VIDEHA — Issue 101 / अंक १०१

Publication: VIDEHA · Issue: 101
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326 327 ISSN 2229-547X VIDEHA 'विदेह' १०१ म अंक ०१ मार्च २०१२ (वर्ष ५ मास ५१ अंक १०१) वि  दे  ह विदेह Videha বিদেহ http://www.videha.co.in  विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका Videha Ist Maithili Fortnightly ejournal  नव अंक देखबाक लेल पृष्ठ सभकेँ रिफ्रेश कए देखू। Always refresh the pages for viewing new issue of VIDEHA. Read in your own script Roman(Eng)Gujarati Bangla Oriya Gurmukhi Telugu Tamil Kannada Malayalam Hindi ऐ अंकमे अछि:- १. संपादकीय संदेश २. गद्य २.१.अमित मिश्र, कथा-मोछ २.२.ओमप्रकाश झा- कथा- गहींर आँखिक व्यथा २.३.नवीन कुमार "आशा"-बेटीक जन्म २.४.उमेश मण्‍डल- वि‍देह नाट्य उत्‍सव- 2012 २.५.डा. रमानन्द झा ‘रमण’- अनुवाद २.६.योगानन्‍द झा, ग्रामजीवनक सत्‍यक संवाहक :: अर्द्धांगि‍नी २.७. शि‍वकुमार झा ‘टि‍ल्‍लू’- मैथि‍ली कथा साहि‍त्‍यक वि‍कासमे राजकमलक योगदान ३. पद्य ३.१.१.कामिनी कामायनी२.रुबी झा ३.२.१.ओमप्रकाश झा-रुबाइ/ गजल/ गीत-कविता ३.३.१.राजदेव मण्‍डल २. अमित मिश्र- गजल -कविता ३.जगदानंद झा 'मनु' कविता –सभसँ आगु आगु छी ३.४.१.संदीप कुमार साफी- भकजोगनी/ बसंत पंचमी२.डा. अरूण कुमार सिंह ३.रामवि‍लास साहु ४.उमेश पासवान ३.५.१.जगदीश प्रसाद मण्‍डल२.चंदन कुमार झा ३.नन्‍द वि‍लास राय ३.६.१.नारायण झा २.निशान्त झा ३.७.१.प्रीति‍ प्रि‍या झा २.पवन कुमार साह ३.डॉ॰ शशिधर कुमर ३.८.१.रमेश मण्‍डलसोनू कुमार झा ‘रश्मि’३.किशन कारीगर ४.कपि‍लेश्वर राउत ४. मिथिला कला-संगीत.राजनाथ मिश्र (चित्रमय मिथिला) . उमेश मण्डल (मिथिलाक वनस्पति/ मिथिलाक जीव-जन्तु/ मिथिलाक जिनगी) ५. गद्य-पद्य भारती: मंगलेश डबराल- हिन्दीसँ मैथिली अनुवाद विनीत उत्पल ६.बालानां कृते-डॉ॰ शशिधर कुमर “विदेह”- कीनि दे हमरो खेलौना (बालगीत) ७. भाषापाक रचना-लेखन -[मानक मैथिली], [विदेहक मैथिली-अंग्रेजी आ अंग्रेजी मैथिली कोष (इंटरनेटपर पहिल बेर सर्च-डिक्शनरी) एम.एस. एस.क्यू.एल. सर्वर आधारित -Based on ms-sql server Maithili-English and English-Maithili Dictionary.] विदेह ई-पत्रिकाक सभटा पुरान अंक ( ब्रेल, तिरहुता आ देवनागरी मे ) पी.डी.एफ. डाउनलोडक लेल नीचाँक लिंकपर उपलब्ध अछि। All the old issues of Videha e journal ( in Braille, Tirhuta and Devanagari versions ) are available for pdf download at the following link. विदेह ई-पत्रिकाक सभटा पुरान अंक ब्रेल, तिरहुता आ देवनागरी रूपमे Videha e journal's all old issues in Braille Tirhuta and Devanagari versions विदेह ई-पत्रिकाक पहिल ५० अंक

विदेह ई-पत्रिकाक ५०म सँ आगाँक अंक विदेह आर.एस.एस.फीड। "विदेह" ई-पत्रिका ई-पत्रसँ प्राप्त करू। अपन मित्रकेँ विदेहक विषयमे सूचित करू। ↑ विदेह आर.एस.एस.फीड एनीमेटरकेँ अपन साइट/ ब्लॉगपर लगाऊ। ब्लॉग "लेआउट" पर "एड गाडजेट" मे "फीड" सेलेक्ट कए "फीड यू.आर.एल." मे http://www.videha.co.in/index.xml टाइप केलासँ सेहो विदेह फीड प्राप्त कए सकैत छी। गूगल रीडरमे पढ़बा लेल http://reader.google.com/ पर जा कऽ Add a  Subscription बटन क्लिक करू आ खाली स्थानमे http://www.videha.co.in/index.xml पेस्ट करू आ Add  बटन दबाउ। Join official Videha facebook group. Join Videha googlegroups विदेह रेडियो:मैथिली कथा-कविता आदिक पहिल पोडकास्ट साइट http://videha123radio.wordpress.com/ Videha Radio मैथिली देवनागरी वा मिथिलाक्षरमे नहि देखि/ लिखि पाबि रहल छी, (cannot see/write Maithili in Devanagari/ Mithilakshara follow links below or contact at ggajendra@videha.com) तँ एहि हेतु नीचाँक लिंक सभ पर जाऊ। संगहि विदेहक स्तंभ मैथिली भाषापाक/ रचना लेखनक नव-पुरान अंक पढ़ू। http://devanaagarii.net/ http://kaulonline.com/uninagari/  (एतए बॉक्समे ऑनलाइन देवनागरी टाइप करू, बॉक्ससँ कॉपी करू आ वर्ड डॉक्युमेन्टमे पेस्ट कए वर्ड फाइलकेँ सेव करू। विशेष जानकारीक लेल ggajendra@videha.com पर सम्पर्क करू।)(Use Firefox 4.0 (from WWW.MOZILLA.COM )/ Opera/ Safari/ Internet Explorer 8.0/ Flock 2.0/ Google Chrome for best view of 'Videha' Maithili e-journal at http://www.videha.co.in/ .) Go to the link below for download of old issues of VIDEHA Maithili e magazine in .pdf format and Maithili Audio/ Video/ Book/ paintings/ photo files. विदेहक पुरान अंक आ ऑडियो/ वीडियो/ पोथी/ चित्रकला/ फोटो सभक फाइल सभ (उच्चारण, बड़ सुख सार आ दूर्वाक्षत मंत्र सहित) डाउनलोड करबाक हेतु नीचाँक लिंक पर जाऊ। VIDEHA ARCHIVE विदेह आर्काइव भारतीय डाक विभाग द्वारा जारी कवि, नाटककार आ धर्मशास्त्री विद्यापतिक स्टाम्प। भारत आ नेपालक माटिमे पसरल मिथिलाक धरती प्राचीन कालहिसँ महान पुरुष ओ महिला लोकनिक कर्मभमि रहल अछि। मिथिलाक महान पुरुष ओ महिला लोकनिक चित्र 'मिथिला रत्न' मे देखू। गौरी-शंकरक पालवंश कालक मूर्त्ति, एहिमे मिथिलाक्षरमे (१२०० वर्ष पूर्वक) अभिलेख अंकित अछि। मिथिलाक भारत आ नेपालक माटिमे पसरल एहि तरहक अन्यान्य प्राचीन आ नव स्थापत्य, चित्र, अभिलेख आ मूर्त्तिकलाक़ हेतु देखू 'मिथिलाक खोज' मिथिला, मैथिल आ मैथिलीसँ सम्बन्धित सूचना, सम्पर्क, अन्वेषण संगहि विदेहक सर्च-इंजन आ न्यूज सर्विस आ मिथिला, मैथिल आ मैथिलीसँ सम्बन्धित वेबसाइट सभक समग्र संकलनक लेल देखू "विदेह सूचना संपर्क अन्वेषण" विदेह जालवृत्तक डिसकसन फोरमपर जाऊ। "मैथिल आर मिथिला" (मैथिलीक सभसँ लोकप्रिय जालवृत्त) पर जाऊ। ऐ बेर मूल पुरस्कार(२०१२) [साहित्य अकादेमी, दिल्ली]क लेल अहाँक नजरिमे कोन मूल मैथिली पोथी उपयुक्त अछि ? Thank you for voting! श्री राजदेव मण्डलक “अम्बरा” (कविता-संग्रह)  13.82% श्री बेचन ठाकुरक “बेटीक अपमान आ छीनरदेवी”(दूटा नाटक)  9.82% श्रीमती आशा मिश्रक “उचाट” (उपन्यास)  6.18% श्रीमती पन्ना झाक “अनुभूति” (कथा संग्रह)  5.82% श्री उदय नारायण सिंह “नचिकेता”क “नो एण्ट्री:मा प्रविश (नाटक)  5.82% श्री सुभाष चन्द्र यादवक “बनैत बिगड़ैत” (कथा-संग्रह)  5.82% श्रीमती वीणा कर्ण- भावनाक अस्थिपंजर (कविता संग्रह)  5.82% श्रीमती शेफालिका वर्माक “किस्त-किस्त जीवन (आत्मकथा)  7.64% श्रीमती विभा रानीक “भाग रौ आ बलचन्दा” (दूटा नाटक)  6.55% श्री महाप्रकाश-संग समय के (कविता संग्रह)  5.82% श्री तारानन्द वियोगी- प्रलय रहस्य (कविता-संग्रह)  5.82% श्री महेन्द्र मलंगियाक “छुतहा घैल” (नाटक)  6.91% श्रीमती नीता झाक “देश-काल” (कथा-संग्रह)  6.55% श्री सियाराम झा "सरस"क थोड़े आगि थोड़े पानि (गजल संग्रह)  7.27% Other:  0.36% ऐ बेर बाल साहित्य पुरस्कार(२०१२) [साहित्य अकादेमी, दिल्ली]क लेल अहाँक नजरिमे कोन मूल मैथिली पोथी उपयुक्त अछि ? श्री जगदीश प्रसाद मण्डल जीक “तरेगन”(बाल-प्रेरक कथा संग्रह)  54.17% श्री जीवकांत - खिखिरक बिअरि  25% श्री मुरलीधर झाक “पिलपिलहा गाछ  18.75% Other:  2.08% ऐ बेर युवा पुरस्कार(२०१२)[साहित्य अकादेमी, दिल्ली]क लेल अहाँक नजरिमे कोन कोन लेखक उपयुक्त छथि ? Thank you for voting! श्रीमती ज्योति सुनीत चौधरीक “अर्चिस” (कविता संग्रह)  27.38% श्री विनीत उत्पलक “हम पुछैत छी” (कविता संग्रह)  7.14% श्रीमती कामिनीक “समयसँ सम्वाद करैत”, (कविता संग्रह)  5.95% श्री प्रवीण काश्यपक “विषदन्ती वरमाल कालक रति” (कविता संग्रह)  5.95% श्री आशीष अनचिन्हारक "अनचिन्हार आखर"(गजल संग्रह)  20.24% श्री अरुणाभ सौरभक “एतबे टा नहि” (कविता संग्रह)  5.95% श्री दिलीप कुमार झा "लूटन"क जगले रहबै (कविता संग्रह)  7.14% श्री आदि यायावरक “भोथर पेंसिलसँ लिखल” (कथा संग्रह)  5.95% श्री उमेश मण्डलक “निश्तुकी” (कविता संग्रह)  11.9% Other:  2.38% ऐ बेर अनुवाद पुरस्कार (२०१३) [साहित्य अकादेमी, दिल्ली]क लेल अहाँक नजरिमे के उपयुक्त छथि? Thank you for voting! श्री नरेश कुमार विकल "ययाति" (मराठी उपन्यास श्री विष्णु सखाराम खाण्डेकर)  35.71% श्री महेन्द्र नारायण राम "कार्मेलीन" (कोंकणी उपन्यास श्री दामोदर मावजो)  12.86% श्री देवेन्द्र झा "अनुभव"(बांग्ला उपन्यास श्री दिव्येन्दु पालित)  14.29% श्रीमती मेनका मल्लिक "देश आ अन्य कविता सभ" (नेपालीक अनुवाद मूल- रेमिका थापा)  11.43% श्री कृष्ण कुमार कश्यप आ श्रीमती शशिबाला- मैथिली गीतगोविन्द ( जयदेव संस्कृत)  11.43% श्री रामनारायण सिंह "मलाहिन" (श्री तकषी शिवशंकर पिल्लैक मलयाली उपन्यास)  12.86% Other:  1.43% फेलो पुरस्कार-समग्र योगदान २०१२-१३ : समानान्तर साहित्य अकादेमी, दिल्ली Thank you for voting! श्री राजनन्दन लाल दास  56.86% श्री डॉ. अमरेन्द्र  17.65% श्री चन्द्रभानु सिंह  23.53% Other:  1.96% १. संपादकीय (सम्पादकीय १०१ म अंक शिव कुमार झा ‘टि‍ल्‍लू’, सहायक सम्पादक, विदेह) मैथि‍ली आर्य परि‍वार समूहक पहि‍ल भाषा थि‍क जेकरापर जाति‍वादि‍ कलंक लागल अछि‍। ऐ भाषाकेँ ब्राह्मणवादी प्रवृति‍सँ झाँपि‍ देबाक वि‍रोध आवश्‍यक भऽ गेल। जखन लालूजी बी.पी.एस.सी.सँ एकरा बाहर केलनि‍ तँ मात्र कि‍छु चानन-ठोपधारी धरि‍ एकर वि‍रोध सीमि‍त रहि‍ गेल छल। ई प्रश्न वि‍चारणीय अछि‍ जे बि‍लट पासवान वि‍हंगम, महेन्‍द्र नारायण राम, प्रो. रवि‍न्‍द्र चौधरी आ डॉ. मोतीलाल यादव सन कि‍छु वि‍द्वतकेँ छोड़ि‍ आन जाति‍क लोकक मध्‍य मैथि‍लीक प्रति‍ दर्द कि‍एक नै भेल छल। कोना हेबो करि‍तए? जखन साहि‍त्‍य अकादेमी सलाहकार बोर्डक अध्‍यक्ष पहि‍ने डॉ. रामदेव झा तकर बाद हुनक ससुर चन्‍द्रनाथ मि‍श्र ‘अमर’क पश्चात रामदेव झाक समधि वि‍द्यानाथ झा वि‍दि‍‍त, तखन आन जाति‍केँ के कहए ब्राह्मणोमे वि‍रोधाभास संभव छैक।

माल महराजक ि‍मर्जा खेलए होली। साहि‍त्‍य अकादेमी देशक जनताक ऊपर लागल कर (टेक्‍स)सँ चलैत अछि‍। भातसँ सन्ना भारी, मि‍थि‍लामे ब्राह्मणक आबादी मात्र पाच-सँ-छओ प्रति‍शत आ संपूर्ण मैथि‍लीपर हुनके अधि‍कार अहूमे कि‍छु पागधारी ऐ साहि‍त्‍यि‍क मंचकेँ पॅजि‍यौने छथि‍। मैथि‍ली गाममे रहि‍नि‍हार आम लोकक भाषा थि‍क। जखन मि‍थि‍ला राज्‍यक बात होइत अछि‍ तँ बेगूसराय के कहए हम सभ बॉका धरि‍ चलि‍ जाइत छी मुदा जौं अधि‍कारक गप तँ समस्‍तीपुर आ मधेपुरा आदि‍क ब्राह्मणो सभ भदेसक मानल जाइत छथि, ओना भदेसक ब्राह्मणमे सँ कि‍छु साहि‍त्‍यकार जेना सुरेन्‍द्र झा ‘सुमन’, मार्कण्‍डेय प्रवासी, कीर्ति‍ नारायण मि‍श्र सन कि‍छु लोक सम्‍मानि‍त कएल गेल छथि‍ कि‍एक तँ ओ सभ दरभंगा आ पटनाक बीच झुलैत उत्तरबरि‍या संस्‍कारि‍क लोकक वि‍दुषक रहलाह।

ऐ बेरक साहि‍त्‍य अकादेमी पुरस्‍कार तँ निर्लज्‍जताक पराकाष्‍ठाकेँ पार कऽ देलक। वर्तमान मैथि‍लीक सर्वश्रेष्‍ठ गद्यकार जगदीश प्रसाद मंडलक नाओं निर्णायक मंडल धरि‍ नै पहुँचल। उदय नारायण सिंह ‘नचि‍केता’ आ सुभाष चन्‍द्र यादवपर भारी पड़ि‍ गेलाह चन्‍द्रनाथ मि‍श्र अमरक चेला उदयचन्‍द्र झा वि‍नोद, कहि‍या धरि‍ एना चलैत रहत?

गलती पछाति‍क साहि‍त्‍यकार अथवा दछि‍नाहा ब्राह्मण साहि‍त्‍यकारो सबहक छन्‍हि‍। अपने पाग पहि‍र ई बि‍सरि‍ जाइ छथि‍ जे जइ‍ समाजक ओ प्रति‍नि‍धि‍त्‍व करैत छथि‍न ओ कहि‍यो हुनका माफ नै करतनि‍। पाग मात्र ब्राह्मण आ कर्ण-कायस्‍थ परि‍वारक सकल मंगलकार्यमे पहि‍रल जाइत अछि‍। आन जाति‍क मध्‍य एकर कोनो प्रयोजन वा परंपरा नै। तखन मि‍थि‍लाक सभटा साहि‍त्‍यि‍क समारोहमे पाग पहि‍रेबाक प्रथाकेँ की मानल जाए? चाटुकार ब्राह्मण साहि‍त्‍यकार ऐ प्रथा द्वारा की‍ प्रमाणि‍त करबए चाहै छथि‍ जे मैथि‍ली मात्र ब्राह्मणेटा केर भाषा थि‍क? गलती कि‍छुए लोक करैत अछि‍ आ दोष सम्‍पूर्ण समाजपर मढ़ल जाइत अछि‍। ब्राह्मणोमे स्‍व. गोपालजी झा गोपेश, स्‍व. कालीकान्‍त झा ‘बूच’, स्‍व. चतुरानन मि‍श्र, श्री सत्‍य नारायण झा, डॉ. बुद्धि‍नाथ मि‍श्र, डॉ. वि‍द्यापति‍ झा आ स्‍व. प्रो. रामकृपाल चौधरी ‘राकेश’ सन रचनाकारक संग न्‍याय नै भेल कि‍एक तँ ओ सभ ऐ चाटुकार मंचक सदस्‍य नै छलथि‍ वा छथि‍। तँए समन्‍वयवादी ब्राह्मण साहि‍त्‍यकारकेँ ऐ गि‍रगि‍टि‍या लोक सभसँ मैथि‍लीक रक्षा करए पड़तनि‍। हम साहि‍त्‍यमे आरक्षणक समर्थन नै करैत छी मुदा सबहक प्रति‍ सम्‍यक भाव रखबाक चाही। वि‍गत 10 समारोहसँ सगर राति‍ दीप जरय’मे मैथि‍लीक साम्‍यवादी प्रांजल साहि‍त्‍यकार जगदीश प्रसाद मंडल भाग लऽ रहल छथि‍ मुदा गोधूलि‍ बेलामे प्रारम्‍भ होमएबला ऐ कथागोष्‍ठीमे हुनका कथा-पाठक आइ धरि‍ रातिक‍ 1 बजेसँ पहि‍ने अवसर नै देल जाइत अछि‍‍‍। 

कवि‍ राजदेव मंडलकेँ अनुवादक कोनो एसाइनमेंट नै भेटलनि‍। हम वि‍श्वासक संग कहैत छी जे राजदेव मंडल आ दुर्गानंद मंडल खुशीलाल झासँ श्रेष्‍ठ अनुवादक छथि‍। डॉ. रवी‍न्‍द्र चौधरी मोहन भारद्वाजसँ श्रेष्‍ठ आलेख लि‍खैत छथि‍। बेचन ठाकुर आ डॉ. उदय ना. सिंह नचि‍केता महेन्‍द्र मलंगि‍यासँ नीक नाटककार छथि‍। डॉ. शेफालि‍का वर्मा उषाकि‍रण खानसँ श्रेष्‍ठ महि‍ला रचनाकार छथि‍।

आनंद कुमार झाकेँ जे सम्‍मान देल गेल तेकर हम समर्थन करैत छी। परंच जौं ओ आनंद पासवान वा आनंद मंडल रहि‍तथि‍ तखन ई संभव छल?

जौं आधुनि‍क पीढ़ीक लोक ऐ कु-बेबस्‍थाक वि‍रोध नै करताह तँ संभव अछि‍ जे हमर स्‍वर्गीय पि‍ता कालीकांत झा ‘बूच’क कवि‍ताक ई पाँति‍ सत्य प्रतीत भऽ जाए- “दि‍वस नि‍कट ओ आबि‍ रहल अछि‍ हेती मैथि‍ली सभसँ कात...।”

ओना ऐ ब्राह्मणवादी सोचबला कि‍छु संस्‍थाक सम्‍यक कार्यक सराहना करब सेहो आवश्‍यक। जेना मि‍थि‍ला सांस्‍कृति‍क परि‍षद जमशेदपुरक वार्षिक कलेण्‍डरमे वि‍द्यापति‍क संग-संग लोकदेव सलहेसक फोटो देखि‍ नीक लागल। ऐ लेल प्रो. अशोक अवि‍चल आ प्रो. रवी‍न्‍द्र चौधरीक संग-संग श्री एस.एन. ठाकुर आ सम्पूर्ण परि‍षद् धन्‍यवादक पात्र छथि‍। ऐ प्रकारक समन्‍वयवादी सोचकेँ शतश: नमन। (सम्पादकीय १०१ म अंक शिव कुमार झा ‘टि‍ल्‍लू’, सहायक सम्पादक, विदेह) गजेन्द्र ठाकुर ggajendra@videha.com http://www.maithililekhaksangh.com/2010/07/blog-post_3709.html २. गद्य २.१.अमित मिश्र, कथा-मोछ २.२.ओमप्रकाश झा- कथा- गहींर आँखिक व्यथा २.३.नवीन कुमार "आशा"-बेटीक जन्म २.४.उमेश मण्‍डल- वि‍देह नाट्य उत्‍सव- 2012 २.५.डा. रमानन्द झा ‘रमण’- अनुवाद २.६.योगानन्‍द झा, ग्रामजीवनक सत्‍यक संवाहक :: अर्द्धांगि‍नी २.७. शि‍वकुमार झा ‘टि‍ल्‍लू’- मैथि‍ली कथा साहि‍त्‍यक वि‍कासमे राजकमलक योगदान अमित मिश्र , गाम-करियन, जिला -समस्तीपुर कथा -- * मोछ * मिथिलाक लोक जहिना दही-चुड़ा  माछ .मखान आ पान कए प्रेमि होइ छथि ओहिना गप्प-सड़क्का कए सेहो बड़का प्रेमि होइ छथि । जँ दु-चारि टा संगी एकठाम जुटला आ गप्प नै भेल ,एहन भS नै सकै यै । देश-विदेश , घर-दुआरि , क'र-कुटमैती , वियाह-द्विरागमन , फिल्म-राजनीति बहुतो रास शिर्षक छै ,गप्प करबाक लेल ।गाम-घर मे ताशक चारि-चारि टा चौकरी एक्के ठाम भेटत आ उहो ठाम गप्पक सुगंध भेटै छै । खुदरा मे गप्प तS हाट-बजार , ट्रेन-बस , गाछी-बिरछी ,बाध-बन आदि जगह भेटबे करै छै मुदा थौक मे गप्पक सरोबर बहै छै ,चाहक दोकान पर । हम्मर गामक चौक पर एक्केटा चाहक दोकान छै , सुरेन्द्र  कए चाहक दोकान । साँझ कS गामक सब बड़-बुजुर्ग ओही दोकान पर जुटै छथि आ चाहक चुस्की संग फुटै छै गप्पक फटक्का । हम्मर एकटा फरीक मे कक्का छथि ,मधु कक्का , जेहन नाम तेहने काम , मुहँ सँ सदिखन मधु चुबैए छेन । मधु कक्का कए गप्प बड़ नीक होइ छै ,हिनकर गप्प सुनबाक लेल साँझ कS चाहक दोकान पर भीड़ जुटल रहै छै । चाह संग बिस्कुट ,समौसा , लिट्टी , जीलेबी . सेहो बड़ बिकाइ छै , इएह कारण छै जे सुरेन्द्र मधु कक्का कए फ्रि मे चाह , बिस्कुट आ कहियो-कहियो जीलेबी .समौसा दS छै । आ एकर बदला मे कक्का नव-नव गप्प सुनबै छथिन। गप्प आ मधु कक्का कए महिमा अपरंपार छै जतेक बखान करब ततेक कम मुदा एहि ठाम कोनो गप्प नहि एकटा घटना बता रहल छी । एक बेर हम अपन किछु दोस्त संगे ओहि देकान पर नाश्ता करबाक लेल गेलौँ  । दोकान पर पएरो राखै कए जगह नै छलै  , किछ गेटा तीनू बेँच पर बैसल छलखिन आ जिनका जगह  नहि भेटलनि से ठार छलखिन , सबहक बीच मे ऊँचगर कुर्सी पर मधु कक्का बैसल छलखिन । हम कक्का कए देखलौँ तS जा कS गोर लागलियनि  । हमरा देख कक्का बाजलाह ," बौआ , दरभंगा सँ गाम कहिया एलहो ।" "कक्का काल्हि साँझ मे एलौँ " हम सामने मे ठार होइत कहलयनि । हमरा दिश कनेक काल देखला कए बाद कहलखिन ," बौआ , वियाह भS गेलS की ?," हम अकचका गेलौँ जे कक्का एहन प्रश्न किएक पुछि रहल छथि । हम मुड़ी निच्चा केने बाजलौँ ,"कक्का ,एखन तS पढ़ि रहल छी , कत्तौ नोकरी भेटत तहन ने नीक दहेज ,नीक कनियाँ आ नीक ठाम वियाह हएत , ओना अहाँ एहन प्रश्न किय पुछलियै ।" " तोरा  नहि मोछ छS नहि दाढ़ी छS आ नहि टिक छS  , तS हम की बुझियै , हौ , जेकरा वियाह भेल रहै छै तकरे ने इ सब नहि रहै छै । " कक्का बड़ा शान्ती सँ बाजलाह । हम्मर समझ मे इ तर्क आबि नहि रहल छल । आखिर मोछ सँ वियाहक कोन संबंध , कोन प्रयोजन । लाजे हम्मर मुड़ी माटि मे धैस रहल छलै मुदा हमहूँ शहरी छौड़ा छलौँ चुप कोना रहब , तेँ हिम्मत कS  कहलौँ ," कक्का ,अहूँ गजबे बात करै छी आब वियाह सँ मोछक कोन संबंध आ टिक नै राखब तS नवका फैसन छै । " " देखहक , देखहक भाई सब छौड़ा कोना बाजै छै ।" कक्का भीड़ दिश देखैत जोर सँ बाजलाह , " रौ , वियाह भेला कए बाद मर्द ,मर्द नै रहै छै ओ मौगी भS जाइ छै आ जमाना जानै छै जे मौगी कए मोछ , दाढ़ी आ टिक नहि होइ छै , तोरा तS सदियह ऐ मे से किछ नहि छौ  , जँ एखनो तोँ अपना कए मर्द कहै छेँ तS जरूर तोहर वियाह भS गेल छौ ।" लोक सब हम्मर आ कक्का कए बार्तालाप सुनै छलैए आ मुस्की मारै छलैए । आइ कक्का कए नजैर पर हम चैढ़ गेल छलौँ । मोने मोने हम क्षण कए के गरियाबै छलौँ जखन ऐ देकान पर आयबाक लेल सोचने छलौँ । सब चाहक चुस्की आ हम्मर बेज्जती सँ मुड-फ्रेस कS  रहल छलैए । हम खिसिया कS कहलियै ,"कक्का .राम भगवान कए देखू , कृष्ण भगवान कए देखू , किनको मोछ नहि छै तS की ओ मर्द नहि छलाह ।" " बौआ , ओ भगवान छलखिन तूँ तS मनुक्ख छेँ , जेना राम जी 14  वर्ष बन मे रहलखिन आ कृष्ण जी गीता  कए उपदेश देलखिन , एहन एक्को टा काज तूँ कS सकै छें? जँ भगवानक देखसी करै छेँ तS भगवान जेकाँ कर्म कS कए देखा , तहन फ्रि भS जेबेँ मोछ राखै सँ ।" कक्का कए तर्कक  सामने हम कमजोर भS गेल छलौँ ,हमरा किछ फुरेबे नहि करै छलैए ,मुदा हमहूँ नव जमाना कए ,नव विचारधारा ,आ नव समाज मे जियै बाला प्राणी छी तS फेर एतेक जल्दी हारि कोना मानि लेब ।हम फेर कने सोचि कS कहलौँ ," आइ कए जमाना मे मुर्ख वा विद्वान सब पाइ चाहै छै , मोछ नहि , आ जँ मोछ राखब तS कोनो नामी कंपनी नोकरी नहि देतै आ जँ नोकरी नहि भेटत तS टाका नहि भेटत आ जँ टाका  नहि रहत तS भुखल  मरब , एहि कारणे कक्का मोछ राखनाइ जरूरी नहि छै ।" फेर कनेक काल ठमकी कक्का कए मूँह पर आबैत भाल पढ़बाक कोशिश केलौँ आ फेर सँ हम अप्पन तर्क देलौँ ," आइ फिलम मे बड़का-बड़का हिरो सब बिन मोछ कए अभिनय करै छै और एक्के दिन मे लाखक-लाख टाका कमा लै छै , जाँ मेछ राखितै तS हमरा हिसाबे ओ सड़क पर रहितै । एकटा बात और मोछ बाला छोड़ा कए कोनो आधुनिक लड़की पसंद नहि करै छै ,आब केउ मुर्खे हेतै जे मोछ राखि कS  अपन पएर पर कुल्हरि मारतै ।" हम मोने-मोने सोचै छलौँ जे ऐ बातक कोनो काट कक्का लग नहि हेएत किएक तS महगाई कए जमाना मे टाका सब कए  चाही ।मुदा कक्क तS कक्के छलाह ओ कोना हारि जेताह ।ओ चट दS  अपन बात कहलनि ," हम मानलियौँ जट टाका सबहक प्रथम जरूरत छै मुदा फिलम मे काज करै बाला मर्द नहि होइ छै ,अरे ऊ तS  अपना संगे बाँडीगार्ड कए फौज लS कS घुमै छै ,भीड़ मे नहि आबS चाहै छै , लाड़का लड़की कए रूप धS मूँह झाँपि कS बहराइ छै , ओकरा करेजे नहि छै खुलेआम धुमै कए , जे सदिखन डर मे जियै छै , आब तूँ ही कह जे ओ मर्द छै की मौगी ।सब नवयुवक ओकर अनुकरण करै छेँ आ मोछ कटाबै छेँ ।लाज कर रौ बौआ ,लाज कर ।" कक्का कए बात सुनि हम फेर सँ निरूतर भS गेलौँ । हमरा लSग आब कोनो एहन ठोस तर्क नहि छल जै सँ हम निमोछिया कए जीता सकितौँ ।हमरा चुप देख कक्का बाजलाह," बौआ ,शास्त्र-पुराण मे अनेको ऋषि-मुनी लिखने छथिन जे माय-बाप कए मरला कए बादे मोछ कटाएबाक चाही ।मोछ तS मर्दक पहचान छै । पहिलुक जमाना मे मोछे सँ बुझहा जाइ छलै जे के बलगर आ के कमजोर छै ।मोछक भेराइटी होइ छलै , छोटका मोछ ,हिटलर कट मोछ , पतरका मोछ आ सब सँ नीक मोछ होइ छलै कान धरि बाला मोछ । पाकल ,कारी ,लाल , कंघी मारल, गोल-गोल औँठिया मोछ ,रौद मे चमैक कs मुँहक तेज बढ़ाबै छलै ।आब तs इ सब सपना भs गेलै । आब तS सब किछ छोट भS रहल छै ,छोट मनुष्य ,छोट गाड़ी  , छोट बर्तन ,छोट नाम जेना माँम डैड ब्रो , छोट कपड़ा , छोट टिक , आ सफाचट मोछ । जेना फैसनक कारण सब किछ छोट भS रहल छै हमरा बुझना जाइ यै मुनुक्खक ऊँचाइ बकरी जेकाँ भS जाएत । बौआ हम सब मिथिलाक छी ,मिथिलाक नाउ ,संस्कार ,संस्कृती ,इज्जत कए माटि मे नहि मिला ।विद्यापति ,उदयनाचार्य ,मंडन सन विद्वानक धरती सँ मोछ रूपि धरोहर फैसनक सागर मे नहि भसा । मोछ राख ,टिक राख , जनेऊ पहिर आ शान सँ कह हम मिथिलाक छी , हम मैथिल छी ।" हम लाजे मुड़ी निच्चा केने कहलियै," कक्का कान पकड़ै छी , आइ सँ हम मोछ नहि काटब आ अपन संगीयो सब सँ कहब मोछ नहि काटबाक लेल ,अपन संस्कृती बचाएबाक लेल ।" सब ताली सँ हम्मर बातक समर्थन केलक । चाहक दोकान पर सँ भीड़ छटS लागल । । ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। ओमप्रकाश झा कथा गहींर आँखिक व्यथा आइ-काल्हि शहरी मध्यवर्गक भोरका रूटीन सब ठाम एक्के रहै ए। चाहे ओ छोट शहर हुए वा महानगर। जँ घर मे स्कूल जाइवाला बच्चा आछि तँ भोरे-भोर उठू आ बच्चा केँ तैयारी मे लागि जाउ। एक नजरि घडी दिस रहै छै जे कहीं लेट नै भऽ जाइ। बस स्टाप पर अलगे भीड आ जे अपने सँ स्कूल पहुँचाबै छथि, हुनकर सभक भीड स्कूल गेट पर। कम बेसी सभ शहरक हाल एहने रहै ए। भागलपुर सेहो एहि सब सँ फराक नै छै। भोर मे सात बजे सँ लऽ कऽ साढे आठ बजे तक सौंसे ट्रैफिक जाम आ भीड भाड रहै छै। संजोग सँ हमहुँ एहि भीड भाडक एकटा हिस्सा रहै छी। छोटकी बेटी केँ स्कूल पहुँचेबाक हमरे ड्यूटी रहै ए। अलार्म लगा कऽ भोरे भोर छह बजे उठि जाइ छी। जौं छह सँ आगू सुतल रहलौं, तँ श्रीमतीजीक सुभाषितानि शुरू भऽ जाइ छै जे हे देखियौ आइ स्कूल छोडेलखिन्ह। जखन सात पर घडीक काँटा आबि जाइ ए तखन हबड हबड बेटीक डैन पकडने स्कूल दिस भागै छी आ जँ समय पर गेटक भीतर ढुका देलियै, तँ बुझाइत अछि जे दुनिया जीत लेलौं। इ तँ भेल नित्यक कार्यक्रम। आब किछ विशेष। स्कूलक इलाका मे नित्य भोरे बहुत रास अभिभावकक जुटान हेबाक कारणेँ गपक छोट छोट ढेरी टोल बनल रहै ए। सभक अपन अपन ग्रुप छै आ इ ग्रुप सभक जुटान हेबा लेल ढेरी चाह आ पानक दोकान सभ सेहो। अस्तु, तँ हमरो एकटा ग्रुप बनि गेल अछि, जाहि मे ब्लाक वाला ठाकुरजी, कालेजक प्रोफेसर दासजी, पोस्ट आफिस वाला शर्माजी, कपडा दोकान वाला मोहन सेठ, सर्वे वाला मेहताजी आ आरो किछ गोटे शामिल छथि। हम सब नित्य बच्चा केँ स्कूल छोडलाक बाद ओतुक्का घनश्यामक चाह दोकान पर जुटै छी आ चाहक संग भरि पोख गपक सेहो रसास्वादन करै छी। निजी समस्या सँ लऽ कऽ देशक राजनीति, अमेरिकाक दादागीरी, सचिनक सेनचुरी, आर्थिक समस्या, टूटल रोड, बिजलीक कमी, मँहगीक मारि, कम दरमाहा आदि बहुते विषय सब पर नित्य अंतहीन बहस होइत रहै ए। कहियो काल जँ बेसी लेट भऽ जाइ ए तँ घरनीक तामस सँ भरल फोन हमर सभक सभा भंग कऽ दैत ए। कखनो कऽ मोबाईल फोन पर तामसो होइ ए जे केहन सुन्नर बहस चलै छल आ बहसक असमय मृत्यु भऽ जाइ ए एकटा फोन काल पर। खैर इ भेल हमर भोरका नित्य कार्य। आब हम मूल कथा दिस बढै छी। घनश्यामक चाह दोकान पर एकटा छोट बच्चा काज करै छल। नाम छलै बिनोद आ हमरा सब लेल ओ छल छोटू। घनश्याम कहै छलै बिनोदबा। इ बिनोद, बिनोदबा वा छोटू जे कहियै दस बरखक हएत। एक दिन बहसक विषय वस्तु छल चाइल्ड लेबर। हम सब अपन चिन्ता प्रकट करै छलौं। ठाकुरजी बजलाह जे यौ ऐ दोकान मे जतय छाह पीबै छी सेहो एकटा बाल मजदूर काज करै ए। एकाएक हमरा सभक धेआन छोटू पर चलि गेल। एतेक दिन सँ इ गप नजरि मे किया नै आबै छल, यैह सोचऽ लगलौं। ठाकुरजी घनश्याम केँ कहलखिन्ह जे बाउ इ गलती काज केने छी अहाँ। पुलिस पकडत आ मोकदमा सेहो हएत। घनश्याम बाजल जे अहाँ जूनि चिन्ता करू। हमर पूरा सेटिंग अछि। लेबर आफिसक बडा बाबू हमर ग्राहक छथि आ कोतवालीक दरोगा सेहो एतय आबै छथि। आइ तक तँ किछ नै कहलाह आ आगू देखल जेतै। हम बजलौं- "से तँ ठीक ए, मुदा इ कहू जे एते छोट बच्चा सँ काज करेनाई अहाँ के नीक लगै ए।" घनश्याम- "जखन एकर बापे केँ नीक लगै छै तखन हमरा की जाइ ए। तीन सय टाका महीनवारी दय छियै।" हम धेआन सँ बिनोद केँ देखलौं। ओकर आँखि बड्ड गहीर छलै। कोनो सुखायल सपना जकाँ ओकर आँखि मे काँची सुखा कऽ सटल छलै। हमर हृदय करूणा सँ भरि गेल। हमरा रहल नै गेल। हम ओकरा लग बजेलियै आ पूछलियै- "बउआ कोन गाम घर छौ।" बिनोद बाजल- "हम्मे जगतपुरो केँ छियै।" हम- "बाबूक की नाम ए।" बिनोद- "हमरो बाबूरो नाम जीबछ दास छै।" हम- "पढै नै छी अहाँ? किया काज करै छी?।" बिनोद- "हमरो बाबू कहलकौं जे काम नै करभीं, त घरो मे चूल्ही नै जरथौं। ऐ सँ हम्मे काम पकडी लेलियै।" हम- "हम अहाँक बाबू सँ भेंट करऽ चाहै छी।" बिनोद ताबत हमरा सँ नीक जकाँ गप करऽ लागल छल आ मुस्की दैत कहलक- "हमरो बाबू आज अइथौं। थोडा देर रूकी जा, भेंट होइ जेथौं।" हम ओतै बिलमि गेलौं। कनी काल मे कनियाँ फोन केलथि- "आइ आफिस नै जेबाक ए।" हम- "बस आधा घण्टा मे आबै छी।" कनियाँ- "इ महफिल आ चौकडी अहाँ केँ बरबादे कऽ कऽ छोडत। जे फुराइ ए सैह करू।" हम देखलौं जे मण्डलीक सब सदस्यक मोबाईल टुनटुनाईत छल। खैर कनी कालक बाद एकटा दीन हीन व्यक्ति दोकान पर आयल। बिनोद कहलक- "हमरो बाबू आबी गेल्हौं। जे गप करना छौं, करी लए।" हम ओहि व्यक्ति सँ पूछलौं- "अहीं जीबछ दास थिकौं।" ओ बाजल- "जी मालिक। केहनौ खोजी रहलौं छलियै हमरा।" हम- "अहाँ अपन छोट बच्चा सँ मजदूरी कियाक करबै छियै? ओकर पढै लिखैक उमरि छै। आओर सरकारी कानून सेहो बनि गेल अछि जे अहाँ बच्चा सँ मजदूरी नै करा सकै छी।" जीबछ- "अरे मालिक सरकारो की करतै? फाँसी लटकाय देतै? घरो रहतै त भूखले मरी जेतै।" हम- "कतेक बाल बच्चा अछि अहाँक?" जीबछ- "पाँच गो बेटा औरो दू गो बेटी छै।" हम- "ककरो पढबै छियै की नै?" जिबछ बिहुँसैत कहलक- "पहीले खाना पीना पूरा होतै तभें नी पढाई होतै।" हम- "एते जनसंख्या कियाक बढेने छी?" जीबछ- "आब होइ गेलै त की करभौं। हमे भी बच्चा मे मजदूरीये केलियौं मालिक। हमरा और के भाग मे यही लिखलो छौं।" हम- "देखू जे भेल से भेल। बच्चा केँ मजदूरी छोडाउ आ स्कूल मे भर्ती करू। सरकार दुपहरियाक खेनाई सेहो दै छै। नै तँ हम लेबर विभाग मे खबरि कऽ देब। कनी एक बेर बिनोदक आँखिक सपना दिस देखियौ। ओकर की दोख छै? कमे अवस्था मे केहन लागै छै। अहाँक दया नामक वस्तु नै ए की? अहींक बच्चा थीक। सरकारक ढेरी योजना छै। अहाँ लोन लऽ सकै छी। अपन कारोबार कऽ सकै छी। नरेगा मे रोजगारक गारण्टी छै। इंदिरा आवास मे मकान लऽ सकैत छी।" पता नै हम की सब कहैत चलि गेलौं। हमरा चुप भेलाक बाद जीबछ बाजल- "मालिक अपने सब ठीके कहलियै। लेकिन सबे जगहो पर कमीशनो खोजै छै। हमे कहाँ से देभौं कमीशन। ढेरी इनक्वाइरी औरो चिट्ठी पतरी होइ छौं। एतना लिखा पढी औरो दौडा दौडी हमरा से नै सपरथौं।" हम- "ठीक छै, एखन तँ हम जाइ छी, मुदा अहाँ केँ जे कहलौं से करब आ कोनो दिक्कत हएत तँ हमरा सँ भेंट करब। हम अहाँक चिट्ठी बना देब आ जतय कहऽ पडत कहि देब।" फेर हम घर चलि गेलौं। सभा विसर्जित भऽ गेल छल। दोसर दिन जखन स्कूल गेलौं, तँ फेर सँ घनश्यामक दोकान पर चाहक जुटान भेल। आइ बिनोद दोकान पर नै छल। हम गर्व सँ बाजलौं- "देखलियै बिनोदक मुक्ति भऽ गेल। आब ओकर गहीर आँखिक सपना फेर सँ हरिआ जाएत।" घनश्याम कहलक- "नै सर, बिनोदबाक बाप अहाँ सब सँ डरि गेल आ हमरा ओतय सँ हटा लेलक। कहै छल जे कहीं साहब सब पकडबा नै दैथ, तैं एकरा कोनो दोसर ठाम रखबा दैत छियै।" हम अवाक रहि गेलौं। बिनोदक गहीर आँखिक सपना हमरा नजरिक सामने ठाढ भेल हमरा पर हँसि कऽ कहै छल- "सब सपना पूरा होइ लेल थोडे होई छै। किछ सपनाक अकाल मृत्यु भऽ जाइ छै। हमरो अकाल मृत्यु भऽ गेल अछि। अहाँ व्यर्थ हमरा जीयेबाक प्रयास कऽ रहल छी।" हम हताश भऽ गेलौं। ओहि दिन सँ बिनोद केँ बहुत ताकलियै, मुदा पूरा भागलपुर मे ओ कतौ नै भेंटल। बच्चा सबहक बडा दिनक छुट्टी मे एकटा भाडाक गाडी सँ गाम जाइ छलौं। बाट मे नारायणपुर मे चाह पीबा लेल गाडी रोकलौं, तँ देखै छी जे बिनोद ओहि चाहक दोकान पर काज करैत छल। हम ओकरा दिस बढलौं की ओ जोर सँ कानऽ लागल। दोकानक मालिक हमरा कहलक- "बच्चा केँ किया डरबै छियै?" हम- "नै डरबै नै छियै। हम ओकरा जानै छियै।" दोकानक मालिक- "से तँ हम देखिये रहल छी। चुपचाप चाह पीबू आ अपन गाम दिस जाउ।" ताबत कनियाँ सेहो आबि गेली आ कहऽ लागली- "अहाँ केँ बताह हेबा मे आब कोनो कसरि नै रहि गेल। चलू तँ चुपचाप।" हम देखलौं जे बिनोद कतौ नुका गेल छल अपन गहीर आँखिक सपना समेटने आ हम चुप भऽ गाडी मे बैसि गेलौं। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। नवीन कुमार "आशा" बेटीक जन्म

