VIDEHA — Issue 105 / अंक १०५

Publication: VIDEHA · Issue: 105
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362 363 ISSN 2229-547X VIDEHA 'विदेह' १०५ म अंक ०१ मइ २०१२ (वर्ष ५ मास ५३ अंक १०५) वि  दे  ह विदेह Videha বিদেহ http://www.videha.co.in  विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका Videha Ist Maithili Fortnightly ejournal  नव अंक देखबाक लेल पृष्ठ सभकेँ रिफ्रेश कए देखू। Always refresh the pages for viewing new issue of VIDEHA. Read in your own script Roman(Eng)Gujarati Bangla Oriya Gurmukhi Telugu Tamil Kannada Malayalam Hindi ऐ अंकमे अछि:- १. संपादकीय संदेश २. गद्य २.१.जगदीश प्रसार मण्डलक दीर्घकथा- फाँसी-आगाँ २.२.मधुपनाथ झा- बिदापत नाच २.३.१.वनीता कुमारी- विहनि कथा- पुनर्न्वेषण २.ओमप्रकाश झा- विहनि कथा- कपारक लिखल ३.जगदानन्द झा 'मनु' - ५टा विहनि कथा ४.चन्दन कुमार झा- विहनि कथा २.४.अतुलेश्वर-पाग, मिथिला आ जातिवादक राजनीति २.५.१.रवि भूषण पाठक- ओक्‍कर तोहर हम्‍मर सपना-३ २.६.श्यामसुन्दर शशि- झूमि उठल जनकपुरवासी २.७.१.सुजीत कुमार झा -नाटकप्रति रंजुमे गजबकेँ समर्पण छल २.सुमित आनन्द- शोध-पत्रिका मैथिली एवं मैथिली काव्यमे अलंकारक लोकार्पण २.८.सुजीत कुमार झा-नव व्यापार ३. पद्य ३.१.श्यामल सुमन ३.२.दिनेश रसिया-हम पत्रकार २.उमेश पासवान ३.३.जवाहरलाल कश्यप ३.४.ओमप्रकाश झा ३.५.जगदीश प्रसाद मण्डल ३.६.रामवि‍लास साहु ३.७.चंदन कुमार झा ३.८.नवीन कुमार ‘‘आशा’’-गर्भक आवाज ४. मिथिला कला-संगीत१.राजनाथ मिश्र (चित्रमय मिथिला) २. उमेश मण्डल (मिथिलाक वनस्पति/ मिथिलाक जीव-जन्तु/ मिथिलाक जिनगी) ५. गद्य-पद्य भारती:१.नित्यानंद गायेन केर दूटा हिंदी कविताक मैथिली अनुवाद अनुवाद कर्ता आशीष अनचिन्हार २.प्रस्तुत अछि कुरानक मैथिली अनुवाद आशीष अनचिन्हार)३.“भरनापर रग्घू”- श्री काशीनाथ सिंह (हिन्दीसँ मैथिली अनुवाद श्री विनीत उत्पल) ४.असगर वजाहत- हम हिन्दू छी हिन्दी कथाक मैथिली रूपान्तरण विनीत उत्पल द्वारा- ६.बालानां कृते-१.जगदीश प्रसाद मण्‍डलक एकटा बाल कथा ‘एकोटा ने’ २.चंदन कुमार झा- बाल गजल ७. भाषापाक रचना-लेखन -[मानक मैथिली], [विदेहक मैथिली-अंग्रेजी आ अंग्रेजी मैथिली कोष (इंटरनेटपर पहिल बेर सर्च-डिक्शनरी) एम.एस. एस.क्यू.एल. सर्वर आधारित -Based on ms-sql server Maithili-English and English-Maithili Dictionary.] विदेह ई-पत्रिकाक सभटा पुरान अंक ( ब्रेल, तिरहुता आ देवनागरी मे ) पी.डी.एफ. डाउनलोडक लेल नीचाँक लिंकपर उपलब्ध अछि। All the old issues of Videha e journal ( in Braille, Tirhuta and Devanagari versions ) are available for pdf download at the following link. विदेह ई-पत्रिकाक सभटा पुरान अंक ब्रेल, तिरहुता आ देवनागरी रूपमे Videha e journal's all old issues in Braille Tirhuta and Devanagari versions विदेह ई-पत्रिकाक पहिल ५० अंक

विदेह ई-पत्रिकाक ५०म सँ आगाँक अंक विदेह आर.एस.एस.फीड। "विदेह" ई-पत्रिका ई-पत्रसँ प्राप्त करू। अपन मित्रकेँ विदेहक विषयमे सूचित करू। ↑ विदेह आर.एस.एस.फीड एनीमेटरकेँ अपन साइट/ ब्लॉगपर लगाऊ। ब्लॉग "लेआउट" पर "एड गाडजेट" मे "फीड" सेलेक्ट कए "फीड यू.आर.एल." मे http://www.videha.co.in/index.xml टाइप केलासँ सेहो विदेह फीड प्राप्त कए सकैत छी। गूगल रीडरमे पढ़बा लेल http://reader.google.com/ पर जा कऽ Add a  Subscription बटन क्लिक करू आ खाली स्थानमे http://www.videha.co.in/index.xml पेस्ट करू आ Add  बटन दबाउ। Join official Videha facebook group. Join Videha googlegroups विदेह रेडियो:मैथिली कथा-कविता आदिक पहिल पोडकास्ट साइट http://videha123radio.wordpress.com/ Videha Radio मैथिली देवनागरी वा मिथिलाक्षरमे नहि देखि/ लिखि पाबि रहल छी, (cannot see/write Maithili in Devanagari/ Mithilakshara follow links below or contact at ggajendra@videha.com) तँ एहि हेतु नीचाँक लिंक सभ पर जाऊ। संगहि विदेहक स्तंभ मैथिली भाषापाक/ रचना लेखनक नव-पुरान अंक पढ़ू। http://devanaagarii.net/ http://kaulonline.com/uninagari/  (एतए बॉक्समे ऑनलाइन देवनागरी टाइप करू, बॉक्ससँ कॉपी करू आ वर्ड डॉक्युमेन्टमे पेस्ट कए वर्ड फाइलकेँ सेव करू। विशेष जानकारीक लेल ggajendra@videha.com पर सम्पर्क करू।)(Use Firefox 4.0 (from WWW.MOZILLA.COM )/ Opera/ Safari/ Internet Explorer 8.0/ Flock 2.0/ Google Chrome for best view of 'Videha' Maithili e-journal at http://www.videha.co.in/ .) Go to the link below for download of old issues of VIDEHA Maithili e magazine in .pdf format and Maithili Audio/ Video/ Book/ paintings/ photo files. विदेहक पुरान अंक आ ऑडियो/ वीडियो/ पोथी/ चित्रकला/ फोटो सभक फाइल सभ (उच्चारण, बड़ सुख सार आ दूर्वाक्षत मंत्र सहित) डाउनलोड करबाक हेतु नीचाँक लिंक पर जाऊ। VIDEHA ARCHIVE विदेह आर्काइव भारतीय डाक विभाग द्वारा जारी कवि, नाटककार आ धर्मशास्त्री विद्यापतिक स्टाम्प। भारत आ नेपालक माटिमे पसरल मिथिलाक धरती प्राचीन कालहिसँ महान पुरुष ओ महिला लोकनिक कर्मभमि रहल अछि। मिथिलाक महान पुरुष ओ महिला लोकनिक चित्र 'मिथिला रत्न' मे देखू। गौरी-शंकरक पालवंश कालक मूर्त्ति, एहिमे मिथिलाक्षरमे (१२०० वर्ष पूर्वक) अभिलेख अंकित अछि। मिथिलाक भारत आ नेपालक माटिमे पसरल एहि तरहक अन्यान्य प्राचीन आ नव स्थापत्य, चित्र, अभिलेख आ मूर्त्तिकलाक़ हेतु देखू 'मिथिलाक खोज' मिथिला, मैथिल आ मैथिलीसँ सम्बन्धित सूचना, सम्पर्क, अन्वेषण संगहि विदेहक सर्च-इंजन आ न्यूज सर्विस आ मिथिला, मैथिल आ मैथिलीसँ सम्बन्धित वेबसाइट सभक समग्र संकलनक लेल देखू "विदेह सूचना संपर्क अन्वेषण" विदेह जालवृत्तक डिसकसन फोरमपर जाऊ। "मैथिल आर मिथिला" (मैथिलीक सभसँ लोकप्रिय जालवृत्त) पर जाऊ। ऐ बेर मूल पुरस्कार(२०१२) [साहित्य अकादेमी, दिल्ली]क लेल अहाँक नजरिमे कोन मूल मैथिली पोथी उपयुक्त अछि ? Thank you for voting! श्री राजदेव मण्डलक “अम्बरा” (कविता-संग्रह)  13.44% श्री बेचन ठाकुरक “बेटीक अपमान आ छीनरदेवी”(दूटा नाटक)  9.84% श्रीमती आशा मिश्रक “उचाट” (उपन्यास)  6.56% श्रीमती पन्ना झाक “अनुभूति” (कथा संग्रह)  5.25% श्री उदय नारायण सिंह “नचिकेता”क “नो एण्ट्री:मा प्रविश (नाटक)  5.9% श्री सुभाष चन्द्र यादवक “बनैत बिगड़ैत” (कथा-संग्रह)  5.25% श्रीमती वीणा कर्ण- भावनाक अस्थिपंजर (कविता संग्रह)  5.57% श्रीमती शेफालिका वर्माक “किस्त-किस्त जीवन (आत्मकथा)  7.87% श्रीमती विभा रानीक “भाग रौ आ बलचन्दा” (दूटा नाटक)  7.21% श्री महाप्रकाश-संग समय के (कविता संग्रह)  5.9% श्री तारानन्द वियोगी- प्रलय रहस्य (कविता-संग्रह)  5.57% श्री महेन्द्र मलंगियाक “छुतहा घैल” (नाटक)  7.21% श्रीमती नीता झाक “देश-काल” (कथा-संग्रह)  6.56% श्री सियाराम झा "सरस"क थोड़े आगि थोड़े पानि (गजल संग्रह)  6.89% Other:  0.98% ऐ बेर बाल साहित्य पुरस्कार(२०१२) [साहित्य अकादेमी, दिल्ली]क लेल अहाँक नजरिमे कोन मूल मैथिली पोथी उपयुक्त अछि ? श्री जगदीश प्रसाद मण्डल जीक “तरेगन”(बाल-प्रेरक कथा संग्रह)  50% श्री जीवकांत - खिखिरक बिअरि  25% श्री मुरलीधर झाक “पिलपिलहा गाछ  23.44% Other:  1.56% ऐ बेर युवा पुरस्कार(२०१२)[साहित्य अकादेमी, दिल्ली]क लेल अहाँक नजरिमे कोन कोन लेखक उपयुक्त छथि ? Thank you for voting! श्रीमती ज्योति सुनीत चौधरीक “अर्चिस” (कविता संग्रह)  24.04% श्री विनीत उत्पलक “हम पुछैत छी” (कविता संग्रह)  6.73% श्रीमती कामिनीक “समयसँ सम्वाद करैत”, (कविता संग्रह)  6.73% श्री प्रवीण काश्यपक “विषदन्ती वरमाल कालक रति” (कविता संग्रह)  4.81% श्री आशीष अनचिन्हारक "अनचिन्हार आखर"(गजल संग्रह)  25% श्री अरुणाभ सौरभक “एतबे टा नहि” (कविता संग्रह)  6.73% श्री दिलीप कुमार झा "लूटन"क जगले रहबै (कविता संग्रह)  6.73% श्री आदि यायावरक “भोथर पेंसिलसँ लिखल” (कथा संग्रह)  4.81% श्री उमेश मण्डलक “निश्तुकी” (कविता संग्रह)  12.5% Other:  1.92% ऐ बेर अनुवाद पुरस्कार (२०१३) [साहित्य अकादेमी, दिल्ली]क लेल अहाँक नजरिमे के उपयुक्त छथि? Thank you for voting! श्री नरेश कुमार विकल "ययाति" (मराठी उपन्यास श्री विष्णु सखाराम खाण्डेकर)  34.52% श्री महेन्द्र नारायण राम "कार्मेलीन" (कोंकणी उपन्यास श्री दामोदर मावजो)  13.1% श्री देवेन्द्र झा "अनुभव"(बांग्ला उपन्यास श्री दिव्येन्दु पालित)  11.9% श्रीमती मेनका मल्लिक "देश आ अन्य कविता सभ" (नेपालीक अनुवाद मूल- रेमिका थापा)  14.29% श्री कृष्ण कुमार कश्यप आ श्रीमती शशिबाला- मैथिली गीतगोविन्द ( जयदेव संस्कृत)  11.9% श्री रामनारायण सिंह "मलाहिन" (श्री तकषी शिवशंकर पिल्लैक मलयाली उपन्यास)  13.1% Other:  1.19% फेलो पुरस्कार-समग्र योगदान २०१२-१३ : समानान्तर साहित्य अकादेमी, दिल्ली Thank you for voting! श्री राजनन्दन लाल दास  54.69% श्री डॉ. अमरेन्द्र  21.88% श्री चन्द्रभानु सिंह  21.88% Other:  1.56% 1.संपादकीय १ ३० अप्रैल २०१२ केँ जानकी नवमीक अवसरपर जनकपुरक रामानन्द चौकपर १५० गोटे जखन मिथिला राज्य लेल धरणापर रहथि, तखने एकटा हाले-फिलहालमे जनमल एकटा मधेशी दल द्वारा कएल बम विस्फोट, जे एकटा क्रिमिनल एक्ट मात्र अछि, मे पाँच गोटे शहीद भऽ गेला आ तीससँ बेशी गोटे घायल छथि। मृतकमे मिथिला नाट्यकला परिषद (मिनाप)क कलाकार ३२ वर्षीया रंजू झा, झगड़ू मण्डल, बिमल चरण, सुरेश उपाध्याय आ दीपेन्द्र दास छथि। जँ हिनकर सभक बलिदानकेँ मोन राखल जाए तखने ओ श्रद्धांजलि भऽ सकत। २ जगदीश प्रसाद मण्डल- एकटा बायोग्राफी...गजेन्द्र ठाकुर द्वारा ........शीघ्र

आगू-

जगदीश प्रसाद मण्डल पाँच-छह बर्खक रहथि तखनेसँ भाइक संग स्कू‍ल जाए लगला। गामेमे लोअर प्राइमरी स्कूल, दू पाली स्कूल चलैत छल। अखन तँ आठम धरि‍क पढ़ाइ हुअए लागल अछि‍ तहि‍ना एक शि‍क्षकसँ चलैत स्कूल सेहो सतरह शि‍क्षक धरि‍ पहुँचि‍ गेल अछि‍। तँए कि‍ शि‍क्षा अगुआ गेल? जि‍नगीक लेल सर्वांगीन वि‍कास अनि‍वार्य अछि‍ जँ से नै तँ ओ अकलांग-वि‍कलांग भेल पड़ल रहत। सामान्य‍ स्कूल-कओलेज तँ ठाम-ठीम बनल मुदा तकनीकी शि‍क्षाक वि‍कास नै भेल। परि‍णाम बनि‍ गेल अछि‍ जे काजक दि‍शे बदलि‍ गेल अछि‍। खैर जे होउ, मुदा आजादीक पहि‍नौं आ पछाति‍यो बेरमा राजनीति‍क, शैक्षणि‍क दृष्टि‍सँ अगुआएल। आजादीक आन्दोलनमे बचनू मि‍श्र उभड़ला। नवानी वि‍द्यालयमे भनसि‍याक काज करैत रहथि‍। लि‍खनाइ तँ नै सीखि‍ भेलनि‍ मुदा वक्ता भऽ गेलाह। देशक प्रति‍ ओहन समर्पित जे आजादीक दौड़मे तीन मास धरि‍ भट्टे-बैगन बि‍ना नूनक, उसनि‍-उसनि‍ खा दि‍न-राति‍ काज करैत रहलाह, आन्दोलन गाम-गाम पकड़नहि‍ रहए। काजेसँ इमानदारी सेहो अबै छै। १९३४ ई.क भूमकमक पछाति‍ राशनक जे बँटवारा हुअए लागल, तइमे एतेक इमानदारीक परि‍चय मधेपुर थानामे देलनि‍ जे समाजक सभ हुनका गाँधीजी कहए लगलनि‍। तइ संग आरो-आरो रहथि‍। बेरमा पंचायत बनबैमे हुनकर योगदान बहुत रहलनि‍। जनसंख्याक हि‍साबसँ, ओइ समयक पंचायतक हि‍साबसँ, बेरमा छोट पड़ैत रहए। सामाजि‍क बुनाबटि‍ एहेन जे गाम-गामक बीच अपन-अपन संबंध। तँए के केकरा संग रहत, ई समस्या। मुदा दीप गामक नेतृत्वोक सहयोगसँ, जे अपन पंचायत काटि‍ पंचायत बनबैमे सहयोग केलथि‍, पंचायत बनल।

पछाति‍ बचनू मि‍श्रक दि‍माग गड़बड़ा गेलनि‍। ओना अस्सीसँ ऊपर बर्खक उमेरमे मुइलाह मुदा प्रभाव कमि‍ गेलनि‍। ब्रेन प्रभावि‍त होइक कारण दूटा भेलनि‍। पहि‍ल पारि‍वारि‍क आर्थिक स्थि‍ति‍ आ दोसर राजनीति‍क क्षेत्रमे इमानदारीक अभाव। मुदा अंत-अंत धरि‍ समाजकेँ जगबैत रहलाह। जहि‍ना राजनीति‍क दृष्टि‍सँ बेरमा गाम जागल तहि‍ना शैक्षणि‍क दृष्टिस‍सँ सेहो ई गाम अगुआएल रहल अछि‍। गाममे स्कूल कहि‍या बनल, एकर नि‍श्चि‍त ति‍थि‍क जानकारी तँ नै मुदा १९३४ ई. क भूमकममे वि‍द्यालयक भीत खसल, ई जानकारीमे अछि‍। मुदा वि‍द्यालयक जगह बदलि‍ गेल। कि‍एक तँ ओइ जगहकेँ जनमानस अशुभ बुझए लागल। ओना ओ स्थान गामक ब्रह्म स्थान छी, शक्ति्‍शाली जगह। अखन ओइ स्थानमे बाल-बोधक आंगनबारी चलि‍ रहल अछि‍। ओइठामसँ वि‍द्यालय उठि‍ लछमीकान्त, रमाकान्त साहुक कचहरीमे चलि‍ आएल। शुरूमे लकड़ीक खुट्टापर बाँसेक घर रहै, मुदा पछाति‍ कचहरी नि‍च्चा सि‍मटी ईंटा ऊपर खढ़क घर बनौलनि‍। ओइ कचहरीमे १९५२ ई.क पहि‍ल चुनावक केन्द्र सेहो बनल।

अखन वि‍द्यालय तेसर स्थानपर अछि‍। जे जगह सरि‍सव-पाहीक प्रो. हेतुकर झाक छि‍यनि‍। ओना ओ रजस्ट्री करैले तैयार भेल छथि‍ मुदा जमीन्दारीक तेहेन ओझरौठमे पड़ल अछि‍ जे हुनका लि‍खले ने होइ छन्हि‍‍! बुढ़ि‍या गाछीक नाओं जमीनक पड़ि‍ गेल अछि‍। सम्प्रति‍ पंचायत भवन, आठमा धरि‍क स्कूल, खंडहर रूपमे अस्पतालक घर आ भव्य दुर्गास्थान सेहो अछि‍।

अठारहम शताब्दीक पूर्वार्द्धमे एकहरे खड़का मूलक परि‍वारमे पं. कंचन झा आ पं. बबुए झा वैदि‍क भेलाह। ओना ओइ समैमे अंग्रेजी शि‍क्षाक प्रचार-प्रसार नै भेल छल, मुदा संस्कृत शि‍क्षाक स्वर्णिम युग अवस्स छल। स्वर्णिम ऐ लेल जे सामाजि‍क ढाँचा, कि‍छु बि‍च्छृंखला छोड़ि‍, वैदि‍क पद्धति‍सँ चलैत छल। आस्ते-आस्ते बि‍च्छृंखला बढ़ि‍ते गेल। पछाति‍ अंग्रेजी शि‍क्षाक प्रभाव सेहो खूब पड़ल। पं. कंचन झाक बालक पं. भुटाइ झा प्रसिद्ध गेठरी झा ख्याति‍ प्राप्त वैदि‍क भेलाह। दरभंगा राजसँ सात सए बीघा जमीन लाखेराज ब्रह्मोत्तर रूपमे भेटल छलनि‍। ओइ समैमे कि‍नको ताधरि‍ पंडि‍तक बीच स्थान नै भेटनि‍ जाधरि‍ ओ काशीसँ पढ़ि‍ नै अबैत छलाह। पं. चि‍त्रधर ठाकुर हुनके घरक भगि‍नमान परि‍वार। पंडि‍त चि‍त्रधर ठाकुरकेँ तीन बालक, पं. जयनाथ ठाकुर, पं. तेजनाथ ठाकुर आ पं. खर्गनाथ ठाकुर। तीनू पंडि‍त मुदा जेठका भाय खेती करैत कि‍सान बनि‍ गेलाह आ बाकी दुनू भाँइ पं. तेजनाथ ठाकुर आ पं. खर्गनाथ ठाकुर काशीसँ पढ़ि‍ एलाह। उच्चचकोटि‍क श्रेणीमे गि‍नती छलनि‍। पंडि‍त तेजनाथ ठाकुर जीवन-पर्यन्त लोहना संस्कृत वि‍द्यालयमे सेवा देलनि‍। तेकर पछाति‍ परि‍वारमे पं. गौरीनाथ ठाकुर, अनि‍रूद्ध ठाकुर आ सुन्दर ठाकुर भेलखि‍न। शरीरसँ अबाह रहने पं. सुन्दर ठाकुर वैद्यक रूपमे गामेमे वैद्यगि‍री करैत रहलाह। पं. अनि‍रूद्ध ठाकुर व्याकरणक पंडि‍त। सीतामढ़ी जि‍लाक वि‍द्यालयमे जि‍नगी भरि‍ सेवा देलनि‍। अखन धरि दुइये परि‍वारक चर्च भेल अछि‍ मुदा एतबे नै अछि‍। पं. कामेश्वर झा, जे खगड़ि‍या वि‍द्यालयक संग दीप महावि‍द्यालयमे सेहो सेवा देलनि‍। वेद-व्याकरणक प्रकाण्ड पंडि‍त छलाह। पंडि‍त चण्डेश्वर झा अरड़ि‍या मध्य वि‍द्यालयक संस्थापि‍त शि‍क्षक बनि‍ अधवयसेमे मरि‍ गेलाह।

पंडि‍त उपेन्द्र मि‍श्र सभसँ भि‍न्न छलाह। एक संग ज्योति‍ष, वेद व्याकरण, साहि‍त्यक वि‍शेष ज्ञाता छलाह। कतेको महावि‍द्यालयमे सेवा दैत शरीर ति‍याग केलनि‍। सभसँ भि‍न्न ओ ऐ अर्थमे छलाह जे कोनो महावि‍द्यालयमे अधि‍क दि‍न नै टि‍क पबैत छलाह। सालक भीतरे कि‍छु ने कि‍छु खटपट भइये जाइत छलनि‍। जखने खटपट होइत छलनि‍, सोझे घरमुँह वि‍दा भऽ जाइत छलाह। मुदा गामो एलापर केकरो कि‍छु कहैत नै छलखि‍न। कि‍यो पुछबो ने करनि‍ जे ओहि‍ना एलौं आकि‍ झगड़ा-दान कऽ कऽ एलौं। अद्भुत गुण छलनि‍ जे अपने-आप वि‍मर्श करैत, समए संग अपन कर्त्तव्यकेँ छुटैत देखि‍ दोसर महावि‍द्यालय दि‍सि‍ वि‍दा होइत छलाह। खराम छोड़ि‍ पएरमे कहि‍यो जूत्ता-चप्पल नै पहिरलनि‍। परोपट्टाक वि‍द्वानक बीच अपन पहि‍चान छलनि‍, जइसँ कोनो वि‍द्यालय, महावि‍द्यालयमे स्वागत रहैत छलनि‍। पंडि‍त उदि‍त नारायण झा, जे गोल्ड‍सँ सम्मानि‍त छलाह, शि‍क्षण कार्य छोड़ि‍ दोकानदारी व्यववसाय केँ अपन जीवि‍का बनौलनि‍। परि‍वारक स्थिति‍ खराब छलनि‍। बि‍नु उपारजने चलैबला नै छलनि‍। मुदा कि‍छुए दि‍नक मेहनति‍क फल नीक भेटि‍लनि‍। जीवन-यापन करैत बीस बीघा जमीन परि‍वारमे बनौलनि‍। पं. रामनारायण झा व्याकरणक ज्ञाता छलाह। शरीरसँ पुष्ट‍ रहने शुरूमे पुलि‍सक नोकरी शुरू केलनि‍, मुदा वि‍देशी शासनक उठैत वि‍रोधमे नोकरी छोड़ि‍ शि‍क्षण कार्यमे चलि‍ एलाह। बेसि‍क स्कूल घोघरडि‍हामे प्रवासी जीक संग रहि‍ सेवा देलनि‍।

गामक स्कूलसँ १९५६ ई.मे जगदीश प्रसाद मण्डल नि‍कलला। गामसँ सटले पूब कछुबीमे मि‍ड्ल स्कूल बनि‍ गेल छल। तइसँ पहि‍ने पाँचमा धरि‍क स्कूल छल। मि‍ड्ल स्कूल अलग बनल। ओना अखन दुनू मि‍लि‍ एक भऽ गेल अछि‍ मुदा पहि‍ने दुनू अलग-अलग छल। पाँचमा धरि‍ फीस नै लगैत छल मुदा छठा-सातमामे अढाइ रूपैआ महीना फीस लगैत छल। १९६० ईं.मे मि‍ड्ल स्कूलसँ नि‍कलि‍ केजरीबाल हाइस्कूल झंझारपुरमे नाओं लि‍खेलनि। बेरमाक वि‍द्यार्थी तमुरि‍यामे हाइ स्कूल आ झंझारपुरो हाइ स्कूलमे साले-साल वि‍भाजित होइत रहैत छल। कारणो रहै। जइ रूपक शि‍क्षकक टीम झंझारपुरमे छल ओइ तरहक टीम तमुरि‍यामे नै छल। तमुरि‍या हाइ स्कूलमे एक-आध शि‍क्षक साले-साल जाइत-अबैत छलाह जखन कि‍ झंझारपुरमे से नै छल, जइसँ झंझारपुरकेँ नीक मानल जाइत छल। जहि‍ना गामक आन-आन वि‍द्यार्थी पएरे जाइत-अबैत छलाह तहि‍ना ईहो जाइत-अबैत छला। कि‍छु गोटे होस्टलोमे रहैत छला। सालो भरि‍ कि‍छु नै कि‍छु असुवि‍धा रहि‍ते छलनि। ओना अखनो कि‍छु-कि‍छु छन्हिये। सालो भरि‍ ऐ तरहेँ रहै छल।

अगहनसँ माघ धरि‍ दि‍नो छोट होइए, मुदा वि‍द्यालयक समए छोट नै होइत छल। काजक अनुकूल समए भेटने दि‍न-राति‍मे अन्तर भलहिं नै बूझि‍ पड़ैत छै, मुदा गाम-घरक लेल तँ ई कठि‍न अछि‍ये। मौसमी छुट्टीक नाओंपर दिसम्बरमे बड़ा दि‍नक छुट्टी आठ-दस दि‍न होइत छल, जे परीक्षापरान्तक आ रि‍जल्टसँ पूर्व होइत छल।

गरमि‍यो मासमे असुवि‍धा तँ तहि‍ना मुदा ओ असुविधा दोसर तरहक होइत छल। ओना एकरा आम खाइक छुट्टी सेहो कहल जाइ छै मुदा ग्रीष्मावकासक नाओं सेहो छै। नमगर छुट्टी, मास दि‍नक होइत छल। नीक परि‍वारक वि‍द्यार्थीकेँ अनुकूल वातावरण रहने दोहरी लाभ होइत छलनि‍, साधारण परि‍वारक वि‍द्यार्थी आम खाइत-खाइत आधा-छि‍धा बि‍सरि‍ जाइत छला। शैक्षणि‍क वातावरण स्पष्ट रूपमे वि‍भाजि‍त भऽ जाइत छल। जहि‍ना जाड़क मास बरेड़ी छुबैत अछि तहि‍ना गरमि‍यो गाछक फुनगी छुबैत अछि‍। जइसँ अप्रील माने चैत सँ ताधरि‍ वि‍द्यालय भि‍नसुरका होइत छल जाधरि‍ गर्मी छुट्टी नै भऽ जाइत छल। तमुरि‍या हाइ स्कूल आ झंझारपुर हाइ स्कूलमे इहो अंतर छल जे आधा घंटा आगू-पाछू खुजबो करैत छल आ बन्नो होइत छल। कारणो छलैक कमला पछि‍मक गाम मेंहथ, नरूआर आदि‍सँ लऽ कऽ पूबमे बेरमा धरि‍ आ गंगापुर खरबाइरसँ लऽ कऽ अलपुरा-अरड़ि‍या धरि‍क वि‍द्यार्थी झंझारपुरमे पढ़ैत छलाह। नमहर क्षेत्र तँए वि‍लम्बसँ स्कूल खुलैत छल। साढ़े एगारह बजे वि‍द्यालयमे छुट्टी होइत रहए। तखन पान-सात मील पएरे चलब कठि‍न छल। ओना ई बड़ कठि‍न नै कि‍एक तँ बेरमाक वि‍द्यार्थी पएरे चलि‍ लोहनो वि‍द्यालयसँ पढ़ने छलाह। तहि‍ना बर्खा मासमे सेहो होइत छल। कखन पानि‍-वि‍हाड़ि‍ आबि‍ जाए, तेकर कोनो ठीक नै। तहूमे कतेकाल बरि‍सत तेकरो ठेकान नै। खैर जे हो.....। केजरीवाल हाइ स्कूल झंझारपुरमे १९६३ ई.मे हायर सेकेण्ड्रीक पढ़ाइ शुरू भेल। मुदा थोड़े पेंच लागि‍ गेलै। कला-विज्ञान आ वाणि‍ज्य तीनूक पढ़ाइ होइत छलैक। कला-वि‍ज्ञानक मंजूरी भेटि‍ गेल, वाणिज्यक भेटबे ने कएल। कते रंगक हवा बहए लागल। ओना शि‍क्षकमे बढ़ोत्तरी पछाति‍ भेल मुदा शुरूमे असुवि‍धा रहल। १९५८ ई.मे जनता कओलेज खुजल। जन-सहयोगसँ कओलेज खुजल। मुदा कओलेजक जे नमगर-चौड़गर घर चाही, जे धड़फड़मे नै भेलै तँए हाइये स्कूलमे साधारण रूपे पढ़ाइ शुरू भेल। कि‍छु गनल चुनल विषयक पढ़ाइ शुरू भेल। खएर जे भेल मुदा शि‍क्षामे नव जागरण क्षेत्रमे आएल। बहुतोक मनक मुराद पूरा होइक संभावना बढ़ल। बी.ए. तकक पढ़ाइ लगमे हएत, तखन पढ़ैबला बच्चा आ पढ़बैबला गारजनक मनमे कि‍अए ने उत्साह जगतनि‍। कि‍छु दि‍नक पछाति‍ कओलेजक अपन कँचका ईंटा आ खपड़ाक मकान बनलै।

जगदीश प्रसाद मण्डल १९६५ ई.मे हायर सेकेण्ड्री पास केलापर बी.ए. पार्ट वनमे नाओं लि‍खेलनि। पहि‍ने दू बर्खक आइ.ए. आ दू बर्खक बी.ए. प्री हुअए लगलैक। दुनू दि‍ससँ वि‍द्यार्थीक प्रवेश हुअए लागल। बी.ए. पार्ट वन केलापर आनर्स पढ़ैक वि‍चार भेलनि। आ आन कओलेजमे आनर्सक पढ़ाइ होइत छल। जनता कओलेजमे नै होइत छल। एक-दू-तीन शि‍क्षकसँ अधि‍क कोनो वि‍षयमे शि‍क्षक नै छल। हि‍न्दी वि‍भागमे सेहो दुइये गोटे छलाह। प्राइवेट रूपमे तैयारी करए लगला। सी.एम. कओलेजक नाओंसँ फार्म भराएल आ परीक्षो भेल। १९५२ ईं.क चुनावक बाद देशक अपन वि‍धि‍वत् सरकार बनल। मुदा एक संग कतेको प्रश्न उठि‍ कऽ ठाढ़ भऽ गेल। सरकारी कार्यलयमे कर्मचारीक जरूरति‍ भेल। जेकर बहालीमे जाति‍वाद आ पैरवी-पैगाम शुरू भेल। आम जनताक जगाएल सरकार जनतासँ बहुत दूर हटि‍ गेल। ओना जे कोनो नव-स्वतंत्र देशक स्थि‍ति‍ होइए तहि‍ना अपनो ऐठाम रहए। मुदा ओइ लेल जत्ते सकारात्मक सोच आ काजक औसत हेबाक चाहि‍ये से नै भेल। सामंती सोच आ सामंत मजगूत छल, जइसँ आम-अवामक बीच आक्रोश पनपए लगलै। राजा-रजबाड़े जकाँ शासन पद्धति‍ चलए लागल। तही बीच भूदान आन्दोलनक उदय सेहो भेल। ओना तेलांगनासँ शुरू भेल भूमि‍ आन्दोलन देशकेँ डोला देने छल। तइ संग केरल, बंगालक संग छि‍टफुट अनेको राज्यमे भूमि‍ आन्दोलन पकड़ि‍ रहल छल। दरभंगा जि‍लामे सेहो भूमि‍ आन्दोलन शुरू भेल। १९५७ ई.क चुनावमे कांग्रेस सरकारक स्थिति‍ कमजोर भेल। केरलमे वामपंथी सरकार बनि‍ गेल। आजादीक दौड़क जे जागरण छल ओे ताजा छल, जइसँ अखुनका जकाँ नै छल। ऐ बीच गोटि‍-पङरा हाइ स्कूल, कओलेज, प्राइवेट रूपमे बनए लागल छल। मुदा औसत कम रहल। खादी भंडार उद्योगक ह्रास होइत गेल आ होइत-होइत ई मेटा जकाँ गेल। तहि‍ना नगदी पैदावारमे कुशि‍यार सेहो छल, जे उद्योगपति‍क चलैत सेहो मरए लागल।

मि‍थि‍लांचलमे मूलत: जीवि‍काक साधन कृषि‍ छल। ओना सघन रूपमे कृषिक‍ पैघ साधन जीवि‍काक छी, मुदा से नै छल। जेहो छल तहूमे रंग-बि‍रंगक छल-प्रपंच चलि‍ रहल छल। बटाइ खेतीमे अधि‍या उपज उपजौनि‍हारकेँ भेटैत छलैक। जखन कि‍ उपजबैमे, खेती करैमे कि‍छुए अन्नक खेती लाभप्रद छल। उपजाक अनुपातमे लागत खर्च किछुमे कम छल आ कि‍छुमे अधि‍क। जइमे अधि‍क छल ओइमे बटेदारकेँ घाटा लगैत छलैक। तइ संग रौदी-दाहीक प्रभाव ओहन कि‍सानपर सेहो पड़ैत छल जे खेती करैत छलाह। जे बेसी खेतबला छलाह हुनकर खेती अधि‍कतर बटाइक माध्यमसँ चलैत छल। तइ संग अधि‍क अन्न रहने अन्नक महाजनि‍यो चलैत छलनि‍। महाजनि‍योक प्रथा गाम-गामक फुट-फुट कोनो गाममे सवाइ (एक मोनक सवा मोन, एक सीजि‍नक) तँ कोनो गाममे एगारही (आठ पसेरीक मोन, एक मोनक एगारह पसेरी) तँ कोनो गाममे डेढ़ि‍या (एक मोनक बारह पसेरी)। जेकर मतलब भेल जे एक मोनक आधा मोन सूदि‍ये भेल। तइ संग इहो होइत छल जे जँ सालक कर्ज सालमे चुकाएल जाइत छल, आ ने तँ सूदो मूड़े बनि‍ जाइत छलैक। जइसँ दू साल बितैत-बितैत कर्ज दोबरा जाइत छलै। अखुनका जकाँ बि‍आह तँ तते भारी नै छल मुदा माए-बापक सराधमे सामाजि‍क आ जातीय एहेन चाप छल जे खेत-पथार बेचि‍ काज चलैत छल। खेतक हि‍साबसँ चारि‍-पाँच मेलक कि‍सान छलाह। गामक-गाम एक-एक गोटेक छलनि‍। जखने एकठाम जमीन समटाएल रहत तखन दोसर-तेसरक की आ कते हेतनि‍? खेतमे काज करैबला बोनि‍हारोक स्थिति‍ बदसँ बदतर छल। एक तँ दि‍न भरि‍क बोनि‍ कम तहूमे सालक गनल दि‍न काज होइत। कि‍सानोक बीच खेतीक नव वैज्ञानि‍क खेतीक पद्धति‍क अभाव छलनि‍। अभावोक कारण छल जे ने सरकारक धि‍यान खेती दि‍स छल आ ने खेतीक साधन उपलब्ध छल। त्रेता युगक जनकक हर जकाँ खेत जोतैक हर होइत छल! जहि‍ना मरि‍आएल बड़द तहि‍ना जोति‍नि‍हार। तइ संग खेत पटबैक पानि‍क कोनो दोसर बेवस्था नै। जहि‍या पानि‍ हएत तहि‍या खेती शुरू हएत। जइसँ बेसमए खेती होइत छल। पोखरि‍-झाँखड़ि‍मे अनेरूआ माछ जे होइ, सएह माछ पोसब कहाइत छल। तहि‍ना तीमनो-तरकारी आ फलो-फलहरीक हाल छल। मोटा-मोटी कृषि‍क ओहन दशा बनि‍ गेल छल जइपर जीवन यापन करब कठि‍न भऽ गेल छल।

पशुपालनक रूपमे गाए-महींस बकरी पोसब मात्र चलैत छल। गाए-महींस पोसैक बीच, महाजनीक एहेन सूत्र लागल छल जे पोसि‍नि‍हार सिर्फ पोसैत छलाह। एक तँ नस्ल पछुआएल रहने पछुआएल कारोबार दोसर एहेन जालमे ओझराएल जे धीरे-धीरे कमि‍ते गेल जे बढ़ैक कोनो संभावना नै रहल। नगदी फसि‍लक रूपमे कुशि‍यार आ पटुआक खेती छल। मुदा उद्योगपति‍क कारामातसँ ओहो दुनू कमजोरे होइत गेल। मुदा सरकारक प्रति‍ जन-आक्रोश बढ़ल। गाम-घरक लोक सरकारी लाभक माने बुझैत छल मात्र कोटाक वस्तु धरि‍। सेहो रस्ते-पेरे लुटाइत छल।

१९६७ ई.क चुनाव आएल। जगदीश प्रसाद मण्डल बी.ए.क वि‍द्यार्थी रहथि। आजादीक पछाति‍ पहि‍ल जन-जागरण छल। पढ़लो-लि‍खल आ वि‍द्यार्थियो मैदानमे उतरल।

सन् सैंतालीस...

भारतक स्वतंत्रताक त्रिवार्णिक झण्डा फहरा रहल छल।

मुदा कम्यूनिस्ट पार्टीक माननाइ छल जे भारत स्वतंत्र नै भेल अछि।

असली स्वतंत्रता भेटब बाँकी छै...

मिथिलाक एकटा गाम…

जन्म होइत अछि एकटा बच्चाक.. ओही बर्ख ...

ओइ स्वतंत्र वा स्वतंत्र नै भेल भारतमे...

पिताक मृत्यु...गरीबी..

केस मोकदमा...

वंचितक लेल संघर्षमे भेटलै स्वतंत्र भारतक वा स्वतंत्र नै भेल भारतक जेल....

आइ बेरमामे पाँच-दस बीघासँ पैघ जोत ककरो नै..

ओइ गाम मे आइ जीवित अछि आइयो किसानी आत्मनिर्भर संस्कृति...

पुरोहितवादपर ब्राह्मणवादक एकछत्र राज्यक जतऽ भेल समाप्ति..

संघर्षक समाप्तिक बाद जिनकर लेखन मैथिली साहित्यमे आनि देलक पुनर्जागरण...

