VIDEHA — Issue 94 / अंक ९४

Publication: VIDEHA · Issue: 94
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338 339 ISSN 2229-547X VIDEHA 'विदेह' ९४ म अंक १५ नवम्बर २०११ (वर्ष ४ मास ४७ अंक ९४) वि  दे  ह विदेह Videha বিদেহ http://www.videha.co.in  विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका Videha Ist Maithili Fortnightly e Magazine   नव अंक देखबाक लेल पृष्ठ सभकेँ रिफ्रेश कए देखू। Always refresh the pages for viewing new issue of VIDEHA. Read in your own script Roman(Eng)Gujarati Bangla Oriya Gurmukhi Telugu Tamil Kannada Malayalam Hindi ऐ अंकमे अछि:- १. संपादकीय संदेश २. गद्य २.१. १बहुआयामी युवा श्री धीरेन्द्र प्रेमर्षि जी सँ विहनि कथाकार मुन्नाजीक भेल गपशप २.डॉ कलाधर झासँ डॉ. शेफालिका वर्माक साक्षात्कार २.२.१.परमेश्वर कापड़ि-मानकताक बात विखपाद अछि ! २.अतुलेश्वर- किछु विचार टिप्पणी २.३.मुन्नाजी- अनमोल झाक समयकेँ साक्षी राखि ....! २.४.१.चेतना समिति, पटना समाचार/ II.खूजत अलग मिथिला प्रदेशक द्वार? छोट प्रदेशक समर्थन कएलनि मुख्यमंत्री (रिपोर्ट नवेंदु कुमार झा)२.उमेश मण्डल-१.‘मैथि‍ली भाषाक दशा ओ दि‍शा’पर परिचर्चा २. महाकवि‍ पण्डित‍ लालदास जयन्ती समारोह  ३. संजीव कुमार ‘शमा’- महाकवि‍ पं. लालदास जयन्‍ती समारोह २.५.गजेन्द्र ठाकुर- उल्कामुख (आगाँ) २.६.राजदेव मण्‍डल- हमर टोल- उपन्‍यास (आगाँ) २.७.ओमप्रकाश झा - कथा- सफल अधिकारी २.८.नवीन ठाकुर-मिथिला उवाच ३. पद्य ३.१.१.गुलसारिका २.इरा मल्लिक ३.शांतिलक्ष्मी चौधरी ४शेफालिका वर्मा ३.२.१.सत्यनारायण झा २ओमप्रकाश झा ३.३. १.जगदीश चन्द्र ठाकुर ’अनिल’ २.मिहिर झा ३.झा हेमन्त बापी ४.जगदानंद झा 'मनु' ३.४.१.शिवशंकर सिंह ठाकुर २.अमित मोहन झा ३.५.१. शिवशंकर श्रीनिवास २.विकास झा रंजन ३.जगदीश प्रसाद मण्डल ४. मुन्नाजी हाइकू ५. रामबिलास साहू- टनका ३.६.१. अन्जनी कुमार वर्मा २.विनीत उत्पल ३.७.१.डॉ॰ शशिधर कुमर २ नवीन कुमार "आशा" ३.८.१.रामदेव प्रसाद मण्‍डल ‘झारूदार’ २. नवीन ठाकुर ४. मिथिला कला-संगीत-१.ज्योति सुनीत चौधरी २.श्वेता झा (सिंगापुर) ३.गुंजन कर्ण ४.इरा मल्लिक ५.राजनाथ मिश्र (चित्रमय मिथिला) ६. उमेश मण्डल (मिथिलाक वनस्पति/ मिथिलाक जीव-जन्तु/ मिथिलाक जिनगी) बालानां कृते-डॉ॰ शशिधर कुमर भाषापाक रचना-लेखन -[मानक मैथिली], [विदेहक मैथिली-अंग्रेजी आ अंग्रेजी मैथिली कोष (इंटरनेटपर पहिल बेर सर्च-डिक्शनरी) एम.एस. एस.क्यू.एल. सर्वर आधारित -Based on ms-sql server Maithili-English and English-Maithili Dictionary.] VIDEHA FOR NON RESIDENTS विदेह ई-पत्रिकाक सभटा पुरान अंक ( ब्रेल, तिरहुता आ देवनागरी मे ) पी.डी.एफ. डाउनलोडक लेल नीचाँक लिंकपर उपलब्ध अछि। All the old issues of Videha e journal ( in Braille, Tirhuta and Devanagari versions ) are available for pdf download at the following link. विदेह ई-पत्रिकाक सभटा पुरान अंक ब्रेल, तिरहुता आ देवनागरी रूपमे Videha e journal's all old issues in Braille Tirhuta and Devanagari versions विदेह ई-पत्रिकाक पहिल ५० अंक

विदेह ई-पत्रिकाक ५०म सँ आगाँक अंक विदेह आर.एस.एस.फीड। "विदेह" ई-पत्रिका ई-पत्रसँ प्राप्त करू। अपन मित्रकेँ विदेहक विषयमे सूचित करू। ↑ विदेह आर.एस.एस.फीड एनीमेटरकेँ अपन साइट/ ब्लॉगपर लगाऊ। ब्लॉग "लेआउट" पर "एड गाडजेट" मे "फीड" सेलेक्ट कए "फीड यू.आर.एल." मे http://www.videha.co.in/index.xml टाइप केलासँ सेहो विदेह फीड प्राप्त कए सकैत छी। गूगल रीडरमे पढ़बा लेल http://reader.google.com/ पर जा कऽ Add a  Subscription बटन क्लिक करू आ खाली स्थानमे http://www.videha.co.in/index.xml पेस्ट करू आ Add  बटन दबाउ। Join official Videha facebook group. 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Go to the link below for download of old issues of VIDEHA Maithili e magazine in .pdf format and Maithili Audio/ Video/ Book/ paintings/ photo files. विदेहक पुरान अंक आ ऑडियो/ वीडियो/ पोथी/ चित्रकला/ फोटो सभक फाइल सभ (उच्चारण, बड़ सुख सार आ दूर्वाक्षत मंत्र सहित) डाउनलोड करबाक हेतु नीचाँक लिंक पर जाऊ। VIDEHA ARCHIVE विदेह आर्काइव भारतीय डाक विभाग द्वारा जारी कवि, नाटककार आ धर्मशास्त्री विद्यापतिक स्टाम्प। भारत आ नेपालक माटिमे पसरल मिथिलाक धरती प्राचीन कालहिसँ महान पुरुष ओ महिला लोकनिक कर्मभमि रहल अछि। मिथिलाक महान पुरुष ओ महिला लोकनिक चित्र 'मिथिला रत्न' मे देखू। गौरी-शंकरक पालवंश कालक मूर्त्ति, एहिमे मिथिलाक्षरमे (१२०० वर्ष पूर्वक) अभिलेख अंकित अछि। मिथिलाक भारत आ नेपालक माटिमे पसरल एहि तरहक अन्यान्य प्राचीन आ नव स्थापत्य, चित्र, अभिलेख आ मूर्त्तिकलाक़ हेतु देखू 'मिथिलाक खोज' मिथिला, मैथिल आ मैथिलीसँ सम्बन्धित सूचना, सम्पर्क, अन्वेषण संगहि विदेहक सर्च-इंजन आ न्यूज सर्विस आ मिथिला, मैथिल आ मैथिलीसँ सम्बन्धित वेबसाइट सभक समग्र संकलनक लेल देखू "विदेह सूचना संपर्क अन्वेषण" विदेह जालवृत्तक डिसकसन फोरमपर जाऊ। "मैथिल आर मिथिला" (मैथिलीक सभसँ लोकप्रिय जालवृत्त) पर जाऊ। १. संपादकीय बेचन ठाकुर जी द्वारा शुरू कएल गेल मैथिली समानान्तर रंगमंचक विवरण। सरस्‍वती पूजा १९९५ केर अवसरपर नाटक मंचन नाओं- रमेश डीलर स्‍थान- न्‍यू लोटस इंग्‍लि‍श स्‍कूल परि‍सर- चनौरागंज ि‍नर्माता ि‍नर्देशक- बेचन ठाकुर पात्र, कलाकार, पि‍ता आ गामक नाओं 1. रमेश प्रधान          रामबाबू साह,          पि‍ता स्‍व. वि‍श्वनाथ साह, गाम- चनौरागंज 2. सीताराम तेली      वि‍जय कुमार पासवान    पि‍ता स्‍व. कारी पासवान चनौरागंज 3. सुकन पासवान      बुद्धदेव कुमार          श्री पंचू महतो   .....    बेरमा 4. ढोलहा            रामकुमार पंजि‍यार      स्‍व. गोपाल पंजि‍यार     चनौरागंज 5. भोलाराम मण्‍डल     नवीन कुमार          श्री कामेश्वर मण्‍डल      चनौरागंज 6. मो. वासील        रामस्‍वरूप पासवान      श्री कपि‍लेश्वर पासवान    चनौरागंज 7. गुलाव चन्‍द्र ठाकुर    केशव कुमार          श्री हेमनारायण साह     नरहि‍या 8. श्‍याम मण्‍डल       चन्‍द्रदेव महतो         स्‍व. लक्ष्‍मी महतो        बेरमा 9. एम.ओ            रामनारायण राउत       श्री जागेश्वर राउत      चनौरागंज मंचनक सहयोगकर्त्ता- हारमोनि‍यम संगतकर्ता-   श्री भीखन महतो       चनौरागंज ढोलकि‍या-            श्री कारी पासवान       चनौरागंज मनोज कुमार पुर्वे       श्री रामावतार पुर्वे             चनौरागंज अमरेन्‍द्र कुमार         श्री ब्रज कि‍शोर साह    चनौरागंज शत्रुध्‍न प्रधान          श्री लक्ष्‍मी प्रधान        चनौरागंज गणेश ठाकुर          श्री लक्ष्‍मी ठाकुर       चनौरागंज वि‍जय कुमार महतो     स्‍व. परमेश्वर महतो      चनौरागंज कृष्‍ण देव ठाकुर        श्री रामखेलावन ठाकुर    मझौरा वि‍शेष सहयोगकर्त्ता व प्रेरक... सामान्‍य पढ़ाइक गुरू-          श्री शुभ चन्‍द्र झा (मोहना) संगीत गुरू.............          श्री रामवृक्ष सि‍ंह (फुलबरि‍या) साहि‍त्‍य गुरू.........            श्री जगदीश प्रसाद मण्‍डल (बेरमा) नाट्यकलाक गुरू.....          प्रो. पुलकि‍त कामत (पौराम) रचना प्रकाशन प्रश्रय............     श्री गजेन्‍द्र ठाकुर नि‍जी वि‍द्यालयक सलाहकार...     श्री अजय कुमार मण्‍डल (बि‍शौल) वि‍द्यालय एवं कोचि‍ंग मकान दाता... श्री महावीर साह (चनौरागंज) कार्यक्रम अभि‍भावकत्‍व................ श्री ब्रज कि‍शोर साह (चनौरागंज) सरस्‍वती पूजा 1996 केर अवसरपर मंचि‍त एकांकी- महावीरलाल स्‍थान- न्‍यू लोटस इंग्‍लि‍श स्‍कूल परि‍सर- चनौरागंज नाटककार- बेचन ठाकुर ि‍नर्देशक- बेचन ठाकुर पात्र           कलाकार,            पि‍ता           गाम 1. महावीरलाल        रामबाबू साह          पि‍ता स्‍व. वि‍श्वनाथ साह,  चनौरागंज 2. हनुमान           संजीव कुमार मण्‍डल     श्री रामवि‍हारी मण्‍डल     चनौरागंज 3. वासील           अाफताब आलम        मो. मुखतार आलम       चनौरागंज 4. पुरहीत           अमरेन्‍द्र कुमार मि‍श्र     श्री वि‍नोद मि‍श्र          बेरमा 5. छब्‍बीस नम्‍बर      मोहन कुमार ठाकुर      श्री महाकान्‍त ठाकुर      चनौरागंज सहयोगकर्त्ता- हारमोनि‍यम संगतकर्ता-   श्री भीखन महतो       चनौरागंज ढोलकि‍या-            श्री कारी पासवान       चनौरागंज राम कि‍शोर पासवान     श्री कपि‍लेश्वर पासवान    चनौरागंज पवन कुमार           श्री रामबहादुर ठाकुर     चनौरागंज इन्‍दू कुमारी           श्री राजेन्‍द्र यादव       चनौरागंज प्रति‍मा कुमारी         श्री ब्रज कि‍शोर साह    चनौरागंज राहुल कुमार          श्री शत्रुघ्‍न साह        चनौरागंज अशोक कुमार राउत     स्‍व. जगदीश राउत     चनौरागंज बेचन पासवान         श्री ति‍रपि‍त पासवान     चनौरागंज रामनाथ मण्‍डल        श्री वि‍न्‍देश्वर मण्‍डल      चनौरागंज सरस्‍वती पूजा १९९७ केर अवसरपर मंचि‍त एकांकी- कि‍सुन बम स्‍थान- न्‍यू लोटस इंग्‍लि‍श स्‍कूल परि‍सर- चनौरागंज जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) नाटककार- बेचन ठाकुर ि‍नर्देशक- बेचन ठाकुर पात्र            अभि‍नय कर्ता       पि‍ताक नाओं        पता 1. कि‍सुन बम         श्रवन कुमार पासवान     पि‍ता स्‍व. भोला पासवान   चनौरागंज 2. राजेन्‍द्र महतो       साकेत वि‍हारी राउत     श्री रामसेवक राउत       चनौरागंज 3. शि‍वकारक         रामबाबू साह          स्‍व. वि‍श्वनाथ साह        चनौरागंज 4. मो. इंताज         नदीम आलम          मो. वकील हक          चनौरागंज 5. पहि‍ल घटक       रहबरे आजम          मो. ईषा आलम          चनौरागंज 6. दोसर घटक       रामकि‍शोर पासवान      श्री कपि‍लेश्वर पासवान     चनौरागंज सहयोगकर्त्ता- हारमोनि‍यम संगतकर्ता-    श्री भीखन महतो       चनौरागंज ढोलकि‍या-            श्री कारी पासवान       चनौरागंज भगीरथ प्रधान               श्री महावीर प्रधान       चनौरागंज अशोक कुमार पोद्दार     श्री रामसेवक पोद्दार      चनौरागंज पवन कुमार           श्री रामवहादुर ठाकुर     चनौरागंज राहुल कुमार          श्री शत्रुघ्‍न साह        चनौरागंज आफताब आलम        मो. मुखतार आलम      चनौरागंज बैजू कुमार मण्‍डल      श्री जगदीश मण्‍डल      चनौरागंज इन्‍दू कुमारी           श्री राजेन्‍द्र यादव       चनौरागंज रामानन्‍द प्रसाद        श्री बैद्यनाथ प्रसाद साहु   चनौरागंज राम नारायण राउत      श्री जागेश्वर राउत      चनौरागंज शमशाद आलम        मो. ईषा आलम        चनौरागंज अजय कुमार          प्रो. पुलकि‍त कामत      पौराम सरस्‍वती पूजा १९९८ केर अवसरपर मंचि‍त चारि‍म एकांकी- लक्ष्‍मी मण्‍डल स्‍थान- न्‍यू लोटस इंग्‍लि‍श स्‍कूल परि‍सर- चनौरागंज दि‍नांक- ०१/ ०२/ १९९८ (रवि‍ दि‍न) नाटककार- बेचन ठाकुर ि‍नर्देशक- बेचन ठाकुर पात्र      कलाकार       पि‍ता       गाम 1. लक्ष्‍मी मण्‍डल       संजीव कुमार         श्री योगेन्‍द्र प्रधान        चनौरागंज 2. राजेन्‍द्र मण्‍डल      आफताब आलम      मो. मुखतार आलम      चनौरागंज 3. जोगी प्रधान         राहुल कुमार          श्री शत्रुघ्‍न साह         चनौरागंज 4. मो. ईषा आलम      रहबरे आजम        मो. ईषा आलम        चनौरागंज मंचनक सहयोगकर्त्ता- हारमोनि‍यम संगतकर्ता-   श्री भीखन महतो       चनौरागंज ढोलकि‍या-                श्री कारी पासवान      चनौरागंज पुष्‍पा कुमारी             श्री लक्ष्‍मण साह        चनौरागंज सुलेखा कुमारी          श्री भरत साह         चनौरागंज दि‍गमंबर यादव          श्री जीबछ यादव       चनौरागंज समीम आलम            मो. वकील हक        चनौरागंज अर्जुन कुमार राम       श्री सीयाराम राम        चनौरागंज राजराम पासवान        श्री लक्ष्‍मी पासवान      चनौरागंज सरस्‍वती पूजा १९९९ केर अवसरपर मंचि‍त पाचि‍म एकांकी- भाए-बहि‍न स्‍थान- न्‍यू लोटस इंग्‍लि‍श स्‍कूल परि‍सर- चनौरागंज दि‍नांक- २२/ ०१/ १९९९ (शुक्र दि‍न) नाटककार- बेचन ठाकुर ि‍नर्देशक- बेचन ठाकुर पात्र, कलाकार, पि‍ता आ गामक नाओं... 1. अमर            हीरा कुमारी     श्री दयाकान्‍त पोद्दार     गाम- चनौरागंज 2. बनबारी           गुंजा कुमारी    श्री भरत साहु         चनौरागंज 3. हेमन्‍त            कि‍रण कुमारी   श्री नारायण प्रधान      चनौरागंज 4. मोहन            कंचन कुमारी    श्री गौड़ी शंकर राउत    चनौरागंज 5. सोहन            अर्चना कुमारी   श्री रामसेवक राउत     चनौरागंज 6. श्‍याम            पि‍ंकी कुमारी    श्री सोहन दास        कनकपुरा 7. सोनू             सुधा कुमारी    श्री महेन्‍द्र पोद्दार        चनौरागंज 8. रेखा             कि‍शोरी कुमारी श्री कपि‍लदेव यादव     चनौरागंज मंचन केर सहयोगकर्त्ता- हारमोनि‍यम संगतकर्ता-   श्री परमानन्‍द ठाकुर     जगदर ढोलकि‍या-            श्री बुच्‍ची महतो       नवानी धीरेन्‍द्र कुमार          श्री ब्रज कि‍शोर साहु    चनौरागंज संजीव कुमार          श्री चेत नारायण साह    चनौरागंज रंजीत कुमार          श्री भरत साह         चनौरागंज शशि‍ रंजन           श्री नन्‍द कि‍शोर गुप्‍ता    चनौरागंज रामस्‍वरूप पासवान      श्री कपि‍लेश्वर पासवान    चनौरागंज रामाशीष यादव        श्री तीरथ यादव        चनौरागंज कुमुद रंजन          श्री नागेश्वर कामत      पौराम पवन कुमार मण्‍डल      श्री राजेन्‍द्र मण्‍डल      चनौरागंज छोटे कुमार यादव      श्री सुकन यादव        चनौरागंज गणेश कुमार यादव      श्री उत्तम लाल यादव    कनकपुरा सरस्‍वती पूजा २००० केर अवसरपर मंचि‍त छठीम एकांकी- कौआसँ गेल्ह बुधि‍यार स्‍थान- न्‍यू लोटस इंग्‍लि‍श स्‍कूल परि‍सर- चनौरागंज दि‍नांक- १०/ ०२/ २००० (वृहस्‍पति‍ दि‍न) नाटककार- बेचन ठाकुर ि‍नर्देशक- बेचन ठाकुर पात्र,             कलाकार,          पि‍ता             पता-... 1. सोमन            हीरा कुमारी           श्री दयाकान्‍त पोद्दार      गाम- चनौरागंज 2. बुधन             सुनीता कुमारी         श्री रघुवीर यादव       चनौरागंज 3. भूखन            रूकमि‍नी कुमारी        श्री दि‍नेश झा (पंडीजी)   कनकपुरा 4. शोभा            संजीत कुमार पासवान    श्री भोला पासवान       चनौरागंज 5. राधा             वीभा कुमारी          श्री उपेन्‍द्र कामत       पौराम 6. गोपी             संजय कुमार          श्री महावीर कामत      पौराम 7. रीता             कंचन कुमारी          श्री गौड़ी शंकर राउत    चनौरागंज 8. कि‍शन            श्रीराम पासवान         श्री लक्ष्‍मी पासवान      चनौरागंज 9. मखना            रवि‍न्‍द्र कुमार साफी     श्री लक्ष्‍मी साफी        चनौरागंज 10. बच्‍चा सुनील       पि‍ंकी कुमारी          श्री सोहन दास        कनकपुरा 11. जुआन सुनील      रामकरण यादव        श्री हरेराम यादव       चनौरागंज मंचन केर सहयोगकर्त्ता- हारमोनि‍यम संगतकर्ता-    श्री परमानन्‍द ठाकुर     जगदर ढोलकि‍या-            श्री बुच्‍ची महतो       नवानी संतोष कुमार महतो      श्री सूरत महतो       चनौरागंज पवन कुमार दास       श्री दया कान्‍त दास     कनकपुरा मुरली कुमार मण्‍डल     श्री कामेश्वर मण्‍डल      चनौरागंज मुकेश कुमार पासवान    श्री बौधू पासवान       चनौरागंज कमलेश कुमार        श्री उपेन्‍द्र साह         चनौरागंज रामबाबू यादव         श्री बि‍लट यादव        चनौरागंज अनील कुमार पासवान    श्री सुशील पासवान      चनौरागंज रामकुमार यादव        श्री अबध यादव        चनौरागंज रामआशीष महतो        श्री कुशेश्वर महतो       चनौरागंज सरस्‍वती पूजा 2005 केर अवसरपर मंचि‍त छठीम एकांकी- राखीक लाज स्‍थान- न्‍यू लोटस इंग्‍लि‍श स्‍कूल परि‍सर- चनौरागंज दि‍नांक- 13/ 02/ 2005 (रवि‍ दि‍न) नाटककार- बेचन ठाकुर ि‍नर्देशक- बेचन ठाकुर पात्र, कलाकार, पि‍ता आ गामक नाओं... 1. उदयशंकर         अनि‍ता कुमारी         प्रो. पुलकि‍त कामत     पौराम 2. श्‍याम सुन्‍दर        सावि‍त्री कुमारी         श्री सूर्यनारायण कामत    पौराम 3. मालती           ज्‍योति‍ कुमारी         श्री वि‍पीन कुमार साह    चनौरागंज 4. प्रि‍यंका           अनुराधा कुमारी        श्री नन्‍दकि‍शोर गुप्‍ता     चनौरागंज 5. सुन्‍दरलाल         मुन्‍नी कुमारी          श्री शंभू मण्‍डल        चनौरागंज 6. मोनू             संगीता कुमारी         श्री सत्‍यनारायण महतो   चनौरागंज 7. टोनू            प्रीती कुमारी          श्री रमेश प्रधान         चनौरागंज 8. शंकर            मीना कुमारी          श्री उपेन्‍द्र कामत        पौराम 9. प्रेमनाथ           रानी कुमारी          श्री बैद्यनाथ साह        सि‍मरा 10. मोहन           शीला कुमारी          श्री परमेश्वर साह       चनौरागंज 11. रामलाल         पूजा कुमारी          श्री लालबहादुर यादव     चनौरागंज 12. मदनलाल        सुलेखा कुमारी         श्री हरेराम यादव        चनौरागंज 13. कमलकांत       रेखा कुमारी          श्री अशर्फी महतो         चनौरागंज 14. गजानंद          गुड़ि‍या कुमारी         श्री देवेन्‍द्र महतो       चनौरागंज 15. राम दुलारी       अनि‍ता कुमारी         स्‍व. लखन महतो       चनौरागंज मंचन कार्यक सहयोगकर्त्ता- वि‍जय कुमार          श्री बैद्यनाथ साह        सि‍मरा (मधुबनी) कन्‍हैया कुमार         श्री कामेश्वर मंडल      चनौरागंज प्रदीप कुमार          श्री शत्रुध्‍न साफी       चनौरागंज मुरली कुमार मण्‍डल     श्री कामेश्वर मण्‍डल      चनौरागंज सि‍द्धार्थ सौरभ         श्री जगदीश मण्‍डल     चनौरागंज साहित्य अकादेमी, दिल्लीक महत्तर सदस्यता श्री चन्द्रनाथ मिश्र अमरकेँ देल गेलन्हि। मैथिली लेल ई पहिल बेर देल गेल। ऐसँ पहिने नागार्जुनकेँ (मैथिलीक यात्रीजी) हिन्दी आ मैथिली कविक रूपमे साहित्य अकादेमी, दिल्लीक महत्तर सदस्यता देलगेल छलन्हि। साहित्य अकादेमी महत्तर सदस्यता स्वीकृति वक्तव्य श्री चन्द्रनाथ मिश्र अमर (संक्षिप्त) पहिल:क्षण आ कणक सदुपयोगकेँ हम अपन जीवन दर्शनक अंग बना लेलौं। दोसर:स्वाध्याय, स्वावलम्बन, स्वच्छताकेँ आदर्श मानलौं। तेसर:मातृभाषा मैथिलीक चतुर्मखी विकासकेँ अपन लक्ष्य निर्धारित केलौं। चारिम: मैथिली साहित्यक इतिहासमे पसरल किछु भ्रान्तिकेँ पत्रिकारिताक इतिहास द्वारा निराकरण केलौं। पाँचम:विद्यापति गोष्ठीक माध्यमसँ मैथिलीक भाषात्वकेँ लऽ कऽ सामंजस्य आ समरसता अनबाक सफल प्रयास केलौं। साहित्य अकादेमीक प्रशस्ति PANDIT CHANDRANATH MISHRA'AMAR' Pandit Chandranath Mishra 'Amar' on whom Sahitya Akademi is conferring its Fellowship today is an outstanding poet, playwright, novelist and critic in Maithili language whose stellar contributions have distinguished him as a major writer in Maithili. Pandit Chandranath Mishra 'Amar' was born in 1925 in Khojpur village of Madhubani district, Bihar. 'Amar', who was dumb till four years of age, was a cause of concern for his father, the reputed scholar Pandit Muktinath Mishra and his devoted mother Daijee Devi. Muktinath Mishra was especialy concerned about his son's deep distaste for learning, and decided to'send him to the town of Narhi for education. But Amar' was not to be tamed so easily and he returned to Khojpur by foot four days later. He was forcefully sent to Narhi again, and this time he took to studies seriously and did not return to his native place for the next three years.                                                                                                                                                                                                                                                                                                             It was a turning point in the life of Amar,' and this boy who couldn't speak for the first four years of his life, began to show all the signs of the master of erudition and eloquence he was to become. But life was not easy for young 'Amar': his studies got interrupted due to frequent illness, difficult circumstances and family tragedies. But he completed his education in flying colours and passed the Acharya degree in grammar and Shastri degree in literature with distinction. For the next couple of years he frequently found himself unemployed as he moved from one school to another as a teacher. His search finally ended in 1947, the year of India's Independence, when he joined M.L. Academy School at Darbhanga which he served till his retirement in 1983, leaving an indelible imprint as a model teacher and a strict disciplinarian. Even if his formative years were full of domestic and employment-related hassles they were not formidable enough to stop him from rising into prominence. He was barely twenty one when his first poetry collection Gudgudi (1946) was published and turned out to be a huge' success for its punching humour. He soon became a household name and began to read his poems at numerous poetry meets. His humour mellowed and led to some serious satirical poems like 'Yugchakra' which was greatly acclaimed when it was published in the daily Swadesh. Though he immediately joined the prestigious league of satirists like Sitaram Jha and Hari Mohan Jha he did not stereotype himself. His other popular poetry collections, Ritupriya (1963), Unta Pal (1972), Asha-Disha (1975) and Thahi-Pathahi dealt with the beauty of nature, the mystery of human sensibility and exhibited the sympathetic understanding and deeply felt emotions of a man closely interacting with his milieu and society. And the rhythmic and musical nature of his poems went a long way in popularising his poems among the masses. Amar' is also the author of the acclaimed novels VeerKanya (1950) and Bidagari (1963); the popular short fiction collections Jalsamadhi (1972); Zero Power (2006) and Dahik Khueichaa (2007) and the one-act plays Samadhaan (1955) and Khajwaa Topee (2005). He has also authored the essay collection Maithili Andolan: Ek Sarvekshan (1968), the memoir Kanyadan Filmak Nepathya Katha (2003) and the autobiography Ateet Manthan (2010). He has also written a book each on the history of Maithili literature, Maithili jounalism and Maithili Mahasabha besides editing numerous short story and poetry anthologies and books on theatre and folklore. His translated works include Vidyapati's Neeti Tarangini, monographs on Bankimchandra Chatterjee and Harinarayan Aapte and Parashuramak Beechal Beryaal Kathaa. He has also served as the editor of numerous periodicals including Swadesh, Janak, Nirmaan and Vaidehee.                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                          Amar' is the recipient of numerous awards including Harinandan Singh Memorial Trust Award (1963), Kaviratnam Award (1969), Sahitya Akademi Award (1983), Lt. Ramanath Jha Memorial Award (1990), Sri Triloknath Jayakant Devi Maithili Sahitya Memorial Award (1990), Sahitya Akademi Translation Award (1998), Bihar Government's Vidyapati Award (1998-99) and the Lifetime Achievement Award (2010) by the All India Maithili Mahasabha. He has also been honoured by numerous organizations including Chetna Samiti (1984), Sanskar Bharati (1994), Sahitya Parishad, Madhubani, Mithila Sanskritik Sangam, Vidyapati Samiti (1999) and KSD Sanskrit University.                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                From being a classicist in literature to being a campaigner for the cause of Maithili, Amar' has taken on numerous roles and has seriously explored the storehouse of tradition at a time when rapid industrialisation and globalization have brought disillusionment. Bringing the depth of insight, sensitivity and the deliberate craft of the master, 'Amar' has articulated the stirrings of an age, a life and a society with profundity and vision. Writing over a period spanning more than six decades he has made his mark as a writer par excellence. Today he stands at a juncture where the past, present and future of Maithili literature converge as he continues his journey of expanding the frontiers of literature. Sahitya Akademi feels proud to confer its highest honour of Fellowship to this doyen who stands tall as the highest pillar of modern Maithili literature. ( विदेह ई पत्रिकाकेँ ५ जुलाइ २००४ सँ अखन धरि ११६ देशक १,९६० ठामसँ ७०,११५ गोटे द्वारा विभिन्न आइ.एस.पी. सँ ३,३०,९५० बेर देखल गेल अछि; धन्यवाद पाठकगण। - गूगल एनेलेटिक्स डेटा। ) गजेन्द्र ठाकुर ggajendra@videha.com http://www.maithililekhaksangh.com/2010/07/blog-post_3709.html २. गद्य २.१. १बहुआयामी युवा श्री धीरेन्द्र प्रेमर्षि जी सँ विहनि कथाकार मुन्नाजीक भेल गपशप २.डॉ कलाधर झासँ डॉ. शेफालिका वर्माक साक्षात्कार २.२.१.परमेश्वर कापड़ि-मानकताक बात विखपाद अछि ! २.अतुलेश्वर- किछु विचार टिप्पणी २.३.मुन्नाजी- अनमोल झाक समयकेँ साक्षी राखि ....! २.४.१.चेतना समिति, पटना समाचार/ II.खूजत अलग मिथिला प्रदेशक द्वार? छोट प्रदेशक समर्थन कएलनि मुख्यमंत्री (रिपोर्ट नवेंदु कुमार झा)२.उमेश मण्डल-१.‘मैथि‍ली भाषाक दशा ओ दि‍शा’पर परिचर्चा २. महाकवि‍ पण्डित‍ लालदास जयन्ती समारोह  ३. संजीव कुमार ‘शमा’- महाकवि‍ पं. लालदास जयन्‍ती समारोह २.५.गजेन्द्र ठाकुर- उल्कामुख (आगाँ) २.६.राजदेव मण्‍डल- हमर टोल- उपन्‍यास (आगाँ) २.७.ओमप्रकाश झा - कथा- सफल अधिकारी २.८.नवीन ठाकुर-मिथिला उवाच १बहुआयामी युवा श्री धीरेन्द्र प्रेमर्षि जी सँ विहनि कथाकार मुन्नाजीक भेल गपशप २.डॉ कलाधर झासँ डॉ. शेफालिका वर्माक साक्षात्कार बहुआयामी युवा श्री धीरेन्द्र प्रेमर्षि जी सँ विहनि कथाकार मुन्नाजीक भेल गपशपक प्रमुख अंश प्रस्तुत अछि। मुन्नाजी: धीरेन्द्र जी नमस्कार। स्वागत अछि विदेहक आंगनमे। मैथिली साहित्यमे प्रवेश कोना केलहुँ। कोनो विशेष कारण वा किछु आओर। धीरेन्द्र प्रेमर्षि: सर्वप्रथम धन्यवाद अछि मुन्नाजी जे हमरा विदेहक आङनमे आमन्त्रित कएलहुँ। ई प्रश्न हमरा नीक लागल जै मैथिली साहित्यमे प्रवेश कोना कएलहुँ? असलमे हमर साहित्यमे प्रवेश लौलसँ भेल छल। सेहो नेपाली भाषाक माध्यमे। ई लगभग वि.सं. २०४४ साल अर्थात् १९८७ ईस्वीक समय छल। लौल ई जे हमरो नाम पत्र-पत्रिकामे छपए। ओना मात्र किछु लिखनाइकेँ जँ साहित्य कहल जाए तँ हमर कलमसँ जिनगीमे सभसँ पहिल कोनो रचना मैथिलीएमे लिखाएल छल, जे एकटा फटीचर टाइप गीत रहए। छोटे वयससँ सरकारी नोकरीमे प्रवेश कऽ चुकल हम जखन बदली भऽ कऽ जनकपुर गेलहुँ तँ अपन गीत-सङ्गीतक प्रेमकेँ मूर्त्त रूप देबाक लेल कोनो जगहक खोज करबाक क्रममे मिथिला नाट्यकला परिषद् पहुँचलहुँ। ओहिठाम जखन डा. धीरेन्द्र, महेन्द्र मलङ्गिया, डा. राजेन्द्र विमल, योगेन्द्र साह ‘नेपाली’ सन विभूति सभसँ भेट भेल तखन जा कऽ असलमे हमरा मैथिली भाषाक अवस्था आ महत्ताक बोध भेल। तकरा बाद हमहूँ अपन लेखन प्रतिक लौलकेँ मैथिली साहित्यक अभियान दिस मोड़ि देलहुँ। वि.सं. २०४६ सालमे मिनाप द्वारा आयोजित मैथिली विकास दिवसक कविगोष्ठीक लेल कन्हि-कूथिकऽ एकटा कविता लिखलहुँ। ओहिमे डा. धीरेन्द्र द्वारा लाल रोसनाइवला कलमसँ जे सुधारात्मक परिवर्तन-चिह्न सभ लगाएल गेल छल, सएह हमरा लेल मैथिली वर्ण विन्यासक गुरुमन्त्र बनि गेल आ हम मैथिलीमे लिखैत चलि गेलहुँ। मुन्नाजी: अहाँक सभ तरहक रचनामे तीक्ष्ण नजरिया जगजिआर होइछ। एकर की स्रोत वा ऐलेल रचनात्मक ऊर्जा कतऽ सँ वा कोना प्राप्त होइए? धीरेन्द्र प्रेमर्षि: एकर जवाबमे हम अपने गजलक एकटा शेर कहऽ चाहब– मनमे ने कनियोँ चोर अछि तेँ गजलो हमर अङोर अछि देश, समाज आ अपना प्रति इमान्दारी लोकमे सहजहिँ तीक्ष्णता आनि दैत छैक। हम 'खुर्पी छुआ बोनि हुआ' मे कहियो विश्वास नहि कएलहुँ। हमर रचनात्मकताक स्रोत अपन समाजे अछि। खास कऽ समाजमे रहल छद्मवेषी परिपाटी हमरा बेसी झकझोड़ैत अछि आ उएह हमरा लिखबितो अछि। एखनो विशुद्ध कर्मशीलतापर विश्वास कएनिहार जे किछु लोक छथि तिनका सभक निष्ठा आ लगनशीलता हमरा सृजनात्मक ऊर्जा दैत अछि। मुन्नाजी: की मैथिलीक अतिरिक्त आनो भाषामे रचना केलहुँ अछि? मैथिली आ अन्यान्य (विशेष कऽ नेपाली) भाषा मध्य मैथिलीक अस्तित्व केहेन वा कोन ठाम नजरि अबैए। धीरेन्द्र प्रेमर्षि: हँ, हम मैथिलीक अतिरिक्त नेपाली भाषामे सेहो यथेष्ट मात्रामे लिखैत छी। नेपालक स्नातक स्तरक अनिवार्य नेपालीक पाठ्यपुस्तकमे हमर गजल सेहो पढ़ाओल जाइत अछि। छिटफुट हम हिन्दीमे सेहो लिखैत छी। खास कऽ नेपाली साहित्यक सङ्ग जखन हम मैथिलीक तुलना करैत छी तँ सोच, संवेदना आ शैलीगत रूपमे हमरा मैथिली कनेको झूस नहि बुझाइत अछि। मुदा सङ्ख्यात्मकता आ व्यापकताक हिसाबेँ मैथिली सीमित अछि। नेपाली साहित्यमे मैथिलीजकाँ व्यापक गोलैसीक वातावरण सेहो नहि छैक, जाहिसँ ओकर विकास-गति तीव्रतर बुझाइत छैक। ओ सभ वर्तमानकेँ उपलब्धिपूर्ण बनएबामे अधिक दत्तचित्त बुझाइत अछि मुदा हम सभ इतिहासक झुनझुन्ना बजबैत मस्त रहबामे बेसी आनन्दित होइत छी। मुन्नाजी: अहाँ रचनाक अलाबे सम्पादनमे सेहो सक्रियता देखा चुकल छी। अहाँक नजरिये सृजनकर्ता आ सम्पादकक मध्य की फरक हेबाक चाही। धीरेन्द्र प्रेमर्षि: हम पल्लव, मैथिल समाज, कामना सिनेमासिक (नेपाली) आदि पत्रक सम्पादन सेहो कऽ चुकल छी। रचनाकार आ सम्पादक दुनूमे फरक की होएबाक चाही से हम नहि कहि सकैत छी। मुदा समान की होएबाक चाही से हम अवश्य कहब। दुनूमे मातृगुण अनिवार्य रूपेँ होएबाक चाही। हँ, मुदा मुखरताक दृष्टिएँ रचनाकार देवकी रहए आ सम्पादक यशोदा तँ सृजनरूपी सन्तान नीक जकाँ फौदएतैक, से निश्चित। मुन्नाजी: सम्पादनमे भाइ-भैयारीबला नजरिया देखाइत रहल अछि। जखन की सम्पादककेँ निरपेक्ष आ दृष्टि फरीछ हेबाक चाही, की कहब अहाँ? धीरेन्द्र प्रेमर्षि: सम्पादनमे भाइ-भैयारीवला नजरियाक बात जे अहाँ उठौलहुँ अछि से सही भऽ सकैत अछि। मुदा एकर सापेक्षता देखब जरूरी अछि। मैथिली पत्रकारिता एहन नहि अछि जे साधन-स्रोतसँ सम्पन्न भऽ कऽ चलैत होइक। लोक अनेक तरहक भाँज भिड़ा कऽ मैथिलीमे पत्रकारिता करैत अछि। एहनमे बाहरसँ स्वतन्त्र रूपेँ यथेष्ट सहयोग नहि भेटि पएबाक कारणे सेहो सम्पादककेँ भाइ-भैयारीक सहयोग लेबऽ पड़ैत होएतनि। मुदा सम्पादन जेँ कि समीक्षा, समालोचना आदि कार्यक दायित्व सेहो निमाहैत चलैत अछि, तेँ यथासम्भव एहिसँ एकरा दूर राखब उचित। कचोट तँ तखन होइत अछि जखन समालोचना भाइ-भैयारीवला नजरियासँ कएल जाइत छैक। मुन्नाजी: अहाँ विभिन्न तरहक कार्यक्रम (आकाशवाणी वा दूरदर्शन) माध्यमे प्रस्तुति दैत रहलौं, की ऐमे रोजगार छै। अपनाकेँ ऐमे कतऽ पबै छी। धीरेन्द्र प्रेमर्षि: नीकजकाँ समर्पित भऽकऽ लगलापर आजुक समयमे सभ क्षेत्रमे रोजगारी छैक। तखन आकाशवाणी वा दूरदर्शन तँ आओर बहुतो लोकक स्वप्न-संसार सेहो छियैक आ आजुक समयक सर्वाधिक सशक्त हथियारो। एहिमे रोजगारी नहि होएबाक बाते नहि अबैत अछि। हम पूर्ण रूपेँ एहिसभ क्षेत्रमे कहियो आश्रित नहि रहलहुँ। हम नेपालक सरकारी आकाशवाणी रेडियो नेपालमे १३ वर्ष धरि मैथिली, हिन्दी आ नेपालीक समाचार वाचनमे संलग्न रहलहुँ। तहिना पछिला एक दशकसँ नेपालक सभसँ पैघ रेडियो नेटवर्क रेडियो कान्तिपुरसँ जुड़ल छी आ हेल्लो मिथिला सहित किछु कार्यक्रमक सञ्चालन करैत आएल छी। तहिना समय-समयपर टेलिभिजनक विभिन्न कार्यक्रम आ सिरियल सेहो करैत आएल छी। हमर रेडियो नेपालसँ जुड़ाव तँ एकटा सरकारी नोकरीक रूपमे छल। मुदा एहि सभ काजमे हमर अभीष्ट मैथिली भाषा-संस्कृतिक सम्मान आ सम्बर्द्धन रहैत अछि। एकरे ध्यानमे राखि १० वर्ष पहिने हम सभ रेडियो कान्तिपुरमे हेल्लो मिथिलाक शुरुआत कएने रही। एहिमे हमर आवद्धता लगभग स्वयंसेवकीय छल। मुदा हम लागल रहलहुँ। तकर परिणाम ई छैक जे हमर रोजगारीमे आंशिक सहायक तँ ओ भेले अछि, आइ नेपालमे कमसँ कम पाँच सय गोटे खालि मैथिलीएमे बाजिकऽ रोजीरोटी कमा रहल छथि। तेँ एहि मादे हम एतबए कहब जे पूर्ण लगनशीलताक सङ्ग जँ हमसभ बालुओ पेरैत रहब तँ एक ने एक दिन ओहिमेसँ तेल बहरएबे करतैक। मुन्नाजी:अहाँ विभिन्न प्रकारक क्रियाकलाप वा गतिविधिमे लागल रहैत छी। अपनाकेँ समेटि रखबामे किछु बाधक तँ नै होइछ? धीरेन्द्र प्रेमर्षि: कहियो काल अवस्था एहन अवश्य भऽ जाइत अछि जे पीठकेँ झँपैत छी तँ माथा उघार आ माथा झँपैत छी तँ पीठ उघार। मुदा समयक सीमित चादरिक व्यवस्थापन करैत माथ आ पीठ दुनू झाँपि लेबामे जे आनन्द अबैत छैक से वर्णनातीत होइत अछि। तेँ बेसी दिस छिड़िअएनाइकेँ सेहो हम अपन सफलताक द्योतक मानैत छी। हँ, एहिदिस साकांक्ष जरूर रहैत छी जे बेसीदिस छिड़िआकऽ कहीँ हमर अभियान तँ लचर नहि भऽ रहल अछि! हम ओ सभ काज करैत रहैत छी जाहिसँ बुझाइत अछि जे ई काज कएलासँ हमर मैथिली एको डेग आगाँ ससरत। जहिया हमरा ई बुझबामे आएत जे ई काज कएने हमर मैथिलीकेँ क्षति भऽ रहल छैक तँ ओ काज हम ठामहि रोकि देबैक। हमरा एखन धरि किछु विशुद्ध पूर्वाग्रही वा अपरोजक-अपाटक सभकेँ छोड़ि केओ एहन सङ्केतो नहि देने अछि, तेँ अपनाकेँ चहुँदिस सक्रिय रखने छी। मुन्नाजी:रूपा भौजी, धीरेन्द्र भैयाक कार्यक्रम सभमे सेहो अर्द्धांगिनी बनि देखार भेलीह अछि। एकर सभक अतिरिक्त अहाँसँ स्वतंत्र कोन-कोन गतिविधिमे सक्रिय रहैत छथि। धीरेन्द्र प्रेमर्षि: स्वतन्त्र रूपेँ सभसँ प्रमुख तँ रूपा एक कुशल गृहिणी छथि। कविता-कथा लिखैत छथि। कम लिखैत छथि, मुदा हुनकामे समाज आ संवेदनाकेँ धरबाक जे कला आ सामर्थ्य छनि से विलक्षण। गीत गबैत छथि, सेहो हुनक स्वतन्त्र क्षेत्र छनि। नेपालक वर्तमान राष्ट्रगानक एक गायिका रूपा सेहो छथि। मैथिल महिला समाजक सचिव आ विभिन्न महिला समाजक सल्लाहकार भऽ कऽ ओ अनेक काज कऽ रहल छथि। नारी जागृति सम्बन्धी कतेको काजमे ओ नेतृत्वदायी भूमिका निर्वाह कऽ रहल छथि। मुन्नाजी: मिथिला (बिहार) आ नेपालमे कोनो मैथिली गतिविधिक रासि अगड़ा जातिक हाथमे रहल अछि। मुदा नवम सदीमे पिछड़ल जातिक धर्रोहिक सक्रिय प्रवेश भेल अछि। एकरा भविष्यमे कोन नजरिये देखै छी। धीरेन्द्र प्रेमर्षि: अहाँ बिहारक नजरियासँ देखैत ई बात कहने होएब। मुदा नेपालक अवस्था किछु भिन्न अछि। नेपालक मैथिली गतिविधिक जँ बात करब तँ एहिठाम अगड़ी-पछड़ीवला बात हमरा बेतुका बुझाइत अछि। नेपालमे तँ बहुत पहिनहिसँ मैथिली गतिविधिक रासि अहाँक आशय रहल तथाकथित पछड़ी जातिक डा. रामावतार यादव, डा. योगेन्द्रप्रसाद यादव, डा. रामदयाल राकेश, डा. गङ्गाप्रसाद अकेला, रामभरोस कापड़ि ‘भ्रमर’, योगेन्द्र साह ‘नेपाली’, परमेश्वर कापड़ि, रामाशीष ठाकुर, मदन ठाकुर, रामनारायण ठाकुर, महेन्द्र मण्डल ‘वनवारी’ सँ लऽकऽ नवतुरियोमे अमरेन्द्र यादव, अमितेश साह, नित्यानन्द मण्डल, शीतल महतो सदृश लोकक हाथमे छनि। जँ संस्थागत गतिविधिक बात करब तँ मात्र सप्तरी जिलामेटा पचाससँ अधिक मैथिलीसँ सम्बन्धित सङ्घ-संस्था भेटत, जकर पदाधिकारी सभ कथित पछड़ा वर्गक छथि। प्रायः इएह कारण छैक जे नेपालक मैथिली गतिविधि जतबए छैक, जड़ि धएने छैक। प्रायोजित नहि बुझाएत एहिठामक मैथिली गतिविधि। अधिकांश भारतीय मैथिली अभियानी सभ जकाँ नहि जे कहब मैथिलीक कार्यकर्ता आ हिन्दीक कनेक अक्षत भेटि जाए तँ ओहीपर तर-उपर होइत रहनिहार वा घरमे हिन्दीक प्रयोगकेँ प्रतिष्ठा बुझनिहार। रहल बात एहि सदीमे जँ बिहारो दिस ब्राह्मण आ कायस्थेतर जाति जँ मैथिली गतिविधिमे आगाँ आबि रहल छथि तँ ई मिथिला-मैथिलीक लेल सौभाग्यक बात छियैक। कारण यथार्थमे जँ देखबैक तँ कथित अगड़ीसभ तँ मैथिलीकेँ रङ्गटीप मात्र करैत आएल छथि, अपन दैनन्दिनीमे मैथिलीकेँ यत्र-तत्र-सर्वत्र प्रयोग करैत यथार्थमे एकरा जीवन देनिहार तँ कथित पछड़े सभ छथि। ओ सभ जँ पूर्ण सचेष्ट भऽ कऽ लागि जाथि तखन तँ मैथिलीक लेल ककरो नोर बहबैत रहबाक कोनो प्रयोजने नहि रहि जएतैक। मुन्नाजी: अहाँ द्वारा प्रस्तुत कार्यक्रम सभ सतही वा व्यावसायिक पूर्ति मात्रकेँ इंगित करैए, की कहब अहाँ? धीरेन्द्र प्रेमर्षि: अपन गायकी वा सङ्गीत, अभिनय वा कार्यक्रम सभकेँ हम साहित्य वा रचना मानैत छी आ ताही भावसँ ओकरा हम कार्यरूप सेहो दैत छियैक। एहनमे हम अहाँक प्रश्नसँ कने असमञ्जसमे पड़ि गेल छी। दोसर नम्बर प्रश्नमे अहाँ ई कहैत छी जे ‘अहाँक सब तरहक रचनामे तीक्ष्ण नजरिया जगजियार होइत अछि’। फेर किछु आगाँ चलिकऽ अहाँ कहैत छी जे ‘अहाँक कार्यक्रम सतही होइत अछि’। चलू जँ सतहीयो होइत अछि तैयो हम एहि बातसँ प्रसन्न छी जे अहाँ सन गम्भीर व्यक्ति एक सतही कार्यक्रम चलबैत मात्र व्यावसायिक पूर्ति करऽ वलाकेँ एहन गूढ़ प्रश्न पुछबाक योग्य व्यक्ति मानलहुँ। हमरा लेल इएह सभसँ पैघ उपलब्धि अछि। मुन्नाजी: अपन अगिला योजना की अछि? कोनो विशेष क्रियाकलापक योजना हुअए तँ उल्लेख करी। धीरेन्द्र प्रेमर्षि: निकट भविष्यक मूलतः तीनटा प्रमुख योजना अछि। पहिल पल्लव पत्रिकाक पुनर्प्रकाशन। दोसर नेपालमे महाकवि विद्यापतिकेँ राष्ट्रिय विभूति घोषणा करएबाक लेल अभियानक सञ्चालन आ तेसर अपन मैथिली गजलसङ्ग्रहक प्रकाशन। मुन्नाजी:मैथिली क्रिपाकलापसँ जुड़ल युवा/ युवतीक लेल की सन्देश देबऽ चाहब। धीरेन्द्र प्रेमर्षि: जे युवा मैथिली क्रियाकलापसँ जूड़ि गेल छथि तिनका किछु कहबाक प्रयोजने नहि अछि। किएक तँ वर्तमानमे बाँकी सभ दिस अवसरक झमाझम वर्षा भऽ रहल समयमे सेहो जँ केओ स्वेच्छासँ मैथिली सन सूखाग्रस्त क्षेत्र चुनैत छथि तँ अनेरे नहि किछु सोचिए कऽ, किछु बूझिए कऽ। ओहुना एखनुक युवा बहुत बुझनुक अछि। हँ, किनको-किनकोमे ई देखबामे अबैत अछि जे सोचल सन उपलब्धि चटपट हासिल नहि भेलापर कने निराश भऽ जाइत छथि। बस अहीठाम कने हिम्मत बन्हने रहबाक जरूरति छैक। हम सभ मैथिलीमे जँ लागल छी तँ अपन माटिक प्रबल प्रेमसँ वशीभूत भऽ कऽ। एहि प्रेममे सरिपहुँ आन कोनो प्रेमसँ बेसी डूबि जाइ। मुदा प्रेम शब्द सुनबामे जतेक सहज छैक, निमाहऽ मे ओतेक किन्नहु नहि छैक। तेँ ने एकटा हिन्दी गीतमे कहल गेल छैक¬ ये इश्क नहीं आसाँ  इतना तो समझ लीजै, एक आग का दरिया है  और डूब के जाना है। बस एतबा बात जँ बूझि गेलहुँ आ एतबा धीरज सेहो धारि लेलहुँ तँ हम सभ तरहत्थीमे सेहो दूभि जनमा सकैत छी। मुन्नाजी:धन्यवाद धीरेन्द्रजी अपन स्वतंत्र विचार देबाक लेल। धीरेन्द्र प्रेमर्षि: एहि अवसरक लेल मुन्नाजी अहाँक सङ्ग-सङ्ग विदेह परिवारक सेहो हम आभारी छी। २. डॉ कलाधर झासँ डॉ. शेफालिका वर्माक साक्षात्कार (हम हेरोगेट, इंग्लॅण्ड . मे हड्डी रोगक शल्य चिकित्सक डॉ. कलाधर झा एवं हुनक पत्नी डॉ. पूनम झा ओतए बैसल छलौं..कलाधर झाजीक पिता श्री जगधर झा जी पटना सायंस कॉलेजक प्रथम ३ टा विद्यार्थी मे सँ छलाह . श्री जगधर झा, डॉ.शीतल प्रसाद, जे दरभंगा मेडिकल कॉलेजक गोड फादर मानल जाइत छलाह आ श्री वाई एन झा  ऐ तीन टा विद्यार्थी सँ पटना सायंस कॉलेज खुजल छल. डॉ. पूनम झा जे जीपी छलीह ,हुनक नाना श्री सी. एस. झा आइ.सी.एस. छलाह,आ पिता श्री महानंद झा इंजीनियर छथि....) शेफालिका वर्मा:अपने मिथिला राज्यक विषयमे की सोचैत छी, हेबाक चाही कि नै ? कलाधर झा (चौंकैत) -हं किएक नै, जरुर हेबाक चाही ,मुदा ,एखन नै, ... शेफालिका वर्मा: से किएक ? कलाधर झा (हमर प्रश्न पर ओ छुटतहि बाजि उठलाह):.जाधरि मिथिलांचलकेँ आर्थिक स्वाधीनता नै हेतैक ताधरि नै.. शेफालिका वर्मा:जेना.. कलाधर झा:(हमर प्रश्न पर ओ कनिक काल हमर मुंह देखैत रहलाह , फेर बाजि उठलाह )..हम अपना सँ किछु निर्भर भऽ जाइ, सीधे सरकारक सोझा मुंह बाबि ठाढ़ भऽ जाइ ई तँ कोनो नीक बात नै..अलग राजसँ घाटा फाएदा दुनु छैक ,सत्ताक विकेंद्रीकरण लेल मिथिला योग्य नै...आर्थिक स्वाधीनता जेना अहाँ पहिने कृषिकेँ उन्नत करू, चीनी मिल, पेपर मिल, यानि नेचुरल रिसोर्सेसकेँ देखू , अहाँ अपनासँ की सभ कऽ सकैत छी..देखू शेफालिका जी, लोग हमरा एंग्री मैन कहैत अछि , किन्तु हम नीक जकां जनैत छी जे सरकार हमर कोनो मदद ऐमे नै करत. शेफालिका वर्मा- तं सरकार हमर की करत से बाजू,--- कलाधर झा(हमर बात पर ओ चोट्टे जबाब देलाह): हँ किएक ने, सुनु, सरकारसँ हम तीन बातक मदति लऽ सकैत छी ..कानून आ व्यवस्था , परिवहन, एनेर्जी , यदि ऐ तीनूक आपूर्ति सरकार कऽ दैक तँ बंद मिल की मिथिलामे एतेक शक्ति छैक जे नव नव मिल खोलि देत,फैक्ट्री खोलि देत, मिथिलाक माछ आ मखानक खेतीसँ तँ मिथिला विश्वक सम्पदा कीनि लेत............... ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। १.परमेश्वर कापड़ि-मानकताक बात विखपाद अछि ! २.अतुलेश्वर- किछु विचार टिप्पणी १. प्रा.परमेश्वर कापड़ि जनकपुरधाम नेपाल मानकताक बात विखपाद अछि ! टिप्पणीमे दम आ सोंच सहितक पकिया ओजह अछि । बहुत बढ़ियाँँ लागल आ एहिस’ मैथिली मुर्दा हअ’स’ बँचत । हम नेपालक छी तएँ नेपालक बात करब आ कहब जे नेपाल नव निमार्ण आ संघीय संरचना विकासक क्रममे अछि । एहि ठामक लोक अपन संघीय राज भाषा,संस्कृति, जातीयता, क्षेत्रीयता, सांीकृतिकता आ एतिहासिकौराणिकताक बाहुल्य एवं प्रभुत्वक प्रभावपर चाहैत अछि । सौंच छै जे एहिस’ हमर अस्मिताक पहचान बनत आ स्वायतताक वोध होएत । ई बाएहिलोकलेखेप्रजातन्त्र आगणतन्त्रोस’ पहिनेक चाहना अछि । हमरासबके भाषा संस्कृतिक बाहुल्यता संघीयराज, सांस्कृतिक पहचान आ राजनीतिक पहुच दिअएतै आ दिअबितो छै! हमरासबकेभाषिाक सांस्कृतिक चेतना अस्मीता आ स्वाततावोधस’ आवद्ध रहनेएहिपर राजनीतियो खूब भ’ रहल छैआ आरो होएतै । एहनमे ईमानकताक बात पद बराइ विद्वताक बात अछि आ एहिस’एहि सालक नेपालक जनगणनामे कैथिलीके बडघाटा भेल छै । छेंट ध’क’ घेंट काट’बलासबके कहब छै जेहमसब अछि, छथि, छथिनबला नै छी। हए हब हैहुइ बजैछी तै बजिका बजैछी । बजिका कहि भाषिक लाभ लभगरस’ होएतै आ एकर राजनैतिक सन्दर्भ अलगे छै । पूर्वीतराइमे थारुभाषा अपन अलगेपहचान आ संस्कार बना लेने अछि सेहे नइ,हमरा सबकेसर्लाही, बाड़ा पर्सा जिलासबकेलोक जैंकि छथि अछि नइ बजैत अछि तैंअपनाके मैथिलीभाषी नहि कहि पाबि रहल अछि । जेकोइ मानकताक हुड़फेर फेर’ चाहैत छथि से ई बात किए ने बूझैत छथिन जेमैथिली भाषा असलमे लोकभाषा अछि, मैथिली संस्कृति लोकसंस्कृति अछि । ईएह हाल लोककला, लोकसंगीत लोकसाहित्य, लोकगीत, लोकगाथा लोकचित्रकलाक अछि । जे सुधार विकास आ निखार आएल अछि ओबहुत एक्हर आबिक’ सेहोहफनियाब’ दफनियाब’ आ भाषा–संस्ककृतिपर राज कर’ वास्ते। मिथिलेमे रहिक’ ब्राह्मण–कायस्थेतर लोक अपनाके मैथिल आ अपना भाषाके मैथिली भाषा नै कहि सकल अछि । आनक भाषाके सम्पर्कमे अएलास’ आनो लोक ओ भाषा सिखि जाइए। हमरा जनितेएकहि गाम समाजमे रहियोक’ तथाकथित सोलकन आ छोटवर्णाअछि छथि छथिन नै बजलखिन्ह आ जत’ कतौ बजलोहोतै त’ सेबहिया खबास, नोकरनी बहिकिरनीसब । मनोविज्ञान देखल जाय जेविरुद्धमेजा’क’ लोक वहिष्कार केना करैछै। वाभन पहचानक अछि छथि,छलह आ जनौकेब्राह्मणेतरवर्गभूलियोक लवजपर नइ लएलखिन्ह ! परिणाम भेलै जे अपने मिथिलामेमैथिलीकेप्रचारमे कह’ जाय पड़लै जे अहूँ मैथिल छी आ अहाँक भाषा मैीथली भाषा अछि, अहाँक संस्कृति मैथिली संस्कृति अछि । आइ किछु लोक कत्त’ कहाँकेधोती–कुत्र्ता आ बभनौटी पागकेमैथिली संस्कृतिक पहचानसङे जोड़के घृस्टता कए रहलाह अछि । हमरा जनिते सय बरख त’ बहुत भ’ गेल, भल पचास वर्ष पहिने धरि अपनासबके पुरुख मानुष विद्यापतिसनके चौन्ही पेन्हैत छलाह । चौवन्ही पेन्हनिहारकेएखन तेसर पुस्ता ठीकस’ अएबो नै कएलैए आ समाजमेबाभन छोड़ि आन केओपाग पहिरते नै छै। जे जाति विशेषस’ आवद्ध अछि सेपाग जँ मैथिली संस्कृतिक प्रतीक बनत त’ नै लगैए जे ई बात फेरु हमरेबाभनके थीक से भ’ जएतै? कोनो भाषा समाज आ संस्कृतिस’ जुड़ले रहैत अछि । हमसब ब्राह्मणेतर छी तै हमरासबके बाउ माइ रहे, माताजी पिताजी नै रहथि ! बाउए सब दिन हर जोतलकै, कोदारि पाड़लकै, करीन पटएलकै घर बन्हलकैखेती गिरहस्तीके सब काज कएलकै। जैंपिताजी वाभनके छलनि तैं ओअएलाह गेलाह पुरहिती पण्डितारेकएलन्हि लौटा सेहो चलौलन्हि । हमरासबके घरमे तिमना बनल , हुनकासबके घरमेभोजन आ तरकारी बनलनि । ई लोक नुआ घोती, आ–जमा पेन्हलक ओ लोकनि संस्कृतक वस्त्र पहिरलथि । संस्कृतेमेकाल्हिघरि पतर–पाँति भेजबलाके मैथिली दांवे–घावे ने अप्पन रहनि ? हमरासबमेबाउ हरजोतैहै। भात खाइ है माइ धास छिलै है उसुन बनिहारी खबासी करै हैसे जे कहै छै त’ ओकर सम्प्रेषणमे,कोनोमानकताक गैंची–मोड़ आदर्थीअनादर्थीकेमान÷अपमान लगिते नै छै त’ आनलोक टिप ध’क’ ऐमे भाषिक विष किए पादत ? फेरु नेपालक सन्दर्भमे कहब जे एखुनका समय सन्दर्भमे मानकताक नइ सबकेसमेटबाक आवश्यकता छै सेहोपोल्हा पनियाँक’ ! जनगणनामे एहि विषयलक’ हमरासबकेबहुते पापड़ बेल’ पड़ल अछि आ धन्यवाद एतिुका राजनैतिक दल आ कार्यकत्र्तासबके जे ओहोलोकनि जे जेहन मार्तभाषा बजैत होथि अपन मार्तभाषा लखा मैथिलीक हकमै बड़ पैघ योगदान देलन्हि अछि । मानकता वर्गभेद, जातिभेद भाषाक राजनीति आ संस्कृतिकेहिसाबे विखण्डनक काज करैत अछि । एहिस’ मैथिलीक विशाल बड़गदकेसोझे पाङि दकड़िठुठ एकपोड़िया बनाएब त’ अछिए, लोकगीत, लोककथा ,लोकगाथा आलोकभाषा–संस्कृतिपर सोझे लात मारि कात करब अछि ।

