458 457 ISSN 2229-547X VIDEHA 'विदेह' ९९ म अंक ०१ फरबरी २०१२ (वर्ष ५ मास ५० अंक ९९) वि दे ह विदेह Videha বিদেহ http://www.videha.co.in विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका Videha Ist Maithili Fortnightly e Magazine नव अंक देखबाक लेल पृष्ठ सभकेँ रिफ्रेश कए देखू। Always refresh the pages for viewing new issue of VIDEHA. Read in your own script Roman(Eng)Gujarati Bangla Oriya Gurmukhi Telugu Tamil Kannada Malayalam Hindi ऐ अंकमे अछि:- १. संपादकीय संदेश २. गद्य २.१.नवेंदु कुमार झा-बिहारक औद्योगिक विकास मे बाधा बनि रहल जमीन आ बिजली/ राशन कार्डक होयत डिजिटलीकरण/ मिथिलांचल मे माछ उत्पादक भरोसा देलनि मुख्यमंत्री, सौराठ मे खुजत मिथिला चित्रकला संस्थान/ जन आंदोलन सँ होयत कोसीक समस्याक समाधान-मेधा पाटेकर २.२. श्री जगदीश प्रसाद मण्डलसँ साक्षात्कार २.३.योगेन्द्र प्रसाद यादवसँ मुन्नाजीक साक्षात्कार २.४.जगदानन्द झा 'मनु' -चोनहा - (धारावाहिक मैथिली कथा) २.५.खुशबू झा-हमरा नजरिमे सुजीतक रिपोर्टर डायरी २.६.श्री मुन्नाजीक श्री रवीन्द्र कुमार दाससँ गपशप २.७.१.सुजीत कुमार झा-कथा-फुल फुलाइए कऽ रहल २.सुमित आनन्द- अक्षरपुरूष-विश्वनाथ ३.नवीन कुमार आशा- फेर सॅ वर रहलाह कुमार २.८.१.अमरकान्त अमर-संघीयतामे मैथिली भाषा २.अतुलेश्वर- तीन तिरहुतिया तेरह पाक ३.पूनम मण्डल- स्थानीय कवि परिषद (सलहेसबाबा परिसर- औरहा) वार्षिकोत्सव- 2012 ३. पद्य ३.१.कामिनी कामायनी-गांधारी ३.२.१.ओमप्रकाश झा- किछु गजल २.रूबी झा ३.शान्तिलक्ष्मी चौधरी ४. शिव कुमार झा ३.३.१.जगदीश चन्द्र ठाकुर ’अनिल’ २.जगदानंद झा 'मनु' -गीत-गजल ३.४.१.अंजनी कुमार वर्मा २.बलराम साह ३.उमेश पासवान ४. रामविलास साहु ५. संजीव कुमार ‘शमा’ ६. सुधीर कुमार ‘सुमन’ ७.उपेन्द्र नारायण ‘अनुपम’८. नारायण झा ३.५.१.जगदीश प्रसाद मण्डल २.कपिलेश्वर राउत ३.६.१.डाॅ. शिव कुमार प्रसाद २.सत्यनारायण झा ३.जवाहर लाल कश्यप ४.किशन कारीगर ३.७.१.डॉ॰ शशिधर कुमर २.नवीन कुमार "आशा" ३.८.१.प्रो. राजकुमार नीलकंठ २.राजदेव मण्डल ४. मिथिला कला-संगीत१.राजनाथ मिश्र (चित्रमय मिथिला) २. उमेश मण्डल (मिथिलाक वनस्पति/ मिथिलाक जीव-जन्तु/ मिथिलाक जिनगी) बालानां कृते-डॉ॰ शशिधर कुमर “विदेह”- १.माँ शारदे वन्दना २.उड़ि ने सकी पर चिड़ै छी हम (भाग-२) भाषापाक रचना-लेखन -[मानक मैथिली], [विदेहक मैथिली-अंग्रेजी आ अंग्रेजी मैथिली कोष (इंटरनेटपर पहिल बेर सर्च-डिक्शनरी) एम.एस. एस.क्यू.एल. सर्वर आधारित -Based on ms-sql server Maithili-English and English-Maithili Dictionary.] विदेह ई-पत्रिकाक सभटा पुरान अंक ( ब्रेल, तिरहुता आ देवनागरी मे ) पी.डी.एफ. डाउनलोडक लेल नीचाँक लिंकपर उपलब्ध अछि। All the old issues of Videha e journal ( in Braille, Tirhuta and Devanagari versions ) are available for pdf download at the following link. विदेह ई-पत्रिकाक सभटा पुरान अंक ब्रेल, तिरहुता आ देवनागरी रूपमे Videha e journal's all old issues in Braille Tirhuta and Devanagari versions विदेह ई-पत्रिकाक पहिल ५० अंक
विदेह ई-पत्रिकाक ५०म सँ आगाँक अंक विदेह आर.एस.एस.फीड। "विदेह" ई-पत्रिका ई-पत्रसँ प्राप्त करू। अपन मित्रकेँ विदेहक विषयमे सूचित करू। ↑ विदेह आर.एस.एस.फीड एनीमेटरकेँ अपन साइट/ ब्लॉगपर लगाऊ। ब्लॉग "लेआउट" पर "एड गाडजेट" मे "फीड" सेलेक्ट कए "फीड यू.आर.एल." मे http://www.videha.co.in/index.xml टाइप केलासँ सेहो विदेह फीड प्राप्त कए सकैत छी। गूगल रीडरमे पढ़बा लेल http://reader.google.com/ पर जा कऽ Add a Subscription बटन क्लिक करू आ खाली स्थानमे http://www.videha.co.in/index.xml पेस्ट करू आ Add बटन दबाउ। Join official Videha facebook group. Join Videha googlegroups विदेह रेडियो:मैथिली कथा-कविता आदिक पहिल पोडकास्ट साइट http://videha123radio.wordpress.com/ Videha Radio मैथिली देवनागरी वा मिथिलाक्षरमे नहि देखि/ लिखि पाबि रहल छी, (cannot see/write Maithili in Devanagari/ Mithilakshara follow links below or contact at ggajendra@videha.com) तँ एहि हेतु नीचाँक लिंक सभ पर जाऊ। संगहि विदेहक स्तंभ मैथिली भाषापाक/ रचना लेखनक नव-पुरान अंक पढ़ू। http://devanaagarii.net/ http://kaulonline.com/uninagari/ (एतए बॉक्समे ऑनलाइन देवनागरी टाइप करू, बॉक्ससँ कॉपी करू आ वर्ड डॉक्युमेन्टमे पेस्ट कए वर्ड फाइलकेँ सेव करू। विशेष जानकारीक लेल ggajendra@videha.com पर सम्पर्क करू।)(Use Firefox 4.0 (from WWW.MOZILLA.COM )/ Opera/ Safari/ Internet Explorer 8.0/ Flock 2.0/ Google Chrome for best view of 'Videha' Maithili e-journal at http://www.videha.co.in/ .) Go to the link below for download of old issues of VIDEHA Maithili e magazine in .pdf format and Maithili Audio/ Video/ Book/ paintings/ photo files. विदेहक पुरान अंक आ ऑडियो/ वीडियो/ पोथी/ चित्रकला/ फोटो सभक फाइल सभ (उच्चारण, बड़ सुख सार आ दूर्वाक्षत मंत्र सहित) डाउनलोड करबाक हेतु नीचाँक लिंक पर जाऊ। VIDEHA ARCHIVE विदेह आर्काइव भारतीय डाक विभाग द्वारा जारी कवि, नाटककार आ धर्मशास्त्री विद्यापतिक स्टाम्प। भारत आ नेपालक माटिमे पसरल मिथिलाक धरती प्राचीन कालहिसँ महान पुरुष ओ महिला लोकनिक कर्मभमि रहल अछि। मिथिलाक महान पुरुष ओ महिला लोकनिक चित्र 'मिथिला रत्न' मे देखू। गौरी-शंकरक पालवंश कालक मूर्त्ति, एहिमे मिथिलाक्षरमे (१२०० वर्ष पूर्वक) अभिलेख अंकित अछि। मिथिलाक भारत आ नेपालक माटिमे पसरल एहि तरहक अन्यान्य प्राचीन आ नव स्थापत्य, चित्र, अभिलेख आ मूर्त्तिकलाक़ हेतु देखू 'मिथिलाक खोज' मिथिला, मैथिल आ मैथिलीसँ सम्बन्धित सूचना, सम्पर्क, अन्वेषण संगहि विदेहक सर्च-इंजन आ न्यूज सर्विस आ मिथिला, मैथिल आ मैथिलीसँ सम्बन्धित वेबसाइट सभक समग्र संकलनक लेल देखू "विदेह सूचना संपर्क अन्वेषण" विदेह जालवृत्तक डिसकसन फोरमपर जाऊ। "मैथिल आर मिथिला" (मैथिलीक सभसँ लोकप्रिय जालवृत्त) पर जाऊ। ऐ बेर मूल पुरस्कार(२०१२) [साहित्य अकादेमी, दिल्ली]क लेल अहाँक नजरिमे कोन मूल मैथिली पोथी उपयुक्त अछि ? श्री राजदेव मण्डलक “अम्बरा” (कविता-संग्रह) 13.16% श्री बेचन ठाकुरक “बेटीक अपमान आ छीनरदेवी”(दूटा नाटक) 9.77% श्रीमती आशा मिश्रक “उचाट” (उपन्यास) 6.39% श्रीमती पन्ना झाक “अनुभूति” (कथा संग्रह) 6.02% श्री उदय नारायण सिंह “नचिकेता”क “नो एण्ट्री:मा प्रविश (नाटक) 6.02% श्री सुभाष चन्द्र यादवक “बनैत बिगड़ैत” (कथा-संग्रह) 6.02% श्रीमती वीणा कर्ण- भावनाक अस्थिपंजर (कविता संग्रह) 6.02% श्रीमती शेफालिका वर्माक “किस्त-किस्त जीवन (आत्मकथा) 7.14% श्रीमती विभा रानीक “भाग रौ आ बलचन्दा” (दूटा नाटक) 6.77% श्री महाप्रकाश-संग समय के (कविता संग्रह) 6.02% श्री तारानन्द वियोगी- प्रलय रहस्य (कविता-संग्रह) 6.02% श्री महेन्द्र मलंगियाक “छुतहा घैल” (नाटक) 6.77% श्रीमती नीता झाक “देश-काल” (कथा-संग्रह) 6.39% श्री सियाराम झा "सरस"क थोड़े आगि थोड़े पानि (गजल संग्रह) 7.52% Other: 0% ऐ बेर बाल साहित्य पुरस्कार(२०१२) [साहित्य अकादेमी, दिल्ली]क लेल अहाँक नजरिमे कोन मूल मैथिली पोथी उपयुक्त अछि ? श्री जगदीश प्रसाद मण्डल जीक “तरेगन”(बाल-प्रेरक कथा संग्रह) 58.54% श्री जीवकांत - खिखिरक बिअरि 21.95% श्री मुरलीधर झाक “पिलपिलहा गाछ 19.51% Other: 0% ऐ बेर युवा पुरस्कार(२०१२)[साहित्य अकादेमी, दिल्ली]क लेल अहाँक नजरिमे कोन कोन लेखक उपयुक्त छथि ? श्रीमती ज्योति सुनीत चौधरीक “अर्चिस” (कविता संग्रह) 25.33% श्री विनीत उत्पलक “हम पुछैत छी” (कविता संग्रह) 8% श्रीमती कामिनीक “समयसँ सम्वाद करैत”, (कविता संग्रह) 6.67% श्री प्रवीण काश्यपक “विषदन्ती वरमाल कालक रति” (कविता संग्रह) 6.67% श्री आशीष अनचिन्हारक "अनचिन्हार आखर"(गजल संग्रह) 17.33% श्री अरुणाभ सौरभक “एतबे टा नहि” (कविता संग्रह) 6.67% श्री दिलीप कुमार झा "लूटन"क जगले रहबै (कविता संग्रह) 8% श्री आदि यायावरक “भोथर पेंसिलसँ लिखल” (कथा संग्रह) 6.67% श्री उमेश मण्डलक “निश्तुकी” (कविता संग्रह) 13.33% Other: 1.33% ऐ बेर अनुवाद पुरस्कार (२०१३) [साहित्य अकादेमी, दिल्ली]क लेल अहाँक नजरिमे के उपयुक्त छथि? श्री नरेश कुमार विकल "ययाति" (मराठी उपन्यास श्री विष्णु सखाराम खाण्डेकर) 33.85% श्री महेन्द्र नारायण राम "कार्मेलीन" (कोंकणी उपन्यास श्री दामोदर मावजो) 12.31% श्री देवेन्द्र झा "अनुभव"(बांग्ला उपन्यास श्री दिव्येन्दु पालित) 15.38% श्रीमती मेनका मल्लिक "देश आ अन्य कविता सभ" (नेपालीक अनुवाद मूल- रेमिका थापा) 12.31% श्री कृष्ण कुमार कश्यप आ श्रीमती शशिबाला- मैथिली गीतगोविन्द ( जयदेव संस्कृत) 12.31% श्री रामनारायण सिंह "मलाहिन" (श्री तकषी शिवशंकर पिल्लैक मलयाली उपन्यास) 13.85% Other: 0% फेलो पुरस्कार-समग्र योगदान २०१२-१३ : समानान्तर साहित्य अकादेमी, दिल्ली श्री राजनन्दन लाल दास 54.55% श्री डॉ. अमरेन्द्र 20.45% श्री चन्द्रभानु सिंह 25% Other: 0% १. संपादकीय नाटक, गीत, संगीत, नृत्य, मूर्तिकला, शिल्प आ चित्रकला क्षेत्रमे विदेह सम्मान २०१२ क घोषणा अभिनय- मुख्य अभिनय सुश्री शिल्पी कुमारी, उम्र- 17 पिता श्री लक्ष्मण झा श्री शोभा कान्त महतो, उम्र- 15 पिता- श्री रामअवतार महतो, हास्य-अभिनय सुश्री प्रियंका कुमारी, उम्र- 16, पिता- श्री वैद्यनाथ साह श्री दुर्गानंद ठाकुर, उम्र- 23, पिता- स्व. भरत ठाकुर नृत्य सुश्री सुलेखा कुमारी, उम्र- 16, पिता- श्री हरेराम यादव श्री अमीत रंजन, उम्र- 18, पिता- नागेश्वर कामत चित्रकला श्री पनकलाल मण्डल, उमेर- ३५, पिता- स्व. सुन्दर मण्डल, गाम छजना श्री रमेश कुमार भारती, उम्र- 23, पिता- श्री मोती मण्डल संगीत (हारमोनियम) श्री परमानन्द ठाकुर, उम्र- 30, पिता- श्री नथुनी ठाकुर संगीत (ढोलक) श्री बुलन राउत, उम्र- 45, पिता- स्व. चिल्टू राउत संगीत (रसनचौकी) श्री बहादुर राम, उम्र- 55, पिता- स्व. सरजुग राम शिल्पी-वस्तुकला श्री जगदीश मल्लिक,५० गाम- चनौरागंज मूर्ति-मृत्तिका कला श्री यदुनंदन पंडित, उम्र- 45, पिता- अशर्फी पंडित काष्ठ-कला श्री झमेली मुखिया,पिता स्व. मूंगालाल मुखिया, ५५, गाम- छजना किसानी-आत्मनिर्भर संस्कृति श्री लछमी दास, उमेर- ५०, पिता स्व. श्री फणी दास, गाम वेरमा नाटक, गीत, संगीत, नृत्य, मूर्तिकला, शिल्प आ चित्रकला क्षेत्रमे विदेह सम्मान २०१२ विदेह नाट्य उत्सव २०१२ मे प्रदान कएल गेल। विदेह नाट्य उत्सव २०१२ क चित्र नीचाँक लिंकपर उपलब्ध अछि। विदेह नाट्य उत्सव २०१२ १ मैथिली- सुरजापुरी- राजबंशी मैथिली बाबूकेँ अपन ऐ राजनैतिक जमीनक अनुभव ओइ दलमे रहितो नै भेल हेतन्हि, जकरा कहियो ओ रामक संग पटेने रहथि। दलमे एकटा प्रभावी नेता कहै जाइबला बाबूकेँ कहियो पिछड़ल वर्गक नेताक रूपमे प्रस्तुत नै कएल गेल। मुदा राजनैतिक जमीनसँ बेशी जोड़तोड़मे माहिर बाबू दलसँ निकालि देल जाइते प्रतिपक्षी-दलक नजरिमे एना चढ़लाह जे हुनका प्रतिपक्षी-दल अपना दिससँ प्रदेशमे पिछड़ल वर्गक गद्दीपर विराजमान कऽ देलक। एकरा सुरजापुरीमे (भारत दिसुका किशनगंज आदि क्षेत्रमे) एना लिखल/ बाजल जाएत:- बाबूक अपना यहार राजनीतिक जमीनेर अहसास उस दलात रहले नी होबे। जहाक कोईखुन वहाय रामेर संगे सीचे छीले। दलात एक कद्दावर नेता कहा जनवार बाबू कोईखुन पिछवाड़ नेतार लखा पेश नी करील। लेकिन राजनीतिक से बेसी जोड़तोड़ोत माहिर बाबू दलार से निकलाते ही प्रतिपक्षी-दलाड़ नजरोत हिरंगदी चढ़ील कि वहाय पाटी अपनार बीती से प्रदेशोत पिछड़ार नेतार गद्दीत विरजमान करील। एकरा राजबंशी [नेपाल दिस सुरजापुरीकेँ राजबंशी भाषा कहल जाइ छै, झापा, सरनामति, चकमकी, मेची, टाघनडुब्बा (ताधंडुवा) आदिमे- राजबंशी आ सुरजापुरीमे मामूली अन्तर छै] मे एना लिखल बाजल जाएत:- बाबूर अपनार इर राजनीतिक जमीनेर ऐहसास उखान दल त रहते हुए भी नी होल, जइर कोधोय उम्हा रामेर संगे छिले। दलात एक कद्दावर नेता कहवार बाबूर कोधोय पिछड़ा नेतार लाखा पेश नी करे। माने राजनीतिक जमीनत भेल्ला जोड़तोड़ माहिर बाबू दल से निकलाले ही प्रतिपक्षी-दलार नजर एनंतिंज चढ़िल कि अम्हा पार्टीत अपनार तरफ से प्रदेशत छट जातिर नेतारक गद्धी पर बठाइ दिल। सुरजापुरी- भारतमे बिहारक किशनगंज आ पूर्णियाँ आदिमे गामे-गाम राजबंशी (महादलित) जाति द्वारा ई भाषा बाजल जाइत अछि। किशनगंजमे मुस्लिममे स्वामी जाइत खोट्टा आ सेवक जाति कुल्हिया कहल जाइत छथि। कुल्हिया जाइत सेहो सुरजापुरी भाषा बजैत छथि। राजबंशी आ जे आन जाइत सभ कुल्हियाक आसपास रहै छथि से सुरजापुरी बजैत छथि। ई भाषा मैथिली आ बांग्लाक मिश्रण अछि। कियो कियो बंगालक कूच बिहारक बाहे बंगाली आ नेपालक राजबंशी भाषाकेँ सेहो सुरजापुरी भाषा कहै छथि। किछु गोटेक मत छन्हि जे बांग्लादेशक लोकक भाषाक क्षेत्रीय भाषासँ मिश्रणक परिणामस्वरूप सुरजापुरी भाषा निकलल। पूर्णियाँ आ किशनगंजमे एक्के गाममे कुल्हिया आ राजबंशी लोकनि सुरजापुरी बजै छथि, संथाल लोकनि संथाली बजै छथि, बंजारा लोकनि बंजारा भाषा बजै छथि जखन कि शेष सभ गोटे मैथिली बजै छथि। जँ मिथिला राज्यमे ऐ क्षेत्र सभकेँ लेल जाए तँ हुनका सभकेँ हुनकर भाषाक विकासक गारन्टी देबऽ पड़त। की मिथिला राज्य अभियानकर्मी सभक सोच एतऽ धरि पहुँचलनि अछि? २ दूर्वाक्षत यजुर्वेदक अध्याय २२ मंत्र २२ केँ विश्वक पहिल राष्ट्रभक्ति गीत होएबाक गौरव प्राप्त छै। मुदा मिथिलामे दूभि-अक्षत छीटि कऽ ऐ मंत्रकेँ दूर्वाक्षत मंत्र बना देल गेल। बिहार स्टेट टेक्स्ट बुक पब्लिशिंग कॉरपोरेशन लि. दूर्वाक्षत नामसँ नवम वर्गक किताब छपने अछि। ऐ पोथीमे मिथिला आ मैथिलीकेँ पछुएबाक षडयंत्र पूर्ण रूपसँ दृष्टिगोचर होइत अछि। अठारह पन्नामे मिथिलाक एकटा जिलाक स्थायी बन्दोबस्तीबला जमीन्दारक जीवनी पढ़ाओल गेल अछि!! मैथिली लिपिक संरक्षणपर डेढ़ पन्नाक पचास बर्ख पुरान लेख अछि जकर आइक तकनीकी युगमे कोनो महत्व नै छै, प्रवासी मैथिल समाज लेख पुरातनपंथी अछि आ अखुनका बच्चाकेँ ई हास्यास्पद बुझेतै, प्रवासक अर्थ, मैथिलक अर्थ आ प्रवासक कारण सभ किछु बदलि गेल अछि। तँ की ई बच्चा सभकेँ गुलामीक पाठ पढ़ेबाक षडयंत्र नै अछि? लोक नवम वर्गक हिन्दी, अंग्रेजी, बांग्ला आ आन भाषाक पोथीसँ एकर तुलना करैए तँ स्थिति आर भयावह भऽ जाइए। शिक्षकसँ आग्रह जे जमीन्दारक जीवनी बच्चा सभकेँ नै पढ़ाबथु, प्रश्न-पत्र सेट केनिहारसँ आग्रह जे ओ जमीन्दारक जीवनीबला अध्यायसँ प्रश्न नै पुछथि। ३ छुतहर/ छुतहर घैल/ छुतहा घैल छुतहा घैल महेन्द्र मलंगियाक नवीन नाटकक नाम छन्हि। ऐ छोटसन नाटकक भूमिका ओ दस पन्नामे लिखने छथि। पहिने ऐ भूमिकापर आउ। हुनका कष्ट छन्हि जे रमानन्द झा “रमण” हुनका सुझाव देलखिन्ह जे “छुतहर घैल”केँ मात्र “छुतहर” कहल जाइ छै। से ओ तीन टा गप उठेलन्हि- पहिल- “तों कहियो पोथी के लेखी, हम कहियो अँखियन के देखी।” दोसर- यात्री जीक विलाप कविता- “काते रहै छी जनु घैल छुतहर आहि रे हम अभागलि कत बड़।” आ कहै छथि जे ओइ कविताक विधवा आ ऐ नाटकक कबूतरी देवीकेँ शिवक महेश्वरो सूत्र आ पाणिनीक दश लकारसँ (वैदिक संस्कृत लेल पाणिनी १२ लकार आ लौकिक संस्कृत लेल दस लकार निर्धारित कएने छथि..खएर…) कोन मतलब छै? तेसर ओ अपन स्थितिकेँ कापरनिकस सन भेल कहैत छथि, जे लोकक कहलासँ की हेतै आ गाम-घरमे लोक “छुतहर घैल” बजिते छैक!! मुदा ऐ तीनू बिन्दुपर तीनू तर्क मलंगियाजीक विरुद्ध जाइ छन्हि। “अँखियन देखी” आ लोकव्यवहार “छुतहर” मात्र कहल जाइत देखलक आ सुनलक अछि, घैलचीपर छुतहरकेँ अहाँ राखि सकै छी? लोइटसँ बड़ैबमे पान पटाओल जाइ छै तखन मलंगियाजीक हिसाबे ओकरा “लोइट घैल” कहबै। घैल, सुराही, कोहा, तौला, छुतहर, लोइट, खापड़ि, कुड़नी, कुरवाड़, कोसिया, सरबा, सोबरना ऐ सभ बौस्तुक अलग नामकरण छै। फूलचन्द्र मिश्र “रमण” (प्रायः फूलचन्द्रजी “छुतहा घैल” शब्दक सुझाव हँसीमे देने हेथिन्ह, आ जँ नै तँ ई एकटा नव भाषाक नव शब्द अछि!!)क सुझाव मानैत मलंगिया जी “छुतहर घैल” केँ “छुतहा घैल” कऽ देलन्हि, ई ऐ गपक द्योतक जे हुनका गलतीक अनुभव भऽ गेलन्हि मुदा रमानन्द झा “रमण”क गप मानि लेने छोट भऽ जइतथि से खुट्टा अपना हिसाबे गाड़ि देलन्हि। आ बादमे रमानन्द झा “रमण” चेतना समितिसँ ओइ पोथीकेँ छपेबाक आग्रह केलखिन्ह आ, चेतना समिति मात्र २५टा प्रति दैतन्हि तेँ ओ अपन संस्थासँ एकरा छपबेलन्हि, ऐ सभसँ पठककेँ कोन सरोकार? आब आउ यात्रीजीक गपपर, यात्रीजीकेँ हिन्दी पाठकक सेहो ध्यान राखऽ पड़ै छलन्हि, हुनका मोनो नै रहै छलन्हि जे कोन कविता हिन्दीमे छन्हि, कोन मैथिलीमे आ कोन दुनूमे, से ओ छुतहर घैल लिखि देलन्हि, एकर कारण यात्रीजीक तुकबन्दी मिलेबाक आग्रहमे सेहो देखि सकै छी। आ फेर आउ कॉपरनिकसपर, जँ यात्री जी वा मलंगिया जी “घैल छुतहर”, “छुतहर घैल” वा “छुतहा घैल” लिखिये देलन्हि तँ की नेटिव मैथिली भाषी छुतहरकेँ “घैल छुतहर”, “छुतहर घैल” वा “छुतहा घैल” बाजब शुरू कऽ देत। से कॉपरनिकस सेहो मलंगियाजीक विरुद्ध छथिन्ह। कॉपरनिकसक किंवदन्तीक सटीक प्रयोग मलंगियाजी नै कऽ सकलाह, प्रायः ओ गैलिलीयो सँ कॉपरनिकसकेँ कन्फ्यूज कऽ रहल छथि, कॉपरनिकसक सिद्धान्तक समर्थन पोप द्वारा भेल छल आ कॉपरनिकस पोप पॉल-३ केँ अपन हेलियोसेन्ट्रिक सिद्धान्तक चालीस पन्नाक पाण्डुलिपि समर्पित केने रहथि। खएर मलंगियाजीक विज्ञानक प्रति अनभिज्ञता आ विज्ञानक सिद्धान्तकेँ किवदन्तीसँ जोड़बाक सोचपर अहाँकेँ आश्चर्य नै हएत जखन अहाँ हुनकर खाँटी लोककथा सभक अज्ञानताकेँ अही भूमिकामे देखब। “अली बाबा आ चालीस चोर”- सम्पूर्ण दुनियाँकेँ बुझल छै जे ई मध्यकालीन अरबी लोककथा अछि जे “अरेबियन नाइट्स (१००१ कथा)” मे संकलित अछि आ ओइमे विवाद अछि जे ई अरेबियन नाइट्समे बादमे घोसियाएल गेल वा नै, मुदा ई मध्यकालीन अरबी लोककथा अछि, ऐ मे कोनो विवाद नै अछि। बलबनक अत्याचार आदिक की की गप साम्प्रदायिक मानसिकता लऽ कऽ मलंगिया जी कहि जाइ छथि से हुनकर लोककथाक प्रति सतही लगाव मात्रकेँ देखार करैत अछि। “मिथिला तत्व विमर्श” वा “रमानाथ झा”क पंजीक सतही ज्ञान बहुत पहिनहिये खतम कऽ देल गेल अछि, आ तेँ ई लिखित रूपसँ हमरा सभक पंजी पोथीमे वर्णित अछि। गोनू झा विद्यापति सँ ३०० बर्ख पहिने भेलाह, मुदा मलंगियाजी ५० साल पुरान गप-सरक्काक आधारपर आगाँ बढ़ै छथि। हुनका बुझल छन्हि जे गोनूकेँ धूर्ताचार्य कहल गेल छन्हि मुदा संगे गोनूकेँ महामहोपाध्याय सेहो कहल गेल छन्हि से हुनका नै बुझल छन्हि!! गोनू झाक समयमे मुस्लिम मिथिलामे रहबे नै करथि तखन “तहसीलदारक दाढ़ी” कतऽ सँ आओत। लोकक कण्ठमे छुतहर छै ओकरा “छुतहा घैल” कऽ दियौ, लोकक कण्ठमे “कर ओसूली”करैबलाक दाढ़ी छै ओकरा “तहसीलदार”क दाढ़ी कहि साम्प्रदायिक आधारपर मुस्लिमकेँ अत्याचारी करार कऽ दियौ, आ तेहेन भूमिका लिखि दियौ जे रमानन्द झा “रमण” आ आन गोटे डरे समीक्षा नै करताह। एकटा पैदल सैनिक आ एकटा सतनामी (दलित-पिछड़ल वर्ग द्वारा शुरू कएल एकटा प्रगतिवादी सम्प्रदाय)क झगड़ासँ शुरू भेल सतनामी विद्रोह औरंगजेबक नीतिक विरोधमे छल आ ओइमे मस्जिदकेँ सेहो जराओल गेलै, मुदा गोनू झाक कर ओसूली अधिकारी मुस्लिम नै रहथि, लोककथामे ई गप नै छै, हँ जँ साम्प्रदायिक लोककथाकार कहल कथामे अपन वाद घोसियेलक आ लिखै काल बेइमानी केलक तँ तइसँ मैथिली लोककथाकेँ कोन सरोकार? फील्डवर्कक आधारपर जँ लोककथाक संकलन नै करब तँ अहिना हएत। महेन्द्र नारायण राम लिखै छथि जे लोककथामे जातित-पाइत नै होइ छै, मुदा मलंगियाजी से कोना मानताह। भगता सेहो हुनकर कथामे एबे करै छन्हि। आ असल कारण जइ कारणसँ ई मलंगिया जीक नाटकक अभिन्न अंग बनि जाइत अछि से अछि हुनकर आनुवंशिक जातीय श्रेष्ठता आधारित सोच। हुनकर नाटकमे मोटा-मोटी अढ़ाइ-अढ़ाइ पन्नाक घीच तीरि कऽ सत्रहटा दृश्य अछि, जइमे पन्द्रहम दृश्य धरि ओ छोटका जाइतक (मलंगियाजीक अपन इजाद कएल भाषा द्वारा) कथित भाषापर सवर्ण दर्शकक हँसबाक, आ भगताक भ्रष्ट-हिन्दीक माध्यमसँ छद्म हास्य उत्पन्न करबाक अपन पुरान पद्धतिक अनुसरण करै छथि। कथाकेँ उद्देश्यपूर्ण बनेबाक आग्रह ओ सोलहम दृश्यसँ करै छथि मुदा बाजी तावत हुनका हाथसँ निकलि जाइ छन्हि। आइ जखन संस्कृत नाटकोमे प्राकृत वा कोनो दोसर भाषाक प्रयोग नै होइत अछि, मलंगियाजीक भरतकेँ गलत सन्दर्भमे सोझाँ आनब संस्कृतसँ हुनकर अनभिज्ञताकेँ देखार करैत अछि आ भरत नाट्यशास्त्रपर हिन्दीमे जे सेकेण्डरी सोर्सक आधारपर लोक सभ पोथी लिखने छथि, तकरे कएल अध्ययन सिद्ध करैत अछि। मलंगियाजीक ई कहब अछि जे नाटक जँ पढ़बामे नीक अछि तँ मंचन योग्य नै हएत, वा मंचन लेल लिखल नाटक पढ़बामे नीक नै लागत? हुनकर संस्कृत पाँतीकेँ उद्घृत करबासँ तँ यएह लगैत अछि। जँ नाटक पढ़बामे उद्वेलित नै करत तँ निर्देशक ओकर मंचनक निर्णय कोना लेत? आ मंचीय गुण की होइ छै, अढ़ाइ-अढ़ाइ पन्नाक सत्रहटा दृश्य, तथाकथित निम्न वर्गकेँ अपमानित करैबला जातिवादी भाषा, भगताक “बुझता है कि नहीं?” बला हिन्दी आ ऐ सभक सम्मिलनक ई “स्लैपस्टिक ह्यूमर”? आ जे एकर विरोध कऽ मैथिलीक समानान्तर रंगमंचक परिकल्पना प्रस्तुत करत से भऽ गेल नाटकक पठनीय तत्त्वक आग्रही आ जे पुरातनपंथी जातिवादी अछि से भेल नाटकक मंचीय तत्वक आग्रही!! की २१म शताब्दीमे मलंगियाजीक जाति आधारित वाक्य संरचना संस्कृत, हिन्दी वा कोनो आधुनिक भारतीय भाषाक नाटकमे (मैथिलीकेँ छोड़ि) स्वीकार्य भऽ सकत? आ जँ नै तँ ऐ शब्दावली लेल १८०० बर्ष पुरनका संस्कृत नाटकक गएर सन्दर्भित तथ्यकेँ, मूल संस्कृत भरत नाट्यशास्त्र नै पढ़ैबला नाटककार द्वारा, बेर-बेर ढालक रूपमे किए प्रयुक्त कएल जाइए? माथपर छिट्टा आ काँखमे बच्चा जँ कियो लेने अछि तँ ओ निम्न वर्गक अछि? ओकर आंगनक बारहमासामे ओ ऐ निम्न वर्गकेँ राड़ कहै छथि, कएक दशक बाद ई धरि सुधार आएल छन्हि जे ओ आब ओइ वर्गकेँ निम्न वर्ग कहि रहल छथि, ई सुधार स्वागत योग्य मुदा ऐ दीर्घ अवधि लेल बड्ड कम अछि। बबाजी कोना कथामे एलै आ गाजा कोना एलै आ ओइसँ बगियाक गाछक बगियाक कोन सम्बन्ध छै? मलंगियाजी अपन जाति-आधारित वाक्य संरचना, आ भ्रष्ट-हिन्दी मिश्रित वाक्य रचना कोना घोसिया सकितथि जँ भगता आ निम्न वर्गक छद्म संकल्पना नै अनितथि, ई तथ्य ओ बड्ड चतुराइसँ नुकेबाक प्रयास करै छथि, आ तेँ ओ मेडियोक्रिटीसँ आगाँ नै बढ़ि पबै छथि। आ तेँ हुनकामे ऐ नाट्य-कथाकेँ उद्देश्यपूर्ण बनेबाक आग्रह तँ छन्हि मुदा सामर्थ्य नै आबि पबै छन्हि। नेपाल प्रज्ञा प्रतिष्ठानक सदस्यता (नेपाल देशक भाषा-साहित्य, दर्शन, संस्कृति आ सामाजिक विज्ञानक क्षेत्रमे सर्वोच्च सम्मान) नेपाल प्रज्ञा प्रतिष्ठानक सदस्यता श्री राम भरोस कापड़ि 'भ्रमर' (2010) श्री राम दयाल राकेश (1999) श्री योगेन्द्र प्रसाद यादव (1994) नेपाल प्रज्ञा प्रतिष्ठान मानद सदस्यता स्व. सुन्दर झा शास्त्री नेपाल प्रज्ञा प्रतिष्ठान आजीवन सदस्यता श्री योगेन्द्र प्रसाद यादव फूलकुमारी महतो मेमोरियल ट्रष्ट काठमाण्डू, नेपालक सम्मान फूलकुमारी महतो मैथिली साधना सम्मान २०६७ - मिथिला नाट्यकला परिषदकेँ फूलकुमारी महतो मैथिली प्रतिभा पुरस्कार २०६७ - सप्तरी राजविराजनिवासी श्रीमती मीना ठाकुरकेँ फूलकुमारी महतो मैथिली प्रतिभा पुरस्कार २०६७ -बुधनगर मोरङनिवासी दयानन्द दिग्पाल यदुवंशीकेँ साहित्य अकादेमी फेलो- भारत देशक सर्वोच्च साहित्य सम्मान (मैथिली) १९९४-नागार्जुन (स्व. श्री वैद्यनाथ मिश्र “यात्री” १९११-१९९८ ) , हिन्दी आ मैथिली कवि। २०१०- चन्द्रनाथ मिश्र अमर (१९२५- ) - मैथिली साहित्य लेल। साहित्य अकादेमी भाषा सम्मान ( क्लासिकल आ मध्यकालीन साहित्य आ गएर मान्यताप्राप्त भाषा लेल):- २०००- डॉ. जयकान्त मिश्र (क्लासिकल आ मध्यकालीन साहित्य लेल।) २००७- पं. डॉ. शशिनाथ झा (क्लासिकल आ मध्यकालीन साहित्य लेल।) पं. श्री उमारमण मिश्र साहित्य अकादेमी पुरस्कार- मैथिली १९६६- यशोधर झा (मिथिला वैभव, दर्शन) १९६८- यात्री (पत्रहीन नग्न गाछ, पद्य) १९६९- उपेन्द्रनाथ झा “व्यास” (दू पत्र, उपन्यास) १९७०- काशीकान्त मिश्र “मधुप” (राधा विरह, महाकाव्य) १९७१- सुरेन्द्र झा “सुमन” (पयस्विनी, पद्य) १९७३- ब्रजकिशोर वर्मा “मणिपद्म” (नैका बनिजारा, उपन्यास) १९७५- गिरीन्द्र मोहन मिश्र (किछु देखल किछु सुनल, संस्मरण) १९७६- वैद्यनाथ मल्लिक “विधु” (सीतायन, महाकाव्य) १९७७- राजेश्वर झा (अवहट्ठ: उद्भव ओ विकास, समालोचना) १९७८- उपेन्द्र ठाकुर “मोहन” (बाजि उठल मुरली, पद्य) १९७९- तन्त्रनाथ झा (कृष्ण चरित, महाकाव्य) १९८०- सुधांशु शेखर चौधरी (ई बतहा संसार, उपन्यास) १९८१- मार्कण्डेय प्रवासी (अगस्त्यायिनी, महाकाव्य) १९८२- लिली रे (मरीचिका, उपन्यास) १९८३- चन्द्रनाथ मिश्र “अमर” (मैथिली पत्रकारिताक इतिहास) १९८४- आरसी प्रसाद सिंह (सूर्यमुखी, पद्य) १९८५- हरिमोहन झा (जीवन यात्रा, आत्मकथा) १९८६- सुभद्र झा (नातिक पत्रक उत्तर, निबन्ध) १९८७- उमानाथ झा (अतीत, कथा) १९८८- मायानन्द मिश्र (मंत्रपुत्र, उपन्यास) १९८९- काञ्चीनाथ झा “किरण” (पराशर, महाकाव्य) १९९०- प्रभास कुमार चौधरी (प्रभासक कथा, कथा) १९९१- रामदेव झा (पसिझैत पाथर, एकांकी) १९९२- भीमनाथ झा (विविधा, निबन्ध) १९९३- गोविन्द झा (सामाक पौती, कथा) १९९४- गंगेश गुंजन (उचितवक्ता, कथा) १९९५- जयमन्त मिश्र (कविता कुसुमांजलि, पद्य) १९९६- राजमोहन झा (आइ काल्हि परसू, कथा संग्रह) १९९७- कीर्ति नारायण मिश्र (ध्वस्त होइत शान्तिस्तूप, पद्य) १९९८- जीवकान्त (तकै अछि चिड़ै, पद्य) १९९९- साकेतानन्द (गणनायक, कथा) २०००- रमानन्द रेणु (कतेक रास बात, पद्य) २००१- बबुआजी झा “अज्ञात” (प्रतिज्ञा पाण्डव, महाकाव्य) २००२- सोमदेव (सहस्रमुखी चौक पर, पद्य) २००३- नीरजा रेणु (ऋतम्भरा, कथा) २००४- चन्द्रभानु सिंह (शकुन्तला, महाकाव्य) २००५- विवेकानन्द ठाकुर (चानन घन गछिया, पद्य) २००६- विभूति आनन्द (काठ, कथा) २००७- प्रदीप बिहारी (सरोकार, कथा) २००८- मत्रेश्वर झा (कतेक डारि पर, आत्मकथा) २००९- स्व.मनमोहन झा (गंगापुत्र, कथासंग्रह) २०१०-श्रीमति उषाकिरण खान (भामती, उपन्यास) साहित्य अकादेमी मैथिली अनुवाद पुरस्कार १९९२- शैलेन्द्र मोहन झा (शरतचन्द्र व्यक्ति आ कलाकार-सुबोधचन्द्र सेन, अंग्रेजी) १९९३- गोविन्द झा (नेपाली साहित्यक इतिहास- कुमार प्रधान, अंग्रेजी) १९९४- रामदेव झा (सगाइ- राजिन्दर सिंह बेदी, उर्दू) १९९५- सुरेन्द्र झा “सुमन” (रवीन्द्र नाटकावली- रवीन्द्रनाथ टैगोर, बांग्ला) १९९६- फजलुर रहमान हासमी (अबुलकलाम आजाद- अब्दुलकवी देसनवी, उर्दू) १९९७- नवीन चौधरी (माटि मंगल- शिवराम कारंत, कन्नड़) १९९८- चन्द्रनाथ मिश्र “अमर” (परशुरामक बीछल बेरायल कथा- राजशेखर बसु, बांग्ला) १९९९- मुरारी मधुसूदन ठाकुर (आरोग्य निकेतन- ताराशंकर बंदोपाध्याय, बांग्ला) २०००- डॉ. अमरेश पाठक, (तमस- भीष्म साहनी, हिन्दी) २००१- सुरेश्वर झा (अन्तरिक्षमे विस्फोट- जयन्त विष्णु नार्लीकर, मराठी) २००२- डॉ. प्रबोध नारायण सिंह (पतझड़क स्वर- कुर्तुल ऐन हैदर, उर्दू) २००३- उपेन्द दोषी (कथा कहिनी- मनोज दास, उड़िया) २००४- डॉ. प्रफुल्ल कुमार सिंह “मौन” (प्रेमचन्द की कहानी-प्रेमचन्द, हिन्दी) २००५- डॉ. योगानन्द झा (बिहारक लोककथा- पी.सी.राय चौधरी, अंग्रेजी) २००६- राजनन्द झा (कालबेला- समरेश मजुमदार, बांग्ला) २००७- अनन्त बिहारी लाल दास “इन्दु” (युद्ध आ योद्धा-अगम सिंह गिरि, नेपाली) २००८- ताराकान्त झा (संरचनावाद उत्तर-संरचनावाद एवं प्राच्य काव्यशास्त्र-गोपीचन्द नारंग, उर्दू) २००९- भालचन्द्र झा (बीछल बेरायल मराठी एकाँकी- सम्पादक सुधा जोशी आ रत्नाकर मतकरी, मराठी) २०१०- डॉ. नित्यानन्द लाल दास ( "इग्नाइटेड माइण्ड्स" - मैथिलीमे "प्रज्वलित प्रज्ञा"- डॉ.ए.पी.जे. कलाम, अंग्रेजी) साहित्य अकादेमी मैथिली बाल साहित्य पुरस्कार २०१०-तारानन्द वियोगीकेँ पोथी "ई भेटल तँ की भेटल" लेल २०११- ले.क. मायानाथ झा "जकर नारी चतुर होइ" लेल प्रबोध सम्मान प्रबोध सम्मान 2004- श्रीमति लिली रे (1933- ) प्रबोध सम्मान 2005- श्री महेन्द्र मलंगिया (1946- ) प्रबोध सम्मान 2006- श्री गोविन्द झा (1923- ) प्रबोध सम्मान 2007- श्री मायानन्द मिश्र (1934- ) प्रबोध सम्मान 2008- श्री मोहन भारद्वाज (1943- ) प्रबोध सम्मान 2009- श्री राजमोहन झा (1934- ) प्रबोध सम्मान 2010- श्री जीवकान्त (1936- ) प्रबोध सम्मान 2011- श्री सोमदेव (1934- ) प्रबोध सम्मान 2012- श्री चन्द्रभानु सिंह (1922- ) आ श्री रामलोचन ठाकुर (1949- ) यात्री-चेतना पुरस्कार २००० ई.- पं.सुरेन्द्र झा “सुमन”, दरभंगा; २००१ ई. - श्री सोमदेव, दरभंगा; २००२ ई.- श्री महेन्द्र मलंगिया, मलंगिया; २००३ ई.- श्री हंसराज, दरभंगा; २००४ ई.- डॉ. श्रीमती शेफालिका वर्मा, पटना; २००५ ई.-श्री उदय चन्द्र झा “विनोद”, रहिका, मधुबनी; २००६ ई.-श्री गोपालजी झा गोपेश, मेंहथ, मधुबनी; २००७ ई.-श्री आनन्द मोहन झा, भारद्वाज, नवानी, मधुबनी; २००८ ई.-श्री मंत्रेश्वर झा, लालगंज,मधुबनी २००९ ई.-श्री प्रेमशंकर सिंह, जोगियारा, दरभंगा २०१० ई.- डॉ. तारानन्द वियोगी, महिषी, सहरसा २०११ ई.- डॉ. राम भरोस कापड़ि भ्रमर (जनकपुर) भारतीय भाषा परिषद, कोलकाता युवा पुरस्कार (२००९-१०) गौरीनाथ (अनलकांत) केँ मैथिली लेल। भारतीय भाषा संस्थान (सी.आइ.आइ.एल.) , मैसूर रामलोचन ठाकुर:- अनुवाद लेल भाषा-भारती सम्मान २००३-०४ (सी.आइ.आइ.एल., मैसूर) जा सकै छी, किन्तु किए जाउ- शक्ति चट्टोपाध्यायक बांग्ला कविता-संग्रहक मैथिली अनुवाद लेल प्राप्त। रमानन्द झा 'रमण':- अनुवाद लेल भाषा-भारती सम्मान २००४-०५ (सी.आइ.आइ.एल., मैसूर) छओ बिगहा आठ कट्ठा- फकीर मोहन सेनापतिक ओड़िया उपन्यासक मैथिली अनुवाद लेल प्राप्त। विदेह सम्मान विदेह समानान्तर साहित्य अकादेमी सम्मान १.विदेह समानान्तर साहित्य अकादेमी फेलो पुरस्कार २०१०-११ २०१० श्री गोविन्द झा (समग्र योगदान लेल) २०११ श्री रमानन्द रेणु (समग्र योगदान लेल) २.विदेह समानान्तर साहित्य अकादेमी पुरस्कार २०११-१२ २०११ मूल पुरस्कार- श्री जगदीश प्रसाद मण्डल (गामक जिनगी, कथा संग्रह) २०११ बाल साहित्य पुरस्कार- ले.क. मायानाथ झा (जकर नारी चतुर होइ, कथा संग्रह) २०११ युवा पुरस्कार- आनन्द कुमार झा (कलह, नाटक) २०१२ अनुवाद पुरस्कार- श्री रामलोचन ठाकुर- (पद्मानदीक माझी, बांग्ला- मानिक बंद्योपाध्याय, उपन्यास बांग्लासँ मैथिली अनुवाद) नाटक, गीत, संगीत, नृत्य, मूर्तिकला, शिल्प आ चित्रकला क्षेत्रमे विदेह सम्मान २०१२ क घोषणा अभिनय- मुख्य अभिनय , सुश्री शिल्पी कुमारी, उम्र- 17 पिता श्री लक्ष्मण झा श्री शोभा कान्त महतो, उम्र- 15 पिता- श्री रामअवतार महतो, हास्य-अभिनय सुश्री प्रियंका कुमारी, उम्र- 16, पिता- श्री वैद्यनाथ साह श्री दुर्गानंद ठाकुर, उम्र- 23, पिता- स्व. भरत ठाकुर नृत्य सुश्री सुलेखा कुमारी, उम्र- 16, पिता- श्री हरेराम यादव श्री अमीत रंजन, उम्र- 18, पिता- नागेश्वर कामत चित्रकला श्री पनकलाल मण्डल, उमेर- ३५, पिता- स्व. सुन्दर मण्डल, गाम छजना श्री रमेश कुमार भारती, उम्र- 23, पिता- श्री मोती मण्डल संगीत (हारमोनियम) श्री परमानन्द ठाकुर, उम्र- 30, पिता- श्री नथुनी ठाकुर संगीत (ढोलक) श्री बुलन राउत, उम्र- 45, पिता- स्व. चिल्टू राउत संगीत (रसनचौकी) श्री बहादुर राम, उम्र- 55, पिता- स्व. सरजुग राम शिल्पी-वस्तुकला श्री जगदीश मल्लिक,५० गाम- चनौरागंज मूर्ति-मृत्तिका कला श्री यदुनंदन पंडित, उम्र- 45, पिता- अशर्फी पंडित काष्ठ-कला श्री झमेली मुखिया,पिता स्व. मूंगालाल मुखिया, ५५, गाम- छजना किसानी-आत्मनिर्भर संस्कृति श्री लछमी दास, उमेर- ५०, पिता स्व. श्री फणी दास, गाम वेरमा अनचिन्हार आखर ( http://anchinharakharkolkata.blogspot.com ) द्वारा प्रायोजित "गजल कमला-कोसी-बगमती-महानंदा सम्मान" बर्ख 2011 लेल ओस्ताद सदरे आलम गौहर जीकेँ प्रदान कएल गेलैन्ह। एहि बेरुक मुख्यचयनकर्ता ओस्ताद सियाराम झा"सरस" छलखिन्ह। गजेन्द्र ठाकुर ggajendra@videha.com http://www.maithililekhaksangh.com/2010/07/blog-post_3709.html २. गद्य २.१.नवेंदु कुमार झा-बिहारक औद्योगिक विकास मे बाधा बनि रहल जमीन आ बिजली/ राशन कार्डक होयत डिजिटलीकरण/ मिथिलांचल मे माछ उत्पादक भरोसा देलनि मुख्यमंत्री, सौराठ मे खुजत मिथिला चित्रकला संस्थान/ जन आंदोलन सँ होयत कोसीक समस्याक समाधान-मेधा पाटेकर २.२. श्री जगदीश प्रसाद मण्डलासँ साक्षात्कार २.३.योगेन्द्र प्रसाद यादवसँ मुन्नाजीक साक्षात्कार २.४.जगदानन्द झा 'मनु' -चोनहा - (धारावाहिक मैथिली कथा) २.५.खुशबू झा-हमरा नजरिमे सुजीतक रिपोर्टर डायरी २.६.श्री मुन्नाजीक श्री रवीन्द्र कुमार दाससँ गपशप २.७.१.सुजीत कुमार झा-कथा-फुल फुलाइए कऽ रहल २.सुमित आनन्द- अक्षरपुरूष-विश्वनाथ ३.नवीन कुमार आशा- फेर सॅ वर रहलाह कुमार २.८.१.अमरकान्त अमर-संघीयतामे मैथिली भाषा २.अतुलेश्वर- तीन तिरहुतिया तेरह पाक ३.पूनम मण्डल- स्थानीय कवि परिषद (सलहेसबाबा परिसर- औरहा) वार्षिकोत्सव- 2012 नवेंदु कुमार झा-बिहारक औद्योगिक विकास मे बाधा बनि रहल जमीन आ बिजली/ राशन कार्डक होयत डिजिटलीकरण/ मिथिलांचल मे माछ उत्पादक भरोसा देलनि मुख्यमंत्री, सौराठ मे खुजत मिथिला चित्रकला संस्थान/ जन आंदोलन सँ होयत कोसीक समस्याक समाधान-मेधा पाटेकर बिहारक औद्योगिक विकास मे बाधा बनि रहल जमीन आ बिजली
