VIDEHA — Issue 97 / अंक ९७

Publication: VIDEHA · Issue: 97
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568 569 ISSN 2229-547X VIDEHA 'विदेह' ९७ म अंक ०१ जनवरी २०१२ (वर्ष ५ मास ४९ अंक ९७) वि  दे  ह विदेह Videha বিদেহ http://www.videha.co.in  विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका Videha Ist Maithili Fortnightly e Magazine   नव अंक देखबाक लेल पृष्ठ सभकेँ रिफ्रेश कए देखू। Always refresh the pages for viewing new issue of VIDEHA. Read in your own script Roman(Eng)Gujarati Bangla Oriya Gurmukhi Telugu Tamil Kannada Malayalam Hindi ऐ अंकमे अछि:- १. संपादकीय संदेश २. गद्य २.१.नवेंदु कुमार झा-साकेतानन्दजीक मृत्यु/ पुरस्कारक बजार मे लागि रहल बोली/ पर्यटक स्थल बनल विस्फी, महिषी पर सेहो अछि नजरि/ अन्धरा ठाढ़ी मे बनत स्मारक, सरकार केँ याद अयलनि वाचस्पति मिश्र/ साहित्यिक जौहरी छथि अकादमीक मैथिली परामर्शी/ शताब्दी वर्ष मे प्रकाशित होयत सय पोथी/ विधान परिषद्क शताब्दी वर्षक अवसर पर आयोजित होयत विशेष बैसक/ बिहार मे खादी ग्रामोद्योग संस्था सभक विकास। २.२.१.प्रा.परमेश्वर कापड़ि- जनकपुरमे कथा–गोष्ठी सम्पन्न २.सुजितक अनुभव रिपोर्टर डायरीमे ३.सुमित आनन्द- मैथिली’ शोध-पत्रिकाक लोकार्पण २.३.अनिल मल्लिक- हम, देह आ विदेह....! २.४.१.जगदीश प्रसाद मण्‍डल- कामरूप आ मिथिला २— बृषेशचन्द्र लाल- बिद्यापति–स्मृति पर्व मादेँ २.५.सत्यनारायण झा -कथा-रिटायरमेंट २.६.१. रवि भूषण पाठक- आचार्य भामहक चिंतन / दण्‍डी आ काव्‍यलक्षण / टिल्‍लू जी (शिव कुमार झा) २. अतुलेश्वर- धीरेन्द्र, मैथिली आ शिष्य २.७.१.ओमप्रकाश झा  -लोकतन्त्रक माने (कथा) २. मुन्नाजी- एकटा विहनि कथा २.८.१.मुन्नाजी- हम पुछैत छी- श्री गोविन्द झा जीसँ मुन्नाजीक भेल मुखोतरि/ मैथिलोत्सव २०११ २.शम्मी वत्स/ रूपेश- हैदराबादमे विद्यापति पर्व समारोह आइ २५ दिसम्बर २०११ केँ भेल(हैदराबादसँ शम्मी वत्स/ रूपेशक रिपोर्ट) ३.शेफालिका वर्मा- "आधुनिक मैथिली साहित्यक प्रभाव क्षेत्रमे नारी तत्व" संगमे "मैथिली आ तमिल कवियित्री सम्मेलन" ४.रोशन झा क रिपोर्ट-  "बुधियार छौड़ा आ राक्षस" बाल नाटकक मंचन ५.रमेश रंजनजीक रिपोर्ट- "बुधियार छौड़ा आ राक्षस" ६.प्रवीण नारायण चौधरी- बिराटनगरमे विद्यापति पर्व समारोह सम्पन्न 9-10 दिसम्बर 2011 ३. पद्य ३.१.१.कामिनी कामायनी- द्रौपदी गतांक सॅ आगॉ. २.भावना नवीन- गजल ३.शान्तिलक्ष्मी चौधरी तीनटा गजल ४.स्वाती शाकम्भरी- पिताजी ३.२.१.डॉ.अरुण कुमार सिंह- सोधनपाल २.ओमप्रकाश झा- सातटा गजल २.जगदीश प्रसाद मण्डल- तीनटा कविता ३.३.१. जगदीश चन्द्र ठाकुर ’अनिल’ २.निक्की प्रियदर्शिनी- दूटा कविता ३.मिहिर झा - दूटा कविता ४.जगदानंद झा 'मनु' -गीत-गजल ५.नारायण झा- एकटा कविता ३.४.१.विनीत उत्पल- गजल २रवि मिश्रा’भारद्वाज’३.उमेश मण्डल ४.सुबोध ठाकुर ३.५.१. अनिल मल्लिक २.गणेश कुमार झा "बावरा"३.रामवि‍लास साहु ३.६.१.परिचय दास-मूल भोजपुरीसँ मैथिली अनुवाद विनीत उत्पल २.निशांत  झा ३. आशीष अनचिन्हार- सेनूरदानक गीत- ४. अजीत मिश्र ५.पवन झा “ अग्निवाण” ३.७.१. प्रवीण नारायण चौधरी २.डॉ॰ शशिधर कुमर ३.नवीन कुमार "आशा" ४.मनीष झा बौआभाई ३.८.१. रवि भूषण पाठक २.नवीन ठाकुर ३.प्रभात राय भट्ट ४.आनन्द कुमार झा ५. अमित मोहन झा ४. मिथिला कला-संगीत-१.ज्योति सुनीत चौधरी २.श्वेता झा (सिंगापुर) ३.गुंजन कर्ण ४.राजनाथ मिश्र (चित्रमय मिथिला) ५. उमेश मण्डल (मिथिलाक वनस्पति/ मिथिलाक जीव-जन्तु/ मिथिलाक जिनगी) ५. गद्य-पद्य भारती: श्री काशीनाथ सिंह “रेहनपर रग्घू”- (हिन्दीसँ मैथिली अनुवाद श्री विनीत उत्पल) असगर वजाहत- हम हिन्दू छी हिन्दी कथाक मैथिली रूपान्तरण विनीत उत्पल द्वारा- ६.बालानां कृते-१.कणकमणि दीक्षित- भगता बेङक कथा- नेपालीसँ मैथिली अनुवाद: श्रीमती रूपा धीरू आ श्री धीरेन्द्र प्रेमर्षि द्वारा २.डॉ॰ शशिधर कुमर “विदेह” - दक्षिणी ध्रुव पर मनुक्खक पएरक सए वर्ष अर्थात्- खिस्सा अण्टार्कटिका केर ७. भाषापाक रचना-लेखन -[मानक मैथिली], [विदेहक मैथिली-अंग्रेजी आ अंग्रेजी मैथिली कोष (इंटरनेटपर पहिल बेर सर्च-डिक्शनरी) एम.एस. एस.क्यू.एल. सर्वर आधारित -Based on ms-sql server Maithili-English and English-Maithili Dictionary.] 8.VIDEHA FOR NON RESIDENTS 8.2.1. Maithili Poem by Smt. shefalika Varma translated into English by  by Mrs Jaya Verma२.The constant shedding of Tears (Maithili poem bySh. Rajdeo Mandal - translated into English by Gajendra Thakur) विदेह ई-पत्रिकाक सभटा पुरान अंक ( ब्रेल, तिरहुता आ देवनागरी मे ) पी.डी.एफ. डाउनलोडक लेल नीचाँक लिंकपर उपलब्ध अछि। All the old issues of Videha e journal ( in Braille, Tirhuta and Devanagari versions ) are available for pdf download at the following link. विदेह ई-पत्रिकाक सभटा पुरान अंक ब्रेल, तिरहुता आ देवनागरी रूपमे Videha e journal's all old issues in Braille Tirhuta and Devanagari versions विदेह ई-पत्रिकाक पहिल ५० अंक

विदेह ई-पत्रिकाक ५०म सँ आगाँक अंक विदेह आर.एस.एस.फीड। "विदेह" ई-पत्रिका ई-पत्रसँ प्राप्त करू। अपन मित्रकेँ विदेहक विषयमे सूचित करू। ↑ विदेह आर.एस.एस.फीड एनीमेटरकेँ अपन साइट/ ब्लॉगपर लगाऊ। ब्लॉग "लेआउट" पर "एड गाडजेट" मे "फीड" सेलेक्ट कए "फीड यू.आर.एल." मे http://www.videha.co.in/index.xml टाइप केलासँ सेहो विदेह फीड प्राप्त कए सकैत छी। गूगल रीडरमे पढ़बा लेल http://reader.google.com/ पर जा कऽ Add a  Subscription बटन क्लिक करू आ खाली स्थानमे http://www.videha.co.in/index.xml पेस्ट करू आ Add  बटन दबाउ। Join official Videha facebook group. Join Videha googlegroups विदेह रेडियो:मैथिली कथा-कविता आदिक पहिल पोडकास्ट साइट http://videha123radio.wordpress.com/ Videha Radio मैथिली देवनागरी वा मिथिलाक्षरमे नहि देखि/ लिखि पाबि रहल छी, (cannot see/write Maithili in Devanagari/ Mithilakshara follow links below or contact at ggajendra@videha.com) तँ एहि हेतु नीचाँक लिंक सभ पर जाऊ। संगहि विदेहक स्तंभ मैथिली भाषापाक/ रचना लेखनक नव-पुरान अंक पढ़ू। http://devanaagarii.net/ http://kaulonline.com/uninagari/  (एतए बॉक्समे ऑनलाइन देवनागरी टाइप करू, बॉक्ससँ कॉपी करू आ वर्ड डॉक्युमेन्टमे पेस्ट कए वर्ड फाइलकेँ सेव करू। विशेष जानकारीक लेल ggajendra@videha.com पर सम्पर्क करू।)(Use Firefox 4.0 (from WWW.MOZILLA.COM )/ Opera/ Safari/ Internet Explorer 8.0/ Flock 2.0/ Google Chrome for best view of 'Videha' Maithili e-journal at http://www.videha.co.in/ .) Go to the link below for download of old issues of VIDEHA Maithili e magazine in .pdf format and Maithili Audio/ Video/ Book/ paintings/ photo files. विदेहक पुरान अंक आ ऑडियो/ वीडियो/ पोथी/ चित्रकला/ फोटो सभक फाइल सभ (उच्चारण, बड़ सुख सार आ दूर्वाक्षत मंत्र सहित) डाउनलोड करबाक हेतु नीचाँक लिंक पर जाऊ। VIDEHA ARCHIVE विदेह आर्काइव भारतीय डाक विभाग द्वारा जारी कवि, नाटककार आ धर्मशास्त्री विद्यापतिक स्टाम्प। भारत आ नेपालक माटिमे पसरल मिथिलाक धरती प्राचीन कालहिसँ महान पुरुष ओ महिला लोकनिक कर्मभमि रहल अछि। मिथिलाक महान पुरुष ओ महिला लोकनिक चित्र 'मिथिला रत्न' मे देखू। गौरी-शंकरक पालवंश कालक मूर्त्ति, एहिमे मिथिलाक्षरमे (१२०० वर्ष पूर्वक) अभिलेख अंकित अछि। मिथिलाक भारत आ नेपालक माटिमे पसरल एहि तरहक अन्यान्य प्राचीन आ नव स्थापत्य, चित्र, अभिलेख आ मूर्त्तिकलाक़ हेतु देखू 'मिथिलाक खोज' मिथिला, मैथिल आ मैथिलीसँ सम्बन्धित सूचना, सम्पर्क, अन्वेषण संगहि विदेहक सर्च-इंजन आ न्यूज सर्विस आ मिथिला, मैथिल आ मैथिलीसँ सम्बन्धित वेबसाइट सभक समग्र संकलनक लेल देखू "विदेह सूचना संपर्क अन्वेषण" विदेह जालवृत्तक डिसकसन फोरमपर जाऊ। "मैथिल आर मिथिला" (मैथिलीक सभसँ लोकप्रिय जालवृत्त) पर जाऊ। ऐ बेर मूल पुरस्कार(२०१२) [साहित्य अकादेमी, दिल्ली]क लेल अहाँक नजरिमे कोन मूल मैथिली पोथी उपयुक्त अछि ? ऐ बेर बाल साहित्य पुरस्कार(२०१२) [साहित्य अकादेमी, दिल्ली]क लेल अहाँक नजरिमे कोन मूल मैथिली पोथी उपयुक्त अछि ? ऐ बेर युवा पुरस्कार(२०१२)[साहित्य अकादेमी, दिल्ली]क लेल अहाँक नजरिमे कोन कोन लेखक उपयुक्त छथि ? ऐ बेर अनुवाद पुरस्कार (२०१३) [साहित्य अकादेमी, दिल्ली]क लेल अहाँक नजरिमे के उपयुक्त छथि? फेलो पुरस्कार-समग्र योगदान २०१२-१३ : समानान्तर साहित्य अकादेमी, दिल्ली ) १. संपादकीय अनुवाद अंकक अतिथि सम्पादकीय ओना तँ विदेहमे अनुवादपर शुरुहेसँ ध्यान देल जाइ छै आ एकर गद्य-पद्य भारती आ अंग्रेजी कॉलम तही लेल समर्पित अछि, मुदा आब ऐपर आर बेसी ध्यान देल जाएत- आ से दू दृष्टिए- एक- दोसर साहित्यक उत्कृष्ट कृति आर बेसी मात्रामे आबए आ दोसर- मैथिलीक उत्कृष्ट कृति दुनियाँक समक्ष जाए- ई दुनू काज विदेह पहिनहियो कइये रहल अछि आब ई आर बेसी मात्रा आ गतिसँ हएत। ऐ अंकमे असगर वजाहतक हिन्दी कथा, काशीनाथ सिंह जीक हिन्दी उपन्यास (धारावाहिक रूपमे), परिचय दास जीक भोजपुरी कविता आ  कणकमणि दीक्षित जीक नेपाली बाल साहित्यक रूपा धीरू आ धीरेन्द्र प्रेमर्षिजी द्वारा कएल अनुवाद देल जा रहल अछि। संगमे शेफालिका वर्मा आ राजदेव मंडल जीक मैथिली कविताक अंग्रेजी अनुवाद सेहो देल जा रहल अछि। नीचाँमे गजेन्द्र ठाकुरजीक मैथिली अनुवाद विषयपर आलेख उद्घृत कऽ रहल छी। पाठकगणकेँ नव बर्खक शुभकामना। विनीत उत्पल (सम्पादक- विदेह अनुवाद विभाग) मैथिली लेल एकटा अनुवाद सिद्धान्त: गजेन्द्र ठाकुर मैथिली लेल एकटा अनुवाद सिद्धान्त: अनुवादक इतिहास बड्ड पुरान छै। कोनो प्राचीन भाषा जेना संस्कृत, अवेस्ता, ग्रीक आ लैटिनक कोनो कालजयी कृति जखन दुरूह हेबऽ लागल तँ ओइपर चाहे तँ भाष्य लिखबाक खगताक अनुभव भेल आ कनेक आर आगाँ ओकरा दोसर भाषामे अनुवाद कऽ बुझबाक खगताक अनुभव भेल। प्राचीन मौर्य साम्राज्यक सम्राट अशोकक पाथरपर कीलित शिलालेख सभ, कएकटा लिपि आ भाषामे, राज्यक आदेशकेँ विभिन्न प्रान्तमे प्रसारित केलक। भाष्य पहिने मूल भाषामे लिखल जाइत छल आ बादमे दोसर भाषामे लिखल जाए लागल। मैथिलीसँ दोसर भाषा आ दोसर भाषासँ मैथिलीमे अनुवाद लेल सिद्धान्त: मैथिलीसँ सोझे दोसर भाषामे अनुवाद अखन धरि संस्कृत, बांग्ला, नेपाली, हिन्दी आ अंग्रेजी धरि सीमित अछि। तहिना ऐ पाँचू भाषाक सोझ अनुवाद मैथिलीमे होइत अछि। ऐ पाँच भाषाक अतिरिक्त मराठी, मलयालम आदि भाषासँ सेहो सोझ मैथिली अनुवाद भेल अछि मुदा से नगण्य अछि। मैथिलीमे अनुवाद आ मैथिलीसँ अन्य भाषामे अनुवाद ऐ पाँचू भाषाकेँ मध्यस्थ भाषाक रूपमे लऽ कऽ होइत अछि।  अहू पाँच भाषामे हिन्दी, नेपाली आ अंग्रेजीक अतिरिक्त आन दू भाषाक मध्यस्थ भाषाक रूपमे प्रयोग सीमित अछि। अनुवादसँ कने भिन्न अछि रूपान्तरण, जेना कथाक नाट्य रूपान्तरण वा गद्यक पद्यमे पद्यक गद्यमे रूपान्तरण। ऐ मे मैथिलीसँ मैथिलीमे विधाक रूपान्तरण होइत अछि आ अनुवाद सिद्धान्तक ज्ञान नै रहने रूपान्तरकार अर्थ आ भावक अनर्थ कऽ दैत अछि। मैथिलीमे आ मैथिलीसँ अनुवादमे तँ ई समस्या आर विकट अछि। उत्तम अनुवाद लेल किछु आवश्यक तत्त्व: शब्दशः अनुवाद करबा काल ध्यान राखू जे कहबी आ सन्दर्भक मूल भाव आबि रहल अछि आकि नै। श्ब्द, वाक्य आ भाषाक गढ़नि अक्षुण्ण रहए से ध्यानमे राखू। मूल भाषाक शब्द सभ जँ प्राचीन अछि तँ अनूदित भाषाक शब्द सभकेँ सेहो पुरान आ खाँटी राखू। मूल आ अनूदित भाषाक व्याकरण आ शब्द भण्डारक वृहत् ज्ञान एतए आवश्यक भऽ जाइत अछि। मूल भाषामे मुँह कोचिया कऽ बाजल रामनाथ, उमेशक प्रति सम्बोधनकेँ रामनाथो, उमेशोक बदलामे रामनाथहुँ, उमेशहुँ कऽ अनुवाद कएल जाएब उचित हएत मुदा सामान्य परिस्थितिमे से उचित नै हएत। से शब्द, भाव, प्रारूपमे सेहो आ मूल कृतिक देश-कालक भाषामे सेहो समानता चाही। अनुवादककेँ मूल आ अनूदित कएल जाएबला भाषाक ज्ञान तँ हेबाके चाही संगमे दुनू भाषा क्षेत्र इतिहास, भूगोल, लोककथा, कहबी आ ग्रम्य-वन्य आ नग्रक संस्कृतिक ज्ञान सेहो हेबाक चाही। ई मध्यस्थ भाषासँ अनुवाद करबा काल आर बेसी महत्वपूर्ण भऽ जाइत अछि। ऐ परिस्थितिमे “दुनू भाषा क्षेत्रक इतिहास, भूगोल, लोककथा, कहबी आ ग्रम्य-वन्य आ नग्रक संस्कृतिक ज्ञान” सँ तात्पर्य अनूदित आ मूल भाषा क्षेत्रसँ हएत मध्यस्थ भाषा क्षेत्रसँ नै। कखनो काल मूल भाषाक कोनो भाषासँ सम्बन्धित तत्त्व वा गएर भाषिक तत्व (सांस्कृतिक तत्त्व) क सही-सही उदाहरण अनूदित भाषामे नै भेटैत अछि आ तखन अनुवादक गपकेँ नमराबऽ लगैत छथि वा ओइ लेल एकटा सन्निकट शब्दावली (ओइ नै भेटल तत्त्वक) देमए लगैत छथि। ऐ परिस्थितिमे सन्निकट शब्दावली देबासँ नीक गपकेँ नमरा कऽ बुझाएब वा परिशिष्ट दऽ ओकरा स्पष्ट करब हएत। ऐ सँ मूल भाषासँ मध्यस्थ माषाक माध्यमसँ कएल अनुवादमे होइबला साहित्यिक घाटाकेँ न्यून कएल जा सकत। कथा, कविता, नाटक, उपन्यास, महाकाव्य (गीत-प्रबन्ध), निबन्ध, स्कूल-कॉलेजक पुस्तक, संगणक विज्ञान, समाजशास्त्र, समाज विज्ञान आ प्रकृति विज्ञानक पोथीक अनुवाद करबा काल किछु विशेष तकनीकक आवश्यकता पड़त। निबन्ध, स्कूल-कॉलेजक पुस्तक, संगणक विज्ञान, समाजशास्त्र, समाज विज्ञान आ प्रकृति विज्ञानक अनुवाद ऐ अर्थेँ सरल अछि जे ऐ सभमे विस्तारसँ विषयक चर्चा होइत अछि आ सर्जनात्मक साहित्य {कथा, कविता, नाटक, उपन्यास, महाकाव्य (गीत-प्रबन्ध)} क विपरीत भाव आ संस्कृतिक गुणांक नै रहैत अछि वा कम रहैत अछि। संगे एतए पाठक सेहो कक्षा/ विषयकक अनुसार सजाएल रहैत छथि। केमिकल नाम, बायोलोजिकल आ बोटेनिकल बाइनरी नाम आ आन सभ सिम्बल आदि जे विशिष्ट अन्तर्राष्ट्रीय संस्था सभ द्वारा स्वीकृत अछि तकर परिवर्तन वा अनुवाद अपेक्षित नै अछि। सर्जनात्मक साहित्यमे नाटक सभसँ कठिन अछि, फेर कविता अछि आ तखन कथा, जँ अनुवादकक दृष्टिकोणसँ देखी तखन। नाटकमे नाटकक पृष्ठभूमि आ परोक्ष निहितार्थकेँ चिन्हित करए पड़त संगहि पात्र सभक मनोविज्ञान बूझए पड़त। कवितामे कविताक विधासँ ओकर गढ़निसँ अनुवादकक परिचित भेनाइ आवश्यक, जेना हाइकूक मैथिलीसँ अंग्रेजी अनुवाद करै बेरमे मैथिलीक वार्णिक ५/७/५ क मेल जँ अंग्रेजीक अल्फाबेटसँ करेबै तँ अहाँक अनूदित हाइकू हास्यास्पद भऽ जाएत कारण अंग्रेजीमे ५/७/५ सिलेबलक हाइकू होइ छै आ मैथिलीमे जेना वर्ण आ सिलेबलक समानता होइ छै से अंग्रेजीमे नै होइ छै। ऐ सन्दर्भमे ज्योति सुनीत चौधरीक मैथिलीसँ अंग्रेजी अनुवाद एकटा प्रतिमान प्रस्तुत करैत अछि। कविताक लय, बिम्बपर विचार करए पड़त संगहि कविता खण्डक कविताक मुख्य शरीरसँ मिलान करए पड़त। कथामे कथाकारक आ कथाक पात्रक संग कथाक क्रम, बैकफ्लैशक समय-कालक ज्ञान आ वातावरणक ज्ञान आवश्यक भऽ जाइत अछि। आब महाकाव्यक अनुवाद देखू, रामलोचन शरणक मैथिली रामचरित मानस अव्धीसँ मैथिलीमे अनुवाद अछि मुदा दोहा, चौपाइ, सोरठा सभ शास्त्रीय रूपेँ अनूदित भेल अछि। संस्कृत भाषाक अनुवादक माध्यमसँ पाठन आंग्ल शासक लोकनि द्वारा प्रारम्भ भेल। ऐ विधिसँ ने लैटिनक आ नहिये ग्रीकक अध्यापन कराओल गेल छल। ऐ विधिसँ जँ अहाँ संस्कत वा कोनो भाषा सीखब तँ आचार्य आ कोविद कऽ जाएब मुदा सम्भाषण नै कएल हएत। जँ कोनो भाषाकेँ अहाँ मातृभाषा रूपेँ सीखब तखने सम्भाषण कऽ सकब, संस्कृति आदिक परिचय पाठ्यक्रममे शब्दकोष; आ लोककथा आ इतिहास/ भूगोलक समावेश कऽ कएल जा सकैत अछि। संगणक द्वारा अनुवाद: सर्जनात्मक वा निबन्ध, स्कूल-कॉलेजक पुस्तक, संगणक विज्ञान, समाजशास्त्र, समाज विज्ञान आ प्रकृति विज्ञानक अनुवाद संगणक द्वारा प्रायोगिक रूपमे कएल जाइत अछि मुदा “कोल्ड ब्लडेड एनीमल” क अनुवाद हास्यास्पद रूपेँ “नृशंस जीव” कएल जाइत अछि। मुदा संगणकक द्वारा अनुवाद किछु क्षेत्रमे सफल रूपेँ भेल अछि, जेना विकीपीडियामे ५०० शब्दक एकटा “बेसी प्रयुक्त शब्दावली” आ २६०० शब्दक “शब्दावली”क अनुवाद केलासँ, गूगलक ट्रान्सलेशन अओजार आदिमे आधारभूत शब्दक अनुवाद केलासँ आ आन गवेषक जेना मोजिला फायरफॉक्स आदिमे अंग्रेजीक सभ पारिभाषिक संगणकीय शब्दक अनुवाद केलासँ त्रुटिविहीन स्वतः मैथिली अनुवाद भऽ जाइत अछि। सूचना: नीचाँमे श्री रामभरोस भ्रमरजीक पत्र दऽ रहल छी, "नीलम फिल्म्स आ गोपाल पाठकक करतूत"- ई पंकज पराशर, सुशीला झा, डॉ. योगनाथ झा (उर्फ योगनाथ सिन्धु उर्फ सिन्धुनाथ झा)क कड़ीमे एकटा आर चोरक चोरिक शृंखला अछि जकर विदेह द्वारा पर्दाफास कएल जा रहल अछि। ( विदेह ई पत्रिकाकेँ ५ जुलाइ २००४ सँ अखन धरि ११६ देशक १,५०२ ठामसँ ७२,०४३ गोटे द्वारा ३५,४५२ विभिन्न आइ.एस.पी. सँ ३,३६,७०७ बेर देखल गेल अछि; धन्यवाद पाठकगण। - गूगल एनेलेटिक्स डेटा। ) गजेन्द्र ठाकुर ggajendra@videha.com http://www.maithililekhaksangh.com/2010/07/blog-post_3709.html २. गद्य २.१.नवेंदु कुमार झा-साकेतानन्दजीक मृत्यु/ पुरस्कारक बजार मे लागि रहल बोली/ पर्यटक स्थल बनल विस्फी, महिषी पर सेहो अछि नजरि/ अन्धरा ठाढ़ी मे बनत स्मारक, सरकार केँ याद अयलनि वाचस्पति मिश्र/ साहित्यिक जौहरी छथि अकादमीक मैथिली परामर्शी/ शताब्दी वर्ष मे प्रकाशित होयत सय पोथी/ विधान परिषद्क शताब्दी वर्षक अवसर पर आयोजित होयत विशेष बैसक/ बिहार मे खादी ग्रामोद्योग संस्था सभक विकास। २.२.१.प्रा.परमेश्वर कापड़ि- जनकपुरमे कथा–गोष्ठी सम्पन्न २.सुजितक अनुभव रिपोर्टर डायरीमे ३.सुमित आनन्द- मैथिली’ शोध-पत्रिकाक लोकार्पण २.३.अनिल मल्लिक- हम, देह आ विदेह....! २.४.१.जगदीश प्रसाद मण्‍डल- कामरूप आ मिथिला २— बृषेशचन्द्र लाल- बिद्यापति–स्मृति पर्व मादेँ २.५.सत्यनारायण झा -कथा-रिटायरमेंट २.६.१. रवि भूषण पाठक- आचार्य भामहक चिंतन / दण्‍डी आ काव्‍यलक्षण / टिल्‍लू जी (शिव कुमार झा) २. अतुलेश्वर- धीरेन्द्र, मैथिली आ शिष्य २.७.१.ओमप्रकाश झा  -लोकतन्त्रक माने (कथा) २. मुन्नाजी- एकटा विहनि कथा २.८.१.मुन्नाजी- हम पुछैत छी- श्री गोविन्द झा जीसँ मुन्नाजीक भेल मुखोतरि/ मैथिलोत्सव २०११ २.शम्मी वत्स/ रूपेश- हैदराबादमे विद्यापति पर्व समारोह आइ २५ दिसम्बर २०११ केँ भेल(हैदराबादसँ शम्मी वत्स/ रूपेशक रिपोर्ट) ३.शेफालिका वर्मा- "आधुनिक मैथिली साहित्यक प्रभाव क्षेत्रमे नारी तत्व" संगमे "मैथिली आ तमिल कवियित्री सम्मेलन" ४.रोशन झा क रिपोर्ट-  "बुधियार छौड़ा आ राक्षस" बाल नाटकक मंचन ५.रमेश रंजनजीक रिपोर्ट- "बुधियार छौड़ा आ राक्षस" ६.प्रवीण नारायण चौधरी- बिराटनगरमे विद्यापति पर्व समारोह सम्पन्न 9-10 दिसम्बर 2011 नवेंदु कुमार झा-साकेतानन्दजीक मृत्यु/ पुरस्कारक बजार मे लागि रहल बोली/ पर्यटक स्थल बनल विस्फी, महिषी पर सेहो अछि नजरि/ अन्धरा ठाढ़ी मे बनत स्मारक, सरकार केँ याद अयलनि वाचस्पति मिश्र/ साहित्यिक जौहरी छथि अकादमीक मैथिली परामर्शी/ शताब्दी वर्ष मे प्रकाशित होयत सय पोथी/ विधान परिषद्क शताब्दी वर्षक अवसर पर आयोजित होयत विशेष बैसक/ बिहार मे खादी ग्रामोद्योग संस्था सभक विकास। १ साकेतानन्दजीक मृत्यु कैन्सरसँ २२ दिसम्बर २०११ केँ एक बजे दिनमे पूर्णियाँ मे भऽ गेलन्हि। साकेतानन्दक जीवनी1940-2011 वरिष्ठ कथाकार, गणनायक (कथा-संग्रह) लेल साहित्य अकादेमी पुरस्कारसँ सम्मानित। 1962 सँ सक्रिय । गोड़ेक चालिस-पचास टा कथा, रिपोर्ताज-संस्मरण, यात्रा-विवरण। पहिल मैथिली कथा “ग्लेसियर” 1962मे ‘मिथिलामिहिर’मे प्रकाशित । हिन्दियोमे दू दर्जन कथा आदि प्रकाशित । सन 99मे छपल पहिल कथा-संग्रह “गणनायक’ केँ ओही वर्ष ‘साहित्य अकादमी पुरस्कार। पैघ बान्धसँ अबैबला विपत्तिकेँ रेखांकित करैत, पर्यावरण केँ कथा वस्तु बना कऽ राजकमल प्रकाशन सँ प्रकाशित एवं अत्यंत चर्चित उपन्यास (‘डौकूमेंट्री फिक्शन’) “सर्वस्वांत” । आकाशवाणीक राष्ट्रीय कार्यक्रममे प्रसारित दू टा उल्लेखनीय वृत्त रूपक- ‘महानन्दा अभयारण्य’ पर आधारित “जंगल बोलता है” एवं झारखंड क ग्रामीण क्षेत्रक ज्वलंत डाइनक समस्या पर आधारित वृत्तरूपक “नैना जोगन” चर्चित एवं प्रसिद्ध । पत्रकारिताक नाम : बृहस्पति. (2) असली नाम : साकेतानन्द सिंह, पिता : स्व. श्री विजयानन्द सिंह, माता- स्व.श्रीमती राधारमा जी, जन्म : 27 फरवरी 1940 क कुमार गंगानन्द सिंहक तत्कालीन आवास “सचिव_सदन” 5, गिरीन्द्र मोहन रोड, दरभंगा, मृत्यु 22 दिसम्बर 2011 पूर्णियाँमे। शिक्षा: क्रमशः राज स्कूल दरभंगा/ बुनियादी स्कूल श्रीनगर, पूर्णियाँ/ विलियम्स मल्टीलेटरल स्कूल,सुपौल। पश्चात पटना एवं मगध विश्वविद्यालय सँ अंग्रेजी औनर्स आ मैथिलीमे स्नात्कोत्तर। आजीवन आकाशवाणीक चाकरी। आठ राज्यक नौ केन्द्रमे विभिन्न पद पर काज । लटे-पटे 40 वर्षक कार्यकाल। पटना, दरभंगा एवं भागलपुरमे बीसो साल तक मैथिली कार्यक्रमक आयोजन, प्रस्तुतिकरणमे लागल। ओतबे दिन क्रमशः आकाशवाणी पटनाक ग्रामीण कार्यक्रम ‘चौपाल’ आ दरभंगाक ‘गामघर’ कार्यक्रम क मुख्य स्वर “जीवछ भाइ” क रूपमे ख्यात। आकाशवाणी दरभंगाक संस्थापक स्टाफ । मैथिली नाटकक कैकटा ‘लैंडमार्क’ यथा डा.रामदेव झा विरचित दू टा नाटक ‘विद्यापति’ आ ‘हरिशचन्द्र’ ; डा. मणिपद्मक ‘चुहड मल्लक मोछ’ , सल्हेस, दीनाभद्री, विदापत आदि लोक गाथा, लोक-नृत्य सभकेँ लोक गायकक मध्य जा कऽ, मूल वस्तुक ध्वन्यंकन एवं ओकर संपादन आ प्रसारण “गणनायक” कथा-संग्रह क राजस्थानी अनुवाद, राजस्थानी साहित्यक जानल-चीन्हल नाम श्री शंकरसिंह राज पुरोहित एवं हिन्दी अनुवाद ख्यातनामा अनुवादिका श्रीमती प्रतिमा पांडे केलनि। सन 2001मे आकाशवाणी हज़ारीबाग सँ केन्द्र-निदेशक क पद सँ अवकाश प्राप्त केलाक बाद पूर्ण रूपेण मैथिली लेखन, मिथिला क्षेत्रक समस्या सब पर वृत्तचित्र बनेबाक, मैथिलीक किछु नीक कथा सभक फिल्म रूपांतरणक गुनान-धुनानमे लागल रहथि…। श्रद्धांजलि.. २ पुरस्कारक बजार मे लागि रहल बोली देशक प्रतिष्ठित साहित्यिक संस्था साहित्य आकदमी अपन वार्षिक पुरस्कारक घोषणा कऽ देलक मुदा एहि वर्ष सेहो मैथिली भाषा पुरस्कारक घोषणा नहि भेल। एकर कारण ओना तऽ परामर्शदात्री समितिक बैसक नहि होयब जनाओल गेल अछि जे किछु हद धरि सही सेहो अछि मुदा जे चर्चा अछि ओकर मोताबिक एहि बैसक मे संभावित नाम पर सहमति नहि बनि सकल तेॅ एखन एकरा टारि देल गेल अछि। दरअसल भारि-भरकम टाकाक पुरस्कार एहि भाषाक लेल बाधा बनल अछि। संभावित उम्मीदवार सभक नजरि तऽ एहि पर अछिए परामर्शी सभक नजरि सेहो एहि पर लागल रहैत अछि। साहित्यिक क्षेत्र मे भऽ रहल चर्चाक अनुसार मैथिली भाषाक साहित्यक अकादमी पुरस्कारक लेल बजार लागि गेल अछि आ एहि पर कब्जा करबाक लेल बोली लागि रहल अछि। साहित्यक एहि शेयर बाजार मे सूचकांक उतार चढ़ावक मध्य एखन धरि योग्य शेयर पर अपन मोहर लगैबाक प्रति परामर्शी अनिश्चयक स्थिति मे छथि। अकादमीक प्रसादक लेल दरभंगा आ दरभंगा सॅ बारहक दू टा योग्य विद्वान मे होड़ लागल अछि। एक दिस लक्ष्मीक त्यागक बात भऽ रहल अछि तऽ दोसर दिस लक्ष्मी कऽ त्यागक संगहि कुबेरक आह्वान कयल जा रहल अछि। तऽ दोसर दिस पुरस्कारक लाइन मे ठाढ़ एकटा पोथीक मूल लेखक अपन लक्ष्मीक लेल गोहारि कऽ रहल छथि। आश्चर्य ई अछि जे जाहि पोथीक भूमिका लिखबा सॅ दरभंगाक पैघ विद्वान ई कहि आपस कऽ देलनि जे ई पोथी लेखकक अपन लेखनी नहि अछि तथापि ओ ताल ठोकि दावेदारी कऽ लाइन मे अछि। दरअसल मैथिलीक परामर्शी साहित्यक जौहरी छथि। हुनक चमत्कार सँ केओ साहित्यकार भऽ अकादमीक साहित्यिक यात्रा कऽ सकैत छथि। से पुरस्कारक दावेदार सभ सेहो जनैत छथि आ तेँ मैदान मे डटल छथि। मुदा मैदान मे दूटा डटगर दावेदारक कारण एहि बेर परामर्शी सेहो चित भेल छथि। ओ एखन अनिर्णयक स्थिति मे छथि। शायद हुनका एहि बातक आभास अछि जे ई दूनू दावेदार पुरस्कारक कुस्तीक मैदान मे शकि जयताह तऽ हुनक काज आसान भऽ जायत। तेॅ नाम केँ गोपनीय आ राशि पुरस्कारक बाजार खोलि कऽ रखने छथि। जहिना एकटा दाबेदार मैदान मे कमजोर पड़ला आ हुनक सूचकांक खसल कि परामर्शी पुरस्कारक घंटी बजा देताह। आब ककर शेयर ओंघरायल आ ककरा साहित्यक ताज भेटत एहि लेल मैथिली साहित्य प्रेमी केँ एखन धैर्य राखऽ पड़त। साहित्य अकादमी मे सम्मिलित सभ भाषाक पुरस्कारक लेल मापदंड आ ओकर प्रक्रिया तय अछि। वर्षक अंतिम सप्ताह मे प्रायः पुरस्कारक घोषणा कऽ देल जाइत अछि। एहि लेल पोथीक चयनकक प्रक्रिया वर्ष भरि चलैत अछि। सभ भाषा परामर्शदात्री समिति एहि प्रक्रिया केँ समय सीमाक भीतर पूरा करबा मे सक्षम अछि तऽ भला मैथिली परामर्शी सभकेँ एहि मे विलम्ब होयबाक कारण नहि बुझि पड़ैत अछि। एकर कारण ई भऽ सकैत अछि जे या तऽ विद्वान परामर्शी सभक स्तरक पोथी पुरस्कारक लाइन मे नहि रहैत अछि अथवा जे पोथी पुरस्कारक लाइन मे रहैत अछि ओहि स्तरक विद्वान परामर्शी नहि छथि। ई दूनू कारण जँ नहि अछि तऽ भला समय सीमाक भीतर अंतिम निर्णय किएक नहि सोझा अबैत अछि। अकादमी प्रसाद येन-केन-प्रकारेन प्राप्तिक इच्छा मैथिली साहित्य केँ नोकसान पहूचा रहल अछि। मात्र प्रसादक प्राप्तिक वास्ते साहित्य सृजन करब कोनो भाषाक साहित्यक लेल लाभदायक नहि अछि। एहि सॅ साहित्यिक स्तर मे ह्रास होयत। साहित्य समाजक ऐना अछि। जँ स्तरहीन साहित्य सृजन केँ प्रश्रय देल गेल तऽ सामाजिक दशा-दिशा प्रभावित होयत। साहित्य संसार केँ पुरस्कारक बाजार बनायब किन्नहु उचित नहि अछि। पुरस्कार छोट होकि पैघ ओकर चयन प्रक्रियाक सीमाक पालन होयब आवश्यक अछि। अन्यथा कतेको आशंका केँ जन्म दऽ सकैत अछि। जेना एखन मैथिली साहित्य जगत मे व्याप्त अछि। मैथिली साहित्य संसार मे कतेको विद्वान पुरस्कारक चिन्ता कयने बिनू अपनी लेखनीक छाप छोड़ि अपन अमर कृति दऽ विदा भऽ गेलाह। मुदा वर्तमान मैथिली साहित्य जेना पुरस्कारक जाल मे फँसि गेल अछि। हजर टकिया सॅ लखटकिया पुरस्कारक लेल साहित्य सृजनक होड़ लागल अछि। पुरस्कारक बजारवाद मैथिली साहित्य केँ नोकसान पहुँचा रहल अछि। तेॅ पुरस्कारक लालसा छोड़ि साहित्यक स्तर पर ध्यानदेब आवश्यक अछि। पुरस्कार देब विद्वान परामर्शी सभक काज अछि आ जँ हुनका फ्री हैण्ड छोड़ल गेल तऽ संभव अछि जे स्तरीय पोथी केँ सम्मान भेटि सकत। ३ पर्यटक स्थल बनल विस्फी, महिषी पर सेहो अछि नजरि मिथिलांचलक महापुरुष सभक जन्म स्थली केँ पर्यटन स्थलक रूप मे विकसित करबाक योजना पुरस्कार काज प्रारंभ कऽ देलक अछि। सरकारक योजना महाकवि विद्यापति आ विद्वान तथा दार्शनिक मंडन मिश्रक जन्म स्थली केँ पर्यटन स्थलक रूप मे विकसित कऽ एहि दिस पर्यटक सभ केँ विशेष रूपे विदेशी पर्यटक केँ आकर्षित करबाक योजना अछि। एहि वास्ते महाकवि विद्यापतिक जनमस्थल राजधानी पटना सॅ 110 किलोमीटर दूर मधुबनी जिलाक विस्फी मे पर्यटक काम्पलेक्स, आडियोटोरियम आ पुस्तकालय बनैबाक योजना केँ पर्यटन विभाग अंतिम रूप देलक अछि जाहि पर 47 लाख टाका खर्च होयत। विभागक सूत्रक अनुसार ई सभ पर करक लेल आधारभूत संरचना उपलब्ध करायब विभागकक प्राथमिकतामे अछि। बिहार राज्य पर्यटन निगम सेहो एहि सभ जगह दिस पर्यटक केँ आकर्षित करबाक लेल प्रयास कऽ रहल अछि। पर्यटन मंत्री सुनील सभ जन्मस्थली केँ पर्यटन स्थलक रूप मे विकसित करबाक योजना बनौलक। श्री पिन्टु जनौलनि जे विद्यापति देशक प्रख्यात व्यक्ति आ बिहारक गौरव छलाह। हुनक जन्मस्थली केँ पर्यटन स्थल बनेबाक मांग कतेको दिन सॅ भऽ रहल छल जे आब साकार भऽ रहल अछि जहिना पश्चिम बंगालक पर्यटन विभाग कवि गुरु रविन्द्र नाथ ठाकुर सॅ संबोधित स्थल सभक दिस पर्यटक केँ खींचि आमदनी अर्जित करैत अछि तहिना बिहार पर्यटन अपन योजना बनौलक अछि। एकरा संगहि आठम शताब्दीक प्रख्यात विद्वान आ दार्शनिक मंडल मिश्रक जन्मस्थली दिस विशेष रूप सॅ विदेशी पर्यटक केँ आकर्षित करबाक लेल एहि सॅ संबंधित जनतब पर्यटन विभाग, वेबसाइट पर उपलब्ध कराओल गेल अछि। मंडन मिश्र आदि शंकराार्यक संग सहरसा जिलाक महिषि गाम मे हिन्दू दर्शन गुण दोष पर शास्त्रार्थ मे हारल छलाह। पर्यटन मंत्री जनतब देलनि जे पर्यटक सभ केँ आकर्षित करबाक लेल विभाग सहरसा मे कोसी महोत्सवक आयोजित करैत अछि आ जल्दीए आन कतेको तरहक गतिविधि प्रारंभ कयल जायत। एहि मध्य, मधुबनी मे स्थापित होमय बाला मिथिला चित्र कला संस्थान पर संग्रहालयक लेल 3.10 एकड़ जमीनक व्यवस्था मधुबनी नगर परिषद् द्वारा कऽ लेल गेल अछि। बिहार विधान परिषद्क सभापति ताराकांत झाक कला संस्कृति मंत्री डॉ0 सुखदा पाण्डेय आ पर्यटन मंत्री सुनील कुमार पिन्टुक संग भेल बैसार मे एहि योजनाक स्वीकृति दऽ देल गेल। एहि संस्थानक निर्माण पर गोटेक 6 करोड़ टाका खर्च होएबाक उम्मीद अछि। ताराकांत झा जनतब देलनि अछि जे एहि संस्थान मे मिथिला चित्रकलाक एक वर्षीय डिप्लोमा आ दू वर्षीय डिग्रीक पाठ्यक्रम पढ़ाई प्रशिक्षण प्रारंभ होयत। परिसर मे निदेशक आ शिक्षक सभक नियुक्ति कयल जायत। एहि संस्थानक भवन निर्माणक लेल विशेष परियोजना प्रतिवेदन तैयार कयल जा रहल अछि। ४ अन्धरा ठाढ़ी मे बनत स्मारक, सरकार केँ याद अयलनि वाचस्पति मिश्र बिहारक शताब्दी वर्षक अवसर पर चुनल गेल बिहार गौरव गीत मे मिथिलाक उपेक्षाक भरपाइ करबा मे नीतीश सरकार लागि गेल अछि। मिथिलावासीक आक्रोश केँ दबबऽ लेल पहिने जानकी नवमी छुट्टी पर मोहर लगौलाक बाद मधुबनी मे चित्रकला संस्थान खोलब, महाकवि विद्यापति आ मंडल मिश्रक जन्मस्थली केँ पर्यटन स्थल बनैबाक योजनाके मूर्त रूप दऽ अपना आप केँ पैघ मैथिल हितैषी होएबाक लेल बेचैन अछि आ आब नवम् शताब्दीक संस्कृत प्रख्यात विद्वान पंडित वाचस्पति मिश्रक जन्म स्थली मधुबनी जिलाक अन्धराठाढ़ी मे स्मारक बनैबाक घोषणा कयलक अछि। भामतीक लेखक पंडित मिश्रक स्मारक स्थल लग एकटा पर्यटक काम्पलेक्स आ पुस्तकालय सेहो बनाओल जायत। एहि वास्ते ग्रामीण सभ दू एकड़ सॅ बेसी जमीन उपलब्ध करौलनि अछि। एहि क्षेत्र क सौंदर्यींकरण सेहो कयल जायत। जाहि पर 37 लाख टाका खर्च होयत संगहि गाम मे स्थित म्यूजियमक आधुनिकीकरण पर दू लाख टाका खर्च कयल जायत। ५ साहित्यिक जौहरी छथि अकादमीक मैथिली परामर्शी साहित्य अकादमीक महिला लेखिका सभक शीतकालीन दक्षिण भारतक मात्रा समाप्त भऽ गेल अछि। एहि यात्रा मे मैथिली साहित्यक परामर्श दात्री समिति जहि तरह महिला मैथिली लेखिका सभ चयन कयने छल एहि सॅ तऽ परामर्शदात्री सभक विद्वता पर प्रश्न चिन्ह लगायब आवश्यक बुझि पड़ैत अछि। मैथिली साहित्यक संग जाहि तरहे अपना आप केँ विद्वान कहय वाला परामर्शी मजाक कऽ रहल छथि ओहि सॅ साहित्यक गरिमा कम भऽ रहल अछि। एकर प्रभाव सभक सोझा अछि। आम मैथिल जन अपन भाषा सॅ दूर भऽ रहल छथि। आ अपना घर-परिवार मे मैथिली छोड़ि आन भाषाक बेधड़क प्रयोग करय वाला सभ साहित्य अकादमीक यात्राक आनन्द उठा रहल छथि। वर्तमान मे सम्पन्न मैथिली लेखिकाक शीत यात्रा मे जाहि तरहे मानवाधिकारक सहधर्मी केँ महिला मैथिली साहित्यकारक सहकर्मी बनाओल गेल एहि सॅ मैथिली साहित्यक परामर्शी सभक साहित्यिक दिवालियापन सोझा आबि गेल अछि। ई एहि बातक संकेत करैत अछि जे मैथिली भाषाक मे बढ़ैत अवसर मे चाटुकारिताक अवसर सेहो बढ़ि रहल अछि। प्रदेश मे महिला सशक्तिकरणक चलि रहल अभियानक क्रम मे मिथिलाक प्रतिनिधि सामाजिक सांस्कृतिक संस्था मे मैथिल महिला केँ स्थान देबाक नाम पर सक्रियता देल गेल आ आब एहि अधिकारक उपयोग मैथिल साहित्यक सहकर्मी बनैबाक लेल करब कतेक उचित अछि एकर निर्णय तऽ विद्वान साहित्यकार लोकनि करताह। एहि यात्राक क्रम मे आयोजित तीन दिवसीय संगोष्ठी मे गोटेक 30टा महिला अपन आलेख पढ़लनि। मुदा किछु एहनो मैथिल महिला साहित्यकार छलीह जे अपन परमेश्वरक कयल परिश्रमक वाचन करबा मे थकमकाइत छलीह। खैर कोनो बात नहि देशक सभ तरहक संस्था सुख-सुविधाक उपयोगक लेल बनल अछि। जँ साहित्य अकादमीक एहि सुख-विलासक अनुभव मैथिली परामर्शी किछु मैथिलीक महिला साहित्यकारक करौलनि तऽ एहि मे हर्जे कोन। आखिर किछु साहित्यकारक खुट्टा मजगूत छनि आ परामर्शी सभक परामर्शक अवधि समाप्त भेलाक बाद ई परामर्शी सभक ओहि खूटा मे बन्हि पाउज करबाक जोगार भऽ सकैत अछि। ई परामर्शी सभ कतेको जागरूक छथि एकर प्रमाण सोझा अछि। साहित्य अकादमी द्वारा प्रकाशित पोथी विद्यापति जकर लेखक रमानाथ झा छथि। ओकर हिन्दी अनुवाद बजार मे उपलब्ध अछि जकर मुख्य पृष्ठ पर लेखकक नाम रामनाथ झा लिखल अछि। एहि विद्वान सभकेँ एहि बातक कोनो चिन्ता नहि अछि। अकादमी सँ एहि पोथीक मुख्य पृष्ठ बदलबाक लेल शायद एखन धरि कोनो प्रयास नहि कयलनि अछि। मुदा मैथिली महिला साहित्यकारक चयन ओ जौहरी जकाँ कयलनि। मुदा प्रकाशित पोथी मे गड़बड़ी भेल तऽ कोनो चिन्ताक बात नहि अछि। वर्तमान मशीनी युग मे सय प्रतिशत शुद्धताक गारंटी तऽ हॉलमार्क गहना मे सेहो नहि अछि तऽ भला साहित्यकार आ पोथीक चयन मे शुद्धताक कोन गारंटी। ओना मैथिली साहित्यकारक ई परामर्शी दल एहि सॅ पहिने मैथिली युवा साहित्यकारक यात्राक नाम पर सेहो अपन जादुगरी देखा चुकल छथि। जँ परामर्शी अपन जादू नहि देखौताह तऽ दर्शक साहित्यकारक भीड़ कोना जुटत। खैर एहि यात्राक दरमियान पुरस्कारक सीजन सेहो अंतिम चरण मे छल मुदा एक बेर फेर साहित्य अकादमी मे मैथिलीक नाम रौशन भेल। मिथिलांचलक ठंडा सॅ दूर दक्षिण प्रदेशक शीत यात्रा पर मैथिली महिला साहित्यकारक संग परामर्शी दल सेहो रहल होयत मुदा विशेषज्ञ सभक फराक फराक रायक कारण परामर्शीक चकरा गेलाह आ पुरस्कारक लॉलीपापक कवर केँ नहि खोललनि। ६ शताब्दी वर्ष मे प्रकाशित होयत सय पोथी बिहारक स्थापना शताब्दी वर्ष पर शिक्षा विभाग “सय वर्ष सय पोथी” नामक योजना बनौलक अछि। एहि योजनाक अंतर्गत विभाग नेना सभक लेल सय टा पोथी प्रकाशित करत। नेना सभ पर केन्द्रित एहि पोथी मे नेना सभ दुनियाँ, सामाजिक योद्धा आ नदी सॅ संबंधित रोचक कथा रहत। सभ कथा तीन सॅ चारि सय शब्द मे रहत। एहि वास्ते एकटा कार्यशाला सम्पन्न भेल जाहि मे नेना सभक लेल सृजनात्मक लेखन करय वाला सरकारी शिक्षक, स्वतंत्र बाल लेखक आ चित्रकार सहित 45 प्रतिभागी भाग लेलनि। एहि कार्यशाला मे प्रतिभागी सभ नव पाण्डुलिपिक रचना कयलनि अछि। संगहि विशिष्ठ लोकसभ सॅ सेहो कथा लिखैबाक योजना अछि। एहि सभ पोथीक लोकार्पण अगिला वर्ष बिहारक स्थापना दिवस पर आयोजित शताब्दी समारोह मे कयल जायत। एहि मध्य शताब्दी समारोहक नव प्रतीक चिन्ह जारी कयल गेल अछि जकर लोकार्पण शिक्षा मंत्री पी के शाही कयलनि। ई प्रतीक चिन्ह राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालयक छात्र अपूर्व सुशांत निःशुल्क तैयार कयलनि अछि। ७ विधान परिषद्क शताब्दी वर्षक अवसर पर आयोजित होयत विशेष बैसक। ------ बिहार विधान परिषद्क स्थापनाक शताब्दी वर्षक अवसर पर अगिला वर्ष विशेष सत्र आयोजित कयल जायत। 20 जनवरी 2012 केँ एक दिवसीय विशेष सत्र पटना कॉलेज मे आयोजित कयल जायत। 20 जनवरी 1913 केँ विधान परिषद्क पहिल सत्र पटना कॉलेज मे सम्पन्न भेल छल। सर वाल्टर मोरेक सभापतित्वक पहिल सत्र मे पांच बैसक भेल छल। एहि विशेष बैसक मे भाग लेबाक लेल सभापति ताराकांत झा बग्घी पर सवार भऽ बैसक स्थल पर जयताह। एहि मे परिषद्क सदस्यक संगहि पूर्व सदस्य केँ सेहो आमंत्रित कयल गेल अछि। बैसकक अवसर पर प्रसिद्ध गायक छज्जु लाल मिश्रक गायन सेहो होयत। परिषद्क गठन इंडियन काउंसिल एक्ट (1861 आ 1909) क अन्तर्गत एकरा गर्वर्मेंट ऑफ बिहार-उड़ीसाक लेफ्टिनेंट गवर्नरक परिषद् कहल जाइत छल। 17 फरवरी 1921 केँ बिहार-उड़ीसा विधान परिषद् गठित कयल गेल छल। खादी संस्थाक विकासक लेल सरकार बनौलक योजना। ८ बिहार मे खादी ग्रामोद्योग संस्था सभक विकास बिहार मे खादी ग्रामोद्योग संस्था सभक विकासक लेल उद्योग विभाग 57 करोड़ टाकाक विकास योजना बनौलक अछि। एहि योजनाक माध्यम सॅ प्रदेशक 85 खादी ग्रामोद्योग संस्थाक विकास मे मदति देल जायत। ई प्रस्ताव बिहार राज्य खादी ग्रामोद्योग संस्थाक विकास मे मदति देल जायत। ई प्रस्ताव बिहार राज्य खादी ग्रामोद्योग बोर्ड सरकार केँ देने छल। ई टाका अगिला मास खादी संस्था सभकेँ उपलब्ध करा देल जायत। बोर्ड अपन स्तर सॅ संस्थाक चयन कऽ ओकर विकास पर टाका खर्च करत। सरकार खादी ग्रामोद्योग संस्था मे अत्याधुनिक तकनीकक उपयोग पर जोर दऽ रहल अछि। विकास योजनाक अंतर्गत 14 हजार बुनकर केँ रोजगार देबाक प्रावधान कयल गेल अछि। बिहार राज्य खादी ग्रामोद्योग बोर्डक अध्यक्ष त्रिपुरारी शरण विकास योजनाक स्वीकृतिक पुष्टि करैत जनतब देलनि अछि जे विभाग द्वारा उपलब्ध कराओल गेल टाका सॅ अति आधुनिक मॉडल चरखाक खरीद कयल जायत। सरकारक योजनानुसार खादीक क्षेत्र मे अति आधुनिक तकनीकिक उपयोग सॅ खादी ग्रामोद्योग संस्था सभक तेजी सॅ विकास होयत। एहि सॅ खादी संस्था सँ जुड़ल लोक सभक सेहो आर्थिक विकास होयत आ हुनक परिवारक जीवन स्तर मे सेहो सुधार होयत। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ।  १.प्रा.परमेश्वर कापड़ि- जनकपुरमे कथा–गोष्ठी सम्पन्न २.सुजितक अनुभव रिपोर्टर डायरीमे ३.सुमित आनन्द- मैथिली’ शोध-पत्रिकाक लोकार्पण १. प्रा.परमेश्वर कापड़ि गोष्ठी संयोजक श्रीरामानन्द युवा क्लव, जनकपुरधाम जनकपुरमे कथा–गोष्ठी सम्पन्न श्रीरामानन्द युब क्लव जनकपुरधामक २६म् वार्षिकोत्सवक उपलक्ष्यमे मिति २०६८ पौष ४ गते १९ लिसम्वर सोमदिन प्राध्यपक परमेश्वर कापड़िक संयोजकत्वम सम्पन्न मैीथली कथाक परिवेश आ प्रवृति विमर्श विषयक एकदिवसीय कथा गोष्ठी, बहुते अर्थे विशिष्ट आ सब अर्थे उल्लेख्य रहल अछि । कार्यक्रमक आयोजकीय प्रवाह डेङी करीनक उछलैत आहर जकाँ आरि–धूरके नङहैत तोड़ैत आन–आन खेतके हानि नोकसानी नहि क’, सैतले सिटले, दमकलक पाइप सनके रहौक, जाहिस’ जै खेत, कियारीमे जतबे जेहन पानिक खगता–बेगरता होइक, ततबे पाइन पटौक, एहन सनके, कार्यक्रमक उद्देश्य आ आयोजनक औचित्यके अनमन अनुशन्धान प्रारुपक साँचमे सँिचि,एना शब्दरुप देल गेल रहए— १ मैथिली कथाक परिवेश आ प्रवृति विमर्श

आजुक अपरिहार्य आवश्यकता अछि— नेपालक मैथिली कथाक प्रभाव आ प्रभुत्वपर, एकर विस्तृत परिधि आ पहुँचके सन्दर्भमे, एकर परिवेश आ प्रकृतिपर जमिक’, जुटिक’ विमर्श करब । मैथिली कथाक ऐतिहासिकता आ रचनाधर्मिताक समग्र आयाम बहुत विस्तृत आ परम ऐतिहासिक रहनहुँ, एकर — पाठकीय समस्या तथा समीक्षात्मक मूल्याँकनक संकट, — बदलैत परिप्रेक्ष्यमे, मोह भंगक स्थितिवोध, — आधुनिक, उत्तर–आधुनिकताक चुनौती आ मूल्य संक्रमणक स्थिति, — युग परिवत्र्तन आ परिवत्र्तित परिप्रेक्ष्यमे मूल्य संघर्षक दिशा, — प्रमाणिक परिवेश आ लोकसरोकारी आवाजक आवेग, — समयसंग साक्षात्कार आ सृजनात्मक रचना प्रक्रियापर, खुलिक’ बात करब । ०००

एहि कथा–गोष्ठीक उद्देश्यक आवेग महत्वाकाँक्षी रहल अछि आ बहुत किछु उपलव्धीमूलक पाबए चाहैत अछि । एहनमे बड़ नीक रहत जे मैथिली कथाक

— सामाजिक सन्दर्भ —     - Social      Context      _ — सांस्कृतिक सन्दर्भ —     -Cultural               ''       _ — राजनैतिक सन्दर्भ —     { -Political              ''       _ — वैचारिक सन्दर्भ - Ideological          ''       _ — समसामयिक सन्दर्भ - Contemporaneous context _ — प्राायोगिक सन्दर्भ - Experimental  context _ पर

ठाठस’ ठठिक’, जमिक’ जाँघ जोड़िक’ एकठौहरी एकमुहरी भ’ एकर समग्र मुद्दा आ विषय–परिदृशयके एहन सानि–मथिक’ निष्कर्षपर पहुँची जे एकर रचनाधर्मिता आ लेखन–प्रक्रियाके समेकित ऊर्जा आ उत्साह दैक आ एकटा ठोस दिशानिर्देश ई पाबए । समकालीन मैथिली कथालेखनक अवलोकन आ पठित कथाके प्रतिक्रियात्मक टिप्पणीस’ कथाकारके रचनात्मक ऊर्जा आ विश्वास प्रदान करबाक हेतुए अपन धारणा सहित, अपन विचारात्मक निर्देशकीय भूमिकास’ उत्साहजनक स्थिति–परिस्तिथि निमार्ण करैत, गोष्ठीके ऐतिहासिकता प्रदान कएल जाय !

२ गोष्ठीक संयोजक प्रा. परमेश्वर कापड़िक अध्यक्ष्ता एवं नेपाल संगीत नाट्य प्रज्ञा प्रतिष्ठानक सदस्य प्राज्ञ रमेश रंजनक प्रमुख आतिथ्यमे सम्पन्न ओहि कथागोष्ठीक व्यवस्थापकीय सुसंचालन प्रा. श्याम शशि कएलन्हि । एके दर्जन कथा पाठ भ’ सकनहुँ, कथासब उपरा–उपरीके त’ रहबे करए, दू–दू तीन–तीनटाक’ कथा एक–एक चक्रमे पाठ कएल जाइत छल आ पठित कथासबपर कमस’ कम दस÷दसटाक’ सुन्दर आ साधल प्रतिक्रिया, टिप्पणीसब अबैत छल जे कथके माजि चमकाक’ सुन्दर अर्थबता आ धारि दैत छल । ईएह शुभ बात आ भाव छल जे एहि गोष्ठीके सराहल गेल सएह नहि, एकर अनिवार्य खगता बेगरताके अगामीयो दिनमे देखैत एकर झमटगर निरन्तरताक आग्रही माङ सब मुहे कएल गेल । जिनकर जे कथा पाठ भेल ओ एना रहए— डा.सुरेन्द्र लाभ नोरक व्यथा रमेश रंजन नियन्त्रण अनियन्त्रण अयोध्यानाथ चौधरी मद्घम श्याम शशि बयिया बृज कुमार यादब करोट फेरैत समय अशोक दत्त बेटी सुजीत झा जिद्दी नित्यानन्द मण्डल चौ विजय दत्त मणि घटैत बढ़ैत शेखी रोशन कुमार झा घर भाड़ा धनश्याम झा पता नै की भेल ! –अलिखित ) अमरकान्त झा सेवा व्यस्त छ ( गप्प )

नेपालक विशिष्ट कथाकारकं उत्कृष्ट कथा जे विभिन्न माध्यमस’ प्राप्त भइयोक’ समयाभाव आ जड़ाएल ठिठुरैत बिकठाह परिस्थितिक कारणे आ स्वंय कथाकार अपने उपस्थित नइ भ’ सकने, पाठ आ समीक्षास’ बँचित रहि गेल । ओना नियारल बात ई स्वीकारल गेलै जे ब्लवस’ प्रकाशित हुअ’बला संकलनमे ओकरा अवश्य सामेल कएले जाएत । आ ओहन महामना कथाकारमेस’ छथि— रामभरोस कापड़ि भ्रमर धर्मेन्द्र झा विह्वल कृष्णशंकर मिश्र चन्द्रकिशोर (बीरगंज) देबेन्द्र मिश्र (राजविराज) पुनम ठाकुर (राजविराज) पुनम झा कुमार पृथु लौल आ कचोट अहू बातके रहि गेलै जे हिनको सबके कथा जँ एहि गोष्ठीमे आबि, अपन स्थान सृजनात्मकत, ऐतिहासिकता पाबि, कथासंसारके झमटगर बनबितए, सेहे नइ कथासमीक्षाके आओर उर्जाबान बना गोष्ठा्ीक गरिमाके आओर निखारितथि— डा. राजेन्द्र विमल धीरेन्द्र प्रेमर्षी रुपा झा सुनिल मल्लिक परमेश्वर कापड़ि, आदि । ओहू पानिके कथाकारलोकनि जँ रहितथि त’ सोनमे सुगन्ध लागि जईतए । समीक्षा आ टिप्पणीकर्तामे रमेश रञ्जन, सुदीप झा, श्याम शशि, अशोक दत्त, सुजित झा, अजय झा, अजय अनुरागी घनश्याम झा, रोशन झा, नित्यानन्द मंडल अमरचन्द्र अनिल अमरकान्त झा जीवनाथ चौधरी, परमेश्वर कापड़ि आदि रहैथ । असलमे अरकान्तक कथा गप्प आ घनश्यामक कथा अलिखित रहने तत्काल एकरा बागि बेरा दी त’ बाँकी दसेटा कथा ओहिमे जे पाठ भेल रहए ओ प्रतिनिधिमूलक आ समसामयिक त’ दशावतारी भाव धाराक, दशोदिशाक समय–सन्दर्भस’ बहुत भेल–पाँचक लागल । मैथिली कथाक अपन पहचान आ पहुँचयुक्त परम ऐतिहासिक विस्तृति रहल अवस्थामे एहि दशेगोट कथाक धार आ भाव खोजने, खोधियारने एकर विस्तृत परिधिक बहुत उच्च आयाम अवश्य देखाइ देत अछि । बहुत कथा बदलैत समाजिक–सांस्कृतिक परिवेश आ राजनैतिक पृष्ठभूमिस’ खूब नीक जकाँ परिचित करबैत, जीवनक ऐतक लगक कथा रहए जे शब्द–भाव निर्मित्त संंसार होइतहुँ समानान्तर जिनगीक प्रत्यथ आ प्रमाणिक वोध त’ करएबे करए किछु कथा अपन आधुनिक सन्दर्भके, समसामयिक यथार्थक मुद्दाके खूब नीकजकाँ सम्बोधन करैत आक्रमक ताव–तेवरम,े परिवत्र्तन आ रुपान्तरणक पक्षमे, विष्फोटक रुपस’ आवाज दैत देखल गेल अछि । श्याम शशिक बगिया लोक श्याम नइ, लैपटौपधारी श्याम शशिक मुँहस’ कहल गेल कथामे लोकभाषा आ लोक मनोविज्ञानक अभाव रहनहँु, परम्परागत ओहि बगिया लोककथाके नवयुगीन सन्दर्भमे किछु फूट अभिप्रायक संग कहल गेल अछि आ ओहिमेके मनुषमारि, मरखौकी बूढ़िया आ ओकर बेटीके मारिक’ खिस्सा खतमक जे चमत्कारी कथा अछि, आबक लोकके ओ जे सुनाएल जाय त’, कहतै जे असली बगिया खिस्सा ईहे छै । एकर मूलमे नवयुगीन सन्दर्भ सहितक पाठान्तरक सोझ सपाट प्रभाव अछि आ प्रयोग एत’ सिझल सपरल अछि । डा. सुरेन्द्र लाभक नोरक व्यथा कथा नेतघटू निपनियाँ नेताक बेठुआ चरित्र आ मूल्यहीन किरदानीके धन्नी–चुन्नी बखिया एहनक’ उघारैत देखाएल गेल अछि, जे सिहराक’ कँपकपाक’ हाड़ हिलाक’ राखि देब’बला नव मिथक गढ़ैत अछि । गर धएने समाजिक यथार्थके, सरोकारी लोक संवेगके, नव अकार–प्रकारमे बढ़ैत–बदलैत परिवेश आ परिवत्र्तनक परिप्रेक्ष्यस’ ठोकराक’ नव आयाम कायम करैत युगवोधके बहुत साधल–सिटल भाषा–भावमे, उत्कृष्ट रुपस’ आवेगित संवेगित करैत बृजकुमार यादवक करोट फेरैत समय कथा मैथिलीक महनीय उपलव्धी मानले गेल । आनो–आन कथासब उपरा–उपरीक रहबे करए, जकरा आधारपर जीनगीके जोख’–परेख’ आ समसामयिक सामाजिक–सांस्कृतिक परिवेशक सम्पूर्णताके नापि–ताैिल अजमाक’, आ एकर साहित्यिक तथा कलात्मक भाषा–भाव पक्षस’ मेल नइ खाइत ऐगुण उबानिपनके बागि बेराक’,आधुनिक विश्व परिप्रेक्ष्य आ समकालीनतास’ मेल खाइत दिशानिर्देश आ सृजनाऊर्जाक आवेग देबाक काज ओतए समीक्षात्मक टिप्पणीसबस’ भरि पोख भेटल रहैक । सबस’ मुनल–बान्हल आ सम्हरल बात ओत ई स्वीकरल गेल जे एतबेटा, कठुआएल गोष्ठी जँ एतेक ऊर्जावाल, प्रमाणिक आ संवेगित संवाद उत्पन्न क’ सकैछ त’ आओर सम्हरल आ झमटगर गोष्ठी आओर उत्पादक आ उत्साहवर्धक रहत, तएँ एकरा निरन्तरता देव बहुत आवश्यक अछि । २. सुजितक अनुभव रिपोर्टर डायरीमे प्रस्तुतिः जितेन्द्र झा

जनकपुरधाममे हाल पत्रकारिता सक्रिय सुजीत कुमार झाक अनुभव आ विचारसभ समेटल रिपोर्टर डायरी नामक संस्मरण प्रकाशित भेल अछि । मैथिली भाषामे प्रकाशित एहि कृतिक प्रकाशक आफन्त नेपाल नामक गैर सरकारी संस्था अछि । ओ जनकपुरमे काज करबाक क्रममे रिपोर्टिंग, घुमफिर आदिके क्रममे कएल अनुभवके डायरीमे समेटने छथि । संस्मरणमे जनकपुरक आर्थिक, राजनीतिक, सामाजिक मुद्दासभके समेटबाक प्रयास कएल गेल अछि । लेखक मिथिला डट कम मैथिली पत्रिकाक सम्पादक छथि । डायरीमे संग्रहित संस्मरण डट कममे विभिन्न समयमे प्रकाशित भऽ चुकल अछि । प्रस्तुत अछि डायरीक किछु महत्वपुर्ण अंश ।

मैथिलीक विकास ट्रष्ट ः नाम उच्च काम तुच्छ मिथिला नाट्य कला परिषदक २०६८ साउन महिनामे भेल साधारण सभामे मैथिली विकास ट्रष्ट कोषपर हम कसिकऽ बजलहु“ । हमरा एहिपर जोड देवाक आशय छल, एहि विषयपर बहस होइक । अहु दूआरे जे ओहि समारोहमे ट्रष्ट कोषक सदस्य सचिव आ दू गोट सदस्य उपस्थित छलथि । मुदा ओसभ किछु नहि वजलथि । किएक नहि वजलथि ? हमरा नहि बुझल अछि । ट्रष्ट कोष नहि चलला सँ ककरा फाइदा भऽ रहल अछि ? या त एकरा पूर्णतः बन्द कऽ देल जाए, नहि तऽ काज शुरु कएल जाए । एहि दूनुपर वहस आवश्यक अछि । बन्द करव कोनो दृष्टि स“ बढिया नहि हैत । एक तऽ मैथिलीक नामपर कतहु स“ पैसा अवैत नहि अछि, जँ एवो कएल तऽ काज नहि भेल आ पैसा फिर्ता चलि जाएत । एहि सँ दुर्भाग्य आओर की भऽ सकैत अछि ! मैथिली विकास ट्रष्ट कोषकेँ संयोजक छथि मैथिलीक वरिष्ठ साहित्यकार डा.राजेन्द्र विमल, सदस्य सचिवमे नेपाल संगीत तथा नाट्य प्रज्ञा प्रतिष्ठानक प्राज्ञ रमेश रंजन, सदस्यमे पूर्वाञ्चल विश्व विद्यालयक उपकुलपति डा. रामावतार यादव, मिथिला नाट्य कला परिषदक अध्यक्ष सुनिल मल्लिक, नेपाल प्रज्ञा प्रतिष्ठानक प्राज्ञ राम भरोष कापड़ि भ्रमर, जिल्ला विकास समिति धनुषाक पूर्व सभापति राम चरित्र साह, एकीकृत नेकपा माओवादीक नेता रोशन जनकपुरी, मिथिला राज्य संघर्ष समितिक संयोजक परमेश्वर कापड़ि आ रामानन्द युवा क्लवक पूर्व अध्यक्ष जीवनाथ चौधरी । ई सभ असफलताक मुंह कहियो देखवे नहि कएने छथि । हिनकासभक निष्ठापर प्रश्ने नहि उठाओल जा सकैत अछि । मुदा कोषके काज देखलापर मस्तिष्कमे वनल सभ प्रभाव समाप्त भऽ जाइत अछि । जिल्ला विकास समितिक कोषक ई हाल अछि तऽ सरकारक कोषके की हाल हैत ? मैथिलीक विकास किएक नहि भऽ रहल अछि । एकर छोट उदाहरण अहु सँ लेल जा सकैत अछि । किओे कहता पैसा नहि अछि तएं काज नहि होइत अछि । मुदा एहि ठाम तऽ पैसो अछि तैयो काज नहि भऽरहल अछि ।

के सुनत बेचनके राग ? बेचन पासवान मिथिलाक चर्चित गायक । धनुषा होइ, महोत्तरी होइ वा काठमाण्डूए, सभ ठामक लोक हिनका चिन्हैत छन्हि । कनिको–मनिकोमे बेचन गीत गाबि देतोक सोँचि लोक हिनका बजालैत अछि । काठमाण्डूक बडका लोकसभके गीत सुनयकेँ मन भेल तऽ बेचनकेँ बजा लैत अछि । मुदा, बेचन आइ कोन अवस्थामे जी रहल छथि, ककरो नहि बुझल हैत । ओ पैसाक लेल घर–घर भटकि रहल छथि । फुटल तबलाके छराबय हेतु देला महिनो भऽ गेल छन्हि । मुदा पैसा नहि छन्हि जे चमरा लग सँ तबला अनता । खायो पर आफत छन्हि । बिना साजक कें गीत सुनत ! बेचन आ गायक उदित नारायण झा मित्र रहथि । आर्थिक स्थिति तहिया दूनुकेँ समाने छल । काठमाण्डूमे कतेको ठाम दूनु सँगे गीत गएने छथि । काठमाण्डूमे संर्घष करैत काल बेचन नेतासभके चम्चागिरीकेँ प्राथमिकता देलन्हि आ उदित नारायण करियरकेँ । आइ उदित नारायण सँगे रहितथि तऽ बेचनोके एहन स्थिति नहि रहैत ?