२ अतुलेश्वर किछु विचार टिप्पणी १ पंडित गोविन्द झा, मैथिली आ अध्ययन आम पाठककें गोविन्द झाक नाटक, कथा आ हुनक लिखल विद्यापतिक आत्मकथा आकर्षित करैत अछि। मैथिली भाषाक अध्ययन कएनिहारकें हुनक साहित्य तँ आकर्षित करितहिं अछि, सबसँ बेशी आकर्षित करैत अछि हुनक भाषा पर कयल कार्य। हुनक साहित्यिक रचना आ भाषा वैज्ञानिक कार्य दुनू एक्के गति सँ चलैत अछि निरंतर गतिशील आ चिंतनशील।  हेमनिमे हुनक एक गोट पोथी आयल अछि, मैथिली व्याकरण(अंग्रेजी सँ मैथिलीमे अनुवाद), जकर मूल रचयिता छथि अंग्रेज लोकनिक ग्रिर्यसन साहेब, मैथिलक गिलेसन साहेब आ गोविन्द झाजीक अनुसार मैथिलीक पाणिनी। प.जीक मैथिली भाषाक प्रति ई काज हुनक जिजीविषाकें देखबैत अछि, कारण जे काज युवा वर्ग आ मैथिली अध्यापककें करबाक चाहिएनि ओ काज पंडित जी अपन नब्बे बरिसमे कतेक मनोयोगसँ कएलनि अछि, तकर अनुभव सभ सहृदयी कए सकैत छथि। हुनक एहि कार्यक हेतु हमरा लग कोनो शब्द नहि अछि, जाहिसँ हुनक अभिवादन-अभ्यर्थना कएल जाए सकए। कारण मैथिली भाषाक  भाषावैज्ञानिक कार्य बहुत सीमित भेल अछि, जे भेल अछि ओ आंगुर पर गानल जा सकैछ, जखनि कि ओकर अध्ययन आ विवेचना स्वतंत्र भारत सँ पूर्व भ चुकल छल। एतए प्रश्न उठैत अछि जे आखिर एहि अन्तरक कोन कारण? एतेक दिन भेलाक बादो आइओ बहुतो तकला पर उचित मैथिली व्याकरण भेटब मोश्किल अछि, जाहिसँ सभ अध्यवसायीक शंकाक समाधान भए सकनि। आइ हमरासभकेँ छोट सँ छोटो व्याकरणीय समस्या लेल बहुत बेशी कसरत करए पड़ैत अछि। मैथिली भाषा वैज्ञानिक अध्ययनक शिथिलताक एकटा नमूना हम सद्य: देखल अछि। जखनि कतहु मैथिली भाषाक चर्चा होइछ तँ ओ कखनो एकरा बिहारी भाषा कहि तँ कखनहुँ हिन्दीक बोली कहि सोचल जाए रहल अछि। सोचबाक विषय अछि जे एहि भाषा क एहन गति कियाक? हमरा लोकनि मात्र शुद्ध आ अशुद्ध क झगड़ा मे लागल रहलहुँ। ई कखनो नहि सोचलहुँ जे भाषा क वैश्विक विकास लेल साहित्यक रचनाक संग-संग ओकर भाषा वैज्ञानिक अध्ययन सेहो होयबाक चाही , ओना किछु कार्य भेल, मुदा  ओकर निरन्तरता नहि रहल जकर कारण भेल मैथिली भाषा हिन्दी क माँझमे दबाइत गेल। ओना ई अनुभव हमरा हेमनिमे आर बेशी भेल  जखनि सम्पूर्ण भारतीय भाषा जे संविधानक अष्टम अनुसूची मे  सम्मिलित अछि ओकर एकटा कार्यशाला छलैक आ कार्यशाला अपन-अपन क्षेत्र मे हेबाक चाही एहि प्रकारक निर्देश छलैक। मुदा मैथिली क कार्यशाला  मिथिला कि बिहार तक मे नहि भेल, एकर एक मात्र कारण देखाओल गेल जे मैथिलीमे भाषाविज्ञ नहि छथि। किन्तु कारण किछु आन छलैक आ ओ कारण छलैक मैथिलीकेँ हिन्दी क बोलीक रूपमे स्थापित करबाक एकटा षडयंत्र। ई षडयंत्रमे जतेक दोषी ओ लोकनि नहि छलाह ओहि सँ बेशी हम मैथिल छी, कारण मैथिलीक नाम पर जे विज्ञ बजाओल जाइत छथि ओ बेर-बेर एतबहि कहताह जेना हिन्दी मे होइत छैक ओहिना मैथिलीमे सेहो होयत। आ मैथिली अपन स्वतंत्र अस्तित्वक लड़ाई लड़बा सँ पहिने हारि जाईत अछि। ई भ रहल अछि अक्षरकट्टु मैथिली विज्ञ लोकनिक कारणेँ। नाम लेब एहि कारणें उचित नहि जे ओ सभ बिन वजह कें प्रसिद्धि पाबि लेताह। हम एहि ठाम ई प्रसंग एहि कारणें देलहुँ अछि जे पंडितजी कें ई आभास छनि जे भाषाक लेल साहित्य जतेक आवश्यक छैक ओहिना ओकर भाषा वैज्ञानिक अध्ययन सेहो, जकर कारण छल ओ सुविधाक अभावों मे मैथिली भाषा क वैज्ञानिक अध्ययन करैत रहलाह अछि । मुदा ई एकटा प्रश्न उठैत अछि जे विश्‍वविद्यालय मे चाकरी कएनिहार आ मैथिली भाषाक विज्ञ कहौनिहार ई अध्यापक लोकनि कें कियाक नहि एहि विन्दु दिश ध्यान जाइत छनि, ओ सभ मात्र सुविधा पएबाक जोगाड़मे कियाक लागल रहलाह आ आइओ छथि। एतेक वर्ष मैथिलीक अध्ययनक आरम्भ भेलाक बादो ई महानुभाव लोकनिकें ई आवश्यकता कियाक नहि देखा पड़ि रहल छनि । एकर कारण अछि हुनका लग एतेक अथाह पानिकें उपछबाक समय नहि छनि, हुनका लग समय मात्र छनि अपन गोंटीके ब्योंत धरएबाक। पुस्तकक प्रकाशन करताह मात्र एहि लेल जे प्रोन्नतिक लाभ भेटतन्हि भलsहि ओ पुस्तक कोनो उपयोगी सिद्ध हुअए वा नहि । मुदा पंडित गोविन्द झाकें नहि तँ ओहि सँ प्रोन्नतिक लाभ होइत छनि आ आने कोनो आने लाभ। हँ, लाभ होइत छनि- यश लाभ, जे हुनक एहि काजक माध्यमेँ मैथिलीकें एकटा स्वतंत्र अस्तित्वक संग-संग मैथिली भाषा क विशेषता देखि आनो प्रबुद्ध वर्ग आकर्षित होएताह। यदि मैथिली भाषाकेँ पूर्ण देखय चाहैत छी तँ ओकरा लेल सर्वप्रथम हमरा लोकनिकें मैथिलीक अध्ययनक विस्तृतताकें बढ़बय पड़य नहि तँ हमरा लोकनि अपन भाषा क विशेषताकेँ प्रतिष्ठित नहि कए सकब। एकरहि परिणाम होएत जे हमर भाषाक विशेषता नुकायले रहि जायत आ दोसर जे केओ हमर भाषाक विषयमे कहत ओएह संसार मानत आ हम सभ ओहिना मूंह तकैत रहि जायब। २ उजरैत गाम बसैत शहर........ - आइ काल्हि मैथिली साहित्यमे गामसँ जा रहल लोक , आ उजड़ैत गामक विषयमे बहुत चिन्तन कयल जाईत देखल जा रहल अछि । कतहु गामक बदलैत परिदृश्य तँ कतहु गामसँ पलायन करैत लोक। ओना ई चिन्तन सही अछि कहल तँ जा सकैछ जे ई चिन्तन बहुत पहिने सँ भऽ रहल अछि । कारण गामक बदलैत परिदृश्य गाम टाकें नहि अपितु गामसँ जुड़ल सभ किछु कें परिवर्तित कएने जा रहल अछि । काल्हि धरि गाममे ध्वनि प्रदुषण नहि छल आई ओ विकट रुप धारण कए चुकल अछि । एहि सँ बेशी गाममे अपन डारि पसारि रहल अछि शहरक संस्कार  आ ताहूसँ बेशी संवेदनहीनताक स्थिति। गामक चिन्ता बहुत नीक जेकां अंतिकाक सम्पादकीयमे अनलकान्त जी केने छथि जे कोना क गाम मे परिवर्तन भ रहल अछि आ ई परिवर्तन मानवीयताक क्षरण दिश ल जा रहल अछि। ओ अपन सम्पादकीय मे कहने छथि जे ई परिदृश्य मात्र हमर गामक नहि छी सम्पूर्ण मिथिलाक गामक थिक । हुनक ई कहब सौ प्रतिशत सत्य अछि। रोजगार क शिलशिलामे घर सँ बाहर होइत मिथिलाक लोक बहुत दिन धरि अपन भीतर गामकें नहि राखि पबैत अछि , कारण जहिना-जहिना ओ गामसं दूर होइत जाइत अछि गामक प्रति ओकर मोह सेहो ओहिना दूर होइत जाइत छैक । हेमनिमे हम दुर्गा पूजा मे गाम जयबाक लेल सोचैत छलहुं कारण गाम मे मां छथि मुदा परिस्थिति गाम नहि जाए देलक । ई क्रम हमरा एहि बेर नहि कतेक बेर सँ भऽ रहल अछि मां छथि मुदा तइयो गाम नहि जा पबैत छी । आ गाम हमरा सँ अखैन मात्र दूर भेल जा रहल अछि, भए सकैछ जे काल्हि तक गाम हमर अतीत भ जाए। मां छथि तँ गाम बचल अछि आ माँक पश्‍चात गाम? कारण गामकें हम संजोगिकें राखब से भ नहि सकत आ संजोगिकें नहि रखैत छी तं ओ हमरा अपना सं दूर केने जा रहल अछि । दोसर आई गामक परिस्थिति सेहो ओहने छैक, अपन आलोचनाक पुस्तक ....मे शिवशंकर श्रीनिवास लिखने छथि जे गाम मे युवा नहि छैक मात्र बूढ़ बांचल छथि। से ठीके, जे बांचल छथि ओहि मे दू वर्ग अछि एकटा जे अपन परिवारक संग बाहर जा नहि पबैत छथि, दोसर किछु गोटें शहर सं उबियाक गाममे रहि रहल छथि । ओ गाममे रहैत तं छथि मुदा गामकें शहर मे बदलि क । हमर एकटा मित्र छथि जिनकर पिता अपन शेष जीवन गाममे बितबय चाहैत छथिन , मुदा जीवनक महत्वपूर्ण क्षण ओ शहरमे बितौने रहबाक कारणेँ गाम मे हुनका बहुत असकौर्य देखबामे अबैत छनि, तैं ओ गाममे एकटा छोट छीन शहरक निर्माण करैत छथि । एहि सं हुनका तँ सहज होइत छन्हि मुदा गामक अर्थ समाप्‍त भ जाइत छैक । आ किछु दिनक पश्‍चात गाम मात्र ओ सरकारी फाईल मे नामकें रुपमे रहि जायत एकर आशंका बढ़ैत अछि । कारण गामक अर्थ छल कम सेँ कम सुविधामे रहब मुदा आई ओकर अभाव देखल जा रहल अछि। एकर कारण अछि गाममे शहर जेकां अपना-अपना मे जीबाक संस्कार नहि छलैक मुदा आई ओतहु ई संस्कार द्रुतगति सँ बढ़ि रहल अछि । काल्हि धरि सभ सभक कुशल क्षेम, ओकर खोज खबरि लैत छलैक मुदा आई ओ समाप्‍त भ रहल छैक। सभ अपनामे सीमित। जे गामक परिदृश्यकें बदलि देलक। हमरा कखनो कखनो होइत अछि जे यदि गाममे ई स्थिति एहिना बढ़ैत गेल तं हमरा लोकनिकें अपन गामकेँ खिस्सा मे ताकय पड़त । हमरा जनैत हम सभ मात्र गामसं पलायन नहि भ रहल छी अपितु हमरालोकनि अपन गामकें उजारि रहल छी । तैं तं भोरे भोर जतऽ पराती सुनाईत छल आई हिन्दी क भजन लाउडीस्पीकर मे सुनाइछ जाहि सं कखनो ई नहि बुझाइत अछि जे ई हमर गामक आत्मा बाजि रहल अछि, लगैत अछि जेना ई गामक प्रेत बाजि रहल अछि जे अपन आत्माक शान्ति लेल गामक लोकसं अनुरोध क रहल अछि । अन्तमे मांक ई पांति जे मोबाइल पर कहने छलीह यात्रादिन जे जयन्ती तँ काटि लेलहुँ, गोसाउन के सेहो चढ़ा देलयन्हि मुदा एतय तँ केओ नहि अछि, कि करु? मुदा ई सोचिकें रखैत छी जे यदि अहां सभ गाम आयब तँ द देब । आ हम सोचय लगैत छी जे ई मात्र हमर माँक भावना नहि सम्पूर्ण मिथिलाक मायकें होइत हेतनि ।  ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। मुन्नाजी अनमोल झाक समयकेँ साक्षी राखि ....! विहिन कथा (लघु कथा) माने बीज कथा। ई कथा, एकटा बीयाक समान अछि। जेना कोनो बीयामे एकटा गाछ हेबाक समग्र गुण विद्यमान होइछ तहिना विहनि कथा अपनामे एकटा संपूर्ण कथाक समग्रता समेटने रहैछ। मैथिली कथाक किछु बानगीकेँ विलगा देल जाए तँ ओकर स्तर अन्यान्य कथा साहित्यक  स्तरक सोझाँ खसल बुझाएत । मुदा गद्य विधाक  एक प्रतिरूप  विहनि कथाक वर्तमान परिदृश्य वैश्विक स्तरक समकक्ष आबि ठाढ़ अछि। एना मात्र तुलनात्मक रूपेँ अछि। किएक तँ एखन ई अपन सहजताकेँ एक सीमा मात्रमे समेटने संकुचित अछि। मैथिली साहित्य मध्य कथा जेना आन भाषाक कथाक तुलनामे अबेरसँ अपन अस्तित्व पौलक, ओइसँ दुर्लभ स्थिति विहनि कथाक अछि। अन्यान्य भाषाक लधु-कथा सेहो प्रारंभ मे मैथिली विहनि-कथा जकाँ एकपेड़िया बाट धऽ आगाँ बढ़ल मुदा ओइ सभ भाषाक सरकारी गैर सरकारी संस्था, प्रकाशक एवं रचनाकारक समग्र बल एकरा अपन फराक नाम आ अस्तित्व दऽ फरिछेबामे संग देलक, तकरे परिणाम स्वरूप बांग्लामे “ए मिनिटेर कथा”, पंजाबीमे “मिन्नी कथा” आदि नामे ई जानल जाए लागल। मुदा विहनि कथा आइयो डुब्बा पानि मध्य उगि डुबि रहल अछि, साहित्य अकादमी (दिल्ली), मैथिली-भोजपुरी अकादमी (दिल्ली सरकार), सी.आइ.आइ.एल. मैसूर वा अन्यान्य संस्था वा ऐपर पलथी मारि बैसल महंथ सभ एकर प्रकाशन , सेमिनार आयोजन वा ऐ मादे स्वतंत्र क्रिया–कलापक पक्षेँ आइ धरि सोझाँ नै आबि सकलाह। किछु भाषाक लघुकथामे स्वतंत्र शोध सेहो शुरू भेल अछि। मैथिलीयो अइमे पछुआएल नै अछि। जकर श्रेय अही रचनाकारकेँ जाइछ। परती-पराँत सन पड़ल जमीनकेँ अपन सर्वस्व ऊर्जा श्रोतेँ उपजा हरियरी अनैबला ऐ रचनाकारक प्रत्येक रचना विहनि कथाकेँ विलगा कऽ स्थान दियाओत। समुन्द्रमे हथोरिया देबै तँ प्रायः मुट्ठीमे पानिये टा आओत। ओहो शुद्द वा साफ नै माटिओसँ लेपटाएल सन। मैथिलीक गद्य विधाक एकटा प्रकार विहनि-कथाक स्थिति सेहो एहनाहेँ जकाँ रहल अछि। मैथिलीक गद्य संसारमे विहनि-कथा सेहो एहि मध्य लहरिक बीच-बीचमे उगैत डुबैत रहल। किछु रचनाकार सभ अपन लेखनीये डुबकी लगेबाक प्रयासो करैत रहलाह। परञ्च ओ ओइ लहरिकेँ सहबाक सामर्थ्य नै राखि लहरिक संग बिलाइत गेलाह। एहेन दुरूह परिस्थिति मध्य जे लेखक सभ किछु सहैत अपन सर्वस्व रचना शक्तिक ऊर्जा ऐमे लगबैत रहलाह ओ छथि श्री अनमोल झा। श्री  झा “ समय साक्षी थिक”, अपन पहिल विहनि-कथा संग्रह लऽ सोझाँ एलाह अछि। ऐ संग्रहमे सत्य कही तँ समयान्तर अनुरूप रचना-संयोजन कएल गेल अछि जे हिनक कएक दशकक भोगल यथार्थक परिणाम थिक। ऐ संग्रह मध्य समाजक  गम्भीर होइत परिस्थितिकेँ उजागर केलनि अछि। ऐमे क्षण-क्षण घटैत सामाजिक घटना, ओकर अधलाह असरिकेँ महीन गढ़निये उजागर करबामे सक्षम भेलाह अछि। ऐमे प्रकाशित अधिकांश रचना सभमे सामाजिक मूल्यक अवमूल्यन, संबंधक दोहन, तकनीकी परिवर्तने प्रभावित होइत सामाजिक अस्तित्वक सुंदर चित्रण परिलक्षित होइछ। ऐमे सङ्गोर भेल अधिकांश रचनाक धारदार समायोजन हिनक विहनि-कथा उद्देश्यकेँ सोझाँ  अनबामे सक्षम  बुझाइत अछि। किछु पारंपरिक कथानक आधारकेँ सेहो नव-नव परिवर्तन वा आकलनक संग जोड़ि देखवामे समर्थ भेल बुझना जाइछ । ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। १.चेतना समिति, पटना समाचार/ २.खूजत अलग मिथिला प्रदेशक द्वार? छोट प्रदेशक समर्थन कएलनि मुख्यमंत्री (रिपोर्ट नवेंदु कुमार झा)२.उमेश मण्डल-१.‘मैथि‍ली भाषाक दशा ओ दि‍शा’पर परिचर्चा २. महाकवि‍ पण्डित‍ लालदास जयन्ती समारोह ३. संजीव कुमार ‘शमा’- महाकवि‍ पं. लालदास जयन्तीत समारोह १. नवेंदु कुमार झा) 01. अस्तित्वक लड़ाई लड़ैत सम्पन्न भेल स्मृति पर्व चेतना समिति द्वारा आयोजित अंठाबनम् विद्यापति स्मृति पर्व समारोह सम्पन्न भऽ गेल| त्रिदिवसीय एहि समारोहक अवसरपर तीन दिन धरि राजधानी पटनाक मिथिलावासी मिथिलाक कला, संस्कृति खान-पानक रसास्वादन क' संगहि गीत-संगीतक आनन्द उठौलनि। मुदा नब्बेक दशकसॅ पहिने राजधानीक मिथिलवासीक लेल पाबनि बनल ई समारोह आब चेतनाक मात्र औपचारिकता भेल जा रहल अछि। आयोजनक घटैत स्तरसॅ जतए मैथिली भाषीक एहि समारोहक प्रति रूचि घटि रहल अछि ओतहि चेतना समिति सेहो एहि आयोजनकें बंद करबाक रणनीतिपर चलैत एहि तरहक कार्यक्रम सभ रखैत अछि जे दिन पर दिन उपस्थिति कम भऽ रहल अछि। ई चेतनाक सौभाग्य अछि जे पछिला तीन चारि वर्ष सॅ तीनू दिनक कार्यक्रम समाप्ति कऽ घोषणा सॅ पहिनहि कार्यक्रम स्थल खाली भऽ जाइत अछि आ ई संभव अछि जे आबए बाला समय मे चेतना समितिक ऊर्जावान सक्रिय अधिकारी आ कार्यकर्ता सभ तीनू दिन स्वयं धूनि रमा बाबा विद्यापतिकें गोहार लगौताह। बिहारक राजधानी पटना मे अठाबन वर्ष पहिने मैथिल आ गैर मैथिलके मिथिलाक कला संस्कृति आ माटि सॅ जोड़बाक लेल बाबा नागार्जून सहित आन कतेको मैथिल धरती पुत्र चेतना समितिक गठनक विद्यापति स्मृति पर्व परम्पराक प्रारंभ कएने छलाह जे बाद मे पटनाक मैथिल आ गैर मैथिलक मध्य ततेक लोकप्रिय भेल जे लोक नव वर्षक कलैन्डर अएलाक बाद आन पाबनि जकां विद्यापति पर्व समरोहक तिथि जरूर तकैत छलाह। मैथिली भाषीक मध्य ई समारोह ततेक लोकप्रिय भेल जे पटनाक हार्डिक पार्कक मैदान छोट पड़ि जाइत छल मुदा आब तऽ विद्यापति भवन हॉल आ मगध क्लबक मैदान पैघ भऽ रहल अछि। राजनीतिक क्षेत्र मे एहि समारोहक ई स्थिति छल जे सभ दलक नेता एहि मे अपन उपस्थिति दर्ज करैबा लेल बेचैन रहैत छलाह। शहरि भरिक मैथिलक एहि जुटान मे कतेको कन्यादान आ वरदान सांस्कृतिक कार्यक्रमक आनन्दक मध्य गपसप मे अंतिम रूप लैत छल। पछिला दू दशक मे चेतनाक ई आयोजन ओकर असफलताक कहानी गढ़ि रहल अछि हालांकि समितिक पदाधिकारीक एहि संदर्भ मे जबर्दस्त तर्क छनि आ ओहि सॅ सहमत होएब हमरा सभक मजबूरी | समितिकक मानब अछि जे टीवी इंटरनेट आदि मनोरंजन बढ़ैत साधनक कारण एहि समारोह मे उपस्थिति कम भऽ रहल अछि आ एहि तर्क सॅ भला के मना कऽ सकैत अछि। शायद समितिक जनतब नहि अछि जे आइयो दरभंगा, कोलकाता, जमशेदपुर, बोकारो आदि आब कतेको ठाम विद्यापति पर्व समारोह आयोजित भऽ रहल अछि आ एकर प्रेरणाक स्रोत चेतना समिति अछि, ओतए एखनो अपन कला संस्कृति गीत-संगीत सॅ मैथिलीभाषी के अरूचि नहि भेल अछि। दरअसल एहि आयोजनक प्रति घटि रहल रूचिक कारण चेतना समितिक मठाधीश छथि जे बाबा विद्यापतिक नामपर बनल मठपर प्रतिदिन सांझ देखा अपन कलैन्डरक अनुसार कार्यक्रम आयोजित कऽ काज समाप्त बुझैत छथि। समिति पछिला दू दशक सॅ प्राइवेट लिमिटेड कम्पनीक जकां काज कऽ रहल अछि। सहकारिताक नीक जनतब राखए बलाक नियंत्रणमे ज्यों कोनो संस्था के प्राइवेट लिमिटेड बना देल जाए तऽ ओकर ई हाल होएब स्वाभाविक अछि। समितिक वर्तमान कार्य प्रणाली आ विद्यापति स्मृति पर्वक वर्तमान स्थिति देखि बाबा नागार्जूनक आत्मा के सेहो ग्लानि होइत। आब तऽ स्थिति ई अछि जे तीनू दिनक कार्यक्रमक उद्घाटक, मुख्य अतिथि, कलाकार आ दर्शक फिक्सड भऽ गेल छथि। कार्यक्रम देखबा सॅ बेसी उत्सुकता आब भेट करबाक रहैत अछि। किछु लोक एखन होइत छथि जे एहि समारोहक दरमियान भेट होइत छथि आ भेटक बाद गपसप कऽ लोक आपस अपना घर दिस बिदा भऽ जाइत छथि। पहिने एहि समारोहक उद्घाटन बिहारक राज्यपाल सॅ करैबाक परम्परा छल आ एहि समारोहक एतबा महत्व छल जे राज्यपाल आ मुख्य मंत्री एहि समारोहक लेल अपन समय सुरक्षित रखैत छलाह मुदा बिहारक राजनीति बदललाक संगहि परिस्थिति सेहो बदलल आ तखन विद्यापति स्मृति समारोहक स्वरूप बदलब स्वाभाविक अछि। हालांकि समिति अपन परम्पराकें फेर सॅ प्रारंभ कएलक आ कतेको वर्षक बाद एहि वर्ष समारोहक उद्घाटन बिहारक राज्यपाल देवानन्द कुंवर कएलनि। समितिक सभसॅ महत्वपूर्ण एहि कार्यक्रमक घटैत लोकप्रियताक लेल समितिक कार्य प्रणाली जिम्मेवार अछि। लोकतांत्रिक व्यवस्थासॅ समिति चलैबाक नामपर जे वर्तमान कार्यकारिणी बनल अछि ओ बिहारक पन्द्रह वर्षक कुशासनक याद दिया रहल अछि। हमरा सभक लेल सौभाग्यक बाद अछि जे पहिल बेर एकटा योग्य महिला अध्यक्ष प्रमीला झाक नेतृत्व मे ई आयोजन भेल। प्रमीला झा योग्य मैथिलानी छथि मुदा समितिक अध्यक्षक पद पर बैसा पर्दाक पाछासॅ समितिक सत्ताक संचालन कोनो तरहे लोकतांत्रिक आ सहकारिताक मूल भावनाक अनुरूप नहि अछि। संगहि समितिक संवैधानिक बाध्यताक कारण महिलाक अध्यक्ष बनाएब आ ओहिमे मिथिल आ मैथिलीक प्रति समर्पित मैथिलानिकें कात करब समितिक नियम पर प्रश्न चिन्ह ठाढ़ करैत खैर, सभ वर्ष जकां अहू बेर पटनाक मैथिल समाज तीन दिन धरि मिथिलाक माटि संग जुड़ि अपन कला संस्कृति, गीत-संगीतक प्रति समर्पण देखौलक मुदा अस्तित्वक संकट झेलि रहल एहि समारोहमे नव दर्शक आमद होएत आ पुरान गरिमाकें स्थापित कऽ सकत एकर कल्पना तऽ वर्तमान नेतृत्व सॅ नहिए कएल जा सकैत अछि। 02. ग्लोबल भेल चेतना चेतना समिति आब ग्लोबल भऽ गेल अछि। त्रिदिवसीय विद्यापति स्मृति पर्वक उद्घाटनक अवसरपर राज्यपाल देवानन्द कुंवर चेतना समितिक बेवसाइटक उद्घाटन कएलनि। देश-विदेशक कोनो कोन सॅ मिथिलावासी www.chetnasamiti.org लॉग इन कऽ समितिक गतिविधि जानि सकैत छथि। समिति एहि माध्यम सॅ प्रवासी मैथिल समाजक विवाह समस्याक समाधानक लेल विवाह योग्य वर कन्याक जनतब सेहो उपलब्ध कराओत राज्यपाल एहि अवसर पर समितिक स्मारिका आ कतेको पुस्तकक विमोचन सेहो कएलनि। 03. मंचित भेल नाटक विद्यापति स्मृति पर्व समारोहक समापन नाटक मंचनक संग भेल, एहि अवसर पर प्रति वर्ष नाटकक मंचन होइत अछि। एहि वर्ष महिला लेखिका विभा रानी लिखित आ कमल मोहन चुन्नू निर्देशित नाटक ‘‘मदति करू माता’’ क मंचन भेल। प्रचलित मैथिली नाटकक विषय वस्तु सॅ हटि नव विषय वस्तुक संग प्रस्तुत ई नाटक लेखक आ निर्देशकक योग्यता आ क्षमताक अनुरूप नहि छल मुदा कलाकार सभ अपन अभिनयक माध्यम सॅ उपस्थित दर्शकक मनोरंजन करए मे सफल रहल। 04. राजकीय समारोहक रूप मे मनल विद्यापति पर्व महाकवि विद्यापतिक जयंती राजकीय समारोहक रूप मे सेहो मनाओल गेल, श्रीकृष्ण स्मारक भवन परिसर मे आयोजित कार्यक्रम मे उपमुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी, बिहार विधान परिषद्क सभापति पंडित ताराकांत झा, खाद्य आपूर्ति मंत्री श्याम रजक, विधायक पूनम देवी सहित कतेको गणमान्य लोक महाकविक चित्र पर माल्यार्पण- श्रद्धांजलि अर्पित कएलनि, बेगूसरायक बरौनीक सिमरिया मे आयोजित अर्द्धकुम्भ मे सेहो उत्साहक संग विद्यापति पर्व समारोह मनाओल गेल। 05.सम्मानित भेलाह विद्वान आ संस्कृतिकर्मी चेतना समिति द्वारा आयोजित त्रिदिवसीय विद्यापति स्मृति पर्व समारोहक उद्घाटनक अवसर पर कतेको सम्मान आ पुरस्कार सेहो देल गेल। एहि अवसर पर समितिक स्मारिका आ आन पुस्तकक विमोचन सेहो भेल। राज्यपाल देवानंद कुंवर कतेको विद्वानकें सम्मानित कएलनि। राज्यपाल आ पूर्व मुख्यमंत्री डा0 जगन्नाथ मिश्र संयुक्त रूप सॅ स्मारिका आ पुस्तकक विमोचन कएलनि। नाटक मे नीक अभिनय आ सर्वश्रेष्ठ महिला कलाकारक पुरस्कार बुद्धिनाथ मिश्र मिश्र देलनि आ कला संस्कृति आ युवा मंत्री बाल मेला मे विजय भेल नेना सभकें पुरस्कार देलनि। 06. चेतना समितिक सम्मान - 2011 संस्कृति साहित्य सम्मान- डा. रामजी ठाकुर मैथिली साहित्य सम्मान- मोहन भारद्वाज संगीत नृत्य नाटक सम्मान- कुणाल मिथिला चित्रकला सम्मान- दुलारी देवी विशिष्ट अवदान सम्मान- महेन्द्र हजारी चेतना सेवी सम्मान- धर्मनाथ झा कीर्ति नारायण मिश्र साहित्य सम्मान- अजीत आजाद यात्री चेतना सम्मान- राम भरोस कापड़ि भ्रमर (जनकपुर) सुलभ सेवा सम्मान- मिथिला सांस्कृतिक समन्वय समिति (गुवाहाटी) डा. माहेश्वरी सिंह महेश ग्रंथ पुरस्कार- प्रवीण कश्यप डा. महेश्वरी सिंह महेश निबंध पुरस्कार- सुश्री श्वेता भारती (भागलपुर) यशोदा देवी मिथिलाक्षर लेखन पुरस्कार- सुश्री मुक्ति रंजन झा सिद्धेश्वरी देवी मैथिली संस्कार गीत पुरस्कार- रेखा झा श्रीमती शैलवाला मिश्र स्मृति पुरस्कार- आशुतोष अभिज्ञ (सर्वश्रेष्ठ कलाकार नाटक) कामेश्वरी देवी पुरस्कार- रितू कर्ण (सर्वश्रेष्ठ महिला कलाकार नाटक) 07. प्रारंभ भेल नव परम्परा त्रिदिवसीय विद्यापति स्मृति पार्क समारोहक तीनू दिनक कार्यक्रमक प्रारंभ गोसाउनिक गीत जय-जय भैरविसॅ होइत रहल छल। मुदा एहि वर्ष समिति एकटा नव परम्परा प्रारंभ कएलक। समारोहक उद्घाटन सत्र एहि वर्ष राष्ट्रीय गीत जन गण मन सॅ प्रारंभ कऽ एकटा नव परम्परा प्रारंभ कएलक। जखन कि समारोहक समापन समदाउन सॅ होइत छल जे एहू वर्ष नहि भेल। 08. आयोजित भेल पुस्तक आ चित्रकला प्रदर्शनी विद्यापति स्मृति पर्वक अवसर पर समारोह स्थल पर पुस्तक मिथिला चित्रकलाक प्रदर्शनी लगाओल गेल, एहि प्रदर्शनी मे लागल कतेको पुस्तक स्टॉल पर मैथिली भाषी मैथिली भाषाक दुर्लभ साहित्य, पत्र-पत्रिका आ मैथिली गीतक सीडी आ मिथिला चित्रकलाक अवलोकन आ खरीद कएलनि। मिथिलांचलक विशिष्ट पहचानक पानक बिक्री सेहो खूब भेल। मैथिल ललना सभक व्यंजनक मेलाक रसास्वादन लोक सभ जमि कऽ कयलनि। 09. राज्य गीत सॅ मिथिला निपत्ता, सरकार पर दबाब बनौलक समिति बिहारक शताब्दी वर्षक अवसर पर राज्य गीतक युग चयन बिहार सरकार कएलक अछि। एहि गीत मे मिथिलाक सामाजिक सांस्कृतिक झलकक एकहुटा शब्द नहि अछि। चेतना समितिक सचिव विवेकानन्द ठाकुर एहि पर चिन्ता प्रकट करैत मिथिलावासी दिस सॅ प्रदेश कला संस्कृति आ युवा मंत्री सुखदा पाण्डेयक ध्यान एहि दिस खिचलनि। श्री ठाकुर मंत्री सॅ आग्रह कएलनि जे सरकार मिथिलावासीक जनभावनाक सम्मान करैत एहि राज्य गीत पर फेर सॅ विचार करए। ................. II खूजत अलग मिथिला प्रदेशक द्वार? छोट प्रदेशक समर्थन कएलनि मुख्यमंत्री बिहारक मुख्यमंत्री नीतीश कुमार छोट प्रदेशक समर्थन कएलनि, सेवा यात्रापर जाइसॅ पहिने पटनामे श्रीकुमार कहलनि जे- सिद्धांत रूपसॅ छोट प्रदेशक समर्थन करैत छी मुदा ई मामिला केन्द्र आ राज्यक मध्यक अछि। नीतीश कुमारक एहि बयानक बाद अलग मिथिला राज्यक आशा बढ़ल अछि। ज्यों विकास आ प्रशासनिक दृष्टिए उत्तर प्रदेशक चारि भागमे बटबाराक प्रति श्री कुमार अपन सहमति दऽ रहल छथि तँ अलग मिथिला राज्यक लेल सेहो हुनका आगाँ अएबाक चाही। मिथिला राज्यक मांग कोनो नव नहि अछि। आजादीक बादे अलग प्रदेशक मांग होइत रहल अछि मुदा मिथिलाक संस्कृति, संस्कार आ माटिमे ओ तेजी नहि देखाओल जे झारखंड, उत्तराखंड आ छत्तीसगढ़मे देखाओल। मिथिलाक लोक शांतिप्रिय छथि आ सादगीक संग अपन बात सरकारक सोझा रखैत रहलाह अछि जकर परिणाम अछि जे स्वतंत्राक 64 वर्षक बादो रौदि आ बाढ़िक शिकार बनल अछि आ अपन माटिकेँ छोड़ि पेटक आगिकेँ शांत करबाक लेल प्रवासी बनि अनकर भविष्य सुधारि रहल छथि। ई दुर्भाग्य अछि जे गोटेक चारि दशक धरि मिथिलाक पुत्रक हाथ मे सत्ताक डोरि रहल मुदा मिथिलाक नोर पोछबाक कोनो प्रयास नहि भेल। पछिला दू दशक रणनीति दृश्य देखी तँ स्पष्ट अछि जे कुशासनक डेढ़ दशकमे विकासक मतलब सारण छल आ एखन पछिला छह वर्षमे विकासक मतलब नालन्दा भऽ गेल अछि, मुदा मिथिला पुत्र सभ मिथिलाकेँ विकासक केन्द्र नहि बना ओकरा अपन राजनीतिक शतरंज बना देलनि जकर परिणाम आइ सोझाँ अछि आ बिहारक राजनीतिमे चारू खाना चित्त भऽ बौक बनल अपन कुर्सी बचबऽ लेल दुहाइ सरकार कऽ रहल छथि। मुख्यमंत्रीक ई विचार एहन समय मे आएल अछि जखन देशमे छोट प्रदेशकेँ लऽ कऽ राजनीति गर्माएल अछि। ई उचित समय अछि जखन मिथिला राज्यक समर्थक सड़कपर उतरथि। किएक तँ बिहारक संग रहने मिथिलाक विकास होएब संभव नहि अछि। एकर उदाहरण संयुक्त बिहार अछि। संयुक्त बिहारमे विकासक धार दक्षिण बिहार (आब झारखंडमे बहैत छल तहिना एखन विकासक मतलब सेहो दक्षिण बिहार (यानि नालन्दा) भऽ गेल अछि। एतबा नहि बिहारक स्थापनाक शताब्दी वर्षमे चुनल गेल राज्य गीतमे सेहो मिथिला लापता अछि। जखन गीतक लेखक खांटी बिहारी होथि तँ भला हुनका मिथिला किएक सुझतनि। तें आब तँ सरकार सेहो मिथिलाकेँ बिहारक अंग नहि मानैत अछि। सरकारकेँ बाबू कुंवर सिंहक गुणगान स्वीकार अछि। मुदा मिथिलाक विभूति महाकवि विद्यापति, दीना-भद्री, लोरिक सलहेस, मंडन, आयाचीक जनतब नहि अछि। ज्यों एकर जनतब बिहार सरकारक विद्वान निर्णायक मंडलीकेँ रहैत तँ ओ भला मिथिलाक एहि महान विभूति सबहक उपेक्षा कऽ लिखल गेल गीतकेँ राज्य गीतक रूपमे कन्नहु स्वीकृति नहि दैत। आब समय आबि गेल अछि। उत्तर प्रदेशक मुख्यमंत्री चुनावक समय छोट प्रदेशक तुरूपक पत्ता भने अपन राजनीतिक उद्देश्यक पूर्तिक लेल फेकलनि अछि मुदा बिहारक मुख्यमंत्री नीतीश कुमारक छोट प्रदेशक समर्थन अलग मिथिला राज्यक निर्माणक दिशामे मीलक पाथर साबित भऽ सकैत अछि। मुदा एहि लेल प्रयास करऽ पड़त किएक तँ नेनाकेँ कनने बिना माय सेहो दूध नहि पिअबैत अछि तँ भला बिहार सरकार आ केन्द्र सरकार सादगी, सदाचार आ शांतिसॅ बैसल रहलापर अलग प्रदेश बनाओत ई असंभव अछि। २ उमेश मण्डल १.‘मैथि‍ली भाषाक दशा ओ दि‍शा’पर परिचर्चा २. महाकवि‍ पण्डित‍ लालदास जयन्ती समारोह १ ‘मैथि‍ली भाषाक दशा ओ दि‍शा’पर परिचर्चा मि‍थि‍लांचल वि‍कास परि‍षद, लहेरि‍यासराय आ मि‍थि‍ला संघर्ष समि‍ति‍ दरभंगाक संयुक्‍त तत्‍वावधानमे दि‍नांक 8 नभम्‍बर 2011 तदनुसार मंगल दि‍न बेरूपहर दू बजेसँ परि‍चर्चाक आयोजन कएल गेल छल। परि‍चर्चाक वि‍षए रहए- ‘मैथि‍ली भाषाक दशा ओ दि‍शा’ सीतायन, दरभंगामे आयोजि‍त परि‍चर्चामे वक्‍ता लोकनि‍ महत्‍वपूर्ण वि‍चार रखलनि‍। मुख्‍य वक्‍ता डॉ. भीमनाथ झा कहलनि‍, कवि‍ कोकि‍ल वि‍द्यापति‍ अपन मातृभाषाक वि‍षएमे काव्‍यभि‍व्‍यक्‍ति‍क क्रममे कहने छथि‍- बालचंद वि‍ज्‍जावई भाषा दुई नऽ लग्‍गई, दुज्‍ज्‍न हासा..। इत्‍यादि‍ कहैत वि‍द्यापति‍क भाषानुरागक वि‍स्‍तृत व्‍याख्‍या  केलनि‍। परि‍चर्चाक अध्‍यक्ष श्री जगदीश प्रसाद मण्‍डल कहलनि‍- “मि‍थि‍ला आ मैथि‍ली भाषाकेँ हमसभ कुचलल आ कमजोर कि‍अए बुझै छी। यूरोपक दर्जनो प्रमुख देश आ ओकर भाषा एहेन अछि‍ जे दुनि‍याँक बीच अपन पहि‍चान बनौने अछि, जहन की‍ ओकर जनसंख्‍या आ क्षेत्रफल हमरा सभसँ माने मि‍थि‍लांचलसँ बहुत कम अछि‍? अपना ऐठाम तँ क्षेत्रे आ जनसंख्‍येक पाछू तेहन वैचारि‍क ओझरी लागल अछि‍ जे सभ रस्‍ते-पेरे बौआइ छी। जमीनी भाषा मैथि‍ली छी, जते दूरमे मैथि‍ली बाजल जाइए ओ मि‍थि‍ला भेल। जहि‍ना आनो-आनो क्षेत्रमे मातृभाषाक अति‍रि‍क्‍तो भाषा बजलो जाइए आ पढ़ौलो-लि‍खौल जाइए, तहि‍ना अहूठाम अछि‍। तहूमे हि‍न्‍दी तँ राष्‍ट्रभाषे छी। जहाँ धरि‍ साहि‍त्‍यि‍क मानक भाषाक प्रश्न अछि‍ ओ तँ कतौ ने अछि‍। दुनि‍याँक बीचमे अंग्रेजी साहि‍त्‍य सभसँ समृद्ध बुझल जाइत अछि‍, जखन कि‍ दू देशक कोन बात जे एको देशक भाषा साहि‍त्‍यमे एकरूपता नहि‍ अछि‍। मि‍थि‍लाराज हेतु जे दशा-दि‍शा अछि‍ तै संबंधमे एकटा कथा कहै छी- द्वापर युगक संध्‍याबेला। अर्जुनक मनमे त्रेता युगक समुद्रमे पुल बनबैक वि‍चार उठलनि‍। लंका जेबाकाल समुद्रमे एक-एक पाथर जोड़ि‍ पुल कि‍अए बनौल गेल? ओ तँ एक तीरोमे बनि‍ सकैत छल? पम्‍पापुरमे हनुमान तपस्‍या कऽ रहल छथि‍ हुनके मुँहेँ सुनब बेसी नीक हएत। पम्‍पापुर पहुँच अर्जुन प्रश्न केलखि‍न। मुस्‍कुराइत हनुमानजी उत्तर देलखि‍न जे पुल बनि‍ सकैए, मुदा जते मजगूत एक-एक पाथर जोड़लासँ बनत ओते तीरसँ नै बनि‍ सकैए। जइठाम बाहरसँ आन-आन भाषाक तेजीसँ आयात भऽ रहल अछि‍, गाम-गाममे अंग्रेजी माध्‍यमक स्‍कूल चलि‍ रहल अछि‍, अपन शि‍क्षा पद्धति‍केँ ि‍नर्मूल उखाड़ैक योजना बनि‍ रहल अछि‍, तइठाम मि‍थि‍लाराज आ मि‍थि‍ला दर्शनक सपना कते सार्थक अछि‍?” इत्‍यादि,‍ अपन वि‍चार व्‍यक्‍त केलनि‍। मि‍. वि‍. प.क अध्‍यक्ष डॉ. वि‍द्यानाथ झा, श्री बुद्धिनाथ झा, श्री फूलेन्‍द्र झा, श्री कि‍शोरी कांत मि‍श्र, डॉ. श्रवण कुमार चौधरी, श्री प्रभाष सहनी, श्री शि‍लानाथ मि‍श्र आदि‍ वक्‍ता, मैथि‍ली भाषाक उत्तरोत्तर वि‍कास यात्रापर प्रकाश देलनि‍। परि‍चर्चाक संचालन मि‍थि‍ला संघर्ष समि‍ति‍क अध्‍यक्ष- श्री कमलेश झा केलनि‍। २. महाकवि‍ पण्डित‍ लालदास जयन्ती समारोह मधुबनी जि‍लाक खरौआ गाममे +2 उच्च वि‍द्यालय परि‍सरमे 02 नभम्वार 2011केँ महाकवि‍ पण्डित‍ लालदास जे रमेश्वर रचि‍त मि‍थि‍ला रामायणक परि‍नेता छलाह। हुनक 155म जयन्ती समारोह सुसम्पन्न भेल। ऐ अवसरपर जयन्ती समारोह, काव्यपाठ, महाकवि‍ परि‍चर्चा आ संस्कृति‍क कार्यक्रम वर्णित क्रमश: चारि‍ सत्रमे ‍सामापन कएल गेल। दि‍नमे 3 बजेसँ अधरति‍या धरि‍ ग्रामीण लोकनि‍ आ खरौआसँ बाहरोक लोक भाग लेलनि‍। आयोजन कमि‍टि‍क उद्घोषक समीर कुमार ‘समा’केँ समारोह सत्रक संचालन करबाक हेतु, आ एच.वी. लालकेँ अध्यक्षता हेतु, हरि‍ नारायण झाकेँ मुख्यि अति‍थि‍ रूपमे आ जनक कि‍शोर लाल दास, लक्ष्मण झा, रंगनाथ चौधरी, कुमार रामेश्वरम्, रमानन्द झा ‘रमण’, जगदीश प्रसाद मण्डल, रधुवीर मोची आदि‍क नाओं वि‍शि‍ष्ठ अति‍थि‍ रूपमे मंचपर वि‍राजमान हेबाक घोषणा आयोजक कमि‍टि‍ केलनि। सभ कि‍यो मंचासीन भेलाह। ‍उप वि‍कास आयुक्त ओम प्रकाश राय दीप प्रज्जवलि‍त कऽ समारोह सभाक उद्घाटन केलनि‍। “महाकवि‍ पण्डित लालदास अपन कर्मसँ पण्डित छलाह। ब्राह्मण जाति‍मे नै रहलाक बादो हुनका राजदरवारमे पण्डितक उपाधि‍ भेटबाक ऐ बातक सूचक थि‍क।” ई बात समारोह सभाक अधयक्ष कहलनि‍। ओम प्रकाश राय खरौआ गामक संग मधुबनीये मात्र नै अपि‍तु सम्पूर्ण मि‍थि‍लामे एक-सँ-एक वि‍द्वान हेबाक सुयोग्या कहलनि‍। ओ इहो कहलनि‍ जे मि‍थि‍लावासी लेल ई गौरवक बात थि‍क, जैठाम मनुष्य नै अपि‍तु मनुष्यक कर्म महान होइए। अपन टि‍प्पणीकेँ पुष्टि करैत कहलनि‍- “महाकवि‍ पण्डित लालदासकेँ पण्डितक उपाधि‍ केना भेटलनि‍। जेकर उल्लेख अखने अध्यक्ष महोदय सुनौलनि‍ अछि‍।” अही परि‍पेक्ष्यमे आगाँ कहलनि‍- 'सभ मनुष्य जन्मसँ शुद्र होइए आ कर्मसँ ब्राह्मण। ऐमे जाति‍क कोनो महत्व‍ नै। ब्रह्म की थि‍क अहु संदर्भमे ओ अपन सुन्दर वि‍चार रखलनि‍। अंतमे अपन एक गोट ‘शेर’ सुनेलखि‍न‍‍। दर्शक-दीर्घापर नीक प्रभाव देखल गेल। थपड़ीक गड़गराहटि ऐ बातक सूचक बुझाएल। उप वि‍कास आयुक्त ओम प्रकाश राय जीक वाचन हि‍न्दी भाषामे छल, अपरोक्त संदर्भित बात हि‍न्दीसँ मैथि‍लीमे कएल भावानुवाद छी। राय जीक नम्ह‍र आ सुन्दर टि‍प्पणीसँ श्रोता जगतमे शान्तिक सुन्दर दर्शन सेहो भेल। बाद एकर, एक आध गोट वि‍शि‍ष्ठ अति‍थि‍क टि‍प्पणीक पछाति‍ दोसर सत्रक माने काव्यगोष्ठी केर घोषणा करैत कहल गेल जे उचयचन्द्र झा ‘वि‍नोद’ गोष्ठीक अध्यक्षता करताह आ फूलचन्द्र झा ‘प्रवीण’ संचालन। संग-संग परि‍सरमे उपस्थित कवि‍ लोकनि‍केँ मंचपर शीघ्र आबए लेल आग्रह कएल गेलनि‍। ऐ शीघ्र आग्रहक आग्रह ओम प्रकाश राय जीक सेहो रहनि‍। अशोक कुमार मेहता, नन्द‍ वि‍लास राय, उमेश पासवान, वि‍द्याधर मि‍श्र, बुचरू पासवान, मो. गुल हसन, रामवि‍लास साहु, हरि‍श्चन्द्र हरि‍त, जगदीश प्रसाद मण्डल, चन्द्रेश, जनक कि‍शोर लालदास, राम सेवक ठाकुर, रामदेव प्रसाद मण्डल ‘झारूदार’, शशि‍कान्त झा, मनोज कुमार मण्डल, शि‍वकुमार मि‍श्र, लक्ष्मी दास, कपि‍लेश्वर राउत, अखि‍लेश कुमार मण्डल, उमेश मण्डल, कल्पकवि उमेश नारायण कर्ण आदि‍क संग गोष्ठीक अध्यक्ष आ संचालक मंचपर उपस्थित भऽ गेलाह। काव्यगोष्ठीक श्रीगणेश अशोक कुमार मेहताक कवि‍ता- ‘कने अपनो कहु आ कने हमरो सुनू’सँ भेल पश्चात् वि‍द्याधर मि‍श्र- ‘गेले घर छी’, बुचरू पासवान- ‘मि‍थि‍ला राज मंगै छी यौ’, हरि‍श्चन्द हरि‍त- गाम हेरा गेल, जगदीश प्रसाद मण्डल- ‘साँझ’, तेकर बाद रामदेव प्रसाद मण्डल, मो. गुल हसन, शशि‍कान्त झा, शि‍वकुमार मि‍श्र, रामसेवक ठाकुर, जनक कि‍शोर लालदास, चन्द्रेश, रामदेव प्रसाद मण्डल ‘झारूदार’ आ एक-आध-टा आओर कवि‍ जीक कवि‍ता पाठ भेल। आयोजक दि‍ससँ अगि‍ला सत्रक कार्यक्रम माने परि‍चर्चा लेल आब ऐ गोष्ठीकेँ समापनक घोषणा जल्दिये करथि‍। से आग्रह संचालक आ अध्यक्षसँ कएल गेल। अध्यक्ष उदयचन्द्र झा ‘वि‍नोद’ इशारामे संचालककेँ सहमति‍ देलखि‍न, संचालक फूलचन्द्र झा ‘प्रवीण’ अशोक कुमार मेहताक हाथमे मैक दैत कहलखि‍न जे ओ हुनकर नाओंक घोषणा कऽ देथि‍न। अशोक कुमार मेहता मैक हाथमे लैत कहलखि‍न- “आब अहाँ सबहक बीच ऐ गोष्ठीक संचालक डॉ. फूलचन्द्र झा ‘प्रवीण’ अपन एकगोट लयात्मक गीत सुनौताह।” बहुत सुन्दर ढंगे लाय आ रागसँ पूर्ण गीतक गायन आराम-आरामसँ बहुत नीक सूरमे केलनि‍‍। गीत सम्पन्न भेलाक बाद संचालक रूपमे आबि‍ लगले-सूरे घोषणा केलखि‍न‍- “आब अध्यक्ष महोदय डॉ. उदयचन्द्र झा ‘वि‍नोद’ जि‍नका अपने सभ नीकसँ जनैत हएब....।” इत्यादि‍ कहैत आ वि‍स्तृत परि‍चए दैत, हुनका आग्रह कएल गेलनि‍। उपस्थित भऽ अध्य‍क्ष महोदय अपन कवि‍ताक पाठ सुन्दर ढगे केलनि‍, सहजता आ असथि‍रतासँ पूर्ण पाठ, बहुत नीक शैलीमे केलनि‍। ई कवि‍ता गोष्ठीक अंति‍म कवि‍ता छल। कवि‍ताक समापन होइतहि‍ अध्यक्ष रूपमे आबि लगले-सूरमे बजलाह- “आब काव्यगोष्ठीक समापनक घोषणा कएल जाइत अछि‍।” मंचपर उपस्थित- उमेश पासवान, रामवि‍लास साहु, नन्द वि‍लास राय, बेचन ठाकुर, कपि‍लेश्वर राउत, मनोज कुमार मंडल, लक्ष्मीदास, अखि‍लेश कुमार मंडल आदि‍ कवि‍ सुगबुगाए लगलाह। मैकपर आयोजकक उद्घोषक घोषणा केरैत कहलनि‍- “मंचपर उपस्थित कवि‍मे जि‍नकर कवि‍ताक पाठ भ' सकल ओ कृपया मंचासीन रहथि‍, हुनका सभकेँ सम्मानि‍त कएल जाएत। वॉकी कविकेँ‍ मंच खाली करबाक आग्रह करै छि‍यनि‍।” सएह भेल। कमि‍टि‍ दि‍ससँ कवि‍ लोकनि‍केँ (जि‍नकर-जि‍नकर कवि‍ता पाठ भऽ सकलनि‍..) एक-हक गोट चादरि‍सँ सम्मानि‍त कएल गेलनि‍। तेकर बाद तेसर सत्रक प्रारम्भ भेल जइमे महाकवि‍ लालदास परि‍चर्चा भेल। कमलेश झा, फूलचन्द्र मि‍श्र ‘रमण’ रमानन्द झा ‘रमण’ कुमार रमेश्वरम्, आदि‍ वि‍द्वान भाग लेलनि‍। ऐ अवसरपर महाकवि‍ लालदास कृत ‘महेश्वर वि‍नोद’ पोथीक लोकार्पण समारोह सभामे मंचासीन सभ गोटे द्वारा कएल गेल आ ‘वि‍देह’ द्वारा आयोजि‍त 15म मैथि‍ली पोथीक भव्य प्रदर्शनी सेहो छल। अंत सांस्कृति‍क कार्यक्रमक पछाति‍ भेल। ३. संजीव कुमार ‘शमा’, एम.ए. (संगीत, हिन्दी आ पत्रकारिता), एल.एल.बी., पी.एच.डी. लेल शोधरत (संगीतमे)। सम्प्रति-अधिवक्ता सिविल कोर्ट ,झंझारपुर। गाम- रतुपार, पोस्‍ट- ताजपुर, भाया- झंझारपुर, जि‍ला- मधुबनी, (बि‍हार) महाकवि‍ पं. लालदास जयन्‍ती समारोह महाकवि‍ पं. लालदास जयन्‍ती समारोह आयोजन समि‍ति‍, खड़ौआ द्वारा पं. लालदासक 155म जयन्‍ती समारोह स्‍थानीय लालदास उच्‍चतर माध्‍यमि‍क वि‍द्यालय प्राङणमे समारोहपूर्वक 02/11/2011केँ मनाओल गेल। समारोहक वि‍शि‍ष्‍ठ अति‍थि‍ जि‍ला उपवि‍कास आयुक्‍त श्री ओमप्रकाश राय, मुख्‍य अति‍थि‍ अवकाश प्राप्‍त शि‍क्षक श्री हरि‍नारायण झा, आयोजन समि‍ति‍ सह कार्यक्रमक अध्‍यक्ष क्षारखण्‍ड वि‍द्युत बोर्डक पूर्व चेअरमैन डॉ. हरि‍वंश लाल संयुक्‍त रूपसँ महाकवि‍क प्रति‍मापर पुष्‍प  अर्पण आ दीप प्रज्‍वलन कऽ समारोहक उद्घाटन केलनि‍। कार्यक्रमक शुभारंभ वंदनाक स्‍वागत गीतसँ भेल तत्‍पश्चात भी.डी.एस.एच संगीत महावि‍द्यालय झंझापुरक छात्र देवेन्‍द्र महतो पं. लालदास रचि‍त मङल गीत- ‘जय जय गि‍रि‍जा तनय गणेश’ गौलनि‍। जकर धुन श्रीमती अंजना शमा देने रहथि‍। वि‍शि‍ष्‍ट अति‍थि‍ श्री राय अपन उद्घाटन भाषणमे उद्गार व्‍यक्‍त  करैत बजलाह जे मि‍थि‍लाक माटि‍ स्‍वनामधन्‍य अछि‍। ऐठाम अदौसँ वि‍द्वानक परंपरा रहल अछि‍। अपन अध्‍यक्षीय भाषणमे डॉ. एच.वी. लाल कहलनि‍ जे महाकवि‍ जन्‍मसँ नै अपि‍तु कर्मसँ पांडि‍त्‍यकेँ चरि‍तार्थ केलनि‍। ओ कहलनि‍ जे हम सभ हुनक व्‍यक्‍तित्‍व आ कृति‍त्‍वसँ कृतार्थ छी। समारोहक मुख्‍य अति‍थि‍ श्री झा जयंती समारोह मनेबा लेल आयोजन समि‍ति‍केँ साधुवाद दैत कहलनि‍ जे पंडि‍तजीक जयन्‍ती मनौलासँ नव पीढ़ीकेँ हुनकर जीवन आदर्शसँ नवा दि‍शा भेटतनि‍। ऐ अवसरपर पंडि‍त लालदास कृत मैथि‍ली पद्ममय पोथी ‘महेश्वर वि‍नोद’क वि‍मोचन वि‍शि‍ष्‍ट अति‍थि‍, मुख्‍य  अति‍थि‍ आ मंचासीन सम्‍मानि‍त अति‍थि‍ लोकनि‍ द्वारा भेल। सभ अति‍थि‍ लोकनि‍केँ फूलक मालासँ सम्‍मानि‍त कएल गेलनि‍। ऐ अवसरपर ‘वि‍देह साहि‍त्‍य आन्‍दोलन’क वैनर तले मैथि‍ली पोथी प्रदर्शनी सेहो छल। वि‍शि‍ष्‍ट अति‍थि‍क वि‍शेष आग्रहपर कवि‍ संगोष्‍ठीक आयोजन प्रथमे सत्रमे कएल गेल। जकर अध्‍यक्षता डॉ. उदय चन्‍द्र झा ‘वि‍नोद’ आ संचालन डाॅ. फूलचन्‍द्र झा ‘प्रवीण’क छल। संगोष्‍ठीमे जतए डॉ. अशोक कुमार मेहता, कल्‍प कवि‍ डॉ. उमेश नारायण कर्ण, डॉ. बुूचरू पासवान, मो. गुल हसन, श्री रामदेव प्रसाद मण्‍डल ‘झारूदार’ श्री चन्द्रेश, श्री शशि‍कान्‍त  झा, श्री जगदीश प्रसाद मण्‍डल, डॉ. जनककि‍शोर लालदास, श्री. शि‍वकुमार मि‍श्र, श्री रामसेवक ठाकुर अपन-अपन काव्‍यपाठसँ श्रोताकेँ मुग्‍ध कलनि‍, ओहीठाम श्री शंभू कुमार दि‍न, श्री उमेश मण्‍डल, श्री नन्‍द वि‍लास राय, श्री लक्ष्‍मी  दास, श्री बेचन ठाकुर, श्री संजीव कुमार शमा, श्री उमेश पासवान, श्री रामवि‍लास साहु , श्री अकलेश कुमार मण्‍डल, श्री मनोज कुमार मण्‍डल, श्री कवि‍लेश्वर राउत आदि‍ कवि‍ अपन काव्‍यपाठसँ वंचि‍त भेलाह। कवि‍ संगोष्‍ठीक अध्‍यक्ष ऐ वास्‍ते  कोनो खेद नै व्‍यक्‍त कऽ सकलाह। आयोजन समि‍ति खड़ौआ’क तरफसँ ओइ सभ कवि‍केँ जि‍नकर-जि‍नकर कवि‍ताक पाठ भऽ सकल, शालसँ सम्‍मानि‍त कएल गेल‍। महाकवि‍क ‘व्‍यक्‍ति‍त्‍व आ कृति‍त्‍व‘ वि‍षयपर परि‍चर्चामे मैथि‍लीक समालोचक डॉ. फूलचंद्र मि‍श्र ‘रमण’ महाकवि‍क रचना ‘रमेश्वर रचि‍त मि‍थि‍ला रामायण’क पुष्‍कर काण्‍डपर गंभीरतापूर्वक प्रकाश दैत कहलनि‍ जे महाकवि‍केँ दर्शनक साक्षात्‍कार छल। मि‍थि‍लामे चंदा झाक रामायण पूर्वहि‍ प्रकाशि‍त भेल छल तँए ई पूर्वहि‍सँ लोकप्रि‍य भेल। डॉ. रमानंद झा ‘रमण’, डी. ई. पी. नि‍देशक श्री रंगनाथ चौधरी दि‍वाकर, श्री कमलेश झा, श्री कुमार रामेश्वर, श्री भरत नारायण कर्ण आ मैथि‍ला अकादमीक पूर्व नि‍देशक डॉ. रघुवीर मोची सन मैथि‍लीक उदभट वि‍द्वान लोकनि‍ अपन शोधपूर्ण सारगर्भित व्‍याख्‍यान देलनि‍। साझूँ परक कार्यक्रममे कस्‍तूरबा गांधी बालि‍का वि‍द्यालय सकरीक छात्रा लोकनि‍ द्वारा जट जटीन, झि‍झि‍या आ डोमकच नृत्‍यक भावपूर्ण प्रस्‍तुति भेल। संदीप कुमार पंकज, चंदन, श्‍यामा, प्रीति‍, अंशु अपन गायनसँ श्रोतावर्गकेँ झूमएपर मजबूर कऽ देलनि‍। ओतहि‍ हास्‍य सम्राट श्री रामसेवक ठाकुर अपन गप-सप्‍पसँ श्रोतावृंदकेँ लोट-पोट केलनि‍। संपूर्ण कार्यक्रममे बैंजोपर राजकुमार महथा, नालपर महेन्‍द्र ठाकुर मन्‍नू, पैडपर चीकू, तबलापर शीतल अपन कुशल संगति‍ प्रदान केलनि‍।। जयंती समारोहक उद्घोषक एस.के.कर्ण शमा कार्यक्रमक सफल संचालन साहि‍त्‍यि‍क अंदाजमे कऽ श्रोतावर्गपर अपन खास प्रभाव छोड़लनि‍। आयोजन समारोहकेँ सफल बनेबामे सुनील कुमार दास, डाॅ. अरवि‍न्‍द लाल, श्री योगानंद लाल दास, श्री अजय कुमार दास, श्री राजेन्‍द्र कुमार दासक संग संपूर्ण ग्रामवसीक भूमि‍का सराहणीय छल। सचि‍व भागि‍रथ लालदासक धन्‍यवाद ज्ञापनक संग समारोह शेष भेल। गजेन्द्र ठाकुर उल्कामुख (मैथिली नाटक) तेसर कल्लोल (आचार्य व्याघ्र एकटा शतरंजक घनक चारू कात घूमि रहल छथि। आचार्य सिंह दोसर शतरंजक घनक चारू कात घूमि रहल छथि।) आचार्य व्याघ्र: तत्वचिन्तामणिमे हमरा सभक चर्चा गंगेश केलन्हि मुदा आब लोक हमर सभक असल नाम सेहो बिसरि गेल। हमर सभक पोथी सेहो सुड्डाह भऽ गेल। आचार्य सिंह: मुदा अपना सभक तँ कोनो सरोकार अछिये नै, तखन? आचार्य व्याघ्र: हँ, आ मुइलाक बाद भूत राकशसँ नीक व्याघ्र आ सिंह कहेनाइ भेल ने। आचार्य सिंह: मुदा अपना सभक तँ कोनो सरोकार छलैहे नै, दर्शनक सिद्धान्तमे गंगेश द्वारा कएल चर्चा… आचार्य व्याघ्र: तहीसँ हमरा सभ अछोप भऽ गेलौं किने। आचार्य सिंह: मुदा ओ तँ आनो लोकक चर्च तत्वचिन्तामणिमे केने छथि। ओ सभ किए अछोप नै भेलाह… आचार्य व्याघ्र: कारण हुनका सभक नाम गंगेश लिखने रहथि। मुदा अपना सभक लेल ओ आचार्य सिंह आ आचार्य व्याघ्र मात्र लिखने छथि। से गंगेशक कविता बनि गेल उल्कामुख आ हम सभ बनि गेलौं व्याघ्र आ सिंह। गंगेशक बेटा वर्द्धमान गंगेशक विषयमे लिखलन्हि “सुकवि कैरव काननेन्दुः”। मुदा कियो खोजो केलकै चौपाड़िपर जे जँ गंगेश कवि रहथि तँ हुनकर कविता की भेल। आचार्य व्याघ्र आ आचार्य सिंहकेँ जँ गंगेश आदर देलन्हि तँ से पोथी सभ सेहो सुड्डाह भऽ गेल। आचार्य सिंह: कोन रहस्य छै ऐ मे। आचार्य व्याघ्र: असुरक्षा आचार्य सिंह। गंगेश केलक रक्षा हमर सभक तर्कक श्रीहर्षक आक्रमणसँ, आ बनेलक नव्य-न्याय। नबका शास्त्र, नबका न्यायशास्त्र। ओहो अजीबे भेल, पिताक मृत्युक पाँच साल बाद भेलै ओकर जन्म आ चर्मकारिणीसँ केलक विवाह। आ ओइ विवाहसँ जे पुत्र भेलै वर्धमान से फेर मिलेलक न्याय आ नव्य-न्यायकेँ। मुदा वर्द्धमान अपन पिताक कविताकेँ नै बिसरल। असुरक्षा आचार्य सिंह, चौपाड़ि मध्य बाहरक विद्यार्थीकेँ तत्वचिन्तामणिक प्रतिलिपि पक्षधर नै करऽ दै छलखिन्ह, ने सार-संक्षेप लिखऽ दै छलखिन्ह। चौपाड़िमे वर्द्धमानक बाद सभ कियो आचार्य व्याघ्र, आचार्य सिंह आ उल्कामुख सभकेँ काल्पनिक बना देलक। आचार्य सिंह: मुदा ऐसँ सर्जन कोना हएत आचार्य व्याघ्र। बिन सर्जनक चौपाड़िपर विद्यार्थी आत्म अभिव्यक्ति कोना करताह। योग्यता कोना बढ़त। पुरान इतिहास व्याघ्र, सिंह आ उल्कामुख बनि नै रहि जाएत? प्रतिबन्ध, प्रतिबन्ध..फेर ज्ञानक विस्तार कोना हएत।समाजक एक वर्ग दोसरसँ कटि जाएत… प्रतिबन्ध, प्रतिबन्ध..ऐ सँ स्नेह बढ़त वा निरपेक्षता बढ़त? जे अहाँकेँ करबाक हुअए करू, जे हमरा करबाक हएत हम करब..की समाजक यएह गति हएत? आचार्य व्याघ्र: आचार्य सिंह। की ऐ विस्मरणकेँ रोकबाक प्रयास नै हेबाक चाही? आचार्य सिंह: हेबाक चाही आचार्य व्याघ्र। कोनो चीजक विस्मरण तावत धरि सम्भव नै जाधरि ओकरा हम सभ बुझनाइ नै छोड़ि दिऐ। आचार्य व्याघ्र: बुझि कऽ मोन राखनाइ, ठीक कहलौं आचार्य सिंह। तँ चौपाड़िपर ई व्यवस्था भऽ रहल हएत जे बिनु बुझने पाठ विद्यार्थीकेँ यादि कराएल जाए जइसँ सभ बिसरि जाथि गंगेश आ वल्लभाकेँ। आचार्य सिंह: मुदा हम सभ संकेतक प्रयोग कऽ सकै छी। संकेतसँ स्मरण विस्मरण नै बनत। अपूर्ण रहत चौपाड़िक पाठ, आ अपूर्ण पाठक विस्मरण नै भऽ सकैए, विस्मरण होइए मात्र पूर्ण पाठ। आचार्य व्याघ्र: मुदा कोन संकेत आचार्य सिंह.. आचार्य सिंह: उल्कामुख… (आकाशवाणी होइए…. उल्कामुख..उल्कामुख…उल्कामुख…उल्कामुख…) आचार्य सरभ: ई गंगेश आ वल्लभाक विवाह शतरंजक खाना सभ दैत्याकार बनि जाएत, सात सए सालमे जाति खतम..किछु करू…रोकू..विस्मरण…विस्मरण…. वर्द्धमान: । उदयन:: जगन्नाथ मन्दिरमे उदयनक उद्घोष, जे जैँ हम तेँ तूँ पूजित होइ छह। बन्द केवार खुजि गेल। दीना: भदरी: जड़िमे दुनू गोटे अड़ा देलिऐ शरीर आ दरकि गेल देवार। आ बन्न केवार खुजि गेल। दीना: मुइल गाइक हड्डीमे फोटरा गिदर बनि नुका कऽ सलहेस दीना-भदरी आ बाघक कुश्ती देखथि। बाघक रान पकड़ि दू कात चीर कऽ फेकी हम दुनू भाँइ आ मुइल गाइक हड्डीसँ बहार भऽ फोटरा गीदर बनल सलहेस ओकरा जोड़ि देथि आ फेर । भदरी: मिथिलाक राजा मग्गहक हंशराज-वंशराजसँ नरुआरक पोखरि खुनबओलन्हि मुदा ओ जाइठ नै उठा सकल। हम दुनू भाँइ दछिनबरिया भीड़सँ जाइठ फेकलौं तँ ओ सोझे जाठिक लेल बनाएल खाधि- बॉली मे जा कऽ खसल। ई जाइठ अखनो दक्षिण दिस टेढ़ अछि। उदयन:: मन्त्रार्थमे महर्षि पतञ्जलिक वैज्ञानिक मन्तव्य “यच्छब्द आह तदस्माकं प्रमाणम्” माने जे शब्द आकि मंत्रक पद कहैत अछि सएह हमरा लेल प्रमाण अछि- एकर अर्थ बादमे वेदे प्रमाण अछि- सेहो हमरा नामसँ भविष्य पुराणमे नै जानि किए गलत रूपेँ दऽ देल गेल। अनकर देखल बौस्तुक स्मरण अनका कोना हेतै? दीना-भदरी (सम्वेत रूपेँ): धामी कहलक हमरा सभकेँ काज करैले अपना खेतमे। मारि कऽ जुमा कऽ फेकलौं हम सभ ओकरा धामिन लग। धामिन गेल खिसिया आ बजेलक अपन दोस फोटरा गीदरकेँ। फोटरा गीदर मारलक हमरा सभकेँ। दीना: मुदा दौरीवाली हिरिया तमोलिन केलक तपस्या पतिक रूपमे प्राप्ति लेल.. भदरी: आ दौरीवाली जिरिया लोहारिन  केलक तपस्या पतिक रूपमे प्राप्ति लेल.. दीना-भदरी (सम्वेत रूपेँ): मरलाक बादो। गंगामे पैसि बनेलौं पत्नी दुनूकेँ। मरलाक बादो। उदयन:: गंगेश केलक रक्षा हमर तर्कक श्रीहर्षक आक्रमणसँ, नव्य-न्याय। नबका शास्त्र, नबका न्यायशास्त्र। ओहो अजीबे भेल, पिताक मृत्युक पाँच साल बाद भेलै ओकर जन्म आ चर्मकारिणीसँ केलक विवाह। आ ओइ विवाहसँ जे पुत्र भेलै वर्धमान से फेर मिलेलक न्याय आ नव्य-न्यायकेँ। दीना-भदरी (सम्वेत रूपेँ): सत्यकामक सेहो तँ सएह हाल रहै। पिता के छलै ओकरा बुझले नै छलै, जबालाक पुत्रसत्यकाम, मुदा गौतम सन गुरु भेटलै, वेदक अध्ययन केलन्हि। मरलाक बादो उदयन, नव आ पुरानक मेल आ विरोध होइए। वंशीधर बाभन आ बालारामक मेल भेल, लोक देवी गहील आ पौराणिक दुर्गा देवीक मेल भेल। उदयन:: मरलाक बादो दीना-भदरी। दीना-भदरी (सम्वेत रूपेँ): हँ उदयन। फोटरा गीदर बनल दोस…संग भेलाह सलहेस। मरलाक बादो… …(जारी) ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। राजदेव मण्‍डल हमर टोल उपन्‍यास गतांशसँ आगू.... धर्मडीहीवाली कतेक दि‍नसँ कोशि‍शमे लगल अछि‍ कि‍न्‍तु मौका हाथ नै लगै छै। ओकर वि‍चार छै जे असगरमे सभटा बात खेलावन भगतकेँ साफ-साफ सुनाबी। परन्‍तु झार-फूँक करबैबलाकेँ कोनो अभाव छै। आ गप्‍प हाँकैबला तँ ओकरे लग बैसत। कखनो सुनहट नै। एेसँ पहि‍ने महतो बाबाक स्‍थानमे डाली लगौने रहए। घोड़ा साफ-साफ कहि‍ देलकै- “हम की करबौ। कोखि‍ मारल छौ।” फेर दवाइ करबैक वि‍चार भेल। नीक डाक्‍टर गाममे रहै नै छै। शहरक बड़का भारी डाक्‍टर लग जाएत तँ ओतेक रूपैया कतएसँ लाबत? संगे के जाएत? रहत कतए अनभुआर जगहपर? तैयो धर्मडीहीवाली नि‍राश नै भेल छै। कि‍छु दि‍नसँ खेलावन भगतपर ओकर वि‍श्वास जेना बढ़ए लगलै। लचारीमे कतेक बेर वि‍चारी करए पड़ै छै। हौ बाबू वि‍श्वासे गुणे फल। आखि‍र दस-दस कोसक लोक लोग आबै छै। फलि‍त नै होइ छै तँ ओहि‍ना? मरल-सुखाएल कोखि‍ हरि‍यर भऽ जाइत छै। जश-अपजश वि‍धि‍ हाथ। सोझेमे तँ छै-नररी बुढ़ि‍याक पुतोहू। ओझा-गुणी, डाक्‍टर-वैद्य, धाइम सभ नकारि‍ देने रहए। खेलावन भगत दूटा सन्‍तान होइक वाक दऽ देलकै। समूचा धनुकटोलीकेँ ठकमुड़ी लगि‍ गेलै। जहि‍या वचन पूरा भेलै। कहए भगता आ पूराबए देवता। ओना तँ ऐंठ खाइ छै आ झूठ बजै छै। सभ कुकरम देखते छी। नचारकेँ वि‍चार की। दस गोटेक बात तँ मानहि‍ पड़ै छै। चलतीमे तँ माटि‍यो बि‍का जाइत छै। धर्मडीहीवालीकेँ तँ सोचि‍-वि‍चारि‍ कऽ काज करए पड़तै। जागेसर तँ ओइ दि‍न कहि‍ देलकै- पंच सभ साल भरि‍क समए देने अछि‍। अहाँक मन-जेकरासँ इलाज कराबी। ओझा-गुणी, डागडर-वैद्य। हमरा दि‍ससँ कोनो मनाही नै। सि‍रि‍फ टाका-पैसा पुरौनाइ हमर काज छी। पाछाँ हमर कोनो दोख नै। खेलावन भगत बेंतमे तेल लगा कऽ सुररि‍ रहल छै। भगतकेँ सभ कि‍छु अलगे टाइपक। बेंत लगै छै- साँप सन। अन्‍हारमे देख लेत तँ साँपे बुझेतै। आइ धर्मडीहीवालीकेँ मौका भेटलै। सुनहटमे सभ गप्‍प फरि‍छा कऽ कहि‍ रहल छै। कि‍न्‍तु भगतक मन जेना कतौ आर टहल-बुलि‍ रहल छै। देह कतौ आ मन कतौ। आँखि‍ जेना नि‍शाँमे डूबल छै। धर्मडीहीवाली सोचैत अछि‍- एना कि‍अए केने अछि‍- भगतजी। कहीं ओइ दि‍नका गप्‍प मन तँ ने पड़ि गेलै। झाड़ैत काल चमेटा जे लगल रहए। कहीं हमरापर तमसाएल तँ ने अछि‍। आब जे होए। बखत पड़लासँ........। धर्मडीहीवाली कने सुरकेँ तेज केलक। अपना दि‍स धि‍यान खि‍ंचबाक लेल तँ उपाए लगबए पड़तै। “भगत जी, हमरो दुख हरण कऽ लि‍अ। आब तँ हम कतौक नै रहबै। जँ बाल-बच्‍चा नै हेतै तँ सोति‍न तरमे बास करए पड़तै। अहाँ तँ बुझि‍ते छी- नदी तरक चास-आ सौति‍न तरक बास।” “सौति‍न ने कहै छै। बैरि‍न तरक बास।”‍ टप्‍प दऽ बाजल भगत। “हम तँ मूरूख छी भगतजी। अहाँ तँ भगवान छि‍ऐ। परोपट्टामे अहाँक जय-जयकार भऽ रहल अछि‍। कतेकोकेँ दुख हरण कऽ लेलि‍ऐ। हमरो दुखसँ उबारू। खाली आँचारकेँ भरि‍ दि‍अ। जँ हमरा संतान नै हेतै तँ हम बेसहारा भऽ जाएब। पएर पकड़ै छी भगत जी। कोनो उपाए करू।” नि‍साँस खि‍ंचैत भगत बजल- “गुरू महराज कहने रहथि‍न- सुआरथ लागि‍ करे सभ पीरीत।” धर्मडीहीवालीकेँ आँखि‍सँ भरभरा कऽ नोर खसि‍ पड़ल। भगत जीक दि‍ल पि‍घलि‍ गेलै। ओकरा हाथकेँ अपना पएरपर सँ हटबैत कहलक- “घबरा नै। सभ कुछो हेतै। जे बाट देखाबै छि‍औ। ओइपर चलए पड़तौ।” “बचा लि‍अ भगतजी। जीअत तँ जीअत, मुइलोमे सौति‍न नै बकसै छै। मुइलोपर बि‍साइत छै।” “तूँ तँ एक-तरफा सोचै छेँ। पुरूषोकेँ दूटा स्‍त्री भेलासँ ओहि‍ना कठ होइ छै। तरघुसका तकलीफ होइ छै। तोरा तँ मालूमो नै हेतौ घोंचाय मड़रक भाइक खि‍स्‍सा।” “हमरा कतएसँ मालूम हेतै।” “आब तँ बेचारा दुनि‍याँसँ चलि‍ गेलाह। चारि‍-पाँच साल पहि‍लुका गप्‍प छि‍ऐ। सौति‍नि‍याँ डाहक शि‍कार भऽ गेलै। दुनू स्‍त्री मि‍लि‍ कऽ दशा बि‍गाड़ि‍ देने रहए। देखैत छी आइयो दुनूटा साँढ़ जकाँ ढेकैर कऽ लड़ैत छै।” “की भेल रहै भगतजी?” धर्मडीहीवालीक आँखि‍मे उत्‍सुकता भरि‍ गेल छै। खेलावन भगत पलथी मारि‍ कऽ बैस गेल। दहि‍ना जाँघपर राखल बेंत थरथरा रहल छै। मुँहसँ खि‍स्‍साक बखान चलि‍ रहल छै। “घोंचाय मड़रक भाइक नाओं रहै- चि‍चाय। एकटा स्‍त्रीमे संतान नै भेलै। फेर दोसर केलक। ओहोमे संतान नै भेलै। दुनू औरति‍यामे राति‍-दि‍न हड़-हड़, खट-खट होइते रहए। चि‍चाय झगड़ा छोड़बैमे अपस्‍याँत। दुनू तरफसँ गाड़ि‍ मारि‍ सुनए पड़ैत। चि‍चाय लवकीकेँ बेसी मानैत। ओकरो संगे राति‍ बि‍ताबैत। पुरनकी कछ-मछ कऽ राति‍ काटैत। सौति‍नि‍या डाहसँ जरैत पुरनकी सोचलक।” कि‍छु काल रूकि‍ भगत आगू बजय लगल- “हँ, अमवस्‍याक राति‍ रहए। खट-खट अन्‍हार। टि‍पि‍र-टि‍पि‍र बून चुबैत। हाथ-हाथ नै देख पड़ैत। लबकी जइ घरमे सुतैत रहए ओइ ओसरपर चि‍चाय दहि‍ना पएर रखलक आकि‍ बामा पएर पुरनकी पकड़ि‍ लेलक। अन्‍हारक कारने चि‍चाय देख नै सकल। ओ डरे ‘आऊँ, आऊॅ’ करए लगल। लबकी दौग कऽ नि‍कलल आ दहि‍ना पएर पकड़ि‍ लेलक। दुनू अपना-अपना दि‍स खि‍ंचए लगल। अपना-अपना घर दि‍स लऽ जेबाक प्रयास। खैंच रहल छल। चि‍चायकेँ बुझि‍ पड़लै जे दू फाँकमे चीरा कऽ बँटि‍ लेत। ओ बाप-बाप करैत चि‍चि‍या उठल। अड़ोसि‍या-पड़ोसि‍या जमा भेल। तखन ममि‍लाकेँ शान्‍त केलक। दूटा स्‍त्री केलाक फल एहनो होइत छै।” “भगतजी, तैयो मरदक जाति‍ ऊपरे रहै छै। हमर नैया कोन वि‍धि‍ पार लगतै।” “तूँ चि‍न्‍ता नै कर। अबए दही उ शुभ घड़ी। उ पवितर राति‍।‍” खेलावन भगत बेंत उठा कऽ उपदेश दि‍अ लगल- “सात दि‍न पहि‍लेसँ अरबा-अरवाइन भोजन। दुनू बखत स्‍नान। मन देह शुद्ध। चौबटि‍यापर पूजा-चक्कर। बाहर बजे राति‍मे एकान्‍त जगहपर आबए पड़तौ। राह-बाटमे कोनो टोका-चाली नै। कि‍यो देखै नै। नि‍शि‍भाग राति‍मे चौबटि‍यापर स्‍नान-पूजा कबुला सभ करए पड़तौ। समैपर सभटा बात बुझा देबौ। भेंट करैत रहि‍हें। शरणमे आबि‍ गेल छेँ तँ कल्‍याण भऽ जेतौ।” “धन्‍य हो भगतजी।” धर्मडीहीवाली उठि‍ कऽ आंगन दि‍स चलि‍ देलक। ओकर पएर स्‍थि‍र नै भऽ रहल छै। जेना नि‍शाँसँ मातल हो तहि‍ना ओकरा मनमे बुझाय छै। पता नै ई नि‍शाँ सफलताक छि‍ऐ वा असफलताक। ओकर पएरक गति‍ तेज भऽ गेलै। तैयो गहबरक गन्‍ध ओकरा चारूभरसँ घेरने छै......। क्रमश: ................... ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। ओमप्रकाश झा सफल अधिकारी वातानूकुलित चैम्बरक शीतल हवा मे रिवॉल्विंग चेयर पर आराम से अर्द्धलेटल अवस्था मे बैसल छलाह श्री बिमलेश चन्द्र। जी हाँ श्री बिमलेश चन्द्र, जे हमर विभागक एकटा सफल आयकर अधिकारी मानल जायत छैथ। हुनकर प्रभावी व्यक्तित्वक आगाँ पूरा विभाग नतमस्तक रहैत अछि। जतय ककरो कोनो काज अटकल कि श्री बिमलेश तुरत यादि कैल जायत छैथ। की अधिकारी आओर की कर्मचारी, सभ गोटे हुनकर काज कराबै केर क्षमता आओर हुनकर व्यक्तित्वक लोहा मानैत छैथ। आई वैह बिमलेश जी किछ शोचपूर्ण मुद्रा मे अपन कुर्सी मे घोंसियायल छलाह। हम भीतर ढुकबाक आज्ञा माँगलियैन्ह त' बिना डोलल संकेत सँ बजेलाह आओर हम ओहि सुन्नर वातानूकुलित कक्ष मे प्रवेश कय गेलहुँ। एतय इ बता दी जे जहिया सँ हमर विभाग मे कम्प्यूटर जीक पदार्पण भेलन्हि, तहिया सँ सभ अधिकारीक कक्ष वातानूकुलित भ' गेल अछि। ओना इ अलग गप थीक जे इ वातानूकुलन कम्प्यूटर जी लेल भेल छैन्ह। हम बिमलेश जी सँ चिन्ताक कारण पूछलियैन्हि। ओ बजलाह- "जहिया सँ मयंक सर गेलाह आओर खगेन्द्र सर एलाह, तहिया सँ हम चिन्तित छी।" मयंक शेखर हमर सभक आयकर आयुक्त छलाह जिनकर बदली भ' गेलन्हि आओर हुनका स्थान पर खगेन्द्र नाथ जी नबका आयुक्तक पदभार ग्रहण केलखिन्ह। हम कहलियैन्ह- "यौ एहि गप सँ चिन्ताक कोन सम्बन्ध? कियो आयुक्त रहथि, अपना सभ केँ त' काज करै केँ अछि, से करैत रहब।" बिमलेश- "अहाँ एहि दुआरे फिसड्डी छी आओर सदिखन अहिना फिसड्डी रहब।" हम चुप रहि केँ पराजय स्वीकार केलहुँ आ एहि सँ आओर उत्साहित होयत ओ बजलाह- "अहाँ बुडिराज छी। इ जनतब राखनाई बड्ड जरूरी अछि जे नबका सर कोन मिजाजक लोक छैथ।" हम- "से कियाक?" ओ अपन ज्ञान सँ हमरा आलोकित करैत कहलाह- "मिजाजक पता रहत तहन ने ओहि अनुरूपे काज कैल जेतई।" फेर ओ सोझ भ' केँ बैस गेलाह आओर एकटा नम्बर दूरभाष पर डायल करैत बजलाह जे मयंक सर केँ फोन करै छियैन्हि। ओकरा बाद एकटा चुप्पी आओर फेर बिमलेश जी मुस्की दैत विनीत भाव मे दूरभाषक चोगा पर बाजलैथ- "प्रणाम सर। हम बिमलेश।" ---------------------------------------------- "जी सब नीके छै अपनेक आशीर्वाद सँ।" ---------------------------------------------- "जी अहाँ संगे काज करय केर आनन्द किछ आओर छल। अहाँक विषयक पकड आओर अहाँक ज्ञान------- ओह सभ मोन पडैत अछि।" ----------------------------------------------- "झूठ नै कहै छी। अच्छा सर अहाँक सामान सभ पहुँचल की नै? सॉरी सर, एक दिन बिलम्ब भ' गेल, ट्रान्सपोर्ट मे ट्रक खाली नै छल।" ----------------------------------------------- "जी इ अपनेक महानता अछि। नहि त' हम कोन जोगरक लोक छी। कोनो आओर काज हुए त' कहब जरूर सर।" ----------------------------------------------- "जी प्रणाम सर।" ई कहैत ओ दूरभाषक सम्बन्ध विच्छेद करैत हमरा पर विजयी मुस्की फेंकलैथ आओर अपन आँखि हमर आँखि मे ढुकबैत कहलैथ जे कहू आर की हाल चाल। हम- "नीके छी यौ। बजबय लेल आयल छलहुँ। चलू नबका आयुक्तक चैम्बर मे मीटिंग अछि।" ओ तुरत हमरा संगे चलि देलैथ आओर हम सब आयुक्त महोदयक चैम्बर पहुँचलहुँ जतय सभ अधिकारी बैसल छलाह। मीटिंग शुरू भेल। एकटा चुप्पी ओहि कक्ष मे पसरि गेल। हमरो विभाग मे आन सरकारी विभाग जकाँ भरि साल मीटिंग चलैत रहैत अछि। एहि विषय पर एकटा ग्रन्थ लिखल जा सकैत अछि जे मीटिंगक कतबा फायदा अछि। खैर मीटिंग मे आयुक्त महोदय अधिकारी सभ केँ खूब पानि पियेलखिन्ह आओर खराब प्रदर्शनक लेल पुरकस डाँट सेहो भेंटल। कहुना मीटिंग खतम भेल आओर हम सभ ओहिना पडेलहुँ जेना बिलाडिक डर सँ मूस परायत अछि। मुदा बिमलेश जी फेर सँ अनुमति ल' केँ भीतर ढुकलाह आओर आयुक्त सँ कहलखिन्ह- "प्रणाम सर, हम बिमलेश।" आयुक्त भावरहित बजलाह- "बैसू।" हमर विभाग मे कोनो नबका अफसर आबैत छैथ त' विभिन्न अधिकारी आओर कर्मचारी केर खासियत सँ हुनका परिचित करेबा मे किछ लोक आगाँ रहैत छैथ। बिमलेश जीक (कु)ख्याति सँ आयुक्त महोदय नीक जकाँ परिचित क' देल गेल छलाह। भाव विहीन चेहरा सँ आयुक्त महोदय बिमलेश जी केँ कहलखिन्ह- "अहाँक रेकॉर्ड त' बड्ड खराब अछि। किछ काज नै भेल अछि।" बिमलेश जी पैंतरा बदलैत बजलाह- "सच पूछू सर त' एहि लेल अपनेक मार्गदर्शन लेल हम आयल छी। एहि चार्ज मे कहियो ठीक सँ काज नहि भेल। आब अहाँ केँ अयला केँ बाद सभ ठीक भ' जेतै।" आयुक्त महोदय कनी नरम भेलाह आओर अपन योजना पर चर्चा करय लगलाह। बिमलेश जी मन्त्र मुग्ध भ' केँ मुस्की दैत हाँ हूँ करैत सुनैत रहलाह। गप खतम भेला केँ बाद बिमलेश जी कहलखिन्ह- "सर अहाँक डेरा पर सामान उतारबाक लेल ५ टा लोक पठा देने छी आओर रातिक खेनाई डिलाईट होटल मे आर्डर क' देने छी।" आयुक्त महोदय किछ नहि बजलाह। ओकर बाद पता चलल जे बिमलेश जी केँ नियमित बोलाहट होबय लागलैन्हि आयुक्त महोदय लग। दू मासक बाद आयकर अधिकारीक बदलीक आर्डर आयुक्त महोदय केँ आफिस सँ निकलल। श्री बिमलेश जी केँ अपन कार्यालय मे छोडैत एकटा आओर कार्यालय केर अतिरिक्त प्रभार देल गेलन्हि। संगहि आयकर अधिकारी (मुख्यालय) केँ अतिरिक्त प्रभार सेहो देल गेलन्हि। हमर पदस्थापन एकटा दूरक जिला मे क' देल गेल छल। साँझ मे बिधुआयल मुँह लेने घर पहुँचलहुँ। कनियाँ मुँह फुलेने बैसल छलीह, कियाक त' हुनका पहिने बदलीक समाचार भेंट गेल छलैन्हि। हमरा दिस तिरस्कार केँ संग देखैत बजलीह- "अहाँ त' ओहिना बुडिबक रहि गेलहुँ। बिमलेश जी केँ देखियौन्ह, कतेक सफल अधिकारी छैथ। सभक पसिन्न छैथ।" हम मौन रहि केँ हुनकर गप सुनैत अपन पराजय स्वीकार केलहुँ। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। नवीन ठाकुर, गाम- लोहा (मधुबनी ) बिहार, जन्म - १५-०५-१९८४, सिक्षा - बी .कॉम (मुंबई विद्यापीठ), रूचि - कविता , साहित्यक अध्यापन एवं अपन मैथिल सांस्कृतिक कार्यकममे रूचि। कार्यरत - Comfort Intech Limited (malad) (R.M. ) १ मिथिला उवाच फलना बाबु मरि गेला बहुत नीक लोक छलाह ..........के कहलक ..........एखने एगो धिया-पुता बजैत जाइ छल जे फलना दिन भोज हेतै ....बाहर निकलहुँ तँ ...हरिबोल - हरिबोल सुनाइ पड़ल .!