जगदीश प्रसाद मण्डल- एकटा बायोग्राफी...गजेन्द्र ठाकुर द्वारा ........शीघ्र जारी................................. ३ समानान्तर परम्पराक विद्यापति आ पाग विद्यापतिक संस्कृत ग्रन्थमे ठक्कुर विद्यापति कृता लिखल अछि/ आ ओ विद्यापति ब्राह्मण छथि। हमर उद्देश्य मैथिली बला विद्यापतिसँ अछि... जै सम्बन्धमे हम चर्चा केलौं जे हुनका किए पाग पहिरा कऽ "हम्मर विद्यापति" बना लेल गेल... ई तखन नै भेल जखन बिदापत नाचक माध्यमसँ आठ सए बर्ख गएर ब्राह्मण समुदाय विद्यापतिकेँ जिएने रखलक, मुदा तखन भेल जखन बंगाल विद्यापति केँ आ गोविन्ददासकेँ अपन बना लेलक आ बंगालेक विद्वान राजकृष्ण मुखोपाध्याय सर्वप्रथम कहलन्हि जे विद्यापति मिथिलाक भाषाक कवि छथि आ बंगालेक नगेन्द्रनाथ गुप्त सर्वप्रथम कहलन्हि जे गोविन्ददास सेहो  मिथिलाक भाषाक कवि छथि आ जखन ई तथ्य सोझाँ उठल तँ पहिने तँ सगर बंगाल हुनकापर मार-मार कऽ उठल आ बादमे मानि गेल। फेर मिथिलाक विद्वानकेँ सोह एलन्हि आ विद्यापतिक संस्कृत ग्रन्थ, गोविन्ददास नाम्ना आ विद्यापति नाम्ना पञ्जीमे उपलब्ध विवरण दऽ विद्यापति ठाकुर आ गोविन्ददास झा (!!!) निकालल गेल- रमानाथ झाक पञ्जीक सतही ज्ञान आ सीमित दृष्टिकोण नोकसान पहुँचेलक। फेर अनचोक्के पाग पहिरा कऽ विद्यापति (मैथिली बला, संस्कृत बला नै) केँ "हम्मर विद्यापति" ब्राह्मण वर्ग द्वारा बना लेल गेल। किछु गोटे ज्योतिरीश्वरक भातिज कहि विद्यापतिकेँ सम्बोधित करऽ लगलाह!! मुदा कवीश्वर ज्योतिरीश्वर सन बहुत रास कवि पज्जीमे उपलब्ध छथि। आ जे नामक अन्तर विद्यापतिमे आबि जाइ छन्हि (जखन कि सभ काज प्लानिंगसँ भेलै तैयो एकटा सबूत बचि गेलै) से ज्योतिरीश्वरमे किए नै अबैए। २. अहाँ बंगाल किए जाइ छी, पूर्णियाँमे ग्रामदेवताक पूजामे हम गेल छी आ राम ठाकुर (भगवान)केँ देवता रूपमे ढेपाबला खेतमे हम देखने छी, कियो जोति देने रहै। ३.मिथिलासँ छत्तीसगढ़ मध्य प्रदेशमे गेल रहथि, मध्य प्रदेशसँ राज्यसभा सांसद प्रभात झा कहि रहल छला, जे बरही (काष्ठकार) मिथिलासँ गेला तँ मैथिली भाषी हेबाक कारण लोक हुनका झाजी कहए लागल, आ ओ सभ आब झा टाइटिल रखै छथि, प्रभात झा कैंपेनिंग कऽ देलखिन्ह आ एक वोटसँ केण्डीडेट जीति गेलै। हमरा अहाँ सभकेँ ई अनुभव अछि जे कोनो टाइटिल हुअए पहिने, पटनो धरिमे लोक झाजी वा झौआ ओकरा कहि दै छै। बंगालक मालदह जिलामे ४-५ गाममे मैथिल ब्राह्मणक टाइटिल ओझा छै, आ अलीगढ़मे मैथिल ब्राह्म्ण (ब्रजस्थ मैथिल)क शर्मा। ४.पञ्जीमे कतेक विद्यापतिक विवरण उपलब्ध अछि: १.पनिचोभ सँ विद्यापतिसुत रमापतिक विवाह विद्यापतिक- माता(देवदासी)-दूषण पंजी २.महो केशवो सुत म.म.पाō गोविन्‍द सुता महो लक्ष्‍मीनाथ म.म. विद्यापति म.म. दामोदर ३.महामहो विद्यापति गंगोली सँ मानकुढ़ वासी कविराज गणेश्‍वर ४.घोसोतसँ म.म. गोविन्‍द सुता म. लक्ष्‍मीधर म.म. विद्यापति ५.राजपण्डित म.म. उ. विद्यापति ६.करमहासँ देवनाथ सुत कवि विद्यापति ७.गुणपति सन्‍तति-पठोङगी)।। विद्यापति-पुडरीक-मछदी। केशव-अमरावती।८.।। सिंहाश्रम सँविद्यापति द्दौo भागीरथ सुतौ कुलेश्‍वर: ९.सिधूक: ए सुता देल्‍हन विश्‍वनाथ श्रीनाथा: सिंहाश्रम सँ विद्यापति दौ।। १०.मिश्र जयदेव (७६/०६) सुता नगवाड़ घोसोत सँ महामहोपाध्‍याय विद्यापति दौ ११.महामहोपाध्‍याय गोविन्‍द सुता महामहो लक्ष्‍मीनाथा परनामक (२०९/०५) ठकरू मo मo उपाo विद्यापति १२.द्दौo।। एवम् ठo विद्यापति मातृक चक्रं।।१३.महोमहोपाध्‍याय विद्यापति सुता अनिरूद्ध अनन्‍त अच्‍युता: एकहरा सँ काशी दौ १४.सदुoसुपे सुतौ दामोदर: ए सुतौ डालूक: पवौलीसँ गोढि दौ डालू (३४/०६) सुतो विद्यापति १५.सुता शिरू पदम लाखू गादूका: एकहरा सँ श्री कर सुत चान्‍द दौ खौआल सँ भूले द्दौo मधुसूदन सुता उमापति (८४/०१) विद्यापति १६.मुसै सुता खौआल सँ डालू सुत विद्यापति दौ भण्‍डारिसम सँ शुभे द्दौo ठo १७.सोदरपुर सँ छोटाई दौ (२८/०८) बसाउन सुता पशुपति विद्यापति १८.कल्‍याण सुता करमहा सँ विद्यापति दौ १९.जालय सँ रामेश्‍वरसुत महिघर दौ यमुगाम सँ गेणाई द्दौo विद्यापति सुतो भगीरथ: २०.हरखू गोविन्‍दा सकo गुणे सुत विद्यापति दौ सुरगन सँ होरे द्दौo २१.कृष्‍णपति सुता मुरारि विद्यापति प्रजापति टकबाल सँ रामकर दौ।।२२.कविन्‍द्र पदांकित मo मo उo रघुनाथा करमहा सँ विद्यापति दौ २३.सुतो विद्यापति माण्‍डरसँ यग्‍यपति दौ २४.तल्‍हनपुर सँ गढ़वय द्दौ. विद्यापति २५.यशु सुतो रविपति रूद्रपति विद्यापति चन्‍द्रपति २६.नरउन सँ विद्यापति दौ २७.रविपति सुतो कृष्‍णपति विद्यापति घुसौत सँ होरे दौ।। २८.विद्यापति सुता बेलउँच सँराम दौ २९.गुणे सुत गौरीपति विद्यापति लक्ष्‍मीपति कुलपतिय: दरिo दिवाकर दौ ३०.महिपति झाक मातामह कवि कोकिल विद्यापति ठाकर) दामोदर सुतो पाँसदु. हरिदेव: नरउनसँ माङनि दौ ३१.गणपति सुतो कवि कोकिल राजपण्डित मo मo उपाo विद्यापति: ए सुतौ हरिपति धनपति।। ३२.महामहोपाध्‍याय विद्यापतिसुता हृषिकेश ३३.हरपति सुता विद्यापति काशी दामोदरा:३४.रतिपति सुता सोदरo विद्यापति दौ ३५.विद्यापति प्रपौत्र पौत्र हरिश्‍वर धनेश्‍वर सुतो गोन्‍दूक पालीसँ ज्ञानदौ।।३६.विद्यापति द्दौ. वेणी सुतो रविनाथ: ३७.सोदरo विद्यापति द्दौo निकार ३८.श्रीपति सुतो विद्यापति परानौ दरिहरा ३९.सोदरo विद्यापति द्दौo मिश्र कमलनयन सुता हरिअम सँ बछाई दौ ४०.रवौआलसँ सोने दौ देवनाथ सुतो कवि विद्यापति पचही सोदरपुरसँ जगन्‍नाथ दौ ४१.गोपी सुतो विद्यापति वाचस्‍पति शीवा हरिअमसँ नारायण दौ।।४२.विद्यापति निधि प्र. धरापतिय: ४३.तरौनी करमहासँ महिधर दौ।।(४६/०३) विद्यापति (१११/०३) सुतो मधुसूदन: ४४.कुलानन्‍द हृदयनन्‍दनो कर. पनाई दौ (१०९//१०६) विद्यापति (३१४/०५) सुता प्रितिनाथ शोभनाथ महिनाथा: ४५.उँमापति सुत विद्यापति सुतो जयपति: ४६.जागू सुता सुरपति हरिपति प्रभापति गिरपति विद्यापतिय: ४७.हचलू सुता हरपति विद्यापति महो ज्ञानपति दिनपति मणिकंठा ४८.कृष्‍ण सुता रमापति श्रीपति रत्‍नपति विद्यापति: बूधवाल सँ धीरू दौ।।४९.दाशे सुता दयोरी खण्‍डबला सँ गोपीनाथ दौ (८५//०२) विद्यापति सुत जीवनाथ ५०.नरउन सँ विद्यापति द्दौo ५१.धर्माधिक रणिक बाटू सुतो विद्यापति ५२.सोदरपुर सँ गयन दौ विद्यापति सुता रमापति होरिल हररवू जिवाईका माण्‍डर सँ सोढू दौ।। ५३.खौआल सँ रघुनाथ दौ (५४//०७) विद्यापति सुत जानू ५४.टकबालसँ विद्यापति द्दौ मतिनाथ ५५.खण्‍डबलासँ विद्यापति सुत जीवनाथ दौ ५६.करमहा सँ विद्यापति द्दौo विश्‍वनाथ ५७.कृष्‍णपति सुतो उँमापति (बo २८/०१) विद्यापति (३०२/०३) पण्‍डुआ सँ पाँ भगीरथ दौ ५८.महो हरिकृष्‍ण सुता खौआल सँ विद्यापति दौ ५९.मधुसूदन सुतो विद्यापति: अलय सँ अनिरूद्ध दौ ६०.माण्‍डर सँ देवशर्म्‍म द्दौo विद्यापति सुता नरउन सँ बदनी दौ ६१.ठo श्‍याम सुतो पुरन्‍दर परमानन्‍दो माण्‍डर सँ विद्यापति दौ ६२.विद्यापति सुता सोदरपुर सँ जयराम ६३.धर्मेश्‍वरौ खौआल सँ हराई सुत मनोहर दौ रूद सुतो राम: गंगोली सँ देवे दौ विस्‍फी सँ कवि कोकिल राज पण्डित मo मo पाo विद्यापति द्दौo राम सुतो भिरवूक: फनन्‍दह सँ लोचन दौ पकलिया सँ दिनू द्दौo भिरवू सुतो हराइक: सोदरपुर सँ विर सुत हरिदौ खौआल सँ शुभे द्दौo हराई सुता मोहन मनोहरा कमल नारायणा: सोदरपुर सँ जगन्‍नाथ सुत भवानी दौ भवानी सुतो हरिदेव सदायकौ हरिअम सँ गोविन्‍द सुत श्रीधर दौ सकo जागे द्दौo मनोहर सुता करमहा सँ रतनपति सुत कृष्‍णदाश दौ कृष्‍णदाश सुता सोदरपुर सँ मधुसूदन सुत सुन्‍दर दौ (४७//०५) दरिहरा सँ मुशाई द्दौo हरि सुतो प्राणपति: सोदरपुर सँ नारायण सुत ननू दौ (११०//०१) (१०१//०१) नारायण सुतो ननूक: वुधवाल सँ बहुड़ी दौ (१८०/०४) दामोदर सुतो बहुड़ीक: सोदरपुर सँ परमानन्‍द सुत कांगव दौ परमानन्‍द सुतो कांगव: माण्‍डर सँ हलघर सुत पीताम्‍बर दौ (५८//०५) करमहा सँ श्रीराम द्दौo कांगव सुता करमहा सँ शिवदेव सुत कारम दौ माण्‍डर सँ वावू दौहित्र दौo ६४. वावू दुर्गापति सिंह: सुतो वावू विद्यापति सिंह: करमहा सँ हरिनाथ सुत तारानाथ दौ ६५. खौआल सँ युवराज द्दौo बावू विद्यापति सिंह सुतो वावू गिरिजापति सिंह ६६.वावू गंगापति सिंह सुता भेषपति सिंह विद्यापति सिंह ६७.वावू भेषपति सिंह पत्‍नी अन्‍तर्जातीय ए सुत हंसपति सिंह: वावू विद्यापति सिंह सुतो रमन कुमार सिंह:६८.बाला सुतो भैया कल्‍याणौ खौआल सँ विद्यापति दौ ६९.विश्‍वनाथ काशीनाथा: अलय सँ विद्यापति दौ ७०.पाठक विद्यापति सुतो दुखमंजन कलरौ आसी एकहरा सँ उँमानन्‍द दौ ७१.नरपति सुता कल्‍याणपुर विस्‍फी सँ सुन्‍दर दौ कमलनयन सुत नारायण सुतो सुन्‍दर: करमहा सँ विद्यापति दौ ७२.मुरारि सुता दामोदर विद्यापति महिघर आनन्‍दा:७३.विद्यापति सुता पद्मापति सभापति आदिपति गणपतिय:।। ७४.विद्यापति सुतो छीतू परमानन्‍दो माण्‍डर सँ नरपति दौ बहेराढ़ी सँ गदाधर द्दौo ७५.अलय सँ कमल सुत नकटू दौ. विद्यापति सुत जीवनाथ सुतो परम: दरि. राम दौ।। ७६.करमहा सँ विद्यापति सुत मधुसूदन दौ ७७.मानी सोदरपुर सँ वाचस्‍पति सुत विद्यापति दौ ७८.खण्‍डबला सँ वावू दुर्गापति सिंह सुत वावू विद्यापति सिंह दौ ७९.खौआल सँ विद्यापति दौ ठ. मधुरापति सुतो वाछ शिवानन्‍दनो८०.सोदरपुर सँ बैद्यनाथ द्दौ. हरिकृष्‍ण सुता खौआल सँ मधुसूदनसुत विद्यापति दौ ८१.मधुसूदन सुत विद्यापति दौ ८२.दरिहरा सँ रमापति सुत वेणी दौ अलय सँ कृष्‍णपति सुत विद्यापति द्दौ ८३.अलय सँ विद्यापति द्दौ.॥ ८४.ज्‍यो. शिवनन्‍दन सुतो विद्यापति . ८५.खौआल सँ भवदेव सुत विद्यापति दौ. ८६.पाठक कृष्‍णपति सुतो उषापति विद्यापति . ८७.विद्यापति सुतो दुखभंजन कलरो एकहरा सँ देवानन्‍द सुत उँमानन्‍द दौ ८८.अलय सँ विद्यापति सुत कलरु दौ ८९.कारु सुता पिताम्‍बर विद्यापति देवकीमाना का सोदरपुर सँ वैदयनाथ सुत जयि दौ ९०.सुरोइ प्र. शारदानन्‍द सुता गौरीनन्‍दन वाचस्‍पति प्र. विद्यापति दिवाकर प्र. मन्‍दू रत्‍नाकर प्र.भ्र. भोलन जी का नग. घुसौत सँ दामोदर सुत उग्रमोहन दौ एकहरा सँ शोभानन्‍द द्दौ.९१.खौआल सँ विद्यापति दौ. आब आउ मूल मुद्दापर। हमरा राजपण्डित आ आर कतेक रास धर्माधिकारणिक विद्यापति सभ जैमे एकटा देवदासीक पुत्र सेहो रहथि, केर ब्राह्मण हेबामे कोनो सन्देह नै अछि। हम विद्यापति ठक्कुरः आ कीर्तिलता कीर्तिपताका नै वरन विद्यापति पदावलीक गप कऽ रहल छी। तेँ कोनो ओझरीमे नै रहल जाए।आब आउ गएर ब्राह्मण द्वारा गाओल बिदापत, जे ज्योतिरीश्वरसँ पूर्व (सम्भवतः ) बार्बर कास्टमे भेल रहथि आ तकर प्रमाण ज्योतिरीश्वर द्वारा वर्णन रत्नाकरमे ऐ कवि आ ओकर कृतिक चर्चा अछि। महादेव मूलतः गएर ब्राह्मणक देवता रहथि, आस्ते-आस्ते ओ ब्राह्मण लोकनि द्वारा अपनाओल गेलाह। विद्यापतिक कोनो पदावलीक रचनामे हुनकर संस्कृत/ अवहट्ठ लेखक हेबाक चर्च नै अछि। मुदा हुनकर रचना (संस्कृत आ अवहट्ठक विरुद्ध, जे दोसर विद्यापतिक रचना छी, जे ब्राह्मण रहथि) सर्वहाराक लेल जे दर्द अछि से संस्कृत आ अवहट्ठक विद्यापतिमे किए नै अछि? उदाहरण देखू। विद्यापतिक बिदेसिया- पिआ देसाँतर भोजपुरीक साहित्य मैथिलीसँ कम समृद्ध अछि मुदा से अछि मात्र परिमाणमे, गुणवत्ताक दृष्टिमे ई कतेक क्षेत्रमे आगाँ अछि। भोजपुरीक भिखाड़ी ठाकुरक बिदेसियाक सन्दर्भमे हम ई कहि रहल छी। भिखाड़ी ठाकुर कलकत्तामे प्रवासी रहथि, घुरि कय अएलाह आ भोजपुर क्षेत्रमे अपन कष्टक वर्णन जाहि मर्मस्पर्शी रूपसँ गामे-गामे घुमि कए आ गाबि कए सुनओलन्हि से बनल बिदेसिया नाटक। मिथिलामे प्रवास आजुक घटना छी, गामक-गाम सुन्न भऽ गेल अछि। मिथिलाक बिदेसिया लोकनि देशक कोन-कोनमे पसरि गेल छथि। मुदा पहिने भोजपुर इलाका जेकाँ प्रवासक घटना मिथिलामे नहि छल। प्रवास मोरंग धरि सीमित छल जे नेपालक मिथिलांचल क्षेत्र अछि। आ ताहिसँ मैथिलीमे लोकगाथाक सूक्ष्म विवरणक बड़ अभाव, जे अछियो से लोकगाथा नायकक विवरण नहि वरन महाकाव्यक नायकक मैथिलीमे विवरण जेकाँ अछि, आ बोझिल अछि, भिखाड़ी ठाकुरक बिदेसियाक जोड़ नहि। सलहेसक कथाक विवरण लिअ, क्षेत्रीय परिधि पार करिते सलहेस राजासँ चोर बनि जाइत छथि आ चोरसँ राजा। तहिना चूहड़मल क्षेत्रीय परिधि पार करिते जतए सलहेस राजा बनैत छथि ओतए चोर बनि जाइत छथि, आ जतए सलहेस चोर कहल जाइत छथि ओतुक्का राजा/ शक्तिशालीक रूपेँ जानल जाइत छथि। मुदा एहि सभपर कोनो शोध नहि भए सकल अछि। एहि क्रममे विद्यापतिक पदावलीक पद सभमे तकैत हमरा समक्ष विभिन्न प्रकारक गीत सभ सोझाँमे आएल। एहिमे जे अधिकांश छल से रहए प्रेमी-प्रेमिकाक विरहक विवरण आ बिदेसियाक जे मूल कनसेप्ट अछि- रोजी-रोटी आ आजीविका लेल मोन-मारि कए प्रवास, ताहिसँ फराक। तखन जा कए हमरा किछु विशुद्ध बिदेसिया जकरा विद्यापति पिआ-देसाँतर कहैत छथि भेटल। एहिमे स्वाभाविक रूपेँ अधिकांश विद्यापतिक नेपाल पदावलीसँ भेटल आ एकटा नगेन्द्रनाथ गुप्तक संग्रीहीत पदावलीसँ। मोरंग नेपाल स्थित मिथिलाक भाग अछि आ प्रवास लेल प्रसिद्ध छल, से एकर सम्भावित कारण।ताहि आधारपर ई संकल्पित नाटिका प्रस्तुत अछि।विद्यापतिक पिआ देसाँतर दृश्य १स्टेजपर हमर बिदेसिया बिदेस नोकरीक लेल बिदा होइत छथि आ जुवती गबैत छथि- गीतक बीचमे एकटा पथिक अबैत छथि । मंचक दोसर छोड़पर चोर लोकनि धपाइत नुकायल छथि। मंचक दोसर छोरपर कोतवाल आ शुभ्र धोतीधारी पेटपर हाथ देने निफिकिर बैसल छथि।धनछी रागे (नेपालसँ प्राप्त विद्यापति पदावली)-हम जुवती, पति गेलाह बिदेस। लग नहि बसए पड़उसिहु लेस।हम युवती छी आ हमर पति बिदेस गेल छथि। लगमे पड़ोसीक कोनो अवशेष नहि अछि। सासु ननन्द किछुआओ नहि जान। आँखि रतौन्धी, सुनए न कान।सास आ ननदि सेहो किछु नहि बुझैत छथि। हुनकर सभक आँखिमे रतौँधी छन्हि आ ओ सभ कानसँ सेहो किछु नहि सुनैत छथि। जागह पथिक, जाह जनु भोर। राति अन्धार, गाम बड़ चोर।हे पथिक! निन्नकेँ त्यागू। काल्हि भोरमे नहि आऊ। अन्हरिया राति अछि आ गाममे बड्ड चोर सभ अछि। सपनेहु भाओर न देअ कोटबार। पओलेहु लोते न करए बिचार।कोतबाल स्वपनहुमे पहरा नहि दैत अछि आ नोत देलोपर विचार नहि करैत अछि। नृप इथि काहु करथि नहि साति।पुरख महत सब हमर सजाति॥ताहि द्वारे राजा ककरो दण्ड नहि दैत छथि आ सभटा पैघ लोक एके रंग छथि। विद्यापति कवि एह रस गाब। उकुतिहि भाव जनाब।विद्यापति कवि ई रस गबैत छथि। उकतीसँ भाव जना रहलीह अछि। विद्यापति कविक प्रवेश होइत छन्हि। कोतवालक लग शुभ्र-धोतीधारी आ एकटा गरीबक आगमन होइत अछि। कोतवाल आभाससँ धोतीधारीक पक्षमे निर्णय सुनबैत छथि आ मंचक दोसर कोनपर बैसलि जुवती माथ पिटैत छथि। गीतक अन्तिम चारि पाँती विद्यापति कवि गबैत छथि। दृश्य २ जुवती एकटा दोकान खोलने छथि, सांकेतिक। मंचक दोसर कातसँ सासु आ ननदिकेँ जएबाक आ क्रेता पथिकक अएबाक संग युवती गेनाइ शुरू करैत छथि आ सभ पाँतिक बाद विद्यापति मंचपर अबैत छथि अर्थ कहैत छथि आ अंधकारमे विलीन भऽ जाइत छथि। मुदा अन्तिम पाँती विद्यापति गबैत छथि आ जुवती ओकर अर्थ बँचैत छथि।मालवरागे (नेपालसँ प्राप्त विद्यापति पदावली)-बड़ि जुड़ि एहि तरुक छाहरि, ठामे ठामे बस गाम।एहि गाछक छाह बड्ड शीतल अछि। ठामे-ठाम गाम बसल अछि। हम एकसरि, पिआ देसाँतर, नहि दुरजन नाम।हम असगरि छी, प्रिय परदेसमे छथि, कतहु दुर्जनक नाम नहि अछि। पथिक हे, एथा लेह बिसराम।हे पथिक! एतय विश्राम करू।जत बेसाहब किछु न महघ, सबे मिल एहि ठाम।जे किछु कीनब, किछुओ महग नहि। सभ किछु एतए भेटत। सासु नहि घर, पर परिजन ननन्द सहजे भोरि।घरमे सासु नहि छथि, परिजन दूरमे छथि आ ननदि स्वभावसँ सरल छथि।एतहु पथिक विमुख जाएब तबे अनाइति मोरि।एतेक रहितो जे अहाँ विमुख भए जाएब तँ आब हमर सक्क नहि अछि।भन विद्यापति सुन तञे जुवती जे पुर परक आस।विद्यापति कहैत छथि- हे युवती! सुनू जे अहाँ दोसराक आस पूरा करैत छी। दृश्य ३एहि गीतमे विद्यापति नहि छथि। जुवतीक ननदि पथिककेँ दबारि रहल छथि, से देखि जुवतीकेँ अपन पिआ देसाँतर मोन पड़ि जाइत छन्हि। ओ ननदि आ सखीकेँ सम्बोधित कए गीत गबैत छथि। गीतक अर्थ सखी कहैत छथि, सभ पाँतीक बाद।धनछीरागे (नेपालसँ प्राप्त विद्यापति पदावली)- परतह परदेस, परहिक आस। विमुख न करिअ, अबस दिस बास।परदेसमे नित्य दोसराक आस रहैत अछि। से ककरो विमुख नहि करबाक चाही। अवश्य वास देबाक चाही।एतहि जानिअ सखि पिअतम-कथा।हे सखी ! प्रियतमक लेल एतबी कथा बुझू।भल मन्द नन्दन हे मने अनुमानि। पथिककेँ न बोलिअ टूटलि बानि।हे ननदि! मोनमे नीक-अधलाहक अनुमान कऽ पथिककेँ टूटल गप नहि बाजू। चरन-पखारन, आसन-दान। मधुरहु वचने करिअ समधान।चरण पखारू, आसन दियौक आ मधुर वचन कहि सान्त्वना दियन्हु।ए सखि अनुचित एते दुर जाए। आओर करिअ जत अधिक बड़ाइ।हे सखी पथिक एतयसँ दूर जायत से अनुचित से ओकर आर बड़ाई करू।दृश्य ४जुवती आ ननदि नगर आबि ठौर धेने छथि। एकटा पथिक आबि आश्रय मँगैत छथि तँ जुवती गबैत छथि आ ननदि सभ पाँतीक बाद अर्थ कहैत छथि। बीचमे चारि पाँती बिना अर्थक नेपथ्यसँ अबैत अछि। फेर जुवती आगाँ गबैत छथि आ ननदि अर्थ बजैत छथि। अन्तमे अन्तिम दू पाँती विद्यापति आबि गबैत छथि। दृश्यक अन्तमे ननदि कहैत छथि जे हम जे ओहि दिन पथिककेँ दबारि रहल छलहुँ से अहाँकेँ नीक नहि लागल रहए, मुदा आइ पथिककेँ आश्रय किएक नहि देलियैक।कोलाररागे (नेपालसँ प्राप्त विद्यापति पदावली)-हम एकसरि, पिअतम नहि गाम। तेँ मोहि तरतम देइते ठाम।हम एकसरि छी आ प्रियतम गाममे नहि छथि। ताहि द्वारे राति बिताबए लेल कहबामे हमरा तारतम्य भऽ रहल अछि।अनतहु कतहु देअइतहुँ बास। दोसर न देखिअ पड़ओसिओ पास।यदि क्यो लगमे रहितथि तँ दोसर ठाम कतहु बास देखा दैतहुँ। छमह हे पथिक, करिअ हमे काह। बास नगर भमि अनतह चाह।हे पथिक क्षमा करू आ जाऊ आ नगरमे कतहु बास ताकू। आँतर पाँतर, साँझक बेरि। परदेस बसिअ अनाइति हेरि।बीचमे प्रान्तर अछि सन्ध्याक समय अछि आ परदेसमे भविष्यकेँ सोचैत काज करबाक चाही। मोरा मन हे खनहि खन भाँग। जौवन गोपब कत मनसिज जाग।चल चल पथिक करिअ प... काह। वास नगर भमि अनतहु चाह।सात पच घर तन्हि सजि देल। पिआ देसान्तर आन्तर भेल।बारह वर्ष अवधि कए गेल। चारि वर्ष तन्हि गेला भेल। घोर पयोधर जामिनि भेद। जे करतब ता करह परिछेद।भयाओन मेघ अछि, रतुका गप छी सोचि कए निर्णय करू। भनइ विद्यापति नागरि-रीति। व्याज-वचने उपजाब पिरीति।विद्यापति कहैत छथि, ई नगरक रीति अछि जे कटु वचनसँ प्रीति अनैत अछि। दृश्य ५अहू दृश्यमे विद्यापति नहि छथि। एकटा पथिक अबैत छथि मुदा सासु-ननदि ककरो नहि देखि बास करबासँ संकोचवश मना कए आगाँ बढ़ि जाइत छथि। जुवती गबैत छथि।घनछीरागे (नेपालसँ प्राप्त विद्यापति पदावली)-उचित बसए मोर मनमथ चोर। चेरिआ बुढ़िआ करए अगोर।कामदेव रूपी चोरक लेल हमर अवस्था ठीक अछि। बुढ़िया चेरी पहरा दऽ रहल छथि। बारह बरख अवधि कए गेल। चारि बरख तन्हि गेलाँ भेल।बारहम बरखक रही, तखन ओ गेलाह आ आब चारि बर्ख तकर भऽ गेल। बास चाहैत होअ पथिकहु लाज। सासु ननन्द नहि अछए समाज।सास आ ननदि क्यो संग नहि छथि आ पथिक सेहो डेरा देबासँ लजाइत छथि। सात पाँच घर तन्हि सजि देल। पिआ देसाँतर आँतर भेल।ओ कामदेव लेल घर सजा कए देशान्तर चलि गेलाह आ हमरा सभक बीचमे अन्तर आबि गेल। पड़ेओस वास जोएनसत भेल। थाने थाने अवयव सबे गेल।पड़ोसक बास जेना सय योजनक भऽ गेल सभ सर-सम्बन्धी जतए ततए चलि गेलाह। नुकाबिअ तिमिरक सान्धि। पड़उसिनि देअए फड़की बान्धि।लोकक समूह अन्हारमे विलीन भऽ गेल, पड़ोसिन फाटकि बन्न कए लेलन्हि। मोरा मन हे खनहि खन भाग। गमन गोपब कत मनमथ जाग।हमर मोन क्षण-क्षण भागि रहल अछि। कामदेव जागि रहल छथि गमनकेँ कतेक काल धरि नुकाएब।दृश्य ६ एहि दृश्यमे सेहो, नहि तँ ननदि छथि, नहिये सासु आ नहिये विद्यापति। एकटा अतिथि अबैत छथि आकि तखने मेघ लाधि दैत अछि आ जुवती गबैत छथि।धनछीरागे (नेपालसँ प्राप्त विद्यापति पदावली)-अपना मन्दिर बैसलि अछलिहुँ, घर नहि दोसर केवा।अपन घरमे बैसल छलहुँ, घरमे क्यो दोसर नहि छल, तहिखने पहिआ पाहोन आएल बरिसए लागल देवा।तखने पथिक अतिथि अएलाह आ बरखा लाधि देलक। के जान कि बोलति पिसुन पड़ौसिनि वचनक भेल अवकासे।की बजतीह ईर्ष्यालु पड़ोसिन से नहि जानि, बजबाक अवसर जे भेटि गेलन्हि।घोर अन्धार, निरन्तर धारा दिवसहि रजनी भाने।दिनहिमे रात्रि जेकाँ होमए लागल।कञोने कहब हमे, के पतिअएत, जगत विदित पँचबाने।हम ककरा कहब आ के पतियायत। कारण कामदेवक ख्याति तँ जगत भरिमे अछि।दृश्य ७मंचक एक दिससँ सासुक मृत्युक बाद हुनकर लहाश निकलैत छन्हि आ मंचपर अन्हार होइत अछि। फेर इजोत भेलापर ननदिक वर हुनका सासुर लए जाइत छन्हि। पथिक रस्तापर छथि दर्शकगणक मध्य आ दर्शकगणकेँ इशारा करैत जुवती गीत गबैत छथि आ विद्यापति सभ पाँतिक बाद अर्थ कहैत छथि। अन्तिम दू पाँतिमे विद्यापति गीत आ अर्थ दुनू बजैत छथि- विद्यापति अन्तिम दू पाँति आ ओकर अर्थ कैक बेर दोहराबैत छथि।नगेन्द्रनाथ गुप्त सम्पादित पदावली-सासु जरातुरि भेली। ननन्दि अछलि सेहो सासुर गेली।सासु चलि बसलीह, ननदि सेहो सासुर गेलीहतैसन न देखिअ कोई। रयनि जगाए सम्भासन होई।क्यो नहि सम्भाषणक लेल पर्यन्त,एहि पुर एहे बेबहारे। काहुक केओ नहि करए पुछारे।एतुका एहन बेबहार, ककरो क्यो पुछारी नहि करैत अछि।मोरि पिअतमकाँ कहबा। हमे एकसरि धनि कत दिन रहबा।हमर पिअतमकेँ कहब, हम असगरे कतेक दिन रहब।पथिक, कहब मोर कन्ता। हम सनि रमनि न तेज रसमन्ता।पथिक हुनका कहबन्हि, हमरा सन रमणिक रसक तेज कखन धरि रहत।भनइ विद्यापति गाबे। भमि-भमि विरहिनि पथुक बुझाबे।विद्यापति गबैत छथि, विरहनि घूमि-घूमि कए पथिककेँ कहि रहल छथि। विद्यापति गबैत-गबैत कनेक खसैत छथि- अन्हार पसरए लगैत अछि तँ एक गोटे जुवती दिस अन्हारसँ अबैत अस्पष्ट देखना जाइत छथि। की वैह छथि पिआ देसान्तर!! हँ, आकि नहि!!! पिआ देसान्तरक घोल होइत अछि आ मंचपर संगीतक मध्य पटाक्षेप होइत अछि। पिआ देसान्तरक ई कन्सेप्ट सुधीगणक समक्ष अछि आ मैथिल बिदेसिया लोकनिक वर्तमान दुर्दशाक बीच ई महाकवि विद्यापतिक प्रति ससम्मान अर्पित अछि। १.की ई दर्द अवहट्ठ आ संस्कृतक विद्यापतिमे छन्हि? २.पदावली एकटा पैरेलल संस्कृतिक द्योतक अछि। एक्के समयमे संस्कृत आ अवहट्ठ एक्के लेखक लिख लेत, ओकरा कष्ट छै जे अवहट्ठमे लिखलापर विद्वान ओकर उपहास करै छथि, मुदा ई दर्द की एकर लेशोमात्र पदावलीक विद्यापतिमे नै छन्हि। ओतए तँ उल्लास आ दर्द छै, सर्वहाराक उल्लास आ दर्द। ओ विद्यापति जे संस्कृत आ अवहट्ठ (पाली ताली नै) ओ राजपण्डित छला से विद्वान रहथि, हुनका अवहट्ठोमे लिखलापर लोक निन्दा करन्हि। मुदा मैथिलीक विद्यापति जे पैरेलल परम्पराक अंग छथि, ओइसँ दूर छला। ई पैरेलल परम्परा ऋगवेदक समयसँ छै (ओइ समयमे नाराशंसी रहै)। ई पैरेलल परम्पराक विद्यापति बार्बर कास्टक रहबे करथि, वा ब्राह्मण कास्टक रहबे करथि, से इतिहास ओइपर मौन अछि। मुदा लोककथा आ परम्परा, बिदापतक सर्वहारासँ सघन सम्बन्ध, बिस्फीक परम्परा हुनका गएर ब्राह्मण सिद्ध करैए। संस्कृत आ अवहट्ठक कोनो पाँति नहिये ओइ विद्यापतिक पदावलीक चर्चा करैए ; आ नहिये पदावली पदावलीक विद्यापतिक संस्कृत वा अवहट्ठ केर रचनाक चर्चा करैए। संस्कृत आ अवहट्ठ मुस्लिम आक्रमणक, जनौ आ मन्दिर भ्रष्ट हेबापर दुखी अछि मुदा पदावली तँ सर्वहाराक हर्ष ,उल्लास आ संघर्ष अछि; ओइ तरहक हाक्रोस ओतए नै।आ जखन मैथिलीबला विद्यापति ब्राह्मण रहबो करथि वा नै तहीपर सवाल अछि तखन पाग पहिरा कऽ कोन सोच हम सभ पैदा कऽ रहल छी, "विद्यापति" हम्मर छलाह की नै? की विद्यापतिक ब्राह्मण नै रहलासँ ओ हमर नै हेताह? की हुनकर "पिआ देशांतर" बला माइग्रेशन बला गीत महत्वहीन भए जेतै? की हुनकर सृन्गरिक गीतक मात्र चर्चा कोनो षड़यंत्र तं नै ? विद्यापति सन कविकेँ पाग पहिरा कऽ जातिगत बन्धनमे बान्हब कतेक सही अछि?‎"मध्यकालीन मिथिला"मे विजय कुमार ठाकुर लिखै छथि: "मिथिलाक धार्मिक क्षेत्रमे एहि सामन्तवादी युगीन धार्मिक विचारधाराक प्रभाव एहन सर्वव्यापी छल जे एखनहुँ एहि परम्पराक निम्नलिखित अवशेष समाजमे विद्यमान अछि: ...(घ) पाग सेहो तांत्रिक विचारधारासँ सम्बद्ध अछि।" (पृ.२६) तँ ईहो तंत्र मंत्र बियाह उपनयन धरि ने रहए दियौ। किए ओइ पैरेलल परम्पराक विद्यापतिकेँ ओइमे सानै छियन्हि। जँ ओ बार्बर कास्टक रहथि तैयो आ जँ ब्राह्मण रहथि तँ आरो (कारण २१म शताब्दीक ब्राह्मणक कट्टरता तँ देखिये रहल छी आ ई हजार साल पुराण ब्राह्मण जँ पैरेलल परम्पराक रहथि तँ पागरूपी सामन्तवादी अवशेष तांत्रिक धार्मिक कर्ममे मात्र प्रयुक्त हुअए, विद्यापतिक माथपर नै)। महाकवि विद्यापति कवीश्वर ज्योतिरीश्वर(लगभग १२७५-१३५०)सँ पूर्व (कारण ज्योतिरीश्वरक ग्रन्थमे हिनक चर्च अछि), मैथिलीक आदि कवि। संस्कृत आ अवहट्ठक विद्यापति ठक्कुरःसँ भिन्न। सम्भवतः बिस्फी गामक बार्बर कास्टक श्री महेश ठाकुरक पुत्र। समानान्तर परम्पराक बिदापत नाचमे विद्यापति पदावलीक (ज्योतिरीश्वरसँ पूर्वसँ) नृत्य-अभिनय होइत अछि। विद्यापति ठक्कुरः 1350-1435 विषएवार बिस्फी-काश्यप (राजा शिवसिंहक दरबारी) आ संस्कृत आ अवहट्ठ लेखक। कीर्तिलता, कीर्तिपताका, पुरुष परीक्षा, गोरक्षविजय, लिखनावली आदि ग्रंथ समेत विपुल संख्यामे कालजयी रचना। ई मैथिलीक आदिकवि विद्यापति (ज्योतिरीश्वर पूर्व)सँ भिन्न छथि। बोधि कायस्थ विद्यापति ठक्कुरःक पुरुष परीक्षामे हिनक गंगालाभक कथा वर्णित अछि। महाकवि विद्यापति(ज्योतिरीश्वर पूर्व मैथिली पदावली सभक लेखक) क विषयमे सेहो गंगालाभक ई कथा प्रचलित आ बादमे विद्यापति ठक्कुरक (संस्कृत आ अवहट्ठक लेखक)विषयमे सेहो गंगालाभक ई कथा प्रचलित भेल। उगना महादेव महादेव (उगनारूपी) विद्यापतिक अहिठाम गीत सुनबा लेल उगना नोकर बनि रहैत छलाह। मैथिलीक आदिकवि विद्यापति (ज्योतिरीश्वर पूर्व) आ विद्यापति ठक्कुरः (संस्कृत आ अवहट्ठक लेखक आ राजा शिवसिंहक दरबारी) दुनूसँ सम्बद्ध कऽ उगनाक ई कथा प्रसिद्ध भेल। गजेन्द्र ठाकुर ggajendra@videha.com http://www.maithililekhaksangh.com/2010/07/blog-post_3709.html २.गद्य २.१.जगदीश प्रसार मण्डलक दीर्घकथा- फाँसी-आगाँ २.२.मधुपनाथ झा- बिदापत नाच २.३.१.वनीता कुमारी- विहनि कथा- पुनर्न्वेषण २.ओमप्रकाश झा- विहनि कथा- कपारक लिखल ३.जगदानन्द झा 'मनु' - ५टा विहनि कथा ४.चन्दन कुमार झा- विहनि कथा २.४.अतुलेश्वर-पाग, मिथिला आ जातिवादक राजनीति २.५.१.रवि भूषण पाठक- ओक्‍कर तोहर हम्‍मर सपना-३ २.६.श्यामसुन्दर शशि- झूमि उठल जनकपुरवासी २.७.१.सुजीत कुमार झा -नाटकप्रति रंजुमे गजबकेँ समर्पण छल २.सुमित आनन्द- शोध-पत्रिका मैथिली एवं मैथिली काव्यमे अलंकारक लोकार्पण २.८.सुजीत कुमार झा-नव व्यापार जगदीश प्रसार मण्डलक दीर्घकथा-

फाँसी पछि‍लासँ आगू----------- ..................... डकैतीक संग खून सूनि‍ मैनजनक मन ठमकल। अधि‍क दि‍नक संगी हएत। तँए दोसति‍ये करब नीक। पड़ले-पड़ल हुकुम चलौलक- “नवका कैदीकेँ खइयो आ सूतैयो ले दि‍हक।” .........................जहि‍ना जि‍नगीक सुख, खाएब-सूतबमे अबै छै तहि‍ना सूतबक आश देखि‍ बलदेवक मनमे खुशी उपकलै। खुशी उपकि‍ते मन बौआए लगलै। तही बीच मेटक मुँहसँ फुटलै- “तेलक शीशी छेबे करौ, काल्हि‍सँ गोदामे सँ लऽ लऽ अनि‍हेँ।” गोदामक नाओं सुनि‍ते वार्डमे गल-गूल शुरू भेल। “नवका कैदीकेँ गोदाम केना जाए देब। ई अन्‍याय छी।” “कि‍ बात छि‍ऐ हौ ठीकेदार भैया? एना कि‍अए हड़बि‍र्ड़ो केने छह?” “तूँ अखन तड़ी-घटी नै बुझबि‍ही।” “से कि‍अए हौ भैया, सुनने लोक सुनबो करैए आ नहि‍यो सुनैए। बुझौने लोक बुझबो करैए आ नहि‍यो बुझैए। पहि‍ने बजबहक तब ने?” “रौ बूड़ि‍बक, सभ गप सभठीम बाजब नीक थोड़े होइ छै। नीको अधला भऽ जाइ छै आ अधलो नीक भऽ जाइ छै।” “एकबेर अजमा कऽ देखहक। नरकोमे ठेलम-ठेल करै छह। बहरामे लोक कि‍छु करैए तँ भीतर -जहल- अबैए। ऐठामसँ कतए जाएत। बाजह, तोरा कि‍ बूझि‍ पड़ै छह जे हम ओहि‍ना आएल छी। आकि‍ कि‍छु कए कऽ आएल छी।” ठीकेदारक बढ़ैत संगी देखि‍ कठहँसी हँसि‍ मैनजन बाजल- “कि‍ रे ठीकेदरबा, कथीक बमकी धेने छौ। सुन....।” एक दि‍सि‍ ठीकेदारकेँ अपन घटैत आमदनी मनमे नचैत तँ दोसर दि‍सि‍ मैनजनक आदेश। घुसुकि‍ कऽ ठीकेदार लगमे आबि‍ फुसफुसा कऽ बाजल- “मैनजन भैया, अहाँसँ कि‍ कोनो बात छि‍पल रहैए। बुझि‍ते छि‍ऐ जे दू पाइ बचा कऽ गाम पठबै छी।” ठीकेदारक बातसँ मेटक मनक आगि‍ नै ठंढ़ाएल। मुदा हवाक लहकी जकाँ जरूर लागल। मनमे उठलै दस लंठ तखन ने महंथ, जँ से नै तँ असगर वरसपति‍यो फूसि‍। जहि‍ना गुलाबी लाल आल-अड़हूल बनि‍ जाइत, रंग बदलि‍ अपराजि‍त उज्‍जर-कारी बनि‍ जाइत, दि‍न-राति‍क खेलमे पूर्णिमा अमावस्‍या आ अमावस्‍या पूनो बनि‍ जाइए तहि‍ना बलदेवक मनमे जि‍नगीक जुआरि‍ उठए लगलै। मुदा बि‍ना जारनक आगि‍ जहि‍ना, पि‍यासल बि‍नु पानि‍ जहि‍ना, खेति‍हर बि‍नु खेत जहि‍ना शक्‍ति‍ रहि‍तो हीनशक्ति‍का बनि‍ जाइत अछि‍ तहि‍ना जि‍नगीकेँ सुता कऽ राखब छी। मुदा प्रश्नो तँ अजनव अछि‍। नीक भोजन, नीक नीन इन्‍द्रासनक मुख्‍य द्वार छी, तखन जि‍नगी....? जि‍नगीक आवश्‍यक तत्वमे सूतबो -नीन- तँ अनि‍वार्य छी। तखन अधला केना भेल? मुदा जखन दस कोठरी बहारैक, साफ करैक भार रहत तखन एक्के कोठरी बहारबो तँ उचि‍त नै। मैनजनक मन ठमकल। ने आगूक बाट देखै आ ने पाछू घूमि‍ ताकब नीक बुझै। मनमे पुन: उठलै, कि‍यो जोग क्रि‍यामे जोगी बनि‍ जोगि‍या जाइत अछि‍, कि‍यो भोगी बनि‍ भोगि‍या जाइत अछि‍ तहि‍ना तँ कि‍यो काजोमे कजि‍या जाइए। मुदा कज्‍जी भेने तँ अबाहो भइये जाइए। जइठाम नि‍रोग वस्‍तुक बलि‍ प्रदान होइत तइठाम अबाहक पूछ केतेक? सामंजस करैत मैनजन भाव-प्रवीण भऽ बाजल- “बौआ ठीकेदार, ई दुनि‍याँ खेल छी। अपना सभ जहलमे तीत-मीठ करै छी, आ कि‍यो खुलल धरती-अकास बीच खूलि‍ कऽ खेलाइए। तइठाम तोहीं कहह जे कि‍ नीक हेतइ?” जहि‍ना चोरोक भरमार अछि‍, कि‍सि‍म-कि‍सि‍मक चाेर अछि‍, तहि‍ना ने एकरंगाहो चोरक भरमार अछि‍। अमती काँटमे ओझराएल जकाँ ठीकेदार ओझरा गेल। जँ चोर चोरि‍ कए कऽ आनए आ जरूरतमन्‍द लोककेँ दऽ दइ तखन ओकरा की कहब? चोरि‍ तँ ओ ने होइत जे चुपचाप आनि‍ चुपचाप रही। जइसँ कि‍यो बुझबो ने करत आ तरे-तर मखड़ैत रहब। ठीकेदारकेँ गुम देखि‍ मैनजन पुछलक- “गुम कि‍अए छह, ठीकेदार? तोरेपर छोड़ि‍ देलि‍यह जे जे तूँ कहबह सएह करब। जाधरि‍ प्रेम-प्रेमसँ नै मि‍लि‍, आत्‍मा-आत्‍मासँ नै मि‍लि‍, मन-मनसँ मि‍लि‍ कऽ नै चलत ताधरि‍ भरि‍ मन सि‍नेह कतए सि‍ंगार करत।” जबाबक तगेदा सुनि‍ ठीकेदारक मनकेँ नै रहल गेलै बाजल- “मैनजन भाय, जखन किलो-कि‍लो तेल अहाँकेँ पहुँचैबि‍ते छी, तखन नवका कैदीकेँ कि‍अए गोदाम जाइले कहलि‍ऐ?” “बौआ, मालीमे तेल हथुड़ैत देखलि‍ऐ, तँए बजा गेल।” अपन बढ़ैत पक्ष देखि‍ ठीकेदारक मनमे खुशी पनपल। खुशि‍आएल मन बजलै- “जे आदमी आइये जहल आएल अछि‍, ओकरा सोझे गोदाम पठाएब नीक नै। चोर अछि‍ कि‍ छुलाह अछि‍, से अखन लगले केना बूझि‍ जेबै? जखन हमरे हाथमे गोदाम अछि‍ तखन अहाँकेँ अभाव नै हएत सएह ने?” ठीकेदारक बात सुनि‍ते मैनजनक मन तीआइर जालमे फँसल माछ जकाँ ओझरा गेल। चोर तँ चोर भेल, मुदा छुलाह कि‍ भेल? मुदा मैनजन भऽ पूछबो नीक नै। जेकरे हाथ सभ कि‍छु, सएह नै बुझै, मैनजनक मनकेँ घुरि‍अबए लगल। एते दि‍नसँ जहलमे छी, ठीकेदारक हि‍साबे छुलाहोक संख्‍या कम नै अछि‍, मुदा नै बूझि‍ पेलौं से केहेन भेल? शब्‍दक मोड़ बदलैत मैनजन पुछलक- “कते रंगक छुलाह जहलमे हेताह ठीकेदार?” जहि‍ना नारद धरतीक रि‍पोर्ट अकासमे करैत तहि‍ना ठीकेदार अपनाकेँ महसूस करैत बाजल- “भाय सहाएब, तेहन घुरछी लगल सबाल अछि‍ जे धड़फड़मे छूटि‍ जाएत। तँए वि‍हि‍या कऽ देखए पड़त। पान-सात दि‍नमे पूरा-पूरी कहि‍ देब।” बलदेवक मनमे जहलक पहि‍ल दि‍न नचए लगलै। पुन: मनमे उठलै, मात्र कि‍छु घंटाक लेल दुनि‍याँमे छी, तखन एक्के दि‍नक काजमे घेराएल रहब नीक नै। मुदा कहबो केकरा करबै आ सुनबो के करत। आगू बढ़ि‍ते मनमे उठलै, जि‍नगीमे जे कि‍छु जे करैए ओ आन देखौ, बुझौ आकि‍ नै देखौ-बुझौ मुदा केनि‍हार तँ जरूर देखबो करैए आ बुझबो करैए। मनमे ग्‍लानि‍ उठए लगलै। जहि‍ना बर्खाक बहैत बुन्नक बेग, घेरामे घेरा जमा हुअए लगैए तहि‍ना जि‍नगीक चलैत चक्रक चालि‍ बलदेबक मनमे समटाए लगलै। कते भारी अपराधी छी जे धरतीक भार बनि‍ गेल छी, जँ हमरा सन अपराधीकेँ फाँसी नै होइ, सेहो अनुचि‍त हएत। मन असथि‍र भऽ गेलै। मनुखे ने मानवो आ दानवो बनैए। दुनि‍याँक ऐ रंगमंचपर कि‍यो वीर बनि‍ तँ कि‍यो कायर बनि‍, पार्ट अदा करैए। मन ठमकलै। पुन: उठलै, जइ धरतीक भार उठबए आएल छलौं ओइ धरतीक भार बनि‍ गेलौं, एना कि‍अए भेल? की जि‍नगी भरि‍ हाथ-पएर मारि‍ रहलौं, सेहो तँ नै अछि‍। चलबैत अाएल छी। तखन भार कि‍अए बनि‍ गेलौं। मन अँटकि‍ गेलै। आइ जरूर बूझि‍ पड़ैए जे जि‍नगी भरि‍ वि‍परीत -बे-पीरि‍त- दि‍शा चलि‍ कुमार्ग पकड़ि‍ लेलौं मुदा से ओइ दि‍न कहाँ बुझलि‍ऐ जे कुमार्ग छी आकि‍ सुमार्ग। काजोमे कतौ बाधा कहाँ उपस्‍थि‍त भेल? जहि‍ना धारक धारा सि‍रासँ भठ्ठा दि‍सि‍ धड़धड़ाइत चलैए मुदा भठ्ठाकेँ सि‍रा दि‍सि‍ ससरैमे सामना करए पड़ै छै। केना-पानि‍ये पानि‍केँ रोकैत रहैए। मुदा बीचमे एकटा तँ होइ छै सि‍रोक पानि‍ आ भठ्ठोक पानि‍ एक-दोसरसँ रोकाइत, ठाढ़ हुअए लगैत अछि‍। ताधरि‍ ताढ़ होइत जाइत जाधरि‍ धारसँ ऊपर उठि‍ धरतीपर नै छि‍ड़ि‍आए लगैत। मुदा धरति‍योपर तँ दि‍शा अवरूद्ध करि‍ते अछि‍। आइ धरि‍ जे नै बूझि‍ सकलौं ओ अपने केना बूझि‍ पाएब। मुदा नै, जि‍नगीक अंति‍म छोरपर भलहिं सभ बात नै बूझि‍ सकि‍ऐ, मुदा कि‍छु नव तँ जरूर बूझि‍ पाबि‍ रहल छी। जँ से नै, तँ कहि‍यो नै बूझि‍ पेलौं जे फाँसी हएत? हमहीं नै सभ एहने वृत्ति‍ करैए, मुदा सभकेँ फाँसि‍ये कहाँ होइ छै। जइठाम पुरजा-पुरजी मनुखक अंग बनल अछि, सभ अंगमे गुण-दोष छै, तइठाम केना जोड़ि‍ कऽ चलाओल जा सकैए। समए पाबि‍ कि‍यो दौड़ए लगैए आ कुसमए पाबि‍ थकथका जाइए। तइठाम सौंसे मनुख बनब, धीया-पुताक खेलौना नै छी। समए अनुकूल बनए-बनबए पड़ै छै, से नै तँ रग्‍गड़मे लोक रगड़ाए कि‍अए जाइए। बि‍सरि‍ गेल बलदेव बारह बजेक फाँसी। मन आगू दि‍सि‍ बढ़लै। जइठाम अधि‍कांश फूल ओहन अछि‍ जे अनेको रंगक होइए। गंध, रूप, अाकार समान रहि‍तो एक-दोसराक अनुकूलो‍ आ प्रति‍कूलो अछि‍। तहि‍ना गुलाबी आ लाल आलो-लाल आ गाढ़ो लाल बनैए तहि‍ना तँ अपराजि‍त करि‍यो बनैए आ उजरो। आ जँ उजरोपर करि‍ये रंग चढ़ि‍ जाए, जना एक-दोसरपर चढ़ैए। भलहिं थलकमल उज्‍जरसँ लाल भऽ जाए मुदा सभ तँ थलकमले नै छी। जहि‍ना फुलवाड़ी फलवाड़ी वा वंशबाड़ी टहललाक उपरान्‍त छाहरि‍मे बैसैक मन होइए तहि‍ना बलदेवकेँ सेहो भेल। दुनि‍याँक दृश्‍य देखि‍ मन हहि‍आए लगलै। ऐठाम के देत? केकरासँ मंगबै? जँ मंगबो करबै तँ जरूरी नै अछि‍ जे नीके देत। अधलोकेँ नीक कहि‍ दैत अछि‍। जुग-जुगसँ रंग-बि‍रंगक फूल-फलक गाछ रहि‍तो अखनो हराएल अछि‍ आ हराइयो रहल अछि‍। भरि‍सक हराइ-जीताइक खेले ने तँ चलैए। बलदेवकेँ अपने-आपपर शंका उठलै। अखन जहलक सेलमे छी, अकलबेड़ामे फाँसीपर चढ़ब, कहीं बुइधे तँ ने भगंठि‍ रहल अछि‍। भंगठले बुधि‍ ने बताह कहबै छै। मुदा बि‍नु भंगठलोकेँ तँ बताह कहै छै। जहि‍ना धान-रब्‍बीक रग्‍गड़सँ हाँसू मुरछि‍ जाइए तहि‍ना बलदेवक मन मुरछि‍ गेलै। कि‍छु समए नि‍कलि‍ते मनमे उठलै, अझुका बाद के हमरा मन राखत। कोनो कि‍ हम असगरे मृत्‍युदंड पेलौं आकि‍ पबै छी। ि‍कयो गाछपरसँ खसि‍ तँ कि‍यो पानि‍मे डूमि‍, कि‍यो बीखहा दबाइ पीब, तँ कि‍यो वि‍षैला साँपकट्टीसँ....? मुदा हम तँ ओइ सभसँ भि‍न्न छी? दुनि‍याँक बीच अपराधी छी, ओहन अपराधी जेकरा दुनि‍याँ थूक फेक भगबैए। मनमे हुमड़ैत वायुक दरद बूझि‍ पड़लै। केकरा लेल एते अपराध केलौं? कि‍ अपना ले आकि‍ परि‍वार ले। आइ के हमरा संग फाँसीपर चढ़त? जँ अपना ले केलौं तँ कि‍ हाथ-पएर नै अछि‍। मनमे एकाएक समुद्रक शीतल समीरक झटका लगलै। झटका लगि‍ते मुँहसँ नि‍कलए लगलै- ओ फाँसी केहेन होइए, जे हँसैत अपने हाथे गरदनि‍मे लगबैए। ओहि‍ना हँसैत मुँह लोकक सोझामे हँसैत रहैए। आ ओ फाँसी केहेन जेकरा थूक फेक लोक आँखि‍ मूनि‍ लइए। कि‍यो सपूत बनि‍ फाँसीपर चढ़ि‍ अमर ज्‍योति‍ जरबैत अछि‍ आ कि‍यो करि‍आएल इजोतमे अन्‍हराएल रहैत अछि‍। ऐ धरतीपर ककरो संग कि‍यो नै जाइत अछि‍। सभ अपन-अपन स्‍वार्थक पाछाँ रहैत अछि‍। मन ठमकलै। मनमे उठलै, केना नै जाइत अछि‍। आत्‍माक संग आत्‍मा जरूर जाइत अछि‍। नीकक संग नीक आ अधलाक संग अधला तँ जाइते अछि‍। राति‍क अंति‍म पहर। एक दि‍सि‍ राति‍ उसरैक बेर तँ दोसर दि‍सि‍ दि‍न चढ़ैक समए। अर्द्धचेत बलदेवक भक्क तखन पुन: खुजल जखन अन्‍हारमे हराएल परुकी संगीक बीच अपन उपस्‍थि‍ति‍ दर्ज करबाक लेल घूटकल, अवाज देलक। अपन-अपन आवेशी अवाजमे गामसँ अान गाम, आ एकसँ अनेक कि‍सि‍मक गाछपर एक जुटताक अवाज देलक। यएह समए छी जे गौतमो ऋृषि‍केँ चन्‍द्रमा धोखा देलकनि‍। सराप चाहे गौतम जे देलखि‍न मुदा एते तँ भेबे केलनि‍ जे आत्‍मासँ खसि‍ देहलोकमे उतरि‍ गेलाह। चन्‍द्रमामे जखन गहन लगि‍ जेतै तखन अन्‍हारमे धरतीपर केकरा के चि‍न्‍हत? परुकी सबहक अवाज सुनि‍ते बलदेवक मनमे जहि‍ना तरेगन रहि‍तो भुरुकबा तरेगन आल-लाल ज्‍योति‍ धरतीपर हँसैत आबि‍ प्रकाशि‍त करैक परि‍यास करैत, तहि‍ना बलदेवक मनमे सेहो पतराएल प्रकाशक आगमन भेलै। ज्‍योति‍क आगमन होइते उठलै, कोनो कि‍ हमरेटा फाँसी हएत आकि‍ अदौसँ होइते एलै आ भवि‍ष्‍योमे होइत रहतै। मुदा हमरा जि‍नगीमे फाँसी चढ़ैक बाट पकड़ाएल कहि‍या? बलदेव पाछू उनटि‍ ताकए लागल। हम तँ ओइ दि‍न फाँसीक बाट पकड़ि‍ लेलौं जइ दि‍न डगर छोड़ि‍ डगहर पकड़ि‍ लेलौं। डगरक तँ सीमा-सरहद होइ छै, नि‍श्चि‍त जगहसँ नि‍श्चि‍त जगह पहुँचैए, मुदा डगहर तँ से नै होइत। घुरि‍या-फिड़ि‍या बौअबैत रहैए। मनुष्‍यक तँ डगर होइ छै, डगहर तँ पशु लेल होइ छै जे जंगलमे चरैले जाइत छैक। कि‍ हमहूँ पशुए भऽ गेलौं। मुदा पशुओ तँ जीबे छी आ मनुखो जीबे छी। दुनूक बीच आत्‍माक बास होइ छै। मुदा आत्‍माक बास रहि‍तो पशु कहाँ बूझि‍ पबै छै जे हमरा बीच आत्‍माक बास अछि‍। मुदा मनुष्‍यकेँ तँ से नै होइ छै। मनुष्‍ये नै जीव-जन्‍तुओसँ प्रेम करैत अछि‍ आ प्रेम पबैत अछि‍। सहयोगी बनि‍ जि‍नगीमे सहयोगो करैत अछि‍ आ सहयोगक अपेक्षो रखैत अछि‍। जँ से नै तँ ओ अपन रहैक बेवस्‍था कि‍अए ने कऽ पबैत अछि‍। जेकरा रहैक बेवस्‍था नै हेतै तेकरा जि‍नगीक गारंटी कि‍ भऽ सकै छै। भलहिं बौआ-ढहना घास-पात वा अन्‍य भोज्‍य पदार्थ ताकि‍ पेट भरि‍ लि‍अए मुदा मनुष्‍य जकाँ तँ जि‍नगी जीबैक गारंटी नै कऽ सकैए। मनुष्‍य तँ पातालसँ पानि‍ आनि‍ पीब सकैए, धरतीसँ भोज्‍य–पदार्थ उपजा सकैए। फेर मन ठमकलै। सोचती बन्न भेलै! सोचनशक्‍ति‍ रूकलै! जहि‍ना कटल वा टुटल रास्‍ता देखि‍ राही ठमकि‍ जाइत जे ओइ पार केना जाएब। मुदा कटबो आकि‍ टुटबो तँ रंग-बि‍रंगक होइत अछि‍। एक टुटब ओहन होइत अछि‍ जइमे पानि‍-थाल-कीच होइत अछि‍ आ दोसर ओहन होइत जे सुखले रहैत अछि‍। जइमे सावधानीसँ नि‍च्‍चाँ उतरि‍ पार कएल जाइत अछि‍। तहि‍ना तँ पनि‍आएलो-थलाहमे होइत। कतौ अगम होइत कतौ कम होइत जइठाम कम होइत तइठाम कने कठि‍ने सही मुदा पार तँ कएल जा सकैए। मुदा अगममे तँ डुमबोक आ गड़बोक संभावना बनले रहै छै। फाँसी लगा, गरदनि‍ दाबि‍ हमर प्राण लेत, मुदा फँसरि‍यो लगा तँ लोक मरि‍ते अछि‍। एहेन-एहेन परि‍स्‍थि‍ति‍ पैदा कऽ दैत जे बेवस भऽ लोक अपन गरदनि‍मे फँसरी लगा प्राण गमबैत अछि‍। कि‍ ओ अपराधी छी आकि‍ अपराधीक सजा पबैए। जखन ओ अपराधी नै छी, तखन अपराधीक सजा कि‍अए भेटि‍लै? वोनक बाघ सि‍ंह कि‍अए दोसराक प्राण लऽ लऽ खून पीबैए? ओकर कि‍ दोख छै? यएह ने जे ओकरा आगू ओ अब्‍बल अछि‍। फेर मन ठमकलै। कि‍यो इनार-पोखरि‍मे डूमि‍ मरैए, कि‍यो आगि‍, पानि‍, पाथर, वि‍र्ड़ोमे मरैए। ततबे नै कि‍यो गाछपर सँ खसि‍ मरैए, तँ कि‍यो गाछपर चढ़ैत-उतरैत काल खसि‍ मरैत अछि‍। प्रकृति‍क तँ अद्भुत लीला अछि‍। क्षण-क्षण पल-पल बाटो पकड़बैत अछि‍ आ धकेल-धकेल नि‍च्‍चाे करैत अछि‍। ऊपर-नि‍च्‍चाक खाड़ी बना जीवन-मृत्‍युक सीमा बनोनै अछि‍। एक तँ ओहि‍ना आगि‍मे अगि‍आएल अछि‍, पानि‍मे पनि‍आएल अछि‍, हवामे हवि‍‍आएल अछि‍, तखन केना परेखि‍ पाएब। परखैले जेहेन आँखि‍क इजोत चाही तेहेन ने करि‍आएल बादलमे अछि‍ जे बर्खासँ सि‍क्‍त करत आ ने डभि‍आएल धरतीमे अछि, जे धरतीक परतकेँ तेना सि‍र गछाड़ने अछि‍ जे शक्‍ति‍हीन बना देने अछि‍। सूखल माइक छातीमे दूध कहाँ अछि‍ जे चाहि‍यो कऽ बेचारी दऽ सकती। अन्‍हारो राति‍मे, जखन हाथ-हाथ नै सुझैत, जखन अपन देहो हरा जाइत, देहक सभ अंग नि‍ष्‍क्रि‍य भऽ जाइत, तखनो तँ कि‍छु रहि‍ते अछि‍ जे हँथोरि‍यो-हँथोरि‍ कि‍छु दूर धरि‍ लइये जाइत अछि‍। मुदा हम तँ सोलहन्नी आन्‍हरा गेलौं। जखन पीबैयो बला पानि‍ बसि‍या गेने फेका जाइत, तहि‍ना आइ दुनि‍याँसँ फेका रहल छी। अपन फेकाइत जि‍नगीपर नजरि‍ पड़ि‍ते बलदेवक मन सहमि‍ गेलै। ने आगूक बाट देखै आ ने पाछू घुसुकि‍ पबैत। जहि‍ना जि‍नगीक ओहि‍ मोड़पर कि‍यो चारू दि‍ससँ दुश्‍मनसँ घेरा, हारि‍-जीतक तारतम्‍य नै कऽ पबैत तहि‍ना बलदेव सेहो घेरा गेल। हारि‍यो मानने दुश्‍मनक हाथे प्राण गमेबे करब, तखन प्राणक मोह राखि‍ हारि‍यो मानब उचि‍त नै। तइसँ नीक जे सामना करैत सामनेमे जत्तेकाल ठाढ़ रहब ओत्तेकालक जि‍नगीक महत तँ आरो कि‍छु हएत। मुदा ठाढ़ रहि‍ के सकैए? जेकर शरीर टी.बी., केन्‍सर सन रोगसँ जर्जर भऽ खोखला भऽ गेल रहैए ओ ठाढ़ केना रहि‍ सकैए। पएरमे ओ शक्‍ति‍ कहाँ छै जे ठाढ़ रखतै। बलदेवक मन वि‍चलि‍त भऽ गेलै। कि‍छु क्षण बाद मनमे उठलै, फाँसी तँ पोखरि‍क जाइठ‍ सदृश जि‍नगीक छी। कि‍यो अगम पानि‍मे डुबकुनि‍याँ काटि‍, माटि‍ नि‍कालि‍ जाइठक मुरेड़ापर लगबैए तँ कि‍यो कि‍नछैरे-कि‍नछैरमे पि‍छड़ि‍ कऽ खसि‍, पि‍छड़ैत-पि‍छड़ैत अगम पानि‍मे डूमि‍, सड़ि‍-सड़ि‍ सड़ैनि‍क गंध पसारैत अछि‍। मुदा जि‍नगीक अंति‍म छोड़पर बुझनहि‍ की हुअए? कमसँ कम जँ अपनो लेल केने रहि‍तौं तँ कनैत कि‍अए, हँसैत कि‍अए ने दुनि‍याँ छोड़ि‍तौं। जि‍नगीक अचूक उपाय कहाँ बूझि‍ पेलौं। जारी........................................ ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। मधुपनाथ झा बिदापत नाच विदापत-नाच एहि नाचक उत्पत्ति दरभंगा जिला मे भेलैक, एहन अंदाज़ कैल जाति छैक | लेकिन अपने मात्रि -भूमि मे इ कोन तरह के अवस्था मे अछि एकरा कहबाक जरूरत नय बुझैत अछि, परंच उत्तरी बिहार के किछु जिला आ भागलपुर, पूर्णिया आदि के गाम सब मे आइयो एकर 'क़द्र' छैक | ई छोटका लग सब के नाच बनि क रहि गेल अछि | तथाकथित भद्र समाज के लोग एकरा देखबाक मे अपन हेठी बुझैत छथि , लेकिन मुसहर, धाँगड़, दुसाध के ठाम---विवाह, मुंडन संगहि अन्य अवसरो पर एकर धूम मचल रहैत छैक | ऐ नाच मे साथ-आठ टा कलाकार रहैत छैक आ दुइए टा वाद्य यन्त्र-मृदंग और मजीरा रहैत छैक | 