घर–घरमे दारु भठ्ठी !

धनुषा जिल्लामे अवैध दारुक भठ्ठी सञ्चालित अछि ई वात हमरा मात्र नहि बहुतो गोटेके बुझल अछि । गोरख यादवक“े सोहनी सिंगरजोरामे रहल भठ्ठी तोडयगेल पुलिस टोली सँग रिपोर्टिङ्गके लेल हमहु“ गेल छलहु“ । ओहि ठाम पुलिस दारुसभ नष्ट कऽ भठ्ठीमे आगि सेहो लगौने छल । मुदा एहिवेर धनुषाक धनौजी गबिसक धनौजी आ भररिया तहिना औरही कप्टौलमे दारु देखलहु“ त चकित रहि गेल छलहु“ । विश्वास नहि भऽ रहल अछि जे धनुषामे अवैध दारुक कारोवार एहि रुप स“ वढि गेल अछि । हमरा एहि तीनू गाममे जाय स“ पूर्व लगैत छल गोरख यादव, सवैलाक जयसवाल, इनरवाक राजा गोइत, फुलगामाक किछु व्यक्ति मात्र ई कारोवार करैत छथि । मुदा सत्य एहि सँ फरक अछि । कतेको घरमे पुलिस दारु नष्ट कएलक । ओ घर सभ बाहर सँ बहुत सम्भ्रान्त जका“ लगैत छल मुदा भितर गेलाकवाद किछु आओर छल । धनुषाक तत्कालीन प्रहरी उपरीक्षक दिनेश आमात्य टोलीक नेतृत्व कएलाक कारण दारु नष्ट करव औपचारिकता नहि रहि गेल छल । एकटा घरमे पुलिस दारु नष्ट करय लेल पहु“चल तऽ गृहणी बरियातीकेँ पियावयके लेल दारु किन कऽ अनने जानकारी देलन्हि । मुदा भितर गेलाकवाद तऽ माहोले किछु आओर छल । ओहि घरमे मात्र पाँच सय लिटर सँ वेसी तैयारी दारु आ ओतवे संख्यामे कच्चा दारु भेटल छल ।

पत्रकारक चुनाव सुन्धारामे सुरापान

नेपाल पत्रकार महासंघक राष्ट्रिय अधिवेशन २०६८ बैशाख २०÷२१ गते सम्पन्न भेल । केन्द्रीय पार्षदक रुपमे हमहु“ सहभागी भेल छलहु“ । पार्षदक रुपमे हमर ई पहिल सहभागिता छल से नहि मुदा जे आनन्द एहिबेर लागल से कहियो नहि लागल छल । सुन्धारामे ठहरबाक व्यबस्था कएल गेल छल । सभ पत्रकारके“ ओहि एरियामे रखलाक कारण विशेषे चहल–पहल होयव स्वभाविक छल । भोजन कएलाकवाद किछु गोटे, दाइ दोहरी हेर्न जाउ“ ..कहय बला सभ सेहो भेटलथि । चुनावमे भोट पएबाक लेल किछु गोटे मु“ह स“ पोलहा रहल छलथि तऽ किछु उम्मेदवार दारुके“ बोतल लऽ कऽ आएल छलथि । काश हमहु“ दारु पिवैत रहितहु“ तऽ कतेक पिबतहु“ – कतेक । दिनमे टेक्सीपर काठमाण्डू घुमावयवला सभ सेहो भेटल । दोहरी डिस्को फाइव स्टारक भोजनक किछु गोटे मित्रसभ लाभ उठौलन्हि । ओहो सभ अपन–अपन खेत बेच कऽ ओना कऽ रहल छलथि से नहि । हुनको सभके“ किओ आओर फण्डीङ्ग कएने छल । व्यापारी, तस्कर, गलत कमायवला नेतासभ दाता रहथि । काठमाण्डूमे लगैत छल एहिना भोट होइत रहितैक आ हमसभ ऐश करैत रहितहु“ । अपना आपके“ समीक्षा करैत छी तऽ काठमाण्डूमे वितायल आनन्द प्रश्न कऽ रहल अछि की पत्रकारक इहे काज अछि ? किए एतेक मह“ग भऽ रहल अछि पत्रकारक चुनाव ? सभ्य समाजक कल्पना करयवला कलमजीविसभ स्वयं विकृति बढावयमे तऽ नहि लागल अछि । एक दू दिनक ऐश अरामलेल पत्रकारक संस्था बदनाम तऽ नहि भऽ रहल अछि ?

बैकुण्ठ जी, महन्थक गरिमा बुझियौ

रत्न सागर स्थानक छोटे महन्थ बैकुण्ठ दास २०६८ अखारमे जिल्ला अदालत धनुषाक एक न्यायधिशक निर्णय सँ भलेही साधारण तारेखमे रिहा भऽ गेल होइथ मुदा समाज एखनो हुनका बहुतो केशमे अपराधी मानैत अछि । जाहि व्यक्तिके“ देखि कऽ मोनमे श्रद्धा जगवाक चाही ओ व्यक्तिके“ देखि कऽ लोकके“ डर लगैत अछि । हमरा जहिया बैकुण्ठ जी स“ परिचय भेल छल त ओ कहलथि, ‘पाकिस्तान सँ डाक्टरी पढने छी ।’ डाक्टर भऽ कऽ बाबाजीबला काज कनीकाल लेल उटपटांग अवश्य लागल छल । हुनका जनकपुरक सर्वशक्तिमान होवयके“ लालसा छन्हि । मन्दिरमे पैसाक“े कनेको अभाव नहि अछि । मुदा खेतपर खेत किया विका रहल अछि ? ओ अपन मन्दिरक जमीन बेचैत–बेचैत जमीनक दलाल भऽ गेल छथि । कतेको मन्दिर जमीनक कारण बरबाद भेल अछि । फेर ओहन बरबाद करयमे किछु महन्थमे हुनको हाथ अबैत अछि । पहिने हुनका स“ भेट होइत छल तऽ ओ मन्दिरके“ एना सुधार करव ओना सुधार करव कहैत छलाह मुदा बादमे बाबाजीसभपर टिप्पणी करय लगला । ओ पुलिसस“ केकर पकडाएबाक आ ककरो छोड़एबामे लागल रहल छथि । ओ न्यायालय के“ प्रभावित कऽ सकैत छथि । पत्रकारके“ अपन पक्षमे लिखावय मात्रे नहि मिडिया हाउस सेहो खोलि सकैत छथि । हुनकर निवासमे दिनभरि चटुकारसभक भीड लागल रहैत अछि । ओ सभ चाहैत अछि बैकुण्ठ जी आओर जमीन बेचौथि, आओर दलाली करौथि, चटुकारितो करव आ ऐशो हैत । जनकपुरक बहुतो मन्दिर एखन घर वा दोकानमे परिणत भऽ गेल । इहो भऽ जाएत । चटुकारसभके“ कोनो लेनादेना नहि अछि । सम्भवतः बैकुण्ठ जी विवाहो नहि कएने छथि । जे धियापुताके“ बहुतो रुपैया छोड़ि कऽ जाइ एकर लोभ हेतन्हि । फला“के पीट, फला“के मार बला बात छोड़ि इम्हर ध्यान मात्र देला स“ देखथुन कतेक प्रसन्नता होइत छन्हि ।

जनकपुरिया आम कत्तऽ गेल ? जनकपुरमे उपलब्ध आमसभ जनकपुरक नहि रहैत अछि । एहि ठाम भारत सँ आएल आम प्रायः बिक्री होइत अछि । नेपालक कतहुँ–कतहुँ बिक्रियो भेल तऽ ओ उदयपुरक । जनकपुरक आम, बजार तक पहुँचिये नहि रहल अछि । एक समय छल जनकपुरक आम नेपालके सभ ठाम बिक्रिक लेल जाइत छल । कतेक व्यापारी तऽ भारत धरि सेहो सप्लाई करैत छल । २० वर्ष पूर्व एहि ठाम ततेक आम होइत छल जे व्यापारीसभ मालोमाल भऽजाइत छल । ओहि उमेरक सभ लोक देखने अछि । कहल जाइत छ्रैक मनुष्य की कुकुर नढिया सेहो आमक महिनामे मोटा जाइत छल । परिक्रमा सडक हुए वा जनकपुर–जलेश्वर, जनकपुर–ढल्केबर, सभ सडकके बगलमे आमक गाछ रहैत छल । तिरहुतिया गाछी, पहाडी गाछीमे ततेक आम फरैत छल जे लोक तोड़ि नहि सकैत छल । राम मन्दिरकेँ आगामे रहल राम पार्कमे सेहो आमक गाछ छल । जानकी मन्दिरक पाछुमे राम बाग छल ओतहुँ विभिन्न जातिक पूmलक अतिरिक्त आमक गाछ छल । जनकपुरक सभ मन्दिरके अलग–अलग आमक बगान छल । आम खाएकें लेल बहुतो लोक आमक महिनामे जनकपुर अबैत छल । मुदा आब नहि आमक बगान रहि गेल आ नहि आम । जनकपुर सँ बाहर जायबला बससभमे आम महिनामे आम भरल रहैत अछि मुदा ओ आम भारत सँ आएल रहैत अछि । काठमाण्डूमे जहिना बाहरके माछ राखि जनकपुरक माछ कहि ठकैती होइत अछि तहिना आमोमे ।

जुडशीतलके जोगाड एहि सँ पहिने कहियो जुड़ शीतलमे थालमाटि नहि खेलने छलहुँ । पहिने थालक ठोप मात्र लगबैत छलहुँ । राम युवा कमिटी २ बर्षसँ थालमाटि खेलक कार्यक्रम रखैत आवि रहल अछि । ओना कही हमरे प्रयास सँ ई थालमाटि राखल गेल अछि । हम पहिने थालमाटिक रिपोर्टिङ्ग करबाक लेल धनुषाक गंगुली जाइत छलहुँ । कलाकार गुड्डु गंगुलीक नेतृत्वमे ओतय थालमाटिकेँ विशेष उत्सव होइत छल । एहि कार्यक्रमक सम्बन्धमे रामयुवा कमिटीक अध्यक्ष सोहन ठाकुरके आग्रह कएलिएन्हि जे राम युवा कमिटी सेहो एकर आयोजना किएक नहि करैत अछि ? एहि पर ओ सहमत भऽ गेलथि आ दू वर्षसँ ई पाबनि भऽ रहल अछि । कहियो ई पावनिकेँ पूरे मिथिलाञ्चलमे एक हप्ता पहिने सँ धुम रहैत छल मुदा सरकारी उदासिनता मात्र नहि एकरा समाप्त करबाक एकटा बडका प्रयास भेल । किछु वर्ष पूर्वधरि एहि दिन सँ नेपाालक एसएलसी परीक्षा शुरु होइत छल । जाहि सँ एहि पावनिकेँ बहुत हदधरि असर कएलक वा कही बसिया बड़ीभात खायमे सिमित कएलक । एकरा बचाबय परत । अहि पावनिमे रंग भरय परत । एक बेर फेर सँ मिथिलाकेँ शीतल शीतल करय परत ।

पैसा दिअ भोट लिअ धनुषा निर्वाचन क्षेत्र नम्बर ५ क उपनिर्वाचनक प्रचार–प्रसार कोना चलि रहल अछि, ई बुझबाक लेल २०६५ चैत १६ गते सखुवा महेन्द्रनगर पहु“चल छलहु“ की, तीन–चारि गोटे हमरा लग आबि कहैत अछि, ‘भाइजी, कोन पार्टीक प्रचारमे आएल छियै ? हम सभ तऽ निर्णय कयने छी, जे बेसी पैसा देत ओकरे भोट देबै ।’ ‘पैसा ?’ ‘ह“ । अहि बेर हम सभ खोलि कऽ पैसा मँगैत छियैक ।’ ‘इन्ट्रेष्टिङ्ग !’ ओ सभ हमरा कोनो उम्मेदवार छी बुझिरहल छल । हम हुनका सभ स“ चाहलहु“ जे पैसा के की खेल भऽ रहल छैक से बुझबामे चलि आबए । तए“ बातके बढ़बैत हुनकँ सभ संगे रहल एक महिला स“ पुछलियन्हि, ‘की अहु“ के पैसा चाही ?’ ओ कनी क्रोधित होइत बजली, ‘किएक नहि, अहा“ सभ जखन हमर भोट लऽ कऽ ढौआढाकी कमा सकैत छी तऽ किए नहि हम सभ पैसा मा“गु ?’ ‘कतेक गोटे देलक अछि ?’ हमर जिज्ञासा पर ओ कहली, ‘प्रचार शुरु होबय सँ पहिने बहुत किछु सुनने छलहु“ जे फला“ महासेठ, फला“ यादव, फला“ डाक्टर ठाड़ भेल छैक । बहुते पैसा भेटत मुदा एकटा स्वतन्त्र उम्मेदवार पचास रुपैया देलक तकरबाद किओ नहि देलक अछि ।’ ओ महिला स“गे रहल एकटा वृद्धा सेहो हमरा दिस ललचायल मुद्रामे ताकि रहल छली । हमरा लागल जे हुनक मुखाकृति कहि रहल अछि जे हम हुनका बिड़ी पिय लेल सेहो जँ पैसा नहि देबैक तऽ ओ हमरा कपडा फारि देती । तथापि हम हुनका दिस तकैत पुछलहु“, ‘दाइ अहा“के किओ पैसा देलक अछि की नहि ?’ ‘एक दु गोटे कहलक अछि । मुदा की कहु“ अगो बेर ठैकि लेलक, अहुँ तऽ कम्तीमे एकरा सभके नहि ठकियौ ?’ ३ सुमित आनन्द ‘मैथिली’ शोध-पत्रिकाक लोकार्पण ‘मैथिली’ (शोध-पत्रिका) - 6 केर लोकार्पण दिनांक 24-12-2011 केँँ ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालयक माननीय कुलपति डाँ एस. पी. सिंहक कर-कमलसँ विश्वविद्यालय मैथिली विभागमे भेल। ई शोध-पत्रिका महाकाव्यपर आधारित अछि जाहिमे पचास गोट विद्वानक शोधपरक आलेख संकलित अछि। एहि अंकमे महाकाव्यक सूचीक संग शोध-संबन्धी सूचना सेहो देल गेल अछि। एहि अंकक लोकार्पण करैत माननीय कुलपति बजलाह जे स्नातकोत्तर विभागसँ शोध-पत्रिकाक प्रकाशन एकटा नीक परम्परा थिक जकर सभ ठाम प्रशंसा होएबाक चाही। ओ कहलनि जे मिथिलाक विभूतिपर सम्पूर्ण देश गौरवान्वित अछि आ मैथिलीक क्षेत्र धीरे-धीरे बढ़ैत जा रहल अछि। हमरा सभके ँ मिलि कए आगाँ बढ़ए पड़त। डॉ. रमण झाक संचालनमे आयोजित एहि कार्यक्रमक मुख्य अतिथि डॉ. सुरेश्वर झा बजलाह जे ई शोध-पत्रिका बहुत उपयोगी अछि। विभागाघ्यक्षा डॉ. वीणा ठाकुर आगत अतिथिके ँ स्वागत करैत संकेत देलनि जे अगिला अंक सेहो विशेषांके रहत मुदा शोधकर्त्ता लोकनिके ँ ध्यानमे रखैत हुनका लोकनिक शोधसँ सम्बद्ध आलेख सेहो आमंत्रित कएल जाएत। डॉ. भीमनाथ झा अन्य विभागक शोध-पत्रिकास ँ एकरा एकैस कहलनि संगहि उपयोगिताक दृष्टिए ँ एहिमे विभिन्न शोधपरक सामग्रीक समावेश करबाक परामर्श देलनि। डॉ. पं. शशिनाथ झा एहि शोध-पत्रिकामे तिरहुतामे लिखल आलेखक समावेश करबाक सेहो मन्तव्य देलनि। एहि अवसरपर डॉ. मित्रनाथ झा, डॉ. कृष्णचन्द्र झा ‘मयंक’ एवं डॉ. धीरेन्द्र नाथ मिश्र सेहो अपन-अपन विचार रखलनि। समारोहमे अनेक गणमान्य व्यक्तिक संग-संग विभागीय शिक्षक डॉ. नीता झा एवं डॉ. विभूति चन्द्र झा तथा विभागक छात्र-छात्रा लोकनि सेहो उपस्थित रहथि। कार्यक्रमक शुभारम्भ शोध-छात्रा कुमारी अमृता चौधरी तथा अर्चना कुमारी एवं एम. ए.क छात्रा शीतल कुमारी तथा सुनीता कुमारी द्वारा प्रस्तुत मंगलाचरणस ँ भेल। प्रो. कृष्णानन्द मिश्र स्वागत गान प्रस्तुत कयलनि तथा कार्यक्रमक समापन डॉ. रमण झाक धन्यवाद ज्ञापनस ँ भेल। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। अनिल मल्लिक हम, देह आ विदेह....! मोन बड़ा उद्विग्न छल, भोरे चाइरे बजे आँखि खुइल गेल ! बौआऽक माय कहलथि “जाड़ मास, ठाड़ पकड़ि लेत, गब्दिया कऽ सुइत ने रहू !” मुदा आँखि मे निंद रहय, तँ ने सुती? निंद तँ पड़ायल छल, चिन्ताक जेना बाढ़िमे भसिऐ लगलौं हम! काइल्हे बौआ'क बियाह लगभग निश्चित केलौं ! भजियबैत भजियबैत, गप्प मिलबैत मिलबैत… सौ टा फुइस साँच बजैत…  दू सालमे चारि ठमन कन्या देखलाक बाद… आब जा कऽ एतऽ हमर दाइल गलल! कन्या सेहो सुशील, मोन गदगद, कि हमर सभ मनोरथ ऐ कुटमैतीसँ पूरा भऽ रहल अछि, सभसँ पैघ बात तँ ई, कि कन्याक पिता झटसँ राजी भऽ गेलथि कि लेनदेनक बात केकरो पता नै चलतै, कतौ नै खोलता, सभ ठमन बजता… कि आदर्श विवाह भेल! हमर गिन्ती समाजक अगुआमे होइत अछि, हमहीं सभ तँ छी, जे एहन कुरीतीक विरोध करै छीI जौं हमरा बारेमे लोककेँ पता चलि जाइ, की हम पाइ लऽ कऽ कुटमैती केलौं, तँ ई समाजमे हमर प्रतिष्ठाक चेथरा उड़ा देतI हम मोनेमोन धन्यवाद दैत एलौं मझिला साढ़ूकेँ, जे सभ बात भीतरे भीतर मिलेलथिI हुनके गतातीक कथा अछि ई, तै दुआरे निफिक्कीर छी ! बड़ खुशी मोनसँ कन्यागत ओतऽ सँ लौटैत बेर भुतही हटियापर सँ ताजा बलसाही  किनने एलौं I घर अबिते बौआक मायकेँ सभ बात बतेलौं I सुनि कऽ बहुत प्रसन्न मोनसँ बाजि उठलथि, की चलू “साँपो मरल आ लाठीओ नै टुटल”! खा पी कऽ जल्दिए सुइत रहलौं दुनु प्राणी ! हौ बा ! ई की भेल ? आब एकर निदान तँ श्रीधर बाबु मात्र बतेता तँ हुनके लंग जाइ छी I मोनेमोन निश्चय कऽ चललौं हुनकेसँ भेंट करs ! कहुना कहुना कऽ पाँच बजल, कुहेश बड़ जोर, दशो हाथ दूर तक देखनाइ मुश्किल, पहुँचलौं श्रीधर बाबूक घर, तीन चाइर गोटेक साथे घुर तपैत भेटला, दतमैन करैत ! अकचका कऽ पुछलथि, की यौ ? की बात ? एतेक सबेरे ? हम कहलियन्हि जे बड़का आफतमे छी, की कहू ? कनेक असगरेमे विचार करैक छल अहाँसँ ! सुनि कऽ श्रीधर बाबु हमरा दलान परक कोठरीमे बैसबाक लेल कहलथि आ कुर्रा आचमन केलाक बाद दू गिलास चाह लऽ कऽ एलथि कोठरीमे, बैसते  कहलथि “हँ ! तँ, आब कहs कोन आफतक बात करै छलह तों?” ! बिना चोरा नुका कऽ सभटा बात कथा कुटमैतीक बारेमे कहलियन्हि हम श्रीधर बाबूकेँ ! हमर गप्प निर्विकार भावसँ सुनैत रहला ! हम कने दम धेलौं, आ फेर कहऽ लगलौं श्रीधर बाबू ! जेना अहाँ कहैत छी जे सपना कहियो भविष्यमे घटैबला घटनाक सूचक सेहो होइ छै आ हमहूँ ई बात मानै छी, आइ राइत बड खुशी खुशी सुतलौं मुदा राइत हम सपना बड बिचित्र क देखलौं ! देखलौं की… हम दू गोटे छी, एकदम हमरे जकाँ… हु बहू… देखबामे एको मिसिया फरक नै जेना डबल रोल होइ? डिट्टो ओहिना, एकटा उपर आ एकटा निच्चा! उप्पर बला अपनाकेँ आत्मा कहैत छल, आ निच्चा बलाकेँ देह ! आत्मा बड खिसिया कऽ धमकबैत छल देहकेँ “ हम नै सहबौ आब तोहर बदमाशी, बाल्यकालक… जबानीक मनमानी क्षमा करैत गेलियौ I अंग-अंग केँ, सभ इन्द्रियकेँ डेमोक्रेशी देलियौ, बदलामे की भेटल हमरा? निराशा, अपमान, आत्मग्लानि… आई तँ अति केलैं तों, हाथ पकड़लक देह क आ जेना घिसीयबैत चलल कहिते की आ तोरा देखबै छियौ तों की की केलैं अखैन धरि, आ दण्ड किए नै दियौ तोरा? मायक गर्भसँ लऽ कऽ अखैन तक क यात्रा हमर देहकेँ क्षण भरिमे करा  देलक जेना सिनेमा होइ तहिना, जेना ऐनामे स्पष्ट देखाइ छै तहिना एकदम किलियर साफ साफ! अपन कुकृत्य देख देह हाँइफ गेल तँ आत्मा ओकर हाथ छोड़लक, देह धप्पसँ खसल जमीनपर, डरा कऽ देखऽ लागल आत्मा दिस जेना चोर देखै छै दरोगा दिस तहिना, चुपचापI कनिक्को शांत नै भेल अखैन धरि आत्मा, बाजैत रहल,  बेटाक बिवाह करै छेँ, नीक बात, मुदा ऐ प्रयासमे तों की की प्रपंच रचलेँ से यादि छौ? सभसँ पहिले तोँ नीक बेपारी जकाँ ग्राहककेँ अपन जालमे फसेलेँ I ग्राहक कन्यागत, प्रोडक्ट तोहर लालच, बेचारा नवयुवक तोहर अपन बेटा जे ई कुरीति, भ्रष्टाचारक विरुद्ध लम्बा युद्ध लड़ैक क्षमता रखै छल, तीन चारि बेर कम्पीटिशन की लूज केलक तों ओकरा हिम्मत देबाक बदला, हौसला देबाक बदला लगले ओकर ब्रेन वास करऽ आर ई शर्टकट रस्तापर चलैक लेल राजी कऽ लेलहीं ! मार्केटिङ टुल बनबाक लेल तैयार कऽ लेलहीं, नीक पैकेज, बोनस, इन्सेन्टिभक मकड़जालमे फाँइस लेलहीं, जखैन ओ तैयार भऽ गेलौ तँ निकलि पड़लै ओकरा लऽ कऽ मार्केटिङमे ! आब आ, तोरा देखबै छियौ तोहर जघन्य अपराध ! हमरा आगाँ आबि गेल दृश्य जइमे हम बौआ लेल पहिल कन्या देखऽ गेल रही ! ओ बाजैत रहल, ऐ कन्याकेँ, तों पिड़श्याम छेँ, दोसरकेँ लम्बाइमे, तेसरकेँ शाकाहारी कहि कऽ छँटलिहीं लेकिन बात दोसरे छलै, तोहर अदॄश्य अभीष्ट जौं पूरा होइतै तँ तों कोनो नै छँटितहीं, जखैन दालि नै गलैबला भेलौ तँ तों बहाना बनेलहीँ ई सभ! यथा सामर्थ कन्यागत तैयार छलखुन तोरा दै कऽ लेल मुदा तों कन्सिडर आ कम्प्रोमाइज करै कऽ लेल तैयार नै भेलें आ छ छ महिना प्रतिक्षा करेलाक बाद, दौड़ैलाक बाद जबाब पठेलहीं की एतऽ नै हएत, आन ठमन देखूI हरेक जगह तों कन्या परिक्षण करैक बेर चला कऽ, बजा कऽ, लिखा कऽ कन्या देखलेँ जेना पुतौह नै मार्केटसँ एल. सी. डी. टेलिभीजन पसन्द कऽ रहल छें कनेक्को अनुमान छौ? कोन मनोदशासँ ऐ सभ निरपराधकेँ गुजरय पड़ल हेतै ? गरजि उठल आत्मा देहपर, कतेक मेहनतसँ ऐ बचिया सभमे विकसित भेल हेतै आत्मविश्वास आ स्वाभिमान, जकर नेओं हिला देलकै तोहर मिथ्या लांछन? निरपराध बचियाकेँ हीन भावनाक शिकार बनबैक, अपराधबोधक शिकार बनबैक दुश्प्रयाश केलें तों, ई अक्षम्य अपराध छौ, एकर दण्ड भेटतौ तोरा ! हम आत्मा छी पर-आत्माक दुख बुझै छी। परम-आत्माक कंठहार बनैक अछि हमरा ! तोहर कुकृत्य हमरा नर्कक द्वार लऽ जायत ! आब मनमौजी नै चलतौ, कड़ा अनुशासन रहतौ आब ! तों तँ देह छेँ, एक दिन सुन्दर काया क्षीण भऽ जेतौ। पे बैक पीरियडक बाद तों बेपारी जेना बैंकक पूँजी आपस करै छिही तहिना हमरो आपस करय पड़तौ ! तोहर नियति छौ… कि तँ तों जड़बे कि तँ तों गड़बे, राख बनबें या माइट ! तोहर खिस्सा तँ खतम भऽ जेतौ, लेकिन हमरा तँ जबाब देबऽ पड़त हमर श्रृजनहारकेँ, देखाबऽ पड़त तोहर बैलेन्सशीट ! हुनको अपन युनिटक परफोरमेन्सक रिपोर्टिङ करय पड़ैत छन्हि, हायर मैनेजमेन्टक! तोहर बैलेन्सशीटक सम्पैत पक्ष छौ सत्कर्म, पुण्य आ दायित्व पक्ष छौ दुष्कर्म, पाप ! तोहर अखन धरिक कारगुजारी सँ निश्चित छौ की तोहर दायित्व पक्ष भारी रहतौ ! हम की औचित्य बतेबै ? हमरा तँ नियुक्त कएल गेल तोहर बैलेन्स शीटक सम्पैत पक्षकेँ भारी करैक लेल, तोरापर विश्वास केलियौ, स्वतंत्रता देलियौ डेमोक्रेटिक एक्सरसाइज  करेलियौ, तकर परिणाम तों धोखा देबऽपर, घाटा देबऽपर लागल छें !  कुकर्म तों करबे आ कुकर्मक बिशेषन हमरा? सजाय हमरा? दुरात्मा, पापात्मा, निचात्मा… हम किए ? तोहर कएल अपराधक सजाय हम नै भोगबौ ! बेर बेर पृथ्बीपर आउ,  एतेक झमेलामे हम आब नै पड़बौ ! आत्माक क्रोध देखि कऽ डरसँ देह काँपि गेल ! दुनु हाथसँ माथ पकड़ने चुक्कीमाली बैसल रहल देह! निशब्द, निस्तब्ध, निसहाय ! जेना करेज फाइट जेतै तहिना दर्द उठलै छातीमे, आँखिक आगाँ एकदम घुप्प अन्हार...जेना अचानक बिजली चलि जाइ तँ केहन अन्हार होइ छै? तहिना ! मोनमे सोच एतबे जे आब कोन दण्ड भेटत ? कनेक देर चुप रहलाक बाद फेर हुँकार भरलक आत्मा, तोहर सजाय ई छौ की हम आइ, अखने तोरासँ निकलि जाइ, हमरा की ? हमरा एतबे ने की फेर आबऽ पड़त धरतीपर?  हमरा तँ फेर कोनो देह भेटत रहैक लेल, तों आब अप्पन सोच… कहिते घुमल आत्मा, देह धड़फड़ा कऽ उठल आ आत्माक पएर पकड़ि लेलक ! देह घिघिऐ लागल, हमरा नै छोरु, सुबकऽ लागल, हाथ जोड़ि कऽ कहऽ लागल, जे अपराध केलौं हम तकर आब प्रायश्चित हम करब, हमरा रस्ता देखाउ ! जे रस्ता अहाँ देखेबै तहीपर हम चलब, अहाँ हमरा एकटा औसर मात्र दिअ, कहिकऽ देह बिलखऽ लागल ! देहक कननाइ देखि कऽ आ पश्चाताप करैत देखि कऽ देहकेँ धेने जे ओकर खास संगी साथी छलै लोभ, काम, ईर्ष्या, द्वेश, मोह पाँचो क पाँचो अपन अभीष्ट आब पूरा नै हएत बुझि कऽ छिटकि गेल ओकरा लगसँ, डगर नापि लेलक, फेर कहीं आत्माक कोपभाजन नै बनि जाइ, ई सोचि कऽ सभक सभ लंक लाइग कऽ भागल! देह केँ असगर छोड़ि कऽ! देहकेँ डर, दिनता आ पश्चाताप करैत देखि कऽ आत्माकेँ दया आबि गेलै! किछु देर चुप रहलाक बाद आत्मा बाजल, किछु कोमल श्वरमे, अखन जे हम तोरा छोड़ि दियौ तँ कतेक दिन धरि सन्जोगि कऽ रखतौ तोरा तोहर परिवार? हम जे अखन निकलि जेबौ तोरामे सँ तँ ऐ सुखक तों भोग कऽ सकबेँ? देह मूड़ी हिलेलक नै क इशारामे ! आत्मा आब समझाबऽ लागल…. देख अखनो किछु नै बिगड़ल छौ, हमर बात मनबे तँ पूर्ण काल तक तोरे संग रहबौ ! डेमोक्रेशीक बड बेजाय फएदा उठओले तों, आब एकटा निश्चित परिधिमे रहैक छौ तोरा! डेमोक्रेसी नै छिनबौ, मुदा तोहर क्रियाकलापपर कड़ा निगरानी रखबौ आत्म लोकपाल बनि कऽ! तोहर दैहिक आवश्यकता, अधिकारक सम्मान करबौ, अपमान तोरा सँ ककरो होए आब, से नै होबय देबौ ! धर्म नै करबे नै कर, मुदा अधर्म तोरासँ, आब नै होबय देबौ ! ककरो सुख नै दऽ सकबे, कोनो बात नै, मुदा ककरो तोरा सँ दुख पहुँचय, से नै होबय देबौ ! नै आनय सकबे ककरो चेहरापर मुश्कान, कोनो बात नै, मुदा तोहर कारण ककरो आँखिसँ नोर खसय, से नै होबय देबौ ! तोरा मे "विदेह" बनैक सामर्थ नै छौ, हम जनै छी, जौं हमर कहबपर चलबे तों, तँ नीक "देह" तोरा जरुर बनेबौ हम ! पक्का...गारण्टी छौ हमर, कह छौ मन्जूर? देह बुझि गेल छल अखैन धरि की आब एकर बात मनबाक अलावा कोनो विकल्प नै अछि तँ कहलक, हँ हम सभ बात मानब ! मोनेमोन मुश्कायल आत्मा,  सोचि कय की चलु ई तँ आयल आब लाइनपर, आब अपन आत्मा बिरादरीक मीटिङ्ग बैसेनाइ बड जरुरी बुझा पडल आत्माकेँ, कतौ आरो कोनो देह तँ एहन बदमाशी ने कऽ रहल होय, आब इग्नोर केनाइ उचित नै ! अधिकसँ अधिक आत्माकेँ सचेत केनाइ आवश्यक महशूस केलक आत्मा, फेर कहलक, तों अप्पन बोझा केना हल्लुक करबे, की स्ट्राटजी बनेबहीं जे तोहर नफा नोक्सान खाता केना नफा देखेतौ, से योजना तोरा अपने बनाबय के छौ ! हमर कोनो हस्तक्षेप नै रहतौ, यदि तोरा सलाहक जरुरी पड़तौ, तँ आँखि बन्द करिहेँ, हमरा यादि करिहेँ, हम तुरन्त आबि जेबौ !  हम चलै छियौ, कहि कय अन्तरध्यान भेल आत्मा ! आब उठल देह लम्बा साँस लय कऽ तँ अचानक अनुभव भेलै जे ओ बहुत हल्लुक भऽ गेल छल, हवामे जेना उड़ियाइत होइ तहिना, देखलक अपनाकेँ तँ आश्चर्य भेलै अपनाकेँ देखि कय ! एक दम नया, साफ, चिक्कन चुनमुन, पहिले तँ जेना हटिया परक चाह बलाकेँ वएह ठमन चाह बनबैबला गंदा ससपेन जेहन देह छलै अखन तँ जेना प्रिल सँ साफ कऽ देने होइ ससपेनकेँ तहिना चमकैत छल देह ओकर ! खुशीसँ हवामे नाचय लागल देह जेना मुन वाक करैत होए तहिना, की ठोकर लगलै आ आँखि खुलि गेल हमर! श्रीधर बाबु ! ई सपना हमरा परेशान कऽ देने अछि !  ऐ सपनाक अर्थ की भऽ सकैत अछि? कि जेना अन्गिनैत सपना हम जीबनमे देखैत छी, जकर कोनो अर्थ नै होइ छै, तहिना ईहो एकटा छै? कहीं ई कोनो संकटक पूर्वानुमान तँ नै? प्रश्नक जेना हम झरी लगा देलिऐ श्रीधर बाबूक आगाँ ! सभटा बात सुनलाक बाद कनेक मुश्केलथि श्रीधर बाबू आ कहय लगला, सुन भाय, ई तोहर भाग्य छौ जे तोहर आत्मा तोरा अतीतसँ वर्तमान तकक मात्र यात्रा देखेलखुन्ह अहिमे तों यतेक त्रस्त भऽ गेलैं, जौं भबिष्यक यात्रामे कहियो लगेलखुन्ह तँ तोहर की हाल हेतौ? हम कहलिऐ, नै बुझलहुँ हम, तँ बजला श्रीधर बाबू, देख तोहर होबयबला समधि अखैन तँ कहलखुन्ह जे ओ कतौ नै बजता मुदा ओ बजता जरुर ! तोहर पुतहुकेँ पता चलतौ, किछु साल बाद बेटो तोरे दोषी कहतौ, अखैन पैरुख छौ कोनो बात नै मुदा धिरे-धिरे अबस्था ढलैत जेतौ, तोरा लोकक जरुरी, सम्मानक जरुरी, प्रेमक जरुरी पड़तौ तखैन तों पयबे कि सभ सुख जेकर तोरा आवश्यकता हेतौ तों मुठ्ठीमे बन्द करय चाहबेँ, लेकिन सुखल बालु जकाँ तोरे आँखिक आगाँ तोहर हाथ सँ निकलि जेतौ सभ सुख! तों किछु नै कऽ सकबे, कसकबे तँ मात्र अफशोस !  कोइ नै रहतौ तोरा संग ! ने पुत्र, ने पुतहु, ने पत्नी ने पौत्र कोइ नै ! ने ककरो प्रेम ने ककरो बिश्वास! असगर रहि जेबैं तों भोगैक लेल अपन कृत्यक परिणाम ! तखैन तों बेर बेर भगबानसँ पुछबे कि तोरे संग किए एना? तखैन तोरा यादि अयतौ तोहर सभ कृत्य, लेकिन करबेँ की? समय तँ निकलि गेल रहतौ ! भोकासी पाड़ि कय कनबे तों, मुदा तोहर नोर पोछयबला कोइ नै रहतौ ! हम सुनैत रहलौं श्रीधर बाबूक सभ बात ध्यानसँ, आँखिक आगाँ जेना चलदृश्य होइ तहिना बुझाइत छल तखैन हमरा ! कहैत रहला श्रीधर बाबू, एकटा बात बुझल छौ, ई दोसर जन्म की होइ छै? दोसर जन्म होइ छै बुढापा ! कहै छै ने बच्चा बूढ एक समान, तँ बच्चाक जन्म भेलै एक जनम आ बुढापा भेलै दोसर जनम ! कहै छै ने पुण्यसँ अगिला जनम सुधरै छै? तँ ई अगिला जनम मृत्युक बाद नै अबै छै! ई छै बुढापा, जकरा नीक कर्म कय कऽ सुधारै छै लोक ! आब तों निश्चय कर कि तोरा की करय के छौ ! बयस अखनो बहुत बाँकी छौ, तों तँ एकटा सफल बेपारी छेँ, तोरा तँ पता छौ कि एकटा खाता जतेक रकमसँ डेबिट होइ छै ओतबेसँ दोसर खाता क्रेडिट सेहो होइ छै ! तँ जीबन बेपारकेँ सेहो डेबिट क्रेडिट एतय होइ छै ! आब कोन पथ चलबें, कि आत्मा सँ कएल वचन पूरा कय सकबें, तोरा निर्णय करैक छौ ! भाय ! हम तँ एतबा कहबौ, जे फर्मुला तों बेपारमे लगा कऽ सफल भेलें तहिना निक फर्मुला निकाल आ जुटि जो जोरसोर सँ जिबन बेपार मे नफा कमाइ क लेल ! एतबा कहि कय श्रीधर बाबू हमर पीठ थपथपेलथि तँ जेना भक्कसँ हमर आँखि खुलि गेल, जेना कोनो पर्दा छल अखैन तक, से अचानक हटि गेल ! चारु दिस जेना प्रकाश, उत्साह, रंग…व्यक्त नै कयल जा सकयबला खुशी…! जेना हमरा नया दिशा भेट गेल, हम गोर लगलौं श्रीधर बाबु केँ आ चलि पड़लहुँ बाँकी रहल जीबन सुधारै क लेल… नव पथपर, पूरा आत्मबिश्वासक साथ… धिरे धिरे ! दूर असमानमे बादलमे दूटा आँखिक आकृति उभरल… जेना लगे रहो मुन्ना भाई मे गान्धी जी क आकृति देखाइ छै ने तहिना, मानू कि आत्मा हमरापर नजैर राखि रहल होय ! हम हँसि पड़लौं आ निर्भीक मलङ्ग जकाँ बढैत रहलौं, बढ़ि रहल छी आ बढैत रहब...हिम्मत दैत रहत "टैगोर" रचित गीत...जोदि तोर डाक सुने कोइ ना आसे तोबे एकला चोलो रे.....!! ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। १.जगदीश प्रसाद मण्‍डल- कामरूप आ मिथिला २— बृषेशचन्द्र लाल- बिद्यापति–स्मृति पर्व मादेँ १ जगदीश प्रसाद मण्‍डल- कामरूप आ मिथिला मिथिला सांस्कृतिक समन्वय समिति द्वारा गुवाहाटीमे आयोजित "विद्यापति स्मृति पर्व समारोह" स्थान: प्राग्ज्योतिष आइ.टी.ए. सेन्टर, माछखोवा, गुवाहाटी  आइ २३ दिसम्बर २०११ केँ ५ बजे अपराह्णसँ शुरू भेल/ ऐ अवसरपर विशेष अतिथि रहथि डॉ. श्रीमती प्रेमलता मिश्र "प्रेम" आ सम्माननीय अतिथि रहथि श्री जगदीश प्रसाद मण्डल। जगदीश प्रसाद मण्डलजी क उद्बोधन भाषण भेल जे नीचाँ देल जा रहल अछि।-सम्पादक वि‍द्यापति‍ स्‍मृति‍ पर्व समारोह- कामरूप आ मिथिला सभसँ पहि‍ने ऐ पर्व समारोहक सहयोगी आ मि‍थि‍ला सांस्‍कृति‍क समन्‍वय समि‍ति‍केँ धन्‍यवाद दैत छि‍यनि‍ जे मि‍थि‍ला आ कामरूपक बीच युग-युगसँ प्रवाहि‍त होइत जीवन धाराकेँ जीवि‍त रखने छथि‍। संगहि‍ आगूओ एहि‍ना लहड़ाइत धाराकेँ जीवि‍त रखताह, से आशा करैत छी। कामरूप आ मि‍थि‍लाक बीच संबंध कहि‍यासँ शुरू भेल, एकर नि‍श्चि‍त ति‍थि‍ तँ नै बुझल अछि‍, मुदा सहस्रो सालसँ जीवन धारा बनि‍ प्रवाहि‍त होइत आबि‍ रहल अछि‍, ई कहैमे कनि‍योँ मनमे संकोच नै अछि‍। जे कामरूप कहि‍यो प्राग्‍ज्‍योति‍ष कहल जाइत छल भरि‍सक तहि‍येसँ। ओना इति‍हासक वि‍द्यार्थी नै रहने इति‍हास पढ़लो नै अछि‍। भऽ सकैत अछि‍ जे जहि‍ना मि‍थि‍लाक संपूर्ण इति‍हास लि‍खि‍नि‍हारक अभाव रहल अछि‍ तहि‍ना भाषोक हुअए। मुदा दुनूक बीच प्रगाढ़ संबंध बनल चलि‍ आबि‍ रहल अछि‍, ऐमे कतौ दू-राइ नै अछि‍। जखन बच्‍चे रही तहि‍यो बूढ़-बूढ़ानुसक मुँहे सुनैत रही जे फल्‍लां कामरूपक सि‍ख छथि‍। ततबे नै मि‍थि‍लावासीक लेल कामरूप कामाख्‍या, अदौसँ तीर्थ-स्‍थल बनल चलि‍ आबि‍ रहल अछि‍, आगूओ चलैत रहत। जहि‍ना बंगालक गंगासागर, दक्षि‍णेश्वर, उड़ीसाक कोणार्क आ जगरनाथ मद्रासक श्वेतबान रामेश्वर, कन्‍याकुमारी, गुजरातक द्वारि‍का, राजस्‍थानक पुष्‍कर पंजावक स्‍वर्ण मंदि‍र, कश्मीरक वैश्‍णोदेवी-अमरनाथ, उत्तरांचलक बद्रीनाथ, हरि‍द्वार उत्तर प्रदेशक काशी, वि‍न्‍घ्‍यांचल मथुरा-वृन्‍दावन इत्‍यादि‍ रहल अछि‍, तहि‍ना। जइ समए गाड़ी-सवारीक अभाव छल तहू समए छल। शंकरदेवक पारिजातहरण आ रामविजय , दैत्यारि ठाकुरक श्यामन्तहरण यात्रा आ  लक्ष्मीदेवक कुमारहरण नाट (शतस्कन्ध रावण वध), ई सभ अंकियानाट मैथिलीक आरम्भिक नाटक अछि आ असमक ऐ ऋणसँ हम सभ कहियो उऋण नै भऽ सकै छी। गंगा-ब्रह्मपुत्र मैदानक बीच बसल मि‍थि‍लो आ कामरूपोक रहने उपजा-बाड़ीसँ लऽ कऽ जि‍नगीक आनो-आनो संबंध सहज अछि‍। जहि‍ना कामरूप तलहटी मैदानसँ लऽ कऽ पहाड़-पठार, वनक संग प्रवाहि‍त होइत जलधारासँ सम्‍पन्न अछि‍ तहि‍ना बि‍‍हारो अछि‍। बंगालक खाड़ीसँ उठैत माैनसुनसँ जहि‍ना कामरूपक भूमि‍ सि‍ंचि‍त होइत तहि‍ना मि‍थि‍लांचलोक। ओना मुँहपर पड़ने कामरूपमे अधि‍क आ जेना-जेना पछि‍म मुँहेँ ससरैत तेना-तेना कम होइत जाइत, मुदा दुनूक बीच नजदीकी रहने बहुत बेसी अंतर नै पड़ैत। गंगा-ब्रह्मपुत्रक एक तलहटी रहने माटि‍यो आ माइटि‍क सुगंधोकेँ एकरंगाह बनौने अछि‍। उत्तरी पहाड़सँ नि‍कलैत (नदी धारा) जल धारो एक-रंगाहे रहल अछि‍। जइठाम जेहन माटि‍-पानि‍ तइठाम तेहन उपजा-बाड़ी। जइठाम जेहन उपजा-बाड़ी तइठाम तेहने खानो-पान आ आचारो-वि‍चार। जइठाम जेहन खान-पान, आचार-वि‍चार तइठाम तहि‍ना कला-सांस्‍कृति‍क संबंध। जे दुनूक बीच अदौसँ रहल अछि‍। ओना, खेती-बाड़ीमे एक-रूपतो अछि‍ आ भि‍न्नतो। अधि‍क मध्‍यम बर्षा भेने, पनि‍सहू फसि‍लो आ फलो-फलहरीमे अन्‍तर होइत, से अछि‍यो। जइ कामरूपमे नारि‍यल, सुपारी, चाहक बहुतायत अछि‍ ओ मि‍थि‍लांचलमे कम अछि‍। ओना मि‍थि‍लांचलमे ि‍सर्फ आम हजारो कि‍स्‍मक अछि‍। मुदा पटुआ आ धान जहि‍ना कामरूपक मुख्‍य फसि‍ल अछि‍ तहि‍ना मि‍थि‍लोक। मुदा जहि‍ना नीलक नव अवि‍ष्‍कार भेने नीलक खेती मारल गेल तहि‍ना पोलीथि‍नक आगमनसँ पटुआक खेती प्रभावि‍त भेल अछि‍। मि‍थि‍लाक उर्वर भूमि। जहि‍ना माटि‍-पानि‍ तहि‍ना स्‍वच्‍छ हवो। जइसँ सभ कथूक वृद्धि‍। चाहे ओ खेती हुअए आकि‍ जीवन पद्धति‍ हुअए आकि‍ कला-संस्‍कृति‍। मि‍थि‍लांचलक चि‍न्‍तन धारामे ि‍सर्फ उच्‍चकोटि‍क मनुष्‍ये नै उच्‍च कोटि‍क समाज आ सामाजि‍क-पद्धति‍क सेहो दि‍शा-दर्शन रहल अछि‍। जन-गणक नगर जनकपुर। आ जनकपुरक राजा जनक। जनि‍क कन्‍या जगत जननी जानकी। एक-सँ-एक चि‍न्‍तक, तत्ववेत्ता, दार्शनि‍क मि‍थि‍ला भूमि‍ पैदा केने अछि‍‍। जेकर वानगी इति‍हास-पुराण जीवि‍त अछि‍। जहि‍ना सौंसे देश गुलामीक शि‍कंजामे हजारो बर्खसँ रहल तहि‍ना देशक उत्तर-मध्‍य बसल मि‍थि‍लो अछि‍। ओना मि‍थि‍ला दू देशमे बटल अछि‍। साठि‍-पेइसठि‍ बर्ख पहि‍ने भारत स्‍वतंत्रताक साँस लेलक जहन कि‍ नेपालक मि‍थि‍ला हालमे साँस लेलक। जहि‍ना अभावी परि‍वारमे अभावक चलैत जीवनक सभ कि‍छु प्रभावि‍त होइत, तहि‍ना भेल। जीवन-पद्धति‍मे खोंट अबैत-अबैत खोंटाह होइत गेल अछि‍। जेकर असरि‍ अधलाह पड़ैत गेल। मुदा तैयो मि‍थि‍लाक वएह भूमि‍ छी जे अदौसँ रहल। मि‍थि‍लांचलक उर्वर भूमि‍ रहने मनुष्‍योक बाढ़ि‍ सभ दि‍नसँ रहल, अखनो अछि‍ आगूओ रहत। कतबो मि‍थि‍लावासी पड़ाइन (पलायन) केलनि‍, दुनि‍याँक कोन-कोनमे बसलाह अछि‍, तैयो मि‍थि‍लाक जनसंख्‍या पर्याप्‍त अछि‍ये। जइसँ गरीबी रहल अछि‍। एक दृष्‍टि‍ये देखलासँ जहि‍ना पर्याप्‍त जनसंख्‍या अछि‍ तहि‍ना प्रचुर सम्‍पत्ति‍यो अछि‍। मुदा दुनूक संयोगमे भि‍न्नता अछि‍। जइसँ दुनूक बीच भारी खाधि‍ बनि‍ गेल अछि‍। जि‍नकर गाम ति‍नकर सम्‍पत्ति‍ नै आ जि‍नकर सम्‍पत्ति‍ ति‍नकर गाम नै। जइसँ मुट्ठी भरि‍ पूर्ण सम्‍पत्ति‍ हथि‍यौने छथि‍। जेकर ज्‍वलंत उदाहरण पड़ाइन (पलायन) अछि‍। गरीबीक चलैत मि‍थि‍लावासी आइये नै पूर्वहि‍सँ नेपाल, बंगाल, अासाम धरि‍ रोजी-रोटीक लेल जाइत रहल छथि‍। पटुआ काटब, धान रोपब, धान काटब हुनका सबहक मुख्‍य कार्य छलनि‍। सालक छह मास ओ सभ कमाइ छलाह। मुदा ओइसँ पैघ-पैघ उपलब्‍धि‍ सेहो भेटल। अपना संग अपन भाषो, कलो-संस्‍कृत लेनौं अबैत छलाह आ लैयो जाइत छलाह जइसँ दुनूक बीचक संबंधमे प्रगाढ़ता अबैत रहल। एकठाम रहने दुनूक बीच सभ तरहक संबंध बनैत रहल आ अखनो प्रवाहमान धारा सदृश्‍य बहि‍ रहल अछि‍। तँए ऐ पावन अवसरपर समन्‍वय समि‍ति‍ संग वि‍द्योपति‍केँ कोटि‍श: नमस्‍कार! पूर्वाचल आ मि‍थि‍ला, दुनूक बीच व्‍यापारि‍क संबंध सेहो अदौसँ रहल अछि‍। गाए-महि‍ंसिक व्‍यापार चलैत रहल अछि‍। संग-संग कलाकारक संग कलाक आदान-प्रदान सेहो चलैत रहल अछि‍। अखनो मि‍थि‍लाक श्रमि‍कक बीच जते पूर्वाचलक भाषा पसरल अछि‍ ओते मध्‍य आ उच्‍च परि‍वारक बीच नै अछि‍। वि‍द्यापति‍ पर्व समारोहक ऐ पावन असवरपर वि‍द्यापति‍केँ ि‍सर्फ मि‍थि‍ले-मैथि‍ल कहब हुनका संग अन्‍याय करब हएत। हुनका आत्‍माकेँ ठेस पहुँचतनि‍। ओ युग-पुरूष छलाह। भाषा-साहि‍त्‍यक अपन धारा अछि‍। जइ धाराक मध्‍य ओ अखनो ठाढ़ छथि‍। वैदि‍क भाषा जखन जन-गणक बीच अपन साहि‍त्‍यि‍क धारा पकड़लक, तहि‍येसँ समाजमे एक नव समाज उठि‍ कऽ ठाढ़ भेल। ओ बढ़ैत-बढ़ैत कालि‍दास धरि‍ अबैत-अबैत सोझा-सोझी ठाढ़ भऽ गेल। मुदा जि‍नगीक लेल भाषा-अनि‍वार्य, तँए जन-गणक बीच पालि‍ भाषा उगल। तहि‍ना आगू बढ़ैत- प्राकृत, अपभ्रंश होइत अवहट्ठमे पहुँच गेल। अवहट्ठक सीमानपर वि‍द्यापति‍ अपन कीर्तिलता लऽ कऽ ठाढ़ छथि‍। जइमे जन-गणक आत्‍मा झलकि‍ रहल छन्‍हि‍। ओना ओ संस्‍कृतक प्रगाढ़ पंडि‍त छलाह, जे हुनक रचनामे झलकि‍ रहल अछि‍, ओ उगना सन संगीक संग रहैत छलाह। जे उगना गंगाजल पहुँचबैत छलनि‍। एक भांग पीसैमे मस्‍त तँ दोसर पीब-पीब मस्‍त! एहनठाम हटलासँ, वि‍द्यापति‍ पत्नि‍योसँ झगड़ा कऽ उगना लेल नि‍ष्‍काम प्रेम धारा नै बहाबथि‍, से केहन होएत। अंतमे, जहि‍ना अदौसँ एक-दोसर सटल रहलौं तहि‍ना आगूओ सटि‍ चलैत रही, यएह शुभ-कामना। एहेन-एहेन पर्व आरो नम्‍हर भऽ भऽ मनाओल जाइत रहए, यएह शुभेच्‍छा! जय-मैथि‍ली! जय मि‍थि‍ला!!, जय कामरूप! जय भारत!! जय मानव!!! २ — बृषेशचन्द्र लाल बिद्यापति–स्मृति पर्व मादेँ —

बड़ सुख सार पाओल स्मरणे ...

एखन सम्पूर्ण मिथिला विद्यापतिमय अछि । नेपाल आ भारतक दुनू पारक मैथिलीभाषी अपन महान् साहित्यकार, जनउद्वेलक लोककवि तथा समाजक मार्गनिर्देशक कविकोकिल विद्यापतिक स्मरण श्रद्धापूर्वक कऽरहल अछि । विद्यापति अपन कालमे अपन विशिष्ट, अद्भूत आ हृदयस्पर्शी लोकलयसँ युक्त पदावलीसभक बलेँ सम्पूर्ण मिथिलाकेँ जोड़बेटा नहि कएलनि वरन् दूर–दूर तक एकर माथ गर्वसँ ऊँच कऽ देलनि । हिनक भक्ति पदावलीसभ वैष्णव सम्प्रदायक सभसँ लोकप्रिय तथा सन्तसभकलेल अध्यात्मिक अनुभूतिदायक बनि गेल । कविकोकिल एखनो सम्पूर्ण मिथिलाक एकताक डोर छथि । प्रत्येक वर्ष विद्यापति स्मृतिपर्वक अवसरपर सम्पूर्ण मैथिलीभाषी एक भऽ जाइत छथि । अन्तर्राष्ट्रिय सीमा बिला जाइत अछि आ हिनक किर्तिपताकाका दुनियाँभरिमे मैथिलभाषीसभपर गौरवक सौरभ छिटैत बहैत चलि जाइत अछि ।

विद्यापति स्मृतिदिवस मिथिलाञ्चलमे कविकोकिलक स्मरणटामे सिमित नहि अछि, आब ई मैथिलीभाषी क्षेत्रक भाषिक आन्दोलनप्रतिक एकवद्धता प्रदर्शनक दिवसक रुप लऽ नेने अछि । मैथिली साहित्यक पुनरुत्थान आ एकरा राष्ट्रियभाषाक रुपमे पुनः सम्मानित आ प्रतिष्ठित कराबएहेतु सक्रिय मिथिलाक सपूतसभकलेल ई उर्जा प्राप्तिक पर्व बनि गेल अछि । भारतेमे नहि नेपालमे सेहो मैथिली–आन्दोलनक प्रारम्भ विद्यापति स्मृति दिवसक आयोजनसँ शुरु भेल छल । काठमाण्डूमे पण्डित सुन्दर झा शास्त्रीक सक्रियतासँ नेपालमे एक भाषा—एक भेषक घोरऔपनिवेशिक मानसिकतासँ चालित राजाशाही क्रूर शासन आ एकदलीय तानाशाहीक सांस्कृतिक बिरोधक शुरुआत सेहो विद्यापति स्मृति पर्वक आयोजनसँ आगाँ आएल छल जकर अनुशरण बादमे अन्यान्य भाषाभाषीसभ सेहो कएलनि । नेवाररत्न शंखधरक स्मृतिमे पद्मरत्न तुलाधर आ हुनक संगीसभसँ न्हुदयाँ भिन्तुना दिवसक भव्य राजनीतिक आयोजन होमए लागल जे समूह एखन नेवार समुदायमे भाषिक आन्दोलनक नेतृत्व कऽ रहल अछि । पण्डित सुन्दर झा तहिआ पर्यटन मन्त्रालयमे कार्यरत छलाह । काठमाण्डूसँ फूलपातक प्रकाशन कऽ मैथिलीक प्रति मैथिलीभाषीसभमे अनुराग वृद्धि आ अपन मातृभाषामे साहित्य रचना करएलेल लोककेँ प्रेरित करक पुनित कार्यमे सत्रिmय छलाह । आईसँ २१ वर्ष पूर्व, काठमाण्डूक मारवाडी सेवा समितिमे आयोजित विद्यापति स्मृति समारोहमे हुनकाद्वारा प्रस्तुत सयगोट व्यङ्ग दोहासभक संग्रह सुन्दर शतसई धूम मचा देने छल । ओहि दोहासभमे तत्कालिन तानाशाही राजशाहीतन्त्रक विभिन्न विषय मादेँ अद्भूत कटाक्ष कएल गेल छल । सुन्दर शतसई अत्यन्त लोकप्रिय भेल आ दोहा लोकक ठोरपर बैसि गेलैक । एहि कारणेँ पण्डित सुन्दर झा शास्त्रीकेँ सरकारक प्रताडनक भागी बनए पडलनि । वृतिविकासपर नकारात्मक असर पडलनि । तथापि पण्डितजीक मैथिली प्रतिक अनुराग आ प्रतिवद्धता बढ़िते गेल आ अवकाशक बाद ओ पूर्णतः अही यज्ञमे लागि गेलाह जे जीवन पर्यन्त करिते रहलाह । जनकपुरमे पर्वक आयोजन, पत्रिका प्रकाशन, मैथिलीक वकालत — मैथिलीकेँ प्रतिष्ठित करएहेतु ओ अपन अन्तिम समयधरि समर्पित भऽ सक्रिय रहलाह । ओ जनकपुरक मुरलीचौकपर विद्यापतिक मूर्ति स्थापित करकहेतु सभकेँ आन्दोलित करैत रहलाह आ अन्तमे लोकतन्त्रक स्थापनाक बाद जखन हम नगरपालिकाक प्रमुख निर्वाचित भेलहुँ, हुनक ई सपना पूरा भेलनि । हुनकर अध्यक्षतामे निर्माण समिति गठित भेल । जनकपुरनगरपालिकाक अनुदानसँ विद्यापति टावरक निर्माण सम्पन्न भेल । एहि पुनित कार्यमे तत्कालिन धनुषा जिलाक सभापति रामसरोज यादवक सेहो महत्वपूर्ण योगदान छलनि । निर्माण कार्यमे शास्त्रीजी अत्यन्त स्वच्छ आ पारदर्शी रहए चाहैत छलाह जाहिसँ हुनकर अपने समितिक लोक हुनकर बिरोध करए लगलखिन । एहिसँ दुखित शास्त्रीजी निर्माण कार्यक अन्तमे निर्माण समितिक अध्यक्षता छोडि देलनि आ दोसरकेँ जिम्मा लगा देलनि । मुदा दुख असिमित रहनि । निर्माण समिति षडयन्त्रपूर्वक हुनका आ नगरप्रमुख रहितो हमरा सेहो उद्वघाटन कार्यक्रममे आमन्त्रित नहि कएलक । हमरासभ कहुना कार्य सम्पन्न होउक विमर्श कए चुप रहलहुँ । उद्वघाटन दिन शास्त्रीजी पश्चिम नेपालमे रहथि आ ओ एहि दुखकेँ वरण करैत स्वर्ग प्रस्थान कऽ देलनि । जनकपुर मैथिली अनुरागीसभक इतिहास ई एकगोट कलंक थिक ।

पंचायतकालमे एहन आयोजनसभ क्षेत्रीय भाषासभक अस्मिता एवं सम्मानक संघर्ष तथा एहिलेल लोकतन्त्रक अनिवार्यताक बोध कराबएदिस सेहो लक्ष्यित रहैत छल । समारोहमे पुलिस हस्तक्षेप होइत छलैक आ सहभागीसभकेँ हनुमानढ़ोकाक गुमसल ठाड़ थुनुवाघरमे अबेर रातितक थुनिकऽ राखल जाइत छलनि । रिहाईक समय होइत छल दूपहर राति — हड्डी गला देबएबला जाड़, पाला, उपरसँ तुसारो आ बहैत शीतलहरीमे सहभागीसभकेँ अपन डेरा जाए पड़ैत छलनि । शनैः पर्वक आयोजन पूर्वी नेपालक शहरसभमे होमए लागल । मिथिलाञ्चलक सांस्कृतिक आ भाषिक आन्दोलनक ई जड़ि बनि गेल ।

नेपालमे लोकतन्त्रक पुर्नस्थापनाक बाद पर्वक आयोजन मैथिलीप्रति मैथिलीभाषीक अनुरागक द्दोतक आ राज्यद्वारा भऽरहल भाषिक भेदभाव विरुद्ध संघर्ष दिस केन्द्रित भऽ गेल अछि । मैथिली साहित्यक पुनरुत्थान, प्रगति आ प्रतिष्ठापनहेतु एहिसँ वत्र्तमान पीढ़ीमे उल्लेखनीय चेतना आ सजगताक अभिवृद्धि भेल अछि । मिथिलाक हरेक सामुदायिक आ शिक्षण संस्थासभमे आब एकहि दिन वा परिस्थिति अनुसार एकाधदिन आगाँपाछाँ पर्वक आयोजन सभ जाति आ वर्गक मैथिलीभाषीमे एकवद्धताक सूत्रक रुपमे विद्यापतिक नामक महत्वक ठोस प्रमाण अछि ।

जन्म, काल आ प्रतिभाक विरासत

विद्यापति वास्तवमे सरस्वती–पुत्र आ विद्याक अधिपति छलाह । भाषा आ साहित्यमे योगदानक सन्दर्भमे हुनक स्थान इटलीक दा“ते आ बेलायतक चौसर जका“ छन्हि । साहित्यिक रचनाकारक संगहिं विद्यापति सफल कूटनीतिज्ञक भूमिका करैत मिथिलाक भूमिक संरक्षणलेल अपन दायिŒवक निर्वाह सेहो कएलनि । मैथिलीक अद्वितीय सेवक विद्यापतिक काल एखनतक सुनिश्चित नहि कएल जा सकल अछि, मुदा अन्वेषकसभक मत छन्हि जे ओ इस्वी सन् १३५० सँ १४४० धरि रहथि । हुनक जन्म गढा बिस्फी गाममे कश्यप गोत्रीय मैथिल ब्राह्मण परिवारमे भेल रहनि । १४०२ ई.मे हुनका अपन जन्मस्थान बिस्फी ग्राम प्रदान कएल गेल रहनि जे सम्प्रति मिथिलाञ्चलक भारतक बिहार राज्यक मधुबनी जिलामे अवस्थित अछि । १४४८मे ओ श्रीमद्भागवत्क प्रतिलिपि तैयार कएने रहथिन्ह आ राजा शिवसिंहक मृत्यु (ई.१४०२)क ३२ बर्षबाद तक ओ जिवित रहलथि से प्रमाणित भए गेल अछि । ओ अपन भनिता आ कृतिसभमे मिथिलाक ओइनिवार वंशीय राजा शिवसिंहसँ भैरवसिंह तकक सम्पर्कमे रहलथि से उल्लेख कएने छथि । अपन मृत्युक तिथिक सम्बन्धमे ओ अपने कहने छथि æविद्यापतिक आयुअवसान कातिक धवल त्रियोदशी जान” । एकरे आधार मानि कातिक धवल त्रियोदशी तिथिमे हुनक स्मृति पर्व मनाओल जाइत अछि ।

विद्यापतिकेँ प्रतिभाक विरासत अपन उच्च पूर्वजसभसँ प्राप्त भेलनि । विष्ण्ु ठाकुर–श्र हरदित्य–श्र कर्मदित्य–श्र देवदित्य–श्र धिरेश्वर–श्र जयदत्त–श्र गणपति आ तखन हुनकर पुत्र विद्यापति । मायक नाम रहनि गंंगादेवी । देवदित्यक सभसँ जेठ बालक मिथिलाक कर्णाट राजा शत्रm सिंहक युद्ध आ शान्तिक मन्त्री रहथिन अर्थात् विदेश विभाग सम्बन्ध प्रमुख । ओ दशकर्मपद्धतिक रचना कएने रहथि । हुनक पुत्र चन्देश्वर धर्मशास्त्र, राजनीति आ ज्योतिषक प्रकाण्ड विद्वान रहथिन । तहिना देवदित्यक दोसर पुत्र गणेश्वर ठाकुर सुगतिसोपान् तथा गंगापट्टालकाक रचना कएने रहथि । हुनक जेठ बालक रामदत्त महादानपद्धति रचलनि । सभसँ छोट पुत्र विष्णुक भक्तिमे गोविन्दमानसोल्लास लिखने रहथिन । विद्यापतिक पूर्वजसभ राजासभक भण्डारिका, स्थानान्तारिका आदि पदसभपर सेहो काज कएने रहथि । मातृपक्ष सेहो राजासभक दरबारक प्रमुख पदाधिकारी रहलखिन ।

कविकोकिल – हिनक रचना आ प्रभाव

मैथिलीक प्रसिद्ध कवि विद्यापतिके“ कविकोकिल कहल जाइत छन्हि । विद्यापतिक प्रति सम्मान स्वरुप सभतरि यएह विशेषणक प्रयोग कएल जाइत अछि । विद्यापतिके“ कविकोकिल किएक कहल गेलन्हि ? कहियास“ कहल गेलन्हि ? प्रायः एहि प्रश्नक ठीकठीक उत्तर किनको लग नहि छन्हि । विद्यापति नीक गायक छलाह । हुनक कण्ठ मधुर छलन्हि । हुनक प्रस्तुतिक कला, हुनक राग–लय–छन्द–अलंकारक अद्भूत संयोजनस“ लोक मुग्ध आ सम्मोहित भद्र जाइत छल । प्रायः तै“ हुनका लोक कविकोकिल कहने हएतनि । मुदा एहि सन्दर्भमे एक गोट ज्ञातव्य जे अपन लेखनीस“ सभस“ पहिने हिन्दीक प्रसिद्ध समालोचक डा.रामवृक्ष बेनीपुरी विद्यापतिके“ कविकोकिल कहलखिन्ह । विद्यापति पदावलीक भूमिकामे ओ लिखने छथि — मैथिली राका रजनी के राकेश कविकोकिल विद्यापति .... । डा. बेनीपुरीक एहि टिप्पणीक बाद कविवर विद्यापतिक सम्बन्धमे कोनो मनतव्य, आलेख आदिक सभस“ पहिल आस्पद रहैत अछि — कविकोकिल विद्यापति !