बिहारक औद्योगिक विकास मे जमीन आ बिजलीक कमी पैद्य समस्या बनि रहल अछि। देशक प्रमुख औद्योगिक संगठन ‘‘फिक्की‘‘ द्वारा हालहि मे जारी कयल गेल रिपोर्ट मे कहल गेल अछि जे कतेको पैघ कंपनी बिहार मे निवेशक प्रति रूचि देखौलक अछि मुदा जमीनक स्तर पर निवेश नहि आयल अछि। गोटेक दू तिहाइ उद्यमी प्रदेशकेँ आकर्षक निवेश स्थलक रूपमे नहि देखि रहल छथि। उद्योगक वर्तमान स्तर मे सेहो बेसी सुधार नहि होयबाक कारण एखनो पैघ संख्या मे उद्यमी सभक लेल कारोबार प्रारंभ करब मुश्किल बुझि पड़ैत अछि। रिपोर्टक अनुसार एकर मुख्य कारण जमीन आ बिजलीक कमी मानल जा रहल अछि। प्रदेश मे औद्योगिक जमीनक कमी अछि आ जे जमीन अछि ओ बहुत महग अछि। संगहि एहि ठाम जमीनक रेकार्ड सेहो बहुत पुरान अछि। जाहि सँ जमीन सँ संबंधित विवाद सेहो बेसी अछि। एहि सभ कारण सँ गोटेक 2.5 करोड़ टाकाक निवेश प्रस्ताव होयबाक बावजूद वास्तविक निवेश कम भेल अछि। फिक्कीक अनुसार प्रदेश मे बुनियादी ढाँचाक अभाव आ सरकारी मशीनरीक कमजोर रूख निवेशक गति कमजोर कऽ रहल अछि। रिपोर्टक अनुसार प्रदेश मे बिजलीक कमी निवेशमे बाधा बनि रहल अछि। प्रदेश मे एखनो आवश्यक बिजलीक 90 प्रतिशत बिजलीक खरीद केन्द्रीय पूल सँ भऽ रहल अछि। प्रदेश मे आवश्यक 5500 मेगावाट बिजलीक मोकाबला मात्र 1800 मेगावाट बिजली भेटि रहल अछि। जाहि सँ विनिर्माण इकाईकेँ बिजली नहि भेटि पाबि रहल अछि। फिक्कीक अनुसार पछिला किछु वर्षमे सड़कक मामिलामे प्रदेशमे प्रगति भेल अछि तथापि ओ कम अछि। उत्तर-बिहार आ दक्षिण बिहारक मध्य आबाजाही एखनो मुश्किल अछि। रेलवे लग सेहो आवश्यकताक मोताबिक रैक उपलब्ध नहि अछि। राष्ट्रीय राजमार्गकेँ चारि लेन आ राज्य राजमार्गकेँ दू लेन करबाक संगहि पूर्णियां, भागलपुर, गया आ डेहरीमे मध्यम दर्जाक हवाइ अड्डा बनायब आवश्यक अछि। विकासक गति मे तेजी अनबाक लेल बुनियादी ढांचाकेँ दुरूस्त करबाक आवश्यकता अछि। प्रदेशमे सत्तारूढ़ नीतीश सरकार अपन पहिल कार्यकालमे औद्योगिक विकासक लेल कतेको प्रयास प्रारंभ कयलक जकर परिणाम दोसर कार्यकालमे अयबाक संभावना अछि। एहि वर्ष प्रदेशमे बिस्कुट, कपड़ा, जूट आ वनस्पतिक इकाइ खुजबाक संभावना अछि। फिक्कीक एहि रिपोर्टक बाद सरकार औद्योगिक विकासक गति देबाक दिस ध्यान केन्द्रित कयलक अछि। उप-मुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदीक अनुसार सरकार प्रदेशमे औद्योगिक विकासक गतिमे तेजी अनबाक लेल सभ संभव प्रयास कऽ रहल अछि मुदा सभ समस्याक समाधान एकहि बेर होयब संभव नहि अछि। कतेको ट्रांसमिशन लाइनकेँ बदलल जा रहल अछि। नव बिजली-घर बनेबाक संगहि पुरान बिजली घर सभकेँ पुनर्जीवित कयल जा रहल अछि। राशन कार्डक होयत डिजिटलीकरण फर्जी राशन कार्ड केँ समाप्त करब आ सरकार द्वारा देल जायबला अन्नक बँटवारा सही तरीकासँ करबाक उद्देश्यसँ केन्द्र सरकार राशन कार्डक डिजिटलीकरण करबाक योजना बनौलक अछि। उड़ीसा, पश्चिम बंगाल, हरियाणा, कर्नाटक, अरूणाचल प्रदेश, असम, चंडीगढ़, गुजरात, छत्तीसगढ़, मेघालय, पुडुचेरी आ आन्ध्र प्रदेश मे राशन कार्डक डिजिटलीकरणक काज प्रारंभ भऽ गेल अछि मुदा एकरा आगा बढ़ेबाक लेल मदतिक आवश्यकता होयत। एहि मद मे केन्द्र सरकार टाकाक आवंटन अप्रील 2012 सँ करत। केन्द्र मे सत्तारूढ़ संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकारक बहुप्रतिक्षीत खाद्य सुरक्षा अधिनियम सेहो अगिला वित्त वर्ष सँ लागू होयबाक संभावना अछि। राशन कार्डक डिजिटलीकरणक मामिला पर खाद्य मंत्रालय 8-9 फरवरी केँ प्रदेश सभक खाद्य आ कृषि मंत्रीक बैसक सेहो करत जाहि सँ एहि पहल केँ आगाँ बढ़ाओल जा सकय। केन्द्रीय खाद्य मंत्री पी. सी. थॉमस जनतब देलनि अछि जे एहि योजना केँ जमीन पर उतरला सँ जन वितरण प्रणालीक अंतर्गत भेटयबला अन्न योग्य लोकक हाथमे भेटि सकत। श्री थॉमस जनतब देलनि जे सरकारक प्रयासक बाद पछिला किछु वर्षमे जन वितरण प्रणालीक अन्न अपात्र लोकक हाथ मे जाय सँ रोकबा मे बहुत हद धरि सफलता भेटल अछि आ ई 40 प्रतिशत सँ 20 प्रतिशत धरि आबि गेल अछि। मुदा वास्तविक लोकक हाथ धरि अन्न पहुँचैबाक लेल एखन आर बहुत किछु करय पड़त। मंत्री सभक दू दिवसीय सम्मेलनकेँ वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी आ कृषि मंत्री शरद पवार सेहो संबोधित करताह। खाद्य मंत्री जनौलनि जे फर्जी राशन कार्ड केँ रद्द करबाक लेल चलाओल गेल अभियानक दरमियान गरीबी रेखा सँ नींचा (बी. पी. एल.)क कार्डक संख्या 10.50 करोड़ सँ घटि कऽ 7.6 करोड़ धरि पहुँचि गेल अछि। मिथिलांचल मे माछ उत्पादक भरोसा देलनि मुख्यमंत्री, सौराठ मे खुजत मिथिला चित्रकला संस्थान मुख्यमंत्री नीतीश कुमार मिथिलांचल मे स्थित नदी पोखरिक पैघ संख्याक सदुपयोग कऽ एहि क्षेत्र मे माछ पालन केँ बढ़ाबा देबाक भरोसा देलनि अछि। अपन सेवा यात्राक क्रम मे मधुबनी जिलाक सेवा यात्राक दरमियान श्री कुमार मधुबनी जिलाक सौराठ मे मिथिला चित्रकलाक संस्थान खोलबाक घोषणा करैत कहलनि जे एहि संस्थानकेँ डिम्ड विश्वविद्यालयक दर्जा देल जायत। ओ कहलनि जे मिथिलांचल मे माछ पालनक पैघ संभावना अछि। एहि क्षेत्र मे पैघ संख्या मे नदी आ पोखरि रहबाक कारण माछक उत्पादन पैघ संख्या मे भऽ सकैत अछि जाहि सँ बिहारक आवश्यकता केँ पूरा करबाक संगहि आन प्रदेश मे सेहो बेचल जा सकैत अछि। ओ कहलनि जे मिथिलांचल एकटा समृद्ध संस्कृति, मिथिला चित्रकला, महाकवि विद्यापति नगर आ पुरातात्विक महत्व वाला जगह अछि। मुख्यमंत्री मधुबनीक सेवा यात्राक क्रम मे जिलाक पुरातात्विक जगह बलिराज गढ़क यात्रा करबाक संगहि मिथिला चित्रकला लेल प्रसिद्ध रांटी गाम जा मिथिला चित्रकलाक विश्व प्रसिद्ध कलाकार 90 वर्षीय महासुन्दरी देवी आ आन कलाकार सभ सँ भेट कयलनि संगहि जिलाक बेनीपट्टीक खिरहर गाम पहुँचि जैविक खाद्य उत्पादन करय वाला किसान संजय चौधरीक काज देखलनि आ हुनक प्रशंसा कयलनि। जन आंदोलन सँ होयत कोसीक समस्याक समाधान-मेधा पाटेकर प्रसिद्ध समाज सेवा आ नेशनल एलांयस ऑफ पीपुल्स मूवमेन्टक राष्ट्रीय संयोजक मेधा पाटेकर कहलनि अछि जे कोसी क्षेत्र सँ जखन जन आंदोलन प्रारंभ होयत तखने कोसी क्षेत्रक समस्याक समाधान होयत। बिहारक दौरा पर आयल सुश्री पाटेकर सुपौलक वीरपुर मे जन सभा केँ संबोधित करैत कहलनि जे नर्मदा परियोजना जकाँ कोसीक पीड़ित सभकेँ मोआवजा भेटबाक चाही। कोसी केँ पहिनहि सँ बिहारक शोक कहल जाइत अछि तेँ सरकार केँ एकरा व्यवस्थित करबाक प्रयास करबाक चाही। कोसीक विस्थापित सभक पुनर्वासक दाबा कागजी साबित भऽ रहल अछि। मुख्यमंत्री जे दाबा कऽ रहल छथि ओकर वास्तविक स्थिति किछु आर अछि। मुख्यमंत्री जे दाबा कऽ रहल छथि ओकर वास्तविक स्थिति किछु आर अछि। ओ कोसीक जन समस्याक निपटाराक लेल विश्व बैंक द्वारा 220 करोड़ डालरक कर्जक संदर्भ मे श्वेत पत्र जारी करबाक मांग सेहो कयलनि। सुश्री पाटेकर अपन दौराक क्रममे अररिया जिलाक भजनपुराक दौरा सेहो कयलनि आ एहि ठामक स्थितिक जनतब लेलनि। भजनपुरामे एकटा व्यवसायी द्वारा रस्ता बंद करबाक क्रम मे भेल जन आंदोलन पर पुलिस द्वारा जनता पर बर्बर कारवाई कयल गेल छल। संगहि बिजलीक मांगक लऽ कऽ मुजफ्फरपुरक कांटीमे भेल जन आंदोलनक दरमियान जेल गेल आंदोलनकारीसँ सुश्री पाटेकर सेहो भेँट कयलनि आ कांटी आ भड़वनमे जन सभाकेँ संबोधित कयलाक बाद बिहार विश्वविद्यालयक सीनेट हॉल मे बुद्धिजीवी सभक संग विचार-विमर्श सेहो कयलनि। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। समानान्तर साहित्य अकादेमी २०११ मूल पुरस्कार- श्री जगदीश प्रसाद मण्डल (गामक जिनगी, कथा संग्रह लेल) केँ विदेह साहित्य उत्सव २०१२ मे १४ जनवरी २०१२ केँ देल गेलन्हि। ओइ अवसरपर श्री उमेश मण्डलजी द्वारा हुनकासँ साक्षात्कार लेल गेल जे नीचाँ देल जा रहल अछि। विदेह- विदेह सम्मान लेल अपनेकेँ बहुत-बहुत बधाई... ज.प्र.मं.- हेराएल-भोतियाएल रचनाकारक खोजि-खबरि लेबा लेल विदेह परिवारकेँ धन्यवाद। विदेह- अपनेक नजरिमे साहित्यक उद्देश्य की अछि? ज.प्र.मं.- अधिकांश विद्वानक विचारे साहित्य समाजक दर्पण थिक। जइ दर्पणसँ देखैत छी ओ तँ खाली (िसर्फ) कोनो वस्तुक उपरी भाग देखबैत अछि। मुदा शरीरक भीतर जे मन, बुइध, विवेक, आत्मा अछि ओ तँ नै देखबैत अछि। मनुष्य िनर्मित साहित्य होइत अछि तँए दुनूकेँ मिला देखबैत अछि। साहित्य जीवन दर्शन छी जे अतीत-सँ-भविष्य धरिकेँ जोड़ैत अछि। तँए साहित्यक उद्देश्य महान अछि जे मनुष्य-मनुष्यक बीच, व्यक्ति-समाजक बीच प्रेमसँ जीवैक दिशा-िनर्देश करैत अछि। वएह दिशा-िनर्देश साहित्यक उद्देश्य छी। विदेह- अहाँक साहित्यमे इतिहास/संस्कृति (खास कऽ मिथिलाक) कोना वर्णित होइत अछि? ज.प्र.मं.- अपन मिथिलांचल सभ दिनसँ कृषि प्रधान रहल अछि। ओना इतिहासक पन्नामे कृषि युगसँ पहिनहुँ शिकारी युग आ जंगली अवस्थाक चर्च अछि। से िसर्फ इतिहासेमे नै सचमुच जिनगियो रहल अछि। राजा रहितो जनक हर जोतलनि, जे कृषिक महत्वकेँ दरसबैत अछि। शुरूहेसँ मिथिलांचलमे बाहरी संस्कृतिक आक्रमण होइत रहल अछि। जइसँ अइठामक अपन संस्कृति टूटैत-झुकैत रहल अछि। रूप-विद्रप होइत रहल छैक। मुदा तैयो रिआइतो-खिआइतो जीवित रहल अछि। हम ओइ किसानी संस्कृतिकेँ अपन संस्कृति मानि चलैत छी। जे कल्याणकारीक संग-संग प्रेम, भाइ-चाराकेँ मजबूत बनबैमे सेहो सहायक अछि। विदेह- दिनानुदिनक अनुभवक अहाँक साहित्यमे कोन तरहेँ विवेचन होइत अछि? ज.प्र.मं.- दुनियाँक प्रत्येक व्यक्ति अपन बीतैत जिनगीक संग-संग परिवारो, समाजो आ देशो-दुनियाँक अनुभव करैत आबि रहल अछि। जहिना दुनियाँ गतिशील अछि तहिना जिनगियो अछि। मुदा सबहक समान आयु नै रहने किछु देखियो पड़ैत अछि आ किछु नहियो। दुनियाँकेँ देखैक आ अनुभव करैक सेहो िभन्न-भिन्न नजरि अछि। जेहन देखिनिहार तेहन दृश्य देखैत अछि। समाजक सभ अपन दिनानुदिनक क्रिया-कलापसँ जिनगीक सच्चाइ धरि पहुँचए चाहैत अछि, जइसँ सुख-समृद्धिक तृप्ति भऽ सकै। आइ सच्चाइकेँ जते इमानदारीसँ चित्र उताड़ि सकलाह ओ सृजनकर्ता ओते कालजयी होइत छथि। यएह प्रयास सभ करै छथि, हमहूँ कऽ रहल छी। विदेह- साहित्यक शक्तिक विषएमे अपनेक की कहब अछि? ज.प्र.मं.- कहलो जाइ छै संगठने शक्ति छी। जहिना व्यक्तिक संगठन परिवार होइत, तहिना परिवारक संगठन समाज छी। समाजेक दर्पण सािहत्य छी। जे जेहन समाज ओकर ओहन शक्तिशाली साहित्य। विदेह- अहाँक साहित्यमे पाप-पुण्यक विश्लेषन कोना होइत अछि? ज.प्र.मं.- पाप-पुण्य धर्मसँ जुड़ल अछि। मुदा आइ धरिक जे सामाजिक इतिहास रहल अछि ओ विकृत होइत-होइत एते विकृत भऽ गेल जे एकर स्वरूप चौपट्ट भऽ गेल। मूलत: जेना व्यासजी कहने छथि जे परोपकार धर्म आ परपीड़ा पाप छी। एकरा िसर्फ वैचारिक नै जिनगी मानि चलै छी। विदेह- कल्पना आ यथार्थक समन्वय अहाँ अपन साहित्यमे कोना करैत छी? ज.प्र.मं.- ओना साहित्यमे अनेको धारा चलि रहल अछि मुदा मूलत: एकरा तीन धारामे राखि आगू बढ़ै छी। पहिल यथार्थ, दोसर कल्पना आ तेसर दुनूक बीच समन्वयवादी। वैदिक युगक विचारधारा सामंती युगमे आबि तहस-नहस भऽ गेल। साहित्य समाजसँ कटि राज-दरवारक बीच चकभौर लगबए लगल। जइसँ साहित्य जन-गणसँ हटि भोग-विलासक वस्तु मात्र रहि गेल। पहिनहुँ रहल आ अखनो अछि जे साहित्य दुनूक (जन-गण आ राज दरवार) बीचक धारा बनि समन्वयवादी विचारधारामे बहए। एे धरतीपर सभकेँ जीबाक अधिकार छै, तइसँ दूर साहित्य हटि गेल अछि। अपन सदति प्रयास रहल अछि जे शोषित-पीड़ित, बंचितकेँ बाँहि पकड़ि ठाढ़ करी। विदेह- अहाँक साहित्यमे पात्र जीवन्त भऽ उठैत अछि, तेकर की रहस्य? ज.प्र.मं.- कोनो समस्या अाकि घटनाक प्रति ई सदति कोशिश रहैत अछि जे िनष्पक्ष भऽ देखबो करी आ िनराकरणो करी। भऽ सकैत अछि जे ऐसँ पात्रमे जीवन्तता आबि गेल होय। विदेह- साहित्य लेखन, विशेष कऽ मैथिली साहित्य लेखन अहाँ लेल कोन तरहेँ विशिष्ट आ एकर प्राथमिकताकेँ अहाँ कोन तरहेँ देखै छी? ज.प्र.मं.- साहित्य समाजक ओहन दर्पण छी जइमे भूत वर्तमान आ भविष्यक दर्शन होइत अछि। दुर्भाग्य रहल जे मैथिली साहित्य समटा कऽ एकभग्गू भऽ गेल अछि। किछु समाजक चर्च आवश्यकतासँ अधिक भेल अछि। जइसँ साहित्य हास-परिहासक बीच ओझरा गेल अछि। जखन कि समाजक अधिकांश हिस्सा कटि कात भऽ गेल अछि। अपन रचनामे सदति कोशिश रहैत अछि जे ओइ छुटल समाजकेँ पकड़ि सृजन करी। विदेह- की अहाँ कोनो तथ्यक झपेलहा भाग उभाड़ैत अगर हँ तँ कोना आ नै तँ किअए? ज.प्र.मं.- जहाँ धरि झपाएल तथ्यक प्रश्न अछि। झपाएल कते रंगक होइत अछि। जना शब्द-सँ-विचार झापब कोनो वस्त्र वा आनसँ झापब, खाधि खुनि माटिसँ झापब इत्यादि। मिथिलांचलक समाज (तथ्य) ओहन झपाएल अछि जेकरा दिस कियो देखिनिहारे नै भेलाह। कोनो चीज देखैसँ पहिने मनमे उठैत अछि। मन आँखिक माध्यमसँ देखैत अछि। मुदा ऐठाम तँ मने हरा गेल अछि! ओहन तथ्य दिस जखन देखैत छी तँ वएह झपेलहा बूझि पड़ैत अछि। विदेह- अहाँ कहियासँ लेखन प्रारम्भ केलौं, ककरा लेल लिखलौं, आइ-काल्हि केकरा लेल लिख रहल छी? ज.प्र.मं.- मोटा-मोटी दू हजार ईंसवी चढ़लाक बादे लिखब शुरू केलौं। ओना हिन्दी साहित्यक विद्यार्थी छी तँ हमरा लेल हिन्दीमे लिखब नीक होइत। मुदा मैथिलीक संबंध परिवार-सँ-समाज धरि तहियो छल अखनो अछि। संगहि एकटा बात आरो अछि जे जे विचार मैथिलीमे गहराइसँ वयक्त कऽ सकै छी ओ हिन्दीमे नै भऽ पबैत अछि। जहाँ धरि ककराक प्रश्न अछि? ओ स्पष्ट रूपे कहि रहल छी जे समाजक ओ दबल-कुचलल वंचित हमर मुख्य आधार अछि, जेकरा लेल लिखबो केलौं आ आगूओ जे किछु लिखब ओकरे लेल लिखब। विदेह- की अहाँकेँ ई लगैत रहल अछि जे मुख्य धारासँ अहाँ कतियाएल गेल छी? अहाँक रचनामे समाजकेँ बाहरसँ देखबाक प्रवृतिक की कारण? ज.प्र.मं.- मुख्य धारासँ कतिआएलक प्रश्न उठौने छी, तँ स्पष्ट रूपे कहि दिअए चाहैत छी जे जहिना कोनो धारमे बरखाक पानि आबि-आबि धारामे मिलैत जाइत अछि, जइसँ धारोमे उफान अबैत अछि आ धरो तेज होइत अछि। मुदा हम अपनाकेँ ओहिसँ अलग बुझैत छी। कम शक्ति रहने धारा भलहिं कमजोर हुअए मुदा दृढ़ विश्वास अछि जे दू-तीन-चारि बढ़ैत-बढ़ैत मुख्य धारा बनि जाएत। तँए अपनाकेँ कतिआएल नै नव धाराक गति देनिहार बुझैत छी। ई विचारधाराक प्रश्न अछि कतिऐबाक नै। विदेह- अपन साहित्य आ रचनामे की स्वयंकेँ पूर्णरूपसँ इमानदार राखब आवश्यक छै? ज.प्र.मं.- जहाँ धरि रचनामे इमानदारीक प्रश्न अछि। ओ िसर्फ रचने नै जिनगीक सभ क्षेत्रमे एकर महत्व छैक आ रहतैक। न्यायमूर्ति सदृश्य रचनाकारकेँ हेबाक चाहियनि। ओना प्रश्न भयंकर अछि। मुँहसँ सभ अपनाकेँ इमानदारे कहैत छथि मुदा कर्मक्षेत्र आ वौद्धिक क्षेत्रमे कते इमानदार छथि, से बेबहारेमे स्पष्ट झलकैत छन्हि। तँए बेसी कहब उचित नै। विदेह- मैथिली साहित्य आइक दिनमे की ई सभ (साहित्यकार)क सामुहिक दोष स्वीकृतिक रूप नै बुझना जाइत अछि? ज.प्र.मं.- अपना ऐठाम (मिथिलांचलमे) नैतिकता िसर्फ भाषण रहि गेल अछि। बेबहारिक रूपमे कतौ किछु ने छैक। तेकर कारण अछि जे नैतिकताक मन गढ़न्त व्याख्या, आइये नै बहुत पहिनेसँ होइत आबि रहल अछि। तँए सामुहिक दोष की कहल जाए। जाधरि मनुष्य अपन िनर्माण अपने नै करताह ताधरि सुगा रटन्तसँ की हएत। ओना दोषोमे एकरूपता नै अछि। रंग-विरंगक दोष पसरल अछि। एके गोटे एकठाम इमानदार छथि दोसरठाम बइमान। एे प्रश्नक समाधान साधारण नै अछि। ओना जँ खुल्लम-खुल्ला वाद-विवाद हुअए तँ किछु हद तक कमि सकैत अछि। विदेह- की अहाँकेँ लगैत अछि जे अहाँक पोथीकेँ हिन्दी, बंग्ला, नेपाली, अंग्रजी आदि भाषामे अनुवाद कएल जाएत? तइ स्थितिमे ओतए एकर कोन रूपेँ स्वागत हेतैक? की अहाँक साहित्य ओइ भाषा आ संस्कृति सभ लेल ओतबे महत्वपूर्ण रहतै जते ओ मैथिली भाषा आ संस्कृति लेल छै? अहाँक लेखन भाषा-संस्कृति निर्पेक्ष किअए नै भऽ सकल? ज.प्र.मं.- आन भाषाक अनुवादक प्रश्न अछि। कोनो भाषाक साहित्य सीमित जगहक लेल नै विश्वक लेल होइत अछि। जहाँ धरि भाषाक प्रश्न अछि ओ क्षेत्रीय होइत अछि। दुनियाँमे सत्ताइस सएसँ बेसी बोली भाषा मिला कऽ अछि। कोनो क्षेत्र वा कोनो भाषाक साहित्यकार खास क्षेत्रमे जन्म लैत छथि। ओइठामक माटि-पानिक सुगंध जइ रूपे ओ अनुभव करैत छथि तइ रूपे दूर दराजक नै बूझि पाबि सकैत छथि। तँए एक भाषा-सँ-दोसर भाषामे अनुवाद होइत अछि। कोनो साहित्य तखने समृद्ध होइत अछि जखन अपन क्षेत्रसँ आगू बढ़ि दुनियाँक साहित्यकेँ अपनामे समाहित करैत अछि। एक भाषाक साहित्यक अनुवाद दोसरमे मात्र अनुवादे नै ओइठामक सामाजिक, आर्थिक, वौद्धिक विश्लेषण सेहो प्रदान करैत अछि। तँए कोनो भाषाक साहित्य िसर्फ ओइ क्षेत्रक नै दुनियाँक सम्पत्ति बनैत अछि। विदेह- अहाँक भाषा तँ मैथिली अछि मुदा अहाँक लेखनपर बाहरी भाषा, संस्कृति, विचारधाराक प्रभाव पड़ल अछि कतौ-कतौ ई स्पष्ट अछि मुदा बेसी ठाम नै, एकर की कारण? ज.प्र.मं.- आेहुना देखै छिऐ जे बच्चेसँ मिथिलांचलोमे स्कूल-कओलेजमे जे पढ़ाइ होइत छैक ओइमे हिन्दी-अंग्रेजी भाषा सेहो छैक। हिन्दी तँ अपन राष्ट्रे-भाषा छी, तँए स्वाभाविक अछि। मुदा अंग्रेजी की छी। जखन अंग्रेजी साहित्य पढ़ै दी तखन अंग्रेजिये साहित्यकारक ने कथा, उपन्यास कविता नाटक सेहो पढ़ै छी। जइसँ बच्चेसँ मन-मस्तिष्कमे अंग्रेजी भाषा, संस्कृति घर बनबए लगैत अछि। आगू चलि जखन किछु लिखए चाहैत छी तँ सिनेमाक रील जकाँ ओ मस्तिष्कमे नाचए लगैत अछि। साहित्य सृजनक अवस्था किछु भिन्न अछि। जइ समए सृजनकर्ताक मस्तिष्क ओइ भावभूमिमे विचरण करए लगैत अछि तइठाम भाषा गौण पड़ि जाइत अछि। लाखो परहेज केलोपरान्त उमड़ि-घुमड़ि कोनो ने कोनो दोग-सान्हि होइत सन्हिआइये जाइत अछि। जहाँ धरि विचारधाराक प्रश्न अछि। उन्नैसमी शताब्दीमे मार्क्सवादी विचारधारा दुनियाँक कोन-कोनमे पसरि गेल। कतौ-कतौ शासनो-सत्ता बदलल। मुदा अपन जे भारतीय चिन्तनधारा रहल अछि ओहो मानव चिन्तनधारा छी। मार्क्सवादी चिन्तनधारा आ भारतीय चिन्तनधाराक पद्धतिमे किछु-किछु भिन्नता रहितो लक्ष्यमे नजदीकी संबंध अछि। दुनू मानव-कल्याणक दिशा-िनर्देश करैत अछि। जइसँ एक-दोसरमे ताल-मेल स्वाभाविक अछि। विदेह- अहाँक रचनाक प्रचार ऐ पुरस्कारक बाद भयंकर रूपसँ भेल अछि, अहाँकेँ ऐसँ केहेन अनुभव भऽ रहल अछि? ज.प्र.मं.- प्रचार कम हुअए आकि बेसी, मूल प्रश्न अछि जे हमर रचनासँ कते गोटेकेँ जीवन-दिशा भेटलनि। जे कियो अपना जिनगीमे उताड़ि लाभ उठबै छथि वएह उपलब्धि भेल। जते अधिकमे हेतनि तते अपना सृजनकेँ सार्थक बूझि संतुष्ट जरूर हएब। विदेह- अहाँक कोन रचना (कोनो खास कथा) हम पहिने पढ़ी माने अहाँक अपन कोन रचना सभसँ बेसी प्रिय अछि? ज.प्र.मं.- ऐ प्रश्नक जबाब दू ढंगसँ दऽ रहल छी- पहिल जेना-जेना रचना कएल अछि ओ अहाँक सोझा अछि। हम कहब जे ओहीक्रमे ओकरा देखियौ। दोसर- ओहन गार्जियन जकाँ रचनाकार छी जेकर एकटा बेटा आइ.ए.एस. होय आ दोसर नाङर-लुल्ह, ओ जहिना दुनूकेँ समान नजरिसँ देखैत छथि तहिना हमहूँ अपना रचनाकेँ देखैत छी तँए कोन नीक आ कोन अधला से कहब कठीन अछि। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। योगेन्द्र प्रसाद यादव, पिएचडी (भाषाविज्ञान) तथा आजीवन सदस्य प्रोफेसर तथा प्रमुख (रिटायर्ड), त्रिभुवन विश्वविद्यालय नेपाल प्रज्ञा-प्रतिष्ठान कीर्तिपुर, काठमांडु, नेपाल कमलादी, काठमांडु सँ मुन्नाजीक साक्षात्कार प्रश्न: १. अपनेकेँ मैथिलीक अनुराग सँ आह्लादित होइछी हमसब केहेन अनुभव करैछी तत्सम्बन्धी काजसबक केँ ? हमर विशेषता भाषाविज्ञानक सैद्धान्तिक, प्रकारात्मक,व्यावहारिक क्षेत्रमे अछि जाहि अनुसार हम मैथिलीपर बिशेष जोड़ दैत नेपाललगायत दक्षिण-एशियाक विभिन्न भाषासभक अध्ययन-अनुसन्धानमे अभिरूचि रखैत आएल छी । हमरा एहि तरहक कार्यसँ प्रसन्नता अछि किन्तु अखनो बहुतरास करनाइ बाँकी अछि । हमर मैथिलीक अनुरागसँ अपने आह्लादित भेलौंह ताहिसँ हमरा प्रसन्नता भेल; धन्यवाद ! २. अपने प्राज्ञी छी ओहि स्तरसँ मैथिली लेल की सब केलहुँ ? कोनो अग्रिम योजना अछि एहि प्रतिष्ठान सँ अहाँ माध्ये मैथिलीक लेल ? भाषाविज्ञानक दृष्टिकोणसँ हमर मैथिली भाषापर अध्ययन-अनुसन्धान १९७९ ई.सँ प्रारंभ भेल अछि । सर्वप्रथम अंग्रेजी आर मैथिली भाषाक fricative consonants क व्यतिरेकी विश्लेषण सम्पन्न भेल (Fricatives in Maithili and English: a contrastive analysis, Hyderabad: Central Institute of English and Foreign Languages, 1979)। तत्पश्चात् मैथिली भाषाक काल-पक्षक अध्ययन पूरा भेल (Tense-Aspect system in Maithili and English: a comparative study, Hyderabad: Central Institute of English and Foreign Languages, 1979)। हमरा विचारसँ सबसँ महत्वपूर्ण कार्य भेल हमर पि.एच.डी.क विषय । एहिमे विश्वप्रसिद्ध अमेरीकी भाषावैज्ञानिक नोम चौम्सकीद्वारा १९८१ ई.मे प्रतिपादित रूपान्तर व्याकरण सिद्धान्तक नवीनत्तम संस्करण Government-Binding (GB) Theory क आधारपर मैथिली वाक्य-संरचनाक विभिन्न पक्षक विश्लेषण करबाक प्रयास कएल गेल अछि जे Lincom Europa (Germany) सँ प्रकाशित भेल (Issues in Maithili Syntax:A GB Approach, Munchen (Germany): Lincom Europa, 1998.)। एहि कार्यमे मैथिली वाक्य-संरचनाका तथ्यक आधारपर भाषाविज्ञानक सैद्धान्तिक नियम कतेक यथार्थ अछि से देखबाक प्रयास भेल अछि । यदि यथार्थ नहि अछि तँ कोन तरहक सैद्दान्तिक परिमार्जनक आवश्यकता अछि तकर निरूपण सेहो कएल गेल अछि । दक्षिण एशियाक कोनो भाषाक आधारपर एहि भाषिक सिद्धान्तक मूल्यांकण करब ई सर्वप्रथम कार्य भेल छल आर तत्पश्चात् दक्षिण एशियाक अन्य भाषाक विश्लेषणमे सहायक सिद्ध भेल । एहि भाषावैज्ञानिक सिद्धान्तक परिपेक्ष्यमे मैथिली वाक्य-विन्यासक विभिन्न पक्षक अनुसन्धान कएल गेल तथा Contemporary issues in Nepalese linguistics (“Sequential converb in Indo-Aryan”, Kathmandu: Linguistic Society of Nepal), Indian Linguistics ("Question Movement in Maithili and binding Conditions" 42.1:1-9, 1982a ; "Maithili Sentences: a Transformational Analysis" 43.3 7-28, 1982b; " Constituent Structure and Discourse Strategies in Maithili", 58. 1-4, 89-99, 1997), Contributions to Nepalese Studies ("The Word Order Phenomenon in Maithili Simple Sentences a TG Approach" , 12.1: 1-14, 1984), The Yearbook of South Asian Languages and Linguistics ("The Complexity of Maithili Verb Agreement". In R. Singh, ed., 1999, Delhi: Sage Publishers), Tribhuvan University Journal ("Resumptive Pronoun Strategy and Island Constraints". xiii.2:77-86, 1987), Annual Review of South Asian Language and Linguistics, Nonnominative subjects ( “Nonnominative case in Maithili”. In Bhaskararao and Subbarao, eds, Amsterdam: John Benjamins, 2005), Linguistic theory and South Asian languages ( “Anaphoric relations in Maithili and linguistic theory", Amsterdam: John Benjamins, 2007) आदि राष्ट्रीय तथा अंतरराष्ट्रीय Journals एवं पुस्तकमे प्रकाशित कएल गेल । विश्व भाषासभक सन्दर्भमे मैथिली क्रिया संगति (Verb Agreement) अत्यन्त जटिल मानल जाइत अछि । एकर सूक्ष्म विश्लेषण Levinson आर Kuno क Face vs. Empathy क pragmatic theory क आधारपर कए Linguistics Journal ("Face vs. Empathy: the Social Foundation of Maithili Verb Agreement" ( co-authored with Balthasar Bickel and Walter Bisang), 1999) मे प्रकाशित कएल गेल । मैथिली व्याकरणमे उपलब्ध उदेश्य, कर्म आदि व्याकरणिक प्रकार्य (Grammatical relations/functions) क निरूपण विभिन्न भारतीय-आर्य भाषासंगे तुलननात्मक अध्ययन (comparative/typological studies) कए Lingua ("A fresh look at grammatical relations in Indo-Aryan", (with B. Bickel), 2000) मे प्रकाशित कएल गेल । हालेमे Encyclopedia of World's Languages ("The Maithili Language". Also in Paul van der Velde, ed., New Aspects of Asian Studies, Leiden: International Institute of Asian Studies. ) एवं Languages of the World (Moscow) मे मैथिली भाषापर प्रविष्टि प्रकाशित भेल अछि । नेपालमे सञ्चालित वहुभाषिक शिक्षा कार्यक्रम अंतरगत मैथिली भाषाकेँ प्राथमिक शिक्षामे कार्यन्वयन करबाक हेतु मैथिली भाषी समुदायमे सचेतना वृद्धि करबाक हेतु मैथिलीमे सामग्री निर्माण कए गोष्ठीमे छलफलक लेल प्रस्तुति कएल गेल । तहिना, मैथिली भाषाक माध्यमसँ प्राथमिक शिक्षा प्रदान करबाक हेतु एहि भाषामे स्थानीय परिवेश आर संस्कृतिक अनुकूल पाठ्यसामग्री निर्माण कएल गेल । भाषिक विविधता रहल नव नेपालक निर्माणमे मैथिली लगायत अन्य भाषासभक समुचित स्थान प्रदान कए समावेशी भाषा नीतिक प्रस्तावनाक लेल विभिन्न अध्ययन-अनुसन्धान कएल गेल । फलस्वरूप, नया संविधानमे मैथिली एकगोट वैकल्पिक सरकारी कामकाजक भाषाक रूपमे स्थापित होएबाक संभावनादिस सेहो हम प्रयासरत छी । ओना त आब मैथिली भाषामे प्राय: सम्पूर्णरूपेण देवनागरी लिपिक प्रयोग प्रचलनमे आबि गेल अछि, परञ्च मिथलाक्षर अथवा तिरहुता लिपिक ऐतिहासिक आ सास्कृतिक महत्वकेँ नहि बिसरल जा सकैत अछि । ताहि हेतु आजुक सूचना प्रविधिक युगमे कम्प्युटरमे देवनागरी संगसंगे मिथिलाक्षर लिपि सेहो उपलब्ध होबाक चाहि । एहि आवश्यकताकेँ ध्यानमे राखि हम नेपाली (देवनागरी) युनिकोडपर आधारित मिथिलाक्षर 'जानकी' फन्टक निर्माणक व्यवस्था कएलौंह । नेपालक परिवर्तित संदर्भमे United Nations Mission to Nepal (UNMIN) द्वारा २००८-९ मे विभिन्न भाषामे सञ्चालित सचेतनामूलक रेडियो कार्यक्रमक मैथिली भाषाक सल्लाहकार भ' कतिपय रेडियो सामग्री निर्माण कारबामे हमर सक्रिय योगदान रहल । वहुभाषिक राष्ट्र नेपालमे भाषिक विविधताक सम्बन्धमे विभिन्न अनुसन्धान कार्यसभ सम्पन्न भेल अछि । ताहिमे निश्चित रूपसँ नेपालमे दोसर सबसँ बेसी वक्तासभ रहल भाषा मैथिलीक विशेष महत्व देल गेल अछि । ईसभ अध्ययन-अनुसन्धानमे हमर महत्वपूर्ण योगदान रहल अछि । कतिपय राष्ट्रीय तथा अंतर्राष्ट्रीय भाषावैज्ञानिक सम्मेलनसभमे हम मैथिली वाक्य-विन्यासपर निबन्धसभ प्रस्तुत क' Journals मे प्रकाशित कएलौंह। नेपाल प्रज्ञा-प्रतिष्ठानमे प्राज्ञक रूपमे हम अनेक पुस्तकसभक प्रकाशन आर सम्पादन कएलौंह । वहुभाषिक पत्रिका सयपत्री क संस्थापक प्रधान सम्पादकक हैसियतमे अपन कार्यकालमे एकर विशेषांक प्रकाशित कएलौंह । एहि अतिरिक्त, मैथिली भाषा, साहित्य आर संस्कृतिसम्बन्धी निबन्धक संकलन क' नेपाल प्रज्ञा-प्रतिष्ठानद्वारा हमर सम्पादकत्वमे Readings in Maithili language, literature and culture (1998) नामक पुस्तकक प्रकाशन भेल । मैथिली भाषाक क्षेत्रमे समकालीन भाषावैज्ञानिक दृष्टिकोणसँ बहुतरास कार्य करबाक बाँकी रहल अछि । ताहि हेतु एहि कमीसभक किछु पूर्ति करबाक लेल भविष्यमे ईसभ कार्य करबाक हमर योजना रहल अछि: १ मैथिली व्याकरण (आधुनिक भाषावैज्ञानिक सिद्धान्तपर आधारित) २ मैथिली-नेपाली-अंग्रेजी शब्दकोष (शिक्षा आर अनुवादमे सहयोगी; ई शब्दकोषक करीब आधा तैयारी भ' चुकल अछि । ) ३ प्राथमिक शिक्षाक लेल प्रत्येक विषयक पाठ्यपुस्तकक निर्माण (निर्माणाधीन) ४ मैथिली भाषामे भाषाविज्ञानक पाठ्यपुस्तकक निर्माण ३. मैथिली-नेपाली मध्य स्तरक माहे ककर केहन वर्तमान भविष्यक आकलन करs चाहब ? नेपालक संघीय राज्यमे परिणत भेलापश्चात मैथिली निश्चित रूपसँ सरकारी कामकाज, शिक्षा आर सञ्चारक माध्यम हएत आर फलत: मैथिलीक भविष्यमे प्रगति हएत । दोसर दिस, नेपालीक अत्यधिक विकास भ' चुकल अछि आर केन्द्रीय सरकारक सरकारी कामकाजक भाषा रहत । किन्तु, ई स्पष्ट अछि जे नेपालीक एकाधिपत्य नहि रहत । ४. मैथिली भाषा आ मिथिलाक संस्कृतिक माहेँ अपने विदेशी भाषा मे लिखलौं एहि सँ मैथिली भाषा संस्कृतिक कतेक प्रसार /उपकार भ' सकल ? हमर अधिकांश कृति अंग्रेजी भाषाक माध्यममे लिखल गेल अछि । एकर प्रमुख कारण अछि जे हम सैद्धान्तिक भाषाविज्ञानक ढाँचामे मैथिली भाषाक विश्लेषण कएने छी आर विज्ञान-प्रविधिजकाँ सैद्धान्तिक भाषाविज्ञानमे प्राविधिक शब्दावली (technical vocabulary) क प्रयोग होइत अछि जे मैथिलीमे एखनधरि उपलब्ध नहि अछि । मैथिलीमे लिखनाइ असमर्थता छल । अन्य लोकनिसभकेँ सेहो अंग्रेजी भाषाक सहारा लिअ पडलन्हि । एकर अतिरिक्त, हम त्रिभुवन विश्वविद्यालयमे २००८ ई.धरि सर्वप्रथम अंग्रेजी आर तत्पश्चात् भाषाविज्ञान विभागमे प्राध्यापन करैत रहलौंह, जाहि विभागक शिक्षण अंग्रेजी भाषाक माध्यमसँ होइत अछि । एहिसँ मैथिली भाषाक प्रसार प्रचुर भेल । उदाहरणक लेल, मैथिली क्रिया मेल (Maithili verb agreement) पर लिखल हमर निबन्ध एहि विषयपर अनुसन्धान करैबला विश्वमे प्रत्येक शोधार्थी अध्ययन करैत अछि । एकर अतिरिक्त, अंग्रेजी भाषामे प्रकाशित हमर आर अन्य व्यक्तिलोकनिक कृतिसभ मैथिली भाषा-संस्कृतिक प्रसारमे बहुत योगदान कएने अछि । एहिसँ ५. मिथिलाक प्रति मैथिली मे लिखब अपना के केहेन अनुभव करै छी ? हमर किछु रचनासभ मैथिलीमे सेहो प्रकाशित भेल अछि किन्तु तुलनात्मक रूपसँ अंग्रेजीसँ कम ।मैथिली भाषामे लिखब स्वाभवत: हमरा गौरव लगैत अछि । सवानिवृत (retired) भेलापर आब हम यथाशक्य मैथिलीमे लिखबाक प्रयास करैत रहब; तइयो प्राविधिक रूपेँ किछु एहन विषयवस्तु अछि जे अंग्रेजीमे मात्रे प्रस्तुत कएल जा सकैत अछि । ६. वर्तमान मैथिली सहित्यक विदेशी भाषाक समक्ष कत' ठाढ क' सकैत छी ? अपन अनुभव कही । वर्तमान मैथिली साहित्यक समृद्ध परम्परा रहल अछि दुनू देशमे । किन्तु किछु विदेशी भाषाक समक्षमे पछाड़ि पड़ल अछि । साहित्यिक विविधताक अभाव देखल गेल अछि ; जेना मैथिलीमे वैज्ञानिक आख्यान (science fiction) नहि पाओल जाइत अछि । ७. मिथिला मैथिलीसम्बन्धी विचार दोसर भाषा माध्यमे प्रेषित करैत रहलौं । विदेशी भाषा साहित्य वा संस्कृतिक मैथिलीभाषी मध्य रखबाक कोनो योजना अछि ? विदेशी भाषा साहित्य वा संस्कृतिक किछु कृतिसभ दुर्लभ आ महत्वपूर्ण अछि; एहेन कृतिसभक मैथिलीमे अनुवादक विचार हम कएने छी । ८. मैथिली मे वर्तमान भाषिक (वा शाब्दिक) मानकता के कतेक शुद्ध मानै छी ? की एहि भाषा मे भाषिक स्तर पर कोनो सुधारक संभावना देखाइत अछि ? मैथिलीमे स्तरीय साहित्यिक कृतिसभ पर्याप्त अछि आ ईसभक लेखन शैली शुद्ध आ मानक अछि । विदेह online magazine मे प्रकाशित मैथिलीक मानक शैली आ मैथिलीमे भाषा सम्पादन पाठ्यक्रम अत्यन्त सराहनीय अछि; हम स्वयं मैथिली लिखैत काल एकर मदद लएत छी । हम एकरा अत्यन्त वैज्ञानिक आर प्राज्ञिक मानैत छी; किन्तु एहि वर्णविन्यासकेँ कतेकगोटे प्रयोगमे लबैत अछि । ई विचार करनाइ युक्तिसंगत हएत जे की ई अंग्रेजीक Received Pronunciation (RP) जकाँ 'political anachronism त नहि ? अत:, हमरा विचारमे मैथिली लेखनक स्तरीय शैलीक निर्धारण आर सुधार करबाक लेल सम्बन्धित व्यक्तिलोकनि आर संस्थासभक सहभागितामे एहि प्रस्तावपर विचार-विमर्श होमय आर एकगोट समावेशी शैलीक निर्माण कएल जाय । ९. ठाम-ठीम मैथिली रचनाकारक अगडी-पिछडी दुनू समूह वा पाँतिक शब्द विषमता के बहस क' दुनूके मानक हेबाक वात राखल जाइए । अहाँ एहि सँ कतेक सहमति असहमति छी ? एहि विषयमे हमर दूगोट मत अछि: १ साहित्यिक लेखनमे दुनू समूहक अपन-अपन भिन्नता राखल जा सकैत अछि, किएक त कथा, उपन्यास, कविता आदि साहित्यिक विधामे सामाजिक परिवेश आर पात्रक अनुसार भाषिक भिन्नता हएब स्वाभाविक अछि । २ औपचारिक लेखन (जेना कानून, सरकारी दस्तावेज, नियम, साहित्यिक समालोचना आदि)मे भाषिक एकरूपता अपरिहार्य अछि । एहेन एकरूपता मानक शब्दकोष, व्याकरण, शिक्षामे मैथिली भाषाक प्रयोग आदिसँ प्राप्त कएल जा सकैत अछि । विश्वक कतिपय भाषामे एहेन स्थिति देखल गेल अछि । १०वर्तमान मे मैथिली मध्य पिछडी जातिक वहुसंख्यक सक्रिय रचनाकारक रूपे प्रवेश के मैथिली सहित्यक भविष्य के कत' देखै छी ? एकरा हम सकारात्मक रूपमे लैत छी । एहिसँ विभिन्न तरहक सामजिक परिवेशक अनुभव आर भावनाकेँ समेटि क' मैथिली समृद्ध आर समावेशी साहित्यिक दिशादिस अग्रसर हएत से हमरा विश्वास अछि । दोसर वात जे एहि तरहक प्रयाससँ मैथिली भाषाकेँ सव समूहसभ अंगीकार (own) करत । एहि ठाम हम नेपालक एकगोट घटना उद्धरण कर' चाहैत छी । सम्प्रति नेपालक मैथिली भाषी क्षेत्रमे किछु समुदायसभद्वारा मैथिलीकेँ अस्वीकार (disown) क' अन्य भाषाकेँ अपन मातृभाषाकेँ रूपमे स्वीकार करबाक स्थिति श्रृजित भ' रहल अछि । हरेक भाषाजकाँ मैथिली भाषामे सेहो भिन्नता रहब स्वाभाविक अछि; ताहि हेतु सब तरहक भिन्नताकेँ स्वीकार क' एक समग्र मैथिलीक अस्तित्वक स्थापना करी । ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। जगदानन्द झा 'मनु' चोनहा (धारावाहिक मैथिली कथा ) चोनहा एक गोट एहन स्वाभिमानी किशोरक मर्म कथा,जए अपन माय-बाप कए कनिक लापरवाही कए कारण घोर अन्हार एवं अपार दर्दक दुनियाँ मे चली गेल | मुदा अपन सहाश व् कुषार्ग वुधि कए द्वारा ओ ओहि घोर अन्हार एवं दर्दक छाया सँ बाहर निकैल,एक सुखद एवं प्रकाशमान जिवन मे चरण बधेलक | पहिल भाग मे अपनेक लोकन्हि पढलौंह - कोना मासूम किशोर संजय कए असहाय माथक पीरा सँ नित्य सामना करय परैक | सब कए सब होएतो ओ निदान्त एसगर, कियोक ओकर इलाज अथवा कष्ट निवारण हेतु प्रयास नहि कएलथि | गाम सँ दिल्ली आएल मुदा सब कए सब ओनाहि, दिल्लीक गर्मी सँ पीरा मे आओर वृद्धि, अपार कष्ट, मुदा सब किछ असगर सहैक लेल बाध्य | अंत मे ओकरा स्वं एही बताक ज्ञान भेलैक जए ओकर आँखि बहुत खराप छैक परन्च ओकर सहायता करै कए जगह ओकरा कोना 'चोनहा' नाम सँ अलंकृत कएल गेलैक | आब आँगा ---- ****************************************************************************************************************************************************** भाग २ संजय कए मोन सैद्खन एहि सोच मे लागल रहै जए आब एकर कि उपाय हुवे | एक त माथक दर्द पाहिले छह-सात वर्ष सँ हरान केने,ताहि पर सँ इ आँखिक कमजोरी | चुकी आब ओकरा अपन कमजोर आँखिक ज्ञान भ गेलैक ताहि कारण सैद्खन ओकर मोन ओहि चिंता मे लागल रहैक | आब ओ कि कय सकैए, गाम सँ दिल्ली आएल तेरह-चौदह वर्षक बच्चा | नहि किछ बुझल नहि किछ ज्ञान, नहि कोनो अस्पताल देखल, नहि कोनो डाक्टरक पत्ता | माय-बाबु सँ साफ-साफ एहि बारे मे बात करे सेहो नहि, ओकर मोन मे धाख व् डर कए मिश्रित भाव एवं कनि कोनो कोन मे स्वाभिमान कए भावना सेहो | एहि गुण-धुन, गुण-धुन मे तिन महिना आओर बीत गेलै, कोनो उपचार नहि | स्कुल मे त्रिमासिक परीक्षा भेलैक | परीक्षा-परिणाम ओकर स्तर सँ निम्न रहलै, तैयो ओकर माय-बाबुक कोनो प्रतिक्रिया नहि, जए सब वर्ग मे पहिल-दोसर आबि बला बच्चा कए एहि परीक्षा मे अनुरूप परिणाम किएक नहि एलै | उल्टा दू-चाइर टा बात आओर सुनय परलैक | एतेक कम नम्बर किएक एलै तकर जैर ताकै बला कियोक नहि | आब तs ओकर हालत इ भs गेलैक जए ओ पढय हेतु बैसअ मे कोताहि करय लगलै, किएक तs आँखि एतेक कमजोर भs गेलै जए ओकरा लेल किताब पढनाई असम्भब भेल जाई | त्रिमासिक परीक्षाक सेहो दु महिना भs गेलै | अकस्मात कतौ सँ संजय कए, रोटरी क्लब द्वारा संचालित आँखिक अस्पतालक विज्ञापन कए पर्ची हाथ लगलै | ताहि मे सूचित कएल गेल रहै जए रोटरी क्लब, तिन ब्लोक त्रिलोक पूरी मे निः शुल्क आँखिक अस्पताल खोललक | संजय कए इ पढि बड मोन खुस भेलै | ओकर अन्हार मोन मे इजोतक एकटा आशा भेटलै | सब सँ बेसी नीक बात जए ओ अस्पताल ओकर स्कुल कए लगे आ निः शुल्क रहै | अगिले दिन संजय, स्कुल कए छुट्टी भेला बाद असगरे पुछैत-पुछैत आँखिक अस्पताल,तिन ब्लोक त्रिलोक पूरी पहुंच गेल | ओहिठाम ओकरा ज्ञात भेलै जए नव मारीच बास्ते पुर्जा भोरक आठ सँ एगारह बजे तक बनैत छैक | मुदा आई तs एक बाजि गेल रहै | काइल्ह भोरे आबैक निश्चय मोने-मोन करैत घर चलि आएल | अगिला दिन भोरे संजय नहा-सुना कs स्कुल कए लेल बिदा भेल अबश्य मुदा स्कुल गेल नहि, किताबक बस्ता दु ब्लोक त्रिलोक पूरी मे अपन काका कए घर राखि कs आँखिक अस्पताल तिन ब्लोक आबि गेल | किछु महिना पाहिले तक संजयो सब दु ब्लोक त्रिलोके पूरी मे रहै छल मुदा आब गणेश नगर मे आबि गेल, जए किछु एक-डेढ़ किलोमीटर दूर छैक | अस्पताल आबि, नव पुर्जाक लाइन मे लागि गेल, लाइन मे लागला वाद ओकरा ज्ञात भेलै जे पुर्जा बनेबाक बास्ते दु रुपया देबय परै छै | जे कि ओकरा लग नहि रहै | ओकर मोन मे किछ दुखो भेलै | स्वं कए सम्भालैत, दोसर दिन ऐबक निश्चय कय ओ ओहिठाम सँ बिदा भय गेल | काका ओहिठाम सँ स्कुल बस्ता लैत घर आबि गेल | संजय कए स्कुल जाईकाल टिफिन बास्ते जे कहियो कs चाईर-आठ आना पाई घर सँ भेटै,( ई बात १९८५-८६ कए छै ताहि समाय मे चाईर-आठ आना कए किछो मोल रहै) ओ पाई कए संजय खए नहि,बचाकय राखय लागल, एक सप्ताह बाद ओकरा लग दु रुपया जमा भय गेलै | ठिक आठम दिन फेर ओ रोट्री क्लब द्वारा संचालित आँखिक अस्पताल पहिले जकाँ भोरे-भोरे किताब-कांपी काका कए घर राखि कs पहुंचल | पांति मे लागि, दु रुपया देला बाद नव पुर्जा बनेलक | पुर्जा बनेला बाद डॉक्टरक कक्ष मे पहुँचल | डॉक्टर-साब एकटा तेरह-चौदह वर्षक बच्चा कए असगर देखते पूछलखिन्ह- "संगे कए अछि " संजय चुप डाक्टरसाब - "माय-बाबु किनको संगे नेने आउ |" आब संजय कए बड्ड मुस्किल भेलै, मुदा ओ अपना पर काबु रखैत डॉक्टरसाब कए तत्काल उत्तर देलकैन्ह - "बाबूजी ड्युटी गेल छथि आ माय गाम मे छथि |" हलाँकि ओ इ बात झुठ बाजल,जए माय गाम मे छथि मुदा डॉक्टर साब ओकर उत्तर मे सत्य देखैत कहलखिन्ह - "अपन बच्चा लेल अहाँक बाबुजी एक दिनक छुट्टी नै कय सकै छथि |" "नहि डॉक्टर साब, हुनक नव नोकरी छैन्ह, छुट्टी क़रथिन्ह त नोकरी छुटि जेतैन |" - इहो बात संजय झूठे बाजल, जखन कि ओकर बाबुजी महिना मे पंद्रह दिन छुट्टीए पर रहैत छलखिन्ह परन्च डॉक्टर साब कए एक गोट मासुमक मुंह सँ इ बात सुनि बिश्बास आ किछु सहानभूति सेहो भय गेलैन्ह | "कोनो बात नहि, आगु घुसैक कs बैसु |" इ कहैत डॉक्टर साब टोर्च वा अन्य-अन्य उपकरण सँ निक जकाँ आँखिक जाँच कएला बाद बजलाह- ''आँखि बड्ड कमजोर अछि,तिन दिन आबए परत, दु दिन आँखि मे दबाई परत आ तेसर दिन चश्मा कए नम्बर भेटत |" इ कहैत डॉक्टर साब ओकर पुर्जा पर किछ-किछ लिखैत, पुर्जा पेपर वेट कए निचा दबा, पनः कहलखिन्ह- "जाउ बाहर बैस रहु, सिस्टर आँखि मे दबाई देती, दबाई लेला बाद करीब एक घंटा एहिठाम बैसब, सिस्टर कए कहला बाद घर जाएब हाँ! काईल्ह परसु दु दिन आओर अबश्य आएब |" "ठिक छै "- कहैत संजय उठि बाहर आबि बेंच पर बैस रहल | किछु छन बाद सिस्टर संजय कए आँखि मे ड्रॉप दैत- "आँखि मुनि बैसल रहब" ओकरा तs आँखि मे दबाई परिते, आँखि एतेक दुखए लगलै जेकर हिसाब नहि, मुदा सहास केने चुपचाप आँखि मुन्ने बैसल रहल | लेकिन पंद्रह-बीस मिनट कए बाद बुझेलै जए माथ एकदम शांत स्थिर भs गेल होय | किछु समाय बाद सिस्टर आबि एक बेर फेर सँ संजय कए आँखिक जाँच कएलाबाद ओकर दुनु आँखि मे दु-दु बूंद दबाई दैत पहिले जकाँ आँखि मुनि कय बैसअ कए निर्देश दैत चैल गएलि | एहि बेर पाहिले सँ किछु कम आँखि दुखेलै | करीब आधा घंटा बाद सिस्टर आबि संजय कए आँखिक जाँच करैत कहलखिन्ह- "ठिक छैक, आब जाउ काईल्ह भोरे आठ बजे आएब |" "अच्छा !"