त चलू विदापत-नाच के आनंद उठाबि अपन भद्रता के किछ काल लेल....धृग धा, धृग धा तिन्ना --बाजि क मृदंग बौक भ गेल.....कुन कुन कुन कुन... मजीर स्वर मे संग देलकय.... गननायं फलदायकं पंडितं पतितं...' अहाँ सब हंसु जुनि इ मंगलाचरण छलैक, शुद्ध संस्कृत मे | 'किनकां, किनकां, किनकां, किनकां मजीर संग देलकय | नाचअ वाला चारू तरफ जेम्हर-जेम्हर समाज के लोग छल चक्कर देनाइ शुरू केलक | ओकर पाछु एक दोसर नर्तक सेहो घिरनी जकां चक्कर लगा रहल छल आ मुंह के रंग-बिरंग के बनबैत ओय -ओय -ओय -ओय बाजि रहल छल |

धिरिनांगी, धिरिनांगी, धिरिनांगी, धिरिनांगी-- मृदंग ताल बदल दोसर सुर निकाल लक... किनकां, किनकां...आब रहअ दिय बड नचौलौं... आब बाद मे नाचक कथा हेतैक |   आई अपना सब विदापत-नाच के आगू बढ़ाबय छी |

नाच करअ वाला एकेटा जगह पर जमा भ झूमअ लागल | धिरिनागि तनका, तिटक-तिटक ध, तिटकल मदगिन धा' | ताल समाप्त भेल आ नाचो शेष भ गेल आ नाचअ वाला सब घोघ तानि दर्शक मंडली मे जा बैसल | नाच मे विकटा बनल छल ओ नाच करनिहार के ताकअ लागल | धृगा-धृगा'...

'धिन-तिनक तिनक, धिन तिनक-तिनक'-- मृदंग बाजल 

'हे समाजियों के सुर मे सुर मिलौलक |

'हे लेल परवेश परम सुकुमारि

हंस गमन वृषभान दुलारि....'

नचनिया सब उठी विकटा लग आबि गेल आ हर्षित भ विकटा ओय ओय ओय ओय केनाई शुरू क देलक | 

'धिन-तिनक तिनक धिन-तिनक तिनक '

'हे ! तन मन बदन पापन सहजोर है दामिनी ऊपर उगलन्हि चाना...' 

नाच अजुका बंद करैत छी फेर आनद उठायल जेतै.....       विदापत-नाच के आब आगूक आनंद उठाऊ... आ प्रितिक्रिया कृपया सेहो व्यक्त अवश्य करू .... जय मिथिला, जय मैथिल, जय मैथिलि, जय मिथिलांचल, जय मिथिलापन, जय मैथिलियता........

नाच करअ वाला सब घोघ हटा लेलकि आ चंद्रमुख ( घुटल दाढ़ी, मोंछ आर बेडोल केहने संके मुंह) देख दर्शको सब हँसैत-हँसैत निहाल भ जैत अछि | नचनिया निचाअ दिस ताकि रहल लाज सँ लज्जावती लता सन सिकुडल नाच क रहल छल वा छली | विकटा ओकरा अपना दिस आकर्षित करअ के कोशिश क रहल अछि | ' हे विहसि उठलि पिऊ दखि सुहागिनी लाज बदन लेल फेरि..' नचनिया विहंस क मुंह फेर लेलक | हंसअ काल मे तमाकुल सेवन सँ जे दांत सब कारि भेल छलय से चमकि उठल | कृपया अहाँ सब शांत भ जाऊ | जी, जी हं, विद्यापति के पदावली भ सकैत अछि, परंच इ छे 'विदापत नाच' |...... न्यू थियेटर्स, विद्यापति, कानन बाला. पहाड़ी सान्याल की... बक-बक बंद कराय जाऊ | आखिर अलाप शुरू कए देलौं, 'मोरे अंगना मे आये आली, मै चाल चलूँ मतवाली'.... अहाँ सब के कतेक बुझौ जे इ 'विदापत नाच' छय आ वो नाच करअ वाला टहलू पासवान, ओकर बाप बड़का डकैत छल | बाप के काला पानी के सजा भ गेलै.. माय केकरो आन सने चलि गेलै आ इ बच्चे सँ नाचअ लागल | अपन जवानी के दिन मे एकर धूम मचल रहित छलय... धूम मचबय छलय धूम | एकर आवभाव देखि त परबतिया अपन बसल बसायल गृहस्थी छोडि एकरा सने रातिये राति पड़ा आयल | हं त टहलू पासवान गाबि सकैत अछि जे...

अंगना आएत जब रसिया 

पलट चलब हम इषत हंसिया 

कान्ह जातां बहु करयिन्ह

लेकिन मोरे अंगना मे आये आली ' से बेचारा की जाने ? धृन्ना धृगा, तिन्ना-तिन्ना -मृदंग आब दोसर ताल बदलि धृन्ना धिग- धृन्ना- धिग- धिरिनंगि- धिरिनंगि- धिरिनंगि- धिरिनंगि...| किन्ना- किन्ना मंजीर सेहो टटल बदलअक | 

'सखि हे...

सखि हे, कि पूछसि अनुभव मोहे 

जनम अवधि हम रूप निहारलौं,

तबहु न तिरपित भेल |"

आब नाचक दृश्य दोसर सीरीज मे ... जय मिथिलांचल.....     जय मिथिला, जय मैथिलि, जय मैथिल, जय मैथिलियता आ जय मैथिलिपन के हमरा सब के अनुसरण के बीच विदापत-नाच कवि कोकिल विद्यापति के स्मरण मे प्रस्तुत करबाक चाहि....

'अरे ? चुप ! चुप !!'--विकटा खिसिया क चुप करा रहल अछि | एक टा समाजी गमछा के कोड़ा बनेनाइ शुरू केलक | विकटा कहनाय आरम्भ केलक जे ओकरा पीट क अनेरे समय बर्बाद कैल जा रहल अछि | जमींदार के जूता खाइत -खाइत ओकर पीठ के चमरी मोट भ गेल छय | ओ अइ लेल मात्र चुप करा रहल छल.. 'कि जन्म भरि केकर रूप निहारैत रहल'... जखन ओकरा बुझावल गेलय जे ओकरे रूप, त ख़ुशी भ तुरंत पॉकेट सँ एकटा छोटका एना निकालि सगर्व सँ अपन मुंह देखअ लागल |

गीत समाप्त भेल, आब विकटा महादेव के बारी छैन |

'हे नेक जी (नायक जी); |

हूँ |

'आब हमसे सुनू' |

'बाप रे, |

बाप रे कोन दुर्गति नहिं भेल |

सात साल हम सूद चुकाओल,

तबहुं उरनि नहिं भेलौं |

कोल्हुक बरद सब खटलौं 

कारज बाढ़त हि गेल |

बारी बेच पटवारी के देलियेंन्ह,

लुटा बेच चौकीदारी | बकरी बेच सिपाही के देलियेंन्ह

'फाटक नाव गिरधारी |' आब आगू वाला सीरीज मे ... जय मिथिलांचल   विदापत-नाच के चारिम सीरीज के आगू बढबैत हम अपना के बड आनंदित अनुभव के रहल छी | हमर अंदाज ठीक अछि से पसंद के क्लिक देखि क बुझ पडैत अछि जे अहुं सब आनंद उठा रहल छी | अस्तु ! नाच शुरू भ गेल अछि किछ बुझलीय अहाँ सब .. अहुं सब पूरा के पूरा फटकनाथ गिरधारी छी | कने दर्शक के देखियोन ने जे ओ सब की बुझलैन जे हँसैत-हँसैत पेट मे दर्द हुअ लगलैन | 

'धृगा-धृगा, धिधिना तिन्ना '....

सखी हे ! 

सखी हे, 

इ माह भादर, भरल बादर,

शुन्य मंदिर मोर |...

सुन्दर ! सुन्दर !!ठीके विद्यापति मैथिल कोकिल....

अहाँ सब फेर भसिया लगलौं, अहुं सब विकटा स कम ने छी | कतबो मना कैल जाय ओकरा जकां सब गीत पर किछ ने किछ सुनाबैय लागै छी | इ लिय विकटा महोदय फेर टपकला...

इ माह भादर, बरिसे बादर,

चुअत छप्पर मोर |' 

'हहा-हहा ...!!' दर्शक मंडली हँसैत-हँसैत लोट-पोत भ रहल अछि | हँ एक टा बात कह्नाय बिसरि गेलौं जे विकटा अपना के कृष्ण बुझैत अछि आ परदेशी साजन सेहो, लेकिन संगहि इहो बात ने बिसरैत अछि जे कि वो कालरू मुसहर अछि,हलहुलिया के रहनिहार आ मनुष्यों रहैत ओ बुझैत छैक जे कोल्हू के बरद सँ बेसी ओकर हैसियत नए छय | नाचअ वाला सब जखन ओकर गर्दन मे बांहि मान- अभिमान सँ प्रेम के प्रदर्शन करैत बुझबैत छय कि ---माधव तजि के चललौं विदेश |' तखनि ओ बिसरि जैत अछि जे वो कृष्ण अछि आ गोकुल सँ मथुरा जा रहल अछि | ओकरा सामने जीवन के विषमता मूर्त रूप भ नाचि उठैत छय आर वो बुझबैत छैक --'नहिं बरसल अदरा (आद्रा नक्षत्र) नहिं अशरेस,

चारु दिस देखय छी बुढ़िया के केश .... 

माछ काछू सब गेल पाताल, 

अब की सखि महा अकाल , 

दिन भरि खटि के एक सेर धान, 

एकरा से कैसे बचत परान, 

छोडि- छोडि सजनि जाइछि विदेश, फेर दोसरे क्षण जखन दर्शक सब गाबअ लागैत छय तेकर दृश्य आगू..............       पैघ के संझुका चरण स्पर्श आ समवयस्क वा कनि-मनि छोट-पैघ के नमस्कार.............. जय मिथिला, जय मैथिलि, जय मैथिल, जय मैथिलियता आ जय मिथिलापन..... विदापत नाच चरम पर पहुँच रहल अछि...सबटा नचनिया इ गीत गेनाय शुरू क देलक.......

'गोद ले बलमा चललि बाजार 

हटिया के लोग पूछे, के लागे तोहार |

सासू जी के लड़िका, ननद के जेठ भाय,

पूर्व के लिखल स्वामी छिक हमार !'

आब विकटा बच्चा जकां जिलेबी, बताशा आर खिलौना लेल छिरिया लागल.. 

अखने एकटा नचनिया गीत गेलक--

'राति जखन भिनसरवा रे ,

पहूं (स्वामी) आयल हमार 

कर कौशल कर कपंइत रे 

हरवा उर डार

कर पंकज उर थपइत रे 

मुखचन्द्र निहार 

विकटा बीचे मे रोकि कअ एकटा समाजी सँ एकर अर्थ बुझबई लेल कहैत छैक आ समाजी खुलि क अय गीत पर टीका करअ लागल | केना नायिका पुआल पर अपन झोपड़ी मे सुतल छलय आ विकटा आयल छल... 

आब नाचक आ गीतक कथा आगू लिखब आशा अछि जे समापन दिस अग्रसर विदापतक नाच के अहाँ सब पहिने जकां पसिन करब...       विदापत-नाच के आब अंतिम दृश्य---------

चलु दर्शक सब के बीच मे... कारी-कारी मोटगर आ गठ्गर देह वाला नवयौवना मंद-मंद मुसकिके दबा आ एक दोसर के केहुनिया-केहुनिया क कनफुसकी करअ मे आनंदित भ विकटा के दिस एक टक निहार रहल छल | अधेड़ उम्र के मौगी सब बनावटी तामस व्यक्त क युवती सब के रोकय चाहैत छैक लेकिन दबल हंसी आ गुद्गुदायल ह्रदय कखन मानय छय.. एम्हर नचनिया सब आलाप क उठल------

'चलु मन, चलु मन ... ससुरालि

जइबै हो रामा,

कि आहो रामा, नैहरा मे 

अगिया लगाइब रे कि...

युवती चंचल भ जाइत छय आ युवक लोकनि के नस मे बिजली दौरअ लगलैन | नाच आब ख़त्म हुअ वाला छैक --

'चलु मन, चलु मन.

धिन.धिनक धिनक, धिन- धिनक धिनक 

कि आहो रामा, नैहरा मे अगिया लगाइब रे कि ...!

डिग डिमिक डिमिक, डिम डिमिक डिमिक ...

अरे इ की ? ओहो चेत्हरू गुंसाई जी छथि | गुंसाई जी कबीर के भक्त छथि | दस-पंद्रह साल पहिने जमींदार साहब के कहला पर ओ झूठ गवाही नय देलकय अय पर जमींदार खिसिया क बेघर गुंसाई जी के कअ देल गेलैन आ तखने सँ 'स=स्ट्रीक बैरागी भ गेला | खंजरी, झोरा और चिमटा, जटा और लम्बा दादी... इ लिय गुंसाई जी खंजरी बजा बजा नचनिया संगे नाच करअ लागल...

'डिग डिमिक डिमिक, डिग डिमिक डिमिक 

कि आहो रामा. नैहरा मे अगिया..

बात इ छय चेत्हरू गुंसाई जी अय गीत के पूरा निर्गुण मानय छैक |

अहा ! ओकर धसल आंखि मे नोर चमकि उठय छय आ नाच समाप्त भ गेल.... जय मिथिला, जय मैथिलि. जय मैथिल, जय मैथिलियता. जय मिथिलापन... ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। १.वनीता कुमारी- विहनि कथा- पुनर्न्वेषण २.ओमप्रकाश झा- विहनि कथा- कपारक लिखल ३.जगदानन्द झा 'मनु' - ५टा विहनि कथा ४. चन्दन कुमार झा- विहनि कथा १. वनीता कुमारी पुनरन्वेषण कनिक देर भऽ गेल छल अन्वेषिका (अन्वी ) के काज पर पहुँचय मे असलमे पहिल बेर तऽ बेसिये पहिने आबि गेल छली से भेलैन जे बाहर नास्ता कऽ क आबि जाथि। कॉलेज के पढ़ाई अखन पूरे भेल छलैन से एकटा सांस्कृतिक परिषद् मे स्टीवार्डक काज पकड़ि लेने छली। कस्टमर सर्विस के अनुभवक संगे मंगनी मे मनोरंजन सेहो होयत छलैन। गेट पर बैसर्ल बैसल लोकक गिनती वा टिकट चेक करू. ककरो किछु जानकारी चाही होय तऽ से दियऊ आ कार्यक्रमक आनन्द लीय।कखनो भारतीय संगीत समरोह तऽ कखनो डायमण्ड जुबली मनाबैत जैज बैण्ड के शो. कखनो आइरिस नृत्य तऽ कखनो जाइव. कखनो बच्चा सबहक नाटक मण्डली तऽ कखनो वृद्ध सबलेल पुरान फिल्म। आहि बॉलीवुड नृत्य सिखाबई वला संस्थानके वार्षिक पुरस्कार वितरण समारोह छल। बाहर सैण्डविच कीनली आ बसे के भोजनालय बूझैत काज दिस भगली तैयो कनी देर भऽ गेलैन।मुदा ई असगर नहिं छली जे देर छली। एकटा आर बालिका जकर पैर में मोच आबि गेल छलै सेहो कातमे बैसल छल।ओ जखन लोक सब अन्दर चलि जैतई तखन गेट लग जाय क बैसतई। अन्वी के मैनेजर ओकरे संगे काज दऽ देलकैन। कार्यक्रम शुरू भेल।मैनेजर कहलकैन जे अहॉं सब बालकोनी के सीट पर बैसू आ लोक सबपर नजरि राखू।अन्वी ओहि रोमन बालिका संगे बालकोनी मे जा कऽ बैसि गेली। ओ बालिका वैशाखी पर छलै। कनिये देर मे सबटा शान्त भऽ गेल आ कार्यक्रम शुरू भेल।इम्हर अन्वीजी के ओहि शान्त बालिका सऽ बातचीत सेहो शुरू भेल।स्वभाविक छलै जे अन्वीजी अपन बात ओकर पैरक स्थितिक कारण पूछैत केलखिन आ ओ होली जे अखने बीतल छल के विषय मे बात करै लागल।ओकर किछु नब सहेली भारतीय छलै जकरा संगे ओ भारतीय अन्दाज मे बात केनाई सीखने छल।ओ होलीमे अपन मित्र सब संगे खूब होली खेलायल छल।बातचीत सऽ अन्वीजीके ज्ञात भेलैेन जे ओकर चेहरा के उदासी मात्र पैरक दर्द सऽ नहिं आयल छहि वरन् ओकरा अपन पुरूषमित्र सऽ दू सालक गड़बड़ायल दोस्ती के कारण सऽसेहो छल। आ एहन समय मे ओकरा अपन नब संगी सब बड़ सहयोगी लागैत छल। ओहि बालिका के भारतीय विशेषतः बॉलीवुड संगीत बड़ रूचिगर लागैत छलै।से ओ बहुत आनन्द लऽ रहल छल संगीत के। बीच बीचमे अपन मायके प्रति कृत्रिम रोष सेहो प्रदर्षित कऽ रहल छल आ ओहि सब अदाकारी मे अन्वेषिकाजीके अपन देशक सुगन्ध आबि रहल छलैन।अतेक विविधता सऽ भरल शहरमे सेहो आइ फेर अन्वीजीके अपन जीवनशैली उत्कृष्ट लागि रहल छलैन। जीवन मे ऊँच नीच तऽ होयते रहैत अछि मुदा ओहि के कोन संस्कृतिमे सबसऽ बढ़िया समाधान छहि से ताक अन्वीजीके उड़ानक सीमा फेर छोट कऽ देलकैन। २ ओमप्रकाश झा विहनि कथा कपारक लिखल शर्माजीक आफिस शनि आओर रवि सप्ताह मे दू दिन बन्न रहै छैन्हि। आइ शनि छल। आफिस बन्न छल आ शर्माजी दरबज्जा पर बैसल छलाह। तावत एकटा भिखमंगा दरबज्जा पर आएल आ बाजल- "मालिक दस टाका दियौ। बड्ड भूख लागलए।" शर्माजी बजलाह- "लाज नै होइ छौ। हाथ पएर दुरूस्त छौ। भीख माँगै छैं। छी छी छी।" भिखमंगा बाजल- "यौ मालिक, पाई नै देबाक हुए तँ नै दियऽ, एना दुर्दशा किएक करै छी। हम जाइ छी।" ओकरा गेलाक बाद शर्माजी खूब बडबडयला। देशक खराप स्थित सँ लऽ कऽ भिखमंगाक अधिकताक कारण आ नै जानि की की, सब विषय पर अपन मुख्य श्रोता कनियाँ केँ सुनबैत रहलाह। दुपहर मे भोजन कएलाक उपरान्त आराम करै छला की कियो गेट ठकठकाबऽ लगलै। निकलि कऽ देखैत छथि एकटा त्रिपुण्ड धारी बबाजी ठाढ छल। हिनका देखैत ओ बबाजी बाजऽ लागल- "जय हो जजमान। दरिभंगा मे एकटा यज्ञक आयोजन अछि। अपन सहयोगक राशि पाँच सय टाका दऽ दियौक।" शर्माजी- "हम किया देब?" बबाजी- "राम राम एना नै बाजी। पुण्यक भागी बनू। फलाँ बाबू सेहो पाँच सय देलखिन्ह। अहूँ पुण्यक भागी लेल टाका दियौ।" शर्मा जी- "हमरा पुण्य नै चाही। हम नरक जाइ चाहै छी। अहाँ केँ कोनो दिक्कत? बडका ने एला हमरा पुण्य दियाबैबला।" ओ बबाजी बूझि गेल जे किछु नै भेंटत आ ओतय सँ पडा गेल। साँझ मे शर्माजी लाउन मे टहलै छलाह। सामने सँ तीन टा खद्दरधारी ढुकल आ हुनका प्रणाम कऽ कहलक- "विधान सभाक चुनाव छैक। दिल्ली सँ फलाँ बाबू एकटा रैली निकालबाक लेल आबि रहल छथि। ऐ मे बड्ड खरचा छैक। अपने सँ निवेदन जे दस हजार टाकाक सहयोग करियौक।" शर्माजी बिदकैत बाजलाह- "एहि लाउन मे टाकाक एकटा गाछ छै। अहाँ सब ओहि मे सँ टाका झारि लियऽ।" एकटा खद्दरधारी बाजल- "हम सब मजाक नै कऽ रहल छी आ आइ कोनो बहन्ना नै चलत। टाका दियौ अहाँ। अहाँक बूझल अछि ने जे हमरे सभक पार्टीक सरकार छै। अहाँक बदली तेहन ठाम भऽ जायत जे माथ धुनबाक अलावा कोनो काज नै रहत।" शर्माजी गरमाइत बाजलाह- "ठीक छै हम माथ धुनबा लेल तैयार छी। अहाँ सब जाउ आ बदली करबा दियऽ। निकलै छी की पुलिस बजाबी।" खद्दरधारी सब धमकी दैत ओतय सँ भागि गेल। रातिक तेसर पहर छल। शर्माजी निसभेर सुतल छलाह। एकाएक हुनकर निन्न ठकठक आवाज पर उचटि गेलैन्हि। कनियाँ केँ उठा कऽ कहलखिन्ह जे कियो दरबज्जाक गेट तोडि रहल अछि। दुनू परानी डरे ओछाओन मे दुबकि गेलैथ। तावत गेट टूटबाक आवाज भेलै आ टूटलहा गेट दऽ कऽ सात टा मोस्चंड शर्माजी केँ गरियाबैत भीतर ढुकि गेलै। सब अपन मूँह गमछी सँ लपेटने छल। एकटाक हाथ मे नलकटुआ सेहो छलै। बाकी दराती, कुरहरि, कचिया आ लाठी रखने छल। एकटा लाठी बला आबि कऽ हुनका जोरगर लाठी पीठ पर दैत कहलकन्हि- "सार, सबटा टाका आ गहना निकालि कऽ सामने राख। नै तँ परान लैत देरी नै लगतौ।" शर्माजी गोंगयाइत बजलाह- "हमरा नै मारै जाउ। हम हार्टक पेशेन्ट छी। इ लियऽ चाबी आ आलमीरा मे सँ सब लऽ जाउ।" ओ सब पूरा घर हसौथि लेलक। पचास हजार टाका आ दस भरि गहना भेंटलै। फेर हिनकर घेंट धरैत डकूबाक सरदार बाजल- "तौं तँ परम कंजूस थीकैं। कतौ खरचो तक नै करै छैं। एतबी टाका छौ। सत बाज, नै तँ नलकटुआ मूँह मे ढुका कऽ फायर कऽ देबौ।" इ कहैत ओ नलकटुआ हुनकर मूँह मे ढुकेलक। ओ थर थर काँपैत बाजऽ लगलाह लैट्रिनक उपरका दूछत्ती मे दू लाख टाका आ बीस भरि गहना राखल छै। लऽ लियऽ आ हमरा छोडि दियऽ। सरदार दू जोरगर थापर दैत कहलकैन्हि आब लैन पर एले ने, आर कतऽ छौ बाज। शर्माजी किरिया खाइत बजलाह आब किछो नै छै बाबू, छोडि दियऽ हमरा। डकैत सब सबटा सामान समटि कऽ विदा भऽ गेल। थोडेक कालक बाद हिम्मति कऽ कऽ ओ चिचियाबऽ लगलाह- "बचाबू, बचाबू डकूबा........।" अडोसी पडोसी दौगल एलथि। कियो पुलिस बजा लेलक। पुलिस खानापूर्ति कऽ कऽ चारि बजे भोरबा मे चलि गेलै। शर्माजी अपन माथ पीटैत बाजै छलाह- "आइ भोरे सँ शनिक कुदृष्टि पडि गेल छल। कतेको सँ लुटाई सँ बचलौं, मुदा कपारक लिखल छल लुटेनाई से लुटाइये गेलौं।" ३ जगदानन्द झा 'मनु' ग्राम पोस्ट- हरिपुर डिह्टोंल, मधुबनी विहनि कथा 1- बलिक छागर बिवाहक मंडप, चारू-कात हँसी- मजाक, हर्ष-उल्लासक वातावरण, मुदा दूल्हा चूप,शांत | बराती में सँ एक दोस्त दोसर सँ -"बताऊ एतेक खुशिक वातावरण में सब प्रसन्य अछि परञ्च वरक मुँह पर खुसी नहि देखा रहल अछि किएक ?" दोसर दोस्त भांगक नसा में हिलैत-डूलैत -"भाई बलि सँ पूर्व छागर कएतौ प्रसन्य रहलैए |" 2-जगह महानगरीय जिवन के अव्यवस्थित आ व्यस्त जिवन में समाय के आगु लचार आजुक जिवन शैली | रामप्रकाश के माय अपन बेटा-पुतौह आ पाञ्च बर्खक पोता कए दर्शन आ किछु दिन हुनक संग बिताबैक लोभ में अपन गाम सँ दिल्ली रामप्रकाश लग एलथि | रामप्रकाश एहिठाम सरकारी दू कोठलीक मकान में रहै छथि | माय कए आगमनक बाद, जगह कें दिक्कत कारणे हुनकर ओछैन बालकोनी में एकटा फोल्डिंग खाट पर लगाएल गेल | राति में एसगर निन्द कें अभाबे करट बदलैत, माय कें मन में ओहि दिनक सुमरण आबि गेलैन्ह, जखन गामक फुश कें एक कोठलीक घर में केना ओ दुनु बियक्ति अपन तिनटा बच्चा संगे गुजारा करैत छलथि, मुदा आई एहिठाम ओ बच्चा दू कोठलीक घर में मायक निर्वाह में असमर्थ बालकोनी में ओछैन केलक | माय कें आँखि सँ नोरक बूंद  टपकैत, नै जानि केखन  आँखि लाइग गेलैन्ह | 3-खुसी कलुआही, बुध दिनक हटिया, चारुकात  भीर-भार, बेपारी आ खरीदारक हल्ला-गुल्ला, कियो बेचै में व्यस्त तs कियो कीनै में मस्त | दीनानाथजी अपन कनियाँ संगे हटिया में प्रबेश कएलथि | हाटक मुँहे पर एकटा सात-आठ बर्खक बच्चिया हाथ में धनी-पात लेने हल्ला करैत -"एक रुपैया कें दू मुठ्ठी, एक रुपैया कें दू मुठ्ठी" मुदा सब कियोक ओकर बातकें अनसुना करैत हाटक भीर में बिलीन भेल जाएत | दीनानाथजी सेहो ओकर बात कें सुनैत हाटक भीर में मिल गेलाह | दू  घंटा बाद, जखन दीनानाथजी अपन खरीदारी पूरा केलाक बाद हाटक मुँह पर वापस  एला तs देखला, धनी-पात बाली बच्चिया पूर्ववत असगरे हल्ला करैत | दू मिनट मोन भय ओहिठाम ठार भेला | हुनक कनियाँ -"चलून धनी-पात तs अपने बारी में बड्ड अछि " दीनानाथजी -"कनी रुकू ", कहैत आगु धनी-पात बाली बच्चिया सँ -"कोना दै छिही बुच्ची" बुच्ची-" बाबु एक रुपैया कें दू मुठ्ठी, मुदा एखन तक किच्छो नै बिकेल, अहाँ एक रुपैया कें  तिन मुठ्ठी लय लिय " दीनानाथजी -"सबटा कतेक छौ" बुच्ची गनैत -"एक,दू,- - सात, आठ  - - - बारह,तेरह - - - उनैस, बीस,  बीस मुठ्ठी बाबूजी " दीनानाथजी -"सबटा दय दे " कनियाँ -"हे-हे की करब ?" दीनानाथजी कनियाँ कए इशारा सँ चुप करैत, अपन कुर्ताक जेबी सँ एकटा दस रुपैयाक नोट निकालि कs बुच्ची कें देला बाद धनी-पात लैत, ओहिठाम सँ बिदा भय गेला | घर अबैत, दलान पर बान्हल जोड भैर बरद, हुनक आहटे सँ अपन-अपन कान उठा कय मानु सलामी देबअ लागल | ओहो आगु आबि कs स्नेह सँ दुनु कें माथ सहलाबैत,अपन झोरी सँ धनी-पात निकालि नाईद में दय देलखिन्ह | कनियाँ-"ई की कएलहुँ दस रुपैयाक धनी-पात बरद कए दय देलियै, एतेक कए घास लैतहुँ तs बरद भैर दिन खैतए " दीनानाथजी -"कोनो बात नहि दस रुपैया तs सभ कें देखाई छैक मुदा ओई धनी-पात बाली बच्चिया कें मुँह पर जे असंतोस,निरासा आ दुखक भाब रहैक ओ केकरो नै देखाई | आ देखलीयै बिकेला बादक खुसी, ओई खुसिक मोल कतौ दस रुपैया सँ बेसी हेतैक |" 4- आठलाखक कार कलुआही  जयनगर राजमार्ग, बरखाक समय, पिचक काते-कात खधिया सब में पानि भडल | दीनानाथजी आ हुनक जिगरी दोस्त रामखेलाबनजी, दुनू गोटा अपन-अपन साईकिल पर उज्जर चमचमाईत धोती-कूर्ता पहिर, पान खाइत, मौसमक आनन्द लैत बतियाइत चैल जाइत रहथि | कि पाछु सँ एकटा नव चमचमाईत बड्डका एसी बुलेरो कार दीनानाथजी कें उज्जर धोती-कूर्ता पर थाल-पानि उड़बैत दनदनाईत आगु निकैल गेल | दुनु   दोस्तक साईकिल एका-एक रुकल | रामखेलाबनजी हल्ला करैत कारबलाकें गरिएनाई शुरू केलैन्ह | दीनानाथजी- "रहए दियौ दोस्त किएक अपन मुँह खराप करै छी, एसी कार में बंद कि सुनत, भागि गेल | ओनाहो ओ आठ लाखक कार पर चलैत अछि, हम आठ सय कें साईकिल पर छी तs पानि- थालक छीत्ता तs हमरे परत |" 5- कुण्ठित मानवता घर में मुरारीजिक कनियाँ अपन आठ बर्खक बेटा आ पाञ्च बर्खक बेटी कें कोनोना सम्हारै में लागल, मुदा हुनक मोनक भाव सँ साफ देखा रहल छल जे हुनकर मोन पुर्णतः मुरारीजी पर लागल छलैन, जे की रातिक दस बजला बादो एखन तक नोकरी सँ घर नहि एलथि | कोनोना दुनु बच्चाकें सुतेलथि | समयक सुई सेहो आगु वरहल | दस सँ एगारह बाजल | हुनक मोन में संका सबहक आक्रमण भेनाई स्वभाबिक छल | इना त एतेक राति पहिले कहियोक नहि भेलै | सहास करैत घर सँ बाहर निकैल, अपन भैंसुरक अंगना पहुँचली | हुनका सब कें कहला बाद शुरू भेल युद्धस्तर पर मुरारीजिक खोज | मुदा सब मेहनत खाली मुरारीजिक कोनो पता नहि | हुनक आडामिल जाहिठाम ओ काज करैत छलथि सँ ज्ञात भेल जे हुनक छुट्टी तs साँझु पहर पाँचे बजए भs गेल रहैन आ ओ अपन साईकिल सँ एहिठाम सँ बिदा सेहो भय गेल रहथि | तकैत-तकैत भोरे चारि बजे हुनक मृत-देह पिपरा घाटक सतघारा बला धूरि पर भेटल | देखते मातर सबहक हाथ-पएर सुन्न | कनाहोर मचल | बाद में स्थानीय प्रतक्षदर्शी सँ ज्ञात भेल की ओ एहिठाम साँझ कए साते बजे सँ छथि, किछु गोटे हुनका हाथ-पएर मारैत देखि बजैत रहेजे -'बेसी शराब पि क' ड्रामा कय रहल अछि |' मुदा हाय रे कुण्ठित मानवता कियोक हुनक बास्तबीक कारण बुझहक प्रयास नहि कएलक, नहि तs ओ एखन जिबैत रहितथि | हुनका तs एपेडेंसीक दर्दक बेग रहैन आ समय पर उपचार नहि हेबाक कारणे ओ चलि बसला | ४. चंदन कुमार झा सररा, मदनेश्वर स्थान मधुबनी, बिहार विहनि-कथा -बुच्चू भइया करमान लागल लोक..अनघोल भेल सौंसे गाम..जकरे देखू तकरे आँखि मे नोर..सगरो संताप पसरल..नहि रहलथि बुच्चू भैया आब एहि दुनिया मे.पचासी बरखक अवस्था भ गेल रहन्हि तइयो सभ बुच्चू भइये कहैत छलन्हि. नेना-भुटका, जर-जवान, बुढ-पुरान,स्त्री-पुरूख..सभक भैया..बुच्चू भैया छलाह. अनकर कोन कथा अपनो बेटा-पोता सभ त' बुच्चू भइये कहैत छलन्हि.कोनो बेशी पढल-लिखल नहि छलाह मुदा बेबहारिक गेयान सँ परिपूर्ण.समाज मे घुलल-मिलल लोक.ककरो-कहियो कोनोटा खराप नहि सोचलखिन्ह जीवन भरि.सभके हरदम नीके रस्ता देखबैत रहलाह.भरि गाम मे ककरो ओहिठाम कोनो तरहक दसगरदा काज मे बिन-बजौनहु पहुँचि जाइत रहैत.कोनो तरहक राग-द्वेश नहि.एकदम शुद्ध-मना.एही गुण सभ दुआरे तऽ एतेक सम्मान भेटै छलन्हि सभठाँ.अनकर कोन कथा बड़का पण्डिजी सेहो हिनकर मान करै छलखिन्ह.उमेर मे नमहर रहितौ ओहो बुच्चुए भइया कहैत छलखिन्ह. दलान पर कुरसी लगा बैसल बुच्चू भइया...अबैत जाइत लोक..के छोट..के पैघ..सब बइस रहैत छल  हुनका सँ दू आखर सुनबा लय..... जिनगीक उँच-नीच गुनबा लय.....खिस्सा-पिहानी सुनबा लय.कल्ला तर पान..ठहक्का मारैत बुच्चू भइया नजरि के सोझाँ ओहिना नाचि रहल छथि.आँखि हमरो नोरा गेल. माँझ अँगना उत्तर मूँहे सूतल छथि बुच्चू भइया.मूँह पर एखनो हँसी पसरल..दिव्य ललाट. गौदान-वैतरनी भ' गेल...बाँसक रथ सवार बुच्चू भइया विदाह भेल छथि अंतिम यात्रा पर...कन्नारोहट उठल सगरो..शांत बुच्चू भइया ..आइ नहि पोछलखिन्ह ककरो नोर.सिरहौना-पोछौना..आमक लकड़ी बोझल गेल..सभ काठी चढौलक श्रद्धांजलि-सवरूप.मुखाग्नि पड़ल..सरर..धुमन..गमकथि बुच्चू भइया.चर्चा-परिचर्चा..केयो बजलइ-"एकबेर बुच्चू भइया के कोनो बात लेल तामश उठि गेलनि.बौसति कियो कहलकन्हि -अहूँ के बड्ड तामश उठैत अछि. हमरा त़ऽ हरदम तामश उठले रहैत अछि, चट्ट दऽ कहने रहथिन्ह बुच्चू भइया"-सभ हँसऽ लागल...धधरा जोर भऽ गेलइ..हँसैत बुच्चू भइया. ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। अतुलेश्वर पाग, मिथिला आ जातिवादक राजनीति- असममे एहि बीच चलि रहल बिहू पर्व  कोनो जाति वा धर्मसँ बान्हल नहि अछि। कहि सकैत छी एहि पावनिक अवसर पर सम्पूर्ण असामबासीक मोनमे एकेटा शब्दक संचार होइछ आ से थिक प्रेम। प्रेम छैक प्रकृतिसँ, लोकसँ, सभ जीव-जन्तुसँ। एहिमे ने कतहु कोनो बान्ह छैक आ ने कोनो सीमा। सभगोटए एहि पुनीत अवसर पर अपन निष्ठा आ सिनेहकेँ एहि रूपें उपस्थापित करैछ, जे लोकक मोनमे ई अभिलाषा वर्षोभरि जोर मारैत रहैत छैक जे बिहू कहिआ आओत आ हम सभ फेर एहि पाबनिकेँ प्रेम-भावसँ मनायब। हुनका लोकनिक मोनमे कतहु एहि विषयक चर्चा नहि जे बिहू कत’ सँ आयल, ई ककर छी, ओ सभ तँ मात्र एतबे जनैत छथि जे ई प्रेमक पाबनि थिक। जापी,गमोछा, बिहू गीत ई किनकर, एहि पर कोनो माथापच्ची नहि, मात्र पावनिक ई सरंजाम असमियाक प्रतीक थिक। एहि प्रसंगकेँ एतए उठएबासँ हमर मतलब अछि जे आइ काल्हि, खासकए मिथिलामे, किछु युवा तुर्क लोकनि विषय बिना बुझने अपन ज्ञान झाक उपयोग प्रारम्भ कए दैत छथि। एम्हर देखल गेल अछि जे किछु गोटे पागकेँ एकटा जाति सँ बान्हि मिथिलाक अस्मिता पर चोट क रहल छथि, प्राय: हुनका अस्मिताक महत्ता ज्ञात नहि छनि। किछु दिन पूर्व पागक मादे मनोज कर्ण उर्फ मुन्नाजी कहलनि जे ई ब्राह्मण आ कर्ण कायस्थक उपयोगक छी। मुदा, एतए हमर कहब अछि जे ओ आजुक गुटबाजीसँ प्रभावित भए ई व्यथा व्यक्त कएलनि, हुनका प्राय: खूब नीक जकाँ बूझल हेतनि जे पाग सम्पूर्ण मिथिलाक गौरवक प्रतीक थिक, प्राय: हुनका देखल होएतनि जे मिथिलाक सभ जातिक लोक अपन बिआहमे एकर उपयोग करैत छथि, से चाहे घुनेसक भीतरमे हो वा मौरक। सत्य पूछी तँ एहन-एहन सोचक कारणेँ हमरा कखनो-कखनो डर लगैत अछि जे ई सभ कखनो इहो कहि सकैत छथि जे विद्यापति मात्र जाति विशेषक साहित्यकार  थिकाह, मखान मात्र जाति विशेषक उपयोगक वस्तु थिक, धोती पहिरब तँ जाति विशेष कर्त्तव्य थिक आदि-आदि। एहि विषय पर सोचला पर लगैछ जे जखन सामंत अपनहिंमे लड़ि कमजोर हुअए लगैत छथि तँ ओसभ एकटा नव कूटनीतिक चालि  चलि शोषितक नेता बनि  हुनका माध्यमे अपन काज सुतारबाक प्रयास प्रारम्भ कए दैत छथि आ तेँ इहो सोच हमरा जनैत ओही नव धाराक सामंती सोचक उपजा छी। किन्तु हुनका लोकनिकेँ आब सावधान भ जएबाक चाहियैन्ह जे अपने कतबो फुटक राजनीति करब, अपन काज सुतारबाक लेल हाथ-पएर मारब, मुदा कार्यसिद्धि असम्भव। आब मिथिलाक आमजन अपन अधिकार आ अस्मिताक प्रति सचेत-सचेष्ट भए गेल छथि। तैँ ई पाग, मखान, माछ कोनो जाति विशेषक संपत्तिक घोषणा करबासँ पूर्व ई सोचि लेब आवश्यक जे ई मिथिलाक अस्मिता छी आ एहि पर सभ मैथिलक अधिकार छैक। अन्तमे मिथिलामध्य जुड़-शीतल चलि रहल अछि , गाछ-बीरिछ क जड़िमे पानि देल जा रहल अछि, सभ अपन पूर्वज आ अपनासँ छोटकेँ जुड़ा रहल छथि आ एहने समयमे हमरा मोन पड़ैत अछि युवा साहित्यकार धीरेन्द्र प्रेमर्षिक लिखल ओ आखर – “भेल प्रेमक रौदी एहि जगमे तेँ धधकए सभतरि दावानल जुड़शीतलक जल-थपकीसन बरिसाउ प्रिये कने प्रेमक जल.....।” (मौर कोढ़िलाक बनैत अछि आ पागसँ फराक अछि। कर्ण कायस्थमे सेहो सिद्धान्त कुमरम आदिमे मात्र पाग पहीरि कऽ विध होइत अछि, ओहो सभ बियाह करऽ पाग नै मौर पहीरि कऽ जाइत छथि। पूर्णियाँक ब्राह्मणमे नव-विवाहिता बरसाइतमे मौर पहीरि कऽ वटवृक्ष धरि जाइत छथि। पाग मात्र आ मात्र मैथिल ब्राह्मणक बियाहक विध-बाधक प्रतीक अछि। विजय कुमार ठाकुर लिखै छथि: "मिथिलाक धार्मिक क्षेत्रमे एहि सामन्तवादी युगीन धार्मिक विचारधाराक प्रभाव एहन सर्वव्यापी छल जे एखनहुँ एहि परम्पराक निम्नलिखित अवशेष समाजमे विद्यमान अछि: ...(घ) पाग सेहो तांत्रिक विचारधारासँ सम्बद्ध अछि।" (मध्यकालीन मिथिला पृ.२६) - सम्पादक) ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। रवि भूषण पाठक ओक्‍कर तोहर हम्‍मर सपना- ३ जेठक पोखरि सभ प्राय: सूखि जाइत छैक ,मुदा एकदम सूखले बूझि यदि पोखरि कें पार कर’ लागब ,तखन पएर कनि कनि धस’ लागत आ एक क्षण रूकि कें अपन दू‍नू हाथ सँ एक कोबा माटि हटा के देखिअओ .....तुरत्‍ते जलक धार अपन उपस्थिति सँ अवगत करा देत..... भिजा के , गरमी सोखि के आ अहांक भ्रांत धारणा मे अपन विनम्र हस्‍तक्षेप करैत ,तें अओ बाबू भैया सत्‍य ओएह नइ थिकइ जे आंखिक समक्ष हो ....सत्‍य कने उद्योगक मांग सेहो करैत छैक ।तें हम अपन गामक परिचय कोना दी ,बड्ड अशौकर्य मे पड़ल छी । ई गाम मिथिलाक ,भारतक आ ब्रह्मांडक एकटा सधारण ग्राम .....अपन खेती-बाड़ी ,खान-पान ,गीत-नाद ,बोली-वाणी ,सामूहिकता क’ विभिन्‍न कसौटी पर ...एकटा सधारण ग्राम ।एकर चर्चा कोना शुरू कएल जाए , टोल सँ ,जाति सँ ,खेत-पथार सँ ,बड़का लोकक स्‍वघोषित महानता वा छोटका लोक पर आरोपित ओछपन सँ...... सब मिलाके एके बात छैक ।पहिले टोल सॅं शुरू कएल जाए ।चारू दिशा क’ नाम पर चारि टोल ,उत्‍तरवारी ,दक्षिणवारी ,पूवारी ,पछवारी अथवा डीह टोल ।दिशाधारित ऐ विभाजनक अलावे बभनटोली ,गुअरटोली ,चमरटोली ,दुसधटोली आ राजपूतक एकटा अलगे टोल ।दुसाधक तीनटा बिखरल बिखरल टोल ,तहिना चमार सभ सेहो दू ठाम समटल.....। विभिन्‍न टोलक प्रति आन टोलक नवीन नवीन रूख ,नवीन दृष्टि आ ओकर चर्चा मे एकटा अपमानजनक टोन ।जेना उत्‍तरवारी टोल अपना मूने सबसॅं बेशी सुसभ्‍य ,दक्षिणवारी टोल सबसँ बेशी लंठ ,पूवारी टोल सबसँ बेशी एडवांस आ डीह टोल सबसँ बेशी जेनुइन छलै ओ दोसर टोलक हिसाबें उत्‍तरवारी टोल मे सबसँ बेशी बतहपन ,दछिनवारी टोल मे मूर्खता ,पूवारी टोल मे दिखाबा आ डीह टोल मे उत्थरपन भरल रहै । आ एहिना मूल ,गोत्र आ बैसारी क’ हिसाबें  सेहो अपना के नीक ,सभ्‍य आ दोसर के ओछ ,असभ्‍य मानबा के बहुत रास घटना ,कहबी ,वृतांत......आ जखन एक जाति मे एते बखरा तखन पूरा गाम मे कतेक .........ओना आपुसी गपशप मे पूरा गाम गामे छलै आ नीक-खराप दूनू साथे चलैत छलै.......

