830 829 ISSN 2229-547X VIDEHA 'विदेह' १०३ म अंक ०१ अप्रैल २०१२ (वर्ष ५ मास ५२ अंक १०३) वि दे ह विदेह Videha বিদেহ http://www.videha.co.in विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका Videha Ist Maithili Fortnightly ejournal नव अंक देखबाक लेल पृष्ठ सभकेँ रिफ्रेश कए देखू। Always refresh the pages for viewing new issue of VIDEHA. Read in your own script Roman(Eng)Gujarati Bangla Oriya Gurmukhi Telugu Tamil Kannada Malayalam Hindi ऐ अंकमे अछि:- १. संपादकीय संदेश २. गद्य २.१.किशोरीकान्त मिश्र जी सँ नबोनारायण मिश्र जी द्वारा लेल साक्षात्कार २.२.ओमप्रकाश झा-१. बहुरूपिया रचना मे २. घोघ उठबैत गजल २.३.१.नवेंदु कुमार झा- केन्द्रीय विश्वविद्यालयक लऽ कऽ राज्य आ केन्द्र मे बढ़ि रहल हार/ उत्साहक संग समाप्त शताब्दी समारोह- डा॰ सच्चिदानंद उपेक्षा पर निधन परिषद् भेलाह नाराज। २. सुजीत कुमार झा - राम जन्मोत्सवपर विशेष/ मिथिलाक कण कणमे रामसीता ३. किशन कारीगर- अकछ भेल छी।/(एकटा हास्य कथा) २.४.विहनि कथा-१.ओमप्रकाश झा २.अमित मिश्र ३.चंदन कुमार झा ४.आशीष चौधरी २.५.१.रवि भूषण पाठक- ओक्कर तोहर हम्मर सपना २.शिव कुमार झा ‘टिल्लू’- बहिरा नाचए अपने ताल २.६.गजेन्द्र ठाकुर- शब्दशास्त्रम् / दिल्ली २.७.१.आशीष अनचिन्हार- "सगर राति दीप जरय"केर अन्त आ साहित्य अकादेमी कथा गोष्ठीक उदय २.प्रियंका झा- सगर राति दीप जरय पर साहित्य अकादेमीक कब्जा/ सरकारी पाइपर भेल बभनभोज/ साहित्य अकादेमीक कथा रवीन्द्र दिल्लीमे समाप्त- रवीन्द्रक कथापर कोनो चर्चा नै भेल- ७६म सगरराति दीप जरय चेन्नैमे विभारानी लऽ गेली ३.सुमित आनन्द- सोसाइटी टुडेक लोकार्पण २.८.१.जगदीश प्रसाद मण्डलक कथा-फागु २.अतुलेश्वर- मातृभाषा दिवस क बहन्ने ३. पद्य ३.१.१.शिव कुमार झा ‘टिल्लू’ २.स्व. लल्लन प्रसाद ठाकुर ३.श्यामल सुमन ३.२.१.ओमप्रकाश झा २.कमल मोहन चुन्नू ३.प्रेमचन्द्र पंकज ४.रुबी झा ३.३.१.अमित मिश्र २.मिहिर झा ३.उमेश पासवान ३.४.१.जगदीश प्रसाद मण्डल २.अनिल मल्लिक ३.कुसुम ठाकुर ३.५.१.चंदन कुमार झा २.पवन कुमार साह ३.६.१. आनन्द कुमार झा २.निशान्त झा ३.७.डॉ॰ शशिधर कुमर ३.८.१.राम विलास साह २. प्रभात राय भट्ट ४. मिथिला कला-संगीत१.गणेश ठाकुर २.राजनाथ मिश्र (चित्रमय मिथिला) ३. उमेश मण्डल (मिथिलाक वनस्पति/ मिथिलाक जीव-जन्तु/ मिथिलाक जिनगी) ५. गद्य-पद्य भारती: मंगलेश डबराल- हिन्दीसँ मैथिली अनुवाद विनीत उत्पल ६.बालानां कृते-बाल गजल १.मिहिर झा २.अमित मिश्र ३.चंदन कुमार झा ४.जगदानन्द झा 'मनु' ५.रूबी झा ६.डॉ॰ शशिधर कुमर “विदेह”-नेनपन (बालगीत) ७. भाषापाक रचना-लेखन -[मानक मैथिली], [विदेहक मैथिली-अंग्रेजी आ अंग्रेजी मैथिली कोष (इंटरनेटपर पहिल बेर सर्च-डिक्शनरी) एम.एस. एस.क्यू.एल. सर्वर आधारित -Based on ms-sql server Maithili-English and English-Maithili Dictionary.] विदेह ई-पत्रिकाक सभटा पुरान अंक ( ब्रेल, तिरहुता आ देवनागरी मे ) पी.डी.एफ. डाउनलोडक लेल नीचाँक लिंकपर उपलब्ध अछि। All the old issues of Videha e journal ( in Braille, Tirhuta and Devanagari versions ) are available for pdf download at the following link. विदेह ई-पत्रिकाक सभटा पुरान अंक ब्रेल, तिरहुता आ देवनागरी रूपमे Videha e journal's all old issues in Braille Tirhuta and Devanagari versions विदेह ई-पत्रिकाक पहिल ५० अंक विदेह ई-पत्रिकाक ५०म सँ आगाँक अंक विदेह आर.एस.एस.फीड। "विदेह" ई-पत्रिका ई-पत्रसँ प्राप्त करू। अपन मित्रकेँ विदेहक विषयमे सूचित करू। ↑ विदेह आर.एस.एस.फीड एनीमेटरकेँ अपन साइट/ ब्लॉगपर लगाऊ। ब्लॉग "लेआउट" पर "एड गाडजेट" मे "फीड" सेलेक्ट कए "फीड यू.आर.एल." मे http://www.videha.co.in/index.xml टाइप केलासँ सेहो विदेह फीड प्राप्त कए सकैत छी। गूगल रीडरमे पढ़बा लेल http://reader.google.com/ पर जा कऽ Add a Subscription बटन क्लिक करू आ खाली स्थानमे http://www.videha.co.in/index.xml पेस्ट करू आ Add बटन दबाउ। Join official Videha facebook group. Join Videha googlegroups विदेह रेडियो:मैथिली कथा-कविता आदिक पहिल पोडकास्ट साइट http://videha123radio.wordpress.com/ Videha Radio मैथिली देवनागरी वा मिथिलाक्षरमे नहि देखि/ लिखि पाबि रहल छी, (cannot see/write Maithili in Devanagari/ Mithilakshara follow links below or contact at ggajendra@videha.com) तँ एहि हेतु नीचाँक लिंक सभ पर जाऊ। संगहि विदेहक स्तंभ मैथिली भाषापाक/ रचना लेखनक नव-पुरान अंक पढ़ू। http://devanaagarii.net/ http://kaulonline.com/uninagari/ (एतए बॉक्समे ऑनलाइन देवनागरी टाइप करू, बॉक्ससँ कॉपी करू आ वर्ड डॉक्युमेन्टमे पेस्ट कए वर्ड फाइलकेँ सेव करू। विशेष जानकारीक लेल ggajendra@videha.com पर सम्पर्क करू।)(Use Firefox 4.0 (from WWW.MOZILLA.COM )/ Opera/ Safari/ Internet Explorer 8.0/ Flock 2.0/ Google Chrome for best view of 'Videha' Maithili e-journal at http://www.videha.co.in/ .) Go to the link below for download of old issues of VIDEHA Maithili e magazine in .pdf format and Maithili Audio/ Video/ Book/ paintings/ photo files. विदेहक पुरान अंक आ ऑडियो/ वीडियो/ पोथी/ चित्रकला/ फोटो सभक फाइल सभ (उच्चारण, बड़ सुख सार आ दूर्वाक्षत मंत्र सहित) डाउनलोड करबाक हेतु नीचाँक लिंक पर जाऊ। VIDEHA ARCHIVE विदेह आर्काइव example भारतीय डाक विभाग द्वारा जारी कवि, नाटककार आ धर्मशास्त्री विद्यापतिक स्टाम्प। भारत आ नेपालक माटिमे पसरल मिथिलाक धरती प्राचीन कालहिसँ महान पुरुष ओ महिला लोकनिक कर्मभमि रहल अछि। मिथिलाक महान पुरुष ओ महिला लोकनिक चित्र 'मिथिला रत्न' मे देखू। गौरी-शंकरक पालवंश कालक मूर्त्ति, एहिमे मिथिलाक्षरमे (१२०० वर्ष पूर्वक) अभिलेख अंकित अछि। मिथिलाक भारत आ नेपालक माटिमे पसरल एहि तरहक अन्यान्य प्राचीन आ नव स्थापत्य, चित्र, अभिलेख आ मूर्त्तिकलाक़ हेतु देखू 'मिथिलाक खोज' मिथिला, मैथिल आ मैथिलीसँ सम्बन्धित सूचना, सम्पर्क, अन्वेषण संगहि विदेहक सर्च-इंजन आ न्यूज सर्विस आ मिथिला, मैथिल आ मैथिलीसँ सम्बन्धित वेबसाइट सभक समग्र संकलनक लेल देखू "विदेह सूचना संपर्क अन्वेषण" विदेह जालवृत्तक डिसकसन फोरमपर जाऊ। "मैथिल आर मिथिला" (मैथिलीक सभसँ लोकप्रिय जालवृत्त) पर जाऊ। ऐ बेर मूल पुरस्कार(२०१२) [साहित्य अकादेमी, दिल्ली]क लेल अहाँक नजरिमे कोन मूल मैथिली पोथी उपयुक्त अछि ? Thank you for voting! श्री राजदेव मण्डलक “अम्बरा” (कविता-संग्रह) 13.84% श्री बेचन ठाकुरक “बेटीक अपमान आ छीनरदेवी”(दूटा नाटक) 10.03% श्रीमती आशा मिश्रक “उचाट” (उपन्यास) 6.57% श्रीमती पन्ना झाक “अनुभूति” (कथा संग्रह) 5.54% श्री उदय नारायण सिंह “नचिकेता”क “नो एण्ट्री:मा प्रविश (नाटक) 5.54% श्री सुभाष चन्द्र यादवक “बनैत बिगड़ैत” (कथा-संग्रह) 5.54% श्रीमती वीणा कर्ण- भावनाक अस्थिपंजर (कविता संग्रह) 5.54% श्रीमती शेफालिका वर्माक “किस्त-किस्त जीवन (आत्मकथा) 7.61% श्रीमती विभा रानीक “भाग रौ आ बलचन्दा” (दूटा नाटक) 6.92% श्री महाप्रकाश-संग समय के (कविता संग्रह) 5.88% श्री तारानन्द वियोगी- प्रलय रहस्य (कविता-संग्रह) 5.54% श्री महेन्द्र मलंगियाक “छुतहा घैल” (नाटक) 6.92% श्रीमती नीता झाक “देश-काल” (कथा-संग्रह) 6.57% श्री सियाराम झा "सरस"क थोड़े आगि थोड़े पानि (गजल संग्रह) 7.27% Other: 0.69% ऐ बेर बाल साहित्य पुरस्कार(२०१२) [साहित्य अकादेमी, दिल्ली]क लेल अहाँक नजरिमे कोन मूल मैथिली पोथी उपयुक्त अछि ? श्री जगदीश प्रसाद मण्डल जीक “तरेगन”(बाल-प्रेरक कथा संग्रह) 50% श्री जीवकांत - खिखिरक बिअरि 28.57% श्री मुरलीधर झाक “पिलपिलहा गाछ 19.64% Other: 1.79% ऐ बेर युवा पुरस्कार(२०१२)[साहित्य अकादेमी, दिल्ली]क लेल अहाँक नजरिमे कोन कोन लेखक उपयुक्त छथि ? Thank you for voting! श्रीमती ज्योति सुनीत चौधरीक “अर्चिस” (कविता संग्रह) 25.53% श्री विनीत उत्पलक “हम पुछैत छी” (कविता संग्रह) 6.38% श्रीमती कामिनीक “समयसँ सम्वाद करैत”, (कविता संग्रह) 6.38% श्री प्रवीण काश्यपक “विषदन्ती वरमाल कालक रति” (कविता संग्रह) 5.32% श्री आशीष अनचिन्हारक "अनचिन्हार आखर"(गजल संग्रह) 24.47% श्री अरुणाभ सौरभक “एतबे टा नहि” (कविता संग्रह) 5.32% श्री दिलीप कुमार झा "लूटन"क जगले रहबै (कविता संग्रह) 7.45% श्री आदि यायावरक “भोथर पेंसिलसँ लिखल” (कथा संग्रह) 5.32% श्री उमेश मण्डलक “निश्तुकी” (कविता संग्रह) 11.7% Other: 2.13% ऐ बेर अनुवाद पुरस्कार (२०१३) [साहित्य अकादेमी, दिल्ली]क लेल अहाँक नजरिमे के उपयुक्त छथि? Thank you for voting! श्री नरेश कुमार विकल "ययाति" (मराठी उपन्यास श्री विष्णु सखाराम खाण्डेकर) 36.84% श्री महेन्द्र नारायण राम "कार्मेलीन" (कोंकणी उपन्यास श्री दामोदर मावजो) 11.84% श्री देवेन्द्र झा "अनुभव"(बांग्ला उपन्यास श्री दिव्येन्दु पालित) 13.16% श्रीमती मेनका मल्लिक "देश आ अन्य कविता सभ" (नेपालीक अनुवाद मूल- रेमिका थापा) 13.16% श्री कृष्ण कुमार कश्यप आ श्रीमती शशिबाला- मैथिली गीतगोविन्द ( जयदेव संस्कृत) 10.53% श्री रामनारायण सिंह "मलाहिन" (श्री तकषी शिवशंकर पिल्लैक मलयाली उपन्यास) 13.16% Other: 1.32% फेलो पुरस्कार-समग्र योगदान २०१२-१३ : समानान्तर साहित्य अकादेमी, दिल्ली Thank you for voting! श्री राजनन्दन लाल दास 53.45% श्री डॉ. अमरेन्द्र 22.41% श्री चन्द्रभानु सिंह 22.41% Other: 1.72% १. संपादकीय I १ यूनीकोड पर साहित्य अकादेमीक कथागोष्ठीमे पर्चा वितरण डॉ. रमानन्द झा रमण जी द्वारा यूनीकोड पर साहित्य अकादेमीक कथागोष्ठीमे पर्चा वितरण कएल गेल। ऐसँ मात्र ई स्पष्ट भेल जे पर्चा लिखिनिहारकेँ नहिये यूनीकोडक विषयमे कोनो जानकारी छन्हि आ नहिये वेस्टर्न वा यूनीकोड दुनू फॉन्टक निर्माण कोनो प्रारम्भिक ज्ञान छन्हि। हँ ऐ परचाक ओइ सभ लोक लेल महत्व छै जे सीखय चाहै छथि जे पूर्वाग्रहपूर्ण आ पक्षपातपूर्ण मैथिली साहित्यक इतिहास कोना लिखल जाए। ऐसँ पहिने चेतना समितिक स्मारिकामे यूनीकोड लेल चेतना समितिक योगदानक चर्चा देखैत छी! तिरहुता यूनीकोड आवेदनकर्ता अंशुमन पाण्डेय जखन पटना गेल रहथि तँ हम हुनका कहने रहियन्हि जे विद्यापति भवनमे शिव कुमार ठाकुरक दोकान छन्हि, ओतऽ सँ अहाँ मैथिलीक किताब कीनि सकै छी, मुदा दू तीन दिन ओ दोकान आ समिति बन्द रहलाक कारण ओतऽ सँ घुरि गेला, बादमे ओतए एक गोटे कहलकन्हि जे सभ दिन अहाँ अबै छी, से ई समिति अखन कमसँ कम १४-१५ दिन आर बन्द रहत कारण दू ग्रुपमे झगड़ा-झाँटी भऽ गेल छै। ई अनुभव लऽ कऽ ओ घुरल रहथि आ से समिति अपन स्मारिकामे यूनीकोड लेल ओ जे योगदान देलक तकर चर्चा करैत अछि! गोविन्द झा जीक पता मँगलापर एक गोट विद्वान् (!) हुनका कहलखिन्ह जे धुर ओ की बतेता, आ गोविन्द झा जीक पता नै देलखिन्ह आ तखन दोसर ठामसँ हुनका पता उपलब्ध करबाओल गेल। २ विहनि कथा ०६ फरबरी १९९५ मे सहयात्री मंचक, लोहना, मधुबनीक बैसारमे मुन्नाजी द्वारा विहनि कथाक शब्दावलीक अवधारणा प्रस्तुत कएल गेल जकर समर्थन श्री राज केलन्हि। एकर समर्थन सर्वश्री शैलेन्द्र आनन्द, भवनाथ भवन, प्रेमचन्द्र पंकज, ललन प्रसाद, प्रभु कुमार मण्डल, मलयनाथ मंडन, अतुलेश्वर, अखिलेश्वर, कुमार राहुल आ सच्चिदानन्द सच्चू केलन्हि। पहिल विहनि कथा गोष्ठी २० फरबरी १९९५ केँ हटाढ़ रुपौलीमे भेल, जइमे विहनि कथाक स्वरूपपर चर्चा आ विहनि कथाक पाठ भेल। ऐ मे शैलेन्द्र आनन्द, श्रीराज, उमाशंकर पाठक, मुन्नाजी, यंत्रनाथ मिश्र, मतिनाथ मिश्र, श्यामानन्द ठाकुर, ललन प्रसाद, भवनाथ भवन, प्रेमचन्द्र पंकज, प्रभु कुमार मण्डल, मलयनाथ मंडन, कुमार राहुल, सच्चिदानन्द सच्चू, विजयानन्द हीरा, सुनील कर्ण, सुश्री मीरा कर्ण, करनजी, विजय शंकर मिश्र, कमलेश झा आदि भाग लेलनि। विदेहक विहनि कथा विशेषांकमे विहनि कथाक स्वरूप आ ओकर समीक्षाशास्त्रपर ढेर रास चर्चा भेल आ कथाक लम्बाइ आ विहनि कथापर विस्तृत चर्च भेल। किछु गोटेकेँ “विहनि कथा” शब्दावलीपर आपति अछि। ओ आध पन्नाक कथाक लेल लघुकथा शब्दक प्रयोग करबापर बिर्त छथि। मुदा तखन ३-४ पन्नाक कथा लेल कोन शब्द प्रयोग करब? लघुकथा तँ तइ लेल प्रयुक्त होइ छै। तँ की “अति लघु कथा” शब्दावली विहनि कथा लेल प्रयोग कएल जाए? ऐपर जे तर्क साहित्य अकादेमीक दिल्ली कथा गोष्ठीमे देल गेल से हास्यास्पद अछि। ओ लोकनि ३-४ पन्नाक कथा लेल “कथा”; आ “विहनि कथा” लेल “लघुकथा”; शब्दावलीक प्रयोग करबाक इच्छुक रहथि। मुदा कथा, खिस्सा, पिहानी तँ विहनि कथा, लघु कथा, दीर्घ कथा, उपन्यास सभ लेल प्रयुक्त एकटा शब्दावली अछि, महाकाव्यमे सेहो कथा होइ छै। ऐपर हमरा अपन स्कूल दिनक एकटा खिस्सा (ई विहनि कथा भऽ सकैए) मोन पड़ैत अछि- हिसाबक कक्षामे साइन थीटा बट्टा कौस थीटा बराबड़ की, ई कहलापर एकटा विद्यार्था उत्तर देलक; साइन बट्टा कॉस, कारण थीटा-थीटा कटि जेतै; से ओइ विद्यार्थीक कहब रहै। मास्टर साहैब तमसेलखिन्ह नै, कहलखिन्ह जे बारह बटा सत्रह बराबड़ दू बटा सात हेतै? विद्यार्थी कहलक नै। किए? एक-एक कटि गेलै तँ दू बटा सात भेलै ने।– मास्टर साहैब कहलखिन्ह। विद्यार्थी कहलकै- नै। बारह आ सत्रह तँ स्वतंत्र अस्तित्व बला अछि। तखन मास्टर साहैब कहलखिन्ह- तहिना साइन थीटा आ कौस थीटा स्वतंत्र अस्तित्व बला अछि। ऐ डिसकसनक बाद “विहनि कथा” शब्दावलीपर आपति करैबला लोकनि बात बुझि जेता से आशा अछि। विहनि कथाक अतिरिक्त आर सभ विधापर जे डिसकसन जरिऐल छल, तइ सभकेँ विदेह गोष्ठी सभ द्वारा अन्तिम रूप देल जा चुकल अछि। ३ विदेह गोष्ठी: (परिचर्चा आ प्रैक्टिकल लैबोरेटरीक प्रदर्शन। किछु विचार डाक आ ई-पत्रसँ सेहो आएल।)- http://esamaad.blogspot.in/p/blog-page_05.html मैथिली नाटक रंगमंच फिल्मपर: २८-२९ जनवरी २०१२ स्थान चनौरागंज,झंझारपुर। निर्मली, जिला सुपौलमे अन्तिम परिचर्चा आधुनिक मैथिली नाटक आ रंगमंचपर: १७-१८ सितम्बर २०११ आ २४-२५ सितम्बर २०११केँ। मैथिली गजल, कता, रुबाइपर निर्मली, जिला सुपौलमे अन्तिम परिचर्चा: २६-२७ नवम्बर २०११ आ ०३ आ ०४ दिसम्बर २०११ मैथिली हाइकू, टनका,शेर्न्यू, हैगा, हैबून पर निर्मली, जिला सुपौलमे अन्तिम परिचर्चा; १२-१३ नवम्बर २०११ आ १९-२० नवम्बर २०११ मैथिली बाल साहित्यपर निर्मली, जिला सुपौलमे अन्तिम परिचर्चा; १५-१६ अक्टूबर २०११ आ २२-२३ अक्टूबर २०११ मैथिली विहनि, लघु, दीर्घ कथा आ उपन्यास पर निर्मली, जिला सुपौलमे अन्तिम परिचर्चा; २९-३० अक्टूबर २०११ आ ०५-०६ नवम्बर २०११ मैथिली प्रबन्ध, निबन्ध, समालोचना, अनुवाद, मानक मैथिली आ शब्दावली पर निर्मली, जिला सुपौलमे अन्तिम परिचर्चा; ०१-०२ अक्टूबर २०११ आ ०८-०९ अक्टूबर २०११ मैथिली महिला आ फेमिनिस्ट लेखन पर निर्मली, जिला सुपौलमे अन्तिम परिचर्चा; ०३-०४ सितम्बर २०११ आ १०-११ सितम्बर २०११ मैथिली कला-शिल्प-संगीत पर निर्मली, जिला सुपौलमे अन्तिम परिचर्चा; २०-२१ अगस्त २०११ आ २७-२८ अगस्त २०११ मैथिली हास्य-व्यंग्य पर निर्मली, जिला सुपौलमे अन्तिम परिचर्चा; ०६-०७ अगस्त २०११ आ १३-१४ अगस्त २०११ मैथिली गूगल ट्रान्सलेटर टूलकिट, गूगल ट्रान्सलेट, गूगल लैंगुएज टूल, मैथिली विकीपीडिया, कैथी आ तिरहुता यूनीकोडक एनकोडिंग पर निर्मली, जिला सुपौलमे अन्तिम परिचर्चा; ०६-०७ दिसम्बर २००८, १३-१४ दिसम्बर २००८, ०५-०६ दिसम्बर २००९, १२-१३ दिसम्बर २००९, ०४-०५ दिसम्बर २०१०, ११-१२ दिसम्बर २०१०, १७-१८ दिसम्बर २०११, २४-२५ दिसम्बर २०११ मैथिली मे प्राथमिक आ मध्य विद्यालयी शिक्षा मैथिली माध्यमसँ मिथिलामे करेबा लेल निर्मली, जिला सुपौलमे परिचर्चा; ०३ फरबरी २०१२ [मैथिलीमे ई-पत्रकारिता :: उमेश मंडल ई-पत्रकारिताक प्रारम्भ भेने लेखक ओ पाठक वर्गमे काफी वृद्धि देखल जाइत अछि। एकर अनेक कारणमे महत्वपूर्ण अछि भौगोलिक दूरीक अंत। जइसँ विश्वमे पसरल मैथिली भाषी, साहित्य प्रेमी सभ सोझा एलाह। ऐठाम अपन विचार व्यक्त करबाक पूर्ण स्वतंत्रा लेखको आ पाठकोकेँ भेटैत छन्हि। रचनापर त्वरित टिप्पणी-समीक्षा-समालोचनाक सुविधा सेहो इन्टरनेटपर अछि। इन्टरनेटपर मैथिलीक पहिल उपस्थितिक रूपमे विदेहक पूर्व-रूप "भालसरिक गाछ" ५ जुलाइ २००४ सँ http://gajendrathakur.blogspot.com/ लिंकपर उपलब्ध अछि। ओना याहू जियोसिटीजपर २००० ईं.सँ ई साइट रहए, जे याहू द्वारा जियोसिटीज बन्द कऽ देलाक बाद आब उपलब्ध नै अछि। मैथिली ई-पत्रकारिताक आरम्भक श्रेय विदेहकेँ छै आ तँए एकर नाओं अछि ‘विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका’ वर्तमानमे १०३ टा अंक ई-प्रकाशित अछि। गूगल एनेलेटिक्स डेटा केर मोताबिक ‘विदेह ई पत्रिका’केँ ५ जुलाइ २००४ई.सँ अखन धरि ११६ देशक १,५०२ ठामसँ ७२,०४३ गोटे द्वारा ३५,४५२ विभिन्न आइ.एस.पी. सँ ३,३६,७०७ बेर देखल गेल अछि। विदेह मैथिली पोथी डाउनलोड http://sites.google.com/a/videha.com/videha-pothi पर उपलब्ध अछि। लगभग २०० सँ बेशी मैथिली पोथी देवनागरी, तिरहुता आ ब्रेल तीनू लिपिमे जे पी.डी.एफ. फाइलमे फ्री डाउनलोड लेल उपलब्ध अछि अनेक रचनाकारक अलाबे जगदीश प्रसाद मंडलक 2टा कथा संग्रह, 2टा एकांकी संग्रह, 3टा नाटक, 2टा कविता संग्रह, पाँचटा उपन्यासक सेहो उपलब्ध अछि। एकर अतिरिक्त ११००० सँ बेशी, तिरहुतामे लिखल, ५०० बर्ख पुरान तालपत्र, विदेह द्वारा स्कैन कऽ ओकर देवनागरी लिप्यंतरणक संग ऐ साइटपर डाउनलोड लेल उपलब्ध अछि। सरकारी आ गएर सरकारी संस्था सभ द्वारा अखन धरि कएल समस्त प्रयाससँ ई लगभग १०० गुणा बेसी अछि। ऐ समस्त कार्यमे लगभग १०,००० घण्टाक श्रम लगाओल गेल अछि आ एतए तिरहुता, ब्रेल आ अन्तर्राष्टीय फोनेटिक अल्फाबेट (आइ्. पी. ए) सिखबाक सेहो बेबस्था कएल गेल छै आ तइ संबंधी पोथी जे श्री गजेन्द्र ठाकुर द्वारा िलखित अछि ओ फ्री डोनलोड लेल सेहो उपलब्ध अछि। विदेह मैथिली ऑडियो संकलन http://sites.google.com/a/videha.com/videha-audio , एतए विविध विधाक ऑडियो जेना कथा, कविता, गजल, हाइकू, टनका, हैबून, हैगा इत्यादि, देल गेल अछि। ऐठामक मुख्य आकर्षण अछि ५० घण्टाक ऑडियो संकलन जे मिथिलाक सभ जाति आ धर्मक संस्कार, लोकगीत आ व्यवहार गीत जे मैथिलीकेँ जाति आधारित भाषा हेबाक अवधारणापर मारक प्रहार सिद्ध कए रहल अछि। मैथिली वीडियोक संकलन http://sites.google.com/a/videha.com/videha-video , एतए नाटक, सेमीनार, वर्षकृत्य, रसनचौकी, सामा-चकेबा, कवि-सम्मेलन, विदेहक नाट्य आ साहित्य उत्सवक वीडियो, मिथिलाक खोज, गीत-ंसंगीत, मैथिली वीडियो, वोकल आर्काइव, सगर राति दीप जरए, साक्षात्कार, विद्यापति पर्व, मैथिली गजल आदिक वीडियो उपलब्ध अछि। ऐठामक मुख्य आकर्षण अछि, मिथिलाक सभ जाति आ धर्मक संस्कार, लोकगीत आ व्यवहार गीतक वीडियो, आ पहिल बेर विदेहक सौजन्यसँ सतमा कक्षाक दीक्षा भारतीक गाओल ‘गोविन्ददास’क गीत। ऐमे लगभग ५००० घण्टाक मेहनति विदेहक सदस्यगण द्वारा लगाओल गेल अछि। विदेह मिथिला चित्रकला/आधुनिक चित्रकला आ चित्र- http://sites.google.com/a/videha.com/videha-paintings-photos/ लिंकपर उपलब्ध अछि ‘मिथिला चित्रकला, आधुनिक चित्रकला, रंगमंच, चौबटिया-सड़क नाटक सहित कएक हजारसँ ऊपर फोटो अछि जइमे २०० सँ ऊपर िमथिलाक वनस्पति, १०० सँ ऊपर मिथिलाक जीव-जन्तु आ १०० सँ ऊपर मिथिलाक जनजीवनक किसानी आ कारीगरी संस्कृतिक फोटो सेहो अछि जइमे ५००० घण्टाक मेहनति विदेह सदस्यगण द्वारा लगाओल गेल अछि। विदेह मैथिली जालवृत्त एग्रीगेटर : http://videha-aggregator.blogspot.com/ पर मैथिलीक सभ वेबसाइटक विवरण सहजताक लेल उपलब्ध अछि। विदेह द्वारा मैथिली साहित्य अंग्रेजीमे अनूदित कए http://madhubani-art.blogspot.com/ साइटपर राखल गेल अछि। एतए सत्तरिटा पोस्ट अछि जकरा माध्यमसँ मैथिलीक श्रेष्ठ साहित्य विश्वक समक्ष राखल गेल अछि। ऐ अनुवादमे लगभग ७०० घण्टासँ बेसी समैक श्रम खर्च कएल गेल अछि। विदेह:सदेह- पहिल तिरहुता (मिथिला़क्षर) जालवृत्त (ब्लॉग) http://videha-sadeha.blogspot.com/ ई मैथिली भाषाक मिथिलाक्षरमे सज्जित पहिल वेबसाइट अछि। विदेह:ब्रेल- मैथिली ब्रेलमे : पहिल बेर विदेह द्वारा http://videha-braille.blogspot.com/ पर मैथिलीक पहिल साइट अछि जे क्रमश: मिथिलाक्षर आ ब्रेलमे अछि जेकारा स्पेशल स्क्रीन टच माॅनिटरसँ संबंधित आदमी पढ़ि सकै छथि तहिना स्पेशल प्रिंटरसँ प्रिंट सेहो निकालि सकै छथि। जइ दुनूमे लगभग हजार-हजार (१०००-१०००) घण्टाक मेहनति लागल अछि। नेना भुटका साइट मैथिलीमे बच्चा सबहक लेल एक मात्र साइट अछि जे संगीतज्ञ माँगनि खबासक नामपर- http://mangan-khabas.blogspot.com/ राखल गेल अछि। बाल साहित्य जेना बाल कथा, प्रेरक कथा, बाल कविता आदि समस्त बाल साहित्यकेँ आधुनिक-वैज्ञानिक दृष्टकोणसँ लिखल श्री जगदीश प्रसाद मण्डलक १२५ गोट प्रेरक कथाक अलाबे विभिन्न लेखक केर साहित्य ऐपर सहजताक संग उपलब्ध अछि जेकरा विश्वमे पसरल नेना, बढ़ैत नेना आ किशोरक लेल फ्री डॉनलोड हेतु उपलब्ध अछि। विदेह रेडियो: मैथिली कथा-कविता आदिक पहिल पोडकास्ट साइट- ऐठामसँ मैथिलीमे गीत-संगीत, कथा-कविता, गजल-हाइकू, टनका-हैबूनक संग अनेक परिचर्चा प्रसारित कएल जाइत अछि। साइटक नाओं अछि- http://videha123radio.wordpress.com/ विदेहक फेसबुक चौबटिया-फरबरी २००८सँ अछि जे पुरान फॉर्मेटमे छल https://www.facebook.com/groups/10299304978/ आ http://www.facebook.com/groups/7436498043/ पर, नव फॉर्मेटमे एतए http://www.facebook.com/groups/videha/ उपलब्ध अछि, आ फेसबुकपर मैथिलीक सभसँ पुरान चौबटिया अछि। ऐ चौबटियापर ८४००सँ बेसी मैथिली भाषी सदस्य द्वारा गत साल १०,००० पोस्ट आ ११०० सँ बेसी फोटो पोस्ट कएल गेल अछि। प्रतिदिन १५० टासँ ऊपर कॉमेट पोस्ट सभपर अबैए जइमे मिथिला-मैथिली विकासपर स्वस्थ्य परिचर्चा होइए। विदेह मैथिली नाट्य उत्सव- मैथिली रंगमंचकेँ वैश्विक स्तर प्रदान केलक अछि जे श्री बेचन ठाकुरजी द्वारा http://maithili-drama.blogspot.com/ पर उपलब्ध अछि। एतए मैथिली आ अंग्रेजीमे मैथिली रंगमंचक चित्र-आ वीडियोक माध्यमसँ विस्तारसँ वर्णन १७५ पोस्टमे देलगेल अछि, ई मैथिलीक अखन धरिक “स्लैपस्टिक ह्यूमर” बला रंगमंचक विरुद्ध विदेह मैथिली समानान्तर रंगमंचक प्रारम्भ केलक अछि। लगभग २००० घण्टाक मेहनति ऐ वेबसाइटपर अखन धरि भऽ चुकल अछि। एतए मिथिलाक गम-गाममे होइत मैथिली रंगमंचक अतिरिक्त, कोलकाता, जनकपुर, राजबिराज, पटना, दिल्ली आदिक रंगमंचक विवरण सेहो उपलब्ध अछि। समदिया- http://esamaad.blogspot.com/ पर पूनम मण्डल आ प्रियंका झा द्वारा २००४ ई.मे शुरू भेल, साहित्यिक पत्रकारिताक लीकसँ हटि कऽ न्यूज पोर्टलक वा ई-पेपरक रूपमे मैथिली पत्रकारिताकेँ एतएसँ प्रारम्भ भेल। अखन धरि ५२५ सँ बेसी पोस्ट ऐठाम भेल अछि। सर्वश्रेष्ठ न्यूजकेँ मासक समदिया पुरस्कार देल जाइत अछि। अगस्त २०१२मे सर्वश्रेष्ठ मैथिली पत्रकारकेँ ‘विदेह मैथिली पत्रकारिता सम्मान’सँ सम्मानित करबाक घोषणा अछि जे आब साले-साल सेहो देल जाएत। ऐ वेबसाइटपर अखन धरि ५५०० घण्टाक मेहनति पूनम मण्डल आ प्रियंका झा टाइपसँ लऽ कऽ समाचार अपलोड करबाक कार्यमे कऽ चुकल छथि आ ई साइट श्री रामभरोस कापड़ि भ्रमरक सीरियल चोरिक भण्डाफोड़क अतिरिक्त ढेर रास उद्घाटन कऽ साहसिक सोद्देश्य मैथिली पत्रकारिताक परिचए दऽ चुकल अछि। मैथिली फिल्म्स http://maithilifilms.blogspot.com/ श्री गजेन्द्र ठाकुर, श्री बेचन ठाकुर, श्री विनीत उत्पल, श्री सुनील कुमार झा आ श्री आशीष अनचिन्हार द्वारा संचालित साइट अछि, ऐपर मैथिली, अंगिका, वज्जिका आ सुरजापुरीक पूर्ण विवरण उपलब्ध अछि। एतए अखन पचाससँ ऊपर पोस्ट उपलब्ध अछि। अनचिन्हार आखर http://anchinharakharkolkata.blogspot.com/ - एेपर ४८१टा गजल, २२टा कता, बन्द, नात, १२४टा रुबाइ, ७०टा करीब आलेखक अलाबे शेरो-शाइरीसँ संबंधित विडियो सेहो उपलब्ध अछि। मैथिली हाइकू http://maithili-haiku.blogspot.com/ - ऐ वेबसाइट मैथिलीक साहित्यिक पत्रकारिताक प्रतिमान प्रस्तुत करैत अछि। मैथिली हाइकू (प्राकृत दृश्यपर ५/७/५) टनका (प्राकृत दृश्यपर ५/७/५/७/७) हैबून (प्राकृत दृश्यपर गद्यक एक-दू या तीन अनुच्छेदक अंतमे ओतबे हाइकू या टनका) हैगा (तत् संबंधी चित्र), शेनर्यू आदिक थ्योरी आ प्रैक्टिस सभ एतए भेट जाएत। मानक मैथिली http://manak-maithili.blogspot.com/ - ऐ वेबसाइटपर मैथिलीक अन्तर्जालपर मानकीकृत स्वरूप नेपाल आ भारतक मैथिली भाषाशास्त्री लोकनिक मतक अनुसार। मैथिलीक साहित्यिक पत्रकारिताक प्रतिमान प्रस्तुत करैत अछि। विहनि कथा http://vihanikatha.blogspot.in/ पर, मैथिली कविता http://maithili-kavita.blogspot.in/ पर, मैथिली कथा http://maithili-katha.blogspot.in/ पर आ मैथिली समालोचना http://maithili-samalochna.blogspot.in/ पर उपलब्ध अछि। विदेह गोष्ठी: (परिचर्चा आ प्रैक्टिकल लैबोरेटरीक प्रदर्शन। किछु विचार डाक आ ई-पत्रसँ सेहो आएल।)- http://esamaad.blogspot.in/p/blog-page_05.html मैथिली नाटक रंगमंच फिल्मपर: २८-२९ जनवरी २०१२ स्थान चनौरागंज,झंझारपुर। निर्मली, जिला सुपौलमे अन्तिम परिचर्चा आधुनिक मैथिली नाटक आ रंगमंचपर: १७-१८ सितम्बर २०११ आ २४-२५ सितम्बर २०११केँ। मैथिली गजल, कता, रुबाइपर निर्मली, जिला सुपौलमे अन्तिम परिचर्चा: २६-२७ नवम्बर २०११ आ ०३ आ ०४ दिसम्बर २०११ मैथिली हाइकू, टनका,शेर्न्यू, हैगा, हैबून पर निर्मली, जिला सुपौलमे अन्तिम परिचर्चा; १२-१३ नवम्बर २०११ आ १९-२० नवम्बर २०११ मैथिली बाल साहित्यपर निर्मली, जिला सुपौलमे अन्तिम परिचर्चा; १५-१६ अक्टूबर २०११ आ २२-२३ अक्टूबर २०११ मैथिली विहनि, लघु, दीर्घ कथा आ उपन्यास पर निर्मली, जिला सुपौलमे अन्तिम परिचर्चा; २९-३० अक्टूबर २०११ आ ०५-०६ नवम्बर २०११ मैथिली प्रबन्ध, निबन्ध, समालोचना, अनुवाद, मानक मैथिली आ शब्दावली पर निर्मली, जिला सुपौलमे अन्तिम परिचर्चा; ०१-०२ अक्टूबर २०११ आ ०८-०९ अक्टूबर २०११ मैथिली महिला आ फेमिनिस्ट लेखन पर निर्मली, जिला सुपौलमे अन्तिम परिचर्चा; ०३-०४ सितम्बर २०११ आ १०-११ सितम्बर २०११ मैथिली कला-शिल्प-संगीत पर निर्मली, जिला सुपौलमे अन्तिम परिचर्चा; २०-२१ अगस्त २०११ आ २७-२८ अगस्त २०११ मैथिली हास्य-व्यंग्य पर निर्मली, जिला सुपौलमे अन्तिम परिचर्चा; ०६-०७ अगस्त २०११ आ १३-१४ अगस्त २०११ मैथिली गूगल ट्रान्सलेटर टूलकिट, गूगल ट्रान्सलेट, गूगल लैंगुएज टूल, मैथिली विकीपीडिया, कैथी आ तिरहुता यूनीकोडक एनकोडिंग पर निर्मली, जिला सुपौलमे अन्तिम परिचर्चा; ०६-०७ दिसम्बर २००८, १३-१४ दिसम्बर २००८, ०५-०६ दिसम्बर २००९, १२-१३ दिसम्बर २००९, ०४-०५ दिसम्बर २०१०, ११-१२ दिसम्बर २०१०, १७-१८ दिसम्बर २०११, २४-२५ दिसम्बर २०११ मैथिली मे प्राथमिक आ मध्य विद्यालयी शिक्षा मैथिली माध्यमसँ मिथिलामे करेबा लेल निर्मली, जिला सुपौलमे परिचर्चा; ०३ फरबरी २०१२-०४-०८ निष्कर्षत: ऐ ई-पत्रकारितामे साहित्यिक आ राजनैतिक दुनू पत्रकारिता शामिल अछि जतए, दृश्य आ श्रव्य माध्यमक प्रचुर प्रयोग कएल गेल अछि।] ४ साहित्य अकादेमीक कथा गोष्ठीकेँ सगर राति दीप जरए कहल जाए? अजित आजाद- प्रभास कुमार चौधरी द्वारा बनारसमे आयोजित सगर राति दीप जरय मे हिन्दी कहानीक पाठ भेल छल। पटनामे आयोजित सगर राति दीप जरयमे सेहो हिन्दीमे कहानी पाठ भेल छल। कथाकार रहथि हृषकेश सुलभ आ संतोष दीक्षित, उर्दू भोजपुरी आ मगहीमे सेहो कथा पाठ भऽ चुकल अछि। महिषी कथा गोष्ठी (१३ अप्रैल १९९७) एक संस्था द्वारा प्रायोजित छल। पूर्णियाँ गोष्ठीकेँ सेहो एक प्रायोजक भेटल छल। पटनामे हम स्टेट बैंक ऑफ इण्डिया, लाइफ इन्स्योरेन्स कॉरपोरेशन आ सुधा द्वारा प्रायोजित करेने छी। एहिमे हर्ज की छैक? सगर राति दीप जरयक मंच सभ लेल खुजल छैक मुदा मैथिलीक शर्तपर नै। रूपेश कुमार झा त्योंथ: आइ जे ज्ञात भेल अछि मैथिली हेतु शर्मनाक छैक। मैथिली कथा गोष्ठीक नामपर ई सभ की भऽ रहल अछि? छी..। सभ बइमनमा सभ बैसल अछि मैथिली केर ठिकेदार बनि कऽ एकरा सभसँ यएह आशा कएल जा सकैत अछि। विनीत उत्पल: रमानंद झा रमण जी जे परचा वितरण करबैने रहथिन हम ओकरा तखने देखने रही, परचासँ लागल जे हुनकर ज्ञान इंटनेटकेँ लऽ कऽ नहि करे बराबर अछि। अप्पन बड़ाइ सभ कियो कऽ सकैत अछि, दोसराक करी तखन कोनो गप होएत। परचा छपायब कोनो पैघ वा छोट गप नहि अछि मुदा ओइमे जे छपल अछि ओकरा लऽ कऽ गंभीर हेबाक चाही। इंटरनेट/ तिरहुता यूनीकोड केँ लऽ कऽ के कत्ते काज कऽ रहल अछि तकरा लेल ठीक तथ्यक कोनो परचा छपबैक चाही। तखन विश्व्वनीयता बनल रहत। रमणजी एहन विद्वान आ आदरणीय लोकसँ ई उम्मीद नहि छल। मैथिलीक विस्तारसँ मिथिला बढ़त। अजित आजाद जी केँ स्पष्टीकरण देबाक चाही। मामला गंभीर अछि. हम सभ मैथिली भाषाक लेल काज कऽ रहल छी नहि कि कोर्टमे। एक गलती केँ पुख्ता करैक लेल पहिलुका गलतीक उदहारण नहि देल जा सकैत अछि। ई कहय मे कोनो संकोच नहि जे अजित आजादजी बड़ स्टेमिनाबला आ कर्मठ लोक अछि। बारह घंटा धरि मंच संचालन सामान्य लोक नहि कऽ सकैत अछि, जे हम दिल्ली गोष्ठीमे देखलहुं। हुनकामे किछु दिव्य शक्ति तँ अछि ताहि सँ ओ बड़ गंभीर भऽ कऽ मंच संचालन कऽ सकलखिन। मुदा कनी-कनी गपक वा अनर्गल गपक कारण हुनकर स्तर नीचाँ आबि जाइत अछि। हुनका अहि पर ध्यान देबाक चाही। जौं टी.ए/ डी.ए क गप अछि तँ प्रकाश जी/ नवीन जी/ अजित आजाद जी सँ अनुरोध जे अहि गप केँ स्पष्ट कएल जाय जे टी.ए/ डी.ए देल गेल अछि वा नै। दिल्लीमे रहैबला लोक तँ ओहिना पहुँचबे कएल, मुदा जे बाहर सँ आयल छल ओकर की हिसाब-किताब छल। जौं ई तीनू गोटेमे कियो अहि मामलाकेँ स्पष्ट करय तँ ठीक नहि तँ अहि मामले मे तीनू गोटेक मौन सहमति बुझल जाय। उमेश मण्डल: ''मिथिला विश्वविद्यालयक “मैथिली” पत्रिकामे वीणा ठाकुर जगदीश प्रसाद मण्डल आ शिव कुमार झा जीक आलेख मंगबेलन्हि मुदा डिपार्टमेन्टक एकटा प्राध्यापक दुनू गोटेक आलेख हटा देलन्हि।'' हमरे सँ मंगबेने रहथि। गजेन्द्र ठाकुर: अजित आजाद जी अही तरहक लूज टाक करैत रहै छथि/ हमरा लग सगर रातिक रजिस्टर क कोपी अछि, की अहाँ ओइ कथा सभक पन्ना बता सकै छी ? अरविन्द ठाकुर जीक सुपौल गोष्ठीमे सेहो हिन्दी कथाक पाठक सूचना अछि। तँ की सगर राति केँ हिन्दीक गोष्ठी बना देल जाए? बैजू कबिलपुर मे मिथिला राज्य लेल बाजल रहथि तँ की सगर राति केँ मिथिला राज्यक मंच बना देल जाए ? अजित आजाद केँ बुझल छनि जे एल.आइ. सी. आ स्टेट बैंकक एडवर्टीजमेन्टक की पालिसी छै? की साहित्य अकादेमीक लोगो मात्र एडवर्टीजमेन्ट छल? नै, ओ स्वामित्व छल जे दिल्लीक कथा गोष्ठीकें सागर राति नै हेबऽ देलकै/अजित आजाद जी अही तरहक लूज टाक करैत रहै छथि/ ओ कबिलपुरेमे यंत्रनाथ जीक सुतबाक चर्चा करैत कहने रहथि -"कहि देल गेलन्हि गेट आउट" तँ की ई सगर रातिक अंग भऽ गेल? सुपौलमे ओ की केने रहथि? उमेश मंडल जी केँ ओ कहलनि जे ऐ बेरुका टैगोर साहित्य सम्मान जगदीश प्रसाद मंडल केँ भेटतनि, मुदा फेर शंकरदेव झाक फोन एलनि उमेशजीकेँ जे अजित आजाद टैगोर साहित्य सम्मानक ग्राउंड लिस्ट बनेलनि आ जगदीश प्रसाद मंडलक पोथीक नाम ग्राउण्डे लिस्टमे ओ नै देलनि ? ई कथनी करनीमे फर्क किए? “कथा पारस” मे शिव कुमार झा जीक कथा सम्पादक अशोक अविचल देलनि मुदा सहायक सम्पादक अजित आजाद जातिवादी मानसिकताक चलते काटि देलनि (जेना अशोक अविचल कहै छथि)? तहिना मिथिला विश्वविद्यालयक “मैथिली” पत्रिकामे वीणा ठाकुर जगदीश प्रसाद मण्डल आ शिव कुमार झा जीक आलेख मंगबेलन्हि मुदा डिपार्टमेन्टक एकटा प्राध्यापक दुनू गोटेक आलेख हटा देलन्हि। शिव कुमार झा आ जगदीश प्रसाद मण्डलक क समीक्षाक दलित विमर्शसँ सभ घबड़ा गेल छथि? सीरियस डिस्कसन मे अजित आजाद जी ऐ तरहक लूज टाक की साहित्य अकादेमीक इशारा पर कऽ रहल छथि, जे अपन गोष्ठी मे मैथिली पोथीक प्रदर्शनक अनुमति नै देलक? जगदीश प्रसाद मण्डल, बेचन ठाकुर, कपिलेश्वर राउत, राजदेव मण्डल, उमेश पासवान, अच्छेलालशास्त्री, दुर्गानन्द मण्डल, झाड़ूदारजी आदि श्रेष्ठ कथाकार लोकनिकेँ एकटा पोस्टकार्डो नै देबाक आयोजन मण्डलक निर्णय अद्भुत अछि, ओना तै सँ ऐ लेखक सभक स्टेचरपर कोनो फर्क नै पड़तन्हि। भऽ सकैए ७५म गोष्ठीक आयोजक अशोक आ कमलमोहन चुन्नू वर्तमान आयोजककेँ हुनकर सभक पता सायास वा अनायास नै देने हेथिन्ह आ वर्तमान आयोजक केँ से सुविधाजनक लागल हेतन्हि। जगदीश प्रसाद मण्डलजीक आयोजनमे सभ धोआधोतीधारी आ चन्दन टीका पाग धारी भोज खा आएल छथि, मुदा बजेबा कालमे अपन आयोजनकेँ बभनभोज बनेबापर बिर्त छथि।ओना ई आयोजन साहित्य अकादेमीक फण्डसँ आयोजित भेल आ एकरा साहित्य अकादेमीक कथा गोष्ठी मात्र मानल जाए। मैथिली साहित्यक इतिहासमे ७६ म सगर राति दीप जरयक रूपमे ऐ जातिवादी गोष्ठीकेँ मान्यता नै देल जा सकत। साहित्य अकादेमीक मैथिली विभागक जातिवादी चेहरा एक बेर फेर सोझाँ आएल अछि जखन ओ मैथिलीक एकमात्र स्वायत्त गोष्ठीकेँ तोड़ि देलक। II जगदीश प्रसाद मण्डल- एकटा बायोग्राफी...गजेन्द्र ठाकुर द्वारा ........शीघ्र दिनांक ५-७-१९४७ ई.केँ जन्म । भरल-पुरल परिवार। तीन पीढ़ीसँ एक पुरुखियाह परिवार चलि अबै छल। जहिना बाबा तहिना पिता छलखिन्ह। घर लग पोखरि-इनार रहने पानिक सुविधा छलन्हि। माता-पिताक संग दीदीयोक परिवारक संग मिलल-जुलल परिवार। तइ संग अपनो किछु जमीन… आ गामक जे बहरबैया मालिक रहथिन्ह हुनकर खेतो बटाइ करैत छलाह जइसँ खेबा-पीबाक अभाव सेहो नै। एक तँ वंशगतो आधार दोसर पितोक ऊपर पारिवारिक-समाजिक प्रभाव पड़ल छलनि जइसँ किछु अगुआएल विचार रहनि। जहिना भतभोजमे बरी पड़िते पंच बूझि जाइत अछि जे भोज अंतिम दौड़मे आबि गेल तँए आब इन्तजार नै करबाक चाही। जँ इन्तजार करब तँ भुखले उठब। तइसँ नीक जे मारि-धूसि झब दऽ कसि ली नै तँ दोख केकर हेतै। तहिना अंग्रेजी शासन अपन सभ किछु समेटि रहल छल। १९४२ईं.मे जे तूफानी आन्दोलन उठल ओ कमल नै, उग्रसँ उग्रतरे भेल जाइत छलै, जेकर परिणाम १५ अगस्त १९४७ईं. छी। मुदा देशोक दशा एकमुड़िया नै, अपनोमे खटपट होइते छलै। कतौ जातीय उन्माद तँ कतौ साम्प्रादायिक उन्माद। कतौ धन-सम्पतिक तँ कतौ इज्जत-आवरूक। जहिना स्वतंत्रता संग्राम जोर पकड़ने तहिना बंगालक अकाल, बिहारक भूमकम (१९३४)क प्रभावसँ प्रभावित छल। स्वतंत्रताक लड़ाइमे मिथिलांचलक योगदान देशक कोनो भागसँ कम नै रहल। एक दिसि पुस्तैनी सोचक मुँहपुरुख तँ दोसर १९४०ईं.क बाद सोशलिस्ट पार्टी आ कम्युनिस्ट पाटी राजनीतिक सोच पैदा करैत रहल। समाजोक बीच जागरूकताक लहरि चलैत रहल। जहिना सोशलिस्ट पार्टी अपन किछु कार्यक्रम लऽ ठाढ़ छल तहिना कम्युनिस्ट पार्टी। दरभंगा जिलाक पहिल टीम (१९३९-४०) पार्टीक सदस्यता ग्रहण कऽ चुकल छलाह। वफादार कार्यकर्ता बनि उतरि चुकल छलाह। तहिना सोशलिस्टो पार्टी, गाम-गाम पहुँच चुकल छल। १९४२ ईं.क जन-आन्दोलन पुस्तैनी सोचमे धक्का मारलक। धक्कासँ विचारमे टूट-फाट भेल। धक्कासँ टूटि नव सोचक संग सेहो ऐल। सामाजिक परिवेश पैदा कऽ चुकल जे जमीन्दारी समाप्त हेबे करतै, राजा-रजबार ढहबे करतै। आइ धरिक जे जमीन निलामीक प्रथा छल आ मालगुजारी असुलक जुल्म छल ओ मेटेबे करतै। नव विचार जन-गणक बीच पैदा लऽ चुकल छल। मिथिलांचक बीच झंझारपुर इलाकाक अप्पन प्रतिष्ठा रहल अछि। जहिना शिक्षाक क्षेत्रमे तहिना आर्थिक क्षेत्रमे। देशक पैमानामे इलाका पछुआएल नै छल अगुआएल छल। एकसँ एक महान पुरुष पैदा लऽ चुकल अछि। आजादीक लड़ाइमे खून बहौनिहार क्षेत्र छी। झंझारपुर अंग्रेजक मुख्य अड्डामे छल। दमन नीति कतौ चलल तँ अहू क्षेत्रमे चलल। मिथिलांचलक बीच झंझारपुर इलाका ओ क्षेत्र छी जइमे मिथिलाक इतिहास दर्शन, अखनो झलकि रहल अछि। अखनो पाथरमे फूल, माटि-पानिमे सुगंध जीवित अछि। क्षेत्रक गाम-समाजमे दर्जनो जाति दर्जनो सम्प्रदाय, अदौसँ अखन धरि मिलि-जुलि एकठाम बास करैत एलाह अछि। भूमियोक शक्ति ओहने उर्वर अछि जे देशक पहिल श्रेणीक सघन अवादीबला क्षेत्र अछि। बीसम सताब्दीक पाँचम दशक देशकेँ ऐ रूपे आन्दोलित कऽ देलक जे लोक जन-गण घर-परिवारसँ आगू बढ़ि देशक लेल अपनाकेँ अर्पित कऽ देलक। जहिना दशकक पूर्वाद्ध आन्दोलित केलक तहिना एक संग अनेको प्रश्न उठि कऽ ठाढ़ भेल। ओना एकसंग खुशी आइ धरिक देशक इतिहासमे कहियो नै भेल छल जते भेल। जेना-जेना आजादीक झंडा फहरबैक दिन लगिचाइत गेल तेना-तेना खुशीमे बढ़ोतरी होइत गेल। अाधा दशक जहिना जगैमे लगल तहिना अाधा दशक रंग-रंगक सपना देखैमे खुशीसँ बीतल। समाजक बीच तँ नै मुदा देशक राजनीतिमे आर्थिक मुद्दा स्पष्ट विभाजित कऽ देने छल। कियो देशक पूर्ण आजादी देखैत छलाह तँ कियो नेङरा आजादी बुझैत छलाह। ओना देशक भीतर रौदी, भुमकम, जाति-सम्प्रदायक उन्माद एते जोर पकड़ि लेने छल जे भीतर-बाहरक लड़ाइमे राजनीतिक दल ओझराएल छल। ओना तेलांगना लड़ाइ देशक नक्शमे आबि चुकल छल। भारत-पाकिस्तान विभाजनक एक-एक जनमानसकेँ झकझोरि रहल छल। दसो बर्खक जेलक जुड़ल हृदए संगी सभक बीच टुटि रहल छलनि। काला-पानी जहलमे संगे छलाह मुदा गाम-समाज विभाजित भऽ गेलनि। १५ अगस्त (१४ अगस्तक बारह बजे रातिक उत्तर)केँ ितरंगा झंडा फहराएल। अंग्रेजी शासक अन्त भेल। जन-मानसक हृदैमे खुशीक लहरि असथिरो नै भेल छल आकि गाँधीजीकेँ राजधानीमे दिन-दहार गोली लगलनि, जे शासनक स्पष्ट चित्र प्रस्तुत करैत अछि। संविधान सभामे संविधान बनब शुरू भेल। संविधान बनल 1952 ई.सँ आम चुनाअो प्रक्रिया शुरू भेल। राज्य आ केन्द्र सरकार बनैक चुनाव भेल। नव सरकारक गठन भेल। ओना देशक विस्तारो अंग्रेजी शासनसँ भेल, मुदा हजारो समस्याक बीच पटकि देलक। नव सरकारक बीच हजरो समस्या उपस्थिति भऽ गेल। गाम-गाममे वकास्त जमीनक लड़ाइ पसरि गेल छल। राजनीतिक सभ पार्टीक एकमुँहरी समर्थन रहने लड़ाइ सफलो भेल। …….. ………….. ………………………….. …………………………………………….. १९५०ईं.मे पिताक निधन भेलनि। जखन तीन बर्खक रहथि। दू भाँइक भौयारीमे छह बर्खक भाय (भैया) रहथिन्ह। पिताजी करीब एक मास बेमार रहलाह। इलाजोक नीक बेवस्था नै, ताबत दरभंगा अस्पताल नै बनल छलै। झाड़-फूकसँ लऽ कऽ जड़ी-बुटीक इलाज समाजमे चलैत छल। आजुक परिवार जकाँ नै जे ने बेटा बाप-माएकेँ देखैत अछि आ ने माए-बाप बेटा-पुतोहुकेँ। कारण अनेक अछि मुदा अपनो परिवारक जँ जिम्मा नै लऽ चलब तँ अनेरे हम सभ मातृभूमि, देश महान कहै छिऐ। इमानदारी पूर्वक हृदैपर हाथ रखि कऽ कहै पड़त जे देलिऐ की आ लेलिऐ की? हमरा नै भेल तेकर दोखी हम नै? एक तँ अपनो परिवारमे समांग दोसर गामक कोनो जाति एहन नै जइ जातिसँ पारिवारिक संबंध नै छलन्हि। तइ संग जातियो नमहर टोल। गामक चारू कातक गाममे कुटुमैती सेहो छलन्हि आ अखनो छन्हि। ओहो सभ अपनामे समए िनर्धारित कऽ अबैत-जाइत रहैत छलाह। कान्ही सेहो नीक बनौलनि। एकसँ एक खिस्सकर आ एकसँ एक गप केनिहार। तँए दिन-रातिमे कोनो अंतर नै। अभाव परिवारमे नहिये छलन्हि तँए अनुकूल परिस्थिति बनल छल। अनुकूल परिस्थिति बनने परिवारक भविष्य दिसि सेहो नजरि पड़लनि। भैयाक बिआह भऽ गेल रहनि। चारि-पाँच बर्खमे बिआह होइत छल। तहूमे मौसी (सात-भाए बहिनमे सभसँ जेठ मौसी आ सभसँ छोट माए।) विधवा भऽ गेलीह। मौसीकेँ मात्र दुइयेटा बेटी, परिवार अन्त भऽ गेलनि। मौसीक प्रभाव माइक ऊपर, तँए जेठ-भायक बिआह पाँचे बर्खमे भऽ गेलनि। भविष्य दिसि दृष्टि पड़िते हिनकापर नजरि पड़लनि। ओछाइन पकड़ल रोगिक अवस्था ओहेन होइत जेकर कोनो निश्तुकी नै। जीवियो सकै छथि मरियो सकै छथि। तँए एहेन अवस्थामे विचारोमे इमानदारी अबै छै। मछधी (ददिया ससुर) परिवार सुभ्यस्त। ददिया ससुरक कुटुमैती गोधनपुर मौसीक परिवारमे। मौसीक आवाजाही बेरमा बहिन ऐठाम। ददिया ससुर सुराग भीड़ा गोधनपुरक मौसाक छोट भाए संग अाबए-लगलाह। छल-प्रपंच विहीन मौसी माएकेँ कहि देलखिन। जेठ-छोटक विचार रखैत माए आश्वासन दऽ देलखिन जे अखन तँ अपने अछोइन धेने छथि, राजा-दैवीक कोनो ठेकान नै छै, तँए अखन किछु नै, बुझल जेतै। मछधीक परिवार बेवहारिक दृष्टिये दब। ताड़-खजुरक गाछ बेसी। एक-लगाइत बुढ़ा (ददिया ससुर) अपन पल्लो भरि धोती आ चद्दैर नेनहि पहुँचि मृत्युक आखिरी समए तक बेरमामे रहि गेला। मृत्युक अंतिम राति, डिबिया जरिते सभकेँ अन्हार बूझि पड़ए लगलनि। जे बोल जीवित छल, बन्न भऽ गेल। हाथ-पएरक डोलब बन्न भऽ गेल। माएकेँ लगमे बजा बुढ़ा (ददिया ससुर) गोधनपुरबला मौसाकेँ सम्बोधित करैत कहलखिन- “समधि, ई बच्चा हमरा दऽ दिअ। गोवर पाथैले पोती देबनि।” मिटिंगक प्रस्ताव जकाँ गोधनपुरबला मौसा समर्थन करैत कहलखिन ई तँ घर कथा भेल, ऐमे कि हँ-हूँ कहल जाएत।’ तही बीच मौसी टपकि गेली- “बहिन, अखन बाल-बोध अछि हिनका बच्चा देलियनि। तीनिये बर्खमे बिआहक बात पक्का भऽ गेल।” अखन धरि परिवारमे अपनासँ गाए दुहैक, हर जोतैक आ खुटापर बच्छा बधिया करेबाक चलनि नै रहए। पिताक परोछ भेनहुँ समैपर स्कूल पहुँचलथि। गाममे लोअर प्राइमरी स्कूल छल। भीतघर रहने भुमकम (१९३४) ई.