विद्यापतिक लेखन, विषय र भाषाक्षेत्र व्यापक आ विशाल छल । हुनकर रचना संस्कृत, प्राकृत, मैथिली आ अबहठ्ठमे प्राप्त भेल अछि । मैथिलीमे शक्ति–आराधना, नचारी, कृष्ण–लीला, प्रणय सहितक विषयपर हजारसँ फजिल गीत परिचित अछि । अबहठ्ठमे दूगोट खण्डकाव्य कित्र्तिलता आ कित्र्तिपताका तथा संस्कृत–प्राकृत–मैथिलीमेगोरक्षविजय आ संस्कृत–प्राकृतमे मणिमञ्जरी नाटकसभ उपलब्ध अछि । संस्कृतमे हुनक लिखल ग्रन्थसभकेँ शास्त्रीय आ व्यवहारोपयोगी मानल जाइत अछि । शिक्षाप्रद रोचक कथासभक संकलन पुरुषपरीक्षा तथा अभिलेखाङ्कन नमूनाक शासनोपयोगी पत्राचारसभक लिखनावली विश्वविख्यात अछि । विद्यापतिका यात्रा साहित्य भूपरिक्रमण, धर्मशास्त्र र कर्मकाण्डका पारम्परिक ग्रन्थसभ विभागसार, शैवसर्वस्वसार, दुर्गाभक्ति तरङ्गिनि, दानवाक्यावली, गङ्गावाक्यावली, गयापत्तलक, बर्षकृत्य, ब्याडी भक्तितरङ्गिनि आदि अमर कृति अछि । एहिसभ कृतिमे तखुनका समयक ऐतिहासिक सूचना एवं समकालिन सामाजिक चित्रण देखल जाइछ । कित्र्तिलता विद्यापतिक पहिल कृति मानल जाइत अछि । ओहि कालमे विद्वानसभ अपन रचना संस्कृतमे करैत रहथि । मुदा, विद्यापति अपन पहिल कृति मैथिलीमे लिखलनि आ मैथिलीमे लिखक कारण आ महत्व सेहो स्पष्ट कएलनि — देसिल बअना सब जनमिठ्ठा, ते“ तैसन जम्पओ अवहट्ठा । कित्र्तिपताकामे मैथिलीमे प्रेम सम्बन्धी कमनीय कवितासभ अछि । शैवसर्वस्वसारमे भवसिंहसँ विश्वासदेवीतकक कीर्तिकथा विरुदावली शैलीमे वर्णित अछि । गंगावाक्यावली आ दुर्गाभत्तिmतरंगिणी गंगा एवं शत्तिmक उपासनामे रचित रचनासभक संग्रह अछि ।

बंगाली साहित्यमे विद्यापतिक जर्बदस्त प्रभाव छन्हि । चण्डीदासक समयमे हुनका बंगाली कविमे रुपमे जानल जाइत रहन्हि । कतेक विद्वान तँ विद्यापतिकेँ जेसोरक ब्राह्मण भावानन्द रायक पुत्र बसन्त राय सिद्ध करक कोशिश करैैत छथि । प्रमाणस्वरुप ओसभ पद–कल्पतरुक १३१७ पदक उल्लेख करैत छथि जाहिमे एहि नामक प्रयोग भेल छैक । चण्डीदास वैष्णव सम्प्रदायक रहथि । विद्वान रोमेश चन्द्र दत्तक कहब छन्हि जे विद्यापतिक रचनाकेँ चण्डीदासक समयमे दोसरक रचनामे मिझरादेल जाइक आ बेसी काल दोसर रचनाकार अपन रचना विद्यापतिक नामेँ करथि । दत्तक अनुसार चण्डीदास बहुत बादमे अएलाह । मुदा ई तथ्य निश्चित अछि जे विद्यापतिक प्रभाव कृष्णकित्र्तनपर जर्बदस्त रहनि । ग्रीयरसन एहि मादेँ Maithili Chrestomathy क पृष्ठ ३४मे लिखैत छथि — And now a curious circumstance arose, unparalleled I believe in the history of literature..(His songs) were twisted and contorted, lengthened and curtailed, in the procrustean bed of the Bengali language and metre into a kind of bastard language neither Bengali nor Maithili. But this was not all. A host of imitators sprang up notably one Basant Roy of Jessore, who wrote, under the name of Vidyapati in this bastard language, songs which in their form bore a considerable resemblance to the matter of our poet, but which almost entirely wanted the polish and felicity of expression of the old master-singer … (These imitation songs known as “Brajbuli” songs) became gradually more popular amongst the Bengali people than the real songs of Vidyapati.”डा. सुकुमार सेन अपन History of Brajbuli मे ब्रजबोलीक सभ कविसभक विवरण देने छथिन । ध्यान देबए योग्य छैक जे ओहि समयक प्रभाव रविन्द्रनाथ ठाकुरपर सेहो पड़लनि । ओ भानुसिंह ठाकुरेर पदावली मे भानुसिंहक नामसँ एहन बहुतो पद लिखने छथि ।

तहिना आसमिया साहित्यपर सेहो कविकोकिल विद्यापतिक प्रभाव स्पष्ट रुपसँ पड़ल अछि । ब्रजबोली अर्थात् मैथिलीककेँ असाममे शंकरदेव लऽ गेलाह । ओ वैष्णव सम्प्रदायक प्रचारमे विद्यापतिक भजनसभक उपयोग कएलनि । असमिया भाषाक इतिहासमे ब्रजबोलीक महŒवपूर्ण स्थान छैक । असमिया भाषाक विकासक आधार ठाढ़ करएमे एकर योगदानक चर्च The Department of Historical Antiquities, Government of Assam, Gauhati द्वारा प्रकाशित सामग्रीमे भेटैत अछि ।

डा. सुकुमार सेन श्री चैतन्यदेव आ रामानन्दक वर्णन कएने छथि । रामानन्द ब्रजबोलीमे विद्यापति प्रभावित पदसभक रचना कऽ मधुर संगीतक संगेँ गबैत छलाह । एहिसँ ओडिसामे विद्यापतिक प्रभाव स्पष्ट देखएमे अबैत अछि । सोरहम शताब्दीमे चम्पति राय, महाराव प्रताप, रुद्रदेव, माधवी दास, कान्हु दास, मुरारी आ सतरहम् शताब्दीमे दामोदर दास, चन्दा कवि, यदुपति दास आदिक रचनामे विद्यापतिक प्रभावसाफे देखएमे अबैत अछि । विद्वानसभक कहब छनि जे एहि सन्दर्भमे आओर अनुसन्धान किछु आओर महŒवपूर्ण तथ्यसभ बाहर आनत ।

नेपालीक कवि भानुभक्तक बधूशिक्षा विद्यापतिक पुरुषपरीक्षापर आधारित अछि । एहि सन्दर्भमे प्रसिद्ध विद्वान डा. राजेन्द्र पसाद विमलजीक कहब छनि जे नेपालीक आदिकवि भानुभत्तm गजाधर सोतीक ओहिठाम एक राति बितोलन्हि आ तकरबाद बधूशिक्षाक रचना कएलन्हि । बधूशिक्षाक शैली विद्यापतिक पुरुषपरीक्षा सनक अछि । डा. विमलक अनुमान छन्हि जे जखन विद्यापति बनौलीमे आएल हएताह तकरबाद हुनक आश्रयदाता सोत्रिय कुलक किछु सोइतसभ तत्कालिन राज्यसत्ताक भयक कारणे“ पश्चिम नेपालक तनहु“ तम्घास क्षेत्रमे जा कए बैसि गेलखिन्ह, जे बादमे सोती ब्राह्मणक रुपमे परिणत भए गेलाह । भानुभक्त हुनका ओतए साहित्यिक चर्चाक क्रममे पुरुषपरीक्षास“ परिचित भए बधूशिक्षाक रचनाक लेल प्रेरित भेल हएताह ।

नेपालमे विद्यापतिक प्रभावक चर्च करैत काल सोचए पड़त जे तहिया नेपाल आ भारतक बीच एखन जकाँ सीमा कहाँ रहैक ? काठमाण्डू उपत्यकामे मैथिलीक स्थान केहन रहैक तकर अन्दाज एतबेसँ कएल जा सकैत अछि जे मल्ल राजासभ मैथिलीमे रचैथ आ एना कऽ ओ अपन विद्वता देखाबथि । अपनाकेँ गौरवान्वित बुझथि । बनौलीमे विद्यापतिक प्रवास आ एतए रचित पदावलीसभक अपने कथा अछि । नेपालक एखुनका तथाकथित विद्वानसभ नेपालक बहुतो तथ्यकेँ नुकाबक दुष्प्रयत्न करैत आबिरहल छथि । ओसभ अपन अज्ञानतावश नेपालकेँ स्वतनत्र आ अलग राष्ट्रिताक प्रमाणित करएलेल ऐतिहासिक तथ्यसभकेँ नुकबक कोशिशमे छथि । मैथिली आ विद्यापतिसँ सम्बन्धित बहुतो वास्तविकता अही कारणेँ अन्हार गुफासँ बाहर निकलि नहि पाबिरहल अछि । एहिलेल स्वतन्त्र आ निष्पक्ष अनुसन्धानक जरुरत अछि । (प्रस्तुत लेख काठमाण्डूसँ प्रकाशित अप्पन मिथिलाक अगहन २०६८ (२०११) वर्ष १ अंक ६ विद्यापति विशेषांकमे विद्यापति मैथिल एकताक डोर शिर्षकसँ प्रकाशित भेल अछि ।-साभार) ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। सत्यनारायण झा कथा रिटायरमेंट सोनभद्र नदीक तट । साँझक समय छैक ।सुरज डुबि रहल छैक । नदी मे जल करतल ध्वनिक वेग सं बहि रहल छै ।पश्चिम दीस आकाश सिनुरिया रंगक देखा रहल छैक । लगैक छैक जेना भगवान भास्कर दुनियाक सभटा दुखक ताप अपना मे समेट प्रस्थान क’ रहल छथि । मलयानिल मद्धिम मद्धिम चलि रहल छैक ।सत्येन बाबू एनीकट पर बैसल किछु सोचि रहल छथि ।एनीकट अंग्रेज शासन द्वारा बनायल गेल छैक ।एहि इलाका कें लोक बर गरीब छलैक ।सोनभद्र नदी कें एनीकट बाँध द्वारा बाँधि देलकै आ पूर्बी आ पश्चिमी नहर निकालि एहि इलाका मे हरित क्रान्ति आनि देलकै ।यद्यपि एनीकट आब भग्नावशेष छैक तथापि एतय चहल पहल मे कोनों कमी नहि अयलैक अछि । एनीकट सं १५ कि० मी० दूर इन्द्रपुरी बराज भारत सरकार द्वारा बना देल गेलैक आ लिंक नहर सं पूर्बी आ पश्चिमी मुख्य नहर के जोरि देल गेलैक अछि ।मुदा साँझक समय एखनो लोक एनीकटे पर घुमय लेल जाइत अछि ।साँझक समय एहिठामक दृश्य बहुत मनोहर रहैत छैक ।सत्येन बाबू त  हर दिन साँझक समय एतय बैसैत छलाह ।ओही सोन प्रणाली मे बिगत तीन बरख सं सत्येन बाबू पदस्थापित छलाह ।आ ६० बरख भ’ गेलनि तै काल्हि रिटायर भेलाह अछि ।सोनभद्राक तट पर एकटा विशाल कलोनी छैक ।ओही कलोनी मे सत्येन बाबू सपत्नीक रहैत छथि ।एखन किछु दिन सं पत्नी दीपमाला अपन पुत्री इन्दुबाला लग बंगलोर गेल छथीन, से सत्येन बाबू एनीकट पर बैसल जल तरंग क’ देखैत छथीन जे कोना तरंग उठैत छैक आ कोना खतम भ’ जाइत छैक ।अपनो जीवन ओही जलतरंग जकाँ बुझा रहल छनि । काल्हि तक कतेक उफान छलैक जीवन मे मुदा आइ सभटा शांत भ’ गेलैक । यैह सोनभद्राक तट छैक ,जतय प्रत्येक दिन  जल तरंग कें कल कल छल छल करैत देखि आनन्दित होइत रहैत छलाह ।अभियंता छथिए आ बेशी समय नहरक नौकरी मे बितेलनि ,तै अभियंत्रण काज सं बेशी लगाव छलनि ।मुदा आइ ओ बेशी गंभीर छलाह ।काल्हिये ने रिटायर भेलाह अछि ।कतेक रूटीन लाइफ छलनि ।मुदा आब रिटायरमेंटक जीवन कोना कटतनि ?यैह सोचि रहल छलाह एखन ।मोन नहि लगलनि ।थोड़बे कालक बाद चलि देलाहअपनडेरा।डेरा पर सेहो त’ एखन असगरे छथि ।चुप चाप लॉन मे कुर्सी लगा बैस जाइत छथि ।आ पुनः अतीत मे चलि जाइत छथि ।याद परैत छनि अपन बचपन ।घर मे माय –बाबूजी ,पित्ती- पितियाइन सभ रहथिन ।सभ पितयौत आ सभ बहीन मिलाकय बहुत पैघ परिवार रहैक ।सभ कतेक खुशी रहैक ।सत्येन बाबू बचपन मे कतेक खेल सभ ने खेलाथि।चोरा नुकी ,झिझिरकोना ,चोर सिपाही कतेक खेल सभ रहैक ।एक बेर लिलिया सं कतेक झगड़ा भ’ गेल रहनि त’ ओकर हाथे मरोरि देने रहथिन त’ कोना काकी सं मारि खुआ देलकै ।ओ छौड़ी बर् बदमास छल मुदा हमरा सहोदरो सं बेशी मानैत छल ।कोनो चिंता नहि ,कोनो फिकिर नहि ।भरि भरि दिन महराजी पोखरि पर गेंद खेलाइत छलाह आ पोखरि मे चुभकी मारैत छलाह मुदा धीरे धीरे बचपन समाप्त भ’ गेलनि ।बाबूजी मरि गेलखिन ।कतेक कानल रहैथ सत्येन बाबू ।बहुत स्नेह रहनि बाबूजी सं ।क्रमहि सभ पित्ती मरि गेलखिन ।अराध्यदेवी माय सेहो स्वर्ग चलि गेलखिन ।सत्येन बाबू सोचैत छथि ,जावे माय जीवैत रहथिन ,कहियो अपना क’ पिता नहि बुझैत छलाह ।संतान लग पिता जरुर छलाह मुदा माय लग पहुँचैत बेटा बनि जाइत छलाह ।आत्मा तृप्त भ’ जाइत छलनि मुदा आब ओ जिनगी कहाँ देखैत छथीन ।सत्येन बाबू क’ कतबो तकलीफ ,दर्द होइत छलनि ,मायक एकटा स्पर्श दुःख –दर्द के तुरंत समाप्त क’ दैत छलनि ।माय सं आत्मीय प्रेम रहनि ।जीवन मे कतेक तूफ़ान अयलैन ,कतेक समस्या रहलनि मुदा सत्येन बाबू कहियो हतोत्साह नहि भेलाह तेकर कारण एक संजीवनी वुटी माय छलखीन ।कतेक पारिवारिक समस्या होइत छलनि मुदा मायक विचार सं कहियो कोनो समस्या बुझेलनि ?सत्येन बाबू पारिवारिक परिवेश मे सेहो बहुत संतुलित छलाह ।समग्र परिवार सं अपनापन छलनि ।जाहि माइट,पानि में जन्म छलनि ताहि सं अत्यधिक प्यार छनि ।मुदा आवक जीवन कोना बिततनि से बुझा नहि रहल छनि । “सर बाजार से क्या लाना है ? भिन्डी एबं कदुआ तों सुबह ही लाया था ।”सत्येन बाबू कें तन्द्रा टुटलनि ।नौकर बनबारी आगू मे ठाढ़ रहनि ।।कहलखिन्ह –जब सब्जी है ही तो छोड़ो बाजार जाना ।पहले नींबू का चाय बनाकर लाओ ।देखो ,तुलसी पत्ता डालना नहीं भूलना ।बनबारी चाह बनाबय चलि गेलनि ।सत्येन बाबू लॉन मे टहलय लगलाह ।गेंदा ,चमेली ,सिंगरहार ,गुलाब तथा रातरानी फूल सं पूरा लॉन भरल छैक ।काते कात कतेक गाछ जेना  आम ,कटहर ,धात्री ,अशोक आदि सभ छैक ।अनवर माली हरदम किछु ने किछु करिते रहैत छैक ।गुलाबक फूल कइएक रंगक छैक ।कोनों मे कली देने छैक त’ कोनो अर्द्धविकसित छैक त’ कोनो पूरा फुलायल छैक ।एहि लॉनक बीच मे एकटा चबूतरा बनायल छैक ।ई चबूतरा अंग्रेज शासन द्वारा निर्मित छैक ।नव मे कतेक रमणीय लगैत हेतैक ?सत्येन बाबू जखन कोनो आत्म चिंतन मे रहैत छथि तखन एही फूलक बीच मे चलि अबैत छथि ।चारुकात  सं नीक नीक सुगंध लगैत छनि ।सुगन्धित वातावरण मे चिंतन सेहो सकारात्मक भ’ जाइत छनि ।चारुकात फूल सं आच्छादित चबूतरा पर बैस जाइत छथि ।ताबे बनबारी चाह बनाकय आबि जाइत छनि ।बनबारी सत्येन बाबू संग बहुत दिन सं छनि ।ओ गाड़ी सेहो चलबैत छनि आ किचेनक काज सेहो करैत छनि ।ओकर माय जखन ओ दु साल क’  छल तखने मरि गेलैक ।बनबारी टुगर भ’ गेलैक ।पैघ भेलैक त’ सत्येन बाबू क’ ओकरा पर दया आबि गेलनि ।राखि लेलखिन्ह अपना लग । से ओ बनबारी सत्येन बाबू क’ बहुत सेवा करैत छनि ।सत्येन बाबू एखन बेचलरे रहैत छथि ।तै सत्येन बाबू बनबारी पर पूरा निर्भर रहैत छथि ।चाह पिबय लगैत छथि ।तुलसी पात देला सं चाहक स्वादे बदलि जाइत छैक ।सत्येन बाबूक तुलसीक चाह विभाग मे प्रसिद्ध भ’ गेल छनि ।चाह पिबैत पिबैत पुनः अतीत मे बिचरय लगैत छथि ।1971 मे सत्येन बाबूक ब्याह एकटा छोट मुदा संभ्रांत परिवार मे दीपमाला संग भेल रहनि ।सत्येन   बाबू पर घरक प्रत्येक आदमीक दृष्टि रहनि । ओहि समय मे कतौ कतौ इंजीनियर होइत छलैक ।सत्येन बाबू कें इंजीनियर होयते परिवारक पृष्ठिभूमि बदलि गेल रहनि ।सत्येन बाबू पर पारिवारिक जिम्मेदारी रहनि ।सत्येन बाबू सं कियो रुष्ट नहि रहथीन ।आई ,सत्येन बाबू सोचैत छथि जाहि व्यक्ति क’ पत्नी संग नहि छैक,ओ व्यक्ति समाज, परिवार क’ दृष्टि मे हीन भ’ जाइत छैक ।कहावत छैक हर सफल व्यक्ति क’ पाछू एकटा स्त्री होइत छैक ।ओ पत्नी ,माय ,बहीन या कियो आनो भ’ सकैत छैक ।मुदा सोसल स्टेटस पत्नीक व्यवहार पर निर्भर छैक ।पत्नीक महत्व जिनगी मे बहुत छैक ।ओ स्वर्गो देखा सकैत छैक आ नर्को ।आई सत्येन बाबू सफल बेटा छथि ,सफल पति छथि ,सफल पिता छथि एबं सफल सामाजिक प्राणी छथि ओहि मे हुनकर पत्नी दीपमाला क’ पैघ हाथ छनि ।मुदा आबक समय सत्येन बाबू क’ कठीन बुझा रहल छनि ।60 बरख भ’ गेलनि । बूढ़ारी दस्तक दय रहल छनि ।नौकरी सं रिटायर क’ गेल छथि ।आव संतानक जरुरत बुझा रहल छनि । सत्येन बाबू कें तीनटा संतान छनि ।दुटा बेटा आ एकटा बेटी ।सुकांत बाबू चौदह साल सं नौकरी करैत छथीन ।बहुत प्रतिभावान ।ओ अपना जीवन क’ अपन लक्ष्य प्राप्त करबा मे लगा देने छथिन ।लक्ष्य प्राप्त करवाक लेल कतौ दोसर दीस देखवाक पलखैत नहि छनि ।ब्याह भ’ गेल छनि ।एकटा पुत्र रत्न छनि ।पारिवारिक दृष्टि सं सुव्यवस्थित छथि ।दोसर बेटा निशिकांत मेधावीक संग अपन काज मे ब्यस्त छथि ।नीक नौकरी करैत छथि ।हुनको ब्याह भ’ गेल छनि ।पत्नीक संग प्रसन्न छथि ।दुनू भाईक पढ़ाई मे सत्येन बाबू कमी नहि केलखिन ।धीया –पुताक पढ़ाई एबं पारिवारिक तथा अन्य सामाजिक काज करय क’ कारण सत्येन बाबू सतत अभावक जिनगी जिलनि ।तै सत्येन बाबू आधुनिक सुख सं वंचित रहलाह ।जिम्मेदारीक बोझ सं दबल रहलाह ,तथापि आत्मीय सुख क’ कमी नहि रहलनि । जतबे रहनि ओतबे मे संतोष रहनि ।अपन दुनिया ततेक ने बढ़ा लेलनि जे अपना लेल किछु नहि रखलनि ।सभ सं चिंता इन्दुबालाक ब्याह रहनि।मुदा भगवानक इच्छा ,इन्दुबालाक ब्याह सेहो नीक भ’ गलनि ।इन्दुबाला आ अंशुमान बाबूक जोड़ी बहुत नीक ।अंशुमान बाबू बहुत उदार प्रकृति कें छथि ।जेहने प्रतिभा तेहने विलक्षण स्वभाव ।ज्ञानी त’ नीर क्षीर हंस जकाँ आ विवेकी महान ।सत्येन बाबू बहुत खुशी भेलाह ।सत्येन बाबूक भाग्य देखि कतेक क’ इर्ष्या होइत छैक ।सत्येन बाबू क’ सभ संतान सं समान प्यार छनि ।मुदा इन्दुबालाक संग २५-२६ बरख तक रहला सं सत्येन बाबू बेटी पर बेशी निर्भर भ’ गेल छलाह ।बेटी सासुर चलि गेलनि तहिया सं सत्येन बाबू कमजोर भ’ गेलाह ।यद्यपि जहिया सं बेटा –बेटी बाहर चलि गेलनि तहिया सं सत्येन बाबूक देख रेख हुनक पत्नी दीपमाला करैत छथीन मुदा इन्दुबालाक विछोह सत्येन बाबू आई तक नहि बिसरि सकलाह अछि ।इन्दुबालाक संगीत सत्येन बाबूक रोम रोम मे बसल छनि ।इन्दुबालाक संगीत सत्येन बाबूक  प्राणदायनी छनि ।इन्दुबाला कहियो नहि बुझि सकलीह मुदा सत्य छैक जे इन्दुबालाक अवाज पर सत्येन बाबू किछुकाल लेल मृत्व क’ भगा देथीन ।संतान त’ सभ एके रंग होइत छैक ।मुदा संतान क’ अपन अपन दुनिया छैक, तै कोनो कोनो  संतान भौतिक सुख मे माय बाप क’ बिसरि जाइत छैक ।युग अनुसार धर्म बदलि जाइत छैक ।ओना माय बाप क’ सेहो बेटा दीस टकटकी नहि लगेने रहबाक चाही ।ओहि सं संतानक उन्नति प्रभावित होइत छैक ।संतान क’ स्वतंत्र छोरि देबाक चाही ।जतेक मोह होइत छैक ओतेक कष्ट होयछ ।एहि जीबनक कोन मोल तै सुख दुःखक अनुभूति बेकार ।बस जे होयत छैक से होयते रहतैक ।”सत्येन बाबू मस्तिष्क क’ एकटा झटका देलखिन्ह ।” की सभ सोचय लगलौ ।सत्येन बाबू क’ एकटा घटना याद अबिते हँसी लागि गेलनि ।इन्दुबाला छोटे सं बहुत नटखट छलैक ।ओकरा अपना बाबूजी सं असीम प्यार छलैक ।सत्येन बाबू क’ सहरसा जिलान्तर्गत कोसी परियोजना मे पोस्टिंग रहनि ।ओहिठाम सत्येन बाबू केनाल एस०डी०ओ० रहथि ।केनालक गप्प डेरा पर ततेक ने होय जे घरक बच्चा सभ सेहो मुख्य ,शाखा ,लघु आ जलवाहा नहर बुझय लगलैक ।डेराक आगा मे निशि ,इन्दुबाला ,आ कालोनीक आओर छोट छोट बच्चा सभ मुख्य ,शाखा ,आ लघु नहरक निर्माण खुरपी सं जमीन कोरि कोरि क’ करैत छलैक ।नहरक निर्माणक बाद लोटा –गिलास –मग सं पानि भरि क’ नहर मे जलश्राव करैक आ नहर मे पानि जखन एक नहर सं दोसर मे बहय लगैक त’ सभ बच्चा थोपरी पारि  नाचय लगैक ।एहि बीच इन्दुबाला एकटा लघु नहर क’ तोरि थोपरी पारय लगैक जे नहर टुइट गेलैक ।फेर ओही बच्चा सभ मे कियो चीफ इन्जिनियर ,कियो एस०ई० ,कियो एस० डी० ओ० बनि कए कमीटीक गठन करैक  आ मामलाक जाँच होइक ।कमीटी द्वारा इन्दुबाला क’ दोषी ठहरायल जाइक ।दोषी क’ आँखि पर पटटी बान्हि चोर घोषित कएल जाइक ।इन्दुबाला चोर बनय लेल तैयार नहि होइत छलैक तखन सभ मिलि क’ ओकरा मारि खुएबाक लेल सत्येन बाबू लग अनबाक प्रयास करैक ।मुदा इन्दुबाला सभ क’ धमकी दैत सभ क’ कहैक तोरा सभ क’ नहि बुझल छौक जे बाबूजी हमरा किछु नहि कहैत छथि ,आ दौड्कय भागि क’ उल्टे सभ बच्चाक शिकायत सत्येन बाबू लग करैक ।बच्चे सं कतेक कंफिडेंस अपना बाबूजी पर रहैक इंदु क’ ।इन्दुबाला आब अपना घर गृहस्ती मे लागल छैक तथापि सत्येन बाबू क’ लगैत छनि जेना ओ एखनो हुनका गरदनि मे लटकल छैक ।संतान त’ वैह छैक जेकरा अपना माय बापक सेंटीमेंट्स अनायास बुझा जाइत छैक ।इन्दुबाला सत्येन बाबुक आत्मा मे बैसल छैक ।जीवनक ढलान पर सत्येन बाबू पहुँच गेल छथि ।सूर्यक प्रखर तेज आब सत्येन बाबू मे नहि छनि ।आब त’ केखनो रात्रिक अन्हार सूर्यक लालिमा क’ झाँपि देतैक ।सत्येन बाबू केखनो क’ उदास भ’ जाइत छथि  ।सत्येन बाबू अतीतक याद सं वर्तमान मे अबैत छथि ।एहि समय की करक चाही ।रिटायरमेंटक  सदमा त’ हर नौकरी पेशा लोक क’ होइत छैक ।तखन सत्येन बाबू कियैक चिंतित छथि ।हुनका त’ चारु तरफ अपन बच्चा सभ ठाढ़ छनि ।हुनका कियैक असुरक्षाक भावना मोन मे आयलनि  ?तकदीर मे जे लिखल हेतैक सैह हेतैक ।अपना बच्चा सभ क’ संस्कार त’ ओ स्वम देने छथिन ।तखन एतेक डरायल कियैक छथि ।डेरायल छथि ओ समय सं ।डेरायल छथि ओ आजुक सभ्यता सं ।समय मे बहुत परिवर्तन भ’ गेलैक अछि ।भौतिकवादी युग मे सभ अर्थ पर विशेष जोर देने छैक ।केकरो फुर्सत नहि छैक जे कतौ दोसर दीस देखतैक ।चारुकात त्राहि त्राहि छैक ।मुदा मोन क’ आत्म संयमित करक छैक ।हर माय –बाप क’ सोचय चाही जे हमर समय बित गेल ।जेकर समय छैक ओकरा सोचय क’ छैक ।सत्येन बाबू विचार मग्न रहथि ।एतबे मे पुनः बनबारी आबि गेलनि आ कहलकनि “सर” खाना तैयार हो गया ।सत्येन बाबू देखलनि ९ बाजि गेलैक ।डेराक भीतर गेलाह ।खाना टेबुल पर लगायल छैक ।सत्येन बाबू भोजन केलनि आ विछावन पर परि रहलाह ।नींद शीघ्रे भ’ गेलनि ।निन्द्रा मे देखैत छथि जे हुनके हमशक्ल एकटा दोसर सत्येन ठाढ़ भ’ हुनका देखि हँसि रहल छनि ।सत्येन बाबू क’ देखि आश्चर्य भेलनि ।पुछला पर कहलकनि ओ सत्येन बाबूक आत्मा छैक ।ओ कहलकनि जे देख हमर दोस्त ,जिनगी तोहर नहि छियौक ।जिनगी त’ तोरा देल गेल छौक ।जहिया तोहर काज समाप्त भ’ जेतौक तोरा देह सं हम निकलि जेबौ आ तोहर देह निर्जीव भ’ जेतौक ।तै तू बेकार किछु सोचैत छे ।तोरा अपना द’ किछु नहि बुझल छौ ।तोहर शरीरक कोनो महत्व नहि छौक ।महत्व छैक हमर अर्थात आत्माक ।ई कहि छाया सत्येन चलि गेलैक ।सत्येन बाबू अबाक रहि गेलाह ।तावे बनबारी उठेलकनि । ‘सर’ उठिये ,सुबह हो गया ।चाय भी बना दिया है ।तुलसी पत्ता भी डाल दिया है ।सत्येन बाबू आँखि मिरैत उठैत छथि आ दीवाल पर लागल दर्पण मे अपन मुँह देखैत छथि आ धीरे सं मुसकि जाइत छथि । ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। १. रवि भूषण पाठक- आचार्य भामहक चिंतन / दण्‍डी आ काव्‍यलक्षण / टिल्‍लू जी (शिव कुमार झा) २. अतुलेश्वर- धीरेन्द्र, मैथिली आ शिष्य १. रवि भूषण पाठक १ आचार्य भामहक चिंतन भामह क चिंतन भामह अलंकारवादी रहथि आ संस्‍कृत आलोचना क ऐ विवाद सॅं परिचित छलाह जे काव्‍यसौंदर्यक मूलाधार शब्‍दालंकार मे होइछ वा अर्थालंकार मे ।पहिल मानैत छलाह जे काव्‍य मे चमत्‍कार क सृष्टि शब्‍द सौंदर्ये सँ संभव अछि ।दोसर समुदाय मानैत छल जे उपमा ,रूपक आदि अर्थालंकारे सँ काव्‍य शोभा होइछ ।भामह अपना हिसाबें दूनू मे समन्‍वय करबा के प्रयास केलखिन्‍ह । ' शब्‍दार्थौ सहितौ काव्‍यम्' क द्वारा भामह शब्‍द आ अर्थ दूनू क महत्‍व पर बल दैत छथिन्‍ह ,अर्थात शब्‍द आ अर्थक सहभाव मे काव्‍यक सृष्टि होइत छैक ।य‍द्यपि भामहक चिंतन सँ ई विवाद आर गहिरायल कि काव्‍य कत' होइत छैक 1 शब्‍द मे2 अर्थ मे 3 या सहभाव मे ।ई विवाद एते प्रबल रहल कि शाहजहॉ कालीन विद्वान जगन्‍नाथ कहलखिन्‍ह 'रमणीय अर्थक प्रतिपादक शब्‍दे काव्‍य थिक ।आ वर्तमान मैथिली कविता के देखल जाइ तखन लागैत अछि जे फेर सॅ शब्‍द अपन जाल फैला रहल अछि । ओना आधुनिक मैथिली मे फतवा क कमी नइ छैक आ जइ कविता के प्राचीन सॅ प्राचीन आचार्य तक नवोन्‍मेष के कारणें स्‍वीकार क' सकैत छलखिन ओ कविता मैथिली मे एक झटका मे श्रीविहीन साबित क' देल जाइत अछि ,आ तहिना श्रीविहीन कविता के गौरवान्वित करए के सेहो ऐ ठाम सुदीर्घ परंपरा अछि । २ दण्‍डी आ काव्‍यलक्षण दण्‍डी नीरस शास्‍त्रकार नइ छथिन्‍ह ,प्रतापी कवि सेहो छथिन्‍ह । ''अलंकृतमसंक्षिप्‍तं रसभाव निरंतरम '' ।हुनकर स्‍पष्‍ट विचार अछि कि कविता ओइ पदसमूह क नाम छैक ,जे वांछित सरसता सँ युक्‍त हो ।ऐ ठाम कविप्रतिभा सुंदर पदावली सँ संयुक्‍त हेबाक चाही । ''शरीरंतावदिष्‍ठार्थ व्‍यवच्छिन्‍ना पदावली ''(काव्‍यादर्श) । इष्‍टार्थयुक्‍त पदावलीक एकटा अर्थ ई जे  पद मे 'योग्‍यता' ,'आकांक्षा' आदि होयबाक चाही ।दंडी महाराजक मंतव्‍य ऐ ठाम ई अछि कि इष्‍ठार्थत्‍व क सौजन्‍ये सँ काव्‍यत्‍व क जन्‍म होइत छैक ।यद्यपि हुनक रसचेतना भावात्‍मक कम आ अलंकार केंद्रित बेशी अछि आ हुनका लेल समस्‍त अलंकारक उद्देश्‍य रससृष्टि मात्र छैक ।                                                             हिनकर चिंतन मे 'इष्‍टार्थ'क स्‍पष्‍ट व्‍याख्‍या नइ छैक ,तैयो ई मानल जाइत अछि जे ऐ पदक संदर्भ भामहकालीन काव्‍यचिंतन सँ छैक ।भामहक लेल शब्‍दालंकार आ अर्थालंकार दूनू इष्‍ट छलइ ,मुदा दण्‍डी क लेल शब्‍द,अर्थ,रस सौंदर्य सँ युक्‍ते पदावली काव्‍य थिक ।दण्‍डी क सीमा ई अछि जे ओ ' 'इष्‍टार्थ'क चर्चा मात्र अर्थालंकारक लेल करैत छथिन्‍ह ।                                                            दण्‍डी क सीमा स्‍पष्‍ट अछि ओ शब्‍दार्थ के काव्‍यक शरीर मानैत छथिन्‍ह आ अलंकार के आत्‍मा ।हुनकर विचार मे अलंकारविहीन पदावली साहित्‍य नइ भ' सकैत अछि । ३ टिल्‍लू जी (शिव कुमार झा) जन्‍मदिनक मधुर मंगलकामना टिल्‍लू जी ।बहुत दिन सँ अहॉं से बात नइ भ' रहल अछि आ हम प्रयासो केलहुं त' अहॉ व्‍यस्‍त रही ,कखनो टाटा ,कखनो भुवनेश्‍वर ।आइ अहॉक जन्‍मदिन अछि आ अहॉक सभ स्‍वप्‍न सभ प्रतिज्ञा सामने होयत ।भगवान सँ हमर सभक प्रार्थना कि अहॉंक सब कामना फलीभूत हो ।मैथिली भाषा क एकटा पाठक होयबाक नाते हमर ई कामना कि अहॉ सब तरहें मैथिली साहित्‍य के समृद्ध करी ।एकटा कविक पुत्र होयबा क नाते जे दायित्‍व अहॉ क छल से अहॉ लगभग पूरा क देलहुं ,मुदा एकटा लेखक होयबा क नाते अहॉके बहुत किछु करबा क अछि ,ने केवल मात्रा मे बल्कि गुणात्‍मकता मे सेहो । अहॉक कविता मे बूच भैया क कविता क छाया देखाइत अछि ,ई जत्‍ते स्‍वाभाविक छैक ,ओतबे अहॉ लेल अपरिहार्य अछि कि अहॉ अपन रस्‍ता बनाबी ।जे ओइ पीढ़ीक दुख छैक ,ई ओकरे छैक आ ओ पीढ़ी जे शिल्‍पक चयन केलकइ ,सेहो ओकरे रहतइ ,नवका पीढ़ी के बेशी नवोन्‍मेषी बनए पड़तए ,तखने ई ज्‍योतिरीश्‍वर आ विद्यापतिक भाषा अपन प्रासंगिकता बनेने रहतइ ।यद्यपि सभ भाषाक अपन अपन संस्‍कार होइत छैक आ ओकर रचनात्‍मकता सेहो इतिहासक कोखि सँ निकलि रहल छैक ,तैयो लोकल किछु नइ रहलइ ।

अहॉक आलोचना भाषा तथ्‍यात्‍मक आ निर्णयात्‍मक रहैत अछि ।तथ्‍यात्‍मकता यद्यपि प्रामाणिकताक अंग बनिके आबैत अछि ,तथापि कखनो कखनो ओ पाठ के बोझिल सेहो बनबैत अछि आ तथ्‍य क बोझ तखन आर बेशी भ' जाइत अछि ,जखन ओ केवल जानकारी क प्रदर्शनक लेल आबैत अछि ।जेना 'गामक जिनगी' पर लिखैत काल अहॉ खूब रास कहानीकारक नाम लिखैत छी । बात केवल अहींके नइ अछि ,प्राय: मैथिली मे नामक गोला चलैत छैक ,आ लेखकक भाषाक स्‍वभाव ,ओकर बनावट पर कम विचार होइत अछि ।तहिना तुलनात्‍मक आलोचनाक मतलब लेखक लोकनि दूटा किताब ,लेखक या उद्धरणांश सँ बूझैत छथिन्‍ह ,तुलनात्‍मक आलोचना के सही बाट देखयबाक जिम्‍मेवारी अहीं सन लेखक के अछि ।ऐतिहासिक आलोचना एखनो महत्‍वपूर्ण अछि ,किएक त' मैथिली साहित्‍यक इतिहास आ विभिन्‍न युग ,लेखक ,क्षेत्र आ प्रवृत्तिक कार्यभागक सही सही मानचित्र अखनो हमरा सभक समक्ष नइ अछि ।समाजशास्‍त्रीय आ उत्‍तर आधुनिक आलोचना क बाते छोड़ू ,एकर त' नामोनिशान अखन मैथिली मे नइ अछि ,मुदा अहॉ सन उद्योगी व्‍यक्ति हमरा समक्ष छथि ,तें आशान्वित छी ,आइ ने काल्हि सब चीज अनुकूल स्‍थान पर मानक रूप मे रहत । आइ बस एतबे ,जन्‍मदिनक फेर सॅ मंगलकामना ।अहॉ चिरायु हो । २ अतुलेश्वर- धीरेन्द्र, मैथिली आ शिष्य मैथिली साहित्यमे राजकमल, ललित, मायानन्द, धीरेन्द्र, रमानन्द रेणु आ सोमदेव क पदार्पण एकहि काल-अवधिमे भेल। राजकमल, ललित, धीरेन्द्र आ रेणु आब नहि छथि। मायानन्द आ सोमदेव मात्र अपन पीढ़ीक प्रतिनिधित्व करैत छथि, सेहो नाम मात्रकेर, कारण पीढ़ीक प्रति वर्तमानमे हुनका सभक कोनो ठोस काज नहि तँ देखल जा रहल अछि आ नहि तँ अपन पीढ़ीक संग भेल अन्याय प्रति कोनो ठोस प्रतिक्रिया देखबामे आएल अछि। ओना एहि पीढ़ीक एकटा विशेषता ई छल सभ केओ सर्वविधावादी छलाह, मूलतः कथाकार आ उपन्यासकार रहितो। समयक ज्ञान छलन्हि हिनका सभ गोटेंमे। ई निश्‍चित जे ओ लोकनि साहित्यकार तँ उच्चकोटिक छलाहें ओहिसँ बेशी मैथिली आन्दोलनकारी आ चिंतक छलाह। ओहि सम्बन्धमे किछुओ उद्धृत करबाक आवश्यकता नहि, कारण मैथिली साहित्यक विषयमे थोड़बो जानकारी रखनिहारकेँ हुनका लोकनिक विषयमे जरूर बुझल हेतनि। हम एतय चर्च मात्र डा.धीरेश्वर झा धीरेन्द्रक करए चाहैत छी, कारण अछि धीरेन्द्रक अवसान जनवरी मासक नओ तारीखकें भेल छलन्हि। दोसर धीरेन्द्रक कर्मभूमि नेपाल रहल आ ओतुक्का बहुतो साहित्यकार, बुद्धिजीवी आ आम लोकक अनुसारेँ आधुनिक नेपालक मैथिली साहित्यक जनक डा.धीरेन्द्र छथि। हमर कहब अछि जे यदि डा.धीरेन्द्र नेपालक आधुनिक साहित्यक निर्माता छथि तँ कोन कारणेँ धीरेन्द्रकेर उपेक्षा कएल जाए रहल अछि? हुनक दीर्घ शिष्य-मण्डली रहितो, जाहिमे सर्वश्री रामभरोस कापड़ि ‘भ्रमर’,जे साझा प्रकाशन सँ ल क प्रज्ञा प्रतिष्ठान धरि प्रतिनिधित्व कयलन्हि अछि, धीरेन्द्रक कोनो अप्रकाशित पोथीक प्रकाशन नहि होएब, हुनका पर केन्द्रित कोनो संगोष्ठीक आयोजन नहि होएब,  हुनक योगदानकेर विषयमे कोनो पोथी प्रकाशित नहि होयब आदि तँ हुनक उपेक्षे ने थिक। एकर जवाब हुनक शिष्य मण्डलिए दए सकैत छथि। हँ, एहि परिप्रेक्ष्यमे जँ केओ अपन उदारता आ धीरेन्द्रक प्रति सम्मान देखौलक तँ ओ थिक मिनाप, जनकपुर, जे विगत वर्ष हुनक कथा संग्रह प्रकाशित कएलक। धीरेन्द्रक शोणितसँ पोषित नेपालीय मैथिली फलि फूलि रहल अछि, मुदा पता नहि जे कोन कारणेँ नेपालीय मैथिली साहित्यक महलकें ठाढ़ कयनिहार एहि साहित्य-मनीषीकेँ विगतक कर्ता-धर्ता लोकनि बिसरि गेलाह अछि। धीरेन्द्रक विषयमे सम्पूर्ण नेपालक लोक इएह कहैत छथि जे ओ मैथिलीक लेल आ अपन जनकपुरक शिष्यक लेल जीबैत छलाह तैँ श्यामसुन्दर शशि हुनक विषय मे लिखने छथि जे आब जनकपुरमे गुरुकुलक परम्परा समाप्‍त भ गेल,  मुदा ओहो फरिछा नहि सकलाह जे एहि गुरुकुलक परम्परा समाप्‍त होयबाक कारण कि छल। हमरा जनैत एकर कारण छल वा अछि लोककेँ चिन्हबाजन्य तीक्ष्ण दृष्टिक अभाव ओ ओहन त्यागी-तपस्वी-मनस्वी साहित्यकारसन योग्य गुरुक अनुपलब्धता।  ओना एकटा प्रसन्नताक विषय अछि जे एहि गुरुकुल परम्पराक चिन्तनमे  लेख लिखनिहार आ धीरेन्द्रक गुरुकुल परम्पराक शिष्य  श्याम सुन्दर शशि नेपालीय मैथिली साहित्यक विकासक लेल स्थापित कयल गेल विद्यापति कोषक सचिव संग नेपालमे मैथिलीक अध्यापक भेलाह अछि आब देखबाक चाही जे ओ अपन गुरुकें मोन पाड़ैत छथि वा नहि, सङ्गहि इहो समयस सङ्ग अपेक्षित रहत जे ओहि गुरु-शिष्य परम्पराक रक्षा करताह वा नहि। ई तँ सर्वविदित अछि जे धीरेन्द्रक गुरुकुलक परम्परासँ मात्र नेपालक लोककें लाभ भेलन्हि, हुनक परिवार आ  स्वयं धीरेन्द्रकेँ  ओहि परम्पराकें निर्वाह करबामे दुख आ अपमान छोड़ि किछु नहि भेटलन्हि। धीरेन्द्रक विषयमे एकटा नेपाली भाषी शिष्य जगदीश धिमिरे अपन नेपाली भाषाक उपन्यास ‘अन्तर्मनको यात्रा’ मध्य लिखने छथि – भारतीय मिथिलाका डा.धीरेन्द्र , क्याम्पसमा मैथिलीका गुरु तथा हिन्दी र अङ्ग्रेजीका पनि विद्वान थिए। उनी साहित्यमनीषी थिए र थिए जनकपुरका आधुनिक मैथिली र नेपाली सिर्जनशील साहित्यका प्रेरणा। अरूका नभए पनि उनी मेरा प्रेरणा थिए। उनी साहित्य नै सास फेर्थे। उनको सपना-बिपना सबै साहित्य नै थियो। साहित्यचर्चामा डुबेर उनी अघाउँदैनथे, जसका सितन हुन्थे चिया र पान। पछि जर्दा थपियो। कृशकाय सी मैथिल पण्डित दिनभरि बोलेर र रातभरि लेखेर थाक्तैनथे। म सोच्थेँ – यी कहिले सुत्छन् होला? कहिले खान्छन् होला? आ आगू  ओ लिखैत छथि जे डा.धीरेन्द्र मेरो साहित्यका मेन्टर हुन्, दृष्टिगुरु। साहित्य र जीवनदर्शनका मेरा जिज्ञासाका गाँठा फुकाउन उनी सधैं तत्पर हुन्थे। उनी उमेर पुगेरै बिते भन्दा हुन्छ। मैथिली साहित्यमा उनको निकै ठूलो स्थान छ। जस्तो कि साहित्यकारहरूको नियति हुन्छ, उनको वृद्धावस्था दुःखद थियो। आर्थिक र मानसिक रूपमा तनावग्रस्त थिए।” हमर एतय ई उक्तिक रखबाक दू टा कारण अछि, पहिल जे लेखक नेपाली भाषी छथि ओ दोसर ई जे ओ कोन कारणेँ ई लिखबाक लेल विवश भेलाह जे ‘आर गोटेंक प्रेरणा होथि वा नहि हमर प्रेरणा छलाह, दोसर कोन कारणें धीरेन्द्रक मानसिक रूपमे तनावग्रस्त छलाह’। एहि उक्तिक व्याख्या करब हमर नियति नहि अछि एतय मात्र हमर प्रश्न अछि एहन नियति डा.धीरेन्द्रक संग कियाक भेल जखनि कि ओ एतेक पैघ जमातिक गुरु छलाह। धीरेन्द्र प्रेमर्षि अपन आलेख  मैथिलीक आकाशक भोरूकबाः डा.धीरेन्द्र मध्य लिखने छथि जे – “ यथार्थ कहल जाए तँ आइयो जँ नेपालक मैथिली साहित्यसँ डॉ. धीरेन्द्रक सक्रियताटाके कतिया देल जाए तँ ई छुछुन्न भऽ जाएत। कहबाक लेल कहल जाइत छैक जे नेपालमे मैथिलीक एना भेल-ओना, मुदा जे-जेना भेल मात्र डॉ. धीरेन्द्रकें लऽ कऽ भेल। जँ धीरेन्द्र आ हुनक कृतित्व नहि तँ नेपालक मैथिली साहित्य किछु नहि। ई यथार्थ अछि।” तखनि डॉ. धीरेन्द्रकें हुनक अवसानक एतेक वर्ष बितलाक पश्‍चातों अपन कृतित्वकें अपन हाल पर छोड़ि देबाक पाछु कोन मंशा तँ होयत नकारात्मक वा सकारात्मक ? किछु दिन पूर्व एकटा सेमिनारमे गौहाटी गेल छलहुँ, ओहि ठाम जखनि नेपाली भाषाक विकासक चर्चा हुअए लागल आ साहित्यक विकासमे  नेपालक साहित्यकारक योगदानक चर्चा भेल तँ दार्जिलिंगक एकटा युवा शोघार्थी कहलनि जे नेपाली भारतीय साहित्यक विकासमे नेपालक साहित्यकारक नाम कियाक लेल जाइछ, ताहि पर एकगोटें प्रतिक्रिया व्यक्त करैत कहलनि जे यदि साहित्य रचनाक सेहो भोगौलिक सीमा हुअए लागल तँ ई साहित्य लिखबाक कोनो प्रयोजन नहि , कारण साहित्यकारक कोनो भोगौलिक सीमा नहि होइछ आ ओहिना भारतीय नेपाली साहित्यमे नेपालक साहित्यकारक योगदान चर्च करब ओहि सिद्घान्तक अन्तर्गत अछि यदि नेपालक साहित्यकार भारतमे रहि अपन साहित्य सेवा क रहल छलाह तखनि ओ नेपालक भेल कि भारतक। आ हमरा जनैत धीरेन्द्रकेँ अपन जन्मभूमि प्रति अगाध स्नेह छलन्हि तैँ ओ नेपालक नागरिकता नहि लेलन्हि मुदा अपन कर्मभूमि प्रति अगाध स्नेह छलन्हि तैँ ओ अपन सन्तानसँ बेशी नेपालीय मैथिलीकेँ स्नेह देलन्हि। मुदा कि! हुनक ई भावनाक रक्षा कयल गेलनि - उत्तर भेटत नहि। महाभारतमे गुरु द्रोणकेँ मात्र अपन आदर्श गुरु मानबाक कारणें एकलव्य अपन औंठा दान देने छलाह, मुदा  धीरेन्द्रकें मात्र गुरु आ नेपालक मैथिली सेवा करबाक कारणें हुनका शिष्य लोकनि हुनक गर्दनि धरि काटि लेबाक षडयंत्र करैत छथि। समय-समय पर धीरेन्द्रक शिष्य लोकनि धीरेन्द्र भारतीय छथि एकर हौआ ठाढ़ कय धीरेन्द्रकें नेपालसँ कतिएबाक प्रयास कयलन्हि आ सफल सेहो भेलाह। मैथिली आकाशक भोरुकबाःडॉ. धीरेन्द्र मध्य धीरेन्द्र प्रेमर्षि हुनक  शिष्य लोकनिक विषयमे लिखने छथि जे- “तहिया जहिया नेपाल राजकीय प्रज्ञा-प्रतिष्ठानक सदस्य हएब विशेष गौरवक विषय मानल जाइत छल, हिनका प्रज्ञा-प्रतिष्ठाने मनोनयन कएल गेल छलनि। मुदा हिनक अपने किछु तथा कथित शिष्यसभ, जिनका आङुर पकड़िकऽ लेखनक एकपेड़िया पर ई चलऽ सिखौने रहथिन, काठमाण्डू ठेकि गेल जे ई तँ भारतीय छथि, तें हिनका एहिमे नहि होएबाक चाहियनि।” आब एतय प्रश्न उठैत अछि जे  जहिना धीरेन्द्रक प्रति हुनक किछु प्रिय शिष्य द्वारा ई विरोधक स्वर उठाओल गेल जे ओ भारतीय छथि तखनि तँ कहियो ईहो मिथिला आ मैथिली विरोधी (नेपालमे) उठा सकैत छथि जे विद्यापति सेहो भारतीय छथि ( कारण विद्यापतिक जन्म भारतक मधुबनी जिला मे भेल छनि)  ओ कोना राष्ट्रीय विभूति होयताह? तखनि ओकर उत्तर की देबैक,कोनो उत्तर अछि? (कारण कहियो भारतक दार्जिलिंग मे एहि प्रकारक स्वर भानु भक्त प्रति आयल छल), कारण स्वार्थक कारण धीरेन्द्र वा महेन्द्र मलंगियाकेँ भारतीय कहि कात क दैत छियनि ( युवा वर्गकें छोड़ि)  तखनि एहि प्रश्नक उत्तर देब सत्यमे असम्भव होयत। कारण काल्हि धरि अपन स्वार्थक लेल जे खाधि खुनने छी ओहि खाधिमे एक न एक दिन अपनो खसय पड़त। कारण साहित्यकार , विचारक आ ज्ञानीक नहि तँ सीमा रेखा सँ बान्हल जा सकैछ आ नहि अपन संकुचित विचारसँ,  ओ तँ पानीक ओहन धार होइत छथि, जे जतए चाहथि बहैत अपन ज्ञानक सरितासँ समाज आ लोककें अभिभूत करैत अपन ज्ञान सँ समाजकेँ आलोकित करैत जाइत छथि। एहि तरहें कहि सकैत छी जे  आधुनिक कालक पं.जीवनाथ झा, डा. धीरेन्द्र , प्रो.मौन, महेन्द्र मलंगिया , मध्यकालक मल्ल राजाक दरबारक नाटककार ,कवि आ प्राचीनकालक कोनो सिद्ध साहित्यकार होथु, हुनका भौगोलिक सीमासँ बांधि राखब अपन ज्ञानकेँ सीमामे बान्हब सदृश होएत। अन्तमे डा.धीरेन्द्रक प्रति आस्था व्यक्त करैत हुनक प्रकाशनाधीन मैथिली मुक्तक संग्रह ‘छिड़ियाएल फूल’ सँ एकटा मुक्तक उद्धित करैत अपन कथ्यकेँ दृढ़ता प्रदान करबाक प्रयास करैत छी- “जिनगी ने कनैए, ने नोर बहबैए; ओ तँ बीतैत क्षणक खेतमे बीया छीटैए।” ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। १.ओमप्रकाश झा  -लोकतन्त्रक माने (कथा) २. मुन्नाजी- एकटा विहनि कथा १ ओमप्रकाश झा लोकतन्त्रक माने (कथा) शैलेश बाबू अपन मिनी लाइब्रेरी मे बैसल किछ पोथी सबहक पन्ना उन्टेने जाइ छलाह। हुनकर कनियाँ सुनन्दा आबि केँ कहलखिन्ह- "कोन खोज मे लागल छी अहाँ। तीन घण्टा सँ अपस्याँत भेल छी।" शैलेश बाबू बजलाह- "लोकतन्त्रक माने ताकि रहल छी।" सुनन्दा हँसैत बजलीह- "हुँह, कथी केँ प्रोफेसर छी अहाँ यौ। लोकतन्त्रक माने होइ छै, बाई द पीपुल, औफ द पीपुल, फौर द पीपुल। इ गप त' बच्चा-बच्चा बूझै छै।" शैलेश बाबू बजलाह- "इ माने त' हमरो बूझल छल। हम लोकतन्त्रक आधार बनल किछ गोटेक हरकत केँ व्याख्या करबाक फेर मे एकर विशिष्ट अर्थ ताकि रहल छी। जतय जाइ छी किछ ने किछ विचित्र हरकत करैवला लोक सब सँ भेँट भ' जाइ ए। हुनकर सबहक लीला लोकतन्त्रक परिभाषा मे आबै छै वा नै, यैह खोज मे तबाह छी।" सुनन्दा कहलखिन्ह- "छोडू एखन इ सब आ चलू किछ पनपियाई क' लिय'।" शैलेश बाबू पनपियाई करैत छलाह तखने हुनकर मित्र मनोज चौधरीक फोन एलन्हि- "कहिया पूर्णिया आबै छी प्रोफेसर साहेब? एहि बेरक दुर्गा पूजा मे हमर गामक प्रोग्राम फाईनल अछि ने?" शैलेश बाबू बजलाह- "हम काल्हि चलै छी।" दोसर दिन शैलेश बाबू पूर्णिया गेलाह आ ओतय सँ मनोज जीक संग हुनकर गाम गेलाह। ओतय हुनकर गाम पर जलखै क' केँ साँझ मे दुनू दोस्त मेला घूमै लेल निकललाह। मेला मे एहि बेर नौटंकीक वेवस्था सेहो छलै। सभ ठाम सँ घूमि दुनू गोटे नौटंकी देखबा लेल पंडाल मे पहुँचि अपन स्थान ग्रहण केलैथि। नौटंकीक बीच मे बाईजीक नाचक सेहो प्रबन्ध छलै। एकटा बाईजी स्टेज पर आबि अपन लटका झटका देखबैत कोनो फिल्मी गाना पर नाच कर' लगलै। शैलेश बाबू मनोज जी केँ कहलखिन्ह जे चलू, इ नाच हम नै देखब। ताबे एकटा घटना भेल, जे देखि ओ ठमकि गेलाह। नाचक बीचे मे दर्शक मे आगू मे बैसल एक गोटे उठलाह आ नाच कर' लागलाह। ओ साँवर रंग केँ उज्जर कुरता पायजामा पहीरने एकटा दाढीदार लोक छलाह आ हाथ मे एकटा नलकटुआ रखने फायरिंग सेहो करै छलाह। मनोज जी बाजलाह- "इ हमर सबहक विधायक छैथ आ सबटा आयोजन हुनके सौजन्ये छैन्हि।" तावत ओ विधायक मन्च पर चढि गेल आ बाईजी संगे फूहड भाव-भंगिमा मे नाच कर' लागल। शैलेश बाबू खिसियाइत बजलाह- "चलू तुरन्त। हम नै रूकब आब। इ किरदानी विधायक केँ, राम-राम।" ओतय सँ दुनू गोटे गाम पर एलाह आ शैलेश बाबू रातिये पटना केँ बस पकडि विदा भ' गेलाह। दोसर दिन भोरे पटना पहुँचलाह। डेरा पर बैसि चाह पीबै छलाह, तखने सुनन्दा बजलीह- "केहेन जमाना आबि गेलै। विधायक नर्तकी संगे स्टेज पर नाच करै छलै। पूरा समाचार मे यैह सब देखा रहल छै।" शैलेश बाबू तुरंत टी.वी. दिस भगलाह आ एकटा न्यूज चैनल लगेलाह। ओहिठाम यैह समाचार बेर बेर देखबै छलै। ओहि चैनलक स्टूडियो मे ऐ विषय पर बहस चलै छलै। किछ राजनीतिक लोक सब आ किछ बुद्धिजीवी लोक सब चर्चा मे लीन छलाह। विधायक जीक पार्टीक नेता केँ छोडि बाकी लोक एहि कृत्यक घोर निन्दा करै छलाह। बीच बीच मे प्रचार आ चैनेल दिस सँ इ उद्घोषणा कि सब सँ पहिने वैह इ समाचार देखौलक। इ विषय गरीबी आ भूखमरीक समस्या केँ कतौ बिला देलकै। एना लागय लागल जे देश मे आब एकमात्र यैह समस्या रहि गेलै। शैलेश बाबू चैनल बदललाह। सभ ठाम वैह देखबै छलै। ओ बडबडाय लागलाह- "कते महत्वपूर्ण समाचार भ' गेलै इ।" ताबत एकटा चैनल पर विधायक जीक बयान आबि गेलै- "इ सब विरोधी पार्टीक दुष्प्रचार थीक। हम ओहि नर्तकी केँ पुरस्कार देबा लेल स्टेज पर गेल छलहुँ। वीडियो मे छेडछाड कैल गेल अछि। इ हमरा बदनाम करै लेल विरोधी सबहक चालि थीक। हम जाँच लेल तैयार छी। एकटा कमीशन बैसायल जाओ।" शैलेश बाबू सुनन्दा केँ कहलखिन्ह- "इ झूठ बाजै ए। हम अपनहि आँखि सँ इ कृत्य देखलौं।" सुनन्दा बजलीह- "चुप रहू आ इ गप आन ठाम नै बाजब। छोडू ने, सिनेमाक चैनल लगाउ।" साँझ मे एकटा चैनल पर "विधायक जी स्टेज पर" एहि विषय पर जनताक बीच विधायक जी केर प्रश्नोत्तरी कार्यक्रम छल। शैलेश बाबू इ देख' लागलाह। विधायक जी साफ-साफ कहलखिन्ह जे ओ स्टेज पर नर्तकी केँ ईनाम दै लेल गेल छलाह। हुनकर कहनाई रहैन्हि जे वीडियो मे छेडछाड कैल गेल। जनताक बीच सँ ढेरो सवाल पूछल गेल आ विधायक जी बिना तमसायल मुस्की दैत शांत जवाब दैत रहलाह। शैलेश बाबू कुनमुनाब' लागलाह। बाजय लागलाह जे केहेन झूठ बाजै छै। मुदा हुनकर के सुनै छैन्हि। सुनन्दा केँ इ गप बूझल छलैन्हि जे शैलेश बाबू जोश मे ओतय जा सकै छैथ, तैं ओ हुनकर पहरेदारी मे मुस्तैद छलीह। एकाएक जनता केँ बीच सँ एकटा युवक उठलै आ हाथ मे एकटा चप्पल लेने मन्च दिस दौडि गेलै। ओ चप्पल सोझे मन्च दिस फेंकलक जकरा विधायक जीक अंगरक्षक सभ लोकि लेलकै। ओहि युवक केँ पुलिस पकडि लेलक आ धुनाई करय लागल। विधायक जी बाजय लगलाह जे देखू विरोधी सबहक कुकृत्य। हमरा नै फँसा सकल त' आब अपन पार्टीक लुच्चा सभ केँ पठा केँ हमरा बेइज्जत करबाक प्रयास करै जाइ ए। शैलेश बाबू धेआन सँ ओहि युवक केँ देखलाह त' हुनकर मुँह सँ निकललैन्हि- "अरे इ त' धनन्जय छै। अपन फूलधर बाबूक जेठका बेटा। इ कोनो पार्टीक लोक नै अछि। इ त' डिग्री ल' केँ घूमैत एकटा बेरोजगार युवक अछि।" शैलेश बाबू टी.वी. बन्न क' केँ माथ पर हाथ धेने बैस गेलाह आ सुनन्दा सँ कहलखिन्ह- "कनी एक गिलास पानि पियैबतहुँ। हम फेर लाइब्रेरी जा रहल छी, लोकतन्त्रक माने ताकबा लेल।" २ मुन्नाजी एकटा विहनि कथा तराजू सर्वधर्म प्रार्थना आयोजन कएल गेल छल। सभ उमेरक आ सभ जाति धर्मक लोक उपस्थित छल। प्रार्थनाक उद्देश्य छलै देश भरिमे अमन-चैनक कामनाक! ई आरोप पूरा-पूरी गलत छैक, हिन्दू कहियो आतंक नै मचबैए। ई काज तँ कियो मुसलमाने समाजक लोक केने हएत। सिक्ख सभ सेहो अमन चैन तकैए। है, ईसाई सभपर ठाम-ठीम धर्मान्तरणक आरोप लगैत रहल अछि। ई गम्भीर आरोप तँ हिन्दुओपर लगैत रहल अछि। यौ, घोंघाउज कऽ के की भेटत? हम अहाँ तँ सूनल- सुनाएल गप्प मात्रक हवामे उधियाइत रहैत छी। सत्य तँ न्यायालयसँ निकलि कऽ सोझाँ आओत। प्रार्थना लेल जुटल लोकक ध्यान एल.सी.डी.मॉनीटरपर जा टिकलै। शान्ति अचानक भंग होइत देखाएल। सभ एक दोसराकेँ पुछऽ लगलै- सजा केकरा भेलैक, हिन्दूकेँ की मुसलमानकेँ? आर्य समाजक मठाधीश घोषणा केलन्हि- आइ कुकृत्यक सजा कोनो जाति, धर्मक लोककेँ नै भेटलैक अछि। सभ सम्वेत स्वरमे जिज्ञासा केलक- तँ सजा ककरा भेटलै? महन्थ- “ऐ बेर सजा मात्र अपराधीकेँ भेटलैक”। प्रार्थना सभागारमे सन्नाटा पसरि गेल। किएक तँ ओ अपराधी हिन्दू छल। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। १.मुन्नाजी- हम पुछैत छी- श्री गोविन्द झा जीसँ मुन्नाजीक भेल मुखोतरि/ मैथिलोत्सव २०११ २. शम्मी वत्स/ रूपेश- हैदराबादमे विद्यापति पर्व समारोह आइ २५ दिसम्बर २०११ केँ भेल(हैदराबादसँ शम्मी वत्स/ रूपेशक रिपोर्ट) ३.शेफालिका वर्मा- -"आधुनिक मैथिली साहित्यक प्रभाव क्षेत्रमे नारी तत्व" संगमे "मैथिली आ तमिल कवियित्री सम्मेलन" ४.रोशन झा क रिपोर्ट-  "बुधियार छौड़ा आ राक्षस" बाल नाटकक मंचन ५.रमेश रंजनजीक रिपोर्ट- "बुधियार छौड़ा आ राक्षस" ६.प्रवीण नारायण चौधरी- बिराटनगरमे विद्यापति पर्व समारोह सम्पन्न 9-10 दिसम्बर 2011 १ ११ दिसम्बर २०११ केँ विदेह समानान्तर साहित्य अकादेमी सम्मान पं. गोविन्द झा जीकेँ पटनामे श्री मुन्नाजी देलन्हि। बहुआयामी व्यक्तित्वक शिखर पुरुष श्री गोविन्द झा जीसँ मुन्नाजीक भेल मुखोतरिक अंशसँ अहाँ सभक जनतब कराएल जा रहल अछि। मुन्नाजी: विदेह सम्मान [विदेह समानान्तर साहित्य अकादेमी फेलो पुरस्कार २०१० श्री गोविन्द झा (समग्र योगदान लेल)] लेल बधाइ। मैथिली भाषा साहित्यक वर्तमान परिदृश्य की अछि। एकरा मरबासँ बचेबामे अखनुक विदेह साहित्य आन्दोलन कतेक कारगर सिद्ध भऽ रहल अछि। पं. गोविन्द झा: स्थिति पहिने एकभगाह सन छल। आब सभ तुरक आ सभ जातिक रचनात्मक प्रवेशे ई भाषा चिरायु वा ई कही जे अमरत्वकेँ प्राप्त करबाक सामर्थ्यवान भेल देखाइए। मुन्नाजी:मैथिली कथा साहित्य भारतीय अन्यान्य कथा साहित्य मध्य कतऽ टिकल अछि। एकर सम्भावना केहेन देखाइए? पं. गोविन्द झा: ई संतुष्टि दैबला बात अछि जे मैथिलीमे अखन सभ प्रकारक कथा आबि रहल छै। ओना मैथिलीमे हमरा जनतबे नारा साहित्यक प्रचलन रहल। मोन कहियो साम्यवादी तँ कहियो नारी केन्द्रित कथा एवं आलेख बेशी देखना जाइए। मुदा एकोटा नारी कल्याणक लेल सशक्त नै अछि। अही सभ कारणे मैथिली कथा भारतीय स्तरकेँ नै प्राप्त कऽ सकल। आगू ऐमे विकेन्द्रीकरणक सम्भावना देखा पड़ैए। मुन्नाजी: वर्तमान मैथिली नाटकक की स्तर अछि। कोन नाटककार ऐ स्तरकेँ प्राप्त केने बुझाइत छथि? पं. गोविन्द झा:मैथिलीकेँ आम जनतासँ जोड़बाक साधन अछि प्रदर्शन। आ जकर मुख्य माध्यम अछि नाटक। वर्तमानमे नाटकक स्तर कमतर अछि। आब लोक पैघ नाटक देखबासँ अगुताइ-ए।ऑडियेन्स सटिस्फाइड नै भऽ पबैए किएक तँ नाटकमे कोनो मोड़ नै अबै अछि। रचना सभ नारी सशक्तिकरणक उल्लेख करैए मुदा नारीक सही चित्रण नै दैए। बसात नारी केन्द्रित पहिल मैथिली नाटक छल। जकरा देखियौ आइयो प्रासंगिक अछि। थियेटरक नाटक तकनीकी दृष्टिए ऊपर गेल अछि। मुदा गाममे नाटक देखबा लेल आइयो लोकक संख्या हजारक करीब भऽ जाइए। “अन्तिम प्रणाम” नाटकक प्रदर्शनमे गाममे ५००० लोक जुटल छल। आब आवश्यकता छै उच्च कोटिक कथा सभक नाट्यरूपान्तरणक, जइमे मैथिली बहुत पछुआएल अछि। जखन की आन सभ भाषामे ई काज खूब भऽ रहल अछि। वर्तमानमे जे नाटककार अपन भाषाक श्रेष्ठता साबित कऽ रहल छथि ओ छथि, महेन्द्र मलंगिया आ अरविन्द अक्कू। मुन्नाजी: भाषिक रूपमे मैथिलीक वर्तमान स्थिति की अछि? की ऐमे ह्रास वा क्षीणता एलैए? पं. गोविन्द झा: भाषाक स्तरपर बहुत फर्क एलैए, आबक लोक पढ़ैए कम, लिखऽ चाहैए बेशी। रचनाकारक शब्द सामर्थ्य घटि रहल छै। नवका धियापुता अंगरेजिया भऽ रहल छै। तखन तँ मैथिलीक दुर्दशा स्वाभाविके छै। मुन्नाजी: मैथिलीमे आब विहनि कथा धुरझार लिखा रहल अछि। एकर वर्तमान अस्तित्व आ सम्भावना की देखाइछ? पं. गोविन्द झा: विहनि कथा पूर्ण रूपेँ कविताक समकक्ष अछि। आ वर्तमानमे ठोस कविता आंगुरपर गनबा जोकरक अछि। तखन लघुकथो बुझनिहार कमे छथि। हँ नव लिखनिहार बढ़ल-ए। तेँ एकर भविष्य नीक भऽ सकैए। मुन्नाजी: नवतुरिया रचनाकारक लेल कोनो सनेस? पं. गोविन्द झा:नव लेखक सभ पहिने अध्ययन तखन अभ्यास, तखन लेखनी करताह तँ अवश्य सफल हेताह। २ मैथिलोत्सव २०११ २० दिसम्बर २०११ केँ भारतक राजधानी दिल्लीमे प्रतिष्ठित संस्था ’मैलोरंग” द्वारा मिथिलोत्सव-११ क सफल संचालन श्रीराम सेन्टर, मण्डी हाउस दिल्लीमे कएल गेल। ऐ अवसरपर स्व. राजकमल चौधरीक प्रसिद्ध कथा “ललका पाग”क नाट्य रूपान्तरण प्रस्तुत कएल गेल, जइमे नाटकक सभ तरहक तकनीकक संयोजन आ प्रदर्शन देखाएल। मुदा आधुनिक प्रयोगक नामपर अतिप्रयोगसँ सामान्य दर्शककेँ कतेको बेर अगुताइत देखल गेल। संगहि मंचकेँ आवश्यकतासँ बेशी देर धरि छोड़ि देल जाइत छल जे संयोजनक कमीकेँ देखार करैत रहल। दोसर सत्रमे प्रसिद्ध रंगकर्मी श्री दयानाथ झाकेँ ज्योतिरीश्वर सम्मान, श्री मुकेश झाकेँ श्रीकान्त मण्डल सम्मान आ श्रीमती सुधा झाकेँ प्रमिला सम्मान देल गेल। सत्य! सम्मानसँ रंगकर्मीकेँ ऐ क्षेत्रमे आगाँ बढ़बामे बल भेटत। तेसर सत्र गीत संगीतकेँ समर्पित रहल। ऐ सत्रमे लिटिल चैम्प नेना सुश्री मैथिली ठाकुरक “जय जय भैरवि..” सभ दोसर क्रियाकलापपर भारी रहल आ कर्णप्रिय रहल। गम्भीर अस्वस्थताक पछाति स्वस्थ भऽ पहिल बेर अंशुमाला जीक प्रस्तुति “पिया मोर बालक” लोककेँ मोहलक। मुदा हुनकर अस्वस्थ अवस्था अखनो हुनकर चेहरापर नजरि आएल जे मोनकेँ कचोटलक। २ शम्मी वत्स/ रूपेश हैदराबादमे विद्यापति पर्व समारोह आइ २५ दिसम्बर २०११ केँ भेल(हैदराबादसँ शम्मी वत्स/ रूपेशक रिपोर्ट)

