VIDEHA — Issue 104 / अंक १०४

Publication: VIDEHA · Issue: 104
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350 351 ISSN 2229-547X VIDEHA 'विदेह' १०४ म अंक १५ अप्रैल २०१२ (वर्ष ५ मास ५२ अंक १०४) वि  दे  ह विदेह Videha বিদেহ http://www.videha.co.in  विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका Videha Ist Maithili Fortnightly ejournal  नव अंक देखबाक लेल पृष्ठ सभकेँ रिफ्रेश कए देखू। Always refresh the pages for viewing new issue of VIDEHA. Read in your own script Roman(Eng)Gujarati Bangla Oriya Gurmukhi Telugu Tamil Kannada Malayalam Hindi ऐ अंकमे अछि:- १. संपादकीय संदेश २. गद्य २.१.जगदीश प्रसार मण्डलक दीर्घकथा- फाँसी २.२.राजदेव मण्डलक उपन्यास हमर टोल- पछि‍ला खेपसँ आगू २.३.डॉ. कैलाश कुमार मिश्र- इंद्रधनुषी अकास २.४.१.अतुलेश्वर- सगर राति दीप जरए , आन्दोलन आ बभनभोज २.विनीत उत्पल आधुनिक मैथिली नाटक आ टुच्चा नाटककारक जातिवादी रंगमंचक अवधारणा/ साहित्य अकादेमी कथा गोष्ठी: सगर राति दीप जरय: एकटा बहन्ना/  ३.पूनम मण्डल- आरती कुमारी आ सगर राति दीप जरय ४.आशीष अनचिन्हार- विदेह मैथिली समानान्तर रंगमंच/ जातिवादी रंगमंचक भाषाक बानगी २.५.१.रवि भूषण पाठक- ओक्‍कर तोहर हम्‍मर सपना-२ २.६.अमित मिश्र- कथा - प्रेमक अंत २.७.१.राम भरोस कापड़ि ‘भ्रमर’- घरमुहाँ- उपन्यास अंश २.चंदन कुमार झा- बिहनि कथा- समय होत बलबान २.८.सुजीत कुमार झा- साधना ३. पद्य ३.१.१.कामिनी कामायनी- काशीक घाट २.श्यामल सुमन ३.२.१.नारायण झा २.जगदानन्द झा३.बेचन ठाकुर-वनभोज ३.३.१.उमेश पासवान २.किशन कारीगर ३.४.रामवि‍लास साहु ३.५.१.जगदीश प्रसाद मण्डल २. नवीन कुमार झा ‘‘आशा’’ ३.६.शि‍वकुमार झा ‘टि‍ल्लू’ ३.७.डॉ॰ शशिधर कुमर ३.८.चंदन कुमार झा- गजल/ कविता/ हाइकू ४. मिथिला कला-संगीत१.वनीता कुमारी ३.राजनाथ मिश्र (चित्रमय मिथिला) ४. उमेश मण्डल (मिथिलाक वनस्पति/ मिथिलाक जीव-जन्तु/ मिथिलाक जिनगी) ६.बालानां कृते-बाल गजल चंदन कुमार झा डॉ॰ शशिधर कुमर “विदेह”-नेनपन (बालगीत) ७. भाषापाक रचना-लेखन -[मानक मैथिली], [विदेहक मैथिली-अंग्रेजी आ अंग्रेजी मैथिली कोष (इंटरनेटपर पहिल बेर सर्च-डिक्शनरी) एम.एस. एस.क्यू.एल. सर्वर आधारित -Based on ms-sql server Maithili-English and English-Maithili Dictionary.] विदेह ई-पत्रिकाक सभटा पुरान अंक ( ब्रेल, तिरहुता आ देवनागरी मे ) पी.डी.एफ. डाउनलोडक लेल नीचाँक लिंकपर उपलब्ध अछि। All the old issues of Videha e journal ( in Braille, Tirhuta and Devanagari versions ) are available for pdf download at the following link. विदेह ई-पत्रिकाक सभटा पुरान अंक ब्रेल, तिरहुता आ देवनागरी रूपमे Videha e journal's all old issues in Braille Tirhuta and Devanagari versions विदेह ई-पत्रिकाक पहिल ५० अंक

विदेह ई-पत्रिकाक ५०म सँ आगाँक अंक विदेह आर.एस.एस.फीड। "विदेह" ई-पत्रिका ई-पत्रसँ प्राप्त करू। अपन मित्रकेँ विदेहक विषयमे सूचित करू। ↑ विदेह आर.एस.एस.फीड एनीमेटरकेँ अपन साइट/ ब्लॉगपर लगाऊ। ब्लॉग "लेआउट" पर "एड गाडजेट" मे "फीड" सेलेक्ट कए "फीड यू.आर.एल." मे http://www.videha.co.in/index.xml टाइप केलासँ सेहो विदेह फीड प्राप्त कए सकैत छी। गूगल रीडरमे पढ़बा लेल http://reader.google.com/ पर जा कऽ Add a  Subscription बटन क्लिक करू आ खाली स्थानमे http://www.videha.co.in/index.xml पेस्ट करू आ Add  बटन दबाउ। Join official Videha facebook group. Join Videha googlegroups विदेह रेडियो:मैथिली कथा-कविता आदिक पहिल पोडकास्ट साइट http://videha123radio.wordpress.com/ Videha Radio मैथिली देवनागरी वा मिथिलाक्षरमे नहि देखि/ लिखि पाबि रहल छी, (cannot see/write Maithili in Devanagari/ Mithilakshara follow links below or contact at ggajendra@videha.com) तँ एहि हेतु नीचाँक लिंक सभ पर जाऊ। संगहि विदेहक स्तंभ मैथिली भाषापाक/ रचना लेखनक नव-पुरान अंक पढ़ू। http://devanaagarii.net/ http://kaulonline.com/uninagari/  (एतए बॉक्समे ऑनलाइन देवनागरी टाइप करू, बॉक्ससँ कॉपी करू आ वर्ड डॉक्युमेन्टमे पेस्ट कए वर्ड फाइलकेँ सेव करू। विशेष जानकारीक लेल ggajendra@videha.com पर सम्पर्क करू।)(Use Firefox 4.0 (from WWW.MOZILLA.COM )/ Opera/ Safari/ Internet Explorer 8.0/ Flock 2.0/ Google Chrome for best view of 'Videha' Maithili e-journal at http://www.videha.co.in/ .) Go to the link below for download of old issues of VIDEHA Maithili e magazine in .pdf format and Maithili Audio/ Video/ Book/ paintings/ photo files. विदेहक पुरान अंक आ ऑडियो/ वीडियो/ पोथी/ चित्रकला/ फोटो सभक फाइल सभ (उच्चारण, बड़ सुख सार आ दूर्वाक्षत मंत्र सहित) डाउनलोड करबाक हेतु नीचाँक लिंक पर जाऊ। VIDEHA ARCHIVE विदेह आर्काइव भारतीय डाक विभाग द्वारा जारी कवि, नाटककार आ धर्मशास्त्री विद्यापतिक स्टाम्प। भारत आ नेपालक माटिमे पसरल मिथिलाक धरती प्राचीन कालहिसँ महान पुरुष ओ महिला लोकनिक कर्मभमि रहल अछि। मिथिलाक महान पुरुष ओ महिला लोकनिक चित्र 'मिथिला रत्न' मे देखू। गौरी-शंकरक पालवंश कालक मूर्त्ति, एहिमे मिथिलाक्षरमे (१२०० वर्ष पूर्वक) अभिलेख अंकित अछि। मिथिलाक भारत आ नेपालक माटिमे पसरल एहि तरहक अन्यान्य प्राचीन आ नव स्थापत्य, चित्र, अभिलेख आ मूर्त्तिकलाक़ हेतु देखू 'मिथिलाक खोज' मिथिला, मैथिल आ मैथिलीसँ सम्बन्धित सूचना, सम्पर्क, अन्वेषण संगहि विदेहक सर्च-इंजन आ न्यूज सर्विस आ मिथिला, मैथिल आ मैथिलीसँ सम्बन्धित वेबसाइट सभक समग्र संकलनक लेल देखू "विदेह सूचना संपर्क अन्वेषण" विदेह जालवृत्तक डिसकसन फोरमपर जाऊ। "मैथिल आर मिथिला" (मैथिलीक सभसँ लोकप्रिय जालवृत्त) पर जाऊ। ऐ बेर मूल पुरस्कार(२०१२) [साहित्य अकादेमी, दिल्ली]क लेल अहाँक नजरिमे कोन मूल मैथिली पोथी उपयुक्त अछि ? Thank you for voting! श्री राजदेव मण्डलक “अम्बरा” (कविता-संग्रह)  13.56% श्री बेचन ठाकुरक “बेटीक अपमान आ छीनरदेवी”(दूटा नाटक)  10.17% श्रीमती आशा मिश्रक “उचाट” (उपन्यास)  6.44% श्रीमती पन्ना झाक “अनुभूति” (कथा संग्रह)  5.42% श्री उदय नारायण सिंह “नचिकेता”क “नो एण्ट्री:मा प्रविश (नाटक)  5.42% श्री सुभाष चन्द्र यादवक “बनैत बिगड़ैत” (कथा-संग्रह)  5.42% श्रीमती वीणा कर्ण- भावनाक अस्थिपंजर (कविता संग्रह)  5.76% श्रीमती शेफालिका वर्माक “किस्त-किस्त जीवन (आत्मकथा)  7.8% श्रीमती विभा रानीक “भाग रौ आ बलचन्दा” (दूटा नाटक)  6.78% श्री महाप्रकाश-संग समय के (कविता संग्रह)  5.76% श्री तारानन्द वियोगी- प्रलय रहस्य (कविता-संग्रह)  5.76% श्री महेन्द्र मलंगियाक “छुतहा घैल” (नाटक)  7.12% श्रीमती नीता झाक “देश-काल” (कथा-संग्रह)  6.44% श्री सियाराम झा "सरस"क थोड़े आगि थोड़े पानि (गजल संग्रह)  7.12% Other:  1.02% ऐ बेर बाल साहित्य पुरस्कार(२०१२) [साहित्य अकादेमी, दिल्ली]क लेल अहाँक नजरिमे कोन मूल मैथिली पोथी उपयुक्त अछि ? श्री जगदीश प्रसाद मण्डल जीक “तरेगन”(बाल-प्रेरक कथा संग्रह)  48.33% श्री जीवकांत - खिखिरक बिअरि  26.67% श्री मुरलीधर झाक “पिलपिलहा गाछ  23.33% Other:  1.67% ऐ बेर युवा पुरस्कार(२०१२)[साहित्य अकादेमी, दिल्ली]क लेल अहाँक नजरिमे कोन कोन लेखक उपयुक्त छथि ? Thank you for voting! श्रीमती ज्योति सुनीत चौधरीक “अर्चिस” (कविता संग्रह)  24.49% श्री विनीत उत्पलक “हम पुछैत छी” (कविता संग्रह)  7.14% श्रीमती कामिनीक “समयसँ सम्वाद करैत”, (कविता संग्रह)  6.12% श्री प्रवीण काश्यपक “विषदन्ती वरमाल कालक रति” (कविता संग्रह)  5.1% श्री आशीष अनचिन्हारक "अनचिन्हार आखर"(गजल संग्रह)  24.49% श्री अरुणाभ सौरभक “एतबे टा नहि” (कविता संग्रह)  7.14% श्री दिलीप कुमार झा "लूटन"क जगले रहबै (कविता संग्रह)  7.14% श्री आदि यायावरक “भोथर पेंसिलसँ लिखल” (कथा संग्रह)  5.1% श्री उमेश मण्डलक “निश्तुकी” (कविता संग्रह)  11.22% Other:  2.04% ऐ बेर अनुवाद पुरस्कार (२०१३) [साहित्य अकादेमी, दिल्ली]क लेल अहाँक नजरिमे के उपयुक्त छथि? Thank you for voting! श्री नरेश कुमार विकल "ययाति" (मराठी उपन्यास श्री विष्णु सखाराम खाण्डेकर)  35% श्री महेन्द्र नारायण राम "कार्मेलीन" (कोंकणी उपन्यास श्री दामोदर मावजो)  12.5% श्री देवेन्द्र झा "अनुभव"(बांग्ला उपन्यास श्री दिव्येन्दु पालित)  12.5% श्रीमती मेनका मल्लिक "देश आ अन्य कविता सभ" (नेपालीक अनुवाद मूल- रेमिका थापा)  13.75% श्री कृष्ण कुमार कश्यप आ श्रीमती शशिबाला- मैथिली गीतगोविन्द ( जयदेव संस्कृत)  11.25% श्री रामनारायण सिंह "मलाहिन" (श्री तकषी शिवशंकर पिल्लैक मलयाली उपन्यास)  13.75% Other:  1.25% फेलो पुरस्कार-समग्र योगदान २०१२-१३ : समानान्तर साहित्य अकादेमी, दिल्ली Thank you for voting! श्री राजनन्दन लाल दास  54.1% श्री डॉ. अमरेन्द्र  22.95% श्री चन्द्रभानु सिंह  21.31% Other:  1.64% संपादकीय जगदीश प्रसाद मण्डल- एकटा बायोग्राफी...गजेन्द्र ठाकुर द्वारा ........शीघ्र

आगू-

जगदीश प्रसाद मण्डल पाँच-छह बर्खक रहथि तखनेसँ भाइक संग स्कू‍ल जाए लगला। गामेमे लोअर प्राइमरी स्कूनल, दू पाली स्कूलल चलैत छल। अखन तँ आठम धरि‍क पढ़ाइ हुअए लागल अछि‍ तहि‍ना एक शि‍क्षकसँ चलैत स्कूथल सेहो सतरह शि‍क्षक धरि‍ पहुँचि‍ गेल अछि‍। तँए कि‍ शि‍क्षा अगुआ गेल? जि‍नगीक लेल सर्वांगीन वि‍कास अनि‍वार्य अछि‍ जँ से नै तँ ओ अपलांग-वि‍कलांग भेल पड़ल रहत। सामान्य‍ स्कूैल-कअोलेज तँ ठाम-ठीम बनल मुदा तकनीकी शि‍क्षाक वि‍कास नै भेल। परि‍णाम बनि‍ गेल अछि‍ जे काजक दि‍शे बदलि‍ गेल अछि‍। खैर जे होउ, मुदा आजादीक पहि‍नौं आ पछाति‍यो बेरमा राजनीति‍क, शैक्षणि‍क दृष्टिल‍सँ अगुआएल। आजादीक आन्दो लनमे बचनू मि‍श्र उभड़ला। नवानी वि‍द्यालयमे भनसि‍याक काज करैत रहथि‍। लि‍खनाइ तँ नै सीखि‍ भेलनि‍ मुदा वक्ता भऽ गेलाह। देशक प्रति‍ ओहन समर्पित जे आजादीक दौड़मे तीन मास धरि‍ भट्टे-बैगन बि‍ना नूनक, उसनि‍-उसनि‍ खा दि‍न-राति‍ काज करैत रहलाह, आन्दो़लन गाम-गाम पकड़नहि‍ रहए। काजेसँ इमानदारी सेहो अबै छै। १९३४ ईं.क भूमकमक पछाति‍ राशनक जे बँटवारा हुअए लागल, तइमे एतेक इमानदारीक परि‍चय मधेपुर थानामे देलनि‍ जे समाजक सभ हुनका गाँधीजी कहए लगलनि‍। तइ संग आरो-ओरो रहथि‍। बेरमा पंचायत बनबैमे हुनकर योगदान बहुत रहलनि‍। जनसंख्याजक हि‍साबसँ, ओइ समयक पंचायतक हि‍साबसँ, बेरमा छोट पड़ैत रहए। सामाजि‍क बुनाबटि‍ एहेन जे गाम-गामक बीच अपन-अपन संबंध। तँए के केकरा संग रहत, ई समस्याए। मुदा दीप गामक नेतृत्वोक सहयोगसँ, जे अपन पंचायत काटि‍ पंचायत बनबैमे सहयोग केलथि‍, पंचायत बनल।

पछाति‍ बचनू मि‍श्रक दि‍माग गड़बड़ा गेलनि‍। ओना अस्सीहसँ ऊपर बर्खक उमेरमे मुइलाह मुदा प्रभाव कमि‍ गेलनि‍। ब्रेन प्रभावि‍त होइक कारण दूटा भेलनि‍। पहि‍ल पारि‍वारि‍क आर्थिक स्थिक‍ति‍ आ दोसर राजनीति‍क क्षेत्रमे इमानदारीक अभाव। मुदा अंत-अंत धरि‍ समाजकेँ जगबैत रहलाह। जहि‍ना राजनीति‍क दृष्टिक‍सँ बेरमा गाम जागल तहि‍ना शैक्षणि‍क दृष्टिस‍सँ सेहो ई गाम अगुआएल रहल अछि‍। गाममे स्कूूल कहि‍या बनल, एकर नि‍श्चि‍त ति‍थि‍क जानकारी तँ नै मुदा १९३४ ई. क भूमकममे वि‍द्यालयक भीत खसल, ई जानकारीमे अछि‍। मुदा वि‍द्यालयक जगह बदलि‍ गेल। कि‍एक तँ ओइ जगहकेँ जनमानस अशुभ बुझए लागल। ओना ओ स्थाभन गामक ब्रह्म स्थादन छी, शक्ति्‍शाली जगह। अखन ओइ स्थाननमे बाल-बोधक अांगनबारी चलि‍ रहल अछि‍। ओइठामसँ वि‍द्यालय उठि‍ लछमीकान्तक, रमाकान्त साहुक कचहरीमे चलि‍ आएल। शुरूमे लकड़ीक खुट्टापर बाँसेक घर रहै, मुदा पछाति‍ कचहरी नि‍च्चाल सि‍मटी ईंटा ऊपर खढ़क घर बनौलनि‍। ओइ कचहरीमे १९५२ ई.क पहि‍ल चुनावक केन्द्र सेहो बनल।

अखन वि‍द्यालय तेसर स्थाचनपर अछि‍। जे जगह सरि‍सव-पाहीक प्रो. हेतुकर झाक छि‍यनि‍। ओना ओ रजि‍स्रीमु करैले तैयार भेल छथि‍ मुदा जमीन्दाररीक तेहेन ओझरौठमे पड़ल अछि‍ जे हुनका लि‍खले ने होइ छन्हि‍‍! बुढ़ि‍या गाछीक नाओं जमीनक पड़ि‍ गेल अछि‍। सम्प्र ति‍ पंचायत भवन, आठमा धरि‍क स्कूतल, खंडहर रूपमे अस्परतालक घर आ भव्यु दुर्गास्थामन सेहो अछि‍।

अठारहम शताब्दीयक पूर्वार्द्धमे एकहरे खड़का मूलक परि‍वारमे पं. कंचन झा आ पं. बबुए झा वैदि‍क भेलाह। ओना ओइ समैमे अंग्रेजी शि‍क्षाक प्रचार-प्रसार नै भेल छल, मुदा संस्कृित शि‍क्षाक स्वाुर्णिम युग अवस्सा छल। स्वआर्णिम ऐ लेल जे सामाजि‍क ढाँॅचा, कि‍छु बि‍च्छृवंखला छोड़ि‍, वैदि‍क पद्धति‍सँ चलैत छल। आस्ते-आस्ते बि‍च्छृमंखला बढ़ि‍ते गेल। पछाति‍ अंग्रेजी शि‍क्षाक प्रभाव सेहो खूब पड़ल। पं. कंचन झाक बालक पं. भुटाइ झा प्रसिद्ध गेठरी झा ख्याृति‍ प्राप्तद वैदि‍क भेलाह। दरभंगा राजसँ सात सए बीघा जमीन लाखेराज ब्रह्मोत्तर रूपमे भेटल छलनि‍। ओइ समैमे कि‍नको ताधरि‍ पंडि‍तक बीच स्थािन नै भेटनि‍ जाधरि‍ ओ काशीसँ पढ़ि‍ नै अबैत छलाह। पं. चि‍त्रधर ठाकुर हुनके घरक भगि‍नमान परि‍वार। पंडि‍त चि‍त्रधर ठाकुरकेँ तीन बालक, पं. जयनाथ ठाकुर, पं. तेजनाथ ठाकुर आ पं. खर्गनाथ ठाकुर। तीनू पंडि‍त मुदा जेठका भाय खेती करैत कि‍सान बनि‍ गेलाह आ बाकी दुनू भाँइ पं. तेजनाथ ठाकुर आ पं. खर्गनाथ ठाकुर काशीसँ पढ़ि‍ एलाह। उच्चचकोटि‍क श्रेणीमे गि‍नती छलनि‍। पंडि‍त तेजनाथ ठाकुर जीवन-पर्यन्तर लोहना संस्कृथत वि‍द्यालयमे सेवा देलनि‍। तेकर पछाति‍ परि‍वारमे पं. गौरीनाथ ठाकुर, अनि‍रूद्ध ठाकुर आ सुन्दरर ठाकुर भेलखि‍न। शरीरसँ अबाह रहने पं. सुन्द र ठाकुर वैद्यक रूपमे गामे वैद्यागि‍री करैत रहलाह। पं. अनि‍रूद्ध ठाकुर व्या करणक पंडि‍त। सीतामढ़ी जि‍लाक वि‍द्यालयमे जि‍नगी भरि‍ सेवा देलनि‍। अखन धरि दुइये परि‍वारक चर्च भेल अछि‍ मुदा एतबे नै अछि‍। पं. कामेश्वर झा, जे खगड़ि‍या वि‍द्यालयक संग दीप महावि‍द्यालयमे सेहो सेवा देलनि‍। वेद-व्या करणक प्रकाण्ड पंडि‍त छलाह। पंडि‍त चण्डे श्वर झा अरड़ि‍या मध्यि वि‍द्यालयक संस्थावपि‍त शि‍क्षक बनि‍ अधवयसेमे मरि‍ गेलाह।

पंडि‍त उपेन्द्रम मि‍श्र सभसँ भि‍न्न छलाह। एक संग ज्यो।ति‍ष, वेद व्या करण, साहि‍त्य क वि‍शेष ज्ञाता छलाह। कतेको महावि‍द्यालयमे सेवा दैत शरीर ति‍याग केलनि‍। सभसँ भि‍न्न ओ ऐ अर्थमे छलाह जे कोनो महावि‍द्यालयमे अधि‍क दि‍न नै टि‍क पबैत छलाह। सालक भीतरे कि‍छु ने कि‍छु खटपट भइये जाइत छलनि‍। जखने खटपट होइत छलनि‍, सोझे घरमुँह वि‍दा भऽ जाइत छलाह। मुदा गामो एलापर केकरो कि‍छु कहैत नै छलखि‍न। कि‍यो पुछबो ने करनि‍ जे ओहि‍ना एलौं आकि‍ झगड़ा-दान कऽ कऽ एलौं। अद्भुत गुण छलनि‍ जे अपने-आप वि‍मर्श करैत, समए संग अपन कर्त्तव्याकेँ छुटैत देखि‍ दोसर महावि‍द्यालय दि‍सि‍ वि‍दा होइत छलाह। खराम छोड़ि‍ पएरमे कहि‍यो जूत्ता-पप्पसल नै पहिरलनि‍। परोपट्टाक वि‍द्वानक बीच अपन पहि‍चान छलनि‍, जइसँ कोनो वि‍द्यालय, महावि‍द्यालयमे स्वारगत रहैत छलनि‍। पंडि‍त उदि‍त नारायण झा, जे गोल्ड‍सँ सम्माभनि‍त छलाह, शि‍क्षण कार्य छोड़ि‍ दोकानदारी व्यववसाय केँ अपन जीवि‍का बनौलनि‍। परि‍वारक स्थिण‍ति‍ खराब छलनि‍। बि‍नु उपारजने चलैबला नै छलनि‍। मुदा कि‍छुए दि‍नक मेहनति‍क फल नीक भेटि‍लनि‍। जीवन-यापन करैत बीस बीघा जमीन परि‍वारमे बनौलनि‍। पं. रामनारायण झा व्यासकरणक ज्ञाता छलाह। शरीरसँ पुष्ट‍ रहने शुरूमे पुलि‍सक नोकरी शुरू केलनि‍, मुदा वि‍देशी शासनक उठैत वि‍रोधमे नोकरी छोड़ि‍ शि‍क्षण कार्यमे चलि‍ एलाह। बेसि‍क स्कूरल घोघरडि‍हामे प्रवासी जीक संग रहि‍ सेवा देलनि‍।

गामक स्कूिलसँ १९५६ ई.मे जगदीश प्रसाद मण्डल नि‍कलला। गामसँ सटले पूब कछुबीमे मि‍ड्ल स्कूवल बनि‍ गेल छल। तइसँ पहि‍ने पाँचमा धरि‍क स्कू ल छल। मि‍ड्ल स्कूपल अलग बनल। ओना अखन दुनू मि‍लि‍ एक भऽ गेल अछि‍ मुदा पहि‍ने दुनू अलग-अलग छल। पाँचमा धरि‍ फीस नै लगैत छल मुदा छठा-सातमामे अढाइ रूपैआ महीना फीस लगैत छल। १९६० ईं.मे मि‍ड्ल स्कूछलसँ नि‍कलि‍ केजरीबाल हाइस्कू-ल झंझारपुरमे नाओं लि‍खेलनि। बेरमाक वि‍द्यार्थी तमुरि‍यामे हाइ स्कू ल आ झंझारपुरो हाइ स्कूसलमे साले-साल वि‍भािजत होइत रहैत छल। कारणो रहै। जइ रूपक शि‍क्षकक टीम झंझारपुरमे छल ओइ तरहक टीम तमुरि‍यामे नै छल। तमुरि‍या हाइ स्कू लमे एक-आध शि‍क्षक साले-साल जाइत-अबैत छलाह जखन कि‍ झंझारपुरमे से नै छल, जइसँ झंझारपुरकेँ नीक मानल जाइत छल। जहि‍ना गामक आन-आन वि‍द्यार्थी पएरे जाइत-अबैत छलाह तहि‍ना ईहो जाइत-अबैत छला। कि‍छु गोटे होस्ट लोमे रहैत छला। सालो भरि‍ कि‍छु नै कि‍छु असुवि‍धा रहि‍ते छलनि। ओना अखनो कि‍छु-कि‍छु छन्हिये। सालो भरि‍ ऐ तरहेँ रहै छल।

अगहनसँ माघ धरि‍ दि‍नो छोट होइए, मुदा वि‍द्यालयक समए छोट नै होइत छल। काजक अनुकूल समए भेटने दि‍न-राति‍मे अन्तहर भलहिं नै बूझि‍ पड़ैत छै, मुदा गाम-घरक लेल तँ ई कठि‍न अछि‍ये। मौसमी छुट्टीक नाओंपर दिसम्बरमे बड़ा दि‍नक छुट्टी आठ-दस दि‍न होइत छल, जे परीक्षाेपरान्तक आ रि‍जल्टकसँ पूर्व होइत छल।

गरमि‍यो मासमे असुवि‍धा तँ तहि‍ना मुदा ओ असुविधा दोसर तरहक होइत छल। ओना एकरा आम खाइक छुट्टी सेहो कहल जाइ छै मुदा ग्रीष्मातवकासक नाअों सेहो छै। नमगर छुट्टी, मास दि‍नक होइत छल। नीक परि‍वारक वि‍द्यार्थीकेँ अनुकूल वातावरण रहने दोहरी लाभ होइत छलनि‍, साधारण परि‍वारक वि‍द्यार्थी आम खाइत-खाइत आधा-छि‍धा बि‍सरि‍ जाइत छला। शैक्षणि‍क वातावरण स्पाष्टर रूपमे वि‍भाजि‍त भऽ जाइत छल। जहि‍ना जाड़क मास बरेड़ी छुबैत अछि तहि‍ना गरमि‍यो गाछक फुनगी छुबैत अछि‍। जइसँ अप्रील माने चैत सँ ताधरि‍ वि‍द्यालय भि‍नसुरका होइत छल जाधरि‍ गर्मी छुट्टी नै भऽ जाइत छल। तमुरि‍या हाइ स्कूरल आ झंझारपुर हाइ स्कूैलमे इहो अंतर छल जे आधा घंटा आगू-पाछू खुजबो करैत छल आ बन्नो होइत छल। कारणो छलैक कमला पछि‍मक गाम मेंहथ, नरूआर आदि‍सँ लऽ कऽ पूबमे बेरमा धरि‍ आ गंगापुर खरबाइरसँ लऽ कऽ अलपुरा-अरड़ि‍या धरि‍क वि‍द्यार्थी झंझारपुरमे पढ़ैत छलाह। नमहर क्षेत्र तँए वि‍लम्बससँ स्कूोल खुलैत छल। साढ़े एगारह बजे वि‍द्यालयमे छुट्टी होइत रहए। तखन पान-सात मील पएरे चलब कठि‍न छल। ओना ई बड़ कठि‍न नै कि‍एक तँ बेरमाक वि‍द्यार्थी पएरे चलि‍ लोहनो वि‍द्यालयसँ पढ़ने छलाह। तहि‍ना बर्खा मासमे सेहो होइत छल। कखन पानि‍-वि‍हाड़ि‍ आबि‍ जाए, तेकर कोनो ठीक नै। तहूमे कतेकाल बरि‍सत तेकरो ठेकान नै। खैर जे हो.....। केजरीवाल हाइ स्कूछल झंझारपुरमे १९६३ ई.मे हायर सेकेण्ड्रीकक पढ़ाइ शुरू भेल। मुदा थोड़े पेंच लागि‍ गेलै। कला-विज्ञान आ वाणि‍ज्यि तीनूक पढ़ाइ होइत छलैक। कला-वि‍ज्ञानक मंजूरी भेटि‍ गेल वाि‍णज्यलक भेटबे ने कएल। कते रंगक हवा बहए लागल। ओना शि‍क्षकमे बढ़ोत्तरी पछाति‍ भेल मुदा शुरूमे असुवि‍धा रहल। १९५८ ई.मे जनता कओलेज खुजल। जन-सहयोगसँ कओलेज खुजल। मुदा कओलेजक जे नमगर-चौड़गर घर चाही, जे धड़फड़मे नै भेलै तँए हाइये स्कू।लमे साधारण रूपे पढ़ाइ शुरू भेल। कि‍छु गनल चुनल विषयक पढ़ाइ शुरू भेल। खएर जे भेल मुदा शि‍क्षामे नव जागरण क्षेत्रमे आएल। बहुतोक मनक मुराद पूरा होइक संभावना बढ़ल। बी.ए. तकक पढ़ाइ लगमे हएत, तखन पढ़ैबला बच्चार आ पढ़बैबला गारजनक मनमे कि‍अए ने उत्सााह जगतनि‍। कि‍छु दि‍नक पछाति‍ कओलेजक अपन कँचका ईंटा आ खपड़ाक मकान बनलै।

जगदीश प्रसाद मण्डल १९६५ ई.मे हायर सेकेण्ड्रील पास केलापर बी.ए. पार्ट वनमे नाओं लि‍खेलनि। पहि‍ने दू बर्खक आइ.ए. आ दू बर्खक बी.ए. प्री हुअए लगलैक। दुनू दि‍ससँ वि‍द्यार्थीक प्रवेश हुअए लागल। बी.ए. पार्ट वन केलापर आनर्स पढ़ैक वि‍चार भेलनि। आ-आन कओलेजमे आनर्सक पढ़ाइ होइत छल। जनता कओलेजमे नै होइत छल। एक-दू-तीन शि‍क्षकसँ अधि‍क कोनो वि‍षयमे शि‍क्षक नै छल। हि‍न्दी। वि‍भागमे सेहो दुइये गोटे छलाह। प्राइवेट रूपमे तैयारी करए लगला। सी.एम. कओलेजक नाओंसँ फार्म भराएल आ परीक्षो भेल। १९५२ ईं.क चुनावक बाद देशक अपन वि‍धि‍वत् सरकार बनल। मुदा एक संग कतेको प्रश्न उठि‍ कऽ ठाढ़ भऽ गेल। सरकारी कार्यलयमे कर्मचारीक जरूरति‍ भेल। जेकर बहालीमे जाति‍वाद आ पैरवी-पैगाम शुरू भेल। आम जनताक जगाएल सरकार जनतासँ बहुत दूर हटि‍ गेल। ओना जे कोनो नव-स्वदतंत्र देशक स्थि ‍ति‍ होइए तहि‍ना अपनो ऐठाम रहए। मुदा ओइ लेल जत्ते सकारात्म।क सोच आ काजक औसत हेबाक चाहि‍ये से नै भेल। सामंती सोच; आ सामंत मजगूत छल, जइसँ आम-अवामक बीच आक्रोश पनपए लगलै। राजा-रजबाड़े जकाँ शासन पद्धति‍ चलए लागल। तही बीच भूदान आन्दोँलनक उदय सेहो भेल। ओना तेलांगनासँ शुरू भेल भूमि‍ आन्दोहलन देशकेँ डोला देने छल। तइ संग केरल, बंगालक संग छि‍टफुट अनेको राज्यएमे भूमि‍ आन्दोगलन पकड़ि‍ रहल छल। दरभंगा जि‍लामे सेहो भूमि‍ आन्दोेलन शुरू भेल। १९५७ ई.क चुनावमे काँग्रेस सरकारक स्थिभ‍ति‍ कमजोर भेल। केरलमे वामपंथी सरकार बनि‍ गेल। आजादीक दौड़क जे जागरण छल आे ताजा छल, जइसँ अखुनका जकाँ नै छल। ऐ बीच गोटि‍-पङरा हाइ स्कूरल, कओलेज, प्राइवेट रूपमे बनए लागल छल। मुदा औसत कम रहल। खादी भंडार उद्योगक ह्रास होइत गेल आ होइत-होइत ई मेटा जकाँ गेल। तहि‍ना नगदी पैदावारमे कुशि‍यार सेहो छल, जे उद्योगपति‍क चलैत सेहो मरए लागल।

मि‍थि‍लांचलमे मूलत: जीवि‍काक साधन कृषि‍ छल। ओना सघन रूपमे कृषिक‍ पैघ साधन जीवि‍काक छी, मुदा से नै छल। जेहो छल तहूमे रंग-बि‍रंगक छल-प्रपंच चलि‍ रहल छल। बटाइ खेतीमे अधि‍या उपज उपजौनि‍हारकेँ भेटैत छलैक। जखन कि‍ उपजबैमे, खेती करैमे कि‍छुए अन्नक खेती लाभप्रद छल। उपजाक अनुपातमे लागत खर्च किछुमे कम छल आ कि‍छुमे अधि‍क। जइमे अधि‍क छल ओइमे बटेदारकेँ घाटा लगैत छलैक। तइ संग रौदी-दाहीक प्रभाव ओहन कि‍सानपर सेहो पड़ैत छल जे खेती करैत छलाह। जे बेसी खेतबला छलाह हुनकर खेती अधि‍कतर बटाइक माध्यिमसँ चलैत छल। तइ संग अधि‍क अन्न रहने अन्नक महाजनि‍यो चलैत छलनि‍। महाजनि‍योक प्रथा गाम-गामक फुट-फुट कोनो गाममे सवाइ (एक मोनक सवा मोन, एक सीजि‍नक) तँ कोनो गाममे एगारही (आठ पसेरीक मोन, एक मोनक एगारह पसेरी) तँ कोनो गाममे डेढ़ि‍या, एक मोनक बारह पसेरी। जेकर मतलब भेल जे एक मोनक आधा मोन सूदि‍ये भेल। तइ संग इहो होइत छल जे जँ सालक कर्ज सालमे चुकाएल जाइत छल, आ ने तँ सूदो मूड़े बनि‍ जाइत छलैक। जइसँ दू साल बितैत-बितैत कर्ज दोबरा जाइत छलै। अखुनका जकाँ बि‍आह तँ तते भारी नै छल मुदा माए-बापक सराधमे सामाजि‍क आ जातीय एहेन चाप छल जे खेत-पथार बेचि‍ काज चलैत छल। खेतक हि‍साबसँ चारि‍-पाँच मेलक कि‍सान छलाह। गामक-गाम एक-एक गोटेक छलनि‍। जखने एकठाम जमीन समटाएल रहत तखन दोसर-तेसरक की आ कते हेतनि‍? खेतमे काज करैबला बोनि‍हारोक स्थि ‍ति‍ बदसँ बदतर छल। एक तँ दि‍न भरि‍क बोनि‍ कम तहूमे सालक गनल दि‍न काज होइत। कि‍सानोक बीच खेतीक नव वैज्ञानि‍क खेतीक पद्धति‍क अभाव छलनि‍। अभावोक कारण छल जे ने सरकारक धि‍यान खेती दि‍स छल आ ने खेतीक साधन उपलब्ध छल। त्रेता युगक जनकक हर जकाँ खेत जोतैक हर होइत छल! जहि‍ना मरि‍आएल बड़द तहि‍ना जोति‍नि‍हार। तइ संग खेत पटबैक पानि‍क कोनो दोसर बेवस्थाध नै। जहि‍या पानि‍ हएत तहि‍या खेती शुरू हएत। जइसँ बेसमए खेती होइत छल। पोखरि‍-झाँखड़ि‍मे अनेरूआ माछ जे होइ, सएह माछ पोसब कहाइत छल। तहि‍ना तीमनो-तरकारी आ फलो-फलहरीक हाल छल। मोटा-मोटी कृषि‍क ओहन दशा बनि‍ गेल छल जइपर जीवन यापन करब कठि‍न भऽ गेल छल।

पशुपालनक रूपमे गाए-महींस बकरी पोसब मात्र चलैत छल। गाए-महींस पोसैक बीच, महाजनीक एहेन सूत्र लागल छल जे पोसि‍नि‍हार ि‍सर्फ पोसैत छलाह। एक तँ नस्ल पछुआएल रहने पछुआएल कारोबार दोसर एहेन जालमे ओझराएल जे धीरे-धीरे कमि‍ते गेल जे बढ़ैक कोनो संभावना नै रहल। नगदी फसि‍लक रूपमे कुशि‍यार आ पटुआक खेती छल। मुदा उद्योगपति‍क कारामातसँ ओहो दुनू कमजोरे होइत गेल। मुदा सरकारक प्रति‍ जन-आक्रोश बढ़ल। गाम-घरक लोक सरकारी लाभक माने बुझैत छल मात्र कोटाक वस्तुज धरि‍। सेहो रस्तेि-पेरे लुटाइत छल।

१९६७ ई.क चुनाव आएल। जगदीश प्रसाद मण्डल बी.ए.क वि‍द्यार्थी रहथि। आजादीक पछाति‍ पहि‍ल जन-जागरण छल। पढ़लो-लि‍खल आ वि‍द्यार्थियो मैदानमे उतरल।

सन् सैंतालीस...

भारतक स्वतंत्रताक त्रिवार्णिक झण्डा फहरा रहल छल।

मुदा कम्यूनिस्ट पार्टीक माननाइ छल जे भारत स्वतंत्र नै भेल अछि।

असली स्वतंत्रता भेटब बाँकी छै...

मिथिलाक एकटा गाम…

जन्म होइत अछि एकटा बच्चाक.. ओही बर्ख ...

ओइ स्वतंत्र वा स्वतंत्र नै भेल भारतमे...

पिताक मृत्यु...गरीबी..

केस मोकदमा...

वंचितक लेल संघर्षमे भेटलै स्वतंत्र भारतक वा स्वतंत्र नै भेल भारतक जेल....

आइ बेरमामे पाँच-दस बीघासँ पैघ जोत ककरो नै..

ओइ गाम मे आइ जीवित अछि आइयो किसानी आत्मनिर्भर संस्कृति...

पुरोहितवादपर ब्राह्मणवादक एकछत्र राज्यक जतऽ भेल समाप्ति..

संघर्षक समाप्तिक बाद जिनकर लेखन मैथिली साहित्यमे आनि देलक पुनर्जागरण...

जगदीश प्रसाद मण्डल- एकटा बायोग्राफी...गजेन्द्र ठाकुर द्वारा ........शीघ्र जारी................................. गजेन्द्र ठाकुर ggajendra@videha.com http://www.maithililekhaksangh.com/2010/07/blog-post_3709.html २.गद्य २.१.जगदीश प्रसार मण्डलक दीर्घकथा- फाँसी २.२.राजदेव मण्डलक उपन्यास हमर टोल- पछि‍ला खेपसँ आगू २.३.डॉ. कैलाश कुमार मिश्र- इंद्रधनुषी अकास २.४.१.अतुलेश्वर- सगर राति दीप जरए , आन्दोलन आ बभनभोज २.विनीत उत्पल आधुनिक मैथिली नाटक आ टुच्चा नाटककारक जातिवादी रंगमंचक अवधारणा/ साहित्य अकादेमी कथा गोष्ठी: सगर राति दीप जरय: एकटा बहन्ना/  ३.पूनम मण्डल- आरती कुमारी आ सगर राति दीप जरय ४.आशीष अनचिन्हार- विदेह मैथिली समानान्तर रंगमंच/ जातिवादी रंगमंचक भाषाक बानगी २.५.१.रवि भूषण पाठक- ओक्‍कर तोहर हम्‍मर सपना-२ २.६.अमित मिश्र- कथा - प्रेमक अंत २.७.१.राम भरोस कापड़ि ‘भ्रमर’- घरमुहाँ- उपन्यास अंश २.चंदन कुमार झा- बिहनि कथा- समय होत बलबान २.८.सुजीत कुमार झा- साधना जगदीश प्रसार मण्डलक दीर्घकथा-

फाँसी

काल्हि‍ बारह बजे बलदेबकेँ फाँसी हएत, रेडि‍यो-अखबार कान-कान जना देलक अछि‍। जहि‍ना बलदेव बुझैत तहि‍ना जहलक उत्ताधि‍कारि‍यो बुझैत अछि‍। जहि‍ना बलदेवक परि‍वार बुझैत अछि‍ तहि‍ना सर-समाज, दोस-महि‍न सोहो बुझैत अछि‍। सबहक मन बारह बजेपर अॅटकल। वएह बारह बजे दि‍न वा राति‍ अपन प्रखर रूपमे दि‍शा दि‍स मैदानक रस्ताउ धड़ैत अछि‍।

जहलक एक नंबर सेल घर। जे घर ओइ अपराधीकोँ ओइ बीच भेटैत अछि‍ जखनन न्या यालयसँ फाँसीक ति‍थि‍ ि‍नर्धारि‍त होइत अछि‍। सेलक बुनाबटि‍यो, आन सेलो आ वार्डोसँ भि‍न्न बनल अछि‍। ओना सेलक बुनाबटि‍ वि‍चि‍त्र अछि‍ मुदा आनसँ अलग तँ अछि‍ये। कोठरीनुमा घर, कोठरि‍येक आँट-पेट सेहो अछि‍। एक कोठरी ओहन होइत जे नमहर घरमे बनैत आ एक कोठरी ओहन होइत जे घरे कहबैत अछि‍। एक नंबर सेलो तहि‍ना बनल अछि‍। चि‍मनीक एक नम्बीर ईंट, क्यू‍ल-लक्खी सरायक बीचक, पथराएल बालु, दू-एक सि‍मटीक जोड़सँ देबाल बनल अछि‍। सात एस्वा बन इर फुटक घर, जे घरक कोठरीओसँ हीने अछि‍। पौने दू फुट आगूक दरबज्जाच, खि‍ड़की दरबज्जा‍ नै, जे भीतर-बाहर अबैत-जाइत अछि‍। लोहाक बनल केबाड़ लगल अछि‍। शेष कोनो देवालमे ने खि‍ड़की-खोलि‍या अछि‍ आ ने पूब-पछि‍म दि‍शा देखबैक कोनो दोसर साधन अछि‍। एक तँ ओहुना जइठाम सभ कि‍छु (दि‍शा-वोधक) रहैत अछि‍ तहूठाम दि‍शान्सअ लगि‍ जाइ छै। आ पूबकेँ पछि‍म, पछि‍मकेँ पूब कहए लगै छै। जि‍नगीक पूर्ण लीला बलदेवकेँ ओइ कोठरीनुमा घरमे पनरह दि‍नसँ होइत अछि‍। ओना तइसँ पूर्वो (15 दि‍नसँ पहि‍ने) सेहो सात नम्बपर सेलमे तीन सालसँ रहैत आबि‍ रहल अछि‍। ओना एक नंबर सेलमे एलापर एतेक सुवि‍धा जरूर भेटि‍ गेल छलै जे पहि‍नेसँ नीक भोजन, नीक ओढ़ना-बि‍छौना भेटि‍ गेल छलैक। भलहि‍ं घरमे नेहि‍ये बि‍जलीक तार आ ने बालु लागल मुदा दरबज्जा सोझे एहन बालु लागल छलै जइसँ कोठरि‍योक भीतर इजोत पहुँचैत छल। मुदा कोठरीक बाहर स्पेरशल सि‍पाहीक बेवस्थाभ सेहो भऽ गेलै। बाहर बजे राति‍क घंटी टावरक मुरेड़ापर बाजल। राति‍-दि‍नक पाशा बदलैक समए भऽ गेल। जहि‍ना भूत-वर्तमान आ वर्तमान भवि‍ष्यंमे बदलैत अछि‍ सएह मुहूर्त अछि‍। राति‍-दि‍नक बाट पकड़त मुदा दूत-भूत एतेक प्रबल जे आरो बेसी उग्र बनैत अछि‍। जहि‍ना राति‍क जनमल बच्चाम दि‍नेक होइत तहि‍ना बलदेवक राति‍ सेहो दि‍ने भऽ गेलै। राति‍-दि‍न भऽ गेलैक आकि‍ नीनि‍ये देवी वि‍ध्न वादि‍नीक संग डरे पड़ा गेलनि‍, से नै कहि‍। ओछाइनपर पड़ल बलदेव उठि‍ कऽ बैस कोठरीक चारू देवाल दि‍स तकलक। अन्हाेरमे सभ हराएल बूझि‍ पड़ल, कि‍एक तँ बाहरक बि‍जलीक इजोत सेहो अन्हाोर चद्दरि‍ ओढ़ि‍ ओहन भऽ गेल जे अपनो भरि‍ नै देखि‍ पड़ैत। देह दि‍स तकलक। हाथ-हाथ नै सुझति‍, बलदेव अजमा कऽ घरक मुँह लग ससरि‍ कऽ पहुँचल। हाथ बढ़ा देखलक तँ बूझि‍ पड़लै जे यएह घरक मुँह छी। घरक मुँह देखि‍ मनमे बि‍सवास जगलै जे ऐठामसँ अन्हाहर-इजोतक सभ कि‍छु देखब। हि‍या कऽ बि‍जली खूॅटामे लटकल बौलपर नजरि‍ देलक। मड़ि‍आएल इजोत तइपर असंख्योल मच्छखर-माछी जान गमबैले तैयार नाचि‍ रहल अछि‍। खूॅटापर गि‍रगीटक झुंड मुँह बॉबि‍ खाइले तैयार आसन लगौने अछि‍। नि‍च्चाझमे बेंगक जेर कुदैत। तइ बीच मच्छ रक जेरि‍ गीत गबैत फाटक टपि‍ भीतर पहुँचल। मुदा बलदेवक धि‍यान मच्छ‍रपर नै गेल। जहि‍ना शरीरमे अनेको रोग रहलापर बड़का रोग छोटकाक चापि‍ रखैत तहि‍ना बलदेव बारह भोग मच्छनरकेँ दाबि‍ देलक। केना नै दाबैत, जइठाम जि‍नगीक खूनक कोनो महत नै तइठाम मच्छ र कत्ते पीबे करत। मुदा तहूसँ बेसी बलदेवक मनमे जागि‍ गेल जे जखन बाहर बजे अन्तेू भऽ रहल छी तइ बीच जँ कनि‍यो उपकार दोसरक भऽ जाइ छै तँ ओहो धरमे छी कि‍ ने? बलदेवक मनमे पनपए लगलै। तखने पएर दाबि‍ सि‍पाहीक झुंड सेलक चारूकात चक्कर कटए लगल। अन्हाऽरमे सभ हराएल। पएरक धमकसँ बलदेव बूझि‍ गेल। जहि‍ना गाए-महि‍ंस मनुक्ख क संग कुत्तो-बि‍लाइक चालि‍ अन्हाररोमे पकड़ि‍ लैत तहि‍ना बलदेवो पकड़लक। मुदा सभ चुप्प। बलदेवक मनमे उठलै, जब कि‍ बारह बजेमे फाॅसि‍येपर चढ़ब तखन कि‍अए एते ओगरवाहि‍क कोन जरूरत छै। एक तँ ओहि‍ना बड़का छहर दि‍वालीक बीच जेल बनल छै, तइ बीच वार्ड-सेल बनल छै, तइ बीच एते ओगरवाहीक कोन चरूरत छै। मुदा लगले वि‍चार बदलि‍ गेलै। वार्ड सभक कैदी तँ अबैत-जाइत रहैए। सभ दि‍न दू-चारि‍ एबो करैए आ नि‍कलबो करैए। मुदा हम तँ आब नि‍कलि‍ नै पाएब। नि‍कलबे नै करब आ कि‍ जि‍नगि‍ये अंत भऽ रहल अछि‍। आँखि‍ उठा आगू तकलक तँ बूझि‍ पड़लै जे साल-महि‍नाक कोन गप जे मात्र कि‍छु घंटाक लेल छी। जइ दि‍न फाँसीक आदेश न्यालयालयसँ भेल ओही दि‍न कि‍अए ने फाँसि‍यो भऽ गेल। अनेरे कोन सोग-सन्तालप देखै-भोगैले पनरह दि‍न जीआ कऽ राखल गेल अछि‍। मन शान्त केलक। शान्त होइते, जहि‍ना पोखरि‍क अगम पानि‍केँ पूर्बा-पछबा हवा डोलबैत रहैए तहि‍ना मन डोललै। डोलि‍ते उठलै, फाँसी कि‍अए हएत? प्रश्नपर नजरि‍ उटकि‍ते उठलै जे फाँसीपर सपूत-कपूत दुनू चढ़ैए। फेर उठलै जे तइ सपूत-कपूतमे हम की छी?