मे खसि पड़ल। राजा-दैव भेने जहिना लोक घराड़ी बदलि लइए तहिना स्कूलक घराड़ी बदलल। ओइ समैमे तीनटा कचहरी बेरमामे छल। दछिनबरिया कचहरीक घरमे स्कूल चलए लगल। पछाति ओहो बदलि अखुनका जगहपर पहुँचल। बेरमा पंडितक गामक श्रेणीमे गनल जाइत अछि। परोपट्टाक लोक गेठरी झाकेँ जनैत छन्हि, जिनका सात सए बीघा जमीन राज-दरभंगासँ भेटल छलनि। ओना ओ जमीन बेरमा सीमामे नै पड़ैत अछि मुदा दू कोस हटि कऽ छल। आब नै छन्हि। दोसर बैचमे चारि गोटे, वेद, व्याकरण साहित्यसँ आचार्य केलनि। दू गोटेकेँ मेडल भेटलनि। ओना तीन गोटे गामसँ बाहर विद्यालय पकड़ि लेलनि, मुदा एक गोटे (मेडलधारी) गाममे नून-तेलक दोकान कऽ लेलनि। ‘पढ़े फारसी बेचए तेल’ चरितार्थ भऽ गेल। मुदा अपन लगन आ मेहनतिसँ तीनू गोटेकेँ आर्थिक क्षेत्रमे पछुआ देलनि। समाजपर बहुत अधिक प्रभाव पड़ल। मेहनती गाम तहियो छल अखनो अछि। आन गाममे कमो पढ़ल-लिखल लोककेँ लोक चुटकी लैत अछि, से बेरमा नै अछि। झंझारपुर बाजारसँ माथपर वस्तु-जातक (दोकानक) मोटरी बैशाखक रौदमे अनैत छलाह, जे सभ देखैत छल। गाममे एक्केटा दोकान। सबहक लाट दोकानसँ। ओना एकटा झंझारपुरक बनिया सेहो आबि बेरमामे दोकान खोलने रहथि। झंझारपुरक बनियाक परिवार भुमकममे नष्ट भऽ गेलनि। ईटाक घर रहने सभ दबा कऽ मरि गेलनि। वएह बेरमा आबि बसि गेलाह। पिताक मृत्युक किछुओ नै यादि छन्हि, िसर्फ गाछीमे जरैत अछिया टा.....। ओना अंग्रेजी शिक्षा सेहो गाममे कम प्रतिशतमे पहुँचि चुकल छल। गामक उत्तर नवानी विद्यालय आ दछिन दीप विद्यालय चलि रहल छल। तमुरिया हाई स्कूल आ झंझारपुर हाई स्कूल सेहो बनि गेल छल। गामक जे तीनू पंडित बाहर रहैत छलाह हुनको सबहक परिवार गामेमे रहैत छलनि। अपनो छुट्टी गाममे बितबैत छलाह। एकडोरिमे तीनू गाम (नवानी, बेरमा, दीप) रहितो सामकजिक वातावरणमे बहुत अधिक भिन्ननता अछि। एक तँ परगन्नाक प्रभाव दोसर सामाजिक बनाबट। जइ नवानी दीपमे ताड़-खजूरक गाछ सेहो भरपुर अछि तइठाम बेरमामे एक्कोटा गाछ नै अछि। दोसर कारण इहो अछि जे मध्य वर्गीय जाति बहुसंख्यक अछि। सन् सैंतालीस... भारतक स्वतंत्रताक त्रिवार्णिक झण्डा फहरा रहल छल। मुदा कम्यूनिस्ट पार्टीक माननाइ छल जे भारत स्वतंत्र नै भेल अछि। असली स्वतंत्रता भेटब बाँकी छै... मिथिलाक एकटा गाम… जन्म होइत अछि एकटा बच्चाक.. ओही बर्ख ... ओइ स्वतंत्र वा स्वतंत्र नै भेल भारतमे... पिताक मृत्यु...गरीबी.. केस मोकदमा... वंचितक लेल संघर्षमे भेटलै स्वतंत्र भारतक वा स्वतंत्र नै भेल भारतक जेल.... आइ बेरमामे पाँच-दस बीघासँ पैघ जोत ककरो नै.. ओइ गाम मे आइ जीवित अछि आइयो किसानी आत्मनिर्भर संस्कृति... पुरोहितवादपर ब्राह्मणवादक एकछत्र राज्यक जतऽ भेल समाप्ति.. संघर्षक समाप्तिक बाद जिनकर लेखन मैथिली साहित्यमे आनि देलक पुनर्जागरण... जगदीश प्रसाद मण्डल- एकटा बायोग्राफी...गजेन्द्र ठाकुर द्वारा ........शीघ्र गजेन्द्र ठाकुर ggajendra@videha.com http://www.maithililekhaksangh.com/2010/07/blog-post_3709.html २. गद्य २.१.किशोरीकान्त मिश्र जी सँ नबोनारायण मिश्र जी द्वारा लेल साक्षात्कार २.२.ओमप्रकाश झा-१. बहुरूपिया रचना मे २. घोघ उठबैत गजल २.३.१.नवेंदु कुमार झा- केन्द्रीय विश्वविद्यालयक लऽ कऽ राज्य आ केन्द्र मे बढ़ि रहल हार/ उत्साहक संग समाप्त शताब्दी समारोह- डा॰ सच्चिदानंद उपेक्षा पर निधन परिषद् भेलाह नाराज। २. सुजीत कुमार झा - राम जन्मोत्सवपर विशेष/ मिथिलाक कण कणमे रामसीता ३. किशन कारीगर- अकछ भेल छी।/(एकटा हास्य कथा) २.४.विहनि कथा-१.ओमप्रकाश झा २.अमित मिश्र ३.चंदन कुमार झा ४.आशीष चौधरी २.५.१.रवि भूषण पाठक- ओक्कर तोहर हम्मर सपना २.शिव कुमार झा ‘टिल्लू’- बहिरा नाचए अपने ताल २.६.गजेन्द्र ठाकुर- शब्दशास्त्रम् / दिल्ली २.७.१.आशीष अनचिन्हार- "सगर राति दीप जरय"केर अन्त आ साहित्य अकादेमी कथा गोष्ठीक उदय २.प्रियंका झा- सगर राति दीप जरय पर साहित्य अकादेमीक कब्जा/ सरकारी पाइपर भेल बभनभोज/ साहित्य अकादेमीक कथा रवीन्द्र दिल्लीमे समाप्त- रवीन्द्रक कथापर कोनो चर्चा नै भेल- ७६म सगरराति दीप जरय चेन्नैमे विभारानी लऽ गेली ३.सुमित आनन्द- सोसाइटी टुडेक लोकार्पण २.८.१.जगदीश प्रसाद मण्डलक कथा-फागु २.अतुलेश्वर- मातृभाषा दिवस क बहन्ने ओमप्रकाश झा १. बहुरूपिया रचना मे २. घोघ उठबैत गजल १. बहुरूपिया रचना मे गजल मे हम रूचि राखैत छी। संगहि मैथिली मे थोड बहुत गजल सेहो लिखै छी आ गजलक पोथी सब पढबाक इच्छा रहै ए। मैथिली मे बहुत कम गजल संग्रह अछि आ ओहो सुलभ नै होइत रहै ए। एहन परिस्थिति मे हमरा श्री अरविन्द ठाकुरजीक सद्यः प्रकाशित मैथिली गजल संग्रह "बहुरूपिया प्रदेश मे" पढबाक अवसर भेंटल आ हम एहि पोथी केँ आद्योपान्त पढलहुँ। सबसे पहिने हम श्री अरविन्द ठाकुरजी केँ मैथिली गजलक पोथी लिखबाक लेल बधाई दैत छियैन्हि। मैथिली गजलक उत्थान लेल प्रत्येक डेग हमरा महत्वपूर्ण लागै ए। पोथीक गेट अप बड्ड सुन्नर अछि। टाईप आ कागतक कोटि सेहो उत्तम अछि। पोथीक भूमिका गजलकार अपने लिखने छथि आ ओहि मे गजल आ एहि संग्रहक सम्बन्ध मे बहुत रास गप सब कहने छथि। जेना पृष्ठ संख्या सातक दोसर पारा मे गजलकार कहैत छथि जे "मैथिलीक मिजाजक सीमा (इ मैथिलीक नहि, हमर अपन सीमा भऽ सकैत अछि) केँ देखैत गजलक व्याकरण (रदीफ, काफिया, मिसरा, मतला, मकता आदि)क स्थापित मापदंडक कसबट्टी पर हमर सभ गजल खरा उतरत तकर दाबी तऽ नहिए टा अछि बल्कि हम तँ इ सकारय चाहै छी जे--------------------------------- हमर सीमाक कारणेँ प्रस्तुत गजल मे कएक जगह सुधि पाठक लोकनि केँ त्रुटि भेटि सकैत छनि।" एहि पाराक अन्त मे ओ कहै छथि जे बहरक दोख किछु शेर मे भेटि सकैत अछि। हम गजलकारक सराहना करैत छी जे ओ भूमिका मे अपने कएक ठाम बहरक आ आन दोख हएब स्वीकार कएने छथि। पोथी केँ आद्योपान्त पढला पर हमरा इ नै बुझाएल जे एहि संग्रहक गजल सब कोन-कोन बहर मे लिखल गेल अछि। अरबीक कोनो टा बहर मे कोनो गजल नहिए अछि, मैथिली मे आइ-काल्हि प्रयुक्त होइ बला सरल वार्णिक बहर मे सेहो कोनो गजल नै अछि। गजलकार केँ प्रत्येक गजल मे इ लिखबाक चाही छल जे कोन बहर मे गजल लिखल गेल अछि। जँ इ "आजाद-गजल"क संग्रह थीक, तँ हुनका एहि बातक उल्लेख करबाक चाही छल। भूमिकाक उपरोक्त पाराक शुरू मे गजलकार कहै छथि जे मैथिलीक मिजाज केँ देखैत एहि मे उर्दू-हिन्दी गजलक मिजाजक नकल करबाक प्रयास कएल जाइत तँ एकरा बुधियारी नहिए टा कहल जायत आओर सफलता सेहो नहि भेंटत। हम हुनकर गप सँ सहमत छी जे नकल करब उचित नहि। मुदा एकटा गप हम कहऽ चाहैत छी जे प्रत्येक विधाक एकटा नियम होइत छै आओर जाहि क्षेत्र मे ओहि विधाक उदय भेल रहैत छै ओहि क्षेत्र मे स्थापित भेल नियमक पालन केने बिना कोनो रचना मूल विधा मे कोना भऽ सकैत अछि। जेना मैथिली मे समदाउन आ सोहरक परम्परा छैक आ जँ पंजाबी मे वा गुजराती मे वा की कोनो आन भाषा मे समदाउन आ सोहर गाबऽ चाही तँ नियम कोना बदलि जेतैक। जँ नियम बदलतै तँ ओ दोसर चीज भऽ जेतैक। तहिना गजल अरब क्षेत्र मे जन्म लेलक आ इ स्वाभाविक छै जे एकर नियम (व्याकरण) ओहि क्षेत्रक स्थापित मानदण्डक आधार पर बनल। स्थापित मानदण्डक पालन करब नकल नहि कहल जा सकैत अछि। आ जे नकलक गप करी तँ 'गजल' कहब अरबी-हिन्दीक नकल थीक। एक दिस गजलकार 'गजल' कहबाक लोभ नै छोडि रहल छथि आ दोसर दिस गजलक व्याकरणक नियम पालन केँ नकल कहै छथि, इ उचित नै बुझाएल। गजल स्थापित मानदण्ड पर जँ नै कहल गेल तँ रचना केँ गजलक स्थान पर दोसर नाम देल जा सकैत अछि। पृष्ठ संख्या दस पर दोसर पारा मे गजलकार कहै छथि जे ओ जीवन सँ सिदहा लैत छथि। इ स्वागत योग्य गप भेल। जीवनक सिदहा सँ तैयार व्यंजन सोअदगर हेबे करतै। मुदा भोजन बनबै काल चाउरक सिदहा पानि मे सोझे फुला कऽ परसि देला सँ भात नहि कहाइत अछि। चाउरक सिदहा केँ अदहन मे देल जाइ छै तखन भात तैयार होइ छै। तहिना जीवनक सिदहा जँ व्याकरण, नियम आ चिन्तन-मननक अदहन मे पकाओल जाइत अछि तँ सोअदगर रचना भेटैत अछि। विधा विशेषक मापदण्ड तोडबाक क्रांतिकारी घोषणा कएला टा सँ किछु विशेष फायदा वा उमेद तँ नहिए जगै ए। जँ कियो मापदण्ड तोडै छथि, तँ मापदण्ड पर चलै बला केँ नकलची आ बाजीगर कहब उचित नहि। गजल आ फकरा आ दोहा मे थोडेक अन्तर तँ छै जे रहबे करतै। अस्तु, इ गजलकारक अपन विचार छैन्हि आ आब प्रकाशित सेहो छैन्हि। गजल संग्रहक सब गजल पढलौं। विषय वस्तु सब नीके लागल। गजलक व्याकरणक आधार पर कहि सकैत छी जे बहरक दोख तँ प्रत्येक गजल मे छैक आ जँ इ आजाद-गजलक संग्रह थीक तँ गजलकार इ गप कतौ नै कहने छथि। गजलकार केँ स्पष्ट करबाक चाही छल जे कोन कोन बहर मे गजल सब लिखल गेल अछि। हमरा बुझने गजलक कोनो शीर्षक नै होइत अछि, मुदा प्रत्येक गजल केँ एकटा शीर्षक देल गेल अछि। बहरक अतिरिक्त रदीफ आ काफियाक नियमक सेहो कएक ठाम पालन नै भेल अछि आ इ गप गजलकार भूमिका मे सेहो स्वीकार कएने छथि। जेना पृष्ठ बाईस मे मतलाक दुनू पाँति, दोसर शेर आ पाँचम शेर मे काफिया मे 'आयब' प्रयोग भेल अछि, तँ दोसर आ चारिम शेर मे 'अब' क प्रयोग अछि। पृष्ठ चौबीस मे मतलाक पहिल पाँति मे काफिया मे 'अ' आयल अछि आ दोसर पाँति आ अन्य शेर मे 'आत' आयल अछि। पृष्ठ पच्चीस मे काफिया की छै, से नै बुझाएल। पृष्ठ तिरपन मे प्रत्येक पाँति मे काफिया एकदम फराक फराक अछि। पृष्ठ अनठाबन मे मतला, दोसर शेर आ चारिम शेर मे काफिया मे 'अल' प्रयुक्त अछि आ आन सब शेर मे काफिया मे 'अ' प्रयुक्त अछि। पृष्ठ उनसठि मे सेहो रदीफ आ काफियाक स्पष्टता नै अछि। पृष्ठ छियासठि मे काफिया मे कतौ 'अल' आ कतौ 'आओल' प्रयुक्त अछि। पृष्ठ सडसठि आ तिहत्तरि मे सेहो काफियाक नियमक उल्लंघन भेल अछि। तहिना संयुक्ताक्षर बला काफियाक नियम सेहो एक दू ठाम हमरा हिसाबेँ ठीक नै अछि। एकर अतिरिक्त आओर कएक ठाम काफियाक नियमक पालन नै भेल अछि। हम उदाहरण स्वरूप किछु पृष्ठक उल्लेख कएलहुँ। हमर इ उद्देश्य नै अछि जे खाली दोख ताकल जाय, मुदा जँ गजल कहै छियै तँ गजलक नियमक पालन हेबाक चाही। सब गोटे केँ जानकारी लेल इ बता दी की बिना रदीफक गजल तँ भऽ सकैत अछि, मुदा बिना दुरूस्त काफिया भेने गजल नै भऽ सकैत अछि। भूमिका सँ एकटा बात आर स्पष्ट होइ ए जे गजलकार मई २००८ सँ मैथिली मे गजल लिखब शुरू केलथि, ओना ओ हिन्दी मे पहिनहुँ गजल लिखैत छलाह। एकर मतलब इ भेल जे गजलकार "अनचिन्हार आखर" (मैथिली गजल केँ समर्पित ब्लाग) सँ बहुत बाद मे मैथिली गजल लिखब शुरू कएने छथि आ मैथिली गजलक वरीयता मे बहुत बाद मे आयल छथि। "अनचिन्हार आखर" ब्लाग देखला सँ पता चलै छै जे गजलकार एहि ब्लाग पर सेहो अपन कएक टा गजल २००९ सँ एखन धरि देने छथि। ओ "अनचिन्हार आखर" ब्लाग सँ चिन्हार छथि, तैँ इ उमेद अछि जे एहि ब्लाग पर प्रकाशित मैथिली गजलक विस्तृत व्याकरण केँ जरूर देखने हेताह। इ उमेद छल जे प्रस्तुत गजल संग्रह मैथिली गजलक नब पीढी लेल एकटा उदाहरण बनत। मुदा एहि संग्रह मे गजलक व्याकरणक जे उपेक्षा भेल अछि, जे गजलकार भूमिका मे स्वयं स्वीकार कएने छथि, निराशा उत्पन्न करैत अछि। मुदा इ संग्रह गजलकारक पहिलुक मैथिली गजल संग्रह अछि, तैँ गजलक व्याकरणक गलती भेनाई स्वभाविक अछि। आशा व्यक्त करै छी जे हुनकर आगामी गजल संग्रह मैथिली गजल मे अपन अलग स्थान राखत। २ घोघ उठबैत गजल मैथिली गजलक पहिलुक प्रकाशित पोथी "उठा रहल घोघ तिमिर" पढबाक सौभाग्य भेंटल। ऐ गजल संग्रहक गजलकार श्री विभूति आनन्द छथि। एहि पोथी मे कुल चौंतीस गोट गजल अछि। पूरा पोथी केँ एकहि बैसार मे पढि गेलहुँ आ बेर-बेर पढलहुँ। सबसे पहिने हम श्री विभूति आनन्दजी केँ मैथिली गजलक पहिलुक संग्रह प्रकाशित करबा लेल धन्यवाद दैत छियैन्हि। एहि पोथीक भूमिका मे गजलकार कहै छथि जे "मैथिलीक गजल सोझे-सोझ हिन्दी सँ प्रभावित अछि मुदा हिन्दी जकाँ जमल नञि अछि एखनो धरि।" आगू हुनकर कहनाई छैन्हि- "पारम्परिक व्याकरण सम्बन्धित अगणित त्रुटि सभ ठाम लक्षित होएत। ओना हम दुस्साहसपूर्वक साहस करैत रहलहुँ अछि जे कथ्य-सामंजस्य लए व्याकरण दिस सँ यदि मूँहो घूमा लेल जाए तँ कोनो हर्ज नञि। किए तँ हम मानैत छी जे ई पाठ्यक्रमक वस्तु नञि अछि। विद्यार्थी मूर्ख नञि बनत। तैं की ------------------------ व्याकरण सँ भयभीत भऽ नञि लिखल जाए।" गजलकारक पहिलुक कथनक सम्बन्ध मे हमर निवेदन अछि जे गजलक परम्परा अरबी-फारसी सँ शुरू भेल अछि आ ओतहि सँ आन भारतीय भाषा मे पसरल अछि। हिन्दी-उर्दू मे गजल कहबाक परम्परा मैथिली सँ पहिने शुरू भेल, तैं बहुसंख्य लोक दिग्भ्रमित भऽ जाइत छथि जे मैथिलीक गजल हिन्दी गजलक नकल छी वा ओइ सँ प्रभावित भेल अछि। गजलकार सेहो एहि मिथ्या धारणा सँ प्रभावित छथि। आब गजलक व्याकरण थोड-बहुत समन्जनक संग सब भाषा मे तँ एक्के रहत। ऐ स्थिति केँ हमरा हिसाबेँ "प्रभावित भेनाई" कहबाक कोनो औचित्य नै अछि। गजलकारक दोसर कथन देखि हम निराश भेल छी। पता नै किया एखन धरि जे दुनू गजल संग्रह (सबसँ पहिलुक आ सबसँ अंतिम प्रकाशित) पढलहुँ, एहि दुनू मे गजलकार कथ्य-सामंजस्यक आगू व्याकरण केँ कोनो मोजर नै देबऽ चाहैत छथि। एकटा गप मोन रखबाक चाही जे साहित्यक निर्माण वैयाकरणिक अनुशासनक बादे सफल भेल अछि। इ फराक गप अछि जे समय-काल आ स्थानक हिसाबेँ सर्वमान्य परिवर्तन व्याकरण मे होइत रहल छैक। बिना वैयाकरणिक अनुशासनक भाषा पढबा, लिखबा आ बाजबा जोग रहत? जिनका मे साहित्य निर्माणक माद्दा छैन्हि, हुनका मे व्याकरण केँ पालनक साहस अबस्स हेबाक चाही। आब हम एहि संग्रहक गजलक सम्बन्ध मे किछु गप कहऽ चाहब। इ गजल संग्रह ओहि समय मे लिखल गेल अछि जखन मैथिली गजलक व्याकरण आ बहरक सम्बन्ध मे बहुत बेसी जनतब सार्वजनिक नै छल। हम एकरा एना कहऽ चाहब जे इ गजल संग्रह "अनचिन्हार आखर" जुग सँ पूर्वक गजल अछि जखन बहर, रदीफ आ काफियाक नियमक पालनक विषय मे बहुत रास गप सर्वजन सुलभ नै छल। एहि हिसाबेँ जँ ऐ संग्रहक गजल सभ मे बहरक दोख छैक तँ इ स्वभाविक बुझाईत अछि। एहि संग्रहक कोनो टा गजल कोनो बहर मे नै अछि। तैं ऐ संग्रहक वैध गजल (जाहि मे काफियाक नियमक पालन भेल हुए) सभ केँ "आजाद-गजल"क श्रेणी मे राखल जा सकैए। आब गजलक काफिया आ रदीफक सम्बन्ध मे किछु गप। एहि संग्रहक बहुत रास गजल मे काफिया आ रदीफक नियमक पालन भेल अछि। मुदा कएक गजल मे रदीफ आ काफियाक गलती अछि। जेना पृष्ठ चौदह पर मतला देखला पर बुझाईत अछि जे "इ मौसम" रदीफ अछि आ "लागैए" आओर "उलाबैए" काफियायुक्त शब्द अछि। मुदा दोसर शेर आ आगूक आन शेर मे एकर पालन नै भेल अछि आओर शेर सभ बिना रदीफक "अ" काफियायुक्त अछि। पृष्ठ पन्द्रह पर सेहो यैह दोख अछि, जाहि मे मतला मे रदीफ "कहाँ रहल"क प्रयोग अछि आ आन शेर सभ बिना रदीफक "अल" काफियायुक्त अछि। एहने दोख पृष्ठ सोलह मे देखल जा सकैत अछि, जतय मतला मे "करै छह" रदीफ मानल जयबाक चाही। ओना ऐ गजलक आन शेर सभ मे दू टा काफियाक सुन्नर प्रयोग अछि, जे नीक लागैए। हमरा हिसाबेँ काफियाक दोख पृष्ठ बीस, बाईस, चौबीस, पचीस, अट्ठाईस, उनतीस(संयुक्ताक्षर काफियाक नियमक दोख), बत्तीस आ सैंतीस मे सेहो अछि। एकर सबहक विस्तृत वर्णन देब हम अपेक्षित नै बूझि रहल छी, कियाक तँ इ हमर उद्देश्य कथमपि नै अछि। गजल संग्रहक सब गजलक विषय-वस्तु नीक अछि आ गजलकार अपन भावना नीक जकाँ प्रकट केने छथि। किछु गजलक काफिया आ रदीफक दोख जँ कात कऽ कऽ देखी, तँ इ गजल-संग्रह एकटा नीक गजल-संग्रह अछि। गजलकारक गजल कहबाक क्षमता सेहो नीक बुझाईत अछि। हमरा ई अचरज लागि रहल अछि जे ऐ संग्रहक बाद गजलकारक दोसर गजल-संग्रह किया नै आएल अछि। एकर कारण तँ गजलकारे केँ पता हेतैन्हि, मुदा अपन अनुभवक आधार पर हम कहऽ चाहै छी जे श्री विभूति आनन्द नीक गजल लिख सकैत छथि। जँ बहरक विचार नै करी, तँ २०१२ मे आएल श्री अरविन्द ठाकुरजीक गजल-संग्रह सँ करीब एकतीस बर्ख पहिने १९८१ मे लिखल गेल एहि संग्रहक गजल सब उम्दा कहल जा सकैत अछि। एकर कारण इ जे एहि संग्रहक गजल सब मे काफियाक नियम-पालनक प्रतिशत वर्तमान समयक संग्रह सब सँ बेसी अछि। कथ्यक मजबूती सेहो नीक कोटिक अछि। खाली कुहरल तुकमिलानी केने गजल नै कहल जा सकैत अछि, इ गप एहि संग्रह केँ पढलाक बाद एखुनका गजलकार सभ केँ सेहो बुझेतन्हि, इ आशा अछि। इहो एकटा अचरजक विषय अछि जे जखन मैथिली मे नीक गजल एतेक साल पहिनो कहल गेल छल, तखन एकर बाद गजलक विकास-यात्रा पचीस-तीस बर्ख धरि कतऽ आ किया ठमकि गेल। बीचक अवधि मे मैथिली गजलक विकासक धार मे बान्ह किया बनि गेल छल, इ विचारणीय गप अछि। ओना आब इ बान्ह टूटि रहल अछि आ आशाक नब जोति मे मैथिली गजलक घोघ उठि रहल अछि। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। १.नवेंदु कुमार झा- केन्द्रीय विश्वविद्यालयक लऽ कऽ राज्य आ केन्द्र मे बढ़ि रहल हार/ उत्साहक संग समाप्त शताब्दी समारोह- डा॰ सच्चिदानंद उपेक्षा पर निधन परिषद् भेलाह नाराज। २. सुजीत कुमार झा - राम जन्मोत्सवपर विशेष/ मिथिलाक कण कणमे रामसीता ३. किशन कारीगर- अकछ भेल छी।/(एकटा हास्य कथा) १ नवेंदु कुमार झा केन्द्रीय विश्वविद्यालयक लऽ कऽ राज्य आ केन्द्र मे बढ़ि रहल हार बिहार मे केन्द्रीय विश्वविद्यालयक स्थापनाक लऽ कऽ केन्द्र आ राज्य सरकारक मध्य बनल गतिरोध समाप्त नहि भऽ रहल अछि। एक दिस मुख्यमंत्री नीतीश कुमार मोतीहारी मे केन्द्रय विश्वविद्यालयक स्थापित करबा पर अड़ल छथि तऽ दोसर दिस केन्द्रीय मानव संसाधन मंत्री कपिल सिब्बल गया मे स्थापित करबा पर जोर दऽ रहल छथि। एहि मामिला मे तीन दिन पहिने मुख्यमंत्री श्री सिब्बल के चिट्ठी लिखि मोतीहारी मे विश्वविद्यालय स्थापित करबाक मांग दोहरौलनि अछि। एहि मध्य जनतब भेटल अछि जे गया मे विश्वविद्यालय स्थापित करबाक लेल केन्द्र सरकार के मंत्रालय जमीन उपलब्ध करा देलक अछि। केन्द्रीय विश्वविद्यालयक कुलपति डाक्टर जनक पाण्डेय एकर पुष्टि करैत कहलनि अछि जे ई सूचना भेटल अछि जे गया मे जमीनक संदर्भ मे मानव संसाधन विकास मंत्रालय आ रक्षा मंत्रालयक मध्य सहमति बनि गेल अछि। उल्लेखनीय अछि जे केन्द्रीय विश्वविद्यालयक मामिला दू वर्ष सॅ श्री कुमार आ श्री सिब्बलक मध्य चिट्ठी का आदान-प्रदान मे उलझि कऽ रहि गेल अछि। विश्वविद्यालयक स्थापना गया, मोतीहारी आ पटना मे सॅ कोनो जगह पर हो एहि पर एखन धरि कोनो सहमति नहि बनि सकल अछि। हालांकि श्री सिब्बल एहि मामिला पर एखनो राज्य सरकारक संग सामंजस्य स्थापित करबाक प्रयास कऽ रहल छथि। प्रदेश मे उच्च शिक्षक विकासक लेल प्रस्तावित केन्द्रीय विश्वविद्यालयक जगह कऽ लऽ कऽ प्रदेश मे राजनीति सेहो गर्मा रहल अछि। मोतीहारी आ दूनू ठाम विश्वविद्यालयक स्थापनाक लेल आंदोलन चलि रहल अछि। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार एहि सॅ पहिने 29 फरवरी 2012 के सेहो श्री सिब्बल के चिट्ठी लिखि मोतीहारी मे विश्वविद्यालयक स्थापित करबा पर जोर दैत गया मे विश्वविद्यालय स्थापित करबाक विरोध कराने छलाह। केन्द्रीय मानव संसाधन मंत्री जनतब देने छलाह जे गयाक पायनपुर मे प्रस्तावित जगह ऐतिहासिक आ सांस्कृतिक केन्द्र अछि जे गयाक अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा सॅ 25 किलोमीटर दूरी पर अछि। श्री सिब्बल खेद व्यक्तिक कयलनि जे राज्य सरकार केन्द्रीय विश्वविद्यालयक स्थापनाक लेल मोतीहारीक अलाबा कोनो विकल्प नहि देलक। केन्द्रीय मानव संसाधन मंत्री गया मे विश्वविद्यालयक स्थापनाक प्रस्ताव स्वीकार करबाक अनुरोध करैत कहलनि जे बिहार मे केन्द्रीय विश्वविद्यालयक अपन अस्थायी परिसर के बदलबाक दबाब अछि। पहिनहि उचित जगहक खोज मे किछु वर्ष गमा देल गेल अछि। ओ छात्र सभके गुणवतापूर्ण शिक्षा देबाक राष्ट्रीय काज मे सहयोग करबाक अपील कयलनि अछि। श्री सिब्बल बिहारक मुख्यमंत्रीक ओहि शिकायत के निर्मूल जनबैत कहलनि अछि जे पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, ओडिशा, तमिलनाडु, बिहार आ हिमाचल प्रदेश आदि प्रदेश मे विश्वविद्यालय स्थापित करबा मे एक मापदंड अपनाओल गेल अछि। श्री कुमार शिकायत कयने छलाह जे विभिन्न प्रदेश मे केन्द्रीय विश्वविद्यालयक स्थापनाक लऽ कऽ फराक-फराक मापदंड अपनाओल जा रहल अछि। श्री सिब्बल किछु दिन पहिने मुख्यमंत्री के चिट्ठी लिखि एहि बात पर जोर देने छलाह जे बिहार मे केन्द्रीय विश्वविद्यालय हन ठाम स्थापित कयल जाय जे हवाई मार्ग आ आन यातायात सम्पर्क सॅ जोड़ल रहबाक संगहि वास्तविक आ आधारभूत संरचना सॅ परिपूर्ण हो। मुख्यमंत्री तीन दिन पहिने चिट्ठी लिखि मोतीहारी मे विश्वविद्यालय स्थापित करबा पर जोर दैत कहने छलाह जे मोतीहारी ऐतिहासिक जगह अछि। एहि ठाम राष्ट्रपिता महात्मा गांधीक स्मरण जुड़ल अछि। ओ स्पष्ट कयलनि अछि जे मोतीहारी केन्द्रीय विश्वविद्यालयक स्थापनाक लेल उपयुक्त जगह अछि आ सरकार सभ तरहे सुविधा आ आधारभूत संरचना उपलब्ध करैबाक लेल तैयार अछि। उत्साहक संग समाप्त शताब्दी समारोह डा॰ सच्चिदानंद उपेक्षा पर निधन परिषद् भेलाह नाराज। बिहारक स्थापनाक सय वर्ष पूरा होयबाक अवसर पर प्रदेश भरि मे आयोजित कयल गेल बिहार शताब्दी समारोह समाप्त भऽ गेला। तीन दिनक एहि समारोहक दरमियान राजधानी पटना सहित पंचायत स्तर धरि कतेको र्काक्रम सम्पन्न भेल। तीन दिन धरि सम्पूर्ण प्रदेश में पाबनि बिहार जकां वातावरण बनल रहल। जिला, प्रखंड आ पंचायत सभ मे सेहो सरकारी आ गैर सरकारी स्तर पर कार्यक्रम आयोजित कयल गेल। राजधानी पटना मे सम्पन्न तीन दिनक समारोह मे विभिन्न क्षेत्रक कतेको नामी गिरामी व्यक्ति भाग लऽ प्रदेशवासीक उत्साह मे सहभागी बनलाह। पटनाक ऐतिहासिक गांधी मैदान मे लोकप्रिय कार्यक्रम आ श्री कृष्ण स्मारक भवन मे शास्त्रीय संगीत समारोहक आनंद लोक सभ उठौलनि। 24 लाख वर्ग फीट मे बनल मुख्य समारोह स्थल पर विभिन्न विभागक स्टॉल पर प्रदेशक विकासक लेल सरकार द्वारा चलाओल जा रहल विकास योजनाक जनतब लोक सभ के देल गेल। बिहारक गौरवपूर्ण इतिहास, विकासक वर्तमान गति आ लोकहित मे सरकार द्वारा प्रदेशक विकासक बनाओल गेल योजनाक प्रदर्शन सेहो कयल गेल। प्रदेश सांस्कृतिक विरासत जनतब सेहो लोक सभ के देल गेल। लेजर शोक माध्यम सॅ प्रदेशक सभ वर्षक यात्राक प्रदर्शन आ छाया चित्रक माध्यम सॅ बिहारक इतिहास आ वर्तमान सामाजिक सांस्कृतिक स्थितिक प्रदर्शन करैत अंजलि सिन्हा, चंदन कुमार, दिनेश दिवाकर आ शैलेन्द्र कुमारक फोटो गैलरी लोक सभक आकर्षण केन्द्र बनल रहला। शताब्दी समारोहक दरमियान गांधी मैदान मे गायक उदित नारायण, ऋचा शर्मा, कैलाश खेर, रब्बानी बंधु, बाबुल सुप्रियोक सुमधुर आवाज पर झुमैत रहलाह तऽ शास्त्रीय संगीत समारोह मे पंडित जसराजा उस्ताद राशिद खान, गुलाम मुस्तफा खान आ अमजद अली खानक गायिकी सॅ भारतीय संगीत जीवंत भऽ रहल। एहि अवसर पर प्रसिद्ध फिल्म निर्देशक प्रकाश झा द्वारा बिहार पर बनाओल सिनेमाक प्रदर्शन सेहो कयल गेल। गीत-संगीत आ आन मनोरंजक, कार्यक्रमक मध्य एहि अवसर पर आयोजित व्यंजन मेला मे बिहारी भोजन, दही चुड़ा, माछ चुरा, लिट्टी-चोखा, बालुशाही, जलेबी, सतू, लीचीक जूस आदिक संगहि पंजाब, महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल, गुजरात आ दक्षिण भारतीय व्यंजनक मनायोग सॅ स्वाद लेलनि। ओना तऽ ई बिहारक शताब्दी समारोह छल मुदा ई पूरा समारोह मुख्यमंत्री नीतीश कुमार पर केन्द्रित छल। समारोह मे भाग लेबऽ वला सभ प्रमुख लोक मुख्यमंत्रीक प्रशंसा करब अपन दायित्व बुझलनि। वर्ष भरि धरि चलल शताब्दी कार्यक्रमक सफलतापूर्वक सम्पन्न भेला पर सरकार राहत सांस लेलक अछि। एहि समारोहक श्रेय मुख्यमंत्रीक देबाऽ मे पूरा सरकारी अमल लागल रहल। समारोहक दरमियान विपक्षक उपेक्षा पर सरकारक सहयोगी भाजपाक विधान पार्षद हरेन्द्र प्रतापक विद्रोही तेवर सेहो सोझा आयल। बिहारक बॅटवारा मे प्रमुख भूमिका के निर्वाह कऽरय वाला सच्चिदानंद सिन्हाक एहि समारोहक दरमियान भेल उपेक्षा पर सरकार के कठघरा मे ठाढ़क देलनि। एहि संदर्भ मे हरेन्द्र प्रताप मुख्यमंत्रीक चिट्ठी सेहो लिखलनि मुदा सरकार दिस सॅ एहि पर कोनो प्रतिक्रिया नहि भेल। समारोह प्रारंभ भेलाक बाद एहि दिस हुनक सक्रियताक बादो सरकार निश्चित रहल। ओना विवाद तऽ राज्य प्रार्थना कऽ लऽ कऽ सेहो उठि रहल अछि। एहि मामिला मे एकटा जनहित याचिका सेहो भाजपाक वरिष्ठ नेता चन्द्र किशोर परासर पटना उच्च न्यायालय मे दायर कयलनि अछि। राज्यगीत मे मिथिलांचलक उपेक्षा पर सेहो सरकार चुप्पी लदने अछि। खैर, समारोहक दरमियान एहि तरहक विवाद समारोहक उत्साह मे दबल रहल। २ सुजीत कुमार झा राम जन्मोत्सवपर विशेष मिथिलाक कण कणमे रामसीता जनकपुरमे मात्र नहि पुरे मिथिलाञ्चलक घर घरमे सोहर गाओल जा रहल अछि । सभकेँ घरमे एक्के रंगकेँ उत्साह अछि । भगवान रामक रविदिन जन्म दिवस रहल अछि । उत्साहकेँ वर्णन करैत जनकपुर ७मे रहल मधुवनी वाली कहैत छथि भगवानक जन्म भलेही अयोध्यामे भेल होइक मुदा उत्सव हुनकर ससुरारिमे सेहो कम नहि । ओ सोहरकेँ एक पाँति सुनबैत कहैत छथि जँ जन्मल रघुनन्दन वन्धन टुटल रे, ललना हरि देलक दन्त गराई तुतना भेल मुरझाइृ......। जनकपुरक दू टा दरवारकेँ ओहिना सजाओल गेल अछि जेना विवाहपञ्चमी कालमे सजाओल जाइत अछि । सजाबएमे मिथिला दरवार आ अयोध्या दरवारमे प्रतिस्पर्धा देखल गेल अछि । अयोध्या दरवार अर्थात राम मन्दिरकेँ सजावएमे ओतएकेँ महन्थ एतेक व्यस्त छथि जे पते नहि चललन्हि शुक्रक राति कोना वित गेल । जन्मक उत्साह वर्णन करैत राम मन्दिरक महन्थ राम गिरी कहैत छथि जेना लागि रहल अछि हमरा घरमे भगवानकेँ जन्म भऽ रहल होइक । भगवानक जन्म त्रेता युगमे किए नहि भेल होइक यदि किछु आकर्षण नहि रहितैक तऽ आखिर एतेक लोक राम नवमीमे जनकपुर कोना अबैत । जनकपुर नगर पालिका ४ क पण्डित विद्यानन्द झा कहैत छथि औजी जँ रेल ठीक रहितैक, बस जीप आबएकेँ भारत सँ जनकपुरधरिकेँ नीक सुविधा रहैत तऽ देखितहुँ कतेक लोक जनकपुर अबैत अछि । भगवान राममे जे शक्ति अछि ओ कतए पाओत । राम नाम उरमे गहिओ जा कै सम नहि कोइ । जिह सिमरथ संकट मिटै दर्शु तुम्हारे होइ ।। जिनकर सुन्दर नामकेँ हृदयमे बसा लेला मात्र सँ सम्पूर्ण कार्य भऽ जाइत अछि । जिनकर समान कोनो दोसर नाम नहि अछि । जिनकर स्मरण मात्र सँ पुरे संकट समाप्त भऽ जाइत अछि । कलयुगमे नहि योग, नहि यज्ञ आ नहि ज्ञानक महत्व अछि । एक मात्र रामक गुणगाने सम्पूर्ण जीवकेँ उद्धार कऽ सकैत अछि । सन्तसभक कहब अछि । प्रमु श्री रामक भक्तिमे कपट, देखावा नहि आन्तरिक भक्ति मात्र आवश्यक अछि । गोस्वामी तुलसी दास कहैत छथि ज्ञान आ वैराग्य प्रभुकेँ पेवाक लेल मार्ग नहि अछि । वल्की प्रेम भक्ति सँ पुरे मैलि धोवा जाइत अछि । प्रेम भक्ति सँ मात्र श्री राम भेटैत अछि । छुटहि मलहि के धोएं । धूत कि पाव कोइ वारि विलोए ।। प्रेम भक्ति जल विनु रघुराइ । अभि अन्तर मैल कबहुँ न जाइ ।। अर्थात मैलिकेँ धोला सँ कि मैलि छुटि सकैत अछि । जलकेँ मथला सँ कि कोनो घी भेट सकैत अछि । अहिना पे्रम भक्तिरुपी निर्मल जलक विना भितरक मैलि कहियो नहि छुटि सकैत अछि । प्रभुकेँ भक्ति विना जीवन निरस अछि अर्थात रसहिन । प्रभु भक्तिक स्वाद, एहन स्वाद अछि जे एहि स्वादकेँ बुझि गेल ओकरा संसारक सभ स्वाद फिका लागत । भक्ति जीवनमे ओतवे महत्वपूर्ण अछि जतेक स्वादिष्ट भोजनमे नुन । भगति हीन गुण सव सुख ऐसे । लवन विण बहु व्यञ्जन जै से ।। अर्थात जेना नुनकेँ विना बढिया सँ बढिया भोजन स्वाद हीन होइत अछि ओहिना प्रभुकेँ चरणक भक्ति विना जीवनक सुख समृद्धि सभ फिका होएत अछि । रामक ऐतिहासिकता चैत महिनाक शुक्ल पक्षक नवमी तिथिक दिन भगवान रामक जन्म भेल अछि । भारतक चेन्नईकेँ एक गैरसरकारी संस्था भारत ज्ञान कतेको वर्षक शोध सँ ई पत्ता लगौलक अछि जे रामक जन्म ५११४ ई.पू. १० जनवरीक भेल छल । रामक विषयमे ई शोध मुम्बईमे कतेको वैज्ञानिक, विद्वान, व्यावसाय जगतक आगु प्रस्तुत कएल गेल छल । एहि शोधक तथ्यपर प्रकाश पारैत एकर संस्थापक ट्रष्टी डिके हरि कहलन्हि एहि शोधमे वाल्मीकि रामायणकेँ मूल आधार मानैत अनेक वैज्ञानिक, ऐतिहासिक, भौगोलिक, ज्योतिषीय आ पुरातात्विक तथ्यकेँ सहयोग लेल गेल अछि । रामक मिथिला संगक सम्बन्ध भगवान रामकेँ मिथिला संग सम्बन्ध सेहो प्रगाढ अछि । भगवान रामक विवाह मिथिला नरेश जनकक पुत्री सीता संग भेल रहय । मिथिलाक कण कणमे राम सीता रहल अछि । जनकपुरमे मात्र नहि पुरे मिथिलाञ्चलमे कोनो उत्सव होइक राम सीताक गुणगान विना ओ उत्सव पूर्णे नहि होइत अछि । जनकपुरक जानकी मन्दिरक महन्थ राम तपेश्वर दास वैष्णव कहैत छथि मन्दिरमे हरेक समय रहैत छी हरेक समय ई बुझाइत रहैत अछि भगवान राम जानकी एहिठाम छथि । ई स्थिति मिथिलाञ्चलक कतहुँ जाइत छी तऽ बुझाइत अछि । फेर जँ मिथिलाञ्चल सँ बाहर गेलहुँ तऽ कतहुँ नहि अनुभव होइत अछि ओ कहलन्हि । ३ किशन कारीगर अकछ भेल छी। (एकटा हास्य कथा) आई दस वर्षक बाद किछु काज स दरभंगा आएल रही। भींसरे भींसरे टेन स दरभंगा स्टेशन उतरले रही कि ने की फुराएल टहलैत टहलैत विश्वविद्यालय कैंपस आबि गेलहुँ। ओतए आबिते मातर सभटा पुरना संस्मरण कॉलेजक पढ़ाई विद्यार्थी जीवनक सभटा हँसी ठीठोला श्यामा माए मंदिर के चक्कर लगाएब जस के तस मोन परि गेल। ओई दिन सोमवार रहै तहू मे सावन महीनाक सोमवारी भक्त लोकनिक भिड़ भिंसरे स बढ़ि गेल रहै की कॉलेज के विद्यार्थी धीया-पूता जवान बुढ़ पुरान सभ पूजा करै लेल अपसियाँत भेल। विशेष कऽ माधवेश्वरनाथ महादेव मंदिर मे और बेसी भीड़। श्यामा माए मंदिर लग पोखरि अछि ओतए माधवेश्वर महादेवक मंदिर सेहो छैक। ओही ठाम श्यामा माए के दर्शन कए बाबाक पूजा लेल महादेव मंदिर अएलहुँ। बाबा के जल बेलपात चढ़ा पूजा केलाक बाद मंदिर स बाहर निकैल बैग पीठ पर लए बिदा भेल रही। कैमरा गारा मे लटकले रहए बिदा होइते रही की पोखरी घाट लक बाबा भेंट भए गेलाह। ओ बजलाह हौ बच्चा के छियह कारीगर एम्हर आब। बाबाक लग मे जा हुनका प्रणाम केलियैन त ओ बजलाह नीके रहअ। अईं हौ कारीगर इ कहअ दारही कटा लेबह से नहि अहि दुआरे त चिन्हैअ मे धोखा भए गेल। गारा मे कैमरा लटकल देखलिय त मोन परल जे कहीं तू दरभंगा आएल हेबह। आब ज तूं दरभंगा आबिए गेल छह त हमर पंचैती कए दैए हौ बच्चा कि कहियअ हम त अकऽक्ष भेल छी। बाबाक गप सुनी हमरा हँसी स रहल नही गेल। हँसैत हँसैत हम बजलहुँ अइ यौ बाबा अहाँ किएक अकऽक्ष भेल छी आ कथिक पंचैयती। बाबा तामसे अघोर भेल बजलाह अईं हौ कारीगर हम अकऽक्ष भेल छी आ तू दाँत चिआरै मे लागल छह। हम बजलहु यौ बाबा अहाँ जुनि खिसियाउ एकटा गप कहू त अहू सन औधरदानी महादेव ज अकऽक्ष भेल अछि त हमरा सभहक केहेन हाल हेतै। बाबा अपने त सौंसे दुनियाक पंचैयती करैत छी हम एकटा छोट छीन भक्त अहाँक पंचैती कोना करब। बाबा फेर बजलाह हौ बच्चा अप्पन सप्पत कहैत छियैह सत्ते मे हम बड्ड अकऽक्ष भेल छी। हम बजलहुँ यौ बाबा अकऽक्ष त हम मीडियावला सभ भेल छी ख़बर लिखैत आ संपादित करैत, एक चैनल के नोकरी छोरि दोसर चैनल के नाकरी पकड़ैत, मीर्च मसल्ला वला ख़बर बनबैत सुनबैत, चैनल मालिक के दवाब रूआब सहैत, बौक जेंका चुपचाप अकऽक्ष भेल छी। हमर गप सुनि बाबा बजलाह आब हमरो गप सुनबहक की अपने टा कहबहक। हम बजलहुँ नहि यौ बाबा इहेए बात त पुछै लेए छलहुँ जे अहाँ किएक अकऽक्ष भेल छी। बाबा डमरू डूगडूगबैत बजलाह हइए लेए सुनह सबटा राम कहानी जे हम किएक अकऽक्ष भेल छी। हौ बच्चा पहिने एकटा फोटो खीच दैए ने भने चैनलो पर ब्रेकिंग न्यूज़ चला दिहक जे बाबा अकछ भेल छथि। लोको त बुझतै ने जे हम केहेन कष्टमय जिनगी जीबि रहल छी। हम बजलहुँ ठीक छैक बाबा अहाँ बजैत जाउ आ हम रेकड केने जाइत छी आ फोटोओ खीच दैत छी मुदा इ कहू जे आई अहाँक त्रिशूल कतए रहि गेल। बाबा अंगोछा स मुँह पुछैत बजलाह हौ कारीगर की कहियअ हौ हम जिबैत जिनगी अकछ भेल छी। गणेश कार्तिक दुनू टा खूरलुच्ची हरदम लड़ाई करैत रहैए एकटा कहैत छै जे हम त्रिशूल ल के नाचब त दोसर कहैत छै जे हम डमरू बजा के नाचब। अहि कहा कही मे इ दुनू टा मुक्कम-मुक्की घिच्चा-तिरी क हमर डमरू सेहो फोरि दैत अछि। एकरा दुनू टा दुआरे हम अकछ छी। हौ बच्चा ततबेक नही कि कहियअ हौ नहा धोहआ के बघम्बर पसारि दैत छियैक मुदा कार्तिक के मयूर ओकरा ओई गाछ पर स ओई गाछ पर ल जा के लेरहा घोरहा दैत अछि। तै पर स गणेशक मूस ओकरा कूतैर फूतैर दैत अछि। तूही कहअ त बिना बघम्बर के कोना हम रहब कियो देखनिहार नै कोइ ने टहल टिकोरा क दैत अछि हम त तहु दुआरे अकछ भेल छी। तूहीं कहअ ने आबक धीया-पूता के लिखा पढ़ा के कि हेतै। हम बजलहुँ आब की भेल यौ बाबा। हमर गप सुनी ओ बजलाह हौ बच्चा तूं बरि खाने बुझहैत छहक कहलियअ त जे हम अपने घरक लोक स अकछ भेल छी। हौ बच्चा तोरा सभटा गप की कहियअ जहिया स गणेश के शिक्षामित्र के नोकरी भेटलै आ कार्तिक के पुल बनबै के सरकारी ठिकेदारी भेटलै दुनू गोटे एक्को बेर घूइरो के ने देखैत अछि जे हम जीबैत छी आ की मूइल। तही दुआरे तूंही कहअ ने एहेन धीया-पूता कोन काजक जे बूढ़ माए बाप के बुरहारी मे मरै लेल गाम मे असगर छोड़ि दैत अछि आ अपने नोकरी मे मगन भेल सभटा आचार-विचार बिसरैत सामाजिक कर्तव्य सँ मुह मोड़ि लैत अछि। ई गप कहैत-कहैत बाबाक आखि नोरा गेलैन ओ आंखिक नोर पोछि हिंचकैत बजलाह हौ बच्चा आब बुरहारी मे गौरीए दाए टा एकमात्र सहारा। मुदा आब हुनको अवस्था भेलैन ओकरो की दोष। कहैत छियैए जे भांग पीस दियअ त गौरी दाए बजैत छथि आब हमरा भांग पीसल नहि होएत बेसी छौंक लागल अछि त चलि जाउ विश्वविद्यालय कैंपस, शंकरानंद ओइ ठाम भरि छाक भांगक लस्सी पीबि लेब। ओइ ठाम सीएम सांइस आ मारवाड़ी कॉलेज के विद्यार्थी सभ भांग खाई लेल सेहो अबैत छैक। हौ बच्चा हम त तहू दुआरे अकछ भेल छी। आब हम एक्को मीनट दरभंगा मे नहि रहब तूं हमरा नेने चलह अपने संगे दिल्ली। हम तोरे साउथ एक्स वला डेरा पर रहब ज जारो बोखार लागत त ओही ठाम एम्स मेडिकल लग्गे मे छै ओतए देखाइओ दिहअ। हम बजलहुँ हं हं बाबा चलू ने इ त हमर सौभाग्य जे अहाँक टहल टिकोरा करबाक हमरा अबसर भेटत। बाबा बजलाह हौ बच्चा एकटा गप तोरा कहनाइ त बिसैरे गेलियै रूकह कनि, हइए मोन परि गेल। कारीगर सभटा गप तू की सुनबहअ हौ हम की कहियअ ई भागेसर पंडा दुआरे सेहो हम अकछ भेल छी। हम हुनका स पुछलियैन से किएक यौ बाबा। त ओ बजलाह हौ कि कहियअ आब महादेव मंदिर मे बोर्ड लगा देलकैयै। हम जिज्ञासावस पुछलहु कथिक बोर्ड यौ बाबा। ओ फेर बजलाह हौ बच्चा श्यामा माए मंदिर मे एकटा बोर्ड लागल छैक मुंडन-51रू, यज्ञोपवित-151रू, विबाह-251रू, आ बलिप्रदान-501रू तही के देखा देखी भागेसरो हमरा मंदिर मे एकटा बोर्ड लगा देलकैए जे बाबाक स्पेशल पूजा-501रू, डमरू बजा के पूजा करब-201, दूध चढ़ाएब-151 आ भांगक स्पेशल परसादी-101रू। देखैत छहक जहिया स ई बोर्ड लगलैह तहिया स त हम और बेसी अकछ भेल छी। हम बजलहुँ से किएक यौ बाबा त ओ बजलाह कि कहियअ विद्यार्थी सभ भांगक परसादी दुआरे मंदिरे मे मुक्कम मुक्की, घिच्चम-तिरी, देह हाथ तोरा-फोरी कए लैत अछि। ततबेक नहि पिछुलका सोमवारी दिन त कि कहियअ एकरा सबहक झग्गरदन मे हमर त्रिशूल टुटि गेल हम त आब तहु दुआरे अकछ भेल छी। ओ सभ नीक नहाति पढ़तह नहि आ परीक्षा मे फेल भेला पर वा कम नम्बर अएला पर हमरो गरिअबैत अछि। जे हे जरलाहा महादेव केहने बेईमान छह पास करा दैतह से नहि हौ बच्चा हम त आब तहू दुआरे अकछ भेल छी। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। विहनि कथा १.ओमप्रकाश झा २.अमित मिश्र ३.चंदन कुमार झा ४.आशीष चौधरी १ ओमप्रकाश झा विहनि कथा १ स्पेशल परमिट एक दिन सिनेमा देखबा लेल सिनेमा हाल सपरिवार गेल रही। ओतय सिनेमाघरक मैनेजर गाडी सँ उतरैत देरी स्वागत मे लागि गेल। ओ हमरा चिन्हैत छल। सिनेमा शुरू हएबा मे किछु देरी छल। ओ हमरा अपन कक्ष मे बैसा कऽ चाह-पान करबऽ लागल। सिनेमाक शो शुरू भेलाक बादो हाल मे बीच बीच मे नाश्ता पानी पूछैत रहल। हमर छोटकी बेटी इ सब अचरज सँ देखैत छल। सिनेमा समाप्त भेलाक बाद मैनेजर आदरपूर्वक हमरा गाडी तक अरियाइति देलक। डेराक बाट मे हमर छोटकी बेटी हमरा पूछलक- "पापा, इ मैनेजर अहाँक एतेक खातिर बात कियेक करै छल? ओतय तँ आरो लोक सब छल, मुदा ककरो दिस ताकबो नै करैत छल।" हम बजलहुँ- "बेटी, अहाँ नै बूझब। हमरा स्पेशल परमिट अछि।" छोटकी बाजल- "तखन तँ अहाँ केँ आरो ठाम इ स्पेशल परमिट भेंटैत हएत।" हम अपन बहादुरी मे कहलौं- "हाँ-हाँ, आरो ठाम भेंटैए।" ऐ पर छोटकी बाजल- "तखन काल्हि सँ हमरा अहाँ इसकूलक भीतर तक गाडी सँ छोडू। प्रसून नित्य गाडी सँ भीतर तक आबै छै आ बड्ड शान देखाबै छै। अहाँ तँ हमरा बाहरे गाडी सँ उतारि दैत छी।" हम सकपकाईत बजलौं- "बेटी प्रसून कलक्टरक बेटा अछि। कलक्टर केँ हमरा सँ पैघ स्पेशल परमिट भेंटल छैक। हमरा अहाँक इसकूलक स्पेशल परमिट नै भेंटल अछि।" छोटकी रूसि गेल आ कहलक- "नै अहाँ हमरा फूसि कहै छी। हमहुँ गाडी सँ इसकूलक भीतर तक जायब।" हम आब ओकरा की बूझैबतियेक। हम चुप रहि गेलौं। २ ढेपमारा गोसाईं मोबाईलक अलार्मक घर-घरी सुनि कऽ मिश्राजीक निन्न टूटि गेलैन्हि। ओ मोबाईल दिस तकलाह आ अलार्म बन्न करैत फेर सुतबाक उपक्रम करऽ लागलाह। आ की कनियाँक कडगर आवाज कान मे ढुकलैन्हि- "यौ किया अनठा कऽ पडल छी? साढे पाँच बजै छै। उठू, नै तँ बच्चा सभ केँ इसकूल लेल के तैयार करओतैक। हम नस्ता बनाबै लेल जा रहल छी। भरि दिन तँ अहाँ आफिस मे कुर्सी तोडबे करै छी, कनी घरो पर धेआन दियौ।" मिश्राजी बिना कोनो विरोध केने पोस माननिहार माल जाल जकाँ चुपचाप बिछाओन सँ उतरि बाथरूम मे ढुकि गेलाह। निवृत भेलाक बाद बच्चा सब केँ उठाबऽ लगलाह। बच्चा सब हुनकर कुशल नेतृत्व मे इसकूल जयबा लेल तैयार हुए लागल। एकाएक बडका बेटा राजू बाजल- "पापा अहाँ हमर कापी आनलहुँ?" मिश्राजी- "नै, बिसरि गेलहुँ। काल्हि आफिस मे बड्ड काज छल।" राजू बाजल- "अहाँ तीन दिन सँ बिसरि रहल छी। रोज आफिसक काजक लाथे हमर कापी नै आबि रहल अछि। अहाँ केँ हमर काज मोन नै रहैए।" ओम्हर सँ कनियाँक स्वर भनसाघर सँ बहराएल- "इ तँ हिनकर पुरान आ पेटेण्ट बहाना अछि। घरक कोनो काज मे हिनकर कोनो अभिरूचि नै छैन्हि। आइ हम अपने तोहर कापी आनि देबह।" कहुना बच्चा सब केँ तैयार करा मिश्राजी बस-स्टाप धरि बच्चा सब केँ छोडि डेरा अएलाह तँ कनियाँ एकटा नमहर लिस्ट हाथ मे थमा देलखिन्ह। सब्जी, आटा, दूध आ आन वस्तु सबहक लिस्ट। मिश्राजी बजलाह- "कनी दम धरऽ दियऽ। हम बडद जकाँ भरि दिन लागल रहै छी, तइयो अहाँ सब केँ हमरे सँ सिकाईत रहैए।" कनियाँ कहलखिन्ह- "बियाहि कऽ अहाँ आनलहुँ आ सिकाईत करै लए भाडा पर लोक ताकी हम?" बेचारे मिश्राजी चुपचाप बाजार दिस ससरि गेलाह। बाट मे बाबूजीक फोन मोबाईल पर एलेन्हि- "हौ, मकानक देबाल नोनिया गेलैक। रंग करबाबै लए पाई कहिया पठेबहक?" मिश्राजी बिहुँसैत बजलाह- "अगिला मास पाई पठा सकब।" पिताजी खिसियाईत कहलखिन्ह- "कतेको मास सँ तौं अगिला मासक गप कहै छह। इ अगिला मास कहियो आओत की नै।" मिश्राजी केँ अपन गामक सीमान परहक ढेपमारा गोसाईं मोन पडि गेलैन्हि, जकरा पर सब कियो आबैत जाईत एकटा ढेपा फेंकि दैत छलै। हुनका बुझाइ लगलैन्हि जे ओ ढेपमारा गोसाईं भऽ चुकल छथि। दस बजे मिश्राजी आफिस पहुँचलाह। कनी काल मे आफिसर अपना कक्ष मे बजा कऽ पूछलखिन्ह- "काल्हि एकटा अर्जेण्ट फाईल नोटिंग लए देने छलहुँ आ अहाँ बिना काज केने भागि गेलहुँ।" मिश्राजी- "सर, बिसरि गेलियै। एखन कऽ दैत छी।" आफिसर- "नित यैह बहाना रहैए। किछो यादि रहैए अहाँ केँ?" मिश्राजी सोचऽ लागलाह- "इहो नै छोडलक। कुर्सी पर बैसल अछि तँ हुकूमत देखबैए।" आफिसर हुनका चुप देखि कहलैथ- "की कोनो नब बहाना सोचै छी की? जाउ काज कऽ कऽ दियऽ।" मिश्राजी- "सर, कहलौं ने बिसरि गेल रही। तुरत कऽ दैत छी।" आफिसर- "अच्छा, रोज तँ यैह बहाना रहैए। किछो मोन रहैए की नै? अपन नाम तँ मोन हैत ने। की नाम अछि अहाँक श्रीमान विनय मिश्राजी।" मिश्राजीक मूँह सँ हरसट्ठे निकलल- "ढेपमारा गोसाईं।" २ अमित मिश्र विहनि कथा चोरि विद्याधर बाबू । साहित्यकार ।जीभ पर साक्षात सरस्वती कए बास । साहित्यक सब विधा पर एक समान पकड़ छलनि मुदा पाइ कए अभाव मे एको टा पोथी छपल नहि छलनि । एक दिन साँझ मे बजार दिश जाइ छलाह । पहुँच गेलाह पुस्तक महल । एकटा सुन्नर काँभर वला पोथी आकर्षित केलकनि तेँए किन लेलाह । घर पर आबि पढ़ै लए बैसलाह , जेना-जेना पन्ना उलटाबैत गेलाह तेना-तेना आँखिक गोलाइ पैघ होइत गेलै । काँभर कए पाछु लेखक कए नाउ पढ़लन्हि ,आँखि और पैघ भ' गेलै । सोच' लागलन्हि टका , मनुख-जानवर .गाड़ी-घोड़ा कए चोरी त' देखने छलौँ मुदा शब्दक चोरी पहिल बेर देखलौह । आन चिजक चोरी मे त' पता चलि जाइ छै मुदा मुँह सँ निकलैत बोल कए चोरी मे कनिको पता नहि चलै छै । धन्य छथि एहन चोर आ धन्य छेँन चोरी कए स्टाइल . . . । । ३ चंदन कुमार झा सररा, मदनेश्वर स्थान मधुबनी, बिहार विहनि कथा अनकर दुर्गति हाथ मे झोड़ा नेने, मोने मोन किछो गुनधुन मे पड़ल हम बजार दिस चलि जाइत रही. एतबे मे हमर लंगोटिया भजार भुटकून सोझाँ मे आबि गेलाह. ओ बम्बई सँ घर घुमल छलाह.दहिना हाथ मे अटैची रहैन्ह आ' बामा कान्ह पर बेश भरिगर बैग.नीक कमाइ छथि से सुनैत छलहुँ मुदा आइ हुनकर पहिरन-ओढ़न देख सबुत भेट गेल. लगीच अबितहि भरि पाँज पकडी लेलाह...की हाल-समाचार छौ रौ भजार..बाप रे कतेक दिनुका बाद भेँट भेल अछि..एह धन्य भए गेलहु..बजलाह. हमरो मोन हुनकर एहि मित्रता आ' हमरा प्रति स्नेह देखि गद-गद भ' गेल.पुछलियैन्ह ..की हाल छह..बहुत दिनुक बाद गाम मोन पड़लह. बिहुसैत बजलाह, काज-राज मे व्यस्त रहैत छी..समये नहि भेटैत अछि जे गाम आयब. ई त' आठम दिन बियाह छी तँइ आबय पडल. हम पुछलियैन्ह-ठीके ? ओ गंभीर होइत बजलाह-हाँ एहिठाम बगले मे रखबारी...फेर पुछलाह-मुदा तोँ एना किएक पुछलैह -"ठीक्के"?. हम कने अनमनस्क होइत बजलहुँ-नहि..नहि..अहिना..हमरा त' बिसबासे नहि भ' रहल अछि...ओना ई साल बड्ड शुभ छै देखहक ने बिदेसराक सेहो बियाह भ' गेलै. आब ओ' हम्मर बात बुझिगेल रहय.बिहुँसैत बाजल-ऐ रौ तु हमरा बुढ़ बुझैत छैह जे हमर गिनती ओहि पैतालिस बरखक बिदेसरा से करैत छैँ. हम हसैँत कहलियन्हि-नहि...नहि ..अरे हमरा कहने हेतै त' हम त' तोरा एखनो एहू पैतिस बरखक अवस्था मे अठारह बरिखक छौडा कहबह मुदा ई त' गौआ सभ कहैत रहैत छह. भुटकुन हँसैत बाजल-हाँ...हाँ..ठीके कहबी छै ने जे अप्पन बियाह भ' गेल त' लगने खतम. हम कहलियैन्ह - नहि..