तूँ ....जेबहक की नै कठियारी ..... हाँ हाँ किएक नै जेबै ! .....जाएब तँ संग कऽ लेब कने - ... फलना बाबु छी यु कठियारी के हकार दैत छी .........चिलना बाबु नै रहला .........! ओहो.. ओहो ...काल्हिये तँ गप्प भेल छल हुनका संग हमरा पोखरिपर भेटल छलाह .........आहा..हां .. कहियौ...... जन्म मरणक कोनो भरोसा नै होइत छै यौ बाबु ..........ठीके कहैत छिऐे काका .......! लेकिन गेलाह सभटा सुख भोगि कऽ बेटा-पुतौह बड़ निक छनि , खूब सेवा वारी करैत छलनि .........! .हाँ हाँ किएक नै करथिन, कमिये कोन छलनि ....एगो बेटा डाक्टर छनि ...एगो, वन विभागक अधिकारी छनि ........बेटियो सभ सुखी सम्पन्न छनि , सभ काजसँ निश्चिंत भऽ कऽ मरलाहेँ! हँ से तँ सभ अर्थेसँ महादेवक कृपा सन भरल पुरल छथि,....... लेकिन काज राज ढंगसँ करता तखन ने ..........भगवान् कोनो कमी नै देने छनि .........जवार तँ खुएबाक चाही ........हँ तँ से किएक नै.......! चल चल देरी भऽ रहल अछि ..........फेर एबाको अछि ..........पूजा पाठ करबाक अछि ......!