अन्हिर उठैसँ पहि‍ने जहि‍ना हवा खसि‍ पड़ैत अछि‍, वायुमंडल शान्तक भऽ जाइत अछि‍ तहि‍ना बलदेवक मन सेहो शान्तब भऽ गेल। कोनो तरहक तरंग नै। मुदा लगले मनमे उठलै जे जि‍नगीक अंति‍म सीमापर पहुँचि‍ गेल छी। जहि‍ना गामक सीमा टपि‍ते दोसर गाम आबि‍ जाइत अछि‍ तहि‍ना जीवन लोकसँ मृत्यु‍ लोक चलि‍ जाएब। मुदा एते तँ हेबे करत जे अखन ठेकानल जि‍नगी अछि‍ पछाति‍ वेठेकानलमे पहुँचि‍ जाएब। फेर उठलै, जीवन लोक तँ खाली मृत्युुक लोक नै छी। जीवनो तँ लोक छी। जहि‍ना कोनो जंगलसँ पड़ाएल जानवर दोसर जंगलक सीमापर पहुँचते चारूकात नजरि‍ उठा कऽ देखैत जे रहै जोकर अछि‍ वा नै, तहि‍ना जीवन-मृत्युवक सीमापर बलदेवक मन अटकि‍ गेल। धरतीपर जहि‍ना एक-दि‍शासँ दोसर दि‍स बहैत धार रास्ता केँ बाधि‍त कऽ दैत तहि‍ना बलदेवक जीवन धार बाधि‍त कऽ देलक। आगू टपैक आशा नै देखि‍ बलदेव वामा-दहि‍ना दि‍शा पकड़ैत वि‍चार केलक। एक दि‍स पहाड़सँ नि‍कलैत धार धरती टपैत समुद्रमे मि‍लैत तँ दोसर धरती टपि‍ समुद्रमे मि‍लैत। आगू तँ कि‍छु घंटा शेष अछि‍ मुदा पाछू तँ सौंसे जि‍नगी पड़ल अछि‍। कि‍ एक बेरक फाँसी फाँसी छी आ कि‍ फाँसी चढ़ल जि‍नगीक फँसरी फाँसी छी। मन ठमकि‍ गेलै। मुदा लगले मन पहि‍ने बारह बजेक घंटी बजल। जहि‍ना धरतीपर आएल बच्चाि आस्तेर-आस्ते सकताए लगैत तहि‍ना बलदेवक मन सेहो सकताए लगलै। मन पड़लै पनरह दि‍न पहि‍लुका फाँसीक सजा। मनमे खौंझ उठलै जखन फाँसीक आदेश भेल तखन फेर पनरह दि‍न जहल कि‍अए भेल? कोन अपराधक फल भेटल। जौं ओही दि‍न फाँसी भऽ जाइत तँ पनरह दि‍न जे सोग-सन्ता प भेल से तँ नै होइताए। ततबे नै अपनो ऊपर अनेरे भार कि‍अए बढ़ौलक? फेर मनमे उठलै जे अनेरे ओझराइ छी। मन शान्तए केलक। शान्ता होइते उपकलै, सपूत बनि‍ दुनि‍याँ छोड़ब आ कि‍ कपूत बि‍न। कि‍यो हि‍लसैत, फुलसैत दुनि‍याँ छोड़ैए आ कि‍यो वि‍लखैत, डुमैत दुनि‍याँ छोड़ैए। मुदा जे हि‍लसैत-फुलसैत छोड़ैए ओ छोड़ै कहाँ अछि‍? ओ तँ जीवात्मातकेँ एहेन चुहुटि‍ कऽ पकड़ैत अछि‍ जे छोड़ौनौं नै छुटैत अछि‍। मुदा हम तँ से नै छी। फेर मन घुमलै। दुनि‍याँ बड़ीटा अछि..,‍ बड़ छोट अछि‍...। बड़ीटा ओकरा लेल छै जे बड़ी पाबए चाहैए। मुदा बड़ी तँ भोजोक अंति‍म पराब नै, घरक मध्या सेहो छी। तखन कि‍अए ओकरा लि‍अ चाहैए। फेर मन ठमकि‍ गेलै। अनेरे अछाहे कुकुड़ भूकब नीक नै। अपनो तँ सेसार अछि‍। जइमे अकास-पताल, चान-सुर्ज, नदी-सरोवर सभ कि‍छु अछि‍। तखन अपन छोड़ि‍ दोसराक देखब अपनासँ दूर हएब हएत। अपन कर्म, अपन धर्मक मर्म बुझब उचि‍त हएत। जाबे से बूझि‍ दुनि‍याँक रंगमंचमे नै उतरब ताबे कौआ कान नेने जाइए, तइ पाछू दौगब हएत। अपन रंगमंच आ अपन अभि‍नय लग अबि‍ते मन ठमकि‍ कऽ ठाढ़ भऽ गेलै। ठाढ़ होइते अनायास मनमे उठलै। अभि‍नयो तँ देखि‍नि‍हारोक लेल आ संसारोक लेल रंग-बि‍रंगक, कतेक स्तोरक होइत अछि‍। मुदा कहल तँ अभि‍नाइये जाइ छै। कि‍यो लीला रचि‍ अभि‍नय करैत, तँ कि‍यो गुण-गुणाइत अभि‍नय करैए। कि‍यो मूक भऽ करैत अछि‍ तँ प्रेमावेशमे करैत अछि‍। केना एकरा बि‍‍लगाएब? एक दि‍स चि‍त्र-वि‍चि‍त्र बनल अछि‍ तँ दोसर दि‍स कुचि‍त्र सेहो बनल अछि‍। ओझराइत मन झमान भऽ झमा उठलै। अनेरे ओझड़ेने समए ससरि‍ जाएत। गनल कुटि‍या नापल झोर जकाँ समए बचल अछि‍, तेकरा जौं ओझरौठेमे राखब सेहो नीक नै। बारह बजेक घंटी कतेखान पहि‍ने बाजि‍ चुकल अछि‍। हाथमे जौं घड़ी रहैत तँ ठीक-ठीक समैयोक बोध होइत, सेहो नहि‍ये अछि‍। जइ दि‍न जेलमे प्रवेश केलौं तेही दि‍न जहलक मुँहपर जमा कऽ केलक। जइ दि‍न नि‍कलब तइ दि‍न देत। मुदा नि‍कलब कहि‍या? आइ तँ फाँसि‍येपर लटकि‍ जि‍नगीक वि‍सर्जन करब तखन घड़ी केना लेब आ पहि‍र कऽ समए बुझब? मुदा तँए कि‍ जइ गाममे मुर्गी नै रहै छै तइ गाममे भोर नै होइ छै? पाँच-दस मि‍नट आगू-पाछू, अनुमान तँ कऽ सकै छी। मुदा काजक संग जे समए चलैए ओकर अनुभव आ बि‍नु काजक अनुभवोमे तँ अन्त र होइते अछि‍। काजक दौड़क अनुभव बेसी बढ़ि‍याँ होइत अछि‍। कि‍एक तँ काजक संग समए सटि‍ चलैत अछि‍। मुदा हमरा तँ सेहो नै अछि‍। बस दू बेर खाइ छी, ढेंग जकाँ ओंघराएल पड़ल रहै छी। कखन जागल रहै छी आ कि‍ सूतल रहै छी, से आनक कोन बात जे अपनो नै बूझि‍ पबै छी। पछतेनौं तँ कि‍छु नै भेटत। फेर मनमे उठलै- फाँसी कि‍अए? कि‍छु समए गुम्मू रहलाक पछाति‍ अनायास मनमे उठलै जौं भक्तिर‍-भावसँ समए कटने रहि‍तौं तँ हँसी-खुशीसँ चढ़ि‍तौं, से नै केलौं तँ कुहरि‍-कलपि‍ चढ़ब। जहि‍ना शक्ति ‍क स्रोत ज्ञान छी तहि‍ना ने भक्ति ‍क स्रोत श्रमो छी। फेर मन ठमकलै। जौं भक्ति ‍क स्रोत श्रम छी तँ हमहूँ तँ श्रमि‍क छि‍हे। जौं से नै रहि‍तौं तँ एत्ते खेल केना केलौं। अचताइत-पचताइत मुँहसँ नि‍कललै। से तँ जरूर केलौं। एक पसीना पत्थिर तोड़ैमे चुबैए, दोसर पत्थखर बनबैमे चुबैए। हँ से तँ दुनूमे चुबैए। मुदा कि‍ दुनूक मि‍ठास एक्के रंग छै? से तँ नै छै। तखन श्रम -सेवा- केकरा कहबै? फेर बलदेवक मन ठमकि‍ नजरि‍ उठा-उठा चौकन्ना होइत चारू दि‍स तकए लगल। मुदा अन्हा रमे कि‍छु देखबे ने करए। मनमे उठलै, अनेरे श्रमक पाछू बौआइ छी। गेल जमाना फेर नै लौटए। आब तँ जि‍नगीक अंति‍म खाड़ीपर चलि‍ एलौं। ने श्रमि‍क छी आ ने श्रमक सि‍रजन कर्ता। अनेरे अनका पाछू बौआए रहल छी। सभकेँ अपन-अपन जि‍नगी छै। अपन-अपन जगह छै, जे समैयोक आ प्रकृति‍योक प्रभावसँ प्रभावि‍त होइत रहै छै तँए अपन बात जेना लोक अपने बुझैत अछि‍ तेना आन थोड़े बुझत। चारू दि‍ससँ घुमैत-फि‍ड़ैत मन अपना लग बलदेवकेँ एलै। मनमे खौंझ उठलै। यएह मन छी जेकर खच्चमरपन्नीसँ कि‍यो भगवान बनि‍ जाइए आ कि‍यो हत्याअरा बनि‍ दुनि‍याँक सोझामे फाँसीपर लटकि‍ जाइए। मुदा कहबै ककरा आ सुनत के? मन ठमकलै। हत्याकरा के? हत्याब की? आ के पैदा करैए? जहि‍ना कम माछी-मच्छ र रहने खेबो काल आ सूतबो काल ओते परेशानी नै होइत जते अधि‍क रहने होइत। बलदेवक मन फेर ओझरा गेलै। ओझरी छुटि‍ते अपनापर ग्लाकनि‍ हुअए लगलै। हमहूँ तँ दुनि‍याँक चुनल अपराधीमे छी। जि‍नगी भरि‍ अपनेमे बेहाल रहलौं मुदा बेहाले केना रहि‍ गेलौं, से कहाँ बूझि‍ पेलौं। जहि‍ना धरतीकेँ बेहाल सृजन शक्तिफ‍ कमि‍ जाइ छै तहि‍ना ने हमरो भेल। मन उफनि‍ गेलै। चि‍चि‍आइत बाजल- “हम अपराधी छी, अपराध केने छी। डकैतीक संग हत्या केने छी। अखन हमरा फाँसी हुअए?” पि‍तोक मास्च र्य ओइ बेटासँ ओही दि‍नसँ कमए लगै छै जइ दि‍न सुपात्र कुपात्र दि‍स जाइत देखै छै। तहि‍ना बलदेवक कलपैत आत्मास मनसँ हटि‍ रहल छै। अनधुन मुँह पटकि‍ रहल छै। अपराधी छी, अपराध केलौं। एक अपराध नै, अनेको, एक दि‍न नै जि‍नगीयो भरि‍। बहुत वि‍लमि‍ कऽ फाँसी भऽ रहल अछि‍। बहुत पहि‍नहि‍ भऽ जाइक चाहै छल। मुदा भेल कि‍अए नै? एकाएक मुँहमे पर्दा लगल हुमड़ैत मन पाछू दि‍स ससरल। अंति‍म हत्या। आ डकैतीक फल फाँसी छी, मुदा आरो जे जि‍नगी भरि‍ केलौं, तेकर कि‍ भेल? मध्यीमासक स्ना न जहि‍ना आन मासक स्ना नसँ अधि‍क सुन्ददर, अधि‍क शीतल होइत तहि‍ना जि‍नगी अपराधक बीच बलदेबक मन अटकि‍ गेल। एक दि‍स जि‍नगी दोसर दि‍स अपराध। शीतल भेल शान्त मनमे उठलै, कि‍ हमर जन्म‍ अपराधि‍ये बनैक लेल भेल छल जे अपराधीक जि‍नगी वि‍तेलौं। मुदा बुझि‍यो कहाँ पेलौं जे अपराध करै छी, अपराधी बनै छी। ओझराइत मनकेँ सोझरबैत बलदेव जि‍नगीक एक-एक दि‍न आ एक-एक घटना मोन पाड़ए लगल। मुँहसँ नि‍कललै- “अपन जि‍नगीक बात जत्ते अपना मनमे अछि‍ ओत्ते थोड़े दोसराकेँ हेतइ। ि‍सर्फ हत्येल-लूट टा तँ नै केने छी, माए-बहि‍नि‍क संबंध सेहो तोड़ने छी।” मन कलपि‍ बजलै- “एकबेर नै हजार बेर फाँसी हेबाक चाही।” बलदेवक मन बेकल हुअए लगलै। केकरा ले केलौं? ई बात मनमे उठि‍ते धि‍यान परि‍वार दि‍स बढ़लै। अंति‍म दि‍न पत्नी आ बेटाक दर्शन हएत? ओ सभ बेचैनीसँ भेँट करए जरूर औत। मुदा कि‍ जहि‍ना परि‍वारमे भेँट होइत छल तहि‍ना हएत? से केना हएत? सि‍पाहीक घेरावंदी हम रहब आ ओ सभ हटि‍ कऽ कातमे ठाढ़ रहत। मन घुमलै। अनेरे कि‍अए कि‍यो भेँट करए औत? कोन मुँह देखत आ कोन देखओत। तइसँ नीक जे भने हमहूँ हराएल छी आ ओहो सभ हराएले रहए। दुनि‍याँकेँ सभ तँ नै चि‍न्हहतै-जनतै। जौं समाजमे लोक ओंगरी देखौते तँ समाज छोड़ि‍ दोसर समाजमे चलि‍ जाएत। जखने एक समाजसँ दोसर समाजमे जाइए तखने पछि‍ला समाजक बान्हं टूटि‍ जाइ छै। बान्हमक भीतर बनल समाज अपन हि‍तक बात सौचैए। मुदा समाज तँ समुद्र छी, जइमे घोंघा-घोंघीसँ लऽ कऽ गोहि‍-गमार तक छै। बलदेवक मन ठमकि‍ गेल। जहि‍ना जन-जन्मालन्तिरसँ वा कुरीति‍-कुसमए पाबि‍ लतामक गाछ बाँसक छाँहमे जनमल समए पाबि‍ कलशि‍ जाइत तहि‍ना बलदेवक मन कलशल। अबोध बच्चािक हाथसँ गि‍रल अइना, माए-बापक दुख जकाँ नै मुदा तैयो टुकड़ी बीछि‍-बीछि‍ जोड़ैक कोशि‍श करैत अछि‍ तहि‍ना बलदेवक कलशल मनमे उपकलै। तीन बर्ख जहल अएना भऽ गेल। राता-राती घरसँ पकड़ा बन्दूोकक हाथे जहल आएल रही। नव-नव लोक, नव-नव जगहसँ भेँट भेल। जहि‍ना देशक मि‍थि‍लांचलोक बासी दुनि‍याँक कोण-कोणक बीच बसि‍ अपन पूर्ब परि‍वारक स्मगरण करै छथि‍ तहि‍ना बलदेवक मनमे परि‍वार सेहो आएल। मुदा लगले जहलक परि‍वार अगुआ गेलै। एक-फाटक टपि‍ दोसरमे घेराएल रही। तलाशीक संग सभ कि‍छु घेरा गेल। बाहरसँ आओत नै अपने घेराइये गेलौं। मुदा तैयो नव-नव चेहरासँ भेँट भेल। भीतर अबि‍ते (वार्डमे) घूस्सा -मुक्काक सलामी भेल। जहि‍ना अखड़ाहापर उतरैत खलीफाकेँ पानि‍ उतरए लगैत तहि‍ना उतरल। जि‍नगीक पहि‍ल बेर जहल देखलौं। स्वाेगतक बाद मेट लग पहुँचाओल गेलौं। अखड़ाहाक बदलने खलीफाक पानि‍यो बदलि‍ जाइ छै। मुदा.....। मेटक रजि‍ष्टजरमे नाओं चढ़ि‍ते ढेर हुकुम एक संग उठल। झाड़ लगबैक ड्यूटी, पैखानामे पानि‍ पहुँचाबैक ड्यूटी इत्या दि‍-इत्यारदि‍। काजक भारसँ मन दबाइत जा रहल छल आ कि‍ मसलनपर पसरल मैनजनक हुकुम भेल- “एम्हपर आ, पहि‍ने जाँत तखन दोसर काज हेतइ।” अवग्रहमे फँसल मन हल्लुक भेल। मनमे खुशी उपकल जे कनि‍यो-कनि‍यो कान ऐंठेँत तँ काने उखड़ि‍ जइतए। जान बचल तँ लाख उपाइ। एक करोट घूमैत मैनजल बाजल- “पहि‍ल दि‍न छि‍औ, आइ तोरा खेनाइ नै भेटतौ।” जहि‍ना मुर्दापर अस्सीत मनसँ नब्बेा मन जारनि‍ चढ़ि‍ जाइए तहि‍ना चढ़ि‍ गेल। मुदा असबि‍सो नै कऽ सकलौं। मुदा तैयो सबुर भेल जे नै खाइले देत, सुतैक तँ जगह भेट गेल कि‍ ने। तइ बीच मैनजनक हुकुम भेल- “कोन केसमे एलेहेँ?” केसक नाओं सूनि‍ मन दलदल भऽ गेल। जहि‍ना सोग-पीड़ामे नोर बहा केकरो सान्व्-राना दैत काल होइत, तहि‍ना। जहलसँ नि‍कलैक आशाक अँकुर सेहो जगलै। हलसि‍ बाजल- “सरकार, डकैती आ खून संगे छै।” डकैतीक संग खून सूनि‍ मैनजनक मन ठमकल। अधि‍क दि‍नक संगी हएत। तँए दोसति‍ये करब नीक। पड़ले-पड़ल हुकुम चलौलक- “नवका कैदीकेँ खइयो ले दि‍हक।”

(जारी......................................) ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। राजदेव मण्डलक उपन्यास हमर टोल पछि‍ला खेपसँ आगू- .... “दौग कऽ अबै जा हौऽऽऽ। देखहक हौ लोक सभ। हमरा अँगनामे ढेपा बरि‍स रहल छै। पछुआर दि‍ससँ कतेक ढेपा फेँक रहल छै। दौगै जा हाे।” “गे माइ गे माइ। कोन उपद्रव शुरू भऽ गेलै गे। कोन देवी-देवता खि‍सि‍सया गेलै हो देव। हौ समाज बचाहब हौ।” हल्ला –गुल्लाश सुनि‍ बहुते लोक दुआरि‍पर जमा भऽ गेल छै। देवीपुर वालीक मुँहपर डर नाचि‍ रहल अछि‍। “की भेल?”- अड़ोसी-परोसी पूछि‍ रहल छै। “जान बचाहब हौ। पछुआर दि‍ससँ ढेला बरि‍स रहल अछि‍, अँगनामे।” “अन्हाचर राति‍मे पछुआरमे केना कऽ देखबै।” “फुलचनमा टाॅर्चक इजोतसँ देखही तँ के छी सरबा।” “हे, गारि‍ नै देबाक चाही। कि‍नसाइत देवी-देवताक ममि‍ला हेतौ तँ धक्कापर चढ़ि‍ जेबे। बुझि‍ लही, एक्के बेरमे जय-सि‍याराम।” हि‍म्मरतगरहा तीन-चारि‍टा छौड़ा आगू बढ़ल। चारूभर टाॅर्चक इजोत छि‍ड़ि‍या गेलै। “कहाँ छै कोइ हौ। नुका तँ नै रहलै।” “कोन ठेकान, कहीं भूत-प्रेरक ममि‍ला ने होइ।” “भऽ सकै छै। देवीपुरवाली कोनो कबुला-पाती केने होइ आ पूरा नै केलाक कारणे देवीक प्रकोप मचबैत होइ।” “देवीपुरवाली लालटेन नेस रहल छै। अँगनामे तँ ढेपाक ढेर लगल छै। एकर बेटज्ञे नै छै।” “धुर, उ तँ चौकपर ताड़ी पीब कऽ मतंग हेतै।” देवीपुरवालीक पुतौहु चमकी ओसारपर बैसल छै। बेचारी डरे थर-थर कापि‍ रहल छै। देवीपरुवाली ि‍वधवा रहि‍तो मरद जकाँ काज करैत छै। बेटाकेँ जन्मैेते पति‍ सदाक लेल संग छोड़ि‍ देलकै। ओइ बेटाक भरोसे पहाड़ सन जीनगी काटि‍ लेलकै। ओकर बेटा ‘नकचट्टा’ आब जुआन भेलै। ओइक संगे आसा जगलै जे एकटा कमौआ पुत भेल आब। कि‍न्तुै ओहो पि‍यक्कड़ भऽ गेलै। काम करत तँ करि‍ते रहि‍ जाएत। कहीं ताड़ी पि‍बाक लेल गेल तँ कखैन आएत पता नै। सासु-पुतौहु मि‍लि‍ कमा-खटा कऽ कहुना गुजर चला रहल अछि‍। “कही एकर पुतौहु चमकी डाइन तँ नै छै हो?” “नै-नै, ई बात झूठ छै। एतेक भोली-भाली औरत डाइन केना कऽ भऽ सकै छै।” “हँ, हँ, भोला-भाला चेहरा भीतर दि‍ल बेइमान।” “हँ रौ भाय। तब ने जइ समैमे पहि‍लुक बेर आएल रहै। लबे-धबे रहै। टोलमे बड़का हो-हल्लाम भेल रहै।” “हे रौ, ऊ जइ घरमे ठाढ़ होइ ने ठीक ओकरा कपारक सामने घरक छप्प रमे आगि‍ लगि‍ जाए छलै। उतरबरि‍या घरमे जाय वएह बात। दक्षि‍णवरि‍या घरमे जाय फर वएह बात। ई तँ चट दऽ लोक मुझा दैत छलै नै तँ पूरा घर जरि‍‍ कऽ सुड्डाह भऽ जएतै।” “पसरतै केना कऽ। बान्हाल आगि‍ रहै ने। बुझि‍ही, औरति‍याकेँ देह नै रहै, आगि‍क भट्ठी रहै।” “तब तँ नकचट्टाकेँ सलाइ कीनबाक कोनो जरूरते नै।” सभ गोटे एक्केबेर खि‍सि‍या कऽ हँसए लगल। उन्मु क्त हास्यल। “अरे तोरी कऽ, ई तँ असल अगि‍नदाइ छि‍यौ रौ।” “फेर ई बेमारी ठीक केना भेलइ?” “वएह खेलावन भगत कतेक दि‍न तक झाड़ फूंक केलके। तब अगि‍नदाइक देहसँ आगि‍ कम भेलै।” “सुनने रही जे ओकरे लग गेलासँ ई खेला शुरू भेल रहै।” “हँ मथदुखी झड़ेबाक लेल खेलावन भगत लग लऽ कऽ गेल हरै। ओही दि‍नसँ ई अगि‍लगौना काण्डे हुअए लगलै।” “तब तँ कुल करामात खेलावने भगतक रहै।” पछुआर दि‍ससँ अजय सोर पाड़लक- “दौग कऽ एने अबै जो। भूत पकड़ा गेलौ।” सभ एक्केबेर दौगल। बैगन गाछक झोंझसँ अलटरबाकेँ नि‍कालैत अजय कहलकै- “एकरा पंचक पास लऽ चल।” “हँ हँ ठीके बात। घोंचाय अपना बेटाकेँ कि‍अए नै सम्हािरैत छै। राति‍-वि‍राइत औआइत रहै छै। राति‍चर भूत जकाँ।” “लोककेँ डेरानाइ कोनो नीक गप्पब होइ छै। कहीं आँखि‍मे ढेपा लगि‍ जाय तँ फूटि‍ जेतै।” “जन्मेँले टासँ नै होइ छै, पति‍पालो करए पड़ै छै। लऽ चल। पंचसभ नि‍रलय करतै।” डेढ़हथ्थीँ कान्हँपर लेने घोंचाय गरजैत देवीपुरवालीक दुआरि‍पर पहुँचलै। “हमरा बेटाकेँ पंचक पास लऽ जेनि‍हार के छी? ई छौड़ा अखने अंगनासँ खा-पी कऽ नि‍कललै। मुतै लेल बाड़ीमे गेल छलै। ई केना कऽ ढेपा फेकतै? छै कोइ गबाह? देखलकै ढेपा फेकैत? अजैया दू अक्षर शहरसँ पढ़ि‍ कऽ की आएल जे सभ जगह अपने कबि‍लगीरी। अोकरा अंगनामे कोनो देवी ढेपा फेकै छै आ नाओं लगबै छै, हमरा बेटाकेँ।” घोचायक स्त्री गारि‍ पढ़ैत पाछूसँ अबै छै। “के नि‍पूतरा हमरा बेटाकेँ पकड़ने अछि‍। कोनो चोरी-डकैती केलकै की। कोइढ़फुट्टा, छोड़ हमरा बेटाकेँ। ने तँ जे ने से कऽ देबै।” झमारि‍ कऽ अपना बेटाकेँ छोड़ौलक। ओकर बाँहि‍ पकड़ि‍ घि‍चने घर दि‍स चलि‍ पड़ैत अछि‍। पाछूसँ फनकैत घोंचाइ जा रहल अछि‍। “अखैन तँ बेकारक झगड़ा ठाढ़ भऽ जइतै। अजयकेँ कोन दुसमनी छलै, ओइ छौड़ाक संग।” “दुसमनी ओकरासँ नै छै। असल दुसमनी घोंचायसँ देवीपुरवालीकेँ छै।” उचि‍तवक्ता बीचमे आबि‍ कऽ बजए लगल- “बेटाक जन्मस भेलापर अंगनासँ बहींगा फेकल जाइ छै। जे घरक ऊपरसँ दरबज्जावपर गि‍रबाक चाही। फेर ओही बहींगामे बैरक झाड़ आ जूता लटका कऽ घरक आगू गाड़ल जाइ छै।” “घोंचायक संग की भेल रहै?” “घोंचायक बेटा भेल रहै ने तँ अंगनासँ बहींगा फेकने रहै। ओही समैमे ओकरा ढांगमे गड़ि‍ गेलै। पंचैती भेलै तँ घोंचायकेँ डण्डभ-जरि‍माना लगलै। ओही दि‍नसँ दुसमनी चलि‍ रहल छै।” “कहीं ढेलफेक्काे भूतकेँ घोंचाय भेजैत हेतौ।” “कुछो हौ। खेलाबन भगतकेँ पूजाक खरचा भेट जेतै। तब देवीपुरवालीकेँ कल्याीण हेतै।” देवीपुरवालीक बेटा नकचट्टा ताड़ी पीब कऽ दुआरि‍पर आबि‍ गेल छै। ओ नि‍साँमे गरजि‍ रहल छै। “हमरा दुआरि‍पर एतेक लोक कि‍एक जमा भेल छै हौ? बुझै छी, ऐ अौरति‍याकेँ। सनकल जा रहल छै। हम घरपर नै रहै छी तँ छौड़ा सभकेँ सोर पाड़ि‍ कऽ रसलीला करैत रहैत अछि‍। कहाँ छै हमर मोटका समाठ बला लाठी। आइ डाँड़ आ पीठी सरका देबै हम।” अगि‍नदाय डरसँ कोठी गोड़ा तरमे नुका रहल अछि‍। पता नै देहपर लाठी कतए-कतए गि‍रतै। रोइयाँ काँटो-काँट भऽ रहल छै। उचि‍तवक्तार दुआरि‍पर सँ बि‍दा होइत बजल- “अजय भाय, चलह ऐठामसँ। नै तँ समाठसँ चूड़ा जकाँ कूटल जेबह।” सभ धड़फड़ा कऽ चलि‍ पड़ैत अछि‍। अजय देखैत अछि‍। आसमानसँ चुगला गि‍रैत अछि‍। धरती दि‍स बढ़ैत इजोतक रेखा। चारूभरसँ अन्हायर ओकरा दि‍स दौगल। छनेमे जेना ओकरा पकड़ि‍ घोंटि‍ लेलक। फेर आँखि‍ अन्हाररेमे अछि‍, इजोतक प्रतीक्षा करैत। ...............

जनीजाति‍ सभ अँगनामे गाबि‍ रहल अछि‍। “बाबा केँ अँगना मे लगनहि‍ आएल पोती भेल डुमरी केँ फूल हे एहि‍ बेर लगनमाँ फि‍राय दि‍यौ बाबा सि‍खऽ छि‍यै लूरि‍ बेबहार यौ।” अकलू मड़रक बेटीकेँ बि‍आह हेतै। बरयाती आबि‍ रहल छै। दुआरि‍केँ कते चि‍क्कन-चुनमुन केने छै। लगै छै जेना चनन छि‍टका देने हो। ततेक इजोत चमकै छै जे अन्हा र तँ जेना नि‍पत्ता भऽ गेलै। दुआरि‍ आ अँगनाकेँ सभ चीज दोसरे रँगक लगै छै। चमाचम। एककातमे भनसि‍या सभ अहरी चढ़ा देने छै। “पहि‍ने भात नै, तीमन बनतै। पानि‍ ला रे।” “भैया, एक चि‍लम गाजा हमरा घरबारीसँ मंगा दे तँ हम भरि‍ राति‍ खटबौ।” “चुप, दारू, गाजा पी कऽ भानस करता।नूनक बदलामे चीनी ढारि‍ देबही। तब की हेतै?” कि‍छु लोक भोजन-भात बना रहल अछि‍ तँ कि‍छु लोक बरयातीकेँ सूतए आ बैसए लेल बेवस्था कऽ रहल अछि‍। धीया-पुता सभ दलानक आगूमे खेल रहल छै। कि‍दु नाँगट-उघार तँ कि‍छुकेँ देहपर बस्‍तरो अछि‍। नाकमे नेटा, सुर-सुर करैत। “भैया मुतबै हौ।” “चुप सार, तोरा तुरत्ते मुतबास लगि‍ गेलौ।” “तँ परसादी मँगा दे।” “भगवानक पूजा नै हेतै। एकरा अँगनामे बि‍आह हेतै।” “हे रे छौड़ा, ऐठाम लगही कऽ देलही।” बूढ़बा लाठी लऽ कऽ फटकारैत बजल- “भाग दुआरपर सँ। नीचा जा कऽ खेल।” अंगनामे गीत गौनि‍हारि‍ सभ उपरौंझ कऽ रहल अछि‍। पहि‍ने तँ एकोटा जनीजाति‍ एबे नेे करै छलै। “जाि‍तसँ अलग। ढाढल बान्हहल छै- अकलू मड़र। ओकरा संगे के जाएत बन्धेनमे पड़ैले।” अकलू मड़रक स्त्री बड्ड चलाकी जनै छै। टोलक मूलगनि‍ घुघुरबत्तीकेँ पटि‍या लेलकै। “दाय हे, जेहने हमर बेटी तेहने तोहर बेटी। कोनो तरहेँ पार-घाट लगा दहक। दोसरा गामकसँ लोक सभ आबि‍ रहल छै। अपना गामक इज्जबति‍क सबाल छै। अपना टोलक गप्प आन लोक कि‍एक बुझतै। रहबै तँ एकेठाम।” केना कऽ मानतै औरति‍या सभ। आखि‍र सुख-दुखमे एकसाथ रहैत आएल छै। “नदि‍या कि‍नारे बाबा हौ कि‍नकर बाजा बाजै, कि‍नकासँ माँगे दहेज हौ, नदि‍या कि‍नारे धाेती तोरे बाजा बाजै हमरासँ माँगे दहेज गे.......।” डि‍म-डि‍म-डि‍मि‍क। ढोलक आ पीपीहीक अवाज। “आरे तोरी कऽ बराती तँ गामक बगलमे पहुँचि‍ गेलौं। जल्दीक सभ प्रवन्धा कर रौ।” “इह, कोनो लाट साहेबकेँ बरयाती नै आबि‍ रहल छै।” “सुनै छी, जे दू बीघा जमीन छै।” “दू बीघा जमीन छै आ सात भाँइ छै। फेर सातोकेँ दू-दूटाक धि‍या-पुता। अंगनामे बेदराक ढेरी लगल छै।” “सुनै छी, लड़ि‍का घरक छप्पदर बनबैमे तेज छै। लाड़-पुआर बत्तीक छप्प र। तँए खेतीक अलाबे कि‍छ आमदनी भऽ जाइ छै।” “बुझलौं- घरमे फुइस-फाइस बाहरमे धक्का।” अंगनासँ गीतक अवाज- “सोनाक पि‍ंजरा बना दऽ हौ बाबा, ओहि‍ मे रहब नुकाय हौ। सोनाक पि‍ंजरा बना देबो गे पोती पि‍ंजरा सहि‍त नेने जाय गे.....।” बुढ़बा सभ अपना पगड़ी आ धोतीकेँ ठीकसँ बान्हैसत अछि‍। ढोल-पीपही आ स्पीपकर जोर-जोरसँ बजए लगल। लोगमे हड़बड़ी मचि‍ गेल छै। समाजक लोक दुआरि‍पर एकट्ठा भऽ रहल छै। “बरयाती आबि‍ गेलै। चलै-चल सुआगतमे। खाना-पीना बादमे हेतै। सुआगतमे ति‍रोटी नै हेबाक चाही।” “हँ, ठीके गप्पे। दोसरा गामक लोक, अरि‍जन-परि‍जन, कुटुम। ओकरा ठाठ बान्हगसँ की मतलब।” “हँ हँ, आखि‍र हमरो धनुकटोलीक कि‍छ शान छै।” “अरे तोरीकेँ, नाचक पाटी लौने अछि‍।” “हँ, लगही आ झाड़ासँ टोलकेँ महकौतौं।” “ई सार तँ नमरी लोफर छै। धि‍याने दोसरे तरफ।” उचि‍तवक्ताल मुड़ी डोलबैत बजल- “असल गप्प। एहि‍ना भकभका कऽ लगै छै। सावधान, नाच देखैते चि‍ड़ै कोनो छौड़ा संगे उड़ि‍ ने जाऊ।” “चुप्प , शैतान।” डेढ़ि‍यापर जनीजाति‍क भीड़। वर देखबाक सबहक आँखि‍मे उत्सुपकता। रंग-बि‍रंगक साड़ी-आँगी पहि‍रने। फूल सन फुलाएल मुख। चहकैत छौड़ा सभक दल। पैंट-शर्ट, लुँगी-कुरतामे सजल। बुड़ सभ धोती-कुरता आ माथकेँ गमछासँ मुरेठा बन्हाने। “पहि‍ले पएर-हाथ धोबाक लेल जलक बेवस्था करह। पूछि‍ लहक सभ बरि‍याती आबि‍ गेलै।” “दुल्हाा नै आएल छै?” “आरे बहींचो, बि‍ना वरक बरि‍याती आबि‍ गेलै हौ। बि‍आह केना हेतै?” “कहै छै- गामसँ संगे-संग चललौं। रास्ताामे पछुआ गेल। पता नै कतए रहि‍ गेलै।” “छुच्छैी छुतहु फूकै छलै रे। बि‍ना दुल्हेक घर-दुआरि‍। दुआरि‍पर आएल कि‍एक? मार सार बरि‍याती सभकेँ।” “ऐमे बरि‍यातीक कोन दोख?” “हे रौ ला तँ सटका। दोष-गुणकेँ फरि‍छाबै छथि‍।” “हे रौ, मनकेँ थि‍र करै जो। ठहर, एना नै करै जो।” बरि‍याती सकदम। जेना सबक छातीमे डर ढुकि‍ गेलै। सभ मुँह लटका लेलक। गप-सप्पए बन्न। मने-मन सभ सोचि‍ रहल अछि‍। कहीं भरि‍ राति‍ वर नै एतै तब की हेतै? एहने स्थिन‍ति‍मे बरि‍याती सभकेँ छौलका छोड़ेने रहै, ढेलपुरा गाममे। चलाक बरि‍याती धोतीकेँ डाँड़मे खोंसि‍ रहल अछि‍। पछुआरक रस्तोा भजि‍आ रहल अछि‍। रंगमे भंग। तमाकूल-बीड़ी सभ बन्न। अंगनामे गीतनादक बदलामे फुसराहटि‍ शुरू भऽ गेल छै। “लीलाक भाग्ये। खराप छै। कतेक मेहनति‍ अकलू मड़र केलकै तब सभ चीजक इतजाम भेलै। दू बरि‍ससँ बेचारेकेँ एड़ी खि‍आ गेलै तब जा कऽ बि‍आहक बात तँइ भेलै। आब देखि‍यो...।” “छठी राति‍ वि‍धि‍ लि‍खे लीलारा की संकट के मेटनहारा।” बात सुनि‍ लीलाक कलेजामे जेना बरछी भोंका गेलै। ओ मुँहमे नुआ ठूसि‍ कऽ कानि‍ रहल अछि‍। लोकक मनमे शंका औना रहल अछि‍। कहीं लेन-देनमे कोनो गड़बड़ी तँ नै भेल छलै। अकलू मड़र छै-बड़ा मक्खीआचूस। “तीमन-तरकारी बनेबै की नै?” “धुर, छोड़ि‍ दि‍यौ। की हेतै की नाइ।” उचि‍तवक्ताक केना चुप रहतै। “कानल कनि‍याँ रहि‍ए गेल कानी कटाओल वर घुरि‍ए गेल।” “मार सारकेँ रौ। बड़ लबर-लबर करै छौ। एने अकलू मड़रकेँ पाछूसँ नि‍साँस छूटि‍ रहल छै। आ एकरा.....।” अकलू मड़रकेँ दोस-महि‍म, कर-कुटुम सम्बँन्धीी सभ बाध-वोन दि‍स खोजै लेल नि‍कलि‍ गेल छै। “हल्लोक जे करबै से वरक नाओं जानबे नै करै छी।” स्टेहजपर ढोलक-हरि‍मुनि‍याँ चुप्पेस पड़ल अछि‍। नाच पाटीक लोक सभ चुपचाप बि‍ड़ी पी रहल अछि‍। “हमरा सभ की करबै यौ? एहो लगन ने उधारे रहि‍ जाए।” “चुप, ओने दोसर नाच भऽ रहल छै। तोहर नाच के देखतौ। बानर जकाँ कूदल घुमै छेँ तखैनसँ।” नाचक लेबरा चट दऽ बजल- “सभ तँ बानरेक सन्ताेन छी आ बानरे छी। हम छी लड़का बानर।” “हे, मुँहकेँ चुप राख नै तँ..।” “गौ बाबू आदति‍ नै छौ। पेट फूलि‍ जाएत।” अकलू मड़र सोचि‍ रहल अछि‍- एक तँ जाति‍ आगि‍-पानि‍ बन्न कऽ देने अछि‍। जखैन कि‍ हमर कोनो दोष नै छलए। भैया मरि‍ गेल छलाह। घरमे कुछो नै रहए। ऊपरसँ अकालक तबाही। कतएसँ करि‍तौं भोज? लोक कहलक खेत बेचि‍। कहए पड़ल- खेत बेचि‍ लेबै तँ खेती कतए करबै? कतेक जमीने छै हमरा पास। दोसरकेँ दुख देखबाक फुरसति‍ केकरा पास छै? सभकेँ तँ अपने दुख भारी छै। सुआरथमे आन्ह।र भेल टेबैत, हथोड़ैत कहुना चलि‍ रहल अछि‍। एक साँझ भोज-भात हेतै आ हमर सभ कि‍छो बि‍का जेतै। लेकि‍न कहाँ कोइ सुनल हमर गप्पभ। ओइदि‍न जाति‍सँ अलग कऽ देलक। कतेक मेहनति‍ केलौं। केकरा-केकरा नै गोड़लग्गीक केलौं। कोन-कोन जानवर लग ने माथ लगेलाैं। तब ि‍बआहक गप्पँ नि‍श्चि‍त भेल। ओहोमे कोन दुसमनी लगि‍ गेल से पता नै। वर बाटेमे बि‍ला गेल। के की केलक से नै जानि‍। सभ तँ दुसमने अछि‍। वर नै आएत तँ हमर बेटी कुमारि‍ रहि‍ जाएत। दोसरठाम बि‍आहक गप्‍पो नै होएत। लोक सोचत लड़कीमे कोनो खराबी छै। बाप रे बाप, कोन उपाए हेतै। कतौ कऽ ने रहबै- हम। सभटा खरच-बरच बेकार चलि‍ जेतै। फेर दोबारा कतए सँ एतेक टाका-पैसाक बनोबस करबै। अफवाह फैलत- बि‍आहमे कोन नाटक भऽ गेलै रौ। केकरो सोझामे केना जाएत। अकलू मड़र अन्हा रेमे बैसि‍ कऽ कानि‍ रहल अछि‍। लोक सभ वरकेँ खोजि‍-खाजि‍ कऽ आपस आबि‍ रहल अछि‍। “कतौ नै भेटलै। बड़की सड़क तक कतौ नै छै।” “चारि‍-पाँचटा छौड़ा बौआ रहल छलै। लग जा कऽ पुछि‍ते पड़ा गलै। गुँहे-मूते दौगैत अपने गाम दि‍स आएल।” सभ नि‍साँस छोड़ैत अछि‍। वरक काका चि‍चि‍आइत अछि‍- “आबि‍ गेल। आबि‍ गेल- दुल्हाे। कतए रहि‍ गेल छलही, तूँ सभ रौ।” हंस पलटि‍ गेल-समधीक। सबहक आँखि‍मे उत्सुपकता। शान्तग पोखरि‍मे हलचल। लोकक देहमे जेना गति‍ आबि‍ गेलै। नाच-मंडलीक कलाकार फानि‍ कऽ स्टेतजपर चढ़ि‍ गेलै। ढोलक-हरमुनि‍यााकेँ जना पराण घूमि‍ गेलै। औरत-सभ खखसि‍‍ कऽ गला साफ कऽ गला साफ कऽ रहल अछि‍। तरे-तर। “लीलाक माए जल्दीक सभ कि‍छो तैयार करू। चुमबैले। समए नै छै।” “चलू, पहि‍ने लड़ि‍का देखबै।” ग्रामीण सभ जमा भऽ गेल छै। “समधि‍ कहाँ छै?” “समधीकेँ रतौनी भेल छै। कम सुझै छै।” “अहाँक बेटा कहाँ अछि‍? कानमे तँ लंगोटा बन्ह”ने छै- सुनतै केना।” “हेयौ दुल्हा कतए छै?” बरि‍याती सभ चारूकात सँ घेरने अछि‍। बीचमे चारि‍-पाँचटा छौड़ा ठाढ़ अछि‍। ओकरा देहपर कछी-जंघि‍या मात्र अछि‍। उघारे देह-जाड़सँ सुटकौने। मुँह लटकौने। दुल्हाक काका हाथसँ इशारा करैत छै। “वएह छी वर। जेकरा देहपर ललका जँघि‍याटा अछि‍।” उचि‍तवक्ता फेंफि‍या कऽ बजल- “अरे तोरी कऽ। हौ, ओइ गामक एहने रि‍वाज छै। नंगा भऽ कऽ एहि‍ना उघारे बि‍आह होइ छै। नंगटा कहीं के....।” “सभ खचरपन्नी समधीक छी। दहेजबला सभटा टाका-पैसा अपना मौगीक पछुआरे राखि‍ कऽ आएल अछि‍।” “हँ हौ, बेटाकेँ कछी-जंघि‍या पहि‍रा कऽ कुश्तीक लड़बाक लेल ठाढ़ कएने अछि‍।” सभ ठि‍ठि‍आ कऽ हँसल। हा.... हा.... हा.. ही... ही...। “हे रौ हमरा तँ लगै छौ, भैंस-गाए चरा कऽ बाधसँ एहि‍ठाम चलि‍ एलौ। देखहक तँ कपारमे एको बून तेल छै। बि‍आह हेतै, कोनो खेल नै हेतै। दसटा ग्रामीत देखतै।” “माथपर मौड़ कहाँ छै हौ?” “चुप रह, मौड़ की देखबहक। घौड़ देखहक। बेटाबलाकेँ संतोष रहै छै हौ। दैत रहक।” समधी तरे-तर तामसे फुलल अछि‍। बेटाक हालति‍ देखि‍ बजत की। अन्त”मे घोंघि‍या कऽ बजल- “जखैनसँ दुआरि‍पर पएर रखलौं तखैनेसँ सभ ओल सन बोल बजि‍ रहल अछि‍। आँत छुबौआ बात। जेना हमर कोनो परति‍ष्ठेए नै। मनुखक बेवहार एहने होइ छै की? सभटा बकटेटि‍या आ लंठाधि‍राज जमा भऽ गेल अछि‍। बेसी तामस चढ़त तँ लड़ि‍काकेँ लऽ कऽ चलि‍ जाएब। सबहक जेना मगजे उनटल छै।” कालू मड़र बीचमे आबि‍ कऽ सम्हाहरैत अछि‍। “सभ बकटेटे जकाँ गप्पं नै करहक। एकरा सबहक संगे की भेलै सेहो तँ बुझबहक।” समधी अपना बेटासँ पुछै छै- “की भेल रहौ बौआ?” दुल्हाप ठोह पाड़ि‍ कऽ कानए लगैत अछि‍। उचि‍तवक्ता ठि‍ठि‍आ कऽ हँसए लगल। “कनि‍याँ बि‍दागरी कालमे कानै छै। ई केहेन वर छै जे सासुर अबि‍ते काल कानि‍ रहल छै मौगी जकाँ।” “पहि‍ने सुनि‍ लहक गप्प ।” “हमरा सभ टाएर-गाड़ीसँ आबि‍ रहल छलौं। बाधमे सात-आठटा डकैत धेरि‍ लेलक। जेबीसँ सभटा पैसा-कौड़ी छीन लेलक। टाँर्चसँ हाथ मोचाड़ि‍ कऽ पहि‍ने झपटि‍ लेने रहए। दि‍ल्ली सँ कमा कऽ घुमैत काल जे पंेट-शुट कीनने छलौं सेहो नि‍कालि‍ लेलक। हमरा सभकेँ ठाेंठकरि‍या दैत गाड़ीपर सँ खरस देलक। आ उ सभ टाएरपर चढ़ि‍ बड़दकेँ हाँकि‍ देलक।” “हम कहै छि‍यौ, नि‍श्चि‍त मूतनमा डाकू हेतौं। आइ-काल्हि‍मे ऊ जेलसँ छुटल छै।” “आब लि‍अ, सुनि‍यौ, सरकार केहेन छै। चोर-डकैतकेँ कतेक छूट दऽ देने छै। कतौ आएब-जाएब मोश्कि ‍ल। सभ अपने कुरसी बचेबाक लेल परेशान। गरीबक तरफ धि‍यान के देतै?” चोर-चहार नि‍शंक भऽ कऽ साँझ-वि‍हान लुट-पाट करै छै। घूसक टाका-पैसा गनैत-गनैत रक्षा करैबलाकेँ पलखति‍ नै भेटै छै। की करतै, आदति‍ पड़ल छै हौ। “हाय रे, अपने समांग दालि‍-भात।” “अच्छाे आब ऊ बात छोड़ि‍ दहक दुल्हातकेँ कपड़ा-वस्तकर पहि‍राबह।” धड़फड़ीमे दोसराक धोती-कुरता वरकेँ पहि‍रा देल गेलै। देहक नापसँ कुरता नमहर छै। लड़ि‍का बाबाजी जकाँ लगै छै। उचि‍तवक्ताो ऊपर-नि‍चा तकैत कहै छै- “हड़बड़ी बि‍आह कनपट्टी सि‍नुर।” “टाइम नै छै। वि‍ध-बेवहार शुरू करह।” फेरसँ सबहक मुँह हरि‍आ गेलै। गीत गनगना गेलै। ओने राजा सलहेसक नाच शुरू भऽ गेलै। “अरे तोरी के, देखहक, तालपर डान्स रकेँ नचैत। जेहने रूप तेहने नाच। आइ खूबे जमतै।” अखैनि‍यो मनोरथ मड़र नमहर केश राखि‍ते अछि‍। जुआनीमे लोक ओकरा नटुआ कहै छलै। बीचेमे टपकल- “अरे, ई की देखै छी। एक समैमे हमहूँ नामी डान्सैर छलौं। धनि‍काहा गाम नाच-पाटीमे गेल रहि‍यौ। तीन दि‍नक साटा रहै। भोरेसँ बड़का घरक मलि‍काइन सभ कहै- चाह हमरा घरपर बनतै तँ कोइ कहै जलखै हमरा घरपर। मन तँ हमर उड़ल फि‍रै। लकि‍न की करबै अपना घरक मोह.....।” नाच शरू भऽ गेल छै। राजा सलहेसकेँ रि‍झबैक लेल सती सेालहो सि‍ंगार कऽ रहल छै। अंगनामे साईत सि‍नुरदान भऽ रहल छै। झोंकपर गीत कान तक आबि‍ रहल छै। दुल्हा सि‍नुर लि‍यौ हाथ, पान-सुपारीक साथ, दुलहि‍न उघारि‍ लि‍यौ माथ, सि‍नुर लए ले। दुल्हालक सि‍रपर शोभे मोर, दुलहि‍न सभदि‍न पूजत गोड़ दुलहि‍न उघारि‍ लि‍औ मांग, सि‍नुर लए ले। ग्रामीत सभ नाचक रसमे दुबकि‍ गेल अछि‍। गामक झगड़ा-लड़ाइ आ सि‍नेह-परेमकेँ अजय देखि‍ रहल अछि‍। ओ कखनो नाच लग जाइत अछि‍ तँ कखनो कोनचरसँ आंगन दि‍सि‍ हुलकी मारैत अछि‍। चारूभर छड़पटाएल घुड़ैत अछि‍। कि‍न्तु शीलाक कोनो सुर-पता नै भेट रहल छै। अजय तकैत-तकैत अपस्यिक‍ांत। पछुआरमे केराक बड़का-बड़का गाछ लाके जकाँ ठाढ़ छै। छोटका-छोटका झड़-झॉंखुरमे भगजोगनी भुक-भुकाइते रहै छै। ओइ झॉंखुरक अढ़मे माटक ढि‍मका छै। वएह तँ बनल अछि‍, दुनूक परेम मि‍लन स्थतल। ओइठाम दुनू गोटे सभ कि‍छु मोन पाड़ैत अछि‍ आ सभ कि‍छु वि‍सरैत अछि‍। जहि‍यासँ जोड़ लगैत गहुमन ओइ जगहपर मारल गेलै तहि‍यासँ ओम्ह र जेबाक साहस कमे लोक करै छै। अंगनामे शीलाकेँ कछमच्छीु लगल छै। लोकक आँखि‍सँ बचि‍ कऽ ओइ जगहपर जेबाक कोशि‍शमे लगल दै। परन्तुे काजक अंगना अछि‍ तँए कोइ ने कोइ ओकरा सोर पाड़ि‍ लैत अछि‍। पछुआरमे अजयकेँ मच्छिर काटि‍ रहल छै। चोर जकाँ रगड़ि‍ कऽ मच्छिरकेँ मारैत अछि‍ फेर वि‍चारमे हरा जाइत अछि‍। शीला आइ दुलहि‍न जकाँ सजल छै। केना ने सजि‍तै? ओकरा बहि‍नक बि‍आह भऽ रहल छै। छजन्ताि छै। अजय आगूक खत्तामे देखैत अछि‍। पानि‍मे चान थरथराइत टहलि‍ रहल अछि‍। चन्द्रूमाँक बगलमे दोसर चानकेँ उगैत देखि‍ चकोरकेँ चकवि‍दोर लगैत अछि‍। “अन्हाखरमे चोर जकाँ के बैसल अछि‍?” “मोन आ दि‍लकेँ चोरबैबला चोर।” “हँ ठीके मक्ख‍न चोर।” अजय आ शीला सहटि‍ कऽ बैस गेल अछि‍। दुनू एक-दोसरसँ अर्थहीन गप्पि कऽ रहल अछि‍। जइमे अर्थ भरल अछि‍। दुनू तेना कऽ सटि‍ गेल जे लगैत अछि‍ जेना गहुमन साँपक जोड़ी फेर जोड़ लगल। लोभ फाेंफि‍या उठल। हाथपर चढ़ि‍ कऽ कामना ससरि‍ रहल अछि‍। सुगन्धेक स्विरूप बदलि‍ गेल अछि‍। मुखक लाली चारूभर छि‍ड़ि‍या गेल छै। जेकरा ठोर समेटि‍ रहल अछि‍। कामना आ परेमक डोरि‍ बढ़ले जा रहल अछि‍। मन्द बसात सँ केराक गाछ हि‍लैत अछि‍। सुखदानक संगे पत्तापर सँ पानि‍क बून भरभरा कऽ गि‍रैत अछि‍। अंगनासॅ ंकोहबर गीत आबि‍ रहल अछि‍। कथी केर मड़बा कथी केरि‍ कोहबर कथी-केरि‍ लागल केबाड़, यौ बि‍नु बाँसक कोहबर सोने केरि‍ मड़ा, रूपा करि‍ कोहवर हीला-मोटी लगल दै केबाड़, यौ बि‍नु बाँसक कोहबर।

(जारी.........................।) ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। डॉ. कैलाश कुमार मि‍श्र इंद्रधनुषी अकास हम मानव वि‍ज्ञान एवं कलाक शोध छात्र छी। शोध छात्रक भाषा तँ प्राणहीन होइत छैक। उपमा, अलंकार, सौन्दनर्य, स्वलप्न आदि‍ शोधछात्रक हेतु जेना कुनो बाहरी परि‍वेशक वस्तुभ होइक। मुदा छी हम घोर आशावादी आ पॉजीटीव। शायद अपन अही पॉजि‍टीव सोच आ दृष्टि ‍कोणक कारणे हम परमादरनीय जगदीश प्रसाद मण्ड ल केर कवि‍ता संग्रह इंद्रधनुषी अकास केर आमुख लि‍खबाक जि‍म्माह लऽ लेलहुँ। मण्डडलजी वि‍चारसँ प्रगति‍शील आ सभ तरहक लोक-वि‍चारधारा, परिस्थिख‍ति‍ आ परि‍वेशमे सामंजस्यल स्था पि‍त करएबला साहि‍त्याकार छथि‍। अल्ट रनेटि‍व डेवलपमेन्टष आ इकोलॉजि‍कल कन्सेतप्ट्केँ स्थाेनीयताक दृष्टि्‍कोणमे बुझबाक आ अपन ज्ञान गंगाकेँ कथा, उपन्या्स, नाटक एवं कवि‍ताक रूपमे बहेबाक असाधारण क्षमता छन्हिे‍ मण्डटलजीमे। हि‍नकर रचना पढ़ैत जाऊ आ ब्योंपत-पर ब्यौं त सुनैत जाऊ! हि‍नकर बात आ ब्यों त सभ सहज, चमत्का री मुदा वि‍श्वशनीय लागत। आब बात करी रचनापर। हि‍नक रचना इंद्रधनुषी अकास सरि‍पहुँ कवि‍ताक प्रकार, छोट-पैघक हि‍साबे, भावनाक प्रवाहक हि‍साबे, अनेक वि‍षयमे होबाक कारणे बहुरंगी चुनरी अछि‍। अतेक वि‍स्तृैत वि‍धा आ वि‍षयकेँ समेटबाक कारणे ऐ संकलनक नामकरण अहि‍सँ उत्तम नै भऽ सकैत अछि‍ : वैवि‍ध्य सँ भरल, मनोरंजक, रंगारंग, दीवास्वकप्न, सोहनगर-मनोरंजक आ मनोहारी अकास। ऐमे जीवनक यर्थाथ अछि‍, कवि‍क कल्पंनाक संसार अछि‍, उपमा आ अलंकार अछि‍, जीवनक दर्शन अछि‍, माटि‍सँ सि‍नेहक उद्गार अछि‍, गीत अछि‍, भाव अछि‍, अर्थ वि‍न्या‍स अछि‍, प्रेमक अनुभवजन्यऐ परि‍भाषा आ प्रवाह अछि‍, प्रकृति‍क अनुराग अछि‍, ग्राम्यप-जीवनक झांकी अछि‍ चीर प्राचीन आ चीर नवीन वि‍चार अछि‍। “इंद्रधनुषी अकास” नामसँ अपन लि‍खल एकटा छोट कवि‍ता स्मदरण अबैत अछि‍, आ स्म रण अबैत अछि‍ ओ परि‍स्थिक‍ति‍ जइसँ प्रेरि‍त भऽ पाँच वर्ष पहि‍ने इंन्द्रसधनुषपर एक छोट कवि‍ताक ि‍नर्माण केने रही। परि‍स्थि‍‍ति‍ ई छल जे हमर पाँच वर्षीय पुत्र शशांक हमरासँ जि‍द्द करय लागल जे ‘हमरा इन्द्र धनुष देखाउ।’ मुदा देखाऊ कोना! घोर समस्यार। कि‍छु काल सोचमे पड़ि‍ गेलौं। अन्तँत: कम्युरस् टर खोलि‍ इन्ट‍रनेट चालू कय ओकरा इन्द्रहधनुषक अनेको फोटो देखा देलि‍ऐक। शशांकक बालशुलभ मोन प्रसन्न भऽ गेलैक। राति‍मे सुतबासँ पहि‍ने मोनमे आएल जे ऐपर कि‍छु लीखी। पेन आ कागत लऽ लि‍खए लेल बैसि गेलौं। सोचल कवि‍ता लि‍खल जाए। कवि‍ताक शीर्षक सेहो फुरा गेल- ‘इन्द्र धनुषक वि‍न्याास’ कवि‍ता स्वोत: प्रारम्भट भऽ गेल-

“सुरुजक इजोतसँ भरल आकास दग्धल कतेक अछि‍ गर्मीक धाहसँ मोन वि‍दग्धी कतेक अछि‍ कोना करी एहि‍ प्रचण्डध गीर्मीमे शीतलताक आभाष कोना करी टहटहाइत इजोतमे इन्द्रड धनुषक वि‍न्याभस? मुदा हारि‍ मानब हमर प्रकृति‍मे कतअ अछि‍ एकाएक बुझाएल जेना इन्द्र धनुष अतअ अछि‍। मोन हरि‍याएल ब्यों्त फुराएल इन्द्र धनुषक ि‍नर्माण हेतु कल्पहनाकेँ सकार कय इन्द्रल-धनुषक रचना हेतु सोचल कोना नै हैत इन्द्र –धनुषक वि‍न्याधस? टहटहाइत सुरुजदेवकेँ ऊपर आँजूरसँ पोखरि‍क पानि‍ छीटि‍, सुखल धरतीकेँ अरि‍यर करबाक हेतु कऽ लेब एकता छोट मुदा यथार्थक इन्द्र धनुषक वि‍न्यालस। फेर की सभ भऽ जाएत सोहनगर, की धरती आ की अकास।”

आब बि‍ना इमहर-ओमहर भटकने जगदीश प्रसाद मण्ड‍ल जीक कवि‍ता संग्रहकेँ देखी। 110 कवि‍ताक समेटि‍ने 146 पन्नाक ई पोथी मैथि‍ली साहि‍त्यस केर एकटा अवि‍श्मरणीय धरोहर अछि‍। हरेक छोट आ पैघ कवि‍तामे कि‍छु संदेश, कि‍छु संस्कािर आ कि‍छु नव वि‍चार प्रस्फुेटि‍त होइत छैक। लोक मि‍थि‍लासँ बाहर पलायन करैत छथि‍ तँ मण्डसलजीकेँ कचोट होइत छन्हिन‍। मुदा जखन लोक मि‍थि‍लासँ साफे रि‍श्तात समाप्त कऽ आनठाम बैस जाइत छथि‍ तँ मण्डनलजीक हृदए जेना भोकासि‍ पाड़ि‍-पाड़ि‍ कानय लगैत छन्हिक‍। ऐ बातक सहज अनुभूति‍ उड़ि‍आएल चि‍ड़ैमे परि‍लक्षि‍त होइत अछि‍ : “उड़ि‍आएल चि‍ड़ैक ठेकाने कोन उड़ि‍ कतऽ जा बास करत। भरि‍ पोख घोघ भरतै जतऽ दि‍न-राति‍ जा रास करत। ओहन चि‍ड़ैक आशे कोन जे बि‍सरि‍ जाएत डीहो-डावर।”

देख! देस परदेस कतहु जाऊ मुदा अपन माटि‍ आ अपन संस्कृआति‍सँ अपनाकेँ बि‍मुख नै करू। शायद यएह बात थीक ऐ कवि‍ताक मूल। अगर आँखि‍ मूनि‍ पलायन करैत रहब आ अवसर एवं सफलता मात्र पेबाक कारणे अपन डीह-डाबर सदाक लेल त्या गि‍ लेब तँ भला अहाँ केहेन मनुक्ख ! अहाँक केहेन संस्काार? छोट कवि‍ताक माध्यासँ कतेक मर्मक बात बजैत अछि‍ जगदीश प्रसाद मण्डकल केर कवि‍ मोन! एक आर कवि‍ता- “चल रे जीवन” अहाँकेँ रोकि‍ लेत। कवि‍ता पढ़ु, ओकर शब्द क युग्म केँ देखू आ कवि‍ताक संग अपना-अापकेँ गति‍मान बना लीअ। ने कवि‍ता रूकत आ ने अहाँ। बाह रे बाह! एहेन आसाधारन सम्बतन्ध- कवि‍ता आ पाठकक बीच जीवन गति‍शील थि‍क। ई बात अनेको कवि‍ अनेको भाषा आ कालमे अपन-अपन ढंगसँ कवि‍ताक माध्यपमसँ कहने छथि‍। मुदा अही बातकेँ सर्वहाराक शब्दािवलीसँ कहब। कहब की चलैत पहि‍यापर एना बैसाएब कि‍ पाठककेँ जोश आबि‍ जाइक। ई कला मण्डशल जीमे छन्हिह‍। कवि‍ताक कि‍छु अंश देखू- “कि‍छु दैतो चल कि‍छु लैतो चल कि‍छु कहि‍तो चल कि‍छु सुनि‍तो चल कि‍छु समेटतो चल कि‍छु बटि‍तो चल कि‍छु रखि‍तो चल कि‍छु फेकि‍तो चल बि‍चो-बीच तँू चलि‍ते चल। चल रे जीवन चलि‍ते चल। समए संग चल ऋृतु संग चल गति‍ संग चल मति‍ संग चल। गति‍-मति‍ संग चलि‍ते चल। चल रे जीवन चलि‍ते चल।” हँ, कवि‍ केवल गति‍मान होमाक प्रेरणा टा नै दैत छथि‍। ओ कहैत छथि‍ जे जोश संगे होशमे रहू : गति‍ संग चल/ मति‍ संग चल/ गति‍-मति‍ संग चलि‍ते चल।

‘सासु-पुतोहु वार्ता’ कवि‍तामे जेनरेशन गैप आ मनोवैज्ञानि‍क वि‍श्लेषण भेटत। जखन कवि‍ता पढ़ब तँ लागत मनोरंजक अछि‍। जखन सोचब तँ लागत एकटा अनुभवजन्या वि‍श्लेमषण अछि‍। एक-एक शब्द।क चयन कवि‍ताकेँ समाजसँ सीधे जोड़बामे प्रभावकारी अछि‍। “अपनेपर हँसै छी” शि‍क्षाक घटैत स्तेर, चाेरी, घूस दय नौकरी प्राप्तज करबाक तरीका, अवसरवादी नेता लोकनि‍क पाॅपुलि‍जम आ शि‍क्षा मि‍त्र इत्या दि‍ केर माध्ययमसँ कि‍छु पाइक मासि‍क भत्तामे राखब, ओइ लेल मुखि‍यासँ नेता आ अधि‍कारी धरि‍ घूसक प्रचलन आदि‍ प्रथापर सोझे-सोझ प्रहार अछि‍। जकरा फबलै से बि‍ना पढ़ने नकल कऽ परीक्षा पास कए डि‍ग्री हासि‍ल कय कोनहुना लाख-डेढ़ लाख टकाक ब्यौंअत कऽ नोकरी हथि‍या लेलक। भाँरमे जाउ शि‍क्षा बेवस्था‍ या चौपट्ट होथि‍ वि‍द्यार्थी! शि‍क्षामि‍त्र लोकनि‍केँ ऐ सँ की मतलब???