बेटीक जन्म पर कतेक लोग हॅसैत खिलखिलैत छथि तअ कतेक लोग नोर बहबैत छथि। कहियो इ सोचल जॅ बेटा बुढ़ापाक लाठी बनि सकैत अछि तअ बेटी कियाक नहि। मानल जाइत अछि जे आजुक समय मे बेटा आ बेटी एक समान अछि, परंच किछु वक्ता लेल एहि विषय पर मतभेद छनि, आखिर किया ? बेटी लक्ष्मीक रूप मानल जाए छथि तय फेर लक्ष्मीक अनादर कियाक। 21वीं ष्षताब्दी, जतय बेटी बेटा सॅ आगु निकलल जाएत छथि, ईहो समय में भ्रूण हत्या, विवाहक बाद दहेज लेल प्रताड़ित करनाए आखिर कियाक ? जे परिवार भ्रूण हत्या करैत छथि आ जे दहेज लेल प्रताड़ित करैत छथि से कहियो सोचलैत की ओ जकरा प्रताड़ित करैत छथि ओ कोनो घरक बेटी अछि। आखिर ई अंतर कहिया धरि तक मिटत। कहियो ई सोचलैत जे अगर इ समाज में बेटीक जन्मदर कम भय जायत तय इ समाज कोना के विकसित होयत। एखन देखल जाए सकैत छैक जे हर क्षे़त्र मे बेटी अपन परचम लहरा रहल अछि, चाहे ओ सिविल, इंजिनियरिंग या अन्य क्षेत्र हुअए, फेर बेटी कय सदिखन अपमान किया कएल जाएत अछि। बेटी चाहे ओ कियाक ने एकटा मॉ हो, पुतौह हो या बेटी, ओ सदिखन अपना ऊपर होय वला अत्याचार के सहैत अछि, आखिर इ कहिया तक ? एकटा और अपन समाज में विषरूपी ब्याप्त समस्या अछि दहेज, जेकर कारणे कतेक बेटी प्रताड़ित कैएल जाए छथि आ कतेको तअ मारि देल जाए छथि। आजुक समय में हरेक लड़की पढ़ल लिखल आ काज करैत होय छैक पर तहियो ओकर विवाह बिना दहेजक नहि होइत छैक। जे वक्ता बेटी के अभिषाप या बेटाक दर्जा नै दैइत छथि, कि कहियो ओ सोचलैत जे ई दहेज प्रथा, भ्रूण हत्याक विरोध करि। कि समाज अपन सोच नहि बदलत। हम ई सब बातक विरोध आ घोर निंदा करैत छी, आ बेटी के हॅसैत-खेलाइत स्वागत करि तकर आवाहन करैत थिक। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। उमेश मण्‍डल वि‍देह नाट्य उत्‍सव- 2012 :: मधुबनी जि‍लान्‍तर्गत चनौरागंजक जे.एम.एस. कोचिंग परि‍सरमे वि‍गत 28-29 जनवरी 2012केँ सरस्‍वती पूजाक अवसरपर दु-दि‍वसीय ‘वि‍देह नाट्य उत्‍सव’क आयोजन वि‍देह ई-पत्रि‍काक नाट्य-रंगमंच-फि‍ल्‍मक संपादक बेचन ठाकुर जीक संयोजकत्‍वमे कएल गेल। श्री बेचनठाकुर लि‍खि‍त ‘बि‍सवासघात’, श्री गजेन्‍द्र  ठाकुर लि‍खि‍त ‘उल्‍कामुख’ आ श्री जगदीश प्रसाद मण्‍डल लि‍खि‍त ‘बि‍रांगना’ नाटकक मंचन श्री बेचन ठाकुरक ि‍नर्देशनमे भेल। नाट्य रंगमंच-फि‍ल्‍मपर परि‍चर्चा, शि‍शुकला प्रदर्शन, काव्‍य गोष्‍ठी‍, एकर अति‍रि‍क्त नाटक अभि‍नय, गीत-संगीत, हास्‍य–कला, नृत्य-कला, मूर्ति-कला, शिल्प-वस्‍तुकला, काष्‍ठ-कला, कि‍सानी-आत्‍मनि‍र्भर संस्‍कृति एवं चित्र-कला‍ क्षेत्रमे 2012क ‘विदेह सम्मान’ सेहो प्रदान कएल गेल। ऐ अवसरपर वि‍शि‍ष्‍ट अति‍थि‍ रहथि‍ साहि‍त्‍यकार जगदीश प्रसाद मण्‍डल, कवि‍ जनककि‍शोर लाल दास, झंझारपुरक वरीय उपसमाहर्ता सह प्रभारी एस.डी.ओ. चेतनारायण राय, डी.सी.एल.आर; कुमार मि‍थि‍लेश प्रसाद सिंह, पूर्व जि‍ला पाषर्द बलराम साहु, डॉ. उषा महासेठ, कुमार रामेश्वर लालदास, रामवृक्ष सिंह, ब्रज कि‍शोर साह आ अवकाश प्राप्‍त शि‍क्षक हरि‍नारायण झा। हजारो दर्शक-श्रोताक अालाबे दूर-दूरसँ आएल साहि‍त्‍य-संगीत प्रेमी सबहक उपस्‍थि‍ति‍ सेहो छल। मंचक संचालन रामसेवक ठाकुर, दुर्गानंद मंडल आ दयानंद कुमार केलनि‍। वि‍देह मैथि‍ली पोथी प्रदर्शनी मंचक दहि‍ना भाग लगाओल गेल रहए जे आकर्षक रहल। दि‍नांक 28/01/2012 अर्थात उत्‍सवक पहि‍ल दि‍न दुटा नाटक क्रमश: बि‍सवासघात आे उल्‍कामुख’क प्रदर्शन भेल। जतए पहि‍ल नाटक हालेमे एन.एच. ि‍नर्माणमे भेल घोटालासँ उपजल षड्यंत्रक प्रभावकेँ उघार केलक ओतहि‍ दोसर नाटक जादू वास्‍तवि‍कतावादी उल्‍कामुख जइमे ऐति‍हासि‍क षड्यंत्रकेँ उघारल करैत खचाखच दर्शकदीर्घामे दाँते ओंगरी कटबाक स्‍थि‍ति‍ बनौलक। गुरु: ब्रह्मा गुरु: वि‍ष्‍णु... मंगलाचरणसँ उद्घाटन सत्र प्रारम्‍भ भेल। वि‍धि‍वत् दीप प्रज्‍वलि‍त कऽ अवकाश प्राप्‍त शि‍क्षक कुमार रामेश्वर लाल दास उद्घाटन केलनि‍। रंगमंचीय अध्‍यक्ष डाॅ. उषा महासेठ एवं श्री ब्रज कि‍शोर साहक अभि‍भावकत्‍वमे कार्यक्रमकेँ आगाँ बढ़ाओल गेल। एकटा सुन्‍दर स्‍वागत गीतसँ सुश्री शि‍ल्‍पी कुमारी ओ आशा कुमारी स्‍वागत केलनि‍। नाटक मंचनसँ पूर्व काली माताक झाँकी प्रस्‍तुत कएल गेल जइमे काली केर प्रदर्शन केलीह सुश्री आरती कुमारी हाथक सहयोग केने रहनि‍ सुश्री उजमा नि‍हकत। ऐ अवसरपर गीत गाओल गेल छल- जय जय भैरवि‍....., जेकर गायक कलाकार रहथि‍ कुष्‍ण कुमार यादव ओ कमल ि‍कशोर ‘पंकज’। एकर अति‍रि‍क्‍त   जल स्‍वच्‍छता अभि‍यानपर आधारि‍त गीत ‘जल स्‍वच्‍छता बढ़बैत चलू....’ एवं जट-जटीन, ‘जब जब पढ़ए कहलि‍यौ गे जटीन.....; फगुआ ‘सरस्‍वती पूजामे नव उमंग आनल वसन्‍त.....; रागि‍नी कुमारी, वि‍भा कुमारी, ललि‍ता कुमारी आ सुधीरा कुमारी द्वारा प्रस्‍तुत कएल गेल। बि‍सवासघात नाटकक प्रमुख पात्र- राम कि‍शुन, बीरू, एस.पी, कलक्‍टर, उमाशंकर, गंगाराम, लक्ष्‍मी, ओम प्रकाश, बि‍लट, राजा आ हरि‍कि‍श्वर जेकर अभि‍नय केने छलाह क्रमश: दुर्गानंद ठाकुर, श्रवण कुमार महतो, सुनील कुमार महतो, नवीन कुमार मण्‍डल, अमि‍त रंजन, सर्व नारायण महतो, नवीन कुमार, अभि‍नव कुमार सागर, मो. टॉसि‍फ, रमेश कुमार यादव, आ जीतेन्‍द्र कुमार पासवान। उल्‍कामुख नाटकक प्रमुख पात्र- गंगेश, वल्‍लभा, देवतत्त, आचार्य सिंह, भगता आ गंगाधर। अभि‍नय केने रहथि‍ क्रमश: अंजली ि‍प्रयदर्शिनी, प्रीति‍ कुमारी, सुलेखा कुमारी, श्‍वेता कुमारी, पूजा कुमारी आ शि‍ल्‍पी   कुमारी। अंतमे हास्‍य कलाकार श्री दुर्गानंद ठाकुर द्वारा अद्भुत समाचारक प्रस्‍तुति‍ कऽ राति‍क 11 बजे कार्यक्रम शेष भेल। एहि‍ना दोसर दि‍न माने 29/ 01/ 2012क कार्यक्रम शुभारम्‍भ भेल ‘वि‍देह सम्‍मान समारोह’सँ ऐ सत्रक उद्घाटन उपसमाहर्ता सह प्रभारी एस.डी.ओ. चेत नारायण राय, डी.सी.एल.आर. कुमार मि‍थि‍लेश प्रसाद सिंह, साहि‍त्‍यकार जगदीश प्रसाद मंडल, कवि‍ जनक कि‍शोर लाल दास, डॉ. उषा महासेठ एवं अवकाश प्राप्‍त  शि‍क्षक हरि‍नारायण झा सम्‍मि‍लि‍त रूपसँ दीप प्रज्‍वलि‍त क’। नाटक, गीत, संगीत, नृत्य, मूर्तिकला, शिल्प-वस्‍तुकला, काष्‍ठ-कला, कि‍सानी-आत्‍मनि‍र्भर संस्‍कृति एवं चित्रकला‍ क्षेत्रमे 2012क विदेह सम्मानसँ सम्‍मानि‍त प्रति‍भागी सबहक सूची ऐ तरहेँ अछि‍- अभि‍नय- सुश्री शि‍ल्‍पी कुमारी, उमेर- 17 पि‍ता श्री लक्ष्‍मण झा श्री शोभा कान्‍त महतो, उमेर- 15 पि‍ता- श्री रामअवतार महतो, हास्‍य-अभिनय- सुश्री प्रि‍यंका कुमारी, उमेर- 16, पि‍ता- श्री वैद्यनाथ साह श्री दुर्गानंद ठाकुर, उमेर- 23, पि‍ता- स्‍व. भरत ठाकुर नृत्‍य- सुश्री सुलेखा कुमारी, उमेर- 16, पि‍ता- श्री हरेराम यादव श्री अमीत रंजन, उमेर- 18, पि‍ता- नागेश्वर कामत चि‍त्रकला- श्री पनकलाल मण्डल, उमेर- 35, पिता- स्व. सुन्दर मण्डल, गाम छजना श्री रमेश कुमार भारती, उमेर- 23, पि‍ता- श्री मोती मण्‍डल संगीत (हारमोनियम)- श्री परमानन्‍द ठाकुर, उमेर- 30, पि‍ता- श्री नथुनी ठाकुर संगीत (ढोलक)- श्री बुलन राउत, उमेर- 45, पि‍ता- स्‍व. चि‍ल्‍टू राउत संगीत (रसनचौकी)- श्री बहादुर राम, उमेर- 55, पि‍ता- स्‍व. सरजुग राम शिल्पी-वस्तुकला- श्री जगदीश मल्लिक, उमेर 50 गाम- चनौरागंज मूर्ति- कला- श्री यदुनंदन पंडि‍त, उमेर- 45, पि‍ता- अशर्फी पंडि‍त काष्ठ-कला- श्री झमेली मुखिया,पिता स्व. मूंगालाल मुखिया, उमेर 55, गाम- छजना किसानी-आत्मनिर्भर संस्कृति- श्री लछमी दास, उमेर- 50, पिता स्व. श्री फणी दास, गाम बेरमा उपरोक्‍त प्रति‍भागी सभकेँ प्रस्‍तीपत्र, प्रतीक चि‍न्‍ह अा मालासँ सम्‍मानि‍त कएल गेलनि‍। उपहार स्‍वरूप लगभग हजार-हजार रूपैयाक नव मैथि‍ली पोथी सेहो प्रदान कएल गेल। ऐ तरहेँ वि‍देह द्वारा ई एकटा नव डेग, जेकरा मैथि‍ली साहि‍त्‍यमे पहि‍ल डेग सेहो कहबामे कोनो हर्ज नै, उठाओल गेल। दोसर सत्र कवि‍ सम्‍मेलन आ परि‍चर्चाक छल‍। ऐमे भाग लेलनि राम सेवक ठाकुर, दुर्गा नन्‍द मण्‍डल,‍ नन्‍द  वि‍लास राय, कपि‍लेश्वर राउत, लक्ष्‍मी दास, रामवि‍लास साहु, प्रो. उपेन्‍द्र नारायण अनुपम, जगदीश प्रसाद मंडल, जनक कि‍शोल लाल दास, राम प्रवेश सिंह, शम्‍भू सौरभ, अजय कुमार दास, बलराम साहु, राम सेवक ठाकुर, अखि‍लेश कुमार मण्‍डल, शि‍वकुमार मि‍श्र आ मो. गुल हसन आदि‍ कविमे‍ अखि‍लेश कुमार‍ मंडल आ लक्ष्‍मी दास छोड़ि‍ सभ अपन-अपन स्‍वलि‍खि‍त नूतन कवि‍ताक पाठ केलनि‍। ऐ तरहेँ दोसर सत्रक समापनक पछाति‍ तेसर सत्र जे रंगमंच-सत्र ओ वि‍देह नाट्य उत्‍सवक अंति‍म सत्र आयोजि‍त भेल। अंति‍म सत्रक वि‍शि‍ष्‍ट अति‍थि‍गण रहथि‍- कामेश्वर कामति‍, नीलकांत दास, शि‍व कारक, मो. असनुद्दीन, नन्‍द कि‍शोर गुप्‍ता, कपि‍लेश्वर राउत। रंगमंचीय अध्‍यक्षता ओ मंच संचालन केलनि‍ दुर्गानंद मंडल। ....ग्रामीण जीवनकेँ बजारोन्‍मुख हएब...। सस्‍ता श्रम-शक्‍ति‍ भेटलासँ पूँजीपति‍ वर्ग द्वारा शोषण...। श्रमक लूटसँ ग्रामीण लोक जानवरोसँ बत्तर जि‍नगी जीबए लेल मजबूर...। रूपैयाक लालचमे नीच-सँ-नीच काज करबाक लेल लोक केना तैयार होइए इत्‍यादि‍ वि‍षय-वस्‍तुपर आधारि‍त बि‍रांगना एकांकी’क प्रस्‍तुति‍क पछाति‍ वि‍देह नाट्य उत्‍सवक समापनक घोषणा कएल गेल। उपरोक्‍त समाचारक फोटो व वि‍डि‍यो नि‍म्‍न लिंक सभपर उपल्‍ब्‍ध अछि‍। http://maithili-drama.blogspot.com/ http://esamaad.blogspot.com/ http://sites.google.com/a/videha.com/videha-video ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। डा. रमानन्द झा ‘रमण’ अनुवाद 1 21 फरबरी - अन्तरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस। एही दिन पूर्वी पाकिस्तानमे लादल गेल उर्दूक विरोधमे बंगलाभाषी विशाल प्रदर्शन कएने छलाह। पाकिस्तानी पुलिस गोली चलौलक। दू बंगलाभाषी नवयुवकक प्राण तत्काल चल गेलनि। तेसर नवयुवकक देहान्त 22 फरबरी, 1952 के ँ भेल। ओहि तीनू बलिदानीक स्मृतिमे तात्कालीन पूर्वी पाकिस्तान आ’ आब बंगलादेश 21 फरबरीरके ँ प्रतिवर्ष मातृभाषा दिवस मनबए लागल। हुनका लोकनिक सारासँ तेहन ने धधरा उठल जे इतिहास साक्षी अछि, बंागलादेश बनि गेल। देशक राजनीतिक स्वतन्त्राताक लेल विश्वक राजनीतिक इतिहासमे अपन प्राणक आहूति देनिहार अनगिनित स्वाधीनताकामी छथि, किन्तु अपन भाषाक नामपर प्राणक आहूति देबाक विश्वमे ई पहिल घटना छलैक। स्वतन्त्राता सेनानीक स्मृतिमे दिल्लीमे इंडिया गेट अछि, आ’ पटनामे शहीद स्मारक। मुदा ढा़कामे शहीदमीनार अछि, जतय प्रतिवर्ष 21 फरबरीके ँ मातृभाषाक अस्मिताक रक्षाक लेल प्राणक आहूति देनिहार ओहि तीनू नवयुवकके ँ लोक श्रद्धांजलि अर्पित करैत अछि। भाषाक संरक्षणक लेल शपथ लैत छथि। बंगलादेशक सरकारक आवेदनपर, विश्वक कतेको देशक समर्थनसँ, जाहिमे भारत प्रमुख छल, 1999 मे यूनेस्को 21 फरबरीके ँ अन्तरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस घोषित कएलक। आब समस्त विश्व 2000 सँ 21 फरबरीके ँ अन्तरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस मनाए रहल अछि। एहन महत्त्वपूर्ण तिथिके ँ मैथिलीक विकासक लेल कार्यक्रमक शुभारम्भ निश्चिते अत्यन्त महत्त्वपूर्ण अछि। नेशनल अनुवाद मिशन, मैसूर मिथिला भाषाक विकास एवं संरक्षणक लेल कतेक सतर्क अछि, तकर ई उदाहरण थिक। नेशनल अनुवाद मिशनक अधिकारीलोकनि धन्यवादक पात्र छथि। 2 हमरालोकनि अपन मातृभाषाक लेल लिखैत रहबाक अतिरिक्त जनजागरण अभियान नहि चलौलहुँ। आन्दोलन नहि कएलहुँ। आन्दोलनक लेल जे संघनित भाषाचेतना अपेक्षित छैक, तकर सभ दिनसँ अभाव रहल। ऐतिहासिक, राजनीतिक वा सामाजिक कारणसँ दूभाषिआ भए गेलहुँ, जाहि गतिसँ पड़ैनी लागल अछि, जाहि तन्मयतासँ बजार आ’ संचार माध्यमक चाक पर नंचैत जाइत छी, आ’ जेना हरिअरी दिस लपकि रहल छी, ओहिसँ जे गढाइत अछि वा गढ़ाएत, स्पष्ट संकेत अछि, अगिला पीढ़ी एक भाषिआ भएके ँ रहत। भाषा वैज्ञानिकक निष्कर्ष अछि, दोसर पीढी दू भाषिआ होइत अछि आ’ तेसर पीढ़ी एक भाषिया। परिणाम होइछ, भाषाक विलुप्ति।1 दोसर भाषा वैज्ञानिक जे.ए. फिशमैनक सेहो शोधनिष्कर्ष एहने अछि, ‘जाहि मातृभाषाक आनुवंशिक संक्रमण नहि होइछ, से भाषा टीकैत नहि अछि।2 एहन सामाजिक स्थितिमे अपन मातृभाषाक रक्षाक लेल संवैधानिक कबच-कुण्डल भेटि गेल अछि। एहिसँ मैथिली प्रयोगक प्रक्षेत्रमे विकासक संग वैविध्य आएल अछि। पहिने कविता कथा लिखि, पढ़ि वा वांचि गदगद होइत छलहुँ। अपना अपनीके ँमग्न रहैत छलहुँ। ओना ई प्रवृत्ति गेल नहि अछि। मैथिलीक सभ छारभार, यश अपयश एही वर्ग पर छलनि। मुदा, संवैधानिक मान्यताक उपरान्त अन्यहु क्षेत्र आ’ शास्त्रक विज्ञजनके ँ गौरवक बोध भेलनि अछि। अपन मातृभाषाके ँ सम्बृद्ध करबाक इच्छा जगलनि अछि। मौलिक आ’ अनुवाद दूनू क्षेत्रामे सक्रिय भेलाह अछि। एहिसँ आनो आनो शास्त्राक रचना मैथिलीमे आबए लागल अछि। साहित्येतर विषयक पोथी मैथिलीमे छपय लागल अछि। मैथिलीक विस्तार एवं संरक्षणक हेतु ई शुभ लक्षण थिक। मैथिलीमे लेखनक दृष्टिसँ समाजमे दू कोटिक शिक्षित मैथिल छथि - 1. मैथिलीक दृष्टिसँ शिक्षित मैथिल एवं, 2. मैथिलीक दृष्टिसँ अशिक्षित मैथिल। 1. When a language surrenders itself to foreign idiom and when all its speakers become bilingual, the penalty is death." -T.F.O' Rahilly- Irish dialects past and present: With chapters on Scottish and Manx. Dublin Institute of Advanced Studies.) 2.Without intergenarational mother tounge transmission - no language maintenace is possible.That which is not transmitted can not be maintained) मैथिलीक दृष्टिसँ शिक्षित मैथिल ओ भेलाह जे विधिवत मैथिली पढ़ने छथि, मैथिलीमे लिखैत रहबाक अभ्यास छनि एवं पारिवारिक सम्भाषणक भाषा मैथिली छनि। मैथिलीक दृष्टिसँ अशिक्षित मैथिलक कोटिमे ओ अबैत छथि जे मातृभाषा मैथिली रहितहु हुनक अध्ययन वा लेखनक माध्यम हिन्दी वा अङरेजी रहैत अछि, पारिवारिक वा सामाजिक सम्भाषणक भाषा मैथिली नहि रहि गेल छनि वा अत्यल्प रूपमे छनि। किन्तु, साहित्य सर्जना वा अन्ये विषयक रचनासँ अपन मातृभाषाक सम्बर्द्धनक प्रबल आकांक्षा छनि। ई आकांक्षा अवश्य स्वागत योग्य अछि। मुदा, ओ ई मानबाक लेल तैआर नहि रहैत छथि जे मैथिली सेहो सीखबाक वस्तु थिकैक, मात्रा बाजब अबैत रहब, साहित्य सर्जनाक लेल पर्याप्त नहि होइत छैक। मातृभाषा थिक, ते ँ जे लिखब, जहिना लिखब, सभटा ठीके होएत, शुद्धे होएत। एहि भ्रान्त धारणाक कारण मैथिली लेखनमे अव्यवस्था बढ़ि गेल अछि। एक टा समाचार पढ़ने छलहुँ, बिलेंतक अधिकांश अन्डर ग्रेजुएट अङरेज, शुद्ध अङरेजी नहि लिखि पबैत र्छिथ। ई मैथिली भाषी पर सेहो लागू होइत अछि। अन्यथा रमानाथ झा नहि लिखने रहितथि - ‘हम ई नहि मानैत छी जे जँ मैथिली हमर मातृभाष थिक, हम मैथिली अहोरात्रा बजैत छी ते ँ जे लिखब, जेना लिखब सएह मैथिली होएत। जे कहैत छथि, जे जहिना बजैत छी तहिना लिखब, तँ मैथिलीक स्वरूप अनन्त भए जाएत।’ एहि प्रसंग भाषावैज्ञानिक डा. रामावतार यादव मैथिली लेखनमे आएल अस्तव्यस्तताक कारणक अन्वष्ेाण कए, भाषावैज्ञानिक तथ्यक आधारपर ओकर परीक्षण कए एहि निष्कर्षपर छथि जे ‘हिन्दी भाषाक माध्यमे ँ शिक्षा ग्रहण कएनिहार एवं हिन्दी भाषाक लैखिक परिपाटीसँ अत्यधिक प्रभावित होमएबाला मैथिलीक लेखक लोकनि हिन्दी जकाँ मैथिली सेहो लिखए चाहैत छथि एवं मैथिलीक प्रत्येक शब्द, रूपिम एवं रचनांग आदिके over differentiate करए चाहैत छथि’। ओ मानैत छथि जे एहि प्रभावक कारणे ँ मैथिलीक ऐतिहासिकताक रक्षा नहि होइत अछि, ओ मैथिलीक निजत्वक परिचायक नहि बनि, मैथिलीके ँ कुरूप कए दैत अछि। एहि देखौंसक परिणामजनित किछु उदाहरण प्रस्तुत कए रहल छी - 1. अहाँ सँ के बहस करत? 2. पूजा करथु, आ कनियो के आबय कहथुन।- मधुकान्त झा, क्रान्तिरथी, पृ.सं.14/66 3. आइ फेर सँ नारायण जी क े डेरा खाली करबाक नोटिस जारी भ’ गेलनि।-ऋषि बशिष्ट, मांटि परक लोक,सुफांटि जतरा, पृ. सं.10 4. एकटा के बजाउ त’ दोसर पार। - ऋषि बशिष्ट, पहिल वाक्यमे ‘के’ सर्वनाम अछि एवं दोसर, तेसर एवं चारिम वाक्यमे ‘के’ कारक चिह्न थिक। मुदा, मैथिलीक लेखक महोदय सभठाम ‘के’क प्रयोग कए देलनि अछि। साहित्य अकादेमीसँ पुरस्कृत मैथिलीक एक लेखकक प्रकाशित नब पोथीपर चर्चाक क्रममे एहि विषयक हमर विचार सुनि ओ तमसा गेलाह आ’ कहलनि ‘अर्थात हमरा मैथिली नहि लिखए अबैत अछि।’ मिथिला भाषाक अपन निजी विशेषता, सानुनासिक स्वरध्वनिक प्रसंग डा. रामावतार यादवक अभिमत अछि जे सानुनासिक स्वर ध्वनिक लेल अर्थात् एहन स्वर ध्वनिक लेल जे कोनहु नासिक्य व्यंजनक सामीप्यक अभावहुमे स्वतः स्वनिमिक भए सानुनासिक रूपे ँ उच्चरित होइत अछि एवं जकरा spontaneous nasalization कहल जाइत अछि, मैथिली वर्तनीमे अद्वयार्थक रूपे ँचन्द्रबिन्दु द्वारा, जेना सँ, तँ, हँ, अहाँ प्रतिबिम्बित होइत आएल अछि एवं सएह उचित अछि। अनुस्वार द्वारा यथा सं, तं, हं, अहां ओ प्रतिनिधित्व नहि होइत अछि। मुदा, कतेको व्यक्ति चन्द्रबिन्दुक कोन कथा, अनुस्वारहुके ँ छोड़ि स’ एवं त’ लिखैत छथि। जेना उदाहरण 4 (‘एकटा के बजाउ त’ दोसर पार’) मे अछि। मैथिलीक गम्भीर अध्येता पं. गोविन्द झा स्पष्टतः लिखने छथि जे मैथिलीक अपन स्वन-व्यवस्थामे अनुस्वारक कतहु स्थान नहि अछि, किन्तु हिन्दीक प्रभावसँ एकर प्रयोग जोर पर अछि, जखन कि बंगलामे अद्यावधि अनुस्वार नहि चलैछ। निश्चित रूपसँ ई बंगलाभाषीक अपन भाषाक निजताक रक्षाक प्रति सचेत एवं साकांक्ष रहबाक परिचायक थिक। अङरेजी शब्द Marriageक संगे कतय जव आ’ कतय ूपजी लागए, से घोखैत जाइत छी, किन्तु, मैथिली अपन मातृभाषा थिक, व्याकरणक नियमक पालनक कोन चिन्ता, जे लिखब, शुद्धे होएत। के काटत? ई मानसिकता पराकाष्ठापर अछि। ई ध्यान देबाक थिक थिक जे पैघ लेखकक भाषा सेहो पैघ होइत छैक, अन्यथा अभिप्रेतक अभिव्यंजना लटपटा जएतैक। राजनीतिक उपनिवेशवाद समाप्त भए गेल। मुदा, उपनिवेशवाद नवरूप धारण कए लेलक अछि। ओ अपन अकादारुण मुह बाबि इनफौरमेशन टेकनौलेजीक रथपर सबार भए, द्रुत गतिसँ आबि रहल अछि। ओ सभटा गीरि जएबाक लेल आतुर अछि। मैथिलीपर दू तरफा मारि पड़ि रहल छैक। ओहि प्रहारसँ मैथिलीके ँसुरक्षित रखबाक अछि। तखनहि, मैथिलीक अपन निजता रहतैक, नहि तँ एकटार भए जाएत। एहि लेल आवश्यक अछि जे मैथिलीक स्वन विशेषताके ँ, ओकर ध्वनि परम्पराके ँ लेखनमे सुरक्षित राखल जाए। डारामावतार यादवक परामर्श अत्यन्त उपयोगी अछि जे मैथिलीक आत्मरक्षार्थ ई परमावश्यक जे ओ हिन्दीसँ भिन्न देखि पड़ए। हम लक्ष्मीपति सिंहक उक्तिके ँ दोहरबैत एहि प्रसंग अपन वक्तव्यके ँ विराम दैत छी। ओ लिखल अछि - ‘जेना बजै छी, तहिना लिखी, जे सर्वसाधारण बूझि जाए, सएह लिखी वा जे किछु शुद्ध-अषुद्ध अपन मन मानि जाए, तकरे सर्वांग सुन्दर काव्य मानि लिपिबद्ध कए ली, तथा व्याकरणादि ग्रन्थ पढ़बाक डरे ँअपन-अपन पारिवारिक वा ग्रामीण स्वर-प्रक्रियाक अनुव्रजन करैत अपनहि इच्छे साहित्यिक मैथिलीक स्तर निर्धारित कए ली, आदि दुराग्रह आइ-काल्हि मैथिली संसारमे संक्रामक रोग जकाँ पसरि रहल अछि। ककर कथा मानओ, के ककर पथ-प्रदर्शक बनथि’। 3 हमर विचारक तेसर बिन्दु भए सकैत छल, अनुवाद सिद्धान्तक प्रसंग किछु बाजब। मुदा, अनुवादक तीनू स्थिति - 1. सिद्धान्त ; (Theory), 2. अभ्यास ; (Practice), एवं. 3. मूल्यंाकन ; (Evaluation)के ँ ध्यानमे राखि बहुत नीक जकाँ कार्यक्रम निर्धारित अछि तथा अध्यापन कार्यमे निष्णात विद्वान सब अग्रिम सत्रासभमे विभिन्न विषयपर अपन-अपन विद्वतापूर्ण व्याख्यानक लेल आमन्त्रिात छथि। ओहि शास्त्राीय विषय पर हम किछु कहबाक साहस नहि कए सकैत छी। तथापि, ई कहब जे अनुवाद, आब एक भाषासँ दोसर भाषामे मात्रा उल्था करब नहि रहि गेल, एकरा शास्त्राीयता प्राप्त भए गेल छैक एवं अनुवादशास्त्राक अध्ययन-अध्यापन अनुवाद विज्ञानक ; ( Translatology)  रूपमे होअए लागल अछि। पहिने अनुवाद द्विकर्णी  (Binary) मानल जाइत छल, किन्तु आब बहुआयामी ; (Multidimensional) भए गेल अछि। पहिने एक शास्त्राीय छल आ’ किन्तु आब अनुवाद विज्ञानक बहुशास्त्राीयताक ; (Interdisciplinarity of Translatology)परिप्रेक्ष्यमे अनुवाद कार्य होइत अछि। पहिने स्रोत भाषा (Source Language) एवं लक्ष्य भाषाक ; (Target Language) जनतब आवश्यक छलैक, मुदा आब अनुवादकक लेल भाषाक संगहि संग, स्रोत संस्कृति (Source Culture)एवं लक्ष्य संस्कृतिक ; (Target Culture )जनतब सेहो आवश्यक मानल जाइत अछि। पहिने एक विषय, जेना समाजशास्त्र होइत छल, किन्तु आब अनुवादक एवं पाठक/स्रोताक बीचक सम्बन्धक लेल Sociology of Translation पर विचार होइत अछि। नॉलेज टेक्स्टक अनुवादसँ अनुवाद शास्त्रामे आओरो विस्तार आबि गेल अछि। आब अनुवादकार्यक स्वरूप, विषय एवं उद्देश्यक आधारपर निर्धारित होइत अछि। अनुवादकक लेल सर्वथा आवश्यक अछि जे हुनका स्रोतसंस्कृति एवं लक्ष्यसंस्कृतिक जनतबहि नहि हो, अपितु विषयक Comman Background Knowledge सेहो रहबाक चाहिअनि। अनुवाद विज्ञानक क्षेत्रामे बी. फॉलकार्टक प्रतिक्रमण (Reversibility) पर आधारित नवीनतम सिद्धान्त(1989) अछि ठंबा.ज्तंदेसंजपवद क सिद्धान्त। एहिमे स्रोतक अनुरूप चारि टा कोटि अछि - 1. गणितीय स्रोत ; ( mathematical text), एहिमे सबसँ बेसी प्रतिक्रमण सम्भव अछि, 2. तकनीकी स्रोत ; (technical text), 3. साधित स्रोत ; ( constrained text) तथा, 4. सामान्य एवं साहित्यिक स्रोत ; ( general and literary text)। नेशनल अनुवाद मिशनक जे लक्ष्य छैक, अनुवादकक लेल Comman Background Knowledge आवश्यक अछि। संगहि, लक्ष्यभाषामे बाजबे टाक अभ्यास पर्याप्त नहि अछि, मैथिलीमे लिखैत रहबाक अभ्यासक संग, मैथिलीक भाषागत विशेषताक ज्ञान सेहो चाहिअनि, तखनहि Sociology of Translation स्थापित भए सकत आ’ अनुवाद हास्यास्पद होएबासँ बंचि सकैछ। विषयक जनतबक अभावमे अनुवाद केहन भए जाइछ, तकर उदाहरण प्रस्तुत अछि। रिजर्व बैक द्वारा सूचीबद्ध वस्तुक आयातक लेल Blanket Permit देल जाइत छलैक आ’ आयातकक लेल आवश्यक नहि छलैक जे प्रत्येक खेपक समय ओ अनुमति प्राप्त करथि। एहि काजसँ अनभिज्ञ अनुवादक Blanket Permitक अनुवाद कंबल परमिट कए देलनि। ओहिना छपिके ँआएल विभिन्न प्रकार बॉण्डक हिसाब जाहि रजिस्टरमे राखल जाइत अछि, तकरा नाम थिक Skelton Register मुदा काजसँ अनभिज्ञ व्यक्ति अनुवाद कए देलनि कंकाल रजिस्टर। ओहिना स्रोत संस्कृति (Source Culture) एवं लक्ष्य संस्कृतिक ; (Target Culture )सँ अनजान अनुवादक की कए सकैत छथि, तकर उदाहरण प्रस्तुत अछि - 'The young daughter kissed her father and bade adieu.' एकर अनुवाद जँ मैथिलीमे कए देबैक ‘जुआन बेटी बापके ँचुम्मा लेलक तँ अनर्थे ने भए जाएत। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। योगानन्‍द झा, कबि‍लपुर, लहेरि‍यासराय, दरभंगा (बि‍हार) ग्रामजीवनक सत्‍यक संवाहक :: अर्द्धांगि‍नी श्री जगदीश प्रसाद मण्‍डल बहुआयामी रचनाकारक रूपमे मैथि‍ली जगतमे प्रसि‍द्ध छथि‍। कथा-कवि‍ता-नाटक-उपन्‍यासादि‍ वि‍धाकेँ ई अपन स्‍वर्णलेखनीसँ सजबैत रहलाह अछि‍। हि‍नक समस्‍त रचना हि‍नका मि‍थि‍ला-मैथि‍लक लोकजीवनक प्रत्‍यक्षदर्शी ओ व्‍याख्‍याताक रूपमे प्रस्‍तुत करैत रहलनि‍ अछि‍। लोकजीवनक यथार्थकेँ यथावत् चि‍त्रि‍त कए मानवीय संवेदनाकेँ उद्बुद्ध करब हि‍नक रचना सबहक प्रधान वि‍शष्‍टता रहलनि‍ अछि‍। प्रति‍भा, व्‍युत्‍पत्ति‍ ओ अभ्‍यास ऐ तीनू कारकसँ सम्‍बलि‍त हि‍नक रचनावलीमे मि‍थि‍ला-मैथि‍लक समस्‍या ओ तकर समाधानक दि‍शा भेटैत अछि‍। वर्त्तमान जीवनमे होइत नि‍त्‍य नूतन परि‍वर्त्तनक खण्‍ड चि‍त्रकेँ यथावत् प्रस्‍तुत करब हि‍नक कथाक वि‍षय-वस्‍तु रहलनि‍ अछि‍ जकरा ई सहज रीति‍यें प्रस्‍तुत करैत रहल छथि‍। मण्‍डलजीक कथा सभ मि‍थि‍लाक माटि‍-पानि‍क कथा थि‍क। हि‍नक कथा सभमे मि‍थि‍लाक ग्राम्‍य जीवनक आशा-नि‍राशा, सुख-दु:ख, हर्ष-उल्‍लास आ जीवन-संघर्षक व्‍याख्‍या भेटैत अछि‍। मि‍थि‍लाक सामाजि‍क-आर्थिक ओ राजनीति‍क जीवनमे होइत परि‍वर्त्तन सभकेँ सूक्ष्‍म मनोवैज्ञानि‍क वि‍श्लेषण द्वारा ई अपन कथा सभकेँ प्रवाहमयता, रोचकता ओ वि‍श्वसनीयताक संग प्रस्‍तुत करबामे सि‍द्धहस्‍त कलाकारक रूपमे प्रति‍ष्‍ठि‍त भेलाह अछि‍। हि‍नक कथासंग्रह अर्द्धांगि‍नी बीस गोट कथाक समुच्‍चय थि‍क। ऐ‍ कथा सभमे नोकरि‍हाराक जीवनक संत्रास, परि‍श्रमी कृषकक उल्‍लास, सांस्‍कृति‍क पावनि‍-ति‍हारमे पैसल अन्‍धवि‍श्वासक प्रति‍ जुगुप्‍सा, ग्राम्‍य जीवनमे जातीय व्‍यवसायक महत्‍व, क्रमश: टूटैत सम्‍बन्‍ध-बन्‍ध, सामाजि‍क जीवनक वि‍भि‍न्न समस्‍या आदि‍क सूक्ष्‍म वि‍श्लेषणपूर्वक लोकमंगलक कामना देखि‍ पड़ैत अछि‍। युगीन समस्‍या ओ समस्‍याक कारण एवं तकर समाधानक प्रति‍ चि‍न्‍तनशीलता हि‍नक वस्‍तु-वि‍न्‍यासकेँ प्रेरक-प्रभावकारी बनौने रहलनि‍ अछि जइमे परम्‍परि‍त कथाधाराक आदर्शोन्‍मुख यथार्थवादी दृष्‍टि‍कोण स्‍पष्‍ट रूपेँ प्रस्‍फुटि‍त देखि‍ पड़ैछ। मि‍थि‍लाक लोकजीवनक उत्‍थानक प्रति‍ सम्‍वेदनात्‍मक अभि‍व्‍यक्‍ति‍ कौशलक कारणे मण्‍डलजीक कथा सभ हि‍नका आधुनि‍क कथाकार लोकनि‍क अग्रि‍म पंक्‍ति‍‍मे ठाढ़ कऽ देलकनि‍ अछि‍। ऐ‍ संग्रहक पहि‍ल कथा थि‍क दोहरी मारि‍। ऐ कथामे पुरुष पात्र गुलाबक मनोवैज्ञानि‍क वि‍श्लेषण भेल अछि‍। अवकाश प्राप्‍त प्रोफेसर गुलाब कतोक वर्षसँ डाइबीटीज ओ ब्‍लड-प्रेसर सदृश बेमारी सभसँ ग्रसत्‍ छथि‍। गामक घर-घराड़ी पर्यन्‍त बेचि‍ शहरमे बनाओल मकानमे पति‍-पत्नी एकाकी रहैत छथि‍। बेटा-पुतोहु परदेशमे रहैत छन्‍हि‍ तँए हि‍नकालोकनि‍क सुधि‍ लेनि‍हार कि‍यो नै छन्‍हि‍। नागर जीवनक चाकचि‍क्‍यसँ सम्‍मोहि‍त भऽ ई शहरी जीवनमे बसि‍ तँ गेल छथि‍, मुदा चोरी-डकैती, लूट-पाट, अपहरण, गंदगी आदि‍ समस्‍यासँ ग्रस्‍त शहरी ग्राम्‍य  जीवनक सौहार्दपूर्ण वातावरणक प्रति‍ आकर्षण जगैत छन्‍हि‍। हद तँ तखन भऽ जाइत अछि‍ जखन पुत्र द्वारा ई समाद भेटैत छन्‍हि‍ जे पौत्रक मूड़न घरपर नै भऽ कऽ वैष्‍णो देवीमे होएतनि‍, जइ लेल हुनकोलोकनि‍केँ ओहीठाम एबाक आमंत्रण भेटैत छन्‍हि‍ आ ओ अपनाकेँ अशक्‍य बूझैत छथि‍। ऐ ‍ कथाक माध्‍यमे मण्‍डलजी साम्‍प्रति‍क जीवनमे उपकल वि‍स्‍थापनक समस्‍याक कारणे अवस्‍था दोषग्रस्‍त  बुजुर्ग पीढ़ीक व्‍यथाकेँ अभि‍व्‍यक्‍ति‍ प्रदान कएलनि‍ अछि‍। ऐ‍ समस्‍याक कारणे नोकरी-चाकरी भेला उत्तर लोक शहरमे बसि‍ ग्राम्‍यजीवनक सौहार्दसँ तँ वञ्चि‍त होइते छथि‍ संगहि‍ वृद्धावस्‍थामे जखन परि‍वारोक लोक हुनक संग छोड़ि‍ दैत छथि‍न तँ अपनाकेँ वंचि‍त अनुभव करए लगैत छथि‍। एही समस्‍याकेँ संग्रहक दोसर कथा “केना जीब” मे सेहो उठाओल गेल अछि‍। एकर पुरूष पात्र सेहो अवकाशप्राप्‍त प्रोफेसर छथि‍। ई बेटाकेँ पढ़ा-लि‍खा कऽ वि‍देश पठयबामे सफल तँ होइत छथि‍ मुदा बेटा वि‍देशी सभ्‍यता ओ संस्‍कृति‍क रंगमे रमि‍ जाइत छन्‍हि‍ आ हि‍नकालोकनि‍क खोजो-पुछारि‍ नै कऽ पबैत छन्‍हि‍। परि‍णामत: दुनू परानी एकाकी जीवन बि‍तएबाक हेतु बाध्‍य होइत छथि‍। एहन स्‍थि‍ति‍मे हि‍नकालोकनि‍क लग एकमात्र अवलम्‍ब बचि‍ जाइत छन्‍हि‍- जि‍जीवि‍षा ओ संघर्ष। यएह जि‍जीवि‍षा ओ संघर्ष करबाक मानसि‍कता ऐ‍ कथाक युग जीवनक अनुकूल संदेश थि‍क जे एकरा पूर्व कथासँ भि‍न्न आ स्‍तरीय बनबैत अछि‍। ऐ‍ कथाक वृद्ध दम्‍पत्ति‍ कखनो हताश आ नि‍राश नै देखि‍ पड़ैत छथि‍। संग्रहक तेसर कथा ग्राम्‍य जीवनक परि‍श्रमी कृषकक गाथा थि‍क जे अपन परि‍श्रमक बलेँ अपन भाग्‍यवि‍धाता बनल अछि‍। नवान शीर्षक ऐ‍ कथामे मि‍थि‍लाक लोक जीवनक वि‍भि‍न्न खण्‍डचि‍त्र उपस्‍थि‍त कएल गेल अछि‍ यथा वृक्ष-लतादि‍क पहि‍ल फड़ देवताकेँ चढ़ायब, गाए बि‍आएलापर महादेवकेँ दूधसँ अभि‍षेक करब आदि‍। ग्राम्‍य जीवनमे पसरैत जातीय ओ साम्‍प्रदायि‍क वि‍द्वेष दि‍स सेहो ऐमे संकेत कएल गेल अछि‍। मुदा ऐ कथामे