मिथिला सांस्कृतिक परिषदक तत्वावधानमे एपीएसआरटीसी कला भवन आरटीसी एक्स रोड मे आइ 25 -12 -2011, दिन रविकेँ साँझ 3 बजेसँ मैथिल "कवि कोकिल विद्यापति" क स्मृतिमे पर्व समारोह आयोजित भेल। समारोहक मुख्य अतिथि "स्वतंत्र वार्ता" हिंदी दैनिक समाचार पत्र , हैदराबादक संपादक डाक्टर राधेश्याम शुक्ल रहथि। ऐ अवसर पर मिथिलांचलक प्रसिद्ध कलाकारक दल सांस्कृतिक कार्यक्रम प्रस्तुत केलनि। -हैदराबादमे सम्पन्न भेल विद्यापति पर्व २५ दिसम्बर २०११ केँ -हैदराबाद के एसआरटीसी कला भवनमे भेल कार्यक्रम -मुख्य अतिथि "स्वतंत्र वार्ता" हिंदी दैनिक समाचार पत्र , हैदराबादक संपादक डाक्टर राधेश्याम शुक्ल -विशिष्ट अतिथि आइ.पी.एस. अधिकारी केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल के आइ.जी. अशोक नाथ झा केलन्हि विद्यापति फोटोपर माल्यार्पण आ दीप प्रज्वलन -गायिका सविता नायक आ रोहित रक्षक केलन्हि गायन -सुश्री रूपल कर्ण क नृत्य -बालिका कुमारी अनिन्द्याक शास्त्रीय गीत सभकेँ मोहि लेलक ३ शेफालिका वर्मा- -"आधुनिक मैथिली साहित्यक प्रभाव क्षेत्रमे नारी तत्व" संगमे "मैथिली आ तमिल कवियित्री सम्मेलन" -"आधुनिक मैथिली साहित्यक प्रभाव क्षेत्रमे नारी तत्व" संगमे "मैथिली आ तमिल कवियित्री सम्मेलन" भारतक साहित्य अकादेमीक तत्वावधानमे १७-१८ दिसम्बर २०११ केँ पुडुचेरीमे सम्पन्न भेल। -साहित्य अकादेमीक ऑफिसर ऑन स्पेशल ड्यूटी श्री जे. पुन्नोदुर्रै स्वागत भाषण देलनि। -आरम्भिक भाषण श्री विद्यानाथ झा "विदित"(संयोजक मैथिली परामर्शदात्री समिति, साहित्य अकादेमी)क आ श्री एरा मोहन (साहित्य अकादेमीक जेनेरल काउन्सिलक सदस्य)क रहल। -अध्यक्षीय भाषण श्रीमती शेफालिका वर्मा देलनि। -उद्घाटन भाषण श्री मनोज दास (ओड़िया आ अंग्रेजी लेखक) देलनि, ओ अरविन्द आश्रम, पुडुचेरीमे रहै छथि। -मैथिली लेखिका श्रीमती रेवती मिश्र मुख्य भाषण देलनि। -सिरपी बालसुब्रह्मण्यम (संयोजक तमिल परामर्शदात्री समिति, साहित्य अकादेमी)सम्माननीय अतिथि रहथि। -१८ दिसम्बर २०११केँ ऑरोविल, पुडुचेरीमे ४ बजे अपराह्णसँ "मैथिली आ तमिल कवियित्री सम्मेलन" भेल। -मैथिलीक मुख्य प्रतिभागी महिला लोकनि रहथि, डा. कमला चौधरी, कुमकुम झा, वीणा कर्ण, रश्मि तनु, आरती कुमारी शेफालिका वर्मा, रमा झा, आशा मिश्र, स्वाति शाकम्भरी, नीलिमा मिश्र, रेवती मिश्र, अरुणा चौधरी, सुशीला झा, वीणा ठाकुर, उषा वत्स,ममता चौधरी, प्रमिला झा , लालपरी देवी, चंदना दत्त आ नीलम कुमारी। -साहित्य अकादेमी ,दिल्ली दिससँ ' आधुनिक साहित्यक प्रभावक्षेत्र मे नारी तत्व ' पर एकटा मुख्यतः महिला लोकनि क सेमिनार पांडिचेरी मे १७-१८ दिसम्बर केँ संपन्न भेल. -एहि सेमिनारक विशेषता छल जे कम सँ कम आयु,एवं नवीन लेखिका सभकेँ मंच पर आनबाक प्रयास कयल गेल छल... -एहि मे तमिलक विद्वान सभ सेहो भरल रहथि.. -ई सेमिनार पांडिचेरीक सभसँ पैघ होटल अनंदा इनमे छल आ रहबाक व्यवस्था सेहो ओहीमे ... -आरम्भ १७ दिसम्बरकेँ करीब १० बजे दिनमे साहित्य अकादमिक ओ.एस.डी. पोंनुदुरै क अभिभाषण सँ भेल -एकर बाद मि. राजा तमिल मे सभक परिचय करौलनी अंग्रेजी अनुवाद क साथ -श्री बैद्यनाथ झा विदित अंग्रेजी आ मैथिली मे सेमिनार केँ संबोधित केलनि संगे एरा मोहन, मेम्बर ,जेनरल कौंसिल ,साहित्य अकादेमी, पोंडिचेरी सेहो सम्बोधित केलनि. - एकर उपरांत डॉ. शेफालिका वर्मा अध्यक्षीय अभिभाषण पहिने अंग्रेजी पुनः मैथिलीमे देलनि जे "आइ उत्तर केर गंगा जमुनाक साहित्य भाव दक्षिण केर साहित्य सागर सँ मिलन पर्व मना रहल अछि.... , -मि. मनोज दास , साहित्य अकादेमी फेलो केर विद्वता पूर्ण भाषण तमिल आ अंग्रेजी मे भेल. श्रीमती रेवती मिश्रा सेमीनारक विषय पर अपन बीज भाषण आ विद्वतापूर्ण विशद आलेख पढ़लनि -गेस्ट ऑफ़ ओनर मि. सिर्पी बलासुब्रह्मण्यम, कन्वेनर , तमिल एडवाइजरी बोर्ड , साहित्य अकादेमी अपन भाषण देलनि . -धन्यवाद ज्ञापन क उपरांत पहिल सेशन भेल जाहि मे अध्यक्षता कमला चौधरी केलनि , मंजर आलम ,अरुणा चौधरी, ,कुमकुम झा, सुशीला झा क आलेख छल. -दोसर सेशन क अध्यक्षता वीणा ठाकुर केलनि, ओइमे धीरेन्द्र नाथ मिश्र, रविन्द्र कु. चौधरी , आशा मिश्र, उषा वत्स केर आलेख छल -तेसर सेशन मे अध्यक्षता प्रमिला झा केलनि। ऐ मे ताराकांत झा, ममता चौधरी आदि क आलेख छल . . -१८ दिसम्बर २०११ केँ चारि सेशन भेल, लालपरी देवीक अध्यक्षतामे अमरनाथ झा , पंचानन मिश्र ,रमा झा , चंदना दत्त क आलेख छल -पाँचम सेशनक अध्यक्षता वीणा कर्ण, आलेख पाठ नीलम कुमारी, रश्मि तनु, आरती कुमारी आ सभसँ कम आयुक स्वाति शाकम्भरी केलनि। -अंतिम सेशनक अध्यक्षता पन्ना झा केलनि, गेस्ट ऑफ ओनर रहथि पी. राजा (साहित्य अकादेमीक जेनेरल काउन्सिलक सदस्य), भाषण उषाकिरण खान, क बाद मात्री मंदिर अरुवेली मे तमिल मैथिली कवि सम्मलेन भेल. -सभ गोटे पहिने अंग्रेजी मे तखन मैथिली मे बजलीह . -कतेक लेखिका खाली अंग्रेजी मे पाठ केलनि. -महिला लेखिकाक बाहुल्य, उत्साह देखि लागल 0ldest to latest क अन्वेषण छल. -मात्री मंदिर मे कवि सम्मलेनक उपरान्त सभ गोटेकेँ एकटा उज्जर झोरामे एक-एक टा चद्दर , एकटा सुंदर दीया , फूल पत्ती छोट छोट कलात्मक चीज सभ देल गेल. -तमिलक सुप्रसिद्ध कवियित्री मीनाक्षी सुन्दरम अपन मोहक मुस्कानसँ सभकेँ मोहि लेलनि ..... - कोनो आलेख सतही नै छल, सभटा विद्वता पूर्ण, पढ़बाक उत्साह वाणीमे झलकैत छल लेखिका गण केर. -नारी शक्ति सँ मिथिला ओत प्रोत अछि कोनो शक नै.... ४. रोशन झा क रिपोर्ट-  "बुधियार छौड़ा आ राक्षस" बाल नाटकक मंचन - "बुधियार छौड़ा आ राक्षस" आइ २६ दिसम्बर २०११ केँ नेपालक पूर्वी तराइक इटहारीमे मंचित भेल। -रमेश रंजनक लेखन, अनिलचन्द्र झाक निर्देशन -नाटकक कलाकार परमेश झा, रवीन्द्र झा, प्रियंका झा, आ रीना रीमाल -ई ऐ विधिये खेलाएल जा रहल छै जइमे भाषाक सीमा हटि जाइ छै। -बच्चा सभमे भऽ रहल अछि बेस लोकप्रिय। पूर्वपीठिका: मिथिला नाट्यकला परिषद (मिनाप), जनकपुर एकटा विशेष नाटक "बुधियार छौड़ा आ राछस" बौवाबुच्चीक लेल लऽ कऽ आबि रहल अछि। सम्वादसँ बेशी क्रियाप्रधान ऐ नाटकक अन्तिम तैयारीक हेतु मिनाप एक सप्ताहक कार्यशाला समाप्त केलक अछि। क्रियाप्रधान हेबाक कारण ई विश्वक कोनो मंचपर प्रस्तुत कएल जा सकैत अछि कारण जे मैथिली नहियो बुझै छथि ओ ई नाटक बुझि सकै छथि। नाटक एक घण्टाक अछि। एकर आलेख अछि रमेश रंजनक आ निर्देशन अछि अनिलचन्द्र झाक। ऐ मे अभिनय कऽ रहल छथि परमेश, रवीन्द्र, प्रियंका आ रीना। मिथिला नाट्यकला परिषद् , मिथिलांचलक मात्र नै नेपालक अग्रणी नाट्य संस्था अछि | अपन ३२ बर्षक यात्रा पूरा क' चुकल मिनाप ,एम्बैसी ऑफ़ डेनमार्कक सहयोग मे रंगमंचक प्रसार लेल नेपालक १७ ठाम अहि नाटकक प्रदर्शन करत | नाटकक अंतिम रूप देबयमे डेनमार्कक नाटक निर्देशन एक्सपर्ट जच्क्कुए मेदिस्सें आ सेट डिजाइनर क्रिस्टन क्रिम्स्सें २ बेर एक-एक हप्ताक प्रशिक्षण देलैन| नाटकक प्रेमिएर २२ तारीखकें काठमांडूमे हैत| नाटकक कथा : दंत्य कथापर आधारित अहि नाटकमे एकटा किशोर गैर जिम्मेबार व्यवहारसं कोना परिवर्तन करैत अछि व एकटा राक्षसकें मारैत अछि आ ओकर भगिनी संग विवाह करैत अछि से देखाओल गेल अछि| नाटक सन्देशमूलकसं बेसी मनोरंजनात्मक अछि| अहि नाटकमे एकटा राक्षस एकटा बुढ़िया कए जीविकोपार्जनक एकमात्र स्रोत ओकर गायक अपहरण क' क' ल' जैत अछि| माय अपन बेटा कए गायकें बचाबय नहि सकलापर धुत्कारैत अछि| तखन बेटा राक्षसकें माइर क' गाय फिरता अनबाक प्रण करैत जंगलमे जैत अछि| जंगलमे राक्षसक भगिनी भेटैत छै| दुनुमे प्रेम भ' जैत अछि| अंततः छौरा राक्षसकें अपन बुधिसं माइर दैत अछि| आ ओकर भगिनी आ अपन गाय ल' क' चलि अबैत अछि |सरल कथात्मकता आ सरल प्रबाह अहि नाटक कए विशेषता अछि|मिनाप अहिसं पहिले एहन प्रयोगक नाटक नहि केने छल| ५. रमेश रंजनजीक रिपोर्ट- "बुधियार छौड़ा आ राक्षस" -मण्डला थिएटर द्वारा आयोजित अन्तर्राष्ट्रीय युवा नाट्य महोत्सवमे मिथिला नाट्यकला परिषद जनकपुर , "बुधियार छौड़ा आ राक्षस" रसियन कल्चर सेन्टर, कमल पोखरी , काठमाण्डूमे २५ नवम्बर २०११ साँझमे भेल। -रमेश रंजनक लेखन, अनिलचन्द्र झाक निर्देशन -नाटकक कलाकार परमेश झा, रवीन्द्र झा, प्रियंका झा, आ रीना रीमाल -"बुधियार छौरा आ राक्षस"क ट्राइल शो २५ नवम्बर २०११ केँ काठमाण्डूक स्कूली विद्यार्थी सभकेँ देखाओल गेलै। (प्रवीण नारायण चौधरीजीक रिपोर्ट) -"बुधियार छौड़ा आ राक्षस"क १३म प्रस्तुति -मिनाप द्वारा सड़क नाटक मंचन आइ २७ दिसम्बर २०११ केँ नेपालक बिराटनगरमे भेल -१४म प्रस्तुति झापा जिलाक भद्रपुरमे -३१ दिसम्बर २०११केँ एकर अन्तिम बेर प्रस्तुति जनकपुरमे हएत (फैमिली थियेटर प्रोजेक्टक अन्तर्गत) -विराटनगरमे नाटक क्षेत्रमे जुड़ैत अपन सजीव योगदान हेतु रामभजन कामत, डोमी कामत, राजकुमार राय एवं नवीन कर्णकेँ मिनाप तरफसँ सामरिक सहयोग हेतु मैथिली सेवा समिति महासचिव प्रवीण नारायण चौधरी आह्वान कयलन्हि - मैथिली सेवा समिति संस्थाक अध्यक्ष डा. एस. एन. झा, उपाध्यक्ष ई. फूल कुमार देव, संस्थापक अध्यक्ष डा. सुरेन्द्र ना. मिश्र ऐ आह्वानक समर्थनमे अपन प्रतिबद्धता व्यक्त केलन्हि। -सहभागी दर्शक लोकनि विराटनगरमे ऐ तरहक नाटक संस्था अवश्य हुअए तइ बातक स्वागत केलन्हि। ६. प्रवीण नारायण चौधरी बिराटनगरमे विद्यापति पर्व समारोह सम्पन्न 9-10 दिसम्बर 2011 -उद्घाटन नेपालक उपराष्ट्रपति श्री परमानन्द झा द्वारा -सामा-चकेवा, झिझिया,, कमला स्नान, होली आ मिथिलाक जीवनक झाँकीक प्रस्तुति - एस.सी. सुमन आ मदन कला देवीक कला दीर्घा रहल आकर्षणक केन्द्र -कुंज बिहारी मिश्र, जितेन्द्र पाठक, पूजा, खुशबू, अर्चना, मिथिलेश ठाकुरक गीत संगीत लोककेँ झुमा देलक -सांस्कृतिक नृत्य राजदेवी कलाकेन्द्र, राजबिराज द्वारा -आर्निको बोर्डिंग स्कूल, बिराटनगर सेहो कार्यक्रममे लेलक भाग -मैथिली विकास अभियानक सेहो सहभागिता -प्रतिबिम्ब रंगमंच, जनकपुर प्रस्तुत केलक भ्रमरजीक “जट-जटिन” -बाल कलाकार अंजू यादव, अम्बिका, भावना देवांशी मन मोहि लेलन्हि -बैद्यनाथ मिश्र “बैजू”, धनाकर ठाकुर,सुखदेव पासवान, लक्ष्मी नारायण मेहता, जयराम यादव, खुशीलाल मण्डल, सियाराम झा सरस, राम भरोस कापड़ि भ्रमर, धीरेन्द्र प्रेमर्षि , देवेन्द्र झा, पूनम ठाकुर, मीना देव, पुष्पा ठाकुर, सचिन चन्द्र कर्ण, संजय कर्ण, करुणा झा, राखी झा, अलखजी, महेश रेग्मी, श्याम अधिकारी, भानुभक्त पोखरेल, महेश जाजू, नारायण कुमार, पवन कर्ण, महानन्द मिश्र, चन्द्रेश, किरण थापा, तारानाथ गौतम, भगवान झा, जितेन्द्र झा, लक्ष्मीरमण झा, काली कुमार लाल, एस.सी. सुमन, रमाकान्त झा, दयानन्द दिकपाल, वरुणमाला मिश्र, योगेन्द्र बराल, संजय दास, सुरेन्द्र नारायण मिश्र , फूल कुमार देव, अजित झा आदिक गौरवमय उपस्थिति -आयोजक “मैथिली सेवा समिति” (अध्यक्ष श्री सुरेन्द्र नारायण मिश्र, उपाध्यक्ष श्री फूल कुमार देव, जेनेरल सेक्रेटरी श्री प्रवीण नारायण चौधरी, सचिव अजित झा) -प्रवीण नारायण चौधरी रहथि संयोजक -नेपालक प्रधानमंत्री श्री बाबूराम भट्टाराइक संदेश हुनकर प्रेस सचिव श्री रामरिझन यादव पढ़लन्हि Pravin Narayan Choudhary Coordinator - Vidyapati Smriti Parva Samaroh - 2068 (Biratnagar) Vidyapati Smriti Parva Samaroh - 2068 A mega event held at Biratnagar on December 9-10, 2011 for two days after a grand success of last year's Vidyapati Smriti Parva Samaroh - 2067 on December 10-11, 2010. The event was inaugurated by His Excellency Parmanand Jha, the First Vice President of Nepal in a very lovely and unique fashion as he joined the cultural procession on mid way and later by putting on the flames of Panchdeep - a traditional mode of flame-burning in Mithila placed opposite the decorated photo of great poet cuckoo Vidyapati. Before this, the honorable chief guest was given a very warm welcome by claps, flowers bouquet, garlands and more beautifully by school students on drum bits through march-past and salutation of honor, thereafter everyone participated in the national anthem and the ever-essential Gosaunik Geet written by Vidyapati - Jay Jay Bhairavi was also sung by all guests and spectators remaining standing on their seats. This was the moment of thrilling to entire audience. Earlier in morning the Maithils gathered in mass of thousands with several shows representing their cultures such as Sita and Princess of Mithila wedded with Rama and Princes of Ayodhya together with Lord Shiva, Vidyapati, Sage Vishwamitra and of course Hanumana as well appeared with His discus. A child artist played beautiful role of Hanumana was the key point of this show. Others were Sama Chakeva, Jhijhiya, Kamala Snan, Holi and a special show for how Maithils live united in the moments of happiness or sorrow - all castes are required to remain in bonds of love. For example, if it is the marriage function, earth potteries are required from earth-potters, some bamboo-utensils required from the sweepers (scavenger class among the Hindus), another Vedi of bamboo shoot and some other stuffs required from the barbers... likewise all castes gather together for success of one event of marriage in Mithila. :) This is the beauty. And, this concept was tried to present through a show. Several distinguished guests from both Nepal and India participated in the inaugural function. Dr. Baidyanath Choudhary 'Baiju', Dr. Dhanakar Thakur - the duo dedicated leaders of Mithila attended the function and delivered their brief address on protection of Mithila identity by granting a separate Mithila state for Maithils both in India and Nepal. The highly reputed writer of Maithili lyrics Siyaram Jha Saras, Dr. Rambharos Kapari and Dhirendra Premarshi also attended the function. Highly learned scholar Dr. Debendra Jha - the ex-HOD of Maithili from Bihar University (Muzaffarpur) once again after winning the heart of all Maithils in Biratnagar in last year function. People heard his sweet voice full of pearls of wisdom calmly, though once again there were a very little time for him to address the audience. His focus on life of Vidyapati and activeness of Maithils were impressive. Luckily ex-MP, Araria and ex-MLA Forbesgunj Sukhdev Paswan and Laxmi Narayan Mehta also arrived to attend this program from Delhi and Patna respectively. They also addressed to the audience for need of separate Mithila state and that of protecting the high values cultural heritages of Maithils - Hon'ble Paswan recalled the role of his party BJP and leader Atal Behari Vajpayee for his gift to Mithila by granting Maithili in Schedule VIII of Indian Constitution and demanded similar honor for Maithili in Nepal. The duo expressed their happiness for attending the event coming from far and thanked the organizer Maithili Sewa Samiti for such a decent function organized at historic land of Biratnagar. The special messenger of Honorable PM Dr. Baburam Bhattarai - his Press Counselor Ramarizhan Yadav read the messages of PM before the audience expressing happiness for wellness of Maithils organizing such mega event for protection of rich language and culture as Maithili. Local MP Jayram Yadav addressed to the audience with commitment to have honor for Mithila and Maithili in new Nepal at any cost, however, the demand for Madhesh overall is on priority and that has to be fulfilled by the constitution on way to be formed. Ex-MP Khushilal Mandal from Rajbiraj also addressed to the audience briefing the role of his party and cadres for protecting the values of Maithili and need of hour for doing more to protect the cultural heritage of Mithila. Dr. Rambharos Kapari - Member of Pragya Pratishthan, Nepal addressed the audience for hard efforts they make for Maithili in center and the role of Pragya Pratishthan for publishing several write ups in Maithili. Siyaram Jha Saras in his long-established fashion presented the delivery for keeping the active excitement of Maithils at top. Dhirendra Premarshi once again revealed the hidden attachment with Maithili for Madheshi politicians advocating for Hindi in Madhesh saying the suppression cannot last long. Truth cannot be hidden by smokes or shadow cannot last without support true Sunlight. Karuna Jha, the lonely lady on dais addressed the audience for need of uplifting women for successful movements in Mithila. Participating UML Leader Mr. Mahesh Regmi insisted on Maithils to interact more and more openly and broadly with all sects of society to let others feel proudly say 'Out Maithili' rather than 'Their Maithili'. This has a beautiful message for balanced communal harmony, which has gone out of order in recent days due to different clashes of identity. The way he addressed clearly said that previous suppression has blasted to shape up new Nepal, and let people not repeat the same blunder ever again in future. Similarly the founder president of Hidippa Sahityik Parishad Mr. Shyam Adhikari addressed the audience for working together for pious purposes without discriminating any caste, creed or color but unitedly for one reason the culture of our mother land. Bhanubhakta Pokharel whose book Kavya Chaugedi was also released by VP addressed to the audience saying it was indeed a blissful moment for him to have attended the celebration of a great poet Vidyapati who served Maithili but getting opportunity of releasing his book in Nepali virtually proves the beautiful fate of near and dear relationship between languages with grammars - both Nepali and Maithili are worth for general mankind of Nepal. There were several other distinguished guests and dignities on the dais including the prominent industrialist and social activist - Central Committee Member of FNCCI and Former President of Morang Merchants Association Mahesh Jaju who was duly declared by the Coordinator to be the true inspiration behind the mega event, Dr. Narayan Kumar, Dr. Pawan Karna, Dr. Mahanand Mishra, Shri Chandresh, Kiran Thapa - Secretary to VP, CDO Morang Taranath Gautam, Prof. Bhagavan Jha, Jitendra Jha, Laxmiraman Jha and others. Organizing executives consisting of the maker of Biratnagar - the first engineer of this locality Mr. Ramakant Jha thanked the attending guests, spectators and organizers for having organized and attended the Samaroh. Vice President of Maithili Sewa Samiti Ful Kumar Dev address welcome speech on the dais. The honored senior activist of Maithil Samaj and the Founder President of organizing committee Maithili Sewa Samiti Dr. Surendra Narayan Mishra by organizing committed by providing Certificate of Honor through H.E. Vice President expressed his thanks for honor and also committed that he would not stop till the last breathing to work for Maithili and Mithila. Senior Advocate and Founder President of Maithili Sahitya Parishad - the adviser of the event Kali Kumar Lal said that Vidyapati or any scholar of Mithila is not reserved for any one particular caste and let the worship continue in better fashion as has been organized last year and this year to infinity for prospering Maithili and Mithila. Some of the significant individuals and institutions were honored by organizing committee and certificate of honors were given by hands of H.E. Vice President - mainly Karuna Jha the lady activist working continuously for making the society dowry free was honored for her daring contribution. S. C. Suman - the prominent artist of Mithila Painting whose arts were also put on display in Art Gallery in the function was also honored for making Mithila Paintings reach to the world and earn reputation by his lively arts. The prominent writer and lyricist Siyaram Jha Saras was honored for his continuous long service to the field of literature. The only and only Maithili writer prominently known to entire nation Dayanand Dikpal was given the certificate of honor through VP to let the flames keep burning in Eastern Zone of Nepal and North East of Mithila. Certificates of honor were also given to Rupa Jha-Dhirendra Premarshi (wife-husband) dedicated for flourishing Mithila and Maithili through his most popular radio program of Hello Mithila via Kantipur FM of Nepal, Nabin Karna of Biratnagar engaged in field of journalism and TV/Radio Programs in Eastern Zone in Maithili, Varun Mala Mishra - the lone lady working actively in field of journalism, Dr. Abadh Narayan (after death) for his immemorial contribution to uplift the people of Biratnagar serving as first doctor in the region and that of participating actively in Hindi Andolan in 2017 in Biratnagar; Pandit Meghraj Sharma (after death) for enormous social contribution and continued support to entire community belonging to Marwari sect of Biratnagar to whom the society owe in different ways was honored by organizing committee. The certificates of honor were also given to participating individuals and institutions in last year event. Dr. S. N. Mishra from the chair of president for the inaugural function and also the event - thanked all and wished for success of the event to be held for two more days. Pravin Narayan Choudhary, the Co-ordinator of the event and General Secretary of organizing committee Maithili Sewa Samiti was anchoring the inaugural function. Two prominent writers' books were also released by HE Vice President - the one was of Prafull Kumar Maun and another of Bhanubhakta Pokharel. In the meantime, the souvenir of last year program was also released by hands of VP. Thereafter, the Art Gallery of Mithila art mainly displaying the auspicious arts of prominent artist S. C. Suman and Madan Kala Devi was inaugurated by H. E. Vice President who keenly looked at every art on display thereby assuring the artist to contribute actively and assured of better state support from Government of Nepal. Programs then followed by Vidyapati Sangitik Sandhya by the most reputed artist Kunjbihari Mishra and his team including Jitendra Pathak, Pooja, Khushbu, Archana, Mithilesh Thakur and several others. The cultural dances were presented by Raj Devi Kalakendra, Rajbiraj in the meantime songs were sung by several other local and invited artists. The program lasted till late night around 12.30 am and despite severe cold wave and foggy weather the spectators were gathered in large mass. The organizing committee had arranged for prepaid food through food stalls. This way the first day program was concluded with announcement of several programs for the next day. On second day, the program started with notable late of about two hours due to foggy weather and wet carpets in spectators tents. Around 10 am the program was started by school students presenting national anthem, Gosaunik Geet and cultural dances. Participating school was Arniko Boarding School - one of the oldest and decent school of Biratnagar still maintaining its high quality education producing disciplined students serving to the nation on high order mostly and other prominent child artists Ambika, Bhavana and Devanshi sang Gosaunik Geet with help of Prominent lyricist Siyaram Jha Saras. A very growing star - another child artist Anju Yadav from Rajbiraj presented several Maithili songs in her magical voices. Indeed this was the indicator of another beautiful day of the event. Later District Education Officer Yogendra Baral addressed the audience for wish of organizer was to establish an everlasting fund of scholarship for poor students who remain deprived of higher education due to lack of funds. Immediately after his address, the senior and adviser of the event Er. Ramakant Jha announced a vital contribution of Rs.25,000.00 followed by similar announcement from Pravin Narayan Choudhary of Rs.25,000.00, Ajit Jha for Rs.25,000.00, Dr. Sanjay Das for Rs.25,555.00, Er. Ful Kumar Dev for Rs.11,000.00, and several more collecting Rs.2,00,000.00 approx for the said fund of scholarship to be given to needy from coming years. The next program was Poets Meet anchored by Secretary of organizing committee Maithili Sewa Samiti Ajit Jha. This program was chaired by Siyaram Jha Saras and delightful presence of the most prominent poets such as Dr. Rambharos Kapari, Dr. Debendra Jha, Dhirendra Premarshi, Chandresh Kumar, Karuna Jha, Poonam Thakur, Meena Dev, Pushpa Thakur, Karna Sanjay, Sachin Chandra Karna, S. C. Suman, Alakh Jee, Kunjbihari Mishra, Pravin Narayan Choudhary, Shyam Adhikari, and several other poets participated in 3 hours long poets meet in the event. Several types of impressive poems, gazals, lyrics were presented by all participating poets. Due to shortage of time and that per wish of the crowds the scheduled program of scholars' conference was delayed. The event turned towards cultural programs once again. On demand, Kunjbehari Mishra had to appear on stage with his bunch of entertaining songs and presentations which once again consumed more time than scheduled. In stream of event organization, this type of things may happen. The scholars conference though started by not lasted for long as there was not a suitable moment for same. This has been postponed in need. Thereafter the beautiful cultural shows which were presented in previous day's procession were now presented on stage and that was so hilarious for all. People enjoyed as something unique were presented. Many of them were not aware of what were going on. When they saw the mode of Kamala Snan - Jhijhiya - Sama Chakewa, they simply enjoyed being proud of Mithila culture. Then some of the local artists including Maithili Vikash Abhiyan child artists, singers Anju Choudhary and Prabaldeep Vishwash presented their reputed songs of Nav Ghar Uthay Puran Ghar Khasay were so brilliant. Then there was the last show of the night - Jat-Jatin; presented by Prativimb Rangmanch of Janakpur composed by Dr. Rambharosh Kapari. This was the superb presentation which won the hearts of all and compelled the spectators to once again hang around the event forgetting the cold wave and fogs. At last, around 1 am, the organizer had to conclude the program by brief addresses from chief leaders and guests Siyaram Jha Saras and Dr. Devendra Jha and Nachari and samadauns by Pravin Narayan Choudhary and Dr. Rakhi Jha respectively. Happy reading the entire event friends - I must have missed to cover a lots of things, but I assure you, this was the event of the year 2011. Let us welcome new year 2012 and commit to have it more beautiful. May Maithils live vigorously to let Mithila survive its High Culture and Discipline. God bless you all. -Pravin Narayan Choudhary Coordinator - Vidyapati Smriti Parva Samaroh - 2068 (Biratnagar) ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com  पर पठाउ। ३. पद्य ३.१.१.कामिनी कामायनी- द्रौपदी गतांक सॅ आगॉ. २.भावना नवीन- गजल ३.शान्तिलक्ष्मी चौधरी तीनटा गजल ४.स्वाती शाकम्भरी- पिताजी ३.२.१.डॉ.अरुण कुमार सिंह- सोधनपाल २.ओमप्रकाश झा- सातटा गजल २.जगदीश प्रसाद मण्डल- तीनटा कविता ३.३.१. जगदीश चन्द्र ठाकुर ’अनिल’ २.निक्की प्रियदर्शिनी- दूटा कविता ३.मिहिर झा - दूटा कविता ४.जगदानंद झा 'मनु' -गीत-गजल ५.नारायण झा- एकटा कविता ३.४.१.विनीत उत्पल- गजल २रवि मिश्रा’भारद्वाज’३.उमेश मण्डल ४.सुबोध ठाकुर ३.५.१. अनिल मल्लिक २.गणेश कुमार झा "बावरा"३.रामवि‍लास साहु ३.६.१.परिचय दास-मूल भोजपुरीसँ मैथिली अनुवाद विनीत उत्पल २.निशांत  झा ३. आशीष अनचिन्हार- सेनूरदानक गीत- ४. अजीत मिश्र ५.पवन झा “ अग्निवाण” ३.७.१. प्रवीण नारायण चौधरी २.डॉ॰ शशिधर कुमर ३.नवीन कुमार "आशा" ४.मनीष झा बौआभाई ३.८.१. रवि भूषण पाठक २.नवीन ठाकुर ३.प्रभात राय भट्ट ४.आनन्द कुमार झा ५. अमित मोहन झा १.कामिनी कामायनी- द्रौपदी गतांक सॅ आगॉ. २.भावना नवीन- गजल ३.शान्तिलक्ष्मी चौधरी तीनटा गजल ४.स्वाती शाकम्भरी- पिताजी १ कामिनी कामायनी द्रौपदी -गतांक सॅ आगॉ. कनिक बजला भीष्म पिता त’ दुर्योधन धमकेलैन्ह राजनीति में छल प्रपंच अहिना होइत एलैहेैं । कुटिल दुश्शासन विहॅसि विहॅसि क’ गज समान उन्मत्त छल । दूनू हाथ फङकि रहल नूआ घींचय लेल बेकल छल । पाबि इशारा जेठ भाय के दौगल छल अज्ञानी । अपने कुल के नंगा करय दुष्ट कुबुद्वि ओ प्राणी । पॉच पति कोन काज क’ जखन इज्जत लूईट रहल छल । मूॅह नूकौने सभामध्य कि जाने गुणि रहल छल । सारथि पुत्र ओहो छल ओत्तै दुर्योधन शकुनि संग । मुसिक रहल छल तिरछि नैन सॅ देखि हमर क्रंदन गंजन । ओकरा ई संताप छलै जे स्वयंवर में पैठ नै भेटलै । बङ अपमान सूनि सहि क’ ओ असफल आपस एलै । बैसि कुटिल जन के संगत मे दुर्वचन बाजि रहल छल । टोंट करैत छल जोर जोर सॅ थपङी पाङि रहल छल । तखन सखा .हे नाथ कहु लज्जा हम्मर के बचौलक। मन मस्तिष्क मे आबि बसल के नूआ हम्मर के बढौलक । अहॉ नाथ हर क्षण संकट मे साथ हमर चलल छी । जीवन संगी रहै कियो अहॉ जीनगी के रक्षक छी । तन त’ छल संसार के संग मन रमल रहल अहीं मे । कटल काल रात्रि जीवन के विप्लव भरल सदी मे । हृदय हमर जौं बसल अहॉ मे कहु कि दोष हमर अछि दुख सॅ भरल अथाह समुद्र मे हम तखने पौङैत छी । बचतै नहि प्राण संकट में जौं संग अहॉ नै दैतौ । दुःस्वप्न ओ समय गुजरि गेल लाक्षागृह में रहि क । भिक्षा बुझि माता कुंती देली पॉच ठाम बाटि । नारि सॅ हम वस्तु भ’ गेलौ सेहो एकदम खॉटि । ओ केहेन कठिन क्षण आयल अब्ब्ल नारि जीवन लेल । सुनेैत वचन मन मरि चुकल ठाढ हमर काया रहि गेल । कोना क’ एतेक कुपित विधाता रथ मे केहेन क’ जोतला पॉच अश्व सॅ खींचा रहल औ टूटल जेकर पहिया । बरख दिन लेल अहिबाती हम फेर बदलि दोसर नाम । पूजै छी मॉ गौरा दाय के जीबैत पॉचो पति महान । बजैत काल रूकमणी सॅ खिस्सा हमहू छलौं धखायल । अनुशासन में राखि पति के केहेन हम नियम बनायल । बरख समाप्त होमए काल नित अग्नि परीक्षा दै छी । जिनकर हाथ पकङि लैत छी हुनके सॅ नेह करैत छी । मुदा सिनेह प’ हम्मर छल पतियो सब के शंका । ईष्र्या डाह सॅ जरैत रहै छल हुनको मन के लंका । अर्जुन दिस किछु नजरि घुमा क’ हमरा दिस हेरैत छल । हृदय चीर क’ देखय चाहैत आखिर की सत्य कथा छल । योग्य पति के पत्नी भ’ क’ तैयो रहल उदासी । तङपैत देह प्राण सब रहि गेल रहि रहि पाङी भोकासी । लोकवेद के देखि थमकि उत्तान भ’ हम चललौं । बूझत कियौ किए क्षत्राणी के मन में धाह उठल छै । ओहि धधरा सॅ भस्म होबए लै राज सजल छल सुन्नरि । आन्हर के पूत आन्हर चालि चलै छल बदतरि । हिय मे ओकरो द्वन्द्व उठल छल याज्ञसैनी के पाबी । बूझि नै पाबै रहि रहि सोचै कोन टा दॉव चलाबी । अभिमानी हम छलौं नाथ बङ जिद्दी आ’ गौरवाही शपथ खा क’ केस जे फोलल सेहो केलक तबाही । बुद्वि बल .चातुर्य सॅ हमरो गढने छलथि विधाता । ता पर रूप मनोहरि देलन्हि सकल जगत के ज्ञाता । लङैत रहल अछि जुग जुग सॅ नर पाबै लै नारी के । बिसरि क’ अप्पन सीमा रेखा अनित्य शरीर धारी के । एतेक आकर्षण द’ हमरा नीयत सबहक बिगाङल देखै जे बाहुबली हमरा पाबै वएह चलि आबै । के प ूछै छल अबल सॅ कि अहॉ किनका चाहैत छी अपन गप मनाबए वाला केकर गप मानैत अछि । बाहरि के कोलाहल तजि क’ अन्तःपुर मे आयल । देखि मुदा ऑगनि के दुर्गति मन हम्मर खौंझायल । छल. छदम :कुटिल चालि सॅ भरल भवन के झरोखा । जिनका बूझलौं सहृदए सयानी ओ सब बङका धोखा । गिरगिट जेका चालि बदलि क’ भेद लेबै छल नारि । आबै . .लग ठहरि क’ देखै ई केहेन मति मारि । कुटनी . .पिसुनी. . चुगलखोर सब दासी मीत कहाबै । अनकर खिस्सा मे किछु अपनो लागि लपेट कहि आबै । बाहर के बङका तपिश सॅ गरम होईत छल आंगन । क्लेश .द्वेष के लहकैत लावा लहरै बनि दावानल । कान रहै छै महल मे केवल ऑखिक’ काज कत्तौ नै । फुसफुस करि क’ स्वर गूॅजै छल स्पष्ट सुनाय किछु नै । भाग्य कत्त कि पॉच गाम के ओ शासक कहलेतथि मुदा सूई के नोंक बराबरि दूर्योधन कत्त दैतथि । कुश ओछा क’ जंगल जंगल रात्रि बिताबैथ परिजन । कएल की पाप बुझि नहि सकलन्हि बाट घाट में भटकैत । दासी हमरो काल बनौलक सैरन्ध्री कहि लोक हॅसल छल । केस गुहैत हम विराट स्त्री के कानल भरि सिसकारी । देख सून मे कतेक बेर ओ नर पिशाच हमलावर । ताङय लागल हाथ पकङि क’ दैत प्रेम के आखर । आखीर करय पङल भीम के कीचक वध किछु बल सॅ । आत्म रक्षा लेल भेलय ई हत्या नहिं जाने कत्तेक छल सॅ। अहिना पति परोक्ष देखि क’ चकित भेल छल जयद्रथ । कुटी के आगॉ ठाढ भ’ गेल रोकि क’ अप्पन सुन्नर रथ । कामदेव के तीर लागल छल हिय मध्य बङ भारी । बहलाबैत फुसलाबेत बढि क’ पकङि नेने छल साङी । तीर तीर घिसियाबए लागल गाङी धरि आनय लेल छल तैयार तीर तरकश लै’ छटपट ओ भागए लेल । ताधरि अयला पॉच पा्रण देखैत हम्मर दुरगतिया । घुस्सा लात सॅ ढेर कयल खूनम खून छल बटिया । युधिष्ठिर के कहला प’ प्राण हरण नहिं भेलन्हि । भीम अनुज गरजि गरजि क’ केश हरन करि लेलन्हि।

तोङि ताङि क’ सीमा सबटा मन म्ो छोह उठैत अछि । विपदा संग सब ठाम सदिखन हम्मर नाम जुटैत अछि । राजपुरूख के संगिनी भ’ पग पग ठोकर खयलहूॅ । कोमल पैर जरैत धरती प’ राखि राखि चिल्लेलहू। वनवासी सब सखी सहेली ऑखि फाङि क’ हेरै । बिलखति हमरा घाम म्ो देखिक ऑचरि ल’ क’ घेरै । केहेन दुष्ट ओ राज हेतै जे वनवास पठौलक । जनी जाति सब घेंट मिलाक’ हमरो बङ समझौलक । किए करब अहॉ भानस बासन हम सब जखन उपस्थित । अहॉ सनक सुबुद्वि सुनारि रहू सदिखन व्यवस्थित । मुदा कहू ओहि सरल चित्त प्राणी के की कहितौं । कोना कटल उपवास मे जीवन कोना क’ नोर बहैबतौं । तखन विहॅसि क’ हमहू कहै छलौं खिस्सा रंग बिरंगा । कोना कोना बलजोरहा सब मिली मारै तुच्छ फतिंगा । व्रत उपास मे नर नारी सब हमरा न्योंत’ आबै । वनदेवी वा लछमी बुझि क’ दर्शन करि करि जावै । मातु कुंति के अचरज होई छल भीलनी संग देखि क’ हमरा । पंच बना क’ सब कियो रखने निर्णय मानि रहल छल । दाना दाना लेल तरसि गेल रहि एहनो दिन हम कटने छी । पीबी पानि पात रान्हि क’ कतेक राति हम कटने छी । भरि भरि राति तरेगण देखी कहुना नींद लगीच आबै । चैन के पहर दू पहर काटि क गृह कार्य मे लागि जाई । भोर होय त’ गाछ बिरीछ दिस टक टक नजरि लगा आबि । देखी कत्तो फङ फूल त’ झट सॅ तोङि क’ ल’ भागी । गीत मधुर हमहूॅ गाबै छल मुदा भास नै आब फूटै कत्तो कोनो राग सुनी त’ धार सहस्त्रों नोर छुटै । वानर भालू .रीछ विचित्र सब संहतिया बनि लग रहै । कूकूर .बिलाङि खरहा .मूषक कुटिया मे रच्छा आप करै । मुदा ध्यान सॅ छुटि नै पाबै हमरो ओ संकल्प भयानक । कोना क’ हम्मर केस तीर क’ महल सॅ बाहरि आनल । क्रोध सॅ थर थर कॉपि कॉपि पीसैत दॉत हम अप्पन। तकैत रही ओ क्षण की ठंढी पाबै कहिया हम्मर मन । नाथ ...क’ल’ जोरि बॉचि रहल छी सबटा पीर जीवन के । आखीर कत्ते पाप कयल मिटै नै ताप निज मन के । अग्नि के दुहिता हम अग्नि निसी दिन धधकैत रहलौं। कनि नै कहियो धाह कमती भेल । जल मे रहलौं तइयो । अगिन के गुण लोक बुझैत अछि मारक वा संहारक । मुदा कण कण शुद्व करि क’ बनबैत सेहो अछि पावन । रूप हमर प्रचंड क्रोध सॅ हरदम रहल अंगारक । अन्तःकरण मे इच्छा रहि गेल होईतौं हम उद्वारक । दया धरम सॅ भरल हिय मे कहियो लोभ नै आयल । अन धन देखि नै कहियो ककरो हम्मर मन ललचायल । विधना हमरो देल बहुत तखन अपन किस्मत छल खोंट । भवन अटारी बखारी खूजल ऑचरि हमर कतेक छल छोट । बादरि सॅ नित रोज लङैत हम फूस के छप्पर छानी । समय कष्ट के बढा जाईत छल चूबैत टप टप पानी । पॉच वीर के नींद नै भंगटै रहि हम अलख जगौने । जीव जन्तु सॅ रक्षा हेतु बोरसी मे आगि जरौने । ओहो की दिन छल नाथ जखन परसौती गृह हम ताकी । कत्त करितौं विश्राम कनि छोङितौं केकरा प’ बाकी। अपने हम बल ..बुद्वि के चाकर दास बनाबी । अपने बनी सखी सहेली अपने राह बनाबी । के पतियेतै कोना क’ नारी जंगल मे राति गमौलक । पॉच पति के संग पाबि क’ तैयो चैन नै पयोलक । तैयो दिन ओ सब भल छल आस के दीप जरैत छल । गरदा माटी पएर सनल छल पाखी कल्लोल करैत छल । पीबैत जल गजराज के देखि चकित भ्रमित हम हेरी । आब लगैत अछि काल के वाहन लगा रहल छल फेरी । राज स्त्री हम क्षत्र्राणी क्रोध हमर बङ भारी । सकल संपदा लुटि लोक मारै शब्द कटारी । ई नारी घमंडक मारल एयह अछि रिपु के शक्ति । मदमातल दिन राति रहैत अछि करैत कृष्ण के भक्ति । कहैथ मुरलीधर की करता हम एतेक बलशाली । हमरा लग बल चातुर्य अतुल अछि हुनक हाथ त’ खाली । दुर्योधन के ललकार सुनि कालो घबङाए रहल छल । सबटा ग्रह नक्षत्र कुमंगल ओहि ठाम आबि बसल छल । शकुनि मामा भ’ क’ जे खेल अनर्थ के खेलल । अपने हाथे सहोदरि के सौभाग्य परम हरि लेलक । जूआ ..मदिरा निंदा .. कलह सब के सहयोग ओतय छल। राजा के सिंहासन सॅ यमराज के राज चलैत छल । दूर लग के राजा हॅसि क’ निफिकिर राज कयल भरिपोख । जे बॉझल अछि गृह कलह मे ओकरा सॅ सब रहै निधोक । घेरने काल हस्तिनापुर के काल रात्रि सन महाविकट । दूर दृष्टि के गप कतए लुप्त जखन दृष्टि निकटस्थ । महापुरूष कियो एहेन नहि जे कौरव के राह देखा सकितै । कियो नै कहल जे शक्ति बढा क’ अश्वमेध ओ यज्ञ करितै । देव . .दया. .दर्शन सब बुझि क’ हम चित्त वश मे करैत अयलहूॅ । श्रेष्ठ जन के मान करैत अपमान के घूॅट पीबैत रहलौं । जहि पैलवार ल्ौ लोक करैत अछि व्रत तीरथ पूजा अर्चन । नौंत द’ ओत्त काल बजौलक नष्ट करय ले सुख जीवन । दिए सुबुद्वि हमरो जन के रहय एना नहि व्याकुल चित्त । उपजै हिय मे ज्ञान कि बुझै बंधु बांधव हित वा मीत । दंड भेद वा साम दाम सॅ चलैत रहल संसार अखिल । प्रेम प्रेम कतबो ऋषि भखलैन्ह ईष्र्या के बेल लतरैत गेल । कियो ककरो देखय नहि चाहै गप करत चाहै कतबो विशेष । निज स्वार्थ मे लीन सदा बात बात प’ करय कल्ोस । अश्वत्थामा के नाम सुमरि अंगोर उठैत अछि हमरा मन मे। मुदा देखि प्रत्यक्ष हुनक ्र माए आबैथ छथि नैनन मे । गुरू स्त्री ओ कानैथ नै जग मे नोर बहा हमरा सन । जीबैथ हुनक पूत बरख सौ जुङैल रहैन्ह हुनकर तन मन । हुनक तेल भरल दीया मे जरैत सहै सुख के बाती । दूनू कुलक े नाश कएल ओ छल अपने गोतिया नाती । क्षमा करैत छी नाथ अरि के ई सब चालि कियो आओर चलल । अग्नि पुत्री दग्ध हृदय के पक्ष किए रहितै उज्ज्वल । कएक जनम के कर्म भोगै लै आयल छी नारि तन में । तङपि तङपि क’ राति दिवस संकल्प लईत छी मने मन मे । जीबाक अछि विरह कुंड मे रोग शोक किए घर बनैत । मन राखि दी मनमोहन लग लिखलाहा सब तन के हैत । शरीर के धर्म नष्ट भेनाय के एकरा एत्त रोकि सकल । मुदा प्राण के आकुलता प’ गंगा जल के छीट्टा देल । दावानल मे झरकि रहल छी तदपि आस नै तजलौं । कॉट कुस सॅ भरल मार्ग प माथ उठा क’ हम चललौं । भेलौं जखन जखन पुरवासी तीर चलल तरूआरि चलल। जतेक जेकर व्यंग वाण छल सब हमरा ललकारि चलल । किएक हमरा सॅ एतेक ईष्र्या बजलौं नै कटु वचन किनको । आदर सॅ हम नाम लईत छी दास दासी चारण तिनको । संचित पाप कतेक हमर छल कियो हमरा ई बूझेलक नहि । शिक्षा दीक्षा भेटल नहिं छल मातु पिता लग रहलौं नहि । जनिमते जुबती भ’ गेलहूॅ इहो छल अपराध हमर प्ुरूखक तृष्णा पूर्ण दृष्टि कयल सुबुद्वि नष्ट हमर। ताकि नजरि भरि बनै शत्रुओ हाय रे विधना ..जो रे कपार । सुमीत कहॉ कत्तौ छल हम्मर जे छल से सब शत्रु हजार । भवन के रानी राजकुमरि सब रहि रहि मारै ताना । नारि के भेस मे लङय आयल अछि ई कोन मर्दाना । अपन झरोखा मे बैसल हम सबहक गप सुनै छी । मुदा खून के घूॅट पीबि क’ चुप्पे चुप्प रहैत छी । पहिनहॅू सॅ सब सखा जनानी पीठ मे मुॅह छल चमकाबै। आखिर की ई पढल म्ांत्र कियो और नै ककरो मन भावै । मुदा प्रत्यक्ष मे होश गुम छल सिनेह देखाबैत गरा लागै । तखन छलै बान्हल मुट्टी थाह नै किनको किछु लागै । जादू मे विश्वास करि नै नै मंतर नै टोना । कर्म पथ प’ चलैत रहल जग हमरो कहलक कृष्णा । चारू कात अनहार जखन छल बाट नै कनियो सूझै । ऑखि मुनने चलैत रहल छी क्षण क्षण दृग के मींजैत । मेघ भरल अनहार राति मे चमकै जेना बिजुरिया । नाम अहॉ के कौंध मगज मे दिशा देखौल सॉवरिया । डाह दियादि एहेन होय छै बिसरि न्ौ सकतै ई जग । भाय भाय के रक्त पिपासु उठेतै आर केहेन पग । कहबा के त’ लोक कहै छल दू के कारण ई जुद्व ठनल । एक दिस दुष्ट दूर्योधन दोसर दिस ई नारि रहल । बिसरय के त’ नहि बिसरलौं दरबार सजल अपमान अपन । बरख बरख वन वन भटकल तजलौं नै प्रतिशोध वचन । क़..त्तेक बेर त’ पांडव हारि कत्तो पङा’ क जाए बसैथ । मुदा कर्म पथ के चेन्हाबैत रखलौं हम ओ काठी जरैत । कालि होय से आय हुए हम नॉघि चुकल छलौ सीमा । क्षमा करय नहिं आयल तहिया लई छी संहार क’ जिम्मा । जौं लछमी के अवतार छलौं त’ भेल किए संहार एतए। सासुर जाहि मे पएर धरल ओ चलि गेल पाताल किए । एक हाथ सॅ थपङी पाङि दुर्योधन की करि सकतथि । दोसर हाथ हम्मर नहि उठितै रणभेरी नहि बजि सकितै । भॉजि रहल तरूआरि हवा मे अपने कुलके घाती । त्रिया बिलखि क’ कानि रहल छल रहि रहि पीटै छाती । आखीर ओकरा द्वेष किएक छल हमरा सॅ एतेक भारी । नजरि उठा क’ हम त’ देखल हारल छल जखन जुआरी । खोदबिन मे लागल हरदम गुप्तचर सब छोङै छल । सबहक कान लगा हमरा दिस मुॅह अपना दिस मोङै छल । मनुक्ख नै बुझलक अपन स्त्री के अनका प’ ध्यान गङौने छल । बिसरि क’ सब औकात अपन हमरे सॅ नजरि लङौने छल । हमरा लेल ओ तृणवत मानुष बेईमान हत्यारा छल । नहि छल लच्छन कुलदीपक के मूरूख वीर बंकाङा छल । छन छन गरजि गरजि क’ बाजै लाज धाक नै एकोरत्ती। तामस जेना नाक प’ बैसल केहेन पिता केहेन पित्ती । नहिं ओकरा विवेक सॅ मतलब नैे बुद्वियार सॅ काजे लै । नहिं ओ सखा सहोदरि बूझै नहि गुरूजन के सम्माने दै । भय के ओ सामा्रज्य चला क’ मोइक देलक जनता के स्वर । चाटुकार सब सजा रहल छल ओकरे पतन लेल गहबर । राजपद के सब दोष सॅ ग्रसित ओकर संपूर्ण शरीर । चलै जेना गजराज चलैत हो धरती नै हो .हो जागीर । हॅसी छुटि गेल जौं हमरा त’ अहि मे हम्मर दोष कतए । देख किए नहि सकल दुष्ट कत्तए पानि सुखैल कत्तए । चंचल चपल सुभाव हमर नहिं सोची आगॉ पाछॉ । बूझि नै सकलहूॅ मर्म शब्द के सेहो बनल एक बाधा । कूदि घूमि चली मस्त भ’ हम त रहल जंगल वासी । महल के जीवन रास भेल नै नहि बूझलक ई भवन वासी । कान मे फूस फूस बाजि नै पाबी जे बाजी से जोर ही जोर । केक्कर के की अर्थ लगाबै सुनि त’ हुए मन कठोर । दोषी अपना आप के बूझि क’ हमहूॅ नतमस्तक छी । बेसुद्व.. .. सनकल .मानुस सन सब के घुरि रहल छी । सप्पत बेर बेर न्हि खयतौं आगि मे घी नहि ढरितै । त्रिया चरित्र के अङ मे पुरूखजन मन मानी नहिं करि सकितै । कुरूक्षेत्र सॅ आपस जखन आबैत छल सवारी । सब गाङी प’ सब चढल छल बचल खुचल नर नारी । कियो विक्षिप्त. .कियो चित्कारै कियो मूर्छित भरि बाट छलै । उन्मत्त कत्तैक गाङी सॅ कूदै राह बटोहिया फूटि पङै । वृद्व पीपर ठाढ ओतए ओ अपने नोर बहाबै छल । ब्रह्यसरोवर के जल रहि रहि थर थर थरथर कॉपै छल । तात . ..हम किए गवाह बनल छी कुरूक्षेत्र वा पीपर के । गीता अपने बॉचि रहल छी बढबैत ज्ञान धर्नुधर के । सबटा मोन आबि क’ फाङै बिन कोदारि गङासी के । कतए क’ पटकी माथ कि बदलै भाग्य प्रभू दुरभागी के । कानि कानि क’ भींज र ह ल अछि हम्मर सबटा नूआ । ई भदवारि मास मे सिहरै भूलकै रहि रहि धूआ । दादूर .झिंगुर . कीट . फतींगा सब तरि बील बनाओल । निशा रात्रि मे मेह के संगे ईहो पीर बढाओल । राति राति भर नीन्न नै आबै खिङकी सॅ झॉकि रहल छी । दूर दूर धरि खड नै खडकै सन्नाटा भॉपि रहल छी । चिग्घाङैत अश्व गज संगे असहाय मनुक्ख क’ हाक्रोश । कान मे गॅूजैत रहै सदिखन हिय के डाहि रहल अछि। ओ अठारह दिन सॅ पहिने जीवन नै एहेन विकट बनल । अवग्रह मे छल प्राण मुदा जीबय के किछु संबल छल । तखन छलै उमंग हिय मे तन मे छल उत्साह अजस्त्र । मुदा आब ओ गप कतए आब बचल मात्र अस्त्र वा शस्त्र । नोर नैे सूखै धर्मराज के अजुर्न के तीर नै फेर उठल । भीम गदा के तोङि क’ फेंकल नकुल सहदेव मुरूझाय रहल । कहै ल्ौ हम पटरानी बनलहूॅ कोन विलास हिय मे बॉचल । निज बंधु बांधव तनुज लग पास मे किछु नै रहल । मान केहेन अपमान केहेन जब सखा मीत नै हो अप्पन । हेरै ल्ौ सुहृदय नहि अछि सुन पङल अछि रंग भवन । आदर सत्कार शरीर के स्वामी आत्मा के नहि फर्क पङै । जे एहि रहस्य सॅ वंचित रहि गेल तिनका सब लेल नर्क इयह । राग रंग रस सबटा सोहै अपने राज नगर मे । अप्पन भाषा .अप्पन माटि अप्पन लोक के संगत मे । सोना .रूपा हीरा जवाहिर देल क़त्तेक दुख हमरा । धन के खातिर कलह फूटि गेल उठल भयानक धधरा । दग्घ हृदय फाटैत अछि रहि रहि ज्वालामुखी बनवा लेल । सहृय नै होईय असह्य पीर ई समय पाबि घनघोर बनल । चक्र कोन ई चलल स्वामी सकल मनोरथि टूटि चुकल । पुरूखक अहि अहं खेल मे स्त्री जाति किए लूटि चुकल । नहि चाहैत छल पांडव कहियो युद्वकरैथ स्वजन जन सॅ । अहिना बलगर राज्य हङपि क’ राज करै छै जुग जुग सॅ । राज्य बला बिन राज्य बला सब माटि के अछि पुतला । खेल रचा क’ समय काल मे सब भ’ जायत अछि निपता । माया के संसार मानि क’ जंग छिङल धम गज्जरि । फूस बनल मर्यादा जरि क’ चारू कात पसरि गेल । मुदा नाथ अहि खेल मे तङफल सबसॅ बेसी निरीह प्रजा । भले कियो सिंहासन बैसोथि करत के हुनकर परिचर्चा । झुका चुकल सब भाग्य के आगॉ अपन अपन माथा । मूक बधिर अपंग बनल ओ ठोकैत छथि छाती माथा । घर घर सून मसान बनल अछि देहरि प’ नै कत्तौ डिबिया । बस्ती मे अलच्छ कनैत अछि कूक्कूर . . . गीदङ .. .नढिया । आस त्यागि क’ जीबि रहल अछि नगर गाम के जनता । खिस्सा ककरा कहतै के सब भग्न हृदय के सुनता । सन्नाटा पसरल महल म्ो अछैत सेवक दास खवास के । बाजैत बाजैत कोढ फटै छै जीवन बिनु आह्वलादके । गेसू . .सुखना . . धनिया . . परमा कोचवान सब आबि कहै । चुल्ही सब धरि मिझा चुकल छै नै कत्तौ कनसार रहल । मालजाल सब बिसुखि गेलय यै बैसल नोर बहाबै छै। चारा कतबो राखल सोझा मुॅह कनियो नै घुमाबै छै । कत्तो कियो कल्लोल करय लेल धिया पुत्ता नै आबै । बनल वृद्व सब द्वार प’ बैसल चिंतित दिवस गमाबै । नै कियो गाबै गीत कि फागुन सेहो सुने लागै । भागि गेल रंगरेज की ओकरा रंगो नै आब सोहाबै । नाम प’ हमर धिक्कारैत अछि कुलक े कनिया मनिया ।

प्रतिशोध के महाज्वाल मे भस्म जेकर भेल दुनिया । हम त’ आगॉ बढि सुभदा्रके गरा लगाबए स्वयं गेलौं। किंतु देखि तनल भृकुटि सहमल चुप्प आपस अयलहॅू। पानि पान पीढा लै आब नै पूछैत अछि पांडव पत्नी । पथने छै अज्ञान कान सब तरि बूलै छै कुटनी । सौतिन सब नैहर सॅ आबि संबंधी संग चौल करै । दुष्ट वचन संग गारि श्राप सब हमरा दिस प्रेसित करि क’ । देव .. . आब अहॉ कहू कि हम अहि संताप सॅ त्र्राण पाबि कोना । सकल विश्व मुॅह फेर चुकल बिन आधार क’ प्राण टिकत कोना । नारि एसगरि ठाढ रहै छै जखन विपत्ति आबै छै । अपन जीवन के दाव लगा सबहक जीवन तारे छै।

कर्ण विदारक चीख सुनि क’ कुहरि कुहरि दिन काटैत छी । देख पांडव के घोर व्यथा हम मंडील मंडील भागै छी । युद्व समाप्त त’ हेबा के छलै इतिहास स्वयं भेल खून सॅ लाल। मुदा विनाश के गरदा ..माटि करतै सृष्टि धरि आत्र्तनाद । ई चुनमुनिया सुग्गा सेहो देखि ऑखि लैत अछि फेर । नहि बाजै छै कोयली बुलबुल नहि नाचै दुरखा मे मोर । आनि धरा प’ गढि बहन्ना हमरा कियै घिसियौलौं यौ । कतबो खून राजपूत कहियौ हर क्षण हम घबङेलौ यौ । राजा के अधिकार नै छै ओ फाग खेलै शोणित सॅ। सिथिया. काजरि पाजेब झूमका हेरै बाट विरहाकुल भ’ । चेरी आबि चुप नोर बहाबै आब नै करए ठिठोली ओ । क्षण क्षण ऑचरि ऑखि पोछति

बिसरि गेल अछि बोली ओ । विधना किए निष्ठुर भेलथि अहि हस्तिनापुर के खातिर । एके संग किए जनम लेल वीर.. . धुरंधर औ’ शातिर । आब लगैय जन साधारण जीबैत सब क़त्तेक सुखारी छै। ह’र’ जोईत क’ प्रियतम आबै भनसा करै सुनारी छै । पीढा बैसल पति के सोझा राखै ओ भरल छै थारी । प्रेम सॅ दूनू मिलजुलि खावै चाहे हो साग गेन्हारी । धिया पुत्ता के सोर सॅ हरिदम कुटिया ओकर मनोरम छै । लोकवेद सॅ गप लङाबैत मास नहाबै संगम छै । मुदा छो ट सन सुख नै द’ क’ बना देलहु पटरानी । शत्रु सॅ भरल कनैत विकल राज्य के महा रानी । अहॉ हमर संगी बनि क्षणक्षण हम्मर नोर हरै छी । सकल जगत के दुर्गति कहि कहि मन मे आस भरै छी । प्रभू हमर संबल छी बल छी अहीं आन्हर के लाठी छी । पैसि हृदय मे नयन द्वार सॅ मस्तिष्कक द्वन्द्व मिटाबैत छी । सोचि सोचि क’ व्यतीतक खिस्सा प्राण कटै अछि अहुरिया । बंद भवन कियो देखि नै पाबै पटकुनिया देने बहुरिया । नाथ हमर सौभाग्य अटल अछि तईयो हम विरहिणी बनल । कतबो सजाओल तन के चारिण मन बैरागिन किछु नैसुनल । उमिर कैद के सजा द’क’ हमरा किए छोङि देलहॅु एतय। हे मुकुन्द ल’ चक्रसुर्दशन टुकङी हम्मर किए नै बनैलहू यौ । स्त्री मात्र एक भोग्या नारी आर ओकर सम्मान केहेन। माता हो भले वीर पुरूख के पीबए छै अपमान कतेक । जौं सुनतथि ओ मातृशक्ति के युद्व के ज्वाला थमि जैतै । मातु कुंती गांधारी के संग जननी सब के हित रहितै । बाजि भूकि क’ कत्तबो रहि जाए नारि तरूआरि उठाबै नै। सहने अछि ओ प्रसव वेदना जननी ओ कहलाबै छै । व्रत .. उपवास .. अर्पण तर्पण करि सब के उमीर बढाबै ओ। राज करि काबिल बूझै सब अहि पाछॉ नहि भागै छै । ं मुदा कात क’ स्त्री वाणी के ओ सब चालि कुटिल चलला । राति राति षङयंत्र रचै छल चालि चलब कोना अगिला । एक विनती हम करै छी नाथ स्त्री नै दूषित हुए जग मे । नै रहतै पहचान पुरूख के वंश के थाह नै कियो पेतै । नारि प’ सब धर्म टिकल अछि गोत्र. . .मूल .. .मातृत्व अखंड। करूणा दया और रस संग सब संस्कार के बीजक मंत्र । मातृ प्रथम गुरू होबैत अछि कर्म अपन नै बिसरि सकै ओ। क्षणिक स्वार्थ दैहिक जीवन के भस्म नै ओकर धर्म करै । तखन कहल गीता मे अपने हम ही जग मे सृष्टि विनाश । हम ही छी उदित भास्कर हमहीं जीवन मृत्यु महान । सकल विश्व अछि ग्रास हमर सब पुरूब जनमक खेल रचल । प्रारब्ध के पाप नै पाछॉ छोङै चलेैत आबै छै जन्म जन्मांतर । नाथ अहॉ मन के स्वामी आब आर कहु की वाणी सॅ । जीवन . .हास ..विलास .. विनाश धुलै नै ऑखि क पानी सॅ । मीत अहॉ बस बसू हृदय मे हाथ सॅ हम छी कर्म करैत । नियत कर्म हमरो निर्धारित काटि लेबै जीवन अछैत । प्रियतम कृष्ण नाम धन अप्पन हमरा सॅ नहिं कखनो लेब छीन । भलै करै कतबो जग गंजन सुनैत रहै मन अहॉ के बीन । अहि क्षण भंगुर माया नगरी मे अर्मत्य केहेन ई अभिलाषा । जीवन सुख सौभाग्य भरल हो जगमे बाजै जन प्रेम के भाषा । (अप्रकाशित पुस्तक ‘काव्यांजलि”-कामिनी कामायनी  सॅ उद्वृत) २ भावना नवीन गजल हुनकर प्रेमक तरीका विचित्र अछि कनि मोन उदास कनि स्थिति विचित्र अछि

बहल जा रहल अछि लहरिक दिशा मे कागजक नावक भाग्य विचित्र अछि

दुश्मनक हरेक दावक हम देलों जबाव लेकिन अहाँक हरेक अंदाज विचित्र अछि

नै टूटलों हम हजार दुःख सहलाक बादो पाथर सन भेल हमर 'भावना' विचित्र अछि

आबैत रहल कांटक यादि राति भरि फूल-पातक सजल ओछौन विचित्र अछि !! ३ शान्तिलक्ष्मी चौधरी तीनटा गजल गजल १ शिशु सिया उपमा उपमान छियै हमर आयुष्मति बेटी मैत्रेयी गार्गीक कोमल प्राण छियै हमर आयुष्मति बेटी टिमकैत कमलनयन, धव-धव माखन सन कपोल पुर्णमासीक चमकैत चान छियै हमर आयुष्मति बेटी बिहुसैत ठोर मे अमृतधारा बिलखैत ठोर सोमरस शिशु स्वरुपक श्रीभगवान छियै हमर आयुष्मति बेटी नौनिहाल किहकारी सरस मिश्री घोरल मनोहर पोथी दा-दा-ना-ना-माँ सारेगामा गान छियै हमर आयुष्मति बेटी सकल पलिवारक अलखतारा जन्मपत्रीक सरस्वती अपन मैया-पिताश्रीक जान छियै हमर आयुष्मति बेटी ज्ञानपीठक बेटी छियै सुभविष्णु मिथिलाक दीप्त नक्षत्र मातृ पितृ कुलक अरमान छियै हमर आयुष्मति बेटी "शांतिलक्ष्मी" विदेहक घर-घर देखय इयह शिशुलक्ष्मी बेटीजातिक भविष्णु गुमान छियै हमर आयुष्मति बेटी ..................वर्ण २२................ गजल २ छाति तानि ठाढ़ सैनिक दुश्मनक तोप बरसाबैत अंगोरा लहास घिसियावैत कुत्ता पढ़ि कवैती शेर केँ कहै भगोरा सात कोनटाक मरचट्टा बदलै कोन-कोन रंगक नै झन्डा बलिदानीक सारा लागल पाथर केँ की बुझतै ओ लिकलोढा सौ मुनसाक संग जे खेलकरी राति-दिन खेलावै रसलीला सून बाट चलैत छौड़ी केँ कहलकै गे बज्जर खसतौ तोरा जँ बातक नहि ठीक तँ बापोक नहि ठीक के छै सत्ते कहवी उनटा-पुनटा गप्पक सतखेल करै ई कुर्सीक चटकोरा नौ सौ मुस खाय केँ बिलाय साधु नाहैत चानन ठोप लगौने सुसुम खुन चाटय सुंघसुंघ करै ई लाकर आदमखोरा "शांतिलक्ष्मी" माथ धयनै बैसल देख रहलै हेँ सभटा छिछा लोकतंत्रक अस्मिता लुटय बेकल कोना देसक कुलबोरा ............वर्ण २३........... गजल ३ दिन सुदिने बुझाइत ई कुहेस मे देस फँसल अछि घोटाला आ केसमे लोकतंत्रक राजा जनता-जनार्दन जनते सुतय तँ तंत्र पेसो-पेस मे पाप पराकाष्ठ होई जनमै श्रीकृष्ण मीडीया छथि जागल ऐय्यार भेष मे छुलाह पहिनौ पापक माल खेलकै न्यायक आँखि आइ पड़ल उधेस मे जनता छाती ठोकि आब लड़ै भीड़ल लोकपालक अस्त्र देखि चोरो क्लेश मे "शांतिलक्ष्मी"केँ सभकिछु शुभे बुझाबै कृष्ण, चाणक्य, गाँधी, आ अन्नाक देस मे ..............वर्ण १४............ ४ स्वाती शाकम्भरी पिताजी पिताजी पिताजी वर्तमान दुनियाँ ए चाँद पर मुदा अहाँ मचान पर बैसल हमर भविष्यक चिंता किया करै छी

हमर भविष्य हमरे पर छोइड़ दिए आबो अपन अनरगल सोच सँ मन क मोइड़ लिय

नारी आब अनाड़ी नै दुत्कारल कौनो भिखाड़ी नै हम दबल कुचल कौनो अबला सन रक्षक केर बाट निहाड़ी नै

हम स्वयं लड़ब वोही दानव सँ ममता विहिन ओइ मानव सँ जै नारीत्व धर्म केर शोषक छै कोमल भावक भक्षक छै