- कहैत संजय उठि बिदा भय गेल, पुनः अपन काका ओइठाम सँ बस्ता लेलक आ अपन घर आबि गेल | अगिला दिन संजय फेर सँ अस्पताल गेल, डाक्टर साब फेर सँ ओकर आँखिक जाँच कएलखिन्ह आ पाहिले दिन जकाँ सिस्टर सँ आँखि मे दबाई दिया कs आबि गेल | तेसर दिन अस्पताल मे डॉक्टर साब संजय कए आँखिक भिन्न-भिन्न तरह कए लेंश सँ जाँच कएला बाद चश्माक नम्बर बना एकटा पुर्जा पर लिख पुर्जा ओकर हाथ मे दैत कहलखिन्ह - "इ अहाँक चश्माक नम्बर अछि, माइनस तिन जए की एहि उर्म मे बहुत अधिक अछि आ अहाँक आँखिक खराबिक गति एखन बहुत अधिक अछि | ताहि हेतु आइये जा कय चश्मा बनबा लेब, आ सैदखन पहिरब | आ हाँ, एक बात आओर जए छ महिना बाद आबि फेर सँ आँखिक जाँच करबा लेब, जाहि सँ इ ज्ञात चलत की आँखिक खराबिक गति कम भेलैक स्थिर भेलैक वा बढी रहल अछि |" "अच्छा जाई छी " - अपन दुनु हाथ जोरि संजय डॉक्टर साब सँ आज्ञा लेलक | "ठिक छै जाउ "- डॉक्टर साब | संजय घर चलि आएल, मुदा ओकर मोन मे एकटा नब द्वन्द मचय लगलैक | चश्मा ! -"चश्मा कतए बनतै? कतय चश्मा कए दुकान छैक? कम सँ कम डेढ़ -दु सय रुपैया मे चश्मा बनत, इ डेढ-दु सय रुपैया कतए सँ आएत?" आओर आन-आन प्रश्न सब ओकर मस्तिश्य मे एक कए बाद एक -एक समुद्र कए हिलकोर जेकाँ आबै जाई | "की करू ? कोना करू ? की बबुजी कए कहिदियैन, जए चश्मा कए नम्बर अन्लौंहें, चश्म बनबा दिय, नहि-नहि कोना कहबनि ? की कहबनि ? नहि कहबनि त चश्मा कतए सँ आएत ? चश्मा किनैलेल रुपैया कतए सँ आएत ? की करु नहि करू ?" संजय किछु निश्चय नहि कय सकल | एहि सब बिषय मे सोचैत -सोचैत ओकर आँखि लागि गेलै ओ सुइत रहल | करीब तिन बजए बेरुपहर ओकर निन्द खुजलै | उठल, मुंह-हाथ धो भोजन केलक परन्च ओकर मष्टिश्य मे चश्माक द्वन्द मचले रहै | ओ कतौ किच्छो करए मुदा ओकर दिमाग चश्मेक बारे मे सोचैत रहै | गुनधुन-गुनधुन करैत अंत मे ओ एकगोट योजना कए अंतर्गत निश्चय केलक जए साँझुपहर बबुजी कए कहि देतनि, आ कोनो दोसर उपाई ओकरा नहि भेटलैक | आ शायद इ बहुत उचित उपाई रहै | साँझुपहर ओकर बबुजी नोकरी सँ एलखिन्ह | गर्मीक महिना रहै, हाथ-पएड धोला बाद, बाहर अँगना मे खाट पर बैसला | जलपान इत्यादि कएला बाद इम्हर-उम्हर कए गप्प-सप्प होबए लगलैक | संजय सेहो जेबी मे चश्माक नम्बर बला पुर्जा लेने हुनके लग जा बैस रहल | संजय कए मोन आबो गुनधुन-गुनधुन करै, कहियौन्ह की नहि | अंत मे ओ हाँ कए निर्णय केलक आ अपन सम्पूर्ण हिम्मत कए जमा करैत, जेबी सँ पुर्जा निकालि कs बाबुजी कए दय देलकैन्ह | "की छै ?" - हलाँकि ओकर बाबुजी पढ़ल-लिखल छथिन्ह,पुर्जा पर सबटा लिखल रहै, अस्पतालक नाम-पत्ता ,मारीच कए नाम उम्र,डॉक्टरक नाम, चश्माक नम्बर वा जरी करै कए तारीख,मुदा तैयो बाबुजी पुर्जा कए पढैत पुछलखिन्ह | "चश्मा कए नम्बर |" - संजय अपन माथ कए निचा झुकोने डराएत धीरे सँ बाजल | "ककर"- बाबुजी पुर्जा पढैत बात कए अन्ठाबैत पुछलखिन्ह | "हमर" - संजय अपन सेफ कए गरदैन सँ निचा घोतैत आगु बाजल -"आई स्कुल मे डॉक्टर आएल रहैक ओ सब बच्चा कए आँखिक जाँच केलकै, हमरो जाँच केलक, हमर आँखि खराप छै कहलक चश्मा पहिरअ परतै |" हलाँ की संजय इ सब बात झुठ बाजल, मुदा ओ पिता छथि , पढ़ल -लिखल छथि, डोक्टरक पुर्जा हुनक हाथ मे छनि, ओ पढि सकै छलाह जए इ पुर्जा रोटरी क्लब द्वारा संचालित आँखिक अस्पताल त्रिलोकपूरी तिन ब्लोक कए छै | मुदा कखन, जाहिखन अपन बच्चा वा बच्चाक स्वास्थ्यक प्रति कोनो रूचि रहितैन | हुनका जेना संजय कए बात पर बिश्बास भय गेलैन्ह | बिश्बासो भएलैन्ह त कम सँ कम इ तs ज्ञात भएलैन्ह जए हुनक बच्चा कए आँखि खराप छैन | आबो कोनो नीक डॉक्टर सँ कतौ अपने सँ देखा दियैक वा डॉक्टर देखने छै तs चश्मा बनबा दियै | कनि मोन मे किछो दोसर रंग हेबाक चाहि | एकदम सँ बैसल-बैसायल किनको इ ज्ञात होइन जए हुनक बच्चाक आँखि खराप छै, एकर प्रमाणिकता कए एकटा विशेषज्ञ डॉक्टरक लिखल पुर्जा हुनक हाथ मे छनि | एहि तरहक पित्ता कए मोन मे जरुर किछो भाव हेतैन्ह - आश्चर्य कए, विश्मय कए, दुख कए, तत्पर्यता कए, मुदा नहि, संजय कए बाबुजी कए ऊपर कोनो तरहक प्रभाब नहि , धनसन | हँसैत संजय सँ कहै छथिन्ह - "डॉक्टर सब एनाहीं कहैत छै, एहि उम्र मे कतौह आँखि खराप होई |" तै पर संजयक माय कहितो छथिन्ह -"हाँ यौ, एकर आँखि चोनाह लगै छै |" बाबुजी- "अच्छा देखियौ, इम्हर आ " एकर बाद अपन एकटा आँगुर देखबैत -"इ कएटा आँगुर छै " संजय-"एकटा " ऐ बेर दूटा आँगुर देखा कs बाबुजी -"इ कएटा आँगुर छै " "दूटा"- संजय धीरे सँ बाजल | "सब ठिक छै, अच्छा कोनो बात नहि,चश्मों बनबा देबौ "- कहैत बाबुजी पुर्जा जेबी मे राखि लेला तकर बाद इम्हर-उम्हर कए गप्प -सप्प होइत बात ख़त्म | बात एलै-गेलै समय बितैत रहलै, संजय कए स्कूलक छमाही परीक्षा सेहो ख़त्म भय गेलै, ओकर आँखिक कमजोरिक गति लगातार बढ़ैत रहलै, चश्मा कए नम्बरों अनला महिना सँ उपर भय गेलै मुदा अखन तक ओकर चश्मा नहि बनलै | संजय कए छोटका मामा सेहो गणेश नगर मे संजय कए घर सँ किछुए दूर पर रहै छलखिन्ह | हुनका किछु समान कए खरीदारीक बास्ते सदर बाज़ार जाई कए रहैन | समान किछु बेसी लेबय कए रहैन, ताहि हेतु ओ संजय कए सेहो अपन संगे टेल्हू मे संग कय लेलखिन्ह | मामा-भगिना दुनु गणेश नगर सँ लाल किला बला बस पकैर, लाल किला कए बस स्टेंड पर उतैर गेला | ओहि ठाम सँ पएरे सदर बाज़ार हेतु चांदनी चौक - खाडिबाबली कए रस्ते बिदा भs गेला | लाल किला कए दिस सँ चांदनी चौक रोड पर किछुए दुकान पार कएला बाद दाहिना हाथ कs एकटा सिनेमा घर परलै आ ओकर तेसरे दुकान, चश्मा कए दुकान रहै | संजय कए नजैर ओहि दुकान पर पैर गेलै | ओ ओहि दुकान कए देख लेलकै, देख की लेलकै ओकर नक्शा अपन मानस-पटल पर उताइर लेलक | चलैत-चलैत संजय कए मस्तिश्य मे एकटा नव विचारक मंथन होबय लगलै - "चश्मा दुकान तs देख लेलौंह,एहिठाम हम असगरो आबि सकै छी, आबि कs चश्मा बनबा सकै छी | रैह गेलै पाईयक बात, हम अपने पाई जमा करब, तिन महिना मे होएतै, चारि महिना मे होएतै, कहुना कs दु सय रुपैया जमा करब | तकरा बाद एहिठाम आबि कs चश्मा बनबालेब | कि जखन बाबुजी नै बनबा देला तs अपनों तs बनाबी | कियो कान-बात नै दैछथि, काल्हि आन्हर भय जाएब तs - - - नहि-नहि हम जमा करब, दु सय रुपैया जमा करब, अबश्य जमा करब |" चलैत-चलैत अपने भीतर हराएल संजय, कखन मामा संगे-संगे सदर बाज़ार पहुँच गेल ओ किछु नहि बुझलक, आ नहि ओकरा कोनो रस्ता यादि रहलै, यादि रहलै त मात्र अपन घर सँ चश्मा दुकान तक कए रस्ता | आब की छलैक, आब तs संजय कए एक गोट नव राह भेट गेलै | जतय कतौ कोनो बाबत,दस -बीस पाई,चारि-आठ आना, एक-दु रुपैया,जए जतय हाथ आबै,एकटा डिब्बा मे जमा केने गेल सब सँ नुका कय छुपा कय माय-बाबु सब सँ | भेटै कतय ? दोसरा तेसरा दिन पर घरे सँ स्कुल कए टिफिन बास्ते चारि-आठ आना पाई | किएक तs ओकर भोरका स्कुल रहैक आ माय ओतेक भोरे किछु बना कs टिफिन बास्ते देथिन से नहि पार लगैन ताहि हेतु दोसरा-तेसरा दिन पर नगदे चारि-आठ आना वा एक-दु रुपैया जए जहिया भेलै ओकरा भेट जाई | मुदा संजय ओई पाई कए खाई मे खर्च नहि करए | ओ मासूम बच्चा अपन भबिष्य हेतु, अपन वर्तमानक मोन कए मारि सैह कs रहि जए | कखनो कs कोनो पित्तियो आ मामा लोकिन सेहो किछु पाई-कौरी धिया-पुता कए कोनो बिशेष अबसर पर दय देथिन्ह, मुदा संजय ओई पाई कए खर्च नहि कय कs चश्मा हेतु राखि लए | पाबैन-तिहार जेना दशहरा, रामलीला देखै लेल, मेला घुमै लेल, दिवालीक फत्तक्का किनैक लेल, आन-आन पाबैन-तिहार कए अबसर पर संजय कए जए पाई घर सँ भेटै; सबटा अपन मोन कए मारि चश्मा कए लेल राखि लए | - - - - - - ----------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------- आँगाक भाग -अगिला अंक मे | पढनाई नहि विसरि, ओकर आँखिक कमजोरिक कि भेलै ? की ओ अपन चश्माक पाई जमा कय पेलक ? की ओकर चश्मा बैन पेलैक ? एक मांसुम किशोर, एक अनचिन्हार शहर मे कोना,सफलता पेलक, व असफलताक गुमनामी कए अन्हार मे हरा गेल ? ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। खुशबू झा हमरा नजरिमे सुजीतक रिपोर्टर डायरी
संस्मरणक किताब हम कएटा पढने छलहुँ मुदा रिपोर्टर डायरी पढयके हमर पहिल अनुभव रहल । रिपोर्टर डायरीमे कीसभ हेतैक एकर उत्सुक्ता छल ।एकरे कारण जखन हमरा रिपोर्टर डायरी भेटल हम दु बैसानमे पढि लेलहुँ । पत्रकार सुजीतकुमार झाक पहिल कृती चिडै हम पढने छलहुँ सँगहि हुनक एभि न्यूज टिभी, रेडियो मिथिला आ मिथिला डटकमक रिपोर्टिङ्ग सँ सेहो परिचित छी । मुदा जे चीज रिपोर्टर डायरीमे भेटल एहि सँ पहिने हमरा हुनकामे देखबामे नहि आएल छल । ४७ टा डायरी अर्थात लेखमे कोन बढियाँ वा कमजोर छुटियाब कठिन अछि । सभ एक पर एक । फेर एहिमे सभ चीज भेटैत अछि । संस्मरण, रिपोर्टाज आ अहुँ सँ बेसी सभ स्टोरीके हम कथे कहैत छीयैक । ला जबाब पिक्चराईज अछि । रिपोर्टर डायरी पढलाक बाद लोक जनकपुर बुझि सकैत अछि । फेर पत्रकारक नजरिमे केहन जनकपुर अछि एकर स्पष्ट झलक एहिमे भेटैत अछि । फेर बहुत रास समस्या सभ सेहो उठल अछि । जेना रस नहि गुल्लाक रेकर्डमे बरियाती आ बेटी बलाक अवस्थाक बहुत बढियाँ जाका चित्रण भेल अछि । तहिना साज विहीन स्वरसम्राट बेचनमे बेचनक अवस्था आ बेचनक मित्र उदित नारायण झा बिचक विकासक्रम बढियाँ सँ कम शब्दमे कहल गेल अछि । बिबाह कार्डमे मैथिली भाषा आ ओ तऽ मैथिली बिटक समाचारदाता छला ओहो लाजबाब अछि । जनकपुरक बिबाह कार्डसभमे कोना मैथिली लिखायके क्रम शुरु भेल तहिना रहिकाक चुनचुन मिश्रक मैथिली प्रतिक समर्पण सेहो गजब सँ लिखाएल अछि । चुनावक नाम पर पैसाक बहस नाम सँ चुनावमे भ्रष्टाचार कोन रुप सँ बढल अछि अहि सँ बढियाँ चित्रण नहि भऽ सकैत अछि । एकटा पत्रकार कोन अवस्था सँ अपन पत्रकारीताक क्रममे गुजरैत अछि तेकर गजब एहिठाम बानगी भेटैत अछि । घडीक सुइके केउ पकरि लेने छल ताहिमे महिला पत्रकार उमा सिहंक हत्या दिनक लेख अछि । एहिमे लेखकके रेडियोमे कार्यक्रम चलाबय जाइतकाल एकटा टेलिफोन अबैत अछि पत्रकार उमासिहंके आक्रमण भेलैक एहनमे ओ उमा सिहंके सहयोग करय जाइथ वा कार्यक्रम चलाबय ओहि समयक द्वन्द बेजोर आएल अछि । तहिना महासंघक चुनाव आ सुन्धराक आनन्दमे नेपालमे पत्रकारितामे पैसाक खेल कतेक बढिगेल अछि तेकर सुन्दर उदाहरण प्रस्तुत कएलगेल अछि । नेपालक पत्रकारितामे कतेक रास बिकृती आएल अछि तेकरा रखैत एकटा निकास देबाक सेहो प्रयास कएलगेल अछि । सरल भाषामे लिखल सुजीतक रिपोर्टर डायरी पढयमे आम पाठकके बहुत आसान हैत । फेर किताबक प्रिन्टीङ्ग तऽ एहन अछि जे एक बेर देखिते रही लगैत अछि । किताबक प्रकाशक आफन्त नेपाल अहिके लेल धन्यबादक पात्र छथि । सुजीत जी किताबमे लिखने छथि पहिल पुस्तक जँका अर्थात चिडै कथासंग्रह जँका एकरा स्निेह भेटतैक आशा रखने छथि । पढलाक बाद हम ई कहि सकैत छी स्नेहके आबश्यकता नहि छैक । नीक चीज छैक लोक पसिन कऽ रहल अछि । हमरा तऽ बहुत बेजोड लागल । मैथिली संसारमे एहन रचनासभक आबश्यकता अछि । खाली कथे कबिता नहि सभ तरहक चीज आबक चाही । नयाँ चीज पाठकके नयाँ आनन्द दैत अछि । ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। हम पुछैत छी: विहनि कथाकार आ विदेह-ई-पत्रिकाक सहायक सम्पादक श्री मुन्नाजीक श्री रवीन्द्र कुमार दास (युवा चित्रकार आ दिल्लीक मैथिली-भोजपुरी अकादमीमे मैथिली परामर्शदातृ समितिक सदस्य) सँ गपशप मुन्नाजी: कलाक दुनियाँमे प्रवेश कोना भेल। एकर आधार की छल प्रवेशक पछाति ई दुनियाँ की अनुभूति देलक। रवीन्द्र कुमार दास: हम नेनेसँ कलामे रुचि लैत रही, पहिने देबालपर आ तकर बाद कागचपर भगवान आ स्वतंत्रता-सेनानीक चित्र बनबैत रही। हमर बाबा अमीन छलाह आ नक्शा बनबैत छलाह तेँ ड्रॉइंग बोर्ड आ रंगक प्लेट हम नेनेमे देखने रही। पटना आर्ट कॉलेजक पाछाँमे बाबूजी मन्दिरी मोहल्लामे डेरा लेने छलाह। फुटबॉल खेलेबाक लेल आर्ट कॉलेजक सोझाँक मैदानमे जाइत रही तँ कलाकार लोकनिक काज आ प्रदर्शनी देखी। बाबूजीक बड्ड मान मनौअल केलाक बाद आर्ट कॉलेजमे एडमिशन लेबाक अनुमति भेटल। तइ दिनसँ कलाक दुनियाँमे प्रवेश भेल आ आइयो कलाक सेवा कऽ रहल छी। कलाकारकेँ पाइ भेटै वा नै सम्मान जरूर भेटै छै। मुन्नाजी: साहित्य आ चित्रकलामे कोनो सम्बन्ध स्थापित होइछ? एकर एकरूपताकेँ अहाँ कोन तरहेँ देखै छी? रवीन्द्र कुमार दास: साहित्य आ चित्रकला दुनू एक मायक बेटी छथि। साहित्ये टा नै कलाक जतेक विधा छै, सभटा एक दोसरासँ जुड़ल अछि। जेना फिल्ममे संगीत, नृत्य, साहित्य, चित्रकला आ अभिनय सभ जुड़ल अछि। तहिना चित्रकारोकेँ सभ विषयक अध्ययन-मनन करए पड़ैत छन्हि। कवि चित्र आ मूर्ति-शिल्पकेँ देखि कऽ कविता लिखैत छथि। जेना प्रयाग शुक्ल, सर्वेश्वर दयाल सक्सेना, हेमन्त कुकरेती आ ऑक्टोवियो पाज कतेक कविता लिखने छथि। मुन्नाजी: अहाँक नजरिये साहित्यकार आ चित्रकार, दुनूमे के बेशी सूक्ष्मदर्शी होइछ आ कोना? की एकटा चित्रकार ओइ सभ बिन्दुकेँ छू सकैत अछि जकरा कि साहित्यकार उठबैत रहल अछि। रवीन्द्र कुमार दास: साहित्यकार आ चित्रकार दुनू सूक्ष्मदर्शी होइत छथि मुदा के कतेक सूक्ष्मदर्शी छथि से से हुनकर ज्ञान, तर्कशक्ति आ काल्पनिकतापर निर्भर करैछ। आम आदमीकेँ आधुनिक कलाक भाषा दुरूह लगैत छै कारण सभ कलाक अपन-अपन व्याकरण होइत छै। ओकर आनन्द लेबाक लेल ओकर व्याकरण बुझनाइ जरूरी छै। साहित्य आम आदमीक भाषामे लिखल जाइत अछि तेँ बेशी असरिकारक होइत अछि। चित्रकार कोनो विषयक चित्रणमे कलाक आर बहुत रास तत्व जकरा शिल्प कहैत छी, सेहो शामिल करैत अछि। मुन्नाजी: जेना साहित्यकारक कोनो विशेष पहिचान नै बनि पबै छै (किछु अपवादकेँ छोड़ि कऽ), ओ साहित्यकेँ अर्थोपार्जनक आधार नै बना पबै अछि, तइ सन्दर्भमे चित्रकारक की अस्तित्व छै? रवीन्द्र कुमार दास: साहित्यकार पहिचान तँ बनैत छनि मुदा सेलेब्रिटी जेकाँ सम्मान नै भेटैत छनि। चित्रकार आइ-काल्हि पेज-थ्री पर पसरल रहैत छथि। ओना कोनो साहित्यकार आ कलाकार दर्शक, पाठक आ आलोचकक स्वीकृतिक बादे सम्मान पबैत छथि। अर्थोपार्जन सेहो तहीपर आधारित छै। साहित्यकारक आमदनी प्रकाशकक रॉयल्टीपर निर्भर करैत छनि। चित्रकारक चित्रक दाम बढ़ैत रहैत छै। एक शैलीक कोनो चित्रक नीलामीमे गेलाक बाद ओइ शैलीक सभ चित्र बिका जाइत छै। एक चित्र पचास बेर बिका सकैत अछि। कलाकृतिक मूल्य ग्राहकक कलाज्ञान आ कलाकृतिक ऊपर कएल गेल खर्चपर निर्भर करैत छै। मुन्नाजी: बहुत रास कलाकार हुनर रहितो कला माध्यमे अपन दशा-दिशा नै तय कऽ पौलक, की कहब अहाँ? रवीन्द्र कुमार दास: जेना दू लाइनक कविताकेँ तुकबन्दी कऽ देलासँ बहुत लोक अपनाकेँ कवि बूझऽ लगैत छथि तहिना चित्र बनेनाइ मात्र सिखलासँ चित्रकार नै भऽ जाइत छथि। अपन रचनाक गुणवत्ताक आ समकालीनताक सदिखन समीक्षा करऽ पड़ैत छै। तेँ जिनकर रचनामे दम होइत छनि तिनका दशा-दिशा भेटि जाइत छनि। मुन्नाजी: फाइन आर्ट आ मिथिला आर्ट (मधुबनी पेण्टिंग) मध्य कतेक समता आ विषमता अछि? फाइन आर्टक सोझाँ मिथिला आर्ट कतऽ अछि? रवीन्द्र कुमार दास: फाइन आर्ट आ मिथिला आर्टक स्तर तँ समान छै। फाइन आर्टकेँ आधुनिक कला आ मिथिला आर्टकेँ लोककला कहलासँ ई आसानीसँ बूझल जा सकैत छै। दुनू कलाक अपन-अपन इतिहास आ विकास यात्रा छै। मिथिला आर्ट सिर्फ मिथिलाक कलाकार करैत छथि मुदा आधुनिक कला सम्पूर्ण विश्वक कलाकार रचैत छथि। बिहारक परिप्रेक्ष्यमे जँ देखल जाए तँ मिथिला कलामे बेसी उपलब्धि भेटल छै। अखन धरि १५ टा कलाकारकेँ राष्ट्रीय पुरस्कार आ चारिटा केँ पद्मश्री भेटल छनि मुदा आधुनिक कलामे सात-आठटा कलाकारकेँ तँ राष्ट्रीय पुरस्कार भेटल छनि मुदा पद्मश्री एको गोटेकेँ नै भेटल छन्हि। गंगा देवी, सीता देवी, जगदम्बा देवी आ महासुन्दरी देवीक नाम जेना अन्तर्राष्ट्रीय स्तरपर लेल जाइत छन्हि तहिना सुबोध गुप्ताक अन्तर्राष्ट्रीय स्तरपर पहिचान छन्हि। मुन्नाजी:अहाँ मैथिली-भोजपुरा अकादमीक सदस्य हेबाक नाते साहित्यक तँ सेवा कऽ रहल छी, की कलाकार लेल सेहो कोनो योजना अछि? रवीन्द्र कुमार दास: हम कलाकार छी तँए कला आ कलाकारक सेवामे लागल रहैत छी। अकादेमीक माध्यमसँ जँ कलाक विकास होइ तँ खुशीक बात हएत। हिन्दी अकादेमी नृत्य नाटक करबैत छल तहिना इहो अकादेमी चित्र प्रदर्शनी आ कलापर सेमीनार करौलक। बिहार सरकारक कला अकादेमी पहिल बेर राष्ट्रीय कला शिविरक आयोजन कएलक तहूमे हमरा आमंत्रण आएल। हम भाग लेलौं, बड्ड मोन खुश भेल जे आब बिहारमे सरकार कलापर ध्यान देनाइ शुरू केलक। संस्कृति मंत्री सुखदा पाण्डेयकेँ हम सभ कएकटा सुझाव देलियन्हि। मुन्नाजी: किछु बर्खसँ देखा रहल अछि जे मैथिली-भोजपुरी अकादमीमे भोजपुरिया सदस्यक वर्चस्वे स्थापित भाषा मैथिलीकेँ आजुक चर्चित भेल भोजपुरी भाषा गरोसने जा रहल अछि? रवीन्द्र कुमार दास: अकादेमीक उपाध्यक्ष आ सचिव जइ भाषाक प्रयोग करता सएह भाषाक वर्चस्व भऽ गेल से कहनाइ उचित नै। साल भरिक कार्यक्रमकेँ देखलाक बाद ई स्पष्ट भऽ जाइत अछि जे दुनू भाषाकेँ बराबर स्थान भेटि रहल छै। मुन्नाजी: अहाँ सबहक प्रयासे किएक ने मैथिलीक स्वतंत्र मैथिली अकादमी हेबा लेल कदम उठाएल जाए, जइसँ मैथिली लेल स्वतंत्र भऽ कऽ काज कएल जा सकत? रवीन्द्र कुमार दास: हम काजमे विश्वास करैत छी, छुच्छे आन्दोलनमे नै। हमरा लोकनि लड़बे बड्ड करैत छी, कतौ जाति-पाइतक नामपर तँ कतौ क्षेत्रकेँ लऽ कऽ। कतेक लोक छथि जे गामसँ निकललाक बाद अपन बाल-बच्चाकेँ मैथिली सिखबैत छथि। क्तेक कार्यक्रम, सम्मेलन आ सेमीनार मैथिलीमे होइत अछि राष्ट्रीय आ अन्तर्राष्ट्रीय स्तरपर, अखन धरि मिथिला कलाक एक्कोटा संग्रहालय भारतमे नै बनि सकल अछि। मुन्नाजी: अकादमी द्वारा गद्य-पद्य दुनू विधामे मूलतः कथा आ कवितापर काज होइछ। किएक ने दुनू विधाक आनो प्रतिरूप जेना गजल आ विहनि कथा, जे अविकसित अछि, अग्रिम योजनामे शामिल कएल जाए, जइसँ ऐ सबहक विकास भऽ सकए? रवीन्द्र कुमार दास: अहाँक विचारसँ हम सहमत छी, कविताक अलाबे साहित्यक अन्य विधामे कार्यक्रम हेबाक चाही। कथाक पाठ तँ कएल गेल अछि मुदा आर कार्यक्रम हेबाक चाही। मुन्नाजी: किछु कथित व्यक्ति द्वारा ठाम-ठीम ई आरोप लगाएल जा रहल अछि जे ई मैथिली-भोजपुरी अकादमी एकटा जाति विशेषक मुट्ठीक संस्था बनि काज कऽ रहल अछि। की स्वतंत्र विचार देब अहाँ? रवीन्द्र कुमार दास: साहित्य आ कलामे कोनो जाइत नै होइत छै। ई महज एकटा घटिया राजनैतिक सोच अछि। जँ अपने अकादेमीकेँ एकटा राजनैतिक मंच बुझैत होइ तँ ई पूछब उचित अछि अन्यथा महज एकटा बहन्ना। ऐमे मैथिली भाषी सदस्य कम नै छथि, हमरा उम्मीद अछि जे दिनोदिन विकास हएत। मुन्नाजी: अहाँ सशक्त युवा सदस्य रूपेँ जुड़ल छी, तँ युवा रचनाकारक लेल कोनो अग्रिम योजना अछि? रवीन्द्र कुमार दास: हमरा लोकनि एकटा चित्र प्रदर्शनी आयोजित करौने रही “रंगपूर्वी”, ओइमे बेसी युवा कलाकारकेँ चुनल गेल रहनि। तहिना कवि सम्मेलनमे सेहो लगातार देखि रहल छी जे बेसी युवा लोकनि आमंत्रित रहैत छथि। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। १.सुजीत कुमार झा-कथा-फुल फुलाइए कऽ रहल २.सुमित आनन्द- अक्षरपुरूष-विश्वनाथ ३.नवीन कुमार आशा- फेर सॅ वर रहलाह कुमार १. सुजीत कुमार झा कथा फुल फुलाइए कऽ रहल
इन्जनकँे शटिङ्ग करयकँे अवाज आबि रहल छल । बीच–बीचमे सिट्टी सेहो बाजि उठैत छल । सवारी गाडी आ माल गाडीकँे आबए जाएकेँ अवाज जोड़ सँ सुनाइ दऽ रहल छल । हम रोबोट जकाँ इम्हर सँ ओम्हर भगैत कखनो ग्यास पर पानि रखैत छलहुँ तऽ कखनो सोनुकेँ दुधक गिलास हातमे दैत छलहुँ । बीच–बीचमे हुनको आवश्यकता पुरा कऽ रहल छलहुँ । भोरक समय कोना बित जाइया पते नहि चलैत अछि । ९ बजे धरि ओहो स्टेशन चलि जाइत छथि आ सोनु सेहो स्कुलक लेल बिदा भऽ जाइत अछि । फेर हम रहि जाइत छी । आ हमर अस्त व्यस्त परल घर, जकरा हम फेर सँ सजाबय लगैत छी । सोनु अपन ब्याग पिठ पर रखलक आ स्कूल चलि देलक, इम्हर ओहो हमरा बाँहि पर एकटा स्नेही हात थपथपा चलि देला । राति सँ भऽ रहल झिस्सी आ बादलक कारण ठण्ढ महशुस भऽ रहल छल । हम आलमारीमे सँ साल निकालि कऽ ओढि लेलहुँ । आगामे टेबुल पर हमरा दूनु गोटेकेँ बिबाहक पहिल वर्षगाँठक खिचल फोटो राखल छल । हम एक टक्क देखैत रहि गेलहुँ, गुलाबी रंगक साड़ी पहिरने हम हुनकर कन्हाँ पर माथ रखने छलहुँ । फोटो हम अपना हातमे लऽ लेलहुँ । हमरा अपन अतित अपने चारु दिस घुमय लागल प्रतीत भेल । माँ बैठक रुम सँ अवाज लगौलक, ‘पिंकी, कनि बेटी, चाह बना कऽ ला नऽ ।’ हम भानस घरमे मचिया पर बैसि आलू सोहि रहल छलहुँ, बगलमे कोबीक तरकारी काटल छल, हमरा कोबीक तरकारी बहुत नीक लगैत अछि, ओकरे देखि रहल छलहुँ । माँकँे प्रेम भरल अवाज सुनि कऽ हमर हृदय जोड़–जोड़ सँ धड़कय लागल । हमरा बुझल छल एहि समय चाहक लेल किए कहल गेल अछि । रातिएमे हम माँ आ बाबुजीक बात सुनि लेने छलहुँ । ओ बातक आधार पर हमरा ई पत्ता चलि गेल छल काल्हि जखन चारि दिनक यात्रा सँ बाबुजी घर अएला ओहि क्रममे ट्रेनमे हुनका एक नवयुवक भेटल छल जे अपने जातिक आ रोजगारमे लागल छल । ओ जयनगर स्टेशन पर सहायक स्टेशन मास्टर छला । बाबुजी हुनकर बात सँ बहुत प्रभावित भेला आ किछु मिनेटक यात्रामे भेल बातक परस्पर घुलि मिल गेलाक बाद बाबुजी हुनका सँ हमरा बिषयमे बात कएने छलथि । आ ओ सहमत भेलाक बाद बाबुजी हुनका गाम जा कऽ हमर बिबाह एक प्रकार सँ तय कऽ लेने छलथि । हम एम ए पास भऽगेल छी, घरमे सभ हमर नोकरीक बिरोधमे अछि । जहिना–जहिना हमर उमेर बढि रहल अछि, माँ आ बाबुजीक चिन्ता सेहो तारक गाछ जकाँ बढि रहल अछि । घरमे दान दहेज देबाक लेल बुहत बेसी किछु नहि अछि, तैयो ओ अपन बेटीक लेल उपयुक्त बरक खोजीमे छला । कतेको लोक हमरा देखय आएल, मुदा वा त बहुत तिलकक अभाव आ फेर हमर पिरसियाम रंगक कारण बातचित बढिए नहि रहल छल । एहि सभबीच हमर अपन छोट सन सुन्दर घरक कल्पना टुटैत महशुस भऽ रहल छल । बाबुजीक बताओल बातक आधार पर हमरा मनमे एहि युवककेँ छवि बनि कऽ आबि रहल छल, हृदय जोड़ सँ धड़ैक रहल छल । धड़कैत हृदय सँ चाह बना कऽ ओढ़नी ठीक करैत बैठक रुममे चलि गेलहुँ । बाबुजी आ माँ बहुत खुशी देखाइ दऽ रहल छल । माँ ओ युवककेँ सम्बन्धमे जानकारी देलन्हि । हमरा लागय लागल जेना लम्बा पतझरकेँ बाद बहार आबि गेल अछि । चारु दिस गाछ सभ पर हरियर कनोजरि फुटि गेल अछि , अपन भावनामे हम स्वयं बहैत जा रहल छलहुँ, बादमे ओ युवककेँ फोटो सेहो हमरा देखाओल गेल । देखि कऽ दंग रहि गेलहुँ अनायासे मुहँ सँ खसि पड़ल अबेरे सँ किए नहि मुदा मोन जोगर जीवन संगी भेट रहल अछि । शायद एतेक सुन्दर पढ़ल लिखल युवक सँ हमर संसार बसय बला छल । एहिद्वारे एखन धरि हमर हिसाब किताब नहि बैसल छल । फोटो हातमे लऽ हम इहे सभ सोचि रहल छलहुँ । ‘चट्ट मगनी पट्ट बिबाह’ बला बात भेल । एतेक बढियाँ लड़का कही हात सँ नहि निकलि जाए एहिद्वारे बाबुजी एक महिना भितरे बिबाह दुरागमन सँ निबैट गेला । लड़काक बाबु नहि छल माँ गामेमे रहैत छली । अगहन महिना जाढ़ शुरुए भऽ रहल छल जाहि पर मन पसिनक सँग हमर कल्पनाक रंग आकाशमे चारु दिस छिरिआए लागल । चारि दिन सासुरमे रहलाक बाद जयनगर स्टेशनक लेल बिदा भऽ गेलहुँ । ओ स्थानक लेल हम तऽ ओहिना बहुत उत्सुक छलहुँ । पतिक व्यवहार सेहो बहुत बढियाँ छल । हुनक हँसमुखक अनुहारकँे अएना जकाँ देखैत छलहुँ । एक दोसर सँ बातचित करैत कखन जयनगर स्टेशन आबि गेल पते नहि चलल । ‘पिंकी, स्टेशन आबि गेल ।’ हुनकर अबाज सुनाइ देलक, हम एकदम चौक कऽ जल्दी सँ उठि अपन माथ झाँपय लगलहुँ । कनिक लाजो भऽ गेल पतिक नोकरी बला स्थानपर पहिल बेर अएलहुँ अछि । फेर जल्दी–जल्दी हुनकर पाछु लागि गेलहुँ । ओ ब्याग हातमे लऽ आगा–आगा जा रहल छला । हम सोचि रहल छलहुँ स्टेशन पर हुनकर चिन्हा परिचयकँे दू तीन गोटे मित्र हमरा अवश्य लेबए अएता, कारण ओ बता रहल छलथि एतेक जल्दीमे बिबाह भेल की ककरो आबएकेँ सम्भव नहि छल । मुदा आश्चर्य लागल जखन किओ देखाइ नहि देलक । हम असगरे समान सभ लऽ हुनकर पाछु चलि रहल छलहुँ । जयनगर स्टेशन सँ किछुए दुर पर किछु क्वाटर सभ बनल छल । एक केँ बाद एक क्वाटर छुटि रहल छल हमरा बुझएमे किछु नहि आबि रहल छल । अन्ततः एकटा छोटका क्वाटरक आगा पहुँच कऽ ओ गेटक ताला खोललन्हि । छोट रुम ओहि सँ सटले एकटा भानस घर आ पाछूमे बाथरुम छल । भानस घरमे आठ दशटा बरतन आ कनिमनि डिब्बा राखल छल । एकटा पुरान पेटी सेहो छल । ई की ? हम अबाक भऽ हुनका दिस ताकय लगलहुँ । ई सभ हमरा अपना आपमे अप्रत्याशीत आ अजिब जँका लागल । ‘एना की देखि रहल छी ? एखन क्वाटर नहि भेटल अछि । एहिद्वारे एहिमे रहि रहल छी । जहिना क्वाटर भेटत बदलि लेब,’ फेर ओ बातकेँ आगा बढबैत कहलन्हि, ‘ओना एखन धरि असगरे छलहुँ किए बड़का घर लितहुँ । आब अहाँ आबि गेल छी तऽ बड़का घरक कोशिश करब ।’ ओ लग आबि कऽ हमरा बाहि पर हात थपथपा खुशी कऽ देलन्हि । एक दू दिनक बाद ओ अपन काज पर सेहो जाए लगलथि आ हम असगरे रहय लगलहुँ । धीरे–धीरे लग पासक महिला सभ हमरा लग आबय लगली । एक दिन चालीस पैतालीस बर्षक एक महिला हमरा घर बाटे जाइत छली । हमरा देखि कऽ टोकि देली । भेष भुषा आ बातचित सँ पत्ता चलल ओ एतयकेँ स्टेशन मास्टरक कनियाँ छथि । एखन धरि जतेक महिला अबैत छली, पारस्परिक बिचारधारा आ स्तरमे समान्य लगलाक कारण किछु जमि नहि रहल छल । ई सोचि कऽ जखन स्टेशन मास्टरक कनियाँ अछि तऽ बातचितमे आनन्द आओत, हम हुनका आदर सँ घरमे अनलहुँ आ खुलि कऽ बातचित करय लगलहुँ । ‘लगैत अछि, अहाँ बहुत पढल लिखल छी ?’ एका एक ओ पुछलन्हि । ‘हँ हम एमए पास छी’ हम गर्व सँ कहलहुँ । ‘अहाँकँे बुझल अछि, अहाँक पति एतय की करैत छथि?’ ओ गम्भिरता सँ पुछली । ‘हँ, एतय ओ सहायक स्टेशन मास्टर छथि ।’ हम ओही गर्व सँ उत्तर देलहुँ । ‘ई अहाँ सँ केँ कहलक अछि ?’ ओ फेर सँ प्रश्न कएली । ‘ओहे हमरा आ हमर नैहरक लोककँे कहने छलथि ।’ हम आब सतर्क भऽगेल छलहुँ आ संगहि आश्चर्य सेहो भऽरहल छल की कतहुँ गरबर तऽ नहि छैक । ‘तऽ आब सुनु, अहाँक संग धोखा भेल अछि । ई जगदिश एहि स्टेशनक पैट म्यान अछि ।’ ओ एक एक शब्द पर जोड दैत कहलन्हि । हमर माथ घुमय जकाँ लागल एखन धरि हमरा सन्दर्भमे जतेक घटना घटि रहल छल, ओ हमरा अप्रत्याशित लागि रहल छल, ई नयाँ बात सुनि हम स्तब्ध भऽ गेल छलहुँ । ई तऽ हम कल्पनामे सेहो नहि सोचि सकैत छलहुँ । हम ओ महिलाके मुहँ दिस देखि रहल छलहुँ । हमर मोन एखनो अपन प्रियतमक लेल ई बात मानयकँे लेल तैयार नहि छल । शायद ओ हमर मोनक बात बुझिगेल छली । दू मिनेटक चुप्पिक बाद हमरा कनहा पर हात रखैत कहलन्हि, ‘एना लगैत अछि अहाँकँे हमरा बातक बिश्वास नहि भऽ रहल अछि । हम अहाँकेँ धोखामे राखय नहि चाहैत छी । एहिद्वारे काल्हि भोर दस बजे अहाँ हमर घर चलि आउ ओ तरकारी लऽ कऽ आओत । हमरा घरक तरकारी ओहे अनैत अछि । तखन अहाँकँे सभ सत्य पत्ता चलि जाएत । ई कहि कऽ ओ तऽ चलि गेली, मुदा हमर मस्तिष्कमे एकटा बबंडर उठल छल । हम ओहि ठाम बैसल आँखि सँ दूर किछु देखय लगलहुँ । हमरा एहि सभ पर बिश्वासे नहि भऽरहल छल । मुदा बेर–बेर एकटा बात घुमि रहल छल ओ अपरिचित महिलाकेँ हमरा सँ एहन झुठ बाजयकँे किए आबश्यकता पड़ि गेल । मोन कहलक, ‘पहिने सही बात पता लगाली, फेर हुनका सँ किछु कही’ ई सोँचि कऽ ओहि दिन हम समान्य जकाँ बनल रहलहुँ । दोसर दिन भोर दस बजे हुनका गेलाक बाद स्वयं तैयार भऽ कऽ ठीक दस बजे छोटका क्वाटर छोड़ि बड़का क्वाटर दिस बढि गेलहुँ । ‘आउ, बैसु ।’ स्टेशन मास्टरक कनियाँ बहुत स्नेह सँ हमरा अपना लग बैसा लेलन्हि । हम दूनु गोटे आपसमे बातचित कऽ रहल छलहुँ की ओ तखने आबि गेला । बास्तबमे तरकारीक बड़का झोड़ा लेने घाम सँ तर उपर छलथि । जहिना हम दूनु एक दोसरकँे देखलहुँ, ओहो स्तब्ध रहि गेला, किछु देरक लेल ओ ठगल जँका ओतहि ठाढ़ रहि गेला । फेर मनकेँ शान्त करैत ओ जल्दी सँ बाँकी पैसा स्टेशन मास्टरक कनियाँकेँ पकरा तिर जँका भागि गेला । आब सभ स्थिति हमरा आगा स्पष्ट भऽ गेल छल । हम लजाइत जल्दी सँ घर आबि द्वार बन्द कऽ चौकी पर उल्टा सुति हिचैक– हिचैक कऽ कानय लगलहुँ । की ई धोखा खाएकँे एतेक बड़का संसारमे हमही रहि गेल छलहुँ । चौबिस बर्षक बाद एकटा छोटका बगैचा चाहलहुँ ओहो काँट सँ भरल निकलल । हमरा हुनका पर बहुत तामस आबि रहल छल । ओ बढ़िया कपड़ा पहिर, अपनाके स्मार्ट देखा कऽ हमरा बाबुजीकेँ धोखा देलन्हि की ओ सहायक स्टेशन मास्टर छथि, जखन की छथि एकटा पैट म्यान । जीबनक उल्लास शुरु भेलो नहि छल की समाप्त होबय जकाँ प्रतित होबय लागल । हम सोचि रहल छलहुँ, ‘नैहरमे, कुटमैतामे, सँगीमे कोना मुहँ देखाएब । सभ हमरा पर हँसत की पैट म्यान सँ बिबाह कएने अछि । माँ बाबुजी सेहो भग्यकँे लऽ कऽ कन्ता ।’ हमरा दिमागमे रंग–विरंगक बिचार आबि रहल छल । हम दिन भरि किछु नहि खेलहुँ आ नहि कोनो काज कएलहुँ । जखन ओ ६ बजे अएलाह तखने हम चौकी पर सँ उठि हुनका खुब बात कहलहुँ । ‘अहाँ हमरा धोखा किए देलहुँ ? हमर जीवन किए बरबाद कएलहुँ ? एकटा एमए पास लडकीकँे कनियाँ बना कऽ किए अनलहुँ’ हम हुनका पर एकदम बरसि रहल छलहुँ । ओ एक दम शान्त भऽ हमरा दिस देखैत बजला, ‘नहि पिंकी, एहन बात नहि अछि । हमरा मोनमे कोनो धोखा देबाक बात नहि छल, हम अहाँ सँ पे्रम करैत छी आ करैत रहब .....’ बात काटि कऽ हम तेजी सँ हुनकर नजदिक आबि कऽ चिचिएलहुँ, ‘पे्रमक एतय की प्रश्न अछि ? अहाँ अपन औकात तऽ देखु एकटा पैट म्यान भऽ कऽ अहाँ हमरा सन लडकी सँ बिबाह कएलहुँ आ आब कहैत छी धोखा नहि देलहुँ अछि । हम अहाँ सँग नहि रहि सकैत छी ।’ ‘सुनु पिंकी हम अहाँकेँ कोनो बातक लेल जोड़ नहि देब मुदा हम साँच कहैत छी, हम एसएलसी धरि पढल छी आ आगा पढयकँे हमर बहुत इच्छा छल मुदा बाबुजीक आकास्मिक मृत्यु आ धनाभावक कारण हमर पढाइ रुकि गेल । एसएलसी कएलाक बाद कतहुँ नोकरी नहि भेटल । अन्तमे एहिठाम काज करय लगलहुँ ।’ ओ गारा बाझल अबाजमे कहि रहल छलथि । ‘हमरा ई सभ नहि सुनयकेँ अछि आ नहि अहाँकँे मजबुरीमे हमर कोनो दिलचस्पी अछि । हम आब एतय एक क्षण नहि रुकि सकैत छी । काल्हि भोरे गाडी सँ चलि जाएब ।’ ‘हम अहाँकेँ रोकब नहि आ नहि अहाँकेँ रोकयकेँ अधिकार अछि । हम अपन गल्ती स्वीकार करैत छी, मुदा एकटा बात धैर्यताक संग सुनु पिंकी, हम ई सोचि कऽ बिबाह कएने छलहुँ जे अहाँके हिम्मत पाबि कऽ आगाकँे पढाइ पुरा करब । हम जे सपना देखने छी, ओ एहि जीवनमे पुरा करब । मुदा अहाँ नहि चाहैत छी तऽ अहाँकँे इच्छा ।’ ओ हमरा नजदिक अबैत बजलथि आ हमरा कनहापर हाथ राखयकँे प्रयास कएलन्हि । मुदा ओहि समय हम एक घाइल शेरनी जकाँ तमसायल छलहुँ । हम हुनकर हात जोड़ सँ झटैक देलहुँ आ बिना हुनका देखने रुमकेँ भितर सँ बन्द कऽ पड़ि रहलहुँ । ओ राति निन्द हमरा सँ कोशो दूर छल । बाहरक पद चाप सँ हमरा आभास भऽ रहल छल ओ बरण्डेमे एम्हर–ओम्हर टहैल रहल छला । बहुत देर धरि हम आबेशमे किछु नहि किछु सोचैत रहलहुँ । बहुत देरक बाद जखन मोनक बिहारि कनिक कम भेल तखन बिचार करय लगलहुँ, ‘काल्हि हमरा जेबाक अछि । मुदा जाएब कतय ? बाबु जीक लग ? मुदा ओ घर तऽ हम छोड़ि आएल छी । आब की ओहने आदर हमरा फेर भेटत ? सभ खिस्सा बता देलाक बाद बाबुजी उल्टे तमसेता । हुनकर तबीयत आओर खराब भऽ जाएत । माँकेँ तऽ ओहिना ब्लड प्रेसर अछि, ओ कहुँ बेहोस भऽ गेल त ? निश्चय हमरा सहानुभूति भेटत, मुदा कहिया धरि ? धीरे–धीरे सभ समान्य भऽ जाएत । मुदा हमराकँे अपनाओत ? हमरा भविष्य पर परित्यक्ताक छाप लागिए जाएत । ‘पड़ोसी, सँगी, सरकुटुम्ब जे सुनत, हमरा मुहँ पर सान्तवना देत, मुदा पीठ पाछू हमर मजाक उडाओत । एतय सँ गेलाक बाद जे भविष्य हम बनाबय चाहैत छी की ओ सम्भव हैत ? भवाबेशमे कोनो नयाँ कदम उठाबय सँ पहिने हमरा ई बढियाँ जकाँ सोचि लेबाक चाही की नयाँ चाल टुटल जीवनकेँ जोड़ि सकत वा नहि ? ‘हुनका बदनामी कएला सँ की हमरा बदनामी नहि हैत ? जिनका सँग सुख दःुख निर्बाह करबाक बचन लेने छलहुँ, यदि ओ गल्तीए कएने छथि तऽ की हम एहि दुखित हालतमे हुनका छोड़ि चलि जाइ ? तऽ हम कि करु ?’ हमर पढाई बिबेक काज कएलक । हमरा धीरे–धीरे एना लागय लागल, ‘हमरा ई घर नहि छोड़बाक चाही । आब तऽ हमरा अपन एहि काँट भरल बाटिकाकँे कोशिश कऽ कऽ फुल सँ भरल बनाबयकेँ चाही । चिड़ै जखन खोता बनबैत अछि तऽ खरपतारसभ निच्चा खसैत रहैत अछि मुदा ओ कहियो हिम्मत नहि हारैत अछि । अपन खोता पुरे करैत अछि । फेर हम तऽ पढल लिखल महिला छी । ओ कहि रहल छथि तऽ शायद ओहो ठीक होथि । सम्भव अछि अपन साधना अधुरा रहलाक कारण आब हमर माध्यम सँ पुरा करय चाहैत होथि आ फेर हम तऽ हुनकर अर्धागिनी छी । महिला तऽ शक्ति होति अछि, पुरुषकँे पौरुष स्त्रीसँग पुरा होइत अछि । ‘हमरा एखन हिम्मत नहि हारबाक चाही । जखन एहि घरमे आबिए गेल छी तऽ एहि घरकँे रोशन करबाक प्रयत्न करब ।’ पुरे राति इहे सोच साँचमे निकलि गेल । जखन सुति कऽ उठलहुँ तऽ उज्जर किरण जँका हमर मन सेहो साफ भऽ गेल छल । ओ धुनक धनी छला ।ओ अपन पढाइ फेर सँ शुरु कएलन्हि । हमहुँ बोर्डिङ्ग स्कुल पकड़ि लेलहुँ । दूनुकँे त्याग, तपस्या आ साहस बास्तबमे रंग देखौलक ओ सात सालमे एमए कऽ लेलन्हि । ओ बास्तवमे सहायक स्टेशन मास्टर बनि गेला । हमर बँगैचामे छोटका फुल सोनु सेहो चलि आएल । आब हम नोकरी छोड़ि देने छी । कतहँु दुर सँ आबि रहल सीट्टीक आबाज सँ हमर ध्यान भंग भेल । हम फोटो टेबुल पर राखि देलहुँ आ खिड़की सँ बाहर दिस तकलहुँ ....कतहुँ दूर रेलक पटरीकँे दूनु कोर एक दोसर सँ मिलैत नजरि आबि रहल छल ।
२. सुमित आनन्द अक्षरपुरूष-विश्वनाथ
समाजशास्त्रक लब्धप्रतिष्ठ विद्वान प्रोफेसर डॉ0 विश्वनाथ अपन अमर कृतिसँ मैथिली साहित्यमे जे स्थान प्राप्त कए चुकल अछि से वस्तुतः मैथिलीयोक विद्वान, प्राध्यापक सुभचिन्तक लोकनिक हेतु दुर्लभ अछि। ई अपन छात्रावस्थहिसँ प्रायः महाविद्यालयमे प्रवेष करितहि पठन-पाठनक विशय किछु रहनि मुदा मैथिलीक सेवामे संलग्न भए गेलाह। ओहि समयमे समाप्ताहिक मिथिला मिहिर सबसँ लोकप्रिय आ दीर्घजीबी पत्रिका छल जाहिमे हिनक रचना मासमे एक वा दूटा अवश्य छपैत छल। मैथिली साहित्यमे डॉ0 विश्वनाथ एकदिस जँ व्यंग्य कथाकारक रूपमे प्रतिष्ठित भेलाह तऽ दोसर दिस ई एकटा नव विद्या पर कलम उठओलनि जे थिक साक्षात्कार विद्या। एहि विद्यापर ओहि समयमे बहुत कमे लोक लिखने छलाह। डॉ0 विश्वनाथक तीन गोट प्रकाशित पोथी अछि अक्षर-अक्षर अमृत, युगान्तर एवं जुलुस रूकल अछि। एहिमेसँ पूर्वक दुनू साक्षात्कार विद्या पर अछि आ तेसर कथा पर आधारित। हिनक अक्षर-अक्षर अमृत जे जहिना वृत्यनुप्रास अछि तहिना ओहिमे संगृहीत सात गोट महापुरूषक अन्तर्वीक्षा वस्तुतः साहित्यक अलङकारे थिक। एहिमे जाहि वरेण्य साहित्यकारक साक्षात्कार प्रस्तुत कयल गेल अछि ओ थिकाह-मधुप, किरण, हरिमोहन झा, तन्त्रनाथ झा, सुमन यात्री एवं आरसी प्रसाद सिंह। डॉ0 साहेबक सर्वप्रथम अन्तर्वीक्षा 1976 मे छपल जे कवि चूड़ामणि ‘मधुप’ संग छल आ तकर बाद तऽ ओ गति पकड़ि लेलक। एहिमे जाहि सातगोट शीर्षस्थ साहित्यकार लोकनिक साक्षात्कार प्रस्तुत कयल गेल अछि तनिक जन्म 1906 सँ 1911 केर कालखण्डमे भेल छल। समाजशास्त्री डॉ0 विश्वनाथक दोसर साक्षात्कारक पोथी थिक युगान्तर जाहिमे 1912 सँ 1933 धरिक कालखण्डसँ नओ गोट मूर्धन्य साहित्यकारक अन्तर्वीक्षा प्रस्तुत कयल गेल। एहि पुस्तकमे जनिक अन्तरंग वार्ता संगृहित अछि ओ थिकाह - व्यास जयकान्त मिश्र, उमानाथ झा, जटाशंकर दास, गोविन्द झा अणिमा सिंह, आनन्द मिश्र एवं लिली रे। ई नवो व्यक्तित्व प्रातः स्मरणीय छथि। मैथिली साहित्यक रीढ़ छथि। डॉ0 विश्वनाथ जेहने आलोचक तेहने कथाकार जेहने कवि तेहने व्यंग्यकार जेहने भाषणकर्ता तेहने मंचसंचालक। हिनक कथा संग्रह ‘जुलुस रूकल अछि’ अत्यन्त रोचक ओत्सुक्सवर्धक आ शिक्षाप्रद अछि। मैथिली साहित्यमे हिनक कथा संग्रह-प्रर्याप्त लोकप्रियताकेँ प्राप्त कयलक। हमर विश्वास अछि जे डॉक्टर साहेब अपन एहने रचना सभसँ मैथिली साहित्यक उद्यानकेँ सुरभित करैत रहताह।
सुमित आनन्द मैनेजिंग एडीटर सोसाइटी टुडे, अम्बेदकर स्टडीज सेन्टर सी. एम. कॉलेज, दरभंगा
३.
नवीन कुमार आशा फेर सॅ वर रहलाह कुमार
आजुक परिस्थिति मे अगर कोनो वरक कथा-वार्ता आबै छनि तँ ओ हुनका पर उपकार होइत अछि, आ अगर वर लोकनि कथाक चर्चा सुनै छथि तँ ओ भलेहि उपर सॅ तमसाइथ मुदा अंदर सॅ खुश रहै छथि, आखिर आबि गेल वैवाहिक जीवनक समय। एहिना किछु घटलनि हमर पिताजी संग। आ सोचू अगर कोनो वरक कथाक गप्प ओकरा सॅ कएल जाए तँ ओ कते प्रसन्न होएत, एहिना हमर पिताजी संग भेल। संजीवजी हालहि मे गाम आएल छलाह, हमर पिसियौत बहिनक विवाहमे। ओइ ठाम हुनकर विवाहक गप्प चलल तँ ओ काफी खिसिया गेलाह मुदा ओ भितरकी मुस्की मारैत छलाह। विवाहक दोसर दिन संजीवजी वापिस दिल्लीक रेल पकड़ि चलि गेलाह। आब विवाहक हिसाव सॅ एक बेर कनियाक द्वितीय यात्रा होइत अछि, आई भोर मे बहिनकेँ अयबाक छलनि से आनइ लेल हम आ हमर भाइजी गेलौंह, ओतय काफी मजा आएल, आ ठाकुरजी सेहो अयलाह, आजुक कार्यक्रम छनि किछु विध-बाध हेतनि। ठाकुरजी (वरक) पहिल यात्रा अपन सासुरक काफी तनाव पूर्ण होइत अछि, काफी शुभ-शाभ्र बैसल छलाह लेकिन कते काल ओहो बरदा्स्त करताह किएक तँ सार-साइर हुनका लग गप्प दैत छलखिन। आब सॉझुक पहर अछि, सभ बइसल छथि ओइ बीचमे बिना पहिचानल नम्बर सॅ फोन केनाइ आरंभ भेल, ओइ क्रममे एकटा फोन संजीवजी लग आएल। संजीवजी कार्यालयमे छलाह। ओम्हर सॅ आवाज आएल ‘‘बौआ बाबूजी छथि’’.... संजीवजी...... नहि..... ओम्हर सॅ ........ श्री कांती जी राय, दुर्गागंज सॅ बाजि रहल छी, अहॉक बाबुजी सॅ काज छल कृपा कऽ कय हुनकर पता देब , किछु आवश्यक काज छल। संजीवजी.........जी अवश्य (फेर हमर पिताजी सोचलथि, आखिर की बात) फेर बाजला.....जी देखि कऽ दैत छी। .... श्री कांतिजी राय.............बौआ....बौआ.......अहॉ की करै छी..(अत्यधिक कम स्वरमे) ऐ आवाज पर सभ हॅसय लागल तँ राय जी फोन काटि देलखिन। कनिक काल बाद फेर फोन भेल। राय जी........बौआ अहॉ की कतय कार्य करै छी... अहि पर संजीवजी .......जी हम अपनेकेँ कनि कालमे फोन करै छी? संजीवजी कने प्रसन्न छथि की आखिर हमर नम्बर आएल। आ एम्हर सभ कियो हल्ला केलक ‘‘ बनि गेलाह बुरबक। फेर ओही राति मे फोन नै भेल आ एम्हुरका लोग बुझथि जे हमरा लोकनि तँ नहि बनि गेलौंह बुरबक। फेर भोर भेल। आइ बहिनकेँ लऽ कय हुनक सासुर जेबाक छल, हम सभ भोरे उठलौं, फेर ठाकुरजी लग गेलौं तँ ओ पुछलथि जे ओ एला क? तँ जवाब देलयनि की नहि-नहि। फेर हम सभ श्री कांतीजी रायक प्रतिमूर्ति संग लऽ गाड़ी मे बैसलौं, कनि काल सन्नाटा छायल किए तँ बहिन कानै छलीह। किछु कालक बाद हम सभ चौक क्रास कयलौं तँ ठाकुरजी कहलथि- ‘‘रायजी केँ फोन घुमाओल जाय, फेर एक दू बेर ओ नहि उठेलाह, तँ हम सभ कियो सोचलौं जे बनला रायजी बुरबक। फेर कनिक काल मे एकटा मिस कॉल आयल तँ फेर रायजी केँ फोन घुमायल गेल, एहि बेर सभ अत्यन्त चुप छल, फेर शुरू भेल वरक(संजीव) वार्तालाप। रायजी ..... बौआ हम राय जी़ संजीव....... जी रायजी.........बौआ अहॉ पता नहि प्रेषित कयलौं, कनि अहॉक बाबुजी सॅ काज छल। संजीव..........जी हम राति मे व्यस्त छलौं। ( गाड़ी मे सभ हॅसय लागल फेर इशारा भेल चुप रहबाक) रायजी.........बौआ, एकरा खराब नहि मानब, एकटा गप्प पूछी? संजीव.........जी अवश्य। रायजी.........बौआ की करय छीयै अहॉ, संजीव..........(काफी कम स्वर मे) जी हम नोएडा मे कार्यरत छी, एकटा मल्टीनेशनल कंपनी मे। रायजी.........(काफी कठोर स्वर मे) वाह...वाह बौआ एकटा गप्प बुझबाक छल, पुछु....... संजीव...........जी अवश्य रायजी...........हमर जेठ बालक ग्रेटर कैलाश मे रहैत छथि, अगर अहॉ खराब नहि मानी तँ ओ अहॉ सॅ भेट करऽ चाहैत छथि की अहॉ हुनका सॅ भेट कऽ सकै छियैन्हि। (संजीव कनी काल सोचलाह फेर बुझलनि की कथा वार्ताक गप्प अछि) संजीव..........जी हमर रात्री कालीन कार्य अछि अगर अपनेकेँ ऐतराज नहि हुअए तँ भोर मे भेट कऽ सकै छथि। रायजी...........बौआ पता तँ अहॉ पठा दिअ किएक तँ हम विदा भऽ गेल छी, अपनेक बाबुजी सॅ आवश्यक कार्य अछि, अगर एक बेर रास्ताक जानकारी दऽ दैतौंह तँ ठीक रहितय। (फेर की छल उत्साहित संजीवजी पता बता देलखिन्ह आ राय जी सेहो बौआ........बौआ कऽ रहल छलखिन्ह। राय जीकेँ सख्त हिदायत भेटल रहन्हि की अंग्रजी शब्दक प्रयोग नहि करथि।) संजीव.......... जी हम कनि देर मे पता भेज दैत छी। रायजी......... अच्छा.....अच्छा.....(कनि मुस्कुराइत) फोन काटि दैत छथि।
आब आगूक ब्यूह रचना तैयार भेल, ठाकुरजी बजलाह.... आब की करब, ममिया ससुर कें तँ मन मे लडडू फूटैत हेतैन्हि। ओना संजीव प्रफुल्लित छलाह, आब विवाहक समय ऐलन्हि जे।
भोरे-भोर हम सभ कियो बहिनक सासुर पहुचलौं, ओतय कनी काल धरि ऐ प्रकरण पर गप्प चलल आ सभ इंतजार करय लगलौं, पर ओइ दिन केओे नहि आयल। आब हम सभ एकटा समयक इंतजार कऽ रहल छलौं, राय जी सेहो प्रसन्न छलाह।
आइ निकिताक द्वितीय-यात्राक बाद पहिल दिन हुनकर सासुर हम आ प्रत्युष (भाईजी) दुनु गोटा जा रहल छी, किएक तँ ठाकुरजीक किछु समान हमरा लग छलन्हि। हम सभ ओतऽ पहुंचलौं, ओ सभ काफी सुशील आ विनम्र छथि। हमरा सभकेँ जिज्ञासा छल की आखिर संजीव किछु कयलथि की नहि। ओतय पहुंचलाक बाद पता चलल की केओ नहि भेजल गेल। ठाकुरजी कहलथि की एतय सभकेँ रायजीक गप्प कहलियैन्ह तँ सभ कियो खुब हँसलथि। फेर राय जी सोचलाह की फोन कएल जाय की नहि, तँ निष्कर्ष निकलल की नहि एखन प्रतिक्रिया आबय दियौ। हम सभ सायं काल वापस आबि गेलौं। घर पर पहुंचलाक बाद संजीवक बाबुजीक फोन हमर मोबाइल पर आयल, तँ हम खूब नीक जकॉ गप्प कयलौं। फेर हमरा सॅ गप्प करैक क्रम मे कहलथि की कनी फोन अपन बाबूकेँ दियौन्ह। हम पछबरिया घरक बरामदा पर बइसल अपन बाबूकेँ फोन देलियन्हि आ कहलियैन्ह जे दादाजीक फोन अछि, आ ओतय गप्पी जकॉ बैसि गेलौं, किएक तँ मोन मे होइत छल की हो ने हो कथा वार्ताक गप्प कहबे करथिन्ह। गप्प आरंभ भेल .... दादाजी हाल चाल बूझैक बाद कहलथिन्ह की संजीवक विवाहक गप्प भऽ रहल छनि काते कात गप्प छनि। बाबु............. कतय सॅ , कोन गाम दादाजी...... दुर्गागंज, बुझाइ अछि मजिस्ट्रेट परिवार सॅ बाबु............. कोन परिवारक छथिन्ह दादाजी........चौधरी परिवार सॅ शायद बाबु............ की चौधरी परिवार या राय परिवार दादाजी.........ओएह किछु, वर सॅ गप्प भेलन्हि पर वर नहि बुझय देलखिन्ह जे ओ वर छथि। बाबु............. अच्छा...अच्छा (हॅसिते-हॅसिते) (कात मे बैसल राय जी सेहो मंद मंद हॅसैत छथि ओहि बातक जानकारी ककरो नहि छनि सिवाय एक दू गोटा छोड़ि कऽ) दादाजी..........हॅ आबथि तखन सोचि छी पर वर नहि तैयार छथि बाबु.................नहि नहि हम बुझा देबन्हि , नीक घर छै, करता करता.. दादाजी...........हॅ मंगैत छलखिन्ह नम्बर आ पता बाबु ............ हॅ आर सभ ठीक, संजीव सभ ठीक ने दादाजी............हॅ हॅ , ठीक छथि। फेर फोन काटि दैत छथिन्ह आ आब राय जी बाबु सभ टा गप्प बतबै छथि, फेर सभ हॅसै छथि। आ फेर बाबु बिगड़ै सेहो छथि, एना नहि करैक चाही, फेर हॅसै छथि, बाते तेहन छैक। आब ऐ बातक जानकारी ठाकुरजीकेँ देलियनि तँ ओहो प्रसन्न भेलाह आ कहलथि आखिर फँसि गेलाह हमर ममिया ससुर विवाहक चक्कर मे। फेर सब एहि विषय पर सोचैत सोचैत कय काफी हॅसला। फेर रायजी काफी उत्साहित छलाह आखिर कथा प्रगति पर छनि। आब फेर सभ विचार कैलथि की फोन कएल जाय वा नहि तँ ठाकुरजी विचार देलखिन्ह की नहि एक बेर आर प्रतिक्रिया आबै दियौ तखन ई प्रक्रम आगु बढ़ाएब। आखिर संजीव विवाह लेल फुर-फुर कय रहल छथि, आइ ई गप्प बुझी कऽ सभ (खास कय कऽ रायजी) अत्यन्त प्रसन्न छथि। ओना संजीवजी सेहो ऐ कथा वार्ताक गप्पकेँ तिल मे तार कऽ सभकेँ बतबैत छलखिन, एहि बातक जानकारी भेटल रवि दिन, ओहि दिन बाबूक छुट्टी रहैत छनि। हम, बाबु आ हमर माइ तीनु गोटा घूर तपैत रही किएक तँ दिसम्बरक महिना आ जाड़क सितलहड़ी रहैक, ओहि क्षण हमर बाबुक मोबाइल पर एकटा फोन आयल, बाबु अपन चश्मा पूवरिया घर मे बिसरि गेल छलाह ताहि द्वारे हमरा कहलथि, ककर फोन अछि? हम देखल तँ ओ संजीवजीक बड़की बहिन रितुक फोन छल दिल्ली सॅ। बाबु फोन उठेलाह आ रितुक संग गप्प मे लागि गेलाह। कुशल-पातीकह बाद ओ हमर माइक संग गप्प करय लगलीह। विवाह दानक गप्प भेल आ फेर ओ माइ सॅ पुछलखिन्ह की.... संजीव किछु कहलथि की.....। (कात मे रायजी सेहो छलाह गप्प सुनैत) माइ........ नहि नहि कहॉ गप्प सुनल हँय, विवाह मे जे आएल छलाह ओकर बाद नहि गप्प भेल, किए? रितु........ हुनका फोन पर कोई कथा वला फोन केने छलखिन्ह, पप्पाक पता आ नम्बर मॅगैत छलखिन्ह, संजीव कहलथि की गप्प करै लेल 10.30 बजे राति मे फोन केने छलखिन्ह आ कहलखिन्ह बौआ अहॉक बाबू सॅ गप्प छल किछु आवश्यक गप्प अछि। संजीव कहलथि की दू तीन बेर नम्बर देलियनि। माई...... फेर की कहलन्हि (हॅसिते हॅसिते) रितु........बुझै नै छियै, ओकरा ओनाहियो विवाहक गप्प सॅ कते चिढ़ छै। माइ...... लेकिन आब विवाह करैक चाहियैन, हम तँ दरभंगा मे कच कचा दैत छलियन्हि तँ कहै छलाह छोड़ू, नै करब तँ कतौ कऽ लेब, फेर की भेलन्हि यै। रितु.........ओ तँ सोचलथि जे पापा क कोनो दोस्त हेथिन्ह, तँय पूरा नीक जकॉ गप्प केलखिन्ह। भौजी यै कहलक की हम तँ हुनका काकाजी बुझै छलियनि पर ओ तँ ससुरजी बनय चाहैत छथि। यै भौजी कहै छै संजीव जे दू साल विवाह नहि करब, की करतै पता नहि। माइ....... लेकिन यै आब गप्प हेतनि तखन ने दू साल मे विवाह हेतनि, आब कऽ लेताह तँ काकीकेँ सेहो नीक हेतन्हि, कतय सॅ एलनि हॅ... (ओनो राय जी ऐ गप्पकेँ वर्चस्व लऽ कऽ सुनि रहल छलाह आ सोचि रहल छलाह की संजीव कते आगि मे घी डालि कय गप्पकेँ प्रस्तुत केलाह अछि। )
फेर रायजी घुर लग सॅ उठि कऽ ऐ बातक जानकारी ठाकुरजी आ निकिता केँ देलखिन्ह, निकिता एखनि सासुर मे छथि, ओ कहलक की रायजी हम गप्प करी की ? रायजी कहलथि की नहि, आब फोन पर कथा उपस्थित करै छी आ अपन माई सॅ विकल वावुकेँ (संजीवक पिताजी) गप्प करा दैत छियनि। फेर रायजी ठाकुरजी सॅ सेहो गप्प कयलथि। ठाकुरजी बजलाह की गप्पकेँ तिलक तार कऽ प्रस्तुत कैल जा रहल अछि, आब की करब रायजी ? रायजी........ नहि नहि बढ़ै दियौ एखन किछु बाकी छै, संजीवकेँ आनंद लियै दियौन्हि एखन। किछु दिनुका बाद रायजी निकिताक सासुर गेलाह फेर ओहि ठाम सॅ विकल बाबुकेँ फोन केलखिन्ह आ कथा उपस्थित कऽ देलखिन्ह। ओना हम ई सभ बुझि कय अपन काका (संजीव) केँ फोन केलियैन्ह आ हुनका बधाइ देलियैन्ह, आ हुनका सॅ पुछलियैन्ह की विवाह करबै ने काका, तँ ओ कहलथि की नहि यौ अखन दु साल नहि करब। हम कहलियैन्ह दु साल तँ विवाह होइत होइत लागि जएबे करत। ताहि पर काका एकदम खिसिया गेलाह आ फोन काटि देलथि। सभ हुनका मनबै मे विफल रहल फेर हमर बाबु संजीव केँ फोन कैलथि आ हुनका सॅ गप्प कैलथि तँ ओ किछु विंदु पर गप्प सुनि कय विवाह करै लेल तैयार भऽ गेलाह। संजीवजीक संग हुनकर परिवारक सब सदस्य काफी प्रसन्न छथि, किएक नहि हेबाक चाहियैन्हि विवाह जे प्रस्तावित छनि। फेर अचानक जहि दिन रायजी केँ विकल बाबु ओतय जेवाक छलन्हि ओहि दिन संजीवक मोबाइल पर एकटा फोन अबैत अछि.... संजीव........ हैलो...हैलो... अपरिचित..... संजीवजी, हाय हम स्मिता झा बाजि रहल छी संजीव....... जी कहू, की बात? स्मिता.........जी हमरा अहॉ सॅ किछु गप्प करबाक छल,की अपने धर सॅ बाहर छियै, नहि तँ जखन बाहर होयब तखन मिस कॉल करि देब? संजीव.........जी, अखन कहि सकैत छी, हम बाहर छी स्मिता..........जी, हमर पिताजी अहॉ ओतय कथा लऽ कऽ गेलाह अछि, हम अहॉकेँ विवाहक बाद परेशान आ दुखी नहि देखय चाहैत छी ताहि लेल किछु गप्प कहय चाहैत छी। हम अहॉकेँ देखने छी, अहॉ सुंदर आ सुशील छी पर हम अहॉ सॅ विवाह नहि कय सकैत छी आ ई गप्प हम ककरो नहि कहि सकैत छियैक तँय अहॉ अपने ई कथा तोड़ि दियौ अहॉ सॅ विशेष आग्रह अछि।
संजीव.......... अहॉ चिंता जुनि करू, अहॉ ई गप्प दोस्त बुझि बतेलौंह अछि ताहि लेल हम अहॉक सहायता अवश्य करब अहॉ निश्चिन्त रहू। फेर संजीव दुखी भऽ जाइत छथि, किएक नहि कियो वर विवाहक सपना देखत, ओहो परिवारक दवाब मे तँ ओकरा पर की बितत? किए तँ-‘‘वर फेर रहि गेलाह कुमार’’।
-------------------- (गुंजन झाकेँ समर्पित) ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। १.अमरकान्त अमर-संघीयतामे मैथिली भाषा २.अतुलेश्वर- तीन तिरहुतिया तेरह पाक ३.पूनम मण्डल- स्थानीय कवि परिषद (सलहेसबाबा परिसर- औरहा) वार्षिकोत्सव- 2012 १ अमरकान्त अमर संघीयतामे मैथिली भाषा नेपालक नयाँ संविधानमे जोड़ तोड़ सँ संघीयताक बात उठि रहल अछि । देशमे संघीय संरचना भेलाक बाद मात्र सभक अधिकार सुनिश्चित होएबापर मिथिला आ मैथिली भाषाभाषीसभ आश्वस्त अछि । तएँ संघीयताक विकल्प आब नहि रहल एतुका जनता सेहो अवाज उठा रहल अछि । तखन संघीय संरचनामे राज्यकेँ कोना कऽ प्रदेशमे छुटिआओल जाए अखनोधरि विभिन्न दलसभबीच मतान्तर देखल गेल अछि । किओ १४ टा राज्य होएबाक मुद्दा उठबैत छथि तऽ किओ ५ टा, किओ ३ टा आदी इत्यादी । मुदा अखन विचारमे मात्र सिमित रहि गेल अछि राज्य पुनरसंरचना । चाहे जे से देर सही दुरुस्त राज्य पुनरसंरचना आ नयाँ संविधानक कल्पना नेपाली जनता कऽ रहल अछि । राष्ट्र भाषा नेपाली बाहेक नेपालमे दोसर राष्ट्रीय भाषाक रुपमे मैथिली भाषा अपन सर्वोच्चता कायम कएने अछि । एहिमे ककरो दू मत सेहो नहि अछि । संघीयतामे गेला सँ मैथिली भाषाकेँ विकास तीव्रगती सँ हएत । राज्य पुनरसंरचनामे जाहि रुप सँ मिथिला प्रदेशक बात उठि रहल अछि, निश्चित मैथिली भाषाक विकास किओ नहि रोकि सकत । तखन मैथिली भाषापर सभ दिन सँ कुठाराघात होइत आएल अछि । एहि सँ बचबाक लेल मैथिली भाषाभाषीसभकेँ सदिखन सचेत रहय पड़त । परापूर्व कालहि सँ मैथिली भाषा समृद्ध रहलाक बादो आन भाषा एनाकऽ लादल गेल जे मैथिली भााषाकेँ उपर उठयमे बहुतरास समस्याक सामना करय पड़ल । ओना मिथिला क्षेत्रक मिथिलानीसभ अपन भाषा आ संस्कृतिकेँ अखनोधरि बचाबएमे सफल छथि । तखन संघीयतामे मैथिली भाषाक स्थान कोन रुप सँ बढि सकत आ एकर प्रभाव केहन हएत ताहिकेँ सम्बन्धमे सामाजिक समावेशीकरण अनुसन्धान कोषक सहयोगमे भाषा विज्ञान सम्बन्धमे अनुसंधान कएनिहार भाषा विद् डा. प्रा योगेन्द्र प्रसाद यादवक कहब छन्हि जे भाषाक आधारपर प्रदेशकेँ निर्माण कएल गेल तऽ मैथिली भाषा वर्तमान अवस्था सँ बहुत सुदृढ आ व्यावसायीकरण दिस उन्मुख हएत । भाषाक आधारपर राज्य पुनरसंरचना कएल गेल तऽ हरेक निकायमे सभगोटे सहज हएत कहैत ओ कहलन्हि जे प्रदेशमे सामनजस्यता, मिलमिलाक संगहि भाषाक संगहि अन्य निकायसभमे सेहो विकासक दू्रतगति लेत । भाषाक आधारपर वा समग्र मेधश एक प्रदेशक आधारपर प्रदेश निर्माण भेल तऽ मैथिली भाषा तुलनात्मक रुपमे सभ सँ अग्रणी स्थानमे रहत भाषा विद् यादवक दावी छन्हि । सम्रग मधेश प्रदेशक निर्माण भेल तऽ हिन्दी भाषाक वर्चश्व मिथिला क्षेत्रमे कायम हएत कएल गेल प्रश्नक जवावमे डा. प्रा. योगेन्द्र प्रसाद यादव कहलन्हि सम्रग मधेश प्रदेशक निर्माण भेल तऽ हिन्दी मात्र सम्पर्कक भाष रहि सकत । हिन्दी सँ मैथिली भाषाकेँ ‘इगनोर’ नहि कएल जाएत कहैत ओ कहैत छथि ,‘संघीय संरचनामे मैथिली भाषाक बाहेक अन्य स्थानीय भाषा सेहो विकास करत ।’ वर्तमान समयमे देखल गेल अछि जे प्राथमिक विद्यालयसभमे मातृ भाषामे अध्ययन अध्यापन नहि भऽ रहलाक कारण विद्यार्थीसभमे मनोवैज्ञानिक त्रास उत्पन्न भेल हुनक कहब छलन्हि । मनोवैज्ञानिक त्रासक कारण वच्चासभ विद्यालय जाए सँ हिचकिचा रहल अछि अनुसंधानक क्रममे देखल गेल ओ जानकारी देलन्हि अछि । तहिना अपन भाषामे पढाई नहि भऽ रहला सँ शिक्षामे गुणात्मक वृद्धि नहि भऽ रहल आ विद्यार्थीसभ सेहो नीक सँ नहि बुझि रहल हुनक धारना छल । मातृ भाषामे शिक्षा ग्रहण कराओल गेल तऽ वच्चासभक मानसिक विकासक वृद्धि होएबाक संगहि भाषिक विकास सेहो होइत अछि कहैत भाषा विद् योगेन्द्र प्रसाद यादव कहलन्हि भातृ भाषाकेँ बीचमे रोकि अन्य भाषामे बुझेला सँ मानसिक असर सेहो पहुँचैत अछि बतौलन्हि । अन्य देशसभमे कएल गेल अनुसंधानमे देखल गेल जे मातृ भाषामे शिक्षा दिक्षा देला पर वच्चासभक दिमाग अन्य भाषाक तुलनामे बेसी तेज होइत अछि तएँ मातृ भाषाक प्रयोग करयपर ओ जोड़ देलन्हि । मिथिला क्षेत्रमे मैथिली भाषाक लोप होइत देखल जा रहल प्रति ओ कहैत छथि जाहि भाषाकेँ लोक सेवामे समोवश नहि कएल गेल, सरकारी काम काजक भाषामे प्रयोग नहि भेल आ अन्य अवसरसभ प्राप्त नहि भेल तऽ ओ भाषाकेँ लोप होएबाक सम्भावना रहैत अछि । भारत, स्वीटजरलेण्ड आ केन्या सहितक देशसभमे संघीय संरचना भाषाक आधारपर कएल गेल कहैत ओ कहलन्हि भाषाक आधारपर कएल गेल राज्य पुनरसंरचना स्थायित्व प्रदेशक निर्माण होएबाक ओ दावी कएलन्हि अछि । तहिना संघीयतामे देश गेलापर मैथिली भाषाक विकास कोन रुप सँ आगा बढत ताहि सम्बन्धमे मिथिला राज्य संघर्ष समितिक संयोजक प्राध्यापक परमेश्वर कापड़िक कहब छन्हि जे संघीयतामे मैथिली भाषा, सांस्कृतिक असल पहिचान आ स्वायत्तताक वोध होएबे करत तएँ तकर दोसर विकल्प खोजब भूत खेलाएब अछि । मैथिली भाषा अभिव्यक्तिक माध्यम मात्र नहि भऽ मैथिली भाषामे लौकिकता, सांस्कृतिकता, कला, साहित्यसभकेँ स्पष्ट आ अनिवार्य छाही देखल जाइछ प्राध्यापक कापड़िक कहब छन्हि । ओ कहैत छथि मैथिला भाषामे सांस्कृतिक निजत्व छैक जकर संप्रेशन आन भाषामे नहिए भऽ सकैत अछि । जकर उदाहरण मैथिली भाषाक होरी, छठि, सामा, जटजटिन, लगनी, सोहर, समदाउन, लोकगाथा, लोक गीत रहल ओ उल्लेख कएलन्हि । ओ कहलन्हि एहिसभकेँ मैथिली बाहेक आन भाषामे अुवाद नहि भऽ सकैत अछि । प्रजातन्त्र गणतन्त्र सँ बेसी एखन देशमे संघीयता चाही कहैत ओ कहलन्हि संघीयता सँ अस्मिताकेँ पहिचान आ स्वात्तताक वोध होइत अछि । संघीयतामे भाषिकता, जातियता, क्षेत्रीयता, ऐतिहासिकता आ पौराणिकताकेँ प्राकृत रुप सँ देखाइ दैत अछि । भाषाक मामलामे मैथिलीकेँ सर्वसत्तावादिता नहि एतुका सभ भाषा आ संस्कृतिककेँ संगहि एकर समायोजित स्वायत्तता मिच्छुन्नताक पक्षधर रहल अछि । मैथिली भाषा भाषी नेपालमे एखन मोरङ्ग सँ लऽ कऽ रौतहट धरि रहल अछि । ओना मैथिली भाषाक बात करी तऽ धनुषा, महोत्तरी, सिरहा, सप्तरी, मोरङ्ग, सुनसरी, रौतहट, सलार्ही सहितक जिल्लामे बेसी प्रभाव देखल गेल अछि । तहिना मिथिला क्षेत्रक बात करी तऽ पूर्वमे मोरंग सँ लऽ पश्चिममे बाराक सिम्ररौनगढधरि मान जाइत अछि । मैथिली भाषा किछु वर्ष इम्हर सँ गती लेवएमे पाछा पड़ल देख गेल मुदा पहिचानक बात उठि रहल समयमे आ संचारक्षेत्रक विकास भेलाकबाद मैथिली भाषाक विकास पुनः गती लेलक अछि । मैथिली भाषापर अन्य भाषासभ लादल नहि गेल तऽ स्वतः मैथिली आ मिथलाक विकास हएत । समय समयमे मैथिली भाषाकेँ कमजोर करय लेल मैथिलीएकेँ मगही कहि कऽ प्रचार कएल जाएत अछि । ओना भाषा विद योगेन्द्र प्रसाद यादव मगही संक्रिर्णताक उपजकेँ संज्ञा देने छथि तऽ प्राध्यापक परमेश्वर कापड़ि मगहि भाषा राजनीतिक विषपाद रहल बतौने छथि । चाहे जे से मगहि कए नहि प्रचार कएल जाएत ओ मैथिलीए भाषा रहल सभ स्वीकार करैत छथि । तहिना भोजपुरी भाषा मैथिलीपर सेहो भाड़ी भेल जा रहल अछि । मैथिलीक अगिंकाक रुपमे रहल कहल जाएबला भोजपुरी भाषामे अश्लिलताक प्रभाव सँ मैथिलीपर भाड़ी पड़ि रहलाक बादो मैथिलीक अस्तित्व अखनो बाचय सफल भेल अछि । मैथिली भाषाकेँ शासन प्रशासन, लोकसेवा आ अदालतक संगहि संचारी भाषाक रुपमे प्रयोग भेलाक बाद मैथिली भाषाक प्रभाव क्षेत्र बहुत व्यापक होएबाक सम्भावना अछि । आ एना भेलापर मैथिली भाषाकेँ विकास करय नहि पड़त स्वत भऽ जाएत । मैथिली भाषाकेँ राज्य स्तर सँ दू भावनामे नहि राखल जाए तऽ एकर प्रभाव काठमाण्डू सहित अन्य भाषाभाषाीमे सेहो लोकप्रिय अछि । मैथिली भाषाकेँ अपन लिपी होएबाक संगहि एकर अपन निजत्व अछि । २.
