर हुअए लगल। दुनू बेटी सासुर गेलनि। परिवारो नीक तँए समरस परिवार भेने समरस जीवन समरस सुख पाबि मुइलाह। कुशेसरी : दुनू भाँइक परिवार? अयोधी : दुनू भाँइयो आ माइयोक एहेन सोभाव रहनि जे कहियो कोनो बाते झगड़ा नै भेलनि। जेठका भायक वियाह धुमधामसँ भेलनि। मुदा छोटका तेहन तीनूक (भाइयो, भौजाइयो आ माइयोक) सहलोल भऽ गेलखिन जे विआहे ने केलखिन। कुशेसरी : परिवारक बात दुनू गोरे नै बुझौलखिन? अयोधी : कहाँदन रहबो करथिन मतिछिन्नु जकाँ। कहियो झाेंक चढ़ि जानि तँ भरि-भरि दिन, बिनु खेनौं-पिनौं कोदारिये भजैत रहि जाइ छेलखिन। कुशेसरी : (ठहाका मारि..) मनुखदेवा ने ते रहथिन? अयोधी : ऍंह, ओतबे, कहियो झोंक चढ़नि तँ खाइयो बेरमे पीढ़ियापर बैस रूसि रहथि। कुशेसरी : से किअए? अयोधी : (हँसैत..) ताबे तक रूसल रहथि जाबे तक माए आगूमे नै आबि जानि। भाय-भौजाइक बातक कोनो मोजर नै। कुशेसरी : माइयक बात मानि लथिन? अयोधी : माए आबि जखन पुछथिन तँ कहनि जे बेटा बिनु माइयक सेवा केने खाइए ओ पापी छी। तँए पहिने एक हाथ सेवा तोरा कऽ देबौ तखन मुँहमे अन्न-पानि लेब। एक-भग्गू लोक जकाँ? कुशेसरी : एक-भग्गू लोक जकाँ नै, एकबट्टू लोक जकाँ। अयोधी : हँ, हँ, तहिना। कुशेसरी : पैछला पीढ़ीसँ तँ छीहे। बौआ छातीपर हाथ राखि कहै छिअ। ऐ घरमे भिनाैज कराैल हमरे छी। जे ओइ दिनमे नै बुझै छलिऐ। अयोधी : से आब केना बुझै छीही? कुशेसरी : हम दुनू परानी टटके जुआएल रही आ भैया दुनू परानी ठमकि गेल रहथि। मलिकाइन बनैक भुख ककरा नै लगै छै। हमरो लागल आ भिनाैज करेलौं। अयोधी : मन हल्लुक भेल। आब विचार दे जे रामरूपकेँ देहमे खून कम छै, ओ तँ हमरे खूनटा मिलै छै। कुशेसरी : जतेक खगता छै तइसँ दोबर दहक। आ इहो बुझि लएह जे एकटंगा भाइक भार अपने कपारपर अछि। (तहीकाल सोनमा काका, रूपनी दादी आ चेथरूक प्रवेश..। अयोधी सोनमा काका आ चेथरूकेँ गोड़ लगलक। कुशेसरी रूपनी दादीकेँ गोड़ लागि विछानपर बैसा दुनू हाथे घुट्ठी दाबए लगलनि। जहिना धौना खसल सोनमा काकाक तहिना रूपनियो दादीक आ चेथरूओक। सभ गुम-सुम भेल बैसल..) चेथरू : अयोधी, भगवान तोरा ऊपर ठनका खसेलखुन। मुदा....? (सोनमा काका आँखि उठा कखनो अयोधीपर तँ कखनो कुशेसरीपर तँ कखनो निच्चा कऽ तरे-तर रामरूपक कटल टाँगपर आ कखनो रामरूपक स्त्रीपर दौड़बैत...) रूपनी दादी : छोड़ह ऐ जाँतब-पीचबकेँ। पहिने रामरूपकेँ देखा दएह। (रूपनी दादीकेँ बाँहि पकड़ि कुशेसरी आँगन लऽ गेलि..) सोनमा काका : रामरूप तँ पितिऔत भाए छिअह किने? अयोधी : हँ। सोनमा काका : ओकरा परिवारमे के सभ छै? अयोधी : अपने दुनू प्राणी अछि आ एकटा तीन सालक बेटा छै। सोनमा काका : खेती-पथारी? अयोधी : किछु ने। जँ से रहितै तँ एहिना परदेशसँ टाँग कटा घर अबैत। चेथरू : एना भेलै केना? अयोधी : सबटा अपन कपारक दोख होइ छै। कोनो की इहएटा ओइ करखन्नामे काज करै छलै आकि आउरो गोरे। चेथरू : काज कोन करै छलै? अयोधी : कहाँ दन, लोहा करखन्नामे काजे करैत काल एकटा गोलका गुरकि आबि कऽ जाँघेपर खसलै। (तहीबीच रूपनी दादी कुशेसरीक संग अबैत..) कुशेसरी : (अबिते..) अहँू दुनू गोरे अंगने चलि कऽ कनी देखि ने लिऔ? चेथरू : दादी तँ देखि कऽ एबे केलीहेँ, पहिने हिनकेसँ बुझि ली। रूपनी दादी : (छाती पीटैत..) एहेन अतहतह नै देखने छलौं। बाप रे बाप! मनुखक नक्शे बदलि गेल अछि। हे भगवान, जखन विपत्तिये देलहक तँ आरो किअए ने बेसी कऽ देलहक जे दू-चारि मासमे लोक विसरि जाइत। सोनमा काका : ओना अपना चसमसँ देखब नीके होइ छै। मुदा किछु एहनो होइ छै जकरा नहिये देखब नीक। रूपनी दादी : पुरूखक जाइ जोकर आंगन नहिये अछि। बेचारी रामरूपक पत्नीकेँ ने नुआ-वस्त्रक ठेकान छै आ ने....। चेथरू : तहँूमे अपना सभ की कोनो ओझा-गुनी, डाक्टर छी जे लगसँ देखबे जरूरी अछि। अपनो सभ वएह देखब जे दादी कहती। सोनमा काका : घाओपर नून छीटि विसतार करबसँ नीक नहिये देखब। चेथरू : काका....? सोनमा काका : अखन किछु बाजैक समए नै अछि। फेर आएब तखन किछु आगूक बात विचारब। चेथरू : काका एक तँ वेचाराकेँ अपना किछु ने छै तइपर अपने कोनो काजक नै रहल। जीवित शरीर तँ अन्न-पानि मंगबै करत। बिनु किछु केने धेने कतेक दिन चलत। सोनमा काका : यएह सभ ने बुझै-विचारैक अछि। तूँ दुनू गोरे अयोधी एके गाछक बखलोइया छह। जही गाछक बखलोइया रहै छै ओही गाछमे ने सटबो करै छै। चेथरू : अयोधी, तेहेन दोरस हवा बहि गेल अछि जे चीन्हो-पहचीन्हि भोतिया गेल अछि। जेना गाछमे देखैत हेबहक जे जे पात सुनटा गरे गाछक शोभा बढ़बैत अछि वएह हवामे उनटि अपन असल रूप उनटा लइए। अयोधी : भाय सहाएब, अपना तँ ओते ऊहि नै अछि जे नीक अधला बात नीक जकाँ बुझबै मुदा एते अहाँ सबहक बीच बजै छी, जे देहक खुने नै ऐ देहसँ जते भऽ सकतै तइमे पाछू नै हटब। सोनमा काका : बौआ, अखन घरसँ बहार धरिक सभ सोगाएल छी तँए, नीक जकाँ जिनगीकेँ नै बुझि सकब। ताबे अखन जे जे जरूरी काज सभ अबैत जाइ छह तकरा सम्हारैत चलह। पाँच-दस दिनक बाद निचेनसँ विचारि लेब। रूपनी दादी : बौआ, समाजमे एक-सँ-एक अमीर आ एक-सँ-एक गरीब रहैए। मुदा समाजरूपी नाहपर केना जिनगीक समुद्र पार करैए। चेथरू : दादी, जहिना समाजमे एक-दोसरक देखा-देखी आन्हरो-बहीर हँसैत-खेलैत जिनगी गुजारि लइए तहिना भगवान रामरूपोक परिवारकेँ पार लगौथिन। (()) तेसर दृश्य- (ओसारपर कोशिला (रामरूपक पत्नी) बैसल, आँखिसँ नोरक टघार चलैत। आगूमे तीन बर्खक बेटा ठाढ़ भऽ हाथसँ नोर पोछैत..) कुशेसरी : कनियाँ, कनैत-कनैत मरियो जेबह तैयो दुख मेटेतह। जखैन काँच बरतन ठाढ़ छी, हवा-विहाड़ि, पानि-पत्थर, सदासँ लगैत आएल आ आगूओ लगिते रहत। मुदा नान्हिटा बगरा-मेना कहाँ मेटा गेल। हम सभ तँ मनुख छी। (आँखि उठा कोशिला कुशेसरीक निच्चासँ ऊपर निहारैत किछु बजैक विचार मनमे उठैत, मुदा स्पष्ट बोली नै फुटैत..) कोशिला : क-अ... क....इ....इ.....। कुशेसरी : तँू ने अंगनामे बैस कऽ भरि दिन कनैत रहै छह मुदा हम तँ मौगी सबहक गप्पो सुनै छी किने। कोशिला : के की बजै.ए? कुशेसरी : जकरा जे मन फुड़ै छै से बाजैए। मुदा सुनबो करिहह तँ उत्तर नै दिहक। सुनि कऽ कानेमे समेटि-समेटि रखैत जहिहह। कोशिला : ई की सुनलखिन? कुशेसरी : घरक लोक छिअह तँए तोरा कहबे करबह। परिवारक कोनो गप परिवारक लोकसँ छिपाबी नै। छिपाबी ओतबे जे जेकरा बुझैक जरूरत नै होय। कोशिला : (ऑंचरसँ आँखि-मुँह पोछैत.. आ कने सक्कत होइत...) की..इ...इ सुनलखिन? कनी नीक जकाँ कहथु? कुशेसरी : अगुता कऽ ने किछु सोचह आ ने किछु करह। भगवान समुद्र सन छाती देने छथि। गीधक सरापे जँ गाए मरैत तँ वएह उपटि गेल रहितै। कोशिला : किछाे तँ बाजथु? कुशेसरी : कनियाँ, मौगी सभ कुट्टी-चौल करैए जे एहेन जुआन मौगी टंगकट्टा घर....। कोशिला : काकी, गरीब छी एकर माने ई नै ने जे मनुखे नै छी। कुशेसरी : रूपनी दादीकेँ बजबै ले अयोधीकेँ पठौने छिऐ। अबिते हेती। तखन आउरो गप करब। (रूपनी दादीक संग अयोधीक प्रवेश..) (रूपनी दादीकेँ देखिते कोशिला दुनू हाथे दुनू पएर छानि..) कोशिला : दादी, की ई सभ अपना नगरसँ बैलाइये देथिन? रूपनी दादी : कनियाँ, पएर छोड़ू। (कोशिला पएर छोड़ि दैत..) कनियाँ कान खोलि सुनि लिअ। ने ककरो भगौने कियो नगरसँ भागि सकैए आ ने दिन-राति कनलासँ दुख मेटा सकैए। कुशेसरी : एक लाखक गप कहलखिन दादी। रूपनी दादी : गपक मोल लाख नै होइए। होइए ओइ काजक जइमे ओ गप सटल रहैए। छुछे कनलासँ जँ होइतै तँ घरसँ बहार धरि कानि-कानि लोक देवी-देवता तककेँ कहिते छन्हि। मुदा फल की होइ छै? (दादीक आँखिपर कोशिला आँखि गड़ा..) कोशिला : दादी, जे विधाता लिखलनि, ओ भाेगब। रूपनी दादी : कनियाँ, अहाँकेँ तँ एकटा बेटो अछि, जे दस बर्खकबाद स्वामी तुल्य भऽ जाएत। तखन तँ गनल कुट्टिया नापल झोर भेल। दस बर्खक दुख थोड़े बड़ भारी होइ छै। अही माटि-पानिक सीता रावणक लंकामे अहूसँ बेसी दिन रहल रहथि। कोशिला : (मुस्कुराइत..) दादी, हिनका सभक नजरि चाही। रूपनी दादी : कनियाँ, हम सभ ओहन धरतीपर जनम लेने छी जे सदिकाल शक्ति उगलैत रहैए। तोरा तँ बेटो छह जे ओ पूबरिया पोखरि देखै छहक? कोशिला : कोन दऽ कहै छथिन दादी। पीपरक गाछ लगहक, आकि परती लगहक? रूपनी दादी : पीपरक गाछ लगहक। ओ पोखरि प्रेमा दीदीक खुनाओल छियनि। वेचारी बाल-विद्धव भऽ गेल छलीह। गामक लोक कतबो हिलौलकनि-डोलौलकनि दोसर िवयाह नै केलखिन। कुशेसरी : सासुर नै बसलखिन? रूपनी दादी : एको दिन सासुर नै गेल रहथिन। मुदा धैनवाद समाजकेँ दी जे वेचारीक जिनगीक ठौर धड़ा देलकनि आ तोहूसँ बेसी ओइ वेचारीकेँ धैनवाद दियनि जे अपन माए-बापक पाड़ उताड़ैत, जिनगी अंतिम समैमे पोखरि खुना समाजक सेवामे लगा कऽ मरलीह। कुशेसरी : दादी, पहिलुका जुग-जमानाक पड़तर आब हेतै? रूपनी दादी : किअए ने हेतै। (कहि चुप भऽ किछु सोचए लगैत...) कोशिला : चुप किअए भेलखिन दादी। आगूओक किछु कहथुन? रूपनी दादी : (गंभीर होइत..) कनियाँ ने जुग-जमाना बदलल आ ने लोक बदलल। कोशिला : तखन? रूपनी : बदलल लोकक विचार आ ओकर जिनगी। कोशिला : केना? रूपनी : सुनै छहक ने फल्लां गाम नीक आ फल्लां गाम अधलाह। कोशिला : हँ, से तँ सुनबे नै करै छी बिसाएलो अछि। रूपनी दादी : (मुस्कुराइत..) बिसाएलो छह! केना बिसाएल छह? कोशिला : तीन बहिनमे छोट हम छी। जेठकी बहीनिक वियाह छतनाराहीमे ठीक भेल। कहाँदन बड़ सुन्नर घर-बर रहै मुदा वियाह नै भेलनि? रूपनी दादी : से किअए? कोशिला : घर-बर देख बाबू-काका दुनू भाँइ वियाहक सभ बात-विचार पक्का कऽ लेलनि। पक्का भेलापर मामासँ विचार करए मात्रिक गेला। रूपनी दादी : बात-विचार करैसँ पहिने ने राय-विचार कऽ लइतथि। कोशिला : धड़फड़ी भऽ गेलनि। रूपनी दादी : की धड़फड़ी? कोशिला : दुनू भाँइ भोज खा कऽ घुमल रहथि, बरी-तरकारी किछु बेसी खेने रहथि। चालि पाबि पियास लगलनि। रस्ताकातमे इनार देख ठाढ़ भेला। मुदा डोल नै रहने पािन कोना पीबतथि। रूपनी दादी : (मुस्की दैत..) तखन की केलनि? कोशिला : इनार लगसँ आगू बढ़ि एकटा दुआरपर जा जोरसँ हल्ला करैत डोल मंगलखिन। आंगनसँ एकटा अधवेसू डोल लेने बहराइत पुछलखिन। रूपनी दादी : की पुछलखिन? कोशिला : नाओं गाओं आ जाति। रूपनी दादी : जाति मिलते ओ अधवेसू हँसैत बजलाह जखन जाति-कुटुम छी तखन ऐना अछोप जकाँ पानि पीआएब उचित हएत। पानि पीब वियाहक गप-सप्प पक्का भऽ गेल। रूपनी दादी : हँ, तखन तँ ठीके धड़फड़ी भेल। माित्रकक लोक की विचार देलकनि? कोशिला : बेसी बात तँ नै बुझल अछि मुदा अधला गाम कहि मनाही केलकनि। रूपनी दादी : कनियाँ एक्के गाम एक जातिक नीक होइए आ दोसराक अधला। कोशिला : गाम तँ गामे होइए। फेर एना किअए होइए। रूपनी दादी : (मुस्कुराइत गंभीर होइत..) कनियाँ, की कहबह आ कते कहबह। भगवान अखन अपने फेरा लगा देलखुन। अपन दिन-दुनियाँक बात सोचह। कुशेसरी : बेस कहलखिन दादी। ठनका ठनकै छै तँ लोक अपना मत्थापर हाथ दइए। मुदा तँए कि ठनका मानि जेतै आकि माथ परक हाथसँ रोका जेतै। लेकिन एकटा तँ होइए जे लोक अपन रक्छा अपना हाथे करए चाहैए। रूपनी दादी : बेस कहलिऐ। एकटा बात तँ तरे पड़ि गेल। कोशिला : से की? रूपनी दादी : जुग-जमाना बदलैक बात उठल छलै। ने दिन-राति बदललहेँ आ ने माटि-पानि, पहाड़। बदललहेँ लोकक आचर-विचार। एकटा बात तँ अपनो ठहकैए जे जेना पहिने समाजक धारणा छल तइमे बहुत बदलाव आएलहेँ। कुशेसरी : दादी, आब हमहूँ कम दिनक नै भेलौं। जहिया सासुर आएल रही तहिया जे लाज करैबला पुरूख छला, हुनकापर नजरि पड़िते जना मुँह झपए लगै छलौं तहिना हुनको सभक नजरि पड़िते या तँ निच्चा मुँहे मूड़ी-गोंति लइ छला वा दोसर दिस तकए लगै छलाह। रूपनी दादी : बेस कहलहक। हमहूँ बूढ़ भेलों, आँखिक इजोतो घटि गेल, तैयो देखै छी तँ लाज होइए। अनेरे भगवान कोन सनतापे देखैले जिया कऽ रखने छथि। कुशेसरी : से की दादी एकेटाकेँ कहबै। मर्द-औरत दुनूक चालि एकेरंग भऽ गेल अछि। रूपनी दादी : खाइर, जे अछि जेतए अछि से ततए रहह। (कोशिला दिस देख) कनियाँ, समाज बड़ पैघ दुनियाँ छी। जाबे मनुखकेँ प्राण रहत ताबे कतौ दुनियेमे रहत। एहेन विपत्ति भगवान तोरेटा नै देलखुनहेँ, तोरा सन-सन बहुतो अछि। कुशेसरी : दादी, सएह तँ दुनू माए-बेटा कहै छिऐ जे दुनू गोटेक जड़ि एके अछि। देखै छिऐ जे सत-सत पीढ़ीक परिवार सभ अछि। हमरा तँ दुइये पीढ़ीक भेलहेँ। तँए की दुनू दू भऽ गेल। (()) चारिम दृश्य- (अयोधी, कुशेसरी आ कोशिला ओसारपर बैसल।) अयोधी : माए, जािनये कऽ तँ हम सभ गरीब छी तँ दुख केकरा हेतै। तोहूमे जँ हिम्मत हारिये देब तँ एको क्षण जीवि पाएब। कुशेसरी : र्इ कोनो नव गप छी। कर्ता पुरूखक ई दुनियाँ छी। कर्ता पुरूख जेहन रहत ओ अपना सन दुनियाँ बना, बास करत। अयोधी : (कोशिलासँ) देखू कनियाँ, जहिना अपना मनक मालिक कियो होइए। तहिना अहूँ छी। तँए अपन अगिला जिनगीक रस्ता अपने धडए पड़त। कुशेसरी : बेस कहलहक बौआ। जेना लोक सभकेँ देखै छिएे जे चरि-चरिटा धिया-पूता छोड़ि दोसर घर चलि जाइए। तहिना जँ तहूँ भागए चाहबह तँ कियो पकड़ि कऽ कते दिन रखि सकतह। मुदा? कोशिला : मुदा की? कुशेसरी : यैह जे अपना सबहक बाप-दादाक कएल कीर्ति मेटा रहल अछि। कोशिला : कनी बुझा कऽ कहथु? कुशेसरी : सभकेँ नीक-अधला काज करैक छुट अछि। जेकरा जे मन फुड़ै छै से करैए। मुदा मनुख जानवर नै विवेकी जीव छी। तँए नीक-अधलाक विचार तँ करए पड़तै। कोशिला : की नीक अधला? कुशेसरी : जहिना अपन कर्तव्य पूरा केलापर मरद पुरूख बनैए तहिना स्त्रीगणो ने नारी। दुनूकेँ अपन-अपन काजक रस्ता छै। रस्ताक संग किछु संकल्प छै, जे जिनगीकेँ जिनगी बनबैत छै। कोशिला : नै बुझलियनि हिनकर बात? कुशेसरी : देखहक, तोरा कियो खूँटामे बान्हि कऽ नै रखि सकै छह मुदा अपन जिनगीक बान्हसँ बन्हि जरूर रहि सकै छह। ई तँ तोरे ने बुझए पड़तह जे हमरे दुआरे घरबला अपन टाँग गमा अधमरू भेल अछि। दूघमुँहा बच्चा सेहो अछि, तइठीन कोन धरानी चलए पड़त। (तही बीच जीवनक प्रवेश..) अयोधी : (जीवनसँ) कतए रहै छी, किनकासँ काज अछि। जीवन : ओना हमरो घर एही इलाका अछि मुदा रहै छी दिल्लीमे। हमरा कम्पनीमे रामरूप काज करै छला हुनके परिवारसँ किछु खास विचार करए आएल छी। अयोधी : हुनकर भाए हमही छियनि। ओ तँ अपने ओछाइनपर पड़ल छथि, उठि-बैस नहिये होइ छन्हि। तखन बाजू, केहन विचार करैक अछि। जीवन : कारखानाक मालिक राय-विचारक लेल पठौलनि अछि। अयोधी : कम्पनीक पठाओल आदमी छी? जीवन : हँ। अयोधी : जखन देहमे शक्ति छलैक, हाथ-पएर दुरूस छलैक तखैन ते ओभर टाइमक लोभ देखा-देखा दिन-राति काज करा बेकम्मा बना घर पठा देलक। आ....? जीवन : कम्पनीक जे निअम छै ओहि हिसाबे ने काज हएत? अयोधी : निअम बनबैकाल काजो केनिहार (श्रमिक) सँ राय-विचार केने छलिएक? जीवन : देखू, जहिना रामरूप कम्पनीक स्टाफ छला तहिना हमहूँ छी, तँए ऐ प्रश्नक उत्तर नै दऽ पएब। अयोधी : तखन? जीवन : जे सभ सुविधा भेटै छै से सभ सुविधा हिनको (रामरूप) भेटतनि। अयोधी : की सभ भेटतनि? जीवन : इलाज करा देलनि। तत्काल पान सौ रूपैयाक संग घर पहुँचा देलकनि। अयोधी : बस? जीवन : नै। एतबे नै। जँ पत्नी काज करए चाहती तँ नौकरियो देतनि आ रामरूपक नाओंसँ एक लाखक बीमा सेहो कऽ देतनि जे मुइलाक बाद परिवारकेँ भेटतनि। अयोधी : जीबैतमे की सभ भेटतनि? जीवन : परिवारकेँ ओही दरमाहाक नोकरी आ रहैक डेरा। अयोधी : हम सभ गामक समाजमे रहै छी, तँए आगू किछु करैसँ पहिने समाजसँ विचार लेब जरूरी अछि। जीवन : बहुत बढ़िया। अयोधी : (माएसँ...) जाबे हम समाजक पाँच गोटेकेँ बजा अनै छी ताबे हिनका चाह जलखै करा दिहनु। कुशेसरी : बड़बढ़िया। (अयोधी जाइत अछि। अयोधीकेँ परोछ होइते कोशिला अधझप्पू मुँह सोलहन्नी उघारि...) कोशिला : जहिना सोलह-सोहल, अट्ठारह-अट्ठारह घंटा पतिसँ काज लइ छलौं तहिना ने हमरोसँ कराएब? जीवन : (कने गुम्म होइत..) की मतलब? कोशिला : मतलब यएह जे जखन सेालह-अट्ठारह घंटा करखन्नामे काज करब, तखन अपने कखन भानस-भात करब आ खा-पी अराम करब। जीवन : एकरो जबाब नै देब। कोशिला : (झपटैत..) एतबे नै, जखन अपनो जोकर समए अपने नै भेटत, तखन तीन बर्खक दूधमुँहाँ बच्चा आ अपंग पतिक सेवा कखन करब। जीवन : (प्रलोभन दैत..) अहाँकेँ थोड़े करखन्नामे काज करए पड़त? कोशिला : तब? जीवन : अहाँकेँ कोठियेक काज भेटत। जेहने काज हल्लुक तेहने समैयोक। कोठियेमे रहैयोक बेबस्था रहत आ अपूछ खेनाइयो-पीनाइ हएत। कोशिला : (किछु सहमैत..) जँ हमरा इज्जतक संग खेलबाड़ हएत तखन के बचाओत? जीवन : मालिकक नजरि सभपर रहै छन्हि। कि मजाल छी जे एकटा माछियो-मच्छर, बिना हुनका पुछने कोठीक भीतर जा-आबि सकैए। कोशिला : (आँखि टेढ़ करैत..) ई तँ बेस कहलौं जे बहारसँ माछियो-मच्छर नै जा सकैए मुदा जँ कोठीक भीतरेक लोक...? जीवन : ओना अहाँक शंका, किछु अंशमे ठीके अछि मुदा घनेरो औरत, जुआनसँ अधबेसू धरि, कोठीक भीतर काज करैए। कुशेसरी : बजलौं तँ बेस बात। मुदा जहिना, ने सभ पुरूखक चालि-ढालि बेबहार एक रंग होइ छै तहिना तँ स्त्रीगणोक अछि। एके काजकेँ कियो खेल बुझैए कियो इज्जत। (सोनमाकाका, चेथरूक संग अयोधीक प्रवेश..) कोशिला : भने कक्को आ भइयो आबिये गेलाह। अयोधी : काका, दिल्लीसँ जीवन आएल छथि। सोनमा काका : कनियाँ, की सभ जीवन कहै छथि? कोशिला : कहै छथि जे अहाँकेँ नोकरी भेटत। सोनमा काका : अपन की विचार होइए। अपन जे विचार हएत सहए ने करब। कोशिला : काका, हिनका सभकेँ किअए बजौलियनि। जँ अपना विचारे करैक रहैत तँ कऽ नेने रहितौं किने। चेथरू : कनियाँ, अपन की विचार अछि, से तँ अपने ने बाजब। कोशिला : भैया, ई सभ जे विचार देता सएह ने करब। चेथरू : (जीवनसँ) जँ कनियाँ (कोशिला) नोकरी नै करै चाहथि तखन की सभ देबनि? जीवन : अपना रहने जे सभ सुविधा भेटतनि ओ नै रहने थोड़े भेट पौतनि। चेथरू : से की? जीवन : तते पैघ कारोवार अछि जे के केकरा देखत। सभकेँ अपने काज तते छै जे ककरो दिस ककरो तकैक पलखैत छै। चेथरू : गाममे रहनिहारि मुँह दुब्बरि औरतकेँ करखन्नाबला सभ मनुखो बुझैए। सोनमा काका : चेथरू बातकेँ अनेरे कते चेथाड़ै छह। छोड़ह ऐ सभकेँ। बाजू कनियाँ अहाँक की विचार अछि? कोशिला : काका, सुनलाहा नै घरेबलाकेँ देखै छयनि जे पैरभुत्ता छलनि ताबे गाए-महीस जकाँ लाठी देखा-देखा दुहैत रहलनि आ जखन पैरभुत्ता घटलनि तखन असमसानक मुरदा जकाँ उठा कऽ ऐठाम दऽ गेलनि। तहिना जँ...? सोनमा काका : नीक जकाँ सोिच-विचारि लिअ। गामक समाज मनुखकेँ छाती चढ़ा बसबैत अछि, जे शहर-बजारमे थोड़े अछि। कोशिला : हँ, ई तँ बेस कहलथि काका। सोनमा काका : एतबे नै कनियाँ, आँखि उठा कऽ देखियौ, निसभरि रातिमे जँ कतौ चोर-चहार अबै छै आकि राजा-दैव होइ छैक तँ जे जतए सुनैए ओ ओतैसँ हल्ला करैत दौड़ैए। मुदा....। कोशिला : मुदा की? सोनमा काका : की कहबनि आ कते कहबनि। मुदा बिना कहनौं तँ नहिये बुझथिन। शहर-बजारमे देखबै जे उपरमे ठनका खसल अछि आ दोसर मुँह घुमा कऽ जा रहल अछि। चेथरू : (बिचहिमे..) काका, एना किअए कहै छिऐ, एना ने कहियौ जे बच्चामे एक्के गाछ एकटा विशाल वृक्ष बनि जाइए आ दोसर लत्ती बनि ओहन भऽ जाइए जे अपने एको-हाथ ठाढ़ होइक तागति नै रहै छै, मुदा माटिक सिनेह ओहन होइ छै जे वएह वृक्ष बाँहि पसारि ओइ लत्तीकेँ अपना ऊपर फुनगी धरि बढ़ैक रास्ता दैत अछि। सोनमा काका : बेस कहलहक चेथरू। एक बेर तहूँ अयोधी बाजह। कनियाँ एखन पीड़िताएल छथि तँ...। अयोधी : काका, जहिना सभ दिन गामक खुट्टा मानैत एलौं तहिना अखनो मानै छी। हम सभ तँ गरीब छी समाजेक आशपर जीबै छी। ई कखनो नै मनमे अबैए जे बेर-विपत्ति पड़त तँ समाज छोड़ि देत। तँए जे विचार देब तइमे एको पाइ डेग पाछू नै खिंचब। कोशिला : (उफनैत..) भैया, काका, बाबा समाजक सभ कियो। जाबे धरि कोशिलाक देहमे पैरभुत्ता रहतै ताबे धरि कहियो पएर पाछु नै करत। जइ दिन पैरभुत्ता टुटतै तइ दिन समाजेमे भीख मांगब। भले हि कियो भिक्षु किअए ने कहए। ((समाप्त)) ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। १.परमेश्वर कापड़ि-छठिमाइके आसि आ लोकजीवनमे हिनक महत्व २.अतुलेश्वर- किछु विचार टिप्पणी १.प्रा परमेश्वर कापड़ि छठिमाइके आसि आ लोकजीवनमे हिनक महत्व
व्रत उपवास आ पावनि –तिहारस’ लोकक जीवनमे आनन्द–उत्साह एवं आस्था–निष्ठाक बाढ़ि–बड़कैतस’ जीवन आनद्यमय बनि जाइत अछि । मिथिलाक अप्पन पावनि–तिहारस’ लोकक जीवनधारा राग–रंगस’ भरि जाइते अछि । एतुका परम्परागत पावनि सबमे छैठक आसि आ महिमा सर्वोपरि रहने आ एकर विध–विधानमे, ओरिआओन बस्तु–जुटानमे स्वच्छता आ शूद्धतापर अधिक ध्यान देने ई पावनि सबस’ बढ़का अछि । परम ईश्वरके शास्त्रे–पुराण आ ज्ञानीए–धर्मी लोक अधिकतर चिन्हैत जनैत अछि, आम अछरकटू लोक छैठपरमेश्वरीएके अधिक जनैत छथिन आ ईह्े ममतामयी एहि लोकके लेल सबकिछु छथिन, सर्वोपरि छथिन । छैठपावनि किथिलामे लोकपूजाक रुपमे विख्यात अछि सेहो मुख्यतः स्त्रीगणद्वारा कएल जाइत अछि आ हिनकास’ सम्वन्धित अनेको राग–भावक गीतसब अछि जे लोकमन्त्रक रुपमे प्रयुक्त होइत रहल अछि । छैठक लोकगीत छठिक अर्ध जकाँ निछुन आ अपरिवत्र्तनीयसनके अछि, परम्परागत अछि आ एहिमे रिमिक्स वा प्रयोगधर्मिता आँकड़ बातर जकाँ छँटा, थुकड़िक’ अलग कए देल जाइत अछि । एकर पाछू एकर सबस’ कहत्वपूर्ण आ मूल कारण ई लगैत अछि जे ई लोकगीत परम्परा सिद्ध अछि आ आधुनिकगीत जा धरि एहन सिद्धिप्राप्त नहि कएल लेत तावत ई प्रचलनके मूलधारमे समाहित भइए ने सकैछ । छैठपावनिमे आदिेदेव भगवान सूर्य आ छैठपरमेश्वरीक पूजा एकहि दिन– षष्ठी–तिथिके, एकहि ठाम, एकहि अर्ध आ एकहि विधि–विधानस’ भेने ईपूजा छैठपूजा, त’ कहबैत अछि मुदा बहुतोलोक भगवती छैठमाइस’ अनभिज्ञ रहने, एहन बूझि भूूूूलियो क’ लैत अछि । एहि लोकपूजामे दिनस’ अधिक सन्ध्या आ रात्रिक महत्व अधिक अछि आ तएँ किछु लोक एकरा डुबैत सूर्य तथा विहान भेने उगैत सूर्यक अर्धस’ जोड़िक’ देखैत छथिन । सूर्यके जलक अर्ध बड़ पसिन्न छैन आ सबस’ बेसी प्रसन्न जलार्ध देनिहारस’ होइत छथिन्ह तथापि छैठदिन जे हिनक पूजा विभिन्न पकवानसबस’ होइत छन् िताहिस’ ई अछिक तिरपित होइत लोकके लहदह बरदान दैत छथिन्ह एहन शास्त्र वचन आ लोक मान्यता रहल अछि । सूर्यके एक दिन सासुरमे यन्त्र–छापस’ साँचल ठकुआ तान्त्रिक रहस्यस’ भरÞल भुसबा खिअएलकनि आ ई पकवान आ विन्यास हिनका बड़ पियरगर लगलनि आ तएँ हिनका ईहे पकवान अरवसिक’ चढ़ाओले जाइत छनि । छैठपावनि मिथिलामे लोकपरम्पराक पूजा रहल होइतोमे एकर प्रचलनक पौराणिक महत्वक अछि आ ब्रह्मवैवर्तपुराणक प्रकृति खण्डमे बहुत विस्तृत रुपमे वर्णन कएल गेल अछि । भगवती षष्ठीदेवीके शिशुसबक अधिष्ठात्री देवी निरुपित कएल गेल अछि । धीयापूताके दीर्घायु बनाएब, हुनक रक्षण एवं भरण–पोषण कएनाइ षष्ठीक स्वाभाविक गुण अछि । पुराणसबमे षष्ठी देवीके बहुत महिमा–मण्डित कएल गेल अछि । मूल प्रकृतिक छठम् अंशस’ प्रकट भेनेस’ हिनक ’षष्ठी’ पड़ल छन्हि । संस्कृतक षष्ठ शब्द मैथिली छठम् अर्थमे प्रयुक्त अछि आ तए हिनका छैठ, छठि मैया कहल जाइत अछि । बढ़का पौराणिक घर–परिवारक ई भगवती छथिन्ह । ई ब्रह्माक मानसपुत्री एवं शिव–पार्वतीक जेठकी पुतौह आ स्कन्दक प्राणप्रिया छथिन्ह । हिनका देवसेना सेहो कहल जाइत छन्हि, सएह नहि विष्णुमाया आ बालदा से कहल जाइत छन्हि । ई माता भगवतीक सोलह मातृका सबमे परिगणित छथि आ अपना समाजमे ई लड़िकोड़ी माताक रुपमे सेहो चिन्हल जाइत छथिन्ह । ई अपन योगक प्रभावस’ शिशुक सङे सदैव बुढ़ियामाइके रुपमे विद्यमान रहैत छथिन्ह आ हुनक रक्षा एवं भरण–पोषण करैत रहैत छथिन्ह । धीयापूताजे सपनामे खियबैत, दुलारैत, हँसबैत एवं अभूतपूर्व वात्सल्य प्रदान करैत रहैत छथिन्ह । ईएह कारण अछि जे सबशिशु अधिकांश समय सुतनाइए पसिन करैत अछि । निन्ह टुटिते बालकक नजरि भगवति परस’ हटने आ हुनकाकोरास’ अलग लगने ओ कान–खिज लगैत अछि । र्ईएह भगवती निनियाँरानी, निन्नवाली बुढ़िया छथिन्ह आ लोरीस’ पड़िकल धीयापूता जावत निनियाँगीत गाबिक’ बजाओल नहि जाइत अछि तावत सुतिते नहि अछि । लोरीक लरमे सुखनिनियाँक अपूर्व स्वर राग आ वात्सल्य भावसहित निनियाँ बुढ़ियाक उपस्थित रहैत अछि । मैथिलीमे निनियाँगीत सुताब’लेल आ घुघुआ झुलुआ गीत हँसाब’–खेलाब’ आ भुलाब’ लेल प्रयुक्त होइत अछि । एहि शिशुगीतके बाल–मन्त्र सेहो अछि, कहल जा’सकैछ । एकर प्रचलन अत्यन्त प्राचिन आ अटुट रुपस’ अछि । —आगे निनियाँ आ’ । बौआके सुतो सात बड़दके निनला’ आगे निनियाँ जनकपुरस’ खटिया मङा देवौ पटनास’ आगे निनियाँ खजन चिड़ैया अण्डा पारि–पारि जो तोरा अण्डाके आगि लगतौ बौआ सुतो । ०००
—आगे निनियाँ कटबोै कान बौआला’ लबिहे फोंका मखान आगे निनियाँ कटबौ कान बौआला’ अबिहे पीरे लताम आगे निनियाँ, अबैछी ! बौआला’ निन लबैछी ।। निनवाली बुढ़ियाके अर्थात छठि मैयाके अनेको तरहे अरोधिक’ बजाक’ बौआ–बुच्ची सबके सुतएबाक अनुरोध कएल जाइत अछि । लोरी आ सुखनिनियाँबीचमे इएह निनबाली बुढ़िया आ लोरी गीतक मधुर रस–भावरहने एकर प्रभाव उत्तम संस्कार सनके जीवनपर गम्भीर रुपस’ पड़ैत अछि । वैदिक विधि अनुसार भगवती षष्ठीक ध्यान एना कएल जाइछ— —देवी मञ्जनसङकाशा चन्द्राधकृतशेखराम् । सिंहारुढां जगद्धात्रीं कौमारीं भक्तवत्सलाम् ।। खड़गं खेतं च विभ्राणाममयं वरदां तथा । तारकाहार भूषाढयां चिन्तयामि नवांशुकाम् ।। ध्यान अराधनामे हिनका इहो कहल गेल छन्हि जे सुन्दर पुत्र, कल्याण तथा दया–प्रदान करएबाली ई प्रकृतिक छठम् अंशस’ उत्पन्न जगत्माता छथि । श्वेत चम्पक–पुष्पक समान हिनक वर्ण अछि । ई रत्नमय आभूषणस’ अलंकृत छथि । एहि परम चित्स्वरुपपिणी भगवती देवसेना षष्ठी देवीके आराधना करैत छी— —षष्ठांशा प्रकृतेः शुद्धां सुप्रातिष्ठाश्च सुव्रताम् । सुपुत्रदाञ्च शुभदां दयारुपां जगतप्रसून ।। श्वेत चम्पक वर्णाभां रत्नभूषणभूषिताम् । पवित्ररुपां परमां देवसेनां परां भजे ।। —व्रह्मवैवत्र्तपुराण, प्रकृतिखण्ड ४३÷४९ पृ. षष्ठी मैयाक पूजा छठियारी पूजा दिन होइत अछि आ ई पूजा प्रत्येक बच्चाक जन्मक छठम्दिनमे विध्नेश, जीवन्तिको देवीक संगहि कएले जाइत अछि । जन्मौटी धीयापूताक भाग्य, आरोग्य आ औरदादि लेख ओहि दिन लिखाइत होइतोमे चैती छैठ आ कैतकी छैठके परम्परा बहुत प्रचलित अछि । हिनक महिमाके गुणगाण ऋषिमुनि एहि मन्त्रमय शब्द–भावमे कएने अछि– — नमो देव्यै महादेव्यै सिद्धियै शान्त्यै नमो नमः शुभायै देवसेनायै षष्ठीदेव्यै नमो नमः
देवरक्षणकारिण्यै षष्ठी देव्यै नमो नमः शुद्धस्त्वस्वरुपायै वन्दितायै नृणं सदा ।। — ब्रह्म.प्र.ख.— ४३÷५७–६६
भगवती सिद्धि एवं शान्तिके नमस्कार अछि ! शुभा, देवसेना एवं भगवती षष्ठीके बेर–बेर नमस्कार । वरदान देनिहारि, पुत्र देनिहारि, धन देनिहारि, सुख–प्रदान कएनिहार एवं मोक्षदात्री भगवती षष्ठीके बेर–बेर नमस्कार । मूलप्रकृतिक छठम् अंशस’ प्रकट शक्तिस्वरुपां भगवती सिद्धिके नमस्कार । माया, सिद्धि योगिनी, स्वयं मुक्त एवं मुक्तिदात्री, सारा, शारदा आ परादेवी नामस’ शोभा पौनिहारि भगवतीके नमस्कार अछि । बालकक अधिष्ठात्री, कल्याणदात्री, कल्याण स्वरुपिणी एवं कर्मक फल देनिहारि देवी षष्ठीके नमस्कार अछि । अपन भक्तके प्रत्यक्ष दर्शन देनिहारि तथा सबकेलेल सम्पूर्ण कार्यमे पूजा प्राप्त करबाक अधिकारिणी स्वामी कात्र्तिकेयक प्राणप्रिया देवी षष्ठीके बेर–बेर नमस्कार अछि । मनुष्य जिनकर नित्य वन्दना करैत अछि आ देवतालोकनिके रक्षामे जे तत्पर रहैत छथि ओहि शुद्धसत्व स्वरुपा देवी षष्ठीके नमस्कार अछि । हिंसा आ क्रोधस’ रहित देवी षष्ठीके नमस्कार ! हे सुरेश्वरी ! अपने हमरा धन दिअ, प्रिय पत्नी दिअ, पुत दिअ, धर्म दिअ, यश दिअ । हे सुपूजिते ! अपने हमरा भूमि दिअ, प्रजा दिअ, विद्या दिअ आ कल्याण एवं जय प्रदान करु । सोइरीघरमे निवास कएनिहारि षष्ठीदेवी ! परम भक्तिस’ पूजित हुअ’बाली अपने हमरा दीर्धायु प्रदान करु । अपने जन्मसम्बन्धी सुखके जननी छी ! धन–सम्पत्तिके वृद्धि कएनिहारि छी, सब प्राणीके उत्पत्ति स्वरुपा छी ! भगवती षष्ठीदेवीक वात्सल्य–महिमा एवं असीम अनुकम्पाक ई विलक्षण कथा सर्वप्रथक नारदजी, भगवान नारायणस’ सूनने रहथि, जकर विस्तृत वर्णन ब्रह्मवैवर्तपुराण, प्रकृति–खण्डक ४३म् अध्यायमे तथा श्रीमद्देवीभागवतक नवम् स्कन्धमे उलेख अछि । ०००