हम विवश वीर के वनिता नै हम दुःखीता द्रौपदी सीता नै हम रणचंडी दुर्गा काली छी दानवीय भाव संहारी आ मानवीय सकल प्रतिपाली । ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। १.डॉ.अरुण कुमार सिंह- सोधनपाल २.ओमप्रकाश झा- सातटा गजल २.जगदीश प्रसाद मण्डल- तीनटा कविता १. डॉ.अरुण कुमार सिंह- भारतीय भाषा संस्थान, मैसूर सोधनपाल एकटा छथि गोपाल गोपाले सन मस्त रंगो गोपाल सन स्वभावो छन्हि व्यसानुकूल पढबाक नाम पर छथि प्रतिकूल जैताह नीत स्कूल लिखताह नहि पढताह मारि धरि खौताह तैयो बिहुँसल स्कूलसँ घूरताह एक दिन अनचोकेमे दलानक बगलेमे लागल लारक ढेरीमे लगोलन्हि सलाईसँ आगि भ’ त’ जाइत जुलूम मुदा कौहुना आगि मिझाओल गेल सौंसे गौऊँआक नजरिमे गोपालसँ भेलाह सोधनपाल। २ ओमप्रकाश झा गजल १ गजल मोनक मोन सँ चलि केँ केहेन हाल केने छी। प्रेम मे अपन जिनगी हम बेहाल केने छी। करेज हमर छल उद्गम प्रेमक गंगा केँ, विरह-नोर मे सानि करेज केँ थाल केने छी। जकर प्रेम-ताल पर हम नाचैत रहलौं, हमरा वैह कहै छै एना किया ताल केने छी। एके बेर हरि केँ प्राण, झमेला खतम करू, जे बेर-बेर आँखिक छुरी सँ हलाल केने छी। अहाँक मातल चालि सँ "ओम"क मोन मतेलै, ऐ मे दोख हमर की, अहाँ आँखि लाल केने छी। ---------------- वर्ण १७ ------------------ २ टुकडी-टुकडी मे जिनगी बीताबैत रहलौं। सुनलक नै कियो जे बेथा सुनाबैत रहलौं। अपन आ आनक भेद इ दुनिया बुझौलक, इ भेद सदिखन मोन केँ बुझाबैत रहलौं। ऐ मोन मे पजरल आगि धधकैत रहल, हम पेट मे लागल आगि मिझाबैत रहलौं। अपन अटारी सभ सँ सुन्नर बनाबै लेल, कोन-कोन नै जोगाड हम लगाबैत रहलौं। दुनियाक खेला मे "ओम" बन' चाहल मदारी, बनि गेलौं जमूरा सभ केँ रीझाबैत रहलौं। -------------- वर्ण १७ --------------- ३ आकाश बड्ड छै शांत, भरिसक बिहाडि आबै छै। ओंघरैत सब एहि मे बलौं ओहार ओढाबै छै। पोछि दियौ झहरैत नोर अहाँ निशब्द आँखिक, आँखिक नोर थीक लुत्ती झट सँ आगि लगाबै छै। चिन्है छै सब ओकरा कतेक स्वाँग रचेतै आब, तखनो ओ सभ केँ बिपटा बनि नाच देखाबै छै। नंगटे भेल छै तखनो कुर्सीक मोह नै छूटल, कुर्सीक इ सौख ओकरा किछ सँ किछ कराबै छै। रोकि सकै छै कियो नै, सागर मे जौं उफान एलै, परतारै लेल देखियौ माटिक बान्ह बनाबै छै। --------------- वर्ण १८ ----------------- ४ डूबैत रहलौं हरदम हम, आर कहिया धरि इ अन्हेर हेतै। खाली मझधारे नै हेतै कपार हमर, हमरो कोनो कछेर हेतै। सब लेल बाँतर कात राखल छी कियो त' कखनो ताकत एम्हरो, खूब गजल सब ले कहल गेल, हमरो लेल ककरो 'शेर' हेतै। सुख-दुख जीवन-क्रम मे लागल, कखनो मीठ कखनो तीत भेंटै, बड्ड अन्हरगर साँझ भेलै, कहियो इजोत भरल सबेर हेतै। सब मिल भिडल छै माथापच्ची केने एकटा कानून बनबै लेल, केहनो कानून बनि जाओ मुदा ओहि मे संशोधन बेर-बेर हेतै। आब नै लुटेतै देशक वैभव, नै क' सकतै खजाना केँ चोरी कियो, सोनक चिडै छल देश हमर, पुरना वैभव वापस फेर हेतै। -------------------- वर्ण २५ ------------------------- ५ सदिखन स्वार्थक चिन्तन करैत रहै ए मोन हमर। इ गप नै बूझि जाइ कियो, डरैत रहै ए मोन हमर। अपन खेतक हरियरी बचा केँ रखबाक जोगार मे, आनक जरल खरिहानो चरैत रहै ए मोन हमर। विचार अपन गाडने दोसरक छाती पर खाम जकाँ, इ खाम उखडबाक डरे ठरैत रहै ए मोन हमर। हृदयक भाव अछि तरंगहीन पोखरिक पानि भेल, गन्हाईत जमल भाव सँ सडैत रहै ए मोन हमर। अन्तर्विरोधक द्वन्द्व युद्ध मे बाझल अछि "ओम"क मोन, अपना केँ जीयेबाक लेल मरैत रहै ए मोन हमर। ------------------- वर्ण २१ ------------------- ६ ओकर गाँधी-टोपी कतौ हरेलै, आब ओ हमरे टोपी पहिराबै छै। सेवक सँ बनि बैसलै स्वामी हमरे छाती पर झण्डा फहराबै छै। चुनाव-काल मे मुस्की द' हमर दरबज्जाक माटि खखोरलक जे, भेंट भेला पर परिचय पूछै, देखियो कतेक जल्दी बिसराबै छै। दंगा भेल वा बाढि-अकाल, सब मे मनुक्खक दाम तय करैवाला, पीडाक ओ मोल की बूझतै, जे मौका भेंटते कुहि-कुहि कुहराबै छै। जनता केँ तन नै झाँपल, पेटक आँत सटकि केँ पीठ मे सटल, वातानुकूल कक्ष मे रहै वाला फूसियों कानि केँ नोर झहराबै छै। डारि-डारि पर उल्लू बैसल, सौंसे गाम बेतालक नाच पसरलै, एखनो आसक छोट किरण "ओम"क मोन मे भरोस ठहराबै छै। ------------------------ वर्ण २५ ----------------------- ७ अन्हरिया राति मे सँ भोर कखनो निकलबे करतै। दुखक अनन्त मेघ केँ चीर सुरूज उगबे करतै। सब फूल बागक झरि गेल सुखा केँ एकर की चिन्ता, नब कोढी फूटलै कहियो सुवास पसरबे करतै। टूटल प्याली पर कहाँ कानैत छै मय आ मयखाना, प्याली फेर कीनेतै, मयखाना मे मस्ती रहबे करतै। सागर मे सदिखन बिला जाइत छै धारक अस्तित्व, तैं की धार रूकै छै, बिन थाकल देखू बहबे करतै। काल्हि "ओम"क नाम लेबाक ककरो फुरसति नै हेतै, आइ कान किछ ठोढ सँ हमर नाम सुनबे करतै। ------------------ वर्ण २० ------------------- ३ जगदीश प्रसाद मण्डल जगदीश प्रसाद मण्‍डलक तीन गोट कवि‍ता- १ समए समए संग तखने चलै छै संगी बना संग मि‍लि‍ चलबै। बाट-घाट बीच देखैत-सुनैत रस्‍सा-कस्‍सी करैत रहबै। संगी तँ ओहन संगी छी देखि‍ परेख जेहन चलबै। तेहने पग पगहा पहि‍रा आगू-पाछू चलैत रहबै। समए ने ककरो संग धड़ै छै ने ककरो छोड़ै छै। अपन-अपन भाग्‍य-करमकेँ अपने आँखि‍ये पकड़ै छै। अपन पएर अपने नै देखब पएर केना पग पकड़त। पगडंडी बि‍नु पग पकड़ने राइत दि‍न केना बनत? जहि‍ना जीवन-मरण चलै छै तहि‍ना ने दुनि‍योँ बनल छै। नि‍र्जीवेमे जीव बसै छै देहा-देही कहि‍ सुनबै छै। जहि‍ना ि‍नर्जीव सजीव देखै छै तहि‍ना सजीवो ि‍नर्जीव देखै छै। पकड़ि‍ पएर एक-दोसरक हँसैत-कनैत संग चलै छै। सजीव ि‍नर्जीवक रस नै चि‍खबै भोज्‍य रस केना बूझबै। की खाएब की पीब बि‍नु ठेकाने जीब केना पेबै। पाताल ऊपर सजल धरती सात तल पातालो केर छै। तहि‍ना सात तल अकासो केर ऊपर मर्त देवलोक कहबै छै। भूवन चौदहो बीच भरैम लहड़ि‍ समुद्र केना पकड़ब। पबि‍ते संगी हि‍हि‍या-हि‍हि‍या बाट अपन केना धड़ब। २ जि‍नगीक मोड़ पानि‍ बनि‍ पाथर जखन धरा-धार धड़ै छै। घाट-बाट बना-बना जि‍नगीये जकाँ चलै छै। जइसँ पहाड़ उठै छै सएह ने सि‍रजए अतल सागर। अपन-अपन नाओं गढ़ि‍ एक पहाड़ दोसर कहबए सागर। जहि‍ना धाराक मोड़ घुमै छै तहि‍ना ने धारो बहै छै। बाट चलैत बटोही जेना जि‍नगीक मोड़ पबै छै। पबि‍ते मोड़ मुरूछि‍ जाइ छै वि‍राग मुरूछि‍ कहबै छै। बनि‍ते मुरूछि‍ तुरूछि‍ जाइ छै पकड़ि‍ बाट एक दोसर छोड़ै छै। मोड़े ने जोड़ो कहबै छै एक दोसरक बाट केर। तेहने ठीन ने देखि‍ पड़ैत बाट-घाटक उनट-फेर। जहि‍ना-जहि‍ना घाट घटै छै तहि‍ना ने बाटो मरै छै। चलनि‍हार जेम्‍हर चलै छै सएह ने चलनसाइर कहबै छै। चलनसाइरो दुभि‍या जाइ छै काँटो-कुश जनमै छै। हवा-बि‍हारि‍ सेहो झकझोड़ए जे काटि‍ एक पेड़ि‍या बनै छै। ततबे नै यौ भाय सहाएब? पानि‍-पाथरक दोसरो कि‍रदानी बर्खा-बाढ़ि‍ बनबै छै। गामक-गाम दहा-भसा उर्वर-उस्‍सर बनबै छै। नि‍हत्‍था हाथ बौआ रहल नि‍कम्‍मा पएरो बनल छै। बनि‍ते हाथ पएर नि‍कम्‍मा जि‍नगी बोझ बनै छै। बोझो कि‍ हल्‍लुक-फल्‍लुक समुद्र पहाड़ बन्‍हल छै। बेबस बुइध बौरा-बौरा मर्माहत भेल पड़ल छै। ३ अकलबेड़ा दि‍न-दि‍नक मध्‍यांतर जहि‍ना राइति‍यो राइत तहि‍ना पबै छै। सि‍र चढ़ि‍ दि‍नकर देखए जब अकलबेड़ झटकि‍ झमकै छै। जबकल जल पोखरि‍ जहि‍ना झील-सरोवर हँसि‍ कहबै छै। तहि‍ना ठमकि‍ दि‍वा नि‍शाकर अकलबेड़ तहि‍ना कहबै छै। ठमकल हवा कहाँ कहै छै मुदा, हवा बनि‍ हवा भरै छै। भरि‍ते हवा भरैक‍-भरैक‍ हुरैक-हुरैक धार धड़ै छै। बनि‍ते धार धारण करै छै चुट्टी-पि‍पड़ी संगे उड़ै छै। जीवन-मरण सि‍रजि-सि‍रजि‍ स्‍वच्‍छ गति‍ स्‍वच्‍छन्‍द चलै छै। जल जलमग्‍न करै छै हवा तेना कहाँ करै छै। मुदा, अकास-पताल बीच शीतल कोमल प्रचण्‍ड होइ छै। धार धरतीक समेट-समेट अकास चढ़ि‍ सुरसरि‍ बहबै छै। सुरसरि‍ बनि‍ अकासगंगा नव थल हृदए पसझै छै। अपना पएरे सभ चलै छै अपने लए सेहो चलै छै। अबि‍ते भकमोड़ी-मोड़ बीच अकलबेड़ ठमकए लगै छै। बाजि‍ महाभारत कहए जेना दृष्‍टि‍कूट चौमेर बनल छै। सए-सएक बीच सजि‍-सजि‍ आगू-पाछू सेहो जोड़ै छै। ओइ चौमेरक बीचो-बीच अॅटकैक अॅटकार बनल छै। बि‍नु अॅटकारे बूझि‍ ने पेबै दसो दि‍शा ओ देशांतर। एक-दोसरकेँ जानि‍ ने पेबै बाम-दहि‍न बीचक अन्‍तर। जि‍नगीक बीच जलमग्‍न सजल भवसागर नाओं धड़बै छै। बि‍नु टपान टपि‍ केना पएबै कानि‍ कलपि‍ प्रेमी कहै छै। बि‍नु पुले रामो ने पौलनि‍ पुष्‍प-बाटि‍का बीच सीता। दि‍न-राइत चि‍कैर-चि‍कैर कण्‍ठ फाइड़ गबै छै गीता। गुण-मंत्र अमुल्‍य औषधि‍ देखा देलनि‍ सेवक हनुमान। बना मार्ग हनुमन भक्‍त पौलनि‍ देवत्‍वक सम्‍मान। भवसागरकेँ पार पबैले नाव तीन लागल छै। नारद-व्‍यास ओ हनुमान अपन नाव रखने छै। काया-माया संग चलै छै छाॅह बनि‍ रूप धेने छै। देखि‍ते छाॅह छि‍छैल-छि‍छैल छोड़ि‍ संग छि‍ड़ि‍याइ छै। तँए की ओ फेर संग छोड़ै छै हटि‍ते छाॅह लपैक-लपैक जत्र-तत्र पकड़ै छै। आँखि‍ मि‍चौनी खेल-बेल कुदि‍-कुदि‍ दि‍न-राइत करै छै। छैल-छबीली छमैक-छमैक पानि‍-पाथर बनबै छै। जे पाथर शि‍व भार उठाबए कैलाश नाओं धड़बै छै। वएह पाथर पानि‍ बनि‍-बनि‍ अगम सागर सेहो कहबै छै। जे पाथर उठबए भार शि‍व पानि‍ बीच डुमबै छै। पाबि‍ ताप सूर्जक प्रखर हवा बनि‍-बनि‍ उड़ै छै पहाड़ सागर बनि‍ते बनैत सि‍र अकास चढ़ै छै। घुमैड़-घुमैड़ अकास बीच दूत, मेघदूत कहबै छै। अलकापुरी अॅटैक-अॅटैक प्रेमाश्रु धार बहबै छै। तँए कि‍ ओ बि‍सैर जाइ छै गुण, धर्म ओ कर्मक मर्म। एक-एककेँ समेट-समेट सभ दि‍न बॅचबए अपन धर्म। बनि‍ पाथर अकास बनबै छै अकास पाथर कहबै छै। झहैर-झहैर-झहैर सदए कि‍छु ने शेष रखै छै। आँखि‍ मि‍चौनी खेल खेला जल थल नभ दौगै छै। तहि‍ना ने हृदैओ सदए अपन चालि‍ चलै छै। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। १. जगदीश चन्द्र ठाकुर ’अनिल’ २.निक्की प्रियदर्शिनी- दूटा कविता ३.मिहिर झा - दूटा कविता ४.जगदानंद झा 'मनु' -गीत-गजल ५.नारायण झा- एकटा कविता १

जगदीश चन्द्र ठाकुर ’अनिल’ गजल १ सत्य अहिंसा केर जय हो नव वर्श मंगलमय हो ।

तिमिर नष्ट हो भ्रष्टाचारक जन-मनमे सूर्योदय हो ।

कां ट-कूश मुक्त बाट हो सभ सज्जन-मन निर्भय हो ।

शिक्षा-शील-स्वभाव जाति हो मूल-गोत्र नहि परिचय हो ।

हो दहेज सं मुक्त धरा ई सभ तरि पावन-परिणय हो ।

जीवन हो संगीत प्रेम केर सुगम ताल, सुमधुर लय हो ।

अभिनयमे जीवन-दर्शन हो जीवन सुन्दर अभिनय हो । २. चालनिमे नित पानि भरै छी हम-अहां कते बरख सं संग रहै छी हम-अहां ।

अपन-अपन दुनियामे हम सभ हेरा गेलहुं एक दोसरकें कहां चिन्है छी हम-अहां ।

कते जतन सं सींचै छी नवगछुलीकें सभ दिन सपना नव देखै छी हम-अहां ।

भिनसर, दुपहर, सांझ, राति केर नाटक ई हंसि क’ कानी, कानि हंसै छी हम-अहां ।

माथक मोटा हल्लुक कहियो भेल कहां रोज मरै छी, रोज जिबै छी हम-अहां ।

काल्हुक दिन होयत शुभ दिन हमरो सभ ले’ यैह सोचि सभ राति सुतै छी हम-अहां ।

नोर आंखि केर, एक दोसरक पोछब हम चलू आइ संकल्प करै छी हम-अहां ।

२. निक्की प्रियदर्शिनी- दूटा कविता १ अहां अहीं सन

अहां अहीं सन , छोट, कोमल आ शान्त हृदय सन, सुन्दर आ सौम्यता सं प्रस्फुटित पुष्प सन, अमावस्याक धोर अन्हार गुज्ज राति सन, दुःख आ विवसता सं भरल धैल सन, अहां अहीं सन, क्रोध आ निर्दयताक अग्नि मे जरैत काठ सन, सजीव रहितों निर्जीव वस्तु सन, जानकी, मन्दोदरी आ उर्मिलाक त्याग सन, मां, बेटी, बहिन, पत्नी आ प्रमिकाक स्वभाव सन, अहां अहीं सन, आधुनिकता आ पौराणिकताक धूरि पर लटकैत पिण्ड सन, कुल आ मर्यादाक कहार सन, नदीक दू किनार सन, बढैत आ धटैत गंगाक धार सन, अहां अहीं सन, मनोरथक लेल बलिदानक निरीह छागर सन, जीवन आ मृत्युक अनुभव करैत संसार सन, दया, करूणा आ प्रेमक महासागर सन, सम्पूर्ण जगतक मातृत्वक भंडार सन, अहां अहीं सन। २ दर्द आंखि मे नहि मन मे

आंखि समबोधक अछि त‘ मन विचारक, आंखि प्रश्न अछि त‘ मन उतर, आंखिमे आशा अछि त‘ मनमे संवेदना, दर्द आंखि मे नहि मनमे होइत अछि, दर्द कें देखि आंखि त‘ बन्द भ‘ जाइत अछि, मुदा मनमे ओ अविस्मरणीय जकां जाइत अछि, आंखिक सीमा सीमित अछि मुदा मनक सीमा नहि जानि कतेक, परम्परा आ आधुनिकता एक-दोसरक पूरक अछि, आधुनिकताक देखि आंखि ओकरा मे समाहित भ‘ जाइत अछि मुदा मन परम्पराक विचार करैत रहैत अछि, मन चंचल अछि आ आंखि अति चपल, तें आवश्यकता अछि प्रेम, करूणा आ सौहार्दक ताकि मन विचलित नहि होए आ आंखि स्थिर नहि।

३ मिहिर झा - दूटा कविता १ जीवन मे चलैत चलैत कखनो ठमकबाक चाही जिंदगी मे आगू बढैत साँस लेबा ले रुकबाक चाही आगू बढैत बढैत कौखन पाछू तकबाक चाही बीतल जीवन एलबम के कोनो चित्र देखबाक चाही रेस के घोडा जेका हरदम पडेबाक नहि चाही बीतल मधुर स्मृति के जीवन शक्ति बनेबाक चाही | २ हम छी एक टा तूक्ष मना पडल रही कोनो कात कोना ताक पर राखल धूरा जमल सोचलहू जिनगी बीतल एहिना मस्ती करैयत घुमैत छलहु नेट सर्फिंग करैत छलहु देखल एक ग्रूप मनोहर विदेह नाम छल ओकर सुन्दर ओहि रोज बदलल सोच पारसमणी छुआएल जेना सम्मान नहि करू पाथर के सम्माननीय मात्र पारसमणी ४. जगदानंद झा 'मनु', -गीत-गजल पिता- श्री राज कुमार झा, जन्म स्थान आ पैत्रिक गाम : हरिपुर डिहटोल ,जिला  मधुबनी, शिक्षा :प्राथमिक -ग्राम  हरिपुर डिहटोल मे, माध्यमिक आ उच्च माध्यमिक -सी बी एस ई, दिल्ली, स्नातक -देशबंधु कालेज ,दिल्ली बिश्वविद्यालय (१) गीत लगबयौन-लगबयौन हिनकर बोली ई,दूल्हा आजु कए हिनकर बर मोल छैन,ई त दूल्हा आजु कए हिनकर बाबु बिकेलखिन लाखे,बाबा कए हजारी लगबयौन मिल जुइल कए बोली ई दूल्हा आजु कए

हिनकर गुण छैन बरभारी,ई रखै छथि दू -टा बखारी दरबज्जा पर जोड़ा बडद,रंग जकर छैन कारी भैर दिन ई पौज पान करैत छथि,जेना करे पारी भोरे उठी ई लोटा लs कs पिबए जाए छथि तारी

साँझु-पहर चौक पर जेता,चाहियैंह हिनका सबारी ई छथि मएक बर-दुलरुआ,हिनका दियौंह एकटा गाड़ी हिनकर गुण छैन बरभारी ई पिबई छथि खाली तारी हिनका पहिरए आबै छैन नहि धोती,दियौन जोर भैर साडी

लगबयौन-लगबयौन हिनकर बोली ई,दूल्हा आजु कए हिनकर बर मोल छैन,ई त दूल्हा आजु कए

(२)गजल पहड राईत बीत गेल निन्द नहि आबैए हमरा रैह-रैह कs अहाँक सुन्नर याद सताबैए हमरा

सुन्नर-मोहनी छवि अहाँक,आँखि में जए बसोने छी सिनेहिया सलोनी हमर,बड्ड तरसाबैए हमरा

घरी-घरी बजाबै छी,अहाँ अपन चंचल इशारा सँ मुइन लिय कोना कs आँखि अपन,काचोतैए हमरा

जुनि खसाबू एतेक अहाँ,अपन दाँतक बिजुडिया एतेक इजोरिया अहाँक ,आब तरपाबैए हमरा

मधुर मिलन होएत अपन,कखन कोन बिधि सँ ओही के विचारे सँ,करेजा हमर जुराबैए हमरा ------------------------------------------------- (३)गजल ज्ञानी नहि हम किछु जानी नहि अल्प वुद्धि हम पहचानी नहि

हम छी मैथिल मिथिला हमर मैथिली छोइर किछु जानी नहि

इतिहास भूगोल सँ अनभिक राजनीती किछु पहचानी नहि

कविता-गजल कए ज्ञान नहि गद्य-पद्य विधा हम जानी नहि

मोनक भाब राखि कागज पर स्नेह कि भेटत सए जानी नहि ५. नारायण झा गाम-पोस्‍ट, रहुआ संग्राम प्रखण्‍ड- मधेपुर जि‍ला- मधुबनी बि‍हार- 847408 कवि‍ता- जाड़ आबि‍ गेल जाड़ गरीब-गुड़बाक काँपए लागल हाड़ सि‍रसि‍राइत अछि‍ तन कलुषि‍त रहैत अछि‍ मन।। एखनो धरि‍ कि‍छु तन उघार फाटल-पुरानक करैत जोगार जोगार होइछ बड़का घुरक भगबैत अछि‍ जाड़केँ।। मोन पड़ैत अछि‍ ओइबेरूका राइत पूसक बुढ़-बच्‍चाक लेल होइत अछि‍ फौती जेना एकरा नोतने कि‍यो बेल न्‍योति‍ नै मानैत घर कोठा आ फूसक।। की कहुँ ओ हरशंखा जाड़केँ फाड़ैत अछि‍ हाड़केँ जड़बैत अछि‍ मनकेँ मसुआबैत अछि‍ सभ काजकेँ।। एकर अंत करैत फगुनि‍या बसात जखन उगैत छथि‍ सुरूज घटैत अछि‍ बि‍सबीसी तखन नाइच उठैत शहरो-देहात।। आबि‍ गेल जाड़ गरीब-गुड़बाक काँपए लागल हाड़ सि‍रसि‍राइत अछि‍ तन कलुषि‍त रहैत अछि‍ मन।। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। १.विनीत उत्पल- गजल २रवि मिश्रा’भारद्वाज’३.उमेश मण्डल ४.सुबोध ठाकुर १. विनीत उत्पल गजल अहाँ क आहटि लेल, ठाढ़ अछि जिनगी निनाएल आँखि भेल, ठाढ़ अछि जिनगी अहाँले तड़पि रहल छल रोम रोम सिहकाबैत आएल, ठाढ़ अछि जिनगी अहाँ क हम सदिखन बाट जोहैत छी बाइ मे बनलौं रेल, ठाढ़ अछि जिनगी चांद सन ई चेहरा, हिरणी सन चालि नाटकक ई छै खेल,  ठाढ़ अछि जिनगी सोचने रही अहाँ ताकब ऐ उत्पलकेँ मिथिला भेलि कुभेल, ठाढ़ अछि जिनगी (१५ वर्ण) २ रवि मिश्रा’भारद्वाज’ ग्राम : ननौर जिला : मधुबनी 'गजल' १ तैयार छै लुटय लेल बेटीवला त लुटेबे करतै बिन दहेज ने उठतै दोली त रकम जुटेबे करतै

प्रेम रस मे डुबल मोन आ जुरल हाथ बिच मे एतै दहेज त जुरल हाथ छोरेबे करतै

फोकटो मे जे ने छै विवाहक लायक दुल्हा खरीदार भेटतै त ऒहो दुल्हा बिकेबे करतै

पानि सँ लबलबायाल भरल छै जे पोखैर अकाल रौदी एतै त भरल पोखैर सुखेबे करतै

चोर क हाथ जँ देबै समानक रखवारि मौका भेटतै त चोर समान चोरेबे करतै

जँ भरल गिलास छै पानि सँ ऒइ मे भरबै पानि तँ पानि नीचाँ हरेबे करतै

जँ दहेज क लालच मे हाथ धरि बैसतै बाप बेटाक जरतै मोन त ऒ चक्कर चलेबे करतै

पर्दा क पाछु जे भऽ रहल छै दहेजक खेल पर्दा नै उठतै त खेलबार खेल खेलेबे करतै

माय केर कौखि सँ हटायल जा रहल बेटीक भ्रूण दहेक ने रुकतै त माय बेटीक भ्रूण हटेबे करतै २ छोडी दियौ हाथ देखिऔ केम्हर जाइ छै इजोत मे सदिखन मुदा अन्हारो मे खाइ छै

अपना सँ छोड़ा क हाथ भागै छै जोरै छै हाथ ऒम्हर जेम्हर देखैत पाइ छै

एतेक भारी खदहा कोड़ने अछि ई हाथ कोशिस केलौं भरय के मुदा नै भराइ छै

तंग अछि लोक जै नेता सं देख हाथ मे नोट ऒकरे  पाछू पड़ाइ छै ३. उमेश मण्डल १ मुँहथैर जेहने घरक लोक रहै छै घरक मुँहथैर तेहने होइ छै। जेहने घरक मुँहथैर रहै छै तेहने ने बाटो धड़ै छै। जेहने जेकर बाट रहै छै आचारो-वि‍चार तेहने होइ छै। जेहने आचार-वि‍चार रहै छै तेहने ने संस्‍कारो बनै छै। जेहने जेकर संस्‍कार होइ छै तेहने ने जीवनो भेटै छै, तेहने ने कला-संस्‍कृतो होइ छै। जेहेन जतए केर कला-संस्‍कृति‍ रहै छै मनुक्‍खक मुँहथैर तेहने होइ छै, साहि‍त्‍यक मुँहथैर तेहने होइ छै। २ हाइकू

राइत दि‍न/ कोनो नै अछि‍ हीन/ नाप-जोखमे।

गुण-दोषसँ/ एक-दोसर बीच/ अबैए फाँट।

दि‍न प्रतीक/ बनि‍ ज्ञानक अछि‍/ भेल महान।

राइत अछि‍/ अज्ञानक प्रतीक/ लोक कहैए।

दि‍नकेँ दुन्‍नी/ राति‍ चौगुन्‍नी सेहो/ लोके कहैए।

नि‍र्णए लि‍अ/ नीक संग अधला/ होइते अछि‍। ४. सुबोध ठाकुर, गाम हैंठी बाला, वाया- झंझारपुर, जिला मधुबनी। सुबोधजी पेशासँ चार्टर्ड एकाउन्टेन्ट छथि। एहेन जीवन जिबितौं अपन जीवनक हर रंगकेँ किछु उत्तम शब्दसँ कवितामे सजबितौं मोन होइए आइ हमरा, फेर किछु सुन्दर रचना करितौं! भयसँ मुक्त आ उन्मुक्त भऽ सुन्दर सपनाकेँ संग लऽ कऽ कल्पना आइ फेरसँ उन्मुक्त गगनमे उड़ितौं अपना जीवनक हर रंगकेँ किछु उत्तम शब्दसँ कवितामे सजबितौं! नहि राग रहए नहि द्वेष रहए, नहि भागम भाग नहि कोनो क्लेश रहए, मन होए हमरा हम एहेन सुन्दर जीवन जिबितौं! अपना जीवनक हर रंगकेँ.. होए कतेक कष्ट अहि भौतिक सुख लेल, जे सरिपहुँ होए भ्रष्ट आर दुख लेल, संघर्ष भरल अहि जीवनसँ, प्रतिद्वन्दताक ज्वालाकेँ हटबितौं! अपन जीवनक हर रंगकेँ काश ओ कोमल बचपन, जे छल नव किशलय दल सनक, जँ फेर घुरि कऽ आबि जेतै तँ स्वच्छन्द रूपसँ ओकरा हम सतरंगी सपनासँ सजबितौं! अपना जीवनक हर रंगकेँ नहि बुझि सकए एकरा समाज भावनासँ भरल ई हृदयक उल्लास नहि तँ अपना संगे संग एहि समाजोकेँ दू डेग चलबितौं मन होए हमरा सभकेँ अपना संग नव जीवनक सनेस दैतौं! ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। १. अनिल मल्लिक २.गणेश कुमार झा "बावरा"३.रामवि‍लास साहु १ अनिल मल्लिक ने भूत लिखू, ने भबिष्य लिखू, चलु आब अहाँ वर्तमान लिखू असगर नै, सभ संग चलू,  करब अहाँ नव निर्माण लिखू

कि भेल, औ भेल किए, कयलक के जर्जर,  आब बिसारि दियौ जाहि पर सन्तती गर्व करय, लौटेबै अतीत क मान लिखू

ने बाट जाम, ने मगज जाम, आब नै, ना, नुकुर बिसारि दियौ उमंग भरु, तरंग भरु ,आब चलतै नव अभियान लिखू

बिश्वास राखू इच्छा शक्तिपर, चलु दंभ अहं केँ बिसारि दियौ अगडा पिछडा कि होइछै यौ, लेब सभ मैथिल क साथ लिखू

बिचार रखियौ स्पष्ट, जखैन राज भेटत, तँ प्रारुप केहन? दुर करु शंका केँ अहाँ, राखब सम-भाव, देब सम्मान लिखू

गान्धीगिरी चलु पुरान भेल, अन्ना क जोर तs मनबै ने अहाँ ने रक्त बहै,  ने नोर झरै,  ने हेतै किन्हको अपमान लिखू

एफडिआई सँ खतरा कि? सहकारीता पर चलु ध्यान दियौ सबल हेतै अर्थतंत्र, अही सत्य केँ करब आत्मसात लिखू

प्रतिभा पलायन किए? नव अवसर क चलू सृजन करु नव सोच लाउ, कि लौटैथ सभ ,लगबैथ माटि क माथ लिखू

पाथर पथ पर प्रचंड अछि, डगर मानलौं उटंङ अछि सागर बान्हि सकै छी अहाँ, नव इतिहासक शुरुआत लिखू

तन सँ, मन सँ, अहाँ प्रसन्न रहू, स्वस्थ स्पर्धा मे भेद नै होय बढु आगाँ, शुभ-कामना अछि, नव बर्ष सँ नव प्रभात लिखू” !! २ गणेश कुमार झा "बावरा":   गुवाहाटी १ "संघर्ष" हम पथ के पथिक एसगरी छोडि देलक सब संग हमर मुदा हम स्वयं के नहि छोड्लहूँ... नहि निराशा सँ कहियो घबरेलहूँ नहि असफलता सँ मान्लहूँ हारि जे भेटल स्वीकार केलहूँ आ आगू बढ़ैत गेलहूँ क्याकि स्वयं पर छल भरोषा... सिखने छलहूँ हम समंदर सँ   "केनाई संघर्ष" जनने छलहूँ हम आगि सँ  "जरनाई" महशुश केने छलहूँ हम "वायु के गति" नपने छलहूँ हम "आकाश के ऊँचाई" बुझल छल हमरा सूरजक सत्य "हुनक उगनाई-दूबनाई" एहिलेल , हम नहि छोड्लहूँ कहियो  "अपन कर्मक पथ" सदा करैत रह्लहूँ "संघर्ष"....

२ अहाँ   बिनु अहाँ  केहन छी तकर कोनो खबरि नै अहाँ आएब कहिया तेकर कोनो तिथि नै.... हम एतय बताह भेल छी जिनगी हमर निराश लगैया बिनु अहाँ हमर जिनाई हमरा व्यर्थ बूझि परैया... अहाँ आउ जल्दी आउ आब विलम्ब  करू जूनि देखू! हम अहाँक बाट में अपन नयन ओछेने छी.... पल-पल हर एक पल हम अहाँ के याद करी जखन हम एकसरि रही अहाँक छवि नयन में निहारी... एकटा कथा जनै छी ? हम अहीं सँ प्रेम करै छी सपनहु में हम दोसर के नहि देखैत छी.... हम जनै छी अहाँ के हमर ई कथा मिथ्या बुझाइत होएत सएह सोचि होईया व्यथा... मुदा, एक कथा सच थिक- हमर प्रेम हम अहाँ सँ बहुत प्रेम करैत छी बहुत- बहुत प्रेम................ ३ कैंचा बिनु कैंचा नहि भेटए शिक्षा बिनु कैंचा नहि भेटए दीक्षा बिनु कैंचा नहि भेटए स्नेह दुलार बिनु कैंचा नहि भेटए मान- सम्मान | कैंचा बनल अछि कैंची कुतैर रहल अछि प्रेम - सम्बन्ध, आजु कैंचा के खातिर बेटी के होइछ प्राण -हरण | गर्भधारण सँ मृत्युकाल धरि कैंचा नहि छोडाए संग, बिनु कैंचा नहि पुरहित- पंडित ग्रहण करए श्राद्धक अन्न | मंदिर जाउ व जाउ मस्जिद बिनु कैंचा नहि हुअए पूजा संपन्न कशी जाउ वा जाउ मथुरा बिनु कैंचा नहि हो गंगा -स्नान | चाहे हुअए इलेक्शन वा सेलेक्शन बिनु कैंचा नहि कोनो एक्शन ज दुहु हाथ खोलि फेकू कैंचा फेर देखू नियोक्ताक रिएक्शन | कैंचा हुअए त' दुलारे कनियाँ बिनु कैंचा ललकारे कनियाँ धिया -पुताक त' हाल नहि पूछू नहि अपना त' ल' आबए पैंचा | कैंचा कें चारू दिश अछि चर्चा देव, गुरु, मुनि बनल अछि कैंचा|| ३ रामवि‍लास साहु हाइकू 50. मधु मखान रेहू माछक खान पानसँ मान पाग सँ बढ़ै शान ि‍मथि‍लाकेँ ि‍नशान 51. आमक फल मधुर रसदार फलक राजा सभकेँ मन भावै सभकेँ ललचाबै। 52. सावन मास रि‍मझि‍म फुहार प्रेम बढ़ाबै प्रेमीकेँ ललचाबै गोरीकेँ तरसाबै। 53. मोनक बात की कहब सजनी समय नहि‍ की भेजब सनेस दि‍ल दर्दक क्‍लेश। 54. दि‍लक रोग नहि‍ कोनो इलाज प्रेमक भूख नहि‍ ि‍मटै धनसँ नहि‍ कोनो दवासँ। 55. चंचल मन ि‍चत्‍त घबराइत मन डोलैत नयन सुखदाय प्रेमी कहै लजाय। 56. सोना कंगना पैर पयजनि‍यँा नाचै अंगना घुरि‍ घुरि‍ ताकैत हमर सजनि‍यँा। 57. फूलक डारि‍ झुलि‍ सनेश दैत देशवासीकेँ सदा प्रसन्‍न रहुँ देशक सेवा करू। 58. देशक सेवा मायक सेवा करू ि‍जनगी भरि‍ र्ध्‍मक पालन छै गरीबक कल्‍याण। 59. सुइत उठि‍ माय-बाप गुरूकेँ छूऊ चरण ि‍नत्‍य बन्‍दन करू कृपा करत देव। 60. पि‍ढ़ ि‍लखकऽ बनु ज्ञानीसँ दानी करू देशक ि‍वकास कल्‍याणक रखू उँचा ि‍तरंगा। 61. सभ अपन पराया नहि‍ कोय सूरज चँाद सभकेँ समझैत एक समान हि‍त। 62. राजा दुखि‍त प्रजा सभ दुखि‍त जोि‍गक दुख दुखि‍या सँ छै बेसी संसार अछि‍ दु     :खी। 63. सेवा करैत पथ पर चलैत आगू बढ़ैत झरना सन आगू संघर्ष सँ बढ़ैते। 64. खूनक दाग ि‍छपाय नहि‍ पावै पापक भार धरती नै उठाबै सत्‍य करै से होय। 65. प्रात:क जल पीबैत रहु ि‍नत्‍य टटका फल खाऊ जीबैत धरि‍ बनल रहु स्‍वस्‍थ। 66. रथक चक्‍का उलटि‍ चलै बाट चाक् चलै छै ठामे ठाम नचैत दुनु करै दू काम। 67. बच्‍चा बेदरू खेलैत संगे खेल कखनु झगड़ा कखनु करै मेल पढ़ै छै पाठ एक। 68. ि‍खलैत फूल देखैत भौंरा नाचै रस पि‍बैत राति‍ बि‍तबै संगै प्रेमक बात करै। 69. दि‍लक बात की कहब सजनी प्रेमक बँाध सभसँ मजबूत तोड़लौं सँ नै टुटै। 70. खूनक दाग सभसँ अछि‍ पक्‍का मि‍टैत नहि‍ कारी दागसँ भारी बड़ पैघ बीमारी। 71. सच्‍चा इंसान ज्ञान धर्म ईमान उच्‍च ि‍वचारि‍ मानवक श्रृंगार कार्य करै महान्। 72. सूर्य रौंद सँ धरती तैप तैप शुद्ध होयत सोना तपै आगि‍सँ धर्म सँ तपै लोक। 73. मोछक मान राखै छै घरवाली सेवक करै घरक रखवाली गाय छै हि‍तकारी। 74. दुर्जन साधु नौकर बेईमान कपटी ि‍मत्र ई तीनु छी शैतान क्षणमे लेत प्राण। 75. खाना खजाना जनाना पखाना केँ पर्दामे राखू जौं राखक बाहर ि‍बख बाि‍न जाएत। 76. प्रीत नै जानै ओछी जाि‍त, नीन नै टुटल खाट प्‍यास नै धोबी घाट सभ कहै छै बात। 77. बैल खींचैत अछि‍ काठक गाड़ी मनुख खींचै छै दुि‍नयाक गाड़ी की बनल लाचारी। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। १.परिचय दास-मूल भोजपुरीसँ मैथिली अनुवाद विनीत उत्पल २.निशांत  झा ३. आशीष अनचिन्हार- सेनूरदानक गीत- ४. अजीत मिश्र ५.पवन झा “ अग्निवाण” १ परिचय दास- मूल भोजपुरीसँ मैथिली अनुवाद विनीत उत्पल द्वारा बेसीकाल शब्द जखन हम विश्वविद्यालयक प्रेक्षागृह मे बैसल रही, आयल छल अज्ञेय जी, ओ करूणामय बुद्धक निवेदित अप्पन कविता केँ केलखिन पाठ हम्मर बगल मे बैसल सज्जन हमरासँ कहलक- वात्सायनजी केँ सुनि कऽ एहन लागैत अछि, जेना मौन शब्द बनल गेल अछि वात्सायन जीक मौन नामी छल। साहित्य अकादमी मे भेल छल व्याख्यान विषय छल-संगीत आ विचार संगीतक संबद्ध जेहन राग आ छंद से अछि ओहिना अछि मौन सँ, वात्सायनजीक मौन ओ सेहो चर्चाक केंद्र मे उपस्थित छल मौन कोनो निठल्लाक इतिश्री नहि अछि- ओ सकारात्मक क्रियाक सहज पूर्व भूमिका अछि। बहुधा शब्द जखन अप्पन गति बिसुरि जाइत अछि तखन मौन आगू अबैत अछि। खाली शब्द केँ हम सभ कियो विचारक अभिव्यक्ति दऽ कऽ देखियौ तँ भावमुद्र शब्दसँ बेसी बलवती आ वेगवती होइत अछि। बिहारीक नायिका 'भरे भौन मे नैनन ही सौं बात' करैत अछि। कहैक अंदाज देखू- कहत नयन रीझत-खिझत भरल भौन मे करैत अछि नैनन ही सौं गप, सन्नाटाक एकटा छंद होइत अछि, एकटा छंद मौनक, मौन मे अपंगता नहि होइत अछि- यानी समर्थ केँ मौन नीक लगैत अछि बिलकुल चुपचाप घाघराक तट पर सांझक बेला मे पीब लियो शब्दहीन हम चहलकदमी कऽ रहल छलहुँ ओतय की कोनो छौड़ा (बहलगंज चाहे दोहरी घाट मे कत्तौ हएत) विरह मे छल- बालू आ  रेत पर डेग कोना चलब बालूक रेत भगवान भास्करक रश्मिसँ तरेगन जेहन चमकि रहल छल। मिनट-दू-मिनट बाद सूर्य देवता भारतसँ लऽ कऽ अमेरिका धरि क यात्रा पर चलि जाएत। हम अपलक देखि रहल छी- एतबा सोना! रश्मि स्वर्ण!! बजारमे सोनाक दाम जेत्ते हुअए ई सोना तँ अमूल्य अछि! आजुक पेशेवर विचारक बहुमूल्य विचार दैत अछि मुदा अमूल्य नहि! मुदा विचारे टा सँ की हएत समकालीन दुनियाक संकट ई अछि जे विचार आ कर्मक सामंजस्य नहि अछि। शुभ आ लाभक समन्वय नहि अछि अहिसँ किताब पुस्तकालयमे राखल कुहरि रहल अछि आ विचार कर्महीनताक चक्रव्यूहमे। पैघ-बुजुर्ग कहैत रहथिन सिद्धजन बड़ नीक नहि देलक भाषण, ओ जे कहलखिन नीक करबाक केलक प्रयास अहिसँ हुनकर शब्द ब्रह्म बनल ब्रह्म कोनो वायवी अवधारणा तऽ नहि अछि। ओ तँ अपना सभक आत्मीय जरूरत अछि जेहन शब्द, तेहन मौन। अहि संसार मे जखन किछु मंगल आ शुभ होइत अछि ओकर एकटा छन्द होइत अछि माघक कुहासा छेक लेलक बाट हम ओकर पार करबाक प्रयास केलहुँ! राति मे बैसलहुं तँ बुढ़िया माय साग-भात देलक खाइ लेल। हम ओकर चुल्ही पर गरम करैले कहलहुं हम कोनटा लग बैसि गेलहुं। तखैन घर भरन आयल आबैत किछु कहलखिन हम जानि लेलहुँ जे ओ गाम भरि क गपक खबर राखैत अछि किछु लोक हुनका नारदो कहैत अछि। ओ कहैत अछि- 'ऐँ यौ, बाबू सुनि लियौ जे परमुआँक घर मे 'हुड़ार" आयल छल," ओकर 'हुड़ार" शब्द पर जोर दैत हम बुझि गेलहुं जे मामला किछु आओर अछि, हम मौन रहलहुं, ओ फेर कहब शुरू केलक- देखू नहि, गाम मे यएह आइ-कालि भऽ रहल अछि, आब  अप्प्न सभक कोना इच्जत बचत। दोसर दिन कियो हमरा कहलक जे अपने घरभरना परमुआंक घर मे घुसल छल। हम सोचलहुं: शब्द सं धोखेबाजी अहिने कएल जाइत अछि। हम जौँ नाम लऽ लैत छी तैँ भऽ जाइत छी बदनाम, ओ कत्ल कऽ दैत अछि तेँ चर्चा नहि होइत अछि। मारीच सेहो लेने छल शब्दक सहारा अश्वत्थामाक केस मे सेहो लेल गेल छल, जौ एहि के आश्रय नहि लेल गेल हएत तखन गप ई नहि कहल जाएत 'कारण कवन नाथ मोहि मारा, मैं बैरी, सुग्रीव पियारा।" --------------------------- ई कहि कऽ हम मारीच चाहे बालि कऽ वकालतनामा नै प्रस्तुत करै जाएत. ओना माइकेल मधुसूदन दत्त मेघनाद केँ पक्ष लेने रहथि. हम तँ मात्र शब्दक आचार-विचारक प्रश्न खा कऽ रहल रही हमरा सभक उपस्थिति शब्दक बाहरी आवरणक लेल खाली नै हेबाक चाही. हमरा सभकेँ ओकर न्यूक्लियस चिन्हबाक चाही. शब्दक छलना-वर्जनाक एगो सात्विक प्रतिक्रिया देबाक चाही. सभ सँ नीक अछि : मोनकेँ मधु बना लेलक - मौन मधु भऽ जाए। गप आ अपन बीच क तटस्थता जरूरी अछि. वात्स्यायन जी अपना आ देवताक बीचमे दूरी राखैक गप कहने रहथि। आइ देवता सभक प्रति नव दृष्टि बनि रहल अछि। उपिनषद् मे एक ठाम तर्क  केँ गुरु  मानल गेल अछि। आधुनिक युगक नव देवता क भूमिकामे चिरंतन दृष्टिए भऽ सकैए शमशेर बहादु सिंहक शब्द लेल जाए - बात बाजी, हम नै भेद खोलत बाते। हम शब्द आ मौनक द्वन्द्वमे पड़ि कऽ सैकत भूमि पर नै जानि निकलि गेलौं कतऽ ! किछु गोटे कहि सकैए कि जतऽ नै पहुँचैए रवि ओतऽ पहुँचैए कवि.... किन्तु हम तँ एहेन ठाम देखने छी जतऽ नहिये कवि पहुँचैए नहिये रवि ! सरयूक तटपर बनल मलाह आ पंडाक घर देखै छी ... सिमसिमाएल .... नै ऐठाँ कहियो कवि पहुँचल नहिये रवि. बालूक चमकैत कण-राशि हुनके आमंत्रण देलौ. २ निशांत  झा, माँ  श्रीमती मंदाकिनी देवी (प्रधानाध्यापिका म. वि.) (साहित्याचार्य), पिता श्री प्रद्युम्न नाथ झा (समाजसेवी), घर सिंगियौन, प्रखंड राजनगर, जिला मधुबनी, १ कविता दाँत मे फँसल अड़बेंगल आ क्लिष्ट शब्द क काफिया नै थिक कविता, जिंदगी क खराब अनुभव जे कारी चट्टान क निच्चा पीअर रेत सँ डिरिया रहल अछि , गर्म चिटठा जकाँ अछि ऐ कविता क आकार कोनो समाज क कद सँ पैघ तँ नै मुदा ओइ समाज क न्याय सँ पैघ अछि जे अन्हरिया राइत मे भुइक रहल कुकुर क वफादार होबक प्रमाण पत्र दैत अछि की अछि कविता मासिक धर्म सँ निवृत्त स्त्री क चेहराक हर्ष ई तँ देशक दुर्भाग्य अछि आकि ऐ देशक कविक या तँ माशूकपर कविता लिखि रहल अछि या बसंत पर... सरकारी आ ईमानदार जमादार क आँइख जे कोनपर पड़ल लाल पीक जकाँ ललचाबैत अछि आ हमर धर्म बरगद क छाहरि पर शिक्षा दैत अछि " ई जे कोना पर लाल अछि" सूरज क अह्निे गुलाल अछि " लिखनाइ एतेक खराब नै की बुराइक स्थापना कएल जाय आ हमर भरती ओतय निःशुल्क भऽ जाय फेर अहाँक लेल की पथ बाँचत .. २ श्रम सोचलौं हम एक दिन संसार मे सैर करू अपन कल्पना क लहर पर धीरे - धीरे हेलऽ लागू तखने विचार आयल मोन मे कल्पना सँ ऊपर उठू अपने चलइते चलइते धरती पर पएर रखू

जखन धरलौं पग हम पृथ्वी पर किछु अहसास भेल एहेन ज़िंदगी क चाइर दिन आ , तैयो जीवन केहेन ?

एतऽ नजरि उठेलौं तँ पेलौं कृषक श्रम दान कऽ रहल छल कानी हाथ रुकइ नै छल एहन मेहनत करै छल .

आँइख धँसल छलय भीतर भुखायल पेट पिचकि रहल छल पसीना क कंचन बूंद सँ तन हुनक चमैक रहल छल .

देख क हुनक ई हालति एक आघात भेल एना मोन पर जीवन पाललक जग केँ जे रक्त देखैत ओकर तन पर

किछु पग आर चललौं आगाँ एगो आलीशान भवन ठाढ़ छल श्रमिक क शोषण कऽ कऽ कए अपना केँ गर्वित बुझि रहल छल .

कहलक गर्व सँ ओ एना ई सभ हमर कर्मक फल अछि कयलक ज़िंदगी भरि श्रम ओ लेकिन तैयो निष्फल अछि .

तखन पुछलौं हम ओकरा सँ सुन तोहर कर्म केहेन छौ हँसि कऽ बजल ओ एना सबटा धन केँ आइड़़ मे छुपाएल अछि .

सोचलौं हम धन केहेन अछि जे सभ किछु छुपा लैत अछि पाप केँ पुण्य आ पुण्य केँ पाप बना दैत अछि .

सोचैत सोचैत गाम क दिश बढ़ल कदम कि लोककेँ केहेन अछि भरम एक दिन अहिना फेर ओही दिश पग बढ़ि चलल जतय कृषक आ भवन छल मिलल .

देखलौं ओतय हम ----- कृषक मग्न भऽ काज कऽ रहल छल पसीना केँ पोइछ ओ हर जोइत रहल छल दृष्टि गेल भवन पर तँ बझलौं कि मात्र एकटा खंडहर ओतय ठाढ़ छल .

ओ देखि कऽ हमरा ओकर बात बुझइमे आयल कि कर्म क अनुसार आइ तूँ ई फल पेलें हमरा मुँह सँ ओइ समय यएह शब्द निकलि गेल नै ओझरायब ऐ भ्रम - जाल मे नै तँ इंसान तँ एतऽ छलल गेल . ३ आशीष अनचिन्हार सेनूरदानक गीत कारी केश बीच कोसी-कमला सन सींथ ताही मे देथिन्ह सेनूर अनचिन्हार रे---------- अपन धियाकेँ पोसने छी बड़ा रे जतनसँ करेजा साटि रखने छी बड़ा रे जतनसँ दुलहा आगू आब अहूँ रखबै विचार रे सेनुरेबै जते नीकसँ यौ दुलहा बाबू रहब दूनू तते नीकसँ यौ दुलहा बाबू विष्णु बनि करिऔ हमर ललनाकेँ उद्धार रे सियाराम सन जोड़ी जुगल बैसल आँगनमे देखबा लेल सगरो टोल पैसल आँगनमे पाहुन सेनुरेलथि भेलथि चिन्हार अनचिन्हार रे...... ४ अजीत मिश्र आ ह्लाद भरल हो आगत ई नववर्ष, ग मन करी चहु दिस, सदा सहर्ष। त न्मय भए करी पूर्ण सभ इच्छा, स्वा गत नववर्षमे, स्वत: मनक सभ इच्छा। ग गन-धरा सभ ठाम, गुँजए अहाँक जे यश, त गमा अगबे भरल,   रहए शत्रु सदा विवश, न ग पर साजए यश-प्रतिष्ठा, हो परिपोख सुयश। व त्सर-वत्सर सदा बढ़ए, यश- मान- प्रतिष्ठा, सा ल हजार-हजार रहए, वंश-मान अधिष्ठा। ल क्ष्य सदा परहितकेर, तेँ अपनेँ विज्ञानी, क र सेवामे सदा निरत, हे अभिनन्दन सुज्ञानी। ५. पवन झा “ अग्निवाण” चलियौ अप्पन गाम, जगत-जननी सीता के धाम विस्मृत जुनि करियौ मिथिला के यौ मिथिलाक संतान

घूमि देश-परदेश कमेलौं खूब टका, सम्मान देशी सा साहब तक बनलौ, बदलि अपन परिधान प्रतिभा के कायल अछी दुनिया खूब करे गुणगान लेकिन सोचियौ मिटा रहल अछि मिथिला के पहचान चलियौ अप्पन गाम, जगत-जननी सीता के धाम

खेती-बाड़ी छूटल गामक, फूटल घर, दलान भाई-भाई में माथ-फोरौव्वल , लागैथ शत्रु समान अपन बोली तीत कतेक प्रिय अछि बोली आन ई मूरखता के के रोकत अस्त भेल दिनमान चलियौ अप्पन गाम, जगत-जननी सीता के धाम

जनकसुता के नगर में देखू नारी के अपमान जत रचाओल गेल स्वयंबर ओतय दहेजक दाम कानी रहल अछि मिथिलाक नारी बिका रहल स्वाभिमान कोन विधि स चुका रहल छी संस्कृति के प्रतिदान ? चलियौ अप्पन गाम, जगत-जननी सीता के धाम

और कतेक दिन सुतल रहब जागू यौ श्रीमान आबो नहीं जागब त बुझू संकट हैत महान विकसित करियौ मिथिला के आ राखू अपन मान तखने भावी पीढ़ी करत मिथिला के जयगान चलियौ अप्पन गाम, जगत-जननी सीता के धाम ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। १. प्रवीण नारायण चौधरी २.डॉ॰ शशिधर कुमर ३.नवीन कुमार "आशा" ४.मनीष झा बौआभाई १ प्रवीण नारायण चौधरी १ जाड़मे प्यार!

एहेन कठोर कनकनी से आउ मोरा हृदय लागू ना.. ललना हे! बड़ खन भेल इ दूरी से आउ मोरा हृदय लागू ना!

माघक जाड़ो बड़ा जुल्मी से आउ मोरा हृदय लागू ना... ललना हे! सदिखन सुमिरी ओ गर्मी जे आउ मोरा हृदय लागू ना!

धैन इ अन्हरिया हे राति जे अहाँके हम जी भैर देखी ना... ललना हे! नींद के मारिके गोली से आउ मोरा हृदय लागू ना!

बड़-बड़ सोचल परखल कहिया इ जाड़ो औतै ना... ललना हे! एहेन प्रेम केर पलमें से आउ मोरा हृदय लागू ना!

एहेन सुहावन संगी के स्नेह केर मौसम इहो ना.. ललना हे! जी भैर देखु न हमरो से आउ मोरा हृदय लागू ना! समय के धार अनुसार चलैत छी हम सभ, शिक्षा के महत्त्वके आत्मसात करी हम सभ, संसार में सभ के अपन-अपन भूमिका छैक, अपन कर्तब्य के आत्मसात्‌ करी हम सभ। २ चोर के चित्त अछि चान पर!

कोन चान प्रिय?

जेहि चान के चिन्हय चोर टा, ओ चान के चिन्हू चित्त सँ प्रिय!

धूर छोड़ू मजाक! सीधा कहु ने!

जुनि चित्त के चंचल एना बनाउ प्रिय जे चोर भागय जान सँ!

इ चोर-चोर करिते-कहिते, मन हमर आर ने दुखाउ प्रिय!

सुनु प्रिय! इ चोर केओ आन नहि बस मन के भीतर प्रेम थीक!

ओ चोर हमरा चिन्हल अछि, एहि चोर के संग हमहुँ थीक!

बस मन मिलय - ओ चोर कि, कि हम कि, कि आर कि!

बस अहाँ छी, बस हम छी, नहि आर किछु, नहि आन कि!

प्रेमी-प्रेयसीके बीच वार्तालाप के मैथिली रूप!

सप्रेम भेंट! नव-विवाहित युगल-प्रेमी सभकेँ प्रति समर्पित! ३ तुँ तूही रे, हम हमहीं छी, तुँ तूही रे, हम हमहीं छी, बिन हुनकर रे कि तू हम कि?

बाजब मोरा तोरा प्री लागौ, वा अप्रि लागौ, पर बाजी हम तऽ सच बाजी!! सच वैह होइत अछि जेकरा सभ माने, यदि तू मानें वा नहि मानें!! पर सच अछि कि आ झूठे कि, बिन हुनकर रे कि तू हम कि?

तुँ तूही रे, हम हमहीं छी, बिन हुनकर रे कि तू हम कि? ४ सभ सँ सस्ता कविता!

देखि रहल छी हाट-बाजार - घूमि रहल छी गाम-शहर, धूम मचल अछि, शोर मचल अछि, सभ सँ सस्ता कविता!

इ कविता जे केवल रचब, केवल वाचब, केवल लिखब, करय बेर में नाँगरि सुटका कैँ-कैँ करैत पछुवैत परायब, एहेन भूस के बखाड़ी सँ नहि पेट भरत यौ मैथिल कवि, रचनामें जँ दम नहि होइ तऽ अजगर बनल अजोधक भीड़, धूम मचल अछि....

जहाँ दू दिनक फुर्सत भेटत लिखब कोनो रचना नीक, अपना दही के खट्टा सुनि के पियब मेर्चाइ के झोरे तीख, इ नहि सोचब जे रचना सँ रचल जैछ सुन्दर संसार, लोकके जीवन के हर क्षण में जेकर बनैछ सुन्दर आधार, धूम मचल अछि.....

पथियामें जेना काँकौड़ खिंचय टाँग दोसरके सुनु यौ मीत, अगबे गप के भंडारा सऽ अनोन बनल मिथिलाक सब रीत, जौं कर्ता आब वक्ता बनता कहू जे करतै के सभ काज, अहिना सभ दिन कविता रचबै कहू जे चलतै कोना के राज.... धूम मचल अछि..... ५ नीक लगै तोहर मुस्कान

आँखि खोलि कि हम आइ देखी प्रिय, बन्द आँखि अहाँके हम देखैत छी। सुन्नरि हे सलोनी संगिनी प्रिय, ... नीर प्रेमक अहींके हम पिबय छी।

पहिले देखल हम सपना में, ताकि-ताकि थकल मन विपना में। चुपचाप रही बस नयन हेरी, कहियो तऽ देखब हम विपना में। जीवन के अनेको पल बितल, बस आइ देखि हम फूलल छी। आँखि खोलि कि हम.....

जानी नै एहेन कोन जादू छै, आँखि देखि एना हम डूबल छी। इ केश घना रेशम अछि प्रिय, मदमस्त छटा सँ पागल छी। आइ सभ सुख के ओ सागर में, भरने हम सुधा केर गागर छी। आँखि खोलि कि हम....

प्रेमक मन्दिर अछि अहीं सँ बनल, मूर्ति देवी के निहारैत रही। कल जोड़ि विनय बस एतबी टा, जिनगी भैर जे सिधारैत रही। कहियो जँ मिलन केर आश टूटय, तैयो हमरे संग नेह भरी। आँखि खोलि कि हम....

देखू आइ कपारो ‘किशोर’क, जीवन रहितो ज्योति चलि गेल। तैयो ‘ज्योति’ केर ज्वाला सँ, जीवन के रौशनी अछिये बनल। ईशक लीला अछि एहेन अजीब, जिनगी के मोल लेल कायल छी। आँखि ....... ६ माय माँगैथ खून

जखन खून हेतैक विश्वास के, जखन अपमान होयत मायकेर अस्मिताके, जखन लूटत केओ स्वाभिमान के, तखन माय के आँखि सँ ज्वाला निकलय, आह्वान करय सभ पुत्र सँ, जागे बेटा आब जुनि रहे सुतल, उठा हाथ में सत्यके हथियार, बचा मान तों माय के, हमलावर के कर पहचान, राख स्मिता निज-भूमि के, बहुत भेलहु रखलें बन्धक तों, मायके लहठी ओ चूड़ी, आबो ला एकरा तों वापस, पटना के बेईमान से, जुनि बिगड़े अपन इच्छा सँ, नून-तेल में कय ले गुजर, कोनो जरुरी नहि छौ तोरा, पटना-मगध-भोजपुर मजबूर, अपनहि धरती सोना उपजय, बनो अपन सुन्दर भरपूर, आब बिहार के माया छोड़े, बनो मिथिला राज के पुर, कर सभ नाका बन्द ओकर जे, मानय नहि छौ बात, चलो प्रशासन अपनहि अपन, छोड़ हेहर के बाट, बन्द करे सभ मौगापन, बुझ पहचान के असली मोल, पूर्वाग्रही पड़ोसी सभ छौ, कर ने एकर आगू विश्वास, तोरे संपदा सऽ बनल व्यापक, तोरहि सभ पर करे ओ राज, एहेन राज के जंजीड़ तोड़े, बचो माय के आबो लाज, एहि लेल बहो आब रक्तके धार, मिथिला माय मनतौ आभार, बेर-बेर हमर क्रन्दन सुन, माँगय माय आब तोहर खून। ७ अटल अटल अहाँके अटलता सऽ बनल भारत के नव ओ रूप, काश! एक बेर फेर बनितौं एहि पैघ प्रजातंत्रके अहीं भूप!

पहिले बेर जखन १३ दिनक राज आयल छल अपनेक हाथ, मुश्किल में राखल गेल घेर अपनेकेँ नहि भेटल सभके साथ!

लेकिन ओहि अपमान के स्मृतिमें रखलक देशक जनता, बहुमत सँ अपनेकँ जिता के देलक प्रधानमंत्रीके मान्यता!

अबिते देरी जखन पोखरण परीक्षण कयलहुँ अपने शानसँ, विस्मित फाटल अचरज सँ तकलक सभ बड़का ध्यानसँ!

रुकलहुँ कहाँ अपने, राखि समेट सभकेँ चलेलहुँ नीक राज, घरके हो वा बाहर के हो देलहुँ नव गठबन्धन के नीक राह!

आइयो राष्ट्र चलि रहल अछि अहींक पथ-प्रदर्शन पर श्रीमान्‌, सदिखन सुन्दर बनल रहय आ दहिन रहैथ ओ ईश महान्‌!

लगले रहल एक शख हमर जे देखितहुँ अपनेकेँ हिया-जी भैर, जानि कतय छी अपने कि अछि हाल इ जाने तरसी बेर-बेर!

बस एक बेर - बस एक बेर, दर्शन दियऽ यौ नेता महान्‌, बुझब जे दर्शन भेट गेल - श्री कृष्ण आ श्री राम भगवान्‌!

अपनेक स्नेही आ प्रशंसक - प्रवीण चौधरी ‘किशोर’

परमादरणीय अटल बिहारी वाजपेयी जी प्रति समर्पित! ८ जागल छी कहिया सँ आदरणीय अहाँके आदर के बड रास भेटल छल कारण यौ! गुण बुझि अहींकेर जीवन के कयलहुँ बहुत किछु धारण यौ!!

पग-पग जीवनके बाँचि रहल हमहुँ जागल छी कहिया सँ! माय-बाप, श्रेष्ठ सभ अपने सन देखि रहल छी जहिया सँ!!

बच्चामें नहि इ बूझि पेलहुँ कि नीक हेतै - कि बेजा हेतै! बढिते रहलहुँ बुझितो रहलहुँ कि रजा हेतै - कि सजा हेतै!!

स्वाध्यायक समुद्रमें जखनहि लागल पहिलुक गुरकुनियाँ! कि जलमें थलमें नभ में अछि से भेटय लागल खुरचनियाँ!!

गीता के गीत बड़ मूल्यवान्‌, सीखबय छै के छथि ईश महान्‌! नियत थीक कि, कि अछि नियति दर्शन भेटैछ एक भगवान्‌!!

जौं कर्म हमर कोनो घटल होय तँ बस क्षमा करब तुच्छ बुझिके! बड़ चूक होइछ जँ हमरो सँ बस बिसैर जेबै हमर छूच्छ देखिके!!

अपनेक अनुज ओ पुत्रवत्‌ - प्रवीण ठाड़्ह अछि कल जोड़ि के! बस माथ हाथ अपनेकेँ होइ - पूर्वाग्रह के सभ बान्ह तोड़ि के!! ९ अपन गीत

रहैत छी अपनहि मे डूबल, अक्सरहाँ बेसी काल, कनिको फुर्सत होइते देरी, ताकय लगै छी माल।

ओ माल केहेन, जे केओ हमरा, पूछय हमर हाल, गीत हमरहि गाबय, छोड़िके सभ अपनहु जंजाल।

रहैत छी अपनहि...

ई दुनिया बनियां अछि बनल, बिसरी ई हर बार, होशियारी हमरो सऽ बेसी, सभ के लगल अछि द्वार।

रहैत छी अपनहि.....

एक रती के बात होइ तऽ, खींची खिंचबाबी हम फोटो, अपन बखानी अपनहि गाबी, बिसरी बाकी सब संसार।

रहैत छी अपनहि....

केओ पूछय वा नहि पूछय, अपनहि बाजै छी हर बात, पसिन्न पड़ल तऽ खूब नीक लागल, वरना मारी लात।

रहैत छी अपनहि.....

इ हम नहि हमर अहं छी भैया, बनैत अछि हंस्सा रार, खुब मजा लूटय अछि हरदम तेकरे बुझय ई संसार।

रहैत छी अपनहि.....

समय सीमित बुझू मूढ प्रवीण - जुनि बहू अहिना बेकार, करू जतेक संभव अछि एहिठाम, बिसरि अहं दूमुँहा धार।

रहैत छी अपनहि..... १० विडंबना

इ अन्हरिया एहेन किऐक जे आँखि निपोरि सुतय लेल मजबूर करैछ?

रात्रि अबैत शरीर थकैत बिछाओन में जा नींद गाबय लेल मजबूर होइछ?

भिनसर होइते सुरुज उगैते पुनः इ निंद्रा जानि कतय अछि भगैत सभके,

जागृति होइत पुनः दिन भैर घूर-दौड़ होइछ सभ नित्यकर्म आ धर्म होइछ।

कि चाँद अपन चन्द्ररस सँ बजबैछ निनिया आ सूर्य आनैत सौर्य अछि?

कि निष्क्रियता झुझुवान करैछ आ सक्रियता सभ कीर्ति महान्‌ करैछ?

हे मैथिल! जुनि बनू कुंभकर्ण, बरु जोगी बनि करू नित्य घूर जाइग राइत भैर;

जराउ झूठ शान ओ दंभ जे हरदम चान मलिन बनि हरण जागृति के करैछ। ११ मैथिल! अहाँ जुनि पड़ू पाछू।

स्मृति करू ओ कीर्ति महान्‌, जाहिसँ अयलाह मिथिला राम, जतय विदेह सम्‌ नृप छथि भेल, से मैथिल कोना पाछू भेल?

सरस्वती जतय बसि हर कंठ, मैथिली बोली सरस ओ मीठ, समृद्ध पुरखा सबहक शान, से मैथिल कोना सहय अपमान?

सुसंगठित समाजिक संरचना, आपसी प्रेम ओ मधुर सम्बन्ध, पछड़ैत जन के सम्हारैत बढनै, से मैथिल कोना सिखलैन टूटनै?

घर फूटै तऽ लूटै गंवार, भाइ-भाइ सभ अपन संसार, मिथिला बनि गेल सुन्न मशान, से मैथिल कोना राखब जान?

जागू यौ जागू! मैथिल बनू होशियार, जुनि बेचू अपन मायके दुष्टक हाथ, सभ दिन दुर्जन मिथिला के विरुद्ध, तेहेन संग कोना गढी संगत शुद्ध?

आइ बँटल दू देशक बीच, तैयो अस्मिता बनले रहतै, केवल बनू अहाँ होशियार, तखनहि उतरब पार मझधार।

मैथिल! जुनि पड़ू पाछू। १२ मिथिला माय करैथ पुकार

बेटा! जागु आबो बनु होशियार! दुश्मन के करू खबरदार!

दोसर भावे जड़ैछ अहाँ सँ, हुनका संग करू मृदु व्यवहार।

स्वयंमें जे अछि कायर घनघोर, माइर भगाबू कर्महि धार।

दूर भगाबू दहेज के कूरीति, मानू बेटी सभ के सुन्दर नाज।

मातृ ऋण सँ उऋण बनू, करू जगत्‌ में सुन्दर काज।

मिथिला सदिखन उपमा बनल, आइयो चलय सब उच्च संस्कार।

राखू लाज माय के आबो, एकत्रित बनि राखू ताज।

मिथिला माय करैथ पुकार! १३ माँ, धन्य तू जे हम छी! धन्य हमर भाग जे तू हमर जननी छें। धन्य तोहर तप गै माय जे जीवन बनल सफल अछि। बिना तोहर कर्ज हम तऽ दुनिया के नहि देखितौं माय। तोहरे दूध के अमृत सऽ अमरता भेटल लगैछ आय। दुःख में रहि तू कोना के पोसलें इ हम कि बखान करी। एक बात हम बुझैत छी, तू सदिखन रहलें एक समान। त्याग करैत बलिदान करैत अपन मन के रखलें तू सम्हारि। यैह तपस्या तोहर गै माय आय बनेलक हमरो शान। माँ, धन्य तू जे हम छी।

बाप हमर रहलथि बड़ अयाची, नहि रखलन्हि कोनो मान-अपमान। समत्व योग के गुण सँ भीजल, जपलन्हि सदा मन सऽ ईश-महान।

माँ, धन्य तू जे हम छी। १४ माय माँगैथ खून

जखन खून हेतैक विश्वास के, जखन अपमान होयत मायकेर अस्मिताके, जखन लूटत केओ स्वाभिमान के, तखन माय के आँखि सँ ज्वाला निकलय, आह्वान करय सभ पुत्र सँ, जागे बेटा आब जुनि रहे सुतल, उठा हाथ में सत्यके हथियार, बचा मान तों माय के, हमलावर के कर पहचान, राख स्मिता निज-भूमि के, बहुत भेलहु रखलें बन्धक तों, मायके लहठी ओ चूड़ी, आबो ला एकरा तों वापस, पटना के बेईमान से, जुनि बिगड़े अपन इच्छा सँ, नून-तेल में कय ले गुजर, कोनो जरुरी नहि छौ तोरा, पटना-मगध-भोजपुर मजबूर, अपनहि धरती सोना उपजय, बनो अपन सुन्दर भरपूर, आब बिहार के माया छोड़े, बनो मिथिला राज के पुर, कर सभ नाका बन्द ओकर जे, मानय नहि छौ बात, चलो प्रशासन अपनहि अपन, छोड़ हेहर के बाट, बन्द करे सभ मौगापन, बुझ पहचान के असली मोल, पूर्वाग्रही पड़ोसी सभ छौ, कर ने एकर आगू विश्वास, तोरे संपदा सऽ बनल व्यापक, तोरहि सभ पर करे ओ राज, एहेन राज के जंजीड़ तोड़े, बचो माय के आबो लाज, एहि लेल बहो आब रक्तके धार, मिथिला माय मनतौ आभार, बेर-बेर हमर क्रन्दन सुन, माँगय माय आब तोहर खून। १५ एखन हम कतय रही, एखन हम कतय एलहुँ एखन हम कतय रही, एखन हम कतय एलहुँ, आकाश सऽ सीधा धरती, धरती सऽ पुनः पाताल, इ मन हमर कत चञ्चल अछि, जानि कतेक भागय ई, मातृभूमिक सेवा - संस्कृति लेल कर्म - धरोहर के संरक्षण, क्षण में बदलि गेल सभ विचार, देखि एक नग्न तस्वीर, कि हम एतेक धृष्ट छी? कि हम एतेक भ्रष्ट छी? जीवन के किछु होइछ अर्थ बुझू, मिथ्याचारके बंद करू। १६ अहं करैछ दुइर।

एक रत्ती नाम भेल, बिसैर न एलौं घूइर, याद राखू फल्लाँ बाबु, अहं करैछ दुइर!!

