VIDEHA — Issue 106 / अंक १०६

Publication: VIDEHA · Issue: 106
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350 349 ISSN 2229-547X VIDEHA 'विदेह' १०६ म अंक १५ मइ २०१२ (वर्ष ५ मास ५३ अंक १०६) वि  दे  ह विदेह Videha বিদেহ http://www.videha.co.in  विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका Videha Ist Maithili Fortnightly ejournal  नव अंक देखबाक लेल पृष्ठ सभकेँ रिफ्रेश कए देखू। Always refresh the pages for viewing new issue of VIDEHA. Read in your own script Roman(Eng)Gujarati Bangla Oriya Gurmukhi Telugu Tamil Kannada Malayalam Hindi ऐ अंकमे अछि:- १. संपादकीय संदेश २. गद्य २.१.१.जगदीश प्रसाद मण्‍डल-गतांशसँ आगू-दीर्घकथा- फाँसी२.शि‍व कुमार झा ‘टि‍ल्‍लू’-इन्‍द्रधनुषी अकासमे सामाजि‍क वि‍मर्श २.२.सुजीत कुमार झा-कथा-केहन सजाय? २.३.सत्यनारायण झा-डायरी २.४.अतुलेश्वर-मिथिला राज्य आन्दोलन आ शहीद रञ्जु झा २.५.चंदन कुमार झा-विहनि-कथा-सद्गति २.६.डॉ. कैलाश कुमार मि‍श्र- कथा- चन्‍दा २.७.सन्दीप कुमार साफी-विहनि कथा-अन्ध विश्वास २.८.किशन कारीगर-आब हम जबान भऽ गेलहुँ-(हास्य कथा) ३. पद्य ३.१.१.सन्दीप कुमार साफी २.शि‍वकुमार झा ‘टि‍ल्‍लू‘३. श्यामल सुमन ४.जगदीश प्रसाद मण्‍डल ३.२.१.डॉ॰ शशिधर कुमर “विदेह”२.रामवि‍लास साहु ३.३.१.जगदीश चन्द्र ठाकुर अनिल २.जवाहरलाल कश्यप३.उमेश पासवान ३.४.१.अयोध्यानाथ चौधरी २.ओमप्रकाश झा ३.५.रवि भूषण पाठक ३.६.चंदन कुमार झा ३.७.जगदानन्द झा 'मनु' ३.८.१. अमित मिश्र- गजल २.मुन्नाजी-रुबाइ ४. मिथिला कला-संगीत१.राजनाथ मिश्र (चित्रमय मिथिला) २. उमेश मण्डल (मिथिलाक वनस्पति/ मिथिलाक जीव-जन्तु/ मिथिलाक जिनगी) ५. गद्य-पद्य भारती:इप्सिता सारंगीक ओड़िया कविता- ओड़ियासँ इंग्लिश इप्सिता सारंगी द्वारा स्वयं, इंग्लिशसँँ मैथिली गजेन्द्र ठाकुर द्वारा ६.बालानां कृते-१.जगदीश चंद्र ठाकुर ‘अनिल’ २.डॉ॰ शशिधर कुमर “विदेह” ७. भाषापाक रचना-लेखन -[मानक मैथिली], [विदेहक मैथिली-अंग्रेजी आ अंग्रेजी मैथिली कोष (इंटरनेटपर पहिल बेर सर्च-डिक्शनरी) एम.एस. एस.क्यू.एल. सर्वर आधारित -Based on ms-sql server Maithili-English and English-Maithili Dictionary.] विदेह ई-पत्रिकाक सभटा पुरान अंक ( ब्रेल, तिरहुता आ देवनागरी मे ) पी.डी.एफ. डाउनलोडक लेल नीचाँक लिंकपर उपलब्ध अछि। All the old issues of Videha e journal ( in Braille, Tirhuta and Devanagari versions ) are available for pdf download at the following link. विदेह ई-पत्रिकाक सभटा पुरान अंक ब्रेल, तिरहुता आ देवनागरी रूपमे Videha e journal's all old issues in Braille Tirhuta and Devanagari versions विदेह ई-पत्रिकाक पहिल ५० अंक