२ अतुलेश्वर किछु विचार टिप्पणी १ ‘बदलैत स्वर’ आ मैथिली आलोचना हेमनिमे मैथिली कथाकार शिवशंकर श्रीनिवासक मैथिली कथा साहित्य पर केन्द्रित आलोचनाक पोथी ‘बदलैत स्वर’ पढ़ल। श्रीनिवासजीक कथा हमरेटा नीक नहि लगैत अछि अपितु सम्पूर्ण मैथिली पाठककें नीक लगैत छनि, जे हिनक कथाक वैशिष्टय परिचय दैछ। मुदा कोनो सफल कथाकार यदि सफल आलोचको होथि तँ ई आर बेशी नीक। श्रीनिवासजीक आलोचनाक पोथी एकर वानगी अछि, जहिना हुनक कथा पढ़ि पाठक मिथिला आ मैथिली कथा प्रति सोचबाक लेल विवश भए जाइत छथि, ठीक तहिना हुनक ई आलोचनाक पोथी सेहो बहुतो किछु सोचबाक हेतु वाध्य करैछ। प्रस्तुत पोथी, जे पूर्णरुपेँण मैथिली कथा साहित्यक विषयमे कहैत अछि, मात्र मैथिली अध्येतामात्रेक लेल नहि, अपितु साधारण पाठकधरि लेल सेहो लाभदायी अछि। कारण जे ई मनोरंजक कथाक विषयमे कहैत ओकर सामयिक सांदर्भिकता आ ओकर वैशिष्टय पर बड़ सहजता सँ बात रखलनि अछि, जे एकर विशिष्टताकेँ बढ़ा दैत अछि। मुदा एतेक सफल प्रस्तुतिक बादो एहिमे किछु त्रुटि रहि गेल छनि। एहि त्रुटिक अभावमे ई पोथी अद्यावधि मैथिली कथासाहित्य पर लिखल गेल आलोचनात्मक अध्ययनजन्य पोथी मध्य सर्वोपरि रहितए, जाहिसँ श्रीनिवासजी चुकि गेलाह अछि। हमरा अनुसारेँ कोनो साहित्यक समीक्षामे जँ मात्र अपन मनोनुकूल विषयमात्र लए प्रस्तुति हो तँ ओ सर्वाङ कहिओ नहि भए सकैछ, एहने किछु अभाव एहि पोथीमे दृष्टिगोचर भए रहल अछि। एहिमे देखल गेल अछि जे समीक्षक मैथिली कथा साहित्यक आलोचना करैत काल भारतमे आएल नक्सलवाड़ी आन्दोलनसँ प्रभावित कथाक चर्च नहि कएनेँ छथि, जे हुनक आलोचनाकें कमजोर कएने छनि। हँ, ई ठीक जे ओहि क्रियाकलापकेँ अहाँ जाहि दृष्टिएँ देखैत होइ, मुदा जखन सम्पूर्ण कथाक चर्च होएत, तखन ओहि कथासभकेँ छोड़ब कोनो हिसाबेँ उचित नहि। जहिना भारतमे मैथिली कथा साहित्य विकास भ रहल अछि, ठीक ओहिना नेपालोमे कथा साहित्य विकासोन्मुख छैक, जकर चर्च उक्त पोथीमे नहि कएल गेलैक। आशा नहि पूर्ण विश्वास जे आलोचक श्रीनिवासजी एहि विन्दु पर हमरासँ सहमत भए अपन अग्रिम कार्यमे एकरा ध्यानमे रखताह। अन्तमे, मैथिली कथा साहित्यक आलोचनाकेँ नव भाव बोधसँ भरि एहि सृजनक लेल श्रीनिवासजीकें कोटिशः धन्यवाद। मैथिली : पंडिताम वा आम? एकबेर फेर मैथिली साहित्यमे मानकीकरणक नारा जोर पकड़लक अछि, एहिक्रममे सोचल जाए रहल अछि जे मानकीकरणक कसौटी तथाकथित पंडितलोकनि तय करताह। हमर सोच अछि जे एकर अर्थ भेल मैथिलीकेँ आम लोकसँ कटबाक एकटा नव सुनियोजित षडयंत्र। हेमनिमे गजेन्द्र ठाकुरक एकटा पत्र आयल छल जे ई षडयंत्र नहि थिक जे कोनो गोष्ठी ( सगर राति दीप जरए, जे वर्तमानमे कथा गोष्ठी सँ बेशी अनर्गल गोष्ठी भ गेल अछि ) मे एहि तथ्य पर नहि आलोचना होइत अछि जे एहि कथामे कोन कमजोरी अछि वा कोन-कोन नव तथ्य आयल अछि, बल्कि जाइत, खाइतकेर सङ्ग रमानाथी-शैली पर चर्चा कएल जाइत अछि? मुदा ई संर्कीण मानसिकता कियाक? एकर दूटा कारण देखाइत अछि, पहिल जे अखनि धरि मैथिली जातिवादक धोधरि सँ नहि निकलि पओलक अछि आ दोसर जे मैथिलीमे कोनो नव नारा नहि भेटि रहल छैक। कियाक तँ मैथिली पंडितक भाषा नहि भए विशुद्ध कय आमलोकक भाषा थिक। कारण महाकवि विद्यापति आमलोकक लेल देसिल बयनामे लिखब प्रारम्भ केने छलाह, नहि कि पंडित वर्गक लेल। (एतय ई स्पष्ट क देब आवश्यक जे हमरा अनुसारेँ पंडित कोनो जाति विशेषसँ नहि भए, हुनका लेल उपयुक्त अछि जे अपन विचार दोसरो पर थोपए चाहैत छथि, से चाहे उचित हो वा अनुचित)। हमरा तँ आश्चर्य लगैत अछि जे ओहि तथाकथित गोष्ठीमे सहभागीलोकनिकेँ कि ई नहि बुझल छलनि जे मैथिलीक कतेको भाषा-भाषी जाइत-खाइत बजैत छथि, मैथिली भाषामे आदरसूचक आ अनादरसूचकक लेल पृथक्-पृथक् शब्द अछि? हम तँ संशकित छी जे जँ एहिना मैथिलीकेँ व्याकरणीय फंदामे लटपटाओल जाइत रहत तँ ओ दिन दूर नहि जे ओ साधारण जनसँ दूर होइत-होइत ओकर अस्तित्वे पर संकट आबि जाएत। आ नेपालक मैथिलीमे बहुत गति देखल जा रहल अछि, कारण छैक ओतुक्का मैथिली भाषामे आमलोक क धारणा आ भावनाकें राखब। नहि तँ एतेक दिन सँ प्रसारित भ रहल मैथिली कार्यक्रम ‘गामघर’ कियाक नहि सम्पूर्ण लोकक कार्यक्रम भ सकल, जखन कि धीरेन्द्र प्रेमर्षिक ‘हेलो मिथिला’ सम्पूर्ण मिथिलाक स्वर बनि प्रशंसित भए रहल अछि आ एकरहि प्रभावेँ मैथिली भाषाक अपन दर्जनों रेडियो एफ.एम. कार्य कए रहल छैक आ ओ आमलोकक वाणी भए प्रसारित भए रहल अछि। तखनि ई बखेरा कियाक? हमरसभक एहन कर्मसँ मैथिलीक कोनो तरहक लाभ संभव नहि, अपितु ओ आमलोकसँ कटि संस्कृतक संग धए लेत। तेँ यदि केओ एहि प्रकारक प्रश्न उठबैत छथि तँ बुझि लिय जे मैथिली क संग हित नहि अहित क रहल छथि। कारण तथाकथित भाषा क अध्ययन कएनिहार एकरा भाषाक विशेषता कहैत छथि आ ओ लोकनि एकरा सुधारबाक लेल जी-जान अरोपने छथि। की, ई मुर्खता छी कि षडयंत्र? ओना एकटा ईहो सत्य अछि जे लोकतंत्रमे बहुमतक सभ किछु मानल जाईत छैक, एतय प्रश्न उठैत छैक जे मैथिली क बहुमत कोन दिश- पंडितलोकनि द्वारा निर्धारित मैथिलीक वा आमलोकक मैथिलीक? उत्तर स्पष्ट अछि आमलोकक, तखनि ई प्रश्न उठएबाक औचित्य कतहु नहि बनैत अछि। कारण विद्यापतिक भाषा पंडितक विरुद्घ उठाओल आन्दोलन छल तेँ मैथिलीकें पंडितक राज नहि आमलोकक काज अछि। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। सुदीप झा सामाजिक मूल्य मान्यताकें चोच मारैत ‘चिड़ै’
सुजीतक प्रायः कथासभ भावनाक धरातलपर बनल मानवीय सम्बन्ध आ सम्बेदनाकेँ कुरेदवाक प्रयास करैत अछि । प्रायः कथासभ स्त्री पुरुष सम्बन्धपर केन्द्रित अछि । ओना किछु कथा सभ पितापुत्र सम्बन्ध, बाबा पौत्रीक सम्बन्धपर सेहो आधारित अछि । सुजीत जी अहि अर्थमे धन्यवादक पात्र छथि जे ओ समाजिक धरातल सँ उपर उठि मानवीय भावना आ सम्बेदनाकेँ धरातलपर सम्बन्धकेँ समझबाक आ समझेबाक प्रयास करैत छथि । एकरा की कहल जाए जँ कोनो पति अपन पत्निकेँ मृत शरीर ओकर प्रेमीकेँ सोपि दैक ? किछु एहने सन कथावस्तु छैक ‘एकटा अधिकार’केँ जाहिमे एकटा पति एरोप्लेन एक्सीडेन्टममे छतविछत भेल अपन पत्निकेँ मृत शरीर उपरक अपन अधिकार अपन पत्निक प्रेमीकेँ हस्तान्तरण कऽ दैत अछि । निश्चित रुप सँ अहि कथाक पति मानविय भावनाकेँ सम्मान करैत छैक । ‘भौजी’ कथामे नायक राजन एकटा विधवा सँ प्रेम करैत अछि आ ओहि विधवा सँ विवाह सेहो करय चाहैत अछि । तहिना ‘चिडै’ कथामे अन्तर वैवाहिक सम्बन्धक कटु यर्थाथकेँ उजागर कएल गेल अछि । कथाकेँ नायिका उषा जखन ओकर विवाहित प्रेमी मनोज ओकरा गुण्डासभकेँ बीच छोडि लोक लाजककेँ कारणे परा जाइत छैक । सुजीतजीक कथासभ किछु एहन सम्बन्ध जकर अनुमति प्रायः मैथिल समाज नहि दैत छैक तकर विभिन्न पक्षकेँ देखार करैत अछि । निश्चित रुप सँ अन्तर वैवाहिक प्रेम आ सम्बन्ध आ विधवा विवाह एकटा समाजिक अपराध मानल जाइत छैक , मैथिल समाजमे । हुनक बहुत रास कथासभ समाजिक मूल्यमान्यताकेँ चाइलेन्ज करैत अछि । एहन बात नहि छैक जे कथाकार समाजिक व्यवस्था सँ बाहर वनल सम्बन्धक अध्ययन मात्र करैत छथि । ‘बाबाजी’ कथामे एकटा बृद्ध व्यक्तिक अन्तिम अवस्थाक कारुणीक विवरण अछि आ स्वार्थपर ठाढ सम्बन्धक यर्थाथ परक विश्लेषण सेहो कएने छथि । ‘वनैत विगरैत ’ कथा एकटा रिटाइर्ड व्यक्तिक व्यथा छैेक । पिताकेँ ठेस जखन लगैत छन्हि जखन हुनका बुझवामे अवैत छन्हि जे हुनक पुत्र नागेश्वर अपन पिता सँ बेसी सम्पति प्रति चिन्तित छथि । तहिना ‘ढोल’ कथा पति प्रेमक लेल व्याकुल पत्नीक मनोदशाक विश्लेषण अछि । हुनक प्राय कथा सँ सम्बन्धक बनैत बिगरैत अवस्थाकेँ विश्लेषण करैछ । समाजिक व्यवस्थाकेँ भितर होइक या वाहर सुजीतजीकेँ कथासभ सभ अर्थमे मानविय सम्वेदनाकेँ कुरेदैत अछि । समाज अपन मुल्य मान्यताक आधारपर नैतिकताक आ अनैतिकताक तराजु बनबैत अछि । समाजिक मुल्यकेँ अनुकूल कार्यकेँ नैतिकताक संज्ञा देल जाइत अछि आ प्रतिकूल कार्यकेँ अनैतिकताक । मुदा सूजीतजी समाजिक मूल्य सँ उपर उठि मानवीय मुल्यकेँ धरातलपर नैतिकताक परिभाषित करैत छथि । उषा एकटा विवाहित पुरुष सँ प्रेम करैत अछि , ओकरा सँ सम्बन्ध स्थापित करैत अछि । उषा अपन प्रेमीकेँ भावनाकेँ कदर करैत अछि । कथामे कतहुँ ओकर नैतिकतापर प्रश्न चिन्ह ठाड़ नहि कएल गेल अछि । मुदा मनोजक नैतिकतापर अवश्य प्रश्न चिन्ह ठाढ़ भऽ जाइत छैक । जखन ओ अपन प्रेमिका नलिनीकेँ गुण्डासभक बीच छोरि परा जाइत अछि आ घायल नलिनी होस्पीटलाइज भऽ जाइत अछि । सुजीतजीक कथासभ बदलैत मानविय सम्बन्धकेँ उजागर तऽ करैत अछि मुदा ओकर पाछा वदलैत राजनीतिक आर्थिक आ सामाजिक परिवेशकेँ समेटवाममे असफल देखल जाइत छथि । मुनष्यक मनोदशा ओकर बनैत बिगरैत सम्बन्ध बहुत हदधरि समाजिक राजनीतिक आ आर्थिक परिवेशद्वारा निर्धारित होइत अछि । अहि पक्षसभदिस कोनो साहित्यकारकेँ अपन कला मार्फत इंगित करब ओतबे जरुरी होइत अछि । कथामे पात्रसभ एकटा खास परिवेशमे क्रिया आ प्रतिक्रिया करैत अछि । सुजीतजी ओहि प्रवेशकेँ नहि राखि पाएल छथि । हम अपन बात एकटा उदाहरणक माध्यम सँ प्रष्ट करय चाहैत छी ‘प्रियंका’ कथामे कथा वाचककेँ नायिका प्रियंका बसमे भेटलन्हि । बसमे तऽ आर लडकीसभ छल हैत । जखन बसपर सँ उतरलै तखनुका परिवेश केहन छलै ? की बस प्रियंकाकेँ ओकर मन्जिलधरि पहुँचेलकैक ? ओकर मोनमे सेहो बस चलैत छल हैतै ? ंिप्रयंका निश्चित रुप सँ अपन मन्जिलधरि नहि पहुँच पबैत अछि । ओना ओकर वेग बड तेज छैक । बस, बसक वेग , वस स्टेण्ड, जीवन गाडी, वाट, सहयात्री आ जीवन लक्ष्य ई सभ चिजकेँ जँ कथाकार समायोजन कऽ पवितथि तऽ प्रियंका कथा आर मुखर भऽ अवितैक । वास्तवममे देखल जाए तऽ कथाकार प्राय कथासभमे बिम्बकेँ सही समायोजन नहि कऽ पाएल छथि । एकठाम मात्र हमरा भेटल जतय ठण्ढा हवा आ धुनि पिता आ पुत्रकेँ ठण्डाइत सम्बन्धकेँ प्रतिबिम्बित करैत अछि । ‘धधकैत आगि आ फुटैत कनोजरि’ कथामे कथाकार खण्डित करैत नजरि अबैत छथि । स्वप्नमे स्वयंकेँ उपस्थिति अनिवार्य रहैत छैक । सम्पूर्ण कथाकेँ घटनाक्रम कथाक नायिका जयन्तिक सपनामे घटैत देखाओल गेल अछि । तखन कथाकेँ सुरुवात ड्राइवर आ खलाासी बीचक वार्तालाप सँ कोना भऽ सकैत अछि । ततबे नहि कथामे किछुदेरक बाद नायिकाकेँ प्रवेश कराएब की उचित अछि ? की सपनाक यर्थाथकेँ खण्डित नहि करैत अछि ? कथा सेहो मानव जीवनककेँ कलात्मक अभिव्यक्ति छैक । कोनो कलामे ओकर गढनी महत्वपूर्ण बनि जाइत छै । शब्द, विम्ब, पात्र आ कथावस्तुकेँ सही संयोजन सँ मात्र कथा जिवन्त भऽ सकैत अछि । कथा एकटा मौलिक अभिव्यक्ति सेहो होइत अछि । कथाकार जीवन जगतकेँ एकटा नयाँ ढंग सँ देखबाक प्रयास करैत छथि । सुजीतजीक अहि दूनु अर्थमे आशिंक सफलता भेटल छन्हि । ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। दुर्गानन्द मण्डल सहायक शिक्षक- उ.वि.झिटकी बनगामा (मधुबनी) पोथी समीक्षा- मौलाइल गाछक फूल जेना लगातार पाँच-सात सालक प्रचंड रौदी भेलाक बाद जौं रोहनि नक्षत्रमे एकटा कसगर अछार हुअए तँ गिरहत सभहक मोन फूलकोका जकाँ खिल उठैत छैक। सभ कियो खेत-पथार जोति, तामि-कोरि, खढ़-पतार सभ बाले-बच्चा मिल ओलि-पालि कऽ देबे सेबे बिहनि खसबैत छैक। गोर दसे दिनक पछाति हरिअरकंच बिहैनक टेम बिरारमे निकलए लगैत अछि। गिरहत सभ पोखरि-झाखरि दिस दिसा-मैदान करैत बॉसक उभ्भीबला दतमनि करैत लोटा नेनहि बिरार दिस चल जाइत छथि। बिरारमे उपजल हरियरकंच बिहैन देख आत्मा जुड़बैत छथि। देखते-देखते बिहैन पैघ भऽ जाइत अछि। गिरहत सभ ऐ आशामे पाँच-सात सालसँ बर्खो नै भेल जौं ऐबेर समए संग देत तँ बाले-बच्चा मिल खूब जतनसँ खेती करब आ ऐ रौदीसँ छुटकारा भेट जाएत। दिन दसे-पनरेहक बाद अारदारा चढ़िते खूब कसगर बर्खा भेल। आ गिरहत सभक आत्मा गूलाबक फूल जकाँ खिल उठल। किनको खुशीक कोनो सिमा नै। सभ बाले-बच्चे लाठी-बहिंगा (पटै), हर-कोदारि, चौकी आदि लऽ खेती करए लेल खेत दिस चललाह। आ कृपा महादेवक जे ऐ साल समए नीक रहल, संग देलक आ मनसंम्फे उपजा भेल। सभ आनंदित छथि। एकटा नव उत्साह आ आनंदक संग दोहाइ दै छथिन परमपिता परमात्माकेँ। ठीक तहिना उपन्यासकार जगदीश प्रसाद मंडल जीक द्वारा लिखल उपन्यास “मौलाइल गाछक फूल”सँ पाप्त भेल खुशी आत्माकेँ तृप्ति कऽ देलक। प्रो. हरिमोहन झा जीक बाद बुझू जे मैथिली साहित्याकासमे बड़का रौदी नै अपितु अकाल पड़ि गेल छल। पाठक-बन्धु हक्कोपरास छलाह, उपन्यास नामक वस्तु पाठककेँ हेरने नै भेटैत छलनि। आत्मा तँ उपन्यास पढ़ए लेल सदिखन व्याकुल रहैत छल। जइ कमीकेँ मण्डलजी दूर कऽ देलनि। लगातार एक-सँ-एक चिक्कन-चूनमुन उपन्यास लिख ने मात्र भारते उपितु आनो-आन देशमे रहएबला मैथिली भाषीक नजरिमे ख्याति पौलन्हि। अपन देशक कथे कोन नेपालक जनकपुरसँ लऽ तराइ क्षेत्रमे सेहो हिनक लिखल पोथी, उपन्यास, कथा संग्रह, कविता संग्रह, नाटक, एकांकी इत्यादि साहित्यक सभ विधा केर पोथी सहजताक संग उपलब्ध अइ। पोथी उपलब्ध सेहो मैथिली साहित्य लेल एक नवीन बात थिक। ओना ऐ लेल हम श्रुति प्रकाशनकेँ अलगसँ धन्यवाद देत छियन्हि। प्रस्तुत उपन्यासमे अपने अपना अनुसारे कतौ कोनो तरहक कोनो तरहक कमी नै रखने छी। अपितु सागरमे गागर भरि समाजक सभ वर्ग, सभ जाति, स्त्री-पुरूष, ऊँच-नीच, छोट-पैघ, नीक-बेजाए, धनीक-गरीब, नेना-भुटका, जवान-जुआनक लेल एकटा अलग संदेस छोड़एमे कतौ कमी नै रखलनि। जे पाठककेँ एक सांसमे उपन्यास पढ़ि जेबाक लेल बाघ्य कऽ दैत अछि। हमरा अनुसारे ई एकटा बड्ड पैघ उपन्यासकारक सार्थकता सिद्ध भऽ रहल अछि। यर्थाथवादी रूपमे गाममे रहितौं उपन्यास पढ़ए काल एहन लगैत अछि जे हम गाम नै अपितु मद्रासमे छी। मुदा मद्रासक चािल-वाणि, रहब-सुतब, लोक सबहक बाजब-भुकब, पैघ-पैघ कोठा-सोफा, अतिआधुनिक पैखाना घर आदि रहलाक बादो अपने अपना गामक माटिक यादि नै बिसरि सकलौं। जे रामाकान्त बाबू अपन गामक सोन्हगर मािटक सुगंधक सिनेहकेँ स्पष्ट करैत कहैत छथि- “हौ जुगे, बिना माटिये हाथ कोना मटियाएब?” उपन्यासक पात्रक नामक अनुसार गुणक विलक्षण समाबेस करब अपने कतौ नै बिसरलौं। नामक अनुसारे कामकेँ अपने स्पष्ट देखौने छी। समाजक जे जेहन लोक जेहन पदपर पदस्थापित छथि। ओइ कार्यक लेल समर्पण उपन्यासक विशेषता बतबैत अछि। ठाम-ठाम अध्यात्म, दर्शन, अपना संस्कृति आदिकेँ दर्शादा देब सभ पाठकक लेल मोन राखक योग्य बुझना गेल। यथा- “ई भूमि जनकक राज मिथिला थिक। तेँ मिथिलावासीकेँ जनकक रास्ता पकड़ि हमरा लोकनिकेँ चलक चाही, जाहिसँ प्रतिष्ठा सभ दिन बरकरार रहत।” ऐ उपन्यासक प्राय: सभ पात्रक चरित्र अति पवित्र, सामजिक समरसतासँ भरल बुझना जाइत अछि। हुनका लोकनिक सहज सज्जनता प्रकृत प्रदत्त बुझाइत अछि। समाज सुधारक जौं कोनो कथा हुअए तँ प्राय: सभ एक-दोसराक प्रति ओतबे जिम्मेवार स्वभावत: बुझना गेल जे एकटा सुसभ्य समाजक सामाजिक चिंतनक प्रति कर्त्तव्यनिष्ठ बुझना जाइत छथि। उपन्यासक केन्द्रीय पात्र रामाकान्त बाबू छथि। जे एकटा नीक जमीनदार होइतो सामाजिक कर्त्तव्यपरायणता, इमानदारी, समाजक सभ जातिक प्रति सिनेह, उदारचित्त विचारधारा, वास्तविक मानवतावादक चित्र, मानवक प्रति कर्त्तव्य ओकर दुख-सुख, मरनी-हरनीमे संग पुरब, हिनक चारित्रिक विशिष्टता स्पष्ट देखबा योग्य अछि। उपन्यासक आरम्भहिंमे जखन कि गाममे अकाल पड़ि जाइत छैक। लोक सभ अन्न बेतरे मरए लगैत अछि। जनकेँ काज कतौ नै भेटैत छै, खेती-खोलाक कतौ थाह-पथाह नै, लोकक घरमे दिनक-दिन चुल्हि नै पजरै छै। इनारोक पानि ससरि ततेक निचाँ चल गेलैक जे उगहनियो सभ छोट भऽ गेलैक। आ एम्हर बौएलालक प्राण भुखसँ छुटै-छुटैपर छल। तेहने दुरूह समैमे रामाकान्त बाबू द्वारा बड़की पोखरि उराहब, समाजक प्रति साहानुभूति हुनक हृदैक महानता देखल जाइत अछि। ऐ तरहेँ एक तँ लोककेँ विभिन्न प्रकारक अकर्मणयतासँ बचा कऽ दोसर दिस, अन्नाभावसँ ग्रस्त लोकक मरबासँ सेहो बचबैत छथि। रमाकान्तबाबूक अवधारणा ई जे ‘सर्वे भवन्तु सुखिन: सर्वे सन्तु निरामया:, सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद् दु:खभाग भवेत्’क ‘‘अथवा सबए भूमि गोपाल की’’ सपष्ट कऽ दैत अछि। तँए रामाकान्तबाबू सामाजिक समरसता लेल ितयागक मिशाल स्वरूप अपन दू सय विधा जमीन गामक भूमिहीन परिवारक बीच वितरण करबा दैत छथिन। ठीक ओहिना जहिना चीम राजा चेन्पौ कएने रहथि। जइसँ गामक सभ व्यक्ति सुखी भऽ जाइ छथि, आ गाधीवादी विचारधारकेँ आरो मजगूती भेट जाइत अछि। अर्थात् व्यक्तिगत खुशी वा सुख-शांतिसँ एकटा समाज सुखी नै भऽ सकैत अछि। बल्कि सामाजिक सुख-शांतिक लेल व्यक्तिगत सुख-शांतिक तियाग करब मनुष्यक अहम कर्त्तव्य थिक। स्पष्ट अछि। मनुष्य एक समाजिक प्राणी थिक, जे सोनेलाककेँ विपति पड़लापर फुदिया द्वारा कहल गपसँ स्पष्ट होइत अछि। जे “भाय, तोरा जे हमर खूनक काज हेतह, हम सेहो देबह।” स्पष्ट अछि जे समाजमे एहिना सबहक काज सभकेँ होइत छैक। उपन्यासक मध्यमे मण्डलजी गाम-घरमे पसरल धर्मभिरूताक चित्रण करब सेहो नै बिसरलाह। जे सोनेलालक आंगनवालीकेँ बिमारीसँ ठीक भेलापर आयोजित भंडारामे दू साधू दलक द्वारा जे एकटा वैष्णम आ कबीरपंथसँ सोनेलाल कोना लुटल जाइत अछि। उपन्यासकार एहन समस्याक प्रति समाजकेँ सचेत करै छथि। आजुक मशीनक युग हमरा समाजकेँ कोन तरहेँ जोंक जकाँ पकड़ने अछि जे तरे-तर शोणित पीब रहल अछि मुदा पता तक नै चलै छै। ई स्पष्ट करबामे शत-प्रतिशत सफल छथि। कोन तरहेँ खून अपना खूनकेँ चिन्हबामे असमर्थ अछि एकदम स्पष्ट अछि जे महिन्द्रक पुत्र रमेश होस्टलसँ आबि अपन पिताकेँ गोड़ लागि ठकुआ कऽ आगाँमे ठाढ़ भऽ जाइत अछि, बाबा-दादीकेँ नै चिन्हैत अछि। बादमे पिताक कहलापर रमेश तीनू गोटेकेँ गोड़ लगलकनि। ऐ तरहेँ संयुक्त परिवारक महत्व जे मिथिलाक धरोहरि छल। ओकरा एकल परिवार बूझु जे झकझौरि कऽ राखि देलक। जे मानवीय सिनेहक नष्ट होइत स्वरूप थिक। एे प्रकारेँ उपन्यास “मौलाइल गाछक फूल”मे सामाजिक जिनगीक विभिन्न प्रकारक समस्या आ ओकर समुचित समाधान तकबाक पूर्ण प्रयत्न केलनि अछि। “मनुष्यसँ परिवार बनैत अछि आ परिवारसँ समाज। जँ परिवार ठाढ़ भऽ जाए तँ समाज स्वत: आगू बढ़ए लागत।” मण्डलजीक सामाजिक भावना आदर्शवादी भावनाक रूपमे परिलक्षित होइत अछि। जकरा धियानमे रखैत मद्रासमे डाक्टरी करैत डॉ. महेन्द्रकेँ गाममे एकटा स्वास्थ्य केन्द्रक स्थापनाक विचार गामवासीक सेवा लेल देखाओल गेल अछि। उपन्यासमे जाति-पाति, धर्म-सम्प्रादयमे खंिडत भेल गाम-समाजमे छूआ-छूत, ऊँच-नीचक खाधिकेँ रामाकान्तबाबू द्वारा भजुआ डोमक ऐठाम जा कऽ भोजन करब समाजक बीच समरसता स्थापना आ छूआ-छूतक अंत कऽ एकटा आदर्शवादी पूर्ण समाधान देखौलनि अछि। जेकरा अशिक्षासँ उत्पन्न लाइलाज बिमारीकेँ विचार मात्रमे परिवर्त्तन कऽ एकसूत्रमे बन्हबाक प्रयास, वरदान सावित भेल अछि। उपन्यासक समस्त नारी पात्र यथा- रधिया, श्यामा, सुगिया, सोनेलालक बहिन आदिमे पतिपरायणता सुख-दुखमे संग साथ देब। भारतीय नारीक मर्यादा स्पष्ट चित्र उपस्थित करबामे पूर्णत: सफल भेल छथि। सुमित्राक पढ़ि-लिख नीक नर्स बनब आ सुजाताकेँ पढ़ि-लिख नीक डाक्टर बनब, नारीक अबला नै अपितु सबला रूप देखबामे अबैत अछि। एतबे नै, उपन्यासक मादे मण्डलजी स्पष्ट दर्शा देलनि अछि जे गरीबो-गुरबामे ओ क्षमता छै जेकरा जँ कनिको सहयोग भेट जाए तँ ओ बहुत आगाँ बढ़ि सकैत अछि। नारीक एकटा अलग स्वरूप काली-दुगाँ आदि शक्तिक रूप सितिया केर चरित्र देखेबामे सफल रहलाह अछि। जखन आवारा छौड़ा ललबा ओकरा इज्जति लुटए चाहै छै तखन सितिया ललबाकेँ लाते-मुक्के थुरि-थारि कऽ राखि दैत छै। बात ओतइ नै खतम होइछ अपितु जखन ललबाक गौआँ सभ हसेरी बान्हि सितिया गामपर हमला करैत अछि तखन सितिया झांसीक रानी बनि सभकेँ परास्त कऽ दैत छै। ऐ तरहेँ मौलाइल गाछक फूल उपन्यासमे सहजता, समरसता, यथार्थवाद, आदर्शवाद, धर्मभिरूता, एकल एवं संयुक्त परिवारक रूप-रेखा खिंच एकटा मनोवैज्ञानिक विश्लेषण रूपमे उपन्यासकार हमरा लोकनिक मध्य उपस्थित छथि। हुनक ई िवधासँ उपन्यास जगतमे एक्केठाम सभ तरहक सुख, आनंदक अनुभव होइत छन्हि। आजुक समाज जे सभ तरहेँ मौलाएल अछि। अपना उपन्यासक मादे उपन्यासकार मात्र एक आदमी रामाकान्तबाबू हृदए परिवर्त्तन कऽ समाजमे एकटा नवका फूल खिलेबामे सश-प्रतिशत सफल भेला अछि। रामाकान्त बाबू द्वारा अपन दू सए बीघा जमीन- सबहक माथपर एकहक बीघा खेत अर्थात् जेकरा सात गो बेटा ओकरा सात बीघा दऽ सभकेँ एकटा नव जिनगी प्रदान करैत छथि। एक नव जिनगी जे पूर्णत: मौलाएल छल ओइमे फूल खीला दैत छथि। हमरा आशा नै अपितु विश्वास अछि जे श्री जगदीश प्रसाद मण्डलजी सन उपन्यासकार होथि आ रामाकान्तबाबू सन नायक तँ अपन समाज रूपी मौलाएल गाछ मौलाएल नै अपितु डगडगीसँ भल गाछ बनि फूलसँ लदि सकैत अछि। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। गजेन्द्र ठाकुर उल्कामुख (मैथिली नाटक) कल्लोल १ (मंचपर वाम मत्तवर्णीपर कूटक दूटा पैघ घन आ दहिन मत्तवर्णीपर कूटक दूटा पैघ घन राखल रहैत अछि, घनक सभ पृष्ठपर शतरंजक आकृति बनाएल रहैत छै।। धधरा फेकैत एकटा गीदर मंचपर चारू कात घूमि जाइत अछि। दू तीनटा टॉर्चसँ ई प्रभाव उत्पन्न कएल जा सकैए। पाछूसँ हूआ-हूआक ध्वनिक संग अन्हार पसरि जाइत अछि। फेर मंच प्रकाशित होइत अछि आ गंगेश आ वल्लभा रंगपीठपर वार्तालापक मुद्रामे बैसल छथि। बीचमे कूटक पैघ घन मत्तवर्णीसँ रंगपीठपर राखल जाइत अछि, जइपर मुँह खसा कऽ दुनू गोटे गप कऽ रहल छथि। ) वल्लभा: उषाक स्वर्णिम आभा सुसज्जित ऋषिक स्मरण करबैत अछि। गंगेश: की भेल? कोन ऋषिक चर्चा अहाँ कऽ रहल छी? ककर स्मरण अबैत अछि? वल्लभा: अहाँक, आर ककर? गंगेश: हम कहियासँ ऋषि भऽ गेलौं। हम तँ एकटा साधारण विद्यार्थी छी। वाकचातुर्य तथ्यपर भारी नै भऽ जाए, तकर मात्र प्रयास कऽ रहल छी। वल्लभा: मुदा तइसँ की हएत। लोक तँ गप घुमा फिरा कऽ बात बजिते छथि। अहाँ वाक चातुर्यक चलाकीकेँ देखार केने छिऐ कतेको श्लोकमे तैयो, तैयो लोक गप घुमा कऽ बाजिये दै छथि। गंगेश: अहाँ कहियासँ हमर एतेक चिन्ता करए लगलौं। वल्लभा: देखू। अहाँ चर्मकार टोलमे बच्चेसँ आबि रहल छी… गंगेश: आ बच्चेसँ लोकक बोल सुनि रहल छी.. वल्लभा: मुदा लोकक बोल आर बिखाह भऽ गेल अछि.. गंगेश: कतेक बिखाह। सत्यकामक भाग्य हमरा भेटल अछि… वल्लभा: कोन सत्यकाम.. गंगेश: वएह सत्यकाम जकरा पिताक विषयमे बुझल नै छलै, ओकर मायोकेँ नै बुझल रहै जे के ओकर पिता छै। मुदा ओकर गुरु गौतम ओकरा शिक्षा देलखिन्ह। वल्लभा: अहूँसँ पूछल गेल ओ प्रश्न.. गंगेश: पूछल गेल वल्लभा, पूछल गेल। बिनु पिताक अहाँक जन्म..पितृ परोक्षे पञ्च वर्ष व्यतीते गंगेशोत्पत्ति… वल्लभा: छोड़ू..हमरा तँ बुझले अछि। गंगेश: गुरुजी हमरोसँ पुछने रहथि पिताक विषयमे। चर्मकार टोलक जे ओ रहथि जे हमर माताकेँ आपत्कालमे सहायता देने रहथि, आब गामे छोड़ि देलन्हि। मुदा हमरा एतऽ आइयो वएह आपकता भेटैए। वल्लभा: आहा। ककरा-ककरासँ। गंगेश: एकटा तँ सोझेँ छथि हमर। वल्लभा: सएह आपकता तँ लोकक आँखिमे नै सोहाइ छै..लोकक आँखिमे हींग सुइया.. गंगेश: उदयनक बाद कएक शताब्दी धरि मिथिलामे भगवान जगन्नाथकेँ ललकारा दै बला कियो नै भेल। वल्लभा: हे से नै कहियौ। दीना आ भदरी से ललकारा दऽ आएल रहथि जगन्नाथकेँ। गंगेश: आ दुनू गोटे विजय सेहो प्राप्त केलन्हि। हे सुनाउ ने एकबेर ई खिस्सा। वल्लभा: एक्के खिस्सा बेर-बेर सुनैत मोन नै भरैए। गंगेश: नै भरैए..तत्त्वचिन्तामणि लिखबामे ई हमर उत्प्रेरक बनैए.. वल्लभा: ठीक छै। तखन दीना हम बनै छी आ भदरी अहाँ बनू। (दुनू गोटे शतरंजक घनक सोझाँ आबि जाइ छथि।) वल्लभा: जोगिया गामक दीना एलै भदरी भाइ जुमि हे गंगेश: कालू सदाय निरसो मैयाक बेटा मजगूत हे वल्लभा: (हँसैत आ गंगेश दिस तकैत) दीन रहथि हीन रहथि मुदा नै मजबूर हे शिकार खेलथि रणे-बने कोरथि खेत मिलि हे पाँच-पाँच मोनक कोदारि लेने बीघा कते दूर हे गंगेश: कटैया बोनक राजा छलै फोटरा गीदर हे ओकर संगी धामन रहै, बिख मशहूर हे बिख सन बोल बाजल धामन दुनू भाइकेँ जो रे दीना जो रे भदरी पानिमे बसैले हे वल्लभा: की बजलेँ धामन तूँ तूँ, की बजलेँ धामिन गे हम्मर जीवन कटैय्या बोनक तूँ नै भागी हे हम्मर जीवन हम्मर बलकेँ बुझलेँ हिनताइ रे मारि-मारि छूटल ओकरापर दुनू भाइ रे धामन मारल धामन फेकल धामिनक आगू रे धामिन थरथर करै लागल लेबौ बदला भाइ रे गंगेश: फोटर राजा कटैय्या बोनक छल दोसतियारी रे हम्मर दोस धामन मारल, दुनू मिलि भाइ रे धामिन भौजी निश्चिन्त रहू, नै करू अगुताइ हे आबै दियौ आबै दियौ शिकार खेलऽ दुनू भाइकेँ वल्लभा: दिन बीतल, गेल भदरी दीना बोन शिकार हे संग गेल बहुरन मामा फोटर तैयार हे बिखहा दाँत गरा देलक मारल दुनू भाइ हे आत्मा बनि घूमए लागल दुनू भाइ हे गंगेश: दौरी गामक हिरिया तमोलिन देखल दुनू भाइकेँ दौरी गामक जिरिया तमोलिन देखल दुनू भाइकेँ एहेन वर चाही हमरा करए लागलि तपस्या जोरसँ वल्लभा (तपस्विनी सन ध्यान लगेने बैसि जाइत छथि): दीना चाही भदरी चाही, वर दुनू सखीकेँ मरल छेँ तँ भेल की स्वीकारू गंगा पैसि कऽ (गंगेश घनक पाछाँ चल जाइ छथि आ हाथ उठबै छथि जेना गंगामे होथि। वल्लभा दोसर कातसँ हाथ पसारै छथि।) वल्लभा: मातैर-मातैर सुनै छलौं मातैर बड़ी दूर हे अन देलौं धन देलौं, लक्ष्मी बहुत हे एकेटा जे स्वामी बिनु लागै य सुन हे मातैर-मातैर सुनै छलौं.....। (तखने मुखरामक प्रवेश होइत अछि।) देवदत्त: (मुस्काइत एक बेर वल्लभाकेँ आ एक बेर गंगेशकेँ देखैत छथि) कमला-कमला सुनै छलौं कमला बड़ दूर हेऽऽ गहबर पहसैत कमला भए गेल कसहूर हे, अन देलौं धन देलौं लक्ष्मी बहुत हे एकेटा जे…… वाह गंगेश। नै नै, वाकचातुर्य नै गंगेश। कोनो चातुरी नै। ई तँ अछि स्थूल प्रेम। प्रेम प्रेम देखी सगरे प्रेमे पूर्ण हे प्रेम बिनु लागै यऽ सभ सून हे… गंगेश। की बात छै। ऐ टोलमे तोहर माएकेँ सेहो मोन लागै छलौ आ तोरा सेहो। मुदा के बाजत। न्याय, तर्कक सोझाँ के ठठत। वल्लभा। अहाँक भाग आकि कोनो मनता जे गंगेशक माए अहींकेँ पुतोहु बनेबा लेल मनने हेती। आकि गंगेशसँ सत करेने हेती जे हमर अपमानक बदलामे तोँ अही टोलमे बियाह कऽ कऽ लोककेँ देखा दहीं। न्याय आ तर्कमे के जीतत गंगेशसँ। न्याय करत गंगेश, तर्क करत कियो नै। गंगेश: देवदत्त.. देवदत्त: नै गंगेश कोनो वचन चतुराइ नै अछि हमरामे। मुदा की कोनो तर्क नै अछि हमर वचनमे। गंगेश: देवदत्त, ने हमर माए कोनो मनता मानने रहथि आ नहिये हमरासँ कोनो सत करबेने रहथि। आ नहिये ऐ टोलक हमर माएपर कएल उपकारक बदला हमर आ वल्लभाक प्रेम अछि। आ जेँ ऐ प्रेममे ने कोनो मनता छै, ने कोनो सत आ ने कोनो उपकार, तेँ ई प्रेम स्थूल प्रेम अछि। देवदत्त: तर्क। नै कोनो वाक चातुरी नै। मुदा गंगेश, ई एकटा गप अहाँ ठीक कहलौं। अहाँक आ वल्लभाक प्रेमकेँ तँ लोक चर्चो नै कऽ रहल अछि। दूर देशक प्रेमक मुदा चर्चा होइए। ठीके कहलौं अहाँ। सुनल अछि कोनो बड़का न्यायक ग्रन्थक अहाँ लेखन कऽ रहल छी। सुनै छिऐ जे ओ तेहेन ग्रन्थ बनि रहल अछि जकर चर्चामे सभ नैय्यायिक ओझरा जेता। भाष्यपर भाष्य, टीकापर टीका लिखाएत ओइपर। मुदा गंगेश, सावधान। अहाँक प्रेमकेँ मारबाक ई षडयंत्र तँ नै अछि गंगेश। ऐ प्रेमक चर्च सेहो पाँच-सए बर्खक बाद मुदा हजार बर्खक भीतरे फेरसँ मिथिलामे हेतै। ओहो हो..ई की कहा गेल गंगेश। (अपन जीह थकुचऽ लगैए) लोक कहैए जे हमर जीह कारी अछि। जँ धानक खेतक आरिपर ठाढ़ भऽ हम कहि दै छिऐ जे देखू ई धान केहेन सनगर अछि तँ ओ धान अगिले दिन जरि जाइ छै। लोके सभ कहैए। (फेरसँ अपन जीह थकुचऽ लगैए) स्थूल प्रेमक चर्च हेबे किए करए गंगेश। किए हुअए स्थूल प्रेमक चर्च। ऐ चर्चसँ तँ समाजमे समरसता आबि जेतै। से नै हेतऽ चर्च ऐ प्रेमक गंगेश, नै हेतऽ चर्च ऐ प्रेमक। तोहर ग्रन्थ चर्च हेतऽ गंगेश, तोहर ग्रन्थकेँ मिथिलाक टोल आ चौपा़ड़िमे तोहर विद्वताक चर्चा हेतै गंगेश, तोहर प्रेमक नै। मिथिलाक शिक्षक तोहर पोथीक प्रतिलिपिक अनुमति नै देथिन्ह गंगेश आ ने ओकर सारांश लिखबाक। आ जँ बंगालक कोनो विद्यार्थी ओकर प्रतिलिपि कइयो लेत गंगेश तँ ओ लऽ जा सकत मात्र तोहर विद्वता। तोहर न्यायशास्त्र। तोहर तर्क। मरि जेतह तोहर प्रेम गंगेश। मरि जेतह तोहर स्थूल प्रेम। वल्लभा: देवदत्त, हजार बर्खक बाद तँ घुरत ने ई प्रेम। गंगेशक अमर पोथी लेल हमरा ओ प्रतीक्षा स्वीकार अछि। चर्च नै हएत प्रेमक…हाह…प्रेम की चर्च हुअए तेँ होइत अछि देवदत्त? देवदत्त: वल्लभा, गंगेशक हारि देख रहल छी हम। गंगेशक हारि देख रहल छी हम गंगेशक मुखपर। गंगेश, की तोँ वल्लभासँ सहमत छह। की वल्लभा आ तोहर स्थूल प्रेमक चर्च नै भेने सामाजिक समरसताक तोहर उद्देश्य पूर्ण हेतह। की ऐ स्थूल प्रेम आ ऐ टोलक नाराशंसी गाथाक कोनो कर्ज तोरा पोथीपर नै छै गंगेश? की तोहर प्रचण्ड तर्क सिद्धान्त बनि कऽ नै रहि जेतऽ गंगेश। प्रायोगिक महत्व खतम नै भऽ जेतै की ओकर? हम भरोस दिआबै छियह गंगेश, भरोस दियाबै छियह, जे तोहर स्थूल प्रेमक कियो विरोध नै करतह। आ तोँ बुझैत रहबह जे ओ सभ तोहर प्रचण्ड तर्कसँ हारि कऽ विरोध नै केलन्हि। मुदा असल बात ई छै जे तोहर पोथीपर भाष्यपर भाष्य आ टीकापर टीका लिखाइत रहतह। तोहर विरोध तँ छोड़ह, तोहर सन्तानोक विरोध कियो नै करतह गंगेश। सिद्धान्त बनि कऽ रहि जेबह तोँ आ तोहर तर्क। गंगेश: देवदत्त। अहाँक कोनो गप हमरा कठानि नै लागि रहल अछि। मुदा एतेक तर्कपूर्ण गप.. देवदत्त: एतेक तर्कपूर्ण गप..ठीके बुझलेँ गंगेश। ई सुनलाहा गप छी। चौपाड़िपर होइत शिक्षक लोकनिक गप। हम तँ किछु बुझै नै छी, से जानि हमरा सोझाँ होइत रहै ई सभ गप..जाइ छी…जाइ छी…(एम्हर ओम्हर तकैत शतरंजक घनकेँ पलटाबऽ लगैए) तँ हमरा की इनाम देब ऐ तर्कपूर्ण गप लेल गंगेश। (शतरंजक एक-एकटा खानाकेँ छुबैत) ई ६४ टा खाना अछि शतरंजक गंगेश। पहिल खानामे एकटा धानक दाना राखू। दोसरपर ओकर दुगुना। तेसरपर दोसरक दुगुना। अन्तिम खानापर जतेक धानक दाना अबैए ततेक दाना दिअ हमरा गंगेश.. वल्लभा: दऽ दियन्हु हिनका इनाम गंगेश। नै जानि ईहो गप ओ कतौसँ सुनि कऽ आएल छथि। गंगेश: नै वल्लभा। ई इनाम ऐ शतरंजक खेलोसँ बेशी विषम छै। सगर पृथ्वीक अन्नक उपजा जँ पाँच सए सँ हजार बर्ख धरि उपजत तखन जा कऽ ई इनाम देल जा सकत। देवदत्त, के बाजै छल ई गप देवदत्त। कोन चौपाड़िपर होइ छल ई गप देवदत्त.. देवदत्त: (डराइत) एतेक पैघ अछि ई इनाम..पाँच सए बर्खक बाद आ हजार बर्खसँ पहिने…गंगेश..जँ ई इनाम अहाँ नै देब हमरा तँ तावत धरि मुनाएल रहत अहाँक स्थूल प्रेम…हा हा हा…(अपने सँ बाजैए) डराओन सन गप..डराओन सन गप..(प्रस्थान कऽ जाइत अछि।) दोसर कल्लोल (दू टा शतरंज-घन दुनू रंगशीर्षपर राखल अछि। गंगेश एकटा शतरंजक घनक चारू कात घूमि रहल छथि। दोसर शतरंजक घनपर प्रकाश छै मुदा ओ फेर विलुप्त भऽ जाइ छै। आ फेर वेदिकासँ एकटा गीत उठै छै।) बभनीकेँ पुत्र तोहें बाल गोरैय्या, पोथी नेने पढ़न जाइ हे पोथिया नेरौलनि गोरिल जाइ बिरिछ तर हलुआइ घर पैसल धपाइ हे किछु मधुर खेलनि गोरिल किछो छिरियौला किछु देल लंका पठाइ हे बभनीक पुत्र तोहेँ बाल गोरैय्या ग्वालिन घर पैसल धपाइ हे किछु दूध पीलनि गोरिल किछु ढ़रकओला किछु देल लंका पठाइ हे गंगेश: हम तँ बभनीक पुत्र मुदा हमर पुत्र तँ नै। ओ अछि बभनीक पुतोहुक पुत्र। हम बारह हजार ग्रन्थक बरोबरि एकटा तत्वचिन्तामणि लिखनिहार लेखक, मात्र एकटा साधारण शिक्षक छी? हमर तत्वचिन्तामणिक प्रतिलिपि करबापर प्रतिबन्ध के लगाएत? नवद्वीपक विद्यार्थी अवश्य लऽ जाएत हमर शिक्षा अपना संग। (वेदिकासँ फेर गीत उठैए।) बभनीक पुत्र तोहेँ बाल गोरैय्या बड़इ घर पैसल धपाइ हे किछु पान खेलनि गोरिल किछु छिड़िऔला किछु देल लंका पठाइ हे बभनीक पुत्र तोहेँ बाल गोरैय्या डोमिन घर पैसल धपाइ हे नीक नीक पाहुर गोरिल अपने चढ़ाओलऽ काना पातर देल हड़काइ हे बभनीक पुत्र तोहेँ बाल गोरैय्या ब्राह्मण घर पैसल धपाइ हे नीक-नीक जनौ गोरिल अपने पहिरलनि औरो देलनि ओझराइ हे हकन कनै छै गोरिल ब्राह्मणीक बेटिया ब्राह्मण बाबू बड़ दुख देल हे भनहि गंगेश सुनू बाबू गोरिल गहवर पैसिये जस लेल हे गंगेश: ई देवदत्त की कहि गेल। मुदा टोल आ चौपाड़िपर हमरा सोझाँ तँ एहेन कियो किछु नै बाजल अछि। मुदा शतरंजक अन्नक गणना। ओ तँ देवदत्तक सकमे नै छै। (वल्लभाक प्रवेश।) वल्लभा: की भेल? कोन गुनधुनी लागल अछि? गंगेश: वएह देवदत्तबला गुनधुनी। वल्लभा: धुर छोड़ू ने। ओकरा बुद्धिक लेशो नै छै.. गंगेश: तेँ तँ वल्लभा। बुद्धिसँ काज केलापर ने सत्य आ असत्य..