“बाट” कवि‍ता कवि‍ रवीन्द्र नाथ ठाकुरक कवि‍ता यदि‍ तोर डाक शुने केऊ न आसे/ तबे एकला चलो रे/ केर स्मथरण करबैत अछि‍। संगहि‍-संग गीताक मूल मंत्र “कर्मण्ये-वाधि‍कारस्तेत माँ फलेषु कदाचन,” अर्थात अहाँक अधि‍कार कर्म तक सीमि‍त अछि‍। तँए अहाँ कर्म करैत जाऊ, फलक इच्छा् नै करू... केर सेहो पुनर्स्था?पि‍त करए चाहैत छथि‍। कवि‍ भावुक सेहो छथि‍। होबाको चाही। भावुक नै भेल तँ कवि‍ताक कोना रचना करत कवि‍! कवि‍क भावुक मोन गीतमे बहय लगैत छैक। “गीत-2”मे कि‍छु एहने दशाक वर्णन थि‍क। भावनासँ द्रवि‍त मोन बाजत तँ कोना? बोल कुना फुटतै? : मुँहसँ बोल कन्ना कऽ फुटतै दरदसँ दुखाइ छै टीससँ टि‍सकै छै छाती लहि‍-लहि‍ लटुआएल छै मुँहसँ बोल कन्नाल.....। आशाक सभ मेटेलै बाटे सभ घेराएल छै ककरो कहने कि‍छु ने भेटत अपने बेथे बेथाएल छै मुँहसँ बोल कन्ना ... चोटसँ चोटाएल छै मन ढहि‍-ढहि‍ कऽ ढनमनाइ छै तैयो हँसि‍-हँसि‍ नाचय गाबए राति‍-दि‍न बड़बड़ाइ छै मुँहसँ बोल कन्नाद...। अही तरहेँ जाल आ गालक उपमा लऽ कवि‍ लोककेँ अगाह करै छथि‍ : जहि‍ना जाल सभ तरहक मांछकेँ पकड़ैत अछि‍, परन्तु. अगर मल्ला ह जालकेँ ठीकसँ नै ओछेलक आ काबूमे नै केलक तँ जाल फाटि‍ जाइत छैक, माछ भागि‍यो जाइत छैक। तहि‍ना मनुष्याकेँ अपन बोलीपर संयम करक चाही : शब्दैजाल छी महाजाल जइमे समटल महाकाल देखैमे जहि‍ना वि‍कराल तहि‍ना अछि‍यो महाकाल। सभ कि‍छु भेटत आँखि‍येमे सभ लटकल अछि‍ जालेमे सभ कि‍छु छै गालेमे। जे जेहन अछि‍ जलवाह से तेहन फेक फेकैए। गैंची ने गैंचि‍या जाइए रोहु, भाकुर तँ फँसि‍तेए। सभ कि‍छु भेटत जालेमे सभ कि‍छु छै गालेमे। गाल बजबैमे जे जेहन से तेहन जाल फेकैए। इचना-कोतरीकेँ के कहए डोका-काँकोर धरि‍ फॅसैए। सभ कि‍छु छै गालेमे सभ फॅसल अछि‍ जालेमे...।”

ि‍वचार तँ वि‍स्ता रपूर्वक अनेकाे कवि‍तापर लि‍खल जा सकैत अछि‍। हि‍नकर ई कवि‍ता संग्रह हाथक आंगुर जकाँ थि‍क। सभ आंगुर स्वेतन्त्रन अछि‍, मुदा सभ जुड़ल अछि‍ तरहत्थीजसँ। तहि‍ना हि‍नकर रचना “इंद्रधनुषी अकास” नामक मालामे गांथल एक सय दस कवि‍ता स्वितंत्र अछि‍- वि‍षय, भाव, शब्द‍–चयन, प्रेम, उपमा आदि‍क स्वाभावसँ परन्तुस अन्तनत: सभ कवि‍ता एक तागसँ गांथल अछि‍ ओ ताग थि‍क जगदीश प्रसाद मण्ड लक व्यकक्तिन‍त्वे आ सोच। सभ कवि‍ता एक-सँ-बढ़ि‍ कऽ एक अछि‍। “माटि‍क फूल, गोधन पूजा, झगड़ा, नजरि‍, भभूत, पुरुषार्थ, अगहन, केना मेटत गरीबी, बाढ़ि‍क सनेस, बेरोजगारी, पू-भर, बेथा, एकैसमी शदीक देश, आदि‍ कि‍छु एहन कवि‍ता अछि‍ जकरा पाठक बेर-बेर पढ़ताह। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। १.अतुलेश्वर- सगर राति दीप जरए , आन्दोलन आ बभनभोज २.विनीत उत्पल आधुनिक मैथिली नाटक आ टुच्चा नाटककारक जातिवादी रंगमंचक अवधारणा/ साहित्य अकादेमी कथा गोष्ठी: सगर राति दीप जरय: एकटा बहन्ना/ (सम्पूर्ण लेखमे लेखक सेहो शामिल अछि, हुनका परछाय कऽ नै देखल जाए) ३.पूनम मण्डल- आरती कुमारी आ सगर राति दीप जरय ४.आशीष अनचिन्हार- विदेह मैथिली समानान्तर रंगमंच/ जातिवादी रंगमंचक भाषाक बानगी १ अतुलेश्वर

सगर राति दीप जरए , आन्दोलन आ बभनभोज कथा साहित्यक प्रकाशन करए वला पत्र-पत्रिका अभावक कारण एकटा प्रश्न ठाढ़ भेल कि यदि मैथिलीक रचनाकारकें अपन रचनाक लेल कोनो मंच नहि भेटत तँ मैथिली आबयवला समयमे रचनाकारक अभाव सँ गुजरि सकैत अछि। आ मैथिली भाषा आ साहियक क्रान्तिकारी पुरुष डा.काञ्चीनाथ झा किरणक जन्म दिवसक अवसर पर लोहना गाममे जे समारोह आयोजन भेल छल ओहिमे पंजाबी भाषामे जहिना भरि रातिक कथा गोष्ठी कयल जा रहल छल ओहिना मैथिली भाषामे आरम्भ कयल जाए। आ कथा साहित्यक पुरोधा आ युवा साहित्यकारक पथपर्दशक स्व. प्रभाष कुमार चौधरीक नेतृत्वमे ई आन्दोलन प्रारम्भ भेल । कहल जा सकैछ जे काल सापेक्ष ई आन्दोलन मैथिली साहित्य लेल वरदान साबित भेल,कारण कतेको कथाकार, आलोचक एहि आन्दोलन सँ मैथिली साहित्य मध्य उपस्थित भेलाह तँ दोसर दिश एक नव आलोचनाक बाट फूजल। मुदा आइ काल्हि तँ एहि मे कथाक चर्चा सँ बेशी मानकीकरण,कखनो जातिवाद,कखनो भत्ताक गप्प होइत अछि। एतेक धरि जे कथाक गोष्ठीक अस्मिता पर कुठाराघात करैत किछु मैथिली अहित सेवी लोकनि ओकरा सरकारी संस्थाक कार्यक्रमसँ जोड़ि ओकर अस्मिता आ स्वतंत्रताक नष्ट करबाक प्रयास क’ रहल छथि। कारण जखनहिं साहित्य अकादेमी आ सरकारी संस्था सभसँ जोड़ल जाएत तँ एहि गोष्ठी सँ जनसहभागिता कम भेल जाएत आ कथा गोष्ठी अपन उद्देश्यक बाटसँ भटकि जाएत ई षडयंत्र हमरा जनैत एहि कारणेँ कएल जा रहल अछि , जे मैथिलीमे नव-नव रचनाकारक अभाव हुअए आ मैथिली साहित्य किछु वर्ग धरि सिमटि जाए। एहि तरहेँ बहुतों गोटा एहि बेरक कथा गोष्ठीकेँ सगर राति दीप जरएक श्रृंखला सँ नहि जोड़बाक आग्रह कयलन्हि अछि समर्थन हमरो अछि,कारण यदि हम सभ विरोध नहि करब तखनि ई लोकनि हमर सभक अस्मिता पर एहिना आघात कयल करताह आ जेकरा रोकब आवश्यक अछि, एहि लेल एकजूट होयब जरूरी अछि।नहि तँ एकटा आन्दोलन षडयंत्रक फाँसमे समाप्त भ’ जाएत। हँ एहि गोष्ठी मे एकटा बात उठल छल जे बभनभोज। गोष्ठी कथा गोष्छी नहि भ’ बभनभोज भ’ गेल , ई सगर राति दीप जरए लेल एकटा आर आघात भेल । आशा करब आदरणीया विभा रानी सँ जे एहि आन्दोलनक दीपकेँ उद्देश्य सँ नहि भटकय देथि पुनः माँ जानकीक भाषा मैथिलीक आन्दोलन अपन उद्देश्य मे लागि जाए। आ सगर राति दीप जरए मैथिली कथा साहित्यक दीपकेँ मात्र जरौने टा नहि रहए ओ सम्पूर्ण विश्वमे मैथिली कथा साहित्यक दीप जगमगबैत रहए । एहि कामनाक संग हम सभ पुनः अपन आन्दोलनक नेतृत्व स्वयं करी आ घुसपैठिया लोकनिकेँ एहि आन्दोलन सँ भगाबी । एहि उद्देश्य संग दक्षिण भारत आबि आ माँ जानकीकेँ मोन पाड़ि।

२ विनीत उत्पल

आधुनिक मैथिली नाटक आ टुच्चा नाटककारक जातिवादी रंगमंचक अवधारणा/ साहित्य अकादेमी कथा गोष्ठी: सगर राति दीप जरय: एकटा बहन्ना/ (सम्पूर्ण लेखमे लेखक सेहो शामिल अछि, हुनका परछाय कऽ नै देखल जाए)

लोकतंत्रक परंपरा अछि जे आलोचना हेबाक चाही। जौं आलोजना सहबाक क्षमता केकरोमे नै अछि तँ ओ लोकतांत्रिक तँ कोनो विधिए नै भऽ सकैत अछि। ओ तँ तानाशाह भेल। अहिनामे तँ समाजमे विकृति अएबे करत आ से विकृति मिथिलामे देखल जा रहल अछि। एकरा कहएमे कोनो संदेह नै अछि जे गारि सभ लोक संस्कृतिक हिस्सा अछि। मुदा कोनो भी रचनात्मक लोक अहि शब्दक प्रयोग, जातिवादी गारिक प्रयोग, कोना करैत अछि, अहि पर हुनकर योग्यता आ क्षमताक आकलन कएल जाइत अछि।

दिल्ली मे आयोजित साहित्य अकादमी कथा गोष्ठी तथाकथित ७६म सगर राति दीप जरय (!) संपूर्ण देश आ विदेश मे रहए बला मैथिली भाषीक आगू कतेको रास प्रश्न छोड़ि देलक। जइ राति ई गोष्ठी भऽ रहल छल, मात्र १८ लोक भोर धरि बचल, ३४ टा लोकक सोंझा अप्पन-अप्पन खिस्सा कागज देख कऽ सुना रहल छल, तखने राजधानी दिल्ली सँ एक हजार किलोमीटर दूर मिथिला क कतेको गाम मे रहए बला लोक द्वारा मचान आ चौबटिया पर कतेको रास लोक मुहजबानी खिस्सा-पिहानीक क्षमताक परिचय दऽ रहल छल। हुनका नै तँ कोनो माइकक जरूरत छल, नहिये मसनदक आ नहिये खाइ कऽ चिंता छल। ओ ओ लोक छल जे दिन भरि मजूरी कऽ सांझ केँ बैसि कऽ टाइम पास कऽ रहल छल। एना मे जे दिल्ली मे कथा गोष्ठी भऽ रहल छल हुनकर आयोजक लोकनि लेल नहिये बंगला कवि रवीन्द्र नाथ ठाकुर महत्वपूर्ण छल (रवीन्द्र नाथ ठाकुर साहित्य अकादेमीक मार्च क्लोजिंगक बचल फण्डक लूट बनि कऽ रहि गेलथि, कारण कथा रवीन्द्रमे रवीन्द्र छोड़ि सभ किछु छल) नहिये मैथिली/ हिन्दीक कवि बाबा नागार्जुन। ई वएह बरख छी जखैन रवीन्द्र नाथ ठाकुरक डेढ़ सएम बरखी मनाओल जा रहल अछि। तमाम संस्थान पाइ उगाहि रहल अछि। जखैन की ई बरख बाबा नागार्जुनक जन्म शताब्दी बरख सेहो अछि। बिहार सेहो अप्पन स्थापनाक सौवां बरख मना रहल अछि। अहि ठाम प्रश्न अछि जे की मैथिली भाषाक लेल रवीन्द्रनाथ ठाकुर अहम छथि वा बाबा नागार्जुन वा दुनू। तखन की मानल जाए जे पूंजी आम लोक आ संस्कृति पर हावी भऽ रहल अछि। एकटा कहबी अछि, पूंजी असगरे नै आबैत अछि, ओ अपना संगे एकटा संस्कृति सेहो आनैत अछि। यएह पूंजी मिथिला केँ खा रहल अछि। मुट्ठी भरि लोकक पाकेट भाषा मैथिली बनि रहल अछि, बाकी सभ मुँह ताकि रहल अछि। रवीन्द्रक विरोध करबाक कोनो प्रयोजन नै अछि मुदा बाबा नागार्जुन केँ बिसुरि कऽ हम हुनका सम्मान दैक प्रयत्नक विरोध तँ अवश्य हेबाक चाही। जखैन देशक राजधानी दिल्ली मे कथा गोष्ठी भऽ रहल अछि, तखन हम अप्पन भाषाक कवि बाबाक नाम फण्डक लेल नै लऽ कऽ कवि रवीन्द्रकेँ नेमप्लेट बना कऽ सम्मान दिऐ, ई केहन मानसिकता अछि। अप्पन दीपक नीचाँ अन्हार आ भरि शहर ढ़िंढोरा, केहन सिद्धांत अछि? अप्पन घर केँ अन्हार राखि कऽ दोसर घरक लेल दीप लेसी, ई केहेन विकृत दुनियाक दृश्य अछि। एखन जखैन किसान मरि रहल अछि, संपूर्ण मिथिला बाढ़ सँ त्रस्त अछि। ढेर रास लेखन समाजसँ बेरल लोक लिखि रहल अछि आ गद्य/पद्यमे प्रमुखतासँ शामिल अछि। अहि परिस्थितिमे एकटा सामान्य मैथिलीक लोक लेल कवि रवीन्द्र प्रासंगिक अछि वा बाबा नागार्जुन। दिल्लीक लिट्ल थियेटर ग्रुप, मंडी हाउस मे हिन्दीक लेखक अज्ञेयक रचना पर हुनकर जन्म शताब्दीक लेल नाट्य प्रस्तुति केलक। मुदा जखैन जे संस्था अपनाकेँ नाट्य संस्था कहि कऽ पताका फहराबऽ चाहैत अछि, मुदा ओकरा भंगिमा, अरिपन, कोलकाता आ जनकपुरक रंगमंच आ विदेह समानान्तर रंगमंचक जानकारी नै अछि, ओकर सँ सभ कियो अपेक्षा करत जे ओ बाबा नागार्जुनक रचना पर कोनो कार्यक्रम जरूर करताह। मुदा, ई नहि भेल। किए? किएकि सरकार पाइ नै देलक। तखन सगर राति दीप जरयक माला उठेबाक कोन खगता छल, जोड-तोडसँ अर्द्धनारेश्वरक बोकारोक प्रस्ताव अस्वीकृत भेल (उमेश मण्डल जीक ऐपर विदेहमे विस्तृत रिपोर्ट आएल अछि। जखन राबड़ी बंटैत अछि तखन जे क्यो 'क्यू" मे ठाढ़ हेता, सभकेँ राबड़ी भेटत। मुदा, बलिहारी तखैन ने जखैन अहाँ लीक सँ चलि आ अप्पन शर्तक आधार पर सरकारी फंड लऽ सकी। फंडक लेल हम कोनो उत्सव करी, ई कतय क आ केहन सिद्धांत अछि।

जौ हम कनी कालक लेल मानि ली जे हम रविंद्र सँ प्रभावित छी तखन हुनका सँ सीखैक जरूरत अछि नै की फंड लऽ पेट भरबाक। आइ धरि बंगालक सभ घरमे रवीन्द्र संगीत गायल आ सुनल जाइत अछि मुदा मिथिलाक घर मे विद्यापति संगीतक केहन हाल अछि, ई केकरो सँ नुकायल नै अछि। जातिवादी मैथिली रंगमंच तँ मैथिलीकेँ लेलिये गेल छल मुदा विदेह समानान्तर रंगमंच ओकर सोझाँमे अवरोध बनि आबि गेल। जखैन की कवि विद्यापति कवि रविंद्र सँ कतेक पुरान छथिन, ई सभकेँ बुझल अछि। समूचा बंगाल घुरि कऽ आबि जाउ, ओतय बंगला भाषाटा बाजल जाइत अछि मुदा मिथिलामे अंगिका, वज्जिका जेहन कतेको भाषा अही जातिवादी लेखन आ रंगमंचक कारण मैथिलीसँ निकलि कऽ अप्पन अस्तित्व टा नै बना लेने अछि, मैथिली केँ चुनौती सेहो दऽ रहल अछि।

आइ जकरा काल्हिक जन्मल मैथिली क टुच्चा नाटककार आ नाटक कहि कऽ जातिवादी रंगमंचक भड़ैत भर्त्सना कऽ रहल छथि ओ टुच्चा कोना भऽ सकैत अछि, जे बिना कोनो तामझामक, बिना मीडिया प्रबंधनक, बिना प्रचारक, बिना कोनो संस्थागत सहयोगक, अप्पन रचनात्मकता मे लागल अछि। ओ टुच्चा कोना अछि जिनकर नाटक देखहि बला लोक केँ दू टाइमक रोटी नै भेटैत अछि, मुदा नाटक जरूर देखैत अछि। आ नाटको दलित विमर्शपर, सूचनाक अधिकारपर, जाति-पातिक कट्टरतापर, भ्रूण हत्यापर। हुनका लग अप्पन गाड़ी नै अछि, बुल्लै दू कोस धरि चलि कऽ नाटक देखैत अछि। भरि-भरि राति हुनकर नाटक देखल जाइत अछि, ६-६ घण्टाक नाटक, एतेक पैघ नाटक मराठीमे सेहो एकाधेटा अछि, मैथिलीक जातिवादी रंगमंचक नाटक आ हिन्दीक नाटकक तँ चर्चे ब्कार। आ नै हुनका लग लाइट लेल बड़का-बड़का बल्ब अछि, नै ओतेक तकनीक, मात्र प्रतिभा अछि, समाजकेँ बचेबाक लेल जातिवादी रंगमंचक विरुद्ध समानान्तर रंगमंचक संकल्पना अछि आ तखन ओ टुच्चा कोना अछि। हुनकर नाटक लेल गाम-घरमे, चौबटिया पर गप होइत अछि, मुदा अखबार, मैथिलीक जातिवादी संस्था सभक पत्रिका या विदेहक अलाबे इंटरनेट पर चर्चा नै आबैत अछि, तखन ओ टुच्चा कोना अछि? जे कियो मैथिली केँ लऽ कऽ 'डिप्रेस्ड’ अछि, तँ ओहेन मानसिकता केँ किछु नै कएल जा सकैत अछि। हिन्दी राजभाषा अछि नै कि अप्पन सभक मातृभाषा। दुनियाक सभ भाषाक सम्मान करबाक चाही, मुदा अप्पन भाषाक दांव पर नै। ई छद्म रंगमंचकर्मी लोकनि अपन जातिवादी नाटकक तुलना हिन्दीक नाटकसँ कऽ गर्व अनुभव करै छथि, जखैन की सत्य अछि जे हिन्दीसँ पुरान साहित्यिक भाषा मैथिली अछि आ हिन्दीबला सभ ज्योतिरीश्वरक मैथिली धूर्त समागमक हिन्दी अनुवाद कऽ कहियासँ नै खेला रहल छथि, ऐ मैथिलीक जातिवादी रंगमंचकर्मी आ नाटककारकेँ ई बुझलो छन्हि जे भारतेन्दुक “अन्धेर नगरी...” ज्योतिरीश्वरक मैथिली धूर्त समागमक अनुकरण मात्र अछि?

जे कियो असली मैथिल होएत ओ अप्पन मां केँ बेचि कऽ नै खा सकैत अछि। अप्पन मिथिला सीताक मिथिला अछि।,माँकेँ सम्मान दैबला। हिन्दी पेट भरयबला, नौकरी भेटयबला भाषा अछि। मिथिला आ मैथिली सँ सभक आत्म सम्मान जुड़ल अछि। जेकरा लग आत्मा नै अछि ओकरा लऽ कऽ किछु कहल नै जा सकैत अछि। आइ किछु लोक मिथिलाक गद्य/पद्य क हिन्दी मे अनुवाद कऽ रहल अछि। अहि ठाम सवाल अछि जे की अहि सँ मैथिली भाषाक प्रचार भऽ रहल अछि आ दोसर भाषा मजबूत भऽ रहल अछि? जखैन धरि आन भाषाक रचना मैथिली मे नै आएत ता धरि मैथिली मजबूत कोना होएत, आ जँ अहाँ घरमे मजगूत नै हएब तँ बाहरमे सम्मान भेटत? एक बेर अप्पन मोनमे ताकि कऽ हिम्मत करए पड़त जे हम अप्पन माँ मैथिली लेल की कऽ रहल छी। माँ अप्पन नेना केँ छातीक दूध पिआबै अछि मुदा ओ नेना पैघ भेले पर माँ केँ नै बेच दैत अछि। माँ, माँ होइत अछि। की अहाँ अप्पन माँ केँ जिंस-टॉप पहिरा कऽ बाजार मे लऽ जाइत छी? की अहाँ अप्पन माँ केँ बाजार मे ठाढ़ कऽ नीलाम करैत छी? की अहाँ कोनो पुरस्कार पेबा लेल अप्पन माँ केँ केकरो आर लग पोसिया लगाबैत छी, नै ने। तखन मैथिली संग ई किए कऽ रहल छी, एक बेर कनी सोचियौ तँ। ३. पूनम मण्डल आरती कुमारी आ सगर राति दीप जरय डॉ. आरती कुमारी (१९६७-२०१२)क काल्हि रातिमे मृत्यु भऽ गेलन्हि। पति श्री अनिल कुमार रॉय आ पुत्र अनुराग कुमार आ पुत्र उज्जवल प्रकाश केँ छोड़ि ओ चलि गेलीह। हुनकर मृत्युसँ मैथिली साहित्य जगत सन्न अछि। हुनकर एकटा पोथी प्रकाशित अछि "मैथिली मुक्तक काव्यमे नारी"। महिषीमे ७३म सगर राति दीप जरय क माला ओ भागलपुर लेल उठेने रहथि, आ तकरा बाद ओ अस्वस्थ भऽ गेलीह, कोलकातामे ऑपरेशन भेलन्हि। किछु सामन्ती प्रवृत्तिक लोककेँ हुनकर सगर राति दीप जरय क माला उठेनाइ नै अरघलन्हि आ हुनका द्वारा भागलपुरक साहित्यकारसँ माला उठेबासँ पहिने नै पुछबाक, आ "जँ भागलपुर मे सगर राति दीप जरय हएत तँ कियो नै आएत" आदि गप कहि मानसिक वेदना पहुँचा कऽ दीप आ रजिस्टर लऽ लेल गेल, आ सगर राति दीप जरय भागलपुरमे नै भऽ सकल। आ सगर राति दीप जरय पर जे ग्रहण लागल से अखन धरि लागले अछि। हम सभ कहनहियो रहियन्हि जे जँ अहाँ भागलपुरमे सगर राति दीप जरय करय चाहै छी तँ निश्चिन्त भऽ करू, सभ पहुँचत, मुदा ओ कहने रहथि जे ओ सगर राति दीप जरय करय चाहै छथि, मुदा विवादमे नै पढय चाहे छथि। स्व. आरती कुमारीकेँ कृतघ्न समाज दिससँ श्रद्धांजलि। Shyam Darihare 74wa SAGAR RATI DEEP JARAY-- 10 SEPT 2011. Sthan:- HAZARIBAGH. ( Patna ke taraf sa Hazaribagh me pravesh sa pahile N.H. par Vinoba Vhave University Gate chhaik. University gate sa ek minat baab dahina me ekta barka maidan chhaik waih chhaik HOME GUARDS TRAINING CENTRE. Ohi Gate par sipahi sa puchhari karu o hall dhari pahuncha det. SAB MAITHILI KATHAKAR aa KATHPREMI LOKaNIKE SADAR HAKAR. Like · · Unfollow Post · August 11, 2011 at 3:48am Shefalika Verma and Kislay Krishna like this. Arvind Thakur बढियां खबर ! बधाइ !रोमन लिपि मे लिखबाक अनेक खतरा छै,एकटा एतहु देखाइत अछि -कथाप्रेमी कें कठप्रेमी पढय मे बेसी सुविधा बुझाइ छै|सभ गोटे देवनागरी मे लिखबाक हिस्सक बनाबी त नीक |हम गोष्ठी मे आयब,दरिहरे जी| August 11, 2011 at 7:29am · Like · 2 Hirendra Kumar Jha Bhagalpurak arth ahzaribag hit chhaik ? August 13, 2011 at 1:13am via · Unlike · 2 Hirendra Kumar Jha Bhagalpurak arth Hazaribagh kona bhay sakait chaik ? ehi san ta prathak samapti bhay jayat. punarbichar karu. Hirendra August 13, 2011 at 1:15am via · Unlike · 1 Ajit Azad aarti ji goshthi karba me saksham nai chhaith. hunke se puchhla par ee bha rahal chhaik. aarti ji gambhir roop se bimar chhaith aa kolkata me 3 maas se ilaaj kara rahlih achhi. August 13, 2011 at 6:10am · Like Kislay Krishna ee ektaa vikalp rup me sojha aayal achhi.... August 13, 2011 at 8:07am · Like Gajendra Thakur आरती जी २४ सितम्बर केँ गोष्ठी करबा लेल तैयार छथि तकरा बादो हुनका सँ मौका छीन कऽ मात्र दस दिन पहिने गोष्ठीकेँ हजारीबाग लऽ जेबाक की प्रयोजन..? Hirendra Kumar Jha जी सँ हम सहमत छी..आब जखन १० सितम्बर तिथि घोषित भऽ गेल तखन आब ओ पाछाँ हटि जाथि से अलग बात, मुदा की हुनका ई भरोस देल गेलन्हि जे अगिला गोष्ठी वएह करेतीह? हम पहिनहियो कहने रही जे हुनकासँ बिना पुछने कोनो निर्णय नै लेबाक चाही..यदि हजारीबागमे गोष्ठी हुअए तँ सशर्त हुअए जे अगिला गोष्ठी आरती जी करेतीह..ई दवाब जे अहाँक अहठाम २४ सितम्बर केँ कियो नै आएत/ अहाँ भागलपुरमे ककरोसँ नै पुछलिऐ..आदि बना कऽ हुनकासँ जबरदस्ती हँ कहेबाक कोनो मतलब नै.. August 17, 2011 at 7:39am · Like Ajit Azad jahiya 10 setamber ke ghoshna bhel...tahi se ek ghanta pahine tak aarti ji lag date final naih rahain. ham fon kayliyai ta o kahlih je AAI RAIT ME HAM AHAN KE KAHAB...KARAN JE EK GOTE HAMRA AARTHIK SAHYOG KARBA LEL CHHAITH...YADI O GACHHI LETAH TA HAM 19 YA 20 SEPTEMBER KE KARAB. ham puchhaliyain 19 ke ya 20 ke? o kahalain EHI DOONU TITHI ME SE JAHIYA SHAIN PARTAIK TAHIYA. ham kahaliyain je ehi doonu tarikh ke shain nai parait chhaik. takhan o garbara gelih. hamhi kahaliyain je 24 ke bha sakait achhi muda durga puja 28 se chhaik...ki ahan 3 september ya 10 september me se kono din kara sakait chhi? o taiyar nai bhelih. ham kahaliyain je takhan ahan 24 ke kareba lel swatantra chhi...aa ham aybo karab muda besi lok nai autah...dosar gap je ekhno tak ahank date final nai achhi ( karan, o takhno ber-ber kahait chhalih je ham ek gote se baat karab takhan date ghoshit karab). ham hunak swasthya aa aarthik sthiti ke dekhait kahaliyain je ahan baad me jahiya thik bha jayab tahiya karab. o kahalain JE HAM SANJH ME AHANKE FINALLY KAHAB. baad me o ohi samay pradip bihari ji ke sabhta baat kahalkhin. pradip ji hunka bujhelkhin je ahan ekra presstige issue nai banau...sabh ahank heet me kaih rahlah achhi. o maini lelkhin aa register hunke patheba lel sahmat bhelkhin. ekar baad pradip bihari ji turat hamra fon kaylain je aarti ji taiyar chhith je agila goshthi hazaribagh me hoiek. pradip ji hunka eeho kahalkhin je ahan ee gap ajit ji ya raman ji ke seho kaih diyoun muda o kahalkhin je ham VIDEHA me kaih dait chhiyaik, sabhke khabar bha jaytaik. ham aai tak videha me hunak kono statement nai parhal. hamra lagait achhi je ehi mamla ke tool nai del jai...o yadi agila goshthi karay chahait chhaith ta o karaith, ehi me kakro kiyaik kono aapatti hetaik. ee goshthi june me hebak rahaik...arthat may me date ghoshit bha jaybak chahi chhal. o june me 10 aa 11 ke saharsa me sahitya acsdemik seminar me aayal chhalih...ham takhno hunaka puchhaliyain je kahiya karbaik goshthi...o july me karbak baat kahlain. tabat tak hunak mon kharab bala baat nai rahaik. julu me kolkata me o kavita path karba lel bimarik avastha me aayal chhlih. takhno ham puchhne rahiyain je kahiya karab goshthi? o kahalain je september tak ta ham kolkate me rahab (under treatment). takar baade karab. August 17, 2011 at 10:55am · Like Ajit Azad ek ber ehi tarhak ghatna aar bhel chhaik. dr dhirendra ji janakpur me karbaik prastav darbhanga goshthi me delkhin muda 4-5 maas tak o nai kara saklah takhan pt. govind jha daman kant jha jik sahyog se patna me karoune rahaith. aarti jik paksha me sabh achhi muda hunak sthiti thik nai chhain...ehi mamila me bhagalpurak lok besi nik se kaih sakait chhaith. ४ आशीष अनचिन्हार विदेह मैथिली समानान्तर रंगमंच मैथिलीक समानान्तर रंगमंचक जन्मदाता: सभसँ बेसी मैथिली नाटकक निर्देशन: राजरोगसँ दूर: जातीय रंगमंचक विरुद्ध बेचन ठाकुर जीक संघर्ष (मुन्नाजी आ अजित आजादक सोझाँमे मलंगिया जीक भड़ैत प्रकाश झा जकरा लेल कहै छथि- भरि दिन केश काटैत रहै छल- पाठकक लेल ई सूचना जे जातिवादी रंगमंचसँ जुड़ल लोक केश काटनाइकेँ खराप बुझै छथि, संगहि ईहो सूचना जे बेचन ठाकुर सैम पित्रोदा (जे भारतमे टेक्नोलोजी मिशनक प्रारम्भ केलन्हि) सन बरही जातिक छथि, जातिवादी रंगमंचकर्मी लोकनि हुनकर गौँआ अंतिकाक सहायक सम्पादक श्रीधरमसँ कन्फर्म कऽ सकै छथि): हिनका नामसँ कतेको रेकॉर्ड दर्ज अछि, जेना संस्कृतक बाद पहिल बेर मैथिलीमे भरत नाट्यशास्त्रक रंगमंचक संकल्पनाक अनुसार नाटक, मात्र महिला नाट्यकर्मीक माध्यमसँ ६-६ घण्टासँ ऊपरक नाटकक मंचन (जखनकि जातिवादी नाट्यकर्मी अदहा घण्टा- ४५ मिनटक नाटकक निष्पादन लेल महिला रंगकर्मीक लेल बौखैत रहै छथि, कारण हिनकर सभक बलगोविना प्रवृत्तिक कारण आ कुकुरचालिक कारण बहुत रास महिला मैथिली नाटकसँ दूर भागि गेलीह। मुदा सभ कान्तिदर्शीकेँ जातिवादिताक कोप, गारि गंजन सुनऽ पड़ै छै, मुदा बेचन ठाकुर एक्केटा छथि...हमरा सभ नाट्यकर्मी, रंगमंचकर्मी, नाटककारकेँ हुनकर मैथिली समानान्तर रंगमंच, जे २५-३० सालसँ अनवरत चलि रहल अछि, पर गर्व अछि। मिथिलाक समाज जँ जातिवादी रंगमंचक बावजूद नै टूटल अछि तँ तकर कारण अछि बेचन ठाकुर जीक मैथिली समानान्तर रंगमंच... आ से मलंगिया जीक काल्हि जन्मल भड़ैत सभकेँ नै बुझल छन्हि, मुदा मलंगिया केँ बुझल छन्हि जे हुनकासँ बेशी संख्यात्मक आ गुणात्मक नाटक/ एकांकी बेचन जीक लिखल छन्हि आ ओइ बेचन ठाकुर आ गुणनाथ झाक एकांकी मैथिली एकांकी संग्रहमे नै देलन्हि.. एकलव्यक औंठा द्रोण कटबा लेलन्हि, मुदा एतऽ तँ गुरुक औंठा मलंगियाजी कटबा रहल छथि..

Gajendra Thakur मलंगिया जीक एकटा बयान आयल रहए, जे विदेहमे सेहो आएल रहए, ओ कहने रहथि जे नेपाली नाटकक स्थिति बड्ड दयनीय छै, मुदा ओतुक्का रंगकर्मीक प्रशंसा केने रहथि। विदेहक ऐ न्यूजक बाद हमरा जनकपुरमे हंगामा भेल रहै आ हमरो मेल पर नेपालसँ ढेर रास मेल आएल रहए, ई लिखैत जे मलंगिया जी जइ थारीमे खेलन्हि ओहीमे छेद केलन्हि। हुनकर मैथिली एकांकी संग्रहमे संकलित एकांकी सभक संकलन हुनकर नाटकीय सोचपर प्रश्न लगबैत अछि। ओइमे किछु एहेन एकांकी राखल गेल जे कहियो कोनो रूपमे नाटककार/ रंगमंचकर्मी नै रहथि; ओतै बहुत रास श्रेष्ठ नाटककार जातिक आधारपर बारल गेलाह। ओइ संग्रहक (साहित्य अकादेमीसँ २००३ ई.मे प्रकाशित)क भूमिकामे मलंगिया जीक अभद्रता ओही तरहेँ अछि जेना २०१० ई.मे प्रकाशित हुनकर छुतहा घैलमे अछि.. हुनकर जातिगत कट्टरता आर बढ़ल अछि। हुनकर सोच आर घटल अछि।

Ram Bharos Kapari Bhramar Sthiti aab spast bharahal aichh.Chintaniya aa bicharniye bat aichh. Ashish Anchinhar मलंगिया जीक नाटक विद्वेष बढ़बैत अछि, हुनकर राड़ आ शोल्कन्हक प्रति आ ओकर भाषाक प्रति घृणा गएर ब्राह्म्ण केँ मैथिलीस‘ं दूर केलक अछि। Monday at 09:08 • Like • 3

Lalit Kumar Jha SRIMAN APAN SOCH BADHAU DOSAR KE SOCHAK CHINTA JUNI KARU Monday at 09:10 • Like • 1

Ashish Anchinhar जहिया गजेन्द्र ठाकुर आ भ्रमर अपन सोच बदलि लेता तहिया मैथिली मरि जाएत। Monday at 09:12 • Like • 4

Ashish Anchinhar Lalit Kumar Jha---ठीके कहैत छी भाइ ओना एकटा गदहाक मर्म दोसरे बड़का गदहा बुझि सकैए। एहि मामिलामे मतलब गदहपनमे अहाँ हमर सीनियर भेलहुँ। सधन्यवाद भाइ|... Monday at 09:14 • Like • 4

Ashish Anchinhar गजेन्द्र ठाकुर- छुतहर/ छुतहर घैल/ छुतहा घैल छुतहा घैल महेन्द्र मलंगियाक नवीन नाटकक नाम छन्हि। ऐ छोटसन नाटकक भूमिका ओ दस पन्नामे लिखने छथि। पहिने ऐ भूमिकापर आउ। हुनका कष्ट छन्हि जे रमानन्द झा “रमण” हुनका सुझाव देलखिन्ह जे “छुतहर घैल”केँ मात्र “छुतहर” कहल जाइ छै। से ओ तीन टा गप उठेलन्हि- पहिल- “तों कहियो पोथी के लेखी, हम कहियो अँखियन के देखी।” दोसर- यात्री जीक विलाप कविता- “काते रहै छी जनु घैल छुतहर आहि रे हम अभागलि कत बड़।” आ कहै छथि जे ओइ कविताक विधवा आ ऐ नाटकक कबूतरी देवीकेँ शिवक महेश्वरो सूत्र आ पाणिनीक दश लकारसँ (वैदिक संस्कृत लेल पाणिनी १२ लकार आ लौकिक संस्कृत लेल दस लकार निर्धारित कएने छथि..खएर…) कोन मतलब छै? तेसर ओ अपन स्थितिकेँ कापरनिकस सन भेल कहैत छथि, जे लोकक कहलासँ की हेतै आ गाम-घरमे लोक “छुतहर घैल” बजिते छैक!! मुदा ऐ तीनू बिन्दुपर तीनू तर्क मलंगियाजीक विरुद्ध जाइ छन्हि। “अँखियन देखी” आ लोकव्यवहार “छुतहर” मात्र कहल जाइत देखलक आ सुनलक अछि, घैलचीपर छुतहरकेँ अहाँ राखि सकै छी? लोइटसँ बड़ैबमे पान पटाओल जाइ छै तखन मलंगियाजीक हिसाबे ओकरा “लोइट घैल” कहबै। घैल, सुराही, कोहा, तौला, छुतहर, लोइट, खापड़ि, कुड़नी, कुरवाड़, कोसिया, सरबा, सोबरना ऐ सभ बौस्तुक अलग नामकरण छै। फूलचन्द्र मिश्र “रमण” (प्रायः फूलचन्द्रजी “छुतहा घैल” शब्दक सुझाव हँसीमे देने हेथिन्ह, आ जँ नै तँ ई एकटा नव भाषाक नव शब्द अछि!!)क सुझाव मानैत मलंगिया जी “छुतहर घैल” केँ “छुतहा घैल” कऽ देलन्हि, ई ऐ गपक द्योतक जे हुनका गलतीक अनुभव भऽ गेलन्हि मुदा रमानन्द झा “रमण”क गप मानि लेने छोट भऽ जइतथि से खुट्टा अपना हिसाबे गाड़ि देलन्हि। आ बादमे रमानन्द झा “रमण” चेतना समितिसँ ओइ पोथीकेँ छपेबाक आग्रह केलखिन्ह आ, चेतना समिति मात्र २५टा प्रति दैतन्हि तेँ ओ अपन संस्थासँ एकरा छपबेलन्हि, ऐ सभसँ पठककेँ कोन सरोकार? आब आउ यात्रीजीक गपपर, यात्रीजीकेँ हिन्दी पाठकक सेहो ध्यान राखऽ पड़ै छलन्हि, हुनका मोनो नै रहै छलन्हि जे कोन कविता हिन्दीमे छन्हि, कोन मैथिलीमे आ कोन दुनूमे, से ओ छुतहर घैल लिखि देलन्हि, एकर कारण यात्रीजीक तुकबन्दी मिलेबाक आग्रहमे सेहो देखि सकै छी। आ फेर आउ कॉपरनिकसपर, जँ यात्री जी वा मलंगिया जी “घैल छुतहर”, “छुतहर घैल” वा “छुतहा घैल” लिखिये देलन्हि तँ की नेटिव मैथिली भाषी छुतहरकेँ “घैल छुतहर”, “छुतहर घैल” वा “छुतहा घैल” बाजब शुरू कऽ देत। से कॉपरनिकस सेहो मलंगियाजीक विरुद्ध छथिन्ह। कॉपरनिकसक किंवदन्तीक सटीक प्रयोग मलंगियाजी नै कऽ सकलाह, प्रायः ओ गैलिलीयो सँ कॉपरनिकसकेँ कन्फ्यूज कऽ रहल छथि, कॉपरनिकसक सिद्धान्तक समर्थन पोप द्वारा भेल छल आ कॉपरनिकस पोप पॉल-३ केँ अपन हेलियोसेन्ट्रिक सिद्धान्तक चालीस पन्नाक पाण्डुलिपि समर्पित केने रहथि। खएर मलंगियाजीक विज्ञानक प्रति अनभिज्ञता आ विज्ञानक सिद्धान्तकेँ किवदन्तीसँ जोड़बाक सोचपर अहाँकेँ आश्चर्य नै हएत जखन अहाँ हुनकर खाँटी लोककथा सभक अज्ञानताकेँ अही भूमिकामे देखब। Monday at 09:17 • Like • 4

Ashish Anchinhar गजेन्द्र ठाकुर- छुतहर/ छुतहर घैल/ छुतहा घैल------“अली बाबा आ चालीस चोर”- सम्पूर्ण दुनियाँकेँ बुझल छै जे ई मध्यकालीन अरबी लोककथा अछि जे “अरेबियन नाइट्स (१००१ कथा)” मे संकलित अछि आ ओइमे विवाद अछि जे ई अरेबियन नाइट्समे बादमे घोसियाएल गेल वा नै, मुदा ई मध्यकालीन अरबी लोककथा अछि, ऐ मे कोनो विवाद नै अछि। बलबनक अत्याचार आदिक की की गप साम्प्रदायिक मानसिकता लऽ कऽ मलंगिया जी कहि जाइ छथि से हुनकर लोककथाक प्रति सतही लगाव मात्रकँण देखार करैत अछि। “मिथिला तत्व विमर्श” वा “रमानाथ झा”क पंजीक सतही ज्ञान बहुत पहिनहिये खतम कऽ देल गेल अछि, आ तेँ ई लिखित रूपसँ हमरा सभक पंजी पोथीमे वर्णित अछि। गोनू झा विद्यापति सँ ३०० बर्ख पहिने भेलाह, मुदा मलंगियाजी ५० साल पुरान गप-सरक्काक आधारपर आगाँ बढ़ै छथि। हुनका बुझल छन्हि जे गोनूकेँ धूर्ताचार्य कहल गेल छन्हि मुदा संगे गोनूकेँ महामहोपाध्याय सेहो कहल गेल छन्हि से हुनका नै बुझल छन्हि!! गोनू झाक समयमे मुस्लिम मिथिलामे रहबे नै करथि तखन “तहसीलदारक दाढ़ी” कतऽ सँ आओत। लोकक कण्ठमे छुतहर छै ओकरा “छुतहा घैल” कऽ दियौ, लोकक कण्ठमे “कर ओसूली”करैबलाक दाढ़ी छै ओकरा “तहसीलदार”क दाढ़ी कहि साम्प्रदायिक आधारपर मुस्लिमकेँ अत्याचारी करार कऽ दियौ, आ तेहेन भूमिका लिखि दियौ जे रमानन्द झा “रमण” आ आन गोटे डरे समीक्षा नै करताह। एकटा पैदल सैनिक आ एकटा सतनामी (दलित-पिछड़ल वर्ग द्वारा शुरू कएल एकटा प्रगतिवादी सम्प्रदाय)क झगड़ासँ शुरू भेल सतनामी विद्रोह औरंगजेबक नीतिक विरोधमे छल आ ओइमे मस्जिदकेँ सेहो जराओल गेलै, मुदा गोनू झाक कर ओसूली अधिकारी मुस्लिम नै रहथि, लोककथामे ई गप नै छै, हँ जँ साम्प्रदायिक लोककथाकार कहल कथामे अपन वाद घोसियेलक आ लिखै काल बेइमानी केलक तँ तइसँ मैथिली लोककथाकेँ कोन सरोकार? फील्डवर्कक आधारपर जँ लोककथाक संकलन नै करब तँ अहिना हएत। महेन्द्र नारायण राम लिखै छथि जे लोककथामे जातित-पाइत नै होइ छै, मुदा मलंगियाजी से कोना मानताह। भगता सेहो हुनकर कथामे एबे करै छन्हि। आ असल कारण जइ कारणसँ ई मलंगिया जीक नाटकक अभिन्न अंग बनि जाइत अछि से अछि हुनकर आनुवंशिक जातीय श्रेष्ठता आधारित सोच। हुनकर नाटकमे मोटा-मोटी अढ़ाइ-अढ़ाइ पन्नाक घीच तीरि कऽ सत्रहटा दृश्य अछि, जइमे पन्द्रहम दृश्य धरि ओ छोटका जाइतक (मलंगियाजीक अपन इजाद कएल भाषा द्वारा) कथित भाषापर सवर्ण दर्शकक हँसबाक, आ भगताक भ्रष्ट-हिन्दीक माध्यमसँ छद्म हास्य उत्पन्न करबाक अपन पुरान पद्धतिक अनुसरण करै छथि। कथाकेँ उद्देश्यपूर्ण बनेबाक आग्रह ओ सोलहम दृश्यसँ करै छथि मुदा बाजी तावत हुनका हाथसँ निकलि जाइ छन्हि। आइ जखन संस्कृत नाटकोमे प्राकृत वा कोनो दोसर भाषाक प्रयोग नै होइत अछि, मलंगियाजीक भरतकेँ गलत सन्दर्भमे सोझाँ आनब संस्कृतसँ हुनकर अनभिज्ञताकेँ देखार करैत अछि आ भरत नाट्यशास्त्रपर हिन्दीमे जे सेकेण्डरी सोर्सक आधारपर लोक सभ पोथी लिखने छथि, तकरे कएल अध्ययन सिद्ध करैत अछि। Monday at 09:19 • Like • 4

Ashish Anchinhar गजेन्द्र ठाकुर- छुतहर/ छुतहर घैल/ छुतहा घैल----मलंगियाजीक ई कहब अछि जे नाटक जँ पढ़बामे नीक अछि तँ मंचन योग्य नै हएत, वा मंचन लेल लिखल नाटक पढ़बामे नीक नै लागत? हुनकर संस्कृत पाँतीकेँ उद्घृत करबासँ तँ यएह लगैत अछि। जँ नाटक पढ़बामे उद्वेलित नै करत तँ निर्देशक ओकर मंचनक निर्णय कोना लेत? आ मंचीय गुण की होइ छै, अढ़ाइ-अढ़ाइ पन्नाक सत्रहटा दृश्य, तथाकथित निम्न वर्गकेँ अपमानित करैबला जातिवादी भाषा, भगताक “बुझता है कि नहीं?” बला हिन्दी आ ऐ सभक सम्मिलनक ई “स्लैपस्टिक ह्यूमर”? आ जे एकर विरोध कऽ मैथिलीक समानान्तर रंगमंचक परिकल्पना प्रस्तुत करत से भऽ गेल नाटकक पठनीय तत्त्वक आग्रही आ जे पुरातनपंथी जातिवादी अछि से भेल नाटकक मंचीय तत्वक आग्रही!! की २१म शताब्दीमे मलंगियाजीक जाति आधारित वाक्य संरचना संस्कृत, हिन्दी वा कोनो आधुनिक भारतीय भाषाक नाटकमे (मैथिलीकेँ छोड़ि) स्वीकार्य भऽ सकत? आ जँ नै तँ ऐ शब्दावली लेल १८०० बर्ष पुरनका संस्कृत नाटकक गएर सन्दर्भित तथ्यकेँ, मूल संस्कृत भरत नाट्यशास्त्र नै पढ़ैबला नाटककार द्वारा, बेर-बेर ढालक रूपमे किए प्रयुक्त कएल जाइए? माथपर छिट्टा आ काँखमे बच्चा जँ कियो लेने अछि तँ ओ निम्न वर्गक अछि? ओकर आंगनक बारहमासामे ओ ऐ निम्न वर्गकेँ राड़ कहै छथि, कएक दशक बाद ई धरि सुधार आएल छन्हि जे ओ आब ओइ वर्गकेँ निम्न वर्ग कहि रहल छथि, ई सुधार स्वागत योग्य मुदा ऐ दीर्घ अवधि लेल बड्ड कम अछि। बबाजी कोना कथामे एलै आ गाजा कोना एलै आ ओइसँ बगियाक गाछक बगियाक कोन सम्बन्ध छै? मलंगियाजी अपन जाति-आधारित वाक्य संरचना, आ भ्रष्ट-हिन्दी मिश्रित वाक्य रचना कोना घोसिया सकितथि जँ भगता आ निम्न वर्गक छद्म संकल्पना नै अनितथि, ई तथ्य ओ बड्ड चतुराइसँ नुकेबाक प्रयास करै छथि, आ तेँ ओ मेडियोक्रिटीसँ आगाँ नै बढ़ि पबै छथि। आ तेँ हुनकामे ऐ नाट्य-कथाकेँ उद्देश्यपूर्ण बनेबाक आग्रह तँ छन्हि मुदा सामर्थ्य नै आबि पबै छन्हि। Monday at 09:19 • Like • 4 जातिवादी रंगमंचक भाषाक बानगी: Lalit Kumar Jha GAJENDRA JI CHHERAIT CHHAITHI GAJENDRA JI K APRAMANIK TATHA ASANGAT TIPPNI SABH PADHLAK BAD EAH LAGAIT ACHHI JE GAJENDRA JI LIKHAIT NAHI CHHAITH CHHATHI, LIDDI KARAIT CHHATHI. AAOR E BAL- BAL KA NIKLAIT RAHAIT ACHHI. HINAK E LIDDI MAITHILI SANSAR KE GHINA DET. KIYEK TA MAITHILI SANSAR CHHOT ACCHI. TE HINKA ANGREJI ME LIKHBAK CHHAHI. KARAN AKAR CHHETRA VISAL CHHAIK. AK KON ME HINAK LIDDI PACHA LETAIN. Monday at 10:09 • Like

Ashish Anchinhar मलंगिया जीक नाटक विद्वेष बढ़बैत अछि, हुनकर राड़ आ शोल्कन्हक प्रति आ ओकर भाषाक प्रति घृणा गएर ब्राह्म्ण केँ मैथिलीस‘ं दूर केलक अछि। Monday at 10:12 • Like • 4

Ashish Anchinhar lalit ji ahank pita aa ahank bhasha dunu ekke tarahak achhi, abhadra Monday at 10:12 • Like • 4

Ashish Anchinhar मलन्गिया जी छेड़ि घिनौने छथि Monday at 10:13 • Like • 4

Ashish Anchinhar Lalit Kumar Jha---ठीके कहैत छी भाइ ओना एकटा गदहाक मर्म दोसरे बड़का गदहा बुझि सकैए। एहि मामिलामे मतलब गदहपनमे अहाँ हमर सीनियर भेलहुँ। सधन्यवाद भाइ|... लिद्दीक ज्ञान देखि हम आर बेशी सन्तुष्ट छी , अहाँ अवश्य गदहपनमे हमर सीनियर भेलहुँ Monday at 10:14 • Like • 4

Ashish Anchinhar ललित जी अहाँ आ अहाँ पिता मलंगिया जी दुनू गोटेक भाषा एक्के तरहक अछि.. अभद्र Monday at 10:15 • Like • 4

Umesh Mandal मलंगिया जीक जीवनक प्रभाव हुनकर बच्चापर देखबामे अबैत अछि.. एतेक असभ्य? हुनकर (मलंगिया जी क) नाटक लोककेँ घृणा करब सिखेने अछि से सिद्ध भेल। ललित जी, गजेन्द्र ठाकुरक मैथिली/ अंग्रेजी/ तिरहुता मैथिली सभटा ग्रन्थक सूची एतए अछि: गजेन्द्र ठाकुर प्रबन्ध-निबन्ध-समालोचना भाग-१ सहस्रबाढ़नि (उपन्यास) सहस्राब्दीक चौपड़पर (पद्य संग्रह) गल्प-गुच्छ (विहनि आ लघु कथा संग्रह) संकर्षण (नाटक) त्वञ्चाहञ्च आ असञ्जाति मन (दूटा गीत प्रबन्ध) बाल मण्डली/ किशोर जगत (बाल नाटक, कथा, कविता आदि) उल्कामुख (नाटक) सहस्रशीर्षा (उपन्यास) प्रबन्ध-निबन्ध-समालोचना भाग दू (कुरुक्षेत्रम अन्तर्मनक-२) धांगि बाट बनेबाक दाम अगूबार पेने छँ (गजल संग्रह) शब्दशास्त्रम (कथा संग्रह) जलोदीप (बाल-नाटक संग्रह) कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक देवनागरी वर्सन KuruKshetramAntarmanak_GajendraThakur.pdf तिरहुता वर्सन KuruKshetramAntarmanak_GajendraThakur_Tirhuta.pdf ब्रेल वर्सन KuruKshetramAntarmanak_GajendraThakur_Braille.pdf सहस्रबाढ़नि_ब्रेल मैथिली (पी.डी.एफ.) सहस्रबाढ़नि_ब्रेल-मैथिली मिथिलाक इतिहास- भाग-२ (शीघ्र) जगदीश प्रसाद मण्डल- एकटा बायोग्राफी (शीघ्र) The Comet The_Science_of_Words On_the_dice-board_of_the_millennium A Survey of Maithili Literature- Vol.II- GAJENDRA THAKUR (soon) Learn Mithilakshar Script तिरहुता (मिथिलाक्षर) सीखू Learn_MithilakShara_GajendraThakur.pdf Learn Braille through Mithilakshar Script ब्रेल सीखू LearnBraille_through_Mithilakshara.pdf Learn International Phonetic Script through Mithilakshar Script अन्तर्राष्ट्रीय ध्वन्यात्मक वर्णमाला सीखू Learn_International_Phonetic_Alphabet_through_Mithilakshara.pdf गजेन्द्र ठाकुर, नागेन्द्र कुमार झा आ पञ्जीकार विद्यानन्द झा VIDEHA ENGLISH MAITHILI DICTIONARY जीनोम मैपिंग (४५० ए.डी.सँ २००९ ए.डी.)--मिथिलाक पञ्जी प्रबन्ध जीनोम मैपिंग (४५० ए.डी.सँ २००९ ए.डी.)--मिथिलाक पञ्जी प्रबन्ध (Click this link to download) http://www.box.net/shared/yx4b9r4kab (Click this link to download) OR right click the following link and save target as:- http://videha123.wordpress.com/files/2009/11/panji_crc1.pdf AND click this link to download some of the jpg images of palm-leaf manuscripts of Panji. http://www.esnips.com/web/videha AND CLICK EACH OF THE FOLLOWING 17 LINKS TO DOWNLOAD ALL THE 11000 JPG IMAGES IN 17 PDF FILES. पंजी (मूल मिथिलाक्षर ताड़पत्र) दूषण पंजी मोदानन्द झा शाखा पंजी मंडार- मरड़े कश्यप-प्राचीन प्राचीन पंजी (लेमीनेट कएल) उतेढ़ पंजी पनिचोभे बीरपुर दरभंगा राज आदेश उतेढ आदि छोटी झा पुस्तक निर्देशिका पत्र पंजी मूलग्राम पंजी मूलग्राम परगना हिसाबे पंजी मूल पंजी-२ मूल पंजी-३ मूल पंजी-४ मूल पंजी-५ मूल पंजी-६ मूल पंजी-७ MAITHILI-ENGLISH DICTIONARIES Maithili_English_Dictionary_Vol.I.pdf MaithiliEnglishDictionary_Vol.II_GajendraThakur.pdf ENGLISH-MAITHILI DICTIONARIES EnglishMaithiliDictionary_Vol.I_GajendraThakur.pdf विदेहक सदेह (प्रिंट) अंक VIDEHA print form विदेह ई-पत्रिकाक पहिल 25 अंकक रचनाक संग containing matter from first 25 issues of Videha e-magazine देवनागरी वर्सन SADEHA_VIDEHA_DEVNAGARIVERSION_PART_1.pdf SADEHA_VIDEHA_DEVNAGARIVERSION_PART_2.pdf तिरहुता वर्सन SADEHA_VIDEHA_TIRHUTAVERSION_PART_1.pdf SADEHA_VIDEHA_TIRHUTAVERSION_PART_2.pdf विदेह ई-पत्रिकाक २६ म सँ ५० म अंकक बीछल रचनाक संग containing matter from 26th to 50th issue of Videha e-magazine विदेह:सदेह:२ (मैथिली प्रबन्ध-निबन्ध-समालोचना २००९-१०) विदेह:सदेह:३ (मैथिली पद्य २००९-१०) विदेह:सदेह:४ (मैथिली कथा २००९-१०) विदेह ई-पत्रिकाक पहिल ५० अंक विदेह ई-पत्रिकाक ५०म सँ आगाँक अंक PANJI_CRC.pdf - File Shared from Box - Free Online File Storage www.box.com Monday at 10:32 • Unlike • 4

Umesh Mandal ललित जी, सात जन्म लेबए पड़त अहाँकेँ आ मलंगिया जी केँ, अहाँ लिद्दीक विश्लेषण करैत रहू Monday at 10:33 • Unlike • 5

Ashish Anchinhar ललित जी तँ गदहा छथि तँए खाली लिद्दिएक विश्लेषण कए सकैत छथि Monday at 10:48 • Like • 4

Shiv Kumar Jha सात जन्म नै ललित जी,आ मलंगिया जी केँ,सत्तरि जन्म लेबऽ पड़तन्हि। Monday at 10:55 • Like • 3

Sanjay Kumar Jha हद क देलियै अपने सब. अपना में लड़ी क , गारी फज्जती क क की मैथिलि आ मिथिला के निक होयत, इ अहाँ सब सोचलाहूँ एको बेर. बंद करू इ प्रलाप आ सब गोटे मिली के एहन काज करू जाहि से की मैथिलि आ मिथिला के उन्नति हुअय. धन्यवाद. Monday at 22:02 • Like • 1

Gunjan Shree आई काल्हि सब एक दोसरा के दुसबा में लागल अछी,जौ कियो ग़लत केलक अछी त जिनका खराब लगलैन्ह हुनका चाही जे ओहि सौ आगू आबि क ओहि सौ बढ़िया करै,कोनो डैरि(line) के मेटा क छोट केनेय छोट लोकक काज होइत चेक,ओना facebook पर इ सब झगड़ा नही करय जाय से निबेदन..... Tuesday at 02:30 • Like • 3

Vinit Utpal दिल्ली में भेल साहित्य अकादमी कथा गोष्ठी में मलंगिया जी के सुपुत्र अप्पन पिताजीक नाम से पुरस्कार शुरू करबाक लेल लोक सें निहोरा करैत छलाह. अहि लेल अजित आजाद जी के खुशामद सेहो करैत छल जे अहां हमर बाबूजी के नाम पर अहि काजक ले आगा आबू. अजित आजाद जी के कहब छल जे अहि लेल एक लाख टका अहां कोनो संस्थान के जमा क दियो आ ओकर ब्याज से पुरस्कार शुरू भ जायत. मुदा हमरा जानल ई गप आगू नहि बढ़ल. ललित जी, अहिना गजशास्त्र लिखैत रहू. अहां के बुझले होयत जे 'हाथी चले बाजार, कुत्ता भूके हजार'. हाथी के डर से जंगल के राजा नुकायल घुरैत अछि आ अहां ते चिट्टा ते छी नहि जे गज के नाक में घुसि के किछु क सकब. Tuesday at 04:35 • Unlike • 4

Ashish Anchinhar गुंजन बौआ, ई ककरो दुसबाक नै वरन् मलंगिया जीक जातिवादी रंगमंचक विरोध छै, आ ओइसँ कए किलोमीटर पैघ डैरि बेचन ठाकुर जी द्वारा खीचि लेल गेल छै, देखल जाए http://maithili-drama.blogspot.in/ विदेह मैथिली नाट्य उत्सव maithili-drama.blogspot.com Tuesday at 07:28 • Like • 4 •

Umesh Mandal http://maithili-drama.blogspot.com/2011/09/blog-post_25.html Tuesday at 09:28 • Like • 3

Umesh Mandal http://maithili-drama.blogspot.com/2011/08/blog-post_1815.html विदेह मैथिली नाट्य उत्सव: बेचन ठाकुर -बाप भेल पित्ती maithili-drama.blogspot.com Tuesday at 09:29 • Like • 3

Umesh Mandal http://maithili-drama.blogspot.com/2011/08/blog-post_8210.html विदेह मैथिली नाट्य उत्सव: अधिकार- बेचन ठाकुर maithili-drama.blogspot.com Tuesday at 09:29 • Unlike • 5

Umesh Mandal जाधरि समीक्षाकेँ खिच्चातानी आ खिच्चातानीकेँ समीक्षा अहाँ बुझैत रहबै गुंजनश्रीजी, ललित जी आ संजय जी ताधरि अहाँसभ अहिना ओझरीमे रहब, Tuesday at 09:36 • Unlike • 5

Ashish Chaudhary कलकत्तामे गंगा झा छथि, नाट्य निर्देशक, ओ मलंगिया जीसँ कहलखिन्ह जे नाटकमे जातिवादी गारि कम कऽ दैले तैपर हुनका मलंगियाजी जवाब देलखिन्ह जे मलंगियाजीकेँ जतेक गारि अबै छनि तकर दसो प्रतिशत नाटकमे नै आएल छै, शर्मनाक। Yesterday at 06:23 • Like • 2

Ashish Chaudhary बेचन ठाकुर नाटककार आ नाट्य निर्देशक http://maithili-drama.blogspot.in/p/blog-page.html मैथिलीक सर्वश्रेष्ठ नाटककार आ नाट्य निर्देशकक रूप्मे उभरि कऽ आएल छथि, तै पाछाँ बेचन जीक उत्कृष्ट जिनगी आ सोच छन्हि। विदेह मैथिली नाट्य उत्सव: पेटार maithili-drama.blogspot.com Yesterday at 06:26 • Like • 2

Ashish Anchinhar मैथिलीक समानान्तर रंगमंचक जन्मदाता: सभसँ बेसी मैथिली नाटकक निर्देशन: राजरोगसँ दूर: जातीय रंगमंचक विरुद्ध बेचन ठाकुर जीक संघर्ष (मुन्नाजी आ अजित आजादक सोझाँमे मलंगिया जीक भड़ैत प्रकाश झा जकरा लेल कहै छथि- भरि दिन केश काटैत रहै छल- पाठकक लेल ई सूचना जे जातिवादी रंगमंचसँ जुड़ल लोक केश काटनाइकेँ खराप बुझै छथि, संगहि ईहो सूचना जे बेचन ठाकुर सैम पित्रोदा (जे भारतमे टेक्नोलोजी मिशनक प्रारम्भ केलन्हि) सन बरही जातिक छथि, जातिवादी रंगमंचकर्मी लोकनि हुनकर गौँआ अंतिकाक सहायक सम्पादक श्रीधरमसँ कन्फर्म कऽ सकै छथि): हिनका नामसँ कतेको रेकॉर्ड दर्ज अछि, जेना संस्कृतक बाद पहिल बेर मैथिलीमे भरत नाट्यशास्त्रक रंगमंचक संकल्पनाक अनुसार नाटक, मात्र महिला नाट्यकर्मीक माध्यमसँ ६-६ घण्टासँ ऊपरक नाटकक मंचन (जखनकि जातिवादी नाट्यकर्मी अदहा घण्टा- ४५ मिनटक नाटकक निष्पादन लेल महिला रंगकर्मीक लेल बौखैत रहै छथि, कारण हिनकर सभक बलगोविना प्रवृत्तिक कारण आ कुकुरचालिक कारण बहुत रास महिला मैथिली नाटकसँ दूर भागि गेलीह। मुदा सभ कान्तिदर्शीकेँ जातिवादिताक कोप, गारि गंजन सुनऽ पड़ै छै, मुदा बेचन ठाकुर एक्केटा छथि...हमरा सभ नाट्यकर्मी, रंगमंचकर्मी, नाटककारकेँ हुनकर मैथिली समानान्तर रंगमंच, जे २५-३० सालसँ अनवरत चलि रहल अछि, पर गर्व अछि। मिथिलाक समाज जँ जातिवादी रंगमंचक बावजूद नै टूटल अछि तँ तकर कारण अछि बेचन ठाकुर जीक मैथिली समानान्तर रंगमंच... आ से मलंगिया जीक काल्हि जन्मल भड़ैत सभकेँ नै बुझल छन्हि, मुदा मलंगिया केँ बुझल छन्हि जे हुनकासँ बेशी संख्यात्मक आ गुणात्मक नाटक/ एकांकी बेचन जीक लिखल छन्हि आ ओइ बेचन ठाकुर आ गुणनाथ झाक एकांकी मैथिली एकांकी संग्रहमे नै देलन्हि.. एकलव्यक औंठा द्रोण कटबा लेलन्हि, मुदा एतऽ तँ गुरुक औंठा मलंगियाजी कटबा रहल छथि..