नहि ई कहबी विल्कुल गलत अछि. हमरा बुझने कोनो विवाहित व्यक्ति ई नहि चाहैत होयत जे अनकर विवाह नहि हो. भुटकुन आश्चर्यचकित होइत बाजल-से कियेक ? दोसरक दुर्गति के नहि देखय चाहैत अछि ?-हम कहलियैन्ह.ओ भभा के हँसय लगलाह. ४ • आशीष चौधरी विहनि कथा ठक किछु दिन पहिने जखन हम पूर्णियाँसँ पटनाक लेल बस पकड़लौं तँ हमर एकटा मित्र सेहो पटना परीक्षा दै लेल जाइ छल, संयोगसँ हमरा दुनू गोटेक सीट मीरा ट्रेवल्स नामक बसमे छल जे बस बिहार राज्य पथ परिवहन निगमक अधीन आबै छल जकर पटनामे लागैक जगह गांधी मैदानसँ सटल इलाका छल। तँ हम दुनू गोटे एकटा टेम्पूसँ पहुँचलौं महावीर मन्दिरक पाछाँमे एकटा बड निक सनक चाहवलाक दोकान छलै जकर दोकानमे चाह पीबए बलाक भीड़ लागल रहै छलै, से हमहुँ दुनू गोटे चाह पीबए लेल गेलौं। किए तँ हमरो दिल्ली आबैक छल आ हमर मित्रकेँ दिनक २ बजेसँ परीक्षा छलै से हम दुनू गोटे सोचलौं जे किए नै पटना घुमी। हम दुनू गोटे पहिल शुरूआत महावीर मन्दिरसँ शुरू केलौं, ओना तँ पटना हम बहुतो बेर घुमल छी मुदा हमर मित्र कहलक जे चलू दुनू गोटे आइ घुमी। शुरूआत भगवानक दर्शनसँ भेल। ओकर बाद स्टेशन परिसरमे लागल पुरान कोयलाक मशीन छलै, से हम दुनू गोटे ओतए घुमऽ लगलौं। जखन चारू कातसँ घुमल भऽ गेल तँ एकटा कोनामे देखलौं, एकटा महिला बड जोरसँ कानै छल, से हम दुनू गोटे ओतए गेलो तँ दंग रह गेलौं किए तँ ओतए एकटा महिला एकटा मुर्दाक संग लिपटि-लिपटिकऽ कानै छलै आ कहै छलै जे हमरा पासमे कफन लेल पैसा नै छल से अहाँ सभ हमर मदद करू। लोक सभ ओकरा किछु ने किछु पाइ देबऽ लागल। हमरो इच्छा भेल जे किछु पाइ हमहुँ दिऐ, से हम अपन पाकेटसँ २० टाकाक एकटा नोट निकालिकऽ ओकरा देलौं, से ओ हमरा आर्शीवाद देलक आ कहलक जे अहाँ ढेरो दिन जीबू। हमरा ओकरापर दया आबि गेल मुदा हमर दोस्त हमरा कहलक जे अहाँ ठका गेलौं। हम ओकरा कहलो एना कोना तँ ओ कहलक जे अहाँ एकर स्थिति देखू तँ अहूँकेँ एकरापर शक भऽ जाएत। हमरा ऐ बातपर यकीन नै भेल मुदा हमर दोस्तक कहब तँ ठीके छलै। फेर ओतए एकटा लोककेँ सेहो पुछलौं तँ ओहो सएह बात कहलक आर तँ आर ओ तँ इहो कहलक जे एकरा लहाश जानै छिऐ के दै छै। हमरा सेहो मोन भेल जे बताउ के दै छलै। ओकर मुँहसँ जखन सुनलौं तँ पएर लगक माइट खसकि गेल किए। ओकरा पुलिस बला एक सए टकामे लावारिस लहाश दऽ दैत छलै, ई ओकरासँ कमा कऽ लाश गंगामे नै तँ कतौ आन ठाम लऽ जा कऽ फेकि दैत छलै। हमरो ता तक ट्रेनक समए भऽ रहल छल से हमहूँ अपन ट्रेन पकड़ैले स्टेशनक अन्दर चलि गेलौं। ठक तँ पुलिस छलै, बेचारी बुढ़िया की ठकत, ओकरासँ ठका कऽ हमरा नीके लागल। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। १.रवि भूषण पाठक- ओक्कर तोहर हम्मर सपना २.शिव कुमार झा ‘टिल्लू’- बहिरा नाचए अपने ताल १ रवि भूषण पाठक ओक्कर तोहर हम्मर सपना नाम:सूर्यकांत उमेर :बयालिस वर्ष रंग:गोर लंबाई:पांच फीट नओ इंच वामा आंखिक ऊपर मे आ दहिना बांहि पर चोटक निशान समस्तीपुर क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक ,करियन शाखा क’ एकटा खाता नम्मर (हम नम्मर सार्वजनिक नइ क’ रहल छी) पहिले पहिल मात्र यैह सूचना फैक्स क’ माध्यम सँ दिल्ली सँ राजीव झा जी भेजला ।राजीव झा दिल्ली पुलिस मे उपनिरीक्षक छथिन ,आ हुनका पता छलनि जे सूर्यकांत हमर पिसियौत भाय छथि ...........दिन छलै सोलह अगस्त दू हजार दस ।जखन हमरा बूझा गेल जे सूर्यकांते भाय ई डायरी लिखला तखन हम कहलियेन जे ई डायरी भेज दियअ । ई डायरी अजीब तरीका सँ लिखल गेल छैक ।जत्ते दिलचस्पी अपना प्रति ओतबे समाजक प्रति ।ओना डायरी क’ बहुत रास बात हमरा अनसोहांत लागल .........कखनो कखनो एत्ते कि सूर्यकांत अप्पन मर्यादा धोए देने हो..........मुदा ऐ विषय मे हम किछु नइ कहब किएक त’ गजेंद्र जी कहला कि डायरी के मूले रूप मे छापल जाय ,तें डायरी क’ कंटेंट पर हमरा किछु नइ कहबा के अछि .......ओहुना मरल आदमी के विषय मे की कहल जाए ? हमरा तऽ ईहो नइ बूझबा मे आबि रहल अछि कि ऐ डायरी मे किछु साहित्यिक तत्व अछि वा नइ ? कखनो डायरी तथ्य आ समै कऽ संदर्भ स्वीकारैत छैक आ कखनो नइ ,कखनो –कखनो तऽ डायरी अप्पन रूप के छोड़ैत संस्मरण ,कथा ,कविता दिसि भागऽ चाहैत अछि ।कखनो –कखनो सपना कऽ रूपक मे समाहित हेबऽ लागैत अछि ।डायरी लिखलो छैक मिथिलाक्षर मे आ हमर मिथिलाक्षर रहबो करए कमजोरे ,तें एकटा ईहो मेहनत बढि़ गेल । मुदा गजेंद्र जी कऽ ई कहतब छनि जे एगो –दूगो पृष्ठ के नित्यप्रति सुलेखित करैत भेजैत रहू । डायरी कें प्रस्तुत करैत सभ सँ पहिले हम राजीव बाबू कें धन्यवाद दैत छिएन जे ओ अप्पन व्यस्त दैनंदिनी कऽ बीच सूर्यकांत कऽ डायरी मे दिलचस्पी देखेलैथ आ एहियो सँ आगू बढि़ हेरायल डायरी कें खोजि निकालला । ई डायरी सूर्यकांत भायकऽ मकान मालिक राखि लेलकइ आ कोनो साहित्यिक वस्तु बूझि बेचबा के फिराक मे रहए ।ऐ डायरी कऽ तथ्य के प्रस्तुत करैत हम सूर्यकांत भाय कऽ आत्मा सँ क्षमा मांगैत छी ,किएक तऽ डायरी मे कतेको एहन चीज छैक ,जइ सँ विवाद उत्पन्न्ा होयत आ मृतात्मा कऽ संबंध मे भ्रांति उत्पन्न भऽ सकैत छैक । मुदा ऐ धन्यवाद आ क्षमाप्रार्थना कऽ प्रासंगिकता तखने ,जखन डायरी मे कोनो सत्व हो ।डायरी मे कतहु कतहु शीर्षक छैक आ कतहु नइ ।सबसॅं नमहर शीर्षक छैक ‘ओक्कर हम्मर तोहर सपना ‘ ।आ डायरी कऽ पहिल पृष्ठ पर एकटा छोट शीर्षक रहै ‘सोयरी आ सपना ‘।ऐ खेप मे ‘सोयरी आ सपना’ प्रस्तुत अछि । सोयरी आ सपना ई कोनो अद्भुत सपना नह रहै ।सभ लोक अपन अपन बच्चा क' लेल एहिना सपना देखै छैक ,आ ई ओकर पहिलो सपना नइ छलै ।पहिलो नइ ,दोसरो नइ ,तेसर ........ ,मुदा आइ सँ तीस-चालीस साल पहिने तीन टा बच्चा बहुत सधारण बात छलै ,से दम्पति अपन सपना के देखबा ,सपना के अगोरबा ,पोसबा के सब उपक्रम करैत गेल ।सपना मे पानि देनइ ,सपना के हवा लगेनइ ,सपना मे सँ आकुट बाकुट कें साफ केनए ,सपना के चोर-शैतान सँ बचाबैत ,लोक-वेद के कहैत गुणैत ।सपना के हाथ-पैर ,मुंह-कान सब बनलए ।ऐ मे लगभग नओ महीना लागि गेलइ ।आ ई नओ महीना कोना बीतलइ दम्पति के पते नइ चललै । एक दिन मिथिला क एकटा गाम मे सपना के धरती पर उतारबाक व्यवस्था प्रारंभ भेल । तीन -चारि टा जनानी ,एकटा चमैन ,आगि-पानि ,तेल-मौध,साबुन-कपड़ा आ गीत-नाद । आ वौआ रे अलगे समै छलै ,ओइ समै मे ,बच्चा जनमै काल एकटा खास भूमिका लेल किछु जनाना कें बजाओल जाइत छलै ,ऐ मे सबसँ प्रशिक्षित जनाना ओइ वर्ग सँ होइत छलखिन जे मिथिले नइ समस्त भारतवर्षक जाति-विचार मे अछोप मानल जाइत छलै ,मतलब सबसँ महत्वपूर्ण काज आ काज केनिहार क दरजा अछोपक ।ई सब बात बाद मे ,पहिले सपना कऽ स्पर्श ,गंध सँ मोन के भिजा तऽ लेल जाए । आ सपना कें जमीन पर उतारबा क जिम्मेवारी ओइ वर्ग के हाथ मे जेकरा सपना देखबा कऽ मनाही हो । मुदा ‘लैंडिंग ऑफ ड्रीम्स’ कऽ मजबूत पायलट सभ अपन-अपन अनुभव कऽ बलें अभियान कें सफल दिशा दैत रंगबिरही बात ,कखनो टोल पड़ोस कखनो धर्म पुराण कखनो शरीर विज्ञान आ यौन विज्ञान सेहो ...... जनी-जातिक मजाक स्वप्नागमन मे निहित वेदना के कम करैत । आ सपना के छोट छोट हाथ छलै ,छोट छोट पएर ....आंखि कान सब छोट छोट ।आब सपना स्वयं अपना लेल सपना देख सकैत छलै ................ मुदा सपना के नून नइ चटाएल गेलै , ई दम्पति कनि अलग रहै यैह बात नइ ,बच्चा ‘बच्चा’ रहै ,बच्ची नइ ।आ सपना एखन सीधा-सीधी बाट चलैत रहै ,भूख ,प्यास ,गरम-ठंड केवल सपना मे आबै ,आ ईहो कोनो सपना देखए के उमेर छलै...............जे बाप माए क’ सपना सएह बच्चा क’ । आ छोट-छोट सपना के पूरा करए लेल माए-बाप रहबे करथिन ,से अपन सुविधा के समेटैत वौआ कऽ आवश्यकता पर केंद्रित भऽ गेलै घर । एखन तक सपना मे सपना कऽ मथफुटौएल नइ भेलै । से किएक? त’ एखन छोटका सपना के हाथ पएर नइ भेल छलै ,ओकर आंखि नइ फुटलै छल एखन ,तें ओकरा देखाओल गेलै जे वौआ रे सपना एहिना देखबा कऽ चाही आ सपना मे मात्र यैह सब देखबा के चाही ।से तीन –चारि साल तक ककरो ई बात दिमागो मे नइ एलै जे ऐ परिवारक प्रत्येक सदस्य के कोन मात्रा मे सपना देखबा कऽ चाही ।एखन तक खाए-पीबए ,पहिरनइ-ओढ़नए ,गीत-गानक सीमित बाईस्कोप छलै ..... आ ओइ समै मे गाम मे बाईस्कोप देखबै वला आबैत छलै आ ओकर चकरका पेटी मे आठ-दस टा खिड़की रहैत छलै आ घूमैत फोटो कऽ साथ गीत सेहो सुनाइत छलै ।फोटो आ गीत मे सामंजस्य हेबाक चाही से वौआ के ओइ समै मे नइ बुझेलए । आ वौआ नइ चिन्हैत छलै तें एके सिनेमा मे मरलका पृथ्वी राजकपूर सँ लऽ के सरलका गोविन्द प्रधान तक के फोटो अजीबे आकर्षक लागै ।फोटो कऽ मुद्रा ,जइ मे मारनए-पीटनए ,हँसेनए ,दौड़ेनए तऽ रहबे करए छौड़ा-छौड़ी एक दोसर के पकड़ने सेहो रहै ।आ वौआ कें ओइ समै मे ई बूझऽ आबि गेल छलै जे वौआ अलग होइ छइ आ बुच्ची अलग .............. आ वौआ कऽ जखन नाम लिखेलइ तऽ वौआ एगो झोरा आ एगो बोरा नेने ईसकुल पहुंचि गेलइ । ईसकुलो मे वौआ अप्पन बोरा कें छौड़ा सभक बोरा मे सटा के राखए ।ईसकुल कऽ वातावरण वौआ के बेसी नइ नीक लागलै ।ऐ ठाम मरसैब सब हिंदी बाजैत छलखिन आ हाथ मे मोटका सटक्की राखैत छलखिन । वौआ के तऽ ईहो पता नइ रहै जे हिंदी कोनो भाषा होइत छैक ,हां ओ सब जे बाजैत छलखिन से गाम मे केओ नइ बाजैत रहै ...........मुदा नइ ऊ जे नीरस भैया आबै छथिन कहियो कहियो गाम ,आ ऊ जे कुमल भैया छथिन्ा ,ऊ दूनू गोटे गामो मे हिंदी बजैत छथिन ,तऽ की हिंदी बहरिया भाषा भेलै ,गाम परक नइ रोड परक ,ईसकुलक भाषा ।मुदा ओइ बात सभक लेल ओइ समै कोनो अवकाश नइ छलै ,ई कोनो सपना नइ छलै ,तें झोरा ईसकुल तक राखि बहुतो बच्चा मंदिर दिसि निकलि जाइ आ वौओ सएह करए ।मंदिर पर ,पोखरि दिसि ,गाछी मे ओ सभ समान मिलैत छलै ,जेकरा सपना मे देखल आ सोचल जा सकैत छैक । कनैलक फूल ,कक्का कऽ ललका लताम ,हुनकर बँसबीट्टी ,उत्तरबाय टोलक ईमली आ पवितरा आ डोमा कऽ तार आ तरकुल मे बहुत नशा छलै ।आ ईसकुलक सर्वमान्य मुद्रा पिनसिल छलै ,मतलब पिनसिलक कनी टा टुकड़ा मे तार कऽ कनी गो हिस्सा मिलबा कऽ गारंटी छलै । ओइ समै मे वौआ के बूझल नइ छलै जे पवितरा दुसाध छैक आ पवितरा के छुइ देला सँ हड्डी तक छुआ जाइत छैक ! ओइ समै ईहो नइ बूझल छलै जे डोमा डोम जाति कऽ बच्चा नइ कुम्हार छैक आ डोमा नाम राखि एगो जोगटोम कएल गेल रहै ,आ ईसकुल मे डोमा कऽ माए –बाप कें ई साबित करबए मे दम लगब’ पड़लै जे डोमा कऽ असली नाम सुकुमार छैक । मुदा वौआ रे हम्मर स्थिति किछु अलग रहै ,आइ तक घर मे हमरा केओ नइ सुनलकै हमरा जन्मक कहानी ।ने माए ने बाबू ने भाय-बहिन सब ।हम विशुद्ध पुरहितिया घर मे जनम लेलियइ ।घरक पूरा अर्थव्यवस्था बाबू के द्वारा सांझ मे आबइ वला सीदहा पर निर्भर रहै ,तें घरक पूरा राजनीति जजिमनिका पर केंद्रित छलै ।भोर मे बाबू नहा-सोना पूजा कऽ लेला के बाद सीधे भागथिन गयघट्टा ।आ ई गायघाट गाम हुनकर समस्त योग्यता आ विद्वता कऽ मंच छलै ।ऐ ठाम हुनका लेल कोनो कंपटिशन तऽ नइ रहै ,तें साबित करबा आ नइ करबा सन किछु नइ रहै मुदा ई जे निर्दन्द्व संभावना छलै से कतेको संभावना कें नून चटा के मारि देलकए ।एकर धरती एको डेग नइ छलै ने अकाश एको हाथ के तें वामन कें वामने रहि मरबा के छलै ,ऐ ठाम विष्णु मात्र सत्यनारयण कथे मे रहथिन ,हुनकर दस टा पचास टा रूप कहियो सपना मे आयल ,विराट रूपक बाते छोड़ू । ऐ ठामक विष्णु लक्ष्मी सहित आबैत रहथिन आ कहियो चौबन्नी ,कहियो अठन्नी ,कहियो सवा रूपैया आ कहियो ‘बाद मे दऽ देब’ कऽ पुनरूक्ति सुनाबैत गौलोक चलि जाइत छलखिन ........................ क्रमश: २ शिव कुमार झा ‘टिल्लू’ बहिरा नाचए अपने ताल प्रस्तुत शीर्षक हमर कोनो अपन रचनात्मक क्रियाशीलता नै बाल-कालमे “मिथिला मिहिर” पढ़ैत छलौं। साप्ताहिक मिहिरक सभ गोटे अंकमे ऐ शीर्षकसँ एकटा स्थायी स्तंभ छपैत छल। बड़ बेथा भऽ रहल अछि जे भारत वर्षक प्रमुख भाषा सभ उत्तर आधुनिक साहित्यक रूपेँ अपन-अपन संस्कृतिसँ भाषामे ओझाराएल छी। ई सर्वथा सत्यसँ बौद्धिक प्रभाव बेशी रहैत अछि, परंच एकटा आर गप्पपर जौं आत्मीय भऽ कऽ धियान देल जाए तँ सामाजिक स्ांरचनाक मध्य सामंजस्य होइछ। सनातन संस्कृतिमे “जाति”क विभेद बेशी रहल मुदा सभ वैदिक संस्कारमे अछोपक महतकेँ संहो नकारि नै सकैत छी। हमरे पूर्वज लिखने छथि “कर्म प्रधान विश्व करि राखा” प्राचीन भलमानुष शब्देटा मे सही एकरा स्वीकार तँ कएलनि। तँए सभकेँ जातिसँ अपन उठि कऽ सोचबाक चाही। आन जातिकेँ के कहए मिथिलामे तँ ब्राह्मणोक मध्य बड़का विदेह छैक, जौं ई विभेद मात्र वैवाहिक संस्कार धरि सीमित रहिते छल तँ येन-केन प्रकारेण स्वीकारर्य, मुदा “पिपरी” जे हमर भोज्य संस्कृति विशेष चिन्ह थिक ओकरो देबएमे बड़ भारी खाधि भऽ गेल छैक। अन्तद्वन्द्व मात्र एतबे धरि नै भलमानुष वर्गक कोनो कवि तँ एतए धरि लिखने छथि- अड़ड़िए कोदड़िए आ मुसवरय, ई मरय तँ मौथिलक पाप टरय अड़ड़िए मैथिल ब्राह्मणक एकटा मूल होइछ, ऐ श्रेणीक ब्राह्मण दड़िभंगा जिलाक “नेहरा” आ समस्तीपुरक भिड़हा गाममे भरल छथि। वएह नेहरा जकरा कहियो “मिथिलाक पोरिस” कहल गेल अछि। आब कहल जाए “मैथिल” ऐ दोहामे कवि ककरा मनने छथि? मात्र श्रोत्रिय, भलमानुष आ उच्चमूलक जयवार ब्राह्मण। जौं एहेन कवि लेल आन ब्राह्मणों अछोप तँ आन जातिकेँ की कहल जाए? विद्यापति स्मृति पर्व समारोह वा कोनो मंच हुअए हास्यपर थपड़ी बजएबाक लेल ऐ प्रकारक दोहा मिथिलाक पहिचान मानल जाइ रहल अछि- रैनी भैनी ओ रौतिनियाँ दीप गोधनपुर कैथिनियाँ पाँच गाम पचही परगन्ना उत्तम गाम ननौर तेली सूरी बसए मधेपुर लंठक ठठ्ठ लखनौर’ जौं मधुबनी जिलाक मात्र ऊपर िलखल किछुए गाम भलमानुषक गाम तँ गोपेश, सरस, गजेन्द्र वा आनंद भलमानुष्ज्ञ नै? समस्तीपुर जिलामे भलमानुषक तात्विक विवेचन तँ आर विचित्र ढंगे कएल गेल अछि- “श्रोत्रिय सलमपुर रानी टोल किछु घर टभका आर सभ चोर” धन्यवाद देबाक चाही एहेन प्रसंगक व्याख्या जे ई बिसरि गेल छथि जे “चोर”क कोनो जाति नै होइत छैक, ओ कथाकथिक भलमानुषक परिवारमे सेहो जन्म लऽ सकैत छथि वा लैत छथि। केओ नै सोचलथि जे हरिवंश तरूण सन प्रांजल साहित्यकार मात्र एक्केटा मैथिली रेडियो नाटक “उगना रे मोर कतए गेलैं” किएक लिखलथि? एकबेर समस्तीपुरक लब्धप्रतिष्ठ शैल्य चिक्ित्सक डॉ. आर.पी.मिश्रा हिन्दुस्तान दैनिकमे अपन आलेख लिखने छलाह जे अधिकार देबए काल हमरा सभकेँ दक्षिनाहा कहल जाइत अछि तखन मैथिलीकेँ आगाँ बढ़एबाक आशा हमरासँ किए करैत छथि? फनीश्वरनाथ रेणु, पोद्दार रामावतार अरूण सन रचनाकारक केओ मैथिलीमे लिखबाक प्रेरणा किएक नै देलकनि? गजेन्द्र ठाकुर, उमेश मण्डल आ शिवकुमार झा सन साधारण लोक समाजक सभ वर्गक रचनाकारकेँ प्रत्साहित कऽ सकैत छथि तँ प्रवीण साहित्यकारसँ की हमर आश रखनाइ अपराध? भुवनेश्वर सिंह भुवनकेँ अर्न्तमनसँ श्रद्धांजलि दैत छियनि जे एकटा हिन्दीक महाकवि आरसी प्रसाद सिंहकेँ मैथिलीमे लिखबाक प्रेरणा देलनि। जखन समस्तीपुरमे मैथिलीक अस्तित्वक रक्षार्थ आन्दोलन होइत अछि तँ डाॅ. नरेश कुमार विकल सभसँ आगाँ रहैत छथि। 1960-70मे हिनक कविता सभ मिथिला मिहिरमे छपैत छल तखन मैथिली साहित्यक इतिहासमे डॉ. दुर्गानाथ झा श्रीश हिनक नाओं किएक नै देलन्हि? हमर कहब ई नै जे सबहक दृष्टिमे सभलोक रहिते छथि, मुदा जौं आत्मीय भऽ कऽ सोचल जाए तँ सभ प्रश्नक समाधान छैक। “मिथिलामे रहनिहार सभ लोक मैथिल” ई उल्लेख सभ मंचपर कएल जाइत अछि। ऐ तरहक उल्लेखसँ भ्रम उत्पन्न भेनाइ स्वाभाविक। जेना अपना चारि बेटामे सँ कोनो बेटाकेँ बेर-बेर माए कहैत छथि जे “तौं हमरे बेटा छेँ।” तँ ओहि पुत्रक दिमागमे निश्चित उत्पन्न हएत जे शायद हम दोसर नारीक पुत्र छी। अंतमे, हमर आग्रह यएह जे सम्यक् दृष्टिकोण राखब अनिवार्य आ संस्कृतिक रक्षार्थ सबल तत्व मानल जाए, नै तँ समानांतर धार बहबे करतीह आ साहित्यक लेल ओ क्षण आत्मघाती सेहो हएत। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। गजेन्द्र ठाकुर- शब्दशास्त्रम् / दिल्ली १ शब्दशास्त्रम् – (ई कथा “जखन तखन” पत्रिका आ “कथा पारस” कथा संकलनमे छपल अछि, मुदा दुनू ठाम संकीर्ण जातिवादी मानसिकताबला सम्पादक लोकनि एकर किछु महत्वपूर्ण भाग काटि देने छथि। एतऽ सम्पूर्ण कथा अविकल रूपमे देल जा रहल अछि।) सिंह राशिमे सूर्य, मोटा-मोटी सोलह अगस्त सँ सोलह सितम्बर धरि। किछु सुखेबाक होअए तँ सभसँ कड़ा रौद। सिंह राशिमे मितूक पिताक तालपत्र सभ पसरल रहैत छल, वार्षिक परिरक्षण योजना, जे एहि तालपत्र सभमे जान फुकैत छल। आनन्दा मितूक पिताजीक एहि तालपत्र सभक परिरक्षण मनोयोगसँ करैत रहथि। कड़गर रौदमे तालपत्र पसारैत आनन्दा, मितूकेँ ओहिना मोन छन्हि। मितू संग जिनगी बीति गेलन्हि आनन्दाक। मुदा एहि बरखक सिंहराशि अएलासँ पूर्वहि आनन्दा चलि गेलीह... आ आब जखन ओ नै छथि तखन जीवनक परिरक्षण कोना होएत। मितूक आ ओहि तालपत्र सभक जीवनक.. भ्रम। शब्दक भ्रम। शब्दक अर्थ हम सभ गढ़ि लैत छी। आ फेर भ्रम शुरू भऽ जाइत अछि। लुकेसरी अँगना चानन घन गछिया तहि तर कोइली घऽमचान हे कटबै चनन गाछ, बेढ़बै अँगनमा छुटि जेतऽ कोइली घऽमचान हे कानऽ लगली खीजऽ लागल, बोन के कोइलिया टूटि गेलऽ कोइली घऽमचान हे जानू कानू जानू की, जोबोन के कोइलिया अहि जेतऽ कोइली घऽमचान हे जहि बोन जेबऽ कोइली रहि जेत तऽ निशनमा जनू झरू नयना से लोर हे सोने से मेढ़ायेब कोइली तोरो दुनू पँखिया रूपे से मेरायेब दुनू ठोर हे जाहे बोन जेबऽ कोइली रुनझुनु बालम रहि जेतऽ रकतमाला के निशान हे कोनो युवतीक अबाज चर्मकार टोलसँ अबैत बुझना गेल..आनन्दाक अबाज। मुदा आनन्दा तँ चलि गेली, कनिये काल पहिने ओकर लहाश देखि आएल छथि बचलू। मितूकेँ समाचार कहि डोमासी घुरि गेल छथि। आ आनन्दा, ओ तँ बूढ़ भऽ मरलीहेँ। तखन ई अबाज, युवती आनन्दाक। भ्रम। शब्दक भ्रम। कहैत रहथि मितूक पिता श्रीकर मीमांसक मारते रास गप शब्दशास्त्रम् पर। शब्दक अर्थ हम सभ गढ़ि लैत छी। आ फेर भ्रम शुरू भऽ जाइत अछि। I शब्दशास्त्रम् गर्दम गोल भेल छल। अनघोल मचि गेल छलै। बलान धारमे कोनो लहाश बहल चलि जा रहल छल। धोबियाघाट लग कात लागल छल। कतेक दूरसँ आएल छल से नै जानि। कोनो बएसगर महिलाक लहाश छल। धोबिन लहाशकेँ चीन्हि गेल रहथि। गौआँकेँ कहि दै छथि ओकर नाम आ पता। गौआँ के, ओहि गामक डोमासीक बचलूकेँ। मृतकक घरमे खबरि भऽ गेल छलै। एसकरे एकटा बुढ़ा रहैए ओहि घरमे...मितू। मितूक टोलबैया गौँआ सभ लहाशकेँ डीहपर आनि लेने छल आ फेर मितू ओकर दाह-संस्कार कऽ देने रहथि। गाममे अही गपक चर्चा रहै। बचलू बुढ़ाकेँ बुझल छन्हि किछु आर गप। चिन्है छथि ओ ओहि लहाशक मनुक्खकेँ। नवका लोककेँ बहुत रास गप नै बुझल छै। आनन्दाक लहाश.. -आनन्दा बड्ड नीक रहै। बुझनुक। ओकर बचिया सभ सभटा सुखितगर घरमे छै..बेटा सेहो विद्वान। मितू, आनन्दाक वर सेहो उद्भट..श्रीकर मीमांसकक पुत्र..। मुदा कहियो मितू आकि आनन्दा कोनो खगतामे ककरो आगाँ हाथ नै पसारने छथि। बचलू सेहो आब बूढ़ भऽ गेल छथि, झुनकुट बूढ़। हिनकासँ पैघ मात्र मितू छथिन्ह। लोक सभ दुनू गोटेकेँ बुढ़ा कहि बजबै छन्हि। आ एहि बचलू बुढ़ाकेँ बुझल छन्हि ढेर रास गप। ..... मितू आ श्रीकरक वार्तालाप। किछु बुझिऐ आ किछु नै। -मितू। भामतीमे वाचस्पति कहै छथि जे अविद्या जीवपर आश्रित अछि आ विषय बनि गेल अछि। आत्मसाक्षात्कार लेल कोन विधि स्वीकार करब? असत्य कथूक कारण कोना भऽ सकत? कोनो बौस्तुक सत्ता ओकरा सत्य कोना बना देत, त्रिकालमे ओकर उपस्थिति कोना सिद्ध कऽ सकत? जे बौस्तु नै तँ सत्य अछि आ नहिये असत्य आ नै अछि एहि दुनूक युग्मरूप; सैह अछि अनिर्वाच्य। बिना कोनो वस्तु आ ओकर ज्ञान रखनिहारक शून्यक अवधारणा कोना बूझऽमे आओत? -मितू। कुमारिल कहै छथि आत्मा चैतन्य जड़ अछि, जागलमे बोध आ सूतलमे बोधरहित। -मितू। भामतीमे वाचस्पति कहै छथि जे आत्मसाक्षात्कारसँ रहित शास्त्रमे कुशल व्यक्ति सर-समाजसँ पशुवत व्यवहार करैत छथि, लाठी लैत अबैत व्यक्तिकेँ देखि भागि जाइ छथि, घास लैत अबैत व्यक्तिकेँ देखि लग जाइत छथि। माने डरसँ घबड़ाइ छथि। “आत्मसाक्षात्कारसँ रहित शास्त्रमे कुशल व्यक्ति सर-समाजसँ पशुवत व्यवहार करैत छथि, लाठी लैत अबैत व्यक्तिकेँ देखि भागि जाइ छथि, घास लैत अबैत व्यक्तिकेँ देखि लग जाइत छथि। माने डरसँ घबड़ाइ छथि।” ई गप मुदा सरिया कऽ बूझबामे आएल रहए हमरा। .... आमक मास रहै। बानर आ बनगदहा खेत सभकेँ धांगने अछि आ पारा बारीकेँ। “सभटा नाश कऽ देलकै बचलू। रातिमे तँ नञि सुझै छै। भोरे-भोर कलम जा कऽ देखै छी। बनगदहा सभटा फसिल खा लेलक आब ई बानर आमक पाछाँ लागल अछि।” हमरा बुझल अछि जे आमक मासमे बानर आ बनगदहा ओहि बरख एक्के संग आएल छलै। आमेक मास रहै। से मितू ओगरबाहीमे लागत आब। आमक टिकुला पैघ भऽ रहल छै। मचान बान्हबाक रहै मितूकेँ। हमहूँ संगमे रहियै। बाँस काटि कऽ अबैत रही। डबरा कात दऽ कऽ अबि रहल छलहुँ। भोरहरबा छल। अकास मध्य लाल रेख कनेक पिरौँछ भेल बुझना गेल छल। -लीख दऽ कऽ चलू बचलू। खेतक बीचमे लीख देने आगाँ बढ़ऽ लागलहुँ। तखने हम शोणित देखलहुँ। हमर देह शोनित देखि सर्द भऽ गेल। मुदा निशाँस छोड़लहुँ। बाँसक तीक्ष्ण पात एकटा बालिकाक हाथ आ मुँहकेँ नोछड़ैत गेल रहै। मितूक बाँसक नोछाड़ ओकरा लागल रहै। मितू हाथसँ बाँस फेकि कऽ ओहि बालिका लग चलि गेल छल। नोराएल आँखिक ओहि बालिकाक शोणित पोछि मितू ओकर नोछारपर माटि रगड़ि देने रहै। -की कऽ रहल छी। -शोनित बन्न भऽ जाएत। बालिका लीखपर आगाँ दौगि गेल छलीह। -की नाम छी अहाँक। -आनन्दा। -कोन गामक छी। -अही गामक। -अही गामक? हम दुनू गोटे संगे बाजल रही। हँ, आनन्दा नाम रहै ओकर। आ मितूक पहिल भेँट वैह रहै। ... मचानो बन्हा गेल रहए। मुदा आनन्दा फेर नै भेटल रहए। मितू पुछैत रहए। -कोन टोलक छी ओ। नहिये मिसरटोलीक अछि, नहिये पछिमाटोलीक आ नहिये ठकुरटोलीक। -डोमासीक रहितए तँ हम चिन्हिते रहितिऐ। -तखन कोना अछि ओ अपन गामक। आ अपन गामक अछि तँ आइ धरि भेँट किए नै भेल रहए ओकरासँ। मुदा बिच्चेमे संयोग भेल छल। मितूक टोलमे फुदे भाइक बेटाक उपनयन रहै। बँसकट्टी दिन पिपहीबलाकेँ बजबैले हम गामक बाहर चर्मकार टोल गेल रही। -हिरू भाइ, हिरुआ भाइ। -आबै छथि। कोनो बालिकाक अबाज आएल रहए। अबाज चिन्हल सन। -अहाँ के छी। -हम हिरूक बेटी। की काज अछि? -पिपही लऽ कऽ एखन धरि अहाँक बाबू नै पहुँचल छथि। बजबैले आएल छियन्हि। -तही ओरियानमे लागल छथि। -अहाँक नाम की छी? तखने टाट परक लत्तीकेँ हँटबैत वैह बालिका सोझाँ आबि गेलि। -हम आनन्दा। हम अहाँकेँ चीन्हि गेल रही। अहाँक की नाम छी? हम तँ सर्द भेल जाइत रही। मुदा उत्तर देबाके छल। -बचलू। -आ अहाँक संगीक। -मितू, पंडित श्रीकरक बेटा। मितूक पिताक नाम सेहो हम आनन्दाकेँ बता देलिऐ। पुछने तँ नै छलि ओ, मुदा नै जानि किएक..कहि देलिऐ। तखने हिरुआ पिपही लेने आबि गेल रहथि। हुनका संगे हम टोलपर आबि गेलहुँ। रस्तामे हिरुआकेँ पुछलियन्हि- आनन्दा अहाँक बेटी छथि। मुदा कहियो देखलियन्हि नै। -मामागाममे बेशी दिन रहै छलै। मुदा आब चेतनगर भऽ गेल छै। से गाम लऽ अनने छिऐ। -फेर मामागाम कहिया जएतीह। -नञि, आब ओ चेतनगर भऽ गेल अछि। आब संगे रहत। पंडितजीक बेटा मितू, हमर संगी मितू, ई गप सुनि की होएतैक ओकरा मोनपर। कैक दिनसँ ओकर पुछारी कऽ रहल छल। हम सोचने रही जे भने मामागाम चलि जाए आनन्दा आ कनेक दिनमे मितूक पुछारीसँ हम बाँचि जाएब। मुदा आब तँ आनन्दा गामेमे रहत आ पंडित श्रीकरक बेटा मितू.. धुर..हमहीं उनटा-पुनटा सोचि लेने छी। ओहिना दू-चारि बेर मितू आनन्दाक विषयमे पुछारी केने अछि। तकर माने ई थोड़बेक भेलै जे.. मुदा जे सैह भेलै तखन ?.. पंडितक बेटा आ चर्मकारक बेटी.. पंडित श्रीकर मानताह?..गौआँ घरुआ मानत? धुर। फेर हम उनटा-पुनटा सोचि रहल छी। पिपही बाजए लागल रहए आ लीखपर देने हम आ मितू, भरि टोलक स्त्रीगण-पुरुषक संगे बँसबिट्टी पहुँचि गेल रही। रस्तामे ओहि स्थलकेँ अकानने रही। मितू आ आनन्दाक पहिल मिलनक स्थलकेँ- कोनो अबाज लागल अबैत..मात्र संगीत..स्वर नै। बरुआ बाँस सभपर थप्पा दऽ देने रहै आ सभ बाँस कटनाइ शुरू कऽ देने रहथि। मड़बठट्ठी आइये छै। घामे-पसीने भेने कनेक मोन तोषित भेल। कन्हापर बाँस लेने हम आ मितू ओही रस्ते बिदा भेल रही..ओही लीख देने। … मुदा मितू हमरा सदिखन टोकारा देमए लागल। कारण कोनो काज हम एतेक देरीसँ नञि केने रहिऐ। ओ हमर राम रहए आ हम ओकर हनुमान। मचानपर एहिना एक दिन हम मितूकेँ कहि देलिऐ- -मितू, बिसरि जो ओकरा। कथी लेल बदनामी करबिहीं ओकर। हिरुआक बेटी छिऐ आनन्दा। ओना तोहर नाम हमरासँ ओ पुछलक तँ हम तोहर नाम आ तोहर पिताजीक नाम सेहो कहि देलिऐ। -हमर पिताजीक नाम ओ पुछने रहौ? -नै पुछने रहए। मुदा.. -तखन किए कहलहीं? -आइ ने काल्हि तँ पता लागबे करतै.. -जहिया लगितै तहिया लगितै..आब ओ हमरासँ कटत..हमर मेहनति तूँ बढ़ा देलेँ.. -कोन मेहनति। तूँ पंडित श्रीकरक बेटा आ ओ हिरुआ चर्मकारक बेटी। कथीले बदनामी करबिहीं ओकर। -बियाह करबै रौ। बदनामी किए करबै। -ककरा ठकै छिहीं ? -ककरो नै रौ। एहिना अनचोक्केमे निर्णय लैत छल मितू। श्रीकर मीमांसकक बेटा मितू नैय्यायिक। ओकरा घरमे तालपत्र सभ पसरल रहैत देखने छलिऐ। से भरोस नै भऽ रहल छल। -गाममे कहियो देखलिऐ नै ओकरा। -तूँ गाममे रहलेँ कहिया। गुरुजीक पाठशालासँ पौरुकेँ तँ आएल छेँ। -मुदा तूँहीं कोन देखने रहीं। -मामा गाम रहै छल ओ। -फेर मामा गाम घुरि कऽ तँ नै चलि जाएत। -नै, से पुछि लेलिऐ। आब गामेमे रहत। पौरुकाँ गामेमे मितूक माएक देहान्त भऽ गेल छलन्हि। श्रीकर मीमांसक सेहो खटबताह सन भऽ गेल छथि- ई गप हुनकर टोलबैय्या सभ करैत छल। तालपत्र सभक परिरक्षण कोना हएत एहि सिंह राशिमे? यैह चिन्ता रहन्हि श्रीकरक, आ तेँ ओ खटबताह सन करए लागल रहथि.. ईहो गप हुनकर टोलबैय्या सभ करैत छल। ... हिर्र..हिर्र…हिर्र.... डोमासीसँ सूगरक पाछू हम आ मितू हिर्र-हिर्र करैत चर्मकार टोल पहुँचि जाइ छी। आनन्दा मुदा सोझाँमे भेटि गेलीह। सुग्गर संगे हम आगाँ बढ़ि जाइ छी। घुमै छी तँ आनन्दा आ मितूक गप सुनैले कान पाथै छी। हिर्र..हिर्र एहि बेर आनन्दा हिर्र कहैत अछि आ हम मुस्की दैत सूगरक आगाँ बढ़ि जाइ छी। ई घटना कैक बेर भेल आ ई गप सगरे पसरि गेल। हिरू कताक बेर हमरा लग आएल रहथि। हीरू उद्वेलित रहए लागल रहथि। हीरूक पत्नी बेटीक भाग्यक लेल गोहारि करए लगलीह। कए कोस माँ मन्दिलबा कए कोस लुकेसरी मन्दिलबा कए कोस पड़ल दोहाइ कनी तकबै हे माइ कए कोस पड़ल दोहाइ कनी तकबै हे माइ दुइ कोस मन्दिलबा चारि कोस लुकेसरी मन्दिलबा पाँचे कोस पड़ल दोहाइ कनी तकबै हे माइ पाँचे कोस पड़ल दोहाइ कोन फूल माँ मन्दिलबा कोन फूल बन्दी मन्दिलबा कोन फूल पर पड़ल दोहाइ कनी तकबै हे माइ कोन फूल पर पड़ल दोहाइ कनी तकबै हे माइ ऐली फूल माँ मन्दिलबा बेली फूल लुकेसरी मन्दिलबा गेन्दे फूल पड़ल दोहाइ कनी तकबै हे माइ गेन्दे फूल पड़ल दोहाइ कनी तकबै हे माइ ......... हिरू डोमासी आबए लागल रहथि। -की हेतै, कोना हेतै। -झुट्ठे.. हम गछलियन्हि जे हम हिरु संगे श्रीकर पंडित लग जाएब। आ हम हिरूकेँ श्रीकर मीमांसक लग लऽ गेल रहियन्हि। श्रीकरक पत्नीक मृत्यु गत बरखक सिंह राशिक बाद भऽ गेल छलन्हि। आ तकर बाद हिरू मीमांसक खटबताह भऽ गेल छथि- लोक कहैत छलन्हि। लोक के? वैह टोलबैय्या सभ। गामक लोक, परोपट्टाक विद्वान लोक सभ तँ बड्ड इज्जत दै छलन्हि हुनका। आँखिक देखल गप कहै छी.. “आउ बचलू। हिरू, आउ बैसू..। ”- गुम्म भऽ जाइत छथि श्रीकर। पत्नीक मृत्युक बाद एहिना, रहैत रहथि, रहैत रहथि आकि गुम्म भऽ जाइत रहथि। “कक्का, आँगन सुन्न रहैत अछि। कतेक दिन एना रहत। मितूक बियाह किए नै करा दै छियन्हि”? “मितू तँ बियाह ठीक कऽ लेने छथि”। “कत्तऽ?” -हम घबड़ाइत पुछै छियन्हि। हिरू हमरा दिस निश्चिन्त भावसँ देखै छथि। “आनन्दासँ, समधि हीरू तँ अहाँक संग आएल छथिये।” हाय रे श्रीकर पंडित। आ बाह रे मितू। पहिनहिये बापकेँ पटिया लेने छल। मुदा बान्हपर जाइत कोनो टोलबैय्याक कान एहि गपकेँ अकानि लेने छल। हम सभ बैसले रही आकि ओ किछु आर गोटेकेँ लऽ कऽ दलानपर जुमि गेल छल। श्रीकर मीमांसकसँ हुनकर सभक शास्त्रार्थ शुरू भेल। शब्दक काट शब्दसँ। “श्रीकर, अहाँ कोन कोटिक अधम काज कऽ रहल छी”। “कोन अधम काज”। “छोट-पैघक कोनो विचार नै रहल अहाँकेँ मीमांसक?” “विद्वान् जन। ई छोट-पैघ की छिऐ? मात्र शब्द। एहि शब्दकेँ सुनलाक पश्चात् ओकर शब्दार्थ अहाँक माथमे एक वा दोसर तरहेँ ढुकि गेल अछि। पद बना कऽ ओहिमे अपन स्वार्थ मिज्झर कऽ...”। “माने छोट-पैघ अछि शब्दार्थ मात्र। आ तकर विश्लेषण जे पद बना कऽ केलहुँ से भऽ गेल स्वार्थपरक”। “विश्वास नै होए तँ ओहि पदमे सँ स्वार्थक समर्पण कऽ कए देखू। सभ भ्रम भागि जाएत”। “माने अहाँ मितू आ आनन्दाक बियाह करेबाले अडिग छी”। “विद्वान् जन। रस्सीकेँ साँप हम अही द्वारे बुझै छी जे दुनूक पृथक अस्तित्व छै। आँखि घोकचा कऽ दूटा चन्द्रमा देखै छी तँ तखनो अकाशक दूटा वास्तविक भागमे चन्द्रमाकेँ प्रत्यारोपित करै छी। भ्रमक कारण विषय नै संसर्ग छै, ओना उद्देश्य आ विधेय दुनू सत्य छै। आ एतए सभ विषयक ज्ञान सेहो आत्माक ज्ञान नै दऽ सकैए। आत्माक विचारसँ अहंवृत्ति- अपन विषयक तथ्यक बोध एहिसँ होइत अछि। आत्मा ज्ञानक कर्ता आ कर्म दुनू अछि। पदार्थक अर्थ संसर्गसँ भेटैत अछि। शब्द सुनलाक बाद ओकर अर्थ अनुमानसँ लग होइत अछि”। “अहाँ शब्दक भ्रम उत्पन्न कऽ रहल छी। हम सभ एहिमे मितू आ आनन्दाक बियाहक अहाँक इच्छा देखै छी”। “संकल्प भेल इच्छा आ तकर पूर्ति नै हो से भेल द्वेष”। “तँ ई हम सभ द्वेषवश कहि रहल छी। अहाँक नजरिमे जातिक कोनो महत्व नै?” “देखू, आनन्दा सर्वगुणसम्पन्न छथि आ हुनकर आ हमर एक जाति अछि आ से अछि अनुवृत्त आ सर्वलोक प्रत्यक्ष। ओ हमर धरोहरक रक्षण कऽ सकतीह, से हमर विश्वास अछि। आ ई हमर निर्णय अछि”। “आ ई हमर निर्णय अछि।”- ई शब्द हमर आ हिरूक कानमे एक्के बेर नै पैसल रहए। हम तँ श्रीकर आ मितूकेँ चिन्हैत रहियन्हि, एहिना अनचोक्के निर्णय सुनबाक अभ्यासी भऽ गेल रही। मुदा हिरु कनेक कालक बाद एहि शब्द सभक प्रतिध्वनि सुनलन्हि जेना। हुनकर अचम्भित नजरि हमरा दिस घुमि गेल छलन्हि। फेर श्रीकर मीमांसक ओहि शास्त्रार्थी सभमेसँ एक ज्योतिषी दिस आंगुर देखबै छथि- “ज्योतिषीजी, अहाँ एकटा नीक दिन ताकू। अही शुद्धमे ई पावन विवाह सम्पन्न भऽ जाए। सिंह राशि आबैबला छै, ओहिसँ पूर्व। किनको कोनो आपत्ति?” सभ माथ झुका ठाढ़ भऽ जाइ छथि। श्रीकर मीमांसकक विरोधमे के ठाढ़ होएत? “हम सभ तँ अहाँकेँ बुझबए लेल आएल छलहुँ। मुदा जखन अहाँ निर्णय लैये लेने छी तखन...।” मीमांसकजीक हाथ उठै छन्हि आ सभ फेर शान्त भऽ जाइ छथि। हम आ हीरू सेहो ओतएसँ बिदा भऽ जाइ छी। हीरू निसाँस लेने रहथि, से हम अनुभव केने रही। ... ई नै जे कोनो आर बाधा नै आएल। मुदा ओ खटबताह विद्वान तँ छले। से आनन्दा हुनकर पुतोहु बनि गेलीह। आ हुनक छुअल पानि हमर टोल आकि मितूक टोल मात्र नै सौँसे परोपट्टाक विद्वानक बीचमे चलए लागल। ..... आनन्दाक नैहरमे विवाह सम्पन्न भेल छल। ओतुक्का गीतनाद हम सुनने रही, उल्लासपूर्ण, एखनो मोन अछि- पर्वत ऊपर भमरा जे सूतल, मालिन बेटी सूतल फुलवारि हे उठू मालिन राखू गिरिमल हार हे पर्वत ऊपर भमरा जे सूतल, मालिन बेटी सूतल फुलवारि हे उठू मालिन राखू गिरिमल हार हे कोन फूल ओढ़ब लुकेसरि के कोन फूल पहिरन कोन फूल बान्धिके सिंगार हे उठू मालिन राखू गिरिमल हार हे बेली फूल ओढ़ब बन्दी चमेली फूल पहिरन अरहुल फूल लुकेसरि के सिंगार हे उठू मालिन गाँथू गिरिमल हार हे उठू मालिन गाँथू गिरिमल हार हे .... श्रीकर मीमांसक आनन्दाकेँ तालपत्र सभक परिरक्षणक भार दऽ निश्चिन्त भऽ गेल रहथि। पत्नीक मृत्युक बाद बेचारे आशंकित रहथि। दैवीय हस्तक्षेप, आनन्दा जेना ओहि तालपत्र सभक परिरक्षण लेल आएल रहथि हुनकर घर। अनचोक्के.. मितू कहि देलक हमरा जे कोना ओ श्रीकर पंडितकेँ पटिया लेने रहए। ब्राह्मणक बेटी सराइ कटोरा आ माटिक महादेव बनबैत रहत आ तालपत्र सभमे घून लागि जाएत.. नै घून लागए देथिन तालपत्र सभमे, आनन्दा आएत एहि घर। श्रीकर मीमांसक निर्णय कऽ लेने रहथि। मितू तँ जेना जीवन भरि अपन लेल एहि निर्णयक प्रति कृतज्ञ छलाह। श्रीकरक आयु जेना बढ़ि गेल छलन्हि। श्रीकर आ आनन्दाक मध्य गप होइते रहै छल ओहि घरमे। आनन्दा बजिते रहै छलीह आ गबिते रहै छलीह। बारहे बरिस जब बीतल तेरहम चढ़ि गेल हे बारहे बरिस जब बीतल तेरह चहरि गेल हे ललना सासु मोरा कहथिन बघिनियाँ बघिनियाँ घरसे निकालब हे ललना सासु मोरा कहथिन बघिनियाँ बघिनियाँ घरसे निकालब हे अंगना जे बाहर तोहि छलखिन रिनियाँ गे ललना गे आनि दियौ आक धथूर फर पीसि हम पीयब रे ललना रे आनी दियौ आक धथूर फर पीसि हम पीयब रे बहर से आओल बालुम पलंग चढ़ि बैसल रे बहर से आओल बालुम पलंग चढ़ि बैसल रे ललना रे कहि दियौ दिल केर बात की तब माहुर पीयब रे ललना रे कहि दियौ दिल केर बात की तब माहुर पीयब रे बारह हे बरिस जब बीतल तेरह चहरि गेल रे ललना रे सासु मोरा कहथिन बघिनियाँ बघिनिया घरसे निकालब रे सासु मोरा मारथिन अनूप धय ननदो ठुनुक धय रे सासु मोरा मारथि अनूप धय ननदो ठुनुक धय रे ललना रे गोटनो खुशी घर जाओल सभ धन हमरे हेतै हे ललना रे गोटनऽ खुशी घर जाओल सभ धन हमरे हेतै हे चुप रहू, चुप रहू धनी की तोहीँ महधनी छिअ हे चुप रहू, चुप रहू धनी की तोहीँ महधनी छिअ हे धनी हे करबै हे तुलसी के जाग, की धन सभ लुटा देबऽ हे ललना हे करबै मे पोखरि के जाग, की सभ धन लुटाएब हे श्रीकर मीमांसक हँसी करथिन- आनन्दा, अहाँकेँ तँ सासु अछि नै, तखन ओ बेचारी अहाँकेँ बघिनियाँ कोना कहतीह? -तेँ ने गबै छी, सभ चीज तँ भरल-पूरल मुदा..। आँखि नोरा गेल छलन्हि आनन्दाक। हमरा अखनो मोन अछि। -हम अहाँकेँ दुःख देलहुँ ई गप कहि कऽ। -कोन दुःख? सासु नै छथि तँ ससुर तँ छथि। श्रीकरकेँ प्रसन्न देखि मितूकेँ आत्मतोष होइन्ह। ....... आ श्रीकर मीमांसकक मृत्युक बादो आनन्दा तालपत्र सभमे जान फुकैत रहैत छलीह। फेर मितूकेँ दूटा बेटी भेलन्हि वल्लभा आ मेधा। आनन्दाक खुशी हम देखने छी। नैहर गेल रहथि ओ। ओतहि दुनू जौँआ बेटी भेल छलन्हि- लाल परी हे गुलाब परी लाल परी हे गुलाब परी हे गगनपर नाचत इन्द्र परी हे गुलाबपर नाचत इन्द्र परी आ फेर भेलन्हि बेटा। पैघ भेलापर बेटा मेघकेँ पढ़बा लेल बनारस पठेने रहथि मितू। आ दिन बितैत गेल, बेटी सभ पैघ भेलन्हि आ दुनू बेटी, मेधा आ वल्लभाक बियाह दान कऽ निश्चिन्त भऽ गेल छलाह मितू। बेटाक परवरिश आ बियाह दान सेहो केलन्हि। मेघ बनारसमे पाठन करए लगलाह। मेघ, मेधा आ वल्लभा तीनू गोटे सालमे एक मास आबथि धरि अवश्य। लोक बिसरि गेल मारते रास गप सभ। II भामती प्रस्थानम् आनन्दा मितूक पिताजीक एहि तालपत्र सभक परिरक्षण मनोयोगसँ कऽ रहल छथि। कड़गर रौद, मितूकेँ ओहिना मोन छन्हि। मितू संग जिनगी बीति गेलन्हि आनन्दाक। आ आब जखन ओ नै छथि तखन मितूक जीवनक परिरक्षण कोना होएत।.. मितू प्रवचनक बीचमे कतहु भँसिया जाइ छथि। प्रवचन चलि रहल अछि। मितू गरुड़ पुराण नै सुनताह। मितू मंडनक ब्रह्मसिद्धि सुनताह, वाचस्पतिक भामती सुनताह, जे सुनबो करताह तँ। जँ बेटी सभक जिद्द छन्हिये तँ आत्मा विषयपर कुमारिलक दर्शन सुनताह। आ सैह प्रवचन चलि रहल अछि। भ्रम। शब्दक भ्रम। कहैत रहथि श्रीकर मारते रास गप शब्दशास्त्रम् पर। भामती प्रस्थानम् पर। शब्दक अर्थ हम गढ़ि लैत छी। आ फेर भ्रम शुरू भऽ जाइत अछि। -गुरुजी। हम पत्नीक मृत्युक बाद घोर निराशामे छी। की छिऐ ई जीवन। कतए होएत आनन्दा। - मितू। धीरज राखू। ब्रह्मसिद्धिक हमर ई पाठ अहाँक सभ भ्रमक निवारण करत। ब्रह्मसिद्धिमे चारि काण्ड छै। ब्रह्म, तर्क, नियोग आ सिद्धि काण्ड। ब्रह्मकाण्डमे ब्रह्मक रूपपर, तर्ककाण्डमे प्रमाणपर, नियोगकाण्डमे जीवक मुक्तिपर आ सिद्धिकाण्डमे उपनिषदक वाक्यक प्रमाणपर विवेचन अछि। - मितू। मुक्ति ज्ञानसँ पृथक् कोनो बौस्तु नै अछि। मुक्ति स्वयं ज्ञान भेल। मानवक क्षुद्र बुद्धिक कतहु उपेक्षा मंडन नै केने छथि। कर्मक महत्व ओ बुझैत छथि। मुदा ताहिटा सँ मुक्ति नै भेटत। स्फोटकेँ ध्वनि-शब्दक रूपमे अर्थ दैत मंडन देखलन्हि। से शंकरसँ ओ एहि अर्थेँ भिन्न छथि जे एहि स्फोटक तादात्म्य ओ बनबैत छथि मुदा शंकर ब्रह्मसँ कम कोनो तादात्म्य नै मानै छथि। से मंडन शंकरसँ बेशी शुद्ध अद्वैतवादी भेलाह। -मितू। मंडन क्षमता आ अक्षमताक एक संग भेनाइकेँ विरोधी तत्व नै मानैत छथि। ई कखनो अर्थक्रियाकृत भेद होइत अछि, मुदा ओ भेद मूल तत्व कोना भऽ गेल। से ई ब्रह्म सभ भेदमे रहलोपर सभ काज कऽ सकैए। -देखू। वाचस्पतिक भामती प्रस्थानक विचार मंडन मिश्रक विचारसँ मेल खाइत अछि। मंडन मिश्रक ब्रह्मसिद्धिपर वाचस्पति तत्वसमीक्षा लिखने छथि। ओना तत्वसमीक्षा आब उपलब्ध नै छै। -तखन तत्व समीक्षाक चर्चा कोना आएल। -वाचस्पतिक भामतीमे एकर चर्चा छै। -मुदा मंडनक विचार जानबासँ पूर्व हमरा मोनमे आबि रहल अछि जे जखन ओ शंकराचार्यसँ हारि गेलाह तखन हुनकर हारल सिद्धान्तक पारायणसँ हमरा मोनकेँ कोना शान्ति भेटत। -देखियौ, मंडन हारि गेल छलाह तकर प्रमाण मंडनक लेखनीमे नै अछि। मंडन स्फोटवादक समर्थक रहथि, मुदा शंकराचार्य स्फोटवादक खण्डन करैत छथि। मंडन कुमारिल भट्टक विपरीत ख्यातिक समर्थक रहथि, मुदा शंकराचार्यक जाहि शिष्य सुरेश्वराचार्यकेँ लोक मंडन मिश्र बुझै छथि ओ एकर खण्डन करै छथि। -से तँ ठीके। मंडन हारि गेल रहितथि तँ हुनकर दर्शन शंकराचार्यक अनुकरण करितन्हि। -आब कहू जे जाहि सुरेश्वराचार्यकेँ शंकराचार्य श्रृंगेरी मठक मठाधीश बनेलन्हि से अविद्याक दू तरहक हेबाक विरोधी छथि मुदा मंडन अपन ग्रन्थ ब्रह्मसिद्धिमे अग्रहण आ अन्यथाग्रहण नामसँ अविद्याक दूटा रूप कहने छथि। मंडन जीवकेँ अविद्याक आश्रय आ ब्रह्मकेँ अविद्याक विषय कहै छथि मुदा सुरेश्वराचार्य से नै मानै छथि। शंकराचार्यक विचारक मंडन विरोधी छथि मुदा सुरेश्वराचार्य हुनकर मतक समर्थनमे छथि। ....... बानर आ बनगदहा खेत सभकेँ धांगने अछि आ पारा बारीकेँ। आब हमरा दुआरे गामक लोक महीस पोसनाइ तँ नै छोड़ि देत। बानर आ बनगदहा बड्ड नोकसान कऽ रहल अछि। “चारिटा बानर कलममे अछि। धऽ कऽ आम सभकेँ दकड़ि देलक। हम गेल रही। साँझ भऽ गेलै तँ आब सभटा बानर गाछक छिप्पी धऽ लेने अछि। साँझ धरि दुनू बापुत कलम ओगरने रही, झठहा मारि भगेलहुँ, मुदा तखन अहाँक कलम दिस चलि गेल”।–- हम मितूकेँ हम कहै छियन्हि। “सभटा नाश कऽ देलकै बचलू। रातिमे तँ नञि सुझै छै। भोरे-भोर कलम जा कऽ देखै छी। बनगदहा सभटा फसिल खा लेलक आब ई बानर आमक पाछाँ लागल अछि। करऽ दियौ जखन...”। “बनगदहा सभ तँ साफ कऽ उपटि गेल छलै। नै जानि फेर कत्तऽ सँ आबि गेल छै। गजपटहा गाममे जाग भेल छलै, ओम्हरेसँ राता-राती धार टपा दै गेल छै”। “से नै छै। ई बनगदहा सभ धारमे भसिया कऽ नेपाल दिसनसँ आएल छै। आबऽ दियौ जखन...”। “हम बानर सभ दिया कहने रही”। “से हेतै”। “हेतै भाइज, तखन जाइ छी”। हमरा बुझल अछि जे आमक मासमे बानर आ बनगदहा ओहि बरख एक्के संग निपत्ता भऽ गेल रहै जाहि बरख आनन्दा आ मितूक भेँट भेल रहै। आ आनन्दाक गेलाक बाद बानर आ बनगदहा नै जानि कत्तऽ सँ फेर आबि गेल छै, आनन्दाक मृत्युक पन्द्रहो दिन नै बीतल छै... ....... बचलू गेलाह आ मितूक कपारपर चिन्ताक मोट कएकटा रेख ऊपर नीचाँ होमए लगलन्हि, हिलकोरक तरंग सन, एक दोसरापर आच्छादित होइत, पुरान तरंग नव बनैत आ बढ़ैत जाइत। अंगनामे सोर करै छथि। “बुच्ची, बुचिया। जयकर आ विश्वनाथ आइ गाछी गेल रहए। आबि गेल अछि ने दुनू गोड़े। सुनलिऐ नै जे बानर सभक उपद्रव भऽ गेल छै। काल्हिसँ नै जाइ जाएत गाछी, से कहि दियौ। आइ बानर सभ कलम आएल छल, से कहबो नै केलहुँ। कहिये कऽ की होएत जखन...”। “कहि तँ रहल छलहुँ बाबूजी मुदा अहाँ तँ अपने धुनमे रहै छी, बाजैत मुँह दुखा गेल तँ चुप रहि गेलहुँ”। हँ, धुनिमे तँ छथिये मितू। ई आम सेहो आनन्दाक मृत्युक बाद पकनाइ शुरू भऽ गेल अछि। आ एतेक दिनुका बाद फेर ई बानर आ बनगदहा कोन गप मोन पारबा लेल फेरसँ जुमि आएल अछि। ... जयकरक माए वल्लभा आ विश्वनाथक माए मेधा। दुनू बहीन कतेक दिनपर आएल छथि नैहर। कतेक दिनपर भेँट भेल छन्हि एक दोसरासँ। आनन्दाक दुनू बेटी आ दुनू जमाए आएल छथि। वल्लभाक पति विशो आ मेधाक पति कान्ह। मेघ अपन पत्नी आ बच्चा सभक संगे आएल छथि। मितू पत्नीकेँ आनन्दा कहि बजा रहल छथि। फेर मोन पड़ै छन्हि जे ओ आब कत्तऽ भेटतीह। फेर कत्तऽ छी वल्लभा, कत्तऽ छी मेधा, जयकर आ विश्वनाथ कतए छथि..सोर करए लागै छथि। वल्लभा आ मेधा अबै छथि आ मितू गीत गबए लगै छथि। आनन्दाक गीत। आनन्दा जे गबै छलीह वल्लभा आ मेधा लेल- लाल परी हे गुलाब परी लाल परी हे गुलाब परी हे गगनपर नाचत इन्द्र परी हे गुलाबपर नाचत इन्द्र परी रकतमाला दुआरपर निरधन खड़ी हे रकतमाला दुआरपर निरधन खड़ी माँ हे निरधनकेँ धन यै देने परी माँ हे निरधनकेँ धन जे देने परी लाल परी हे गुलाब परी माँ हे रकतमाला दुआरपर अन्धरा खड़ी माँ हे अन्धराकेँ नयन दियौ जलदी माँ हे अन्धराकेँ नयन दियौ जलदी बाप आ दुनू बेटी भोकार पाड़ए लगै छथि। ... -मितू। आनन्दाक मृत्यु अहाँ लेल विपदा बनि आएल अछि। अहाँ ब्राह्मण जातिक आ आनन्दा चर्मकारिणी। मुदा दुनू गोटेक प्रेम अतुलनीय। हुनकर मृत्यु लेल दुःखी नै होउ। ब्रह्म बिना दुखक छथि। ब्रह्मक भावरूप आनन्द छियन्हि। से आनन्दा लेल अहाँक दुःखी होएब अनुचित। ब्रह्म द्रष्टा छथि। दृश्य तँ परिवर्तित होइत रहैए, ओहिसँ द्रष्टाकेँ कोन सरोकार। ई जगत-प्रपंच मात्र भ्रम नै अछि, एकर व्यावहारिक सत्ता तँ छै। मुदा ई व्यावहारिक सत्ता सत्य नै अछि। -मितू। चेतन आ अचेतनक बीच अन्तर छै मुदा से सत्य नै छै। जीवक कएकटा प्रकार छै, आ अविद्याक सेहो कएकटा प्रकार छै। अविद्या एकटा दोष भेल मुदा तकर आश्रय ब्रह्म कोना होएत, पूर्ण जीव कोना होएत। ओकर आश्रय होएत एकटा अपूर्ण जीव। अविद्या तखन सत्य नै अछि मुदा खूब असत्य सेहो नै अछि। -मितू। एहि अविद्याकेँ दूर करू आ तकरे मोक्ष कहल जाइत अछि। वैह मोक्ष जे आनन्दा प्राप्त केने छथि। आ मितूक मुखपर जेना शान्ति पसरि जाइ छन्हि। ........ मितू जेना भेँट करबा लेल जा रहल छथि। मोन पड़ि जाइ छन्हि आनन्दा संग प्रेमालाप। -आनन्दा। अहाँसँ गप करैत-करैत हमरा कनीटा डर मोनमे आबि गेल अछि। पिताक सभसँ प्रधान कमजोरी छन्हि हुनकर तालपत्र सभक परिरक्षण। से ई सभ मोन राखू। पिता जे पुछताह जे ताल पत्रक परिरक्षण कोना होएत तँ कहबन्हि- पुस्तककेँ जलसँ तेलसँ आ स्थूल बन्धनसँ बचा कऽ। छाहरिमे सुखा कऽ। ५००-६०० पातक पोथी सभ। हम कोनो दिन देखा देब। एक पात एक हाथ नाम आ चारि आंगुर चाकर होइ छै। ऊपर आ नीचाँ काठक गत्ता लागल रहै छै। वाम भागमे छिद्र कऽ सुतरीसँ बान्हल रहै छै। -पिता मानताह। -नै मानताह किएक। ब्राह्मणक बेटीसँ बियाह कराबैक औकाति छन्हि? हम एक गोटेकेँ दू टाका बएना देने रहियै खेतिहर जमीन किनबा लेल। मुदा पिता जा कऽ बएना घुरा आनलन्हि। एक-एक दू-दू टाका जमा कऽ रहल छथि। ७०० टाका लड़कीबलाकेँ देताह तखन बेटाक विवाह हेतन्हि आ पाँजि बनतन्हि। आ से ब्राह्मणी अओतन्हि तँ तालपत्रक रक्षा करतन्हि? मितूक माएक मृत्युक बाद श्रीकर खटबताह भऽ गेल छलाह। टोलबैय्या सभ कहै छथि। आ फेर बेमारी अएलै, प्लेग। गामक दूटा टोल उपटिये गेल, मिसरटोली आ पछिमाटोली। परोपट्टाक बहुत रास गाममे कतेक लोक मुइल से नै जानि। मितू पिताकेँ आनन्दासँ भेँट करा देलखिन्ह। श्रीकर तालपत्र परिरक्षणक ज्ञानसँ परिपूर्ण आनन्दामे नै जानि की देखि लेलन्हि। मितू जीति गेल। नैय्यायिक मितू मीमांसक श्रीकरसँ जीति गेल आ मीमांसक श्रीकर अपन टोलबैय्या सभकेँ पराजित कऽ देलन्हि। आ आनन्दा आ मितूक विवाह सम्पन्न भेल। मोन पड़ि जाइ छन्हि आनन्दा संग प्रेमालाप। मितू जेना भेँट करबा लेल जा रहल छथि। आनन्दाक मृत्यु भऽ गेल अछि। बलानमे पएर पिछड़ि गेलन्हि आनन्दाक। ओहिना पिछड़ैक चिन्हासी देखबामे आबि रहल अछि। मितू ओहि चिन्हासीकेँ देखै छथि आ हुनकर मोन हुलसि जाइ छन्हि, पिछड़ि जाइ छथि भावनाक हिलकोरमे.. आनन्दा आ मितूक एक दोसरासँ भेँट-घाँट बढ़ए लागल छल, खेत, कल्लम-गाछी, चौरी आ धारक कातक एहि स्थलपर। आ दुनू गोटे पिछड़ैत छलाह, खेतमे, कल्लम-गाछीमे, चौरीमे आ धारक कातमे सेहो। धारमे फाँगैत नै छलाह मितू। यएह ढलुआ पिच्छड़ स्थल जे आइ-काल्हिक छौड़ा सभ बनेने अछि, से मितूक बनाओल अछि। एहिपर पोन रोपैत छलाह आ सुर्रसँ मितू धारमे पानि कटैत आगाँ बढ़ि जाइत छलाह। “हे, कने नै पिछड़ि कऽ तँ देखा।” “से कोन बड़का गप भेलै।” “देखा तखन ने बुझबै।” आनन्दा अस्थिरसँ आगाँ बढ़बाक प्रयास करथि मुदा..हे.हे..हे.. नै रोकि सकलथि ओ अपनाकेँ, नहिये खेतमे, नहिये कल्लम-गाछीमे, नहिये चौरीमे आ नहिये एहि धारक कातमे.. आ की करए आएल होएतीह आनन्दा एतए..जे पिछड़ि गेलीह आ डूमि गेलीह.. कोनो स्मृतिकेँ मोन पड़बा लेल आएल होएतीह.. - हँ आनन्दा आएल अछि बचलू। देखियौ ई गीत सुनू- घर पछुवरबामे अरहुल फूल गछिया हे फरे-फूले लुबुधल गाछ हे उतरे राजसए सुगा एक आओल बैसल सूगा अरहुल फूल गाछ हे फरबो ने खाइ छऽ सुगबा, फुलहो ने खाइ छऽ हे डाढ़ि-पाति केलक कचून हे फुलबो ने खाइ छऽ सुगबा, फरहु ने खाइ छऽ हे डाढ़ि-पाति केलक कचून हे घर पछुवरबामे बसै सर नढ़िआ हे बैसल सूगा दिअ ने बझाइ हे एकसर जोड़ल सोनरिया दुइसर जोड़ल हे तेसर सर सूगा उड़ि जाइ हे सुगबो ने छिऐ भगतिया तितिरो ने छिऐ येहो छिऐ गोरैय्या के बाहान हे -भाइ अहाँ ई गीत नै सुनि पाबि रहल छी की? -भाइ सुनि रहल छी। देखियो रहल छी। आनन्दा भौजी छथि। जहिया ओ मुइल छलीह तहियो सुनने रही- वएह रहथि- गाबै रहथि- लुकेसरी अँगना चानन घन गछिया तहि तर कोइली घऽमचान हे -शब्द भ्रम नै छल ओ। माँछ-मौस आ सत्यनारायण पूजाक बाद अगिले दिनक गप अछि। ने चानन गाछ कटेने रहथि आ ने अँगना बेढ़ने रहथि आनन्दा। दोसर दिन ओहि चानन गाछक नीचाँ चर्मकारटोलमे गौआँ सभ दुनू गोटेक लहाश देखलन्हि। आ ईहो शब्द गगनमे पसरि गेल, सौँसे गौँआ सुनलक- आनन्दाक अबाजमे- जाहे बोन जेबऽ कोइली रुनझुनु बालम रहि जेतऽ रकतमाला के निशान हे शब्द भ्रम नै छल ओ। (ई कथा “शब्दशास्त्रम्” श्री उमेश मंडल गाम-बेरमा लेल।) २ दिल्ली १ पोस्टमार्टम कएल शरीर सातटा मोटका शिल्लपर, जड़त कनीकालमे। गोइठामे आगि जे अनलन्हिहेँ सुमनजी राखि देलन्हि नीचाँ। कनकनाइत पानिमे डूम दऽ गोइठाक आगिसँ आगि लऽ शरीरकेँ गति- सद्गति देबा लेल। आ कऽ देलन्हि अग्निकेँ समर्पित । तृण, काठ आ घृत। घुरि गेला सभ। लोह, पाथर, आगि आ जल नांघि, छूबि; डेढ़ मासक बच्चाकेँ कोरामे लेने छलि माए, तकड़ा छोड़ि। सभ घर घुरैत छथि। २ दिल्ली। ३१ दिसम्बरक राति। आब एक तारीख भऽ गेलै। रतिका शिफ्टमे हम छी। कोरियासँ आएल एकटा स्त्री हमरासँ पुछैए, ई नव एयरपोर्ट अछि की? हम कहै छिऐ- हँ। आ पुछै छिऐ- किए? ओ स्त्री कहैए- नै, हमरा लागल, किएक तँ छह मास पहिने आएल रही। -हँ पहिने टर्मिनल दू पर अहाँ आएल हएब, ई नव टर्मिनल छिऐ, टर्मिनल- तीन। नीक लागल अहाँकेँ?-– हम पुछै छियन्हि। -बड्ड नीक लागल। एयरपोर्ट नै, होटल सन लागि रहल अछि। इण्डिया आब मजगूत भऽ रहल अछि।-– महिला बजै छथि। रतिका शिफ्टमे हम छी। तखने गामसँ एकटा फोन हमर मोबाइलपर अबैए। हमर महिला सहकर्मी हँसी करै छथि- गामसँ फोन आएल हेतन्हि, आब फेर ई मैथिलीमे गप करता, हम सभ भाषा बुझै नै छिऐ, मीठ भाषा छै, तेँ हमर सभक खिधांशो करैत हएब तँ हमरा सभकेँ पता नै चलत। ३१ दिसम्बरक राति छिऐ। आब एक तारीख भऽ गेलै। मुदा दुर्घटना बारह बजे रातिक पहिने भेल छलै। लहाशक जेबीमे मोबाइल रहै। तीन चारिटा अंतिम बेर डायल कएल गेल फोन नम्बरपर पुलिस ओही मोबाइलसँ फोन केलकै आ सूचना देलकै जे जकर फोनसँ पुलिस फोन कऽ रहल अछि, से आब ऐ दुनियाँमे नै रहल। मध्य रात्रि। एक्स-रे मशीन आ स्निफर डॉगकेँ छोड़ि ऑफिससँ छुट्टी लऽ हम बिदा होइ छी। ई एयरपोर्ट बाहरसँ कोनो सजल-धजल नवकनियाँ सन लागि रहल अछि। रातिमे बाहरसँ हमहूँ नै देखने रहिऐ ऐ नवकनियाँकेँ। ठीके कहै छल ओ महिला। होटले लागि रहल अछि, प्रकाशमे चमचमाइत। गाड़ी आगाँ बढ़ि रहल अछि। दिल्लीक रोड एतेक चाकर कोना भऽ गेलै। दिनमे तँ तीन मिनट प्रति किलोमीटरक गति रहै छै ऐ सड़कपर। मुदा रातिमे खाली रहने चकरगर लागि रहल अछि। मुदा फेर जमुनापार अबैए, रोड पातर होइत जाइए। भजनपुरा, खजूरी खास। दिनमे तँ गाड़ी एतऽ आबियो नै सकितए। बिजली सेहो कटि गेल छै। सड़कक दुनू कात गन्दा पसरल। गाड़ी गलीक कोनमे लगा कऽ आगाँ बढ़ै छी। गली पार कऽ हिलैत सिरही बाटे अमरजीक घर पैसै छी। कन्नारोहट उठल छै। दिल्ली.. इण्डिया, मजगूत इण्डियाक राजधानीक ईहो एकटा इलाका अछि। कोरियन महिला एतऽ नै आबि सकत। एतुक्के लोक चमचमाइत घर, ऑफिस, आ व्यापारक पाछाँ अछि। अगिला खाढ़ी भऽ सकैए फएदामे रहतै.. तै आसमे। पता चलैए जे लहाश गुरु तेग बहादुर अस्पतालमे राखल छै। ओतऽ सँ बिदा होइ छी। बोल भरोस देबा योग्य परिस्थिति नै छै। गुरु तेग बहादुर अस्पतालक मुर्दाघरमे मोहित बाबूक बेटाक लहास ओकर रक्तसम्बन्धीकेँ देल जेतै। पुलिस कहने रहए- पिता जीवित छथिन्ह तखन दोसराकेँ देबाक बाते नै छै, नै जिबैत रहितथिन्ह तखन देल जा सकै छल- उच्च न्यायालयक आदेश छै। पछिला बेर दऽ देल गेल रहै आ जखन असली रक्त-सम्बन्धी आबि कऽ केस कऽ देलकै तँ तीनटा पुलिसबला निलम्बित भऽ गेलै। आ कने काल लेल मानि लिअ जे पुलिस दैयो देत, मुदा डॉक्टर पोस्टमार्टमे नै करत। ३ अमोदक घरमे हरबिर्रो उठि गेलै। दिल्लीसँ एक बजे रातिमे फोन आएल छै, मोहित बाबूक बेटा अमर मरि गेलै। दिल्लीमे सड़क दुर्घटनामे मरि गेलै। अमोदक फोनपर फोन आएल छै। अमोद मोहित बाबूकेँ कोना की कहतै। तत्ता-सिहर कटा कऽ एक्केटा बेटा मोहित बाबूकेँ, चारिटा बेटीपरसँ। परुकेँ बियाह भेल छलै। अमोद मोहित ककाक दरबज्जा लग पहुँचैए। हाक दैए। काकी अबै छथि। मोहित बाबू गाममे छथिये नै। बहनोइक मृत्यु-संस्कारमे भाग लैले गेल छथि। अमोदकेँ ई गप काकी कहै छथिन्ह। -से की भेलै एतेक रातिमे?- काकी चिन्तित भऽ पुछै छथिन्ह। -नै भोरमे अबै छी।–काज छल। अमोद मोहित बाबूक घरसँ पुछारी कऽ बहरा जाइए। अमोद आगाँ बढ़ि जाइए। सरवनक दरबज्जापर जाइए। हँ एकरे कहि दै छिऐ, काकीकेँ भोरमे कहि देतन्हि। सरवन चौकीपर सूतल अछि। अमोद ओकरा उठाबैए आ सभ गप कहैए। सरवन भोरमे काकीकेँ कहि देतै आ काकाकेँ सेहो भोरेमे फोन कऽ देतै। भोरमे भरि गाम हाक्रोस ….। काकी तँ बताह भेल जाइ छथि। मोहित बाबूकेँ फोन गेलन्हि जे जहिना छी तहिना आबि जाउ, काकीक मोन बड्ड खराप छन्हि। मोहित बाबू गामपर एलाह तँ दोसरे गप। दिल्लीमे टोलक बड्ड लोक छै, मुदा पुलिस लहास ककरो नै देतै। रक्त-सम्बन्धीकेँ लहास भेटतै। मोहित बाबू दिल्ली नै जेताह, संताप देखैले नै जेताह। मुदा पुलिस लहास दोसराकेँ नै देतै। मोहित बाबूकेँ पंडितजी भरोस दै छथिन्ह। ओतऽ के कोना दाह संस्कार करतै, से पण्डीजी संगे जेताह। साँझमे पटनासँ दिल्लीक ट्रेनमे रिजर्वेशन भऽ जेतै। विधायक जीसँ अमोद गप कऽ लेने छथि, टिकट कटा, रिजर्वेशन करा कऽ अमोदक भातिज टिकटक संग पटना जंक्शनपर भेटत। दिल्लीमे पीअर बच्चाक बेटा कार लऽ कऽ स्टेशनपर आएत, करोलबागमे कैकटा दोकान छै पीअर बच्चाक बेटाक। सोझे ओतऽसँ मोहित बाबूकेँ मुर्दाघर लऽ अनतन्हि ओ… पण्डीजी आ मोहित बाबू पटनाक बस पकड़ै छथि। साँझमे दिल्लीक ट्रेन छै। काल्हि भोरमे मोहित बाबू दिल्ली पहुँचि जेताह आ बेटा जे काल्हि धरि जिबिते रहै आ आइ जे लहास बनल दिल्लीक मुर्दाघरमे राखल छै- तकर मृत शरीरकेँ लेताह। ४ ट्रेन आशाक नगरी दिल्ली पहुँचैबला छै, चिमनीक धुँआ आ फैक्ट्रीसभ खतम भेलै आ बड़का-बड़का स्टेडियम, प्रगति मैदान आ की-की आबि गेलै। मोहित बाबूकेँ ई सभ बौस्तु पहिने नीक लागै छलन्हि। दिल्ली हाटमे गमैआ बौस्तु सभक स्टॉलपर बड़का गाड़ीबला सभ उतरि कऽ समान कीनै छल। मोहित बाबूकेँ हँसी लागै छलन्हि। गाममे ई सभ बौस्तु अनेरे पड़ल रहै छै, कियो किननिहार नै। ऐ परदेशी सभकेँ गामक लोक सभ एत्तऽ अनेरे ठकै छै। मुदा आइ ई दिल्ली हुनका लेल मुर्दाघरक पता बनि गेल छन्हि। गुरु तेग बहादुर अस्पतालक मुर्दाघरमे हुनकर बेटाक लहास ओकर रक्तसम्बन्धीकेँ देल जेतैक। पिता रक्तसम्बन्धी बनि पहुँचैबला छथि। मोहित बाबू मुर्दाघर पहुँचि जाइ छथि, पहिने बुझलो नै छलन्हि जे दिल्लीमे सेहो मुर्दाघर होइ छै, बिजली-बत्तीबला शहर दिल्लीमे..... ५ दिल्ली। के बसेलकै, कोना बसेलकै। अंग्रेज जहिया कलकत्तासँ दिल्ली राजधानी बनेबाक विचार केलक तखन तँ एकोटा गामक लोक एतऽ नै हेतै। आ आब … मोहित बाबू पहुँचि जाइ छथि। हबोढेकार भऽ कानऽ लगै छथि। हम भरि-पाँज कऽ पकड़ि कऽ बैसि जाइ छियन्हि। -गामक छोड़ू कोन टोलक, कोन घर लोक एत्तऽ नै छै। सड़क दुर्घटना सेहो भेल छै। मुदा बचि-बचि जाइ छलै। अमरो बचि जैतै तँ कत्ते नीक होइतै। अपंगो भऽ कऽ रहितै तँ देखबो तँ करितिऐ। हे कनियाँकेँ आगि नै देबऽ देबै, डेढ़मासक बच्चा छै। बच्चा लीलो भऽ जाएत। नै, हमहीं देबै आगि.. आन देबो करतै तँ अन्तिम दिन तँ उतरी कनियाँक गरामे आबिये जेतै। तेँ हमहीं देबै आगि। -एह.. एक्कैसे बरखक तँ छै, छौंकी सन शरीर छै कनियाँक। चारिटा भाइ छै, सभ एकरासँ पैघ। ओकर जीवन कोना बिततै। ऐ बूढ़ शरीरसँ बच्चाकेँ हम कोना पोसबै। कतबो धनीक रहै छै, नोकरी लेल पठबैते छै.. पीअरो बच्चा तँ सेहो पठेने छथि अपन बच्चाकेँ। ओकरसँ बेसी के छै धनीक गाममे? हमरा तँ दस कट्ठा जमीनो नै पुरत... रौ दैब... कहै छलिऐ जे हम नै जाएब दिल्ली...... संताप देखैले की जाएब? मुदा कहलकै जे लाशे नै देत। आ आब आबि गेल छी तँ हमहीं देबै आगि। -नै से नै हएत, बाप कतौ आगि देलकैहेँ...अहाँकेँ अश्मसानघाटो नै जेबाक अछि। सभ पुरना गप बिसरि जाउ... ओकर पितियौतकेँ देबए दियौ आगि... ऐ परिस्थितिमे पुरान गप बिसरि जाउ। -नै, से भातिजक प्रति हमरा कोनो तेहन आन भावना नै अछि। ठीक छै... सुमनजी दौ आगि। ६ एक्कैसम शताब्दीक पहिल दशकक अन्तिम रातिक घटना, आ ओकर बादक भोर। मुदा नै छै कोनो अन्तर। पहिराबा आ पुरुखपातकेँ छोड़ि दियौ। महिला तँ वएह…। ऐ कनकनाइत बसातसँ बेशी मारुख। हाड़मे ढुकल जाइत अछि। कमला कात नै यमुनाक कात। हजार माइल दूर गामसँ आबि। मिज्झर होइत अछि खररखवाली काकीक श्वेत वस्त्र। साइठ साल पूर्वक वएह खिस्सा, वएह समाज, मात्र पहिराबा बदलि गेल, मात्र धार बदलि गेल। गोपीचानन, गंगौट, माला, उज्जर नव वस्त्र मुँहमे तुलसीदल, सुवर्ण खण्ड, गंगाजल, कुश पसारल भूमि, तुलसी गाछ लग उत्तर मुँहे पोस्टमार्टम कएल शरीर आनल जाइए। फेर ओतऽसँ यमुना कात… कनकनी छै बसातमे, हाड़मे ढुकि जाएत ई कनकनी, पोस्टमार्टम कएल शरीर जे राखल अछि, सातटा मोटका शिल्लपर, कमला कात नै यमुनाक कात, जड़त कनीकालमे। सुमनजी सेहो नव उज्जर वस्त्र पहीरि, जनौ, उत्तरी पहीरि, नव माटिक बर्तनक जलसँ, तेकुशासँ पूब मुँहे मंत्र पढ़ै छथि आ ओहि जलसँ मृतककेँ शिक्त करै छथि वामा हाथमे ऊक लऽ गोइठाक आगिसँ धधकबैत छथि तीन बेर मृतकक प्रदीक्षणा कऽ मुँहमे आगि अर्पित होइत अछि। लकड़ी कोना राखल जाए तइपर दू गोटेमे बहसा-बहसी भऽ रहल अछि। लगैए झगड़ा भऽ जेतै। पहिल गोटा कहि रहल छथि- एना लकड़ी नै तोपल जाइ छै, कतबो घी कर्पूर देबै आगि नै धरत। मुदा किछु काल आर। सातटा शिल्लपर राखल ओ शरीर, अग्नि लीलि रहल सुड्डाह कऽ रहल। एकटा परिवार फेरसँ बनत आ तीस बर्खक बाद देखब ओकर परिणाम। ताधरि हाड़मे ढुकल रहत ई सर्द कनकनी, ऐ बसातक कनकनीसँ बड्ड बेशी सर्द। सभ दिल्लीयेमे रहता, दिल्लीसँ लड़बा लेल, इण्डियाकेँ महाशक्ति बनेबा लेल, अपन प्रगतिक आशामे, अगिला खाढ़ी लेल एतेक तँ बलिदान देबैए पड़त, ई सोचैत। कपास, काठ, घृत, धूमन, कर्पूर, चानन कपोतवेश मृतक। पाँच-पाँचटा लकड़ी सभ दैत छथि। कपोतक दग्ध शरीरावशेष सन मांसपिण्ड भऽ गेलापर, सतकठिया लऽ सातबेर प्रदक्षिणा कऽ, कुरहरिसँ ओहि ऊकक सात छौ सँ खण्ड कऽ, सातो बन्धनकेँ काटि सातो सतकठिया आगिमे फेकि बाल-वृद्धकेँ आगाँ कऽ एड़ी-दौड़ी बचबैत नहाइले जाइ छथि, तिलाञ्जलि मोड़ा-तिल-जलसँ, बिनु देह पोछने, मृतकक आंगनमे द्वारपर क्रमसँ लोह, पाथर, आगि आ पानि स्पर्श कऽ सभ घर घुरि जाइ छथि। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। १.आशीष अनचिन्हार- "सगर राति दीप जरय"केर अन्त आ साहित्य अकादेमी कथा गोष्ठीक उदय २.प्रियंका झा- सगर राति दीप जरय पर साहित्य अकादेमीक कब्जा/ सरकारी पाइपर भेल बभनभोज/ साहित्य अकादेमीक कथा रवीन्द्र दिल्लीमे समाप्त- रवीन्द्रक कथापर कोनो चर्चा नै भेल- ७६म सगरराति दीप जरय चेन्नैमे विभारानी लऽ गेली ३.सुमित आनन्द- सोसाइटी टुडेक लोकार्पण १ आशीष अनचिन्हार "सगर राति दीप जरय"केर अन्त आ साहित्य अकादेमी कथा गोष्ठीक उदय "सगर राति दीप जरय"केर अन्त आ साहित्य अकादेमी कथा गोष्ठीक उदय (रिपोर्ट आशीष अनचिन्हार) २१ जुलाइ २००७केँ सहरसा "सगर राति दीप जरय"मे जीवकांत जी मैथिलीकेँ राजरोगसँ ग्रसित हेबाक संकेत देने छलाह। आ तकरा बाद लेखक सभकेँ मैथिलीकेँ ऐ राजरोगसँ बचेबाक आग्रह रमानंद झा रमण केने छलाह। मुदा हमरा जनैत- ई मात्र सुग्गा-रटन्त भेल। कारण ई राजरोग आस्ते-आस्ते जीवकांत जी आ रमण जीक आँखिक सामने मैथिलीकेँ गछाड़ि लेलकै। मैथिलीक ई रोगक बेमरिआह स्वरूप आर बेसी फरिच्छ भऽ कऽ दिल्लीक धरतीपर "मैलोरंग" द्वारा संचालित आ साहित्य अकादेमीक पाइक बलें कुदैत "सगर राति दीप जरय" मैथिली भाषाकेँ मारि देलक। २४ मार्च २०१२केँ साँझ धरिलोक भ्रममे छल जे दिल्लीमे "सगर राति दीप जरए" केर आयोजन भऽ रहल छै। संयोजक देवशंकर नवीन माला उठेने रहथि, मुदा आगाँ प्रकाश आ फेर मैलोरंग नै जानि कतऽ सँ आबि गेलै, आ अतत्तः तखन भेलै जे बादमे पता चललै जे ओ सगर राति नै छल ओ तँ "मैलोरंग" द्वारा संचालित आ साहित्य अकादेमीक पाइसँ आयोजित मात्र कथा गोष्ठी छल। मैलोरंग एकरा ७६म "सगर राति दीप जरय"क रूपमे आयोजित करबाक नियार केने छल मुदा "सगर राति दीप जरय" मे आइ धरि सरकारी साहित्यिक संस्थासँ फण्ड लेबाक कोनो प्रावधान नै रहै, से ई ७६म "सगर राति दीप जरय"क क्रम टूटि गेलै आ तँए ई ७६ कथा गोष्ठीक रूपमे मान्यता नै प्राप्त कऽ सकल। पाइ साहित्य अकादेमीक लागल छलै एकर प्रमाण फोटो सभमे सहयोगक रूपे " साहित्य अकादेमी"क नाम देखाइ स्पष्ट रूपे पड़त। आ अकादेमीक पर्यवेक्षकक रूपमे देवेन्द्र कुमार देवेश आएल छलाह। साहित्य अकादेमी द्वारा मैथिलीक ऐ एकमात्र स्वायत्त गोष्ठीकेँ तोड़बाक प्रयासक साहित्य जगतमे भर्त्सना कएल जा रहल अछि। ओना हम स्पष्ट कही जे राजरोगकेँ हटेबाक बात करए बला रमानंद झा रमण सेहो ऐ कूकृत्यकेँ आँखिसँ देखलन्हि आ मौन सम्मति देलनि। आब चूँकि ई "सगर राति दीप जरए" नै छल तँए आगूक एकर विवेचन हम मात्र कथा गोष्ठीक रूपमे करब। चूँकि लोकमे भ्रम पैदा कएल गेल छलै जे ई "सगर राति दीप जरए" अछि तँए विदेह दिससँ पोथीक स्टाल लगाएल जा रहल छल कथा स्थलपर, मुदा ओही समय "मैलोरंग"केर कर्ता-धर्ता प्रकाश झा द्वारा ऐपर रोक लगा देल गेलै। प्रकाश जी कहलखिन्ह जे जँ फ्रीमे बँटबै तखने स्टाल संभव हएत। मुदा हुनक विचारकेँ स्टाल व्यवस्थापक आशीष चौधरी द्वारा नकारि देल गेल। आ एकर विरोधमे विदेहक संपादक गजेन्द्र ठाकुर कथास्थलसँ निकलि गेलाह। ऐकथा गोष्ठीक शुरूआतमे ओना हम अपने फेसबूकपर घोषणा केने रही जे गजल आ हाइकूक पोस्टर प्रदर्शनी करब सगर रातिमे, मुदा जखन ओ सगर रात छलैहे नै तखन हम सभ कतए करब आ ताहिपर विदेह पोथी स्टालक विरोधक बाद! हमरा लोकनि एकर विरोध करैत ऐ पोस्टर प्रदर्शनीकेँ स्थगित कऽ देलौं। ऐ कथा गोष्ठीक आरंभ बारह गोट पोथीक विमोचनसँ भेल। जइमे कुल पाँच हिन्दी-उर्दूक पोथी छल आ सातटा मैथिलीक। अजुका मने दिल्ली बाल सगर रातिसँ पहिने हम २००८मे रहुआ संग्राममे भाग लेने रही। ओ हमर पहिल सगर राति छल। पूरा उत्साहसँ भरल रही। मुदा जेना जेना राति बितैत गेल हमर उत्साह बिलाइत गेल आ अंतमे ३ बजे रातिमे जखन हमरा कथा पढ़बाक मौका भेटल तखन हम जागल रही ओहि सत्रके अध्यक्ष शिवशंकर श्रिनिवास जागल रहथि आ दू-चारिटा अनचिन्हार लोक जागल रहथि ( अनचिन्हार लोक ताहि सामयकेँ हिसाबसँ उमेश मंडल, जगदीश प्रसाद मंडल, फूल चंद्र मिश्र रमण इत्यादि) आ बाद-बाँकी तथाकथित समीक्षक-आलोचक एवं हरेक सगर रातिमे अपन भाँज पुरबए बला लोक सभ सूतल रहथि मने तारा बाबूसँ लए क' रमानंद झा रमण धरि। ओही दिन हमरा अनुभव भेल जे जँ कुम्भकर्ण सबहक बीच वेद-पाठ करब तँ अपने पापक भागी बनब। अस्तु हम ओहि कथा गोष्ठीक वहिष्कार केलहुँ आ आ कथा नै पढ़लहुँ। मुदा जखन गोष्ठीक कर्ता-धर्ता ( संयोजनक नै) कुंभकर्णे छथि तखन हमर एहि वहिष्कारक चर्चा केना हो। ओना ओहि कथा गोष्ठीक वहिष्कारक कारण छल जे " जँ समीक्षके कथा नै सुनताह तँ हम पढ़ब केकरा लेल। आब अहाँ सभ कहि सकैत छी जे अहाँ आम श्रोताकेँ अपन कथा सुना सकैत छलहुँ। इ गप्प सत्य मुदा बेरमा छोड़ि हमरा कतौ आम श्रोता नै भेटल। हम अपने तँ बेरमामे नै रही मुदा ओकर विडियो जे कि यूट्यूबपर छै ताहिमे इ स्पष्ट रूपें देखल जा सकैए।आब आबी दिल्लीक एहि कथा-गोष्ठीपर। इ कथा-गोष्ठी अपना-आपमे कतेको कीर्तिमानकेँ स्थापित केलक आ धवस्त केलक। जँ भारतीय दर्शनमे वर्णित आत्मा आ पुनर्जन्म सत्य छै तँ आदरणीय प्रभाष चौधरी जीक आत्मा कुहर-हुकरि रहल हेतन्हि। ओ एहि दिनक कल्पना केनहो नै हेताह। एहि कथा-गोष्ठीक किछु कीर्तिमान देखल जाए।---- 1) रहुआ संग्रामसँ जे मैथिली साहित्यमे गैर ब्राम्हण मुदा टेलेन्टेड प्रतिभा एनाइ शुरू भेल छल से एहिठाम टुटि गेल। कथा गोष्ठीक निअम छलै जे कथाकार-साहित्यकार वा श्रोता अपन खर्चापर एताह-जेताह मुदा बात जखन दिल्लीकेर होइ तँ संयोजक अपन इष्ट सभहँक लेल नीक जकाँ पाइ खरचा केलाह। एकर परिणाम कतेक भयंकर हेतै से सहजहि सोचल जा सकैए। दिल्लीसँ पहिने हरेक कथा गोष्ठीक निअम छलै जे " जे कथाकार पहुँचता से कथा पढ़ताह"। मुदा एहि बेर संयोजक घोषणा केलाह जे जिनका हम निमंत्रण पढ़ेबन्हि सएह एताह वा जिनका एबाक छन्हि से अपन स्वीकार पत्र पठाबथि। भविष्यपर एहि निअम सेहो प्रभाव पड़तै से लागि रहल अछि। अस्तु एहि एतेक कीर्तिमान स्थापित केलाक बाद जे इ गोष्ठी भेल आब ताहिकेँ देखी--- ई कथा गोष्ठी आठ सत्रमे बाँटल छल। अध्यक्ष छलाह गंगेश गुंजन आ संचालक छलाह अजित कुमार अजाद। साहित्य अकादेमीक कथा गोष्ठीक पहिल सत्रमे विभूति आनन्द (छाहरि), मेनका मल्लिक(मलहम) आ प्रवीण भारद्वाजक (पुरुखारख) कथाक पाठ भेल। कथापर समीक्षा अशोक मेहता आ रमानन्द झा रमण केलन्हि। अशोक मेहता कहलन्हि जे विभूति आनन्दक कथामे किछु शब्दक प्रयोग खटकल। मेनका मल्लिकक भाषाक सन्दर्भमे ओ कहलन्हि जे एतेक दिनसँ बेगूसरायमे रहलाक बादो हुनकर भाषा अखनो दरभंगा, मधुबनीयेक अछि। प्रवीण भारद्वाजक कथाक सन्दर्भमे ओ कहलन्हि जे कथाकार नव छथि से तै हिसाबे हुनकर कथा नीक छन्हि। रमानन्द झा रमण विभूति आनन्दक कथामे हिन्दी शब्दक बाहुल्यपर चिन्ता व्यक्त केलन्हि। मेनका मल्लिकक कथाक सन्दर्भमे ओ कहलन्हि जे महिला लेखन आगाँ बढ़ल अछि। प्रवीण भारद्वाजक कथाक भाषाकेँ ओ नैबन्धिक कहलन्हि आ आशा केलन्हि जे आगाँ जा कऽ हुनकर भाषा ठीक भऽ जेतन्हि। तकर बाद श्रोताक बेर आएल, सौम्या झा विभूति आनन्दक कथाकेँ अपूर्ण, ओइ इलाकासँ कटल लगलन्ह् मुदा ओ कहलन्हि जे हुनका ई कथा नीक लगलन्हि मुदा ऐमे कमी छै, देवशंकर नवीन विभूति आनन्दक पक्षमे बीच बचावमे (!!!) एलाह मुदा सौम्या झा अपन बातपर अडिग रहलीह। आशीष अनचिन्हार विभूति आनन्दसँ हुनकर कथाक एकटा टेक्निकल शब्द "अभद्र मिस कॉल"क अर्थ पुछलन्हि तँ देवशंकर नवीन राजकमलक कोनो कथाक असन्दर्भित तथ्यपर २० मिनट धरि विभूति आनन्दक पक्षमे बीच बचाव करैत रहला (!!!), अनन्तः विभूति आनन्द श्रोताक प्रश्नक उत्तर नै देलन्हि। दोसर सत्रमे विभा रानीक कथा सपनकेँ नै भरमाउ, विनीत उत्पलक कथा निमंत्रण, आ दुखमोचन झाक छुटैत संस्कारक पाठ भेल। विभा रानीक कथा पर समीक्षा करैत मलंगिया एकरा बोल्ड कथा कहलन्हि, सारंग कुमार कथोपकथनकेँ छोट करबा लेल कहलन्हि, कमल कान्त झा एकरा अस्वभाविक कथा कहलन्हि आ कहलन्हि जे माए बेटाक अवहेलना नै कऽ सकैए, मुदा श्रीधरम कहलन्हि जे जँ बेटाक चरित्र बदलतै तँ मायोक चरित्र बदलतै। कमल मोहन चुन्नू कहलन्हि जे ई कथा घरबाहर मे प्रकाशित अछि। आयोजक कहलन्हि जे विभा रानीक कथा सपनकेँ नै भरमाउ केँ ऐ गोष्ठीसँ बाहर कएल जा रहल अछि। विनीत उत्पलक कथा निमंत्रण पर मलंगिया जीक विचार छल जे ई उमेरक हिसाबे प्रेमकथा अछि। सारंग कुमार एकरा महानगरीय कथा कहलन्हि मुदा एकर गढ़निकेँ मजगूत करबाक आवश्यकता अछि, कहलन्हि। श्रीधरम ऐ कथामे लेखकीय ईमानदारी देखलन्हि मुदा एकर पुनर्लेखनक आवश्यकतापर जोर देलन्हि। हीरेन्द्रकेँ ई कथा गुलशन नन्दाक कथा मोन पाड़लकन्हि मुदा प्रदीप बिहारी हीरेन्द्रक गपसँ सहमत नै रहथि। ओ एकरा आइ काल्हिक खाढ़ीक कथा कहलन्हि।दुखमोचन झाक छुटैत संस्कारपर मलंगिया जी किछु नै बजला, ओ कहलन्हि जे ओ ई कथा नै सुनलन्हि। सारंग कुमार एकरा रेखाचित्र कहलन्हि। कमलकान्त झाकेँ ई संस्कारी कथा लगलन्हि। श्रीधरमकेँ आरम्भ नीक आ अन्त खराप लगलन्हि। शुभेन्दु शेखरकेँ जेनेरेशन गैप सन लगलन्हि आ कमल मोहन चुन्नूकेँ ई यात्रा वृत्तान्त लगलन्हि। दोसर सत्रमे श्रोताक सहभागिया शून्य जकाँ रहल। ोसर सत्रक बाद भोजन भेल। भोजनमे भात-दालि तरकारी, भुजिया-पापड़, दही आ चिन्नी बेसी बला रसगुल्ला छल। आ भोजनक बाद शून्यकाल। शून्यकाल केर माने जे भोजन करू आ कथा स्थलकेँ शून्य करू। मुदा अधिकाशं छलाहे आ किछु जेनाकी विभूति आनंद शून्यमे विलीन भऽ गेल छला। (शून्यमे विलीन विभूति आनन्द, महेन्द्र मलंगिया आ रमानन्द झा रमण) शून्य कालक दौरान हीरेन्द्र कुमार झा द्वारा मैथिलीमे बाल साहित्यकेर विकासक बात राखल गेल। ओ जोर देलन्हि जे बाल साहित्य मुफ्तमे बाँटल जेबाक चाही। किछु गोटेँ ऐ बातपर जोर देलन्हि जे भविष्यमे जे सगर राति हएत ओइमे सँ कोनो एकटा आयोजन पूरा-पूरी बालकथा पर हेबाक चाही। मुदा आशचर्यक विखय ई रहल जे देवशंकर नवीन" इंटरनेट पर विदेहक माध्यमे आबैत बाल साहित्यकेँ बिसरि गेलह जखन की ओ इंटरनेटक गतिविधिसँ परिचित छथि। ओही क्रममे आशीष अनचिन्हार द्वारा हीरेन्द्र जीकेँ मुफ्त डाउनलोड प्रक्रिया बताएल गेल। मुदा नतीजा वएह- जनैत-बुझैत इंटरनेटपर सुलभ बाल साहित्यकेँ एकटा सुनियोजित तरीकासँ कात कएल गेल। बात जखन हरेक विधामे बाल साहित्य लिखबा पर आएल तखन पहिल बेर आशीष अनचिन्हार द्वारा मैथिलीमे "बाल गजल" केर परिकल्पना देल गेल। मुदा एकटा बात रोचक जे बाल साहित्यकेर चर्चा पुरस्कारक बात पर अटकि गेलै। किनको ई दुख छलन्हि जे आब हमर सबहक उम्र बीति गेल तखन ई शुरू भेल। तँ किनको ई दुख छलन्हि जे अमुक अपन कनियाँ केर नामसँ व्योंतमे लागल छथि। ऐ बहसक दौरान अविनाश जी ऐ बातपर जोर देलन्हि जे "बाल कथा"क तर्ज पर "व्यस्क कथा" सेहो हेबाक चाही। ओना जे पटना सगर रातिमे सहभागी हेताह से अविनाश जीसँ नीक जकाँ परिचित हेताह से उम्मेद अछि। धनाकर जीक रंगीन जलपर रिपोर्ट कएक ठाम आएल अछि(विदेह फेसबुक आ घर बाहरमे सेहो)। शून्यकालक बाद तेसर स्तर शुरू भेल- ई विशुद्भ रूपे विहनि कथापर आधारित छल। ऐमे मुन्ना जी चश्मा, सेवक आ कट्टरपंथी नामक तीन टा विहनि कथा पढलन्हि। अरविन्द ठाकुर दूगोट विहनि कथा-दाम आ अगम-अगोचर पढलन्हि। प्रदीप बिहारी बूड़ि नामक विहनि कथा पढ़लन्हि। ऐ सत्रक मुख्य बात ई रहल जे मुन्ना जी लघुकथा नै बल्कि विहनि कथा कहबा पर जोर देलन्हि मुदा हुनकर उन्टा अशोक मेहता कहलन्हि जे लघुकथा नाम ठीक छै। ऐ सत्रमे मुन्ना जी सगर रातिकेर कोनो एकटा आयोजन विहनि कथापर करबा पर जोर देलन्हि। श्रोतामेसँ आशीष अनचिन्हार मुन्ना जीक विहनिकथा "चश्मा"केँ आधुनिक जीवनमे पनपैत नकली संवेदनाकेँ देखार करैत कथा कहलन्हि। ऐसँ पहिने देवशंकर नवीन जी समाजमे पसरैत असंवेदनाकेँ रेखांकित केने छलाह अपन वक्त्व्यमे। अनचिन्हार संवेदनाक एहू पक्षपर नवीन जीकेँ धेआन देओलखिन्ह। ऐ विहनि कथा सभपर अनेक टिप्पणी सभ आएल। मुदा वएह जे नीक लागल, बड्ड नीक आदि फर्मेटमे। चारिम सत्रमे हीरेन्द्र कुमार झाक दीर्घकथा " एकटा छल गाम" आ पंकज सत्यम केर कथा " एकटा विक्षिप्तक चिट्ठी" आएल। एकटा छल गाम पर चुन्नू जी कहलखिन्ह जे कथा बेसी नमरल अछि मुदा कथ्य नीक अछि। श्री धरम जी चुन्नू जीक आलोचनासँ सहमत छलाह। संगे संग चुन्नू जी कहलखिन्ह जे ऐमे गामक चिंता नीक जकाँ आएल अछि। आ श्रीधरम कहलखिन्ह जे दलित उभार जँ ऐकथामे अबितै तँ आर नीक रहितै। श्रोता वर्गसँ आशीष अनचिन्हार द्वारा कमल मोहन चुन्नू जीकेँ कहल गेलन्हि जे या तँ ओ जगदीश प्रसाद मंडलक कथा नै पढने छथि वा बिसरि गेल छथि। जँ चुन्नू जी जगदीश मंडल जीक कथामे अबैत गामक चिंताक बाटे हीरेन्द्र जीक गामक चिन्ता देखथि तँ ओ आरो नीक जकाँ आलोचना कऽ सकै छलाह। हमर ऐ बात पर आयोजकक एकटा परम ब्राम्हणवादी सदस्य कहलाह जे अहाँ जगदीश मंडल जीक कथाक उदाहरण दिअ हम देबए लेल तैयार छलहुँ मुदा संचालक ओइ ब्राम्हणवादी सदस्यकेँ बतकुट्टौलि करबासँ रोकि देलन्हि। ऐ सत्रक आन आलोचक सभ प्रदीप बिहारी, अविनाश, रमण कुमार सिंह आदि छलाह। पाँचम सत्रमे दीनबंधु जीक कथा "अपराधी", विनयमोहन जगदीश जी "संकल्पक बल" आ आशीष अनचिन्हारक "काटल कथा" पढ़ल गेल।आशीष अनचिन्हारक कथा पर चुन्नू जी कहलाह जे शिल्प क तौर पर ई असफल कथा अछि संगे संग कोन बात कतए छै से स्पष्ट नै छै। पाठक कन्फ्यूज्ड भऽ जाइत छथि। ऐबातकेँ आर बिस्तार दैत कमलेश किशोर झा कहलखिन्ह जे ऐ कथामे सेन्ट्रल प्वांइट केर अभाव छै। मुकेश झा कहलखिन्ह जे अनचिन्हार जीकेँ कोनो डाक्टर नै कहने छथिन्ह जे अहाँ कथा लीखू। तेनाहिते आशीष झा( पति कुमुद सिंह) कहलखिन्ह जे हमरा आधा बुझाएल आधा नै बुझाएल ई कथा छल की रिपोर्ट से नै पता। विनयमोहन जगदीश जी पर चुन्नु जी कहलखिन्ह जे कथामे नमार बेसी छै। ई लोकनि दीनबंधु जीक कथाक सेहो आलोचना केलन्हि मुदा चलंत स्टाइलमे। छठम सत्रमे काश्यप कमल जीक दीर्घकथा- भोट, कमलेश किशोर झाक -गुदरिया पढल गेल। लिस्टमे तँ कौशल झाक न्याय नामक कथा सेहो छल मुदा पढ़बा काल धरि ओ स्थल पर नै छलाह। भोट कथा पर मुन्ना जीक कहब छलन्हि जे हँसीसँ सूतल लोककेँ जगा देलक ई कथा। कमलेश जीक कथा सेहो नीक छल मुदा वएह चलंत आलोचना। सातम सत्रमे अशोक कुमार मेहता-"बाइट", कमलकांत झा -"विद्दति" आ महेन्द्र मलंगिया जीक कथा- लंच (वाचन प्रकाश झा) आएल। हीरेन्द्र झा मेहता जीक कथाकेँ कमजोर गढ़निक मानलन्हि। कमलकांत जीक कथाकेँ सुन्दर वर्णनात्मक खास कऽ बस बला प्रसंग केँ नीक कहलखिन्ह। मलंगिया जीक कथाकेँ नीक तँ कहलखिन्ह मुदा इहो कहलखिन्ह जे अंत एकर कमजोर छै। चुन्नू जी बाइट कथाक गढ़निकेँ कमजोर मानलन्हि आ कमलकांत आ मलंगिया जीक कथाकेँ अपराधिक पृष्ठभूमि बला मानलन्हि। आठम सत्र अध्यक्षीय भाषण आ हुनक शीर्षक हीन मौखिक कथासँ समाप्त भेल। एतेक भेलाकेँ बाद अगिला सगर राति ( के जानए जे फेर कथा गोष्ठी)क संयोजक केर खोज शुरू भेल। पहिल प्रस्ताव अरविन्द ठाकुर सुपौल लेल देलखिन्ह आ दोसर विभारानी चेन्नै लेल। आ तेसर प्रस्ताव दिल्लीसँ भवेश नंदन जीक छलन्हि। सभसँ राय पूछल गलै। बहुत गोटेँ चेन्नैक पक्षमे एलाह। अंततः ७६म "सगर राति दीप जरय"क विभारानीकेँ रूपमे एकटा महिला संयोजक सगर रातिके भेटल| २ प्रियंका झा सगर राति दीप जरय पर साहित्य अकादेमीक कब्जा/ सरकारी पाइपर भेल बभनभोज/ साहित्य अकादेमीक कथा रवीन्द्र दिल्लीमे समाप्त- रवीन्द्रक कथापर कोनो चर्चा नै भेल- ७६म सगरराति दीप जरय चेन्नैमे विभारानी लऽ गेली (स्रोत: समदिया) -साहित्य अकादेमीक कथा रवीन्द्र दिल्लीमे समाप्त -रवीन्द्रक कथापर कोनो चर्चा नै भेल -रवीन्द्रनाथ टैगोरक१५०म जयन्तीपर साहित्य अकादेमीसँ फण्ड लेबा लेल मात्र नाम "कथा रवीन्द्र" राखल गेल -समाप्ति कालमे संयोजककेँ गलतीक भान भेलन्हि, तखन रवीन्द्रनाथ टैगोरक एकटा कविताक दू पाँतीक हिन्दी अनुवाद देवशंकर नवीन पढ़लन्हि -मात्र १८ टा कथाक पाठ भेल -७६म सगरराति दीप जरय चेन्नैमे विभारानी लऽ गेली, ओना ई ७७म आयोजन होइतए मुदा किएक तँ साहित्य अकादेमीक फण्डसँ संचालित कथा रवीन्द्र प्रभास कुमार चौधरीक शुरु कएल "सगर राति दीप जरय" क भावनाक अपमान कऽ साहित्य अकादेमीक खिलौना बनि गेल तेँ एकरा "सगर राति दीप जरय"क मान्यता नै देल जा सकल। -एकटा मैथिली न्यूज पोर्टलक महिला संचालकक पति दारू पीबि कऽ आएल रहथि आ भोजनकालोमे हुनकर मुँह भभकैत छलन्हि। ७५म सगर राति दीप जरयमे दारू पीबापर धनाकर ठाकुर जीक विरोधक बाद कथा रवीन्द्र मे सेहो ऐ तरहक घटना भेलापर साहित्य जगतमे आक्रोश अछि। -भोजनक उपरान्त कथास्थल खाली भऽ गेल आ अधिकांश वरिष्ठ कथाकार सूतल देखल गेलाह, प्रभास कुमार चौधरीक कथा लेल भरि रातिक जगरना एकटा मखौल बनि कऽ रहि गेल। -आयोजक स्वयं ऐ गोष्ठीकेँ बभनभोजक संज्ञा देने रहथि आ अन्ततः सएह सिद्ध भेल। -ई गोष्ठी सगर राति दीप जरयक अन्त आ साहित्य अकादेमीक गोष्ठीक प्रारम्भ रूपमे देखल जा रहल अछि। "सगर राति दीप जरय" आब साहित्य अकादेमी संपोषित भऽ गेल आ ओकर इशारापर हिन्दीक लोकक कब्जा भऽ गेल, जइमे हिन्दीक पोथीक लोकार्पणसँ लऽ कऽ रवीन्द्रक कविताक हिन्दी अनुवादक दू पाँतीक पाठ धरि सम्मिलित रहल। -टी.ए., डी.ए. आदिक परम्पराक घृणित आरम्भ साहित्य अकादेमीक फण्डसँ भेल, आ ऐसँ सगर राति दीप जरयक अन्तक प्रारम्भ मानल जा रहल अछि। मुदा साहित्य अकादेमी द्वारा संपोषित कवि-सम्मेलन आ सेमीनारमे टी.ए., डी.ए. सभ कवि निबन्धकारकेँ देल जाइ छन्हि मुदा एतऽ किछुए गोटेकेँ ई सौभाग्य प्राप्त भेल। -टी.ए., डी.ए. लेल विभारानीपर सेहो जोर देल गेल मुदा ओ कहलन्हि जे हुनकर आयोजन व्यक्तिगत रहतन्हि तेँ टी.ए., डी.ए. देब हुनका लेल सम्भव नै, जँ कथाकार लोकनि चेन्नै बिना टी.ए. डी.ए. लेने नै जेता तँ ओ ऐ कार्यक्रमकेँ करबा लेल इच्छुक नै छथि। अजित आजाद कहलन्हि जे हुनका टी.ए., डी.ए.भेटतन्हि तखन ओ जेता। कमल मोहन चुन्नू अजित आजादक समर्थन केलन्हि। मुदा टी.ए., डी.ए. आदिक परम्पराक घृणित आरम्भक विरोध आशीष अनचिन्हार केलन्हि तखन जा कऽ मामिला सुलझल। -विदेह मैथिली पोथी प्रदर्शनीक सभ मैथिली कथा गोष्ठी, सेमीनारमे होइ छल मुदा साहित्य अकादेमीक फण्डिंगक शुरुआतक बाद "कथा रवीन्द्र"मे विदेह मैथिली पोथी प्रदर्शनीक अनुमति नै देबाक पाछाँ फण्ड देनिहार साहित्य अकादेमीक सुविधाजनक दबाब भऽ सकैए, से साहित्यकार लोकनिक बीचमे चर्चा अछि। [-साहित्य अकादेमीक कथा गोष्ठी दिल्लीमे शुरू भेल/ १२ टा पोथीक लोकार्पण भेल जइमे ४ टा हिन्दीक पोथी छल !! -कथा रवीन्द्र क रूपमे साहित्य अकादेमी द्वारा मैथिली कथा गोष्ठीक आरम्भ, संयोजक अछि मैलोरंग, देवशंकर नवीन आ प्रकाश - मैलोरंग एकरा ७६म "सगर राति दीप जरय"क रूपमे आयोजित करबाक नियार केने छल मुदा "सगर राति दीप जरय" मे आइ धरि सरकारी साहित्यिक संस्थासँ फण्ड लेबाक कोनो प्रावधान नै रहै, से ई ७६म "सगर राति दीप जरय"क रूपमे मान्यता नै प्राप्त कऽ सकल। -साहित्य अकादेमी द्वारा मैथिलीक ऐ स्वायत्त गोष्ठीकेँ तोड़बाक प्रयासक साहित्य जगतमे भर्त्सना कएल जा रहल अछि। -आशीष चौधरी विदेह मैथिली पोथी प्रदर्शनी लेल पोथी जखन पसारऽ लगलाह तँ साहित्य अकादेमीक कथा गोष्ठीक (कन्फूजन छल जे ई ७६म "सगर राति दीप जरय"क आयोजन स्थल छी जे एतऽ एलाक बाद पता लागल जे ई साहित्य अकादेमीक कथा गोष्ठीक रूपमे हैक कऽ लेल गेल अछि।) एकटा संयोजक प्रकाश झा तकर अनुमति नै देलखिन्ह, जखन कि एकर सूचना दोसर संयोजक देवशंकर नवीनकेँ दऽ देल गेल छल। प्रकाश झा आशीष चौधरीकेँ कहलखिन्ह जे जँ मंगनीमे पोथी बाँटी तँ तकर अनुमति देल जा सकैए, मुदा तकर कोनो सम्भावनासँ आशीष चौधरी मना केलन्हि । तकर बाद आशीष चौधरी विदेहक सम्पादक गजेन्द्र ठाकुरक संग अपन पोथी लऽ कऽ ओतऽ सँ बहरा गेलाह। ऐ कारणसँ किछु मैथिली पोथीक लोकार्पण नै भेल (जे ओना ७६म "सगर राति दीप जरय"मे लोकार्पण लेल आएल छल साहित्य अकादेमीक कथा गोष्ठी लेल नै।) । ई पहिल बेर अछि जखन कोनो मैथिली गोष्ठीमे मैथिली पोथी बेचबाक अनुमति नै देल गेल, हँ कन्नारोहट होइत रहैए जे मैथिलीमे पोथी नै बिकाइए। साहित्य जगतमे ऐ तरहक जातिवादी गोष्ठी द्वारा कएल जा रहल सरकारी फण्डक मैथिलीक नामपर दुरुपयोगपर चिन्ता व्यक्त कएल जा रहल अछि। -गजेन्द्र ठाकुर फेसबुकपर लिखलन्हि- जगदीश प्रसाद मण्डल, बेचन ठाकुर, कपिलेश्वर राउत, राजदेव मण्डल, उमेश पासवान, अच्छेलालशास्त्री, दुर्गानन्द मण्डल आदि श्रेष्ठ कथाकार लोकनिकेँ एकटा पोस्टकार्डो नै देबाक आयोजन मण्डलक निर्णय अद्भुत अछि, ओना तै सँ ऐ लेखक सभक स्टेचरपर कोनो फर्क नै पड़तन्हि। भऽ सकैए ७५म गोष्ठीक आयोजक अशोक आ कमलमोहन चुन्नू वर्तमान आयोजककेँ हुनकर सभक पता सायास वा अनायास नै देने हेथिन्ह आ वर्तमान आयोजक केँ से सुविधाजनक लागल हेतन्हि। जगदीश प्रसाद मण्डलजीक आयोजनमे सभ धोआधोतीधारी आ चन्दन टीका पाग धारी भोज खा आएल छथि, मुदा बजेबा कालमे अपन आयोजनकेँ बभनभोज बनेबापर बिर्त छथि।..ओना ई आयोजन साहित्य अकादेमीक फण्डसँ आयोजित भऽ रहल अछि आ एकरा साहित्य अकादेमीक कथा गोष्ठी मात्र मानल जाए। मैथिली साहित्यक इतिहासमे ७६ म सगर राति दीप जरयक रूपमे ऐ जातिवादी गोष्ठीकेँ मान्यता नै देल जा सकत। साहित्य अकादेमीक मैथिली विभागक जातिवादी चेहरा एक बेर फेर सोझाँ आएल अछि जखन ओ मैथिलीक एकमात्र स्वायत्त गोष्ठीकेँ तोड़ि देलक। पवन कुमार साह लिखलन्हि-काल्हि धरि सगर रातिक आयोजक कोनो संस्था नै होइ छल। मुदा आब ई वंधन टूटि गेल। -साहित्य अकादेमीक कथा गोष्ठीक पहिल सत्रमे विभूति आनन्द (छाहरि), मेनका मल्लिक (मलहम) आ प्रवीण भारद्वाजक (पुरुखारख) कथाक पाठ भेल। -साहित्य अकादेमीक कथा गोष्ठी अध्यक्षता गंगेश गुंजन कऽ रहल छथि। -कथापर समीक्षा अशोक मेहता आ रमानन्द झा रमण केलन्हि। अशोक मेहता कहलन्हि जे विभूति आनन्दक कथामे किछु शब्दक प्रयोग खटकल। मेनका मल्लिकक भाषाक सन्दर्भमे ओ कहलन्हि जे एतेक दिनसँ बेगूसरायमे रहलाक बादो हुनकर भाषा अखनो दरभंगा, मधुबनीयेक अछि। प्रवीण भारद्वाजक कथाक सन्दर्भमे ओ कहलन्हि जे कथाकार नव छथि से तै हिसाबे हुनकर कथा नीक छन्हि। -रमानन्द झा रमण विभूति आनन्दक कथामे हिन्दी शब्दक बाहुल्यपर चिन्ता व्यक्त केलन्हि। मेनका मल्लिकक कथाक सन्दर्भमे ओ कहलन्हि जे महिला लेखन आगाँ बढ़ल अछि। प्रवीण भारद्वाजक कथाक भाषाकेँ ओ नैबन्धिक कहलन्हि आ आशा केलन्हि जे आगाँ जा कऽ हुनकर भाषा ठीक भऽ जेतन्हि। -तकर बाद श्रोताक बेर आएल, सौम्या झा विभूति आनन्दक कथाकेँ अपूर्ण कहलन्हि, मुदा हुनका ई कथा नीक लगलन्हि। आशीष अनचिन्हार विभूति आनन्दसँ हुनकर कथाक एकटा टेक्निकल शब्द "अभद्र मिस कॉल"क अर्थ पुछलन्हि तँ देवशंकर नवीन राजकमलक कोनो कथाक असन्दर्भित तथ्यपर २० मिनट धरि विभूति आनन्द जीक बचाव करैत रहला, अनन्तः विभूति आनन्द श्रोताक प्रश्नक उत्तर नै देलन्हि। -दोसर सत्रमे विभा रानीक कथा सपनकेँ नै भरमाउ, विनीत उत्पलक कथा निमंत्रण, आ दुखमोचन झाक छुटैत संस्कारक पाठ भेल। विभा रानीक कथा पर समीक्षा करैत मलंगिया एकरा बोल्ड कथा कहलन्हि, सारंगकुमार कथोपकथनकेँ छोट करबा लेल कहलन्हि, कमल कान्त झा एकरा अस्वभाविक कथा कहलन्हि आ कहलन्हि जे माए बेटाक अवहेलना नै कऽ सकैए, मुदा श्रीधरम कहलन्हि जे जँ बेटाक चरित्र बदलतै तँ मायोक चरित्र बदलतै। कमल मोहन चुन्नू कहलन्हि जे ई कथा घरबाहर मे प्रकाशित अछि। आयोजक कहलन्हि जे विभा रानीक कथा सपनकेँ नै भरमाउ केँ ऐ गोष्ठीसँ बाहर कएल जा रहल अछि। विनीत उत्पलक कथा निमंत्रण पर मलंगिया जीक विचार छल जे ई उमेरक हिसाबे प्रेमकथा अछि। सारंग कुमार एकरा महानगरीय कथा कहलन्हि मुदा एकर गढ़निकेँ मजगूत करबाक आवश्यकता अछि, कहलन्हि। श्रीधरम ऐ कथामे लेखकीय इमानदारी देखलन्हि मुदा एकर पुनर्लेखनक आवश्यकतापर जोर देलन्हि। हीरेन्द्रकेँ ई कथा गुलशन नन्दाक कथा मोन पाड़लकन्हि मुदा प्रदीप बिहारी हीरेन्द्रक गपसँ सहमत नै रहथि। ओ एकरा आइ काल्हिक खाढ़ीक कथा कहलन्हि।दुखमोचन झाक छुटैत संस्कारपर मलंगिया जी किछु नै बजला, ओ कहलन्हि जे ओ ई कथा नै सुनलन्हि। सारंग कुमार एकरा रेखाचित्र कहलन्हि। कमलकान्त झाकेँ ई संस्कारी कथा लगलन्हि। श्रीधरमकेँ आरम्भ नीक आ अन्त खराप लगलन्हि। शुभेन्दु शेखरकेँ जेनेरेशन गैप सन लगलन्हि आ कमल मोहन चुन्नूकेँ ई यात्रा वृत्तान्त लगलन्हि। दोसर सत्रमे श्रोताक सहभागिता शून्य रहल।..आशीष अनचिन्हार] ३ सुमित आनन्द सोसाइटी टुडेक लोकार्पण अर्द्धवार्षिक द्विलिपि संयुक्त ‘सोसाइटी टुडे’क लोकार्पण ल. ना. मिथिला विश्वविद्यालय जुबली हॉलमे यू. सी. प्रायोजित समाज शास्त्रक राष्ट्रीय संगोष्ठीमे दि. 25.03.2012 केँ भेल। लोकार्पणकर्ता छलाह उक्त विश्वविद्यालयक माननीय कुलपति डॉ. समरेन्द्र प्रताप सिंह जखनकि अध्यक्षता कयलनि प्रतिकुलपति डॉ. ध्रुव कुमार। शोध्-पत्रिका हाथमे नेने अन्य विशिष्ट विद्वान जे गदगद मुद्राामे मंच पर उपस्थित छलाह से उक्त विश्वविद्यालयक कुलसचिव डॉ. विजय प्रसाद सिंह, एफ. ए. डॉ. सी. आर. डीगवाल, समाजशास्त्राी डॉ. के. एल. शर्मा, डॉ. हेतुकर झा, सी. एस. एस. ठाकुर, विधान पार्षद डॉ. विनोद कुमार चौधरी, वि.वि. समाजशास्त्र विभागाध्यक्ष डॉ. विद्यानन्द झा डॉ. विश्वनाथ झा, सुमित आनन्द आदि। सभाकेँ सम्बोध्ति करैत एहि शोध् पत्रिकाक एडीटर एवं प्रख्यात समाजशास्त्री डॉ. विश्वनाथ झा, प्राचार्य एवं अध्यक्ष, समाजशास्त्र विभाग, सी. एम. कॉलेज, दरभंगा, मंचपर उपस्थित एहि शोध् पत्रिकाक मैनेजिंग एडिटर श्री सुमित आनन्द केँ धन्यवाद दैत बजलाह जे एकर प्रकाशनक पूर्ण श्रेय एही प्रतिभावान कर्मठ युवक केँ छनि जनिक सत्प्रयाससँ ई अंक रजिस्ट्रेशन नम्बरक संग प्रकाशित भए सकल। कार्यक्रमक शुभारम्भ ‘जय-जय भैरवि’ सँ भेल जखनकि, कार्यक्रमक संचालन पुतुल सिंह कयलनि। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। १.जगदीश प्रसाद मण्डलक कथा-फागु २.