मुदा ओकरा बुद्धि नै छै। तेँ ओकर गपपर हमरा सोच पड़ि रहल अछि। वल्लभा: अहाँ तँ तत्वचिन्तामणिक अलाबे आब कवि सेहो भऽ गेल छी। एतेक सुन्दर गीत लिखऽ लागल छी। तत्वचिन्तामणिमे आचार्य सिंह आ आचार्य व्याघ्र आ गीतमे बाल-गोरैय्या!! गंगेश: हँ वल्लभे। अनायासे अहाँ कतेक नीक गप बाजि देलौं (शतरंजक घनकेँ टेढ़ कऽ कंगुरिया आंगुरसँ कोनपर नियन्त्रित करै छथि।) हँ..तत्वचिन्तामणि नै, आचार्य सिंह आ आचार्य व्याघ्रक परिभाषा नै, ई बालगोरैय्या चौपाड़ि आ टोलक षडयंत्रकेँ तोड़ि सकत। (गंगेश कंगुरिया आंगुर घनसँ हटा लै छथि। घन घुमि कऽ फेर स्थिर भऽ जाइए।) अनायासे अहाँ कतेक नीक गप बाजि दै छी वल्लभा। (तखने देवदत्त प्रवेश करैए।) देवदत्त: गंगेश कवि!!!(आश्चर्यसँ हाथ पसारैए) गंगेश तत्त्वचिन्तामणिकारक। गंगेश कविक कवित्वक चर्च कियो नै करत। वल्लभा: की ईहो निर्णय टोल आ चौपाड़िपर भऽ गेल छै। देवदत्त: हँ वल्लभा। मुदा तोरा कोना बुझल छौ? वल्लभा: बुझल नै अछि मुदा आब बुझल भऽ गेल जे हमर आ गंगेशक प्रेमकचर्चा, हमर आ गंगेशक विवाहक चर्चापर पहरुआ ठाढ़ कऽ देल गेल छै। गंगेश: (शतरंजक घनकेँ फेर टेढ़ करैए) तँ हमर कवितापर सेहो चर्चा नै हएत। तत्त्वचिन्तामणिक सभ पाँतीपर भाष्य,टीका आ कवितापर.. वल्लभा: (शतरंजक घन गंगेशसँ अपना हाथमे लऽ लैए) गंगेश आब अहाँ चिन्ता छोड़ि दिअ। ई सभ गीत हमर नैहरामे गाओल जाएत। देवदत्त कहि अबियौ टोल आ चौपाड़िपर, गीत बन्न नै हएत। आइ नै तँ सात सए बर्ख बादो ऐ प्रेमक चर्चा फेरसँ हएत। आ जे प्रेम सात सए बर्ख इन्तजारी नै कऽ सकए ओ प्रेम प्रेम नै। की अहूपर हेतै कोनो प्रतिबन्ध। देवदत्त: हेतै नै भऽ गेल छै वल्लभा। देखू ओ बँसबिट्टी। गाम आ अहाँक नहिराक टोलक बीचमे जे बाँसक कोपर सभ देखा पड़ि रहल अछि। अहाँक नहिराकेँ परदेस बना देत ई कोपड़। अहाँक गीत ओइ टोलसँ बहार तँ हएत मुदा ऐ बँसबिट्टीमे ओ भुतहा गीत बनि घुरत..तत्वचिन्तामणिकारक गंगेश.. वल्लभा: सुकविकैरवकाननेन्दुः – गंगेश। अपन पुत्र वर्द्धमानकेँ कहबै हम। अपन पिताक कवि हेबाक प्रमाण छोड़त ओ..कहि दियौ देवदत्त टोल आ चौपाड़िपर। छै कियो ओतऽ सात सए साल लड़ैबला? बँसबिट्टीक गीत घुरियाइत रहतै। सुनै छिऐ कोनो ध्वनि खतम नै होइ छै दुनियाँमे। सुनै छिऐ एक्के तरहक सातटा लोक होइ छै दुनियाँमे एक्के समएमे। सात सए बर्खमे सातटा लोक नै हेतै की देवदत्त? देवदत्त: नै हेतै वल्लभा। सात सए बर्खमे एकटा भऽ जाए सेहो बहुत छै। वल्लभा: एक टा तँ हेतै ने देवदत्त, तँ तइ लेल हमर सभक प्रेमक गीत विचरैत रहतै अहि बोन बँसबिट्टीमे। बँसबिट्टीक पारक जीवन, टोल, चौपाड़ि सभ खतम भऽ जेतै देवदत्त ऐ सात सए बर्खमे, मुदा ई भुतहा गीत नै खतम हेतै। देवदत्त: नै खतम हेतै वल्लभा, नै खतम हेतै। (देवदत्त झटकारि कऽ प्रस्थान करैए। वल्लभा आ गंगेश शतरंजक घन लग आबि ठाढ़ भऽ जाइ छथि।) गंगेश: वल्लभा, छोड़ू ई सभ। कोन गुनधुनी लागि गेल अहाँकेँ। सुनाउ ने खिस्सा, बालाराम आ वंशीधर ब्राह्मणक, व्याघ्र आ सूकरक, गहिल आ दुर्गाक। वल्लभा: (वल्लभा मुस्की दै छथि आ शतरंजक सभटा घनकेँ एकत्र करै छथि आ हाथसँ सभटाकेँ नेपथ्य दिस सहटारि कऽ मंचसँ हटा दै छथि।) हिर्र हिर्र सूगर जाइए अखराहा करीब सँ पाछू बंशीधर भाभन खेहारैए जोर सँ भोरे भोरे अखराहामे सूगर संग युद्ध रे श्यामसिंह आबि माटि फेकल जूमि कए बंशीधरकेँ तामस उठलै बाजल किछु बड़बर गहिल गहिल कहि श्याम सिंह छूटल बड़ी जोरसँ बंशीधर बलगर छल मारल बड़ मारुख अरड़ा कऽ खसल श्यामसिंह, भेल अन्हेर हे ओकर बेटा बालाराम केलक सत्त हे गहिल दिअ शक्ति हमरा मारी बंशीधर केँ गहील गेली दुर्गाजी लग करबेलन्हि सत्त हे दुर्गा मुदा आबै छथि बंशीधरकेँ रक्ष हे बंशीधरक सूगरकेँ मोहिनी काँटी भोकि मारल बंशीधर तमसा कऽ ललकारा दैए बालारामकेँ मुदा बालाराम भोंकैए काँटी ओकरो पेटमे बंशीधरक पेट चिराएल दुर्गा एली बीचमे गंगामे कऽ ठाढ़ कराएल बालाराम बंशीधर दोस्ती भेलै दुहू बीचमे गहिल मिललि,मिललि दुर्गा सभ मिलि बढ़ू अहि देसमे (हूआ-हूआक ध्वनिक संग अन्हार पसरि जाइत अछि।) …(जारी) ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। जगदीश प्रसाद मण्डल- तामक तमघैल एकांकी तामक तमघैल जगदीश प्रसाद मण्डल पात्र परिचए... पुरूष पात्र- 1. रविन्द्र ४५ वर्ष 2. चन्द्रदेव ४५ वर्ष 3. सुनलाल ३५ वर्ष स्त्रीपात्र- 1. रागिनी ६५ वर्ष 2. बलाटवाली ६० वर्ष 3. पीपरावाली २५ वर्ष 4. अनुराधा ४५ वर्ष 5. 6. पहिल दृश्य- (जेठ मास। एगारह बजैत। जेठुआ दृश्य।) पीपरावाली : (माथपर छिट्टामे पुरना पार्ट-पुर्जा साइकिलक नेने) लोहा-लक्कर बेचै जाइ- जाएब ई.. य..अ..अ..ऐ...? (रागिनी आ बलाटवाली घरक ओसारपर बैसल गप-सप करैत। कवाड़िनक अवाज सुनि..) रागिनी : कनी लोहा-लक्करवालीकेँ एम्हरे अबैले कहियौ। (ओछाइनपर सँ उठि बलाटवाली आगू बढ़ि..) बलाटवाली : हइ पीपरावाली, कनी एम्हरे आबह। (माथपर छिट्टा नेने पच्चीस बर्खक पीपरावाली छपुआ साड़ी पहिरने, पएरक चप्पल फटफटबैत अबैत..।) पीपरावाली : काकी, कनी छिट्टा टेक दथु। (दुनू गोटे छिट्टा उताड़ि निच्चाँमे रखैत। माथ परक बीरबा निच्चाँ राखि आँचरसँ चानिपर चुबैत पसीना पोछैत। तइबीच रागिनी भीतरसँ -घरसँ- एकटा तामक तमघैल आनि आगूमे रखैत..) रागिनी : कनियाँ, हमरा ते बुझले ने छलए जे तहूँ लोहा-लक्करक कारोवार करै छह। नै ते....? पीपरावाली : दादी, अपने करै छी आकि दीन करबैए? रागिनी : सासु-ससुर आ घरबला नै छह? पीपरावाली : सासु-ससुर तँ धिना कऽ मुइल जे घरोबला तेहने अछि। रागिनी : से की? पीपरावाली : की कहबनि। पतिक खिघांस केने ते पाप लागत। मुदा छिपौनौ तँ जिनगिये जाएत। (गुन-धुनमे पीपरावाली पड़ि जाइत..) बलाटवाली : दीदी, अही बेचारीक की सुनथिन। अपने सबहक नै देखै छथिन। हिनके बेटा-पुतोहू छन्हि, दस-बारह बर्खसँ कम गाम एना भेल हेतनि। रागिनी : बाहरम बर्ख छी। बलाटवाली : हिनके की कहबनि, हमरे नै देखै छथिन जे जहियासँ घरबला मुइल तहियासँ दुनू-बेटा-पुतोहू कोनो गरनामे रहए देने अछि। तखन ते अपना लुरिये-बुद्धिये जीबै छी। (रागिनी आ बलाटवालीक बात सुनि पीपरावाली..) पीपरावाली : दादी, ई बड़का छथि। हम कहुना भेलौं ते हिनकर धिये-पूते भेलियनि। धिया-पूता जे माए-बाप लग झुठ बाजे सेहो नीक नै। बलाटवाली : माइये-बाप किअए कहै छहक, लोककेँ झुठ बजबे नै करक चाही। पीपरावाली : काकी, कहलथि ते बेस बात, मुदा हम सभ ते धंधा करै छी। झुठेक खेती छी। निच्चाँ-ऊपर सगतरि एक्के रंग। रागिनी : बलाटवाली, जहिना अहाँ भरि दिन खुरपीसँ घास छिलै छी तहिना जे गपोकेँ छिलबै तँ उ घास जकाँ उखड़त की आरो असुआएल लोक जकाँ छिड़िया कऽ पसरि जाएत। बलाटवाली : हँ, ते आगू की कहए लगलहक हइ पीपरावाली? पीपरावाली : घरबला दे कहए लगलियनि। की कहबनि काकी, बजैत लाज होइए। जहिना बुढ़बा -ससुर- तड़िपीबा रहए तहिना बेटो छै? (कहि चुप भऽ पुन: आँचरसँ चानि पोछए लगैत..) रागिनी : कमाइ-खटाइ नै छह? पीपरावाली : से जे कमैते ते एहिना रौदमे वौऐतौं। बापकेँ तँ खेत-पथार रहै बेचि-बिकीन के पीलक। आब तँ ने खेत पथार अछि आ ने कमाइबला। रागिनी : बच्चा कअएटा छह? पीपरावाली : दू भाए-बहिन अछि। जेठका छह बर्खक आ छोटकी चारि बर्खक। रागिनी : अपने जे भौरी करए चलि जाइ छह ते बेटा-बेटीकेँ बाप देखै छै किने? पीपरावाली : की देखतै जनिपिट्टा। भरि दिन पीब कऽ अड़-दड़ बजैत रहैए। जहाँ किछ बाजब की सोहाइ लाठी लगा दइए। बलाटवाली : तोहूँ किअए ने उनटा दै छहक? पीपरावाली : धुर काकी, इहो सएह कहै छथि। कुल-खनदान की पुरखेटा बँचबैए आकि जनिजातियो। हमरा जे कतबो देह धुनत ते ओकरा दोख नै लगतै मुदा हम जे उनटा देबै तँ कुल-खनदानक नाक कटतै आकि नै? रागिनी : भरि दिनमे कत्ते कमा लै छहक? पीपरावाली : दादी, कमाइयेपर ने ठाढ़ छी। दुनू बच्चोकेँ पोसै-पालै छी आ घरोबलाकेँ पाँच-दस रूपैया पीऐ लऽ देबे करै छिऐ ने? बलाटवाली : एहेन छुतहर घरबला छह ते किअए ने छोड़ि दै छहक? पीपरावाली : काकी, मरलो-जड़ल अछि तँ घरेबला छी। यएह कहथु जे जे सुख घरबलासँ होइ छै से दोसरसँ हएत। रागिनी : आब ते हुिस गेलह। नै जे पहिने बूझल रहितए जे गाममे तोहूँ लोहा-लक्करक कारवार करै छह ते तोरे दैतियह। पीपरावाली : ककरा हाथे बेचलखिन? रागिनी : झंझारपुरक एकटा बेपारी अबैए, ओकरे हाथे। पीपरावाली : झंझारपुरबला बेपारी ते गरदनि कट सभ छी। रागिनी : से की? पीपरावाली : अनकर की कहबनि, अपने कहै छिअनि। आठ बर्ख पहिने हमर बाप खुआ चानीक हँसुली दुरागमनमे देलक। ऐठाम दिन घटल। पाँच बर्खक पछाति जखन वएह हँसुली ओही वनीमा ऐठाम बेचए गेलौं ते रूपा कहि अधिये दाम देलक। रागिनी : छोड़ह दुनियाँ-जहानक गप। अपन बाल-बच्चा, घर-परिवारक गप करह, जे केना ठाढ़ रहत? ककरा कहब भल आ ककरा कहब कुभल। कोइ अपना ले करैए। बलाटवाली : कनियाँ, नैहरोमे यहए काज करै छेलह? पीपरावाली : (दुनू आँखि मीड़ैत..) काकी, हिनकर पएर छुबि कहै छिअनि, कहुना भेली तँ माइये-पितिआइन भेली। गाम मन पड़ैए ते......? बलाटवाली : चुप किअए भेलह? ऐठाम की कियो पुरूख-पातर अछि जे धखाइ छह। नैहरामे के ने खेलाइ-धुपाइए। पीपरावाली : धुर बुढ़िया नहितन। एको पाइ बजैमे संकोच नै होइ छन्हि। रागिनी : ओहिना बलाटवाली चौल करै छह। बाजह...? पीपरावाली : दादी, नैहर मन पड़ैए ते सुमारक होइए। माए-बापक बड़ दुलारू छेलिऐ। चारि भाँइक बीच असकरे बहिन छिऐ। रागिनी : वियाह करै काल बाप देखा-सुनी नै केने छेलखुन? पीपरावाली : अनकर दोख की देबै दादी। दोख अपन कपारक। जे कपारमे सटि गेल सहए ने हएत। रागिनी : हँ, से ते सएह होइ छै। मुदा तैयो ते लोक लड़का-लड़कीक मिलान देख ने वियाह करैए। पीपरावाली : सोझमतिया बाप ठकहरबा सबहक भाँजमे पड़ि गेल। रागिनी : ऐठामसँ आरो आगू जेबहक की घुरि जेबहक? पीपरावाली : भऽ गेल भरि दिनक कमाइ। बालो-बच्चा देखना बड़ी खान भऽ गेल आ रौदो चंडाल अछि। (तमघैल उनटा-पुनटा कऽ देख बलाटवाली..) बलाटवाली : आब ऐ सबहक कोनो माेल रहल दीदी। घरमे अन्न रहत ते लोक माटियो बरतनमे रान्हि-पका खा सकैए। रागिनी : बड़ी खान तोरो भऽ गेलह कनियाँ। एकेठाम बैसने काज नै चलतह। बाजह, कते दाम देबहक? पीपरावाली : दादी, हिनका लग झुठ नै बाजब। एक तँ कते दिनसँ कारेवार करै छी। तहूमे एहेन तमघैल आइ पहिले दिन अभरलहेँ। आइ रखि लथु। भाउ बुझि कऽ दोसर दिन लऽ जाएब। रागिनी : एकरा नेने जाह। जतेमे बिकेतह तइमे तूँ अपन बोनि निकालि दऽ दिहह। बलाटवाली : बड़ निम्मन चीज छन्हि। रागिनी : जहिना सासु-ससुरक बीचक जिनगी, बेटा-पुतहूक बीच बदलि जाइ छै तहिना अहू तमघैलकेँ भेल। पीपरावाली : से की दादी, से की? रागिनी : (विस्मित होइत..) की कहबह! नैहरमे जहिया देलक आ ऐठाम आएल तहिया घरक गिरथानि भऽ रूपैया-पैसा रखैक तिजोरी बनल रहए। मुदा जखन चोर-चहारक उपद्रव बढ़ल तखन बुढ़हा -ससुर- झँपना दऽ ओछाइनिक तरमे गाड़ि कऽ रखै छलाह। आब तँ सहजहि घरे ढनमना गेल ते एकरा के पूछत। बलाटवाली : कनियाँ, दीदीयोकेँ खगता छन्हि। ताबे नून-तेल करैले अधो-छिधो दऽ दहुन आ लऽ जाह। पीपरावाली : (पचास रूपैयाक नोट दैत..) दादी, ताबे एते रहए देथुन। एक खेप गामपर सँ रखने अबै छी। एक घोंट पानियो पीब लेब। बलाटवाली : अखैन खाइ-पीबै बेर भऽ गेल। जँ अखन नहियो आबि हेतह ते ओही बेरमे, बेरू पहर लऽ जइहह। पीपरावाली : हँ सेहो हएत। जँ आइ नै आबि हएत ते काल्हियो लऽ जाएब। रागिनी : आब तोहर चीज भेलह। देखते छहक चोर-चहारक उपद्रव। तँए नीक हेतह जे साँझो पड़ैत आइये लऽ जइहह। पीपरावाली : बड़बढ़िया! (()) दोसर दृश्य- (खैर-चून मिला, रागिनी अल्मुनियम डेकचीक पेनमे लगबैत..) रागिनी : कपार फुटने लोकक सभ किछु फुटए लगै छै आ जुटने सभ किछु जुटए लगै छै। जखन नूनो-तेल जोड़ैमे भीड़ पड़ैए तखन डेकची कीनब असान अछि। कत्ते दिन चून-खैर साटि काज चलत। जखन फुटि गेल तखन आरो बेसिये होइत जाएत की दढ़ हएत। (बाड़िये देने झटकल बलाटवाली अबैत...) रागिनी : किअए सिताएल नढ़िया जकाँ बाड़िये-बाड़ी पड़ाएल एलह हेन? बलाटवाली : (हँफैत) की कहबनि दीदी, ई की कोनो नै जनै छथिन जे जेहने बेटा अछि तेहने पुतोहू। बीचमे हम दुश्मन। रागिनी : की करबहक, जखन बेटे माएकेँ नै चिन्हलक, जेकरा नअ मास पेटमे रखलक तखन पुतोहू तँ सहजहि दोसराक बेटी छी। बलाटवाली : कहै तँ दीदी ठीके छथिन, मुदा एह कहथु जे ओइ घर-दुआरमे हमर किछाे ने अछि। हम कतौसँ दहा-भसा कऽ आएल छी। रागिनी : से के कहै छह! लोकक मतिये मरा गेल अछि। जे माए-बाप दादा-दादी एतेटा जिनगी बिता एते देखलक ओ किछु ने आ छौड़ा-छौड़ी किछु ने देखलक ओ बुिद्धयार भऽ गेल अछि। से नै देखै छहक। बलाटवाली : हँ, से तँ देखै छिऐ। सभ कहैए जे जुग-जमाना बदलि गेल आ बदलल किछो देखबे ने करै छिऐ तँ केना विसवास हएत। रागिनी : जहिना दिशांस लगने लोक पूबकेँ पछिम आ उत्तरकेँ दछिन बुझए लगैए तहिना भऽ गेल अछि। बलाटवाली : नै बुझलियनि? रागिनी : जुग-जमाना बदलल नै आगू डेग बढ़ौलक हेन। बदलैक माने होइ छै एकटाकेँ हटा दोसर आनब। से नै भेलहेँ। जँ से होइते तँ देखतहक सभ किछु आगिमे जड़ि गेल आकि बाढ़िमे दहा गेल आ फेरसँ सभ किछु नवका भऽ गेल। बलाटवाली : छोड़थु ऐ मगजमारी गपकेँ। अपन बात विसरि जाएब। अनकर गप सुनने मगज भरियेबे करै छै। जाबे अपन बात नै बुझब ताबे माथ हल्लुक केना हएत? रागिनी : की भेलह हेन जे एते....? बलाटवाली : िक कहबनि खेलरा-खेलरीक गप, दुनू एके रंग अछि। एते दिन मौगीक गप नीक लगै छलै, आब जे हुकुम चलबए लगलै तँ बकछुहुल लगै छै। रागिनी : तूँ तँ केहन बढ़ियाँ जीबै छह। दुनू पहर दू पथिया घास अनै छह आ दुनू साँझ खाइ छह। बेटा-पुतोहू जे घर दफानिये लेलकह तँ आरो जान हल्लुके केलकह किने? बलाटवाली : हँ, से तँ भेल। मुदा से देखल जाइए। जते काल बाधमे रहै छी ततबे काल ने, जखन अंगनामे रहै छी तखैन केना देखल जाएत। (तही बीच सुनरलाल ललकैत अबैए..) सुनरलाल : दादी, ऐ बुझ़ियाकेँ पूछियौ जे किअए छिटकल घुरैए। बलाटवाली : दीदी, ऐ छौड़बाकेँ पूछथुन जे हमरा माए बुझैए। तखन ते अपन बनाओल घर छी, लछमीक (गाए) सेवा करै छी वएह पार लगौती। सुनरलाल : हम तोरा माए नै बुझलियौ आकि अपने पुतोहूकेँ कपारपर चढ़ा लेलेँ। जे तोरा कपारपर चढलौ ओ कुदि कऽ हमरा कपारपर नै चढ़ि जाएत। बलाटवाली : हँ रौ, चारू कातसँ हारलेँ हेँ तखैन तूँ हमरा बुझबै छेँ। आइ तक एक्को दिन भेलौ जे माएकेँ कोनो तीरथ करा दिऐ। ई तँ धैन दीदी जे लाटमे जनकोपुर, सिंहेसरो आ कुशेसरो देखलौं। रागिनी : (बलाटवालीकेँ चोहटैत) तोहूँ बड़े बजै छह, अखैन तक अपन उमेरोक ठेकान नै छह। किअए बुढ़ियापर बिगड़ल छहक बौआ? सुनरलाल : माएपर किअए बिगड़ब। देखियौ जे हाथपर ओते पाइ नइए जे पनरहम दिन बेटाक नाआें कोचिंगमे लिखाएब तइपर सँ कन्यादानी नौत सासुरसँ चलि आएल हेन? बलाटवाली : दीदी, बात छिपा कऽ बजै छन्हि। ई दुनूटा चाहैए जे गाए बेचि भोज खा आबी। रागिनी : कनी फरिछा कऽ कहह? बलाटवाली : ऐ धड़कटहाकेँ पुछथुन जे मात्रिक उसरि गेल आकि अछि। इज्जत बँचबै दुआरे भातिज सभकेँ कहि देलिऐ जे बौआ, आब ओते चलि-फिर नै होइए जे आएब-जाएब करब। ओहो सभ परदेशिया, गाम अबैए तँ दस-बीस रूपैइयौ आ लत्तो-कपड़ा दऽ जाइए। एकरा पुछथुन जे एक बीत नुओ कीन कऽ दइए। रागिनी : तोहूँ बड़ रगड़ी छह बलाटवाली। कनी फरिछा कऽ कहह बौआ? सुनरलाल : दादी, ननौरवालीक बहिन बेटीक बेटीकेँ विआह छी। सभटा परदेशिया भऽ गेल। नवका-नवका विधि बेबहार सभ करैए। पुरना गामक लोक लए छोड़ि देने अछि। रमेशक सभ संगी झंझारपुर कोचिंगमे नाअों लिखाओत, ओकरा हम नै लिखेबै से केहेन हएत? रागिनी : ऐ काजमे के मुहछी मारतह। भगवान करथुन चारियो अक्षर जे पढ़ि लेतह ओते नीके हेतह किने। अहूना लोक बजैए जे पढ़ल-लिखल हरो जोतत तँ सिरौर सोझ हेतै। कनियाँक की विचार छन्हि? सुनरलाल : ओ कहैए जे सबहक ठाठ-बाठ बजरूआ रहतै तइठीन जे हम जाएब से केना जाएब। हमरा देख ओ सभ हँसत नै। रागिनी : बौआ, जाबे असथिर मनसँ घरक नीक-अधला नै बुझबहक ताबे एहिना हेतह। तोरा जे कहबह से अपने नै देखै छह। बेटा-पुतोहू शरहमे खेत कीनलक हेँ। घर बनाओत। आ हम ऐठाम नून-तेल ले मरै छी। सुनरलाल : अखनो जे एक रती चुहचुही अछि से अही बुढ़ियापर। खेत-पथारक कोनो लज्जति अछि। गोटे बेर बाढ़िये चलि अबैए तँ गोटे बेर रौदिये भऽ जाइए। गोटे साल हबे तेहेन बहैए जे दने भौर भऽ जाइ छै। कीड़ी-फतीगिंक चरचे कोन। रागिनी : बौआ, घरक पुरूख तँ तोंही ने छहक? तोंही ने गारजन भेलहक? सुनरलाल : हँ, से तँ छिऐ मुदा कियो मोजर देत तखैन ने। ई बुढ़िया अखनो बेदरे बुझैए तँ घरवाली की बुझत? बलाटवाली : थूक देथुन एहेन छौंड़बाकेँ? रागिनी : दुनियाँमे माइयक सेवा बेटाक लेल ओहन होइत जेकर जोड़ा नै छै। तखन रंग-बिरंगक माए-बाप, बेटा-बेटी भऽ गेल अछि। तँए दुनियाँ दिस नै देख अपन ऐनामे माएकेँ देखि हृदैमे समुचित जगह देबाक चाही। बलाटवाली : दीदी, पैघ फड़क पैघ लत्ती होइ छै, मुदा छोटक तँ छोटे होइ छै। रागिनी : हँ से तँ होइ छै। अच्छा बौआ, एते दूरक लत्ती केना पकड़ि लेलकह। नैरह-सासुर धरिक लत्ती तँ ठीक छै मुदा नोनी साग जकाँ केना एते चतरि गेलह। सुनरलाल : दादी, की कहब। ई सार मोबाइल जे ने करए। मोबाइलेपर नौत-पिहान, ए.टी.एम.सँ लेन-देन तेहन रस्ता धड़ा देलक हेन जे फुदियोसँ बेसी लोक उड़ए लगल हेन। रागिनी : बौआ, अनकर की कहबह, अपना पोताकेँ दस बर्ख भऽ गेल अछि, अखैन तक एक नैन देखलौं तक नै। तखन ते छातीमे मुक्का मारनहि छी जे जखैन बेटे नै तखन पुतोहुए आ पोते-पोती कतए। सुनरलाल : तखन की करी दादी? रागिनी : बौआ, किछु जे धाँइ दे कहि देबह से नीक नै हएत। किअए तँ घरमे (परिवारमे कते) कते रंगक लोक रहैए। अपना रंगे सभ देखै छै। तँए एके बात एककेँ नीक लगै छै दोसरकेँ अधला। जेकरा अधला लगतै ओ तँ अधले कहत। सुनरलाल : दादी, अहाँक बात माइयो मानैए। अहाँ जे कहब सएह करब। रागिनी : बौआ, देखहक जखने कमाएत कोइ आ खर्च करत कोइ तखने किछु-ने-किछु गड़बड़ हेबे करत। सुनरलाल : तखन? रागिनी : यएह जे परिवारकेँ सभ संस्था बुझि इमनदारीसँ जीबए। सुनरलाल : ननौरवाली केना सुढ़िआएत? रागिनी : बौआ, बेटा तोरे नै ननौरोवालीक छिऐक। स्कूलमे की खर्च होइ छै से तँ तूँ बुझै छहक। मुदा माए नै बुझै छै। तँए कहक जे रमेशक नाओं स्कूल जा लिखा दिऔ। बलाटवाली : बेस कहलिऐ दीदी। बैसल-बैसल देह पोसैए आ बात गढ़ैए। भने कहलिऐ? सुनरलाल : कहने थोड़े चलि जाएत। कहत जे बुझले ने अछि बौआ जाएब। रागिनी : (मुस्कुराइत) बौआ, यएह बात सभकेँ बुझए पड़तै। सोझे कौआ जकाँ अकासमे कुचड़ने नै ने हेतै। बलाटवाली : दादी कहथुन ने, जे हाटपर दू सेर सीम भट्टा कीनत तँ सेगे दुनू गोरे जाएत। आ स्कूलमे जा कऽ नाओं लिखा देतै, से नै हेतै। तइकाल पाग उतड़ि जेतै। रागिनी : बेस तँ कहलहक। (()) तेसर दृश्य- (डेराक बरामदा। चारि कुरसी एक टेबुल। टेबुलक एक भाग रविन्द्र आ दोसर भाग अनुराधा बैसल..) रविन्द्र : की समए आ की सपना छल। आइ की देख रहल छी। अनुराधा : जना बुझि पड़ैए जे कओलेजक ओ दिन मन पड़ि रहल जइ दिन एहिना कौमन रूममे बैस गप-सप करैत रहै छलौं। रविन्द्र : हँ, सपना तँ साकार भेल जे जहिना अहाँ देख संगी बनेबाक इच्छा भेल। मुदा एकटा कहू जे ओइ समए अहाँ की सोचैत रही। जे कओलेजसँ निकलला बाद की करब? अनुराधा : (विस्मित होइत) सभ कर्मक खेल छी। जा धरि संगीक बंधनमे नै बान्हल गेल छलौं ताधरि एकटा झिझड़ीदार परदा बीचमे छल, जे आब नइए। रविन्द्र : की मतलब? अनुराधा : मतलब यएह जे सृष्टिक एक कर्ता रूपमे अपनाकेँ पाबि रहल छी। मुदा....? रविन्द्र : मुदा की ? अनुराधा : अपन प्रवल इच्छा रहए जे प्रोफेसर बनि बाल-बाेधकेँ बाट देखाएब मुदा आइ बुझि पड़ैए जे अपनो बाट अन्हराएले जा रहल अछि। रविन्द्र : से की ? अनुराधा : यएह जे एम.ए.क डिग्री बेकार लेलौं। की जिनगी अछि? यएह ने जे भानस करै छी अपनो खाइ छी आ अहँू सभकेँ खुआबै छी। रविन्द्र : (मुस्की दैत) एकरा कम बुझै छिऐ? अनुराधा : कम तँ नै छिऐ मुदा जकरा मौनसूनक बोध नै रहत ओ जँ हथिया नक्षत्रक बर्खा देखत, से कते काल? रविन्द्र : गप-सपक ओझरी की तियारि जालसँ कम होइए। एक बेर ओझराएत तँ ओकरा फेकै पड़त। अच्छा, ओइ सभ गपकेँ छोड़ू अखुनका गप करू। अनुराधा : जखैन अपन जमीन भऽ गेल तखैन अनेरे आठ हजार भाड़ाबलाकेँ किअए दै छिऐ? रविन्द्र : भरिसक जमीन बेचए पड़त। घर नै बना पाएब। अनुराधा : एना निराश किअए भेल जाइ छी? रविन्द्र : निराश केना नै हएब! ने कोनो बैंकक नोकरी करै छी जे दरमहो बेसी आ कमीशनो भेटत आ ने प्रशासनिक सेवामे छी जइठाम ‘राम-नामक लूट भऽ रहल अछि। अनुराधा : (मूड़ी डोलबैत) हँ से तँ बान्हल दरमाहा अछि। एकटा करू, किछु टयूशने करू आकि कोनो कोचिंगे पकड़ि लिअ। रविन्द्र : ई ने ते बुझै छिऐ जे बर-पीपरक गाछ जकाँ मनुक्खो अछि, चालिस टपि गेलौं। अखन ते चश्मे टाक जरूरत भेलहेँ, आगू तँ बाकिये अछि। अनुराधा : तखन? रविन्द्र : तखन की अहू ते संगे पढ़ने छी। संगीये छी तखन आइ किअए पूछै छी। अनुराधा : पूछब बड़ अधला भेलै। ऐ घरक चिन्ता अपने नै करब ते कियो आन आबि कऽ देत। रविन्द्र : से तँ नै करत मुदा एकटा बात कहूँ जे जइ दिन दरमाहा उन-सँ-दून भेल आ तइसँ दुनू गोटेक मन खुशी भेल। जइ खुशीमे बजारसँ सजा कऽ अनने रही। तइ दिन आमदनी तँ देखलिऐ मुदा खरचा देखिलिऐ। छह महिनासँ घरक भाड़ा विवादमे पड़ल अछि। ओ आठ हजारसँ दस हजार कऽ देलक। बेसी बात नै करब, एकेटा बात कहू जे मोबाइलेमे कते महिना उठैए। अनुराधा : (गुम्म भऽ उपरो-नीचा देखैत आ मूड़ियो डोलबैत..) मूड़ियो डोलबैत। रविन्द्र : गुम्म किअए छी। समाजक पढ़ल-लिखल लोक तँ अपने सभ छिऐ। अनुराधा : हँ, से तँ देखै छी रंग-विरंगक खरचा बढ़ि गेल हेन। एते दिन किताबो-पत्रिका पढ़ि-पढ़ि समए बितबै छलौं आब जे टी.बी. अछि ते बिजलीक लाइने ने रहै छै। रविन्द्र : अपनो मन जना किताब दिससँ उचटले जाइए। एते दिन इच्छा रहैत छलए जे किछु नव चीज पढ़ि विद्यार्थीकेँ पढ़ावी मुदा आब तँ रटले साॅपक मंत्र जकाँ, बकि दै छिऐ। अनुराधा : (रिंग सुनि मोबाइल उठा) हेलो? चन्द्रदेव : हँ, हँ मुम्बईसँ चन्द्रदेव बाजि रहल छी। अनुराधा : (सुखल हँसी हँसि..) आहा हा, चन्द्रदेवबाबू? चन्द्रदेव : हँ, हँ अनुराधा जी? अनुराधा : हँ, हँ, हँ। चन्द्रदेव अहींक शहर आबि गेल छी। एक घंटाक समय खाली अछि तँए सोचलौं जे मिल-जुलि ली। पान-सात मिनटमे डेरा पहुँच रहल छी। अनुराधा : अवस-अवस अबियैक। दोसो डेरेपर छथि। चन्द्रदेव : गाड़ीमे मोबाइल गड़बड़ाइए। आगूक गप डेरेपर हेतै। रविन्द्र : चन्द्रदेव सेठ भऽ गेल। पँच-पँचटा नोकर। अपन तीन-तीनटा गाड़ी। अनुराधा : जेकर भाग चमकै छै तेकरा एहिना होइ छै। रविन्द्र : कहलिऐ ते बेस बात मुदा ई बुझे छिऐ जे एक्के कओलेजसँ निकलल एक गोटे लाखक कमाइ करैए आ एक गोरे पाँच हजारपर शिक्षा मित्र अछि। अनुराधा : हँ, से तँ अछि। (नव मोडलक पोशाकमे चन्द्रदेवक प्रवेश..) रविन्द्र : (दुनू हाथे बाँहि पकड़ि छाती मिलबैत..) भाय, भाय, अहाँ तँ बड़का लोक भऽ गेलौं। चन्द्रदेव : नै-नै भाय, मनुख कतौ रहए मुदा हृदए तँ वएह रहै छै। की अनुराधा जी। अनुराधा : (सरमाइत) चन्द्रदेव बाबू कतए आ अनुराधा कतए। आब ओ सभ पैछला गप स्मृति बनि किछु मनो अछि आ बेसी बिसरिये गेलौं। चन्द्रदेव : मुनेसरक दोकानक छोला आ कपरकट्टा दोकानक गुप-चुप। अनुराधा : जइ दिनक जे भोग-पारस छल भेल। आइ जे अछि से भऽ रहल अछि। चन्द्रदेव : भाय, अपन घर छिअह आकि भाड़ाबला? रविन्द्र : (मलिन होइत..) भाय, एते दिन अशो छल मुदा....? चन्द्रदेव : मुदा की? रविन्द्र : अर्थक जालमे ओझरा गेल छी। गुन अछि जे बेसी धिया-पूता नै अछि। चन्द्रदेव : परिवार नियोजन करा लेलह? रविन्द्र : हँ, मुदा दुइयोटा केँ पाड़ लागब कठिन बुझि पड़ि रहल अछि। चन्द्रदेव : भाय, जते भारी जिनगीकेँ बुझै छहक ओते भारी कहाँ अछि। अपनासँ बेसी वाइफ कमाइए। अनुराधा : ओहो नोकरी करै छथि? चन्द्रदेव : नै। लाइसेंस करा कऽ अपन एकटा ब्रांच खोलने छी। पचाससँ उपरे एजेंट काज कऽ रहल अछि। अनुराधा : पैघ लोकक पैघ बात। रविन्द्र : हमरो कोनो विचार दाए तँ.....? चन्द्रदेव : गाममे की कम सम्पत्ति छह। बेच कऽ लऽ आनह। कहबे केलह जे दू कट्टा जमीन कीनने छी। निच्चा-ऊपर मकान बना लएह। तते भाड़ा हेतह जे घरक काज अनेरे हराएल रहतह। रविन्द्र : भाय, तेना ने तोरा देख हेरा गेलौं जे चाहो-पान पछुआ गेल। (अनुराधा भीतर जाइत..) चन्द्रदेव : जखैनसँ गाड़ीसँ उतड़लौं तखैनसँ बुझि पड़ैए जे गरमे देह झड़कैए। रविन्द्र : की कहबह ऐठामक पानि-बिजलीबला सबहक किरदानी। चन्द्रदेव : से की? रविन्द्र : देखते छहक जे एते गरमी अछि बिजलीक कतौ पता नै। (पािन-चाह आनि अनुराधा टेबुलपर रखैत। तीनू गोटे तीनू दिस बैस, पानि पीब चाह पीबैत..) अनुराधा : चन्द्रदेवबाबू, कते दिनसँ अपनो मनमे नचै छलए जे गामक खेत-पथार बेच, एतै बेबस्था कऽ ली मुदा अपने दुविधामे पड़ल छथि। चन्द्रदेव : से की? रविन्द्र : माए गाममे अछि। जँ हम बेचए चाहब आ ओ नै बेचए दिअए तखन की करब। माए बेटामे झगड़ा करब? अनुराधा : हक-हिस्सा ले तँ लोक बापोसँ झगड़ा करैए आ अहाँ माइयेक गप करै छी। रविन्द्र : बापसँ झगड़ा करब नीक मुदा माएसँ....? (()) चारिम दृश्य- (रागिनीक पुरान घर। बरसातक झमारल..) रविन्द्र : माए, छुट्टी नइए। बरह-बजिया गाड़ीसँ चलि जाएब। रागिनी : एते धड़फराएल किअए छह। एते दिनपर एलह, तखन एते किअए अगुताएल छह। कम-सँ-कम, जहिना कोटमे जते मासक एस्काउन्ट रहल तते दिन कस्टडीमे राखि जमानत भऽ जाइ छै तहिना कम-सँ-कम, दसो दिन तँ रहह। रविन्द्र : अखैन बहुत कड़ाइ कौलेजमे चलि रहल अछि। एते दिन तँ नहियो गेने काज चलि जाइ छलए। आब तँ विद्यार्थी आबह कि नै आबह मुदा प्रोफेसरकेँ जाएब अनिवार्य भऽ गेल अछि। रागिनी : माल-जालकेँ लोक बान्हि कऽ रखैए, मनुखकेँ कियो थोड़े बान्हि कऽ राखि सकैए। अनुराधा : माए, हमसब िकमहर एलियनि से तँ पुछबे ने केलथि? रागिनी : अपनो घरमे लोककेँ एहन बात पुछल जाइ छै जे तोरा सभकेँ पुछबह। अनुराधा : काजे आएल छी। रागिनी : केहन काज, बाजह? अनुराधा : से तँ बेटा सोझेमे छन्हि, पुछि लेथुन। रागिनी : से की बौआ नै सुनैए जे पुछबै। बाजत तँ वएह ने। बिना बजने थोड़े बुझब। रविन्द्र : माए, पाँच बर्ख जमीन कीनना भऽ गेल। सोचने रही जे ऐ साल जमीन कीन लै छी आ अगिला साल घर बना लेब। से गरेपर ने चढ़ैए। रागिनी : से तँ अपने बुझबहक? जे की सोचलौं आ की होइए। हम स्त्रीगण जाति की बुझबै जे घर केना बनाओल जाइए। इहो (अपन घर देखबैत..) तँ अपने (पति) बनाओल छिअनि जे कष्टो काटि कऽ आसरा अछि। रविन्द्र : माए, जहिना अरामसँ कमाइ छी तहिना अरामे सँ खरचो भऽ जाइए। रागिनी : से की? रविन्द्र : कोनो की एक रंगक खर्च अछि। जहिना उन-सँ-दून दरमाहा बढ़ल तहिना ने खरचो उन-सँ-दून भऽ गेल अछि। कतबो बचा कऽ रखए चाही छी, कहाँ बचि पबैए। रागिनी : खाइर, छोड़ह ऐ सभ गपकेँ। की कहलह जे काजे...? रविन्द्र : दुनू प्राणी विचारलौं हेन जे गामक चीज-बौस बेच कऽ घर बना लेब। अनेरे जे एते भाड़ा भरै छी से तँ नै भरए पड़त। रागिनी : ऐठामक जे चीज-बैस बेच लेबह तँ हम कतए रहब? अनुराधा : किअए, हिनका रहैले घर नै छन्हि। बेटा कियो वीरान छिअनि। रागिनी : से के वीरान कहत। मुदा.....? अनुराधा : मुदा की? रागिनी : मनुख दू जिनगी जीबैए। एक बेटा-बेटीक दोसर माए-बापक। जाबे सासु-ससुर जीबै छलाह, ताबे बेटी जकाँ रहलौं। मुदा ई तँ दुनियाँक खेले छी जे सभ सब दिन नै रहत। जहाँ धरि बनि पड़ल तहाँ धरि एक्को दिन सासुक मुँहे अवाच गप नै सुनलौं। अनुराधा : की कहै छथिन से नै बुझि रहलयनि हेन? रागिनी : अमरूक लोकक बात जे पढ़ल-लिखल बुझैत तँ एहिना दुनियाँ रहैत। छातीपर हाथ राखि बाजह जे दस-बारह बरिससँ एको पाइ नूनो-तेल ले देलह? अनुराधा : ई दोख हिनकेटा मे नै, हिनका सन-सन सभ सासुमे आबि गेलहेँ। रागिनी : ऐमे तोहर दोख नै छह, दोख छै जुग-जमानाक विचारकेँ। जेहन जुग हएत तेहने ने विचारो हएत आकि जेहने विचार हएत तेहने ने जुगो हएत। परोछा-परोछी नै बजै छी, सोझमे कहलियह हेन। धरमागती बाजह। (तत्-मत् करैत अनुराधाकेँ देख..) रविन्द्र : माए, तोहर बात कटैबला नै अछि। तखन मनमे यएह रहल जे सभ किछु तँ अछिये तखन जरूरते की पड़तै। रागिनी : तू पुरूख जाति कियाँ-ने गेलहक माइयक छातीकेँ, जे बच्चाकेँ छातीक दूध पीआ ठाढ़ करै छै ओकरा आगूसँ जँ बच्चा हटा लेल जाए तँ ओइ माइक दशा की हएत? रविन्द्र : (मूड़ी डोलबैत) हँ, से तँ हएत। रागिनी : हम तोरा कहाँ कहै छिअह जे कमा कऽ सभटा हमरे दऽ दएह, ओते खगतो ने अछि। तँू नोकरी करै छह, सरकारक काज करै छहक, मुदा पुतोहू बाल-बच्चा। जँ एहेन पुतोहूँ भगवान दथि जिनकर हाथक भोजन पइठ नै हुअए तइसँ नीक जे नहिये दथि। रविन्द्र : से कि, से की माए? रागिनी : किछु ने। रविन्द्र : मनमे एते दुख नै कर। रागिनी : दुखो वएह नीक होइ छै जइसँ किछु भेटै छै। जइसँ किछु भेटल नै तइसँ नीक जे मनमे दुख अबै ने दी। जहिये अपने (पति) संग छोड़लनि तइ दिन मनकेँ बुझा देलिऐ जे संग पूरैक हाथ जे पकड़ने छलाह तिनकासँ हाथ छुटि गेल। अनुराधा : माए, अनेरे ई सोग अरजि-अरजि बोझ बना माथपर रखने छथि। रागिनी : हमहीं किअए राखब, सभ बाप-माए, दादा-दादी अपन अगिला परिवारक बोझ माथपर रखैए। दस बर्खक पोता अछि, जेकरा आइ देखलौं हेन। यएह मनोरथ भगवान देलनि। अनुराधा : अपने नै जाइ छथि आकि हम सभ मनाही करै छिअनि ? रागिनी : मनाही दू रंगक होइ छै, एकटा होइ छै जे मुँह फोड़ि कहब आ देसर होइ छै उनटा बात-विचार। पहुँनाइयो लाथे जे जाएब से ने काहे-कूहे बाजए अबैए आ ने एकोटा चिन्हार लोक भेटत। अनुराधा : हम सभ जे छिअनि ? रागिनी : कहलौं तँ बेस बात मुदा बेटा-पुतोहू आकि परिवारक आने, सभकेँ एक सीमा छै। सीमा भीतर गपे कते रहै छै। मुदा चौबीस घंटाक दिन-राति छोट तँ नै होइए। अनुराधा : फेर लोकक आएब-जाएब रहै छै आकि नै? रागिनी : की उत्तर देबह। रविन्द्र : किअए, किअए माए चुप भेलँह? रागिनी : चुप की हएब। तँू सभ चुप केने छह। जइ घरमे जन्म लेलह, खेललह-धुपलह, पढ़ि-लिख नोकरी पौलह, ओही घरकेँ बिसरि गेलह। रविन्द्र : की करबै तते काज बढ़ि गेल अछि जे नीनो हराम भऽ जाइए। रागिनी : हम से कहाँ किछु कहै छिअह। मुदा कान खोलि दुनू बेकती सुनि लाए जे जहिना अपने (पति) अपन लगाओल गाछीमे बास करै छथि तहिना हमहूँ बास करब। जहिना तूँ अपन मनक मालिक छह तहिना हमहूँ छी। रविन्द्र : आशा लगा आएल छलाैं। रागिनी : तोहर आशा भग्न कहाँ होइ छह। अखने आँखि मूनब, सभटा तँ तोरे हेतह। हमरो तँ जिनगी अछि। जिनगीक लेल तँ सभ कथुक बेगरता सभकेँ रहै छै। रविन्द्र : आब कते दिन....? रागिनी : जिनगीक कोनो ठेकान अछि, अखनो टन कहि देब आ पच्चीसो पचास बर्ख जीब सकै छी। तइले.....? (पीपरावाली माथपर छिट्टा लेने प्रवेश...) पीपरावाली : दादी, भगवान हिनका भल करनु बड़बढ़ियाँ कमाइ भेल। दुनू भाए-बहिनकेँ आंङी-पेंट कीनि देलिऐ। रागिनी : भगवान भल करथुन। मुदा उसरलमे एहल। आब कहाँ कोनो बरतन-बासन रहल। जतबेक बेगरता होइए ततबे अछि। रविन्द्र : घरक सभ बरतन बेच लेलेँ माए? रागिनी : मनसँ नै हटै छलए, मुदा दोसर उपाइये की? रविन्द्र : आब केना चलतौ? रागिनी : अखन तक ते बरतने-वासन सठल। अखन गहना-जेबर तँ अछिये। जकरा बेसी छै ओकरा लेल गहना श्रृंगारक बौस छिऐ आ जकरा नै छै तेकरा लेल पेटेक आगि मिझबैक सम्पत्ति। रविन्द्र : कोन वस्तु छलै कनियाँ, जे बढ़िया कमाइ भेल? पीपरावाली : काका, हिनकासँ लाथ कोन। जहिना दादी तहिना ने इहो छथि। तामक तमघैल छलै। अनुराधा : आब तँ तामक दाम बहुत बढ़ि गेल अछि। रविन्द्र : कोन चीज सस्त रहल। रागिनी : बौआ, से बात नै छै, महग बौस सस्ता भऽ गेल आ सस्ता वस्तु महग। अनुराधा : से की? रागिनी : की कहबह। जखन मनुखे अपन मोल नै बुझैए तखन चरचे की ? ((समाप्त)) ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। १.अच्छेलाल शास्त्री-रणभूमि आ कविता नामक शीर्षक कवितापर दू शब्द २.नवेंदु कुमार झा -१.चीनी निगम क मिठास सँ दूर निवेशक, नीलामीक बढ़ल समय सीमा २. केसीसीक लेल लागल शिविर ३.उत्तर बिहार तीन टा रेल लाइनक दोहरीकरणक प्रयास मे आएल तेजी १ अच्छेलाल शास्त्री रणभूमि आ कविता नामक शीर्षक कवितापर दू शब्द अच्छेलाल शास्त्री- १९५६ गाम- सोनवर्षा, पोस्ट- करहरी भाया- नरहिया, जिला- मधुबनी (बिहार) “रणभूमि” कविता पढ़ि कविक भावसँ हृदए विभोर भऽ उठल। काव्यक गहराइमे गोंता लगेलासँ देखबामे बहुत किछु आएल। श्री जगदीश प्रसाद मण्डलक काव्य भू-मंडलकेँ प्रभावित करैत अछि। संसारक रणभूमिमे मनुष्यक जिनगीकेँ राखि भौतिक, अध्यात्मिक अर्थ ज्ञानसँ कर्म वा धर्मपर ध्यानाकर्षण करबैत अछि। विवेकसँ संसार समरमे सामर्थवान योद्धा बनबाक प्रेरण देल अछि। मातृभूमिक समस्याकेँ समूल निदानक लेल कर्मवाण चला भंग संग गमक उपमा दऽ असत्यपर सत्यक विजयक महाभारतक उदाहरण दिएलन्हि अछि। मनुष्यक लेल शकल वसुधाकेँ सुख भोग क्राति लेल, सतत् सचेष्ट भऽ जग रणमे, कर्मवीर बनबाक प्रेरणा देलन्हि अछि। तन-मन वतन केर पवित्रतापर जोड़ दैत विष अमृत पहिचानि विवेकसँ समए धरातलपर उतरल समस्याकपर सचेष्ट करौलनि अछि। “कविता” शीर्षक कवितापर- श्री जगदीश प्रसाद मण्डल जी सम्पूर्ण कविवृन्दकेँ अपन मनोभावनासँ चिताकर्षण करौलन्हि अछि। काव्यक सृजनात्मक विधाक दिशा िनर्देश कएलनि अछि। मन स्थिति भावनाक प्रवाहमे ित्रवेणी संगममे पाठक संग रचनाकारकेँ गोंता लगौलन्हि अछि। छंद अलंकार वाणी आनन्द युक्त कवितापर जोर देलन्हि अछि। २ नवेंदु कुमार झा १ चीनी निगम क मिठास सँ दूर निवेशक, नीलामीक बढ़ल समय सीमा