राम नाम सत्य है ............!

हरी बोल ....हरी बोल .......! कथीक अतेक हल्ला भऽ रहल छै यौ छोटका बाबू ........- भौजी फलना बाबुक स्वर्वास भऽ गेलनि !

ठीक छै अहाँ चलि जाउ कठियारी ....... भैयाक पठा दियौ कने अंगना भोरसं भुखले प्यासल बैसल छथि ....दालानपर !

.................................................................. !

इजोरियो रातिमे टोर्च लऽ कऽ ई के आबि रहल अछि बुरलेल आदमी हौ तखने मुँहपर टोर्च मारलकैन .........काका ......एकाद्सा - दुआद्साक नोत हँकार दैत छी ......पुरख्क दफ्फा ..!

आहा ...फलना बाबु ...औ औ बैसू .....! नै काका बड़ काज अछि एखन ...!

हाँ अहाँकेँ तँ एखन काजक अंगना अछि बौआ , ........बहिन सभ एलीहेँ की नै? हाँ सभ आबि गेल ......काका छोटकी पुछै छल अहाँक बारेमे .........जे काका जिबिते छथिन ने ..........! हह हहह हा.. हा.. हाँ हाँ ओकरा तँ होइते हेतै , बच्चामे बड़ मारने रहिऐे ने ......!

बड़की बहिनकेँ तँ ननकिरबो छऽ ने एकटा ...... हाँ ५ सालक छै ननकिरबा ..........! भगवान् देह समांग दोउ बढ़िया .......बड़ निक ! ठीक छै चली छी काका .!

भोजक दिन -

कए गो तरकारी छै हौ भाइ .........? सात गो तरकारी छै काका ......! कोन-कोन ? .........आलू- कोबी, भाटा-अदौरी , कदीमा , सजमैन, साग , बड़ ,आ बड़ी ,

आह बहुत निक .......सबेर सकाल बिझो भऽ जेतै तँ ठीक रहितै ..बेसी रातिमे नै ठीक होइ छै ...धिया पुता सब उन्घा लागै छै ..........हाँ -

जाने....... कनेक देख कऽ आब तँ कतऽ तक काज आगाँ बढ़लैए .......!

तखने.दूर सं..........!

फलना बाबु छी यौ ....बिझो करबैत छी .! हाँ हाँ .........ठीक छै ........! हइ बिझो भेलै ....बिझो भेलै....! हइ छौरी सभ हल्ला नै कर ....! बाबा ......भर्तुआ सुइत रहल ...! हइ जो ने उठा दही ने सांझे सँ हल्ला केने छलअ भोज खाएब भोज खाएब .....जो जल्दी लोटा लऽ कऽ आऽगऽ ..! दू गो लोटा लऽ लिहँ....... हाँ...!

यौ एगो आउर पात दिअ ई फाटल अछि ...... हइ छौरी ....पात खेबा की भात .....! जाए दियौ बच्चा छै हइ ले बौआा ...दोसर पात ! हइै भात उठब ने ......! मऽ तोरी गप की करैत छऽ उम्हर एखन धरि पतों नै परसला ....!

दाइल लेब दाइल ..! डालना.... डालना....! पाइन ओ एगोटा तँ उठा ला कम सं कम ....की सब तरकारिये परसबऽ!..हरे करिया ..एम्हर आ ..चल पाइन उठा ले तूँ .! हइ हम पैन नै उठाएब .......! हइ बह्निचो पैन पिएला सँ धर्म हेतौ .......उठा ने !

.....................

............. हइै क़ात भऽ कऽ हाथ धोए जाइ जाउ - हइ ई के धिया-पुता अछि ........हइ बिच्चइमे रास्ता पर पाइन हरबै छऽ ...लोक पिछैर कऽ खस्तै एकने चंडाल कही के ...!

बहुत नीक .........छल काका भोज , जय जय भऽ गेलै ..! हौ एतबो नै करितै तँ नाक -कान कटब के छलै की ...एतेक सम्पैत कतऽ कऽ रखतै ....समाजमे रहऽ के छै की नै ....!

हाँ सेहो छिऐ........देखियौ आब काल्हि की होइएा ....सुनऽ मे आएलऽ जे जवार भऽ रहल अछि पांच गाम नोतात.! आह करबाके चाही .. अहि सं नाम होइत छै ....अपने नाम हेतै ने कोनो हमर थोड़े ने, हाँ .......गामक नाम सेहो हेतै कने ! भोजक २-४ दिन पश्चात ...........!

हौ फलना बाबुकेँ राति तबियत ख़राब भऽ गेलै की ....!

हल्ला सुनलिऐ काका आइ भोरमे ........ओहो लटकले छथि ..........पाकल आम छथि ....... आब जे दिन जीबैत छथि से दिन !

हाँ .........हमरो जेबाक छलए बंबई लेकिन ई हल्ला सुनलिऐ तँ रुकि गेलहुं ! दू चारि दिन आर रूकि जाइ छी .......कही ओहो ने ...आब कतबो छथि तँ दियादे छथि ने .....चलि जाएब तँ बदनामिये हएत .....!