अतुलेश्वर- मातृभाषा दिवस क बहन्ने १. जगदीश प्रसाद मण्डलक कथा- फागु कौआ डकैसँ पहिने कतौ-कतौ गाछपर परुकिक बोल फूटल कि रघुनी बाबाक नीन टुटलनि। जहिना अर्द्ध-चेत अवस्थामे किछु बजा जाइत तहिना मुँहसँ निकललनि- “आइ फगुआ छी। राति भरिक हँसैत चान सुर्जक लालिमा धरि अरिआति आबि चुकल अछि। कते सुन्नर राति-दिनक संग मिलि रहल अछि। जे जीबए से खेलए फागु” बजैत-बजैत चेतना चेत गेलनि। चेतते मन दोहरौलकनि- “जे जीबए से खेलए फागु।” मुदा जीवित-मृत्युक बीच एहेन लट्टा-पट्टी अछि जे के मरल के जीबैए, बिलगाएब कठिन अछि। कियो जीवित-मृत्यु बुझबे ने करैत तँ कियो बुझितो मानबे नै करैत। कियो जँ बुझबो करैत तँ काते हटौने रहैत। शिवजीक सीमा खिंचब कठिन अछि। पौह फटिते जहिना सुर्जक आगमन हुअए लगैत तहिना रघुनी बाबाक अलिसाएल मन जिनगी दिसि नजरि उठौलकनि। जहिना कोनो िवद्यार्थीक पहिल कलम कोनो प्रश्नमे अॅटकि जाइत तहिना रघुनी बाबाक मन अॅटकि गेलनि। ओछाइनपर पड़ले-पड़ल कर (करोट) घुमलाह। मनमे उठलनि, अनाड़ियो-धुनाड़ियो कोदारिसँ परती खेत तामि लइए। कहाँ ओकरा हर जकाँ लूरि सिखए पड़ै छै। मुदा बिना लूरिये तँ कोदारियो नै पारल जा सकैए। अँटकल मनमे उठलनि, किछु लूरि देखियो कऽ भऽ जाइत, किछु हाथ पकड़ि सिखाओल जाइत आ किछु रगड़ि-रगड़ि कऽ सिखए पड़ैत छै। ठमकलाह। पुन: मोनमे उठलनि, जहिना पानि माटिक ऊपर छिछलि धारा बनि आगू बढ़ैत, तहिना तँ सुर्जोक किरिण छिछलैत पूबसँ पछिम चलैत अछि। अॅटकै कहाँ अछि। हँ अॅटकैए। खाधिमे पानि अॅटकैए, तामल खेतक गोलामे सुर्जक किरिण अॅटकैए। मोनमे संचार भेलनि। दिनक सगुन उचाड़ए लगलाह। फगुआक दिन छी। फागुनक विदाइ सेहो छी। आइये रातिमे चैतक आगमन सेहो हएत। मोन मधुएलनि। पावनिक दिन छी। वसन्ती पावनि। पुआ-मलपुआ खाएब, रंग-अबीर खेलब, होलीक संग विरहा वसन्त, ढोल-डम्फाक संग गेबो करब आ नचबो करब। मोन पसीज गेलनि। “एक दिनक भोजे की आ एक दिनक राजे की।” ठमकल मोन पाछू बढ़लनि। वसन्तक मध्य, होली पावनि। माघक इजोरिया पंचमी होलीसँ एक मास बीस दिन पूर्व वसन्तक जन्म भेल। मुदा चैत-बैशाखकेँ वसन्त मानने तँ पूर्व पक्षे हेरा जाइत अछि। जँ मध्य मानब तैयो पचास-साठिक दूरी बनि जाइत अछि। ओझराएल मोन मुड़छि कऽ तुड़ुछि गेलनि। भने दस बर्खसँ होली मनाएबे छोड़ि देने छी। लऽ दऽ कऽ भाजने टा शेष बचैए। सेहो दिनेक फल छी। मुदा फलो तँ कअए तरहक होइए- मिठो होइए, खट्टो होइए आ षट-मधुर सेहो होइए। तीनू संगो रहैए आ अलगो-अलगो रहैए। जामंतो प्रकारक भोजनमे तीनूक अपन-अपन महत छै। भोजमे जएह अचार अपन विशेष मतह बनौने अछि, वएह असगरमे दाँतकेँ कोतिया कात कऽ दैत अछि। जे काज करैसँ हनछिन करए लगैए। मोनकेँ घुमिते उपकलनि, वसन्तक आगमनक दिन। आइये सरस्वती पूजा सेहो छी आ हरबाह गृहस्तक हर परतीपर ठाढ़ करत। ठाढ़े नै करत अढ़ाइ मोड़ घुमबो करत। अढ़ाइये मोड़क बोइनियो तहिना। सभ परानी खेबो करत आ जते धानसँ हरक नाश डुमतै तते लैयो जाएत। पसारी भाथीक आगिमे धान-मरूआ लाबा फोड़ि सालक समए गुनत। मुदा सेहो होइ कहाँ छै? हेबो केना करतै, गाए-महिसिक मास एक्कैस-बाइस दिनक होइ छै आ मनुक्खक भऽ जाइ छै तीस दिनक। जहन कि दुनू संगे रहैए। संगे लक्ष्मी बनैए, संगे ऐरावत। रघुनी बाबाक मोनमे उठलनि- अनेरे कोन फेड़मे पड़ै छी। पावनिक दिन छी हँसी-खुशीसँ उठब खाएब-पीब मौज-मस्ती करब। जे गति सबहक से गति हमरो। तइले अनेरे एते मगज-मारी करैक कोन जरूरति। राम-श्याम करैत रघुनी बाबा ओछाइनसँ उठैक विचार केलनि। तखने गाम दिसिसँ पीह-पाहक अवाज कानमे पड़लनि। भोरहरबा नढ़ियाक अवाज जकाँ अकानए लगलाह जे कि कहै छै। रघुनी बाबाक मोनमे उठलनि, ओह, अनेरे पावनि छोड़लौं। जाबे जिबै छी ताबेए ने। मरि जाएब तँ के देखत आ ककरो देखब। मोनमे फेरि उपकलनि, किअए नै पावनि छोड़ी? जइ होली पावनिक नाओंपर इज्जत-आबरूक, धन-सम्पतिक लूट हुअए ओ पावनि किअए करब। मुदा भुताहि गाछ बूझि कियो आमक गाछ तर जाएब छोड़ि देत तँ आम केना खाएत? जामुनपर सहजहि जम बैसलै अछि। बेल फड़नहि कौआकेँ की? खैर जानह जओ जानह जाँत। गामक बात गौआँ जानह। मुदा परिवार तँ अपन छी। परिवारक नीक-बेजाएक तँ जबाब दिअए पड़त। मुँहो चोरा कऽ रहब नीक नै। कते दिन जीबे करब। आइसँ फेरि फगुआ खेलब। मुदा खेलब कतए? परिवारक संग खेलब...। रघुनी बाबाक मोन नीक जकाँ असथिरो नै भेल छलनि आकि दादी आबि टोकलकनि- “सौंसे गामक लोक हर-बिर्ड़ो करैए आ अहाँले भोरो ने भेल। आबो उठब कि सूतले रहब?” जहिना नोनगर बिस्कुट खेलापर चाह पीबैक मोन होइत तहिना रघुनी बाबाब मोन भेलनि। घोकचल भौंहुक बीचक करिया तीर तनैत बजलाह- “जखन अहाँ आबिये गेलौं तखन किअए ने गाछक जड़ियेमे पानि ढारी जे डारि-पात सगतरि पहुँचतै। अहीं संग फगुआ खेलब।” बाबाक बात दादीक हृदैकेँ बेधि देलकनि। छटपटाइत उत्तर देलखिन- “अखन जे तीस-पेंइतीस गोरेक फुलवाड़ी लगल अछि ओ केकर छिऐ? जहिना कृष्ण वृन्दावनमे फागु खेलाइत छलाह तइसँ कि कम हमर अछि।” मुस्की दैत रघुनी बाबा कहलखिन- “अखनो धरि मोनमे बेइमानी अछिये जे अपन कहलिऐ आ हमर छोड़ि देलिऐ?” अड़हुलक कली सदृश तीर साधि दादी दगलनि- “अहाँकेँ आन बुझै छी जे फुटा कऽ कहितौं।” “अच्छा छोड़ू ऐ सभकेँ। परिवारमे सभकेँ कहि दियौ जे दुपहर तक सभ कियो नहा-खा तैयार भऽ जाए। बेरू पहर दुनू गोरे केना जुआनी बितेलौं से सौंसे परिवारकेँ सुना देबै।” बाबाक बात सुनिते दादीक आँखि मधुआ गेलनि। बजलीह- “आबक लोककेँ निमहतै। मन अछि कि नै जे दुरागमनक तेसरे दिन पटुआ काटए पू-भर गेल रही।। ऐठाम रौदी भऽ गेल रहै आ डेढ़ बख्रक पछाति आएल रही।” दादीक बात सुनिते रघुनी बाबा उठि कऽ बैसैत बजलाह- “अझुका लोकक मने बदलि गेल अछि। जेकर देखा-देखीसँ बालो-बच्चा प्रभावित भऽ रहल अछि।” बजैत-बजैत जहिना दादी-दुनियाँ बिसरि गेली तहिना सुनैत-सुनैत कथा-वक्ता-श्रोता जकाँ रघुनी बाबा जिनगीक बोनमे बोना गेला। एक मन औनाए लगलनि तँ दोसर मन गाबए लगलनि- “सदा आनन्द रहे अही दुआरे मोहन खेलै होरी हो।” दादी दरबज्जासँ आंगन दिसि गुनगुनाइत बढ़लीह- “कियो लुटाबए अपन महिमा।” जुआनीक रंगमे रंगि रघुनी बाबा गाम दिसि विदा भेला। दरबज्जाक बाट टपि गामक बाटपर पहुँचते मोनमे उठलनि- देखा चाही, कत्ते नवतुरिया सभ देहपर रंग फेकैए आ कत्ते जुआन-जहान अकाससँ अबीर उड़बैए। मुदा लगले मोनमे उठि गेलनि, लोको लाज तँ छी। धिया-पुता केना रंग देत? किअए ने देत, खेलाएत तँ अपनामे, मुदा छिच्चा उड़ि जे पड़त आेकरा कि कहबै। एका-एकी दादी परिवारक सभकेँ अपने मुँहेँ कहलनि। बाबाक समाद दादी भरि मोन बॅटलनि। नीक-बेजाए दुनूक समीक्षा हुअए लगल। अन्त-अन्त यएह सभ बुझलक जे कहियो ने से पावनि दिन। बूढ़-पुरानक हुकुम छियनि, तँए यादि स्वरुप सुनि लेब नीके हएत। के कहलक अगिला होली देखता आकि नै। जँ देखबो करताह तँ के कहलक जे पाँखि तोड़ि कऽ देखताह आकि ओछाइन धेने देखताह तेकर कोन ठेकान। मुदा ईहो बात मोने-मोन उठैत जे वएह देखताह हमहीं नै देखिऐ। कमसँ कम तँ ई हएत किने जे सौंसे परिवार एकठाम बैसि पवनिक दिन बिताएब। दादीकेँ पोती कहियो देलकनि जे आइ भानसो तोरे करऽ पड़तौं। समैसँ किछु पहिनहि परिवारक सभ कियो दरबज्जापर पहुँचल। बाबा-दादीक बात तँए महादेव-पार्वतीक फागु सबहक मोनमे घुमैत सबहक मुँह बन्न। सभ बाबा-दादीक बात सुनैले कान पाथि नजरि अॅटकौने। रघुनी बाबाक मोनमे उठलनि जे तिल-तण्डुल जँ फेंटा जाए तँ बिलगाएल जा सकैए मुदा जौं पानि-माटि फेंटा जाएत तखन केना बिलगाओल जाएत। तीन खाड़ी बीच परिवार अछि। सबहक अपन-अपन स्तर अछि, अपन-अपन जिनगी अछि। जिनगियेमे खुशियो अबैत जाइत रहैत अछि। मुदा जहिना लोक अपना नीक लेल सभ किछु करैए तहिना ने परिवारो लेल करैए। भलहिं परिवार पैघसँ छोटे किअए ने भऽ गेल हुअए। फगुआ दिनक उमकीमे मोन उमकि गेलनि। जहिना बर्खा पानिमे धिया-पुता उमकैए तहिना बबो-दादीक मोन उमकए लगलनि। दादीकेँ बाबा टीप देलखिन- “जइ साल दुरागमन भेल रहए आ परदेश गेल रही, से मोन अछि आ कि बिसरि गेलौं?” बाबाक प्रश्नक उत्तर दादी केना नै देथिन। बाबाक ने रोच (धाख) मुदा परिवारक तँ गारजने। निचलासँ ऊपर छिहे। सिनेमा कलाकार जकाँ दादी पोजमे बजलीह- “लोक सुख बिसरि जाइ छै, दुख मोने रहै छै। किअए ने मोन रहत।” दादीक पोज देखि छोटकी पर-पुतोहु अपन हालक दुरागमन बूझि बाबाक प्रश्नपर जोर देलक। पुतोहुक टॉट बोली सुनि दादीक मोनमे उठलनि जे मुँहजोर पुतोहु अछि एकटा उत्तर देबै तँ दोसर दोहरा देत। मुँह नोचि कऽ खा जाएत। तइसँ नीक जे अपने मुँहे कहए दियनि। दादीकेँ हारि मानैत बूझि रघुनी बाबा लपकि प्रश्न पकड़ि बाजए लगलाह- “कनियाँ, नव-कबरिये रही। मोछ-दाढ़ीक पम्ह अबिते रहए। तीन सालसँ परदेश खटैत रही। जेठ मास दुरागमन भेले रहए। दुरागमनक तेसरे दिन मेड़िया सभ पू-भर जेबाक समए बनौलक। अपनो घरमे चूड़ा-भुसबा रहबे करए बटखरचा लऽ लेलौं। भाड़ा-भुड़ी ले गोरलगाइबला रूपैया रहबे करए। तेसरा दिन चलि गेलौं।” जिज्ञासा करैत पुतोहु पुछलकनि- “पएरे गेलखिन आ कि गाड़ी-सवारीसँ।” जना गुड़ घावसँ पीज निकलै काल सुआस पड़ै छै तहिना बाबाक मोनमे सेहो भेलनि। विह्वल होइत बजलाह- “कनियाँ, निरमली तक रेलगाड़ीसँ गेलौं। तेकर बाद पूब दिसक रस्ता धेने कोसी घाटपर पहुँचलौं।” “धार केना टपलखिन?” “कनियाँ, जेठुआ समए रहै। धारक पेट खाली भऽ गेल रहै मुदा तैयो अगम पानि तँ रहबे करै। ओना फुलाइक समए भऽ गेल रहै मुदा फुलाएल नै रहै। बेसी नाव भदबरियामे डुमै। एकबेर एहिना भेल जे अपने गौआँक मेड़िया घुमैकाल डूमि गेलै।” उत्सुक होइत पुतोहु पुछलकनि- “कते गोरे रहथि?” “तेरह-चौदह गोरे अपना गामक रहथि आर गोटे आन-आन गामक। चालिस-पेंइतालिस गोरे नावपर चढ़ल रहथि।” “कते दिन पू-भर कमाइ ले गेलखिन?” मोन पाड़ैत रघुनी बाबा बजलाह- “तेकर ठेकान अछि। मुदा तैयो बीस-पच्चीस बर्ख तँ गेलै हएब।” “कअए दिने पहुँचै छेलखिन?” “आइ बोर तीनिये दिनमे रंगैली पहुँचि गेलौं। बजारसँ थोड़बे हटि कऽ पकड़ा गेल। चिन्हरबे गिरहत रहए।” “जौं ओइठीम काज नै पकड़ैतनि तखन कि करितथिन?” पुतोहुक प्रश्न सुनि रघुनी बाबाक जुआनी मोनमे उठलनि। जोशमे बजलाह- “की करितिऐ! कोनो कि ओतबे देखल-सुनल रहए। मोरंगमे नै काज भेटितए तँ आगू बढ़ि जैतिऐ। सिलीगुड़ी असाम, ढाका तक ठेका दैतिऐ। मुदा काज केने बिना नै अबितिऐ।” “कोन काज करै छेलखिन?” काजक नाओं सुनि बाबाक मोन बौरा गेलनि। बजलाह- “कनियाँ, काजक कोनो ठेकान अछि। गिरहस्तौआ सभ काजक लूरि अछि। ओना धन रोपनी-कटनी आ पटुआ कटैले जाइ छलौं।” “कते दिन रहै छेलखिन?” “सालमे दू-बेर जाइ छलौं। घुमा-फिरा कऽ छओ मास लगि जाइ छलए। धन कटनीमे तँ एक-लगना काज रहै छलए। मुदा पटुआ समैमे काज छिड़िया जाइ छलए।” मुँहपर एकटा आंगुर लैत पुतोहु पुछलकनि- “एक-लगना काज केकरा कहै छथिन?” पुतोहुक प्रश्न सुनि रघुनी बाबाक गुरुमन जागि उठलनि। नजरिपर नजरि दैत कहए लगलखिन- “एक-लगना काज ओ भेल जे क्रमबद्घ चलैए। एकक बाद एक काज अबैए। जेना भानस करै काल चुल्हि पजारि बरतन चढ़बै छी। अदहन दइ छिऐ। पानि गरम होइए तखन सिदहा लगबै छी। यएह क्रम एक-गलना भेल। मुदा जखन रोटियो पकाएब रहत, तरकारियो बनाएब रहत आ भातो रान्हब रहत तखन ओ काज छिड़िया जाएत। छिड़िआएल काजमे अधिक भनसियो आ चुल्हियोक जरूरति पड़ि जाइ छै। नै जँ भनसिया असगरुआ रहल तँ छिगड़ी तानमे पड़ि गेल।” “एक-लगना काज केना करै छेलखिन?” “पटुऐक कही छी। पहिने ओकरा कटलौं। काटि कऽ जमा कऽ देलिऐ। ती-चारि दिनमे पत्ता झड़ि जाइ छलै। तखन ओकरा अॅटियाहा बोझ बनबै छलौं। पानि ठेकिना उघि कऽ लऽ जाइ छलौं। पानिमे बाँसक खुट्टी पाटि कऽ, तीन-चारि छल्ली लगा दइ छेलौं एक-दोसराकेँ दबबो केलक आ ऊपरसँ माटिक चेका चढ़ा दइ छलौं। पानिक तरमे सभ डुमि जाइ छलै। गोरलाक बीस-पच्चीस दिनमे सीझ जाइ छलै। तखन ओकरा मुंगरीसँ झाड़ि-झाड़ि साफ करै छलौं।” “पटुआमे भरिगर काज की होइ छै?” प्रश्न सुनि रघुनी बाबाक आँखि ढबढबा गेलनि। आँखि ढबढबाइते पानि पड़ल खजुरी जकाँ मधुर भऽ गेलनि। कहलनि- “कनियाँ, अखन अहाँ बाल-बोध छी। दुनियाँक तीत-मीठ नै बुझलिऐए मुदा कहै छी। काजे जिनगी छी। तँए काजसँ सटबाक कोशिक हरदम करी। हरदम करैक मतलब ई नै जे भरि दिन देहे धुनी। जहिना राजमिस्त्री मकानक नक्शा बना मकान बनबैए तहिना काजोक छै। छोटे-काज नमहर लग लऽ जाइ छै आ आगू मुँहे टुसिकियेबो करै छै।” “प्रश्न छूटि गेलनि बाबा?” “कनियाँ, की कहब? तरकारी तँ ओलो छी जे गाछमे एकेटा होइए, जा कऽ खट दे उखाड़ि लेब। उखाड़ैमे जते समए लागल ओइसँ कम समैमे सजमनि तोड़ल जा सकैए। मुदा सैकड़ो फड़निहार सजमनि बिना देखने-सुनने टेबि केना सकै छी। टेबब असान काज तँ नै। मोनमे दूटाक तुलना करब छी। तहूमे किछु एहेन होइत जे कमे उमेरमे फुफुआ कऽ नमहर भऽ जाइत आ किछु लुलुआ कऽ बौना भऽ जाइत। जँ छोट जानि, छोड़ैत जाएब तँ ओ तरेतर जुआ जाएत, मेहनति डूिम जाएत। तँए हल्लुको काज भारी होइए।” “बाबा, फेर भसिया गेलखिन?” “नै कनियाँ, भसिआइ कहाँ छी। होइए जे हृदए फाड़ि अहाँ सभक बीच छिड़िया दी आ अहाँ सभ तितिर जकाँ सभ पीबि ली। मर्द बनि जखन काज करए निकललौं, तखन भरिगर की आ हल्लुक की। मुदा एकटा बात धियानमे जरूर राखक चाही जे कोन काजमे कते जोखिम उठबए पड़त। जइ काजमे जते जोखिम होय ओइमे ओते सतर्क रही। तर्के रास्ता बनबैए। पटुआ काजमे सभसँ भरिगर अछि पटुआ झाड़ि सोन बनौनाइ। जहिना एक-दोसर जिनगी पबैत तहिना डाँड़ भरि सड़ल पानिमे जइमे जोंक-ठेंगीक संग विषैला साँप सेहो रहैत। चानिपर टहटहौआ रौद, निच्चा डाँड़ भरि पानि। सर्द-गर्मक बीच शरीर। तइपर एक-लगना ठाढ़ भऽ कखनो एकटंगा ठहुन बना पटुआ जड़ि जोड़ल जाइत, तँ कखनो वामा हाथमे उठा दहिना हाथे मुंगरीसँ झाड़ल जाइत। माछी-मच्छड़क तँ ठेकाने कोन।” सिनेहासिक्त होइत पुतोहु पुछलकनि- “कते दिनक पछाति घुड़लखिन?” “डेढ़ बर्खपर घुमलौं। आेइ साल रौदी भऽ गेल रहै। रूपैया पठा दिऐ आ अपने कमाय।” “अनदिना, बिना सिजनक समैमे कोन काज करै छेलखिन?” “कनियाँ, वएह समान सभ जेना- पटुआ, तोरी, धान इत्यादि देहातमे उपजै आ तैयार भऽ कऽ बजार अबै-छलै। बजारोमे काज बढ़ि जाइ छलै। उठा काज करै छलौं।” २ अतुलेश्वर मातृभाषा दिवस क बहन्ने हेमनिमे मातृभाषा दिवस छल, विभिन्न भाषा भाषी लोकनि अपन मातृभाषाक प्रति अनुराग ओकर विकास , अपेक्षा आ उपेक्षा पर चिंतन कयने होयताह। हमहुँ संयोग सं जनकपुर ( नेपाल) गेल रही । जानकी मंदिरक परिसरमे मैथिली भाषी लोकनि मातृभाषा दिवस मना रहल छलाह , सभामे नाटककार महेन्द्र मलंगिया, का. शितल झा, प्रा. परमेश्वर कापड़ि , प्रा. श्याम सुन्दर शशि आदि मैथिलीक विद्वान आ चिंतक लोकनि उपस्थिति छलाह। कार्यक्रमक रूप एकदम जनतंत्रीय छल कारण कार्यक्रम कोनो सभागार मे नहि भ’ जानकी मंदिरक प्रांगण मे भ’ रहल छल , जेकर कारण जनमानसक संख्या अधिक सँ अधिक छल , मोनमे जनमानसक उत्साहकेँ देखि उत्साह भेल । कारण देखल जाइत अछि जे बहुतों खर्च होएबाक पश्चातों जनमानसक सहभागिता कम देखल जाइत अछि, मुदा एतए एहन स्थिति नहि छल। कारण मातृभाषा दिवस क महत्व भाषा धरि सीमित नहि अछि ओकर महत्वक एकटा व्यापकताक अछि। विभिन्न वक्ताक भाषण सुनलाक पश्चात किछु सोचबाक लेल बाध्य कयलक आखिर कियो ई कियाक नहि कहि सकलाह जे एकटा भाषिक आन्दोलनक होयबाक चाहि मात्र एतबहिं कहि रहल छलाह जे हमरा सभकें अधिकार भेटबाक चाहि आखिर हुनका ई कियाक नहि बूझय मे आबि रहल छल जे अखनि धरि मैथिलीक लेल कोनो भाषिक आन्दोलन नहि भेल अछि आ जे भेल अछि ओ जनमानस सँ कटि क । कारण अखनि धरि हम सभ मानकीकरण आ मैथिली ब्राह्मण आ कायस्थ शुद्ध बजैत छथि एहिक लड़ाइ मे लागल छी, जेकर कारण भ रहल अछि मैथिली आइ अपन क्षेत्र धरि नहि बचा पाबि रहल अछि , जाहि जिलाक मैथिलीकें मानक मैथिली कहैत छियैक ओतुक्का जनता मे ई भ्रम छैक जे हम सभ जे मैथिली बजैत छी ई अशुद्ध अछि। एहि विषय पर कियो नहि सोचि रहल छथि जे आखिर ई धारणाक जन्म कोना भेल यदि भेल हम सभ ओकरा निरूपण करबाक लेल कि कहि रहल छी। मैथिलीक प्रति अपने सोचि सकैत छी जे हेमनिमे जाबत धरि साहित्य अकादमी पुरस्कारक घोषणा विलम्ब सँ भेल एहि स्थितिक लेल मैथिलीक चिंतक बुझनिहार लोकनि किछु नहि बाजि सकलाह सभ कियो एहि दुआरे चुप्प रहलाह जे कहि ई पूआ हमरे भेटि जाय। एहि ठाम ई तथ्य उठयबाक हमर मात्र ई नियति छल जे हमर सभक मानसिकता केहन अछि। भाषाक लेल सभ कियो कहताह जे हम ई क रहल छी मुदा हुनका भाषाक सेवा लेल जे पारिश्रामिकों भेटैत छनि ओहि संस्थाक ई स्थिति अछि जे ओतय गेलाक बाद अपनेक बुझायत जे हम कि सोचि आयल छलहुँ हम कि देखि रहल छी । आखिर कियाक? अपने देखि सकैत छी मैथिली साहित्यकार आ चिंतक लोकनि एतेक निम्न स्तरक चरित्रक छथि जे एक दिश कहताह जे फलां महाशय मैथिली आ मैथिलीक साहित्यकारमे भेदभावक स्थापना क रहल छथि आ हम एहि धारणाकें मेटेबाक प्रयास क रहल छी आ जखनि अहाँ हुनक धारणा देखब तँ ओ उन्नैस छलाह आ ई बीस भ गेल छथि , हम नाम लेबए एहि दुआरे नहि चाहैत छी जे बेकार कें ओ लोकनि प्रसिद्ध पाबि जेताह मुदा बुझबाक हेतनि बुझि जयताह । तैँए एहि बीच एकटा मित्र साहित्यकार कहलनि जे मैथिली आ मिथिला मे सभ नागनाथ आ साँपनाथें छथि तैँए किनको बारे बेसी निक वा बेजायक प्रमाण नहि द सकैत छी । बहुत उहापोहक स्थितिक बीच , साहित्य अकादेमी अपन चोर पोटरी खोललक। आदरणीय उदय चन्द्र झा विनोद कें हुनक कविता संग्रह अक्षप आ डा. खुशीलाल झाकें हुनका अनुवाद पुरस्कार सँ सम्मानित कयल गेल दुनू महानुभाव कें शुभकामना । ओना विनोद जीकें मैथिल चिन्हैत छन्हि कारण ओ मैथिली आ मिथिलाक मुद्दा सं जुड़ल छथि मुदा प्रश्न ठाढ़ भ गेल विनोद जीक पुरस्कार सम्मान सँ नहि इ विलम्बसँ । आखिर ई कोन दबाब छल जे पुरस्कार मे देरी भेल । वा पुनः उएह खिस्सा दोहराओल गेल जे एहि बेर विनोद जीकें द दियौन्ह बहुत आश कयने छथि कि कोनो दोसर फार्मूला ।आनन्द कुमार झाजी जिनका युवा साहित्य अकादेमी पुरस्कार भेटल , ओ उचितों जे पहिल बेर मैथिली मे कोनो युवा लेल पुरस्कार भेटल आ ओ हुनका भेटलन्हि एहि लेल हुनका शुभकामना। ओना हमरा जनैत हुनका सँ निक –निक लिखनिहार मैथिलीमे युवा साहित्यकार छथि नाम लेब उचित नहि मुदा प्रश्न उठल जे कोन कारण अछि एहि बेर सभ पुरस्कार एकटा वर्ग मे सीमित रहि गेल कारण रचना स्तरीय अछि तँ कियाक मैथिली एकगोट प्रसिद्ध आलोचक सँ पूछल जे युवा पुरस्कार जिनका भेटलन्हि अछि ओहि पर कि कहब अछि ओ कहलनि जे ठीके छैक कम सँ कम पाइ तँ भेंटि गेलन्हि। आ हमरा लागल जे ठीके साहित्य सेहो आब बाजारक चिज बनय जा रहल अछि ओकर अर्थ , ओकर महत्ता ओकर सामर्थ्य क्षिण भऽ रहल अछि। एहि बीच होरी समाप्त भेल आब मिथिलाक गाम सभमे फागु नहि गायल जाइत अछि , गाम संवेदनहीन भ गेल अछि । सांस्कृतिक चिंतन पर असमक एकटा विद्वानक लेख मोन पड़ैत अछि हुनक नाम ओतेक मोन नहि अछि किन्तु ओ सांस्कृतिक परम्परा पर जे गप्प कहने छलाह से मोन अछि। हुनक चिंतन असमक परम्पराक विषय मे छल जे एक दिन असम मे एहन स्थिति आओत जे बिहु संग्रहालय आ मंचक वस्तु भ जायत । ओतुक्का कि स्थिति छैक से कहि नहि सकब कारण ओतय किछु सांस्कृतिक चेतना बाँकी छैक से हम देखल , मुदा मिथिलामे ओ ठीके रंगमंचक प्रेक्षा गृहक वस्तु भ गेल अछि संग्रहालय मे राखल जाए मुदा मिथिला मे अखनि धरि विस्तृत संग्रहालय नहि अछि। ई प्रश्न एहि दुआरे हम कहि रहल छी जे एकटा ईमेल हकार पाँति क आयल छल ओहि मे अपन सांस्कृतिक चेतनाकें बचयबाक लेल कहल गेल अछि आ जेकर कारण ओ लोकनि फागु महोत्सव मना रहल छथि , मुदा तँ जे करै छी से ठीके मुदा कि एकर दूरगामी प्रभाव होयत वा क्षणिक कारण रंगकर्मी ई तं नहि सोचि क जयताह जे निक तैयारी आ प्रस्तुति सँ पैघ पुरस्कार भेटि जाय ? अन्त मे वासंती नवरात्र आ रामनवमीकेँ सम्पूर्ण मिथिलावासीकेँ मंगलमय शुभकामना। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। ३. पद्य ३.१.१.शिव कुमार झा ‘टिल्लू’ २.स्व. लल्लन प्रसाद ठाकुर ३.श्यामल सुमन ३.२.१.ओमप्रकाश झा २.कमल मोहन चुन्नू ३.प्रेमचन्द्र पंकज ४.रुबी झा ३.३.१.अमित मिश्र २.मिहिर झा ३.उमेश पासवान ३.४.१.जगदीश प्रसाद मण्डल २.अनिल मल्लिक ३.कुसुम ठाकुर ३.५.१.चंदन कुमार झा २.पवन कुमार साह ३.६.१. आनन्द कुमार झा २.निशान्त झा ३.७.डॉ॰ शशिधर कुमर ३.८.१.राम विलास साह २. प्रभात राय भट्ट १.शिव कुमार झा ‘टिल्लू’ २.स्व. लल्लन प्रसाद ठाकुर ३.श्यामल सुमन १. शिव कुमार झा ‘टिल्लू’ कविता- सगर राति दीप जरय- राति माने कारी पहर गत्र-गत्र शांत जीव अजीव आक्रांत रजनीक लीलासँ क्षणिक बचबाक लेल लोक जरबैछ दीप सभ्यताक विकासक संग-संग मनुक्ख चेतनशील होइत गेल पहिने इजोतक लेल... खर-पुआर जारनि लत्ता नूआ फट्टा सूत छोड़ि रूइयाक बाती ढिबड़ीक बदला लेम्प बहकैत रोशनीमे गबैत पराती बुिधक विकास भेल... विद्युत तरंगमे गैसक उमंगमे विज्ञानक जय भऽ गेल... सभ ठाम इजोत मुदा! वैदेहीक घर अन्हार मात्र लिखते रहब ककरोसँ नै कहब के बूझत कथाक विकास ककरो नै छल आभास दधीचि बनि साङह लेने आबि गेलनि मैथिली कथा जगतमे प्रभास सुरुज दिन भरि अपन करेजकेँ जड़ा कऽ नै मेटा सकल ऐ वसुन्धरापर सँ विगलित मानुषक प्रवृत्ति प्रभास दीप बारि अपन करूआरि सम्हारि कथा सागरक जमल तरंगमे दिअ लगलनि हिलकोर... समाज जागत- ई छल विश्वास मुदा नै आदि भेटलनि नै भेटलनि छोर... किनछेरिपर अपस्यिात कथाकार लऽ लेलनि िनर्वाण जागरणक आशामे कहियो तँ सुखतनि वैदेहीक झहरैत नोर... चलि गेला अभिलाषा लेने उत्तराधिकारी सभ खेलाइत छथि अट्ठा बज्जर करिया-झुम्मरि उद्यत छथि अधिकार हरबाक लेल पाग पहिरबाक लेल सगर राति दीप जरय... रमण-विभूति गेरुआ गर लगौने छथि महेन्द्र मसनद पजिऔने छथि समालोचक- उद्घोषक सूतय मात्र वाचक मंच चिकरय... कहैत छथि बुढ़ छी तखन गोष्ठीमे आबि नाटक करबाक कोन प्रयोजन? दीप बारि दुआरि नै जराउ जे जगदीश जागल रहत ओकर गामक जिनगी के सुनत? ओ अछि समाजक कात कहियो होमए देब ओकर साहित्य साधनाक प्रभात किएक तँ ओ थिक वेमात्र जइ माटिक अन्हारकेँ सुरुज नै हटा सकल ओ केना हटत माटिक दीपक बल...? जौं दृष्टिकोणमे रहत छल तँ विवेक केना िनर्मल? ओइ कठकोंकारि सबहक बीच मैथिली छथि दुबकल सगर राति दीप जरय अन्हार घर संस्कार सड़य कथासँ केना पारस िनकसय...? २ स्व. लल्लन प्रसाद ठाकुर "हे रे चन्दा" हे रे चन्दा लेने जो सनेस पिया परदेश रे......... .चन्दा....। तोहें ने उगै छ आन्हर राति बिसरल रहै छी पिया केर पांति तोंहे जाँ उगै छ दीया बाती दीया बाती होइये मोन मे कलेश रे .......... .चन्दा...... । हम्मर दुःख केयो ने बुझैया कोना ओ रहै छथि केयो ने कहैया कहियौन्ह विकल छैन्ह हुनकर दासी हुनकर दासी रुसल किए छथि महेश रे ........... चन्दा....... । पांति हुनके आजु गाबय छी छवि में हुनके लीन रहय छी धैर्य नहि आब बसल उदासी बसल उदासी नहि अछि कोनो उदेश रे.............. .चन्दा रे.......... बहुत जतन सँ ह्रदय के बुझेलहुं नहि दोसर के हम किछु कहलहुं आस बनल अछि नहि हम बिसरि नहि हम बिसरि चाहि एतबहि, नय किछुओ बिशेष रे....... ..चन्दा जहिया मँगलहुं एतबे मँगलहुं सँग रही बस एतबे चाहलहुं जनम भरक दुःख कही केकरा सँ कही केकरा सँ गेलैथ ओ एहेन बिदेश रे.................. .चन्दा ३ श्यामल सुमन गजल १ लागल एहेन रिवाज बिसरलहुँ अप्पन अप्पन काज बिसरलहुँ सच पूछू तऽ लाज बिसरलहुँ सिखलहुँ लूरि जीबय के जतय कियै ओहेन समाज बिसरलहुँ छूटल अरिपन, सोहर सब किछु लागल एहेन रिवाज बिसरलहुँ सासुर मे छल खूब रईसी घर मे नखरा-नाज बिसरलहुँ मन गाबय छल गीत मिलन के सुर के सँग मे साज बिसरलहुँ संस्कार के बात करी नित जीबय के अन्दाज बिसरलहुँ हम छी राजा, बाकी परजा मुदा सुमन के ताज बिसरलहुँ २ ठेहुन छुबि प्रणाम देखय छी बहुत दूर, पर गाम देखय छी भेल बहुत बदनाम देखय छी काली-पूजा, फगुआ छूटल दारू के परिणाम देखय छी बापक कान्ह कोदारि सदरिखन बेटा केर आराम देखय छी कष्ट झुकय मे नवतुरिया केँ ठेहुन छुबि प्रणाम देखय छी अपनापन के बात निपत्ता घर घर मे संग्राम देखय छी धन के अर्जन घूसखोरी सँ हुनके बड़का नाम देखय छी सुमन सुधारक आशा टूटल तखनहि केवल राम देखय छी ३ व्यर्थक बात करय छी कियै अहाँ कहलहुँ, अहीं लऽ मरय छी। अहाँ, व्यर्थक बात करय छी।। आस लगेलहुँ, रूप सजेलहुँ, लेकिन तखनहुँ अहाँ नहि एलेहुँ। काज करय में दिन कटैया, कुहरि कुहरिकय राति बितेलहुँ। पेटक कारण, अहाँ बिनु साजन, जहिना तहिना रहय छी। अहाँ, व्यर्थक बात करय छी।। सब सखियन के साजन आयल, सभहक घर मे बाजय पायल। ओढ़ि लेने छी हँसी मुँह पर, लेकिन भीतर सँ छी घायल। विरहन के दुख, लोक बुझत की, तरे तर जरय छी। अहाँ, व्यर्थक बात करय छी।। पीड़ा मन के, बिनु बन्धन के, ककरा कहबय दुख जीवन के। किछु नय किछु मजबूरी सबके, ताकू अवसर सुमन मिलन के। आँखिक नोर सूखल पर भीतर नोरक संग बहय छी। अहाँ, व्यर्थक बात करय छी।। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। १.ओमप्रकाश झा २.कमल मोहन चुन्नू ३.प्रेमचन्द्र पंकज ४.रुबी झा १. ओमप्रकाश झा गजल १ मोनक आस सदिखन बनि कऽ टूटैत अछि। किछु एना कऽ जिनगी हमर बीतैत अछि। मेघक घेर मे भेलै सुरूजो मलिन, ऐ पर खुश भऽ देखू मेघ गरजैत अछि। हम कोना कऽ बिसरब मधुर मिलनक घडी, रहि-रहि यादि आबै, मोन तडपैत अछि। देखै छी कते प्रलाप बिन मतलबक, चुप अछि ठोढ, बाजै लेल कुहरैत अछि। मुट्ठी मे धरै छी आगि दिन-राति हम, जिद मे अपन, "ओम"क हाथ झरकैत अछि। (बहरे-कबीर) २ जीनाइ भेलै महँग, एतय मरब सस्त छै। महँगीक चाँगुर गडल, जेबी सभक पस्त छै। जनता ढुकै भाँड मे, चिन्ता चुनावक बनल, मुर्दा बनल लोक, नेता सब कते मस्त छै। किछु नै कियो बाजि रहलै नंगटे नाच पर, बेमार छै टोल, लागै पीलिया ग्रस्त छै। खसि रहल देबाल नैतिकताक नित बाट मे, आनक कहाँ, लोक अपने सोच मे मस्त छै। चमकत कपारक सुरूजो, आस पूरत सभक, चिन्तित किया "ओम" रहतै, भेल नै अस्त छै। (बहरे-बसीत) २ कमल मोहन चुन्नू गजल 1 कगनीए पर नाह लगैए, बाजू नहि? आङ-समाङक धाह लगैए, बाजू नहि? मोसि-कलम-कागत धेने परोपट्टामे, एक्कहु नहि पुरखाह लगैए, बाजू नहि? भरल-पुरल दरबज्जा आँगन सबजनियाँ, दोगे-दोग अबाह लगैए, बाजू नहि? कोन बसात सिहकलै जनमारा पछबा, गामक-गाम रोगाह लगैए, बाजू नहि? जाहि आँखिमे भरि जिनगी बोहियइतहुँ हम, पेनी तकर अथाह लगैए, बाजू नहि ? होइत रहत एहिना मरलहबा गुरमिन्टी, लोके नहि इरखाह लगैए, बाजू नहि? ठीका-मनखपमे उजमहल धर्मध्वजी, नेत ओकर मरखाह लगैए, बाजू नहि? हड्डी-गुद्दा केर हबक्का- सौजनमे, कुकुरो आइ घबाह लगैए, बाजू नहि? 2 पाछू जँ नहि अंक तँ एसकर सुन्ना की? कानक बेतरे सोना की झुनझुन्ना की? जीरा लए जोलहाल जानकीक नैहर केर, पोखरिए महुराह तँ रोहु की भुन्ना की? सिरिफ अगौं लए रकटल- लुधकल भगिनमान तकर जजातक उपजा की मरहन्ना की? भङघोटनासँ अकछि लोक बन्हलक मुट्ठी तँ दरबारक कोट-कानूनक जुन्ना की? पथरौटी डिहवार छातियो पाथर के, तकर गोहरिया गुम्हरल की अँखिमुन्ना की? धातुक बासन टुटलोपर बोमियाइत अछि, मैथिल बासन साबुत की सकचुन्ना की? डंटी मारए जे बैसल सप्पत खा कऽ तकरा लए छै गाँधी की आ अन्ना की? ( दुनू गजल बिना बहरक अछि-सम्पादक) ३ प्रेमचन्द्र पंकज गजल १ हम बात अहीं केर मीत कहब, नहि गजल कहब बरु कहब मीठ नहि, तीत कहब, नहि गजल कहब चाङुर अपन पसारि रहल अछि माथापर सम्बन्धक बाज कोन विधि बाँचत प्रीत कहब, नहि गजल कहब कतबो माँटि सुँघाएब तैओ नहि मानब हम अप्पन हारि चारु नाल पछाड़ि अपन हम जीत करब नहि गजल कहब गगनक मुँहकेँ चूमए कतबो ठाढ़ अहाँ केर शीसमहल बस कखनहुँ बालुक भीत करब नहि गजल कहब हाथ पसारब रहत पसरले, मुँहे टेढ़ करब तँ की कनि दूसि मुँह विपरीत चलब, नहि गजल कहब २ गजलक बहन्ने हम आंगन- घर- दुआरि लिखब बाध-बन- कलमबाग-बेख –बसबारि लिखब साँढ़ छैक छुट्टा आ पाड़ा मरखाह कतैक बाँचल फसिलकेर सुरजाक रखबारि लिखब थानामे नाङट भेलि रमियाक हाकरोस- सुननिहार केओ नहि तकरे पुछारि लिखब बारल खेलौनासँ, पोथीसँ दूर कएल जिनगीक बोझ उघैत नेनाक भोकारि लिखब नाचि रहल लोक आइ असली नचनिञा सभ नचा रहल परदासँ केओ परतारि लिखब फाटल अकास छै सीअत के-कते कोना लिखब जे “पंकज” बेर-बेर विचारि लिखब ( दुनू गजल बिना बहरक अछि-सम्पादक) ४ रुबी झा ---गजल--- १ तरहत्थी दीप जरा हम ठारै छलौं, अहान्क प्रतिक्षा सदा हम ठारै छलौं , अहाँ आएब एहि बाटे फुइसे छलै , लेलों किए हाथो जरा हम ठारै छलौं , छी अहाँ कठोर देखल नै आँखि नोर , मुदा कानि आँखि फुला हम ठारे छलौं , हमर दर्दक मोल नै जानल अहाँ , कनै बुझितहुँ व्यथा हम ठारे छलौं , अही केर आशा मे ज्योँ मरब कहियो , नै आनब नामो कदा हम ठारे छलौं , बेदर्दी अहाँ दर्द बुझब की हमर, मुदा व्यर्थ पीड़ा बता हम ठारे छलौं| २ --- गजल---- जग मे बेटी केँ सम्मान भेटै कहियो, माइ बापक अभिमान भेटै कहियो, माँ केर कोइख सँ लेलें दुनु जनम, मुदा अधिकार समान भेटै कहियो, भरि देश केँ आइ सम्हारने छै बेटी, अपन समाजो मे मान भेटै कहियो, पहुँच गेलै बेटी अंतरिक्ष अखन, वसुंधरा पर सम्मान भेटै कहियो, भेल चौपट मिथिला दहेज प्रथा सँ, दहेज बिनु वरदान भेटै कहियो, घुटि मरै "रूबी" पुरुखक समाज मे, एको दिन नारी प्रधान भेटै कहियो..!!! ३ गजल गजबे िनशा हुनक आँखिमे अजबे कथा हुनक आँखिमे हम बहल जाइ सदिखन भरल ब्यथा हुनक आँखिमे िभजल हम आँखिक अलौते कारी घटा हुनक आँखिमे समािहत भऽ गेलहुँ कखनो हम दबल दुिवधा हुनक आँखिमे कोयला भँ गेलहुँ जरि जरि हम जरल ज्वाला हुनक आँखिमे बेहोशे तँ छी अखन धरि हम अजबे िनशा हुनक आँखिमे ४ हे यै सोना, अहाँक रुप लगै सोना जेकाँ गोर गाल पर तील कोनो जादु टोना जेकाँ, केश मेघो सन कारी गोर गरदन शोभैए, जुट्टी अएन्चल अहाँक नाग फेना जेकाँ चितवन चंचल एहन लागैए हिरनी तेहन ताहु पर काजर मशीह भौं कमाने जेकाँ, ठोर पातर एहन पानक पोटरिया जेहन लाली लगबैए छी जखन लगै सुगा जेकाँ, देह छरहर एहन गाछ कुसियारक तेहन रस भरल पोरे-पोर चीनी बसना जेकाँ, अहाँ जखन चली बाट मोन होए उचाट गाम गाम गमकी एहन फुलक दोना जेकाँ। ५ सगरो नगरी मे कतेक, शोर भs गेलए हुनक रुपक इजोत सँ , भोर भs गेलए यौबन केर रौद चम-चम चमकै एना नहा इजोरिया, रसिक चकोर भs गेलए केखनो गुदरी ज्योँ फाटल, लेलैन्ह पहीर देह हुनकर सजल , पटोर भs गेलए अनुपम सुन्नैर लगैत जेना ओ अप्सरा मेनकाक रुप जेना कोनो थार भs गेलए ओ लेलैन अंगराइ, करेज बुढबो पिटै छौरा देखैक लेल तहलखोर भs गेलए ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। १.अमित मिश्र २.मिहिर झा ३.उमेश पासवान १ अमित मिश्र पहिल टिकुला मज्जरक दिन सँ पसरल सुगंध , हर्षित मोन सुंघि मातल गंध , फूसिये कहै छी कोयलक गीत सुन' जाइ छलौ , सच कहौँ बढ़ैत टिकुलाक दर्शन कर' जाइ छलौँ , डाँढ़ि-पात लुबधल हरियर टिकुला , पैघ-छोट ,वाह! केहन रूप दैब रचला , पहिल टिकुला सँ चटनी थारी सजल , साल भरि के बाद मुँहक स्वाद बदलल , एखने सँ मीठ राजा लागि रहल , बम्बई मालदह छकि क' खेबै आश लागल , धन्य भेल जिनगी देख पहिल टिकुला , "अमित" रसालक ध्यान मे बनल बगुला . . . । । २ ओकर मूँह लागैए कते म्लान सन , कत' गेलै चमक ओ पुनम के चान सन , मौलाइल गुलाबक ठोर ओकर किए , नोराएल कारी नैन , जे वाण सन , केशो नै गुहल पसरल धरा पर किए , देने पेटकुनियाँ भेल अपमान सन , टोना कोन डाइन केलकै आइ यौ , मुस्की गेल हेरा कोयलक गाण सन , दिल मे आगि लागल छै विरह के "अमित" , परदेशी पिया भेला अपन जान सन . . . । । 2221-2221-2212 बहरे -कबीर २ मिहिर झा हाइकू ची ची करैत बगडा केर बच्चा ताकय पानि कारी बिलाड़ि बीच दुपहरिया बगडा बच्चा दाना पानि ने माय बाप बाहर नीचा बिलाड़ि एहि रौद मे बिन पान्खि, निर्बल हरि बचाउ १ स्वर्गक नाम जपैत सगरे नर्क पसरल छै साधुक भेष धरि सगरे रावण अभरल छै सब छे घिचने लक्ष्मण रेखा अपन चारू कात लंका दहन केर नाम पर सब ससरल छै रूप गेलै बदलि जमाना संग बानरोक आब हनुमानक स्थान पर आब मारीच भरल छै नियमबद्ध होएब लगै आब करैला सों तीत एहि बात पर सगरे आब आगि धधकल छै २ कसीदा - ए - विदेह जग घूमल सर्वत्र मुदा त्राण पाएल विदेह पर सब गाम स्वाद चीखि चीखि लोक आएल विदेह पर गज़ल कता रुबाई हाइकू छन्द कविता वा हौ रोला मातृभाषा मे लिखल देखि प्राण बाजल विदेह पर सब जाति धर्म के मैथिल जे एकत्र भेला एक ठाम अप्पन मोनक भाव कहै धूम जमल विदेह पर रगडा झगड़ा आदर मान छैक अप्पन लोक जेका शुभारंभ साहित्य विधा के सौंसे देखल विदेह पर दुर्लभ छथि जे गुरुजन अन्यथा, ज्ञान भेटैक नहि पाबि मार्गदर्शन कविगण नित्य बनल विदेह पर देश विदेश गून्जल गान माय मिथिला भेली प्रसन्न गूगल नतमस्तक भेल मिथिला सजल विदेह पर छद्म साहित्य ख़सल पिछडि लोक केलक बहिस्कार समानांतर अकॅडमी छे शान बनल विदेह पर ३ कसीदा - ए - वैदेही मूल्य बुझि माटिक अहां जन्म खेते लेलहु वैदेही नारी मान बढाबय लेल स्त्री रूप धेलहु वैदेही धनुष उठा नीपैत पोछैत अहां पूजल भोले के ओही धनुष ल के अहां स्वयंवर केलहु वैदेही देश विदेशक राजा आयल देखबै अपन जोर देखि राम के दूरे से ईश्वर अहां पेलहु वैदेही कमला कोशी बागमती तजि नेह भेल सरजू सों आय अयोध्या भेल धन्य एत' अहां एलहु वैदेही ससुर महात्मा ईश्वर राम सासुर बनल धाम तीन सासु दियर संग पूर्ण अहां भेलहु वैदेही पिता वचन के राखि मान देश तजि चलला राम संस्कार के पाठ गुनैत संगे अहां गेलहु वैदेही निश्छलता के लाभ उठाय रावण ठकबा आयल देखि जटायु पंखहीन छुछे नोर देलहु वैदेही भोर सांझ ल प्रणय निवेदन रावण आबे रोज पर पुरुख़ बाजू कोना, त्रिन ठोढ धेलहु वैदेही अग्निपरीक्षा देल तखनो धोबिया भरलक कान मिथ्या आरोप बुझितो पतिक मान केलहु वैदेही जीवन छोडि कर्तव्य लेल गेहलौ जंगल कुटिया सूर्य समान दुहु पूत के कोना पोसलहु वैदेही कतेक बर्छा भोंकल करेज और कतेक छै बाकी पुनर्परीक्षा देखि सोझा धरती पैसलहु वैदेही ३ उमेश पासवानक 3 दर्जन कविता- 36 हाल-चाल बड़ बराब छै हाल ऐठामक नेता छै माला-माल रोड-सड़ककेँ देखियौ तँ कदबा गजार सन छै थाल ऐ मुँहझौसा नेता सभकेँ कोइ नै किछु कहै छै भरि बरसात साँप-किड़ाक डरसँ साँझे घर घड़ै छै एक-दोसरमे एकता नै छै यएह छिऐ काल बड़का नेता-मंत्री छिऐ तँ एकर मतलब की कतेक बेलना बेलए पड़लै ओकरा केना कऽ गलतै राजनीतिक दालि मासुम जनताक संगे चलै छै चतुर सिआरक चालि अाबए दहक समए हौ नेता भिजल बिलाइ सन हेतह हाल अखन तँ खाली पाइये सुझाइ छै सगरे पिटै छै विकासक डंका मुदा घरक आगाँमे साँझे बेंग कोकिआइ छै करै छै कोनो काज जेना कछुआक चालि बड़ खराप छै हाल ऐठामक नेता छै माला-माल रोड-सड़ककेँ देखियौ कदबा गजार सन छै थाल जहिना इण्डिया तहिना नेपाल। 35 पथ ई केहेन गुज-गुज अनहरियामे केना हेरा गेल हमर मोन आब सम्हारब केना अप्पन जीवन नै पाछाँ छोड़ैए मद्धपान दारू-शराब नै पाछाँ छोड़ैए संगतक लक्षण जेम्हर जाइ छी सगरे ओनाइ छी पथ ई केहेन जइपर चलैत पछताइ छी आइ मरनासन भऽ गेल हमर अवस्था कष्टक मारल छटपटाइ छी केहेन कठिन ई रस्ता अपने प्रश्नसँ हम ओझराइ छी दोसरकेँ संदेश कि देब ने जिऐ छी आ ने मरै छी करनीक फल भोगि रहल छी अपने सभ करू विचार नशामुक्त बनौ देश ओ संसार। 34 गृहस्थ सबहक हाल सभ किसान भेल अछि परेशान समएपर बरखा नै भऽ रहल अछि केना रोपाएल धान बिति गेल श्रावणक मास खेतमे गिराएल बिआ सुखि कऽ भऽ रहल अछि नाश। जोतल खेतमे गरदा-धूल उड़ि रहल अछि किसान सभकेँ ऐबेर खेतीसँ आस टूटि रहल अछि अखन धरि नै भेल पानि सभ गिरहत मेघ दिस देखि रहल अछि इंद्र भगवान किएक भऽ गेल नराज नै जानि। सभ किसान भेल अछि परेसान समैपर बर्खा नै भऽ रहल अछि केना रोपाएत धान। पछिला साल बाढ़िमे नाश भऽ गेल धान हम किसान खेतीपर िनर्भर छी ऐबेर सुखार भऽ गेल किसानक जा रहल अछि जान सभ किसान भेल अछि परेसान समैपर बर्खा नै भऽ रहल अछि केना रोपाएत धान। 33 मिथिला महान टाटपर लतरल तिलकोर पोखरिमे मखान अखार मासमे झूमि-झूमि कऽ किसान रोपैए धान जगमे सभसँ सुन्दर अछि हमर मिथिला धाम भाषा आ संस्कृति देखि लोभाएल श्रीराम बारीमे भेटैए पान चूड़ा-दहीक जर-जलपान मैथिल मिथिला महान हरक पाछाँ बगुला घुमैए हरबाहा जोरसँ बरदकेँ बाबू भैया कहि हँकैए आरिपर बैसल गिरहतबा खुशीसँ दइए मुस्कान। हमर सभ सुन्दर मिथिला गाम मैथिल मिथिला महान। माता-बहिन सभ खेतमे गबैए सोहर-समदौन घुमरैत मेघ देखि कविकेँ हर्षित होइए मोन हरबाहा जलखैमे खाइए मरुआ रोटीपर सुक्खल नून बहैए पछबा हवा पानि पड़ैए झम-झम वर्षाक झटकसँ टुटैए आसमान सभसँ सुन्दर हमर मैथिल मिथिला महान। 32 हेराएल जिनगीक सफरमे जिनगी जिनाइ हम बिसरि गेलौं कि हमर हेराएल कि हमरा भेटल संघर्षक रास्तामे बाधासँ लड़नाइ हम बिसरि गेलौं सही रस्तामे छल काँट भरल पगडंडीसँ हम निकलि गेलौं चुकि गेल सभ ओ बात सच कहनाइ हम बिसरि गेलौं मानव भऽ मानवकेँ धर्म हम नै निभा सकलौं जाइत धर्म ऊँच-नीचक बंधनमे हम जकरि गेलौं अखन कमी महसुस होइए ऐ सभ बातक कि करब आब तँ जिनगी अहिना गुजरि गेल जिनगीक सफरमे जिनगी जिनाइ हम बिसरि गेलौं। 31 दुभर मंहगाइक दानब आसमान चढ़ि गेल सभ भाड़ एतए गरीबपर पड़ि गेल कियो भऽ गेल अरबपत्ति कियो भऽ गेल खरबपत्ति कियो नून रोटी लेल मरि गेल चलैए ई शिलशिला एतए अहिना जहिना तहिना कियो सासनक गद्दीपर बैस राज करैए केकरो बेटा-बेटी डाक्टरी तँ इंजिनियरिंग पढ़ैए केकरो बेटी घरेलू नोकर बनि घरक काज करैए रोज मेहनति मजदुरी करि कऽ जीवन बितबैए गरीबक बेटा हॉस्पीटलमे रूपैया बिनु इलाजक खातिर मरि गेल महगाइक दानव आसमान चढ़ि गेल। 30 विडम्वना कतेक लिखब दलितक बेथा सलहेश गामक संदेश कतेक लिखब समाजक विडम्वना आँखिक नोर सुखि गेल दर्द नै होइए कम के बुझत कि अछि झूठ कि अछि साँच टकमे टिक जोरि रहैए बुझैए अपनाकेँ बड़का खुद ओ अपने भितरसँ कारी अछि दुश्मन बनल तड़का बड़-बड़ करैए नाच दलितक प्रगतिसँ जलनक लगैए हिनका आॅच कतेक लिखब दलितक बेथा सलहेश गामक संदेश। 29 दियादी बॉट अपनहि घरमे हेराएल छी हम भेटैए हिस्सा बरोबरि कऽ मुदा बॉटमे पछुआएल छी हम लड़ए पड़त अखनो दियादी बॉटक लेल नै तँ करत आओर झेल कऽ रहल अछि ओ दिगभ्रमित हमरा दलित अक्षोप कहि कऽ करने अछि एकात हमरा ओही एकातसँ चलि कर आएल छी हम सहलौं सभ किछु सलहेशक संतान रहितौं जहिया तक चुप रहलौं आइ आँखि फारि कऽ देखि रहल अछि ओ हमरा जब अप्पन हिस्साक बात कऽ रहल छी हम अपनहि घरमे हेराएल छी हम। 28 पूर्णिमा पुर्णिमाक रातिमे चाँद केर चुप चाप घरतीपर उतरैत देखलौं घासपर गिरल ओस केर बुन्नमे अप्पन चेहरा देखि चाँदकेँ खिलखिलाएल हँसैत देखलौं नव यौवन कोमल हसीन सुरत चाँदकेँ पुरा मुखड़ा देखलौं घरतीपर प्रकृतिक सृष्टीक मनमोहन दृश्य देखि गाछ-वृक्षक संग चाँदकेँ नचैत देखलौं चाँदकेँ होइ छल किछु बात धीरेसँ बाजू अप्पन रूप-रंग घन-सम्पतिक भाओ नै तौलू चाँदकेँ लोकक लेल यएह संदेश लिखि कऽ जाइत देखलौं पुर्णिमाक रातिमे चाँद केर चुप-चाप...। 27 रिश्ता हँसैत-खेलैत हमर जिनगी छलए वसंत ऋृतु जकाँ जाइत छलिऐ अलग मुदा दोस छलए पक्का भेदभावो नै जेना मालामे गाँथल रंग-बिरंगक फूल जकाँ हुनकर खुशीमे हँसैत-छलै दुख:मे कनै छलै संग-संग चलै छलै नदिक दुनू किनार जकाँ दुनू गोटेमे मित्रता छल सुदामा और कृष्ण जकाँ लोक देखि कऽ जड़ै छल धधकल कुलाह जकाँ दोस्तीमे जहर घोरि देलक दूधमे खटाइ जकाँ लोक अप्पन रास्ताक दिवार जकाँ हँसैत खेलैत...। 26 अज्ञानी कम फुल किचरमे फुलाइ छै जखन संग दइ छै पानियो आँखि मुनि कऽ किएक बनल छी अज्ञानी यौ छोट तँ लोक कर्मसँ होइ छै मुदा हमर किएक छै आइ दुख: भरल कहानी यौ देहसँ देह केना छुबाइ छै किएक नै चलैए हमर छुअल पानि यौ कोन जुलुमक सजा हमरा दऽ रहल छी किअए बुझै छी हमरा अपमानी यौ जिवन हमर केना बिततै भेद-भाव ऊँच-निचक भावना समाजक मनसँ कहिया मिटेतै केहन अहाँ छी अज्ञानी यौ। 25 कनी देखू हे बलान माता कनी देखू अहाँ हमर ओर आँखिसँ सुखल नोर भुखसँ सुखल ठोर घरमे नै अछि िकछु बॉचल सभ लऽ गेलेँ बाढ़िमे दहा कऽ दक्षिण अाेर कनैत-कनैत करेज फटैए केना अहाँ देलौं हमरा झकझोड़ि दाना-दानाक लेल बिलखै छी बौआ रहल छी हम चारू ओर विपत्तिक बादल हमरा ऊपर लागल अछि घनघोर रातिक नीन नै होइए जागि कऽ होइए भोर हे माता दया करू नै बनु अहाँ निठारे अनजानमे जौं कोनो गलती भेल तँ माफ करब हाथ जोड़ि लगै छी गोर हे बलान माता कनी देखू...। 24 मास्टरक बहाली देखियौ-देखियौ भेड़िया-धसान सन भेल एतए मास्टरक बहाली कियो नै करैए एकर रखवाली स्कूलमे नैना-भुटुका करैए हल्ला-गुल्ला मास्टर साहेब दऽ रहल अछि ठहाका पढ़ाइ-लिखाइ के करबैए देखियौ केना उठबैए सरकारी टाका अखार मासमे बारह बजे दिन तक खेतमे कदबा-गजार करैए सर एक बजे स्कूल अबैए सर खैनीमे लगबैए चोट शिक्षाकेँ रखने अछि ताखपर मंगनीमे उठबैए नोट स्कूलक मैडमोकेँ देखियो ओहो कम नै छथि लेक्मीक लिपिस्टक लगेने मैडम बॉबकट केश पहरबैए इतर छिट कऽ गमकबैए पर्ससँ निकाइल कऽ अइना रहि-रहि मुँह िनङहारैए मोबाइले करैए हेल्लौ समए केना बितबैए देखियो-देखियो सरकारी पैसा केना उठबैए कहबी अछि, जेहने इमाम सहाब तेहने ढोलकिया विद्यार्थीक गार्जियन भरि दिन धिया-पुतासँ गाए-महींस चरबबैए देखिये-देखियो खिचरी खाइ बेरमे स्कूल केना पठबैए। 23 फागुनमे अइहो वृजगोपाला फागुनमे खेलैले होली हमरा संगे तोरा लेल संजौनी छी मखन भड़ल थाड़ी बाट जोहि रहल अछि राधा-सखी केर संग वसंतक ऋृतु मधुमासक मौसम फगुनी हवामे हम उराएब रंग अबिर तोहे प्रेम सुधा केर रंग बरसैए मोहे रंग दिहो अप्पन संगमे हमर जिनगीक मनोरथ पुरा कहिहो श्यामा अहीबेर होलीमे अइहो वृजगोपाला फागुनमे। 22 श्यामल मोहे खोजत हम तोरा ताही लेल हेरा गेल हमर कृष्ण कन्हैया बासुरी बजइया रासी हे किछु बाजत नै तोर ओनाएल छी हम मृगा कस्तुरी सन खोजीह देहो श्यामल मोहे चित्तचाेर सखी हे किछु बाजत नै तोर वृन्दावन यमुनातट पनघटपर कदमुआ पेड़ सुना लागही प्रेम लिखा करत आब के फेर सखी हे किछु बाजत नै तोर बड़ा नटखट छैल छबिली चित्तमन प्रितम केर केसुआ होबे घूंघराएल मोर मकून्दल सरपे सखी हे किछु बाजत नै तोर। 21 जीतक झंडा जरै जाउ वतन केर दुश्मन आगि सुनगाएल करू जीत केर झंडा फहराएल करू मोनमे राखि कऽ उमंग गीत देश भक्तिक गाएल करू हिमालय सन ऊँच हृदए अछि हमर प्रेमक फूल खिलाएल करू अछि गाँधीक देश ई गंगा-यमुना पावन नदि दइए संगमक संदेश जतए तिलक, टैगोर, अम्बेदकर जतए विर भगत सिंह चन्द्रशेखर, सुभाष वीर पुत्र जतए भेटए संघर्षक कथा जतए मातृभूमि अप्पन भारत माता केर गुण गाएल करू जरै जाउ वतनक दुश्मन आगि सुनगाएल करू। 20 युवा रहैए युवाकेँ उमंग मोनमे जौं पहाड़सँ लड़ि लेब हम संघर्षक जीवन अहिना चलतै जीवनक अंतिम समैमे किछु कए लेब हम जोश जतए कम नै हुअए परिस्थिति सात समुद्र पार कऽ लेब हम हमरा नै रोकू कियो दलितक दरदकेँ हर संभव कम कऽ लेब हम लड़ए किएक ने पड़ए हमरा दुश्मनक छाती चीर कऽ देखा देब हम बहुत सतेने अछि हमरा समाजकेँ भरि जीवन बीच अखारामे पटकि कऽ देखा देब हम चुप नै रहू सभ हकक लड़ाइक लेल आगू बढ़ू रहैए युवाकेँ उमंग मोनमे। 19 हम युवा जाति-धर्म मजहब केर नाओंपर षडयंत्र रचैए कियो हमर देशकेँ भीतर आबि कऽ आतंकवादक गाछ रोपैए कियो भारतवासी शेर छी शेरकेँ मादमे आबि कऽ जगबैए कियो दुश्मनक थाह नै ऐ बातक हम युवा हर मोड़पर ठार छी अंत करैले सदिखन ऐ दानवक लेल तैयार छी हम छी गोली, हम छी बारूद हमही खंजर तलवार छी तिरंगाक तिनू रंग तीर-कमान छी जौं दोस्तीक लेल हाथ बढ़ाएब तँ हमही फूलक माला गला केर हार छी संदेश दइ छी शान्ति केर हमहीं महात्मा गाँधी, गौतम बुद्धक अवतार छी जौं कहियो एक बुन्न सोनित गिरल ऐ धरतीपर तँ हमहीं वीर भगत सिंह चन्द्रशेखर आजाद छी जाति-धर्म ओ मजहब केर नाओंपर। 