अतुलेश्वर तीन तिरहुतिया तेरह पाक मिथिला आ मैथिली भाषाक बाबा विश्वनाथक नगर काशीसँ पौराणिक संबंध रहल अछि। मिथिलाक लोक मोक्ष प्राप्तिक कामनाक लेल काशी वासक बड्ड बेशी महत्व दैत छलाह तँ दोसर दिशि एहिठामक लोकक उच्च शिक्षाक आकर्षणक केन्द्र छल काशी। एहि तरहेँ सोचल जाए सकैत अछि जे मैथिली भाषाक आधुनिक कालकेर विकास एहीठाम प्रारम्भ भए मैथिली भाषाक आधुनिकीकरणक निओँ पड़ल होएत। ई तँ सर्वविदित अछि जे मैथिलीक लेल आन्दोलनक प्रारम्भ आ आन्दोलनकें मिथिलाक लोकसँ जोड़बाक रणनीति काशीअहिसँ प्रारम्भ भेल । मुदा, हेमनिमे देखबामे आबि रहल अछि जे काशी मिथिलाक लोक-भावनासँ तँ निश्चित रुपेँ जुड़ल अछि, परञ्च लोकसँ नहि । मिथिलाक लोक आइ उच्च शिक्षाक हेतु जतए आन-आन ठाम जाइत छथि तँ तीर्थ करबाक लेल सेहो काशी सँ बेशी दक्षिण वा उत्तर दिशि। कहल जाइत छैक जे सामाजिक-धार्मिक वा अन्य भावना लोककें कोनो स्थान सँ जोड़ैत अछि। आइ काशीक प्रति मिथिलाक लोकक भावनामे ह्रास आयल अछि। काशी, जे कहिओ सभ मिथिलाबासीक हृदयमे बास करैत छल, आइ बहुतो दूर चलि गेल अछि। हेमनिमे हम काशी हिन्दू विश्वविद्यालयमे एकटा कार्यशालामे गेल रही, लगभग पन्द्रह दिन ओतय रहलहुँ, मुदा हमरा ओ काशी नहि भेटल, जतए कहियो मिथिलाक लेल जागरण कयल गेल छल। बहुतो प्रयास कएलाक बादो नहि तँ केओ जागरणक चर्चा कयनिहार आ नहि केओ जागरण कयनिहारक। लागल जेना हुनकासभकेँ एहि प्रकारक कोनो जागरणक ज्ञानो नहि छनि। कारण कार्यशालामध्य जखन हम चर्च कएल जे कहियो मैथिली भाषाक पढ़ाइ एहि विश्वविद्यालय मे होइत छल, तँ से सुनि ओतय उपस्थित मैथिल आ अमैथिल अकचका गेलाह। अत्यन्त दु:ख भेल ई सोचि जे हमसभ कतबा सुस्त भए गेलहुँ अछि अपन मातृभाषाक प्रतिऐँ। एक दिशि आन भाषाभाषी गर्भमे नुकाएल अपन इतिहास बहार करबामे व्यस्त छथि आ हमसभ अपन इतिहासकेँ बिसरबामे। मोन पड़ल जे कहियो हमर सभक बुद्धिजीवी वर्ग अपन भाषा आ माटिकें सम्मान देबाक लेल लड़ैत छलाह, मुदा आजुक बुद्धिजीवी वर्ग बसुलिऐ धारकेर प्रकृत्तिसँ आबद्ध भए अपन माटि आ भाषाक चिन्तन छोड़ि चुकल छथि। कहबाक अभिप्राय जे कतेको संघर्ष सँ हमर-अहाँक पूर्वजलोकनि मैथिलीकें अखिल भारतीय साहित्यिक मंच सँ जोड़लनि। हुनकासभक सोच छल जे मैथिलीकेँ विस्तृत परिवेश प्राप्त होएतैक, जाहिसँ साहित्यिक समृद्धि होएत। मुदा, अत्यन्त कष्टक अनुभूति होइछ, जखन आजुक कर्णधारलोकनिकेँ ‘स्व’केर फेरमे पड़ल देखैत छी। किछु एहने सोचनीय स्थितिमे अपन उद्वेग जखन एकटा मित्र लग राखल तँ हुनक कहब छल जे ई तँ अदौसँ होइत आबि रहल अछि। हमसभ अपनेँ जाँघ पर कुरहरि चलएबामे बड़ आगू छी, भने किछु कालक हेतु किछु सुविधा प्राप्त भए जाए। हुनक कहब छल जे अहाँक चिन्ता साहित्य अकादमी पुरस्कारक स्थिति देखि भए रहल अछि, मुदा ई तँ बहुतो दिनसँ होइत आबि रहल अछि। पुरस्कार प्राप्त करबाक हेतु गुटबाजी करए पड़त, नहि तँ चकोर बनि ओसक बुन्नकेर आशामे जीवन व्यतीत भए जाएत। मैथिली मे आई धरि जतेक अकादमी पुरस्कार भेटल अछि, ओकर जँ उचित मूल्यांकन कयल जाय तँ देखब जे बेशीतर मात्र गुटक प्रसंशक वा हुनक दया पात्रहि पुरस्कारसँ सिंचित भेलाह अछि, एहि हेतु चाहे केहनो साहित्यकार वा साहित्य होथु, हुनक बलिदान देल गेल। ओहि मित्रक एकटा आर बात बहुत दुखदायी छल जे मैथिलीक जाहि पुस्तककें साहित्य अकादमी पुरस्कार भेटल अछि, ओहि मे किछु लेखकक पुस्तककेँ छोड़ि बाँकी पुस्तकक अनुवाद जखन दोसर भाषामे कयल जायत तँ दोसर भाषा-भाषी इएह सोचताह जे मैथिली मे अखनि लेखन आरम्भ भेल अछि, किएक तँ ओ पुस्तक रचनाकारक प्रारम्भिके चरणक होइत छनि। हुनक ई समालोचना सुनि हमरा भेल जे यदि ई भावना सत्य तँ कि मैथिली अपन परिवेशकेँ बढ़ा नहि सकत? सङहि सोचनीय विषय इहो जे एहि भाषाक प्रतिभा गुटबाजीक फेरासँ उबरबाक हेतु दोसर भाषाक दिस आकृष्ट नहि भए जाथि। हमरा जनैत एकर एकमात्र उपाय अछि जे माँ मैथिली एहि तथाकठित मठाधीशलोकनिकेँ सद्बुद्धि देथुन जे ओ सभ अपन व्यावहारिक पक्षमे पारदर्शिता आनथि, पहिनेँ माँ मैथिलीक हित देखथु, तखन अपन। ओना मैथिलक हेतु तँ कहले गेल अछि जे ‘तीन तिरहुतिया तेरह पाक’, जकरा साहित्य अकादमी पुरस्कारक चयन समितिक सदस्यलोकनिक मध्य चरितार्थ होइत देखि एतबा सोचबाक हेतु बाध्य कएलक। काशी मे घुमबाक समय जे मैथिल भेटैत छलाह आ जखनि हुनका लोकनिसँ मैथिली मे गप्प करैत छलहुँ तँ एकटा अलग आनन्द भेटैत छल(ओ मैथिल मात्र बुद्धिजीविए नहि अपितु साधारण मजदूर वर्गक सेहो होइत छलाह ), ओतेक आनन्द जे गंगा आ विश्वनाथ दर्शन सँ नहि भेटैत छल। एहीक्रममे मकर संक्रान्ति दिन अस्सी घाट पर रिक्शा चालक पासवान जीक गप्प मोन पड़ैत अछि, जनिक उक्ति छल जे हमर भाषा मैथिली बड़्ड मीठ छैक, मजबूरी आ पेटक कारणेँ मैथिली छोड़ि दोसर भाषा बजैत छी। हुनक एहन उक्ति सुनि हम पुन: सोचबाक हेतु बाध्य भेलहुँ जे जँ एहिना पढ़ल-लिखल व्यक्तिओ सोचथि, तँ माँ मैथिलीक केहन दिन होएतनि? अन्त मे आदरणीय साकेतानन्दजीक आकस्मिक देहावसान बड़ कष्टप्रद, काशीमे हुनका अवसानक मादे चर्चा करैत डा. अजय मिश्र कहलन्हि जे एकटा सहज लोक चलि गेलाह मैथिली संसारसँ। ठीके, राजशी ठाठ-बाट छोड़ि आमजनक जीवन व्यतीत करैत साकेतानन्दजीक सौम्य मुखमंडल आगाँ नाचि उठल। मुदा, ई तँ ईश्वरेच्छा। हुनकहि हाथ सद्गति, सद्बुद्धि आ सद्भावना, प्रार्थना जे मैथिलीक तथाकथित भाग्यनिर्मातालोकनिकेँ मुक्त हाथेँ बाँटथु सद्बुद्धि। ३. पूनम मण्डल स्थानीय कवि परिषद (सलहेसबाबा परिसर- औरहा) वार्षिकोत्सव- 2012. दिनांक- 27 जनवरी 2012 (शुक्र दिन) स्थानीय कवि परिषदक चारिम वार्षिकोत्सव-2012क अवसरपर सम्मान समारोह आ कवि सम्मेलन श्री उमेश पासवानक संजोजकत्वमे सुसम्पन्न भेल। स्थान- सलहेसबाबा परिसर- औरहा, प्रखण्ड- लौकही, जिला- मधुबनी, समए- 11: 00 बजे (पूर्वाहन)सँ संध्या 5 बजे धरि कार्यक्रम चलैत रहल। कार्यक्रमकेँ दीप प्रज्वलित क' विधिवत् उद्घाटन केलनि वनगामा (उत्तरी) पंचायतक मुखिया श्री दयानंद साह आ सरपंच श्री नूनू साहजी। मैथिली साहित्यक श्रेष्ठ कथाकार, नाटकरकार, उपन्यासकार आ कवि श्री जगदीश प्रसाद मंडल, एकैसम् शताब्दीक पहिल दशकक सर्वश्रेष्ठ कवि श्री राजदेव मंडल आ कवि श्री अच्छेलाल शास्त्री जीकेँ नव वस्त्रक संग प्रो राधाकृष्ण चौधरी लिखित ‘मिथिलाक इतिहास’ आ मैथिली साहित्यक सर्वश्रेष्ठ बाल-साहित्य ‘मिथिलाक लोकदेवता’ (श्रीमती प्रीति ठाकुर) पोथीसँ सम्मानित कएल गेलनि। सम्मान समारोहक अध्यक्षता केलनि श्री मिथिलेश सिंह (शिक्षक, मध्य विद्यालय- महदेवा, मधुबनी) आ मंच संचालन श्री दुर्गानंद मण्डल आ संजीव कुमार शमा। कार्यक्रमकेँ आगाँ बढ़ाओल गेल श्री राधाकान्त मण्डलक स्वलिखित स्वागत गीत- हे मिथिलावासी कविवर, स्वागत हमर स्वीकार करू....सँ। ‘आशासँ फूलक माला लेने हम ठाढ़......’ सुन्दर गीतसँ प्रो. उपेन्द्र नारायण अनुपमजी सेहो स्वागत केलनि। तकरबाद स्वागत भाषण प्रस्तुत केलनि प्रो. कपिलेश्वर साहु जी आ स्वागत कविताक अतिविशिष्ठ पाठ केलनि- श्री रामविलास साहुजी। पहिल सत्रक समापनक बाद दोसर सत्र प्रारम्भ भेल जइमे लगभग 2 दर्जनसँ बेसी कवि लोकनि अपन-अपन नूतन कविताक पाठ केलनि जे ऐ तरहेँ भेल- अवकाश प्राप्त शिक्षक- श्री दुखन प्रसाद यादव- गरीबी, गणतंत्र, हमर भारत छै, श्री नंदविलास राय- मानवता, शिक्षित बेरोजगार, लक्ष्मी दास- लौटिया, अखिलेश कुमार मण्डल- जिनगी, रामविलास साहु- प्रेमक भूखल, माघक जाड़, हमर गाम घर, उमेश मण्डल- आगाँ अबै जाउ, आत्म विश्वास, अढ़ाइ हाथ, प्रो. उपेन्द्र नारायाण साह- छी कनी, प्रो. कपिलेश्वर साह- गामक घटक, श्री विरेन्द्र कुमार यादव- मारल बुइध, श्री हेमनारायण साह- व्यथा, श्री कुसुम लाल मंडल- ठाढ़ी, श्री राजदेव मंडल- कामना, श्री अच्छेलाल शास्त्री- हवा बहैत अछि सन-सन-सन, श्री जगदीश प्रसाद मण्डल- किछु सिखू किछु करू, उमेश पासवान- रगड़ा, संजीव कुमार शमा- भेल छने अन्हार, गप मजगर कह, प्रो. रमेश कुमार मंडल- आत्म-हत्या, अहिना श्री आशीष कुमार सिंह, श्री अमरनाथ यादव, संजय कुमार सिंह, सोनेलाल यादव, रामप्रवेश मंडल, राधाकान्त मंडल आदि। ऐ अवसरपर लौकही थानाध्यक्ष श्री राज किशोर बैठा, श्री गुप्ता प्रसाद सिंह, एस. आइ. लौकही, मधुबनी, छिन्नमस्तिका एफ.एम, राजविराज, नेपालसँ आएल प्रमोद प्रियदर्शी, भूतपूर्व सरपंच श्री रामनारायण यादव, शिक्षक श्री सत्य नारायण मण्डल, डंगराहा पंचायतक भूतपूर्व मुखिया श्री रामप्रीत मंडल जीक संग-संग लगभग पाँच सएसँ ऊपर लोक समारोहमे भाग लेलनि। ‘विदेह’ मैथिली पोथी प्रदर्शनीसँ ग्रामीण सभमे काफी हर्ष देखबामे आएल। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। ३. पद्य ३.१.कामिनी कामायनी-गांधारी ३.२.१.ओमप्रकाश झा- किछु गजल २.रूबी झा ३.शान्तिलक्ष्मी चौधरी ४. शिव कुमार झा ३.३.१.जगदीश चन्द्र ठाकुर ’अनिल’ २.जगदानंद झा 'मनु' -गीत-गजल ३.४.१.अंजनी कुमार वर्मा २.बलराम साह ३.उमेश पासवान ४. रामविलास साहु ५. संजीव कुमार ‘शमा’ ६. सुधीर कुमार ‘सुमन’ ७.उपेन्द्र नारायण ‘अनुपम’८. नारायण झा ३.५.१.जगदीश प्रसाद मण्डल २.कपिलेश्वर राउत ३.६.१.डाॅ. शिव कुमार प्रसाद २.सत्यनारायण झा ३.जवाहर लाल कश्यप ४.किशन कारीगर ३.७.१.डॉ॰ शशिधर कुमर २.नवीन कुमार "आशा" ३.८.१.प्रो. राजकुमार नीलकंठ २.राजदेव मण्डल कामिनी कामायनी 2011 दिसंबर मास मे महात्मा बुद्व के महासंबोधि प्राप्ति के 2600 बरख भेलोपरांत ’हम हुनक अद्र्धांगिनी के मोन पाङैत ई काव्य कुसुम हुनक चरण कमलेषु मे समर्पित कय रहल छी । .. गांधारी हिय मे शूल.. .. .मुदा भाव निर्मूल रहि रहि क’ उठैत ई आह करैत अछि करेज के स्याह कानू त’ कत्तेक आ’ फाटू त’ कत्तेक । सबटा नोर एके बेर सहस्त धार बनि चुबि गेल छल ऑखि सॅ जखन पितामहक ई उदघोष
कर्ण कुटीर के चीरैत छाती मे पवेशकरैत मचा देने छल पलय जे पराजित नरेशक’ सर्वांग सुन्नरि विजित क’ हाथ मे सौंप देल जाए तखन की ऋ आकाश मे उङैत पाखी क्षण भरि उङनाय तजि चिंतित आ’ व्याकुल छल बाध बोन मे चरैत उमकैत बैसल ठाढ पसु उद्विग्न भ’ . . . माथ झुका परती के निहारै छल। तप्पत तप्पत बयार जोर जोर सॅ बहैत तबाही के सनेस पसरैत। अंतरिक्ष मे बैसल इष्टदेव सॅ नम निवेदन करैत चिहुॅकि क’ बाजि उठल छल ई कीऋ कारी कारी मेघ अपन लट छितरेने उद्दाम अश्व सन दौगैत संपूर्ण नभ मंडल प’ पसरि त’ गेल मुदा स्वयं के आघात दैत पीटैत चिकरैत कंठ फाङि क’ कानब सॅ पहिनहीं माथ प’ हाथ धेने गुमसुम गुमसुम चुप्पेचाप .. . . .नहि जानि कोन कोन मे गेल बिला तखन कीऋ ओहो अपन रत्नजङित पलंग प’ कतेक काल धरि अपार केस रासि फोलने पेटकुनिया देने .. . . रहितथि पङल नहुॅ नहुॅ क’ भवनक पट्ट खोलि द्वार प’लटकल पीजङा सॅ निहारैत सुग्गा सॅ उदास भ’ बजै ल’ चाहल आखर लाजै . . . .मुॅह सॅ नहि बहरायल मुदा अवज्ञा कोना राजकुम्मरिक’ आबैत काल . . . देखल सब . . . कोना लङखङाति डगमगैत . . हकमैत. तोतराति आध छिध आखर .. . जेठक’ सूखैल घासक’ ढेर जकॉ दग्ध हिय मे लुत्ती लगा सनासन . .जरय लेल उकसाबए लगलै पिंजङा मे बन्न सुगबा. . .आखरक ताप नहि सकल सहि आ’ क्षण मात मे ओकर प्राण । कुम्मरि के हाथ मे रहि गेलेै मुदा ओ कानियो नहि सकलिह समस्त नोर .. . एके बेर. . .सहस्त धार बनि ऑखि सॅ चूबि चुकल छल। करेज फाटय के स्थिति मे क़त्तए ओ त’ बज भेल आ’ बज कत्तौ फाटय ओ त’ फाङब टा जानैत अछि । सब टा पट्ट महिषी .. .सखी सहेली सन्न एहेन कोन पन्न केहेन ई विध्वंसी . . . रचल चक चालि नहि जानि विधाता .. . देलन्हि ई केहेन आघात सहस्त्रो वजपात एक संग . . .क्षण भरि मे उन्मुक्त हवा के सहचरी सुशील कोमलांगी परी केहेन विषाक्त जेना बरख क’ ज्वरोपरांत उठल जुबती मुरूझायल अङहूल सन . . . निस्तेज मुख मंडल ऑखि मे पसरल दूर दूर धरि सन्नाटा
कपोल द्वय प’ नोर मे भींजल काजरक’ चॉटा । ई अथाह दारूण .. केहेन करूणा कत्तेक व्यथा । मुदा काल शीघता सॅ बुलैत बॉचय जा रहल छल कोनो आओर पलयंकारी कथा । दारूण दुख हिस्सा मे नहि तोरे टा सब किछु त’ संग अछि ....रहत नै नोरे टा ठठा क’ हॅसल छल कत्तो कोनो राजा सजाबए लै महफा बजाबए लै बाजा । आ’ दौङैत रथ क’ स्वर्ण जङित चक्का मे ओझरायल अगनित कत्तेक रास खिस्सा आईयो कहैत अछि उङि उङि क’ रज कण कोना ओ कचनारि बेकल भ’ निहारल हवेली आ जन जन के मन मे उतारल ओ हरियर पीयर लाल कारी दुपट्टा ओ लहंगा ओ चुनरि चानी के पनबट्टा उङैत तूर सन ओ संध्या कुमारि असरफी ओ मोती ओ हीरा जवाहरि’ बिछिया हॅसुली बाजुबंद साङी नथिया ओ टीका मखमल ओ अटारी निहारल भरि ऑखि रूप जीनगी के पकृति धरा के माता बहिन के फफा क’ कानल काल देखि अपन करनी एकरे चुनल किएक अही परीक्षा घङी लेल मुदा भाग्य अप्पन कयल पूर्ब जन्मक तथापि निरासक लुत्ती मिझाबैत ओ ज्ञानी स्वयं कारी पट्टी बनल छल आ’ सुन्नरि सुनारि के दृग प चढल छल पति परमेश्वर जखन छथि नयन बिन त’ देखब नजरि सॅ हम किएक ई दिन ठिठुरैत . . .निहुरैत . . दुलारैत . मनाबैत चलल छल विधाता अपने हिसाबे मुदा हाथ मे आब ओकर डोर कत्तय ऋ ओ अपने पहिया के दॉत सॅ झीकैत बढल जा रहल छल देखय खेल बिक्कट ।
इन्द्रासनक परी. . .ऑखि प पट्टी केहेन. . . ई गर्विनी . .यक्षिणी. . . सुखदायी परम नागिन सन फुफकारैत . .कारी जुट्टी. . . बेकल अछि छुबए लेल नगर के माटि वाक विहिन. .सब . .झहरै छै नोर कत्तो नै उत्साह नै कोनो सोर क़त्तेक काल सॅ ठकुआयल ठाढ अछि भोर .. बिसरल अछि नाचय पमरिया आ’ मोर तखन राजपंडित महाशंख बजाओल आगॉ बढि क’ सोहागिन महफा सॅ उतारेत समवेत स्वर मे मंगल गान गायल विधना लिखल हमहू पात सब छी ई रानी हमर भावी राज्य माता नयन बिनुसहचर के कथा छल सुनल सब सबटा नीति के चालि बुझि रानी लै मन मे अथाह स्नेह उमङल ताबैत शोक सॅ उबैर क’ बहुरिया धो मॉजि अपन व्योहार के चमकायल सिनेहक मजगूत डोरी बांधवा मे कलेसक’ ताप ताग के’ जरा दै रहि रहि क’ ओ करूण वेदना आबै हिय के डॉवा डोल करै मुदा ओकर कोढ कहियो नहि फाटल ओ त’ कहिया कत्त नै बज भ’ गेल छल आ’ बज फटै नै फाङै छै सबके एकसरि जुबति .. .जौवन अपरूप पणय निवेदन .. .पति के पतीक्षा पसूति गृह सॅ . .अबैत पथम बाल क्रंदन . . डोलाबैत हिय के . . . अतिशय कोमल गाछ ..वा . . पानि बिनु तङफङाइत .. .छिलमिलाईत माछ . . अथवा कनसारि क’ बौल मे भङभङा क’ फूटैत लाबा सिंहासन सॅ दौगैत त’ मुदा वीरांगी .. . संयमी. . .क्षत्राणी क’ बहकल पएर. . ठामे ठाम ठमकल क़त्तेक स्वर गुंजायमान भेल कान मे दासी के स्वर सॅ बनल पतिबिम्ब गौर भुर्राक़ . .चन्दमासन .कारी औंठिया केश पैघ पैघ ऑखि वला .. स्वस्थ . भावी नरेशक वर्णन सुनि ओकर हाथ सॅ झपट्टा मारिक’ छीनैत नेना के. . .अपन दग्घ हिय सॅ लगौने ‘ नयन रहितौ नयन विहिन . . कतेक पैघ विपत्ति कतेक कठोर पण. . केहेन घोर तप मात बीत्त भरि क’ दूरी प ऑखि . क्षण मात मे पट्टी झटैक़ . . विस्फारित दृष्टि सॅ . .भरि पोख तकैत.... . .अपन लाल के. . . मुदा बज बनल करेज़ . बज नहि फाटैत अछि बज फाङैत अछि। आ’ हाथ कखनो . कर्मक रेघा नांघए के कोरसिस सेहो नहि कयल तखन समय काल के सेहो होबैेत रहलै प्राण बेकल. . एकसरि रूपवती. . .जौवन भार सॅ दबल. . हाथ सॅ टउआ क’ निहारैत नेना शिशु सबहक रूप एहेन केस रासि .. ओहेन मजगुत भुजबल राजीव लोचन . .मक्खन. . मोलायम चितवन पीतांबरी के गोटा .. . धनुषक’ नक्काशी. . .चेरी कहैत अछि. . .आ’ नैनन मे हुनक उपस्थित भ’.. .अतीत .. फरीछा दैत छन्हि सब किछु. . .पटोरक रंग़ .पलंगक़ . चद्दरि. . . .खिङकी. .दलानक’ परदा . . स्त्रीगण सबहक रूप गुण . . .सुनैत गुनैत. . . बसौने अपन मस्तिष्क मे . . एक गोट अजगुत संसार जौं पति नयन बिन . .आखीर तखन रहल की . . हुनक़ . भाग्य संसार. . पुर स्वामिनी . .महारानी. . .अभिमानी .. . . एतेक विस्तृत सामाज्य . .जीबए केर. .ई केहन सुन्नर आधार. . तखन रानी मात कान . . कान बनि गेलन्हि . रोम रोम । भनसा सॅ आबैत सुगंध. . पाक विद्या के पवीण हस्त भॉति भॉति क’ सामागी .. .मात गंध सॅ चिन्हैत. . . परोसति थारी मे स्वामी के. . .विहृवल भ’ पूछि लैथ ‘ई पायस केहेन आर्य ..’ . बनौने हमी छी . च्ोटी अछि पमाण ..।’ . विहॅसि श्रीमान .. बढाबैत ..अतिशय स्नेह सॅ पकंपित अपन बाम हाथ. . . . पमाणक’ कोन पयोजन ऋ.. . जखन हम दूनू नयन विहिन .. . हम जन्मजात . . अहॉक .स्नेह प आघात. भेल भानस. . .अहॉक स्पर्श मात सॅ. रसमय. मधुमय. . . भ’ उठैत अछि. . . .आ’ ई त’ सद्यः अपने कोमल हाथ सॅ रान्हल. . थामैत राजा के बढल हाथ. शब्द मात सॅ हृदय मे उठैत सिनेहक तीव . . .वेगवती धार के छुबैत. . .पकङि हुनक अर्इंठ हाथ. . .कठौत मे धोबए लेल . . दासी बढौलक जलपात ..। . निशा राति मे नीन्न .. किए नै किए बनि दियाद. . . लङए लागैत अछि ऑखि सॅ. . भवनक’ छत प’. .सिहकैत बयार मे .. नहुॅ नहुॅ टहलैत . . हाथ पकङने चेरी कहैत. . . आय अकास मे बङका टा के चान निकसल छै. . केहेन पीयर . .. जेना दूध मे फेंट देने होय केसर कियो. . ।. आ अनेको बिम्ब . . . विगत क’ चान के. . ऑखिक सोझा थरथर कॉपैत. . पूछि रहल .. . कोन अपराध हमर कहु सुन्नरी किएक नै हमरा हेरी रहल छी. . . .चकोर बताह बनल हमरा लै. . .अहॉ केना विरक्त बनल. .? . मुदा ओ पण .. . हिय प लागल छल जे वण. . करेज वज भ’ गेल छल. . .आ’ बज फटैत नहि अछि फाङैत अछि । मस्तिष्क मे बसल सबटा कोलाहल. . समय काल पाबि अर्थ गहण करैत ठाढ भेल सचित . .सावाक .. .आ अनायास . . .जीवन जीबा मे कोनो विशेष नहि देखैत कंटक मुदा काज पयोजन. . . शिशु बालकक उपनैन वा विद्याभ्यास .. . विवाह दान .. .परिछन. .चुमौन .. . समय ककर बंधुआ. . . ककर खवास एहेन पण .. .आय धरि के ज्ञात इतिहास मे । निभा सकल के. . . ताहू मे एकगोट नारि. . जेकरा लेल अहि समाजक नियत सदिखन विकट .. सूर्य. चन्द. .्र .गह नक्षत ्र्र.. .ताहि सॅ उपजल . .्र्र .वत उपवास सॅ एकदम फराक ........... .. . . . आन आन वत . .्र मात अन्न .पानि त्यागि भूमि शयन .. .अग्नि गमन वा एहने सन किछु .. ंमुदा ओ वत आ ई. . .असंभव. . दुसाध्य. . आजीवन दृष्टि बाध्य अछैत दृग़ .. . .्र स्ती एक गोट खेलौना. .्र्र . राज्य जीतबाक कम मे . . . ्र जीत लिअ ओकरो .. .ओ एकगोट वस्तु मात .. ्र. . फहराबू अपन ध्वजा. . .अपन वर्चस्व ्र ओकर कोन र्दद. . .अभिलाष वा ज्ञान .. मात सेविका .. . परिचारिका .. .्र तखन की. . .्र्र तखन विधान इएह बनौल ई समाज .. . जे स्ती आखीर उठौत किएक आवाज़ . .्र घेंट प’ बङका टा के फट्टा आ’ माथ प’ दुपट्टा .. .्र आ मजबूरि क अथाह समुद कत्त ..्र डूबब ्र.. . कत्त ..्र पौङब .. ्र. ताहू मे पराजित राज के दुहिता .. .्र मुदा भाग्य दासी नहि रानी सेहो बनायल. . . . . . . . . .आय सहस्तों बरिख बाद जुग औचक जेना जागि उठल बङका बङका परचम फहराबैत. ्र .. . पूछि रहल अछि हुनका सॅ. . .्र्र्र्र आखीर किएक बान्हल ऑखि प’ पट्टी. . ्र. ई अज्ञानता वा परम निराशा अतीत के एक गोट दुसह दुखद दिन देखौलक संसार क’ पथम विश्व जुद्व. . . कुरूक्षेतक जुद्व ..्र . कारण . ..मूल मे माते. . . . सौ टा संतान करैत घमासान. . .्र जिनक सहस्त पुत कोना नै हेतै एहेन जुद्व. . . . आ तखन ऑखि प’ पट्टी .. . ्र जानि बूझि क’ रहय लेल .. ्र. सत्य सॅ अनभिज्ञ. . . .्र अहॉ के नजरि मे सुयोधन .. .सुयोधने रहि गेल. . .्र्र मुदा कर्म. . .आ .. समाज धेल दोसरि नाम .. .सु’ हटि क’ दु’. . .आ इएह एक गोट आखर .. .्र भ’ गेलै पाथर. . . . ्र ंमानवता के संहारक़ . .आत्याचारी . .लोलूप. . ्र. ंमाता के कोमल उपदेश . . द सकैत छल इतिहास के एक गोट नीक संकेत. .्र आ’ वन वन नहि भटैक़ . ्र. पॉच गाम. . सॅ संतुष्ट .. ्र्र भ’ जयतथि अनंत मे विलिन. .्र . . मुदा युद्व त’ कदापि नहि . तङपि क कहलैन्ह जुग सॅ सुननेछी अहू सुरू सॅ. . . हमरा.. प’ जे कलंक लागै . मुदा अन्याय के गाछ प’ न्यायक फङ नै लागै छै .. . सत्य ई अहि गप के रहि गेलन्हि हुनको मन मे खेद. . . . किएक एहेन विभेद. . ्र. एके कुलक लोक एक दोसरा लेल. .. एतेक पैघ अरि .... . . . हे हरि. . . . . .तखन बहल जतेक शोणित आ’ नोर .. . . हिय नै रहल्ौ कठोर. . छल ओ सहस्त पुतक जननी. .के. . . .युद्व भूमि मे करैत. . हृदय .दावक विलाप. . असहृय वेदना. . . करूण संताप सुनौलन्हि जदुनंदन के भरि पोख सराप. . अहि संहार के .. ओएह संचालक . . अजस्त नोर सॅ . .पट्टी पारदर्शी भ’ . . .दृष्टिगत कयल सबटा नर संहार. .सुन्नर .. .विलक्षण काया . . पङल अंग भंग भेल. . .खसल माटीक मूरत .. .नै बाजय. .्र नै भूकय लेल .. ओ माटिक बासन सब . .एखन धरि नहि भांगल .. .अछि अजहू राखल आंगन. . .ताहि मे पोषल पूत सब कोना .. .एतेक शीघ भेला सपन . मात एक स्ती के माथ प’ कलंक़ . ्र आ’ अपने बुलि रहल छी निःशंक़ . . . हे रणछोङ . . कहै छी हिय तोङि. . चतुराई सॅ अहॉ के अपना अधीन करि के सकैत अछि. ्र. .जे स्वयं चौसठो कला मे पवीण. . .छल सॅ .. बल सॅ . .कौसल सॅ. . .तोङितौ सारथिसुत क अभिमान .. एकसर दुरजोधनक अज्ञान .. . ककरा बल प’ लङबा लेल ताल ठोकितै . . अहॉसन ज्ञानी. . .त्रिलोक दर्शी कहेबाक दंभ रखैत .. ्र. एतेक नहि भेल जे खूनक ई फाग रोकि दैतिएक़ . . . . चारू कात धधकैत आग़ि . . ताहि मे अहॉ तकैत छलहू केहेन न्याय . . . फुसियाही के खेल मे .. . सोचैत रहि गेलौं उपाय .. . चालि शतरंजक चला देलियै. . .अपने पाछॉ हटि क’ .. . मति भष्ट सब के जुटा देलियै. . धिया पुत्ता के कर्म के .. नाम देलियै धर्म के. . . युद्व त’ युद्व होइत छै. .परिणाम . .नर संहार. . तखन एकरा धर्मक नाम किएक देल. . धर्म की अछि .. . कहूॅ विस्तार सॅ .. . . . हङपब .. . मारब . .लूटब. . .जारब .. जाहि समस्याक समाधान . . .गप सॅ भ’ सकैत छल. . .ताहि लेल तरूआरि . . गङासा. .तीर धनुक्ख़ . ई कोन जुगक मनुक्ख .. . पाषाण कालक’ वा. . .ताहू सॅ पहिने के आदिम . . हे अवतारी. . .अहॉ त’ तखनो पकट भेलहु . .भरल सभा मे दा्रैपदी के जखन भ’ रहल छल चीर हरण. . .नूआ त’ बढा क’ वाह वाही लुटल . .जे पांचाली के लाजबचि गेल मुदा अहि कुकृत्यक विरोध मे स्वर त’ उठौबितौ. . गुरूजन. . . दूरजोधन के ललकारिक . .मल्लजुद्व मे पछाङि क’ . . शिक्षा त’ दैतियैक नैतिक़ . . .पांडव दिस स्नेह सिक्त .. . ..कौरव दिस फूटल दृष्टि. . . . आखिर कियै केशव. .्र . हित त’ पांडव के सेहो कतए. . . सब कानि खींझी क’ विलखि विलखि क’ अपन अपन शिविर मे . . . .करि रहल अछि . दारूण विलाप .. . कतए अहॉ के जय जय कार . . .सब युक्ति . . सब तर्क बेकार. . अहूॅ त’ एतबे मे रहि गेलहू. . . ..प्रेम सॅ नहि पूछल त’ साग विदूरक घर खेलहूॅ. . . . ओ समय मान सम्मान करेबाक कतए छल. . प्रेम त’ कत्तेक देल गोपी . . .तैयो तरसल. . देखैत रहलहू धर्मक’ रथ प’ चढल . .भाय भाय के कूक्कूर जकॉ लङल. . . अहि मे अहॉ क’ की विराटता . .पत्यक्ष ठाढ अपने. . .आ’ हस्तिनापुरक दू टा कुलक’ सर्वनाश भ गेलै. . . तखन अहॉ केहेन भगवान .. . .नहि जानि की छल. . .अहॉक दृष्टि .. . .अहॉक ईमान. . कतए उठाबए चाहैत छल स्वजन प’ पांडव अपन गांडीव. . . . निषिद्व भीख लेल मोन बना क’ पङारहल छल निर्जन मे . . . .सदाचारी ओ . . गुरूजन सोझॉ कहियो माथ नै उठाओल. . उकसा उकसा हाथ मे ओकरा हथियार पकङाओल शंखनाद करि रक्त जरैलौ कोखि उजाङय लेल. . स्त्रीजाति के . .धिक्कार अछि हे कृष्ण. . आयल छलहूॅ बहन्ना करि क’ मारए लेल वा तारय लेल ओ लूल्ह. . ई लांगङ. . .ओ कोढ़ि . .ई आन्हर. . ्र. एयह छल अहॉक सैन्य बल . . . ..वा कोनो पैघ छल .. तिल के ताङ . . राई के पहाङ .. . .ताहि प’ अपने ठाढ़ . .नेने हाथ मे सुदर्शन चक. . .बनौने दृष्टि वक .. . केकरा छल बनेबाक छिन्नमस्ता . . हमहू छी ठाढ़ .काटू हमर मत्था. . . . हे तेजस्वी पुरूख .. . देखने होयत जे अहॉक रूप . . आश्चर्य हेतै जुग के. . नायक . . महानायक . .देखि क’ दृश्य. . .फटैत अछि कियेक नहि करेज़ . . होबैत अछि किएक नहि मन मे कोनो दरेग .. . . सुनि क’ एहेन आत्र्तनाद .. . . .दिग्दिगंत धरि भ’ चुकल अछि .. .आका्रंत . . अहॉ एहेन निस्पृह.. . नहि कोनो मोह . . .नहि सिनेह. . . . भीषण ताप सॅ चट्टान सेहो भ’ जाईत अछि विखंडित. . . . .नारि अहॉ के नेह सॅ सराबोर करि देलक . .त’ दोसरो नारिए अहॉक अभिशप्त सेहो कय रहल. . लिखू. . . दिवस .. .समय .. . स्थान .. .्र्र . अहिना अहॉक कुलक घमासान . . . शोणितक एकएक बूॅद जरबैत .. . .करत चित्कार. . फाटत माथ कपार. . . आ’ ओहि शोकाकुल मानस दशा मे . . .करब अपने धरती सॅ पस्थान. . . . .अंत अहू के निकट. . . . होयत एतबै बिकट. . . . कनैत बजैत गांधारी ..्र . संभारैत अपन साङी . . .क्षण मात मे ततेक कमजोर . . जेना . .जन्मजात अशक्त . . .नहूॅ नहॅू . .पहुचल छली त’ महल मे. . मुदा सुनि कोलाहल .. . . कुंतीक वन गमनक’. . . पति सॅ कयल निवेदन. . . आब एत्त की .. . .कतेक सूनब सोर. . . .अहि कष्टक .. . कोन छोर. . . .नहि छल भाग्य मे जे सुख . .तेकर कोन दुख़ . . .लिखनहार सॅ केहेन बैर. . .स्वप्न छल जरि गेल. . . . .सूल सॅ भरल ई महल .. . आब कत्तय रहय बला रहल. . . कान मे सदिखन गुॅजैत अछि . .पुत . .पौत. . .सखा मीतक स्वर . . हिय मे उठैत अछि लहरि. . . सागरक छाति प’ छटपटाईत बताहि. . ्र. काटैत अछि किंस्याह अपने वंश सन आहि. . जतेक बॉचल आब जीवन. कटि जेतैक चलि क’ वन. . . मस्तिष्क मे शांति आर हेतै त’ कोना .. चलू ओहिना चली. . . चलाबैत छथि विधाता जेना. . . . तीनू गोटे. .संग निकसल. . तप करय ..वा अगिन मे भस्म होबए . .नियति. त’ चुप छल . . . ओकर हाथ मे किछु कत्तय .. . . . . । ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। १.ओमप्रकाश झा- किछु गजल २.रूबी झा ३.शान्तिलक्ष्मी चौधरी ४. शिव कुमार झा १. ओमप्रकाश झा गजल कुशल आबि देख लिअ, एतऽ सबटा आँखि नोर सँ भरल छै। विकास कतऽ भेलै, विकासक दिस इ बाट चोर सँ भरल छै। चिडै सभ कतौ गेल की, मोर घूमैत अछि गाम सगरो, इ बगुला तँ पंख अछि रंगि कऽ, सभा वैह मोर सँ भरल छै। सब नजरि पियासल छल तकैत आकाश चानक दरस केँ, निकलतै इ चान कहिया, आसक धरा चकोर सँ भरल छै। उजाही उठल गाम मे, नै कनै छै करेज ककरो यौ, हमर गाम एखनहुँ खुश गीत गाबैत ठोर सँ भरल छै। कहै छल कियो गौर वर्णक गौरवक एहन अन्हार इ, सब दिस तँ अछि स्याह मोन जखन इ भूमि गोर सँ भरल छै। फऊलुन(ह्रस्व-दीर्घ-दीर्घ)- ६ बेर प्रत्येक पाँति मे गजल कहि कऽ नै मोनक हम तँ बड्ड भेल तबाह छी बाबू। कहब जे मोनक, अहीं बाजब हम बताह छी बाबू। हुनकर गप हम रहलौं जे सुनैत तँ बनल नीक छलौं, गप हुनकर हम नै सुनल, कहथि हम कटाह छी बाबू। सदिखन रहलथि मूतैत अपने आगि सभ केँ दबने, हम कनी डोलि गेलौं, ओ कहै अगिलाह छी बाबू। बनल छल काँचक गिलास हुनके मोनक विचार सुनू, इ अनघोल सगरो भेलै हम तँ टुनकाह छी बाबू। सचक रहि गेल नै जुग, सच कहि कऽ हम छी बनल बुरबक, गप कहल साँच तऽ अहीं कहब "ओम" धराह छी बाबू। (ह्रस्व-दीर्घ-दीर्घ-दीर्घ)--- ४ बेर गजल टूटि-टूटि क' हम त' जोडाइत रहै छी। मोनक विचार सुनि पतियाइत रहै छी। गौरवे आन्हर पडल अपने घरारी, सदिखन मुँह उठा क' अगधाइत रहै छी। हाट मे प्रेमक खरीद करै सब किया, बूझि नै, आब त' हम बिकाइत रहै छी। फहरतै झंडा हमर सब दिस हवा मे, एहि आसेँ खूब फहराइत रहै छी। "ओम"क कपार पर कानि क' की करत ओ, फूसियों हम ताकि औनाइत रहै छी। गजल मुस्की सँ झाँपि रखने छी जरल करेज अपन। सब सँ नुकेने छी दुख भरल करेज अपन। दिल्लगी करै लेल चाही एकटा जीबैत करेज, ककरा परसियै हम मरल करेज अपन। मोहक जुन्ना मे बान्हल हम जोताईत रहै छी, देखैत रहै छी माया मे गडल करेज अपन। कियो देखै नै, तैं केने छी करेज केँ ताला मे बन्न, देखबियै ककरा आब डरल करेज अपन। कोनो गप पर नै चिहुँकै आब करेज "ओम"क, अपने सँ हम घोंटै छी ठरल करेज अपन। ---------------- वर्ण १८ --------------- २ रूबी झा , ग्राम पोस्ट -समसा[मंसूर चक ], जिला -बेगुसराय [बिहार ], सम्प्रति:-गांधीनगर [अहमदाबाद ] [गुजरात ] '' निष्ठुर प्रियतम'' केहेन निष्ठुर जकां प्रियतम, अपन जन के सताबय छी , करेय छी सिनेह अतिसय हम, ताहि सा अहाँ क बताबय छी , उठे ये पीर करेजा मे किएक , अहाँ जनि बुझी दुखाबय छी , सुने छी प्रेम अहाँ अप्पन ता , आंजुर भरी- भरी लूटाबय छी , आबे ये बेर जखन हम्मर ता, देखू किय निकुती नपाबय छी , नै जानि कतेक निदर्दी छी अहाँ , सबटा बुझितो न लजाबय छी , बुझै छी बात ता सबटा हम, अहाँ हमरा की सिखाबइ छी , रहे ये मोन टांगल कतौ अहाँक, आ प्रेम हमरा सां जताबइ छी , ३. शान्तिलक्ष्मी चौधरी गज़ल १ अपने पुरखाक मानदानक जड़ि कोड़य मे सभ लागल छै कियो ककरो कहै घताह कियो ककरो कहै निटट पागल छै बाँसक बंश केँ उकनै बाँसे देखू कुढ़ैड़क पोन मे छै पैसल फ़ाटैत मानक चद्दरि केँ सिबै सुईक पोन कियै नै तागल छै अपने लोकक टाँग घिचैत बेंग केर बनल सभकियो खिस्सा माय सुमैथिलीक करमे बुझाइत आइ भs गेल अभागल छै बरदक कान्हक पालो जनु बुझाइत धीयापुता केँ बड़ भारी छुट्टा खाइत बौआइत एनाहैत जेना अड़िया बछ्छा दागल छै अपन लोकवेद केँ आगु करय आइ जखन दुनियाँ चेतल हमसभ निभेर भेल तैयो सुतल, कहु के कतय जागल छै अहंकारक धाह तापैत मैथिल जनगण छथि अगरमस्त समाजक एहन विचित्र स्वभाव सेँ "शांतिलक्ष्मी"यो नै बागल छै ..........वर्ण २४........ गज़ल २ पेट मे भल खड़ नै हिनका मुदा सिंघ मे तेल छै माय कहै बौआ हमर नुनुआगर, बुरलेल छै जीटजाट फ़ीटफ़ाट, मारय सीटल बिछान सन मारल कंघी लटुरिया जुल्फ़ मे गमकै फुलेल छै जेहने चढ़ल पंथ बौआ तेहने होइन्ह संगति तीन खेप मैटरिक फेल दोस, फेलो मे फलेल छै लभ लिखल फ़ोनटेन लभे उकारल कुंजी-झावा लभ घसल तरहैत तँ कामदेवक गुलेल छै तीर तरकस सँ लैस बोआ चलला शिकार पर कान्ह पर हाथ देनय संगबै भजारी टंडेल छै अंगना घरक नुनुआ छथि सड़क पर उचक्का भरल चालि ढ़ालि मे अवरपनीक अटखेल छै "शांतिलक्ष्मी" देखय छत पर षोडषीक काकचेष्ट बाट ठाढ़ बौआक आंखि मे बकोध्यानक झमेल छै .........वर्ण १९........ गजल ३ छाति तानि ठाढ़ सैनिक दुश्मनक तोप बरसाबैत अंगोरा लहास घिसियावैत कुत्ता पढ़ि कवैती शेर केँ कहै भगोरा सात कोनटाक मरचट्टा बदलै कोन-कोन रंगक नै झन्डा बलिदानीक सारा लागल पाथर केँ की बुझतै ओ लिकलोढा सौ मुनसाक संग जे खेलकरी राति-दिन खेलावै रसलीला सून बाट चलैत छौड़ी केँ कहलकै गे बज्जर खसतौ तोरा जँ बातक नहि ठीक तँ बापोक नहि ठीक के छै सत्ते कहवी उनटा-पुनटा गप्पक सतखेल करै ई कुर्सीक चटकोरा नौ सौ मुस खाय केँ बिलाय साधु नाहैत चानन ठोप लगौने सुसुम खुन चाटय सुंघसुंघ करै ई लाकर आदमखोरा "शांतिलक्ष्मी" माथ धयनै बैसल देख रहलै हेँ सभटा छिछा लोकतंत्रक अस्मिता लुटय बेकल कोना देसक कुलबोरा ............वर्ण २३........... ४ शिवकुमार झा ‘टिल्लू’ कविता- क्षणप्रभा सभ दिस सर्द कियो नै बेपर्द देह सिहकल रेह ठिठुरल पोखरि-इनार ठमकल पूस रमकल श्याम असर्ध शीतक बीच ट्क-ट्क धएने आश कखन भरत मोनक पियास कबदबैत चम्पा मुस्कैत पलाश सूर्यमुखीक दशा देखि ओकरासँ किअए करैत छी सिनेह जे कुन्तीकेँ ठकि लेलक ओकर कौमार्य नष्ट कऽ देलक आइ आगिक ढेपपर के करत विश्वास? झॉपू मर्यादा बचाउ गेह भावक आगाँ प्राप्ति कोन मोजर एतबेमे मघ उड़ि गेल शीत लुप्त भेल क्षणप्रभा बनि रविक अर्चिस सूर्यमुखीक, कोमल कोंपरमे समागेल ज्योतिपुंजकेँ आदित्यक चरण मानि- सूर्यमुखी अपन सेंथुमे भस्मीभूत कऽ लेलीह अखण्ड सौभाग्यवतीक आशीषक संग किरण ससरल कली फूल बनि पसरल हम तँ उभय लिंगी छी नै रहितौं तैयो करितियनि सुरूजसँ प्रेम...... सभ किअए दैत छी हुनकापर दोख ने डूमैत छथि ने उगैत छथि सभ पिण्ड घूमि- हुनकापर डूमि जएबाक कलंक लगबैत अछि- जखन अपनामे दृढ़ता नै तँ दोसरपर दोष केहेन? बिनु बजौने सभ लग अबैत छथि आठो याम जरैत छथि कुन्ती सभ जनैत किअए कएली वरण- ज्योजिपुंजकेँ बान्हब ककरासँ भेल संभव? आदित्य सिनेहक तापस लगले तप्पत, लगले विद्रूप कोना भेला छलिया? सिनेहक अर्थ सुधि प्रभंजन नै स्पर्श एकर नै अवसान नै उत्कर्ष... क्षणप्रभा जकरापर खसल ओ जरल ओ मरल मुदा! सिनेहक क्षणप्रभा वासना मात्र नै- शाश्वत स्पंदन... जकरामे केलक प्रवेश ओकरा रोम-रोम शेष-अशेष एकर भंगिमा वएह कहत जकरामे संवेदना रहत....। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। १. जगदीश चन्द्र ठाकुर ’अनिल’ २.जगदानंद झा 'मनु' -गीत-गजल १
जगदीश चन्द्र ठाकुर ’अनिल’ गजल १ गीत गजलमे लागल छी ओ बुझैत छथि पागल छी । हम रातिकें राति कहै छी तें भरि गामसं बारल छी । अहां बाढिएसं तबाह छी हम रौदी केर मारल छी । हम स्वयंकें नहि चिन्हलौं देखू केहेन अभागल छी । अहां कहैछी कविता सूनू हम यात्राक झमारल छी । ऐ खेलाके यैह नियम छै सब जीतल आ हारल छी । पाइ प्रतिष्ठा पद नै चाही प्रेमक हम पियासल छी ।
२ कुदने की, फनने की अन्हराकें जगने की । सडक आ ने बिजली कुरसी पकडने की । पाप बढि गेल अछि गंगाजीकें बहने की । शासन बहीर अछि कहने की,सुनने की । मोन अछि झमेलामे राम राम रटने की । सब ठाम सुखराम अन्नाजीकें सहने की । शीलक विचार करू कुंडली टा देखने की ।
२. जगदानंद झा 'मनु', पिता- श्री राज कुमार झा, जन्म स्थान आ पैत्रिक गाम : हरिपुर डिहटोल ,जिला मधुबनी, शिक्षा :प्राथमिक -ग्राम हरिपुर डिहटोल मे, माध्यमिक आ उच्च माध्यमिक -सी बी एस ई, दिल्ली, स्नातक -देशबंधु कालेज ,दिल्ली बिश्वविद्यालय गजल -१ अहाँक चमकैत बिजली सन काया ओई अन्हरिया राति में आह ! कपार हमहुँ की पयलौंह मिलल जए छाति छाति में सुन्नर सलोनी मुंह अहाँ कए, कारी घटा घनघोर केशक होस गबा बैसलौंह हम अपन, पैस गेल हमर छाति में बिसरि नहि पाबी सुतलो-जैगतो, ध्यान में हरदम अहीं के अहाँक कमलिनी सुन्नर आँखि, देखलौं जए नशिली राति में ओ बनेला निचैन सँ अहाँ के, पठबै सँ पहिले धरती पर मिलन अहाँ कए अंग-अंग में जे, नहि अछि दीप आ बाति में सुन्नर अहाँ छी सुन्नर अछि काया अंग-अंग सुन्नर अहाँ के नहि कैह सकैछी एहि सँ बेसी अहाँक बर्णन हम पांति में ***जगदानंद झा 'मनु' -------------------------------------------------------------------- गजल-२ लाल-दाई के ललना लाले लाल लगैत छथि लाली अपन माय के चोरा कs लजाबैत छथि छैन आँखि में हिनकर काजरक बिजुडिया माइयो सँ सुन्नर झिलमिल झलकैत छथि लटकल माथ पर सुन्नर लत हिनकर देखु-देखु चंद्रमा कए इ त नुकाबैत छथि सुनि-सुनि बहिना सब हिनकर किलकाडि कियो खेलाबैत कियो हिनका झुलाबैत छथि रंग-रूप चाल-चलन सबटा निहाल छैन मुस्की सँ इ अपन मनु कए लुभाबैत छथि ***जगदानंद झा 'मनु' *********************************************** गजल-३ टीस उठैए करेज में कोना कहु बितैए की कोन लगन लगेलौं अहाँ सँ याद अबैए की
जतय देखु जिम्हर देखु अहाँ कए देखै छी कोना बितत दिन-राति कोना कय बितैए की
रहि-रहि याद अहाँ के हमरा बड आबैए कि करू कोना करू आब नै किछ फुराईए की