 उमा बाबू भूगोल पढ़ाथिन त’ टंगड़ी हिलबैत रहथिन आ मोटका करची क’ सटक्‍की सँ अपन तरवा पर हरदम चलाबैत रहथिन जेना कि केओ मजूर अपन हांसू के पिजबैत छैक  ....ओ कहथिन जे आबादी बसै आ घरक समूहक गठन एकटा खास पैटर्न पर होए छैक आ विश्‍वक विभिन्‍न भागक लोक सब अलग-अलग पैटर्न पर अपन निवास बनबैत छैक ,उमा बाबू ईहो कहथिन जे यदि केवल भारते के देखल जाए त’ उत्‍तर भारत आ दक्षिण मे असंख्‍य पैटर्न ........गंगा ,गोदावरी ,रावी,गंडक ,कोशी सभक पेट मे अलग अलग श्रृंगार ।केवल मिथिले नइ मिथिलो मे समस्‍तीपुर के देखियौ उत्‍तर मे अलग आ दक्षिण मे अलग ।उत्‍तर मे घर पर घर आ सटल सटल टोल ,जखन कि दक्षिण मे हटल हटल घर ।विशाल खेत आ तखन एकटा दूटा घर ,खूब फैलल गाछी बिरछी तखन किछुए टा घर ।आ घरक अवस्थिति केहन त’ पोखरि ,रोड वा मंदिरक आस-पास ।अपने गामक विचार करियै त’ पूरा ब्राह्मणक आबादी नबकी पोखरि ,नौला आ बरी पोखरिक चारू कात वा फेर डीह पर कचहरी ,इसकूलक चारू कात आ रोसड़ा-बहेड़ी मार्ग पर । आ सबसँ उस्‍सर ,बंजर ,सक्‍कत जमीन पर चमार आ दुसाधक आबादी ,एकदम बबूर जँका ,कत्‍तउ जनमि जाइत हो ,खेतक आडि़ पर ,पोखरिक मोहार पर ,गाछीक खत्‍ता मे लोकपरिया पर ,पीचरोडक दूनू कात आ श्‍मशान मे सेहो........ने खाद देबाक काज आ ने पानि देबाक चिंता।मुदा सबसँ सक्‍कत , सूर्य भगवान आ सभ्‍यताक समस्‍त गरमी के सोखैत जहिना के तहिना ......एकदम हरियर पत्‍ती .......बाभनक दांत पर घुस्‍सा मारैत ,भोर सांझ.......आ जखन सभ हरियरका जजाति सूखि जाइत हो तखन बबूरक पत्‍ती आ ओकर फअर सभक जान बचाबैत........तहिना चमार आ दुसाध सेहो अपन छोट दुनिया मे एकदम मस्‍त आ हरियर । गामक सब सरल गेन्‍हायल पानि ,गनगी बरसा आ बिना बरसा के पूबरिया ढ़लान होयत चमरटोली दिस चलि जायत ।आ चमरटोली जे गामक पूबरिया सीमान पर बसाएल गेल छलै ,समस्‍त अग्राह्य सेवा क’ लेल ,जत’ के लोक सभ के ई कहबाक अधिकार नइ छलै जे अओ बाबू अपन देहक ,घरक ई दुर्गन्‍ध हमरा दिसि किएक बहा रहल छी \ ई आबादी जेकर पेट ,देह आ मोनक चर्चा तक अश्‍पृश्‍य छलै .....देहे नइ मोन तक छुआ जाए वला .....गंगा जल ,नइ गंगो जल नइ पवित्र करत ,हड्डी तक छुआए वला गनगी.........स्‍मृति आ वर्णगत विभिन्‍न श्‍लोक ,कहबी ,हवा-पानि ,भूत-प्रेत पर्यंत तक फैलल...... यद्यपि चमार सब पूरबिये सीमान पर समटि गेल छलै ,मुदा दुसाध सब जीयत रहै ,डीहक सक्‍कत जमीन पर ...आ जेकरा जीन मे घुसल रहै संकट निवारण लेल साहस ,उद्योग ,आ ओ सप्‍पत खेने रहै अपन राजा जी के .....राजा जी हुनकर कुल देवता नइ रहथिन ,ओकर अप्‍पन राजा जी ,हँ मिथिलाक आदिवासी दुसाधक राजा जी .....आ राजा जी पहिले महल ,गद्दी ,दरबार छोड़लखिन आ किताब ,पुरातत्‍व सँ सेहो हुनकर निशानी मिटि जाइत रहल.....मुदा राजा जी बसल रहलखिन दुसाध सभक करेज मे - कते घोड़ा तोहर राजा कते दुश्‍मनमा के धरती चलै अकाश हो........ आ राजा जी आ राजा जी क· घोड़ा दूनू अपन मूल स्‍वरूप के पानि जँका छोडि़ देने रहै आ राजा जी मने घोड़ा आ घोड़ा मने राजा जी ,तें घोड़ा चढ़एबा क पूजा बेशी धूमधाम सँ होइत छलै आ राजा जी वला उत्‍सव दुसाध सभ मे एकटा खास उत्‍साह,आत्‍मविश्‍वास जनमाबैत छलै ,मुदा राजा जीक मन्दिर कोन ठाम बनै,विद्यालय पर ,आचार्यक डीह पर वा दुसधटोली मे ......ई खिस्‍सा कनेक बाद......... अपन गामक चर्चा कोना करी ,खूब मीठ प्रशंसा सँ .....जेना कि केवल मीठे-मीठ अनुभव होए ।केवल मीठ अनुभव तखने संभव ,जखन कि एक-दू दिनक लेल पिकनिक पर आयल जाए ,मुदा जखन जिनगीए बिताबै के अछि तखन केवल मैथिली शरण गुप्‍त क भंगिमा ल· के कोना जीयब आ बात बात मे ग्रामीण जीवन ,भारतक प्राचीनता आ महानता क पाठ कोना कएल जाए .....आ मैथिली मे सेहो गुप्‍त जी नइ मैथिली शरण सभक कमी नइ ,जे बात बात मे मिथिलाक महानताक बखान करैत रहता ,हुनकर ग्रामीण जीवन क फॉर्मेट पहिले सँ सुनिश्चित रहै छैक ,केवल विवरण भरबाक काज......छोड़ू ऐ सब कें.......चलू हम अप्‍प्‍न डायरीक ई पाठ अहींक कविता सँ प्रारंभ करैत छी ।

(आगूक तीन-चारि टा पन्‍ना फाटल अछि) क्रमश: ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। श्यामसुन्दर शशि झूमि उठल जनकपुरवासी

युवा नाट्यकला परिषद परवाहा देउरी बिक्रमी शम्वत २०६९के पूर्व सन्ध्यामे अन्तरराष्ट्रिय मैथिली नाटक महोत्सव आयोजन कएलक जकर उदघाटन गणतन्त्र नेपालक पहिल राष्ट्रपति डा.रामवरण यादव कएलनि । महोत्सवमे नेपाल आ भारतके आठ गोट नाट्य समूह सहभागी भेल । चारि दिवसीय महोत्सवके समापन तथा नयॉ वर्ष २०६९के स्वागतमे मिथिला नाट्य कला परिषद एवं रामानन्द युवा क्लवक कलाकारलोकनि रंगारंग सांस्कृतिक कार्यक्रम सेहो आयोजन गएने छल । जाहिमे मिनाप अध्यक्ष सुनिल मल्लिक,नेहा,ललित कामत,संगीता देव, नवीन मिश्रआदि गायक गायिकालोकनि अपन स्वरक जादूस‘ दर्शकके मन्त्रमुग्ध कद्र देने छल । महोत्सवक अन्तिम दिन मिथिला अनुभूति दरभंगा श्याम भास्कर लिखित तथा निर्देशित ‘हमर गाम’नामक नाटक मञ्चन कएने छल त रामानन्द युवा क्लव अवधेश पोख्रेल लिखित तथा पि चन्द्रशेखर आ बिएन पटेल निर्देशित ‘मर्जीवा’नाटक मञ्चन कएने छल । दुनू नाटकमे समाजक भहरैत सामाजिक मूल्य मान्यता आ धनक पाछॉ अपस्यांत लोकक कथा वर्णित छल । महोत्सवके तेसर दिन अर्थात वृहस्तपति दिन मञ्चित दू नाटकमे मिथिलाक दूगोट लोकनायकके कथा वर्णित छल । बिराट मैथिली नाट्यकला परिषद विराटनगरद्वारा प्रदर्शित ‘महाकंजुस’ नामक नाटकमे मिथिलाक लोकनायक गोनू झाक बहुचर्चित हास्य कथा वर्णित छल । एहि नाटकके संकलन आ निर्देशन युवा प्रतिभावान नाटककार रामभजन कामत छलाह त चेतना अभियान जनकपुरद्वारा मञ्चित ‘भैया अएलै अपन सोराज’ मे मुसहरजातिक लोक नायक दीना आ भद्रीक कथा वर्णित छल । नाटककार रामभरोस कापडि लिखित तथा सुनिल यादव निर्देशित ई नाटक ऐतिहासिक महत्वक छल । दोसर दिन प्रतिविम्व नाट्य समूह अवधेश पोख्रेल लिखित ‘कम्मो डार्लिंग’ एवं सीमावर्ती मधुवनीक मिथिला अनुभूति नाट्य समूह महेन्द्र मलंगिया लिखित ऐतिहासिक नाटक ‘नसवन्दी’ प्रदर्शन कएने छल । महोत्सवके पहिल दिन भारत सहरसाक पंचकोशी नाट्य समूह हरिमोहन झाक कथापर आधारित ‘पॉचपत्र’ आ मिथिला नाट्यकला परिषद जनकपुर रमेशरंजन झा लिखित तथा अनिलचन्द्र मिश्र निर्देशित‘बुधियार छौडा आ राक्षस’नामक नाटक मञ्चन कएने छल । मिनापके नाटक शिल्प आ अभिनयके दृष्टिस‘ वेजोड छल ।

नाट्य महोत्सवके किछु तस्वीर सेहो तस्वीर श्यामसुन्दर शशि,कान्तिपुर ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। १.सुजीत कुमार झा -नाटकप्रति रंजुमे गजबकेँ समर्पण छल २.सुमित आनन्द- शोध-पत्रिका मैथिली एवं मैथिली काव्यमे अलंकारक लोकार्पण १ सुजीत कुमार झा नाटकप्रति रंजुमे गजबकेँ समर्पण छल

जनकपुरक रामानन्द चौकक बम विस्फोटक समाचार छायांकन करय जनकपुर अञ्चल अस्पतालमे सोमदिन पहुँचते छी की पत्रकार बटुक नाथ झा कनैत बाजल रंजु दिदी मरि गेलै । अए मिनापक रंजु .........हमरा मुहँ सँ एहि सँ बेसी नहि बहराएल । हमरा फुराइए नहि रहल छल बटुककेँ कोना सान्त्वना देल जाए । खुन सँ लतपत रामानन्द युवा क्लवक पूर्व अध्यक्ष रमेश ठाकुर सेहो रंजुकेँ की भेलैक पुछि रहल छलथि । कल्पनो नहि छल रंगमंचक हस्ती रंजु झा हमरा सभ लग सँ अतेक जल्दी चलि जएती । रंजु संग रंगमंचमे प्रवेश कएलाक किछुए दिनकबाद परिचय भेल छल मुदा व्यक्तिगत रुप सँ हमरा कमे बातचित होइत छल । जहिया कहियो भेटैत छलथि प्रणाम दिदी कहैत छलियन्हि आ रंजु मुसैक कऽ प्रणाम प्रणाम कहि दैत छली । मुदा एहि बेरक नाटक महोत्सवमे एक्के स्थानपर बैस कऽ सभ दिन नाटक देखैत छलहुँ एहि सँ किछु खुलि गेल रही । महोत्सबभरि सभ नाटककेँ हम समीक्षा कएने छलहुँ आ हमर समीक्षाकेँ ओ बहुत बडका प्रशंसक रहथि । सभ दिन नाटक हलमे भेटथि आ हमरा देखिते बाजए लगैथि हम जे सोचने छलहुँ सएह अपन समीक्षामे राखि देलियै । रंजुमे नाटककेँ प्रति गजबकेँ समर्पण छल । रंग मंचपर नहियो रहैत छली तैयो एकर खुब आनन्द लैत छली । किछुए दिन पूर्व मिथिला नाट्य कला परिषद जानकी मन्दिरक प्राङ्गणमे बुधियार छौडा आ राक्षस नाटक मञ्चन कएने छल । एभि न्यूज टिभीक लेल भिजुअल करय ओतए पहुँचलहुँ तऽ सभ सँ पाछु ठाढ़ भऽ रंजुकेँ नाटक देखैत देखलहुँ । रंजु मिनापक सदस्य भेलाक बादो असन्तुष्ट छलथि तैयो नाटक देखब नहि छोडलथि । महेन्द्र मलंगियाद्वारा लिखित छुतहा घलि नाटकमे कबुतरी देवीक जिवन्त अभिनय कएने छली । गाम नइ सुतैया, काठक लोक सहित दर्जन सँ बेसी नाटकमे ओ अभिनय कएने छली । हुनक अभिनयकेँ सभ नाटकमे सराहल गेल अछि । दिल्लीक मेलोरंग संस्था सँ किछुए दिन पूर्व सम्मानित रंजु मिनाप संग असन्तुष्टीक बाद ओतके मंचपर नहि देखाइत छली । रंजु संग नाटक महोत्सवक क्रममे एक दिन पुछने छलहुँ नाटक नहि करैत छी तऽ टाइम पास कोना होइत अछि एहिपर ओ चौकाबए बला बात कहलन्हि एखन खाली गीत लिखैत छी । ओ जानकारी देलन्हि जे एखनधरि मैथिली भाषामे ५० टा सँ बेसी गीत भऽ गेल अछि । हम फेर सँ रंजु कोना रंग मञ्चपर आबैथ एहिकेँ लऽ कऽ बहुत चिन्तित छलहुँ । रविराति मात्रे दाङ्ग जिल्ला सँ जनकपुर अबैतकाल रामानन्द युवा क्लवक अध्यक्ष नविन कुमार मिश्र संग रंजुक विषयमे बातचित कएने छलहुँ । जनकपुर अबिते मिनाप संग सम्झौता कराएब एक प्रकार सँ सप्पथ खएने छलहुँ मुदा ओ सप्पथ हमरा सभकेँ पुरा नहि भऽ सकल । मुदा रंजु मिथिला राज्यक लेल जे सपथ खएने छलथि लगैत अछि ओकरे पुरा कराबएमे सभकेँ उर्जा लगाबए पडत ।

          २. सुमित आनन्द

शोध-पत्रिका मैथिली एवं मैथिली काव्यमे अलंकारक लोकार्पण ‘मिथिलाक उत्थानक हेतु शोधकार्य अत्यन्त आवश्यक अछि’-ई गप्प ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालयक कुलपति डॉ. एस. पी. सिंह दिनांक 21.04.2012 केँ विश्व्वविद्यालय मैथिली विभागमे शोध-पत्रिका मैथिली एवं मैथिली काव्यमे अलंकारक लोकार्पण कयलाक पश्चात् कहलनि। ओ कहलनि जे शोधकार्य शिक्षक एवं छात्र दुनूक हेतु आवश्यक अछि। शोधक दृष्टिएँ विश्व्वविद्यालयकेँ आओरो आगू बढय पड़तैक। ओ बजलाह जे एतय प्रतिभावान शिक्षकक अभाव नहि अछि किन्तु दृढ आत्मविश्वास एवं पवित्र उद्देश्यक आवश्यकता अछि। ओ ईहो जनौलनि जे विश्वविद्यालयकेँ विकासक शिखरपर पहुँचयबाक हेतु शिक्षक, छात्र,  कर्मी एवं सरकारक समवेत प्रयासक आवश्यकता अछि। कुलपति डॉ. सिंह एहि विभागक प्राचार्य डॉ. रमण झाकेँ मैथिली काव्यमे अलंकारक प्रकाशनक हेतु साधुवाद देलनि तथा एहिना शोध कार्यमे अग्रसर होइत रहबाक हेतु प्रेरित कयलनि। एहि अवसरपर विश्व्वविद्यालयक वित्तीय परामर्शी सी. आर. डीगवाल सेहो शोधपत्रिका एवं शोधग्रंथ दुनूक संबंधमे मैथिली भाषामे अपन विचार रखलनि जकर लोक करतल ध्वनिसँ स्वागत कयलक। विभागाध्यक्षा डॉ. बीणा ठाकुर आगत अतिथिक स्वागत करैत बजलीह जे ओ पत्रिकाक स्तरकेँ ऊपर उठयबाक हेतु कोनहुटा प्रयास बाँकी नहि रखतीह संगहि एकर चयनित रचनासँ पुस्तकक प्रकाशन सेहो करतीह। साहित्य अकादेमी पुरस्कारसँ सम्मानित मैथिली साहित्यक मूर्धन्य विद्वान डॉ. भीमनाथ झा शोधपत्रिका एवं शोधग्रंथक तुलना करैत बजलाह जे शोधग्रंथ ग्रंथक संग राखल जाइत अछि आ शोधपत्रिका पत्रिकाक संग। तेँ शोधग्रंथ विशेष महत्वक थिक । ओ ईहो कहलनि जे डॉ. रमण झाक शोधग्रंथ मैथिली काव्यमे अलंकार शिक्षक एवं छात्र दुनूक हेतु महत्वपूर्ण अछि। एहि अवसरपर डॉ. सुरेश्व्वर झा, डॉ. बैद्यनाथ चौधरी ‘बैजू’, डॉ. धीरेन्द्र नाथ मिश्र, डॉ. कृष्णचन्द्र झा ‘मयंक’ प्रभृति विद्वान लोकनि शोधपत्रिका एवं शोधग्रंथ दुनूक संबंधमे अपन अपन विचार रखलनि। दस अध्यायमे विभक्त मैथिली काव्यमे अलंकारकेँ सभक्यो उपयोगी मानलनि। कार्यक्रमक शुभारम्भ शीतल कुमारी, पुष्पलता कुमारी, सुनीता कुमारी एवं सोनी कुमारीक मंगलाचरणसँ भेल । सोसाइटी टुडेक मैनेजिंग एडीटर सुमित आनन्द स्वागत गानसँ आगत अतिथिक स्वागत कयलनि। मंच संचालन एवं धन्यवाद ज्ञापन डॉ. रमण झा कयलनि। डॉ. झा पहिल बेरि शोधपत्रिकाक प्रकाशनमे विश्व्वविद्यालयक सहयोगक प्रति आभार ज्ञापित कयलनि। एहि अवसरपर डॉ. अरुण कुमार झा, डॉ. टुनटुन झा, डॉ. उषा चौधरी, डॉ. रमेश झा, डॉ. विभूति चन्द्र झा, डॉ. अशोक कुमार मेहता, डॉ. फूलचन्द्र झा ‘प्रवीण’ श्री अमलेंन्दु शेखर पाठक, सोनू कुमार , आलोक, अमृता, किरण, अर्चना, श्यामानन्द, सुरेन्द्र आदि अनेक षिक्षक, शोधकर्त्ता एवं छात्र छात्रागण उपस्थित छलथि। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। सुजीत कुमार झा नव व्यापार साँझक सात बाजि गेल छल । साधना एखनधरि नहि आएल छलीह । नेहा वरण्डापर उदास बैसल मम्मीके प्रतीक्षा कऽ रहल छल । जीतेन्द्र प्रसाद भितर रुममे दर्दसँ परेशान छलाह । यद्यपि दर्द आइ किछु कम छल मुदा, ओ भितरकँे कछमछीसँ तनावमे छलाह । साँझक चारि बजे चाह पिलाक बादसँ ओ आ नेहा साधनाक प्रतीक्षाकऽ रहल रहैथि । चारि बजे पंकज ब्याट–बल खेलऽ चलि गेल छल । रीना सङीसँ भेट करऽ गेल छल । रहि गेल छला जीतेन्द्र प्रसाद आ नेहा । साधना भोरे जलपानकऽ कऽ घरसँ निकलल छलीह, ई कहिकऽ जे बेरियाधरि चलि आएब । बहुत रास काज अछि कहि गेल छलीह, कपड़ा बेचबाक अछि, मिश्राजीके घर भेट करबाक लेल जएबाक अछि, महिला क्लवमे अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवसक कार्यक्रममे जएबाक अछि आ बजारसँ दोकानक लेल समान किनवाक अछि, बेरियाधरि आबि जाएब । जीतेन्द्र प्रसाद सोचि रहल छलैथि, ‘की भऽ रहल अछि ? साधना हरदम घरसँ बाहर रहऽ लागल छथि । की भऽ गेल छैन्हि हुनका ? पता नहि कपड़ाक व्यपार आ दोकानकँे की भऽगेल अछि ? किए आवश्यकता अछि साधनाकेँ एतेक काज उठएबाक ?’ ओ सोचैत जा रहल छलाह, ‘एखन तऽ आजुक दबाइ सेहो बजारसँ लेबाक अछि । पंकज सेहो खेलकऽ नहि आएल अछि । नहि जानि की भऽगेल अछि एहि घरकेँ ?’ नेहाकँे बजाकऽ ओ अपना लग बैसा लेलैन्हि । जीतेन्द्र प्रसाद आ नेहा दुनू उदास रहैथि । प्रसंग बदलैत जीतेन्द्र नेहाकँे चाह बनएबाक लेल कहलैन्हि । बूझल छलैन्हि जे चिनी समाप्त भऽ गेलै मुदा, ककरो अनबाक पलखैत नहि छै, तखने नेहा इहो कहलक जे ‘घरमे चाहपत्ती नहि अछि ।’ जीतेन्द्र प्रसाद नेहाक बात सुनलैन्हि । क्षण भरिके लेल ओ किछु विचलित भऽगेला आ फेर शुन्यमे ताकऽ लगलाह । जीतेन्द्र प्रसादक मोन विद्रोहकऽ उठल, ‘की एहनो कतहु घर भेलैए, जतऽ कोनो सामञ्जस्यता नहि । एकरा तऽ होटल सेहो नहि कहल जा सकैए, की विमार हएब कोनो अपराध अछि ? ओ जानि बूझिकऽ तऽ विमार नहि पड़ल छथि । डाक्टर तऽ कहैत अछि बहुत बेसी काज कएलासँ बहुत थकावट आबि गेल अछि, शरीरकेँ आराम तथा मस्तिष्ककँे शान्तिक आवश्यकता अछि । मुदा कहाँ अछि शान्ति ?’ ओ सोचैत रहलाह, सोचिते रहला । पंकज आबि गेल । रीना सेहो आबि गेल । जीतेन्द्र प्रसाद सभ किछु देखैत रहलाह, हुनका किछु बाजब, नहि बाजब बराबरे छल । एहि घरक सभ सदस्य पूर्ण स्वतन्त्र छल । रीना भानस घरकँे एक सर्वेक्षण कएलक, फेर पंकजसँ किछु कहलक, पंकज बजारसँ किछु समान अनलक । भोजन बनल । राति आठसँ उपर बाजि रहल छल, दोकान बन्दकऽ कऽ दीपक सेहो चलि आएल छल । रीना दीपककेँ बजार पठाकऽ जीतेन्द्र प्रसादक लेल दबाइ मगबओलक । रातिक दश बाजि गेल अछि । नेहा सूति रहल अछि । रीना आ पंकज अपना रुममे किछु पढ़ि रहल छल । जीतेन्द्र प्रसाद ओछाएनपर पड़ल–पड़ल किछु सोचि रहल रहैथि –एकटा बात छोड़िकऽ दोसर, दोसर छोड़ि कऽ तेसर । साधनाकँे केओ स्कुटरसँ छोड़ि गेलैन्हि । स्कुटरक आवाज सूनिकऽ रीना आ पंकज बाहर आएल । साधना अबिते जीतेन्द्र प्रसादके रुममे चलि अएलीह तथा बगलमे सूति रहलीह । रीना आ पंकज ठकुआएल सन किछु देर ठाढ़ रहल आ चुपचाप घूमि गेल । जीतेन्द्र प्रसाद देखिते रहलाह, फेर बात चलएबाक हिसाबसँ बजलाह, ‘कहाँ छलहुँ एखनधरि, घरमे नहि चाहपत्ती, नहि चिनी, नहि चाउर, नहि दबाइ । बेरिएमे आएब कहने छलहुँ ? ‘हँ, मुदा कि कहुँ महिला क्लव चलि गेलहुँ प्रीति पकड़िकऽ लऽगेल । ओतऽ सुषमा भेट गेल । अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवसक बैसार छल मनोरमाक घरपर । निन्न आबि रहल अछि । सूति रहू ?’ ‘किए, की बात अछि ? आँखि अहाँक लाल बुझाइत अछि ।’ ‘हँ, कनि–मनि लऽ लेने छी, लेडिज ड्रिंक । ओतेक नहि लगैत छैक । क्लवक आइ वर्षगाँठ छल । मधु दिससँ पार्टी छल । अगिला बेर हमरे नम्बर अछि ।’ साधना कहिते–कहिते सूति रहलीह । जीतेन्द्र प्रसाद सुनैत रहला आ सोचैत रहलाह, ‘की भऽ गेल अछि हिनका ? की भऽ गेल अछि एहि घरकँे ? केमहर जा रहल अछि साधना ? की हएत आगाँ ? नहि, आब एकर अन्त करहे पड़त । कोना चलत एना ?’ हुनक हृदयक दर्द बढ़ि गेल । ओ हाथसँ छातीकँे दबा करोट फेरैत रहलाह । रुमके बल जरैत रहल, ओ सोचैत रहलाह ..... आइ एहि शहरमे अएला लगभग दश बर्ष भऽ गेल अछि । आएल छला तऽ कनिक तलब छलैन्हि मुदा कतेक शान्त जीवन छल, कतेक सुखद छल ई घर । साँझ पड़िते अफिससँ घर अएबाक मोन करऽ लगैत छल । कतेक मेल छल घरकेँ एक–एक प्राणीमे । तहियासँ कतेक अन्तर आबि गेल अछि एखन । तहियासँ तलबमे सेहो दूगुणा बृद्धि भऽगेल अछि । दश वर्षमे एहि शहरकँे कोना–कोना परिचित भऽगेल अछि । शहरक सभा सोसाइटी सँ सम्बन्ध भऽगेल अछि । ई शहर तऽ आब अपने भऽ गेल अछि । साधना आब शहरक महिला क्लवमे जाए लागल छथि । महिला क्लव आब तऽ हुनकापर छा गेल छैन्हि । आब साधनाकँे रुपैयाक लोभ भऽगेल अछि । तहिया कतेक नीक छलीह साधना । थोड़बे रुपैयामे घरक खर्च बढियाँ जकाँ चला लैत छलीह । घरके सभ समान ओहीे पैसासँ कीनल गेल अछि आ आइ की भगेल अछि ? साधना दोसरके देखासिखी दोकानो खोलि लेने छथि । ओहूसँ पैसा अबैत अछि मुदा, तैयो घरक खर्च नहि चलैत अछि । कहियो चाहपती नइँ, कहियो चिनी नइँ, कहियो ई नइँ तऽ ओ नइँ । कतेक झगड़ा ! हँ, ओ झगड़े तऽ छल दोकान खोलबाक लेल । कतेक सम्झओने छलहुँ साधनाकेँ । हमर असली धन तऽ नेहा, रीना आ पंकज अछि । यदि इएह सभ ठीक जकाँ पढ़ि–लिख लेत तऽ एहिसँ बड़का धन आओर कि हएत । एकरो सभकँे स्कुलसँ अएलाक बाद ममत्व चाही । एकरो सभक विषयमे पुछऽबला होएबाक चाही । मुदा की साधना कोनो बातके बुझती ? मानलहुँ हम दोकानमे किछु नहि करैत छी, मुदा घर तऽ बिगरल जा रहल अछि । बच्चा की बुझैत हएत ? की बुभैmत साधना ई सभकऽ रहल छथि ? ओह, की भऽ गेल अछि साधनाकेँ ? कपड़ाक व्यपार ! ओहो एकटा कथे अछि । साधना कहैत छलीह, ‘कपड़ा बढ़ियाँ बिकाएत ।’ कतेक बिकाएल कपड़ा ? महिला क्लवक ई दोसर उपहार छल कि महिला क्लवमे लोक कपड़े किनत दैनिक ? के बुझाओत साधनाकेँ ! जयनगर जाउ, सीतामढ़ी जाउ, कपड़ा लाउ, प्रदर्शनी लगाउ तखन जाकऽ थोकमे कपड़ा बिकाइत अछि । की भऽ गेल अछि हमर जीवनकँे ? साँझमे अफिससँ आउ तऽ स्वयं चाह बनाउ । दीपककँे की पड़ल अछि ? आइ हमरा घरमे अछि, काल्हि दोसर घरमे चलि जाएत । पैसा कतऽ बँचैत अछि ? हमर तलब अछि, दोकानके पैसा अछि मुदा एकटा छोटको बिमारीमे कर्जा लेवाक अवस्था चलि आएल । लोक ओतबे अछि । इएह पंकज अछि । पहिने क्लासमे प्रथम करैत छल । शिक्षककेँ प्रिय छल । आब फेल होबऽ लागल अछि । कतेक उदास रहैत अछि पता नहि ककरा सभकेँ सङी बना लेने अछि ? ‘की भऽ गेल अछि एहि दश वर्षमे,’ जीतेन्द्र प्रसाद सोचैत रहलाह, बल्व जरिते रहल । ओ करोट फेरैत रहलाह मुदा, साधना निफिक्किर सूतल रहलीह । भोरमे साधना दीपककँे बजार पठाकऽ घरक लेल समान मगबओलैन्हि । घरके ठीक कएलैन्हि । नेहा, रीना, पंकज सभ साधनाक आगाँ कतेको समस्या सुनओलक । साधना किछु देर सुनैत रहलीह, किछु कालक बाद ओकरा सभकेँ किछु कहलीह मुदा, बातक अन्त भेल नेहाक पिटाइसँ । ‘आखिर अहाँ कोन तमाशा बना रहल छी ? की भऽगेल अछि ? अहाँ कतऽ अबैत जाइत रहैत छी ? किछु देर घरोमे रहू आ बच्चाक देख–भाल करु,’ जीतेन्द्र प्रसादके तामस बढैÞत जारहल छल । ‘तऽ की करु ? ई सभ काज बन्दकऽ दिऔ ? आब जखन बजारमे कपड़ा बिकाए लागल अछि, दोकान चलऽ लागल अछि, तऽ की बन्दकऽ दिअ दोकानकेँ ? घरमे बैसल रहब तऽ सभ काज ठप्प भऽ जाएत ।’ ‘मुदा घरो तऽ नहि चलैत अछि । घरमे कम पैसा तऽ नहि अछि । घर चलएबाक लेल बढ़िएँ तलब भेटैत अछि । एहिसँ कम तलब भेटैत छल तहिया ई हाल नहि छल । एतेक मारि–पीट, एतेक झगड़ा नहि होइत छल ।’ ‘हम तऽ अहाँके किछु करहोके लेल नहि कहैत छी, हम स्वयं कऽ रहल छी । घर बाहर घूमि रहल छी । शुरुमे तऽ अहुँ मदति कएने छलहुँ, बच्चा आब तऽ छोट नहि रहि गेल अछि, अपन काज स्वयं कऽ सकैत अछि । घरमे एकटा नोकरो अछिए । की हम नोकरनीए बनिकऽ रहू सभ दिन ?’ ‘ओह, अहाँ इहो तऽ सोचू जे हम विमार छी । उठिकऽ स्वयं चलि फिर नहि सकैत छी । बजारसँ समान नहि आनि सकैत छी । बच्चाकँे पढाइ सेहो बढियाँसँ नहि चलि रहल अछि । एहिसँ बढिकऽ तऽ पैसा नहि अछि । जखन हमही सभ नहि रहब तऽ की हएत पैसा लऽ कऽ ? लड़का गुण्डा–आवारा भऽ जाएत तऽ की हएत ? अहाँकँे बन्द करऽ पड़त ई सभ कारोवार । ई घर अछि कोनो बजार नहि, होटल नहि । याद राखू, घर अछि ।’ ‘चाहे जे भऽ जाउ, हम दोकान बन्द नइँ करब । कपड़ाक व्यपार नहि बन्द करब । चाहे बच्चाकँे होस्टलमे पठाउ वा घरमे पढ़ाउ । अहाँकेँ बेमारीएमे कतेक खर्च भेल अछि, किछु बूझल अछि अहाँकेँ ? घरक खर्च कतेक बढ़ि गेल अछि, किछु बूझल अछि अहाँकेँ ?’ जीतेन्द्र प्रसाद टूटि सन गेल छलाह, ‘हम की देखू ? बच्चा होस्टल जाएत तऽ खर्चा बढ़त की घटत ? हमरा बिमारीमे पैसा लागल तऽ की हमर पैसा किछु नहि बचल छल ? अहाँ की कहऽ चाहैत छी ? की मतलव अछि अहाँकें ? ’ दुनूके स्वरक आवाज बढैÞत जा रहल छल । बातचित आब झगड़ाक रुप धारणकऽ लेने छल । तखने रीना चाहक कप लऽकऽ रुममे पहुँचल । चुप्पी । साधना चाहक कप जीतेन्दं्र प्रसाद दिस बढ़ा देलीह । किछु देरक शान्ति । दूनु एक दोसरकेँ देखैत रहल मुदा किछु नहि बाजल । साधना कपड़ा लऽकऽ बाथरुम चलि गेलीह । जीतेन्द्र प्रसाद चुपचाप पड़ल रहलाह । पाएर लग नेहा बैसल छल । एखनधरि पत्रिका सेहो चलि आएल छल । मोट अक्षरमे महिला दिवस मनएबाक कार्यक्रम छपल छल । शहरक लेडिज क्लवमे महिला वर्ष मनएबाक पुरा कार्यक्रम छल । साधना कार्यक्रमक संयोजक छलीह । कलवेल बाजि उठल । नेहा गेट खोललक । ‘मम्मी अछि, बौवा ?’ ‘हँ, छैक । अपने के ?’ ‘कहियौन्ह मिश्रा जी आएल छथि ।’ मिश्राजीक नाम सुनिते साधना जल्दी–जल्दी वाथ रुमसँ निकललीह । ‘बेटी, एक कप चाह पियबियौन्ह, कनी जल्दी । ’ साधना कपडा बदलि लेलीह । रीना चाहक कप रुममे रखलक साधना सेहो मिश्रा जी सँग चाह पीलैन्हि आ बैग उठा लेलैन्हि । ‘हँ, तऽ हम जा रहल छियौ । जल्दिए अएबाक कोशिस करबौ । रीना, भोजन बनालिहँे । रुपैया अलमारीमे छौ ।’ जीतेन्द्र प्रसाद चुपचाप सुनैत रहलाह, साधना मिश्राजीक स्कुटरपर बैसि विदा भऽ गेलीह । ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com  पर पठाउ। ३. पद्य ३.१.श्यामल सुमन ३.२.दिनेश रसिया-हम पत्रकार २.उमेश पासवान ३.३.जवाहरलाल कश्यप ३.४.ओमप्रकाश झा ३.५.जगदीश प्रसाद मण्डल ३.६.रामवि‍लास साहु ३.७.चंदन कुमार झा ३.८.नवीन कुमार ‘‘आशा’’-गर्भक आवाज श्यामल सुमन मोन कियै सिंहासन पर मोन कियै सिंहासन पर घर मे आफत राशन पर

काज करय मे दाँती लागय तामस झाड़ी बासन पर

लाज करू जे पाहुन जेकाँ खाय छी कोना आसन पर

खोज-खबर नहि धिया-पुता के बात सुनाबी शासन पर

बिना कमेने किछु नहि भेटत जीयब खाली भाषण पर

कहू सोचिकय कहिया सुधरब जखन उमरि निर्वासन पर

सुमन समय पर काज करू आ सोचू निज अनुशासन पर चलू बैसिकय केँ कानय छी रीति बिगड़ि गेल जानय छी चलू बैसिकय केँ कानय छी

असगरुआ जौं नहि नीक लागय  आओर लोक केँ आनय छी

समाधान आ कारण हमहीं बात कियै नहि मानय छी

पैघ लोक के बात, सोचबय के के एखन गुदानय छी

आस व्यर्थ छी बिना प्रयासक फुसिये गप केँ तानय छी

नीक आओर अधलाह लोक केँ कियै एक सँग सानय छी

लऽ कऽ चालनि सुमन हाथ मे नीक लोक केँ छानय छी गलती बारम्बार करू गलती बारम्बार करू अधलाहा सँ प्यार करू

दुर्गुण सँ के दूर जगत मे निज-दुर्गुण स्वीकार करू

दाम समय के सब सँ बेसी सदिखन किछु व्यापार करू

अपने नीचा, मोन पालकी एहि पर कने विचार करू

बल भेटत स्थायी, पढ़िकय ज्ञानो पर अधिकार करू

भाग्य बनत कर्मे टा फल सँ  आलस केँ धिक्कार करू

प्रेमक बाहर किछु नहि भेटत प्रीति सुमन-श्रृंगार करू ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। १.दिनेश रसिया- २.उमेश पासवान १ दिनेश रसिया हम पत्रकार

हम छी एकटा पत्रकार न्याय दिलाबऽ के लेने छी भार जकर महिमा रहल अछि अपार मुदा तैयो किए मरैत अछि पत्रकार

कहाबै छी हमहीं देशक तेसर आँखि लगा कऽ सूर्यपंखी घोड़ाक पाँखि अन्याय निकाली हम सभ ताकि-ताकि सत्य आ निष्ठा पर रहै छी अटल तैयो किए पत्रकारे के गर्दनि कटल

हम सभ करै छी सत्य तथ्य के खोज सुबहसँ शामतक चाहे भुखल रही रोज चाहे रहऽ परए रौदमे खजुरक पात जेकाँ सोमत तब जाके करबै छी जनताकेँ सही बातकेँ अबगत तैयो किया सब देखाबैये हमरे लग तागत बाराके मरायल बिरेन्द्र शाह,ककरा आयल छल आह तब मरायल दिदी उमा सिंह, जकरा केलक संसारसँ बिदा अखन देखु यादब पौडेलके भेल उहे गती, तैयो नै आयल अछि शान्ति रोकु ई अत्याचार नै तँ आब करब हम सभ मिल कऽ पत्रकार जनक्रान्ति । २ उमेश पासवानक तीनटा कवि‍ता- डर हे यौ केना कहै छि‍ऐ नै छै डर आॅफि‍समे हाकि‍मक डर घरमे घरवालीक डर देशमे आतंकवादी-माओवादीक डर हे यौ केना कहै छि‍ऐ नै छै डर जनताकेँ नेतासँ डर बापकेँ बेटासँ डर सासुकेँ पुतोहुसँ डर बि‍जली रहि‍तौ लॉडस्‍पीकरक डर खेलमे मैच फि‍क्‍सिंगक डर रूपैयामे जाली नोटक डर हे यौ केना कहै छि‍ऐ नै छै डर गोसाइकेँ भगतासँ डर मन्‍दि‍रक चन्‍दाकेँ पण्‍डासँ डर घी खरि‍दब तँ डलडासँ डर प्रेम करब तँ धोखाक डर हे यौ केना कहै छि‍ऐ नै छै डर। नटि‍न झोटा झोटौबलि‍ हेतौ नटि‍नि‍या तोरा संग अही बेर गे करबौ हम चुमौन अही लगनमे एतौ घरमे सौतीन उदि‍न उ दि‍न अबैमे नै छै देरी गे झोटा झोटौबलि‍ हेतौ नटि‍नि‍या आठ बजे दि‍न धरि‍ सूतल रहै छेँ तूँ पुरुषसँ करबै छेँ चूल्ही-चौकाक काम केहेन करै छेँ तूँ अनहेेर गे झोटा-झोटौबलि‍ हेतौ नटि‍नि‍या रहै छेँ घरमे बैसल करै छेँ उकटा-पेंची नैहरे लागे तारा नीक गे टोले-टोले घुमल फि‍रै छेँ कामक बेरमे अंगनेमे लागि‍ जाइ छौ दि‍क गे झोटा-झोटौबलि‍ हेतौ नटि‍नि‍या बाबू तोहर गामक मुखि‍या बेटी तेकर दुलारी गे ससुर-भैंसूरकेँ दि‍अर सन बुझै छेँ माथपर कि‍एक नै लइ छेँ साड़ी गे ओल सन तँू बोल बजै छेँ केना कही हम तोरा मि‍थि‍लाक नारी गे झोटा-झोटौबलि‍ हेतौ नटि‍नि‍या। ‍ बताह गुम-सुम बैसल रहै ओ अप्‍पन हाथक लकि‍र नि‍हारि‍ कऽ हँसैए ओ गुज-गुज अन्‍हरि‍या राति‍मे असगरे घुमल-फि‍ड़ैए ओ गि‍त गुनगुनाइत अछि‍ तँ कखनो जोरसँ गबैए ओ हुनक भेष-भुसा देखि‍ कऽ लोग कहैए ओ हि‍नका छथि‍ बताह सुनि‍ कऽ बि‍खनि‍-बि‍खनि‍ गारि‍ पढ़ैए ओ पहि‍रने फाटल-अंगा-पेंट नम्‍हर-नम्‍हर केश-दाढ़ी बढ़ेने रहैए ओ घूि‍म-घूमि‍ कऽ माँगि‍-चाँगि‍ कऽ खाइए ओ जखन कि‍यो दुतकारैए हि‍नका बोम फाड़ि‍ कऽ कानैए ओ कि‍ साँचे बताह अछि‍ ओ? ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। जवाहरलाल कश्यप पानिक बुंद चढैत अछि आगि पर पानिक बुंद चढैत अछि आगि पर बनैत अछि भाफ मिलैत अछि प्रक्रिति मे खत्म होएत अछि ओकर अस्तित्व तखन बनैत अछि स्वच्छ निर्मल जल / आदमी चढैत अछि सत्यक ताप पर बनैत अछि दयाशील मिलैत अछि प्रक्रिति मे खत्म होएत अछि ओकर अस्तित्व तखन बनैत अछि मानव महामानव / ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। ओमप्रकाश झा गजल नैनक छुरी नै चलाबू यै सजनियाँ कोना कऽ जीयब बताबू यै सजनियाँ नै चोरि केलौं किया डरबै हम-अहाँ सुनतै जमाना सुनाबू यै सजनियाँ छी हम पियासल अहाँ प्रेमक धार छी आँजुर सँ हमरा पियाबू यै सजनियाँ बेथा करेजक किया नै सुनलौं अहाँ हमरा सँ नेहा लगाबू यै सजनियाँ छटपट करै प्राण तकियो एम्हर अहाँ "ओम"क करेजा जुडाबू यै सजनियाँ बहरे-सगीर मुस्तफइलुन-फाइलातुन-मुस्तफइलुन दीर्घ-दीर्घ-ह्रस्व-दीर्घ, दीर्घ-ह्रस्व-दीर्घ-दीर्घ, दीर्घ-दीर्घ-ह्रस्व-दीर्घ गजल तकियो कनी कानैए उघारल लोक गाडब कते, दुख मे बड्ड गाडल लोक