Rishi Kumar Jha GAJENDRA JI CHHERAIT CHHAITHI GAJENDRA JI K APRAMANIK TATHA ASANGAT TIPPNI SABH PADHLAK BAD EAH LAGAIT ACHHI JE GAJENDRA JI LIKHAIT NAHI CHHAITH CHHATHI, LIDDI KARAIT CHHATHI. AAOR E BAL- BAL KA NIKLAIT RAHAIT ACHHI. HINAK E LIDDI MAITHILI SANSAR KE GHINA DET. KIYEK TA MAITHILI SANSAR CHHOT ACCHI. TE HINKA ANGREJI ME LIKHBAK CHHAHI. KARAN AKAR CHHETRA VISAL CHHAIK. AK KON ME HINAK LIDDI PACHA LETAIN. — in New Delhi. Like • • Monday at 9:58am • Shubh Narayan Jha and 3 others like this.

Lalit Kumar Jha bahut badhiya Monday at 10:07am • Like

Naresh Jha bahut uchit likhne chi rishi Monday at 12:39pm • Like

Ajit Azad are chhoro bhi yaar...apne dil ko itna bara kar lena chahiye ki isme saundar bhi sama jai

जातिवादी रंगमंचक भाषाक बानगी:

Mukesh Jha vinit utpal pyada/pyaja no -420विनीत उत्पल जी के लेल जिनका आँखी में रतौधी छैन | अपन आलेख मे लिखैत छैथ जे बाबा के उपर कोनो कार्यक्रम नई भेल अछि | यो उत्पल जी जौ नौकरी के बाद जे समय बचैत अछि से यदि चमचैई के अलावा अहि तरहक आयोजन देखबा मे केने रहितियेक त अहि तरहक भ्रम नहि होयत | उम्मीद अछि आगू स ध्यान राखब |

Mukesh Jha Sujhal yo vinit utpal jee

Mukesh Jha जत्त मलंगिया जी के नाटक के तुलना भारतीय रंगमंच के प्रसिद्ध नाटककार जेना मोहन राकेश, विजय तेंदुलकर, गिरीश कर्नाड, बादल सरकार आदि स भ रहल छैक ओहि ठाम आई कालिह मे जनमल मैथिली के टुच्चा नाटकार आ नाटक स तुलना केनाई बेईमानी अछि |

Mukesh Jha से बेईमान सब स पुछियोक भाई | 23 hours ago • Like Anuradha Jha अहि मे कोनो दू मत नई जे महेंद्र मलंगिया मैथिली के सर्वश्रेष्ट नाटककार छैथ | 23 hours ago • Like Anuradha Jha मलंगिया जी पर जाही तरह फेस बुक पर किछु लोक अनाप सनाप लिखी क श्रेष्टता पाब चाही रहल छैथ से सर्वदा गलत अछि | श्रेष्टता पेबाक कोनो दोसर बाट ताकल जा सकैत अछि | किछु लोकक पोस्ट आ भाषा घोर आपत्ति जनक अछि | अहि स मिथिला मैथिली के अपमान भ रहल अछि | कुंठा स ग्रसित नई हाउ आ अपन नीक काज कय क अपन स्थान बनाव नई की खिच्चम तानी मे लागल रहैत जाऊ | 23 hours ago • Like Prakash Jha मैथिली नाटकक ज्ञान सब के नै छनि. जे लोकनि नाटक वाकि रंगमंच स' जुड़ल छथि हुनका सभ स' विचार लेल जयबाक चाही. जेना कि कुणाल जी, गगन जी, किशोर केशव, प्रेमलता मिश्र प्रेम, शिवनाथ मंडल, यदुवीर यादव आदि आदि....बाँकी फेसबुक पर जे भ' रहल अछि ओकर तह मे किछु आर अछि. कोनो खास व्यक्ति केँ मात्र साहित्य अकादेमी पुरस्कार दियबाक लेल भ' रहल अछि. एही बीच महेन्द्र मलंगिया जीक पुस्तक आबि गेलन्हि कि ई लोकनि डरि गेल छथि... त' लगल्न्हि अछि उंटा चालि चल' .... 23 hours ago • Like Mukesh Jha उचित कहल अनुराधा जी मुदा किछु बेकहल लोक के कोना रोकल जा सकैत अछि | जे की अपना आ अपन खानदान के श्रेष्ट बनेबाक लेल सब कर्म करबाक लेल तैयार छैथ | जिनका मे टेलेंट हेतैन तिनका जोर जबरदस्ती नई कर परैत छैक से के बुझेतैन महामुर्ख लोकनि के | मलंगिया जी के नाटक जतेक लोकप्रिय अछि प्रेक्षक के बीच मे किनक नाटक लोकप्रिय अछि से कहौत नबका जन्मौटी नाटक के हितेषी लोकनि ? 23 hours ago • Like Mukesh Jha ओहो त एकर मतलब ई जे मात्र ई ओझराब के योजना भरी अछि ?

Ashish Anchinhar एखन हमरा मोबाइल पर एकटा नम्बर सँ फोन आएल छल जकर नम्बर अछि----08595372399 । फोन करब बला कहलाह जे हम बजरंग मंडल छी। आ इ कहू जे आशीष चौधरी के छथि। हम कहलिअन्हि जे से तँ प्रकाश झासँ पूछि लिअ। ओ हमरा कहलाह जे हम प्रकाश झासँ किएक पुछबै। आ बातचीत क्रममे कहलाह जे हमर नाम किएक फेसबुक पर आएल। हम कहलिअन्हि जे हमरा जे अहाँ भोरमे अहाँ कहलहुँ जे रातिमे इ सभ मारए बला छलाह। मुदा हम रोकबा देलहुँ। बातचीतकेँ अंतमे बजरंग जी इहो कहलाह जे फेसबूक पर इ बात आनि बहुत गलत केलहुँ अछि। सभ गोटाकेँ धआन देआबी जे बजरंग मंडल मैथिली फांउडेशनसँ बेसी जुड़ल छथि जे की मैलोरंगसँ टूटि कए बनल एकटा संस्था अछि। मुदा फोन करए बला कहलाह जे हम दोसर बजरंग मंडल छी। भए सकैए जे दूटा बजरंग मंडल होथि मुदा ई संभव नै छै जे ओ दूनू के दूनू बजरंग मंडल हमरा चिन्हैत होथि। ओना जँ बजरंग जीकेँ अवाजसँ ई स्पष्ट छल जे कोनो दबाबमे जरूर छथि।ओना जँ बजरंग जी चाहथि तँ अपन पहिचान दए सकै छथि। फोन नम्बर सेहो ट्रेस भए जेतै।

संगे-संग प्रकाश झा स्वंय अपने मूँहसँ मुन्ना जीकेँ कहलकै जे अंतो-अंत धरि हम आशीष अनचिन्हारकेँ मारबै ताहि पर मुन्ना जी कहलखिन्ह जे हम अनचिन्हार संगे परिचय करबा दै छी कने छूओ क देखिऔ। ताहि पर प्रकाश झाक एकटा परम ब्राम्हणवादी सहयोगी मुन्ना जीकेँ कहलखिन्ह जे अहाँ बचा लेबै अनचिन्हारकेँ । ताहि पर मुन्ना जी कहलखिन्ह जे हम सभ कहै नै छिऐ करै छीऐ खाली एकबेर छू क देखिऔ। ताहि पर प्रकाश झा कहलखिन्ह जे कोनो बात नै देखिऔ जे की होइ छै। जँ साहित्य अकादेमीक ओहि कथा गोष्ठीक फोटो-विडियोकेँ देखल जाए तँ ई स्पष्ट अछि जे प्रकाश झा-मुकेश झा हमरा मरबा लेल व्यग्र छल।उपरमे एकटा फोटो राखि रहल छी जाहिमे की कए रहल अछि प्रकाश से देखू---- मुदा मुन्ना जीक कहलाक बाद डरें किछु नै कएल पार लगलै प्रकाश झा एनड मुकेश झा कम्पनीकेँ।

Ashish Chaudhary मलंगिया आ प्रकाश झाक इशारापर भ्रमरजीक विरुद्ध मिथिलादर्शन आ आन-आन ठाम चिट्ठी भेजनिहार मुकेश झा आब इन्टरनेट पर आबि गेल अछि, ऐ फ्रॉड आइ.डी.सँ सावधान। ई ककरो दोसरा द्वारा संचालित होइत अछि.. सावधान। ... मलंगिया जीक नाटक लोककेँ बेसी कट्टर बनेलक अछि, गएर ब्राह्मण मैथिलीसँ दूर भागल अछि। ... प्रकाश झा आ मुकेश झा घोषणा केने रहथि जे २४ मार्च २०१२ क साहित्य अकादेमी कथा गोष्ठीमे आशीष अनचिन्हारकेँ मारताह, बजरंग मण्डल ओतए आशीष अनचिन्हारकेँ ऐ मादे सतर्क सेहो केने रहथि। मुदा छूलो भेलन्हि?malangiya ji jatek mehnati lathait posai me lagelanhi tatek jan neek naatak likhbai me lagabitathi te aai mukesh jha, rajiv mishra, lalit jha, prakash jha san nirlajjak aavashyakta nai rahitanhi Bhaskar Jha भाई एहन ऎहन आपत्तिजनक गप के जतय तुलि देबय ओतय बढत! किनको व्यक्तिगत सोच आ आपत्ति के सार्वजनिक नहिं कयल जयबाक चाही। विद्वजन के अपन अपन मतानतर होयत छई। वोहि मतानतर पर हम - अहां आपस में नहिं लड़ि। दूनू महान व्यक्तित्व के धनी छथि। दूनू गोटे सं हमरा सबके सीखबाक चाही। 7 April at 21:35 • Like • 1

Ashish Chaudhary भाइ पत्रिका सभमे लठैतक छद्म नामसँ चिट्ठी पठेबाक प्रवृत्तिपर किछु तँ कमी आएत।

Ashish Chaudhary भाइ पत्रिका सभमे लठैतक छद्म नामसँ चिट्ठी पठेबाक प्रवृत्तिपर किछु तँ कमी आएत। 7 April at 21:46 • Like • 2

Bhaskar Jha हां सेहो बात सही अछि 7 April at 22:05 • Like • 1

Manoj Jha इ सब मिथिला मैथिली के लेल दुर्भाग्यक गप्प थिक .. 7 April at 22:55 via Mobile • Like • 3

Umesh Mandal सामंती लोकनि‍क बेवहारि‍क परि‍चय.... 8 April at 01:40 • Like • 1

Shubh Narayan Jha kane positive bha chalba sa maithili ke vikas chhaik ne ki ek dosra ke khichay kela sa

Ashish Anchinhar जातिवादी रंगमंचक शब्दावलीक बानगी:-जातीय रंगमंचक भाषाक बानगी:- Prakash Jha सुप्रसिद्ध कथक नृत्यांगना सुश्री ...... आजकल दिल्ली में ही हैं. 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Vinit Utpal जातिवादी रंगमंच क प्राइवेट पार्टी मे ५-१० मिनट यात्री आ राजकमल कें देल गेलन्हि आ ओकर फोटो १०-२० साल धरि बेचल जाएत , ई जातिवादी रंगमंच अखबारक कतरन समेटैत अछि. 4 hours ago • Unlike • 1 Vinit Utpal (यात्रीक जन्म ३० जून १९११ छन्हि ) 4 hours ago • Like Ashish Anchinhar विनीत भाइ ई सभ फण्ड केर खेला छै जहिया फण्ड भेटतै तहिये बाबा मोन पड़तिन्ह आ सातो जन्म धरि फोटो लगा इ बाबू सभ हल्ला मचेताह।.... 4 hours ago • Like Ashish Anchinhar भाइ एकट गप्प इहो जे जेना जातिवादी रंगकर्मी सभ अपन दिमाग मे कूड़ा-कर्कट भरने रहै छथि तेनाहित अपन घर-आफिस कतरनसँ भरने रहै छथि। ई कतरन सभ फण्ड उगाही केर नीक साधन छै जातिवादी सभ लेल। जँ ई कतरन नै रहतै तँ फण्ड देतै के। ओना विनीत भाइ अहाँक जानकारी लेल ई कहि दी जे पेड पत्रकारितामे पाइ दए न्यूज छपा लेब जातिवादी सभ लेल कोनो बड़का गप्प नै। फोटोशापसँ ब्रोशर बना लेनाइ सेहो आसान छै। प्रिंटर सँ पर्चा सेहो छपा लिअ। भारत सरकार फण्ड देबा कालमे इएह सभ देखैत छै।.. 4 hours ago • Like Mukesh Jha यो अनचिन्हार जी काज कय क हल्ला करैत छीयेक आहाँ और आहाँ के ग्रुप भूते त बाबा के नाम पर एकटा गोष्टीयो नई कायल भेल | 4 hours ago • Like Mukesh Jha यो अन्चिहार जाहि ग्रुप के पोसुवा छी आहाँ ओही ग्रुप स एक बेर मंडी हाउस मे एकटा बाबा के नाम पर गोष्टी करबा क देखा दियह | 4 hours ago • Like Rajiv Mishra kya bat hai mukesh bhai gargara diye... 4 hours ago • Like Ashish Anchinhar जातिवादी रंगकर्मीक बलगोविना प्रवृत्तिक कारण आ कुकुरचालिक कारण बहुत रास महिला मैथिली नाटकसँ दूर भागि गेलीह। .... 12 minutes ago • Like Ashish Anchinhar राजीव मिश्रा, प्रकाश झा आ मुकेश झा सन भड़ैतक चलते कियो परिवार आ बहु बेटीक संग जातिवादी रंगमंचक समारोह (प्राइवेट पार्टी)मे नै जाइए। about an hour ago • Like Ashish Anchinhar जातिवादी रंगमंचक शब्दावलीक बानगी:Mukesh Jha साहित्य अकेदमी पुरस्कार के कारण भ रहल अछि राजनीति | जातिवाद के हवाला दय कय रहल छैथ किछु चिन्हार आ किछु अनचिन्हार लोक घिनायल राजनीति | यो महामहिम लोकनि साहित्य अकादेमी पुरस्कार कोनो जाती विशेष के नई भेटैत छैक, उत्कृष्ट रचना के देल जायत छैक | सबुर राखु रचना मे दम्म होयत त अवश्य भेटत, अन्धेर्ज जुनि हाउ | जिनका पुरस्कार दियाब चाहैत छियेन हुनका कहियोन जे साहित्य के कोनो एक विधा के मजबूत करताह | खने कविता, खने कहानी आ आब नाटक मे सेहो अपन कलम भाजीं रहला अछि, यो ताहि स नही चलत, | खैर हल्ला करब त दओ दिया से भारी बात नई | मुदा ऐना नई चलत, जाही नाटक के आहाँ लोकनि पुरस्कार दियाबह लेल व्यग्र छि, ताहि मे दम नई अछि, आधा किताब एक सीन मे आ बांकी आधा मे ७ गो सीन, से नई होयत छैक यो सरकार | आ कनि दिमाग लगाब लेल सेहो कहियोन नाटककार महोदय के -- | नाटक के अपन व्याकरण छैक तकरा अनुसरण करैत लिखता त मंचित होमा मे असोकर्ज नई हेतैक | ध्यान दियोक |आ बेसी स बेसी मंचिंत नाटक के महत्व होयत छैक | about an hour ago • Like Ashish Anchinhar ई डायलोग- "Mukesh Jha साहित्य अकेदमी पुरस्कार के कारण भ रहल अछि राजनीति | जातिवाद के हवाला दय कय रहल छैथ किछु चिन्हार आ किछु अनचिन्हार लोक घिनायल राजनीति | यो महामहिम लोकनि साहित्य अकादेमी पुरस्कार कोनो जाती विशेष के नई भेटैत छैक, उत्कृष्ट रचना के देल जायत छैक | सबुर राखु रचना मे दम्म होयत त अवश्य भेटत, अन्धेर्ज जुनि हाउ | जिनका पुरस्कार दियाब चाहैत छियेन हुनका कहियोन जे साहित्य के कोनो एक विधा के मजबूत करताह | खने कविता, खने कहानी आ आब नाटक मे सेहो अपन कलम भाजीं रहला अछि, यो ताहि स नही चलत, | खैर हल्ला करब त दओ दिया से भारी बात नई | मुदा ऐना नई चलत, जाही नाटक के आहाँ लोकनि पुरस्कार दियाबह लेल व्यग्र छि, ताहि मे दम नई अछि, आधा किताब एक सीन मे आ बांकी आधा मे ७ गो सीन, से नई होयत छैक यो सरकार | आ कनि दिमाग लगाब लेल सेहो कहियोन नाटककार महोदय के -- | नाटक के अपन व्याकरण छैक तकरा अनुसरण करैत लिखता त मंचित होमा मे असोकर्ज नई हेतैक | ध्यान दियोक |आ बेसी स बेसी मंचिंत नाटक के महत्व होयत छैक |" प्रकाश झा मुन्नाजीकेँ बेचन ठाकुरक नाटकक (जिनका ओ भरि दिन केश काटैबला कहैए) विषयमे ई गप कहने रहन्हि। आब सिद्ध् भेल जे ई मुकेश झा नै प्रकाश झा अछि। 5 minutes ago • Like Ashish Anchinhar प्रकाश झा बाउ: टिनही चश्मासँ देखू बेचन ठाकुरक नाटक: "आधा किताब एक सीन मे आ बांकी आधा मे ७ गो सीन"- दुनिया लग ई किताब छै आ अपन भड़ैती जारी राखू, झूठक खेतीक संग: अहाँ भड़ैतीक अलाबे आर किछु नै कऽ सकै छी बाउ। एतए पोथीक लिंक अछि, पढ़ू आ माथ पीटू https://sites.google.com/a/videha.com/videha-pothi/Home/BechanThakur.pdf?attredirects=0 https://sites.google.com/a/videha.com/videha-pothi/Home/BechanThakur.pdf?attredirects=0 8869256024489431480-a-videha-com-s-sites.googlegroups.com A few seconds ago • Like • Ashish Anchinhar मलंगिया जी केँ सेहो पढ़बा देबन्हि- गुणनाथ झा कहै छलाह जे होइ छल जे उमेरक संग मलंगियाजी आधुनिक रंगमंच बुझि जेताह., मुदा काश... https://sites.google.com/a/videha.com/videha-pothi/Home/BechanThakur.pdf?attredirects=0‎8869256024489431480-a-videha-com-s-sites.googlegroups.com about an hour ago • Like • Sangeeta Jha gajendra jee prasidh hobay ke lel badhiya chai prasidh aadmi ke aalochna karu.aakhir malangia jee ke naam dekh ka lok kum sa kum aahan ke naam padhiye let.Ona suraj oar thuku tha thukappne par parai chai. mathili ke jeevan ahak soch par nirbhar chai aascharya 54 minutes ago • Unlike • 1 Gajendra Thakur जातिवादी रंगमंचक महिला विरोधी, दलित पिछड़ा विरोधी प्रवृत्ति दुखी करैत अछि। समानान्तर रंगमंच एकर विरोधमे आजन्म ठाढ़ रहत।

Poonam Mandal काल्हि मलंगिया जीक मैलोरंगक (जकर आइ काल्हि अध्यक्ष देवशंकर नवीन छथि) दूटा सदस्य प्रकाश झा आ मुकेश झा एकटा महिलाकेँ बदनाम करबाक कोशिश (हम कोशिशे कहब, कारण हिनका सभक औकात ततेक नै छन्हि जे ओइमे ई सफल होथि, साहित्यिक सम्वेदनाक विश्लेषण ओ कऽ सकता?) केलन्हि। संगे ई दुनू गोटा जगदीश प्रसाद मण्डल आ बेचन ठाकुर जीक प्रति जातिगत अपशब्द सेहो कहलन्हि। अही तरहक जातिगत टिप्पणी देवशंकर नवीन द्वारा वैदेही पत्रिकामे सुभाष चन्द्र यादव जीक विरुद्ध सेहो कएल गेल रहए। की एक्कैसम शताब्दीक ई सभ लेखक छथि? एक्कैसम शताब्दीक रंगमंचकर्मी छथि? मैलोरंग पत्रिकामे प्रेमराज नामसँ अनलकान्त (गौरीनाथ- अंतिकाक सम्पादक)केँ गारि देनिहार मैलोरंगक वर्तमान वा पूर्व अध्यक्ष अपन नाम किए नै सोझाँ आनलन्हि, किए प्रकाश आ मुकेशक कान्हपर बन्दूक राखि ओ प्रेमराजक छद्म नामसँ गारि पढ़लन्हि, पत्रिकामे जे ई मेल प्रेमराजक देल अछि ओ बाउन्स कऽ रहल अछि। मलंगियाकेँ बुजुर्गक रूपमे सम्मानदेबाक आग्रही जगदीश प्रसाद मण्डल आ बेचन ठाकुर केँ किए गरिया रहल छथि? Ashish Anchinhar धरती गोल छै..... प्रेमराजकेँ त्रिकालज्ञसँ भेँट भैए गेलै।.. ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। रवि भूषण पाठक ओक्‍कर तोहर हम्‍मर सपना- २ कांटी आ मरिया जजिमान आ पुरहितक सम्बन्ध पता नइ कोदारि आ बेंटक संबंध छैक वा कांटी आ मरिया क’ । बुझाइत तऽ एहिना छइ जे एगो मरिया हेतै त’ दोसर के कांटी बनय्यै पड़तै ।आ एहनो कोनो जोगाड़ नइ बैसै छैक जे कांटियो रहि के मरिया क’ मारि नइ खाए पड़ै । आ मरिया रहि के केओ ऋषि मुनि बनल रहए ,से हमरा जनैत तऽ असंभवे बूझू .....ओना हम पुरहित रहियइ आ हमर भरि दिन जजिमनिके मे बीतए ......वियाहे-श्राद्ध नइ ,मारि-पीट , गारि-उपराग ,टोना-मानी सभक हिस्सान ।हअर जोतनइ ,चौकी केनए ,बाउग केनइ ,कमौनी ,पानि देनए ,खाद छिटनइ ,जजात के घोघेनए ,दाना पुष्ट. भेनए ,कीड़ा लागनइ ,दवाइ के स्प्रे ,सूखनए ,काटनए ,दउनी वा झंटेनइ ,कखनो कखनो मशीन सँ दउनी..........अन-पानि सुखेनए आ कोठी अथवा बोरा मे राखनए .......ऐ सब प्रक्रिया मे हमर सक्रिय भागेदारी रहैत छलै आ हम दिने नइ गुनैत रहियइ ,कखनो कखनो सलाहक स्वकरूप समाजिक आ वैज्ञानिक सेहो भ’ जाइत रहै ।हम कोनो मार्क्स वादी बात नइ करैत छी ,ने हम ई मानैत छी जे उत्पा्दन प्रक्रिया मे हमर समान भागेदारी रहै .......ने विश्वाहस क’ स्तिर पर ने समाजक स्तीर पर । अपन भूमिका के अवमूल्य न नइ करितौं ई कहबा मे हमरा कोनो लाज नइ कि मिलै वला प्रतिफल असंतोषजनक ,असमान आ अमानवीय छलै ।कोठी आ खरिहान के भरै मे सांस्कृितिक सहयोगी आ मिलै छलै आसेर ,सेर भर अगऊं ।एगो दूगो बाबू सब छलखिन जे साल मे एक –दू बेर पसेरी भरि दाना दैत छलखिन ।आ ई हमर खानदानी कर्त्तूव्यब छलै कि जजिमानक समृद्धि क’ प्रति विरक्तिक भाव बनेने रहियइ ।भगवती अन्न पूर्णाक पूजा मे कतओ कमी छलै आ अन्निपूर्णों खूब तमाशा देखबैत रहथिन ...........

आ जजिमानक पुरूखा सभक बरखी ,छाया ,एकोदिष्ट क’ तिथि हमरा मुंहजबानी यादि रहै ......यादि रहै यैह बात नइ ,यादि केनए परमावश्याक रहै ,महाकर्त्ताव्य ............शायदेसंयोग यदि कहियो बिसरि गेलियइ त’ ओइ दिन जजिमान महासामंत भऽ जाइत छलैखिन आ हम महादास......आ मृत्यु.दंड सँ कनिये छोट दंड रहै ई वाक्यन ‘हमरा अहांक कट्टमकट्टी ।हम आब फलां पंमडी जी सँ पूजायब’ ।आ जइ दिन बाबू के ई बात पता लागेन ,हमर देह ,हाथ ,माथ पर हुनकर खड़ाम आ लाठीक चेन्हू अहां गिन नइ पेतियइ .........ओना माए गानैत छलखिन आ कखनो बाबू आ कखनो दुनियो के ......कानबो करथिन आ गारियो देथिन.........

एतबे नइ एकादशी ,त्रयोदशी ,चतुर्दशी ,पूर्णिमा अमावस्यान सब........जेना सूर्य आ चन्द्रनमा हमरे पूछि के डोलैत छथिन ।आ कोन एकादशी करियौ आ कोन छोडि़यौ ...ईहो बात विधिपूर्वक हेबाक चाही ।आ बात-बात पर महादेव पूजा ।पान सौ आ हजार त’ डेलीए पूजाथिन ,मुदा कहियो कहियो सवा लाख महादेव क’ बात सेहो होए ...आ ओइ दिन त’ एकटा उत्सकवक वातावरण बनि जाए ,ओइ दिन बाबू महंत जँका करथिन ,किएक त’ हजार दूहजार सभक घर मे बनए आ बाबूए हुनका सभ के दक्षिणा बांटथिन ।आ बाबू ईमानदारी पूर्वक दक्षिणा बांटथिन तें हुनका कहियो पंडितक अकाल नइ पड़लेन ।हरदम टोल-पड़ोसक पंडित सभ आगू-पाछू करैत रहए ।आ ई कोनो महादेव पूजे तक सीमित होए ,एहनो बात नइ रहै ,कहियो श्राद्ध कहियो बरखी कहियो उपनेन-वियाह........एहिना चलैत रहए ।आ बाबू चाहथिन छल तखन सभ दिन पारसे आबैत रहतै छल ,मुदा बाबू पारस लेबाक विरोधी छलखिन ।जत्तेि ब्राह्मण होए ,ओतबे क’ भाड़ा लियओ ,दुनिया क’ ठीकेदारी नइ......

वैदिक कर्म शुभक हो वा अशुभक ,जजिमान सभ एकटा खास नजरि सँ पुरहित कें देखैत छलखिन ।हुनका लेल आदर्श पुरहित ओ भेल जे मैल चिकाठि पहिरने हो ,चाहे धोती हो वा कुरता एक दरजन ठाम ओइ पर चिप्पी हो ।अहांक मोंछ-दारही बरहल हेबाक चाही ,अहां टुटलकी चप्पहल या बिना चप्पओले के यात्रा करैत हो ।यदि अहां साफ-सूतरा कपड़ा-लत्ताह पहिरने छी आ पएर मे जुत्तो. हो तखन त’ बूझू जे ने केवल अहांक धर्म भ्रष्टा अछि बल्कि जजिमनिका मे कनफुसकी क’ केंद्रविंदु सेहो अछि ।सब कहत ‘देखियौ ने कनेक जुत्ताम देखियौ ,बाप के खड़ाम खटखटबैत जिनगी गुजरि गेलेन आ बेटा ......’ आ फेर तखन बहुत रास खिस्सा एहनो जइ मे हुनकर बाप आ बाबा हमरा बाबू आ बाबा के खाली पएर देखि द्रवित भ’ गेलखिन आ प्लासस्टिक वला जुत्ताह वा चप्पबल वा खड़ाम दऽ देने हेथिन ।

आ भाय लोकनि ध्याटन देबै मैथिली मे एहन कहबी सबसँ बेशी छैक ,जइ मे अहांक तुलनात्मयक महत्ताल स्पएष्टब होइत अछि मतलब नीचा दिस ,खराब दिस ,जेना कि ‘बापक नाम लत्तील फत्तीा ,बेटाक नाम कदीमा ‘ ,’खाए लेल खेसारी आ .....पोछै लेल जिलेबी ‘ , ‘पूजी ....नइ चाभी क’ झब्बा ‘ , ‘नमहर नाग बैसल छथि आ ढ़ोरहाय मांगै पूजा ‘ आदि आदि ।आ ई सभ कहबी जत्तेज लौकिक अनुभव सँ भरल होए अहांक अपमानित करबा लेल पर्याप्तज रहै ।मुदा ई सुनला के बादो कोनो उत्त र नइ देबाक रहए ।एगो बात ईहो छलै जे जकरा कर्म करबाक रहै ,ओ चाहे किछो पहिरए ,खाए ,पीबए ,अहांक लेल खास ड्रेसकोड ।मतलब बाप मरै फलनमा के आ केश छिलाबैथ पंडित राम । सम्माान आ अपमानक एहन दुर्लभ संगति हमरा मूने कोनो सभ्य ता ,कोनो समाज मे असंभव अछि ।आ मैथिल ब्राह्मणक चरम लक्ष्य् सभ दिन चूड़े दही रहल ।हरिमोहन बाबूक दार्शनिक अंदाज जत्तेे ‘खट्टर कका क’ तरंग’ मे चूड़ा दही चीनी मे विस्ता र लैत अछि ,ओहियो सँ बेशी ।एकटा भोजन ......नइ भोजने मात्र नइ.....अलगे आकर्षण ......अलगे नशा ।एकटा सुस्तीओ ,संतोषक भाव ।त्रिगुण केवल सानै काल तक ,ओकरा बाद विषम भावक सह-अस्तित्वा ।दांत चूड़ा पर प्रहार करैत आ जीभ आ कंठ दही के ससारैत आ चीनी मुंहक सभ अंग सँ मेलजोल बरहाबैत ।अंत मे विषमता समाप्त आ सभ तत्वी अपन अपन वैशिष्ट्यअ के समाप्त करैत .......।आ चूड़ा दही एहन नै बुझियौ जे केवल खाइए वला मे सुस्तीस बरहाबैत हो ,खुएनहार मे सेहो तेहने आलस्यब बरहाबैत छैक । चूड़ा दही खुएबा मे अहांक करबा के की अछि ? चुड़ा कुटाएल बोरा मे राखल ,दही पौरल आ चीनी दोकान सँ खरीदल ,तखन त’ मात्र अंचारक सहारे सेहो अहांक ‘ए’ ग्रेड मिलि सकैत छैक .....हम धर्म ,पुण्यद आ पितरक बात अखन नइ क’ रहल छी ।जे होए चूड़ा दहीक नशा एहन रहै जे इसकुलक समै मे इसकुल कालेजक समै मे कालेज छोड़लियइ ।ने घअर दुआरि ने खेती बाड़ी ।कोन कुटुम कोन कुटमैती ।ने समाजक नौत-निमंत्रण ने पावनि तिहारि ।बस अर्जुन जँका ...संभवत: ओ मांसाहारी रहै तें माछक आंखि मे तीर मारलकए आ हम सर्वाहारी मैथिल ....चूड़ा दही क’ गंध दिस आंखि मूनने बरहैत आ हमर प्रेम चातको सँ बेशी ,हम्मरर धियान बगुलो सँ बेशी ,हमर क्रोध सिंहो सँ बेशी आ हमर भूख सांपो सँ बेशी आन्हहर।मुदा रूकू महराज हम किछु बेशीए बाजि गेलौं हमर भूख चाहे जेहन होए दुर्वासा आ भृगुक क्रोध किताबे तक सीमित रहलै ,हम अपन जिनगी मे त’ नइ देखलियै जे केओ जजिमान अहांक उचितो क्रोध कें सकारने हएत ।भृगु अपन क्रोध कें ने छिपेलखिन ने सम्हालरलखिन आ भगवान विष्णुक के धएले लाति करेजा पर मारि देलखिन आ भगवानो केहन त’ पूछलखिन ‘हे ब्राह्मण श्रेष्ठक चोट त’ नइ लागल ।हम्म र करेज त’ पाथरक अछि ,मुदा अहांक पएर त’ कमलोऽ सँ बेशी कोमल ‘ ।ई प्रसंग ब्राह्मणवादक संरक्षणक एकटा नमूना अछि कि कोना वैचारिक स्त र पर यथास्थितिवादक समर्थन कएल गेलै । फेर लक्ष्मीई क’ क्रोध आ पुन: भृगु कें क्रोधित भऽ कें भृगुसंहिता लिखनए आ लक्ष्मी के संबोधित ई गर्वोक्ति कि ‘जे ब्राह्मण ई पोथी परहत ,ओकरा लग तों दौड़ल जेबहीं ‘ ।

एकटा बात आर अहां अपन दैनंदिनी के चाहे जेना व्यावस्थित राखियौ ,एक चीज लेल हरदम तैयार रहियौ ।अहांक कखनो बुलाहट आबि सकैत अछि .......नइ नइ उपनेन वियाह त’ पहिले सँ निश्चित रहैत अछि ,मुदा सत्यननारायण कथा ,महादेव पूजा ,कोनो गुप्त् उद्देश्यछक लेल ब्राह्मण भोजन आ एहने सन बहुतो रास प्रसंग ,जइ ठाम अल्प्सूचना पर अहांक उपस्थिति अनिवार्य आ कखनो कखनो लठैत वला भाषा ‘यादि राखब पंडित जी समै खराब छैक छओ सँ सात नइ हेबाक चाही ‘ ।आ ग्याारह टा ब्राह्मणक निमंत्रण छैक त’ ग्याउरह टा हेबाक चाही ,औ जी साहेब आब गाम मे नइ छइ त’ नइ छइ ,हम कतऽ सँ लाबी ।सब गाम छोडि़ के दिल्ली ,पंजाब रहै छैक ।बहुतो लोक गामो मे छैक त’ अपन अपन काज धंधा मे व्यकस्तस ।ओ चूड़ा दही खेबा लेल तीन घंटा बेरबाद नइ करता ।ओना त’ काज चलिए जाए मुदा कहियो काल एहन स्थिति उत्पलन्ऩ होए कि लागै आइ नऽ छऽ भइए के रहत ।कोनो कोनो जजिमान कें होए कि कम ब्राह्मण हम पारस जमा करबा लेल आनलौं ।कखनो कखनो त’ हद भऽ जाए जजिमान सब नाओ गिनाबऽ लागता ,फलां पंबडित त’ गामे मे रहैत छथिन ,आ चिल्लांनक भतीजा सेहो ............. आ जजिमनिका क’ एकटा खास शिष्टा चार रहै ।प्रणाम त’ सब अहींके करैत छलथि ,मुदा अहां आर्शीवाद एकटा विशेष संबोधन के साथ दिअओ ।‘खुश रहियौ हाकिम’ ‘आनंद सँ रहियौ सरकार’ ‘जिमीन्दाकरक जय जय हो ‘ ‘राजा सदैव विजयी रहथि ‘ ।मतलब जजिमानक प्रणाम सूदि समेत लौटाबए क’ व्यावस्थाा रहै ।आ कोनो कोनो गुंडा टाईप के पंडित जी ऐ व्यरवस्था के दोसर रूप दऽ दैत रहथिन जेना ओ जजिमान के देखिते चिचियाथिन ‘जय जय बम बम’ , ‘जय हो जय हो ‘ आ पता नइ ऐ मे ककर जय आ ककर बम बम रहै ।मुदा ई व्यडवस्थाम विभिन्नू रूपांतरणक साथ आगू चलैत छलै ।आ दूनू तत्व यैह चाहथिन जे हम कांटी नइ मरिये रही ,मुदा ई केवल सोचबाक बात नइ रहै ...........

आब कनेक पुरहितक दृष्टिकोण ।तमाम नीचता कें छुपबैत अपन क्षुद्रता कें गौरवान्वित करैत पुरहित चाहैत छलखिन जे संसारक तमाम सिंहासन हुनके लेल रहै ।कखनो सर्दी-बुखार ,कखनो जाड़क मारि आ कखनो अलसियाइत पं‍डी जी बिन नहेने ,तेल चानन लगा झुठौंआ फूसौंआ के कंपकंपाइत रहथिन कि हुनकर ख्यातति एहन पंडित क’ रूप मे होए जे अपन तपस्याे सँ हवा-बसात के जीति नेने होए ।आ अपन अल्पा संस्कृएत ज्ञान कें कखनो लय ,कखनो रटंतु विद्या सँ सुरक्षित करैत ऐ ठामक सब पंडित ई साबित करैत रहिथिन जे उदयनाचार्यक सब पोथी हुनका पास ।किछु लोकनि ऐ भ्रम के सेहो पोसैत छलखिन कि संभवत: लोक विश्वािस केने जा रहल अछि कि वास्तसव मे उदयनाचार्यक असली वारिस यैह छथि ........ ई पंडित जी छलखिन ,एहन तारनहार जे मंत्रच्यु त ,विचारविहीन आ तर्कशीलता सँ योजन भरि दूर ।अपन जन्मनक बल पर ,तीन-पांचक बल पर ,गाल बजेबाक कौशल आ ठोप-ठंकारक बलें ।मंत्र कतबो मूल्यनवान हो ,दू-चारि टा शब्द अपने गीलने ,दू-चारि टा कुल खानदानक नाम पर आ दू-चारिटा संभावित दक्षिणाक विचारमग्न ता सँ भ्रष्ट होइत.......धियान आबिते फेर सँ हाथ-आंखि हिलबैत भगवान के ठकैत आ जजिमान के भरोस दीबैत कि ‘हमरा सन शुद्ध पूजा केओ ने करा सकैत अछि ‘ । मुदा पुरहित आ जजिमान मे एकटा लिखित समझौता रहै ।भोजन कतबो विशिष्टत आ वैविध्यय सँ भरल होए जजिमान कहथिन ‘जे नून चूड़ा छैक ,आबियौ आ ग्रहण करियौ ।‘ आ भोजन कतबो सरल-गेन्हारयल होय पंडित जी कहथिन ‘ऐ सँ बढि़ के बाते होइत छैक ।‘ मुदा कखनो कखनो विजय बाबू सन मर्दराज सेहो छला जे ऐ लीक के अपन स्व भावे तोड़बाक प्रयास करैत छला ।ओ साफ कहथिन’पंडी जी चिंता नइ करियौ ,आराम सँ खाएल जाओ ।पर्याप्तक दही छैक ,नून चुड़ा वला कोनो बात नइ’ ,तैयो विजय बाबूक ई यथार्थवादी रूख कोनो स्थारयी प्रवृत्तिक रूप धारण नइ केलकै ।आ ई द्विपक्षीय समझौता संभवत: जजिमानी व्यीवस्थारक सर्वोच्चत तत्वइ रहै । यद्यपि पंडित लोकनि जखन एक-दोसरा सँ बात करथि त’ ओ प्राय: दक्षिणा संबंधी होए ।जजिमानक खिधांश ,जजिमनिकाक भोजनक निंदा ,नून ,मिरचाय तेज हेबाक चरचा ,दूध ,दही कम हेबाक बात हरदम सजनिये ,हरदम घिउड़े ,कखनो के सब दिन राम तोरय..........छि: छि: सोहारी मे घृतक नामोनिशान नइ ,आ खीर मे पानि एकदिस आ दूध एक दिस आ चाउर भोकारि पारि के कानैत ।बेलना टूटबाक बात आ मकई क’ रोटी ब्राह्मण के दैत जजिमान सब ।घोर कलियुग ,एहन एहन जजिमान के कत’ सँ पुण्यो हेतै ।संकल्पज आ दक्षिणा मे एकटका दूटका देबा ,कखनो ऊधारिये रहि जेबाक चिंता ।अपन कुटिल पांडित्ये आ दुनिया दारी सँ लोक कें ठकबा सम्बिन्धीद विस्तृनत विमर्श आ दोसर के फटकारि देबा आ चमत्कृडत करबाक कतेको कथा ।गलत-सलत मंत्र परहेबाक प्रसंग बत्तीरसी के खोलि के हँसबा के अवसर दैत आ अपने मूने त्रुटिरहित चलाकी ....... दोसर दिस जजिमानो सब अपन हकिमई ,जमिंदारी आ लंठई क’ चर्चा क’ संग ।विविध प्रसंग जइ मे पुरहितक गलती कें ओ पकडि़ नेने हो ,एहनो प्रकरण जइ मे पुरहित सब कें अपन दानशीलता सँ ओ मोहि नेने होथि ।कखनो कखनो त’ एहन बात कि पहिले त’ बिन जजिमनिका पेट कि पांजरो नइ भरैत रहेन ,मुदा आब कने मजगूत भ’ गेला ।आ ऐ पेट-पांजर क’ चर्चा प्राय: होइत छलै । जजिमान-पुरहितक ई कांटी-मरिया निरंतर ठोकाइत रहला के बादो हमरा ई कहबा मे कोनो हर्ज नइ कि जजिमनका मे कतेको आदमी एहनो छथिन ,जे ऐ जजिमान-पुरहितक संबंध सँ आगू छथिन ,आ ओ हमरा लेल कोनो बाप-पित्तीभ सँ कम नइ ।चाहे जानकी बाबू होथिन वा मकसूदन बाबू ,इंजीनियर साहेबक परिवार हो वा बैद्यनाथपुर मे शशि के आंगन मे ओ वृद्ध मसोमात ।ई सब लोक हमरा लेल हमरा खानदानक लेल पारिजात बनि के रहला आ हमर सब कष्टे हिनका लोकनि के छाया मे हेरायत चलि गेल ।नित्यरप्रति क’ भेंट आ हिनकर सभक दुलार कहियो वास्त विकता सँ परिचय नइ होम’ देलक ,नइ त’ पुरहितक जिनगी कोनो माली ,कोनो धानुक ,कोनो धोबी सँ कोन प्रकारे बेशी छैक ।ओहो सब अपन हिस्सार लैत छैक आ हमहूं । यदि फल महत्विपूर्ण छैक त’ एना सोचनए बहुत बेजाए त’ नहिये............................... (क्रमश:) ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। अमित मिश्र करियन(समस्तीपुर )

कथा - प्रेमक अंत

आइ भोरे सँ आनंदक मोन कतौ अनत' अटकि गेल छलै । की करबाक चाही , की नै करबाक चाही ? गाम -घर मे की भ रहल छै ? एहि तरहक कोनो प्रश्नक जबाब पता नहि छलै । अपन सूधि-बूधि बिसरि गामक अबारा पशु जकाँ इम्हर-उम्हर भटकि रहल छल । पैघ केश-दाढ़ी , मैल-चिकाठि गंजी-पेँट मे अपना -आप सँ बतियाइत देख जँ केउ अनचिन्हार पागल बूझि ढेपा मारत त' कोनो आश्चर्यक बात नहि । आनंदक इ डेराउन रूप देख क' गामक लोक सब अपना मे बतियाइ छल जे परसू जखन दिल्ली सँ गाम आएल छल त' बड-बढ़ियाँ सब कए गोर लागि , काकी-कक्का , कहि क' नीक-नीक गप करै छलैए मुदा इ एके राति मे की भ' गेलै जानि नहि? लागै छै जे मगज कए कोनो नस दबा गेलै आ रक्तसंचार बंद भ' जाएबाक कारण मोन भटकि रहल छै । इहो भ' सकै यै जे बेसी पाइ कमा लेलकै तेए दिमाग खराप भ' गेलै वा भ' सकै छै जे पागल कए दौड़ा पड़ल होइ । आब एसगर कनियाँ काकी की सब करथिन , आब टोलबैये कए मिल क' राँची कए पागल वला अस्पताल मे भर्ती कराब' पड़तै , नै त' काल्हि जँ टोलक कोनो नेना कए पटकि देतै त' ओकर जबाबदेही के लेतै ? अनेक तरहक प्रश्न-उतर , सोच-बिचार के बाद टोलबैया सब निर्णय लेलक जे आइ साँझ धरि देखै छीये ,जँ ठीक नै हेतै त' साँझ मे सब गोटा मिल जउर सँ हाथ पएर बान्हि देबै आ काल्हि भोरका ट्रेन सँ राँची चलि जेबै । जे खर्च-बर्च लागतै से कनियाँ काकी देथिन ,जँ एन.एच लग बला एको कट्ठा घसि देथिन त' ओतबे मे आनंदक बेरा पार भ' जेतै ,आखीर जमीन बेचथिन किएक नहि ,बेटो त' एके टा छेन । कनियाँ काकी मतलब आनंदक माए सँ बीन पुछने टोलबैया ,सब हिसाब-किताब क' लेलक ।

उम्हर टोलबैया सब जमीन बेचेबाक ,आनंद कए पागल बना राँची पहुँचेबाक जोगार मे छल आ इम्हर आनंद एहि सब सँ अंजान अपन धुन मे कखनो बड़बड़ाइत , कखनो हाथ चमकाबैत गामक पूब गाछी दिश कए बाट धेने जा रहल छल । गाछी मे एकटा झमटगर आमक गाछ त'र बैस रहल ,गाछ सँ खसल टिकुला बिछ क' जमा केलक आ एक-एक टिकुला उठा सामने पड़ल पत्थर पर मारैए जखन सब टिकुला खतम भ' जाए त' फेर सँ बीछ पहिले जकाँ पत्थर पर मार' लागैए । कतेको घंटा एनाहिते करैत रहल । समय आ सुरूज उपर चढ़ैत गेलन्हि आ आब सुरूज देब सीधे माँथ पर आबि गेलन्हि । रौद सीधे आनंदक देह पर पड़लै , जखन गरम लागलै त' ओत' सँ उठि क' गाछक जैड़ मे सटि क' बैस रहल , टिकुला फेकनाइ बंद क' सामने देखलक ,सब किछ बदलल-बदलल बूझहेलै , नै पहिलुका रंग आ नै पहिलुका आनंदक लहर भेटल |

तीन वर्ष पहिले एत' भीड़ लागल रहै छलै गामक युवा वर्गक पहिल पसंद छलै इ मैदान जे आब खेत बनि गेल छलै , गामक नेना-भुटका सँ नम्हर धरि गेंद-बल्ला- बिकेट ल' भोरे सँ मस्त भेल एत' खेलै छलै ।एहि ठामक मजा ल'ग टि.भी वला आइ .पि .एल एको क्षण नै टीक सकै छलैए , मुदा मैदानक मालिक कए इ खेल नीक नहि लागै छलै तेँए एक दिन राता-राती सौँसे मैदान जोति देलक आ राहरि बाउग क' देलक । तहिये सँ खेलक इ आशियाना उजरि गेलै । आनंद कए एहि मैदान मे पाकल गहुमक बालि देखेलै जे हवा सँ टकरा कोनो कमसीन नाच' वाली के पातर डाँर कए लचक जकाँ बेली डाँन्स करैत छलैए । सुरूजक किरण ओहि पाकल बालि कए और स्वर्ण रंग द' रहल छल ।पूरा खेत रावणक सोना कए लंका जकाँ रौद मे चमकि रहल छल , दुपहर कए गर्मी मे चलैत लू सँ काँपैत हवा मे फराक-फराक आकृती सब बनबै छलै कखनो डेराउन त' कखनो मनोरम , एहि दृश्य मे डूबल कखन आँखि लागि गेलै जानि नहि । आँखि लागैत देर नहि आनंद एहि दुनियाँ कए छोड़ि श्वप्न नगर मे चल गेल । ओहि अद्भुत श्वप्न परी कए देश मे यादि आब' लागलै आइ सँ तीन साल पहिलुक ओ दिन . . . । ............ काँलेजक पहिल दिन , गामक उच्च विद्यालय सँ पास भ' लाखो छात्र-छात्रा नव सपना संग पैघ-पैघ शहर कए नामी काँलेज सब मे नामाँकन करेलक आ तकर बाद 10-10 टा किताब क झोरा छोड़ि दू टा काँपि ल' काँलेजक गेट पर स्वतंत्र मोन सँ छात्र-छात्रा सब कए लागै जे स्वतंत्रताक लड़ाइ जीत लेलक ,गजब कए मुस्कान सबहक अधर पर नाचि रहल छल । स्कुलक टाँप आनंदो अपन काँलेज पहुँचल मुदा काँलेज कए गेट पार करै कए साथ ओहि ठामक काज देख अधरक मुस्कान बीला गेलै । छ'-सात टा लड़का-लड़की एकरा घेर लेलक आ सबाल-जबाब कर' लागल कखनो एकर त' कखनो हेयर स्टाइलक , कखनो पहिराबा कए त' कखनो गाम-खानदान कए मजाक कर' लागल । आनंद कए तामस तरबा सँ मगज धरि पहुँचि गेलै मुदा नव अछि कैये की सकै यै ?

तखने एकटा लड़का एगो गुलाबक फूल दैत कहलक ,"रै , सामने ललकी ओढ़नी मे पिछु घुमल जे लड़की ठाढ़ छौ ओकरा हमरा दिश सँ आइ लव यू कहि क' इ गुलाब देने आ ।"

आनंदक मोन नहि मानै छलै तेँए ओ हिलबे नै केलै ,जखन सब देखलक जे इ नहि जा रहल अछि त' एक चमेटा मारैत घेकलि देलक जै सँ आनंद खसैत-खसैत बचल , ओ समझि गेल जे जँ एकर बात नहि मानब त' मारत तेँए मोन मसोसि क' गुलाब उठा ओहि लड़की लग चल गेल । ओकर पिछ आनंद दिश छलै तेँए ओकर मुँह देखाइ नै पड़लै खैर आनंद कहलक ,"मैडम ,"

इ सुनि लड़की पलटल , आनंद के ओकर मुँह चिन्हार लागलै , लाल लिपिस्टीक सँ रांगल ठोर आँखिल काजर , केशक स्टाइल आ एकर चिर-परिचित परफ्युमक खुशबू ,सब किछ चिन्हार सन लागलै मुदा मोन नहि पड़ि रहल छल जे ओ के छथि?

आनंद अपन बात आगु बढ़ेलक ,"मैडम , हम जे किछ कहब सँ हमरा सँ ओ छौड़ा सब कहबा रहल अछि तेँए हमरा माँफ करब ओ हरीयरका टिशर्ट वला अहाँ कए आइ लव यू कहलक यै आ इ गुलाब देलक यै ।"

गुलाब दै काल ओहि चिन्हार मुदा अनचिन्हार सन लड़की कए हाथक स्पर्श मात्र सँ अंग-अंग एना सिहरि गेलै मानु जे 440 वोल्ट कए झटका लागल हो । ओ लड़की गुलाब ल' बाजल ," कोनो बात नै हम खराप नहि मानलौँ ,ओ अबारा छौड़ा-छौड़ी हब हमरो रैगीँग लेलक आ अहूँ कए ल' रहल अछि , ओना अहाँ . . . " ओ लड़की अपन बात खतमो नहि केने छलै की प्रिंसपल साहेब ओहि ठाम आबि गेलन्हि , प्रिँसपल साहेब कए देख रैगीँग लेनिहार सब छौड़ा-छौड़ी पड़ा गेल । आनंद आ ओ लड़की दूनू प्रिंसपल साहेब कए गोर लागलक आ हुनके संगे क्लास दिश चलि देलक । गामक स्कुल मे लड़का-लड़की अलग-अलग बेँच पर बैसै छलै मुदा एहि ठाम एहन भेद-भाव नहि छलै , जेकरा जत' मोन होइ ओ ओत' जा क' बैसल । आनंद आ ओ लड़की संग एके बेँच पर बैसल , ऐ दिनक बात संयोगे सँ वा जानि-बूझि क' तीन दिन धरि संग उठला बैसला कए बादो कोनो तरहक बात-चित नै भेलै । चारिम दिन पहचान -पत्र पर मोहर लगाबै लेल जखन दूनू समान्य कक्ष गेल त' ओहि लड़की कए नाम-गाम पढ़लक तकरा बाद ओ अनचिन्हार लड़की पूर्णत: चिन्हार भ' गेल तेँए आनंद बाजल ," सीमा , हमर नाम आनंद अछि आ अहीक गाम के छी । दूनू गोटे सतमाँ धरि एकै स्कुल मे पढ़लियै आ तकरा बाद अहाँ बजार आबि गेलौँ आ हम गामे मे रहि गेलौँ , यादि ऐल की नै ?"