प्रियतम मनु के किएक इना तरपाबै छी मोन में लहर उठल से अहुँ के लगैए की *** जगदानंद झा 'मनु' ********************************************** गजल-४ निर्धन जानि अहुँ बिसरलौन्ह माँ कोन अपराध हम कएलौन्ह माँ निर्धन छी हम हमर नै गलती इ निक सनेस अहीं दएलौन्ह माँ मुल्यक तराजू में नै हमरा तौलु ममता कए प्यासल रहलौन्ह माँ दर-दर भटकैत खाक छनै छी आँचर अहाँक नहि पएलौन्ह माँ मनु के नै अपन स्नेह देलौं किछु चरणों सँ आब दूर कएलौन्ह माँ ***जगदानंद झा 'मनु' ******************************************** गजल-५ कि-कि बनब चाहै छलौं हम की बनि गेलौंह सुगंधा अहीं कए स्नेह में हम सनि गेलौंह आस हमर करेज के करेजे में रहि गेल अहाँ के छोइर दुनियाँ में कतौ जुनि गेलौंह रहल नहि होश हमरा दुनियाँ के गम के अहाँ कए स्नेह में भय पागल कनि गेलौंह सैदखन ख्याल में अहीं कए बसेने रहै छी सब कुछ हम अपन अहीं के मनि गेलौंह हमर स्नेह जे अहाँ सँ स्नेह नहि रहि गेल हमर मोन में बसि अहाँ प्राण बनि गेलौंह ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। १.अंजनी कुमार वर्मा २.बलराम साह ३.उमेश पासवान ४. रामविलास साहु ५. संजीव कुमार ‘शमा’ ६. सुधीर कुमार ‘सुमन’ ७.उपेन्द्र नारायण ‘अनुपम’८. नारायण झा १ अंजनी कुमार वर्मा आत्मबल ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,, संघर्ष मय जिनगी सं फराक रहब निक अछि अहि बिगड़ल समाज सं सुनसान जंगले निक अछि मुदा कतैक दिन धैर ? उचितक बात पर नहि क सकैछ धनुषाकार आत्मबल कें राखि देखू आत्म्बलक इतिहास धनुषाकारक बाद भ जाईछ जनजागरण क्रांतिक विकराल रूप क लैछ धारण जगविदित अछि क्रांति केर की की होईछ परिणाम रौद्र रूप धारण कय जखन लैछ तीर- कमान नहि अप्पन प्राण केर भय होइछ नहि दोसराक प्राणक मोह तखैन देह में आबी जैत अछि अभिमन्यु केर खून सोइच लिय हे पथभ्रष्ट जयद्रथ होयत कोन उपाय कतेक दिन धैर सहन करत दुखिया केर समुदाय लौह-भुजा आब फड़कि रहल अछि प्राण -प्राण लेल तड़पि रहल अछि क्रांतिक ज्वाला भड़कि रहल अछि आब सोचु अप्पन उपाय नहि मानत पीड़ित समुदाय क्रन्तिये ठीक अंत उपाय.......... ओजक भोज ,,,,,,,,,,,,,,, इ आत्मीयता थिक मृगमरीचिका जाहि पाछु आम लोक सदृश स्थिति कें खुआ रहल छी ओजक भोज झाँपल हाड़ भ गेल बहार वसन तर सं द रहल अछि देखार इ कर्तव्यक द्वार ,केयो नै पाबैछ पार गलब अछि सहज मुदा स्वर्ण बनब कठिन इ सम्बन्ध अछि अनंत इ आत्मीयता अभिन्न..... समस्या ,,,,,,,,,, आबक लोक की करत बसंतक अनुभव की सुनत कोइलीक गीत की घुमत पुष्प वाटिका में , कपार पर राखल करिया पाग कए उघैत - उघैत बनल रहैछ बताह नहि पाबि सकैछ थाह नहि सुति सकैछ सुख सं नहि बाजि सकैछ दुःख सं गोंताह पानि में डूबल रहैछ कंठ धरि छटपटाइत रहैछ, बऊआयत रहैछ मन सपनहूँ में देखैछ सदिखन दुःख धंधा घेंट में लागल फंदा , नहि रौदक चिंता अछि,नहि पानिक मात्र चिंता अछि सबकें अप्पन पेटक फंदा लागल घेंटक .... वासंती गीत ''''''''''''''''''''''''''''''''' कोइली कुहू -कुहू कुहुके हो रामा वन उपवन में नव किसलय सँ गाछ लागल अछि मंजरि गम -गम गमकि रहल अछि रंग बिरंगक फुल गाछ में प्रकृति कयल श्रृंगार हो रामा वन उपवन में ........ टिकुला सँ अछि झुकि गेल मंजरि नेना सब हर्षित अछि घर -घर गाछ -गाछ पर विरहिणी कोइली कुहू -कुहू पिया कय बजाबै हो रामा वन उपवन में .... श्वेतवसन कचनार पहिरी कय भ्रमर आंखि केर काजर बनि कय कामदेव क लजा रहल अछि बढ़वय रूप हज़ार हो रामा वन उपवन में ..... महुआ गम -गम गमकि रहल अछि नेना चहुँदिसि दौरि रहल अछि डाली -झोरी मं अछि महुआ गाबय चैत बहार हो रामा वन उपवन में ...... दुई गोट भूख ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,, खसि गेलैक-ए आँखिक पानि आब लोक चौबटिया पर बेच दैछ अप्पन अस्तित्व , खोलि दैछ नीबी-बंध कियैक तs पेटक होम कुंड मs देबय परैछ आहुति ... बढ्ले जा रहल अछि दिनानुदिन अनंत दिशा में वासना केर भूख वासनाक भूखल किनी लेछ रोटीक लेल छटपटाइत लोकक अस्तित्व लोक में आब कोन वृत्ति आबि गेल अछि दानवी , पाशविक आ की कोनो तेसर ...... एकर वर्गीकरण करब अछि असंभव दुवs भुखक सम्बन्ध भs गेल अछि अन्योन्याश्रय ..... २ बलराम साह जन्म- 21/11/1973 पिताक नाओं श्री जीबछ साह, गाम- नौआबाखर, पत्रालय- हटनी, भाया- घोघरडीहा, जिला- मधुबनी (बिहार) संप्रति- अधिवक्ता, जिला न्यायलय, मधुबनी सांसद प्रतिनिधि, झंझारपुर। कविता- आकि नीन टूटि गेल- काजक थाकल विचारक मारल आ चिन्ताक टूटल ओछाइनपर रही पड़ल आँखि लागि गेल देखलौं एकटा सपना आकि नीन टूटि गेल। सपना छल विचित्र देखलौं जे गामक रधिया जे अछि दैवक मारल मसोमात ओकरा भेटलै इन्दिरा आवास ओहो बिना घूसकेँ आकि तखने हमर नीन टूटि गेल। गाममे भेलै मारि चलल लाठी आ फरसा भेलै लठम-लठ जाति-जातिक एकता बैसल एकटा पंचैती और हाकिम-दरोगा मिलि सबटा झगड़ा मेटा देल आकि हमर नीन टूटि गेल। जखन नीनमे निनवासले रही पढ़ल-लिखल बेटा करैत छथि बापक सेवा पढ़ल पुतोहू करैत रहथि सासुक उत्कृष्ट सेवा भाय-भायमे छल मिलानी जाबत देखतौ आगू की भेल ताबत हमर नीन टूटि गेल। गामक बेटी पढ़लक-लिखलक गरीबीसँ लादि लेलक बी.ए.क डिग्री बगलक गामक मास्टर साहेबक बेटा सेहो बनल हाकिम आ बिना दहेजक दुनूक वियाह भऽ गेल आकि ताबत हमर नीन टूटि गेल। यौ समाज की होएत हमर सपना साँच कहियो किएक तँ हमर नीन टूटि गेल। ३ उमेश पासवान गेलहे घर छी जौं अखार महिनामे बुढ़ बरद, पजरामे दरद पंजाबमे मरद अछि तँ समझू हे गेलहे घर छी। घर लग बलान चोर संग मिलान घनक गान अछि तँ समझू हे गेलहे घर छी। दूध लग बिलाइ बच्चा लग सलाइ अप्पन काज करैमे ढिलाइ तँ समझू हे गेलहे घर छी। डराइबर अनारी एड्स बेमारी दोकानमे खाइ छी उधारी तँ समझू हे गेहले घर छी। मैट्रीकमे फेल जवानीमे जेल बुढ़ाढीमे केलौं मेल तँ समझू हे गेलहे घर छी। चाहक चुस्की लड़कीक मुस्की दारू आ विस्कीक फेरीमे परलूँ तँ समझू हे गेलहे घर छी। बन्दूकक नाल माछक चाल सैरक गाल देखि कऽ कुदब तँ समझू हे गेलहे घर छी। भैयारीमे झगरा घरवाली अछि तगरा ससूर अछि लबरा तँ समझू हे गेलहे घर छी। बाप कंजूस कोठीमे लागल मुस नोकरीमे देलौं घूस तँ समझू हे गेलहे घर छी। कपड़ापर पड़ल मोबिल कपारमे फरल ढील टॉगमे गरल किल तँ समझू हे गेलहे घर छी। ४ रामविलास साहु धरतीक सुख ऋृतुराज वसंत धरतीपर पहुँचल सोलह श्रृंगार करैत दुलहिन सन सजल धरती पगलाएल भौंरा नाचि-नाचि करए मधुपान अविराम चिड़ै चहकए कोइली कुहकए करए आगमन मदन रति सुआगतमे वसंत अभिनंदन करए आएल अतिथिक मधुपान करबए स्वर्गसँ उतरि धरतीपर परी सभ मिलि सुआगत गीत गबए देखि देवगण गुणगान करए सबहक दिल ललचाइ छलैक बेर-बेर धरतीपर मेहमान बनैत एहन सुन्दर नै छै देवलोक धरतीक सुख स्वर्गसँ सुन्दर जे सुख मनुककेँ मिलै छै धरतीपर देवाेकेँ नै नसीब होइत स्वर्गमे धन्य अछि ओ पावन धरती बेर-बेर वसंतक बहार मिलए फूल-मंजर झुकि-झुकि सभकेँ अभिनंदन करए। साओनक राित झर-झर बरसै बदरिया हो रामा एबकी सवनमा बिजुरी चमकै मेघ गरजै थर-थर कापए वदनमा हो रामा झर-झर बरसै बदरिया हो रामा एबकी सवनमा। पिया िनरमोहिया बड़ निरदैया जानए ने कोनो मरमुआ हो रामा झर-झर बरसै बदरिया हो रामा एबकी सवनमा। सओनक अन्हरिया चमकै बिजुरिया पानिक बुन्नसँ भिजै वदनमा भीजल तन राति काटब कोना झर-झर बरसै वदरिया हो रामा एबकी सवनमा। भीजल बदनमा चढ़ल यौवनमा सिहकए पवनमा तरपाबए सजनमा झर-झर बरसै बदरिया हो रामा एबकी सवनमा। चढ़ल यौवन दरिया सन उमरल पिया बिनु तरसै नयनमा हो रामा झर-झर बरसै वदरिया हो रामा एबकी सवनमा। ५ संजीव कुमार ‘शमा’ क्रांति दीप आउ क्रांतिवीर बनि मिथिलाकेँ बचेबाक लेल जड़ाउ क्रांति दीप जतए भूमि अछि रहबाक लेल। िल-तिल समैकेँ पकड़ि जे हाथसँ नै ससरए एकताक ठोसगर मापदंड अपन एतए नै फूटए मैथिलीक प्रचार, जन-जनकेँ जगेबाक लेल..् बड्ड भेल! आब कते काल धरि बेइज्जत होइत रहब, माँ मिथिलाकेँ आजाद कराएब से संकल्प दोहराबैत रहब, चलू चलल फिरङ्गी चालिकेँ, मिटेबाक लेल... बजा देने छथि बैजूबाबू विजयक बिगुल, भीषण हंुकार जकाँ, मचि गेल अछि शोर चहुँदिश, स्वतंत्रताक पुकार जकाँ आगूमे जे ठाढ़ अछि पहाड़, चलू खसेबाक लेल डरपोक बनि कतेक काल धरि डरल रहब आब कहिआ भट्ठीक आगि जकाँ धधकब धधकल छथि शमा मिथिलांचलक दीप जड़ेबाक लेल। ६ सुधीर कुमार ‘सुमन’ पिता- श्री सत्यदेव ‘सुमन’ गाम- लकसेना पोस्ट– महिन्दवार भाया- तुलापतगंज जिला- मधुबनी (बिहार) कविता- समए समैकेँ सदिखन धियानमे राखि जिनगीकेँ धरतीसँ जोड़ि लुच्चा–लौफरक बातमे ने आबी अपन बीतल बात पसारैत समाजक मर्यादाक मान बचाबी अपन चिन्ताकेँ चिन्ता ने मानि मैथिल-संस्कृतिक मान बचाबी साँझ पड़ैत ठंढ़ अबैत लोक िनहाड़ए अपन बाटकेँ विद्वान, विदुषी मैथिली भाषी अपन चमतकार िनखाड़ए देखाबए ठंढ़ा पानि आजुक दिन सपना भरल छै हँसी-हँसीमे समए बीतल छै समए पकड़ि आगू बढ़ू भैया सभ अपन सपनाकेँ साकार करै छै। ७ उपेन्द्र नारायण ‘अनुपम’ गाम- भुतहा, भाया- नरहिया थाना- लौकही, जिला- मधुबनी संप्रति- व्याख्याता (मनोविज्ञान विभाग), अशर्फी दास साहु समाज इण्टर महिला महाविद्यालय- िनर्मली, सुपौल कविता- दुख हम्मर कतेक आब दुख सहब ककरा ई बात कहब घर-घरमे अछि झगड़ा सभकेँ सभसँ अछि रगड़ा। झगड़ा तँ हटत नै रगड़ा तँ मिटत नै मिटत नै आश बेचरा होएत निराश आशक आब डोर टूटल निराशासँ ठोर सुखल छूटल अपन साम-दाम बाबू गिड़ल धराक-धड़ाम पहिले बड़का गाछ गिड़ैत अछि तब कहीं छोटका पात उड़ैत अछि उड़ि जाइत अछि सभ तृण एक दिन दुनियाँसँ होएब भिन्न। सुखक जननी दुखे होइत अछि दुखक बादे सुख अबैत अछि दुख जाएत, सुख आएत जरूर-जरूर एक दिन कहब। दुखसँ नै घबराबउ दुखसँ खूब टकराउ दुखसँ पाबू पार गुड़ गंजन बादे मिश्री जेना तैयार ओहने सवव, और की कहब। अनुपम-सुशीला ई बेथा सुना कऽ जन-जन तक अपन वणी पहुँचा कऽ उहो लेत एक दिन दम ई बात नै अछि कम। घी कनी ई कनी घी ओही लेल केलौं ने की-की साँझ-भीनसर-भोर बड्ड लगेलौं जोर मटकुरी, रेही लाबि कऽ पीढ़ीपर बैस कऽ मथए लगलौं जोर। पसेना आएल, मथा गेल छालही जमा भऽ गेल मक्खन-मट्ठा-घोड़ आनि कराही आॅच दिअए लगलौं खशीसँ नेना भेल विभोर। ऑच बढ़ल कराही कड़कल मक्खन होअए लगलै थोड़ घी बना बेचि कऽ लाएब चूड़ी-साया-साड़ी घी बनल कराही उतड़ल विचार आएल छल बेजोड़। कराही उतड़ल, मन छल छनगर कराही चटकल घी बहल रहि गेल दारही थोड़। फुसुर-फुसुर भेल आबए लगल लोक धूर केहेन छथिन अभागलनी कोनो घी बनबैपर मन छलनि थोड़े मन छलनि गाछपर तन हुनक खाटपर घीक कोनो नै कसूर भेल घी हरा गेल छाती पीटैत रहि गेलि दुलहिनिया भोरे-भोर। अनुपम-सुशीला घी खातीर नयनसँ बहबए लगलै नोर ई दीन-कथा घी गरीबक पसरि गेल चाहुँ ओर। परदेसिया प्रियतम तँू चनचल छेँ, रौ मन चित्त लऽ गेल हम्मर चोर सावन केर जब अइहेँ महिना आँखिसँ बहए नोर तँू छलिया परदेशी बालम टुकुर-टुकुर तकैत भेल साँझ-सँ-भोर। भादव केर जब अइहेँ महिना असगर लागए डर बिनु बालम केर नीक नै लगए कनैत-कनैत भऽ गेल रति-सँ-भोर। बेंग टर्र-टर्र, झिंगुर झुन-झुन अंगनामे नाचए मोर बिनु साजन केर खिलत कोना कलियाँ बीतल जवानी फूलबा ने कोर। अनुपम-सुशीला कहए केहेन परदेशिया गै प्रीति कहियो-ने-कहियो तँ मिल जाएत अप्पन मक्खन चोर। ८ नारायण झा जन्म- 05/07/1980 गाम-पोस्ट, रहुआ संग्राम प्रखण्ड- मधेपुर जिला- मधुबनी बिहार- 847408 शैक्षणिक एवं प्रशैक्षणिक योग्यता- बी.कॉम (प्रतिष्ठा) बी.एड एम.कॉम (अध्ययनरत) कार्यरत- प्रखंड शिक्षकक रूपमे वर्ष 2003 ईं.सँ रा.म. विद्यालय रहुआ-संग्राम। रूचि- लेखन आ नव गपसँ अवगत भेनाइ। सरकार पर्चा-पर्चा पसरल चर्चा ऐ सरकारक विकासक चर्चा। अखबारक सुरखी जाइत अछि समेटल माटिपर देखब तँ किछु नै भेटल। शिलान्यास-पर-शिलान्यास होइत सभ दिने देखल जाइत अछि अखबारमे हुनका दोगे-कोने। नाम-यश समटि रिकार्ड बनबैत छथि योजनाक राशिपर नॉच करैत छथि। नूतन प्रयोगक विख्यात सरकार सभ दिन नव योजनाक हुअए विचार। ठेका प्रणालीक छथि महानायक फुसियाँ देखबैत विकासक स्वप्न भयानक। विजली विगड़ल, पानि पछड़ल शिक्षा अछि समुचे दरकल। डकैती, महगाइ आओर भष्टाचार दिनो-दिन बढ़ैत ई दुराचार। विकासक सपना होइत तखन साकार। आकाससँ उतड़ि, जमीनसँ देखि आकार। पर्चा-पर्चा पसरल चर्चा ऐ सरकारक विकासक चर्चा। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। १.जगदीश प्रसाद मण्डल २.कपिलेश्वर राउत १ जगदीश प्रसाद मण्डलक नौटा कविता- 1. धूप-छाँह हे सूर्ज तोड़े पूछै छिअह? उपर रहि तँू किअए बनौने, एना छह दोहरी बेबहार। अपन रश्मि आगू बढ़बैमे धरतीकेँ किअए केने अन्हार। केना रोकि तोरा दइ छह वन-उपवन ओ जंगल। आस लगौने धरतियो बैसल करै छह किअए मंगल-अमंगल। विहुँसि सूर्ज बाजल विह्वल! कोनो भेद-भाव कखनो नै मनमे कहियो उठैए। जे जतए पकड़ि-पकड़ि से अपन काज करबए लगैए। जँ तोहू करबए चाहै छह छाहरि छोड़ि निकलह बाहर। जखने नजरि मिला-चलबह तखनेसँ संग पूरए लगबह। मर्माहत भऽ पुकारि धरती- केना कऽ घुसुकि पेबै, चारू दिस घेड़ने-ए। केना कऽ संग पाएब तोहर कानि-कानि मन कहैए। ))(( 2. माए भेटि नै पबैत शब्दकोषमे एक्को उदाहरण माइक लेल। नजरि उठा जखन देखै छी माताराम की सभ देल। तीसे वर्खमे विधवा भेलौं कहब कि अहाँसँ मइया। मनुख बना ठाढ़ कऽ देलौं बाकी कि रखलौं हे मइया। कनतोड़ी भरि अपन आभूषण बेचि-विकीन लगा देलौं जुआनी गला जे सिनेह विलहलौं बदलामे हम की कऽ देलौं। राखि-सम्हारि घरसँ बाहर अपन ओ लागिक परिवार। लुटा-मेटा अपन जिनगीकेँ जिनगी जीबैक चढ़ेलौं धार। हँसी-खुशी जिनगी ससरैए। सटि-सटि आनो परिवार। एक-दोसरमे भेद कहाँ-ए। संगे-संग मानो-सम्मान। नव-नव चेहरा सिरजि नव-नव काज धड़बैए। नव-नव परिवार समेटि नव-नव सिनेह सजबैए। अपन सदृश्य अपने हे मैया शब्द कहाँ अछि जे किछु कहबह। अपन रूप परसि-परसि अपने सन हमरो बनेलह। ))(( 3. साथी जिनगीमे साथी मिलए जँ, जीवन रस पीबे करत। जीवने रस ने अमृत कहबए अमृतमय जिनगी जीबे करत। जाबे अमृतपान नै होइ छै साथी हेराइक डरो रहै छै। जहिना तेज धारा धारमे हाथक साथी हथिआर (लाठी) छुटै छै। कोमल-कड़ा बीख होइत जहिना तहिना ने अमृतो होइ छै। कात-करोट किनछेरे-किनछरि घोंघा-सितुआ मोती भेटै छै। नै अछि जरूरी कोनो अमृत मधुर हेबे करत। तीतोमे बास जेकर छै नीक-नीक फल देबे करत। आशमे अमृत बरसै छै निराश छोड़ि आशावान बनू। अपन जान-परान अपनेमे मुट्ठी बान्हि-बान्हि आगू बढ़ू। जहिना दुनियाँक रंग सतरंगी तहिना चालि जिनगियो धड़ै छै खसैत-उठैत, चलैत-चलैत जिनगी रसपान करै छै। ))(( 4. घर लोटिया बुड़ले अछि। घर लोटिया बुड़ले अछि, घर-घरारी गेले अछि। गाम-घर उजड़ि-उपटि नाओं-ठेकान विसरले अछि। घरक लोटिया बुड़ले अछि। बेटा-पुतोहू निकलि घरसँ देखलक शहर-बजार। ओ कि फेरि घुरि घर औत आकि घुमत हाट-बजार। छाती मुक्का मारि लिअ अपन जिनगी सम्हारि लिअ। नै तँ अपनो बुड़ले अछि घरक लोटिया बुड़ले अछि। जइ बच्चाकेँ भेँट नै हेतै सालक-साल माए-बाप। दादा-दादीक कथे कि कहब मोबाइलेसँ करत क्रिया-कलाप। कुल-खनदान सभ गेलै अछि घरक लोटिया बुड़ले अछि। अंग्रेजी पढ़ि अंग्रेजिया बनि-बनि पप्पा-मम्मी आनत घर। बाप-दादाक कि भेद ओ बुझत अड़ि-अड़ि बाजत निडर। आबो कहू भाय, केना नै डुमतै घरक लोटिया केना नै बुड़तै। ))(( 5. जुग बदलल जमाना बदलल। जुग बदलल जमाना बदलल बदलि गेल सभ रीति-बेबहार। चालि-ढालि सेहो बदलि गेल बदलि गेल सभ आचार-विचार। मुदा, राति-दिन एको ने बदलल नै बदलल चान, सूर्ज, अकास। पूरबा-पछबा सेहो ने बदलल नै बदलल जिनगीक विसवास। दुख देखि सभ दौग रहल-ए पाबए चाहैए सुखक भंडार। उड़ि-उड़ि पूरबा-पछियामे लोभक बाट पकड़ि धूरझाड़। घर छोड़ि घुड़मुड़िया खेलए दुहाइ कसि मातृभूमिक लगबए। अपनो जिनगी देखि-देखि करनीक तँ फलो किछु देखबए। एक सुग्गा वन बास करैए दोसर पोसा िपजरा कहबैए। रहितो पिजरा पोसा सुग्गा राम-राम दिन राति रटैए। अपन जिनगी अपने बूझि अपन बाट पकड़ए पड़त। अपना जिनगी लेल सदति जीवन-संघर्ष करए पड़त। जइ युवामे आत्मबल नै ओइ युवाक जुआनी केहन। अपन हाथ अपने छाती रखि मुँहसँ अवाज निकलए जेहन। ))(( 6 गरीबी गरीबीक गुरू-आश्रम बीच भट्ठेसँ पढ़ैत एलौं। भोरे उठि प्रणाम करै छियनि मनक असीरवाद पबैत एलौं। राति-दिन सुरता लगौने सदिखन चर्च करै छियनि। उठिते चर्च अपने आबि-आबि जन्म–अजन्मक बात कहै छियनि। आँखिक आगू गुरू-गरीबीक सुतलमे जगबै छथि। दू-दिसिया चालि मनुखक पकड़ि बाँहि कहै छथि। अमीर-गरीबक चालि दू-दिसिया कखनो अमीर, कखनो गरीब बनैत। भाग्यक रेखा अगम-अथाह छै हँसि-हँसि सदिखन सुनबैत। गरीबी सत्-मार्ग चलबैए हँसि कु-मार्ग अमीरी धड़बैए भेद-कुभेद भेद बिनु बुझने सुमार्ग कहि कुमार्ग चलबैए। जेकरा ढौआ ढन-ढन करए ओ केना पहुँचत मधुशाला। चिकड़ि-चिकड़ि गरीबनाथ कहए भोजन नै छी सुआद मशाला। अपने हाथे पकड़ि बाँहि सीमा सरहद देखि-देखि चलबैए। अपन आड़ि-मेड़ अपने पकड़ि हँसि-हँसि अपन चालि धड़बैए। जेकरा अहाँ अमीर बूझै छी नै छिऐक ओ अमीरी। आ ने जेकरा गरीब बूझै छी नै छिऐक ओहो गरीबी। बुद्धदेव किअए राज-पाट छोड़लनि जँ अभावेकेँ गरीबी कहबै। भिझुक बेना पकड़ि किअए जिनगी भीखमंगाक बनबए। गरीबीक जे राह पकड़ि-पकड़ि राही बनि रनिबास चलैए। ब्रह्मा, विष्णु ओ शिवदानी पदे-पद दर्शन पबैए। यएह गरीबी आ अमीरीक धड़-धड़ जीवन धार बहैए सागर-गंगा हेराएल कहाँ तिले-तिल चलैत रहैए। 7 दबाइये राेग कहिया कतएसँ रोगाएल छी रोगे ओछाइन धेने एलौं। जी तोड़ि तरद्दुतो करै छी रोगे संग-संग जीबैत एलौं। रोगो कहाँ छोड़ए चाहैए अपन ओझराएल-पोझराएल बान रोगाएल देखि-देखि कहैए ओ अछिये महा बुरिबान। उक्कठ-पाकठ बरमहल करैए कखनो नै छोड़ए अपन सान। ताकि-ताकि मीठहा दवाइ आनि गमबए चाहैए अपन जान। कहै छलै पेट पाचन बिगड़ल पीबए लगलौं महाजाइम। आठे दिन अबैत-अबैत सरदी-बोखार पकड़लक तानि। कोनो कि एना आइये होए आकि होइत आएल जुग-जुगसँ। जएह पोषक सएह शोषक बनि लीड़ी-बीड़ी करैत जुग-जुगसँ। मनुख-मनुखक बीच अड़िया घुमा बुइध बुद्धियार बनौलक। दिन-राति छाँटि-छुटि आड़ि साबरमंत्र पढ़ा मुग्ध बनौलक। मनतरो कि हरही-सुरही पीठिया-पीठिया मन घुमौलक। हँसि-हँसि पकड़ि चालि बुइधसँ यारी करौलक। छी ठाढ़ बुद्धियार बनि-बनि जिनगीक परिचए कहाँ पेलौं। अपनो जिनगी नै देखै छी कतएसँ कतए एलौं-गेलौं। पाँच तत्वक जीवन पाबि-पाबि जिनगीमे किछु नै केलौं अकारथ जिनगी बना-बना बेर्थमे जिनगी गमेलौं। कि कहब किछु ने फुड़ैए पीछराह बाट पकड़ि लेलौं। केम्हरो-सँ-केम्हरो पीछड़ै छी मृत्युकेँ सदति नतैत एलौं। भार बना जीवन लीलाकेँ कुहरि-कुहरि जीबै छी। आशा-आसी ताकि रहल छी जिनगी बाट काटै छी। 8 मुँहक झालि मुँहक झालि बजौने कि हएत, काजक झालि बजबए पड़त। फोकला-खाख अन्ने की सुभर दाना उपजबए पड़त। जाधरि धरती पड़ती रहतै चारागाह दिन-रातियो बनतै। चरनिहारोक चालि असंख्य छै, दिन-राति चरबे करतै। सूर्जे जकाँ ओहो रहै छै सूर्जेक संग चलबो करै छै। राति-दिन बेड़ा-बेड़ा समए देखि चड़बो करै छै। देहधारी जीवे टा नै विवेकियो पुरूष कहबै छी लाज-शर्म जँ उठा-पीब तँ अपन बिटारि अपने करै छी। जँ धरतीपर जन्म लेलौं किछु देबो किछु लेबो सीखू। अपने केलहा संग चलै छै गीरह बान्हि कन्हेठ राखू। जहिना वनमे वृक्ष बहुत छै जीवो-जन्तु तहिना भरल छै। पाँच तत्व िनर्मित जे कहबै पाँचे तत्व विलीनो होइ छै। बिनु भक्तिक मुक्ति कहाँ बिनु मुक्तिक जिनगी कहाँ छै। भक्ति-मुक्तिक बीच बटोही जिनगीक रसपान करै छै। मुँहक झालि लहरी नै कर्मक स्वरलहरी सीखू अपन इतिहास अपने हाथसँ स्वार्णाक्षरमे लिखनाइ सीखू। 9 किछु सीखू किछु करू जिनगीमे किछु करब सीखू जिनगीमे किछु लड़ब सीखू। सभ जनै छी, सभ देखै छी अज्ञान-अबोध बनि-बनि अबै छी। सज्ञान-सुबोध तखने बनब संघर्षक बाट जिनगी धड़ब। एक-दोसरमे तखन बदलै छै बीच परिवर्तनक खेल चलै छै। जहिना रीतु परिवर्तन होइ छै तहिना कुरीत-सुरीत सेहो बनै छै। जहिना जाड़मे गरमी बदलै छै तहिना ने गरमियो जाड़ बदलै छै। पबिते पानि धरती धमकि नवरंगी रूप बना सजै छै। जिनगियोक तँ खेल एहिना अहीमे सभ किछु बनै छै। कियो भक्त भगवान पबैत तँ कियो पबैत भगवत् भजन। कियो योद्धा बनि अस्त्र उठबए तँ कियो कुकर्म-सुकर्म गढ़ैत। आँखि उठा घर-बाहर देखू अपन कालखंड अपने परखू। पबिते परेखि जीवन-मौसम केर साओनक सोहनगर सुगंध बिखड़ू। २ कपिलेश्वर राउत कविता- माइक ओद्रमे जे भाषा सिखलक परदेश जा सभ विसरलक। गाम आबि काहे-कुहे बजैए समाज कहैत आब बड्ड बुझैए। पढ़ल लिखल आर विगारलक बाल बच्चाकेँ कनभेन्ट धरेलक। चालि-ढालि अंग्रेजिया पकड़ि मातृभाषाकेँ खिल्ली उड़ौलक। अप्पन भाषा बिसरि बहरबैया भाषा अपनौलक। अहाँ मैथिलीकेँ केना आगू केलौं अपने तँ गेबे केलौं बच्चोकेँ भसिएलौं। जेतबो इज्जत गौआँ दइए परदेशी ओकरा थकुचैए। गौआँ-घरूआ मैथिली जियाबए परदेशिया बाहर भगाबए। कनिये अंग्रेजिया जोर लगबिऔ मैथिलीकेँ आगाँ देखबिऔ। जनक आ सीताक भाषा अपनाउ कर्म छोड़ू नै अपनाकेँ बनाउ। विद्यापति आ यात्री कहि गेला मण्डन आ अयाची कर्म वीर भेला। अप्पन भाषा सभ जन मिठ्ठा एकरा नै बुझू हँसी ठठ्ठा। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। १.डाॅ. शिव कुमार प्रसाद २.सत्यनारायण झा ३.जवाहर लाल कश्यप ४.किशन कारीगर १ डाॅ. शिव कुमार प्रसाद वरीय व्याख्याता हिन्दी विभाग िनर्मली काॅलेज, िनर्मली जन्म- 12/ 11/ 1956 गाम+पोस्ट- सिमरा भाया- झंझारपुर जिला- मधुबनी (बिहार) िनर्मलीक िनर्मलतामे िनर्मलीक िनर्मलतामे मनक मलाल सभ मेटा रहल अछि। शिक्षाक ऐ महापंकमे गामक जिनगी लेटा रहल अछि। कैंचा-पैसा जोरि-जोरि कऽ माए-बाप सभ पठा रहल अछि। कोचिंग, विद्यालय, काओलेजमे एक-एक जन आइ लुटा रहल अछि। गामक जिनगी..............। के पठाओत ककरा लग जा कऽ नेना भुटका पढ़ि रहल अछि। नै दू सुधि बुइध केकरो छैक अपने झंझट ओझराएल अछि। गामक जिनगी....। दौगैत-दौगैत चटिया सभटा पढ़बैत-पढ़बैत बड़का सर सभ अपन-अपन भाॅजमे सभकोइ डॉरहि छुबए लेल अपसियाँत अछि। गामक जिनगी लेटा रहल अछि। मनक मलाल सभ मेटा रहल अछि। 2 तैं किछु ने किछु लिखैत जाउ लिखैत-लिखैत लिखिये देबै मैथिलीक उपकारी हेबै तैं किछु-ने-किछु नित लिखैत जउ। छपैत-छपैत छैपिये जेबै एकदिन लेखक बनिए जेबै मंच आर इनामो भेटत तैं किछु-ने-किछु लिखते जाउ। मौलिकता ककरा कहैत छी किनकामे मौलिकता देखल सभ कियो एक्के बात लिखैत छथि सबहक नीयत साफ देखैत अछि तैं किछु-ने-किछु लिखते जाउ। नीर-क्षीर विवेक किनका छन्हि लिखिनिहारमे हंस के छथि पूर्जा-पूर्जी जोड़ि-तोड़ि कऽ किछु-ने-किछु अहाँ घसैत जाउ तैं किछु-ने-किछु लिखैत जाउ। २. सत्यनारायण झा गंगाकात मे--- ओ भेट भेल छली हमरा, गंगाकात मे | रामनामी ओढ़नी ओढ़ने,फुलडाली हाथ मे नेने, तुलसी माला गर मे धेने ,धवल शुभ्रा वस्त्र पहिरने , ओ जाइत छली ,गंगाजल लाबय,गंगाकात मे , ओ भेट भेल छली हमरा ,गंगाकात मे | मांग उजरल सिउथ उज्जर ,लहठी टुटल ,अबला सन , सन्यासिनीक रूप ,दुखक मूर्ति बनल , ओ जाइत छली गंगाजल लाबय ,गंगा कात मे, ओ भेट भेल छली हमरा, गंगा कात मे || मृग नयनी छली ,पिक बयनी छली , गज गामिनी छली ,चित चोरनी छली , कतेक मनोहारणी छली ,कतेक मनोभावनी छली रूपक रानी छली ,मोहनीये नहि ,अद्भुत छली , से भेट भेल छली हमरा गंगाकात मे , ओ जाइत छली गंगाजल लाबय ,गंगाकात मे ||| हुनक आभा देखि सूर्य उगैत छल , हुनक गंध सं लोक गमकैत छल , हुनक मादकता देखि लोक हँसइत छल , से आइ बनल छनि एहन दशा , देखि मोन मे उठल ब्यथा , एहन दशा मे भेट भेल छली ,ओ हमरा , गंगाजल लाबय गेल छली ओ गंगा कात मे , भेट भेल छली ओ गंगा कात मे|||| हुनक दुःख देखि हृदय सुन्न भेल , हुनक कांति देखि मोन खिन भेल , पाथर सन कठोर ई संसार , तेहने कठोर ओ रचनाकार , तैं ओ अपन अरमान बहाबय , नहू नहू जाइत छली ,ओ गंगाकात मे ओ भेट भेल छली हमरा , गंगाकात मे ||||| ३ जवाहर लाल कश्यप अन्ना जी भ गेलथि चुप अन्ना जी भ गेलथि चुप आशा के जे एक किरण छल ओहो कतहु भ गेल गुम राजनीति के दाव पेंच देख निकालय खुब अनका मे मीन मेख अप्पन दामन कियौ नहि देखय जाहि मे अछि हजरो छेद निकलैत सुरज डुबि गेल भ गेल आब अन्हार कुप्प अन्ना जी भ गेलथि चुप ४किशन कारीगर चाह पीबू। (हास्य कविता) हरबड़ी मे जुनि ठोर पकाउ यौ नेता जी दिल्लीक कुर्सी भेटल सूखचेन स अहाँ बैसू आउ हम बेना डोला दैत छी फूकी फूकी अहाँ गरम-गरम चाह पीबू।। भूखे मरि रहल अछि जनता मरअ दियौअ ओकरा नहि कोनो चिन्ता अहाँ के कोन अछि बेगरता संसद के कुर्सी पर बैसल अराम अहाँ करू करिक्का रूपैया स बैंक बैलेंस अहाँ भरू।। मूर्ती बनबै स रथ यात्रा करै लेल पाई अछि मुदा रोटी रोजगार हेतू एक्को टा पाई नहि अछि फुसयाँहीक चुनावी घोषणा पर घोषणा टा करू कुर्सी भेटल त घोटाला पर महाघोटाला टा करू।। बाजि गेल चुनावी पीपही राजनैतिक गठजोड़ जल्दी अहाँ करू जुनि पछुआउ सियासी कुर्सी अहाँ ताकू फेर पाँच साल जनता के बेकूफ बनाएल करू।। दुनियाक सभ स नमहर लोकतंत्र बनि गेल वोट बैंकक भेड़तंत्र सम्प्रदायिकता के आगि मे जनता के झरकाउ कुर्सी हथियाबै लेल रचू कोनो नबका षड्यंत्र।। पहिने कुर्सी फेर मंत्रालय कोना भेटत सभटा छल प्रपंच अखने अहाँ करू हे यौ लोकप्रिय भलमानुष जनप्रतिनिधी संसदो मे अहाँ खूम मुक्कम मुक्की करू।। कुर्सीक खातिर देशक संसाधन बेचलहुँ बाँचल खूचल सेहो एक दिन अहाँ बेचू जनता भूखे मरि गेल ओ बिलैटि गेल मुदा साले साल राजनैतिक रोटी अहाँ सेकू।। मँहगाइ भूखमरी कोनो समाधान ने कराउ कृषि मंत्रालय मे राखल अन्न अहाँ सड़ाउ संसद के कैंटीन में सरकारी सब्सिडी लगाउ चिकन कोरमा शाही पनीर भरिपेट अहाँ खाउ।। घोटाला पर महाघोटाल सभ केलहुँ तइयो ने पेट अहाँ के भरल मिठ बोली बाजि जनता के ठकलहुँ एक्को दिन भूखले पेट होएत अहाँ के रहल कतेको लोक भूखले मरि गेल बेकार भेल अछि किएक संसद भवन स एक दिन बाहर निकलि अहाँ त देखू की भा परैत छैक एक्के दिन मे बुझिए जेबैए बिना किछ खेन्ने एक दिन भूखले रहि के अहाँ देखू।। मुदा कोनो चिन्ता नहि आब कुर्सी भेटिए गेल संसद भवन मे सूखचेन स अहाँ बैसू कारीगर बेना डोला दैत अछि फूकी फूकी अहाँ गरम-गरम चाह पीबू।। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। १.डॉ॰ शशिधर कुमर २.नवीन कुमार "आशा" १. डॉ॰ शशिधर कुमर, एम॰डी॰(आयु॰) – कायचिकित्सा, कॉलेज ऑफ आयुर्वेद एण्ड रिसर्च सेण्टर, निगडी – प्राधिकरण, पूणा (महाराष्ट्र) – ४११०४४ मातृभूमि निज मिथिला अछि, छी वासी हिन्दुस्तान के (मातृ भू वन्दन गीत) (विगत् गणतन्त्र दिवस पर विशेष) मातृभूमि निज मिथिला अछि, छी वासी हिन्दुस्तान के (केर)।* पुण्यभूमि, रणभूमि, तपो - भू, धरती स्वर्ग समान जे ।। युग - युग सँ अछि ठाढ़ जतऽ, गर्वोन्नत दिव्य हिमालय । गूँजय वेद - पुराण जतऽ, अछि सदाचार केर आलय । बहय जतऽ गोदावरी, गंगा, कोशी, कमला आ कृष्णा । विभिन्न धर्म, भाषा भाषी जतऽ, रहय निडर भऽ, क्लेश विना । शत कोटि करय छी नमण आइ हम, धरती कनक समान जे । पुण्यभूमि, रणभूमि, तपोभू, धरती स्वर्ग समान जे ।। भारत केर सन्तान छी हम, आ भारत माँ केर प्रहरी । धर्म हमर अछि देशक रक्षा, देशक उन्नति – प्रगती (ति) ।** देत कुदृष्टि जे एहि धरती पर, करब तकर सन्धान । मारि भगायब हर एक केँ, जे होयत खल शैतान । इएह धरती थिक मण्डन गौतम, औलिया, नानक राम के (केर) ।* पुण्यभूमि, रणभूमि, तपो - भू, धरती स्वर्ग समान जे ।। फहराय हमेशा मुक्त व्योम मे, विजयी - विश्व - तिरंगा । रहय विश्व मे सभसँ आगाँ, हमर देश केर झण्डा । अमर रहय ई देश, जतऽ अछि धीर – वीर सन्तान । मातृभूमि केर रक्षा लेऽ जे, करय निछाउर प्राण । नञि बिसरि सकब गान्धी - सुभाष, आ अगनित कत’ बलिदान केँ । पुण्यभूमि, रणभूमि, तपो - भू, धरती स्वर्ग समान जे ।। * मैथिली काव्य रूप मे बहुधा “केर” आ “केँ” केर उच्चारण द्विमात्रिक “के” सन होइत अछि । यद्यपि गद्य मैथिली मे एहि प्रकारेँ लिखब गलत अछि पर पद्य मैथिली मे पद्यक लय – ताल केर अनुसारेँ आवश्यकता पड़ला पर लिखल जा सकैत अछि । · केर = ह्रस्व उच्चारण = ।। = २ मात्रा · केँ = दिर्घ उच्चारण = ऽ = २ मात्रा · के = दिर्घ उच्चारण = ऽ = २ मात्रा ** पद्य मैथिलीक एकटा आओर विशेषता । पद्य मैथिली मे पद्यक लय – ताल केर अनुसारेँ आवश्यकता पड़ला पर मूल “ह्रस्व उच्चारण” केँ “दिर्घ” आ “दिर्घ उच्चारण” केँ “ह्रस्व” रूप मे उच्चारित कयल जा सकैत अछि । हे अए (ऐ) हमर शशिकामिनी (गीत) (आगामी वेलेण्टाइन डे पर विशेष) हे अए (ऐ) हमर शशिकामिनी ।* हे अए (ऐ) हमर शशिकामिनी ।। गज - गामिनी, मनोहारिनी । मम् हृदय - कुञ्ज विहारिणी ।। मृदु - भाषिणी, मित - भाषिणी । छलकय अधर सञो वारुणी ।। मधु - हासिनी , सौदामिनी । रति - छवि नयन सुखदायिनी ।। प्रिय - दर्शिनी, मधु - वर्षिणी । शोभा अलंकृत - कारिणी ।। मन्मथ - जयी, सद्यः रती । कर काम जय - ध्वज धारिणी ।। अहँ उर्वशी, मम् – उर – बसी । अहँ प्रीति – पय - मन्दाकिनी ।। हे अए (ऐ) हमर शशिकामिनी । हे अए (ऐ) हमर शशिकामिनी ।। * शशिकामिनी = चाँदनी = चानी २ नवीन कुमार "आशा" हिंगलू भाइ यौ टिंगलू भाइ हिंगलू भाइ यौ टिंगलू भाइ जुनि अहाँ तोड़ू तुराइ जँ अहाँ तोड़ब तुराइ रातिमे खायब खूब पिटाइ जुनि रहू अहाँ खाटपर नै तँ काल्हि रहब टाटपर आब सुनू यौ भाइ सुनू यौ भाइ जे अछि टाटक बत्ती नै बनबै जाउ देहक पहचान आइ दुपहरिया रहि रहरिया ओतए आबै अहाँक अबाज पहुँचलौं जखन हम अहाँक डेरा तखन आएल माथमे फेरा फेर बुझल हम घरक रीत अहाँ करी सभटा काज भौजी खाली करथि साज तँए कही यौ टिगलू भैया जल्दी-जल्दी खेनाइ पकाउ जँ अहाँ पकायब नीक खेनाइ रातिमे भौजी दैथि रस मलाइ आ जँ अगर तानब तुराइ फेर खायब खूब पिटाइ ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। १.प्रो. राजकुमार नीलकंठ २.राजदेव मण्डल १ प्रो. राजकुमार नीलकंठ अवकाश प्राप्त प्रोफेसर हिन्दी विभाग िनर्मली महाविद्यालय, िनर्मली। गाम- बेलही जिला- सुपौल। कविता- स्रष्टा अहाँ जतऽ कतहु जनमलहु अपनहि शवकेँ गुरू-चरण तर दबाए ऊर्जित-उत्तनित यष्टि अानत मुख, नमित दृष्टि ठाढ़ रहलहु एक िनर्मम प्रश्नवाचक। आ, फेरसँ शून्यमे पसरि गेल दिगस्तत्व–सहस्र-दल नव रङे रंजित नव नामे संज्ञित, अहाँक सर्प-यज्ञमे देशसँ, देशान्तरसँ ससरि-ससरि, छिहुलि-छिहुलि आयब अनिवार्य भेल होयब अनिवार्य भेल अनर्थकेँ अहाँसँ उत्तरित अहाँसँ अन्तत: अहाँसँ अमुक्त। ठाढ़ रहलहु अहाँ तोड़लहु तँ किछु नहि टूटि गेल सभ अपनहि-आप अपनहि अनुत्तरक नागफणि वनमे लोटि-अरूछा कऽ, जोड़लहु तँ किछु नहि सभ जुटि गेल अपनहि-आप अपनहि ववर्तसँ अपनहि नाङरिक पाछाँ-पाछाँ धावित। अहाँक होयब मात्रसँ नग्रता भेल पूर्ण। अहींक दृष्टि-आवरणसँ पुन: छँपि गेल सम्पूर्ण। एक तीक्ष्ण अटकनपर चितकाबर केचुआ उतारि ससरि गेल शंकित ओ- अनिर्वचनीय वृद्ध अजगर स्यात् कोनो अन्य घाटीक खोजमे शापित करए सुख-मग्र तृरीतिया। साभार- मिथिला मिहिर, जून, 1969ईं. २ राजदेव मण्डलक कविता- कुहेस कतौ ने किछु बचल अछि शेष चारूभर पसरल कुहेस कठुआ गेल देह भीजल अछि केश अधभिज्जू सन भेल सभटा भेष घुरिया रहल छी ठामहि-ठाम कियो ने दैत अछि समैपर काम टूटल जा रहल सभ आस ऊपरसँ लगि गेल दिशाँस कुहेस आर भऽ गेल सघन इजोत लगैत अछि टीका सन खेत-खरिहान, घर जंगल-झाड़ सभटाकेँ घोंटि गेल अन्हार उनटि गेल जेना माथ छूटि गेल सभ संग-साथ नै भेटैत अछि बाट नै अपन घाट लगे-लग औनाइत मन भेल उच्चाट सभ गोटे धऽ लेने छी खाट देखा दिअ जाएब कोन बाट कहिया फटत ई कुहेस भेटत अपन घर परिवेश हे सुरूज किरणकेँ जगाऊ आबो तँ ऐ कुहेसकेँ भगाऊ। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। विदेह नूतन अंक मिथिला कला संगीत १ राजनाथ मिश्र चित्रमय मिथिला स्लाइड शो चित्रमय मिथिला (https://sites.google.com/a/videha.com/videha-paintings-photos/ ) २. उमेश मण्डल मिथिलाक वनस्पति स्लाइड शो मिथिलाक जीव-जन्तु स्लाइड शो मिथिलाक जिनगी स्लाइड शो मिथिलाक वनस्पति/ मिथिलाक जीव जन्तु/ मिथिलाक जिनगी (https://sites.google.com/a/videha.com/videha-paintings-photos/ ) ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। विदेह नूतन अंक गद्य-पद्य भारती १. मोहनदास (दीर्घकथा):लेखक: उदय प्रकाश (मूल हिन्दीसँ मैथिलीमे अनुवाद विनीत उत्पल) मोहनदास (मैथिली-देवनागरी) मोहनदास (मैथिली-मिथिलाक्षर) मोहनदास (मैथिली-ब्रेल) २.छिन्नमस्ता- प्रभा खेतानक हिन्दी उपन्यासक सुशीला झा द्वारा मैथिली अनुवाद छिन्नमस्ता ३.कनकमणि दीक्षित (मूल नेपालीसँ मैथिली अनुवाद धीरेन्द्र प्रेमर्षि) भगता बेङक देश-भ्रमण बालानां कृते डॉ॰ शशिधर कुमर “विदेह” - १.माँ शारदे वन्दना २.उड़ि ने सकी पर चिड़ै छी हम (भाग-२) १ माँ शारदे वन्दना - १ (गीत) (श्री सरस्वती पूजाक शुभ अवसरि पर विशेष) जय अम्बे, जय माँ शारदे, विनय हमर स्वीकार करू । सभहक अहाँ सुनै छी हे माता, हमरो बेड़ा पार करू । क्षमा करू अपराध हमर सभ, हमरो अहाँ उद्धार करू । जय अम्बे, जय माँ शारदे, विनय हमर स्वीकार करू ।। नञि जानी पूजा केर विधि माँ, हम धिया - पुता अज्ञानी छी । दिशाहीन संसार बीच हम, अहींक चरण - अनुगामी छी । हमहूँ अहींक सन्तान छी माता, हमरो निज करुणा दान करू । पथ - प्रशस्त, शुभ - दिशाबोध, सद्ज्ञान दियऽ, अभिमान हरू। जय अम्बे, जय माँ शारदे, विनय हमर स्वीकार करू ।। नञि बालक प्रह्लाद छी हम माँ, नञि ध्रुव सन हम ज्ञानी छी । आयल छी माँ अहींक शरण मे, कृपा दृष्टि केर कामी छी । अज्ञानक अन्हार हरू माँ, ज्ञानक ज्योति प्रदान करू । नहि हमरहि, सम्पुर्ण जगत भरि, जन – जन केर कल्याण करू । जय अम्बे, जय माँ शारदे, विनय हमर स्वीकार करू ।। माँ शारदे वन्दना - २ (गीत) (श्री सरस्वती पूजाक शुभ अवसरि पर विशेष) जय माँ शारदे, विद्यादायिनी, अज्ञानस्य तिमिर हरणम् । तन शुभ्र प्रकाशित, पंकज राजित, शोभित चारु कमल नयनम् ।। जय माँ शारदे, विद्यादायिनी, अज्ञानस्य तिमिर हरणम् ।। कामिनि चतुरानन, हंसहि वाहन, शान्त स्वभाव, वाणि मधुरम् । वीणा कर शोभित, सभजन पूजित, सकल कला – कौशल कुशलम् ।। जय माँ शारदे, विद्यादायिनी, अज्ञानस्य तिमिर हरणम् ।। मम् जहि निर्बुद्धि, देहि सुबुद्धि, विद्या सम वारिधि सलिलम् । छल लोभ च कामम्, तम अज्ञानम्, हरिअ सकल मम् दोष अयम् ।। जय माँ शारदे, विद्यादायिनी, अज्ञानस्य तिमिर हरणम् ।। २ उड़ि ने सकी पर चिड़ै छी हम (भाग-२) अगिला साँझ, हाट – बजार कऽ कऽ आङ्गन अबैत रही । दूरहि सँ कोनटहि लऽग सँ बुझा गेल जे धिया – पुता सभ बाट ताकि रहल अछि । आइ संख्या सेहो किछु बेशीअहि बुझि पड़ल, जे कि यथार्थे छल । लऽग अबितहि सभ धिया - पुता सामने राखल काठक कुर्सी पर हमरा झीकि – तीरि कऽ बैसा देलक आ अपने सभ सामने राखल चौकी पर बैसि रहल । सोनी – तऽ चलू आब शुरू भऽ जाउ आ आगाक खिस्सा सुनाउ । कञ्चन – हम्मे काल्हि नञि रहियै , हम्मे शुरू सऽ सुनाउ । किछु धिया पुता सभ बाजल – नञि ! नञि ! हम सभ आगा केर खिस्सा सुनब । कञ्चन आइ भोरहि भागलपुर सऽ आयल छलि, एहि ठाम ओकर मामा गाम । तऽ फेर भगिनमानक बऽल, कोना ओकर बात टारि सकैत छलियै । बाकी धिया – पुता केँ सेहो मोन नञि तोड़ल जा सकैत छल तेँ ओकरा सभ केँ समझबैत पहिलुका खिस्सा एक बेर फेर सँ संक्षेप मे कहल । .......................... तऽ हम सभ कैसोवरी लग आबि कऽ रूकल रही ?? - हँ, आ एकर बाद “सोन चिड़ै” केर रहए । बब्बन सोनी दिशि इशारा करैत बाजल । सभ धिया – पुता फेर जोर सँ भभा कऽ हँसि पड़ल । सोनी ओहि ठाम सँ उठि, हमर कुर्सीक कात मे आबि ठाढ़ि भऽ गेलि । थोड़ेक तामस मे बाजलि – यौ देखै छियै ई सभ कोना हमरा खौंझबैत रहइए । - हम कात मे राखल एकटा मचिया अपन कुर्सीक बगल मे रखैत बजलहुँ – ठीक छै तोँ एहि ठाम बैस । एहि मे खौंझाइ केर कोन गप्प , तोँ तऽ छेँहे “सोन चिड़ै” । लोक तऽ दुलार सऽ कहैत छौ ने । - ओकर तामस कम होइत निपत्ता भऽ गेलै जेना कि सहजहि धिया – पुता सभ मे होइत छै । ओ हमरहि लऽग ओहि मचिया पर बैसि रहलि । - हँ तऽ ऑस्ट्रेलिया केर बगल मे कोन देश छै ? - हम बाकी धिया – पुता दिशि मूँह करैत बजलहुँ । – न्यूजीलैण्ड । सभ धिया पुता केँ शान्त देखि कञ्चन कने गम्भीर पर आत्मविशवास भरल स्वर मे बाजलि । हम – आ ओहि ठामक राष्ट्रिय चिड़ै कोन ? – सभ धिया पुता फेर अवाक भए हमर मूँह ताकए लागल । - तोँ सभ क्रिकेट खेलय जाय छह, देखै जाय छह, कने जोड़ दहक दिमाग पर – हम बजलहुँ । हम पुनः बजलहुँ - अच्छा छोड़ह, ई कहह जे न्यूजीलैण्ड केर लोक सभ केँ की कहल जाइत छै ? बब्बन – चहकैत बाजल – अरे, हाँ ................ किवी । हम – एकदम सही “कीवी” ओहि ठामक राष्ट्रिय चिड़ै अछि आ ओहो उड़ि नञि सकैत अछि । एकर वंश (Genus) थिक अटेरिक्स (Apteryx) । एकर पाँच टा जाति (Species) पाओल जाइत अछि , जाहि मे सँ अटेरिक्स ऑस्ट्रेलिस (Apteryx australis) । ई लजकोटरि आ मुख्यतः राति मे विचरण कएनिहार चिड़ै अछि । तेरहम सती मे न्यूजीलैण्ड मे मनुक्खक आगमन सँ ओहि ठाम कीवी केर कोनो शत्रु नञि छल । परञ्च मनुक्ख अपना संगहि कुकुर, बिलाइ आ ओकरहि सन आन जानवर जेना कि स्टोट (Stoat) फेर्रेट (Ferret ,बिज्जी केर एक प्रकार) आदि सेहो नेने आयल । स्टोट आ फेर्रेट कीवीक अण्डा केर परम शत्रु आ कुकुर बिलाइ वयस्क कीवीक । एहि प्रकारेँ कीवीक संख्या बहुत कम होइत गेल आ ई चिड़ै वलुप्त होयबाक श्रेणी मे आबि गेल । एकरा बचयबाक लेल 200 ई॰ मे न्यूजीलैण्ड मे पाँच टा कीवी अभयारण्य (sanctuary) बनाओल गेल अछि । प्रिया – से सभ तऽ ठीक । पर एकरा बारे मे कोनो विशेष बात बताउ । हम – बहुत किछु विशेषता छै । एकर सूँघबाक शक्ति बहुत तेज होइत अछि । सोनी – तखन तऽ ईहो कुकुरहि भेल कि ने ? हम – हाँ एहि मामिला मे कुकुरहि सन तेज । एकर नमगर चोंचक अगिला भाग मे नासाछिद्र (Nostrils) होइत अछि जखन कि आन चिड़ै सभ केर चोंच केर पछिला भाग मे । ई सर्वाहारी अछि फल – फूल, कीड़ा – मकोड़ा, बेङ्ग – दादुर आदि खा जाइत अछि । कीवी बिना देखनहि, जमीनक नीचा मे बिल मे बैसल कीड़ा – मकोड़ा केँ सही – सही अन्दाजि सकैत अछि । यद्यपि शुतुर्मुर्गक अण्डा केर वास्तविक आकार दुनिञा मे सभसँ पैघ अछि , पर वयस्क चिड़ै केर आकार केर अनुपात मे अण्डा केर आकार देखला सँ कीवीक अण्डाक सानुपातिक अकार (Relative / comparative size) सभसँ पैघ होइछ । कीवीक एक अण्डा केर ओजन वयस्क स्त्री कीवीक ओजन केर चौथाई ओजन धरि भऽ सकैत अछि । ई किछु गिनल - चुनल चिड़ै मे सँ अछि जे एक बेर जोड़ी बनलाक बाद जिनगी भरि संग रहैछ । विकास – हूँ । से नञि बूझल छल । हम – आब हम सभ नऽव दुनञा दिशि चली । बब्बन – नऽव दुनिञा ? हम नञि बुझली । प्रिया – अमेरिका के नऽव दुनिञा कहल जाइत छै ........