18 पथिक हम पथिक छी जीवन केर जीबि लिअ दिअ निहस्वार्थ रूपसँ मनुख बनि कऽ दोख हमरा ऊपर नै लागए कोनो नै गलती हुअए फेर हम पथिक छी जीवनक मनुखक तन भेटल हमरा मानव धर्म निभाएब मानव सेवा करब जीवन प्रयत्न चंचल डगर मोहनी मायाक बसमे नै ओझराएब फेर हम पथिक छी जीवनक गोरि देलौं हम मन जीतक झंडा अपना मोनमे अविरल समस्या कठिन परीक्षा किएक नै हुअए जीवनमे पाछू उलटि कऽ नै देखब फेर हम पथिक छी जीवन केर। 17 हमहूँ कनै छी जहियासँ हम अहाँकेँ नै देखि रहल छी साँझ-विहान एक नोर कनै छी। कतए चलि गेलैं अपने छोड़ि कऽ हमरा एतए असगर आगूक दुनियाँ हम अन्हारे देखै छी। सभ पुछैए अहाँक बारेमे कियो अाह करैए हे भगवान केना भऽ गेलै नीक लोककेँ कियो करैए अहाँक बराइ कहू कतए चलि गेलौं हमरा छोड़ि कऽ आइ हमहूँ कनै छी बौओ कनैए माइक आँखिसँ सदिखन नोर झहरैए जखन किछु सोचै छी अहींक यादि अबैए जहियासँ हम अहाँकेँ नै देखि रहल छी। 16 एना किएक अखनो चलै छै समाजमे टंगघिच्चा टंगघिच्चीक खेल ऊपरसँ नूनू बौआ भितरे-भितर कहैए बकलेल बर्षोसँ देखि रहल छी हर तरहसँ दलितक उपेक्षा कएल गेल कहू किएक मैथिली छी हम मिथिलावासी छी तइ लेल? ऐ तरहक निअम बनौनिहार अपने जौं हमरोमे कमी खोजै छी तँ अपनो समाजक चेहरा देखू किएक नै हुनको संग अहिना कएल गेल ऐ प्रश्नक जबाब दिअ समाजक जाति-पातिक नाओंपर बटनिहार अहाँकेँ कहू दलितकेँ हर तरहसँ उपेक्षित किएक कएल गेल कािवल नै बुझू अपनाकेँ अपने छी बकलेल अखनो चलै छै समाजमे टंगघिच्चा टंगघिच्चीक खेल। 15 जितिया गे दैया गितिया माए गेल छौ पोखरिमे नहाइले पावनि छै जितिया होइ छै बड़ भारी तीन दिन धरि सहल रहए पड़ै छै अखन छेँ तूँ अनारी कऽ ले घर-आंगना साफ सुथरा चूल्हि-चौका नीप पोति ले देखैमे लगतौ नीमन आइ बनबिहेँ मरूआक रोटी माछक तीमन जितिया पावनि सभ मिथलानी करै छै बाल-बच्चा घर-परिवारक दुख: कलेश दूर होइ छै बढ़ै छै उमेर पोखरिमे घेराकेँ पातपर खैर-तेल चढ़ै छै खुश होइ छै देव पितर भगवान भोरे सभ खाइ छै आमक अमोट चूड़ाक जर जलपान गे दइया गितिया। 14 डगर जिनगीक ओइ मोड़पर हम बैसल छी जतए देखै छी हरेक तरहक लोकेँ जे अलग-अलग डगरपर चलैए कियो ऊपर चढ़ि गेल कियो बीच बाटमे अॅटकि गेल कियो असफलताक डरसँ पाछू रहि गेल शाइद एकर जिनगी कहैत छै हम अखने धरि असमंजसमे पड़ल छी कि करू किछु नै फुराइए तइ लेल एत्तै बैसल छी बैसल रहब पछुआ जाएब हमरो आब एतएसँ चलए पड़त कोन डगर चली केन दिशा चली अप्पन शक्ती देखि बाट पकड़ए पड़त जिनगीक ओइ मोड़पर। 13 रमल छी रामम धूनमे रमल छी हम संतक सेवामे जुटल छी हम शांतिक संदेश बाटैमे लागल छी हम गाए रक्षा करैक शपथ खेने छी हम वेद पुराण धर्म शास्त्र पढ़ि कऽ अप्पन जीवनमे उतारबाक कोशिशमे लागल छी हम नीज स्वार्थ त्यागी केर लोकहित काममे लागल छी हम जइ बाटपर चलल महात्मा गाँधी महात्मा बुद्ध वएह बाटपर चलल छी हम राम केर धूनमे रमल छी हम। 12 संत नदिमे भसिआएल मुर्दा शांतचित्त भऽ कऽ पानिपर पड़ल अछि एकर नै नाओं अछि नै कोनो पता पानिक रेतक संगे अनजान पथपर चलल अछि कतौ पानिक रेत झकझोरइए तँ कतौ झारीमे फसि कऽ निकलैक प्रसास करैए कतौ नदिक किनछरिमे टकरा कऽ चलैए पानि धार संगे उथल-पुथल होइए रौद-बसात सहैए उगैए तँ डुमैए सफरक एेकरा कोनो ठेकान नै बस पानिक संग चलैए जहिना संत भक्ति-भावमे डुमल रहैए भक्ति मार्गपर चलैए नदिमे भसिआए मुर्दा। 11 बन्हन चुप घरक किछु कहैत छी ई केहेन अजब सन टिस हमर दिलमे होइत अछि जेना लगैए दुख केर नदिसँ बाचि कऽ हम निकलल छी खुशीसँ चिड़ै जकाँ उड़ै लेल चाहै छी हम मुदा पएरमे लागल अछि ई बेरिया बन्हनक ओकरा खोलैले चाहै छी हम एगो भूल भऽ गेल हमरा भूलसँ ओ भूलकेँ भूलैमे खुद अपनाकेँ भूलि गेल छी हम आब हमर अपनो छाँह दोसरकेँ लगैए आ खुदकेँ खोजैले निकलल छी हम। 10 संघर्ष जारी रखब समस्या और बढ़ि गेल सफर अधुरा रहि गेल जीत केर हारि गेलौं हम हरेक कोशिश नाकाम भऽ गेल तखनो अप्पन हौसला नै हारने छी हम हर डेंग संघर्ष जारी रखब अनजान अनभिज्ञ ई समए कतै तक लजाइए हमरा विरह केर भीरसँ मुदा एकर डर नै अछि लड़ैत रहब अप्पन समाजक अधिकारक लेल लोग हमर काम देखि हँसैए हमरापर नेकिप कहै डर हम एहेन जीनगी जिनाइसँ कोन फाइदा जइमे संघर्ष नै अछि एतए सभ अप्पना-अप्पना लेल जिबैए जीने तँ अोकरा कहल जाइए जे समाज कल्याणक लेल जबैए मरलाक बादो सदिखन हुनकर कृति जिवित रहैए अहू ओ अही डगरपर हमहूँ चलल छी। 9 भरदुतिया आइ छिऐ सुकराती गे मुनिया दिआरी डिबियामे कर तँू तेल एम्हर आउरो मंगला हुका-बाती खेल ई पावनि त्योहार छै मेल मिलाप करैक सभ संग कऽ ले मेल प्रेमसँ रहैमे नै होइ छै कोनो परेशानी दीप जरा हुका जरा-बाती खेल केलह विहाने दइयाक सासुर जहीमे भरदुतिया पावनि छै न्योंत लिहेँ देतौ हाथमे पान-सुपारी आसिरवाद लिहेँ देखिहेँ हुरा-हूरीक पहलमानी फटाका-फुटुकीक नै कर क्षेल आइ छिऐ सुकराती गे मुनिया। 8 गवहा संक्राति बड़ अनचित भेल गृहस्त सबहक संग ऐबेर खेतीमे लगाउ खर्चा मेहनति-मजदुरी सभ बाढ़िक चपेटिमे चलि गेल पावनि-तिहारमे सेहन्ता अगलै रहि गेल आजुक दिन गवहासंक्राति अछि अन्न-धनक घरमे कमी देखै छी केना कऽ अहीबेर खेतक आड़िपर जा कऽ कहब सेर-बरोबरि उखैर सन बीट समाठ सन सिस जेम्हर देखै छी खाली खेत खसल अछि चारू दिस प्रश्न कऽ रहल अछि हमरासँ खेतक आड़ि आ मेर खेतमे अगबे अछि बालुक ढेर केना कऽ गुजर चलत उपजा कऽ कास-पटेर बड़ अनचित भेल गृहस्त सबहक संग ऐबेर। 7 किमती भोट हरेक पाँच बर्खपर जन प्रतिनिधि हम सभ चुनै छी राज्य सभासँ संसद धरि पहुँचाबै छी अपन किमती भोट दऽ कऽ जिताबै छी चुनवक भार हम जनता सभ उठाबै छी मुदा जीत गेलाक बाद ई नेता-मंत्री अपनाकेँ बुझैए महान कहू विकासशील देशक श्रेणीमे रहल विकसित कहिया बनत हिन्दुस्तान लोकतंत्रक हिनका परबाह नै देशक विकासक हिनका चाह नै सामंतवादी सन रखैए अपन सोच मन-मोताबिक करैए विकासक रूपैया केर खर्च माननीय हिनका केना कही एक नम्मरक अछि ओ चापलूस बेइमान कहू विकासशील देशक श्रेणीमे रहल विकासित कहिया बनत हिन्दुस्तान एक दिस विश्व बैंकसँ कर्जा लऽ रहल अछि दोसर दिस धांधलीक रूपैया विदेशमे जमा कऽ रहल अछि देशक कोन तरह कमजोर बना रहल अछि लोकतंत्रकेँ कऽ रहल अछि अपमान कहू विकशित देशक श्रेणीमे रहल विकसित कहिया बनत हिन्दुस्तान। 6 असली-नकली मोन जौं चोन्हराएत तखन की करबै कलयुग अछि कछु भऽ सकैत अछि असली-नकलीमे फर्क कोन की झूठ की साँच तर्क कोन सभ एक्के सिरहने पड़ल अछि आइक परिस्थितिमे नीक कही तखनो गेलौं बेजाए कही तैयो गेलौं तइ दुआरे हम मुँह लटकेने छी कखन की भऽ जाएत से कोनो ठीक नै सभ किछु देखि कऽ आँखि मूनि लेब मुदा चुप रहब सेहो ठीक नै समए सभ दिन अहिना थोड़े रहतै हरेक प्रश्नक जबाब जरूर भेटतै मौन जौं चोन्हराएत तखन की करबै। 5 कोसी माइहे कतेक हम कनलौं-खिजलौं कतेक नोर बहेलौं सनइ-पटुआ कास-पटेर अल्हुआ-मरूआ उपजा कऽ गुजर-बसर हम केलौं सहलौं बड़-बड़ कष्ट बाढ़िमे घर-द्वार विहिन चैन-विवेके हम रहलौं सोचि-सोचि कऽ कए परेखि समए बितेलौं व्यर्थ-फिजुल कऽ देलिऐ मिथिलाकेँ दु-भागमे पूबमे सहरसा-सुपौल पछिममे मधुबनी-दरभंगा बिचमे अगबे बालु आ धूल कहू आब कतेक चुप रहब ऐबेर हम बना देलौं पुल रोजी-रोटीक अवसर भेटल हँसै छल जे दुनियाँ आब हमरा देखत शिक्षाक नव-ज्योति जगत जाएत पढ़ैले बेटा-बेटी कओलेज-स्कूल माइहे कतेक हम कनलौं-खिजलौं कतेक नोर बहेलौं। 4 मच्छर रानी सूनसान रातिमे चुपचाप नंगे पएर लग अबैए भन-भन करैत छोट-नटखटी सुकुमारी प्यारी-दुलारी मच्छर रानी चोंच नोकिला नयन कटिला अछि बड़ सियानी उघार देह देखि कऽ करैए हमरा संग छेड़खानी कखनो गाल-चुमैए कखनो खून चुसैए प्यास नै लगैए जेना कहाँ पिबैए पानि भरि राति जागि कऽ हम एकरा संगे राति बितबै छी होइए बड़ परेसानी आब एकरासँ बचबाक करब उपाइ रोजे राति कऽ लगाएब मच्छरदानी सूनसान रातिमे चुप-चाप नंगे पएर लग अबैए। 3 हरिजन हिन्दु मुसलिम सिख ईसाइ सभकेँ कहै छी सभसँ पुछै छी किएक भेल दू रंगक मोन हम दलित छी मेहनति-मजदुरी कए कऽ बितबै छी अपन जीवन तैयो जरैत अछि लोक देखि कऽ जरै केकरो तन करै अछि छुआ-छूतक भेद-भाव मंदिर पूजाघर जेबासँ करैत अछि वंचित एखनो एकैसम सदीमे हरिजनक संग किएक कऽ रहल छी अहाँ सभ अनुचित हिन्दू-मुस्लिम-सिख ईसाइ। 2 हम छी मैथिली हम छी मैथिल जे बजै छी वएह लिखै छी जे देखै छी वएह कहै छी स्वयं दलित छी दलितक दरद जनै छी किछु व्यक्तिक किरदानीसँ चकित छी दलित भऽ कऽ ओ व्यक्ति अपनो समाजकेँ बिसरि गेल अप्पन भाषा-भेष छोड़ि कऽ दोसरक रंग-ढ़ंगमे ढलि गेल नाओं मात्रसँ दलित कर्मसँ बहूरुपिया बनि गेल साहित्य जे समाजक आइना मानल जाइए ओहूमे अप्पन नामक खातिर अप्पन बोली-भाषा तक बिसरि गेल तइ दुआरे दलितक स्थिति जस-के-तस रहि गेल हम छी मैथिल। 1 बौकी मांगि-चांगि कऽ बौकी जीवन अपन बितबैए कोइ दइ बाइस भात-रोटी कोइ दइ फाटल-पुरान वस्त्र ओइ फाटल वस्त्रसँ झाँपने अपन तन बेइमान भेल अछि लोकक नजरिमे उजरल-पुजरल अछि टुटलघर बसल अछि ओ गामक कातमे जिनगीक फिकिर नै इज्जतिक छै डर पोसने अछि दुगो सुगर जे भागल फिरैए गाछी-गाछी-बासे-बाँस चरबै ले जाइए दिन-दुपहर दुनियासँ अछि ओ बेखबर मांगि-चांगि कऽ बौकी जीवन अपन बितबैए। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। १.जगदीश प्रसाद मण्डल २.अनिल मल्लिक ३.कुसुम ठाकुर १ जगदीश प्रसाद मण्डलक गीत गीत-1 मीत यौ, गृहनीक गारि सुनै छी मीत यौ गृहनीक गप सुनै छी। गाम-गाम आ गृह-गृहमे गसल गीरह देखै छी मीत यौ, अहींटा कहै छी मीत यौ गृहनीक कथा कहै छी। गीरहक बीच गृही गुहाएल छै गूह बीच जुट्टी समाएल छै देखि-देखि चटिआइ छै, मीत यौ, देखि-देखि चटिआइ छी अहींटा कहै छी, मीत यौ गृहपति सभ बनए चाहै छै नै पाबि घुड़-मौड़ करै छै। घुड़-मौड़सँ घुरिया घुरै छै अहींटा कहै छी, मीत यौ गृहनीक गारि सुनै छी लाजे-धाक मरै छी, मीत यौ अहींटा कहै छी। गीत-2 हे बहिना, हे बहिनी जीवन संग जिनगी बदलै छै। अपने बदलि किछु, किछु बदलैयो पड़ै छै किछु अपने सुधरि, किछु सुधारैयो पड़ै छै। जीवन संग जिनगी बदलै छै। हे बहिना हे बहिनी, जीवन.... संगे-संग मिलि खेललौं-धुपलौं संग-संग रहि संगी कहलौं। पकड़ि बाँहि बहिना कहेलौं फूल-प्रीत बनि सासुर बसलौं हलसि-हलसि मन हँसै छै जीवन संग जिनगी बदलै छै हे बहिना, हे बहिनी एक बहिन ओद्रक कहबै छै सहस्रो समाज गढ़ै छै। बहिनासँ दीदी, दीदीसँ दादी हँसि हँसि मन तड़पै छै। हे बहिना, हे दिदगर जीवन संग जिनगी चलै छै। चलि-चलि रंग बदलै छै हे बहिना, हे बहिनी जीवन संग जिनगी बदलै छै। गीत-3 हे बहिना, हे दीदी, हे दादी सुरति केना बदलतै हे... प्रीतिक रीति कुरीत बनल छै रीति-सुरीति केना पेबै थाल-खिचार घर-द्वार बनि फल वृक्ष कल्प कहिया देखबै। हे बहिना हे संगी, हे प्रेमी सुरति केना बदलते हे.... जहिना जहर तहिना फुफकार नाग, गहुमन डॅसैत रहै छै। करम-भाग मनतर जपि-जपि अगुआ-पछुआ धरैत रहै छै। हे प्रीतिया हे रीतिया नीक फल कहिया देखबै हे नीक फल कहिया देखबै। जगदीश प्रसाद मण्डलक कविता- अनेरुआ वन जुग-जुगसँ जनमैत एलै जंगल वन लगैत गेलै। गुण-अवगुण बिनु बिलगौने संग-संग सहेजति गेलै। जे जेना-जेना जगैत उठल से तेना-तेना जगजिआ लगल जे जेना-जेना पछुआए उठल से तेना-तेना पछुआए लगल। मुदा नै, आरो किछु भेल? आगुओ उगल पछुआए लगल पाछुओ उगल अगुआए लगल। ने सबहक कद-काठी समान ने सुर्जक दिन-रातिक मान। मान-समान समतल बिनु किछु दबि किछु फुफुआएल। कान्ह मिला देखि-सुनि तरसि-तरसि झुझुआए लगल। तहिना मनुक्खोक बीच वन रंग-बिरंग चतरल अछि। दुभि-लत्ती ऊपर पेड़ पसरि तँ लत्तियो गछाड़ि चतरल अछि। फँसरी फँसरी लगा धड़ैन लटकलौं पिताएल मन सभ किछु केलौं। फँसरी जखन बैसल गरदनि मन पड़ल दोसर मरदनि। सुख-दुख मरदनि जनमाबए संगे दुनू कात हटाबए। आद्र एक रहितो दुनू एक दोसरकेँ दूर भगाबे। लगल फँसरी जहाँ तनाएल दम फुलि देहो कठुआएल। गरदनि पकड़ि पोखरि जहिना हँसि-हँसि हरदा बजबाएल। जेना-जेना गीरह कसैत गेल तहिना जिनगी मन पड़ैत गेल। चक्र चलैत देखि-देखि जिनगी तड़तड़ा-तड़तड़ा खसैत गेल। ऐ सँ नीक तँ फाँसी होइ छै किछु कऽ धऽ कऽ तइपर चढ़ै छै। घरक फँसरी अॅतरी दुहै छै हार रस सूधि स्वान पबै छै। २ अनिल मल्लिक गजल अहाँ के देखब कोना आब हम, अछि हमर भाग जडल अहाँ सॉ भेटव कोना आब हम, अछि हमर भाग घटल सँगे चलबै जीवन भरि बचन इ, जे अहाँ तोडि देलिएै समेटब कहू कोना आब हम, स्वप्न हमर भाफ बनल अहाँ लेल खेल छल किछु दिन के, की कोनो मजबूरी छल सूनलौं ने किया किछु हमर, मोने मे हमर बात रहल बन्द अछि मुट्ठी मे खुसी हमर, इ केहन भरम मे छलौं सुखल बालु जकाँ जे ससरल, खाली हमर हाथ रहल फटैत छाती ल देखैत रहलौं, घुरि कs अहाँ तकलौं कहाँ देह के राखू कतेक दिन हम, देखू हमर जान चलल राति जे छत पर छलौं देर तक, कारी असमान तकैत जेना बादल हम छलौं ठहरल, ओ हमर चान चलल जागल छी बहुत दिन सॉ आब, सुतितौं हम चिर निद्रा मे निन्द आबै कहाँ कहियो जेना, आँखि मे हमर काँट गडल ----- (सरल बर्ण २२) ३ कुसुम ठाकुर हाइकू समृद्ध भाषा मैथिली मिथिलाक जायत हेरा लाज होइछ बाजब कोना भाषा पढ़ल हम दोषारोपण नेता अभिभावक नहि कर्त्तव्य देशक नेता नहि जनता केर स्वार्थे डूबल करू ज्यों स्नेह माँ आ मात्रि भाषा सँ संकल्प लिय आबो तs जागू मिथिला केर लाल प्रयास करू अबेर भेल तैयो विचार करू अछि सन्देश ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। १.चंदन कुमार झा २.पवन कुमार साह १ चंदन कुमार झा सररा, मदनेश्वर स्थान, मधुबनी, बिहार हाइकू चैतक मास पछबा हन-हन माल चरैए । पड़रु पीठ बगुला बइसल ढील फँकैए । बूट मटर ओरहा सोन्हगर मुँह पकैए । आम्र मज्जर टिकुला लुधकल लुक्खी खाइए । जुड़-शीतल कटहर के बर बड़ी पकैए । हर्षित मोन कोइलीक बाजब गीत लगैए । (1.)-भूख भूख निज-मानक जमाना मे केहन पसरल, लोक दोसराक सनमान करबहु बिसरल ।। अनका नीच देखेबा मे बुझय अपन श्रेष्ठता, सभ सँ श्रेष्ठ अपना के छै सभ बुझि रहल । निज-स्वार्थ सधबा मे रहय हरदम लागल , घेँट कटलै जँ ककरो त', हमर की बिगड़ल | (2)-"बिहाड़ि" छल दशो दिशा स्तब्ध, शांत, दम सधने, भयाक्रांत, गुमकी आ' उमस मेँ, सुखा रहल छल कंठ, चित्त भ' गेल छल- अक्खत तीत्त, फड़फड़ा रहल छल प्राण । पसरल छल वातावरण मे, सभतरि सन्नाटा । मुदा- पोखरिक मोहार परहुक, तारक गाछक कतार, आ' चौबटिया परहक, विशाल वटवृक्ष मात्र, करा रहल छल, अपन श्रेष्ठता एवम् विशालताक आभास क्रमशः, जना रहल हो जनु, अपन साम्राज्यक विस्तार केँ । आ'कि- उठैत अछि प्रबल-प्रचण्ड, प्रकृति-कोमलांगी के , वन-उद्यान के छाती चिड़ैत बिर्ड़ो । क्षणहि मे मचि जाइछ प्रलय, अर्रा-अर्रा खसय लगैछ, अभिमान सँ उठल तारक मूड़ी, आ' सीर समेत उपरि, खसैत अछि वटवृक्षो हारि, एहने होइछ बिहारि । २ पवन कुमार साह जीक पद्य- गीत- अहाँ बिनु हम केना रहब हमरा बता दिअ अहाँ बिनु हम जीअब कि मरब हमरा बता दिअ अहाँ बिनु...... अहीं चैन छी हमरा अहीं तँ निन्निया सुख-दुख हमर अहीं तँ सजनियाँ अहीं जीवन हमर अहीं तँ परनिया सभ किछु छी हमर अहीं तँ सजनियाँ सजनी बिनु हम केना रहब हमरा बता दिअ अहाँ बिनु......... देखू हमर चेहरा केहेन भऽ गेलए मिलैक बिनु अहाँसँ मुर्झा गेलए सूरति अहाँक हमर जीगरमे गड़ि गेलए मिलैक लेल दिल तड़सि कऽ रहि गेलए अहाँसँ हम केना मिलब हमरा बता दिअ अहाँ बिनु.....। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। १. आनन्द कुमार झा २.निशान्त झा १ आनन्द कुमार झा मैया अहाँ बसै छी मैया अहाँ बसै छी मिथिला नगरीक माँटिमे पुण्यभूमि उच्चैठमे ना कखनो काली बनि अहाँ एलौं कखनो दुर्गा अहाँ बनि गेलौं कखनो सीता बनि कऽ अहाँ भेटै छिऐ खेतमे मिथिला नगरीक माँटिमे ना मैया अहाँ… मण्डन भारती सेवलनि धाम रखलिअनि हुनको अहाँ शान कालिदासक आस पुरेलिअनि एकहि रातिमे पुण्यभूमि उच्चैठमे ना मैया अहाँ… जे किओ जपलनि अहाँ केर नाम पुरित कए देलिअनि सभ मांग एहि बेर बारी अछि आनन्दक एहि पाँतिमे पुण्यभूमि उच्चैठमे ना मैया अहाँ… २ निशान्त झा १ हमरा संगे छत पर आबू देखू बहाना नै बनाबू चान क माथ दुखाइत अछि हमरा संगे ओकर माथ ससारू देखू बहन्ना जुनि बनाबू चान क माथ सेहो हल्लुक होएत आर हमर आंगुर अहाँक आंगुर सँ छु जाएत चान केँ आ हमरा सेहो नीक नींद आएत आब चलियो आबू देखू बहन्ना जुनि बनाबू .................. २ कए सालसँ सुनैत आबि रहल छी, बेटी तँ पराया धन होइत अछि , जकरा हम सहेजै छी, सम्हारै छी , अपन जान सँ बेसी मानैत छी , आ फेर चलि जाइत अछि ओ एक दिन, अपन तथाकथित स्वामी लग। मुदा एक बातक उत्तर देता कियो हमरा , भला किएक कियो अपन धन केँ , आपस लैमे सेहो धन माँगैत अछि , वा फेर अपन धनकेँ अनैहते , जरबैत अछि आकि घरसँ निकलि बाहर करैत अछि | जँ नै तँ किएक दहेजक आगिमे, जरैत अछि हजारो बेटी, आकि दर दर ठोकर खाइ लेल मजबूर अछि , अपन बाबुक ओ राजदुलारी, दोष नियतिक अछि आकि अछि समाजक, की यशोदा सेहो आन बुझलक, आ देवकी सेहो नै अपनेलक| ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। डॉ॰ शशिधर कुमर, एम॰डी॰(आयु॰) – कायचिकित्सा, कॉलेज ऑफ आयुर्वेद एण्ड रिसर्च सेण्टर, निगडी – प्राधिकरण, पूणा (महाराष्ट्र) – ४११०४४ कोयली कानय भोरहि सँ (कविता) याद अबैछ गुरुदेव रबिन्द्रक, * कोयली कानय भोरहि सँ । मिथिला केर इतिहास लिखायल, सभदिन अगबे नोरहि सँ ।। लागल कोन कुहेस हटए नहि, सुर्य अस्त छथि भोरहि सँ । मिथिला – मैथिल केर दुर्गति, देखथि विद्यापति ओरहि सँ ।। जन्मभूमि जननी ओ भाषा, बिसरि गेलह बढ़ि स्वर्गहु सँ । हे मैथिल ! धिक्कार थिकह, जिनगी बत्तर छह नर्कहु सँ ।। लाज होइछ निज जिनगी पर, हमसभ बत्तर छी चोरहि सँ । शपथ लैत छी, हम लड़ब, जत होयत हमरा जोरहि सँ ।। तन मन धन जत भाग हमर, मिथिला - मैथिली लए अर्पित अछि । हमर लेखनीक हरेक शब्द, निज भाषा लए संकल्पित अछि ।। आशीष दियऽ हे माए मैथिली, पुर्ण करी निज इच्छा हम । तोड़ि सकी हर एक व्यूह केँ, करी शत्रु केर चेष्टा भंग ।। * गुरुदेव रबिन्द्र = मैथिलीक सुप्रशिद्ध कवि व लेखक श्री रबिन्द्र नाथ ठाकुर (नञि कि बाङ्गालक स्व॰ रविन्द्रनाथ टैगोर) । नेनपनहि सँ हमर कान मे जे पहिल मैथिली गीत गूँजल आ हमर स्मृति पटल पर मैथिली साहित्यक प्रति अटूट सिनेह ओ निष्ठा जगओलक से छल श्री रबिन्द्र नाथ ठाकुर ओ श्री जगदीश चन्द्र ठाकुर ‘अनिल’ जीक गीत सभ । ओहि समय मे हिनक गीत सभ ततेक ने प्रशिद्ध छल जे गाम सँ पटना धरि हरेक गोटेक ठोर पर अनायासहि अबैत रहैत छल । मञ्च पर श्री रबिन्द्रजी आ स्व॰ महेन्द्रजीकेँ सुनबाक सौभाग्य बहुत बाद मे पटनाक विद्यापति स्मृति पर्व समारोह मे भेटल आ भेटैत रहल परञ्च गाम घऽर मे बहुत नेनपनहि सँ हर वयसमूहक लोक सभ सँ सुनल हुनिक गीत सभ हमरा प्रेरित करैत रहल । ताहू मे श्री रबिन्द्रजीक गीत “की थिक मिथिला, के छथि मैथिल” हमर मोन मस्तिष्क केँ हमेशा झकझोड़ैत रहल आ एखनहु झकझोड़ैत रहैत अछि, एहि प्रश्नक सही उत्तर तकबाक लेल बेर – बेर प्रेरित करैत रहैत अछि आ शायद आजीवन करैत रहत । तेँ ओ लोकनि हमर मैथिली साहित्यक क्षेत्र मे गुरु भेलाह । ओना तँ हमर ई गीत २५ – ०३ - १९९८ कऽ लिखल गेल छल । पर गुरुदेव श्री रबिन्द्र नाथ ठाकुरजीक हुनक ६७म जन्मदिनक अवसरि पर हुनिका प्रति आदर व्यक्त करैत आइ ई गीत प्रकाशित कए रहल छी । हुनिक जन्म ०७ अप्रिल १९३६ ई॰ कऽ पुर्णिञा जिलाक धमदाहा गाँव (दक्षिणबारि टोल) मे भेल छलन्हि । तीन तिरहुतिया, तेरह पाक (गीत) तीन तिरहुतिया, तेरह पाक । अप्पन ढोलक, अपनहि थाप । चेतह आबहु, नञि तँ फेरहु, होयतह ओएह, ढाकक तीन पात । तीन तिरहुतिया, तेरह पाक ।। एक दोसरा सँ छकि कऽ लड़लह, खूब परस्पर टाँग तोँ झिकलह । सोति असोति आ बड़का छोटका, जानि ने की की आओरो बँटलह । उत्तराहा दक्षिणाहा कएलह, आओर पुबरिया पछबरिया । जाहि बाट पर रोज चलै छह, खानि लेलह ओएह पर खधिया । कालीदास सत्तहि पुरखा, की काटि रहल छह, नञि छह भाख । तीन तिरहुतिया, तेरह पाक ।। अपना बीच तेहल्ला पैसलह, कमजोरी तोर भाँपि ओ गेलह । परिकल भेदिया, कयल हिसाब, तेरह, छब्बीस हो बड़ भाग । नऽव - नऽव परिभाषा गढ़लक, साँच युधिष्ठिर सन ओ बजलक । अंग - बज्जि - मिथिला मे भेद, तिरहुत – कोसी – सीमा देश । कहलक कान लऽ कौआ भागल, कान के देखए ? कौआ ताक ! तीन तिरहुतिया, तेरह पाक ।। मैथिल फोरलक, मिथिला डाहलक, मैथिलीक सेहो चिता सजओलक । भाँग पिया, भकुअओलक सभ केँ, सभ मैथिल केर बुद्धि हेरओलक । अपनहि “ओ” अदृश्य बनल छल, मुरूख मैथिलहि ऊक उठओलक । भाँग पीबि बेमत्त नचए छल, नीक – बेजाए, ने बूझि सकै छल। एतबा मे किछु मैथिलजन केँ, षडयण्त्रक भेलन्हि आभास ।* तीन तिरहुतिया, तेरह पाक ।। किछु मैथिलजन सजग भेलाह, * जरबाक गन्ध चीन्हए लगलाह । टीनही चश्मा जे फेकलन्हि तँ, अपनहि महल जरैत देखलाह । मैथिल अपनहि फानि रहल छल, अपनहि अपनहि ठानि रहल छल । पानि के लाओत, आगि मेझाओत ? भेदियेक बात गुदानि रहल छल । तइयो सजग – सचेत – धीरमति, * मानल नञि भेदिया सँ हारि । तीन तिरहुतिया, तेरह पाक ।। अपना घऽर मे शेर बनथि, आ बाहर डऽरेँ लंक धरथि । मैथिल केँ भेटल छल श्राप, पर कहिया धरि तकर प्रताप ? हरेक चीज केर होइतछि अन्त, की एहि श्रापक नञि अवश्रंस ? बाट ने ताकू - अओताह राम, अपनहि हाथ, अपन सम्मान । मुट्ठी भरि ओहि सजग पूत केर, ** व्यर्थ ने जायत अथक प्रयास । तीन तिरहुतिया, तेरह पाक ।। * मिथिलाक ओ सपूत लोकनि से मिथिला, मैथिली ओ मैथिलक उत्थान हेतु कोनहु प्रकारक सार्थक प्रयास कएलन्हि वा योगदान देलन्हि – चाहे ओ कोनहु जाति, धर्म वा वर्ग विशेषक होथि । संगहि ओहो सपूत लोकनि जे मैथिल नहिञो रहैत मिथिला आ मैथिलीक विकास मे अपन सार्थक योगदान देलन्हि । ** ओना नाँव लिखल जाए तँ एहि सपूत लोकनिक संख्या बहुत बुझना जायत पर समस्त मैथिलगण केर संख्याक अनुपात मे ई नाँव सभ मात्र “मुट्ठी भरि” गनल जाएत । नञि पत्र एकहु टा लीखल (गीत) पहु गेलाह परदेश सखी ! दिन - मास कतेकहु बीतल । नञि पत्र एकहु टा लीखल ।* नञि पत्र एकहु टा लीखल ।। सगर पहर हुनिकहि छवि मनमे, हुनिकहि पर जी टाँगल । पर नञि सखि हुनिका सुधि कनिञो, हम छी केहेन अभागलि । विरह बेदना केहेन सखी, से हऽम एही बेर सीखल । नञि पत्र एकहु टा लीखल ।। दिन मे हुनिकहि याद अबैतछि, राति मे हुनिकहि सपना । कौआ कुचरय अहल भोर सँ, तदपि ने आबथि सजना । भेल बसन्त सखी पतझड़, नित नैन रहैतछि तीतल । नञि पत्र एकहु टा लीखल ।। प्रियतम जञो दूरहि रहताह, की होयत रहि भरि अङ्गना ? ककरा लए शिंगार करब, ककरा लए पहिरब कङ्गना ? चान कठोर रहैछ मुदा, लगइत अछि अतिशय शीतल । नञि पत्र एकहु टा लीखल ।। * ई गीत आइ सँ १० - १५ साल पहिनुक सन्दर्भ मे लिखल गेल छल, जखन कि पूरा गाँव या परोपट्टा मे कतहु – कतहु कोनो एक गोट टेलीफोन बूथ होइत छलै । आ ओहि टेलीफोन बूथ पर राति मे अमुक समय सँ अमुक समय धरि STD कॉल केर पाइ आधा, अमुक समय सँ अमुक समय धरि तेहाइ आ अमुक समय सँ अमुक समय धरि चौथाइ पाइ लगैत छलै । एहिना स्थिति मे कनिञा – बहुरिया लोकनि केँ परदेश मे काज कएनिहार अपन - अपन प्रियतम सँ सीधा बात करब सम्भव नञि होइत छलन्हि । ओना मोबाइल केर चलती सँ बहुधा आब ई स्थिति नञि अछि तथापि मिथिला मे एखनहु एहि गीतक सन्दर्भ किछु हद तक प्रासंगिक अछि । ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। १.राम विलास साह २. प्रभात राय भट्ट १. राम विलास साहु जीक दू दर्जन कविता- गंजन- 24 बड़-बड़ गुर गंजन सहैए मिश्री नाओं धड़बैए पीटि-पीटि सोना आगि तपि कसौटी रगड़ि चमकैए चौदह बरख वन घुमैत वनबासी जिनगी बितबैत पुरुषोत्तम राम कहबैए केकरा कहबै सुख-दुख दुखसँ उपजए सुख दुखियाक सारथी भगवान बनैत सुखिया गंजन सहैत अज्ञात बास काटैत पाण्डव नित हरि दर्शन करैत सुखियाक साथी सभ बनैए दुखियाकेँ ने कोइ दुखक अंत एक दिन होइए सुखसँ संकट बढ़ैए बड़-बड़ गुर गंजन सहैए मिश्री नाओं धड़बैए। कर्मक फल- 23 कर्मक फल अवश्य मिलै छै जानि-बूझि जौं करै छै हानि होइ छै धन जन अभिमानक हािन सभ तरफ होइ छै नकिहानि काज नै होइ छै छोट-पैघ कर्मसँ लोक होइ छै छोट-पैघ जेहेन सोच ओहेन काज होइ छै भावनाक संग भाव नदी सन बहै छै सभकेँ सुख मिलए, दुखक अंत होइ छै कर्ता पुरुषक पूजा सभ करै छै कर्मसँ भाग्य बदलै छै कर्म पूजा कर्म महान जगतमे होइ छै अमर नाम सूतल जागलमे फर्क होइ छै सूतलमे भाग्यक विनाश होइ छै जागल पुरुषकेँ नाश नै होइ छै कर्मक फल अवश्य मिलै छै जानि-बूझि जौं करै छै हानि। प्रेमक बान्ह- 22 आशा-निराशा भेल पिआ कतेक दिन रहब अहाँ परदेश आँखिक नोर बहए दिन-राति सबूर बान्हि जीबै छी कहुना दिल धक्-धक् करैए अहिना धैर्य टूटि गेल हमर करम फूटि गेल सोगमे रोग बढ़ि रहैए तन धधकैए मोन बरसैए आँखि-आँखिसँ बहैए निरंतर नोर किएक तरसाबै छी दिल हमर छन-छन बितैए जिनगी अनमोल कि राखल छै परदेशमे आउ मिलि रहब अपने घरमे नारी-पुरुष जिनगीक दुपहिया छी दुनू मिलि गाड़ी समरूप चलै छै परिवार समाजक िनर्माण होइ छै देशक प्रगति दिन-राति होइ छै जल्दीसँ लौटो अपन देश सभ दिन काज नै देत परदेश कतेक सबूर बान्हब हम दिलक अरमान सभ चूर भल गेल। बिनु प्रेम जिनगी बेकार अछि प्रेमक बान्ह सभ बान्हसँ मजगुत नै तोड़ि सकै छै कोनो काल जहिया तक संसार रहत सुरुज-चान गबाह रहत प्रेम अविनासी अमर रहत। जीबैत चलू- 21 जीबैत चलू खाति-पिऐत चलैत रहू सत्यक राह पकड़ैत चलू जिनगी अमर नै होइ छै नीक काज करैत चलू जीबैत चलू। कर्म अमर होइ छै जिनगी ओहीले मिलै छै सत्यक बाटपर ठाेकर बड़ लगै छै गिड़ैत-पड़ैत चलैत रहू जीबैत चलू। जाधरि सांस चलैत रहत संसारक जाल बढ़ैत रहत माया ममता दूरसँ रहू अनकर धनसँ परहेज करू जीबैत चलू। जिनगी जीबाक लेल नै नीक काज लेल होइ छै कर्म-सुकर्म संगै जाइ छै सभ किछु अहीठाम रहि जाइ छै कर्मक फल बाटैत चलू सबहक हीत करैत चलू किछु करैत चलू जीबैत चलू। बिसरल गीत- 20 कोइली बैसल आमक डारिपर झूलि-झूलि गाबए बिसरल गीत सूतलमे जगबए नीन मधूर गीतक स्वर सुनि मोन भेल विभोर बेर-बेर कोइली सुनबए दुख भरल सनेस बिसरल प्रेमक सिनेह दिलक दरद रहि-रहि जगए पिआसँ कहिया हएत भेँट बिसरल गीत मौलाएल मोन सुक्खल तन जेना उजरल वन कहिया हरिअर हएत ई प्रेमक बंधन कोइली सुनबए बेर-बेर बिसरल गीत। जड़ैत दीप-19 आगिसँ आगि जड़ैत पानिसँ मेटैत पिआस दीप जड़ैत आगिसँ हवा दइ छै मुझाए जड़ैत दीप अपन ज्योतिसँ जगमग करैत जगत घूरक आगि रसे-रसे सुनगि हवासँ नै मुझाए जौं मुझाबए हवा घूराकेँ सुनगि जरबए जगत आगि नै जानए भेद सभकेँ जरबए एक्के संग जीनगी अछि दू-चारि दिनक फेर हएत अनहरिया राित कर्त्तव्य-धर्मक पालन करैत पथपर चलू दिन-राति चलैत रहू जाधरि अछि जिनगी जहिना दीप जड़ै छै ताधरि तेल रहै छै बाती संग अपन जिनगीक अनहरियामे दोसरकेँ राखए इजोरियामे तहिना मानव, मानव लेल उपकार करैत जड़ैत रहू जाधरि लहू अछि अहाँ संगे। गामक नारी-18 मन्द–मन्द हवा सिहकए फूलक पंखुरी झरि-झरि गिरए छने-छन मौसम बदलए कखनो रौद कखनो छाह पड़ए बिनु वसन्त बहार बनए खेतक आड़िपर गामक नारी कन्याँ-बहुरिआ नवतुरिआ फाँढ़ बान्हि खेतमे काज करए भूलल-बिसरल सोहर-समदौन बिरहा-विदेशिया गीत गाबए बाट-बटोही सुनि-सुनि बाट भूलि लजाइ छलै कहैत बाट चलैत छलै गामक नारी- देशक छी हितकारी देशक िनर्माणमे करैत अछि साझेदारी। पियासल धरती-17 पियासल धरती तड़सि रहल अछि काल-कोठरीमे छिपल बदरिया धरती सूखि दड़ारि पड़ल अछि सूखि दुबैक कमजोर पड़ल अछि गरमीसँ हाहाकार मचैए चिड़ै-चुनमुल मुँह खोलि बैसल अछि घास-पात सूखि जड़ैत अछि चास जड़ैक देखि खेतिहर माथपर हाथ लऽ सोचि रहल अछि पानि-बिनु जिनगी तड़पि रहल अछि माल-जाल भटकि मरि रहल अछि पोखरि-झाखरि डबरा-नदी सूखि रहल अछि नाओं-निशान मिट रहल अछि सूखि-सूखि धरती फाटि रहल अछि पिआसल धरती तड़सि रहल अछि िनर्दय छल मेघ मुदा दयावान भेल गरजैत-बरसैत कारीमेघ ऊमरल पानि बरिसल घन-घोर भाटल दरारिसँ- बेंगक बरियाती सजि निकलि पड़ल सभरंगा गीत उछलि-कुदि गाबए लगल कारी मेघ झुमि-झुमि बरसि रहल अछि धरतीक पिआस मरि रहल अछि धरतीक पिआस मरि रहल अछि। चिंता-चिता-16 आगि जड़ैत सभ देखै छै दिल जड़ैत ने देखै कोइ चिंता-चितामे अन्तर छै चितापर मरल जड़ै छै चिंतामे जीविते जड़ै छै समुद्र उधियाइत सभ देखै छै दिल उधियाइत ने देखै कोइ लकड़ी जड़ि कोइला बनै छै कोइलामे हीरा खोजै छै चिता जड़ि सदगति मिलै छै चिंतामे जड़ि मणी खोजे छै बिनु चिंता नै दुनियाँ चलै छै चिंतामे लोक सभ दिन जड़ै छै चितामे अन्त होइ छै चिंता सभ जीबैत करै छै चितापर मरल चढ़ै छै आगि जड़ैत सभ देखै छै दिल जड़ैत ने देखैत कोइ। मातृभूमि-15 हमर मातृभूमि जानसँ अछि प्यारी खूनसँ भीजल धरती पवित्र भूमि सजल वन उजाड़ि वॉटै छी क्यारी हमर मातृभूमि धन सम्पतिसँ भरल-पड़ल नीत दिन सोना उगलैए खाए-पीब कऽ फूलै-फड़ै छी हम सभ मिलि ओकरे विनास करै छी हमर मातृभूमि जानसँ अछि प्यारी निवारण नै उजाड़न छी विनासक कारण हम सभ छी अपन मातृभूमिकेँ अपनेसँ विगाड़ै छी िनर्मल भूमि हवा-पानि प्रकृतिक रचनाकेँ बिगाड़ै छी मातृभूमि बचेबाक लेल अपन भूमिकेँ रक्षा-सुरक्षाक नित्य करू तैयारी बनू पूजारी हमर मातृभूमि जानसँ अछि प्यारी। मिथिलाक अभिनंदन-14 नीत भोरे सुरुज करए मिथिलाकेँ अभिनंदन साँझ करै छै तरेगन-चान भरि राति जगि-जगि भगजोगिनी करै अभिनंदन मिथिलाक भूमि महान माटि-पानि अमृत समान भोरे पूर्बा साँझ पछिया करै छै मिथिलाक अभिनंदन मिथिला सन पावन धरती नै छैक दुनियामे आनो ठाम डेग-डेगपर पानिक खान पोखरि-झाखरि नदी छै अम्बार कोसी-कमला-तिलयुगा गंडक-बागमती-भूतही-बलान गाम-गाम अछि दलान अन्न-जल-फलसँ भरल घर-घरमे अतिथि मेहमान स्वागत होइ छै देवता समान तीनू लोकमे होइ छै गुणगान मिथिला अछि महान रंग-बिरंगक फूलपर भौंरा करै छै गुणगान बगिया-बगिया कोइली कुहकैए मोड़-पपिहा-मेना-बुलबुल कुदकि-चहकि सुनबए मिठि बोल सभ नीत-दिन सुति-उठि माथपर लगबैए माटिक चंदन मिथिलाकेँ करैए वंदन मिथिलाकेँ अभिनंदन। ई की केलौं अहाँ-13 ई की केलौं अहाँ? अपन रहितो विरान भेलौं अहाँ जीबैत छलौं जिनगी जड़ा देलौं अहाँ ई की केलौं अहाँ? नामी छलौं वदनाम केलौं अहाँ गम भुलबै खातिर छिप-छिप मिलै छलौं अहाँ ई की केलौं अहाँ? ई हालति हमर किअए केलौं अहाँ जीबतेमे हमरा जड़ा देलौं अहाँ ई की केलौं अहाँ? दिलक दर्पणमे झाकि-झाकि देखू अहाँ हम कण-कणमे समाएल छी लहू जेना ई की केलौं अहाँ? शोक सागरमे डुमल छलौं कहुना नागीन बनि हमरा कटलौं केना ई की केलौं अहाँ? खूब सुरत हसीन पड़ी जेना मुसुकराइत हँसै छी गुलाबक कली जेना मुर्दा आँखि खोलि ताकए जकोर जेना ई की केलौं अहां? केकरा संग खेलब होरी-12 बाट तकैत भरि-भरि राति जगैत ऑंखिया भेल लाले-लाल कतेक पतझर बीतल कतेको आएल वसन्त-बहार सभ सखी-सहेली मिलि फगुआ गाबए खुशी मनाबए पिआ संग खेलै होरी हमर पिआ परदेसिया केकरा संग खेलब होरी सभ मिलि रंग-अबिर उड़ाबए हमरा कहि-कहि लजाबए केना भीजलो तोहर चोली ननदि-लजाबए देवरा सताबए केकरा संग खेलब होरी नैना-भुटुका टोली बनि मिठगर बोलीसँ गाबए होरी रंगक पिचकारीसँ रंग बरसाबए जहिना खेलैए राधा-संग अन्हैया होरी राम-लखन खेलै अवधमे होरी ढोल-मजीरा ढाक डफली पिट-पिट गाबए होरी रंग-अबिर गुलाल उड़बैत सभ मिल खेलए होरी रंग-वरसै मोन तड़सै ऑंखिया भेल लाल-लाल कहिया आएत परदेसिया मिलि संगे खेलब होरी बिनु पिया तड़सै छी हम केकरा संग खोलब होरी। गाए-माए-11 गाएकेँ माय सभ कहै छै मुदा पोसै छै ने सभ कोइ जे पोसै छै गाए हुनके हक छै कहत माय बिनु श्रम कर्म नै होइ छै ने श्रम कर्मक फल मिलै छै सुनल-सुनाएल सभ कहै छै जिनगीमे गाएक गुण नै जनै छै मरलामे वेतरनी पार करै छै गोदानक चर्च पुराणोमे कएल छै गाए पोसब तखन सुख भेटत जिबैतमे दूध-भात भेटत। नै पोसब गाए तँ मरलापर दूध-भात केना भेटत सभ लोकनि सोचैत रहै छै बिनु धरती महल बनबै छै गाएकेँ माए सभ नै बुझै छै मुदा माएकेँ माए सभ कहै छै गाए नै पोसै छै सभ कोइ। जिनगीक जीवन पथमे गाएक गुण नै जनै छै मुदा मरलापर गाए संगे वेतरनी पार स्वर्ग पहुँचै छै जिबैतमे गाए-माएकेँ दूध सभ पिऐ छै नरकसँ सोझे स्वर्ग पहुँचै छै गाएक जरूरी सभ नै बुझै छै दूधक लेल मारा-मारी करै छै मरलापर गोदान करै छै। खेतिहरक जिनगी-10 भुरुकवा ऊगल सूतल पड़ल छलौं मोन कछमछाइत छल उठि मोन मारि कहुना बाल-बच्चा मिलि खेतपर गेलौं काज करैत घाम बहए भूखसँ टौआइत छलौं खेतक आड़ि बैस मिलि सूखल रोटी-नून-तेल चटनी मिरचाइ खेलौं पानि पीब काजमे भीरलौं खेतक काज करैत देहक हड्डी-पसरी धसि सूखि कारी बनि गेल भरि पेट खेनाइ नै भेल कतेको पीढ़ि बीति गेल नीक वस्त्र नीक घर कहियो नसीव नै भेल कहियो रौदी कहियो बाढ़ि भेल उपजा जरि-भसिया गेल खाद-पानि महग भेल खेतक उपजा जन-मजदूरीमे चलि गेल सालक भरि बाल-बच्चा की खाएत केना जीअत माथपर हाथ धरि सोक-सागरमे डूमि गेल बाप-दादा अही सोचमे कर्जा लादि मरि गेल दुख दबाइ बेटी बिआहमे किताक-किताक खेत बिक गेल माथपर चोट मारैत बाजल- खेत कि देहक लहू बिक गेल जीब कऽ की करब केकरा मुँह देखाएब के सरण-भरण करत आत्मदाह करनाइ नीक रहत खेत उपजा कऽ की करब नै अनक दाम नै जिनगीमे अराम बजारक समानक दाम पहुँचि गेल असमान केना बँचत खेतिहरक प्राण। ज्ञानक दीप-9 अन्हरिया राति इजोतक नै कोनो उपाइ सोचै छलौं केना भागत ई अन्हरिया राति सोचैत मोनमे फुराएल एक उपाइ अछि बचल दीप जरेलौं तखन किछु अन्हार भागल-पड़ाएल मुदा सोचलौं ई अन्हरिया बेर-बेर होइत रहत कहियो इजोरिया तँ कहियो अन्हरिया ऐ दीपसँ केना हएत मनुक्खक प्रकाश मनुखकेँ अछि ज्ञान-रूपी प्रकाशक अभाव जखन मनुख बनत ज्ञानी तँ अभिमानी अन्हार दूर भागत दीपक अन्हार भगौलासँ नै काज चलत दुनियाकेँ ज्ञानरूपी प्रकाश अछि जरूरी जइसँ दुनिया जग-मग हएत ज्ञानक दीप जरौलासँ कहियो अन्हरिया नै हएत। दुखाएल गंगा-8 सभ साधु गंगा नहाइ छै कतेक पाप जिनगीमे केने छै जखन गंगा पापीक पाप धोइ छै सभक तन-मन शुद्ध करै छै तँ अपने गंगा किएक गंगा रहै छै गंगा साधुकेँ शुद्ध करै छै की साधु गंगाकेँ शुद्ध करै छै की पापी पापकेँ गंगामे धोइ छै तँ गंगा एतेक पाप कतए रखै छै स्वर्गक गंगा धरतीपर बहै छै पापीक पाप धोइत गंगा पापक मोटरी कतए रखै छै गंगा पापीकेँ तन-कंचन मोन िनर्मल करै छै सभक कल्याण उपकार करै छै उल्टे सभ गंगाकेँ दुख दइ छै किएक गंगा एतेक दुख सहै छै नै कोइ गंगाक हीत सोचै छै जिबैत गंगा मरैत गंगा पाप उघैत बदनाम होइ छै पाप नै पापी देखि गंगा धरती छोड़ि पड़ाएल फिड़ै छै स्वर्गसँ धरतीपर आबि गंगा दुबकि दिन-राति पचताइत रहै छै कतेक पापी धरतीपर बसै छै असगरे गंगा पाप धोइ छै पापीक पापीसँ दबि-दबि गंगा मरि रहल छै गंगाक दुख कोइ नै बूझै छै अपने दुखसँ दुखाएल गंगा सागरमे डूमि-डूमि मरै छै। बेंगक बरियाती-7 असाढ़क मास उम्मास भड़ल दिन अमरस खाए-पीब खोपड़ीमे सूतल पसिनासँ देह भिजल निन्न टूटि गेल भंडार कोणसँ ढनढनाइत मेघ बिजुरी चमकैत घनघोर बरसैत जड़ल धरतीकेँ प्यास मुझबए लगल अद्रा नक्षत्रमे खन्ता–डबरा-पोखरि झम-झम बरखासँ भड़ए लगल भड़ल पानिमे बेंगक बरियाती सजए लगल उछलि-कूदि ढौसा चितकबरा पिअरका-मलिछाहा सुरुकुनियाँ काटि-काटि बरियातिक भीड़ जुटए लगल घोघ फलकाबैत एक्के स्वरमे टर्टराइत ढोढियाइत हजारक-हजार अनघौल करैत किछु गीत गाबए किछु पानिमे डूमि नकसक-नकसक करए किछु एक-दोसरापर सबार भऽ ऐपार-सँ-ओइपार करैत सबल-िनर्वलकेँ सभ मिलि सहयोग करए बेंगक जातिमे कोनो भेदि नै अपन संगठनकेँ मजगूत बनौने एकताक परिचए दैत रहल बरखाक बुन्न पड़ैत रहल शीतल हवा बहति रहल बेंगक बरियाती सजैत रहल। बलानक बाढ़ि-6 बलानक बाढ़ि ढल-पर-ढल बजरैत सनसनाइत उधियाइत पसरि गेल बाढ़िक पानि हिम्मत हारि लोक करए लगल गुहारि बलानकेँ नै आएल कोनो दया-माया गौरवसँ कहलक चारि मास तक रहत हमर राज नै चलए देब हम अहाँ सबहक राज-काज जखन हमर बाढ़िक भूत सबार रहत ऐपारक लोक अही पार रहत ओइपारक लोक ओहीपार रहत जे हमरा बीच आएत ओ हमरे पेटमे समाएत कोस भरिक पेट हमर केना भरत कलम-गाछी चास-बास खाएब लेब साँस पोखरि-खत्ता डबरा बालुसँ भरि बनाएब हम भीठ कहबी छै जे आएल बलान तँ बान्हलक दलान गेल बलान तँ उजरल दलान कहबी साँच-छूठ सेहो होइ छै मुदा बलान जिनगीकेँ तहस-नहस कऽ दइ छै उपजाऊ खेतकेँ बालुसँ भरि भीन्डा बना दइ छै अन्नक बदला बलान बालु फॅकबै छै बलानक बाढ़ि ठहुनिये पानिमे गरगोटिया दइ छै विकास नै हुअए दइ छै विनाष करै छै गाम-घरकेँ उजाड़ि जिनगी तबाह करै छै बलानक बाढ़ि। पानिक बून्न-5 बून्न-बून्न पानिक खगता सभकेँ पड़ै छै बून्न-बून्नसँ घैला भरै छै पोखरि-इनार भरि झील-झरना-नदी भरै छै धारा मिलि समुद्र भरै छै सबहक पिआस मेटाइ छै दुनियाँ जीबै छै सुखाएल धरतीकेँ सिंचै छै सभ मिलि पानिक उपयोग करै छै दुरूपयोग सेहो होइ छै ओ दिन दूर नै छै पानिक बून्न लेल तरसि-तरसि मरैत धरती धधकि जीव जरिते दुनियाकेँ बचेबाक लेल बूने-बून पानिक करए पड़त नै तँ जिनगी क्षनो भरि नै चलत। हेराएल भगवान-4 मोन घबराएल छल चैन छिनाएल सन कच्छ-मछ करैत मोनमे फुराएल सुख-शांति लेल भगवानसँ मिलब अपन दुखरा सुनाएब जे सुख-शांति लेल कोनो उपाय बताएत जइसँ कल्याण हएत मंदिरे-मंदिर घूमि-घूमि पूजा-विनती बहुत केलौं मस्जित-गुरुद्वारामे माथा टेकिलौं गिरजाघरमे प्रार्थना केलौं मुदा हेराएल भगवान कतौं नै भेटल मोनक अशांति नै मेटल मोनमे विचारि गहबरे-गहबर मंसा केलौं साधु-संतक सेवा करैत वन-जंगल घूमि-घूमि तीर्थाटन यात्रा केलाैं तन-मनक सुद्धि लेल गंगामे नहेलौं देहक मलि जरूर छुटि गेल मुदा मोनक मलि नै गेल बैचैनी बढ़ि गेल तखन ज्ञान भेल सबहक दिलमे भगवान बसैए कण-कणमे रमैए अपन मोन-मंदिरमे ताकि तकलौं हेराएल भगवानकेँ देखलौं सुख-शांतिक वरदान पेलौं। जीबए लेल-3 जीबए लेल दुखक नोर पीबए पड़ै छै बिनु अरमान जीबए पड़ै छै दुखक भार जिनगी भरि सहए पड़ै छै जिनगी मिलै छै दुखक सहए लेल बिनु दुख सुख नै मिलै छै किछु करबाक लेल जिनगी जीबए पड़ै छै जीबए लेल दुखक नोर पीबि कऽ जीबए पड़ै छै संसार सुन्दर नै दुखक सागर छै अमर नै नाश्वर छै काँट भरल बाट मोड़े-मोड़पर त्रिशुल गाड़ल छै कर्मसँ काँट फूल बनै छै सभ दुख सुख बनि जाइ छै दुख सहि-सहि जहिना किचरमे कमल फुलै छै जीबए लेल किछु करए पड़ै छै बिनु कर्म जीवन सफल नै होइ छै जीबए लेल दुखक नोर पीबि-पीबि कऽ जीबए पड़ै छै। चैताबर गीत-2 लाले रंग चुनरी रंगेबै हो रामा चैतक महिनमा ना गोरे-गोर हाथमे मेंहदी लगेबै सजनाकेँ तड़सेबै ना हो रामा चैतक महिनमा ना लाल रंग फूलसँ सजिया सजेबै मीठ-मीठ बात सजनासँ कहबै हो रमा चैतक महिनमा ना आमक बगियामे बैसल कोयलिया पियाकेँ बजबै ना हमरा तड़साबै ना हो रामा चैतक महिनमा ना चमेली फुलबासँ गजरा बनेबै कारी-कारी केसियाकेँ सजेबै पियाकेँ ललचेबै ना हो राम चैतक महिनमा ना। चैती गीत-1 भोर भेलै हे सखी भिनसरबा भेले हे कनी चलू ने बगिया कोयलिया बजै हे हे सखी चैतक महिना हे आमक गाछीमे झुलबा झुलबै पिया केर संगे हे हे सखी चैतक महिना हे कारी-कारी केसिया डॉरपर लटकै पूर्वा-पछियामे फुलकै मीठ-मीठ गीत पियाकेँ सुनेबै हे हे सखी चैतक महिना हे पिअर साड़ी लाल चोली लाले चुनरिया हे चढ़ल यौवन मसकै चोली रहि-रहि विहुँसै हे हे सखी चैतक महिना हे। २ प्रभात राय भट्ट १ परम पावन पुन्यभूमि अछि अपने मिथिलाधाम यौ मिथिला के हम बेट्टी छि मैथिलि हमर नाम यौ जनक हमर पिता छथि जनकपुर हमर गाम यौ जगमे भेटत नै कतहूँ एहन सुन्दर मिथिलाधाम यौ परम पावन पुन्यभूमि अछि अपने मिथिलाधाम यौ मिथिला के हम बेट्टा ची मिथिलेश हमर नाम यौ मिथिला के हम वासी छि जनकपुर हमर गाम यौ ऋषि महर्षि केर कर्मभूमि अछि मिथिलाधाम यौ परम पावन पुन्यभूमि अछि अपने मिथिलाधाम यौ मिथिलाक मैट सं अवतरित भेल्हीं सीता जिनकर नाम यौ उगना बनी महादेव एलाह पाहून बनी कय राम यौ धन्य धन्य अछि मिथिलाधाम,मिथिलाधाम जगमे महान यौ परम पावन पुन्यभूमि अछि अपने मिथिलाधाम यौ हिमगिरी के कोख सं ससरल कमला कोशी बल्हान यौ मिथिला के शान बढौलन मंडन,कुमारिल,वाचस्पति विद्द्वान यौ हमर जन्मभूमि कर्मभूमि स्वर्गभूमि मिथिलाधाम यौ परम पावन पुन्यभूमि अछि अपने मिथिलाधाम यौ कपिल कणाद गौतम अछि मिथिलाक शान यौ विद्यापति के बाते अनमोल ओ छथि मिथिलाक पहिचान यौ जगमे भेटत नै कतहूँ एहन सुन्दर मिथिलाधाम यौ परम पावन पुन्यभूमि अछि अपने मिथिलाधाम यौ २. प्राचीन मिथिला मिथिला के मिथिलेश्वर महादेव हम की कहू यौ स्वम अहाँ छि अन्तरयामी अहाँ सभटा जनैतछी यौ बसुधाक हृदय छल हमर महान मिथिला इ हमही नै शाश्त्र पुराण कहैय यौ मिथिलाक जन जन छलाह जनक एही ठाम ताहि लेल नाम पडल जनकपुर धाम राजा जनक छलाह राजर्षि जनकपुरधाम में सीता अवतरित भेलन्हि मिथिले गाम में मिथिलाक पाहून बनी ऐलाह चारो भाई राम विद्यापती के चाकर बनलाह उगना एहि ठाम चारो दिस अहिं छि महादेव जनकपुर के द्वारपाल पुव दिस मिथिलेश्वरनाथ पश्चिम जलेश्वरनाथ उत्तर दिस टूटेश्वरनाथ दक्षिण कलानेश्वरनाथ किनहू भs सकय मिथिलाक प्राणी अनाथ इ ध्रुव सत्य अछि प्राचीन मिथिलाक परिभाषा एखुनो अछि एहन सुन्दर मिथिलाक अभिलाषा ३ गीत सुन सुन रे सुन पवन पुरबैया की लेने चल हमरो अप्पन गाम हमर जन्मभूमि वहि ठाम जतय छै सुन्दर मिथिलाधाम //२ देश विदेश परदेश घुमलौं मोन केर भेटल नहीं आराम साग रोटी खैब रहब अप्पने गाम जतय छै सुन्दर मिथिलाधाम //२ घर घर में छन्हि बहिन सीता राजर्षि जनक सन पिता सभ केर पाहून छथि राम जतय छै सुन्दर मिथिलाधाम //२ काशी घुमलौं मथुरा घुमलौं घुमलौं मका मदीना सभ सँ पैघ विद्यापति केर गाम जतय छै सुन्दर मिथिलाधाम //२ हिमगिरी कोख सँ बहैय कमला कोशी बल्हान तिरभुक्ति तिरहुत छै जग में महान दूधमति सँ दूध बहैय छै वैदेहीक गाम जतय छै सुन्दर मिथिलाधाम //२ ४ गजल मिथिलाक पाहून भगवान श्रीराम छै जग में सब सं सुन्दर मिथिलाधाम छै मिथिलाक मईट सं अवतरित सीता जग में सब सं सुन्दर हुनक नाम छै मिथिलाक शान बढौलन महा विद्द्वान कवी कोकिल विद्यापति हुनक नाम छै भS जाएत अछि सम्पूर्ण पाप तिरोहित मिथिला एकटा पतित पावन धाम छै भेटत नै एहन अनुपम अनुराग प्रेम परागक कस्तूरी मिथिलाधाम छै घुमु अमेरिका अफ्रीका लन्दन जापान जग में नै कोनो दोसर मिथिलाधाम छै मिथिला महातम एकबेर पढ़ी जनु मिथिला सं पैघ नै कोनो दोसर धाम छै जतय भेटत कमला कोशी बलहान अयाचिक दलान,वही मिथिलाधाम छै गौतम कपिल कणाद मंडन महान प्रखर विद्द्वान सभक मिथिलाधाम छै ऋषि मुनि तपश्वी तपोभूमि अहिठाम छै "प्रभात"क गाम महान मिथिलाधाम छै .............