तहि दुआरे रुकिए जाइ ...............! ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com  पर पठाउ। ३. पद्य ३.१.१.गुलसारिका २.इरा मल्लिक ३.शांतिलक्ष्मी चौधरी ४शेफालिका वर्मा ३.२.१.सत्यनारायण झा २ओमप्रकाश झा ३.३.१.जगदीश चन्द्र ठाकुर ’अनिल’ २.मिहिर झा ३.झा हेमन्त बापी ४.जगदानंद झा 'मनु' ३.४.१.शिवशंकर सिंह ठाकुर २.अमित मोहन झा ३.५.१. शिवशंकर श्रीनिवास २.विकास झा रंजन ३.जगदीश प्रसाद मण्डल ४. मुन्नाजी हाइकू ५. रामबिलास साहू- टनका ३.६.१. अन्जनी कुमार वर्मा २.विनीत उत्पल ३.७.१.डॉ॰ शशिधर कुमर २ नवीन कुमार "आशा" ३.८.१.रामदेव प्रसाद मण्‍डल ‘झारूदार’ २. नवीन ठाकुर ३.१.१.गुलसारिका २.इरा मल्लिक ३.शांतिलक्ष्मी चौधरी ४शेफालिका वर्मा १ गुलसारिका,  भोपाल अहाँक जीवनक अहाँक जीवनक हमही सपता आ विपता अहिना डोरा घुमैत रहत हम गीरह बनैत रहब अहाँ गृहस्थीक धानक खोईंछा छोडबैत रहब चलू आजुक इजोरियामे धो आबी अपन अपन मुँह आ कान चिन्हबाक करी प्रयत्न जे एखनधरि हम आ अहाँ कतेक भेलहुँ अपन आ कतेक छी आन कनी देखी अहाँक तरह्त्थीक रेखा आ माथा परहुक रेघा सब ठाम त सँगहि छी कतहु टेढ त कतहु सीधा जँ नहि लागए बेजाए त कहि दी बुझाए सप्तपदीक अनुबन्ध सँ बहुत पैघ होइत छै प्रकृति आ पुरुष केर बन्ध अहाँ अहिना बांहि पुजबैत रही मोंछ पिजबैत रही सीता जेकाँ हम ठिठियाइते रहब आ लक्ष्य दीस धकियबिते रहब ओना त टांगल छीहे अहाँक कान्ह पर पहिरल गंजी वा पुरना गमछा जेकां घुसिया जैब कोनो कोन त भरोस अछि मोने मोन उपालम्भ दैतो नील आ टीनोपाल द फेर पहिरिये लेब तें हे नाथ जुनि करी मोन छोट संघर्षक पजारल चूल्हि पर खौल दिय अदहन अहाँ बढ़ू आगू कंगुरिया धेने हम पाछुए  रहब ठाढ़ २ इरा मल्लिक, पिता स्व. शिवनन्दन मल्लिक, गाम- महिसारि, दरभंगा। पति श्री कमलेश कुमार, भरहुल्ली, दरभंगा। जीवन ------- जीवन अछि, आह, कराहक सिलसिला , पीड़ा आ दर्द के रंगीन, मनमोहक कथा! सब किछ, भ्रम, स्वप्न, मिथ्या, प्रवँचना! दुनियाँक सब रिश्ता अछि, ममताक मृगतृष्णा!

जीवन के , सिर्फ अपना लेल जिनाय. अपन लेल सोचनाय, हमर जीवन, बस हमरे लए? नहिँ नहिँ, एना सोचब तै. होयत स्वार्थ हमर, नितांत स्वार्थ ! जीवन के किछ अर्थ भेनाइ, ते जरुरी छैक, जीवन के एक लछ्य भेनाइ, ते बेहद जरुरी छैक। ओ लछ्य, भए सकैत अछि, भिन्न भिन्न । ककरा हम कहबै, सत्य. ककरा हम, असत्य ठहरा सकैत छी। किन्तु एक सत्य , मानव जीवन मेँ, आनि सकैत अछि, अथाह शान्ति. असीम आनन्द! ओहि सत्य के बुझबाक , हम प्रयास करैत छी निरंतर! हमरा लए हमर जीवन मेँ, सबसे पैघ वैभव, ओ स्वर्गिक सुख अछि, जे दैत अछि अपूर्व सँतोष, मानव सेवा मेँ छिपल अछि, हमर अँतर्मन के ओ , अलौकिक सत्य! मानव सेवा आ परोपकार सँग, जी उठैत अछि , हमर आत्मा, तृप्त भs जायत अछि मोन, ओहि आत्मिक सुख के आगू, दुनियाँ के सब सुख . बुझायत अछि छोट , छोट, बहुत छोट!!! मानव सेवा आ परोपकार, यैह अनँत निधि अछि , यैह निताँत सत्य अछि, यैह एक लछ्य अछि, हमर जीवन के!! ३ श्रीमति शांतिलक्ष्मी चौधरी, ग्राम गोविन्दपुर, जिला सुपौल निवासी आ राजेन्द्र मिश्र महाविद्यालय, सहरसा मे कार्यरत पुस्तकालयाध्यक्ष श्री श्यामानन्द झाक जेष्ठ सुपुत्री, आओर ग्राम महिषी (पुनर्वास आरापट्टी), जिला सहरसा निवासी आ दिल्ली स्कूल ऑफ इकानोमिक्स सँ जुड़ल अन्वेषक आ समाजशास्त्री श्री अक्षय कुमार चौधरीक अर्धांगिनी छथि। प्राणीशास्त्र सँ स्नातकोत्तर रहितो शिक्षाशास्त्रक स्नातक शिक्षार्थी आ एकटा समाजशास्त्री सँ सानिध्यक चलिते आम जीवनक सामाजिक बिषय-बौस्तु आ खास कऽ महिलाजन्य सामाजिक समस्या आ प्रघटनामे हिनक विशेष अभिरूचि स्वभाविक। गजल १ पले पल प्रेमक प्यास लागय आब फ़ेर कहिया मिझायब यौ रूइसकेँ तँ जाइत छी परायल पिया फेर कहिया आयब यौ पचासे हजारक लेल ऐना तामसायल छी कथी लय पीतम काज अस्सल फेरसँ हम अपन माय बाबुजी केँ बुझायब यौ परुके साल एल.सी.डी. आओर फ़ीज बाबुजी रहैथ कीन देने कहै छलाह अपन जमायक एहिना सभ सsख पुरायब यौ मोटरोसाइकिलक सsख अहाँक ओहो जल्दीये कय देता पुरा बस आब दसे हजार रुपैया बचल आरो छैक बचायब यौ बाबुजीक आय छैक बड़ कम खर्चा अथाह अपरम पार यौ तैपर मासेमास भायकेँ पढ़ेवाक खर्चा होस्टल पढ़ायब यौ साल दुई साल तक छैक सेहो दस लाख दान-दहेजक खर्चा वयस बितल जाइत छोटकी बहिन केँ पहिने बिहायब यौ बर हाथ लगैल बेटीक ऐतै करैथ बाबुजीयेक बड़प्पन बुझनुक लोक स्वयं अहाँ छीहै हम गमारीन की बुझायब यौ कहै छी हम बेचि लिय हमर सभटा गुड़िया गहना जेब़र सोन शृंगार नय रहत तेँकि पिया हम उढ़ैर नै जायब यौ हम अहाँकेँ छौड़ि कतय जायब पिया, छौड़ि कतय जायब यौ चाहे मैरि-जैरि आब वा सदेह सिते जकाँ मैटिये समायब यौ "शांतिलक्ष्मी" कहैत छथी यौ अहाँ तिरहुतक सर्वपुज पाहुन और कतैक दिन धरि विदेहक बेटी जाति केँ सतायब यौ ....................वर्ण २४.................. २ विकासक आगु विचार देखियौ कोना खसल जाइत छै लिअ’ लोगबाग आब प्रगतिक पथ चढ़ल जाइत छै बुढ़-पुरान सँ सिनेह-भावक भs रहलै अभाव आब स्थुल माय-बापक निमेराक तँ रीते उठल जाइत छै बुढ़वा-बुढ़िया केँ भिन कs बेटा गप भँजे छथि सुभ्यस्त आब कोवरे सँ गिरथैनि बहराति देखल जाइत छै कोर पोसल स्वपुत जखन भs रहल छै कर्तव्य च्युत भावक धर्मपुत पाबि बुढ़ाकेँ नोर ढ़रल जाइत छै खड़ खड़ जोड़ि जे ठाढ़ केयलनि आश्रम घर गृहस्ती वैह बुढ़ घरसँ निकैलि बृद्धाश्रम ढ़ुकल जाइत छै बुढाक स्वर्ग सिधारैक पसरल छै भोरे सँ घुनसुन मुदा कनना-आरोहैटक आइ लाजो उठल जाइत छै "शांतिलक्ष्मी" हँसै सोचि सोचि चौथापनक अहाँक दुर्गति इहो वयस बुढ़ापाकेँ तँ ओहिना गुड़कल जाइत छै .....................वर्ण २१................ ४.शेफालिका वर्मा पानिक कम्पित लहरि पर , नै रचू अहाँ इतिहास हमर पवन-उर्मिक वेगपर नै रचू अहाँ हास हमर कतेक व्यथा -वाण लागल काल धनुष पर झूलि कऽ सांसक लघु लहरि सिहकौलक संसृतिक फूल कें रेत केर देवार पर ,आइ सजल उजास हमर

चित्र-अंकित रेख मे नहि जीवनक स्पन्दन क्षीण सुधि-दीप ज्योतित कोना स्नेह-वर्तिका आइ अचेतन प्राणक लघु-निलय मे आइ मोन उदास हमर

क्षण क्षण परिवर्तित अग-जग लहरि लहरि मे मौन निमन्त्रण नीरव निःस्वर पल पल अहांक उपहारक दर्शन तुहिन विन्दु सन किसलय अंचल मे झरैत कुसुम तारक सन भाव-हृदय घन श्यामल मे !

भेलौं निःशेष प्रीतिक प्रतीक्षा मे अनलिखल पाती दऽ रहल छी समीक्षा मे एहि अक्षम लेखनी सँ नै लिखू अहाँ तरास हमर काल-पत्र पर छविमान सतत उच्छ्वास हमर पानिक कम्पित लहरि पर नै लिखू अहाँ इतिहास हमर............... ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। १.सत्यनारायण झा २ओमप्रकाश झा १ सत्यनारायण झा धारक कछेर मे बैसल टुकुर टुकुर तकइत छी, तकइ छी एहि धार क’,तकइ छी ओहि पार क’ यैह ओ धार छैक ,?सभक करेज पर छुरी चलबैत छल जवानों क’ दिल धरकबैत छल | एकर जखन जवानी रहैक , कतेक उफनैत छलै ,कतेक फनकैत छलै जेना एकरा आगा कियो नहि छै एकरा डरे कियो सुतैत नहि छल ई कखन की करत ,एकर कोनो ठेकान नहि ? गामक गाम सुन्न क’ देलक , पोखरि,इनार ,गाछी विरछी सभ नाश केलक , ई गामक जेठरैयत छल ,गामक पटवारी छल एकर आगमने सुनि लोक कपैत छल | बाप रे फेर डकुबा एतैक , एहिबेर नहि जानि की करतैक ? समूचा गाम क’ सुड्डाह केलक , घर, आँगन, दलान तोरलक | धीयापूता कलोल करैत छल , भूखे पेटकान धेने ,बेजान रहैत छल | मुदा ,एहि डकुबा क’ कनेको दया नहि ,विवेक नहि , निष्ठुर हिरदय ,कर्कश स्वर ‘ अगिया बेताल छल ,ई धारे नहि, महाकाल छल | कतेक क’ मांग पोछलक ,कतेक क’ लहठी तोरलक| कतेक क’ कोखि उजारलक , ई राक्षसे नहि ,पैघ भक्षक छल | एकर प्रवाह तेज होयते ,लोक सिहरि जाइ छल , केखनो सीधा दौडइत छल ,पाछू घुमैत छल , चक्कर कटैत छल , विकराले नहि ,भयानक लगैत छल | समय चक्र उनटलइ ,एकरो अंत एलइ एकरा बुझल नहि छलैक ,एकरो काल घेरतइक ‘ इहो एक दिन निष्प्राण हेतैक | एकरा करेज पर लोक घर बान्हि देलकै , ई निर्जीव भेल परल ,नगटे ओंघरायल छैक , जतेक पाप केलक ,सभक फल पेलक | एकर हाल भिखमंगनी जकाँ छैक , एकरा देह पर गुदरी लादल छैक , हुक हुकी छैक ,मगर टुकुर टुकुर तकइ छैक हमरे जकाँ , ,जेना हम तकइ छी एखन एकरे जकाँ | २ ओमप्रकाश झा गजल धरल रहि जैत होशियारी, मोटरी बान्हने की हैत। जखन टूटल अछि केवाडी, यौ ताला भरने की हैत। नीमक पात तर चानन कानै ई कोन रीत रचेलै, जे ई सवार बनल सवारी, नाक रगडने की हैत। केहेन गाछी अहाँ लगेलौं जे भूताहि भेल जाइ ए यौ, बढबै लागै जखन बेमारी, दवाई कीनने की हैत। झरकल मुँह केँ झाँपने नीक होइत छै सदिखन, राखले रहि जैत ई तैयारी, मुँह केँ रँगने की हैत। शीशा महग भेल हीरा सँ "ओम" केँ अचरज लागल, राखले घर भरल बखारी, सगरो कानने की हैत। ------------------ वर्ण २० ------------------- गजल किया एना ई भ' गेल छै देखू उनटा व्यवहार। हर वहै से खढ खाय छै, बकरी खाय अचार। ककरो तन नै झाँपल, कियो आडम्बर छै केने, कियो तरसल बूँद लेल, लागल कतौ सचार। रामनामा ओढि केँ आबै भीतर रखने खंजर, छै जकर मोन दरिद्र, हमरा देलक हकार। महगी केर बाण चलै छै चाम देहक नोचैत, जन-जन ओ बाण सहै भूशायी पडल लाचार। जीबै केर अधिकार छिनायल "ओम" देखू कोना, 'सुनामी' बनि तडपैत मोन मे भरल विचार। --------------- वर्ण १८ ----------------- गजल बालुक भीत  बनल  जिनगी चमकै छै कोना। सुखायल ई  फूल  सम्बन्धक गमकै छै कोना। नकली मुस्कीक  भीड मे  हरायल कतौ हँसी, चिन्ता भरल मुँह पर मुस्की  दमकै छै कोना। पैघ भेल  जाइ छै  मनुक्ख,  झूस विचार भेलै, कर्म-धार  मे हल्लुक  विचार जमकै छै कोना। भ'  रहलै  तमाशा  नाचक  बिना सुर-ताल के, सरगम  कतौ नै  मुदा  पैर  झमकै छै कोना। काठक  बनल  लोक  रहै छै  ऊँच  मकान मे, जे सुनै छै कियो नै किछ, "ओम" बमकै छै कोना। ------------------- वर्ण १७ ------------------ गजल हमर हृदयक कुंज-गली मे विचरैत मोनक मीत अहीं छी। गाबि-गाबि जे मोन सुनाबै सदिखन ओ राग अहीं गीत अहीं छी। जिनगी हमर पहिने कहियो एते सोअदगर किया नै छल, सबटा सोआद अहीं मे छै बसल, मीठ, नोनगर, तीत अहीं छी। आँखिक बाट मोन मे ढुकि केँ प्रेमक घर आलीशान बनेलियै, ओहि घरक कण-कण मे छै नाम अहींक, ओकर भीत अहीं छी। जुग-जुग सँ प्रेमक धार मे अहीं हमर पतवार बनल छी, हमर प्रेमक दुनियाक सुन्नर रंग सबटा आ रीत अहीं छी। "ओम"क मोन केर कोन-कोन मे बसल रहै छै अहींक सुरभि, आब ई जमाना सँ की लेनाई प्रिये, हमर हार आ जीत अहीं छी। ------------------------- वर्ण २४ -------------------------- गजल मिझबै लेल पेटक आगि देखू पजरि रहल छै आदमी। जीबाक आस धेने सदिखन कोना मरि रहल छै आदमी। डेग-डेग मँहगी केर निर्दय जाँत मे पीसल राति दिन, पीयर मुँह बिहुँसि केँ उठौने कुहरि रहल छै आदमी। जनसंख्याक नांङरि कियाक बढले जाइ ए बिन थाकल, फसिलक उपजा कम भेल, सौंसे फरि रहल छै आदमी। स्वार्थक एहन बिहाडि चलल छै आइ मनुक्खक गाम मे, सम्बन्धक झरकल गाछ सँ आब झरि रहल छै आदमी। कहियो हँसीक ईजोर पसरतै "ओम"क अन्हार टोल मे, यैह सोचैत सलाई विश्वासक रगडि रहल छै आदमी। -------------------- वर्ण २२ --------------------- गजल कर जोडै छी सरकार आब रह' दियौ। कते करब भ्रष्टाचार आब रह' दियौ। 'टू जी', चारा, खान घोटाला, किछो नै छूटल, भरि गेल अछि 'तिहाड' आब रह' दियौ। मुखिया बनै सँ पहिने चलै छलौं पैरे, कोना चढ' लगलौं कार आब रह' दियौ। कण्ठ मोकि जनताक कते राज करब, जनता नै छै यौ लाचार आब रह' दियौ। कोना फूसि बाजि अहाँ "ओम" केँ ठकि लै छी, केलियै लाजक संहार आब रह' दियौ। ----------- वर्ण १५ ---------------- गजल घोघ तर सँ चान उगल, अँगना मे इजोर पसरि गेलै। मोन हमर छल बान्हल, किया आइ अपने पिछडि गेलै। मृगनयनी, मोनमोहनी, चंचल नयन सँ प्राण हतल, मुख पर नयन-कमल, जै सुरभि सँ मोन पजरि गेलै। सुनि अहाँक वचन, भ' प्रेम मगन, मोन-मयूर नाचल, प्रेम-बोली तोहर सुनल, इ हृदय नाचि केँ ससरि गेलै। हिय-आँगन, पायल झन-झन, संगीत मधुर छै बाजल, रोकि कोना जे मोन नाचल, नै कहब किया नै सम्हरि गेलै। अहाँक अजगुत रूप देखि केँ, भाव "ओम" रोकि नै सकल, जे किछ छल मोन राखल, कोना देखू सबटा झहरि गेलै। ---------------------- वर्ण २२ --------------------- गजल

किया एना ई भ' गेल छै देखू उनटा व्यवहार। हर वहै से खढ खाय छै, बकरी खाय अचार।

ककरो तन नै झाँपल, कियो आडम्बर छै केने, कियो तरसल बूँद लेल, लागल कतौ सचार।

रामनामा ओढि केँ आबै भीतर रखने खंजर, छै जकर मोन दरिद्र, हमरा देलक हकार।

महगी केर बाण चलै छै चाम देहक नोचैत, जन-जन ओ बाण सहै भूशायी पडल लाचार।

जीबै केर अधिकार छिनायल "ओम" देखू कोना, 'सुनामी' बनि तडपैत मोन मे भरल विचार। --------------- वर्ण १८ ----------------- ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। १. जगदीश चन्द्र ठाकुर ’अनिल’ २.मिहिर झा ३.झा हेमन्त बापी ४.जगदानंद झा 'मनु' १

जगदीश चन्द्र ठाकुर ’अनिल’ गजल 1 कांट-कूस अछि भरल बाट पर जहां-तहां नढिया,कूकुर मरल बाट पर जहां-तहां ।

ए राजा,कनिमोझी आ कलमाडीक युग इ केने छथि सभ दखल बाट पर जहां-तहां ।

हेय दृष्टि सं देखि रहल अछि नर-नारी कें सांढ आ महिशा पडल बाट पर जहां-तहां ।

ऐंठन एखनहुं धरि ओहिना के ओहिना अछि जौड कते अछि जडल बाट पर जहां-तहां ।

खोपडी ठाढ छलै अनगिनती,बिला गेलै ठाढ भेल अछि महल बाट पर जहां-तहां ।

बूझि पडैये जीत गेल छथि पुत्र पिता सं रंग बहुत अछि उडल बाट पर जहां-तहां ।

आइ हजारो अन्ना केर आवश्य्यकता अछि सत्य बहुत अछि गडल बाट पर जहां-तहां ।

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अपने छी एत्त’आ मोन कतहु टांगल अछि जानि नहि देख’ ले’ की की सभ बांचल अछि ।

सभठां बिलाइ छै आ सभ ठाम रस्ता घूरब कतेक बेर सभ बाट काटल अछि ।

कर्जा पर कर्जा आ रसगुल्लाक भोज ओझा बताह आ कि भरि गाम पागल अछि ।

मुंबईमे बेटा आ दिल्लीमे कनियां बूढ मोन दूटा हजार ठाम बांटल अछि ।

जीवकान्त,गौहर,वियोगी,विहंगम देखू असंख्य फूल मालामे गांथल अछि ।

गाम-गाम देखू ई दृश्य महाभारतक शतरंजक खेलमे सभ हाथ बाझल अछि ।

जहिया समयलीह सीता एहि धरतीमे तहिया सं धरती हजार बेर फाटल अछि । २ मिहिर झा चक्रव्यूह :

निर्विकार निराकार उन्मुक्त पदार्थ रंग रूप जाति सों विमुक्त यथार्थ मनुष्य हमरा कहै प्रेत हम घुमै छी खेते खेत |

भेल एक टा ज़ोरगर प्रहार जन्म लेलहु करैत चीत्कार देव ! जखन उठाएल मूह देलहु हमरा ई चक्रव्यूह

पढ़ल लिखल भूजा फाँकी पहिल व्यूह टूटल पेट झाँकि हन्सैत छल सुनि हमर कथा के बूझत मोनक व्यथा ?

व्याह भेल परिवार भेल उत्तरदायित्व साकार भेल बन्लहु हम कोलहुक बरद कोनो कष्ट आब की गरत तोड़ल दोसर व्यूहक् तार हे भगवान लगाऊ पार |

धीया पुता पढि लिख गेल व्याह दान सों फ़ुर्सत भेल राम राम हम पढि रहल छी अंतिम व्यूह सों लड़ रहल छी  फेर सों आब हम भेलहु चेत  भनहि छलहू हम बनल प्रेत | १ झा हेमन्त बापी झा हेमन्त बापि १ धिया सुइन सौसे घर मचल कोहराम सन्न भ रैह गेलौ सब ठामे ठाम सुनाइ परल घर जनमली धिया हमरे घर ऐला अभगली कीया

नै बटल मिठाई नै केलौ दान माथ पकैर कहलौ हे भगवान कोन जनम के पाप की कैलौ तकर फ़ल हमरा आहाँ दैलौ

दैतहुँ पूत जे संगइह रहैयत हमर बुढ़ाढ़ी के ठेंगा बनैत् इ कि देलौहु जिनगी के झर् पराय जयत जे अनकर घर

तिलक दहेज लेल टाका जोगाउ या एकरा इस्कुल पठाउ कतबो इ पढ़तै लिखतै चौका चल्हा त करहे पड़तै जै स रहै छ्ह्लौ परयल सेहै हमर माथा बथाइल् सदिखन इज्जत के रे सोची बेर बेर माथा हम नोची

सुनु आब बापि के रे विचार तजु मोन स घिनयल वीकार् पूत एक कुल के दिपक होइये बेटी दु कुल के इजोत करैये

खोलु मगज आ करु विचार कनि जौ जुग नै रहैत जनि त हम आहाँ कोन क रैह्तौ स्रिश्टी केर कि कल्प्ना कैर्तहु

जै हिन्द जै मिथिला ज्ऐ मैथिल जै मैथिलि २ की कहु सैद खन समय परा रहल ऐछ नै बन्हबाक कोनो जोगार आब नै काटल कइट रहल ऐछ जिनगी बनल पहाड़

ज धैर छ्ल समङ्ग देह मे नै केकरो गोहरेलौ खसल सरीर जे आएल बुढ़ाढ़ी निज घर स बहरैलौ

दुःख स माथ पकैर कनै छी केउ नै नोर पोछैया जेकरा हाम बजनाइ सीखेलौ ओ देख दशा हांसैया

बड़का बौआ कहैथ जोर स किछु नै आहाँ बुझै छी मंझिला,छोटका दुत्कैर रहल ऐछ नै जानै कोन जिबै छी

पोता पुतोहु नै आब टेरैया केउ घुइरो क नै ताकाइ कुहैर कुहैर क जीब रहल छी प्राण नै निकसै केहु बाटे

नै सुझबाक ,नै सुनबाक दुःख नै दुःख एतबे मोन होइए जिनक लेल जिलौ जिऐलौ सेहे अप्पन फ़ास बुझैए

चाईर पान्च धिया पुता के म्या बाप् सहज सुलभ पलै ऐ मुदा सब मील जुइल क म्या बाप के नै रखै ऐ

कहै बापि जैनि करु एना अहुँक समय आबै ऐ ईहो जुग मे जे जेना करै ऐ तेहने फल पबै ऐ झा हेमन्त बापी ३ अभिलाशा

सौसे घर चहैक रहल छै , सब के मूख पर नव उल्लास। मुदा ओ दुखनी बुढ़िया कोन मे, बैसल मूहँ लटकोने भेल उदास्।

आय ओकर पोता के मुंडण, ओकरा केउ नै पुइछ रहल छै। घर के सब जन खा पी उठल, ओ अप्पन बेरक बाट जोहि रहल छै।

देख कै गरम कचौड़ी तीमन, भ गेलै दुखनि के मोन अधीर। सोचलक डेग बढ़ा ल लै छी, अपने सॅ कनि पुरी खीर।

जखने हाथ सॅ उठबै लागल, दू टा पुरी सेरायल। तखने चिकरैत पगहा वाली, दौड़ल आयल हनहनायल।

देखियो सेखी चटोरी बुढ़िया के, कैनको लाज नै आबै छै। पाहुन सब लेल बनल पुड़ी सॅ, खाइ ले कोना चोराबै छै।

कतए गेलौ यो देख रहल छी, अप्पन माय के करतुत। कनिञा के हाँ मे हाँ मिलेला, सोन सनक ओ पूत।

गट्टा पकैर क पगहा वाली, दुखनि के खिचैत ल गेल। पछुऐत बनल कोठली मे ल जा, दुखनि के बन्द क देल।

पछता क बुढ़िया काइन रहल ऐ, इ भूल किए कएलो। पहुन सब लेल बनल भोज मे, अप्पन हाथ लगएलो।

पगहा वालि जे केलक , तेकर नै मोन मे अघात। सोईच नोर के धार बहैया , किया बौआ नै देलक साथ।

बूढ़ छी, बुद्धी हरा गेल छल, तईयो एना नै कऽरैत्। सभक लॅग किया बेजती कएलक, असगरे मे बुझअबैत।

किछे देर मे मोन ठंढेतै , आयत बजआबऽ हमरा। कहत चलै माँ मुंड़न देखऽ, नै जएबै आ करबै झगड़ा।

मान मनौअल खुब्बे करत, तखने संगे जएबै। देखबै मुंडन गेबै गीत, आ मोन भैर आशिश देबै।

सोइच , पुरनका कोना मे धरल , खोललक जा कऽ पेटी। बान्हल पोटली ओहि मे सॅ काढ़लक , खोललक ओकर गेंठी।

बाजल देब अपन पोता के ,लऽ सोना के सिकरी हाथ । देख सब के सेहन्ता हेतै , बैसऽरतै पैछ्ला बात।

सोचैत-सोचैत दिन बितल ,नै बौआ नै आयल समाद। कछ्मछ दुखनि करए लागल, सांझक दीया बाती बाद्।

सोचलक काज के घर छै, परल नै होएतै मोन्। अपने ज आशिश दऽ आबै छी , चलल हाथ धऽ सोन।

लटपटायत केहुना डेग बढ़ोलक , आङान दिस ओ जखने। पगहा वालि फेर नै मारै , सोइच घुरल ओ तखने।

कनि काल तऽ कलमच बैसल , फेर लागल चहुँ दिस ताकऽ। कतौ केउ नै सुइझ परलै तऽ , पऽइर रहल केथरि पर जा कऽ।

बाट जोहैत-जोहैत केहुना , आधा राइत त बितल। हारल थाकल नैन बन्द भेल ,जे रऽहे नोर सॅ तीतल।

दु दिन के बद जखन सबके , कोनो चीजक दुर्गन्ध लागल्। पछुऐत दिस सॅ आइब रहल ऐ , ओम्हरे सब केओ भागल्।

पहुँच जखन सब केओ खोललक, कोठली के केवाड़। परल चीर निन्द्रा मे दुखनि, देह लुधकल चुट्टी केर धार्।

अखनो बाट ओ जोहि रहल ऐ, लऽ सोना सिकड़ी हाथ। केउ बुझलक केउ नै बुझलक बापी, दुखनि मोन के बात।

४ दानव

जगदम्बा सॅ उपजल धरती बनल निठुर आ भऽ गेल परती फाईट रहल मिथिला के करेज जनमल एहि ठाम असुर दहेज घरे घर पैस गेल इ दानव हैवान बनल मिथिला केर मानव घरे सॅ धूआँ उड़ा रहल छी बेटी सन पुतोहु के जरा रहल छी नित बहिन बेटी के बलि मंगैया कते के खा गेल मुदा एकर पेट नै भरैया हाम सब एकरा खुआ रहल छी घरे मे राछस पाईल रहल छी अनका स कहै छी एकरा त्यागू अपना बेर मे सभ सॅ आगू पहिर लेलौ निर्लज्जक भेश बेटा के बुझै छी नगदी कैश काईन रहल मिथिला केर धीया ई धरती पर जनमलौ कीया बैन गेलौ घऽरक अभिशाप परल सोइच मे भाई,माँ, बाप एकरा जे सभ बढ़ा रहल छैथ मिथिला के ओ सभ जरा रहल छैथ कैऽह दै छी ई नै आब परायत एक दिन अहुँक घर जरायत दिने दिन ई बढ़ले जाइ ऐ सुरसा जेना मुहँ फारने जाइ ऐ आकार एकर भै गेल अनन्त मिथिला सन्स्कारऽक कऽ देलक अन्त किरिया ऐ एकरा सॅ सब जूझू अनकर वैदेही के अप्पन बूझू सभ गोटे करु एकरा सॅ परहेज भगवती सप्पत नै लेब आ नै देब दहेज "बापी" आबो सब चेत जाउ आउ सब मिल इ दानव के बैलाउ फेर घरे घर अएती माँ सीया धन्य बुझब जे घर अएती धीया २ जगदानंद झा 'मनु', पिता- श्री राज कुमार झा, जन्म स्थान आ पैत्रिक गाम : हरिपुर डिहटोल ,जिला  मधुबनी, शिक्षा :प्राथमिक -ग्राम  हरिपुर डिहटोल मे, माध्यमिक आ उच्च माध्यमिक -सी बी एस ई, दिल्ली, स्नातक -देशबंधु कालेज ,दिल्ली बिश्वविद्यालय कविता (1) कथा अमर अपन मिथिला कए कथा अमर अपन मिथिला कए एकरा   जुनि    बिसरू   | समस्त बिहार  मैथिलीमय हुए आब  ओ  दिन   सुमरु  || बहुत पिसेलौंह सत्ताक  जांत  में आब  जुनि  पिसल  जाउ | बहुत पछुएलौन्ह  पाँछा चैलकए आबो आगु   डेग  बढाउ || निरादर किएक मायक भाषा कए एकरा  जुनि  बिसराउ  | आबो   जागू होश  सम्हारु मैथिलि   कए  बचाउ  || उठू  सुतल सिंह  जगाबु अपन स्वाभिमान  कए | आसमान सs ऊँच उठाबु अपन मिथिलाक पहचान कए || *** जगदानंद झा 'मनु' ------------------------------------------------------- (2) मिथिला स पलायन खेत -खडीहान  उजार  भेल     सबटा मिथिला हमर आई बेगार भेल सबटा| नहि  गामक हाट  ओ नहि कुजर्निक हक़ ओ नहि ककाक ठाठ  ओ मिथिलाक रित     हेराय  गेल सबटा| नहि  बजैत  पैजनियाँ नहि बाबी कए खेलौनियाँ बाबा कए लाठी हेरायगेल सबटा मिथिला हमर आई उजार भेल सबटा | पेटक         आइग     में आधुनिकता कए खाई में बेरोजगारी   कए है    में मिथिला हमर आई पलायन भेल सबटा मिथला हमर आई उजार  भेल   सबटा | *** जगदानंद झा 'मनु' -------------------------------------------------- (3) धन हमर मिथिला जुनि  हमरा  चाहि,  धनक   गठडिया | दए दिय हमरा,हमर माटी कए पुडिया || लए लियअ हमरा सँ,हमर कमायल धन | धन  हमर  मिथिला, माटी   एकर  धन || मायक आँचर सँ,हमर मिथिलाक धरती | पायब एहन  कहु, दोसर  कतए   धरती || दूर भए कए बुझलौंह, मोल एकर हम  | कि थिक हमर, आ  कि   एकर   हम   || जाहि आँगन  में,  जनमलौंह  खेलेलौंह | दाबा पकैर  जतए, चलब हम सिखलौंह || आई ओही आँगन सँ,एतेक दूर भएलौंह | कचोतैए मोन कए,दर्शनों  नहि कएलौंह || ४ ऐ सुंदर-सुंदर कनियाँ , अहाँ के बाजे बर निक पैजनियाँ | ई झुमकी,लाली,बिंदियाँ,चम्-चम् चमके अहाँ के ओधनियाँ||

कनियों त संभारू अपन, ओ मुस्की चौबन्नी बाली | नै त ल लेट हमर जान , ऐ कनियाँ -झिट्की बाली ||

ई कल्पतरु सन बिखरल , मनोहारी कंचन-वेश | बिषधर सँ बेसी मादक , ई सुंदर अहाँक केश ||

रहितों जे हम कवी , रैचतौ बरनिक कविता | बस मोने -म़ोन देखै छी, हम अहाँक छबिता || ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। .शिवशंकर सिंह ठाकुर २.अमित मोहन झा १. शिवशंकर सिंह ठाकुर रुबाइ ठोर स ठोर सटे ज़ाम टकराई अछि, नैन स नैन मिले,प्रेम कहाई अछि , दूर स हुनका जे देखलौंह एक बेरि, ने हुनका सुधि रहल ने हमरा सुधि रहल , गजल

किये रूईस क चईल गेली ओ हमरा स , कोन अपराध जाने भेल हमरा स ,

कत चईल गेली जिनका हम चाहई छलौंह , नेह लगा क रूईस गेली हमरा स ,

जिम्हर सँ जाई छि देखै छि हुनके हम , मोनक आशा ओ छीन गेली हमरा सँ ,

छाती पर पाथर हम राखि क चलई छि , हमरे जान छीन क ल गेली हमरा स,

भूख ने प्यास ,ने नींद लगईया, हमरे चैन ओ छीन गेली हमरा स ,

हुनकर प्रेम नस -नस में रमल अई , की करू आब,हारि गेलौंह अपने स ,

फुसिये हम मोन के रहि-रहि पारतारय छि, प्रेम बिना हम निरसल छि अपने स ,

राईत - दिन तरपई छि मिलय लेल हुनका स , ओ छथि जे हमरे नीन चोरा ल गेली हमरा स ,

कतबो कहै छथि शिव शंकर जे मानि जाऊ , हमरे 'प्रेम' चोरा लेली ओ हमरा स , २. अमित मोहन झा ग्राम- भंडारिसम(वाणेश्वरी स्थान), मनीगाछी, दरभंगा, बिहार, भारत। हमर प्रेयसी काश हम कविता बनि पबितहु, अहांक उर के छू पबितहु, बनि भ्रमित भ्रमर अहांक यौवन के, लव पंखुरी पर छा पबितहु । अहांक आँखिंक काजल होईतहु, अहांक पलक पे बसि पबितहु, ओइ नीला मान सरोवर के, ओ श्वेत हंस हम बन पबितहु । अहां प्रेम काव्य के मूरत छी, रति कामदेव के सूरत छी, वाणी मे वीणा वास करे, हर एक कला स पूरित छी। देख अहांक छम से चलनाई, वन के हिरनी शर्मावैत अछि, यौवन घट एना छलक रहल, जेना घटा उमर कय आवैत अछि। श्यामल मुख पर झिलमिल बिंदिया, लय चोरा गेल नैनन निंदिया, लय कपोल पर वो खनक हंसी, अहां बनि गेलौ हमर मनबसिया। हमर श्वेत धवल मन मंदिर मे, अहां सुर-सुरम्य अहां वीणा छी, एही श्यामल सुंदर यौवन के, हे मानिनी हम ते याचक छी। अधखुला केश के  देख देख, सावन की घटा शर्मा जायत , अहांक नैनक काम वाण, हमर हृदय तरसा जायत। अहांक कदम के चूमि चूमि, निर्जीव धरा अति हर्षित अछि, अहांक मोहिनी छवि देख, ऋतु वसंत शर्मिंदित अछि। कारी लट अहाँ बिखरा जाउ, घनघोर घटा सन अहाँ छा जाउ, क्षुधित अंक मे प्रेम से लय,, प्रेमक सावन अहाँ बरसा जाउ। अधरक ओ सुधा पिलाबु ने, नैनन से नैन मिलाबु ने, अपन अहाँ सर्वस्व सोंपि, हमर अस्तित्व मिटाबु ने। प्रेम भाग्य के बनि रेखा, हमर हाथ मे अहाँ छा जाउ, बन प्रेम पथिक हमर राधा, “अमित” हृदय मे अहाँ समा जाउ। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। १. शिवशंकर श्रीनिवास २.विकास झा रंजन ३.जगदीश प्रसाद मण्डल ४. मुन्नाजी हाइकू ५. रामबिलास साहू- टनका १ शिवशंकर श्रीनिवास दूटा गीत १ रोटी भातक नै छै पत्ता अगबे हर-हर गीत। इमान मुखौटा लगा बहादुर लऽ रहल छै जीत॥ औ जी बुद्धिक छै बलिहारी। कहै छै दूध, मुदा छै ताड़ी॥ जतहि हथौरब कतहु किछु नै अगबे चाले-चाल। छुच्छ हाथमे कतहु किछु नै जिनगी भेल बेहाल॥ पेपर लिखै बम- वम वम टीबी नाचै छम छम छम औजी अद्भुत छै अपियारी। कहै छै दूध मुदा छै ताड़ी॥ करौछ छिपाओल गरम पानिमे कऽ रहल छै छनाक-छनाक हूले- ले ले, हूले- ले ले भऽ रहल छै दनाक-दनाक औजी अद्भुत छै बुधियारी। कहै छै दूध मुदा छै ताड़ी॥ २ आउ श्रमिक जन आउ। अपन गाम घुरि आउ॥ कनियाँ औती बच्चा आओत जागत गामक प्राण॥ आउ श्रमिक जन आउ। अपन गाम घुरि आउ। नव ज्योति जे छिटकि रहल अछि ओकरा आनू खेत नदी पानि जे छै बौआयल ओकरो मोरू रेत महमह चास वासमे प्रातीक सूनब टान। आउ श्रमिक जन आउ। अपन गाम घुरि आउ॥ अहाँ बिना ई गाम उदास कानै रन्ना माय दूध भात के अङना खेतै कनने चन्ना जाय। अहाँ आयब तऽ ठुमकत आङन हँसता मामा चान आउ श्रमिक जन आउ अपन गाम घुरि आउ सुकरातीक आङनमे अरिपन फेर लिखेतै। आँचर तर हे दीप नेह दुलारल जेतै॥ वासमती आ जलबा गमकत लौकत मड़ुआ धान। आउ श्रमिक जन आउ। अपन गाम घुरि आउ॥ २ विकास झा रंजन गजल हमर घरक भीत लाईग छोट सन बाट बाटक ध कगनी हुनक ताकि हम बाट