दुनिया के छल, आश इ लागल, बनला गौंआ बड़का लोक, पलटि नहि सुनलौं, रखले रहल, हुनक प्रेम के रंग अनमोल।

एक बेर - दु बेर किछु बेर अपन संग दैत जे कर्ज देलहुँ, अवसरपर सभ बिसैर के कर्तब, कैलो पर पैन फेरि देलहुँ।

हरदम अपन नाम के मदमें चूर रहब तऽ खसब एक दिन, तहिया कतबू बजेबै लोक के देखत सभ नजैर सिर्फ घिन।

बड़का लेखक कलाकार या विद्वानो के एहसास इ अछि, जीवन के क्षण अलग रूप में बदलैत अन्त अवश्ये अछि।

सोचू! किछु नहि जाय संग में, केवल रहय कीर्ति अजीब, धनिकाहा के सभ केओ मित्र, श्याम मित सुदामा गरीब!! १७ जयकारा चारू कात मातारानी के जयकारा के शोर छै। शक्तिदात्री माँ जगत्‌ के जननी, हिनकहि सगरो जोर छै॥

अहु जगह ऊपर सभ केओ, पूजा करैत मगन छथिन। एक-दोसरके शुभकामना दैत, सुमिरन सभ करैत छथिन॥

चारु कात ....

नारी शक्ति के देवी शक्ति, मानय जाउ यौ भाइ सभ। स्वच्छ समाज के निर्मात्री के, पूजै जाउ यौ भाइ सभ॥

चारु कात....

दहेज के मारि सँ नारीके, अपमान करैत अहाँ लाज करू। जनिक संग सँ अगिला पीढी, त्राण करैत अहाँ लाज करू॥

चारु कात....

मातृभूमि मिथिला वा कोनो, तेकरो अहाँ निज माय बुझू। जहिना माय के पूजा करी, जन्मभूमि लेल किछुओ करू॥

चारु कात.....

अपन जननी सत्‌ शक्ति स्वरूपा, दूधके कर्ज केँ मान बुझू। हिनक वृद्धापन या होथि ऊपर, सेवा मिलि सपरिवार करू॥

चारु कात....

अन्तमें हमर इ विनती यौ बाबु, बेटा बेटी एक बुझू। भेद केने ओ दबल बनल अछि, दुर्गा जी के भक्ति करू॥ १८ अफसोस अफसोस जे केओ सच मंशा नहि बुझैत किछु बाजि देलक। जे गैर देलक ताहु लेल नहि बल्कि धमकी सऽ झाड़ि देलक॥ अफसोस जे केओ सच ....

सच के शक्ति नहि बुझय केओ, बस मन के बुद्धि महान्‌ बुझैथ। पर सद्‌कृपा सत्‌ सदिखन होय, शरणागत के भगवान्‌ सुनैथ॥ अफसोस जे केओ सच....

मन कानि उठल के मैथिल आइ, मन हमर बहुत हद तोड़ि देलाह। हम कि सोचलहुँ, ओ कि सोचलाह, विश्वास के पूरा घोरि देलाह॥ अफसोस जे केओ सच....

मन गढंत बात के दाम नहि होइछ, कतबू चिचियाय बजैथ केओ। असली के शान कथमपि नहि घटैछ, कतबू घिसियौर कटैथ केओ॥ अफसोस जे केओ सच....

ईश्वर के कृपा सच कवच बनय, शिव त्रिशूल सदा त्रिताप हरय। आगू सदिखन हरि-हर जी हमर, पाछू सऽ सहारा आप बनय॥ अफसोस जे केओ सच....

हम हृदय सऽ गोहारी ईश्वर के, सुनि लैथ हमर ओ करुण पुकार। करि सत्य जीत, बचे भक्ति मीत, सुधि लैथ सदा दुर्जन दुश्तार॥ अफसोस जे केओ सच.... १९ गप्पी मैथिल

छोड़ि दिअ यदि गप मारय लऽ, तऽ सभ सऽ बड़का हमहीं छी। बिन पाँइख उड़ैते-उड़ैते हम, नभ विचरि-विचरिके थाकल छी॥

जेहो छल सत्‌ बल तंत्र-मंत्र, सभटा के तक्खा पर छोड़ने छी। हम ढीठ बनल आ बनल हेहर, लत बत रगड़ा थरकौने छी॥ छोड़ि दिअ यदि....

केओ नीक कहय से ललसा में, अपनहि सँ मुँह चमकौने छी। बिन बोलाहटे के पंच बनि, मुँह-पुरुख बनल झमकौने छी॥ छोड़ि दिअ यदि....

केओ काज कहय कोनो करय ले, लाख बहाना जानैत छी। कोढिया भीतर बैसल यऽ हमर, पर फुर्सत नहि हम कानय छी॥ छोड़ि दिअ यदि.....

हम ई करी या ओ करी - हा करी या ना करी, बात बड़ा भरियौने छी। असलीमें हमर कोनो शक्ति नहि यऽ, दिन-समय केनाहू काटैत छी॥ छोड़ि दिअ यदि.... २० संग यदि काज के बेर में अहाँ संग नहि तऽ कहू अहाँ के कि कहू? यदि लाज बचाबय लेल ढंग नहि तऽ कहू अहाँके कि कहू?

भले एसगर होइ, बस आगू बढी, कतबू किछु होइ पथ विचार चली, यदि सोच हमर कोनो नीक नै लागे तऽ कहू अहाँके कि कहू? यदि संग चलै के मोंन नै होय तऽ कहू अहाँके कि कहू?

प्रकृति अपन अछि रुचि अपन, लगन अपन अछि साधन अपन, यदि संग दरिद्री कम नहि होय तऽ कहू अहाँके कि कहू? यदि बुझितो सभटा बेहोश रही तऽ कहू अहाँके कि कहू?

जतबी संभव ओतबी करू, मुदा लाज बचु यदि काज करू, यदि निर्लज्ज बनै के बैन बनल तऽ कहू अहाँके कि कहू? यदि कर्म अपन सभ छोड़ि बसय तऽ कहू अहाँके कि कहू?? २१ अपन सोच अपन, विचार अपन, काज अपन, जहान अपन, जीवन अपन, मरण अपन, शान अपन, मान अपन॥

संसार अपन, सभ अपन, ईश अपन, दोष अपन, रोष अपन, होश अपन, जोश अपन, नेह अपन॥

अपन यदि छी स्वयं अपन, सभ केओ अपन रहतै अपन! २२ छी ना!! कतेक बेर एकहिगो गप बजबाबै छी... यौ घूरि-घूरि घूरियाबैत छी ना!!

कहलहुँ मैथिलीमें एतय बाजू... कहलहुँ मैथिलीमें एतय लिखू...

तैयो जानि-बूझिके बातो के ओझराबैत छी, घूरि-घूरि घूरियाबैत छी ना॥

कहबी छै सभ सच्चे छैक.. अपन त्यागि पहिरी अनेक...

कौआ कतबू पहिरय पाँखि मयुरक नाटक छी, घूरि-घूरि घूरियाबैत छी ना॥

सुधरू पहिले अपन चालि... देखब बाद में रजनीति डाइर...

भ्रष्टाचार या आरक्षण के झमारल छी, घूरि-घूरि घूरियाबैत छी ना॥ २३ झुंगनी कोना गेलौ सैड़?

रे ठकबा कुजरा - झुंगनी कोना गेलौ सैड़। यौ मालिक, कीड़ा गेलै फैड़॥

हम नहि बूझी कि होइछ कीड़ा, खाली जानी खायब खीड़ा, यदि लगलौ खेतो में कीड़ा, सह तू एकसरि सभटा पीड़ा... झुंगनी कोना गेलौ सैड़.... रे ठकबा कुजरा.... यौ मालिक.....

ईशके हाथ में फल के जिम्मो, हमर काज छल कैल ने कमो, धूप-बरखा के माटिपर धमो, झुंगनी गेलै जे सैड़, यौ मालिक... रे ठकबा कुजरा.... २४ गाम कनै यऽ गाम कनै यऽ ग्रामीण हंसै यऽ, सोचियौ कनि ओरे सँ। मिथिला माटि के शान घटै यऽ, देखियौ कनि ओरे सँ॥ गाम कनै यऽ .... एहि भूमि के मान बढेली, जगजननी सिया जन्म लेली। पुरुषोत्तमके चरण रखैत एतय, अभगदशा सभ दूर भेली॥ कहु यौ भैया, कहु हे बहिना - २, मन के भीतर छोरे सँ। गाम कनै यऽ.... अंगना निपैत अहिपन पारैत, केराके पातो पर देव आबैथ। ऋषि-मुनि के भूमि रहल ई, रिद्धि-सिद्धि अपनहि आबैथ॥ आइ दरिद्रा घून लागल अछि - २, घटल छटा अछि नोरे सँ। गाम कनै यऽ.... कतबू रहियौ देश-परदेश, गाम पठबियौ अपन सनेश। कंजूसी के छोड़ियौ आबो, आ आन्दोलन करू श्रीगणेश॥ मिथिला राज्य वा दहेज उन्मूलन - २, बचबू धरोहर जोरे सँ। गाम कनै यऽ.... छिटफूट सभ केओ कतबू कुदबै, एहि सऽ नहि चलतै कोनो काज। गाम-गाम के संगठित करबै, तखन बनेबै सुच्चा मिथिला राज॥ आब बहाना नहिये चलत - २, लगियौ दिल के पोरे सँ। गाम कनै यऽ..... २५ तुकबंदी कोयलिया कुहू-कुहू, निकम्मा इहू-इहू! करमें अपनो नहि कोनो काज, अगबे शान के झारमें राज, मन में एतहु से सभ बाज, चोट्टा तोरा नै कोनो लाज॥ कोयलिया कुहू-कुहू, निकम्मा इहू-इहू!! १०० में ८० भेलौ बेईमान, तैयो कहतौ देश महान्‌, एहेन फुसियांही के आन, कह कोना चलतौ फेरो शान॥ कोयलिया कुहू-कुहू, निकम्मा इहू-इहू!! कहबौ खूलि के सभटा बात, तहियो देमें नहि तू साथ, बघारमें बुद्धि के तू साज, चुप करमें कर्मठ के आवाज॥ कोयलिया कुहू-कुहू, निकम्मा इहू-इहू!! छोड़लें गामो के तू बाट, रहै छें परदेशे में ठाठ, नहि कोनो मतलब माइयो-बाप, भेलौ करनी तोर सपाट॥ कोयलिया कुहू-कुहू, निकम्मा इहू-इहू!! यदि इ भेलौ कोनो गैर, तखन तू खोले बन्द नजैर, ‘प्रवीण’ आबो जो सुधैर, नहि तऽ मिथिला देतौ मैर॥ कोयलिया कुहू-कुहू, निकम्मा इहू-इहू!! २६ इन्सान-महान जनैत छी अपने लोकनि जनता, जनैत छथि भगवान्‌। अपने मुँह सऽ कि हम कही, किऐक माँगी सम्मान॥ सत्य अगर अछि धर्म हमर आ कर्म करब सब महान। त्याग करब यदि सदिखन हमहुँ कीर्ति बनत जगजान॥ अभ्यासे सऽ विद्या बढैछ, परोपकार सँ बढैछ मान। सम-दृष्टि जँ सदिखन राखब पायब आत्मसम्मान॥ याचक बनि आयल एहि धरापर, पाबय लेल जे ज्ञान। मार्ग मुक्ति के जँ चाही तऽ, भक्ति के मार्ग सँ त्राण॥ संसारक सांसारिकतामें जुनि उलझू अन्जान। प्रेमके लेना - प्रेमके देना केवल बनू इन्सान॥ २७ किछु बात करी मोंन कहैछ किछु बात करी, अपने सँ - अपन हाल पूछी। ‘कोना चलत जीवन’ इ राज बुझी, द्वंद्वरहित समत्व सही॥ मोंन कहैछ किछु बात करी.......... जन्म-मरण के धारा, ईशके नाम आधारा। समय बीतैत बेचारा, के बनैछ सत्य सहारा। हर तीर सही, न अधीर बनी, निज आत्मरूप के बोध करी। मोंन कहैछ किछु बात करी...... देखि समग्र इ शासन, लौकिक राज्ञ प्रशासन। रोग-शोग के राशन, मिथ्या केवल भाषण। नहि नोर भरी, नहि शोर करी, देखी ओ सनातन हर और हरी! मोंन कहैछ किछु बात करी...... ओ चलिये गेल, देखैत सभ खेल आ संगक ओ मेल। तहियो हमर पड़ि गेल नकेल, पटरी सँ उतरल जीवन के रेल। आब कि तकैछ कि रहि अछि गेल, जीवनके लेल सभ भेल अलेल। मोंन कहैछ किछु बात करी....... २८ भाइ रे!! डरा रहल अछि चोर!! भाइ रे!! डरा रहल अछि चोर!! कतबू देखय झूठ नौटंकी, मेघक घटा घनघोर, मुदा बुझे जे सत्य इ छैक जे डरा रहल छौ चोर!! भाइ रे!! डरा रहल अछि चोर!! आरोपक अंबार लगौलक, उल्टहि चोर कोतवाल के डटलक, मुदा नहि लागल ओर! भाइ रे! डरा रहल अछि चोर!! चन्दाके धन्धा कहि दमसल, भीखमंगा के संज्ञा देलक, पर न डिगल मुँह मोर, भाइ रे! डरा रहल अछि चोर!! बाबु ओकर खुबे पढेलकै, एहि आशमें जे पाइ बड भेटत, मुदा नहि छोड़बै पछोड़, भाइ रे!! डरा रहल अछि चोर!! सोचैत अछि जे भभकी सँ, धमकी सँ आ गुम्हरी सँ, बन्द होयत ई घोष, भाइ रे!! डरा रहल अछी चोर!! जे किछु करब से शरण हुनक रहि, सभटा अगुवा हुनकहि पर छोड़ि, लागी हुनकहि गोर, भाइ रे!! डरा रहल अछि चोर!! २९ स्वार्थी दुनिया स्वार्थी दुनिया सऽ रहू सदिखन सावधान ओ मोलके नहि करैछ कथमपि सम्मान, डेरायल रहैछ केवल भ्रान्ति सऽ हरदम, भरत दंभ जेना मालिक रहय ओ संसारके, लेकिन ओ अपनहि भीतर रहैछ कमजोर, प्रश्नके बौछाड़ ओकरा रखैत अछि परेशान। ३० हेरै! सिखमें कि नहि!! मैथिली बजमें कि नहि!! भाइ रे! बाबु यौ!! हम भऽ गेलहुँ परेशान!! जानि कतय छथि ईश्वर महान्‌!! देखू नऽ, कहैत-कहैत हम गेलहुँ थाकि, तैयो नहि बुझैछ इ नवका तुरिया, लिखैत - बाजैत अछि अंग्रेजी-हिन्दी, पकड़ि-पकड़ि स्पीकर माइक!! भाइ रे! बाबु यौ!! हम भऽ गेलहुँ ...... :) ऐँ यौ! कहीं पेटहिमें तऽ नहि इ सिखलक, माइयो एकर अंग्रेजी बजलक, तखन कहीं इहो अछि बदलल, कोना करब एकरा हम सोझ, ओझरी लागल बुझैछ बोझ... भाइ रे! बाबु यौ!! हम भऽ गेलहुँ ..... :) शपथ खाइ छी, एकरा पढैब! बाजब सिखैब, लिखब सिखैब!! जतेक सकब अपनहि हम करब, बाकी करता भाइ-बहिन, काका-काकी, मामा-मामी, पिसी-पीसा, ईश्वर दहिन!! भाइ रे! बाबु यौ!! हम भऽ गेलहुँ .... २. डॉ॰ शशिधर कुमर, एम॰डी॰(आयु॰) – कायचिकित्सा, कॉलेज ऑफ आयुर्वेद एण्ड रिसर्च सेण्टर, निगडी – प्राधिकरण, पूणा (महाराष्ट्र) – ४११०४४ सखि तोहर मुखक तुलना के कर सखि तोहर मुखक  तुलना के कर । सखि तोहर मुखक तुलना के कर ।। रवि  ज्योतिर्मय, सुन्नर  अतिशय । पर किरणक ताप, प्रचण्ड  प्रखर । सखि तोहर मुखक तुलना के कर ।। शशि अतिव धवल, अतिशय शीतल । पर  अति  कठोर, केवल  प्रस्तर । सखि तोहर मुखक तुलना के कर ।। जँ कही जलज, नहि उचित तदपि । हो विकसित रूप ने बिनु दिनकर । सखि तोहर मुखक तुलना के कर ।। तोँ  छेँ अनुपम, अनमोल  रत्न । तोँ साँच थिकेँ, वा  हमर  स्वप्न । पर जे हो,  छेँ  तोँ  अति सुन्दर । सखि तोहर मुखक तुलना के कर ।। ३ नवीन कुमार "आशा" रोटी रोटी लेल तिलमिल करै अछि भूखल प्यासल हमर प्राण प्राण अखन हमरासँ कहए हमरा दिअ दू चुरुक पाइन पाइन पीबि भूक मेटाए रोटी ने चाही हमरा भाइ कतबो बुझाबी अन्तर्मनसँ किछु ने किछु हेतै जोगाड़ ओ तखनो नै होए तैयार रोटी लेल तिलमिल करै अछि भूखल प्यासल हमर प्राण भोर बितल साँझ बितल पसेनासँ कपड़ा तीतल आब पसेना सेहो देलक जवाब ओहो माँगै अछि हमरासँ जवाब भूखसँ लागैए जाएत जान डगमग-डगमग करैए प्राण रोटी लेल तिलमिल करै अछि भूखल प्यासल हमर प्राण आजुक अछि ई व्यथा जँ भेटैत जूठन हमरा लागत घुरि आएल प्राण रोटी लेल तिलमिल करै अछि भूखल प्यासल हमर प्राण तखने दूर देखाइ देलक आस जागल जेना मिटत प्यास बटै छलै मैयाक प्रसाद लगबै छला पुजारीजी अबाज “आशा” कहला अपना मोनसँ लगलौ आजुक रोटीक जोगाड़ आजुक भूख तोहर मेटेतौ नै जानि आब फेर कतेक दिन सहेतौ रोटी लेल तिलमिल करै अछि भूखल प्यासल हमर प्राण “आशा”क अछि एकटा विनती जुनि करी खेनाइक अपमान ओकरो अछि सम्मान अछि ओकरा अपनापर अभिमान रोटी लेल तिलमिल करै अछि भूखल प्यासल हमर प्राण ४ मनीष झा बौआभाई नव बरखक नव बरखक नव आगमन पर नव रचना के संग अहिना लिखि लिखि परसैत भेटब कविता रंग बिरंग कहाँ बिसरलहुं पोरकां सालक देल अहाँके नेह ह्रदय बीच में पैस गेल छी सब पाठक आ विदेह मोनक बात कोना क' लिखब से भेटल अछि अधिकार मीन मेख नै कहियो देखल तै बेर बेर विदेहक आभार सिद्धहस्त रचनाकारक संगे देल नवसिखु के सेहो स्थान तालमेल क' छपने गेला आ बूझल सब के एक समान महिमामंडित माँ मिथिले के धन्य अहाँ सब पूत परसि रहल ई स्नेह पत्रिका बनि क' मिथिला दूत ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। १. रवि भूषण पाठक २.नवीन ठाकुर ३.प्रभात राय भट्ट ४.आनन्द कुमार झा ५. अमित मोहन झा १ रवि भूषण पाठक १ बर्फ भोर सूर्यदेव कत' लुप्‍त भेला कोन अंतरिक्ष ,मंदाकिनी मे या जाड़ हुनकेा खेहाड़इ छइ देखियौ ने कुम्‍हरबा मटकूरी नइ बनाबए छइ । बनाओत की मटकूरी घैल चुक्‍का पातिल तौला उगता नइ सूर्यदेव लेब की हम बमभोला । तहिना पसरल अन्‍हार कुहेसा हड्डियो कंपकंपाइ छइ बीलटबा सूतलेसूतल ओछैने पर खाइ छइ । रूकल जीवन स्‍पंदन गाय भैंस कुकुर बकरी डोलबए छए गरदनि डोलबए नांगरि पूछड़ी कानए बिना नोर दांत देखबै छै । बंद भेलै विद्यालय बंद कटनी रोपनी एहन बर्फ भोरो मे नहा के छुन्‍नू पंडित पहिर ओढि़ काजल टीका तीन कोस जजिमनिका साइकिल के गरूड़ बूझि घंटी डोलबैत छइ २ देश आ गेयर देश सुस्‍ता रहल छइ या पनहा रहल छइ चाही एकरा तेल ग्रीस मोबिल आ तहिना साहित्‍य आ सम्‍बन्‍धो मे पहिले हमरा पढ़ैत देखि मॉ आनइ छली चाय पानि बाबू तमाकू चूनबैत चलि जाइत छलाह अकाश सँ आगू आ कनिया पहिरैत छली चूड़ी ,पायल नि:शब्‍द झनझनाहट सँ भंग नइ हो हमर ध्‍यान हवा बिहाडि़ सेहो बहैत छलए पूछि के । हमरे खोंखी सँ खोंखियाइ पूरा दुनिया हमरे सपना सपनाइत उगैत छलइ चान सूरज । ओ आर जमाना छलए नेता जी यादि अछि अहॉ क एक संकेत पर देश बिछ जाइत छलइ अहॉ मतलब देश आ देश मतलब अहॉ नेताजी आब दोसरे हवा बहि रहल सब अपना विषय मे सोचि रहल स्‍त्री ,सोलकन,जाम्बिया ,भूटान ,लातेहार ,पलामू सबके पता छइ अपन हित अपन बात देश ,सम्‍बन्‍ध ,साहित्‍य चढ़ाई पर चलि रहल  चाही बेशी दम गेयर नम्‍बर चारि बेशी गति बेशी तेल पानि या फेर बच्‍चा क वीछियो जँका बढ़ा दियओ लेवेल धूर्तता ,छल ,धोखाक लेवेल बढ़ब' पड़त चाही नया नया मुखौटा मोबिलाइजेशन प्रोपेगंडा पाखंडक अद्यतन संस्‍करण दोसरे हवा बहि रहल छैक  देश दुनिया जागि रहल छइ ३ पॉंच केबी इंटरनेटक मंद गति आ सुन्‍नरि तोहर फोटो ससरैत बढ़ैत लहरि जेना स्‍वर्गक परदा खुलैत हो धीरे धीरे सितार पर राग भैरवीक साथ पॉंच केबी मे माथ दस मे कपार पंद्रह मे आंखि पिपनी डिम्‍मा सहित फेर रूकि गेलइ नेट पता नइ आइ देखि सकब आंखिक निचला ढ़लान अरे आंखियो देखा गेलइ आंखियो सँ नीचा सिंधुगंगाक विशाल मैदान कनि नाक त' देखियौ हिमालयक बहिन बनल जाइ देखियौ त' नेटक नरहेरपनी केवल वामे देखाए छए दहिना त' गिलने जाइ छैक की दहिनो ओतबे पवित्र ओहिना गंगाजल ।

नेटकंपनी क लेल निकृष्‍टतम पंचाक्षरी गारि के घोंटैत  बंद करैत हम जाल जंजाल सत झूठ आ खेहारने अनेरे कवि यात्री  आध फांक आंखि आ आध फांक नाक ४ दोस महिम कखनो जातिक लसेर लगबैत कखनो कुल गोत्र क सोंगर नेने उपकारक पंजी समेटने बीतल युग पर टीका करैत कोनो चित्र पर सँ जाल मकरी साफ करैत आबि गेलखिन दोस ओ कहथिन आ कहिते र‍हथिन ओ सुनबा ले नइ आयल छथिन हुनका मोल चाही ओ तौल रहल छथिन अतीत के सिनेह के ओ खोजि रहल छथिन सबसँ बड़का अंक जे अचूक होए आ बटखरा के बदला राखि देने छथिन बीतल युगक दोसतियारी २ आब दोस डेली बतियाइ छथिन सामना सामनी नइ त' फोने सँ थाहइ छथिन कोन नस कत्‍त' सँ पकड़ी थाहैत छछारैत मुस्कियाइ छथिन हम दबि रहल छी हुनकर जानकारी सँ कालिदास मैथिली मोहम्‍मद रफी आब हुनको प्रिय विषय अछि पहिले मिलबा सँ बचैत रही आब नइ आबइ छथिन त' कोनादिन लागैत अछि दोस तमाकू जँका ठोर कब्जियेने जाइ छथि आ भांग जँका दिमाग की कही दिमाग त पहिले सँ हफीमियाइल अछि दोस एता ओ कहता आ हम करब यद्यपि नफा नुकसान जनइ छी मुदा दोस शिष्‍ट बना गेला बाजइ भूकइक तरीका नीक जँका सीखा गेला ३ गीत गाबैत श्‍लोक पढ़ैत  उद्धरणक बरसा करैत कखनो प्रेरक प्रसंग कखनो वेद पुराण तहिना अर्थराजनीति कखनो भकुआइ अकछी कखनो दोस देवता देखाथिन दया बेचैत ओ छली फरेबी वंचक बहुरूपिया छलइ कखनो कालिदास विद्यापति जपइ छलइ महान ज्ञानी नइ जानकार छलइ फंसा लै छलै कोनो चरचा मे मनबा लै छलै बात भ जाइ छलियइ चित्‍त पटो मे किछु नइ करैत छलियइ ओ कखनो बीमा कखनो कविता कखनो किताब बेचि पड़ा जाइत छल । ओ आब चुप अछि ने दुश्‍मनीक बात ने दोस्‍ती क चर्चा छइ काल्हि फेर आयत कोनो नया डिब्‍बा पेटी किताब मोबाईल स्‍कीम नेने हम फेर चित्‍त हेबइ ओ फेर भूतिया जायत अपन बटुआ सम्‍हारैत । ५ मनोज भाय क चिट्ठी की भाय आबो राजदूत उड़बै छियइ सौ पर की भाय आबो हंसइ छियइ ओहिना हहा के की भाय आबो देखइ छियइ रौद बरखा के ओहिना प्रेम सँ की भाय आबो कचकूह आम देखि पानि आबैत अछि मुंह मे अपन गाछी आ दोसरक आम एखनो नीक लागैत अछि की भाय जालंधरो करियने जँका छैक कोना साधए छियइ उदयनाचार्य आ जालंधरनाथ के एक साथ नव्‍यन्‍याय आ नाथपंथक सूत्र कत' मिलैत अछि या हमरे जँका उलझैत देरी छोडि़छाडि़ निवृत्‍त भ' जाइ छी सही कहलहुँ भाइ विदेहो त' हमरे छथि आ हम पूरा दुनिया मे पसरलाक बादो ओतबे लोकल छी सक्‍कत माटि खींचैत अछि हमरा आ दरिद्रछिम्‍मरि रहितहुं ओतबे सामंतवादी छी संग मे अछिए की ,जे दुनिया छीनत तैयो पकड़ने छी अपन दूबि के बकुट्टा मे छोड़ू ई सब  की  ओतहु एहिना गामघर गीतनाद धूपदीप यादि आबै छी हम ,गाम आ समाजक लोक बड़ी ,‍सिंगराही ,नबकी  नौला पोखरि बडि़याही ,बलहा घाट ककरहा ,ठकुरनीया ,महिसर बाध कखनो सुनइ छी प्राती ,नचारी ,समदओन चाखै छी नबका चूड़ा पर छलियैल पूष मासक टटका दही हंसए क बात पर हंसइ छी आ कानइ क मौका पर गिरैत अछि नोर या आहूं के मारि देलक समय जेना हमरा मारलक सम्‍हरल डांग सँ ६ बियाह आ मोंछ ओ बियाह नइ ,मोंछक लड़ाई छलई आ सभक अपन अपन प्‍लान रहए बाबू ,मॉ ,दोस ,सासु ससुर संस्‍कार कम ,नाच बजार छलइ ।  बाबूए पढ़ेने लिखेने रहथिन तें बियाह हुनके पसिन्‍नक जगह ,लड़की आ तिथि के निश्चित छलए भैयाक लेल ई छलए अचूक मौका साबित करबाक लेल बहुत रास चीज तें केवल नवका चमचम गाड़ी क जखीरा रहए आ यदि ऐ साल बियाह नइ हेतइ तखन बाबू क मोंछ आ माथ नीचा भ' जेतेन । यदि हम काजर लगेबा सँ रोकबा क प्रयास करतियइ तखन जनानी सबक नजरि मे मॉ बहुत छोट भ' जेतइ आ ससुर महराज सेहो लगेने रहथिन बाजी ककरो सँ तें दिसम्‍बर पक्‍का रहए आ ने हमर उमेर कम रहए ने हम बेरोजगार रहियइ तें ससुरक ससुर जांच करबा लेल पहुंच गेलखिन बागमती सँ केन कहीं कोनो जनानाक चक्‍कर त' नइ छइ आ बियाह मे जरूरी रहए दारू पीनए आ नाचनए किएक त' वीडियो गड़बड़ा जेतइ आ धियान देने रहए बहुत लोक गिद्धो सँ बेशी हम हुसियइ आ ओ प्रारम्‍भ करए । ७ प्‍लेटो आ हमर कनिया अंतत: प्‍लेटो के योग्‍य शिष्‍या मिलिये गेलेन हे मैथिलीक स्‍वर्गीय कविगण बता देबेन प्‍लेटा के ओ एकटा युवा महिला छथिन्‍ह आ जहिना प्‍लेटो दोड़ैत छलथिन्‍ह कविता दिसि राजदंड ल के तहिना ललकारैत छथिन्‍ह ई एकटा नवोदित कवि के आ पूछैत छथिन्‍ह एकटा अस्‍थापित कवि सँ की हेतओ ऐ कविता ल' के  काज रोजगारि छोडि़ किएक बताह भेल छें सजमनि छीलैत आटा सानैत फोड़न दैत छौंकक मेंजन तैयार करैत बच्‍चा के मुंह मे कौर दैत नेटा कांची पोछैत नाना प्रकारक मुखाकृति भाव भंगिमा खुसुर फुसुर खौंझाइत बड़बड़ाइत गारि गीत जँका कखनो गायत्री मंत्र कखनो सप्‍तशती कखनो कोनो अतुकांत वैदिक ऋचा अरबीक अबूझ नेमाज जँका । आ प्‍लेटा जे नइ क' सकला मंत्री पद अछैत बधाई प्‍लेटो । अहॉक योग्‍य शिष्‍य अरस्‍तू वा हमर कनियां । ओ निर्णय निकालि नेने छथि एहिना फिफियाइत रहब हिहियाइत रहब किछु देखने सुनने ऐ दुनिया मे सब केओ अछि आ दुनिया ढ़न्‍नूक लाल सॅ नइ चलैत अछि मुदा ई दुनिया ढ़न्‍नुको लालक छैक । ८ टिप्‍स फ्राम खट्टरकका न्‍यूटनक नियम मे किछु जोडि़ घटा देबहक कोनो दोसर भाषा कोनो आन फांट मे किछु शब्‍द बदलि के क्रम बदलि के तखन की ओ नियम तोहर भ' जेत' नइ ने  मुदा साहित्‍य मे ई फ्राड खूब लोकप्रिय अछि टीपू आ छपि जाउ बूझलहो वौआ आ केओ पकडि़ लए तखन कहि दहो हम त' हुनका सँ प्रेरणा लेने छी आ बूडि़भकुआ तैयो नइ मान' तखन जोर सॅ बाजिह' ओकर कान तीरैत कानिह' खीजिह' अपनो मुंह कान नोचैत ओकरो केश टीक तीरने साल दू साल त' बिताए देब' साहित्‍यो विज्ञान होइछ तावत केओ आन कतउ सँ टीपतइ ओ मंच पर आबि जेतइ आ फेर नया सिरा सँ तीरमतीरा प्रारंभ भ' जेतइ ९ बर्फ पानि भाफ देह ओकर बर्फ छलइ मोन ओकर पानि छलइ स्‍वप्‍न ओकर भाफ छलइ देह मोन स्‍वप्‍न ओकर बर्फ पानि भाफ छलइ उमेर ओकर तेहने सन सतरह अठारह छलइ मोनक उन्‍नीस बीस जिनगी केर पैघ छोट जाउ कनि एमहर वा ओमहर लजाति छलइ मुसका बैत मंद मंद आंखि नाक तीर तारि नहू नहू डेग ओकर कखनो बिहाडि़ छलइ इतिहासक घंटी मे गणिते बुझाइत रहइ रामजीक सासुर अयोध्‍या देखाइत रहए । १० बस तीने दिन लागि रहल पटना दरभंगा  तीन दिन लसेर अओ जुटि रहला बड़ बड़ महन्‍थ सेर केओ सवा सेर अओ सुनु सुनु रंगबिरही बाजा वौआ पटना कक्‍का झाझा पाउडर काजर खूब लगेने कविक राग बहेर अओ  लस्‍सी पेप्‍सी मुरगा माछक  पन्‍नी शीशी  हड्डी कांटा  लागि रहल अछि ढ़ेर अओ  बस तीने दिन जय विद्यापति  जय मिथिला के फेर अओ फेर वौआ तहिना दिन रहतइ कानिपीट के भाग पड़ेतइ जगत जानकी सासुर बसतइ बस तीने दिन दिनक फेरा

बिसरत सब नरहेर अओ ११ उत्‍थर लोक जेहने हम तेहने हमर ई उत्‍थर शब्‍द करिया माटिक बड़का चेका सुक्‍खल बज्‍जर सन हर बरदक बात छोडू ट्रेक्‍टरोक चक्‍का धसैत छैक आ कखनो भुसभुसिया उस्‍सर पनिसोखिया बलुआही कनियो लैस नइ की चापलूसी कोन कृतज्ञता नोकगर खतरनाक सटला पर घोंपयबाक गारंटी कखनो लाल लाल जेना माटि खूनक दोस्‍ती हो सुल्‍तानगंज भागलपुरक जमीन अलगे उपज जेजात बूझू कोनो ग'रक लोक नइ अहॉ उपकार करब हम हस्‍तक्षेप मानब अकछियाएब अलगे हम छी उत्‍थर लोक परिधि पर रहए वला । १२ चमारक ऋण बहुत नमहर मोट पुरान रजिस्‍टर छैक  चमार सभ कें संग मे  हँ हँ सभ के संग मे छैक  ककरो जिल्‍द रंगगर छैक  ककरो सादा  तहिना नव पुरान सेहो  केओ छंद निछंद  सभ्‍यासभ्‍य  सभ पर छैक क्रोधक निशान  कोनो कोनो मे प्रतिहिंसा क आगि ,लोहा ,पाथर  केओ तर्कक साथ  ई तर्क तर्कशास्‍त्रक उधार नइ  विज्ञानक छैक  आ कखनो फूले ,अंबेदकर  कखनो कर्पूरीक फोटो  सजा गेलइ ई रजिस्‍टर  ई केओ चोरा नइ सकैत छैक  केओ जरा गला नइ सकैत छैक  एकर सभ शब्‍द  चमार सभ के ह्रदय पर अंकित छैक  पाथरक शब्‍द  लोहाक शब्‍द  कोनो आर भरिगर वस्‍तु होइ त कहब १३ दीवाली क पहिले दीवाली सँ पहिले  कोदारि सँ खूनैत  करिया माटि  पनि द' छछारैत सानैत मिलबैत कुम्‍हार  चाक पर बैसा के  गांरि काटैत कुम्‍हार  कखनो हवा बसात सँ बचबैत  रौद मे सुखबैत कुम्‍हार  गोइठा जारन कोयला  सँ जरबैत कुम्‍हार  लाल लाल दीप देखि  मोंछ पिजाबैत कुम्‍हार १४ धनतेरस राति बहुतो रास दूटकिया लॉटरी अखबारक ईनामी कूपन सब दू नम्‍मर सॅं छूटैत डिवीजन तीनू बेर बेटिये बेटी । तैयो साहस करैत घुसलउँ बजार सोना चानी क कोन बात टिनही लेल भेल प्रात डोलैत करौछ छोलनी बेलना सब जेना डरबए लेल नाच करैत छल कठौत टुकुर टुकुर ताकैत रहए जेना हमहीं सनेबए उसनए क नौत दैत छल उ फूलही डेकची अओ बाबू आइ त' भॉगो नइ खेलियइ ई कूकर कथी लेल सीटी मारइ छइ अरे बाप चूल्हियो कहॉ पजारल छइ धुर जो ई की भेलइ हमरा किछु ने किछु त ' खरीदनइ जरूरिए चलू थारी खरीदल जाए छोट छोट बच्‍चा छइ तीन चारि खाना वला थारी नाना विधि व्‍यंजन नइ छप्‍पन भोग नइ नवान्‍नो त हेतइ एकटा मे रसदार एकटा भूजिया एकटा मे अँचार पापर ऑखि नइ लगबू जीय' दिय' हमरा जाइ छी गाम पर आहूं जाउ । १५ हम पुरहितिया इजोत सँ अन्‍हारक अनंत यात्रा हँ हँ पूर्णिमा से अमावस्‍या बूझू पतरा देखैत दिन गुनैत पतिया कटैत सब शुभाशुभ जेना हमरे पाछॉ लागल अछि ठीके चिन्‍हलउॅ हम छी मिथिलाक पुरहितिया बाभन । सुरजो सँ पहिले शहरियो सँ पहिले जोतुआ बड़द बहलमानो सँ पहिले मियॉं जीक मुरगाके बॉगो सँ पहिले सबसँ पहिले उठिके पूज' चाहैत छी अपन कम दोसर के भगवान के बेशी पाप पुण्‍य व्रत विधि सब दोसरे लेल मिलबो करैछ दोसरे कें आ हम नित्‍य नित्‍य  घुमि रहल छी कखनो पैदल कखनो साइकिल हमरो दुनिया खूब जमल अछि जजिमनिका क ऐ तीन गाम सँ प्रति सॉझ हम आबइ छी पाव भरि गहूम आसेर मकइ किलो धान क पोटरी ल' के संगहिसंग एक मटकूरी दही लेने पंडिताइन खोलइ छथिन ई पोटरी जेना रानी खोलइ पड़ोसी रानीक भेजल उपहार । वा कुबेरक कनिया जेना देखथि घरवला क कृतकृत्‍य । आ कहियो राति बारहो एक जिन्‍न सबसँ बतियाइत ब्रह्मराक्षस कें चून तमाकूल दैत चुड़ैल सबके धकियाबैत पछुआबैत ब्रह्मडाकिनी के सरियाबैत अपन मटकूरी । आ वौआ बड कठिन छइ जजिमानी बचेनइ कम देबहो तैयो रूसनइ मना छइ बेशी देबहो तैयो प्रशंसा नइ सुनबहक गमि लेबहक तों सब सब बडा बढि़या खूब नीक चलि रहल छइ भगवानक माया छइ । रवि भूषण पाठक १६ चालीसक बात तेरह साल पहिलेक बात छइ  ओ सब  ओ सब बात  आब त हमहु चालीसक लगभगाएल छी  तोहूं जरूर चौंतीस पैंतीसक भ गेल हेबें  कहां पूछि सकलियओ तोरा सं कोनो बात  आब त प्रश्‍नो सब बिसरि गेलहुं  जे यादि केने छलियओ तोरा सं पूछए लेल  हवा क साथ दइ वला केश हमर  किछु उडि़ गेल  किछु पाकिके डरा रहल अछि  हंसीक साथ निकलइ वला धवल दांतक पांति  किछु टुटि गेल  किछु हिल रहल अछि  तहिना गोरनार चमरो ई  भेल कारी बदरंग  तू केहन भ' गेलें  कतओ देखबओ  त कोना चिन्‍हबओ  ई कहनए त बिसरिये गेलियओ  हमरा दू टा बच्‍चो अछि  तोरा कएक टा छओ  आ तों कत' रहैत छें  की तूहू हमरे जँका नौकरी करैत बनरा गेलें  आबो सुनइ छें राति के रेडियो  आ लिखइ छें पोस्‍टकार्ड  की तोरो कोनो पता नइ छओ  ई निरर्थक गद्य बस तोरे लेल  तूही बूझबीही छंदक भयानक दुनिया मे  तुकहीन पद मे छुपल  एकटा नीरव एकांत अर्थ २ नवीन ठाकुर १ गज़ल (प्रेम रस )  1. अछि पियासल मोन तँ पिबैत चलि जाउ........२  गुण प्रीतम क बाट गबैत चलि जाउ !!२ मोनक बेगरता अछि , प्यासल अछि कंठ  घुट- घुट नै जिबू एना बनू नै चंठ ........२  अछि ललसा जे मोनक कहैत चलि जाउ !!२ गुण प्रीतम क बाटे गबैत चलि जाउ !!३ मानलौं जे पीने हएब बहुतो जहाँ क  प्यासल अछि मोन जे तैयो अहाँ क.......२  अछि प्रेमक ई धारा बहैत चलि जाउ !!२ गुण प्रीतम क बाटे गबैत चलि जाउ !!३ ससरल ने कंठ सँ एहन कोन पिबै छी  पिबते उतरि गेल , तेहन की पिबै छी........२  लिअ चस्का ई प्रेम क डूबैत चलि जाउ !!२ गुण प्रीतम क बाटे गबैत चलि जाउ !! अछि पियासल मोन तँ पिबैत चलि जाउ........२  गुण प्रीतम क बाटे गबैत चलि जाउ !! ५ २ . मैथिली गीत --

सुनिते बोली अहाँ क इजोर भऽ गेलै...............(मुखरा ) एला पाहून हमर सौंसे शोर भऽ गेलै ..एला पाहून हमर सौंसे ......!२

कुचरैत छल कौवा आइ -बड जोर सँ..................(अंतरा ) एता जे कियो ई आस छल भोर सं......! २  देखते मुखड़ा .... हो देखते मुखरा अंहक मोन बेभोर भऽ गेलै ....! २ एला पाहून हमर सौंसे.......................

अंगना दुआरि नीप, रखलहुँ सकाले तरुवा - तरकारी अछि सभटा तरैले ! २ कने दही ला ...हे हे ... कने दही ला किए अनघोल भऽ गेलै ......!२ ...एला पाहून हमर .........

कनिया - पुत्रा सभ हुल्की मारैए टाटक दोग दऽ कऽ चुटकी मारैए ! २  किए जाईते ..... हो किए जाईते हमर मोन केँ चितचोर लऽ गेलै  एला पाहून हमर सौंसे शोर भऽ गेलै ......

सुनिते बोली अहाँ क इजोर भऽ गेलै...............(मुखरा ) एला पाहून हमर सौंसे शोर भऽ गेलै ..एला पाहून हमर सौंसे ......! एला पाहून हमर सौंसे शोर भऽ गेलै ......! ३ ३ प्रभात राय भट्ट नव वर्षक आगमन के स्वागत करैछै दुनिया नव नव दिव्यजोती सं जगमग करैछै दुनिया

विगतके दू:खद सुखद क्षण छुईटगेल पछा नव वर्षमें सुख समृद्धि कामना करैछै दुनिया

शुभ-प्रभातक लाली सं पुलकित अछी जन जन नव वर्षक स्वागत में नाच गान करैछै दुनिया

नव वर्ष में नव काज करैएला आतुरछै सब शुभ काम काजक शुभारम्भ में लागलछै दुनिया

नव वर्षक वेला में लागल हर्ष उल्लासक मेला मुश्की मुश्की मधुर वाणी बोली रहलछै दुनिया

जन जन छै आतुर नव नव सुमार्गक खोजमे स्वर्णिम भाग्य निर्माणक अनुष्ठान करैछै दुनिया

धन धान्य ऐश्वर्य सुख प्राप्ति होएत नव वर्षमे आशाक संग नव वर्षक स्वागत करैछै दुनिया .............................वर्ण-१९....................... २. गजल नव वर्षक नव उर्जा आगमन भS गेल अछी दू:खद सुखद समय पाछू छुईटगेल अछी

इर्ष्या द्दोष लोभ लालच आल्श्य कय त्याग करी रोग शोक ब्यग्र ब्याधा सभटा पडागेल अछी

नव प्रभातक संग नव कार्य शुभारम्भ करी नव वर्षक नवका सूर्य उदय भS गेल अछी

अशुभ छोड़ी शुभ मार्ग चलबाक संकल्प करी दिव्यज्योति सभक मोन में जागृत भगेल अछी

निरर्थक अप्पन उर्जाशक्ति के ह्रास नहीं करी शुख समृद्धि प्राप्तिक मार्ग प्रसस्त भS गेल अछी

सुमधुर वाणी सं सबहक मोन जीतल करी सामाजिक सहिंष्णुता आवश्यकता भS गेल अछी .............................वर्ण:-१८ ........................... ४ आनन्द कुमार झा मिथिला क बात  सुनबै छी (तर्ज भारत का रहनेवाला हूँ) अछि प्रेम जतय क रित बनल हम गीत ओतय क गावय छी मिथिला क रहै बाला छी मिथिले क बात सुनाबै छी जय मिथिला जय मैथली जतय पाहुन बनि क राम एला जतय हर बाला मे सीता छै सीता छै जतय घरे घरे वेद पढ़ै जतय हरेक हाथ मे गीता छै गीता छै हमहूँ मिथिलेमे जनम लेलौं २ ई सोचि सोचि इतराबै छी मिथिला क .............................. जय मिथिला जय मैथली एतय मंडन अयाचिक जनम भेलनि अछि विद्यापति क गीत अमर गीत अमर राजा साल्हेशक ई नगरी अछि जनक धाम क रित अमर रित अमर जकर  कमला कोसी पएर धोबै हम नित नित शीष झुकाबै छी मिथिला क .............................. जय मिथिला जय मैथिली जतय भोजन मे तिलकोर तरइ जतय माछक मूड़ भोग चढ़य भोग चढ़य जतय डेगे डेगे पोखरि छै जतय घरे घरे पान बनय पान बनय अछि फल मे मखानक तेज केहन ई दुनियां केँ सिखाबय छी मिथिला क रहै बाला छी मिथिले क बात सुनाबय छी जय मिथिला जय मैथिली ५ अमित मोहन झा

ग्राम- भंडारिसम(वाणेश्वरी स्थान), मनीगाछी, दरभंगा, बिहार, भारत। काश काश विश्व मे पुनः चिरशांति स्थापित कय पबितौं हम। काश बितैत समय केँ रोकि पबितौं हम, मित्रक संग बितायल समय पुनः आनि पबितौं हम, नहि कहि कतेको काज देलथि मित्र सब हमर, हुनका लेल ई जीवन केँ पाछु मोड़ि पबितौं हम। काश आकाश मे स्वछंद उड़ान भरि पबितौं हम, पंख पसारि हिमालय केँ लांघि पबितौं हम, अगाध सागर केँ पार कऽ पबितौं हम, काश अपन जीवन निर्भीक जी पबितौं हम। काश डोरी संग अपनहि पतंगो बनितौं हम, अपन डोर अपनहि संग राखि पबितौं हम, मेघक संग अनवरत विचरि सकितौं हम, काश रश्मि-सूर्य क स्पर्श कय पबितौं हम। काश मानसरोवरक हंस बनि पबितौं हम, समुद्री सीपक ओ अनमोल मोती बनि पबितौं हम, एरावतक गजमुक्ता बनि पबितौं हम, शेषनागक मस्तक-मणि बनि सजि सकितौं हम। काश दीनजनक आंखिक आशा बनि पबितौं हम, हुनक दुर्भाग्य, अपन सौभाग्य सँ बदलि पबितौं हम, असंख्य अबोधक चिर-बोध बनि पबितौं हम, प्राणी मात्र क जीवन मे शीतल छांह आनि पबितौं हम। काश अहांक कपोल कल्पना बनि पबितौं हम, अहांक मधुर स्वप्न मे आबि पबितौं हम, अहांक कान मे मधुर प्रेमगीत गुनगुना पबितौं हम, अहांक हृदय मे चिर रिक्त स्थान छोड़ि पबितौं हम। काश समग्र नारी जाति केँ माँ क स्थान दिया पबितौं हम, भाइ बहिनक ओ अमर प्रेम जगा पबितौं हम, पतिव्रता महिला सन, पुरूषो केँ एक पत्नीव्रती बना पबितौं हम, प्रेमक एक नव आयामक निर्माण कय पबितौं हम। काश मिथिलाकेँ शीर्ष पर पहुँचा सकितौं हम, मैथिली(मधुर भाषा)केँ जन जन आवाज बना पबितौं हम, अरिपनकेँ पुनः सजा सकितौं हम, बाबा अयाची मिश्रकेँ फेर सँ बजा सकितौं हम। काश मंडन मिश्रकेँ फेर सँ जगा सकितौं हम, सुगासँ वेद पाठ करबा सकितौं हम, बनि विदुषी भारती पुनः जगतगुरुकेँ हरा पबितौं हम, मिथिलाकेँ भारतक सिरमौर बना पबितौं हम। काश मानवताकेँ पुनः जगा पबितौं हम, विश्वकेँ पुनः भाईचारा क पाठ पढ़ा सकितौं हम, अन्यायकेँ न्यायसँ बदलि पबितौं हम, “अमित” विश्वकेँ किछु आर आगू लय जा सकितौं हम। काश ब्रहांडकेँ उद्भाषित कय पबितौं हम, महाकालसँ पुनः तांडव करबा पबितौं हम, बनि महाकाली, असुर-दुष्ट-दुर्भाग्य क भक्षण कय पबितौं हम, “अमित” विश्व मे पुनः चिर शांति स्थापित कय पबितौं हम। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। विदेह नूतन अंक मिथिला कला संगीत १.ज्योति सुनीत चौधरी २.श्वेता झा (सिंगापुर) ३.गुंजन कर्ण ४.राजनाथ मिश्र (चित्रमय मिथिला) ५. उमेश मण्डल (मिथिलाक वनस्पति/ मिथिलाक जीव-जन्तु/ मिथिलाक जिनगी) १. ज्योति सुनीत चौधरी जन्म स्थान -बेल्हवार, मधुबनी। ज्योति मिथिला चित्रकलामे सेहो पारंगत छथि आ हिनकर मिथिला चित्रकलाक प्रदर्शनी ईलिंग आर्ट ग्रुप केर अंतर्गत ईलिंग ब्रॊडवे, लंडनमे प्रदर्शित कएल गेल अछि। कविता संग्रह ’अर्चिस्’ प्रकाशित। ज्योति सम्प्रति लन्दनमे रहै छथि। २.श्वेता झा (सिंगापुर) ३.गुंजन कर्ण राँटी मधुबनी, सम्प्रति यू.के.मे रहै छथि। www.madhubaniarts.co.uk पर हुनकर कलाकृति देखि सकै छी। ४. राजनाथ मिश्र चित्रमय मिथिला स्लाइड शो चित्रमय मिथिला (https://sites.google.com/a/videha.com/videha-paintings-photos/ ) ५. उमेश मण्डल मिथिलाक वनस्पति स्लाइड शो मिथिलाक जीव-जन्तु स्लाइड शो मिथिलाक जिनगी स्लाइड शो मिथिलाक वनस्पति/ मिथिलाक जीव जन्तु/ मिथिलाक जिनगी  (https://sites.google.com/a/videha.com/videha-paintings-photos/ ) ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। विदेह नूतन अंक गद्य-पद्य भारती १. मोहनदास (दीर्घकथा):लेखक: उदय प्रकाश (मूल हिन्दीसँ मैथिलीमे अनुवाद विनीत उत्पल) मोहनदास (मैथिली-देवनागरी) मोहनदास (मैथिली-मिथिलाक्षर) मोहनदास (मैथिली-ब्रेल) २.छिन्नमस्ता- प्रभा खेतानक हिन्दी उपन्यासक सुशीला झा द्वारा मैथिली अनुवाद छिन्नमस्ता ३.कनकमणि दीक्षित (मूल नेपालीसँ मैथिली अनुवाद धीरेन्द्र प्रेमर्षि) भगता बेङक देश-भ्रमण ४.“रेहनपर रग्घू”- श्री काशीनाथ सिंह (हिन्दीसँ मैथिली अनुवाद श्री विनीत उत्पल) ५.असगर वजाहत- हम हिन्दू छी हिन्दी कथाक मैथिली रूपान्तरण विनीत उत्पल द्वारा- ४. “रेहनपर रग्घू”- श्री काशीनाथ सिंह (हिन्दीसँ मैथिली अनुवाद श्री विनीत उत्पल) श्री काशीनाथ सिंह: जन्म:०१ जनवरी १९३७, कथा संग्रह: कहनी उपखान , उपन्यास- अपना मोर्चा , काशी का अस्सी,  रेहन पर रग्घू । संस्मरण:  घर का जोगी जोगड़ा , याद हो कि न याद हो , नाटक: घोआस विनीत उत्पल:विनीत उत्पल (जन्म: 7 अप्रैल, 1978, ननिहाल पूर्णिया जिलाक सुखसेना गाममे)। पैत्रिक घर: आनंदपुरा, मधेपुरा। प्रारंभिक शिक्षा मुंगेर जिला अंतर्गत रणग्राम आ तारापुरमे। तिलकामांझी भागलपुर विश्वविद्यालय, भागलपुर सँ गणित विषय मे बी.एस.सी. (आनर्स), मारवाड़ी कॉलेज, भागलपुर। जामिया मिल्लिया इस्लामिया, नई दिल्ली क हिंदी विभाग सँ जनसंचार आ रचनात्मक लेखन मे स्नातकोत्तर डिप्लोमा। भारतीय विद्या भवन, नई दिल्ली सँ अंग्रेजी पत्रकारिता मे स्नातकोत्तर डिप्लोमा। गुरु जम्भेश्वर विश्वविद्यालय, हिसार सँ जनसंचार मे मास्टर डिग्री। जामिया मिल्लिया इस्लामिया, नई दिल्ली क नेल्सन मंडेला सेंटर फॉर पीस एंड कानफ्लीक्ट रिजोल्यूलशन क पहिल बैचक छात्र आ सर्टिफिकेट प्राप्त। भारतीय विद्या भवन, नई दिल्ली सँ फ्रेंच भाषाक शिक्षा। छात्र जीवनमे रोट्रेक्ट क्लब, भागलपुर (रोटरी इंटरनेशनलक युवा शाखा) सँ जुड़ल, कएकटा संबद्ध पत्र-पत्रिकाक संपादन। जामिया मिल्लिया इस्लामिया, नई दिल्लीक हिन्दी विभागमे अध्ययनक दौरान 'हमारी पहचान" नामक पाक्षिक समाचार पत्रक संपादक मंडलक सदस्य। दिल्लीसँ प्रकाशित कएकटा राष्ट्रीय अंग्रेजी समाचार पत्रमे ग्रामीण विकासक खबरिक विश्लेषण, हिन्दीक प्रचार-प्रसारमे केंद्रीय वित्त मंत्रालयकेँ योगदानक अलावा गुजरात दंगामे अंग्रेजी आ गुजराती मीडियाक भूमिकापर लघुशोध। हिन्दी, मैथिली, अंग्रेजी भाषामे विपुल लेखन आ सुनीता नारायण, शशि थरूर, महेश रंगराजन आदिक लेख सभक अंग्रेजीसँ हिन्दीमे अनुवाद। वरिष्ठ पत्रकार अरविंद मोहन द्वारा संपादित 'लोकतंत्र का नया लोक" मे उपलब्ध द्वैपायन भट्टाचार्य, जी.कोटेश्वर प्रसाद आ नलिनी रंजन मोहंतीक अंग्रेजी लेख सभक अनुवाद आ पुनर्लेखन। अनियमितकालीन कला पत्रिका 'कैनवास" मे समन्वय संपादक।मैथिली कविता संग्रह 'हम पुछैत छी" प्रकाशित। साहित्य अकादमी सँ पुरस्कृत हिन्दीक वरिष्ठ कथाकार उदयप्रकाशक दीर्घ-कथा/ उपन्यास 'मोहनदास" क मैथिली अनुवाद।पत्रकार, लेखक, कवि आ अनुवादक विनीत उत्पल, दैनिक भास्कर, दिल्ली प्रेस, हिन्दुस्तान, देशबंधुमे पत्रकारिताक बाद आइ-काल्हि राष्ट्रीय सहारा, नई दिल्लीमे वरिष्ठ उपसंपादकक पदपर कार्यरत छथि। रेहनपर रग्घू १ जनवरीक ओ साँझ कहियो नै बिसरब। साँझ तँ मौसम कऽ देने छल मुदा रहए दुपहरिया। कनी काल पहिने रौदे छल। ओ खेनाइ खेने छल आ खा कऽ अखन अप्पन कोठलीमे पटायले छल आकि एकबैग बिर्रो ऐल। घरक सभटा खुजल खिड़की-दरबज्जा धाँइ-धाँइ करैत अपनेसँ बन्द हुअए लागल आ खुजए लागल। किल्ली उड़ि कऽ कतौ खसल आ भट-भट की-की केना-केना खसऽ लागल, लागल जेना धरती थरथरा रहल अछि आ भीत हीलि रहल अछि। अकास कारी खटखट भऽ गेल छल आ चारू दिस अन्हार गुज्ज छल। ओ उठि कऽ बैसि रहल। अंगना आ दरबज्जा बड़का-बड़का ओला आ बरफक पाथरसँ छरा गेल, दलानक रेलिंग टूटि कऽ दू लग्गा दूर जा कऽ धड़ामसँ खसल। एकर बाद जे निराउ  बर्खा बरिखब शुरू भेल तँ ओ पाइनक बुन्नी नै छल, लागए जेना पाइनक बड़हा छल, जकरा पकड़ि कऽ कियो चाहए तँ ओतऽ धरि चलि जाए जतऽ सँ ओ छोड़ल आकि खसाएल जा रहल छल। मेघ लगातार गरजि रहल छल, दूर नै, लगेमे माथक ऊपर जेना बिजलौका लौकि रहल छल, दूर नै, खिड़कीसँ भीतर आँखिमे।एकहत्तरि बर्खक बूढ़ रघुनाथ अवाक! ई एकाएक की भऽ गेल? की भऽ रहल छै? ओ मुँहपरसँ बनरटोपी हटेलक, देहपर पड़ल सीरक हटेलक आ खिड़की लग ठाढ़ भऽ गेल। खिड़कीक दुनू पल्ला अड़काक टेकसँ खुजल छल आ बाहर दिस देखि रहल छल। घरक आगुए कदम्बक बड़का गाछ छल मुदा ओकर पता नै चलि रहल छल, अन्हारक कारण, आ बर्खाक कारण जे धऽ कऽ तोपने छल, पथियाक पथिया उझील रहल छल। छातक डाउन-पाइपसँ पाइनक धार खसि रहल छल आ ओकर हहारो अलगेसँ सुना दऽ रहल छल। एहेन मौसम, एहेन पाइन आ एहेन हवा ओ कहिया देखने छल? दिमागपर जोर देलापर मोन पड़ल- साठि-बासठि बर्ख पहिने! ओ स्कूल जाए लागल छल, गामसँ दू माइल दूर। मौसम खराप देखि कऽ मास्टर समयसँ पहिने छुट्टी दऽ देने छल। ओ सभ नेना-भुटकाक संगे गाछी पहुँचले छल आकि आन्ही-बिर्रो-पाइन आबि गेल आ अन्हार पसरि गेल। सभ कियो आमक गाछक अढ़ लेबऽ चाहलक मुदा बिर्रो ओकरा सभकेँ जेना लऽ कऽ उड़ि गेलै आ गाछीसँ बाहर धानक बाधमे लऽ जा कऽ पटकलकै। ककरो झोराक आ किताब-पत्तरक कोनो पता नै छलै। पाइनक बुन्नी ओकर देहपर गोलीक छर्रा सन लागि रहल छलै आ ओ मारे चिचिया रहल छल। बिर्रो थम्हलाक बाद जखन पाइन-बुन्नी कनी कम भेल तँ गामक लोक लालटेन आ डिबिया लऽ कऽ बहार भेल छल ताकै लेल। ई एकटा अनहोनी छल आ अनहोनी जँ नै हुअए तँ जिनगी की? आ ईहो एकटा अनहोनीये छल जे बाहर एहेम मौसम छै आ ओ कोठलीमे अछि। कत्ते दिन भऽ गेल बर्खामे भिजना? कत्ते दिन भऽ गेल गरमी मासक दुपहरियाक बहैत लूमे घुमना? कत्ते दिन भऽ गेल जेठक गुमारमे झरकनाइ? कत्ते दिन भऽ गेल इजोरिया रातिमे बौएनाइ? कत्ते दिन भऽ गेल ठारमे ठिठुरि दाँत कटकटेनाइ? की ई अही लेल होइत अछि जे हम एकरासँ कोना बचि कऽ रही? बचि-बचि कऽ चली? आ अही लेल की एकरा भोगी, एकरा जीबी, एकरासँ दोस्तियारी करी, गप करी, माथपर बैसाबी? हम एकरासँ एना व्यवहार कऽ रहल छी जेना ई हमर शत्रु अछि। किए कऽ रहल छी एहेन? एम्हर कतेक दिनसँ रघुनाथकेँ लगैत छलन्हि जे ओ दिन दूर नै जखन ओ नै रहत आ ई धरती रहि जाएत। ओ चलि जाएत आ ऐ धरतीक वैभव, एकर ऐश्वर्य, एकर सौन्दर्य- ई मेघ, ई रौद, ई गाछ-बृच्छ, ई फसिल, ई धार, कछार, जंगल, पहाड़ आ ई सभ किछु एतऽ घुरि जाएत। ओ ई सभ किछु अप्पन आँखिमे बसा लैक चाहैत अछि जेना ओ जँ चलियो जाएत तँ ओकर आँखि अतै रहि जेतै। चमड़ीपर सभ चीजक थाप सोखि लै लऽ चाहैत अछि जेना चमड़ी केंचुल जकाँ एतऽ घुरि जाएत आ ओकर स्पर्श हुनका लग पहुँचैत रहत। हुनका लागैत छल जे बेसी दिन आब हुनका नै अछि जाइमे। भऽ सकैए जे ओ दिन काल्हि हुअए, जहिया हुनका लेल सुरुज नै उगै। उगत तँ अबस्से मुदा से दोसर लोक सभ देखत, ओ नै। की ई सम्भव नै अछि जे ओ सुरुजकेँ बान्हि कऽ अपना संग लेने जाए, ने ओ रहत, ने ओ उगत आ नहिये कियो आर ओकरा देखत! मुदा एकटा सुरुजे सौंसे धरती तँ नै, ओ कोन-कोनक बौस्तुकेँ बान्हत आ ककरा-ककरा देखबासँ रोकत? हुनकर हाथ एतेक नम्हर किए नै भऽ जाइ छन्हि जे ओइमे सभटा धरतीकेँ समेटि लिऐ आ मरै वा जिअए तँ सभक संग! मुदा एकटा मोन आर छल, रघुनाथक जे हुनका धिक्कारि रहल छल, काल्हि धरि कतऽ छल ई प्रेम? धरतीसँ प्रेमक ई आतुरताइ? ई अहलदिली? काल्हि सेहो ई धरती छल। यएह मेघ, अकास, तरेगण, सुरुज, चन्द्रमा छल। धार, निर्झर, सागर, जंगल, पहाड़ छल। यएह गली, मकान, चौबटिया छल। कतऽ छल ई अहलदिली? फुरसति छल हुनका ई सभ देखै कऽ? आइ जखन मृत्यु बिलाड़ि जकाँ आस्तेसँ कोठलीमे ढुकि रहल अछि तखन बाहरक जिनगीक अबाज सुनाइ दऽ रहल अछि? सत-सत बाजू रघुनाथ। अहाँकेँ जे भेटल अछि ओकरा लऽ कऽ कहियो सोचने रही? कहियो सोचने रही जे एकटा छोट सन गामसँ लऽ कऽ अमेरिका धरि पसरि जाएब? ओसारपर पिरहीपर बैसि कऽ रोटी-पियाजु-नून खाइबला अहाँ अशोक विहारमे बैसि कऽ लंच आ डिनर करब? मुदा रघुनाथ ई सभ नै सुनि रहल छल। ई अबाज बाहरक गड़गराहटि आ बर्खाक अबाजमे दबि गेल छल। ओ अप्पन सकमे नै छल। ओकर नजरि कोनमे राखल लाठी आ छत्तापर गेल। जाड़क ठंढ़ी ओहिने भयंकर छल आ ऊपरसँ ई ओला आ बर्खा। हिम्मत जवाब दऽ रहल छलै, तकर बादो ओ दरबज्जा खोललक। किल्ली खोलि कऽ ओ ठाढ़ भेल तँ दरबज्जा अपने खुजि गेल। सिहकैत बसात सनसना कऽ भीतर पैसि गेल आ ओ डरा कऽ पाछाँ हटि गेल। फेरसँ ओ साहस केलक आ बाहर जेबाक तैयारी शुरू कऽ देलक। पूरा बाँहिबला गरम गंजी पहिरलक, ओइपरसँ सूती अंगा, ओइपरसँ स्वीटर आ ऊपरसँ कोट। ऊनी पैंट ओ पहिनहिये पहीर लेने छल। यएह ओकर जाड़क मासमे भोरमे टहलबाक वस्त्र छल। मोफलर सेहो छलै मुदा ओइसँ बेसी जरूरी छलै गमछा। बर्खाकेँ देखैत जेना-जेना कपड़ा भिजैत जेतै ओ एकाएकी उतारैत जाएत आ फेकैत जाएत आ अन्तिममे रहि जेतै मात्र ई टा गमछा। ओ अप्पन पहिराबा-ओढ़ाबासँ आब सभ तरहेँ निश्चिन्त छल मुदा खाली माथकेँ लऽ कऽ ओ ततमतमे छल, कनटोप ठीक रहतै आकि माथमे गमछा बान्हि लए। ओला जतेक खसबाक रहै से खसि गेल छलै। आब ओकरा कोनो अन्दाज नै छलै। ओ गमछाकेँ गरदनिक चारू दिस लपेटि लेलक, खालिये माथ बहरा गेल। आब ने कियो रोकैबला छलै आ ने टोकैबला। ओ कहलक- “रौ मोन! घुरि कऽ आबि जेमेँ तँ वाह-वाह आ नै घुरि कऽ आबि सकमे तँ वाह-वाह।” बर्फ सन पाइनक अन्हार बीहरिमे उतरबासँ पहिने ओ ई नै सोचने छल जे भीजल कपड़ाक भार संग एक्को डेग बढ़ैब ओकरा लेल मोश्किल हेतै। ओ कोठलीसँ तँ बहरा गेल मुदा गेटसँ बाहर नै जा सकल। छत्ता खुजलासँ पहिने जे पहिलुक बुन्न ओकर बिन झाँपल केशहीन चानिपर पड़लै तँ ओ तुरत्ते बूझि नै सकल जे ई बिजलौका खसल छलै आकि लोहाक किल्ली खसल छलै जे माथमे भूर करैत भीतरे-भीतर तरबा धरि पहुँचि गेलै। ओकर सम्पूर्ण शरीर झनझना गेलै। ओ पानिक अछारसँ डरा कऽ बैसि गेल मुदा भिजबासँ नै बचि सकल। जाधरि छत्ता खुजितै ताधरि ओ पूरा भीजि गेल छल। आब ओ ओझरीमे पड़ि गेल छल, बर्फ सन बसात आ अछारक बीच। हबा टूटल दूभि सन हुनका उड़ा रहल छल आ अछार धरतीपर पटकि रहल छल। भीजल कपड़ाक भार हुनका उड़ऽ नै दै छल आ हबा हुनका घिसिया रहल छल। हुनका एतबेटा मोन छन्हि जे लोहाक गेटपर ओ कतेक बेर भहरा कऽ खसला आ ई बेर-बेर तखन धरि भेल जखन छत्ताक कमची टूटि गेल आ ओ उड़ैत गेटक बहार जा कऽ बिला गेल। आब ओकरा एना लगै छल जेना बसात ठामे-ठाम नोचि रहल होइक आ पाइन धीपल लोहसँ दागि रहल होइक। बेहोश भऽ कऽ खसबासँ पहिने ओकरा लग दिमागमे ज्ञानदत्त चौबे एलै। ओ दू बेर आत्महत्या करबाक विचार केने छल- पहिल बेर लोहता स्टेशनक रेलक पटरीपर गाम-घरसँ दूर निर्जनमे, जतऽ कियो आबै जाइ नै छल। तइ काल ओ सामान्य पैसेंजर वा मालगाड़ीकेँ नै, एक्सप्रेस वा मेलकेँ चुनने छल, किएक तँ जे हुअए से हुअए खट दऽ, एक्के निशाँसमे, जइसँ तकलीफ नै होइ। ओ पटरीपर सुतले छल आकि मेल अबैत देखा पड़लै। पता नै किए ओकरामे जीवनसँ मोह उत्पन्न भऽ गेलै आ ओ उठि कऽ भगबापर छल आकि ठेहुन लगक एकटा पएर खचाक। ई तँ मरैसँ बेसी खराप भेलै। बैशाखीक आश आ घरक लोकक गाइर आ धुत्कारी। एक बेर फेर आत्महत्या करबाक धुनि सवार भेलै ओकरापर। ऐबेर ओ चुनकक सिमानपरबला इनार। ओ अप्पन बैशाखी फेकि कऽ ओइमे फांगि गेल छपाकसँ आकि एकटा बरहा पकड़िमे आबि गेलै। तीन दिन बिन खेने पीने भूखल सोर पाड़ैत रहल ओ इनारमे आ निकलल तँ दोसर पएर तोड़बा कऽ। आइ वएह ज्ञानदत्त - बिन पएरक ज्ञानदत्त- चौबटियापर भीख मंगैत अछि। मरबाक ओकर इच्छा ओकरा कतौ कऽ नै छोड़लकै। मुदा ई हरमजदा ज्ञानदत्त ओकरा मोनमे एलै किए नै? ओ मरबाक लेल तँ नै निकलल छल? निकलल तँ छल ओ पाइनक ठोपक लेल, ओला सभक लेल, बसात लेल। ओ ऐ बातपर आबि गेल जे जीवनक अनुभवसँ पैघ अछि जीवन। जखन जीवने नै तँ अनुभव केकरा लेल। २ पहाड़पुरमे रघुनाथ एक्केटा छल। ओना कहैक लेल रामनाथ, शोभानाथ, छविनाथ, शामनाथ, प्रभुनाथ सेहो सभ छल मुदा ओ रघुनाथ नै छल। आ रघुनाथक ई भाग्य छल जे जतऽ कतौ ओ देखा पड़ै छल, गाम घरक लोक बिख-सबिख भऽ जाइ छल आ पैघ साँस लैत कहै छल- बाह! की भाग्य पेलक अछि ई बिरनल! रघुनाथ पहाड़पुर गाममे असगरे पढ़ल लिखल लोक छल। डिग्री कॉलेजक अध्यापक। दुब्बर-पातर नमगर-छरगर देहबला। शुरुहक दस बरख धरि साइकिलसँ अबैत जाइत छल, बादमे स्कूटरसँ। पछिला सीटपर पहिने बेटी बैसै छलै, बादमे बेटा बैसऽ लगलै। कहियो एकटा, कहियो दुनू। मोटा-मोटी पाँच-छह माइलक दूरी रहै। सभ सुखी आ सफल लोक सन रघुनाथ सेहो अपना जीबा लेल, आगाँ बढ़बा लेल आ अकास छूबा लेल किछु ईलम ताकि लेने छल। सत्य पूछू तँ ओ तकने नै छल, ओकरा प्रकृतिमे छलै। ओ खाली बूझि गेल छल आ ओकरा ओ नित्य व्यवहारक संग बनौने छल। ओ पातर आ नमगर छल आ तइसँ कने लीब कऽ चलै छल। कतौ अबैत-जाइत काल, केकरोसँ भेँट-घाँट करैत काल, बाजैत काल ओ कनी लीबल रहै छल। पहिल बेर ओ अप्पन बारेमे केकरो दोसरासँ गप्प करैत प्रिन्सिपल साहेबक मुँहसँ “विनम्रता” शब्द सुनलक। एहेन हुनकर प्रशंसामे कहल गेल छल। जइ लीबल रहैमे ओ लाजक अनुभव करै छल, ओकर वएह खूबी छल, ई नव बोध ओकरा भेलै। ऐमे ओ आगू जा कऽ दूटा खूबी आर जोड़ि देलक, मुस्कियेनाइ, आ सहमति देनाइ। कियो किछु कहितिऐ ओ मुस्कियाइत रहितिऐ आ समर्थनमे मूड़ी हिलाबैत रहितिऐ। ई तखने सम्भव छलै जखन अहाँ अपना दिससँ कम बाजी। ऐ तरहेँ रघुनाथ विनम्रता, कम बाजाभूकी आ मुस्की संगे जीवनक यात्राक प्रारम्भ केने छल। आ एकरा संयोगे कहियौ जे ओ कहियो असफल नै भेल। ऐ संयोगकेँ दोसर लोक सभ “भाग्य” कहैत छल। आ ऐपर रघुनाथ सेहो विश्वास कऽ लेने छल। भेल ई जे एक बेर ओ जखन कॉलेजसँ साइकिलसँ घर घुरि रहल छल तखन ओ देखलक जे ओकर साइकिलक चेन टूटि गेल छै। ओ साइकिलकेँ कॉलेजमे छोड़ि देलक आ बुलि कऽ आबऽ लागल। गर्मी मास, रौद खूब, हवा कतौ नै, देह घामसँ भीजल। बाटमे कतौ गाछो-पात नै। अकासमे मेघ छलै मुदा दुरस्तमे। हुनकर मोन बाजल- “ओह! ई मेघ जँ रहितए माथक ऊपर छत्ता सन।” आ देखू, एक फर्लांग एबे कएल रहए आकि मेघ सत्ते ओकर माथक ऊपर आबि गेलै। आ एतबेटा नै, ओ मेघ हुनका संगे छाह करैत गाम धरि आएल। अगिला दिन ई सिद्ध भऽ गेल जे ई मात्र भ्रम नै छल। ओ वर्गमे पढ़ेबा लेल जहिना बिदा भेल, तहिना ध्यान गेलै जे कलम नै छै। चाहे तँ ओ घरेमे छूटि गेलै आकि बाटमे खसि पड़लै। ओ एखन क्लासमे पहुँचलो नै छल आकि आगू हॉलमे ओकरा एकटा कलम खसल लखा देलकै, रौदमे चमकैत। एहेन गप आन लोकक संग सेहो होइत अछि मुदा नै जानि किए हुनका लगै छल जे दीनदयालु परमपिताक हुनकापर विशेष कृपा छन्हि। ओ हुनकर सभ सुविधा-असुविधाक ध्यान रखैत अछि। ऐसँ जे ओ चाहैत छथि ओ देर सबेर भऽ जाइत अछि।आ देखू जे ओ जखैन-जखैन चाहलक, जे जे चाहलक से भेल गेल। हुनका किछु करऽ नै पड़ल, अपने मोने भऽ गेल। पढ़ाइ खतम केलाक बाद ओ शोध कऽ रहल रहथि आ हुनकर मोन नै लागि रहल छलन्हि। आब कहिया धरि ओ करैत रहितिऐ शोध? कतौ नोकरी भेटि जेतिऐ तँ जान बचितिऐ। आ बेसी दिन नै बितलै आ हुनका नोकरी भेटि गेलन्हि। एकर श्रेय ओ हालेमे जन्मल अपन बेटीकेँ देलक। बेटी लक्ष्मी होइत अछि। वएह अप्पन संगे आ अपना लेल हुनकर नोकरी लऽ कऽ आएल छल। मुदा आब एकर बाद एकटा बेटा चाही। ई ओ नै, हुनकर हृदय बाजल। आ देखू, चारि बर्खक बाद बेटा सेहो आबि गेल। एकर बाद एकटा आर बेटा- बस! ऐ तरहेँ एकटा बेटी, दूटा बेटा, शीला आ रघुनाथ, सभ कियो मिला कऽ पाँच लोकक परिवार। छोट परिवार, सुखी परिवार। परिवार सुखी रहल हुअए वा नै, रघुनाथ सुखी नै छल। जिनगी हुनका लेल पहाड़पुरक धूल-धक्कर आ हँसी खेल नै छल। जन्मले छल तँ स्वयं कीड़ा-मकोड़ाक योनिमे किए नै जन्म लेलक? ओ ओतऽ जनमि सकै छल मुदा नै, भगवान जँ हुनका ऋषि-मुनिक लेल दुर्लभ योनिमे जनम देने अछि तँ एकर पाछाँ हुनकर कोनो उद्देश्य रहल हेतन्हि। जे जाउ, साठि-सत्तरि बरखक मौका दैत छी अहाँकेँ, जाउ धरतीकेँ सुन्नर आ सुखी बनाउ। धरती सुन्नर आ सुखी तखैन हएत जखैन अहाँक बाल-बच्चा सुखी, सुन्नर आ सम्पन्न हएत। अहाँकेँ जे बनबाक अछि ओ तँ अहाँ बनि गेलौं, आब बच्चा अछि जिनकर आगू पूरा जिनगी आ दुनियाँ राखल छै। यएह अहाँक भविष्य अछि। जीबू तँ हुनकर जिनगी, मरू तँ हुनकरे जिनगी। आ रघुनाथ से केलक। हुनकर सभटा शक्ति आ सभटा बुद्धि आ सभटा पूँजी हुनका सभकेँ बनबैमे लागल रहल। ओ चाहलक- सरला पढ़ि लिखि कऽ नोकरी करितिऐ। सरला पढ़ि लिखि कऽ नोकरी करऽ लागल। ओ चाहलक- संजय सॉफ्टवेअर इन्जीनियर बनितिऐ। संजय सॉफ्टवेअर इन्जीनियरटा नै बनल, अमेरिका तक पहुँचि गेल। ओ चाहलक- मैनेजर समधी हुअए। संजय ई नै चाहलक। ओ से केलक जे ओ चाहलक। रघुनाथक आस रहि गेल। दयानिधान किछु मदति नै कऽ सकल हुनकर। हुनका दुख ऐ गपक छल जे मैनेजर एकरा बाप-बेटाक मेलपेंच बुझलक। ओ बड़ मानसिक तनावमे चलि रहल छल, मुदा कॉलेजक हुनकर सहयोगी हुनका बधाइ दऽ कऽ भरोस देलक जे एकटा अन्हार खधाइमे खसबासँ ओ बचि गेला। ऐमे प्रिन्सपलक भूमिका आर नीक छल। ओ मोटामोटी तीस साल पहिने रघुनाथक संग कॉलेज पकड़ने छल। दुनुक दोस्तियारी छलै। जखैन भेटितिऐ हँसी मजाक, हाहा हूहू करितिऐ। ओ एक दिन आस्तेसँ कहलक- “यौ रघुनाथ, हमरा आश्चर्य लगैत अछि जे एतबेटा गप अहाँकेँ बुझैमे किए नै आएल? ओ अहाँक बेटीक बदलामे अहाँक बेटाकेँ खरीद रहल छल।” ऐ तरहेँ रघुनाथ सहज भऽ रहल छल जे एक दिन घरपर हुनका प्रिन्सपलक दसखतबला नोटिस भेटल। आरोप दूटा छल- “नेग्लिजेन्स ऑफ ड्यूटी”(काजमे ढिलाइ) आ “इनसबऑर्डिनेशन”(उच्च अधिकारीक गप नै मानब)। एहेन कोनो संकेत अपन गपमे नै देने छल ओ पहिने कहियो। ई दुनूटा आरोप छल निराधार। एकरा रघुनाथेटा नै, सहयोगी सभ सेहो जानैत छल आ प्रिन्सपल सेहो। सबहक सहानुभूति ओकरा संगे छलै, मुदा संग देबा लेल कियो तैयार नै छल। ओ उत्तर दऽ देलक मुदा ओ ई जानैत छल जे एकरासँ कोनो लाभ नै अछि। ओ फेंफियाइत एतऽ सँ ओतऽ दौगैत गेल। आजिज आबि कऽ प्रिन्सपलसँ भेँट केलक आ हुनकासँ सलाह मांगलक। ओ कहलक- “देखू रघुनाथ, अहाँ जतेको दौड़-धूप करू, निलम्बनक मोन बना लेने अछि मैनेजर। हुनकर शक्ति आ पहुँचकेँ अहाँ जनिते छी। एकर बाद अहाँ कचहरी जाएब, फौदारी लड़ब, ई कहिया धरि चलत, कियो नै जनैत अछि। भऽ सकैत अछि जे फैसला होइसँ पहिने अहाँ मरियो जाइ। हँ, जाधरि मुकदमा चलत, ताधरि पेंशन रुकल रहत। ई सभ देखि कऽ हमर तँ सलाह अछि जे अहाँ वी.आर.एस. (वॉलन्टरी रिटायरमेन्ट स्कीम, स्वेच्छासँ सेवानिवृत्ति सुविधा) लऽ लिअ। रघुनाथ बड़ी काल धरि चुप रहल। हुनकासँ किछु बाजल नै गेल। “ठीक अछि, मुदा एकटा अहाँ मदति करू।” “कहू, की कऽ सकैत छी हम?” “निलम्बनकेँ अहाँ ताधरि लटकेने राखू जाधरि बेटीक बियाह नै भऽ जाए। फेर हम सएह करब जे अहाँ कहने छी।” मनुष्यताक लेल ई करबाके छल। प्रिन्सपल चिन्तित भऽ कऽ बाजल- “जाउ, कोशिश करै छी, मुदा ई गप अहाँ कतौ नै बाजी, से।” आ प्रिन्सपल कहिया धरि बाट तकितिऐ। (जारी….) ५. असगर वजाहत- हम हिन्दू छी हिन्दी कथाक मैथिली रूपान्तरण विनीत उत्पल द्वारा हम हिन्दू छी एहेन कन्नारोहट जे मुर्दो कब्रमे ठाढ़ भऽ जाए। लागल जे अबाज सोझे कान लगसँ आएल अछि। ओइ स्थितिमे.. हम कूदि कऽ बिछौनपर बैसि गेलौं, अकासमे अखनो तरेगन छल.. किंशाइत रातिक तीन बाजल हएत। अब्बोजान उठि कऽ बैसि गेला। कन्नारोहट फेरसँ सुनाइ पड़ल। सैफ अपन अखड़ा खाटपर पड़ल चिकड़ि रहल छल। अंगनामे एक दिससँ सभक खाट लागल छलै। 'लाहौलविलाकुव्वत. . .' अब्बाजान लाहौल पढ़लन्हि 'खुदा नै जानि ई किए सुतलेमे किए चित्कार करऽ लगैए।' अम्मा बजली। 'अम्मा एकरा राति भरि छौड़ा सभ डरबैत रहै छै. . .' हम कहलिऐ। 'ओइ सरधुआ सभकेँ सेहो चेन नै पड़ै छै. . .लोक सभक जान आफदमे छै आ ओकरा सभकेँ बदमाशी सुझाइ छै', अम्मा बजली। सफिया चद्दरिसँ मुँह बहार कऽ बाजलि, 'एकरा कहू छतपर सुतल करए।' सैफ अखन धरि नै जागल छल। हम ओकर पलंग लग गेलौं आ झुकि कऽ देखलौं जे ओकर मुँहपर घाम छलै। साँस खूब चलि रहल छलै आ देह थरथरा रहल छलै। केस घामसँ भीजल छलै आ किछु केस माथपर सटि गेल छलै। हम सैफकेँ देखैत रहलौं आ ओइ छौड़ा सभक प्रति मोनमे तामस घुरमैत रहल जे ओकरा डराबैए। तखन दंगा एहेन नै होइत छल जेहेन आइ काल्हि होइए। दंगाक पाछाँ नुकाएल दर्शन, ईलम, काजक पद्धति आ गतिमे ढेर रास  बदलेन आएल अछि। आइसँ पच्चीस-तीस साल पहिने नहिये लोककेँ जिबिते भकसी झोका कऽ मारल जाइ छलै आ नहिये सौंसे टोल-मोहल्लाकेँ सुनसान कएल जाइत छलै। ओइ जमानामे प्रधानमंत्री, गृहमंत्री आ मुख्यमंत्रीक आशीर्वाद सेहो दंगा करैबलाकेँ नै भेटै छलै। ई काज छोट-मोट स्थानीय नेता अपन स्थानीय आ क्षुद्र स्वार्थ पूरा करै लेल करै छला। व्यापारिक प्रतिद्वंद्व, जमीनपर कब्जा करैले, चुंगीक चुनावमे हिंदू वा मुस्लिम वोट समटैले इत्यादि उद्देश्य भेल करै छल। आब तँ दिल्ली दरबारपर कब्जा करबाक ई  साधन बनि गेल अछि। सांप्रदायिक दंगा। संसारक सभसँ पैघ लोकतंत्रक मुँमे जाबी वएह पहिरा सकैए जे सांप्रदायिक हिंसा आ घृणापर शोनितक धार बहा सकए। सैफकेँ जगाएल गेल। ओ बकरीक असहाय बच्चा सन चारू दिस ऐ तरहे देखि रहल छल जेना माँकेँ ताकि रहल हुअए। अब्बाजानक बेमात्रे भाइक सभसँ छोट सन्तान सैफुद्दीन प्रसिद्ध सैफ जखन अपन घरक सभ लोककेँ चारू दिस घेरने देखलक तँ ओ अकबका कऽ ठाढ़ भऽ गेल। सैफक अब्बा कौसर चचाक मरबाक खबरि लेने आएल कोनमे कटल पोस्टकार्ड हमरा अखनो नीक जकाँ मोन अछि। गामक लोक सभ चिट्ठीमे कौसर चचाक मरबाके टा खबरि नै देने छला संगमे ईहो लिखने छला जे हुनकर सभसँ छोट सन्तान सैफ आब ऐ दुनियामे असगर रहि गेल अछि। सैफक पैघ भाइ ओकरा अपना संग बम्बै नै लऽ गेल। ओ साफे कहि देलन्हि जे सैफ लेल ओ किछु नै कऽ सकै छथि। आब अब्बाजानक अलाबे ओकर ऐ दुनियामे कियो नै छै। कोन कटल पोस्ट कार्ड पकड़ि अब्बाजान बहुत काल धरि चुपचाप बैसल रहथि। अम्मांसँ कएक बेर जगड़ा केलाक बाद अब्बाजान पैतृक गाम धनवाखेड़ा गेलथि आ बचल जमीन बेचि, सैफकेँ संग लऽ घुरलथि। सैफकेँ देखि हमरा सभकें हँसी आएल रहए। कोनो देहाती बच्चाकेँ देखि अलीगढ़ मुस्लिम युनिवर्सिटीक स्कूलमे पढ़ैवाली सफियाक आर की प्रतिक्रिया भऽ सकैए, पहिले दिन ई बुझा गेल जे सैफ खाली देहातिये नै वरन् अर्द्ध-बताहसन सोझ वा मूर्ख छल। हमसभ ओकरा कबदाबैत आ फुचियाबैत रहै छलिऐ। एकर एकटा फाएदा सैफकेँ एना भेलै जे अब्बाजान आ अम्मांक हृदय ओ जीत लेलक। सैफ खूब मेहनति करए। काजसँ ओ देह नै नुकाबए। अम्मांकेँ ओकर ई व्यवहार खूब पसिन्न पड़ै। जँ दूटा रोटी बेसी खाइए तँ की? काज तँ सेहो देह झारि कऽ करैए। सालक साल बितैत गेलै आ सैफ हमर सभक जिनगीक अंग बनि गेल। हम सभ ओकरा संग सामान्य होइत गेलौं। आब मोहल्लाक कोनो बच्चा जँ ओकरा बताह कहि दै तँ हम ओकर मुँह नोंचि लै छलिऐ। हमर भाइ अछि ई एकरा तूँ बताह कोना कहै छेँ? मुदा घरक भीतर सैफक की स्थिति रहै से हमरे सभ टाकेँ बुझल छल। नग्रमे दंगा ओहिने शुरू भेल छल जेना भेल करै छल, माने मस्जिदसँ ककरो एकटा पोटरी भेटलै, जइमे कोनो प्रकारक माउस छलै आ माउसकेँ बिन देखने ई मानि लै जाइ छल जे किएक तँ ई माउस मस्जिदमे फेकल गेल छल तेँ ई सुग्गरक माउस हेबे टा करत। तकर बदलामे मुगल टोलमे गाय काटि देल गेल आ दंगा शुरू भऽ गेल। किछु दोकान जड़ि गेल मुदा बेसीकेँ लुटल गेल।छूरी-चक्कूक ढेर रास घटनामे मोटा-मोटी सात-आठ गोटे मुइलाह आ प्रशासन एतेक संवेदनशील छल जे कर्फ्यू लगा देल गेल। आइ-काल्हिबला बात नै छल जखन हजारक हजार लोकक मुइलाक बादो मुख्यमंत्री मोंछपर ताव दैत घुमैत छथि आ कहैत छथि जे, जे किछु भेल ठीक भेल। दंगा किएक तँ लगपासक गामोमे पसरि गेल छल तइ दुआरे कर्फ्यू बढ़ा देल गेल छल। मुगलपुरा मुसलमानक सभसँ पैघ मोहल्ला छल से ओतऽ कर्फ्यूक प्रभाव छल आ जिहाद सन वातावरण सेहो बनि गेल छल। मोहल्लामे तँ गली-कूची होइते छै मुदा कएकटा दंगाक बाद ई अनुभव कएल गेल जे घरक भीतरसँ सेहो रस्ता हेबाक चाही। माने आप्तकालक व्यवस्था। से घरक भीतरसँ, छतक ऊपरसँ (जारी....) ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। बालानां कृते १.कणकमणि दीक्षित- भगता बेङक कथा- नेपालीसँ मैथिली अनुवाद: श्रीमती रूपा धीरू आ श्री धीरेन्द्र प्रेमर्षि द्वारा २.डॉ॰ शशिधर कुमर “विदेह” - दक्षिणी ध्रुव पर मनुक्खक पएरक सए वर्ष अर्थात्- खिस्सा अण्टार्कटिका केर १ कणकमणि दीक्षित, ५५ बर्ख, हिमाल खबरपत्रिकाक प्रकाशक आ हिमाल साउथ एशियनक सम्पादक छथि। ओ कॉलेजक पढ़ाइ काठमाण्डूसँ, लॉ क पढ़ाइ दिल्लीसँ आ परास्नातकक पढ़ाइ न्यूयॉर्कसँ केने छथि। नेपालीसँ मैथिली अनुवाद: श्रीमती रूपा धीरू आ श्री धीरेन्द्र प्रेमर्षि द्वारा रूपा धीरू: रूपा धीरू- जन्मस्थान-मयनाकडेरी, सप्तरी, श्रीमती पूनम झा आ श्री अरूणकुमार झाक पुत्री।स्थायी पता- अञ्चल- सगरमाथा, जिल्ला- सिरहा। प्रथम प्रकाशित रचना-कोइली कानए, माटिसँ सिनेह (कविता),भगता बेङक देश-भ्रमण (कनक दीक्षितक पुस्तकक धीरेन्द्र प्रेमर्षिसँग मैथिलीमे सहअनुवाद,सङ्गीतसम्बन्धी कृति- राष्ट्रियगान, भोर, नेहक वएन, चेतना, प्रियतम हमर कमौआ (पहिल मैथिली सीडी), प्रेम भेल तरघुस्कीमे, सुरक्षित मातृत्व गीतमाला, सुखक सनेस। सम्पादन-पल्लव, मैथिली साहित्यिक मासिक पत्रिका, सम्पादन-सहयोग,हमर मैथिली पोथी (कक्षा १, २, ३, ४ आ ५ आ कक्षा 9-10 क ऐच्छिक मैथिली विषय पाठ्यपुस्तकक भाषा सम्पादन)। धीरेन्द्र प्रेमर्षि, सिरहा, नेपाल 1967-