सीमा जखन अपना बारे मे एतेक बात सुनलक त' उहो बाजल ,"हाँ आनंद ,सब किछ यादि अछि ।हमरा पहिले दिन सँ होइ छलैए जे अहाँ कए कतौ देखने छी मुदा लाजे किछ नहि बाजै छलौँ" "

आनंद मोने-मोने बड खूश छल कारण एहि अंजान शहर मे केउ त' चिन्हार अछि ।मोहर मरबा दूनू बगीचा मे जा क' बैसल आ पुरना बात कए मोन पाड़' लागल , पाकरि त'र गर्दा आ कंकर भरल भाटि मे बोरा पर बैस क' पढ़ाइ , बूढ़बा इमली गाछक मीठगर इमली . भूट्टू मास्टर साहेब , अपन बचपन मे एतेक हेरा गेल जे कखन साँझ भ' गेलै पता नहि चलल । जखन गाछ पर चिड़ाँइ अनघोल कर' लागल तखन दूनू बचपन सँ निकलल ।

एहिना समय बीतैत गेलै । एहि व्यस्त शहर कए व्यस्त जीवन मे एक पटरी पर दौड़ैत दूनू कए दोस्ती एक्सप्रेस कखन प्रेमक स्टेशन पर आबि गेलै , दूनू मे सँ ककरो पता नहि चलल । नव उमरि मे प्रेम भेटला कए बाद एकटा अलगे उर्जा कए संचार अंग-अंग मे होब' लागलै , दूनू कए नजरीया सत प्रतीशत बदलि गेलै , काल्हि धरि किताब-काँपि ,पढ़ाइ-लिखाइ कए बारे मे सोचै वला आइ अपन भविष्यक बारे मे सेच' लागलै , अपन-अपन कैरियर कए लेल सोचबाक लेल नव-नव सपना कए महल बनब' लागलै , राति दिन भोर-साँझ एक-दोसरक नैनक झील मे डूबि जीबनक सब सँ पैघ आनंदक अनुभूति कर' लागलै । बाट चलैत जग सँ अंजान भ' इएह पाँति गुनगुनाब' लागलै

भेटल अहाँ के संग हमरा जहियेसँ जिनगी हमर लेलक करोटो तहियेसँ

हम एकरा की कहब छल एहन भाग बैसल छलौँ हम बाट मे दुपहरियेसँ

गेलौँ शिखर पर भेल जे एगो स्पर्श जुड़ि गेल साँस प्राण संगे कहियेसँ

छी ग्यान{GYAN} के पेटी अहाँ जादू गजल शाइरक कोनो कलम लागै हँसियेसँ

हम भेल नतमस्तक लिखब कोना शब्द शाइर "अमित" छी संग हमरा जहियेसँ

कहल गेलै यै जे जँ सच्चाइ कए संदुक मे बंद क' सात ताला मारि सागर मे भसा देल जाए तैयो एक-ने-एक दिन ओ ताला तोड़ि समाजक सामने जरूर आबै छै , आ जँ ओ सच्चाइ लड़का-लड़की कए प्रेमक होइ त' ओ जंगल कए आगि-जकाँ क्षण मे सगरो पसरि जाइ छै । इ समाज एहन सच्चाइ पर हास्य-व्यंग आ चुटकी लेब' लागै छै । आनंद-सीमा कए प्रेमक खिस्सा काँलेजक बाउण्ड्री तोड़ि सीमा कए बाबू जी डाँ. देबेन्द्र धरि पहूँचि गेल ।ओ आनंद कए डराब'-धमकाब' लागलन्हि मुदा आनंद आधुनिक लोक रहितो आधुनिक नहि छल , आइ -काल्हि कए लोक प्रेम-प्रेम नहि वासना बूझैत छथि , हुनका लेल आ आधुनिक प्रेमक अंत मात्र शारीरीक मिलन होइत धेन आ तकरा बाद ओ प्रेम गटर कए कीड़ा जकाँ अशुद्ध भ' जाइ छै । मुदा आनंदक मोन मे ऐ तरहक कोनो बात नहि छलै , ओ अपन प्रेम कए सम्मान द' वियाह धरि पहुँचाब' चाहै छलैए तेँए कोनो तरहक धमकी एकरा पर असर नहि क' सकलै , संगे सीमा सेहो डाँ . देबेन्द्र पर अपन प्रेम सफल करबाक लेल दबाब देब' लागलै । तीनू अपन-अपन बात पर अड़ि गेल । इएह घिचम-तीड़ा कए बीच दूनू इंटर कए पढ़ाइ खतम केलक । समय बढ़ैत गेल संगे प्रेमक गाछ फूलाइत रहल आ डाँ . देबेन्द्र पैघ-पैघ ढेला फेक एहि फूलाइल गाछ कए फूल तोड़ैत रहलन्हि , अंतत: एक दिन डाँ. साहेब आनंद कए अपन डेरा बजौलनि ।

आनंद गुनधुन मे पड़ल जखन सीमा कए डेरा पहुँचल त' डाँ . देबेन्द्र कहलनि ,"देखू अहाँ दूनू कए प्रेमक आगू हम हारि गेलौँ , हम एहि वियाहक लेल तैयार छी मुदा वियाह कोनो बच्चा कए खेल नहि छै , वियाहक पश्चात बहुतो रास जीम्मेदारी माँथ पर आबि जाइ छै । बियाहक बाद सीमा कए कत' राखब ? "

आनंद बाजल ," हमहू जानै छी जे वियाह कोनो खेल नहि छै आ जहाँ धरि वियाहक बाद रहै कए सबाल छै त' गाम मे अपन-घर अछि । अहाँ जानिते छी अपन जमीनो अछि त' ओत' हमरा दूनू गोटा कए जीवन बढ़ियाँ जकाँ कटि जाएत ।"

"मुदा हमर बेटी गाम मे नहि रहि सकै यै किएक त' ओ बजार मे सब सुबिधा सम्पन्न घर मे रहि रहल अछि । हमरहमर बेटी गामक भनसा घर मे घुआँ नै पियत ।"

"आब गामो मे विकास भ' रहल छै हमरो गाम मे गैस .सड़क , रेल आ बिजली कए सुविधा अछि तेँए कोनो तरहक दिक्कत नहि हेतै । तैयो जँ सीमा कए इच्छा बजार मे रहबाक हेतै त' गामक कोनो जमीन बेचि बजार मे घर बना लेब । " आनंद सँ लबालब भरल बाजल ।

देबेन्द्र बाबू चाह आ बिस्कुट कए ट्रे आनंद दिश बढ़ाबैत बाजलन्हि ." से सब त' ठीक छै मुदा एतेक जल्दी इ सब नहि भ' सकै यै ।" दु -तीन चुस्की चाह सँ घेँट भिजेला कए बाद बात आगू बढ़ेलन्हि ," एखन अहाँ दूनू कए उमरि कम अछि आ ऐ उमरि मे कानून वियाहक आदेश नहि दै छै .दोसर विआहक बाद घरक खर्चा बैढ़ जाइ छै ।एखन अहाँ अपन माए पर निर्भर छी आ माए खेती-बाड़ी पर , आ सब जानै यै जे खेती सँ एतेक कमाइ नहि होइ छै जै सँ आधुनिक साज-समान कए साथ बजार मे जीवन ऐश-मोज सँ कटि सकै । जा धरि अहाँ अपन पएर पर नहि ठाढ़ हेएब ता धरि केऊ बेटी वला अपन बेटी कए हाथ अहाँ कए हाथ मे कोना द' देत आखिर सब माए-बाप कए किछ स'ख-मनोरथ होइ छै की नै?"

चाहक कप राखैत आनंद कने चिन्तीत मुद्रा मे बाजल ," अहाँक बात सत्य अछि हमहुँ इ नहि कहै छी जे एखने हमर वियाह क' दिअ , जहाँ घरि अपन पएर पर खड़ा होइ कए बात छै त' हमर इंटर भैये गेल ।हमर नानी गामक किछ लोक दिल्ली मे रहै छथि त' हम सोचै छी जे ओतै जा किछ दिन काज करब , तखन धरि उमरि भ' जाएत तकर बाद हमर वियाह क' देब ।"

डाँ0 साहेब अधर पर कुटिल मुस्कान फैलाबैत बाजलन्हि ." अहाँक इ बात हमरा नीक लागल ।अहाँ अपन पएर पर ठाढ़ भ' जाउ हम अश्वासन दै छी अहाँ प्रेम सफल करबा देब ।"

एहि भेँट कए बाद आनंद के सीमा सँ वियाह करबाक सपना सच लाग' लागलै । ओ अपन प्रेमक सफलाता कए लेल कठीन सँ कठीन काज करबाक लेल तैयार छल । अपन पढ़ाइ बीच मे छोड़ि दिल्ली जाएबाक मोन बना लेलक । कनियाँ काकी कए सब बात बता तीन दिन कए बाद दिल्ली कए गाड़ी पकरि दिल्ल चलि गेल । अपन प्यार , अपन गाम . अपन सीमा सँ हजारो किलोमीटर दूर दिल्ली कए भीड़-भाड़ वला गली , बड़का-बड़का सोसाइटी मे हेराएल-भुतलाएल काज खोज' लागल । बड दौड़ धूप कए बाद रिश्ता कए मामा अपन सेठ सँ बात क' 12 घंटा कए नोकरी आ पाँच हजार दरमाहा पर काज धरा देलकै । भोर सँ साँझ धरि हड्डी तोड़ला कए बादो एते कमाइ नहि होइ छलै जाहि सँ कहि सकैए जे आब परिबारक भार उठा सकै छी । सब राति सीमा कए फोटो करेजा सँ साटि कसम खाए जे काल्हि आइ सँ बेसी मेहनत करब । उम्हर आनंद सीमाक प्रेम मे अपन देह गला रहल छल आ इम्हर सीमा अपन पढ़ाइ आगु बढ़ा रह छलै । समय तीब्र गती सँ बढ़ैत गेलै , आनंदो कए परमोसन होइत गेलै , आब 15000 टका कमाइ बला सुपरबाइजर भ' गेल । आफ ओकरा लाग' लागरै जे ओ अपन आ सीमा कए बजार मे रहै कए खर्च कमा लै यै त' ट्रेन ध' गाम आबि गेल । गाम आबिते देर नहि , सब सँ अपन दोस्त सब सँ सीमा कए बारे मे पुछलक त' पता लागलै जे देबेन्द्र बाबू ओकर वियाह अपने हाँस्पिटलक डाँ0 सँ ठीक क' देने छथिन ।सीमा कए मोन बदलि गेल छै आ दू दिन बाद गामे मे वियाह छै । इ शुभ सन अशुभ समाचर सूनै कए साथ आनंद बौक भ' गेल , किछ फुरेबे नै करै , जकरा लेल पढ़ाइ छोड़लक , 12-12 घंटा देह गलेल , से ओकरा छोड़ि दोसर सँ वियाह क' रहल छै ।

आनंद कए विश्वास नहि भेलै तेँए ओ सीमा कए घर सँ बहराए कए बाट जोह' लागल । सँयोग सँ ओहि साँझ गामक बजार मे भेँट भ' गेलै , सीमा कए संगे केउ नहि छलै तेँए बीना कोनो झंझट कए आनंद सीधे सीमा लग गेर । सीमो आनंद कए देख रूकि गेलै । आनंद सीमा लग जा बाजल ." सीमा , अहाँक बाबू जे किछ चाहैत छलथि ओ सब हम पूरा क' देलौँ । आइ हम 15000 टका कमा लै छी आ कानून कए मुताबीक उमरि भ' गेल तेँए अपन वियाह मेँ आब कोनो रूकाबट नहि अछि । अहाँक बाबू जी हमरा अश्वासन देने छलथि मुदा हम सूनि रहल छी जे अहाँक वियाह काल्हि कोनो डाँक्टर सँ भ' रहल अछि । अहाँ हमरा सँ प्रेम केरै छलौँ तखन आ सब की भ' रहल छै ? अहाँ एकबेर अपना मुँह सँ कहि दिअ जे अहाँ मात्र हमरे सँ प्रेम करै छी आ इ वियाहक बात झूठ अछि ।"

आनंदक बात सूनि ओ मृग समान कारी नैन लाल भ' गेलै ,मुँह पर कठोरता कए भाव नाच' लागलै , ओ मीठ बाजै बला जवान सँ आगिक धधरा जकाँ शब्द बहरेलै ," इ सबटा बात एकदम सत्य छै ,जहिया अहाँ सँ प्रेम केलौँ तहिया हम बच्चा छलौँ मुदा बाबू जी हमर आँखि खोलि देलनि । हमर बराबरी क' सकी एतेक अहाँ क ओकाइध नहि अछि । अहाँ मात्र इंटर पास छी आ हमर M.B.B.S कए फाइनल इयर छै । एकटा 15 हजार कमाइ वला कए हाथ मे अपन हाथ द' हम अपन जीवन किएक बर्बाद करब ? जतेक अहाँ एक महिना मे कमाइ छी ओतेक हम एक दिन मे खर्च करै छीयै । जीवनक ग्राफ पर अहाँ बाँटम मे छी आ हम टाँप पर , बाँटम आ टाँप सदिखन पैरलल रहै छै रहै छै आ अहाँ त' जानिते छी जे पैरलल लाइन कखनो मिलै नहि छै तेँए अपन दूनूक मिलन संभबे नहि अछि ।अहाँ अपध दिल आ दिमाग सँ हमर नाम मेटा लिअ । अहाँ हमर संगी छी तेँए वियाह मे आएबाक निमंत्रण द' रहल छी ,मोन हेएत त' आबि क' देख लेब हमर होइ वला ब'र कए । हमरा बहुत काज अछि ,हम जा रहल छी ।अहूँ हमरा बिसरि क' घर जाउ|"

इ कहि सीमा कार मे बसि गर्दा उड़ाबैत ओहि ठाम सँ चलि गेल । आनंद ओहि गर्दा सँ नहा गेल । दुनियाँ नाच' लागलै ,चक्कर आब' लागलै आ आनंद बीच्चे सड़क पर खसि पड़ल ।

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इ सब सपना बनि गाछ तर सूतल आनंदक आँखि मे नाचि रहल छल तखने गाछ सँ एकटा टिकुला टूटि आनंदक मुँह पर खसलै । टिकुला के चोट लागैते नीन खुजि गेलै । उपर चंदा मामा चमकि रहल छरखिन ,तारा टिमटिमा रहल छर , चारू कात अन्हार पसरि गेल छलै । गाम दिश देखलक त' गामक छोर पर नव कनियाँ सन सजल घर साफ-साफ देखाइ देलकै । लाल-पियर-हरीयर बाँल भूक-भूक क' रहल छलै ।डि.जे वला बैण्ड पर बाजैत नवका धुन बाताबरण मे अनघोल क' रहल छलै ।आनंदक मोन मेँ गजबे तूफान उठ' लागलै ।सोचै , जकरा लेल एतेक मेहनक केलौँ सएह नै भेटल । की हमर गलती इ अछि जे हम गरीब छी? जाति त' एकै छै तखन की हमर गलती इ अछि जे हम एक समाज आ एक गामकए छी वा इ जे हम कहियो प्रेम केलौँ ? बहुतो रास सबाल मन मे उठै छल आ बहुतो सबाल आँखि सँ बहैत नोर क' रहल छल । तखने अकाश मे बिजुरी जेना चमकि उठलै , उपर लाल-पियर - हरीयर आगिक चिनगी चमक' लागलै ,ब्राम-ब्रूम क' फटक्का फूट' लागलै । आनंदक आँखि सँ नोरक धार गाछक जरि के पटा रहल छल । ब्राम ब्रूम फटक्का फूटि रहल छल आ आइ फेर एकटा प्रेमक अंत भ' रहल छल । ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। १.राम भरोस कापड़ि ‘भ्रमर’- घरमुहाँ- उपन्यास अंश २.चंदन कुमार झा- बिहनि कथा- समय होत बलबान १ राम भरोस कापड़ि ‘भ्रमर’ घरमुहाँ उपन्यास अंश

सरिता आइ कैक दिनसं बेटीकेँ चुपचाप घरमे पड़ल देखि रहलीह अछि । पहिने तँ भेलै जे ओकरा देहक कष्ट छै ।’ पुछबो कएलकै तँ नहि किछु हएबाक बात कहि कऽ टारि देलकै । मुदा जखन पाँच दिन भऽ गेलै आ ने घरकेँ कोनो काम करैक आने कओलेजे जाइक त मायकेँ मनमे किछु शंका उठलैक । पतिक कहल बातमे ओजन बुझाए लगलैक । किरणकेँ कोठरीमे जाकऽ ओकरा कातमे बैसि गेलि । माथ हंसोतैथ दुलारसँ पुछलकै – ‘बेटी, एना गुम्म किए पड़ल रहैत छे । कोन बात भेलौअ ?’ किरण किछु नहि बाजलि । माय जखन दोबारा पुछैत छैक त ओ उठि कऽ वहराए चाहैत अछि । आ बजैत अछि – ‘नै गे ! कहने रहियौ, किछु नै होइए ।’ ‘तखन कलेज कैला ने जाइछे । देहो हाथके सैहार नै करैछे । केना कोठरीमे किताब आ कपड़ा सभ छिटाएल छौ’ – माय कोठरीमे चारुकात नजरि खिरबैत कहैत छैक । ‘ई सब आब कऽ कऽ की हएतै । जखन बेच–बाइच कऽ जाही के छैक त सम्हार के कोन काम ।’ ‘ई त अपना बशमे नै है बेटी । धमकी अबैहै । बहुतो लोकके उठीवास भऽ गेल है । तैस तोहर बाबू ई निर्णय कएलकौअ ।’ ‘त हम कहां कहै छियौ नै जाएला । जहां–जहां ल जएबै त जएबे करबौ । तोहर आश्रित सन्तान छियौ ने ।’ ‘एना, कटाह बात कैला बजै छे बौआ । बापक मुह आ देह–दशा नै देखै छही । केना उजरल आ सुखाएल लगै है । दिन भरि विद्यार्थीमे लागल, मीतक ओत्त खान–पीन, गायन–वादन ! देखै छही किछु ।’ किरण पुनः बैस जाइत अछि । मायक मु्ह दिश एकटक देखए लगैत अछि । आँखिमे नोर छलछला आएल छैक । किरण भावुक भऽ बजैत अछि – ‘माय हमर मोनमे घर–परिवारक समस्या नै अछि से बात नै । हमरा त रहए हम इंजिनियर बनि कऽ घरके सम्हारब । लेकिन आब संभव लगै छौ ?’ सरिता चुप्प भऽ गेलि । ओकरा मनमे किछु गुनधुन भऽ रहल छैक, मुदा बेटीसँ पुछबाक साहस नहि भऽ रहलैक अछि । लेकिन पुछ त पड़तै । मास्टर साहेब ई जवावदेही दऽ देने छथिन । तखन कोना पुछी सएह नहि फुराइ छै सरिताकेँ । ‘माय, चुप किए भऽ गेले । बाजने किछु । हम तोरा सबस अलग सोचै छी की ! बाबूजीक अवस्था, दुनू बौआक भविष्य, हमर योजना ई मधेश आन्दोलन गीड़ि लेलक । इएह सोचि कऽ मोन दुखित अछि ।’ सरिता कनेक हिम्मत करैए – ‘बेटी कह त, तों ठीके एहीला दिन राति कनैत रहैछे ।’ किरण आश्चर्यसँ पुछै छै – ‘तोरा के कहलकौ जे हम कनै छी । हम कनै कहां छी, सोचै छी । मन नै लगैए पढ़मे, किछु करऽ मे ।’ ‘बौआ, ठीके तों हमरा सभक आशा छे । किछु अओर बात छै त बाज खुलिकऽ । हम सभ आन नै छियौ ने !’ किरण नीचाँ मुह कऽ लैत अछि । ओकरो भीतर जेना बिहाड़ि उठल हो । माथ उठबैत छैक आ मायकेँ मुहदिश ताकि भोकासी पाड़ि कान’ लगैछ । माय भरि पाँज कऽ छातीसँ लगा चुप कर’ लगैत छैक । कानब कनेक थम्हैत छैक तँ पुछैत छै – ‘आब कह तों दुखी किएक छे ?’ किरण सम्हरैत अछि आ मायकेँ कथा सुनबैत छैक – ‘तोरा सभके घर बेचि कऽ अन्त चल जएबाक बात सुनलियौ त ठीके हमरा रहल नै भेल आ आबि कऽ अपन कोठरीमे भरि पोख कनने रही । चलि जएबाक दुख त रहबे करए एकटा दोसरो बात रहैक ।’ माय सचेष्ट होइत छैक – ‘दोसर कोन बात ?’ ‘हम राजीबसं प्रेम कर’ लागल छी । आ दुनू गोटे विवाह करबाक विचारो कऽ लेने छी ।’ ‘के छै राजीब गे ? आ एतेक भारी निर्णय विना हमरा सभके कहने कोना कैलही ?’ ‘माय, ओ दक्षिणवारी टोलक बढ़का घरके बेटा छै । बी.एस.सी. मे पढ़ैत छैक । नीक व्यक्ति अछि । कओलेजेमे मीलि गेलै, की करितिऐ । जहां तक तोरा सबके जानकारी देबके बात त तों सपनोमे नै सोच हम विना पुछने किछु करिती ।’ ‘त, आइ तक बजलिही कैला नै ?’ ‘कहितियौ, ई मधेश आन्दोलन शुरु भऽ गेलै । लोक सडक पर उतिर गेलै । पहाडी–मधेशीमे भेद छुटिआब’ लगलै । हिम्मत नै भेल तोरा सबके किछु कहके । भेलै, शांत होतै त कहबौ । ताबेमे जाएके नियार भऽ गेलै त हम की करितिऐ’ । सरिता गुम्म भऽ गेल । बेटीक व्यथा बुझवामे ओकरा कोने कसरि नहि रहलै । लेकिन आब किरण की करत से बात धरि बुझए चाहैत छल । पूछलक – ‘आब की करविही ?’ चोट्टे उत्तर देलक किरण – ‘की करबै ! हम कहि देलिऐ, आब संभव नै अछि । हम मां–बाबूक संग जा रहल छी । सभ विसरि जाउ !’ ‘ओ की कहलकौ ?! ‘ओ त कान’ लगलै आ ई असंभव थिक बाजल । अहां विना हम एक्को पहर एत्त रहि नहि सकब । बरु जल्दीए आबि जाउ से धरि कहैत रहल ।’ ‘तों की कहलही ?’ ‘हम मना कऽ देलिऐ । आब घर–परिवारके एहन हालतिमे छोड़ि कऽ हम कतहु नै जा सकैछी । कहि देने छिऐ । आब फोनो अबैछै त नै उठबै छीऐ । ने कओलेजे जाइछी जे कतहु भेंट ने भऽ जाए... । कह हम की करु ?! बढ़का बोझ माथपर धऽ देलकै किरण सरिताकेँ । दुनूक बीच एतेक लगक सम्बन्धकेँ तोड़बो कठिन, ने ई निचैनसँ रहत ने ऊहे । की करौक ओ, वेचैन भऽ जाइत अछि सरिता । ‘माय तों चिन्ता नै कर । जे तों सभ निर्णय लेने छे, हम साथ छियौ । हं, बाबूजीके हालत एखन बड़ खराब छै । चिन्ता घेरने छैक । ई बात हुनका नै कहिहै ।’ सरिता बेटीक मुह देखैत अछि आ दुनू हाथसँ लगमे लाबि चुम्मा लऽ लैत अछि । दुनू माय–बेटी भावुक भऽ जाइत अछि । सरिता कहैत छैक – ‘बेटी, तोरा बाबूजीके सभ पता छौ ।’ ‘से केना गे ?’ ‘जखन तो कोनटा लगसं आबि अपन कोठरीमे कनैत रही आ राजीवके फोन करैत रही, तखन ओ आंगनमे आएल छलाह आ तोहर कानब सुनि तोहर दरबज्जा धरि गेल छलाह । तखने तोहर बात सुनलखून्ह । ताहीसं एहि बातके खुलासा कर’लेल हमरा भार देने छलखिन ।’ ‘माय, बाबुओ जानि गेलखिन्ह नै ! हम कोन मुहें हुनका सोझा निकलबै ।’ ‘सभ ठीक भऽ जएतै । समय घुरतै । बात कैलखिन्ह ह । मन शांत होइते हम तोहर बात कहबनि । ओ जरूर मानि जएताह । खाली ओम्हर मानतै कि नै, ओकर बाप–माय !’ ‘तकर भार राजीवके छै माय । ओ मना लेत ।’ – किरण प्रफुल्लित देखि पड़ैत अछि । कैक दिनसँ कओलेज नहि गेल रहैछ । ओ तुरत कपड़ा बदलैत अछि । किताब उठबैत अछि आ कओलेज दिश विदा भऽ जाइत अछि । माय टुकुर–टुकुर बेटीकेँ खुशीसँ उठैत पयर पर नजरि टिकौने रहैत अछि ।

राम भरोस कापडि भ्रमरक जनकपुर ललित कला प्रतिष्ठानसं सद्यः प्रकाशित होबबला उपन्यास घरमुहां जल्दीय बजारमे उपलब्ध हएत । प्रतिक्षा करी । २ चंदन कुमार झा सररा, मदनेश्वर स्थान मधुबनी, बिहार बिहनि कथा समय होत बलबान

मालिक बाबा..माने श्री सुरुज ठाकुर..जमाना केँ जमींदार. एकटा समय छलै जखन बारह सौ बिगहा जोतैत रहथि. इनार,पोखरि,कलम-गाछी कथुक अभाव नहि.परोपट्टा मे नाम रहैन्ह. आँगा-पाँछा हरदम चारिटा लठैत रहैत छलन्हि.एही शान-रोआब दुआरे बड़का-छोटका सभ मालिक कहैत छलन्हि..एखनो कहैत छन्हि...कियो मालिक बाबा त' कियो मालिक काका. मुदा आब ओ समय नहि छन्हि.सुख-भोगक पाँछा निर्भूम भ' गेलाह.अपना खेतक लवाणो नहि होइत छन्हि.हँ घरारी एखनो पुरने छन्हि.बीच गामपर कम से कम पाँच बिगहा के. चारू कात जंगल जनमल रहैत छै आ' बिच मे पुरना हबेली छैन्ह.कतेको ठाम ढहल.मुदा रोआब एखनो पुरनके.चिनीया बिमारी छन्हि तइयो डाक्टर ल'ग जेबा सँ पहिने भरि पोख रसगुल्ला खा' लैत छथि. कहैत छथि -फेर सार डाक्टर मना करत. पहिने खा' लेब' दे. बात-बात मे गारि देब आदत बनल छैन्ह मुदा हुनकर गारि ककरो खराप नहि लगैत छैक.सभ असिरबादी बुझैत अछि. परुका मलकाइन मरि गेलखिन्ह.बडड् प्रेम छलन्हि दुनू परानी मे.जहिया से मलकाइन मरलखिन्ह, मालिक बाबा बताह बनल रहैत छथि.एकदिन बारीक आमक गाछ पर कोइली बाजब सुनि अनेरे गरियाब' लगलाह.कोनो नेना ई घटना देखि लेलक. मालिक बाबा..कूउ..अनायास ओकर मुँह सँ बहरा गेलै. माइये-बहिन ओकरा गरिया देलखिन्ह.असर्ध गारि सभ. फेर की ई त' खिस्सा बनि गेल..मालिक बाबा ..कूउ..की बच्चा..की चेतन..सभ खौँझाबय लागल आ' असिरबादी सुनय लागल. काल्हि मलिकाइन के बरखी छियैन्ह. एगारह टा ब्राह्मण के खुएथिन्ह तकरे इंतजाम मे लागल रहथि.घामे-पसेने तर.थाकि गेल रहथि. दरबज्जा पर बसि रहलाह.खरिहान मे एकटा बकरी चरैत रहय.बारी मे फेर कोइली बाजल..कूउ..तामस चढि गेल रहन्हि..मुदा गारि नहि बहरेलन्हि मुँह सँ..आँखि भीज गेलन्हि. गमछा लय मूह-आँखि पोछय लगलाह. बकरी मेमिया उठल..बुझेलन्हि जेना मलकाइन बौसि रहल हो. कहैत होइथिन्ह -"समय होत बलबान" ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। सुजीत कुमार झा साधना साँझक सात बाजि गेल छल । साधना एखनधरि नहि आएल छलीह । नेहा वरण्डापर उदास बैसल मम्मीके प्रतीक्षा कऽ रहल छल । जीतेन्द्र प्रसाद भितर रुममे दर्दसँ परेशान छलाह । यद्यपि दर्द आइ किछु कम छल मुदा, ओ भितरकँे कछमछीसँ तनावमे छलाह । साँझक चारि बजे चाह पिलाक बादसँ ओ आ नेहा साधनाक प्रतीक्षाकऽ रहल रहैथि । चारि बजे पंकज ब्याट–बल खेलऽ चलि गेल छल । रीना सङीसँ भेट करऽ गेल छल । रहि गेल छला जीतेन्द्र प्रसाद आ नेहा । साधना भोरे जलपानकऽ कऽ घरसँ निकलल छलीह, ई कहिकऽ जे बेरियाधरि चलि आएब । बहुत रास काज अछि कहि गेल छलीह, कपड़ा बेचबाक अछि, मिश्राजीके घर भेट करबाक लेल जएबाक अछि, महिला क्लवमे अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवसक कार्यक्रममे जएबाक अछि आ बजारसँ दोकानक लेल समान किनवाक अछि, बेरियाधरि आबि जाएब । जीतेन्द्र प्रसाद सोचि रहल छलैथि, ‘की भऽ रहल अछि ? साधना हरदम घरसँ बाहर रहऽ लागल छथि । की भऽ गेल छैन्हि हुनका ? पता नहि कपड़ाक व्यपार आ दोकानकँे की भऽगेल अछि ? किए आवश्यकता अछि साधनाकेँ एतेक काज उठएबाक ?’ ओ सोचैत जा रहल छलाह, ‘एखन तऽ आजुक दबाइ सेहो बजारसँ लेबाक अछि । पंकज सेहो खेलकऽ नहि आएल अछि । नहि जानि की भऽगेल अछि एहि घरकेँ ?’ नेहाकँे बजाकऽ ओ अपना लग बैसा लेलैन्हि । जीतेन्द्र प्रसाद आ नेहा दुनू उदास रहैथि । प्रसंग बदलैत जीतेन्द्र नेहाकँे चाह बनएबाक लेल कहलैन्हि । बूझल छलैन्हि जे चिनी समाप्त भऽ गेलै मुदा, ककरो अनबाक पलखैत नहि छै, तखने नेहा इहो कहलक जे ‘घरमे चाहपत्ती नहि अछि ।’ जीतेन्द्र प्रसाद नेहाक बात सुनलैन्हि । क्षण भरिके लेल ओ किछु विचलित भऽगेला आ फेर शुन्यमे ताकऽ लगलाह । जीतेन्द्र प्रसादक मोन विद्रोहकऽ उठल, ‘की एहनो कतहु घर भेलैए, जतऽ कोनो सामञ्जस्यता नहि । एकरा तऽ होटल सेहो नहि कहल जा सकैए, की विमार हएब कोनो अपराध अछि ? ओ जानि बूझिकऽ तऽ विमार नहि पड़ल छथि । डाक्टर तऽ कहैत अछि बहुत बेसी काज कएलासँ बहुत थकावट आबि गेल अछि, शरीरकेँ आराम तथा मस्तिष्ककँे शान्तिक आवश्यकता अछि । मुदा कहाँ अछि शान्ति ?’ ओ सोचैत रहलाह, सोचिते रहला । पंकज आबि गेल । रीना सेहो आबि गेल । जीतेन्द्र प्रसाद सभ किछु देखैत रहलाह, हुनका किछु बाजब, नहि बाजब बराबरे छल । एहि घरक सभ सदस्य पूर्ण स्वतन्त्र छल । रीना भानस घरकँे एक सर्वेक्षण कएलक, फेर पंकजसँ किछु कहलक, पंकज बजारसँ किछु समान अनलक । भोजन बनल । राति आठसँ उपर बाजि रहल छल, दोकान बन्दकऽ कऽ दीपक सेहो चलि आएल छल । रीना दीपककेँ बजार पठाकऽ जीतेन्द्र प्रसादक लेल दबाइ मगबओलक । रातिक दश बाजि गेल अछि । नेहा सूति रहल अछि । रीना आ पंकज अपना रुममे किछु पढ़ि रहल छल । जीतेन्द्र प्रसाद ओछाएनपर पड़ल–पड़ल किछु सोचि रहल रहैथि –एकटा बात छोड़िकऽ दोसर, दोसर छोड़ि कऽ तेसर । साधनाकँे केओ स्कुटरसँ छोड़ि गेलैन्हि । स्कुटरक आवाज सूनिकऽ रीना आ पंकज बाहर आएल । साधना अबिते जीतेन्द्र प्रसादके रुममे चलि अएलीह तथा बगलमे सूति रहलीह । रीना आ पंकज ठकुआएल सन किछु देर ठाढ़ रहल आ चुपचाप घूमि गेल । जीतेन्द्र प्रसाद देखिते रहलाह, फेर बात चलएबाक हिसाबसँ बजलाह, ‘कहाँ छलहुँ एखनधरि, घरमे नहि चाहपत्ती, नहि चिनी, नहि चाउर, नहि दबाइ । बेरिएमे आएब कहने छलहुँ ? ‘हँ, मुदा कि कहुँ महिला क्लव चलि गेलहुँ प्रीति पकड़िकऽ लऽगेल । ओतऽ सुषमा भेट गेल । अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवसक बैसार छल मनोरमाक घरपर । निन्न आबि रहल अछि । सूति रहू ?’ ‘किए, की बात अछि ? आँखि अहाँक लाल बुझाइत अछि ।’ ‘हँ, कनि–मनि लऽ लेने छी, लेडिज ड्रिंक । ओतेक नहि लगैत छैक । क्लवक आइ वर्षगाँठ छल । मधु दिससँ पार्टी छल । अगिला बेर हमरे नम्बर अछि ।’ साधना कहिते–कहिते सूति रहलीह । जीतेन्द्र प्रसाद सुनैत रहला आ सोचैत रहलाह, ‘की भऽ गेल अछि हिनका ? की भऽ गेल अछि एहि घरकँे ? केमहर जा रहल अछि साधना ? की हएत आगाँ ? नहि, आब एकर अन्त करहे पड़त । कोना चलत एना ?’ हुनक हृदयक दर्द बढ़ि गेल । ओ हाथसँ छातीकँे दबा करोट फेरैत रहलाह । रुमके बल जरैत रहल, ओ सोचैत रहलाह ..... आइ एहि शहरमे अएला लगभग दश बर्ष भऽ गेल अछि । आएल छला तऽ कनिक तलब छलैन्हि मुदा कतेक शान्त जीवन छल, कतेक सुखद छल ई घर । साँझ पड़िते अफिससँ घर अएबाक मोन करऽ लगैत छल । कतेक मेल छल घरकेँ एक–एक प्राणीमे । तहियासँ कतेक अन्तर आबि गेल अछि एखन । तहियासँ तलबमे सेहो दूगुणा बृद्धि भऽगेल अछि । दश वर्षमे एहि शहरकँे कोना–कोना परिचित भऽगेल अछि । शहरक सभा सोसाइटी सँ सम्बन्ध भऽगेल अछि । ई शहर तऽ आब अपने भऽ गेल अछि । साधना आब शहरक महिला क्लवमे जाए लागल छथि । महिला क्लव आब तऽ हुनकापर छा गेल छैन्हि । आब साधनाकँे रुपैयाक लोभ भऽगेल अछि । तहिया कतेक नीक छलीह साधना । थोड़बे रुपैयामे घरक खर्च बढियाँ जकाँ चला लैत छलीह । घरके सभ समान ओहीे पैसासँ कीनल गेल अछि आ आइ की भगेल अछि ? साधना दोसरके देखासिखी दोकानो खोलि लेने छथि । ओहूसँ पैसा अबैत अछि मुदा, तैयो घरक खर्च नहि चलैत अछि । कहियो चाहपती नइँ, कहियो चिनी नइँ, कहियो ई नइँ तऽ ओ नइँ । कतेक झगड़ा ! हँ, ओ झगड़े तऽ छल दोकान खोलबाक लेल । कतेक सम्झओने छलहुँ साधनाकेँ । हमर असली धन तऽ नेहा, रीना आ पंकज अछि । यदि इएह सभ ठीक जकाँ पढ़ि–लिख लेत तऽ एहिसँ बड़का धन आओर कि हएत । एकरो सभकँे स्कुलसँ अएलाक बाद ममत्व चाही । एकरो सभक विषयमे पुछऽबला होएबाक चाही । मुदा की साधना कोनो बातके बुझती ? मानलहुँ हम दोकानमे किछु नहि करैत छी, मुदा घर तऽ बिगरल जा रहल अछि । बच्चा की बुझैत हएत ? की बुभैmत साधना ई सभकऽ रहल छथि ? ओह, की भऽ गेल अछि साधनाकेँ ? कपड़ाक व्यपार ! ओहो एकटा कथे अछि । साधना कहैत छलीह, ‘कपड़ा बढ़ियाँ बिकाएत ।’ कतेक बिकाएल कपड़ा ? महिला क्लवक ई दोसर उपहार छल कि महिला क्लवमे लोक कपड़े किनत दैनिक ? के बुझाओत साधनाकेँ ! जयनगर जाउ, सीतामढ़ी जाउ, कपड़ा लाउ, प्रदर्शनी लगाउ तखन जाकऽ थोकमे कपड़ा बिकाइत अछि । की भऽ गेल अछि हमर जीवनकँे ? साँझमे अफिससँ आउ तऽ स्वयं चाह बनाउ । दीपककँे की पड़ल अछि ? आइ हमरा घरमे अछि, काल्हि दोसर घरमे चलि जाएत । पैसा कतऽ बँचैत अछि ? हमर तलब अछि, दोकानके पैसा अछि मुदा एकटा छोटको बिमारीमे कर्जा लेवाक अवस्था चलि आएल । लोक ओतबे अछि । इएह पंकज अछि । पहिने क्लासमे प्रथम करैत छल । शिक्षककेँ प्रिय छल । आब फेल होबऽ लागल अछि । कतेक उदास रहैत अछि पता नहि ककरा सभकेँ सङी बना लेने अछि ? ‘की भऽ गेल अछि एहि दश वर्षमे,’ जीतेन्द्र प्रसाद सोचैत रहलाह, बल्व जरिते रहल । ओ करोट फेरैत रहलाह मुदा, साधना निफिक्किर सूतल रहलीह । भोरमे साधना दीपककँे बजार पठाकऽ घरक लेल समान मगबओलैन्हि । घरके ठीक कएलैन्हि । नेहा, रीना, पंकज सभ साधनाक आगाँ कतेको समस्या सुनओलक । साधना किछु देर सुनैत रहलीह, किछु कालक बाद ओकरा सभकेँ किछु कहलीह मुदा, बातक अन्त भेल नेहाक पिटाइसँ । ‘आखिर अहाँ कोन तमाशा बना रहल छी ? की भऽगेल अछि ? अहाँ कतऽ अबैत जाइत रहैत छी ? किछु देर घरोमे रहू आ बच्चाक देख–भाल करु,’ जीतेन्द्र प्रसादके तामस बढैÞत जारहल छल । ‘तऽ की करु ? ई सभ काज बन्दकऽ दिऔ ? आब जखन बजारमे कपड़ा बिकाए लागल अछि, दोकान चलऽ लागल अछि, तऽ की बन्दकऽ दिअ दोकानकेँ ? घरमे बैसल रहब तऽ सभ काज ठप्प भऽ जाएत ।’ ‘मुदा घरो तऽ नहि चलैत अछि । घरमे कम पैसा तऽ नहि अछि । घर चलएबाक लेल बढ़िएँ तलब भेटैत अछि । एहिसँ कम तलब भेटैत छल तहिया ई हाल नहि छल । एतेक मारि–पीट, एतेक झगड़ा नहि होइत छल ।’ ‘हम तऽ अहाँके किछु करहोके लेल नहि कहैत छी, हम स्वयं कऽ रहल छी । घर बाहर घूमि रहल छी । शुरुमे तऽ अहुँ मदति कएने छलहुँ, बच्चा आब तऽ छोट नहि रहि गेल अछि, अपन काज स्वयं कऽ सकैत अछि । घरमे एकटा नोकरो अछिए । की हम नोकरनीए बनिकऽ रहू सभ दिन ?’ ‘ओह, अहाँ इहो तऽ सोचू जे हम विमार छी । उठिकऽ स्वयं चलि फिर नहि सकैत छी । बजारसँ समान नहि आनि सकैत छी । बच्चाकँे पढाइ सेहो बढियाँसँ नहि चलि रहल अछि । एहिसँ बढिकऽ तऽ पैसा नहि अछि । जखन हमही सभ नहि रहब तऽ की हएत पैसा लऽ कऽ ? लड़का गुण्डा–आवारा भऽ जाएत तऽ की हएत ? अहाँकँे बन्द करऽ पड़त ई सभ कारोवार । ई घर अछि कोनो बजार नहि, होटल नहि । याद राखू, घर अछि ।’ ‘चाहे जे भऽ जाउ, हम दोकान बन्द नइँ करब । कपड़ाक व्यपार नहि बन्द करब । चाहे बच्चाकँे होस्टलमे पठाउ वा घरमे पढ़ाउ । अहाँकेँ बेमारीएमे कतेक खर्च भेल अछि, किछु बूझल अछि अहाँकेँ ? घरक खर्च कतेक बढ़ि गेल अछि, किछु बूझल अछि अहाँकेँ ?’ जीतेन्द्र प्रसाद टूटि सन गेल छलाह, ‘हम की देखू ? बच्चा होस्टल जाएत तऽ खर्चा बढ़त की घटत ? हमरा बिमारीमे पैसा लागल तऽ की हमर पैसा किछु नहि बचल छल ? अहाँ की कहऽ चाहैत छी ? की मतलव अछि अहाँकें ? ’ दुनूके स्वरक आवाज बढैÞत जा रहल छल । बातचित आब झगड़ाक रुप धारणकऽ लेने छल । तखने रीना चाहक कप लऽकऽ रुममे पहुँचल । चुप्पी । साधना चाहक कप जीतेन्दं्र प्रसाद दिस बढ़ा देलीह । किछु देरक शान्ति । दूनु एक दोसरकेँ देखैत रहल मुदा किछु नहि बाजल । साधना कपड़ा लऽकऽ बाथरुम चलि गेलीह । जीतेन्द्र प्रसाद चुपचाप पड़ल रहलाह । पाएर लग नेहा बैसल छल । एखनधरि पत्रिका सेहो चलि आएल छल । मोट अक्षरमे महिला दिवस मनएबाक कार्यक्रम छपल छल । शहरक लेडिज क्लवमे महिला वर्ष मनएबाक पुरा कार्यक्रम छल । साधना कार्यक्रमक संयोजक छलीह । कलवेल बाजि उठल । नेहा गेट खोललक । ‘मम्मी अछि, बौवा ?’ ‘हँ, छैक । अपने के ?’ ‘कहियौन्ह मिश्रा जी आएल छथि ।’ मिश्राजीक नाम सुनिते साधना जल्दी–जल्दी वाथ रुमसँ निकललीह । ‘बेटी, एक कप चाह पियबियौन्ह, कनी जल्दी । ’ साधना कपडा बदलि लेलीह । रीना चाहक कप रुममे रखलक साधना सेहो मिश्रा जी सँग चाह पीलैन्हि आ बैग उठा लेलैन्हि । ‘हँ, तऽ हम जा रहल छियौ । जल्दिए अएबाक कोशिस करबौ । रीना, भोजन बनालिहँे । रुपैया अलमारीमे छौ ।’ जीतेन्द्र प्रसाद चुपचाप सुनैत रहलाह, साधना मिश्राजीक स्कुटरपर बैसि विदा भऽ गेलीह । ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com  पर पठाउ। ३. पद्य ३.१.१.कामिनी कामायनी- काशीक घाट २.श्यामल सुमन ३.२.१.नारायण झा २.जगदानन्द झा३.बेचन ठाकुर-वनभोज ३.३.१.उमेश पासवान २.किशन कारीगर ३.४.रामवि‍लास साहु ३.५.१.जगदीश प्रसाद मण्डल २. नवीन कुमार झा ‘‘आशा’’ ३.६.शि‍वकुमार झा ‘टि‍ल्लू’ ३.७.डॉ॰ शशिधर कुमर ३.८.चंदन कुमार झा- गजल/ कविता/ हाइकू १.कामिनी कामायनी- काशीक घाट २.श्यामल सुमन १ कामिनी कामायनी काशीक घाट बाबन टा घाट सॅ टघरैत बहैत नुकैत . . .मुस्कैत ऐंठैत. . .उमकैत झूमैत. . हॉफैत चलि रहल अछि नाह मद्विम मद्विम .. . . ऊपरि आकाश केर अपन बाहुपाश में नेने कारी कचोर मेघ छिटकौने सबटा जट्टा बनौने बडका छॉहरि दैत जेठक जरैत रौद सॅ बचवा के असीरबाद पानि कम छै दूर दूर धरि सूखल कछार भनभनाति. . .असंख्य बौलक स्वर पर्यावरणक अधोगतिक पसारए चाहैत अछि खिस्सा मुदा हुनकर पठाओल हकार हुनक दरबार नहि सुनब आजु हम केकरो आनक विलाप नहिं देखब हम मंडिल के दुर्गति पंडा सबहक लूट खसोट वृद्व आ’ नगर वधू. .. प’ विभत्स रस क लेपन वा चहूॅ दिस पसरल कूडा कचरा के साम्राज्य खसत त’ अवस्स नोर हमर आय मुदा विश्वनाथे के मंडिल मे जाए दीवोदास क् राज्य मे औघड के त्रिशूल प’ बसल जे धाम वएह त’ हमर काशी हमर प्राण वएह त’ हमर स्वप्नक चिर प्रतीक्षित गाम ।। 2सारनाथक संत तपस्वी इम्हर एकांत में प्रकृति सुन्नरि के रूप लावण्य निहारि एतेक ऐश्वर्य पाबि कतेक आनंद भेटल अपनेक मुख मंडल सॅ ज्ञात होबि रहल अछि यद्यपि छी ध्यानमग्न अपन पॉच शिष्यक संग गाछक नीचा तीतैत अविचल .. . . काल वा मौसमक प्रहार सॅ विजय वा पराजयक आस सॅ पृथक एकसरि लडैत अपना सॅ बढैत जा रहल छी र्निद्वन्द्व. . . सहस्त्रों बरख पहिने देल ओ प्रवचन अनुगुॅजित भ’ रहल अछि शंखनाद बनि मॅह मॅह करैत अछि वातावरण चारूकात अपनेक दैहिक सुवास सॅ ओहि दिन सॅ विलमल समय . . . चकित ..मुदित सीखा रहल अछि अष्टांगी मार्गक चरम ऊद्देश्य समेटने अपन बोरिया बिस्तरा नेने हाथ मे. छडी कमंडल .. . . ओहि चिरंतन बाट के बटोही जेकर पाथेय मात्र सत्य छै जीवनक कटुतम सत्य। ।

२. श्यामल सुमन तखने जीयब शान सँ

समय के सँग मे डेग बढ़ाबी तखने जीयब शान सँ किछु ऊपर सँ रोज कमाबी तखने जीयब शान सँ

काका, काकी, पिसा, पिसी रिश्ता भेल पुरान यौ कहुना हुनका दूर भगाबी तखने जीयब शान सँ

सठिया गेला बूढ़ लोक सब हुनका बातक मोल की हुनको नवका पाठ पढ़ाबी तखने जीयब शान सँ

सासुर अप्पन कनिया, बच्चा एतबे टा पर ध्यान दियऽ बाकी सब सँ पिण्ड छोड़ाबी तखने जीयब शान सँ

मातु-पिता के चश्मा टूटल कपड़ा छय सेहो फाटल कनिया लय नित सोन गढ़ाबी तखने जीयब शान सँ

पिछड़ल लोक बसल मिथिला मे धिया-पुता सँ कहियो अंगरेजी मे रीति सिखाबी तखने जीयब शान सँ

सुमन दहेजक निन्दा करियो बस बेटी वियाह मे बेटा बेर मे खूब गनाबी तखने जीयब शान सँ

आँखि के नोर सँ

भेटेय छै फल अपन कर्मक जखन मानय छी फुटल नसीब तखन कहिकय कियै कानय छी

खेलहुँ नय नीक-निकुत कहियो ककर दोष कहू खाय छी कूटि केँ ओतबे नित लूटि आनय छी

रहल छी साल कतेक संगे आबो चीन्ह लियऽ बुझिकय खाट कियै हमरा नित गतानय छी

लोक मे पानि भऽ रहल कम आओर दुनिया मे आँखि के नोर सँ नित आटा हमहुँ सानय छी

लगल छी रोज प्रशंसा मे जिनका टाका छै हुनक खराब छलय नीयत जखन जानय छी

बूढ़ केँ ज्ञान बिसरि कहलहुँ बोझ भऽ गेला मोन सँ सोचि कहू हुनका के गुदानय छी

टूटल प्रतिज्ञा सुमन जखने तखन हूब घटल करू प्रयास खूब मन सँ किछुओ ठानय छी

जतबय अछि औकात करय छी

कत्तेक सुन्दर बात करय छी पाछाँ सँ आघात करय छी

जखनहि स्वार्थ सधल जिनका सँ तखनहि हुनका कात करय छी

सगरे देख रहल छी प्रायः झगड़ा हम बेबात करय छी

टाका सबटा गेल दहेजे डीह बेचि बरियात करय छी

कनिको दुख नहि सुमन हृदय मे जतबय अछि औकात करय छी खूब मोन सँ सभक सुनय छी

कनिये कनिये रोज लिखय छी छात्र एखन, साहित्य सिखय छी

भारी भरकम बात लिखल नहि घर-आँगन केर बात कहय छी

बेसी वक्ता, कम छै श्रोता कविता सँ सम्वाद करय छी

कहियो नहि मन-दर्पण देखल बाहर दर्पण रोज देखय छी

छी असगर ई भाव भीड़ मे बनिकऽ पानी संग बहय छी

एहि जीवन मे दुख ककरा नहि दुख मे नित मजबूत रहय छी

कियो सुमन के सत्य सुनल नहि खूब मोन सँ सभक सुनय छी ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। १.नारायण झा २.जगदानन्द झा ३. बेचन ठाकुर- कवि‍ता- वनभोज १ नारायण झा रहुआ संग्राम कवि‍ता- कुर्त्ता उजरे, पैजामा उजरे। कान्ह्पर गमछा उजरे दलाने-दलाने छातथि‍ अगबे गप। करथि‍ वादा हुनकासँ लप्परक-पल दौग-दौग सभ नेना मांगैत छन्हिम‍ पर्चा बाटेमे नै लगैत छैक कोनो खर्चा। की हौ मुखि‍या काका, की हेतै हाल मुर्गा बोतल की करतै एहुबरे कमाल। अहुँ सुनबै, तहुँ सुनहक एकर जर्जर हाल देखहक। अनाज, कि‍रासन, इंदि‍रा आवास जरूर भेटतैक राखह बि‍सवास। ई गप मारि‍ फटकबाक छै कोनो की करबाक छै। समाजक सेवा परम सेवा दि‍न-दि‍न भेटतैक एकर मेबा। कुर्त्ता उजरे, पैजामा उजरे कान्ह् परक गमछा उजरे।। २ जगदानन्द झा गजल-१ हाथी दाँत खे केँ आर, देखाबै कए छै आर नेता कें कहैक तँ बात आर करै कए छै आर

केलक भोज जे नै दालि बड सुडके, इ जग-जाहीर भोजक बात आरो छैक, बात किनै कए छै आर

दोसर कें फटल में टाँग, सब कीयो अडाबै छैक फाटल अपन सार्बजनिक देखाबै कए छै आर

सासुर कें मजा बहुते होइ छै, अपने बुझल सब नीक कनियाँ सन्ग सासुर में मजा तँ रहै कए छै आर

भाई धन कए गौरब तँ गौरबए बताहे छैक आ सम्पैत-गौरब बाप जँ कमेलै कए छै आर

(दीर्घ,दीर्घ,दीर्घ,हस्व SSSI, चारि-चारि बेर सभ पांति में )

गजल -२

बेटी नहि होइ दुनिआ में, कहु बेटा लाएब कतए सँ जँ दीप में बाती नहि तँ, कहु दीप जलाएब कतए सँ

आबै दियौ जग में बेटी के, के कहे ओ प्रतिभा,इन्द्रा होइ भ्रूण-हत्या करब तँ कल्पना,सुनीता पाएब कतए सँ

मातृ-स्नेह, वात्सलके ममता, बेटी छोरि कें दोसर देत बिन बेटी वर कें कनियाँ कहु कोना लाएब कतए सँ

धरती बिन उपजा कतए, घर बिनु कतए घरारी बिन बेटी सपनो में, नव संसार बसाएब कतए सँ

हमर कनियाँ, माए बाबी हमर किनको बेटीए छथि बिन बेटी एहि दुनिआ में, मनु हम आएब कतए सँ

(सरल वार्णिक बहर, वर्ण-२१ ) गजल-३ आई काल्हि तँ राजनीतिक बाजार बहुत गर्म अछि देखू नेता सभहँक हाल बनल बड्ड बेशर्म अछि

चानन टिका लगा कs ओ बनल बडका-बडका भक्त नहि पुछू एहि संसार में केने कतेक कुकर्म अछि

जए अछि कर्मयोद्धा धीर बीर, ओ बजैत नहि अछि चुप्प भs करैत सदिखन अपन-अपन कर्म अछि

भैय्यारी आ सद्भावना इ तँ सबसँ बड़का प्रेम अछि जे लडाबए एक दोसर सँ ओ नहि कोनो धर्म अछि

हम छी मैथिल, आ नहि कोनो आन हमर धर्म अछि सपनो में एकरा त्यागि,सबसँ बडका अधर्म अछि

(सरल वार्णिक बहर, वर्ण-२०) गजल -४

नरहीया भुकैए हमर घराडी पर बसलौं परदेश में हम खोबाडी पर

दूध-दही पान मखान सब छोरि एलौं छी पेट पोसने तs दु-टुक सुपारी पर

जे किछ कमेलौं हाथ-पएर तोरि कय साँझ परैत खर्च भेल छूछे तारी पर

बचेलौं बर्ख भरि पेट काति-काति कय गमेलौं गाम जए-आबक सबारी पर

छोरु दोसरक आसा अपन बसाऊ यौ घुरि आउ मनु सोनसन घराडी पर

(सरल वार्णिक बहर, वर्ण-१५) गजल-५ किस्त-किस्त में जिनगी बिताबै लेल मजबूर छी माटि पानि छोरि अपन, किएक एतेक दूर छी

आबै जाए जाउ घुरि-घुरि अपन-अपन घर घर में रोटी नै, रखने माछ-भात भरपूर छी

तिमन-तरकारी बेच-बेच करू नै गुजरा यौ घुरि आऊ अपन गाम, एतुका अहाँ हजूर छी

परदेश में बनि कतेक दिन रहब परबा अपन घर आऊ, एतए के अहाँ तs गरूर छी

अपन लोकक मन-मन में मनु अहाँ बसुयौ परक द्वारि पर बनल किएक मजदुर छी

(सरल वार्णिक बहर, वर्ण-१८)

गजल-६ किस्त-किस्त में जिनगी बिताबै लेल मजबूर छी माटि पानि छोरि अपन, किएक एतेक दूर छी

आबै जाए जाउ घुरि-घुरि अपन-अपन घर घर में रोटी नै, रखने माछ-भात भरपूर छी

तिमन-तरकारी बेच-बेच करू नै गुजरा यौ घुरि आऊ अपन गाम, एतुका अहाँ हजूर छी

परदेश में बनि कतेक दिन रहब परबा अपन घर आऊ, एतए के अहाँ तs गरूर छी

अपन लोकक मन-मन में मनु अहाँ बसुयौ परक द्वारि पर बनल किएक मजदुर छी गजल -७ करेजा में अहाँक छबी बसल,मोन हमर ह्टैत नहि अछि अहाँके स्नेह सागर में नहेलौं,एकर पानि घटैत नहि अछि

सुतै-जागैत ध्यान अहींक केने, हम सदिखन रमल रहै छी अहाँके अछि सुन्नर काया कतेक, कतौ मन ह्टैत नहि अछि

सगर संसार देलहुँ त्यागि हम, केने वरण छी आब अहीं के अहाँके संग छोरि कतौ, मिसीयो भरि उसास अबैत नहि अछि

अहींके नाम लिखल अछि, मनु कए एक-एक धरकन पर पुछूनै हमर हाल अहाँ, बिनु अहाँ जीबन कटैत नहि अछि (वर्ण-२४, बहरे-ह्जज ) गजल-८ अहाँ कखनो तँ बाट हमर घरक धरबै अहाँक हाथे ओहि दिन हम वरक धरबै

लाली सेनुर टुकली श्रृंगार हमर सबटा अहाँ बिनु एकरा हम कोनो सरक धरबै

एही जीबन में सिनेहिया अहाँ नहि भेटबै जिबते जीबैत हम तs बुझु नरक धरबै

अहाँ हमर जिबनक पूर्निमाक इजोरिया अहीं हमर मोन में इजोत भोरक धरबै

अहाँ आब त फूसीयो सँ आबियो घर जाउ यौ मनु कखनो त कनिको कोनो सरक धरबै गजल-९ खूर देलखिन्ह ओ सोधि लेलखिन्ह ओ

देख मोका नीक सँ चाभि पेलखिन्ह ओ

माय-बेटा के देखू फूट केलखिन्ह ओ

नीक-नीक साडी में फीट भेलखिन्ह ओ

गाम-गाम घूमी क नाम केलखिन्ह ओ गजल-१० धुप-आरती हम कएलहुँ नहि जप-तप करब जनलहुँ नहि

सैदखन कर्तव्यक बोझ उठोने अहाँक ध्यान किछु धरलहुँ नहि

की होइत अछि माय-पुत्र के नाता एखन तक हम जनलहुँ नहि

हम बिसरलहुँ अहाँ के लेकिन अहुँ एखन तक देखलहुँ नहि

आब हमरो ध्यान लियअ हे माता स्नेह अहाँक हम पएलहुँ नहि ३ बेचन ठाकुर कवि‍ता वनभोज सगर राति‍ वनभोज भऽ गेल मि‍थि‍लांचल छोड़ि‍ दि‍ल्ली चलि‍ गेल। साहि‍त्य. अपमान भऽ गेल, कथा गोष्ठी़क कि‍ल्लीऽ तोड़ि‍ देल। हरि‍नक गवाही सुग्गर देल दुनू पड़ा कऽ जंगल गेल। जंगलमे मंगल भेल। हि‍स्सेऽदारक हि‍स्सा कटि‍ गेल। जे भेल से नीके भेल, जेना रमायण महाभारत भेल। बुधि‍मे बि‍याधि‍ भऽ गेल, कएल-धाएल पानि‍मे चलि‍ गेल। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। १.उमेश पासवान २.किशन कारीगर १. उमेश पासवानक पद्य-