वर्ण:-१५........... ५ गीत बसु दरभंगा मधुवनी चाहे जनकपुर हम सभ छि मिथिलावासी रहू जतय दूर बसु बिराटनगर राजविराज चाहे लहान हम सभ मिथिलावासी हमर मिथिला महान बसु सीतामढ़ी शिवहर चाहे मुजफरपुर हम सभ छि मिथिलावासी रहू जतय दूर घर आंगनमे बहैय हमरा कमला कोशी बल्हान भाईचारा प्रेम देखैला चालू अयाचिक दलान राजर्षि जनक आँगन अवतरित भेल्हीं जनकदुलारी मिथिला केर पाहून बनलाह राम लखन धनुषधारी बसु मलंगवा जलेश्वर चाहे समस्तीपुर हम सभ छि मिथिलावासी रहू जतय दूर मिथिलाक गौरव मंडन कपिल कणाद वाचस्पति जन जन केर आत्मा छथि कवी कोकिल विधापति बसु अररिया खगड़िया चाहे भागलपुर हम सभ छि मिथिलावासी रहू जतय दूर बसु सहरसा सुपौल मधेपुरा चाहे पूर्णिया सम सभ छि मिथिलावासी जनै समूचा दुनिया बसु नेपाल बिहार मुंगेर कटिहार चाहे बेगुसराय हम सभ छि मिथिलावासी कियो नहि पराय ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। विदेह नूतन अंक मिथिला कला संगीत १ १. गणेश ठाकुर, पिता श्री विनोद ठाकुर, पोखड़िभीरा (कक्षा आठक विद्यार्थी) राजनाथ मिश्र चित्रमय मिथिला स्लाइड शो चित्रमय मिथिला (https://sites.google.com/a/videha.com/videha-paintings-photos/ ) २. उमेश मण्डल मिथिलाक वनस्पति स्लाइड शो मिथिलाक जीव-जन्तु स्लाइड शो मिथिलाक जिनगी स्लाइड शो मिथिलाक वनस्पति/ मिथिलाक जीव जन्तु/ मिथिलाक जिनगी (https://sites.google.com/a/videha.com/videha-paintings-photos/ ) ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। विदेह नूतन अंक गद्य-पद्य भारती १. मोहनदास (दीर्घकथा):लेखक: उदय प्रकाश (मूल हिन्दीसँ मैथिलीमे अनुवाद विनीत उत्पल) मोहनदास (मैथिली-देवनागरी) मोहनदास (मैथिली-मिथिलाक्षर) मोहनदास (मैथिली-ब्रेल) २.छिन्नमस्ता- प्रभा खेतानक हिन्दी उपन्यासक सुशीला झा द्वारा मैथिली अनुवाद छिन्नमस्ता ३.कनकमणि दीक्षित (मूल नेपालीसँ मैथिली अनुवाद धीरेन्द्र प्रेमर्षि) भगता बेङक देश-भ्रमण .मंगलेश डबराल- हिन्दीसँ मैथिली अनुवाद विनीत उत्पल मंगलेश डबराल- हिन्दीसँ मैथिली अनुवाद विनीत उत्पल १ भोथिआएल शहरक पेशाबघर आ आर जानल-चिन्हल ठाम मे ओ भोथिआएल लोकक तकै बला पोस्टर एखनो साटल लखाह दैत अछि जे कतेको बरख पहिने दस-बारह बरखक उम्र मे बिना बतेने घरसँ निकलि गेल छल पोस्टरक मुताबिक ओकर लम्बाइ मझौला छै रंग गोर नै पिण्डश्याम छै हवाइ चट्टी पहिरले छै चेहरा पर कोनो चोटक निशान छै आ ओकर माय ओकरा बिना कानैत रहैत छै पोस्टरक अंत मे ई आश्वासन सेहो रहैत छै जे हरायल केँ खबर दै बला केँ भेटत यथासंभव उचित इनाम तखनो ओ केकरो चिन्हऽ मे नै आबैत छै पोस्ट मे छपल झलफल फोटोसँ ओकर बगेबानी नै मिलैत छै ओकर शुरुबला उदासी पर आब कष्ट झेलब बला ताव छै शहरक मौसमक हिसाबसँ बदलैत गेल अछि ओकर चेहरा कम खाएत, कम सुतत/ कम बाजैत लगातार अप्पन ठाम बदलैत सरल आ कठिन दिवस केँ एक जना बिताबैत आब ओ एकटा दोसर दुनिया मे अछि किछु कुतूहलक संग अप्पन गुमशुदगीक पोस्टर देखैत जकरा ओकर माता-पिता अखन धरि छपवाबैत रहैत छै जइ मे आबो दस वा बारह लिखल रहैत अछि ओकर उम्र। रचनाकाल: 1993 २ अभिनय एकटा गहीर आत्मविश्वाससं भरि कऽ भोरे निकलि जाइत छी घरसँ जइसँ दिन भरि आश्वस्त रहि सकी एकटा लोक सँ भेंट करैत मुस्काइत छी ओ एकाएक देखि लैत अछि हमर मिज्झर मन एकटासँ चटसँ हाथ मिलाबैत छी ओ बुझि लैत अछि जे हम भीतरसँ छी मिज्झर एकटा सखाक आगू चुप बैसि जाइ छी ओ कहैत अछि जे अहां दुब्बर-रोगियाहा सन लखाह दऽ रहल छी जे हमरा कहियो घरमे नै देखने छल ओ कहैत अछि जे आइ अहाँकेँ टीवी पर देखने छलहुँ एकदिन बाजारमे घुमैत छी निश्शब्द डिब्बामे बंद भऽ रहल अछि पूरा देश सम्पूर्ण जीवन बिकाबैक लेल एकटा नब रंगीन पोथी अछि जे हमर कविताक विरोध मे आएल अछि जइमे छपल सुन्नर चेहरामे कोनो कष्ट नै ठाम-ठाम नृत्यक मुद्रा अछि विचारक बदलामे हेयौ एकटा पूरा फिल्म अछि लम्बा अहाँ कीन लिअ आ खूब आनंद उठाउ शेष जे किछु अछि अभिनयक चारू कात शोर आबि रहल अछि मेकअप बदलहिक काल नै अछि हत्यारा एकटा नेनाक कपडा पहिनि कऽ आबि गेल छल ओ जकरा अपना पर घमंड छल एकटा खुशामदक आवाज मे गिडगिडा रहल छल ट्रेजडी अछि संक्षिप्त नम्हर प्रहसन सभ चाहैत अछि कोन तरहे छीन ली सभसँ नीक अभिनेताक पुरस्कार । रचनाकाल : १९९० बालानां कृते बाल गजल १.मिहिर झा २.अमित मिश्र ३.चंदन कुमार झा ४.जगदानन्द झा 'मनु' ५.रूबी झा ६.डॉ॰ शशिधर कुमर “विदेह”-नेनपन (बालगीत) १ मिहिर झा बाल गजल १ नुनु हे रौ तू किया हरदम कानै छे राति दिन तू हमर माथा भुकाबै छे हेलै छे केरा डम्फर के बना जहाज़ पोखरियो मे रोज तू रेस लगाबै छे एक हाथे धेने पेंट दोसर मे डन्टा रोड़ी के मारि ठोकर गर्दा उडाबै छे घूमि घुमि गाछी तू बीच दुपहरिया दलुआ क कलम से आम चोराबै छे २ झमझम बरखै बुन्नी रौ टमटम चलबै मुन्नी रौ आगू पाछू मलहा डोलय खत्ता मे बड गडचुन्नी रौ आम तोडय झाम गूडय डोमा देलक चुनचुन्नी रौ राजा के बेटा मारय ढेपा कुकुर भुकै मधुबन्नी रौ २ अमित मिश्र बाल गजल १ कुकुर उनटल पड़ल लार पर बंदरो बैसलै चार पर मूस दौगै गहुँम भरल घर कोइली तन दै तार पर नादि पर गाय दै दूध छै नजर देने श्रवन ढार पर स्वागत लेल बौआ कए फूल मुस्कै गुथल हार पर भोर भेलै उठल राजा यौ "अमित " बौआ चढ़ल कार पर बहरे -मुतदारिक २ बाल गजल भनसा धर दिश दौड़लनि बौआ , अपन जलखइ माँगलनि बौआ , बीच आँगन मे ऊँच पिढ़ी लगेला , छरपला , डोलल खसलनि बौआ , देखलनि माँ के ठाढ़ हाथ फैलेने , चोट बिसरि कोरा बैसलनि बौआ , दादी एलखिन लेने बाटी बौआ के . दूध देख क' बाटी फेकलनि बौआ , बाबू खेलखिन मिरचाइ सोहारी , हुँनको चाही से जीद धेलनि बौआ , गेँद गुड्डा हाथी , देब मोटर कार , बहुते मनेलौँ नै मानलनि बौआ , संग मे जाएब घुमै लए सर्कस , "अमित" सँ चारि लड्डू लेलनि बौआ . . . । । ३ बाल गजल आइ तारा केर नगरी सँ एथिन माँ , अपन कोरा झट द' हमरा उठेथिन माँ , खेलबै माँ संग आ रूसबै हँसबै , पकड़ि आँङुर गाम-घर मे बुलेथिन माँ , थाकि जेबै जखन , भोजन करा हमरा , गाबि लोड़ी आँचरक त'र सुतेथिन माँ , राम कक्का के परू छैक मरखहिया , सुरज के बकरी सँ हमरा बचेथिन माँ , हमर संगी संग माँ के घुमै सर्कस , आबि घर हमरो सिनेमा ल' जेथिन माँ , कत' सँ एलै मेघ कारी इ , अंबर मे , "अमित" मन डेराइ यै कखन एथिन माँ . . . । । बहरे-कलीब फाइलातुन-फाइलातुन-मफाईलुन 2122-2122-1222 ३ चंदन कुमार झा सररा, मदनेश्वर स्थान मधुबनी, बिहार बाल-गजल-१ चार पर छै कौआ बैसल, माँझ अँगना बौआ बैसल । घुट-घुट खाथि दूध-भात, मायक कोरा बौआ बैसल । राजा-रानी सुनथि पिहानी, मइयाँ कोरा बौआ बैसल । ओ-ना-मा-सी सिखथि-पढ़थि, बाबाक कोरा बौआ बैसल । सुग्गा-मेना संग खेलै छथि, "चंदन" अँगना बौआ बैसल । बाल-गजल-२ कुकरुकू जखन मुरगा बाजल, किरिण सुरूजक मूँह मेँ लागल । कौआ डकलक कोइली बाजल, आँखि मिड़ैते चुनमुन जागल । नहा-सोना के कयलनि जलखै, इसकुल गेलथि घंटी बाजल । दीदीजी बड्ड नीक लगैत छन्हि, मास्टर जी के छड़ी लय भागल । कान पकड़ि के उठक-बैठक, तैयो खेले पर मोन छै टाँगल । "चंदन" टन-टन घंटी बजलै , छुट्टी भेलइ घर दिस भागल बाल-गजल-३ बेंग बजय छै टर-टर-टर्र बगरा उड़य फर-फर-फर्र । झरना झहरे झर-झर-झर्र, बाँस बजय छै कर-कर-कर्र । मिल चलय छै धर-धर-धर्र, साँप ससरलै सर-सर-सर्र । चुनमा छाती धक-धक-धक्क, डरसँ कापय थर-थर-थर्र । पप्पा एलखिन भागि गेल डर, बात पदाबय चर-चर-चर्र । ४ जगदानन्द झा 'मनु' नैना-भुटकाक - गजल ----------------------- चम चम चम चम तारा चमके बौआ कए हाथक तरुआ गमके कारी बकरी,नब उज्जर महिष लाल बाछी किए दौर-दौर बमके बौआक घोरा सय-सय कए देखू काका कें घोरा पिद्दी कतेक कमके बाबी कें साडी मए कें लहंगा बहे बौआ कें गघरी त कतेक झमके बौआ हमर आब गुमशुम किए किएक नै ठुमुक-ठुमुक ठुमके ( वर्ण-१३ ) ५ रूबी झा बाल गजल हेरौ बौआ तूँ ऐना रुसल छेँ किए , दूध-भात लेल तूँ बैसल छेँ किए , मुँहमें खूएब आ कोरा बैसाएब , गए कें दूध लेल अरल छेँ किए , किन देब गेन लाल आ घुरकुन्ना , छोर ने जिद्दपन डटल छेँ किए , आबो दहुन बाबा के देठुन पेंरा , पेंरा सन नीक कि नठल छेँ किए , कहबै नाना कें देथुन धेनु गैया, आबो बरेडी पर चढ़ल छेँ किए..| वर्ण-१३ ६ डॉ॰ शशिधर कुमर “विदेह” नेनपन (बालगीत) खेलै – कूदै - मौज मनाबै, नेनपन होइ छै खेलबा लए । पर पढ़ाई सेहो आवश्यक, नेनपन होइ छै पढ़बा लए ।। मीठगर – मीठगर नीक लगए, पर जँ सदिखन मिट्ठहि भेटए । बढ़ए मोटापा गेंड़ा सन, आ सुस्त मोन हो, जी उचटए । नोनगर, खटगर, तीत जरूरी, भोजन मे रुचि रहबा लए । तेँ पढ़ाई सेहो आवश्यक, नेनपन होइ छै पढ़बा लए ।। खेल – कूद नेनपन केर गहना, व्यक्तित्वक संपोषक छी । खेल – कूद सिखबैछ बहुत किछु, तेँ ओ अति आवश्यक छी । पर पढ़ाई बिनु खेल – कूद बस, अनुचित – जीवन जिउबा लए । तेँ पढ़ाई सेहो आवश्यक, नेनपन होइ छै पढ़बा लए ।। उचित समय पर खेली – कूदी, उचित समय अध्ययन - अध्यापन । एकक परिपूरक दोसर छी, सम्यक अनुपातेँ परिपालन । सुख – दुख जिनगी केर दू पहिया, दुहु जरूरी जिउबा लए । नेनपन केर आधार गढ़नि पर, जिनगी खल – खल हँसबा लए ।। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। बच्चा लोकनि द्वारा स्मरणीय श्लोक १.प्रातः काल ब्रह्ममुहूर्त्त (सूर्योदयक एक घंटा पहिने) सर्वप्रथम अपन दुनू हाथ देखबाक चाही, आ’ ई श्लोक बजबाक चाही। कराग्रे वसते लक्ष्मीः करमध्ये सरस्वती। करमूले स्थितो ब्रह्मा प्रभाते करदर्शनम्॥ करक आगाँ लक्ष्मी बसैत छथि, करक मध्यमे सरस्वती, करक मूलमे ब्रह्मा स्थित छथि। भोरमे ताहि द्वारे करक दर्शन करबाक थीक। २.संध्या काल दीप लेसबाक काल- दीपमूले स्थितो ब्रह्मा दीपमध्ये जनार्दनः। दीपाग्रे शङ्करः प्रोक्त्तः सन्ध्याज्योतिर्नमोऽस्तुते॥ दीपक मूल भागमे ब्रह्मा, दीपक मध्यभागमे जनार्दन (विष्णु) आऽ दीपक अग्र भागमे शङ्कर स्थित छथि। हे संध्याज्योति! अहाँकेँ नमस्कार। ३.सुतबाक काल- रामं स्कन्दं हनूमन्तं वैनतेयं वृकोदरम्। शयने यः स्मरेन्नित्यं दुःस्वप्नस्तस्य नश्यति॥ जे सभ दिन सुतबासँ पहिने राम, कुमारस्वामी, हनूमान्, गरुड़ आऽ भीमक स्मरण करैत छथि, हुनकर दुःस्वप्न नष्ट भऽ जाइत छन्हि। ४. नहेबाक समय- गङ्गे च यमुने चैव गोदावरि सरस्वति। नर्मदे सिन्धु कावेरि जलेऽस्मिन् सन्निधिं कुरू॥ हे गंगा, यमुना, गोदावरी, सरस्वती, नर्मदा, सिन्धु आऽ कावेरी धार। एहि जलमे अपन सान्निध्य दिअ। ५.उत्तरं यत्समुद्रस्य हिमाद्रेश्चैव दक्षिणम्। वर्षं तत् भारतं नाम भारती यत्र सन्ततिः॥ समुद्रक उत्तरमे आऽ हिमालयक दक्षिणमे भारत अछि आऽ ओतुका सन्तति भारती कहबैत छथि। ६.अहल्या द्रौपदी सीता तारा मण्डोदरी तथा। पञ्चकं ना स्मरेन्नित्यं महापातकनाशकम्॥ जे सभ दिन अहल्या, द्रौपदी, सीता, तारा आऽ मण्दोदरी, एहि पाँच साध्वी-स्त्रीक स्मरण करैत छथि, हुनकर सभ पाप नष्ट भऽ जाइत छन्हि। ७.अश्वत्थामा बलिर्व्यासो हनूमांश्च विभीषणः। कृपः परशुरामश्च सप्तैते चिरञ्जीविनः॥ अश्वत्थामा, बलि, व्यास, हनूमान्, विभीषण, कृपाचार्य आऽ परशुराम- ई सात टा चिरञ्जीवी कहबैत छथि। ८.साते भवतु सुप्रीता देवी शिखर वासिनी उग्रेन तपसा लब्धो यया पशुपतिः पतिः। सिद्धिः साध्ये सतामस्तु प्रसादान्तस्य धूर्जटेः जाह्नवीफेनलेखेव यन्यूधि शशिनः कला॥ ९. बालोऽहं जगदानन्द न मे बाला सरस्वती। अपूर्णे पंचमे वर्षे वर्णयामि जगत्त्रयम् ॥ १०. दूर्वाक्षत मंत्र(शुक्ल यजुर्वेद अध्याय २२, मंत्र २२) आ ब्रह्मन्नित्यस्य प्रजापतिर्ॠषिः। लिंभोक्त्ता देवताः। स्वराडुत्कृतिश्छन्दः। षड्जः स्वरः॥ आ ब्रह्म॑न् ब्राह्म॒णो ब्र॑ह्मवर्च॒सी जा॑यता॒मा रा॒ष्ट्रे रा॑ज॒न्यः शुरे॑ऽइषव्यो॒ऽतिव्या॒धी म॑हार॒थो जा॑यतां॒ दोग्ध्रीं धे॒नुर्वोढा॑न॒ड्वाना॒शुः सप्तिः॒ पुर॑न्धि॒र्योवा॑ जि॒ष्णू र॑थे॒ष्ठाः स॒भेयो॒ युवास्य यज॑मानस्य वी॒रो जा॒यतां निका॒मे-नि॑कामे नः प॒र्जन्यों वर्षतु॒ फल॑वत्यो न॒ऽओष॑धयः पच्यन्तां योगेक्ष॒मो नः॑ कल्पताम्॥२२॥ मन्त्रार्थाः सिद्धयः सन्तु पूर्णाः सन्तु मनोरथाः। शत्रूणां बुद्धिनाशोऽस्तु मित्राणामुदयस्तव। ॐ दीर्घायुर्भव। ॐ सौभाग्यवती भव। हे भगवान्। अपन देशमे सुयोग्य आ’ सर्वज्ञ विद्यार्थी उत्पन्न होथि, आ’ शुत्रुकेँ नाश कएनिहार सैनिक उत्पन्न होथि। अपन देशक गाय खूब दूध दय बाली, बरद भार वहन करएमे सक्षम होथि आ’ घोड़ा त्वरित रूपेँ दौगय बला होए। स्त्रीगण नगरक नेतृत्व करबामे सक्षम होथि आ’ युवक सभामे ओजपूर्ण भाषण देबयबला आ’ नेतृत्व देबामे सक्षम होथि। अपन देशमे जखन आवश्यक होय वर्षा होए आ’ औषधिक-बूटी सर्वदा परिपक्व होइत रहए। एवं क्रमे सभ तरहेँ हमरा सभक कल्याण होए। शत्रुक बुद्धिक नाश होए आ’ मित्रक उदय होए॥ मनुष्यकें कोन वस्तुक इच्छा करबाक चाही तकर वर्णन एहि मंत्रमे कएल गेल अछि। एहिमे वाचकलुप्तोपमालड़्कार अछि। अन्वय- ब्रह्म॑न् - विद्या आदि गुणसँ परिपूर्ण ब्रह्म रा॒ष्ट्रे - देशमे ब्र॑ह्मवर्च॒सी-ब्रह्म विद्याक तेजसँ युक्त्त आ जा॑यतां॒- उत्पन्न होए रा॑ज॒न्यः-राजा शुरे॑ऽ–बिना डर बला इषव्यो॒- बाण चलेबामे निपुण ऽतिव्या॒धी-शत्रुकेँ तारण दय बला म॑हार॒थो-पैघ रथ बला वीर दोग्ध्रीं-कामना(दूध पूर्ण करए बाली) धे॒नुर्वोढा॑न॒ड्वाना॒शुः धे॒नु-गौ वा वाणी र्वोढा॑न॒ड्वा- पैघ बरद ना॒शुः-आशुः-त्वरित सप्तिः॒-घोड़ा पुर॑न्धि॒र्योवा॑- पुर॑न्धि॒- व्यवहारकेँ धारण करए बाली र्योवा॑-स्त्री जि॒ष्णू-शत्रुकेँ जीतए बला र॑थे॒ष्ठाः-रथ पर स्थिर स॒भेयो॒-उत्तम सभामे युवास्य-युवा जेहन यज॑मानस्य-राजाक राज्यमे वी॒रो-शत्रुकेँ पराजित करएबला निका॒मे-नि॑कामे-निश्चययुक्त्त कार्यमे नः-हमर सभक प॒र्जन्यों-मेघ वर्षतु॒-वर्षा होए फल॑वत्यो-उत्तम फल बला ओष॑धयः-औषधिः पच्यन्तां- पाकए योगेक्ष॒मो-अलभ्य लभ्य करेबाक हेतु कएल गेल योगक रक्षा नः॑-हमरा सभक हेतु कल्पताम्-समर्थ होए ग्रिफिथक अनुवाद- हे ब्रह्मण, हमर राज्यमे ब्राह्मण नीक धार्मिक विद्या बला, राजन्य-वीर,तीरंदाज, दूध दए बाली गाय, दौगय बला जन्तु, उद्यमी नारी होथि। पार्जन्य आवश्यकता पड़ला पर वर्षा देथि, फल देय बला गाछ पाकए, हम सभ संपत्ति अर्जित/संरक्षित करी। 8.VIDEHA FOR NON RESIDENTS 8.1 to 8.3 MAITHILI LITERATURE IN ENGLISH 8.1.1.The Comet -GAJENDRA THAKUR translated by Jyoti Jha chaudhary 8.1.2.The_Science_of_Words- GAJENDRA THAKUR translated by the author himself 8.1.3.On_the_dice-board_of_the_millennium- GAJENDRA THAKUR translated by Jyoti Jha chaudhary 8.1.4.NAAGPHANS (IN ENGLISH)- SHEFALIKA VERMA translated by Dr. Rajiv Kumar Verma and Dr. Jaya Verma विदेह नूतन अंक भाषापाक रचना-लेखन Input: (कोष्ठकमे देवनागरी, मिथिलाक्षर किंवा फोनेटिक-रोमनमे टाइप करू। Input in Devanagari, Mithilakshara or Phonetic-Roman.) Output: (परिणाम देवनागरी, मिथिलाक्षर आ फोनेटिक-रोमन/ रोमनमे। Result in Devanagari, Mithilakshara and Phonetic-Roman/ Roman.) English to Maithili Maithili to English इंग्लिश-मैथिली-कोष / मैथिली-इंग्लिश-कोष प्रोजेक्टकेँ आगू बढ़ाऊ, अपन सुझाव आ योगदान ई-मेल द्वारा ggajendra@videha.com पर पठाऊ। Top of Form विदेहक मैथिली-अंग्रेजी आ अंग्रेजी मैथिली कोष (इंटरनेटपर पहिल बेर सर्च-डिक्शनरी) एम.एस. एस.क्यू.एल. सर्वर आधारित -Based on ms-sql server Maithili-English and English-Maithili Dictionary. १.भारत आ नेपालक मैथिली भाषा-वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक शैली आ २.मैथिलीमे भाषा सम्पादन पाठ्यक्रम १.नेपाल आ भारतक मैथिली भाषा-वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक शैली
१.१. नेपालक मैथिली भाषा वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक उच्चारण आ लेखन शैली (भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक धारणाकेँ पूर्ण रूपसँ सङ्ग लऽ निर्धारित) मैथिलीमे उच्चारण तथा लेखन १.पञ्चमाक्षर आ अनुस्वार: पञ्चमाक्षरान्तर्गत ङ, ञ, ण, न एवं म अबैत अछि। संस्कृत भाषाक अनुसार शब्दक अन्तमे जाहि वर्गक अक्षर रहैत अछि ओही वर्गक पञ्चमाक्षर अबैत अछि। जेना- अङ्क (क वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ङ् आएल अछि।) पञ्च (च वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ञ् आएल अछि।) खण्ड (ट वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ण् आएल अछि।) सन्धि (त वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे न् आएल अछि।) खम्भ (प वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे म् आएल अछि।) उपर्युक्त बात मैथिलीमे कम देखल जाइत अछि। पञ्चमाक्षरक बदलामे अधिकांश जगहपर अनुस्वारक प्रयोग देखल जाइछ। जेना- अंक, पंच, खंड, संधि, खंभ आदि। व्याकरणविद पण्डित गोविन्द झाक कहब छनि जे कवर्ग, चवर्ग आ टवर्गसँ पूर्व अनुस्वार लिखल जाए तथा तवर्ग आ पवर्गसँ पूर्व पञ्चमाक्षरे लिखल जाए। जेना- अंक, चंचल, अंडा, अन्त तथा कम्पन। मुदा हिन्दीक निकट रहल आधुनिक लेखक एहि बातकेँ नहि मानैत छथि। ओ लोकनि अन्त आ कम्पनक जगहपर सेहो अंत आ कंपन लिखैत देखल जाइत छथि। नवीन पद्धति किछु सुविधाजनक अवश्य छैक। किएक तँ एहिमे समय आ स्थानक बचत होइत छैक। मुदा कतोक बेर हस्तलेखन वा मुद्रणमे अनुस्वारक छोट सन बिन्दु स्पष्ट नहि भेलासँ अर्थक अनर्थ होइत सेहो देखल जाइत अछि। अनुस्वारक प्रयोगमे उच्चारण-दोषक सम्भावना सेहो ततबए देखल जाइत अछि। एतदर्थ कसँ लऽ कऽ पवर्ग धरि पञ्चमाक्षरेक प्रयोग करब उचित अछि। यसँ लऽ कऽ ज्ञ धरिक अक्षरक सङ्ग अनुस्वारक प्रयोग करबामे कतहु कोनो विवाद नहि देखल जाइछ। २.ढ आ ढ़ : ढ़क उच्चारण “र् ह”जकाँ होइत अछि। अतः जतऽ “र् ह”क उच्चारण हो ओतऽ मात्र ढ़ लिखल जाए। आन ठाम खाली ढ लिखल जएबाक चाही। जेना- ढ = ढाकी, ढेकी, ढीठ, ढेउआ, ढङ्ग, ढेरी, ढाकनि, ढाठ आदि। ढ़ = पढ़ाइ, बढ़ब, गढ़ब, मढ़ब, बुढ़बा, साँढ़, गाढ़, रीढ़, चाँढ़, सीढ़ी, पीढ़ी आदि। उपर्युक्त शब्द सभकेँ देखलासँ ई स्पष्ट होइत अछि जे साधारणतया शब्दक शुरूमे ढ आ मध्य तथा अन्तमे ढ़ अबैत अछि। इएह नियम ड आ ड़क सन्दर्भ सेहो लागू होइत अछि। ३.व आ ब : मैथिलीमे “व”क उच्चारण ब कएल जाइत अछि, मुदा ओकरा ब रूपमे नहि लिखल जएबाक चाही। जेना- उच्चारण : बैद्यनाथ, बिद्या, नब, देबता, बिष्णु, बंश, बन्दना आदि। एहि सभक स्थानपर क्रमशः वैद्यनाथ, विद्या, नव, देवता, विष्णु, वंश, वन्दना लिखबाक चाही। सामान्यतया व उच्चारणक लेल ओ प्रयोग कएल जाइत अछि। जेना- ओकील, ओजह आदि। ४.य आ ज : कतहु-कतहु “य”क उच्चारण “ज”जकाँ करैत देखल जाइत अछि, मुदा ओकरा ज नहि लिखबाक चाही। उच्चारणमे यज्ञ, जदि, जमुना, जुग, जाबत, जोगी, जदु, जम आदि कहल जाएबला शब्द सभकेँ क्रमशः यज्ञ, यदि, यमुना, युग, यावत, योगी, यदु, यम लिखबाक चाही। ५.ए आ य : मैथिलीक वर्तनीमे ए आ य दुनू लिखल जाइत अछि। प्राचीन वर्तनी- कएल, जाए, होएत, माए, भाए, गाए आदि। नवीन वर्तनी- कयल, जाय, होयत, माय, भाय, गाय आदि। सामान्यतया शब्दक शुरूमे ए मात्र अबैत अछि। जेना एहि, एना, एकर, एहन आदि। एहि शब्द सभक स्थानपर यहि, यना, यकर, यहन आदिक प्रयोग नहि करबाक चाही। यद्यपि मैथिलीभाषी थारू सहित किछु जातिमे शब्दक आरम्भोमे “ए”केँ य कहि उच्चारण कएल जाइत अछि। ए आ “य”क प्रयोगक सन्दर्भमे प्राचीने पद्धतिक अनुसरण करब उपयुक्त मानि एहि पुस्तकमे ओकरे प्रयोग कएल गेल अछि। किएक तँ दुनूक लेखनमे कोनो सहजता आ दुरूहताक बात नहि अछि। आ मैथिलीक सर्वसाधारणक उच्चारण-शैली यक अपेक्षा एसँ बेसी निकट छैक। खास कऽ कएल, हएब आदि कतिपय शब्दकेँ कैल, हैब आदि रूपमे कतहु-कतहु लिखल जाएब सेहो “ए”क प्रयोगकेँ बेसी समीचीन प्रमाणित करैत अछि। ६.हि, हु तथा एकार, ओकार : मैथिलीक प्राचीन लेखन-परम्परामे कोनो बातपर बल दैत काल शब्दक पाछाँ हि, हु लगाओल जाइत छैक। जेना- हुनकहि, अपनहु, ओकरहु, तत्कालहि, चोट्टहि, आनहु आदि। मुदा आधुनिक लेखनमे हिक स्थानपर एकार एवं हुक स्थानपर ओकारक प्रयोग करैत देखल जाइत अछि। जेना- हुनके, अपनो, तत्काले, चोट्टे, आनो आदि। ७.ष तथा ख : मैथिली भाषामे अधिकांशतः षक उच्चारण ख होइत अछि। जेना- षड्यन्त्र (खड़यन्त्र), षोडशी (खोड़शी), षट्कोण (खटकोण), वृषेश (वृखेश), सन्तोष (सन्तोख) आदि। ८.ध्वनि-लोप : निम्नलिखित अवस्थामे शब्दसँ ध्वनि-लोप भऽ जाइत अछि: (क) क्रियान्वयी प्रत्यय अयमे य वा ए लुप्त भऽ जाइत अछि। ओहिमे सँ पहिने अक उच्चारण दीर्घ भऽ जाइत अछि। ओकर आगाँ लोप-सूचक चिह्न वा विकारी (’ / ऽ) लगाओल जाइछ। जेना- पूर्ण रूप : पढ़ए (पढ़य) गेलाह, कए (कय) लेल, उठए (उठय) पड़तौक। अपूर्ण रूप : पढ़’ गेलाह, क’ लेल, उठ’ पड़तौक। पढ़ऽ गेलाह, कऽ लेल, उठऽ पड़तौक। (ख) पूर्वकालिक कृत आय (आए) प्रत्ययमे य (ए) लुप्त भऽ जाइछ, मुदा लोप-सूचक विकारी नहि लगाओल जाइछ। जेना- पूर्ण रूप : खाए (य) गेल, पठाय (ए) देब, नहाए (य) अएलाह। अपूर्ण रूप : खा गेल, पठा देब, नहा अएलाह। (ग) स्त्री प्रत्यय इक उच्चारण क्रियापद, संज्ञा, ओ विशेषण तीनूमे लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना- पूर्ण रूप : दोसरि मालिनि चलि गेलि। अपूर्ण रूप : दोसर मालिन चलि गेल। (घ) वर्तमान कृदन्तक अन्तिम त लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना- पूर्ण रूप : पढ़ैत अछि, बजैत अछि, गबैत अछि। अपूर्ण रूप : पढ़ै अछि, बजै अछि, गबै अछि। (ङ) क्रियापदक अवसान इक, उक, ऐक तथा हीकमे लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना- पूर्ण रूप: छियौक, छियैक, छहीक, छौक, छैक, अबितैक, होइक। अपूर्ण रूप : छियौ, छियै, छही, छौ, छै, अबितै, होइ। (च) क्रियापदीय प्रत्यय न्ह, हु तथा हकारक लोप भऽ जाइछ। जेना- पूर्ण रूप : छन्हि, कहलन्हि, कहलहुँ, गेलह, नहि। अपूर्ण रूप : छनि, कहलनि, कहलौँ, गेलऽ, नइ, नञि, नै। ९.ध्वनि स्थानान्तरण : कोनो-कोनो स्वर-ध्वनि अपना जगहसँ हटि कऽ दोसर ठाम चलि जाइत अछि। खास कऽ ह्रस्व इ आ उक सम्बन्धमे ई बात लागू होइत अछि। मैथिलीकरण भऽ गेल शब्दक मध्य वा अन्तमे जँ ह्रस्व इ वा उ आबए तँ ओकर ध्वनि स्थानान्तरित भऽ एक अक्षर आगाँ आबि जाइत अछि। जेना- शनि (शइन), पानि (पाइन), दालि ( दाइल), माटि (माइट), काछु (काउछ), मासु (माउस) आदि। मुदा तत्सम शब्द सभमे ई निअम लागू नहि होइत अछि। जेना- रश्मिकेँ रइश्म आ सुधांशुकेँ सुधाउंस नहि कहल जा सकैत अछि। १०.हलन्त(्)क प्रयोग : मैथिली भाषामे सामान्यतया हलन्त (्)क आवश्यकता नहि होइत अछि। कारण जे शब्दक अन्तमे अ उच्चारण नहि होइत अछि। मुदा संस्कृत भाषासँ जहिनाक तहिना मैथिलीमे आएल (तत्सम) शब्द सभमे हलन्त प्रयोग कएल जाइत अछि। एहि पोथीमे सामान्यतया सम्पूर्ण शब्दकेँ मैथिली भाषा सम्बन्धी निअम अनुसार हलन्तविहीन राखल गेल अछि। मुदा व्याकरण सम्बन्धी प्रयोजनक लेल अत्यावश्यक स्थानपर कतहु-कतहु हलन्त देल गेल अछि। प्रस्तुत पोथीमे मथिली लेखनक प्राचीन आ नवीन दुनू शैलीक सरल आ समीचीन पक्ष सभकेँ समेटि कऽ वर्ण-विन्यास कएल गेल अछि। स्थान आ समयमे बचतक सङ्गहि हस्त-लेखन तथा तकनीकी दृष्टिसँ सेहो सरल होबऽबला हिसाबसँ वर्ण-विन्यास मिलाओल गेल अछि। वर्तमान समयमे मैथिली मातृभाषी पर्यन्तकेँ आन भाषाक माध्यमसँ मैथिलीक ज्ञान लेबऽ पड़ि रहल परिप्रेक्ष्यमे लेखनमे सहजता तथा एकरूपतापर ध्यान देल गेल अछि। तखन मैथिली भाषाक मूल विशेषता सभ कुण्ठित नहि होइक, ताहू दिस लेखक-मण्डल सचेत अछि। प्रसिद्ध भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक कहब छनि जे सरलताक अनुसन्धानमे एहन अवस्था किन्नहु ने आबऽ देबाक चाही जे भाषाक विशेषता छाँहमे पडि जाए। -(भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक धारणाकेँ पूर्ण रूपसँ सङ्ग लऽ निर्धारित) १.२. मैथिली अकादमी, पटना द्वारा निर्धारित मैथिली लेखन-शैली
१. जे शब्द मैथिली-साहित्यक प्राचीन कालसँ आइ धरि जाहि वर्त्तनीमे प्रचलित अछि, से सामान्यतः ताहि वर्त्तनीमे लिखल जाय- उदाहरणार्थ-
ग्राह्य
एखन ठाम जकर, तकर तनिकर अछि
अग्राह्य अखन, अखनि, एखेन, अखनी ठिमा, ठिना, ठमा जेकर, तेकर तिनकर। (वैकल्पिक रूपेँ ग्राह्य) ऐछ, अहि, ए।
२. निम्नलिखित तीन प्रकारक रूप वैकल्पिकतया अपनाओल जाय: भऽ गेल, भय गेल वा भए गेल। जा रहल अछि, जाय रहल अछि, जाए रहल अछि। कर’ गेलाह, वा करय गेलाह वा करए गेलाह।
३. प्राचीन मैथिलीक ‘न्ह’ ध्वनिक स्थानमे ‘न’ लिखल जाय सकैत अछि यथा कहलनि वा कहलन्हि।
४. ‘ऐ’ तथा ‘औ’ ततय लिखल जाय जत’ स्पष्टतः ‘अइ’ तथा ‘अउ’ सदृश उच्चारण इष्ट हो। यथा- देखैत, छलैक, बौआ, छौक इत्यादि।
५. मैथिलीक निम्नलिखित शब्द एहि रूपे प्रयुक्त होयत: जैह, सैह, इएह, ओऐह, लैह तथा दैह।
६. ह्र्स्व इकारांत शब्दमे ‘इ’ के लुप्त करब सामान्यतः अग्राह्य थिक। यथा- ग्राह्य देखि आबह, मालिनि गेलि (मनुष्य मात्रमे)।
७. स्वतंत्र ह्रस्व ‘ए’ वा ‘य’ प्राचीन मैथिलीक उद्धरण आदिमे तँ यथावत राखल जाय, किंतु आधुनिक प्रयोगमे वैकल्पिक रूपेँ ‘ए’ वा ‘य’ लिखल जाय। यथा:- कयल वा कएल, अयलाह वा अएलाह, जाय वा जाए इत्यादि।
८. उच्चारणमे दू स्वरक बीच जे ‘य’ ध्वनि स्वतः आबि जाइत अछि तकरा लेखमे स्थान वैकल्पिक रूपेँ देल जाय। यथा- धीआ, अढ़ैआ, विआह, वा धीया, अढ़ैया, बियाह।
९. सानुनासिक स्वतंत्र स्वरक स्थान यथासंभव ‘ञ’ लिखल जाय वा सानुनासिक स्वर। यथा:- मैञा, कनिञा, किरतनिञा वा मैआँ, कनिआँ, किरतनिआँ।
१०. कारकक विभक्त्तिक निम्नलिखित रूप ग्राह्य:- हाथकेँ, हाथसँ, हाथेँ, हाथक, हाथमे। ’मे’ मे अनुस्वार सर्वथा त्याज्य थिक। ‘क’ क वैकल्पिक रूप ‘केर’ राखल जा सकैत अछि।
११. पूर्वकालिक क्रियापदक बाद ‘कय’ वा ‘कए’ अव्यय वैकल्पिक रूपेँ लगाओल जा सकैत अछि। यथा:- देखि कय वा देखि कए।
१२. माँग, भाँग आदिक स्थानमे माङ, भाङ इत्यादि लिखल जाय।
१३. अर्द्ध ‘न’ ओ अर्द्ध ‘म’ क बदला अनुसार नहि लिखल जाय, किंतु छापाक सुविधार्थ अर्द्ध ‘ङ’ , ‘ञ’, तथा ‘ण’ क बदला अनुस्वारो लिखल जा सकैत अछि। यथा:- अङ्क, वा अंक, अञ्चल वा अंचल, कण्ठ वा कंठ।
१४. हलंत चिह्न निअमतः लगाओल जाय, किंतु विभक्तिक संग अकारांत प्रयोग कएल जाय। यथा:- श्रीमान्, किंतु श्रीमानक।
१५. सभ एकल कारक चिह्न शब्दमे सटा क’ लिखल जाय, हटा क’ नहि, संयुक्त विभक्तिक हेतु फराक लिखल जाय, यथा घर परक।
१६. अनुनासिककेँ चन्द्रबिन्दु द्वारा व्यक्त कयल जाय। परंतु मुद्रणक सुविधार्थ हि समान जटिल मात्रापर अनुस्वारक प्रयोग चन्द्रबिन्दुक बदला कयल जा सकैत अछि। यथा- हिँ केर बदला हिं।
१७. पूर्ण विराम पासीसँ ( । ) सूचित कयल जाय।
१८. समस्त पद सटा क’ लिखल जाय, वा हाइफेनसँ जोड़ि क’ , हटा क’ नहि।
१९. लिअ तथा दिअ शब्दमे बिकारी (ऽ) नहि लगाओल जाय।
२०. अंक देवनागरी रूपमे राखल जाय।
२१.किछु ध्वनिक लेल नवीन चिन्ह बनबाओल जाय। जा' ई नहि बनल अछि ताबत एहि दुनू ध्वनिक बदला पूर्ववत् अय/ आय/ अए/ आए/ आओ/ अओ लिखल जाय। आकि ऎ वा ऒ सँ व्यक्त कएल जाय।
ह./- गोविन्द झा ११/८/७६ श्रीकान्त ठाकुर ११/८/७६ सुरेन्द्र झा "सुमन" ११/०८/७६
२. मैथिलीमे भाषा सम्पादन पाठ्यक्रम २.१. उच्चारण निर्देश: (बोल्ड कएल रूप ग्राह्य):- दन्त न क उच्चारणमे दाँतमे जीह सटत- जेना बाजू नाम , मुदा ण क उच्चारणमे जीह मूर्धामे सटत (नै सटैए तँ उच्चारण दोष अछि)- जेना बाजू गणेश। तालव्य शमे जीह तालुसँ , षमे मूर्धासँ आ दन्त समे दाँतसँ सटत। निशाँ, सभ आ शोषण बाजि कऽ देखू। मैथिलीमे ष केँ वैदिक संस्कृत जकाँ ख सेहो उच्चरित कएल जाइत अछि, जेना वर्षा, दोष। य अनेको स्थानपर ज जकाँ उच्चरित होइत अछि आ ण ड़ जकाँ (यथा संयोग आ गणेश संजोग आ गड़ेस उच्चरित होइत अछि)। मैथिलीमे व क उच्चारण ब, श क उच्चारण स आ य क उच्चारण ज सेहो होइत अछि। ओहिना ह्रस्व इ बेशीकाल मैथिलीमे पहिने बाजल जाइत अछि कारण देवनागरीमे आ मिथिलाक्षरमे ह्रस्व इ अक्षरक पहिने लिखलो जाइत आ बाजलो जएबाक चाही। कारण जे हिन्दीमे एकर दोषपूर्ण उच्चारण होइत अछि (लिखल तँ पहिने जाइत अछि मुदा बाजल बादमे जाइत अछि), से शिक्षा पद्धतिक दोषक कारण हम सभ ओकर उच्चारण दोषपूर्ण ढंगसँ कऽ रहल छी। अछि- अ इ छ ऐछ (उच्चारण) छथि- छ इ थ – छैथ (उच्चारण) पहुँचि- प हुँ इ च (उच्चारण) आब अ आ इ ई ए ऐ ओ औ अं अः ऋ ऐ सभ लेल मात्रा सेहो अछि, मुदा ऐमे ई ऐ ओ औ अं अः ऋ केँ संयुक्ताक्षर रूपमे गलत रूपमे प्रयुक्त आ उच्चरित कएल जाइत अछि। जेना ऋ केँ री रूपमे उच्चरित करब। आ देखियौ- ऐ लेल देखिऔ क प्रयोग अनुचित। मुदा देखिऐ लेल देखियै अनुचित। क् सँ ह् धरि अ सम्मिलित भेलासँ क सँ ह बनैत अछि, मुदा उच्चारण काल हलन्त युक्त शब्दक अन्तक उच्चारणक प्रवृत्ति बढ़ल अछि, मुदा हम जखन मनोजमे ज् अन्तमे बजैत छी, तखनो पुरनका लोककेँ बजैत सुनबन्हि- मनोजऽ, वास्तवमे ओ अ युक्त ज् = ज बजै छथि। फेर ज्ञ अछि ज् आ ञ क संयुक्त मुदा गलत उच्चारण होइत अछि- ग्य। ओहिना क्ष अछि क् आ ष क संयुक्त मुदा उच्चारण होइत अछि छ। फेर श् आ र क संयुक्त अछि श्र ( जेना श्रमिक) आ स् आ र क संयुक्त अछि स्र (जेना मिस्र)। त्र भेल त+र । उच्चारणक ऑडियो फाइल विदेह आर्काइव http://www.videha.co.in/ पर उपलब्ध अछि। फेर केँ / सँ / पर पूर्व अक्षरसँ सटा कऽ लिखू मुदा तँ / कऽ हटा कऽ। ऐमे सँ मे पहिल सटा कऽ लिखू आ बादबला हटा कऽ। अंकक बाद टा लिखू सटा कऽ मुदा अन्य ठाम टा लिखू हटा कऽ– जेना छहटा मुदा सभ टा। फेर ६अ म सातम लिखू- छठम सातम नै। घरबलामे बला मुदा घरवालीमे वाली प्रयुक्त करू। रहए- रहै मुदा सकैए (उच्चारण सकै-ए)। मुदा कखनो काल रहए आ रहै मे अर्थ भिन्नता सेहो, जेना से कम्मो जगहमे पार्किंग करबाक अभ्यास रहै ओकरा। पुछलापर पता लागल जे ढुनढुन नाम्ना ई ड्राइवर कनाट प्लेसक पार्किंगमे काज करैत रहए। छलै, छलए मे सेहो ऐ तरहक भेल। छलए क उच्चारण छल-ए सेहो। संयोगने- (उच्चारण संजोगने) केँ/ कऽ केर- क ( केर क प्रयोग गद्यमे नै करू , पद्यमे कऽ सकै छी। ) क (जेना रामक) –रामक आ संगे (उच्चारण राम के / राम कऽ सेहो) सँ- सऽ (उच्चारण) चन्द्रबिन्दु आ अनुस्वार- अनुस्वारमे कंठ धरिक प्रयोग होइत अछि मुदा चन्द्रबिन्दुमे नै। चन्द्रबिन्दुमे कनेक एकारक सेहो उच्चारण होइत अछि- जेना रामसँ- (उच्चारण राम सऽ) रामकेँ- (उच्चारण राम कऽ/ राम के सेहो)। केँ जेना रामकेँ भेल हिन्दीक को (राम को)- राम को= रामकेँ क जेना रामक भेल हिन्दीक का ( राम का) राम का= रामक कऽ जेना जा कऽ भेल हिन्दीक कर ( जा कर) जा कर= जा कऽ सँ भेल हिन्दीक से (राम से) राम से= रामसँ सऽ , तऽ , त , केर (गद्यमे) एे चारू शब्द सबहक प्रयोग अवांछित। के दोसर अर्थेँ प्रयुक्त भऽ सकैए- जेना, के कहलक? विभक्ति “क”क बदला एकर प्रयोग अवांछित। नञि, नहि, नै, नइ, नँइ, नइँ, नइं ऐ सभक उच्चारण आ लेखन - नै त्त्व क बदलामे त्व जेना महत्वपूर्ण (महत्त्वपूर्ण नै) जतए अर्थ बदलि जाए ओतहि मात्र तीन अक्षरक संयुक्ताक्षरक प्रयोग उचित। सम्पति- उच्चारण स म्प इ त (सम्पत्ति नै- कारण सही उच्चारण आसानीसँ सम्भव नै)। मुदा सर्वोत्तम (सर्वोतम नै)। राष्ट्रिय (राष्ट्रीय नै) सकैए/ सकै (अर्थ परिवर्तन) पोछैले/ पोछै लेल/ पोछए लेल पोछैए/ पोछए/ (अर्थ परिवर्तन) पोछए/ पोछै ओ लोकनि ( हटा कऽ, ओ मे बिकारी नै) ओइ/ ओहि ओहिले/ ओहि लेल/ ओही लऽ जएबेँ/ बैसबेँ पँचभइयाँ देखियौक/ (देखिऔक नै- तहिना अ मे ह्रस्व आ दीर्घक मात्राक प्रयोग अनुचित) जकाँ / जेकाँ तँइ/ तैँ/ होएत / हएत नञि/ नहि/ नँइ/ नइँ/ नै सौँसे/ सौंसे बड़ / बड़ी (झोराओल) गाए (गाइ नहि), मुदा गाइक दूध (गाएक दूध नै।) रहलेँ/ पहिरतैँ हमहीं/ अहीं सब - सभ सबहक - सभहक धरि - तक गप- बात बूझब - समझब बुझलौं/ समझलौं/ बुझलहुँ - समझलहुँ हमरा आर - हम सभ आकि- आ कि सकैछ/ करैछ (गद्यमे प्रयोगक आवश्यकता नै) होइन/ होनि जाइन (जानि नै, जेना देल जाइन) मुदा जानि-बूझि (अर्थ परिव्र्तन) पइठ/ जाइठ आउ/ जाउ/ आऊ/ जाऊ मे, केँ, सँ, पर (शब्दसँ सटा कऽ) तँ कऽ धऽ दऽ (शब्दसँ हटा कऽ) मुदा दूटा वा बेसी विभक्ति संग रहलापर पहिल विभक्ति टाकेँ सटाऊ। जेना ऐमे सँ । एकटा , दूटा (मुदा कए टा) बिकारीक प्रयोग शब्दक अन्तमे, बीचमे अनावश्यक रूपेँ नै। आकारान्त आ अन्तमे अ क बाद बिकारीक प्रयोग नै (जेना दिअ , आ/ दिय’ , आ’, आ नै ) अपोस्ट्रोफीक प्रयोग बिकारीक बदलामे करब अनुचित आ मात्र फॉन्टक तकनीकी न्यूनताक परिचायक)- ओना बिकारीक संस्कृत रूप ऽ अवग्रह कहल जाइत अछि आ वर्तनी आ उच्चारण दुनू ठाम एकर लोप रहैत अछि/ रहि सकैत अछि (उच्चारणमे लोप रहिते अछि)। मुदा अपोस्ट्रोफी सेहो अंग्रेजीमे पसेसिव केसमे होइत अछि आ फ्रेंचमे शब्दमे जतए एकर प्रयोग होइत अछि जेना raison d’etre एतए सेहो एकर उच्चारण रैजौन डेटर होइत अछि, माने अपोस्ट्रॉफी अवकाश नै दैत अछि वरन जोड़ैत अछि, से एकर प्रयोग बिकारीक बदला देनाइ तकनीकी रूपेँ सेहो अनुचित)। अइमे, एहिमे/ ऐमे जइमे, जाहिमे एखन/ अखन/ अइखन केँ (के नहि) मे (अनुस्वार रहित) भऽ मे दऽ तँ (तऽ, त नै) सँ ( सऽ स नै) गाछ तर गाछ लग साँझ खन जो (जो go, करै जो do) तै/तइ जेना- तै दुआरे/ तइमे/ तइले जै/जइ जेना- जै कारण/ जइसँ/ जइले ऐ/अइ जेना- ऐ कारण/ ऐसँ/ अइले/ मुदा एकर एकटा खास प्रयोग- लालति कतेक दिनसँ कहैत रहैत अइ लै/लइ जेना लैसँ/ लइले/ लै दुआरे लहँ/ लौं गेलौं/ लेलौं/ लेलँह/ गेलहुँ/ लेलहुँ/ लेलँ जइ/ जाहि/ जै जहिठाम/ जाहिठाम/ जइठाम/ जैठाम एहि/ अहि/ अइ (वाक्यक अंतमे ग्राह्य) / ऐ अइछ/ अछि/ ऐछ तइ/ तहि/ तै/ ताहि ओहि/ ओइ सीखि/ सीख जीवि/ जीवी/ जीब भलेहीं/ भलहिं तैं/ तँइ/ तँए जाएब/ जएब लइ/ लै छइ/ छै नहि/ नै/ नइ गइ/ गै छनि/ छन्हि ... समए शब्दक संग जखन कोनो विभक्ति जुटै छै तखन समै जना समैपर इत्यादि। असगरमे हृदए आ विभक्ति जुटने हृदे जना हृदेसँ, हृदेमे इत्यादि। जइ/ जाहि/ जै जहिठाम/ जाहिठाम/ जइठाम/ जैठाम एहि/ अहि/ अइ/ ऐ अइछ/ अछि/ ऐछ तइ/ तहि/ तै/ ताहि ओहि/ ओइ सीखि/ सीख जीवि/ जीवी/ जीब भले/ भलेहीं/ भलहिं तैं/ तँइ/ तँए जाएब/ जएब लइ/ लै छइ/ छै नहि/ नै/ नइ गइ/ गै छनि/ छन्हि चुकल अछि/ गेल गछि २.२. मैथिलीमे भाषा सम्पादन पाठ्यक्रम नीचाँक सूचीमे देल विकल्पमेसँ लैंगुएज एडीटर द्वारा कोन रूप चुनल जेबाक चाही: बोल्ड कएल रूप ग्राह्य: १.होयबला/ होबयबला/ होमयबला/ हेब’बला, हेम’बला/ होयबाक/होबएबला /होएबाक २. आ’/आऽ आ ३. क’ लेने/कऽ लेने/कए लेने/कय लेने/ल’/लऽ/लय/लए ४. भ’ गेल/भऽ गेल/भय गेल/भए गेल ५. कर’ गेलाह/करऽ गेलह/करए गेलाह/करय गेलाह ६. लिअ/दिअ लिय’,दिय’,लिअ’,दिय’/ ७. कर’ बला/करऽ बला/ करय बला करैबला/क’र’ बला / करैवाली ८. बला वला (पुरूष), वाली (स्त्री) ९ . आङ्ल आंग्ल १०. प्रायः प्रायह ११. दुःख दुख १ २. चलि गेल चल गेल/चैल गेल १३. देलखिन्ह देलकिन्ह, देलखिन १४. देखलन्हि देखलनि/ देखलैन्ह १५. छथिन्ह/ छलन्हि छथिन/ छलैन/ छलनि १६. चलैत/दैत चलति/दैति १७. एखनो अखनो १८. बढ़नि बढ़इन बढ़न्हि १९. ओ’/ओऽ(सर्वनाम) ओ २० . ओ (संयोजक) ओ’/ओऽ २१. फाँगि/फाङ्गि फाइंग/फाइङ २२. जे जे’/जेऽ २३. ना-नुकुर ना-नुकर २४. केलन्हि/केलनि/कयलन्हि २५. तखनतँ/ तखन तँ २६. जा रहल/जाय रहल/जाए रहल २७. निकलय/निकलए लागल/ लगल बहराय/ बहराए लागल/ लगल निकल’/बहरै लागल २८. ओतय/ जतय जत’/ ओत’/ जतए/ ओतए २९. की फूरल जे कि फूरल जे ३०. जे जे’/जेऽ ३१. कूदि / यादि(मोन पारब) कूइद/याइद/कूद/याद/ यादि (मोन) ३२. इहो/ ओहो ३३. हँसए/ हँसय हँसऽ ३४. नौ आकि दस/नौ किंवा दस/ नौ वा दस ३५. सासु-ससुर सास-ससुर ३६. छह/ सात छ/छः/सात ३७. की की’/ कीऽ (दीर्घीकारान्तमे ऽ वर्जित) ३८. जबाब जवाब ३९. करएताह/ करेताह करयताह ४०. दलान दिशि दलान दिश/दलान दिस ४१ . गेलाह गएलाह/गयलाह ४२. किछु आर/ किछु और/ किछ आर ४३. जाइ छल/ जाइत छल जाति छल/जैत छल ४४. पहुँचि/ भेट जाइत छल/ भेट जाइ छलए पहुँच/ भेटि जाइत छल ४५. जबान (युवा)/ जवान(फौजी) ४६. लय/ लए क’/ कऽ/ लए कए / लऽ कऽ/ लऽ कए ४७. ल’/लऽ कय/ कए ४८. एखन / एखने / अखन / अखने ४९. अहींकेँ अहीँकेँ ५०. गहींर गहीँर ५१. धार पार केनाइ धार पार केनाय/केनाए ५२. जेकाँ जेँकाँ/ जकाँ ५३. तहिना तेहिना ५४. एकर अकर ५५. बहिनउ बहनोइ ५६. बहिन बहिनि ५७. बहिन-बहिनोइ बहिन-बहनउ ५८. नहि/ नै ५९. करबा / करबाय/ करबाए ६०. तँ/ त ऽ तय/तए ६१. भैयारी मे छोट-भाए/भै/, जेठ-भाय/भाइ, ६२. गिनतीमे दू भाइ/भाए/भाँइ ६३. ई पोथी दू भाइक/ भाँइ/ भाए/ लेल। यावत जावत ६४. माय मै / माए मुदा माइक ममता ६५. देन्हि/ दइन दनि/ दएन्हि/ दयन्हि दन्हि/ दैन्हि ६६. द’/ दऽ/ दए ६७. ओ (संयोजक) ओऽ (सर्वनाम) ६८. तका कए तकाय तकाए ६९. पैरे (on foot) पएरे कएक/ कैक ७०. ताहुमे/ ताहूमे ७१. पुत्रीक ७२. बजा कय/ कए / कऽ ७३. बननाय/बननाइ ७४. कोला ७५. दिनुका दिनका ७६. ततहिसँ ७७. गरबओलन्हि/ गरबौलनि/ गरबेलन्हि/ गरबेलनि ७८. बालु बालू ७९. चेन्ह चिन्ह(अशुद्ध) ८०. जे जे’ ८१ . से/ के से’/के’ ८२. एखुनका अखनुका ८३. भुमिहार भूमिहार ८४. सुग्गर / सुगरक/ सूगर ८५. झठहाक झटहाक ८६. छूबि ८७. करइयो/ओ करैयो ने देलक /करियौ-करइयौ ८८. पुबारि पुबाइ ८९. झगड़ा-झाँटी झगड़ा-झाँटि ९०. पएरे-पएरे पैरे-पैरे ९१. खेलएबाक ९२. खेलेबाक ९३. लगा ९४. होए- हो – होअए ९५. बुझल बूझल ९६. बूझल (संबोधन अर्थमे) ९७. यैह यएह / इएह/ सैह/ सएह ९८. तातिल ९९. अयनाय- अयनाइ/ अएनाइ/ एनाइ १००. निन्न- निन्द १०१. बिनु बिन १०२. जाए जाइ १०३. जाइ (in different sense)-last word of sentence १०४. छत पर आबि जाइ १०५. ने १०६. खेलाए (play) –खेलाइ १०७. शिकाइत- शिकायत १०८. ढप- ढ़प १०९ . पढ़- पढ ११०. कनिए/ कनिये कनिञे १११. राकस- राकश ११२. होए/ होय होइ ११३. अउरदा- औरदा ११४. बुझेलन्हि (different meaning- got understand) ११५. बुझएलन्हि/बुझेलनि/ बुझयलन्हि (understood himself) ११६. चलि- चल/ चलि गेल ११७. खधाइ- खधाय ११८. मोन पाड़लखिन्ह/ मोन पाड़लखिन/ मोन पारलखिन्ह ११९. कैक- कएक- कइएक १२०. लग ल’ग १२१. जरेनाइ १२२. जरौनाइ जरओनाइ- जरएनाइ/ जरेनाइ १२३. होइत १२४. गरबेलन्हि/ गरबेलनि गरबौलन्हि/ गरबौलनि १२५. चिखैत- (to test)चिखइत १२६. करइयो (willing to do) करैयो १२७. जेकरा- जकरा १२८. तकरा- तेकरा १२९. बिदेसर स्थानेमे/ बिदेसरे स्थानमे १३०. करबयलहुँ/ करबएलहुँ/ करबेलहुँ करबेलौं १३१. हारिक (उच्चारण हाइरक) १३२. ओजन वजन आफसोच/ अफसोस कागत/ कागच/ कागज १३३. आधे भाग/ आध-भागे १३४. पिचा / पिचाय/पिचाए १३५. नञ/ ने १३६. बच्चा नञ (ने) पिचा जाय १३७. तखन ने (नञ) कहैत अछि। कहै/ सुनै/ देखै छल मुदा कहैत-कहैत/ सुनैत-सुनैत/ देखैत-देखैत १३८. कतेक गोटे/ कताक गोटे १३९. कमाइ-धमाइ/ कमाई- धमाई १४० . लग ल’ग १४१. खेलाइ (for playing) १४२. छथिन्ह/ छथिन १४३. होइत होइ १४४. क्यो कियो / केओ १४५. केश (hair) १४६. केस (court-case) १४७ . बननाइ/ बननाय/ बननाए १४८. जरेनाइ १४९. कुरसी कुर्सी १५०. चरचा चर्चा १५१. कर्म करम १५२. डुबाबए/ डुबाबै/ डुमाबै डुमाबय/ डुमाबए १५३. एखुनका/ अखुनका १५४. लए/ लिअए (वाक्यक अंतिम शब्द)- लऽ १५५. कएलक/ केलक १५६. गरमी गर्मी १५७ . वरदी वर्दी १५८. सुना गेलाह सुना’/सुनाऽ १५९. एनाइ-गेनाइ १६०. तेना ने घेरलन्हि/ तेना ने घेरलनि १६१. नञि / नै १६२. डरो ड’रो १६३. कतहु/ कतौ कहीं १६४. उमरिगर-उमेरगर उमरगर १६५. भरिगर १६६. धोल/धोअल धोएल १६७. गप/गप्प १६८. के के’ १६९. दरबज्जा/ दरबजा १७०. ठाम १७१. धरि तक १७२. घूरि लौटि १७३. थोरबेक १७४. बड्ड १७५. तोँ/ तूँ १७६. तोँहि( पद्यमे ग्राह्य) १७७. तोँही / तोँहि १७८. करबाइए करबाइये १७९. एकेटा १८०. करितथि /करतथि १८१. पहुँचि/ पहुँच १८२. राखलन्हि रखलन्हि/ रखलनि १८३. लगलन्हि/ लगलनि लागलन्हि १८४. सुनि (उच्चारण सुइन) १८५. अछि (उच्चारण अइछ) १८६. एलथि गेलथि १८७. बितओने/ बितौने/ बितेने १८८. करबओलन्हि/ करबौलनि/ करेलखिन्ह/ करेलखिन १८९. करएलन्हि/ करेलनि १९०. आकि/ कि १९१. पहुँचि/ पहुँच १९२. बत्ती जराय/ जराए जरा (आगि लगा) १९३. से से’ १९४. हाँ मे हाँ (हाँमे हाँ विभक्त्तिमे हटा कए) १९५. फेल फैल १९६. फइल(spacious) फैल १९७. होयतन्हि/ होएतन्हि/ होएतनि/हेतनि/ हेतन्हि १९८. हाथ मटिआएब/ हाथ मटियाबय/हाथ मटियाएब १९९. फेका फेंका २००. देखाए देखा २०१. देखाबए २०२. सत्तरि सत्तर २०३. साहेब साहब २०४.गेलैन्ह/ गेलन्हि/ गेलनि २०५. हेबाक/ होएबाक २०६.केलो/ कएलहुँ/केलौं/ केलुँ २०७. किछु न किछु/ किछु ने किछु २०८.घुमेलहुँ/ घुमओलहुँ/ घुमेलौं २०९. एलाक/ अएलाक २१०. अः/ अह २११.लय/ लए (अर्थ-परिवर्त्तन) २१२.कनीक/ कनेक २१३.सबहक/ सभक २१४.मिलाऽ/ मिला २१५.कऽ/ क २१६.जाऽ/ जा २१७.आऽ/ आ २१८.भऽ /भ’ (’ फॉन्टक कमीक द्योतक) २१९.