धरले रहत सब हथियार शस्त्रागार बनलै मिसाइल भूखे झमारल लोक

छै भरल चिनगीये टा करेजा जरल अहुँ केँ उखाडत सबठाँ, उखाडल लोक

लोकक बले राजभवन, इ गेलौं बिसरि खाली करू आबैए खिहारल लोक

माँगी अहाँ "ओम"क वोट मुस्की मारि पटिया सकत नै एतय बिसारल लोक बहरे-सलीम दीर्घ-दीर्घ-ह्रस्व-दीर्घ, दीर्घ-दीर्घ-दीर्घ-ह्रस्व, दीर्घ-दीर्घ-दीर्घ-ह्रस्व मुस्तफइलुन-मफऊलातु-मफऊलातु (पाँति मे एक बेर) कुण्डलिया आइ-काल्हि बाबा सभक लोकप्रियताक देखैत एकटा रचना प्रस्तुत अछि। निर्मल मोन सँ बाबाजी दए छथि आशीष। खाता नंबर अहाँ लिखू, जमा कराबू फीस। जमा कराबू फीस, बिगडल काज बनत, केनेए जे हरान, से सबटा कष्ट जरत। कहैए "ओम" धरू बाबाक चरण-कमल, फीसक लियौ रसीद, भेंटत कृपा-निर्मल। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। जगदीश प्रसाद मण्डलक पद्य- गीत-३९ हरा-पड़ा ढेरि‍आएल ढेर भोर-साँझ भूमकैत रहै छै। भोर-साँझ....। जइ डीह चढ़ि‍ नढ़ि‍या भूकै उसरन-वि‍सरन होइत रहै छै उसरन-वि‍सरन होइत रहै छै। हरा-पड़ा...। तान मारि‍, मारि‍ तानि‍ कि‍यो छि‍नकि‍-छि‍नकि‍ छि‍छि‍आइत रहै छै। छि‍नकि‍-छि‍नकि‍ छि‍छि‍आइत रहै छै। हरा-पड़ा...। बान्‍हल दौन कराम जहि‍ना उरदा-खेरहा दौन करै छै आसा-आस लागि‍ लगौने ति‍ले-ति‍ल ति‍लमि‍लाइत चलै छै। हरा-पड़ा ढेरि‍आएल ढेर भोर-साँझ भूमकैत रहै छै। भाेर-साँझ...। ))(( गीत-४० घात लगौने घात लगल छै फल करनी अवघात मढ़ल छै घात लगौने घात लगल छै करनी फल अवघात मढल छै। घात लगौने....। ति‍नकमि‍या बंशी बनि‍-बनि‍ पानि‍ बीच घति‍या पड़ल छै। गंध बोर सुगंध कहि‍-कहि‍ मुँह मध्‍य अवघात करै छै। घात लगौने घात लगल छै। बि‍नु अवघाते होइत रहै छै गलफड़ घात लगैत रहै छै। ही-जी छि‍छि‍या-छि‍नि‍या उनटि‍-सुनटि‍ सुनगैत रहै छै। घात लगौने घात लगल छै। ))(( गीत-४१ उठि‍ते आगि‍ तनकि‍ मन मुक्का छाती मारि‍ कहै छै, ताल-ताल मि‍ला बेताल संग बाँहि‍ आवाज भरै छै। उठि‍ते आगि‍ तनकि‍ मन....। चढ़ि‍ते काति‍क गाछी-बि‍रछी गाम-गाम अखाड़ सुनाइ छै, जाड़-हाड़ संग मि‍लि‍ दुनू जड़ि‍आएल जाल तोड़ैत रहै छै। उठि‍ते आगि‍ तनकि‍ मन....। सुषुम तेल तरहत्‍थी जहि‍ना बच्‍चा सि‍र धड़ैत रहै छै धरि‍ते तेल पकड़ि‍ केश अगि‍आइत आगि‍ पाबैत रहै छै। उठि‍ते आगि‍ तनकि‍ मन, मुक्का छाती मारि‍ कहै छै। ताल-ताल मि‍ला बेताल संग बाँहि‍ आवाज भरै छै। ))(( गीत-४२ देहसँ नमहर टाँग जेकर आड़ि‍-धूर वएह कूदि‍ टपै छै। टपि‍ टपान हाथो कहैत राही राह पकड़ि‍ चलै छै। देहसँ नमहर टाँग जेकर...। टाँग जेकर हाथी सदृश बालु ऊँट कहाँ बुझै छै चाि‍ल सुचालि‍ पकड़ि‍-पएर रच्‍छा अपन करैत रहै छै। देहसँ नमहर टाँग जेकर...। मुसुक मन मारि‍ मुस्‍की मने-मन मुसकान भरै छै। हहा-हहा हषवि‍ष अबैत कूदि‍-फानि‍ कहैत रहै छै। देहसँ नमहर टाँग जेकर छै...। ))(( गीत-४३ रंग सि‍याही रोशनाइ बनि‍-बनि‍ रेहे-रेहे सियाह घोराइ छै। भाव-अभाव कुभाव बनि‍-बनि‍ गीत प्रेम लेखाइत रहै छै। रंग सि‍याही रोशनाइ बनि‍-बनि‍ रेहे-रेहे सि‍याह घोड़ाएल छै। गहराएल गहन पुनि‍ चान जहि‍ना इजोत-अन्‍हार बनहाएल छै। तहि‍ना ने दि‍नो-दीनानाथ भक-इजोत भऽ कनखि‍आइत रहै छै। रंग सि‍याही रोशनाइ बनि‍-बनि‍ रेहे-रेहे सि‍याह घोराइ छै। कहि‍ रोशन टघरि‍ सि‍याह लेख कर्म लि‍खैत रहै छै। ति‍ले-ति‍ल ति‍लकि‍ जअ जहि‍ना हवन कुंड जरैत रहै छै। रंग सि‍याही रोशनाइ बनि‍-बनि‍ रेहे-रेहे ि‍सयाह घोराइ छै। भाव-अभाव कुभाव बनि‍-बनि‍ गीत प्रेम लि‍खाइत रहै छै। ))(( गीत-४४ जि‍नगीमे जे संग पूड़ैए संगी वएह कहबैत रहैए। संग ससरि‍, घुसुकि‍-पुसकि‍ प्रेमी मि‍त्र कहबैत रहैए। जि‍नगीमे जे संग पूड़ैए संगी वएह कहबैत रहैए। मि‍त्र बनि‍ मैत्रेयी पकड़ि‍ जि‍नगीक झूल झूलैत रहैए लेख-जोख कर्मक करैत गुण गुण मन गुणैत रहैए। जि‍नगीमे जे संग पूड़ैए संगी वएह कहबैत रहैए। संगी, प्रेमी दोस्‍त भजार बैसि‍ बाट बति‍आइत रहैए। संग-कुसंग, कुसंग-संग नीड़ नोर नि‍नि‍आइत रहैए। जि‍नगीमे जे संग पूड़ैए संगी वएह कहबैत रहैए। संग ससरि‍ घुसुकि‍-पुसुकि‍ प्रेमी मि‍त्र कहबैत रहैए। ))(( गीत- ४५ हे बहि‍ना केना कऽ जेबइ ओइ घरबा थुक फेकि‍ जइ घर नि‍कललौं केना जेबइ ओइ दुअरबा हे बहि‍ना केना कऽ जेबइ ओइ घरबा थुक फेकि‍...। केना जेबइ....। जनि‍-जनि‍ बीआ वाणी-बानि‍‍ लतरै-चतरै छै फुलबतबा सुबास-कुबास बनि‍-बनि‍ सभ कि‍छु देलि‍ऐ गमबा हे बहि‍ना केना कऽ जेबइ ओइ घरबा पुरुखपात रहलै ने एक्को करतै के बगबटबा घरहरि‍या एको ने बॅचलै बन्‍हतै के घरमरबा हे बहि‍ना केना कऽ जेबइ ओइ घरबा। गीत- ४६ नढ़ड़ा हेल हेलै छी, भाय यौ नढ़ड़ा हेल हेलै छी। ठकि‍-ठकि‍, फुसि‍या-पनि‍या जि‍नगी संग खेलै छी, भाय यौ जि‍नगी संग खेलै छी, नढ़ड़ा हेल... जुग छल जमाना छल कलपि‍ कूश लागै छल सोझ-साझ फुलका-फलका चालि‍ खि‍खि‍र बनल छल। सुख स्‍मृति‍ पाबैत रहै छी नढ़ड़ा खेल खेलैत रहै छी। नढ़ड़ा हेल हेलैत रहै छी। नढ़ड़ा जहि‍ना गाछ उगै छै भकराड़ चालि‍ पकड़ि‍ चलै छै। फड़-फूल बि‍नु रूप गढ़ि-गढ़ि‍ नढ़ड़ा फल देखबैत रहै छै। देख-देख‍ अलिसाएल रहै छी नढ़ड़ा खेल खेलैत रहै छी। भाय यौ, नढ़ड़ा हेल हेलैत रहै छी। २ बीटगरहा टुकड़ा-टुकड़ी बनि‍ अंक जहि‍ना भूमि‍ भाव संग चलए लगै छै। अकास-पताल बीच अंतर रहि‍तो हि‍लमि‍ल-झि‍लमि‍ल करए लगै छै। जूड़ि‍-जूड़ि‍ अक्षर शब्‍द सधै छै अंक कूदि‍ गुन-भाग करै छै। चालि‍-ढालि‍ दुनूक दू रहि‍तो प्रेमक प्रेमी रूप धड़ै छै। चालि‍ शि‍कारी घोड़ा जहि‍ना कूदि‍-फानि‍ रस्‍ता बनबै छै इकाइयो दहाइ चलि‍ तहि‍ना गरहनि‍ बीट गरहनि‍ रचै छै। पुरजा-उरजा बनि‍-बनि‍ अंक पौआ-अधपइ कनमा-कनइ छै। अणु-परमाणु जुग जे बनौ अंक अंक भकराड़ बनल छै। रूप-गुण सभ ओहि‍ना-ओहि‍नी मूल तत्‍व आधार बनल छै। बि‍नु बीटे ठाढ़ केना रहतै नमगर-छड़गर कड़ची बाँस। वंशो-वृक्ष तहि‍ना रहै छै धड़ि‍-धीर धेने छी आस अटपट-लटपट खेल चलै छै आमक गाछ महकारी फड़ै छै गंध आम पसारि‍-पसारि‍ मीठ-तीत सेहो बनबै छै। भाव-भूमि‍ भवजाल पसारि‍ नजरि‍ खि‍रा ताकैत रहै छै। दौजी-मुड़हन समेटि‍-समेटि‍ हवा बीच उड़बैत रहै छै। बि‍र्ड़ो बीच बौआइत-ढहनाइत देखि‍नि‍हारो देखैत रहै छै। पकड़ि‍ पेट खोंइचा छोड़ि‍ दूधक फेड़-फाड़ देखै छै। मुदा तैयो, आंगुर चुट्टा बनि‍ बीछि‍-बीछि‍ बीआ पकड़ै छै। गनि‍-गनि‍ फुटा-हटा धरतीक भाव बुझै छै। सुरकुनि‍या चालि‍ पकड़ि‍-पकड़ि‍ समाढ़-जाल तोड़ैत चलै छै। जहि‍ना कोंपर रूप बाँस बनि‍ टोपी खोलि‍ अकास धड़ै छै। पाछू-पछुआ कड़ची सि‍रजि‍ नाओं बाँस धड़बए लगै छै। आशा-आस लगा एक-दोसर झूला जि‍नगी झूलए लगै छै। सोधि‍-ओधि‍ सि‍रजि‍ कोंपर बीट वंश कहबए लगै छै। अंति‍म छोर लीला जि‍नगीक आशा आस लगबए लगै छै। फड़ि‍-फुला हरि‍आ-हरि‍आ परि‍वार-गाम बनबए लगै छै। सर्ग-नर्क उतरि‍ अकास बोड़ि‍या-बि‍‍स्‍तर समटए छै। फँसरी- २ फँसि‍ फँसरी लटकि‍ धरनि‍ पीड़ाएल मन तमसाइत केलौं। रस जि‍नगीक बुझि नै पाबि‍ करनी अपने मरनी बनलौं। ओझरी तनि‍-तनि‍ दाबि‍ गर-गड़ ऐँठि‍-ऐँठि केलक मन मरदनि‍। होइत मरद करजनि‍ देखि‍-देखि‍ लुत्ति‍या-लुत्ति‍या केलक गरजनि‍। जि‍नगीक दोहरी बाट बनल छै बड़की-छोटकी नाओं कहै छै। बड़कीपर बड़की चलै छै छोटकी-छोटकी छि‍छि‍आइ छै। उठि‍ भोर धार धड़ि‍ दुनू संगे-संग चलबो करै छै। मारि‍-आँखि‍ बड़की छोटकी गर-फाँस लगबैत रहै छै। गरदनि‍ पकड़ि‍ पछाड़ि‍ पानि‍ हरदा-हरदी बजबए लगै छै। हारल-मारल आकि‍ मारल हारल फाँस गर लगबैत रहै छै। फँसरीसँ नीक फाँसी होइ छै क‍ऽ धऽ कि‍छु चढ़ैत रहै छै। पूब-उत्तर देखि‍ नि‍हारि‍ हँसि‍-कानि‍ गाबैत रहै छै। वि‍चलि‍त मन पार्टनर, मुँहगर केना नै बनबै? छअ-पाँच दि‍न राति‍ करै छी भंग अंग मुखति‍यारि‍ करै छी घोरि‍-घाड़ि‍ घि‍सि‍आइत चलै छी कहि‍या धरि‍ एना चलबै पार्टनर, मुँहगर केना नै बनबै। कठरा लकड़ी तबला बनै छै ढोलक-ढोल सेहो बनै छै। रस-कुरस पकड़ि‍-पकड़ि‍ कारीगर मुँह सेहो बनबै छै। अहाँ छोड़ि‍ केकरा कहबै पार्टनर, मुँहगर केना नै बनबै। कि‍यो मुँहक झालि‍ सदि‍ बजाबे तँ कि‍यो सूर मुँह भरै छै। अलापि‍ तान कि‍यो कहै छै जय-जयकार कि‍यो सेहो करै छै। तइ बीच केना कऽ चलबै पार्टनर, मुँहगर केना नै बनबै। मुँहक तान मान मपै छै पलड़ा जोड़ लगबैत रहै छै। मूंग्‍गा, जअ बाट बना-बना तीन लोक भूभाग तौलै छै। तइ बीच केना कऽ बचबै, पार्टनर, आबो कहू कि‍ करबै पार्टनर, आबो.... दुनि‍याँक रंगमंच सजल छै राशि‍-राशि‍ दृष्‍टि‍ बनल छै। मेलाक हाट-बजार बीच कारी मुँह चून केना सजेबै कारीख-चून लगेबै, पार्टनर, कारीख-चून लगेबै। ))(( ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। रामवि‍लास साहुक दर्जन भरि‍ कवि‍ता- कतेक दुख काटब हरि‍ हे हरि‍ हे, दुखक ने कोनो ओर दुखक धार बहए चहुओर चंचल मन चतुराइ करए बीच भंवरमे घुरि‍आइत रहए थाकल तन-मन उबि‍आइत रहए जनमसँ मरण धरि‍ छी अनाथ कतेक दुख काटब हरि‍ हे। अहाँ बि‍नु हम केना जीअब जनमक बंधन केना तोड़ब थाकल पाॅव चलब केना दुख सहैत भेलौं मजबूर दुखक आस नि‍रास भेल हरि‍ हे हम छी अनाथ कतेक दुख काटब हरि‍ हे। काठक नाव दुखि‍या सबार चहुओर बहए बयार बीच धार भौर खेलाइत उधि‍आएल धारमे डुमै सबार थाकल तन हारल मन अहाँक शरणमे छी आएल पड़ाएल कतेक दुख काटब हरि‍ हे। सत्‍यक नाव धर्मक पतबारि‍ हरि‍ खेबैया पार लगाबए अपने मन मंदि‍रमे बसाबए जन्‍मक दुखसँ मुक्‍ति‍ पाबए आत्‍माक रहस्‍य जानि‍ भवसागरकेँ हरि‍ पार लगाबए कतेक दुख काटब हरि‍ हे। बारहो मास अगहनक आगमनसँ सभ सुख पाबए पूसक सर्द हवा दुख बढ़ाबए ओस कुहेससँ जाड़ बढ़ाबए माघक जाड़ हार हि‍लाबए फागुन मास सभ फगुआ गाबए रंग-अबीर गुलाल उड़ाबए बाजए कोइली कू-कू मोर-पपीहा पी-पी वसन्‍ती हवासँ सभ हर्ष मनाबए आम-लीची बौरसँ बौड़ाएल फूलक महकसँ हवा पगलाएल चैत मास चना-जअ गहुम पकए महुआक फूल सभ दि‍स गमकए बैसाखक रौद धरती तपाबए कुम्‍हार माटि‍क बासन पकाबए जेठमे खेतीहर खेत जोताबए धानक बीआ खेत खसाबए बनि‍याँ-बेकाल अन्नक भंडार बढ़ाबए असाढ़मे आम-जामुन खाबए पाकल आमसँ हाट सजाबए खेताक धूर मजगुत बनाबए सावन-भादो कि‍सान करए खेत कादो खेतमे लगाबए धानक चास बाढ़ि‍-पानि‍ दइ शोक-संताप आसीन जगाबए पावनि-तोहारक आस काति‍क मास पेटक दुख सताबए तेरहम मास कर्जा बढ़ाबए अगहन आगमनसँ सभ सुख पाबए। सड़क बीच नाला साँझक समए पूर्बा बहैत डुमैत सुरुज चान मुस्‍काइ घर-घरमे दीप जरैत अकासमे तरेगन चमकैत बाग-बगि‍चा मह-मह करैत चि‍ड़ै-चुनमुन्नीक चहक शान्‍त भऽ गेल गामक चौबट्टीयापर पसरल हाट-बजार उसरि‍ शान्‍त भेल मुदा हमर कान्‍त नै घर घुमि‍ आएल ओ एबो करत केना बैसल अछि‍ दारूखाना दारू पीब बनल अछि‍ मस्‍ताना मस्‍तीमे कुश्‍ती केलक हार-पाँजर तोड़ि‍ बेकाम बनल काज तँ बड़ घि‍नौना केलक लड़खराइत नि‍शाँमे चलैत सड़कपर झुकैत-पड़ैत नालामे धड़फराइत गि‍रल नि‍शाँमे बेहोश पड़ल छल मुदा कहैत छल ई नाला दि‍नमे रहैए सड़कक कात राितमे आबि‍ जाइए सड़कक बीचो-बीच हमरा गि‍रबैए खि‍ंच अपने दि‍सि‍ मुदा हम तँ छी अपने नीच जखन हम होशमे एबै नाला बनेबै सड़कक बीच। आँखि‍ रहि‍तो आन्‍हर गहबर-गहबर गोसाँइ खेले भगता-भगति‍नि‍याँ ठगि‍नि‍याँ देवी-देवताक ठि‍केदार असल धर्मराज बनल पान-फूल अच्‍छत लड़ू दीप-धूप अगरबत्ती भरल रंग-बि‍रंगक डाली सजल डाली लगबए गहबरमे भुति‍नि‍याँ झालि‍ मृदंगक धाप संगे झुमि‍-झुमि‍ गाबए देवी गीत गाेसाँइ खेले भगता-भगति‍नि‍याँ छत्तीस देवी चौदहो देबान अखन छौ देहपर ि‍वरजमान जे मांगब से पूरा करतौ कारनीक सभ रोग वि‍याधि‍ हरतौ फूल-अच्‍छतसँ वरदान देतौ बि‍गरल काज मनोकामना चुट्की बजि‍ते पूरा करतौ बदलामे लड्डु-छागर-पाठी मांगतौ बेङ जेना कूदि‍-कूदि‍ घुमैत बेंतक छड़ीकेँ हि‍लि‍ते आहूत जड़ैत देखि‍ते भूत-प्रेत सभ भागि‍ जेतौ अरहुल फूलसँ देवी बजाबए बोल जय गंगाक पुकार लगाबए भूत-प्रेत लगल कारनीकेँ झोंटा पकड़ि‍ झुलाबए-भगाबए कोखि‍या गोहारि‍ गहबरम करए कबुलामे छागर-पाठी बलि‍ मांगए बि‍ना देने नै देवी मान्‍तौ कुल-खनदान बाल-बच्‍चाकेँ सतेतौ गामक-गाम सुड्डाह करतौ सभ डरि‍ एकटंगा कल जोड़ि‍ देवीकेँ मनौलक-बुझौलक मन भरि‍ लड्डू अँचरी चढ़ौलक छागर-पाठी बलि‍ देलक तंत्र-मंत्रसँ बान्‍हल जंतर अपन-अपन कंठहार बनौलक अखनो धरि‍ समाजक लोक अन्‍धवि‍श्‍वासमे फँसि‍ मरैए हि‍ंसा-हत्‍यामे वि‍श्‍वास करैए एकैसम सदी वैज्ञानि‍क युगकेँ आन्‍हर बनि‍ कलंकि‍त करैए धमि‍याँ-ओझा-गुणी भगता-भगति‍नि‍याँ जंतर-मंतरपर वि‍श्‍वास करैए आँखि‍ रहि‍तो अखन धरि‍ लोक आन्‍हर बनि‍ अन्‍हरा कहबैए। भाग भरोसे कोनो काज एना नै होइए सोचल समझल काज बनैए पूर्ब नि‍योजि‍त मनमे ठानैए बि‍नु जानि‍ बूझि‍ हानि‍ होइए गलत सोचसँ राह भटकैए मान-सम्‍मानपर ठेंस पहुँचैए जेहेन मन ओहेन काज होइए कर्मक फल ओहने पबैए सोचि‍ समझि‍ जँ हुअए काज अहि‍त कम, हि‍त काज होइए काजे लेल दुनि‍याँ बनल-ए काज कोनो नै छोट-पैघ होइए छोट-पैघ तँ कर्मसँ बनैए कर्मक फल अवश्‍य भेटैए राज-रंक हुअए वा फकि‍र सत्‍ छी कि‍ झूठ से कि‍यो नै बूझैए सबहक हि‍त ईश्‍वर करैए ईश्‍वर बि‍नु नै पत्ता हि‍लैए सभ कि‍छु नाश्वर अमर नै होइए सत्‍य डगर कठि‍न होइए मुदा सत् कर्मसँ वि‍जय भेटैए अपन काज अपना लेल सभ करैए जे काज लोक दुनि‍याँ लेल करैए कर्मवीर उहए कहबैए सूरवीर-धर्मवीर-कर्मवीरकेँ तीनू लोकमे जगह भेटैए भाग्‍य भरोसे नै कि‍छु होइए। फूल-पत्ता फूल तँ फूल होइ छै पत्ता ने कोनो कम होइ छै बि‍नु पत्ता ने फूल फुलाइ छै पत्ता संगे फूल रहै छै जहि‍ना दुख-सुख संगे होइ छै बि‍नु पत्ता नै फूलक शोभा होइ छै पत्ता फूल संग काटो होइ छै काट फूलक रच्‍छा करै छै सुखक संग फूल दइ छै दुखक संग पत्ता काट दइ छै फूल-फड़क इच्‍छा सभ करै छै पत्ताक उपैछा करै छै फूल तँ फूल होइ छै पत्ताे ने कोनो कम होइ छै। भदबा तीस दि‍नक मासमे छह दि‍न भदबा रहै छै साल भरि‍मे बहत्तरि‍ दि‍न होइ छै लोक कहैए भदबाकेँ काजमे बाघा करैए एहेन कोन बाघा जइसँ मनुखे प्रभावि‍त होइए धरतीपर लाखो जीव होइए केकरो भादबा नै बाघा करैए मुदा मनुखकेँ महि‍नेमे छह दि‍न केना हानि‍ करैए धरती सूर्ज-चान नक्षत्र सभ दि‍न अपना गति‍ये रहैए प्रकृित अपन रचना करैए एहेन पैघ काजकेँ भदबा कहाँ रोकैए भदबामे जनम-मरण होइए तखन भदबा कि‍अए नै रोकैए भदबामे काज अशुभ होइतै जखन भदबामे दोख होइतै तँ सभ काज भदबामे रूकि‍ जइतै नै भदबामे खेती होइतै आ ने पेट भरि‍ कि‍यो खइतै तहूमे भदबा बाघा करि‍तै भदबाक नै कोनो दोख छै सभ दोख मनुखेकेँ छै अपन स्‍वार्थमे आन्‍हर बनि‍ भदबाकेँ बदनाम करै छै भदबा कोनो बाघा होइतै सृष्‍टि‍-वृष्‍टि‍केँ रोकि‍ दइतै। बाबा बले फौदारी की केलौं की पेलौं जेहेन करब तेहेन पएब बाबाक थैली भरोषे नै चलत कोनो काज अपना भरोषे होइ छै काज जौं बाबा भरोषे फौजदारी लड़ब तखन पराजय हएत जे काज जहि‍ना हेतइ ओहि‍ना ने करए पड़त अनका भरोषे नै होइ छै काज अपन काज जौं अपने करब तखन प्रगति‍ दि‍न-राति‍ हएत स्‍वावलंबी जाधरि‍ नै बनब ताधरि‍ परजीवी बनल रहब की करब सोचि‍ करब समए संग काज करब तखन जि‍नगीक महत रहत वर्त्तमानमे करब तँ भवि‍ष्‍य बनत भूत तँ बीत गेल वर्त्तमानपर भवि‍ष्‍य उज्‍जवल रहत संसार काजसँ चलैए जाधरि‍ अपन काज अपनासँ नै करब ताधरि‍ आत्‍म ि‍नर्भर नै बनब आत्‍मनि‍र्भर भेनाइ सबहक कर्त्तव्‍य बनैए नै तँ एक-दोसराक संग जि‍नगीक पि‍साइत रहैए अपन जि‍नगीक भारसँ लोक स्‍वयं दबल रहैए दोसराक भार केना सहैत रहैए दबि‍-दबि‍ जि‍नगी मरैत रहैए की कहब कहल नै जाइए से हाल प्रमात्‍मा जनै छथि‍ अपन वि‍कास जौं सभ करत केकरोपर नै ि‍नर्भर रहत सभ सुखी, दुखी नै कोइ रहतै। केकरा ले कानब हाल-चाल की कहब जेकरा ले कनै छी ओकरा आँखि‍ नोर नै अपन हारल की कहब दुख कि‍यो थोड़े बॉटि‍ लेत सुखक साथी सभ बनै छै दुखमे जानल अनजान होइ छै केकरा ले कानब के हमर नोर पोछि‍ देत सभ देखि‍-देखि‍ मुँह चोरबैए धीरज देनि‍हारो नै भेटैए हमरे देखि‍ हँसैत रहैए जहि‍ना जरलपर नून छि‍िट घा बढ़बैए घी दऽ आगि‍ बढ़बैए केकरो देखि‍नि‍हार कोइ ने होइए जनए देखै छी अन्‍हारे रहैए मतलबी यार तँ बहुतो भेटैए दुनि‍याँमे केकरो कोइ नै स्‍वार्थमे एक-दोसरकेँ लूटैए केकरा कहबै के पति‍येतै जेकरे कहै छी वएह हँसैए केकरा ले कानब वएह लति‍यबैए। परि‍वर्त्तन पल-पल क्षण-क्षण समए बढ़ैए क्षणे-क्षण मौसम बदलैए दि‍न-बदलि‍ राति‍ बनैए राति‍ बदलि‍ दि‍न कहबैए खास मौसम ऋृतु कहबै सभ ऋृतु बदलैत रहैए कल-कल छल-छल नदी बहैत सागर मि‍लि‍ महासागर बनैए काल बदलि‍ युग बदलैए युगक संग सभ कि‍छु बदलैए बदलि‍-बदलि‍ नव पुरान होइए प्रकृति‍ बदलि‍ आकृति‍ बदलैए तन-मन बदलि‍ चोला बदलैए परि‍वर्त्तन संसारक नि‍अम छै उनटि‍-पुनटि‍ संसार चलै छै करम-धरम नीति‍ बदलै छै बदलि‍-बदलि‍ जि‍नगी चलबैए अहि‍ना जँ सृष्‍टि‍ बदलि‍ जाएत तँ ई संसार केना चलत सभ कि‍छु बदलि‍तो सुरुज-चान कहाँ बदलैए। माइयक ममता माइयक ममताक नै अछि‍ जोर नअ मास धरि‍ गर्भमे पालि‍ तीन साल धरि‍ कोरामे खेला झूला-झुलाबै लोरी सुना अॅचराक छाँहसँ दुख बचा जि‍नगी भरि‍ अपन ममतासँ धीया-पुताकेँ दीर्घायु बनाबै भगवानक ममतासँ बेसी माइयक ममता सुख पहुँचाबै भूखल-दुखलमे छाती लगाबै माइयक ममता अछि‍ बेजोर सुक्‍खक खान माइयक ममताक नै अछि‍ कोनो मोल तोल सागरसँ गहींर माइयक दि‍ल धीरज अटल हि‍मालय सन जे सुख माइयक अँचरामे झाँपल बच्‍चाकेँ कोरामे मि‍लै छै ओ सुख ने स्‍वर्गोमे मि‍लै छै माइयक ममताक नै अछि‍ दुनि‍याँमे कोनो जोर। परदेशि‍या पाहुन आएल पहुना बाटे अॅटकि‍ गेल की गामक बाट भूलि‍ गेल मन उपकैए झाँकि‍-झाँकि‍ देखि‍तौं आकि‍ बाट चलि‍ दूर देखि‍तौं ओर-छोर नै देखै छी लगैए पहुनाक बाट छूटि‍ गेल ि‍क दि‍लमे कोनो कचोट भऽ गेल कि‍ करब कि‍छु ने फुराइए दि‍न-राति‍ मन घबराइए कि‍ हमरामे कोनो दोख बुझाइए जानि‍-मानि‍ ने तँ भेल कोनो हानि‍ मान-सम्‍मानमे जँ कोनो कमी भेल तँ हमरा कोनो उपरागो नै देल बि‍नु अपराध पाहुन भूलि‍ गेल हमरासँ कि‍एक रूसि‍ गेल सभ दि‍न तँ पहुना लेल कोन-कोन करम ने करै छी पहुना परदेशि‍या जखने भेल अपन घर अंगना भूलि‍ गेल कि‍ कोनो सौति‍नि‍याँ संग लगि‍ गेल ओज-टोनसँ मन मोहि‍ लेलक आएल पाहुन कि‍अए बाट भूलि‍ गेल पहुना पराया ने तँ बनि‍ गेल दि‍न-राति‍ सूरता पहुनापर लगल-ए सूरता करि‍ते होइए मूर्छा देहक खून सुखि‍ पानि‍ बनैए पहुना यादि‍ रहि‍-रहि‍ बनैए गौना पहुना कि‍अए करैलौं ऐसँ नीक कुमारि‍ये रहि‍तौं पहुनाक फेरि‍मे कहि‍यो ने पड़ि‍तौं दि‍लक रोगसँ दूरे रहि‍तौं कि‍एक एहेन दुख जुआनि‍येमे सहि‍तौं पाहुन जँ परचट्टा हेतै अपन जि‍नगी परदेशमे गमेतै केना कोइ पहुनापर वि‍श्वास करतै अपन जुआनी-जि‍नगीकेँ नास करतै। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। चंदन कुमार झा सररा, मदनेश्वर स्थान, मधुबनी, बिहार गजल-1 कमला-कोशीक धार मे दहायल जिनगी थाल-कादो सनायल मटिआयल जिनगी निशाँ ताड़ीकेर मातल बौरायल जिनगी माटि चाँगुर सँ कोरैछ भुखायल जिनगी रौद जेठ केर जारल फुलायल जिनगी एसी घर देखू बैसल घमायल जिनगी टुअर-टापर नञ्गटे टौआयल जिनगी देखू साजि-सम्हारल ओरिआयल जिनगी देखू हँसैत कनैत आ' खौँझायल जिनगी "चंदन" रूप अनेकहु देखायल जिनगी गजल-2 सपना नोरक धार बहाओल जागि-जागि केर राति बिताओल साज-सिंगार सोहैछ नै किछुओ विरहा-आगि करेज जराओल नभ मे चमकल जखने चंदा हियामे प्रेमक ज्वारि उठाओल कोइली सौतिन मुँह दुसै अछि कू-कू-कुहुकि के होश उड़ाओल अचके बालम ऐलाह अँगना "चंदन" सजनी मोन जुड़ाओल गजल-3 लगै अछि लाल अहाँकेर गाल जहिना सिनुरिया आम अहाँ केर चान सन मुखरा देखि चानो बनल गुलाम केश कारी घटा घनघोर अमावस राति सन लागय नैन काजर सजल चमकल बिजुरी के छुटल घाम जएह बोली अहाँक ठोर केर चुमि कय बहराइछ महुआ गाछ पर कोइली सैह बाजल बनल सूनाम डेग राखल जत' धरती माटि बनिगेल ओत' चानन रुनझुन पजेब-झंकार सँ अँगना बनल सुरधाम कसमस जुआनी देख सुधिबुधि हमर हेरायल पिबै लेल नेहरस ब्याकुल भमरा भऽगेल बदनाम "चंदन"पथिक प्यासल प्रेम केर बाट पर बौआइछ दिऔ ने नेहरस एकरा पिआय बइसा करेजा-धाम गजल- 4 बेचि खेलक इमानो बजार मे लाज-धाखो सजेलक सचार मे भाय-बापो सँ देखू लड़ैत छै प्रेम देखू फुसिए छै भजार मे आब मातोक ममता बिकाय छै नेह-नाता भसेलक इनार मे जे कहाबै लफंगा समाज मे सैह नामी बनल छै जबार मे देखि"चंदन" परल छी विचार मे साधु-संतो रमल बेभिचार मे मुजाइफ 212-212-212-12 गजल-5 हमतऽ कनिते रही आँखिक नोरे सूखा गेलइ अपने कानब पर देखू हमरा हँसा गेलइ लोक पुछलक जखन कहल ने भेल किछुओ असगरे आइ सभ बात अनेरे बजा गेलइ साओन-बदरी जे आगि उनटे धधकि उठल आइ सैह आगि एकबूँद पसेने पझा गेलइ बैसि अँगना भरि राति गनैत छलौँ तरेगन आइ सैह तरेगन केयो आँचर सजा गेलइ कतेको साल सँ पटबैत छलौँजे गाछ "चंदन" आइ अँगना मे सैह रोपल गाछ फुला गेलइ --------वर्ण-१८----------- रुबाइ-1 भासल सभटा सपना नोरक धार मे कण्ठ दबायल जनु हमर गृमहार मे बैसल छी एकात निजहि परिवार मे सोंगर खोँसि रहल छी टूटल चार मे । रुबाइ-2 लोक भूखले पेट चिकरैछ बाट पर छै ढ़करैत सरकार सूतल खाट पर निन्न टुटैछै नेताक आब केवल कोनो आम जनतासँ लागल चाट पर । रूबाइ-3 अपन महीष कुरहरिए नाथब सुगरे गूँह सँ चिपरी पाथब छी स्वतंत्र देश के बासी तइँ की बरछी सँ माला गाँथब ? आकाशवाणीक दरभंगा केन्द्र सँ दिनांक १०-०३-२००४ के तरुण-कुसुम कार्यक्रम मे प्रसारित  एकटा कविताः- (1)"हमहू पढबै आब" बाबू यौ, कीनि दिअ' ने हमरो किताब बाबू यौ, हमहू पढ़बै क,ख,ग,घ आब । नित्यदिन हम इस्कुल जेबै, पढिलिखि कऽ आफिसर बनबै, करबै हमहू बी.ए.एम.ए. पास, बाबू यौ, गामो पर करबै सभटा काज, बाबू यौ, कीनि दिअ' ने हमरो किताब बाबू यौ, हमहू पढ़बै क,ख,ग,घ आब । बेटा-बेटी मे नहि रहतै अंतर हमहू बनबै डाक्टर, इंजीनियर, नहि करबै आब ककरो आस, बाबू यौ, नहि रहबै आब हम बेकार, बाबू यौ, कीनि दिअ' ने हमरो किताब बाबू यौ, हमहू पढ़बै क,ख,ग,घ आब । अबला सँ सबला हम बनबै, देश समाजक सेवा करबै, नहि सहबै हम ककरो रोआब, बाबू यौ, चिन्हबै हमहूँ अप्पन अधिकार, बाबू यौ, कीनि दिअ' ने हमरो किताब बाबू यौ, हमहू पढ़बै क,ख,ग,घ आब । दहेज-प्रथा केर भूतो भगतइ, नारी समाजक शोषण रुकतइ, तखनहि हेतइ देशक पूर्ण-विकास, बाबू यौ, जखने पढ़बै हमहू किताब, बाबू यौ, कीनि दिअ' ने हमरो किताब बाबू यौ, हमहू पढ़बै क,ख,ग,घ आब । हाइकू कारी अकाश बिजुरी चकमक बर्षा झहरे माटिक गंध गमगम गमके नाचय मोर झाँट बिहाड़ि थकुचलक आम कुच्चा अचार आमक गाछी खोपड़ी छारइछ पसेना घाम जोति बिरार कयलक बाउग धानक बिया मुँग जनेर हरियर कचोर सगरो बाध हर बरद आशान्वित कृषक जोतय खेत | ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। नवीन कुमार ‘‘आशा’’ गर्भक आवाज