मनक बि‍सवास भेल अन्हाार लगल जेना सभ नि‍पत्ता बहल पछबा चलल हवा टुटल पत्ता हृदए व्यााकुल मि‍लनक आश दौड़ैत-दौड़ैत भेटल नै ठौर कखनो सफलता कखनो असफलताक डर दृढ़ संकल्पक अटुट बि‍सवास जि‍वनमे आश लेने मनक बि‍सवास देखि‍ रहल छी सुगम पथ उत्सापहक रथ एक दि‍न जरूर पुरा होएत मनक मनोरथ ऐ लेल पीबए परैए कोनो घाटक पानि‍ कि‍एक नै उपछए पड़ए खत्ता भेल अन्हा र लगल जेना सभ नि‍पत्ता।

केहेन वि‍धना लि‍खलनि‍ वि‍धाता कलजुगमे मेटा रहल मानवता अप्पगन-अप्प न हि‍तक लेल मारि‍ कऽ रहल अछि‍ परोपकारक नै अता-पता केहेन वि‍धना लि‍खलनि‍ वि‍धाता आब ि‍एक भऽ रहल अछि‍ मनुख चरि‍त्र नि‍प्पता सेवासँ सभ नि‍रवि‍त माता-पि‍ता केहेन वि‍धना लि‍खलनि‍ वि‍धाता नि‍त दि‍न मनुख-मनुख करैए हत्याक केकरा दोख दी जेहने गुरु तेहने चटि‍या असली-नकलीमे अन्तपर की माटि‍क मुरुत बनल अछि‍ भाग्य वि‍धाता। अपनेकेँ की कही समाजक अइना कही कि‍ फोटोग्राफर प्रोफेसर कही कि‍ पत्रकार कवि‍ कही कि‍ रचनाकार अफसर कही कि‍ बेरोजगार अभि‍भावक कही कि‍ दोकानदार पढ़ै छी रोज अपनेक लि‍खल समाचार खुलि‍ जाइए हमर बुधि‍क सभ द्वार टक-टकी लगेने रहै छी पढ़बाक लेल हि‍न्दुलस्ताढनक समाचार सबहक मनकेँ भावैए अपनेक बेवहार डरे अछि‍ घुसखोर कमी भेल भ्रष्टाएचार सदि‍खन अहि‍ना चुमी अहाँ सफलताक शि‍खर-पहाड़ कोन नाम केर सम्बोिधन करी अपनेक लेल अचरजमे पड़ल अछि‍ कवि‍ चौकीदार। फुसि‍-फट्टका हे आब बुझि‍औ बड़ दम खम देखबै छलए चौकीदार-दफेदारकेँ आबि‍ रहल अछि‍ ओ सभ कि‍यो आबए दि‍औ नि‍ति‍श कुमारकेँ घूस लइए तरे-तर ि‍नर्दोशकेँ भि‍तर दोषीकेँ बहार कनि‍याकेँ लऽ कऽ नेपाल तँ कहि‍यो घरपर खाली फूसि‍ फट्टका हे आब बुझि‍औ आबि‍ रहल अछि‍ ओ सभ कि‍यो डि‍यूटी कम-सम खाली छुट्टी मोन जे गरमाएत ओनीहारकेँ तँ लगा देत पुलि‍स लाइनमे डि‍यूटी कि‍ बुझै छि‍ऐ मुख्ता र-मुंशी, दुनू पार्टीसँ करैए कनफुसकी थानाकेँ छोड़ि‍ दै छि‍ऐ जे.पी बाबू आर.आर सि‍ंहपर हे आब बुझि‍यो। हकि‍कत आँखि‍ बंन्न डि‍ब्बाब गायब अतै हकि‍कत अछि‍ जोर चलैए लबड़ा-चुच्चा क जे मंगैए दऽ दि‍यौ नै देब तँ जानपर मोशि‍बत अछि‍ लोक बनल अछि‍ बहुरुपि‍या रंग भेषसँ केकरा चि‍न्हिब मोसकि‍ल अछि‍ एतए मनुखक रूपमे शैतान छि‍पल अछि‍ के की छी नै कि‍नको माथपर लि‍खल रहैए आइ मानवताकेँ कऽ रहल अछि‍ कलंकि‍त जे अप्पतन स्वाटर्थ भावमे डुमल अछि‍ मनुख तन पाबि‍ कऽ प्रभूक भजन छोड़ि‍ कऽ अहि‍त काममे लागल अछि‍ आँखि‍ बन्न डि‍ब्बाब गायब एतेक हकि‍कत अछि‍। पावन भूमि‍ बि‍हारक पावन भूमि‍मे सदा बहैत अछि‍ गंगा, कोसी कमला बलान एकर ि‍नर्मल जलसँ नि‍खरल अछि‍ एतुक्का खेत ओ खरि‍हान वि‍क्रमशि‍ला वि‍श्ववि‍द्यालय बुद्ध स्पुतत मि‍थि‍ला पेटिंग अति‍तक अछि‍‍ स्वा‍भि‍मान महा कवि‍ वि‍द्यापति‍ आर्यभट्ट, आयाची मंडन जतए छथि‍ महान एतए अति‍थि‍ पुजल जाइत अछि‍ संतकेँ होइत अछि‍ सत्काुर स्वाेगतमे भेटैए पान-मखान भाषा संस्कृ ति‍ सदि‍खन सभकेँ मनमोहने अछि‍ कला संस्कृिति‍केँ अलग-पहि‍चान एतए श्रीराम आएल छथि‍ वनक मेहमान एखन हम कहाँ बि‍सलौं जे कहि‍ गेल महावि‍र बुद्ध भगवान अपन माटि‍ पानि‍सँ जुड़ल छी हम अल्लााकेँ जपै छी पुजै छी श्री राम छठि‍, ईद मनबै छी एक संग मि‍लि‍ कऽ हि‍न्दूँ और मुसलमान देश हमर हि‍न्दुदस्तांन बि‍हारक पावन भूमि‍पर सदा बहैत अछि‍ गंगा कोसी कमला बलान।

एना नै कर बौआ रौ एना नै कर सुन हमर बात कि‍दु सोची जखन मन रहैए शि‍तल सुख-दुख राखी कऽ मोनमे बि‍सरि‍ कऽ सभ बात बि‍तल बौआ रौ एना नै कर सुन हमर बात अबेर तक नै रह सूतल भोरे उठि‍ कऽ कर माए-बाबुकेँ प्रणाम तकरबाद धुम-फि‍र टहल मन रहतौ चंचल बौआ रौ एना नै कर सुन हमर बात अपनासँ श्रेष्ठबसँ कि‍छु सि‍खी नै बात करी रटल खेली-कुदी पढ़ी-लि‍खी करी सबहक कहल बौआ रौ एना नै कर सुन हमर बात। भुतहा मोड़ नि‍त दि‍न होइए नव-नव घटना साँझ ओ भोर कोइ होइए घाइल तँ कोइ होइए चोटील थोड़बो थोड़ मरि‍ गेलै बुचना तँ मरि‍ गेलै सजन-धजल बर उजरि‍ गेलै केकरो मांगक सि‍नुर उजरि‍ गेलै केकरो घर बि‍हुँसै छै नव कन्याँग कनै छै माए-बाबू-भाए-बहि‍न बहबै छै दहो-बहो नोर चरचामे बनल हृदए वि‍दारक ई घटना चहू ओर मौतक चौराहा बनल अछि‍ एन.एच भुतहा मोड़। हमरो लेने चलू हमरो कहि‍ दि‍अ यौ अपने कतए जा रहल छी संग हमरो लेने चलू हमहूँ जाए चाहै छी अपनेक संग अइठाम ऐ दुनि‍याँमे मोन हमरो औना गेल जेना लागैए हम भऽ गेलौं तंग सभ ई अपनेक बनाओल ई वि‍धना के अप्पनन के पराया सभ अपने छी हम आइ बूिझ गेलौं सभ कि‍छु भऽ गेल मोह माया हमर भंग अपनेक अलौकि‍क छी अन्तकर्यामी छी सभमे छी अंनत रंग खुलि‍ गेल हमर आँखि‍क भरम दुनि‍याँ ई एकटा नाटक अछि‍ केकरो जीवन तँ केकरो मरण ई पार्ट तँ अहि‍ना चलैए हमरो कहि‍ दि‍अ यौ अपने कतए जा रहल छी संग हमरो लेने चलू। अथाह पलक झपकैत हम सपनाक दुनि‍याँमे बटोही सन हम हेरा गेलौं जहू दऽ कऽ बाट नै छल तहू दऽ कऽ हम चलि‍ देलौं डेग-डेगपर होइत रहल लोक संगे नोक-झोक जाइत रहलौं हम बेरोक-टोक उलटि‍ कऽ नै देखलौं के भेल खुश के भेल नाराज बि‍नु परवाह केने हम चलैत रहलौं ततेक दूर हम चलि‍ गेलौं हमरो थाह नै लागल निनक नदीक धारामे सपनाक नाहपर सवार हम चलैत रहलौं अवि‍रल मोन वि‍भि‍न्न तरहक वि‍चारक प्रवाह अबैत रहल डगमगाए लागल बि‍च अथाहमे लोभ-क्रोध नै छल हमरा चाहमे पलक झपकैत हम सपनाक दुनि‍याँमे बटोही सन हम हेरा गेलौं। गारल मुर्दा श्‍मशानमे गारल मुर्दा छटपटा रहल अछि‍ भि‍तरसँ अाेङरी अप्प न उठा रहल अछि‍ कहरैत श्वरमे बाजल आजुक मनुखक अस्तिम‍त्वा कि‍ अछि‍ मानवताक गुण वि‍श्वास परम्पअरा सभ कि‍छु बि‍सरि‍ गेल अछि‍ आइ मनुखक दुश्मवन मनुख बनल अछि‍ सभ लोभ-क्रोध मोह-माया केर जालमे ओझरा गेल अछि‍ गारल मुर्दाक प्रश्नसँ हमर हृदए कापि‍ गेलि‍ एकर उत्तर हमरा लग नै छल अनायास हमरो मुँहसँ नि‍कलि‍ गेल आजुक मनुखक अस्तहत्वक कि‍ रहि‍ गेल। २ किशन कारीगर अगिला अंक मे छपत (हास्य कविता) रचना भेटल अहाँ के मुदा अगिला अंक मे ओ छपत बेसी फोन फान करब त फुसयाँहिक आश्वासन टा भेटत।

अहाँ के लिखल कहाँ होइए तयइो हमरा अहाँ तंग करैत छी हमरा त लिखैत लिखैत आँखि चोन्हराएल अहाँक रचना हम स्तरीय कहाँ देखैत छी।

रचना कोना क स्तरीय हेतैय सेहो त फरिछा के अहाँ किएक नहि कहैत छी हम रचना पर रचना पठबैत छी मुदा अहाँ त कोनो प्रत्युतरो ने दैत छी।

हम त कहलहुँ अहाँ के लिखल ने होइए नवसिखुआ के ने लिखबाक ढ़ग अछि कोनो पत्रिका में त छैपिए जाएत इहए टा एकटा भ्रम अछि।

ई भ्रम नहि सच्चाई थिक नवसिखुओ एक दिन नीक लिखत नहि छपबाक अछि त नहि छापू लिखनाहर के कतेक दिन के रोकत।

संपादक छी हम अहाँ की कए लेब मोन होएत त नहि त नै छापब बेसी बाजब त कहि दैत छी अहाँ के कनि दिन और टरकाएब।

रचना नुकाउ आ की हमरा टरकाऊ आँखि तरेरू अहाँ खूम खिसियाऊ कारीगर ने अछि डरैए वला किएक ने अहाँ पंचैती बैसाउ।

हे यौ वरीय रचनाकार महोदय पहिने अहुँ त नवसिखुए रही आ कि एक्के आध टा रचना लिखी समकालीन सर्वश्रेष्ठ बनि गेल रही।

सच गप सुनि अहाँ के तामस उठत तहि दुआरे किछु ने कहब कविता हम लिखब आश्वासन भेटिए गेल त आब की ओ त अगिला अंक मे छपत। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। रामवि‍लास साहुक पद्य- धनरोपनी सावनक राति‍ इजोरि‍या जरैत पूरबा हवा दोमैत आसन लगौने बैस अकास नि‍हारैत सोचैत छल आश लगेने सावनक बून्न कहि‍या खसत जे भरि‍खरि‍ धनरोपनी हएत कि‍छु दुर नभमे बि‍जली चमकैत ढनमनाइत दस्तजक दैत बादल उमरि‍ गेल धरतीपर बेंगक बाजा नि‍रंतर बजैत झि‍ंगुरक झनकारसँ धरती धमकाबैत मेघक बरि‍याती सजए लागल कारी काजर सन मेघ उमरि‍ पड़ल बि‍जली छि‍टकैत छि‍टकैत मेघक रास्ताी देखबैत पसरि‍ गेल चारूकात घनघोर बर्खा भेल डबरा-खत्ता भरि‍ गेल खेत चानी सन चमैक गेल खेतक पानि‍सँ धूर तड़पैत उछलैत इचना-पोठी-टेंगरा चाल दैत कुदकैत देख गामक बच्चाद बेदरू कूदि‍-कूदि‍ माछ पकड़ैत बि‍हानेसँ गजार कदबा हुअए लगल खेत हर जोतैत हरबाह बि‍रहा गाबैत गामक माए-बहि‍न धानक बीज उपारैत भूलल बि‍सरल सोहर समदाउन गबैत धनरोपनी करैत खेत हर्षित मनसँ कहैत- “हरक नाश आ खेतक चासपर पेट भरबाक अछि‍ सभकेँ आश।”

लफंगा फाटल धोती फाटल अंगा पएरक जूता टुटल फाटल आँखि‍क चश्माग दूरंगा चौंकैत चलैत अछि‍ बेढ़ंगा बात करैत जना लफंगा लफड़ैत चलि‍ दरि‍भंगा बात-बातमे फॅसाबए दंगा सवाल-जबाब करैत अरंगा जखैन भऽ जाइत दंगा मौका पाबि‍ फनैत नंगा बात-बातमे कहैत लफंगा मन चंगा तँ कठौतीमे गंगा साँच झूठक दोहरी अंगा एकरंगा पहि‍र बनाबै फंदा झूठक खेतीमे उपजाबए बूटी फाटल जेबीमे रखलक मोती राम-नाम रटलासँ नै मि‍लत रौटी नीक काज कऽ बनाएब कसौटी जखन कि‍नब माेट-मोट पोथी ज्ञानक प्रकाश मि‍लत अनोखी वि‍कासक गंगा बहत चौमुखी।

रूपैआक ढेरी रूपैआक ढेरीपर करैए खेल दुनि‍याँकेँ नचबैए ठेल-ठेल रूपयाक लालचमे बनल अछि‍ पागल दानव बनि‍ मानवपर करैत राज सुखक भुख मि‍टबैए रूपैआसँ दीन दुखि‍याक तौलैए रूपैआसँ मनुक्खखक चालि‍ छोड़ि‍ चलैए नाच करैए खंजन चि‍ड़ै सन सुखक चाहमे भटकि‍ गेल राह सोमरसमे समाए गेल मन वि‍चार नंगा नाच करैए रूपैआ ढेरीपर जोशमे होश उड़ि‍ गेल नचबैयाकेँ जखन रूपैआक ढेरी अंत भऽ गेल जि‍नगीक दू कि‍नारा बीच पि‍साए गेल दुखक धारमे बहि‍ गेल रूपैआक ढेरी जहि‍ना मनुख मुठ्ठी बन्न जनमैए हाथ पसारि‍ संसारसँ चलि‍ जाइए रूपैआक ढेरी ओहि‍ना रहि‍ जाइए।

आएल वसन्त

आएल वसन्तर भागल जाड़ फूलसँ सजल धरती दुलहि‍न समान फूलक सुगन्धर चढ़ए आसमान आम मजरल महुआ पसरल भौंरा करए गुणगान सेरसौं बाजए शहनाइ समान वसन्त रंगमे रंगाएल सभ एक समान ढोल, मजीरा, ढाक, डफली बजबैत गबैत फागुनक गान रंग अबीरमे नहाएल समान भेद-भाव मि‍ट गेल सभ लगैए एक्के समान आमक गाछपर कोइली बजैत सभकेँ दैत प्रेमक वरदान धरती बनल स्वरर्ग समान आएल वसंत भागल जाड़।

अप्पन-पराया अपना लेल सभ मरै छै पराया लेल नै कोइ जे परायाकेँ अप्प न बूझै छै तँ जग सुन्द र होइ अप्पगन तँ अप्प न होइ छै पराया कि‍अए होइ छै सभ धरतीपर जनम लइ छै एक्केठाम जीबै-मरै छै जाति‍ भेदक अंतर कि‍अए होइ छै अपन करम अपने करै छै दोसरकेँ अहि‍त कि‍अए होइ छै जखन मनुक्खिक जाति‍ एक्के होइ छै सभ तँ अन्ने-पानि‍ खाए-पीब जि‍बै छै तखन वि‍चारमे कि‍अए अन्तकर होइ छै सबहक वि‍चार जँ एक्के हेतै सभ-आनो-वि‍रानो अप्पान हेतै एक्करंगा समाज बनतै सबहक वि‍कास समरूप हेतै अप्प न-परायक भेद मेटेतै जग सुन्द‍र बनि‍ जेतै। बाट बटोही डेग-डेगपर बाटमे मोड़ होइ छै तैयो राही बाट चलै छै तहि‍ना जि‍नगीमे मोड़ होइ छै बाटक मोड़ करोट नै लइ छै मुदा जि‍नगीक मोड़ करोट लइ छै बाटपर बटोही सभ दि‍न चलै छै जि‍नगीक मोड़ कठि‍न होइ छै बाटक बटोही बदलैत रहै छै तहि‍ना जि‍नगि‍यो बदलै छै जहि‍ना बाटक दि‍शा होइ छै ओहि‍ना जि‍नगीक दि‍शा सेहो होइ छै सही बाट पकड़ि‍ बटोही अप्पबन-मंजि‍ल पहुँचै छै गलत बाट पकड़ि‍ बटोही भटकि‍-भटकि‍ चलि‍ थकै छै बाटक ओर-छोड़ नै होइ छै बटोही चलैत थकि‍ मरै छै मुदा सही बाट चलैत बटोही अप्प न जि‍नगीक लक्ष्यह पबै छै। हाटक चाउर बाटक पानि‍ हाटक चाउर बाटक पानि बनि‍याँ घरक तरजूकेँ नै होइ छै कोनो माइन जानि‍-मानि‍ होइ छै हानि‍ जि‍नगी चलै छै उबानि‍ उजरल वनमे फूल-फड़ खि‍लैत-फड़ैत केना ठेलि‍-ठेलि‍ जि‍नगी चलैत केना फाटल वस्त्रू टूटल घरमे जि‍नगी रहै छै अन्हाेरे-अन्हाकर सूखल जि‍नगी केना पोनगत पोनगि‍-पोनगि‍ सुखि‍-सुखि‍ जाए केना सि‍ंचब नै फुराए सभ दि‍न जि‍नगी अन्हुरि‍ये बि‍ताए इजोरि‍या कहि‍यो नै देखाए सूख तन उजरल मन वन-वन भटकै मृग समान हाटक चाउर बाटे बि‍लाएल घाटक पानि‍ घाटे सुखाएल बि‍नु पानि‍ नै पि‍यास बुझाए। ज्ञान बाॅटैत चलू ि‍लखैत पढ़ैत रहू जि‍नगीकेँ सजबैत रहू लि‍खल पढ़ि‍ ज्ञानी बनू लि‍खि‍-लि‍खि‍ ज्ञान बाॅटैत चलू अपन ज्ञान अपने नै दुनि‍याँमे बॉटैत चलू लि‍खैत-पढ़ैत रहू ज्ञानक गीरह नै बान्हूै खोलि‍-सजाय बॉटैत रहू ज्ञानीक ज्ञानसँ दुनि‍याँ सजै छै आज्ञानी वि‍नाश करै छै लोभ-मोह-माया-छोड़ि दुनि‍याकेँ सजबैत चलू ज्ञान बाॅटलासँ खर्च नै होइ छै नि‍रंत्तर ज्ञान बढ़ैत रहै छै ज्ञानसँ अभि‍मान मेटाइ छै मान-सम्मारन सभ दि‍न भेटै छै ज्ञानक काज राजा-रंककेँ पड़ै छै िबनु ज्ञान दुनि‍याँ नै चलै छै ज्ञान बॉटैत चलू....। प्रेम आकि‍ पैसा अहाँकेँ की चाही? प्रेम‍- प्रेम आकि‍ पैसा प्रेमसँ सुख-शांति‍ भेटत दुख हरत कल्यारण करत बि‍गरल काज असान करत दि‍लक दरद असान करत एकताक पहि‍चान बनत यश बढ़त इज्ज‍त भेटत वि‍श्वक कल्या ण करत। पैसा- पेंच फॅसाएत प्रेमसँ दूर राखत दुखक पोटरी सि‍रपर लादत ऊँच-नीचक भेद बढ़ाएत धर्म-इमान मेटाएत अपने बलसँ गरीबपर अत्याबचार बढ़ाएत धाक जमाएत जोश बढ़ाएत नीन उड़ाएत दुनि‍याँमे अशांति‍ बढ़ाएत अहाँकेँ की चाही।

कालक पहरा कालक पहरा चहुओर पड़ैए चंचल चि‍त्त मन चोर बनल अछि‍ कि‍ला बीच दुआरि‍पर पहरा पड़ैए नगर शहरमे ढि‍ढोरा पड़ैए राजा बैसल सिंगहासन डोलैए प्रजा सूतल नीन खिंचैए तही बीच चोर चोरी करैए कालक पहरा चहुओर पड़ैए। आन्ह र राजा सेवक बहि‍र भूखल प्रजा होइ छै अधीर मंत्री-संत्री चोर बनल अछि‍ अधि‍कारी खजाना लूटैए आन्हरर राजा भुजा फँकैए मंत्री मलाइ चटैए भरल खजाना लूटि‍-लूटि‍ नीत होली-दि‍वाली मनबैए देखि‍ प्रजा भूखल सूतैए कालक पहरा चहुओर पड़ैए। खजानाक माल वि‍देस भेजैए रक्षक भक्षक बनल अछि‍ ि‍नर्वल राजा चोर सबल अछि‍ जनताक लहु चौबटि‍यापर बि‍कैए सिंगहासनसँ सटल राजा लोभ-मोह-माया बीच फँि‍स टुकुर-टुकुर तकैए खाली खजाना देखि‍ राजा सोगमे सोगाएल रहैए कालक पहरा चहुओर पड़ैए। पियासल मन झुलसल तन करि‍याएल सन पि‍यासल मन मन्हुसआएल सन सूखल वन उजरल उपवन तपि‍-तपि‍ धरती जरल सन बि‍नु मेघ तड़सए नयन करेजा कापए भुमकम सन कि‍ हएत बर्खा हर्षित मन नै कोइ जानए ज्योहत्षीि सन मन उदास देखि‍ डोलए पवन मेघकेँ बजबए सिहकि‍ पवन वातावरण भेल मेघौन झरझर बरसए बजए ढनढन सूखल धरती मुरझाएल वन उपवन भेल हरि‍अर कंचन झुमि‍-झुमि‍ नाचए मेघ संग पवन बि‍जुरी चमकए डरै तन-मन पाखि‍ खोलि‍ नाचए मोर-मोरनी संग सबहक तन-मन जुराएल पि‍यासल मन धरतीकेँ बुझाएल। दहेजक खेल दहेज- बि‍आह बि‍गाड़त इज्ज।ति‍ उताड़त तैयो लोक करैत अछि‍ दहेजसँ मेल जखन दहेजक खेल शुरू भेल बि‍आह भेल गरमेल समाजमे भेल बड़-बड़ खेल बि‍आह सन पवि‍त्र बंधनकेँ बि‍गाड़ैत दानव दहेजक खेल बि‍आहक शुभ मुहुर्तमे दहेज दि‍अए अरचन-धोखा बि‍गाड़ैत समाजक नाता परि‍वार आ समाजक तोड़ि‍ देत दि‍लक नाता आउ हम सभ मि‍लि‍ दहेज मुक्त समाजक ि‍नर्माण करू भेद-भाव मेटा कऽ बि‍आहक वंधन मजगूत करू। घर परदेश कतेक दि‍न बाद एलौं हाल-चाल दुखद सुनेलौं राति‍-दि‍न दुख कि‍अए सहलौं घरेमे रहि‍तौं धीरज देतौं सभ मि‍लि‍ दुख सहि‍तौं अधो रोटी खाए कऽ जीबि‍तौं धि‍या-पुता संगे रहि‍तौं अपने समाजमे कमेतौं परदेश पराया होइ छै दुख-सुख कि‍यो नै बॉटै छै रूपैया लेल दुष्कुर्म करै छै नै रूपैया भूखै मरै छै मुदा अपन समाजमे प्रेम होइ छै पैंच उधार सेहो भेटै छै अपन कि‍ आनोकेँ वि‍पत्तिमे मदति‍ करै छै सभ इज्जातसँ जीबै छै घर छोड़ि‍ परदेश कि‍अए गमेलौं बाल-बच्चातकेँ बि‍लटेलौं रि‍नि‍या महाजन सेहो भेल कर-कुटुमैती सभ छूटि‍ गेल एहेन करम कि‍अए करब ‍जे परदेशमे खटब काज नै देत मरि‍तो परदेश आब एहेन काज नै करब जीबैले समाज सभसँ पैघ समाजेमे रहि‍ जीअब मरब गहुमक कटनी-दौनी अधरति‍येमे नीन टुटल कच्छिमछाइ सूतल पड़ल गहुमक कटनी माथपर चढ़ल काटि‍-खोंटि‍ घर नै लाएब तँ भरि‍ साल बाल-बच्चाब की खाएत केना जीअत अही सोचमे पड़ल छलौं एकाएक मनमे फुराएल सभ धि‍या-पुताकेँ उठेलौं आँखि‍ मि‍ड़ैत हँसुआ लेलौं सभ मि‍लि‍ खेत पहुँचलौं गहुमक खेतक नम्हएर कि‍त्ता सभ मि‍लि‍ काटैत छलौं अधकटनी भेल मुदा चैतक रौद मुँहपर पड़ल आब कि‍ काटब गहुम रौदामे झुलसि‍ गेलौं खाली गहुमे काटब से केना भूख-पियाससँ बहए पसि‍ना मुदा हि‍म्म ति‍ हारि‍ जाएब केना सभ गहुम काटि‍ खेत खसेलौं चैतक रौदमे देह झरकेलौं घूमि‍ घर एलौं सुसतेलौं भानस-भात भेल नहेलौं सभ मि‍लि‍ खेलौं आराम केलौं पानि‍ पीब जुन्ना बनेलौं धि‍या-पुता संग खेत गेलौं गहुमक बोझ बान्हिप‍-बान्हि‍‍ उघि‍-उघि‍ थ्रेसर लग पहुँचेलौं राति‍ भरि‍ दौनी करेलौं गहुमक दाना कोठीमे भरलौं भूसीकेँ भुसकाँरमे टलि‍येलौं चारि‍ मासक गहुमक फसलि‍ दि‍न-राति‍ खटि‍ कऽ घर केलौं साल-भरि‍ रोटि‍यो खा जीअब तइ चि‍न्ता-सँ दूर भेलौं।

बि‍आह की थि‍क?

बि‍आह की थि‍क दू आत्मा‍क मि‍लन कि‍ दू रक्ति मेल कि‍ दू देहक संगम कि‍ दू वंशक गठवंधन कि‍ स्त्रीक-पुरुषक प्रेम वंधन कि‍ मनुख जाति‍क क्रमश: सृजनात्म‍क सफल प्रयाससँ कि‍ बि‍आह समाजक रीति‍-रि‍वाज बि‍आह की थि‍क?

आजुक दि‍न समाजक बदलल स्व रूप ने ओ गाम ने ओ नगर ने पहि‍लुका ठाठ-बाठ ओ पुरना वि‍रासतमे भेटल धरोहर भेल वि‍लि‍न ख्‍ाण्ड‍-पखण्डट भऽ टूटि‍ गेल बाबा समैक गाम-समाज पोखरि‍ इनार परती-पराँत सभ कि‍छु बदलि‍ गेल नै अछि‍ कोइ देखि‍बैया समाजक प्रेम टूटि‍ गेल बड़का दलान बड़का परि‍वार टूटि‍ कऽ चकनाचूर भऽ गेल कतेको पड़ाइन भेल तँ कतेको वि‍कासक होड़मे गाम-घर छोड़ि‍ चलि‍ गेल समाजक मर्यादा पानि‍मे बहि‍ गेल आजुक दि‍न नै रहल भाय-भैयारीमे प्रेम सभ अपन रागक डफली अपन-अपन बजबैए बदलल समाजक स्वनरूपमे अपन जि‍नगी बि‍तबैए खान-पान बदलि‍ गेल पालकी-महफा ओहार लगल कठही गाड़ी वि‍लि‍न भऽ गेल डफरा-बसुली कठघोड़ाक नाच आइ समाजसँ उसरि‍ गेल गामक पंचैती गामेमे बड़का दलान बैस करै छल बड़का-छोटका सभ मि‍लि‍ दूघ-पानि‍ बेड़बै छल बाघ-बकरीकेँ एकठाम एकहि‍ घाट नमबै छल आजुक दि‍न ओ रीति‍-रेबाज गामसँ उसरि‍ गेल बदलल लोक बदलल समाज हि‍त कम अहि‍त बेसी भेल आजुक दि‍न देखै छी। पुत्र कुपुत्र आशीर्वाद हम दइ छलौं अहाँ नै उचि‍त समझि‍ सकलौं माए-बापक अरमानकेँ अहाँ पुरा नै कऽ सकलौं पुत्र नै कुपुत्र छी अहाँ खनदानक मर्यादा नै बचा सकलौं माए-बापक रीनकेँ अहाँ जि‍नगीमे नै सठा सकलौं स्वार्ग सन सृजल घरकेँ अहाँ लंका जकाँ जरा देलौं भरत सन भक्तर भाएकेँ अहाँ अपन प्‍यार नै दऽ सकलौं देशभक्तन छी अहाँ मुदा अपन घरकेँ जराकेँ जरा देलौं जरल घर ऊजरल परि‍वार समाजोकेँ अहाँ ठोकरा देलौं आबए बला समैमे अहाँ केकरा की जबाब देबै मुँह छुपा अन्हाेरेमे अहाँ आँखि‍क नोर बहेबै मनुख की मनुखताकेँ छोड़ि‍ क्षनि‍क धन-सुख लेल अमुल्यी जि‍नगी गमा देलौं असल जि‍नगी स्वेर्ग छोड़ि‍ नरकक जि‍नगी अपनाए लेलौं आशा बहुत छल अहाँसँ सभकेँ नि‍रास बना देलौं की उदेश अछि‍ अहाँक हम सभ नै जानि‍ सकलौं की लऽ कऽ एलौं अहाँ की लऽ कऽ जएब सभ अरमानकेँ अहाँ क्षनेमे जराए मेटाए देलौं अहाँपर बहुत गर्व छल सभकेँ माटि‍मे मि‍ला देलौं पुत्र नै कुपुत्रक नाओंसँ दुनि‍याँमे जानल जाएब अहाँ धन पत्नी मि‍त्र बहुत भेटत माए-बाप सहोदर भाए जि‍नगीमे एक्केबेर भेटत टुटल दि‍ल कहि‍यो नै जुटल कुपुत्रक कलंक नै छुटत सभ कि‍छु रहि‍तो जि‍नगीमे आशीर्वाद नै भेटत। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। १.जगदीश प्रसाद मण्डल २. नवीन कुमार झा ‘‘आशा’’ १. जगदीश प्रसाद मण्डलक पद्य-

गुड़ घाव

उपकि‍-उपकि‍ गुड़ घाव तन-तन, फण-फण करए लगल। सगर शरीरक आसन बनि‍ थइर अपन बान्ह ए लगल। संग दि‍नक बढ़ि‍-बढ़ैत गुड़ घाव कहबए लगल। पसरि‍-पसरि‍ फोँसरी पसरि‍ सुख-दुख पीड़ रचए लगल। समए संग ससरि‍-ससरि‍ पेड़-फेंड़ बनबए लगल। जड़ि‍ एक रहि‍तो रहैत फेंड़ जोड़ लगबए लगल। संगे मोजरि‍, फुला संगे संग-संग फलो रचए लगल। संगे-संगे संग चलि‍ आशा फल देखबए लगल। आश बास देखि‍-देखि‍ ति‍रपि‍त मन सि‍हरए लगल। रक्ता–भक्तत बनि‍ पीब पकि‍ पीज नि‍कलए लगल। छेदि‍ देह पकड़ि‍ मांस खील बनि‍ खि‍लए लगल। पबि‍ते खील खि‍ल-खि‍ला राति‍-दि‍न टहकए लगल। टहकि‍-टहकि‍ घुसकि‍-फुसकि मासु हार पकड़ए लगल। पीड़ा हारक हू-हू-आ-हूहूआ गरजि‍-तरंगि‍ नि‍कलए लगल। हारक पीड़ मासु-पीज संग दर्द मन बेदर्द बनल। चि‍न्हब-पहचि‍न्ह हराएल देखि‍ हारल-हराएल बेड़बए लगल। ))(( एकटा बताह जे जनकक संतान कहि‍यो कृषि‍ वृत्ति‍ कि‍सान छलाह। कृषि‍ कुशल कहि‍-कहि‍ दि‍न-राति‍ मलड़ैत छलाह। भुमकम बाढ़ि‍ रौदीक भार सहि‍ जीवन-यापन करैत छलाह। वेद-बखान नि‍त-प्रति‍दि‍न साँझ-भाेर रटैत छलाह। गति‍ समए केर बीच-बीच दोरस हवा उपकए लगल। नव-पुरान बीच-बीच रंग-रूप बदलए लगल। रंग-रूप बीच रंग भेद पनपि‍-पनपि‍ पनपए लगल। सोहरि‍-सोहरि‍ उठि‍-उठि‍ धन-गर्जन करए लगल। साहोर‍-साहोर‍ मंत्र जपि‍ डंका-ठनका बचए लगल। मानक मान समान लि‍अए झड़कि‍-झड़कि‍ झड़कए लगल। कुहरि‍-कुहरि‍ कलपि‍-कलपि‍ छाउर-आगि‍ खसए लगल। जेना-जेना आगि‍ मड़ि‍आएल शक्तिम‍ श्रम घटए लगल। घटबी पुरबै पाछू बेहाल रीन-पेंइच फँसए लगल। रीनि‍याक रीन कुरीन बनि‍-बनि‍ तरे-तरे घुसकए लगल। पहुँचीसँ बाँहि‍ पकड़ि‍ धोबि‍या खेल खेलए लगल। दसक दाह सम्हाारि‍ पाबि‍ नै मन-मनतर मथए लगल। जे कहि‍यो मि‍थि‍ कहाबए क्षीण शक्त्ि‍ कहबए लगल। ))((

हूसि‍ गेल हूसि‍ गेल सभ खेल खेलौना हूसि‍ गेल सभ मन-वि‍चार। जीवन संग जि‍नगी पि‍छड़ि‍ ससरि‍ गेल इजोत-अन्हाडर। अन्हासरे उपकि‍ अनचि‍न्ह। अन्हासर केना अधला लगतै। इजोत-अन्हाेर भेद बि‍नु बुझने राति‍-दि‍न भजए लगलै। जेकरे दि‍न तेकरे राति‍ राति‍येक दि‍न कहाबए लगलै। दहि‍ना-वामा रंग-सि‍याही नव-नव शब्द गढ़ए लगलै। जहि‍ना सि‍याह सि‍याही बनि‍ हरि‍अर-लाल कहाबए लगलै। कोरा कागज ऊपर ससरि‍ हारि‍-जीत लि‍खए लगलै। ऊपर उठा, उठा ऊपर खेल धोबि‍या खेलए लगलै। घुमा-घुमा, नचा-नचा घाट धार पटकए लगलै। मड़ू-अधमड़ू बना-बना घुमा-घुमा फेकए लगलै। गाड़ीक अगुआ पछुआ पकड़ि‍ जुआ जोति‍ खिंचए लगलै। रंग-बि‍रंग जुआ बनि‍-बनि‍ खेल-खेलौना कहबए लगलै। हूसि‍ गेल सभ खेल खेलौना हारि‍-हारि‍ मन तड़पए लगलै। अखड़ा जि‍नगी अखड़ा जि‍नगी सखड़ा बनि‍-बनि‍ शुद्ध-अशुद्धक भेद वि‍लीन भेल। शक्ति ‍ चढ़ल जहि‍ना शीशा नयन ज्यो‍ति‍ बदलि‍ चलि‍ गेल। आशा-आश लगौने मनमे फल-कुफल बदलि‍ केना गेल। नै बूझि‍ समझि‍ नै पेलौं बाटे-घाट बदलि‍ चलि‍ गेल। अखड़ा जि‍नगी सखड़ा बनि‍-बनि‍ शुद्ध-अशुद्धक भेद वि‍लीन भेल। जल भरल लोटा अछींजल शक्तिल‍ क्षीण होइत केना गेल। शक्तिल‍ क्षीण होइत हबाइत अवगुण-गुण बदलि‍ केना गेल। मानि‍ मान ससरि‍ सामान खाली-खाली बनि‍ केना गेल। अखड़ा जि‍नगी सखड़ा बनि‍-बनि‍ शुद्ध-अशुद्ध बीच बदलि‍ केना गेल मानने देव नै तँ पाथर जुग-जुगसँ सुनैत एलौं। पाथर बीच देव वि‍राजए पानि‍-हवा लुढ़कैत एलौं। उड़ि‍ धरती-अकास बीच उड़ि‍-उड़ि‍ उड़ि‍आइत गेलौं पूर्बा-पछबा सम्हातरि‍ पाबि‍ नै चि‍न्हस-पहचि‍न्हल वि‍सरैत गेलौं। अखड़ा जि‍नगी सखड़ा बनि‍-बनि‍ आश-नि‍राश खखराइत पेलौं।

गीत- जेहने शक्तिव‍क रंग रहै छै, पकि‍या रंग तेहने धड़ै छै। जेहने शक्तिव‍क रंग रहै छै। जेहन पकि‍या रंग रहै छै, देव सि‍र तेहने चढ़ै छै। जेहन शक्तिि‍क रंग रहै छै, पकि‍या रंग तेहने चढ़ै छै। दुनि‍याँक भँवर जाल बीच, मि‍त्र-इष्टच वि‍ड़ले भेटै छै अशि‍ष्टक, इष्ट।, जालमे सोझर ओझर होइत चलै छै जेहने शक्तिइ‍क रंग रहै छै लीलाक तेहने दृष्यि बनै छै। ))((

गीत- खेल खेलौना खेल खेलै छी मने-मन बपहारि‍ कटै छी। खेल खेलौना खेल खेलै छी। एक खेलौना छी मन रंजन दोसर जीवन धार बहाबै कदम डारि‍ झुलि‍ झूला जमुना धार महार कहाबए। नै हँसि‍ कानि‍ नै पाबि‍ मन-मरदन करैत रहै छी खेल खेलौना खेल देखै छी मने-मन बपहारि‍ कटै छी। ))((

गीत- संच-मंच रहए कहाँ दइए यार यौ, संचमंच रहए कहाँ दइए मकड़ी फड़ खुआ-खुआ टीक पकड़ि‍ खिंचैत रहैए भजार यौ, संच-मंच रहए कहाँ दइए। चि‍ड़चि‍ड़ी छीट-छीट कखनो ओझरी टीक लगबैए। पोझरी पकड़ि‍-पकड़ि‍ खेल नाच लगबैए। यार यौ, संच-मंच रहए कहाँ दइए। कहि‍यो रंग कहि‍यो कादो सभपर सभ फेकैए। रंग-सि‍याही बदलि‍ आँखि‍ दुइर करैए। यार यौ......। ))((

गीत- प्रीति‍क रीति‍ कुरीति‍ बनल छै सुबोध सुरीि‍त सुदि‍न केना पेबै। थाल-कीच घर-दुआर सजल छै फल वृक्ष कल्पी कहि‍या देखबै। हे बहि‍ना, सुरति‍ केना बदलबै प्रीति‍क रीति‍ कुरीति‍ बनल छै सुबोध सुरीि‍त सुदि‍न केना पेबै। जहर भरल फुफकार छोड़ि‍-छोड़ि‍ गहुमन-नाग लपकैत रहै छै। करम-भाग मन-मनतर रटि‍-रटि‍ अगुआ-पछुआ धड़ैत रहै छै। मन-मनुख मानव केना बनबै प्रीति‍क रीति‍ कुरीति‍ बनल छै सुरीति‍ सुबोध सुदि‍न केना पेबै। ))((

गीत- बाढ़ि‍मे सभ कि‍छु दहा गेल, मीत यौ, बाढ़ि‍मे सभ कि‍छु दहा गेल। मुँह-दुआरि‍ परदा दहा गेल दहा गेल सभ कुटुम-परि‍वार हि‍त-अपेछि‍त सेहो भसि‍या गेल भसि‍ गेल सभ अाचार-वि‍चार। बाढ़ि‍मे सभ कि‍छु दहा गेल मीत यौ, जि‍नगीक संग जि‍नगी हरा गेल। गुल्लील–डन्टाु खेल दहा गेल दहा गेल दुआर दुआरधार चि‍न्हआ पहचि‍न्हद सेहो दहा गेल कखनी घुमतै दुआर-दुआरधार। कानि‍ कलपि‍ केकरा के कहबै अपने बेथे सभ बेथाएल। सुनत केकर के दुख नचारी अपने मनमे सभ बौड़ाएल। मीत यौ, बाढ़ि‍मे सभ कि‍छु दहा गेल। ))(( २

नवीन कुमार झा ‘‘आशा’’

यौ भाई दहेज प्रथाक अंत करू किछु अवश्य षडयंत्र रचु कतेक दिन मुँह राखब बंद कखनो तय करू ऐकर अंत बेटी भेनाई अभिषाप नै थिक लक्ष्मीक होय ओ दोसर रूप ओकर सेहो अछि स्वप्न सजल दहेजक कीड़ाक करू शिकार जुनि पालि राखु ई विकार यौ भाई दहेज प्रथाक अंत करू। किछु अवश्य षडयंत्र गढ़ु जँ अहाँ बेटा के गढ़लौ कि ओहि मे निज स्वार्थ देखलौ बेटा जँ अछि अहाँक हीरा तॅ बेटी अछि बड़ बहुमूल्य दूनूक जॅ करि वियाह दहेजक अभहेलना करि यौ भाई दहेज प्रथाक अंत करू..............................। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। शि‍वकुमार झा ‘टि‍ल्लू ’ कवि‍ता- कर्मयोगी ने भगता योगी आ ने डलबाह हरखक तरंग नै, नै वि‍पत्ति‍क आह पहि‍लुक दर्शन कहि‍या भेल नै अछि‍ मोन जहि‍यासँ देखैत छि‍यनि‍ वएह गंभीर मुस्की .. ककरो उपहास नै ककरो परि‍हास नै नै ठोरपर वसन्तक गान नै हि‍अमे ग्रीष्मँक मसान नेना सभक प्रि‍य अध्याीपक कर्मयोगी- अपकल कोना भेलनि‍ पि‍तामह चूकि‍? रीति‍क कालपुरुखक नाओं- कामदेव!!! कोनो नै काम भलमानुष नि‍ष्कानम तेसर पहरक वि‍झनीक बाद जगतधात्रीक नि‍त्यक दर्शन तामझामक गाममे रहि‍तो त्रि‍पुंडसँ मुक्तत छुच्छेक हाथे तर्पण आब की मंगैत छथि‍ बाबा? झबरल आंगनमे शक्तिछ‍ सहचरी जाइ रवि‍-शशि‍क कि‍रणकेँ आत्मरसात् करबाक लेल लोक करैछ अनर्गल प्रलाप व्य र्थ कुटि‍चालि‍ रचैछ चोरि‍ कऽ आडंवर करैछ तनयक रूपमे ओ दुनू बाबाक आंगनक श्रवण कुमार “अचला” चंचला बनि‍ देलनि‍ कन्यांक उपहार दु:खक सोतीमे जखन अकुलाइत छैक मनुक्खब तखन आस्तिक‍कता जगैछ भूख मुदा! ति‍रपि‍त बाबा नै करैत छथि‍ भगवानसँ छल सुरधामे जल मन नि‍रमल.... समाजमे छन्हिर‍ शीतलताक आह सदेह कवि‍ नै तखन वैदेहीक चाह? अपने नेपथ्य मे रहि‍ नाटकक कएलनि‍ ि‍नर्देशन देसि‍ल वयनाक प्रति‍ कर्मक गति‍ अर्पण एकाध प्रहसन लि‍खि‍ अकथ्यप कवि‍ता गढ़ि‍ कतेक आजाद भऽ गेल चि‍न्हा र मुदा! इजोतक स्त्रो तक पि‍रही अन्हाूर कोनो नै छन्हि ‍ छोह सबहक उत्कनर्ष हुअए यएह आश, यएह मोह की ब्राह्मण की अछोप की धानुक की गोप सबहक बाबा...... जे गाछ, छि‍अए छाहरि‍ वएह उतुंग वएह श्रंृग सि‍क्क.ठि‍ हुअए वा नरकटि स्वीशकार करैए पड़तनि‍ समाजकेँ बाबा सन चेतनशील मनुक्ख केँ जे संस्काेर लुटाबए सबहक कल्यातणक लेल अन्त र्मनसँ सोहर गाबए...। ‍ ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। डॉ॰ शशिधर कुमर, एम॰डी॰(आयु॰) – कायचिकित्सा, कॉलेज ऑफ आयुर्वेद एण्ड रिसर्च सेण्टर, निगडी – प्राधिकरण, पूणा (महाराष्ट्र) – ४११०४४ आगामी जानकी नवमी / मिथिला दिवस / मैथिली दिवस पर विशेष

भजु धरणिसुता (किर्तन)

भजु धरणिसुता, तनुजा – मिथिला, जय रामलला दशरथ नन्दन । जय गौरि – महेश, गणेश, विभो, जय पवनपुत्र मारूति - नन्दन । * भजु धरणिसुता ...........................।।

तजि लोभ मोह, धरु राम चरण। तजि भव माया, गहू राम चरण । धरु ध्यान सदा मिथिलेश - सुता, करू राम – रमा सादर वन्दन । भजु धरणिसुता ...........................।।

सभ कष्ट - क्लेश - सन्ताप हरथि । निज भक्तक बेड़ा पार करथि । करथि गरल–सुधा, कन्दुक-वसुधा, हिय वन मे करु हुनि अभिनन्दन । भजु धरणिसुता ...........................।।

श्रीराम सिया छथि कण – कण मे । ओ बसथि सभक अन्तर्मन मे । बस ध्यान धरू, सन्धान करू, करू हुनिकहि मे तन-मन अर्पण । भजु धरणिसुता ...........................।।

माँ जानकी वन्दना (किर्तन)

जगत जननी, कमल नयनी, जनक कन्या, सुता धरणी । अवध रानी, रमा – रश्मि, जनिक आसन कमल – नलिनी ।।

जनिक चरणरज पाबि धन्य भेल, मिथिला केर पावन धरती । मिथिलाक मान बढ़ाओल जग मे, मिथिला केर बनि स्वयं बेटी । क्षिति तनया, श्री मिथिलाङ्गिनी, जनक कन्या, सुता धरणी । अवध रानी, रमा – रश्मि, जनिक आसन कमल – नलिनी ।।

सुर नर मुनि गन्धर्व आ किन्नर, जनिकर महिमा गाबथि । सृष्टि मे कखनहु ने श्री बिनु, श्रीपति पुर्ण कहाबथि । माँ वैदेही, श्रीराम संगिनी, जनक कन्या, सुता धरणी । अवध रानी, रमा – रश्मि, जनिक आसन कमल – नलिनी ।।

जन्म लेलन्हि नारी बनि जग मे, आदर्शहि लेल अर्पित । जिनगी बिताओल सघन विपिन मे, रामहि लेल समर्पित । लवक माता, कुशक जननी, जनक कन्या, सुता धरणी । अवध रानी, रमा – रश्मि, जनिक आसन कमल – नलिनी ।।

किए मैथिलीक आङ्गन उदास लगैए ? (गीत)

खन आबि केओ कान मे ई बात पुछैए । किए मैथिलीक आङ्गन उदास लगैए ?

किए बैसल छथि मैथिल आराम सँ ? किए उठइछ ने धधरा हरेक गाम सँ ? किए दिनहु मे गुजगुज अन्हार लगैए ? किए मैथिलीक आङ्गन उदास लगैए ?

कतए गेलाह शिवसिंह, विद्यापति, जनक ? किए पड़ल अछि मन्द आइ माथक तिलक ? किए मिथिला मे उनटा बसात बहैए ? किए मैथिलीक आङ्गन उदास लगैए ?

कहू ! कनइछ के बैसल एहि कोन मे ? की ने बाँचल अछि सिंह एकहु बोन मे ? किए पीयर सनि खेतक जजाति लगैए ? किए मैथिलीक आङ्गन उदास लगैए ?

हए बसन्ती पवन, कने धीरे तोँ चल (गीत)

हए बसन्ती पवन ! कने धीरे तोँ चल । कने धीरे तोँ चल ने मचा हलचल । हए बसन्ती पवन ! कने धीरे तोँ चल ।।

देखू कनइत अछि नगर - नगर, सिसकैत अछि गाम । बनल पावन विदेह, अपनहि केर गुलाम । हे, सुन, सुन गे सरित ! ने तोँ कर छल-छल । हए बसन्ती पवन ! कने धीरे तोँ चल ।।

पुज्य जनकक ई धरती, मशान बनल अछि । लोक रहितहुँ जेना ई, विरान बनल अछि । सुन गे कोयली कने ! ने तोँ गा चञ्चल । हए बसन्ती पवन ! कने धीरे तोँ चल ।।

जतए गूँजय छल सदिखन, विद्यापति केर गीत । आइ नचइत अछि ताण्डव, आ गूँजैत अछि चीख । शस्य श्यामल ई भूमि, अछि बनल मरूथल । हए बसन्ती पवन ! कने धीरे तोँ चल ।।

उठू मैथिल युवक, कहू मैथिलीक जय । होहु आबहु सतर्क, करू मैथिलीक जय । फूँक शंख रे मधुप ! चल छोड़ शतदल । हए बसन्ती पवन ! कने धीरे तोँ चल ।।

शान्तिक सपूत संग्राम करय (गीत)

काश्मीर बनय, आसाम बनय । शान्तिक सपूत संग्राम करय ।* नञि दोष हुनिक एहि मे कनिञो, जँ मिथिला - भू पञ्जाब बनय ।।

हम मैथिल छी - मिथिलाबासी । सम अधिकारक छी अभिलाषी । जहिना तामिल ओ गुजराती, तहिना हमहूँ मिथिलाभाषी । हमरहु इच्छा, हमरहु मिथिला, कर्णाटक ओ बङ्गाल बनय ।।

हम माङ्गय छी नञि किछु विशेष, निज माङ्गय छी अधिकार बेस । हमरो प्रगतिक अछि हक ओहिना, जहिना करइछ आनहु प्रदेश । जञो नञि, तँ दोष हुनिक ने कहब, यदि क्रान्तिक कतहु मशाल जरय ।।

नञि भीख, अपन अधिकार मङ्गै छी, कोशी – कमला धार मङ्गै छी । जल–थल–नभ मे सञ्चार मङ्गै छी, शिक्षा – रोजी – व्योपार मङ्गै छी । नञि कहब फेर, जञो आइ एखन, हर मैथिल, हर – विकराल बनय ।।

हर प्रदेश, भारत केर हिस्सा, सभहक दर्जा एक समान । तखन किए केओ अमृत लूटय, ककरो भेटय विष – अपमान । नञि फेर कहब - हुनिका सँ केओ, जञो कोसी कमला लाल बहय ।।

* स्वभाव सँ मिथिलाक सपूत / मैथिल / मिथिलाबासी / मिथलाभाषी शान्तिप्रिय ओ सहनशील होइत अछि । ओ ककरहु सँ अनावश्यक युद्ध नञि चाहैत अछि । इतिहास साक्षी अछि कि मिथिलाक कोनहु राजा वा कोनहु व्यक्ति सिर्फ अपन राज्यक सीमाविस्तार वा अपन महत्त्वाकांक्षाक पुर्त्तिक लेल कहियो ककरहु पर अनावशयक युद्ध नञि थोपलक । ओकरा लऽग मे जतबहि भू – भाग वा सम्पदा छलै ततबहि मे सन्तुष्ट रहल ।

परन्तु आइ लोक ओकर शान्तिप्रिय ओ सहनशील स्वभाव केँ गलत स्वरूप मे ग्रहण करैछ । ओकरा आधुनिक राजनैतिक तन्त्र व आन विभिन्न सञ्चार माध्यम सँ बेर बेर उदाहरण देल जाइछ कि “क्या आप तेलंगाना की तरह विरोध प्रदर्शन कर सकते हो ?” ................... ओकर शान्तिपुर्ण माँग सभ केर प्रति धेआन नञि देब आओर संगहि पुर्ण दमनात्मक कार्यवाही करब सर्वथा अनुचित थिक । ओकरा जबरदस्ती अपन शान्तिपुरण रास्ता केँ छोड़बाक लेल उकसाएब थिक ।

स्वभाव सँ मिथिलाक सपूत / मैथिल / मिथिलाबासी / मिथलाभाषी एखनहु शान्तिप्रिय ओ सहनशील छथि । तेँ एहि गीतक माध्यमेँ भारत सरकार ओ तथाकथित समाचार व सञ्चार माध्यम सँ निवेदन जे अपन अनुचित ओ दमनात्मक क्रियाकलाप केँ विराम देथु; गलत जानकारी प्रसारित कए वा जानकारी सभ केँ गलत स्वरूप मे प्रचारित – प्रसारित कए मिथिला, मैथिल व मैथिली केँ तोड़बा – फोरबाक प्रक्रिया सँ बाज आबथु ।

कहिया तक शान्ति हो ? (आवाहन गीत)

शान्ति, शान्ति, शान्ति, शान्ति, कहिया तक शान्ति हो ? आबहु तँ मिथिला आ मैथिली ले’ क्रान्ति हो ।।

मैथिलीक उत्थान हो, मैथिलीक सम्मान हो । भारत केर नक्शा पर, मिथिला केर नाम हो । शान्ति नञि, शान्ति नञि, क्रान्तिक आह्वान हो । आबहु तँ मिथिला आ मैथिली ले’ क्रान्ति हो ।।

घर - बाहर सर्वत्र, मैथिलीक गान हो । मैथिलीक मान हो, मैथिलीक शान हो । एहि पुनीत यज्ञ मे, स्वार्थक बलिदान हो । आबहु तँ मिथिला आ मैथिली ले’ क्रान्ति हो ।।

छलहुँ परतन्त्र, तखन बातहि किछु आओर छल । आब छी स्वतन्त्र, मुदा तइयो ने बात बनल ।* आबहु किए भ्रमित छी, दिशा केर ज्ञान हो । आबहु तँ मिथिला आ मैथिली ले’ क्रान्ति हो ।।

शस्त्र सँ ने क्रान्ति हो, शास्त्र सँ क्रान्ति हो । क्रांति, क्रांति, क्रांति, क्रांति, चेतनाक क्रान्ति हो । एकताक तीर सञो, लक्ष्यक सन्धान हो । आबहु तँ मिथिला आ मैथिली ले’ क्रान्ति हो ।।

* महान भाषाविद् सर जॉर्ज अब्राहम ग्रियर्सनक अनुसार बिहार केर अन्तर्गत मैथिली एकमात्र एहेन भाषा छल जे वास्तव मे भाषा होयबाक सभ शर्त पूरा करैत छल । ओ मैथिली केँ बिहारक राजकाजक भाषा केर रूप मे स्वीकार करबा हेतु तत्कालीन ब्रिटिश सरकार सँ अनुरोध / अनुमोदन कएने छलाह ।

परञ्च ओहि समय भारतक स्वाधीनता संग्राम अपन चरम पर छल आ कहल गेल कि ग्रियर्शन महोदयक उपरोक्त प्रस्ताव फुटकएबाक नीति सँ प्रेरित थिक – तेँ नञि मानल जएबाक चाही । मैथिल लोकनि देशहित मे (भारतक हित मे) सहर्ष बिना कोनहु विरोध केँ मैथिली लेल जिद्द छोड़ि हिन्दीक प्रचार – प्रसार करबाक बात केँ स्वीकार कएलन्हि । एहि क्रम मे अंग्रेज लोकनि सँ मित्रता होयबाक बादहु तत्कालीन दड़िभंगा महाराज स्व॰ लक्ष्मीश्वर सिंह देवनागरी (हिन्दी) केर प्रचार बढ़एबाक हेतु निर्देश निर्गत कएलन्हि । एकर मतलब ई कथमपि नञि कि मैथिल लोकनि अप्पन मातृभाषा “मैथिली” केँ बिसरि गेलाह । मोन मे रहन्हि जे भारतक स्वाधीनताक बाद मैथिली आ मिथिला केँ स्वतः अपन स्थान भेटि जायत ।

अस्तु ‍१५ अगस्त ‍१९४७ ई॰ कऽ देश स्वाधीन भेल । पर मैथिली केर संग आशाक एकदम्मे विपरीय पुर्ण भेद – भाव कएल गेल । भाषाक आधार पर मिथिला राज्य के कहए अपितु मैथिली केर अस्तित्वहि पर प्रश्न चिन्ह लगाओल गेल, हिन्दीक बोलीक रूप मे घोषित करबाक भरिसक दुष्प्रयास कएल गेल । नहिञे साहित्य अकादमी आ नहिञे आठम अनुसुची मे स्थान देल गेल (जे कि बाद मे कतेकहु संघर्षक बाद भेटल) । एतबहि नञि मैथिली केँ तोड़बाक हेतु आ मैथिल केँ परस्पर लड़एबाक हेतु नऽव नऽव परिभाषा सभ गढ़ल गेल । मैथिली केँ भाषाक अधिकार देमए काल अस्सी मोन पानि पड़ैत छलन्हि परञ्च तिरहुतिया, बज्जिका, अंगिका आदि मैथिलीक बोली सभ केँ स्वतन्त्र भाषाक रूप मे परिभाषित कएल गेल । मैथिल लोकनिक देशहित मे कएल गेल काज वा देशभक्तिक ई केहेन पारितोषिक छल, से नहि जानि ??????