वि.सं.२०२४ साल भादब १८ गते सिरहा जिलाक गोविन्दपुर-१, बस्तीपुर गाममे जन्म लेनिहार प्रेमर्षिक पूर्ण नाम धीरेन्द्र झा छियनि।कान्तिपुरसँ हेल्लो मिथिला कार्यक्रम प्रस्तुत कर्ता जोड़ी रूपा-धीरेन्द्रक धीरेन्द्रक अबाज गामक बच्चा-बच्चा चिन्हैत अछि। “पल्लव” मैथिली साहित्यिक पत्रिका आ “समाज” मैथिली सामाजिक पत्रिकाक सम्पादन। किछु दूर ओ घनगर खपड़ैल घर सभ, मन्दिरक गुम्बज सभ आ विशाल–विशाल दरबारक बुर्ज सभ देखलक। ओकरा विश्वास भेलैक जे इचङ्गूक बेङ सभ जाहि ‘शहर’क बात करतै छल से निश्चित रूपेँ इएह थिक । भक्तप्रसाद सुनने छल जे शहरमे मोटर–गाड़ी, बिजली–पङ्खा आ सैकड़ो कोठलीवला बड़का–बड़का बङ्गला सभ होइत छैक । एक दिन भक्तप्रसादक कनेक लटकलहा नाङरि सेहो टूटि गेलैक । ताही दिन ओ सभसँ कहलकैक जे आइ साँझ्मे ओ घर छोड़ि देबाक निश्चय कएलक अछि । “किएक छोड़बह ?”— सभगोटे एक्कहि स्वरमे पुछलकैक । घर छोड़ि ओ दूर जा सकैत अछि ताहि बात पर ओकरा घरक ककरो विश्वासे नहि छलैक । भक्तप्रसाद जवाब देलक— “हम एहि दुनियासँ बाहरी दुनियाक अनुभव करऽ चाहैत छी । हम देखऽ चाहैत छी जे शहरमे लोकसभ कोना रहैत अछि । हम तराइमे जाए चाहैत छी । हमरा बड़का नदी, आश्चर्यजनक प्राणी सभ, समतल काठमाण्डूक आकर्षण चौरी–चाँचर आ बड़का–बड़का पहाड़ सभ देखबाक मोन होइत अछि ।” घरक अभिभावक बुद्धिए प्रसादटा भक्तप्रसादक मोनक बात बुझ्लकैक । बहुतो साल पहिने ओकरो मोनमे एहने विचार आएल रहैक । मुदा, ओ अपन सोचलहा नहि कऽ पओने रहए । ओकरा अपन सोचलाहा पूरा नहि होएबाक बडड् पछताबा छलैक । तेँ ओ प्रसन्न भऽ अपन हिम्मतगर पोताकेँ देखि मोनहि मोन विचार कएलक— “ई छौड़ा हमरोसँ बेसी हिम्मतगर बहराएल । अपना विचारमे ई अड़ल रहऽवला अछि । एकरा केओ नहि रोकि सकैत अछि ।” भक्तप्रसादक घर छोड़िकऽ जएबाक निर्णयसँ दुःखित भऽ सभटा बेङ एकठाम जमा भेल । ओकरा सभकेँ बद्धि प्रसाद कहलककै — “एकरा जाए दहक । जखन ई  बाहरी दुनिया देखि लेत तँ हमरा सभकेँ कतेको नव–नव बात सभ बताओत ।” तैयो भक्तप्रसादक माए सानुमैयाँ किछु कहऽ चाहतै छलि कि भकप्रसाद चटपट सभकेँ प्रणाम-पाती कऽ विदाह भऽ गेल । “बाबा ! हम जाइ छिअह ।” भक्तप्रसाद जाइत–जाइत जोरसँ चिकरैत बाजल । तकरा बाद ओ लोकक चलऽवला रस्तासँ चलनाइ शुरू कएलक आ जा अपन खेतसँ अऽढ़ नहि भऽ गेल ता ओ उनटिकऽ नहि तकलक । किछु दूर चललाक बाद ओ मोटर–गाड़ी दौड़ऽवला पक्की सड़कपरसँ चलनाइ शुरु कएलक । ........ (जारी...) २ डॉ॰ शशिधर कुमर “विदेह” दक्षिणी ध्रुव पर मनुक्खक पएरक सए वर्ष अर्थात् खिस्सा अण्टार्कटिका केर आइ धिया – पुता सभ सोचैत होयताह कि विदेहजी फेर अहू बेर कोनो उपदेश वला कविता वा गीत लऽ कऽ अओताह आ अनेरो हमर सभक दिमाग खएताह । तऽ से नञि, एहि बेर कोनो उपदेश नञि । एहि बेर हम अहाँ सभ केँ एकटा दूर देशक यात्रा पर लऽ चलैत छी – देश नञि महादेश थिक ओ । चारू कात पानि सँ (समुद्र सँ) घेड़ायल अछि – तेँ महाद्वीप थिक ओ । अहूँ सभ सोचैत होयब कि एहि ठिठुरल जार मे के घऽर छोड़ि कऽ घूमय लेल निकलत । पर जतऽ जयबाक विचार अछि ओहि ठाम तत्तेक ने जार पड़ैत अछि कि अपना ओहि ठामक माघ मास आ तीला संक्राँतिक जार सेहो गर्मी सनि बुझि पड़त । अहाँ सभक मोन मे होइत होयत जे कहीं हम कनाडा या स्विटजरलैण्ड केर बात तऽ नञि कऽ रहल छी । नञि – कथमपि नञि -  स्विटजरलैण्ड वा कनाडा तऽ देश थिक आ हम महादेशक बात कऽ रहल छी । ओ महादेश जत्तऽ प्राकृतिक रूप सँ मनुक्ख नञि रहैत अछि । ............... सही सोचि रहल छी अहाँ सभ, ओकर नाम थिक “अण्टार्कटिका” । अप्पन धरती केर दक्षिणी ध्रुव केर चारू कात बसल महादेश अण्टार्कटिका । अण्टार्कटिका ग्रीक शब्दक रोमण संस्करण थिक, जकर अर्थ होइत अछि “आर्कटिक केर विपरीत”  (Anti - Arctic) अर्थात् “उत्तर केर उनटा” , माने कि “दक्षिण” । चित्र सं॰ - 1  – धरतीक ग्लोब पर अण्टार्कटिकाक स्थिति अहाँ सभ केँ ई तऽ बुझले होयत कि धरती गोल अछि आ एकर दुनु ध्रुव समतोला सन थोड़ेक धँसल आ सपाट अछि । उत्तरी ध्रुव केँ 90° उत्तरी अक्षांश रेखा आ दक्षिणी ध्रुव केँ 90° दक्षिणी अक्षांश रेखा कहल जाइत अछि । रेखा नाम रहितहु ई दुनु रेखा नञि भऽ कऽ एकटा विन्दुक सदृश थिक । एकर दुनुक आस पासक क्षेत्र केँ क्रमशः “आर्कटिक क्षेत्र” आ “अण्टार्कटिक क्षेत्र” कहल जाइत अछि । संसार मे सात टा महादेश थिक जाहि मे सँ एक थिक  “अण्टार्कटिका” । ओहि ठाम चारू कात केवल बर्फे - बर्फ अछि, सौंसे धरती बर्फक तऽर मे नुकायल रहैत अछि । ओ दुनियाक सभसँ बेशी निर्जन, ठण्ढा, हवा - बिहाड़ि युक्त आ शुष्क क्षेत्र अछि । सामान्य भाषा मे शुष्क माने सुखायल । अहाँ सभक मोन मे प्रश्न उठल होयत कि एक तरफ तऽ हम कहि रहल छी जे  चारू कात केवल बर्फे - बर्फ अछि आ दोसर तरफ कहैत छी दुनिञाक सभ सँ सुखायल क्षेत्र – से कोना ? ओहि ठामक न्यूनतम् तापमान – 89.2°C (-128.6°F) नापल गेल अछि (रूसी अण्टार्कटिक  केन्द्र “वोस्तोक” द्वारा) । तेँ पानि जमि कऽ ठोस आ कठोर (पाथरहु सँ बेशी कठोर) बर्फ भऽ जाइत अछि – हवा सँ पानिक अंश वा आर्द्रता (moisture / humidity) पुर्ण रूपेँ निपत्ता भऽ जाइत अछि, परिणामस्वरूप हवा अत्यन्त शुष्क भऽ जाइत अछि । संगहि ओहि ठाम सतह पर कोनो ऊँच पहाड़, गाछ - वृक्ष वा आन अवरोध नञि होयबाक कारणेँ ई हवा बिना रोक – टोक केर बहैत रहैत अछि आ बिहाड़िक रूप लऽ लैत अछि । एहि ठाम हवा केर अधिकतम् गति 320 कि॰मि॰ प्रति घण्टा नापल गेल अछि । दक्षिणी ध्रुव केर नज़दीक बर्फक अधिकतम् मोटाई 4.776 कि॰मि॰ पाओल गेल अछि – जाहि सँ ओहि ठामक ठण्ढीक अन्दाज आसानी सँ लगाओल जा सकैत अछि । विश्वक स्वच्छ पानि (fresh water)  केर लगभग 70% अण्टार्कटिकाक हिम – आवरणक रूप मे जमल अछि जखन कि विश्वक सम्पुर्ण बर्फक 90%  भाग एकसरि अण्टार्कटिका मे अछि ।

        अण्टार्कटिका केर क्षेत्रफल ‍लगभग ‍1 करोड़ 40 लाख वर्ग कि॰मि॰ (14.00 million km2) थिक आ ओ एशिया, अफ्रिका, उ॰ अमेरिका आ द॰ अमेरिकाक बाद विश्वक पाँचम सबसँ पैघ महादेश अछि । ई चारू कात सँ दक्षिणी हिम महासागर (अण्टार्कटिक महासागर) सँ घेड़ायल अछि । एहि महासागरक ऊपरुका भाग ठण्ढी मे जमि जाइत अछि, जाहि सँ एहि समय मे महाद्वीपक आकार प्रायः दूना बुझि पड़ैछ । एहि ठाम लगभग 6  महीना केर दिन आ 6  महीना केर राति होइत अछि तेँ अपना घड़ीक अनुसार 6 महीना धरि रातियो मे आकाश मे सूर्य देखाइ पड़ैत अछि – थिक ने आश्चर्यक गप्प ! पर गर्मी केर दिन मे सेहो अधिकतम् तापमान  मात्र - 26°C  (- 15°F) नापल गेल अछि । अपना सभ दिशि माघ मासक शीतलहरी मे सेहो औसत तापमान 4°C सँ  10°C  केर बीचे मे रहैत अछि ।  आब अहीं कहू  - छै ने बहुत ठण्ढा जगह ? पड़ाए गेल ने अहाँ सभक जार ? चित्र सं॰ - 2 -  ठीक दक्षिणी ध्रुव केर ऊपर सँ देखला पर अण्टार्कटिका केर स्वरूपक रेखाचित्र अण्टार्कटिका केर धरती पर मनुक्खक पहुँचब एक समय मे ओहिना छल जेना कि बाद मे चान पर पहुँचब – ओहिना कठिन आ ओतबहि महत्त्वपुर्ण ।  लोक सभ अप्पन – अप्पन प्राणक बाजी लगा कऽ ओतए पहुँचबाक प्रयास मे लागल छलाह । किछु लोक अप्पन – अप्पन उद्देश्य वा लक्ष्य प्राप्त करबा मे सफल भेलाह आ आपिस सेहो आबि सकलाह, जखन कि किछु लोक अप्पन प्राण गमाए बैसलाह ।  ओहि समय मे पाल वला पनिया जहाज अण्टार्कटिका तक पहुँचबाक एक मात्र साधन छल । रस्ता मे “समुद्री बिहाड़ि” (Cyclone) मे घेड़एबाक वा “प्लवित / दहाइत हिमखण्ड” (Iceberg) तथा “प्रवाहित समुद्री हिमखण्ड” (Pancake ice, Polynya etc.) सँ टकड़एबाक वा “हिमनद” (Glacier) तथा “हिमीभूत समूद्री सतह” (Pack ice, Fast ice etc.) मे फँसि जएबाक सम्भावना रहैत अछि । प्लवित / दहाइत हिमखण्ड कतेक विनाशक भऽ सकैत अछि तकर सभ सँ नीक उदाहरण “टाइटेनिक” नामक पनिया जहाजक विश्वप्रशिद्ध दुर्घटना सँ लगाओल जा सकैत अछि । ई जहाज साउथेम्पटन (ब्रिटेन) सँ न्युयॉर्क (अमेरिका) जएबा काल, 10 अप्रील 1912 कऽ एकटा एहने “प्लवित / दहाइत हिमखण्ड” (Iceberg) सँ टकड़एबाक कारणेँ दुर्घटनाग्रस्त भेल छल । जएबा व अएबा दुनु कालक लेल खएबा – पिउबाक चीज – बस्तु पहिने सँ संग मे ओरिआ कए राखए पड़ैत छैक ।  ज्यों – ज्यों वातावरणक तापमान कम होइत जाइत छैक आ हवाक शुष्कता एवम् गति बढ़ैत छैक, त्यों – त्यों शरीर सुन्न होमए लगैत छैक, शरीरक कोशिका (Cells) सभ मरए लागैत छैक जकरा चिकित्सकिय भाषा मे “हिम – दाह  / हिम – दग्ध” (Frost bite) कहल जाइत अछि । एहि “हिम - दाह” सँ किछुए काल मे मनुक्खक प्राण तक जा सकैत अछि । तेँ एहि जानमारुक ठण्ढी सँ बचबाक पूरा ओरिआओन संग मे लऽ कऽ चलए पड़ैत छै । अण्टार्कटिका केर बीचो – बीच मध्य अण्टार्कटिक पर्वतश्रेणी (Trans Antarctic Maountains) थिक जे बर्फ सँ आच्छादित रहैत अछि । ई पर्वतश्रेणी अण्टार्कटिका केँ दू भाग मे बाँटैत अछि – पैघ “मुख्य भाग” (Main land) आ दोसर छोट “प्रायद्विपीय भाग” (Antarctic peninsula) । एकर अतिरिक्त ओहि ठाम किछु सुप्त ज्वालामुखी पहाड़ सेहो थिक जे कखनो कखनो सक्रिय भऽ उठैत अछि । ओहि ठाम लगभग 70  टा स्वच्छ / मीठ पानिक झील (Fresh water lakes) सेहो अछि । ओहि ठाम मनुक्ख तऽ नञि अछि, पर प्राणीविहीन जगह नञि थिक ओ । चिड़ै मे पेंग्वीन (Penguin) (जे उड़ि नञि सकैत अछि पर पानि मे नीक जेकाँ डुबकी लगा कऽ हेलि सकैत अछि आ बर्फ पर अपन दू पएर सँ मनुक्ख जेकाँ चलि सकैत अछि), स्क्युआ (Skua) आ एल्बेट्रॉस (Albatross) (एकर दुनु पंखक पसार संसार मे आन सभ चिड़ै सँ बेशी होइत अछि) आदि ओहि ठामक मूल निवासी थिक । समुद्र मे सील (Seal), वालरस (Walrus) , क्रील (Krill), मिंक ह्वेल (Mink Whale) आदि पाओल जाइत अछि । चित्र सं॰ - 3 -  अण्टार्कटिकाक जैव धरोहरि कैप्टन जेम्स कुक (Captain James Cook)  पहिल मनुक्ख छलाह जे “अण्टार्कटिक वृत्त” केँ 17 जनवरी 1773 ई॰ कऽ पार कयलन्हि – एकर बाद ओ साले भरि मे दू बेर आओरो प्रयास कयलन्हि पर वातावरणीय विषमताक कारण अण्टार्कटिका धरि नञि पहुँचि सकलाह । 27 जनवरी 1820 ई॰ कऽ रूसी अण्वेषक बेल्लिंगहुसेन (Fabian Gottlieb von Bellingshausen) अण्टार्कटिकाक हिमाच्छादित धरती केँ पहिल बेर दूरहि सँ देखि सकलाह – पर हुनिकहु ओहि ठाम पएर रखबाक सौभाग्य नञि भेटलन्हि । तकरा बाद बहुतो लोक प्रयास कयलन्हि पर ओहि ठाम पएर रखबा मे असफल रहलाह ।

उपलब्ध साक्ष्यक अनुसार अण्टार्कटिकाक हिमाच्छादित धरती पर पहिल बेर पएर रखनिहार व्यक्ति छलाह जॉन डेविस (John Davis) – यद्यपि एहि सँ पहिने किछु आओरो लोक सभ एहि तरहक दावा कएने छलाह पर हनिकर सन्दर्भ मे पुष्टि कएनिहार कोनो साक्ष्य उपलब्ध नञि थिक । ओ सील नामक समुद्री प्राणिक शिकारक उद्देश्य सँ 7 फरवरी 1821 ई॰ कऽ पच्छिमी अण्टार्कटिका मे उतरलाह । परञ्च ओ ओहि ठाम किछुए काल ठहरि कऽ आपिस आबि गेलाह, किएक तऽ ओ शिकारी छलाह , वैज्ञानिक नञि । किछु लोक एकरहु विवादिते मानैत छथि । चित्र सं॰ - 4 -  दक्षिणी ध्रुव पर पहिल बेर पएर रखनिहार मनुक्ख, नॉर्वे निवासी “रॉएल्ड अमुण्डसेन” अण्टार्कटिका आ ओकर बाद दक्षिणी ध्रुव धरि पहुँचबाक प्रतियोगिता निरन्तर चलैत रहल । एहि बेर बाजी मारलन्हि नॉर्वे वासी रॉएल्ड अमुण्डसेन (Roald Amundsen) । ओ ‍14 दिसम्बर 1911 ई॰  कऽ भौगोलिक दक्षिणी ध्रुव (Geographical south pole i.e. 90°S latitude) पर पहुँचबा मे सफल रहलाह । ओ अपन दलक सदस्य सभक संग ओहिठाम नॉर्वे केर झण्डा फहरओलन्हि आ अपन पहुँचबाक साक्ष्य ओतय सुरक्षित राखि आपिस चलि अयलाह । पहुँचबा सँ पहिने ओ अपन यात्रा केर जानकारी दुनिञा सँ नुकाए कऽ रखलन्हि – तेँ हुनक प्रतियोगी सभ केँ एहि बातक मिसियो खबड़ि नञि रहन्हि । अमुण्डसेन केर जन्म 16 जुलाई 1872 ई॰ मे नॉर्वे (यूरोप महादेशक एक टा देश) केर शहर ओस्लो (Oslo)  केर नजदीक क्रिस्चिनिया (Christinia) मे भेल छलन्हि । एहि अभियान मे हुनक जहाजक नाँव छल फ्रॅम (Fram) । हुनक नजदीकी प्रतियोगी इंग्लैण्ड केर कैप्टन राबर्ट फॉल्कन सकॉट (Captain Robert Falcon Scott) अमुण्डसेनक 33 दिनक बाद 17 जनवरी 1912 ई॰ कऽ भौगोलिक दक्षिणी ध्रुव पर पहुँचि सकलाह आ पहुँचलाक बाद पहिने सँ नॉर्वे केर झण्डा देखि हुनिका बहुत दुख आ तामस सेहो भेलन्हि । आपिस लौटैत काल दुर्घटना मे स्कॉट अप्पन पूरा दल केर संग मारल गेलाह । ‍14 दिसम्बर 2011 ई॰ कऽ अमुण्डसेनक दक्षिणी ध्रुव पर विजयक 100 वर्ष पूरा भेल ।  2011 ई॰ केँ नार्वे “अमुण्डसेन वर्ष” आ यूनेस्को (UNESCO) “दक्षिण ध्रुव पर पहिल मनुक्खक शताब्दी वर्ष” केर रूप मे मनओलक अछि । चित्र सं॰ - 5 -  अण्टार्कटिका केर भूगोल आ ओहिठाम भारतीय अनुसंधान केन्द्र दर्शक मानचित्र डॉ॰ सय्यद जहूर कासिम (Dr Sayed Zahoor Qasim) केर नेतृत्व मे 9 जनवरी 1982 ई॰ कऽ 21 सदस्यीय पहिल भारतीय अण्टार्कटिक अभियान दल अण्टार्कटिका केर हिमाच्छादित धरती पर पएर रखलक आ भारतक लेल इतिहास लिखलक । ई दल 1981 कऽ गोआ सँ अपन गण्तव्यक लेल चलल छल । डॉ॰ हर्ष गुप्ता (Dr. Harsha Gupta) केर नेतृत्व मे तेसर भारतीय अण्टार्कटिक अभियान दल द्वारा 1983 – 84 ई॰ मे एकटा स्थायी संशोधन केन्द्रक स्थापना कयल गेल – जकर नाँव राखल गेल “दक्षिण गंगोत्री” । एहि मे एकटा भू - चुम्बकीय प्रयोगशाला (Geomagnetic laboratory) बनाओल गेल । ई एकटा “हिम छज्जी” (Ice shelf) पर स्थापित छल, जे बाद मे बर्फ मे धँसि गेल आ नऽव अनुसन्धान केन्द्र स्थापित करबाक आवस्यकता पड़ल । भारत अण्टार्कटिका मे अपन दोसर स्थायी संशोधन केन्द्रक स्थापना 1989 ई॰ मे कयलक आ 1990 ई॰ सँ “दक्षिण गंगोत्री” केँ पुर्णतया बन्न कऽ देल गेल । नऽव अनुसन्धान केन्द्रक नाम राखल गेल “मैत्री” जे कि बर्फ रहित स्थान पर अवस्थित अछि । अण्टार्कटिकाक 98 प्रतिशत भाग हिमाच्छादित अछि जखन कि मात्र 2 प्रतिशत भाग बर्फ रहित अछि । मैत्रीक स्थान द॰ गंगोत्री सँ लगभग 90 कि॰ मि॰ दूर अछि । भारतक तेसर स्थायी संशोधन केन्द्र निर्माणाधीन थिक जकर नाम होयत “भारती” । भारती केर स्थापना मैत्री सँ लगभग 3000 कि॰ मि॰ दूर अण्टार्कटिका केर आन भाग मे भऽ रहल अछि जाहि सँ एहि विस्तृत महादेशक विस्तृत अध्ययन कयल जा सकय । ई केन्द्र मार्च – अप्रील  2012 ई॰ धरि प्रारम्भ भऽ जायत । 25 मई 1998 ई॰ कऽ राष्ट्रिय अण्टार्कटिक एवं समुद्री अनुसन्धान केन्द्र (National Centre for Antarctic and Ocean Research; NCAOR) केर स्थापना गोआ मे भेल । 14 अक्टूबर 2010 धरि भारत 30 गोट वैज्ञानिक अनुसन्धान दल अण्टार्कटिका पठाए चुकल अछि । चित्र सं॰ - 6 -  अण्टार्कटिका मे भारतक पहिल (दक्षिण गंगोत्री) आ दोसर (मैत्री) अनुसंधान केन्द्र आ तेसर (भारती) अनुसन्धान केन्द्रक प्रस्तावित प्रारूप (मॉडेल) अण्टार्कटिका  दुनिञाक सभसँ पैघ प्राकृतिक प्रयोगशाला (Largest Natural Laboratory) अछि । ओहि ठाम भू – चुम्बकत्व, भूगर्भ विज्ञान, पृथ्वी आ सौरमण्डलक उत्पत्ति व विकाश, समुद्री जीव – जन्तु, वायुमण्डल (विशेषतः ओजोन स्तर) पर प्रदूषणक प्रभाव, चिकित्सा, मनोविज्ञान आदिक अध्ययन आ ओहि सँ सम्बद्ध अनुसन्धान काज आदि कयल जाइत अछि ।

तऽ केहेन लागल नऽव वर्षक अवसरि पर नऽव ठामक यात्रा ? फेर कहियो जखन समय भेटत तऽ आन ठाम घुमबा – फिरबा लेल चलब । आइ बस एतबहि । आब अप्पन – अप्पन घऽर आपिस चलल जाए । ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com  पर पठाउ। बच्चा लोकनि द्वारा स्मरणीय श्लोक १.प्रातः काल ब्रह्ममुहूर्त्त (सूर्योदयक एक घंटा पहिने) सर्वप्रथम अपन दुनू हाथ देखबाक चाही, आ’ ई श्लोक बजबाक चाही। कराग्रे वसते लक्ष्मीः करमध्ये सरस्वती। करमूले स्थितो ब्रह्मा प्रभाते करदर्शनम्॥ करक आगाँ लक्ष्मी बसैत छथि, करक मध्यमे सरस्वती, करक मूलमे ब्रह्मा स्थित छथि। भोरमे ताहि द्वारे करक दर्शन करबाक थीक। २.संध्या काल दीप लेसबाक काल- दीपमूले स्थितो ब्रह्मा दीपमध्ये जनार्दनः। दीपाग्रे शङ्करः प्रोक्त्तः सन्ध्याज्योतिर्नमोऽस्तुते॥ दीपक मूल भागमे ब्रह्मा, दीपक मध्यभागमे जनार्दन (विष्णु) आऽ दीपक अग्र भागमे शङ्कर स्थित छथि। हे संध्याज्योति! अहाँकेँ नमस्कार। ३.सुतबाक काल- रामं स्कन्दं हनूमन्तं वैनतेयं वृकोदरम्। शयने यः स्मरेन्नित्यं दुःस्वप्नस्तस्य नश्यति॥ जे सभ दिन सुतबासँ पहिने राम, कुमारस्वामी, हनूमान्, गरुड़ आऽ भीमक स्मरण करैत छथि, हुनकर दुःस्वप्न नष्ट भऽ जाइत छन्हि। ४. नहेबाक समय- गङ्गे च यमुने चैव गोदावरि सरस्वति। नर्मदे सिन्धु कावेरि जलेऽस्मिन् सन्निधिं कुरू॥ हे गंगा, यमुना, गोदावरी, सरस्वती, नर्मदा, सिन्धु आऽ कावेरी  धार। एहि जलमे अपन सान्निध्य दिअ। ५.उत्तरं यत्समुद्रस्य हिमाद्रेश्चैव दक्षिणम्। वर्षं तत् भारतं नाम भारती यत्र सन्ततिः॥ समुद्रक उत्तरमे आऽ हिमालयक दक्षिणमे भारत अछि आऽ ओतुका सन्तति भारती कहबैत छथि। ६.अहल्या द्रौपदी सीता तारा मण्डोदरी तथा। पञ्चकं ना स्मरेन्नित्यं महापातकनाशकम्॥ जे सभ दिन अहल्या, द्रौपदी, सीता, तारा आऽ मण्दोदरी, एहि पाँच साध्वी-स्त्रीक स्मरण करैत छथि, हुनकर सभ पाप नष्ट भऽ जाइत छन्हि। ७.अश्वत्थामा बलिर्व्यासो हनूमांश्च विभीषणः। कृपः परशुरामश्च सप्तैते चिरञ्जीविनः॥ अश्वत्थामा, बलि, व्यास, हनूमान्, विभीषण, कृपाचार्य आऽ परशुराम- ई सात टा चिरञ्जीवी कहबैत छथि। ८.साते भवतु सुप्रीता देवी शिखर वासिनी उग्रेन तपसा लब्धो यया पशुपतिः पतिः। सिद्धिः साध्ये सतामस्तु प्रसादान्तस्य धूर्जटेः जाह्नवीफेनलेखेव यन्यूधि शशिनः कला॥ ९. बालोऽहं जगदानन्द न मे बाला सरस्वती। अपूर्णे पंचमे वर्षे वर्णयामि जगत्त्रयम् ॥ १०. दूर्वाक्षत मंत्र(शुक्ल यजुर्वेद अध्याय २२, मंत्र २२) आ ब्रह्मन्नित्यस्य प्रजापतिर्ॠषिः। लिंभोक्त्ता देवताः। स्वराडुत्कृतिश्छन्दः। षड्जः स्वरः॥ आ ब्रह्म॑न् ब्राह्म॒णो ब्र॑ह्मवर्च॒सी जा॑यता॒मा रा॒ष्ट्रे रा॑ज॒न्यः शुरे॑ऽइषव्यो॒ऽतिव्या॒धी म॑हार॒थो जा॑यतां॒ दोग्ध्रीं धे॒नुर्वोढा॑न॒ड्वाना॒शुः सप्तिः॒ पुर॑न्धि॒र्योवा॑ जि॒ष्णू र॑थे॒ष्ठाः स॒भेयो॒ युवास्य यज॑मानस्य वी॒रो जा॒यतां निका॒मे-नि॑कामे नः प॒र्जन्यों वर्षतु॒ फल॑वत्यो न॒ऽओष॑धयः पच्यन्तां योगेक्ष॒मो नः॑ कल्पताम्॥२२॥ मन्त्रार्थाः सिद्धयः सन्तु पूर्णाः सन्तु मनोरथाः। शत्रूणां बुद्धिनाशोऽस्तु मित्राणामुदयस्तव। ॐ दीर्घायुर्भव। ॐ सौभाग्यवती भव। हे भगवान्। अपन देशमे सुयोग्य आ’ सर्वज्ञ विद्यार्थी उत्पन्न होथि, आ’ शुत्रुकेँ नाश कएनिहार सैनिक उत्पन्न होथि। अपन देशक गाय खूब दूध दय बाली, बरद भार वहन करएमे सक्षम होथि आ’ घोड़ा त्वरित रूपेँ दौगय बला होए। स्त्रीगण नगरक नेतृत्व करबामे सक्षम होथि आ’ युवक सभामे ओजपूर्ण भाषण देबयबला आ’ नेतृत्व देबामे सक्षम होथि। अपन देशमे जखन आवश्यक होय वर्षा होए आ’ औषधिक-बूटी सर्वदा परिपक्व होइत रहए। एवं क्रमे सभ तरहेँ हमरा सभक कल्याण होए। शत्रुक बुद्धिक नाश होए आ’ मित्रक उदय होए॥ मनुष्यकें कोन वस्तुक इच्छा करबाक चाही तकर वर्णन एहि मंत्रमे कएल गेल अछि। एहिमे वाचकलुप्तोपमालड़्कार अछि। अन्वय- ब्रह्म॑न् - विद्या आदि गुणसँ परिपूर्ण ब्रह्म रा॒ष्ट्रे - देशमे ब्र॑ह्मवर्च॒सी-ब्रह्म विद्याक तेजसँ युक्त्त आ जा॑यतां॒- उत्पन्न होए रा॑ज॒न्यः-राजा शुरे॑ऽ–बिना डर बला इषव्यो॒- बाण चलेबामे निपुण ऽतिव्या॒धी-शत्रुकेँ तारण दय बला म॑हार॒थो-पैघ रथ बला वीर दोग्ध्रीं-कामना(दूध पूर्ण करए बाली) धे॒नुर्वोढा॑न॒ड्वाना॒शुः धे॒नु-गौ वा वाणी र्वोढा॑न॒ड्वा- पैघ बरद ना॒शुः-आशुः-त्वरित सप्तिः॒-घोड़ा पुर॑न्धि॒र्योवा॑- पुर॑न्धि॒- व्यवहारकेँ धारण करए बाली र्योवा॑-स्त्री जि॒ष्णू-शत्रुकेँ जीतए बला र॑थे॒ष्ठाः-रथ पर स्थिर स॒भेयो॒-उत्तम सभामे युवास्य-युवा जेहन यज॑मानस्य-राजाक राज्यमे वी॒रो-शत्रुकेँ पराजित करएबला निका॒मे-नि॑कामे-निश्चययुक्त्त कार्यमे नः-हमर सभक प॒र्जन्यों-मेघ वर्षतु॒-वर्षा होए फल॑वत्यो-उत्तम फल बला ओष॑धयः-औषधिः पच्यन्तां- पाकए योगेक्ष॒मो-अलभ्य लभ्य करेबाक हेतु कएल गेल योगक रक्षा नः॑-हमरा सभक हेतु कल्पताम्-समर्थ होए ग्रिफिथक अनुवाद- हे ब्रह्मण, हमर राज्यमे ब्राह्मण नीक धार्मिक विद्या बला, राजन्य-वीर,तीरंदाज, दूध दए बाली गाय, दौगय बला जन्तु, उद्यमी नारी होथि। पार्जन्य आवश्यकता पड़ला पर वर्षा देथि, फल देय बला गाछ पाकए, हम सभ संपत्ति अर्जित/संरक्षित करी। 8.VIDEHA FOR NON RESIDENTS 8.1 to 8.3 MAITHILI LITERATURE IN ENGLISH 8.1.1.The Comet   -GAJENDRA THAKUR translated by Jyoti Jha chaudhary 8.1.2.The_Science_of_Words- GAJENDRA THAKUR translated by the author himself 8.1.3.On_the_dice-board_of_the_millennium- GAJENDRA THAKUR translated by Jyoti Jha chaudhary 8.1.4.NAAGPHANS (IN ENGLISH)- SHEFALIKA VERMA translated by Dr. Rajiv Kumar Verma and Dr. Jaya Verma 1. Maithili Poem by Smt. shefalika Varma translated into English by  by Mrs Jaya Verma२.The constant shedding of Tears (Maithili poem bySh. Rajdeo Mandal - translated into English by Gajendra Thakur) १ 1. Maithili Poem by Smt. shefalika Varma translated into English by  by Mrs Jaya Verma Shefalika Verma has written two outstanding books in Maithili; one a book of poems titled “BHAVANJALI”, and the other, a book of short stories titled “YAYAVARI”. Her Maithili Books have been translated into many languages including Hindi, English, Oriya, Gujarati, Dogri and others. She is frequently invited to the India Poetry Recital Festivals as her fans and friends are important people. WOMAN I am a woman, is not my misdemeanor Yes, I am a woman. Your writing has catapulted me to the cultural height Not just as a human being living on this earth But as the Goddess at the pedestal. At the same time, you have made me Screech lacimiating the heart of Tartarus. Up surging Kosi’s uproar on nature’s face Falling on lips Sometimes autumn morning Sometimes wintery cold nights Whenever I see my face in mirror Sita’s distressed shadow Trembles on my eyelid My aanchal Is not filled with moon and stars But with Rahu-Ketu. But, not now No more the blowing wind will pollute woman Now I realize Nothing exists in this body of flesh and blood We are made of the same matter Nature has made woman tender and delicate Then why only I am guilty?? I am not a creeper Who wilts just seeing index finger Now the time has changed Country’s freedom has entered Into women’s inner-self Spreading bright sunshine Illuminating inner and outer domain Dreaming to touch the sky Demolishing tradition- counter tradition Creating new sun rays in the reconstructed sky Women are marching ahead … But still look at my devotion Bearing everything I conceive and create I give you birth But it is you who becomes the God Now it is the time To Forgo man-centric discourse And begin women-centric discourse. 2. The constant shedding of Tears (Maithili poem by Sh. Rajdeo Mandal - from his anthology of Maithili poems "Ambara"- translated into English by Gajendra Thakur) -----------------

Out of the eyes of my beloved tears like a river always remain flowing and in that water of tears people plunge some feel cold and some feel hot some say wow! and some feel bad. but my blind-deaf accomplice does not care, her tears always remain flowing but for some time her tears have stopped coming out now perhaps she has emptied herself of tears or is she storing it! Send your comments to ggajendra@videha.com विदेह नूतन अंक भाषापाक रचना-लेखन Input: (कोष्ठकमे देवनागरी, मिथिलाक्षर किंवा फोनेटिक-रोमनमे टाइप करू। Input in Devanagari, Mithilakshara or Phonetic-Roman.) Output: (परिणाम देवनागरी, मिथिलाक्षर आ फोनेटिक-रोमन/ रोमनमे। Result in Devanagari, Mithilakshara and Phonetic-Roman/ Roman.) English to Maithili Maithili to English इंग्लिश-मैथिली-कोष / मैथिली-इंग्लिश-कोष  प्रोजेक्टकेँ आगू बढ़ाऊ, अपन सुझाव आ योगदान ई-मेल द्वारा ggajendra@videha.com पर पठाऊ। Top of Form विदेहक मैथिली-अंग्रेजी आ अंग्रेजी मैथिली कोष (इंटरनेटपर पहिल बेर सर्च-डिक्शनरी) एम.एस. एस.क्यू.एल. सर्वर आधारित -Based on ms-sql server Maithili-English and English-Maithili Dictionary. १.भारत आ नेपालक मैथिली भाषा-वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक शैली आ २.मैथिलीमे भाषा सम्पादन पाठ्यक्रम १.नेपाल आ भारतक मैथिली भाषा-वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक शैली

१.१. नेपालक मैथिली भाषा वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक  उच्चारण आ लेखन शैली (भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक धारणाकेँ पूर्ण रूपसँ सङ्ग लऽ निर्धारित) मैथिलीमे उच्चारण तथा लेखन १.पञ्चमाक्षर आ अनुस्वार: पञ्चमाक्षरान्तर्गत ङ, ञ, ण, न एवं म अबैत अछि। संस्कृत भाषाक अनुसार शब्दक अन्तमे जाहि वर्गक अक्षर रहैत अछि ओही वर्गक पञ्चमाक्षर अबैत अछि। जेना- अङ्क (क वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ङ् आएल अछि।) पञ्च (च वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ञ् आएल अछि।) खण्ड (ट वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ण् आएल अछि।) सन्धि (त वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे न् आएल अछि।) खम्भ (प वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे म् आएल अछि।) उपर्युक्त बात मैथिलीमे कम देखल जाइत अछि। पञ्चमाक्षरक बदलामे अधिकांश जगहपर अनुस्वारक प्रयोग देखल जाइछ। जेना- अंक, पंच, खंड, संधि, खंभ आदि। व्याकरणविद पण्डित गोविन्द झाक कहब छनि जे कवर्ग, चवर्ग आ टवर्गसँ पूर्व अनुस्वार लिखल जाए तथा तवर्ग आ पवर्गसँ पूर्व पञ्चमाक्षरे लिखल जाए। जेना- अंक, चंचल, अंडा, अन्त तथा कम्पन। मुदा हिन्दीक निकट रहल आधुनिक लेखक एहि बातकेँ नहि मानैत छथि। ओ लोकनि अन्त आ कम्पनक जगहपर सेहो अंत आ कंपन लिखैत देखल जाइत छथि। नवीन पद्धति किछु सुविधाजनक अवश्य छैक। किएक तँ एहिमे समय आ स्थानक बचत होइत छैक। मुदा कतोक बेर हस्तलेखन वा मुद्रणमे अनुस्वारक छोट सन बिन्दु स्पष्ट नहि भेलासँ अर्थक अनर्थ होइत सेहो देखल जाइत अछि। अनुस्वारक प्रयोगमे उच्चारण-दोषक सम्भावना सेहो ततबए देखल जाइत अछि। एतदर्थ कसँ लऽ कऽ पवर्ग धरि पञ्चमाक्षरेक प्रयोग करब उचित अछि। यसँ लऽ कऽ ज्ञ धरिक अक्षरक सङ्ग अनुस्वारक प्रयोग करबामे कतहु कोनो विवाद नहि देखल जाइछ। २.ढ आ ढ़ : ढ़क उच्चारण “र् ह”जकाँ होइत अछि। अतः जतऽ “र् ह”क उच्चारण हो ओतऽ मात्र ढ़ लिखल जाए। आन ठाम खाली ढ लिखल जएबाक चाही। जेना- ढ = ढाकी, ढेकी, ढीठ, ढेउआ, ढङ्ग, ढेरी, ढाकनि, ढाठ आदि। ढ़ = पढ़ाइ, बढ़ब, गढ़ब, मढ़ब, बुढ़बा, साँढ़, गाढ़, रीढ़, चाँढ़, सीढ़ी, पीढ़ी आदि। उपर्युक्त शब्द सभकेँ देखलासँ ई स्पष्ट होइत अछि जे साधारणतया शब्दक शुरूमे ढ आ मध्य तथा अन्तमे ढ़ अबैत अछि। इएह नियम ड आ ड़क सन्दर्भ सेहो लागू होइत अछि। ३.व आ ब : मैथिलीमे “व”क उच्चारण ब कएल जाइत अछि, मुदा ओकरा ब रूपमे नहि लिखल जएबाक चाही। जेना- उच्चारण : बैद्यनाथ, बिद्या, नब, देबता, बिष्णु, बंश, बन्दना आदि। एहि सभक स्थानपर क्रमशः वैद्यनाथ, विद्या, नव, देवता, विष्णु, वंश, वन्दना लिखबाक चाही। सामान्यतया व उच्चारणक लेल ओ प्रयोग कएल जाइत अछि। जेना- ओकील, ओजह आदि। ४.य आ ज : कतहु-कतहु “य”क उच्चारण “ज”जकाँ करैत देखल जाइत अछि, मुदा ओकरा ज नहि लिखबाक चाही। उच्चारणमे यज्ञ, जदि, जमुना, जुग, जाबत, जोगी, जदु, जम आदि कहल जाएबला शब्द सभकेँ क्रमशः यज्ञ, यदि, यमुना, युग, यावत, योगी, यदु, यम लिखबाक चाही। ५.ए आ य : मैथिलीक वर्तनीमे ए आ य दुनू लिखल जाइत अछि। प्राचीन वर्तनी- कएल, जाए, होएत, माए, भाए, गाए आदि। नवीन वर्तनी- कयल, जाय, होयत, माय, भाय, गाय आदि। सामान्यतया शब्दक शुरूमे ए मात्र अबैत अछि। जेना एहि, एना, एकर, एहन आदि। एहि शब्द सभक स्थानपर यहि, यना, यकर, यहन आदिक प्रयोग नहि करबाक चाही। यद्यपि मैथिलीभाषी थारू सहित किछु जातिमे शब्दक आरम्भोमे “ए”केँ य कहि उच्चारण कएल जाइत अछि। ए आ “य”क प्रयोगक सन्दर्भमे प्राचीने पद्धतिक अनुसरण करब उपयुक्त मानि एहि पुस्तकमे ओकरे प्रयोग कएल गेल अछि। किएक तँ दुनूक लेखनमे कोनो सहजता आ दुरूहताक बात नहि अछि। आ मैथिलीक सर्वसाधारणक उच्चारण-शैली यक अपेक्षा एसँ बेसी निकट छैक। खास कऽ कएल, हएब आदि कतिपय शब्दकेँ कैल, हैब आदि रूपमे कतहु-कतहु लिखल जाएब सेहो “ए”क प्रयोगकेँ बेसी समीचीन प्रमाणित करैत अछि। ६.हि, हु तथा एकार, ओकार : मैथिलीक प्राचीन लेखन-परम्परामे कोनो बातपर बल दैत काल शब्दक पाछाँ हि, हु लगाओल जाइत छैक। जेना- हुनकहि, अपनहु, ओकरहु, तत्कालहि, चोट्टहि, आनहु आदि। मुदा आधुनिक लेखनमे हिक स्थानपर एकार एवं हुक स्थानपर ओकारक प्रयोग करैत देखल जाइत अछि। जेना- हुनके, अपनो, तत्काले, चोट्टे, आनो आदि। ७.ष तथा ख : मैथिली भाषामे अधिकांशतः षक उच्चारण ख होइत अछि। जेना- षड्यन्त्र (खड़यन्त्र), षोडशी (खोड़शी), षट्कोण (खटकोण), वृषेश (वृखेश), सन्तोष (सन्तोख) आदि। ८.ध्वनि-लोप : निम्नलिखित अवस्थामे शब्दसँ ध्वनि-लोप भऽ जाइत अछि: (क) क्रियान्वयी प्रत्यय अयमे य वा ए लुप्त भऽ जाइत अछि। ओहिमे सँ पहिने अक उच्चारण दीर्घ भऽ जाइत अछि। ओकर आगाँ लोप-सूचक चिह्न वा विकारी (’ / ऽ) लगाओल जाइछ। जेना- पूर्ण रूप : पढ़ए (पढ़य) गेलाह, कए (कय) लेल, उठए (उठय) पड़तौक। अपूर्ण रूप : पढ़’ गेलाह, क’ लेल, उठ’ पड़तौक। पढ़ऽ गेलाह, कऽ लेल, उठऽ पड़तौक। (ख) पूर्वकालिक कृत आय (आए) प्रत्ययमे य (ए) लुप्त भऽ जाइछ, मुदा लोप-सूचक विकारी नहि लगाओल जाइछ। जेना- पूर्ण रूप : खाए (य) गेल, पठाय (ए) देब, नहाए (य) अएलाह। अपूर्ण रूप : खा गेल, पठा देब, नहा अएलाह। (ग) स्त्री प्रत्यय इक उच्चारण क्रियापद, संज्ञा, ओ विशेषण तीनूमे लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना- पूर्ण रूप : दोसरि मालिनि चलि गेलि। अपूर्ण रूप : दोसर मालिन चलि गेल। (घ) वर्तमान कृदन्तक अन्तिम त लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना- पूर्ण रूप : पढ़ैत अछि, बजैत अछि, गबैत अछि। अपूर्ण रूप : पढ़ै अछि, बजै अछि, गबै अछि। (ङ) क्रियापदक अवसान इक, उक, ऐक तथा हीकमे लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना- पूर्ण रूप: छियौक, छियैक, छहीक, छौक, छैक, अबितैक, होइक। अपूर्ण रूप : छियौ, छियै, छही, छौ, छै, अबितै, होइ। (च) क्रियापदीय प्रत्यय न्ह, हु तथा हकारक लोप भऽ जाइछ। जेना- पूर्ण रूप : छन्हि, कहलन्हि, कहलहुँ, गेलह, नहि। अपूर्ण रूप : छनि, कहलनि, कहलौँ, गेलऽ, नइ, नञि, नै। ९.ध्वनि स्थानान्तरण : कोनो-कोनो स्वर-ध्वनि अपना जगहसँ हटि कऽ दोसर ठाम चलि जाइत अछि। खास कऽ ह्रस्व इ आ उक सम्बन्धमे ई बात लागू होइत अछि। मैथिलीकरण भऽ गेल शब्दक मध्य वा अन्तमे जँ ह्रस्व इ वा उ आबए तँ ओकर ध्वनि स्थानान्तरित भऽ एक अक्षर आगाँ आबि जाइत अछि। जेना- शनि (शइन), पानि (पाइन), दालि ( दाइल), माटि (माइट), काछु (काउछ), मासु (माउस) आदि। मुदा तत्सम शब्द सभमे ई निअम लागू नहि होइत अछि। जेना- रश्मिकेँ रइश्म आ सुधांशुकेँ सुधाउंस नहि कहल जा सकैत अछि। १०.हलन्त(्)क प्रयोग : मैथिली भाषामे सामान्यतया हलन्त (्)क आवश्यकता नहि होइत अछि। कारण जे शब्दक अन्तमे अ उच्चारण नहि होइत अछि। मुदा संस्कृत भाषासँ जहिनाक तहिना मैथिलीमे आएल (तत्सम) शब्द सभमे हलन्त प्रयोग कएल जाइत अछि। एहि पोथीमे सामान्यतया सम्पूर्ण शब्दकेँ मैथिली भाषा सम्बन्धी निअम अनुसार हलन्तविहीन राखल गेल अछि। मुदा व्याकरण सम्बन्धी प्रयोजनक लेल अत्यावश्यक स्थानपर कतहु-कतहु हलन्त देल गेल अछि। प्रस्तुत पोथीमे मथिली लेखनक प्राचीन आ नवीन दुनू शैलीक सरल आ समीचीन पक्ष सभकेँ समेटि कऽ वर्ण-विन्यास कएल गेल अछि। स्थान आ समयमे बचतक सङ्गहि हस्त-लेखन तथा तकनीकी दृष्टिसँ सेहो सरल होबऽबला हिसाबसँ वर्ण-विन्यास मिलाओल गेल अछि। वर्तमान समयमे मैथिली मातृभाषी पर्यन्तकेँ आन भाषाक माध्यमसँ मैथिलीक ज्ञान लेबऽ पड़ि रहल परिप्रेक्ष्यमे लेखनमे सहजता तथा एकरूपतापर ध्यान देल गेल अछि। तखन मैथिली भाषाक मूल विशेषता सभ कुण्ठित नहि होइक, ताहू दिस लेखक-मण्डल सचेत अछि। प्रसिद्ध भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक कहब छनि जे सरलताक अनुसन्धानमे एहन अवस्था किन्नहु ने आबऽ देबाक चाही जे भाषाक विशेषता छाँहमे पडि जाए। -(भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक धारणाकेँ पूर्ण रूपसँ सङ्ग लऽ निर्धारित) १.२. मैथिली अकादमी, पटना द्वारा निर्धारित मैथिली लेखन-शैली

१. जे शब्द मैथिली-साहित्यक प्राचीन कालसँ आइ धरि जाहि वर्त्तनीमे प्रचलित अछि, से सामान्यतः ताहि वर्त्तनीमे लिखल जाय- उदाहरणार्थ-

ग्राह्य

एखन ठाम जकर, तकर तनिकर अछि

अग्राह्य अखन, अखनि, एखेन, अखनी ठिमा, ठिना, ठमा जेकर, तेकर तिनकर। (वैकल्पिक रूपेँ ग्राह्य) ऐछ, अहि, ए।

२. निम्नलिखित तीन प्रकारक रूप वैकल्पिकतया अपनाओल जाय: भऽ गेल, भय गेल वा भए गेल। जा रहल अछि, जाय रहल अछि, जाए रहल अछि। कर’ गेलाह, वा करय गेलाह वा करए गेलाह।

३. प्राचीन मैथिलीक ‘न्ह’ ध्वनिक स्थानमे ‘न’ लिखल जाय सकैत अछि यथा कहलनि वा कहलन्हि।

४. ‘ऐ’ तथा ‘औ’ ततय लिखल जाय जत’ स्पष्टतः ‘अइ’ तथा ‘अउ’ सदृश उच्चारण इष्ट हो। यथा- देखैत, छलैक, बौआ, छौक इत्यादि।

५. मैथिलीक निम्नलिखित शब्द एहि रूपे प्रयुक्त होयत: जैह, सैह, इएह, ओऐह, लैह तथा दैह।

६. ह्र्स्व इकारांत शब्दमे ‘इ’ के लुप्त करब सामान्यतः अग्राह्य थिक। यथा- ग्राह्य देखि आबह, मालिनि गेलि (मनुष्य मात्रमे)।

७. स्वतंत्र ह्रस्व ‘ए’ वा ‘य’ प्राचीन मैथिलीक उद्धरण आदिमे तँ यथावत राखल जाय, किंतु आधुनिक प्रयोगमे वैकल्पिक रूपेँ ‘ए’ वा ‘य’ लिखल जाय। यथा:- कयल वा कएल, अयलाह वा अएलाह, जाय वा जाए इत्यादि।