बिहार राज्य चीनी निगम क बंद पड़ल चीनी मिल क नीलामीक चारिम चरण में 9 मिलक नीलामी करबाक निर्णय सरकार लेने छल। एहि लेल नीलामी क समय सीमाक भीतर निवेशक कम रूचि देखौलाक बाद सरकार नीलामी क तिथि बढ़ा देलक अछि। नीलामी चारिम चरणक आवेदन पत्रक बिक्री क तिथि 24 अक्टूबर छल। जकरा बढ़ा क आब 30 नवम्बर सं बढ़ा क 22 दिसम्बर कऽ देल गेल अछि। गन्ना आयुक्त विमलानन्द झा जनतब देलनि अछि जे पहिने घोषित 24 अक्टूबर कऽ अंतिम तिथि धरि 18टा निवेशक एहि मिलक नीलामी मे रूचि देखौनि छलाह। आब जखन कि समय सीमा बढ़ा देल गेल अछि निवेशक संख्या बढ़बाक उम्मीद अछि आ उम्मीद अछि जे नव समय सीमा कऽ अर्न्तगत अंतिम समय धरि गोटेक 50टा निवेशक एहि नीलामी में सम्मिलित भऽ सकैत छथि। सरकार प्रदेश मे बंद पड़ल चीनी निगमक 9टा मिल लोहर, गोरौल, सीवान, न्यू सीवान, वारसलिगंज, हथुआ, गुरारू, समस्तीपुर आबनमनखी स्थित चीनी मिलक नीलामी चारिम चरण मे कऽ रहल अछि। एहि सँ चीनी मिगम के 278 करोड़ टाका भेटबाक उम्मीद अछि एहि मिल सभक वास्ते निवेशक के आकर्षित करबाक लेल सरकार कतेको छूट सेहो दऽ रहल अछि। एहि मिल सभके पहिने 60 वर्षक लेल पट्टा पर देल जाएत आ बाद मे निवेशक मांग पर एकरा 30 वर्षक लेल बढ़ालओल जा सकत। एहि जमीनक उपयोग निवेशक अपना मर्जी सँ उद्योग लगबइ लेल कऽ सकताह। चीनी निगमक बंद पड़ल 15 चीनी मिल मे सँ 6 मिलक नीलाम पहिनहि तीन चरण मे भऽ चूकल अछि। प्रदेश मे 1997 40टा चीनी मिल छल जाहि सँ ओहि समय से प्रति वर्ष 3 लाख टन चीनी कऽ उत्पादन होइत छल मुदा वर्तमान मात्र 12टा चीनी मिल कार्यरत अछि आ 6 लाख चीनीक उत्पादन भऽ रहल अछि। एहि तरहे कुसियारक उपज पहिने 40 लाख टन प्रति हेक्टेयर छल जे एखन 57 लाख टन प्रति हेक्टेयर भऽ गेल अछि। अगिला दू वर्ष मे कर्नाटक आ महाराष्ट्र जकां 100 लाख टन प्रति हेक्टेयर कुसियार उपजक लक्ष्य राखल गेल अछि। एहि मध्य प्रदेश मे अगिला मौसम सँ पाच टा चीनी मिल सँ हरिनगर, रोगा, लौरिया, नरकटियागंज आ सुगौली चीनी मिल सँ प्रतिदिन 270 लीटर इथनाल कऽ उत्पादन प्रारंभ भऽ जाएत। एहि मिल सँ स्प्रिट कऽ उत्पादन सेहो प्रारंभ होएत। २ केसीसीक लेल लागल शिविर बिहार सरकार प्रदेशक सभ किसान के वर्त्तमान वित्तीय वर्षक अंत धरि किसान क्रेडिट कार्ड (केसीसी) उपलब्ध करैबाक लेल प्रयास मे तेजी अनलक अछि। एहि वास्ते जिला स्तर पर जिलाधिकारीक अध्यक्षता मे अनुश्रवण समिति गठित करबाक निर्देश देल गेल अछि। एहि समितिक बैसक सभ मास मे होएत जाहि मे केसीसी बटबाक कार्यान्वन आ अनुश्रवण सुनिश्चित कएल जाएत। अगिला मास 7 सँ 18 नवम्बरक मध्य प्रखंड सभ मे आयोजित कएल जाए वाला कृषि उत्सव मे केसीसीक लेल शिविर लगाओल जाएत। उप मुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी अधिकारी सभके निर्देश देलनि अछि जे 9 दिसम्बर 2011 आ 9 जनवरी 2012 के सभ प्रखंड मुख्यालय मे मेगा किसान क्रेडिट कार्ड शिविर आयोजित आयोजित करथि। कृषि विभागक विषय वस्तु विशेषज्ञ आ कृषि सलाहकार किसान सभ सँ केसीसीक लेल आवेदन पत्र लऽ बैंक के उपलब्ध करौताह। बैंक के सेहो किसान सभ सँ सीधा आवेदन लेबाक निर्देश देल गेल अछि। बैंक के भेटल आवेदन कऽ निपटारा जल्दी कऽ दस दिनक भीतर किसान क्रेडिट कार्ड देबऽ लेल कहल जाएत। ३
उत्तर बिहार तीन टा रेल लाइनक दोहरीकरणक प्रयास मे आएल तेजी पूर्व मध्य रेलवे उत्तर बिहारक तीन टा मुख्य रेल लाइनक दोहरीकरणक प्रयास मे तेजी अनलक अछि। पूर्व मध्य रेलवेक सोनपुर मंडल महत्वपूर्ण मुजफ्फरपुर सँ हाजीपुरक मध्य रामदयाल-हाजीपुर रेल लाइनक दोहरीकरणक लेल तेसर बेर रेलवे बोर्ड के प्रस्ताव पठौलक अछि। 50 किलोमीटर कऽ एहि रेल लाइन पर 172 करोड़ टाका खर्च होएबाक संभावना अछि। एकर अलाबा सोनपुर मंडल द्वारा हाजीपुर-बढ़बाड़ा, आ कोसी रेलपुल (कटरिया-कुरसेला) रेल लाइनक दोहरीकरणक प्रस्ताव के अगिला रेल बजट मे स्वीकृतिक लेल पठौलक अछि। ज्यो एहि तीनु प्रस्ताव के स्वीकृति भेटि जायत तऽ सोनपुर मंडल सँ गुजरऽ बाला सभ रेल लाइनक दोहरीकरण भऽ जायत। एहि तीनु लाइनक दोहरीकरणक लेल मंडल कार्यालय तीन वर्ष सँ प्रयासरत अछि। वित्तीय वर्ष-2010-11, आ 2011-12 मे एहि लाइनक दोहरीकरणक प्रस्ताव पठाओल गेल छल जकरा रेलवे बोर्ड खारिज कऽ देने छल। रेल मंत्रालयक कमान बिहारक हाथ सँ छुटलाक बाद बिहारक प्रति रेलवेक उदासीनता सँ मंडल आ क्षेत्रीय कार्यालयक प्रयासक कोनो सकारात्मक प्ररिणाम नहि नकलल।एक बेर फरे वित्तीय वर्ष-2012-13क बजट मे एहि तीनू लाइन के स्वीकृत करैबाक लेल सोनपुर मंडल प्रयास सएलक अछि। गोटेक 541 करोड़ टाकाक संभावित खर्च बाला एहि तीनू रेल लाइनक दोहरी करण मेला सँ उत्तर बिहार सहित सम्पूर्ण मिथिलांचल मे आबाजाहि आसान भऽ सकत। एखन ई तीनू रेल लाइन पर सिंगल टैªक अछि जाहि सँ एहि तीनू लाइन पर टैªकक कमीक कारण गाड़ी सभ कतेको घंटा धरि फसल रहैत अछि। एहि योजना कें पूरा मेला सँ एहि रेल लाइन पर माल गाड़ीक परिचालन मे सेहो सुविधा होएत। पूर्व मध्य रेलवेक अन्तर्गत एखन सोनपुर-हाजीपुर आ कुरसेला-काढ़गोलाक रेल लाइनक दोहरीकरणक काज चलि रहल अछि। दोहरीकरणक लेल प्रस्तावित हाजीपुर बछवाड़ा रेल लाइनक 60 किलोमीटरक दोहरीकरण पर गोटेक 28 करोड़ टाका आ कोसी रेल पुल (कटरिया-कुरसेला) दोहरीकरण पर गोटेक 81 करोड़ टाका खर्च होएबाक अनुमान अछि। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। नवीन ठाकुर, गाम- लोहा (मधुबनी ) बिहार, जन्म - १५-०५-१९८४, सिक्षा - बी .कॉम (मुंबई विद्यापीठ), रूचि - कविता , साहित्यक अध्यापन एवं अपन मैथिल सांस्कृतिक कार्यकममे रूचि। कार्यरत - Comfort Intech Limited (malad) (R.M. ) मिथिला उवाच पुरवा बहि रहल अछि चंडाल जकां सायं-सायं कऽ रहल अछि जेना दौगि रहल अछि .....आतुर भऽ - व्याकुल भऽ, हरा गेलैए किछु ..ताकि रहल अछि जेना !
सुखा गेल मुँह , नाक , कान सभटा , पैर तरक धरा मे दरार पड़ि गेल अछि....सौंसे खेत मे , छाती फाटि कऽ कानि रहल अछि जेना बुझा रहल छै सीता एखने गेलीहेँ धरतीमे फांक दऽकऽ !
मूड़ी ऊपर उठेलहुँ तँ लागल जेना चुनरी ओढा देलक कियो मुँहपर .........!
हे भगवान् बज्जर खसौ ई करिया बदरा केँ। सभ दिन कऽ अपन सकल देखा कऽ ...मुँह दुइस कऽ भागि जाइए! कनेकबो दर्द नै छै कोंढ़मे बेदर्दाकेँ ......!
आह ..हा ...नाक पर एगो शीतल बूंद खसल ओढ़नी सँ चुबि कऽ .......मोनक भ्रम अछि की ..... तखने दुनु पपनीपर खसल जेना कहि रहल अछि, उठू, आब नै सताएब हम अहाँकेँ किया एतेक अन्धेरेज
भेल अछि .....संतोख भेल भीतरसँ कने !
ठनका ,ठनकल जोरसँ तखने ........!
कतऽ गेल गै छौड़ी ........अमोट सुखाइ छौ अंगनामे उठा ले ने, पाइन एलै...... भिजलौ सभटा !
यै भौजी, असगनीपर सँ कपड़ा उतारू सभटा ..........भिजल ........( अमोट उठबैत एगो भौजीयोकेँ काज अरहेने गेल दुलरिया )
एक अछार बरिस कऽ रुकि गेल तँ निकलि गेलौं खेत दिस कने .......... आह हा ........ह्रदयक गहराइ तक उतरि गेल ओ सोन्ह्गर माटिक सुगंध पहिल अछारक बाद दबने छल जे बहुत दिनसँ भीतरमे !
मृग मरीचिका जेना भटकलौंहेँ कने काल ....., ओर ने कोनो छोर ओइ सुगंधक ,... सजि-धजि कऽ बैसल अछि जेना मिलनक आसमे प्रेमीक बाट तकैत...
चारु दिस सुन्न पड़ल अछि खेत, नबका फसलक इंतजारमे!
सरजू काका महिना भरिसँ हरक शान चढ़ा रहल छथि फारक, बड़द सभकेँ खुआ-पिया कऽ टनगर बनेने निङहारैत छलथि आकाश .. सभ दिन चारू दिशामे घूमि कऽ बरखाक आसमे,
लिअ आइ बरसि पड़ल ! राति भरि कतेक बरसल नै बुझि पड़ल , मुदा निन एहन पड़लौं जेना काल्हिये बोर्डक परीक्षा खतम भेल ......!
भरि गर्मीकेँ निन आँखिमे घुरमैत छल !
भोरे उठि दलानपर बैसि कऽ चाह पिबैत रही.....चन्दन बाबू कान्हपर कोदारि नेने दौगल जाइत छलाह बाध दिस ...... टोकलियनि तँ इशारामे किछु कहि कऽ भागि गेला ..... आन दिन चाहक नामपर बिन बजेन्हो टपकि पड़ैत छलथि .......आइ की भऽ गेलनि!
हे यौ, ई चन्दन बाबूकेँ की भऽ गेलनिहेँ, भोरे -भोरे .....- सरजू काका ओम्हरसँ अबैत रहथि, पुछलियनि।
हौ बौआ हुनकर खेतक पाइन सभटा बहल जाइत छनि, गेलाहेँ आइर बान्हऽ , ..........ओहो सुआइत.!
संझाक बेर बिदा भेलहुँ पोखरि दिस .....लागल, बेंगक अज्ञातवास खतम भऽ गेल .......टर्र.. टर्र ... करैत खत्ताक ओइ पारसँ अइ पार तक ......... सुर ताल देबऽबलाक कमी नै, सभ एकै साथे प्रतियोगितामे ठाढ़ भेल जेना !
सबहक धानक बीया खसि पड़ल .........लुटकुन बाबूक बीया बड़ जोरगर छनि ....हेतै कोना ने, बेचारा ..राति दिन एक कऽ कऽ छाउर आ गोबरसँ खेतकेँ पाटि देने छलखिन! हुनकर खेतो तँ सभसँ पहिने गाममे रोपा जाइत छनि ...!
आइयो कादो कऽ कऽ एलैथहेँ .......झौआहमे ..!
गमछामे किछु फड़फराइत देखलियनि.....पुछलियनि काका की अछि तौनी मे ......?
हौ, खेत मे बड़ माछ छल गमछा सँ माँरलहुँहेँ ! काल्हि निचका बला खेत मे चास देबै, भेज दिहक छोटका केँ, बड़ माछ छै ..ओहू खेत मे !
ठीक छै ......कहलियनि ......!
मंगनीक माछ खाइमे बड़ मोन लगै छै मुँहमे पाइन आबि गेल सुनि कऽ!
जल्दी अबिहेँ, मशाला पिसबा कऽ रखने रहबौ ..............( छोटका केँ जाइत-जाइत कहलिऐ। ) ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। ३. पद्य ३.१.१. झा हेमन्त बापी २.जगदानंद झा 'मनु'३. राहुल राही ४.शांतिलक्ष्मी चौधरी ५. जवाहर लाल कश्यप ३.२.१.इरा मल्लिक २ओमप्रकाश झा ३.उमेश पासवान ३.३. १. जगदीश चन्द्र ठाकुर ’अनिल’ २.मिहिर झा ३.४.१.शिवशंकर सिंह ठाकुर २.अमित मोहन झा ३. राजदेव मण्डल ३.५.१.स्तुति नारायण २.विकास झा रंजन ३.जगदीश प्रसाद मण्डल ३.६.१. प्रभात राय भट्ट २.उमेश मण्डल ३.७.१.डॉ॰ शशिधर कुमर २ पंकज कुमार झा ३.नवीन कुमार "आशा" ३.८. १.रामदेव प्रसाद मण्डल ‘झारूदार’ २.अच्छेलाल शास्त्री ३.शिवकुमार झा ‘टिल्लू’ ३.१.१. झा हेमन्त बापी २.जगदानंद झा 'मनु'३. राहुल राही ४.शांतिलक्ष्मी चौधरी ५. जवाहर लाल कश्यप १ झा हेमन्त बापी जेकर नै कएल जाएत बखान विद्यापति सन जतए कवि महान मण्डन मिसरक जनमक थान जे अछि विदेह जनक केर धाम
मिसरी सन वणी जाहि ठाम के बनला पहुन राम ओहि ठाम के जननि जतए माँ सिया भेली जाहि ठाम गंगा चलि कऽ ऐली जतए छ्ल- छ्ल, बहि रहल अछि कमला , कोसी, जीबछ, बलान
हर आङन तुलसीक चौड़ा घर घर होअए चण्डी पाठ जतए माँ सरस्वतीक बास जाहि ठाम एहन सुन्नर कहु ठाठ कतए
दही चूड़ाक भोग जतए भिनसरे लैथि भगवान सगरे जगत मे कतए भेटैए रसगुल्ला, माँछ, पान, मखान
कतौ सोहर कतौ बट गबनी कतौ चैता, फगुआ, बरहमासा समदाओनक राग कतौ सॅ कतौ सांझ,पराति, छमासा
छठि,दिवाली,दुर्गा पुजा फगुआ आ सौराठक मेला कतै पायब साम-चकेवा आ झीझिया के खेला
स्वर्ग सनक ई नगरी बापि नै पायब दोसर ठाम गर्व सॅ कहु जै मिथिला ,जै मैथिली, जै जै मिथिला धाम २ जगदानंद झा 'मनु', पिता- श्री राज कुमार झा, जन्म स्थान आ पैत्रिक गाम : हरिपुर डिहटोल ,जिला मधुबनी, शिक्षा :प्राथमिक -ग्राम हरिपुर डिहटोल मे, माध्यमिक आ उच्च माध्यमिक -सी बी एस ई, दिल्ली, स्नातक -देशबंधु कालेज ,दिल्ली बिश्वविद्यालय १ हम मौन किएक छी हम मौन किएक छी हम चुप किएक छी निष्ठुर हमर समाज बनल अछि निराकार सरकार निर्लज सोनित आताताइ निर्भीक गुंडा राज हम मौन किएक छी हम चुप किएक छी परवाशी बनि हम रहब कतेक दिन दूर - पड़ायब कतेक दिन हमर समाज हमहि सुधारब हमर सरकार हमहि बनायब आताताइ गुंडा केँ आब हमहि सतायब हम मौन किएक छी हम चुप किएक छी | २ मिथिला राज हम धीर-वीर बलवान मैथिल मिथिला राज चाहैत छी, ई हमर भीख नहि बुझु अधिकार अपन माँगै छी, जाहि दिन धीर हम अधीर भेलौंह वीर हम वीरता देखा देब नहि, फेर विश्वास करू हमर की एक चाणक्य हम आर बना देब।
३ गुमान बहुत गुमान अछि हम मैथिल छी मिथिला हमर शान अछि उदितमान ई अछि धरती पर कोनो स्वर्ग समान अछि ! कण-कण खल-खल कोसी कमला बुझु एकर पहचान अछि जनक-जानकी आ विद्यापति मिथिलाक सिर केर पाग अछि ! भक्ति रसक कथा की कहू स्वयं संकर चाकरी केने छथि एकर विद्वता जुनि कियो पुछू मंडनमिश्र आ अजानी भारतीक नाम बिख्यात अछि ! ३ राहुल राही, पिताक नाम - श्री हरिश्चंद्र झा गाम- माऊंबेहट, मनीगाछी, दरभंगा, स्थायी निवास - दरभंगा , बिहार ., वर्तमान निवास - सेलम , तमिलनाडु हमर प्रियतम ! प्रियतम ! अहाँ कतेक नीक छी / कतेक विश्वासी आ अपन कहल पर सटीक छी . कि हम आंखि बंद कय कऽ कय सकैत छी / अहाँ पर विश्वास . कि जहिना पछिला जन्म मे / ओकर पछिला जन्म मे / आ जन्म-जन्मान्तर सँ हर जन्म मे . अहाँ हमरा सँ भेंट करैत एलौं / अपन वचनक अनुसार . आ हमरा मिलाबैत एलौं / ओहि परम आनंद सँ / जतय कोनो दर्दक अनुभूति नहि रहि जाइत छै / कोनो अपूर्ण इच्छाक टीस नहि रहि जाइत छै / एकटा तृप्ति होइ छै जीवनकेँ जी लेबाक / आ संतुष्टि होइ छै अहाँकेँ पाबि सब किछु बिसरि जेबाक .
जेना अहाँ कहियो हुसलौं नहि अपन वचन सँ / जेना अहाँ कहियो भटकलौं नहि अपन कर्त्तव्य सँ .
ओहिना / जखन कोनो अप्पन के बिछड़बाक दुःख गहीर उतरि कऽ करेजा मे भूर करय लगै / जखन ककरो उपकारक कर्ज मन-ओ-मस्तिष्क केँ अपना बोझक निच्चा दाबि मरदय लगै / जखन ककरो वचन दय अंतिम समय पर नहि भेंट कय पेबाक टीस अपराध-बोधक आगि मे जराबय लगै / आ जखन ककरो लेल किछु करबाक प्रेममय तीव्र इच्छा दम तोडि मिसिया-मिसिया कय मरबा लय बाध्य करय लगै / तखन अहाँ आयब आ हमरा सम्हारि लेब / देखू हमरा तिल-तिल कय मरय नहि देब .
हमरा विश्वास अछि / अहाँ आयब आ हमरा सम्हारि लेब / अहाँ हमरा मिसिया-मिसिया कय मरय नहि देब .
किएकि / हमर तँ जिजीविषाक श्वास-नलिये टूटि गेल छल / तखन सँ अहींक देल भरोसाक सांस पर तँ जीबि रहल छी .
कतेक अहाँक प्रशंसा करू / कोना अहाँकेँ धन्यवाद कहू / किछु बुझबामे नहि आबि रहल अछि .
मुदा अहाँ समय सँ आबि जायब / देखू , आबै मे देरी नहि लगायब .
हे हमर प्रियतम ! हे हमर मृत्यु ! ४ श्रीमति शांतिलक्ष्मी चौधरी, ग्राम गोविन्दपुर, जिला सुपौल निवासी आ राजेन्द्र मिश्र महाविद्यालय, सहरसा मे कार्यरत पुस्तकालयाध्यक्ष श्री श्यामानन्द झाक जेष्ठ सुपुत्री, आओर ग्राम महिषी (पुनर्वास आरापट्टी), जिला सहरसा निवासी आ दिल्ली स्कूल ऑफ इकानोमिक्स सँ जुड़ल अन्वेषक आ समाजशास्त्री श्री अक्षय कुमार चौधरीक अर्धांगिनी छथि। प्राणीशास्त्र सँ स्नातकोत्तर रहितो शिक्षाशास्त्रक स्नातक शिक्षार्थी आ एकटा समाजशास्त्री सँ सानिध्यक चलिते आम जीवनक सामाजिक बिषय-बौस्तु आ खास कऽ महिलाजन्य सामाजिक समस्या आ प्रघटनामे हिनक विशेष अभिरूचि स्वभाविक। गज़ल १ पले पल अपन अंतर्मनक आगि मे सुनगैत अंशुमाला भs गेलहु खने हर्ख स्मृतिक, खने दुखक आगि मे पजरैत, अंशुमाला भs गेलहु
जीवनक बदलैत मौसमक डुबैत-उगैत चान सुरुजक रूप धs खने स्याह अन्हार, खने इन्द्रधनुखक विहुँसैत अंशुमाला भs गेलहु
अल्हड़ कुमारिक सिहरैत सर्दी मे जाधरि गुदगुदी रहैक मुस्कैत लोक कहै हम ओसाइत इजोरियाक ठहकैत अंशुमाला भs गेलहु
मधुगंध आ नव आस लs कs जखन आयल बियाह राति केर बसंत मोन मे रहै भ्रम हम उखा-अरूषक बिहुँसैत अंशुमाला भs गेलहु
प्राणक प्यास आ टुटल आस लs कs जखन आयल गुरदा-रोगक ग्रीष्म पीय विस्वासघातक प्रचंड दुपहरी मे जड़ैत अंशुमाला भs गेलहु
शुभेच्छुक आशीख आ मायक वात्सल्य वरखा आपस अनलैथ पावस हम घुरि नव उम्मेदक दियाबाति मे टिमकैत अंशुमाला भs गेलहु
"शांतिलक्ष्मी" कहैथ स्त्रीशक्तिक पावनि तिहार लs घुरि आयल अछि जाड़ मानु हे सखि, अहाँ तँ धुमन आरतीमे गमकैत अंशुमाला भs गेलहु
.........................वर्ण २७....................
(अपन अनचिन्हार सखि अंशुमाला झा केँ समर्पितl एहि गजल मे अंशुमाला शब्दक प्रयोग कतहुँ व्यक्तिवाचक नहि अछिl शाव्दिक अर्थक अनुसार शब्दक प्रयोग प्रकाशक लड़ीक रूप मे भेल अछिl) २. पुत कपुत एना हेबै तँ कोना चलतै माय विदेह केँ कनेवै तँ कोना चलतै
माय मरै भुक्खे, पड़ै अहाँकेँ की अंतर मोन केँ ऐना जँ बौरेबै तँ कोना चलतै
परदेस भल्हौं होइ अहाँ मुँहपुरुख निजदेस सँ जँ परेलै तँ कोना चलतै
मानलौं माय भेली पिछिता अहाँ अधुना माय केँ तेँ दुतकरवै तँ कोना चलतै
पड़ोसी भेली धनुखैनि माय दलिदर तेँकि माय केँ जँ छोड़वै तँ कोना चलतै
अपनाकेँ खोरनाठी अनका सिक्कीपंखा ई दुई रीत जँ चलेबै तँ कोना चलतै
माय-बापे सँ होइ छै सुजन परिचय माय-देसक नै ठेकानै तँ कोना चलतै
बुझलौ जे रोटी लेल छै ई सभ चटुता कर्ज दुधेक नै चुकेवै तँ कोना चलतै
अपना मोने मे छै नीति अनीतिक रीत पुत सुमातेक बोहेतै तँ कोना चलतै
"सभ्य"केर कुभाखा मोन केँ लागै सुन्दर भाखा मैयेक जँ हरेलै तँ कोना चलतै
भाखा आन खेलकै कतै सरकारी टाका मैथिलि खैरातो बिलोलै तँ कोना चलतै
"शांतिलक्ष्मी" कहती अहाँसँ बस एतबे स्वगौरव अहीं दबेबै तँ कोना चलतै
.................वर्ण १५............... कविता वियाह मैथिल धराक मुइल सभागाछी, जनमलाह नवरूपक अवतार लs इन्टरनेटक ’मेट्रीमोनियल साइट’ आ प्रिंट-मिडियाक रविवारीय पन्नाक वैवाहिक विज्ञापन/कथा-उथान मेl तयौ सभ पर भारी छै आइयो घरकथाl गान्धर्व वियाह छै एखनो झाँपले-तोपल, शरशय्या सौराठक अपन करूण व्यथाl मिथिलाक सुयोग कहावै वाला वरगण केँ चाही मनपसंद अधुना-अर्वाचीन कनियाँ, तकै जाइत छथि वैवाहिक-विज्ञापन सँ सुन्नरि, अंग्रेजी स्कुल-कालेज शिक्षित, मुदा अपन ’कल्चर-ट्रेडिशन’ मे ’वेल-ट्रेन्ड’l आधुनिक वर मे पसरैत ई छै नव ’ट्रेन्ड’l पुरुखगण पकरै छथि बदलैत समयक नब्ज़, कनियाँ देशी वयना मे फ़ेटल अंग्रेजी शब्दl सुन्नरिक अटपट परिभाषा छैक जटीलl वरक अप्पन आ घरक लोकक पसिन्न- होइ छैक अकसर मुरी मुरी मतरभिन्नl कटगर मुँह-कान, होइ पतरका नाक-ठोर, ललकी गोराइ होइ आकि दक-दक गोरl आमक फ़ारा आ डोका सन-सन आँखि, नमगर-छहरगर, मुँहक खिलता पानिl घिचल-घिचल आंगुर, हाथ-पारि सुकुमार, शैलज्ज, शालिन, सददि हँसमुख व्यवहारl सुचेष्टा, चलव-बुलब, पहिरव-ओढ़व आर- गप्पे-सप्प सँ बुझाइत नीक आचार-विचारl बढिया होइक जवानियो केर लहरैत उफान, छौड़ीक देह मे होइ देखनुगर वयसक चढ़ानl यौवन धन होइक उत्तम/सवोत्तम, सोहनगर, लड़की भेटय परम सुपवित्र, देहक रौनकगरl अंग्रेजी स्कुल-कालेजक शिक्षिता चाहीl नोकरिया वरक बेशीतर नोकरिये मन, तहु मे जेहने अपन नोकरी तेहने पसन्नl वा पढ़ैत इंजीनियर, डाक्टर, एम.बी.ए., आकि एम.ए.सी. इन माइक्रोबाइलोजीl मास्टर डिग्री इन सोसलसाइंस/सोसलवर्क, वा स्पेसल ट्रेनिंग इन ह्युमेन-साइकोलोजीl नहि तँ कम सँ कमतर इयह सेहन्ता- बी.एड. होइ, आनि कि स्कुली शिक्षिकाl ग्रेजुएट तकैत जाइत छथि केहनो ग्रेजुएट मास्टर धारी केँ चाही साइंस/आर्ट मास्टरl गाम-घरक मुरखो-मोचन्ड आब माँग करै हमर कनियाँ हुअय पढ़ल-लिखल साक्षरl अपन ’कल्चर-ट्रेडिशन’ मे ’वेल-ट्रेन्ड’l एहि मादे बिना दुविधे बुझु जे ऐहन- सीता, सावित्री, गौरी सनक हुअय पतिव्रता, भारती, मैत्रेयी, गार्गी सनक सुबुद्धिमताl सास-ससुरक सेवा सँ कखनो नै औगताय, कुल-मान हेतु केहनो बिपत्तिये नै घबरायl पर-पाहुन संग करैथ उचित व्यवहार, माय बाप सिखेनै हेथीन मिथिलामक आचारl बुझैथ पुजा-पाठ, उपास-हरिवास, पावनि-तिहार, आर आनो-आन छै मैथिलाक मेहका सँस्कारl गोसौनीघर, पंचमुख/कृतमुख/पार्थिव महादेव, शुभ/अशुभक अरिपैन, आ जनैथ सामा-चकेवl सौहर, समदौन, रास, गवैथ फ़ागु, चेतार, गोसाउनिक गीत, बुझैथ मैयाक सोलहो श्रृंगारl हवाबड़ी, अदौरी, कुम्हरौरी बनैब मिथिलामेक अंग, बिलिन नै हुअए जनउ बाँटब, माजब, रंगैय तंतl मैथिल ’कल्चर-ट्रेडिशन’क ओना बड़-बड़ गुण, कनिया हुअय एहि सभ कला मे अधछिधो निपुनl वरक विज्ञापन मे ओना नै भेटत दहेजक चरचा, पाय खरच नै हैत- ताहि लेल नै रहु दुमरजाl बेटी जँ जनमेने छी तँ ई स्पष्ट बनै छै आधार, दहेज पुरुखक पिताक थिकै जनमसिद्ध अधिकारl बुधियार बेटीक बाप केर तेँ अगिते अभियर्थना, "डिसेन्ट मैरेज"क पहिने दs दैय छथि सुचनाl लड़कीक रूप, गुण, सुसंस्कृति, नोकरी, शिक्षा- तय करै इयह दहेजक लेन-देनक गुण आ मात्राl तैयो कलक्टर/एस.पी दहेज लै छैथि पुरा करोड़, डाक्टर/इंजीनियर सेहो अक्सर मँगै अधा करोड़l बी.डी.ओ./पी.ओ./मेनेजर छथि डाक्टरे पदक साख, किरानी, पुलिस, मास्टर माँगेय पाँच सँ आठ लाखl आदर्शो वियाह मे बेशीठाम भेटत अजगुत रीत, कथा तय भेलाक बाद भेटत समानक फ़ेहरिस्तl "नो डाउरी" लिख बेटाक बाप पसारय छथि जाल, किछ तँ ठीक छथि, मुदा बेशी लोक रंगल सियारl परिणय संस्कार केर बाद शुरु हैत अटपट माँग, मनक दबल अपेक्षा खुजत तखन लागत उटपटाँगl ई नै देलहु, ओ नै देलहु, सभ सेहन्ताक भेल सराध- लिअ सुनैत रहु ताजीवन आब जरल-जरल उपरागl निरीह गाय सन भल बेटी मे ताकत तेहन नै अपाय, हक्कन कानैत रहैक सिवा नै बचै तखन कोनो उपायl बेटीक हँसब गेल, तन गेल, फेर मानसिक स्वास्थ्य, मुरूत सन बेटी देखते-देखते भs गेली जिन्दा लहासl तलाक, पुनर्विवाह नै छियै मिथिला मे एकर उपचार, एक बेर ओझरेलौ तँ बुझु जिनगी भs जाइत पहाड़l केहनो मजगूत हृदयक बेटी तखन लगावै छथि आगि, बेटीक एहने चिता मे जड़ै अछि बेटी जनमावैक लागिl पहिल कन्या धरि भरोस धरे, दु बेटीक बाद हहरै कोढ़, एक्केटा लक्ष्मीक बाद डरैल बापक दस दिस दौड़ै मोनl देखै दिल्ली, कोलकाता, पटना, दरभंगा, दुनियाँ जहान, गुम्मे-गुम करै लिंग परीक्षण आ गर्भपातक ओरीयानl दहेजक राकस पेटे मे दै नवपीढ़ीक कनिया केँ मरौरी, भावी सीता-सावित्री, भारती-मैत्रेयी केँ अंडे मे घिकौरिl दिनोंदिन लड़की केँ कम होइ पर लोक करै बाप-बाप, तैयौ मिथिला मे पसरले जाइ छैक दहेजक अभिशापl मोगीक जीवन थैरक गोवर-करसी, खेतक ठोकरा-कूर जैड़ जेती कोनो आड़ि-मेड़, तापि लेल जेती कोनो घूरl आकि सड़ैत गलैत बढ़वैत रहती अपन धराक उपजा, सीते लग सँ सहैत एलि, सहि लेति अजुको विपदाl अथवा काली तारा दुर्गा भs कs लेती प्रचंड अवतार तैरि जेति मिथिलाक नारी आ तारि देति जग-संसारl मैथिलक बढ़ैत समवेत डेग, सपना छै दहेज मुक्त मिथिलाl पापी-सुर कहिया हैत हंत, शिकार पर छथि नवतुर-युवाll ५. जवाहर लाल कश्यप (१९८१- ), पिता श्री- हेमनारायण मिश्र , गाम फुलकाही- दरभंगा। हम पुछलियैन्ह के छी बाबु ? उज्जर चक-चक कुर्ता पहिरने, अंदर कतेक दाग छुपेने/ अपने ओ मुसकाय रहल छठि, अप्पन गुन ओ गबि रहल छठि/ हम पुछलियैन्ह के छी बाबु ? ओ कहलथि चुप रह बेटा हम छी अहि देशक नेता / संगमे चारिटा गुन्डा लेने पुलिस के दु बंदा लेने अप्पन रोब जमाय रहल अछि सबके ओ हरकाय रहल अछि हम पुछलियैन्ह के छी बाबु ? ओ कहलथि नहि छी कियौ और हम छी अहि देशक ठीकेदार / सत्यक राह बहुत दुख देबा, जान दियौ वा खाउ मेवा/ सोचने रहि सिस्टम के बदलब, सिस्टम संग अपने बदललहुँ/ हम पुछलियैन्ह के छी बाबु ? ओ कह्लथि नहि पुछु सर हम छी देशक अफिसर / महगाई बढि गेल बहुत छै, मुस्किल स आब पेट भरैत छै/ उपरे उपरे सब सेटिंग छै, घुसकि भेतत सब फिटिंग छै/ हम पुछलियैन्ह के छी बाबु ? मुस्किल स चलैत अछि दाना पानी हम छी अहि देशक किरानी/ तोन्द हुनक छैन्ह् सेहो निकलल, मोछ हुनक छैन्ह सेहो फडकल / हाथ मे लेने छथि ओ डंडा, करथि हलाल अनेको बंदा / हम पुछलियैन्ह के छी बाबु ? ओ कहलथि चुप रह फुलिश हम छी अहि देशक पुलिस / गाडी मे लागल अछि बत्ती, सबहक गुम अछि सिट्टी पिट्टी/ लागि जाइत अछि ओतय मेला, जतय स गुजरैत अछि काफिला/ हम पुछलियैन्ह के छी बाबु ? ओ कहलथि चुप रह ससुरी, हम छी अहि देशक मन्तरी/ राजपथ पर भेटल भीखमंगा, दरिद्रक संतान भुखा नंगा/ मालगोदम मे अन्न सरैत् अछि, तैयो लोक भुके मरैत अछि/ हम पुछलियैन्ह के छी बाबु ? ओ कहलथि तेहन सब स परल वास्ता हम छी अहि देशक जनता/ ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। १.इरा मल्लिक २ओमप्रकाश झा ३.उमेश पासवान १ इरा मल्लिक, पिता स्व. शिवनन्दन मल्लिक, गाम- महिसारि, दरभंगा। पति श्री कमलेश कुमार, भरहुल्ली, दरभंगा। किछु हाइकू/ टनका १ जीवनक ई रंग ग्राम्य जीवन मे पेबै अहाँ घोर गरीबीयो मे सब व्यस्त आ सब मस्त । २ गरजितोम्भि सागर जल अइ धरती नभ सभ काँपि उठल देखि सिन्धुक कोप ३ निर्भीक टापू विशाल समुद्रमे मानू कहैत नर सुदृढ़ बनू कर्तव्य पथपर ४ आतुर भेल अइ घटा घनसँ मिलन लेल परबत प्रहरी निहारि रहल-ए ५ यै बिल्लो रानी कहू तँ अहाँ लेल माँछ आनि दी ६ बिलाड़ि राज देबारपर बैसू या बैसू कतौ मूस नञि आओत कतबो करू घात ७ बाग बगीचा सुन्दर जलधारा नीक नजारा ८ कलकलक सुमधुर गानमे उठि खसैत निर्झरक तानमे सुन्दर जलरूप २ ओमप्रकाश झा आगि पजरलै जखन, धुआँ उठबे करत यौ। इ प्रेम मे डूबल मोन खिस्सा रचबे करत यौ।
किया करेज पर खंजर नैनक अहाँ चलेलौं, ककरो खून भेलै इ दुनिया बूझबे करत यौ।
होइ छै प्रेमक डोरी तन्नुक, एकरा जूनि तोडू, जोडबै तोडल डोरी गिरह बनबे करत यौ।
राम-नाम मुख रखने प्रेमक बाट नै धेलियै, प्रेमक बाट जे चलबै मुक्ति भेंटबे करत यौ।
बीत-बीत दुनियाक प्रेमक रंग मे रंगि दियौ, "ओम"क इ सपना अहाँ संग पूरबे करत यौ। . उमेश पासवान कविता उमेश पासवान कविता- कपुत समए संग-संग सभ किछु बदैल गेल लगैए कलयूगक चपेटमे सभ किछु परि गेल माता-पिता भगवानसँ बढ़ि कऽ होइए तकरो लोग बिसरि गेल की कहूँ रहि-रहि देह सिहरैए थर-थर कपैए हाथ कोना कऽ केकरो लग बाजब पुत भऽ गेल कपुत कऽ देने अछि कात भेटल अछि पुरान ओछनि आ टूटल खाट पुसक जारमे कियो हमरो लग आबए कखैनसँ तकै छी बाट। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। १. जगदीश चन्द्र ठाकुर ’अनिल’ २.मिहिर झा १
जगदीश चन्द्र ठाकुर ’अनिल’ गजल 1.