मि‍थि‍लाक लोकजीवनक आर्थिक स्‍थि‍ति‍केँ बदहाल करएबला जइ समस्‍यापर वि‍शेष दृष्‍टि‍नि‍क्षेप कएल गेल अछि‍, से थि‍क बाढ़ि‍क समस्‍या। ऐ‍ समस्‍याक कारणे मि‍थि‍लाक ग्राम्‍य जीवनक आर्थिक व्‍यवस्‍था अस्‍त-व्‍यस्‍त  भऽ जाइत अछि‍। तथापि‍ ऐ‍ कथाक नायक आधुनि‍क वैज्ञानि‍क पद्धति‍ अपनाए नव कि‍स्‍मक धान उगबय लगैत अछि‍, तीमन-तरकारीक नगदी फसि‍ल उपजाबय लगैत अछि‍ आ नूतन नस्‍लक माल-जाल पोसि‍ अपन जीवनकेँ खुशहाल बना लैत अछि‍, वस्‍तुत: ऐ वैज्ञानि‍क पद्धति‍ द्वारा मि‍थि‍लाक कृषक जीवनक समुन्नति‍ भऽ सकैत अछि‍, से संदेश देब कथाकारक उद्देश्‍य छन्‍हि‍। संग्रहक चारि‍म कथा थि‍क “ति‍लासंक्रान्‍ति‍क लाइ” ऐ‍ कथामे ग्राम्‍यजीवनमे पसरल अन्‍धवि‍श्वासपर प्रहार कएल गेल अछि‍। ति‍लासंक्रान्‍ति‍क एकटा एहन पर्व थि‍क जे सोत्‍साह मि‍थि‍लाक घर-घरमे मनाओल जाइत अछि‍। ऐ‍ दि‍नसँ सूर्य उत्तरायण भऽ जाइत छथि‍ आ क्रमश: शीत ऋृतु वसन्‍त आ गृष्‍म दि‍स बढ़य लगैत अछि‍। मि‍थि‍लाक प्रशस्‍त भोजन चूड़ा-दही ऐ‍ दि‍न गरीबो-गुरबा धरि‍ खाइते अछि‍। चूड़ा ओ मुरहीक लाइ, ति‍लबा आदि‍ देवताकेँ चढ़ाय प्रासाद रूपेमे ग्रहण करब ऐ‍ पावनि‍क कृत्‍य होइत छैक। शीत ऋृतु रहलाक बादो मि‍थि‍लाक ग्राम्‍यजीवन ऐ‍ पर्वक ओरि‍आओनमे मास दि‍न पूर्वहि‍सँ लागि‍ जाइत अछि‍। मुदा ऐ‍ पर्वक प्रसाद ग्रहण करबाक हेतु प्रात: स्‍नान जरूरी बूझल जाइत छैक। मि‍थि‍लामे ई अपवाद सेहो पसरल छैक जे ऐ‍ दि‍न जे कि‍यो  भोरे नदी वा पोखरि‍मे डूब दैत छथि‍ हुनका नदी-देवता तत्‍काले लाइ धरा दैत छथि‍न। एही अपवादपर वि‍श्वास कऽ गोपाल नामक एकटा नेना बारहे बजे राति‍मे नदीमे डूब देबए चल जाइत अछि‍ आ ठंढसँ ग्रस्‍त  भऽ जाइत अछि‍। ग्राम्‍यजीवनक अन्‍धवि‍श्वासी समाजकेँ ऐ‍ कथाक माध्‍यमसँ ई संदेश देल गेल अछि‍ जे वस्‍तुत: ई पावनि‍ प्रकृति‍-परि‍वर्त्तनपर आधारि‍त अछि‍ आ ऐमे बि‍नु पाखंड कएने लोककेँ अपन सामर्थ्‍यक अनुसार समैपर स्‍नान करबाक चाही, नै कि‍ अन्‍धवि‍ष्वासमे पड़ि‍ रोगग्रस्‍त भऽ जएबाक चाही। हरड़ीवालीक उक्ति‍- “अहाँ जकाँ राति‍मे कुकुर घि‍सि‍यौने छलौं जे भोरे नहा कऽ पाक हएब” अन्‍धवि‍ष्वासक प्रति‍ बेस प्रहार कएलक अछि‍। कथामे ऐ‍ पावनि‍क तैयारीमे जुटल लोकजीवन अत्‍यन्‍त सुन्‍दर चि‍त्र भेटैत अछि‍। पाँचम कथा “भाइक सि‍नेह” भाइ-भैयारीक आपसी कलह ओ आर्त्‍यानक प्रेमक कथा थि‍क। शि‍ष्‍टदेव आ वि‍चारनाथ दुनू भँइ एक दोसराक प्रति‍ अगाध श्रद्धा, भक्‍ति ओ बन्‍धुत्‍वक भाव रखैत छथि‍ मुदा देयादि‍नी लोकनि‍क बीच खट-पटसँ परि‍वारमे भि‍न्न-भि‍नाउज भऽ जाइत छन्‍हि‍। भि‍न्न-भि‍नाउजक मूलमे अर्थसत्तापर कबजा रहैत अछि‍। मुदा जखन दुनूक मनमे परस्‍पर प्रेमक भाव जगैत छन्‍हि‍ तँ दुनू एकदोसराक दु:ख बँटबाक हेतु तत्पर भऽ जाइत छथि‍। ऐ‍ कथामे कृषक जीवनमे पारस्‍परि‍क सहयोग, सद्भाव ओ शक्‍ति‍क अनुकूल श्रमपर आधारि‍त संयुक्‍त परि‍वारक उपयोगि‍ताक परम्‍परि‍त अनुगायन देखि‍ पड़ैछ। संग्रहक छठम कथा “प्रेमी” वस्‍तुत: प्रेमकथाक रूपमे लि‍खल गेल अछि‍ मुदा ऐ‍ कथामे रचनाकारक उद्देश्‍य  समाजि‍क जीवनमे व्‍याप्‍त दहेज प्रथाक कुरीति‍केँ समाप्‍त करबाक संदेश सएह अभि‍व्‍यक्‍त भेल अछि‍। पक्षधर आ ज्ञानचन्‍द दू गामक छथि‍। दुनूमे प्रगाढ़ दोस्‍ती छन्‍हि‍। ज्ञानचन्‍दक पौत्र परीक्षा देबाक हेतु पक्षधरक गाम अबैत छथि‍न जतए परीक्षावधि‍ धरि‍ ज्ञानचन्‍दक पौत्र लोचन आ पक्षधरक पौत्री सुकन्‍याक बीच संवाद होइत छन्‍हि‍ आ दुनू परस्‍परानुरक्‍त भऽ जाइत छथि‍। लोचनकेँ वि‍दा करबाक क्रममे सुकन्‍या ओकरे संग ओकरा घर धरि‍ चलि‍ जाइत अछि‍ जे ओहि‍ गाममे गुलञ्जरक वस्‍तु भऽ जाइत छैक। वि‍जातीय रहलाक बादो पक्षधर आ ज्ञानचन्‍द पारस्‍परि‍क मैत्रीकेँ सम्‍बन्‍धमे बदलि‍ एकटा आदर्शक स्‍थापना करैत छथि‍। पक्षधरक उक्‍ति‍- “जइ समाजमे मनुक्‍खक खरीद-बि‍करी गाए-महींस, खेत-पथार जकाँ होइए ओइ समाजकेँ पञ्च तत्तवक बनल मनुक्‍ख कहल जा सकैत अछि‍? जँ से नै तँ हमर कि‍यो मालि‍क नै छी। कि‍यो अगुँरी देखाओत तँ ओकर अगुँरी काटि‍ लेबै।” मे दहेज प्रथाक समर्थक ओ प्रेम-वि‍वाह, वि‍जातीय वि‍वाहक अवरोधक तत्वपर प्रहार कएल गेलैक अछि‍। संग्रहक सातम कथा “बपौती सम्‍पत्ति‍” कृषक जीवनमे जातीय व्‍यवसायक महत्तवक अवधारणापर आधारि‍त अछि‍। सम्‍प्रति‍ कृषक-मजदूरक पलायनसँ जे गामक अर्थ-व्‍यवस्‍था चरमरा गेल अछि‍ तकरा सुधारबाक हेतु ऐ‍ कथामे चि‍न्‍तनक एकटा दि‍शा भेटैत अछि‍। कथानायक गुलटेन अपन पि‍ताक सि‍खाओल व्‍यवसायसँ नीक जकाँ परि‍वारक परि‍पालन करबामे सक्षम अछि‍। तँए कथाकारक उद्देश्‍य ग्राम्‍य स्‍वावलम्‍बनकेँ पुन: स्‍थापि‍त करबाक हेतु मार्गदर्शन करब बुझना जाइत अछि‍। आठम कथा “डंका” लोकजीवनक अवमूल्‍यनकेँ रेखांकि‍त करैत अछि‍। एकर मुख्‍य पात्र भैयाकाका गामक रक्षा करबाक संकल्‍प लऽ अपनो गाममे अखड़ाहाक प्रचलन शुरू करैत छथि‍ जइसँ पास-पड़ोसक गाम कि‍ंवा जमीन्‍दारक पहलमान हुनकालोकनि‍केँ अबल बूझि‍ प्रताड़ि‍त नै कऽ सकनि‍। ऐ‍ तरहेँ समस्‍त समाजक हि‍तकामनाक प्रति‍ हुनका व्‍यग्रता छन्‍हि‍ मुदा साम्‍प्रति‍क जीवनमे स्‍वार्थक प्रवेशसँ ओ ई जानि‍ वि‍चलि‍त भऽ जाइत छथि‍ जे आब गाम-घरक लोकक कल्‍याणक गप्‍प तँ दूर, लोक अपनो सर-सम्‍बन्‍धीक खोज-पुछारि‍ करबासँ कतरयबाक मूल्‍यरहि‍त संस्‍कार पालय लागल अछि‍। हि‍नक उक्‍ति‍- “माए-बाप, भाए-बहि‍न सबहक संबंध आ शि‍ष्‍टाचार ऐ रूपे नष्‍ट भऽ रहल अछि‍ जे साधनाभूमि‍केँ मरूभूमि‍ बनब अनि‍वार्य छै” मे समस्‍त  कथासार अभि‍व्‍यक्‍त भऽ जाइत अछि‍।‍ नवम कथा “संगी” शि‍क्षा जगतमे भेल अद्य:पतनक कथा थि‍क जइमे स्‍कूल-कओलेजमे शि‍क्षाक व्‍यवसायीकरणक फलस्‍वरूप सामान्‍य जनसँ छीनल जाइत शि‍क्षाक समस्‍यापर वि‍मर्श भेल अछि‍, जकर समाधानक हेतु दूटा संगी पारस्‍परि‍क परि‍णयपूर्वक क्रान्‍ति‍क शंखनाद करैत देखि‍ पड़ैत छथि‍। कथाक घटनाक्रम आकस्‍मि‍कताक दोषसँ ग्रस्‍त बुझना जाइछ, जे प्रभावान्‍वति‍केँ कमजोर करैत अछि‍। ठकहरबा पूर्णत: राजनीति‍क कथा थि‍क। ऐमे स्‍वातंत्र्योत्तर भारतमे पुलि‍स ओ नेतालोकनि‍क भ्रष्‍ट चरि‍त्र, मतदानमे गड़बड़ी आदि‍क चि‍त्रण करैत लोकजगतमे क्रमश: पसरैत भ्रष्‍टाचारक अति‍रेकक चि‍त्रण भेल अछि‍ जइसँ कोनो वस्‍तुक वि‍श्वासनीयतापर प्रश्नचि‍न्ह लागि‍ गेल अछि‍। ई कथा लोकतंत्रमे लोक आ तंत्र दुनूक स्‍खलनपर सोचबाक हेतु वि‍वश करैत अछि‍। “अतहतह”मे मि‍थि‍लाक वैवाहि‍क प्रथामे बरि‍याती पक्ष द्वारा सरि‍याती पक्षकेँ देखार करबाक हेतु खाद्य वस्‍तुपर जोर देबाक परि‍ष्‍कारक रूपमे सरि‍याती पक्ष द्वारा तकर बदला लेबाक कथा कहल गेल अछि‍। ऐ‍ कथामे बरि‍याती पक्षकेँ पानि‍क संग दवाइ पि‍आय ओकरा सभकेँ देखार करबाक प्रयास कएल गेल अछि‍ जे लोकसंस्‍कृति‍क प्रति‍कूल होएबाक कारणे प्रतीयमान नै भऽ सकल अछि‍। अवश्‍ये ऐमे वर पक्षमे शराब पीबि‍ कऽ बरि‍याती जएबाक आधुनि‍क प्रचलनक वि‍रुद्ध आक्रोशक अभव्‍यक्‍ति‍ भेल अछि‍। मण्‍डलजीक ई कथा कन्‍यादान-वरदानमे दुहू पक्षक सम्‍मान रक्षाक पारस्‍परि‍क दायि‍त्‍वक प्रति‍ कान्‍तासम्मि‍त उपदेश दैत अछि‍। बारहम कथा “अर्द्धांगि‍नी” ऐ‍ पोथीक नामकरणक आधार बनल अछि‍। ऐ‍ कथामे अवकाशप्राप्‍त शि‍क्षकक अत्‍यन्‍त  सूक्ष्‍म मनोवि‍श्लेषण भेल अछि‍। अपन कमाइक बलें ओ आजीवन अपन पत्नीक दासीसँ आगू बुझबाक हेतु तैयार नै होइत छथि‍ मुदा जखन नोकरी समाप्‍त भऽ जाइत छन्‍हि‍ तखन पत्नीक आवयकतापर धि‍यान जाइत छन्‍हि‍ आ अर्द्धांगि‍नीक महत्तव बूझि‍ पबैत छथि‍। लेखक नारीक सेवि‍का स्‍वरूपकेँ मर्यादि‍त कए ओकरा पुरुषक समानान्‍तर मूल्‍य प्रदान करबाक पक्षपाती छथि‍, जकर अभि‍व्‍यक्‍ति‍ ऐ‍ कथाक लक्ष्‍य बुझना जाइत अछि‍। तेरहम कथा थि‍क “ऑपरेशन” ऐ‍ कथामे मइटुग्गर नेनाक सामाजि‍क स्‍थि‍ति‍पर वि‍मर्श कएल गेल अछि‍। जखन कोनो नेनाक माय असमए कालकवलि‍त भऽ जाइत छैक, तँ समाज ओकरा अलच्‍छ कऽ कऽ बूझय लगैत छैक आ ककरो ओकर शारीरि‍क ओ मानसि‍क वकासक चि‍न्‍ता नै रहैत छैक। मुदा जँ ओहि‍ बच्‍चाक पि‍ता दोसर वि‍वाह कऽ ओकर प्रति‍पालनक हेतु, स्‍थानापन्न माताक व्‍यवस्‍था करैत छथि‍ तँ वएह समाज बेर-बेर ई जनबाक प्रयास करैत अछि‍ जे सतमाय ओकर पालन नीक जकाँ कऽ रहल छैक वा नै। समाजक ई व्‍यवहार ओकर क्रूर मानसि‍कताक परि‍चय दैत अछि‍ जइसँ नेना आ ओकर पि‍ता आहत होएबाक लेल बाध्‍य होइत छथि‍। लेखक समाजक ऐ‍ वि‍रूपि‍त मानसि‍कतापर व्‍यंग्‍य करब ऐ‍ कथाक उद्देश्‍य रखलनि‍ अछि‍। एही माध्‍यमसँ अस्‍पतालक दुर्व्‍यवस्‍था तथा प्राइवेट प्रैक्‍टि‍सक कारणपर सेहो वि‍मर्श कएल गेल अछि‍। चौदहम कथा “धर्मनाथ” ढहैत जमींदार परि‍वारक गाथा थि‍क। ऐ‍मे दहेज प्रथाक उन्‍मूलनक हेतु सामाजि‍क जागरण कथाकारक उद्देश्‍य बुझना जाइत अछि‍। एकर नायक धर्मनाथ जमीन्‍दार परि‍वारक छथि‍ आ पि‍ताक अमलदारीमे धरि‍ हुनक परि‍वार देहेजक संतोषक रहल अछि‍ आ खेत बेचि‍-बेचि‍ कन्‍यादान करैत अपन कुलाभि‍मानक रक्षा करैत रहल अछि‍। मुदा ई मि‍थ्‍याभि‍मान जमीन्‍दारी उन्‍मूलनसँ क्षत-वि‍क्षत भऽ गेल छैक आ धर्मनाथ ऐ‍ स्‍थि‍ति‍मे नै रहि‍ पबैत छथि‍ जे पुत्रीक वि‍वाह जमीन्‍दारे परि‍वारमे करबाक हेतु धन जुटा पाबथि‍। अन्‍तत: ओ प्रो. रामरतन सन दहेजवि‍रोधी व्‍यक्‍ति‍क सहायतासँ एकटा कर्मयोगी बालकसँ अपन बेटीक वि‍वाह ठीक कऽ लैत छथि‍ आ मि‍थ्‍या प्रति‍ष्‍ठाकेँ चुनौती दैत छथि‍। परि‍णामत: हुनक पि‍ता अपन कुलाभि‍मानपर प्रहार होइत देखि‍ मृत्‍युकेँ प्रात्र कऽ लैत छथि‍। धि‍या-पुताक थपड़ी बजा-बजा ई कहब जे- “बाबा मुइलाह- पूरी-जि‍लेबीक भोज खायब..” वस्‍तुत: परम्‍परा आ अन्‍धवि‍श्वासँ जकड़ल सामाजि‍क व्‍यवस्‍थाक वि‍नाशक प्रति‍ उत्‍सव थि‍क जे दहेज प्रथाक उन्‍मूलनकेँ सकेति‍त करैत ई ईंगि‍त करैत अछि‍ जे जँ लोक मि‍थ्‍याभि‍मानक त्‍याग नै करताह आ दहेज देब-लेबकेँ सामाजि‍क प्रति‍ष्‍ठाक मानदंड बनौने रहताह तँ अद्य: पतन अवश्‍यम्‍भावी अछि‍। “सरोजि‍नी” प्रेमवि‍वाहपर आधारि‍त कथा थि‍क। नायि‍का सरोजि‍नी जमीन्‍दार घरक कन्‍या छथि‍। हि‍नक भाय हृदयनारायण बि‍लैति‍न कन्‍यासँ प्रेमवि‍वाह कऽ लेने छथि‍न। इहो अपन बालसखा रमेशक संग वि‍वाह कऽ लैत छथि‍। रमेश हि‍नके नोकर घूरनक शि‍क्षि‍त पुत्र छथि‍। आर्थिक ओ सामाजि‍क दुनू स्‍तरपर असमान लोकक वि‍जातीय वि‍वाहक समर्थनक ई आधार जे “अपन मालि‍क हम स्‍वयं छी। अखन धरि‍ जाति‍क पहाड़ जे अपना समाजमे बनल अछि‍, ओकरा मेटाएब। जे समाज भूखलकेँ ने पेट भरैत अछि‍, ने नाङटकेँ वस्‍त्र दैत अछि‍, ने बेघरकेँ घरे। एतए धरि‍ जे मूर्खकेँ पढ़ा नै सकैत अछि‍, लूटैत इज्‍जतकेँ बचा नै सकैत अछि‍, ओहि‍ समाजकेँ वि‍रोध करबाक कोन अधि‍कार?” उपदेशात्‍मक ओ असहज तथा सि‍ने जगतक वस्‍तु जकाँ असहजतासँ प्रभावि‍त बुझना जाइत अछि‍। तथापि‍ कथाकार जातीय व्‍यवस्‍थापर आधारि‍त वैवाहि‍क पद्धति‍केँ गुण ओ प्रेमपर आधारि‍त करबाक समर्थन कऽ ऐ‍ प्रथामे युगानुरूप परि‍वर्त्तनक आकांक्षी बुझना जाइत छथि‍। वि‍श्रृंखलि‍त होइत वैवाहि‍क व्‍यवस्‍थाक प्रति‍ समाजक ध्‍यान आकृष्‍ट करब ऐ‍ कथाक उद्देश्‍य बुझना जाइत अछि‍। संग्रहक सोलहम कथा सुभद्रा वि‍धवा वि‍वाहक समस्‍यापर आधारि‍त अछि‍। दैवयोगसँ सुभद्राक पति‍क देहान्‍त  हवाइ दुर्घटनासँ भऽ जाइत छन्‍हि‍। ओ अभि‍शप्‍त जीवन बि‍तएबाक हेतु बाध्‍य भऽ जाइत छथि‍। एकर कारण ई अछि‍ जे ओ जइ‍ जाति‍सँ अबैत छथि‍ तइमे वि‍धबा वि‍वाहकेँ मान्‍यता नै छैक। कथाकार रूपलाल बाबा नामक एक गोट गाँधीवादी चरि‍त्रक अवतारणा करैत छथि‍ जे नारी समुत्‍थानक प्रति‍ समर्पित छथि‍। हि‍नक मान्‍यता छन्‍हि‍ जे जहि‍ना पत्नीक मुइला उत्तर पति‍केँ दोसर वि‍वाह करबाक अधि‍कार छैक तहि‍ना पति‍क मुइला उत्तर पत्नीयोकेँ दोसर वि‍वाहक अधि‍कार भेटबाक चाही। रूपलाल बाबा सुभद्राक पि‍ताकेँ मानाय सुशील नामक युवकसँ ओकर वि‍वाह सम्‍पन्न करबैत छथि‍। ऐ तरहेँ समाजमे वि‍धवाकेँ मान्‍यता भेटैत छैक। आदर्शवादी संकल्‍पनापर आधारि‍त ई कथा वस्‍तुत: ऐ सामाजिक समस्‍याक प्रति‍ कथाकारक प्रगति‍वादी मूल्‍यकेँ उद्घाटि‍त करैत अछि‍। “सोनमा काका” ऐ संग्रहक सतरहम कथा थि‍क। ई कथा मानव धर्मपर आधारि‍त अछि‍। एकर प्रधान पात्र सोनमा काका स्‍वयं पत्नीक बीमारीसँ त्रस्‍त छथि‍। ओकर इलाज करा जखन गाम घूमैत छथि‍ तँ रामकि‍सुन नामक एकटा बि‍गड़ैल व्‍यक्‍ति‍क मृत्‍युक समाचार भेटैत छन्‍हि‍। ओ व्‍यसनक चक्रमे पड़ि‍ ततेक ि‍नर्धन भऽ गेल छल जे ओकरा कफनो धरि‍क उपाय नै छलैक। सोनमा काका समाजक सहायतासँ ओकर संस्‍कार करबैत छथि‍ आ ओकर अनाथ बालककेँ अपन बेटीक संग वि‍वाह कराय ओकर जीवनकेँ सामान्‍य बनेबाक प्रयत्न करैत छथि‍। कथाकार ऐ आदर्श पुरूषक स्‍थापना कए ई सि‍द्ध’ करए चाहैत छथि‍ जे जँ समाज चाहय तँ केहनो पैघ समस्‍याक नि‍दान भऽ सकैत छैक। अठारहम कथा “दोती बि‍याह” परि‍त्‍यक्‍ताक पुनर्विवाहपर आधारि‍त अछि‍। एकर प्रमुख पुरुष पात्र उमाकान्‍त  छथि‍ जे पचास वर्षक आयुमे पत्नीक देहावसानक कारणे एकाकी जीवन जीबाक हेतु बाध्‍य छथि‍। जीवन संगि‍नीक अभावमे हि‍नक दि‍न काटब पहाड़ भऽ गेल छन्‍हि‍। दोसर दि‍स यशोदि‍या नामक एकटा युवती छथि‍ जनि‍क पति‍ दि‍ल्‍लीमे नोकरी करैत छलथि‍न मुदा शहरी चाकचि‍क्‍यमे पड़ि‍ यशोदि‍याकेँ परि‍त्‍यक्‍त कऽ कतहु पड़ा जाइत छथि‍। नि‍स्‍सहाय यशोदि‍या गाम घूरि‍ अबैत अछि‍ आ हरि‍नारायण नामक एक गोट सम्‍भ्रान्‍त व्‍यक्‍ति‍क आश्रममे रहि‍ जीवन-यापन करए लगैत अछि‍। हरि‍नारायण उमाकान्‍तक स्‍थि‍ति‍केँ परखि‍ हुनका यशोदि‍या संग वि‍वाह करा दैत छथि‍न जइसँ दुनूकेँ अवलम्‍ब भेटैत छन्‍हि‍ आ दूटा उजड़ल परि‍वार बसि‍ पबैत अछि‍। ऐ कथाक माध्‍यमे कथाकारक ई उद्देश्‍य स्‍पष्‍ट होइत छन्‍हि‍ जे मानव जीवनकेँ सन्‍तुलि‍त रखबाक हेतु पति‍-पत्नीमे कि‍यो जँ एकाकी जीवन जीबैत अछि‍, तँ ओ अनेक प्रकारक मानसि‍क व्‍यथामे पड़ल रहैत अछि‍ जकर ि‍नदानक हेतु समतूल युगल बनयबाक हेतु प्रयत्न होएबाक चाही। उनैसम कथा “पड़ाइन” ग्राम्‍य जीवने पसरल अराजकताक कथा थि‍क जकरा कारणे बलगर लोक ि‍नर्बलकेँ सता कऽ ओकरा गामसँ उपटयबापर लागल रहैत अछि‍। ऐ कथाक पात्र चेथरू महाजनी अत्‍याचार, खेत-पथारमे बेइमानी-शैतानी, चाेरि‍, बलपूर्वक दोसरक जताति‍ नष्‍ट करब आ माय-बहि‍नि‍क इज्‍जतक संग खेलवाड़ करब आदि‍सँ त्रस्‍त भऽ गाम छोड़ि‍ दैत अछि‍ आ नेपाल जा कऽ बसि‍ जाइत अछि‍। ओतय परि‍श्रमपूर्वक अर्जित धनसँ सम्‍पत्ति‍शाली बनि‍ नीक जकाँ गुजर करऽ लगैत अछि‍। ऐ कथामे कथाकारक उद्देश्‍य ग्राम जीवनक कि‍छु समस्‍या सभकेँ इंगि‍त करब बुझना जाइत अछि‍ मुदा आधुनि‍क परि‍प्रेक्ष्‍यमे ऐमे स्‍वाभावि‍कताक अभाव बुझना जाइत अछि‍। “कतौ ने” कथा संग्रहक अन्‍ति‍म कथा थि‍क जे वस्‍तुत: यात्रा-वृत्तान्‍त थि‍क। ऐमे जनकपुर यात्राक वर्णन आएल अछि‍। गामक एकटा टोली जनकपुरमे वि‍वाह पंचमीक मेला देखबाक हेतु प्रस्‍थान करैत अछि‍ मुदा वि‍वाह पंचमी दि‍न ई लोकनि‍ धनुषा दर्शन करबाक हेतु जाइत छथि‍ आ ओतए गाड़ी खराब भऽ जएबाक कारणे वि‍वाह पंचमीक राति‍मे पुन: जनकपुर घुमि‍ नै पबैत छथि‍ जइसँ हुनकालोकनि‍केँ जनकपुरक कार्यक्रम देखबाक अवसर नै भेटि‍ पबैत छन्‍हि‍। अन्‍तत: हारि‍-थाकि‍ कऽ सभ सोचैत छथि‍ जे कत्त एलौं तँ कत्तौ ने। दुर्योगवशात् मनोरथपूर्त्तिमे बाधा होएबाक ऐ कथामे वस्‍तुत: जनकपुर यात्राक एक गोट मनोरम वृत्तान्‍त भेटैत अछि‍। ऐ तरहेँ अर्द्धांगि‍नी कथा संग्रह मि‍थि‍लाक ग्राम्‍य जीवनक वि‍भि‍न्न आयाम ओ समस्‍या तथा तकर समाधान सबहक आदर्शोन्‍मुख यथार्थवादी व्‍याख्‍या थि‍क। ऐ संग्रहक कथा सभ वर्णन-प्रधान देखि‍ पड़ैत अछि‍। कथाकारक शैली एहन छन्‍हि‍ जे ओ कोनो घटनाकेँ प्रस्‍तुत करबासँ पूर्व ओकर पूर्ववीठि‍काकेँ ततेक सघन कऽ दैत छथि‍ जे पाठक तइमे तल्‍लीन भऽ जाइत छथि‍। ऐ प्रकारक वर्णन-वि‍न्‍यास हि‍नक औपन्‍यासि‍क वृत्ति‍केँ स्‍पष्‍ट करैत अछि‍ जइमे वर्णनक हेतु पयाप्‍त अवसर रहैत छैक। मनोवि‍श्लेषण मण्‍डलजीक कथा सबहक अन्‍यतम वि‍शि‍ष्‍टता थि‍कनि‍। ई जइ कोनो पात्रकेँ प्रस्‍तुत करैत छथि‍ तकर अन्‍तस्‍तलमे प्रेवेश कए ओकर भावराशि‍केँ अभि‍व्‍यक्‍त कऽ दैत छथि‍ जइसँ पात्रक चरि‍त्र स्‍वत: स्‍फुट होमय लगैत अछि‍। उदाहरणार्थ “बपौती सम्‍पत्ति‍” कथामे गुलटेनक मानसि‍क स्‍थि‍ति‍केँ अभि‍व्‍यक्‍त करैत ई पाँती द्रष्‍टव्‍य अछि‍- “मनमे उठलै पुरने कपड़ा जकाँ परि‍वारो होइए। जहि‍ना पुरना कपड़ाकेँ एकठाम फाटल सीने दोसरठाम मसकि‍ जाइत अछि‍, तहि‍ना परि‍वारोक काजक अछि‍। एकटा पुराउ दोसर आबि‍ जाएत। मुदा चि‍न्‍ता आगू मुँहेँ नै ससरि‍ रुकि‍ गेलै। चि‍न्‍ताक अॅटकि‍ते मनमे खुशी भेलै। अपनापर ग्‍लानि‍ भेलै जे जइ धरतीपर बसल परि‍वारमे जन्‍म लेबाक सेहन्‍ता देवी-देवताकेँ होइत छन्‍हि‍ ओकरा हम मायाजाल कि‍अए बुझैत छी। ई दुनि‍याँ ककरा लेल छै? ककरो कहने दुनि‍याँ असत्‍य भऽ जाएत। ई दुनि‍याँ उपयोग करैक छैक नै कि‍ उपभोग करैक।” मण्‍डलजी कथाक भाषामे मैथि‍लीक गमैया बोली-वाणीक सहज स्‍वरूप अभि‍व्‍यक्‍त भेल अछि‍। ई पात्रानुरूप भाषाक प्रयोग कएलनि‍ अछि‍ जइसँ प्रत्‍येक पात्रक बौद्धि‍क ओ सामाजि‍क स्‍थि‍ति‍ स्‍पष्‍ट होइत चल जाइत अछि‍। हि‍नक कथा सभमे कथाकारक भाषा सेहो मैथि‍लीक लोकजगतक भाषाहि‍क अनुगमन करैत अछि‍ जइमे सहजता अछि‍। कनेको कृत्रि‍म प्रयोगसँ ई बचैत रहल छथि‍। हि‍नक भाषामे तद्भव ओ देशज शब्‍दक प्रचुर प्रयोग भेल अछि‍। युग्‍म शब्‍दक प्रयोग हि‍नक भाषाकेँ लालि‍त्‍य प्रदान करबामे आ ओकर प्रवाहमयतामे सहायक रहलनि‍ अछि‍। उदाहरणक हेतु माल-जाल, लेब-देब, दोकान-दौरी, चट्टी-बट्टी, ताड़ी-दारू, छहर-महर, चोरी-डकैती, बाल-बोध, बेटा-पुतोहु, भोज-काज, अन्‍हर-बि‍हाड़ि‍, दार-मदार, सुक-पाक, भुखल-दुखल, चीज-बौस, घुसका-फुसका आदि‍केँ देखल जा सकैछ। मण्‍डलजी कथा भाषाक ई अन्‍यतम वि‍शि‍ष्‍टता थि‍क जे ई कोनो स्‍थि‍ति‍केँ पाठकक समक्ष अभि‍व्‍यक्‍त करबाक हेतु चमत्‍कारि‍क उपमानक प्रयोग करैत छथि‍ जइसँ वस्‍तुस्‍थि‍ति‍क स्‍पष्‍ट चि‍त्र पाठकक सोझाँ आबि‍ जाइत अछि‍ यथा-  “जहि‍ना खढ़ाएल खेतमे हरबाहकेँ हर जोतब भरि‍गर बूझि‍ पड़ैत छैक तहि‍ना सुशीलक मन समस्‍याक बोनाएल रूप देखलक। जहि‍ना पहाड़सँ नि‍कलि‍ अनवरत गति‍सँ चलि‍ नदी समुद्रमे जाय मि‍लैत अछि‍ तहि‍ना ने टटघरक ज्ञान उड़ि‍ कऽ सर्वोच्‍च ज्ञानक समुद्रमे मि‍लत।” आदि‍। एतावता कहल जा सकैछ जे मण्‍डलजीक कथा वर्णनक दृष्‍टि‍ञे मि‍थि‍लाक ग्रामजीवनक यथार्थवादी चि‍त्र, घटनाक दृष्‍टि‍ञे आदर्शक प्रति‍ अभि‍भूत, सूक्ष्‍म मनोवि‍श्लेषणक प्रति‍ प्रति‍बद्ध तथा उद्देश्‍यक दृष्‍टि‍ञे लोक मंगलकारी अछि‍। मैथि‍लीक आधुनि‍क कथा लेखन हि‍नक रचना सभसँ सम्‍बलि‍त भेल अछि‍ आ एकर समाजोपयोगी तत्व सभ अनन्‍त काल धरि‍ मि‍थि‍लाक लोकजीवनकेँ प्रेरि‍त-प्रभावि‍त करैत रहत। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। शि‍वकुमार झा ‘टि‍ल्‍लू’ मैथि‍ली कथा साहि‍त्‍यक वि‍कासमे राजकमलक योगदान :: सन् 1954 मे “अपराजि‍ता” कथाक संग राजकमल जीक मैथि‍ली कथा साहि‍त्‍य जगतमे प्रवेश भेल। हि‍नक मूल नाओं मनीन्‍द्र नारायण चौधरी छन्‍हि‍। 1929मे जनमल ऐ साहि‍त्‍यकारक लेखनीसँ मैथि‍ली साहि‍त्‍यकेँ लगभग 36 गोट कथा भेटल। मात्र 38 बरखक अपन जीवनकालमे राजकमल मैैथि‍ली गद्य साहि‍त्‍यकेँ कि‍छु एहेन कृति‍ दऽ देलनि‍ जइसँ प्रयोगकेँ बादक धरातलपर प्रति‍ष्‍ठि‍त करबाक श्रेय साहि‍त्‍यक समालोचक लोकनि‍ ऐ साहि‍त्‍यकारकेँ ि‍नर्विवाद रूपेँ दऽ रहल छथि‍‍। हि‍नक तीन गोट कथा संग्रह ललका पाग, एक आन्‍हर एक रोगाह आ “ि‍नमोही बालम हम्‍मर” पुस्‍तकाकार प्रकाशि‍त छन्‍हि‍। एकर अति‍रि‍क्‍त हि‍नक एक गोट पोथी “कृति‍ राजकमलक” मैथि‍ली अकादेमीसँ प्रकाशि‍त भेल अछि‍ जइमे 13 गोट कथा आ एकटा उपन्‍यास आन्‍दोलन संकलि‍त अछि‍। ओना कृति‍राजकमलक छओ गोट कथा “ललका पाग”मे सेहो छपल अछि‍। रमानाथ झाक मतेँ राजकमलक कथा मूल उद्देश्‍य मनोवि‍श्लेषणत्‍मक प्रणालीसँ आरोपि‍त मर्यादा ओ आदर्शक पाछाँ नुकाएल आन्‍हरकेँ नाङट करब अछि‍। डॉ. डी.एन. झा सेहो ऐ मतसँ सहमत छथि‍। “ललका पाग” कथा हि‍नक लि‍खल कथा सभमे अपन वि‍शि‍ष्‍ट स्‍थान रखैत छन्‍हि‍। ऐ कथाकेँ मैथि‍ली साहि‍त्‍यक कि‍छु श्रेष्‍ठ कथामे स्‍थान देब सर्वथा न्‍यायोचि‍त अछि‍। कथाक आरंभमे मैथि‍ली स्‍त्रीक चि‍न्‍हबाक वि‍श्‍लेषणमे कोनो अचरज नै। त्रि‍पुराक तुलना जइ वर्गक मैथि‍ली नारि‍सँ कएल गेल कथाक भूमि‍कामे ओइ वर्गक स्‍पष्‍ट उल्‍लेख तँ नै कएल गेल मुदा ओ ब्राह्मण परि‍वारक कन्‍या छथि‍। अल्‍पायुमे पण्‍डि‍त पि‍ताक मृत्‍युक पश्चात् ति‍रू अपन माइक संग गाममे रहैत छलीह। अग्रज झि‍ंगुरनाथ बाहर धन उपार्जन लेल चलि‍ गेलाह। कि‍छुए वर्षमे ति‍रू युवती वयसमे प्रवेश कऽ गेलीह। दस-एगारह वर्षक बाद जखन झि‍ंगुरनाथ अपन गाम घुरि‍ अएलनि‍ तँ मातृसि‍नेहक संग-संग ति‍रूक हाथ पीअर करबाक जि‍म्‍मेदारीक आभास भेलनि‍। वास्‍तवि‍कतो छैक जे जखन ई कथा 1955मे वि‍देह वि‍शेषांकमे देल गेल ओइ कालकेँ के कहए वर्तमान समैमे सेहो अपना सबहक समाजमे कन्‍याक जन्‍म कालहि‍सँ बि‍याहक चि‍न्‍ता अभि‍भावककेँ सतबए लगैत छन्‍हि‍। ति‍रू तँ माघमे 14मे वर्षमे प्रवेश कऽ जेतीह। उद्देश्‍य जौं सार्थक हुअए तँ सफलता नि‍श्चि‍त भेटबे करैत अछि‍। चण्‍डीपुरक राम सागर चौधरीक सुपुत्र राधाकान्‍तसँ स्‍व. पण्‍डि‍त हेकनाथ झाक पुत्री त्रि‍पुराक बि‍याह सम्‍पन्न भेल। सासुर आबि‍ ति‍रू कनेको स्‍तब्‍ध नै छथि‍ कि‍एक तँ जीवन शैलीक कोनो ज्ञाने नै छन्‍हि‍। अज्ञानतामे बाड़ीक पछुआरमे पोखरि‍ देखि‍ अपन बेमात्र सासुसँ हेलबाक कलाक जि‍ज्ञासा कएलनि‍। यएह जि‍ज्ञासा हुनक जीवनक लेल काल भऽ गेलनि‍। चननपुरवाली सासु भोरे-भोर समस्‍त गाममे अफवाह पसारि‍ देलखि‍न जे राति‍मे नवकी कनि‍याँ पोखरि‍मे चुभकि‍ रहल छलीह। राधाकान्‍त ऐ घटनासँ मर्माहि‍त भऽ गेलाह। आब प्रश्‍न उठैत अछि‍ जे चननपुरवाली एना कि‍अए कएलीह? ओ अपन पि‍ति‍औत भाय डाॅ. शंभूनाथ मि‍सरक सुपत्रीसँ राधाकान्‍तक बि‍याह करबए चाहैत छलीह। ऐठाम कथाकार कनेक चुकि‍ गेल छथि‍। ऐ उद्देश्‍यकेँ कतौ स्‍पष्‍ट नै कएल गेल। माए जौं अपन बेटाक बि‍याह कोनोठाम करबए चाहैत छलीह तँ त्रि‍पुरासँ कोना भऽ गेलनि‍। जखन की चननपुरवाली परि‍वारक अभि‍भावि‍का छलखि‍न। हुनक पति‍क हुनकापर कोनो वि‍शेष अनुशासन सेहो नै छलनि‍ आ ने राधाकान्‍त त्रि‍पुरासँ प्रेम बि‍याह केलखि‍न तँ कथानकमे एहेन परि‍वर्त्तनकेँ सोझे-सोझ आत्‍मसात् करब कनेक कठि‍न लागि‍ रहल अछि‍। गाममे तँ कूटनीति‍ चलि‍ते अछि‍ कि‍एक तँ छद्म रोजी रोजगारपर बेरोजगारी भारी। तँए भोलामास्‍टर आ बंगट चौधरी सन परि‍वार वि‍ध्‍वंसक केँ राधाकान्‍त सन संवेदनशील लोककेँ दोसर बि‍याह करबाक प्रेरणा देबएमे यथार्थ बोध होइत अछि‍। ई सभ घटना चक्रसँ कथा रोचक होइत अछि‍। मुदा कथाकेँ आकर्षक बनेबाक क्रममे राजकमल बि‍सरि‍ गेलाह जे त्रि‍पुरा मात्र 13-14 वर्षक बालि‍का छथि‍। जखन पोखरि‍मे चुभकबाक जि‍ज्ञासा सासुरोमे छन्‍हि‍ तखन सौति‍न अएबाक संभावनाक मध्‍य अपन सकल गृहस्‍थ कार्यमे कोना लागल रहलीह? एक दि‍स चंचल रूपक उद्बोधन आ दोसरा रूपमे परि‍पक्‍व नारी, एकरा प्रयोगवाद तँ कहल जा सकैत अछि‍ मुदा प्रयोगात्‍मक रूपसँ वास्‍तवि‍कतासँ बहुत दूर। राधाकान्‍त सेहो शि‍क्षि‍त छथि‍, मात्र अपन स्‍त्रीकेँ पोखरि‍मे स्‍नान करबाक सजाक रूपेँ दोसर बि‍याह। ओना मि‍थि‍लामे पहि‍ने गप्‍पे-गप्‍पमे बि‍याह करबाक इति‍हास रहल अछि‍ परंच ऐ प्रकारक बि‍याहक कारण समीचीन नै लागल। अंतमे अपन बि‍याह कालक राखल ललका पाग जखन त्रि‍पुरा राधाकान्‍तकेँ दोसर बि‍याहक लेल प्रस्‍थानकालमे दैत छथि‍न तँ राधाकान्‍तक हृदए परि‍वर्तन भऽ जाइत अछि‍ आ पहि‍लुक ललका पागक मर्यादा रखबाक लेल ओ चुप्‍प भऽ आंगनमे आबि‍ कुर्सीपर बैस जाइत छथि‍। एहू घटनकाक्रममे कथा वास्‍तवि‍कतासँ बेसी कल्‍पवृक्षक पुष्‍प प्रतीत होइत अछि‍। जे राधाकान्‍त मात्र पोखरि‍ स्‍नानक दंडमे त्रि‍पुरासँ नारीक अधि‍कार छीनि‍ लेबाक ि‍नर्णए केलनि‍ ओ अंगुलि‍माल जकाँ क्षणहि‍मे कोना बदलि‍ गेलाह। ई ध्रुव सत्‍य अछि‍ जे मैथि‍ल ब्राह्मण परि‍वारमे ललका पागक स्‍थान वि‍शेष छैक आ ओइ पागकेँ सहेजि‍ कऽ त्रि‍पुरा धएने छलीह। भगवत परीक्षा जकाँ सौति‍न अनबाक लेल पति‍क हाथमे पाग देबाक ि‍नर्णएमे अंगुलि‍माल रूपी राधाकान्‍तकेँ बुद्धसँ दर्शन भेलनि‍। जौं एकरा संभवो मानल जाए तैयो कनेक कमी ई जे राधाकान्‍त त्रि‍पुराक तुलनामे कामाख्‍या दाइक संस्‍कारकेँ सोचि‍-वि‍चारि‍ वि‍शि‍ष्‍ट मानि‍ दोसर बि‍याह करबाक ि‍नर्णए कएलनि‍। कोनो क्षणहि‍मे नै। ऐ बि‍याहक सूत्रधार हुनक बेमात्र माए छलथि‍न। चननपुरवालीकेँ अछैत राधाकान्‍त माथपर बि‍नु पाग धएने कोना वि‍दा भऽ रहल छलाह, ई तँ सद्य: कथाक बहुत कमजोर पक्ष अछि‍। भाषा वि‍ज्ञानक आधारपर जौं मूल्‍यांकन कएल जाए तँ कथाकार परम्‍परावादी मैथि‍ल साहि‍त्‍यकार जकाँ गद्यकेँ अधोषि‍त श्रृंगारक रूप देबाक प्रयास कएलनि‍। ति‍रूक तुलना वाण भट्टक श्‍यामांगी नायि‍कासँ करए काल ई उद्देश्‍य स्‍पष्‍ट भऽ जाइत अछि‍। मुदा जखन लि‍खैत छथि‍ जे “मि‍थि‍लाक छौड़ी सभ अहि‍ना करैत अछि‍।” तँ स्‍पष्‍ट भऽ जाइत छन्‍हि‍ आत्‍मि‍क रूपसँ कि‍छु आर कहए चाहैत छथि‍। ऐठाम छौड़ीक स्‍थानपर ‘कन्‍या‘ शब्‍दक प्रयोग सेहो कएल जा सकैत छल जे बेसी नीक लगि‍तए। कामाख्‍या दाइक वि‍षयमे राधाकान्‍तक मौन सि‍नेहमे मि‍आ आ आ जाऽ....... लि‍खबाक उद्देश्‍य स्‍पष्‍ट नै भऽ सकल। ई सत्‍य अछि‍ जे राजकमल मैथि‍लीक संग-संग हि‍न्‍दीमे सेहो लि‍खैत छलाह, मुदा हि‍न्‍दीक प्रति‍ झॉपल सि‍नेह मैथि‍ली कथामे परि‍लक्षि‍त भऽ गेल‍। ई मैथि‍ली साहि‍त्‍यक लेल दुर्भाग्‍यक गप्‍प जे ऐ भाषाकेँ दुभाषी रचनाकार मात्र अपन नाओं-गाओंक लेल हथि‍यार बनेलनि‍ मातृभाषा सि‍नेहसँ साहि‍त्‍यि‍क रचनाक कोनो संबंध नै। ओना ऐ प्रकारक कथ्‍य यात्री आ आरसीक रचनामे नै भेटैत अछि‍। कथोपकथनमे वि‍रोधाभास देखलाक बादो एकरा नीक रचना मानल जा सकैछ कि‍एक तँ कथा बड्ड आकर्षक छन्‍हि‍। जौं बि‍म्‍बक वि‍श्लेषणकेँ शि‍ल्‍पक रूपमे देखल जाए तँ राजकमलजी स्‍थापि‍त शि‍ल्‍पी छथि‍ ई ललका पाग प्रकट भऽ गेल। क्रमश: ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com  पर पठाउ। ३. पद्य ३.१.१.कामिनी कामायनी२.रुबी झा ३.२.१.ओमप्रकाश झा-रुबाइ/ गजल/ गीत-कविता ३.३.१.राजदेव मण्‍डल २. अमित मिश्र- गजल -कविता ३.जगदानंद झा 'मनु' कविता –सभसँ आगु आगु छी ३.४.१.संदीप कुमार साफी- भकजोगनी/ बसंत पंचमी२.डा. अरूण कुमार सिंह ३.रामवि‍लास साहु ४.उमेश पासवान ३.५.१.जगदीश प्रसाद मण्‍डल२.चंदन कुमार झा ३.नन्‍द वि‍लास राय ३.६.१.नारायण झा २.निशान्त झा ३.७.१.प्रीति‍ प्रि‍या झा २.पवन कुमार साह ३.डॉ॰ शशिधर कुमर ३.८.१.रमेश मण्‍डलसोनू कुमार झा ‘रश्मि’३.किशन कारीगर ४.कपि‍लेश्वर राउत १.कामिनी कामायनी२.रुबी झा १ कामिनी कामायनी फागुन राग फागुन मे रास रचाऊ सखी फागुन मे. .।। 2. . पीयरी पहिरने खेत मे देखियौ. . . नाचि रहल अछि जौवन. . . . सिनुरिया सन दहकि रहल अछि. . . चारूकात वन उपवन .. . . गरमाहट सॅ भरल ई सूरज .. . आब नै मूॅह नुकाबै. . . जोर जोर सॅ चलैत वसंती. . . सेहो डहकन गाबै. . . . मन उमकि रहल बेजोड़ . . चाहै सीमा तोडि लै फागुन मे. . . . .. .।।2 असगर कोना रहब फाग मे हिय हम्मर नहि मानै. . गाछ बिरीछ सब मुसिक रहल अछि कि सोचै कि जानै. . . . आस बढा क’ पॉती लिख लिख़. . पठबैत हम प्रियजन के. . . मग मे बैसल बिहुॅसि उठैत छी. . दीप जरा नैनन के. . . . हम्मर आंगन स्नेहक धाम बनल फागुन मे .. . .।।2 गठजोरि खेलु फाग सखी फागुन मे. . . . ई पूआ . . . ई मालपूआ. . . . ई दहीबडा. . . .मूॅगबा .. .इमरती .. . पहिने खेलू फाग पोख भरि पेट मे तखने ससरती. . . . बिन पीने . . मदिरा भॉग . .बौरैलौ फागुन मे. . . .. बलजोरि खेलूॅ फाग सखी फागुन मे. . . . .।।2