गर्भमे तोहर फकसियारी काटी जुनि हमरा सता गैय माँ । एक बेर जन्म लय कय, जिनगीक दुःख-सुख सिखय दे गैय माँ। माँ तुहि बुझमें दुःख हमर, दुनिया में पैर पसारैय दे गैय माँ। दाय, बाबा आ बाबु कतबो सतेथिन, मरहम तुहि त लगेमे गैय माँ। गर्भ में तोहर फकसियारी काटी, एक बेर जन्म दय दे गैय माँ। बाबु कतबो कहथिन अभिशाप, हम दूनूक आस बनबौय गैय माँ। गर्भ में बेटी फकसियारी काटे, ओकरा जुनि सता गैय माँ। बेटी जँ नहि लेते जन्म, दुनिया कोणा बढ़तैय गैय माँ। गर्भ सँ तोहर विनती करियौ, जन्म हमरा दय दे गैय माँ । ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। विदेह नूतन अंक मिथिला कला संगीत राजनाथ मिश्र चित्रमय मिथिला स्लाइड शो चित्रमय मिथिला (https://sites.google.com/a/videha.com/videha-paintings-photos/ ) २. उमेश मण्डल मिथिलाक वनस्पति स्लाइड शो मिथिलाक जीव-जन्तु स्लाइड शो मिथिलाक जिनगी स्लाइड शो मिथिलाक वनस्पति/ मिथिलाक जीव जन्तु/ मिथिलाक जिनगी  (https://sites.google.com/a/videha.com/videha-paintings-photos/ ) ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। विदेह नूतन अंक गद्य-पद्य भारती १. मोहनदास (दीर्घकथा):लेखक: उदय प्रकाश (मूल हिन्दीसँ मैथिलीमे अनुवाद विनीत उत्पल) मोहनदास (मैथिली-देवनागरी) मोहनदास (मैथिली-मिथिलाक्षर) मोहनदास (मैथिली-ब्रेल) २.छिन्नमस्ता- प्रभा खेतानक हिन्दी उपन्यासक सुशीला झा द्वारा मैथिली अनुवाद छिन्नमस्ता ३.कनकमणि दीक्षित (मूल नेपालीसँ मैथिली अनुवाद श्रीमती रूपा धीरू आ श्री धीरेन्द्र प्रेमर्षि) भगता बेङक देश-भ्रमण ४.नित्यानंद गायेन केर दूटा हिंदी कविताक मैथिली अनुवाद अनुवाद कर्ता आशीष अनचिन्हार ५.प्रस्तुत अछि कुरानक मैथिली अनुवाद आशीष अनचिन्हार) ६.“रेहनपर रग्घू”- श्री काशीनाथ सिंह (हिन्दीसँ मैथिली अनुवाद श्री विनीत उत्पल) ७.असगर वजाहत- हम हिन्दू छी हिन्दी कथाक मैथिली रूपान्तरण विनीत उत्पल द्वारा- ४. नित्यानंद गायेन केर दूटा हिंदी कविताक मैथिली अनुवाद अनुवाद कर्ता आशीष अनचिन्हार १ हम नै चाहै छी अपना उपर संदेह हमरा अहाँक माँझ एहिना बनल रहए दूरी अम अपन सफाइ दए क नै करए चाहैत छी अपना उपर संदेह आ ने अहीँकेँ करए चाहैत छी बेइज्जत........ २ रौद पघलि रहल अछि मनुख सुखा रहल अछि जरि कए आ रौद पघलि रहल अछि------ राजा लूटि रहल मंत्री सूति रहल ओकील जागि रहल विपक्ष नाचि रहल कूकूर बाटपर भूकि रहल "हम" देखि रहल छी चुपचाप ई सभ। ५ प्रस्तुत अछि कुरानक मैथिली अनुवाद अनुवाद कर्ता ( आशीष अनचिन्हार) नोट-- ई अनुवाद मधुर संगम संदेश द्वारा अरबी-हिन्दी कुरान पर आधारित अछि---- तँ शुरू करैत छी आइसँ कुरान केर मैथिली अनुवाद। कुरानक पहिल अध्यायकेँ " अल-फातिहा" कहल जाइत छै। एहि अध्यायमे सात टा आयत छै ( आयत मने श्लोक )। ई सातो आयत पैगम्बर मोहम्मद मक्का नामक जगह पर कहला। १) शुरू करै छी अल्लाह खुदा भगवानक नामसँ जे की एकमात्र प्रशंसा केर हकदार छथि। २) जे की बड़का कृपाशील आ दयावान छथि। ३) जे की रोजे-रजा ( बदला लेबए आ देबएकेँ ) मालिक छथि। ४) जिनकर हम सभ पूजा करैत छिअन्हि आ जिनकासँ मदति माँगै छिअन्हि। ५) जे की हमरा सोझ आ सही बाटपर चलबा लेल प्रेरित करै छथि। ६) ओहि लोकक बाट पर सेहो चलबाक लेल कहै छथि जे की खुदा केर प्रिय छथि। ७) आ हुनका संग रहबा लेल सेहो प्रेरित करै छथि जे की ने नीच छथि आ ने पथभ्रष्ट। ६. “भरनार रग्घू”- श्री काशीनाथ सिंह (हिन्दीसँ मैथिली अनुवाद श्री विनीत उत्पल) श्री काशीनाथ सिंह: जन्म:०१ जनवरी १९३७, कथा संग्रह: कहनी उपखान , उपन्यास- अपना मोर्चा , काशी का अस्सी,  रेहन पर रग्घू । संस्मरण:  घर का जोगी जोगड़ा , याद हो कि न याद हो , नाटक: घोआस विनीत उत्पल:विनीत उत्पल (जन्म: 7 अप्रैल, 1978, ननिहाल पूर्णिया जिलाक सुखसेना गाममे)। पैत्रिक घर: आनंदपुरा, मधेपुरा। प्रारंभिक शिक्षा मुंगेर जिला अंतर्गत रणग्राम आ तारापुरमे। तिलकामांझी भागलपुर विश्वविद्यालय, भागलपुर सँ गणित विषय मे बी.एस.सी. (आनर्स), मारवाड़ी कॉलेज, भागलपुर। जामिया मिल्लिया इस्लामिया, नई दिल्ली क हिंदी विभाग सँ जनसंचार आ रचनात्मक लेखन मे स्नातकोत्तर डिप्लोमा। भारतीय विद्या भवन, नई दिल्ली सँ अंग्रेजी पत्रकारिता मे स्नातकोत्तर डिप्लोमा। गुरु जम्भेश्वर विश्वविद्यालय, हिसार सँ जनसंचार मे मास्टर डिग्री। जामिया मिल्लिया इस्लामिया, नई दिल्ली क नेल्सन मंडेला सेंटर फॉर पीस एंड कानफ्लीक्ट रिजोल्यूलशन क पहिल बैचक छात्र आ सर्टिफिकेट प्राप्त। भारतीय विद्या भवन, नई दिल्ली सँ फ्रेंच भाषाक शिक्षा। छात्र जीवनमे रोट्रेक्ट क्लब, भागलपुर (रोटरी इंटरनेशनलक युवा शाखा) सँ जुड़ल, कएकटा संबद्ध पत्र-पत्रिकाक संपादन। जामिया मिल्लिया इस्लामिया, नई दिल्लीक हिन्दी विभागमे अध्ययनक दौरान 'हमारी पहचान" नामक पाक्षिक समाचार पत्रक संपादक मंडलक सदस्य। दिल्लीसँ प्रकाशित कएकटा राष्ट्रीय अंग्रेजी समाचार पत्रमे ग्रामीण विकासक खबरिक विश्लेषण, हिन्दीक प्रचार-प्रसारमे केंद्रीय वित्त मंत्रालयकेँ योगदानक अलावा गुजरात दंगामे अंग्रेजी आ गुजराती मीडियाक भूमिकापर लघुशोध। हिन्दी, मैथिली, अंग्रेजी भाषामे विपुल लेखन आ सुनीता नारायण, शशि थरूर, महेश रंगराजन आदिक लेख सभक अंग्रेजीसँ हिन्दीमे अनुवाद। वरिष्ठ पत्रकार अरविंद मोहन द्वारा संपादित 'लोकतंत्र का नया लोक" मे उपलब्ध द्वैपायन भट्टाचार्य, जी.कोटेश्वर प्रसाद आ नलिनी रंजन मोहंतीक अंग्रेजी लेख सभक अनुवाद आ पुनर्लेखन। अनियमितकालीन कला पत्रिका 'कैनवास" मे समन्वय संपादक।मैथिली कविता संग्रह 'हम पुछैत छी" प्रकाशित। साहित्य अकादमी सँ पुरस्कृत हिन्दीक वरिष्ठ कथाकार उदयप्रकाशक दीर्घ-कथा/ उपन्यास 'मोहनदास" क मैथिली अनुवाद।पत्रकार, लेखक, कवि आ अनुवादक विनीत उत्पल, दैनिक भास्कर, दिल्ली प्रेस, हिन्दुस्तान, देशबंधुमे पत्रकारिताक बाद आइ-काल्हि राष्ट्रीय सहारा, नई दिल्लीमे वरिष्ठ उपसंपादकक पदपर कार्यरत छथि। भरनापर रग्घू (पछिला अंकसँ आगाँ) अहाँक सीनियर सेहो, क्लासफेलो सेहो। मुदा बेटा भारी संकटमे छी, अहीं उबारि सकै छी ऐ संकटसँ। पछिला बरख ई बाजल छल जे बियाह करब तँ संजयसँ, नै तँ नै करब बियाह। अपना भीतर नुकेने रहलौं ऐ गपकेँ। आइ बाजि रहल छी, सेहो ऐ दुआरे जे फैसलाक घड़ी आबि गेल अछि। तीन-चारि मास आर अछि कैलिफोर्निया जेबामे। ऐ बीच बियाह अछि, हवाइ टिकट अछि, पासपोर्ट अछि, वीजा अछि, सभटा तैयारी अछि। सोनल अमेरिका आ हनीमूनकेँ लऽ कऽ उत्साहित अछि।” ओ आँखि पोछलक आ संजयकेँ देखलक। “सभ बापक सपना होइ छै आ हमरो अछि। नै हेतिऐ तँ सेंट्रो कार किए लैतिऐ? अपना लेल फिएट तँ छेबे करल। नव घर गृहस्तीक समान किए जुटैबितिऐ? अहाँक नग्रमे एकटा कॉलोनी अछि अशोक विहार। ओइमे एकटा छोट सन बंगला बनबैले छी। सभ किछु कम्प्लीट अछि। बस फिनिशिंग टा बाकी अछि। सोचले रही जे एतऽसँ रिटायर करब तँ काशीवास करब। सभ लोक यएह चाहै छै। अहाँक पापा-मम्मी सेहो चहैत होएत। मुदा सोचैत छी जे काल्हि सोनल विश्वविद्यालयमे ज्वाइन करत तँ कतए रहत? हमर तँ सभटा जीवन राँचीमे बीतल, सभटा दोस्त-मित्र, सर-सम्बन्धी एतए अछि। ओतऽ जा कऽ की करब? तइसँ बंगला ओकरे नाम कऽ रहल छी।” संजय चिन्तित भेल। ओकर आँखिमे पापा-मम्मीक चेहरा घूमि रहल छलै। ओकरा लागि रहल छलै जे ओ हुनका हँ करैमे जल्दी कऽ देने छल। बाजल “बड देर कऽ देलौं सर सोनलक बात बताबैमे।” “देर सबेर किछु नै होइत अछि संजू, सभ चीजक बेर होइ छै। आब यएह देखू, हमर साढ़ू प्रोफेसर अस्थानाकेँ बनारस मे एहने घड़ीपर कुलपति किए हाँकि देने छल जखन सोनल थीसिस जमा कऽ रहल छलि?” ओ सिगरेट जरेलक- “ओना तँ सिगरेट मना अछि मुदा कहियो काल एकाध सोंटा लऽ लैत छी। तँ अहाँक पापा। हुनकर परेशानी बुझि सकैत छी। कहैत रहल छी हुनका लऽ कऽ। छोट भाइ अछि अहींक। पछिला तीन-चारि बर्खसँ कैट-मैट परीक्षा दऽ रहल अछि। लोक सेवा आयोगक परीक्षा दऽ रहल अछि। आ कोनोमे नै आबि रहल अछि- ओकर परेशानी। गप आएल बीचमे तैं, परेशान भऽ कऽ किछु कऽ नै लिअए तेँ ओइसँ पहिने कोनो मैनेजमेन्ट इन्स्टीट्यूटमे नामांकन करा दियौ। एना नै तँ डोनेशन दऽ कऽ। ऐं यौ, कत्ते लागत? डेढ़ लाख, दू लाख, आर की? अहाँ बतेने छलौं जे अहाँक पढ़ाइ लेल ऋण लेल गेल छल आ खेत सेहो भरनापर राखल अछि। ऐ सभ परेशानीसँ बहार होइले कतेक जरूरति हएत हुनका? हुनकासँ गप कऽ कए तँ देखू। की चाहैत छथिन ओ। देखू, बरियाती, धूम-धरक्का, गाजा-बाजा ई सभ फुसियाहींक बखेरा छी। कोनो जरूरति नै अछि देखावटी व्यवहार आ तमाशाक। बियाह लेल कोर्ट अछि आ दोस महीम लेल एकटा स्वागत समारोह राखि देबै। ई हम कऽ देब, फेर? ओना एकटा गप बता दै छी, जेहेन कम्पनी आ जेहेन शर्तपर अमेरिका जेबाक अछि ओइसँ तीन बरखमे कियो एते कमा लेत जे जौँ ओकर बाप चाहै तँ गामक गाम कीनि लेत। बुझलौं?” “प्रश्न ई नै अछि सर। पिताजी कने लोक-लाज आ जाति-पातिमे विश्वास करऽबला पुरान ढङक लोक छथिन।” सक्सेना गम्भीर भऽ गेला। कनी काल धरि चुप रहलखिन। ऐ बीच सोनल साड़ीमे आएल। खाइक लेल बजाबैक लेल। “देखू संजू। लॉ ऑफ ग्रेविटेशनक निअम गाछ आ फड़ धरि लेल मात्र लागू नै होइत अछि। मनुक्खक सम्बन्धपर सेहो लागू होइत अछि। सभ बेटा-बेटीक माँ-बाप पृथ्वी अछि। बेटा ऊपर जाइले चाहैत अछि आर ऊपर, कनिक आर ऊपर तँ माँ-बाप अपन आकर्षणसँ ओकरा घिचैत अछि। आकर्षण संस्कार भऽ सकैत अछि आ प्रेम सेहो, माया-मोह सेहो। मंशा गिराबैक नै होइत अछि। मुदा खसा दैत अछि। जँ हम अपन बापक सुनने हेतिऐ तँ हेतमपुरमे पटवारी बनि गेल हेतिऐ। तँ ई अछि। हमरा जे कहबाक रहए, से कहि देलौं। अहाँकेँ जे नीक लगैत अछि से करू। हँ, जाइसँ पहिने सोनलसँ गप कऽ लेब।” ४ जुलाइमे बियाह भऽ गेल चिरंजीवी संजय आ सोनलक कोर्टमे। नहिये बरियाती आ नहिये बाजा-गाजा। प्रीतिभोजक लेल नोत आएल छल, रघुनाथक नामसँ सेहो। मुदा ओ नै गेला। एहेन चोट लागल छल रघुनाथ आ शीलाकेँ जे ओ दोसरकेँ नै देखा सकैत छल आ नहिये ककरोसँ नुका सकै छल। एहेन ठामपर जाएब ओ बन्द कऽ देने छल जतऽ दू-चारि गोटे जुमैत होथि। ओ मानि लेने छल जे दू बेटामे एकटा बेटा मरि गेल। जखन माए-बापक प्रतिष्ठाक ओकरा चिन्ते नै तँ मरले बुझू।सितम्बरमे ओ अमेरिका जाए आकि नर्क, ऐसँ ओकरा कोनो सरोकार नै। ऐ घड़ी लेल ओ ओकरा पालने-पोसने छल, पढ़ेने-लिखेने छल, गाछ कटने छल, कर्ज लेने छल, भरनापर खेत देने छल, आ दुनिया भरिक तगेदा सुनने छल? हुनकर लाख मना केलाक बादो राजू गेल छल, रामू माने संजयक भाए धनंजय, घुरल तँ ओकरा हाथमे एकटा ब्रीफकेश छल जे रघुनाथ लेल सक्सेना पठेने छल। रघुनाथ कॉलेजक तैयारी कऽ रहल छल। कुमोनसँ ब्रीफकेश दिश देखलक आ बाजल- “राखि दियौ।” “ऐं, एना कोना राखि दी। अप्पन संदूकमे राखू।” बाबा जमानाक सन्दूकमे की कहाँ राखै छल रघुनाथ आ ओकर चाभी ओ ककरो नै दै छल। बिना किछु बजने ओ चाभी ओकरा दिश फेकि देलक।राजू ब्रीफकेशकेँ संदूकमे राखि चाभी घुरा देलक आ बाजल, “आर किछु नै पुछब?” शीला उदास मोनसँ दरबज्जापर ठाढ़ि छल, भीतर चलि गेलि। “अहाँ सभ तँ एना गुम्म छी जेना कोनो बिपति आबि गेल”, राजू हँसैत माँक पाछाँ भीतर चलि गेल। “कनियाँ एहेन जे लाखमे एक। माँ अहाँ चिन्ता नै करू। सभ किछु करत ओ जे संजय बाजैत छल। हाथ-पएर जाँतत, मुँह दबाएत, बर्तन माँजत, बाढ़नि लगाएत, खेनाइ बनाएत, जे जे चाहत से सभ किछु करत। कनी अमेरिकासँ घुरिकऽ आबऽ तँ दियौ। अखन हनीमूनपर जा रहल अछि दार्जिलिंग, ओतएसँ दमदम हवाइ अड्डा, फेर ओतएसँ अमेरिका। बचि गेलौं अहाँ, जँ गेल रहितिऐ तँ मुँह देखाइ देबऽ पड़ितिऐ। ई लिअ, अहाँले फोटो पठेलक अछि स्वागत समारोहक…।” राजू नै जानि की-की बजैत रहल, ओ सुनितो रहल, नहियो सुनैत रहल। दुनू गोटेक फोटो ओतए पड़ल रहल जतऽ ओ बैसल छल। एकटा मन कहि रहल छल, “देखी”, दोसर कहि रहल छल, “छोड़ू, जाए दियौ”। सभटा सख धरले रहि गेल। राति भऽ गेल छल। गाममे सनाटा पसरि गेल छल। एक दिन पहिनहिये खूब बरखा बुन्नी भेल छल। हरियरी पसरि गेल छल। झिंगुरक अबाज गामकेँ गनगनेने छल। मेघ घटाटोप केने छल। दूर अकाशमे बिजलौका लौकै छल। ओम्हर कतौ पानि पड़ल हेतै, एम्हर नै भेल। रघुनाथक घर दुआर गामक बाहरी इलाकामे छल। घरक अगुलका हिस्सा दुआर पछुलका घर। दुआरक माने दलान आ बरण्डा। ऐ बरण्डामे सुतै छल रघुनाथ आ राजू। राजूक सुतलाक बाद रघुनाथ आध रातिमे नुका कऽ भीतर गेल, ढिबरी लेसलक आ सन्दूकसँ ब्रीफकेश निकाललक। जखन ओ ढिबरी आ ब्रीफकेश लऽ कऽ शीलाक बगलबला कोठली गेल तँ ओकरा मोन पड़लै जे ब्रीफकेशक चाभी तँ राजू देबे नै केलक। ओ रकमसँ राजूकेँ जगेलक। राजू बतेलक जे ब्रीफकेश चाभीसँ नै नम्बरसँ खुजत, ऐ नम्बरसँ। आ बड़-बड़ करैत ब्रीफकेश खुजि गेल। रघुनाथ ब्रीफकेशकेँ खोललक तँ भाव-विभोर। बेटा संजयकेँ लऽ कऽ जत्ते तामस रहै सभ टा बिला गेलै। टाकाक एतेक गड्डी अपन आँखिक सोझाँ एकटा ब्रीफकेशमे ओ पहिल बेर देखि रहल छल। आ ई कोनो सिनेमा नै वास्तविकता छलै। गामक लोक रघुनाथकेँ झगड़ा-झंझटिसँ दूर रहैबला मुदा कंजूसक श्रेणीमे गनती करै छल जे टाकामे अठन्नी भजबैत अछि। लोक ईहो कहै छल जे बड्ड लोभ नै केने रहितिऐ तँ ई दिन नै देखऽ पड़ितिऐ। रघुनाथ ब्रिन्चकेँ अपना दिस घिचलक। पहिने सए-सएक गड्डी गननाइ शुरू केलक। ओ एक-एक बण्डलक संख्या सेहो लिखि रहल छल। फेर ओ पाँच-पाँच सएक नोटक गड्डी उठा कऽ गनब आ लिखब शुरू केलक। गनैत-गनैत राति बेशी भऽ गेल आ सभटा रुपैयाक जोड़ भेल चारि लाख साठि हजार। हुनकर हअदय काँपल, जँ गनैयोमे गलती भेल हएत तँ एतेक टाका कोना? ओ उठि गेल आ सन्दूकमे झोंकि फेर आनि लेलक। घुरतीमे भंसाघरसँ कटोरामे पानि लऽ रहल छल तँ शीला जागि गेल। अंगुर भिजा-भिजा कऽ फेरसँ टका गनलक मुदा फेर वएह चारि आ साठि। ओ माथ पकड़ि बैसि गेल। “कोन गप अछि?”, शीला पुछलक। “पाँच लाखमे कम अछि चालीस हजार, कियो सन्दूक तँ नै खोलने छल?” “चाभी तँ अहीं लग छल, खोलत के?” “कियो आर तँ नै आएल छल घरमे?” “अहाँ आ राजू आएल छलौं, आर तँ कियो नै।” कनी कालक बाद ओ नै जानि की सोचि कऽ उठल आ राजूकेँ जगा कऽ लऽ अनलक। राजू आँखि मिड़ैत आएल। “ब्रीफकेश के देने छल अहाँकेँ, संजू आकि सक्सेना?” “किए? की गप अछि?” “बताउ, कम अछि पाँच लाखमे?” राजू हँसल, “मंगनीक बाछीक दाँत नै गानल जाइ छै। संतोष करू, जत्ते भेटि गेल से मंगनीमे, सएह बुझू।” ओ एकटक राजूकेँ देखैत रहल, “अहाँ तँ किछु एम्हर-ओम्हर नै केने छी?” “हम जनै छलौं जे यएह शक करब अहाँ, अहाँ स्वभावेसँ शक्की छी।” “चुप्प”, शीला बाजलि, “अहिना बापसँ गप्प कएल जाइ छै?” “बुझि गेलौं, यएह चोरेलक अछि। बतेलक नै।” “पहिने बुझि जेबाक चाही। चोरा कतौ बतबै छै जे चोरि वएह केने अछि”, राजू बाजल। रघुनाथ आश्चर्यसँ देखलक ओकरादिस, “की भऽ गेल छै ऐ छौड़ाकेँ। एकर भाए कम्प्यूटर अभियन्ता। ओ ऐ तरहेँ कहियो गप नै केने अछि बापसँ।” “गप्प नै केलक, तेँ अस्थिरेसँ चुपचाप बियाह कऽ लेलक आ बापकेँ खबरि धरि नै केलक।” झनझना उठल गुस्सा सं रघुनाथ। मन भेल-ओकरा घर सं निकलि जायैक कहियै मुदा नहि जानि की सोचहि के ओतय सं उठल आ आंगन मे आबि गेल। कोना मे बंसखट पड़ल छल, ओहि पर बैसि गेल। ओ भगवानक लेल माथ उठैलक आसमान दिस। 'देखू मां, हम डेढ़ बरख सं कहि रहल छलहुं हिनका सं जे मोटरबाइक दऽ दियौ। घरानाक सभ छौड़ा लग अछि, एकटा हमहीं छी जकरा लग नहि अछि। हिनकर कहब छल जे हाथ-पाइर तोड़बाक अछि की? माथ फोड़बाक अछि की? चोरी-चकारी आ लफंगई करबाक अछि की? डाका डलबाक अछि की? केकर हाथ-पइर टूटल अछि, कहू ते? ते संजू हमरा सं पुछलक-'अहां के की चाहि? जखैन हम ओतय सं घुरहि लागलहुं। हम कहलहुं-'हां, मोटरबाइक। ओ हमरा टका थमा देलक। ओ ब्राीफकेस मे सं देलक या कतय सं देलक हमरा नहि पता।" 'सरासर झूठ। ई जानैत अछि जे संजय आब नहि आबय बला अछि। हम नहि पूछि सकब ओकरा सं।" रघुनाथ के ई झूठ बर्दाश्त नहि भेल। शीला ठाढ़-ठाढ़ डिबरीक मद्धिम रोशनी मे कानि रहल छलि। ओ अप्पन बेटाक अहि रूप सं अनजान छलि। 'आैर कहू। हमर बापजानक दूटा बेटा-संजू आ हम। ई एक्को आंखि सं हमरा देखलक तक नहि। सभटा मेहनत आ सभटा पाय ई ओकरे पर खर्च करलखिन। पढ़ैलक, लिखैलक, कंप्यूटर इंजीनियर बनैलक आ हमरा लेल। कामर्स पढ़ू। जकरा पढ़हि मे नहि ते मदद कऽ सकैत छल, नहि हमरा मन लागैत छल। कोनो तरहे बीकाम करलहुं ते कोचिंग करू, ई टेस्ट दियौ, ओ टेस्ट दियौ। हम थाकि गेल छी टेस्ट दैत-दैत। हिनका सं कहियौ, ई टका कत्तौ इमढ़-उमढ़ खर्च नहि करैथ, डोनेशन लेल राख्ौथ। बिना डोनेशन कत्तौ एडमिशन नहि हय बला छै। परछा के बता दैत छी।" 'जौं डोनेशनक टका नहि देब तऽ?" 'ते कहियौ नहि पूछब जे ई की कऽ रहल छी?"'कियअ कऽ रहल छी?" 'की करब? डाका डालब? तस्करी करब? गांजा हेरोइन बेचब? कत्ल करब?" की बक-बक कऽ रहल छी अहां? फालतू? झमाइर के शीला बाजल, 'आओर अहां चुप रहू। अनाप-शनाप कहि रहल छी बाप सें।" राजू कमरा सं बाहर निकलैत पिता सं बाजल, 'बस कहि देलहुं।" 'सुनू-सुनू। भागू नहि। अपना लऽ कऽ सोचैत छी आ कहियौ अप्पन बहिन कऽ लऽ कऽ सोचने छी? जखैन होयत अछि तखन जाइत छी हजार पांच सौ मारि के आबि जायत छी ओकरा सं? ओकर ब्याह कऽ लऽ कऽ कखनो सोचैत छी?" 'देखि रहल छी हिनकर?" ओ मां दिस मुड़ल, 'जकरा सं कहबाक छल, ओकरा सं नहि कहलल, कहि हमरा सं रहल अछि, जे एखन पढ़ि रहल अछि। डोनेशनक गप आयल ते दीदीक ख्याल आबि रहल अछि। पहिले हिनका सं कहियौक जे कंजूसी आ दरिद्रता छोड़ैक आब। हंसी उड़ाबैत अछि लोक। ई ढिबरी आ लालटेन छोड़य आ आन जना तार खींचवांके-कम से कम आंगन आ दरवाजा पर लट्टू ते लगवाय लियै। इजोत हुयै घर मे। एकर संगे फोन लगा रहल अछि लोक। घर मे फोन होयत ते संजू जखन चाहत, गप कऽ लेत। अहां सरला दीदी सं गप कऽ लेब। दीदी से टा किया भौजी सं सेहो।" माथा फोड़ैत फेर सं बैस गेल रघुनाथ-'यहि छी भाग्य। जकरा लेल कंजूसी करलहुं, ैओकरे मुंह से ई सुनबाक छल।" 'आओर एकटा गप कहि दैत छी अहां से आओर हिनको सं। फेर एहन बेवकूफी नहि करैथ जेहन संजूक काल मे कइलय अछि। दीदी से परछा के गप कऽ लहुं चे ओ हिनकर तय करल सं ब्याह करत या नहि। ई ते दौड़-भाग कऽ कत्तौ तय कऽ अइथिन आ ओ कहि दियै जे हमरा ब्याह नहि करबाक अछि। फेर भद पिटत हिनकर।" 'ई अहां कोनो कहि सकैत छी।" 'कियैकि हम एकटा आदमी के अकसर हुनका संग देखनी छी। के छी ओ, नहि जानैत छी।" 'देखलियै नै? एकरा शरम धरि टा नहि अछि बहिन कऽ लऽ के अहि तरहे गप करैत?" रघुनाथ दांत पीसैत ओतय सं बाजल। ५ सरला दुविधा मे छल-ब्याह करि आ नहि करि? पक्का एतबेक टा छल जे ओकरा ओ ब्याह नहि करबाक अछि जे पापा खोजि के आनत। कतेक रास लोचा छल ओकर दुविधा मे! आजुक सं कोनो सात-आठ बरख पहिने। ओ अपना भीतर किछु अजब-सन महसूस केने छळ-मन उखड़ल रहैत छल, कत्तौ हरायल-हरायल सन छल, बिना गप्पक हंसी आबैत छल, हरदम गुनगुनाबैक जी चाहैत छल, बाहर आबैत छल, ते दोस्तनी सब हंस के कहय लागल छल-देखू-देखू। पैरक चप्पल-दू डिजाइनक। क्लास कहानी के, किताब कविताक हाथ मे। ई वहि दिन छल जखन नगर मे आबि बला कोनो फिल्म ओकरा सं नहि छूटहि छल। अहिना मे नहि जानि कोना कौशिक सर नुका के आयल आ ओकर दिल मे आबि के बैसि गेल। कौशिक सर कविताक अध्यापक। बड़ गंभीर आ चुप रहि बला आ सिद्धांतवादी। पातर-दुबर, नमर गर आ देखहि मे आकर्षक। अधेड़ आ तीन नेना नहि युवाक पिता? अद्भुत 'सेंस ऑफ ह्यूमर"क मालिक। हुनका सं प्रेम करहि मे कोनो खतरा नहि छल। नहि कोनो खतरा, नहि कोनो तरहक संदेह। ओ बड़ बुधियारी आ विवेक सं काज लेने छल अप्पन 'ब्वायफ्रेंड" चुनहि मे। छौड़ा-छौड़ीक 'गॉसिप"क डर सेहो नहि छल। कौशिक सर कृतज्ञ आ अभिभूत छल। मिज्झर होयत जिनगीक अंतिम प्यार। सेहो सरला जेहन सुनर छौड़ी सं। पचास-पचपनक उमर मे ते कियो सोचहि नहि सकैत अछि, एहन भाग्यक लऽ कऽ। सरलाक मन बेचैन छल, देह सेहो। बस प्रेमक गप आ तड़प। आर किछु नहि। सऽ ते ओकर सहेलीक संग भऽ रहल छल। किछु ्ते अलग हुयै-कौशिक सर कोनो विद्यार्थी थोड़े अछि। अहिने इच्छा कौशिक सर के सेहो छल मुदा नगर मे कत्तौ एहन ठाम नहि छल, जतय हुनका कियो नहि जानैत हुयै। निश्चित भेल जे कौशिक सर एक दिन टैक्सी सं 'अमुक ठाम" पहुंचत, ओतय सं सरला के 'पिकअप" करत आर दू-चारि घंटाक लेल सारनाथ। फेर सोचल जायत 'एकांत" आ 'निर्जन"क लऽ कऽ। प्रेम बंद आ सुरक्षित कोठलीक चीज नहि अछि। खतरा सं खेलहिक नाम अछि प्रेम। लोकक भीड़ सं बचाबैत, हुनका धत्ता बताबैत, हुनकर नजरि के चकमा दैत जे करल जायत अछि-ओ अछि प्रेम। ब्याह से पहिने यहि चाहैत छल सरला। ब्याहक बाद ते ओ विश्वासघात होयत, व्याभिचार होयत, अनैतिक होयत। जे करबाक अछि, पहिने कऽ लियअ। अनुभव कऽ लिअ एक बेर। मर्दक स्वाद! एकटा एडवैंचर! जस्ट फॉर फन! सरला रोमांचित छल। नर्वस छल आ उत्तेजित सेहो। जहि दिन जैबाक छल ओकरा सं पहिलुक राति। ओ सुति नहि सकल नीक सं। नींद नहि आबि रहल छल। कतेक रास गप, कतेक रासक ख्याल, कतेक रासक गुदगुदी। अपने सं लजाबैत छल, अपने आप हंसैत छल। ओ सोच लेने छल जे अवसर भेटय पर एत्ते आगू नहि बढ़हिक दैक अछि कौशिक सर के जे ओ ओकरा गलत बुझि लियअ। ई ते शुरुआत अछि... एखन नहि जानि कतेक मुलाकात बाकी अछि। नहि, आबि कतय मुलाकात? 'फेयरवेल" भऽ चुकल अछि। दू-चारि दिन आर चलि सकैत अछि क्लास, ओकर बाद ते इम्तहान! फेर कतय संभव अछि भेंट? कोन बहाना रहत भेंट करबाक लेल? कौशिक सर लोकप्रिय लोक छल! विश्वविद्यालयक नहि, नगरक सेहो! जानहि बला बड़ छल। तरह-तरहक लोक! अहि बातक गर्व छल सरला के जे ओ जेकरा सं प्यार करैत छल, ओ कियो सीटी बजाबहि बला, लाइन मारहि बला सड़क छाप विद्यार्थी नहि, विद्वान अछि। कौशिक सर बड़ सावधानी बरतलक-ओ छुट्टीक दिन नहि हुयै, स्कूल-कॉलेज खुजल हुयै, कियैकि छौड़ा-छौड़ी पढ़हि मे आ अध्यापक पढ़ाबै मे व्यस्त हुयै, पिकनिक आ भ्रमणक कार्यक्रम नहि बनाबै, सारनाथक मेला सेहो नहि हुयै ओहि दिन! अहि सावधानीक संग कौशिक सर सरलाक संग टैक्सी सं पहंुचल चौखंडी स्तूप! सारनाथ से पहले! सड़कक कात पहाड़ीनुमा ढूडक ऊपर खंडहर जेहन टूटल-फूटल स्तूप! ठाड़ भऽ जाऊ ते पूरा सारनाथ ते नहि, दूर-दूर धरि गाम गिरावं आर बाग-बगीचा नजर आयत। खाली पड़ल छल स्तूप! नीचा चौकीदार, सिपाही, माली अप्पन-अप्पन काज मे लागल छल। एकदम निर्जन असगर ठाढ़ छल स्तूप! 'हिमगिरि के उत्तुंग शिखर" के तरहे। कियो दर्शनार्थी नहि! मनु श्रद्धा सं देखलक! श्रद्धा मनु के देखलक! दूनू टैक्सी सड़कक कात मे ठाढ़ करलक आ चलि पड़ल। घुमावदार बाट से चक्कर काटैत। आगा-पाछां नहि, अगल-बगल। संगे-संग। हाथ मे हाथ लेल! सरला असगरे मे कौशिक सर के 'मीतू" कहैत छल। ओहि दिन ओ सत मे मीतू भऽ गेल छल। सरला-जे सदिखन समीज सलवार आ दुपट्टा मे रहैत छल-ओ सरला हरका बार्डरक बासंती साड़ी मे गजब ढ़ा रहल छल। बार्डरक रंगक साड़ी सं मैच करैत ब्लाउज आर माथ पर छोट-सन लाल बिन्दी! हवा उड़ायल जा रहल छल आंचल के, जकरा ओ बेर-बेर संभारि रहल छल। ओ चढ़ाय खत्म कऽ स्तूपक लग पहुंचल आ चारो दिस देखलक-दूनूक मुंह सं एक संग निकलल-'जेहन अछोर, अनंत, असीम हरियालीक समुद्र"। आर ओहि मे पीयर फुलल तोड़ीक जतय-ततय खेत--एहन लागि रहल छल जेहन पाल बाली हिलैत-डुलैत डोंगी! 'आ हम?" सरला पुछलक! कौशिक सर मुस्कुरायल! बाजल-'मस्तूल बला बड़ पैग जहाज के डेक पर।" स्तूप के अहि धरि छांह छल आ ओहि धरि कुनकुनी रौद! छांह नम्हर होयत ओतय धरि चलि गेल छल, जतय माली काज कऽ रहल छल। ओ ओहि कात गेल रौद मे, जिम्हर समुद्र छल आ हिलैत-डुलैत पीयर डोंगी! ओ स्तूप से सटल साफ-सुथर ठाम पर बैसि गेल-चुपचाप! ओ चुप छल मुदा हुनकर दिल बाजि रहल छल-अपने आप सं, आर एक-दोसर सं सेहो! हुनका लग की रहि गेल छल कहैक-सुनैक लेल? डेढ़ बरख सं यहि ते भऽ रहल छल-गप, गप आर गप्पे टा! गप सं ओ थाकि गेल छल आ मन सेहो ऊबि गेल छल। सरला बगल मे बैसल लगातार कौशिक सर दिस देखहि जा रहल छल आ ओ देखहि के देखैत दुबरी ने नोचि रहल छल। फेर एकाटक दिलीप कुमार स्टाइल मे मुस्कुरा के बाजल-ऊं! की कहलियै! हंसैत सरला अप्पन सिर हुनकर कान्हा पर राखि देलक-'बड़ रास गप? सुनहुं तखैन नहि!" ओ दिल, जे आबि धरि खंडहरक पाछां गुटर गूं कऽ रहल छल, कुकड़ू कूं करहि लागल छल भरि दुपहरिया मे! कौशिक सर सरलाक पीठक पाछां सं हाथ बढ़ाके ओकर सुडौल गोलाई मसैल देलक! सरलाक पूरा बदन मे एकटा झुरझरी भेल आ ओ शरमाबैत हुनकर कोरा मे ढहि गेल। अबकी बेर कौशिक सर कनि जोर सं मसललक। चिहंुक कर सीत्कार कऽ उठल सरला आ आंखि बंद कऽ लेलक-'जंगलियै छियै की!" कौशिक सर माथ सं लिबा के ओकर आंखि के चूमि लेलक! 'ई की भऽ रहल अछि चचा?" अचानके एकटा कड़कड़ाती आवाज आ आगू सं ठाड़ ऐतिहासिक धरोहरक पहरेदार आ सिपाही खाकी बर्दी मे! (जारी….) ७. असगर वजाहत- हम हिन्दू छी हिन्दी कथाक मैथिली रूपान्तरण विनीत उत्पल द्वारा हम हिन्दू छी (लघु कथा) एहेन कन्नारोहट जे मुर्दो कब्रमे ठाढ़ भऽ जाए। लागल जे अबाज सोझे कान लगसँ आएल अछि। ओइ स्थितिमे.. हम कूदि कऽ बिछौनपर बैसि गेलौं, अकासमे अखनो तरेगन छल.. किंशाइत रातिक तीन बाजल हएत। अब्बोजान उठि कऽ बैसि गेला। कन्नारोहट फेरसँ सुनाइ पड़ल। सैफ अपन अखड़ा खाटपर पड़ल चिकड़ि रहल छल। अंगनामे एक दिससँ सभक खाट लागल छलै। 'लाहौलविलाकुव्वत. . .' अब्बाजान लाहौल पढ़लन्हि 'खुदा नै जानि ई किए सुतलेमे किए चित्कार करऽ लगैए।' अम्मा बजली। 'अम्मा एकरा राति भरि छौड़ा सभ डरबैत रहै छै. . .' हम कहलिऐ। 'ओइ सरधुआ सभकेँ सेहो चेन नै पड़ै छै. . .लोक सभक जान आफदमे छै आ ओकरा सभकेँ बदमाशी सुझाइ छै', अम्मा बजली। सफिया चद्दरिसँ मुँह बहार कऽ बाजलि, 'एकरा कहू छतपर सुतल करए।' सैफ अखन धरि नै जागल छल। हम ओकर पलंग लग गेलौं आ झुकि कऽ देखलौं जे ओकर मुँहपर घाम छलै। साँस खूब चलि रहल छलै आ देह थरथरा रहल छलै। केस घामसँ भीजल छलै आ किछु केस माथपर सटि गेल छलै। हम सैफकेँ देखैत रहलौं आ ओइ छौड़ा सभक प्रति मोनमे तामस घुरमैत रहल जे ओकरा डराबैए। तखन दंगा एहेन नै होइत छल जेहेन आइ काल्हि होइए। दंगाक पाछाँ नुकाएल दर्शन, ईलम, काजक पद्धति आ गतिमे ढेर रास  बदलेन आएल अछि। आइसँ पच्चीस-तीस साल पहिने नहिये लोककेँ जिबिते भकसी झोका कऽ मारल जाइ छलै आ नहिये सौंसे टोल-मोहल्लाकेँ सुनसान कएल जाइत छलै। ओइ जमानामे प्रधानमंत्री, गृहमंत्री आ मुख्यमंत्रीक आशीर्वाद सेहो दंगा करैबलाकेँ नै भेटै छलै। ई काज छोट-मोट स्थानीय नेता अपन स्थानीय आ क्षुद्र स्वार्थ पूरा करै लेल करै छला। व्यापारिक प्रतिद्वंद्व, जमीनपर कब्जा करैले, चुंगीक चुनावमे हिंदू वा मुस्लिम वोट समटैले इत्यादि उद्देश्य भेल करै छल। आब तँ दिल्ली दरबारपर कब्जा करबाक ई  साधन बनि गेल अछि। सांप्रदायिक दंगा। संसारक सभसँ पैघ लोकतंत्रक मुँमे जाबी वएह पहिरा सकैए जे सांप्रदायिक हिंसा आ घृणापर शोनितक धार बहा सकए। सैफकेँ जगाएल गेल। ओ बकरीक असहाय बच्चा सन चारू दिस ऐ तरहे देखि रहल छल जेना माँकेँ ताकि रहल हुअए। अब्बाजानक बेमात्रे भाइक सभसँ छोट सन्तान सैफुद्दीन प्रसिद्ध सैफ जखन अपन घरक सभ लोककेँ चारू दिस घेरने देखलक तँ ओ अकबका कऽ ठाढ़ भऽ गेल। सैफक अब्बा कौसर चचाक मरबाक खबरि लेने आएल कोनमे कटल पोस्टकार्ड हमरा अखनो नीक जकाँ मोन अछि। गामक लोक सभ चिट्ठीमे कौसर चचाक मरबाके टा खबरि नै देने छला संगमे ईहो लिखने छला जे हुनकर सभसँ छोट सन्तान सैफ आब ऐ दुनियामे असगर रहि गेल अछि। सैफक पैघ भाइ ओकरा अपना संग बम्बै नै लऽ गेल। ओ साफे कहि देलन्हि जे सैफ लेल ओ किछु नै कऽ सकै छथि। आब अब्बाजानक अलाबे ओकर ऐ दुनियामे कियो नै छै। कोन कटल पोस्ट कार्ड पकड़ि अब्बाजान बहुत काल धरि चुपचाप बैसल रहथि। अम्मांसँ कएक बेर जगड़ा केलाक बाद अब्बाजान पैतृक गाम धनवाखेड़ा गेलथि आ बचल जमीन बेचि, सैफकेँ संग लऽ घुरलथि। सैफकेँ देखि हमरा सभकें हँसी आएल रहए। कोनो देहाती बच्चाकेँ देखि अलीगढ़ मुस्लिम युनिवर्सिटीक स्कूलमे पढ़ैवाली सफियाक आर की प्रतिक्रिया भऽ सकैए, पहिले दिन ई बुझा गेल जे सैफ खाली देहातिये नै वरन् अर्द्ध-बताहसन सोझ वा मूर्ख छल। हमसभ ओकरा कबदाबैत आ फुचियाबैत रहै छलिऐ। एकर एकटा फाएदा सैफकेँ एना भेलै जे अब्बाजान आ अम्मांक हृदय ओ जीत लेलक। सैफ खूब मेहनति करए। काजसँ ओ देह नै नुकाबए। अम्मांकेँ ओकर ई व्यवहार खूब पसिन्न पड़ै। जँ दूटा रोटी बेसी खाइए तँ की? काज तँ सेहो देह झारि कऽ करैए। सालक साल बितैत गेलै आ सैफ हमर सभक जिनगीक अंग बनि गेल। हम सभ ओकरा संग सामान्य होइत गेलौं। आब मोहल्लाक कोनो बच्चा जँ ओकरा बताह कहि दै तँ हम ओकर मुँह नोंचि लै छलिऐ। हमर भाइ अछि ई एकरा तूँ बताह कोना कहै छेँ? मुदा घरक भीतर सैफक की स्थिति रहै से हमरे सभ टाकेँ बुझल छल। नग्रमे दंगा ओहिने शुरू भेल छल जेना भेल करै छल, माने मस्जिदसँ ककरो एकटा पोटरी भेटलै, जइमे कोनो प्रकारक माउस छलै आ माउसकेँ बिन देखने ई मानि लै जाइ छल जे किएक तँ ई माउस मस्जिदमे फेकल गेल छल तेँ ई सुग्गरक माउस हेबे टा करत। तकर बदलामे मुगल टोलमे गाय काटि देल गेल आ दंगा शुरू भऽ गेल। किछु दोकान जड़ि गेल मुदा बेसीकेँ लुटल गेल।छूरी-चक्कूक ढेर रास घटनामे मोटा-मोटी सात-आठ गोटे मुइलाह आ प्रशासन एतेक संवेदनशील छल जे कर्फ्यू लगा देल गेल। आइ-काल्हिबला बात नै छल जखन हजारक हजार लोकक मुइलाक बादो मुख्यमंत्री मोंछपर ताव दैत घुमैत छथि आ कहैत छथि जे, जे किछु भेल ठीक भेल। दंगा किएक तँ लगपासक गामोमे पसरि गेल छल तइ दुआरे कर्फ्यू बढ़ा देल गेल छल। मुगलपुरा मुसलमानक सभसँ पैघ मोहल्ला छल से ओतऽ कर्फ्यूक प्रभाव छल आ जिहाद सन वातावरण सेहो बनि गेल छल। मोहल्लामे तँ गली-कूची होइते छै मुदा कएकटा दंगाक बाद ई अनुभव कएल गेल जे घरक भीतरसँ सेहो रस्ता हेबाक चाही। माने आप्तकालक व्यवस्था। से घरक भीतरसँ, छातक ऊपरसँ देवारकेँ तड़पैत किछु एहनो रस्ता बनि गेल छल जे ओकरा जानैबला मोहल्लाक एक कोनसँ दोसर कोन आरामसँ जा सकैत छल। मोहल्लाक लोक तैयारी युद्ध जकाँ केने छल। एहेन बेबस्था रहै जे जँ एक्को मास धरि जँ कर्फ्यू जाइए तैयो जरूरतक बौस्तुजात मोहल्लेमे भेटि जाए। दंगा मोहल्लाक छबारी सभकेँ अद्भुते उत्साह देखेबाक मौका दैत छल। रौ.. हम सभ तँ ऐ हिन्दू सभकेँ गर्दा फँका देबै.. की बुझि राखने अछि ई धोती बान्हैबला सभ.. धुर्र डरपोक होइ जाइए ई सभ।.. एक मुसलमान दस हिन्दूपर भारी पड़ैए.. हँसि कऽ लेने छी पाकिस्तान, लड़ि कऽ लेब हिन्दुस्तान.. एहने सन वातावरण बनि जाइ छल। मुदा मोहल्लासँ बाहर निकलैक नामपर सभक जान निकलऽ लागै छलै। पी.ए.सी.क चौकी दुनू दिस रहै। पी.ए.सी.क बूट आ राइफलक हत्थाक मारि कतेको गोटेकेँ मोन रहै, से मौखिक धरि तँ सभ ठीक रहै मुदा ओइसँ आगाँ…. संकटमे एकता लोक सीखि लैत अछि। एकता अनुशासन आ बेबहार। सभ घरसँ एकटा छौड़ा पहरापर रहत। हमर घरमे हमरा अलाबे, आ हम २५ बरख पार कऽ गेल रही से हमरा छौड़ा नै कहल जा सकैत छल, छौड़ सैफ टा छल, से ओकरा रतुका पहरापर रहऽ पड़ैत छलै। रतुका पहरा छातपर होइत छल। मुगलपुरा किएक तँ नग्रक सभसँ उपरका हिस्सामे छल से छातपर सँ सम्पूर्ण नग्र देखाइ पड़ैत छल। मोहल्लाक छौड़ा सभक संग सैफ पहरापर जाइत छल। ई हमरा लेल अब्बा लेल आ साफिया लेल बड्ड नीक गप छल। जँ हमरा घरमे सैफ नै रहितए तँ शाइत हमरे रातिमे धक्का खाए पड़ितए। सैफक फरापर जेबाक कारणसँ ओकरा किछु सुविधा सेहो देल गेल रहै, जेना आठ बजे धरि ओकर सूतऽ देल जाइत रहै। ओकरासँ बाढ़नि नै दिआएल जाइत रहै। ई काज साफियाक जिम्मा भऽ गेल छल जे साफियाँकेँ एक्को रत्ती पसिन्न नै रहै। कखनो-कखनो रातिमे हम सेहो छातपर चलि जाइत रही, लाठी, लकड़ी आ पजेबाक ढेरी एम्हर ओम्हर लागल छलै। दू चारिटा छौड़ा लग देशी पेस्तौल आ बेसी लग चक्कू रहै। ओइमे सँ सभ छोट-मोट काज करैबला कारीगर छला। बेशी गोटे तालाक कारखानामे काज करै छला। किछु दर्जी, काठ-लकड़ी सन काज करैत छला। एम्हर बजार बन्न छल से हुनकर सभक काज सेहो बन्न छल। ऐमे बेशी गोटेक घरमे कर्जासँ चूल्हि जरि रहल छलै। मुदा ओ सभ प्रसन्न रहथि। छातपर बैसि कऽ ओ सभ दंगाक नव खबरि पर टीका-टिप्पणी करै जाइ छला आ नै तँ हिन्दू सभकेँ गारि पढ़ै जाइत छला। हिन्दूसँ बेशी गारि ओ सभ पी.ए.सी.केँ दैत छला। पाकिस्तान रेडियोक सभटा कार्यक्रम हुनका सभकेँ जबानी मोन छलन्हि आ कम अबाजमे ओ सभ रेडियो लाहौर सुनल करथि। ऐ छौड़ा सभमे दू-चारि गोटे जे पाकिस्तान गेल रहथि हुनकर सभक इज्जति हाजी सन छल। ओ सभ पाकिस्तानक रेलगाड़ी “तेजगाम” आ “गुलशने इकबाल कॉलोनी”क एहेन खिस्सा सुनबैत रहथि जे लगै छल जे स्वर्ग जँ कतौ अछि तँ ओ पाकिस्तानमे अछि। पाकिस्तानक बड़ाइसँ जखन हुनकर सभक मोन भरि जाइ छलन्हि तखन ओ सैफ संगे हँसी करै जाइ छला। सैफ पाकिस्तान, पाकिस्तान आ पाकिस्तानक वर्णन सुनलाक बाद एक दिन पुछि देने रहए जे ई पाकिस्तान अछि कतऽ? ऐपर सभ गोटे ओकरा संग बड हँसी केने रहथि। ओ किछु बुझने रहए मुदा ओकरा ठीकसँ ई पता नै चललै जे पाकिस्तान अछि कतऽ? ई पहरुआ छौड़ा सभ सैफकेँ मजाकमे दरबैत रहथि, “देख सैफ, जँ हिन्दू तोरा देख लेतौ तँ बुझै छहीं की करतौ? पहिने तोरा नाङट कऽ देतौ।” छौड़ा सभकेँ बुझल रहै जे सैफ अर्द्ध बताह हेबाक बादो नंगटे भेनाइकेँ बड खराप आ अधला गप बुझै छल, “तकर बाद हिन्दू सभ तोरा तेलसँ मालिश्त करतौ।” “किए, तेल-मालिश्त किए करत?” “किएकि जखन ओ सभ तोरा बेंतसँ मारौ तँ तोहर खाल निकलि जाउ। तकर बाद धीपल छड़सँ तोरा दागै जेतौ।…” “नै”, ओकरा बिसवास नै भेलै। रातिमे ओकरा डरौन आ मारि-काटि बला जे खिस्सा सुनाओल जाइ छल, ओइसँ ओ खूब डरा गेल छल। कखनो काल ओ हमरासँ भसियाएल गप करऽ लागै छल। हमरा रञ्ज होइ छल आ ओकरा चुप करा दै छलौं, मुदा ओकर मोनक प्रश्नक उत्तर नै भेटि पाबै छलै। एक दिन ओ पूछऽ लागल- “भैया, पाकिस्तानमे सेहो माटि होइ छै की?” “किए? ओतऽ माटि किए नै हेतै?” “ओतऽ खाली सड़के सड़क नै छै? ओतऽ टेरीलीन भेटै छै.. ओतऽ सस्त छै.. आ” “देखू ई सभटा मोनक गढ़ल गप अछि… तूँ अल्ताफ आ ओकर संगी सभक गपपर काने नै दिअ।” हम ओकरा बुझेलिऐ। “भैया, की हिन्दू आँखि बहार कऽ लै छथि..” “फूसि.. ई तोरा के कहलकौ?” “बच्छन।” “फूसि।” “तखन चरसा सेहो नै खिचैत छथि?” “ऊँह.. ई की सभ पूछि रहल छेँ..” ओ चुप भऽ गेल, मुदा ओकरा आँखिमे सैकड़ाक संख्यामे प्रश्न छलै। हम बाहर चलि गेलौं। ओ साफियासँ यएह सभ गप करऽ लागल। कर्फ्यू बढ़िते गेल। रतुका पहरेदारी सेहो चलैत रहल। हमर घरसँ सैफे जाइत रहल। किछु दिन बाद एक दिन अनचोक्के सुतलमे सैफ चिकड़ऽ लागल। हम सभ घबड़ा गेलौं मुदा ई बुझबामे भाङठ नै रहल जे ई सभ ओकरा डराएल जएबाक कारणसँ अछि। अब्बाकेँ छौड़ा सभपर बड्ड पित्त लहड़ल छलन्हि आ ओ मोहल्लाक एकाध मुँहपुरुख लोकनिकेँ ई गप कहनहियो रहथिन्ह, मुदा तकर कोनोटा असरि नै भेल। छौड़ा सभ आ सेहो मोहल्लाक छौड़ा सभ किए ऐ मनोरंजनकेँ छोड़ितथि? बात कतऽसँ कतऽ धरि पहुँचि गेल अछि एकर कनियो अंदेशा हमरा ओइ दिन धरि नै भेल जहिया सैफ हमरासँ खूब गम्भीर भऽ पुछलक, “भैया, हम हिन्दू बनि जाउ?” प्रश्न सुनि हम गुम्म पड़ि गेलौं, मुदा तुरत्ते हमरा बुझऽ मे आबि गेल जे ई रातिमे डरौन खिस्सा सुनाओल जएबाक परिणाम अछि। हमरा तामस उठि गेल, फेर सोचलौं जे बताहपर तामस केलासँ नीक जे तामस पीबि जाइ आ ओकरा बुझेबाक प्रयत्न करी। हम पुछलिऐ, “किए? अहाँ हिन्दू किए बनऽ चाहै छी? बचबा लेल? एकर माने भेल जे हम नै बचि पाएब?” “तँ अहूँ बनि जाउ..”, ओ बाजल। “आ तोहर कक्का, हमर अब्बा”, हम अपन अब्बा आ ओकर कक्काक गप पुछलिऐ। “नै.. हुनक सभकेँ…”, ओ किछु सोचऽ लागल। अब्बाजानक उज्जर आ नमगर दाढ़ीमे कतौ ओ ओझरा गेल छल। “देखलौं, ई सभ छौड़ा सभक किरदानी छी जे अहाँकेँ भटकाबैए। ई जे ओ सभ अहाँकेँ कहै छथि, से सभटा झूठ अछि। रौ, महेशकेँ नै चिन्है छेँ?” “ओ जे स्कूटरपर अबै छथि…” ओ प्रसन्न भऽ गेल। “हँ हँ, वएह।” “ओ हिन्दू छथि?” “हँ हिन्दू छथि”, हम कहलिऐ। पहिने तँ ओकर मुँहपर निराशाक छाह एलै फेर ओ गुम्म भऽ गेल। “ई सभ उच्क्का सभक काज छी.. नहिये हिन्दू लड़ैत अछि आ नहिये मुसलमान… उच्क्का सभ लड़ैत अछि, बुझलौं?” दंगा शैतानक अँतड़ी सन नमड़ैत गेल आ मोहल्लामे लोक परेशान हेबऽ लगला- भजार न्ग्रमे दंगा करैबला हिन्दू आ मुसलमान उचक्का सभकेँ जँ मिलाइयो देल जाए तँ कतेक हेता.. बेशीसँ बेशी एक हजार, चलू दू हजार मानि लिअ। तँ भाइ दू हजार गोटे लाख लोकक जिनगी नर्क बनेने छथि आ हम सभ घरमे सुटकि कऽ बैसल छी। ई तँ वएह भेल जे दस हजार अंग्रेज कोटि हिन्दुस्तानीपर राज करैत छला आ सम्पूर्ण सरकार ओकर अन्तर्गत चलैत छल, आ फेर ऐ दंगासँ फाएदा ककर अछि, फाएदा? औ जी हाजी अब्दुल करीमकेँ फाएदा अछि जे चुंगीक चुनाव लड़त आ ओकरा मुसलमान वोट भेटतै। पंडित जोगेश्वरकेँ हेतै जकरा हिन्दूक वोट भेटतै। आब तखन हम की छी? तूँ वोटर छेँ हिंदू वोटर, मुसलमान वोटर, हरिजन वोटर, कायस्थ वोटर, सुन्नी वोटर, शिआ वोटर, यएह सभ होइत रहत ऐ देशमे? हँ, किए नै? जतऽ लोक मूर्ख अछि, जतऽ भाड़ापर हत्या केनिहार भेटै छै, जतऽ राजनीतिज्ञ अपन गद्दी लेल दंगा करबै छथि ओतऽ आर की भऽ सकैए? भजार, की हम लोक सभकेँ पढ़ा नै सकै छी? बुझा नै सकै छी? हह- हह- तूँ के होइ छह पढ़बैबला, सरकार पढ़ेतै। जँ चाहत तँ सरकार आ जँ नै चाहत सरकार तँ ऐ देशमे किछु नै भऽ सकैए? हँ.. अंग्रेज हमरा सभकेँ यएह सिखेने अछि.. हम एकर अभ्यासी छी.. चलू छोड़ू, तखन दंगा होइत रहत? हँ होइत रहत। मानि लिअ जे ऐ देशक सभटा मुसलमान हिन्दू भऽ जाथि? लाहौलविलाकुव्वत ई की कहि रहल छी? बेस तँ मानि लिअ जे ऐ देशक सभटा हिन्दू मुसलमान बनि जाथि? सुभान अल्लाह केहेन चोटगर गप कहलौं.. तखन की दंगा रुकि जाएत? ई तँ सोचबा जोग गप अछि। पाकिस्तानमे शिया सुन्नी एक दोसराक जानक पाछाँ छथि.. बिहारमे ब्राह्मण दलितक छाहसँ बचैत छथि.. तँ की भजार लोक आकि मनुक्ख कहू सार अछिये एहेन जे लड़िते रहऽ चाहैए? ओना देखू तँ जुम्मन आ मैकूमे बड़ दोस्तियारी छै। तँ किए ने मैकू आ जुम्मन बनि जाइ… एह, केहेन बात कहि देलौं, माने… माने… माने… हम भोरे-भोर रेडियोक कान अमेठि रहल छलौं, साफिया बहारि रहल छलि आकि राजाक छोट भाइ अकरम भागैत भागैत आएल आ फूलल साँसकेँ रोकबाक असफल प्रयत्न करैत बाजल, “सैफकेँ पी.ए.सी. बला सभ मारि रहल अछि।” “की? की कहि रहल छी?” “सैफकेँ पी.ए.सी. बला मारि रहल अछि”, ओ कने रुकि कऽ बाजल। “किए मारि रहल अछि? की बात अछि?” “की जानी.. चौबटियापर..” “ओतऽ जतऽ पी.ए.सी.क चौकी अछि?” “हँ, ओतै।” “मुदा किए…”, हमरा बुझल छल जे आठ बजे सँ दस बजे धरि कर्फ्यू खुजऽ लागल अछि आ सैफकेँ आठ बजेक करीब अम्मा दूध अनबा लेल पठेने छलि। सैफ सन बताहोकेँ बुझल रहै जे जल्दी-जल्दी आपस एबाक अछि, आब तँ दस बाजि गेल अछि। “चलू हम चलै छी।”, रेडियोसँ बहराइत अनटोटल अबाजक चिन्ता केने बिनु हम तेजीसँ बहरेलौं। बताहकेँ किए मारि रहल अछि पी.ए.सी.बला सभ, ओ कोन एहेन कर्म केलक अछि? ओ कइये की सकैत अछि? अपने एहेन भयभीत रहैत अछि जे ओकरा मारबाक आवश्यकते की.. फेर की कारण भऽ सकैए? पाइ, औजी ओकरा तँ अम्मा दू टका देने अछि। दू टका लेल पी.ए.सी. बला सभ ओकारा मारत? चौबटियापर मुख्य सड़कक बराबर कोठापर मोहल्लाक किछु गोटे जमा रहथि। सोझाँमे सैफ पी.ए.सी.बलाक संग ठाढ़ छल। ओकर सोझाँमे पी.ए.सी.क जवान सभ छल। सैफ जोर-जोरसँ चिकड़ि रहल छल, “हमरा तूँ सभ किए मारलेँ.. हम हिन्दू छी.. हिन्दू छी…” हम आगाँ गेलौं। हमरा देखलाक बादो सैफ बजिते रहल, “हँ, हँ हम हिन्दू छी..”, ओ थरथरा रहल छल। ओकर ठोढ़क कोनसँ शोनितक एक बुन्न निकलि कऽ टघरि कऽ ठोढ़ीपर ठाढ़ छल। “तूँ हमरा मारलेँ कोना.. हम हिन्दू..”। “सैफ… ई की भऽ रहल अछि… घर चलू।” “हम.. हम हिन्दू छी।” हमरा बड्ड आश्चर्य भेल.. की ई वएह सैफ छी जे ई छल.. एकर तँ रूपे बदलि गेल अछि। ई एकरा भऽ की गेल अछि? “सैफ, होशमे आउ”, हम ओकरापर जोरसँ तमसेलिऐ। मोहल्लाक लोक सभ नै जानि केकरापर भितरे भीतर दूरसँ हँसि रहल रहथि। हमरा पित्त चढ़ल। सार, ई सभ ई नै बुझै छथि जे ओ बताह अछि। “ई अहाँक के अछि?”, एकटा पी.ए.सी. बला हमरासँ पुछलक। “हमर भाए छी.. कनेक मानसिक परेशानी छै एकरा।” “तँ एकरा घर लऽ जाउ”, एकटा सिपाही बाजल। “हमरा सभकेँ बताह बना देलक”, दोसर बाजल। “चलू… सैफ घर चलू। कर्फ्यू लागल अछि, कर्फ्यू..”। “नै जाएब… हम हिन्दू छी.. हिन्दू.. हमरा… हमरा…”, ओ हबोढकार कानऽ लागल। “मारलक… हमरा मारलक.. हमरा मारलक.. हम हिन्दू छी.. हम”, सैफ चितंग निच्चा खसल.. शाइत बेहोश भऽ गेल छल.. आब ओकरा उठा कऽ लऽ गेनाइ आसान छल। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। बालानां कृते १.जगदीश प्रसाद मण्‍डलक एकटा बाल कथा ‘एकोटा ने’ २.चंदन कुमार झा- बाल गजल १. जगदीश प्रसाद मण्‍डलक एकटा बाल कथा ‘एकोटा ने’ पुरमपुर गाममे पुरन कक्काक परि‍वारकेँ गौआेँ आ अनगौआेँ पुनचन परि‍वारसँ जनैत छन्‍हि‍। ओना अस्‍सी बर्खक अवस्‍थामे कहि‍यो पुरन काका कनमा-कनइ नै पढ़लनि‍ मुदा कनमा-कनइ दुनूक कि‍रदानी देखि‍-देखि‍ सदि‍खन क्षुब्‍ध रहै छथि‍। गरे ने बैसै छन्‍हि‍ जे जे वस्‍तु तरजूपर रखि‍ बटि‍खाड़ासँ तौलल जाएत, ओ जँ बँटैत-खोंटैत, पौआ-कनमा होइत रत्ती-माशामे चलि‍ जाएत तँ चलि‍ जाएत, मुदा दुनि‍याँक एते नमहर धरती केना बँटाएत-खोंटाएत कनमा-कनइ-फनै दि‍सि‍ पहुँचि‍ जाइए। बादलक कि‍रदानी की‍ पतालक पानि‍ सोखि‍ लेत? जँ सोखए चाहत तँ राखत कतए? हवा-बि‍हाड़ि‍ केत्तेकाल अँटका कऽ रखि‍ सकैए। खैर जे होउ मुदा पुरन काका करैला लत्तीक मचान जकाँ अपना परि‍वारकेँ बना हरि‍अर, तड़गर खेबे करै छथि‍। जहि‍ना सक्कत-कड़गर बीआ धरती धारण करि‍ते, दीयाक तेल-बत्ती जकाँ अपन ति‍ल-ति‍ल अर्पित करए लगैत अछि‍ तहि‍ना ने करैलोक बीआ केने अछि‍। वएह अंकुर ने धरती धारण करैत ऊपर आबि‍ लत्ती बनि‍ लतड़ए लगल। भलहिं पातर-छीतर कड़चीक आलम संग मचानपर कि‍अए ने पहुँचल हुअए। तँए कि‍ ओ अपन शरीरक रच्‍छा करैत मुँह बँचबैत नै पहुँचल? जरूर पहुँचल अछि‍। पुरन काकाक परि‍वारोक सभ तेहने छन्‍हि‍ जे अपनामे जे घंघौज होन्‍हि‍ मुदा काका लग पहुँचते मन सकदम भऽ जाइत छन्‍हि‍, कि‍अए तँ सभ बुझैत जे अगि‍आएलमे हँसि‍यो ही-ही-आ कऽ धड़ैत छै। तँए जहि‍ना रस्‍तापर ऐँठैत-जुठैत चलैत साँप बोहरि‍मे प्रवेश करि‍ते सोझ भऽ जाइत तहि‍ना काकाक सोझमे परि‍वारक सदस्‍य। ओना, बि‍नु पएरक चलैबला साँप माटपर चलि‍ केना सकैए। मन-चि‍त्त मारि‍ पुरनो काका राति‍-दि‍न परि‍वारेक पाछू लगल रहै छथि‍। अखनो मनमे ओहि‍ना ओ बात तड़गर बनल छन्‍हि‍ जे वीर भोग्‍या बसुंधरा। जे ऐ धरतीसँ प्रेम करत ओकरे प्रेमी बनि‍ धरति‍यो चुम्‍मा लेत। कखनो माए बनि‍, कखनो भाए-बहि‍न बनि‍। चेतनसँ बालबोध धरि‍क परि‍वार पुरन काकाक छन्‍हि‍। तालो मेल अजीव छन्‍हि‍। चेतन सभ पुरनकाकाकेँ गार्जन बूझि‍ अपन छुट्टी नेन रहैए तँ बालो-बोध सभ अपन बाबा बूझि‍ अपन सभ कि‍छु बुझैए। परि‍वारक सभसँ छोट बच्‍चा चारि‍ सालक छन्‍हि‍। तालो-मेल नीक छन्‍हि‍। अंगनाक सभ समाचारक समदि‍या रहि‍तो संवाद-बाहकक काज करि‍ते छन्‍हि‍। एहेन चेला भेटबो मोसकि‍ल। मुदा से तँ छन्‍हि‍ये। नवका दोसि‍ति‍यारे तँए बेसीकाल एकठाम रहने चाहो-बि‍स्‍कुट संगे करै छथि‍। काका खुशी जे अपन बात पहि‍ने उसारि‍, भरि‍ दि‍न गप सुनैले तैयार रहैए। आ पोता दीनमा खुशी जे आँखि‍-कान तँ तखने काजक बनत जखन ओकरासँ काज कराएब। नइ तँ गमे-गमे गेड़ी बनि‍ जाएत। मुदा से कहाँ होइ, एक काने सुनै आ दोसर काने उड़ि‍ जाए। उड़ैत-उड़ैत सुतली राति‍मे सभ उड़ि‍ जाए। वसन्‍तक आगमन भऽ गेल। कि‍छु दि‍न पूर्ब जे जाड़सँ जड़ि‍आएल छल, पालासँ पलाएल छल ओ फुड़फुड़ा कऽ उठल। सुखाएल-सड़ल लत्ती आ कुमही जकाँ पबि‍ते वसन्‍ती हवामे उड़ए लगल। मुदा तैयो बेदरंग भेल धरती, घर-अांगन जकाँ बाहरै-सोहरै ले इशारा दि‍अए लगल। रसे-रसे रस भरल हवाक रमकी रमकए लगल। जहि‍ना सेवा ि‍नवृत्ति‍क समए कोनो अफसरकेँ स्‍वर्ग सुझैत तँ कोनोक आगूमे नांगट नर्कक नाच होइत अछि‍, तहि‍ना शि‍शि‍र -सि‍रसि‍राइत समए- वसन्‍तक बीच होइत। मुदा से बात पुरन काकाक परि‍वारमे नै छन्‍हि‍। कोल्हुक बड़द जकाँ सभ परि‍वारक अपने-अपने नाचक पाछू लागल रहैत छन्‍हि‍। दि‍न उगि‍ते दीनमा, बाइस खा जत्ताक -माटि‍क बनाओल- दुनू पट्टा दुनू हाथमे नेने दरबज्‍जाक आगूमे बैसि‍, रस्‍ताक धूरा-गरदाकेँ जत्तामे पीसए लगल। बि‍नु देखनौं आशा बनले रहै जे बाबा दरबज्‍जेमे छथि‍। सुतल छथि‍ कि‍ जागल, तइसँ कोन मतलब दीनमाकेँ। ओ तँ अपन काजमे बेहाल। मनमे रहबे करै जे चाहक बेर भऽ गेल अछि‍ माए चाह आनि‍ देबे करतनि‍, हमहूँ पीबे करब। परि‍वारक बोझसँ दबल थोड़े रहै जे नून नै अछि‍ तँ केसक तारीखपर जाए पड़त। जहि‍ना तत्ववेत्ता तत्‍वचि‍न्‍तनमे रमल रहैत तहि‍ना दीनमा अपन काजमे हराएल। कोन मतलब ओकरा रहै जे बुझैत, काजक हराएल अधखड़ुआ रहि‍ जाइए। माइक हाथक चाह देखि‍ते दीनमा, जत्ता छोड़ि‍ आगूए आगू दरबज्‍जाक ऊपर चढ़ल। दीनमापर नजरि‍ पड़ि‍ते पुरन काका मुस्‍की दैत कहलखि‍न- “की दीनबाबू, चाहो-ताहक बेर भेलैए आकि‍ नै?” तहि‍ बीच चाह नेने पुतोहु पहुँच गेलनि‍। दीनमाक नजरि‍ देबालमे टँगल हनुमान जीक छातीक रामपर पहुँचि‍ गेल। देबालमे सटल फोटो देखि‍ दीनमा बाजल- “बाबा, उ फोटो उतारि‍‍ दि‍अ।” दीनमाक बात सुनि‍ पोल्हबैत पुरनकाका कहलखि‍न- “बौआ, पहि‍ने चाह पीब लि‍अ, पछाति‍ ई सभ हेतइ?” जना बुझले रहै तहि‍ना दीनमा बाजल- “पहि‍ने अहाँ पीब ने लि‍अ, पाछू हम‍ पीब।” बहाना पकड़ाइत देखि‍ पुरनकाका कहलखि‍न- “हमरा हाथमे गि‍लास अछि केना उतारल हएत?‍” चाह पीब, खि‍ड़कीपर राखल खुरपी उतारि‍‍ पुरनकाका बाड़ी-झाड़ी दि‍सि‍ वि‍दा होइक वि‍चार केलनि‍। हाथसँ खुरपी छि‍नैत दीनमा आगू-आगू वि‍दा भेल। दाड़ि‍मक बाड़ी पहुँचि‍ काका हि‍या-हि‍या हि‍यबए लगलाह। गाछक जड़ि‍मे पानि‍क अभाव बूझि‍ पड़लनि‍। मुदा गाछक डगडगी आ फूलसँ लदल गाछ देखि‍ मन ललि‍या गेलनि‍। लाल-लाल फूलसँ लदल गाछ। सभ डारि‍मे फूल लागल। खुरपी नेने दीनमा खाधि‍ खुनैक जगह हि‍यबैत। जँ कि‍यो पैघ अफसर नै बनि‍ पाओत तँ कि‍ ओ ओहि‍ना रहि‍ जाएत। हि‍या-हि‍या फूलकेँ देखैत हरि‍आएल-हरि‍आएल फड़ो देखलनि‍। मन भेलनि‍ जे जतबे-ततबे जड़ि‍ सबहक खढ़ उखाड़ि‍ दिएे। मुदा नजरि‍ दाड़ि‍मक काँटपर गेलनि‍। डारि‍ये काँट भऽ जाइए। ऊपर-नि‍च्‍चा सगतरि‍ काँट। जखने अपने खढ़ उखाड़ए लगब तखने इहो -दीनमो- कि‍छु ने कि‍छु करए लगत। तहूमे खुरपी हाथेमे छै। तेहेन झाड़ी अछि‍ जे सुगबा साँप जकाँ माथमे गड़तै कि‍ गरदनि‍मे तेकर कोन ठेकान। जखने काँट गड़तै कि‍ कानब शुरू करत। जखने कानत तखने ओकरा चुप करब आकि‍ गाछक जड़ि‍क खढ़ उखाड़ब। समझौता करैत काज मनमे एलनि‍। काज ई जे फड़क गि‍नती कऽ ली। दीनमा हाथक खुरपी आड़ि‍पर रखि‍, कोरामे उठा काका कहलखि‍न- “बौआ, अहाँकेँ नेने हम टहलब आ अहाँ फड़ गनब।” नव फड़क गि‍नतीक काज देखि‍ दीनमाक मन खुशीसँ आरो खुशि‍या गेल। मुदा कट्टा भरि‍ झाड़ीक बगानमे पचासोसँ ऊपर गाछक फड़ केना गनि‍ लेब। तहूमे बीसे तक गनल होइए। गाछक सभ फड़ अपने हि‍या-हि‍या देखथि‍, जे फड़क बीच कीड़ोक असर भेलहेँ आकि‍ नै। अपने तँ एक्केटा गाछक फड़ देखि‍ अन्‍दाजि‍ लेलनि‍ जे कते हएत? जहि‍ना गोल-गोल, कि‍छु नमती नेने लाल-लाल फूल हरि‍अर होइत अपन जि‍नगीक फल पकड़ि‍ रहल अछि‍, तहि‍ना तँ गोटि‍-पङरा कड़ुआएल आमक आकार सेहो पकड़ि‍ रहल अछि‍। एकसँ दोसर गाछक फड़ गनैमे दीनमा बेर-बेर बि‍सरि‍ जाए। कखनो गि‍नति‍ये छूटि‍ जाइ तँ कखनो अंके बि‍सरि‍ जाए। कखनो बीससँ ऊपर नै बढ़ल। अंतमे काका पुछलखि‍न- “बौआ, कते फड़ भेलह?” बाबाक प्रश्न सुनि‍ दीनमाक मुँहसँ नि‍कलि‍ गेल- “दसटा।” “अच्‍छा बड़बढ़ि‍या। आब एतए आबि‍ के खेलि‍हह। ओगरबाहि‍यो भऽ जेतह आ खेलबो करबह।” नीक फसल भेलनि‍। खेबा जोगर फल हुअए लगल। फड़ फल बनि‍ गेल। ओना सजमनि‍ फड़क-फड़े रहि‍ जाइत। मुदा दाड़ि‍म, आम, लताम इत्‍यादि‍ फड़सँ फल बनि‍ जाइत अछि‍। अंति‍म अवस्‍था अबैत-अबैत तूबि-तूबि‍ फल अपने खसए लगल। गाछक सभ फल समाप्‍त भऽ गेल। जहि‍ना परसौती जनानाकेँ देख-भालक जरूरति‍ पड़ैत तहि‍ना ने बाड़ि‍यो-झाड़ीक अछि‍। ई सोचि‍ पुरनकाका दीनमाक संगे दाड़ि‍मक गाछ लग पहुँचलाह। जे कहि‍यो फड़ फूलसँ लदल छल ओ सून-सून भेल, अपन बेथा सुना रहल अछि‍। व्‍यथि‍त मने दीनमाकेँ पुछलखि‍न- “बौआ, कते फड़ अछि?” वि‍चलि‍त होइत दीनमा बाजल- “एकोटा ने।” “ऐ लेल वि‍चलि‍त कि‍अए होइ छी। जहि‍ना समए आएल छलइ तहि‍ना फेनो औतै।” “केना औतै?” “समए अनुसार एकर ताक-हेरि‍ करबै तँ एबे करतै।” २. चंदन कुमार झा सररा, मदनेश्वर स्थान मधुबनी, बिहार बाल-गजल-७ मस्जिद जखने परल अजान कोइली ठनलक पराती गान कौआ डकलक खेत खरिहान बगुला खत्ता बिच करय स्नान गर-गर दुध दुहैछ बथान टक-टक पड़रू लगौने ध्यान बाबा छथि बाड़ी बान्हथि मचान बाबी अँगना मेँ लगाबथि पान टुह-टुह लाल पूब असमान 'चंदन'जलखै मे दूध मखान ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com  पर पठाउ। बच्चा लोकनि द्वारा स्मरणीय श्लोक १.प्रातः काल ब्रह्ममुहूर्त्त (सूर्योदयक एक घंटा पहिने) सर्वप्रथम अपन दुनू हाथ देखबाक चाही, आ’ ई श्लोक बजबाक चाही। कराग्रे वसते लक्ष्मीः करमध्ये सरस्वती। करमूले स्थितो ब्रह्मा प्रभाते करदर्शनम्॥ करक आगाँ लक्ष्मी बसैत छथि, करक मध्यमे सरस्वती, करक मूलमे ब्रह्मा स्थित छथि। भोरमे ताहि द्वारे करक दर्शन करबाक थीक। २.संध्या काल दीप लेसबाक काल- दीपमूले स्थितो ब्रह्मा दीपमध्ये जनार्दनः। दीपाग्रे शङ्करः प्रोक्त्तः सन्ध्याज्योतिर्नमोऽस्तुते॥ दीपक मूल भागमे ब्रह्मा, दीपक मध्यभागमे जनार्दन (विष्णु) आऽ दीपक अग्र भागमे शङ्कर स्थित छथि। हे संध्याज्योति! अहाँकेँ नमस्कार। ३.सुतबाक काल- रामं स्कन्दं हनूमन्तं वैनतेयं वृकोदरम्। शयने यः स्मरेन्नित्यं दुःस्वप्नस्तस्य नश्यति॥ जे सभ दिन सुतबासँ पहिने राम, कुमारस्वामी, हनूमान्, गरुड़ आऽ भीमक स्मरण करैत छथि, हुनकर दुःस्वप्न नष्ट भऽ जाइत छन्हि। ४. नहेबाक समय- गङ्गे च यमुने चैव गोदावरि सरस्वति। नर्मदे सिन्धु कावेरि जलेऽस्मिन् सन्निधिं कुरू॥ हे गंगा, यमुना, गोदावरी, सरस्वती, नर्मदा, सिन्धु आऽ कावेरी  धार। एहि जलमे अपन सान्निध्य दिअ। ५.उत्तरं यत्समुद्रस्य हिमाद्रेश्चैव दक्षिणम्। वर्षं तत् भारतं नाम भारती यत्र सन्ततिः॥ समुद्रक उत्तरमे आऽ हिमालयक दक्षिणमे भारत अछि आऽ ओतुका सन्तति भारती कहबैत छथि। ६.अहल्या द्रौपदी सीता तारा मण्डोदरी तथा। पञ्चकं ना स्मरेन्नित्यं महापातकनाशकम्॥ जे सभ दिन अहल्या, द्रौपदी, सीता, तारा आऽ मण्दोदरी, एहि पाँच साध्वी-स्त्रीक स्मरण करैत छथि, हुनकर सभ पाप नष्ट भऽ जाइत छन्हि। ७.अश्वत्थामा बलिर्व्यासो हनूमांश्च विभीषणः। कृपः परशुरामश्च सप्तैते चिरञ्जीविनः॥ अश्वत्थामा, बलि, व्यास, हनूमान्, विभीषण, कृपाचार्य आऽ परशुराम- ई सात टा चिरञ्जीवी कहबैत छथि। ८.साते भवतु सुप्रीता देवी शिखर वासिनी उग्रेन तपसा लब्धो यया पशुपतिः पतिः। सिद्धिः साध्ये सतामस्तु प्रसादान्तस्य धूर्जटेः जाह्नवीफेनलेखेव यन्यूधि शशिनः कला॥ ९. बालोऽहं जगदानन्द न मे बाला सरस्वती। अपूर्णे पंचमे वर्षे वर्णयामि जगत्त्रयम् ॥ १०. दूर्वाक्षत मंत्र(शुक्ल यजुर्वेद अध्याय २२, मंत्र २२) आ ब्रह्मन्नित्यस्य प्रजापतिर्ॠषिः। लिंभोक्त्ता देवताः। स्वराडुत्कृतिश्छन्दः। षड्जः स्वरः॥ आ ब्रह्म॑न् ब्राह्म॒णो ब्र॑ह्मवर्च॒सी जा॑यता॒मा रा॒ष्ट्रे रा॑ज॒न्यः शुरे॑ऽइषव्यो॒ऽतिव्या॒धी म॑हार॒थो जा॑यतां॒ दोग्ध्रीं धे॒नुर्वोढा॑न॒ड्वाना॒शुः सप्तिः॒ पुर॑न्धि॒र्योवा॑ जि॒ष्णू र॑थे॒ष्ठाः स॒भेयो॒ युवास्य यज॑मानस्य वी॒रो जा॒यतां निका॒मे-नि॑कामे नः प॒र्जन्यों वर्षतु॒ फल॑वत्यो न॒ऽओष॑धयः पच्यन्तां योगेक्ष॒मो नः॑ कल्पताम्॥२२॥ मन्त्रार्थाः सिद्धयः सन्तु पूर्णाः सन्तु मनोरथाः। शत्रूणां बुद्धिनाशोऽस्तु मित्राणामुदयस्तव। ॐ दीर्घायुर्भव। ॐ सौभाग्यवती भव। हे भगवान्। अपन देशमे सुयोग्य आ’ सर्वज्ञ विद्यार्थी उत्पन्न होथि, आ’ शुत्रुकेँ नाश कएनिहार सैनिक उत्पन्न होथि। अपन देशक गाय खूब दूध दय बाली, बरद भार वहन करएमे सक्षम होथि आ’ घोड़ा त्वरित रूपेँ दौगय बला होए। स्त्रीगण नगरक नेतृत्व करबामे सक्षम होथि आ’ युवक सभामे ओजपूर्ण भाषण देबयबला आ’ नेतृत्व देबामे सक्षम होथि। अपन देशमे जखन आवश्यक होय वर्षा होए आ’ औषधिक-बूटी सर्वदा परिपक्व होइत रहए। एवं क्रमे सभ तरहेँ हमरा सभक कल्याण होए। शत्रुक बुद्धिक नाश होए आ’ मित्रक उदय होए॥ मनुष्यकें कोन वस्तुक इच्छा करबाक चाही तकर वर्णन एहि मंत्रमे कएल गेल अछि। एहिमे वाचकलुप्तोपमालड़्कार अछि। अन्वय- ब्रह्म॑न् - विद्या आदि गुणसँ परिपूर्ण ब्रह्म रा॒ष्ट्रे - देशमे ब्र॑ह्मवर्च॒सी-ब्रह्म विद्याक तेजसँ युक्त्त आ जा॑यतां॒- उत्पन्न होए रा॑ज॒न्यः-राजा शुरे॑ऽ–बिना डर बला इषव्यो॒- बाण चलेबामे निपुण ऽतिव्या॒धी-शत्रुकेँ तारण दय बला म॑हार॒थो-पैघ रथ बला वीर दोग्ध्रीं-कामना(दूध पूर्ण करए बाली) धे॒नुर्वोढा॑न॒ड्वाना॒शुः धे॒नु-गौ वा वाणी र्वोढा॑न॒ड्वा- पैघ बरद ना॒शुः-आशुः-त्वरित सप्तिः॒-घोड़ा पुर॑न्धि॒र्योवा॑- पुर॑न्धि॒- व्यवहारकेँ धारण करए बाली र्योवा॑-स्त्री जि॒ष्णू-शत्रुकेँ जीतए बला र॑थे॒ष्ठाः-रथ पर स्थिर स॒भेयो॒-उत्तम सभामे युवास्य-युवा जेहन यज॑मानस्य-राजाक राज्यमे वी॒रो-शत्रुकेँ पराजित करएबला निका॒मे-नि॑कामे-निश्चययुक्त्त कार्यमे नः-हमर सभक प॒र्जन्यों-मेघ वर्षतु॒-वर्षा होए फल॑वत्यो-उत्तम फल बला ओष॑धयः-औषधिः पच्यन्तां- पाकए योगेक्ष॒मो-अलभ्य लभ्य करेबाक हेतु कएल गेल योगक रक्षा नः॑-हमरा सभक हेतु कल्पताम्-समर्थ होए ग्रिफिथक अनुवाद- हे ब्रह्मण, हमर राज्यमे ब्राह्मण नीक धार्मिक विद्या बला, राजन्य-वीर,तीरंदाज, दूध दए बाली गाय, दौगय बला जन्तु, उद्यमी नारी होथि। पार्जन्य आवश्यकता पड़ला पर वर्षा देथि, फल देय बला गाछ पाकए, हम सभ संपत्ति अर्जित/संरक्षित करी। 8.VIDEHA FOR NON RESIDENTS 8.1 to 8.3 MAITHILI LITERATURE IN ENGLISH 8.1.1.The Comet   -GAJENDRA THAKUR translated by Jyoti Jha chaudhary 8.1.2.The_Science_of_Words- GAJENDRA THAKUR translated by the author himself 8.1.3.On_the_dice-board_of_the_millennium- GAJENDRA THAKUR translated by Jyoti Jha chaudhary 8.1.4.NAAGPHANS (IN ENGLISH)- SHEFALIKA VERMA translated by Dr. Rajiv Kumar Verma and Dr. Jaya Verma विदेह नूतन अंक भाषापाक रचना-लेखन Input: (कोष्ठकमे देवनागरी, मिथिलाक्षर किंवा फोनेटिक-रोमनमे टाइप करू। Input in Devanagari, Mithilakshara or Phonetic-Roman.) Output: (परिणाम देवनागरी, मिथिलाक्षर आ फोनेटिक-रोमन/ रोमनमे। Result in Devanagari, Mithilakshara and Phonetic-Roman/ Roman.) English to Maithili Maithili to English इंग्लिश-मैथिली-कोष / मैथिली-इंग्लिश-कोष  प्रोजेक्टकेँ आगू बढ़ाऊ, अपन सुझाव आ योगदान ई-मेल द्वारा ggajendra@videha.com पर पठाऊ। Top of Form विदेहक मैथिली-अंग्रेजी आ अंग्रेजी मैथिली कोष (इंटरनेटपर पहिल बेर सर्च-डिक्शनरी) एम.एस. एस.क्यू.एल. सर्वर आधारित -Based on ms-sql server Maithili-English and English-Maithili Dictionary. १.भारत आ नेपालक मैथिली भाषा-वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक शैली आ २.मैथिलीमे भाषा सम्पादन पाठ्यक्रम १.नेपाल आ भारतक मैथिली भाषा-वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक शैली