अगहन के धान छी अहां पूर्णिमाक चान छी अहां।
दौड़ि-दौड़ि थाकि गेल छी दूर आसमान छी अहां।
बेर-बेर छी पढ़ैत हम वेद आ पुराण छी अहां।
कांट अछि भरल बाट पर दूभि आओर धान छी अहां।
जीबितहिं स्वर्ग देखि लेल पान आ मखान छी अहां।
जिनगीमे प्रश्न अछि कते सभहक निदान छी अहां।
गजल 2.
कर्जाक मोटा माथ पर उठेलहुं कतेक बेर बैंकक गाड़ी देखि क’ पड़ेलहुं कतेक बेर।
जमायक बात सूनि आइ करेज फटैए सासु-ससुर कें हमहूं कनेलहुं कतेक बेर।
बांचि गेलहुं चोर आ उचक्का सं दिल्लीमे मुदा अपनहि घरमे ठकेलहुं कतेक बेर।
नियारि कतहु जायब से पार नहि लागल तत्कालहि के टिकट कटेलहुं कतेक बेर।
सुंदर सं सुंदर शब्दक तलाशमे रहलहुं लीखि-लीखि अपनहि मेटेलहुं कतेक बेर।
आइ चुरूक भरि पानिमे डूबैत छी किए’ बाढ़िमे कतेक लोक कें बचेलहुं कतेक बेर।
२ मिहिर झा गजल मोनक आखर मुहे परसितहु आई यदि अहां रुकिये जयतहु
अहां चल जायब नहि बुझलाहु की जैते जे हम झुकिये जयतहु
किछु गॅप झांपल विश्वास तोड़ल की होएते यदि बुझिए जयतहु
गेलहु विदेश देलहु नहि ध्यान की होएते यदि रुकिये जयतहु
पता जे रहितय प्रेम नगर के कहुना कय के घुसिये जयतहु सामा गीत (संकलन) कोने भाय्या अनथिन आलेर झालेर, कोने भाय्या अनथिन पटोर कोने भाय्या अनथिन संखा चूडी, कोने भाय्या अनथिन सिंदूर कोने बहिनो पिनहथीं आलेर झालेर कोने बहिनो पिनहथीं पटोर कोने बहीना पिनहथीं संखा चूडी कोने बियाहिनो पिनहथीं सिंदूर बड़का भैया अनथिन आलेर झालेर मझला भाय्या अनथिन पटोर सैनझला भाय्या अनथिन संखा चूडी छोट्का भाय्या अनथिन सिंदूर बड्की बहिनो पिनहथीं आलेर झालेर मनझली बहिनो पिनहथीं पटोर सैनझली बहिनो पिनहथीं संखा चूडी छोट्की बहिनो पिनहथीं सिंदूर ------------------------------------------------------------- गाम के अधिकारी तोहे मझला भाय्या हो भाईय्या हाथ दस पोखरि खुनाई दहो चंपा फूल लगाई दहो हे फूलवा लोरहेई त बहिनी घमी गेली हे आहे घाम गेलनी सिर के सिंदूर नैना केर काजर घमली हे छ्टवा लाना दौड़ाल ऐल्खिन बड़का भाईय्या हे बैसो बहिनो ईहो जुड़ी छाहरि की हमारो के आशीष दियो कथी बाझायब बनतित्तिर हे आहे कथी बाझायब राजा हंस चकेवा जाले बझायेब बहिनो तित्तिर हे आहे रौब सा बझायेब राजा हंस चकेवा खेल करू हे बहिनो खेल करू हे भाइय्या झटायल फूल बहिनो हार गुथु हे आहे सहो हार पिनहथीं भौजो बहिनो खेल करू हे ------------------------------------------ बृंदावन म आगि लागे कोई ना मिझावे हे हमर भाईय्या फलना भैया दौड़ दौड़ मिझावे हे --- छौड, छौड, छौड हमरा भाय्या कोठी छौड. छौड, छौड, छौड चुगला घर मे छौड चुगला करे चुगली बिलयईया करे मीयौ चुगला के जीभ हम नोंच नूच खाओं ---------------------------- समा हे चकेवा हे ऩहिरा नई बिसरैह हे ससुरा म पूजा पाईह हे कोडल खेत मे रहिह हे जोतल खेत मे रहिह हे रंगेई रंग पटिया ऊछाबि ह हे ढेपा फोडि फोडि खाईह हे ओस पिबि पिबि रहीह हे हमर भाई क आसीस दिह हे आगिला साल फेर आइह हे ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। १.शिवशंकर सिंह ठाकुर २.अमित मोहन झा ३. राजदेव मण्डल १. शिवशंकर सिंह ठाकुर कोह्बरक हाल कहलो ने जाय कोह्बरक हाल कहलो ने जाय , पटिया परक सुतब ,घाममे भीजल देह , नवबिवाहिते टा बुझै छथि , चतुर्थी दिनक बात तँ किछु अलगे होइए, पटिया परक रगरघस ,चमरियो छिला जाइए, मौहकक खुशी सभ मांटि मे मिलि जाइए
दू चारी दिनक खुशी आ,बाकी सभ तँ बुझले अइ, आजुक नवकनियाँ "दिल्लीक लड्डुए" बनि जाइत छथि , मुदा ईहो सत्य अछि जे किछु गनल-चुनल कनियाँ , जिनगी मे मिठांस भरि दैत छथि ,जिनगी स्वर्ग बनि जाइए ,
किछु गोटे कहता जे विवाह जुनि करू , मुदा हम तँ कहब जे विवाह अवश्य करू, विवाह अनुशासन अछि, आदमी केँ काबू मे करबाक साधन अछि , विवाह यदि नै हएत,हरैद लगबे करत , मोनक मनोरथ पूरा हेबे करत ,
तैं जिनकर विवाह अखन तक नहि भेल , कोह्बरक आस जुनि छोडू,मोनक उम्मीद केँ नहि तोडू , एहि लगन मे अहाँक विवाह जरूर हएत, कोहबरक आनंद अहांके जरूर भेटत !!!!!!!!!!!!!! २. अमित मोहन झा ग्राम- भंडारिसम(वाणेश्वरी स्थान), मनीगाछी, दरभंगा, बिहार, भारत। आब जमाना बदलि गेलै यौ, आब जमाना बदलि गेलै। आब सिस्टर सब सिस कहाइ छथि, भैया दैया नाम झमाइ छथि, बाबूजी तँ डैड भेला, बेटी संग ओ क्लबो गेला, नवयुगक ई रीत निराला, संस्कार कोसी भसिएला, छौंरी सबहक टाइट जींस देखि, छौड़ा सभटा बहकि गेलै, आब जमाना बदलि गेलै यौ, आब जमाना बदलि गेलै। बुढ़ा-बुढ़ी मॉल जाइत छथि, आइसक्रीम एक संगे खाइ छथि, एक दोसराक डाँड़ हाथ दय, नैन-मट्ट्क्का सेहो करै छथि, रॉक एन रॉलक मस्त धुनपर, बुढ़बा बूढ़ा डांस करए लगलै, बुढ़ाक टनगर डांस देखि, बुढ़बापर बुढ़िया छड़पि गेलै, आब जमाना बदलि गेलै यौ, आब जमाना बदलि गेलै। पहिने घोडा चना खाइ छल, चनों आब सपना भऽ गेलै, रुखल-सुखल घास-फूसपर, हड्डी सभटा निकलि गेलै, टीसन जाइ काल बीच राहमे, घोडा बहुते हकमि गेलै, घोडा लय टमटमक संगे, जोतला खेत मे गुरकि गेलै, आब जमाना बदलि गेलै यौ, आब जमाना बदलि गेलै। आब गुरुजी सर कहाइ छथि, सरक सर कते बेर फुटलै, गुरु तँ गुरे रहि गेला, चेला सभ चिन्नी भेलै, टास्क बनेने नै छल मुसरी, सरकेँ ओकरा डेंगबय पड़लै, मुसरी तँ मुसरिए छलखिन, छनहि क्रुद्ध भय प्रण एक लेलखिन, सरक साइकिलक चक्कामे, लाठी ओकरा घुसबऽ पड़लै, आब जमाना बदलि गेलै यौ, आब जमाना बदलि गेलै। छौड़ियो सभ सिगरेट पिबैए, छौड़ा सभ संग पार्क घुमैए, बाइकक पाछूमे बैसल, ब्रेकक लाथे मजा मारैए, एक्कर सभक चालि ने देखु, बीसो टा बॉयफ्रेंड रखैए, आब जमाना बदलि गेलै यौ, आब जमाना बदलि गेलै। आइ काल्हिक छौड़ाकेँ देखियौ, टीक कटा जुल्फी रखैए, पढ़ाइ-लिखाइमे साढ़े बाइस, मोछ मुड़ेने देखियौन ताइस, गप सुनबै तँ भऽ जाएब दंग, लेकिन सरस्वती छन्हि मंद, बैंग्लोरक नामी मंत्री मॉल दिस, “अमित” केँ सेहो मोन गेलैए, आब जमाना बदलि गेलैए, आब जमाना बदलि गेलै। आब जमाना बदलि गेलै यौ, आब जमाना बदलि गेलै। ३. राजदेव मण्डल कविता- जय हे किसान परतीकेँ पोड़ि ढेपाकेँ फोड़ि कण-कणकेँ कोड़ि जलसँ घोरि कएलौं कादो माह भादो रोपलौं धान जय हे किसान-जय हे किसान कतेक बेर चास-समार पड़लौं बेमार बिनु उपचार अपन-आन सभ बैमान अहाँक लेल सभ समान जय हे किसान-जय हे किसान माघक बदरी कनकनी बसात जीवा-जन्तुक ठिठुरैत गात जीअन-मरण खेतक साथ अँही बुते उपजत धान जय हे किसान-जय हे किसान बैशाखक रौदमे जरैत रहै छी दिनभरि गुमसड़ैत धरतीकेँ सिंचित करबाक लेल अपने पियासे रहै छी मरैत रौदी-दाही वा फाटए आसमान फलक कोनो चिन्ता नै कर्ममे लगौने जी-जान जय हे किसान-जय हे किसान अपना अभिलाषाकेँ डाहि जारि करम करैत छी नित सम्हारि सफलता पकड़ने रहैत अछि पाइर धेने एकहि तान, गाबै छी कजरीगान जय हे किसान-जय हे किसान अहाँ छी देशक अभिमान तैयो सहैत छी नित अपमान बचबैत छी जन-जन प्राण अपन दैत बलिदान जय हे किसान-जय हे किसान हरकेँ नाशपर सभकेँ आश चहुँदिश छिटकल हरियर प्रकाश ऊसर धरतीपर अहाँ िलखैत छी नव-नव इतिहास अँही कऽ सकैत छी अन्नदान जय हे किसान-जय हे किसान। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। १.स्तुति नारायण २.विकास झा रंजन ३.जगदीश प्रसाद मण्डल १ स्तुति नारायण मन पड़ैत अछि...
मन पड़ैत अछि पोखरि- झांखरि, अपना गामक बान्ह अपना गामक खेत-पथार टेढ़-मेढ़ ओ बाट मन पड़ैत अछि महमह गमकैत, मोजरल आमक गाछ भोर अन्हारे महु बिछ आनब, लोढ़ब फुल-बेलपात मन पड़ैत अछि लुधकल जामुन, लीची, बैर, अनार आमक कुच्चा, सागक मोचरा, इमली आर अचार रनै-बनै कत फिरै छँ, मां क झिड़की डांट चल सभ बच्चा कलम चलै छी पिताक सहज दुलार टोला परके धिया पुता आर कलमक ऊँच मचान गsप-सsप आ हंसी-हंसी मे सीखब जीवन पाठ...।
(मिथिलांगन द्वारा आयोजित कवि सम्मेलन मे पाठ कएल गेल कविता) २ विकास झा रंजन गजल काल्हि आँखिक हम तरेगन छलौं, आइ तरेगन बना किए दूर केलौं !
सब आखर सिनेहक हम गुनैत छलौं आइ आखर किए आहाँ बिसरा गेलौं !
हम एसगर अहीं संग दोसर भेलौं आइ तेसर बना किए आन केलौं !
ठोर अहाँक ने कहियो हम चुम्मा केलौं आइ नोरक किए ठोर चुम्मा देलौं !
तीर तरकस जकाँ संग सदिखन छलौं, आइ तीरे लगा किए पीर देलौं !! ३ जगदीश प्रसाद मण्डल 1 दिव्य शक्ति दिव्य शक्ति पबिते मनुज मन दिव्य ज्योति बिखड़ैए। सगतरि एक्के रश्मि बिलहि दिव्य-भूमि, वसुधा कहबैए। गंगा सदृश्य धार जतए नीक-अधलाक विचार करैत सभकेँ पार करैवाली गंगे अनवरत गतिये वहैत रहैत। दिव्य भूमि पहुँचते वसुधा धरा-धम कहबए लगैत नै रहैत भेद ततए मनुजमे सूर-धामक कपाट खुजैत। जतए विराजए वसुदेव वसुधा वएह कहबैए। नन्द-नन्दक मंत्र सुमरि आनन्द बन भरमैए। पाँचम कला बनि जे बीआ मनुज मन विरजैए। डेगे-डेग डगरि-डगरि सोलहम कला पबैए। (()) 2 साँझ जिनगीमे साँझ कहाँ छै, छी दिन-रातिक मिलन बेल। एक सृजन दोसर उसरन बदलब छी मात्र खेल। अपन गतिये सभ चलै छै चाहे सुर्ज हो वा ग्रह-नक्षत्र। तहिना ने देवो-दानव चलै छै बनि रक्षक चाहे भक्षक। चाहे गंगा हो वा जमुना धार पेट धारण करै छै। तही मध्य ने सरस्वती साँझ-प्रभाती गबै छै। आलय-हिमालय ओ कैलाश विश्राम भूमि बनल छै। बाट-घाट ओ तीर्थ-वर्त अनवरत बनि पड़ल छै। सभ दिनसँ आबि रहल बाल-सियान बदलैत रहल। उमेरे आकि बाल बोधे अनिर्णित प्रश्न बनल रहल। जहिना सोर पाड़ि साँझ कहए सुतैक इशारा दिअए तहिना ने आँखिसँ जागैक सुर-पता सेहो भेटए। घड़ी कहाँ कहियो बुझलक साँझ-भोरक किरदानी एके चालिये चलि-चालि मुस्कुराइत गबए जिनगानी। बिनु जिनगानीक जिनगी मनुख ठठ्ठर कहबै छै। जहिना कौआ खएल मकै खेत ठठेर कहबै छै। (()) 3 रहसा चौर भीतर मिथिलाक ओ भूभाग चौड़गर एकटा चौरी छै। दूर-दूर धरि पसरल-पसरल विसबासू खेतीक भूमि नै छै। नअ मास पानिये गुड़गुड़ा हिया-हारि कनबो करैए। माटियोक कर्मक फल तेहने अपने बेथे चिचिआ रहल-ए। तीन मास सुखा सुख पाबि करमी, केशौर कोढ़िला सजबैए। जिनगी-मृत्युक भय मेटा, संग मिल सभ भाँज पुरबैए। चारि गामक बीच बसल नमगर-चौड़गर सीमा घेरैत चारू कातक पानि गुड़कि अद्रेसँ झील बनबैत। गामक माटिक जँ दशा एहन मिथिला राज केहन बनतै। बाहरे-बाहरक सुसकारीसँ गहूमनक बीख केना झड़तै। विचार इमानक ककरा कहबै खोलि देखू मातृकोष। अपने-आप प्रश्न पूछि विचार करू सम्हारि होश। (()) 4 जीबैले लड़ए पड़त लड़ि जीबू आकि मरि जीबू जिनगीक दू धार बहै छै। अपन सभ भाग्य िनर्माता मनोनुकूल जिनगी बनै छै। लक्ष्य बिनु जिनगी ओहने जेहन बॉझ-बहिल होइए। सुगरक मल सदृश्य ओकर नीप-पोत विहीन होइए। सभ चाहए आनन्दक जीवन डारि-पात फूल फुलाए। बिनु सुख-चैने केना फुलेतै अछैते पराने जिनगी कुम्हलाए। सुख-चैन फड़ै दुख मेटेने दुख मेटाएत संघर्षमे। तीन दुख पसरल छै सगतरि बौआएत ढहनाएत जीवनमे। दैहिक-दैविक भौतिक ताप बिलगा-बिलगा देखए पड़त। बिनु देखने िदशाहीन भऽ औना-पौना सड़ि मरब। तीनूक अपन-अपन दुनियाँ लीला तीनूक रंग-विरंग। तीनू बाँटि नेने छै धरती कुदैत-फनैत रंग-रंग। (()) 5 महगी दस सगे नितराइत विचार दस सगा देख डरि रहल छै। एके गाम, परिवार भैयारी भाए-बहिनसँ डरि रहल छै। कियो बाजए धी बसाएब पुन तँ कियो चेतबैत धी-भागिन खेलो सभ अजगुत छिड़िआएल खेलाड़ी देखबए तोड़ि तानि। देखए पड़त, विचारए पड़त एना होइए तँ केना भेल? आजुक जे खाहिंस छै ओ हएत तँ केना हएत? अरबो टन अन्न माटि पड़ल करोड़ेमे जाँत पीसै छी। उन्नति-उन्नैत घोल करै छी हृदए खोलि बाजै छी। किछु दबाएल माटिक तरमे तँ किछु काटए जहल गोदाम। मौगियाहा पहरूदार बनि-बनि कठपुतरी नाच देखबैत ठाम-ठाम। जइ उन्नैस सए एक ईस्वी मन धान तीन मन खेसारी। रूपैया बरोवरि रहए नजरि उठा देखू भैयारी। (()) ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। १. प्रभात राय भट्ट २.उमेश मण्डल १ प्रभात राय भट्ट १ तड़पि-तड़पि बाँचि रहल छी सजनी अहांक इयादमे कोना कोना हम जिबैछी प्रियम्बदा हमर कोना हेती पूर्वा पवन सं पुछै छी पात पात फुल फुल पैर अहांक नाम लिखैछी प्रेम अहांक पागल भेल सदिखन हम रहैत छी १ देख हमर ई हालत लोग मजनू हमरा बुझैए देख हमर ई तड़पन लोग बताह सेहो कहैए इयाद अहांक आबिते गोरी चिहैक उठैए करेज अहां बिनु निरसल जिनगी आब नै होइए परहेज २ घर घुरि आबू सजनी आब नै तड़पाबू स्नेहक प्यासल मोनक हिया हमर जुड़ाबू बेकल तनमन हमर अहांक संग खोजैए अहां बिनु ई दुनियाँ सुनसान वीरान लगैए ३ मधुर मिलनक आस तड़पि तड़पि बांचि रहल छी मुदा भीतर भीतर हम विरह भेल टुटि रहल छी कदम कदम पर ठेस लगैए कंकर कांट पएर चुभैए हिया हमर हारि गेल कतए कुनु खबर नै भेटैए ४ २ कतय गेलै चितचोर बदरा उमैर उमैर घनघोर बरसै आंगन मोर प्यासल तनमन अछि हृदय भेल हमर विभोर दिल चोरा कऽ प्रीतम मोर कतय गेलै चितचोर २ सिनेहियाक सूरत देखैले नैना सं झहरे नोर रिमझिम रिमझिम सावन वर्षे तनमन अगनके जलन सजन उठल बड जोर कतय गेलै चितचोर २ अंग अंग व्यथा उठल फटैए पोर पोर बदराक बूंद बूंद लगैए संगीतक शोर खन खन खनकैए कंगना छम छम बजैए पायल मोर २ पिया लग आउ प्यास बुझाउ मोन उठल बड़ जोरक हिलोर अहां बिनु जीवन भेल भारी मोर कतए गेलै सजन चितचोर विरहिन भेष देख हमर मुस्की मारैए चानचकोर २ २ उमेश मण्डल कविता- बाधा विदा भेल मंगला पू-भर कान्हपर टँगने अछि साइकिल बालुपर कहुना कऽ लगिचेलक लटपटाइत पहुँचल धारक कछेरमे। बिनु पानिक अछि धार चक-चक करैत अछि बालु चारूकात नाव नै बालु देख भेलै मंगलाकेँ थोड़े होश एलै अपन छूछ जेबीपर भरोस भेलै। आब टपैमे कोनो नै हएत बाधा पहुँचबे करब सरायगढ़क पाठशाला मुदा, मंगला लसैक गेल घाटपर नजरि दौड़ौलक अपन कोनो लाटपर। अपन जेबीमे देने हाथ तकैए चारू कात आब की करबै हौ बाप ई तँ लेबे करतै घाटी जेना लगैए एकरा उठल छै आँति सुखलौ घाटक लेतै खेबाइ नै देबै तँ देत ई रेबाड़ि। सहए भेल मंगला घुरि गेल पछिमे मुरि गेल। धर्मात्मा धर्मात्मा होइ छथि तियागी तियागी कहल केकरा जाए यौ भैयारी? वएह ने जे केलनि तियाग आकि ओ जे भाेग केलनि वेसुमार। मजदूर, हरबाह भिनसरसँ साँझ धरि देह धुनैए उचित बोनि मात्र दू सेर पबैए एक सेर बेच लऽ दोकान जाइए नोन, तेल, हरदी, गोटी किनैए बचलाहा एक सेरसँ सभो परानी पेट चलबैए भरि दिन तँ ओहो खटबे करैए अहीं कहू, ई केहेन मशीन एले हिसाब जोड़ैकाल ऊपरे-ऊपर नजरि दौड़ौलकै एकर तियागपर नजरि नै खिड़ैलकै? भागीकेँ धर्मात्मा कहि गेलै। श्रोता भागवत वाचन शुरू भेल श्रोता सभ आबि-आबि जगह लेल चारि तरहक श्रोता बैसल छथि अपन-अपन काज-धियानमे मग्न छथि बाचको आ श्रोतो। एक तरहक श्रोता भागवत सुनि नीकक प्रचार करै छथि दोसरोकेँ नव गप्पसँ अवगत करबै छथि मुदा दोसर दोसर श्रोता अंगीकार करै छथि मुदा बजै नै छथि बिना पुछने तेसर श्रोताक देखियो बैसल छथि भागवत प्रवचनमे मुदा धियान छन्हि व्यापार मंडलमे घुरिआइत-नुरिआइत स्पष्ट अछि जे किछु नै पेला ई प्रसादटा खेला ई चारिम श्रोतापर करू विचार ई छथि मुदा सदाचार सुनितो छथि आ गबितो छथि अपन जिनगीक क्रियासँ मिलैबतो छथि ओतबे नै डेन पकड़ि पछुएलहाकेँ खिचितो छथि आ ठमकलहाकेँ धक्का सेहो लगबैत छथि। देश हमर देश किछु लोक खेल रहल छथि धुरखेल खुट्टीसँ आगाँ पड़ल बड़का देवाल देवालक भीतरे लागल अछि मड़कड़ी चारूकात इजोत चकचकाइत अछि दिने जकाँ राइतो बुझाइत अछि चुट्टी-पिपड़ी छोड़ि सभ किछु देखाइत अछि मुदा देवालक अंतिम खुट्टीसँ ओम्हरे भऽ रहल अछि मनोरंजन हेबक सेहो चाही जरूरतसँ ऊपर उठि गेलापर स्वभाविक अछि। मुदा देवालसँ इम्हर बोन-झार सदृश्य मनुक्खक जरल रूपक खेखनैत स्वर कियो सुनैबला नै चारि तरहक नाओं रचैबला लोक देशक भीतरेमे बड़का देवाल ठाढ़ करैमे अपनो उड़ैलनि होश कऽ रहल छथि किलोल हमर देश अछि अनमोल एक्कैसम शदीमे चलि रहल अछि ताबड़तोर। भाषा भेद हमरा सबहक माथपर पसरल अछि मरलत्ती जकाँ िकछु िकयो सुचिन्तक नै जे िच◌ंतन करता एेपर ई कथी लतड़ल अछि सभपर मुदा दुर्भाग्य एेमे छिपल अछि िकछु बात जइमे अछि नै एक्कोटा पात सबहक कहब छन्हि “ई आगाँ चलि कऽ करत प्रदूषण साफ जीबैक लेल स्वच्छ हवा-बसातक अछि जहिना खगता करत ई दूर सबहक बेगरता।” देखा चाही ई दूर करत प्रदूषण आकि करत सभकेँ िनपत्ता। नोर गोरसपट टकधियान लगेने मुन्निया बैसलि अकानैए घर-अंगन, द्वारि-दरबज्जा भोरे सभ दिन बहारैए बर्तन-वासन, छिपली-कटोरी सभ दिन चमका कऽ मांजैए झक-झक झलकैत थारी-बाटी देख मुन्निया माए गुनगुनाइए। गुनगुन्नीमे अह्लाद भरल छै सुख-दुख सेहो उमरल छै मुन्निया आब छोड़त ई दुनियाँ। माइक आँखिक नोर मुन्नियाक हृदैमे उठबैत हिलकोर भऽ जाइत अछि बेहोश। होश अबिते फेर अकानैए आँखिक नोर निङहारैए माइक मन टटोलैए सुखक नोर आकि दुखक नोर दुनू एक्के संग टघरैत-झहड़ैत मा क चेहरापर देखैए। खूर-खूर, खूर-खूर काजौ करैए घर-आंगन सम्हारबो करैए। मुन्निया मुदा ई बुझि नै पबैए खुशीक नोर आकि दुखक नोर माइक आँखिक ई बुझि नै पबैए। यएह बेवसी मुन्नियाकेँ सतबैए। उमेश मण्डल संस्कार गीत (संकलन) मल्लाहक गोसाँइ, कमला गीत- 1 कमला-कमला सुनै छलौं कमला बड़ दूर हेऽऽ गहबर पहसैत कमला भए गेल कसहूर हे, अन देलौं धन देलौं लक्ष्मी बहुत हे एकेटा जे माइ बिनु लागै य सुनऽ हे। कोयल-कोयला सनै छलौं कोयला बड़ी दूर हेऽऽ गोबर पहसैते कोयला भऽ गेल मसहूर हे अन देलौं धन देलौं लक्ष्मी बहुत हे जे भातिज बिनु लागै य सुन हे कोयला-कोयला.....। मातैर-मातैर सुनै छलौं मातैर बड़ी दूर हे अन देलौं धन देलौं, लक्ष्मी बहुत हे एकेटा जे स्वमी बिनु लागै य सुन हे मातैर-मातैर.....। ससिया-ससिया सुनै छलौं, ससिया बड़ी दूर हे अन देलौं धन देलौं, लक्ष्मी बहुत हे एकेटा जे बालक बिनु लागै य सुन हे कमला-कमला......। मल्लाहक गोसाँइ, कमला गीत- 2 कमला मैया बसत बड़ी दूर गमक लागे गेंदा फूल कथी डाली लोरहब बेली-चमेली कथी डाली लोरहब अरहूल हे गमक लागे गेंदा फूल कमला मैया..... किनका चढ़ाएब बेली-चमेली किनका चढ़ाएब अरहूल गमक लागे गेंदा फूल-2 कमला चढ़ाएब बेली-चमेली कोयला चढ़ाएब अरहूल, गमक लागे गेंदा फूल हे कमला... किनका सँ मांगब अन-धन सोनमा किनकासँ मांगब सोहाग गे सोहाग गे मलहिनयाँ देखै मे फूल बड़ लाल हे ससिया सँ मांगब अन-धन सोनमा मातैर सँ मांगब सोहाग गे मलहिनयाँ देखै मे फूल वर लाल....। कमला...........। गमक लागे गेंदा फूल....3 मल्लाहक गोसाँइ, कमला गीत- 3 कटबै मे सोना सुतरिया बिनबै झुमरि जाल हेऽऽ जाल फरि-फरि कमला एलखिन सन-झुन लागै गोहबरिया कहाँ गेली परलोभिया सेवक सुन लगै गोहबरिया हेऽऽ कटबै...... जाल फरि-फरि गांगो एलखिन रून-झुन लगै गोहबरिया हे कहाँ गेली परलोभिया सेवक, सुन लगै गोहबरिया हे-2 कटबै......... जाल फरि-फरि मातैर एलखिन रून-झुन लगै गोहबरिया हे कहाँ गेली परलोभिया सेवक सुन लगै गोहबरिया हे कटबै..... बिनबै झुमरि जाल हे। मल्लाहक गोसाँइ, कमला गीत- 4 जग मग जग मग ज्योति जले मंदिरमे देखियौ कमला के श्रृंगार कमला के लट मे तेल सोभे हुनका सेंदुर के अधिकार जग मग जले मंदिर मे देखियौ मातैर के नाक मे नथिया सोभे हुनका झुमका के अधिकार जग मग जले मंदिर मे ससिया के मांग मे टिका सोभे हुनका होसली के अधिकार जग मग जग मग ज्योति जलै मंदिर मे कमला श्रृंगार.....। मल्लाहक ब्राह्मन गीत- 1 नटुआ खूब सुन्दर सँ गाना गाभिहँ नाचिहेँ ब्राह्मण के सुनभियेँ पहिले गबिहेँ ब्राह्मण गीत तखने रामचंद्र रधुविर नटुआ देतै असिरवाद जुग जुग जीबह ब्राह्मण के सुनभिहेँ...। मल्लाहक ब्राह्मण गीत- 2 ब्राह्मण बाबू अंगना चनन घन गछिया ओहीपर कोइली धनश्याम हे.. कटबै चनन गछिया बेढ़बै अंगनामा हे छुटि जेतै कोइली घनश्याम हे.. कानए लगली खिजए लगली कोइली मुरूछिया कथीसँ मेढ़ब तोहर दुनू पखिया हे.. कथी से मेढ़ब कोइली तोहर दुनू ठोर सोने से मोरब हे कोइली तोहर दुनू पखिया रूपे से मेढ़ब तोहर दुनू ठोर हे.. जही वन जेबह हे कोइली रूनू झुनू बोलिया रहि जेतऽ ब्राह्मण बाबू के नाम हे...। मल्लाहक ब्राह्मण गीत- 3 गामक पछिममे एक ठूठि पखरिया ओहिपर कोइली घनश्याम हे। हरिनो ने मारे कोइली तितिरो ने मारे बीछि-बीछि मारे लए मयूर हे जब तोरा आहे कोइल सिन्दुर बकसबऽ रहि जेतऽ ब्राह्मण बाबू नाम हे..। डोमीनक गोसाँइ गीत-1 करिया कुखा हे काली माय लेलनि जोरि आइ हे मैया एक कोस गेलऽ हे काली माय दुइ कोस गेलऽ हे काली माइ तेसर कोस उठल शिकार हे हकन कनै छै काली बैन के मयुर हे बकैस दियौ सीर के सिन्दुर हे सारी रात नटुआ नचाबऽ हे होइत भोर मे उसारब हे......। डोमीनक गोसाँइ गीत-2 एक मूड़ी तुलसी जल साजि के रखिहेँ गै मलहीनियाँ हमरा पानि सेब देवता अरैध के लबिहेँ गै एक मूड़ी तुलसी जल साजि के रखिहेँ गै मलहीनियाँ? हमरा गौरध्या सन अरैध के लबिहेँ गै एक मूड़ी तुलसी जल साजि के रखिहेँ गै मलहीनियाँ हमरा गहील सन देवता अरैध के लबिहेँ गैऽऽ.....। डोमीनक गोसाँइ गीत-2 इहो हम जनतियौ गहिल मैया औथिन आंगन चनन घर ढौरितियौ हे कथिये दियरा कथिये के बाती सेरसों तेल जराबितौं सारी रात हे सोने के दियरा पताबर सुत बाती सेरसौं के तेल जराइबतौं हे जसो दियौ जसो दियौ गोसाओं अही जस वीरहब संसार हे..। डोमीनक ब्राह्मण गीत ब्राह्मण के अंगना मे चनन बृक्षिया ओइ तरो कोयली धन श्याम हेऽऽ काटबै चनन गाछ बेरबै अंगनमा रहि जेतै ब्राह्मण के इनाम हे कथिये मेराहयब कोयली तोहर दुनू पैखिया कथिये मेराहयब तोहर दुनू ठोर हेऽऽ सोने से मेराहयब कोइली तोहर दुनू पैखिया रूपे मेराहयब दुनू ठोर हे....। मुसहरक गोसाँइ गीत- किनका कोखी बस्तीपर आएल गांगे जनमलि हे कहाँ माँ लिऔ बसेरा सखी-2 आजू गांगों गोहबर आएल हाथ कमल के फूल सखी-2 किनका.... मैया कोखी गांगो जनमलि हे, गोहबर लियो बसेरा सखी आजू गांगो गोहबरमे आएल हाथ दिऔ तलवार सखी.....2 किनका कोखी बस्तीपर आएल गोगे जनमलि हे....2 मुसहरक ब्राह्मण गीत-1 ब्राह्मण बाबू अंगना चनन घन गछिया ओही तर कोयली घनश्याम हे-2 काटबै चंदन गाछ, बेरब अंगनमा छुटि जेतै कोयली घनश्याम हे-2 कानऽ खिजऽ लगलै कोयली बिरिछिया झरऽ लगलै नयना से नोर हे-2 ब्राह्मण........। जानु-कानु जानु खोजै, कोयली मुरूतिया झरऽ लगलै नयना से नोर हे-2 तोहरो जे देबौ हे काेयली सोने दुनू पखिया रूपे से मोहबै ठोर हे-2 ब्राह्मण.......। जहू वन जेबऽ हे कोयली रूनु-मुनू बोलितर रहि जेतऽ ब्राह्मण बाबू के नाम हे-2 ब्राह्मण.......। मुसहरक ब्राह्मण गीत-2 कथी बिनु यौ अहाँ ब्राह्मण कथी बिनु सकलक हिंग मैयो-2 शिव ब्राह्मण अयलह गोहबरमे किरतनियाँ नाच देखाओ सखी-2 कथी बिनु...........। दूध बिनु सेवक मुँह मलिन लड़ू बिनु सकलक हिंग भेल-2 शिव ब्राह्मण..........। कथी ब्राह्मण के मुँह मलिन, कथी बिनु सकलक हिंग मयो भजू ब्राह्मण आहै गोहबर मे, किरतनियाँ नाच देखाओ सखी-2 जनऊ बिनु सेवक मुँह मलिन, पान बिनु सकलक मुँह हिंग मयो-2 भजू..........। मुसहरमे छेका गीत- झिलिया के लोभे जे गोसाओन, अयलौं अंगनमा हे मइया मधुर देखि रहलौ लोभाय-2 पहिले जे अइवतौं जे गोसाआंे सब मधुर खइतौं हे मइया सब मुधर गेल बिकायी हे-2 झिलिया के..........। झिलिया के लोभे जे गोसाओन, अयलौं अंगनमा यौ बाबा, मधुर देखि रहलौं लोभाय हे-2 पहिेल जे अइवतौं, सब मधुर खइतौं यौ बाबा सब मधुर गेल बिकायी हे झििलया....। मुसहरमे कुमार-बियाह गीत- मन छैल मनोरथ सुति घर बियाही तहुँ करितौं पंडित जमइया हे सेहो देबौ नै जाने करितौं नै पंडित जमाय हे-2 मन छैल लवका जे पतवा कहुँवा ने पायल पुरना पतवा जे भेल अनमोल, छोटे-छोटे खिलिया लगहबियौ बाबा बहुते डड़ाबैए बरियात हे-2 येहो हम जैनतौं गयि पोती खपि लैतौं दसे गाछै मरिचिया मरिचयक जोग गै हम पोती, ओही तम फूल से उघारऽ हे...2 मन छैल मनोरथ.....। मुसहरक बियाह गीत- छोटी-मोटी तुलसी के गछिया ओही मे जे चतरल डरहिया हे-2 ओही तरऽ कमला लेलनि विसराम हे सोहागन तुलसी-2 केयो चढ़ाबै हुनका फूल अक्षत हे केयो चढ़ाबै लड़ू पान हे सोहागन तुलसी-2 भगता चढ़ाबै जुनका फूल अक्षत सेवक चढ़ाबै नऽ पान हे सोहागन तुलसी-2 छोटी-मोटी तुलसी...........। चमार जाितक गोसाँइ गीत-1 साँझ दियौ साँझ दियौ बाभन के बेटिया यै साँझ बीतल जैयऽऽ कथी के दियरा राकी कथी सुत बाती यै साँझ बीतल यैयऽऽ सोने के दियरा राकी पाटेसुत बाती यै साँझ बीतल जैयऽऽ जरै लागल दियरा राकी जमाके लागल बाती यै साँझ बीतल जैयऽऽ खेले लागल पचदेवती सारी रात यै साँझ बीतल जैयऽऽऽ। चमार जाितक गोसाँइ गीत-2 कारूवीर के अंगना मे अरहुल फूल गछिया हेऽऽ फरल फुलाल डारि लुबधल हेऽऽ उत्तरे ही राजासँ ये सुगा एक आयल बैसल सुगा अरहुल फूल गाछ हेऽऽ फल ने खाइ छेँय रे सुगबा फूलो ने खाइ छेँय डारीपाती केला सकचूर हेऽऽ उत्तरे ही राजा सँ ये एलेँ सरनरिया बैसल सुगा दिऔ ने बझाईऽऽ सुबगवों नै छियै हौ सेवक पंछी नै छियै इहो छियै सेवक के खेलौना हेऽऽ। चमार जातिक मूड़न गीत- कौने बाबा कैची गरहाओल सोना से मेरहाओल हेऽऽ ललना रे अपन दादी लेलक जनम केश होरिलाजी के मूड़न हेऽऽ अपन छुड़िया गरहाओल सोना से मेरहाओल हेऽऽ ललना रे अपन मामा-मामी लेतनि जनम केश हो सिलाजी के मूड़न हेऽऽ अपन चाचा कैची गरहाओल सोना से मेरहाओल हेऽऽ ललना रे अपन चाची लेतनि जनम केश होरिलाजी के मूड़न हेऽऽ अपन नाना कैची गरहाओल सोना से मेरहाओल हे ललना रे अपन नानी लेतनि जनम केश होरिलाजी के मूड़न हेऽऽ। चमार जातिक बियाह गीत-1 हरी हरी वाँस कटाइ दऽ हो बाबा ऊँचे-ऊँचे मरबा छराइ दऽ हौ बाबा मरबा बती होने ठार भेलै सोनी बेटी कइ लॉब एला वरियात हे गइया जे देलियै हौ बाबा भैसियो देलियै साइकिल रूसल जमाइ हे छुब दियौ पोती भिनसरबा लागा दियौ बजार हेऽऽ खरीद लेबै साइकिल बोधि लेबै जमाइ हे हरि हरि वाँस कटाइ दहो बाबा मरबा के बती घेने ठार सोनी बेटी कइ लाख एला वरियात हेऽऽ औठी जे देलियै हौ पापा घड़ी जे देलियै मोवाइल ले रूसल जमाइ हे छुब दियौ भिनसरबा बेटी लागा दियौ बजार हे खरीद लेबै मोवाइल बोधि लेबै जमाइ हे...। चमार जातिक बियाह गीत-2 चलु चलु हे सखी सभ अजोध्या नगरी-2 अजोध्यामे जाय के भरब गगरी-2 अजोध्या के छौड़ा सभ बर रगड़ी मारत तीर मैय गे फाेरत गगरी हुनका राजा दशरथ सँ किनायब गगरी हुनका रानी कोशीला से भराएब गगरी। चमार जातिक बियाह गीत-3 गेंद खेल गेला दुलरवा मालिन फूलवरिया तोरि देलक अरहुल फूल गाछ हेऽऽ मछिया बैसल छथिन बाबा से अपन बाबा मलिन देलक उपराग हे एहेन ज्ञान पहिले जे बरतहिहँ भोरे उठि देला उपराग हेऽऽ लड़की जे रहितै गै मालिन वरजल जाइतै छहेलबा बरजलो ने जाइ हो। गेंद खेलऽ गेला दुलरबा मालिन फूल वरिया तोरी देला सुपारी के गाछ हेऽऽ मछिया बैसल छथिन पापा से अपन पापा भोरे उठी देलक उपराग हे लड़की जे रहितै वरजल जाइतै छहेलबा बरजलो ने जाइ हे...। संकलन, मूड़न गीत गोसाउनि नोतक गीत बट्टा भरि चानन रगड़ल पाने पत्र लिखल हे। ताहि पान नोतब गोसाउनि जे नित पूजि थिकि हे। ताहि पान नोतब पितर लोक जे निज आशिष देथि हे ताहि पान नोतब ऐहब लोक जाहि स मंगल हएत हे। मूड़न बेरक- कौने बाबा दिनमा गुनाय जग ठानल हे। कौने बाबी पड़िछथि केश िक होड़िया के मूड़न हे। लाल पीयर चीर पहिरब केश परीछब हे बाँस पुरैन लेल खोंइछ कि होड़िलाक मूड़न हे देबउ हजमा बड़ इनाम कि होड़िलाक मूड़न हे। शुभ-शुभ काट हजमा केश कि होड़िलाक मूड़न हे। लाबा भुजै कालक लाव भूजय बैसली बहिनिया चुलहा दहिनिया हे। हे सुन्दरि मंगल आगि पजारल हे सात्री पत्र मे राखल लावा पुनि भूजल हे। दुलहिन गृह मे बैसि जे ब्याहल हे। कहय हे सखि सभ आनन्द मनाविय प्रभु गोहराविय हे। जुगे-जुगे बढ़ू अहिबात कि अइहब गाबिय हे। गोसाउनिक गीत अहाँ जगजननी सकल दुख मन्जनि हमरा बिसरि किये देल। हमहूँ अबोध बोध नै हमरो िकये उसह दुख देल। कियेक चरण तब हटल अम्ब हे कियेक ऐहेन मन हम अपराध कएल बड़ जननी मातु क्षमा कय देल मूस कवि कर जोड़ि विनय करू हमरा बिसरि किय देल। 2 हे भवानी दुख हरू माँ पुत्र अपनो जािन केँ। दय रहल छी दुख भारी बीच भँवर आन केँ। आबि आशा मे पड़ल छी की करू हम कानि केँ विश्वमाता छी अहाँ माँ आह! से हम मानि केँ। कोटियो ने पएर छोड़ब हाथ राखब छानि केँ। दीन प्रभु हम नित्य पूजब नेम व्रत केँ ठानि केँ। हे भवानी। 3 अम्बे-अम्बे जय जगदम्बे, जय-जयकार करै छी हे। तिनू भुवन के माय अहाँ छी तीन नयन से तकै छी हे। सिंह पर एक कमल राजित, ताहि पर बैसल छी हे। भूत प्रेत सब झालि बजाबै योगिन के नचबै छी हे। राक्षस के संहार करै छी दुनियाँ के जुड़बै छी हे। 4 कतेक दुख सुनाएब हे जननी कतेक दुख....... तंत्र-मंत्र एको नै जानल की कहि अहाँ के सुनाएब हे जननी मूर्ख पुत्र एक अहाँ के भुतिआएल रखबनि संग लगाए, हे जननी सूरदास अधम जग मूरख तारा नाम तोहार, हे जननी दुर्गा नाम तोहार। 5 मैया दुआर अड़हुल फुल गछिया माँ हे फड़-फुल लुबधल डािर दछिन पछिम स सूगा एक आएल माँ हे बैस गेल अड़हुल फूल गाछ फड़ो ने खाय सुगा फूलो ने खाय माँ हे पाते पाते खेलय पतझार कहाँ गेल किए भेल डीहवार ठाकुर माँ हे अपन सूगा लीअ सुमझाय भनहिं विद्यापति सुनू जगदम्बा हे माँ हे सेवक पर रहबइ सहाय। विषहरिक गीत 1 विषहरि सेब मोरा किछुओ ने भेल बाँझिन पद मोरा रहिये गेल कियो नीपय अगुआर, कियो पछुआर हमहुँ अभागलि दुआर धेने ठार िकयो लोढ़ै बेली फूल कियो अढ़ूल हमहुँ अभागलि तिरिया खोदू नामी दुबि कियो मांगय अन-धन, कियो पूत हमहुँ अभागलि कर जोड़ि ठार। भनहिं विद्यापति विषहरि माय सभ दिन सभ ठाम रहब सहाय। 2 साओन विषहरि लेल प्रवेश भादव विषहरि खेलल झिलहोरि। आसिन विषहरि भगता लेल पान कतिक विषहरि नयना झरू नोर। अगहन विषहरि हेती अनमोल। 3 ऊँच रे अटरिया पर विषहरि माय राम, नीची रे अटरिया पर सोनरा के माय देबौ रे सोनरा भाइ डाला भरि सोन राम, गढ़ि विषहरि के कलस पचास बाट रे बटोहिया कि तोहें मोर भाइ राम, कहबनि विषहरि के कलसा लय जाइ तोहरो विषहरि के चिन्हियो ने जानि राम, कहबनि कोना के कलस लए जाय हमरो विषहरि के नामी-नामी केश राम, मुठी एक डाँर छनि अल्प बएस। मूड़न गीत बाबा यौ जग मूड़न करा दिअ मूड़न करा दिअ नटुआ नचा दिअ बाजा दिअ पूजा करा दिअ लौआ मंगा दिअ मूड़न करा दिअ के यौ लुटाबी अन धन सोनमा केओ हाथकेँ कंगन मामा लुटाबए अन धन सोनमा मामी लुटाबए हाथ के कंगनमा बाबा यै जग मूड़न करा दिअ मूड़न करा नटुआ नचा दिअ...। महेशवाणी 1 दुर-दुर छीया ए छीया, एहन बौराहा बर संग जयती कोना धीया पाँच मुख बीच शोभनि तीन अंखिया सह-सह नचै छनि सांप सखिया दुर-दुर.....। काँख तर झोरी शोभनि, धथूर के बीया दिगम्बर के रूप देख साले मैना के हीया दुर-दुर.....। जँ धिया के विष देथिन पिआ कोहबर मे मरती धीया भनहि विद्यापति सुनू धीया के माय बैसले ठाम गौरी के गुजरिया दुर-दुर......। 2 ना जाएब, ना जाएब ना जाएब हे सखि गौरी अंगनमा गौरी अंगना सखि, पारवती अंगनमा बहिरा साँपक माड़ब बनाओल तेलिया देल बन्हनमा हे धामन साँपक कोरो बनाओल, अजगर के देल धरनमा हे सखि गौरी अंगनमा हरहरा के काड़ा-छाड़ा, कड़ैत के लाओल कंगनमा पनियादरार के पहुँची लाओल ढरबा के लौल ढोलनमा हे, सखि गौरी........ सुगवा साँप के लौल जशनमा हे, चान्द तारा के शीशा लाओल मछगिद्धि के अभरनमा हे, सखि गौरी.........। 3 सखि जोगी एक ठाढ़ अंगनमामे अंगनमामे, हे भवनमामे साँपहि-साँप बामदहिन छल चित्र-विचित्र वसनमामे नित दिन भीख कतए सँ लायब घुरि फिरि जाहु अंगनमामे भीखो ने लिअए जोगी, घुरियो ने जाइ गौरी हे निकलू अंगनमामे भनहिं विद्यापति सुनू हे मनाइन शिव सन दानी के भुवनमामे। 4 डर लगैए हे डेराओन लगैए गौरी हम नहि जाएब तोरा अंगना, भयाओन लगैए हे अजगर के सम्हा पर धामिन के बरेड़िया गहुमन के कोरो फुफकार मारैए, गौरी हम.... कड़ेत के बत्ती पर सांखड़ के बन्हनमा बिढ़नी के खोता घनघन करैए। गौरी......... सुगबा के पाढ़ि पर ढोरबा के ढोलनमा पनिया के जीभ हनहन करैए गौरी......... तेहि घर मे बैसल छथि अपने महादेव बिछुआ के कुण्डल सनसन करैए। गौरी.......... 5 हम नहि गौरी शिव सँ बिआहब मोर गौरी रहत कुमारि हे भूत-प्रेत बरियाति अनलनि मोर जिया गेल डेराइ गे। गे माइ गालो चोकटल, मोछो पाकल पएरो मे फाटल बेमाइ गे गौरी लए भागव, गौरी लए जाएब गौरी ले पड़ाएब नैहर हे। भनहिं विद्यापति सुनू हे मनाइनि इहो थिक त्रिभुवननाथ हे शुभ-शुभ कए गौरी के बिआह, तारू होउ सनाथ गे माइ। नचारी बम-बम भैरो हो भूपाल अपनी नगरिया भोला खेबि लगाबऽ पार कथी केर नाव-नवेरिया कथी करूआरि कोने लाला खेबनहारे, कोने उतारे पार सोने केर नाव-नवेरिया रूपे करूआरि भैरो लाला खेबनहारे, भोला उतारे पार जँ तोहें भैरो लाला खेबि लगाएब पार मोतीचूर के लड़ुआ चढ़ाएब परसाद हाथी चलै, घोड़ा चलै, पड़ै निशान बाबा के कमरथुआ चलै, उठै घमसान 2 भोला नेने चलू हमरो अपन नगरी अपन नगरी यो कैलास पुरी पारबती के हम टल बजाएब नित उठि नीर भरब गगरी बेलक पतिया फूल चढ़ाएब िनत उठि भांग पीसब रगड़ी भनहिं विद्यापति सुनू हे मनाइनि इहो थिक दानीक माथक पगड़ी। 3 जय शिवशंकर भोले दानी क्षमा मंगै छी तोरे सँ अपराधी पातक हम भारी तैं कनै छी भोरे से। तोहर शरण छोड़ि ककरा शरण मे जाएब हे शंकरदानी दयावान दाता तोरा सन के त्रिलोक मे नहि जानि। जाधरि नहि ताकब बमभोले हम चिचिआएब जोरे सँ अपना ले फक्कर भंगिया िकन्तु तोहर अनुचर भरले कोसे-कोसे नामी तूँ शंकर सेवक पर सदिखन ढरले। जनम भेल माया तृष्णा मे से तृष्णा नहि पूर भेलै। कामना के लहरि मे बाबा जीवन एहिना दूरि भेलै। हे दुखमोचन पार लगाबऽ हम दुखिया छी ओरे सँ पूजन विधि नहि जानी हम हे यएह जपि-जपि कऽ धियान धरी कर्म चक्र के जीवन भरि हम पेटे ले ओरियान करी जे ज्योतिश्वर पार लगाबह हम दुखिया छी ओरे सँ। 4 हटलो ने मानय त्रिपुरारी हो विपत्ति बड़ भारी खूजल बसहा के डोरी कोना पकड़ब चड़ि गेल फूल-फूलवारी, हो विपत्ति बड़ भारी अंगने-अंगने सखि सभ उलहन दै छथि कतेक सहब अति गारी, हो विपत्ति बड़ भारी भनहिं विद्यापति सुनू हे गौरी दाइ इहो छथि त्रिशुलधारी, हो विपत्ति बड़ भारी। सोहर- 1 धन धन राज अयोध्या धन्य राजा दशरथ रे। धन रे कौशल्या के भाग कि राम जनम लेल रे। देखैत पण्डित पुरोहित पोथी कर नेने रे ललना रे बालक होयत सगेआन वनहि सिधारत रे। से सुनि रानी विकल भेल राजा मुरक्षित रे। ललना रे राम जनम लेल जौं बन जायत रे। मन गुनी रानी हरखित भेली राजा मुदित भेल रे। ललना रे....... भल भेल राम जनम लेल, बाँझी पद छुटल रे। 2 कौने मास मेघबा गरजि गेल कोने मास बेंगवा बाजू रे ललना रे कोने मासे होरिला जनम लेल कि गोतिनक हिया सालू रे। सावन मेघवा गरजि गेल, भादव बेंग बाजू रे। आसिन होरिला जनम लेल कि गोतिनक हिया सालू रे। कोने तेल देव सासु के कोने ननदि जी के रे। ललना रे, करू तेल देबैन सासु जी के गरी ननदि जी के रे। ललना रे अमला दबैन गोतिन के हुनकर पैंच हेतनि रे। दसमासी सोहर पहिल मास चढ़ु अगहन, देवकी गरम संओ रे ललना रे.... मूंगक दाल नहि सोहाय, केहन गरम संओ रे ललना रे.... दोसर मास चढ़ु पूस, देवकी गरम संओ रे ललना रे..... पूसक माछी ने सोहाय, कि देवकी गरम संओ रे ललना रे..... तेसर मास चढ़ु माघ, देवकी गरम संओ रे ललना रे..... पौरल खीर ने सोहाय, कि केहन गरम संओ रे ललना रे.... चारिम मास चढ़ु फागुन, देवकी गरम संओ रे ललना रे.... फगुआक पूआ ने सोहाय, कि देवकी गरम संओ रे ललना रे..... पाँचम मास चढ़ु चैत, देवकी गरम संओ रे चैत के माछ ने सोहाय, कि केहन गरम संओ रे छठम मास चढ़ु वैशाक, देवकी गरम संओ रे ललना रे..... आम के टिकोला ने सोहाय, कि केहन गरम सेओ रे सातम मास चढ़ु जेठ, देवकी गरम संओ रे ललना रे..... खुजल केश ने सोहाय, कि केहन गरम संओ रे आठम मास चढ़ु अखाढ़, देवकी गरम संओ रे ललना रे..... पाकल आम ने सोहाय, कि केहन गरम संओ रे नवम मास चढ़ु साओन, देवकी गरम संओ रे ललना रे.... पिया के सेज ने सोहाय, कि केहन गरम संओ रे दसम मास चढ़ु भादव, कि देवकी गरम संओ रे ललना रे.... देवकी दरदे बेयाकुल दगरिन बजायब रे जब जनमल जदुनन्दन, खुजि गेल बंधन रे ललना रे..... खुजि गेल बज्र केबार पहरू सभ सूतल रे। 4 यशोमति अद्भुत लेखल, बालक देखल रे सुन्दर हुनकर गात, कि बात पकठोसल रे कंस केँ जी थर-थर काँपय, अपन घर पहुँचल रे पूतनाकेँ देल विचार, जाहु तौहें गोकुल रे। पूतना थन विष लेल घोरि विदा भेल गोकुल रे घर स बहार भेली यशुमती, बालक लइली रे देलनि पूतना केँ कोर, बालक बड़ सुन्दर रे। पूतना दूध पिआओल, आओर विष पसारल रे हरि देलनि दरसन बैसाइ खसल मुरछाइ रे। खेलौना 1 हाथक कंगना ननदी के दलनि से नहि मन भाबय हो लाल। फूल के घड़ी ननदिया माँगय, सेहो कहाँ पाएब हो लाल। डाँड़ के डरकस ननदी के दलिएनि से नहि मन भावय हो लल पियबा देलियनि ननदोसिया देलिएनि, से नहि मन भावय हो लाल। ई सभ किछु नहि हुनका चाही ओ मांगथि पठनमे हो लाल। 2 सोठौरा नइ खाएब राजा तीत लगैए सासु जे बजती बाजि कऽ की करती छठियारी पुजाबऽ लए माय अबैए सोठौरा ने खाएब...... गोतनो ने बजती बाजि कऽ की करती हलुआ बनाबए लए भौजी अबैए। सोठौरा ने....... ननदो जे बजती बाजि कऽ की करती कजरा सेदै लए बहिन अबैए। सोठौरा ने....... देओर जे बजता बाजि कऽ की करता दगरिन बजबै ले भाय अबैए। सोठौरा ने....... ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। १.डॉ॰ शशिधर कुमर २ पंकज कुमार झा ३.नवीन कुमार "आशा" १. डॉ॰ शशिधर कुमर, एम॰डी॰(आयु॰) – कायचिकित्सा, कॉलेज ऑफ आयुर्वेद एण्ड रिसर्च सेण्टर, निगडी – प्राधिकरण, पूणा (महाराष्ट्र) – ४११०४४ सुनू यौ भारत केर सरकार ! (आह्वान गीत) सुनू यौ भारत केर सरकार ! सुनू यौ भारत केर सरकार ! नञि माँगय छी भीख हऽम, निज माँगै छी अधिकार । सुनू यौ भारत केर सरकार ! जाहि धरती पर जन्म लेलहुँ हम, जाहि धरती पर खेल केलहुँ । पीबि जकर हम अमिय सलिल नित, अन्न खाय प्रतिपाल भेलहुँ । माँगि रहल छी, माए मैथिलीक पावन निर्मल प्यार । सुनू यौ भारत केर सरकार ! जन्महि सँ सिखलहुँ जे बाजब, जाहि भाषा सँ दुनिञा जनलहुँ । जकर ज्ञान - गंगा मे नहा हम , वाणी रुपी रुपी रत्न केँ पओलहुँ । माँगि रहल छी, ओहि भाषा मे भाव – ज्ञान सञ्चार । सुनू यौ भारत केर सरकार ! किन्नहु आब ने रहतीह मैथिली, ककरहु चरणक दासी । लेब अपन अधिकार , रहब हम लऽ कऽ अप्पन थाती । शान्ति समाहित क्रान्ति ज्वाल सँ, दूर करब अन्हार । सुनू यौ भारत केर सरकार ! लेब अपन अधिकार, मैथिलक स्वाभिमान अछि जागि उठल । निज समृद्धि, उन्नति, विकाश केर, नूतन पथ अछि बना रहल । आब ने रहतीह मिथिला - शिथिला, ने सहतीह अत्याचार । सुनू यौ भारत केर सरकार ! रोकि सकैछ ने केओ आइ, कोशी कमलाक उमड़ल धारा । बान्हि सकैछ की केओ हवा, पहिरा सकइछ ओकरा काड़ा ? देब जवाब डूबा ओकरा , जे रोकत निज करुआरि । सुनू यौ भारत केर सरकार ! नोर (कविता) रे नोर धन्य जिनगी तोहर, निज प्रियाक नैन मे बसइत छेँ । बहि नैन सँ छूबि कपोल दुहु, मधुकोष अधर मे खसइत छेँ ।। पी अधर अमिय तोँ भऽ चञ्चल, मुख चूमि वेग सँ बढ़इत छेँ । पुनि चूमि प्रियाक मृणाल गृवा, कुच श्रृंग मध्य भऽ बहइत छेँ ।। तोँ केलि करैत, अठखेलि करैत, नाभी जल पूरित करइत छेँ । पुनि धार अनेक बना कटि पर, चुम्बन कऽ आगाँ बढ़इत छेँ ।। नीबी नभ तर भऽ हर्ष चित्त, सागर सँ संगम करइत छेँ । ओहि अनुपम अर्णव तट पहुँचि, अपना केँ धन्य तोँ बुझइत छेँ ।। पर व्यर्थ तोहर अभिमान सर्व, हमरहि कारण तोँ बहइत छेँ । नहि मोल तोहर रे अश्रु कोनहु, बहबाक हेतुअहि बनइत छेँ ।। हमहीं छी हुनक चितवन मे सदा, यद्यपि तोँ आँखि मे रहइत छेँ । हम हुनक हृदय, हर अंग मे छी, स्पर्श मात्र तोँ करइत छेँ ।। हम जीवन नेने अबइत छी, तोँ मरणक राह देखबइत छेँ । हमरा लग हर्षक द्युति - इजोत, तोँ तम विषाद लऽ अबइत छेँ ।। हम कनितहु, कानि ने सकइत छी (गीत) की हाल कहू, हम अहँ सँ प्रिय, सब हाल तऽ अपने जनितहि छी । हम एहि ठाँ दूर, अहाँ सँ प्रिय, चुप रहितहुँ सदिखन, कनितहि छी ।। हर एक क्षण अहाँ हमर सन्मुख, हम याद अहीं केँ करइत छी । अछि भेल जेना निन्नहु उन्मुख, भरि राति तरेगन गनइत छी ।। चन्ना मे देखि अहँक मुख छवि, जँ धीर कने हम धरइत छी । तऽ देखि कलंक, प्रिय अहँ केँ, चानहु बुझबा सँ डरइत छी ।। हे प्राण हमर ! अहँ जुनि पुछू, हम अहँ बिनु कोना कऽ रहइत छी । संदेह करब अहँ जुनि कनिञो, हम अहीँ केर पूजा करइत छी ।। सौभाग्य जे प्रिय अहँ नाड़ि थिकहुँ, नोरहु केर भाषा जनइत छी । पर हमर विवशता तऽ देखू, हम कनितहु, कानि ने सकइत छी ।। २. आउ सुनु कने बात हमर- पंकज कुमार झा -पंकज जी सॉफ्टवेयर अभियन्ता छथि। आउ सुनु कने बात हमर, नै पकड़ू अहाँ कान हमर, कहै छी हम आइ कनी अप्रियगर, मुदा पिबहे पड़त क्रोधक जहर, अहंकार आ क्रोध केँ, कंठेमे धरु, अहाँ आब नीलकंठ बनू, जेकरा पुजैत एलहुँ सभ दिन, वएह महादेव बनू अहाँ, ध्यान करू, कनी ज्ञान करू, विज्ञानक अहाँ संग धरु, परंपराकेँ बुझू अहाँ, तर्क तथ्यसँ तौलू अहाँ, कसौटीपर कसलाक बादे, ओकरा अहाँ अंगीकार करू, अंध मोहि धृतराष्ट्र जकाँ, आ गांधारी ने बनू अहाँ, हिसाब करू, कनी विचार करू, अलग अलग विधासँ साक्षात करू, अध्ययन करू, निर्माण करू, श्रीजनात्मक्ताक अहाँ आयाम बनू, तास छोडू, भाँग छोड़ू, बिना बातक बात छोड़ू, अपन बड़ाइक राग छोड़ू, दलानक बैसार छोड़ू, राजनीतक कौचर्य छोड़ू, आब समय नै भोज भातक, आब समय अइ समय संग चलै के, उच्च अध्ययनमे पाइ लगाउ, व्यपार बाणिज्यसँ हाथ मिलाउ, अपन सहजता अपन सरलता, अपन दर्शन केँ आर बढ़ाउ, इतिहासमे नै, आब बर्तमान केँ, अपन कर्मठतासँ सजाउ, विज्ञानक ज्ञाता बनू, दर्शनमे छलहुँ अग्रणी, आब विज्ञानक बारी अइ, पूजा पाठकेँ विज्ञानसँ जोड़ू, नियम निष्ठाकेँ स्वास्थ्यसँ जोड़ू, तहने टा कल्याण हएत, जहने पान माछ मखानसँ उबरब, खेबा टाक सिर्फ बात नै करब, साँस साँसमे ध्यान करब, आ बात बातमे विज्ञान, गणित गणितक चर्चामे, तकनीकक आधुनिकतामे, समय अपन पूरा बितैब, कनी याद करू, सीता उठाबै छलीह शिव धनुष, आ अहाँ दबल छी दहेजक ज्वालासँ, गाम गाम नशामे डूबल, कुंठाक निक्षेपसँ भरल, आरोप आ प्रत्यारोपसँ उबरु, अपनाकेँ अहाँ कलासँ जोड़ू, आब समय विश्रामक नै अइ, आब परिश्रमक अइ जरूरत, जनकक गीते टा नै गाउ, फेर जनक जकाँ विज्ञानक हर चलाउ, ज्ञानक मटकूरमे सीता निकलतीह, लक्ष्मीसँ भरपूर धरती, राम पुरुषार्थ स्वयं औताह, सीता के वरन करताह, कतौ दुखक दरश नै हएत, सबहक मोन निर्मल भऽ जएत, माता पिता नै डराएल रहताह, बाल बच्चाकेँ पढ़ाएल करताह, गाम गाममे हएत विज्ञानक चर्चा, हर्षित मोनमे खुशहालीक बर्षा, खेल खेलमे गणितक पाठ, बैसारीमे कविता कहानी, पुनः मैथिल ज्ञान विज्ञानसँ आलोकित, करताह पूरा जगमे इजोत | ३ नवीन कुमार "आशा" माए बाबु .. माए बाबु आइ अहाँक मोन परल , तखन हमरा ने किछु फुराएल .. बैसि कऽ आंगन मे , खूब हम नीर बहायल.. फेर सोचल जे सपना देखला बाबु , ओकर कोना करु त्याग .. कोना घुरि जाए ओ गाम जकरा लेल लेलौं वनवास .... आइ मरम बुझे अछि आशा , की अछि ई मिथिला समाज .. एकरा मे अछि ओ जान , जे मुरदा मे सेहो फुकै जान. माए बाबु ने करब ई दुख बौआ एतय अहाँक पाबै सुख. जाबत ओ ने रचत इतिहास नै आओत अहँक पास... माए बाबु.. (अपन माँ बाबुजी कँ समर्पित ,हुनक आस ,नवीनक आशा) ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। १.रामदेव प्रसाद मण्डल ‘झारूदार’ २.अच्छेलाल शास्त्री ३.शिवकुमार झा ‘टिल्लू’ १ रामदेव प्रसाद मण्डल ‘झारूदार’, मैथिलीक पहिल जनकवि आ मैथिलीक भिखारी ठाकुर रामदेव प्रसाद मण्डल ‘झारूदार’क गीत आ झारु। रामदेव प्रसाद मण्डल ‘झारूदार’ गीत- नेता अफसर मौज करै छै। शासक आँखिमे छिट कऽ छौर।। जनता नै एकता बनबै छै। तँए चाटै छै मामक घैड़।। एकताकेँ जौं नै अपनेबै जीवन भरि सुख लऽ सपनेबै। लुच्चा-लम्पट खुनि कऽ खाइ छै नीचाँ-ऊपर सभ खमहौर। जन.......। अपने पेट लऽ सभ बेहाल छै तँए तँ देशक एहन हाल छै। मात्र औपचारिक राज चलै छै मिडिया खाली लै छै घमहौर। जन............। एकता बनैले सहए पड़ै छै घटो लगा कऽ बहए पड़ै छै अपन गलतपर लहए पड़ै छै। जन.........। २ अच्छेलाल शास्त्री- १९५६ गाम- सोनवर्षा, पोस्ट- करहरी भाया- नरहिया, जिला- मधुबनी (बिहार) दूटा कविता- की देख रहल छी? गाम-गाममे अछि पसरल झगड़ा। लोभी बैमान करैत अछि नखड़ा।। घर बिगारू करैत देखू बखड़ा। सभ किछु जानि रहल मैया सखड़ा।। झगड़ घर बिगारू लगा रहल अछि। बूतल आगिकेँ सुनगा रहल अछि।। फुसि गप कोना पतिया रहल अछि। कनफूसकी कऽ ओ बतिया रहल अछि।। की कही घर-घरमे अछि तँ यएह दुख। देख जड़ैत एक दोसरक सुख।। सभटा खेला करैत टोल प्रमुख। एक दोसरकेँ प्रगतिक खएबाक भुख।। मूर्दाकेँ उखाड़ि गनका रहल अछि। भायपर भायकेँ सनका रहल अछि।। जन धन-क्षण कोना गमा रहल रहल अछि। परिवारक प्रगति तँ जा रहल अछि।। एे लेल मिलल देशक आजादी। गलती करबाक लोक भेल आदि।। लड़ैत मरैत वादी प्रतिवादी। देशक जन-धन-क्षण हुुअए वर्वादी।। कहू तहन ऐमे गलती किनकर। हिनकर कि हुनकर देख रहल दिनकर।। (()) दू हजार दस श्रावणक दृश्य- सुखि गेल पोखरि डाबर घर। पूर्वा बहैत जाड़ बेजाड़।। लागल दमकल फट-फट करैए। चर चाँचर सभ छट-छट करैए।। सगर डगर बाट गर्दा उड़ैए। दूपहर चलक नै मन करैए।। खेतक बीआ सुखल बीरार। ने कादो आ ने होइत गजार।। श्रावण लगैत बैशाक मास। धान नै लागल शकल चास।। बाधक बाध चरैत अछि माल। कि कहतन्हि कियो हाल-चाल।। कखनो हवा शान्त रौद गुमार। केहेन अछि खेतीहर कपार।। लागल तागत सभटा बुड़ल। दाहीपर अछि रौदी घूड़ल।। किसान पिसान दुख नै बुझत। अपना दिस तँ सभकेँ सुझत।। शीघ्र करू सरकार जोगार। सुखि गेल पोखरि डाबर धार।। (()) ३ शिवकुमार झा ‘टिल्लू’ कविता- अस्तित्वक प्रश्न? ककरासँ कहबै के पतियेतै अपने तरंगमे भीजल दुनियाँ बड़ अथाह स्वार्थक अर्णव ई शुभ बनि गेलै लोलुप बनियाँ शोणित बोरि-बोरि टाट बनएलौं खर खोड़ि टिटही लऽ गेलै फाटल आॅचरसँ कोना कऽ झॅपबै खाली चिनुआर बेपर्द भऽ गेलै व्याल दृष्टिसँ राकस गुड़कए चिहुकि-बिचुकि कऽ कानए रनियाँ कर्मक नाहमे भेलै भोकन्नर वामे हाथे पानि उपछलौं भदवरिएमे पतवारि हेराएल दहिना हाथक लग्गा बनएलौं सभटा आङुर पानि खा गेलै, कोना बजतै दर्दक हरमुनियाँ कछेरमे विषनारि उगल छै थलथल पॉक पएर धॅसि गेलै अन्हार मोनिमे कछमछ कऽ रहलौं बिनु जाले टेंगड़ा फॅसि गेलै कोनो कऽ हमरा बाहर करतै नोर चाटि हहरए सोनमनियाँ... किछु छिद्दीक तरमे दबि कऽ पंद्रह अाना अकसक कऽ रहलै भारी भेल कुकर्मक सोती ओकरे धारमे गंगा बहलै घनन दरिद्रा तांडव करतै, अस्तित्वक- प्रश्न बनल पैजनियाँ... ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। १.ज्योति सुनीत चौधरी २.श्वेता झा (सिंगापुर) ३.गुंजन कर्ण ४.राजनाथ मिश्र (चित्रमय मिथिला) ५. उमेश मण्डल (मिथिलाक वनस्पति/ मिथिलाक जीव-जन्तु/ मिथिलाक जिनगी) १. ज्योति सुनीत चौधरी जन्म स्थान -बेल्हवार, मधुबनी। ज्योति मिथिला चित्रकलामे सेहो पारंगत छथि आ हिनकर मिथिला चित्रकलाक प्रदर्शनी ईलिंग आर्ट ग्रुप केर अंतर्गत ईलिंग ब्रॊडवे, लंडनमे प्रदर्शित कएल गेल अछि। कविता संग्रह ’अर्चिस्’ प्रकाशित। ज्योति सम्प्रति लन्दनमे रहै छथि। तुलसी विवाह २.श्वेता झा (सिंगापुर) ३.गुंजन कर्ण राँटी मधुबनी, सम्प्रति यू.के.मे रहै छथि। www.madhubaniarts.co.uk पर हुनकर कलाकृति देखि सकै छी। ४. राजनाथ मिश्र चित्रमय मिथिला स्लाइड शो चित्रमय मिथिला (https://sites.google.com/a/videha.com/videha-paintings-photos/ ) ५. उमेश मण्डल मिथिलाक वनस्पति स्लाइड शो मिथिलाक जीव-जन्तु स्लाइड शो मिथिलाक जिनगी स्लाइड शो मिथिलाक वनस्पति/ मिथिलाक जीव जन्तु/ मिथिलाक जिनगी (https://sites.google.com/a/videha.com/videha-paintings-photos/ ) ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। विदेह नूतन अंक गद्य-पद्य भारती १. मोहनदास (दीर्घकथा):लेखक: उदय प्रकाश (मूल हिन्दीसँ मैथिलीमे अनुवाद विनीत उत्पल) मोहनदास (मैथिली-देवनागरी) मोहनदास (मैथिली-मिथिलाक्षर) मोहनदास (मैथिली-ब्रेल) २.छिन्नमस्ता- प्रभा खेतानक हिन्दी उपन्यासक सुशीला झा द्वारा मैथिली अनुवाद छिन्नमस्ता बालानां कृते १. डॉ॰ शशिधर कुमर २.संस्कृति वर्मा ३.बिपिन कुमार झा १ डॉ॰ शशिधर कुमर “विदेह” एम॰डी॰(आयु॰) – कायचिकित्सा कॉलेज ऑफ आयुर्वेद एण्ड रिसर्च सेण्टर, निगडी – प्राधिकरण, पूणा (महाराष्ट्र) – ४११०४४, ओ व्यक्ति की ? (बालगीत) ओ व्यक्ति की ? जे नहि समय केर मारि सहने हो । ओ हृदय की ? जे ने दुःखक कोनो स्वाद चिखने हो ।। ओ सैनिकहि की ? युद्ध मे जे भाग नञि लेलक । ओ नाविकहि की ? जे ने झंझावात सञो खेलल । ओ सोन की ? जे आगि केर नञि धाह सहने हो । ओ व्यक्ति की ? जे नहि समय केर मारि सहने हो ।। तरुआरि की ? जे शत्रु केर शोणित सँ नञि भीजल । ओ आँखि की ? जे नोर सन अमृत सँ नञि तीतल । संजोगे की ? जे नञि वियोगक राति सहने हो । ओ व्यक्ति की ? जे नहि समय केर मारि सहने हो ।। ओ की पथिक ? जे काँट पर चलनाय नहि सीखल । ओ की सरित ? जे पर्वतहुँ मे धार नहि चीड़ल । ओ वयस की ? जे नञि जगक अनुभव समेटने हो । ओ व्यक्ति की ? जे नहि समय केर मारि सहने हो ।। ओ गाछ की ? सदिखन लसित वसन्त जे देखल । ओ विजय की ? जे विघ्न – बाधा केर विना भेटल । ओ दीप की ? जे वायु केर नञि कम्प सहने हो । ओ व्यक्ति की ? जे नहि समय केर मारि सहने हो ।। २. संस्कृति वर्मा हमर दादी माँ हमर दादी माँ क गाम जकर नाम छी बडगाम कतेक नीक कतेक सुंदर नीक नीक लोग नीक नीक घर सब केओ प्रेम सँ भरल एतेक सुन्दर गाम ककर दीप दीप सँ जगमगाइत जाहि ठाम हमर दादी माँ ओ भऽ गेल हमर धाम जकर नाम छी बडगाम ....... .... काश हमरा पंख रहितैक तँ हम अकास मे उडैत रहितौं काश ,हमरा चारि हाथ होयतैक सब काज जल्दी जल्दी करितौं काश ,हम यदि जनितौं सभक दुःख ख़त्म कऽ दैतौं किन्तु, हमरा किछु नै चाही हमरा तँ चाही हम्मर दादी माँ जिनक बिन सबटा सून अछि जे हमर जीवन-संगीतक धुन अछि .... ३. बिपिन कुमार झा एहि चराचर जगत मे मनुक्ख के? [एहि हास्यकथा केर रचनाकर्ता बिपिन कुमार झा राष्ट्रिय संस्कृत संस्थान, मानितविश्वविद्यालय, श्री सदाशिव परिसर पुरी, ओडिशा केर साहित्य विभाग में अध्यापनरत छथि। कोनो प्रकारक टिप्पणीkumarvipin.jha@gmail.com पर सादर अपेक्षित] एहि चराचर जगत में मनुक्ख सब सँ अधिक बुद्धि बला प्राणी अछि ई सर्वविदित अछि। मुदा मनुक्ख के ई प्रश्न सदिखन मन में अबैत रहैत छलैकएकटा जङ्गल केर राजा कें। ओ एक दिन सभा बजौलक। सभ सँऽ ई प्रश्न राखल गेल जे एहि चराचर जगत में मनुक्ख के अछि? आ ओ हमरा सभ सँऽ कोना अधिक महत्त्वपूर्ण अछि? सभा में एकटा बृद्ध छलाह ओ उठि के कहलथि- हे वनराज! कियाक नै अपना सभ सीधा ई गप्प विधाता ब्रह्मा सँ करी? वनराज प्रत्युत्तर देलथि- एवमस्तु। तिथि निर्धारित भेल। सभ अपन विमान सँ सीधे ब्रह्मा लग पहुँचला। ब्रह्मा के प्रणाम कय पुछलथि। हे संसार के बनेनिहार ब्रह्माजी एकटा जिज्ञासा स हम सभ एतय आयल छी। ब्रह्मा के किछु फुरि नहि रहल छलन्हि कियाक तऽ एतबाक दिन तऽ मात्र इन्द्रे किछु पुछैक लेल अबैत छलखीन्ह मुदा आब तऽ पशु सभ सेहो.... कोनो बात नै। ओ कहलथि- देरी कोन बातक। अपन गप्प कहू। वनराज कहलथि- हे विधाता! मनुक्ख हमरा सभ सँ श्रेष्ठ कोना? ब्रह्मा कहलथि- सुनू मनुक्ख लग ज्ञान छैक अस्तु ओ अहाँ सभ सऽ श्रेष्ठ अछि। वनराज आपत्ति उठेलथि- ज्ञान तऽ हमरो सभ लग अछि। यदि नै रहितय तऽ बच्छा के एक हजार गाय के बीच में छोडि देला पर ओ केकरहु थन सँऽ दूध पी लैतऽ... । कहियो एहेन भेल? ब्रह्मा कहलथि- नै .... वत्सो गच्छति मातरम्... वनराज कहलथि- तखनि अहाँ कोन आधार पर मनुक्ख के एना टीकासन पर बैसा देलियैक? ब्रह्मा कहलथि- देखू मनुक्ख लग धर्म एहेन चीज छैक जे अहाँ सभ लग नै अछि| धर्मो हि तेषामधिको विशेषो....। वनराज हारि मानय बला नहि. बजलाह- ई तऽ अपने अनुचित कहल। प्रत्येक पशु के अपन धर्म छैक। जे मांसाहारी अछि ओ नित्य मांसाहारी अछि जेना हम। हम कहियो घास नहिं खा सकैत छी। जे शाकाहारी अछि से कहियो मांस नहि खा सकैत अछि। जेना बरद लोकनि। ब्रह्मा तऽ विचित्र संकट में आबि गेला। मनुक्ख के श्रेष्ठ कोना कही। नै कहबै त ओ सभ आबि के हल्ला करत। कहलथि कनिकाल रुकू। हम पोथी पतरा उलटा के कहैत छी। कनिक काल केर बाद ब्रह्मा कहलथि- सुनु यौ, मनुक्ख में एकटा विशिष्ट गुण छैक। ओ छैक परिवर्तनशीलता। मनुक्ख कखनहु एक स्वभाव बला नै रहि सकैत अछि। ओ स्वयं के हर स्थिति में समायोजित कय सकैत अछि। शाकाहारी मांसाहार कय सकैत अछि। मांसाहारी शाकाहार कय सकैत अछि। संस्कृत पढनिहार अंग्रेजी पढि सकै अछि। अंग्रेजी पढनिहार संस्कृत। राजस्थान मे रहनिहार जम्मू में रहि सकैत् अछि आ गुजरात में रहनिहार अटलाण्टा में। मनुष्य समायोजन कय सकैत अछि। की अहँऽ घास खा सकैत छी। ऊँट बिहार केर बाढि के वर्दाश्त कय सकत? वनराज निरुत्तरित भय गेलाह मुदा उत्साह सँ बजलाह- बाह वाह... मुदा एकटा गप्प कहू? जे व्यक्ति परिवर्तन नहिं कय पवैत अछि वा जे एके रंग हमेशा रहैत अछि। जेकरा में बिबिधता नहिं अछि ओ ऽऽऽ ब्रह्मा कहलथि- हँ अहाँ सभ केर बात सुनि लगैत अछि जे विधिक विधान मॆ संशोधनक आवश्यकता अछि। जे विविधता सँ रहित छथि ओ आय सँ मनुक्ख नहिं कहल जेताह। वनराज बजलाह- तखनि ओ की कहौताह? ब्रह्मा कहलथि- ओ विचित्र पशु कहौताह। सभ पशु हर्षित भय मृत्युलोक अयलथि। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। बच्चा लोकनि द्वारा स्मरणीय श्लोक १.प्रातः काल ब्रह्ममुहूर्त्त (सूर्योदयक एक घंटा पहिने) सर्वप्रथम अपन दुनू हाथ देखबाक चाही, आ’ ई श्लोक बजबाक चाही। कराग्रे वसते लक्ष्मीः करमध्ये सरस्वती। करमूले स्थितो ब्रह्मा प्रभाते करदर्शनम्॥ करक आगाँ लक्ष्मी बसैत छथि, करक मध्यमे सरस्वती, करक मूलमे ब्रह्मा स्थित छथि। भोरमे ताहि द्वारे करक दर्शन करबाक थीक। २.संध्या काल दीप लेसबाक काल- दीपमूले स्थितो ब्रह्मा दीपमध्ये जनार्दनः। दीपाग्रे शङ्करः प्रोक्त्तः सन्ध्याज्योतिर्नमोऽस्तुते॥ दीपक मूल भागमे ब्रह्मा, दीपक मध्यभागमे जनार्दन (विष्णु) आऽ दीपक अग्र भागमे शङ्कर स्थित छथि। हे संध्याज्योति! अहाँकेँ नमस्कार। ३.सुतबाक काल- रामं स्कन्दं हनूमन्तं वैनतेयं वृकोदरम्। शयने यः स्मरेन्नित्यं दुःस्वप्नस्तस्य नश्यति॥ जे सभ दिन सुतबासँ पहिने राम, कुमारस्वामी, हनूमान्, गरुड़ आऽ भीमक स्मरण करैत छथि, हुनकर दुःस्वप्न नष्ट भऽ जाइत छन्हि। ४. नहेबाक समय- गङ्गे च यमुने चैव गोदावरि सरस्वति। नर्मदे सिन्धु कावेरि जलेऽस्मिन् सन्निधिं कुरू॥ हे गंगा, यमुना, गोदावरी, सरस्वती, नर्मदा, सिन्धु आऽ कावेरी धार। एहि जलमे अपन सान्निध्य दिअ। ५.उत्तरं यत्समुद्रस्य हिमाद्रेश्चैव दक्षिणम्। वर्षं तत् भारतं नाम भारती यत्र सन्ततिः॥ समुद्रक उत्तरमे आऽ हिमालयक दक्षिणमे भारत अछि आऽ ओतुका सन्तति भारती कहबैत छथि। ६.अहल्या द्रौपदी सीता तारा मण्डोदरी तथा। पञ्चकं ना स्मरेन्नित्यं महापातकनाशकम्॥ जे सभ दिन अहल्या, द्रौपदी, सीता, तारा आऽ मण्दोदरी, एहि पाँच साध्वी-स्त्रीक स्मरण करैत छथि, हुनकर सभ पाप नष्ट भऽ जाइत छन्हि। ७.अश्वत्थामा बलिर्व्यासो हनूमांश्च विभीषणः। कृपः परशुरामश्च सप्तैते चिरञ्जीविनः॥ अश्वत्थामा, बलि, व्यास, हनूमान्, विभीषण, कृपाचार्य आऽ परशुराम- ई सात टा चिरञ्जीवी कहबैत छथि। ८.साते भवतु सुप्रीता देवी शिखर वासिनी उग्रेन तपसा लब्धो यया पशुपतिः पतिः। सिद्धिः साध्ये सतामस्तु प्रसादान्तस्य धूर्जटेः जाह्नवीफेनलेखेव यन्यूधि शशिनः कला॥ ९. बालोऽहं जगदानन्द न मे बाला सरस्वती। अपूर्णे पंचमे वर्षे वर्णयामि जगत्त्रयम् ॥ १०. दूर्वाक्षत मंत्र(शुक्ल यजुर्वेद अध्याय २२, मंत्र २२) आ ब्रह्मन्नित्यस्य प्रजापतिर्ॠषिः। लिंभोक्त्ता देवताः। स्वराडुत्कृतिश्छन्दः। षड्जः स्वरः॥ आ ब्रह्म॑न् ब्राह्म॒णो ब्र॑ह्मवर्च॒सी जा॑यता॒मा रा॒ष्ट्रे रा॑ज॒न्यः शुरे॑ऽइषव्यो॒ऽतिव्या॒धी म॑हार॒थो जा॑यतां॒ दोग्ध्रीं धे॒नुर्वोढा॑न॒ड्वाना॒शुः सप्तिः॒ पुर॑न्धि॒र्योवा॑ जि॒ष्णू र॑थे॒ष्ठाः स॒भेयो॒ युवास्य यज॑मानस्य वी॒रो जा॒यतां निका॒मे-नि॑कामे नः प॒र्जन्यों वर्षतु॒ फल॑वत्यो न॒ऽओष॑धयः पच्यन्तां योगेक्ष॒मो नः॑ कल्पताम्॥२२॥ मन्त्रार्थाः सिद्धयः सन्तु पूर्णाः सन्तु मनोरथाः। शत्रूणां बुद्धिनाशोऽस्तु मित्राणामुदयस्तव। ॐ दीर्घायुर्भव। ॐ सौभाग्यवती भव। हे भगवान्। अपन देशमे सुयोग्य आ’ सर्वज्ञ विद्यार्थी उत्पन्न होथि, आ’ शुत्रुकेँ नाश कएनिहार सैनिक उत्पन्न होथि। अपन देशक गाय खूब दूध दय बाली, बरद भार वहन करएमे सक्षम होथि आ’ घोड़ा त्वरित रूपेँ दौगय बला होए। स्त्रीगण नगरक नेतृत्व करबामे सक्षम होथि आ’ युवक सभामे ओजपूर्ण भाषण देबयबला आ’ नेतृत्व देबामे सक्षम होथि। अपन देशमे जखन आवश्यक होय वर्षा होए आ’ औषधिक-बूटी सर्वदा परिपक्व होइत रहए। एवं क्रमे सभ तरहेँ हमरा सभक कल्याण होए। शत्रुक बुद्धिक नाश होए आ’ मित्रक उदय होए॥ मनुष्यकें कोन वस्तुक इच्छा करबाक चाही तकर वर्णन एहि मंत्रमे कएल गेल अछि। एहिमे वाचकलुप्तोपमालड़्कार अछि। अन्वय- ब्रह्म॑न् - विद्या आदि गुणसँ परिपूर्ण ब्रह्म रा॒ष्ट्रे - देशमे ब्र॑ह्मवर्च॒सी-ब्रह्म विद्याक तेजसँ युक्त्त आ जा॑यतां॒- उत्पन्न होए रा॑ज॒न्यः-राजा शुरे॑ऽ–बिना डर बला इषव्यो॒- बाण चलेबामे निपुण ऽतिव्या॒धी-शत्रुकेँ तारण दय बला म॑हार॒थो-पैघ रथ बला वीर दोग्ध्रीं-कामना(दूध पूर्ण करए बाली) धे॒नुर्वोढा॑न॒ड्वाना॒शुः धे॒नु-गौ वा वाणी र्वोढा॑न॒ड्वा- पैघ बरद ना॒शुः-आशुः-त्वरित सप्तिः॒-घोड़ा पुर॑न्धि॒र्योवा॑- पुर॑न्धि॒- व्यवहारकेँ धारण करए बाली र्योवा॑-स्त्री जि॒ष्णू-शत्रुकेँ जीतए बला र॑थे॒ष्ठाः-रथ पर स्थिर स॒भेयो॒-उत्तम सभामे युवास्य-युवा जेहन यज॑मानस्य-राजाक राज्यमे वी॒रो-शत्रुकेँ पराजित करएबला निका॒मे-नि॑कामे-निश्चययुक्त्त कार्यमे नः-हमर सभक प॒र्जन्यों-मेघ वर्षतु॒-वर्षा होए फल॑वत्यो-उत्तम फल बला ओष॑धयः-औषधिः पच्यन्तां- पाकए योगेक्ष॒मो-अलभ्य लभ्य करेबाक हेतु कएल गेल योगक रक्षा नः॑-हमरा सभक हेतु कल्पताम्-समर्थ होए ग्रिफिथक अनुवाद- हे ब्रह्मण, हमर राज्यमे ब्राह्मण नीक धार्मिक विद्या बला, राजन्य-वीर,तीरंदाज, दूध दए बाली गाय, दौगय बला जन्तु, उद्यमी नारी होथि। पार्जन्य आवश्यकता पड़ला पर वर्षा देथि, फल देय बला गाछ पाकए, हम सभ संपत्ति अर्जित/संरक्षित करी। 8.VIDEHA FOR NON RESIDENTS 8.1 to 8.3 MAITHILI LITERATURE IN ENGLISH 8.1.1.The Comet -GAJENDRA THAKUR translated by Jyoti Jha chaudhary 8.1.2.The_Science_of_Words- GAJENDRA THAKUR translated by the author himself 8.1.3.On_the_dice-board_of_the_millennium- GAJENDRA THAKUR translated by Jyoti Jha chaudhary 8.1.4.NAAGPHANS (IN ENGLISH)- SHEFALIKA VERMA translated by Dr. Rajiv Kumar Verma and Dr. Jaya Verma 1. Episodes Of The Life - ("Kist-Kist Jeevan" by Smt. shefalika Varma translated into English by Smt. Jyoti Jha Chaudhary ) 2.Original Poem in Maithili by Kalikant Jha "Buch" Translated into English by Jyoti Jha Chaudhary १ Episodes Of The Life - ("Kist-Kist Jeevan" by Smt. shefalika Varma translated into English by Smt. Jyoti Jha Chaudhary ) Shefalika Verma has written two outstanding books in Maithili; one a book of poems titled “BHAVANJALI”, and the other, a book of short stories titled “YAYAVARI”. Her Maithili Books have been translated into many languages including Hindi, English, Oriya, Gujarati, Dogri and others. She is frequently invited to the India Poetry Recital Festivals as her fans and friends are important people.