२ रुबी झा १ निर्मोही निर्मोही संग जोरल प्रेम क कहानी , सानै छी नोरसँ प्रेमक पिहानी , मौधमे बोरि-बोरि कहै छलाह . ... तखन केहन ओ प्रेमक बयना , केने सराबोर छथि ओतबे ,, नोरसँ हमर दुनु नयना , हाथमे हाथ दऽ बझबै, कोना ओ प्रेमक परिभाषा . हज़ार खंड केलाह आइ ओ , हमर मोनक सभ आशा , मोन मे आश छल काटब, हुनका संगे जिनगानी, किछु दितौं किछु लितौं , हम हुनका प्रेमक निशानी , हुनक स्वभाव रसिक भ्रमर , केर होइ अछि तहिना , रस पिबथि चंपा चमेली , खन गुलाब पर तहिना , जुनी कहिओ करब बिस्बास , पुरुख प्रेम पर यै सहेली , कहिओ नै सुलहए उलझल रहए सदिखन ई अछि पहेली पूरुखक , प्रेम जेना कागजक नैया , भिजय तँ गोबर सुखय तँ रूइया

२ ओढ़नी लाल ओढ़नी लाल चुनर के , लिपटि लिपटि कऽ अहाँसँ, हम्मर प्यासल नयनकेँ, सदिखन हँसबैत राखैत छल , कखनो उड़ए ओ झकोर हवा संग , कखनो समेटी जाइ बाँहिमे , कखनो कान्हा पर ब्याकुल भय , ससरैत खसकैत रहैत छल , हुनक कानमे जा कऽ कखनो किछु छातीसँ कखनो सटि जाइत छल , हुनक धरकन केँ गिनि गिनि कऽ , ओ उठैत बजरैत रहैत छल , कखनो हुनकर कमरबंद बनि , कखनो गालकेँ छुबैत छल , कखनो पीठ पर जा कऽ बेशरम , ससरैत ढलकैत रहैत छल , कखनो तँ देखू ई जाजिम बनि कऽ , कखनो कोरामे सूति जाइत छल  , कखनो  हुनकर हाथकेँ ऐ दुलारे , सदिखन हमरा सतबैत  छल , एकरा माथ पर नै रखु अहां , अहांक ओढ़नी अछि हम्मर दुश्मन , हमरा अहांक बीच आबि कऽ सदिखन , किएक ई बेशरम रहैत छल , ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। ओमप्रकाश झा रुबाइ/ गजल/ गीत-कविता रुबाइ कोना कऽ रंगलक करेज केँ इ रंगरेज, रंग छूटै नै। नैन पियासल छोडि गेल, मुदा आस मिलनक टूटै नै। हमरा छोडि तडपैत पिया अपने जा बसला मोरंग, बूझथि विरहक नै मोल, भाग्य इ ककरो एना फूटै नै। गजल किछ हमर मोन आइ बस कहऽ चाहै ए। अहींक बनि कऽ सदिखन तँ इ रहऽ चाहै ए। इ लाली ठोरक तँ अछि जानलेवा यै, अछि इ धार रसगर, संग बहऽ चाहै ए। अहाँ काजर लगा कऽ अन्हार केने छी, बरखत सिनेह घन कखन दहऽ चाहै ए। अहाँ फेंकू नहि इ मारूक सन मुस्की, बिना मोल हमर करेज ढहऽ चाहै ए। बिन अहाँ "ओम"क सुखो छै दुख बरोबरि, सब दुख अहाँक इ करेज सहऽ चाहै ए। (बहरे-हजज) गजल बाहरक शत्रु हारि गेल मुदा मोन एखनहुँ कारी अछि। नांगरि नहि कटा कऽ मुडी कटबै कऽ हमर बेमारी अछि।

तेल सँ पोसने सींग रखै छी व्यर्थ कोना हम होबय देबै, खुट्टा अपन गाडब ओतै जतऽ सभक सँझिया बाडी अछि।

पेट भरल अछि तैं खूब भेजा चलै ए, नै तऽ हम थोथ छी, ढोलक कियो बजाबै, मस्त भेल बाजैत हमर थारी अछि।

जीतबा लेल ढेरी रण बाँचल, एखन कहाँ निचेन हम, केहनो इ व्यूह होय, टूटबे करतै जँ पूरा तैयारी अछि।

डाह-घृणा केँ अहाँ कात करू, इ अस्त्र शस्त्र नै कमजोरी छै, आउ सब ओहिठाम जतय रहै "ओम" प्रेम-पुजारी अछि। सरल वार्णिक बहर वर्ण २२ गजल हमर मुस्कीक तर झाँपल करेजक दर्द देखलक नहि इ जमाना। सिनेहक चोट मारूक छल पीडा जकर बूझलक नहि इ जमाना। हमर हालत पर कहाँ नोर खसबैक फुरसति ककरो रहल कखनो, कहैत रहल अहाँ छी बेसम्हार, मुदा सम्हारलक नहि इ जमाना। करैत रहल उघार प्रेमक इ दर्द भरल करेज हमरा सगरो, हमर घावक तँ चुटकी लैत रहल, कखनहुँ झाँपलक नहि इ जमाना। मरूभूमि दुनिया लागैत रहल, सिनेहक बिला गेल धार कतौ, करेज तँ माँगलक दू ठोप टा प्रेमक, किछ सुनलक नहि इ जमाना। कियो "ओम"क सिनेहक बूझतै कहियो सनेस पता कहाँ इ चलै, करेजक हमर टुकडी छींटल, मुदा देखि जोडलक नहि इ जमाना। (बहरे-हजज) गजल कहैए राति सुनि लिअ सजन, आइ अहाँ तँ जेबाक जिद जूनि करू। इ दुनियाक डर फन्दा बनल, इ बहाना बनेबाक जिद जूनि करू। अहाँ बिन सून पडल भवन बलम, रूसल किया हमरा सँ हमर मदन, अहाँ नै यौ मुरूत बनि कऽ रहू, हमरा हरेबाक जिद जूनि करू। इ चानक पसरल इजोत नस-नस मे ढुकल, मोनक नेह छै जागल, सिनेह सँ सींचल हमर नयन कहल, अहाँ कनेबाक जिद जूनि करू। अहाँ प्रेम हमर जुग-जुग सँ बनल, हम खोलि कहब अहाँ सँ कहिया धरि, अहाँ संकेत बूझू, सदिखन इ गप केँ कहेबाक जिद जूनि करू। कहै छै मोन "ओम"क पाँति भरल प्रेम सँ, सुनि अहाँ चुप किया छी, इ नोत कते हम पठैब, उनटा गंगा बहेबाक जिद जूनि करू। (बहरे-हजज) मनुक्ख (कविता) जिनगीक कैनभस पर, अपन कर्मक कूची सँ, चित्र बनेबा मे अपस्याँत मनुक्ख, भरिसक आइयो अपन हेबाक अर्थ खोजि रहल अछि। हजारो-लाखो बरख सँ, बहैत इ जिनगीक धार, कतेक बिडरो केँ छाती मे नुकेने, भरिसक आइयो अपन सृजनक अर्थ खोजि रहल अछि। राजतन्त्र सँ प्रजातन्त्र धरि, ऊँच-नीचक गहीर खाधि, सुरसाक मुँह जकाँ बढले अछि, भरिसक आइयो इ तन्त्र सभक अर्थ खोजि रहल अछि। कखनो करेजक बरियारी, कखनो मोनक राज सहैत, बढले जाइ छै मनुक्खक जिनगी, भरिसक आइयो मोन आ करेजक अर्थ खोजि रहल अछि। शिवरात्रिक अवसर पर एकटा प्रस्तुति- गौरी रहि-रहि देखथि बाट, कखन एता भोलेनाथ। आंगन मे मैना कानि रहल छथि, मुनि नारद केँ कोसि रहल छथि। ताकि अनलाह केहन बर बौराह, गौराक जिनगी भेल आब तबाह। मैना पीटै छथि अपन माथ, कखन एता.................... भूत-बेतालक लागल अछि मेला, प्रेत पिशाचक अछि ठेलम ठेला। पूडी पकवान कियो नै तकै छै, सब भाँग धथूरक खोज करै छै। कियो नंगटे, कियो ओढने टाट, कखन एता................... कोना कऽ गौरी अपन सासुर बसतीह, विषधर साँप सँ कोना कऽ बचतीह। पिताक घरक छलीह जे बनल रानी, कोना लगेतीह आब ओ बडदक सानी। आब तऽ किछ नै रहलै हाथ, कखन एता..................... गौरीक मोनक आस आइ पूरा हएत, बर बनि अयलाह शम्भू त्रिभुवन नाथ। जगज्जननी माँ गौरी शंकर छथि स्वामी, जग उद्धारक शिव छथि अन्तर्यामी। फेरियो हमरो माथ पर हाथ, कखन एता....................... "ओम" बुझाबै, सुनू हे मैना महारानी, इ छथि जगतक स्वामी औढरदानी। भोला नाथक छथि नाथ कहाबथि, सबहक ओ बिगडल काज बनाबथि। शिव छथि एहि सृष्टि केर नाथ, कखन एता................... ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। १.राजदेव मण्‍डल २. अमित मिश्र- गजल -कविता ३.जगदानंद झा 'मनु' कविता –सभसँ आगु आगु छी १ राजदेव मण्‍डल कवि‍ता- कामना अपन-अपन कामना सबहक पास धरतीसँ पसरल अकास बढ़ले जा रहल मासे मास होइते बाधा दुखक आस आस ि‍नरास तैयो आस- जि‍नगीक पाश नि‍बुधि‍या पोता फानि‍ कऽ बजल- “यौ, बाबा आबि‍ गेल फागुन मास।” “हँ रौ बौआ रौदा भऽ गेल आब हएत जाड़सँ उबरास परसाल कहाँ भेल छल जाड़ ऐबेरक जाड़ तँ देहकेँ कऽ देलक तार-तार घुरमे जरि‍ गेल सभटा लार-पुआर लगै छल नै बँचत जान लीलसासँ भरल छल खान दुनू बेटा भऽ गेल जुआन हमरो बढ़ि‍ गेल सामाजि‍क शान पलि‍बारक भार उठौलक कान्‍ह आब नि‍चेन भेल हमरो जान टहलब, बुलब कि‍छु करब दान गाबि‍ सकब सुखसँ भक्‍ति‍ गान।” “यौ बाबा नै करू लाथ हमरा कहू एकटा बात झगड़ा केलक बाबूसँ काका माँगैत रहै तीन हजार टका कहै छलै- तोहर नै ठीक‍ रहलौ ईमान भऽ गेलह पूरा बेइमान बाबू अछि‍ सभ झगड़ाक जड़ि‍ सनकेलकौ तोरा जि‍नगी भरि‍ ऐ जाड़मे करतौ ओ परलोक बास बाँटि‍ लेबो सभ चास-बास अपन-अपन चास, अपन-अपन बास देखि‍हेँ सि‍नेमा खेलि‍हेँ तास अपना सम्‍पति‍केँ करि‍हेँ नाश बाबा ठीके करबै परलोकबास बीतल जा रहल जाड़क मास।” घुमए लगलै माथक चाक बाबा भेल अवाक्। २ अमित मिश्र १ गजल आइ एला पिया गाम ल' कंगना दाइ गै , सून भेल छलै काल्हि जे अंगना दाइ गै ,

नीन नै होइ छै यादि ओ आबि गेला यदी , आइ एला पिया छोड़ि क' पटना दाइ गै ,

आलु कोबी कए राख भेलै भुजीया सखी , जानलौँ आबि गेला पुरा {जगह कए नाम} पहुना दाइ गै ,

बाजलै पायल दोगलौ ओलती मे नुका , लाज लागै छलै होयते सामना दाइ गै ,

नीक साड़ी चुनरी बुटीदार चोली छलै , भीजलै मोन होली सँ , प्रेमो घना दाइ गै . . . । । २ ‎गजल राति मे हुनकर इयादि आबैए बेसी . राति मे बाट जोहैत आँखि जागैए बेसी ,

कतबो प्रकृतिक कोरा मे रहब मुदा , खण्डहर सिनेहक नीक लागैए बेसी ,

माँ कए चिन्ता जेना संतान लेल होइ छै . खून नै रग-रग सँ चिन्ता दौगैए बेसी ,

गामक टुटल टाट दोग सँ देखैत ओ , पहिलुक मिलनक बात दागैए बेसी ,

कोना-कोना कोहबर सँ कलकत्ता एलौँ , रूकबो नै करै फिल्म जेकाँ भागैए बेसी ,

विरहक वेदना झुलसा देलक आत्मा , घुरो सँ "अमित" करेज सुनगैए बेसी . . . । । ३ कविता मच्छर

मच्छर बड़ करेजगर होइ छै जानक बजी लगा सब कए क चुमै छै हमर घर में रहै छै हमरे खून चुसै छै अनमन घुसखोर कर्मचारी जेकाँ कान लग आबि भैरवी में सुन्नर गीत सुनबै छै अनमन चुनावक समय नेता जी जेकाँ मनुक्ख कए सचेत होइ सन पाहिले  पड़ा जाइ छै अनमन ठग ,चोर ,पाकेटमार जेकाँ जहिना सगरो भ्रष्टाचार पसरल अछि ओहिना मच्छरों भ्रष्टाचार करै छै एक्के आदमी कए बेर-बेर चुसै छै अनमन मिलाबटी  सामान बेच वाला बनिया जेकाँ मच्छरक जनसंख्याँ दिन-व-दिन बढ़त अनमन बेरोजगारी,गरीबी,आ दहेज़ जेकाँ किछु उपाय करू इ काटबे  करत

अनमन आतंकवादी ,महगाई जेकाँ एकरा सँ छुटकारा कोना भेटत , चिंता कए विषय अछि अनमन बेटी कए वियाह जेकाँ हे मच्छर सन नीक देवता ,अपना में कते गुण समेटने छि आइ सँ ''अमित '' अहाँक चेला बनल अनमन कोनो पार्टी कए चमचा जेकाँ  ||