विदेह ई-पत्रिकाक ५०म सँ आगाँक अंक विदेह आर.एस.एस.फीड। "विदेह" ई-पत्रिका ई-पत्रसँ प्राप्त करू। अपन मित्रकेँ विदेहक विषयमे सूचित करू। ↑ विदेह आर.एस.एस.फीड एनीमेटरकेँ अपन साइट/ ब्लॉगपर लगाऊ। ब्लॉग "लेआउट" पर "एड गाडजेट" मे "फीड" सेलेक्ट कए "फीड यू.आर.एल." मे http://www.videha.co.in/index.xml टाइप केलासँ सेहो विदेह फीड प्राप्त कए सकैत छी। गूगल रीडरमे पढ़बा लेल http://reader.google.com/ पर जा कऽ Add a  Subscription बटन क्लिक करू आ खाली स्थानमे http://www.videha.co.in/index.xml पेस्ट करू आ Add  बटन दबाउ। Join official Videha facebook group. Join Videha googlegroups विदेह रेडियो:मैथिली कथा-कविता आदिक पहिल पोडकास्ट साइट http://videha123radio.wordpress.com/ Videha Radio मैथिली देवनागरी वा मिथिलाक्षरमे नहि देखि/ लिखि पाबि रहल छी, (cannot see/write Maithili in Devanagari/ Mithilakshara follow links below or contact at ggajendra@videha.com) तँ एहि हेतु नीचाँक लिंक सभ पर जाऊ। संगहि विदेहक स्तंभ मैथिली भाषापाक/ रचना लेखनक नव-पुरान अंक पढ़ू। http://devanaagarii.net/ http://kaulonline.com/uninagari/  (एतए बॉक्समे ऑनलाइन देवनागरी टाइप करू, बॉक्ससँ कॉपी करू आ वर्ड डॉक्युमेन्टमे पेस्ट कए वर्ड फाइलकेँ सेव करू। विशेष जानकारीक लेल ggajendra@videha.com पर सम्पर्क करू।)(Use Firefox 4.0 (from WWW.MOZILLA.COM )/ Opera/ Safari/ Internet Explorer 8.0/ Flock 2.0/ Google Chrome for best view of 'Videha' Maithili e-journal at http://www.videha.co.in/ .) 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Thank you for voting! श्री राजदेव मण्डलक “अम्बरा” (कविता-संग्रह)  13.02% श्री बेचन ठाकुरक “बेटीक अपमान आ छीनरदेवी”(दूटा नाटक)  10.79% श्रीमती आशा मिश्रक “उचाट” (उपन्यास)  6.35% श्रीमती पन्ना झाक “अनुभूति” (कथा संग्रह)  5.08% श्री उदय नारायण सिंह “नचिकेता”क “नो एण्ट्री:मा प्रविश (नाटक)  6.03% श्री सुभाष चन्द्र यादवक “बनैत बिगड़ैत” (कथा-संग्रह)  5.08% श्रीमती वीणा कर्ण- भावनाक अस्थिपंजर (कविता संग्रह)  5.71% श्रीमती शेफालिका वर्माक “किस्त-किस्त जीवन (आत्मकथा)  7.94% श्रीमती विभा रानीक “भाग रौ आ बलचन्दा” (दूटा नाटक)  6.98% श्री महाप्रकाश-संग समय के (कविता संग्रह)  5.71% श्री तारानन्द वियोगी- प्रलय रहस्य (कविता-संग्रह)  5.4% श्री महेन्द्र मलंगियाक “छुतहा घैल” (नाटक)  7.94% श्रीमती नीता झाक “देश-काल” (कथा-संग्रह)  6.35% श्री सियाराम झा "सरस"क थोड़े आगि थोड़े पानि (गजल संग्रह)  6.67% Other:  0.95% ऐ बेर बाल साहित्य पुरस्कार(२०१२) [साहित्य अकादेमी, दिल्ली]क लेल अहाँक नजरिमे कोन मूल मैथिली पोथी उपयुक्त अछि ? श्री जगदीश प्रसाद मण्डल जीक “तरेगन”(बाल-प्रेरक कथा संग्रह)  50% श्री जीवकांत - खिखिरक बिअरि  25% श्री मुरलीधर झाक “पिलपिलहा गाछ  23.53% Other:  1.47% ऐ बेर युवा पुरस्कार(२०१२)[साहित्य अकादेमी, दिल्ली]क लेल अहाँक नजरिमे कोन कोन लेखक उपयुक्त छथि ? श्रीमती ज्योति सुनीत चौधरीक “अर्चिस” (कविता संग्रह)  23.15% श्री विनीत उत्पलक “हम पुछैत छी” (कविता संग्रह)  7.41% श्रीमती कामिनीक “समयसँ सम्वाद करैत”, (कविता संग्रह)  6.48% श्री प्रवीण काश्यपक “विषदन्ती वरमाल कालक रति” (कविता संग्रह)  4.63% श्री आशीष अनचिन्हारक "अनचिन्हार आखर"(गजल संग्रह)  25% श्री अरुणाभ सौरभक “एतबे टा नहि” (कविता संग्रह)  6.48% श्री दिलीप कुमार झा "लूटन"क जगले रहबै (कविता संग्रह)  8.33% श्री आदि यायावरक “भोथर पेंसिलसँ लिखल” (कथा संग्रह)  4.63% श्री उमेश मण्डलक “निश्तुकी” (कविता संग्रह)  12.04% Other:  1.85% ऐ बेर अनुवाद पुरस्कार (२०१३) [साहित्य अकादेमी, दिल्ली]क लेल अहाँक नजरिमे के उपयुक्त छथि? Thank you for voting! श्री नरेश कुमार विकल "ययाति" (मराठी उपन्यास श्री विष्णु सखाराम खाण्डेकर)  35.23% श्री महेन्द्र नारायण राम "कार्मेलीन" (कोंकणी उपन्यास श्री दामोदर मावजो)  13.64% श्री देवेन्द्र झा "अनुभव"(बांग्ला उपन्यास श्री दिव्येन्दु पालित)  11.36% श्रीमती मेनका मल्लिक "देश आ अन्य कविता सभ" (नेपालीक अनुवाद मूल- रेमिका थापा)  14.77% श्री कृष्ण कुमार कश्यप आ श्रीमती शशिबाला- मैथिली गीतगोविन्द ( जयदेव संस्कृत)  11.36% श्री रामनारायण सिंह "मलाहिन" (श्री तकषी शिवशंकर पिल्लैक मलयाली उपन्यास)  12.5% Other:  1.14% फेलो पुरस्कार-समग्र योगदान २०१२-१३ : समानान्तर साहित्य अकादेमी, दिल्ली Thank you for voting! श्री राजनन्दन लाल दास  52.94% श्री डॉ. अमरेन्द्र  25% श्री चन्द्रभानु सिंह  20.59% Other:  1.47% 1.संपादकीय १ जगदीश प्रसाद मण्डल- एकटा बायोग्राफी...गजेन्द्र ठाकुर द्वारा ........शीघ्र जगदीश प्रसाद मण्डल बी.ए. पार्ट-1 केलनि आ करि‍ते १९६७ ईस्‍वीक आम चुनाव आएल। जहि‍ना काग्रेस पार्टी जन-समूहसँ हटि कि‍छु खास जाति‍क पार्टी बनि‍ रहल छल तहि‍ना आनो-आन पार्टीक स्‍थि‍ति‍ छलैक। कम्‍युनि‍स्‍ट पार्टी ि‍कछु क्षेत्रमे मजगूत छल मुदा झंझारपुर इलाकामे कमजोर छलैक। मुदा तैयो जोर-सोरसँ पकड़ि‍ रहल छल। काग्रेसक प्रति‍ लोकक आक्रोश बढ़ि‍ रहल छल। सरकार वि‍रोधी (काग्रेस सरकार) हवा बनि‍ रहल छल। कारणो छलैक, स्‍वतंत्रता आन्‍दोलनमे स्‍वतंत्र देशक जे आकांक्षा होइत ओ तँ छलैहे मुदा ओकर पूर्तिक कोनो उपाए नै भेल। संगे-संग काग्रेस पाटी जनसमूहक संग छोड़ि‍ परि‍वार वि‍शेष वा जाति‍-वि‍शेषमे समटा चुकल छल। ग्रामीण समाजमे स्‍वतंत्रताक कोनो लाभ स्‍पष्‍ट रूपे सोझा नै आएल। कि‍सान प्रधान मि‍थि‍लांचलकेँ आजादी पूर्वेक स्‍थि‍ति‍ बनल रहल। ओना देशेमे पंजाबक कि‍सानक स्‍थि‍ति‍ सुधरि‍ गेल। कारण ओइठामक सरकार कृषिकेँ प्रमुखतासँ पकड़ि‍ पानि‍-बि‍जलीक बेवस्‍था कऽ लेलक। पानि‍ आ बि‍जली, कृषि लेल दुनू साधन प्रमुख अछि। से बि‍हार (मि‍थि‍लांचल)मे नै भेल। शि‍क्षा-बेवस्‍थामे सेहो जेहेन हेबाक चाही सेहो नै भेल। संग-संग आरो बहुत कारण भेल। जइसँ वि‍द्यार्थीक बीच आक्रोश सेहो बढ़ल। राजनीति‍क चेतना बढ़ने जगौनि‍हारोक संख्‍या बढ़ल। मुदा अपनेमे लड़ने-झगड़ने सभ वि‍रोधी पार्टीक स्‍थि‍ति‍ सेहो खराबे। नव चेतनाक संग वि‍रोधी (काग्रेस वि‍रोधी) सभ राजनीति‍क पार्टी एक मंचपर आएल। अंग्रेजि‍ये शासन जकाँ काग्रेसो शासनक वि‍रूद्ध लोक उठि‍ कऽ ठाढ़ भेल। ओना देशेक मुदा बि‍हारक तँ कहले जेतइ जे स्‍वतंत्रताक उपरान्‍त पहि‍ल जन-जागरण छल। सभ पार्टीकेँ एक मंचपर एने कोनो नि‍श्चि‍त कार्यक्रम बनब असंभव छल कारण एते जल्‍दि‍बाजीमे भइये कि‍ सकैए। तखन तँ आम-चुनाव पीठपर अछि‍ तँए सरकार बदलैक कार्यक्रम बनल। कि‍सान-बोनि‍हारक संग बुद्धि‍जीवि‍यो मैदानमे उतरलाह। कांग्रेस वि‍रोधीक नीक हवा बनल। अपन मधुबनी जि‍लामे अखन दूटा पार्लियामेंट क्षेत्र अछि‍, तइदि‍न दरभंगे जि‍ला छल। दुनू क्षेत्रमे काग्रेस हारल। हारबे नै कएल वोटोक प्रति‍शत बहुत नि‍च्‍चा उतरल। एकसूत्री कार्यक्रम, कांग्रेस हटाउ, रहने काेनो राज्‍यमे एक पार्टीक सरकार नै बनल। खि‍चड़ि‍ये सरकार बि‍हारो, बंगालो, उत्तरोप्रदेश आ आनो-आन राज्‍यमे बनल। समस्‍यासँ ग्रसि‍त राज्‍य सभ छलैहे, कि‍महरसँ समस्‍या पकड़ल जाए, मुख्‍य समस्‍या छल। तइबीच चतरल-गछगर भूदानो आन्‍दोलन उधि‍आए लगल। मुदा तैयो कि‍छुु गोटे भूदानसँ राजनीति‍क मंचपर एलाह। भूदानकेँ आन्‍दोलनक रूपमे ठाढ़ कएल गेल। ओना तेलांगनाक भूमि‍ आन्‍दोलन चरमपर छल। जमीनक छअम भाग (छठा हि‍स्‍सा दान दिअ) हि‍स्‍सा मंगैक अभि‍यान शुरू भेल। लोक लाखक-लाख बीघा दान देलनि‍। सबहक अनुमान भेलनि‍ जे देशक छअम हि‍स्‍सा गरीबोक बीच आओत। कोनो गाम दू प्रति‍शतसँ लऽ कऽ पनरह बीस प्रति‍शत तकक जमीन घर-घराड़ीमे लगै छै। तइठाम छअम हि‍स्‍सा सोलह प्रति‍शतसँ ऊपर, जमीनक आमद-खर्च दुनू भऽ गेल। भलहिं आइयो, २०१२ ई.मे ढेरो परि‍वार एहन अछि‍ जेकरा चारि‍ डि‍समि‍ल जमीन नै छैक जे घरो बना सकत। जहि‍ना हवामे उधि‍आइत भूदान आन्‍दोलन आएल आ गेल तेकर ओत्ते प्रभाव नै पड़ल जत्ते गामक एकटा गृह-उद्योग समाप्‍त भेने भऽ गेल। खादी-भंडारक माध्‍यमसँ कारोबार चलैत छल, तइमे तेना कऽ मुसहनि‍ लागल जे अन्न-माटि‍ दुनू एकबट्ट भऽ गेल। जेहने दाना अन्न तेहने मुसहनि‍क माटि‍, केना बेराओल जाएत। ओना अखनो कि‍छु गोटे भूदानी जमीन पाबि‍ खुशहालीक जि‍नगी बनौने छथि‍ तहि‍ना कपड़ोक (खादी) कारोबार चलैए, मुदा नगण्‍य रूपमे। जहि‍ना लूटमे चरखा नफा कहल जाइ छैक तहि‍ना चरखोक नफा सठि‍ रहल छल। मुदा अखनो बुनि‍यादी समस्‍याक भीड़ कि‍यो जाए नै चाहैत अछि‍। ओहन समाजो नै बनि‍ सकल अछि‍। ओना समाजो केना बनत, दुरूस्‍त केनि‍हारसँ बेसी भङठेनि‍हारे अछि‍। बेरोजगारोक संख्‍या कम नै छैक मुदा ओहनो बेरोजगार तँ अछि‍ये जेकरा मोटर साइकि‍ल, होटल, मोबाइल होइत कपड़ा-लत्ता, भोजन-छाजन सहि‍त बीस हजार रूपैआ महीनाक जि‍नगी बनि‍ गेल अछि‍। तैंतीस सूत्री कार्यक्रम लऽ कऽ मि‍लल-जुलल सरकार बनल। मैट्रि‍कक परीक्षामे अंग्रेजी भाषाकेँ कमजोर कएल गेल संग-संग हाइ स्‍कूल तकक शि‍क्षा फ्री करैक अावाज उठल। १९५७ ई.क बाद अंग्रेजी शि‍क्षा आगू बढ़ल। जइ अंग्रेजीक पढ़ाइ आठमा (हाइ स्‍कूल) सँ शुरू होइत छल ओ मि‍ड्ल स्‍कूलमे प्रवेश कऽ गेल। छठासँ पढ़ाइ शुरू भऽ गेल। घीच-तीड़‍ कऽ अठारह महीना सरकार चलल। फेर मध्‍याबद्धि‍ चुनाव भेल। मुदा पहि‍लुका खि‍चड़ी, जे सोलहन्नी घीसँ अलग छल, ऐबेर घी-खि‍चड़ी सरकार बनल। समस्‍या-समाधानक प्रति‍ ओते नै भेलै मुदा जन-जागरण जरूर भेलै। तइ बीच हरि‍तक्रान्‍ति‍ कृषि‍मे सेहो भेल। कतौ-कतौ तँ एहेन भेल जे जइ खेतमे पाँच सेर कट्ठा होइत छल ओ क्‍वीन्‍टल कट्ठा उपजए लगल। मुदा अपना ऐठामक जमीनक ईहो दुभाग्‍य रहल जे खेतबला नोकरी-चाकरी करए शहरसँ वि‍देश धरि‍ पहुँचि‍ गेलाह, मुदा खेत तँ गामेमे रहि‍ गेलनि‍। बटाइक एहेन बेवहार जे बटेदारकेँ लाभ नै होइत। पाइ-कौड़ी कमेने संस्‍कारो तेज भेलनि‍। अभावमे लोक खेत बेचैए आकि‍ पाइयो-कौड़ी रहने लोक बेचत। पड़ले रहत। मुदा बेचि‍ कऽ बाप-दादाक नाक केना कटाएब! तइ संग सरकारी कार्यालय कागजी झंझटि‍क अड्डा बनल अछि‍। मि‍थि‍लांचलक एक-एक समस्‍या मि‍थि‍लावासीक छि‍यनि‍। अखनो बच्‍चा सबहक स्‍कूलमे ऐ ढंगसँ मारल-पीटल जाइ छै जे ओ स्‍कूल छोड़ि‍ दैत अछि‍। एक्कैसम शताब्‍दीमे जँ अठारहम सदीक बेवहार चलत तँ ओइसँ समुचि‍त लाभक आशा नै कएल जा सकैए। जगदीश प्रसाद मण्डल १९६७ ई.क चुनावी दौड़मे जनवरी १९६७ ई.