चान सुरुज देखि देखि घोर भेल नैना जिनगीक चान आई उगती ई बाट

हसोथब कोना हुनक रूपक इजोत के टहाटही अभरत आई इजोर ई बाट

हमरे सन हुनको भेल हेतैन धकमकी देखि देखि इ सब मुसुकी देत ई बाट

हुनके गछेर हम कह्बैन निजगुत जरे जरे काटब जिनगीक ई बाट ३ जगदीश प्रसाद मण्‍डल जगदीश प्रसाद मण्‍डल कवि‍ता- सान-धार-धारा अबैत जखन मनुखमे सान शानसँ चलए लगैत। एक दोसरमे सान चढ़ा परि‍वारक शान बनबए लगैत। चढ़ि‍ते सान परि‍वारमे बर्खा-बून बनि‍ धरि‍याए लगैत धरि‍आइत-धरि‍आइत धरि‍आ, धारा बनि‍ धड़धड़ाइत चलैत। अपन-अपन माटि‍क रसे अपन-अपन सभ धार सजबैत, संग मि‍लि‍ चालि‍-चलैत नीक-अधला रहए बनैत-बि‍गड़ैत। जइ बर्खाक जेहन बून तेहन से बनबैत धार धार मि‍लि‍ धरा धार अपना गति‍ये बदलैत धार। जे धारा सृजए गंगा कमला कोसी ओ महानन्‍दा ओ धार कहि‍या धरि‍ ठमकि मानैत रहत फंदा? ४. मुन्नाजी हाइकू १ पजेबा काँच ठीकाक मकान भसैक गेल २ पीड़ित नारी प्रमोशन रुकै नै तेँ मुँह बन्न ३ नोकरी नीक भीतरमे गञ्जन एयर होस्ट ४ हाक सूनल मारि खेबाक डरे नै बचौलक ५ भोगने बिना जीवनक दर्शन सत्यसँ दूर ६ अग्नि पीढ़ीमे होहल्ला भेल बेसी काजमे शून्य ७ मैथिली मध्य ओलि वसूलीकेँ समीक्षा बुझू ८ जाति पातिक भेदभाव घटल समरसता ९ इलाज भेल हास परिहाससँ एक माध्यम १० आब अछि नै जीवनक विक्षोभ कमौआ लेल ५ रामबिलास साहू किछु टनका 30. पान मखान ि‍मथि‍लाक सम्‍मान धानक खान जनकपुर धाम ि‍मथि‍लाकेँ प्रणाम। 31. पढ़ैत सुग्‍गा कहैत राम नाम ि‍पंजड़ा बन्‍द रहैत छै गुलाम अछि‍ संत समान। 32. सँाच बजैत जग मारल जाय झूठ बजै तँ जगत पति‍याय नै छोरू सँाच बानि‍। 33. नीमक गाछि‍ सुतल रही खाट सपनैति‍ छी चलि‍तो पछताति‍ नदी तटक बाट। 34. दु:खक बात नै कहि‍यो ककरो सुनि‍ हसँत हानि‍ करत मान नै ि‍मलत सम्‍मान। 35. जीवन दैत जल जीव जन्‍तुकेँ शीतल चँाद चँादनी िछटकैत शोभा छै धरतीकेँ। 36. आमक डारि‍ झूला झूलैत राधा कृष्‍ण पुकारै संगे-संग झूलव वृन्‍दावनक झूला। 37. पानक पात मखानक प्रसाद स्‍वर्गक बास नदी तटक चास नै होएत वि‍श्‍वास। 38. मायक गोद धरतीकेँ बि‍छौना फूलक सेज सुख पाबै बेजोर नै ि‍मलै परलोक। 39. बँासक वंशी स्‍वर बजै मधुर माया पसारै स्‍वर छै अनमोल सुनै सभ वि‍भोर। 40. कारी काजर मुखड़ा ि‍बगारैत कारी कोइली मधुर गीत गबै सभकेँ ललचाबै। 41. चँादनी राति‍ कहै मनक बात प्‍यासल प्रेमी प्‍यास बुझाबै राति‍ दि‍लसँ करै बात। 42. देव धर्मसँ उपर माय-बाप तीर्थक खान धरती माता अछि‍ हि‍न्‍दुस्‍तान महान्। 43. मान घटै जँ ि‍नत्‍य जाय सासुर मान बढ़ै जँ करै अति‍थि‍ सेवा सेवासँ ि‍मलै मेवा। 44. कालक मुँह खुलल छै ि‍वशाल क्रमश: सभ समाय बचै नहि‍ कोय एहि‍ चक्रसँ। 45. चमेली फूल गमकै ि‍दन-राति‍ गजरा बनि‍ देवौकेँ नहि‍ चढ़ै नारी सजाबै केश। 46. कमल फूल ि‍बराजै लक्ष्‍मीजी सुख शान्‍ति‍ दै अन्‍न, धनसँ भरै सभक छै कल्‍याण। 47. सावन मास जलक बुन्‍न पड़ै आसमानसँ बेंगक बाजा बजै खन्‍ता डबरा भरै। 48. पानि‍क बुनन मोतीसँ महग छै मोतीसँ नहि‍ ि‍मटै भूखक रोग पानि‍ ि‍जनगी दैत। 49. मैथि‍ली भाषा मौध सन मधुर जे नहि‍ पढ़ै वो बाजि‍तौ लजाय पावै पढ़ि‍ते मान। 50. मौध मखान रेहू माछक खान पानसँ मान पाग सँ बढ़ै शान ि‍मथि‍लाकेँ ि‍नशान ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। . अन्जनी कुमार वर्मा २.विनीत उत्पल १ अन्जनी कुमार वर्मा १ ओजक भोज ,,,,,,,,,,,,,,, इ आत्मीयता थिक मृगमरीचिका जाहि पाछु आम लोक सदृश स्थिति कें खुआ रहल छी ओजक भोज झाँपल हाड़ भ गेल बहार वसन तर सं द रहल अछि देखार इ कर्तव्यक द्वार ,केयो नै पाबैछ पार गलब अछि सहज मुदा स्वर्ण बनब कठिन इ सम्बन्ध अछि अनंत इ आत्मीयता अभिन्न.... २ दुई गोट भूख ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,, खसि गेलैक-ए आँखिक पानि आब लोक चौबटिया पर बेच दैछ अप्पन अस्तित्व , खोलि दैछ नीबी-बंध कियैक तs पेटक होम कुंड मs देबय परैछ आहुति ... बढ्ले जा रहल अछि दिनानुदिन अनंत दिशा में वासना केर भूख वासनाक भूखल किनी लेछ रोटीक लेल छटपटाइत लोकक अस्तित्व लोक में आब कोन वृत्ति आबि गेल अछि दानवी , पाशविक आ की कोनो तेसर ...... एकर वर्गीकरण करब अछि असंभव दुवs भुखक सम्बन्ध भs गेल अछि अन्योन्याश्रय ..... ३ समस्या ,,,,,,,,,, आबक लोक की करत बसंतक अनुभव की सुनत कोइलीक गीत की घुमत पुष्प वाटिका में , कपार पर राखल करिया पाग कए उघैत - उघैत बनल रहैछ बताह नहि पाबि सकैछ थाह नहि सुति सकैछ सुख सं नहि बाजि सकैछ दुःख सं गोंताह पानि में डूबल रहैछ कंठ धरि छटपटाइत रहैछ, बऊआयत रहैछ मन सपनहूँ में देखैछ सदिखन दुःख धंधा घेंट में लागल फंदा , नहि रौदक चिंता अछि,नहि पानिक मात्र चिंता अछि सबकें अप्पन पेटक फंदा लागल घेंटक .... ३ विनीत उत्पल तात-तात औ तात, सभ दिश अछि भ्रष्टाचार देखै छी के राजा के रंक, सभक यैह अछि शिष्टाचार देखै छी

घूस दियो, घूस लियो, घूस पिबू,घूस  खाइ जाउ यौ घूस अछि हमर ब्रहम, ई अछि सदाचार देखै छी

घूसं ब्रह्मा, घूसं विष्णु, घूसं देव महेश्वरः सुनै छी घूसं जीवन आ मरणं, इत्तेक छी हम लाचार   देखै छी

हाय पैसा, हाय पैसा, सभ किछु अछि पैसे-पैसा  किए ई धर्म करू, कर्म करू, छोडू ई सभटा दुराचार देखै छी

आजुक कालमे व्याकुल उत्पल कहि रहल   अछि  नीक काज नै करब, नाम पर होयत मूत्राचार.  देखै छी ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। १.डॉ॰ शशिधर कुमर २ नवीन कुमार "आशा" १. डॉ॰ शशिधर कुमर, एम॰डी॰(आयु॰) – कायचिकित्सा, कॉलेज ऑफ आयुर्वेद एण्ड रिसर्च सेण्टर, निगडी – प्राधिकरण, पूणा (महाराष्ट्र) – ४११०४४ पूणा – प्रवास (‍१) (कविता) मिथिलाक  माटि सँ दूर एतए, यौ अहाँ पुछै छी केहेन लगैए । त्वरित वेग, पर एकरस जिनगी, पुरिबा – पछिबा बुझि ने पड़ैए ।। की  बसन्त – बरसात – घाम, सभ एक्कहि रंग मधुमास लगैए । की आयल, की गेल, से नञि कहि, शरद – शिशिर – हेमन्त बितैए ।। सौ - सौ उर्वशि - रति - मेनका, आँखिक  सोझाँ  सदा  रहैए । रुचिर प्रकृति - मनोहर - सुन्नर, नन्दन - वन सन रोज हँसैए ।। मुदा तदपि नञि जानि एतऽ किए, हमर मोन, मिसियो ने लगैए । ओ मिथिला – भू याद  आबैतछि, मिथिला – भाषा  कहाँ  भेटैए ?? पूणा – प्रवास (‍२) (कविता) जे देखल, से कहि ने सकै छी । बिनु कहने, चुप रहि ने सकै छी । की पूणे नगरी छी रे भैय्या, दूरहि देखि कऽ कहि ने सकै छी । जे देखल,  से कहि ने  सकै छी ।। देव मानि,  आदर्श  बुझै  छी । जकरा हम सब नित्य पुजै छी । इन्द्रक कृत्य कतोक देवमय, निज जीनगी अनुसरि ने सकै छी । जे देखल,  से कहि ने  सकै छी ।। भोरक सूर्य - शान्त ओ सुन्नर । दूरहि,  चान - तरेगन  सुन्नर । लऽग सँ कक्कर दृश्य केहेन की, कोना कहू, किछु कहि ने सकै छी । जे देखल,  से कहि ने  सकै छी ।। पूणे - नगरी, विद्या केर नगरी । बहुत पैघ  बान्हल  तेँ  पगरी । नहि फूसि एकहु आखर एहि मे, ओहो विद्या , जे ने वरणि सकै छी । जे देखल,  से कहि ने  सकै छी ।। चकोरक उक्ति चानक प्रति (कविता) हे  चान !  अहाँ  धन्य  छी । हमर मृत्यु पर प्रशन्न छी । अहँक हृदयहीनता सँ, हऽम अवसन्न छी । हे  चान !  अहाँ  धन्य  छी ।। जिनगी भरि रटलहुँ हम, अऽहीं केर नाम । मनमे  अऽहींक  छवि,  बसल  अभिराम । की हम कहू , अहाँ पाथर अनमन्न छी । हे  चान !  अहाँ  धन्य  छी ।। अहीं  हमर  इच्छा,  अहीं  हमर  काम । अहीं  हमर  काया,  अहीं  हमर  प्राण । हम तऽ अहाँक, छद्म रूप देखि सन्न छी । हे  चान !  अहाँ  धन्य  छी ।। अहीं केर वियोगेँ,  हम त्यागै छी प्राण । अहँक ठोर निष्ठुर,  छिड़ियाबै  मुस्कान । सोचि रहल छी, अपनेँ पाथर प्रणम्य छी । हे  चान !  अहाँ  धन्य  छी ।। अहाँ  सपनहि मे  आबै छी, आयल करू (गज़ल) अहाँ  सपनहि मे  आबै छी, आयल करू । मोन सपनहि मे  क्षणिकहु, जुड़ायल करू ।। हम चाही ने आओर  किछु, अहँ सँ प्रिय । अहँ बनि कऽ गुलाब, मुस्किआयल  करू ।। पाबि सकलहुँ ने अहँ केँ जदपि हम प्रिय । अहँ ओहिना,  कौमुदि केँ  लजायल करू ।। अहँ  दूरहि  रही,  अहाँ  अनकहि  सही । दीप   प्रेमक   हमेशा,   जड़ायल  करू ।। प्रेम  प्रेमहि  रहत , ओ  मेटा ने सकत । अहँ चाही तऽ  सपनहु  ने  आयल करू ।। प्रेम  मोनक मिलन, नहि  कामक सदन । अहँ जाहि ठाँ छी,ओहि ठाँ फुलायल करू ।। २.नवीन कुमार "आशा" दफ्तर दफ्तरक सब के खसता हाल जखन पहुँचब बुझु हएब हलाल . दफ्तरक चक्कर बड खराब ,ओतय ने अछि कोनो जवाब .. जँ अहा छी बड जल्दीमे ,स्वागत करियौनि नकदी सँ .. ओतय चलए सब तरहक रेट ,सब कियो लै छथि अलग सँ भेट .. बरका होथि वा छोटका सभकेँ दियौन टटका जँ करबनि सिनाजोरि  हेत काज मे देरी... देख ओतुक्का नजारा  चढल हमरा पारा, बुझितय ओकर इलाज  पर हमरो तँय छल काज.. मोनमे आएल सबक सिखाबि ,फेर आएल याद . जँ हिनका सब सँ करब सिनाजोरि तँ होयत काजमे देरी कि करतै बेचारा आशा नै छलै आर कोनो आस . .जेबीसँ निकाललक टाका आ करा देलक ओ निर्गत ... कनिको ने सोचलक ओ जँ ऐकरा देब बढावा  तखन तँ चढबै पड़त चढावा.. दफ्तरक  ई हाल ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। १.रामदेव प्रसाद मण्‍डल ‘झारूदार’ २. नवीन ठाकुर १ रामदेव प्रसाद मण्‍डल ‘झारूदार’, मैथिलीक पहिल जनकवि आ मैथिलीक भिखारी ठाकुर रामदेव प्रसाद मण्‍डल ‘झारूदार’क गीत आ झारु। झारू भाि‍ग गेला अंग्रेज अकेला। छोरि‍ कऽ पाछू ढेरो जाि‍त॥ कर रंगदारी वसुल रहल अछि‍। मारि‍ मारि‍ कऽ सभकेँ लाति‍॥ गीत (1) लोभी लालची कामी क्रोधी। भूमि‍ भरल दूर-दूर हौ॥ बाजह हौ काका केना कऽ हेतह। देशक गरीबी दूर हौ॥......2 हाथ कड़ोरो काम जे कैरतै। सोनसँ खजाना भैरतै॥ घर बैसल घरघुसरा बैनि‍ कऽ। कला कौशल मजदूर हौ॥ बा.... व्‍यर्थ बैसल मानव संसाधन। हाथ पैर मेंहदी आँखि‍मे आजन॥ भरि‍ दि‍न चौकपर तास खेलै छै। और मचबै छै हुर‍ हौ॥ बा.... सी.ओ, बी.डी.ओ, सरपँच मुखि‍या। धरतीपर सभसँ ई दुखि‍या॥ फँड कोना सभ हम्‍मर हेतै। हरदम भाजै भूर हौ॥ बा.... शान्‍ति‍ सभकेँ दँात काटै छै। एक दोसर लऽ दुख बाँटै छै॥ अपने भायकेँ लहु चाटै छै। बनि‍ कऽ महि‍षासूर हौ॥ बा.... काम-क्रोध और लोभ भरल छै। आगि‍ अज्ञानमे सभ जड़ल छै॥ आम जानि‍ कऽ सभ रोपै छै। गजड़ा काँट बबुर हौ।। बा.... सूस्‍त परल छै राजक कर्मी। सेवामे बर्तै छै नर्मी॥ सत् कर्मकेँ सभकोई छोड़ि‍‍ कऽ सुखसँ भेलै दूर हौ।। बा.... राजकोषपर नजर गरल छै। हथि‍याबक लोभ भरल छै।। हम्‍मर की कर्तव्‍य बनै छै। ज्ञान हि‍नकासँ दूर हौ॥ बा.... जाति‍ धरम मानवता भेदी। लोग बनल सभ अही‍ केर कैदी॥ धरम आगि‍मे जड़ि‍ ई जनता। बनि‍ गेल छह सभ क्रुड़ हौ।। बा.... धरम इमानसँ लोग छै वंचि‍त। काम क्रोध और लोभ छै संचि‍त।। नि‍ष्‍ठा नीति‍ मानवताकेँ। जड़ा तापल केर घुर हौ।। बा.... अन्‍धविश्वास छै सभकेँ धरने। कुरि‍तीसँ घर छै भरने।। अज्ञानक अग्‍नि‍मे जड़लै। सबहक करम कपुर हौ।। बा.... वोटक खाि‍तर आजुक नेता। मारै छै चानी केर जूता॥ कुछ पापी तँ वोट बेच कऽ। खाधि‍ खसल छै जरूर हौ।। बा.... गप्‍पे-गप्‍पमे लफड़ा बढ़लै। शाशक सि‍रपर टेन्‍शन चढ़लै।। अलुल-जलुलसँ लड़ि‍ ई शाषक। भेलह चकना चूर हौ।। बा.... मुँह देखैल पंचैती होई छै। घूस पंच भगवानो खाइ छै।। आब ककड़ापर आश करतै। गामक लोग मजबूर हौ।। बा.... ज्ञानले नै कोइ स्‍कूल जाइ छै। नौकड़ी कऽ ई जड़ि‍ देखाइ छै।। शि‍क्षामे सभ कोई खोजै छै। पाइ अड़जि‍ कऽ लुरि‍ हौ॥ बा.... २ नवीन ठाकुर, गाम- लोहा (मधुबनी ) बिहार, जन्म - १५-०५-१९८४, सिक्षा - बी .कॉम (मुंबई विद्यापीठ), रूचि - कविता , साहित्यक अध्यापन एवं अपन मैथिल सांस्कृतिक कार्यकममे रूचि। कार्यरत - Comfort Intech Limited (malad) (R.M. ) १ गीत --

किए जिनगीक आशा अहाँ सँ केलहुं / ........................(मुखरा) अपन हृदयक कोनामे अहींकेँ बसेलहुँ// किए जिनगीक................................//

मोनक बाते मोने रहि गेल , ..............................(अंतरा ) उपजल जे ललसा कोना मरि गेल // कंठ अधीर भऽ सुखाएल जाइए, अपन अधरक जाम सँ वंचित केलहुँ / किए जिनगीक...............................//

जनलहुँ ने दोख जे हमरा सँ भेल , प्रेमकेँ जं दोख बुझी हमरा सँ भेल // प्रेमक परिभाषा बुझलिऐ ने कहियो ~ धनक बेगरता अहाँ प्रेममे सिखलहुँ / किए जिनगीक ..................................//

बैसिते फुलवारीमे याद पड़ि गेल टिशक दू संझा सँ आँखि भरि गेल // प्राणक बिना कोनो जिनगी भेलैए ~ अहाँ देहकेँ बिसरि हमर प्राण लऽ गेलहुँ / किए जिनगीक ..................................//

अपन हृदयक कोनामे अहींकेँ बसेलहुँ // किए जिनगीक ..................................////

२ मिथिला दर्पण १

चाहे रहू मिथिलामे चाहे रहू परदेश , मिथिलाक संतत छी जुनि राखू क्लेश ! !

ने बिसरू संस्कृति ने बदलू व्यवहार  मैथिल के देखिते नै बनू अनचिन्हार  संगठन बिन एकताक ने पूर्ण हएत उद्देश्य ! चाहे रहू मिथिलामे चाहे रहू परदेश, मिथिलाक संतति छी जुनि राखू क्लेश !!

अपना धरोहरकेँ कए बुझैत छी बेकार दोसराक उत्सवमे जा पुरैत छी हकार धियो - पुता केँ उनटा - सीधा दैत छी उपदेश  चाहे रहू मिथिलामे चाहे रहू परदेश , मिथिलाक संतत छी जुनि राखु क्लेश ! !

धर्म केर ई भूमि अछि मिथिला महान हमर बुद्ध, जानकी, महावीर क धाम छी गाम हमर सहेजू पुलकित भऽ एहन दुर्लभ सन्देश  चाहे रहू मिथिलामे चाहे रहू परदेश , मिथिलाक संतत छी जुनि राखु क्लेश ! !

ने छी कम किनको सँ, छी ने किछुमे पाछू भ्रान्ति जे मोनक अछि तकरा मेटाबू अपने दहीकेँ खट्टा कहि, करैत छी खुदसँ द्वेश चाहे रहू मिथिलामे चाहे रहू परदेश , मिथिलाक संतत छी जुनि राखु क्लेश ! !

छी नै अनभिज्ञ अहाँ मिथिलाक इतिहास सँ बुझितो जे मुहं फेरै छी अपना विकाश सँ मिथिलाक उत्थान हेतु बन परत मिथिलेश  चाहे रहू मिथिलामे चाहे रहू परदेश , मिथिलाक संतत छी जुनि राखु क्लेश ! ! ३ मिथिला दर्पण २

परदेशमे रहिकऽ मोन पड़ैए गाओँक पोखरी भीर  भूखे गुलेर मीठ लगैत छै जहिना कोबराक खीर !

पटुवा ,बथुवा और खेसारी साग बड छल अनमोल बारीक़ कोबी आर कदीमा छोटका बरका ओल ! मति मारलक जे हमरा लागल बारीक़ पटुवा तीत  परदेशमे रहिकऽ मोन पड़ैए गाओँक पोखरी भीर ! भूखे गुलेर मीठ लगैत छै जहिना कोबराक खीर ! !

भोजक दिनमे भोरे सँ भरि दिन मचबैत छलहुँ हल्ला  कियो कहैत सकरौरी छै कियो कहैत छल रसगुल्ला  देखिते चुरा - दही पात पर , मुहं सँ छुबैत छल नीर  परदेशमे रहिकऽ मोन पड़ैए गाओंक पोखरी भीर ! भूखे गुलेर मीठ लगैत छै जहिना कोबराक खीर ! !

आमक महिना गाछी बिरछी बाध-बोन बौएतौं  कृष्णभोग , बम्बैया ,मालदह चोभा मारि कऽ खैतों  किछुओ जे छुबतौं हमर आमकेँ होइतौं हम अधीर  परदेशमे रहिकऽ मोन पड़ैए गाओंक पोखरी भीर ! भूखे गुलेर मीठ लगैत छै जहिना कोबराक खीर ! !

छैठ, दिवाली , दुर्गा पूजा , भरदुतिया सन नै पाबैन जे कियो नै बुझला मिथिला दर्पण हुनका के बुझाबैन आस्था मिथिलाक प्रेममे बंधने अछि हमरा जंजीर  परदेशमे रहिकऽ मोन पड़ैए गाओंक पोखरी भीर ! भूखे गुलेर मीठ लगैत छै जहिना कोबराक खीर ! ! ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। विदेह नूतन अंक मिथिला कला संगीत १.ज्योति सुनीत चौधरी २.श्वेता झा (सिंगापुर) ३.गुंजन कर्ण ४.इरा मल्लिक ५.राजनाथ मिश्र (चित्रमय मिथिला) ६. उमेश मण्डल (मिथिलाक वनस्पति/ मिथिलाक जीव-जन्तु/ मिथिलाक जिनगी) १. ज्योति सुनीत चौधरी जन्म स्थान -बेल्हवार, मधुबनी। ज्योति मिथिला चित्रकलामे सेहो पारंगत छथि आ हिनकर मिथिला चित्रकलाक प्रदर्शनी ईलिंग आर्ट ग्रुप केर अंतर्गत ईलिंग ब्रॊडवे, लंडनमे प्रदर्शित कएल गेल अछि। कविता संग्रह ’अर्चिस्’ प्रकाशित। ज्योति सम्प्रति लन्दनमे रहै छथि। २.श्वेता झा (सिंगापुर) ३.गुंजन कर्ण राँटी मधुबनी, सम्प्रति यू.के.मे रहै छथि। www.madhubaniarts.co.uk पर हुनकर कलाकृति देखि सकै छी। ४.इरा मल्लिक ५ राजनाथ मिश्र चित्रमय मिथिला स्लाइड शो चित्रमय मिथिला (https://sites.google.com/a/videha.com/videha-paintings-photos/ ) ६. उमेश मण्डल मिथिलाक वनस्पति स्लाइड शो मिथिलाक जीव-जन्तु स्लाइड शो मिथिलाक जिनगी स्लाइड शो मिथिलाक वनस्पति/ मिथिलाक जीव जन्तु/ मिथिलाक जिनगी  (https://sites.google.com/a/videha.com/videha-paintings-photos/ ) ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। विदेह नूतन अंक गद्य-पद्य भारती १. मोहनदास (दीर्घकथा):लेखक: उदय प्रकाश (मूल हिन्दीसँ मैथिलीमे अनुवाद विनीत उत्पल) मोहनदास (मैथिली-देवनागरी) मोहनदास (मैथिली-मिथिलाक्षर) मोहनदास (मैथिली-ब्रेल) २.छिन्नमस्ता- प्रभा खेतानक हिन्दी उपन्यासक सुशीला झा द्वारा मैथिली अनुवाद छिन्नमस्ता बालानां कृते डॉ॰ शशिधर कुमर “विदेह” एम॰डी॰(आयु॰) – कायचिकित्सा कॉलेज ऑफ आयुर्वेद एण्ड रिसर्च सेण्टर, निगडी – प्राधिकरण, पूणा (महाराष्ट्र) – ४११०४४, हम  फूल बनब, हम काँट बनब (बालगीत) हम  फूल बनब, हम काँट बनब । कोमलतम्,  टाँट  सँ टाँट बनब ।। नहि ककरहु हम, अधिकार हरब । नहि ककरहु हम पथविघ्न बनब । पर अपन प्रगति - पथ - रोड़ा लेऽ हम  लोहक  दण्ड समाठ बनब ।। पानिक संग बनि कऽ माछ रहब । शत्रु  लेऽ  विषधर  साँप  बनब । सज्जन लेऽ शिव  अभिराम सही, दुर्जन  लेऽ  हर विकराल बनब ।। मिथिला  केर  पारावार  हमर । मिथिला भाषा  अधिकार हमर । अछि तुच्छ एतए, संसार सगर । मिथिला भाषा  सभसँ  मीठगर । आँखि  उठाओत  जे एकरा दिशि, तकरा  लेऽ चूल्हिक आँच बनब । ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com  पर पठाउ। बच्चा लोकनि द्वारा स्मरणीय श्लोक १.प्रातः काल ब्रह्ममुहूर्त्त (सूर्योदयक एक घंटा पहिने) सर्वप्रथम अपन दुनू हाथ देखबाक चाही, आ’ ई श्लोक बजबाक चाही। कराग्रे वसते लक्ष्मीः करमध्ये सरस्वती। करमूले स्थितो ब्रह्मा प्रभाते करदर्शनम्॥ करक आगाँ लक्ष्मी बसैत छथि, करक मध्यमे सरस्वती, करक मूलमे ब्रह्मा स्थित छथि। भोरमे ताहि द्वारे करक दर्शन करबाक थीक। २.संध्या काल दीप लेसबाक काल- दीपमूले स्थितो ब्रह्मा दीपमध्ये जनार्दनः। दीपाग्रे शङ्करः प्रोक्त्तः सन्ध्याज्योतिर्नमोऽस्तुते॥ दीपक मूल भागमे ब्रह्मा, दीपक मध्यभागमे जनार्दन (विष्णु) आऽ दीपक अग्र भागमे शङ्कर स्थित छथि। हे संध्याज्योति! अहाँकेँ नमस्कार। ३.सुतबाक काल- रामं स्कन्दं हनूमन्तं वैनतेयं वृकोदरम्। शयने यः स्मरेन्नित्यं दुःस्वप्नस्तस्य नश्यति॥ जे सभ दिन सुतबासँ पहिने राम, कुमारस्वामी, हनूमान्, गरुड़ आऽ भीमक स्मरण करैत छथि, हुनकर दुःस्वप्न नष्ट भऽ जाइत छन्हि। ४. नहेबाक समय- गङ्गे च यमुने चैव गोदावरि सरस्वति। नर्मदे सिन्धु कावेरि जलेऽस्मिन् सन्निधिं कुरू॥ हे गंगा, यमुना, गोदावरी, सरस्वती, नर्मदा, सिन्धु आऽ कावेरी  धार। एहि जलमे अपन सान्निध्य दिअ। ५.उत्तरं यत्समुद्रस्य हिमाद्रेश्चैव दक्षिणम्। वर्षं तत् भारतं नाम भारती यत्र सन्ततिः॥ समुद्रक उत्तरमे आऽ हिमालयक दक्षिणमे भारत अछि आऽ ओतुका सन्तति भारती कहबैत छथि। ६.अहल्या द्रौपदी सीता तारा मण्डोदरी तथा। पञ्चकं ना स्मरेन्नित्यं महापातकनाशकम्॥ जे सभ दिन अहल्या, द्रौपदी, सीता, तारा आऽ मण्दोदरी, एहि पाँच साध्वी-स्त्रीक स्मरण करैत छथि, हुनकर सभ पाप नष्ट भऽ जाइत छन्हि। ७.अश्वत्थामा बलिर्व्यासो हनूमांश्च विभीषणः। कृपः परशुरामश्च सप्तैते चिरञ्जीविनः॥ अश्वत्थामा, बलि, व्यास, हनूमान्, विभीषण, कृपाचार्य आऽ परशुराम- ई सात टा चिरञ्जीवी कहबैत छथि। ८.साते भवतु सुप्रीता देवी शिखर वासिनी उग्रेन तपसा लब्धो यया पशुपतिः पतिः। सिद्धिः साध्ये सतामस्तु प्रसादान्तस्य धूर्जटेः जाह्नवीफेनलेखेव यन्यूधि शशिनः कला॥ ९. बालोऽहं जगदानन्द न मे बाला सरस्वती। अपूर्णे पंचमे वर्षे वर्णयामि जगत्त्रयम् ॥ १०. दूर्वाक्षत मंत्र(शुक्ल यजुर्वेद अध्याय २२, मंत्र २२) आ ब्रह्मन्नित्यस्य प्रजापतिर्ॠषिः। लिंभोक्त्ता देवताः। स्वराडुत्कृतिश्छन्दः। षड्जः स्वरः॥ आ ब्रह्म॑न् ब्राह्म॒णो ब्र॑ह्मवर्च॒सी जा॑यता॒मा रा॒ष्ट्रे रा॑ज॒न्यः शुरे॑ऽइषव्यो॒ऽतिव्या॒धी म॑हार॒थो जा॑यतां॒ दोग्ध्रीं धे॒नुर्वोढा॑न॒ड्वाना॒शुः सप्तिः॒ पुर॑न्धि॒र्योवा॑ जि॒ष्णू र॑थे॒ष्ठाः स॒भेयो॒ युवास्य यज॑मानस्य वी॒रो जा॒यतां निका॒मे-नि॑कामे नः प॒र्जन्यों वर्षतु॒ फल॑वत्यो न॒ऽओष॑धयः पच्यन्तां योगेक्ष॒मो नः॑ कल्पताम्॥२२॥ मन्त्रार्थाः सिद्धयः सन्तु पूर्णाः सन्तु मनोरथाः। शत्रूणां बुद्धिनाशोऽस्तु मित्राणामुदयस्तव। ॐ दीर्घायुर्भव। ॐ सौभाग्यवती भव। हे भगवान्। अपन देशमे सुयोग्य आ’ सर्वज्ञ विद्यार्थी उत्पन्न होथि, आ’ शुत्रुकेँ नाश कएनिहार सैनिक उत्पन्न होथि। अपन देशक गाय खूब दूध दय बाली, बरद भार वहन करएमे सक्षम होथि आ’ घोड़ा त्वरित रूपेँ दौगय बला होए। स्त्रीगण नगरक नेतृत्व करबामे सक्षम होथि आ’ युवक सभामे ओजपूर्ण भाषण देबयबला आ’ नेतृत्व देबामे सक्षम होथि। अपन देशमे जखन आवश्यक होय वर्षा होए आ’ औषधिक-बूटी सर्वदा परिपक्व होइत रहए। एवं क्रमे सभ तरहेँ हमरा सभक कल्याण होए। शत्रुक बुद्धिक नाश होए आ’ मित्रक उदय होए॥ मनुष्यकें कोन वस्तुक इच्छा करबाक चाही तकर वर्णन एहि मंत्रमे कएल गेल अछि। एहिमे वाचकलुप्तोपमालड़्कार अछि। अन्वय- ब्रह्म॑न् - विद्या आदि गुणसँ परिपूर्ण ब्रह्म रा॒ष्ट्रे - देशमे ब्र॑ह्मवर्च॒सी-ब्रह्म विद्याक तेजसँ युक्त्त आ जा॑यतां॒- उत्पन्न होए रा॑ज॒न्यः-राजा शुरे॑ऽ–बिना डर बला इषव्यो॒- बाण चलेबामे निपुण ऽतिव्या॒धी-शत्रुकेँ तारण दय बला म॑हार॒थो-पैघ रथ बला वीर दोग्ध्रीं-कामना(दूध पूर्ण करए बाली) धे॒नुर्वोढा॑न॒ड्वाना॒शुः धे॒नु-गौ वा वाणी र्वोढा॑न॒ड्वा- पैघ बरद ना॒शुः-आशुः-त्वरित सप्तिः॒-घोड़ा पुर॑न्धि॒र्योवा॑- पुर॑न्धि॒- व्यवहारकेँ धारण करए बाली र्योवा॑-स्त्री जि॒ष्णू-शत्रुकेँ जीतए बला र॑थे॒ष्ठाः-रथ पर स्थिर स॒भेयो॒-उत्तम सभामे युवास्य-युवा जेहन यज॑मानस्य-राजाक राज्यमे वी॒रो-शत्रुकेँ पराजित करएबला निका॒मे-नि॑कामे-निश्चययुक्त्त कार्यमे नः-हमर सभक प॒र्जन्यों-मेघ वर्षतु॒-वर्षा होए फल॑वत्यो-उत्तम फल बला ओष॑धयः-औषधिः पच्यन्तां- पाकए योगेक्ष॒मो-अलभ्य लभ्य करेबाक हेतु कएल गेल योगक रक्षा नः॑-हमरा सभक हेतु कल्पताम्-समर्थ होए ग्रिफिथक अनुवाद- हे ब्रह्मण, हमर राज्यमे ब्राह्मण नीक धार्मिक विद्या बला, राजन्य-वीर,तीरंदाज, दूध दए बाली गाय, दौगय बला जन्तु, उद्यमी नारी होथि। पार्जन्य आवश्यकता पड़ला पर वर्षा देथि, फल देय बला गाछ पाकए, हम सभ संपत्ति अर्जित/संरक्षित करी। 8.VIDEHA FOR NON RESIDENTS 8.1 to 8.3 MAITHILI LITERATURE IN ENGLISH 8.1.1.The Comet   -GAJENDRA THAKUR translated by Jyoti Jha chaudhary 8.1.2.The_Science_of_Words- GAJENDRA THAKUR translated by the author himself 8.1.3.On_the_dice-board_of_the_millennium- GAJENDRA THAKUR translated by Jyoti Jha chaudhary 8.1.4.NAAGPHANS (IN ENGLISH)- SHEFALIKA VERMA translated by Dr. Rajiv Kumar Verma and Dr. Jaya Verma Input: (कोष्ठकमे देवनागरी, मिथिलाक्षर किंवा फोनेटिक-रोमनमे टाइप करू। Input in Devanagari, Mithilakshara or Phonetic-Roman.) Output: (परिणाम देवनागरी, मिथिलाक्षर आ फोनेटिक-रोमन/ रोमनमे। Result in Devanagari, Mithilakshara and Phonetic-Roman/ Roman.) English to Maithili Maithili to English इंग्लिश-मैथिली-कोष / मैथिली-इंग्लिश-कोष  प्रोजेक्टकेँ आगू बढ़ाऊ, अपन सुझाव आ योगदान ई-मेल द्वारा ggajendra@videha.com पर पठाऊ। Top of Form विदेहक मैथिली-अंग्रेजी आ अंग्रेजी मैथिली कोष (इंटरनेटपर पहिल बेर सर्च-डिक्शनरी) एम.एस. एस.क्यू.एल. सर्वर आधारित -Based on ms-sql server Maithili-English and English-Maithili Dictionary. १.भारत आ नेपालक मैथिली भाषा-वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक शैली आ २.मैथिलीमे भाषा सम्पादन पाठ्यक्रम १.नेपाल आ भारतक मैथिली भाषा-वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक शैली