१.१. नेपालक मैथिली भाषा वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक  उच्चारण आ लेखन शैली (भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक धारणाकेँ पूर्ण रूपसँ सङ्ग लऽ निर्धारित) मैथिलीमे उच्चारण तथा लेखन १.पञ्चमाक्षर आ अनुस्वार: पञ्चमाक्षरान्तर्गत ङ, ञ, ण, न एवं म अबैत अछि। संस्कृत भाषाक अनुसार शब्दक अन्तमे जाहि वर्गक अक्षर रहैत अछि ओही वर्गक पञ्चमाक्षर अबैत अछि। जेना- अङ्क (क वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ङ् आएल अछि।) पञ्च (च वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ञ् आएल अछि।) खण्ड (ट वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ण् आएल अछि।) सन्धि (त वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे न् आएल अछि।) खम्भ (प वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे म् आएल अछि।) उपर्युक्त बात मैथिलीमे कम देखल जाइत अछि। पञ्चमाक्षरक बदलामे अधिकांश जगहपर अनुस्वारक प्रयोग देखल जाइछ। जेना- अंक, पंच, खंड, संधि, खंभ आदि। व्याकरणविद पण्डित गोविन्द झाक कहब छनि जे कवर्ग, चवर्ग आ टवर्गसँ पूर्व अनुस्वार लिखल जाए तथा तवर्ग आ पवर्गसँ पूर्व पञ्चमाक्षरे लिखल जाए। जेना- अंक, चंचल, अंडा, अन्त तथा कम्पन। मुदा हिन्दीक निकट रहल आधुनिक लेखक एहि बातकेँ नहि मानैत छथि। ओ लोकनि अन्त आ कम्पनक जगहपर सेहो अंत आ कंपन लिखैत देखल जाइत छथि। नवीन पद्धति किछु सुविधाजनक अवश्य छैक। किएक तँ एहिमे समय आ स्थानक बचत होइत छैक। मुदा कतोक बेर हस्तलेखन वा मुद्रणमे अनुस्वारक छोट सन बिन्दु स्पष्ट नहि भेलासँ अर्थक अनर्थ होइत सेहो देखल जाइत अछि। अनुस्वारक प्रयोगमे उच्चारण-दोषक सम्भावना सेहो ततबए देखल जाइत अछि। एतदर्थ कसँ लऽ कऽ पवर्ग धरि पञ्चमाक्षरेक प्रयोग करब उचित अछि। यसँ लऽ कऽ ज्ञ धरिक अक्षरक सङ्ग अनुस्वारक प्रयोग करबामे कतहु कोनो विवाद नहि देखल जाइछ। २.ढ आ ढ़ : ढ़क उच्चारण “र् ह”जकाँ होइत अछि। अतः जतऽ “र् ह”क उच्चारण हो ओतऽ मात्र ढ़ लिखल जाए। आन ठाम खाली ढ लिखल जएबाक चाही। जेना- ढ = ढाकी, ढेकी, ढीठ, ढेउआ, ढङ्ग, ढेरी, ढाकनि, ढाठ आदि। ढ़ = पढ़ाइ, बढ़ब, गढ़ब, मढ़ब, बुढ़बा, साँढ़, गाढ़, रीढ़, चाँढ़, सीढ़ी, पीढ़ी आदि। उपर्युक्त शब्द सभकेँ देखलासँ ई स्पष्ट होइत अछि जे साधारणतया शब्दक शुरूमे ढ आ मध्य तथा अन्तमे ढ़ अबैत अछि। इएह नियम ड आ ड़क सन्दर्भ सेहो लागू होइत अछि। ३.व आ ब : मैथिलीमे “व”क उच्चारण ब कएल जाइत अछि, मुदा ओकरा ब रूपमे नहि लिखल जएबाक चाही। जेना- उच्चारण : बैद्यनाथ, बिद्या, नब, देबता, बिष्णु, बंश, बन्दना आदि। एहि सभक स्थानपर क्रमशः वैद्यनाथ, विद्या, नव, देवता, विष्णु, वंश, वन्दना लिखबाक चाही। सामान्यतया व उच्चारणक लेल ओ प्रयोग कएल जाइत अछि। जेना- ओकील, ओजह आदि। ४.य आ ज : कतहु-कतहु “य”क उच्चारण “ज”जकाँ करैत देखल जाइत अछि, मुदा ओकरा ज नहि लिखबाक चाही। उच्चारणमे यज्ञ, जदि, जमुना, जुग, जाबत, जोगी, जदु, जम आदि कहल जाएबला शब्द सभकेँ क्रमशः यज्ञ, यदि, यमुना, युग, यावत, योगी, यदु, यम लिखबाक चाही। ५.ए आ य : मैथिलीक वर्तनीमे ए आ य दुनू लिखल जाइत अछि। प्राचीन वर्तनी- कएल, जाए, होएत, माए, भाए, गाए आदि। नवीन वर्तनी- कयल, जाय, होयत, माय, भाय, गाय आदि। सामान्यतया शब्दक शुरूमे ए मात्र अबैत अछि। जेना एहि, एना, एकर, एहन आदि। एहि शब्द सभक स्थानपर यहि, यना, यकर, यहन आदिक प्रयोग नहि करबाक चाही। यद्यपि मैथिलीभाषी थारू सहित किछु जातिमे शब्दक आरम्भोमे “ए”केँ य कहि उच्चारण कएल जाइत अछि। ए आ “य”क प्रयोगक सन्दर्भमे प्राचीने पद्धतिक अनुसरण करब उपयुक्त मानि एहि पुस्तकमे ओकरे प्रयोग कएल गेल अछि। किएक तँ दुनूक लेखनमे कोनो सहजता आ दुरूहताक बात नहि अछि। आ मैथिलीक सर्वसाधारणक उच्चारण-शैली यक अपेक्षा एसँ बेसी निकट छैक। खास कऽ कएल, हएब आदि कतिपय शब्दकेँ कैल, हैब आदि रूपमे कतहु-कतहु लिखल जाएब सेहो “ए”क प्रयोगकेँ बेसी समीचीन प्रमाणित करैत अछि। ६.हि, हु तथा एकार, ओकार : मैथिलीक प्राचीन लेखन-परम्परामे कोनो बातपर बल दैत काल शब्दक पाछाँ हि, हु लगाओल जाइत छैक। जेना- हुनकहि, अपनहु, ओकरहु, तत्कालहि, चोट्टहि, आनहु आदि। मुदा आधुनिक लेखनमे हिक स्थानपर एकार एवं हुक स्थानपर ओकारक प्रयोग करैत देखल जाइत अछि। जेना- हुनके, अपनो, तत्काले, चोट्टे, आनो आदि। ७.ष तथा ख : मैथिली भाषामे अधिकांशतः षक उच्चारण ख होइत अछि। जेना- षड्यन्त्र (खड़यन्त्र), षोडशी (खोड़शी), षट्कोण (खटकोण), वृषेश (वृखेश), सन्तोष (सन्तोख) आदि। ८.ध्वनि-लोप : निम्नलिखित अवस्थामे शब्दसँ ध्वनि-लोप भऽ जाइत अछि: (क) क्रियान्वयी प्रत्यय अयमे य वा ए लुप्त भऽ जाइत अछि। ओहिमे सँ पहिने अक उच्चारण दीर्घ भऽ जाइत अछि। ओकर आगाँ लोप-सूचक चिह्न वा विकारी (’ / ऽ) लगाओल जाइछ। जेना- पूर्ण रूप : पढ़ए (पढ़य) गेलाह, कए (कय) लेल, उठए (उठय) पड़तौक। अपूर्ण रूप : पढ़’ गेलाह, क’ लेल, उठ’ पड़तौक। पढ़ऽ गेलाह, कऽ लेल, उठऽ पड़तौक। (ख) पूर्वकालिक कृत आय (आए) प्रत्ययमे य (ए) लुप्त भऽ जाइछ, मुदा लोप-सूचक विकारी नहि लगाओल जाइछ। जेना- पूर्ण रूप : खाए (य) गेल, पठाय (ए) देब, नहाए (य) अएलाह। अपूर्ण रूप : खा गेल, पठा देब, नहा अएलाह। (ग) स्त्री प्रत्यय इक उच्चारण क्रियापद, संज्ञा, ओ विशेषण तीनूमे लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना- पूर्ण रूप : दोसरि मालिनि चलि गेलि। अपूर्ण रूप : दोसर मालिन चलि गेल। (घ) वर्तमान कृदन्तक अन्तिम त लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना- पूर्ण रूप : पढ़ैत अछि, बजैत अछि, गबैत अछि। अपूर्ण रूप : पढ़ै अछि, बजै अछि, गबै अछि। (ङ) क्रियापदक अवसान इक, उक, ऐक तथा हीकमे लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना- पूर्ण रूप: छियौक, छियैक, छहीक, छौक, छैक, अबितैक, होइक। अपूर्ण रूप : छियौ, छियै, छही, छौ, छै, अबितै, होइ। (च) क्रियापदीय प्रत्यय न्ह, हु तथा हकारक लोप भऽ जाइछ। जेना- पूर्ण रूप : छन्हि, कहलन्हि, कहलहुँ, गेलह, नहि। अपूर्ण रूप : छनि, कहलनि, कहलौँ, गेलऽ, नइ, नञि, नै। ९.ध्वनि स्थानान्तरण : कोनो-कोनो स्वर-ध्वनि अपना जगहसँ हटि कऽ दोसर ठाम चलि जाइत अछि। खास कऽ ह्रस्व इ आ उक सम्बन्धमे ई बात लागू होइत अछि। मैथिलीकरण भऽ गेल शब्दक मध्य वा अन्तमे जँ ह्रस्व इ वा उ आबए तँ ओकर ध्वनि स्थानान्तरित भऽ एक अक्षर आगाँ आबि जाइत अछि। जेना- शनि (शइन), पानि (पाइन), दालि ( दाइल), माटि (माइट), काछु (काउछ), मासु (माउस) आदि। मुदा तत्सम शब्द सभमे ई निअम लागू नहि होइत अछि। जेना- रश्मिकेँ रइश्म आ सुधांशुकेँ सुधाउंस नहि कहल जा सकैत अछि। १०.हलन्त(्)क प्रयोग : मैथिली भाषामे सामान्यतया हलन्त (्)क आवश्यकता नहि होइत अछि। कारण जे शब्दक अन्तमे अ उच्चारण नहि होइत अछि। मुदा संस्कृत भाषासँ जहिनाक तहिना मैथिलीमे आएल (तत्सम) शब्द सभमे हलन्त प्रयोग कएल जाइत अछि। एहि पोथीमे सामान्यतया सम्पूर्ण शब्दकेँ मैथिली भाषा सम्बन्धी निअम अनुसार हलन्तविहीन राखल गेल अछि। मुदा व्याकरण सम्बन्धी प्रयोजनक लेल अत्यावश्यक स्थानपर कतहु-कतहु हलन्त देल गेल अछि। प्रस्तुत पोथीमे मथिली लेखनक प्राचीन आ नवीन दुनू शैलीक सरल आ समीचीन पक्ष सभकेँ समेटि कऽ वर्ण-विन्यास कएल गेल अछि। स्थान आ समयमे बचतक सङ्गहि हस्त-लेखन तथा तकनीकी दृष्टिसँ सेहो सरल होबऽबला हिसाबसँ वर्ण-विन्यास मिलाओल गेल अछि। वर्तमान समयमे मैथिली मातृभाषी पर्यन्तकेँ आन भाषाक माध्यमसँ मैथिलीक ज्ञान लेबऽ पड़ि रहल परिप्रेक्ष्यमे लेखनमे सहजता तथा एकरूपतापर ध्यान देल गेल अछि। तखन मैथिली भाषाक मूल विशेषता सभ कुण्ठित नहि होइक, ताहू दिस लेखक-मण्डल सचेत अछि। प्रसिद्ध भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक कहब छनि जे सरलताक अनुसन्धानमे एहन अवस्था किन्नहु ने आबऽ देबाक चाही जे भाषाक विशेषता छाँहमे पडि जाए। -(भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक धारणाकेँ पूर्ण रूपसँ सङ्ग लऽ निर्धारित) १.२. मैथिली अकादमी, पटना द्वारा निर्धारित मैथिली लेखन-शैली

१. जे शब्द मैथिली-साहित्यक प्राचीन कालसँ आइ धरि जाहि वर्त्तनीमे प्रचलित अछि, से सामान्यतः ताहि वर्त्तनीमे लिखल जाय- उदाहरणार्थ-

ग्राह्य

एखन ठाम जकर, तकर तनिकर अछि

अग्राह्य अखन, अखनि, एखेन, अखनी ठिमा, ठिना, ठमा जेकर, तेकर तिनकर। (वैकल्पिक रूपेँ ग्राह्य) ऐछ, अहि, ए।

२. निम्नलिखित तीन प्रकारक रूप वैकल्पिकतया अपनाओल जाय: भऽ गेल, भय गेल वा भए गेल। जा रहल अछि, जाय रहल अछि, जाए रहल अछि। कर’ गेलाह, वा करय गेलाह वा करए गेलाह।

३. प्राचीन मैथिलीक ‘न्ह’ ध्वनिक स्थानमे ‘न’ लिखल जाय सकैत अछि यथा कहलनि वा कहलन्हि।

४. ‘ऐ’ तथा ‘औ’ ततय लिखल जाय जत’ स्पष्टतः ‘अइ’ तथा ‘अउ’ सदृश उच्चारण इष्ट हो। यथा- देखैत, छलैक, बौआ, छौक इत्यादि।

५. मैथिलीक निम्नलिखित शब्द एहि रूपे प्रयुक्त होयत: जैह, सैह, इएह, ओऐह, लैह तथा दैह।

६. ह्र्स्व इकारांत शब्दमे ‘इ’ के लुप्त करब सामान्यतः अग्राह्य थिक। यथा- ग्राह्य देखि आबह, मालिनि गेलि (मनुष्य मात्रमे)।

७. स्वतंत्र ह्रस्व ‘ए’ वा ‘य’ प्राचीन मैथिलीक उद्धरण आदिमे तँ यथावत राखल जाय, किंतु आधुनिक प्रयोगमे वैकल्पिक रूपेँ ‘ए’ वा ‘य’ लिखल जाय। यथा:- कयल वा कएल, अयलाह वा अएलाह, जाय वा जाए इत्यादि।

८. उच्चारणमे दू स्वरक बीच जे ‘य’ ध्वनि स्वतः आबि जाइत अछि तकरा लेखमे स्थान वैकल्पिक रूपेँ देल जाय। यथा- धीआ, अढ़ैआ, विआह, वा धीया, अढ़ैया, बियाह।

९. सानुनासिक स्वतंत्र स्वरक स्थान यथासंभव ‘ञ’ लिखल जाय वा सानुनासिक स्वर। यथा:- मैञा, कनिञा, किरतनिञा वा मैआँ, कनिआँ, किरतनिआँ।

१०. कारकक विभक्त्तिक निम्नलिखित रूप ग्राह्य:- हाथकेँ, हाथसँ, हाथेँ, हाथक, हाथमे। ’मे’ मे अनुस्वार सर्वथा त्याज्य थिक। ‘क’ क वैकल्पिक रूप ‘केर’ राखल जा सकैत अछि।

११. पूर्वकालिक क्रियापदक बाद ‘कय’ वा ‘कए’ अव्यय वैकल्पिक रूपेँ लगाओल जा सकैत अछि। यथा:- देखि कय वा देखि कए।

१२. माँग, भाँग आदिक स्थानमे माङ, भाङ इत्यादि लिखल जाय।

१३. अर्द्ध ‘न’ ओ अर्द्ध ‘म’ क बदला अनुसार नहि लिखल जाय, किंतु छापाक सुविधार्थ अर्द्ध ‘ङ’ , ‘ञ’, तथा ‘ण’ क बदला अनुस्वारो लिखल जा सकैत अछि। यथा:- अङ्क, वा अंक, अञ्चल वा अंचल, कण्ठ वा कंठ।

१४. हलंत चिह्न निअमतः लगाओल जाय, किंतु विभक्तिक संग अकारांत प्रयोग कएल जाय। यथा:- श्रीमान्, किंतु श्रीमानक।

१५. सभ एकल कारक चिह्न शब्दमे सटा क’ लिखल जाय, हटा क’ नहि, संयुक्त विभक्तिक हेतु फराक लिखल जाय, यथा घर परक।

१६. अनुनासिककेँ चन्द्रबिन्दु द्वारा व्यक्त कयल जाय। परंतु मुद्रणक सुविधार्थ हि समान जटिल मात्रापर अनुस्वारक प्रयोग चन्द्रबिन्दुक बदला कयल जा सकैत अछि। यथा- हिँ केर बदला हिं।

१७. पूर्ण विराम पासीसँ ( । ) सूचित कयल जाय।

१८. समस्त पद सटा क’ लिखल जाय, वा हाइफेनसँ जोड़ि क’ ,  हटा क’ नहि।

१९. लिअ तथा दिअ शब्दमे बिकारी (ऽ) नहि लगाओल जाय।

२०. अंक देवनागरी रूपमे राखल जाय।

२१.किछु ध्वनिक लेल नवीन चिन्ह बनबाओल जाय। जा' ई नहि बनल अछि ताबत एहि दुनू ध्वनिक बदला पूर्ववत् अय/ आय/ अए/ आए/ आओ/ अओ लिखल जाय। आकि ऎ वा ऒ सँ व्यक्त कएल जाय।

ह./- गोविन्द झा ११/८/७६ श्रीकान्त ठाकुर ११/८/७६ सुरेन्द्र झा "सुमन" ११/०८/७६

  २. मैथिलीमे भाषा सम्पादन पाठ्यक्रम २.१. उच्चारण निर्देश: (बोल्ड कएल रूप ग्राह्य):- दन्त न क उच्चारणमे दाँतमे जीह सटत- जेना बाजू नाम , मुदा ण क उच्चारणमे जीह मूर्धामे सटत (नै सटैए तँ उच्चारण दोष अछि)- जेना बाजू गणेश। तालव्य शमे जीह तालुसँ , षमे मूर्धासँ आ दन्त समे दाँतसँ सटत। निशाँ, सभ आ शोषण बाजि कऽ देखू। मैथिलीमे ष केँ वैदिक संस्कृत जकाँ ख सेहो उच्चरित कएल जाइत अछि, जेना वर्षा, दोष। य अनेको स्थानपर ज जकाँ उच्चरित होइत अछि आ ण ड़ जकाँ (यथा संयोग आ गणेश संजोग आ गड़ेस उच्चरित होइत अछि)। मैथिलीमे व क उच्चारण ब, श क उच्चारण स आ य क उच्चारण ज सेहो होइत अछि। ओहिना ह्रस्व इ बेशीकाल मैथिलीमे पहिने बाजल जाइत अछि कारण देवनागरीमे आ मिथिलाक्षरमे ह्रस्व इ अक्षरक पहिने लिखलो जाइत आ बाजलो जएबाक चाही। कारण जे हिन्दीमे एकर दोषपूर्ण उच्चारण होइत अछि (लिखल तँ पहिने जाइत अछि मुदा बाजल बादमे जाइत अछि), से शिक्षा पद्धतिक दोषक कारण हम सभ ओकर उच्चारण दोषपूर्ण ढंगसँ कऽ रहल छी। अछि- अ इ छ  ऐछ (उच्चारण) छथि- छ इ थ  – छैथ (उच्चारण) पहुँचि- प हुँ इ च (उच्चारण) आब अ आ इ ई ए ऐ ओ औ अं अः ऋ ऐ सभ लेल मात्रा सेहो अछि, मुदा ऐमे ई ऐ ओ औ अं अः ऋ केँ संयुक्ताक्षर रूपमे गलत रूपमे प्रयुक्त आ उच्चरित कएल जाइत अछि। जेना ऋ केँ री  रूपमे उच्चरित करब। आ देखियौ- ऐ लेल देखिऔ क प्रयोग अनुचित। मुदा देखिऐ लेल देखियै अनुचित। क् सँ ह् धरि अ सम्मिलित भेलासँ क सँ ह बनैत अछि, मुदा उच्चारण काल हलन्त युक्त शब्दक अन्तक उच्चारणक प्रवृत्ति बढ़ल अछि, मुदा हम जखन मनोजमे ज् अन्तमे बजैत छी, तखनो पुरनका लोककेँ बजैत सुनबन्हि- मनोजऽ, वास्तवमे ओ अ युक्त ज् = ज बजै छथि। फेर ज्ञ अछि ज् आ ञ क संयुक्त मुदा गलत उच्चारण होइत अछि- ग्य। ओहिना क्ष अछि क् आ ष क संयुक्त मुदा उच्चारण होइत अछि छ। फेर श् आ र क संयुक्त अछि श्र ( जेना श्रमिक) आ स् आ र क संयुक्त अछि स्र (जेना मिस्र)। त्र भेल त+र । उच्चारणक ऑडियो फाइल विदेह आर्काइव  http://www.videha.co.in/ पर उपलब्ध अछि। फेर केँ / सँ / पर पूर्व अक्षरसँ सटा कऽ लिखू मुदा तँ / कऽ हटा कऽ। ऐमे सँ मे पहिल सटा कऽ लिखू आ बादबला हटा कऽ। अंकक बाद टा लिखू सटा कऽ मुदा अन्य ठाम टा लिखू हटा कऽ– जेना छहटा मुदा सभ टा। फेर ६अ म सातम लिखू- छठम सातम नै। घरबलामे बला मुदा घरवालीमे वाली प्रयुक्त करू। रहए- रहै मुदा सकैए (उच्चारण सकै-ए)। मुदा कखनो काल रहए आ रहै मे अर्थ भिन्नता सेहो, जेना से कम्मो जगहमे पार्किंग करबाक अभ्यास रहै ओकरा। पुछलापर पता लागल जे ढुनढुन नाम्ना ई ड्राइवर कनाट प्लेसक पार्किंगमे काज करैत रहए। छलै, छलए मे सेहो ऐ तरहक भेल। छलए क उच्चारण छल-ए सेहो। संयोगने- (उच्चारण संजोगने) केँ/  कऽ केर- क ( केर क प्रयोग गद्यमे नै करू , पद्यमे कऽ सकै छी। ) क (जेना रामक) –रामक आ संगे (उच्चारण राम के /  राम कऽ सेहो) सँ- सऽ (उच्चारण) चन्द्रबिन्दु आ अनुस्वार- अनुस्वारमे कंठ धरिक प्रयोग होइत अछि मुदा चन्द्रबिन्दुमे नै। चन्द्रबिन्दुमे कनेक एकारक सेहो उच्चारण होइत अछि- जेना रामसँ- (उच्चारण राम सऽ)  रामकेँ- (उच्चारण राम कऽ/ राम के सेहो)। केँ जेना रामकेँ भेल हिन्दीक को (राम को)- राम को= रामकेँ क जेना रामक भेल हिन्दीक का ( राम का) राम का= रामक कऽ जेना जा कऽ भेल हिन्दीक कर ( जा कर) जा कर= जा कऽ सँ भेल हिन्दीक से (राम से) राम से= रामसँ सऽ , तऽ , त , केर (गद्यमे) एे चारू शब्द सबहक प्रयोग अवांछित। के दोसर अर्थेँ प्रयुक्त भऽ सकैए- जेना, के कहलक? विभक्ति “क”क बदला एकर प्रयोग अवांछित। नञि, नहि, नै, नइ, नँइ, नइँ, नइं ऐ सभक उच्चारण आ लेखन - नै त्त्व क बदलामे त्व जेना महत्वपूर्ण (महत्त्वपूर्ण नै) जतए अर्थ बदलि जाए ओतहि मात्र तीन अक्षरक संयुक्ताक्षरक प्रयोग उचित। सम्पति- उच्चारण स म्प इ त (सम्पत्ति नै- कारण सही उच्चारण आसानीसँ सम्भव नै)। मुदा सर्वोत्तम (सर्वोतम नै)। राष्ट्रिय (राष्ट्रीय नै) सकैए/ सकै (अर्थ परिवर्तन) पोछैले/ पोछै लेल/ पोछए लेल पोछैए/ पोछए/ (अर्थ परिवर्तन) पोछए/ पोछै ओ लोकनि ( हटा कऽ, ओ मे बिकारी नै) ओइ/ ओहि ओहिले/ ओहि लेल/ ओही लऽ जएबेँ/ बैसबेँ पँचभइयाँ देखियौक/ (देखिऔक नै- तहिना अ मे ह्रस्व आ दीर्घक मात्राक प्रयोग अनुचित) जकाँ / जेकाँ तँइ/ तैँ/ होएत / हएत नञि/ नहि/ नँइ/ नइँ/ नै सौँसे/ सौंसे बड़ / बड़ी (झोराओल) गाए (गाइ नहि), मुदा गाइक दूध (गाएक दूध नै।) रहलेँ/ पहिरतैँ हमहीं/ अहीं सब - सभ सबहक - सभहक धरि - तक गप- बात बूझब - समझब बुझलौं/ समझलौं/ बुझलहुँ - समझलहुँ हमरा आर - हम सभ आकि- आ कि सकैछ/ करैछ (गद्यमे प्रयोगक आवश्यकता नै) होइन/ होनि जाइन (जानि नै, जेना देल जाइन) मुदा जानि-बूझि (अर्थ परिव्र्तन) पइठ/ जाइठ आउ/ जाउ/ आऊ/ जाऊ मे, केँ, सँ, पर (शब्दसँ सटा कऽ) तँ कऽ धऽ दऽ (शब्दसँ हटा कऽ) मुदा दूटा वा बेसी विभक्ति संग रहलापर पहिल विभक्ति टाकेँ सटाऊ। जेना ऐमे सँ । एकटा , दूटा (मुदा कए टा) बिकारीक प्रयोग शब्दक अन्तमे, बीचमे अनावश्यक रूपेँ नै। आकारान्त आ अन्तमे अ क बाद बिकारीक प्रयोग नै (जेना दिअ , आ/ दिय’ , आ’, आ नै ) अपोस्ट्रोफीक प्रयोग बिकारीक बदलामे करब अनुचित आ मात्र फॉन्टक तकनीकी न्यूनताक परिचायक)- ओना बिकारीक संस्कृत रूप ऽ अवग्रह कहल जाइत अछि आ वर्तनी आ उच्चारण दुनू ठाम एकर लोप रहैत अछि/ रहि सकैत अछि (उच्चारणमे लोप रहिते अछि)। मुदा अपोस्ट्रोफी सेहो अंग्रेजीमे पसेसिव केसमे होइत अछि आ फ्रेंचमे शब्दमे जतए एकर प्रयोग होइत अछि जेना raison d’etre एतए सेहो एकर उच्चारण रैजौन डेटर होइत अछि, माने अपोस्ट्रॉफी अवकाश नै दैत अछि वरन जोड़ैत अछि, से एकर प्रयोग बिकारीक बदला देनाइ तकनीकी रूपेँ सेहो अनुचित)। अइमे, एहिमे/ ऐमे जइमे, जाहिमे एखन/ अखन/ अइखन केँ (के नहि) मे (अनुस्वार रहित) भऽ मे दऽ तँ (तऽ, त नै) सँ ( सऽ स नै) गाछ तर गाछ लग साँझ खन जो (जो go, करै जो do) तै/तइ जेना- तै दुआरे/ तइमे/ तइले जै/जइ जेना- जै कारण/ जइसँ/ जइले ऐ/अइ जेना- ऐ कारण/ ऐसँ/ अइले/ मुदा एकर एकटा खास प्रयोग- लालति‍ कतेक दि‍नसँ कहैत रहैत अइ लै/लइ जेना लैसँ/ लइले/ लै दुआरे लहँ/ लौं गेलौं/ लेलौं/ लेलँह/ गेलहुँ/ लेलहुँ/ लेलँ जइ/ जाहि‍/ जै जहि‍ठाम/ जाहि‍ठाम/ जइठाम/ जैठाम एहि‍/ अहि‍/ अइ (वाक्यक अंतमे ग्राह्य) / ऐ अइछ/ अछि‍/ ऐछ तइ/ तहि‍/ तै/ ताहि‍ ओहि‍/ ओइ सीखि‍/ सीख जीवि‍/ जीवी/ जीब भलेहीं/ भलहि‍ं तैं/ तँइ/ तँए जाएब/ जएब लइ/ लै छइ/ छै नहि‍/ नै/ नइ गइ/ गै छनि‍/ छन्‍हि‍  ... समए शब्‍दक संग जखन कोनो वि‍भक्‍ति‍ जुटै छै तखन समै जना समैपर इत्‍यादि‍। असगरमे हृदए आ वि‍भक्‍ति‍ जुटने हृदे जना हृदेसँ, हृदेमे इत्‍यादि‍। जइ/ जाहि‍/ जै जहि‍ठाम/ जाहि‍ठाम/ जइठाम/ जैठाम एहि‍/ अहि‍/ अइ/ ऐ अइछ/ अछि‍/ ऐछ तइ/ तहि‍/ तै/ ताहि‍ ओहि‍/ ओइ सीखि‍/ सीख जीवि‍/ जीवी/ जीब भले/ भलेहीं/ भलहि‍ं तैं/ तँइ/ तँए जाएब/ जएब लइ/ लै छइ/ छै नहि‍/ नै/ नइ गइ/ गै छनि‍/ छन्‍हि‍ चुकल अछि/ गेल गछि २.२. मैथिलीमे भाषा सम्पादन पाठ्यक्रम नीचाँक सूचीमे देल विकल्पमेसँ लैंगुएज एडीटर द्वारा कोन रूप चुनल जेबाक चाही: बोल्ड कएल रूप ग्राह्य: १.होयबला/ होबयबला/ होमयबला/ हेब’बला, हेम’बला/ होयबाक/होबएबला /होएबाक २. आ’/आऽ आ ३. क’ लेने/कऽ लेने/कए लेने/कय लेने/ल’/लऽ/लय/लए ४. भ’ गेल/भऽ गेल/भय गेल/भए गेल ५. कर’ गेलाह/करऽ गेलह/करए गेलाह/करय गेलाह ६. लिअ/दिअ लिय’,दिय’,लिअ’,दिय’/ ७. कर’ बला/करऽ बला/ करय बला करैबला/क’र’ बला / करैवाली ८. बला वला (पुरूष), वाली (स्‍त्री) ९ . आङ्ल आंग्ल १०. प्रायः प्रायह ११. दुःख दुख १ २. चलि गेल चल गेल/चैल गेल १३. देलखिन्ह देलकिन्ह, देलखिन १४. देखलन्हि देखलनि/ देखलैन्ह १५. छथिन्ह/ छलन्हि छथिन/ छलैन/ छलनि १६. चलैत/दैत चलति/दैति १७. एखनो अखनो १८. बढ़नि‍ बढ़इन बढ़न्हि १९. ओ’/ओऽ(सर्वनाम) ओ २० . ओ (संयोजक) ओ’/ओऽ २१. फाँगि/फाङ्गि फाइंग/फाइङ २२. जे जे’/जेऽ २३. ना-नुकुर ना-नुकर २४. केलन्हि/केलनि‍/कयलन्हि २५. तखनतँ/ तखन तँ २६. जा रहल/जाय रहल/जाए रहल २७. निकलय/निकलए लागल/ लगल बहराय/ बहराए लागल/ लगल निकल’/बहरै लागल २८. ओतय/ जतय जत’/ ओत’/ जतए/ ओतए २९. की फूरल जे कि फूरल जे ३०. जे जे’/जेऽ ३१. कूदि / यादि(मोन पारब) कूइद/याइद/कूद/याद/ यादि (मोन) ३२. इहो/ ओहो ३३. हँसए/ हँसय हँसऽ ३४. नौ आकि दस/नौ किंवा दस/ नौ वा दस ३५. सासु-ससुर सास-ससुर ३६. छह/ सात छ/छः/सात ३७. की  की’/ कीऽ (दीर्घीकारान्तमे ऽ वर्जित) ३८. जबाब जवाब ३९. करएताह/ करेताह करयताह ४०. दलान दिशि दलान दिश/दलान दिस ४१ . गेलाह गएलाह/गयलाह ४२. किछु आर/ किछु और/ किछ आर ४३. जाइ छल/ जाइत छल जाति छल/जैत छल ४४. पहुँचि/ भेट जाइत छल/ भेट जाइ छलए पहुँच/ भेटि‍ जाइत छल ४५. जबान (युवा)/ जवान(फौजी) ४६. लय/ लए क’/ कऽ/ लए कए / लऽ कऽ/ लऽ कए ४७. ल’/लऽ कय/ कए ४८. एखन / एखने / अखन / अखने ४९. अहींकेँ अहीँकेँ ५०. गहींर गहीँर ५१. धार पार केनाइ धार पार केनाय/केनाए ५२. जेकाँ जेँकाँ/ जकाँ ५३. तहिना तेहिना ५४. एकर अकर ५५. बहिनउ बहनोइ ५६. बहिन बहिनि ५७. बहिन-बहिनोइ बहिन-बहनउ ५८. नहि/ नै ५९. करबा / करबाय/ करबाए ६०. तँ/ त ऽ तय/तए ६१. भैयारी मे छोट-भाए/भै/, जेठ-भाय/भाइ, ६२. गि‍नतीमे दू भाइ/भाए/भाँइ ६३. ई पोथी दू भाइक/ भाँइ/ भाए/ लेल। यावत जावत ६४. माय मै / माए मुदा माइक ममता ६५. देन्हि/ दइन दनि‍/ दएन्हि/ दयन्हि दन्हि/ दैन्हि ६६. द’/ दऽ/ दए ६७. ओ (संयोजक) ओऽ (सर्वनाम) ६८. तका कए तकाय तकाए ६९. पैरे (on foot) पएरे  कएक/ कैक ७०. ताहुमे/ ताहूमे ७१. पुत्रीक ७२. बजा कय/ कए / कऽ ७३. बननाय/बननाइ ७४. कोला ७५. दिनुका दिनका ७६. ततहिसँ ७७. गरबओलन्हि/ गरबौलनि‍/ गरबेलन्हि/ गरबेलनि‍ ७८. बालु बालू ७९. चेन्ह चिन्ह(अशुद्ध) ८०. जे जे’ ८१ . से/ के से’/के’ ८२. एखुनका अखनुका ८३. भुमिहार भूमिहार ८४. सुग्गर / सुगरक/ सूगर ८५. झठहाक झटहाक ८६. छूबि ८७. करइयो/ओ करैयो ने देलक /करियौ-करइयौ ८८. पुबारि पुबाइ ८९. झगड़ा-झाँटी झगड़ा-झाँटि ९०. पएरे-पएरे पैरे-पैरे ९१. खेलएबाक ९२. खेलेबाक ९३. लगा ९४. होए- हो – होअए ९५. बुझल बूझल ९६. बूझल (संबोधन अर्थमे) ९७. यैह यएह / इएह/ सैह/ सएह ९८. तातिल ९९. अयनाय- अयनाइ/ अएनाइ/ एनाइ १००. निन्न- निन्द १०१. बिनु बिन १०२. जाए जाइ १०३. जाइ (in different sense)-last word of sentence १०४. छत पर आबि जाइ १०५. ने १०६. खेलाए (play) –खेलाइ १०७. शिकाइत- शिकायत १०८. ढप- ढ़प १०९ . पढ़- पढ ११०. कनिए/ कनिये कनिञे १११. राकस- राकश ११२. होए/ होय होइ ११३. अउरदा- औरदा ११४. बुझेलन्हि (different meaning- got understand) ११५. बुझएलन्हि/बुझेलनि‍/ बुझयलन्हि (understood himself) ११६. चलि- चल/ चलि‍ गेल ११७. खधाइ- खधाय ११८. मोन पाड़लखिन्ह/ मोन पाड़लखि‍न/ मोन पारलखिन्ह ११९. कैक- कएक- कइएक १२०. लग ल’ग १२१. जरेनाइ १२२. जरौनाइ जरओनाइ- जरएनाइ/ जरेनाइ १२३. होइत १२४. गरबेलन्हि/ गरबेलनि‍ गरबौलन्हि/ गरबौलनि‍ १२५. चिखैत- (to test)चिखइत १२६. करइयो (willing to do) करैयो १२७. जेकरा- जकरा १२८. तकरा- तेकरा १२९. बिदेसर स्थानेमे/ बिदेसरे स्थानमे १३०. करबयलहुँ/ करबएलहुँ/ करबेलहुँ करबेलौं १३१. हारिक (उच्चारण हाइरक) १३२. ओजन वजन आफसोच/ अफसोस कागत/ कागच/ कागज १३३. आधे भाग/ आध-भागे १३४. पिचा / पिचाय/पिचाए १३५. नञ/ ने १३६. बच्चा नञ (ने) पिचा जाय १३७. तखन ने (नञ) कहैत अछि। कहै/ सुनै/ देखै छल मुदा कहैत-कहैत/ सुनैत-सुनैत/ देखैत-देखैत १३८. कतेक गोटे/ कताक गोटे १३९. कमाइ-धमाइ/ कमाई- धमाई १४० . लग ल’ग १४१. खेलाइ (for playing) १४२. छथिन्ह/ छथिन १४३. होइत होइ १४४. क्यो कियो / केओ १४५. केश (hair) १४६. केस (court-case) १४७ . बननाइ/ बननाय/ बननाए १४८. जरेनाइ १४९. कुरसी कुर्सी १५०. चरचा चर्चा १५१. कर्म करम १५२. डुबाबए/ डुबाबै/ डुमाबै डुमाबय/ डुमाबए १५३. एखुनका/ अखुनका १५४. लए/ लिअए (वाक्यक अंतिम शब्द)- लऽ १५५. कएलक/ केलक १५६. गरमी गर्मी १५७ . वरदी वर्दी १५८. सुना गेलाह सुना’/सुनाऽ १५९. एनाइ-गेनाइ १६०. तेना ने घेरलन्हि/ तेना ने घेरलनि‍ १६१. नञि / नै १६२. डरो ड’रो १६३. कतहु/ कतौ कहीं १६४. उमरिगर-उमेरगर उमरगर १६५. भरिगर १६६. धोल/धोअल धोएल १६७. गप/गप्प १६८. के के’ १६९. दरबज्जा/ दरबजा १७०. ठाम १७१. धरि तक १७२. घूरि लौटि १७३. थोरबेक १७४. बड्ड १७५. तोँ/ तूँ १७६. तोँहि( पद्यमे ग्राह्य) १७७. तोँही / तोँहि १७८. करबाइए करबाइये १७९. एकेटा १८०. करितथि /करतथि १८१. पहुँचि/ पहुँच १८२. राखलन्हि रखलन्हि/ रखलनि‍ १८३. लगलन्हि/ लगलनि‍ लागलन्हि १८४. सुनि (उच्चारण सुइन) १८५. अछि (उच्चारण अइछ) १८६. एलथि गेलथि १८७. बितओने/ बि‍तौने/ बितेने १८८. करबओलन्हि/ करबौलनि‍/ करेलखिन्ह/ करेलखि‍न १८९. करएलन्हि/ करेलनि‍ १९०. आकि/ कि १९१. पहुँचि/ पहुँच १९२. बत्ती जराय/ जराए जरा (आगि लगा) १९३. से से’ १९४. हाँ मे हाँ (हाँमे हाँ विभक्त्तिमे हटा कए) १९५. फेल फैल १९६. फइल(spacious) फैल १९७. होयतन्हि/ होएतन्हि/ होएतनि‍/हेतनि‍/ हेतन्हि १९८. हाथ मटिआएब/ हाथ मटियाबय/हाथ मटियाएब १९९. फेका फेंका २००. देखाए देखा २०१. देखाबए २०२. सत्तरि सत्तर २०३. साहेब साहब २०४.गेलैन्ह/ गेलन्हि/ गेलनि‍ २०५. हेबाक/ होएबाक २०६.केलो/ कएलहुँ/केलौं/ केलुँ २०७. किछु न किछु/ किछु ने किछु २०८.घुमेलहुँ/ घुमओलहुँ/ घुमेलौं २०९. एलाक/ अएलाक २१०. अः/ अह २११.लय/ लए (अर्थ-परिवर्त्तन) २१२.कनीक/ कनेक २१३.सबहक/ सभक २१४.मिलाऽ/ मिला २१५.कऽ/ क २१६.जाऽ/ जा २१७.आऽ/ आ २१८.भऽ /भ’ (’ फॉन्टक कमीक द्योतक) २१९.निअम/ नियम २२० .हेक्टेअर/ हेक्टेयर २२१.पहिल अक्षर ढ/ बादक/ बीचक ढ़ २२२.तहिं/तहिँ/ तञि/ तैं २२३.कहिं/ कहीं २२४.तँइ/ तैं / तइँ २२५.नँइ/ नइँ/  नञि/ नहि/नै २२६.है/ हए / एलीहेँ/ २२७.छञि/ छै/ छैक /छइ २२८.दृष्टिएँ/ दृष्टियेँ २२९.आ (come)/ आऽ(conjunction) २३०. आ (conjunction)/ आऽ(come) २३१.कुनो/ कोनो, कोना/केना २३२.गेलैन्ह-गेलन्हि-गेलनि‍ २३३.हेबाक- होएबाक २३४.केलौँ- कएलौँ-कएलहुँ/केलौं २३५.किछु न किछ- किछु ने किछु २३६.केहेन- केहन २३७.आऽ (come)-आ (conjunction-and)/आ। आब'-आब' /आबह-आबह २३८. हएत-हैत २३९.घुमेलहुँ-घुमएलहुँ- घुमेलाें २४०.एलाक- अएलाक २४१.होनि- होइन/ होन्हि/ २४२.ओ-राम ओ श्यामक बीच(conjunction), ओऽ कहलक (he said)/ओ २४३.की हए/ कोसी अएली हए/ की है। की हइ २४४.दृष्टिएँ/ दृष्टियेँ २४५ .शामिल/ सामेल २४६.तैँ / तँए/ तञि/ तहिं २४७.जौं / ज्योँ/ जँ/ २४८.सभ/ सब २४९.सभक/ सबहक २५०.कहिं/ कहीं २५१.कुनो/ कोनो/ कोनहुँ/ २५२.फारकती भऽ गेल/ भए गेल/ भय गेल २५३.कोना/ केना/ कन्‍ना/कना २५४.अः/ अह २५५.जनै/ जनञ २५६.गेलनि‍/ गेलाह (अर्थ परिवर्तन) २५७.केलन्हि/ कएलन्हि/ केलनि‍/ २५८.लय/ लए/ लएह (अर्थ परिवर्तन) २५९.कनीक/ कनेक/कनी-मनी २६०.पठेलन्हि‍ पठेलनि‍/ पठेलइन/ पपठओलन्हि/ पठबौलनि‍/ २६१.निअम/ नियम २६२.हेक्टेअर/ हेक्टेयर २६३.पहिल अक्षर रहने ढ/ बीचमे रहने ढ़ २६४.आकारान्तमे बिकारीक प्रयोग उचित नै/ अपोस्ट्रोफीक प्रयोग फान्टक तकनीकी न्यूनताक परिचायक ओकर बदला अवग्रह (बिकारी) क प्रयोग उचित २६५.केर (पद्यमे ग्राह्य) / -क/ कऽ/ के २६६.छैन्हि- छन्हि २६७.लगैए/ लगैये २६८.होएत/ हएत २६९.जाएत/ जएत/ २७०.आएत/ अएत/ आओत २७१ .खाएत/ खएत/ खैत २७२.पिअएबाक/ पिएबाक/पि‍येबाक २७३.शुरु/ शुरुह २७४.शुरुहे/ शुरुए २७५.अएताह/अओताह/ एताह/ औताह २७६.जाहि/ जाइ/ जइ/ जै/ २७७.जाइत/ जैतए/ जइतए २७८.आएल/ अएल २७९.कैक/ कएक २८०.आयल/ अएल/ आएल २८१. जाए/ जअए/ जए (लालति‍ जाए लगलीह।) २८२. नुकएल/ नुकाएल २८३. कठुआएल/ कठुअएल २८४. ताहि/ तै/ तइ २८५. गायब/ गाएब/ गएब २८६. सकै/ सकए/ सकय २८७.सेरा/सरा/ सराए (भात सरा गेल) २८८.कहैत रही/देखैत रही/ कहैत छलौं/ कहै छलौं- अहिना चलैत/ पढ़ैत (पढ़ै-पढ़ैत अर्थ कखनो काल परिवर्तित) - आर बुझै/ बुझैत (बुझै/ बुझै छी, मुदा बुझैत-बुझैत)/ सकैत/ सकै। करैत/ करै। दै/ दैत। छैक/ छै। बचलै/ बचलैक। रखबा/ रखबाक । बिनु/ बिन। रातिक/ रातुक बुझै आ बुझैत केर अपन-अपन जगहपर प्रयोग समीचीन अछि‍। बुझैत-बुझैत आब बुझलि‍ऐ। हमहूँ बुझै छी। २८९. दुआरे/ द्वारे २९०.भेटि/ भेट/ भेँट २९१. खन/ खीन/  खुना (भोर खन/ भोर खीन) २९२.तक/ धरि २९३.गऽ/ गै (meaning different-जनबै गऽ) २९४.सऽ/ सँ (मुदा दऽ, लऽ) २९५.त्त्व,(तीन अक्षरक मेल बदला पुनरुक्तिक एक आ एकटा दोसरक उपयोग) आदिक बदला त्व आदि। महत्त्व/ महत्व/ कर्ता/ कर्त्ता आदिमे त्त संयुक्तक कोनो आवश्यकता मैथिलीमे नै अछि। वक्तव्य २९६.बेसी/ बेशी २९७.बाला/वाला बला/ वला (रहैबला) २९८ .वाली/ (बदलैवाली) २९९.वार्त्ता/ वार्ता ३००. अन्तर्राष्ट्रिय/ अन्तर्राष्ट्रीय ३०१. लेमए/ लेबए ३०२.लमछुरका, नमछुरका ३०२.लागै/ लगै ( भेटैत/ भेटै) ३०३.लागल/ लगल ३०४.हबा/ हवा ३०५.राखलक/ रखलक ३०६.आ (come)/ आ (and) ३०७. पश्चाताप/ पश्चात्ताप ३०८. ऽ केर व्यवहार शब्दक अन्तमे मात्र, यथासंभव बीचमे नै। ३०९.कहैत/ कहै ३१०. रहए (छल)/ रहै (छलै) (meaning different) ३११.तागति/ ताकति ३१२.खराप/ खराब ३१३.बोइन/ बोनि/ बोइनि ३१४.जाठि/ जाइठ ३१५.कागज/ कागच/ कागत ३१६.गिरै (meaning different- swallow)/ गिरए (खसए) ३१७.राष्ट्रिय/ राष्ट्रीय Festivals of Mithila DATE-LIST (year- 2011-12) (१४१९ साल) Marriage Days: Nov.2011- 20,21,23,25,27,30 Dec.2011- 1,5,9 January 2012- 18,19,20,23,25,27,29 Feb.2012- 2,3,8,9,10,16,17,19,23,24,29 March 2012- 1,8,9,12 April 2012- 15,16,18,25,26 June 2012- 8,13,24,25,28,29 Upanayana Days: February 2012- 2,3,24,26 March 2012- 4 April 2012- 1,2,26 June 2012- 22 Dviragaman Din: November 2011- 27,30 December 2011- 1,2,5,7,9,12 February 2012- 22,23,24,26,27,29 March 2012- 1,2,4,5,9,11,12 April 2012- 23,25,26,29 May 2012- 2,3,4,6,7 Mundan Din: December 2011- 1,5 January 201225,26,30 March 2012- 12 April 2012- 26 May 2012- 23,25,31 June 2012- 8,21,22,29 FESTIVALS OF MITHILA Mauna Panchami-20 July Madhushravani- 2 August Nag Panchami- 4 August Raksha Bandhan- 13 Aug Krishnastami- 21 August Kushi Amavasya / Somvari Vrat- 29 August Hartalika Teej- 31 August ChauthChandra-1 September Karma Dharma Ekadashi-8 September Indra Pooja Aarambh- 9 September Anant Caturdashi- 11 Sep Agastyarghadaan- 12 Sep Pitri Paksha begins- 13 Sep Mahalaya Aarambh- 13 September Vishwakarma Pooja- 17 September Jimootavahan Vrata/ Jitia-20 September Matri Navami- 21September Kalashsthapan- 28 September Belnauti- 2 October Patrika Pravesh- 3 October Mahastami- 4 October Maha Navami - 5 October Vijaya Dashami- 6 October Kojagara- 11 Oct Dhanteras- 24 October Diyabati, shyama pooja-26 October Annakoota/ Govardhana Pooja-27  October Bhratridwitiya/ Chitragupta Pooja-28 October Chhathi-kharna -31 October Chhathi- sayankalik arghya - 1 November Devotthan Ekadashi- 17 November Sama poojarambh- 2 November Kartik Poornima/ Sama Bisarjan- 10 Nov ravivratarambh- 27 November Navanna parvan- 29 November Vivaha Panchmi- 29 November Makara/ Teela Sankranti-15 Jan Naraknivaran chaturdashi- 21 January Basant Panchami/ Saraswati Pooja- 28 January Achla Saptmi- 30 January Mahashivaratri-20 February Holikadahan-Fagua-7 March Holi-9 Mar Varuni Yoga-20 March Chaiti  navaratrarambh- 23 March Chaiti Chhathi vrata-29 March Ram Navami- 1 April Mesha Sankranti-Satuani-13 April Jurishital-14 April Akshaya Tritiya-24 April Ravi Brat Ant- 29 April Janaki Navami- 30 April Vat Savitri-barasait- 20 May Ganga Dashhara-30 May Somavati Amavasya Vrata- 18 June Jagannath Rath Yatra- 21 June Hari Sayan Ekadashi- 30 June Aashadhi Guru Poornima-3 Jul VIDEHA ARCHIVE १.विदेह ई-पत्रिकाक सभटा पुरान अंक ब्रेल, तिरहुता आ देवनागरी रूपमे Videha e journal's all old issues in Braille Tirhuta and Devanagari versions विदेह ई-पत्रिकाक पहिल ५० अंक