मे भारतीय कम्‍युनि‍स्ट पार्टीक सदस्‍य बनला। चुनावो पीठेपर रहै, मधेपुरोसँ काग्रेस पार्टी हारल। गाम-समाजसँ लऽ कऽ देशक राजनीति‍ तकमे अराजक स्‍थि‍ति‍ बनए लगलै। १९५७ ई.क केरलक वामपंथी सरकार तोड़ैमे सरकारक साख खसल। स्‍वतंत्रता सेनानि‍योक (आजादीक लड़ाइ लड़नि‍हारोक)क संख्‍यामे बहुत कमी नहि‍ये भेल छल। कि‍छु प्रखर नेता जरूर मरि‍ गेल छलाह। राजनीति‍क क्षेत्रमे भाइ-भातिज आ जाति‍वाद, सम्‍प्रदायवाद, दल-बदल इत्यादि जोर मारलक। नेतृत्‍वक साख सेहो घटल। जाति‍वाद रूपमे जतऽ जनताक साख नेतृत्‍वक नजरि‍मे गि‍रल ततऽ कोनो पार्टीक वि‍धायक सांसद कोनो कुरता-धोती पहीरि‍-पहीरि‍ लोकक बीच अबए लगलाह। बड़का नेताक संग छोटकाक बलि‍ चढ़ए लगल कि‍एक तँ जाति‍, कुटुम्‍ब, गौआँ, पड़ोसी, लेन-देन ओकर आधार बनल। बि‍हारोक राजनीति‍ जटा-जटीनक नाच जकाँ झि‍लहोरि‍ खेलए लागल। प्रशासनो लाभ उठौलक। वोटक पार्टीकेँ बि‍नु वोटक पार्टी दबा-दबा शासन पकड़ए लागल। एक तँ ग्राम-पंचायत सि‍नेमा पोस्‍टर जकाँ नाम गाम छल, जेकरा मजगूत करब सभसँ अहं मुदा देशक छल जेकरा आरो कमजोर बना सरकारी तंत्रक हाथमे समेटि‍ कऽ राखि‍ देल गेल छल। कोट-कचहरीक चलती आबि‍ गेल। केन नै अबैत एक दि‍स‍ हारल मुखि‍या मुखि‍या, हारल आरो-आरो सत्तासीन हुअए लगल आ जनताक प्रति‍नि‍धि‍ सड़कपर रहि‍ गेल। जमीनदार-सामंत घसाइत-घसाइत घसा गेल, गाम-गामक ओकर जमीन गौआँक अखड़ाहा बनि‍ गेल। जेकर लाठी, तेकर भैंसक स्‍थि‍ति‍ बनि‍ गेल। वि‍चारधारक बीच राजनीति‍क पार्टीक बीच सेहो उठा-पटक हुअए लागल। मोटा-मोटी सामाजि‍क, आर्थिक, बौद्धि‍क, राजनीति‍क सभ मंचपर वैचारि‍क संघर्षक संग सामाजि‍क-आर्थिक सेहो हुअए लागल। जेकर परि‍णाम इन्‍दि‍रा जीक नेतृत्‍वकालमे स्‍पष्‍ट भऽ गेल। आजादीक बाद कांग्रेसक बीच पहि‍ल वैचारि‍क लड़ाइ छल। गाम-गाममे सेहो पुरोहि‍तवादकेँ धक्का लागल। जति‍या आगू पति‍या नै लगै छै, ि‍नर्णायक भेल। मुदा जइ रूपमे आर्थिक शोषण होइत छल तइमे कमी नै भेल। जाति‍मे कि‍छु बदलाव आएल मुदा बेवहारि‍क पक्ष ठामक ठामहि‍ रहि‍ गेल। कतबो ठामक-ठामे रहल तैयो बेवस्‍थाक वि‍रोधमे कि‍छु ने कि‍छु लाभ भेबे कएल। कारणो भेल, हो-हामे काज तँ शुरू भेल मुदा पोथी-पत्राक भाषा तँ संस्‍कृते रहए। पढ़नि‍हारोक संख्‍या कम आ बुझि‍नि‍हारक तँ सहजहि‍ नै। मुदा तैयो कि‍छु ने कि‍छु चक-चूक चलि‍ते रहल। कतौ ओम लऽ कऽ मारि‍-पीटि‍ तँ कतौ कि‍छु। जहि‍ना पोथी-पतराक दशा भेल तहि‍ना राजनीति‍क मंचपर गाँधीवादक दशा भेलनि‍। एक्के बात एक्के पाँति‍क व्‍याख्‍या जते-मुँह तते रंगक हुअए लगल। जरूरत अछि‍, जरूरत अछि‍ जे ऐ समस्‍याक समाधान मजगूतीसँ कएल जाए। नै तँ मूड़न आ सराधक भोजमे कोनो भेद नै रहत। शि‍क्षा-संस्‍थान आरो एकटा अड्डा बनि‍ गेल। कोनो तरहक प्रति‍बंध नै। वएह कओलेजमे गाँधीवादी सि‍द्धान्‍तो पढ़ौता आ फील्‍डमे आबि‍ खि‍ल्‍लि‍यो उड़ौताह। आ वि‍धानसभा संसदमे बि‍केबो करताह। एहेन खेल धड़ल्‍लेसँ भेल। मुदा एकटा जरूर भेल जे जहि‍ना १९४२ई.क अंगेज वि‍रोधी हवा पैदा केलक। तहि‍ना १९६७ ई.क हवा सेहो केलक। एक दि‍स रौदीक मारल कि‍सान, सामंत-पूँजीपति‍क बीच वि‍वाद, जाति‍-जाति‍क आ वर्ग-जाति‍क बीचक दूरी जोतल खेत जकाँ चौकि‍या कऽ एकबट्ट भऽ गेल। मुदा सोलहन्नी नै भेल। ओना कोसीक पुल (नेपाल फाटक सहि‍त) बनल, कोसी नहरि‍मे हाथ लागल मुदा की लाभ भेल, देखि‍ते छि‍ऐ। जइ तरहक हलचल कओलेज आ हायर शि‍क्षण संस्‍थानमे भेल तइ तरहक हलचल हाइ स्‍कूलमे नै भेल। मि‍ड्ल स्‍कूलक तँ चर्चे नै। जे युनि‍वर्सिटीक सर्वोच्‍च पद (भी.सी) वि‍द्वत मंडलीक बीच छल ओ प्रशासनि‍क अफसरक हाथ जाए लगल। केना ने जाइत, वि‍द्वता आ प्रशासनमे तँ कि‍छु बेवहारि‍क अंतर अछि‍ये। कोनो कारगर नि‍अमो नै लगौल जा सकैए। कि‍छु सरकारी कओलेज तँ कि‍छु गैर सरकारी। कि‍छु बनि‍ते तँ कि‍छु बनैक वि‍चारे करैत। एहना स्‍थि‍ति‍मे नि‍अममे मजगूती केना आओत। उपरका धार नि‍च्‍चा दि‍स बहल। वि‍द्यार्थियो जे साल भरि‍ नेतागि‍री केलनि‍ ओ परीक्षा केना पास करताह। तहू ले तँ कानूनेक जरूरति‍। हूड़ उठल आ एक्के-दुइये कि‍छु कओलेज छोड़ि‍ परीक्षामे चाेरी शुरू भेल। काॅपी जँचनि‍हारोकेँ अगहन हाथ लगलनि‍। कतेक कंठी शि‍क्षकक बीच टुटल। पाइ हाथ लगने शहर दि‍स सेहो बढ़लाह। मुदा कि‍छु होउ, कि‍छु कमजोर लोकक वि‍द्यार्थीकेँ जरूर लाभ भेलनि‍। ओना जते हेबाक चाही से नै भेलनि‍। रंग-बि‍रंगक प्राइवेट कओलेज कागजेपर उठि‍ कऽ ठाढ़ भेल। कागजेपर पढ़ाइ कागजेपर परीक्षा आ कागजेक डि‍ग्री बि‍काए लागल। जइसँ बुनि‍यादी समस्‍या छुटि‍ गेल। ने मेडि‍कल कओलेज बढ़ल आ ने इंजीनि‍यरि‍ंग, ने इंजीनि‍यर ने कारखाना। ने टेकनीकल कओलेज बढ़ल आ ने कुशल कारीगरक ि‍नर्माण भेल। ने एग्रीकल्‍चर कओलेज बढ़ल आ ने कुशल कि‍सान बढ़ल। उत्तर-दछि‍न बि‍हारक संबंधसँ ऐठामक (मि‍थि‍लांचल) पढ़ल-लि‍खलकेँ दछि‍न बि‍हारमे नोकरी भेटलनि‍। बहुत गोटे घरो-अंगना बना लेलनि‍, मुदा दुनू राज्‍यकेँ वि‍भाजि‍त भेने भाषाक सीमाबंदी भेल। ओना जेहन एकरंगाह भाषा मि‍थि‍लांचलक अछि‍ ओहन दछि‍न बि‍हारक नै अछि‍। कारणो अछि‍ जे जखन कल-कारखाना अछि‍ये नै तखन कोन नोकरी पाबए आन राजक लोक औताह। तँए भाषामे कोनो धक्का नै लागल अछि‍। हि‍न्‍दी आनर्सक संग बी.ए. पास केलन्हि जगदीश प्रसाद मण्डल, १९६९-७१ ई.क बैचमे सी.एम. कओलेजमे नाओं लि‍खेलन्हि। पढ़ाइक स्‍तर सेहो कमि‍ चुकल छल। प्रोफेसर आ वि‍द्यार्थीक बीचक संबंधमे जबरदस्‍त धक्का लागल। जइसँ शि‍क्षकक प्रति‍ष्‍ठामे कमी आबि‍ रहल छल। नीक शि‍क्षक अपन मुँह बन्न कऽ अपन प्रति‍ष्‍ठा बचबैमे लगि‍ गेलाह। आक्रोश शि‍क्षकोक बीच बढ़बे कएल। पाइ-कौड़ीक लेन-देन आ पैरबी-पैगाम खूब बढ़ल। जाति‍ आधारि‍त छात्र-शि‍क्षकक बीच संबंध बढ़ल तँ दोसर दि‍स (आन-जाति‍क) संबंधमे कमि‍यो भेल। ओना तँ सभ क्‍लासक मुदा एम.ए.क परीक्षा तीन साल पछुआएल रहए। क्‍लास सम्‍पन्न केलाक बाद गाम आबि‍ परीक्षाक प्रतीक्षा करए लगला। तइ बीच गाममे (बेरमा) दुर्गापूजाक वि‍चार उठल। जतऽ-ततऽ चर्चा हुअए लागल। अधि‍कांश लोक पूजाक पक्षमे रहथि‍। मुदा दुर्गापूजा तँ आन पूजा नै जे कमो जगहमे कएल जा सकैए। ऐ लेल अधि‍क जगहक जरूरति‍ होइत अछि‍। कारण जे एक तँ दस दि‍नक पूजा, तइपर दोकान-दौरी, मेला, नाच-तमाशा सेहो होइए। गौआँक सहमति‍ बनले रहै, स्‍कूलक प्रांगनमे बैसार भेलै, ओना तइसँ पहि‍नौं गौआक बैसार कते बरे भेल मुदा जते लोक ऐ बैसारमे उपस्‍थि‍त भेल ओते कहि‍यो नै भेल छल। तहि‍ना बैसारमे बजनि‍हारोक संख्‍या बढ़ल। नव पीढ़ी कान्‍ह उठौलनि‍। बैसारमे पूजा स्‍थलक चुनाव हुअए लगल। दू-तीनटा जगह ओहन भेटल जइमे दुर्गापूजा सम्‍हरि‍ सकैए। मुदा खाली जगहेटा सँ नै हुअए, दि‍न-राति‍क मेला, तँए सुरक्षो अनि‍वार्य अछि‍। तँए सुरक्षि‍त जगहक महत बढ़ल। स्‍कूलेक प्रांगनक सहमति‍ बनल। दोसर प्रश्न उठल बलि‍ प्रदानक। परोपट्टाक दुर्गापूजा दुनू ढंगक चलैत। कि‍छु ठाम बलि‍ प्रदानो होइत आ कि‍छु ठाम नहि‍यो होइत। मुदा गप आेझरा गेल। एक मतक गाममे दुनू मत पनपल। जहि‍ना बैसार एक मतसँ शुरू भेल तहि‍ना दू मतमे वि‍भाजि‍त भऽ गेल। बलि‍ प्रदानक पक्षसँ अधि‍क वि‍पक्षक। दोसर दि‍स पूजा करीब आबि‍ गेल रहैक। जँ हूसि‍ जाइत तँ साले हूसि‍ जाएत। ईहो बात सबहक मनमे रहनि‍। घमर्थन होइत-होइत बलि‍ प्रदान रूकल। मुदा वि‍वाद बढ़ि‍ये गेल। वि‍वाद बढ़ैक कारण भेल जे पंचायतक जे मुखि‍या रहथि‍, हुनकर प्रभाव अधि‍क रहनि‍। मुदा समाजोमे नव चेतना जागि‍ चुकल छल। शुरूमे (१९५२ ई.) जखन पंचायत बनल तखन जे मुखि‍या बनलाह ओ १९६२ ई.क चुनावमे हारि‍ चुकल छलाह। ओहो मतभेद रहबे करनि‍। पूजा दस-बारह दि‍न पहि‍ने एकटा जबर्दस घटना घटल। ओ घटना ई जे मौजुदा मुखि‍या कि‍छु गनन-चुनल लोकक वि‍चारसँ दोसर स्‍थानपर माने स्‍कूलक प्रांगनसँ अलग स्‍थानपर पूजाक न्‍यों लऽ लेलनि‍। समाजक बीच आक्रोश बढ़ल। मुदा आगू बढ़ैक हि‍म्‍मति‍ नै। मनमे उत्‍साह जरूर मुदा डरो। कारणो स्‍पष्‍ट छल जे इलाकाक मुड़हन लोकक समर्थन ओही स्‍थानकेँ भेट गेल। जगदीश प्रसाद मण्डल जी सभ दोहरा कऽ बैसार केलन्हि। सोझा-सोझी तँ कि‍यो वि‍रोध नै केलखिन्ह‍ मुदा खुलि‍ कऽ अबैयोले कियो तैयार नै। जबर्दस समस्‍या उठि‍ कऽ ठाढ़ भऽ गेल। ई बात सभ बुझैत जे जहि‍ना खटपट भेलोपर जहि‍ना बि‍आहक बाद समझौता भइये जाइत अछि‍ तहि‍ना ऐबेरक हूसलापर पूजोमे हेबे करत। तँए मौका हाथसँ नि‍कलने पूजे नि‍कलि‍ जाएत। बैसारमे तँइ भेल जे दोसरो पूजा हुअए। सएह भेल। संग-संग ईहो तँइ भेल जे सभ समाजसँ बाहर चंदा करए नै जाएल जाए, भलहिं जतबे चंदा हएत ततबे लऽ कऽ पूजा कएल जाए। नै पान तँ पानक डंटि‍येसँ काज चलाएल जाए। मुदा दोसर दि‍स (जइ दि‍स मुखि‍या रहथि‍) चंदाक भरमार भेल। सरकारीसँ लऽ कऽ आनो-आन पंचायतक चंदा भेल। संग-संग ईहो भेल जे गाममे बन्‍हुआ चंदा सेहो भेल। बन्‍हुआ चंदा ई जे चंदा देनि‍हारक वि‍चारसँ होइत अछि‍ नै कि‍ जबर्दस्‍ती। मुदा सेहो भेल। चंदाक नाओंपर जुरि‍मानाक रूप पकड़लक। खुलि‍ कऽ नै, चुपे-चाप। परि‍स्‍थि‍ति‍यो अनुकूले पकड़ाएल। जे आदमी झगड़ा-झंझटि‍मे ओझरा गेल अछि‍ ओ कतऽ जाएत। मुदा समाज (गाम)मे तँ कोनो बात छपि‍त नहि‍ये रहै छै। तीन-पार्टीमे समाज बँटि‍ गेल। दुनू दुर्गास्‍थानक दू पार्टी आ दुदि‍सि‍या। दुदि‍सि‍याबला सभ बन्‍हुआ चंदामे फँसलाह। पूजाक आरंभ भेल। दुनू स्‍थानक बीच कि‍छु खास-खास अंतर भेल। ओ ई भेल जे जगदीश प्रसाद मण्डल सभ गामक लोककेँ नव दोकानदारक रूपमे ठाढ़ केलन्हि। कि‍यो मि‍ठाइ तँ कि‍यो दोसर चीजक दोकान केलनि‍। समाजक चंदासँ पूजा हएत समाजेक लोक दोकान करताह तँए मेलामे बट्टी (टेक्‍स)क प्रावधान समाप्‍त कऽ देल गेल। कि‍छु गोटे ताल ठोकि‍ ठाढ़ भऽ गेलाह जे हमहूँ सभ ओहि‍ना पूजाक आयोजन करब जहि‍ना ओ सभ करताह। भलहिं चंदा नै पूरत तँ व्‍यक्‍ति‍गत रूपमे देब। एहेन करीब पान-सात गोटे भेलाह। तइ संग ईहो भेल जे सभ ओइ स्‍थान (दोसर स्‍थान) पर नै जेता। फेर दुदि‍सि‍या सभ फँसलाह। फँसबे नै केलाह जि‍महर जाथि‍ ति‍महर लोक लू-लू, थू-थू करनि‍। एमहर आबथि‍ तँ ओमहुरका आ ओमहर जाथि‍ तँ एमहुरका मुँहेँ-काने बोकि‍अबए लगलनि‍। पुरान पीढ़ीक वि‍चारकेँ धक्का लागल। नव पीढ़ीक हाथमे समाज आएल। तइ संग ईहो भेल जे बेरमाक बगलक गाम जगदरो आ कछुबि‍यो बँटा गेल। जइसँ दुनू गामक समर्थन दुनू स्‍थानकेँ भेटल। मि‍लि‍-जुली सरकार बनने हाइयो स्‍कूल प्रभावि‍त भेल। कि‍एक तँ कि‍छु स्‍कूल सरकारक नि‍यंत्रणमे आएल। मुदा सभ नै आएल। जे आएल ओकर हालतो सुधरलै आ शि‍क्षककेँ वेतनो बढ़लनि‍। मुदा जे नै आएल ओ ठामक ठामहि‍ रहि‍ गेल। जइसँ एक नव लड़ाइ शि‍क्षो वि‍भागमे शुरू भेल। सन् सैंतालीस...