छै ने ? हमरा दिशि तकैत बाजलि । हम – हँ नऽव दुनिञा (New World) प्रायः अमेरिकहि केँ आ खास कऽ दक्षिणी अमेरिका (उच्चारण – दैच्छनी अमेरिका) केँ कहल जाइत छै । ओना किछु लोक ऑस्ट्रेलिया आ लऽग – पासक द्वीप समूह सभ केँ सेहो नऽव दुनिञा कहैत छथिन्ह । कञ्चन – यानि कि हम्मे सभ एक नऽव दुनिञा सऽ दोसर नऽव दुनिञा जयवो । हम – हँ । तऽ चली । सभ केओ तैय्यार छी । - सभ धिया – पुता एक स्वरेँ बाजल – हँ, तैय्यार छी । हम - द॰ अमेरिका केर मूल निवासी अछि “रिया” । ई करीब – करीब पूरा दक्षिणी अमेरिका – जेना कि ब्राजील, पेरू, अर्जेण्टीना, चिली आदि देश – मे पाओल जाइत अछि । पवन – रिया तऽ हमर मौसी के नाम हए । हम – पर एहि ठाम “रिया” मनुक्खक नञि, चिड़ै केर नाँव थिक । एकर दू टा जाति पाओल जाइछ – पहिल बड़की रिया या रिया अमेरिकाना (Rhea americana) आ दोसर छोटकी रिया या रिया पिन्नाटा (Rhea pennata) । ई सभ सर्वाहारी (Omnivirous) होइत अछि पर अधिकांशतः चाकर पत्तावला गाछ – बिरिछ केर पात खाइत अछि, पर जरूरति पड़ला पर फल, बीया आ छोट – मोट गाछक जड़ि सेहो चिबा जाइत अछि । भूख लगला पर छोट – मोट कीड़ा – मकोड़ा आ गिरगिट धरि खा सकैत अछि । नञि उरि सकएबला चिड़ै सभ मे रिया केर पंखक आकार सभसँ पैघ होइत अछि आ जखन ओ चलैत वा दौड़ैत अछि तऽ पंख केँ थोड़े – थोड़े पसारि लैत अछि । ई चिड़ै बहुत चलाक होइत अछि । सोनी – से कोना ? हम – पहिने कहल आन चिड़ै सभ जेना ईहो, जमीने पर अपन अण्डा दैत अछि , घोसला आस – पास मे पाओल जाय वला घास – पात सँ बनबैछ । एक घोसला मे 10 सँ 60 धरि अण्डा भऽ सकैत अछि । पवन – एहि मे कथी केर चलाकी ? हम - ई एकर चलाकी नञि । अण्डा खएनिहार जीव – जन्तु केर ध्यान बहटारए केर लेल ई चिड़ै अपन मुख्य घोसला केर चारू कात दू – चारि टा अण्डा छोड़ि दैत अछि । एहि प्रकारेँ अपन किछु अण्डा केर बलि दऽ कऽ शेष अण्डा केर बुद्धिमानी सँ सुरक्षित बचा लैछ । बब्बन – हँ, तऽ बुझली, इएह छी एकर चलाकी । हम – दक्षिणी अमेरिका मे एक गोट आओरो चिड़ै भेटैछ , जे उड़ि नञि सकैछ । केओ बता सकैत छह ओकर नाँव ?? - सभ धिया – पुता एक दोसराक मूँह ताकए लागल । पर केओ किछु नञि बाजल । हम – “पेंगुइन” केर नाम सुनने छह की ? - सभ धिया – पुताक जेना भक टुटि गेल हो । एक्कहि संगे जोर सँ बाजल – यौ ! ओ तऽ अण्टार्कटिका मे होइत छै । सोनी – अहीं तऽ अपन पिछला खिस्सा – “खिस्सा अण्टार्कटिका केर” - मे लिखने छलियै । अहूँ केँ निन्न लागल सन बुझाइत अछि । हम – निन्न नञि लागल अछि । हम ई थोड़े ने लिखने रही कि पेंगुइन (पेंग्वीन) खाली अण्टार्कटिकहि मे होइत अछि । पेंगुइन केर करीब 17 सँ 20 जाति पाओल जाइत अछि आ ओ अण्टार्कटिकाक अतिरिक्त दक्षिणी अमेरिका (अर्जेण्टीना, चीली), ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैण्ड, दक्षिण अफ्रिका, गैलेपैगोस द्वीपसमूह आदि स्थान पर पाओल जाइत अछि । ई सभटा स्थान पृथ्वीक दक्षिणी गोलार्ध (Southern hemisphere) मे अबैछ । जे अकार मे पैघ आ भारी पेंगुइन अछि ओ ठण्ढा जगह पर आ जे छोट आ हल्लुक पेंगुइन अछि से अपेक्षाकृत गर्म जगह पर पाओल जाइछ । सम्राट पेंगुइन या एम्पेरर पेंगुइन (Emperor penguin) सभसँ पैघ आ भारी होइछ जे कि अण्टार्कटिका मे रहैछ । एकर ऊँचाई 1.1 मीटर (लगभग साढ़े तीन फीट) आ ओजन लगभग 35 कि॰ग्रा॰ धरि होइत अछि । सम्राट पेंगुइन केर जैव वैज्ञानिक नाँव अछि ऑप्टेनोडाइटिस फोर्सटेराइ (Aptenodytes forsteri) । अच्छा तोरा सभ केँ एकरा बारे मे की की बूझल छह ? बब्बन – ई हमरे आर मनुक्ख जेकाँ दू पैर सऽ चलि सकै हए । हम – एकर मतलब कि अहाँ सभ एहि चिड़ै सँ अपरिचित नञि छी । पेंगुइन मनुक्खे जेकाँ दू पएर सँ धऽर उठा कए नाकक सीध मे चलि सकैत अछि । एहि चलबाक समय ओकर छोट- क्षीण नाँगरि (Tail) सन पछिला भाग ओकरा अपन शरीर केँ सन्तुलित रखबा मे मदति करैछ । कञ्चन – हम्मे डिस्कवरी चैनल पर देखने रहियै जे ओकर पेट उज्जर आ पीठ कारी होइ छैक । हम – एकदम सही, ओकर पेटक रंग बर्फ सन उज्जर होइत अछि । एहि कारणेँ समुद्रक अन्दर सँ ताकि रहल शिकारी समुद्री जीव – जेना कि सील, वालरस आदि – समुद्रक कात मे बर्फ पर ठाढ़ पेंगुइन आ बर्फ मे भेद नञि कऽ पबैछ । एहि प्रकारेँ पेटक उज्जर रंग ओकरा लेल सुरक्षा – कवच सन काज करैत छै । तहिना पीठ परक कारी रंग सेहो – आकाश मे उड़ि रहल पैघ शिकारी चिड़ै सभ पाथर सन बुझि धोखा खा जाइत अछि । जीव विज्ञान मे एहि प्रकारक प्राकृतिक सुरक्षा व्यवस्था केँ छद्मावरण (Camouflage) कहल जाइछ । एकर आन उदाहरण अछि गिरगिट केर रंग बदलब । सोनी – ओ पानि मे हेलि सेहो सकैत अछि । हम – बेस कहल । ओ समुद्रक पानि मे डुम्मी काटि कऽ हेलि (Diving) सकैत अछि । ओकर देह मे बहुत चर्बी रहैत छै । अहाँ सभ केँ बुझले होयत कि चर्बी पानि सँ हल्लुक होइत अछि आ तेँ ओ पानि मे हेलबा मे मदति करैछ । ई चर्बी पेंगुइन केँ ठण्ढी सँ सेहो सुरक्षित रखैछ । ओकर दुनू पंख पानि मे हेलबाक लेल अनुकूलित भऽ गेल अछि आ हेलबाक समय नाओ केर पतवाड़ि सदृश काज करैछ । ओ 6 सँ 12 कि॰ मि॰ प्रति घण्टा केर गति सँ पानि मे दुम्मी मारि कऽ हेलि सकैछ । सम्राट पेंगुइन समुद्र केर भीतर 365 मीटर अर्थात् 1870 फीट गहीर तक जा सकैत अछि । ओ समुद्री माछ आ जीव जन्तुक शिकार कऽ कऽ अपन पेट भरैछ आ कहुखन – कहुखन इएह फेरी मे स्वयं आन समुद्री प्राणीक (यथा सील आ वालरसक) शिकार सेहो बनि जाइछ । ओ समुद्रक पानि सेहो पिउबि कऽ पचा सकैत अछि आ समुद्रक पानि केर संग पिउल गेल अतिरिक्त नोन केँ मगरमच्छे जेकाँ नोरक संग बहा दैछ । पानि मे पेंगुइन केर हेलबाक प्रक्रिया देखबा मे बहुत किछु हवा मे कोनो चिड़ै केर उरबाक प्रक्रिया सँ मेल खाइछ । प्रिया – सही मे , ई तऽ चिड़ै सनि लगिते नञि अछि । हम – हाँ । कखनो कखनो ई बर्फ पर छहलैत – छहलैत (Sliding) एक जगह सँ दोसर जगह पहुँचि जाइछ तऽ कखनो – कखनो छोट धिया – पुता जेकाँ दुनु पएर उठा कऽ कूदि – कूदि कऽ सेहो चलैछ । पवन – आश्चर्य !!! हम – हाँ आश्चर्ये थिक । ओना तऽ नञि उड़ि सकनिहार करीब 40 प्रकारक चिड़ै अछि पर ई चिड़ै सभ लोक केँ बेशी आकर्षित करैत अछि तेँ अहूँ सभ केँ सुना देलहुँ । ई खिस्सा आब एतहि खतम करैत छी । विकास – तइयो किछु आओर एहि तरहक चिड़ै सभहक नाँव तऽ बताउ । हम – नाँव तऽ अहूँ सभ केँ बुझले अछि – मुर्गा, बत्तख आ मोर । प्रिया – पर ओ सभ तऽ उड़ए छै । हम – नञि खा गेलहुँ ने धोखा । ओ सभ वास्तव मे उड़ैत नञि अछि, कोनो ऊँच स्थान सँ कुदैत अछि, अपन पंख केँ फड़फड़बैत अछि आ हवा पर गुड्डी (पतंग) जेकाँ उधियाइत वा उड़ियाइत (Glide) रहैत अछि । पवन – सही कहलहुँ अहाँ । हम – चलैत – चलैत एकटा नाँव आओर बता दैत छी – “डोडो” । ई चिड़ै मॉरिशस केर मूल निवासी छल, उड़ि नञि सकैत छल । अत्यधिक शिकार होयबाक कारणेँ ओ करीब चारि – साढ़े चारि सौ वर्ष पहिने विलुप्त (Extinct) भऽ गेल । पवन – ओह । ई तऽ बहुत खड़ाब भेल । हम – हँ से तऽ अछि । पर जे एक बेर विलुप्त भऽ गेल से फेर सँ दोबारा नञि आबि सकैछ । - किछु क्षण केर लेल सभ शान्त भऽ गेल । - शान्ति केर तोड़ैत हम बजलहुँ । ठीक अछि तऽ आब चलबाक चाही । - हाँ । सभ धिया – पुता बेमोन सँ बाजल । सोनी – फेर अगिला बेर कोन खिस्सा सुनाएब । हम – से अगिलहि बेर कहब । ता धरि शुभ रात्रि । ******************* ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। बच्चा लोकनि द्वारा स्मरणीय श्लोक १.प्रातः काल ब्रह्ममुहूर्त्त (सूर्योदयक एक घंटा पहिने) सर्वप्रथम अपन दुनू हाथ देखबाक चाही, आ’ ई श्लोक बजबाक चाही। कराग्रे वसते लक्ष्मीः करमध्ये सरस्वती। करमूले स्थितो ब्रह्मा प्रभाते करदर्शनम्॥ करक आगाँ लक्ष्मी बसैत छथि, करक मध्यमे सरस्वती, करक मूलमे ब्रह्मा स्थित छथि। भोरमे ताहि द्वारे करक दर्शन करबाक थीक। २.संध्या काल दीप लेसबाक काल- दीपमूले स्थितो ब्रह्मा दीपमध्ये जनार्दनः। दीपाग्रे शङ्करः प्रोक्त्तः सन्ध्याज्योतिर्नमोऽस्तुते॥ दीपक मूल भागमे ब्रह्मा, दीपक मध्यभागमे जनार्दन (विष्णु) आऽ दीपक अग्र भागमे शङ्कर स्थित छथि। हे संध्याज्योति! अहाँकेँ नमस्कार। ३.सुतबाक काल- रामं स्कन्दं हनूमन्तं वैनतेयं वृकोदरम्। शयने यः स्मरेन्नित्यं दुःस्वप्नस्तस्य नश्यति॥ जे सभ दिन सुतबासँ पहिने राम, कुमारस्वामी, हनूमान्, गरुड़ आऽ भीमक स्मरण करैत छथि, हुनकर दुःस्वप्न नष्ट भऽ जाइत छन्हि। ४. नहेबाक समय- गङ्गे च यमुने चैव गोदावरि सरस्वति। नर्मदे सिन्धु कावेरि जलेऽस्मिन् सन्निधिं कुरू॥ हे गंगा, यमुना, गोदावरी, सरस्वती, नर्मदा, सिन्धु आऽ कावेरी धार। एहि जलमे अपन सान्निध्य दिअ। ५.उत्तरं यत्समुद्रस्य हिमाद्रेश्चैव दक्षिणम्। वर्षं तत् भारतं नाम भारती यत्र सन्ततिः॥ समुद्रक उत्तरमे आऽ हिमालयक दक्षिणमे भारत अछि आऽ ओतुका सन्तति भारती कहबैत छथि। ६.अहल्या द्रौपदी सीता तारा मण्डोदरी तथा। पञ्चकं ना स्मरेन्नित्यं महापातकनाशकम्॥ जे सभ दिन अहल्या, द्रौपदी, सीता, तारा आऽ मण्दोदरी, एहि पाँच साध्वी-स्त्रीक स्मरण करैत छथि, हुनकर सभ पाप नष्ट भऽ जाइत छन्हि। ७.अश्वत्थामा बलिर्व्यासो हनूमांश्च विभीषणः। कृपः परशुरामश्च सप्तैते चिरञ्जीविनः॥ अश्वत्थामा, बलि, व्यास, हनूमान्, विभीषण, कृपाचार्य आऽ परशुराम- ई सात टा चिरञ्जीवी कहबैत छथि। ८.साते भवतु सुप्रीता देवी शिखर वासिनी उग्रेन तपसा लब्धो यया पशुपतिः पतिः। सिद्धिः साध्ये सतामस्तु प्रसादान्तस्य धूर्जटेः जाह्नवीफेनलेखेव यन्यूधि शशिनः कला॥ ९. बालोऽहं जगदानन्द न मे बाला सरस्वती। अपूर्णे पंचमे वर्षे वर्णयामि जगत्त्रयम् ॥ १०. दूर्वाक्षत मंत्र(शुक्ल यजुर्वेद अध्याय २२, मंत्र २२) आ ब्रह्मन्नित्यस्य प्रजापतिर्ॠषिः। लिंभोक्त्ता देवताः। स्वराडुत्कृतिश्छन्दः। षड्जः स्वरः॥ आ ब्रह्म॑न् ब्राह्म॒णो ब्र॑ह्मवर्च॒सी जा॑यता॒मा रा॒ष्ट्रे रा॑ज॒न्यः शुरे॑ऽइषव्यो॒ऽतिव्या॒धी म॑हार॒थो जा॑यतां॒ दोग्ध्रीं धे॒नुर्वोढा॑न॒ड्वाना॒शुः सप्तिः॒ पुर॑न्धि॒र्योवा॑ जि॒ष्णू र॑थे॒ष्ठाः स॒भेयो॒ युवास्य यज॑मानस्य वी॒रो जा॒यतां निका॒मे-नि॑कामे नः प॒र्जन्यों वर्षतु॒ फल॑वत्यो न॒ऽओष॑धयः पच्यन्तां योगेक्ष॒मो नः॑ कल्पताम्॥२२॥ मन्त्रार्थाः सिद्धयः सन्तु पूर्णाः सन्तु मनोरथाः। शत्रूणां बुद्धिनाशोऽस्तु मित्राणामुदयस्तव। ॐ दीर्घायुर्भव। ॐ सौभाग्यवती भव। हे भगवान्। अपन देशमे सुयोग्य आ’ सर्वज्ञ विद्यार्थी उत्पन्न होथि, आ’ शुत्रुकेँ नाश कएनिहार सैनिक उत्पन्न होथि। अपन देशक गाय खूब दूध दय बाली, बरद भार वहन करएमे सक्षम होथि आ’ घोड़ा त्वरित रूपेँ दौगय बला होए। स्त्रीगण नगरक नेतृत्व करबामे सक्षम होथि आ’ युवक सभामे ओजपूर्ण भाषण देबयबला आ’ नेतृत्व देबामे सक्षम होथि। अपन देशमे जखन आवश्यक होय वर्षा होए आ’ औषधिक-बूटी सर्वदा परिपक्व होइत रहए। एवं क्रमे सभ तरहेँ हमरा सभक कल्याण होए। शत्रुक बुद्धिक नाश होए आ’ मित्रक उदय होए॥ मनुष्यकें कोन वस्तुक इच्छा करबाक चाही तकर वर्णन एहि मंत्रमे कएल गेल अछि। एहिमे वाचकलुप्तोपमालड़्कार अछि। अन्वय- ब्रह्म॑न् - विद्या आदि गुणसँ परिपूर्ण ब्रह्म रा॒ष्ट्रे - देशमे ब्र॑ह्मवर्च॒सी-ब्रह्म विद्याक तेजसँ युक्त्त आ जा॑यतां॒- उत्पन्न होए रा॑ज॒न्यः-राजा शुरे॑ऽ–बिना डर बला इषव्यो॒- बाण चलेबामे निपुण ऽतिव्या॒धी-शत्रुकेँ तारण दय बला म॑हार॒थो-पैघ रथ बला वीर दोग्ध्रीं-कामना(दूध पूर्ण करए बाली) धे॒नुर्वोढा॑न॒ड्वाना॒शुः धे॒नु-गौ वा वाणी र्वोढा॑न॒ड्वा- पैघ बरद ना॒शुः-आशुः-त्वरित सप्तिः॒-घोड़ा पुर॑न्धि॒र्योवा॑- पुर॑न्धि॒- व्यवहारकेँ धारण करए बाली र्योवा॑-स्त्री जि॒ष्णू-शत्रुकेँ जीतए बला र॑थे॒ष्ठाः-रथ पर स्थिर स॒भेयो॒-उत्तम सभामे युवास्य-युवा जेहन यज॑मानस्य-राजाक राज्यमे वी॒रो-शत्रुकेँ पराजित करएबला निका॒मे-नि॑कामे-निश्चययुक्त्त कार्यमे नः-हमर सभक प॒र्जन्यों-मेघ वर्षतु॒-वर्षा होए फल॑वत्यो-उत्तम फल बला ओष॑धयः-औषधिः पच्यन्तां- पाकए योगेक्ष॒मो-अलभ्य लभ्य करेबाक हेतु कएल गेल योगक रक्षा नः॑-हमरा सभक हेतु कल्पताम्-समर्थ होए ग्रिफिथक अनुवाद- हे ब्रह्मण, हमर राज्यमे ब्राह्मण नीक धार्मिक विद्या बला, राजन्य-वीर,तीरंदाज, दूध दए बाली गाय, दौगय बला जन्तु, उद्यमी नारी होथि। पार्जन्य आवश्यकता पड़ला पर वर्षा देथि, फल देय बला गाछ पाकए, हम सभ संपत्ति अर्जित/संरक्षित करी। 8.VIDEHA FOR NON RESIDENTS 8.1 to 8.3 MAITHILI LITERATURE IN ENGLISH 8.1.1.The Comet -GAJENDRA THAKUR translated by Jyoti Jha chaudhary 8.1.2.The_Science_of_Words- GAJENDRA THAKUR translated by the author himself 8.1.3.On_the_dice-board_of_the_millennium- GAJENDRA THAKUR translated by Jyoti Jha chaudhary 8.1.4.NAAGPHANS (IN ENGLISH)- SHEFALIKA VERMA translated by Dr. Rajiv Kumar Verma and Dr. Jaya Verma विदेह नूतन अंक भाषापाक रचना-लेखन Input: (कोष्ठकमे देवनागरी, मिथिलाक्षर किंवा फोनेटिक-रोमनमे टाइप करू। Input in Devanagari, Mithilakshara or Phonetic-Roman.) Output: (परिणाम देवनागरी, मिथिलाक्षर आ फोनेटिक-रोमन/ रोमनमे। Result in Devanagari, Mithilakshara and Phonetic-Roman/ Roman.) English to Maithili Maithili to English इंग्लिश-मैथिली-कोष / मैथिली-इंग्लिश-कोष प्रोजेक्टकेँ आगू बढ़ाऊ, अपन सुझाव आ योगदान ई-मेल द्वारा ggajendra@videha.com पर पठाऊ। Top of Form विदेहक मैथिली-अंग्रेजी आ अंग्रेजी मैथिली कोष (इंटरनेटपर पहिल बेर सर्च-डिक्शनरी) एम.एस. एस.क्यू.एल. सर्वर आधारित -Based on ms-sql server Maithili-English and English-Maithili Dictionary. १.भारत आ नेपालक मैथिली भाषा-वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक शैली आ २.मैथिलीमे भाषा सम्पादन पाठ्यक्रम १.नेपाल आ भारतक मैथिली भाषा-वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक शैली
१.१. नेपालक मैथिली भाषा वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक उच्चारण आ लेखन शैली (भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक धारणाकेँ पूर्ण रूपसँ सङ्ग लऽ निर्धारित) मैथिलीमे उच्चारण तथा लेखन १.पञ्चमाक्षर आ अनुस्वार: पञ्चमाक्षरान्तर्गत ङ, ञ, ण, न एवं म अबैत अछि। संस्कृत भाषाक अनुसार शब्दक अन्तमे जाहि वर्गक अक्षर रहैत अछि ओही वर्गक पञ्चमाक्षर अबैत अछि। जेना- अङ्क (क वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ङ् आएल अछि।) पञ्च (च वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ञ् आएल अछि।) खण्ड (ट वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ण् आएल अछि।) सन्धि (त वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे न् आएल अछि।) खम्भ (प वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे म् आएल अछि।) उपर्युक्त बात मैथिलीमे कम देखल जाइत अछि। पञ्चमाक्षरक बदलामे अधिकांश जगहपर अनुस्वारक प्रयोग देखल जाइछ। जेना- अंक, पंच, खंड, संधि, खंभ आदि। व्याकरणविद पण्डित गोविन्द झाक कहब छनि जे कवर्ग, चवर्ग आ टवर्गसँ पूर्व अनुस्वार लिखल जाए तथा तवर्ग आ पवर्गसँ पूर्व पञ्चमाक्षरे लिखल जाए। जेना- अंक, चंचल, अंडा, अन्त तथा कम्पन। मुदा हिन्दीक निकट रहल आधुनिक लेखक एहि बातकेँ नहि मानैत छथि। ओ लोकनि अन्त आ कम्पनक जगहपर सेहो अंत आ कंपन लिखैत देखल जाइत छथि। नवीन पद्धति किछु सुविधाजनक अवश्य छैक। किएक तँ एहिमे समय आ स्थानक बचत होइत छैक। मुदा कतोक बेर हस्तलेखन वा मुद्रणमे अनुस्वारक छोट सन बिन्दु स्पष्ट नहि भेलासँ अर्थक अनर्थ होइत सेहो देखल जाइत अछि। अनुस्वारक प्रयोगमे उच्चारण-दोषक सम्भावना सेहो ततबए देखल जाइत अछि। एतदर्थ कसँ लऽ कऽ पवर्ग धरि पञ्चमाक्षरेक प्रयोग करब उचित अछि। यसँ लऽ कऽ ज्ञ धरिक अक्षरक सङ्ग अनुस्वारक प्रयोग करबामे कतहु कोनो विवाद नहि देखल जाइछ। २.ढ आ ढ़ : ढ़क उच्चारण “र् ह”जकाँ होइत अछि। अतः जतऽ “र् ह”क उच्चारण हो ओतऽ मात्र ढ़ लिखल जाए। आन ठाम खाली ढ लिखल जएबाक चाही। जेना- ढ = ढाकी, ढेकी, ढीठ, ढेउआ, ढङ्ग, ढेरी, ढाकनि, ढाठ आदि। ढ़ = पढ़ाइ, बढ़ब, गढ़ब, मढ़ब, बुढ़बा, साँढ़, गाढ़, रीढ़, चाँढ़, सीढ़ी, पीढ़ी आदि। उपर्युक्त शब्द सभकेँ देखलासँ ई स्पष्ट होइत अछि जे साधारणतया शब्दक शुरूमे ढ आ मध्य तथा अन्तमे ढ़ अबैत अछि। इएह नियम ड आ ड़क सन्दर्भ सेहो लागू होइत अछि। ३.व आ ब : मैथिलीमे “व”क उच्चारण ब कएल जाइत अछि, मुदा ओकरा ब रूपमे नहि लिखल जएबाक चाही। जेना- उच्चारण : बैद्यनाथ, बिद्या, नब, देबता, बिष्णु, बंश, बन्दना आदि। एहि सभक स्थानपर क्रमशः वैद्यनाथ, विद्या, नव, देवता, विष्णु, वंश, वन्दना लिखबाक चाही। सामान्यतया व उच्चारणक लेल ओ प्रयोग कएल जाइत अछि। जेना- ओकील, ओजह आदि। ४.य आ ज : कतहु-कतहु “य”क उच्चारण “ज”जकाँ करैत देखल जाइत अछि, मुदा ओकरा ज नहि लिखबाक चाही। उच्चारणमे यज्ञ, जदि, जमुना, जुग, जाबत, जोगी, जदु, जम आदि कहल जाएबला शब्द सभकेँ क्रमशः यज्ञ, यदि, यमुना, युग, यावत, योगी, यदु, यम लिखबाक चाही। ५.ए आ य : मैथिलीक वर्तनीमे ए आ य दुनू लिखल जाइत अछि। प्राचीन वर्तनी- कएल, जाए, होएत, माए, भाए, गाए आदि। नवीन वर्तनी- कयल, जाय, होयत, माय, भाय, गाय आदि। सामान्यतया शब्दक शुरूमे ए मात्र अबैत अछि। जेना एहि, एना, एकर, एहन आदि। एहि शब्द सभक स्थानपर यहि, यना, यकर, यहन आदिक प्रयोग नहि करबाक चाही। यद्यपि मैथिलीभाषी थारू सहित किछु जातिमे शब्दक आरम्भोमे “ए”केँ य कहि उच्चारण कएल जाइत अछि। ए आ “य”क प्रयोगक सन्दर्भमे प्राचीने पद्धतिक अनुसरण करब उपयुक्त मानि एहि पुस्तकमे ओकरे प्रयोग कएल गेल अछि। किएक तँ दुनूक लेखनमे कोनो सहजता आ दुरूहताक बात नहि अछि। आ मैथिलीक सर्वसाधारणक उच्चारण-शैली यक अपेक्षा एसँ बेसी निकट छैक। खास कऽ कएल, हएब आदि कतिपय शब्दकेँ कैल, हैब आदि रूपमे कतहु-कतहु लिखल जाएब सेहो “ए”क प्रयोगकेँ बेसी समीचीन प्रमाणित करैत अछि। ६.हि, हु तथा एकार, ओकार : मैथिलीक प्राचीन लेखन-परम्परामे कोनो बातपर बल दैत काल शब्दक पाछाँ हि, हु लगाओल जाइत छैक। जेना- हुनकहि, अपनहु, ओकरहु, तत्कालहि, चोट्टहि, आनहु आदि। मुदा आधुनिक लेखनमे हिक स्थानपर एकार एवं हुक स्थानपर ओकारक प्रयोग करैत देखल जाइत अछि। जेना- हुनके, अपनो, तत्काले, चोट्टे, आनो आदि। ७.ष तथा ख : मैथिली भाषामे अधिकांशतः षक उच्चारण ख होइत अछि। जेना- षड्यन्त्र (खड़यन्त्र), षोडशी (खोड़शी), षट्कोण (खटकोण), वृषेश (वृखेश), सन्तोष (सन्तोख) आदि। ८.ध्वनि-लोप : निम्नलिखित अवस्थामे शब्दसँ ध्वनि-लोप भऽ जाइत अछि: (क) क्रियान्वयी प्रत्यय अयमे य वा ए लुप्त भऽ जाइत अछि। ओहिमे सँ पहिने अक उच्चारण दीर्घ भऽ जाइत अछि। ओकर आगाँ लोप-सूचक चिह्न वा विकारी (’ / ऽ) लगाओल जाइछ। जेना- पूर्ण रूप : पढ़ए (पढ़य) गेलाह, कए (कय) लेल, उठए (उठय) पड़तौक। अपूर्ण रूप : पढ़’ गेलाह, क’ लेल, उठ’ पड़तौक। पढ़ऽ गेलाह, कऽ लेल, उठऽ पड़तौक। (ख) पूर्वकालिक कृत आय (आए) प्रत्ययमे य (ए) लुप्त भऽ जाइछ, मुदा लोप-सूचक विकारी नहि लगाओल जाइछ। जेना- पूर्ण रूप : खाए (य) गेल, पठाय (ए) देब, नहाए (य) अएलाह। अपूर्ण रूप : खा गेल, पठा देब, नहा अएलाह। (ग) स्त्री प्रत्यय इक उच्चारण क्रियापद, संज्ञा, ओ विशेषण तीनूमे लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना- पूर्ण रूप : दोसरि मालिनि चलि गेलि। अपूर्ण रूप : दोसर मालिन चलि गेल। (घ) वर्तमान कृदन्तक अन्तिम त लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना- पूर्ण रूप : पढ़ैत अछि, बजैत अछि, गबैत अछि। अपूर्ण रूप : पढ़ै अछि, बजै अछि, गबै अछि। (ङ) क्रियापदक अवसान इक, उक, ऐक तथा हीकमे लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना- पूर्ण रूप: छियौक, छियैक, छहीक, छौक, छैक, अबितैक, होइक। अपूर्ण रूप : छियौ, छियै, छही, छौ, छै, अबितै, होइ। (च) क्रियापदीय प्रत्यय न्ह, हु तथा हकारक लोप भऽ जाइछ। जेना- पूर्ण रूप : छन्हि, कहलन्हि, कहलहुँ, गेलह, नहि। अपूर्ण रूप : छनि, कहलनि, कहलौँ, गेलऽ, नइ, नञि, नै। ९.ध्वनि स्थानान्तरण : कोनो-कोनो स्वर-ध्वनि अपना जगहसँ हटि कऽ दोसर ठाम चलि जाइत अछि। खास कऽ ह्रस्व इ आ उक सम्बन्धमे ई बात लागू होइत अछि। मैथिलीकरण भऽ गेल शब्दक मध्य वा अन्तमे जँ ह्रस्व इ वा उ आबए तँ ओकर ध्वनि स्थानान्तरित भऽ एक अक्षर आगाँ आबि जाइत अछि। जेना- शनि (शइन), पानि (पाइन), दालि ( दाइल), माटि (माइट), काछु (काउछ), मासु (माउस) आदि। मुदा तत्सम शब्द सभमे ई निअम लागू नहि होइत अछि। जेना- रश्मिकेँ रइश्म आ सुधांशुकेँ सुधाउंस नहि कहल जा सकैत अछि। १०.हलन्त(्)क प्रयोग : मैथिली भाषामे सामान्यतया हलन्त (्)क आवश्यकता नहि होइत अछि। कारण जे शब्दक अन्तमे अ उच्चारण नहि होइत अछि। मुदा संस्कृत भाषासँ जहिनाक तहिना मैथिलीमे आएल (तत्सम) शब्द सभमे हलन्त प्रयोग कएल जाइत अछि। एहि पोथीमे सामान्यतया सम्पूर्ण शब्दकेँ मैथिली भाषा सम्बन्धी निअम अनुसार हलन्तविहीन राखल गेल अछि। मुदा व्याकरण सम्बन्धी प्रयोजनक लेल अत्यावश्यक स्थानपर कतहु-कतहु हलन्त देल गेल अछि। प्रस्तुत पोथीमे मथिली लेखनक प्राचीन आ नवीन दुनू शैलीक सरल आ समीचीन पक्ष सभकेँ समेटि कऽ वर्ण-विन्यास कएल गेल अछि। स्थान आ समयमे बचतक सङ्गहि हस्त-लेखन तथा तकनीकी दृष्टिसँ सेहो सरल होबऽबला हिसाबसँ वर्ण-विन्यास मिलाओल गेल अछि। वर्तमान समयमे मैथिली मातृभाषी पर्यन्तकेँ आन भाषाक माध्यमसँ मैथिलीक ज्ञान लेबऽ पड़ि रहल परिप्रेक्ष्यमे लेखनमे सहजता तथा एकरूपतापर ध्यान देल गेल अछि। तखन मैथिली भाषाक मूल विशेषता सभ कुण्ठित नहि होइक, ताहू दिस लेखक-मण्डल सचेत अछि। प्रसिद्ध भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक कहब छनि जे सरलताक अनुसन्धानमे एहन अवस्था किन्नहु ने आबऽ देबाक चाही जे भाषाक विशेषता छाँहमे पडि जाए। -(भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक धारणाकेँ पूर्ण रूपसँ सङ्ग लऽ निर्धारित) १.२. मैथिली अकादमी, पटना द्वारा निर्धारित मैथिली लेखन-शैली
१. जे शब्द मैथिली-साहित्यक प्राचीन कालसँ आइ धरि जाहि वर्त्तनीमे प्रचलित अछि, से सामान्यतः ताहि वर्त्तनीमे लिखल जाय- उदाहरणार्थ-
ग्राह्य
एखन ठाम जकर, तकर तनिकर अछि
अग्राह्य अखन, अखनि, एखेन, अखनी ठिमा, ठिना, ठमा जेकर, तेकर तिनकर। (वैकल्पिक रूपेँ ग्राह्य) ऐछ, अहि, ए।
२. निम्नलिखित तीन प्रकारक रूप वैकल्पिकतया अपनाओल जाय: भऽ गेल, भय गेल वा भए गेल। जा रहल अछि, जाय रहल अछि, जाए रहल अछि। कर’ गेलाह, वा करय गेलाह वा करए गेलाह।
३. प्राचीन मैथिलीक ‘न्ह’ ध्वनिक स्थानमे ‘न’ लिखल जाय सकैत अछि यथा कहलनि वा कहलन्हि।
४. ‘ऐ’ तथा ‘औ’ ततय लिखल जाय जत’ स्पष्टतः ‘अइ’ तथा ‘अउ’ सदृश उच्चारण इष्ट हो। यथा- देखैत, छलैक, बौआ, छौक इत्यादि।
५. मैथिलीक निम्नलिखित शब्द एहि रूपे प्रयुक्त होयत: जैह, सैह, इएह, ओऐह, लैह तथा दैह।
६. ह्र्स्व इकारांत शब्दमे ‘इ’ के लुप्त करब सामान्यतः अग्राह्य थिक। यथा- ग्राह्य देखि आबह, मालिनि गेलि (मनुष्य मात्रमे)।
७. स्वतंत्र ह्रस्व ‘ए’ वा ‘य’ प्राचीन मैथिलीक उद्धरण आदिमे तँ यथावत राखल जाय, किंतु आधुनिक प्रयोगमे वैकल्पिक रूपेँ ‘ए’ वा ‘य’ लिखल जाय। यथा:- कयल वा कएल, अयलाह वा अएलाह, जाय वा जाए इत्यादि।
८. उच्चारणमे दू स्वरक बीच जे ‘य’ ध्वनि स्वतः आबि जाइत अछि तकरा लेखमे स्थान वैकल्पिक रूपेँ देल जाय। यथा- धीआ, अढ़ैआ, विआह, वा धीया, अढ़ैया, बियाह।
९. सानुनासिक स्वतंत्र स्वरक स्थान यथासंभव ‘ञ’ लिखल जाय वा सानुनासिक स्वर। यथा:- मैञा, कनिञा, किरतनिञा वा मैआँ, कनिआँ, किरतनिआँ।
१०. कारकक विभक्त्तिक निम्नलिखित रूप ग्राह्य:- हाथकेँ, हाथसँ, हाथेँ, हाथक, हाथमे। ’मे’ मे अनुस्वार सर्वथा त्याज्य थिक। ‘क’ क वैकल्पिक रूप ‘केर’ राखल जा सकैत अछि।
११. पूर्वकालिक क्रियापदक बाद ‘कय’ वा ‘कए’ अव्यय वैकल्पिक रूपेँ लगाओल जा सकैत अछि। यथा:- देखि कय वा देखि कए।
१२. माँग, भाँग आदिक स्थानमे माङ, भाङ इत्यादि लिखल जाय।
१३. अर्द्ध ‘न’ ओ अर्द्ध ‘म’ क बदला अनुसार नहि लिखल जाय, किंतु छापाक सुविधार्थ अर्द्ध ‘ङ’ , ‘ञ’, तथा ‘ण’ क बदला अनुस्वारो लिखल जा सकैत अछि। यथा:- अङ्क, वा अंक, अञ्चल वा अंचल, कण्ठ वा कंठ।
१४. हलंत चिह्न निअमतः लगाओल जाय, किंतु विभक्तिक संग अकारांत प्रयोग कएल जाय। यथा:- श्रीमान्, किंतु श्रीमानक।
१५. सभ एकल कारक चिह्न शब्दमे सटा क’ लिखल जाय, हटा क’ नहि, संयुक्त विभक्तिक हेतु फराक लिखल जाय, यथा घर परक।
१६. अनुनासिककेँ चन्द्रबिन्दु द्वारा व्यक्त कयल जाय। परंतु मुद्रणक सुविधार्थ हि समान जटिल मात्रापर अनुस्वारक प्रयोग चन्द्रबिन्दुक बदला कयल जा सकैत अछि। यथा- हिँ केर बदला हिं।
१७. पूर्ण विराम पासीसँ ( । ) सूचित कयल जाय।
१८. समस्त पद सटा क’ लिखल जाय, वा हाइफेनसँ जोड़ि क’ , हटा क’ नहि।
१९. लिअ तथा दिअ शब्दमे बिकारी (ऽ) नहि लगाओल जाय।
२०. अंक देवनागरी रूपमे राखल जाय।
२१.किछु ध्वनिक लेल नवीन चिन्ह बनबाओल जाय। जा' ई नहि बनल अछि ताबत एहि दुनू ध्वनिक बदला पूर्ववत् अय/ आय/ अए/ आए/ आओ/ अओ लिखल जाय। आकि ऎ वा ऒ सँ व्यक्त कएल जाय।
ह./- गोविन्द झा ११/८/७६ श्रीकान्त ठाकुर ११/८/७६ सुरेन्द्र झा "सुमन" ११/०८/७६
२. मैथिलीमे भाषा सम्पादन पाठ्यक्रम २.१. उच्चारण निर्देश: (बोल्ड कएल रूप ग्राह्य):- दन्त न क उच्चारणमे दाँतमे जीह सटत- जेना बाजू नाम , मुदा ण क उच्चारणमे जीह मूर्धामे सटत (नै सटैए तँ उच्चारण दोष अछि)- जेना बाजू गणेश। तालव्य शमे जीह तालुसँ , षमे मूर्धासँ आ दन्त समे दाँतसँ सटत। निशाँ, सभ आ शोषण बाजि कऽ देखू। मैथिलीमे ष केँ वैदिक संस्कृत जकाँ ख सेहो उच्चरित कएल जाइत अछि, जेना वर्षा, दोष। य अनेको स्थानपर ज जकाँ उच्चरित होइत अछि आ ण ड़ जकाँ (यथा संयोग आ गणेश संजोग आ गड़ेस उच्चरित होइत अछि)। मैथिलीमे व क उच्चारण ब, श क उच्चारण स आ य क उच्चारण ज सेहो होइत अछि। ओहिना ह्रस्व इ बेशीकाल मैथिलीमे पहिने बाजल जाइत अछि कारण देवनागरीमे आ मिथिलाक्षरमे ह्रस्व इ अक्षरक पहिने लिखलो जाइत आ बाजलो जएबाक चाही। कारण जे हिन्दीमे एकर दोषपूर्ण उच्चारण होइत अछि (लिखल तँ पहिने जाइत अछि मुदा बाजल बादमे जाइत अछि), से शिक्षा पद्धतिक दोषक कारण हम सभ ओकर उच्चारण दोषपूर्ण ढंगसँ कऽ रहल छी। अछि- अ इ छ ऐछ (उच्चारण) छथि- छ इ थ – छैथ (उच्चारण) पहुँचि- प हुँ इ च (उच्चारण) आब अ आ इ ई ए ऐ ओ औ अं अः ऋ ऐ सभ लेल मात्रा सेहो अछि, मुदा ऐमे ई ऐ ओ औ अं अः ऋ केँ संयुक्ताक्षर रूपमे गलत रूपमे प्रयुक्त आ उच्चरित कएल जाइत अछि। जेना ऋ केँ री रूपमे उच्चरित करब। आ देखियौ- ऐ लेल देखिऔ क प्रयोग अनुचित। मुदा देखिऐ लेल देखियै अनुचित। क् सँ ह् धरि अ सम्मिलित भेलासँ क सँ ह बनैत अछि, मुदा उच्चारण काल हलन्त युक्त शब्दक अन्तक उच्चारणक प्रवृत्ति बढ़ल अछि, मुदा हम जखन मनोजमे ज् अन्तमे बजैत छी, तखनो पुरनका लोककेँ बजैत सुनबन्हि- मनोजऽ, वास्तवमे ओ अ युक्त ज् = ज बजै छथि। फेर ज्ञ अछि ज् आ ञ क संयुक्त मुदा गलत उच्चारण होइत अछि- ग्य। ओहिना क्ष अछि क् आ ष क संयुक्त मुदा उच्चारण होइत अछि छ। फेर श् आ र क संयुक्त अछि श्र ( जेना श्रमिक) आ स् आ र क संयुक्त अछि स्र (जेना मिस्र)। त्र भेल त+र । उच्चारणक ऑडियो फाइल विदेह आर्काइव http://www.videha.co.in/ पर उपलब्ध अछि। फेर केँ / सँ / पर पूर्व अक्षरसँ सटा कऽ लिखू मुदा तँ / कऽ हटा कऽ। ऐमे सँ मे पहिल सटा कऽ लिखू आ बादबला हटा कऽ। अंकक बाद टा लिखू सटा कऽ मुदा अन्य ठाम टा लिखू हटा कऽ– जेना छहटा मुदा सभ टा। फेर ६अ म सातम लिखू- छठम सातम नै। घरबलामे बला मुदा घरवालीमे वाली प्रयुक्त करू। रहए- रहै मुदा सकैए (उच्चारण सकै-ए)। मुदा कखनो काल रहए आ रहै मे अर्थ भिन्नता सेहो, जेना से कम्मो जगहमे पार्किंग करबाक अभ्यास रहै ओकरा। पुछलापर पता लागल जे ढुनढुन नाम्ना ई ड्राइवर कनाट प्लेसक पार्किंगमे काज करैत रहए। छलै, छलए मे सेहो ऐ तरहक भेल। छलए क उच्चारण छल-ए सेहो। संयोगने- (उच्चारण संजोगने) केँ/ कऽ केर- क ( केर क प्रयोग गद्यमे नै करू , पद्यमे कऽ सकै छी। ) क (जेना रामक) –रामक आ संगे (उच्चारण राम के / राम कऽ सेहो) सँ- सऽ (उच्चारण) चन्द्रबिन्दु आ अनुस्वार- अनुस्वारमे कंठ धरिक प्रयोग होइत अछि मुदा चन्द्रबिन्दुमे नै। चन्द्रबिन्दुमे कनेक एकारक सेहो उच्चारण होइत अछि- जेना रामसँ- (उच्चारण राम सऽ) रामकेँ- (उच्चारण राम कऽ/ राम के सेहो)। केँ जेना रामकेँ भेल हिन्दीक को (राम को)- राम को= रामकेँ क जेना रामक भेल हिन्दीक का ( राम का) राम का= रामक कऽ जेना जा कऽ भेल हिन्दीक कर ( जा कर) जा कर= जा कऽ सँ भेल हिन्दीक से (राम से) राम से= रामसँ सऽ , तऽ , त , केर (गद्यमे) एे चारू शब्द सबहक प्रयोग अवांछित। के दोसर अर्थेँ प्रयुक्त भऽ सकैए- जेना, के कहलक? विभक्ति “क”क बदला एकर प्रयोग अवांछित। नञि, नहि, नै, नइ, नँइ, नइँ, नइं ऐ सभक उच्चारण आ लेखन - नै त्त्व क बदलामे त्व जेना महत्वपूर्ण (महत्त्वपूर्ण नै) जतए अर्थ बदलि जाए ओतहि मात्र तीन अक्षरक संयुक्ताक्षरक प्रयोग उचित। सम्पति- उच्चारण स म्प इ त (सम्पत्ति नै- कारण सही उच्चारण आसानीसँ सम्भव नै)। मुदा सर्वोत्तम (सर्वोतम नै)। राष्ट्रिय (राष्ट्रीय नै) सकैए/ सकै (अर्थ परिवर्तन) पोछैले/ पोछै लेल/ पोछए लेल पोछैए/ पोछए/ (अर्थ परिवर्तन) पोछए/ पोछै ओ लोकनि ( हटा कऽ, ओ मे बिकारी नै) ओइ/ ओहि ओहिले/ ओहि लेल/ ओही लऽ जएबेँ/ बैसबेँ पँचभइयाँ देखियौक/ (देखिऔक नै- तहिना अ मे ह्रस्व आ दीर्घक मात्राक प्रयोग अनुचित) जकाँ / जेकाँ तँइ/ तैँ/ होएत / हएत नञि/ नहि/ नँइ/ नइँ/ नै सौँसे/ सौंसे बड़ / बड़ी (झोराओल) गाए (गाइ नहि), मुदा गाइक दूध (गाएक दूध नै।) रहलेँ/ पहिरतैँ हमहीं/ अहीं सब - सभ सबहक - सभहक धरि - तक गप- बात बूझब - समझब बुझलौं/ समझलौं/ बुझलहुँ - समझलहुँ हमरा आर - हम सभ आकि- आ कि सकैछ/ करैछ (गद्यमे प्रयोगक आवश्यकता नै) होइन/ होनि जाइन (जानि नै, जेना देल जाइन) मुदा जानि-बूझि (अर्थ परिव्र्तन) पइठ/ जाइठ आउ/ जाउ/ आऊ/ जाऊ मे, केँ, सँ, पर (शब्दसँ सटा कऽ) तँ कऽ धऽ दऽ (शब्दसँ हटा कऽ) मुदा दूटा वा बेसी विभक्ति संग रहलापर पहिल विभक्ति टाकेँ सटाऊ। जेना ऐमे सँ । एकटा , दूटा (मुदा कए टा) बिकारीक प्रयोग शब्दक अन्तमे, बीचमे अनावश्यक रूपेँ नै। आकारान्त आ अन्तमे अ क बाद बिकारीक प्रयोग नै (जेना दिअ , आ/ दिय’ , आ’, आ नै ) अपोस्ट्रोफीक प्रयोग बिकारीक बदलामे करब अनुचित आ मात्र फॉन्टक तकनीकी न्यूनताक परिचायक)- ओना बिकारीक संस्कृत रूप ऽ अवग्रह कहल जाइत अछि आ वर्तनी आ उच्चारण दुनू ठाम एकर लोप रहैत अछि/ रहि सकैत अछि (उच्चारणमे लोप रहिते अछि)। मुदा अपोस्ट्रोफी सेहो अंग्रेजीमे पसेसिव केसमे होइत अछि आ फ्रेंचमे शब्दमे जतए एकर प्रयोग होइत अछि जेना raison d’etre एतए सेहो एकर उच्चारण रैजौन डेटर होइत अछि, माने अपोस्ट्रॉफी अवकाश नै दैत अछि वरन जोड़ैत अछि, से एकर प्रयोग बिकारीक बदला देनाइ तकनीकी रूपेँ सेहो अनुचित)। अइमे, एहिमे/ ऐमे जइमे, जाहिमे एखन/ अखन/ अइखन केँ (के नहि) मे (अनुस्वार रहित) भऽ मे दऽ तँ (तऽ, त नै) सँ ( सऽ स नै) गाछ तर गाछ लग साँझ खन जो (जो go, करै जो do) तै/तइ जेना- तै दुआरे/ तइमे/ तइले जै/जइ जेना- जै कारण/ जइसँ/ जइले ऐ/अइ जेना- ऐ कारण/ ऐसँ/ अइले/ मुदा एकर एकटा खास प्रयोग- लालति कतेक दिनसँ कहैत रहैत अइ लै/लइ जेना लैसँ/ लइले/ लै दुआरे लहँ/ लौं गेलौं/ लेलौं/ लेलँह/ गेलहुँ/ लेलहुँ/ लेलँ जइ/ जाहि/ जै जहिठाम/ जाहिठाम/ जइठाम/ जैठाम एहि/ अहि/ अइ (वाक्यक अंतमे ग्राह्य) / ऐ अइछ/ अछि/ ऐछ तइ/ तहि/ तै/ ताहि ओहि/ ओइ सीखि/ सीख जीवि/ जीवी/ जीब भलेहीं/ भलहिं तैं/ तँइ/ तँए जाएब/ जएब लइ/ लै छइ/ छै नहि/ नै/ नइ गइ/ गै छनि/ छन्हि ... समए शब्दक संग जखन कोनो विभक्ति जुटै छै तखन समै जना समैपर इत्यादि। असगरमे हृदए आ विभक्ति जुटने हृदे जना हृदेसँ, हृदेमे इत्यादि। जइ/ जाहि/ जै जहिठाम/ जाहिठाम/ जइठाम/ जैठाम एहि/ अहि/ अइ/ ऐ अइछ/ अछि/ ऐछ तइ/ तहि/ तै/ ताहि ओहि/ ओइ सीखि/ सीख जीवि/ जीवी/ जीब भले/ भलेहीं/ भलहिं तैं/ तँइ/ तँए जाएब/ जएब लइ/ लै छइ/ छै नहि/ नै/ नइ गइ/ गै छनि/ छन्हि चुकल अछि/ गेल गछि २.२. मैथिलीमे भाषा सम्पादन पाठ्यक्रम नीचाँक सूचीमे देल विकल्पमेसँ लैंगुएज एडीटर द्वारा कोन रूप चुनल जेबाक चाही: बोल्ड कएल रूप ग्राह्य: १.होयबला/ होबयबला/ होमयबला/ हेब’बला, हेम’बला/ होयबाक/होबएबला /होएबाक २. आ’/आऽ आ ३. क’ लेने/कऽ लेने/कए लेने/कय लेने/ल’/लऽ/लय/लए ४. भ’ गेल/भऽ गेल/भय गेल/भए गेल ५. कर’ गेलाह/करऽ गेलह/करए गेलाह/करय गेलाह ६. लिअ/दिअ लिय’,दिय’,लिअ’,दिय’/ ७. कर’ बला/करऽ बला/ करय बला करैबला/क’र’ बला / करैवाली ८. बला वला (पुरूष), वाली (स्त्री) ९ . आङ्ल आंग्ल १०. प्रायः प्रायह ११. दुःख दुख १ २. चलि गेल चल गेल/चैल गेल १३. देलखिन्ह देलकिन्ह, देलखिन १४. देखलन्हि देखलनि/ देखलैन्ह १५. छथिन्ह/ छलन्हि छथिन/ छलैन/ छलनि १६. चलैत/दैत चलति/दैति १७. एखनो अखनो १८. बढ़नि बढ़इन बढ़न्हि १९. ओ’/ओऽ(सर्वनाम) ओ २० . ओ (संयोजक) ओ’/ओऽ २१. फाँगि/फाङ्गि फाइंग/फाइङ २२. जे जे’/जेऽ २३. ना-नुकुर ना-नुकर २४. केलन्हि/केलनि/कयलन्हि २५. तखनतँ/ तखन तँ २६. जा रहल/जाय रहल/जाए रहल २७. निकलय/निकलए लागल/ लगल बहराय/ बहराए लागल/ लगल निकल’/बहरै लागल २८. ओतय/ जतय जत’/ ओत’/ जतए/ ओतए २९. की फूरल जे कि फूरल जे ३०. जे जे’/जेऽ ३१. कूदि / यादि(मोन पारब) कूइद/याइद/कूद/याद/ यादि (मोन) ३२. इहो/ ओहो ३३. हँसए/ हँसय हँसऽ ३४. नौ आकि दस/नौ किंवा दस/ नौ वा दस ३५. सासु-ससुर सास-ससुर ३६. छह/ सात छ/छः/सात ३७. की की’/ कीऽ (दीर्घीकारान्तमे ऽ वर्जित) ३८. जबाब जवाब ३९. करएताह/ करेताह करयताह ४०. दलान दिशि दलान दिश/दलान दिस ४१ . गेलाह गएलाह/गयलाह ४२. किछु आर/ किछु और/ किछ आर ४३. जाइ छल/ जाइत छल जाति छल/जैत छल ४४. पहुँचि/ भेट जाइत छल/ भेट जाइ छलए पहुँच/ भेटि जाइत छल ४५. जबान (युवा)/ जवान(फौजी) ४६. लय/ लए क’/ कऽ/ लए कए / लऽ कऽ/ लऽ कए ४७. ल’/लऽ कय/ कए ४८. एखन / एखने / अखन / अखने ४९. अहींकेँ अहीँकेँ ५०. गहींर गहीँर ५१. धार पार केनाइ धार पार केनाय/केनाए ५२. जेकाँ जेँकाँ/ जकाँ ५३. तहिना तेहिना ५४. एकर अकर ५५. बहिनउ बहनोइ ५६. बहिन बहिनि ५७. बहिन-बहिनोइ बहिन-बहनउ ५८. नहि/ नै ५९. करबा / करबाय/ करबाए ६०. तँ/ त ऽ तय/तए ६१. भैयारी मे छोट-भाए/भै/, जेठ-भाय/भाइ, ६२. गिनतीमे दू भाइ/भाए/भाँइ ६३. ई पोथी दू भाइक/ भाँइ/ भाए/ लेल। यावत जावत ६४. माय मै / माए मुदा माइक ममता ६५. देन्हि/ दइन दनि/ दएन्हि/ दयन्हि दन्हि/ दैन्हि ६६. द’/ दऽ/ दए ६७. ओ (संयोजक) ओऽ (सर्वनाम) ६८. तका कए तकाय तकाए ६९. पैरे (on foot) पएरे कएक/ कैक ७०. ताहुमे/ ताहूमे ७१. पुत्रीक ७२. बजा कय/ कए / कऽ ७३. बननाय/बननाइ ७४. कोला ७५. दिनुका दिनका ७६. ततहिसँ ७७. गरबओलन्हि/ गरबौलनि/ गरबेलन्हि/ गरबेलनि ७८. बालु बालू ७९. चेन्ह चिन्ह(अशुद्ध) ८०. जे जे’ ८१ . से/ के से’/के’ ८२. एखुनका अखनुका ८३. भुमिहार भूमिहार ८४. सुग्गर / सुगरक/ सूगर ८५. झठहाक झटहाक ८६. छूबि ८७. करइयो/ओ करैयो ने देलक /करियौ-करइयौ ८८. पुबारि पुबाइ ८९. झगड़ा-झाँटी झगड़ा-झाँटि ९०. पएरे-पएरे पैरे-पैरे ९१. खेलएबाक ९२. खेलेबाक ९३. लगा ९४. होए- हो – होअए ९५. बुझल बूझल ९६. बूझल (संबोधन अर्थमे) ९७. यैह यएह / इएह/ सैह/ सएह ९८. तातिल ९९. अयनाय- अयनाइ/ अएनाइ/ एनाइ १००. निन्न- निन्द १०१. बिनु बिन १०२. जाए जाइ १०३. जाइ (in different sense)-last word of sentence १०४. छत पर आबि जाइ १०५. ने १०६. खेलाए (play) –खेलाइ १०७. शिकाइत- शिकायत १०८. ढप- ढ़प १०९ . पढ़- पढ ११०. कनिए/ कनिये कनिञे १११. राकस- राकश ११२. होए/ होय होइ ११३. अउरदा- औरदा ११४. बुझेलन्हि (different meaning- got understand) ११५. बुझएलन्हि/बुझेलनि/ बुझयलन्हि (understood himself) ११६. चलि- चल/ चलि गेल ११७. खधाइ- खधाय ११८. मोन पाड़लखिन्ह/ मोन पाड़लखिन/ मोन पारलखिन्ह ११९. कैक- कएक- कइएक १२०. लग ल’ग १२१. जरेनाइ १२२. जरौनाइ जरओनाइ- जरएनाइ/ जरेनाइ १२३. होइत १२४. गरबेलन्हि/ गरबेलनि गरबौलन्हि/ गरबौलनि १२५. चिखैत- (to test)चिखइत १२६. करइयो (willing to do) करैयो १२७. जेकरा- जकरा १२८. तकरा- तेकरा १२९. बिदेसर स्थानेमे/ बिदेसरे स्थानमे १३०. करबयलहुँ/ करबएलहुँ/ करबेलहुँ करबेलौं १३१. हारिक (उच्चारण हाइरक) १३२. ओजन वजन आफसोच/ अफसोस कागत/ कागच/ कागज १३३. आधे भाग/ आध-भागे १३४. पिचा / पिचाय/पिचाए १३५. नञ/ ने १३६. बच्चा नञ (ने) पिचा जाय १३७. तखन ने (नञ) कहैत अछि। कहै/ सुनै/ देखै छल मुदा कहैत-कहैत/ सुनैत-सुनैत/ देखैत-देखैत १३८. कतेक गोटे/ कताक गोटे १३९. कमाइ-धमाइ/ कमाई- धमाई १४० . लग ल’ग १४१. खेलाइ (for playing) १४२. छथिन्ह/ छथिन १४३. होइत होइ १४४. क्यो कियो / केओ १४५. केश (hair) १४६. केस (court-case) १४७ . बननाइ/ बननाय/ बननाए १४८. जरेनाइ १४९. कुरसी कुर्सी १५०. चरचा चर्चा १५१. कर्म करम १५२. डुबाबए/ डुबाबै/ डुमाबै डुमाबय/ डुमाबए १५३. एखुनका/ अखुनका १५४. लए/ लिअए (वाक्यक अंतिम शब्द)- लऽ १५५. कएलक/ केलक १५६. गरमी गर्मी १५७ . वरदी वर्दी १५८. सुना गेलाह सुना’/सुनाऽ १५९. एनाइ-गेनाइ १६०. तेना ने घेरलन्हि/ तेना ने घेरलनि १६१. नञि / नै १६२. डरो ड’रो १६३. कतहु/ कतौ कहीं १६४. उमरिगर-उमेरगर उमरगर १६५. भरिगर १६६. धोल/धोअल धोएल १६७. गप/गप्प १६८. के के’ १६९. दरबज्जा/ दरबजा १७०. ठाम १७१. धरि तक १७२. घूरि लौटि १७३. थोरबेक १७४. बड्ड १७५. तोँ/ तूँ १७६. तोँहि( पद्यमे ग्राह्य) १७७. तोँही / तोँहि १७८. करबाइए करबाइये १७९. एकेटा १८०. करितथि /करतथि १८१. पहुँचि/ पहुँच १८२. राखलन्हि रखलन्हि/ रखलनि १८३. लगलन्हि/ लगलनि लागलन्हि १८४. सुनि (उच्चारण सुइन) १८५. अछि (उच्चारण अइछ) १८६. एलथि गेलथि १८७. बितओने/ बितौने/ बितेने १८८. करबओलन्हि/ करबौलनि/ करेलखिन्ह/ करेलखिन १८९. करएलन्हि/ करेलनि १९०. आकि/ कि १९१. पहुँचि/ पहुँच १९२. बत्ती जराय/ जराए जरा (आगि लगा) १९३. से से’ १९४. हाँ मे हाँ (हाँमे हाँ विभक्त्तिमे हटा कए) १९५. फेल फैल १९६. फइल(spacious) फैल १९७. होयतन्हि/ होएतन्हि/ होएतनि/हेतनि/ हेतन्हि १९८. हाथ मटिआएब/ हाथ मटियाबय/हाथ मटियाएब १९९. फेका फेंका २००. देखाए देखा २०१. देखाबए २०२. सत्तरि सत्तर २०३. साहेब साहब २०४.