Translator:Jyoti Jha Chaudhary, Place of Birth- Belhvar (Madhubani District), Her Mithila Paintings have been displayed by Ealing Art Group at Ealing Broadway, London.published work: "ARCHIS"- COLLECTION OF MAITHILI HAIKUS AND POEMS. She currently lives in London. Episodes Of The Life : How these forty years of togetherness have passed! The goddess has blessed me with the enchanting wife. I couldn’t even complete my conversation and such a long period has passed Just look at the lilting flowers in the small garden of our dream. Flowers have attracted more flowers, the couple flowers made buds What to say, was that possible without your co-operation Many difficulties have come in the life and you didn’t allow me to distracted You always encouraged me with your inspiring words There are many remembrances that make me unhappy You are gifted to me as a boon to realise the happiness You forgave me for all my faults and rendered all your duties The tiny flowers of emotions are dedicated to you today I beheld you for life long But my eyes are not yet satisfied I pray only That you never get any sorrow in your life, I have trust on my Goddess To my Ranno, Raniya, Chhammo, Raaj on her fortieth birth anniversary - Lalan 3-07-1999 CTC Broadgreen Hospital, Liverpool, U.K. He wrote this after only one month of my birthday To my lovely, attractive, bright wife ‘Raj’ who adorned my life with her enchanting beauty- “Keep on showering affection to everybody like you have been doing yet. I only can feel that I cannot live without you for a single second.” - Lalan 09-08-1999, Omskark, U.K. I was able to see with my eyes overflow with tears as clear as the rising sun, how happy Vermaji was on that day as his daughter Vandana (Pinki) was coming from England. She was the one who with her husband had saved her dad’s life in England. २ Kalikant Jha "Buch" 1934-2009, Birth place- village Karian, District- Samastipur (Karian is birth place of famous Indian Nyaiyyayik philosopher Udayanacharya), Father Late Pt. Rajkishor Jha was first headmaster of village middle school. Mother Late Kala Devi was housewife. After completing Intermediate education started job block office of Govt. of Bihar.published in Mithila Mihir, Mati-pani, Bhakha, and Maithili Akademi magazine. Translator:Jyoti Jha Chaudhary, Place of Birth- Belhvar (Madhubani District), Her Mithila Paintings have been displayed by Ealing Art Group at Ealing Broadway, London.published work: "ARCHIS"- COLLECTION OF MAITHILI HAIKUS AND POEMS. She currently lives in London. Kanyadaan Now you will be alone dear daughter The tears will flow The lips will be sunk After sacrificing the smile You are born and grown up like a son The mom was more delighted to have a daughter You are pampered by uncle and aunt You attracted everyone’s love by your virtue You’re granddad’s attention and life of grandmother Life line of your father oh dear daughter The dark nights vanished as soon as you were born I hugged the scattered bright night I am lotus of this house you are moonlit of others Tell me when will come your kahars Today’s full moon will become moon of dwitiya tomorrow Accept the blessings and complete your shringaar Be the garland of his enchanted heart Ashutosh, Mrityunjay and Shankar is my son-in-law I understood you are not a daughter but an incarnation of Gauri I am handing over you finally I realised today You have become a daughter! Send your comments to ggajendra@videha.com Input: (कोष्ठकमे देवनागरी, मिथिलाक्षर किंवा फोनेटिक-रोमनमे टाइप करू। Input in Devanagari, Mithilakshara or Phonetic-Roman.) Output: (परिणाम देवनागरी, मिथिलाक्षर आ फोनेटिक-रोमन/ रोमनमे। Result in Devanagari, Mithilakshara and Phonetic-Roman/ Roman.) English to Maithili Maithili to English इंग्लिश-मैथिली-कोष / मैथिली-इंग्लिश-कोष प्रोजेक्टकेँ आगू बढ़ाऊ, अपन सुझाव आ योगदान ई-मेल द्वारा ggajendra@videha.com पर पठाऊ। Top of Form विदेहक मैथिली-अंग्रेजी आ अंग्रेजी मैथिली कोष (इंटरनेटपर पहिल बेर सर्च-डिक्शनरी) एम.एस. एस.क्यू.एल. सर्वर आधारित -Based on ms-sql server Maithili-English and English-Maithili Dictionary. १.भारत आ नेपालक मैथिली भाषा-वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक शैली आ २.मैथिलीमे भाषा सम्पादन पाठ्यक्रम १.नेपाल आ भारतक मैथिली भाषा-वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक शैली
१.१. नेपालक मैथिली भाषा वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक उच्चारण आ लेखन शैली (भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक धारणाकेँ पूर्ण रूपसँ सङ्ग लऽ निर्धारित) मैथिलीमे उच्चारण तथा लेखन १.पञ्चमाक्षर आ अनुस्वार: पञ्चमाक्षरान्तर्गत ङ, ञ, ण, न एवं म अबैत अछि। संस्कृत भाषाक अनुसार शब्दक अन्तमे जाहि वर्गक अक्षर रहैत अछि ओही वर्गक पञ्चमाक्षर अबैत अछि। जेना- अङ्क (क वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ङ् आएल अछि।) पञ्च (च वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ञ् आएल अछि।) खण्ड (ट वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ण् आएल अछि।) सन्धि (त वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे न् आएल अछि।) खम्भ (प वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे म् आएल अछि।) उपर्युक्त बात मैथिलीमे कम देखल जाइत अछि। पञ्चमाक्षरक बदलामे अधिकांश जगहपर अनुस्वारक प्रयोग देखल जाइछ। जेना- अंक, पंच, खंड, संधि, खंभ आदि। व्याकरणविद पण्डित गोविन्द झाक कहब छनि जे कवर्ग, चवर्ग आ टवर्गसँ पूर्व अनुस्वार लिखल जाए तथा तवर्ग आ पवर्गसँ पूर्व पञ्चमाक्षरे लिखल जाए। जेना- अंक, चंचल, अंडा, अन्त तथा कम्पन। मुदा हिन्दीक निकट रहल आधुनिक लेखक एहि बातकेँ नहि मानैत छथि। ओ लोकनि अन्त आ कम्पनक जगहपर सेहो अंत आ कंपन लिखैत देखल जाइत छथि। नवीन पद्धति किछु सुविधाजनक अवश्य छैक। किएक तँ एहिमे समय आ स्थानक बचत होइत छैक। मुदा कतोक बेर हस्तलेखन वा मुद्रणमे अनुस्वारक छोट सन बिन्दु स्पष्ट नहि भेलासँ अर्थक अनर्थ होइत सेहो देखल जाइत अछि। अनुस्वारक प्रयोगमे उच्चारण-दोषक सम्भावना सेहो ततबए देखल जाइत अछि। एतदर्थ कसँ लऽ कऽ पवर्ग धरि पञ्चमाक्षरेक प्रयोग करब उचित अछि। यसँ लऽ कऽ ज्ञ धरिक अक्षरक सङ्ग अनुस्वारक प्रयोग करबामे कतहु कोनो विवाद नहि देखल जाइछ। २.ढ आ ढ़ : ढ़क उच्चारण “र् ह”जकाँ होइत अछि। अतः जतऽ “र् ह”क उच्चारण हो ओतऽ मात्र ढ़ लिखल जाए। आन ठाम खाली ढ लिखल जएबाक चाही। जेना- ढ = ढाकी, ढेकी, ढीठ, ढेउआ, ढङ्ग, ढेरी, ढाकनि, ढाठ आदि। ढ़ = पढ़ाइ, बढ़ब, गढ़ब, मढ़ब, बुढ़बा, साँढ़, गाढ़, रीढ़, चाँढ़, सीढ़ी, पीढ़ी आदि। उपर्युक्त शब्द सभकेँ देखलासँ ई स्पष्ट होइत अछि जे साधारणतया शब्दक शुरूमे ढ आ मध्य तथा अन्तमे ढ़ अबैत अछि। इएह नियम ड आ ड़क सन्दर्भ सेहो लागू होइत अछि। ३.व आ ब : मैथिलीमे “व”क उच्चारण ब कएल जाइत अछि, मुदा ओकरा ब रूपमे नहि लिखल जएबाक चाही। जेना- उच्चारण : बैद्यनाथ, बिद्या, नब, देबता, बिष्णु, बंश, बन्दना आदि। एहि सभक स्थानपर क्रमशः वैद्यनाथ, विद्या, नव, देवता, विष्णु, वंश, वन्दना लिखबाक चाही। सामान्यतया व उच्चारणक लेल ओ प्रयोग कएल जाइत अछि। जेना- ओकील, ओजह आदि। ४.य आ ज : कतहु-कतहु “य”क उच्चारण “ज”जकाँ करैत देखल जाइत अछि, मुदा ओकरा ज नहि लिखबाक चाही। उच्चारणमे यज्ञ, जदि, जमुना, जुग, जाबत, जोगी, जदु, जम आदि कहल जाएबला शब्द सभकेँ क्रमशः यज्ञ, यदि, यमुना, युग, यावत, योगी, यदु, यम लिखबाक चाही। ५.ए आ य : मैथिलीक वर्तनीमे ए आ य दुनू लिखल जाइत अछि। प्राचीन वर्तनी- कएल, जाए, होएत, माए, भाए, गाए आदि। नवीन वर्तनी- कयल, जाय, होयत, माय, भाय, गाय आदि। सामान्यतया शब्दक शुरूमे ए मात्र अबैत अछि। जेना एहि, एना, एकर, एहन आदि। एहि शब्द सभक स्थानपर यहि, यना, यकर, यहन आदिक प्रयोग नहि करबाक चाही। यद्यपि मैथिलीभाषी थारू सहित किछु जातिमे शब्दक आरम्भोमे “ए”केँ य कहि उच्चारण कएल जाइत अछि। ए आ “य”क प्रयोगक सन्दर्भमे प्राचीने पद्धतिक अनुसरण करब उपयुक्त मानि एहि पुस्तकमे ओकरे प्रयोग कएल गेल अछि। किएक तँ दुनूक लेखनमे कोनो सहजता आ दुरूहताक बात नहि अछि। आ मैथिलीक सर्वसाधारणक उच्चारण-शैली यक अपेक्षा एसँ बेसी निकट छैक। खास कऽ कएल, हएब आदि कतिपय शब्दकेँ कैल, हैब आदि रूपमे कतहु-कतहु लिखल जाएब सेहो “ए”क प्रयोगकेँ बेसी समीचीन प्रमाणित करैत अछि। ६.हि, हु तथा एकार, ओकार : मैथिलीक प्राचीन लेखन-परम्परामे कोनो बातपर बल दैत काल शब्दक पाछाँ हि, हु लगाओल जाइत छैक। जेना- हुनकहि, अपनहु, ओकरहु, तत्कालहि, चोट्टहि, आनहु आदि। मुदा आधुनिक लेखनमे हिक स्थानपर एकार एवं हुक स्थानपर ओकारक प्रयोग करैत देखल जाइत अछि। जेना- हुनके, अपनो, तत्काले, चोट्टे, आनो आदि। ७.ष तथा ख : मैथिली भाषामे अधिकांशतः षक उच्चारण ख होइत अछि। जेना- षड्यन्त्र (खड़यन्त्र), षोडशी (खोड़शी), षट्कोण (खटकोण), वृषेश (वृखेश), सन्तोष (सन्तोख) आदि। ८.ध्वनि-लोप : निम्नलिखित अवस्थामे शब्दसँ ध्वनि-लोप भऽ जाइत अछि: (क) क्रियान्वयी प्रत्यय अयमे य वा ए लुप्त भऽ जाइत अछि। ओहिमे सँ पहिने अक उच्चारण दीर्घ भऽ जाइत अछि। ओकर आगाँ लोप-सूचक चिह्न वा विकारी (’ / ऽ) लगाओल जाइछ। जेना- पूर्ण रूप : पढ़ए (पढ़य) गेलाह, कए (कय) लेल, उठए (उठय) पड़तौक। अपूर्ण रूप : पढ़’ गेलाह, क’ लेल, उठ’ पड़तौक। पढ़ऽ गेलाह, कऽ लेल, उठऽ पड़तौक। (ख) पूर्वकालिक कृत आय (आए) प्रत्ययमे य (ए) लुप्त भऽ जाइछ, मुदा लोप-सूचक विकारी नहि लगाओल जाइछ। जेना- पूर्ण रूप : खाए (य) गेल, पठाय (ए) देब, नहाए (य) अएलाह। अपूर्ण रूप : खा गेल, पठा देब, नहा अएलाह। (ग) स्त्री प्रत्यय इक उच्चारण क्रियापद, संज्ञा, ओ विशेषण तीनूमे लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना- पूर्ण रूप : दोसरि मालिनि चलि गेलि। अपूर्ण रूप : दोसर मालिन चलि गेल। (घ) वर्तमान कृदन्तक अन्तिम त लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना- पूर्ण रूप : पढ़ैत अछि, बजैत अछि, गबैत अछि। अपूर्ण रूप : पढ़ै अछि, बजै अछि, गबै अछि। (ङ) क्रियापदक अवसान इक, उक, ऐक तथा हीकमे लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना- पूर्ण रूप: छियौक, छियैक, छहीक, छौक, छैक, अबितैक, होइक। अपूर्ण रूप : छियौ, छियै, छही, छौ, छै, अबितै, होइ। (च) क्रियापदीय प्रत्यय न्ह, हु तथा हकारक लोप भऽ जाइछ। जेना- पूर्ण रूप : छन्हि, कहलन्हि, कहलहुँ, गेलह, नहि। अपूर्ण रूप : छनि, कहलनि, कहलौँ, गेलऽ, नइ, नञि, नै। ९.ध्वनि स्थानान्तरण : कोनो-कोनो स्वर-ध्वनि अपना जगहसँ हटि कऽ दोसर ठाम चलि जाइत अछि। खास कऽ ह्रस्व इ आ उक सम्बन्धमे ई बात लागू होइत अछि। मैथिलीकरण भऽ गेल शब्दक मध्य वा अन्तमे जँ ह्रस्व इ वा उ आबए तँ ओकर ध्वनि स्थानान्तरित भऽ एक अक्षर आगाँ आबि जाइत अछि। जेना- शनि (शइन), पानि (पाइन), दालि ( दाइल), माटि (माइट), काछु (काउछ), मासु (माउस) आदि। मुदा तत्सम शब्द सभमे ई निअम लागू नहि होइत अछि। जेना- रश्मिकेँ रइश्म आ सुधांशुकेँ सुधाउंस नहि कहल जा सकैत अछि। १०.हलन्त(्)क प्रयोग : मैथिली भाषामे सामान्यतया हलन्त (्)क आवश्यकता नहि होइत अछि। कारण जे शब्दक अन्तमे अ उच्चारण नहि होइत अछि। मुदा संस्कृत भाषासँ जहिनाक तहिना मैथिलीमे आएल (तत्सम) शब्द सभमे हलन्त प्रयोग कएल जाइत अछि। एहि पोथीमे सामान्यतया सम्पूर्ण शब्दकेँ मैथिली भाषा सम्बन्धी निअम अनुसार हलन्तविहीन राखल गेल अछि। मुदा व्याकरण सम्बन्धी प्रयोजनक लेल अत्यावश्यक स्थानपर कतहु-कतहु हलन्त देल गेल अछि। प्रस्तुत पोथीमे मथिली लेखनक प्राचीन आ नवीन दुनू शैलीक सरल आ समीचीन पक्ष सभकेँ समेटि कऽ वर्ण-विन्यास कएल गेल अछि। स्थान आ समयमे बचतक सङ्गहि हस्त-लेखन तथा तकनीकी दृष्टिसँ सेहो सरल होबऽबला हिसाबसँ वर्ण-विन्यास मिलाओल गेल अछि। वर्तमान समयमे मैथिली मातृभाषी पर्यन्तकेँ आन भाषाक माध्यमसँ मैथिलीक ज्ञान लेबऽ पड़ि रहल परिप्रेक्ष्यमे लेखनमे सहजता तथा एकरूपतापर ध्यान देल गेल अछि। तखन मैथिली भाषाक मूल विशेषता सभ कुण्ठित नहि होइक, ताहू दिस लेखक-मण्डल सचेत अछि। प्रसिद्ध भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक कहब छनि जे सरलताक अनुसन्धानमे एहन अवस्था किन्नहु ने आबऽ देबाक चाही जे भाषाक विशेषता छाँहमे पडि जाए। -(भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक धारणाकेँ पूर्ण रूपसँ सङ्ग लऽ निर्धारित) १.२. मैथिली अकादमी, पटना द्वारा निर्धारित मैथिली लेखन-शैली
१. जे शब्द मैथिली-साहित्यक प्राचीन कालसँ आइ धरि जाहि वर्त्तनीमे प्रचलित अछि, से सामान्यतः ताहि वर्त्तनीमे लिखल जाय- उदाहरणार्थ-
ग्राह्य
एखन ठाम जकर, तकर तनिकर अछि
अग्राह्य अखन, अखनि, एखेन, अखनी ठिमा, ठिना, ठमा जेकर, तेकर तिनकर। (वैकल्पिक रूपेँ ग्राह्य) ऐछ, अहि, ए।
२. निम्नलिखित तीन प्रकारक रूप वैकल्पिकतया अपनाओल जाय: भऽ गेल, भय गेल वा भए गेल। जा रहल अछि, जाय रहल अछि, जाए रहल अछि। कर’ गेलाह, वा करय गेलाह वा करए गेलाह।
३. प्राचीन मैथिलीक ‘न्ह’ ध्वनिक स्थानमे ‘न’ लिखल जाय सकैत अछि यथा कहलनि वा कहलन्हि।
४. ‘ऐ’ तथा ‘औ’ ततय लिखल जाय जत’ स्पष्टतः ‘अइ’ तथा ‘अउ’ सदृश उच्चारण इष्ट हो। यथा- देखैत, छलैक, बौआ, छौक इत्यादि।
५. मैथिलीक निम्नलिखित शब्द एहि रूपे प्रयुक्त होयत: जैह, सैह, इएह, ओऐह, लैह तथा दैह।
६. ह्र्स्व इकारांत शब्दमे ‘इ’ के लुप्त करब सामान्यतः अग्राह्य थिक। यथा- ग्राह्य देखि आबह, मालिनि गेलि (मनुष्य मात्रमे)।
७. स्वतंत्र ह्रस्व ‘ए’ वा ‘य’ प्राचीन मैथिलीक उद्धरण आदिमे तँ यथावत राखल जाय, किंतु आधुनिक प्रयोगमे वैकल्पिक रूपेँ ‘ए’ वा ‘य’ लिखल जाय। यथा:- कयल वा कएल, अयलाह वा अएलाह, जाय वा जाए इत्यादि।
८. उच्चारणमे दू स्वरक बीच जे ‘य’ ध्वनि स्वतः आबि जाइत अछि तकरा लेखमे स्थान वैकल्पिक रूपेँ देल जाय। यथा- धीआ, अढ़ैआ, विआह, वा धीया, अढ़ैया, बियाह।
९. सानुनासिक स्वतंत्र स्वरक स्थान यथासंभव ‘ञ’ लिखल जाय वा सानुनासिक स्वर। यथा:- मैञा, कनिञा, किरतनिञा वा मैआँ, कनिआँ, किरतनिआँ।
१०. कारकक विभक्त्तिक निम्नलिखित रूप ग्राह्य:- हाथकेँ, हाथसँ, हाथेँ, हाथक, हाथमे। ’मे’ मे अनुस्वार सर्वथा त्याज्य थिक। ‘क’ क वैकल्पिक रूप ‘केर’ राखल जा सकैत अछि।
११. पूर्वकालिक क्रियापदक बाद ‘कय’ वा ‘कए’ अव्यय वैकल्पिक रूपेँ लगाओल जा सकैत अछि। यथा:- देखि कय वा देखि कए।
१२. माँग, भाँग आदिक स्थानमे माङ, भाङ इत्यादि लिखल जाय।
१३. अर्द्ध ‘न’ ओ अर्द्ध ‘म’ क बदला अनुसार नहि लिखल जाय, किंतु छापाक सुविधार्थ अर्द्ध ‘ङ’ , ‘ञ’, तथा ‘ण’ क बदला अनुस्वारो लिखल जा सकैत अछि। यथा:- अङ्क, वा अंक, अञ्चल वा अंचल, कण्ठ वा कंठ।
१४. हलंत चिह्न निअमतः लगाओल जाय, किंतु विभक्तिक संग अकारांत प्रयोग कएल जाय। यथा:- श्रीमान्, किंतु श्रीमानक।
१५. सभ एकल कारक चिह्न शब्दमे सटा क’ लिखल जाय, हटा क’ नहि, संयुक्त विभक्तिक हेतु फराक लिखल जाय, यथा घर परक।
१६. अनुनासिककेँ चन्द्रबिन्दु द्वारा व्यक्त कयल जाय। परंतु मुद्रणक सुविधार्थ हि समान जटिल मात्रापर अनुस्वारक प्रयोग चन्द्रबिन्दुक बदला कयल जा सकैत अछि। यथा- हिँ केर बदला हिं।
१७. पूर्ण विराम पासीसँ ( । ) सूचित कयल जाय।
१८. समस्त पद सटा क’ लिखल जाय, वा हाइफेनसँ जोड़ि क’ , हटा क’ नहि।
१९. लिअ तथा दिअ शब्दमे बिकारी (ऽ) नहि लगाओल जाय।
२०. अंक देवनागरी रूपमे राखल जाय।
२१.किछु ध्वनिक लेल नवीन चिन्ह बनबाओल जाय। जा' ई नहि बनल अछि ताबत एहि दुनू ध्वनिक बदला पूर्ववत् अय/ आय/ अए/ आए/ आओ/ अओ लिखल जाय। आकि ऎ वा ऒ सँ व्यक्त कएल जाय।
ह./- गोविन्द झा ११/८/७६ श्रीकान्त ठाकुर ११/८/७६ सुरेन्द्र झा "सुमन" ११/०८/७६
२. मैथिलीमे भाषा सम्पादन पाठ्यक्रम २.१. उच्चारण निर्देश: (बोल्ड कएल रूप ग्राह्य):- दन्त न क उच्चारणमे दाँतमे जीह सटत- जेना बाजू नाम , मुदा ण क उच्चारणमे जीह मूर्धामे सटत (नै सटैए तँ उच्चारण दोष अछि)- जेना बाजू गणेश। तालव्य शमे जीह तालुसँ , षमे मूर्धासँ आ दन्त समे दाँतसँ सटत। निशाँ, सभ आ शोषण बाजि कऽ देखू। मैथिलीमे ष केँ वैदिक संस्कृत जकाँ ख सेहो उच्चरित कएल जाइत अछि, जेना वर्षा, दोष। य अनेको स्थानपर ज जकाँ उच्चरित होइत अछि आ ण ड़ जकाँ (यथा संयोग आ गणेश संजोग आ गड़ेस उच्चरित होइत अछि)। मैथिलीमे व क उच्चारण ब, श क उच्चारण स आ य क उच्चारण ज सेहो होइत अछि। ओहिना ह्रस्व इ बेशीकाल मैथिलीमे पहिने बाजल जाइत अछि कारण देवनागरीमे आ मिथिलाक्षरमे ह्रस्व इ अक्षरक पहिने लिखलो जाइत आ बाजलो जएबाक चाही। कारण जे हिन्दीमे एकर दोषपूर्ण उच्चारण होइत अछि (लिखल तँ पहिने जाइत अछि मुदा बाजल बादमे जाइत अछि), से शिक्षा पद्धतिक दोषक कारण हम सभ ओकर उच्चारण दोषपूर्ण ढंगसँ कऽ रहल छी। अछि- अ इ छ ऐछ (उच्चारण) छथि- छ इ थ – छैथ (उच्चारण) पहुँचि- प हुँ इ च (उच्चारण) आब अ आ इ ई ए ऐ ओ औ अं अः ऋ ऐ सभ लेल मात्रा सेहो अछि, मुदा ऐमे ई ऐ ओ औ अं अः ऋ केँ संयुक्ताक्षर रूपमे गलत रूपमे प्रयुक्त आ उच्चरित कएल जाइत अछि। जेना ऋ केँ री रूपमे उच्चरित करब। आ देखियौ- ऐ लेल देखिऔ क प्रयोग अनुचित। मुदा देखिऐ लेल देखियै अनुचित। क् सँ ह् धरि अ सम्मिलित भेलासँ क सँ ह बनैत अछि, मुदा उच्चारण काल हलन्त युक्त शब्दक अन्तक उच्चारणक प्रवृत्ति बढ़ल अछि, मुदा हम जखन मनोजमे ज् अन्तमे बजैत छी, तखनो पुरनका लोककेँ बजैत सुनबन्हि- मनोजऽ, वास्तवमे ओ अ युक्त ज् = ज बजै छथि। फेर ज्ञ अछि ज् आ ञ क संयुक्त मुदा गलत उच्चारण होइत अछि- ग्य। ओहिना क्ष अछि क् आ ष क संयुक्त मुदा उच्चारण होइत अछि छ। फेर श् आ र क संयुक्त अछि श्र ( जेना श्रमिक) आ स् आ र क संयुक्त अछि स्र (जेना मिस्र)। त्र भेल त+र । उच्चारणक ऑडियो फाइल विदेह आर्काइव http://www.videha.co.in/ पर उपलब्ध अछि। फेर केँ / सँ / पर पूर्व अक्षरसँ सटा कऽ लिखू मुदा तँ / कऽ हटा कऽ। ऐमे सँ मे पहिल सटा कऽ लिखू आ बादबला हटा कऽ। अंकक बाद टा लिखू सटा कऽ मुदा अन्य ठाम टा लिखू हटा कऽ– जेना छहटा मुदा सभ टा। फेर ६अ म सातम लिखू- छठम सातम नै। घरबलामे बला मुदा घरवालीमे वाली प्रयुक्त करू। रहए- रहै मुदा सकैए (उच्चारण सकै-ए)। मुदा कखनो काल रहए आ रहै मे अर्थ भिन्नता सेहो, जेना से कम्मो जगहमे पार्किंग करबाक अभ्यास रहै ओकरा। पुछलापर पता लागल जे ढुनढुन नाम्ना ई ड्राइवर कनाट प्लेसक पार्किंगमे काज करैत रहए। छलै, छलए मे सेहो ऐ तरहक भेल। छलए क उच्चारण छल-ए सेहो। संयोगने- (उच्चारण संजोगने) केँ/ कऽ केर- क ( केर क प्रयोग गद्यमे नै करू , पद्यमे कऽ सकै छी। ) क (जेना रामक) –रामक आ संगे (उच्चारण राम के / राम कऽ सेहो) सँ- सऽ (उच्चारण) चन्द्रबिन्दु आ अनुस्वार- अनुस्वारमे कंठ धरिक प्रयोग होइत अछि मुदा चन्द्रबिन्दुमे नै। चन्द्रबिन्दुमे कनेक एकारक सेहो उच्चारण होइत अछि- जेना रामसँ- (उच्चारण राम सऽ) रामकेँ- (उच्चारण राम कऽ/ राम के सेहो)। केँ जेना रामकेँ भेल हिन्दीक को (राम को)- राम को= रामकेँ क जेना रामक भेल हिन्दीक का ( राम का) राम का= रामक कऽ जेना जा कऽ भेल हिन्दीक कर ( जा कर) जा कर= जा कऽ सँ भेल हिन्दीक से (राम से) राम से= रामसँ सऽ , तऽ , त , केर (गद्यमे) एे चारू शब्द सबहक प्रयोग अवांछित। के दोसर अर्थेँ प्रयुक्त भऽ सकैए- जेना, के कहलक? विभक्ति “क”क बदला एकर प्रयोग अवांछित। नञि, नहि, नै, नइ, नँइ, नइँ, नइं ऐ सभक उच्चारण आ लेखन - नै त्त्व क बदलामे त्व जेना महत्वपूर्ण (महत्त्वपूर्ण नै) जतए अर्थ बदलि जाए ओतहि मात्र तीन अक्षरक संयुक्ताक्षरक प्रयोग उचित। सम्पति- उच्चारण स म्प इ त (सम्पत्ति नै- कारण सही उच्चारण आसानीसँ सम्भव नै)। मुदा सर्वोत्तम (सर्वोतम नै)। राष्ट्रिय (राष्ट्रीय नै) सकैए/ सकै (अर्थ परिवर्तन) पोछैले/ पोछै लेल/ पोछए लेल पोछैए/ पोछए/ (अर्थ परिवर्तन) पोछए/ पोछै ओ लोकनि ( हटा कऽ, ओ मे बिकारी नै) ओइ/ ओहि ओहिले/ ओहि लेल/ ओही लऽ जएबेँ/ बैसबेँ पँचभइयाँ देखियौक/ (देखिऔक नै- तहिना अ मे ह्रस्व आ दीर्घक मात्राक प्रयोग अनुचित) जकाँ / जेकाँ तँइ/ तैँ/ होएत / हएत नञि/ नहि/ नँइ/ नइँ/ नै सौँसे/ सौंसे बड़ / बड़ी (झोराओल) गाए (गाइ नहि), मुदा गाइक दूध (गाएक दूध नै।) रहलेँ/ पहिरतैँ हमहीं/ अहीं सब - सभ सबहक - सभहक धरि - तक गप- बात बूझब - समझब बुझलौं/ समझलौं/ बुझलहुँ - समझलहुँ हमरा आर - हम सभ आकि- आ कि सकैछ/ करैछ (गद्यमे प्रयोगक आवश्यकता नै) होइन/ होनि जाइन (जानि नै, जेना देल जाइन) मुदा जानि-बूझि (अर्थ परिव्र्तन) पइठ/ जाइठ आउ/ जाउ/ आऊ/ जाऊ मे, केँ, सँ, पर (शब्दसँ सटा कऽ) तँ कऽ धऽ दऽ (शब्दसँ हटा कऽ) मुदा दूटा वा बेसी विभक्ति संग रहलापर पहिल विभक्ति टाकेँ सटाऊ। जेना ऐमे सँ । एकटा , दूटा (मुदा कए टा) बिकारीक प्रयोग शब्दक अन्तमे, बीचमे अनावश्यक रूपेँ नै। आकारान्त आ अन्तमे अ क बाद बिकारीक प्रयोग नै (जेना दिअ , आ/ दिय’ , आ’, आ नै ) अपोस्ट्रोफीक प्रयोग बिकारीक बदलामे करब अनुचित आ मात्र फॉन्टक तकनीकी न्यूनताक परिचायक)- ओना बिकारीक संस्कृत रूप ऽ अवग्रह कहल जाइत अछि आ वर्तनी आ उच्चारण दुनू ठाम एकर लोप रहैत अछि/ रहि सकैत अछि (उच्चारणमे लोप रहिते अछि)। मुदा अपोस्ट्रोफी सेहो अंग्रेजीमे पसेसिव केसमे होइत अछि आ फ्रेंचमे शब्दमे जतए एकर प्रयोग होइत अछि जेना raison d’etre एतए सेहो एकर उच्चारण रैजौन डेटर होइत अछि, माने अपोस्ट्रॉफी अवकाश नै दैत अछि वरन जोड़ैत अछि, से एकर प्रयोग बिकारीक बदला देनाइ तकनीकी रूपेँ सेहो अनुचित)। अइमे, एहिमे/ ऐमे जइमे, जाहिमे एखन/ अखन/ अइखन केँ (के नहि) मे (अनुस्वार रहित) भऽ मे दऽ तँ (तऽ, त नै) सँ ( सऽ स नै) गाछ तर गाछ लग साँझ खन जो (जो go, करै जो do) तै/तइ जेना- तै दुआरे/ तइमे/ तइले जै/जइ जेना- जै कारण/ जइसँ/ जइले ऐ/अइ जेना- ऐ कारण/ ऐसँ/ अइले/ मुदा एकर एकटा खास प्रयोग- लालति कतेक दिनसँ कहैत रहैत अइ लै/लइ जेना लैसँ/ लइले/ लै दुआरे लहँ/ लौं गेलौं/ लेलौं/ लेलँह/ गेलहुँ/ लेलहुँ/ लेलँ जइ/ जाहि/ जै जहिठाम/ जाहिठाम/ जइठाम/ जैठाम एहि/ अहि/ अइ (वाक्यक अंतमे ग्राह्य) / ऐ अइछ/ अछि/ ऐछ तइ/ तहि/ तै/ ताहि ओहि/ ओइ सीखि/ सीख जीवि/ जीवी/ जीब भलेहीं/ भलहिं तैं/ तँइ/ तँए जाएब/ जएब लइ/ लै छइ/ छै नहि/ नै/ नइ गइ/ गै छनि/ छन्हि ... समए शब्दक संग जखन कोनो विभक्ति जुटै छै तखन समै जना समैपर इत्यादि। असगरमे हृदए आ विभक्ति जुटने हृदे जना हृदेसँ, हृदेमे इत्यादि। जइ/ जाहि/ जै जहिठाम/ जाहिठाम/ जइठाम/ जैठाम एहि/ अहि/ अइ/ ऐ अइछ/ अछि/ ऐछ तइ/ तहि/ तै/ ताहि ओहि/ ओइ सीखि/ सीख जीवि/ जीवी/ जीब भले/ भलेहीं/ भलहिं तैं/ तँइ/ तँए जाएब/ जएब लइ/ लै छइ/ छै नहि/ नै/ नइ गइ/ गै छनि/ छन्हि चुकल अछि/ गेल गछि २.२. मैथिलीमे भाषा सम्पादन पाठ्यक्रम नीचाँक सूचीमे देल विकल्पमेसँ लैंगुएज एडीटर द्वारा कोन रूप चुनल जेबाक चाही: बोल्ड कएल रूप ग्राह्य: १.होयबला/ होबयबला/ होमयबला/ हेब’बला, हेम’बला/ होयबाक/होबएबला /होएबाक २. आ’/आऽ आ ३. क’ लेने/कऽ लेने/कए लेने/कय लेने/ल’/लऽ/लय/लए ४. भ’ गेल/भऽ गेल/भय गेल/भए गेल ५. कर’ गेलाह/करऽ गेलह/करए गेलाह/करय गेलाह ६. लिअ/दिअ लिय’,दिय’,लिअ’,दिय’/ ७. कर’ बला/करऽ बला/ करय बला करैबला/क’र’ बला / करैवाली ८. बला वला (पुरूष), वाली (स्त्री) ९ . आङ्ल आंग्ल १०. प्रायः प्रायह ११. दुःख दुख १ २. चलि गेल चल गेल/चैल गेल १३. देलखिन्ह देलकिन्ह, देलखिन १४. देखलन्हि देखलनि/ देखलैन्ह १५. छथिन्ह/ छलन्हि छथिन/ छलैन/ छलनि १६. चलैत/दैत चलति/दैति १७. एखनो अखनो १८. बढ़नि बढ़इन बढ़न्हि १९. ओ’/ओऽ(सर्वनाम) ओ २० . ओ (संयोजक) ओ’/ओऽ २१. फाँगि/फाङ्गि फाइंग/फाइङ २२. जे जे’/जेऽ २३. ना-नुकुर ना-नुकर २४. केलन्हि/केलनि/कयलन्हि २५. तखनतँ/ तखन तँ २६. जा रहल/जाय रहल/जाए रहल २७. निकलय/निकलए लागल/ लगल बहराय/ बहराए लागल/ लगल निकल’/बहरै लागल २८. ओतय/ जतय जत’/ ओत’/ जतए/ ओतए २९. की फूरल जे कि फूरल जे ३०. जे जे’/जेऽ ३१. कूदि / यादि(मोन पारब) कूइद/याइद/कूद/याद/ यादि (मोन) ३२. इहो/ ओहो ३३. हँसए/ हँसय हँसऽ ३४. नौ आकि दस/नौ किंवा दस/ नौ वा दस ३५. सासु-ससुर सास-ससुर ३६. छह/ सात छ/छः/सात ३७. की की’/ कीऽ (दीर्घीकारान्तमे ऽ वर्जित) ३८. जबाब जवाब ३९. करएताह/ करेताह करयताह ४०. दलान दिशि दलान दिश/दलान दिस ४१ . गेलाह गएलाह/गयलाह ४२. किछु आर/ किछु और/ किछ आर ४३. जाइ छल/ जाइत छल जाति छल/जैत छल ४४. पहुँचि/ भेट जाइत छल/ भेट जाइ छलए पहुँच/ भेटि जाइत छल ४५. जबान (युवा)/ जवान(फौजी) ४६. लय/ लए क’/ कऽ/ लए कए / लऽ कऽ/ लऽ कए ४७. ल’/लऽ कय/ कए ४८. एखन / एखने / अखन / अखने ४९. अहींकेँ अहीँकेँ ५०. गहींर गहीँर ५१. धार पार केनाइ धार पार केनाय/केनाए ५२. जेकाँ जेँकाँ/ जकाँ ५३. तहिना तेहिना ५४. एकर अकर ५५. बहिनउ बहनोइ ५६. बहिन बहिनि ५७. बहिन-बहिनोइ बहिन-बहनउ ५८. नहि/ नै ५९. करबा / करबाय/ करबाए ६०. तँ/ त ऽ तय/तए ६१. भैयारी मे छोट-भाए/भै/, जेठ-भाय/भाइ, ६२. गिनतीमे दू भाइ/भाए/भाँइ ६३. ई पोथी दू भाइक/ भाँइ/ भाए/ लेल। यावत जावत ६४. माय मै / माए मुदा माइक ममता ६५. देन्हि/ दइन दनि/ दएन्हि/ दयन्हि दन्हि/ दैन्हि ६६. द’/ दऽ/ दए ६७. ओ (संयोजक) ओऽ (सर्वनाम) ६८. तका कए तकाय तकाए ६९. पैरे (on foot) पएरे कएक/ कैक ७०. ताहुमे/ ताहूमे ७१. पुत्रीक ७२. बजा कय/ कए / कऽ ७३. बननाय/बननाइ ७४. कोला ७५. दिनुका दिनका ७६. ततहिसँ ७७. गरबओलन्हि/ गरबौलनि/ गरबेलन्हि/ गरबेलनि ७८. बालु बालू ७९. चेन्ह चिन्ह(अशुद्ध) ८०. जे जे’ ८१ . से/ के से’/के’ ८२. एखुनका अखनुका ८३. भुमिहार भूमिहार ८४. सुग्गर / सुगरक/ सूगर ८५. झठहाक झटहाक ८६. छूबि ८७. करइयो/ओ करैयो ने देलक /करियौ-करइयौ ८८. पुबारि पुबाइ ८९. झगड़ा-झाँटी झगड़ा-झाँटि ९०. पएरे-पएरे पैरे-पैरे ९१. खेलएबाक ९२. खेलेबाक ९३. लगा ९४. होए- हो – होअए ९५. बुझल बूझल ९६. बूझल (संबोधन अर्थमे) ९७. यैह यएह / इएह/ सैह/ सएह ९८. तातिल ९९. अयनाय- अयनाइ/ अएनाइ/ एनाइ १००. निन्न- निन्द १०१. बिनु बिन १०२. जाए जाइ १०३. जाइ (in different sense)-last word of sentence १०४. छत पर आबि जाइ १०५. ने १०६. खेलाए (play) –खेलाइ १०७. शिकाइत- शिकायत १०८. ढप- ढ़प १०९ . पढ़- पढ ११०. कनिए/ कनिये कनिञे १११. राकस- राकश ११२. होए/ होय होइ ११३. अउरदा- औरदा ११४. बुझेलन्हि (different meaning- got understand) ११५. बुझएलन्हि/बुझेलनि/ बुझयलन्हि (understood himself) ११६. चलि- चल/ चलि गेल ११७. खधाइ- खधाय ११८. मोन पाड़लखिन्ह/ मोन पाड़लखिन/ मोन पारलखिन्ह ११९. कैक- कएक- कइएक १२०. लग ल’ग १२१. जरेनाइ १२२. जरौनाइ जरओनाइ- जरएनाइ/ जरेनाइ १२३. होइत १२४. गरबेलन्हि/ गरबेलनि गरबौलन्हि/ गरबौलनि १२५. चिखैत- (to test)चिखइत १२६. करइयो (willing to do) करैयो १२७. जेकरा- जकरा १२८. तकरा- तेकरा १२९. बिदेसर स्थानेमे/ बिदेसरे स्थानमे १३०. करबयलहुँ/ करबएलहुँ/ करबेलहुँ करबेलौं १३१. हारिक (उच्चारण हाइरक) १३२. ओजन वजन आफसोच/ अफसोस कागत/ कागच/ कागज १३३. आधे भाग/ आध-भागे १३४. पिचा / पिचाय/पिचाए १३५. नञ/ ने १३६. बच्चा नञ (ने) पिचा जाय १३७. तखन ने (नञ) कहैत अछि। कहै/ सुनै/ देखै छल मुदा कहैत-कहैत/ सुनैत-सुनैत/ देखैत-देखैत १३८. कतेक गोटे/ कताक गोटे १३९. कमाइ-धमाइ/ कमाई- धमाई १४० . लग ल’ग १४१. खेलाइ (for playing) १४२. छथिन्ह/ छथिन १४३. होइत होइ १४४. क्यो कियो / केओ १४५. केश (hair) १४६. केस (court-case) १४७ . बननाइ/ बननाय/ बननाए १४८. जरेनाइ १४९. कुरसी कुर्सी १५०. चरचा चर्चा १५१. कर्म करम १५२. डुबाबए/ डुबाबै/ डुमाबै डुमाबय/ डुमाबए १५३. एखुनका/ अखुनका १५४. लए/ लिअए (वाक्यक अंतिम शब्द)- लऽ १५५. कएलक/ केलक १५६. गरमी गर्मी १५७ . वरदी वर्दी १५८. सुना गेलाह सुना’/सुनाऽ १५९. एनाइ-गेनाइ १६०. तेना ने घेरलन्हि/ तेना ने घेरलनि १६१. नञि / नै १६२. डरो ड’रो १६३. कतहु/ कतौ कहीं १६४. उमरिगर-उमेरगर उमरगर १६५. भरिगर १६६. धोल/धोअल धोएल १६७. गप/गप्प १६८. के के’ १६९. दरबज्जा/ दरबजा १७०. ठाम १७१. धरि तक १७२. घूरि लौटि १७३. थोरबेक १७४. बड्ड १७५. तोँ/ तूँ १७६. तोँहि( पद्यमे ग्राह्य) १७७. तोँही / तोँहि १७८. करबाइए करबाइये १७९. एकेटा १८०. करितथि /करतथि १८१. पहुँचि/ पहुँच १८२. राखलन्हि रखलन्हि/ रखलनि १८३. लगलन्हि/ लगलनि लागलन्हि १८४. सुनि (उच्चारण सुइन) १८५. अछि (उच्चारण अइछ) १८६. एलथि गेलथि १८७. बितओने/ बितौने/ बितेने १८८. करबओलन्हि/ करबौलनि/ करेलखिन्ह/ करेलखिन १८९. करएलन्हि/ करेलनि १९०. आकि/ कि १९१. पहुँचि/ पहुँच १९२. बत्ती जराय/ जराए जरा (आगि लगा) १९३. से से’ १९४. हाँ मे हाँ (हाँमे हाँ विभक्त्तिमे हटा कए) १९५. फेल फैल १९६. फइल(spacious) फैल १९७. होयतन्हि/ होएतन्हि/ होएतनि/हेतनि/ हेतन्हि १९८. हाथ मटिआएब/ हाथ मटियाबय/हाथ मटियाएब १९९. फेका फेंका २००. देखाए देखा २०१. देखाबए २०२. सत्तरि सत्तर २०३. साहेब साहब २०४.गेलैन्ह/ गेलन्हि/ गेलनि २०५. हेबाक/ होएबाक २०६.केलो/ कएलहुँ/केलौं/ केलुँ २०७. किछु न किछु/ किछु ने किछु २०८.घुमेलहुँ/ घुमओलहुँ/ घुमेलौं २०९. एलाक/ अएलाक २१०. अः/ अह २११.लय/ लए (अर्थ-परिवर्त्तन) २१२.कनीक/ कनेक २१३.सबहक/ सभक २१४.मिलाऽ/ मिला २१५.कऽ/ क २१६.जाऽ/ जा २१७.आऽ/ आ २१८.भऽ /भ’ (’ फॉन्टक कमीक द्योतक) २१९.निअम/ नियम २२० .हेक्टेअर/ हेक्टेयर २२१.पहिल अक्षर ढ/ बादक/ बीचक ढ़ २२२.तहिं/तहिँ/ तञि/ तैं २२३.कहिं/ कहीं २२४.तँइ/ तैं / तइँ २२५.नँइ/ नइँ/ नञि/ नहि/नै २२६.है/ हए / एलीहेँ/ २२७.छञि/ छै/ छैक /छइ २२८.दृष्टिएँ/ दृष्टियेँ २२९.आ (come)/ आऽ(conjunction) २३०. आ (conjunction)/ आऽ(come) २३१.कुनो/ कोनो, कोना/केना २३२.गेलैन्ह-गेलन्हि-गेलनि २३३.हेबाक- होएबाक २३४.केलौँ- कएलौँ-कएलहुँ/केलौं २३५.किछु न किछ- किछु ने किछु २३६.केहेन- केहन २३७.आऽ (come)-आ (conjunction-and)/आ। आब'-आब' /आबह-आबह २३८. हएत-हैत २३९.घुमेलहुँ-घुमएलहुँ- घुमेलाें २४०.एलाक- अएलाक २४१.होनि- होइन/ होन्हि/ २४२.ओ-राम ओ श्यामक बीच(conjunction), ओऽ कहलक (he said)/ओ २४३.की हए/ कोसी अएली हए/ की है। की हइ २४४.दृष्टिएँ/ दृष्टियेँ २४५ .शामिल/ सामेल २४६.तैँ / तँए/ तञि/ तहिं २४७.जौं / ज्योँ/ जँ/ २४८.सभ/ सब २४९.सभक/ सबहक २५०.कहिं/ कहीं २५१.कुनो/ कोनो/ कोनहुँ/ २५२.फारकती भऽ गेल/ भए गेल/ भय गेल २५३.कोना/ केना/ कन्ना/कना २५४.अः/ अह २५५.जनै/ जनञ २५६.गेलनि/ गेलाह (अर्थ परिवर्तन) २५७.केलन्हि/ कएलन्हि/ केलनि/ २५८.लय/ लए/ लएह (अर्थ परिवर्तन) २५९.कनीक/ कनेक/कनी-मनी २६०.पठेलन्हि पठेलनि/ पठेलइन/ पपठओलन्हि/ पठबौलनि/ २६१.निअम/ नियम २६२.हेक्टेअर/ हेक्टेयर २६३.पहिल अक्षर रहने ढ/ बीचमे रहने ढ़ २६४.आकारान्तमे बिकारीक प्रयोग उचित नै/ अपोस्ट्रोफीक प्रयोग फान्टक तकनीकी न्यूनताक परिचायक ओकर बदला अवग्रह (बिकारी) क प्रयोग उचित २६५.केर (पद्यमे ग्राह्य) / -क/ कऽ/ के २६६.छैन्हि- छन्हि २६७.लगैए/ लगैये २६८.होएत/ हएत २६९.जाएत/ जएत/ २७०.आएत/ अएत/ आओत २७१ .खाएत/ खएत/ खैत २७२.पिअएबाक/ पिएबाक/पियेबाक २७३.शुरु/ शुरुह २७४.शुरुहे/ शुरुए २७५.अएताह/अओताह/ एताह/ औताह २७६.जाहि/ जाइ/ जइ/ जै/ २७७.जाइत/ जैतए/ जइतए २७८.आएल/ अएल २७९.कैक/ कएक २८०.आयल/ अएल/ आएल २८१. जाए/ जअए/ जए (लालति जाए लगलीह।) २८२. नुकएल/ नुकाएल २८३. कठुआएल/ कठुअएल २८४. ताहि/ तै/ तइ २८५. गायब/ गाएब/ गएब २८६. सकै/ सकए/ सकय २८७.सेरा/सरा/ सराए (भात सरा गेल) २८८.कहैत रही/देखैत रही/ कहैत छलौं/ कहै छलौं- अहिना चलैत/ पढ़ैत (पढ़ै-पढ़ैत अर्थ कखनो काल परिवर्तित) - आर बुझै/ बुझैत (बुझै/ बुझै छी, मुदा बुझैत-बुझैत)/ सकैत/ सकै। करैत/ करै। दै/ दैत। छैक/ छै। बचलै/ बचलैक। रखबा/ रखबाक । बिनु/ बिन। रातिक/ रातुक बुझै आ बुझैत केर अपन-अपन जगहपर प्रयोग समीचीन अछि। बुझैत-बुझैत आब बुझलिऐ। हमहूँ बुझै छी। २८९. दुआरे/ द्वारे २९०.भेटि/ भेट/ भेँट २९१. खन/ खीन/ खुना (भोर खन/ भोर खीन) २९२.तक/ धरि २९३.गऽ/ गै (meaning different-जनबै गऽ) २९४.सऽ/ सँ (मुदा दऽ, लऽ) २९५.त्त्व,(तीन अक्षरक मेल बदला पुनरुक्तिक एक आ एकटा दोसरक उपयोग) आदिक बदला त्व आदि। महत्त्व/ महत्व/ कर्ता/ कर्त्ता आदिमे त्त संयुक्तक कोनो आवश्यकता मैथिलीमे नै अछि। वक्तव्य २९६.बेसी/ बेशी २९७.बाला/वाला बला/ वला (रहैबला) २९८ .वाली/ (बदलैवाली) २९९.वार्त्ता/ वार्ता ३००. अन्तर्राष्ट्रिय/ अन्तर्राष्ट्रीय ३०१. लेमए/ लेबए ३०२.लमछुरका, नमछुरका ३०२.लागै/ लगै ( भेटैत/ भेटै) ३०३.लागल/ लगल ३०४.हबा/ हवा ३०५.राखलक/ रखलक ३०६.आ (come)/ आ (and) ३०७. पश्चाताप/ पश्चात्ताप ३०८. ऽ केर व्यवहार शब्दक अन्तमे मात्र, यथासंभव बीचमे नै। ३०९.कहैत/ कहै ३१०. रहए (छल)/ रहै (छलै) (meaning different) ३११.