भारतक स्वतंत्रताक त्रिवार्णिक झण्डा फहरा रहल छल।

मुदा कम्यूनिस्ट पार्टीक माननाइ छल जे भारत स्वतंत्र नै भेल अछि।

असली स्वतंत्रता भेटब बाँकी छै...

मिथिलाक एकटा गाम…

जन्म होइत अछि एकटा बच्चाक.. ओही बर्ख ...

ओइ स्वतंत्र वा स्वतंत्र नै भेल भारतमे...

पिताक मृत्यु...गरीबी..

केस मोकदमा...

वंचितक लेल संघर्षमे भेटलै स्वतंत्र भारतक वा स्वतंत्र नै भेल भारतक जेल....

आइ बेरमामे पाँच-दस बीघासँ पैघ जोत ककरो नै..

ओइ गाम मे आइ जीवित अछि आइयो किसानी आत्मनिर्भर संस्कृति...

पुरोहितवादपर ब्राह्मणवादक एकछत्र राज्यक जतऽ भेल समाप्ति..

संघर्षक समाप्तिक बाद जिनकर लेखन मैथिली साहित्यमे आनि देलक पुनर्जागरण...

जगदीश प्रसाद मण्डल- एकटा बायोग्राफी...गजेन्द्र ठाकुर द्वारा ........शीघ्र  ( विदेह ई पत्रिकाकेँ ५ जुलाइ २००४ सँ अखन धरि ११८ देशक १,५७० ठामसँ ७८,३४३ गोटे द्वारा ३९,०२१ विभिन्न आइ.एस.पी. सँ ३,५३,८४९ बेर देखल गेल अछि; धन्यवाद पाठकगण। - गूगल एनेलेटिक्स डेटा। ) गजेन्द्र ठाकुर ggajendra@videha.com http://www.maithililekhaksangh.com/2010/07/blog-post_3709.html २.गद्य २.१.१.जगदीश प्रसाद मण्‍डल-गतांशसँ आगू-दीर्घकथा- फाँसी२.शि‍व कुमार झा ‘टि‍ल्‍लू’-इन्‍द्रधनुषी अकासमे सामाजि‍क वि‍मर्श २.२.सुजीत कुमार झा-कथा-केहन सजाय? २.३.सत्यनारायण झा-डायरी २.४.अतुलेश्वर-मिथिला राज्य आन्दोलन आ शहीद रञ्जु झा २.५.चंदन कुमार झा-विहनि-कथा-सद्गति २.६.डॉ. कैलाश कुमार मि‍श्र- कथा- चन्‍दा २.७.सन्दीप कुमार साफी-विहनि कथा-अन्ध विश्वास २.८.किशन कारीगर-आब हम जबान भऽ गेलहुँ-(हास्य कथा) १.जगदीश प्रसाद मण्‍डल-गतांशसँ आगू-दीर्घकथा- फाँसी२.शि‍व कुमार झा ‘टि‍ल्‍लू’-इन्‍द्रधनुषी अकासमे सामाजि‍क वि‍मर्श १ जगदीश प्रसाद मण्‍डल गतांशसँ आगू दीर्घकथा- फाँसी सूर्योदय भऽ गेल। बलदेवक पत्नी कामि‍नी आ बेटा सुशील गुमसुम भेल अपन-अपन काजमे लागल, मुदा मनमे वि‍चि‍त्र स्‍थि‍ति‍ बनल रहैक। ने सुशील माएकेँ कि‍छु कहैत आ ने माए बेटाकेँ। दुनूक मनकेँ बलदेवक फाँसी भीतरे-भीतर खिंचैत रहए। जइसँ मनक पीड़ा बढ़ैत रहैक। मनक पीड़ा ताधरि‍ बढ़ैत जाधरि‍ ओकरा नि‍कालि‍ दोसरकेँ नै कहल जाइत अछि‍। तखने अकासमे एकटा कौआ बाजल। कौआक बोलमे कामि‍नीकेँ अपशगुन बूिझ पड़लनि‍, मुदा सुशीलकेँ सगुन बूझि‍ पड़ल। गुम्‍मी  तोड़ैत कामि‍नी बाजलि‍- “बौआ, कौआक बोल केहेन ओल सन भेल।” ओना बलदेवक फाँसी दुनूकेँ बुझल, मुदा तौयो मनकेँ फुसलबैत बहलबैत कामि‍नी बजलीह। माइक बेथाकेँ सुशील बूझि‍ गेल, मुदा जि‍नगीमे एहि‍ना सोग-पीड़ा अबै-जाइ छैक। छोटसँ-छोट पीड़ा होय आकि‍ पैघसँ-पैघ होय मुदा समैक संग तँ लोक ससरि‍ये जाइत अछि‍। जइसँ धीरे-धीरे कमैत-कमैत मेटा जाइत अछि‍। जहि‍ना चलैले रास्‍ता चाही, से तँ नीक कि‍ बेजाए अछि‍ये। समाज तँ ओहन समुद्र छी जइमे करोड़ो-अरबो जीव-जन्‍तु स्‍वछंद भऽ जीवन-यापन करैत रहैए, भलहिं एक-दोसराक बाटो घेरैत रहै छै, पकड़ि‍-पकड़ि‍ खेबो करै छै मुदा, तैयो तँ रहबे करैए। नीक कि‍ अधला, मनुख मनुखे बीच रहैत अछि‍। माइक पीड़ाकेँ सुशील भाँपि‍ गेल। मने-मन सोचलक जे एक तँ बेचारीकेँ जि‍नगी भरि‍क संगी छूटि‍ रहल छन्‍हि‍ तइपर जँ हमहूँ ओहने बात कहबनि‍ तँ आरो मनमे धक्का लगतनि‍। चोटपर-चोट लगने आरो अधि‍क वेदनाक अनुभव होइ छै। मुदा जहि‍ना कड़ू लगने लोक पानि‍ पीब कड़ू कम करैए तहि‍ना जे दर्द मेटबैक उपाए करब तँ दर्द आगू नै बढ़ि‍ या तँ ठमकल रहतनि‍ वा कमतनि‍। समगम होइत सुशील माएकेँ उत्तर देलक- “माए, कौआ तँ केहेन सुन्नर बाजल। कबकबाएल कहाँ?” सुशीलक बात सुनि‍ कामि‍नी बजलीह- “आन दि‍न केहेन सुन्नर भि‍नसुरका बोली नि‍कालै छलै आइ केहेन सबसबाएल बोल नि‍काललक।” माइक हृदैक वेदनाकेँ सुशील भाँपि‍ लेलक। ओना मनुष्‍यक हृदैक थाह नै छैक। एक दि‍स रूइयाक फाहा जकाँ बि‍नु हवोक उड़ैए तँ दोसर दि‍स जुआन पति‍, कमाइबला जुआन बेटाक मृत्‍यु, सेहो तँ सहबे करैए। बाट टुटल वा कटल होउ आकि‍ छोटसँ नमहर खाधि‍ होउ, लोककेँ चलैले तँ बाट चाहबे करी। एकठाम बैसलासँ तँ जि‍नगी नहि‍ये चलै छै। कोनो ने कोनो उपाए तँ करै पड़ै छैक। कतौ लोक कूदि‍ कऽ खाधि‍ पार करैत अछि‍ तँ कतौ बगलक माटि‍ काटि‍ वा छीलि‍ कऽ ओकरा पहेटि‍ चलैत अछि‍। कतौ एहनो होइ छै जे नमहर टुटान वा कटान रहै छै तँ ओकरा छोड़ि‍ दोसर बाट बना लइए। माइक पीड़ाकेँ कमैत नै देखि‍ सुशीलक मनमे उठल। एक-एक ढेपासँ सेहो बाटक खाधि‍ भरल जाइत अछि‍ आ खाधि‍क हि‍साबसँ चेकान काटि‍ सेहो भरल जा सकैत अछि‍। सुशील बाजल- “माए, हमरा तँ कौआक बोलमे सकुन बूझि‍ पड़ल। जहि‍ना ककरो कोनो वस्‍तु  हरेलासँ दुख होइ छै तहि‍ना ने भेटि‍नि‍हारकेँ खुशि‍यो होइ छै। बीचक वस्‍तु तँ एकेटा रहै छै। एक्के बात वा वस्‍तु एकक लेल नीक अछि‍ तँ दोसराक लेल अधलो भऽ जाइत अछि‍। जीवन रक्षक पति‍यो होइत अछि‍ आ बेटो होइत अछि‍। मुदा एक काज रहि‍तो दुनूक करैक वि‍धि‍मे कि‍छु-ने-कि‍छु अन्‍तर तँ भइये जाइत अछि‍। वएह अन्‍तर तँ एक-दोसराक बीच अन्‍तरो पैदा करैत अछि‍।” सुशीलक वि‍चार कामि‍नीक वि‍चारक सोझा-सोझी ठाढ़ भऽ गेल। कामि‍नीक वि‍चार ठमकलनि‍। एकाएक ठाढ़ भेने जहि‍ना शरीरमे झोंक अबैत छैक तहि‍ना कामि‍नीकेँ एलनि‍। मनमे झों लगि‍ते डोललनि‍। डोलि‍ते नजरि‍ एक दि‍स पति‍पर तँ दोसर दि‍स पुत्रपर वि‍भाजि‍त हुअए लगलनि‍। जइ छत्रछायामे अखन धरि‍ रहलौं ओ तँ टूटि‍ रहल अछि‍। मन नि‍राश हुअए लगलनि‍, मुदा लगले आगूमे पुत्र देखि‍ आशा जगलनि‍। पुत्रो तँ पति‍ये जकाँ प्रहरी होइत अछि‍। नि‍राशक मचकीमे आशाक आश लगलनि‍। हृदय सि‍हरलनि‍। सि‍हरि‍ते पुत्रक प्रति‍ प्रेम जगलनि‍। ओ प्रेम नै जे प्रेम माइक आशामे पुत्रकेँ होइत। बल्‍कि‍ ओ प्रेम जइ आशामे पुत्रक आश्रयमे माए जीबैत छथि‍। जहि‍ना जलसँ जलकण आ ओससँ ओसकण बनि‍ पुन: जल वा ओसक सृजन करैत अछ, तहि‍ना। नि‍राश मनमे खुशीक संचार भेलनि‍। संचार होइते खि‍लैत कली जकाँ मन खि‍ललनि‍। जहि‍ना खापड़ि‍मे मकै वा धानक लाबा एक्के-दुइये फुटि‍-फुटि‍ रंग बदलैत तहि‍ना मनक रंग बदलए लगलनि‍। केना लोक कहैए जे कोनो बीआक लेल अनुकूले वातावरण भेटलापर अंकुर होइ छै। अंकुरक लेल तँ वएह वातावरण अनुकूल भऽ जाइत अछि‍ जइ मूलक ओ बीआ आ बीआक गाछ होइत अछि‍। जँ से नै तँ एक दि‍स अगम पानि‍बला समुद्रमे बीआ अकुरि पनि‍गाछक जन्‍म दैत अछि‍ तँ दोसर माटि‍-पानि‍ बीच सेहो दैत अछि‍। ततबे कि‍अए? दोखरा बालुओ आ चखान भेल पाथरोमे तँ कोनो-ने-कोनो गाछक बीआ तँ अकुरिते अछि‍। जखन दुनि‍याँक सभठाम शक्‍ति‍ मौजूद अछि‍ तखन मि‍थि‍लाक भूमि‍ कि‍अए शक्‍ति‍हीन भऽ जाएत। जे बीत भरि‍क पेटक रच्‍छा नै कऽ सकैत अछि‍। जे धरती भि‍खारीकेँ भि‍क्‍क्षु बना सकैए, भोगीकेँ जोगी बना सकैए, ओ जोगीकेँ कि‍अए ने भोगी आ भि‍क्‍क्षुकेँ भि‍खारी बना सकैए। एक नव शक्‍ति‍क उदय कामि‍नीक मनमे जमि‍ चुकल छलनि‍। साैंसे धानक लाबा जकाँ मन दू फाँक भऽ गेल छलनि‍। जहि‍ना खापड़ि‍मे एक-फाँक, दू-फाँक, तीन-फाँक होइत लाबा खापड़ि‍सँ उड़ए चाहैत अछि‍, उड़बो करैत अछि‍ तहि‍ना कामि‍नीक वि‍चार उड़लनि‍। मुदा मुँहक बोल सुखा गेलनि‍। कंठक तरास बढ़ए लगलनि‍। मुदा पति‍-पुत्रक बीच चलैत धारमे अपनाकेँ पाबि‍ कामि‍नीक हृदय छटपटेलनि‍। सुशीलक आँखि‍मे आँखि गाड़ैत बजलीह- “बाउ सुशील, अहाँक पि‍ता आ अपन पति‍क तँ अंति‍म दि‍नक क्षण क्षणकि‍ रहल अछि‍। चलि‍ कऽ आइ दुनू माए-बेटा भेँट कऽ लि‍अनु?” माइक बात सुनि‍ सुशीलक मन ठमकल। ककरो मनमे फुलक वर्षा होइत अछि‍ तँ ककरो पानि‍-पाथर बनल ओला-पाथर बरसैए। मुदा जहि‍ना मरबो दुनू करैए तँ जीबो तँ करि‍ते अछि‍। भेँट करए चाइले माए कहै छथि‍ मुदा कि‍ ई उचि‍त हएत? हम सभ जेबे करब तइसँ कि‍ हुनका भेटतनि? आ हमरे सभकेँ भेटत? अस्‍ताचल गामी सूर्यक लाभ तँ ओकरे भेटैत छै जे उदीयमान अछि‍। उदीयमान नै अछि‍ ओकरा लेल तँ जेहने दि‍न तेहने राति‍, तखन अस्‍ताचलक महत्‍वे की? हुनका -पि‍ता- कि‍छु ने भेटतनि‍, भेटतनि‍ वएह जे अपना ले फाँसीपर चढ़ि‍ रहला अछि‍ आ परि‍वारक लेल। जँ परि‍वारक लेल तँ कि‍ अधले काजपर परि‍वार चलि‍ सकैए आ नीक काजपर नै चलि‍ सकैए। जँ चलि‍ सकैए तँ ओ खुद नीक बाट छोड़ि‍ अधला बाटपर चलि‍ अंति‍म दर्शन देखा रहला अछि‍। अंति‍म दर्शन की? यएह ने जे धरतीपर कनैत एलौं हँसैत जाएब आकि‍ जहि‍ना कनैत एलौं तहि‍ना कनैत जाएब, तँ कि‍ एहेन जि‍नगीकेँ सुभर जि‍नगी मानबै? कथमपि‍ नै? जखने घरसँ डेग उठाएब तखनेसँ लोक कहबो करत आ थूकबो करत जे खुनि‍या-अधरमीक बहु-बेटाकेँ देखि‍यौ? नि‍रलज जकाँ केहेन धमौड़ दैत जा रहल अछि‍। माइक प्रश्नक उत्तर दैत सुशील बाजल- “माए, कोन मुँह देखए आ देखबए जाएब। सोझ पड़लापर पि‍ता यएह ने कहता जे अहीं सभले जा रहल छी? मुदा अपना सभ कि‍ पुछबनि?” सुशीलक वि‍चार कामि‍नीक मनमे अभि‍भावकक रूपमे जगलनि‍। जहि‍ना सइयो हाथक लत्ती बि‍ना सहाराक धरतीसँ नै उठि‍ सकैत अछि‍ तहि‍ना ने नारि‍यो अछि‍। डाॅड़मे चोट मारि‍ ने वि‍धातो वि‍धि‍क रचना केलनि‍। बेटाक सहारा देखि‍ कामि‍नीक मनमे अगि‍ला जि‍नगीक आस जगले रहनि‍। वि‍ह्वल भऽ बजलीह- “बेटा, बेटा बनि‍ जँ धरतीपर आबी तँ बेटा कहबैत चली। आब तँ तोंही ने सभ कि‍छु भेलह। वैधव्‍य भेने एक आकुश मात्र लगत। मुदा आरो जि‍नगी तँ संग मि‍लि‍ चलबे करबह कि‍ ने, तोहर जे वि‍चार हेतह यएह ने हमरो वि‍चार हएत। कहुना भेलह तँ तूँ पुरुष-पात भेलह? हम कतबो हएब तँ घरे भरि‍ हएब।” माइक बात सुनि‍ सुशीलक मन पसीज गेल। अपन दायि‍त्वक भान भेलै। मुदा लगले मन मुरुछि‍ गेलै। एक दि‍स धरती सदृश नि‍श्चल माए तँ दोसर दि‍स कुकर्मी अपराधी, धरतीक पापात्मा पि‍ता देखए लगल। पि‍ताक प्रति‍ मनक उष्‍मा तेज भऽ गेलै। बाजल- “माए, परि‍वारक बड़का बोझ उतरैक दि‍न........।”