जयति जयति मिथिले (जन्मभूमि स्तुति गीत)

जय हे ! जयति मिथिला । जयति मिथिले । जय कवि - कोकिल - अमिय - वाङ्गमय, जयति, जयति मिथिले ।।

जय मिथिला – भू तरण – तारिणी । श्रीसीते निज गर्भ धारिणी । नतमस्तक तोरा आगाँ माँ, जन्मभूमि मिथिले ।।

जय शत् – सरिते अमिय – वाहिनी । मिथिला – भू जीवन – प्रदायिनी । अमिय चरणरज माए मैथिलीक, पाबि धन्य गंगे ।।

जय मिथिला धन जन वन उपवन । जय मिथिला केर पुज्य हरेक कण । बारम्बार करी स्तुति हम, जयति जयति मिथिले ।। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। चंदन कुमार झा सररा, मदनेश्वर स्थान मधुबनी, बिहार गजल/ कविता/ हाइकू गजल-१ करेजक घर तँ खोलू कने सिनेहक ताग जोरू कने अहिँक हिय-बीच चाही बसै जगह बसबाक छोड़ू कने बनल बेरस हमर जीवने अहिमेँ नेहरस घोरू कने करय फरियाद "चंदन" सुनू सजल संबंध जोरू कने (ह्रस्व-दीर्घ-दीर्घ-दीर्घ+ ह्रस्व-दीर्घ-दीर्घ+ ह्रस्व-दीर्घ) गजल-2 आन्हर बनल सरकार छै लाचार भेल जनता व्यापार पोषित नीति से कोना केर एतइ समता गाम भूखल-पेट देशक खेत उसर भेल छइ बाढ़ि-रौदीक बीच उपजल छइ मात्र दरिद्रता कल-करखाना शहर मे चलइछ दिन-राति जे प्रगति के अछि मापदण्ड आ' एकात भेल जनता गाम जा' बसि रहल शहर जीविका केर जोह मे महाजन केर ब्याज-तर फुला रहल निर्धनता ग्राम-वासिनी भारती कियेक गेलीह बसै नगर कनैत छथि आइ तँइ ई केहन कैलनि मूर्खता "चंदन" करू आह्ववान, स्वराज के एकबेर फेर हँसतीह एही सँ देश खुशहाल बनत जनता गजल-3 नेहक सूत बान्हि रखलियै करेजक कोन ओकरा बिसरल नइ भेल जकरा ओ' बिसरि गेल हमरा जिनगीक बाट जकरे आञ्गुर ध' चलब सिखेलियै बिचहि बाट में ओ' छोड़ि पड़ायल खसितहि हमरा कहाँ बचल छै कनियो मोल आब अनमोल-नेहक सौंसे छै खाली टाकाक पुछ आब लोकक पुछ ककरा "चंदन" टाका त' छियै हाथक मैल सत्-संबंधक आगाँ जे नैं बुझैछ ई बात बनैछ तकरे जिनगी फकरा गजल-4 घोघ हुनकर उतरि गेलै जोत सगरो पसरि गेलै बहल पुरबा जखन शीतल हुनक आँचर ससरि गेलै देखि हुनकहि ठोढ़-लाली आगि छाती पजरि गेलै नैन लाजे हुनक झूकल अटकि हमरो नजरि गेलै रूप यौवन निरखि "चंदन" मोन मधुकर मलरि गेलै I-U-I-I+I-U-I-I गजल-5 जिनगी केर बाट पर काँट सौँसे गाड़ल छै नियति केर टाट बेढ़ सगरो दफानल छै माय-बाप,भाय-बन्धु, छै झुठहि संबध सभ मोह-जाल ओझरायल जिनगी गतानल छै कनियो जँ ढीठ बनि सुनलक कियो मन के छूतहर घैल बनल समाजो से बारल छै लुटि-कुटि जीवन भरि आनल से बाँटि देल खाली हाथ आब देखि परिजन खौंझायल छै बुढ़ भेल, दुरि गेल फकरा बनि बैसल छै "चंदन" कहय केहन दुनिया अभागल छै गजल-6 मूरख बड़ा महान ओ'जे अपना के काबिल बुझै छै अपन माथक टेटर ठीक्के ककरहु नहि सुझै छै आनक नीको अधलाह ताकब कबिलताइ कहाबे अप्पन अधलाहो केर जग मे सबसँ नीक बुझै छै छह-पाँच नहि किछुओ बुझे नहि मोने कलछप्पन ऊँच-नीच के भेद ने जाने मूर्ख सबके एक बुझै छै छल-प्रपंच आ राग-द्वेष तऽ काबिल केर गहना छी चलैत बाट तइँ ओकरे सभ के भिखमंगो लुझै छै पर-उपकारे लीन रहै जे सैह अछि अस्सल ज्ञानी "चंदन" असली ज्ञानी जगमे ओ' जे नहि खूब बुझै छै गजल-7 शब्द संग खेलाएब हमरा नीक लगैत अछि शब्दहि ओझराएब हमरा नीक लगैत अछि मोनक चिनबार पर छी रान्हैत जे मीठ-तीत्त भावहि से झोराएब हमरा नीक लगैत अछि सुखक-गीत दुखक-टीस जिनगीक कथा-ब्यथा जगभरि सुनाएब हमरा नीक लगैत अछि सुरूजक किरीण चढ़ी स्वर्ग केर विहार करी धरती में लोटाएब हमरा नीक लगैत अछि विहग-गीत गाबय छी आ' विरहनि सुनाबै छी "चंदन" ई बौराएब हमरा नीक लगैत अछि गजल-8 कौआ कूचरल भोरे अँगना साँझ परैत औथिन्ह सजना छम-छम-छम-छम पायल बाजे खनकि उठल कंगना सासुक बोली लगैए पियरगर ननदि बनल बहिना गम-गम-गमकय तुलसीक चौरा चानन सन अँगना रचि-रचि साजल रूप मनोहर कत'बेर देखल ऐना टिकुली-काजर जुट्टी-खोपा नवका-नुआ चमकय गहना पहिलहि साँझ बारल दीप-बाती जगमग घर-अँगना उगल चान असमान हृदय मे उठल विरह वेदना सेज सजौने बाट तकैत छी एताह कखन घर सजना "चंदन" सजनी गुनधुन बैसलि की मांगब मुँह बजना गजल-9 हमरा इजोते सँ लगइत अछि आब डर चुप भेल तैँ बइसल छी हम अन्हार घर नहि मोन अछि हमरा नाम आ' परिचय अनजान छी संसार मे तेँ घुमैत छी निडर तकैत अछि लोक नाम मे पहचान लोक के गुण-शीलक आब समाज मे छै कहाँ मोजर संबंध नहि जकरा सँ बनल सैह समांग तोड़लक भरोस ओ' भरोसे छलहु जकर "चंदन" जगके रीति ओझराउ नहि जिनगी सुनू खबरदार ! हरदम रहू बेखबर गजल-10 पुनिमक राति केर चान सन चमकैत छी अहाँ अँगना केर तुलसी चौरा सन गमकैत छी अहाँ कखनहु मायक ममता बनि झहरैत छी अहाँ कखनहुँ आगिक धधरा सन धधकैत छी अहाँ कखनहु संगी-बहिनपा बनि हँसबैत छी अहाँ कखनहुँ जीवन संगिनी बनि बुझबैत छी अहाँ कखनहु अबला के रूप धरी फकरैत छी अहाँ कखनहु काली केर रूप धरी डरबैत छी अहाँ कखनहु प्रेमक मुरति बनि सिखबैत छी अहाँ "चंदन" नारी केर रूप अनेक देखबैत छी अहाँ गजल-11 नहि फुरैछ हमरा आब प्रेम गीत अंतर नहि किछुओ हारि हो वा जीत टकटकी लगौने रहैत छी राति-भरि सपनो नहि आबय केयो मनमीत श्मशान बनल अछि करेज हमर पैसत के एहिमे सभ क्यो भयभीत जीवैत छी मुदा बैसल छी मुर्दाघर मुर्दा संग जीवन करैत छी ब्यतीत "चंदन" जीवने सँ लगैछ आब डर मृत्यु सँ हमरा अछि भऽगेल पिरीत गजल-12 चलू एकबेर फेर रंगमंच सजाबी बहुरूपिया-रूप धरी आ नाच देखाबी दुनिया बरू बूझत बकलेले हमरा हमरा अछि सख जे दुनियाके हँसाबी सुन्दर अभिनेता त' जगभरि भेटय हमर मोन जे पाठ लेबराक खेलाबी दुनिया के रंगमंच जे लागैछ निरस आउ एकरा जीवन-रस बोर डुबाबी "चदन" ई जे गुमसूम बैसल जीवन चलू अपने पर हँसि एकरा हँसाबी २ कविता आकाशवाणीक दरभंगा केन्द्र सँ दिनांक १०-०३-२००४ के तरुण-कुसुम कार्यक्रम मे प्रसारित फेर हेतइ भोर होइत छैक साँझ जखन मद्धिम भऽ जाइत छैक सूर्यक प्रकाश लाल भऽ जाइत छैक पच्छिम भर आकाश चिड़ै सभ जाय लगैत अछि अपना-अपना आवास बंद भऽ जाइत छैक कुसुमित कमल बंद भऽ जाइत अछि ताहि मे भ्रमर ।

एतबहि मे भऽ जाइत छैक अन्हार भऽ जाइत छैक सभ चीज अनचिन्हार सूति रहैत अछि थाकल संसार मुदा, सूतैत नहि अछि भ्रमर ।

सोचैत अछि भ्रमर- फेर हेतइ भोर फेर पसरतइ चहुँदिश सूर्यक प्रकाश फेर हेतइ लाल पुरबक आकाश चिड़ै छोड़त फेर अपन आवास नहि रहतइ कतहु अन्हार जागत ई संसार फेर फुलेतइ कमल,आ' ताहि पर नाचत ओ "भ्रमर" ।

३ हाइकू

सगरो शांत गुमकी पसरल आकुल मन ।

निःशब्द वन चिड़ैक फर्र-फर्र चुप्पी तोड़ल ।

उठलै बिर्ड़ो प्रलय मचाओल संकटे प्राण ।

क्षत-विक्षत धरती खसलय चिड़ैक खोँता ।

अंडा टूटल उजरल दुनिया मोन उदास ।

सोचि-बिचारि धरती उतरल खर बिछैले ।

नवका खोँता चिडैक चहकब नव लगैए ।

हाइकू (राम-कथा)

चैत्र-नवमी अवध नगर मे रामक जन्म ।

मिथिला भुमि धनुष के तोड़ल सिया विवाह ।

दू वरदान मंगलथि कैकेयी दशरथ सँ ।

राजा भरत रामक वनवास सगरो शोक ।

स्वर्णक मृग मोहित मन सीता पकरू राम ।

पर्णकुटी सँ वैदेही हरलक रावण दुष्ट ।

किष्किंधा देश सुग्रीव के ताड़ल बालि मारल ।

ताकय सीता चलल चहुँओर वानर सेना ।

सागर-पार कपीश हनुमान लंका जारल ।

पाथर डारि नल-नील दू भाई बान्हल सेतु ।

कुंभकरण रावण के मारल जीतल लंका ।

घुमला राम अवध नगरिया रामहि राज । ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। विदेह नूतन अंक मिथिला कला संगीत १. वनीता कुमारी राजनाथ मिश्र चित्रमय मिथिला स्लाइड शो चित्रमय मिथिला (https://sites.google.com/a/videha.com/videha-paintings-photos/ ) २. उमेश मण्डल मिथिलाक वनस्पति स्लाइड शो मिथिलाक जीव-जन्तु स्लाइड शो मिथिलाक जिनगी स्लाइड शो मिथिलाक वनस्पति/ मिथिलाक जीव जन्तु/ मिथिलाक जिनगी  (https://sites.google.com/a/videha.com/videha-paintings-photos/ ) ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। विदेह नूतन अंक गद्य-पद्य भारती १. मोहनदास (दीर्घकथा):लेखक: उदय प्रकाश (मूल हिन्दीसँ मैथिलीमे अनुवाद विनीत उत्पल) मोहनदास (मैथिली-देवनागरी) मोहनदास (मैथिली-मिथिलाक्षर) मोहनदास (मैथिली-ब्रेल) २.छिन्नमस्ता- प्रभा खेतानक हिन्दी उपन्यासक सुशीला झा द्वारा मैथिली अनुवाद छिन्नमस्ता ३.कनकमणि दीक्षित (मूल नेपालीसँ मैथिली अनुवाद धीरेन्द्र प्रेमर्षि) भगता बेङक देश-भ्रमण .मंगलेश डबराल- हिन्दीसँ मैथिली अनुवाद विनीत उत्पल मंगलेश डबराल- हिन्दीसँ मैथिली अनुवाद विनीत उत्पल १ बेर-बेर कहैत छलहुं हम

जोर सं नहि मुदा बेरे-बेर कहैत छलहुं हम अप्पन गप ओकर सभटा दुर्बलताक संग कोनो उम्मीद मे बताबैत छलहुं निराशा विश्वास व्यक्त करैत छलहुं बिना आत्मविश्वासक लिखैत आ काटैत जाइत छलहुं ई वाक्य जे चीज अप्पन सबसे खराब दौर सं गुजरि रहल अछि बिखरल कागज के संभारैत छलहुं धुरा पौछैत छलहुं उलटैक-पलटैत छलहुं किछु क्रिया के अहिने जेना भेल, होयत रहल ऐना हेबाक चाहि, भऽ सकैत छल हेतियै ते की हेतियै।

(1994 मे रचित) --------- २ दिल्ली मे एकटा दिन

ओहि छोट सन शहर मे एकटा भोर वा सांझ वा कोनो छुट्टिक दिन हम देखलहुं गाछक जड़ मजबूत सं धरती के पकड़ल रहैत हवा छल जेकर चलहि सं आबो एकटा रहस्य बचल छल सुनसान सड़क पर एकाएक कियो प्रकट भऽ सकैत छल आबि सकैत छल कोनो दोस्तक आवाज कनि कालक बाद अहि छोट सन शहर मे आयलहुं शोर कालिख पसीना आ लालचक पैग शहर।

(1994 मे रचित) बालानां कृते बाल गजल चंदन कुमार झाडॉ॰ शशिधर कुमर “विदेह”-नेनपन (बालगीत) बाल गजल चंदन कुमार झा सररा, मदनेश्वर स्थान मधुबनी, बिहार बाल-गजल-1

बुच्ची पहिरलक सोन गहना, बौआके डाँर झूले लाल फुदना ।

साजि-राजि दूनू गेला मेला देखऽ, हाथ मे पाइ छलै बारह अना ।

मुरही-कचरी, आ' बतासा-लड्डू रंग-विरंग किनलक फुकना ।

झूललक झूला नाच देखलक, "चंदन" घुमल घर सोना-चना । बाल-गजल-2

साँझ परल, बैसि पिपर पर चिड़ै करय पंचैती, सूगा-मैना ब्याह रचाओत बगुला करय घटकैती ।

फुदकि-फुदकि के फुद्दी नाचय फेर हेतै वनभोज, कौआ पिजबैछ लोल कोइली गाबि रहल छइ चैती ।

बगरा-परबा अपस्याँत अछि इंतजाम मे लागल, डकहर बैसल सोचि रहल कोना हेतै कुटमैती ।

पोरकी पिपही बजा रहल छै टिटही पिटै ढोलक, मोर नचैछै ता-ता-थैया "चंदन" अद्भुत ई कुटमैती ।

बाल-गजल-3

नवका कुर्ती नवके सलवार पहिर कय बुच्ची भेल तैयार

ललका फीताक गुहलक जुट्टी बाजे रुनझुन पायल झन्कार

हाथक बाला खन-खन-खनके टम-टम चढि के गेल बजार

ढोलक-पिपही आ तमाशा-नाच सूनल देखल हरख अपार

बाबाक हाथ पकड़ि कए बुच्ची प्रमुदित घुमय हाट-बजार २ डॉ॰ शशिधर कुमर “विदेह” मिथिलाक धिया (बाल कविता)

हऽम धिया मिथिला मैथिल केर, मैथिली हम्मर नाम । हमही जानकी, हम वैदेही, सीता हमरहि नाम ।।

भारतवर्षक पूब दिशा मे, मिथिला हम्मर गाम । संग नेपालक पूब ओ दक्षिण, हमरहि बास सुठाम ।।

कहियो हम मिथिलाक माटि पर, ज्ञानक दीप जरओने छी । की मिथिला ? सौंसे भूतल केँ, हम विज्ञान सिखओने छी ।।

हमही कहियो छलहुँ गार्गी, हमही मैत्रेयी बनलहुँ । मण्डन शंकर वाग्युद्ध केर, सूत्रधार हमही बनलहुँ ।।

ब्रम्हज्ञान लौकिक - परलौकिक, हम भामति, सञ्चित कयलहुँ । पर की भेल ? आइ हमरा अहँ, शिक्षा सञो वञ्चित कयलहुँ ।।

एहनो दिवस रहल जहिया, नञि चिट्ठी - पत्री हम जानी ।* मिथिला केर बेटी बनि कऽ, हम खुशी मनाबी, वा कानी ।।

एखनहु बड़ - बड़ गप्प हँकै छी, धिया – सिया कहि पड़तारी । पर की अतबहि अछि दुलार, की अतबहि केर हम अधिकारी ??

तिलकक नाँव सँ हक्कन कनै छी, छी सत्ते ई महामारी । पर बाबू ! की कहियो सोचल, अपने केर की जिम्मेदारी ??

की अपनेक ई सोच उचित, जे बेटी अनकहि घर जयतीह ?** पढ़ा - लिखा कऽ की होयत, जँ कमा – खटा अनकहि देतीह ??**

अनकर दोष कहू हम की, जँ अपनहि लोकक सोच एहेन । गप्पक छुच्छ दुलारहि की, जँ व्यवहारहि मे भोंक एहेन ??

सोचू कक्का ! अपनहु घर मे, कहियो तँ अनकहि धी अओतीह । जँ अनकहु सोच अहीं सन हो, तँ भौजी पढ़ल कोना अओतीह ??

छी किछु लोक तँ आओरो बढ़ि कऽ, तथाकथित सज्जन समाज । कोखि मे खेलैत अपनहि धी केर, वध करैछ, सरिपहु ने लाज ।।

हमरहु इच्छा दुनिञा देखी, आ दुनिञा केर संग बढ़ी – चली । हमरहु इच्छा खेली – कूदी, आ संगहि संग हम पढ़ी – लिखी ।।

मुट्ठी भरि मैथिल ललना केर, नाँव गना जुनि बहटारू । अपन हृदय सँ अपनहि पूछू, मूँह घुमा, जुनि गप्प टारू ।।

* सन्दर्भ देखू श्री “अक्कू” जीक गीतक पाँती सखी पिया केँ पत्र आइ हम, कोना कऽ लिखबै हे ? ककरा सँ अ – आ – क – ख – ग – ङ सिखबै हे ? ............................................................... पाँचे बरष सँ फुलडाली लए, तोड़ब सिखलहुँ फूल अरहूल । जानी ने हम चिट्ठी - पत्री, छी बेटी मिथिला केर मूल ।

** ई विचार हमर अप्पन नञि थिक, परञ्च अपनहि मैथिल समाजक देन थिक । केओ गोटे जखन अपन बेटी केँ इन्जिनियरिंग केर पढ़ाई केर लेल पठाए रहल छलाह तँ हुनिकहि किछु सम्माननीय सर – सम्बन्धीक ई कटाक्ष स्वर छलन्हि । सभसँ दुखक बात जे ई स्वर अपन समाजक मुर्ख – अशिक्षित लोकनिक नञि अपितु किछु अति विद्वान, प्रतिष्ठित लोकनिक छलन्हि । ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com  पर पठाउ। बच्चा लोकनि द्वारा स्मरणीय श्लोक १.प्रातः काल ब्रह्ममुहूर्त्त (सूर्योदयक एक घंटा पहिने) सर्वप्रथम अपन दुनू हाथ देखबाक चाही, आ’ ई श्लोक बजबाक चाही। कराग्रे वसते लक्ष्मीः करमध्ये सरस्वती। करमूले स्थितो ब्रह्मा प्रभाते करदर्शनम्॥ करक आगाँ लक्ष्मी बसैत छथि, करक मध्यमे सरस्वती, करक मूलमे ब्रह्मा स्थित छथि। भोरमे ताहि द्वारे करक दर्शन करबाक थीक। २.संध्या काल दीप लेसबाक काल- दीपमूले स्थितो ब्रह्मा दीपमध्ये जनार्दनः। दीपाग्रे शङ्करः प्रोक्त्तः सन्ध्याज्योतिर्नमोऽस्तुते॥ दीपक मूल भागमे ब्रह्मा, दीपक मध्यभागमे जनार्दन (विष्णु) आऽ दीपक अग्र भागमे शङ्कर स्थित छथि। हे संध्याज्योति! अहाँकेँ नमस्कार। ३.सुतबाक काल- रामं स्कन्दं हनूमन्तं वैनतेयं वृकोदरम्। शयने यः स्मरेन्नित्यं दुःस्वप्नस्तस्य नश्यति॥ जे सभ दिन सुतबासँ पहिने राम, कुमारस्वामी, हनूमान्, गरुड़ आऽ भीमक स्मरण करैत छथि, हुनकर दुःस्वप्न नष्ट भऽ जाइत छन्हि। ४. नहेबाक समय- गङ्गे च यमुने चैव गोदावरि सरस्वति। नर्मदे सिन्धु कावेरि जलेऽस्मिन् सन्निधिं कुरू॥ हे गंगा, यमुना, गोदावरी, सरस्वती, नर्मदा, सिन्धु आऽ कावेरी  धार। एहि जलमे अपन सान्निध्य दिअ। ५.उत्तरं यत्समुद्रस्य हिमाद्रेश्चैव दक्षिणम्। वर्षं तत् भारतं नाम भारती यत्र सन्ततिः॥ समुद्रक उत्तरमे आऽ हिमालयक दक्षिणमे भारत अछि आऽ ओतुका सन्तति भारती कहबैत छथि। ६.अहल्या द्रौपदी सीता तारा मण्डोदरी तथा। पञ्चकं ना स्मरेन्नित्यं महापातकनाशकम्॥ जे सभ दिन अहल्या, द्रौपदी, सीता, तारा आऽ मण्दोदरी, एहि पाँच साध्वी-स्त्रीक स्मरण करैत छथि, हुनकर सभ पाप नष्ट भऽ जाइत छन्हि। ७.अश्वत्थामा बलिर्व्यासो हनूमांश्च विभीषणः। कृपः परशुरामश्च सप्तैते चिरञ्जीविनः॥ अश्वत्थामा, बलि, व्यास, हनूमान्, विभीषण, कृपाचार्य आऽ परशुराम- ई सात टा चिरञ्जीवी कहबैत छथि। ८.साते भवतु सुप्रीता देवी शिखर वासिनी उग्रेन तपसा लब्धो यया पशुपतिः पतिः। सिद्धिः साध्ये सतामस्तु प्रसादान्तस्य धूर्जटेः जाह्नवीफेनलेखेव यन्यूधि शशिनः कला॥ ९. बालोऽहं जगदानन्द न मे बाला सरस्वती। अपूर्णे पंचमे वर्षे वर्णयामि जगत्त्रयम् ॥ १०. दूर्वाक्षत मंत्र(शुक्ल यजुर्वेद अध्याय २२, मंत्र २२) आ ब्रह्मन्नित्यस्य प्रजापतिर्ॠषिः। लिंभोक्त्ता देवताः। स्वराडुत्कृतिश्छन्दः। षड्जः स्वरः॥ आ ब्रह्म॑न् ब्राह्म॒णो ब्र॑ह्मवर्च॒सी जा॑यता॒मा रा॒ष्ट्रे रा॑ज॒न्यः शुरे॑ऽइषव्यो॒ऽतिव्या॒धी म॑हार॒थो जा॑यतां॒ दोग्ध्रीं धे॒नुर्वोढा॑न॒ड्वाना॒शुः सप्तिः॒ पुर॑न्धि॒र्योवा॑ जि॒ष्णू र॑थे॒ष्ठाः स॒भेयो॒ युवास्य यज॑मानस्य वी॒रो जा॒यतां निका॒मे-नि॑कामे नः प॒र्जन्यों वर्षतु॒ फल॑वत्यो न॒ऽओष॑धयः पच्यन्तां योगेक्ष॒मो नः॑ कल्पताम्॥२२॥ मन्त्रार्थाः सिद्धयः सन्तु पूर्णाः सन्तु मनोरथाः। शत्रूणां बुद्धिनाशोऽस्तु मित्राणामुदयस्तव। ॐ दीर्घायुर्भव। ॐ सौभाग्यवती भव। हे भगवान्। अपन देशमे सुयोग्य आ’ सर्वज्ञ विद्यार्थी उत्पन्न होथि, आ’ शुत्रुकेँ नाश कएनिहार सैनिक उत्पन्न होथि। अपन देशक गाय खूब दूध दय बाली, बरद भार वहन करएमे सक्षम होथि आ’ घोड़ा त्वरित रूपेँ दौगय बला होए। स्त्रीगण नगरक नेतृत्व करबामे सक्षम होथि आ’ युवक सभामे ओजपूर्ण भाषण देबयबला आ’ नेतृत्व देबामे सक्षम होथि। अपन देशमे जखन आवश्यक होय वर्षा होए आ’ औषधिक-बूटी सर्वदा परिपक्व होइत रहए। एवं क्रमे सभ तरहेँ हमरा सभक कल्याण होए। शत्रुक बुद्धिक नाश होए आ’ मित्रक उदय होए॥ मनुष्यकें कोन वस्तुक इच्छा करबाक चाही तकर वर्णन एहि मंत्रमे कएल गेल अछि। एहिमे वाचकलुप्तोपमालड़्कार अछि। अन्वय- ब्रह्म॑न् - विद्या आदि गुणसँ परिपूर्ण ब्रह्म रा॒ष्ट्रे - देशमे ब्र॑ह्मवर्च॒सी-ब्रह्म विद्याक तेजसँ युक्त्त आ जा॑यतां॒- उत्पन्न होए रा॑ज॒न्यः-राजा शुरे॑ऽ–बिना डर बला इषव्यो॒- बाण चलेबामे निपुण ऽतिव्या॒धी-शत्रुकेँ तारण दय बला म॑हार॒थो-पैघ रथ बला वीर दोग्ध्रीं-कामना(दूध पूर्ण करए बाली) धे॒नुर्वोढा॑न॒ड्वाना॒शुः धे॒नु-गौ वा वाणी र्वोढा॑न॒ड्वा- पैघ बरद ना॒शुः-आशुः-त्वरित सप्तिः॒-घोड़ा पुर॑न्धि॒र्योवा॑- पुर॑न्धि॒- व्यवहारकेँ धारण करए बाली र्योवा॑-स्त्री जि॒ष्णू-शत्रुकेँ जीतए बला र॑थे॒ष्ठाः-रथ पर स्थिर स॒भेयो॒-उत्तम सभामे युवास्य-युवा जेहन यज॑मानस्य-राजाक राज्यमे वी॒रो-शत्रुकेँ पराजित करएबला निका॒मे-नि॑कामे-निश्चययुक्त्त कार्यमे नः-हमर सभक प॒र्जन्यों-मेघ वर्षतु॒-वर्षा होए फल॑वत्यो-उत्तम फल बला ओष॑धयः-औषधिः पच्यन्तां- पाकए योगेक्ष॒मो-अलभ्य लभ्य करेबाक हेतु कएल गेल योगक रक्षा नः॑-हमरा सभक हेतु कल्पताम्-समर्थ होए ग्रिफिथक अनुवाद- हे ब्रह्मण, हमर राज्यमे ब्राह्मण नीक धार्मिक विद्या बला, राजन्य-वीर,तीरंदाज, दूध दए बाली गाय, दौगय बला जन्तु, उद्यमी नारी होथि। पार्जन्य आवश्यकता पड़ला पर वर्षा देथि, फल देय बला गाछ पाकए, हम सभ संपत्ति अर्जित/संरक्षित करी। 8.VIDEHA FOR NON RESIDENTS 8.1 to 8.3 MAITHILI LITERATURE IN ENGLISH 8.1.1.The Comet   -GAJENDRA THAKUR translated by Jyoti Jha chaudhary 8.1.2.The_Science_of_Words- GAJENDRA THAKUR translated by the author himself 8.1.3.On_the_dice-board_of_the_millennium- GAJENDRA THAKUR translated by Jyoti Jha chaudhary 8.1.4.NAAGPHANS (IN ENGLISH)- SHEFALIKA VERMA translated by Dr. Rajiv Kumar Verma and Dr. Jaya Verma विदेह नूतन अंक भाषापाक रचना-लेखन Input: (कोष्ठकमे देवनागरी, मिथिलाक्षर किंवा फोनेटिक-रोमनमे टाइप करू। Input in Devanagari, Mithilakshara or Phonetic-Roman.) Output: (परिणाम देवनागरी, मिथिलाक्षर आ फोनेटिक-रोमन/ रोमनमे। Result in Devanagari, Mithilakshara and Phonetic-Roman/ Roman.) English to Maithili Maithili to English इंग्लिश-मैथिली-कोष / मैथिली-इंग्लिश-कोष  प्रोजेक्टकेँ आगू बढ़ाऊ, अपन सुझाव आ योगदान ई-मेल द्वारा ggajendra@videha.com पर पठाऊ। Top of Form विदेहक मैथिली-अंग्रेजी आ अंग्रेजी मैथिली कोष (इंटरनेटपर पहिल बेर सर्च-डिक्शनरी) एम.एस. एस.क्यू.एल. सर्वर आधारित -Based on ms-sql server Maithili-English and English-Maithili Dictionary. १.भारत आ नेपालक मैथिली भाषा-वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक शैली आ २.मैथिलीमे भाषा सम्पादन पाठ्यक्रम १.नेपाल आ भारतक मैथिली भाषा-वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक शैली

१.१. नेपालक मैथिली भाषा वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक  उच्चारण आ लेखन शैली (भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक धारणाकेँ पूर्ण रूपसँ सङ्ग लऽ निर्धारित) मैथिलीमे उच्चारण तथा लेखन १.पञ्चमाक्षर आ अनुस्वार: पञ्चमाक्षरान्तर्गत ङ, ञ, ण, न एवं म अबैत अछि। संस्कृत भाषाक अनुसार शब्दक अन्तमे जाहि वर्गक अक्षर रहैत अछि ओही वर्गक पञ्चमाक्षर अबैत अछि। जेना- अङ्क (क वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ङ् आएल अछि।) पञ्च (च वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ञ् आएल अछि।) खण्ड (ट वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ण् आएल अछि।) सन्धि (त वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे न् आएल अछि।) खम्भ (प वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे म् आएल अछि।) उपर्युक्त बात मैथिलीमे कम देखल जाइत अछि। पञ्चमाक्षरक बदलामे अधिकांश जगहपर अनुस्वारक प्रयोग देखल जाइछ। जेना- अंक, पंच, खंड, संधि, खंभ आदि। व्याकरणविद पण्डित गोविन्द झाक कहब छनि जे कवर्ग, चवर्ग आ टवर्गसँ पूर्व अनुस्वार लिखल जाए तथा तवर्ग आ पवर्गसँ पूर्व पञ्चमाक्षरे लिखल जाए। जेना- अंक, चंचल, अंडा, अन्त तथा कम्पन। मुदा हिन्दीक निकट रहल आधुनिक लेखक एहि बातकेँ नहि मानैत छथि। ओ लोकनि अन्त आ कम्पनक जगहपर सेहो अंत आ कंपन लिखैत देखल जाइत छथि। नवीन पद्धति किछु सुविधाजनक अवश्य छैक। किएक तँ एहिमे समय आ स्थानक बचत होइत छैक। मुदा कतोक बेर हस्तलेखन वा मुद्रणमे अनुस्वारक छोट सन बिन्दु स्पष्ट नहि भेलासँ अर्थक अनर्थ होइत सेहो देखल जाइत अछि। अनुस्वारक प्रयोगमे उच्चारण-दोषक सम्भावना सेहो ततबए देखल जाइत अछि। एतदर्थ कसँ लऽ कऽ पवर्ग धरि पञ्चमाक्षरेक प्रयोग करब उचित अछि। यसँ लऽ कऽ ज्ञ धरिक अक्षरक सङ्ग अनुस्वारक प्रयोग करबामे कतहु कोनो विवाद नहि देखल जाइछ। २.ढ आ ढ़ : ढ़क उच्चारण “र् ह”जकाँ होइत अछि। अतः जतऽ “र् ह”क उच्चारण हो ओतऽ मात्र ढ़ लिखल जाए। आन ठाम खाली ढ लिखल जएबाक चाही। जेना- ढ = ढाकी, ढेकी, ढीठ, ढेउआ, ढङ्ग, ढेरी, ढाकनि, ढाठ आदि। ढ़ = पढ़ाइ, बढ़ब, गढ़ब, मढ़ब, बुढ़बा, साँढ़, गाढ़, रीढ़, चाँढ़, सीढ़ी, पीढ़ी आदि। उपर्युक्त शब्द सभकेँ देखलासँ ई स्पष्ट होइत अछि जे साधारणतया शब्दक शुरूमे ढ आ मध्य तथा अन्तमे ढ़ अबैत अछि। इएह नियम ड आ ड़क सन्दर्भ सेहो लागू होइत अछि। ३.व आ ब : मैथिलीमे “व”क उच्चारण ब कएल जाइत अछि, मुदा ओकरा ब रूपमे नहि लिखल जएबाक चाही। जेना- उच्चारण : बैद्यनाथ, बिद्या, नब, देबता, बिष्णु, बंश, बन्दना आदि। एहि सभक स्थानपर क्रमशः वैद्यनाथ, विद्या, नव, देवता, विष्णु, वंश, वन्दना लिखबाक चाही। सामान्यतया व उच्चारणक लेल ओ प्रयोग कएल जाइत अछि। जेना- ओकील, ओजह आदि। ४.य आ ज : कतहु-कतहु “य”क उच्चारण “ज”जकाँ करैत देखल जाइत अछि, मुदा ओकरा ज नहि लिखबाक चाही। उच्चारणमे यज्ञ, जदि, जमुना, जुग, जाबत, जोगी, जदु, जम आदि कहल जाएबला शब्द सभकेँ क्रमशः यज्ञ, यदि, यमुना, युग, यावत, योगी, यदु, यम लिखबाक चाही। ५.ए आ य : मैथिलीक वर्तनीमे ए आ य दुनू लिखल जाइत अछि। प्राचीन वर्तनी- कएल, जाए, होएत, माए, भाए, गाए आदि। नवीन वर्तनी- कयल, जाय, होयत, माय, भाय, गाय आदि। सामान्यतया शब्दक शुरूमे ए मात्र अबैत अछि। जेना एहि, एना, एकर, एहन आदि। एहि शब्द सभक स्थानपर यहि, यना, यकर, यहन आदिक प्रयोग नहि करबाक चाही। यद्यपि मैथिलीभाषी थारू सहित किछु जातिमे शब्दक आरम्भोमे “ए”केँ य कहि उच्चारण कएल जाइत अछि। ए आ “य”क प्रयोगक सन्दर्भमे प्राचीने पद्धतिक अनुसरण करब उपयुक्त मानि एहि पुस्तकमे ओकरे प्रयोग कएल गेल अछि। किएक तँ दुनूक लेखनमे कोनो सहजता आ दुरूहताक बात नहि अछि। आ मैथिलीक सर्वसाधारणक उच्चारण-शैली यक अपेक्षा एसँ बेसी निकट छैक। खास कऽ कएल, हएब आदि कतिपय शब्दकेँ कैल, हैब आदि रूपमे कतहु-कतहु लिखल जाएब सेहो “ए”क प्रयोगकेँ बेसी समीचीन प्रमाणित करैत अछि। ६.हि, हु तथा एकार, ओकार : मैथिलीक प्राचीन लेखन-परम्परामे कोनो बातपर बल दैत काल शब्दक पाछाँ हि, हु लगाओल जाइत छैक। जेना- हुनकहि, अपनहु, ओकरहु, तत्कालहि, चोट्टहि, आनहु आदि। मुदा आधुनिक लेखनमे हिक स्थानपर एकार एवं हुक स्थानपर ओकारक प्रयोग करैत देखल जाइत अछि। जेना- हुनके, अपनो, तत्काले, चोट्टे, आनो आदि। ७.ष तथा ख : मैथिली भाषामे अधिकांशतः षक उच्चारण ख होइत अछि। जेना- षड्यन्त्र (खड़यन्त्र), षोडशी (खोड़शी), षट्कोण (खटकोण), वृषेश (वृखेश), सन्तोष (सन्तोख) आदि। ८.ध्वनि-लोप : निम्नलिखित अवस्थामे शब्दसँ ध्वनि-लोप भऽ जाइत अछि: (क) क्रियान्वयी प्रत्यय अयमे य वा ए लुप्त भऽ जाइत अछि। ओहिमे सँ पहिने अक उच्चारण दीर्घ भऽ जाइत अछि। ओकर आगाँ लोप-सूचक चिह्न वा विकारी (’ / ऽ) लगाओल जाइछ। जेना- पूर्ण रूप : पढ़ए (पढ़य) गेलाह, कए (कय) लेल, उठए (उठय) पड़तौक। अपूर्ण रूप : पढ़’ गेलाह, क’ लेल, उठ’ पड़तौक। पढ़ऽ गेलाह, कऽ लेल, उठऽ पड़तौक। (ख) पूर्वकालिक कृत आय (आए) प्रत्ययमे य (ए) लुप्त भऽ जाइछ, मुदा लोप-सूचक विकारी नहि लगाओल जाइछ। जेना- पूर्ण रूप : खाए (य) गेल, पठाय (ए) देब, नहाए (य) अएलाह। अपूर्ण रूप : खा गेल, पठा देब, नहा अएलाह। (ग) स्त्री प्रत्यय इक उच्चारण क्रियापद, संज्ञा, ओ विशेषण तीनूमे लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना- पूर्ण रूप : दोसरि मालिनि चलि गेलि। अपूर्ण रूप : दोसर मालिन चलि गेल। (घ) वर्तमान कृदन्तक अन्तिम त लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना- पूर्ण रूप : पढ़ैत अछि, बजैत अछि, गबैत अछि। अपूर्ण रूप : पढ़ै अछि, बजै अछि, गबै अछि। (ङ) क्रियापदक अवसान इक, उक, ऐक तथा हीकमे लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना- पूर्ण रूप: छियौक, छियैक, छहीक, छौक, छैक, अबितैक, होइक। अपूर्ण रूप : छियौ, छियै, छही, छौ, छै, अबितै, होइ। (च) क्रियापदीय प्रत्यय न्ह, हु तथा हकारक लोप भऽ जाइछ। जेना- पूर्ण रूप : छन्हि, कहलन्हि, कहलहुँ, गेलह, नहि। अपूर्ण रूप : छनि, कहलनि, कहलौँ, गेलऽ, नइ, नञि, नै। ९.ध्वनि स्थानान्तरण : कोनो-कोनो स्वर-ध्वनि अपना जगहसँ हटि कऽ दोसर ठाम चलि जाइत अछि। खास कऽ ह्रस्व इ आ उक सम्बन्धमे ई बात लागू होइत अछि। मैथिलीकरण भऽ गेल शब्दक मध्य वा अन्तमे जँ ह्रस्व इ वा उ आबए तँ ओकर ध्वनि स्थानान्तरित भऽ एक अक्षर आगाँ आबि जाइत अछि। जेना- शनि (शइन), पानि (पाइन), दालि ( दाइल), माटि (माइट), काछु (काउछ), मासु (माउस) आदि। मुदा तत्सम शब्द सभमे ई निअम लागू नहि होइत अछि। जेना- रश्मिकेँ रइश्म आ सुधांशुकेँ सुधाउंस नहि कहल जा सकैत अछि। १०.हलन्त(्)क प्रयोग : मैथिली भाषामे सामान्यतया हलन्त (्)क आवश्यकता नहि होइत अछि। कारण जे शब्दक अन्तमे अ उच्चारण नहि होइत अछि। मुदा संस्कृत भाषासँ जहिनाक तहिना मैथिलीमे आएल (तत्सम) शब्द सभमे हलन्त प्रयोग कएल जाइत अछि। एहि पोथीमे सामान्यतया सम्पूर्ण शब्दकेँ मैथिली भाषा सम्बन्धी निअम अनुसार हलन्तविहीन राखल गेल अछि। मुदा व्याकरण सम्बन्धी प्रयोजनक लेल अत्यावश्यक स्थानपर कतहु-कतहु हलन्त देल गेल अछि। प्रस्तुत पोथीमे मथिली लेखनक प्राचीन आ नवीन दुनू शैलीक सरल आ समीचीन पक्ष सभकेँ समेटि कऽ वर्ण-विन्यास कएल गेल अछि। स्थान आ समयमे बचतक सङ्गहि हस्त-लेखन तथा तकनीकी दृष्टिसँ सेहो सरल होबऽबला हिसाबसँ वर्ण-विन्यास मिलाओल गेल अछि। वर्तमान समयमे मैथिली मातृभाषी पर्यन्तकेँ आन भाषाक माध्यमसँ मैथिलीक ज्ञान लेबऽ पड़ि रहल परिप्रेक्ष्यमे लेखनमे सहजता तथा एकरूपतापर ध्यान देल गेल अछि। तखन मैथिली भाषाक मूल विशेषता सभ कुण्ठित नहि होइक, ताहू दिस लेखक-मण्डल सचेत अछि। प्रसिद्ध भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक कहब छनि जे सरलताक अनुसन्धानमे एहन अवस्था किन्नहु ने आबऽ देबाक चाही जे भाषाक विशेषता छाँहमे पडि जाए। -(भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक धारणाकेँ पूर्ण रूपसँ सङ्ग लऽ निर्धारित) १.२. मैथिली अकादमी, पटना द्वारा निर्धारित मैथिली लेखन-शैली

१. जे शब्द मैथिली-साहित्यक प्राचीन कालसँ आइ धरि जाहि वर्त्तनीमे प्रचलित अछि, से सामान्यतः ताहि वर्त्तनीमे लिखल जाय- उदाहरणार्थ-

ग्राह्य

एखन ठाम जकर, तकर तनिकर अछि

अग्राह्य अखन, अखनि, एखेन, अखनी ठिमा, ठिना, ठमा जेकर, तेकर तिनकर। (वैकल्पिक रूपेँ ग्राह्य) ऐछ, अहि, ए।

२. निम्नलिखित तीन प्रकारक रूप वैकल्पिकतया अपनाओल जाय: भऽ गेल, भय गेल वा भए गेल। जा रहल अछि, जाय रहल अछि, जाए रहल अछि। कर’ गेलाह, वा करय गेलाह वा करए गेलाह।

३. प्राचीन मैथिलीक ‘न्ह’ ध्वनिक स्थानमे ‘न’ लिखल जाय सकैत अछि यथा कहलनि वा कहलन्हि।

४. ‘ऐ’ तथा ‘औ’ ततय लिखल जाय जत’ स्पष्टतः ‘अइ’ तथा ‘अउ’ सदृश उच्चारण इष्ट हो। यथा- देखैत, छलैक, बौआ, छौक इत्यादि।

५. मैथिलीक निम्नलिखित शब्द एहि रूपे प्रयुक्त होयत: जैह, सैह, इएह, ओऐह, लैह तथा दैह।

६. ह्र्स्व इकारांत शब्दमे ‘इ’ के लुप्त करब सामान्यतः अग्राह्य थिक। यथा- ग्राह्य देखि आबह, मालिनि गेलि (मनुष्य मात्रमे)।

७. स्वतंत्र ह्रस्व ‘ए’ वा ‘य’ प्राचीन मैथिलीक उद्धरण आदिमे तँ यथावत राखल जाय, किंतु आधुनिक प्रयोगमे वैकल्पिक रूपेँ ‘ए’ वा ‘य’ लिखल जाय। यथा:- कयल वा कएल, अयलाह वा अएलाह, जाय वा जाए इत्यादि।

८. उच्चारणमे दू स्वरक बीच जे ‘य’ ध्वनि स्वतः आबि जाइत अछि तकरा लेखमे स्थान वैकल्पिक रूपेँ देल जाय। यथा- धीआ, अढ़ैआ, विआह, वा धीया, अढ़ैया, बियाह।

९. सानुनासिक स्वतंत्र स्वरक स्थान यथासंभव ‘ञ’ लिखल जाय वा सानुनासिक स्वर। यथा:- मैञा, कनिञा, किरतनिञा वा मैआँ, कनिआँ, किरतनिआँ।

१०. कारकक विभक्त्तिक निम्नलिखित रूप ग्राह्य:- हाथकेँ, हाथसँ, हाथेँ, हाथक, हाथमे। ’मे’ मे अनुस्वार सर्वथा त्याज्य थिक। ‘क’ क वैकल्पिक रूप ‘केर’ राखल जा सकैत अछि।

११. पूर्वकालिक क्रियापदक बाद ‘कय’ वा ‘कए’ अव्यय वैकल्पिक रूपेँ लगाओल जा सकैत अछि। यथा:- देखि कय वा देखि कए।

१२. माँग, भाँग आदिक स्थानमे माङ, भाङ इत्यादि लिखल जाय।

१३. अर्द्ध ‘न’ ओ अर्द्ध ‘म’ क बदला अनुसार नहि लिखल जाय, किंतु छापाक सुविधार्थ अर्द्ध ‘ङ’ , ‘ञ’, तथा ‘ण’ क बदला अनुस्वारो लिखल जा सकैत अछि। यथा:- अङ्क, वा अंक, अञ्चल वा अंचल, कण्ठ वा कंठ।

१४. हलंत चिह्न निअमतः लगाओल जाय, किंतु विभक्तिक संग अकारांत प्रयोग कएल जाय। यथा:- श्रीमान्, किंतु श्रीमानक।

१५. सभ एकल कारक चिह्न शब्दमे सटा क’ लिखल जाय, हटा क’ नहि, संयुक्त विभक्तिक हेतु फराक लिखल जाय, यथा घर परक।

१६. अनुनासिककेँ चन्द्रबिन्दु द्वारा व्यक्त कयल जाय। परंतु मुद्रणक सुविधार्थ हि समान जटिल मात्रापर अनुस्वारक प्रयोग चन्द्रबिन्दुक बदला कयल जा सकैत अछि। यथा- हिँ केर बदला हिं।

१७. पूर्ण विराम पासीसँ ( । ) सूचित कयल जाय।

१८. समस्त पद सटा क’ लिखल जाय, वा हाइफेनसँ जोड़ि क’ ,  हटा क’ नहि।

१९. लिअ तथा दिअ शब्दमे बिकारी (ऽ) नहि लगाओल जाय।

२०. अंक देवनागरी रूपमे राखल जाय।

२१.किछु ध्वनिक लेल नवीन चिन्ह बनबाओल जाय। जा' ई नहि बनल अछि ताबत एहि दुनू ध्वनिक बदला पूर्ववत् अय/ आय/ अए/ आए/ आओ/ अओ लिखल जाय। आकि ऎ वा ऒ सँ व्यक्त कएल जाय।