विदेह ई-पत्रिकाक ५०म सँ आगाँक अंक २.मैथिली पोथी डाउनलोड Maithili Books Download ३.मैथिली ऑडियो संकलन Maithili Audio Downloads ४.मैथिली वीडियोक संकलन Maithili Videos ५.मिथिला चित्रकला/ आधुनिक चित्रकला आ चित्र Mithila Painting/ Modern Art and Photos "विदेह"क एहि सभ सहयोगी लिंकपर सेहो एक बेर जाऊ। ६.विदेह मैथिली क्विज  :  http://videhaquiz.blogspot.com/ ७.विदेह मैथिली जालवृत्त एग्रीगेटर : http://videha-aggregator.blogspot.com/ ८.विदेह मैथिली साहित्य अंग्रेजीमे अनूदित http://madhubani-art.blogspot.com/ ९.विदेहक पूर्व-रूप "भालसरिक गाछ"  : http://gajendrathakur.blogspot.com/ १०.विदेह इंडेक्स  : http://videha123.blogspot.com/ ११.विदेह फाइल : http://videha123.wordpress.com/ १२. विदेह: सदेह : पहिल तिरहुता (मिथिला़क्षर) जालवृत्त (ब्लॉग) http://videha-sadeha.blogspot.com/ १३. विदेह:ब्रेल: मैथिली ब्रेलमे: पहिल बेर विदेह द्वारा http://videha-braille.blogspot.com/ १४.VIDEHA IST MAITHILI  FORTNIGHTLY EJOURNAL ARCHIVE http://videha-archive.blogspot.com/ १५. विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका मैथिली पोथीक आर्काइव http://videha-pothi.blogspot.com/ १६. विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका ऑडियो आर्काइव http://videha-audio.blogspot.com/ १७. विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका वीडियो आर्काइव http://videha-video.blogspot.com/ १८. विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका मिथिला चित्रकला, आधुनिक कला आ चित्रकला http://videha-paintings-photos.blogspot.com/ १९. मैथिल आर मिथिला (मैथिलीक सभसँ लोकप्रिय जालवृत्त) http://maithilaurmithila.blogspot.com/ २०.श्रुति प्रकाशन http://www.shruti-publication.com/ २१.http://groups.google.com/group/videha VIDEHA केर सदस्यता लिअ Top of Form Bottom of Form ईमेल : एहि समूहपर जाऊ २२.http://groups.yahoo.com/group/VIDEHA/ Top of Form Subscribe to VIDEHA Powered by us.groups.yahoo.com Bottom of Form २३.गजेन्द्र ठाकुर इ‍डेक्स http://gajendrathakur123.blogspot.com २४. नेना भुटका http://mangan-khabas.blogspot.com/ २५.विदेह रेडियो:मैथिली कथा-कविता आदिक पहिल पोडकास्ट साइट http://videha123radio.wordpress.com/ २६.Videha Radio २७. Join official Videha facebook group. २८. विदेह मैथिली नाट्य उत्सव http://maithili-drama.blogspot.com/ २९.समदिया http://esamaad.blogspot.com/ ३०. मैथिली फिल्म्स http://maithilifilms.blogspot.com/ ३१.अनचिन्हार आखर http://anchinharakharkolkata.blogspot.com/ ३२. मैथिली हाइकू http://maithili-haiku.blogspot.com/ ३३. मानक मैथिली http://manak-maithili.blogspot.com/ ३४. विहनि कथा http://vihanikatha.blogspot.in/ ३५. मैथिली कविता http://maithili-kavita.blogspot.in/ ३६. मैथिली कथा http://maithili-katha.blogspot.in/ ३७.मैथिली समालोचना http://maithili-samalochna.blogspot.in/ महत्त्वपूर्ण सूचना:(१) 'विदेह' द्वारा धारावाहिक रूपे ई-प्रकाशित कएल गेल गजेन्द्र ठाकुरक  निबन्ध-प्रबन्ध-समीक्षा, उपन्यास (सहस्रबाढ़नि) , पद्य-संग्रह (सहस्राब्दीक चौपड़पर), कथा-गल्प (गल्प-गुच्छ), नाटक(संकर्षण), महाकाव्य (त्वञ्चाहञ्च आ असञ्जाति मन) आ बाल-किशोर साहित्य विदेहमे संपूर्ण ई-प्रकाशनक बाद प्रिंट फॉर्ममे। कुरुक्षेत्रम्–अन्तर्मनक खण्ड-१ सँ ७ Combined ISBN No.978-81-907729-7-6 विवरण एहि पृष्ठपर नीचाँमे आ प्रकाशकक साइट http://www.shruti-publication.com/ पर । महत्त्वपूर्ण सूचना (२):सूचना: विदेहक मैथिली-अंग्रेजी आ अंग्रेजी मैथिली कोष (इंटरनेटपर पहिल बेर सर्च-डिक्शनरी) एम.एस. एस.क्यू.एल. सर्वर आधारित -Based on ms-sql server Maithili-English and English-Maithili Dictionary. विदेहक भाषापाक- रचनालेखन स्तंभमे। कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक- गजेन्द्र ठाकुर गजेन्द्र ठाकुरक निबन्ध-प्रबन्ध-समीक्षा, उपन्यास (सहस्रबाढ़नि) , पद्य-संग्रह (सहस्राब्दीक चौपड़पर), कथा-गल्प (गल्प गुच्छ), नाटक(संकर्षण), महाकाव्य (त्वञ्चाहञ्च आ असञ्जाति मन) आ बालमंडली-किशोरजगत विदेहमे संपूर्ण ई-प्रकाशनक बाद प्रिंट फॉर्ममे। कुरुक्षेत्रम्–अन्तर्मनक, खण्ड-१ सँ ७ Ist edition 2009 of Gajendra Thakur’s KuruKshetram-Antarmanak (Vol. I to VII)- essay-paper-criticism, novel, poems, story, play, epics and Children-grown-ups literature in single binding: Language:Maithili ६९२ पृष्ठ : मूल्य भा. रु. 100/-(for individual buyers inside india) (add courier charges Rs.50/-per copy for Delhi/NCR and Rs.100/- per copy for outside Delhi)

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Details for purchase available at print-version publishers's site website: http://www.shruti-publication.com/ or you may write to e-mail:shruti.publication@shruti-publication.com विदेह: सदेह : १: २: ३: ४ तिरहुता : देवनागरी "विदेह" क, प्रिंट संस्करण :विदेह-ई-पत्रिका (http://www.videha.co.in/) क चुनल रचना सम्मिलित। विदेह:सदेह:१: २: ३: ४ सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। Details for purchase available at print-version publishers's site http://www.shruti-publication.com  or you may write to shruti.publication@shruti-publication.com २. संदेश- [ विदेह ई-पत्रिका, विदेह:सदेह मिथिलाक्षर आ देवनागरी आ गजेन्द्र ठाकुरक सात खण्डक- निबन्ध-प्रबन्ध-समीक्षा,उपन्यास (सहस्रबाढ़नि) , पद्य-संग्रह (सहस्राब्दीक चौपड़पर), कथा-गल्प (गल्प गुच्छ), नाटक (संकर्षण), महाकाव्य (त्वञ्चाहञ्च आ असञ्जाति मन) आ बाल-मंडली-किशोर जगत- संग्रह कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक मादेँ। ] १.श्री गोविन्द झा- विदेहकेँ तरंगजालपर उतारि विश्वभरिमे मातृभाषा मैथिलीक लहरि जगाओल, खेद जे अपनेक एहि महाभियानमे हम एखन धरि संग नहि दए सकलहुँ। सुनैत छी अपनेकेँ सुझाओ आ रचनात्मक आलोचना प्रिय लगैत अछि तेँ किछु लिखक मोन भेल। हमर सहायता आ सहयोग अपनेकेँ सदा उपलब्ध रहत। २.श्री रमानन्द रेणु- मैथिलीमे ई-पत्रिका पाक्षिक रूपेँ चला कऽ जे अपन मातृभाषाक प्रचार कऽ रहल छी, से धन्यवाद । आगाँ अपनेक समस्त मैथिलीक कार्यक हेतु हम हृदयसँ शुभकामना दऽ रहल छी। ३.श्री विद्यानाथ झा "विदित"- संचार आ प्रौद्योगिकीक एहि प्रतिस्पर्धी ग्लोबल युगमे अपन महिमामय "विदेह"केँ अपना देहमे प्रकट देखि जतबा प्रसन्नता आ संतोष भेल, तकरा कोनो उपलब्ध "मीटर"सँ नहि नापल जा सकैछ? ..एकर ऐतिहासिक मूल्यांकन आ सांस्कृतिक प्रतिफलन एहि शताब्दीक अंत धरि लोकक नजरिमे आश्चर्यजनक रूपसँ प्रकट हैत। ४. प्रो. उदय नारायण सिंह "नचिकेता"- जे काज अहाँ कए रहल छी तकर चरचा एक दिन मैथिली भाषाक इतिहासमे होएत। आनन्द भए रहल अछि, ई जानि कए जे एतेक गोट मैथिल "विदेह" ई जर्नलकेँ पढ़ि रहल छथि।...विदेहक चालीसम अंक पुरबाक लेल अभिनन्दन। ५. डॉ. गंगेश गुंजन- एहि विदेह-कर्ममे लागि रहल अहाँक सम्वेदनशील मन, मैथिलीक प्रति समर्पित मेहनतिक अमृत रंग, इतिहास मे एक टा विशिष्ट फराक अध्याय आरंभ करत, हमरा विश्वास अछि। अशेष शुभकामना आ बधाइक सङ्ग, सस्नेह...अहाँक पोथी कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक प्रथम दृष्टया बहुत भव्य तथा उपयोगी बुझाइछ। मैथिलीमे तँ अपना स्वरूपक प्रायः ई पहिले एहन  भव्य अवतारक पोथी थिक। हर्षपूर्ण हमर हार्दिक बधाई स्वीकार करी। ६. श्री रामाश्रय झा "रामरंग"(आब स्वर्गीय)- "अपना" मिथिलासँ संबंधित...विषय वस्तुसँ अवगत भेलहुँ।...शेष सभ कुशल अछि। ७. श्री ब्रजेन्द्र त्रिपाठी- साहित्य अकादमी- इंटरनेट पर प्रथम मैथिली पाक्षिक पत्रिका "विदेह" केर लेल बधाई आ शुभकामना स्वीकार करू। ८. श्री प्रफुल्लकुमार सिंह "मौन"- प्रथम मैथिली पाक्षिक पत्रिका "विदेह" क प्रकाशनक समाचार जानि कनेक चकित मुदा बेसी आह्लादित भेलहुँ। कालचक्रकेँ पकड़ि जाहि दूरदृष्टिक परिचय देलहुँ, ओहि लेल हमर मंगलकामना। ९.डॉ. शिवप्रसाद यादव- ई जानि अपार हर्ष भए रहल अछि, जे नव सूचना-क्रान्तिक क्षेत्रमे मैथिली पत्रकारिताकेँ प्रवेश दिअएबाक साहसिक कदम उठाओल अछि। पत्रकारितामे एहि प्रकारक नव प्रयोगक हम स्वागत करैत छी, संगहि "विदेह"क सफलताक शुभकामना। १०. श्री आद्याचरण झा- कोनो पत्र-पत्रिकाक प्रकाशन- ताहूमे मैथिली पत्रिकाक प्रकाशनमे के कतेक सहयोग करताह- ई तऽ भविष्य कहत। ई हमर ८८ वर्षमे ७५ वर्षक अनुभव रहल। एतेक पैघ महान यज्ञमे हमर श्रद्धापूर्ण आहुति प्राप्त होयत- यावत ठीक-ठाक छी/ रहब। ११. श्री विजय ठाकुर- मिशिगन विश्वविद्यालय- "विदेह" पत्रिकाक अंक देखलहुँ, सम्पूर्ण टीम बधाईक पात्र अछि। पत्रिकाक मंगल भविष्य हेतु हमर शुभकामना स्वीकार कएल जाओ। १२. श्री सुभाषचन्द्र यादव- ई-पत्रिका "विदेह" क बारेमे जानि प्रसन्नता भेल। ’विदेह’ निरन्तर पल्लवित-पुष्पित हो आ चतुर्दिक अपन सुगंध पसारय से कामना अछि। १३. श्री मैथिलीपुत्र प्रदीप- ई-पत्रिका "विदेह" केर सफलताक भगवतीसँ कामना। हमर पूर्ण सहयोग रहत। १४. डॉ. श्री भीमनाथ झा- "विदेह" इन्टरनेट पर अछि तेँ "विदेह" नाम उचित आर कतेक रूपेँ एकर विवरण भए सकैत अछि। आइ-काल्हि मोनमे उद्वेग रहैत अछि, मुदा शीघ्र पूर्ण सहयोग देब।कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक देखि अति प्रसन्नता भेल। मैथिलीक लेल ई घटना छी। १५. श्री रामभरोस कापड़ि "भ्रमर"- जनकपुरधाम- "विदेह" ऑनलाइन देखि रहल छी। मैथिलीकेँ अन्तर्राष्ट्रीय जगतमे पहुँचेलहुँ तकरा लेल हार्दिक बधाई। मिथिला रत्न सभक संकलन अपूर्व। नेपालोक सहयोग भेटत, से विश्वास करी। १६. श्री राजनन्दन लालदास- "विदेह" ई-पत्रिकाक माध्यमसँ बड़ नीक काज कए रहल छी, नातिक अहिठाम देखलहुँ। एकर वार्षिक अ‍ंक जखन प्रिं‍ट निकालब तँ हमरा पठायब। कलकत्तामे बहुत गोटेकेँ हम साइटक पता लिखाए देने छियन्हि। मोन तँ होइत अछि जे दिल्ली आबि कए आशीर्वाद दैतहुँ, मुदा उमर आब बेशी भए गेल। शुभकामना देश-विदेशक मैथिलकेँ जोड़बाक लेल।.. उत्कृष्ट प्रकाशन कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक लेल बधाइ। अद्भुत काज कएल अछि, नीक प्रस्तुति अछि सात खण्डमे।  मुदा अहाँक सेवा आ से निःस्वार्थ तखन बूझल जाइत जँ अहाँ द्वारा प्रकाशित पोथी सभपर दाम लिखल नहि रहितैक। ओहिना सभकेँ विलहि देल जइतैक। (स्पष्टीकरण-  श्रीमान्, अहाँक सूचनार्थ विदेह द्वारा ई-प्रकाशित कएल सभटा सामग्री आर्काइवमे https://sites.google.com/a/videha.com/videha-pothi/ पर बिना मूल्यक डाउनलोड लेल उपलब्ध छै आ भविष्यमे सेहो रहतैक। एहि आर्काइवकेँ जे कियो प्रकाशक अनुमति लऽ कऽ प्रिंट रूपमे प्रकाशित कएने छथि आ तकर ओ दाम रखने छथि ताहिपर हमर कोनो नियंत्रण नहि अछि।- गजेन्द्र ठाकुर)...   अहाँक प्रति अशेष शुभकामनाक संग। १७. डॉ. प्रेमशंकर सिंह- अहाँ मैथिलीमे इंटरनेटपर पहिल पत्रिका "विदेह" प्रकाशित कए अपन अद्भुत मातृभाषानुरागक परिचय देल अछि, अहाँक निःस्वार्थ मातृभाषानुरागसँ प्रेरित छी, एकर निमित्त जे हमर सेवाक प्रयोजन हो, तँ सूचित करी। इंटरनेटपर आद्योपांत पत्रिका देखल, मन प्रफुल्लित भऽ गेल। १८.श्रीमती शेफालिका वर्मा- विदेह ई-पत्रिका देखि मोन उल्लाससँ भरि गेल। विज्ञान कतेक प्रगति कऽ रहल अछि...अहाँ सभ अनन्त आकाशकेँ भेदि दियौ, समस्त विस्तारक रहस्यकेँ तार-तार कऽ दियौक...। अपनेक अद्भुत पुस्तक कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक विषयवस्तुक दृष्टिसँ गागरमे सागर अछि। बधाई। १९.श्री हेतुकर झा, पटना-जाहि समर्पण भावसँ अपने मिथिला-मैथिलीक सेवामे तत्पर छी से स्तुत्य अछि। देशक राजधानीसँ भय रहल मैथिलीक शंखनाद मिथिलाक गाम-गाममे मैथिली चेतनाक विकास अवश्य करत। २०. श्री योगानन्द झा, कबिलपुर, लहेरियासराय- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पोथीकेँ निकटसँ देखबाक अवसर भेटल अछि आ मैथिली जगतक एकटा उद्भट ओ समसामयिक दृष्टिसम्पन्न हस्ताक्षरक कलमबन्द परिचयसँ आह्लादित छी। "विदेह"क देवनागरी सँस्करण पटनामे रु. 80/- मे उपलब्ध भऽ सकल जे विभिन्न लेखक लोकनिक छायाचित्र, परिचय पत्रक ओ रचनावलीक सम्यक प्रकाशनसँ ऐतिहासिक कहल जा सकैछ। २१. श्री किशोरीकान्त मिश्र- कोलकाता- जय मैथिली, विदेहमे बहुत रास कविता, कथा, रिपोर्ट आदिक सचित्र संग्रह देखि आ आर अधिक प्रसन्नता मिथिलाक्षर देखि- बधाई स्वीकार कएल जाओ। २२.श्री जीवकान्त- विदेहक मुद्रित अंक पढ़ल- अद्भुत मेहनति। चाबस-चाबस। किछु समालोचना मरखाह..मुदा सत्य। २३. श्री भालचन्द्र झा- अपनेक कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक देखि बुझाएल जेना हम अपने छपलहुँ अछि। एकर विशालकाय आकृति अपनेक सर्वसमावेशताक परिचायक अछि। अपनेक रचना सामर्थ्यमे उत्तरोत्तर वृद्धि हो, एहि शुभकामनाक संग हार्दिक बधाई। २४.श्रीमती डॉ नीता झा- अहाँक कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़लहुँ। ज्योतिरीश्वर शब्दावली, कृषि मत्स्य शब्दावली आ सीत बसन्त आ सभ कथा, कविता, उपन्यास, बाल-किशोर साहित्य सभ उत्तम छल। मैथिलीक उत्तरोत्तर विकासक लक्ष्य दृष्टिगोचर होइत अछि। २५.श्री मायानन्द मिश्र- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक मे हमर उपन्यास स्त्रीधनक जे विरोध कएल गेल अछि तकर हम विरोध करैत छी।... कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पोथीक लेल शुभकामना।(श्रीमान् समालोचनाकेँ विरोधक रूपमे नहि लेल जाए।-गजेन्द्र ठाकुर) २६.श्री महेन्द्र हजारी- सम्पादक श्रीमिथिला- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़ि मोन हर्षित भऽ गेल..एखन पूरा पढ़यमे बहुत समय लागत, मुदा जतेक पढ़लहुँ से आह्लादित कएलक। २७.श्री केदारनाथ चौधरी- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक अद्भुत लागल, मैथिली साहित्य लेल ई पोथी एकटा प्रतिमान बनत। २८.श्री सत्यानन्द पाठक- विदेहक हम नियमित पाठक छी। ओकर स्वरूपक प्रशंसक छलहुँ। एम्हर अहाँक लिखल - कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक देखलहुँ। मोन आह्लादित भऽ उठल। कोनो रचना तरा-उपरी। २९.श्रीमती रमा झा-सम्पादक मिथिला दर्पण। कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक प्रिंट फॉर्म पढ़ि आ एकर गुणवत्ता देखि मोन प्रसन्न भऽ गेल, अद्भुत शब्द एकरा लेल प्रयुक्त कऽ रहल छी। विदेहक उत्तरोत्तर प्रगतिक शुभकामना। ३०.श्री नरेन्द्र झा, पटना- विदेह नियमित देखैत रहैत छी। मैथिली लेल अद्भुत काज कऽ रहल छी। ३१.श्री रामलोचन ठाकुर- कोलकाता- मिथिलाक्षर विदेह देखि मोन प्रसन्नतासँ भरि उठल, अंकक विशाल परिदृश्य आस्वस्तकारी अछि। ३२.श्री तारानन्द वियोगी- विदेह आ कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक देखि चकबिदोर लागि गेल। आश्चर्य। शुभकामना आ बधाई। ३३.श्रीमती प्रेमलता मिश्र “प्रेम”- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़लहुँ। सभ रचना उच्चकोटिक लागल। बधाई। ३४.श्री कीर्तिनारायण मिश्र- बेगूसराय- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक बड्ड नीक लागल, आगांक सभ काज लेल बधाई। ३५.श्री महाप्रकाश-सहरसा- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक नीक लागल, विशालकाय संगहि उत्तमकोटिक। ३६.श्री अग्निपुष्प- मिथिलाक्षर आ देवाक्षर विदेह पढ़ल..ई प्रथम तँ अछि एकरा प्रशंसामे मुदा हम एकरा दुस्साहसिक कहब। मिथिला चित्रकलाक स्तम्भकेँ मुदा अगिला अंकमे आर विस्तृत बनाऊ। ३७.श्री मंजर सुलेमान-दरभंगा- विदेहक जतेक प्रशंसा कएल जाए कम होएत। सभ चीज उत्तम। ३८.श्रीमती प्रोफेसर वीणा ठाकुर- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक उत्तम, पठनीय, विचारनीय। जे क्यो देखैत छथि पोथी प्राप्त करबाक उपाय पुछैत छथि। शुभकामना। ३९.श्री छत्रानन्द सिंह झा- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़लहुँ, बड्ड नीक सभ तरहेँ। ४०.श्री ताराकान्त झा- सम्पादक मैथिली दैनिक मिथिला समाद- विदेह तँ कन्टेन्ट प्रोवाइडरक काज कऽ रहल अछि। कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक अद्भुत लागल। ४१.डॉ रवीन्द्र कुमार चौधरी- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक बहुत नीक, बहुत मेहनतिक परिणाम। बधाई। ४२.श्री अमरनाथ- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक आ विदेह दुनू स्मरणीय घटना अछि, मैथिली साहित्य मध्य। ४३.श्री पंचानन मिश्र- विदेहक वैविध्य आ निरन्तरता प्रभावित करैत अछि, शुभकामना। ४४.श्री केदार कानन- कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक लेल अनेक धन्यवाद, शुभकामना आ बधाइ स्वीकार करी। आ नचिकेताक भूमिका पढ़लहुँ। शुरूमे तँ लागल जेना कोनो उपन्यास अहाँ द्वारा सृजित भेल अछि मुदा पोथी उनटौला पर ज्ञात भेल जे एहिमे तँ सभ विधा समाहित अछि। ४५.श्री धनाकर ठाकुर- अहाँ नीक काज कऽ रहल छी। फोटो गैलरीमे चित्र एहि शताब्दीक जन्मतिथिक अनुसार रहैत तऽ नीक। ४६.श्री आशीष झा- अहाँक पुस्तकक संबंधमे एतबा लिखबा सँ अपना कए नहि रोकि सकलहुँ जे ई किताब मात्र किताब नहि थीक, ई एकटा उम्मीद छी जे मैथिली अहाँ सन पुत्रक सेवा सँ निरंतर समृद्ध होइत चिरजीवन कए प्राप्त करत। ४७.श्री शम्भु कुमार सिंह- विदेहक तत्परता आ क्रियाशीलता देखि आह्लादित भऽ रहल छी। निश्चितरूपेण कहल जा सकैछ जे समकालीन मैथिली पत्रिकाक इतिहासमे विदेहक नाम स्वर्णाक्षरमे लिखल जाएत। ओहि कुरुक्षेत्रक घटना सभ तँ अठारहे दिनमे खतम भऽ गेल रहए मुदा अहाँक कुरुक्षेत्रम् तँ अशेष अछि। ४८.डॉ. अजीत मिश्र- अपनेक प्रयासक कतबो प्रश‍ंसा कएल जाए कमे होएतैक। मैथिली साहित्यमे अहाँ द्वारा कएल गेल काज युग-युगान्तर धरि पूजनीय रहत। ४९.श्री बीरेन्द्र मल्लिक- अहाँक कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक आ विदेह:सदेह पढ़ि अति प्रसन्नता भेल। अहाँक स्वास्थ्य ठीक रहए आ उत्साह बनल रहए से कामना। ५०.श्री कुमार राधारमण- अहाँक दिशा-निर्देशमे विदेह पहिल मैथिली ई-जर्नल देखि अति प्रसन्नता भेल। हमर शुभकामना। ५१.श्री फूलचन्द्र झा प्रवीण-विदेह:सदेह पढ़ने रही मुदा कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक देखि बढ़ाई देबा लेल बाध्य भऽ गेलहुँ। आब विश्वास भऽ गेल जे मैथिली नहि मरत। अशेष शुभकामना। ५२.श्री विभूति आनन्द- विदेह:सदेह देखि, ओकर विस्तार देखि अति प्रसन्नता भेल। ५३.श्री मानेश्वर मनुज-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक एकर भव्यता देखि अति प्रसन्नता भेल, एतेक विशाल ग्रन्थ मैथिलीमे आइ धरि नहि देखने रही। एहिना भविष्यमे काज करैत रही, शुभकामना। ५४.श्री विद्यानन्द झा- आइ.आइ.एम.कोलकाता- कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक विस्तार, छपाईक संग गुणवत्ता देखि अति प्रसन्नता भेल। अहाँक अनेक धन्यवाद; कतेक बरखसँ हम नेयारैत छलहुँ जे सभ पैघ शहरमे मैथिली लाइब्रेरीक स्थापना होअए, अहाँ ओकरा वेबपर कऽ रहल छी, अनेक धन्यवाद। ५५.श्री अरविन्द ठाकुर-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक मैथिली साहित्यमे कएल गेल एहि तरहक पहिल प्रयोग अछि, शुभकामना। ५६.श्री कुमार पवन-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक पढ़ि रहल छी। किछु लघुकथा पढ़ल अछि, बहुत मार्मिक छल। ५७. श्री प्रदीप बिहारी-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक देखल, बधाई। ५८.डॉ मणिकान्त ठाकुर-कैलिफोर्निया- अपन विलक्षण नियमित सेवासँ हमरा लोकनिक हृदयमे विदेह सदेह भऽ गेल अछि। ५९.श्री धीरेन्द्र प्रेमर्षि- अहाँक समस्त प्रयास सराहनीय। दुख होइत अछि जखन अहाँक प्रयासमे अपेक्षित सहयोग नहि कऽ पबैत छी। ६०.श्री देवशंकर नवीन- विदेहक निरन्तरता आ विशाल स्वरूप- विशाल पाठक वर्ग, एकरा ऐतिहासिक बनबैत अछि। ६१.श्री मोहन भारद्वाज- अहाँक समस्त कार्य देखल, बहुत नीक। एखन किछु परेशानीमे छी, मुदा शीघ्र सहयोग देब। ६२.श्री फजलुर रहमान हाशमी-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक मे एतेक मेहनतक लेल अहाँ साधुवादक अधिकारी छी। ६३.श्री लक्ष्मण झा "सागर"- मैथिलीमे चमत्कारिक रूपेँ अहाँक प्रवेश आह्लादकारी अछि।..अहाँकेँ एखन आर..दूर..बहुत दूरधरि जेबाक अछि। स्वस्थ आ प्रसन्न रही। ६४.श्री जगदीश प्रसाद मंडल-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक पढ़लहुँ । कथा सभ आ उपन्यास सहस्रबाढ़नि पूर्णरूपेँ पढ़ि गेल छी। गाम-घरक भौगोलिक विवरणक जे सूक्ष्म वर्णन सहस्रबाढ़निमे अछि, से चकित कएलक, एहि संग्रहक कथा-उपन्यास मैथिली लेखनमे विविधता अनलक अछि। समालोचना शास्त्रमे अहाँक दृष्टि वैयक्तिक नहि वरन् सामाजिक आ कल्याणकारी अछि, से प्रशंसनीय। ६५.श्री अशोक झा-अध्यक्ष मिथिला विकास परिषद- कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक लेल बधाई आ आगाँ लेल शुभकामना। ६६.श्री ठाकुर प्रसाद मुर्मु- अद्भुत प्रयास। धन्यवादक संग प्रार्थना जे अपन माटि-पानिकेँ ध्यानमे राखि अंकक समायोजन कएल जाए। नव अंक धरि प्रयास सराहनीय। विदेहकेँ बहुत-बहुत धन्यवाद जे एहेन सुन्दर-सुन्दर सचार (आलेख) लगा रहल छथि। सभटा ग्रहणीय- पठनीय। ६७.बुद्धिनाथ मिश्र- प्रिय गजेन्द्र जी,अहाँक सम्पादन मे प्रकाशित ‘विदेह’आ ‘कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक’ विलक्षण पत्रिका आ विलक्षण पोथी! की नहि अछि अहाँक सम्पादनमे? एहि प्रयत्न सँ मैथिली क विकास होयत,निस्संदेह। ६८.श्री बृखेश चन्द्र लाल- गजेन्द्रजी, अपनेक पुस्तक कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक पढ़ि मोन गदगद भय गेल , हृदयसँ अनुगृहित छी । हार्दिक शुभकामना । ६९.श्री परमेश्वर कापड़ि - श्री गजेन्द्र जी । कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक पढ़ि गदगद आ नेहाल भेलहुँ। ७०.श्री रवीन्द्रनाथ ठाकुर- विदेह पढ़ैत रहैत छी। धीरेन्द्र प्रेमर्षिक मैथिली गजलपर आलेख पढ़लहुँ। मैथिली गजल कत्तऽ सँ कत्तऽ चलि गेलैक आ ओ अपन आलेखमे मात्र अपन जानल-पहिचानल लोकक चर्च कएने छथि। जेना मैथिलीमे मठक परम्परा रहल अछि। (स्पष्टीकरण- श्रीमान्, प्रेमर्षि जी ओहि आलेखमे ई स्पष्ट लिखने छथि जे किनको नाम जे छुटि गेल छन्हि तँ से मात्र आलेखक लेखकक जानकारी नहि रहबाक द्वारे, एहिमे आन कोनो कारण नहि देखल जाय। अहाँसँ एहि विषयपर विस्तृत आलेख सादर आमंत्रित अछि।-सम्पादक) ७१.श्री मंत्रेश्वर झा- विदेह पढ़ल आ संगहि अहाँक मैगनम ओपस कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक सेहो, अति उत्तम। मैथिलीक लेल कएल जा रहल अहाँक समस्त कार्य अतुलनीय अछि। ७२. श्री हरेकृष्ण झा- कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक मैथिलीमे अपन तरहक एकमात्र ग्रन्थ अछि, एहिमे लेखकक समग्र दृष्टि आ रचना कौशल देखबामे आएल जे लेखकक फील्डवर्कसँ जुड़ल रहबाक कारणसँ अछि। ७३.श्री सुकान्त सोम- कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक मे  समाजक इतिहास आ वर्तमानसँ अहाँक जुड़ाव बड्ड नीक लागल, अहाँ एहि क्षेत्रमे आर आगाँ काज करब से आशा अछि। ७४.प्रोफेसर मदन मिश्र- कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक सन किताब मैथिलीमे पहिले अछि आ एतेक विशाल संग्रहपर शोध कएल जा सकैत अछि। भविष्यक लेल शुभकामना। ७५.प्रोफेसर कमला चौधरी- मैथिलीमे कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक सन पोथी आबए जे गुण आ रूप दुनूमे निस्सन होअए, से बहुत दिनसँ आकांक्षा छल, ओ आब जा कऽ पूर्ण भेल। पोथी एक हाथसँ दोसर हाथ घुमि रहल अछि, एहिना आगाँ सेहो अहाँसँ आशा अछि। ७६.श्री उदय चन्द्र झा "विनोद": गजेन्द्रजी, अहाँ जतेक काज कएलहुँ अछि से मैथिलीमे आइ धरि कियो नहि कएने छल। शुभकामना। अहाँकेँ एखन बहुत काज आर करबाक अछि। ७७.श्री कृष्ण कुमार कश्यप: गजेन्द्र ठाकुरजी, अहाँसँ भेँट एकटा स्मरणीय क्षण बनि गेल। अहाँ जतेक काज एहि बएसमे कऽ गेल छी ताहिसँ हजार गुणा आर बेशीक आशा अछि। ७८.श्री मणिकान्त दास: अहाँक मैथिलीक कार्यक प्रशंसा लेल शब्द नहि भेटैत अछि। अहाँक कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक सम्पूर्ण रूपेँ पढ़ि गेलहुँ। त्वञ्चाहञ्च बड्ड नीक लागल। ७९. श्री हीरेन्द्र कुमार झा- विदेह ई-पत्रिकाक सभ अंक ई-पत्रसँ भेटैत रहैत अछि। मैथिलीक ई-पत्रिका छैक एहि बातक गर्व होइत अछि। अहाँ आ अहाँक सभ सहयोगीकेँ हार्दिक शुभकामना। विदेह मैथिली साहित्य आन्दोलन (c)२००४-१२. सर्वाधिकार लेखकाधीन आ जतए लेखकक नाम नहि अछि ततए संपादकाधीन। विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। सह-सम्पादक: उमेश मंडल। सहायक सम्पादक: शिव कुमार झा आ मुन्नाजी (मनोज कुमार कर्ण)। भाषा-सम्पादन: नागेन्द्र कुमार झा आ पञ्जीकार विद्यानन्द झा। कला-सम्पादन: वनीता कुमारी आ रश्मि रेखा सिन्हा। सम्पादक-शोध-अन्वेषण: डॉ. जया वर्मा आ डॉ. राजीव कुमार वर्मा। सम्पादक- नाटक-रंगमंच-चलचित्र- बेचन ठाकुर। सम्पादक- सूचना-सम्पर्क-समाद- पूनम मंडल आ प्रियंका झा। सम्पादक- अनुवाद विभाग- विनीत उत्पल। रचनाकार अपन मौलिक आ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि) ggajendra@videha.com केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx, .rtf वा .txt फॉर्मेटमे पठा सकैत छथि। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेताह, से आशा करैत छी। रचनाक अंतमे टाइप रहय, जे ई रचना मौलिक अछि, आ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। मेल प्राप्त होयबाक बाद यथासंभव शीघ्र ( सात दिनक भीतर) एकर प्रकाशनक अंकक सूचना देल जायत। ’विदेह' प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका अछि आ एहिमे मैथिली, संस्कृत आ अंग्रेजीमे मिथिला आ मैथिलीसँ संबंधित रचना प्रकाशित कएल जाइत अछि। एहि ई पत्रिकाकेँ श्रीमति लक्ष्मी ठाकुर द्वारा मासक ०१ आ १५ तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि। (c) 2004-12 सर्वाधिकार सुरक्षित। विदेहमे प्रकाशित सभटा रचना आ आर्काइवक सर्वाधिकार रचनाकार आ संग्रहकर्त्ताक लगमे छन्हि। रचनाक अनुवाद आ पुनः प्रकाशन किंवा आर्काइवक उपयोगक अधिकार किनबाक हेतु ggajendra@videha.co.in पर संपर्क करू। एहि साइटकेँ प्रीति झा ठाकुर, मधूलिका चौधरी आ रश्मि प्रिया द्वारा डिजाइन कएल गेल। सिद्धिरस्तु वि दे ह विदेह Videha বিদেহ  विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका Videha Ist Maithili Fortnightly ejournal  विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका 'विदेह' १०५ म अंक ०१ मइ २०१२ (वर्ष ५ मास ५३ अंक १०५) मानुषीमिह संस्कृताम् ISSN 2229-547X VIDEHA वि दे ह विदेह Videha বিদেহ  विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका Videha Ist Maithili Fortnightly e Magazine  विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई 'विदेह' १०५ म अंक ०१ मइ २०१२ (वर्ष ५ मास ५३ अंक १०५) मानुषीमिह संस्कृताम् ISSN 2229-547X VIDEHA