गेलैन्ह/ गेलन्हि/ गेलनि २०५. हेबाक/ होएबाक २०६.केलो/ कएलहुँ/केलौं/ केलुँ २०७. किछु न किछु/ किछु ने किछु २०८.घुमेलहुँ/ घुमओलहुँ/ घुमेलौं २०९. एलाक/ अएलाक २१०. अः/ अह २११.लय/ लए (अर्थ-परिवर्त्तन) २१२.कनीक/ कनेक २१३.सबहक/ सभक २१४.मिलाऽ/ मिला २१५.कऽ/ क २१६.जाऽ/ जा २१७.आऽ/ आ २१८.भऽ /भ’ (’ फॉन्टक कमीक द्योतक) २१९.निअम/ नियम २२० .हेक्टेअर/ हेक्टेयर २२१.पहिल अक्षर ढ/ बादक/ बीचक ढ़ २२२.तहिं/तहिँ/ तञि/ तैं २२३.कहिं/ कहीं २२४.तँइ/ तैं / तइँ २२५.नँइ/ नइँ/ नञि/ नहि/नै २२६.है/ हए / एलीहेँ/ २२७.छञि/ छै/ छैक /छइ २२८.दृष्टिएँ/ दृष्टियेँ २२९.आ (come)/ आऽ(conjunction) २३०. आ (conjunction)/ आऽ(come) २३१.कुनो/ कोनो, कोना/केना २३२.गेलैन्ह-गेलन्हि-गेलनि २३३.हेबाक- होएबाक २३४.केलौँ- कएलौँ-कएलहुँ/केलौं २३५.किछु न किछ- किछु ने किछु २३६.केहेन- केहन २३७.आऽ (come)-आ (conjunction-and)/आ। आब'-आब' /आबह-आबह २३८. हएत-हैत २३९.घुमेलहुँ-घुमएलहुँ- घुमेलाें २४०.एलाक- अएलाक २४१.होनि- होइन/ होन्हि/ २४२.ओ-राम ओ श्यामक बीच(conjunction), ओऽ कहलक (he said)/ओ २४३.की हए/ कोसी अएली हए/ की है। की हइ २४४.दृष्टिएँ/ दृष्टियेँ २४५ .शामिल/ सामेल २४६.तैँ / तँए/ तञि/ तहिं २४७.जौं / ज्योँ/ जँ/ २४८.सभ/ सब २४९.सभक/ सबहक २५०.कहिं/ कहीं २५१.कुनो/ कोनो/ कोनहुँ/ २५२.फारकती भऽ गेल/ भए गेल/ भय गेल २५३.कोना/ केना/ कन्ना/कना २५४.अः/ अह २५५.जनै/ जनञ २५६.गेलनि/ गेलाह (अर्थ परिवर्तन) २५७.केलन्हि/ कएलन्हि/ केलनि/ २५८.लय/ लए/ लएह (अर्थ परिवर्तन) २५९.कनीक/ कनेक/कनी-मनी २६०.पठेलन्हि पठेलनि/ पठेलइन/ पपठओलन्हि/ पठबौलनि/ २६१.निअम/ नियम २६२.हेक्टेअर/ हेक्टेयर २६३.पहिल अक्षर रहने ढ/ बीचमे रहने ढ़ २६४.आकारान्तमे बिकारीक प्रयोग उचित नै/ अपोस्ट्रोफीक प्रयोग फान्टक तकनीकी न्यूनताक परिचायक ओकर बदला अवग्रह (बिकारी) क प्रयोग उचित २६५.केर (पद्यमे ग्राह्य) / -क/ कऽ/ के २६६.छैन्हि- छन्हि २६७.लगैए/ लगैये २६८.होएत/ हएत २६९.जाएत/ जएत/ २७०.आएत/ अएत/ आओत २७१ .खाएत/ खएत/ खैत २७२.पिअएबाक/ पिएबाक/पियेबाक २७३.शुरु/ शुरुह २७४.शुरुहे/ शुरुए २७५.अएताह/अओताह/ एताह/ औताह २७६.जाहि/ जाइ/ जइ/ जै/ २७७.जाइत/ जैतए/ जइतए २७८.आएल/ अएल २७९.कैक/ कएक २८०.आयल/ अएल/ आएल २८१. जाए/ जअए/ जए (लालति जाए लगलीह।) २८२. नुकएल/ नुकाएल २८३. कठुआएल/ कठुअएल २८४. ताहि/ तै/ तइ २८५. गायब/ गाएब/ गएब २८६. सकै/ सकए/ सकय २८७.सेरा/सरा/ सराए (भात सरा गेल) २८८.कहैत रही/देखैत रही/ कहैत छलौं/ कहै छलौं- अहिना चलैत/ पढ़ैत (पढ़ै-पढ़ैत अर्थ कखनो काल परिवर्तित) - आर बुझै/ बुझैत (बुझै/ बुझै छी, मुदा बुझैत-बुझैत)/ सकैत/ सकै। करैत/ करै। दै/ दैत। छैक/ छै। बचलै/ बचलैक। रखबा/ रखबाक । बिनु/ बिन। रातिक/ रातुक बुझै आ बुझैत केर अपन-अपन जगहपर प्रयोग समीचीन अछि। बुझैत-बुझैत आब बुझलिऐ। हमहूँ बुझै छी। २८९. दुआरे/ द्वारे २९०.भेटि/ भेट/ भेँट २९१. खन/ खीन/ खुना (भोर खन/ भोर खीन) २९२.तक/ धरि २९३.गऽ/ गै (meaning different-जनबै गऽ) २९४.सऽ/ सँ (मुदा दऽ, लऽ) २९५.त्त्व,(तीन अक्षरक मेल बदला पुनरुक्तिक एक आ एकटा दोसरक उपयोग) आदिक बदला त्व आदि। महत्त्व/ महत्व/ कर्ता/ कर्त्ता आदिमे त्त संयुक्तक कोनो आवश्यकता मैथिलीमे नै अछि। वक्तव्य २९६.बेसी/ बेशी २९७.बाला/वाला बला/ वला (रहैबला) २९८ .वाली/ (बदलैवाली) २९९.वार्त्ता/ वार्ता ३००. अन्तर्राष्ट्रिय/ अन्तर्राष्ट्रीय ३०१. लेमए/ लेबए ३०२.लमछुरका, नमछुरका ३०२.लागै/ लगै ( भेटैत/ भेटै) ३०३.लागल/ लगल ३०४.हबा/ हवा ३०५.राखलक/ रखलक ३०६.आ (come)/ आ (and) ३०७. पश्चाताप/ पश्चात्ताप ३०८. ऽ केर व्यवहार शब्दक अन्तमे मात्र, यथासंभव बीचमे नै। ३०९.कहैत/ कहै ३१०. रहए (छल)/ रहै (छलै) (meaning different) ३११.तागति/ ताकति ३१२.खराप/ खराब ३१३.बोइन/ बोनि/ बोइनि ३१४.जाठि/ जाइठ ३१५.कागज/ कागच/ कागत ३१६.गिरै (meaning different- swallow)/ गिरए (खसए) ३१७.राष्ट्रिय/ राष्ट्रीय Festivals of Mithila DATE-LIST (year- 2011-12) (१४१९ साल) Marriage Days: Nov.2011- 20,21,23,25,27,30 Dec.2011- 1,5,9 January 2012- 18,19,20,23,25,27,29 Feb.2012- 2,3,8,9,10,16,17,19,23,24,29 March 2012- 1,8,9,12 April 2012- 15,16,18,25,26 June 2012- 8,13,24,25,28,29 Upanayana Days: February 2012- 2,3,24,26 March 2012- 4 April 2012- 1,2,26 June 2012- 22 Dviragaman Din: November 2011- 27,30 December 2011- 1,2,5,7,9,12 February 2012- 22,23,24,26,27,29 March 2012- 1,2,4,5,9,11,12 April 2012- 23,25,26,29 May 2012- 2,3,4,6,7 Mundan Din: December 2011- 1,5 January 201225,26,30 March 2012- 12 April 2012- 26 May 2012- 23,25,31 June 2012- 8,21,22,29 FESTIVALS OF MITHILA Mauna Panchami-20 July Madhushravani- 2 August Nag Panchami- 4 August Raksha Bandhan- 13 Aug Krishnastami- 21 August Kushi Amavasya / Somvari Vrat- 29 August Hartalika Teej- 31 August ChauthChandra-1 September Karma Dharma Ekadashi-8 September Indra Pooja Aarambh- 9 September Anant Caturdashi- 11 Sep Agastyarghadaan- 12 Sep Pitri Paksha begins- 13 Sep Mahalaya Aarambh- 13 September Vishwakarma Pooja- 17 September Jimootavahan Vrata/ Jitia-20 September Matri Navami- 21September Kalashsthapan- 28 September Belnauti- 2 October Patrika Pravesh- 3 October Mahastami- 4 October Maha Navami - 5 October Vijaya Dashami- 6 October Kojagara- 11 Oct Dhanteras- 24 October Diyabati, shyama pooja-26 October Annakoota/ Govardhana Pooja-27 October Bhratridwitiya/ Chitragupta Pooja-28 October Chhathi-kharna -31 October Chhathi- sayankalik arghya - 1 November Devotthan Ekadashi- 17 November Sama poojarambh- 2 November Kartik Poornima/ Sama Bisarjan- 10 Nov ravivratarambh- 27 November Navanna parvan- 29 November Vivaha Panchmi- 29 November Makara/ Teela Sankranti-15 Jan Naraknivaran chaturdashi- 21 January Basant Panchami/ Saraswati Pooja- 28 January Achla Saptmi- 30 January Mahashivaratri-20 February Holikadahan-Fagua-7 March Holi-9 Mar Varuni Yoga-20 March Chaiti navaratrarambh- 23 March Chaiti Chhathi vrata-29 March Ram Navami- 1 April Mesha Sankranti-Satuani-13 April Jurishital-14 April Akshaya Tritiya-24 April Ravi Brat Ant- 29 April Janaki Navami- 30 April Vat Savitri-barasait- 20 May Ganga Dashhara-30 May Somavati Amavasya Vrata- 18 June Jagannath Rath Yatra- 21 June Hari Sayan Ekadashi- 30 June Aashadhi Guru Poornima-3 Jul VIDEHA ARCHIVE १.विदेह ई-पत्रिकाक सभटा पुरान अंक ब्रेल, तिरहुता आ देवनागरी रूपमे Videha e journal's all old issues in Braille Tirhuta and Devanagari versions विदेह ई-पत्रिकाक पहिल ५० अंक
विदेह ई-पत्रिकाक ५०म सँ आगाँक अंक २.मैथिली पोथी डाउनलोड Maithili Books Download ३.मैथिली ऑडियो संकलन Maithili Audio Downloads ४.मैथिली वीडियोक संकलन Maithili Videos ५.मिथिला चित्रकला/ आधुनिक चित्रकला आ चित्र Mithila Painting/ Modern Art and Photos "विदेह"क एहि सभ सहयोगी लिंकपर सेहो एक बेर जाऊ। ६.विदेह मैथिली क्विज : http://videhaquiz.blogspot.com/ ७.विदेह मैथिली जालवृत्त एग्रीगेटर : http://videha-aggregator.blogspot.com/ ८.विदेह मैथिली साहित्य अंग्रेजीमे अनूदित http://madhubani-art.blogspot.com/ ९.विदेहक पूर्व-रूप "भालसरिक गाछ" : http://gajendrathakur.blogspot.com/ १०.विदेह इंडेक्स : http://videha123.blogspot.com/ ११.विदेह फाइल : http://videha123.wordpress.com/ १२. विदेह: सदेह : पहिल तिरहुता (मिथिला़क्षर) जालवृत्त (ब्लॉग) http://videha-sadeha.blogspot.com/ १३. विदेह:ब्रेल: मैथिली ब्रेलमे: पहिल बेर विदेह द्वारा http://videha-braille.blogspot.com/ १४.VIDEHA IST MAITHILI FORTNIGHTLY EJOURNAL ARCHIVE http://videha-archive.blogspot.com/ १५. विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका मैथिली पोथीक आर्काइव http://videha-pothi.blogspot.com/ १६. विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका ऑडियो आर्काइव http://videha-audio.blogspot.com/ १७. विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका वीडियो आर्काइव http://videha-video.blogspot.com/ १८. विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका मिथिला चित्रकला, आधुनिक कला आ चित्रकला http://videha-paintings-photos.blogspot.com/ १९. मैथिल आर मिथिला (मैथिलीक सभसँ लोकप्रिय जालवृत्त) http://maithilaurmithila.blogspot.com/ २०.श्रुति प्रकाशन http://www.shruti-publication.com/ २१.http://groups.google.com/group/videha VIDEHA केर सदस्यता लिअ Top of Form Bottom of Form ईमेल : एहि समूहपर जाऊ २२.http://groups.yahoo.com/group/VIDEHA/ Top of Form Subscribe to VIDEHA Powered by us.groups.yahoo.com Bottom of Form २३.गजेन्द्र ठाकुर इडेक्स http://gajendrathakur123.blogspot.com २४. नेना भुटका http://mangan-khabas.blogspot.com/ २५.विदेह रेडियो:मैथिली कथा-कविता आदिक पहिल पोडकास्ट साइट http://videha123radio.wordpress.com/ २६.Videha Radio २७. Join official Videha facebook group. २८. विदेह मैथिली नाट्य उत्सव http://maithili-drama.blogspot.com/ २९.समदिया http://esamaad.blogspot.com/ ३०. मैथिली फिल्म्स http://maithilifilms.blogspot.com/ ३१.अनचिन्हार आखर http://anchinharakharkolkata.blogspot.com/ ३२. मैथिली हाइकू http://maithili-haiku.blogspot.com/ ३३. मानक मैथिली http://manak-maithili.blogspot.com/ महत्त्वपूर्ण सूचना:(१) 'विदेह' द्वारा धारावाहिक रूपे ई-प्रकाशित कएल गेल गजेन्द्र ठाकुरक निबन्ध-प्रबन्ध-समीक्षा, उपन्यास (सहस्रबाढ़नि) , पद्य-संग्रह (सहस्राब्दीक चौपड़पर), कथा-गल्प (गल्प-गुच्छ), नाटक(संकर्षण), महाकाव्य (त्वञ्चाहञ्च आ असञ्जाति मन) आ बाल-किशोर साहित्य विदेहमे संपूर्ण ई-प्रकाशनक बाद प्रिंट फॉर्ममे। कुरुक्षेत्रम्–अन्तर्मनक खण्ड-१ सँ ७ Combined ISBN No.978-81-907729-7-6 विवरण एहि पृष्ठपर नीचाँमे आ प्रकाशकक साइट http://www.shruti-publication.com/ पर । महत्त्वपूर्ण सूचना (२):सूचना: विदेहक मैथिली-अंग्रेजी आ अंग्रेजी मैथिली कोष (इंटरनेटपर पहिल बेर सर्च-डिक्शनरी) एम.एस. एस.क्यू.एल. सर्वर आधारित -Based on ms-sql server Maithili-English and English-Maithili Dictionary. विदेहक भाषापाक- रचनालेखन स्तंभमे। कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक- गजेन्द्र ठाकुर गजेन्द्र ठाकुरक निबन्ध-प्रबन्ध-समीक्षा, उपन्यास (सहस्रबाढ़नि) , पद्य-संग्रह (सहस्राब्दीक चौपड़पर), कथा-गल्प (गल्प गुच्छ), नाटक(संकर्षण), महाकाव्य (त्वञ्चाहञ्च आ असञ्जाति मन) आ बालमंडली-किशोरजगत विदेहमे संपूर्ण ई-प्रकाशनक बाद प्रिंट फॉर्ममे। कुरुक्षेत्रम्–अन्तर्मनक, खण्ड-१ सँ ७ Ist edition 2009 of Gajendra Thakur’s KuruKshetram-Antarmanak (Vol. I to VII)- essay-paper-criticism, novel, poems, story, play, epics and Children-grown-ups literature in single binding: Language:Maithili ६९२ पृष्ठ : मूल्य भा. रु. 100/-(for individual buyers inside india) (add courier charges Rs.50/-per copy for Delhi/NCR and Rs.100/- per copy for outside Delhi)
For Libraries and overseas buyers $40 US (including postage)
The book is AVAILABLE FOR PDF DOWNLOAD AT
https://sites.google.com/a/videha.com/videha/
http://videha123.wordpress.com/
Details for purchase available at print-version publishers's site website: http://www.shruti-publication.com/ or you may write to e-mail:shruti.publication@shruti-publication.com विदेह: सदेह : १: २: ३: ४ तिरहुता : देवनागरी "विदेह" क, प्रिंट संस्करण :विदेह-ई-पत्रिका (http://www.videha.co.in/) क चुनल रचना सम्मिलित। विदेह:सदेह:१: २: ३: ४ सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। Details for purchase available at print-version publishers's site http://www.shruti-publication.com or you may write to shruti.publication@shruti-publication.com २. संदेश- [ विदेह ई-पत्रिका, विदेह:सदेह मिथिलाक्षर आ देवनागरी आ गजेन्द्र ठाकुरक सात खण्डक- निबन्ध-प्रबन्ध-समीक्षा,उपन्यास (सहस्रबाढ़नि) , पद्य-संग्रह (सहस्राब्दीक चौपड़पर), कथा-गल्प (गल्प गुच्छ), नाटक (संकर्षण), महाकाव्य (त्वञ्चाहञ्च आ असञ्जाति मन) आ बाल-मंडली-किशोर जगत- संग्रह कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक मादेँ। ] १.श्री गोविन्द झा- विदेहकेँ तरंगजालपर उतारि विश्वभरिमे मातृभाषा मैथिलीक लहरि जगाओल, खेद जे अपनेक एहि महाभियानमे हम एखन धरि संग नहि दए सकलहुँ। सुनैत छी अपनेकेँ सुझाओ आ रचनात्मक आलोचना प्रिय लगैत अछि तेँ किछु लिखक मोन भेल। हमर सहायता आ सहयोग अपनेकेँ सदा उपलब्ध रहत। २.श्री रमानन्द रेणु- मैथिलीमे ई-पत्रिका पाक्षिक रूपेँ चला कऽ जे अपन मातृभाषाक प्रचार कऽ रहल छी, से धन्यवाद । आगाँ अपनेक समस्त मैथिलीक कार्यक हेतु हम हृदयसँ शुभकामना दऽ रहल छी। ३.श्री विद्यानाथ झा "विदित"- संचार आ प्रौद्योगिकीक एहि प्रतिस्पर्धी ग्लोबल युगमे अपन महिमामय "विदेह"केँ अपना देहमे प्रकट देखि जतबा प्रसन्नता आ संतोष भेल, तकरा कोनो उपलब्ध "मीटर"सँ नहि नापल जा सकैछ? ..एकर ऐतिहासिक मूल्यांकन आ सांस्कृतिक प्रतिफलन एहि शताब्दीक अंत धरि लोकक नजरिमे आश्चर्यजनक रूपसँ प्रकट हैत। ४. प्रो. उदय नारायण सिंह "नचिकेता"- जे काज अहाँ कए रहल छी तकर चरचा एक दिन मैथिली भाषाक इतिहासमे होएत। आनन्द भए रहल अछि, ई जानि कए जे एतेक गोट मैथिल "विदेह" ई जर्नलकेँ पढ़ि रहल छथि।...विदेहक चालीसम अंक पुरबाक लेल अभिनन्दन। ५. डॉ. गंगेश गुंजन- एहि विदेह-कर्ममे लागि रहल अहाँक सम्वेदनशील मन, मैथिलीक प्रति समर्पित मेहनतिक अमृत रंग, इतिहास मे एक टा विशिष्ट फराक अध्याय आरंभ करत, हमरा विश्वास अछि। अशेष शुभकामना आ बधाइक सङ्ग, सस्नेह...अहाँक पोथी कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक प्रथम दृष्टया बहुत भव्य तथा उपयोगी बुझाइछ। मैथिलीमे तँ अपना स्वरूपक प्रायः ई पहिले एहन भव्य अवतारक पोथी थिक। हर्षपूर्ण हमर हार्दिक बधाई स्वीकार करी। ६. श्री रामाश्रय झा "रामरंग"(आब स्वर्गीय)- "अपना" मिथिलासँ संबंधित...विषय वस्तुसँ अवगत भेलहुँ।...शेष सभ कुशल अछि। ७. श्री ब्रजेन्द्र त्रिपाठी- साहित्य अकादमी- इंटरनेट पर प्रथम मैथिली पाक्षिक पत्रिका "विदेह" केर लेल बधाई आ शुभकामना स्वीकार करू। ८. श्री प्रफुल्लकुमार सिंह "मौन"- प्रथम मैथिली पाक्षिक पत्रिका "विदेह" क प्रकाशनक समाचार जानि कनेक चकित मुदा बेसी आह्लादित भेलहुँ। कालचक्रकेँ पकड़ि जाहि दूरदृष्टिक परिचय देलहुँ, ओहि लेल हमर मंगलकामना। ९.डॉ. शिवप्रसाद यादव- ई जानि अपार हर्ष भए रहल अछि, जे नव सूचना-क्रान्तिक क्षेत्रमे मैथिली पत्रकारिताकेँ प्रवेश दिअएबाक साहसिक कदम उठाओल अछि। पत्रकारितामे एहि प्रकारक नव प्रयोगक हम स्वागत करैत छी, संगहि "विदेह"क सफलताक शुभकामना। १०. श्री आद्याचरण झा- कोनो पत्र-पत्रिकाक प्रकाशन- ताहूमे मैथिली पत्रिकाक प्रकाशनमे के कतेक सहयोग करताह- ई तऽ भविष्य कहत। ई हमर ८८ वर्षमे ७५ वर्षक अनुभव रहल। एतेक पैघ महान यज्ञमे हमर श्रद्धापूर्ण आहुति प्राप्त होयत- यावत ठीक-ठाक छी/ रहब। ११. श्री विजय ठाकुर- मिशिगन विश्वविद्यालय- "विदेह" पत्रिकाक अंक देखलहुँ, सम्पूर्ण टीम बधाईक पात्र अछि। पत्रिकाक मंगल भविष्य हेतु हमर शुभकामना स्वीकार कएल जाओ। १२. श्री सुभाषचन्द्र यादव- ई-पत्रिका "विदेह" क बारेमे जानि प्रसन्नता भेल। ’विदेह’ निरन्तर पल्लवित-पुष्पित हो आ चतुर्दिक अपन सुगंध पसारय से कामना अछि। १३. श्री मैथिलीपुत्र प्रदीप- ई-पत्रिका "विदेह" केर सफलताक भगवतीसँ कामना। हमर पूर्ण सहयोग रहत। १४. डॉ. श्री भीमनाथ झा- "विदेह" इन्टरनेट पर अछि तेँ "विदेह" नाम उचित आर कतेक रूपेँ एकर विवरण भए सकैत अछि। आइ-काल्हि मोनमे उद्वेग रहैत अछि, मुदा शीघ्र पूर्ण सहयोग देब।कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक देखि अति प्रसन्नता भेल। मैथिलीक लेल ई घटना छी। १५. श्री रामभरोस कापड़ि "भ्रमर"- जनकपुरधाम- "विदेह" ऑनलाइन देखि रहल छी। मैथिलीकेँ अन्तर्राष्ट्रीय जगतमे पहुँचेलहुँ तकरा लेल हार्दिक बधाई। मिथिला रत्न सभक संकलन अपूर्व। नेपालोक सहयोग भेटत, से विश्वास करी। १६. श्री राजनन्दन लालदास- "विदेह" ई-पत्रिकाक माध्यमसँ बड़ नीक काज कए रहल छी, नातिक अहिठाम देखलहुँ। एकर वार्षिक अंक जखन प्रिंट निकालब तँ हमरा पठायब। कलकत्तामे बहुत गोटेकेँ हम साइटक पता लिखाए देने छियन्हि। मोन तँ होइत अछि जे दिल्ली आबि कए आशीर्वाद दैतहुँ, मुदा उमर आब बेशी भए गेल। शुभकामना देश-विदेशक मैथिलकेँ जोड़बाक लेल।.. उत्कृष्ट प्रकाशन कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक लेल बधाइ। अद्भुत काज कएल अछि, नीक प्रस्तुति अछि सात खण्डमे। मुदा अहाँक सेवा आ से निःस्वार्थ तखन बूझल जाइत जँ अहाँ द्वारा प्रकाशित पोथी सभपर दाम लिखल नहि रहितैक। ओहिना सभकेँ विलहि देल जइतैक। (स्पष्टीकरण- श्रीमान्, अहाँक सूचनार्थ विदेह द्वारा ई-प्रकाशित कएल सभटा सामग्री आर्काइवमे https://sites.google.com/a/videha.com/videha-pothi/ पर बिना मूल्यक डाउनलोड लेल उपलब्ध छै आ भविष्यमे सेहो रहतैक। एहि आर्काइवकेँ जे कियो प्रकाशक अनुमति लऽ कऽ प्रिंट रूपमे प्रकाशित कएने छथि आ तकर ओ दाम रखने छथि ताहिपर हमर कोनो नियंत्रण नहि अछि।- गजेन्द्र ठाकुर)... अहाँक प्रति अशेष शुभकामनाक संग। १७. डॉ. प्रेमशंकर सिंह- अहाँ मैथिलीमे इंटरनेटपर पहिल पत्रिका "विदेह" प्रकाशित कए अपन अद्भुत मातृभाषानुरागक परिचय देल अछि, अहाँक निःस्वार्थ मातृभाषानुरागसँ प्रेरित छी, एकर निमित्त जे हमर सेवाक प्रयोजन हो, तँ सूचित करी। इंटरनेटपर आद्योपांत पत्रिका देखल, मन प्रफुल्लित भऽ गेल। १८.श्रीमती शेफालिका वर्मा- विदेह ई-पत्रिका देखि मोन उल्लाससँ भरि गेल। विज्ञान कतेक प्रगति कऽ रहल अछि...अहाँ सभ अनन्त आकाशकेँ भेदि दियौ, समस्त विस्तारक रहस्यकेँ तार-तार कऽ दियौक...। अपनेक अद्भुत पुस्तक कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक विषयवस्तुक दृष्टिसँ गागरमे सागर अछि। बधाई। १९.श्री हेतुकर झा, पटना-जाहि समर्पण भावसँ अपने मिथिला-मैथिलीक सेवामे तत्पर छी से स्तुत्य अछि। देशक राजधानीसँ भय रहल मैथिलीक शंखनाद मिथिलाक गाम-गाममे मैथिली चेतनाक विकास अवश्य करत। २०. श्री योगानन्द झा, कबिलपुर, लहेरियासराय- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पोथीकेँ निकटसँ देखबाक अवसर भेटल अछि आ मैथिली जगतक एकटा उद्भट ओ समसामयिक दृष्टिसम्पन्न हस्ताक्षरक कलमबन्द परिचयसँ आह्लादित छी। "विदेह"क देवनागरी सँस्करण पटनामे रु. 80/- मे उपलब्ध भऽ सकल जे विभिन्न लेखक लोकनिक छायाचित्र, परिचय पत्रक ओ रचनावलीक सम्यक प्रकाशनसँ ऐतिहासिक कहल जा सकैछ। २१. श्री किशोरीकान्त मिश्र- कोलकाता- जय मैथिली, विदेहमे बहुत रास कविता, कथा, रिपोर्ट आदिक सचित्र संग्रह देखि आ आर अधिक प्रसन्नता मिथिलाक्षर देखि- बधाई स्वीकार कएल जाओ। २२.श्री जीवकान्त- विदेहक मुद्रित अंक पढ़ल- अद्भुत मेहनति। चाबस-चाबस। किछु समालोचना मरखाह..मुदा सत्य। २३. श्री भालचन्द्र झा- अपनेक कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक देखि बुझाएल जेना हम अपने छपलहुँ अछि। एकर विशालकाय आकृति अपनेक सर्वसमावेशताक परिचायक अछि। अपनेक रचना सामर्थ्यमे उत्तरोत्तर वृद्धि हो, एहि शुभकामनाक संग हार्दिक बधाई। २४.श्रीमती डॉ नीता झा- अहाँक कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़लहुँ। ज्योतिरीश्वर शब्दावली, कृषि मत्स्य शब्दावली आ सीत बसन्त आ सभ कथा, कविता, उपन्यास, बाल-किशोर साहित्य सभ उत्तम छल। मैथिलीक उत्तरोत्तर विकासक लक्ष्य दृष्टिगोचर होइत अछि। २५.श्री मायानन्द मिश्र- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक मे हमर उपन्यास स्त्रीधनक जे विरोध कएल गेल अछि तकर हम विरोध करैत छी।... कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पोथीक लेल शुभकामना।(श्रीमान् समालोचनाकेँ विरोधक रूपमे नहि लेल जाए।-गजेन्द्र ठाकुर) २६.श्री महेन्द्र हजारी- सम्पादक श्रीमिथिला- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़ि मोन हर्षित भऽ गेल..एखन पूरा पढ़यमे बहुत समय लागत, मुदा जतेक पढ़लहुँ से आह्लादित कएलक। २७.श्री केदारनाथ चौधरी- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक अद्भुत लागल, मैथिली साहित्य लेल ई पोथी एकटा प्रतिमान बनत। २८.श्री सत्यानन्द पाठक- विदेहक हम नियमित पाठक छी। ओकर स्वरूपक प्रशंसक छलहुँ। एम्हर अहाँक लिखल - कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक देखलहुँ। मोन आह्लादित भऽ उठल। कोनो रचना तरा-उपरी। २९.श्रीमती रमा झा-सम्पादक मिथिला दर्पण। कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक प्रिंट फॉर्म पढ़ि आ एकर गुणवत्ता देखि मोन प्रसन्न भऽ गेल, अद्भुत शब्द एकरा लेल प्रयुक्त कऽ रहल छी। विदेहक उत्तरोत्तर प्रगतिक शुभकामना। ३०.श्री नरेन्द्र झा, पटना- विदेह नियमित देखैत रहैत छी। मैथिली लेल अद्भुत काज कऽ रहल छी। ३१.श्री रामलोचन ठाकुर- कोलकाता- मिथिलाक्षर विदेह देखि मोन प्रसन्नतासँ भरि उठल, अंकक विशाल परिदृश्य आस्वस्तकारी अछि। ३२.श्री तारानन्द वियोगी- विदेह आ कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक देखि चकबिदोर लागि गेल। आश्चर्य। शुभकामना आ बधाई। ३३.श्रीमती प्रेमलता मिश्र “प्रेम”- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़लहुँ। सभ रचना उच्चकोटिक लागल। बधाई। ३४.श्री कीर्तिनारायण मिश्र- बेगूसराय- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक बड्ड नीक लागल, आगांक सभ काज लेल बधाई। ३५.श्री महाप्रकाश-सहरसा- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक नीक लागल, विशालकाय संगहि उत्तमकोटिक। ३६.श्री अग्निपुष्प- मिथिलाक्षर आ देवाक्षर विदेह पढ़ल..ई प्रथम तँ अछि एकरा प्रशंसामे मुदा हम एकरा दुस्साहसिक कहब। मिथिला चित्रकलाक स्तम्भकेँ मुदा अगिला अंकमे आर विस्तृत बनाऊ। ३७.श्री मंजर सुलेमान-दरभंगा- विदेहक जतेक प्रशंसा कएल जाए कम होएत। सभ चीज उत्तम। ३८.श्रीमती प्रोफेसर वीणा ठाकुर- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक उत्तम, पठनीय, विचारनीय। जे क्यो देखैत छथि पोथी प्राप्त करबाक उपाय पुछैत छथि। शुभकामना। ३९.श्री छत्रानन्द सिंह झा- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़लहुँ, बड्ड नीक सभ तरहेँ। ४०.श्री ताराकान्त झा- सम्पादक मैथिली दैनिक मिथिला समाद- विदेह तँ कन्टेन्ट प्रोवाइडरक काज कऽ रहल अछि। कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक अद्भुत लागल। ४१.डॉ रवीन्द्र कुमार चौधरी- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक बहुत नीक, बहुत मेहनतिक परिणाम। बधाई। ४२.श्री अमरनाथ- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक आ विदेह दुनू स्मरणीय घटना अछि, मैथिली साहित्य मध्य। ४३.श्री पंचानन मिश्र- विदेहक वैविध्य आ निरन्तरता प्रभावित करैत अछि, शुभकामना। ४४.श्री केदार कानन- कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक लेल अनेक धन्यवाद, शुभकामना आ बधाइ स्वीकार करी। आ नचिकेताक भूमिका पढ़लहुँ। शुरूमे तँ लागल जेना कोनो उपन्यास अहाँ द्वारा सृजित भेल अछि मुदा पोथी उनटौला पर ज्ञात भेल जे एहिमे तँ सभ विधा समाहित अछि। ४५.श्री धनाकर ठाकुर- अहाँ नीक काज कऽ रहल छी। फोटो गैलरीमे चित्र एहि शताब्दीक जन्मतिथिक अनुसार रहैत तऽ नीक। ४६.श्री आशीष झा- अहाँक पुस्तकक संबंधमे एतबा लिखबा सँ अपना कए नहि रोकि सकलहुँ जे ई किताब मात्र किताब नहि थीक, ई एकटा उम्मीद छी जे मैथिली अहाँ सन पुत्रक सेवा सँ निरंतर समृद्ध होइत चिरजीवन कए प्राप्त करत। ४७.श्री शम्भु कुमार सिंह- विदेहक तत्परता आ क्रियाशीलता देखि आह्लादित भऽ रहल छी। निश्चितरूपेण कहल जा सकैछ जे समकालीन मैथिली पत्रिकाक इतिहासमे विदेहक नाम स्वर्णाक्षरमे लिखल जाएत। ओहि कुरुक्षेत्रक घटना सभ तँ अठारहे दिनमे खतम भऽ गेल रहए मुदा अहाँक कुरुक्षेत्रम् तँ अशेष अछि। ४८.डॉ. अजीत मिश्र- अपनेक प्रयासक कतबो प्रशंसा कएल जाए कमे होएतैक। मैथिली साहित्यमे अहाँ द्वारा कएल गेल काज युग-युगान्तर धरि पूजनीय रहत। ४९.श्री बीरेन्द्र मल्लिक- अहाँक कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक आ विदेह:सदेह पढ़ि अति प्रसन्नता भेल। अहाँक स्वास्थ्य ठीक रहए आ उत्साह बनल रहए से कामना। ५०.श्री कुमार राधारमण- अहाँक दिशा-निर्देशमे विदेह पहिल मैथिली ई-जर्नल देखि अति प्रसन्नता भेल। हमर शुभकामना। ५१.श्री फूलचन्द्र झा प्रवीण-विदेह:सदेह पढ़ने रही मुदा कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक देखि बढ़ाई देबा लेल बाध्य भऽ गेलहुँ। आब विश्वास भऽ गेल जे मैथिली नहि मरत। अशेष शुभकामना। ५२.श्री विभूति आनन्द- विदेह:सदेह देखि, ओकर विस्तार देखि अति प्रसन्नता भेल। ५३.श्री मानेश्वर मनुज-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक एकर भव्यता देखि अति प्रसन्नता भेल, एतेक विशाल ग्रन्थ मैथिलीमे आइ धरि नहि देखने रही। एहिना भविष्यमे काज करैत रही, शुभकामना। ५४.श्री विद्यानन्द झा- आइ.आइ.एम.कोलकाता- कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक विस्तार, छपाईक संग गुणवत्ता देखि अति प्रसन्नता भेल। अहाँक अनेक धन्यवाद; कतेक बरखसँ हम नेयारैत छलहुँ जे सभ पैघ शहरमे मैथिली लाइब्रेरीक स्थापना होअए, अहाँ ओकरा वेबपर कऽ रहल छी, अनेक धन्यवाद। ५५.श्री अरविन्द ठाकुर-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक मैथिली साहित्यमे कएल गेल एहि तरहक पहिल प्रयोग अछि, शुभकामना। ५६.श्री कुमार पवन-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक पढ़ि रहल छी। किछु लघुकथा पढ़ल अछि, बहुत मार्मिक छल। ५७. श्री प्रदीप बिहारी-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक देखल, बधाई। ५८.डॉ मणिकान्त ठाकुर-कैलिफोर्निया- अपन विलक्षण नियमित सेवासँ हमरा लोकनिक हृदयमे विदेह सदेह भऽ गेल अछि। ५९.श्री धीरेन्द्र प्रेमर्षि- अहाँक समस्त प्रयास सराहनीय। दुख होइत अछि जखन अहाँक प्रयासमे अपेक्षित सहयोग नहि कऽ पबैत छी। ६०.श्री देवशंकर नवीन- विदेहक निरन्तरता आ विशाल स्वरूप- विशाल पाठक वर्ग, एकरा ऐतिहासिक बनबैत अछि। ६१.श्री मोहन भारद्वाज- अहाँक समस्त कार्य देखल, बहुत नीक। एखन किछु परेशानीमे छी, मुदा शीघ्र सहयोग देब। ६२.श्री फजलुर रहमान हाशमी-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक मे एतेक मेहनतक लेल अहाँ साधुवादक अधिकारी छी। ६३.श्री लक्ष्मण झा "सागर"- मैथिलीमे चमत्कारिक रूपेँ अहाँक प्रवेश आह्लादकारी अछि।..अहाँकेँ एखन आर..दूर..बहुत दूरधरि जेबाक अछि। स्वस्थ आ प्रसन्न रही। ६४.श्री जगदीश प्रसाद मंडल-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक पढ़लहुँ । कथा सभ आ उपन्यास सहस्रबाढ़नि पूर्णरूपेँ पढ़ि गेल छी। गाम-घरक भौगोलिक विवरणक जे सूक्ष्म वर्णन सहस्रबाढ़निमे अछि, से चकित कएलक, एहि संग्रहक कथा-उपन्यास मैथिली लेखनमे विविधता अनलक अछि। समालोचना शास्त्रमे अहाँक दृष्टि वैयक्तिक नहि वरन् सामाजिक आ कल्याणकारी अछि, से प्रशंसनीय। ६५.श्री अशोक झा-अध्यक्ष मिथिला विकास परिषद- कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक लेल बधाई आ आगाँ लेल शुभकामना। ६६.श्री ठाकुर प्रसाद मुर्मु- अद्भुत प्रयास। धन्यवादक संग प्रार्थना जे अपन माटि-पानिकेँ ध्यानमे राखि अंकक समायोजन कएल जाए। नव अंक धरि प्रयास सराहनीय। विदेहकेँ बहुत-बहुत धन्यवाद जे एहेन सुन्दर-सुन्दर सचार (आलेख) लगा रहल छथि। सभटा ग्रहणीय- पठनीय। ६७.बुद्धिनाथ मिश्र- प्रिय गजेन्द्र जी,अहाँक सम्पादन मे प्रकाशित ‘विदेह’आ ‘कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक’ विलक्षण पत्रिका आ विलक्षण पोथी! की नहि अछि अहाँक सम्पादनमे? एहि प्रयत्न सँ मैथिली क विकास होयत,निस्संदेह। ६८.श्री बृखेश चन्द्र लाल- गजेन्द्रजी, अपनेक पुस्तक कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़ि मोन गदगद भय गेल , हृदयसँ अनुगृहित छी । हार्दिक शुभकामना । ६९.श्री परमेश्वर कापड़ि - श्री गजेन्द्र जी । कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़ि गदगद आ नेहाल भेलहुँ। ७०.श्री रवीन्द्रनाथ ठाकुर- विदेह पढ़ैत रहैत छी। धीरेन्द्र प्रेमर्षिक मैथिली गजलपर आलेख पढ़लहुँ। मैथिली गजल कत्तऽ सँ कत्तऽ चलि गेलैक आ ओ अपन आलेखमे मात्र अपन जानल-पहिचानल लोकक चर्च कएने छथि। जेना मैथिलीमे मठक परम्परा रहल अछि। (स्पष्टीकरण- श्रीमान्, प्रेमर्षि जी ओहि आलेखमे ई स्पष्ट लिखने छथि जे किनको नाम जे छुटि गेल छन्हि तँ से मात्र आलेखक लेखकक जानकारी नहि रहबाक द्वारे, एहिमे आन कोनो कारण नहि देखल जाय। अहाँसँ एहि विषयपर विस्तृत आलेख सादर आमंत्रित अछि।-सम्पादक) ७१.श्री मंत्रेश्वर झा- विदेह पढ़ल आ संगहि अहाँक मैगनम ओपस कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक सेहो, अति उत्तम। मैथिलीक लेल कएल जा रहल अहाँक समस्त कार्य अतुलनीय अछि। ७२. श्री हरेकृष्ण झा- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक मैथिलीमे अपन तरहक एकमात्र ग्रन्थ अछि, एहिमे लेखकक समग्र दृष्टि आ रचना कौशल देखबामे आएल जे लेखकक फील्डवर्कसँ जुड़ल रहबाक कारणसँ अछि। ७३.श्री सुकान्त सोम- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक मे समाजक इतिहास आ वर्तमानसँ अहाँक जुड़ाव बड्ड नीक लागल, अहाँ एहि क्षेत्रमे आर आगाँ काज करब से आशा अछि। ७४.प्रोफेसर मदन मिश्र- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक सन किताब मैथिलीमे पहिले अछि आ एतेक विशाल संग्रहपर शोध कएल जा सकैत अछि। भविष्यक लेल शुभकामना। ७५.प्रोफेसर कमला चौधरी- मैथिलीमे कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक सन पोथी आबए जे गुण आ रूप दुनूमे निस्सन होअए, से बहुत दिनसँ आकांक्षा छल, ओ आब जा कऽ पूर्ण भेल। पोथी एक हाथसँ दोसर हाथ घुमि रहल अछि, एहिना आगाँ सेहो अहाँसँ आशा अछि। ७६.श्री उदय चन्द्र झा "विनोद": गजेन्द्रजी, अहाँ जतेक काज कएलहुँ अछि से मैथिलीमे आइ धरि कियो नहि कएने छल। शुभकामना। अहाँकेँ एखन बहुत काज आर करबाक अछि। ७७.श्री कृष्ण कुमार कश्यप: गजेन्द्र ठाकुरजी, अहाँसँ भेँट एकटा स्मरणीय क्षण बनि गेल। अहाँ जतेक काज एहि बएसमे कऽ गेल छी ताहिसँ हजार गुणा आर बेशीक आशा अछि। ७८.श्री मणिकान्त दास: अहाँक मैथिलीक कार्यक प्रशंसा लेल शब्द नहि भेटैत अछि। अहाँक कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक सम्पूर्ण रूपेँ पढ़ि गेलहुँ। त्वञ्चाहञ्च बड्ड नीक लागल। ७९. श्री हीरेन्द्र कुमार झा- विदेह ई-पत्रिकाक सभ अंक ई-पत्रसँ भेटैत रहैत अछि। मैथिलीक ई-पत्रिका छैक एहि बातक गर्व होइत अछि। अहाँ आ अहाँक सभ सहयोगीकेँ हार्दिक शुभकामना। विदेह मैथिली साहित्य आन्दोलन (c)२००४-१२. सर्वाधिकार लेखकाधीन आ जतए लेखकक नाम नहि अछि ततए संपादकाधीन। विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। सह-सम्पादक: उमेश मंडल। सहायक सम्पादक: शिव कुमार झा आ मुन्नाजी (मनोज कुमार कर्ण)। भाषा-सम्पादन: नागेन्द्र कुमार झा आ पञ्जीकार विद्यानन्द झा। कला-सम्पादन: वनीता कुमारी आ रश्मि रेखा सिन्हा। सम्पादक-शोध-अन्वेषण: डॉ. जया वर्मा आ डॉ. राजीव कुमार वर्मा। सम्पादक- नाटक-रंगमंच-चलचित्र- बेचन ठाकुर। सम्पादक- सूचना-सम्पर्क-समाद- पूनम मंडल आ प्रियंका झा। सम्पादक- अनुवाद विभाग- विनीत उत्पल। रचनाकार अपन मौलिक आ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि) ggajendra@videha.com केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx, .rtf वा .txt फॉर्मेटमे पठा सकैत छथि। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेताह, से आशा करैत छी। रचनाक अंतमे टाइप रहय, जे ई रचना मौलिक अछि, आ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। मेल प्राप्त होयबाक बाद यथासंभव शीघ्र ( सात दिनक भीतर) एकर प्रकाशनक अंकक सूचना देल जायत। ’विदेह' प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका अछि आ एहिमे मैथिली, संस्कृत आ अंग्रेजीमे मिथिला आ मैथिलीसँ संबंधित रचना प्रकाशित कएल जाइत अछि। एहि ई पत्रिकाकेँ श्रीमति लक्ष्मी ठाकुर द्वारा मासक ०१ आ १५ तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि। (c) 2004-12 सर्वाधिकार सुरक्षित। विदेहमे प्रकाशित सभटा रचना आ आर्काइवक सर्वाधिकार रचनाकार आ संग्रहकर्त्ताक लगमे छन्हि। रचनाक अनुवाद आ पुनः प्रकाशन किंवा आर्काइवक उपयोगक अधिकार किनबाक हेतु ggajendra@videha.co.in पर संपर्क करू। एहि साइटकेँ प्रीति झा ठाकुर, मधूलिका चौधरी आ रश्मि प्रिया द्वारा डिजाइन कएल गेल। सिद्धिरस्तु वि दे ह विदेह Videha বিদেহ विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका Videha Ist Maithili Fortnightly e Magazine विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका 'विदेह' ९९ म अंक ०१ फरबरी २०१२ (वर्ष ५ मास ५० अंक ९९) मानुषीमिह संस्कृताम् ISSN 2229-547X VIDEHA वि दे ह विदेह Videha বিদেহ विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका Videha Ist Maithili Fortnightly e Magazine विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका 'विदेह' ९९ म अंक ०१ फरबरी २०१२ (वर्ष ५ मास ५० अंक ९९) मानुषीमिह संस्कृताम् ISSN 2229-547X VIDEHA
कि y aT } t) 4 ) wy SV yd Swan सौजन्य विकिपीडिया Rip सम्राट =
हक दा 2 : So woe 7 — : Ss
हो न नह कह ¢ a 7: sy fa KGS
कि थे + oy : दर Wij, y= ae ९ J We Le Lill “225. \ a Whip Hee ae. 3 me weal नि
ie o oe Lae SS oe 222 Lae ! aa Pe NG ee es Le ton ee ee fs कु a o cs Ae Wl ce ee fF ~~ £2 a te sane vy J oe i —— के 6A. ae _4 दे S woe 4 coal Eo Rei Ny 7 PEN WN SS <\ Rie a ae ee a Be eae NE a ae . Le ihe ay, i a ee ae es लाश / न NE | ee ; Lee eae, 5 ee wae Lo | ली oe a ee a a ea oes : Be) cre a — a mE Hate a ey ae a ia eed 4 a , a a) zB Was td é ee 5 a ae a oe ee eee Dai