ह./- गोविन्द झा ११/८/७६ श्रीकान्त ठाकुर ११/८/७६ सुरेन्द्र झा "सुमन" ११/०८/७६

  २. मैथिलीमे भाषा सम्पादन पाठ्यक्रम २.१. उच्चारण निर्देश: (बोल्ड कएल रूप ग्राह्य):- दन्त न क उच्चारणमे दाँतमे जीह सटत- जेना बाजू नाम , मुदा ण क उच्चारणमे जीह मूर्धामे सटत (नै सटैए तँ उच्चारण दोष अछि)- जेना बाजू गणेश। तालव्य शमे जीह तालुसँ , षमे मूर्धासँ आ दन्त समे दाँतसँ सटत। निशाँ, सभ आ शोषण बाजि कऽ देखू। मैथिलीमे ष केँ वैदिक संस्कृत जकाँ ख सेहो उच्चरित कएल जाइत अछि, जेना वर्षा, दोष। य अनेको स्थानपर ज जकाँ उच्चरित होइत अछि आ ण ड़ जकाँ (यथा संयोग आ गणेश संजोग आ गड़ेस उच्चरित होइत अछि)। मैथिलीमे व क उच्चारण ब, श क उच्चारण स आ य क उच्चारण ज सेहो होइत अछि। ओहिना ह्रस्व इ बेशीकाल मैथिलीमे पहिने बाजल जाइत अछि कारण देवनागरीमे आ मिथिलाक्षरमे ह्रस्व इ अक्षरक पहिने लिखलो जाइत आ बाजलो जएबाक चाही। कारण जे हिन्दीमे एकर दोषपूर्ण उच्चारण होइत अछि (लिखल तँ पहिने जाइत अछि मुदा बाजल बादमे जाइत अछि), से शिक्षा पद्धतिक दोषक कारण हम सभ ओकर उच्चारण दोषपूर्ण ढंगसँ कऽ रहल छी। अछि- अ इ छ  ऐछ (उच्चारण) छथि- छ इ थ  – छैथ (उच्चारण) पहुँचि- प हुँ इ च (उच्चारण) आब अ आ इ ई ए ऐ ओ औ अं अः ऋ ऐ सभ लेल मात्रा सेहो अछि, मुदा ऐमे ई ऐ ओ औ अं अः ऋ केँ संयुक्ताक्षर रूपमे गलत रूपमे प्रयुक्त आ उच्चरित कएल जाइत अछि। जेना ऋ केँ री  रूपमे उच्चरित करब। आ देखियौ- ऐ लेल देखिऔ क प्रयोग अनुचित। मुदा देखिऐ लेल देखियै अनुचित। क् सँ ह् धरि अ सम्मिलित भेलासँ क सँ ह बनैत अछि, मुदा उच्चारण काल हलन्त युक्त शब्दक अन्तक उच्चारणक प्रवृत्ति बढ़ल अछि, मुदा हम जखन मनोजमे ज् अन्तमे बजैत छी, तखनो पुरनका लोककेँ बजैत सुनबन्हि- मनोजऽ, वास्तवमे ओ अ युक्त ज् = ज बजै छथि। फेर ज्ञ अछि ज् आ ञ क संयुक्त मुदा गलत उच्चारण होइत अछि- ग्य। ओहिना क्ष अछि क् आ ष क संयुक्त मुदा उच्चारण होइत अछि छ। फेर श् आ र क संयुक्त अछि श्र ( जेना श्रमिक) आ स् आ र क संयुक्त अछि स्र (जेना मिस्र)। त्र भेल त+र । उच्चारणक ऑडियो फाइल विदेह आर्काइव  http://www.videha.co.in/ पर उपलब्ध अछि। फेर केँ / सँ / पर पूर्व अक्षरसँ सटा कऽ लिखू मुदा तँ / कऽ हटा कऽ। ऐमे सँ मे पहिल सटा कऽ लिखू आ बादबला हटा कऽ। अंकक बाद टा लिखू सटा कऽ मुदा अन्य ठाम टा लिखू हटा कऽ– जेना छहटा मुदा सभ टा। फेर ६अ म सातम लिखू- छठम सातम नै। घरबलामे बला मुदा घरवालीमे वाली प्रयुक्त करू। रहए- रहै मुदा सकैए (उच्चारण सकै-ए)। मुदा कखनो काल रहए आ रहै मे अर्थ भिन्नता सेहो, जेना से कम्मो जगहमे पार्किंग करबाक अभ्यास रहै ओकरा। पुछलापर पता लागल जे ढुनढुन नाम्ना ई ड्राइवर कनाट प्लेसक पार्किंगमे काज करैत रहए। छलै, छलए मे सेहो ऐ तरहक भेल। छलए क उच्चारण छल-ए सेहो। संयोगने- (उच्चारण संजोगने) केँ/  कऽ केर- क ( केर क प्रयोग गद्यमे नै करू , पद्यमे कऽ सकै छी। ) क (जेना रामक) –रामक आ संगे (उच्चारण राम के /  राम कऽ सेहो) सँ- सऽ (उच्चारण) चन्द्रबिन्दु आ अनुस्वार- अनुस्वारमे कंठ धरिक प्रयोग होइत अछि मुदा चन्द्रबिन्दुमे नै। चन्द्रबिन्दुमे कनेक एकारक सेहो उच्चारण होइत अछि- जेना रामसँ- (उच्चारण राम सऽ)  रामकेँ- (उच्चारण राम कऽ/ राम के सेहो)। केँ जेना रामकेँ भेल हिन्दीक को (राम को)- राम को= रामकेँ क जेना रामक भेल हिन्दीक का ( राम का) राम का= रामक कऽ जेना जा कऽ भेल हिन्दीक कर ( जा कर) जा कर= जा कऽ सँ भेल हिन्दीक से (राम से) राम से= रामसँ सऽ , तऽ , त , केर (गद्यमे) एे चारू शब्द सबहक प्रयोग अवांछित। के दोसर अर्थेँ प्रयुक्त भऽ सकैए- जेना, के कहलक? विभक्ति “क”क बदला एकर प्रयोग अवांछित। नञि, नहि, नै, नइ, नँइ, नइँ, नइं ऐ सभक उच्चारण आ लेखन - नै त्त्व क बदलामे त्व जेना महत्वपूर्ण (महत्त्वपूर्ण नै) जतए अर्थ बदलि जाए ओतहि मात्र तीन अक्षरक संयुक्ताक्षरक प्रयोग उचित। सम्पति- उच्चारण स म्प इ त (सम्पत्ति नै- कारण सही उच्चारण आसानीसँ सम्भव नै)। मुदा सर्वोत्तम (सर्वोतम नै)। राष्ट्रिय (राष्ट्रीय नै) सकैए/ सकै (अर्थ परिवर्तन) पोछैले/ पोछै लेल/ पोछए लेल पोछैए/ पोछए/ (अर्थ परिवर्तन) पोछए/ पोछै ओ लोकनि ( हटा कऽ, ओ मे बिकारी नै) ओइ/ ओहि ओहिले/ ओहि लेल/ ओही लऽ जएबेँ/ बैसबेँ पँचभइयाँ देखियौक/ (देखिऔक नै- तहिना अ मे ह्रस्व आ दीर्घक मात्राक प्रयोग अनुचित) जकाँ / जेकाँ तँइ/ तैँ/ होएत / हएत नञि/ नहि/ नँइ/ नइँ/ नै सौँसे/ सौंसे बड़ / बड़ी (झोराओल) गाए (गाइ नहि), मुदा गाइक दूध (गाएक दूध नै।) रहलेँ/ पहिरतैँ हमहीं/ अहीं सब - सभ सबहक - सभहक धरि - तक गप- बात बूझब - समझब बुझलौं/ समझलौं/ बुझलहुँ - समझलहुँ हमरा आर - हम सभ आकि- आ कि सकैछ/ करैछ (गद्यमे प्रयोगक आवश्यकता नै) होइन/ होनि जाइन (जानि नै, जेना देल जाइन) मुदा जानि-बूझि (अर्थ परिव्र्तन) पइठ/ जाइठ आउ/ जाउ/ आऊ/ जाऊ मे, केँ, सँ, पर (शब्दसँ सटा कऽ) तँ कऽ धऽ दऽ (शब्दसँ हटा कऽ) मुदा दूटा वा बेसी विभक्ति संग रहलापर पहिल विभक्ति टाकेँ सटाऊ। जेना ऐमे सँ । एकटा , दूटा (मुदा कए टा) बिकारीक प्रयोग शब्दक अन्तमे, बीचमे अनावश्यक रूपेँ नै। आकारान्त आ अन्तमे अ क बाद बिकारीक प्रयोग नै (जेना दिअ , आ/ दिय’ , आ’, आ नै ) अपोस्ट्रोफीक प्रयोग बिकारीक बदलामे करब अनुचित आ मात्र फॉन्टक तकनीकी न्यूनताक परिचायक)- ओना बिकारीक संस्कृत रूप ऽ अवग्रह कहल जाइत अछि आ वर्तनी आ उच्चारण दुनू ठाम एकर लोप रहैत अछि/ रहि सकैत अछि (उच्चारणमे लोप रहिते अछि)। मुदा अपोस्ट्रोफी सेहो अंग्रेजीमे पसेसिव केसमे होइत अछि आ फ्रेंचमे शब्दमे जतए एकर प्रयोग होइत अछि जेना raison d’etre एतए सेहो एकर उच्चारण रैजौन डेटर होइत अछि, माने अपोस्ट्रॉफी अवकाश नै दैत अछि वरन जोड़ैत अछि, से एकर प्रयोग बिकारीक बदला देनाइ तकनीकी रूपेँ सेहो अनुचित)। अइमे, एहिमे/ ऐमे जइमे, जाहिमे एखन/ अखन/ अइखन केँ (के नहि) मे (अनुस्वार रहित) भऽ मे दऽ तँ (तऽ, त नै) सँ ( सऽ स नै) गाछ तर गाछ लग साँझ खन जो (जो go, करै जो do) तै/तइ जेना- तै दुआरे/ तइमे/ तइले जै/जइ जेना- जै कारण/ जइसँ/ जइले ऐ/अइ जेना- ऐ कारण/ ऐसँ/ अइले/ मुदा एकर एकटा खास प्रयोग- लालति‍ कतेक दि‍नसँ कहैत रहैत अइ लै/लइ जेना लैसँ/ लइले/ लै दुआरे लहँ/ लौं गेलौं/ लेलौं/ लेलँह/ गेलहुँ/ लेलहुँ/ लेलँ जइ/ जाहि‍/ जै जहि‍ठाम/ जाहि‍ठाम/ जइठाम/ जैठाम एहि‍/ अहि‍/ अइ (वाक्यक अंतमे ग्राह्य) / ऐ अइछ/ अछि‍/ ऐछ तइ/ तहि‍/ तै/ ताहि‍ ओहि‍/ ओइ सीखि‍/ सीख जीवि‍/ जीवी/ जीब भलेहीं/ भलहि‍ं तैं/ तँइ/ तँए जाएब/ जएब लइ/ लै छइ/ छै नहि‍/ नै/ नइ गइ/ गै छनि‍/ छन्‍हि‍  ... समए शब्‍दक संग जखन कोनो वि‍भक्‍ति‍ जुटै छै तखन समै जना समैपर इत्‍यादि‍। असगरमे हृदए आ वि‍भक्‍ति‍ जुटने हृदे जना हृदेसँ, हृदेमे इत्‍यादि‍। जइ/ जाहि‍/ जै जहि‍ठाम/ जाहि‍ठाम/ जइठाम/ जैठाम एहि‍/ अहि‍/ अइ/ ऐ अइछ/ अछि‍/ ऐछ तइ/ तहि‍/ तै/ ताहि‍ ओहि‍/ ओइ सीखि‍/ सीख जीवि‍/ जीवी/ जीब भले/ भलेहीं/ भलहि‍ं तैं/ तँइ/ तँए जाएब/ जएब लइ/ लै छइ/ छै नहि‍/ नै/ नइ गइ/ गै छनि‍/ छन्‍हि‍ चुकल अछि/ गेल गछि २.२. मैथिलीमे भाषा सम्पादन पाठ्यक्रम नीचाँक सूचीमे देल विकल्पमेसँ लैंगुएज एडीटर द्वारा कोन रूप चुनल जेबाक चाही: बोल्ड कएल रूप ग्राह्य: १.होयबला/ होबयबला/ होमयबला/ हेब’बला, हेम’बला/ होयबाक/होबएबला /होएबाक २. आ’/आऽ आ ३. क’ लेने/कऽ लेने/कए लेने/कय लेने/ल’/लऽ/लय/लए ४. भ’ गेल/भऽ गेल/भय गेल/भए गेल ५. कर’ गेलाह/करऽ गेलह/करए गेलाह/करय गेलाह ६. लिअ/दिअ लिय’,दिय’,लिअ’,दिय’/ ७. कर’ बला/करऽ बला/ करय बला करैबला/क’र’ बला / करैवाली ८. बला वला (पुरूष), वाली (स्‍त्री) ९ . आङ्ल आंग्ल १०. प्रायः प्रायह ११. दुःख दुख १ २. चलि गेल चल गेल/चैल गेल १३. देलखिन्ह देलकिन्ह, देलखिन १४. देखलन्हि देखलनि/ देखलैन्ह १५. छथिन्ह/ छलन्हि छथिन/ छलैन/ छलनि १६. चलैत/दैत चलति/दैति १७. एखनो अखनो १८. बढ़नि‍ बढ़इन बढ़न्हि १९. ओ’/ओऽ(सर्वनाम) ओ २० . ओ (संयोजक) ओ’/ओऽ २१. फाँगि/फाङ्गि फाइंग/फाइङ २२. जे जे’/जेऽ २३. ना-नुकुर ना-नुकर २४. केलन्हि/केलनि‍/कयलन्हि २५. तखनतँ/ तखन तँ २६. जा रहल/जाय रहल/जाए रहल २७. निकलय/निकलए लागल/ लगल बहराय/ बहराए लागल/ लगल निकल’/बहरै लागल २८. ओतय/ जतय जत’/ ओत’/ जतए/ ओतए २९. की फूरल जे कि फूरल जे ३०. जे जे’/जेऽ ३१. कूदि / यादि(मोन पारब) कूइद/याइद/कूद/याद/ यादि (मोन) ३२. इहो/ ओहो ३३. हँसए/ हँसय हँसऽ ३४. नौ आकि दस/नौ किंवा दस/ नौ वा दस ३५. सासु-ससुर सास-ससुर ३६. छह/ सात छ/छः/सात ३७. की  की’/ कीऽ (दीर्घीकारान्तमे ऽ वर्जित) ३८. जबाब जवाब ३९. करएताह/ करेताह करयताह ४०. दलान दिशि दलान दिश/दलान दिस ४१ . गेलाह गएलाह/गयलाह ४२. किछु आर/ किछु और/ किछ आर ४३. जाइ छल/ जाइत छल जाति छल/जैत छल ४४. पहुँचि/ भेट जाइत छल/ भेट जाइ छलए पहुँच/ भेटि‍ जाइत छल ४५. जबान (युवा)/ जवान(फौजी) ४६. लय/ लए क’/ कऽ/ लए कए / लऽ कऽ/ लऽ कए ४७. ल’/लऽ कय/ कए ४८. एखन / एखने / अखन / अखने ४९. अहींकेँ अहीँकेँ ५०. गहींर गहीँर ५१. धार पार केनाइ धार पार केनाय/केनाए ५२. जेकाँ जेँकाँ/ जकाँ ५३. तहिना तेहिना ५४. एकर अकर ५५. बहिनउ बहनोइ ५६. बहिन बहिनि ५७. बहिन-बहिनोइ बहिन-बहनउ ५८. नहि/ नै ५९. करबा / करबाय/ करबाए ६०. तँ/ त ऽ तय/तए ६१. भैयारी मे छोट-भाए/भै/, जेठ-भाय/भाइ, ६२. गि‍नतीमे दू भाइ/भाए/भाँइ ६३. ई पोथी दू भाइक/ भाँइ/ भाए/ लेल। यावत जावत ६४. माय मै / माए मुदा माइक ममता ६५. देन्हि/ दइन दनि‍/ दएन्हि/ दयन्हि दन्हि/ दैन्हि ६६. द’/ दऽ/ दए ६७. ओ (संयोजक) ओऽ (सर्वनाम) ६८. तका कए तकाय तकाए ६९. पैरे (on foot) पएरे  कएक/ कैक ७०. ताहुमे/ ताहूमे ७१. पुत्रीक ७२. बजा कय/ कए / कऽ ७३. बननाय/बननाइ ७४. कोला ७५. दिनुका दिनका ७६. ततहिसँ ७७. गरबओलन्हि/ गरबौलनि‍/ गरबेलन्हि/ गरबेलनि‍ ७८. बालु बालू ७९. चेन्ह चिन्ह(अशुद्ध) ८०. जे जे’ ८१ . से/ के से’/के’ ८२. एखुनका अखनुका ८३. भुमिहार भूमिहार ८४. सुग्गर / सुगरक/ सूगर ८५. झठहाक झटहाक ८६. छूबि ८७. करइयो/ओ करैयो ने देलक /करियौ-करइयौ ८८. पुबारि पुबाइ ८९. झगड़ा-झाँटी झगड़ा-झाँटि ९०. पएरे-पएरे पैरे-पैरे ९१. खेलएबाक ९२. खेलेबाक ९३. लगा ९४. होए- हो – होअए ९५. बुझल बूझल ९६. बूझल (संबोधन अर्थमे) ९७. यैह यएह / इएह/ सैह/ सएह ९८. तातिल ९९. अयनाय- अयनाइ/ अएनाइ/ एनाइ १००. निन्न- निन्द १०१. बिनु बिन १०२. जाए जाइ १०३. जाइ (in different sense)-last word of sentence १०४. छत पर आबि जाइ १०५. ने १०६. खेलाए (play) –खेलाइ १०७. शिकाइत- शिकायत १०८. ढप- ढ़प १०९ . पढ़- पढ ११०. कनिए/ कनिये कनिञे १११. राकस- राकश ११२. होए/ होय होइ ११३. अउरदा- औरदा ११४. बुझेलन्हि (different meaning- got understand) ११५. बुझएलन्हि/बुझेलनि‍/ बुझयलन्हि (understood himself) ११६. चलि- चल/ चलि‍ गेल ११७. खधाइ- खधाय ११८. मोन पाड़लखिन्ह/ मोन पाड़लखि‍न/ मोन पारलखिन्ह ११९. कैक- कएक- कइएक १२०. लग ल’ग १२१. जरेनाइ १२२. जरौनाइ जरओनाइ- जरएनाइ/ जरेनाइ १२३. होइत १२४. गरबेलन्हि/ गरबेलनि‍ गरबौलन्हि/ गरबौलनि‍ १२५. चिखैत- (to test)चिखइत १२६. करइयो (willing to do) करैयो १२७. जेकरा- जकरा १२८. तकरा- तेकरा १२९. बिदेसर स्थानेमे/ बिदेसरे स्थानमे १३०. करबयलहुँ/ करबएलहुँ/ करबेलहुँ करबेलौं १३१. हारिक (उच्चारण हाइरक) १३२. ओजन वजन आफसोच/ अफसोस कागत/ कागच/ कागज १३३. आधे भाग/ आध-भागे १३४. पिचा / पिचाय/पिचाए १३५. नञ/ ने १३६. बच्चा नञ (ने) पिचा जाय १३७. तखन ने (नञ) कहैत अछि। कहै/ सुनै/ देखै छल मुदा कहैत-कहैत/ सुनैत-सुनैत/ देखैत-देखैत १३८. कतेक गोटे/ कताक गोटे १३९. कमाइ-धमाइ/ कमाई- धमाई १४० . लग ल’ग १४१. खेलाइ (for playing) १४२. छथिन्ह/ छथिन १४३. होइत होइ १४४. क्यो कियो / केओ १४५. केश (hair) १४६. केस (court-case) १४७ . बननाइ/ बननाय/ बननाए १४८. जरेनाइ १४९. कुरसी कुर्सी १५०. चरचा चर्चा १५१. कर्म करम १५२. डुबाबए/ डुबाबै/ डुमाबै डुमाबय/ डुमाबए १५३. एखुनका/ अखुनका १५४. लए/ लिअए (वाक्यक अंतिम शब्द)- लऽ १५५. कएलक/ केलक १५६. गरमी गर्मी १५७ . वरदी वर्दी १५८. सुना गेलाह सुना’/सुनाऽ १५९. एनाइ-गेनाइ १६०. तेना ने घेरलन्हि/ तेना ने घेरलनि‍ १६१. नञि / नै १६२. डरो ड’रो १६३. कतहु/ कतौ कहीं १६४. उमरिगर-उमेरगर उमरगर १६५. भरिगर १६६. धोल/धोअल धोएल १६७. गप/गप्प १६८. के के’ १६९. दरबज्जा/ दरबजा १७०. ठाम १७१. धरि तक १७२. घूरि लौटि १७३. थोरबेक १७४. बड्ड १७५. तोँ/ तूँ १७६. तोँहि( पद्यमे ग्राह्य) १७७. तोँही / तोँहि १७८. करबाइए करबाइये १७९. एकेटा १८०. करितथि /करतथि १८१. पहुँचि/ पहुँच १८२. राखलन्हि रखलन्हि/ रखलनि‍ १८३. लगलन्हि/ लगलनि‍ लागलन्हि १८४. सुनि (उच्चारण सुइन) १८५. अछि (उच्चारण अइछ) १८६. एलथि गेलथि १८७. बितओने/ बि‍तौने/ बितेने १८८. करबओलन्हि/ करबौलनि‍/ करेलखिन्ह/ करेलखि‍न १८९. करएलन्हि/ करेलनि‍ १९०. आकि/ कि १९१. पहुँचि/ पहुँच १९२. बत्ती जराय/ जराए जरा (आगि लगा) १९३. से से’ १९४. हाँ मे हाँ (हाँमे हाँ विभक्त्तिमे हटा कए) १९५. फेल फैल १९६. फइल(spacious) फैल १९७. होयतन्हि/ होएतन्हि/ होएतनि‍/हेतनि‍/ हेतन्हि १९८. हाथ मटिआएब/ हाथ मटियाबय/हाथ मटियाएब १९९. फेका फेंका २००. देखाए देखा २०१. देखाबए २०२. सत्तरि सत्तर २०३. साहेब साहब २०४.गेलैन्ह/ गेलन्हि/ गेलनि‍ २०५. हेबाक/ होएबाक २०६.केलो/ कएलहुँ/केलौं/ केलुँ २०७. किछु न किछु/ किछु ने किछु २०८.घुमेलहुँ/ घुमओलहुँ/ घुमेलौं २०९. एलाक/ अएलाक २१०. अः/ अह २११.लय/ लए (अर्थ-परिवर्त्तन) २१२.कनीक/ कनेक २१३.सबहक/ सभक २१४.मिलाऽ/ मिला २१५.कऽ/ क २१६.जाऽ/ जा २१७.आऽ/ आ २१८.भऽ /भ’ (’ फॉन्टक कमीक द्योतक) २१९.निअम/ नियम २२० .हेक्टेअर/ हेक्टेयर २२१.पहिल अक्षर ढ/ बादक/ बीचक ढ़ २२२.तहिं/तहिँ/ तञि/ तैं २२३.कहिं/ कहीं २२४.तँइ/ तैं / तइँ २२५.नँइ/ नइँ/  नञि/ नहि/नै २२६.है/ हए / एलीहेँ/ २२७.छञि/ छै/ छैक /छइ २२८.दृष्टिएँ/ दृष्टियेँ २२९.आ (come)/ आऽ(conjunction) २३०. आ (conjunction)/ आऽ(come) २३१.कुनो/ कोनो, कोना/केना २३२.गेलैन्ह-गेलन्हि-गेलनि‍ २३३.हेबाक- होएबाक २३४.केलौँ- कएलौँ-कएलहुँ/केलौं २३५.किछु न किछ- किछु ने किछु २३६.केहेन- केहन २३७.आऽ (come)-आ (conjunction-and)/आ। आब'-आब' /आबह-आबह २३८. हएत-हैत २३९.घुमेलहुँ-घुमएलहुँ- घुमेलाें २४०.एलाक- अएलाक २४१.होनि- होइन/ होन्हि/ २४२.ओ-राम ओ श्यामक बीच(conjunction), ओऽ कहलक (he said)/ओ २४३.की हए/ कोसी अएली हए/ की है। की हइ २४४.दृष्टिएँ/ दृष्टियेँ २४५ .शामिल/ सामेल २४६.तैँ / तँए/ तञि/ तहिं २४७.जौं / ज्योँ/ जँ/ २४८.सभ/ सब २४९.सभक/ सबहक २५०.कहिं/ कहीं २५१.कुनो/ कोनो/ कोनहुँ/ २५२.फारकती भऽ गेल/ भए गेल/ भय गेल २५३.कोना/ केना/ कन्‍ना/कना २५४.अः/ अह २५५.जनै/ जनञ २५६.गेलनि‍/ गेलाह (अर्थ परिवर्तन) २५७.केलन्हि/ कएलन्हि/ केलनि‍/ २५८.लय/ लए/ लएह (अर्थ परिवर्तन) २५९.कनीक/ कनेक/कनी-मनी २६०.पठेलन्हि‍ पठेलनि‍/ पठेलइन/ पपठओलन्हि/ पठबौलनि‍/ २६१.निअम/ नियम २६२.हेक्टेअर/ हेक्टेयर २६३.पहिल अक्षर रहने ढ/ बीचमे रहने ढ़ २६४.आकारान्तमे बिकारीक प्रयोग उचित नै/ अपोस्ट्रोफीक प्रयोग फान्टक तकनीकी न्यूनताक परिचायक ओकर बदला अवग्रह (बिकारी) क प्रयोग उचित २६५.केर (पद्यमे ग्राह्य) / -क/ कऽ/ के २६६.छैन्हि- छन्हि २६७.लगैए/ लगैये २६८.होएत/ हएत २६९.जाएत/ जएत/ २७०.आएत/ अएत/ आओत २७१ .खाएत/ खएत/ खैत २७२.पिअएबाक/ पिएबाक/पि‍येबाक २७३.शुरु/ शुरुह २७४.शुरुहे/ शुरुए २७५.अएताह/अओताह/ एताह/ औताह २७६.जाहि/ जाइ/ जइ/ जै/ २७७.जाइत/ जैतए/ जइतए २७८.आएल/ अएल २७९.कैक/ कएक २८०.आयल/ अएल/ आएल २८१. जाए/ जअए/ जए (लालति‍ जाए लगलीह।) २८२. नुकएल/ नुकाएल २८३. कठुआएल/ कठुअएल २८४. ताहि/ तै/ तइ २८५. गायब/ गाएब/ गएब २८६. सकै/ सकए/ सकय २८७.सेरा/सरा/ सराए (भात सरा गेल) २८८.कहैत रही/देखैत रही/ कहैत छलौं/ कहै छलौं- अहिना चलैत/ पढ़ैत (पढ़ै-पढ़ैत अर्थ कखनो काल परिवर्तित) - आर बुझै/ बुझैत (बुझै/ बुझै छी, मुदा बुझैत-बुझैत)/ सकैत/ सकै। करैत/ करै। दै/ दैत। छैक/ छै। बचलै/ बचलैक। रखबा/ रखबाक । बिनु/ बिन। रातिक/ रातुक बुझै आ बुझैत केर अपन-अपन जगहपर प्रयोग समीचीन अछि‍। बुझैत-बुझैत आब बुझलि‍ऐ। हमहूँ बुझै छी। २८९. दुआरे/ द्वारे २९०.भेटि/ भेट/ भेँट २९१. खन/ खीन/  खुना (भोर खन/ भोर खीन) २९२.तक/ धरि २९३.गऽ/ गै (meaning different-जनबै गऽ) २९४.सऽ/ सँ (मुदा दऽ, लऽ) २९५.त्त्व,(तीन अक्षरक मेल बदला पुनरुक्तिक एक आ एकटा दोसरक उपयोग) आदिक बदला त्व आदि। महत्त्व/ महत्व/ कर्ता/ कर्त्ता आदिमे त्त संयुक्तक कोनो आवश्यकता मैथिलीमे नै अछि। वक्तव्य २९६.बेसी/ बेशी २९७.बाला/वाला बला/ वला (रहैबला) २९८ .वाली/ (बदलैवाली) २९९.वार्त्ता/ वार्ता ३००. अन्तर्राष्ट्रिय/ अन्तर्राष्ट्रीय ३०१. लेमए/ लेबए ३०२.लमछुरका, नमछुरका ३०२.लागै/ लगै ( भेटैत/ भेटै) ३०३.लागल/ लगल ३०४.हबा/ हवा ३०५.राखलक/ रखलक ३०६.आ (come)/ आ (and) ३०७. पश्चाताप/ पश्चात्ताप ३०८. ऽ केर व्यवहार शब्दक अन्तमे मात्र, यथासंभव बीचमे नै। ३०९.कहैत/ कहै ३१०. रहए (छल)/ रहै (छलै) (meaning different) ३११.तागति/ ताकति ३१२.खराप/ खराब ३१३.बोइन/ बोनि/ बोइनि ३१४.जाठि/ जाइठ ३१५.कागज/ कागच/ कागत ३१६.गिरै (meaning different- swallow)/ गिरए (खसए) ३१७.राष्ट्रिय/ राष्ट्रीय Festivals of Mithila DATE-LIST (year- 2011-12) (१४१९ साल) Marriage Days: Nov.2011- 20,21,23,25,27,30 Dec.2011- 1,5,9 January 2012- 18,19,20,23,25,27,29 Feb.2012- 2,3,8,9,10,16,17,19,23,24,29 March 2012- 1,8,9,12 April 2012- 15,16,18,25,26 June 2012- 8,13,24,25,28,29 Upanayana Days: February 2012- 2,3,24,26 March 2012- 4 April 2012- 1,2,26 June 2012- 22 Dviragaman Din: November 2011- 27,30 December 2011- 1,2,5,7,9,12 February 2012- 22,23,24,26,27,29 March 2012- 1,2,4,5,9,11,12 April 2012- 23,25,26,29 May 2012- 2,3,4,6,7 Mundan Din: December 2011- 1,5 January 201225,26,30 March 2012- 12 April 2012- 26 May 2012- 23,25,31 June 2012- 8,21,22,29 FESTIVALS OF MITHILA Mauna Panchami-20 July Madhushravani- 2 August Nag Panchami- 4 August Raksha Bandhan- 13 Aug Krishnastami- 21 August Kushi Amavasya / Somvari Vrat- 29 August Hartalika Teej- 31 August ChauthChandra-1 September Karma Dharma Ekadashi-8 September Indra Pooja Aarambh- 9 September Anant Caturdashi- 11 Sep Agastyarghadaan- 12 Sep Pitri Paksha begins- 13 Sep Mahalaya Aarambh- 13 September Vishwakarma Pooja- 17 September Jimootavahan Vrata/ Jitia-20 September Matri Navami- 21September Kalashsthapan- 28 September Belnauti- 2 October Patrika Pravesh- 3 October Mahastami- 4 October Maha Navami - 5 October Vijaya Dashami- 6 October Kojagara- 11 Oct Dhanteras- 24 October Diyabati, shyama pooja-26 October Annakoota/ Govardhana Pooja-27  October Bhratridwitiya/ Chitragupta Pooja-28 October Chhathi-kharna -31 October Chhathi- sayankalik arghya - 1 November Devotthan Ekadashi- 17 November Sama poojarambh- 2 November Kartik Poornima/ Sama Bisarjan- 10 Nov ravivratarambh- 27 November Navanna parvan- 29 November Vivaha Panchmi- 29 November Makara/ Teela Sankranti-15 Jan Naraknivaran chaturdashi- 21 January Basant Panchami/ Saraswati Pooja- 28 January Achla Saptmi- 30 January Mahashivaratri-20 February Holikadahan-Fagua-7 March Holi-9 Mar Varuni Yoga-20 March Chaiti  navaratrarambh- 23 March Chaiti Chhathi vrata-29 March Ram Navami- 1 April Mesha Sankranti-Satuani-13 April Jurishital-14 April Akshaya Tritiya-24 April Ravi Brat Ant- 29 April Janaki Navami- 30 April Vat Savitri-barasait- 20 May Ganga Dashhara-30 May Somavati Amavasya Vrata- 18 June Jagannath Rath Yatra- 21 June Hari Sayan Ekadashi- 30 June Aashadhi Guru Poornima-3 Jul VIDEHA ARCHIVE १.विदेह ई-पत्रिकाक सभटा पुरान अंक ब्रेल, तिरहुता आ देवनागरी रूपमे Videha e journal's all old issues in Braille Tirhuta and Devanagari versions विदेह ई-पत्रिकाक पहिल ५० अंक

विदेह ई-पत्रिकाक ५०म सँ आगाँक अंक २.मैथिली पोथी डाउनलोड Maithili Books Download ३.मैथिली ऑडियो संकलन Maithili Audio Downloads ४.मैथिली वीडियोक संकलन Maithili Videos ५.मिथिला चित्रकला/ आधुनिक चित्रकला आ चित्र Mithila Painting/ Modern Art and Photos "विदेह"क एहि सभ सहयोगी लिंकपर सेहो एक बेर जाऊ। ६.विदेह मैथिली क्विज  :  http://videhaquiz.blogspot.com/ ७.विदेह मैथिली जालवृत्त एग्रीगेटर : http://videha-aggregator.blogspot.com/ ८.विदेह मैथिली साहित्य अंग्रेजीमे अनूदित http://madhubani-art.blogspot.com/ ९.विदेहक पूर्व-रूप "भालसरिक गाछ"  : http://gajendrathakur.blogspot.com/ १०.विदेह इंडेक्स  : http://videha123.blogspot.com/ ११.विदेह फाइल : http://videha123.wordpress.com/ १२. विदेह: सदेह : पहिल तिरहुता (मिथिला़क्षर) जालवृत्त (ब्लॉग) http://videha-sadeha.blogspot.com/ १३. विदेह:ब्रेल: मैथिली ब्रेलमे: पहिल बेर विदेह द्वारा http://videha-braille.blogspot.com/ १४.VIDEHA IST MAITHILI  FORTNIGHTLY EJOURNAL ARCHIVE http://videha-archive.blogspot.com/ १५. विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका मैथिली पोथीक आर्काइव http://videha-pothi.blogspot.com/ १६. विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका ऑडियो आर्काइव http://videha-audio.blogspot.com/ १७. विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका वीडियो आर्काइव http://videha-video.blogspot.com/ १८. विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका मिथिला चित्रकला, आधुनिक कला आ चित्रकला http://videha-paintings-photos.blogspot.com/ १९. मैथिल आर मिथिला (मैथिलीक सभसँ लोकप्रिय जालवृत्त) http://maithilaurmithila.blogspot.com/ २०.श्रुति प्रकाशन http://www.shruti-publication.com/ २१.http://groups.google.com/group/videha VIDEHA केर सदस्यता लिअ Top of Form Bottom of Form ईमेल : एहि समूहपर जाऊ २२.http://groups.yahoo.com/group/VIDEHA/ Top of Form Subscribe to VIDEHA Powered by us.groups.yahoo.com Bottom of Form २३.गजेन्द्र ठाकुर इ‍डेक्स http://gajendrathakur123.blogspot.com २४. नेना भुटका http://mangan-khabas.blogspot.com/ २५.विदेह रेडियो:मैथिली कथा-कविता आदिक पहिल पोडकास्ट साइट http://videha123radio.wordpress.com/ २६.Videha Radio २७. Join official Videha facebook group. २८. विदेह मैथिली नाट्य उत्सव http://maithili-drama.blogspot.com/ २९.समदिया http://esamaad.blogspot.com/ ३०. मैथिली फिल्म्स http://maithilifilms.blogspot.com/ ३१.अनचिन्हार आखर http://anchinharakharkolkata.blogspot.com/ ३२. मैथिली हाइकू http://maithili-haiku.blogspot.com/ ३३. मानक मैथिली http://manak-maithili.blogspot.com/ ३४. विहनि कथा http://vihanikatha.blogspot.in/ ३५. मैथिली कविता http://maithili-kavita.blogspot.in/ ३६. मैथिली कथा http://maithili-katha.blogspot.in/ ३७.मैथिली समालोचना http://maithili-samalochna.blogspot.in/ महत्त्वपूर्ण सूचना:(१) 'विदेह' द्वारा धारावाहिक रूपे ई-प्रकाशित कएल गेल गजेन्द्र ठाकुरक  निबन्ध-प्रबन्ध-समीक्षा, उपन्यास (सहस्रबाढ़नि) , पद्य-संग्रह (सहस्राब्दीक चौपड़पर), कथा-गल्प (गल्प-गुच्छ), नाटक(संकर्षण), महाकाव्य (त्वञ्चाहञ्च आ असञ्जाति मन) आ बाल-किशोर साहित्य विदेहमे संपूर्ण ई-प्रकाशनक बाद प्रिंट फॉर्ममे। कुरुक्षेत्रम्–अन्तर्मनक खण्ड-१ सँ ७ Combined ISBN No.978-81-907729-7-6 विवरण एहि पृष्ठपर नीचाँमे आ प्रकाशकक साइट http://www.shruti-publication.com/ पर । महत्त्वपूर्ण सूचना (२):सूचना: विदेहक मैथिली-अंग्रेजी आ अंग्रेजी मैथिली कोष (इंटरनेटपर पहिल बेर सर्च-डिक्शनरी) एम.एस. एस.क्यू.एल. सर्वर आधारित -Based on ms-sql server Maithili-English and English-Maithili Dictionary. विदेहक भाषापाक- रचनालेखन स्तंभमे। कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक- गजेन्द्र ठाकुर गजेन्द्र ठाकुरक निबन्ध-प्रबन्ध-समीक्षा, उपन्यास (सहस्रबाढ़नि) , पद्य-संग्रह (सहस्राब्दीक चौपड़पर), कथा-गल्प (गल्प गुच्छ), नाटक(संकर्षण), महाकाव्य (त्वञ्चाहञ्च आ असञ्जाति मन) आ बालमंडली-किशोरजगत विदेहमे संपूर्ण ई-प्रकाशनक बाद प्रिंट फॉर्ममे। कुरुक्षेत्रम्–अन्तर्मनक, खण्ड-१ सँ ७ Ist edition 2009 of Gajendra Thakur’s KuruKshetram-Antarmanak (Vol. I to VII)- essay-paper-criticism, novel, poems, story, play, epics and Children-grown-ups literature in single binding: Language:Maithili ६९२ पृष्ठ : मूल्य भा. रु. 100/-(for individual buyers inside india) (add courier charges Rs.50/-per copy for Delhi/NCR and Rs.100/- per copy for outside Delhi)

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Details for purchase available at print-version publishers's site website: http://www.shruti-publication.com/ or you may write to e-mail:shruti.publication@shruti-publication.com विदेह: सदेह : १: २: ३: ४ तिरहुता : देवनागरी "विदेह" क, प्रिंट संस्करण :विदेह-ई-पत्रिका (http://www.videha.co.in/) क चुनल रचना सम्मिलित। विदेह:सदेह:१: २: ३: ४ सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। Details for purchase available at print-version publishers's site http://www.shruti-publication.com  or you may write to shruti.publication@shruti-publication.com २. संदेश- [ विदेह ई-पत्रिका, विदेह:सदेह मिथिलाक्षर आ देवनागरी आ गजेन्द्र ठाकुरक सात खण्डक- निबन्ध-प्रबन्ध-समीक्षा,उपन्यास (सहस्रबाढ़नि) , पद्य-संग्रह (सहस्राब्दीक चौपड़पर), कथा-गल्प (गल्प गुच्छ), नाटक (संकर्षण), महाकाव्य (त्वञ्चाहञ्च आ असञ्जाति मन) आ बाल-मंडली-किशोर जगत- संग्रह कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक मादेँ। ] १.श्री गोविन्द झा- विदेहकेँ तरंगजालपर उतारि विश्वभरिमे मातृभाषा मैथिलीक लहरि जगाओल, खेद जे अपनेक एहि महाभियानमे हम एखन धरि संग नहि दए सकलहुँ। सुनैत छी अपनेकेँ सुझाओ आ रचनात्मक आलोचना प्रिय लगैत अछि तेँ किछु लिखक मोन भेल। हमर सहायता आ सहयोग अपनेकेँ सदा उपलब्ध रहत। २.श्री रमानन्द रेणु- मैथिलीमे ई-पत्रिका पाक्षिक रूपेँ चला कऽ जे अपन मातृभाषाक प्रचार कऽ रहल छी, से धन्यवाद । आगाँ अपनेक समस्त मैथिलीक कार्यक हेतु हम हृदयसँ शुभकामना दऽ रहल छी। ३.श्री विद्यानाथ झा "विदित"- संचार आ प्रौद्योगिकीक एहि प्रतिस्पर्धी ग्लोबल युगमे अपन महिमामय "विदेह"केँ अपना देहमे प्रकट देखि जतबा प्रसन्नता आ संतोष भेल, तकरा कोनो उपलब्ध "मीटर"सँ नहि नापल जा सकैछ? ..एकर ऐतिहासिक मूल्यांकन आ सांस्कृतिक प्रतिफलन एहि शताब्दीक अंत धरि लोकक नजरिमे आश्चर्यजनक रूपसँ प्रकट हैत। ४. प्रो. उदय नारायण सिंह "नचिकेता"- जे काज अहाँ कए रहल छी तकर चरचा एक दिन मैथिली भाषाक इतिहासमे होएत। आनन्द भए रहल अछि, ई जानि कए जे एतेक गोट मैथिल "विदेह" ई जर्नलकेँ पढ़ि रहल छथि।...विदेहक चालीसम अंक पुरबाक लेल अभिनन्दन। ५. डॉ. गंगेश गुंजन- एहि विदेह-कर्ममे लागि रहल अहाँक सम्वेदनशील मन, मैथिलीक प्रति समर्पित मेहनतिक अमृत रंग, इतिहास मे एक टा विशिष्ट फराक अध्याय आरंभ करत, हमरा विश्वास अछि। अशेष शुभकामना आ बधाइक सङ्ग, सस्नेह...अहाँक पोथी कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक प्रथम दृष्टया बहुत भव्य तथा उपयोगी बुझाइछ। मैथिलीमे तँ अपना स्वरूपक प्रायः ई पहिले एहन  भव्य अवतारक पोथी थिक। हर्षपूर्ण हमर हार्दिक बधाई स्वीकार करी। ६. श्री रामाश्रय झा "रामरंग"(आब स्वर्गीय)- "अपना" मिथिलासँ संबंधित...विषय वस्तुसँ अवगत भेलहुँ।...शेष सभ कुशल अछि। ७. श्री ब्रजेन्द्र त्रिपाठी- साहित्य अकादमी- इंटरनेट पर प्रथम मैथिली पाक्षिक पत्रिका "विदेह" केर लेल बधाई आ शुभकामना स्वीकार करू। ८. श्री प्रफुल्लकुमार सिंह "मौन"- प्रथम मैथिली पाक्षिक पत्रिका "विदेह" क प्रकाशनक समाचार जानि कनेक चकित मुदा बेसी आह्लादित भेलहुँ। कालचक्रकेँ पकड़ि जाहि दूरदृष्टिक परिचय देलहुँ, ओहि लेल हमर मंगलकामना। ९.डॉ. शिवप्रसाद यादव- ई जानि अपार हर्ष भए रहल अछि, जे नव सूचना-क्रान्तिक क्षेत्रमे मैथिली पत्रकारिताकेँ प्रवेश दिअएबाक साहसिक कदम उठाओल अछि। पत्रकारितामे एहि प्रकारक नव प्रयोगक हम स्वागत करैत छी, संगहि "विदेह"क सफलताक शुभकामना। १०. श्री आद्याचरण झा- कोनो पत्र-पत्रिकाक प्रकाशन- ताहूमे मैथिली पत्रिकाक प्रकाशनमे के कतेक सहयोग करताह- ई तऽ भविष्य कहत। ई हमर ८८ वर्षमे ७५ वर्षक अनुभव रहल। एतेक पैघ महान यज्ञमे हमर श्रद्धापूर्ण आहुति प्राप्त होयत- यावत ठीक-ठाक छी/ रहब। ११. श्री विजय ठाकुर- मिशिगन विश्वविद्यालय- "विदेह" पत्रिकाक अंक देखलहुँ, सम्पूर्ण टीम बधाईक पात्र अछि। पत्रिकाक मंगल भविष्य हेतु हमर शुभकामना स्वीकार कएल जाओ। १२. श्री सुभाषचन्द्र यादव- ई-पत्रिका "विदेह" क बारेमे जानि प्रसन्नता भेल। ’विदेह’ निरन्तर पल्लवित-पुष्पित हो आ चतुर्दिक अपन सुगंध पसारय से कामना अछि। १३. श्री मैथिलीपुत्र प्रदीप- ई-पत्रिका "विदेह" केर सफलताक भगवतीसँ कामना। हमर पूर्ण सहयोग रहत। १४. डॉ. श्री भीमनाथ झा- "विदेह" इन्टरनेट पर अछि तेँ "विदेह" नाम उचित आर कतेक रूपेँ एकर विवरण भए सकैत अछि। आइ-काल्हि मोनमे उद्वेग रहैत अछि, मुदा शीघ्र पूर्ण सहयोग देब।कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक देखि अति प्रसन्नता भेल। मैथिलीक लेल ई घटना छी। १५. श्री रामभरोस कापड़ि "भ्रमर"- जनकपुरधाम- "विदेह" ऑनलाइन देखि रहल छी। मैथिलीकेँ अन्तर्राष्ट्रीय जगतमे पहुँचेलहुँ तकरा लेल हार्दिक बधाई। मिथिला रत्न सभक संकलन अपूर्व। नेपालोक सहयोग भेटत, से विश्वास करी। १६. श्री राजनन्दन लालदास- "विदेह" ई-पत्रिकाक माध्यमसँ बड़ नीक काज कए रहल छी, नातिक अहिठाम देखलहुँ। एकर वार्षिक अ‍ंक जखन प्रिं‍ट निकालब तँ हमरा पठायब। कलकत्तामे बहुत गोटेकेँ हम साइटक पता लिखाए देने छियन्हि। मोन तँ होइत अछि जे दिल्ली आबि कए आशीर्वाद दैतहुँ, मुदा उमर आब बेशी भए गेल। शुभकामना देश-विदेशक मैथिलकेँ जोड़बाक लेल।.. उत्कृष्ट प्रकाशन कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक लेल बधाइ। अद्भुत काज कएल अछि, नीक प्रस्तुति अछि सात खण्डमे।  मुदा अहाँक सेवा आ से निःस्वार्थ तखन बूझल जाइत जँ अहाँ द्वारा प्रकाशित पोथी सभपर दाम लिखल नहि रहितैक। ओहिना सभकेँ विलहि देल जइतैक। (स्पष्टीकरण-  श्रीमान्, अहाँक सूचनार्थ विदेह द्वारा ई-प्रकाशित कएल सभटा सामग्री आर्काइवमे https://sites.google.com/a/videha.com/videha-pothi/ पर बिना मूल्यक डाउनलोड लेल उपलब्ध छै आ भविष्यमे सेहो रहतैक। एहि आर्काइवकेँ जे कियो प्रकाशक अनुमति लऽ कऽ प्रिंट रूपमे प्रकाशित कएने छथि आ तकर ओ दाम रखने छथि ताहिपर हमर कोनो नियंत्रण नहि अछि।- गजेन्द्र ठाकुर)...   अहाँक प्रति अशेष शुभकामनाक संग। १७. डॉ. प्रेमशंकर सिंह- अहाँ मैथिलीमे इंटरनेटपर पहिल पत्रिका "विदेह" प्रकाशित कए अपन अद्भुत मातृभाषानुरागक परिचय देल अछि, अहाँक निःस्वार्थ मातृभाषानुरागसँ प्रेरित छी, एकर निमित्त जे हमर सेवाक प्रयोजन हो, तँ सूचित करी। इंटरनेटपर आद्योपांत पत्रिका देखल, मन प्रफुल्लित भऽ गेल। १८.श्रीमती शेफालिका वर्मा- विदेह ई-पत्रिका देखि मोन उल्लाससँ भरि गेल। विज्ञान कतेक प्रगति कऽ रहल अछि...अहाँ सभ अनन्त आकाशकेँ भेदि दियौ, समस्त विस्तारक रहस्यकेँ तार-तार कऽ दियौक...। अपनेक अद्भुत पुस्तक कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक विषयवस्तुक दृष्टिसँ गागरमे सागर अछि। बधाई। १९.श्री हेतुकर झा, पटना-जाहि समर्पण भावसँ अपने मिथिला-मैथिलीक सेवामे तत्पर छी से स्तुत्य अछि। देशक राजधानीसँ भय रहल मैथिलीक शंखनाद मिथिलाक गाम-गाममे मैथिली चेतनाक विकास अवश्य करत। २०. श्री योगानन्द झा, कबिलपुर, लहेरियासराय- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पोथीकेँ निकटसँ देखबाक अवसर भेटल अछि आ मैथिली जगतक एकटा उद्भट ओ समसामयिक दृष्टिसम्पन्न हस्ताक्षरक कलमबन्द परिचयसँ आह्लादित छी। "विदेह"क देवनागरी सँस्करण पटनामे रु. 80/- मे उपलब्ध भऽ सकल जे विभिन्न लेखक लोकनिक छायाचित्र, परिचय पत्रक ओ रचनावलीक सम्यक प्रकाशनसँ ऐतिहासिक कहल जा सकैछ। २१. श्री किशोरीकान्त मिश्र- कोलकाता- जय मैथिली, विदेहमे बहुत रास कविता, कथा, रिपोर्ट आदिक सचित्र संग्रह देखि आ आर अधिक प्रसन्नता मिथिलाक्षर देखि- बधाई स्वीकार कएल जाओ। २२.श्री जीवकान्त- विदेहक मुद्रित अंक पढ़ल- अद्भुत मेहनति। चाबस-चाबस। किछु समालोचना मरखाह..मुदा सत्य। २३. श्री भालचन्द्र झा- अपनेक कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक देखि बुझाएल जेना हम अपने छपलहुँ अछि। एकर विशालकाय आकृति अपनेक सर्वसमावेशताक परिचायक अछि। अपनेक रचना सामर्थ्यमे उत्तरोत्तर वृद्धि हो, एहि शुभकामनाक संग हार्दिक बधाई। २४.श्रीमती डॉ नीता झा- अहाँक कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़लहुँ। ज्योतिरीश्वर शब्दावली, कृषि मत्स्य शब्दावली आ सीत बसन्त आ सभ कथा, कविता, उपन्यास, बाल-किशोर साहित्य सभ उत्तम छल। मैथिलीक उत्तरोत्तर विकासक लक्ष्य दृष्टिगोचर होइत अछि। २५.श्री मायानन्द मिश्र- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक मे हमर उपन्यास स्त्रीधनक जे विरोध कएल गेल अछि तकर हम विरोध करैत छी।... कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पोथीक लेल शुभकामना।(श्रीमान् समालोचनाकेँ विरोधक रूपमे नहि लेल जाए।-गजेन्द्र ठाकुर) २६.श्री महेन्द्र हजारी- सम्पादक श्रीमिथिला- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़ि मोन हर्षित भऽ गेल..एखन पूरा पढ़यमे बहुत समय लागत, मुदा जतेक पढ़लहुँ से आह्लादित कएलक। २७.श्री केदारनाथ चौधरी- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक अद्भुत लागल, मैथिली साहित्य लेल ई पोथी एकटा प्रतिमान बनत। २८.श्री सत्यानन्द पाठक- विदेहक हम नियमित पाठक छी। ओकर स्वरूपक प्रशंसक छलहुँ। एम्हर अहाँक लिखल - कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक देखलहुँ। मोन आह्लादित भऽ उठल। कोनो रचना तरा-उपरी। २९.श्रीमती रमा झा-सम्पादक मिथिला दर्पण। कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक प्रिंट फॉर्म पढ़ि आ एकर गुणवत्ता देखि मोन प्रसन्न भऽ गेल, अद्भुत शब्द एकरा लेल प्रयुक्त कऽ रहल छी। विदेहक उत्तरोत्तर प्रगतिक शुभकामना। ३०.श्री नरेन्द्र झा, पटना- विदेह नियमित देखैत रहैत छी। मैथिली लेल अद्भुत काज कऽ रहल छी। ३१.श्री रामलोचन ठाकुर- कोलकाता- मिथिलाक्षर विदेह देखि मोन प्रसन्नतासँ भरि उठल, अंकक विशाल परिदृश्य आस्वस्तकारी अछि। ३२.श्री तारानन्द वियोगी- विदेह आ कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक देखि चकबिदोर लागि गेल। आश्चर्य। शुभकामना आ बधाई। ३३.श्रीमती प्रेमलता मिश्र “प्रेम”- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़लहुँ। सभ रचना उच्चकोटिक लागल। बधाई। ३४.श्री कीर्तिनारायण मिश्र- बेगूसराय- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक बड्ड नीक लागल, आगांक सभ काज लेल बधाई। ३५.श्री महाप्रकाश-सहरसा- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक नीक लागल, विशालकाय संगहि उत्तमकोटिक। ३६.श्री अग्निपुष्प- मिथिलाक्षर आ देवाक्षर विदेह पढ़ल..ई प्रथम तँ अछि एकरा प्रशंसामे मुदा हम एकरा दुस्साहसिक कहब। मिथिला चित्रकलाक स्तम्भकेँ मुदा अगिला अंकमे आर विस्तृत बनाऊ। ३७.श्री मंजर सुलेमान-दरभंगा- विदेहक जतेक प्रशंसा कएल जाए कम होएत। सभ चीज उत्तम। ३८.श्रीमती प्रोफेसर वीणा ठाकुर- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक उत्तम, पठनीय, विचारनीय। जे क्यो देखैत छथि पोथी प्राप्त करबाक उपाय पुछैत छथि। शुभकामना। ३९.श्री छत्रानन्द सिंह झा- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़लहुँ, बड्ड नीक सभ तरहेँ। ४०.श्री ताराकान्त झा- सम्पादक मैथिली दैनिक मिथिला समाद- विदेह तँ कन्टेन्ट प्रोवाइडरक काज कऽ रहल अछि। कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक अद्भुत लागल। ४१.डॉ रवीन्द्र कुमार चौधरी- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक बहुत नीक, बहुत मेहनतिक परिणाम। बधाई। ४२.श्री अमरनाथ- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक आ विदेह दुनू स्मरणीय घटना अछि, मैथिली साहित्य मध्य। ४३.श्री पंचानन मिश्र- विदेहक वैविध्य आ निरन्तरता प्रभावित करैत अछि, शुभकामना। ४४.श्री केदार कानन- कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक लेल अनेक धन्यवाद, शुभकामना आ बधाइ स्वीकार करी। आ नचिकेताक भूमिका पढ़लहुँ। शुरूमे तँ लागल जेना कोनो उपन्यास अहाँ द्वारा सृजित भेल अछि मुदा पोथी उनटौला पर ज्ञात भेल जे एहिमे तँ सभ विधा समाहित अछि। ४५.श्री धनाकर ठाकुर- अहाँ नीक काज कऽ रहल छी। फोटो गैलरीमे चित्र एहि शताब्दीक जन्मतिथिक अनुसार रहैत तऽ नीक। ४६.श्री आशीष झा- अहाँक पुस्तकक संबंधमे एतबा लिखबा सँ अपना कए नहि रोकि सकलहुँ जे ई किताब मात्र किताब नहि थीक, ई एकटा उम्मीद छी जे मैथिली अहाँ सन पुत्रक सेवा सँ निरंतर समृद्ध होइत चिरजीवन कए प्राप्त करत। ४७.श्री शम्भु कुमार सिंह- विदेहक तत्परता आ क्रियाशीलता देखि आह्लादित भऽ रहल छी। निश्चितरूपेण कहल जा सकैछ जे समकालीन मैथिली पत्रिकाक इतिहासमे विदेहक नाम स्वर्णाक्षरमे लिखल जाएत। ओहि कुरुक्षेत्रक घटना सभ तँ अठारहे दिनमे खतम भऽ गेल रहए मुदा अहाँक कुरुक्षेत्रम् तँ अशेष अछि। ४८.डॉ. अजीत मिश्र- अपनेक प्रयासक कतबो प्रश‍ंसा कएल जाए कमे होएतैक। मैथिली साहित्यमे अहाँ द्वारा कएल गेल काज युग-युगान्तर धरि पूजनीय रहत। ४९.श्री बीरेन्द्र मल्लिक- अहाँक कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक आ विदेह:सदेह पढ़ि अति प्रसन्नता भेल। अहाँक स्वास्थ्य ठीक रहए आ उत्साह बनल रहए से कामना। ५०.श्री कुमार राधारमण- अहाँक दिशा-निर्देशमे विदेह पहिल मैथिली ई-जर्नल देखि अति प्रसन्नता भेल। हमर शुभकामना। ५१.श्री फूलचन्द्र झा प्रवीण-विदेह:सदेह पढ़ने रही मुदा कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक देखि बढ़ाई देबा लेल बाध्य भऽ गेलहुँ। आब विश्वास भऽ गेल जे मैथिली नहि मरत। अशेष शुभकामना। ५२.श्री विभूति आनन्द- विदेह:सदेह देखि, ओकर विस्तार देखि अति प्रसन्नता भेल। ५३.श्री मानेश्वर मनुज-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक एकर भव्यता देखि अति प्रसन्नता भेल, एतेक विशाल ग्रन्थ मैथिलीमे आइ धरि नहि देखने रही। एहिना भविष्यमे काज करैत रही, शुभकामना। ५४.श्री विद्यानन्द झा- आइ.आइ.एम.कोलकाता- कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक विस्तार, छपाईक संग गुणवत्ता देखि अति प्रसन्नता भेल। अहाँक अनेक धन्यवाद; कतेक बरखसँ हम नेयारैत छलहुँ जे सभ पैघ शहरमे मैथिली लाइब्रेरीक स्थापना होअए, अहाँ ओकरा वेबपर कऽ रहल छी, अनेक धन्यवाद। ५५.श्री अरविन्द ठाकुर-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक मैथिली साहित्यमे कएल गेल एहि तरहक पहिल प्रयोग अछि, शुभकामना। ५६.श्री कुमार पवन-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक पढ़ि रहल छी। किछु लघुकथा पढ़ल अछि, बहुत मार्मिक छल। ५७. श्री प्रदीप बिहारी-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक देखल, बधाई। ५८.डॉ मणिकान्त ठाकुर-कैलिफोर्निया- अपन विलक्षण नियमित सेवासँ हमरा लोकनिक हृदयमे विदेह सदेह भऽ गेल अछि। ५९.श्री धीरेन्द्र प्रेमर्षि- अहाँक समस्त प्रयास सराहनीय। दुख होइत अछि जखन अहाँक प्रयासमे अपेक्षित सहयोग नहि कऽ पबैत छी। ६०.श्री देवशंकर नवीन- विदेहक निरन्तरता आ विशाल स्वरूप- विशाल पाठक वर्ग, एकरा ऐतिहासिक बनबैत अछि। ६१.श्री मोहन भारद्वाज- अहाँक समस्त कार्य देखल, बहुत नीक। एखन किछु परेशानीमे छी, मुदा शीघ्र सहयोग देब। ६२.श्री फजलुर रहमान हाशमी-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक मे एतेक मेहनतक लेल अहाँ साधुवादक अधिकारी छी। ६३.श्री लक्ष्मण झा "सागर"- मैथिलीमे चमत्कारिक रूपेँ अहाँक प्रवेश आह्लादकारी अछि।..अहाँकेँ एखन आर..दूर..बहुत दूरधरि जेबाक अछि। स्वस्थ आ प्रसन्न रही। ६४.श्री जगदीश प्रसाद मंडल-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक पढ़लहुँ । कथा सभ आ उपन्यास सहस्रबाढ़नि पूर्णरूपेँ पढ़ि गेल छी। गाम-घरक भौगोलिक विवरणक जे सूक्ष्म वर्णन सहस्रबाढ़निमे अछि, से चकित कएलक, एहि संग्रहक कथा-उपन्यास मैथिली लेखनमे विविधता अनलक अछि। समालोचना शास्त्रमे अहाँक दृष्टि वैयक्तिक नहि वरन् सामाजिक आ कल्याणकारी अछि, से प्रशंसनीय। ६५.श्री अशोक झा-अध्यक्ष मिथिला विकास परिषद- कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक लेल बधाई आ आगाँ लेल शुभकामना। ६६.श्री ठाकुर प्रसाद मुर्मु- अद्भुत प्रयास। धन्यवादक संग प्रार्थना जे अपन माटि-पानिकेँ ध्यानमे राखि अंकक समायोजन कएल जाए। नव अंक धरि प्रयास सराहनीय। विदेहकेँ बहुत-बहुत धन्यवाद जे एहेन सुन्दर-सुन्दर सचार (आलेख) लगा रहल छथि। सभटा ग्रहणीय- पठनीय। ६७.बुद्धिनाथ मिश्र- प्रिय गजेन्द्र जी,अहाँक सम्पादन मे प्रकाशित ‘विदेह’आ ‘कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक’ विलक्षण पत्रिका आ विलक्षण पोथी! की नहि अछि अहाँक सम्पादनमे? एहि प्रयत्न सँ मैथिली क विकास होयत,निस्संदेह। ६८.श्री बृखेश चन्द्र लाल- गजेन्द्रजी, अपनेक पुस्तक कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक पढ़ि मोन गदगद भय गेल , हृदयसँ अनुगृहित छी । हार्दिक शुभकामना । ६९.श्री परमेश्वर कापड़ि - श्री गजेन्द्र जी । कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक पढ़ि गदगद आ नेहाल भेलहुँ। ७०.श्री रवीन्द्रनाथ ठाकुर- विदेह पढ़ैत रहैत छी। धीरेन्द्र प्रेमर्षिक मैथिली गजलपर आलेख पढ़लहुँ। मैथिली गजल कत्तऽ सँ कत्तऽ चलि गेलैक आ ओ अपन आलेखमे मात्र अपन जानल-पहिचानल लोकक चर्च कएने छथि। जेना मैथिलीमे मठक परम्परा रहल अछि। (स्पष्टीकरण- श्रीमान्, प्रेमर्षि जी ओहि आलेखमे ई स्पष्ट लिखने छथि जे किनको नाम जे छुटि गेल छन्हि तँ से मात्र आलेखक लेखकक जानकारी नहि रहबाक द्वारे, एहिमे आन कोनो कारण नहि देखल जाय। अहाँसँ एहि विषयपर विस्तृत आलेख सादर आमंत्रित अछि।-सम्पादक) ७१.श्री मंत्रेश्वर झा- विदेह पढ़ल आ संगहि अहाँक मैगनम ओपस कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक सेहो, अति उत्तम। मैथिलीक लेल कएल जा रहल अहाँक समस्त कार्य अतुलनीय अछि। ७२. श्री हरेकृष्ण झा- कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक मैथिलीमे अपन तरहक एकमात्र ग्रन्थ अछि, एहिमे लेखकक समग्र दृष्टि आ रचना कौशल देखबामे आएल जे लेखकक फील्डवर्कसँ जुड़ल रहबाक कारणसँ अछि। ७३.श्री सुकान्त सोम- कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक मे  समाजक इतिहास आ वर्तमानसँ अहाँक जुड़ाव बड्ड नीक लागल, अहाँ एहि क्षेत्रमे आर आगाँ काज करब से आशा अछि। ७४.प्रोफेसर मदन मिश्र- कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक सन किताब मैथिलीमे पहिले अछि आ एतेक विशाल संग्रहपर शोध कएल जा सकैत अछि। भविष्यक लेल शुभकामना। ७५.प्रोफेसर कमला चौधरी- मैथिलीमे कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक सन पोथी आबए जे गुण आ रूप दुनूमे निस्सन होअए, से बहुत दिनसँ आकांक्षा छल, ओ आब जा कऽ पूर्ण भेल। पोथी एक हाथसँ दोसर हाथ घुमि रहल अछि, एहिना आगाँ सेहो अहाँसँ आशा अछि। ७६.श्री उदय चन्द्र झा "विनोद": गजेन्द्रजी, अहाँ जतेक काज कएलहुँ अछि से मैथिलीमे आइ धरि कियो नहि कएने छल। शुभकामना। अहाँकेँ एखन बहुत काज आर करबाक अछि। ७७.श्री कृष्ण कुमार कश्यप: गजेन्द्र ठाकुरजी, अहाँसँ भेँट एकटा स्मरणीय क्षण बनि गेल। अहाँ जतेक काज एहि बएसमे कऽ गेल छी ताहिसँ हजार गुणा आर बेशीक आशा अछि। ७८.श्री मणिकान्त दास: अहाँक मैथिलीक कार्यक प्रशंसा लेल शब्द नहि भेटैत अछि। अहाँक कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक सम्पूर्ण रूपेँ पढ़ि गेलहुँ। त्वञ्चाहञ्च बड्ड नीक लागल। ७९. श्री हीरेन्द्र कुमार झा- विदेह ई-पत्रिकाक सभ अंक ई-पत्रसँ भेटैत रहैत अछि। मैथिलीक ई-पत्रिका छैक एहि बातक गर्व होइत अछि। अहाँ आ अहाँक सभ सहयोगीकेँ हार्दिक शुभकामना। विदेह मैथिली साहित्य आन्दोलन (c)२००४-१२. सर्वाधिकार लेखकाधीन आ जतए लेखकक नाम नहि अछि ततए संपादकाधीन। विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। सह-सम्पादक: उमेश मंडल। सहायक सम्पादक: शिव कुमार झा आ मुन्नाजी (मनोज कुमार कर्ण)। भाषा-सम्पादन: नागेन्द्र कुमार झा आ पञ्जीकार विद्यानन्द झा। कला-सम्पादन: वनीता कुमारी आ रश्मि रेखा सिन्हा। सम्पादक-शोध-अन्वेषण: डॉ. जया वर्मा आ डॉ. राजीव कुमार वर्मा। सम्पादक- नाटक-रंगमंच-चलचित्र- बेचन ठाकुर। सम्पादक- सूचना-सम्पर्क-समाद- पूनम मंडल आ प्रियंका झा। सम्पादक- अनुवाद विभाग- विनीत उत्पल। रचनाकार अपन मौलिक आ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि) ggajendra@videha.com केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx, .rtf वा .txt फॉर्मेटमे पठा सकैत छथि। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेताह, से आशा करैत छी। रचनाक अंतमे टाइप रहय, जे ई रचना मौलिक अछि, आ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। मेल प्राप्त होयबाक बाद यथासंभव शीघ्र ( सात दिनक भीतर) एकर प्रकाशनक अंकक सूचना देल जायत। ’विदेह' प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका अछि आ एहिमे मैथिली, संस्कृत आ अंग्रेजीमे मिथिला आ मैथिलीसँ संबंधित रचना प्रकाशित कएल जाइत अछि। एहि ई पत्रिकाकेँ श्रीमति लक्ष्मी ठाकुर द्वारा मासक ०१ आ १५ तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि। (c) 2004-12 सर्वाधिकार सुरक्षित। विदेहमे प्रकाशित सभटा रचना आ आर्काइवक सर्वाधिकार रचनाकार आ संग्रहकर्त्ताक लगमे छन्हि। रचनाक अनुवाद आ पुनः प्रकाशन किंवा आर्काइवक उपयोगक अधिकार किनबाक हेतु ggajendra@videha.co.in पर संपर्क करू। एहि साइटकेँ प्रीति झा ठाकुर, मधूलिका चौधरी आ रश्मि प्रिया द्वारा डिजाइन कएल गेल। सिद्धिरस्तु वि दे ह विदेह Videha বিদেহ  विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका Videha Ist Maithili Fortnightly ejournal  विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका 'विदेह' १०४ म अंक १५ अप्रैल २०१२ (वर्ष ५ मास ५२ अंक १०४) मानुषीमिह संस्कृताम् ISSN 2229-547X VIDEHA वि दे ह विदेह Videha বিদেহ  विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका Videha Ist Maithili Fortnightly e Magazine  विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई 'विदेह' १०४ म अंक १५ अप्रैल २०१२ (वर्ष ५ मास ५२ अंक १०४) मानुषीमिह संस्कृताम् ISSN 2229-547X VIDEHA

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