‍ सुशीलक बोल बन्न भऽ गेलै। वि‍स्‍मि‍त अवस्‍थामे सुशीलकेँ देखि‍ कामि‍नी बाजलि‍- “सोग नै करह। जइ दि‍नक जे भवि‍तव्‍य छलै ओ भेलै। जहि‍ना जरल-मरल धरती आद्राक बुन्न पाबि‍ ि‍सर्फ जीवि‍ते नै सृजक सेहो बनि‍ जाइत अछि‍। तों तँ सहजे पुरुख छि‍अह। आन के केकरा कहत आ केकर के सुनत। मुदा जहि‍ना तोहर पि‍ता तहि‍ना तँ हमरो पति‍ छथि‍ये। तँए अन्‍ति‍म घड़ीमे श्रद्धापूर्वक स्‍मरण कऽ वि‍सरि‍ जाह। चलह अंगनेक ओसारपर बैस चाहो बना पीब आ गपो-सप करब। दुनि‍याँ कि‍छु कहह, मुदा तोहर मुँह देखि‍ एहेन खुशी भऽ रहल अछि‍ जे जि‍नगीमे कहि‍यो नै भेल छल।” माइक बात सुनि‍ सुशीलक मन ओहि‍ना फड़फड़ा उठल जहि‍ना आवेशी मुँहमे दुरभाखा नै छै मुदा बड़ असानो तँ नहि‍ये अछि‍। बेटाक आस भरल बात सुनि‍ कामि‍नीक हृदए पसीज गेलनि‍। बजलीह- “बौआ, आब तूँ बौआ नै बेटा भेलह। बापक काज कऽ देखि‍ परेखि‍ दुनि‍याँक संग चलैक एक सि‍पाही भेलह। परि‍वार-समाज कर्मभूमि‍ भेलह। ने अनका पढ़ने आनकेँ ज्ञान होइत आ ने अनकर ज्ञान अनका ले सबतरि‍ उचि‍ते होएत। तँए अपन समए, परि‍स्‍थि‍ति‍केँ अॅकैत परि‍वारकेँ आगू मुँहेँ ससारैक तँ भार माथपर आबि‍ये गेल छह। केहेन मनुख बनि‍ धरतीक धारण केलौं, यएह ने जि‍नगीक परीछा छी।” माए-बेटाक बीच जि‍नगी परि‍वारक गप-सपक बीच कामि‍नीक मन कखनो पति‍सँ हटि‍यो जाइत मुदा लगले पुन: आबि‍ मनकेँ पकड़ि‍ लैत। जखन मनसँ हटैत तखन अपनो हाथ-पएर नि‍हारि‍-नि‍हारि‍ देखथि‍ आ सुशीलोकेँ नि‍हारि‍-नि‍हारि‍ देखथि‍। मनमे उठलनि‍ पाँखि‍ तँ टि‍कुलि‍योकेँ होइ छै, अकासमे उड़बो करैए मुदा तँए ओ चि‍ड़ै तँ नै कहाइत। चि‍ड़ै लेल तँ पाँखि‍मे दम चाही। से कहाँ टि‍कुलीमे होइ छै। कनि‍यो कि‍छु होइ छै कि‍ पाँखि‍ टुटि‍ जाइ छै। जइसँ अकास उड़बे बन्न भऽ जाइ छै। तहि‍ना तँ अखन अपनो परि‍वार भऽ गेल अछि‍। हम उमरदार छी तँ घरसँ बहार कि‍छु करबे ने केलौं आ सुशील तँ सहजे कोनो भार बुझबे ने केलक। नै बहराइक कारणो भेल जे अपनाकेँ घरेक सीमामे रखलौं। जे उचि‍तो भेल आ अनुचि‍तो भेल। अर्द्धांगि‍नी होइक नाते जि‍नगीक सभ वृत्ति‍सँ परि‍चि‍त हेबाक चाहै छल से नै भेल। जँ से भेल रहैत तँ जरूर नीक-अधला वृत्ति‍क वि‍चार करि‍तौं। मुदा, अपसोचो केने तँ नहि‍ये कि‍छु हएत। बाजलि‍- “बेटा, जँ ऐ धरतीपर बेटा बनि‍ आबी तँ कि‍छु कऽ देखाबी। जँ से नै तँ बेटाक महत्ते की?” माइक बात सुनि‍ सुशीलक मन नव कलशल टुस्‍सा जकाँ नव रूपमे पनगल। माइक आँखि‍मे आँखि‍ गाड़ि‍ बाजल- “माए, दुनि‍याँमे सभ अपन-अपन भाग-तकदीर लऽ जि‍नगी बनबैत अछि‍। जेहेन जेकर जि‍नगी जीबैक बाट रहै छै तेहेन से भार उठा चलैत अछि‍।” सुशीलक बात सुनि‍ कामि‍नी वि‍ह्वल होइत बजलीह- “बेटा, जहि‍ना एक बेटा बनल-बनाएल परि‍वार-खनदानकेँ नाश कऽ दैत अछि‍ तहि‍ना एक बेटा बनल-बनाएल परि‍वारकेँ उठा ठाढ़ो कऽ दैत अछि‍।” जहि‍ना कल्‍पवृक्षक नि‍च्‍च बैसि‍नि‍हार बौड़ाइत रहैए तहि‍ना फाँसीपर चढ़ैत बलदेवक परि‍वारक मन बौड़ा रहल अछि‍। असमसान जाइकाल मुर्दाक पाछू कठि‍यारीबला ‘राम-नाम सत् है, सबको यही गत है।’, कहैत चलैत मुदा घुमति‍यो काल जखन कि‍ मुर्दा नै रहैत, वएह कहैत जे ‘राम नाम सत् है, सबको यही गत है।’ भलहिं मृत्‍युक आंगन आबि‍ लोह-पाथर, आगि‍ छूबि‍ बि‍सरि‍ जाइत वा छोड़ि‍ दैत। जइठाम बच्‍चासँ सि‍यान धरि‍ मंत्र जपैत तइठाम एहेन जि‍नगीक दशा कि‍एक? जहि‍ना रस्‍ता चलैत बताह कखनो रस्‍तासँ हटि‍ तँ कखनो सटि‍ ललकारो भरैत आ कखनो असथि‍र भऽ बौको बनि‍ जाइत तहि‍ना माए-बेटाक अर्थात् सुशील-कामि‍नीक मन पि‍ता-पति‍क फाँसीक कि‍छु समए पूर्व पुरबा-पछबा जकाँ रस्‍सा-कस्‍सी करैत। कामि‍नी- “बेटा, तीन गोरेक परि‍वारमे एकक अंत भऽ रहल अछि‍ तैयो तँ दू गोरे बँचलौं। तोहर बि‍आह होइते फेर तीन गोरे भइये जाएब।” माइक बात सुनि‍ सुशील बाजल- “एहि‍ना परि‍वार कम-बेसी होइत एलैए आ होइत चलतै। तइले कत्ते माथ धूनब। तखन तँ एकटा बात बुझए पड़त जे आनकेँ केकर परि‍वारक भार उठबैए, अपन परि‍वारक भार तँ अपने उठबए पड़त।” कामि‍नी- “हँ, ई तँ बेस बजलह।” सुशील- “दुखे कि‍ सुखे परि‍वारक बोझ तँ परि‍वारेक लोककेँ उठबए पड़तै।” सुशीलक बात सुनि‍ कामि‍नीक मन सहमि‍ गेलनि‍। बेटा सहजहि‍ अनाड़ि‍ये अछि‍, अपने कहि‍यो भारे ने बुझलौं। तखन.....? बकार बन्न भऽ गेलनि‍। जहि‍ना भुमकमक समए धरतीक सभ कि‍छु डोलए लगैत तहि‍ना कामि‍नीक भीतर-बाहर डोलए लगलनि‍। धारक बहैत पानि‍मे जहि‍ना पएर असथि‍रो कऽ टपैमे थरथड़ाइत तहि‍ना कामि‍नीकेँ हुअए लगलनि‍। सुशीलोक मन वि‍चलि‍त होइत मुदा मनकेँ थीर करैत बाजल- “माए, प्रश्न तँ छुटि‍ये गेल अछि‍। उत्तर कहाँ देलँह।” सुशीलक प्रश्न मन पाड़ि‍ कामि‍नी बजलीह- “अर्द्धांगि‍नी बनि‍ जइ पुरुखक संग पकड़लौं हुनका चीन्‍हि‍ नै सकलि‍यनि‍। आइ बुझै दभ्‍ जे पुरुखक भीतर सेहो, पुरुख होइ छै आ नारीक भीतर सेहो नारी होइ छै। जँ से बुझने रहि‍तौं तँ एतेक दूरी नै बनि‍ पबैत। ओना परि‍वारक भीतर अपन भार नि‍माहैमे कहि‍यो कोताही नै केलौं मुदा....। आब उपाऐ कि‍ अछि‍?” बजैत-बजैत कामि‍नी ठमकि‍ गेलीह। जहि‍ना नदी-नालाक पानि‍क बेग आगूमे बान्‍ह  पाबि‍ रूकि‍ जाइत तहि‍ना कामि‍नीकेँ भेलनि‍। सहत बेधल माछ जकाँ छटपटाए लगलीह। छटपटाइत मनमे आबए लगलनि‍, एक दि‍स तत्‍ववेत्ता तात्वि‍क चि‍न्‍तन-वि‍वेचनमे लगल रहैत अछि‍ तँ दोसर दि‍स व्‍यक्‍ति‍-व्‍यक्‍ति‍क बीच सेहो होड़ लगल अछि‍। सभ सभसँ आगू बढ़ए चाहैत अछि‍। जइसँ संगे चलब छूटि‍ जाइत अछि‍। समाज वि‍खंडि‍त भऽ जाइत अछि‍। श्रमि‍क अश्रमि‍कक बीच दि‍शा-दि‍शान्‍तरक अंतर बनि‍ जाइत अछि‍। दुनू माए-बेटा गुमसुम भेल एक-दोसराक मुँह देखैत। गुम्‍मी तोड़ि‍ सुशील बाजल- “माए, तोहर की इच्‍छा छउ?” बेटाक बात सुनि‍ कामि‍नीक मन शान्‍त भऽ गेलनि‍। पति‍क फाँसी मनसँ हटि‍ गेलनि‍। मन पाड़ि‍ बाजए लगलीह- “बेटा, बहुत दुनि‍याँ देखलौं। नाना-नानी, दादा-दादी, बाप-माए, मामा-मामी, केत्ते कहबह। पाछू उनटि‍ तकै छी तँ सभ कि‍छु देखै छी मुदा आगू तकै छी तँ तोरा छोड़ि‍ कि‍छु ने देखै छी। जहि‍ना नमहर गाछ खसि‍ रस्‍ता रोकि‍ दइए तहि‍ना आगू बूझि‍ पड़ैए।” माइक बात सुनि‍ सुशील बाजल- “माए, तोहर जे इच्‍छा छोउ, ओकरा जहाँधरि‍ भऽ सकत पूरबैक कोशि‍श करब। जे धरती छोड़ि‍ चलि‍ गेल, ओ तँ सहजे चलि‍ गेल। ओकरा संग कि‍छु थोड़बे जेतइ। मुदा जे अछि‍ ओकर तँ आशा अछि‍ये।” आशा भरल सुशीलक वि‍चारमे आस लगबैत माए बजलीह- “दुनि‍याँक खेल छि‍ऐ जे एकपर सए ठाढ़ अछि‍ आ कखनो सए सए दि‍सि‍ छि‍ड़ि‍आएल रहैए। तँए सभ कि‍छु बि‍सरि‍ जाह। बीतलाहा काल्हि‍ मन राखह आ अगि‍ला काल्हि‍ लेल हाथ-पएर उठाबह।” २ शि‍व कुमार झा ‘टि‍ल्‍लू’ इन्‍द्रधनुषी अकासमे सामाजि‍क वि‍मर्श “इंद्रधनुषी अकास” आधुनि‍क मैथि‍लीक चर्चित गद्यकार श्री जगदीश प्रसाद मण्‍डलक पहि‍ल पद्य संग्रह अछि‍‍। जगदीशजी सन् 2008सँ पूर्व मैथि‍ली साहि‍त्‍यक लेल अनचि‍न्‍ह नाओं छलाह, मुदा गत तीन-चारि‍ बरखक भीतर हि‍नक वि‍वि‍ध बि‍म्‍बक उपन्‍यास, कथा, नाटक, एकांकी, बाल गद्य साहि‍त्‍य आदि‍सँ मैथि‍ली साहि‍त्‍यकेँ उतर आधुनि‍क युगमे प्रवेशक अवसरि‍ भेट गेलनि‍। मूलत: कथाकार आ उपन्‍यासकार जगदीश प्रसाद मण्‍डल कोनो चन्‍दा झा सन प्राचीनता ओ नवीनताक सन्‍धि‍क कवि‍ नै आ ने हि‍नक रचनामे परम्‍परावादी प्रीति‍क कतहु दर्शन होइछ। भुवनेश्वर सिंह भुवन जकाँ ने जगदीश नवीन प्रगीत काव्‍यक व्‍याख्‍याता छथि‍ आ ने आरसी प्रसाद सिंह जकाँ आशु कवि‍। ९५ कवि‍ताक संग्रह “इंद्रधनुषी अकास”मे जे ई वैशि‍ष्‍ट्यता प्रमाणि‍त कएलनि‍ ओ अछि‍ सम्‍पूर्ण समाजक लेल समन्‍वयवादी दृष्‍टि‍कोणक दार्शनि‍क अवलोकन आ अर्थनीति‍क सम्‍यक वि‍श्लेषण। अनचोकेमे कवि‍ता सबहक रूपेँ हि‍नक वि‍राट सरल जीवन दर्शन प्रदर्शित होइत अछि‍। “मणि‍” वि‍षधर साँपकेँ सेहो मनोरम बना दैत जकर लोभमे सपेरा सबहक अंत भऽ जाइछ। ओ मणि‍ तँ वैज्ञानि‍क दृष्‍टि‍कोणसँ काल्‍पनि‍क थि‍क, मुदा मणि‍ कवि‍तामे कवि‍ अपन मनक मनोभावकेँ मढ़ि‍-मढ़ि‍ मणि‍’क रूप रेखाक संदेश दैत छथि‍। भाववाचक संज्ञा थि‍क-मणि‍ मुदा जाति‍ आ व्‍यक्‍ति‍क रचनाक लेल भावक आवश्‍यकता प्रासांगि‍क होइछ। जखन अर्न्‍तमनमे दि‍व्‍य ज्‍योति‍ जागत तँ तन अवश्‍य प्रज्‍जवलि‍त हएत। लक्ष्‍मी  तखने औतीह जखन कर्मपथ उज्‍ज्‍वल हएत। कर्मपथकेँ प्रकाशि‍त करबाक लेल स्‍वस्‍थ मोनक आवश्‍यक्‍ता  होइत छैक। पहि‍ने ई अवधारना छल जे स्‍वस्‍थ शरीरमे स्‍वस्‍थ मनक नि‍वास होइत छैक, मुदा आधुनि‍क वैज्ञानि‍क दृष्‍टकोणे ई मि‍थ्‍या प्रमाणि‍त भ्‍ाऽ रहलैक। व्‍यस्‍त जीवन शैलीमे मोन अस्‍थि‍र भऽ गेल छैक। बि‍नु कर्मक अधि‍क प्राप्‍ति‍क तृष्‍णासँ मनमे वि‍चलन स्‍वाभावि‍क जइसँ मोन अस्‍वस्‍थ। जखन मोन अस्‍वस्‍थ तँ शरीरक अस्‍वस्‍थ हएब कोनो अजगुत नै। ‘चि‍न्ह बि‍ना औषधि‍ भारी’ वैज्ञानि‍क दृष्‍टि‍कोणसँ अक्षरश: सत्‍य  मानल जाए। सोडि‍यम कार्बोनेट धोवि‍या सोडर थि‍क आ सोडि‍यम बाइकार्वोनेट पेटक अम्‍लीयताकेँ दूर करैत अछि‍। मात्र ‘वाइ’ शब्‍द हटलासँ जौं उलटा सेवन हएत तँ जीवन वाइ-वाइ भऽ सकैत अछि‍। मुदा सामाजि‍क जीवनमे धोवि‍यो सोडर अनि‍वार्य कि‍एक तँ मात्र पेटक अम्‍लीयता दूर कएलासँ शरीरक मोइल नै धोअल जा सकैछ। तँए जीवनमे सबहक लेल समायुसार स्‍थान देल जाए। ‘श्रेष्‍ठ जीवन मानव कहबै छै मानवता उद्देश्‍य जकर’ ऐ पॉति‍सँ रचनात्‍मक समन्‍वयवादी न्‍याय दर्शन प्रदर्शित होइत छैक। समाजक आगाँ पॉति‍क लोक जखन कात लागल वर्गकेँ मर्मािहत करैत अछि‍, तखन कातक लोक सेहो उग्रता प्रदर्शित करैत अछि‍। ऐ प्रकारक अदला-बदलाक भाव जगदीश जीक ऐ कवि‍तामे नै भेटल। ई तँ सकारात्‍मक सोचक आशावादी दार्शनि‍क जकाँ अपन कवि‍ताक इति‍ श्री करैत छथि‍- ‘मनुखक भेद वि‍भेद मेटबैक छी धर्म ओकर’ संभवत: ब्रह्माक वरद पूत सभकेँ आदर्शवादी बनबाक संदेश देलनि‍ अछि‍। ओना अलंकार मि‍लएबाक क्रममे एकठाम चूकि‍ गेल छथि‍ जखने मन मणि‍ बनत छि‍टकत ज्‍योति‍ धरतीपर अपने बाट अपने देखब हँसैत चलब पृथ्‍वीपर ऐठाम पृथ्‍वी परक स्‍थानपर ‘परतीपर’ जौं लि‍खल रहि‍तए तँ शब्‍द सामंजस्‍य भऽ सकैत छल। ओना कवि‍क दृष्‍टि‍कोण भऽ सकैत छैक जे कि‍छु आर होन्‍हि‍। गंभीर आशु काव्‍यक मान्‍यता समाप्‍त होइत मैथि‍ली साहि‍त्‍यमे वि‍चार मूलक पद्य बि‍रले भेटैत अछि‍। जीवन आ आध्‍यात्‍मक संबंध चलन्‍त समाजक बीच देखैमे आबि‍ रहल छैक। सभ दि‍श भागमभाग सोचबाक लेल फुरसत नै। मैथि‍ली साहि‍त्‍यमे छायावादक काल ि‍नर्धारण तँ नै कएल गेल अछि‍, मुदा अनचोकेमे कि‍छु साहि‍त्‍यकार ऐ काव्‍य वि‍धापर समए-समैपर रचना कऽ दैत छथि‍। ‘चल रे जीवन’ कवि‍ता आध्‍यात्‍मि‍क दर्शनसँ कर्मशील जीवनक संधि‍ करबामे पूर्णत: सफल मानल जा सकैछ। महाकवि‍ आरसीक कहब छलन्‍हि‍ जे सभ लोकमे आशुत्‍व होइत छैक मुदा लेखनीसँ अभि‍व्‍यक्‍त करबाक लेल अर्न्‍तमन आ आत्‍माक मि‍लन जि‍नकामे हएत वएह ‘आशु कवि‍’ मानल जएताह। जगदीश तँ आशुकवि‍ नै छथि‍, मुदा ‘चल रे जीवन’ हि‍नक क्षणि‍क अर्न्‍तमन आ आत्‍मीय मि‍लनक परि‍णामे आशु कवि‍ता अवश्‍य भऽ गेल। जीवनमे गति‍ सर्वाधि‍क उपयोगी आ सम्‍प्रभु-सर्वशक्‍ति‍ मान तत्‍व थि‍क। जइ वसुन्‍धराक माथपर हमर अस्‍ति‍त्‍व अछि‍ ओ कखनो ने रुकैत छथि‍। ग्रह-नक्षण सभ सदि‍खन गति‍मान, अंति‍म काल धरि‍ जीवन गति‍मान, मुइलापर प्राण गति‍मान होइत अदृश्‍य चक्रमे प्रवेश कऽ जाइत अछि‍। “यात्रीकेँ आराम कहाँ छै यात्रा पथ वि‍श्राम कहाँ छै।” जे अभागल छथि‍ ओ सुतले रहथि‍ मुदा हुनको शरीरमे क्षि‍ति‍, जल, पावक, समीर, रुधि‍रक संग सभ अंग मौलि‍क रुपसँ गति‍मान रहैत अछि‍। ‘सूर्य-तरेगन सेहो चलै छै’ वैज्ञानि‍क मान्‍यतासँ सर्वथा अनुचि‍त मानल जाइत अछि‍। सूर्य नै तँ उगैत अछि‍ आ ने डुमैत अछि‍। तँए कवि‍क एक पाॅति‍केँ मात्र उत्‍साह वर्धनक लेल कवि‍त्‍वक कि‍छु मंद वात मानल जाए। वास्‍तवि‍क रूपसँ ई असत्‍य मात्र कवि‍तेमे क्षम्‍य जौं कथा रहि‍तए तँ अप्रासंगि‍क मानल जा सकैत छल। जेना जगदीश कथामे शब्‍द समंजन कऽ लैत छथि‍ ओना कवि‍तामे कतहु-कतहु ओझरा जाइत छथि‍न्‍ह। “समए संग चल, ऋूतु संग चल गति‍ संग चल मति‍ संग चल।” सभठाम ‘संग’ उदेश्‍य आ कथोपकथनक लेल सर्वथा उचि‍त, मुदा स्‍वरात्‍मक पद्यमे कथोपकथनक संग-संग अलंकार आ छंदक सम्‍मि‍लन सेहो आवश्‍यक होइत अछि‍। ई कवि‍ता कोनो अतुकांत कवि‍ता नै तँए छंदमे आबद्घ करबाक लेल कवि‍केँ वि‍शेष धि‍यान देबाक छलनि‍। जगदीशक शब्‍द-कोषमे मैथि‍लीक खॉटी शब्‍द सभ भरल छन्‍हि‍ तँए हि‍नकासँ आर आशा कएल जा सकैत अछि‍। बाल मनोवि‍ज्ञानक दृष्‍टि‍सँ ई पद्य उपयुक्‍त मानल जाए। जे बाल आ युवावस्‍थाक संधि‍ भऽ सकैत अछि‍ कि‍एक तँ ऐ अवधि‍मे जीवनक गति‍-चक्रकेँ बूझब वि‍शेष अनि‍वार्य होइछ। ऐसँ भाषा-साहि‍त्‍य वि‍कास सेहो होइत छैक। आरसी प्रसाद सि‍ंह, सोहन लाल द्वि‍वेदी, सुमि‍त्रा नंदन पंत आ हरि‍वंश राय बच्‍चन सन हि‍न्‍दी  साहि‍त्‍यक ‘आशुकवि‍’ लोकनि‍क ऐ प्रकारक पद्य प्रारंभि‍क आ माध्‍यमि‍क शि‍क्षामे वि‍शेष लोकप्रि‍यता प्राप्‍त कएने अछि‍। “टुटए ने कहि‍यो सुर-तार हुअए ने कहि‍यो जि‍नगी बेहाल।” जखने जीवनमे गति‍ मति‍ आ नि‍यति‍क त्रि‍वेणी अलग-अलग भऽ जाइत अछि‍ तँ जीवन उदासीन आ परि‍णाम कष्‍टदायी, तँए कवि‍क ऐ उक्‍ति‍केँ वि‍चारक संग-संग शि‍क्षा मूलक सेहो मानल जाए। गति‍ बि‍नु पहि‍ने जि‍नगी अक्रि‍य फेर अकर्मण्‍यता आ परि‍णाम जि‍नगी बेहाल, अंकगणि‍तीय आधारपर दृष्‍टि‍कोणकेँ प्रमाणि‍त कएल गेल जे सर्वथा उपयुक्‍त लगैत अछि‍। जीवन जीवाक कलासँ संबंध काव्‍यमे प्राय: कवि‍ लोकनि‍ स्‍वयंकेँ नायक बना कऽ कवि‍ता लि‍खैत छथि‍। हि‍न्‍दी  साहि‍त्‍यमे जानकी वल्‍लभ शास्‍त्री आध्‍यात्‍म दर्शनक सम्‍मि‍लन- “मेरे पथ में न वि‍राम रहा” सँ कएलनि‍ तँ मैथि‍ली साहि‍त्‍यमे कालीकान्‍त झा बूच- “मृगी जकाँ हम कॉपि‍ रहल छी, झॉखुरसँ तन झॉपि‍ रहल छी” रूपेँ समाजक रुग्‍न दशासँ बचि‍ कऽ जीबए चाहैत छथि‍। मुदा जगदीश ऐ समाजक मैलकेँ साफ करबाक लेल उद्वि‍ग्‍न छथि‍। ‘धोब घाट’ कवि‍ता कोनो मैल वस्‍त्रक मूल नै, वरन समाजक कृत-कृत्‍यपर लागल कुचक्रकेँ साफ कऽ कऽ ऐ सँ वचबाक प्रेरणा थि‍क- “धोइब घाट ओ घाट छी, पाप धुआ पुन बनैत रहैत अज्ञान-ज्ञान राति‍ दि‍न रगड़ि‍ सान चढ़बैत रहैत” मैथि‍ली साहि‍त्‍यमे रीति‍क त्रि‍भाषीय नाटक, प्रीति‍क महाकाव्‍य अर्थहीन वैरागी काव्‍य शास्‍त्र कखनो वि‍नोदी, कखनो चलन्‍त कवि‍ता आ कखनो नाम-गाम आ ठामक पद्यसँ भरल पद्य संग्रहक प्रधानता अछि‍ कि‍एक तँ भलमानुस जे लि‍खत वएह कोसक पाथर मानल जाएत। तँए अभावक ऐ साहि‍त्‍यमे नीति‍शास्‍त्रसँ सन्नि‍हि‍त पद्याभावकेँ ‘धोब घाट’ सन कवि‍ता पूरा करैत अछि‍- उला-पका राति‍केँ साले साल सूर्ज सुड़कैए सुख आरामक पहर छीि‍न हँसि‍-हँसि‍ राति‍ दि‍न झाड़ैए। कोनो आवश्‍यक नै जे जाज्‍वल्‍यमान नक्षत्रक कर्मसँ नि‍कसैत प्रभावक सभटा परि‍णाम उत्तमे हएत। सूर्य ज्‍योति‍क प्रतीक छथि‍, मुदा कखनो तँ हि‍नको कि‍रण जीव-अजीवकेँ उला-पका दैत अछि‍ तत्‍पश्चात् अन्‍हार। हि‍नक प्रति‍भा आ कर्मपर कवि‍केँ कोनो संदेह नै तँए भलमानुसोक अधलाह कर्मक वि‍रोध करबाक चाही। ऐसँ समाजमे दृष्‍टि‍कोणक वि‍जय प्रासंगि‍क हएत। वृक्ष मात्र गगनगामी..... एकर एक दृष्‍टि‍ एकटा उद्देश्‍य होइछ परंच शोर वि‍चलनसँ भरल लक्षण रखैत अछि‍। एक ध्‍वनि‍ अकास आ दोसर पताल प्रकृति‍क रंग बॉसक गि‍रह जकाँ प्रत्‍येक दृश्‍यपर पटाक्षेप। नाटकक अंकमे एकसँ बेसी दृश्‍य होएबाक चाही, मुदा प्रकृति‍ अर्थात् वि‍धाता अपन प्रत्‍येक अंककेँ अलग-अलग दृष्‍यसँ आबद्घ कऽ वि‍वि‍ध नाटकीय परि‍दृश्‍यक मंचन करैत अछि‍। ऐ पद्यक प्रत्‍येक छंदमे वि‍शेष अर्थ झॉपल अछि‍ जे पाठकक मस्‍ति‍ष्कपर ज्‍यामि‍ति‍क दबाब अवश्‍य बनाएत- जहि‍ना डारि‍ करोटन लीची खोंधि‍‍ते खोंइचा पकड़ैए नि‍च्‍चाँ-ऊपर ससरि‍-ससरि‍ अपन-अपन बाट पबैए भारतीय संस्‍कृति‍क संग ई दुर्भाग्‍य रहल जे परम्‍परावादी दृष्‍टि‍कोणक कि‍छु अवांक्षि‍त तत्‍वसँ लोक परेशान तँ छथि‍ मुदा कि‍यो ओकरा समाप्‍त होमए देबए नै चाहैत छथि‍। ‘काटर प्रथा’ ऐ रूपेमे सभसँ ि‍नर्घिष्‍ठ मानल जाए। ‘सासु-पुतोहु वार्ता’मे कवि‍ ओना स्‍पष्‍ट रूपेँ काटरक परि‍णाम स्‍वरूपक उद्वोधन नै कएने छथि‍, मुदा परक बेटीकेँ बेटीक रूपमे स्‍वीकार करब सुसंस्‍कृत समाजक नारी लेल असहज होइछ। ई वि‍डंवना जे अपन संतानक संग जे सि‍नेह रहैछ ओ  दोसराक संतान जे आब आत्‍मसात भऽ गेल छथि‍ ति‍नका लेल असंभव। ओना एकरा स्‍वार्थ सेहो नै मानल जा सकैछ कि‍एक तँ पुतोहुक आवश्‍यकता व्‍याहुत बेटीसँ बेसी होइत छैक। ऐमे प्रति‍द्वन्‍द्वताक भाव रहैत अछि‍‍। मनुक्‍खकेँ अपन अधि‍कार तँ मोन रहैत अछि‍ मुदा कर्त्तव्‍यवोधक ज्ञान जि‍नकामे नै रहत हुनका पारि‍वारि‍क शांति‍क स्‍पप्‍न देखनाइ सर्वता अनुचि‍त आ भ्रामक। प्रति‍द्वन्‍द्वि‍ता ऐ खेलमे सासु-पुतोहु दुनू दोषी मुदा सासुक दोख बेसी कि‍एक तँ आनक बेटी अपन घरमे अनलाक बाद हास-परि‍हास सासुएक मुखसँ पहि‍ने नि‍कलबाक संभावना रहैत छैक- ओसार पुवरि‍या बैस सासु पड़ल पुतोहुकेँ देल धाही अकड़ि‍ कऽ मकड़ि‍ बाजलि‍ देहक पानि‍ लऽ गेल हाही। ककरोपर जौं झूटका फेंकब तँ प्रत्‍युत्तरमे पाथर अवश्‍य भेटत, कि‍एक तँ कि‍यो-ककरोसँ कम नै। अधलाह देखौंस संस्‍कार मनुक्‍खमे पहि‍ने अबैछ तँ नवकी कनि‍याँ कोना चुप रहतीह- पानि‍ये तँ पसरि‍ देहमे पीब गेल सभटा पाणि‍ की करब, फुरि‍ते कहाँ अछि‍ कहाँ पड़ल छी जानि‍....। ऐ प्रकारक आरोप-प्रत्‍यारोप ग्रामीण समाजमे बरोबरि‍ देखए मे अबैत अछि‍। परि‍णाम परि‍हासक संग-संग अपन दैनन्‍दि‍नीमे लागलि‍ पुतोहु सासुरमे बसलि‍ ननदि‍केँ बीचमे सेहो लऽ अबैत छथि‍। कवि‍क कहबाक उद्देश्‍य छन्‍हि‍ जे स्‍वस्‍थ जड़ि‍सँ स्‍वस्‍थ वृक्षक वि‍कास हएब प्रासंगि‍क तँए सासुकेँ अपन मर्यादाक स्‍मरण राखि‍ पुतोहुक संग ओहने बेबहार करबाक चाहि‍यनि‍ जेना बेटीक संग करैत छथि‍। पुतोहुकेँ सेहो सासुमे अपन माइक छबि‍ देखबाक आवश्‍यकता छैक। प्रयोगात्‍मक रूपेँ आब ऐ प्रकारक अनटेटल क्रि‍या-कलापक संभावना क्षीण भऽ रहलैक कि‍एक तँ पलायनवादी समाजमे सासु-पुतोहु एक संग रहतीह, बि‍रले अवसरि‍ भेटैछ। जगदीशजी गाममे रहि‍ कऽ साहि‍त्‍य साधना कऽ रहल छथि‍ तँए ऐ प्रकारक घटना गाम-घरमे घटि‍त होइत देखानाइ कवि‍क लेल कोनो अजगुत नै। कवि‍ताक बि‍म्‍ब आ शि‍ल्‍पसँ बेसी महत्‍वपूर्ण अछि‍ कवि‍क उद्देश्‍य। एे दृष्‍टि‍सँ जौं देखल जाए तँ कवि‍ता नीक छैक। भाषा वि‍ज्ञानक रूपमे अद्भुत कि‍एक तँ अपन गद्य जकाँ एेठाम जगदीश धाही, अकड़ि‍, मकड़ि‍, हाही, लसि‍या, नि‍चेन सन लुप्‍त होइत शब्‍द सभसँ पद्यकेँ वांछि‍त रूपेँ बोरि‍ कवि‍ता श्रवणीय बना देलनि‍‍। “बौड़ाएल बटोही” शीर्षक कवि‍ता ऐ संग्रहक सभसँ नीक बि‍म्‍बकेँ केन्‍द्रि‍त कऽ कऽ लि‍खल गेल अछि‍। जीवन दर्शन आ आध्‍यात्‍मक तात्वि‍क वि‍वेचन अत्‍यन्‍त वि‍स्‍मयकारी छायावादसँ भरल मानल जा सकैछ। ‘परदा’मे ओझराएल जि‍नगी जकाँ वर्त्तमान मनुक्‍खक जीवन भऽ गेल अदि‍। प्रयोगात्‍मक रूपेँ आब कोवरक कनि‍याँक ओ रूप कतए जकर कल्‍पना कवि‍ कएने छथि‍, मुदा गामक समाजमे एखनो कोवरमे नुकाएल कनि‍याँ भेटैत अछि‍। कोवरक कनि‍याँ तँ मर्यादाक अनुपालनक लेल नुकाएल छथि‍ मुदा कर्म पथपर वि‍चरण करैबला मनुक्‍ख कटि‍ कऽ कि‍एक रहि‍ रहल अछि‍? जे कि‍छु नै जानि‍ रहल अर्थात् अशि‍क्षि‍त मूक अनभुआरसँ सामर्थ्‍यशील मनुक्‍ख कि‍एक तकरार कऽ रहल छथि‍? अपन-अपन कर्मक संग-संग माए-बापक कर्म ओ धर्म संतानक सफलताक बाट उज्‍ज्वल करैत अछि‍। ऐठाम धर्मक भाव संप्रदाय नै अपि‍तु मानवीय मूल्‍यक सम्‍यक अनुपालन मानल जाए। वि‍लगि‍त पथपर जौं चरण राखल जाए तँ बुइध बि‍‍लेनाइ स्‍वाभावि‍क आ जखन बुइध बि‍ला जाएत तँ बाट कलुष अवश्‍य भऽ जाएत- बाटे बि‍ला वुइध बाटे बि‍सरि‍ गेल जेम्‍हर जे चलल तेम्‍हरे पहुँचि‍ गेल...। कर्मक बीआ जाैं सत्‍व तम ओ रज रस रससँ बोरल नै जाएत तँ ‘मनोकामना’ भ्रम बनि‍ अपन सि‍द्धि‍क आशमे लुप्‍त अवश्‍य भऽ जाएत। कोनाे रचनाकार जौं स्‍वयं नायक बनि‍ कवि‍ता लि‍खैत छथि‍ तँ कोनो अचरज नै, मुदा बेसीठाम कवि‍ स्‍वयंकेँ रीति‍ ओ प्रीति‍क नायक बना कऽ कवि‍ता लि‍खलाहेँ ई बरोबरि‍ मैथि‍ली साहि‍त्‍यमे देखएमे अबैत अछि‍। अपन आलोचना करब सबहक लेल संभव नै, ओना कतौ-कतौ हास्‍य रसक कवि‍तामे कवि‍ लोकनि‍ अपन मजाक अवश्‍य उड़बैत छथि‍ मुदा एना करब कवि‍ताकेँ लोकप्रि‍य बनाएब मात्र मानल जाए। ‘अपनेपर हँसै छी’ शीर्षक कवि‍ता मूलत: वर्त्तमान शि‍क्षा प्रणालीपर कविक‍ आलोचनात्‍मक काव्‍य शैलीमे प्रहार थि‍क। स्‍वयंकेँ नायक बना कऽ चोरि‍क डि‍ग्रीक आधारपर ‘शि‍क्षा मि‍त्र’क नौकरी प्राप्‍त करबामे हेर-फेर देखाओल गेल अछि‍। गाममे रहि‍ कऽ बि‍हारक शैक्षणि‍क प्रणालीपर कटु टि‍प्‍पणी न्‍यायोचि‍त। शासन तंत्र कतबो मजगूत मानल जाए मुदा जखन बेबस्‍थे भ्रष्‍ट, तखन इमानदारीक दाबा केनाइ भ्रामक सि‍द्ध होइत छैक। साम्‍यवादी वि‍चारधाराक अक्षरश: सम्‍पोषक कवि‍ कोनो राजनैति‍क दल वि‍शेषपर टि‍प्‍पणी नै केने छथि‍। अर्थनीति‍ जौं भ्रामक हुअए तँ ऐ लेल सम्‍पूर्ण समाजकेँ दोख देल जाए। लोक जखन स्‍वयं भ्रष्‍ट भऽ गेल छथि‍ तँ प्रजातंत्र वा शासन तंत्रपर दोख देब अनुचि‍त- लाखे रूपैयामे दशो कट्ठा जमीन गमेलौं गुरु दक्षि‍ना देने बि‍ना गुरु भाइक भार उठेलौं....। ओना भारतीय परि‍दृश्‍यमे बि‍हारक राज्‍य बेबस्‍था भलहि‍ं स्‍तरीय मानल जा रहल मुदा शैक्षणि‍क बहालीमे योग्‍यतमक उत्तरजीवि‍कामे धन बल आ कुचक्रबल बेसी भारी पड़लैक, ज्ञानक मोजर एखनों नै भेटि‍ रहल। पाँच हजारक नौकरीक लेल मूल्‍यवान वसुन्‍धराकेँ बेचि‍ लोक लौटरी लगा रहल छथि‍। एकर दू गोट कुपरि‍णाम- पहि‍ल कृषि‍ कार्य जे हमरा समाजक रीढ थि‍क तकर महत्‍व समाप्‍त भऽ रहलैक आ दोसर प्रति‍भाक पलायन अवश्‍यभावी कि‍एक तँ साधनहीन प्रति‍भा सम्‍पन्न व्‍यक्‍ति‍ ऐ भ्रष्‍ट मंचपर कोना आसीन होथि‍- बि‍नु धनक धनि‍क जहि‍ना ताम-झाम देखबैए देखि‍-देखि‍ आँखि‍ करूआए लाजे आँखि‍ मुनै छी अपने पर हँसै छी.....। वि‍चारमूलक पद्य देशकालक दशाक एक रूपेँ सत्‍यश: चि‍त्रण करैत अछि‍। चारूकातक परि‍दृश्‍य हेहर भऽ गेलैक, ऐ दशामे सोझ बाट अकल्‍याणकारी लगनाइ कोनो अनुचि‍त नै। चोटगर तीक्ष्‍ण वान चला कऽ भ्रष्‍ट लोक अपनाकेँ सत्‍य साबि‍त करबामे कोनो अर्थे नै हुसैत अछि‍ कि‍एक तँ धनक संग गालक जमाना एक तँ चोरि‍ आ दोसर सीना जोरि‍। ऐ कटु सत्‍यकेँ साहि‍त्‍यमे कोना स्‍वीकार कएल जाए ई तँ भवि‍ष्‍यक गप्‍प मुदा यात्री आ आरसी जकाँ अपन लेखनीक संग जीवनमे सम्‍यक साम्‍यवादी जगदीशक ई कवि‍ता समाजक लेल दि‍शा ि‍नर्देश कऽ रहलैक‍। ओना ई अलग बात जे वर्त्तमान परि‍दृश्‍य फ्रांसक राज्‍यक्रांति‍ जकाँ नै जखन रूसो आ वाल्‍टेयरक आखर-आखरसँ समाजमे क्रांति‍ आबि‍ गेल छल। आशावादी दृष्‍टि‍सँ जौं सोचल जाए तँ साहि‍त्‍य समाजक दर्पण अवश्‍य प्रतीत हएत, मुदा प्रत्‍येक पाठक एकर सम्‍यक् तत्‍वकेँ जौं अपन जीवनमे उतारि‍ लेथि‍ तखने ई संभव मानल जा सकैछ। क्रमश:............. समाजक माने सबहक दृष्‍टि‍कोण आ आचार-वि‍चारक सभ गोट रूप व्‍यापक अर्थमे मंथन कएल जाए। जगदीशजी ‘धोब घाट’ कवि‍ताक बाद ‘धोबि‍ घाट’ कवि‍ता सेहो लि‍खने छथि‍। ‘दर्शन’ कोनो पोथी पढ़ि‍ नै उत्पन्न कएल जा सकैछ, ई तँ जीवनकेँ देखबाक अपन दृष्‍टकोण होइत अछि‍। उदयनाचार्य कोनो काशी आ प्रयागमे रहि‍ ‘न्‍याय कुसुमांजलि‍’ सन पोथी नै लि‍खने रहथि‍। राजपूत कालक ‘करि‍यन’ हुनक साहि‍त्‍य सृज्‍नताक गहवर छलनि‍। तँए जगदीशसँ टेम्‍स नदीक सभ्‍यताक आधुनि‍क बि‍म्‍बक आश केनाइ सर्वथा अनुचि‍त हएत कि‍एक तँ मि‍थि‍लाक खॉटी गाम ‘बेरमा’ हि‍नक साहि‍त्‍य साधनाक केन्‍द्र बि‍न्‍दु छन्‍हि‍। दर्शनक तीन वयस होइत अछि‍- नीति‍, श्रृंगार ओ वैराग्‍य। सामाजि‍क जीवनमे रहनि‍हार मनुक्‍खक लेल तीनूक सम्‍यक काल ओ भाव होइत छैक। जीवन क्रममे संतुलन बनएबाक लेल तीनू वयससँ अलग-अलग सत्‍व रज ओ तमो गुण टपकैछ। ‘सात्‍वि‍क भाव’ कवि‍ता सत्‍व गुणकेँ आधार बना कऽ लि‍खल गेल अछि‍। सात्‍वि‍क भाव वि‍रासतपर आधारि‍त होइत छैक। जाहि‍ ठामक भूमि‍ सात्‍वि‍क, हवा पानि‍ सात्‍वि‍क माने नैसगि‍क संस्‍कार सात्‍वकतासँ भरल होइछ ओइठाम एकर प्रभाव अवश्‍यंभावी होइत छैक। लक्ष्‍य, संकल्‍प आ दृष्‍ता सेहो मनुक्‍खकेँ सम्‍यक शाश्‍वत कर्म दि‍श लऽ जाइछ, मुदा ऐ लेल संस्‍कार अनुवंशि‍की आदि‍पर व्‍यक्‍ति‍त्‍वक वि‍चार ि‍नर्भर होइछ। सुभाव-कुभाव आदि‍ संगहि‍ चलैत अछि‍ मुदा ऐ लेल दृष्‍टि‍कोणकेँ जाहि‍ रूपसँ देखल जाए वएह रूप दृष्‍टि‍गोचर हएत। कवि‍ताक भाव दर्शनपर आधारि‍त सरल शब्‍दमे मुदा वि‍चार बोधक लेल गूढ़ अछि‍ तँए एकरा बेशी लोकप्रि‍य नै मानल जाए परंच साहि‍त्‍यि‍क वि‍कासक लेल आ जीवन-दर्शनक लेल युक्‍ति‍संगत कवि‍ता थि‍क। दि‍व्‍य पुरुष ओ जे सोलह कलासँ परि‍पूर्ण होथि‍। ‘दि‍व्‍य शक्‍ति‍’ शीर्षक पद्य सरल रूपेँ पढ़लाक बाद कि‍छु वि‍शेष नै देखबामे अबैछ मुदा जेना कवि‍क व्‍यक्‍ति‍त्‍व अर्न्‍तमुखी तहि‍ना पद्यमे गूढ़ रहस्‍य झॉपल छैक। दि‍व्‍य शक्‍ति‍सँ पूर्ण होएबाक बाद मनुजमे प्रखर ज्‍योति‍क आवरण पनकि‍ जाइत अछि‍। नीक-अधलाह वि‍चार संस्‍कारसँ उत्‍पन्न होइत अछि‍ मुदा गंगा माने पवि‍त्रताक परि‍चायक संस्‍कृति‍सँ आबद्घ् जलधाराक कोखि‍मे सबहक लेल समान स्‍थान। जइ भूमि‍पर वसुदेव वि‍राजथि‍ वएह वसुधा.......। नन्‍द आ वसुदेवक प्रसंग तँ वर्तमान सामाजि‍क परि‍दृश्‍यमे ‘उपहास’ जकाँ भऽ गेल अछि‍ मुदा कवि‍ आशावादी छथि‍..... पाँचम कला बनि‍ जे बीआ मनुज मन वि‍रजैए डेगे-डेगे डगरि‍-डगरि‍ सोलहम कला पबैए... जगदीश जीक जे काव्‍य सृजनता ओ व्‍यंगनाक वि‍शेषता छन्‍हि‍ ओ थि‍क हि‍नक आशावादी सकारात्‍मक दृष्‍टि‍कोण। अपन पद्यमे कतौ कवि‍ सामाजि‍क दशासँ नि‍राश नै छथि‍। कालक अकालकेँ अपन पद्यमे देखबैत तँ छथि‍ मुदा ओहि‍सँ उदि‍ग्‍न नै। ‘उड़ि‍आएल चि‍ड़ै’ कवि‍तामे वर्त्तमान मानवक मनोवृत्ति उझलि‍ लेखनीसँ कवि‍ताक रूपेँ उद्धृत कऽ कवि‍ पलायनवादपर तीक्ष्‍ण प्रहार कएलनि‍ अछि‍। ऐ पलायनमे मात्र अपन माि‍टसँ पलायन नै अपि‍तु संस्‍कार आ मानवीयमूल्‍यक पड़ाइन सेहो देखाएल गेल अछि‍। ‘चि‍ड़ै’क उदाहरण मात्र कवि‍क छायावादी दृष्‍टि‍कोण छन्‍हि‍, कचोट तँ संस्‍कृति‍क पराभवकेँ मानल जाए। जे चि‍ड़ै अपन डीहो-डाबरकेँ बि‍सरि‍ स्‍वार्थ आ कृत्रि‍मताक लहरि‍मे जतऽ घोघ भरतै ओतहि‍ रास करत ओहि‍ चि‍ड़ैक मधुर स्‍वरसँ मूल समाजकेँ कोन काज- ओहन स्‍मृति‍ स्‍मृते की जे मने मन घुरि‍आइत रहैत पसरि‍ नै पबैत जे कहि‍यो तरे-तर खि‍आइत रहैत....। कवि‍सँ बेशी समाजक लेल वि‍डंबना जे बाटसँ भटकल बाटोही अपन मूल बाटपर श्रद्धा तँ व्‍यक्‍त करैत अछि‍, मुदा जइ पथमे पहि‍ल बेर उदयायल आदि‍ि‍लक दर्शन होइत अछि‍ ओइ पथपर फेर धुरब पथ भ्रष्‍टक लेल असंभव जकाँ लगैत अछि‍। अपन मूल संस्‍कारक पराभव करब उचि‍त नै मात्र स्‍मृति‍सँ मूल माटि‍मे मातृत्‍व