निअम/ नियम २२० .हेक्टेअर/ हेक्टेयर २२१.पहिल अक्षर ढ/ बादक/ बीचक ढ़ २२२.तहिं/तहिँ/ तञि/ तैं २२३.कहिं/ कहीं २२४.तँइ/ तैं / तइँ २२५.नँइ/ नइँ/ नञि/ नहि/नै २२६.है/ हए / एलीहेँ/ २२७.छञि/ छै/ छैक /छइ २२८.दृष्टिएँ/ दृष्टियेँ २२९.आ (come)/ आऽ(conjunction) २३०. आ (conjunction)/ आऽ(come) २३१.कुनो/ कोनो, कोना/केना २३२.गेलैन्ह-गेलन्हि-गेलनि २३३.हेबाक- होएबाक २३४.केलौँ- कएलौँ-कएलहुँ/केलौं २३५.किछु न किछ- किछु ने किछु २३६.केहेन- केहन २३७.आऽ (come)-आ (conjunction-and)/आ। आब'-आब' /आबह-आबह २३८. हएत-हैत २३९.घुमेलहुँ-घुमएलहुँ- घुमेलाें २४०.एलाक- अएलाक २४१.होनि- होइन/ होन्हि/ २४२.ओ-राम ओ श्यामक बीच(conjunction), ओऽ कहलक (he said)/ओ २४३.की हए/ कोसी अएली हए/ की है। की हइ २४४.दृष्टिएँ/ दृष्टियेँ २४५ .शामिल/ सामेल २४६.तैँ / तँए/ तञि/ तहिं २४७.जौं / ज्योँ/ जँ/ २४८.सभ/ सब २४९.सभक/ सबहक २५०.कहिं/ कहीं २५१.कुनो/ कोनो/ कोनहुँ/ २५२.फारकती भऽ गेल/ भए गेल/ भय गेल २५३.कोना/ केना/ कन्ना/कना २५४.अः/ अह २५५.जनै/ जनञ २५६.गेलनि/ गेलाह (अर्थ परिवर्तन) २५७.केलन्हि/ कएलन्हि/ केलनि/ २५८.लय/ लए/ लएह (अर्थ परिवर्तन) २५९.कनीक/ कनेक/कनी-मनी २६०.पठेलन्हि पठेलनि/ पठेलइन/ पपठओलन्हि/ पठबौलनि/ २६१.निअम/ नियम २६२.हेक्टेअर/ हेक्टेयर २६३.पहिल अक्षर रहने ढ/ बीचमे रहने ढ़ २६४.आकारान्तमे बिकारीक प्रयोग उचित नै/ अपोस्ट्रोफीक प्रयोग फान्टक तकनीकी न्यूनताक परिचायक ओकर बदला अवग्रह (बिकारी) क प्रयोग उचित २६५.केर (पद्यमे ग्राह्य) / -क/ कऽ/ के २६६.छैन्हि- छन्हि २६७.लगैए/ लगैये २६८.होएत/ हएत २६९.जाएत/ जएत/ २७०.आएत/ अएत/ आओत २७१ .खाएत/ खएत/ खैत २७२.पिअएबाक/ पिएबाक/पियेबाक २७३.शुरु/ शुरुह २७४.शुरुहे/ शुरुए २७५.अएताह/अओताह/ एताह/ औताह २७६.जाहि/ जाइ/ जइ/ जै/ २७७.जाइत/ जैतए/ जइतए २७८.आएल/ अएल २७९.कैक/ कएक २८०.आयल/ अएल/ आएल २८१. जाए/ जअए/ जए (लालति जाए लगलीह।) २८२. नुकएल/ नुकाएल २८३. कठुआएल/ कठुअएल २८४. ताहि/ तै/ तइ २८५. गायब/ गाएब/ गएब २८६. सकै/ सकए/ सकय २८७.सेरा/सरा/ सराए (भात सरा गेल) २८८.कहैत रही/देखैत रही/ कहैत छलौं/ कहै छलौं- अहिना चलैत/ पढ़ैत (पढ़ै-पढ़ैत अर्थ कखनो काल परिवर्तित) - आर बुझै/ बुझैत (बुझै/ बुझै छी, मुदा बुझैत-बुझैत)/ सकैत/ सकै। करैत/ करै। दै/ दैत। छैक/ छै। बचलै/ बचलैक। रखबा/ रखबाक । बिनु/ बिन। रातिक/ रातुक बुझै आ बुझैत केर अपन-अपन जगहपर प्रयोग समीचीन अछि। बुझैत-बुझैत आब बुझलिऐ। हमहूँ बुझै छी। २८९. दुआरे/ द्वारे २९०.भेटि/ भेट/ भेँट २९१. खन/ खीन/ खुना (भोर खन/ भोर खीन) २९२.तक/ धरि २९३.गऽ/ गै (meaning different-जनबै गऽ) २९४.सऽ/ सँ (मुदा दऽ, लऽ) २९५.त्त्व,(तीन अक्षरक मेल बदला पुनरुक्तिक एक आ एकटा दोसरक उपयोग) आदिक बदला त्व आदि। महत्त्व/ महत्व/ कर्ता/ कर्त्ता आदिमे त्त संयुक्तक कोनो आवश्यकता मैथिलीमे नै अछि। वक्तव्य २९६.बेसी/ बेशी २९७.बाला/वाला बला/ वला (रहैबला) २९८ .वाली/ (बदलैवाली) २९९.वार्त्ता/ वार्ता ३००. अन्तर्राष्ट्रिय/ अन्तर्राष्ट्रीय ३०१. लेमए/ लेबए ३०२.लमछुरका, नमछुरका ३०२.लागै/ लगै ( भेटैत/ भेटै) ३०३.लागल/ लगल ३०४.हबा/ हवा ३०५.राखलक/ रखलक ३०६.आ (come)/ आ (and) ३०७. पश्चाताप/ पश्चात्ताप ३०८. ऽ केर व्यवहार शब्दक अन्तमे मात्र, यथासंभव बीचमे नै। ३०९.कहैत/ कहै ३१०. रहए (छल)/ रहै (छलै) (meaning different) ३११.तागति/ ताकति ३१२.खराप/ खराब ३१३.बोइन/ बोनि/ बोइनि ३१४.जाठि/ जाइठ ३१५.कागज/ कागच/ कागत ३१६.गिरै (meaning different- swallow)/ गिरए (खसए) ३१७.राष्ट्रिय/ राष्ट्रीय Festivals of Mithila DATE-LIST (year- 2011-12) (१४१९ साल) Marriage Days: Nov.2011- 20,21,23,25,27,30 Dec.2011- 1,5,9 January 2012- 18,19,20,23,25,27,29 Feb.2012- 2,3,8,9,10,16,17,19,23,24,29 March 2012- 1,8,9,12 April 2012- 15,16,18,25,26 June 2012- 8,13,24,25,28,29 Upanayana Days: February 2012- 2,3,24,26 March 2012- 4 April 2012- 1,2,26 June 2012- 22 Dviragaman Din: November 2011- 27,30 December 2011- 1,2,5,7,9,12 February 2012- 22,23,24,26,27,29 March 2012- 1,2,4,5,9,11,12 April 2012- 23,25,26,29 May 2012- 2,3,4,6,7 Mundan Din: December 2011- 1,5 January 201225,26,30 March 2012- 12 April 2012- 26 May 2012- 23,25,31 June 2012- 8,21,22,29 FESTIVALS OF MITHILA Mauna Panchami-20 July Madhushravani- 2 August Nag Panchami- 4 August Raksha Bandhan- 13 Aug Krishnastami- 21 August Kushi Amavasya / Somvari Vrat- 29 August Hartalika Teej- 31 August ChauthChandra-1 September Karma Dharma Ekadashi-8 September Indra Pooja Aarambh- 9 September Anant Caturdashi- 11 Sep Agastyarghadaan- 12 Sep Pitri Paksha begins- 13 Sep Mahalaya Aarambh- 13 September Vishwakarma Pooja- 17 September Jimootavahan Vrata/ Jitia-20 September Matri Navami- 21September Kalashsthapan- 28 September Belnauti- 2 October Patrika Pravesh- 3 October Mahastami- 4 October Maha Navami - 5 October Vijaya Dashami- 6 October Kojagara- 11 Oct Dhanteras- 24 October Diyabati, shyama pooja-26 October Annakoota/ Govardhana Pooja-27 October Bhratridwitiya/ Chitragupta Pooja-28 October Chhathi-kharna -31 October Chhathi- sayankalik arghya - 1 November Devotthan Ekadashi- 17 November Sama poojarambh- 2 November Kartik Poornima/ Sama Bisarjan- 10 Nov ravivratarambh- 27 November Navanna parvan- 29 November Vivaha Panchmi- 29 November Makara/ Teela Sankranti-15 Jan Naraknivaran chaturdashi- 21 January Basant Panchami/ Saraswati Pooja- 28 January Achla Saptmi- 30 January Mahashivaratri-20 February Holikadahan-Fagua-7 March Holi-9 Mar Varuni Yoga-20 March Chaiti navaratrarambh- 23 March Chaiti Chhathi vrata-29 March Ram Navami- 1 April Mesha Sankranti-Satuani-13 April Jurishital-14 April Akshaya Tritiya-24 April Ravi Brat Ant- 29 April Janaki Navami- 30 April Vat Savitri-barasait- 20 May Ganga Dashhara-30 May Somavati Amavasya Vrata- 18 June Jagannath Rath Yatra- 21 June Hari Sayan Ekadashi- 30 June Aashadhi Guru Poornima-3 Jul VIDEHA ARCHIVE १.विदेह ई-पत्रिकाक सभटा पुरान अंक ब्रेल, तिरहुता आ देवनागरी रूपमे Videha e journal's all old issues in Braille Tirhuta and Devanagari versions विदेह ई-पत्रिकाक पहिल ५० अंक
विदेह ई-पत्रिकाक ५०म सँ आगाँक अंक २.मैथिली पोथी डाउनलोड Maithili Books Download ३.मैथिली ऑडियो संकलन Maithili Audio Downloads ४.मैथिली वीडियोक संकलन Maithili Videos ५.मिथिला चित्रकला/ आधुनिक चित्रकला आ चित्र Mithila Painting/ Modern Art and Photos "विदेह"क एहि सभ सहयोगी लिंकपर सेहो एक बेर जाऊ। ६.विदेह मैथिली क्विज : http://videhaquiz.blogspot.com/ ७.विदेह मैथिली जालवृत्त एग्रीगेटर : http://videha-aggregator.blogspot.com/ ८.विदेह मैथिली साहित्य अंग्रेजीमे अनूदित http://madhubani-art.blogspot.com/ ९.विदेहक पूर्व-रूप "भालसरिक गाछ" : http://gajendrathakur.blogspot.com/ १०.विदेह इंडेक्स : http://videha123.blogspot.com/ ११.विदेह फाइल : http://videha123.wordpress.com/ १२. विदेह: सदेह : पहिल तिरहुता (मिथिला़क्षर) जालवृत्त (ब्लॉग) http://videha-sadeha.blogspot.com/ १३. विदेह:ब्रेल: मैथिली ब्रेलमे: पहिल बेर विदेह द्वारा http://videha-braille.blogspot.com/ १४.VIDEHA IST MAITHILI FORTNIGHTLY EJOURNAL ARCHIVE http://videha-archive.blogspot.com/ १५. विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका मैथिली पोथीक आर्काइव http://videha-pothi.blogspot.com/ १६. विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका ऑडियो आर्काइव http://videha-audio.blogspot.com/ १७. विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका वीडियो आर्काइव http://videha-video.blogspot.com/ १८. विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका मिथिला चित्रकला, आधुनिक कला आ चित्रकला http://videha-paintings-photos.blogspot.com/ १९. मैथिल आर मिथिला (मैथिलीक सभसँ लोकप्रिय जालवृत्त) http://maithilaurmithila.blogspot.com/ २०.श्रुति प्रकाशन http://www.shruti-publication.com/ २१.http://groups.google.com/group/videha VIDEHA केर सदस्यता लिअ Top of Form Bottom of Form ईमेल : एहि समूहपर जाऊ २२.http://groups.yahoo.com/group/VIDEHA/ Top of Form Subscribe to VIDEHA Powered by us.groups.yahoo.com Bottom of Form २३.गजेन्द्र ठाकुर इडेक्स http://gajendrathakur123.blogspot.com २४. नेना भुटका http://mangan-khabas.blogspot.com/ २५.विदेह रेडियो:मैथिली कथा-कविता आदिक पहिल पोडकास्ट साइट http://videha123radio.wordpress.com/ २६.Videha Radio २७. Join official Videha facebook group. २८. विदेह मैथिली नाट्य उत्सव http://maithili-drama.blogspot.com/ २९.समदिया http://esamaad.blogspot.com/ ३०. मैथिली फिल्म्स http://maithilifilms.blogspot.com/ ३१.अनचिन्हार आखर http://anchinharakharkolkata.blogspot.com/ ३२. मैथिली हाइकू http://maithili-haiku.blogspot.com/ ३३. मानक मैथिली http://manak-maithili.blogspot.com/ महत्त्वपूर्ण सूचना:(१) 'विदेह' द्वारा धारावाहिक रूपे ई-प्रकाशित कएल गेल गजेन्द्र ठाकुरक निबन्ध-प्रबन्ध-समीक्षा, उपन्यास (सहस्रबाढ़नि) , पद्य-संग्रह (सहस्राब्दीक चौपड़पर), कथा-गल्प (गल्प-गुच्छ), नाटक(संकर्षण), महाकाव्य (त्वञ्चाहञ्च आ असञ्जाति मन) आ बाल-किशोर साहित्य विदेहमे संपूर्ण ई-प्रकाशनक बाद प्रिंट फॉर्ममे। कुरुक्षेत्रम्–अन्तर्मनक खण्ड-१ सँ ७ Combined ISBN No.978-81-907729-7-6 विवरण एहि पृष्ठपर नीचाँमे आ प्रकाशकक साइट http://www.shruti-publication.com/ पर । महत्त्वपूर्ण सूचना (२):सूचना: विदेहक मैथिली-अंग्रेजी आ अंग्रेजी मैथिली कोष (इंटरनेटपर पहिल बेर सर्च-डिक्शनरी) एम.एस. एस.क्यू.एल. सर्वर आधारित -Based on ms-sql server Maithili-English and English-Maithili Dictionary. विदेहक भाषापाक- रचनालेखन स्तंभमे। कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक- गजेन्द्र ठाकुर गजेन्द्र ठाकुरक निबन्ध-प्रबन्ध-समीक्षा, उपन्यास (सहस्रबाढ़नि) , पद्य-संग्रह (सहस्राब्दीक चौपड़पर), कथा-गल्प (गल्प गुच्छ), नाटक(संकर्षण), महाकाव्य (त्वञ्चाहञ्च आ असञ्जाति मन) आ बालमंडली-किशोरजगत विदेहमे संपूर्ण ई-प्रकाशनक बाद प्रिंट फॉर्ममे। कुरुक्षेत्रम्–अन्तर्मनक, खण्ड-१ सँ ७ Ist edition 2009 of Gajendra Thakur’s KuruKshetram-Antarmanak (Vol. I to VII)- essay-paper-criticism, novel, poems, story, play, epics and Children-grown-ups literature in single binding: Language:Maithili ६९२ पृष्ठ : मूल्य भा. रु. 100/-(for individual buyers inside india) (add courier charges Rs.50/-per copy for Delhi/NCR and Rs.100/- per copy for outside Delhi)
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Details for purchase available at print-version publishers's site website: http://www.shruti-publication.com/ or you may write to e-mail:shruti.publication@shruti-publication.com विदेह: सदेह : १: २: ३: ४ तिरहुता : देवनागरी "विदेह" क, प्रिंट संस्करण :विदेह-ई-पत्रिका (http://www.videha.co.in/) क चुनल रचना सम्मिलित। विदेह:सदेह:१: २: ३: ४ सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। Details for purchase available at print-version publishers's site http://www.shruti-publication.com or you may write to shruti.publication@shruti-publication.com २. संदेश- [ विदेह ई-पत्रिका, विदेह:सदेह मिथिलाक्षर आ देवनागरी आ गजेन्द्र ठाकुरक सात खण्डक- निबन्ध-प्रबन्ध-समीक्षा,उपन्यास (सहस्रबाढ़नि) , पद्य-संग्रह (सहस्राब्दीक चौपड़पर), कथा-गल्प (गल्प गुच्छ), नाटक (संकर्षण), महाकाव्य (त्वञ्चाहञ्च आ असञ्जाति मन) आ बाल-मंडली-किशोर जगत- संग्रह कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक मादेँ। ] १.श्री गोविन्द झा- विदेहकेँ तरंगजालपर उतारि विश्वभरिमे मातृभाषा मैथिलीक लहरि जगाओल, खेद जे अपनेक एहि महाभियानमे हम एखन धरि संग नहि दए सकलहुँ। सुनैत छी अपनेकेँ सुझाओ आ रचनात्मक आलोचना प्रिय लगैत अछि तेँ किछु लिखक मोन भेल। हमर सहायता आ सहयोग अपनेकेँ सदा उपलब्ध रहत। २.श्री रमानन्द रेणु- मैथिलीमे ई-पत्रिका पाक्षिक रूपेँ चला कऽ जे अपन मातृभाषाक प्रचार कऽ रहल छी, से धन्यवाद । आगाँ अपनेक समस्त मैथिलीक कार्यक हेतु हम हृदयसँ शुभकामना दऽ रहल छी। ३.श्री विद्यानाथ झा "विदित"- संचार आ प्रौद्योगिकीक एहि प्रतिस्पर्धी ग्लोबल युगमे अपन महिमामय "विदेह"केँ अपना देहमे प्रकट देखि जतबा प्रसन्नता आ संतोष भेल, तकरा कोनो उपलब्ध "मीटर"सँ नहि नापल जा सकैछ? ..एकर ऐतिहासिक मूल्यांकन आ सांस्कृतिक प्रतिफलन एहि शताब्दीक अंत धरि लोकक नजरिमे आश्चर्यजनक रूपसँ प्रकट हैत। ४. प्रो. उदय नारायण सिंह "नचिकेता"- जे काज अहाँ कए रहल छी तकर चरचा एक दिन मैथिली भाषाक इतिहासमे होएत। आनन्द भए रहल अछि, ई जानि कए जे एतेक गोट मैथिल "विदेह" ई जर्नलकेँ पढ़ि रहल छथि।...विदेहक चालीसम अंक पुरबाक लेल अभिनन्दन। ५. डॉ. गंगेश गुंजन- एहि विदेह-कर्ममे लागि रहल अहाँक सम्वेदनशील मन, मैथिलीक प्रति समर्पित मेहनतिक अमृत रंग, इतिहास मे एक टा विशिष्ट फराक अध्याय आरंभ करत, हमरा विश्वास अछि। अशेष शुभकामना आ बधाइक सङ्ग, सस्नेह...अहाँक पोथी कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक प्रथम दृष्टया बहुत भव्य तथा उपयोगी बुझाइछ। मैथिलीमे तँ अपना स्वरूपक प्रायः ई पहिले एहन भव्य अवतारक पोथी थिक। हर्षपूर्ण हमर हार्दिक बधाई स्वीकार करी। ६. श्री रामाश्रय झा "रामरंग"(आब स्वर्गीय)- "अपना" मिथिलासँ संबंधित...विषय वस्तुसँ अवगत भेलहुँ।...शेष सभ कुशल अछि। ७. श्री ब्रजेन्द्र त्रिपाठी- साहित्य अकादमी- इंटरनेट पर प्रथम मैथिली पाक्षिक पत्रिका "विदेह" केर लेल बधाई आ शुभकामना स्वीकार करू। ८. श्री प्रफुल्लकुमार सिंह "मौन"- प्रथम मैथिली पाक्षिक पत्रिका "विदेह" क प्रकाशनक समाचार जानि कनेक चकित मुदा बेसी आह्लादित भेलहुँ। कालचक्रकेँ पकड़ि जाहि दूरदृष्टिक परिचय देलहुँ, ओहि लेल हमर मंगलकामना। ९.डॉ. शिवप्रसाद यादव- ई जानि अपार हर्ष भए रहल अछि, जे नव सूचना-क्रान्तिक क्षेत्रमे मैथिली पत्रकारिताकेँ प्रवेश दिअएबाक साहसिक कदम उठाओल अछि। पत्रकारितामे एहि प्रकारक नव प्रयोगक हम स्वागत करैत छी, संगहि "विदेह"क सफलताक शुभकामना। १०. श्री आद्याचरण झा- कोनो पत्र-पत्रिकाक प्रकाशन- ताहूमे मैथिली पत्रिकाक प्रकाशनमे के कतेक सहयोग करताह- ई तऽ भविष्य कहत। ई हमर ८८ वर्षमे ७५ वर्षक अनुभव रहल। एतेक पैघ महान यज्ञमे हमर श्रद्धापूर्ण आहुति प्राप्त होयत- यावत ठीक-ठाक छी/ रहब। ११. श्री विजय ठाकुर- मिशिगन विश्वविद्यालय- "विदेह" पत्रिकाक अंक देखलहुँ, सम्पूर्ण टीम बधाईक पात्र अछि। पत्रिकाक मंगल भविष्य हेतु हमर शुभकामना स्वीकार कएल जाओ। १२. श्री सुभाषचन्द्र यादव- ई-पत्रिका "विदेह" क बारेमे जानि प्रसन्नता भेल। ’विदेह’ निरन्तर पल्लवित-पुष्पित हो आ चतुर्दिक अपन सुगंध पसारय से कामना अछि। १३. श्री मैथिलीपुत्र प्रदीप- ई-पत्रिका "विदेह" केर सफलताक भगवतीसँ कामना। हमर पूर्ण सहयोग रहत। १४. डॉ. श्री भीमनाथ झा- "विदेह" इन्टरनेट पर अछि तेँ "विदेह" नाम उचित आर कतेक रूपेँ एकर विवरण भए सकैत अछि। आइ-काल्हि मोनमे उद्वेग रहैत अछि, मुदा शीघ्र पूर्ण सहयोग देब।कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक देखि अति प्रसन्नता भेल। मैथिलीक लेल ई घटना छी। १५. श्री रामभरोस कापड़ि "भ्रमर"- जनकपुरधाम- "विदेह" ऑनलाइन देखि रहल छी। मैथिलीकेँ अन्तर्राष्ट्रीय जगतमे पहुँचेलहुँ तकरा लेल हार्दिक बधाई। मिथिला रत्न सभक संकलन अपूर्व। नेपालोक सहयोग भेटत, से विश्वास करी। १६. श्री राजनन्दन लालदास- "विदेह" ई-पत्रिकाक माध्यमसँ बड़ नीक काज कए रहल छी, नातिक अहिठाम देखलहुँ। एकर वार्षिक अंक जखन प्रिंट निकालब तँ हमरा पठायब। कलकत्तामे बहुत गोटेकेँ हम साइटक पता लिखाए देने छियन्हि। मोन तँ होइत अछि जे दिल्ली आबि कए आशीर्वाद दैतहुँ, मुदा उमर आब बेशी भए गेल। शुभकामना देश-विदेशक मैथिलकेँ जोड़बाक लेल।.. उत्कृष्ट प्रकाशन कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक लेल बधाइ। अद्भुत काज कएल अछि, नीक प्रस्तुति अछि सात खण्डमे। मुदा अहाँक सेवा आ से निःस्वार्थ तखन बूझल जाइत जँ अहाँ द्वारा प्रकाशित पोथी सभपर दाम लिखल नहि रहितैक। ओहिना सभकेँ विलहि देल जइतैक। (स्पष्टीकरण- श्रीमान्, अहाँक सूचनार्थ विदेह द्वारा ई-प्रकाशित कएल सभटा सामग्री आर्काइवमे https://sites.google.com/a/videha.com/videha-pothi/ पर बिना मूल्यक डाउनलोड लेल उपलब्ध छै आ भविष्यमे सेहो रहतैक। एहि आर्काइवकेँ जे कियो प्रकाशक अनुमति लऽ कऽ प्रिंट रूपमे प्रकाशित कएने छथि आ तकर ओ दाम रखने छथि ताहिपर हमर कोनो नियंत्रण नहि अछि।- गजेन्द्र ठाकुर)... अहाँक प्रति अशेष शुभकामनाक संग। १७. डॉ. प्रेमशंकर सिंह- अहाँ मैथिलीमे इंटरनेटपर पहिल पत्रिका "विदेह" प्रकाशित कए अपन अद्भुत मातृभाषानुरागक परिचय देल अछि, अहाँक निःस्वार्थ मातृभाषानुरागसँ प्रेरित छी, एकर निमित्त जे हमर सेवाक प्रयोजन हो, तँ सूचित करी। इंटरनेटपर आद्योपांत पत्रिका देखल, मन प्रफुल्लित भऽ गेल। १८.श्रीमती शेफालिका वर्मा- विदेह ई-पत्रिका देखि मोन उल्लाससँ भरि गेल। विज्ञान कतेक प्रगति कऽ रहल अछि...अहाँ सभ अनन्त आकाशकेँ भेदि दियौ, समस्त विस्तारक रहस्यकेँ तार-तार कऽ दियौक...। अपनेक अद्भुत पुस्तक कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक विषयवस्तुक दृष्टिसँ गागरमे सागर अछि। बधाई। १९.श्री हेतुकर झा, पटना-जाहि समर्पण भावसँ अपने मिथिला-मैथिलीक सेवामे तत्पर छी से स्तुत्य अछि। देशक राजधानीसँ भय रहल मैथिलीक शंखनाद मिथिलाक गाम-गाममे मैथिली चेतनाक विकास अवश्य करत। २०. श्री योगानन्द झा, कबिलपुर, लहेरियासराय- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पोथीकेँ निकटसँ देखबाक अवसर भेटल अछि आ मैथिली जगतक एकटा उद्भट ओ समसामयिक दृष्टिसम्पन्न हस्ताक्षरक कलमबन्द परिचयसँ आह्लादित छी। "विदेह"क देवनागरी सँस्करण पटनामे रु. 80/- मे उपलब्ध भऽ सकल जे विभिन्न लेखक लोकनिक छायाचित्र, परिचय पत्रक ओ रचनावलीक सम्यक प्रकाशनसँ ऐतिहासिक कहल जा सकैछ। २१. श्री किशोरीकान्त मिश्र- कोलकाता- जय मैथिली, विदेहमे बहुत रास कविता, कथा, रिपोर्ट आदिक सचित्र संग्रह देखि आ आर अधिक प्रसन्नता मिथिलाक्षर देखि- बधाई स्वीकार कएल जाओ। २२.श्री जीवकान्त- विदेहक मुद्रित अंक पढ़ल- अद्भुत मेहनति। चाबस-चाबस। किछु समालोचना मरखाह..मुदा सत्य। २३. श्री भालचन्द्र झा- अपनेक कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक देखि बुझाएल जेना हम अपने छपलहुँ अछि। एकर विशालकाय आकृति अपनेक सर्वसमावेशताक परिचायक अछि। अपनेक रचना सामर्थ्यमे उत्तरोत्तर वृद्धि हो, एहि शुभकामनाक संग हार्दिक बधाई। २४.श्रीमती डॉ नीता झा- अहाँक कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़लहुँ। ज्योतिरीश्वर शब्दावली, कृषि मत्स्य शब्दावली आ सीत बसन्त आ सभ कथा, कविता, उपन्यास, बाल-किशोर साहित्य सभ उत्तम छल। मैथिलीक उत्तरोत्तर विकासक लक्ष्य दृष्टिगोचर होइत अछि। २५.श्री मायानन्द मिश्र- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक मे हमर उपन्यास स्त्रीधनक जे विरोध कएल गेल अछि तकर हम विरोध करैत छी।... कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पोथीक लेल शुभकामना।(श्रीमान् समालोचनाकेँ विरोधक रूपमे नहि लेल जाए।-गजेन्द्र ठाकुर) २६.श्री महेन्द्र हजारी- सम्पादक श्रीमिथिला- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़ि मोन हर्षित भऽ गेल..एखन पूरा पढ़यमे बहुत समय लागत, मुदा जतेक पढ़लहुँ से आह्लादित कएलक। २७.श्री केदारनाथ चौधरी- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक अद्भुत लागल, मैथिली साहित्य लेल ई पोथी एकटा प्रतिमान बनत। २८.श्री सत्यानन्द पाठक- विदेहक हम नियमित पाठक छी। ओकर स्वरूपक प्रशंसक छलहुँ। एम्हर अहाँक लिखल - कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक देखलहुँ। मोन आह्लादित भऽ उठल। कोनो रचना तरा-उपरी। २९.श्रीमती रमा झा-सम्पादक मिथिला दर्पण। कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक प्रिंट फॉर्म पढ़ि आ एकर गुणवत्ता देखि मोन प्रसन्न भऽ गेल, अद्भुत शब्द एकरा लेल प्रयुक्त कऽ रहल छी। विदेहक उत्तरोत्तर प्रगतिक शुभकामना। ३०.श्री नरेन्द्र झा, पटना- विदेह नियमित देखैत रहैत छी। मैथिली लेल अद्भुत काज कऽ रहल छी। ३१.श्री रामलोचन ठाकुर- कोलकाता- मिथिलाक्षर विदेह देखि मोन प्रसन्नतासँ भरि उठल, अंकक विशाल परिदृश्य आस्वस्तकारी अछि। ३२.श्री तारानन्द वियोगी- विदेह आ कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक देखि चकबिदोर लागि गेल। आश्चर्य। शुभकामना आ बधाई। ३३.श्रीमती प्रेमलता मिश्र “प्रेम”- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़लहुँ। सभ रचना उच्चकोटिक लागल। बधाई। ३४.श्री कीर्तिनारायण मिश्र- बेगूसराय- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक बड्ड नीक लागल, आगांक सभ काज लेल बधाई। ३५.श्री महाप्रकाश-सहरसा- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक नीक लागल, विशालकाय संगहि उत्तमकोटिक। ३६.श्री अग्निपुष्प- मिथिलाक्षर आ देवाक्षर विदेह पढ़ल..ई प्रथम तँ अछि एकरा प्रशंसामे मुदा हम एकरा दुस्साहसिक कहब। मिथिला चित्रकलाक स्तम्भकेँ मुदा अगिला अंकमे आर विस्तृत बनाऊ। ३७.श्री मंजर सुलेमान-दरभंगा- विदेहक जतेक प्रशंसा कएल जाए कम होएत। सभ चीज उत्तम। ३८.श्रीमती प्रोफेसर वीणा ठाकुर- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक उत्तम, पठनीय, विचारनीय। जे क्यो देखैत छथि पोथी प्राप्त करबाक उपाय पुछैत छथि। शुभकामना। ३९.श्री छत्रानन्द सिंह झा- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़लहुँ, बड्ड नीक सभ तरहेँ। ४०.श्री ताराकान्त झा- सम्पादक मैथिली दैनिक मिथिला समाद- विदेह तँ कन्टेन्ट प्रोवाइडरक काज कऽ रहल अछि। कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक अद्भुत लागल। ४१.डॉ रवीन्द्र कुमार चौधरी- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक बहुत नीक, बहुत मेहनतिक परिणाम। बधाई। ४२.श्री अमरनाथ- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक आ विदेह दुनू स्मरणीय घटना अछि, मैथिली साहित्य मध्य। ४३.श्री पंचानन मिश्र- विदेहक वैविध्य आ निरन्तरता प्रभावित करैत अछि, शुभकामना। ४४.श्री केदार कानन- कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक लेल अनेक धन्यवाद, शुभकामना आ बधाइ स्वीकार करी। आ नचिकेताक भूमिका पढ़लहुँ। शुरूमे तँ लागल जेना कोनो उपन्यास अहाँ द्वारा सृजित भेल अछि मुदा पोथी उनटौला पर ज्ञात भेल जे एहिमे तँ सभ विधा समाहित अछि। ४५.श्री धनाकर ठाकुर- अहाँ नीक काज कऽ रहल छी। फोटो गैलरीमे चित्र एहि शताब्दीक जन्मतिथिक अनुसार रहैत तऽ नीक। ४६.श्री आशीष झा- अहाँक पुस्तकक संबंधमे एतबा लिखबा सँ अपना कए नहि रोकि सकलहुँ जे ई किताब मात्र किताब नहि थीक, ई एकटा उम्मीद छी जे मैथिली अहाँ सन पुत्रक सेवा सँ निरंतर समृद्ध होइत चिरजीवन कए प्राप्त करत। ४७.श्री शम्भु कुमार सिंह- विदेहक तत्परता आ क्रियाशीलता देखि आह्लादित भऽ रहल छी। निश्चितरूपेण कहल जा सकैछ जे समकालीन मैथिली पत्रिकाक इतिहासमे विदेहक नाम स्वर्णाक्षरमे लिखल जाएत। ओहि कुरुक्षेत्रक घटना सभ तँ अठारहे दिनमे खतम भऽ गेल रहए मुदा अहाँक कुरुक्षेत्रम् तँ अशेष अछि। ४८.डॉ. अजीत मिश्र- अपनेक प्रयासक कतबो प्रशंसा कएल जाए कमे होएतैक। मैथिली साहित्यमे अहाँ द्वारा कएल गेल काज युग-युगान्तर धरि पूजनीय रहत। ४९.श्री बीरेन्द्र मल्लिक- अहाँक कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक आ विदेह:सदेह पढ़ि अति प्रसन्नता भेल। अहाँक स्वास्थ्य ठीक रहए आ उत्साह बनल रहए से कामना। ५०.श्री कुमार राधारमण- अहाँक दिशा-निर्देशमे विदेह पहिल मैथिली ई-जर्नल देखि अति प्रसन्नता भेल। हमर शुभकामना। ५१.श्री फूलचन्द्र झा प्रवीण-विदेह:सदेह पढ़ने रही मुदा कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक देखि बढ़ाई देबा लेल बाध्य भऽ गेलहुँ। आब विश्वास भऽ गेल जे मैथिली नहि मरत। अशेष शुभकामना। ५२.श्री विभूति आनन्द- विदेह:सदेह देखि, ओकर विस्तार देखि अति प्रसन्नता भेल। ५३.श्री मानेश्वर मनुज-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक एकर भव्यता देखि अति प्रसन्नता भेल, एतेक विशाल ग्रन्थ मैथिलीमे आइ धरि नहि देखने रही। एहिना भविष्यमे काज करैत रही, शुभकामना। ५४.श्री विद्यानन्द झा- आइ.आइ.एम.कोलकाता- कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक विस्तार, छपाईक संग गुणवत्ता देखि अति प्रसन्नता भेल। अहाँक अनेक धन्यवाद; कतेक बरखसँ हम नेयारैत छलहुँ जे सभ पैघ शहरमे मैथिली लाइब्रेरीक स्थापना होअए, अहाँ ओकरा वेबपर कऽ रहल छी, अनेक धन्यवाद। ५५.श्री अरविन्द ठाकुर-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक मैथिली साहित्यमे कएल गेल एहि तरहक पहिल प्रयोग अछि, शुभकामना। ५६.श्री कुमार पवन-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक पढ़ि रहल छी। किछु लघुकथा पढ़ल अछि, बहुत मार्मिक छल। ५७. श्री प्रदीप बिहारी-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक देखल, बधाई। ५८.डॉ मणिकान्त ठाकुर-कैलिफोर्निया- अपन विलक्षण नियमित सेवासँ हमरा लोकनिक हृदयमे विदेह सदेह भऽ गेल अछि। ५९.श्री धीरेन्द्र प्रेमर्षि- अहाँक समस्त प्रयास सराहनीय। दुख होइत अछि जखन अहाँक प्रयासमे अपेक्षित सहयोग नहि कऽ पबैत छी। ६०.श्री देवशंकर नवीन- विदेहक निरन्तरता आ विशाल स्वरूप- विशाल पाठक वर्ग, एकरा ऐतिहासिक बनबैत अछि। ६१.श्री मोहन भारद्वाज- अहाँक समस्त कार्य देखल, बहुत नीक। एखन किछु परेशानीमे छी, मुदा शीघ्र सहयोग देब। ६२.श्री फजलुर रहमान हाशमी-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक मे एतेक मेहनतक लेल अहाँ साधुवादक अधिकारी छी। ६३.श्री लक्ष्मण झा "सागर"- मैथिलीमे चमत्कारिक रूपेँ अहाँक प्रवेश आह्लादकारी अछि।..अहाँकेँ एखन आर..दूर..बहुत दूरधरि जेबाक अछि। स्वस्थ आ प्रसन्न रही। ६४.श्री जगदीश प्रसाद मंडल-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक पढ़लहुँ । कथा सभ आ उपन्यास सहस्रबाढ़नि पूर्णरूपेँ पढ़ि गेल छी। गाम-घरक भौगोलिक विवरणक जे सूक्ष्म वर्णन सहस्रबाढ़निमे अछि, से चकित कएलक, एहि संग्रहक कथा-उपन्यास मैथिली लेखनमे विविधता अनलक अछि। समालोचना शास्त्रमे अहाँक दृष्टि वैयक्तिक नहि वरन् सामाजिक आ कल्याणकारी अछि, से प्रशंसनीय। ६५.श्री अशोक झा-अध्यक्ष मिथिला विकास परिषद- कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक लेल बधाई आ आगाँ लेल शुभकामना। ६६.श्री ठाकुर प्रसाद मुर्मु- अद्भुत प्रयास। धन्यवादक संग प्रार्थना जे अपन माटि-पानिकेँ ध्यानमे राखि अंकक समायोजन कएल जाए। नव अंक धरि प्रयास सराहनीय। विदेहकेँ बहुत-बहुत धन्यवाद जे एहेन सुन्दर-सुन्दर सचार (आलेख) लगा रहल छथि। सभटा ग्रहणीय- पठनीय। ६७.बुद्धिनाथ मिश्र- प्रिय गजेन्द्र जी,अहाँक सम्पादन मे प्रकाशित ‘विदेह’आ ‘कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक’ विलक्षण पत्रिका आ विलक्षण पोथी! की नहि अछि अहाँक सम्पादनमे? एहि प्रयत्न सँ मैथिली क विकास होयत,निस्संदेह। ६८.श्री बृखेश चन्द्र लाल- गजेन्द्रजी, अपनेक पुस्तक कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़ि मोन गदगद भय गेल , हृदयसँ अनुगृहित छी । हार्दिक शुभकामना । ६९.श्री परमेश्वर कापड़ि - श्री गजेन्द्र जी । कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़ि गदगद आ नेहाल भेलहुँ। ७०.श्री रवीन्द्रनाथ ठाकुर- विदेह पढ़ैत रहैत छी। धीरेन्द्र प्रेमर्षिक मैथिली गजलपर आलेख पढ़लहुँ। मैथिली गजल कत्तऽ सँ कत्तऽ चलि गेलैक आ ओ अपन आलेखमे मात्र अपन जानल-पहिचानल लोकक चर्च कएने छथि। जेना मैथिलीमे मठक परम्परा रहल अछि। (स्पष्टीकरण- श्रीमान्, प्रेमर्षि जी ओहि आलेखमे ई स्पष्ट लिखने छथि जे किनको नाम जे छुटि गेल छन्हि तँ से मात्र आलेखक लेखकक जानकारी नहि रहबाक द्वारे, एहिमे आन कोनो कारण नहि देखल जाय। अहाँसँ एहि विषयपर विस्तृत आलेख सादर आमंत्रित अछि।-सम्पादक) ७१.श्री मंत्रेश्वर झा- विदेह पढ़ल आ संगहि अहाँक मैगनम ओपस कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक सेहो, अति उत्तम। मैथिलीक लेल कएल जा रहल अहाँक समस्त कार्य अतुलनीय अछि। ७२. श्री हरेकृष्ण झा- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक मैथिलीमे अपन तरहक एकमात्र ग्रन्थ अछि, एहिमे लेखकक समग्र दृष्टि आ रचना कौशल देखबामे आएल जे लेखकक फील्डवर्कसँ जुड़ल रहबाक कारणसँ अछि। ७३.श्री सुकान्त सोम- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक मे समाजक इतिहास आ वर्तमानसँ अहाँक जुड़ाव बड्ड नीक लागल, अहाँ एहि क्षेत्रमे आर आगाँ काज करब से आशा अछि। ७४.प्रोफेसर मदन मिश्र- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक सन किताब मैथिलीमे पहिले अछि आ एतेक विशाल संग्रहपर शोध कएल जा सकैत अछि। भविष्यक लेल शुभकामना। ७५.प्रोफेसर कमला चौधरी- मैथिलीमे कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक सन पोथी आबए जे गुण आ रूप दुनूमे निस्सन होअए, से बहुत दिनसँ आकांक्षा छल, ओ आब जा कऽ पूर्ण भेल। पोथी एक हाथसँ दोसर हाथ घुमि रहल अछि, एहिना आगाँ सेहो अहाँसँ आशा अछि। ७६.श्री उदय चन्द्र झा "विनोद": गजेन्द्रजी, अहाँ जतेक काज कएलहुँ अछि से मैथिलीमे आइ धरि कियो नहि कएने छल। शुभकामना। अहाँकेँ एखन बहुत काज आर करबाक अछि। ७७.श्री कृष्ण कुमार कश्यप: गजेन्द्र ठाकुरजी, अहाँसँ भेँट एकटा स्मरणीय क्षण बनि गेल। अहाँ जतेक काज एहि बएसमे कऽ गेल छी ताहिसँ हजार गुणा आर बेशीक आशा अछि। ७८.श्री मणिकान्त दास: अहाँक मैथिलीक कार्यक प्रशंसा लेल शब्द नहि भेटैत अछि। अहाँक कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक सम्पूर्ण रूपेँ पढ़ि गेलहुँ। त्वञ्चाहञ्च बड्ड नीक लागल। ७९. श्री हीरेन्द्र कुमार झा- विदेह ई-पत्रिकाक सभ अंक ई-पत्रसँ भेटैत रहैत अछि। मैथिलीक ई-पत्रिका छैक एहि बातक गर्व होइत अछि। अहाँ आ अहाँक सभ सहयोगीकेँ हार्दिक शुभकामना। विदेह मैथिली साहित्य आन्दोलन (c)२००४-१२. सर्वाधिकार लेखकाधीन आ जतए लेखकक नाम नहि अछि ततए संपादकाधीन। विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। सह-सम्पादक: उमेश मंडल। सहायक सम्पादक: शिव कुमार झा आ मुन्नाजी (मनोज कुमार कर्ण)। भाषा-सम्पादन: नागेन्द्र कुमार झा आ पञ्जीकार विद्यानन्द झा। कला-सम्पादन: वनीता कुमारी आ रश्मि रेखा सिन्हा। सम्पादक-शोध-अन्वेषण: डॉ. जया वर्मा आ डॉ. राजीव कुमार वर्मा। सम्पादक- नाटक-रंगमंच-चलचित्र- बेचन ठाकुर। सम्पादक- सूचना-सम्पर्क-समाद- पूनम मंडल आ प्रियंका झा। सम्पादक- अनुवाद विभाग- विनीत उत्पल। रचनाकार अपन मौलिक आ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि) ggajendra@videha.com केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx, .rtf वा .txt फॉर्मेटमे पठा सकैत छथि। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेताह, से आशा करैत छी। रचनाक अंतमे टाइप रहय, जे ई रचना मौलिक अछि, आ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। मेल प्राप्त होयबाक बाद यथासंभव शीघ्र ( सात दिनक भीतर) एकर प्रकाशनक अंकक सूचना देल जायत। ’विदेह' प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका अछि आ एहिमे मैथिली, संस्कृत आ अंग्रेजीमे मिथिला आ मैथिलीसँ संबंधित रचना प्रकाशित कएल जाइत अछि। एहि ई पत्रिकाकेँ श्रीमति लक्ष्मी ठाकुर द्वारा मासक ०१ आ १५ तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि। (c) 2004-12 सर्वाधिकार सुरक्षित। विदेहमे प्रकाशित सभटा रचना आ आर्काइवक सर्वाधिकार रचनाकार आ संग्रहकर्त्ताक लगमे छन्हि। रचनाक अनुवाद आ पुनः प्रकाशन किंवा आर्काइवक उपयोगक अधिकार किनबाक हेतु ggajendra@videha.co.in पर संपर्क करू। एहि साइटकेँ प्रीति झा ठाकुर, मधूलिका चौधरी आ रश्मि प्रिया द्वारा डिजाइन कएल गेल। सिद्धिरस्तु वि दे ह विदेह Videha বিদেহ विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका Videha Ist Maithili Fortnightly ejournal विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका 'विदेह' १०३ म अंक ०१ अप्रैल २०१२ (वर्ष ५ मास ५२ अंक १०३) मानुषीमिह संस्कृताम् ISSN 2229-547X VIDEHA वि दे ह विदेह Videha বিদেহ विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका Videha Ist Maithili Fortnightly e Magazine विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका 'विदेह' १०३ म अंक ०१ अप्रैल २०१२ (वर्ष ५ मास ५२ अंक १०३) मानुषीमिह संस्कृताम् ISSN 2229-547X VIDEHA
[4] ae; ककिपाति विद्यापतिक सर्वमान्य चित्र-रिरुपण पारिषदे द्वारा निर्धारित कयल गेल wor तकर विवरण देल जाय। em: i96: ई० सँ पूर्व हमरा लोकनि बिद्यापत्तिक स्मरण निराकार रूपें ate रहलहूँ। परिषद एहिं अभावक पूर्ति कयलक | 'विद्यापतिक वंशज crafts ten गढ़नि, मुखाकृति आदिक आधार पर विद्यापतिक काल्पनिक चित्रक निर्माण 'कयल गेल । चित्रकार were मुँगेर जिला निवासी weve सिंह, स्थानीय निवास 9, गुप्ता लेन, कलकत्ता-6। चित्रक उद्घाटन दिनांक i4 नवम्बर, 960 कें भेल, उद्घाटनकर्त्ता छलाह A at Ge ec aa wo शशिभूषण पाण्डेय ( भारती पुस्तक मंदिर) | समारोहक As ae Rae A ES : Ps अध्यक्षता कयलन्हि विश्व fags विद्वान डा० सुकुमार सेन। अपन. AT neh ee i अध्यक्षीय भाषण में कहलन्हि - “मैथिली, बंगला, असमिया, 235. हम iia, डर उड़िया आदि मागधी mga भाषाक आदि ane विचापति छथि। Bs, कि. रा. कि, निनन्धकार, गल्पकार, इतिहासज्ञ आदिक रूप में भारत कहियो at लिरिय गए हिनकर महत्व के नहि बिसरत।'' डा० wae नारायण सिंह है. री ome te bee 'बिद्यापतति faa निरूपण हेतु परिषदक भूरि-भूरि प्रशंसा कयलन्हि । दी nie एल विद्यापततिक चित्रक उद्घाटनक बाद विभिन्न पत्र-पत्रिका में चित्र... विद्यापति जयन्ती समारोहमे de शशिभूषण पाण्डेय प्रकाशित कराओल गेल, विभिन्न मैथिली सेवी संस्था PON ASE TIT) en j के पठाओल गेल। एक वर्षक समय सीमा राखल गेल संशोधन SRT हेतु। कतहु सँ कोनो प्रकारक id d|) निचार नहि अएला पर परिषद डाक तार विभाग, भारत सरकार सँ विद्यापत्तिक डाक टिकट हेतु पत्नाचार B हूँ के: aren कयलक। अहर्निश प्रयासक बाद 77 नवम्बर, 965 ई० 5 विद्यापतिक डाक टिकट बहार Se मेल विचार-विमर्श हेतु दिनांक 28 सितम्बर, i965 Fo ws परिषद कार्यालय में आायल रहथि श्री तक पु {wa पी. चटर्जी, फिलेटेलिक आफिसर, डाक तार fram, भारत सरकार आ at अपन मन्तव्य द5 it i “It has a great pleasure for me to record the activities taken by the Mithila (ee Miss. iit): Sanskritik Parishad, Calcutta for bringing out a commemorative postage stamp a to honour the great poet of Mithila, Vidyapati.” S/d - S. P. Chatterji, Phila, Officer Bet: जनगणना से मैथिली लिखयकाक अनुरोध कहिया सँ कहिया aft चलल आछि 2 उत्तर : १95। ई० क जनगणनाक रिपोर्ट देखलाक बाद जाहि में मेंथिली-भाषीक संस्था मात्र तत्कालीन दरभंगा जिलाक जनसंख्याक लगधक छल, 967 ई० सँ भेल जे हेमनि तक चलल | भड सकें अछि भविष्यों मे चलए | wet; मैधिलीक युवा साहित्यकार केँ प्रोत्साहित wearer धाविष्य में की योजना artes 2 उत्तर : भविष्णु युवा साहित्यकारक प्रति परिषद सदा सहदयता Cad अछि आ भविष्यों में राखत | परिषदक प्रकाशन कें अपन 'एकटा मानदण्ड SH तथापि सुवा साहित्यकार कें प्रोत्साहन स्वरूप कनेक झूसों रचनाक प्रकाशन परिषद करत | एहि बेर : श्री अनमोल झाक लघुकथा संग्रह ' टेकनोलजी ' प्रकाशित AeA प्रश्न ; नव-पीड्ीक लेल अपने की eae dae चाहबान्हि 7 उत्तर : Bar पीढ़ी हिन्दी एवं अंगरेजी परस्त भए गेल छथि | अपना घर में अंगरेजी माध्यम सँ वार्तालाप करए में सक्षम नहिं छथि तैं हिन्दीक शरण में जाइ fer) दुधमुँहो लच्चा कें gard हिन्दीयें मे करताह । ओना आजुक परिपेक्ष मे अंगरेजी आवश्यक अछि हिन्दी नहि, औओना जेतेक भाषा सीखी से नीक | मैथिली के बन्डक राखि एवं ate ps aie) शिक्षाक माध्यम जे हो परंच घरक एवं गामक भाषा मैथिली रहए | मनीषी लोकनि कें दृष्टि मे राखि धीया- पूता के आगू बढ़ पे अभिभावक लोकनि सहयोग wee, जे मनीषी कहियों हिन्दी an अंगरेजीक शरण में अपन मातृभाषा त्यागि नहि गेलाह। जेना - सर गंगानाथ झा, Slo अमरनाथ झा, म० Yo उमेश मिश्र, डा० जयकान्त मिश्र, श्री are पाठक * वियोगी ' safe |
अरद्धशतान्दी सँँ बेसी (गत 50 वर्ष) सँ मिथिला-मैंथिलीक सेवा कएनिहार श्री किशोरी कान्त मिश्र, पूर्व अध्यक मिधिला सांस्कृतिक परिषद्, कोलकाता सै लेल गेल साक्षात्कार । — श्री नबोनारायण मिश्र, सचिक कोकिल मंच, कोलकाता िलाल ee Pe असन / अपने कलकत्ता काहिया अयलहूँ 2 जग उत्तर : 7956 ई० क जून में हम कलकत्ता अएलहूँ। अर्थ उपार्जनक संग शिक्षा _ [न ग्रहण करन उद्देश्य छल | रह ; wed: सिधिला-सैधिली सँ काहिया on किनका dean सँ gece ? कदनुकूल ~ की उद्देश्य छल ? भी “Sy उत्तर : गणित में कमजोर रहबाक कारणे विद्यालय में विज्ञान विभाग नहि : पं ee | कला बिभागक शरण में अएलहूँ आ गणितक स्थान पर मैथिली । विषय भेटल। विद्यालय में प्रत्येक शनिक5 वाद-विवादू प्रतियोगिता r x‘ हर as wep | एहिं में जे कियो भाग as सके छल — पक्ष या विपक्ष मे हमहूँ भाग लेब शुरू काएल | उपप्रधान अध्यापक eo शिवनारायण मिश्न, मुठ ग्राम निवासी प्रतियोगिताक अध्यक्ष छलाह। मातृभाषा प्रेमी, विद्यालयीय विज्ञान विषय wife प्रत्येक विषय में निष्णात। विद्यार्थी लोकनि बाजवाक माध्यम हिन्दी या अंगरेजी रखैत छलाह | aang हमरा लोकनि कें मैंथिलीयो में बाजक छूट देलन्हि sitet ठाम सँँ मैथिलीक प्रति प्रेम जागल छल | कलकत्ता में 959 ई० क जनवरी में मिथिला सांस्कृतिक परिषदक स्थापना भेल । हम एवं स्व० राजकुमार मल्लिक साहित्य प्रेस में काज eta रहीं de हमरा we संस्था सँ सच्द्ध करौलन्हि | उद्देश्य छल मात्र मातृ धाषाक प्रति आदरभाव आ औओकर सेवा केनाइ | We: साहित्य केँ अपने कोन get देखेंत छी 2 उत्तर : मैथिली साहित्य कें हम श्रद्धा भाव सँ देखैत छी । साहित्य संगे व्यावसायिक दृष्टिकोण रखनिहारक प्रति हमरा घृणा भाव उत्पन्न होइत अछि। साहित्य अकादमी में मैथिलीक स्थान प्राप्त करबा में हमरा लोकनि किछु व्यक्ति अधक परिश्रम कएलहूँ। मिथिला सांस्कृतिक परिषद के मैधिलीक मान्यता संगहि साहित्यिक संस्था रूपें साहित्य अकादमी मान्यता देलक | साहित्य अकादमी में अपना कें कर्त्ताधर्तता बूझे wee ओ लोकनि ओहि समय में साहित्य अकादमीक नामों नहि जनै were | आइ आओ पैघ मैथिली सेवक आ साहित्यकार कहने छथि । साहित्य अकादमी में आन भाषाक संग मैथिलीक मान घटत Us बात पर ध्यान नहिं eu मात्र मुद्रा उपार्जन में लागल रहैं छथि। साहित्य अकादमीक मैथिली सेमिनार कें प्राथमिक पाठशाला al छथि an ifs मंच पर नव लेखक कें लेखनक अ-आ - क-ख सीखक अवसर प्रदान et छथि । कथन छन्हि — नव साहित्यकार कें प्रोत्साहन दए रहल why | ae: cet अकाशनक ay ये सिधिला सास्कितिक पारिषदक महत्वपूर्ण भूमिका रहलैक ane Tay अयनेक सम्परादन में सेहो पोधी-पत्रिका अकाशित Sea अधि तकर विवरण कोना की अड्ि 2 उत्तर : परिषदक स्थापना कालहि सँ परिषद diel एवं स्मारिकाक प्रकाशन करत रहल। मुद्रण व्यवसाय सँँ जुड़ल रहबाक कारणे हम आ To राजकुमार मल्लिक परिषदक प्रकाशन एवं मुद्रणक व्यवस्था करे छलहूँ। जैं कि हम युवक wee मल्लिकजी अधिकांश भार हमरे पर छोड़ि दैत छलाह। ओहि दिन में मिधिला मिहिरक प्रकाशन बिना व्यतिक्रम के होइत छल। Ho Bulg शेखर चौधरी मिहिर A छपए वाला सामग्रीक वर्तनी एक रखे were) मैंधिलीक चर्तनी निर्धारण मे मिहिर एवं सुधांशुजीक काज स्तुत्य रहल | आब पुन: See रचनाकार ऑतेक तरहक वर्तनी | हमहूँ हुनके अनुसरण aid परिषदक तमाम प्रकाशन में वर्तनीक एकरूपता रखे wae! हमरा देखरेख में प्राय: 'परिषदक del wa tea आ ओकर adel एक रहल । मिहिरक अनुकरण ata उल्टा कौमाक स्थान पर अआर्द्धकार प्रयोग करैत eee स्वनामधन्य स्व० ब्रजक्िशोर वर्मा ' मणिपदाक' वर्तनी कें ठीक करत परिषद द्वारा प्रकाशित हुक पोथी में परिषद द्वारा Stated मानक adit ea ही
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