१.१. नेपालक मैथिली भाषा वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक  उच्चारण आ लेखन शैली (भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक धारणाकेँ पूर्ण रूपसँ सङ्ग लऽ निर्धारित) मैथिलीमे उच्चारण तथा लेखन १.पञ्चमाक्षर आ अनुस्वार: पञ्चमाक्षरान्तर्गत ङ, ञ, ण, न एवं म अबैत अछि। संस्कृत भाषाक अनुसार शब्दक अन्तमे जाहि वर्गक अक्षर रहैत अछि ओही वर्गक पञ्चमाक्षर अबैत अछि। जेना- अङ्क (क वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ङ् आएल अछि।) पञ्च (च वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ञ् आएल अछि।) खण्ड (ट वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ण् आएल अछि।) सन्धि (त वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे न् आएल अछि।) खम्भ (प वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे म् आएल अछि।) उपर्युक्त बात मैथिलीमे कम देखल जाइत अछि। पञ्चमाक्षरक बदलामे अधिकांश जगहपर अनुस्वारक प्रयोग देखल जाइछ। जेना- अंक, पंच, खंड, संधि, खंभ आदि। व्याकरणविद पण्डित गोविन्द झाक कहब छनि जे कवर्ग, चवर्ग आ टवर्गसँ पूर्व अनुस्वार लिखल जाए तथा तवर्ग आ पवर्गसँ पूर्व पञ्चमाक्षरे लिखल जाए। जेना- अंक, चंचल, अंडा, अन्त तथा कम्पन। मुदा हिन्दीक निकट रहल आधुनिक लेखक एहि बातकेँ नहि मानैत छथि। ओ लोकनि अन्त आ कम्पनक जगहपर सेहो अंत आ कंपन लिखैत देखल जाइत छथि। नवीन पद्धति किछु सुविधाजनक अवश्य छैक। किएक तँ एहिमे समय आ स्थानक बचत होइत छैक। मुदा कतोक बेर हस्तलेखन वा मुद्रणमे अनुस्वारक छोट सन बिन्दु स्पष्ट नहि भेलासँ अर्थक अनर्थ होइत सेहो देखल जाइत अछि। अनुस्वारक प्रयोगमे उच्चारण-दोषक सम्भावना सेहो ततबए देखल जाइत अछि। एतदर्थ कसँ लऽ कऽ पवर्ग धरि पञ्चमाक्षरेक प्रयोग करब उचित अछि। यसँ लऽ कऽ ज्ञ धरिक अक्षरक सङ्ग अनुस्वारक प्रयोग करबामे कतहु कोनो विवाद नहि देखल जाइछ। २.ढ आ ढ़ : ढ़क उच्चारण “र् ह”जकाँ होइत अछि। अतः जतऽ “र् ह”क उच्चारण हो ओतऽ मात्र ढ़ लिखल जाए। आन ठाम खाली ढ लिखल जएबाक चाही। जेना- ढ = ढाकी, ढेकी, ढीठ, ढेउआ, ढङ्ग, ढेरी, ढाकनि, ढाठ आदि। ढ़ = पढ़ाइ, बढ़ब, गढ़ब, मढ़ब, बुढ़बा, साँढ़, गाढ़, रीढ़, चाँढ़, सीढ़ी, पीढ़ी आदि। उपर्युक्त शब्द सभकेँ देखलासँ ई स्पष्ट होइत अछि जे साधारणतया शब्दक शुरूमे ढ आ मध्य तथा अन्तमे ढ़ अबैत अछि। इएह नियम ड आ ड़क सन्दर्भ सेहो लागू होइत अछि। ३.व आ ब : मैथिलीमे “व”क उच्चारण ब कएल जाइत अछि, मुदा ओकरा ब रूपमे नहि लिखल जएबाक चाही। जेना- उच्चारण : बैद्यनाथ, बिद्या, नब, देबता, बिष्णु, बंश, बन्दना आदि। एहि सभक स्थानपर क्रमशः वैद्यनाथ, विद्या, नव, देवता, विष्णु, वंश, वन्दना लिखबाक चाही। सामान्यतया व उच्चारणक लेल ओ प्रयोग कएल जाइत अछि। जेना- ओकील, ओजह आदि। ४.य आ ज : कतहु-कतहु “य”क उच्चारण “ज”जकाँ करैत देखल जाइत अछि, मुदा ओकरा ज नहि लिखबाक चाही। उच्चारणमे यज्ञ, जदि, जमुना, जुग, जाबत, जोगी, जदु, जम आदि कहल जाएबला शब्द सभकेँ क्रमशः यज्ञ, यदि, यमुना, युग, यावत, योगी, यदु, यम लिखबाक चाही। ५.ए आ य : मैथिलीक वर्तनीमे ए आ य दुनू लिखल जाइत अछि। प्राचीन वर्तनी- कएल, जाए, होएत, माए, भाए, गाए आदि। नवीन वर्तनी- कयल, जाय, होयत, माय, भाय, गाय आदि। सामान्यतया शब्दक शुरूमे ए मात्र अबैत अछि। जेना एहि, एना, एकर, एहन आदि। एहि शब्द सभक स्थानपर यहि, यना, यकर, यहन आदिक प्रयोग नहि करबाक चाही। यद्यपि मैथिलीभाषी थारू सहित किछु जातिमे शब्दक आरम्भोमे “ए”केँ य कहि उच्चारण कएल जाइत अछि। ए आ “य”क प्रयोगक सन्दर्भमे प्राचीने पद्धतिक अनुसरण करब उपयुक्त मानि एहि पुस्तकमे ओकरे प्रयोग कएल गेल अछि। किएक तँ दुनूक लेखनमे कोनो सहजता आ दुरूहताक बात नहि अछि। आ मैथिलीक सर्वसाधारणक उच्चारण-शैली यक अपेक्षा एसँ बेसी निकट छैक। खास कऽ कएल, हएब आदि कतिपय शब्दकेँ कैल, हैब आदि रूपमे कतहु-कतहु लिखल जाएब सेहो “ए”क प्रयोगकेँ बेसी समीचीन प्रमाणित करैत अछि। ६.हि, हु तथा एकार, ओकार : मैथिलीक प्राचीन लेखन-परम्परामे कोनो बातपर बल दैत काल शब्दक पाछाँ हि, हु लगाओल जाइत छैक। जेना- हुनकहि, अपनहु, ओकरहु, तत्कालहि, चोट्टहि, आनहु आदि। मुदा आधुनिक लेखनमे हिक स्थानपर एकार एवं हुक स्थानपर ओकारक प्रयोग करैत देखल जाइत अछि। जेना- हुनके, अपनो, तत्काले, चोट्टे, आनो आदि। ७.ष तथा ख : मैथिली भाषामे अधिकांशतः षक उच्चारण ख होइत अछि। जेना- षड्यन्त्र (खड़यन्त्र), षोडशी (खोड़शी), षट्कोण (खटकोण), वृषेश (वृखेश), सन्तोष (सन्तोख) आदि। ८.ध्वनि-लोप : निम्नलिखित अवस्थामे शब्दसँ ध्वनि-लोप भऽ जाइत अछि: (क) क्रियान्वयी प्रत्यय अयमे य वा ए लुप्त भऽ जाइत अछि। ओहिमे सँ पहिने अक उच्चारण दीर्घ भऽ जाइत अछि। ओकर आगाँ लोप-सूचक चिह्न वा विकारी (’ / ऽ) लगाओल जाइछ। जेना- पूर्ण रूप : पढ़ए (पढ़य) गेलाह, कए (कय) लेल, उठए (उठय) पड़तौक। अपूर्ण रूप : पढ़’ गेलाह, क’ लेल, उठ’ पड़तौक। पढ़ऽ गेलाह, कऽ लेल, उठऽ पड़तौक। (ख) पूर्वकालिक कृत आय (आए) प्रत्ययमे य (ए) लुप्त भऽ जाइछ, मुदा लोप-सूचक विकारी नहि लगाओल जाइछ। जेना- पूर्ण रूप : खाए (य) गेल, पठाय (ए) देब, नहाए (य) अएलाह। अपूर्ण रूप : खा गेल, पठा देब, नहा अएलाह। (ग) स्त्री प्रत्यय इक उच्चारण क्रियापद, संज्ञा, ओ विशेषण तीनूमे लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना- पूर्ण रूप : दोसरि मालिनि चलि गेलि। अपूर्ण रूप : दोसर मालिन चलि गेल। (घ) वर्तमान कृदन्तक अन्तिम त लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना- पूर्ण रूप : पढ़ैत अछि, बजैत अछि, गबैत अछि। अपूर्ण रूप : पढ़ै अछि, बजै अछि, गबै अछि। (ङ) क्रियापदक अवसान इक, उक, ऐक तथा हीकमे लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना- पूर्ण रूप: छियौक, छियैक, छहीक, छौक, छैक, अबितैक, होइक। अपूर्ण रूप : छियौ, छियै, छही, छौ, छै, अबितै, होइ। (च) क्रियापदीय प्रत्यय न्ह, हु तथा हकारक लोप भऽ जाइछ। जेना- पूर्ण रूप : छन्हि, कहलन्हि, कहलहुँ, गेलह, नहि। अपूर्ण रूप : छनि, कहलनि, कहलौँ, गेलऽ, नइ, नञि, नै। ९.ध्वनि स्थानान्तरण : कोनो-कोनो स्वर-ध्वनि अपना जगहसँ हटि कऽ दोसर ठाम चलि जाइत अछि। खास कऽ ह्रस्व इ आ उक सम्बन्धमे ई बात लागू होइत अछि। मैथिलीकरण भऽ गेल शब्दक मध्य वा अन्तमे जँ ह्रस्व इ वा उ आबए तँ ओकर ध्वनि स्थानान्तरित भऽ एक अक्षर आगाँ आबि जाइत अछि। जेना- शनि (शइन), पानि (पाइन), दालि ( दाइल), माटि (माइट), काछु (काउछ), मासु (माउस) आदि। मुदा तत्सम शब्द सभमे ई निअम लागू नहि होइत अछि। जेना- रश्मिकेँ रइश्म आ सुधांशुकेँ सुधाउंस नहि कहल जा सकैत अछि। १०.हलन्त(्)क प्रयोग : मैथिली भाषामे सामान्यतया हलन्त (्)क आवश्यकता नहि होइत अछि। कारण जे शब्दक अन्तमे अ उच्चारण नहि होइत अछि। मुदा संस्कृत भाषासँ जहिनाक तहिना मैथिलीमे आएल (तत्सम) शब्द सभमे हलन्त प्रयोग कएल जाइत अछि। एहि पोथीमे सामान्यतया सम्पूर्ण शब्दकेँ मैथिली भाषा सम्बन्धी निअम अनुसार हलन्तविहीन राखल गेल अछि। मुदा व्याकरण सम्बन्धी प्रयोजनक लेल अत्यावश्यक स्थानपर कतहु-कतहु हलन्त देल गेल अछि। प्रस्तुत पोथीमे मथिली लेखनक प्राचीन आ नवीन दुनू शैलीक सरल आ समीचीन पक्ष सभकेँ समेटि कऽ वर्ण-विन्यास कएल गेल अछि। स्थान आ समयमे बचतक सङ्गहि हस्त-लेखन तथा तकनीकी दृष्टिसँ सेहो सरल होबऽबला हिसाबसँ वर्ण-विन्यास मिलाओल गेल अछि। वर्तमान समयमे मैथिली मातृभाषी पर्यन्तकेँ आन भाषाक माध्यमसँ मैथिलीक ज्ञान लेबऽ पड़ि रहल परिप्रेक्ष्यमे लेखनमे सहजता तथा एकरूपतापर ध्यान देल गेल अछि। तखन मैथिली भाषाक मूल विशेषता सभ कुण्ठित नहि होइक, ताहू दिस लेखक-मण्डल सचेत अछि। प्रसिद्ध भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक कहब छनि जे सरलताक अनुसन्धानमे एहन अवस्था किन्नहु ने आबऽ देबाक चाही जे भाषाक विशेषता छाँहमे पडि जाए। -(भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक धारणाकेँ पूर्ण रूपसँ सङ्ग लऽ निर्धारित) १.२. मैथिली अकादमी, पटना द्वारा निर्धारित मैथिली लेखन-शैली

१. जे शब्द मैथिली-साहित्यक प्राचीन कालसँ आइ धरि जाहि वर्त्तनीमे प्रचलित अछि, से सामान्यतः ताहि वर्त्तनीमे लिखल जाय- उदाहरणार्थ-

ग्राह्य

एखन ठाम जकर, तकर तनिकर अछि

अग्राह्य अखन, अखनि, एखेन, अखनी ठिमा, ठिना, ठमा जेकर, तेकर तिनकर। (वैकल्पिक रूपेँ ग्राह्य) ऐछ, अहि, ए।

२. निम्नलिखित तीन प्रकारक रूप वैकल्पिकतया अपनाओल जाय: भऽ गेल, भय गेल वा भए गेल। जा रहल अछि, जाय रहल अछि, जाए रहल अछि। कर’ गेलाह, वा करय गेलाह वा करए गेलाह।

३. प्राचीन मैथिलीक ‘न्ह’ ध्वनिक स्थानमे ‘न’ लिखल जाय सकैत अछि यथा कहलनि वा कहलन्हि।

४. ‘ऐ’ तथा ‘औ’ ततय लिखल जाय जत’ स्पष्टतः ‘अइ’ तथा ‘अउ’ सदृश उच्चारण इष्ट हो। यथा- देखैत, छलैक, बौआ, छौक इत्यादि।

५. मैथिलीक निम्नलिखित शब्द एहि रूपे प्रयुक्त होयत: जैह, सैह, इएह, ओऐह, लैह तथा दैह।

६. ह्र्स्व इकारांत शब्दमे ‘इ’ के लुप्त करब सामान्यतः अग्राह्य थिक। यथा- ग्राह्य देखि आबह, मालिनि गेलि (मनुष्य मात्रमे)।

७. स्वतंत्र ह्रस्व ‘ए’ वा ‘य’ प्राचीन मैथिलीक उद्धरण आदिमे तँ यथावत राखल जाय, किंतु आधुनिक प्रयोगमे वैकल्पिक रूपेँ ‘ए’ वा ‘य’ लिखल जाय। यथा:- कयल वा कएल, अयलाह वा अएलाह, जाय वा जाए इत्यादि।

८. उच्चारणमे दू स्वरक बीच जे ‘य’ ध्वनि स्वतः आबि जाइत अछि तकरा लेखमे स्थान वैकल्पिक रूपेँ देल जाय। यथा- धीआ, अढ़ैआ, विआह, वा धीया, अढ़ैया, बियाह।

९. सानुनासिक स्वतंत्र स्वरक स्थान यथासंभव ‘ञ’ लिखल जाय वा सानुनासिक स्वर। यथा:- मैञा, कनिञा, किरतनिञा वा मैआँ, कनिआँ, किरतनिआँ।

१०. कारकक विभक्त्तिक निम्नलिखित रूप ग्राह्य:- हाथकेँ, हाथसँ, हाथेँ, हाथक, हाथमे। ’मे’ मे अनुस्वार सर्वथा त्याज्य थिक। ‘क’ क वैकल्पिक रूप ‘केर’ राखल जा सकैत अछि।

११. पूर्वकालिक क्रियापदक बाद ‘कय’ वा ‘कए’ अव्यय वैकल्पिक रूपेँ लगाओल जा सकैत अछि। यथा:- देखि कय वा देखि कए।

१२. माँग, भाँग आदिक स्थानमे माङ, भाङ इत्यादि लिखल जाय।

१३. अर्द्ध ‘न’ ओ अर्द्ध ‘म’ क बदला अनुसार नहि लिखल जाय, किंतु छापाक सुविधार्थ अर्द्ध ‘ङ’ , ‘ञ’, तथा ‘ण’ क बदला अनुस्वारो लिखल जा सकैत अछि। यथा:- अङ्क, वा अंक, अञ्चल वा अंचल, कण्ठ वा कंठ।

१४. हलंत चिह्न निअमतः लगाओल जाय, किंतु विभक्तिक संग अकारांत प्रयोग कएल जाय। यथा:- श्रीमान्, किंतु श्रीमानक।

१५. सभ एकल कारक चिह्न शब्दमे सटा क’ लिखल जाय, हटा क’ नहि, संयुक्त विभक्तिक हेतु फराक लिखल जाय, यथा घर परक।

१६. अनुनासिककेँ चन्द्रबिन्दु द्वारा व्यक्त कयल जाय। परंतु मुद्रणक सुविधार्थ हि समान जटिल मात्रापर अनुस्वारक प्रयोग चन्द्रबिन्दुक बदला कयल जा सकैत अछि। यथा- हिँ केर बदला हिं।

१७. पूर्ण विराम पासीसँ ( । ) सूचित कयल जाय।

१८. समस्त पद सटा क’ लिखल जाय, वा हाइफेनसँ जोड़ि क’ ,  हटा क’ नहि।

१९. लिअ तथा दिअ शब्दमे बिकारी (ऽ) नहि लगाओल जाय।

२०. अंक देवनागरी रूपमे राखल जाय।

२१.किछु ध्वनिक लेल नवीन चिन्ह बनबाओल जाय। जा' ई नहि बनल अछि ताबत एहि दुनू ध्वनिक बदला पूर्ववत् अय/ आय/ अए/ आए/ आओ/ अओ लिखल जाय। आकि ऎ वा ऒ सँ व्यक्त कएल जाय।

ह./- गोविन्द झा ११/८/७६ श्रीकान्त ठाकुर ११/८/७६ सुरेन्द्र झा "सुमन" ११/०८/७६

  २. मैथिलीमे भाषा सम्पादन पाठ्यक्रम २.१. उच्चारण निर्देश: (बोल्ड कएल रूप ग्राह्य):- दन्त न क उच्चारणमे दाँतमे जीह सटत- जेना बाजू नाम , मुदा ण क उच्चारणमे जीह मूर्धामे सटत (नै सटैए तँ उच्चारण दोष अछि)- जेना बाजू गणेश। तालव्य शमे जीह तालुसँ , षमे मूर्धासँ आ दन्त समे दाँतसँ सटत। निशाँ, सभ आ शोषण बाजि कऽ देखू। मैथिलीमे ष केँ वैदिक संस्कृत जकाँ ख सेहो उच्चरित कएल जाइत अछि, जेना वर्षा, दोष। य अनेको स्थानपर ज जकाँ उच्चरित होइत अछि आ ण ड़ जकाँ (यथा संयोग आ गणेश संजोग आ गड़ेस उच्चरित होइत अछि)। मैथिलीमे व क उच्चारण ब, श क उच्चारण स आ य क उच्चारण ज सेहो होइत अछि। ओहिना ह्रस्व इ बेशीकाल मैथिलीमे पहिने बाजल जाइत अछि कारण देवनागरीमे आ मिथिलाक्षरमे ह्रस्व इ अक्षरक पहिने लिखलो जाइत आ बाजलो जएबाक चाही। कारण जे हिन्दीमे एकर दोषपूर्ण उच्चारण होइत अछि (लिखल तँ पहिने जाइत अछि मुदा बाजल बादमे जाइत अछि), से शिक्षा पद्धतिक दोषक कारण हम सभ ओकर उच्चारण दोषपूर्ण ढंगसँ कऽ रहल छी। अछि- अ इ छ  ऐछ (उच्चारण) छथि- छ इ थ  – छैथ (उच्चारण) पहुँचि- प हुँ इ च (उच्चारण) आब अ आ इ ई ए ऐ ओ औ अं अः ऋ ऐ सभ लेल मात्रा सेहो अछि, मुदा ऐमे ई ऐ ओ औ अं अः ऋ केँ संयुक्ताक्षर रूपमे गलत रूपमे प्रयुक्त आ उच्चरित कएल जाइत अछि। जेना ऋ केँ री  रूपमे उच्चरित करब। आ देखियौ- ऐ लेल देखिऔ क प्रयोग अनुचित। मुदा देखिऐ लेल देखियै अनुचित। क् सँ ह् धरि अ सम्मिलित भेलासँ क सँ ह बनैत अछि, मुदा उच्चारण काल हलन्त युक्त शब्दक अन्तक उच्चारणक प्रवृत्ति बढ़ल अछि, मुदा हम जखन मनोजमे ज् अन्तमे बजैत छी, तखनो पुरनका लोककेँ बजैत सुनबन्हि- मनोजऽ, वास्तवमे ओ अ युक्त ज् = ज बजै छथि। फेर ज्ञ अछि ज् आ ञ क संयुक्त मुदा गलत उच्चारण होइत अछि- ग्य। ओहिना क्ष अछि क् आ ष क संयुक्त मुदा उच्चारण होइत अछि छ। फेर श् आ र क संयुक्त अछि श्र ( जेना श्रमिक) आ स् आ र क संयुक्त अछि स्र (जेना मिस्र)। त्र भेल त+र । उच्चारणक ऑडियो फाइल विदेह आर्काइव  http://www.videha.co.in/ पर उपलब्ध अछि। फेर केँ / सँ / पर पूर्व अक्षरसँ सटा कऽ लिखू मुदा तँ / कऽ हटा कऽ। ऐमे सँ मे पहिल सटा कऽ लिखू आ बादबला हटा कऽ। अंकक बाद टा लिखू सटा कऽ मुदा अन्य ठाम टा लिखू हटा कऽ– जेना छहटा मुदा सभ टा। फेर ६अ म सातम लिखू- छठम सातम नै। घरबलामे बला मुदा घरवालीमे वाली प्रयुक्त करू। रहए- रहै मुदा सकैए (उच्चारण सकै-ए)। मुदा कखनो काल रहए आ रहै मे अर्थ भिन्नता सेहो, जेना से कम्मो जगहमे पार्किंग करबाक अभ्यास रहै ओकरा। पुछलापर पता लागल जे ढुनढुन नाम्ना ई ड्राइवर कनाट प्लेसक पार्किंगमे काज करैत रहए। छलै, छलए मे सेहो ऐ तरहक भेल। छलए क उच्चारण छल-ए सेहो। संयोगने- (उच्चारण संजोगने) केँ/  कऽ केर- क ( केर क प्रयोग गद्यमे नै करू , पद्यमे कऽ सकै छी। ) क (जेना रामक) –रामक आ संगे (उच्चारण राम के /  राम कऽ सेहो) सँ- सऽ (उच्चारण) चन्द्रबिन्दु आ अनुस्वार- अनुस्वारमे कंठ धरिक प्रयोग होइत अछि मुदा चन्द्रबिन्दुमे नै। चन्द्रबिन्दुमे कनेक एकारक सेहो उच्चारण होइत अछि- जेना रामसँ- (उच्चारण राम सऽ)  रामकेँ- (उच्चारण राम कऽ/ राम के सेहो)। केँ जेना रामकेँ भेल हिन्दीक को (राम को)- राम को= रामकेँ क जेना रामक भेल हिन्दीक का ( राम का) राम का= रामक कऽ जेना जा कऽ भेल हिन्दीक कर ( जा कर) जा कर= जा कऽ सँ भेल हिन्दीक से (राम से) राम से= रामसँ सऽ , तऽ , त , केर (गद्यमे) एे चारू शब्द सबहक प्रयोग अवांछित। के दोसर अर्थेँ प्रयुक्त भऽ सकैए- जेना, के कहलक? विभक्ति “क”क बदला एकर प्रयोग अवांछित। नञि, नहि, नै, नइ, नँइ, नइँ, नइं ऐ सभक उच्चारण आ लेखन - नै त्त्व क बदलामे त्व जेना महत्वपूर्ण (महत्त्वपूर्ण नै) जतए अर्थ बदलि जाए ओतहि मात्र तीन अक्षरक संयुक्ताक्षरक प्रयोग उचित। सम्पति- उच्चारण स म्प इ त (सम्पत्ति नै- कारण सही उच्चारण आसानीसँ सम्भव नै)। मुदा सर्वोत्तम (सर्वोतम नै)। राष्ट्रिय (राष्ट्रीय नै) सकैए/ सकै (अर्थ परिवर्तन) पोछैले/ पोछै लेल/ पोछए लेल पोछैए/ पोछए/ (अर्थ परिवर्तन) पोछए/ पोछै ओ लोकनि ( हटा कऽ, ओ मे बिकारी नै) ओइ/ ओहि ओहिले/ ओहि लेल/ ओही लऽ जएबेँ/ बैसबेँ पँचभइयाँ देखियौक/ (देखिऔक नै- तहिना अ मे ह्रस्व आ दीर्घक मात्राक प्रयोग अनुचित) जकाँ / जेकाँ तँइ/ तैँ/ होएत / हएत नञि/ नहि/ नँइ/ नइँ/ नै सौँसे/ सौंसे बड़ / बड़ी (झोराओल) गाए (गाइ नहि), मुदा गाइक दूध (गाएक दूध नै।) रहलेँ/ पहिरतैँ हमहीं/ अहीं सब - सभ सबहक - सभहक धरि - तक गप- बात बूझब - समझब बुझलौं/ समझलौं/ बुझलहुँ - समझलहुँ हमरा आर - हम सभ आकि- आ कि सकैछ/ करैछ (गद्यमे प्रयोगक आवश्यकता नै) होइन/ होनि जाइन (जानि नै, जेना देल जाइन) मुदा जानि-बूझि (अर्थ परिव्र्तन) पइठ/ जाइठ आउ/ जाउ/ आऊ/ जाऊ मे, केँ, सँ, पर (शब्दसँ सटा कऽ) तँ कऽ धऽ दऽ (शब्दसँ हटा कऽ) मुदा दूटा वा बेसी विभक्ति संग रहलापर पहिल विभक्ति टाकेँ सटाऊ। जेना ऐमे सँ । एकटा , दूटा (मुदा कए टा) बिकारीक प्रयोग शब्दक अन्तमे, बीचमे अनावश्यक रूपेँ नै। आकारान्त आ अन्तमे अ क बाद बिकारीक प्रयोग नै (जेना दिअ , आ/ दिय’ , आ’, आ नै ) अपोस्ट्रोफीक प्रयोग बिकारीक बदलामे करब अनुचित आ मात्र फॉन्टक तकनीकी न्यूनताक परिचायक)- ओना बिकारीक संस्कृत रूप ऽ अवग्रह कहल जाइत अछि आ वर्तनी आ उच्चारण दुनू ठाम एकर लोप रहैत अछि/ रहि सकैत अछि (उच्चारणमे लोप रहिते अछि)। मुदा अपोस्ट्रोफी सेहो अंग्रेजीमे पसेसिव केसमे होइत अछि आ फ्रेंचमे शब्दमे जतए एकर प्रयोग होइत अछि जेना raison d’etre एतए सेहो एकर उच्चारण रैजौन डेटर होइत अछि, माने अपोस्ट्रॉफी अवकाश नै दैत अछि वरन जोड़ैत अछि, से एकर प्रयोग बिकारीक बदला देनाइ तकनीकी रूपेँ सेहो अनुचित)। अइमे, एहिमे/ ऐमे जइमे, जाहिमे एखन/ अखन/ अइखन केँ (के नहि) मे (अनुस्वार रहित) भऽ मे दऽ तँ (तऽ, त नै) सँ ( सऽ स नै) गाछ तर गाछ लग साँझ खन जो (जो go, करै जो do) तै/तइ जेना- तै दुआरे/ तइमे/ तइले जै/जइ जेना- जै कारण/ जइसँ/ जइले ऐ/अइ जेना- ऐ कारण/ ऐसँ/ अइले/ मुदा एकर एकटा खास प्रयोग- लालति‍ कतेक दि‍नसँ कहैत रहैत अइ लै/लइ जेना लैसँ/ लइले/ लै दुआरे लहँ/ लौं गेलौं/ लेलौं/ लेलँह/ गेलहुँ/ लेलहुँ/ लेलँ जइ/ जाहि‍/ जै जहि‍ठाम/ जाहि‍ठाम/ जइठाम/ जैठाम एहि‍/ अहि‍/ अइ (वाक्यक अंतमे ग्राह्य) / ऐ अइछ/ अछि‍/ ऐछ तइ/ तहि‍/ तै/ ताहि‍ ओहि‍/ ओइ सीखि‍/ सीख जीवि‍/ जीवी/ जीब भलेहीं/ भलहि‍ं तैं/ तँइ/ तँए जाएब/ जएब लइ/ लै छइ/ छै नहि‍/ नै/ नइ गइ/ गै छनि‍/ छन्‍हि‍  ... समए शब्‍दक संग जखन कोनो वि‍भक्‍ति‍ जुटै छै तखन समै जना समैपर इत्‍यादि‍। असगरमे हृदए आ वि‍भक्‍ति‍ जुटने हृदे जना हृदेसँ, हृदेमे इत्‍यादि‍। जइ/ जाहि‍/ जै जहि‍ठाम/ जाहि‍ठाम/ जइठाम/ जैठाम एहि‍/ अहि‍/ अइ/ ऐ अइछ/ अछि‍/ ऐछ तइ/ तहि‍/ तै/ ताहि‍ ओहि‍/ ओइ सीखि‍/ सीख जीवि‍/ जीवी/ जीब भले/ भलेहीं/ भलहि‍ं तैं/ तँइ/ तँए जाएब/ जएब लइ/ लै छइ/ छै नहि‍/ नै/ नइ गइ/ गै छनि‍/ छन्‍हि‍ चुकल अछि/ गेल गछि २.२. मैथिलीमे भाषा सम्पादन पाठ्यक्रम नीचाँक सूचीमे देल विकल्पमेसँ लैंगुएज एडीटर द्वारा कोन रूप चुनल जेबाक चाही: बोल्ड कएल रूप ग्राह्य: १.होयबला/ होबयबला/ होमयबला/ हेब’बला, हेम’बला/ होयबाक/होबएबला /होएबाक २. आ’/आऽ आ ३. क’ लेने/कऽ लेने/कए लेने/कय लेने/ल’/लऽ/लय/लए ४. भ’ गेल/भऽ गेल/भय गेल/भए गेल ५. कर’ गेलाह/करऽ गेलह/करए गेलाह/करय गेलाह ६. लिअ/दिअ लिय’,दिय’,लिअ’,दिय’/ ७. कर’ बला/करऽ बला/ करय बला करैबला/क’र’ बला / करैवाली ८. बला वला (पुरूष), वाली (स्‍त्री) ९ . आङ्ल आंग्ल १०. प्रायः प्रायह ११. दुःख दुख १ २. चलि गेल चल गेल/चैल गेल १३. देलखिन्ह देलकिन्ह, देलखिन १४. देखलन्हि देखलनि/ देखलैन्ह १५. छथिन्ह/ छलन्हि छथिन/ छलैन/ छलनि १६. चलैत/दैत चलति/दैति १७. एखनो अखनो १८. बढ़नि‍ बढ़इन बढ़न्हि १९. ओ’/ओऽ(सर्वनाम) ओ २० . ओ (संयोजक) ओ’/ओऽ २१. फाँगि/फाङ्गि फाइंग/फाइङ २२. जे जे’/जेऽ २३. ना-नुकुर ना-नुकर २४. केलन्हि/केलनि‍/कयलन्हि २५. तखनतँ/ तखन तँ २६. जा रहल/जाय रहल/जाए रहल २७. निकलय/निकलए लागल/ लगल बहराय/ बहराए लागल/ लगल निकल’/बहरै लागल २८. ओतय/ जतय जत’/ ओत’/ जतए/ ओतए २९. की फूरल जे कि फूरल जे ३०. जे जे’/जेऽ ३१. कूदि / यादि(मोन पारब) कूइद/याइद/कूद/याद/ यादि (मोन) ३२. इहो/ ओहो ३३. हँसए/ हँसय हँसऽ ३४. नौ आकि दस/नौ किंवा दस/ नौ वा दस ३५. सासु-ससुर सास-ससुर ३६. छह/ सात छ/छः/सात ३७. की  की’/ कीऽ (दीर्घीकारान्तमे ऽ वर्जित) ३८. जबाब जवाब ३९. करएताह/ करेताह करयताह ४०. दलान दिशि दलान दिश/दलान दिस ४१ . गेलाह गएलाह/गयलाह ४२. किछु आर/ किछु और/ किछ आर ४३. जाइ छल/ जाइत छल जाति छल/जैत छल ४४. पहुँचि/ भेट जाइत छल/ भेट जाइ छलए पहुँच/ भेटि‍ जाइत छल ४५. जबान (युवा)/ जवान(फौजी) ४६. लय/ लए क’/ कऽ/ लए कए / लऽ कऽ/ लऽ कए ४७. ल’/लऽ कय/ कए ४८. एखन / एखने / अखन / अखने ४९. अहींकेँ अहीँकेँ ५०. गहींर गहीँर ५१. धार पार केनाइ धार पार केनाय/केनाए ५२. जेकाँ जेँकाँ/ जकाँ ५३. तहिना तेहिना ५४. एकर अकर ५५. बहिनउ बहनोइ ५६. बहिन बहिनि ५७. बहिन-बहिनोइ बहिन-बहनउ ५८. नहि/ नै ५९. करबा / करबाय/ करबाए ६०. तँ/ त ऽ तय/तए ६१. भैयारी मे छोट-भाए/भै/, जेठ-भाय/भाइ, ६२. गि‍नतीमे दू भाइ/भाए/भाँइ ६३. ई पोथी दू भाइक/ भाँइ/ भाए/ लेल। यावत जावत ६४. माय मै / माए मुदा माइक ममता ६५. देन्हि/ दइन दनि‍/ दएन्हि/ दयन्हि दन्हि/ दैन्हि ६६. द’/ दऽ/ दए ६७. ओ (संयोजक) ओऽ (सर्वनाम) ६८. तका कए तकाय तकाए ६९. पैरे (on foot) पएरे  कएक/ कैक ७०. ताहुमे/ ताहूमे ७१. पुत्रीक ७२. बजा कय/ कए / कऽ ७३. बननाय/बननाइ ७४. कोला ७५. दिनुका दिनका ७६. ततहिसँ ७७. गरबओलन्हि/ गरबौलनि‍/ गरबेलन्हि/ गरबेलनि‍ ७८. बालु बालू ७९. चेन्ह चिन्ह(अशुद्ध) ८०. जे जे’ ८१ . से/ के से’/के’ ८२. एखुनका अखनुका ८३. भुमिहार भूमिहार ८४. सुग्गर / सुगरक/ सूगर ८५. झठहाक झटहाक ८६. छूबि ८७. करइयो/ओ करैयो ने देलक /करियौ-करइयौ ८८. पुबारि पुबाइ ८९. झगड़ा-झाँटी झगड़ा-झाँटि ९०. पएरे-पएरे पैरे-पैरे ९१. खेलएबाक ९२. खेलेबाक ९३. लगा ९४. होए- हो – होअए ९५. बुझल बूझल ९६. बूझल (संबोधन अर्थमे) ९७. यैह यएह / इएह/ सैह/ सएह ९८. तातिल ९९. अयनाय- अयनाइ/ अएनाइ/ एनाइ १००. निन्न- निन्द १०१. बिनु बिन १०२. जाए जाइ १०३. जाइ (in different sense)-last word of sentence १०४. छत पर आबि जाइ १०५. ने १०६. खेलाए (play) –खेलाइ १०७. शिकाइत- शिकायत १०८. ढप- ढ़प १०९ . पढ़- पढ ११०. कनिए/ कनिये कनिञे १११. राकस- राकश ११२. होए/ होय होइ ११३. अउरदा- औरदा ११४. बुझेलन्हि (different meaning- got understand) ११५. बुझएलन्हि/बुझेलनि‍/ बुझयलन्हि (understood himself) ११६. चलि- चल/ चलि‍ गेल ११७. खधाइ- खधाय ११८. मोन पाड़लखिन्ह/ मोन पाड़लखि‍न/ मोन पारलखिन्ह ११९. कैक- कएक- कइएक १२०. लग ल’ग १२१. जरेनाइ १२२. जरौनाइ जरओनाइ- जरएनाइ/ जरेनाइ १२३. होइत १२४. गरबेलन्हि/ गरबेलनि‍ गरबौलन्हि/ गरबौलनि‍ १२५. चिखैत- (to test)चिखइत १२६. करइयो (willing to do) करैयो १२७. जेकरा- जकरा १२८. तकरा- तेकरा १२९. बिदेसर स्थानेमे/ बिदेसरे स्थानमे १३०. करबयलहुँ/ करबएलहुँ/ करबेलहुँ करबेलौं १३१. हारिक (उच्चारण हाइरक) १३२. ओजन वजन आफसोच/ अफसोस कागत/ कागच/ कागज १३३. आधे भाग/ आध-भागे १३४. पिचा / पिचाय/पिचाए १३५. नञ/ ने १३६. बच्चा नञ (ने) पिचा जाय १३७. तखन ने (नञ) कहैत अछि। कहै/ सुनै/ देखै छल मुदा कहैत-कहैत/ सुनैत-सुनैत/ देखैत-देखैत १३८. कतेक गोटे/ कताक गोटे १३९. कमाइ-धमाइ/ कमाई- धमाई १४० . लग ल’ग १४१. खेलाइ (for playing) १४२. छथिन्ह/ छथिन १४३. होइत होइ १४४. क्यो कियो / केओ १४५. केश (hair) १४६. केस (court-case) १४७ . बननाइ/ बननाय/ बननाए १४८. जरेनाइ १४९. कुरसी कुर्सी १५०. चरचा चर्चा १५१. कर्म करम १५२. डुबाबए/ डुबाबै/ डुमाबै डुमाबय/ डुमाबए १५३. एखुनका/ अखुनका १५४. लए/ लिअए (वाक्यक अंतिम शब्द)- लऽ १५५. कएलक/ केलक १५६. गरमी गर्मी १५७ . वरदी वर्दी १५८. सुना गेलाह सुना’/सुनाऽ १५९. एनाइ-गेनाइ १६०. तेना ने घेरलन्हि/ तेना ने घेरलनि‍ १६१. नञि / नै १६२. डरो ड’रो १६३. कतहु/ कतौ कहीं १६४. उमरिगर-उमेरगर उमरगर १६५. भरिगर १६६. धोल/धोअल धोएल १६७. गप/गप्प १६८. के के’ १६९. दरबज्जा/ दरबजा १७०. ठाम १७१. धरि तक १७२. घूरि लौटि १७३. थोरबेक १७४. बड्ड १७५. तोँ/ तूँ १७६. तोँहि( पद्यमे ग्राह्य) १७७. तोँही / तोँहि १७८. करबाइए करबाइये १७९. एकेटा १८०. करितथि /करतथि १८१. पहुँचि/ पहुँच १८२. राखलन्हि रखलन्हि/ रखलनि‍ १८३. लगलन्हि/ लगलनि‍ लागलन्हि १८४. सुनि (उच्चारण सुइन) १८५. अछि (उच्चारण अइछ) १८६. एलथि गेलथि १८७. बितओने/ बि‍तौने/ बितेने १८८. करबओलन्हि/ करबौलनि‍/ करेलखिन्ह/ करेलखि‍न १८९. करएलन्हि/ करेलनि‍ १९०. आकि/ कि १९१. पहुँचि/ पहुँच १९२. बत्ती जराय/ जराए जरा (आगि लगा) १९३. से से’ १९४. हाँ मे हाँ (हाँमे हाँ विभक्त्तिमे हटा कए) १९५. फेल फैल १९६. फइल(spacious) फैल १९७. होयतन्हि/ होएतन्हि/ होएतनि‍/हेतनि‍/ हेतन्हि १९८. हाथ मटिआएब/ हाथ मटियाबय/हाथ मटियाएब १९९. फेका फेंका २००. देखाए देखा २०१. देखाबए २०२. सत्तरि सत्तर २०३. साहेब साहब २०४.गेलैन्ह/ गेलन्हि/ गेलनि‍ २०५. हेबाक/ होएबाक २०६.केलो/ कएलहुँ/केलौं/ केलुँ २०७. किछु न किछु/ किछु ने किछु २०८.घुमेलहुँ/ घुमओलहुँ/ घुमेलौं २०९. एलाक/ अएलाक २१०. अः/ अह २११.लय/ लए (अर्थ-परिवर्त्तन) २१२.कनीक/ कनेक २१३.सबहक/ सभक २१४.मिलाऽ/ मिला २१५.कऽ/ क २१६.जाऽ/ जा २१७.आऽ/ आ २१८.भऽ /भ’ (’ फॉन्टक कमीक द्योतक) २१९.निअम/ नियम २२० .हेक्टेअर/ हेक्टेयर २२१.पहिल अक्षर ढ/ बादक/ बीचक ढ़ २२२.तहिं/तहिँ/ तञि/ तैं २२३.कहिं/ कहीं २२४.तँइ/ तैं / तइँ २२५.नँइ/ नइँ/  नञि/ नहि/नै २२६.है/ हए / एलीहेँ/ २२७.छञि/ छै/ छैक /छइ २२८.दृष्टिएँ/ दृष्टियेँ २२९.आ (come)/ आऽ(conjunction) २३०. आ (conjunction)/ आऽ(come) २३१.कुनो/ कोनो, कोना/केना २३२.गेलैन्ह-गेलन्हि-गेलनि‍ २३३.हेबाक- होएबाक २३४.केलौँ- कएलौँ-कएलहुँ/केलौं २३५.किछु न किछ- किछु ने किछु २३६.केहेन- केहन २३७.आऽ (come)-आ (conjunction-and)/आ। आब'-आब' /आबह-आबह २३८. हएत-हैत २३९.घुमेलहुँ-घुमएलहुँ- घुमेलाें २४०.एलाक- अएलाक २४१.होनि- होइन/ होन्हि/ २४२.ओ-राम ओ श्यामक बीच(conjunction), ओऽ कहलक (he said)/ओ २४३.की हए/ कोसी अएली हए/ की है। की हइ २४४.दृष्टिएँ/ दृष्टियेँ २४५ .शामिल/ सामेल २४६.तैँ / तँए/ तञि/ तहिं २४७.जौं / ज्योँ/ जँ/ २४८.सभ/ सब २४९.सभक/ सबहक २५०.कहिं/ कहीं २५१.कुनो/ कोनो/ कोनहुँ/ २५२.फारकती भऽ गेल/ भए गेल/ भय गेल २५३.कोना/ केना/ कन्‍ना/कना २५४.अः/ अह २५५.जनै/ जनञ २५६.गेलनि‍/ गेलाह (अर्थ परिवर्तन) २५७.केलन्हि/ कएलन्हि/ केलनि‍/ २५८.लय/ लए/ लएह (अर्थ परिवर्तन) २५९.कनीक/ कनेक/कनी-मनी २६०.पठेलन्हि‍ पठेलनि‍/ पठेलइन/ पपठओलन्हि/ पठबौलनि‍/ २६१.निअम/ नियम २६२.हेक्टेअर/ हेक्टेयर २६३.पहिल अक्षर रहने ढ/ बीचमे रहने ढ़ २६४.आकारान्तमे बिकारीक प्रयोग उचित नै/ अपोस्ट्रोफीक प्रयोग फान्टक तकनीकी न्यूनताक परिचायक ओकर बदला अवग्रह (बिकारी) क प्रयोग उचित २६५.केर (पद्यमे ग्राह्य) / -क/ कऽ/ के २६६.छैन्हि- छन्हि २६७.लगैए/ लगैये २६८.होएत/ हएत २६९.जाएत/ जएत/ २७०.आएत/ अएत/ आओत २७१ .खाएत/ खएत/ खैत २७२.पिअएबाक/ पिएबाक/पि‍येबाक २७३.शुरु/ शुरुह २७४.शुरुहे/ शुरुए २७५.अएताह/अओताह/ एताह/ औताह २७६.जाहि/ जाइ/ जइ/ जै/ २७७.जाइत/ जैतए/ जइतए २७८.आएल/ अएल २७९.कैक/ कएक २८०.आयल/ अएल/ आएल २८१. जाए/ जअए/ जए (लालति‍ जाए लगलीह।) २८२. नुकएल/ नुकाएल २८३. कठुआएल/ कठुअएल २८४. ताहि/ तै/ तइ २८५. गायब/ गाएब/ गएब २८६. सकै/ सकए/ सकय २८७.सेरा/सरा/ सराए (भात सरा गेल) २८८.कहैत रही/देखैत रही/ कहैत छलौं/ कहै छलौं- अहिना चलैत/ पढ़ैत (पढ़ै-पढ़ैत अर्थ कखनो काल परिवर्तित) - आर बुझै/ बुझैत (बुझै/ बुझै छी, मुदा बुझैत-बुझैत)/ सकैत/ सकै। करैत/ करै। दै/ दैत। छैक/ छै। बचलै/ बचलैक। रखबा/ रखबाक । बिनु/ बिन। रातिक/ रातुक बुझै आ बुझैत केर अपन-अपन जगहपर प्रयोग समीचीन अछि‍। बुझैत-बुझैत आब बुझलि‍ऐ। हमहूँ बुझै छी। २८९. दुआरे/ द्वारे २९०.भेटि/ भेट/ भेँट २९१. खन/ खीन/  खुना (भोर खन/ भोर खीन) २९२.तक/ धरि २९३.गऽ/ गै (meaning different-जनबै गऽ) २९४.सऽ/ सँ (मुदा दऽ, लऽ) २९५.त्त्व,(तीन अक्षरक मेल बदला पुनरुक्तिक एक आ एकटा दोसरक उपयोग) आदिक बदला त्व आदि। महत्त्व/ महत्व/ कर्ता/ कर्त्ता आदिमे त्त संयुक्तक कोनो आवश्यकता मैथिलीमे नै अछि। वक्तव्य २९६.बेसी/ बेशी २९७.बाला/वाला बला/ वला (रहैबला) २९८ .वाली/ (बदलैवाली) २९९.वार्त्ता/ वार्ता ३००. अन्तर्राष्ट्रिय/ अन्तर्राष्ट्रीय ३०१. लेमए/ लेबए ३०२.लमछुरका, नमछुरका ३०२.लागै/ लगै ( भेटैत/ भेटै) ३०३.लागल/ लगल ३०४.हबा/ हवा ३०५.राखलक/ रखलक ३०६.आ (come)/ आ (and) ३०७. पश्चाताप/ पश्चात्ताप ३०८. ऽ केर व्यवहार शब्दक अन्तमे मात्र, यथासंभव बीचमे नै। ३०९.कहैत/ कहै ३१०. रहए (छल)/ रहै (छलै) (meaning different) ३११.तागति/ ताकति ३१२.खराप/ खराब ३१३.बोइन/ बोनि/ बोइनि ३१४.जाठि/ जाइठ ३१५.कागज/ कागच/ कागत ३१६.गिरै (meaning different- swallow)/ गिरए (खसए) ३१७.राष्ट्रिय/ राष्ट्रीय Festivals of Mithila DATE-LIST (year- 2011-12) (१४१९ साल) Marriage Days: Nov.2011- 20,21,23,25,27,30 Dec.2011- 1,5,9 January 2012- 18,19,20,23,25,27,29 Feb.2012- 2,3,8,9,10,16,17,19,23,24,29 March 2012- 1,8,9,12 April 2012- 15,16,18,25,26 June 2012- 8,13,24,25,28,29 Upanayana Days: February 2012- 2,3,24,26 March 2012- 4 April 2012- 1,2,26 June 2012- 22 Dviragaman Din: November 2011- 27,30 December 2011- 1,2,5,7,9,12 February 2012- 22,23,24,26,27,29 March 2012- 1,2,4,5,9,11,12 April 2012- 23,25,26,29 May 2012- 2,3,4,6,7 Mundan Din: December 2011- 1,5 January 201225,26,30 March 2012- 12 April 2012- 26 May 2012- 23,25,31 June 2012- 8,21,22,29 FESTIVALS OF MITHILA Mauna Panchami-20 July Madhushravani- 2 August Nag Panchami- 4 August Raksha Bandhan- 13 Aug Krishnastami- 21 August Kushi Amavasya / Somvari Vrat- 29 August Hartalika Teej- 31 August ChauthChandra-1 September Karma Dharma Ekadashi-8 September Indra Pooja Aarambh- 9 September Anant Caturdashi- 11 Sep Agastyarghadaan- 12 Sep Pitri Paksha begins- 13 Sep Mahalaya Aarambh- 13 September Vishwakarma Pooja- 17 September Jimootavahan Vrata/ Jitia-20 September Matri Navami- 21September Kalashsthapan- 28 September Belnauti- 2 October Patrika Pravesh- 3 October Mahastami- 4 October Maha Navami - 5 October Vijaya Dashami- 6 October Kojagara- 11 Oct Dhanteras- 24 October Diyabati, shyama pooja-26 October Annakoota/ Govardhana Pooja-27  October Bhratridwitiya/ Chitragupta Pooja-28 October Chhathi-kharna -31 October Chhathi- sayankalik arghya - 1 November Devotthan Ekadashi- 17 November Sama poojarambh- 2 November Kartik Poornima/ Sama Bisarjan- 10 Nov ravivratarambh- 27 November Navanna parvan- 29 November Vivaha Panchmi- 29 November Makara/ Teela Sankranti-15 Jan Naraknivaran chaturdashi- 21 January Basant Panchami/ Saraswati Pooja- 28 January Achla Saptmi- 30 January Mahashivaratri-20 February Holikadahan-Fagua-7 March Holi-9 Mar Varuni Yoga-20 March Chaiti  navaratrarambh- 23 March Chaiti Chhathi vrata-29 March Ram Navami- 1 April Mesha Sankranti-Satuani-13 April Jurishital-14 April Akshaya Tritiya-24 April Ravi Brat Ant- 29 April Janaki Navami- 30 April Vat Savitri-barasait- 20 May Ganga Dashhara-30 May Somavati Amavasya Vrata- 18 June Jagannath Rath Yatra- 21 June Hari Sayan Ekadashi- 30 June Aashadhi Guru Poornima-3 Jul VIDEHA ARCHIVE १.विदेह ई-पत्रिकाक सभटा पुरान अंक ब्रेल, तिरहुता आ देवनागरी रूपमे Videha e journal's all old issues in Braille Tirhuta and Devanagari versions विदेह ई-पत्रिकाक पहिल ५० अंक