८. उच्चारणमे दू स्वरक बीच जे ‘य’ ध्वनि स्वतः आबि जाइत अछि तकरा लेखमे स्थान वैकल्पिक रूपेँ देल जाय। यथा- धीआ, अढ़ैआ, विआह, वा धीया, अढ़ैया, बियाह।

९. सानुनासिक स्वतंत्र स्वरक स्थान यथासंभव ‘ञ’ लिखल जाय वा सानुनासिक स्वर। यथा:- मैञा, कनिञा, किरतनिञा वा मैआँ, कनिआँ, किरतनिआँ।

१०. कारकक विभक्त्तिक निम्नलिखित रूप ग्राह्य:- हाथकेँ, हाथसँ, हाथेँ, हाथक, हाथमे। ’मे’ मे अनुस्वार सर्वथा त्याज्य थिक। ‘क’ क वैकल्पिक रूप ‘केर’ राखल जा सकैत अछि।

११. पूर्वकालिक क्रियापदक बाद ‘कय’ वा ‘कए’ अव्यय वैकल्पिक रूपेँ लगाओल जा सकैत अछि। यथा:- देखि कय वा देखि कए।

१२. माँग, भाँग आदिक स्थानमे माङ, भाङ इत्यादि लिखल जाय।

१३. अर्द्ध ‘न’ ओ अर्द्ध ‘म’ क बदला अनुसार नहि लिखल जाय, किंतु छापाक सुविधार्थ अर्द्ध ‘ङ’ , ‘ञ’, तथा ‘ण’ क बदला अनुस्वारो लिखल जा सकैत अछि। यथा:- अङ्क, वा अंक, अञ्चल वा अंचल, कण्ठ वा कंठ।

१४. हलंत चिह्न निअमतः लगाओल जाय, किंतु विभक्तिक संग अकारांत प्रयोग कएल जाय। यथा:- श्रीमान्, किंतु श्रीमानक।

१५. सभ एकल कारक चिह्न शब्दमे सटा क’ लिखल जाय, हटा क’ नहि, संयुक्त विभक्तिक हेतु फराक लिखल जाय, यथा घर परक।

१६. अनुनासिककेँ चन्द्रबिन्दु द्वारा व्यक्त कयल जाय। परंतु मुद्रणक सुविधार्थ हि समान जटिल मात्रापर अनुस्वारक प्रयोग चन्द्रबिन्दुक बदला कयल जा सकैत अछि। यथा- हिँ केर बदला हिं।

१७. पूर्ण विराम पासीसँ ( । ) सूचित कयल जाय।

१८. समस्त पद सटा क’ लिखल जाय, वा हाइफेनसँ जोड़ि क’ ,  हटा क’ नहि।

१९. लिअ तथा दिअ शब्दमे बिकारी (ऽ) नहि लगाओल जाय।

२०. अंक देवनागरी रूपमे राखल जाय।

२१.किछु ध्वनिक लेल नवीन चिन्ह बनबाओल जाय। जा' ई नहि बनल अछि ताबत एहि दुनू ध्वनिक बदला पूर्ववत् अय/ आय/ अए/ आए/ आओ/ अओ लिखल जाय। आकि ऎ वा ऒ सँ व्यक्त कएल जाय।

ह./- गोविन्द झा ११/८/७६ श्रीकान्त ठाकुर ११/८/७६ सुरेन्द्र झा "सुमन" ११/०८/७६

  २. मैथिलीमे भाषा सम्पादन पाठ्यक्रम २.१. उच्चारण निर्देश: (बोल्ड कएल रूप ग्राह्य):- दन्त न क उच्चारणमे दाँतमे जीह सटत- जेना बाजू नाम , मुदा ण क उच्चारणमे जीह मूर्धामे सटत (नै सटैए तँ उच्चारण दोष अछि)- जेना बाजू गणेश। तालव्य शमे जीह तालुसँ , षमे मूर्धासँ आ दन्त समे दाँतसँ सटत। निशाँ, सभ आ शोषण बाजि कऽ देखू। मैथिलीमे ष केँ वैदिक संस्कृत जकाँ ख सेहो उच्चरित कएल जाइत अछि, जेना वर्षा, दोष। य अनेको स्थानपर ज जकाँ उच्चरित होइत अछि आ ण ड़ जकाँ (यथा संयोग आ गणेश संजोग आ गड़ेस उच्चरित होइत अछि)। मैथिलीमे व क उच्चारण ब, श क उच्चारण स आ य क उच्चारण ज सेहो होइत अछि। ओहिना ह्रस्व इ बेशीकाल मैथिलीमे पहिने बाजल जाइत अछि कारण देवनागरीमे आ मिथिलाक्षरमे ह्रस्व इ अक्षरक पहिने लिखलो जाइत आ बाजलो जएबाक चाही। कारण जे हिन्दीमे एकर दोषपूर्ण उच्चारण होइत अछि (लिखल तँ पहिने जाइत अछि मुदा बाजल बादमे जाइत अछि), से शिक्षा पद्धतिक दोषक कारण हम सभ ओकर उच्चारण दोषपूर्ण ढंगसँ कऽ रहल छी। अछि- अ इ छ  ऐछ (उच्चारण) छथि- छ इ थ  – छैथ (उच्चारण) पहुँचि- प हुँ इ च (उच्चारण) आब अ आ इ ई ए ऐ ओ औ अं अः ऋ ऐ सभ लेल मात्रा सेहो अछि, मुदा ऐमे ई ऐ ओ औ अं अः ऋ केँ संयुक्ताक्षर रूपमे गलत रूपमे प्रयुक्त आ उच्चरित कएल जाइत अछि। जेना ऋ केँ री  रूपमे उच्चरित करब। आ देखियौ- ऐ लेल देखिऔ क प्रयोग अनुचित। मुदा देखिऐ लेल देखियै अनुचित। क् सँ ह् धरि अ सम्मिलित भेलासँ क सँ ह बनैत अछि, मुदा उच्चारण काल हलन्त युक्त शब्दक अन्तक उच्चारणक प्रवृत्ति बढ़ल अछि, मुदा हम जखन मनोजमे ज् अन्तमे बजैत छी, तखनो पुरनका लोककेँ बजैत सुनबन्हि- मनोजऽ, वास्तवमे ओ अ युक्त ज् = ज बजै छथि। फेर ज्ञ अछि ज् आ ञ क संयुक्त मुदा गलत उच्चारण होइत अछि- ग्य। ओहिना क्ष अछि क् आ ष क संयुक्त मुदा उच्चारण होइत अछि छ। फेर श् आ र क संयुक्त अछि श्र ( जेना श्रमिक) आ स् आ र क संयुक्त अछि स्र (जेना मिस्र)। त्र भेल त+र । उच्चारणक ऑडियो फाइल विदेह आर्काइव  http://www.videha.co.in/ पर उपलब्ध अछि। फेर केँ / सँ / पर पूर्व अक्षरसँ सटा कऽ लिखू मुदा तँ / कऽ हटा कऽ। ऐमे सँ मे पहिल सटा कऽ लिखू आ बादबला हटा कऽ। अंकक बाद टा लिखू सटा कऽ मुदा अन्य ठाम टा लिखू हटा कऽ– जेना छहटा मुदा सभ टा। फेर ६अ म सातम लिखू- छठम सातम नै। घरबलामे बला मुदा घरवालीमे वाली प्रयुक्त करू। रहए- रहै मुदा सकैए (उच्चारण सकै-ए)। मुदा कखनो काल रहए आ रहै मे अर्थ भिन्नता सेहो, जेना से कम्मो जगहमे पार्किंग करबाक अभ्यास रहै ओकरा। पुछलापर पता लागल जे ढुनढुन नाम्ना ई ड्राइवर कनाट प्लेसक पार्किंगमे काज करैत रहए। छलै, छलए मे सेहो ऐ तरहक भेल। छलए क उच्चारण छल-ए सेहो। संयोगने- (उच्चारण संजोगने) केँ/  कऽ केर- क ( केर क प्रयोग गद्यमे नै करू , पद्यमे कऽ सकै छी। ) क (जेना रामक) –रामक आ संगे (उच्चारण राम के /  राम कऽ सेहो) सँ- सऽ (उच्चारण) चन्द्रबिन्दु आ अनुस्वार- अनुस्वारमे कंठ धरिक प्रयोग होइत अछि मुदा चन्द्रबिन्दुमे नै। चन्द्रबिन्दुमे कनेक एकारक सेहो उच्चारण होइत अछि- जेना रामसँ- (उच्चारण राम सऽ)  रामकेँ- (उच्चारण राम कऽ/ राम के सेहो)। केँ जेना रामकेँ भेल हिन्दीक को (राम को)- राम को= रामकेँ क जेना रामक भेल हिन्दीक का ( राम का) राम का= रामक कऽ जेना जा कऽ भेल हिन्दीक कर ( जा कर) जा कर= जा कऽ सँ भेल हिन्दीक से (राम से) राम से= रामसँ सऽ , तऽ , त , केर (गद्यमे) एे चारू शब्द सबहक प्रयोग अवांछित। के दोसर अर्थेँ प्रयुक्त भऽ सकैए- जेना, के कहलक? विभक्ति “क”क बदला एकर प्रयोग अवांछित। नञि, नहि, नै, नइ, नँइ, नइँ, नइं ऐ सभक उच्चारण आ लेखन - नै त्त्व क बदलामे त्व जेना महत्वपूर्ण (महत्त्वपूर्ण नै) जतए अर्थ बदलि जाए ओतहि मात्र तीन अक्षरक संयुक्ताक्षरक प्रयोग उचित। सम्पति- उच्चारण स म्प इ त (सम्पत्ति नै- कारण सही उच्चारण आसानीसँ सम्भव नै)। मुदा सर्वोत्तम (सर्वोतम नै)। राष्ट्रिय (राष्ट्रीय नै) सकैए/ सकै (अर्थ परिवर्तन) पोछैले/ पोछै लेल/ पोछए लेल पोछैए/ पोछए/ (अर्थ परिवर्तन) पोछए/ पोछै ओ लोकनि ( हटा कऽ, ओ मे बिकारी नै) ओइ/ ओहि ओहिले/ ओहि लेल/ ओही लऽ जएबेँ/ बैसबेँ पँचभइयाँ देखियौक/ (देखिऔक नै- तहिना अ मे ह्रस्व आ दीर्घक मात्राक प्रयोग अनुचित) जकाँ / जेकाँ तँइ/ तैँ/ होएत / हएत नञि/ नहि/ नँइ/ नइँ/ नै सौँसे/ सौंसे बड़ / बड़ी (झोराओल) गाए (गाइ नहि), मुदा गाइक दूध (गाएक दूध नै।) रहलेँ/ पहिरतैँ हमहीं/ अहीं सब - सभ सबहक - सभहक धरि - तक गप- बात बूझब - समझब बुझलौं/ समझलौं/ बुझलहुँ - समझलहुँ हमरा आर - हम सभ आकि- आ कि सकैछ/ करैछ (गद्यमे प्रयोगक आवश्यकता नै) होइन/ होनि जाइन (जानि नै, जेना देल जाइन) मुदा जानि-बूझि (अर्थ परिव्र्तन) पइठ/ जाइठ आउ/ जाउ/ आऊ/ जाऊ मे, केँ, सँ, पर (शब्दसँ सटा कऽ) तँ कऽ धऽ दऽ (शब्दसँ हटा कऽ) मुदा दूटा वा बेसी विभक्ति संग रहलापर पहिल विभक्ति टाकेँ सटाऊ। जेना ऐमे सँ । एकटा , दूटा (मुदा कए टा) बिकारीक प्रयोग शब्दक अन्तमे, बीचमे अनावश्यक रूपेँ नै। आकारान्त आ अन्तमे अ क बाद बिकारीक प्रयोग नै (जेना दिअ , आ/ दिय’ , आ’, आ नै ) अपोस्ट्रोफीक प्रयोग बिकारीक बदलामे करब अनुचित आ मात्र फॉन्टक तकनीकी न्यूनताक परिचायक)- ओना बिकारीक संस्कृत रूप ऽ अवग्रह कहल जाइत अछि आ वर्तनी आ उच्चारण दुनू ठाम एकर लोप रहैत अछि/ रहि सकैत अछि (उच्चारणमे लोप रहिते अछि)। मुदा अपोस्ट्रोफी सेहो अंग्रेजीमे पसेसिव केसमे होइत अछि आ फ्रेंचमे शब्दमे जतए एकर प्रयोग होइत अछि जेना raison d’etre एतए सेहो एकर उच्चारण रैजौन डेटर होइत अछि, माने अपोस्ट्रॉफी अवकाश नै दैत अछि वरन जोड़ैत अछि, से एकर प्रयोग बिकारीक बदला देनाइ तकनीकी रूपेँ सेहो अनुचित)। अइमे, एहिमे/ ऐमे जइमे, जाहिमे एखन/ अखन/ अइखन केँ (के नहि) मे (अनुस्वार रहित) भऽ मे दऽ तँ (तऽ, त नै) सँ ( सऽ स नै) गाछ तर गाछ लग साँझ खन जो (जो go, करै जो do) तै/तइ जेना- तै दुआरे/ तइमे/ तइले जै/जइ जेना- जै कारण/ जइसँ/ जइले ऐ/अइ जेना- ऐ कारण/ ऐसँ/ अइले/ मुदा एकर एकटा खास प्रयोग- लालति‍ कतेक दि‍नसँ कहैत रहैत अइ लै/लइ जेना लैसँ/ लइले/ लै दुआरे लहँ/ लौं गेलौं/ लेलौं/ लेलँह/ गेलहुँ/ लेलहुँ/ लेलँ जइ/ जाहि‍/ जै जहि‍ठाम/ जाहि‍ठाम/ जइठाम/ जैठाम एहि‍/ अहि‍/ अइ (वाक्यक अंतमे ग्राह्य) / ऐ अइछ/ अछि‍/ ऐछ तइ/ तहि‍/ तै/ ताहि‍ ओहि‍/ ओइ सीखि‍/ सीख जीवि‍/ जीवी/ जीब भलेहीं/ भलहि‍ं तैं/ तँइ/ तँए जाएब/ जएब लइ/ लै छइ/ छै नहि‍/ नै/ नइ गइ/ गै छनि‍/ छन्‍हि‍  ... समए शब्‍दक संग जखन कोनो वि‍भक्‍ति‍ जुटै छै तखन समै जना समैपर इत्‍यादि‍। असगरमे हृदए आ वि‍भक्‍ति‍ जुटने हृदे जना हृदेसँ, हृदेमे इत्‍यादि‍। जइ/ जाहि‍/ जै जहि‍ठाम/ जाहि‍ठाम/ जइठाम/ जैठाम एहि‍/ अहि‍/ अइ/ ऐ अइछ/ अछि‍/ ऐछ तइ/ तहि‍/ तै/ ताहि‍ ओहि‍/ ओइ सीखि‍/ सीख जीवि‍/ जीवी/ जीब भले/ भलेहीं/ भलहि‍ं तैं/ तँइ/ तँए जाएब/ जएब लइ/ लै छइ/ छै नहि‍/ नै/ नइ गइ/ गै छनि‍/ छन्‍हि‍ चुकल अछि/ गेल गछि २.२. मैथिलीमे भाषा सम्पादन पाठ्यक्रम नीचाँक सूचीमे देल विकल्पमेसँ लैंगुएज एडीटर द्वारा कोन रूप चुनल जेबाक चाही: बोल्ड कएल रूप ग्राह्य: १.होयबला/ होबयबला/ होमयबला/ हेब’बला, हेम’बला/ होयबाक/होबएबला /होएबाक २. आ’/आऽ आ ३. क’ लेने/कऽ लेने/कए लेने/कय लेने/ल’/लऽ/लय/लए ४. भ’ गेल/भऽ गेल/भय गेल/भए गेल ५. कर’ गेलाह/करऽ गेलह/करए गेलाह/करय गेलाह ६. लिअ/दिअ लिय’,दिय’,लिअ’,दिय’/ ७. कर’ बला/करऽ बला/ करय बला करैबला/क’र’ बला / करैवाली ८. बला वला (पुरूष), वाली (स्‍त्री) ९ . आङ्ल आंग्ल १०. प्रायः प्रायह ११. दुःख दुख १ २. चलि गेल चल गेल/चैल गेल १३. देलखिन्ह देलकिन्ह, देलखिन १४. देखलन्हि देखलनि/ देखलैन्ह १५. छथिन्ह/ छलन्हि छथिन/ छलैन/ छलनि १६. चलैत/दैत चलति/दैति १७. एखनो अखनो १८. बढ़नि‍ बढ़इन बढ़न्हि १९. ओ’/ओऽ(सर्वनाम) ओ २० . ओ (संयोजक) ओ’/ओऽ २१. फाँगि/फाङ्गि फाइंग/फाइङ २२. जे जे’/जेऽ २३. ना-नुकुर ना-नुकर २४. केलन्हि/केलनि‍/कयलन्हि २५. तखनतँ/ तखन तँ २६. जा रहल/जाय रहल/जाए रहल २७. निकलय/निकलए लागल/ लगल बहराय/ बहराए लागल/ लगल निकल’/बहरै लागल २८. ओतय/ जतय जत’/ ओत’/ जतए/ ओतए २९. की फूरल जे कि फूरल जे ३०. जे जे’/जेऽ ३१. कूदि / यादि(मोन पारब) कूइद/याइद/कूद/याद/ यादि (मोन) ३२. इहो/ ओहो ३३. हँसए/ हँसय हँसऽ ३४. नौ आकि दस/नौ किंवा दस/ नौ वा दस ३५. सासु-ससुर सास-ससुर ३६. छह/ सात छ/छः/सात ३७. की  की’/ कीऽ (दीर्घीकारान्तमे ऽ वर्जित) ३८. जबाब जवाब ३९. करएताह/ करेताह करयताह ४०. दलान दिशि दलान दिश/दलान दिस ४१ . गेलाह गएलाह/गयलाह ४२. किछु आर/ किछु और/ किछ आर ४३. जाइ छल/ जाइत छल जाति छल/जैत छल ४४. पहुँचि/ भेट जाइत छल/ भेट जाइ छलए पहुँच/ भेटि‍ जाइत छल ४५. जबान (युवा)/ जवान(फौजी) ४६. लय/ लए क’/ कऽ/ लए कए / लऽ कऽ/ लऽ कए ४७. ल’/लऽ कय/ कए ४८. एखन / एखने / अखन / अखने ४९. अहींकेँ अहीँकेँ ५०. गहींर गहीँर ५१. धार पार केनाइ धार पार केनाय/केनाए ५२. जेकाँ जेँकाँ/ जकाँ ५३. तहिना तेहिना ५४. एकर अकर ५५. बहिनउ बहनोइ ५६. बहिन बहिनि ५७. बहिन-बहिनोइ बहिन-बहनउ ५८. नहि/ नै ५९. करबा / करबाय/ करबाए ६०. तँ/ त ऽ तय/तए ६१. भैयारी मे छोट-भाए/भै/, जेठ-भाय/भाइ, ६२. गि‍नतीमे दू भाइ/भाए/भाँइ ६३. ई पोथी दू भाइक/ भाँइ/ भाए/ लेल। यावत जावत ६४. माय मै / माए मुदा माइक ममता ६५. देन्हि/ दइन दनि‍/ दएन्हि/ दयन्हि दन्हि/ दैन्हि ६६. द’/ दऽ/ दए ६७. ओ (संयोजक) ओऽ (सर्वनाम) ६८. तका कए तकाय तकाए ६९. पैरे (on foot) पएरे  कएक/ कैक ७०. ताहुमे/ ताहूमे ७१. पुत्रीक ७२. बजा कय/ कए / कऽ ७३. बननाय/बननाइ ७४. कोला ७५. दिनुका दिनका ७६. ततहिसँ ७७. गरबओलन्हि/ गरबौलनि‍/ गरबेलन्हि/ गरबेलनि‍ ७८. बालु बालू ७९. चेन्ह चिन्ह(अशुद्ध) ८०. जे जे’ ८१ . से/ के से’/के’ ८२. एखुनका अखनुका ८३. भुमिहार भूमिहार ८४. सुग्गर / सुगरक/ सूगर ८५. झठहाक झटहाक ८६. छूबि ८७. करइयो/ओ करैयो ने देलक /करियौ-करइयौ ८८. पुबारि पुबाइ ८९. झगड़ा-झाँटी झगड़ा-झाँटि ९०. पएरे-पएरे पैरे-पैरे ९१. खेलएबाक ९२. खेलेबाक ९३. लगा ९४. होए- हो – होअए ९५. बुझल बूझल ९६. बूझल (संबोधन अर्थमे) ९७. यैह यएह / इएह/ सैह/ सएह ९८. तातिल ९९. अयनाय- अयनाइ/ अएनाइ/ एनाइ १००. निन्न- निन्द १०१. बिनु बिन १०२. जाए जाइ १०३. जाइ (in different sense)-last word of sentence १०४. छत पर आबि जाइ १०५. ने १०६. खेलाए (play) –खेलाइ १०७. शिकाइत- शिकायत १०८. ढप- ढ़प १०९ . पढ़- पढ ११०. कनिए/ कनिये कनिञे १११. राकस- राकश ११२. होए/ होय होइ ११३. अउरदा- औरदा ११४. बुझेलन्हि (different meaning- got understand) ११५. बुझएलन्हि/बुझेलनि‍/ बुझयलन्हि (understood himself) ११६. चलि- चल/ चलि‍ गेल ११७. खधाइ- खधाय ११८. मोन पाड़लखिन्ह/ मोन पाड़लखि‍न/ मोन पारलखिन्ह ११९. कैक- कएक- कइएक १२०. लग ल’ग १२१. जरेनाइ १२२. जरौनाइ जरओनाइ- जरएनाइ/ जरेनाइ १२३. होइत १२४. गरबेलन्हि/ गरबेलनि‍ गरबौलन्हि/ गरबौलनि‍ १२५. चिखैत- (to test)चिखइत १२६. करइयो (willing to do) करैयो १२७. जेकरा- जकरा १२८. तकरा- तेकरा १२९. बिदेसर स्थानेमे/ बिदेसरे स्थानमे १३०. करबयलहुँ/ करबएलहुँ/ करबेलहुँ करबेलौं १३१. हारिक (उच्चारण हाइरक) १३२. ओजन वजन आफसोच/ अफसोस कागत/ कागच/ कागज १३३. आधे भाग/ आध-भागे १३४. पिचा / पिचाय/पिचाए १३५. नञ/ ने १३६. बच्चा नञ (ने) पिचा जाय १३७. तखन ने (नञ) कहैत अछि। कहै/ सुनै/ देखै छल मुदा कहैत-कहैत/ सुनैत-सुनैत/ देखैत-देखैत १३८. कतेक गोटे/ कताक गोटे १३९. कमाइ-धमाइ/ कमाई- धमाई १४० . लग ल’ग १४१. खेलाइ (for playing) १४२. छथिन्ह/ छथिन १४३. होइत होइ १४४. क्यो कियो / केओ १४५. केश (hair) १४६. केस (court-case) १४७ . बननाइ/ बननाय/ बननाए १४८. जरेनाइ १४९. कुरसी कुर्सी १५०. चरचा चर्चा १५१. कर्म करम १५२. डुबाबए/ डुबाबै/ डुमाबै डुमाबय/ डुमाबए १५३. एखुनका/ अखुनका १५४. लए/ लिअए (वाक्यक अंतिम शब्द)- लऽ १५५. कएलक/ केलक १५६. गरमी गर्मी १५७ . वरदी वर्दी १५८. सुना गेलाह सुना’/सुनाऽ १५९. एनाइ-गेनाइ १६०. तेना ने घेरलन्हि/ तेना ने घेरलनि‍ १६१. नञि / नै १६२. डरो ड’रो १६३. कतहु/ कतौ कहीं १६४. उमरिगर-उमेरगर उमरगर १६५. भरिगर १६६. धोल/धोअल धोएल १६७. गप/गप्प १६८. के के’ १६९. दरबज्जा/ दरबजा १७०. ठाम १७१. धरि तक १७२. घूरि लौटि १७३. थोरबेक १७४. बड्ड १७५. तोँ/ तूँ १७६. तोँहि( पद्यमे ग्राह्य) १७७. तोँही / तोँहि १७८. करबाइए करबाइये १७९. एकेटा १८०. करितथि /करतथि १८१. पहुँचि/ पहुँच १८२. राखलन्हि रखलन्हि/ रखलनि‍ १८३. लगलन्हि/ लगलनि‍ लागलन्हि १८४. सुनि (उच्चारण सुइन) १८५. अछि (उच्चारण अइछ) १८६. एलथि गेलथि १८७. बितओने/ बि‍तौने/ बितेने १८८. करबओलन्हि/ करबौलनि‍/ करेलखिन्ह/ करेलखि‍न १८९. करएलन्हि/ करेलनि‍ १९०. आकि/ कि १९१. पहुँचि/ पहुँच १९२. बत्ती जराय/ जराए जरा (आगि लगा) १९३. से से’ १९४. हाँ मे हाँ (हाँमे हाँ विभक्त्तिमे हटा कए) १९५. फेल फैल १९६. फइल(spacious) फैल १९७. होयतन्हि/ होएतन्हि/ होएतनि‍/हेतनि‍/ हेतन्हि १९८. हाथ मटिआएब/ हाथ मटियाबय/हाथ मटियाएब १९९. फेका फेंका २००. देखाए देखा २०१. देखाबए २०२. सत्तरि सत्तर २०३. साहेब साहब २०४.गेलैन्ह/ गेलन्हि/ गेलनि‍ २०५. हेबाक/ होएबाक २०६.केलो/ कएलहुँ/केलौं/ केलुँ २०७. किछु न किछु/ किछु ने किछु २०८.घुमेलहुँ/ घुमओलहुँ/ घुमेलौं २०९. एलाक/ अएलाक २१०. अः/ अह २११.लय/ लए (अर्थ-परिवर्त्तन) २१२.कनीक/ कनेक २१३.सबहक/ सभक २१४.मिलाऽ/ मिला २१५.कऽ/ क २१६.जाऽ/ जा २१७.आऽ/ आ २१८.भऽ /भ’ (’ फॉन्टक कमीक द्योतक) २१९.निअम/ नियम २२० .हेक्टेअर/ हेक्टेयर २२१.पहिल अक्षर ढ/ बादक/ बीचक ढ़ २२२.तहिं/तहिँ/ तञि/ तैं २२३.कहिं/ कहीं २२४.तँइ/ तैं / तइँ २२५.नँइ/ नइँ/  नञि/ नहि/नै २२६.है/ हए / एलीहेँ/ २२७.छञि/ छै/ छैक /छइ २२८.दृष्टिएँ/ दृष्टियेँ २२९.आ (come)/ आऽ(conjunction) २३०. आ (conjunction)/ आऽ(come) २३१.कुनो/ कोनो, कोना/केना २३२.गेलैन्ह-गेलन्हि-गेलनि‍ २३३.हेबाक- होएबाक २३४.केलौँ- कएलौँ-कएलहुँ/केलौं २३५.किछु न किछ- किछु ने किछु २३६.केहेन- केहन २३७.आऽ (come)-आ (conjunction-and)/आ। आब'-आब' /आबह-आबह २३८. हएत-हैत २३९.घुमेलहुँ-घुमएलहुँ- घुमेलाें २४०.एलाक- अएलाक २४१.होनि- होइन/ होन्हि/ २४२.ओ-राम ओ श्यामक बीच(conjunction), ओऽ कहलक (he said)/ओ २४३.की हए/ कोसी अएली हए/ की है। की हइ २४४.दृष्टिएँ/ दृष्टियेँ २४५ .शामिल/ सामेल २४६.तैँ / तँए/ तञि/ तहिं २४७.जौं / ज्योँ/ जँ/ २४८.सभ/ सब २४९.सभक/ सबहक २५०.कहिं/ कहीं २५१.कुनो/ कोनो/ कोनहुँ/ २५२.फारकती भऽ गेल/ भए गेल/ भय गेल २५३.कोना/ केना/ कन्‍ना/कना २५४.अः/ अह २५५.जनै/ जनञ २५६.गेलनि‍/ गेलाह (अर्थ परिवर्तन) २५७.केलन्हि/ कएलन्हि/ केलनि‍/ २५८.लय/ लए/ लएह (अर्थ परिवर्तन) २५९.कनीक/ कनेक/कनी-मनी २६०.पठेलन्हि‍ पठेलनि‍/ पठेलइन/ पपठओलन्हि/ पठबौलनि‍/ २६१.निअम/ नियम २६२.हेक्टेअर/ हेक्टेयर २६३.पहिल अक्षर रहने ढ/ बीचमे रहने ढ़ २६४.आकारान्तमे बिकारीक प्रयोग उचित नै/ अपोस्ट्रोफीक प्रयोग फान्टक तकनीकी न्यूनताक परिचायक ओकर बदला अवग्रह (बिकारी) क प्रयोग उचित २६५.केर (पद्यमे ग्राह्य) / -क/ कऽ/ के २६६.छैन्हि- छन्हि २६७.लगैए/ लगैये २६८.होएत/ हएत २६९.जाएत/ जएत/ २७०.आएत/ अएत/ आओत २७१ .खाएत/ खएत/ खैत २७२.पिअएबाक/ पिएबाक/पि‍येबाक २७३.शुरु/ शुरुह २७४.शुरुहे/ शुरुए २७५.अएताह/अओताह/ एताह/ औताह २७६.जाहि/ जाइ/ जइ/ जै/ २७७.जाइत/ जैतए/ जइतए २७८.आएल/ अएल २७९.कैक/ कएक २८०.आयल/ अएल/ आएल २८१. जाए/ जअए/ जए (लालति‍ जाए लगलीह।) २८२. नुकएल/ नुकाएल २८३. कठुआएल/ कठुअएल २८४. ताहि/ तै/ तइ २८५. गायब/ गाएब/ गएब २८६. सकै/ सकए/ सकय २८७.सेरा/सरा/ सराए (भात सरा गेल) २८८.कहैत रही/देखैत रही/ कहैत छलौं/ कहै छलौं- अहिना चलैत/ पढ़ैत (पढ़ै-पढ़ैत अर्थ कखनो काल परिवर्तित) - आर बुझै/ बुझैत (बुझै/ बुझै छी, मुदा बुझैत-बुझैत)/ सकैत/ सकै। करैत/ करै। दै/ दैत। छैक/ छै। बचलै/ बचलैक। रखबा/ रखबाक । बिनु/ बिन। रातिक/ रातुक बुझै आ बुझैत केर अपन-अपन जगहपर प्रयोग समीचीन अछि‍। बुझैत-बुझैत आब बुझलि‍ऐ। हमहूँ बुझै छी। २८९. दुआरे/ द्वारे २९०.भेटि/ भेट/ भेँट २९१. खन/ खीन/  खुना (भोर खन/ भोर खीन) २९२.तक/ धरि २९३.गऽ/ गै (meaning different-जनबै गऽ) २९४.सऽ/ सँ (मुदा दऽ, लऽ) २९५.त्त्व,(तीन अक्षरक मेल बदला पुनरुक्तिक एक आ एकटा दोसरक उपयोग) आदिक बदला त्व आदि। महत्त्व/ महत्व/ कर्ता/ कर्त्ता आदिमे त्त संयुक्तक कोनो आवश्यकता मैथिलीमे नै अछि। वक्तव्य २९६.बेसी/ बेशी २९७.बाला/वाला बला/ वला (रहैबला) २९८ .वाली/ (बदलैवाली) २९९.वार्त्ता/ वार्ता ३००. अन्तर्राष्ट्रिय/ अन्तर्राष्ट्रीय ३०१. लेमए/ लेबए ३०२.लमछुरका, नमछुरका ३०२.लागै/ लगै ( भेटैत/ भेटै) ३०३.लागल/ लगल ३०४.हबा/ हवा ३०५.राखलक/ रखलक ३०६.आ (come)/ आ (and) ३०७. पश्चाताप/ पश्चात्ताप ३०८. ऽ केर व्यवहार शब्दक अन्तमे मात्र, यथासंभव बीचमे नै। ३०९.कहैत/ कहै ३१०. रहए (छल)/ रहै (छलै) (meaning different) ३११.तागति/ ताकति ३१२.खराप/ खराब ३१३.बोइन/ बोनि/ बोइनि ३१४.जाठि/ जाइठ ३१५.कागज/ कागच/ कागत ३१६.गिरै (meaning different- swallow)/ गिरए (खसए) ३१७.राष्ट्रिय/ राष्ट्रीय Festivals of Mithila DATE-LIST (year- 2011-12) (१४१९ साल) Marriage Days: Nov.2011- 20,21,23,25,27,30 Dec.2011- 1,5,9 January 2012- 18,19,20,23,25,27,29 Feb.2012- 2,3,8,9,10,16,17,19,23,24,29 March 2012- 1,8,9,12 April 2012- 15,16,18,25,26 June 2012- 8,13,24,25,28,29 Upanayana Days: February 2012- 2,3,24,26 March 2012- 4 April 2012- 1,2,26 June 2012- 22 Dviragaman Din: November 2011- 27,30 December 2011- 1,2,5,7,9,12 February 2012- 22,23,24,26,27,29 March 2012- 1,2,4,5,9,11,12 April 2012- 23,25,26,29 May 2012- 2,3,4,6,7 Mundan Din: December 2011- 1,5 January 201225,26,30 March 2012- 12 April 2012- 26 May 2012- 23,25,31 June 2012- 8,21,22,29 FESTIVALS OF MITHILA Mauna Panchami-20 July Madhushravani- 2 August Nag Panchami- 4 August Raksha Bandhan- 13 Aug Krishnastami- 21 August Kushi Amavasya / Somvari Vrat- 29 August Hartalika Teej- 31 August ChauthChandra-1 September Karma Dharma Ekadashi-8 September Indra Pooja Aarambh- 9 September Anant Caturdashi- 11 Sep Agastyarghadaan- 12 Sep Pitri Paksha begins- 13 Sep Mahalaya Aarambh- 13 September Vishwakarma Pooja- 17 September Jimootavahan Vrata/ Jitia-20 September Matri Navami- 21September Kalashsthapan- 28 September Belnauti- 2 October Patrika Pravesh- 3 October Mahastami- 4 October Maha Navami - 5 October Vijaya Dashami- 6 October Kojagara- 11 Oct Dhanteras- 24 October Diyabati, shyama pooja-26 October Annakoota/ Govardhana Pooja-27  October Bhratridwitiya/ Chitragupta Pooja-28 October Chhathi-kharna -31 October Chhathi- sayankalik arghya - 1 November Devotthan Ekadashi- 17 November Sama poojarambh- 2 November Kartik Poornima/ Sama Bisarjan- 10 Nov ravivratarambh- 27 November Navanna parvan- 29 November Vivaha Panchmi- 29 November Makara/ Teela Sankranti-15 Jan Naraknivaran chaturdashi- 21 January Basant Panchami/ Saraswati Pooja- 28 January Achla Saptmi- 30 January Mahashivaratri-20 February Holikadahan-Fagua-7 March Holi-9 Mar Varuni Yoga-20 March Chaiti  navaratrarambh- 23 March Chaiti Chhathi vrata-29 March Ram Navami- 1 April Mesha Sankranti-Satuani-13 April Jurishital-14 April Akshaya Tritiya-24 April Ravi Brat Ant- 29 April Janaki Navami- 30 April Vat Savitri-barasait- 20 May Ganga Dashhara-30 May Somavati Amavasya Vrata- 18 June Jagannath Rath Yatra- 21 June Hari Sayan Ekadashi- 30 June Aashadhi Guru Poornima-3 Jul VIDEHA ARCHIVE १.विदेह ई-पत्रिकाक सभटा पुरान अंक ब्रेल, तिरहुता आ देवनागरी रूपमे Videha e journal's all old issues in Braille Tirhuta and Devanagari versions विदेह ई-पत्रिकाक पहिल ५० अंक

विदेह ई-पत्रिकाक ५०म सँ आगाँक अंक २.मैथिली पोथी डाउनलोड Maithili Books Download ३.मैथिली ऑडियो संकलन Maithili Audio Downloads ४.मैथिली वीडियोक संकलन Maithili Videos ५.मिथिला चित्रकला/ आधुनिक चित्रकला आ चित्र Mithila Painting/ Modern Art and Photos "विदेह"क एहि सभ सहयोगी लिंकपर सेहो एक बेर जाऊ। ६.विदेह मैथिली क्विज  :  http://videhaquiz.blogspot.com/ ७.विदेह मैथिली जालवृत्त एग्रीगेटर : http://videha-aggregator.blogspot.com/ ८.विदेह मैथिली साहित्य अंग्रेजीमे अनूदित http://madhubani-art.blogspot.com/ ९.विदेहक पूर्व-रूप "भालसरिक गाछ"  : http://gajendrathakur.blogspot.com/ १०.विदेह इंडेक्स  : http://videha123.blogspot.com/ ११.विदेह फाइल : http://videha123.wordpress.com/ १२. विदेह: सदेह : पहिल तिरहुता (मिथिला़क्षर) जालवृत्त (ब्लॉग) http://videha-sadeha.blogspot.com/ १३. विदेह:ब्रेल: मैथिली ब्रेलमे: पहिल बेर विदेह द्वारा http://videha-braille.blogspot.com/ १४.VIDEHA IST MAITHILI  FORTNIGHTLY EJOURNAL ARCHIVE http://videha-archive.blogspot.com/ १५. विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका मैथिली पोथीक आर्काइव http://videha-pothi.blogspot.com/ १६. विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका ऑडियो आर्काइव http://videha-audio.blogspot.com/ १७. विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका वीडियो आर्काइव http://videha-video.blogspot.com/ १८. विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका मिथिला चित्रकला, आधुनिक कला आ चित्रकला http://videha-paintings-photos.blogspot.com/ १९. मैथिल आर मिथिला (मैथिलीक सभसँ लोकप्रिय जालवृत्त) http://maithilaurmithila.blogspot.com/ २०.श्रुति प्रकाशन http://www.shruti-publication.com/ २१.http://groups.google.com/group/videha VIDEHA केर सदस्यता लिअ Top of Form Bottom of Form ईमेल : एहि समूहपर जाऊ २२.http://groups.yahoo.com/group/VIDEHA/ Top of Form Subscribe to VIDEHA Powered by us.groups.yahoo.com Bottom of Form २३.गजेन्द्र ठाकुर इ‍डेक्स http://gajendrathakur123.blogspot.com २४. नेना भुटका http://mangan-khabas.blogspot.com/ २५.विदेह रेडियो:मैथिली कथा-कविता आदिक पहिल पोडकास्ट साइट http://videha123radio.wordpress.com/ २६.Videha Radio २७. Join official Videha facebook group. २८. विदेह मैथिली नाट्य उत्सव http://maithili-drama.blogspot.com/ २९.समदिया http://esamaad.blogspot.com/ ३०. मैथिली फिल्म्स http://maithilifilms.blogspot.com/ ३१.अनचिन्हार आखर http://anchinharakharkolkata.blogspot.com/ ३२. मैथिली हाइकू http://maithili-haiku.blogspot.com/ ३३. मानक मैथिली http://manak-maithili.blogspot.com/ महत्त्वपूर्ण सूचना:(१) 'विदेह' द्वारा धारावाहिक रूपे ई-प्रकाशित कएल गेल गजेन्द्र ठाकुरक  निबन्ध-प्रबन्ध-समीक्षा, उपन्यास (सहस्रबाढ़नि) , पद्य-संग्रह (सहस्राब्दीक चौपड़पर), कथा-गल्प (गल्प-गुच्छ), नाटक(संकर्षण), महाकाव्य (त्वञ्चाहञ्च आ असञ्जाति मन) आ बाल-किशोर साहित्य विदेहमे संपूर्ण ई-प्रकाशनक बाद प्रिंट फॉर्ममे। कुरुक्षेत्रम्–अन्तर्मनक खण्ड-१ सँ ७ Combined ISBN No.978-81-907729-7-6 विवरण एहि पृष्ठपर नीचाँमे आ प्रकाशकक साइट http://www.shruti-publication.com/ पर । महत्त्वपूर्ण सूचना (२):सूचना: विदेहक मैथिली-अंग्रेजी आ अंग्रेजी मैथिली कोष (इंटरनेटपर पहिल बेर सर्च-डिक्शनरी) एम.एस. एस.क्यू.एल. सर्वर आधारित -Based on ms-sql server Maithili-English and English-Maithili Dictionary. विदेहक भाषापाक- रचनालेखन स्तंभमे। कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक- गजेन्द्र ठाकुर गजेन्द्र ठाकुरक निबन्ध-प्रबन्ध-समीक्षा, उपन्यास (सहस्रबाढ़नि) , पद्य-संग्रह (सहस्राब्दीक चौपड़पर), कथा-गल्प (गल्प गुच्छ), नाटक(संकर्षण), महाकाव्य (त्वञ्चाहञ्च आ असञ्जाति मन) आ बालमंडली-किशोरजगत विदेहमे संपूर्ण ई-प्रकाशनक बाद प्रिंट फॉर्ममे। कुरुक्षेत्रम्–अन्तर्मनक, खण्ड-१ सँ ७ Ist edition 2009 of Gajendra Thakur’s KuruKshetram-Antarmanak (Vol. I to VII)- essay-paper-criticism, novel, poems, story, play, epics and Children-grown-ups literature in single binding: Language:Maithili ६९२ पृष्ठ : मूल्य भा. रु. 100/-(for individual buyers inside india) (add courier charges Rs.50/-per copy for Delhi/NCR and Rs.100/- per copy for outside Delhi)

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Details for purchase available at print-version publishers's site website: http://www.shruti-publication.com/ or you may write to e-mail:shruti.publication@shruti-publication.com विदेह: सदेह : १: २: ३: ४ तिरहुता : देवनागरी "विदेह" क, प्रिंट संस्करण :विदेह-ई-पत्रिका (http://www.videha.co.in/) क चुनल रचना सम्मिलित। विदेह:सदेह:१: २: ३: ४ सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। Details for purchase available at print-version publishers's site http://www.shruti-publication.com  or you may write to shruti.publication@shruti-publication.com २. संदेश- [ विदेह ई-पत्रिका, विदेह:सदेह मिथिलाक्षर आ देवनागरी आ गजेन्द्र ठाकुरक सात खण्डक- निबन्ध-प्रबन्ध-समीक्षा,उपन्यास (सहस्रबाढ़नि) , पद्य-संग्रह (सहस्राब्दीक चौपड़पर), कथा-गल्प (गल्प गुच्छ), नाटक (संकर्षण), महाकाव्य (त्वञ्चाहञ्च आ असञ्जाति मन) आ बाल-मंडली-किशोर जगत- संग्रह कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक मादेँ। ] १.श्री गोविन्द झा- विदेहकेँ तरंगजालपर उतारि विश्वभरिमे मातृभाषा मैथिलीक लहरि जगाओल, खेद जे अपनेक एहि महाभियानमे हम एखन धरि संग नहि दए सकलहुँ। सुनैत छी अपनेकेँ सुझाओ आ रचनात्मक आलोचना प्रिय लगैत अछि तेँ किछु लिखक मोन भेल। हमर सहायता आ सहयोग अपनेकेँ सदा उपलब्ध रहत। २.श्री रमानन्द रेणु- मैथिलीमे ई-पत्रिका पाक्षिक रूपेँ चला कऽ जे अपन मातृभाषाक प्रचार कऽ रहल छी, से धन्यवाद । आगाँ अपनेक समस्त मैथिलीक कार्यक हेतु हम हृदयसँ शुभकामना दऽ रहल छी। ३.श्री विद्यानाथ झा "विदित"- संचार आ प्रौद्योगिकीक एहि प्रतिस्पर्धी ग्लोबल युगमे अपन महिमामय "विदेह"केँ अपना देहमे प्रकट देखि जतबा प्रसन्नता आ संतोष भेल, तकरा कोनो उपलब्ध "मीटर"सँ नहि नापल जा सकैछ? ..एकर ऐतिहासिक मूल्यांकन आ सांस्कृतिक प्रतिफलन एहि शताब्दीक अंत धरि लोकक नजरिमे आश्चर्यजनक रूपसँ प्रकट हैत। ४. प्रो. उदय नारायण सिंह "नचिकेता"- जे काज अहाँ कए रहल छी तकर चरचा एक दिन मैथिली भाषाक इतिहासमे होएत। आनन्द भए रहल अछि, ई जानि कए जे एतेक गोट मैथिल "विदेह" ई जर्नलकेँ पढ़ि रहल छथि।...विदेहक चालीसम अंक पुरबाक लेल अभिनन्दन। ५. डॉ. गंगेश गुंजन- एहि विदेह-कर्ममे लागि रहल अहाँक सम्वेदनशील मन, मैथिलीक प्रति समर्पित मेहनतिक अमृत रंग, इतिहास मे एक टा विशिष्ट फराक अध्याय आरंभ करत, हमरा विश्वास अछि। अशेष शुभकामना आ बधाइक सङ्ग, सस्नेह...अहाँक पोथी कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक प्रथम दृष्टया बहुत भव्य तथा उपयोगी बुझाइछ। मैथिलीमे तँ अपना स्वरूपक प्रायः ई पहिले एहन  भव्य अवतारक पोथी थिक। हर्षपूर्ण हमर हार्दिक बधाई स्वीकार करी। ६. श्री रामाश्रय झा "रामरंग"(आब स्वर्गीय)- "अपना" मिथिलासँ संबंधित...विषय वस्तुसँ अवगत भेलहुँ।...शेष सभ कुशल अछि। ७. श्री ब्रजेन्द्र त्रिपाठी- साहित्य अकादमी- इंटरनेट पर प्रथम मैथिली पाक्षिक पत्रिका "विदेह" केर लेल बधाई आ शुभकामना स्वीकार करू। ८. श्री प्रफुल्लकुमार सिंह "मौन"- प्रथम मैथिली पाक्षिक पत्रिका "विदेह" क प्रकाशनक समाचार जानि कनेक चकित मुदा बेसी आह्लादित भेलहुँ। कालचक्रकेँ पकड़ि जाहि दूरदृष्टिक परिचय देलहुँ, ओहि लेल हमर मंगलकामना। ९.डॉ. शिवप्रसाद यादव- ई जानि अपार हर्ष भए रहल अछि, जे नव सूचना-क्रान्तिक क्षेत्रमे मैथिली पत्रकारिताकेँ प्रवेश दिअएबाक साहसिक कदम उठाओल अछि। पत्रकारितामे एहि प्रकारक नव प्रयोगक हम स्वागत करैत छी, संगहि "विदेह"क सफलताक शुभकामना। १०. श्री आद्याचरण झा- कोनो पत्र-पत्रिकाक प्रकाशन- ताहूमे मैथिली पत्रिकाक प्रकाशनमे के कतेक सहयोग करताह- ई तऽ भविष्य कहत। ई हमर ८८ वर्षमे ७५ वर्षक अनुभव रहल। एतेक पैघ महान यज्ञमे हमर श्रद्धापूर्ण आहुति प्राप्त होयत- यावत ठीक-ठाक छी/ रहब। ११. श्री विजय ठाकुर- मिशिगन विश्वविद्यालय- "विदेह" पत्रिकाक अंक देखलहुँ, सम्पूर्ण टीम बधाईक पात्र अछि। पत्रिकाक मंगल भविष्य हेतु हमर शुभकामना स्वीकार कएल जाओ। १२. श्री सुभाषचन्द्र यादव- ई-पत्रिका "विदेह" क बारेमे जानि प्रसन्नता भेल। ’विदेह’ निरन्तर पल्लवित-पुष्पित हो आ चतुर्दिक अपन सुगंध पसारय से कामना अछि। १३. श्री मैथिलीपुत्र प्रदीप- ई-पत्रिका "विदेह" केर सफलताक भगवतीसँ कामना। हमर पूर्ण सहयोग रहत। १४. डॉ. श्री भीमनाथ झा- "विदेह" इन्टरनेट पर अछि तेँ "विदेह" नाम उचित आर कतेक रूपेँ एकर विवरण भए सकैत अछि। आइ-काल्हि मोनमे उद्वेग रहैत अछि, मुदा शीघ्र पूर्ण सहयोग देब।कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक देखि अति प्रसन्नता भेल। मैथिलीक लेल ई घटना छी। १५. श्री रामभरोस कापड़ि "भ्रमर"- जनकपुरधाम- "विदेह" ऑनलाइन देखि रहल छी। मैथिलीकेँ अन्तर्राष्ट्रीय जगतमे पहुँचेलहुँ तकरा लेल हार्दिक बधाई। मिथिला रत्न सभक संकलन अपूर्व। नेपालोक सहयोग भेटत, से विश्वास करी। १६. श्री राजनन्दन लालदास- "विदेह" ई-पत्रिकाक माध्यमसँ बड़ नीक काज कए रहल छी, नातिक अहिठाम देखलहुँ। एकर वार्षिक अ‍ंक जखन प्रिं‍ट निकालब तँ हमरा पठायब। कलकत्तामे बहुत गोटेकेँ हम साइटक पता लिखाए देने छियन्हि। मोन तँ होइत अछि जे दिल्ली आबि कए आशीर्वाद दैतहुँ, मुदा उमर आब बेशी भए गेल। शुभकामना देश-विदेशक मैथिलकेँ जोड़बाक लेल।.. उत्कृष्ट प्रकाशन कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक लेल बधाइ। अद्भुत काज कएल अछि, नीक प्रस्तुति अछि सात खण्डमे।  मुदा अहाँक सेवा आ से निःस्वार्थ तखन बूझल जाइत जँ अहाँ द्वारा प्रकाशित पोथी सभपर दाम लिखल नहि रहितैक। ओहिना सभकेँ विलहि देल जइतैक। (स्पष्टीकरण-  श्रीमान्, अहाँक सूचनार्थ विदेह द्वारा ई-प्रकाशित कएल सभटा सामग्री आर्काइवमे https://sites.google.com/a/videha.com/videha-pothi/ पर बिना मूल्यक डाउनलोड लेल उपलब्ध छै आ भविष्यमे सेहो रहतैक। एहि आर्काइवकेँ जे कियो प्रकाशक अनुमति लऽ कऽ प्रिंट रूपमे प्रकाशित कएने छथि आ तकर ओ दाम रखने छथि ताहिपर हमर कोनो नियंत्रण नहि अछि।- गजेन्द्र ठाकुर)...   अहाँक प्रति अशेष शुभकामनाक संग। १७. डॉ. प्रेमशंकर सिंह- अहाँ मैथिलीमे इंटरनेटपर पहिल पत्रिका "विदेह" प्रकाशित कए अपन अद्भुत मातृभाषानुरागक परिचय देल अछि, अहाँक निःस्वार्थ मातृभाषानुरागसँ प्रेरित छी, एकर निमित्त जे हमर सेवाक प्रयोजन हो, तँ सूचित करी। इंटरनेटपर आद्योपांत पत्रिका देखल, मन प्रफुल्लित भऽ गेल। १८.श्रीमती शेफालिका वर्मा- विदेह ई-पत्रिका देखि मोन उल्लाससँ भरि गेल। विज्ञान कतेक प्रगति कऽ रहल अछि...अहाँ सभ अनन्त आकाशकेँ भेदि दियौ, समस्त विस्तारक रहस्यकेँ तार-तार कऽ दियौक...। अपनेक अद्भुत पुस्तक कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक विषयवस्तुक दृष्टिसँ गागरमे सागर अछि। बधाई। १९.श्री हेतुकर झा, पटना-जाहि समर्पण भावसँ अपने मिथिला-मैथिलीक सेवामे तत्पर छी से स्तुत्य अछि। देशक राजधानीसँ भय रहल मैथिलीक शंखनाद मिथिलाक गाम-गाममे मैथिली चेतनाक विकास अवश्य करत। २०. श्री योगानन्द झा, कबिलपुर, लहेरियासराय- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पोथीकेँ निकटसँ देखबाक अवसर भेटल अछि आ मैथिली जगतक एकटा उद्भट ओ समसामयिक दृष्टिसम्पन्न हस्ताक्षरक कलमबन्द परिचयसँ आह्लादित छी। "विदेह"क देवनागरी सँस्करण पटनामे रु. 80/- मे उपलब्ध भऽ सकल जे विभिन्न लेखक लोकनिक छायाचित्र, परिचय पत्रक ओ रचनावलीक सम्यक प्रकाशनसँ ऐतिहासिक कहल जा सकैछ। २१. श्री किशोरीकान्त मिश्र- कोलकाता- जय मैथिली, विदेहमे बहुत रास कविता, कथा, रिपोर्ट आदिक सचित्र संग्रह देखि आ आर अधिक प्रसन्नता मिथिलाक्षर देखि- बधाई स्वीकार कएल जाओ। २२.श्री जीवकान्त- विदेहक मुद्रित अंक पढ़ल- अद्भुत मेहनति। चाबस-चाबस। किछु समालोचना मरखाह..मुदा सत्य। २३. श्री भालचन्द्र झा- अपनेक कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक देखि बुझाएल जेना हम अपने छपलहुँ अछि। एकर विशालकाय आकृति अपनेक सर्वसमावेशताक परिचायक अछि। अपनेक रचना सामर्थ्यमे उत्तरोत्तर वृद्धि हो, एहि शुभकामनाक संग हार्दिक बधाई। २४.श्रीमती डॉ नीता झा- अहाँक कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़लहुँ। ज्योतिरीश्वर शब्दावली, कृषि मत्स्य शब्दावली आ सीत बसन्त आ सभ कथा, कविता, उपन्यास, बाल-किशोर साहित्य सभ उत्तम छल। मैथिलीक उत्तरोत्तर विकासक लक्ष्य दृष्टिगोचर होइत अछि। २५.श्री मायानन्द मिश्र- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक मे हमर उपन्यास स्त्रीधनक जे विरोध कएल गेल अछि तकर हम विरोध करैत छी।... कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पोथीक लेल शुभकामना।(श्रीमान् समालोचनाकेँ विरोधक रूपमे नहि लेल जाए।-गजेन्द्र ठाकुर) २६.श्री महेन्द्र हजारी- सम्पादक श्रीमिथिला- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़ि मोन हर्षित भऽ गेल..एखन पूरा पढ़यमे बहुत समय लागत, मुदा जतेक पढ़लहुँ से आह्लादित कएलक। २७.श्री केदारनाथ चौधरी- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक अद्भुत लागल, मैथिली साहित्य लेल ई पोथी एकटा प्रतिमान बनत। २८.श्री सत्यानन्द पाठक- विदेहक हम नियमित पाठक छी। ओकर स्वरूपक प्रशंसक छलहुँ। एम्हर अहाँक लिखल - कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक देखलहुँ। मोन आह्लादित भऽ उठल। कोनो रचना तरा-उपरी। २९.श्रीमती रमा झा-सम्पादक मिथिला दर्पण। कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक प्रिंट फॉर्म पढ़ि आ एकर गुणवत्ता देखि मोन प्रसन्न भऽ गेल, अद्भुत शब्द एकरा लेल प्रयुक्त कऽ रहल छी। विदेहक उत्तरोत्तर प्रगतिक शुभकामना। ३०.श्री नरेन्द्र झा, पटना- विदेह नियमित देखैत रहैत छी। मैथिली लेल अद्भुत काज कऽ रहल छी। ३१.श्री रामलोचन ठाकुर- कोलकाता- मिथिलाक्षर विदेह देखि मोन प्रसन्नतासँ भरि उठल, अंकक विशाल परिदृश्य आस्वस्तकारी अछि। ३२.श्री तारानन्द वियोगी- विदेह आ कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक देखि चकबिदोर लागि गेल। आश्चर्य। शुभकामना आ बधाई। ३३.श्रीमती प्रेमलता मिश्र “प्रेम”- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़लहुँ। सभ रचना उच्चकोटिक लागल। बधाई। ३४.श्री कीर्तिनारायण मिश्र- बेगूसराय- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक बड्ड नीक लागल, आगांक सभ काज लेल बधाई। ३५.श्री महाप्रकाश-सहरसा- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक नीक लागल, विशालकाय संगहि उत्तमकोटिक। ३६.श्री अग्निपुष्प- मिथिलाक्षर आ देवाक्षर विदेह पढ़ल..ई प्रथम तँ अछि एकरा प्रशंसामे मुदा हम एकरा दुस्साहसिक कहब। मिथिला चित्रकलाक स्तम्भकेँ मुदा अगिला अंकमे आर विस्तृत बनाऊ। ३७.श्री मंजर सुलेमान-दरभंगा- विदेहक जतेक प्रशंसा कएल जाए कम होएत। सभ चीज उत्तम। ३८.श्रीमती प्रोफेसर वीणा ठाकुर- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक उत्तम, पठनीय, विचारनीय। जे क्यो देखैत छथि पोथी प्राप्त करबाक उपाय पुछैत छथि। शुभकामना। ३९.श्री छत्रानन्द सिंह झा- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़लहुँ, बड्ड नीक सभ तरहेँ। ४०.श्री ताराकान्त झा- सम्पादक मैथिली दैनिक मिथिला समाद- विदेह तँ कन्टेन्ट प्रोवाइडरक काज कऽ रहल अछि। कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक अद्भुत लागल। ४१.डॉ रवीन्द्र कुमार चौधरी- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक बहुत नीक, बहुत मेहनतिक परिणाम। बधाई। ४२.श्री अमरनाथ- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक आ विदेह दुनू स्मरणीय घटना अछि, मैथिली साहित्य मध्य। ४३.श्री पंचानन मिश्र- विदेहक वैविध्य आ निरन्तरता प्रभावित करैत अछि, शुभकामना। ४४.श्री केदार कानन- कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक लेल अनेक धन्यवाद, शुभकामना आ बधाइ स्वीकार करी। आ नचिकेताक भूमिका पढ़लहुँ। शुरूमे तँ लागल जेना कोनो उपन्यास अहाँ द्वारा सृजित भेल अछि मुदा पोथी उनटौला पर ज्ञात भेल जे एहिमे तँ सभ विधा समाहित अछि। ४५.श्री धनाकर ठाकुर- अहाँ नीक काज कऽ रहल छी। फोटो गैलरीमे चित्र एहि शताब्दीक जन्मतिथिक अनुसार रहैत तऽ नीक। ४६.श्री आशीष झा- अहाँक पुस्तकक संबंधमे एतबा लिखबा सँ अपना कए नहि रोकि सकलहुँ जे ई किताब मात्र किताब नहि थीक, ई एकटा उम्मीद छी जे मैथिली अहाँ सन पुत्रक सेवा सँ निरंतर समृद्ध होइत चिरजीवन कए प्राप्त करत। ४७.श्री शम्भु कुमार सिंह- विदेहक तत्परता आ क्रियाशीलता देखि आह्लादित भऽ रहल छी। निश्चितरूपेण कहल जा सकैछ जे समकालीन मैथिली पत्रिकाक इतिहासमे विदेहक नाम स्वर्णाक्षरमे लिखल जाएत। ओहि कुरुक्षेत्रक घटना सभ तँ अठारहे दिनमे खतम भऽ गेल रहए मुदा अहाँक कुरुक्षेत्रम् तँ अशेष अछि। ४८.डॉ. अजीत मिश्र- अपनेक प्रयासक कतबो प्रश‍ंसा कएल जाए कमे होएतैक। मैथिली साहित्यमे अहाँ द्वारा कएल गेल काज युग-युगान्तर धरि पूजनीय रहत। ४९.श्री बीरेन्द्र मल्लिक- अहाँक कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक आ विदेह:सदेह पढ़ि अति प्रसन्नता भेल। अहाँक स्वास्थ्य ठीक रहए आ उत्साह बनल रहए से कामना। ५०.श्री कुमार राधारमण- अहाँक दिशा-निर्देशमे विदेह पहिल मैथिली ई-जर्नल देखि अति प्रसन्नता भेल। हमर शुभकामना। ५१.श्री फूलचन्द्र झा प्रवीण-विदेह:सदेह पढ़ने रही मुदा कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक देखि बढ़ाई देबा लेल बाध्य भऽ गेलहुँ। आब विश्वास भऽ गेल जे मैथिली नहि मरत। अशेष शुभकामना। ५२.श्री विभूति आनन्द- विदेह:सदेह देखि, ओकर विस्तार देखि अति प्रसन्नता भेल। ५३.श्री मानेश्वर मनुज-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक एकर भव्यता देखि अति प्रसन्नता भेल, एतेक विशाल ग्रन्थ मैथिलीमे आइ धरि नहि देखने रही। एहिना भविष्यमे काज करैत रही, शुभकामना। ५४.श्री विद्यानन्द झा- आइ.आइ.एम.कोलकाता- कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक विस्तार, छपाईक संग गुणवत्ता देखि अति प्रसन्नता भेल। अहाँक अनेक धन्यवाद; कतेक बरखसँ हम नेयारैत छलहुँ जे सभ पैघ शहरमे मैथिली लाइब्रेरीक स्थापना होअए, अहाँ ओकरा वेबपर कऽ रहल छी, अनेक धन्यवाद। ५५.श्री अरविन्द ठाकुर-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक मैथिली साहित्यमे कएल गेल एहि तरहक पहिल प्रयोग अछि, शुभकामना। ५६.श्री कुमार पवन-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक पढ़ि रहल छी। किछु लघुकथा पढ़ल अछि, बहुत मार्मिक छल। ५७. श्री प्रदीप बिहारी-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक देखल, बधाई। ५८.डॉ मणिकान्त ठाकुर-कैलिफोर्निया- अपन विलक्षण नियमित सेवासँ हमरा लोकनिक हृदयमे विदेह सदेह भऽ गेल अछि। ५९.श्री धीरेन्द्र प्रेमर्षि- अहाँक समस्त प्रयास सराहनीय। दुख होइत अछि जखन अहाँक प्रयासमे अपेक्षित सहयोग नहि कऽ पबैत छी। ६०.श्री देवशंकर नवीन- विदेहक निरन्तरता आ विशाल स्वरूप- विशाल पाठक वर्ग, एकरा ऐतिहासिक बनबैत अछि। ६१.श्री मोहन भारद्वाज- अहाँक समस्त कार्य देखल, बहुत नीक। एखन किछु परेशानीमे छी, मुदा शीघ्र सहयोग देब। ६२.श्री फजलुर रहमान हाशमी-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक मे एतेक मेहनतक लेल अहाँ साधुवादक अधिकारी छी। ६३.श्री लक्ष्मण झा "सागर"- मैथिलीमे चमत्कारिक रूपेँ अहाँक प्रवेश आह्लादकारी अछि।..अहाँकेँ एखन आर..दूर..बहुत दूरधरि जेबाक अछि। स्वस्थ आ प्रसन्न रही। ६४.श्री जगदीश प्रसाद मंडल-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक पढ़लहुँ । कथा सभ आ उपन्यास सहस्रबाढ़नि पूर्णरूपेँ पढ़ि गेल छी। गाम-घरक भौगोलिक विवरणक जे सूक्ष्म वर्णन सहस्रबाढ़निमे अछि, से चकित कएलक, एहि संग्रहक कथा-उपन्यास मैथिली लेखनमे विविधता अनलक अछि। समालोचना शास्त्रमे अहाँक दृष्टि वैयक्तिक नहि वरन् सामाजिक आ कल्याणकारी अछि, से प्रशंसनीय। ६५.श्री अशोक झा-अध्यक्ष मिथिला विकास परिषद- कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक लेल बधाई आ आगाँ लेल शुभकामना। ६६.श्री ठाकुर प्रसाद मुर्मु- अद्भुत प्रयास। धन्यवादक संग प्रार्थना जे अपन माटि-पानिकेँ ध्यानमे राखि अंकक समायोजन कएल जाए। नव अंक धरि प्रयास सराहनीय। विदेहकेँ बहुत-बहुत धन्यवाद जे एहेन सुन्दर-सुन्दर सचार (आलेख) लगा रहल छथि। सभटा ग्रहणीय- पठनीय। ६७.बुद्धिनाथ मिश्र- प्रिय गजेन्द्र जी,अहाँक सम्पादन मे प्रकाशित ‘विदेह’आ ‘कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक’ विलक्षण पत्रिका आ विलक्षण पोथी! की नहि अछि अहाँक सम्पादनमे? एहि प्रयत्न सँ मैथिली क विकास होयत,निस्संदेह। ६८.श्री बृखेश चन्द्र लाल- गजेन्द्रजी, अपनेक पुस्तक कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक पढ़ि मोन गदगद भय गेल , हृदयसँ अनुगृहित छी । हार्दिक शुभकामना । ६९.श्री परमेश्वर कापड़ि - श्री गजेन्द्र जी । कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक पढ़ि गदगद आ नेहाल भेलहुँ। ७०.श्री रवीन्द्रनाथ ठाकुर- विदेह पढ़ैत रहैत छी। धीरेन्द्र प्रेमर्षिक मैथिली गजलपर आलेख पढ़लहुँ। मैथिली गजल कत्तऽ सँ कत्तऽ चलि गेलैक आ ओ अपन आलेखमे मात्र अपन जानल-पहिचानल लोकक चर्च कएने छथि। जेना मैथिलीमे मठक परम्परा रहल अछि। (स्पष्टीकरण- श्रीमान्, प्रेमर्षि जी ओहि आलेखमे ई स्पष्ट लिखने छथि जे किनको नाम जे छुटि गेल छन्हि तँ से मात्र आलेखक लेखकक जानकारी नहि रहबाक द्वारे, एहिमे आन कोनो कारण नहि देखल जाय। अहाँसँ एहि विषयपर विस्तृत आलेख सादर आमंत्रित अछि।-सम्पादक) ७१.श्री मंत्रेश्वर झा- विदेह पढ़ल आ संगहि अहाँक मैगनम ओपस कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक सेहो, अति उत्तम। मैथिलीक लेल कएल जा रहल अहाँक समस्त कार्य अतुलनीय अछि। ७२. श्री हरेकृष्ण झा- कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक मैथिलीमे अपन तरहक एकमात्र ग्रन्थ अछि, एहिमे लेखकक समग्र दृष्टि आ रचना कौशल देखबामे आएल जे लेखकक फील्डवर्कसँ जुड़ल रहबाक कारणसँ अछि। ७३.श्री सुकान्त सोम- कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक मे  समाजक इतिहास आ वर्तमानसँ अहाँक जुड़ाव बड्ड नीक लागल, अहाँ एहि क्षेत्रमे आर आगाँ काज करब से आशा अछि। ७४.प्रोफेसर मदन मिश्र- कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक सन किताब मैथिलीमे पहिले अछि आ एतेक विशाल संग्रहपर शोध कएल जा सकैत अछि। भविष्यक लेल शुभकामना। ७५.प्रोफेसर कमला चौधरी- मैथिलीमे कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक सन पोथी आबए जे गुण आ रूप दुनूमे निस्सन होअए, से बहुत दिनसँ आकांक्षा छल, ओ आब जा कऽ पूर्ण भेल। पोथी एक हाथसँ दोसर हाथ घुमि रहल अछि, एहिना आगाँ सेहो अहाँसँ आशा अछि। ७६.श्री उदय चन्द्र झा "विनोद": गजेन्द्रजी, अहाँ जतेक काज कएलहुँ अछि से मैथिलीमे आइ धरि कियो नहि कएने छल। शुभकामना। अहाँकेँ एखन बहुत काज आर करबाक अछि। ७७.श्री कृष्ण कुमार कश्यप: गजेन्द्र ठाकुरजी, अहाँसँ भेँट एकटा स्मरणीय क्षण बनि गेल। अहाँ जतेक काज एहि बएसमे कऽ गेल छी ताहिसँ हजार गुणा आर बेशीक आशा अछि। ७८.श्री मणिकान्त दास: अहाँक मैथिलीक कार्यक प्रशंसा लेल शब्द नहि भेटैत अछि। अहाँक कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक सम्पूर्ण रूपेँ पढ़ि गेलहुँ। त्वञ्चाहञ्च बड्ड नीक लागल। ७९. श्री हीरेन्द्र कुमार झा- विदेह ई-पत्रिकाक सभ अंक ई-पत्रसँ भेटैत रहैत अछि। मैथिलीक ई-पत्रिका छैक एहि बातक गर्व होइत अछि। अहाँ आ अहाँक सभ सहयोगीकेँ हार्दिक शुभकामना। विदेह मैथिली साहित्य आन्दोलन (c)२००४-१२. सर्वाधिकार लेखकाधीन आ जतए लेखकक नाम नहि अछि ततए संपादकाधीन। विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। सह-सम्पादक: उमेश मंडल। सहायक सम्पादक: शिव कुमार झा आ मुन्नाजी (मनोज कुमार कर्ण)। भाषा-सम्पादन: नागेन्द्र कुमार झा आ पञ्जीकार विद्यानन्द झा। कला-सम्पादन: वनीता कुमारी आ रश्मि रेखा सिन्हा। सम्पादक-शोध-अन्वेषण: डॉ. जया वर्मा आ डॉ. राजीव कुमार वर्मा। सम्पादक- नाटक-रंगमंच-चलचित्र- बेचन ठाकुर। सम्पादक- सूचना-सम्पर्क-समाद- पूनम मंडल आ प्रियंका झा। सम्पादक- अनुवाद विभाग- विनीत उत्पल। रचनाकार अपन मौलिक आ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि) ggajendra@videha.com केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx, .rtf वा .txt फॉर्मेटमे पठा सकैत छथि। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेताह, से आशा करैत छी। रचनाक अंतमे टाइप रहय, जे ई रचना मौलिक अछि, आ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। मेल प्राप्त होयबाक बाद यथासंभव शीघ्र ( सात दिनक भीतर) एकर प्रकाशनक अंकक सूचना देल जायत। ’विदेह' प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका अछि आ एहिमे मैथिली, संस्कृत आ अंग्रेजीमे मिथिला आ मैथिलीसँ संबंधित रचना प्रकाशित कएल जाइत अछि। एहि ई पत्रिकाकेँ श्रीमति लक्ष्मी ठाकुर द्वारा मासक ०१ आ १५ तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि। (c) 2004-12 सर्वाधिकार सुरक्षित। विदेहमे प्रकाशित सभटा रचना आ आर्काइवक सर्वाधिकार रचनाकार आ संग्रहकर्त्ताक लगमे छन्हि। रचनाक अनुवाद आ पुनः प्रकाशन किंवा आर्काइवक उपयोगक अधिकार किनबाक हेतु ggajendra@videha.co.in पर संपर्क करू। एहि साइटकेँ प्रीति झा ठाकुर, मधूलिका चौधरी आ रश्मि प्रिया द्वारा डिजाइन कएल गेल। सिद्धिरस्तु वि दे ह विदेह Videha বিদেহ  विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका Videha Ist Maithili Fortnightly e Magazine  विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका 'विदेह' ९७ म अंक ०१ जनवरी २०१२ (वर्ष ५ मास ४९ अंक ९७) मानुषीमिह संस्कृताम् ISSN 2229-547X VIDEHA वि दे ह विदेह Videha বিদেহ  विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका Videha Ist Maithili Fortnightly e Magazine  विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका 'विदेह' ९७ म अंक ०१ जनवरी २०१२ (वर्ष ५ मास ४९ अंक ९७) मानुषीमिह संस्कृताम् ISSN 2229-547X VIDEHA

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