तागति/ ताकति ३१२.खराप/ खराब ३१३.बोइन/ बोनि/ बोइनि ३१४.जाठि/ जाइठ ३१५.कागज/ कागच/ कागत ३१६.गिरै (meaning different- swallow)/ गिरए (खसए) ३१७.राष्ट्रिय/ राष्ट्रीय Festivals of Mithila DATE-LIST (year- 2011-12) (१४१९ साल) Marriage Days: Nov.2011- 20,21,23,25,27,30 Dec.2011- 1,5,9 January 2012- 18,19,20,23,25,27,29 Feb.2012- 2,3,8,9,10,16,17,19,23,24,29 March 2012- 1,8,9,12 April 2012- 15,16,18,25,26 June 2012- 8,13,24,25,28,29 Upanayana Days: February 2012- 2,3,24,26 March 2012- 4 April 2012- 1,2,26 June 2012- 22 Dviragaman Din: November 2011- 27,30 December 2011- 1,2,5,7,9,12 February 2012- 22,23,24,26,27,29 March 2012- 1,2,4,5,9,11,12 April 2012- 23,25,26,29 May 2012- 2,3,4,6,7 Mundan Din: December 2011- 1,5 January 201225,26,30 March 2012- 12 April 2012- 26 May 2012- 23,25,31 June 2012- 8,21,22,29 FESTIVALS OF MITHILA Mauna Panchami-20 July Madhushravani- 2 August Nag Panchami- 4 August Raksha Bandhan- 13 Aug Krishnastami- 21 August Kushi Amavasya / Somvari Vrat- 29 August Hartalika Teej- 31 August ChauthChandra-1 September Karma Dharma Ekadashi-8 September Indra Pooja Aarambh- 9 September Anant Caturdashi- 11 Sep Agastyarghadaan- 12 Sep Pitri Paksha begins- 13 Sep Mahalaya Aarambh- 13 September Vishwakarma Pooja- 17 September Jimootavahan Vrata/ Jitia-20 September Matri Navami- 21September Kalashsthapan- 28 September Belnauti- 2 October Patrika Pravesh- 3 October Mahastami- 4 October Maha Navami - 5 October Vijaya Dashami- 6 October Kojagara- 11 Oct Dhanteras- 24 October Diyabati, shyama pooja-26 October Annakoota/ Govardhana Pooja-27 October Bhratridwitiya/ Chitragupta Pooja-28 October Chhathi-kharna -31 October Chhathi- sayankalik arghya - 1 November Devotthan Ekadashi- 17 November Sama poojarambh- 2 November Kartik Poornima/ Sama Bisarjan- 10 Nov ravivratarambh- 27 November Navanna parvan- 29 November Vivaha Panchmi- 29 November Makara/ Teela Sankranti-15 Jan Naraknivaran chaturdashi- 21 January Basant Panchami/ Saraswati Pooja- 28 January Achla Saptmi- 30 January Mahashivaratri-20 February Holikadahan-Fagua-7 March Holi-9 Mar Varuni Yoga-20 March Chaiti navaratrarambh- 23 March Chaiti Chhathi vrata-29 March Ram Navami- 1 April Mesha Sankranti-Satuani-13 April Jurishital-14 April Akshaya Tritiya-24 April Ravi Brat Ant- 29 April Janaki Navami- 30 April Vat Savitri-barasait- 20 May Ganga Dashhara-30 May Somavati Amavasya Vrata- 18 June Jagannath Rath Yatra- 21 June Hari Sayan Ekadashi- 30 June Aashadhi Guru Poornima-3 Jul 8.VIDEHA FOR NON RESIDENTS 8.1 to 8.3 MAITHILI LITERATURE IN ENGLISH 8.1.1.The Comet -GAJENDRA THAKUR translated by Jyoti Jha chaudhary 8.1.2.The_Science_of_Words- GAJENDRA THAKUR translated by the author himself 8.1.3.On_the_dice-board_of_the_millennium- GAJENDRA THAKUR translated by Jyoti Jha chaudhary 8.1.4.NAAGPHANS (IN ENGLISH)- SHEFALIKA VERMA translated by Dr. Rajiv Kumar Verma and Dr. Jaya Verma Original Poem in Maithili by Kalikant Jha "Buch" Translated into English by Jyoti Jha Chaudhary Kalikant Jha "Buch" 1934-2009, Birth place- village Karian, District- Samastipur (Karian is birth place of famous Indian Nyaiyyayik philosopher Udayanacharya), Father Late Pt. Rajkishor Jha was first headmaster of village middle school. Mother Late Kala Devi was housewife. After completing Intermediate education started job block office of Govt. of Bihar.published in Mithila Mihir, Mati-pani, Bhakha, and Maithili Akademi magazine. Jyoti Jha Chaudhary, Date of Birth: December 30 1978,Place of Birth- Belhvar (Madhubani District), Education: Swami Vivekananda Middle School, Tisco Sakchi Girls High School, Mrs KMPM Inter College, IGNOU, ICWAI (COST ACCOUNTANCY); Residence- LONDON, UK; Father- Sh. Shubhankar Jha, Jamshedpur; Mother- Smt. Sudha Jha- Shivipatti. Jyoti received editor's choice award from www.poetry.comand her poems were featured in front page of www.poetrysoup.com for some period.She learnt Mithila Painting under Ms. Shveta Jha, Basera Institute, Jamshedpur and Fine Arts from Toolika, Sakchi, Jamshedpur (India). Her Mithila Paintings have been displayed by Ealing Art Group at Ealing Broadway, London. Kavi Kokil Vidyapati Because of whom our native language got a life That world-renowned nightingale poet’s name is Vidyapati A new hope in the Mithilanchal Our language is spread in each house Kind emotions and colourful thoughts Stability in mind and woman in the vision Created the God Shiva under the veil That world-renowned nightingale poet’s name is Vidyapati The shade of yoga in the bed of enjoyment The illusion of personality is immeasurable The triveni is immerged in the belly The shrine resides with the beauty The sun of creation shined in the kaalratri of rituals That world-renowned nightingale poet’s name is Vidyapati Face is like spring, bhado (rainy season) in eyes The flow is pure, bank is muddy Like leaves of lotus in the water Like flow of nectar in the desert Singing the song for Radha but keeping Madhav in the mind That world-renowned nightingale poet’s name is Vidyapati Vidyapati nagaram is blessed With Visfisut, Truth, Shiva and Virtue Remnant after being burnt out Mahesh is immortal after death The entrance is adorned with gold but inside is crematorium That world-renowned nightingale poet’s name is Vidyapati Send your comments to ggajendra@videha.com VIDEHA ARCHIVE १.विदेह ई-पत्रिकाक सभटा पुरान अंक ब्रेल, तिरहुता आ देवनागरी रूपमे Videha e journal's all old issues in Braille Tirhuta and Devanagari versions विदेह ई-पत्रिकाक पहिल ५० अंक
विदेह ई-पत्रिकाक ५०म सँ आगाँक अंक २.मैथिली पोथी डाउनलोड Maithili Books Download ३.मैथिली ऑडियो संकलन Maithili Audio Downloads ४.मैथिली वीडियोक संकलन Maithili Videos ५.मिथिला चित्रकला/ आधुनिक चित्रकला आ चित्र Mithila Painting/ Modern Art and Photos "विदेह"क एहि सभ सहयोगी लिंकपर सेहो एक बेर जाऊ। ६.विदेह मैथिली क्विज : http://videhaquiz.blogspot.com/ ७.विदेह मैथिली जालवृत्त एग्रीगेटर : http://videha-aggregator.blogspot.com/ ८.विदेह मैथिली साहित्य अंग्रेजीमे अनूदित http://madhubani-art.blogspot.com/ ९.विदेहक पूर्व-रूप "भालसरिक गाछ" : http://gajendrathakur.blogspot.com/ १०.विदेह इंडेक्स : http://videha123.blogspot.com/ ११.विदेह फाइल : http://videha123.wordpress.com/ १२. विदेह: सदेह : पहिल तिरहुता (मिथिला़क्षर) जालवृत्त (ब्लॉग) http://videha-sadeha.blogspot.com/ १३. विदेह:ब्रेल: मैथिली ब्रेलमे: पहिल बेर विदेह द्वारा http://videha-braille.blogspot.com/ १४.VIDEHA IST MAITHILI FORTNIGHTLY EJOURNAL ARCHIVE http://videha-archive.blogspot.com/ १५. विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका मैथिली पोथीक आर्काइव http://videha-pothi.blogspot.com/ १६. विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका ऑडियो आर्काइव http://videha-audio.blogspot.com/ १७. विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका वीडियो आर्काइव http://videha-video.blogspot.com/ १८. विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका मिथिला चित्रकला, आधुनिक कला आ चित्रकला http://videha-paintings-photos.blogspot.com/ १९. मैथिल आर मिथिला (मैथिलीक सभसँ लोकप्रिय जालवृत्त) http://maithilaurmithila.blogspot.com/ २०.श्रुति प्रकाशन http://www.shruti-publication.com/ २१.http://groups.google.com/group/videha VIDEHA केर सदस्यता लिअ Top of Form Bottom of Form ईमेल : एहि समूहपर जाऊ २२.http://groups.yahoo.com/group/VIDEHA/ Top of Form Subscribe to VIDEHA Powered by us.groups.yahoo.com Bottom of Form २३.गजेन्द्र ठाकुर इडेक्स http://gajendrathakur123.blogspot.com २४.विदेह रेडियो:मैथिली कथा-कविता आदिक पहिल पोडकास्ट साइट http://videha123radio.wordpress.com/ २५. नेना भुटका http://mangan-khabas.blogspot.com/ महत्त्वपूर्ण सूचना:(१) 'विदेह' द्वारा धारावाहिक रूपे ई-प्रकाशित कएल गेल गजेन्द्र ठाकुरक निबन्ध-प्रबन्ध-समीक्षा, उपन्यास (सहस्रबाढ़नि) , पद्य-संग्रह (सहस्राब्दीक चौपड़पर), कथा-गल्प (गल्प-गुच्छ), नाटक(संकर्षण), महाकाव्य (त्वञ्चाहञ्च आ असञ्जाति मन) आ बाल-किशोर साहित्य विदेहमे संपूर्ण ई-प्रकाशनक बाद प्रिंट फॉर्ममे। कुरुक्षेत्रम्–अन्तर्मनक खण्ड-१ सँ ७ Combined ISBN No.978-81-907729-7-6 विवरण एहि पृष्ठपर नीचाँमे आ प्रकाशकक साइट http://www.shruti-publication.com/ पर । महत्त्वपूर्ण सूचना (२):सूचना: विदेहक मैथिली-अंग्रेजी आ अंग्रेजी मैथिली कोष (इंटरनेटपर पहिल बेर सर्च-डिक्शनरी) एम.एस. एस.क्यू.एल. सर्वर आधारित -Based on ms-sql server Maithili-English and English-Maithili Dictionary. विदेहक भाषापाक- रचनालेखन स्तंभमे। कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक- गजेन्द्र ठाकुर गजेन्द्र ठाकुरक निबन्ध-प्रबन्ध-समीक्षा, उपन्यास (सहस्रबाढ़नि) , पद्य-संग्रह (सहस्राब्दीक चौपड़पर), कथा-गल्प (गल्प गुच्छ), नाटक(संकर्षण), महाकाव्य (त्वञ्चाहञ्च आ असञ्जाति मन) आ बालमंडली-किशोरजगत विदेहमे संपूर्ण ई-प्रकाशनक बाद प्रिंट फॉर्ममे। कुरुक्षेत्रम्–अन्तर्मनक, खण्ड-१ सँ ७ Ist edition 2009 of Gajendra Thakur’s KuruKshetram-Antarmanak (Vol. I to VII)- essay-paper-criticism, novel, poems, story, play, epics and Children-grown-ups literature in single binding: Language:Maithili ६९२ पृष्ठ : मूल्य भा. रु. 100/-(for individual buyers inside india) (add courier charges Rs.50/-per copy for Delhi/NCR and Rs.100/- per copy for outside Delhi)
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Details for purchase available at print-version publishers's site website: http://www.shruti-publication.com/ or you may write to e-mail:shruti.publication@shruti-publication.com विदेह: सदेह : १: २: ३: ४ तिरहुता : देवनागरी "विदेह" क, प्रिंट संस्करण :विदेह-ई-पत्रिका (http://www.videha.co.in/) क चुनल रचना सम्मिलित। विदेह:सदेह:१: २: ३: ४ सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। Details for purchase available at print-version publishers's site http://www.shruti-publication.com or you may write to shruti.publication@shruti-publication.com २. संदेश- [ विदेह ई-पत्रिका, विदेह:सदेह मिथिलाक्षर आ देवनागरी आ गजेन्द्र ठाकुरक सात खण्डक- निबन्ध-प्रबन्ध-समीक्षा,उपन्यास (सहस्रबाढ़नि) , पद्य-संग्रह (सहस्राब्दीक चौपड़पर), कथा-गल्प (गल्प गुच्छ), नाटक (संकर्षण), महाकाव्य (त्वञ्चाहञ्च आ असञ्जाति मन) आ बाल-मंडली-किशोर जगत- संग्रह कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक मादेँ। ] १.श्री गोविन्द झा- विदेहकेँ तरंगजालपर उतारि विश्वभरिमे मातृभाषा मैथिलीक लहरि जगाओल, खेद जे अपनेक एहि महाभियानमे हम एखन धरि संग नहि दए सकलहुँ। सुनैत छी अपनेकेँ सुझाओ आ रचनात्मक आलोचना प्रिय लगैत अछि तेँ किछु लिखक मोन भेल। हमर सहायता आ सहयोग अपनेकेँ सदा उपलब्ध रहत। २.श्री रमानन्द रेणु- मैथिलीमे ई-पत्रिका पाक्षिक रूपेँ चला कऽ जे अपन मातृभाषाक प्रचार कऽ रहल छी, से धन्यवाद । आगाँ अपनेक समस्त मैथिलीक कार्यक हेतु हम हृदयसँ शुभकामना दऽ रहल छी। ३.श्री विद्यानाथ झा "विदित"- संचार आ प्रौद्योगिकीक एहि प्रतिस्पर्धी ग्लोबल युगमे अपन महिमामय "विदेह"केँ अपना देहमे प्रकट देखि जतबा प्रसन्नता आ संतोष भेल, तकरा कोनो उपलब्ध "मीटर"सँ नहि नापल जा सकैछ? ..एकर ऐतिहासिक मूल्यांकन आ सांस्कृतिक प्रतिफलन एहि शताब्दीक अंत धरि लोकक नजरिमे आश्चर्यजनक रूपसँ प्रकट हैत। ४. प्रो. उदय नारायण सिंह "नचिकेता"- जे काज अहाँ कए रहल छी तकर चरचा एक दिन मैथिली भाषाक इतिहासमे होएत। आनन्द भए रहल अछि, ई जानि कए जे एतेक गोट मैथिल "विदेह" ई जर्नलकेँ पढ़ि रहल छथि।...विदेहक चालीसम अंक पुरबाक लेल अभिनन्दन। ५. डॉ. गंगेश गुंजन- एहि विदेह-कर्ममे लागि रहल अहाँक सम्वेदनशील मन, मैथिलीक प्रति समर्पित मेहनतिक अमृत रंग, इतिहास मे एक टा विशिष्ट फराक अध्याय आरंभ करत, हमरा विश्वास अछि। अशेष शुभकामना आ बधाइक सङ्ग, सस्नेह...अहाँक पोथी कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक प्रथम दृष्टया बहुत भव्य तथा उपयोगी बुझाइछ। मैथिलीमे तँ अपना स्वरूपक प्रायः ई पहिले एहन भव्य अवतारक पोथी थिक। हर्षपूर्ण हमर हार्दिक बधाई स्वीकार करी। ६. श्री रामाश्रय झा "रामरंग"(आब स्वर्गीय)- "अपना" मिथिलासँ संबंधित...विषय वस्तुसँ अवगत भेलहुँ।...शेष सभ कुशल अछि। ७. श्री ब्रजेन्द्र त्रिपाठी- साहित्य अकादमी- इंटरनेट पर प्रथम मैथिली पाक्षिक पत्रिका "विदेह" केर लेल बधाई आ शुभकामना स्वीकार करू। ८. श्री प्रफुल्लकुमार सिंह "मौन"- प्रथम मैथिली पाक्षिक पत्रिका "विदेह" क प्रकाशनक समाचार जानि कनेक चकित मुदा बेसी आह्लादित भेलहुँ। कालचक्रकेँ पकड़ि जाहि दूरदृष्टिक परिचय देलहुँ, ओहि लेल हमर मंगलकामना। ९.डॉ. शिवप्रसाद यादव- ई जानि अपार हर्ष भए रहल अछि, जे नव सूचना-क्रान्तिक क्षेत्रमे मैथिली पत्रकारिताकेँ प्रवेश दिअएबाक साहसिक कदम उठाओल अछि। पत्रकारितामे एहि प्रकारक नव प्रयोगक हम स्वागत करैत छी, संगहि "विदेह"क सफलताक शुभकामना। १०. श्री आद्याचरण झा- कोनो पत्र-पत्रिकाक प्रकाशन- ताहूमे मैथिली पत्रिकाक प्रकाशनमे के कतेक सहयोग करताह- ई तऽ भविष्य कहत। ई हमर ८८ वर्षमे ७५ वर्षक अनुभव रहल। एतेक पैघ महान यज्ञमे हमर श्रद्धापूर्ण आहुति प्राप्त होयत- यावत ठीक-ठाक छी/ रहब। ११. श्री विजय ठाकुर- मिशिगन विश्वविद्यालय- "विदेह" पत्रिकाक अंक देखलहुँ, सम्पूर्ण टीम बधाईक पात्र अछि। पत्रिकाक मंगल भविष्य हेतु हमर शुभकामना स्वीकार कएल जाओ। १२. श्री सुभाषचन्द्र यादव- ई-पत्रिका "विदेह" क बारेमे जानि प्रसन्नता भेल। ’विदेह’ निरन्तर पल्लवित-पुष्पित हो आ चतुर्दिक अपन सुगंध पसारय से कामना अछि। १३. श्री मैथिलीपुत्र प्रदीप- ई-पत्रिका "विदेह" केर सफलताक भगवतीसँ कामना। हमर पूर्ण सहयोग रहत। १४. डॉ. श्री भीमनाथ झा- "विदेह" इन्टरनेट पर अछि तेँ "विदेह" नाम उचित आर कतेक रूपेँ एकर विवरण भए सकैत अछि। आइ-काल्हि मोनमे उद्वेग रहैत अछि, मुदा शीघ्र पूर्ण सहयोग देब।कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक देखि अति प्रसन्नता भेल। मैथिलीक लेल ई घटना छी। १५. श्री रामभरोस कापड़ि "भ्रमर"- जनकपुरधाम- "विदेह" ऑनलाइन देखि रहल छी। मैथिलीकेँ अन्तर्राष्ट्रीय जगतमे पहुँचेलहुँ तकरा लेल हार्दिक बधाई। मिथिला रत्न सभक संकलन अपूर्व। नेपालोक सहयोग भेटत, से विश्वास करी। १६. श्री राजनन्दन लालदास- "विदेह" ई-पत्रिकाक माध्यमसँ बड़ नीक काज कए रहल छी, नातिक अहिठाम देखलहुँ। एकर वार्षिक अंक जखन प्रिंट निकालब तँ हमरा पठायब। कलकत्तामे बहुत गोटेकेँ हम साइटक पता लिखाए देने छियन्हि। मोन तँ होइत अछि जे दिल्ली आबि कए आशीर्वाद दैतहुँ, मुदा उमर आब बेशी भए गेल। शुभकामना देश-विदेशक मैथिलकेँ जोड़बाक लेल।.. उत्कृष्ट प्रकाशन कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक लेल बधाइ। अद्भुत काज कएल अछि, नीक प्रस्तुति अछि सात खण्डमे। मुदा अहाँक सेवा आ से निःस्वार्थ तखन बूझल जाइत जँ अहाँ द्वारा प्रकाशित पोथी सभपर दाम लिखल नहि रहितैक। ओहिना सभकेँ विलहि देल जइतैक। (स्पष्टीकरण- श्रीमान्, अहाँक सूचनार्थ विदेह द्वारा ई-प्रकाशित कएल सभटा सामग्री आर्काइवमे https://sites.google.com/a/videha.com/videha-pothi/ पर बिना मूल्यक डाउनलोड लेल उपलब्ध छै आ भविष्यमे सेहो रहतैक। एहि आर्काइवकेँ जे कियो प्रकाशक अनुमति लऽ कऽ प्रिंट रूपमे प्रकाशित कएने छथि आ तकर ओ दाम रखने छथि ताहिपर हमर कोनो नियंत्रण नहि अछि।- गजेन्द्र ठाकुर)... अहाँक प्रति अशेष शुभकामनाक संग। १७. डॉ. प्रेमशंकर सिंह- अहाँ मैथिलीमे इंटरनेटपर पहिल पत्रिका "विदेह" प्रकाशित कए अपन अद्भुत मातृभाषानुरागक परिचय देल अछि, अहाँक निःस्वार्थ मातृभाषानुरागसँ प्रेरित छी, एकर निमित्त जे हमर सेवाक प्रयोजन हो, तँ सूचित करी। इंटरनेटपर आद्योपांत पत्रिका देखल, मन प्रफुल्लित भऽ गेल। १८.श्रीमती शेफालिका वर्मा- विदेह ई-पत्रिका देखि मोन उल्लाससँ भरि गेल। विज्ञान कतेक प्रगति कऽ रहल अछि...अहाँ सभ अनन्त आकाशकेँ भेदि दियौ, समस्त विस्तारक रहस्यकेँ तार-तार कऽ दियौक...। अपनेक अद्भुत पुस्तक कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक विषयवस्तुक दृष्टिसँ गागरमे सागर अछि। बधाई। १९.श्री हेतुकर झा, पटना-जाहि समर्पण भावसँ अपने मिथिला-मैथिलीक सेवामे तत्पर छी से स्तुत्य अछि। देशक राजधानीसँ भय रहल मैथिलीक शंखनाद मिथिलाक गाम-गाममे मैथिली चेतनाक विकास अवश्य करत। २०. श्री योगानन्द झा, कबिलपुर, लहेरियासराय- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पोथीकेँ निकटसँ देखबाक अवसर भेटल अछि आ मैथिली जगतक एकटा उद्भट ओ समसामयिक दृष्टिसम्पन्न हस्ताक्षरक कलमबन्द परिचयसँ आह्लादित छी। "विदेह"क देवनागरी सँस्करण पटनामे रु. 80/- मे उपलब्ध भऽ सकल जे विभिन्न लेखक लोकनिक छायाचित्र, परिचय पत्रक ओ रचनावलीक सम्यक प्रकाशनसँ ऐतिहासिक कहल जा सकैछ। २१. श्री किशोरीकान्त मिश्र- कोलकाता- जय मैथिली, विदेहमे बहुत रास कविता, कथा, रिपोर्ट आदिक सचित्र संग्रह देखि आ आर अधिक प्रसन्नता मिथिलाक्षर देखि- बधाई स्वीकार कएल जाओ। २२.श्री जीवकान्त- विदेहक मुद्रित अंक पढ़ल- अद्भुत मेहनति। चाबस-चाबस। किछु समालोचना मरखाह..मुदा सत्य। २३. श्री भालचन्द्र झा- अपनेक कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक देखि बुझाएल जेना हम अपने छपलहुँ अछि। एकर विशालकाय आकृति अपनेक सर्वसमावेशताक परिचायक अछि। अपनेक रचना सामर्थ्यमे उत्तरोत्तर वृद्धि हो, एहि शुभकामनाक संग हार्दिक बधाई। २४.श्रीमती डॉ नीता झा- अहाँक कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़लहुँ। ज्योतिरीश्वर शब्दावली, कृषि मत्स्य शब्दावली आ सीत बसन्त आ सभ कथा, कविता, उपन्यास, बाल-किशोर साहित्य सभ उत्तम छल। मैथिलीक उत्तरोत्तर विकासक लक्ष्य दृष्टिगोचर होइत अछि। २५.श्री मायानन्द मिश्र- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक मे हमर उपन्यास स्त्रीधनक जे विरोध कएल गेल अछि तकर हम विरोध करैत छी।... कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पोथीक लेल शुभकामना।(श्रीमान् समालोचनाकेँ विरोधक रूपमे नहि लेल जाए।-गजेन्द्र ठाकुर) २६.श्री महेन्द्र हजारी- सम्पादक श्रीमिथिला- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़ि मोन हर्षित भऽ गेल..एखन पूरा पढ़यमे बहुत समय लागत, मुदा जतेक पढ़लहुँ से आह्लादित कएलक। २७.श्री केदारनाथ चौधरी- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक अद्भुत लागल, मैथिली साहित्य लेल ई पोथी एकटा प्रतिमान बनत। २८.श्री सत्यानन्द पाठक- विदेहक हम नियमित पाठक छी। ओकर स्वरूपक प्रशंसक छलहुँ। एम्हर अहाँक लिखल - कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक देखलहुँ। मोन आह्लादित भऽ उठल। कोनो रचना तरा-उपरी। २९.श्रीमती रमा झा-सम्पादक मिथिला दर्पण। कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक प्रिंट फॉर्म पढ़ि आ एकर गुणवत्ता देखि मोन प्रसन्न भऽ गेल, अद्भुत शब्द एकरा लेल प्रयुक्त कऽ रहल छी। विदेहक उत्तरोत्तर प्रगतिक शुभकामना। ३०.श्री नरेन्द्र झा, पटना- विदेह नियमित देखैत रहैत छी। मैथिली लेल अद्भुत काज कऽ रहल छी। ३१.श्री रामलोचन ठाकुर- कोलकाता- मिथिलाक्षर विदेह देखि मोन प्रसन्नतासँ भरि उठल, अंकक विशाल परिदृश्य आस्वस्तकारी अछि। ३२.श्री तारानन्द वियोगी- विदेह आ कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक देखि चकबिदोर लागि गेल। आश्चर्य। शुभकामना आ बधाई। ३३.श्रीमती प्रेमलता मिश्र “प्रेम”- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़लहुँ। सभ रचना उच्चकोटिक लागल। बधाई। ३४.श्री कीर्तिनारायण मिश्र- बेगूसराय- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक बड्ड नीक लागल, आगांक सभ काज लेल बधाई। ३५.श्री महाप्रकाश-सहरसा- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक नीक लागल, विशालकाय संगहि उत्तमकोटिक। ३६.श्री अग्निपुष्प- मिथिलाक्षर आ देवाक्षर विदेह पढ़ल..ई प्रथम तँ अछि एकरा प्रशंसामे मुदा हम एकरा दुस्साहसिक कहब। मिथिला चित्रकलाक स्तम्भकेँ मुदा अगिला अंकमे आर विस्तृत बनाऊ। ३७.श्री मंजर सुलेमान-दरभंगा- विदेहक जतेक प्रशंसा कएल जाए कम होएत। सभ चीज उत्तम। ३८.श्रीमती प्रोफेसर वीणा ठाकुर- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक उत्तम, पठनीय, विचारनीय। जे क्यो देखैत छथि पोथी प्राप्त करबाक उपाय पुछैत छथि। शुभकामना। ३९.श्री छत्रानन्द सिंह झा- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़लहुँ, बड्ड नीक सभ तरहेँ। ४०.श्री ताराकान्त झा- सम्पादक मैथिली दैनिक मिथिला समाद- विदेह तँ कन्टेन्ट प्रोवाइडरक काज कऽ रहल अछि। कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक अद्भुत लागल। ४१.डॉ रवीन्द्र कुमार चौधरी- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक बहुत नीक, बहुत मेहनतिक परिणाम। बधाई। ४२.श्री अमरनाथ- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक आ विदेह दुनू स्मरणीय घटना अछि, मैथिली साहित्य मध्य। ४३.श्री पंचानन मिश्र- विदेहक वैविध्य आ निरन्तरता प्रभावित करैत अछि, शुभकामना। ४४.श्री केदार कानन- कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक लेल अनेक धन्यवाद, शुभकामना आ बधाइ स्वीकार करी। आ नचिकेताक भूमिका पढ़लहुँ। शुरूमे तँ लागल जेना कोनो उपन्यास अहाँ द्वारा सृजित भेल अछि मुदा पोथी उनटौला पर ज्ञात भेल जे एहिमे तँ सभ विधा समाहित अछि। ४५.श्री धनाकर ठाकुर- अहाँ नीक काज कऽ रहल छी। फोटो गैलरीमे चित्र एहि शताब्दीक जन्मतिथिक अनुसार रहैत तऽ नीक। ४६.श्री आशीष झा- अहाँक पुस्तकक संबंधमे एतबा लिखबा सँ अपना कए नहि रोकि सकलहुँ जे ई किताब मात्र किताब नहि थीक, ई एकटा उम्मीद छी जे मैथिली अहाँ सन पुत्रक सेवा सँ निरंतर समृद्ध होइत चिरजीवन कए प्राप्त करत। ४७.श्री शम्भु कुमार सिंह- विदेहक तत्परता आ क्रियाशीलता देखि आह्लादित भऽ रहल छी। निश्चितरूपेण कहल जा सकैछ जे समकालीन मैथिली पत्रिकाक इतिहासमे विदेहक नाम स्वर्णाक्षरमे लिखल जाएत। ओहि कुरुक्षेत्रक घटना सभ तँ अठारहे दिनमे खतम भऽ गेल रहए मुदा अहाँक कुरुक्षेत्रम् तँ अशेष अछि। ४८.डॉ. अजीत मिश्र- अपनेक प्रयासक कतबो प्रशंसा कएल जाए कमे होएतैक। मैथिली साहित्यमे अहाँ द्वारा कएल गेल काज युग-युगान्तर धरि पूजनीय रहत। ४९.श्री बीरेन्द्र मल्लिक- अहाँक कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक आ विदेह:सदेह पढ़ि अति प्रसन्नता भेल। अहाँक स्वास्थ्य ठीक रहए आ उत्साह बनल रहए से कामना। ५०.श्री कुमार राधारमण- अहाँक दिशा-निर्देशमे विदेह पहिल मैथिली ई-जर्नल देखि अति प्रसन्नता भेल। हमर शुभकामना। ५१.श्री फूलचन्द्र झा प्रवीण-विदेह:सदेह पढ़ने रही मुदा कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक देखि बढ़ाई देबा लेल बाध्य भऽ गेलहुँ। आब विश्वास भऽ गेल जे मैथिली नहि मरत। अशेष शुभकामना। ५२.श्री विभूति आनन्द- विदेह:सदेह देखि, ओकर विस्तार देखि अति प्रसन्नता भेल। ५३.श्री मानेश्वर मनुज-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक एकर भव्यता देखि अति प्रसन्नता भेल, एतेक विशाल ग्रन्थ मैथिलीमे आइ धरि नहि देखने रही। एहिना भविष्यमे काज करैत रही, शुभकामना। ५४.श्री विद्यानन्द झा- आइ.आइ.एम.कोलकाता- कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक विस्तार, छपाईक संग गुणवत्ता देखि अति प्रसन्नता भेल। अहाँक अनेक धन्यवाद; कतेक बरखसँ हम नेयारैत छलहुँ जे सभ पैघ शहरमे मैथिली लाइब्रेरीक स्थापना होअए, अहाँ ओकरा वेबपर कऽ रहल छी, अनेक धन्यवाद। ५५.श्री अरविन्द ठाकुर-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक मैथिली साहित्यमे कएल गेल एहि तरहक पहिल प्रयोग अछि, शुभकामना। ५६.श्री कुमार पवन-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक पढ़ि रहल छी। किछु लघुकथा पढ़ल अछि, बहुत मार्मिक छल। ५७. श्री प्रदीप बिहारी-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक देखल, बधाई। ५८.डॉ मणिकान्त ठाकुर-कैलिफोर्निया- अपन विलक्षण नियमित सेवासँ हमरा लोकनिक हृदयमे विदेह सदेह भऽ गेल अछि। ५९.श्री धीरेन्द्र प्रेमर्षि- अहाँक समस्त प्रयास सराहनीय। दुख होइत अछि जखन अहाँक प्रयासमे अपेक्षित सहयोग नहि कऽ पबैत छी। ६०.श्री देवशंकर नवीन- विदेहक निरन्तरता आ विशाल स्वरूप- विशाल पाठक वर्ग, एकरा ऐतिहासिक बनबैत अछि। ६१.श्री मोहन भारद्वाज- अहाँक समस्त कार्य देखल, बहुत नीक। एखन किछु परेशानीमे छी, मुदा शीघ्र सहयोग देब। ६२.श्री फजलुर रहमान हाशमी-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक मे एतेक मेहनतक लेल अहाँ साधुवादक अधिकारी छी। ६३.श्री लक्ष्मण झा "सागर"- मैथिलीमे चमत्कारिक रूपेँ अहाँक प्रवेश आह्लादकारी अछि।..अहाँकेँ एखन आर..दूर..बहुत दूरधरि जेबाक अछि। स्वस्थ आ प्रसन्न रही। ६४.श्री जगदीश प्रसाद मंडल-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक पढ़लहुँ । कथा सभ आ उपन्यास सहस्रबाढ़नि पूर्णरूपेँ पढ़ि गेल छी। गाम-घरक भौगोलिक विवरणक जे सूक्ष्म वर्णन सहस्रबाढ़निमे अछि, से चकित कएलक, एहि संग्रहक कथा-उपन्यास मैथिली लेखनमे विविधता अनलक अछि। समालोचना शास्त्रमे अहाँक दृष्टि वैयक्तिक नहि वरन् सामाजिक आ कल्याणकारी अछि, से प्रशंसनीय। ६५.श्री अशोक झा-अध्यक्ष मिथिला विकास परिषद- कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक लेल बधाई आ आगाँ लेल शुभकामना। ६६.श्री ठाकुर प्रसाद मुर्मु- अद्भुत प्रयास। धन्यवादक संग प्रार्थना जे अपन माटि-पानिकेँ ध्यानमे राखि अंकक समायोजन कएल जाए। नव अंक धरि प्रयास सराहनीय। विदेहकेँ बहुत-बहुत धन्यवाद जे एहेन सुन्दर-सुन्दर सचार (आलेख) लगा रहल छथि। सभटा ग्रहणीय- पठनीय। ६७.बुद्धिनाथ मिश्र- प्रिय गजेन्द्र जी,अहाँक सम्पादन मे प्रकाशित ‘विदेह’आ ‘कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक’ विलक्षण पत्रिका आ विलक्षण पोथी! की नहि अछि अहाँक सम्पादनमे? एहि प्रयत्न सँ मैथिली क विकास होयत,निस्संदेह। ६८.श्री बृखेश चन्द्र लाल- गजेन्द्रजी, अपनेक पुस्तक कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़ि मोन गदगद भय गेल , हृदयसँ अनुगृहित छी । हार्दिक शुभकामना । ६९.श्री परमेश्वर कापड़ि - श्री गजेन्द्र जी । कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़ि गदगद आ नेहाल भेलहुँ। ७०.श्री रवीन्द्रनाथ ठाकुर- विदेह पढ़ैत रहैत छी। धीरेन्द्र प्रेमर्षिक मैथिली गजलपर आलेख पढ़लहुँ। मैथिली गजल कत्तऽ सँ कत्तऽ चलि गेलैक आ ओ अपन आलेखमे मात्र अपन जानल-पहिचानल लोकक चर्च कएने छथि। जेना मैथिलीमे मठक परम्परा रहल अछि। (स्पष्टीकरण- श्रीमान्, प्रेमर्षि जी ओहि आलेखमे ई स्पष्ट लिखने छथि जे किनको नाम जे छुटि गेल छन्हि तँ से मात्र आलेखक लेखकक जानकारी नहि रहबाक द्वारे, एहिमे आन कोनो कारण नहि देखल जाय। अहाँसँ एहि विषयपर विस्तृत आलेख सादर आमंत्रित अछि।-सम्पादक) ७१.श्री मंत्रेश्वर झा- विदेह पढ़ल आ संगहि अहाँक मैगनम ओपस कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक सेहो, अति उत्तम। मैथिलीक लेल कएल जा रहल अहाँक समस्त कार्य अतुलनीय अछि। ७२. श्री हरेकृष्ण झा- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक मैथिलीमे अपन तरहक एकमात्र ग्रन्थ अछि, एहिमे लेखकक समग्र दृष्टि आ रचना कौशल देखबामे आएल जे लेखकक फील्डवर्कसँ जुड़ल रहबाक कारणसँ अछि। ७३.श्री सुकान्त सोम- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक मे समाजक इतिहास आ वर्तमानसँ अहाँक जुड़ाव बड्ड नीक लागल, अहाँ एहि क्षेत्रमे आर आगाँ काज करब से आशा अछि। ७४.प्रोफेसर मदन मिश्र- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक सन किताब मैथिलीमे पहिले अछि आ एतेक विशाल संग्रहपर शोध कएल जा सकैत अछि। भविष्यक लेल शुभकामना। ७५.प्रोफेसर कमला चौधरी- मैथिलीमे कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक सन पोथी आबए जे गुण आ रूप दुनूमे निस्सन होअए, से बहुत दिनसँ आकांक्षा छल, ओ आब जा कऽ पूर्ण भेल। पोथी एक हाथसँ दोसर हाथ घुमि रहल अछि, एहिना आगाँ सेहो अहाँसँ आशा अछि। ७६.श्री उदय चन्द्र झा "विनोद": गजेन्द्रजी, अहाँ जतेक काज कएलहुँ अछि से मैथिलीमे आइ धरि कियो नहि कएने छल। शुभकामना। अहाँकेँ एखन बहुत काज आर करबाक अछि। ७७.श्री कृष्ण कुमार कश्यप: गजेन्द्र ठाकुरजी, अहाँसँ भेँट एकटा स्मरणीय क्षण बनि गेल। अहाँ जतेक काज एहि बएसमे कऽ गेल छी ताहिसँ हजार गुणा आर बेशीक आशा अछि। ७८.श्री मणिकान्त दास: अहाँक मैथिलीक कार्यक प्रशंसा लेल शब्द नहि भेटैत अछि। अहाँक कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक सम्पूर्ण रूपेँ पढ़ि गेलहुँ। त्वञ्चाहञ्च बड्ड नीक लागल। ७९. श्री हीरेन्द्र कुमार झा- विदेह ई-पत्रिकाक सभ अंक ई-पत्रसँ भेटैत रहैत अछि। मैथिलीक ई-पत्रिका छैक एहि बातक गर्व होइत अछि। अहाँ आ अहाँक सभ सहयोगीकेँ हार्दिक शुभकामना। विदेह मैथिली साहित्य आन्दोलन (c)२००४-११. सर्वाधिकार लेखकाधीन आ जतय लेखकक नाम नहि अछि ततय संपादकाधीन। विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। सह-सम्पादक: उमेश मंडल। सहायक सम्पादक: शिव कुमार झा आ मुन्नाजी (मनोज कुमार कर्ण)। भाषा-सम्पादन: नागेन्द्र कुमार झा आ पञ्जीकार विद्यानन्द झा। कला-सम्पादन: ज्योति सुनीत चौधरी आ रश्मि रेखा सिन्हा। सम्पादक-शोध-अन्वेषण: डॉ. जया वर्मा आ डॉ. राजीव कुमार वर्मा। सम्पादक- नाटक-रंगमंच-चलचित्र- बेचन ठाकुर। सम्पादक-सूचना-सम्पर्क-समाद पूनम मंडल आ प्रियंका झा। रचनाकार अपन मौलिक आ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि) ggajendra@videha.com केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx, .rtf वा .txt फॉर्मेटमे पठा सकैत छथि। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेताह, से आशा करैत छी। रचनाक अंतमे टाइप रहय, जे ई रचना मौलिक अछि, आ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। मेल प्राप्त होयबाक बाद यथासंभव शीघ्र ( सात दिनक भीतर) एकर प्रकाशनक अंकक सूचना देल जायत। ’विदेह' प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका अछि आ एहिमे मैथिली, संस्कृत आ अंग्रेजीमे मिथिला आ मैथिलीसँ संबंधित रचना प्रकाशित कएल जाइत अछि। एहि ई पत्रिकाकेँ श्रीमति लक्ष्मी ठाकुर द्वारा मासक ०१ आ १५ तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि। (c) 2004-11 सर्वाधिकार सुरक्षित। विदेहमे प्रकाशित सभटा रचना आ आर्काइवक सर्वाधिकार रचनाकार आ संग्रहकर्त्ताक लगमे छन्हि। रचनाक अनुवाद आ पुनः प्रकाशन किंवा आर्काइवक उपयोगक अधिकार किनबाक हेतु ggajendra@videha.co.in पर संपर्क करू। एहि साइटकेँ प्रीति झा ठाकुर, मधूलिका चौधरी आ रश्मि प्रिया द्वारा डिजाइन कएल गेल। सिद्धिरस्तु वि दे ह विदेह Videha বিদেহ विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका Videha Ist Maithili Fortnightly e Magazine विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका 'विदेह' ९३ म अंक ०१ नवम्बर २०११ (वर्ष ४ मास ४७ अंक ९३)http://www.videha.co.in/ मानुषीमिह संस्कृताम् ISSN 2229-547X VIDEHA वि दे ह विदेह Videha বিদেহ विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका Videha Ist Maithili Fortnightly e Magazine विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक 'विदेह' ९३ म अंक ०१ नवम्बर २०११ (वर्ष ४ मास ४७ अंक ९३)http://www.videha.co.in/ मानुषीमिह संस्कृताम् ISSN 2229-547X VIDEHA
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