कविता- आधुनिक बैण्ड

काल्हि छलौँ सुतल मचान पर , तखने किछु बड्ड जोर सँ बाजलै , लड़खड़ा क' खसलौँ दलान पर , झट पुछलौँ बड़का बेटा सँ , कहलक भुटकुनमा के विआह छै . ओही ठाम बैण्ड बाजए छै , बैण्ड ! आश्चर्य सँ खुजल रही गेल आँखि , बैण्ड एहन होई छै . हमरा जमाना मे होइ छलै  एकटा ठेला . मधुरगर शहनाई के स्वर , ढोलक थाप . झाइलक झंकार , आ गीक गाबैत गबैया , मुदा आब , चारि{4} चकिया धुआँ उड़ाबैत ट्रक , ताही पर 10-20 टा ध्वनी विस्तारक यंत्र , तेज धुन , अश्लिल बोल , दारू पि नाचैत छौड़ा छौड़ी , ई पहचान अछि आधुनिक बैण्ड कए , फाटी जाइ ककरो कानक पर्दा , पैड़ जाइ दिल के दौड़ा , भ' जाइ ब्रेन हैमरेज , त' कोनो जुलुम नइ , ई बैण्डक धुन सुनि क' खुशी वा डर सँ जानवरो नाच' लागै छै , सच मे जमाना बदलि गेलै यै , . . । । ३ जगदानन्द झा 'मनु' गजल-१ कहलन्हि ओ  मंदीर मे, नहि पिबू एतए शराब कोनठाम घर हुनक  नहि, पिबू जतए  शराब इ नहि अछि खराप, बदनाम एकरा केने अछि ओ की बुझत, भेटलै नहि जेकरा कतए  शराब मरलाबादो हम नहि पियासल जाएब स्वर्ग  मे जाएब जतए  सदिखन भेटए ओतए  शराब मारा-मारि भs रहल अछि जाति-पातिक नाम पर मेल देखक हुए तs देखू भेटए जतए  शराब सब गोटे कए निमंत्रण सस्नेह मनु दैत अछि आबि जाए-जाउ सबमिल पियब एतए  शराब ------------------------------------------------------ गजल-२ टूटल करेज राखब नहि हम एखन सिखने छी किछु अपने एकडा तोरलौं किछु भागक लिखने छी जिनका लुटेलहुँ हम अपन स्नेह भरल करेज हुनका सँ दूर होबाक, माहुर अपने सँ चीखने छी सोचने त छलहुँ एक दिन जीबन मे होयत रंग ओहि रंग भरल दुनियाँ सँ कतेक दूर एखने छी दोसर सँ करू की शिकाति जँ अपने नहि बुझलक जिनका केलौं नेह करेज तोरैत हुनका देखने छी ------------------------------------------------------------- गजल-३ केहन-केहन दुनियाँ, केहन-केहन रंग एकर कियो हँसैए कियो कनैए,कियो झुमैए संग एकर कियो मरैए दुधक द्वारे,कियो भाँग मे डुबल अछि बुझि नहि पएलहुँ आइतक कनिको ढंग एकर लक्ष्मीके देखलौं पथैत चिपड़ी,कुबेड चराबे पारी गंगा-यमुना पानि भरैत,की हमहुँ छी अंग एकर भोट मांगे पोहला-पोहला कs,गदहो के बाप बना कs जितैत देखु गिरगिट जेकाँ बदलैत रंग एकर 'मनु' छल कारिझाम चिन्हार बनोलन्हि अनचिन्हार घरी-घरी मे बदलैत देखु आब तs उमंग एकर - - - - - - - - - - - -वर्ण-२०  - - - - - - - - - - - ------------------------------------------------- गजल-४ दर्द करेजक देखाएब तs अहाँ  जानब की हमर बात कनी सपनो मे अहाँ  मानब की अहाँ कहलौं पुरुषक प्रेम गोबर आ रुई करेज चीरो कs देखायब तs अहाँ कानब की दोख एकेटा मे होई छैक सबमे कत्तौ नहि सबके संग हमरो अहाँ ओहि मे सानब की अहाँ कहैत छी सबठाम अन्हारे-अन्हारे छै इजोरियाके आँखि मुनि अन्हरिया मानब की एक बेर हमरो पर भरोसा कय कs देखु प्रेम केकरा कहैत छैक 'मनु' सँ जानब की --------------------------------------------- गजल-५ जरि-जरि झाम बनलहुँ हम सोना नहि बनि पएलहुँ हम कतेक अभागल हमर भाग अपन सोभाग हरेलहुँ हम अपन जीबन अपने लेलहुँ किएक लगन लगेलहुँ हम सुगँधा अहाँ के विरह मे देखु की की जरलाहा बनलहुँ हम अहाँ विरह के माहुर पिबैत मरनासन आब भेलहुँ हम जतेक हमर मनोरथ छल संगे सारा मे ल अनलहुँ हम मातल प्रेमक जडित आगि मे खकसिआह मनु भेलहुँ हम ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। १.संदीप कुमार साफी २.डा. अरूण कुमार सिंह ३.रामवि‍लास साहु ४.उमेश पासवान १ संदीप कुमार साफी, जन्म ७ जून १९८४ पिता श्री सीताराम साफी, माता- श्रीमती सीता देवी, गाम- मेंहथ, भाया- झंझारपुर, जिला- मधुबनी। शिक्षा- बी.ए. (प्रतिष्ठा), मैथिली। १ भकजोगनी भुकुर-भुकुर बत्ती बड़ै राइतक अन्हरियामे हाथ-हाथ नै सुझैए जेबाक अछि टोलपर कुक्कुर भुकैए झाउ-झाउ-झाउ साँझक बजैए छअ हाथमे नै अछि लाठी-ठेंगा नरहिया करैए सोर मैइझला बाबा गबैए निर्गुण तमाकुलपर मारै चोट बौआ कनैए भगजोगनी लए बड़ैए चाहूँ ओर पकड़ रोउ, भुल्ला, होकवा ठहा- ठहैइ अन्हरियामे लुत्ती नेने माथपर नारक आँटी थरथराइ छी हम पछुआरमे २ बसंत पंचमी सरस्वती पूजा सभ साल जेना हरेक सालमे आबैए विद्यार्थी सभ हर्ष उमंगसँ माता लग शीस झुकाबैए माघ मासक शुक्ल पक्षमे ई सुन्दर पबइन आबैए हरियर-हरियर तीसी-मौसरी सरिसौ कऽ फूल फुलाइए जोर-जोरसँ पछबा हबा धऽ कऽ गर्दा उड़ाबैए देखियौ आम आ देखियौ महुवा सभ मिल सुगन्ध सुंगहाबैए गछमे हरियर नवका पत्ता रौदामे चमक देखाबैए नहू-नहू बहए पुरबा हाबा होलीक गीत सुनाबैए धिया-पुता सभ बैठ आइरपर गहुम गोइढलाक ओरहा पकाबैए बसन्त पंचमी सभ लोककेँ अपनामे मिलाबैए २ डा. अरूण कुमार सिंह भारतीय भाषा संस्थान, मैसूर भारतीय भाषाक हम बेटी मैथिली हम बेटी तँ छी माय, अहिंक मुदा अष्टम अनुसूचिमे पहुँचि विकासक बाट जौहेत विस्तारक लेल छटपटाइत हम बेटी तँ छी परंच अहाँक प्रतीक्षाक केन्द्रबिन्दु नहि अहाँक सांस पर माय लिखल अछि कोनो आन नाम नहि दए सकैत छी हम अहाँकेँ आगियो धरि जन्मेसँ हक-वंचित एहिना, माय जखन नाम बनिकए भारतीय भाषा बनि जाइत छी तखनो एकटा प्रश्न नक्शा पर उभड़िये अबैछ हम के छी? अहाँक महीमा गीतमे अपन चर्चोसँ महरूम हमर नामक आगू ‘श्री’ लागो वा ‘मरहूम’ हम धनी रही वा गरीब अहाँकेँ की नहि जीत छी अहाँक नहि अहाँक हार छी हम जरैत दियाक पातर अन्हार छी अहाँ भारतीय भाषा छी माय हम मैथिली छी माय, हम मैथिली छी! ३ रामवि‍लास साहु कवि‍ता- आएल वसन्‍त आएल वसन्‍त भागल जाड़ फूलसँ सजल धरती दुलहि‍न समान फूलक सुगन्‍ध चढ़ए आसमान आम मजरल महुआ पसरल भौंरा करए गुणगान सेरसौं बाजए शहनाइ समान वसन्‍त रंगमे रंगाएल सभ एक समान ढोल, मजीरा, ढाक, डफली बजबैत गबैत फागुनक गान रंग अबि‍रमे नहाएल समान भेद-भाव मि‍ट गेल सभ लगैए एक्के समान आमक गाछपर कोइली बजैत सभकेँ दैत प्रेमक वरदान धरती बनल स्‍वर्ग समान आएल वसंत भागल जाड़। ४ उमेश पासवान कवि‍ता- बान्‍ह एक्के बेर टुटल बड़का बान्‍ह गाम-घर बनि‍ गेल कोसी ओ बलान तब मनमे सोचलौं हे भगवान केना बचतै लोकक जान मत्‍थाहाथ लैत सभ अछि‍ कानैत कतएसँ आनब मरूआ धान भुखसँ नि‍कलैए प्राण नेता मोछ टेरैत खाइए पान देखू केना लोकतंत्रकेँ कए रहल अछि‍ अपमान। अपने-सँ-अपने कहि‍-कहि‍ मि‍थि‍लाक वि‍भूति‍ कए रहल अछि‍ प्रति‍ष्‍ठाकेँ बन्‍दरबॉट। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। १.जगदीश प्रसाद मण्‍डल२.चंदन कुमार झा ३.नन्‍द वि‍लास राय जगदीश प्रसाद मण्‍डल- चारि‍टा गीत गीत- 1 बि‍सरि‍ गेल मन तोरा हे वहि‍ना बि‍सरि‍ गेल मन तोरा जहि‍ना गाछक फूल झड़ै छइ झाड़ि‍-झाड़ि‍ खसलह तोरा हे वहि‍ना, बि‍सरि‍ गेल मन तोरा। रहि‍-रहि‍ सुमारक अबै छइ देखैले हृदए तड़सै छइ मारि‍-सम्‍हारि‍ गबै छह तोरा हे वहि‍ना, बि‍सरि‍ गेल मन तोरा। खोद-बेद सदि‍ करैत रहै छह तोरा-पाछू घुमैत रहै छह लपकि‍-झपकि पाबए चाहै छह झपटि‍ पकड़ि‍ वॉहि‍ तोरा हे वहि‍ना, बि‍सरि‍ गेल मन तोरा कोसी-कमला दूर भगौलक नैहर-सासुर सेहो बि‍सरौलक। हहरि‍-हहरि‍ हृदए सहटि‍ छाती सटबए चाहैए तोरा हे वहि‍ना, बि‍सरि‍ गेल मन तोरा। गीत- 2 छप्‍पर कि‍अए कुचड़ै छह हे कौआ छप्‍पर कि‍अए बैसल छह। लग-आबि‍ समाद सुनाबह नैहराक सोखरि‍ सुनाबह भैया-भौजीक हाल-चाल संग गाम-समाजक सेहो सुनाबह। छप्‍पर कि‍अए बैसल छह हे कौआ छप्‍पर कि‍अए कुचड़ै छह। दादी-दरदक हाल सुनाबह बाबूक बात बि‍सरि‍हह नै रेखि‍या-सुगि‍या पढ़ै छइ कि‍ नै माइयक मन बि‍सरि‍हक नै छप्‍पर कि‍अए कुचड़ै छह हे कौआ छप्‍पर कि‍अए बैसल छह। गीत- 3 गामसँ कि‍अए डरै छी भाय यौ, गामसँ कि‍अए डरै छी। सदि‍काल गामक चर्च करै छी राति‍-दि‍न प्रशंसो करै छी। तखन कि‍अए भगै छी भाय यौ, गामसँ कि‍अए डरै छी। बाप-पुरुखाक पुरुषार्थ गाबि‍-गाबि‍ छाती-तानि‍ हामी भरै छी नानी-दादीक खि‍स्‍सा-पि‍हानी सुना-सुना मोहै छी भाय यौ, गामसँ कि‍अए डरै छी। जइ मातृभूमि‍ ममतासँ हृदए गंग बहबै छी गामे-गाम पसरल छइ मि‍थि‍ला गामेसँ कि‍अए मुरुछल छी, भाय यौ, गामसँ कि‍अए डरै छी। गीत- 4 आबो कने वि‍चारू भाय यौ, आबो कने वि‍चारू। भूखे भगलौं, सभ जनैए दुखे भगलौं, सभ जनैए। भरल पेट वि‍चारू, भाय यौ..... जहि‍या जे भेल, से तहिया भेल भूत गेल, भूतकालो गेल। वर्त्तमानक कथा-बेथा संग वि‍चारू, आबो भवि‍ष्‍यक लेल। वि‍चारू आबो भवि‍ष्‍यक लेल भाय यौ.... कमा-खटा कऽ दुख मेटेलौं भूख-पि‍यास सेहो, भगेलौं। जरल मन भरि‍ पोख भरलौं आबो कने वि‍चारू, भाय यौ आबो..... आधा दर्जन कवि‍ता- प्रि‍य- 1 उठि‍ते वेदना उधि‍आए लगए जब रच-वि‍चड़ी हुअए लगै छइ। कर्ण-प्रि‍य, प्रि‍य वाणी वीणा रूप माधुर्य सि‍रजए लगै छइ। दूर-दूर जंगल पसरल पसरल छइ ग्रह-नक्षत्र सागर तरेगन छि‍ड़ि‍आ-बि‍ति‍आ सजबए रूप पठार-पहाड़। धरती ऊपर शून्‍य बसल छइ नाओं धरौने अपन अकास। चुसि‍ रस माटि‍-पानि‍क संग चलैए रौद-वसात। नै छइ ओर-छोड़ अकासक एक छोड़ धरती धेने छइ। लपेटि‍-लपेटि‍ लपेटा डोर वि‍धाता गुड्डी उड़बै छइ। बनि‍ वि‍धकरी वि‍धाता सि‍रजन शक्‍ति‍ जगबै छइ। कर्मभूमि‍, जन्‍मभूमि‍ ओ मर्मभूमि‍ कला-जीवन सि‍खबै छइ। सुगबा-साड़ी पहीरि‍ देखि‍ कि‍यो गुणधाम रूप बुझए लगै छइ हंस चालि‍ पकड़ि‍-पकड़ि‍ वाहि‍नी हंस कहबए लगै छइ। चलि‍ चालि‍ हंसवाहि‍नीक सुरधाम नचबए लगै छइ सजि‍ केश सुकेसि‍नी गढ़ि‍ रूपवती कहबए लगै छइ। गुणवती रूपवती बनि‍-बनि‍ गुणधाम बि‍सरए लगै छइ। गुण पकड़ि‍ जखन सुकेसि‍नी धार जमुना ि‍सरजए लगै छइ। कारी रंग पकड़ि‍-पकड़ि‍ सि‍रसि‍राइत सि‍र सजबए गलै छइ। शुभ्र-स्‍वभाव, गुण सि‍रजि‍ गुणवती रूप बनबए लगै छइ। गुणवती रूपवती बनि‍-बनि‍ गंगा-सरस्‍वती मि‍लए लगै छइ। जइठाम तीनू धार सटए त्रि‍वेणी घाट बनबए लगै छइ। घाट-स्‍नान कऽ तीनू सहेली अलड़ैत-मलड़ैत चलए लगै छइ। भेद-कुभेद मेटा-मेटा गंगा-सागर जा डुमै छइ। सम्‍पन्न शब्‍द, शैली सम्‍पन्न शब्‍द कोष सि‍रजए लगै छइ। जड़ि‍-छीप पकड़ि‍ भाषाक संसार-साहि‍त्‍य गढ़ए लगै छइ। अपन-अपन अस्‍त्र-शस्‍त्र सजि‍ पथ-प्रदर्शन करए लगै छइ। पथ प्रि‍य प्रेमी पाबि‍-पाबि‍ पथि‍क पथ चलए लगै छइ। लोक अनेक, दुनि‍याँ अनेक पथ अनेक अनेक पथबाह। अपन खेत जहि‍ना जोतै छइ बरदक संग अपन हरबाह। बेथा-कथा सम्‍पन्न गढ़ि‍, कवि‍त्त संग मि‍लि‍ चलै छइ दोहा, चौपाइ, छप्‍पय ओ कवि‍त्त संग मि‍लि‍ कवि‍ता कहबै छइ। आँखि‍, कान, नाक मि‍लि जहि‍ना रूप देह सजबै छइ। मुँह बीच जि‍हि‍या पकड़ि‍ वाणी वीणा तार खि‍ंचै छइ। तड़पि‍-तड़पि‍ मनक बेथा दुबट्टी ओझर जा फँसै छइ। शब्‍द वाण जा-जा कहै छइ मुदा ओझर कहाँ बदलै छइ। ओझर जखन चालि‍ पकड़ि‍ अस्‍त्र हाथ उठबै छइ कर्मभूमि‍ पकड़ि‍ धरती शब्‍दवाण छोड़ै छइ। नख-सि‍ख रूप जतऽ सजै छइ पूर्णिमाक चान कहबए लगै छइ। पूनोक गौरव गाथा कहि‍-कहि‍ मास सलोनी पबए लगै छइ। जहि‍ना साओनक‍ सिस्‍की सि‍हकए तहि‍ना सि‍हकए वीणाक तार। मनोक तार तहि‍ना सि‍हकि‍ सि‍रजि‍ अपन तहि‍ना उद्गार। जहि‍ना धरती अकास बीच गाछ-वि‍रीछ लहलह करैत। तहि‍ना वि‍वेक वि‍चार संग सदि‍ हँसि‍-गाबि‍ कहैत। हजार नाम जहि‍ना हरि‍ हजार हाथ तहि‍ना सजल छइ। हजार मन सेहो कहैत हजार कोष भरल छइ। अपनेपर- 2 अपनेपर कनै छी अपनेपर हँसै छी। अपने दि‍स तकै छी अपने नै देखै छी। घुरि‍ पाछू जखन देखै छी जुगक अनुकूल समाज देखै छी। ऊपरे-ऊपर नीपल-पोतल भीतरमे कंकाल देखै छी। ओही समाजक बीच बसल अपनो पुरुखाक इति‍हास पबै छी। बि‍हि‍या-बि‍हि‍या बि‍हि‍यबि‍ते‍ ढहल-ढनमनाएल देखै छी। नि‍श्चि‍त सीमा बीच गाम नि‍श्चि‍त जाति‍ बान्‍हल छी। टोलबैया कहि‍ नि‍श्चि‍त जाति‍क पति‍आनी लागि‍ सटल छी। सटल-सटल पति‍आनीक बीच हटल-सटल सेहो पबै छी। सटल-हटल आ कि‍ हटल-सटल गामक थाह कहाँ पबै छी। चौहद्दी बीच कत्तौ समाज कत्तौ जाति‍ समाज कहबै छी। कत्तौ-कत्तौ पुरुखक समाज तँ कत्तौ सम्‍प्रदाय समाज बनै छी। उठि‍ते नजरि‍ भूत-भवि‍ष्‍य सि‍हरनसँ सि‍हरए लगैए। अकारथ जि‍नगी देखि‍ पाबि‍ कुहरि‍ मन तुरछि‍ मरैए। अगम-अथाह रूप समाजक असथि‍र भऽ सागर कहबैए। बर्खा बुन्नी बीच-बीच ओला-पाथर बरि‍सा दइए। पबि‍ते पाबि‍ पृथ्‍वी पसरि‍ धरि‍या-चालि‍ धड़ए लगैए। उट्ठी-बैसी खेल खेलैत मोइन-धार बनबए लगैए। टूक सुपारी समाज कटि‍-कटि‍ टुकड़ी जाति‍ बनल छइ। टूक-टूक जाति‍क धरम धर्म-मानव कात पड़ल छइ। कल्‍याणक पर्याय धर्म कहबए कल्‍याणक दुश्‍मन बनल छइ। दृष्‍टि‍कूट सि‍रजि‍ दुर्ग-बीच अलग चि‍त्त चौनाल खसल छइ। देखि‍-देखि‍ कुहरै छी। कुहरि‍-कुहरि‍ सि‍हरै छी सि‍हरि‍-सि‍हरि‍ सि‍सकै छी सि‍सकि‍-सि‍सकि‍ ठुनकै छी ठुनकि‍-ठुनकि‍ कनै छी अपनेपर कनै छी अपनेपर हँसै छी। तँए कि‍ कोनो हारि‍ मानै छी भाग्‍य-तकदीर सि‍रजै छी। ज्‍योति‍षक ज्‍योति‍ पजारि‍-पजारि‍ कर्म-लेख लि‍खैत चलै छी। जेकर जेहेन भाग्‍य बनल छइ तेहने तेकरा फल भेटै छइ। फँसि‍-फँसि‍ शब्‍दजाल कर्म गीता गीत सुनबए लगै छइ। पढ़ि‍ गीता बौरा कि‍यो चि‍न्‍तक बनि‍ चि‍न्‍तन करैए। पागल कहि‍ पुक्की दए-दए बौराहा रूप गढ़ैए। सभ कि‍रदानी देखि‍-सुनि‍ मदनारी शि‍व कहबैए। कि‍यो भांगि‍या-भि‍खारी‍ मानह शि‍वदानी शि‍व कहबैए। डायरी- 3 मनक डायरी लि‍खए बैसलौं उपहारक डायरी नि‍काललौं। रंग-रूप देखि‍ डायरीक ऊपरे-ऊपरे भसए लगलौं। भसैत-भसैत-भसैत मनक बात बि‍सरए लगलौं। छपल फूल गुलाब कली बि‍हि‍या-बि‍हि‍या देखए लगलौं। सुर-सुर करैत सुरसुरी आबि‍ नाकर छोर खि‍चए लगल। रस-गंधक भूख जगा भूखल मन तरसए लगल। ताकए लगलौं रस कलीमे सादा कागज बनल-पड़ल। सीख-लीख नै परेखि‍ पेलौं अखनो ओहि‍ना बैसल पड़ल। गुन-गुन गुनगुनाए लगलौं जगल अपन डायरी मनमे हाँइ-हाँइ पन्ना उनटेलौं कलम खोलि‍ वि‍चारल मनमे। तही बीच आँखि‍ पड़ल पन्ना चार्ट बना टांगल देखल अपन मनक चार्ट नै देखि‍ अदहन मन उधि‍आए लगल। आखर अंति‍म मन पड़ि‍ते कलमक हाथ घुसकए लगल। अनका असे कते दि‍न बीतल मनक हि‍साब उठए लगल। मानव गुण- 4 जा धरि‍ गुण नै अबैत मनुजमे ता धरि‍ मनुज मनु रहैए। अबि‍ते गुण फल-फूल जहि‍ना नाओं अपन धड़बए लगैए। जा धरि‍ फूल महक नै पबैत कोढ़ी-वाती कहबैत रहैए। तहि‍ना ने मनुखो बीच मनुष्‍य-मनुख कहबैत रहैए। गुण अनेक समेटि आठ पौरुष गुण कहबैए। पबि‍ते पाबि‍ बनैत गुणी महापुरुष बनए लगैए। जहि‍ना-जहि‍ना गुण बढ़ै छइ तहि‍ना-पुरुखपनो बढ़ै छइ। अबि‍ते पौरुष तन मनुजमे महापुरुष कहबए लगै छइ। तीन गुण आदि‍ये सँ आबि‍ सत्-रज-तम कहबैए। तामस-प्रीति‍ मनुखेटा नै पशु-पक्षी सेहो पकड़ैए। जहि‍ना-जहि‍ना पशु-पक्षी बीच गुण तीनू गुणगान करैए। एक-दोसरसँ हटि‍-सटि‍ कामी-लोभीक रूप धड़ैए। बि‍ना कि‍छु कहनौं-सुननौं बीख बमन सदति‍ करैए। गहुमन चालि‍ बूझि‍ देखि‍ मनुष्‍यत्‍व डरए लगैए। मुदा टोननि‍हार मनुखो होइ छइ उपाए तेकर सोचए लगैए। मंत्र-जौड़ सीखि‍-सीखि‍ चि‍त्ती-कौड़ी भाॅजए लगैए। भजि‍ते चि‍त्ती-कौड़ी धरती गरुड़ चालि‍ पकड़ए लगैए। चारू दि‍शा नजरि‍ दौगा अकास बीच उड़ए लगैए। उड़ि‍ते अकास देखए लगैत बील-धोधड़ि‍ वृक्ष-धरती एक अकास दोसर पताल जागल वृक्ष सुतल धरती। जहि‍ना बरही काठ खोदि‍ उखड़ि‍ ढोलक कठरा बनबैए। तहि‍ना ने कठखोधि‍यो खोदि‍ हीर काटि‍ धोधड़ि‍ बनबैए। रक्षि‍त सुरक्षि‍त भवन बीच चैनक जि‍नगी बास करैए। नि‍च्‍चाँ धड़तीक बोहरि‍ देखि‍-देखि‍ सुख-सेजि‍ वि‍श्राम करैए। ने डर पानि‍ ओ पाथर हवो ने कि‍छु कए सकैए। धरती सहजहि‍‍ पड़ल-सुतल भयये कि‍अए भऽ सकैए। मुसक खुनल बील पकड़ि‍ नाग-नागि‍न कहबए लगैए। नागे तँ धरती टेकने छइ अखण्‍ड राज भोगै छइ। जेकरे बनाओल घर बसै छइ तेकरे पकड़ि‍ भोजन करै छइ। सुख-पतालक पाबि‍-पाबि‍ अकास-पताल लोक गढ़ैए। भोगी जोगी बनि‍-बनि‍ मंत्र सूत्र गढ़ए लगैए। सुर्जो-चानक गति‍-मति‍केँ रगड़ि‍-रगड़ि‍ मेटबए लगैए। कहि‍यो बादर पकड़ि‍ मेघाओन रूप धड़ए लगैए। तँ कहि‍यो देव-दानव ठर्ड़ा बेबस भऽ देखए लगैए। छुटि‍ गेल- 5 पाछू घुरि‍ जखन देखै छी मरूभमि भेल गाम देखै छी। गंगोट मानि‍ सि‍र सजि‍ चानन करैत अनैत रहलौं। बालुक बुर्जा बनल बाध देखि‍-देखि‍ कुहरैत रहलौं। जइ पानि‍क बीच बसल छी तरो पानि‍ तरहथि‍यो पानि‍ वायुओ पानि‍ बसातो पानि‍ उड़ल अकास दौड़तो पानि‍ तइ पानि‍क बीच काहि‍ काटि‍ पानिये‍ बि‍नु छटपट करै छी कत्तौ चुटकि‍यो नोन नै कत्तौ-कत्तौ सागर बनल छइ। दुनि‍याँक दोखाह वसात दुरि‍ केने छइ दुनि‍याँकेँ बिनु कल-कारखानाक मि‍थि‍ला दूषि‍त भेल अछि‍ हावासँ। देश-दुनि‍याँक कारखाना चला खेती-पथारी सेहो करैए। अपन सभ कि‍छु उपटा-बि‍लटा मि‍थि‍लाक जय-जयकार करैए। भाषा साहि‍त्‍यक कथे की नमगर-चौड़गर बान्‍ह कसल-ए। करे मुसबा पकड़ए युनुसबा दि‍न-राति‍क लीला चलैए जननि‍हार सभ कि‍छु जनै छथि‍ मुदा पेट पकड़ि‍ पेटकान देने सभ-सबहक मुँह देखि‍-देखि‍ लेने-लेने कि‍ देने-देने? फगुआ- 6 जुआनीक जे रूप देखबैए तेकरेसँ ठट्ठा करै छी। अपन करम-धरम बि‍सरि‍ फगुआ हँसि‍-हँसि‍ गबै छी। दोहाकेँ कवि‍त्त बना-बना दोगे-दोग वि‍हुँसैत चलू। रचि‍ कवि‍ता जोगि‍रा केर र- र- र- र- गर्द करू। रूप सजि‍ करता-करतीक श्‍मशान रूप बनबै छी रस फूल माधुर्य फलक जी-जान कहाँ चि‍खै छी। जहि‍ना सरसो-झुन-झुन करैए गहुमनि‍या रंग लपकति‍ रहैए। केचुआ छोड़ैक मसीम परखि‍ लपटि‍-लपटि‍ लपटए लगैए। ताड़ वीणाक कम्‍पन्न जहि‍ना ओर-छोड़ झनकबए लगैए। तहि‍ना पएरक उठल झुन-झुन डारि‍-पात, सि‍र डोलबैए। पाबि‍ फागु वसुन्‍धरा जहि‍ना अलसाएल-मलसाएल झुमैए। पाबि‍ जुआनी बि‍रह तहि‍ना बि‍ड़हा-बि‍ड़ही बौराइए। ढोल-डम्‍फ ताल मि‍ला-मि‍ला दुनू नाचए-गाबए लगैए। फड़ल-फुलाएल देखि‍ वसुधा अकास पवन डोलए लगैए। चान-सुर्ज बैसि‍ दुनू संग हि‍स्‍सा-बखरा फड़ि‍यबए लगैए। जहि‍ना पुनोक चान चमकए मध्‍य–मस्‍त सूर्ज सेहो हँसैए। अपन-अपन दशा-दि‍शा मि‍लि‍ दुनू गाबए लगैए। बामा हाथ थि‍ड़कि‍-थि‍ड़कि‍‍ दहि‍ना चकमक चमकए लगैए। जहि‍ना जाड़क पाला पकड़ि‍ शीतल हृदए मि‍लि‍ जुड़ौलक। ठि‍ठुरल-ठि‍ठुड़ल पकड़ि‍ कली वसन्‍त गीत सेहो सि‍रजौलक। २ चंदन कुमार झा सररा, मदनेश्वर स्थान, मधुबनी, बिहार ||हेतैक नवका भोर||

एतै जागृति हेतैक नवका भोर, घर-घर मे पहुँचत शिक्षा, शिक्षित हेतै सभ लोक, संपूर्ण धरा पर खुशिये पसरत, ककरो आँखि मे नहि रहतै नोर, नहि रहतै आतंक, आतंकी, आ आतंकवादक जोर, नहि रहतै राजनिति आ' जातिवादक गठजोड़, नवल दिवस, नुतन प्रभात, पुनि हेतैक नवल इजोर।. ३ नन्‍द वि‍लास राय जीक कवि‍ता- मानवता आनक गलती नि‍ङहारब ई नीक काज नै कखनो काल अपनो मुँह एेनामे नि‍ङहारल करू जौं दानवसँ मानव बनबाक अछि‍ मानवबला कर्त्तव्‍य ि‍नभाएल करू। जीत केर खुशीमे सभ रहैत अछि‍ मगन हारि‍क दुखीमे अहाँ मुस्‍कुराएल करू दोसरक खुशी देखि‍ जड़ी छी कि‍एक देखि‍ दोसरक तरक्की मरै छी कि‍एक हएत केना अप्पन तरक्की वि‍चारल करू की लऽ दुनि‍याँमे एलौं की लऽ कऽ दुनि‍याँसँ जाएब फेर एना कि‍एक करै छी राति‍-दि‍न बाप-बाप ढौआ कमाबए लेल केलौं कतेक पाप जौं पापसँ मुक्ति‍ चाहै छी अहाँ गरीब-गुरबापर अन्न-धन लुटाएल करू दोसरक खुशी लेल जौं जीत कऽ हारि‍ सकी आनक बचेबाक खातीर घर अपन जाड़ि‍ सकी धरतीपर केना मानवता जीबैत रहत अपना भरि‍ अहाँ जुक्ती लगाएल करू अपना लेल तँ सभ जीबैत अछि‍ अनका लेल जौं अहाँ जी सकी आनक उपकार खातीर जौं जहर पीब सकी मरियो कऽ केना लोक भऽ जाइत अछि‍ अमर अहू गप्‍पपर थोड़ैक माथ लगाएल करू आनक गलती नि‍ङारब ई नीक काज नै कखनो काल अपनो मुँह ऐना नि‍ङहारल करू। शि‍क्षि‍त बेरोजगार हम शि‍क्षि‍त बेरोजगार छी परि‍वारपर बनल भार छी गौआँ समाजक लेल बेकार छी हम शि‍क्षि‍त बेरोजगार छी बाबू हमरेपर भाषण झाड़ै छथि‍ गप्‍पसँ हमरा मारै छथि‍ हम मने-मन भनभनाइत छी गप्‍प मारि‍ खाइ छी। हमर कनि‍याेँ हमरासँ रूसल अछि‍ ओ कहै अछि‍ हम कपारे फूटल अछि‍। की एक गद्दी सेनुरो देलौं जहि‍यासँ गौना भऽ अहाँ घर एलौं की तेलौ सावुन अहाँकेँ हमरा लेल जुमैत अछि‍। की कहँू भाय लोकनि‍ हमरा तँ कि‍छु ने फुड़ैत अछि‍। कोड़ाक मारि‍सँ बेसी चोट लगैत अछि‍ कनि‍याँक बातक हमरा के पति‍याएत अपन दुख हम कहि‍यौ ककरा कनि‍याँक बापो अपन बेटी हमरासँ बि‍याहि‍ पचताइत अछि‍ दि‍ल्‍ली पंजाब पठेबाक लेल हमर माथ खाइत अछि‍। अाब नै गूजर हएत हमरा गाममे चलि‍ जाएब दि‍ल्‍ली आइये साँझमे ओतए करब कोनो काम ढौआ कमा, लाएब गाम। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। १.नारायण झा २.निशान्त झा नारायण झा मि‍थि‍ला राज्‍यक आह्वान करू आंदोलन बनाऊ राज मि‍थि‍ला जमि‍ कऽ बनाऊ राज मि‍थि‍ला। मि‍थि‍ला थि‍क मि‍थि‍लावासीक करेज राखक अछि‍ एकरा सभकेँ सहेजि‍। हाथ जोड़ैक समए बीत गेल अधि‍कार हथि‍येबामे देरी भऽ गेल। जनकक संग सीताक खा कऽ सप्‍पत सघर्ष सदि‍खन राखब तखनहि‍ भेटत। आलस, भुख-पि‍यास छोड़ि‍ कऽ राति‍-दि‍नक संघर्ष कऽ। दि‍न-राति‍क परि‍श्रम कऽ बजाउ घंटा तखने बाजत मि‍थि‍ला राज बनबाक डंडा। अप्‍पन राज्‍यक अप्‍पन संस्‍कार अनुकरणीय होएत संसार। दि‍ग-दि‍गंत पताखा फहरा सकैत अछि‍ सफलताक बीआ बूना सकैत अछि‍। सम्‍पूर्ण मि‍थि‍लावासी होएताह आत्‍मनि‍र्भर सपनोंमे नै रहए पड़त ककरो पड़ ि‍नर्भर। करू आंदोलन बनाऊ राज मि‍थि‍ला जमि‍ कऽ बनाऊ राज मि‍थि‍ला। २. निशान्त झा खुश रहै लेल  अहाँकेँ   हजार  बहाना अछि   , कलीसँ  दोस्ती अहाँकेँ  गुलसँ अहाँक  याराना अछि ,,

हमर  ख़्वाब तूँ  आसमानसँ ऊँच भऽ जो, हमरो आइ अपन  हौसला कनी  अजमेबाक अछि ,,

साकी तूँ बस  पियेने  जो  वजह नै पूछ  पीबै के , सबहक  दर्द  अपन  अपन  सबहक  अपन  अफसाना अछि ,,

एक  चूक भेल  की तोहर  नजइरसँ  उतरि  गेलौं , ऐना छौ तोहर आँखि की  अदब  की पैमाना  अछि ,,