विदेह ई-पत्रिकाक ५०म सँ आगाँक अंक २.मैथिली पोथी डाउनलोड Maithili Books Download ३.मैथिली ऑडियो संकलन Maithili Audio Downloads ४.मैथिली वीडियोक संकलन Maithili Videos ५.मिथिला चित्रकला/ आधुनिक चित्रकला आ चित्र Mithila Painting/ Modern Art and Photos "विदेह"क एहि सभ सहयोगी लिंकपर सेहो एक बेर जाऊ। ६.विदेह मैथिली क्विज  :  http://videhaquiz.blogspot.com/ ७.विदेह मैथिली जालवृत्त एग्रीगेटर : http://videha-aggregator.blogspot.com/ ८.विदेह मैथिली साहित्य अंग्रेजीमे अनूदित http://madhubani-art.blogspot.com/ ९.विदेहक पूर्व-रूप "भालसरिक गाछ"  : http://gajendrathakur.blogspot.com/ १०.विदेह इंडेक्स  : http://videha123.blogspot.com/ ११.विदेह फाइल : http://videha123.wordpress.com/ १२. विदेह: सदेह : पहिल तिरहुता (मिथिला़क्षर) जालवृत्त (ब्लॉग) http://videha-sadeha.blogspot.com/ १३. विदेह:ब्रेल: मैथिली ब्रेलमे: पहिल बेर विदेह द्वारा http://videha-braille.blogspot.com/ १४.VIDEHA IST MAITHILI  FORTNIGHTLY EJOURNAL ARCHIVE http://videha-archive.blogspot.com/ १५. विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका मैथिली पोथीक आर्काइव http://videha-pothi.blogspot.com/ १६. विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका ऑडियो आर्काइव http://videha-audio.blogspot.com/ १७. विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका वीडियो आर्काइव http://videha-video.blogspot.com/ १८. विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका मिथिला चित्रकला, आधुनिक कला आ चित्रकला http://videha-paintings-photos.blogspot.com/ १९. मैथिल आर मिथिला (मैथिलीक सभसँ लोकप्रिय जालवृत्त) http://maithilaurmithila.blogspot.com/ २०.श्रुति प्रकाशन http://www.shruti-publication.com/ २१.http://groups.google.com/group/videha VIDEHA केर सदस्यता लिअ Top of Form Bottom of Form ईमेल : एहि समूहपर जाऊ २२.http://groups.yahoo.com/group/VIDEHA/ Top of Form Subscribe to VIDEHA Powered by us.groups.yahoo.com Bottom of Form २३.गजेन्द्र ठाकुर इ‍डेक्स http://gajendrathakur123.blogspot.com २४.विदेह रेडियो:मैथिली कथा-कविता आदिक पहिल पोडकास्ट साइट http://videha123radio.wordpress.com/ २५. नेना भुटका http://mangan-khabas.blogspot.com/ महत्त्वपूर्ण सूचना:(१) 'विदेह' द्वारा धारावाहिक रूपे ई-प्रकाशित कएल गेल गजेन्द्र ठाकुरक  निबन्ध-प्रबन्ध-समीक्षा, उपन्यास (सहस्रबाढ़नि) , पद्य-संग्रह (सहस्राब्दीक चौपड़पर), कथा-गल्प (गल्प-गुच्छ), नाटक(संकर्षण), महाकाव्य (त्वञ्चाहञ्च आ असञ्जाति मन) आ बाल-किशोर साहित्य विदेहमे संपूर्ण ई-प्रकाशनक बाद प्रिंट फॉर्ममे। कुरुक्षेत्रम्–अन्तर्मनक खण्ड-१ सँ ७ Combined ISBN No.978-81-907729-7-6 विवरण एहि पृष्ठपर नीचाँमे आ प्रकाशकक साइट http://www.shruti-publication.com/ पर । महत्त्वपूर्ण सूचना (२):सूचना: विदेहक मैथिली-अंग्रेजी आ अंग्रेजी मैथिली कोष (इंटरनेटपर पहिल बेर सर्च-डिक्शनरी) एम.एस. एस.क्यू.एल. सर्वर आधारित -Based on ms-sql server Maithili-English and English-Maithili Dictionary. विदेहक भाषापाक- रचनालेखन स्तंभमे। कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक- गजेन्द्र ठाकुर गजेन्द्र ठाकुरक निबन्ध-प्रबन्ध-समीक्षा, उपन्यास (सहस्रबाढ़नि) , पद्य-संग्रह (सहस्राब्दीक चौपड़पर), कथा-गल्प (गल्प गुच्छ), नाटक(संकर्षण), महाकाव्य (त्वञ्चाहञ्च आ असञ्जाति मन) आ बालमंडली-किशोरजगत विदेहमे संपूर्ण ई-प्रकाशनक बाद प्रिंट फॉर्ममे। कुरुक्षेत्रम्–अन्तर्मनक, खण्ड-१ सँ ७ Ist edition 2009 of Gajendra Thakur’s KuruKshetram-Antarmanak (Vol. I to VII)- essay-paper-criticism, novel, poems, story, play, epics and Children-grown-ups literature in single binding: Language:Maithili ६९२ पृष्ठ : मूल्य भा. रु. 100/-(for individual buyers inside india) (add courier charges Rs.50/-per copy for Delhi/NCR and Rs.100/- per copy for outside Delhi)

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Details for purchase available at print-version publishers's site website: http://www.shruti-publication.com/ or you may write to e-mail:shruti.publication@shruti-publication.com विदेह: सदेह : १: २: ३: ४ तिरहुता : देवनागरी "विदेह" क, प्रिंट संस्करण :विदेह-ई-पत्रिका (http://www.videha.co.in/) क चुनल रचना सम्मिलित। विदेह:सदेह:१: २: ३: ४ सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। Details for purchase available at print-version publishers's site http://www.shruti-publication.com  or you may write to shruti.publication@shruti-publication.com २. संदेश- [ विदेह ई-पत्रिका, विदेह:सदेह मिथिलाक्षर आ देवनागरी आ गजेन्द्र ठाकुरक सात खण्डक- निबन्ध-प्रबन्ध-समीक्षा,उपन्यास (सहस्रबाढ़नि) , पद्य-संग्रह (सहस्राब्दीक चौपड़पर), कथा-गल्प (गल्प गुच्छ), नाटक (संकर्षण), महाकाव्य (त्वञ्चाहञ्च आ असञ्जाति मन) आ बाल-मंडली-किशोर जगत- संग्रह कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक मादेँ। ] १.श्री गोविन्द झा- विदेहकेँ तरंगजालपर उतारि विश्वभरिमे मातृभाषा मैथिलीक लहरि जगाओल, खेद जे अपनेक एहि महाभियानमे हम एखन धरि संग नहि दए सकलहुँ। सुनैत छी अपनेकेँ सुझाओ आ रचनात्मक आलोचना प्रिय लगैत अछि तेँ किछु लिखक मोन भेल। हमर सहायता आ सहयोग अपनेकेँ सदा उपलब्ध रहत। २.श्री रमानन्द रेणु- मैथिलीमे ई-पत्रिका पाक्षिक रूपेँ चला कऽ जे अपन मातृभाषाक प्रचार कऽ रहल छी, से धन्यवाद । आगाँ अपनेक समस्त मैथिलीक कार्यक हेतु हम हृदयसँ शुभकामना दऽ रहल छी। ३.श्री विद्यानाथ झा "विदित"- संचार आ प्रौद्योगिकीक एहि प्रतिस्पर्धी ग्लोबल युगमे अपन महिमामय "विदेह"केँ अपना देहमे प्रकट देखि जतबा प्रसन्नता आ संतोष भेल, तकरा कोनो उपलब्ध "मीटर"सँ नहि नापल जा सकैछ? ..एकर ऐतिहासिक मूल्यांकन आ सांस्कृतिक प्रतिफलन एहि शताब्दीक अंत धरि लोकक नजरिमे आश्चर्यजनक रूपसँ प्रकट हैत। ४. प्रो. उदय नारायण सिंह "नचिकेता"- जे काज अहाँ कए रहल छी तकर चरचा एक दिन मैथिली भाषाक इतिहासमे होएत। आनन्द भए रहल अछि, ई जानि कए जे एतेक गोट मैथिल "विदेह" ई जर्नलकेँ पढ़ि रहल छथि।...विदेहक चालीसम अंक पुरबाक लेल अभिनन्दन। ५. डॉ. गंगेश गुंजन- एहि विदेह-कर्ममे लागि रहल अहाँक सम्वेदनशील मन, मैथिलीक प्रति समर्पित मेहनतिक अमृत रंग, इतिहास मे एक टा विशिष्ट फराक अध्याय आरंभ करत, हमरा विश्वास अछि। अशेष शुभकामना आ बधाइक सङ्ग, सस्नेह...अहाँक पोथी कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक प्रथम दृष्टया बहुत भव्य तथा उपयोगी बुझाइछ। मैथिलीमे तँ अपना स्वरूपक प्रायः ई पहिले एहन  भव्य अवतारक पोथी थिक। हर्षपूर्ण हमर हार्दिक बधाई स्वीकार करी। ६. श्री रामाश्रय झा "रामरंग"(आब स्वर्गीय)- "अपना" मिथिलासँ संबंधित...विषय वस्तुसँ अवगत भेलहुँ।...शेष सभ कुशल अछि। ७. श्री ब्रजेन्द्र त्रिपाठी- साहित्य अकादमी- इंटरनेट पर प्रथम मैथिली पाक्षिक पत्रिका "विदेह" केर लेल बधाई आ शुभकामना स्वीकार करू। ८. श्री प्रफुल्लकुमार सिंह "मौन"- प्रथम मैथिली पाक्षिक पत्रिका "विदेह" क प्रकाशनक समाचार जानि कनेक चकित मुदा बेसी आह्लादित भेलहुँ। कालचक्रकेँ पकड़ि जाहि दूरदृष्टिक परिचय देलहुँ, ओहि लेल हमर मंगलकामना। ९.डॉ. शिवप्रसाद यादव- ई जानि अपार हर्ष भए रहल अछि, जे नव सूचना-क्रान्तिक क्षेत्रमे मैथिली पत्रकारिताकेँ प्रवेश दिअएबाक साहसिक कदम उठाओल अछि। पत्रकारितामे एहि प्रकारक नव प्रयोगक हम स्वागत करैत छी, संगहि "विदेह"क सफलताक शुभकामना। १०. श्री आद्याचरण झा- कोनो पत्र-पत्रिकाक प्रकाशन- ताहूमे मैथिली पत्रिकाक प्रकाशनमे के कतेक सहयोग करताह- ई तऽ भविष्य कहत। ई हमर ८८ वर्षमे ७५ वर्षक अनुभव रहल। एतेक पैघ महान यज्ञमे हमर श्रद्धापूर्ण आहुति प्राप्त होयत- यावत ठीक-ठाक छी/ रहब। ११. श्री विजय ठाकुर- मिशिगन विश्वविद्यालय- "विदेह" पत्रिकाक अंक देखलहुँ, सम्पूर्ण टीम बधाईक पात्र अछि। पत्रिकाक मंगल भविष्य हेतु हमर शुभकामना स्वीकार कएल जाओ। १२. श्री सुभाषचन्द्र यादव- ई-पत्रिका "विदेह" क बारेमे जानि प्रसन्नता भेल। ’विदेह’ निरन्तर पल्लवित-पुष्पित हो आ चतुर्दिक अपन सुगंध पसारय से कामना अछि। १३. श्री मैथिलीपुत्र प्रदीप- ई-पत्रिका "विदेह" केर सफलताक भगवतीसँ कामना। हमर पूर्ण सहयोग रहत। १४. डॉ. श्री भीमनाथ झा- "विदेह" इन्टरनेट पर अछि तेँ "विदेह" नाम उचित आर कतेक रूपेँ एकर विवरण भए सकैत अछि। आइ-काल्हि मोनमे उद्वेग रहैत अछि, मुदा शीघ्र पूर्ण सहयोग देब।कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक देखि अति प्रसन्नता भेल। मैथिलीक लेल ई घटना छी। १५. श्री रामभरोस कापड़ि "भ्रमर"- जनकपुरधाम- "विदेह" ऑनलाइन देखि रहल छी। मैथिलीकेँ अन्तर्राष्ट्रीय जगतमे पहुँचेलहुँ तकरा लेल हार्दिक बधाई। मिथिला रत्न सभक संकलन अपूर्व। नेपालोक सहयोग भेटत, से विश्वास करी। १६. श्री राजनन्दन लालदास- "विदेह" ई-पत्रिकाक माध्यमसँ बड़ नीक काज कए रहल छी, नातिक अहिठाम देखलहुँ। एकर वार्षिक अ‍ंक जखन प्रिं‍ट निकालब तँ हमरा पठायब। कलकत्तामे बहुत गोटेकेँ हम साइटक पता लिखाए देने छियन्हि। मोन तँ होइत अछि जे दिल्ली आबि कए आशीर्वाद दैतहुँ, मुदा उमर आब बेशी भए गेल। शुभकामना देश-विदेशक मैथिलकेँ जोड़बाक लेल।.. उत्कृष्ट प्रकाशन कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक लेल बधाइ। अद्भुत काज कएल अछि, नीक प्रस्तुति अछि सात खण्डमे।  मुदा अहाँक सेवा आ से निःस्वार्थ तखन बूझल जाइत जँ अहाँ द्वारा प्रकाशित पोथी सभपर दाम लिखल नहि रहितैक। ओहिना सभकेँ विलहि देल जइतैक। (स्पष्टीकरण-  श्रीमान्, अहाँक सूचनार्थ विदेह द्वारा ई-प्रकाशित कएल सभटा सामग्री आर्काइवमे https://sites.google.com/a/videha.com/videha-pothi/ पर बिना मूल्यक डाउनलोड लेल उपलब्ध छै आ भविष्यमे सेहो रहतैक। एहि आर्काइवकेँ जे कियो प्रकाशक अनुमति लऽ कऽ प्रिंट रूपमे प्रकाशित कएने छथि आ तकर ओ दाम रखने छथि ताहिपर हमर कोनो नियंत्रण नहि अछि।- गजेन्द्र ठाकुर)...   अहाँक प्रति अशेष शुभकामनाक संग। १७. डॉ. प्रेमशंकर सिंह- अहाँ मैथिलीमे इंटरनेटपर पहिल पत्रिका "विदेह" प्रकाशित कए अपन अद्भुत मातृभाषानुरागक परिचय देल अछि, अहाँक निःस्वार्थ मातृभाषानुरागसँ प्रेरित छी, एकर निमित्त जे हमर सेवाक प्रयोजन हो, तँ सूचित करी। इंटरनेटपर आद्योपांत पत्रिका देखल, मन प्रफुल्लित भऽ गेल। १८.श्रीमती शेफालिका वर्मा- विदेह ई-पत्रिका देखि मोन उल्लाससँ भरि गेल। विज्ञान कतेक प्रगति कऽ रहल अछि...अहाँ सभ अनन्त आकाशकेँ भेदि दियौ, समस्त विस्तारक रहस्यकेँ तार-तार कऽ दियौक...। अपनेक अद्भुत पुस्तक कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक विषयवस्तुक दृष्टिसँ गागरमे सागर अछि। बधाई। १९.श्री हेतुकर झा, पटना-जाहि समर्पण भावसँ अपने मिथिला-मैथिलीक सेवामे तत्पर छी से स्तुत्य अछि। देशक राजधानीसँ भय रहल मैथिलीक शंखनाद मिथिलाक गाम-गाममे मैथिली चेतनाक विकास अवश्य करत। २०. श्री योगानन्द झा, कबिलपुर, लहेरियासराय- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पोथीकेँ निकटसँ देखबाक अवसर भेटल अछि आ मैथिली जगतक एकटा उद्भट ओ समसामयिक दृष्टिसम्पन्न हस्ताक्षरक कलमबन्द परिचयसँ आह्लादित छी। "विदेह"क देवनागरी सँस्करण पटनामे रु. 80/- मे उपलब्ध भऽ सकल जे विभिन्न लेखक लोकनिक छायाचित्र, परिचय पत्रक ओ रचनावलीक सम्यक प्रकाशनसँ ऐतिहासिक कहल जा सकैछ। २१. श्री किशोरीकान्त मिश्र- कोलकाता- जय मैथिली, विदेहमे बहुत रास कविता, कथा, रिपोर्ट आदिक सचित्र संग्रह देखि आ आर अधिक प्रसन्नता मिथिलाक्षर देखि- बधाई स्वीकार कएल जाओ। २२.श्री जीवकान्त- विदेहक मुद्रित अंक पढ़ल- अद्भुत मेहनति। चाबस-चाबस। किछु समालोचना मरखाह..मुदा सत्य। २३. श्री भालचन्द्र झा- अपनेक कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक देखि बुझाएल जेना हम अपने छपलहुँ अछि। एकर विशालकाय आकृति अपनेक सर्वसमावेशताक परिचायक अछि। अपनेक रचना सामर्थ्यमे उत्तरोत्तर वृद्धि हो, एहि शुभकामनाक संग हार्दिक बधाई। २४.श्रीमती डॉ नीता झा- अहाँक कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़लहुँ। ज्योतिरीश्वर शब्दावली, कृषि मत्स्य शब्दावली आ सीत बसन्त आ सभ कथा, कविता, उपन्यास, बाल-किशोर साहित्य सभ उत्तम छल। मैथिलीक उत्तरोत्तर विकासक लक्ष्य दृष्टिगोचर होइत अछि। २५.श्री मायानन्द मिश्र- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक मे हमर उपन्यास स्त्रीधनक जे विरोध कएल गेल अछि तकर हम विरोध करैत छी।... कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पोथीक लेल शुभकामना।(श्रीमान् समालोचनाकेँ विरोधक रूपमे नहि लेल जाए।-गजेन्द्र ठाकुर) २६.श्री महेन्द्र हजारी- सम्पादक श्रीमिथिला- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़ि मोन हर्षित भऽ गेल..एखन पूरा पढ़यमे बहुत समय लागत, मुदा जतेक पढ़लहुँ से आह्लादित कएलक। २७.श्री केदारनाथ चौधरी- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक अद्भुत लागल, मैथिली साहित्य लेल ई पोथी एकटा प्रतिमान बनत। २८.श्री सत्यानन्द पाठक- विदेहक हम नियमित पाठक छी। ओकर स्वरूपक प्रशंसक छलहुँ। एम्हर अहाँक लिखल - कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक देखलहुँ। मोन आह्लादित भऽ उठल। कोनो रचना तरा-उपरी। २९.श्रीमती रमा झा-सम्पादक मिथिला दर्पण। कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक प्रिंट फॉर्म पढ़ि आ एकर गुणवत्ता देखि मोन प्रसन्न भऽ गेल, अद्भुत शब्द एकरा लेल प्रयुक्त कऽ रहल छी। विदेहक उत्तरोत्तर प्रगतिक शुभकामना। ३०.श्री नरेन्द्र झा, पटना- विदेह नियमित देखैत रहैत छी। मैथिली लेल अद्भुत काज कऽ रहल छी। ३१.श्री रामलोचन ठाकुर- कोलकाता- मिथिलाक्षर विदेह देखि मोन प्रसन्नतासँ भरि उठल, अंकक विशाल परिदृश्य आस्वस्तकारी अछि। ३२.श्री तारानन्द वियोगी- विदेह आ कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक देखि चकबिदोर लागि गेल। आश्चर्य। शुभकामना आ बधाई। ३३.श्रीमती प्रेमलता मिश्र “प्रेम”- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़लहुँ। सभ रचना उच्चकोटिक लागल। बधाई। ३४.श्री कीर्तिनारायण मिश्र- बेगूसराय- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक बड्ड नीक लागल, आगांक सभ काज लेल बधाई। ३५.श्री महाप्रकाश-सहरसा- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक नीक लागल, विशालकाय संगहि उत्तमकोटिक। ३६.श्री अग्निपुष्प- मिथिलाक्षर आ देवाक्षर विदेह पढ़ल..ई प्रथम तँ अछि एकरा प्रशंसामे मुदा हम एकरा दुस्साहसिक कहब। मिथिला चित्रकलाक स्तम्भकेँ मुदा अगिला अंकमे आर विस्तृत बनाऊ। ३७.श्री मंजर सुलेमान-दरभंगा- विदेहक जतेक प्रशंसा कएल जाए कम होएत। सभ चीज उत्तम। ३८.श्रीमती प्रोफेसर वीणा ठाकुर- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक उत्तम, पठनीय, विचारनीय। जे क्यो देखैत छथि पोथी प्राप्त करबाक उपाय पुछैत छथि। शुभकामना। ३९.श्री छत्रानन्द सिंह झा- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़लहुँ, बड्ड नीक सभ तरहेँ। ४०.श्री ताराकान्त झा- सम्पादक मैथिली दैनिक मिथिला समाद- विदेह तँ कन्टेन्ट प्रोवाइडरक काज कऽ रहल अछि। कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक अद्भुत लागल। ४१.डॉ रवीन्द्र कुमार चौधरी- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक बहुत नीक, बहुत मेहनतिक परिणाम। बधाई। ४२.श्री अमरनाथ- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक आ विदेह दुनू स्मरणीय घटना अछि, मैथिली साहित्य मध्य। ४३.श्री पंचानन मिश्र- विदेहक वैविध्य आ निरन्तरता प्रभावित करैत अछि, शुभकामना। ४४.श्री केदार कानन- कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक लेल अनेक धन्यवाद, शुभकामना आ बधाइ स्वीकार करी। आ नचिकेताक भूमिका पढ़लहुँ। शुरूमे तँ लागल जेना कोनो उपन्यास अहाँ द्वारा सृजित भेल अछि मुदा पोथी उनटौला पर ज्ञात भेल जे एहिमे तँ सभ विधा समाहित अछि। ४५.श्री धनाकर ठाकुर- अहाँ नीक काज कऽ रहल छी। फोटो गैलरीमे चित्र एहि शताब्दीक जन्मतिथिक अनुसार रहैत तऽ नीक। ४६.श्री आशीष झा- अहाँक पुस्तकक संबंधमे एतबा लिखबा सँ अपना कए नहि रोकि सकलहुँ जे ई किताब मात्र किताब नहि थीक, ई एकटा उम्मीद छी जे मैथिली अहाँ सन पुत्रक सेवा सँ निरंतर समृद्ध होइत चिरजीवन कए प्राप्त करत। ४७.श्री शम्भु कुमार सिंह- विदेहक तत्परता आ क्रियाशीलता देखि आह्लादित भऽ रहल छी। निश्चितरूपेण कहल जा सकैछ जे समकालीन मैथिली पत्रिकाक इतिहासमे विदेहक नाम स्वर्णाक्षरमे लिखल जाएत। ओहि कुरुक्षेत्रक घटना सभ तँ अठारहे दिनमे खतम भऽ गेल रहए मुदा अहाँक कुरुक्षेत्रम् तँ अशेष अछि। ४८.डॉ. अजीत मिश्र- अपनेक प्रयासक कतबो प्रश‍ंसा कएल जाए कमे होएतैक। मैथिली साहित्यमे अहाँ द्वारा कएल गेल काज युग-युगान्तर धरि पूजनीय रहत। ४९.श्री बीरेन्द्र मल्लिक- अहाँक कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक आ विदेह:सदेह पढ़ि अति प्रसन्नता भेल। अहाँक स्वास्थ्य ठीक रहए आ उत्साह बनल रहए से कामना। ५०.श्री कुमार राधारमण- अहाँक दिशा-निर्देशमे विदेह पहिल मैथिली ई-जर्नल देखि अति प्रसन्नता भेल। हमर शुभकामना। ५१.श्री फूलचन्द्र झा प्रवीण-विदेह:सदेह पढ़ने रही मुदा कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक देखि बढ़ाई देबा लेल बाध्य भऽ गेलहुँ। आब विश्वास भऽ गेल जे मैथिली नहि मरत। अशेष शुभकामना। ५२.श्री विभूति आनन्द- विदेह:सदेह देखि, ओकर विस्तार देखि अति प्रसन्नता भेल। ५३.श्री मानेश्वर मनुज-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक एकर भव्यता देखि अति प्रसन्नता भेल, एतेक विशाल ग्रन्थ मैथिलीमे आइ धरि नहि देखने रही। एहिना भविष्यमे काज करैत रही, शुभकामना। ५४.श्री विद्यानन्द झा- आइ.आइ.एम.कोलकाता- कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक विस्तार, छपाईक संग गुणवत्ता देखि अति प्रसन्नता भेल। अहाँक अनेक धन्यवाद; कतेक बरखसँ हम नेयारैत छलहुँ जे सभ पैघ शहरमे मैथिली लाइब्रेरीक स्थापना होअए, अहाँ ओकरा वेबपर कऽ रहल छी, अनेक धन्यवाद। ५५.श्री अरविन्द ठाकुर-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक मैथिली साहित्यमे कएल गेल एहि तरहक पहिल प्रयोग अछि, शुभकामना। ५६.श्री कुमार पवन-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक पढ़ि रहल छी। किछु लघुकथा पढ़ल अछि, बहुत मार्मिक छल। ५७. श्री प्रदीप बिहारी-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक देखल, बधाई। ५८.डॉ मणिकान्त ठाकुर-कैलिफोर्निया- अपन विलक्षण नियमित सेवासँ हमरा लोकनिक हृदयमे विदेह सदेह भऽ गेल अछि। ५९.श्री धीरेन्द्र प्रेमर्षि- अहाँक समस्त प्रयास सराहनीय। दुख होइत अछि जखन अहाँक प्रयासमे अपेक्षित सहयोग नहि कऽ पबैत छी। ६०.श्री देवशंकर नवीन- विदेहक निरन्तरता आ विशाल स्वरूप- विशाल पाठक वर्ग, एकरा ऐतिहासिक बनबैत अछि। ६१.श्री मोहन भारद्वाज- अहाँक समस्त कार्य देखल, बहुत नीक। एखन किछु परेशानीमे छी, मुदा शीघ्र सहयोग देब। ६२.श्री फजलुर रहमान हाशमी-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक मे एतेक मेहनतक लेल अहाँ साधुवादक अधिकारी छी। ६३.श्री लक्ष्मण झा "सागर"- मैथिलीमे चमत्कारिक रूपेँ अहाँक प्रवेश आह्लादकारी अछि।..अहाँकेँ एखन आर..दूर..बहुत दूरधरि जेबाक अछि। स्वस्थ आ प्रसन्न रही। ६४.श्री जगदीश प्रसाद मंडल-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक पढ़लहुँ । कथा सभ आ उपन्यास सहस्रबाढ़नि पूर्णरूपेँ पढ़ि गेल छी। गाम-घरक भौगोलिक विवरणक जे सूक्ष्म वर्णन सहस्रबाढ़निमे अछि, से चकित कएलक, एहि संग्रहक कथा-उपन्यास मैथिली लेखनमे विविधता अनलक अछि। समालोचना शास्त्रमे अहाँक दृष्टि वैयक्तिक नहि वरन् सामाजिक आ कल्याणकारी अछि, से प्रशंसनीय। ६५.श्री अशोक झा-अध्यक्ष मिथिला विकास परिषद- कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक लेल बधाई आ आगाँ लेल शुभकामना। ६६.श्री ठाकुर प्रसाद मुर्मु- अद्भुत प्रयास। धन्यवादक संग प्रार्थना जे अपन माटि-पानिकेँ ध्यानमे राखि अंकक समायोजन कएल जाए। नव अंक धरि प्रयास सराहनीय। विदेहकेँ बहुत-बहुत धन्यवाद जे एहेन सुन्दर-सुन्दर सचार (आलेख) लगा रहल छथि। सभटा ग्रहणीय- पठनीय। ६७.बुद्धिनाथ मिश्र- प्रिय गजेन्द्र जी,अहाँक सम्पादन मे प्रकाशित ‘विदेह’आ ‘कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक’ विलक्षण पत्रिका आ विलक्षण पोथी! की नहि अछि अहाँक सम्पादनमे? एहि प्रयत्न सँ मैथिली क विकास होयत,निस्संदेह। ६८.श्री बृखेश चन्द्र लाल- गजेन्द्रजी, अपनेक पुस्तक कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक पढ़ि मोन गदगद भय गेल , हृदयसँ अनुगृहित छी । हार्दिक शुभकामना । ६९.श्री परमेश्वर कापड़ि - श्री गजेन्द्र जी । कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक पढ़ि गदगद आ नेहाल भेलहुँ। ७०.श्री रवीन्द्रनाथ ठाकुर- विदेह पढ़ैत रहैत छी। धीरेन्द्र प्रेमर्षिक मैथिली गजलपर आलेख पढ़लहुँ। मैथिली गजल कत्तऽ सँ कत्तऽ चलि गेलैक आ ओ अपन आलेखमे मात्र अपन जानल-पहिचानल लोकक चर्च कएने छथि। जेना मैथिलीमे मठक परम्परा रहल अछि। (स्पष्टीकरण- श्रीमान्, प्रेमर्षि जी ओहि आलेखमे ई स्पष्ट लिखने छथि जे किनको नाम जे छुटि गेल छन्हि तँ से मात्र आलेखक लेखकक जानकारी नहि रहबाक द्वारे, एहिमे आन कोनो कारण नहि देखल जाय। अहाँसँ एहि विषयपर विस्तृत आलेख सादर आमंत्रित अछि।-सम्पादक) ७१.श्री मंत्रेश्वर झा- विदेह पढ़ल आ संगहि अहाँक मैगनम ओपस कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक सेहो, अति उत्तम। मैथिलीक लेल कएल जा रहल अहाँक समस्त कार्य अतुलनीय अछि। ७२. श्री हरेकृष्ण झा- कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक मैथिलीमे अपन तरहक एकमात्र ग्रन्थ अछि, एहिमे लेखकक समग्र दृष्टि आ रचना कौशल देखबामे आएल जे लेखकक फील्डवर्कसँ जुड़ल रहबाक कारणसँ अछि। ७३.श्री सुकान्त सोम- कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक मे  समाजक इतिहास आ वर्तमानसँ अहाँक जुड़ाव बड्ड नीक लागल, अहाँ एहि क्षेत्रमे आर आगाँ काज करब से आशा अछि। ७४.प्रोफेसर मदन मिश्र- कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक सन किताब मैथिलीमे पहिले अछि आ एतेक विशाल संग्रहपर शोध कएल जा सकैत अछि। भविष्यक लेल शुभकामना। ७५.प्रोफेसर कमला चौधरी- मैथिलीमे कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक सन पोथी आबए जे गुण आ रूप दुनूमे निस्सन होअए, से बहुत दिनसँ आकांक्षा छल, ओ आब जा कऽ पूर्ण भेल। पोथी एक हाथसँ दोसर हाथ घुमि रहल अछि, एहिना आगाँ सेहो अहाँसँ आशा अछि। ७६.श्री उदय चन्द्र झा "विनोद": गजेन्द्रजी, अहाँ जतेक काज कएलहुँ अछि से मैथिलीमे आइ धरि कियो नहि कएने छल। शुभकामना। अहाँकेँ एखन बहुत काज आर करबाक अछि। ७७.श्री कृष्ण कुमार कश्यप: गजेन्द्र ठाकुरजी, अहाँसँ भेँट एकटा स्मरणीय क्षण बनि गेल। अहाँ जतेक काज एहि बएसमे कऽ गेल छी ताहिसँ हजार गुणा आर बेशीक आशा अछि। ७८.श्री मणिकान्त दास: अहाँक मैथिलीक कार्यक प्रशंसा लेल शब्द नहि भेटैत अछि। अहाँक कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक सम्पूर्ण रूपेँ पढ़ि गेलहुँ। त्वञ्चाहञ्च बड्ड नीक लागल। ७९. श्री हीरेन्द्र कुमार झा- विदेह ई-पत्रिकाक सभ अंक ई-पत्रसँ भेटैत रहैत अछि। मैथिलीक ई-पत्रिका छैक एहि बातक गर्व होइत अछि। अहाँ आ अहाँक सभ सहयोगीकेँ हार्दिक शुभकामना। विदेह मैथिली साहित्य आन्दोलन (c)२००४-११. सर्वाधिकार लेखकाधीन आ जतय लेखकक नाम नहि अछि ततय संपादकाधीन। विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। सह-सम्पादक: उमेश मंडल। सहायक सम्पादक: शिव कुमार झा आ मुन्नाजी (मनोज कुमार कर्ण)। भाषा-सम्पादन: नागेन्द्र कुमार झा आ पञ्जीकार विद्यानन्द झा। कला-सम्पादन: ज्योति सुनीत चौधरी आ रश्मि रेखा सिन्हा। सम्पादक-शोध-अन्वेषण: डॉ. जया वर्मा आ डॉ. राजीव कुमार वर्मा। सम्पादक- नाटक-रंगमंच-चलचित्र- बेचन ठाकुर। सम्पादक-सूचना-सम्पर्क-समाद पूनम मंडल आ प्रियंका झा। रचनाकार अपन मौलिक आ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि) ggajendra@videha.com केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx, .rtf वा .txt फॉर्मेटमे पठा सकैत छथि। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेताह, से आशा करैत छी। रचनाक अंतमे टाइप रहय, जे ई रचना मौलिक अछि, आ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। मेल प्राप्त होयबाक बाद यथासंभव शीघ्र ( सात दिनक भीतर) एकर प्रकाशनक अंकक सूचना देल जायत। ’विदेह' प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका अछि आ एहिमे मैथिली, संस्कृत आ अंग्रेजीमे मिथिला आ मैथिलीसँ संबंधित रचना प्रकाशित कएल जाइत अछि। एहि ई पत्रिकाकेँ श्रीमति लक्ष्मी ठाकुर द्वारा मासक ०१ आ १५ तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि। (c) 2004-11 सर्वाधिकार सुरक्षित। विदेहमे प्रकाशित सभटा रचना आ आर्काइवक सर्वाधिकार रचनाकार आ संग्रहकर्त्ताक लगमे छन्हि। रचनाक अनुवाद आ पुनः प्रकाशन किंवा आर्काइवक उपयोगक अधिकार किनबाक हेतु ggajendra@videha.co.in पर संपर्क करू। एहि साइटकेँ प्रीति झा ठाकुर, मधूलिका चौधरी आ रश्मि प्रिया द्वारा डिजाइन कएल गेल। सिद्धिरस्तु वि दे ह विदेह Videha বিদেহ  विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका Videha Ist Maithili Fortnightly e Magazine  विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका 'विदेह' ९४ म अंक १५ नवम्बर २०११ (वर्ष ४ मास ४७ अंक ९४)http://www.videha.co.in/ मानुषीमिह संस्कृताम् ISSN 2229-547X VIDEHA वि दे ह विदेह Videha বিদেহ  विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका Videha Ist Maithili Fortnightly e Magazine  विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक 'विदेह' ९४ म अंक १५ नवम्बर २०११ (वर्ष ४ मास ४७ अंक ९४)http://www.videha.co.in/ मानुषीमिह संस्कृताम् ISSN 2229-547X VIDEHA

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