खामोशी  तन्हाइ  नाकामी  रुसवाइ , 'निशांत ' भेटलौ तोरा   मोहबत  के  नजराना अछि २ करोड़पतिक सेट पर, आइ बवाल भऽ गेलै करोड़पतिक सेट पर, आइ बवाल भऽ गेलै । कंप्यूटर स्क्रीन पर, आयल  गज़ब सवाल भऽ गेलै ॥ आयल  गजब सवाल जीत कय ,फास्टेस्ट फिंगर फस्ट । हॉट सीट पर आबि गेलथि , नेता जी एकगो  भ्रष्ट ॥ पहिला प्रश्न जितायत , रुपया  पाँच हजार । देशमें भष्टाचार ले, के अछि  जिम्मेदार ? सही जवाब बताबू, विकल्प अछि ई चारि । ए) जनता बी) मंत्री सी) नेता डी) सरकार ॥ हम छी  नेता, हम छी  मंत्री, हमरे अछि सरकार । जँ जनता केँ  लौक करब , चुनाव जायब  हार ॥ मंत्री जी पड़ि गेलथि  सोचमे, मदति करत  आब के? बजला  - फोन लगायल जे विपक्षक पार्टी नेताकेँ  ॥ तीसे सेकंड मे भऽ  गेल , नोट वोट केर  डील । कटि केलथि  नेता जी बजला  एक्चुअली व्हाट आइ फील ॥ बिना जवाबक अरबों बनैत अछि अपन वोट - सीट पर। की  रखल अछि  "निशांत" छोड़ओ अहन हॉट-सीट पर ॥ फुसि वचन , फुसि कसम , फुसि देखा कऽ श्वप्न ।  ओतय जनताक वोटिंग पेड्स पर सबटा विकल्प अपन  ॥ कखनो  कखनो बस भाषण बाजी, करकल  तेवर तीख । करोड़पतिक सेट पर, आइ बवाल भऽ गेलै । करोड़पतिक सेट पर, आइ बवाल भऽ गेलै । ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। १.प्रीति‍ प्रि‍या झा २.पवन कुमार साह ३.डॉ॰ शशिधर कुमर १. प्रीति‍ प्रि‍या झा अन्‍तराष्‍ट्रीय महि‍ला दि‍वस 08 मार्चक अावाहन भऽ रहल अछि‍। ऐ अवसरक परि‍पेक्ष्‍यमे नवतुरि‍या कवयि‍त्रीक सम्‍यक प्रस्‍तुति‍। रचनाकार- प्रीति‍ प्रि‍या झा, पि‍ताक नाओं- श्री वि‍जय चन्‍द्र झा, माताक नाओं- श्रीमती सीमू झा, जनम ति‍थि‍- 01/ 03/ 1994 सम्‍प्रति‍- छात्रा कथा 12म, केन्‍द्रीय वि‍द्यालय टाटा नगर, आवासीय पता- गोलपहाड़ी मेन रोड, गायत्री मंदि‍रक नि‍कट, जमशेदपुर, पैतृक गाम- धनखोरि‍, फुलपरास मधुबनी, मातृक-  घोघरडीहा, मधुबनी कवि‍ता- बेटी जन्‍मएकाल, आमक मज्‍जर खुशीक पेटार घरक लक्ष्‍मी बेटी मुदा मंचेटापर सभ कहै छइ बेटी-बेटा एक समान तँ कि‍अए दुख मनबैत छी कन्‍याक जन्‍मपर कि‍अए नै जन्‍माएल जाइ छइ बेटी एकटा पुत्रक आशामे सात-सात बेटी ककरो तनपर साफ वस्‍त्र नै मुदा एकटा बेटा- वएह- बौआ, बाबू, सुग्‍गा-नूनू दोष ककरा देल जाए? सबहक मति‍मे पुत्रमोह, ति‍लकक लोभ ककरो मति‍ तँ बदलल नै जा सकैछ बाप बेपारी आ बेटा वस्‍तु बनि‍ बजारमे पसरल अछि‍ बि‍कबाक लेल तैयार चाम-मोट मुदा दाम चमनगर जखन बेटीक बाप- तखन कनैत छी मुदा! जखन बालकक पि‍ता तँ भगवानक समान आदर चाही बेटी सभ मारल जाइ छै नीके हएत, बेटी खतम भऽ जाएत रहि‍ जेता सभटा बालक कुमारे प्रकृति‍केँ चुनौती दि‍अ? वाह आर्यवर्त्तक पूत! ! ! २ पवन कुमार साह जन्‍म- 2/2/1987 पि‍ताक नाओं- श्री वासुदेव साह गाम- खाप, पोस्‍ट- अन्‍धारवन (वासुदेवपुर), थाना- लाैकहा, जि‍ला- मधुबनी, (बि‍हार) पि‍न- 847421 शि‍क्षा- एम.ए. (अंग्रजी) एल.एम.एन.यू; दरभंगा कवि‍ता- प्रेम की पाप छल प्रेम हमर की गुनाह छल प्रेम हमर लगि‍ गेल कि‍एक एकरा एहेन नजरि‍ की पाप छल प्रेम..... जौं प्रेम पाप छी तँ ई पाप हम करबे करब कि‍यो मि‍लए ने दि‍अए चाहैए हमरा मुदा हम ओकरासँ मि‍लबे करब सभ कि‍छु ओकरा लेल मेटा गेल हमर की पाप छल प्रेम...... सुनि‍ लि‍अ यौ प्रेमक दुश्‍मन मि‍लैसँ हमरा नै रोकू कऽ देलौं ओकरे नओं जीवन हमरा आब कि‍यो ने टोकू व्‍यर्थ भेल जि‍नाइ जि‍नगी हमर की पाप छल प्रेम..... गीत- उड़ि‍ गेलै ओ हमर दि‍ल एना तोड़ि‍ कऽ उड़ि‍ जाए पंक्षी जेना पि‍ंजरा तोड़ि‍ कऽ उड़ि‍ गेलै.... अपना ओ पंक्षी समझलक हमरा दि‍लक पि‍ंजरा छोड़लक जखन संग हमर तड़पए लगल जि‍यरा मारलक तीर दि‍लमे एना जोड़ि‍ कऽ उड़ि‍ जाए पंक्षी जेना पि‍ंजरा तोड़ि‍ कऽ उड़ि‍ गेलै..... पि‍ंजराकेँ कोनो दर्द ने होइए दि‍ल बेगरि‍ दर्दक ने रहैए पंक्षी तँ गगनमे उड़ैए संगी हमरा चमनमे घुमैए ि‍जलौं ओकरा बि‍नु हम एना मरि‍ कऽ उड़ि‍ जाए पंक्षी जेना पि‍ंजरा तोड़ि‍ कऽ उड़ि‍ गेलै....। ३ डॉ॰ शशिधर कुमर, एम॰डी॰(आयु॰) – कायचिकित्सा, कॉलेज ऑफ आयुर्वेद एण्ड रिसर्च सेण्टर, निगडी – प्राधिकरण, पूणा (महाराष्ट्र) – ४११०४४ अहंकार” (कविता) “अहंकार”   छी   भूत    एहेन,  बड़का – बड़का   केँ  खएलक  ई । १ की  मनुक्ख  केर गप्प  कही,  देवहु  केँ  सबक़  सिखओलक  ई ।। नारद  सन  ऋषि  केँ  अहं  भेलन्हि, ‍२ निज मन पर हमर नियण्त्रण अछि । कहलन्हि – के  हमरा  डोला सकत ? त्रिभुवन केँ - मोर  आमण्त्रण अछि । ब्रम्हाक   तनय,   विष्णूक    भक्त, हर विषय  सँ हम - निर्लिप्त थिकहुँ । की    काम – वासना – क्रोध – लोभ, की  मोह – द्वेष,  सभ  जय कयलहुँ । बानर सन मूँह भेलन्हि हुनकर, सच ! अहं काल केर भोजन छी । की  मनुक्ख  केर गप्प  कही,  देवहु  केँ  सबक़  सिखओलक  ई ।। सर्जक    बड़का  –  हम   कथाकार, हम    गीतकार   वा   गजलकार । हम   के  छी – ककरहु  कही  तुच्छ, आ  कही  “कूथि  कऽ  लिखनिहार” ? की  नीक – बेजाए ?  तकर  निर्णय, करताह पाठक – जन, सुधी – समाज । हम   तऽ  लेखक,  लिखबाक   कर्म, हम   के   छी  परमिट  बँटनिहार ? जँ छी महान, तऽ लोक कहत; अपनहि निज गाल बजओने की । की  मनुक्ख  केर गप्प  कही,  देवहु  केँ  सबक़  सिखओलक  ई ।। हमरा   सम्मुख  केओ  अनचिन्हार, ३ वा  हमर  केओ  परिचित  चिन्हार । जनिका   जतबा  जे  शक्य  लिखथु, हर जन  केँ  अभिव्यक्तिक अधिकार ? सभ   केँ   माथा   सोचबाक   लेल, आ   हाथ   भेटल   लिखबाक लेल । नञि   जन्मजात  केओ   सिद्धहस्त, छी  समय,  निपुण  बनबाक  लेल । इएह मूँह – हाथ  आदर दैत’छि, आ बहुतहु केँ लतिअओलक ई । की  मनुक्ख  केर गप्प  कही,  देवहु  केँ  सबक़  सिखओलक  ई ।। जँ   छी   आलोचक  –  समालोचना, नीक  -  बेजाए    सभटा    देखी । अपना    खेमा,    अनकर    खेमा, दुहु   कात    परिक्षण    समलेखी । अपना    खेमा    अधलाहो    नीक, अनका  जँ  कही  हम - सब  तीते । तऽ  चानि  पर खापड़ि  निश्चित अछि, छी  कालक  गति   अनुपम,  ठीके । “समय” हाथ निर्णय सभ – टा, कत दुर्ग – दर्प भँसिअओलक ई । की  मनुक्ख  केर  गप्प  कही,  देवहु  केँ  सबक़  सिखओलक  ई ।। सन्दर्भ संकेत - ‍ १) ॰ एहि कविता केर विषय वस्तुक प्रेरणा “विदेह” पर विगत २ महीना सँ चलि रहल वार्तालाप सभ सँ मनःस्फुर्त भेल अछि । तेँ फेसबुक पर “विदेह” कम्युनिटीक एडमिन लोकनि केँ सादर धन्यवाद । २) ॰ ई सन्दर्भ “विष्णु – पुराण” मे वर्णित एक कथा सँ लेल गेल अछि । ३) ॰ एहि ठाम प्रयुक्त “अनचिन्हार” शब्द “अपरिचित” केर परिचायक थिक (चिन्हारक उनटा) । कोनहु व्यक्तिविशेष सँ एकर कोनहु प्रकारक सम्बन्ध नञि अछि । ई कविता “विदेह” केर आगामी अंक (अंक ‍१०१) मे प्रकाशनक हेतु  सम्पादक मण्डल केँ सेहो पठाओल गेल अछि । आयल  वसन्त  नेने, नव - नव  उमंग (युगल गीत) [+ -]     मलयक   सुवास  नेने,   बहइछ  पवन । आयल  वसन्त  नेने, नव - नव  उमंग ।। [-]        तीसी आ सरिसो केर, कुसुमित     शाखा । [+]       प्रेम  केर  मधुवन मे, नयन   केर   भाषा । [-]        अएलाह भूतल पर मन्मथ, रती केर संग । [+ -]     आयल  वसन्त  नेने, नव - नव  उमंग ।। [-]        धरती केर कण कण मे, हरियऽरी      आयल । [+]       भाँति – भाँति  रंग  केर, फूल        फुलायल । [-]        सुनि कोयलीक बोल,  बढ़य प्रेमक अगन । [+ -]    आयल  वसन्त  नेने, नव - नव  उमंग ।। [-]       सभतरि अछि जीवन, आ  सभतरि यौवन । [+]      प्रिया केँ  निरखि कऽ, अघायल ने प्रियतम । [-]       चलल  भौंरा  पराग  लए, लसित उपवन । [+ -]    आयल  वसन्त  नेने, नव - नव  उमंग ।। [-]       चकोरक   प्रतिक्षा   केर, भेल      जेना     अन्त । [+]       चन्द्रमा सँ मिलल जनु, पार      कऽ      अनन्त । [-]       आइ क्षितिजक पार मिलल, धरती – गगन । [+ -]    आयल  वसन्त  नेने,  नव - नव  उमंग ।। [-] :-   स्त्री अवाज         [+] :- पुरुष अवाज          [+ -] :- स्त्री आ पुरुष दुहुक समवेत अवाज देखू आयल बसन्त (गीत) बीति गेल,  बीति गेल,  देखू बीतल हेमन्त । निज दल-बल केर संग, देखू आयल बसन्त ।। हवा  मदहोश  बहय,  मोन उतड़ए – चढ़ए । जनु   सबतरि,   अछि   छायल   अनंग ।। खग  कलरव  करय,  राह  गमगम करय । गूँजय  कोयलीक  स्वर,   दिग – दिगन्त ।। देखू  केसर,  पलाश,  बेली, चम्पा, गुलाब । भेल   सुरभित,   धरा    संग   अनन्त ।। विरह  वेदना बढ़ल,  मिलन सपना सजल । रम्य  लगइत  अछि,   सुरूजक  किरण ।। नऽव शाखी* उगल, आयल किशलय नवल । लागय  धरती  केर  कण – कण जीवन्त ।। * शाखी = शाखायुक्त = गाछ - बिरिछ आयल  होलीक  दिन मतवारी (गीत) आयल  होलीक  दिन मतवारी । चहु   दिशि  अनंग  सञ्चारी ।। हर तरफ  बहय मलयानिल, लए शीतल सुगन्धि चन्दन । सौंसे भूतल हरियर – सुन्नर, हर  उपवन  जनु  नन्दन । मारय प्रकृति  जेना किलकारी । आयल  होलीक दिन मतवारी ।। जमुना तट पर धूम मचल अछि, कुञ्ज – भवन   मे   हलचल । रंग – अबीर सँ लाल भेल आइ, जमुना  केर   श्यामल – जल । मारय भरि – भरि कऽ पिचकारी । आयल  होलीक  दिन मतवारी ।। एक दिशि अछि  सभ ग्वाल – बाल, दोसर   दिशि   सभ   ब्रजनारी । बीच  मे  हर्षित – मुदित  राधिका, संग     मे    कृष्ण  –  मुरारी । भीजय  ब्रजबाला  केर  साड़ी । आयल  होलीक दिन मतवारी ।। आयल होली केर तिहार (गीत) आयल होली केर तिहार । संग  बसन्त  बहार । नेने  आयल  अछि  संगहि,  नव  उमंग - उल्लास ।। कतहु लोक सभ झूमि – झूमि कऽ, घोड़ि    रहल    छथि    भांग । कतहु  करैतछि   बालबृन्द   सभ, रंग    घोड़बाक    ओरिआओन । बहय मदहोश बसात । संगे  सुरभित सुवास । नेने  आयल  अछि  संगहि,  नव  जीवनक  उसास ।। भोरे  –  भोरे    नबकी    भौजी, कएलन्हि बन्न केबाड़ आ खिड़की । मोन  खड़ाबक  बहाना  बना  कऽ, बड़की  भौजी   खाट  पकड़लीह । लेकिन दियऽर बड़ चलाक । चलतन्हि  किनकहु ने  कोनो  बात । नेने  आयल  ओ  संगहि,  रंग  हरियर  आ  लाल ।। भौजी   कतबहु  होथि  लजबिज्जी, होथि पुरनकी,  नवकी – जुअनकी । चाहे   कोनहु   बहाना   बनओती, लेकिन  रंग  सँ  आइ  ने बचती । रंगबनि हिनकर दुहु गाल । करबनि   ठोर   दुहु  लाल । नेने  आयल  छी   संगहि,   रंग – अबीर – गुलाल ।। दियऽर भाउज केर बीच होइछ ई, निर्मल      प्रेमक      धार । ई पुणीत अवसरि  आयल अछि, एक    बरख    केर    बाद । जुनि  करू  आइ  लाज । नहिञे  आन  कोनहु  लाथ । करू  स्वागत  बसन्तक,  रंग – अबीर   लए  हाथ ।। छायल मिथिला मे आजु बसन्त (गीत) जेम्हरहि देखू, तेम्हर आइ अछि भाँति – भाँति केर रंग । आइ भेल  बेमत्त  लोक सभ,  पीबि कऽ  नबका  भंग ।। भाँग पीबि कऽ आइ ई बुढ़हो, पओलन्हि   नऽव   खुमारी। काया लकलक,  दाँतहु टूटल, पर  नस – नस मे जुआनी । छायल चहु दिशि जेना उमंग । आइ भेल  बेमत्त  लोक सभ,  पीबि कऽ  नबका  भंग ।। तोड़ि  आजु  संकल्प – प्रतिज्ञा, तरुणी     संग    ब्रम्हचारी ।* छाड़ि ध्यान-तप-त्याग ओ पूजा, कामिनी     संग    सञ्चारी । छायल अंग – अंग जेना अनंग । आइ भेल  बेमत्त  लोक सभ,  पीबि कऽ  नबका  भंग ।। यत्र – तत्र  देखबा मे  आबए, राधा  आ  कृष्णक   टोली । लाले रंग साड़ी रंग सँ तीतल, हरियर  रंग  राँगल  चोली । छायल मिथिला मे आजु बसन्त । आइ भेल  बेमत्त  लोक सभ,  पीबि कऽ  नबका  भंग ।। * ई पाँती सभ प्रतीकात्मक मात्र थिक । कोनहु वर्ग विशेष वा समुदाय विशेष पर आक्षेप नञि । हे ऐ भौजी, रूसलि किए छी ? (गीत) हे अए (ऐ) भौजी, रूसलि किए छी ? गाल फुला,  चुप बैसलि  किए छी ? घऽर मे  बैसलि, किए  आँखि  लाल  करै  छी ? दू बुन्न पड़िए जँ गेल, तऽ किए बबाल करै छी ? होली मे होइतहि  अछि एहिना, रंग अबीर मे, डूबल ई दुनिञा । मानव  केर  तऽ बात कहू की, नाचय धरती बनि नवकनिञा । किए  कोप - भवन मे,  अहाँ  कपार  धुनै छी ? दू बुन्न पड़िए जँ गेल, तऽ किए बबाल करै छी ? खेलथि ब्रज मे गोपी केर संग, कृष्णजी     रंग     अबीर । मिथिला मे फगुआ अछि नामी, दियऽर  भाउजि   केर  बीच । किए   आइ   अहाँ,   हड़ताल   कएने   छी ? दू बुन्न पड़िए जँ गेल, तऽ किए बबाल करै छी ? रूसू जुनि, हम करै छी भौजी, हाथ     जोड़ि     नेहोरा । एक बरख केर बादहि आओत, पाबनि    फेर     दोबारा । किए  स्नेहक  हाथ  अपन,  कात  कएने  छी ? दू बुन्न पड़िए जँ गेल, तऽ किए बबाल करै छी ? सभ हीलि – मीलि  कऽ गाउ (गीत) सभ हीलि – मीलि  कऽ गाउ । खुशी  सरगम  सजाउ । आयल  होलीक  तिहार,  रंग – अबीर लगाउ ।। आयल बसन्त, बहए मलयक बसात । प्रकृति कामिनी कयल सोलहो शिंगार । नृप – आसन  लगाउ । घर – आङ्गन सजाउ । आयल  होलीक  तिहार,  रंग – अबीर लगाउ ।। वृद्ध हो,  बालक हो,  युवा हो या युवती । सभमे जुआनी अछि, सभमे अछि मस्ती । ढोल – डम्फा  बजाउ । जुनि  कनिञो लजाउ । आयल  होलीक  तिहार,  रंग – अबीर लगाउ ।। अवधपुरी  मे  खेलथि  लक्ष्मण,  सीता  केर  संग  होरी । मिथिलो मे अछि नामी सभतरि, दियऽर भाउजि केर जोड़ी । भौजी !  एम्हर  आउ । जुनि  घऽर मे नुकाउ । आयल  होलीक  तिहार,  रंग – अबीर लगाउ ।। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। १.रमेश मण्‍डलसोनू कुमार झा ‘रश्मि’३.किशन कारीगर ४.कपि‍लेश्वर राउत १ रमेश मण्‍डल गाम- ि‍नर्मली पोस्‍ट- ि‍नर्मली वार्ड नं. 08 थाना- ि‍नर्मली, जि‍ला- सुपौल संप्रति‍- व्‍याख्‍याता (अंग्रेजी वि‍भाग), अशर्फी दास, साहु-समाज इण्‍टर महि‍ला महावि‍द्यालय- ि‍नर्मली, सुपौल, मि‍थि‍ला-बि‍हार। ई छथि‍ स्‍कूल प्राईवेट ट्यूटर नन्‍हि‍टा स्‍कूलक दुनि‍याँमे रहैत अछि‍ ई प्राईवेट ट्यूटर हँसैत पान चि‍बबैत दैत अछि‍ ओ लेक्‍चर ओ समझैए ऐसँ पैघ नै ई दुनि‍याँ परंच सच ई अछि‍ हि‍नकासँ बेसी कमाइए एकटा धुनि‍या कि‍छु तँ घरक खर्ची काटि‍ कऽ रहैत अछि‍ मेन्‍टीनेन्‍समे प्रणाम सर सुनि‍ कऽ बहकैत अछि‍ सेन्‍टीमेंटमे ओ कहैत अछि‍ हमरासँ नीक अछि‍ कि‍यो ऐ गाममे परंच सच्‍चाइ ई चट्टि‍यो नै अछि हि‍नकर पएरमे अतेक कठि‍नाइ केर बादो ई स्‍कूल नै छोड़ता हि‍टलर जकाँ प्राचार्यक आगाँ हाथ ई जोड़ि‍ बजताह- ट्यूशन मि‍लैक ई स्‍कूल अछि‍ संगम बेतन अगर डेढ़ सए रूपैया अछि‍ तैयो एक्को रत्ती ने गम कम बेतन पाबि‍ हम सन्‍तुष्‍ट हो लेब सि‍र्फ दूटा ट्यूशन पकड़ा दि‍औ केनाहि‍तो जीब लेब हि‍टलर जकाँ प्राचार्य हि‍नका मनमानीसँ जोतैत कखनो ओ कार्यालयमे रखैत तँ कखनो ओ सब्‍जी अनबाक लेल पठबैत मि‍लब अहाँसँ फुसलाएब अहाँकेँ कि‍ बच्‍चा दि‍अ हमरा वि‍द्यालयमे अवश्‍य एकर संख्‍या बढ़त तँ खरि‍दब एक स्‍कूल बस एतै रहि‍ प्राचार्यक जी-हजूरी करब अगर वि‍चार नै मि‍लत तँ नबका स्‍कूल खोलब हि‍नक नारा अछि‍- अहाँ बच्‍चाकेँ स्‍वस्‍थ नागरीक बना देब मुदा हि‍नक पढ़ाओल बच्‍चा चाह-पान बेचैत नजर आऔत अंतमे रमेश सर अपन नसीहत भूल भऽ प्राइवेट ट्यूटर नै बनब नारि‍यल बेचि‍ लेब मजासँ रहब प्राइवेट ट्यूटरक ई दर्दनाक कहानी आ कतेक सच्‍ची कतेक सुहानी २. सोनू कुमार झा ‘रश्मि’, द्वारा –श्री विमल कुमार झा, ग्राम- हरिनगर ,पो.—रघुनीदेहट, जिला –मधुबनी . बिहार कविता संतुलन धरती पर पयर धरवा सं पहिने मुक्त हवामे साँस लेवासं पहिने अपन आँखिए किछु देखवासं पहिने मारल जाइत छी जन्म लेवा सं पहिने शो़कक लहरि पसरि जाइत अछि जाहि घर जन्म लैत छी कयल जाइत अछि जन्मे सं कुभेला सभक नजरिसं अबडेरल जाइत छी सभ दिन रहलहुं हम आगू भेटल जखन मौका हमरा तखन कियेक करइ छी हमरा संग अन्याय रोकै छी कियेक अयबा सं हमरा अछि प्रश्न ओहि मायसं हमरा कहबैत छथि जे एक्कैसम सदीक नारी उडितहु कोना आकाशमे माय जं गर्भमे दितथि मारि अछि हमर एकटा अर्जी नहि रोकू धरती पर अयवासं टूटि जायत सृष्टिक संतुलन केवल हमरेटा मरला सं ३. किशन कारीगर करीक्का रूपैया। (हास्य कविता) नेहोरा करैत करैत मरि गेल कारीगर नहि लियअ आ ने दियअ करीक्का रूपैया मुदा ई की कोनो काज करेबाक अछि त कहल जायत जल्दी लाउ करीक्का रूपैया। मौका भेटला पर सरकारी बाबू नहि छोड़त रूपैया बिन एक्को टा काज ने होएत अहाँ फायल ल व्यर्थ घूमैत छी यौ भैया काज करेबाक अछि त जल्दी लाउ करीक्का रूपैया।। कहलहुँ त स्वीस बैंक मे खाता खोलाएब चुपेचाप पार्टी ऑफिस मे चंदा जमा कराएब जीबैत जिनगी हम अप्पन मुर्ती बनाएब मोन होएत त विदेश यात्रा पर जाएब।। कतबो हल्ला करब तै स की स्वीस बैंक मे जमा रहत करबै की लुटा रहल अछि सरकारी खजाना अहुँ लुटु हमहुँ लुटैत छी जमा करू करीक्का रूपैया।। भ्रष्टाचाराक ढे़रीऔलहा संपति हमरे छी एहि दुआरे पक्ष-विपक्ष मे झगरा भेल औ भैया एक दोसराक मुँह पर करीक्का स्याही फेकलक राजनैतिक घमासान मचा देलक करीक्का रूपैया।। रामलीला मैदान मे जनआंदोलन भेल लोकपाल पर कोनो ठोस कारवाई ने भेल सरकार फोंफ काटि रहल अछि बुझलहुँ की साफ सुथरा लोकपाल कहियो आउत ने।। भ्रष्टाचार मे खूम नाम कमेलहुँ मुदा तइयो संतोष नहि भेल औ भैया भ्रष्टाचाराक रोटी खा देह फुलाउ संपैत ढ़ेरियाउ अहाँ जमा करू करीक्का रूपैया।। दुनियाक सभ सँ नमहर लोकतंत्र मे कुर्सी हथिएबाक होड़ मचल अछि अहाँ जुनि पछुआउ गठजोड़ करू यौ भैया चुपेचाप अहाँ जमा करू करीक्का रूपैया।। हल्ला-गुल्ला करने किछ काज ने होएत बिना किछ लेने-देने फायल ने घुसकत ईमानदारी स किछो नहि तकैत की छी जल्दी जेबी गरम करू लाउ अहाँ करीक्का रूपैया।। ४ कपि‍लेश्वर राउत कवि‍ता- माइक ओद्रमे जे भाषा सि‍खलक परदेश जा सभ वि‍सरलक। गाम आबि‍ काहे-कुहे बजैए समाज कहैत आब बड्ड बुझैए। पढ़ल लि‍खल आर वि‍गारलक बाल बच्‍चाकेँ कनभेन्‍ट धरेलक। चालि‍-ढालि‍ अंग्रेजि‍या पकड़ि‍ मातृभाषाकेँ खि‍ल्‍ली उड़ौलक। अप्‍पन भाषा बि‍सरि‍ बहरबैया भाषा अपनौलक। अहाँ मैथि‍लीकेँ केना आगू केलौं अपने तँ गेबे केलौं बच्‍चोकेँ भसि‍एलौं। जेतबो इज्‍जत गौआँ दइए परदेशी ओकरा थकुचैए। गौआँ-घरूआ मैथि‍ली जि‍याबए परदेशि‍या बाहर भगाबए। कनि‍ये अंग्रेजि‍या जोर लगबि‍औ मैथि‍लीकेँ आगाँ देखबि‍औ। जनक आ सीताक भाषा अपनाउ कर्म छोड़ू नै अपनाकेँ बनाउ। वि‍द्यापति‍ आ यात्री कहि‍ गेला मण्‍डन आ अयाची कर्म वीर भेला। अप्‍पन भाषा सभ जन मि‍ठ्ठा एकरा नै बुझू हँसी ठठ्ठा। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। विदेह नूतन अंक मिथिला कला संगीत १ राजनाथ मिश्र चित्रमय मिथिला स्लाइड शो चित्रमय मिथिला (https://sites.google.com/a/videha.com/videha-paintings-photos/ ) २. उमेश मण्डल मिथिलाक वनस्पति स्लाइड शो मिथिलाक जीव-जन्तु स्लाइड शो मिथिलाक जिनगी स्लाइड शो मिथिलाक वनस्पति/ मिथिलाक जीव जन्तु/ मिथिलाक जिनगी  (https://sites.google.com/a/videha.com/videha-paintings-photos/ ) ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। विदेह नूतन अंक गद्य-पद्य भारती १. मोहनदास (दीर्घकथा):लेखक: उदय प्रकाश (मूल हिन्दीसँ मैथिलीमे अनुवाद विनीत उत्पल) मोहनदास (मैथिली-देवनागरी) मोहनदास (मैथिली-मिथिलाक्षर) मोहनदास (मैथिली-ब्रेल) २.छिन्नमस्ता- प्रभा खेतानक हिन्दी उपन्यासक सुशीला झा द्वारा मैथिली अनुवाद छिन्नमस्ता ३.कनकमणि दीक्षित (मूल नेपालीसँ मैथिली अनुवाद धीरेन्द्र प्रेमर्षि) भगता बेङक देश-भ्रमण ४. मंगलेश डबराल- हिन्दीसँ मैथिली अनुवाद विनीत उत्पल घर शांत अछि

रौद भीत केँ रकमे-रकम तपा रहल अछि लगे मे एकटा मद्धिम आँच अछि बिछौना पर एकटा गेंद पड़ल अछि पोथी चुपचाप अछि मुदा ओकरामे कतेक रास बिपैत बंद अछि

हम अधजागल छी आर अधसुतल छी अधसुतल छी आर अधजागल छी बाहरसँ आबै बला शोरमे केकरो कानैक शोर नै अछि केकरो धमकाबैक वा डरैक शोर नै अछि नै कियो प्रार्थना कऽ रहल अछि नै कियो भीख मांगि रहल अछि

आ हमर भीतर कनियो टा मैल नै अछि मुदा एकटा परछायल ठाम अछि जतय कियो रहि सकैत अछि आ हम लाचार नै छी ऐ काल मुदा भरल छी एकटा जरूरी वेदनासँ आ हमरा मोन पड़ि रहल अछि नेना कालक घर जकर अंगनामे चितंग भऽ हम पीठ पर धूप तापैत रही

हम दुनियासँ किछु नै मांगि रहल छी हम जी सकैत छी लुक्खी, गेंद वा घास सन कोनो जिनगी हमरा चिंता नै कहिया कियो झठहासँ हिलाकऽ ढाहि देतै ऐ शांत घरकेँ।

(रचनाकाल : 1990) बालानां कृते डॉ॰ शशिधर कुमर “विदेह” – कीनि दे हमरो खेलौना (बालगीत) माए गे माए !  कीनि दे हमरा खेलौना । कनिञा – पुतरा केर दिन गेलै,  लेब ने  हम झुनझूऽऽना ।। हम्मर  इसकुल  केर संगी सभ, जानि  ने   की – की   लाबैए । “मैथिल बुड़िबक” कहि कऽ हमरा, ओ    सभ   रोज   सिहाबैए । हमरो  कीनि  दे  बार्बी  गुड़िया,  डिज्नी  बला  खेलौना । माए गे माए ! कीनि दे हमरा खेलौना ।। केओ उड़ाबए  हवाई – जहाज, केओ  मोटर  केँ   दौड़ाबैए । केओ हाथ  बन्दूक  लऽ घूमए, विडियो – गेम     देखाबैए । सभहक  हाथ  रिमोट  खेलौना,  हमरा  लग  टुनमूऽऽना । माए गे माए ! कीनि दे हमरा खेलौना ।। धिया   भारती – सिया  हमर, आ  बौआ  गौतम – मण्डन । धिया  हमर  बुधियारि  बहुत, आ  बौआ  तेहने   सज्जन । जुनि कानू, मोन छोट करू नञि, कीनि देब बहुते खेलौना । माए गे माए ! कीनि दे हमरा खेलौना ।। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com  पर पठाउ। बच्चा लोकनि द्वारा स्मरणीय श्लोक १.प्रातः काल ब्रह्ममुहूर्त्त (सूर्योदयक एक घंटा पहिने) सर्वप्रथम अपन दुनू हाथ देखबाक चाही, आ’ ई श्लोक बजबाक चाही। कराग्रे वसते लक्ष्मीः करमध्ये सरस्वती। करमूले स्थितो ब्रह्मा प्रभाते करदर्शनम्॥ करक आगाँ लक्ष्मी बसैत छथि, करक मध्यमे सरस्वती, करक मूलमे ब्रह्मा स्थित छथि। भोरमे ताहि द्वारे करक दर्शन करबाक थीक। २.संध्या काल दीप लेसबाक काल- दीपमूले स्थितो ब्रह्मा दीपमध्ये जनार्दनः। दीपाग्रे शङ्करः प्रोक्त्तः सन्ध्याज्योतिर्नमोऽस्तुते॥ दीपक मूल भागमे ब्रह्मा, दीपक मध्यभागमे जनार्दन (विष्णु) आऽ दीपक अग्र भागमे शङ्कर स्थित छथि। हे संध्याज्योति! अहाँकेँ नमस्कार। ३.सुतबाक काल- रामं स्कन्दं हनूमन्तं वैनतेयं वृकोदरम्। शयने यः स्मरेन्नित्यं दुःस्वप्नस्तस्य नश्यति॥ जे सभ दिन सुतबासँ पहिने राम, कुमारस्वामी, हनूमान्, गरुड़ आऽ भीमक स्मरण करैत छथि, हुनकर दुःस्वप्न नष्ट भऽ जाइत छन्हि। ४. नहेबाक समय- गङ्गे च यमुने चैव गोदावरि सरस्वति। नर्मदे सिन्धु कावेरि जलेऽस्मिन् सन्निधिं कुरू॥ हे गंगा, यमुना, गोदावरी, सरस्वती, नर्मदा, सिन्धु आऽ कावेरी  धार। एहि जलमे अपन सान्निध्य दिअ। ५.उत्तरं यत्समुद्रस्य हिमाद्रेश्चैव दक्षिणम्। वर्षं तत् भारतं नाम भारती यत्र सन्ततिः॥ समुद्रक उत्तरमे आऽ हिमालयक दक्षिणमे भारत अछि आऽ ओतुका सन्तति भारती कहबैत छथि। ६.अहल्या द्रौपदी सीता तारा मण्डोदरी तथा। पञ्चकं ना स्मरेन्नित्यं महापातकनाशकम्॥ जे सभ दिन अहल्या, द्रौपदी, सीता, तारा आऽ मण्दोदरी, एहि पाँच साध्वी-स्त्रीक स्मरण करैत छथि, हुनकर सभ पाप नष्ट भऽ जाइत छन्हि। ७.अश्वत्थामा बलिर्व्यासो हनूमांश्च विभीषणः। कृपः परशुरामश्च सप्तैते चिरञ्जीविनः॥ अश्वत्थामा, बलि, व्यास, हनूमान्, विभीषण, कृपाचार्य आऽ परशुराम- ई सात टा चिरञ्जीवी कहबैत छथि। ८.साते भवतु सुप्रीता देवी शिखर वासिनी उग्रेन तपसा लब्धो यया पशुपतिः पतिः। सिद्धिः साध्ये सतामस्तु प्रसादान्तस्य धूर्जटेः जाह्नवीफेनलेखेव यन्यूधि शशिनः कला॥ ९. बालोऽहं जगदानन्द न मे बाला सरस्वती। अपूर्णे पंचमे वर्षे वर्णयामि जगत्त्रयम् ॥ १०. दूर्वाक्षत मंत्र(शुक्ल यजुर्वेद अध्याय २२, मंत्र २२) आ ब्रह्मन्नित्यस्य प्रजापतिर्ॠषिः। लिंभोक्त्ता देवताः। स्वराडुत्कृतिश्छन्दः। षड्जः स्वरः॥ आ ब्रह्म॑न् ब्राह्म॒णो ब्र॑ह्मवर्च॒सी जा॑यता॒मा रा॒ष्ट्रे रा॑ज॒न्यः शुरे॑ऽइषव्यो॒ऽतिव्या॒धी म॑हार॒थो जा॑यतां॒ दोग्ध्रीं धे॒नुर्वोढा॑न॒ड्वाना॒शुः सप्तिः॒ पुर॑न्धि॒र्योवा॑ जि॒ष्णू र॑थे॒ष्ठाः स॒भेयो॒ युवास्य यज॑मानस्य वी॒रो जा॒यतां निका॒मे-नि॑कामे नः प॒र्जन्यों वर्षतु॒ फल॑वत्यो न॒ऽओष॑धयः पच्यन्तां योगेक्ष॒मो नः॑ कल्पताम्॥२२॥ मन्त्रार्थाः सिद्धयः सन्तु पूर्णाः सन्तु मनोरथाः। शत्रूणां बुद्धिनाशोऽस्तु मित्राणामुदयस्तव। ॐ दीर्घायुर्भव। ॐ सौभाग्यवती भव। हे भगवान्। अपन देशमे सुयोग्य आ’ सर्वज्ञ विद्यार्थी उत्पन्न होथि, आ’ शुत्रुकेँ नाश कएनिहार सैनिक उत्पन्न होथि। अपन देशक गाय खूब दूध दय बाली, बरद भार वहन करएमे सक्षम होथि आ’ घोड़ा त्वरित रूपेँ दौगय बला होए। स्त्रीगण नगरक नेतृत्व करबामे सक्षम होथि आ’ युवक सभामे ओजपूर्ण भाषण देबयबला आ’ नेतृत्व देबामे सक्षम होथि। अपन देशमे जखन आवश्यक होय वर्षा होए आ’ औषधिक-बूटी सर्वदा परिपक्व होइत रहए। एवं क्रमे सभ तरहेँ हमरा सभक कल्याण होए। शत्रुक बुद्धिक नाश होए आ’ मित्रक उदय होए॥ मनुष्यकें कोन वस्तुक इच्छा करबाक चाही तकर वर्णन एहि मंत्रमे कएल गेल अछि। एहिमे वाचकलुप्तोपमालड़्कार अछि। अन्वय- ब्रह्म॑न् - विद्या आदि गुणसँ परिपूर्ण ब्रह्म रा॒ष्ट्रे - देशमे ब्र॑ह्मवर्च॒सी-ब्रह्म विद्याक तेजसँ युक्त्त आ जा॑यतां॒- उत्पन्न होए रा॑ज॒न्यः-राजा शुरे॑ऽ–बिना डर बला इषव्यो॒- बाण चलेबामे निपुण ऽतिव्या॒धी-शत्रुकेँ तारण दय बला म॑हार॒थो-पैघ रथ बला वीर दोग्ध्रीं-कामना(दूध पूर्ण करए बाली) धे॒नुर्वोढा॑न॒ड्वाना॒शुः धे॒नु-गौ वा वाणी र्वोढा॑न॒ड्वा- पैघ बरद ना॒शुः-आशुः-त्वरित सप्तिः॒-घोड़ा पुर॑न्धि॒र्योवा॑- पुर॑न्धि॒- व्यवहारकेँ धारण करए बाली र्योवा॑-स्त्री जि॒ष्णू-शत्रुकेँ जीतए बला र॑थे॒ष्ठाः-रथ पर स्थिर स॒भेयो॒-उत्तम सभामे युवास्य-युवा जेहन यज॑मानस्य-राजाक राज्यमे वी॒रो-शत्रुकेँ पराजित करएबला निका॒मे-नि॑कामे-निश्चययुक्त्त कार्यमे नः-हमर सभक प॒र्जन्यों-मेघ वर्षतु॒-वर्षा होए फल॑वत्यो-उत्तम फल बला ओष॑धयः-औषधिः पच्यन्तां- पाकए योगेक्ष॒मो-अलभ्य लभ्य करेबाक हेतु कएल गेल योगक रक्षा नः॑-हमरा सभक हेतु कल्पताम्-समर्थ होए ग्रिफिथक अनुवाद- हे ब्रह्मण, हमर राज्यमे ब्राह्मण नीक धार्मिक विद्या बला, राजन्य-वीर,तीरंदाज, दूध दए बाली गाय, दौगय बला जन्तु, उद्यमी नारी होथि। पार्जन्य आवश्यकता पड़ला पर वर्षा देथि, फल देय बला गाछ पाकए, हम सभ संपत्ति अर्जित/संरक्षित करी। 8.VIDEHA FOR NON RESIDENTS 8.1 to 8.3 MAITHILI LITERATURE IN ENGLISH 8.1.1.The Comet   -GAJENDRA THAKUR translated by Jyoti Jha chaudhary 8.1.2.The_Science_of_Words- GAJENDRA THAKUR translated by the author himself 8.1.3.On_the_dice-board_of_the_millennium- GAJENDRA THAKUR translated by Jyoti Jha chaudhary 8.1.4.NAAGPHANS (IN ENGLISH)- SHEFALIKA VERMA translated by Dr. Rajiv Kumar Verma and Dr. Jaya Verma विदेह नूतन अंक भाषापाक रचना-लेखन Input: (कोष्ठकमे देवनागरी, मिथिलाक्षर किंवा फोनेटिक-रोमनमे टाइप करू। Input in Devanagari, Mithilakshara or Phonetic-Roman.) Output: (परिणाम देवनागरी, मिथिलाक्षर आ फोनेटिक-रोमन/ रोमनमे। Result in Devanagari, Mithilakshara and Phonetic-Roman/ Roman.) English to Maithili Maithili to English इंग्लिश-मैथिली-कोष / मैथिली-इंग्लिश-कोष  प्रोजेक्टकेँ आगू बढ़ाऊ, अपन सुझाव आ योगदान ई-मेल द्वारा ggajendra@videha.com पर पठाऊ। Top of Form विदेहक मैथिली-अंग्रेजी आ अंग्रेजी मैथिली कोष (इंटरनेटपर पहिल बेर सर्च-डिक्शनरी) एम.एस. एस.क्यू.एल. सर्वर आधारित -Based on ms-sql server Maithili-English and English-Maithili Dictionary. १.भारत आ नेपालक मैथिली भाषा-वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक शैली आ २.मैथिलीमे भाषा सम्पादन पाठ्यक्रम १.नेपाल आ भारतक मैथिली भाषा-वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक शैली

१.१. नेपालक मैथिली भाषा वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक  उच्चारण आ लेखन शैली (भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक धारणाकेँ पूर्ण रूपसँ सङ्ग लऽ निर्धारित) मैथिलीमे उच्चारण तथा लेखन १.पञ्चमाक्षर आ अनुस्वार: पञ्चमाक्षरान्तर्गत ङ, ञ, ण, न एवं म अबैत अछि। संस्कृत भाषाक अनुसार शब्दक अन्तमे जाहि वर्गक अक्षर रहैत अछि ओही वर्गक पञ्चमाक्षर अबैत अछि। जेना- अङ्क (क वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ङ् आएल अछि।) पञ्च (च वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ञ् आएल अछि।) खण्ड (ट वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ण् आएल अछि।) सन्धि (त वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे न् आएल अछि।) खम्भ (प वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे म् आएल अछि।) उपर्युक्त बात मैथिलीमे कम देखल जाइत अछि। पञ्चमाक्षरक बदलामे अधिकांश जगहपर अनुस्वारक प्रयोग देखल जाइछ। जेना- अंक, पंच, खंड, संधि, खंभ आदि। व्याकरणविद पण्डित गोविन्द झाक कहब छनि जे कवर्ग, चवर्ग आ टवर्गसँ पूर्व अनुस्वार लिखल जाए तथा तवर्ग आ पवर्गसँ पूर्व पञ्चमाक्षरे लिखल जाए। जेना- अंक, चंचल, अंडा, अन्त तथा कम्पन। मुदा हिन्दीक निकट रहल आधुनिक लेखक एहि बातकेँ नहि मानैत छथि। ओ लोकनि अन्त आ कम्पनक जगहपर सेहो अंत आ कंपन लिखैत देखल जाइत छथि। नवीन पद्धति किछु सुविधाजनक अवश्य छैक। किएक तँ एहिमे समय आ स्थानक बचत होइत छैक। मुदा कतोक बेर हस्तलेखन वा मुद्रणमे अनुस्वारक छोट सन बिन्दु स्पष्ट नहि भेलासँ अर्थक अनर्थ होइत सेहो देखल जाइत अछि। अनुस्वारक प्रयोगमे उच्चारण-दोषक सम्भावना सेहो ततबए देखल जाइत अछि। एतदर्थ कसँ लऽ कऽ पवर्ग धरि पञ्चमाक्षरेक प्रयोग करब उचित अछि। यसँ लऽ कऽ ज्ञ धरिक अक्षरक सङ्ग अनुस्वारक प्रयोग करबामे कतहु कोनो विवाद नहि देखल जाइछ। २.ढ आ ढ़ : ढ़क उच्चारण “र् ह”जकाँ होइत अछि। अतः जतऽ “र् ह”क उच्चारण हो ओतऽ मात्र ढ़ लिखल जाए। आन ठाम खाली ढ लिखल जएबाक चाही। जेना- ढ = ढाकी, ढेकी, ढीठ, ढेउआ, ढङ्ग, ढेरी, ढाकनि, ढाठ आदि। ढ़ = पढ़ाइ, बढ़ब, गढ़ब, मढ़ब, बुढ़बा, साँढ़, गाढ़, रीढ़, चाँढ़, सीढ़ी, पीढ़ी आदि। उपर्युक्त शब्द सभकेँ देखलासँ ई स्पष्ट होइत अछि जे साधारणतया शब्दक शुरूमे ढ आ मध्य तथा अन्तमे ढ़ अबैत अछि। इएह नियम ड आ ड़क सन्दर्भ सेहो लागू होइत अछि। ३.व आ ब : मैथिलीमे “व”क उच्चारण ब कएल जाइत अछि, मुदा ओकरा ब रूपमे नहि लिखल जएबाक चाही। जेना- उच्चारण : बैद्यनाथ, बिद्या, नब, देबता, बिष्णु, बंश, बन्दना आदि। एहि सभक स्थानपर क्रमशः वैद्यनाथ, विद्या, नव, देवता, विष्णु, वंश, वन्दना लिखबाक चाही। सामान्यतया व उच्चारणक लेल ओ प्रयोग कएल जाइत अछि। जेना- ओकील, ओजह आदि। ४.य आ ज : कतहु-कतहु “य”क उच्चारण “ज”जकाँ करैत देखल जाइत अछि, मुदा ओकरा ज नहि लिखबाक चाही। उच्चारणमे यज्ञ, जदि, जमुना, जुग, जाबत, जोगी, जदु, जम आदि कहल जाएबला शब्द सभकेँ क्रमशः यज्ञ, यदि, यमुना, युग, यावत, योगी, यदु, यम लिखबाक चाही। ५.ए आ य : मैथिलीक वर्तनीमे ए आ य दुनू लिखल जाइत अछि। प्राचीन वर्तनी- कएल, जाए, होएत, माए, भाए, गाए आदि। नवीन वर्तनी- कयल, जाय, होयत, माय, भाय, गाय आदि। सामान्यतया शब्दक शुरूमे ए मात्र अबैत अछि। जेना एहि, एना, एकर, एहन आदि। एहि शब्द सभक स्थानपर यहि, यना, यकर, यहन आदिक प्रयोग नहि करबाक चाही। यद्यपि मैथिलीभाषी थारू सहित किछु जातिमे शब्दक आरम्भोमे “ए”केँ य कहि उच्चारण कएल जाइत अछि। ए आ “य”क प्रयोगक सन्दर्भमे प्राचीने पद्धतिक अनुसरण करब उपयुक्त मानि एहि पुस्तकमे ओकरे प्रयोग कएल गेल अछि। किएक तँ दुनूक लेखनमे कोनो सहजता आ दुरूहताक बात नहि अछि। आ मैथिलीक सर्वसाधारणक उच्चारण-शैली यक अपेक्षा एसँ बेसी निकट छैक। खास कऽ कएल, हएब आदि कतिपय शब्दकेँ कैल, हैब आदि रूपमे कतहु-कतहु लिखल जाएब सेहो “ए”क प्रयोगकेँ बेसी समीचीन प्रमाणित करैत अछि। ६.हि, हु तथा एकार, ओकार : मैथिलीक प्राचीन लेखन-परम्परामे कोनो बातपर बल दैत काल शब्दक पाछाँ हि, हु लगाओल जाइत छैक। जेना- हुनकहि, अपनहु, ओकरहु, तत्कालहि, चोट्टहि, आनहु आदि। मुदा आधुनिक लेखनमे हिक स्थानपर एकार एवं हुक स्थानपर ओकारक प्रयोग करैत देखल जाइत अछि। जेना- हुनके, अपनो, तत्काले, चोट्टे, आनो आदि। ७.ष तथा ख : मैथिली भाषामे अधिकांशतः षक उच्चारण ख होइत अछि। जेना- षड्यन्त्र (खड़यन्त्र), षोडशी (खोड़शी), षट्कोण (खटकोण), वृषेश (वृखेश), सन्तोष (सन्तोख) आदि। ८.ध्वनि-लोप : निम्नलिखित अवस्थामे शब्दसँ ध्वनि-लोप भऽ जाइत अछि: (क) क्रियान्वयी प्रत्यय अयमे य वा ए लुप्त भऽ जाइत अछि। ओहिमे सँ पहिने अक उच्चारण दीर्घ भऽ जाइत अछि। ओकर आगाँ लोप-सूचक चिह्न वा विकारी (’ / ऽ) लगाओल जाइछ। जेना- पूर्ण रूप : पढ़ए (पढ़य) गेलाह, कए (कय) लेल, उठए (उठय) पड़तौक। अपूर्ण रूप : पढ़’ गेलाह, क’ लेल, उठ’ पड़तौक। पढ़ऽ गेलाह, कऽ लेल, उठऽ पड़तौक। (ख) पूर्वकालिक कृत आय (आए) प्रत्ययमे य (ए) लुप्त भऽ जाइछ, मुदा लोप-सूचक विकारी नहि लगाओल जाइछ। जेना- पूर्ण रूप : खाए (य) गेल, पठाय (ए) देब, नहाए (य) अएलाह। अपूर्ण रूप : खा गेल, पठा देब, नहा अएलाह। (ग) स्त्री प्रत्यय इक उच्चारण क्रियापद, संज्ञा, ओ विशेषण तीनूमे लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना- पूर्ण रूप : दोसरि मालिनि चलि गेलि। अपूर्ण रूप : दोसर मालिन चलि गेल। (घ) वर्तमान कृदन्तक अन्तिम त लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना- पूर्ण रूप : पढ़ैत अछि, बजैत अछि, गबैत अछि। अपूर्ण रूप : पढ़ै अछि, बजै अछि, गबै अछि। (ङ) क्रियापदक अवसान इक, उक, ऐक तथा हीकमे लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना- पूर्ण रूप: छियौक, छियैक, छहीक, छौक, छैक, अबितैक, होइक। अपूर्ण रूप : छियौ, छियै, छही, छौ, छै, अबितै, होइ। (च) क्रियापदीय प्रत्यय न्ह, हु तथा हकारक लोप भऽ जाइछ। जेना- पूर्ण रूप : छन्हि, कहलन्हि, कहलहुँ, गेलह, नहि। अपूर्ण रूप : छनि, कहलनि, कहलौँ, गेलऽ, नइ, नञि, नै। ९.ध्वनि स्थानान्तरण : कोनो-कोनो स्वर-ध्वनि अपना जगहसँ हटि कऽ दोसर ठाम चलि जाइत अछि। खास कऽ ह्रस्व इ आ उक सम्बन्धमे ई बात लागू होइत अछि। मैथिलीकरण भऽ गेल शब्दक मध्य वा अन्तमे जँ ह्रस्व इ वा उ आबए तँ ओकर ध्वनि स्थानान्तरित भऽ एक अक्षर आगाँ आबि जाइत अछि। जेना- शनि (शइन), पानि (पाइन), दालि ( दाइल), माटि (माइट), काछु (काउछ), मासु (माउस) आदि। मुदा तत्सम शब्द सभमे ई निअम लागू नहि होइत अछि। जेना- रश्मिकेँ रइश्म आ सुधांशुकेँ सुधाउंस नहि कहल जा सकैत अछि। १०.हलन्त(्)क प्रयोग : मैथिली भाषामे सामान्यतया हलन्त (्)क आवश्यकता नहि होइत अछि। कारण जे शब्दक अन्तमे अ उच्चारण नहि होइत अछि। मुदा संस्कृत भाषासँ जहिनाक तहिना मैथिलीमे आएल (तत्सम) शब्द सभमे हलन्त प्रयोग कएल जाइत अछि। एहि पोथीमे सामान्यतया सम्पूर्ण शब्दकेँ मैथिली भाषा सम्बन्धी निअम अनुसार हलन्तविहीन राखल गेल अछि। मुदा व्याकरण सम्बन्धी प्रयोजनक लेल अत्यावश्यक स्थानपर कतहु-कतहु हलन्त देल गेल अछि। प्रस्तुत पोथीमे मथिली लेखनक प्राचीन आ नवीन दुनू शैलीक सरल आ समीचीन पक्ष सभकेँ समेटि कऽ वर्ण-विन्यास कएल गेल अछि। स्थान आ समयमे बचतक सङ्गहि हस्त-लेखन तथा तकनीकी दृष्टिसँ सेहो सरल होबऽबला हिसाबसँ वर्ण-विन्यास मिलाओल गेल अछि। वर्तमान समयमे मैथिली मातृभाषी पर्यन्तकेँ आन भाषाक माध्यमसँ मैथिलीक ज्ञान लेबऽ पड़ि रहल परिप्रेक्ष्यमे लेखनमे सहजता तथा एकरूपतापर ध्यान देल गेल अछि। तखन मैथिली भाषाक मूल विशेषता सभ कुण्ठित नहि होइक, ताहू दिस लेखक-मण्डल सचेत अछि। प्रसिद्ध भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक कहब छनि जे सरलताक अनुसन्धानमे एहन अवस्था किन्नहु ने आबऽ देबाक चाही जे भाषाक विशेषता छाँहमे पडि जाए। -(भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक धारणाकेँ पूर्ण रूपसँ सङ्ग लऽ निर्धारित) १.२. मैथिली अकादमी, पटना द्वारा निर्धारित मैथिली लेखन-शैली

१. जे शब्द मैथिली-साहित्यक प्राचीन कालसँ आइ धरि जाहि वर्त्तनीमे प्रचलित अछि, से सामान्यतः ताहि वर्त्तनीमे लिखल जाय- उदाहरणार्थ-

ग्राह्य

एखन ठाम जकर, तकर तनिकर अछि

अग्राह्य अखन, अखनि, एखेन, अखनी ठिमा, ठिना, ठमा जेकर, तेकर तिनकर। (वैकल्पिक रूपेँ ग्राह्य) ऐछ, अहि, ए।

२. निम्नलिखित तीन प्रकारक रूप वैकल्पिकतया अपनाओल जाय: भऽ गेल, भय गेल वा भए गेल। जा रहल अछि, जाय रहल अछि, जाए रहल अछि। कर’ गेलाह, वा करय गेलाह वा करए गेलाह।

३. प्राचीन मैथिलीक ‘न्ह’ ध्वनिक स्थानमे ‘न’ लिखल जाय सकैत अछि यथा कहलनि वा कहलन्हि।

४. ‘ऐ’ तथा ‘औ’ ततय लिखल जाय जत’ स्पष्टतः ‘अइ’ तथा ‘अउ’ सदृश उच्चारण इष्ट हो। यथा- देखैत, छलैक, बौआ, छौक इत्यादि।

५. मैथिलीक निम्नलिखित शब्द एहि रूपे प्रयुक्त होयत: जैह, सैह, इएह, ओऐह, लैह तथा दैह।

६. ह्र्स्व इकारांत शब्दमे ‘इ’ के लुप्त करब सामान्यतः अग्राह्य थिक। यथा- ग्राह्य देखि आबह, मालिनि गेलि (मनुष्य मात्रमे)।

७. स्वतंत्र ह्रस्व ‘ए’ वा ‘य’ प्राचीन मैथिलीक उद्धरण आदिमे तँ यथावत राखल जाय, किंतु आधुनिक प्रयोगमे वैकल्पिक रूपेँ ‘ए’ वा ‘य’ लिखल जाय। यथा:- कयल वा कएल, अयलाह वा अएलाह, जाय वा जाए इत्यादि।

८. उच्चारणमे दू स्वरक बीच जे ‘य’ ध्वनि स्वतः आबि जाइत अछि तकरा लेखमे स्थान वैकल्पिक रूपेँ देल जाय। यथा- धीआ, अढ़ैआ, विआह, वा धीया, अढ़ैया, बियाह।

९. सानुनासिक स्वतंत्र स्वरक स्थान यथासंभव ‘ञ’ लिखल जाय वा सानुनासिक स्वर। यथा:- मैञा, कनिञा, किरतनिञा वा मैआँ, कनिआँ, किरतनिआँ।

१०. कारकक विभक्त्तिक निम्नलिखित रूप ग्राह्य:- हाथकेँ, हाथसँ, हाथेँ, हाथक, हाथमे। ’मे’ मे अनुस्वार सर्वथा त्याज्य थिक। ‘क’ क वैकल्पिक रूप ‘केर’ राखल जा सकैत अछि।

११. पूर्वकालिक क्रियापदक बाद ‘कय’ वा ‘कए’ अव्यय वैकल्पिक रूपेँ लगाओल जा सकैत अछि। यथा:- देखि कय वा देखि कए।

१२. माँग, भाँग आदिक स्थानमे माङ, भाङ इत्यादि लिखल जाय।

१३. अर्द्ध ‘न’ ओ अर्द्ध ‘म’ क बदला अनुसार नहि लिखल जाय, किंतु छापाक सुविधार्थ अर्द्ध ‘ङ’ , ‘ञ’, तथा ‘ण’ क बदला अनुस्वारो लिखल जा सकैत अछि। यथा:- अङ्क, वा अंक, अञ्चल वा अंचल, कण्ठ वा कंठ।

१४. हलंत चिह्न निअमतः लगाओल जाय, किंतु विभक्तिक संग अकारांत प्रयोग कएल जाय। यथा:- श्रीमान्, किंतु श्रीमानक।

१५. सभ एकल कारक चिह्न शब्दमे सटा क’ लिखल जाय, हटा क’ नहि, संयुक्त विभक्तिक हेतु फराक लिखल जाय, यथा घर परक।

१६. अनुनासिककेँ चन्द्रबिन्दु द्वारा व्यक्त कयल जाय। परंतु मुद्रणक सुविधार्थ हि समान जटिल मात्रापर अनुस्वारक प्रयोग चन्द्रबिन्दुक बदला कयल जा सकैत अछि। यथा- हिँ केर बदला हिं।

१७. पूर्ण विराम पासीसँ ( । ) सूचित कयल जाय।

१८. समस्त पद सटा क’ लिखल जाय, वा हाइफेनसँ जोड़ि क’ ,  हटा क’ नहि।

१९. लिअ तथा दिअ शब्दमे बिकारी (ऽ) नहि लगाओल जाय।

२०. अंक देवनागरी रूपमे राखल जाय।

२१.किछु ध्वनिक लेल नवीन चिन्ह बनबाओल जाय। जा' ई नहि बनल अछि ताबत एहि दुनू ध्वनिक बदला पूर्ववत् अय/ आय/ अए/ आए/ आओ/ अओ लिखल जाय। आकि ऎ वा ऒ सँ व्यक्त कएल जाय।

ह./- गोविन्द झा ११/८/७६ श्रीकान्त ठाकुर ११/८/७६ सुरेन्द्र झा "सुमन" ११/०८/७६

  २. मैथिलीमे भाषा सम्पादन पाठ्यक्रम २.१. उच्चारण निर्देश: (बोल्ड कएल रूप ग्राह्य):- दन्त न क उच्चारणमे दाँतमे जीह सटत- जेना बाजू नाम , मुदा ण क उच्चारणमे जीह मूर्धामे सटत (नै सटैए तँ उच्चारण दोष अछि)- जेना बाजू गणेश। तालव्य शमे जीह तालुसँ , षमे मूर्धासँ आ दन्त समे दाँतसँ सटत। निशाँ, सभ आ शोषण बाजि कऽ देखू। मैथिलीमे ष केँ वैदिक संस्कृत जकाँ ख सेहो उच्चरित कएल जाइत अछि, जेना वर्षा, दोष। य अनेको स्थानपर ज जकाँ उच्चरित होइत अछि आ ण ड़ जकाँ (यथा संयोग आ गणेश संजोग आ गड़ेस उच्चरित होइत अछि)। मैथिलीमे व क उच्चारण ब, श क उच्चारण स आ य क उच्चारण ज सेहो होइत अछि। ओहिना ह्रस्व इ बेशीकाल मैथिलीमे पहिने बाजल जाइत अछि कारण देवनागरीमे आ मिथिलाक्षरमे ह्रस्व इ अक्षरक पहिने लिखलो जाइत आ बाजलो जएबाक चाही। कारण जे हिन्दीमे एकर दोषपूर्ण उच्चारण होइत अछि (लिखल तँ पहिने जाइत अछि मुदा बाजल बादमे जाइत अछि), से शिक्षा पद्धतिक दोषक कारण हम सभ ओकर उच्चारण दोषपूर्ण ढंगसँ कऽ रहल छी। अछि- अ इ छ  ऐछ (उच्चारण) छथि- छ इ थ  – छैथ (उच्चारण) पहुँचि- प हुँ इ च (उच्चारण) आब अ आ इ ई ए ऐ ओ औ अं अः ऋ ऐ सभ लेल मात्रा सेहो अछि, मुदा ऐमे ई ऐ ओ औ अं अः ऋ केँ संयुक्ताक्षर रूपमे गलत रूपमे प्रयुक्त आ उच्चरित कएल जाइत अछि। जेना ऋ केँ री  रूपमे उच्चरित करब। आ देखियौ- ऐ लेल देखिऔ क प्रयोग अनुचित। मुदा देखिऐ लेल देखियै अनुचित। क् सँ ह् धरि अ सम्मिलित भेलासँ क सँ ह बनैत अछि, मुदा उच्चारण काल हलन्त युक्त शब्दक अन्तक उच्चारणक प्रवृत्ति बढ़ल अछि, मुदा हम जखन मनोजमे ज् अन्तमे बजैत छी, तखनो पुरनका लोककेँ बजैत सुनबन्हि- मनोजऽ, वास्तवमे ओ अ युक्त ज् = ज बजै छथि। फेर ज्ञ अछि ज् आ ञ क संयुक्त मुदा गलत उच्चारण होइत अछि- ग्य। ओहिना क्ष अछि क् आ ष क संयुक्त मुदा उच्चारण होइत अछि छ। फेर श् आ र क संयुक्त अछि श्र ( जेना श्रमिक) आ स् आ र क संयुक्त अछि स्र (जेना मिस्र)। त्र भेल त+र । उच्चारणक ऑडियो फाइल विदेह आर्काइव  http://www.videha.co.in/ पर उपलब्ध अछि। फेर केँ / सँ / पर पूर्व अक्षरसँ सटा कऽ लिखू मुदा तँ / कऽ हटा कऽ। ऐमे सँ मे पहिल सटा कऽ लिखू आ बादबला हटा कऽ। अंकक बाद टा लिखू सटा कऽ मुदा अन्य ठाम टा लिखू हटा कऽ– जेना छहटा मुदा सभ टा। फेर ६अ म सातम लिखू- छठम सातम नै। घरबलामे बला मुदा घरवालीमे वाली प्रयुक्त करू। रहए- रहै मुदा सकैए (उच्चारण सकै-ए)। मुदा कखनो काल रहए आ रहै मे अर्थ भिन्नता सेहो, जेना से कम्मो जगहमे पार्किंग करबाक अभ्यास रहै ओकरा। पुछलापर पता लागल जे ढुनढुन नाम्ना ई ड्राइवर कनाट प्लेसक पार्किंगमे काज करैत रहए। छलै, छलए मे सेहो ऐ तरहक भेल। छलए क उच्चारण छल-ए सेहो। संयोगने- (उच्चारण संजोगने) केँ/  कऽ केर- क ( केर क प्रयोग गद्यमे नै करू , पद्यमे कऽ सकै छी। ) क (जेना रामक) –रामक आ संगे (उच्चारण राम के /  राम कऽ सेहो) सँ- सऽ (उच्चारण) चन्द्रबिन्दु आ अनुस्वार- अनुस्वारमे कंठ धरिक प्रयोग होइत अछि मुदा चन्द्रबिन्दुमे नै। चन्द्रबिन्दुमे कनेक एकारक सेहो उच्चारण होइत अछि- जेना रामसँ- (उच्चारण राम सऽ)  रामकेँ- (उच्चारण राम कऽ/ राम के सेहो)। केँ जेना रामकेँ भेल हिन्दीक को (राम को)- राम को= रामकेँ क जेना रामक भेल हिन्दीक का ( राम का) राम का= रामक कऽ जेना जा कऽ भेल हिन्दीक कर ( जा कर) जा कर= जा कऽ सँ भेल हिन्दीक से (राम से) राम से= रामसँ सऽ , तऽ , त , केर (गद्यमे) एे चारू शब्द सबहक प्रयोग अवांछित। के दोसर अर्थेँ प्रयुक्त भऽ सकैए- जेना, के कहलक? विभक्ति “क”क बदला एकर प्रयोग अवांछित। नञि, नहि, नै, नइ, नँइ, नइँ, नइं ऐ सभक उच्चारण आ लेखन - नै त्त्व क बदलामे त्व जेना महत्वपूर्ण (महत्त्वपूर्ण नै) जतए अर्थ बदलि जाए ओतहि मात्र तीन अक्षरक संयुक्ताक्षरक प्रयोग उचित। सम्पति- उच्चारण स म्प इ त (सम्पत्ति नै- कारण सही उच्चारण आसानीसँ सम्भव नै)। मुदा सर्वोत्तम (सर्वोतम नै)। राष्ट्रिय (राष्ट्रीय नै) सकैए/ सकै (अर्थ परिवर्तन) पोछैले/ पोछै लेल/ पोछए लेल पोछैए/ पोछए/ (अर्थ परिवर्तन) पोछए/ पोछै ओ लोकनि ( हटा कऽ, ओ मे बिकारी नै) ओइ/ ओहि ओहिले/ ओहि लेल/ ओही लऽ जएबेँ/ बैसबेँ पँचभइयाँ देखियौक/ (देखिऔक नै- तहिना अ मे ह्रस्व आ दीर्घक मात्राक प्रयोग अनुचित) जकाँ / जेकाँ तँइ/ तैँ/ होएत / हएत नञि/ नहि/ नँइ/ नइँ/ नै सौँसे/ सौंसे बड़ / बड़ी (झोराओल) गाए (गाइ नहि), मुदा गाइक दूध (गाएक दूध नै।) रहलेँ/ पहिरतैँ हमहीं/ अहीं सब - सभ सबहक - सभहक धरि - तक गप- बात बूझब - समझब बुझलौं/ समझलौं/ बुझलहुँ - समझलहुँ हमरा आर - हम सभ आकि- आ कि सकैछ/ करैछ (गद्यमे प्रयोगक आवश्यकता नै) होइन/ होनि जाइन (जानि नै, जेना देल जाइन) मुदा जानि-बूझि (अर्थ परिव्र्तन) पइठ/ जाइठ आउ/ जाउ/ आऊ/ जाऊ मे, केँ, सँ, पर (शब्दसँ सटा कऽ) तँ कऽ धऽ दऽ (शब्दसँ हटा कऽ) मुदा दूटा वा बेसी विभक्ति संग रहलापर पहिल विभक्ति टाकेँ सटाऊ। जेना ऐमे सँ । एकटा , दूटा (मुदा कए टा) बिकारीक प्रयोग शब्दक अन्तमे, बीचमे अनावश्यक रूपेँ नै। आकारान्त आ अन्तमे अ क बाद बिकारीक प्रयोग नै (जेना दिअ , आ/ दिय’ , आ’, आ नै ) अपोस्ट्रोफीक प्रयोग बिकारीक बदलामे करब अनुचित आ मात्र फॉन्टक तकनीकी न्यूनताक परिचायक)- ओना बिकारीक संस्कृत रूप ऽ अवग्रह कहल जाइत अछि आ वर्तनी आ उच्चारण दुनू ठाम एकर लोप रहैत अछि/ रहि सकैत अछि (उच्चारणमे लोप रहिते अछि)। मुदा अपोस्ट्रोफी सेहो अंग्रेजीमे पसेसिव केसमे होइत अछि आ फ्रेंचमे शब्दमे जतए एकर प्रयोग होइत अछि जेना raison d’etre एतए सेहो एकर उच्चारण रैजौन डेटर होइत अछि, माने अपोस्ट्रॉफी अवकाश नै दैत अछि वरन जोड़ैत अछि, से एकर प्रयोग बिकारीक बदला देनाइ तकनीकी रूपेँ सेहो अनुचित)। अइमे, एहिमे/ ऐमे जइमे, जाहिमे एखन/ अखन/ अइखन केँ (के नहि) मे (अनुस्वार रहित) भऽ मे दऽ तँ (तऽ, त नै) सँ ( सऽ स नै) गाछ तर गाछ लग साँझ खन जो (जो go, करै जो do) तै/तइ जेना- तै दुआरे/ तइमे/ तइले जै/जइ जेना- जै कारण/ जइसँ/ जइले ऐ/अइ जेना- ऐ कारण/ ऐसँ/ अइले/ मुदा एकर एकटा खास प्रयोग- लालति‍ कतेक दि‍नसँ कहैत रहैत अइ लै/लइ जेना लैसँ/ लइले/ लै दुआरे लहँ/ लौं गेलौं/ लेलौं/ लेलँह/ गेलहुँ/ लेलहुँ/ लेलँ जइ/ जाहि‍/ जै जहि‍ठाम/ जाहि‍ठाम/ जइठाम/ जैठाम एहि‍/ अहि‍/ अइ (वाक्यक अंतमे ग्राह्य) / ऐ अइछ/ अछि‍/ ऐछ तइ/ तहि‍/ तै/ ताहि‍ ओहि‍/ ओइ सीखि‍/ सीख जीवि‍/ जीवी/ जीब भलेहीं/ भलहि‍ं तैं/ तँइ/ तँए जाएब/ जएब लइ/ लै छइ/ छै नहि‍/ नै/ नइ गइ/ गै छनि‍/ छन्‍हि‍  ... समए शब्‍दक संग जखन कोनो वि‍भक्‍ति‍ जुटै छै तखन समै जना समैपर इत्‍यादि‍। असगरमे हृदए आ वि‍भक्‍ति‍ जुटने हृदे जना हृदेसँ, हृदेमे इत्‍यादि‍। जइ/ जाहि‍/ जै जहि‍ठाम/ जाहि‍ठाम/ जइठाम/ जैठाम एहि‍/ अहि‍/ अइ/ ऐ अइछ/ अछि‍/ ऐछ तइ/ तहि‍/ तै/ ताहि‍ ओहि‍/ ओइ सीखि‍/ सीख जीवि‍/ जीवी/ जीब भले/ भलेहीं/ भलहि‍ं तैं/ तँइ/ तँए जाएब/ जएब लइ/ लै छइ/ छै नहि‍/ नै/ नइ गइ/ गै छनि‍/ छन्‍हि‍ चुकल अछि/ गेल गछि २.२. मैथिलीमे भाषा सम्पादन पाठ्यक्रम नीचाँक सूचीमे देल विकल्पमेसँ लैंगुएज एडीटर द्वारा कोन रूप चुनल जेबाक चाही: बोल्ड कएल रूप ग्राह्य: १.होयबला/ होबयबला/ होमयबला/ हेब’बला, हेम’बला/ होयबाक/होबएबला /होएबाक २. आ’/आऽ आ ३. क’ लेने/कऽ लेने/कए लेने/कय लेने/ल’/लऽ/लय/लए ४. भ’ गेल/भऽ गेल/भय गेल/भए गेल ५. कर’ गेलाह/करऽ गेलह/करए गेलाह/करय गेलाह ६. लिअ/दिअ लिय’,दिय’,लिअ’,दिय’/ ७. कर’ बला/करऽ बला/ करय बला करैबला/क’र’ बला / करैवाली ८. बला वला (पुरूष), वाली (स्‍त्री) ९ . आङ्ल आंग्ल १०. प्रायः प्रायह ११. दुःख दुख १ २. चलि गेल चल गेल/चैल गेल १३. देलखिन्ह देलकिन्ह, देलखिन १४. देखलन्हि देखलनि/ देखलैन्ह १५. छथिन्ह/ छलन्हि छथिन/ छलैन/ छलनि १६. चलैत/दैत चलति/दैति १७. एखनो अखनो १८. बढ़नि‍ बढ़इन बढ़न्हि १९. ओ’/ओऽ(सर्वनाम) ओ २० . ओ (संयोजक) ओ’/ओऽ २१. फाँगि/फाङ्गि फाइंग/फाइङ २२. जे जे’/जेऽ २३. ना-नुकुर ना-नुकर २४. केलन्हि/केलनि‍/कयलन्हि २५. तखनतँ/ तखन तँ २६. जा रहल/जाय रहल/जाए रहल २७. निकलय/निकलए लागल/ लगल बहराय/ बहराए लागल/ लगल निकल’/बहरै लागल २८. ओतय/ जतय जत’/ ओत’/ जतए/ ओतए २९. की फूरल जे कि फूरल जे ३०. जे जे’/जेऽ ३१. कूदि / यादि(मोन पारब) कूइद/याइद/कूद/याद/ यादि (मोन) ३२. इहो/ ओहो ३३. हँसए/ हँसय हँसऽ ३४. नौ आकि दस/नौ किंवा दस/ नौ वा दस ३५. सासु-ससुर सास-ससुर ३६. छह/ सात छ/छः/सात ३७. की  की’/ कीऽ (दीर्घीकारान्तमे ऽ वर्जित) ३८. जबाब जवाब ३९. करएताह/ करेताह करयताह ४०. दलान दिशि दलान दिश/दलान दिस ४१ . गेलाह गएलाह/गयलाह ४२. किछु आर/ किछु और/ किछ आर ४३. जाइ छल/ जाइत छल जाति छल/जैत छल ४४. पहुँचि/ भेट जाइत छल/ भेट जाइ छलए पहुँच/ भेटि‍ जाइत छल ४५. जबान (युवा)/ जवान(फौजी) ४६. लय/ लए क’/ कऽ/ लए कए / लऽ कऽ/ लऽ कए ४७. ल’/लऽ कय/ कए ४८. एखन / एखने / अखन / अखने ४९. अहींकेँ अहीँकेँ ५०. गहींर गहीँर ५१. धार पार केनाइ धार पार केनाय/केनाए ५२. जेकाँ जेँकाँ/ जकाँ ५३. तहिना तेहिना ५४. एकर अकर ५५. बहिनउ बहनोइ ५६. बहिन बहिनि ५७. बहिन-बहिनोइ बहिन-बहनउ ५८. नहि/ नै ५९. करबा / करबाय/ करबाए ६०. तँ/ त ऽ तय/तए ६१. भैयारी मे छोट-भाए/भै/, जेठ-भाय/भाइ, ६२. गि‍नतीमे दू भाइ/भाए/भाँइ ६३. ई पोथी दू भाइक/ भाँइ/ भाए/ लेल। यावत जावत ६४. माय मै / माए मुदा माइक ममता ६५. देन्हि/ दइन दनि‍/ दएन्हि/ दयन्हि दन्हि/ दैन्हि ६६. द’/ दऽ/ दए ६७. ओ (संयोजक) ओऽ (सर्वनाम) ६८. तका कए तकाय तकाए ६९. पैरे (on foot) पएरे  कएक/ कैक ७०. ताहुमे/ ताहूमे ७१. पुत्रीक ७२. बजा कय/ कए / कऽ ७३. बननाय/बननाइ ७४. कोला ७५. दिनुका दिनका ७६. ततहिसँ ७७. गरबओलन्हि/ गरबौलनि‍/ गरबेलन्हि/ गरबेलनि‍ ७८. बालु बालू ७९. चेन्ह चिन्ह(अशुद्ध) ८०. जे जे’ ८१ . से/ के से’/के’ ८२. एखुनका अखनुका ८३. भुमिहार भूमिहार ८४. सुग्गर / सुगरक/ सूगर ८५. झठहाक झटहाक ८६. छूबि ८७. करइयो/ओ करैयो ने देलक /करियौ-करइयौ ८८. पुबारि पुबाइ ८९. झगड़ा-झाँटी झगड़ा-झाँटि ९०. पएरे-पएरे पैरे-पैरे ९१. खेलएबाक ९२. खेलेबाक ९३. लगा ९४. होए- हो – होअए ९५. बुझल बूझल ९६. बूझल (संबोधन अर्थमे) ९७. यैह यएह / इएह/ सैह/ सएह ९८. तातिल ९९. अयनाय- अयनाइ/ अएनाइ/ एनाइ १००. निन्न- निन्द १०१. बिनु बिन १०२. जाए जाइ १०३. जाइ (in different sense)-last word of sentence १०४. छत पर आबि जाइ १०५. ने १०६. खेलाए (play) –खेलाइ १०७. शिकाइत- शिकायत १०८. ढप- ढ़प १०९ . पढ़- पढ ११०. कनिए/ कनिये कनिञे १११. राकस- राकश ११२. होए/ होय होइ ११३. अउरदा- औरदा ११४. बुझेलन्हि (different meaning- got understand) ११५. बुझएलन्हि/बुझेलनि‍/ बुझयलन्हि (understood himself) ११६. चलि- चल/ चलि‍ गेल ११७. खधाइ- खधाय ११८. मोन पाड़लखिन्ह/ मोन पाड़लखि‍न/ मोन पारलखिन्ह ११९. कैक- कएक- कइएक १२०. लग ल’ग १२१. जरेनाइ १२२. जरौनाइ जरओनाइ- जरएनाइ/ जरेनाइ १२३. होइत १२४. गरबेलन्हि/ गरबेलनि‍ गरबौलन्हि/ गरबौलनि‍ १२५. चिखैत- (to test)चिखइत १२६. करइयो (willing to do) करैयो १२७. जेकरा- जकरा १२८. तकरा- तेकरा १२९. बिदेसर स्थानेमे/ बिदेसरे स्थानमे १३०. करबयलहुँ/ करबएलहुँ/ करबेलहुँ करबेलौं १३१. हारिक (उच्चारण हाइरक) १३२. ओजन वजन आफसोच/ अफसोस कागत/ कागच/ कागज १३३. आधे भाग/ आध-भागे १३४. पिचा / पिचाय/पिचाए १३५. नञ/ ने १३६. बच्चा नञ (ने) पिचा जाय १३७. तखन ने (नञ) कहैत अछि। कहै/ सुनै/ देखै छल मुदा कहैत-कहैत/ सुनैत-सुनैत/ देखैत-देखैत १३८. कतेक गोटे/ कताक गोटे १३९. कमाइ-धमाइ/ कमाई- धमाई १४० . लग ल’ग १४१. खेलाइ (for playing) १४२. छथिन्ह/ छथिन १४३. होइत होइ १४४. क्यो कियो / केओ १४५. केश (hair) १४६. केस (court-case) १४७ . बननाइ/ बननाय/ बननाए १४८. जरेनाइ १४९. कुरसी कुर्सी १५०. चरचा चर्चा १५१. कर्म करम १५२. डुबाबए/ डुबाबै/ डुमाबै डुमाबय/ डुमाबए १५३. एखुनका/ अखुनका १५४. लए/ लिअए (वाक्यक अंतिम शब्द)- लऽ १५५. कएलक/ केलक १५६. गरमी गर्मी १५७ . वरदी वर्दी १५८. सुना गेलाह सुना’/सुनाऽ १५९. एनाइ-गेनाइ १६०. तेना ने घेरलन्हि/ तेना ने घेरलनि‍ १६१. नञि / नै १६२. डरो ड’रो १६३. कतहु/ कतौ कहीं १६४. उमरिगर-उमेरगर उमरगर १६५. भरिगर १६६. धोल/धोअल धोएल १६७. गप/गप्प १६८. के के’ १६९. दरबज्जा/ दरबजा १७०. ठाम १७१. धरि तक १७२. घूरि लौटि १७३. थोरबेक १७४. बड्ड १७५. तोँ/ तूँ १७६. तोँहि( पद्यमे ग्राह्य) १७७. तोँही / तोँहि १७८. करबाइए करबाइये १७९. एकेटा १८०. करितथि /करतथि १८१. पहुँचि/ पहुँच १८२. राखलन्हि रखलन्हि/ रखलनि‍ १८३. लगलन्हि/ लगलनि‍ लागलन्हि १८४. सुनि (उच्चारण सुइन) १८५. अछि (उच्चारण अइछ) १८६. एलथि गेलथि १८७. बितओने/ बि‍तौने/ बितेने १८८. करबओलन्हि/ करबौलनि‍/ करेलखिन्ह/ करेलखि‍न १८९. करएलन्हि/ करेलनि‍ १९०. आकि/ कि १९१. पहुँचि/ पहुँच १९२. बत्ती जराय/ जराए जरा (आगि लगा) १९३. से से’ १९४. हाँ मे हाँ (हाँमे हाँ विभक्त्तिमे हटा कए) १९५. फेल फैल १९६. फइल(spacious) फैल १९७. होयतन्हि/ होएतन्हि/ होएतनि‍/हेतनि‍/ हेतन्हि १९८. हाथ मटिआएब/ हाथ मटियाबय/हाथ मटियाएब १९९. फेका फेंका २००. देखाए देखा २०१. देखाबए २०२. सत्तरि सत्तर २०३. साहेब साहब २०४.गेलैन्ह/ गेलन्हि/ गेलनि‍ २०५. हेबाक/ होएबाक २०६.केलो/ कएलहुँ/केलौं/ केलुँ २०७. किछु न किछु/ किछु ने किछु २०८.घुमेलहुँ/ घुमओलहुँ/ घुमेलौं २०९. एलाक/ अएलाक २१०. अः/ अह २११.लय/ लए (अर्थ-परिवर्त्तन) २१२.कनीक/ कनेक २१३.सबहक/ सभक २१४.मिलाऽ/ मिला २१५.कऽ/ क २१६.जाऽ/ जा २१७.आऽ/ आ २१८.भऽ /भ’ (’ फॉन्टक कमीक द्योतक) २१९.निअम/ नियम २२० .हेक्टेअर/ हेक्टेयर २२१.पहिल अक्षर ढ/ बादक/ बीचक ढ़ २२२.तहिं/तहिँ/ तञि/ तैं २२३.कहिं/ कहीं २२४.तँइ/ तैं / तइँ २२५.नँइ/ नइँ/  नञि/ नहि/नै २२६.है/ हए / एलीहेँ/ २२७.छञि/ छै/ छैक /छइ २२८.दृष्टिएँ/ दृष्टियेँ २२९.आ (come)/ आऽ(conjunction) २३०. आ (conjunction)/ आऽ(come) २३१.कुनो/ कोनो, कोना/केना २३२.गेलैन्ह-गेलन्हि-गेलनि‍ २३३.हेबाक- होएबाक २३४.केलौँ- कएलौँ-कएलहुँ/केलौं २३५.किछु न किछ- किछु ने किछु २३६.केहेन- केहन २३७.आऽ (come)-आ (conjunction-and)/आ। आब'-आब' /आबह-आबह २३८. हएत-हैत २३९.घुमेलहुँ-घुमएलहुँ- घुमेलाें २४०.एलाक- अएलाक २४१.होनि- होइन/ होन्हि/ २४२.ओ-राम ओ श्यामक बीच(conjunction), ओऽ कहलक (he said)/ओ २४३.की हए/ कोसी अएली हए/ की है। की हइ २४४.दृष्टिएँ/ दृष्टियेँ २४५ .शामिल/ सामेल २४६.तैँ / तँए/ तञि/ तहिं २४७.जौं / ज्योँ/ जँ/ २४८.सभ/ सब २४९.सभक/ सबहक २५०.कहिं/ कहीं २५१.कुनो/ कोनो/ कोनहुँ/ २५२.फारकती भऽ गेल/ भए गेल/ भय गेल २५३.कोना/ केना/ कन्‍ना/कना २५४.अः/ अह २५५.जनै/ जनञ २५६.गेलनि‍/ गेलाह (अर्थ परिवर्तन) २५७.केलन्हि/ कएलन्हि/ केलनि‍/ २५८.लय/ लए/ लएह (अर्थ परिवर्तन) २५९.कनीक/ कनेक/कनी-मनी २६०.पठेलन्हि‍ पठेलनि‍/ पठेलइन/ पपठओलन्हि/ पठबौलनि‍/ २६१.निअम/ नियम २६२.हेक्टेअर/ हेक्टेयर २६३.पहिल अक्षर रहने ढ/ बीचमे रहने ढ़ २६४.आकारान्तमे बिकारीक प्रयोग उचित नै/ अपोस्ट्रोफीक प्रयोग फान्टक तकनीकी न्यूनताक परिचायक ओकर बदला अवग्रह (बिकारी) क प्रयोग उचित २६५.केर (पद्यमे ग्राह्य) / -क/ कऽ/ के २६६.छैन्हि- छन्हि २६७.लगैए/ लगैये २६८.होएत/ हएत २६९.जाएत/ जएत/ २७०.आएत/ अएत/ आओत २७१ .खाएत/ खएत/ खैत २७२.पिअएबाक/ पिएबाक/पि‍येबाक २७३.शुरु/ शुरुह २७४.शुरुहे/ शुरुए २७५.अएताह/अओताह/ एताह/ औताह २७६.जाहि/ जाइ/ जइ/ जै/ २७७.जाइत/ जैतए/ जइतए २७८.आएल/ अएल २७९.कैक/ कएक २८०.आयल/ अएल/ आएल २८१. जाए/ जअए/ जए (लालति‍ जाए लगलीह।) २८२. नुकएल/ नुकाएल २८३. कठुआएल/ कठुअएल २८४. ताहि/ तै/ तइ २८५. गायब/ गाएब/ गएब २८६. सकै/ सकए/ सकय २८७.सेरा/सरा/ सराए (भात सरा गेल) २८८.कहैत रही/देखैत रही/ कहैत छलौं/ कहै छलौं- अहिना चलैत/ पढ़ैत (पढ़ै-पढ़ैत अर्थ कखनो काल परिवर्तित) - आर बुझै/ बुझैत (बुझै/ बुझै छी, मुदा बुझैत-बुझैत)/ सकैत/ सकै। करैत/ करै। दै/ दैत। छैक/ छै। बचलै/ बचलैक। रखबा/ रखबाक । बिनु/ बिन। रातिक/ रातुक बुझै आ बुझैत केर अपन-अपन जगहपर प्रयोग समीचीन अछि‍। बुझैत-बुझैत आब बुझलि‍ऐ। हमहूँ बुझै छी। २८९. दुआरे/ द्वारे २९०.भेटि/ भेट/ भेँट २९१. खन/ खीन/  खुना (भोर खन/ भोर खीन) २९२.तक/ धरि २९३.गऽ/ गै (meaning different-जनबै गऽ) २९४.सऽ/ सँ (मुदा दऽ, लऽ) २९५.त्त्व,(तीन अक्षरक मेल बदला पुनरुक्तिक एक आ एकटा दोसरक उपयोग) आदिक बदला त्व आदि। महत्त्व/ महत्व/ कर्ता/ कर्त्ता आदिमे त्त संयुक्तक कोनो आवश्यकता मैथिलीमे नै अछि। वक्तव्य २९६.बेसी/ बेशी २९७.बाला/वाला बला/ वला (रहैबला) २९८ .वाली/ (बदलैवाली) २९९.वार्त्ता/ वार्ता ३००. अन्तर्राष्ट्रिय/ अन्तर्राष्ट्रीय ३०१. लेमए/ लेबए ३०२.लमछुरका, नमछुरका ३०२.लागै/ लगै ( भेटैत/ भेटै) ३०३.लागल/ लगल ३०४.हबा/ हवा ३०५.राखलक/ रखलक ३०६.आ (come)/ आ (and) ३०७. पश्चाताप/ पश्चात्ताप ३०८. ऽ केर व्यवहार शब्दक अन्तमे मात्र, यथासंभव बीचमे नै। ३०९.कहैत/ कहै ३१०. रहए (छल)/ रहै (छलै) (meaning different) ३११.तागति/ ताकति ३१२.खराप/ खराब ३१३.बोइन/ बोनि/ बोइनि ३१४.जाठि/ जाइठ ३१५.कागज/ कागच/ कागत ३१६.गिरै (meaning different- swallow)/ गिरए (खसए) ३१७.राष्ट्रिय/ राष्ट्रीय Festivals of Mithila DATE-LIST (year- 2011-12) (१४१९ साल) Marriage Days: Nov.2011- 20,21,23,25,27,30 Dec.2011- 1,5,9 January 2012- 18,19,20,23,25,27,29 Feb.2012- 2,3,8,9,10,16,17,19,23,24,29 March 2012- 1,8,9,12 April 2012- 15,16,18,25,26 June 2012- 8,13,24,25,28,29 Upanayana Days: February 2012- 2,3,24,26 March 2012- 4 April 2012- 1,2,26 June 2012- 22 Dviragaman Din: November 2011- 27,30 December 2011- 1,2,5,7,9,12 February 2012- 22,23,24,26,27,29 March 2012- 1,2,4,5,9,11,12 April 2012- 23,25,26,29 May 2012- 2,3,4,6,7 Mundan Din: December 2011- 1,5 January 201225,26,30 March 2012- 12 April 2012- 26 May 2012- 23,25,31 June 2012- 8,21,22,29 FESTIVALS OF MITHILA Mauna Panchami-20 July Madhushravani- 2 August Nag Panchami- 4 August Raksha Bandhan- 13 Aug Krishnastami- 21 August Kushi Amavasya / Somvari Vrat- 29 August Hartalika Teej- 31 August ChauthChandra-1 September Karma Dharma Ekadashi-8 September Indra Pooja Aarambh- 9 September Anant Caturdashi- 11 Sep Agastyarghadaan- 12 Sep Pitri Paksha begins- 13 Sep Mahalaya Aarambh- 13 September Vishwakarma Pooja- 17 September Jimootavahan Vrata/ Jitia-20 September Matri Navami- 21September Kalashsthapan- 28 September Belnauti- 2 October Patrika Pravesh- 3 October Mahastami- 4 October Maha Navami - 5 October Vijaya Dashami- 6 October Kojagara- 11 Oct Dhanteras- 24 October Diyabati, shyama pooja-26 October Annakoota/ Govardhana Pooja-27  October Bhratridwitiya/ Chitragupta Pooja-28 October Chhathi-kharna -31 October Chhathi- sayankalik arghya - 1 November Devotthan Ekadashi- 17 November Sama poojarambh- 2 November Kartik Poornima/ Sama Bisarjan- 10 Nov ravivratarambh- 27 November Navanna parvan- 29 November Vivaha Panchmi- 29 November Makara/ Teela Sankranti-15 Jan Naraknivaran chaturdashi- 21 January Basant Panchami/ Saraswati Pooja- 28 January Achla Saptmi- 30 January Mahashivaratri-20 February Holikadahan-Fagua-7 March Holi-9 Mar Varuni Yoga-20 March Chaiti  navaratrarambh- 23 March Chaiti Chhathi vrata-29 March Ram Navami- 1 April Mesha Sankranti-Satuani-13 April Jurishital-14 April Akshaya Tritiya-24 April Ravi Brat Ant- 29 April Janaki Navami- 30 April Vat Savitri-barasait- 20 May Ganga Dashhara-30 May Somavati Amavasya Vrata- 18 June Jagannath Rath Yatra- 21 June Hari Sayan Ekadashi- 30 June Aashadhi Guru Poornima-3 Jul VIDEHA ARCHIVE १.विदेह ई-पत्रिकाक सभटा पुरान अंक ब्रेल, तिरहुता आ देवनागरी रूपमे Videha e journal's all old issues in Braille Tirhuta and Devanagari versions विदेह ई-पत्रिकाक पहिल ५० अंक

विदेह ई-पत्रिकाक ५०म सँ आगाँक अंक २.मैथिली पोथी डाउनलोड Maithili Books Download ३.मैथिली ऑडियो संकलन Maithili Audio Downloads ४.मैथिली वीडियोक संकलन Maithili Videos ५.मिथिला चित्रकला/ आधुनिक चित्रकला आ चित्र Mithila Painting/ Modern Art and Photos "विदेह"क एहि सभ सहयोगी लिंकपर सेहो एक बेर जाऊ। ६.विदेह मैथिली क्विज  :  http://videhaquiz.blogspot.com/ ७.विदेह मैथिली जालवृत्त एग्रीगेटर : http://videha-aggregator.blogspot.com/ ८.विदेह मैथिली साहित्य अंग्रेजीमे अनूदित http://madhubani-art.blogspot.com/ ९.विदेहक पूर्व-रूप "भालसरिक गाछ"  : http://gajendrathakur.blogspot.com/ १०.विदेह इंडेक्स  : http://videha123.blogspot.com/ ११.विदेह फाइल : http://videha123.wordpress.com/ १२. विदेह: सदेह : पहिल तिरहुता (मिथिला़क्षर) जालवृत्त (ब्लॉग) http://videha-sadeha.blogspot.com/ १३. विदेह:ब्रेल: मैथिली ब्रेलमे: पहिल बेर विदेह द्वारा http://videha-braille.blogspot.com/ १४.VIDEHA IST MAITHILI  FORTNIGHTLY EJOURNAL ARCHIVE http://videha-archive.blogspot.com/ १५. विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका मैथिली पोथीक आर्काइव http://videha-pothi.blogspot.com/ १६. विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका ऑडियो आर्काइव http://videha-audio.blogspot.com/ १७. विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका वीडियो आर्काइव http://videha-video.blogspot.com/ १८. विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका मिथिला चित्रकला, आधुनिक कला आ चित्रकला http://videha-paintings-photos.blogspot.com/ १९. मैथिल आर मिथिला (मैथिलीक सभसँ लोकप्रिय जालवृत्त) http://maithilaurmithila.blogspot.com/ २०.श्रुति प्रकाशन http://www.shruti-publication.com/ २१.http://groups.google.com/group/videha VIDEHA केर सदस्यता लिअ Top of Form Bottom of Form ईमेल : एहि समूहपर जाऊ २२.http://groups.yahoo.com/group/VIDEHA/ Top of Form Subscribe to VIDEHA Powered by us.groups.yahoo.com Bottom of Form २३.गजेन्द्र ठाकुर इ‍डेक्स http://gajendrathakur123.blogspot.com २४. नेना भुटका http://mangan-khabas.blogspot.com/ २५.विदेह रेडियो:मैथिली कथा-कविता आदिक पहिल पोडकास्ट साइट http://videha123radio.wordpress.com/ २६.Videha Radio २७. Join official Videha facebook group. २८. विदेह मैथिली नाट्य उत्सव http://maithili-drama.blogspot.com/ २९.समदिया http://esamaad.blogspot.com/ ३०. मैथिली फिल्म्स http://maithilifilms.blogspot.com/ ३१.अनचिन्हार आखर http://anchinharakharkolkata.blogspot.com/ ३२. मैथिली हाइकू http://maithili-haiku.blogspot.com/ ३३. मानक मैथिली http://manak-maithili.blogspot.com/ महत्त्वपूर्ण सूचना:(१) 'विदेह' द्वारा धारावाहिक रूपे ई-प्रकाशित कएल गेल गजेन्द्र ठाकुरक  निबन्ध-प्रबन्ध-समीक्षा, उपन्यास (सहस्रबाढ़नि) , पद्य-संग्रह (सहस्राब्दीक चौपड़पर), कथा-गल्प (गल्प-गुच्छ), नाटक(संकर्षण), महाकाव्य (त्वञ्चाहञ्च आ असञ्जाति मन) आ बाल-किशोर साहित्य विदेहमे संपूर्ण ई-प्रकाशनक बाद प्रिंट फॉर्ममे। कुरुक्षेत्रम्–अन्तर्मनक खण्ड-१ सँ ७ Combined ISBN No.978-81-907729-7-6 विवरण एहि पृष्ठपर नीचाँमे आ प्रकाशकक साइट http://www.shruti-publication.com/ पर । महत्त्वपूर्ण सूचना (२):सूचना: विदेहक मैथिली-अंग्रेजी आ अंग्रेजी मैथिली कोष (इंटरनेटपर पहिल बेर सर्च-डिक्शनरी) एम.एस. एस.क्यू.एल. सर्वर आधारित -Based on ms-sql server Maithili-English and English-Maithili Dictionary. विदेहक भाषापाक- रचनालेखन स्तंभमे। कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक- गजेन्द्र ठाकुर गजेन्द्र ठाकुरक निबन्ध-प्रबन्ध-समीक्षा, उपन्यास (सहस्रबाढ़नि) , पद्य-संग्रह (सहस्राब्दीक चौपड़पर), कथा-गल्प (गल्प गुच्छ), नाटक(संकर्षण), महाकाव्य (त्वञ्चाहञ्च आ असञ्जाति मन) आ बालमंडली-किशोरजगत विदेहमे संपूर्ण ई-प्रकाशनक बाद प्रिंट फॉर्ममे। कुरुक्षेत्रम्–अन्तर्मनक, खण्ड-१ सँ ७ Ist edition 2009 of Gajendra Thakur’s KuruKshetram-Antarmanak (Vol. I to VII)- essay-paper-criticism, novel, poems, story, play, epics and Children-grown-ups literature in single binding: Language:Maithili ६९२ पृष्ठ : मूल्य भा. रु. 100/-(for individual buyers inside india) (add courier charges Rs.50/-per copy for Delhi/NCR and Rs.100/- per copy for outside Delhi)

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Details for purchase available at print-version publishers's site website: http://www.shruti-publication.com/ or you may write to e-mail:shruti.publication@shruti-publication.com विदेह: सदेह : १: २: ३: ४ तिरहुता : देवनागरी "विदेह" क, प्रिंट संस्करण :विदेह-ई-पत्रिका (http://www.videha.co.in/) क चुनल रचना सम्मिलित। विदेह:सदेह:१: २: ३: ४ सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। Details for purchase available at print-version publishers's site http://www.shruti-publication.com  or you may write to shruti.publication@shruti-publication.com २. संदेश- [ विदेह ई-पत्रिका, विदेह:सदेह मिथिलाक्षर आ देवनागरी आ गजेन्द्र ठाकुरक सात खण्डक- निबन्ध-प्रबन्ध-समीक्षा,उपन्यास (सहस्रबाढ़नि) , पद्य-संग्रह (सहस्राब्दीक चौपड़पर), कथा-गल्प (गल्प गुच्छ), नाटक (संकर्षण), महाकाव्य (त्वञ्चाहञ्च आ असञ्जाति मन) आ बाल-मंडली-किशोर जगत- संग्रह कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक मादेँ। ] १.श्री गोविन्द झा- विदेहकेँ तरंगजालपर उतारि विश्वभरिमे मातृभाषा मैथिलीक लहरि जगाओल, खेद जे अपनेक एहि महाभियानमे हम एखन धरि संग नहि दए सकलहुँ। सुनैत छी अपनेकेँ सुझाओ आ रचनात्मक आलोचना प्रिय लगैत अछि तेँ किछु लिखक मोन भेल। हमर सहायता आ सहयोग अपनेकेँ सदा उपलब्ध रहत। २.श्री रमानन्द रेणु- मैथिलीमे ई-पत्रिका पाक्षिक रूपेँ चला कऽ जे अपन मातृभाषाक प्रचार कऽ रहल छी, से धन्यवाद । आगाँ अपनेक समस्त मैथिलीक कार्यक हेतु हम हृदयसँ शुभकामना दऽ रहल छी। ३.श्री विद्यानाथ झा "विदित"- संचार आ प्रौद्योगिकीक एहि प्रतिस्पर्धी ग्लोबल युगमे अपन महिमामय "विदेह"केँ अपना देहमे प्रकट देखि जतबा प्रसन्नता आ संतोष भेल, तकरा कोनो उपलब्ध "मीटर"सँ नहि नापल जा सकैछ? ..एकर ऐतिहासिक मूल्यांकन आ सांस्कृतिक प्रतिफलन एहि शताब्दीक अंत धरि लोकक नजरिमे आश्चर्यजनक रूपसँ प्रकट हैत। ४. प्रो. उदय नारायण सिंह "नचिकेता"- जे काज अहाँ कए रहल छी तकर चरचा एक दिन मैथिली भाषाक इतिहासमे होएत। आनन्द भए रहल अछि, ई जानि कए जे एतेक गोट मैथिल "विदेह" ई जर्नलकेँ पढ़ि रहल छथि।...विदेहक चालीसम अंक पुरबाक लेल अभिनन्दन। ५. डॉ. गंगेश गुंजन- एहि विदेह-कर्ममे लागि रहल अहाँक सम्वेदनशील मन, मैथिलीक प्रति समर्पित मेहनतिक अमृत रंग, इतिहास मे एक टा विशिष्ट फराक अध्याय आरंभ करत, हमरा विश्वास अछि। अशेष शुभकामना आ बधाइक सङ्ग, सस्नेह...अहाँक पोथी कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक प्रथम दृष्टया बहुत भव्य तथा उपयोगी बुझाइछ। मैथिलीमे तँ अपना स्वरूपक प्रायः ई पहिले एहन  भव्य अवतारक पोथी थिक। हर्षपूर्ण हमर हार्दिक बधाई स्वीकार करी। ६. श्री रामाश्रय झा "रामरंग"(आब स्वर्गीय)- "अपना" मिथिलासँ संबंधित...विषय वस्तुसँ अवगत भेलहुँ।...शेष सभ कुशल अछि। ७. श्री ब्रजेन्द्र त्रिपाठी- साहित्य अकादमी- इंटरनेट पर प्रथम मैथिली पाक्षिक पत्रिका "विदेह" केर लेल बधाई आ शुभकामना स्वीकार करू। ८. श्री प्रफुल्लकुमार सिंह "मौन"- प्रथम मैथिली पाक्षिक पत्रिका "विदेह" क प्रकाशनक समाचार जानि कनेक चकित मुदा बेसी आह्लादित भेलहुँ। कालचक्रकेँ पकड़ि जाहि दूरदृष्टिक परिचय देलहुँ, ओहि लेल हमर मंगलकामना। ९.डॉ. शिवप्रसाद यादव- ई जानि अपार हर्ष भए रहल अछि, जे नव सूचना-क्रान्तिक क्षेत्रमे मैथिली पत्रकारिताकेँ प्रवेश दिअएबाक साहसिक कदम उठाओल अछि। पत्रकारितामे एहि प्रकारक नव प्रयोगक हम स्वागत करैत छी, संगहि "विदेह"क सफलताक शुभकामना। १०. श्री आद्याचरण झा- कोनो पत्र-पत्रिकाक प्रकाशन- ताहूमे मैथिली पत्रिकाक प्रकाशनमे के कतेक सहयोग करताह- ई तऽ भविष्य कहत। ई हमर ८८ वर्षमे ७५ वर्षक अनुभव रहल। एतेक पैघ महान यज्ञमे हमर श्रद्धापूर्ण आहुति प्राप्त होयत- यावत ठीक-ठाक छी/ रहब। ११. श्री विजय ठाकुर- मिशिगन विश्वविद्यालय- "विदेह" पत्रिकाक अंक देखलहुँ, सम्पूर्ण टीम बधाईक पात्र अछि। पत्रिकाक मंगल भविष्य हेतु हमर शुभकामना स्वीकार कएल जाओ। १२. श्री सुभाषचन्द्र यादव- ई-पत्रिका "विदेह" क बारेमे जानि प्रसन्नता भेल। ’विदेह’ निरन्तर पल्लवित-पुष्पित हो आ चतुर्दिक अपन सुगंध पसारय से कामना अछि। १३. श्री मैथिलीपुत्र प्रदीप- ई-पत्रिका "विदेह" केर सफलताक भगवतीसँ कामना। हमर पूर्ण सहयोग रहत। १४. डॉ. श्री भीमनाथ झा- "विदेह" इन्टरनेट पर अछि तेँ "विदेह" नाम उचित आर कतेक रूपेँ एकर विवरण भए सकैत अछि। आइ-काल्हि मोनमे उद्वेग रहैत अछि, मुदा शीघ्र पूर्ण सहयोग देब।कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक देखि अति प्रसन्नता भेल। मैथिलीक लेल ई घटना छी। १५. श्री रामभरोस कापड़ि "भ्रमर"- जनकपुरधाम- "विदेह" ऑनलाइन देखि रहल छी। मैथिलीकेँ अन्तर्राष्ट्रीय जगतमे पहुँचेलहुँ तकरा लेल हार्दिक बधाई। मिथिला रत्न सभक संकलन अपूर्व। नेपालोक सहयोग भेटत, से विश्वास करी। १६. श्री राजनन्दन लालदास- "विदेह" ई-पत्रिकाक माध्यमसँ बड़ नीक काज कए रहल छी, नातिक अहिठाम देखलहुँ। एकर वार्षिक अ‍ंक जखन प्रिं‍ट निकालब तँ हमरा पठायब। कलकत्तामे बहुत गोटेकेँ हम साइटक पता लिखाए देने छियन्हि। मोन तँ होइत अछि जे दिल्ली आबि कए आशीर्वाद दैतहुँ, मुदा उमर आब बेशी भए गेल। शुभकामना देश-विदेशक मैथिलकेँ जोड़बाक लेल।.. उत्कृष्ट प्रकाशन कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक लेल बधाइ। अद्भुत काज कएल अछि, नीक प्रस्तुति अछि सात खण्डमे।  मुदा अहाँक सेवा आ से निःस्वार्थ तखन बूझल जाइत जँ अहाँ द्वारा प्रकाशित पोथी सभपर दाम लिखल नहि रहितैक। ओहिना सभकेँ विलहि देल जइतैक। (स्पष्टीकरण-  श्रीमान्, अहाँक सूचनार्थ विदेह द्वारा ई-प्रकाशित कएल सभटा सामग्री आर्काइवमे https://sites.google.com/a/videha.com/videha-pothi/ पर बिना मूल्यक डाउनलोड लेल उपलब्ध छै आ भविष्यमे सेहो रहतैक। एहि आर्काइवकेँ जे कियो प्रकाशक अनुमति लऽ कऽ प्रिंट रूपमे प्रकाशित कएने छथि आ तकर ओ दाम रखने छथि ताहिपर हमर कोनो नियंत्रण नहि अछि।- गजेन्द्र ठाकुर)...   अहाँक प्रति अशेष शुभकामनाक संग। १७. डॉ. प्रेमशंकर सिंह- अहाँ मैथिलीमे इंटरनेटपर पहिल पत्रिका "विदेह" प्रकाशित कए अपन अद्भुत मातृभाषानुरागक परिचय देल अछि, अहाँक निःस्वार्थ मातृभाषानुरागसँ प्रेरित छी, एकर निमित्त जे हमर सेवाक प्रयोजन हो, तँ सूचित करी। इंटरनेटपर आद्योपांत पत्रिका देखल, मन प्रफुल्लित भऽ गेल। १८.श्रीमती शेफालिका वर्मा- विदेह ई-पत्रिका देखि मोन उल्लाससँ भरि गेल। विज्ञान कतेक प्रगति कऽ रहल अछि...अहाँ सभ अनन्त आकाशकेँ भेदि दियौ, समस्त विस्तारक रहस्यकेँ तार-तार कऽ दियौक...। अपनेक अद्भुत पुस्तक कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक विषयवस्तुक दृष्टिसँ गागरमे सागर अछि। बधाई। १९.श्री हेतुकर झा, पटना-जाहि समर्पण भावसँ अपने मिथिला-मैथिलीक सेवामे तत्पर छी से स्तुत्य अछि। देशक राजधानीसँ भय रहल मैथिलीक शंखनाद मिथिलाक गाम-गाममे मैथिली चेतनाक विकास अवश्य करत। २०. श्री योगानन्द झा, कबिलपुर, लहेरियासराय- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पोथीकेँ निकटसँ देखबाक अवसर भेटल अछि आ मैथिली जगतक एकटा उद्भट ओ समसामयिक दृष्टिसम्पन्न हस्ताक्षरक कलमबन्द परिचयसँ आह्लादित छी। "विदेह"क देवनागरी सँस्करण पटनामे रु. 80/- मे उपलब्ध भऽ सकल जे विभिन्न लेखक लोकनिक छायाचित्र, परिचय पत्रक ओ रचनावलीक सम्यक प्रकाशनसँ ऐतिहासिक कहल जा सकैछ। २१. श्री किशोरीकान्त मिश्र- कोलकाता- जय मैथिली, विदेहमे बहुत रास कविता, कथा, रिपोर्ट आदिक सचित्र संग्रह देखि आ आर अधिक प्रसन्नता मिथिलाक्षर देखि- बधाई स्वीकार कएल जाओ। २२.श्री जीवकान्त- विदेहक मुद्रित अंक पढ़ल- अद्भुत मेहनति। चाबस-चाबस। किछु समालोचना मरखाह..मुदा सत्य। २३. श्री भालचन्द्र झा- अपनेक कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक देखि बुझाएल जेना हम अपने छपलहुँ अछि। एकर विशालकाय आकृति अपनेक सर्वसमावेशताक परिचायक अछि। अपनेक रचना सामर्थ्यमे उत्तरोत्तर वृद्धि हो, एहि शुभकामनाक संग हार्दिक बधाई। २४.श्रीमती डॉ नीता झा- अहाँक कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़लहुँ। ज्योतिरीश्वर शब्दावली, कृषि मत्स्य शब्दावली आ सीत बसन्त आ सभ कथा, कविता, उपन्यास, बाल-किशोर साहित्य सभ उत्तम छल। मैथिलीक उत्तरोत्तर विकासक लक्ष्य दृष्टिगोचर होइत अछि। २५.श्री मायानन्द मिश्र- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक मे हमर उपन्यास स्त्रीधनक जे विरोध कएल गेल अछि तकर हम विरोध करैत छी।... कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पोथीक लेल शुभकामना।(श्रीमान् समालोचनाकेँ विरोधक रूपमे नहि लेल जाए।-गजेन्द्र ठाकुर) २६.श्री महेन्द्र हजारी- सम्पादक श्रीमिथिला- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़ि मोन हर्षित भऽ गेल..एखन पूरा पढ़यमे बहुत समय लागत, मुदा जतेक पढ़लहुँ से आह्लादित कएलक। २७.श्री केदारनाथ चौधरी- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक अद्भुत लागल, मैथिली साहित्य लेल ई पोथी एकटा प्रतिमान बनत। २८.श्री सत्यानन्द पाठक- विदेहक हम नियमित पाठक छी। ओकर स्वरूपक प्रशंसक छलहुँ। एम्हर अहाँक लिखल - कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक देखलहुँ। मोन आह्लादित भऽ उठल। कोनो रचना तरा-उपरी। २९.श्रीमती रमा झा-सम्पादक मिथिला दर्पण। कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक प्रिंट फॉर्म पढ़ि आ एकर गुणवत्ता देखि मोन प्रसन्न भऽ गेल, अद्भुत शब्द एकरा लेल प्रयुक्त कऽ रहल छी। विदेहक उत्तरोत्तर प्रगतिक शुभकामना। ३०.श्री नरेन्द्र झा, पटना- विदेह नियमित देखैत रहैत छी। मैथिली लेल अद्भुत काज कऽ रहल छी। ३१.श्री रामलोचन ठाकुर- कोलकाता- मिथिलाक्षर विदेह देखि मोन प्रसन्नतासँ भरि उठल, अंकक विशाल परिदृश्य आस्वस्तकारी अछि। ३२.श्री तारानन्द वियोगी- विदेह आ कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक देखि चकबिदोर लागि गेल। आश्चर्य। शुभकामना आ बधाई। ३३.श्रीमती प्रेमलता मिश्र “प्रेम”- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़लहुँ। सभ रचना उच्चकोटिक लागल। बधाई। ३४.श्री कीर्तिनारायण मिश्र- बेगूसराय- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक बड्ड नीक लागल, आगांक सभ काज लेल बधाई। ३५.श्री महाप्रकाश-सहरसा- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक नीक लागल, विशालकाय संगहि उत्तमकोटिक। ३६.श्री अग्निपुष्प- मिथिलाक्षर आ देवाक्षर विदेह पढ़ल..ई प्रथम तँ अछि एकरा प्रशंसामे मुदा हम एकरा दुस्साहसिक कहब। मिथिला चित्रकलाक स्तम्भकेँ मुदा अगिला अंकमे आर विस्तृत बनाऊ। ३७.श्री मंजर सुलेमान-दरभंगा- विदेहक जतेक प्रशंसा कएल जाए कम होएत। सभ चीज उत्तम। ३८.श्रीमती प्रोफेसर वीणा ठाकुर- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक उत्तम, पठनीय, विचारनीय। जे क्यो देखैत छथि पोथी प्राप्त करबाक उपाय पुछैत छथि। शुभकामना। ३९.श्री छत्रानन्द सिंह झा- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़लहुँ, बड्ड नीक सभ तरहेँ। ४०.श्री ताराकान्त झा- सम्पादक मैथिली दैनिक मिथिला समाद- विदेह तँ कन्टेन्ट प्रोवाइडरक काज कऽ रहल अछि। कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक अद्भुत लागल। ४१.डॉ रवीन्द्र कुमार चौधरी- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक बहुत नीक, बहुत मेहनतिक परिणाम। बधाई। ४२.श्री अमरनाथ- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक आ विदेह दुनू स्मरणीय घटना अछि, मैथिली साहित्य मध्य। ४३.श्री पंचानन मिश्र- विदेहक वैविध्य आ निरन्तरता प्रभावित करैत अछि, शुभकामना। ४४.श्री केदार कानन- कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक लेल अनेक धन्यवाद, शुभकामना आ बधाइ स्वीकार करी। आ नचिकेताक भूमिका पढ़लहुँ। शुरूमे तँ लागल जेना कोनो उपन्यास अहाँ द्वारा सृजित भेल अछि मुदा पोथी उनटौला पर ज्ञात भेल जे एहिमे तँ सभ विधा समाहित अछि। ४५.श्री धनाकर ठाकुर- अहाँ नीक काज कऽ रहल छी। फोटो गैलरीमे चित्र एहि शताब्दीक जन्मतिथिक अनुसार रहैत तऽ नीक। ४६.श्री आशीष झा- अहाँक पुस्तकक संबंधमे एतबा लिखबा सँ अपना कए नहि रोकि सकलहुँ जे ई किताब मात्र किताब नहि थीक, ई एकटा उम्मीद छी जे मैथिली अहाँ सन पुत्रक सेवा सँ निरंतर समृद्ध होइत चिरजीवन कए प्राप्त करत। ४७.श्री शम्भु कुमार सिंह- विदेहक तत्परता आ क्रियाशीलता देखि आह्लादित भऽ रहल छी। निश्चितरूपेण कहल जा सकैछ जे समकालीन मैथिली पत्रिकाक इतिहासमे विदेहक नाम स्वर्णाक्षरमे लिखल जाएत। ओहि कुरुक्षेत्रक घटना सभ तँ अठारहे दिनमे खतम भऽ गेल रहए मुदा अहाँक कुरुक्षेत्रम् तँ अशेष अछि। ४८.डॉ. अजीत मिश्र- अपनेक प्रयासक कतबो प्रश‍ंसा कएल जाए कमे होएतैक। मैथिली साहित्यमे अहाँ द्वारा कएल गेल काज युग-युगान्तर धरि पूजनीय रहत। ४९.श्री बीरेन्द्र मल्लिक- अहाँक कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक आ विदेह:सदेह पढ़ि अति प्रसन्नता भेल। अहाँक स्वास्थ्य ठीक रहए आ उत्साह बनल रहए से कामना। ५०.श्री कुमार राधारमण- अहाँक दिशा-निर्देशमे विदेह पहिल मैथिली ई-जर्नल देखि अति प्रसन्नता भेल। हमर शुभकामना। ५१.श्री फूलचन्द्र झा प्रवीण-विदेह:सदेह पढ़ने रही मुदा कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक देखि बढ़ाई देबा लेल बाध्य भऽ गेलहुँ। आब विश्वास भऽ गेल जे मैथिली नहि मरत। अशेष शुभकामना। ५२.श्री विभूति आनन्द- विदेह:सदेह देखि, ओकर विस्तार देखि अति प्रसन्नता भेल। ५३.श्री मानेश्वर मनुज-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक एकर भव्यता देखि अति प्रसन्नता भेल, एतेक विशाल ग्रन्थ मैथिलीमे आइ धरि नहि देखने रही। एहिना भविष्यमे काज करैत रही, शुभकामना। ५४.श्री विद्यानन्द झा- आइ.आइ.एम.कोलकाता- कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक विस्तार, छपाईक संग गुणवत्ता देखि अति प्रसन्नता भेल। अहाँक अनेक धन्यवाद; कतेक बरखसँ हम नेयारैत छलहुँ जे सभ पैघ शहरमे मैथिली लाइब्रेरीक स्थापना होअए, अहाँ ओकरा वेबपर कऽ रहल छी, अनेक धन्यवाद। ५५.श्री अरविन्द ठाकुर-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक मैथिली साहित्यमे कएल गेल एहि तरहक पहिल प्रयोग अछि, शुभकामना। ५६.श्री कुमार पवन-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक पढ़ि रहल छी। किछु लघुकथा पढ़ल अछि, बहुत मार्मिक छल। ५७. श्री प्रदीप बिहारी-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक देखल, बधाई। ५८.डॉ मणिकान्त ठाकुर-कैलिफोर्निया- अपन विलक्षण नियमित सेवासँ हमरा लोकनिक हृदयमे विदेह सदेह भऽ गेल अछि। ५९.श्री धीरेन्द्र प्रेमर्षि- अहाँक समस्त प्रयास सराहनीय। दुख होइत अछि जखन अहाँक प्रयासमे अपेक्षित सहयोग नहि कऽ पबैत छी। ६०.श्री देवशंकर नवीन- विदेहक निरन्तरता आ विशाल स्वरूप- विशाल पाठक वर्ग, एकरा ऐतिहासिक बनबैत अछि। ६१.श्री मोहन भारद्वाज- अहाँक समस्त कार्य देखल, बहुत नीक। एखन किछु परेशानीमे छी, मुदा शीघ्र सहयोग देब। ६२.श्री फजलुर रहमान हाशमी-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक मे एतेक मेहनतक लेल अहाँ साधुवादक अधिकारी छी। ६३.श्री लक्ष्मण झा "सागर"- मैथिलीमे चमत्कारिक रूपेँ अहाँक प्रवेश आह्लादकारी अछि।..अहाँकेँ एखन आर..दूर..बहुत दूरधरि जेबाक अछि। स्वस्थ आ प्रसन्न रही। ६४.श्री जगदीश प्रसाद मंडल-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक पढ़लहुँ । कथा सभ आ उपन्यास सहस्रबाढ़नि पूर्णरूपेँ पढ़ि गेल छी। गाम-घरक भौगोलिक विवरणक जे सूक्ष्म वर्णन सहस्रबाढ़निमे अछि, से चकित कएलक, एहि संग्रहक कथा-उपन्यास मैथिली लेखनमे विविधता अनलक अछि। समालोचना शास्त्रमे अहाँक दृष्टि वैयक्तिक नहि वरन् सामाजिक आ कल्याणकारी अछि, से प्रशंसनीय। ६५.श्री अशोक झा-अध्यक्ष मिथिला विकास परिषद- कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक लेल बधाई आ आगाँ लेल शुभकामना। ६६.श्री ठाकुर प्रसाद मुर्मु- अद्भुत प्रयास। धन्यवादक संग प्रार्थना जे अपन माटि-पानिकेँ ध्यानमे राखि अंकक समायोजन कएल जाए। नव अंक धरि प्रयास सराहनीय। विदेहकेँ बहुत-बहुत धन्यवाद जे एहेन सुन्दर-सुन्दर सचार (आलेख) लगा रहल छथि। सभटा ग्रहणीय- पठनीय। ६७.बुद्धिनाथ मिश्र- प्रिय गजेन्द्र जी,अहाँक सम्पादन मे प्रकाशित ‘विदेह’आ ‘कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक’ विलक्षण पत्रिका आ विलक्षण पोथी! की नहि अछि अहाँक सम्पादनमे? एहि प्रयत्न सँ मैथिली क विकास होयत,निस्संदेह। ६८.श्री बृखेश चन्द्र लाल- गजेन्द्रजी, अपनेक पुस्तक कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक पढ़ि मोन गदगद भय गेल , हृदयसँ अनुगृहित छी । हार्दिक शुभकामना । ६९.श्री परमेश्वर कापड़ि - श्री गजेन्द्र जी । कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक पढ़ि गदगद आ नेहाल भेलहुँ। ७०.श्री रवीन्द्रनाथ ठाकुर- विदेह पढ़ैत रहैत छी। धीरेन्द्र प्रेमर्षिक मैथिली गजलपर आलेख पढ़लहुँ। मैथिली गजल कत्तऽ सँ कत्तऽ चलि गेलैक आ ओ अपन आलेखमे मात्र अपन जानल-पहिचानल लोकक चर्च कएने छथि। जेना मैथिलीमे मठक परम्परा रहल अछि। (स्पष्टीकरण- श्रीमान्, प्रेमर्षि जी ओहि आलेखमे ई स्पष्ट लिखने छथि जे किनको नाम जे छुटि गेल छन्हि तँ से मात्र आलेखक लेखकक जानकारी नहि रहबाक द्वारे, एहिमे आन कोनो कारण नहि देखल जाय। अहाँसँ एहि विषयपर विस्तृत आलेख सादर आमंत्रित अछि।-सम्पादक) ७१.श्री मंत्रेश्वर झा- विदेह पढ़ल आ संगहि अहाँक मैगनम ओपस कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक सेहो, अति उत्तम। मैथिलीक लेल कएल जा रहल अहाँक समस्त कार्य अतुलनीय अछि। ७२. श्री हरेकृष्ण झा- कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक मैथिलीमे अपन तरहक एकमात्र ग्रन्थ अछि, एहिमे लेखकक समग्र दृष्टि आ रचना कौशल देखबामे आएल जे लेखकक फील्डवर्कसँ जुड़ल रहबाक कारणसँ अछि। ७३.श्री सुकान्त सोम- कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक मे  समाजक इतिहास आ वर्तमानसँ अहाँक जुड़ाव बड्ड नीक लागल, अहाँ एहि क्षेत्रमे आर आगाँ काज करब से आशा अछि। ७४.प्रोफेसर मदन मिश्र- कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक सन किताब मैथिलीमे पहिले अछि आ एतेक विशाल संग्रहपर शोध कएल जा सकैत अछि। भविष्यक लेल शुभकामना। ७५.प्रोफेसर कमला चौधरी- मैथिलीमे कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक सन पोथी आबए जे गुण आ रूप दुनूमे निस्सन होअए, से बहुत दिनसँ आकांक्षा छल, ओ आब जा कऽ पूर्ण भेल। पोथी एक हाथसँ दोसर हाथ घुमि रहल अछि, एहिना आगाँ सेहो अहाँसँ आशा अछि। ७६.श्री उदय चन्द्र झा "विनोद": गजेन्द्रजी, अहाँ जतेक काज कएलहुँ अछि से मैथिलीमे आइ धरि कियो नहि कएने छल। शुभकामना। अहाँकेँ एखन बहुत काज आर करबाक अछि। ७७.श्री कृष्ण कुमार कश्यप: गजेन्द्र ठाकुरजी, अहाँसँ भेँट एकटा स्मरणीय क्षण बनि गेल। अहाँ जतेक काज एहि बएसमे कऽ गेल छी ताहिसँ हजार गुणा आर बेशीक आशा अछि। ७८.श्री मणिकान्त दास: अहाँक मैथिलीक कार्यक प्रशंसा लेल शब्द नहि भेटैत अछि। अहाँक कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक सम्पूर्ण रूपेँ पढ़ि गेलहुँ। त्वञ्चाहञ्च बड्ड नीक लागल। ७९. श्री हीरेन्द्र कुमार झा- विदेह ई-पत्रिकाक सभ अंक ई-पत्रसँ भेटैत रहैत अछि। मैथिलीक ई-पत्रिका छैक एहि बातक गर्व होइत अछि। अहाँ आ अहाँक सभ सहयोगीकेँ हार्दिक शुभकामना। विदेह मैथिली साहित्य आन्दोलन (c)२००४-१२. सर्वाधिकार लेखकाधीन आ जतए लेखकक नाम नहि अछि ततए संपादकाधीन। विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। सह-सम्पादक: उमेश मंडल। सहायक सम्पादक: शिव कुमार झा आ मुन्नाजी (मनोज कुमार कर्ण)। भाषा-सम्पादन: नागेन्द्र कुमार झा आ पञ्जीकार विद्यानन्द झा। कला-सम्पादन: वनीता कुमारी आ रश्मि रेखा सिन्हा। सम्पादक-शोध-अन्वेषण: डॉ. जया वर्मा आ डॉ. राजीव कुमार वर्मा। सम्पादक- नाटक-रंगमंच-चलचित्र- बेचन ठाकुर। सम्पादक- सूचना-सम्पर्क-समाद- पूनम मंडल आ प्रियंका झा। सम्पादक- अनुवाद विभाग- विनीत उत्पल। रचनाकार अपन मौलिक आ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि) ggajendra@videha.com केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx, .rtf वा .txt फॉर्मेटमे पठा सकैत छथि। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेताह, से आशा करैत छी। रचनाक अंतमे टाइप रहय, जे ई रचना मौलिक अछि, आ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। मेल प्राप्त होयबाक बाद यथासंभव शीघ्र ( सात दिनक भीतर) एकर प्रकाशनक अंकक सूचना देल जायत। ’विदेह' प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका अछि आ एहिमे मैथिली, संस्कृत आ अंग्रेजीमे मिथिला आ मैथिलीसँ संबंधित रचना प्रकाशित कएल जाइत अछि। एहि ई पत्रिकाकेँ श्रीमति लक्ष्मी ठाकुर द्वारा मासक ०१ आ १५ तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि। (c) 2004-12 सर्वाधिकार सुरक्षित। विदेहमे प्रकाशित सभटा रचना आ आर्काइवक सर्वाधिकार रचनाकार आ संग्रहकर्त्ताक लगमे छन्हि। रचनाक अनुवाद आ पुनः प्रकाशन किंवा आर्काइवक उपयोगक अधिकार किनबाक हेतु ggajendra@videha.co.in पर संपर्क करू। एहि साइटकेँ प्रीति झा ठाकुर, मधूलिका चौधरी आ रश्मि प्रिया द्वारा डिजाइन कएल गेल। सिद्धिरस्तु वि दे ह विदेह Videha বিদেহ  विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका Videha Ist Maithili Fortnightly ejournal  विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका 'विदेह' १०१ म अंक ०१ मार्च २०१२ (वर्ष ५ मास ५१ अंक १०१) मानुषीमिह संस्कृताम् ISSN 2229-547X VIDEHA वि दे ह विदेह Videha বিদেহ  विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका Videha Ist Maithili Fortnightly e Magazine  विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका 'विदेह' १०१ म अंक ०१ मार्च २०१२ (वर्ष ५ मास ५१ अंक १०१) मानुषीमिह संस्कृताम् ISSN 2229-547X VIDEHA

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