कोना उत्पन्न हएत। तँए ‘पलायन’ कोनो रूपेँ उचि‍त नै। मि‍थि‍लाक माटि‍-पानि‍सँ फलैत-फूलैत हि‍न्‍दीक चर्चित उपन्‍यासकार फनीश्वर नाथ रेणु आंचलि‍क बनि‍ गेलनि‍। जौं मैथि‍लीक गप्‍प करी तँ कथाकार तँ कथा जगतमे ललि‍त, राजकमल, धूमकेतु, कुमार पवन आ कमला चौधरी सन प्रांजल आंचलि‍क कथाकार भेल छथि‍ मुदा आंचलि‍क काव्‍य जगतमे समग्र सामाजि‍क दैनन्‍दि‍नीककेँ छूबैत कवि‍मे यात्री (चि‍त्रा) ओ आरसी प्रसाद सिंह (सूर्यमुखी)क पश्चात् जगदीश प्रसाद मण्‍डलकेँ मानल जाए। ‘सान-धार-धारा’ कवि‍ता कोनो कैंचीक शानपर आधारि‍त काव्‍य बून नहि‍ ई तँ मानवीय मूल्‍य ओ संवेदनाक शानपर आधारि‍त पद्य अछि‍- जे धारा सि‍रजए गंगा कमला कोशी ओ महानन्‍दा ओ धार कहि‍या धरि‍ ठमकि‍ मानैत रहत फंदा? गंगा, कमला आ कोसीक कि‍छेरमे बसल गाम सभ मि‍थि‍लाक परि‍धि‍क भीतर अबैछ ऐ तरहक उल्‍लेख तँ बहुत रास कवि‍तामे भेटैत अछि‍, मुदा ऐठाम ‘महानन्‍दा’क चर्च कऽ कवि‍ पुबरि‍या बि‍हारक क्षेत्र कि‍शनगंजसँ आगाँ धरि‍क लोककेँ आश्वस्‍त कऽ देलन्‍हि‍ जे अहूँ मैथि‍ले थि‍कौं? मात्र पद्यमे लयात्‍मकता भरबाक लेल एना नै कएल गेल। कवि‍ मोन भावुक होइत छैक, भावमे बहनाइ कवि‍क प्रवृत्ति‍ मुदा मि‍थि‍लाक संस्‍कारसँ भरल रहलाक बादो ई क्षेत्र साहि‍त्‍यमे अपच जकाँ छल, तँए कवि‍क भावनाकेँ सम्‍मान करबाक चाही। ’जहाँ न जाए रवि‍ वहाँ जाए कवि‍’- ई वाक्‍य जे कि‍यो लि‍खने होथि‍ मुदा ई सर्वथा वि‍चारमूलक अछि‍। ऐ संग्रहक कि‍छु पद्य जेना पपीहाक गीत, वि‍खधरक बीख, नंगरकट घोड़ा आदि‍ पढ़लासँ स्‍पष्‍टत: बुझना गेल जे छायावादी दृष्‍टि‍कोण रचनाकारकेँ छोड़ि‍ सबहक लेल पूर्णत: बुझबामे नै अबैत छैक। ‘कोइली’ शीर्षक कवि‍तामे कवि‍ चन्‍द्रभानु सिंह ‘मैथि‍ली’क सरसताकेँ स्‍पष्‍ट रूपेँ पाठक वा श्रोता लग परसि‍ देने छथि‍ मुदा पपीहा गीत शीर्षक पद्य कोनो चि‍ड़ै-चुन्‍मुन्नीक स्‍वरपर आधारि‍त संस्‍कृति‍ गीत नै ई तँ सम्‍पूर्ण दर्शन थि‍क- जीवन-मरणक दर्शन। धरती अकाश, जल-थल कानि‍-अकानि‍ सन सहचाी विपरीतार्थक जीवन दर्शन......... काव्‍यक व्‍याख्‍या बड़ कठि‍न होइछ, तँए गजेन्‍द्र ठाकुर जीक ऐ मतसँ सहमत छी जे कवि‍ता कम लोक पढ़ैत छथि‍। चलन्‍त गीत-नादकेँ जौं छोड़ि‍ देल जाए तँ प्राय: साहि‍त्‍यि‍क काव्‍यमे कतौ ने कतौ कवि‍ स्‍वयं जीवि‍त रहैत छथि‍। कि‍छु वि‍शेष बि‍म्‍बकेँ स्‍पर्श करएबला कवि‍ता सभमे सेहो छायावादि‍ताक आवरण लागल रहैत अछि‍। ऐ ओहारक मध्‍य बि‍न्‍दु दर बि‍न्‍दु प्रवेश करब कि‍नको लेल दुष्‍कर, तँए कवि‍ताक वास्‍तवि‍क दृष्‍टकोणकेँ कवि‍-छोड़ि‍ कि‍यो नै बूझि‍ सकैत छैक। “सरस्‍वती वंदना” कोनो देवोपराध क्षमा मंत्र नै, आ ने पारम्‍परि‍क सनातन संस्‍कृति‍क अवलम्‍बकेँ स्‍पर्श करैत भक्‍ति‍गीत। ऐ वन्‍दनामे समाजक असंतुलि‍त दशाकेँ समाप्‍त करबाक लेल बुधि‍क देवीकसँ याचना कएल गेल अछि‍। कि‍छु वि‍शेष दि‍वसकेँ देवोपासनाक लेल चयन आ तात्‍कालि‍क आस्‍था कोनो भक्‍ति‍क श्रद्धा नै, एकरा कवि‍ आडंवर मानने छथि‍। साम्‍यवादमे आस्‍ति‍कता वि‍शेष पंथसँ संबंध नै रखैत अछि‍। कर्म प्रधान वि‍वेचन कवि‍क कोनो कवि‍ता मात्रमे नै ई अर्न्‍तआत्‍माक ज्‍वार थि‍क। मात्र एक दि‍न वर्ष भरि‍मे बुधि‍क आवरहन आ शेष दि‍वस-राति‍मे कुमार्गपर चलैत रहबामे संस्‍कारक पराभव अवश्‍यम्‍भावी हएत। तँए सरस्‍वतीसँ प्रति‍क्षण आ प्रति‍पल संग रहबाक प्रार्थना कएल गेल अछि‍। कर्म आ ज्ञानक सराबोरि‍ जौं नै हएत तँ सि‍नेहसँ सि‍नेह स्‍पर्श नै कऽ सकैछ। जेना महाकवि‍ वि‍द्यापति‍ “अपन करम फल हम उपभोगव तोहि‍ कि‍ए तेजह पराने सखि‍ हे मन जनि‍ करुऊ मलाने......” लि‍खि‍ कर्म फलक मूल्‍यांकनमे कर्त्ताक कर्त्तव्‍यकेँ आधार बनेने छथि‍। जगदीश सेहो कहैत छथि‍- “जे हूसल से हम्‍मर हूसल तइले कि‍अए छी कलहन्‍त सभ जागैए सभ सूतैए एक दि‍न हेतै सबहक अंत....” ऐमे याचक भगवती सरस्‍वतीसँ कि‍छु वि‍शेष नै मँगैत अछि‍ मात्र सत्‍कर्मक बाटपर चलबाक दि‍शा ि‍नर्देशक आश रखैत अछि‍। जौं ऐमे ओ हूसि‍ जाएत तँ भगवानक संग-संग आन ककरो दोख नै। कामना तँ सभ करैत अछि‍ मुदा ओकरा कर्मक पतवारि‍सँ जौं ि‍नत्‍य आगाँ नै बढ़ाएल जाए तँ प्रति‍स्‍पर्द्धाक युगमे पाछाँ रहब प्रासंगि‍क अछि‍। सबहक आगाँ आ पाछाँक बाट सुन्न नै, सभ ठाम जीव अपन अस्‍ति‍त्‍वक रक्षार्थ ि‍नरंतर लागल छथि‍ ऐमे वि‍जयश्री ओकरे भेटत जेकर चंचल मन रुढ़ रहत आ भीड़-भार देखि‍ उजगुजाएत नै- “टुटि‍ते लाट धरासँ भीड़े-भीड़ बनैत रहैत एक्के-दुइये भीड़ टपैमे भीड़ेमे भरमति‍ रहैत....” कर्त्तव्‍यनि‍ष्‍ठ व्‍यक्‍ति‍केँ हंस जकाँ दुग्‍ध आ नीरमे वि‍भेद करबाक प्रयोजन कि‍एक तँ हरि‍-हरी सन सहचरी कखनो नारायण कखनो बेग तँ कखनो साँप सेहो भऽ सकैत अछि‍। ऐ प्रकारक काव्‍य सामान्‍य बहुत आकर्षक आ सुस्‍वादु नै भऽ सकैछ मुदा नि‍ष्‍ि‍क्रय जीवन भेलापर अलात अनि‍वार्य। जेना भूमि‍गत जल पीबाक योग्‍य होइत अछि‍ मुदा आसुतजाल कंठसँ पीअल नै जा सकैछ कि‍एक तँ ओ सीरम थि‍क। वएह सीरम नाद आ स्‍नायुमे नाद आ स्‍नायुमे ि‍नर्जलीकरणक स्‍थि‍ति‍मे सोडि‍यम आ क्‍लोरीन मि‍ला कऽ नस द्वारा सूई भोंकि‍ शरीरमे चटाओल जाइछ। तँए जगदीशक कवि‍ता हास्‍य आ प्रीति‍क मंचसँ थपरी बजएबलाक लेल भलहि‍ं उपयोगी नै होनि‍ मुदा ऐमे छुच्‍छ तत्‍व भरल छैक तँए मृतक समान भऽ रहल समाजक लेल एकरा सीरम अवस्‍था मानल जाए। ऋृतु वर्णन बहुत रास कवि‍तामे भेटैत अछि‍ मुदा “अगहन” कवि‍ताक माध्‍यमसँ कवि‍क ऋृतुक वि‍वेचन अत्‍यन्‍त वि‍लक्षण छन्‍हि‍। “समय पाठ तरूवर फले, केतक सींचो नीर”‍ जकाँ कवि‍ अगहन केर आ वाहनमे कि‍सान जकाँ उताहुल नै छथि‍। जखन धान लबालब शीशसँ धराकेँ स्‍पर्श करए लगैत अछि‍, तँ कि‍सान मजूरक धैर्यक बान्‍ह टुटब स्‍वाभावि‍क। मुदा कवि‍ धैर्य धरबाक लेल आगाह करैत छथि‍- “तीन दि‍न, आठ अगहन वाॅकी धड़फड़ बेसी नै अगुताउ धीरजसँ सभ कि‍छु होइ छै तइ बीच घरक काज सरि‍आऊ....” स्‍वाभावि‍क छैक कृषि‍ प्रधान देशमे कि‍सान मजदूरक जीवि‍काक साधन कोनो सभ मासक वि‍शेष तारि‍खकेँ नौकरि‍हारा जकाँ धनसँ कऽ नै अबैछ। बरख भरि‍क मेहमति‍ आ पसीनाक गंगा जखन बान्‍ह तोड़बाक लेल उफान तोड़ि‍ रहल तँ कवि‍क ि‍नर्देश जे घरक आन काज सभ सरि‍या कऽ पहि‍ने खरि‍हान बनाएल जाए एकटा यथार्थ प्रयोगवाद मानल जा सकैछ। रातुक नाच देखबाक लेल दर्शक लोकनि‍ गाम-गाममे सपरि‍वार जाइत छलाह मुदा ओ कृत्रि‍मतासँ भरल, कि‍एक तँ भोर होइते जखन कलाकारक रूप बदलि‍ जाइत छै तँ दर्शकक कोन ठेकान ओतए ठका गेल। मुदा चौकीपर धम्‍म–धम्‍म जखन चानक बोझ पड़ि‍ चष्‍टाएल बहार भऽ जाइछ कि‍सानक नाच कर्मफल बनि‍ कोठीमे भरि‍ जाइत अछि‍। ई चौकी स्‍टेज नै ऐठाम मान सम्‍मानक माने आजीवि‍काक फल आ अर्थक आवाहन। एहू कर्ममे लोक सभ परानी हांसू लऽ कऽ खेत दि‍श जाइत अछि‍ मुदा अन्नपूर्णाक संग अपन घर घुरैत अछि‍। बनाबटी नाचमे टका अर्थात् अन्नपूर्णाक संग जाइत तँ अछि‍ मुदा घुरबाक काल खाली हाय अपन आंगन आ बथान वापस अबैत अछि‍। मनोरंजन तखने नीक जखन कर्मक गति‍ प्रखर हुअए कवि‍क ऐ शि‍क्षामे समाजक वास्‍तवि‍क रूप-रेखा दृष्‍टि‍ पटलपर उभरि‍ कऽ समक्ष आबि‍ गेल। ऐ प्रकारक संदेश ऋृतु वर्णनक माध्‍यमसँ मैथि‍ली साहि‍त्‍यमे संभवत: पहि‍ने नै भेटल हएत। ग्राम्‍य जीवनक वृत्ति‍ चि‍त्रक ि‍नर्देशक वएह भऽ सकैत अछि‍ जे गामक संस्‍कार आ व्‍यवस्‍थाकेँ आत्‍मसात कऽ नेने हुअए। जीवन तीनू मौि‍लक गुण सत्‍व रज ओ तमक दार्शनि‍क अवलोकन मैथि‍ली गद्य साहि‍त्‍यमे “खट्टर ककाक तरंग” रूपेँ प्रो. हरि‍मोहन झा कएने छथि‍, मुदा गंभीर चि‍न्‍तनकेँ हास्‍यक बि‍हाड़ि‍मे उधि‍या देलासँ एकर प्रासंगि‍कता ओइठाम नि‍ष्‍क्रि‍य भऽ गेल। ऐ कमीकेँ जगदीशजी “तरंग” कवि‍तामे पूर्ण कऽ देलनि‍। तरंग कोनो जल तरंग नै जीवन क्रि‍याशीलता ओ शैलीक तरंग थि‍क। एकटा कहबी छैक जेहने छलि‍अ हौ कुटुम तेहने भेटलऽ हौ कुटुम- वास्‍तवमे जीवन क्रीड़ाक मैदानमे जेहेन दृष्‍टि‍कोण रहत ओहने खेलबाक खेलौना भेटत। आइ धरि‍क मैथि‍ली काव्‍य जगतमे जे कमी खलैत अछि‍ ओ थि‍क रचनाकारक जीवनशैली ओ रचनाक तारतम्‍यक अभाव। संभवत: जगदीशक कवि‍ता पढ़ि‍ पाठक कवि‍क दृष्‍टि‍कोणपर प्रश्‍नचि‍न्‍ह नै ठाढ़ कऽ सकैत छथि‍। शैक्षणि‍क पाठ्यक्रममे कोनो चर्चित व्‍यक्‍ति‍ जीवन परि‍चय मात्र सकारात्‍मक दृष्‍टकोणकेँ पनकबैत देल जाइत अछि‍। प्राथमि‍क आ माध्‍यमि‍क शि‍क्षामे समालोचना छात्र नै कऽ सकैत अछि‍, ओइमे मर्यादाक बान्‍हकेँ नाङब संभव नै। मैथि‍ली साहि‍त्‍यमे संभवत: एहि‍ना होइत रहल अछि‍। व्‍यक्‍ति‍गत वा कि‍छु खास वर्गकेँ महि‍मामंडि‍त करबाक क्रममे अधि‍कांश साहि‍त्‍यकार समाजक वास्‍तवि‍क वृति‍चि‍त्रकेँ झाँपि‍ देबाक प्रयास करैत छथि‍न्‍ह। ऐ दुर्भाग्‍यसँ साहि‍त्‍य कलंकि‍त तँ होइत रहल मुदा कि‍नको एकर क्षेभ नै। सभ शब्‍द समंजन आ आत्‍म संतुष्‍टि‍मे लागल छथि‍ कि‍एक तँ आत्‍म संदृष्‍टि‍क रूप वि‍चि‍त्र भऽ गेल छैक। जगदीश जीक काव्‍यमे ई सभ नै भेटत कि‍एक तँ हि‍नक दृष्‍टि‍कोण साफ छन्‍हि‍ ई सामाजि‍क वि‍डंबना आ वि‍षमताकेँ झाँपि‍ कऽ नै राखए चाहैत छथि‍। आब ि‍नर्भर करैत छैक जे समाज हि‍नक दृष्‍टि‍कोणकेँ कतए धरि‍ मोजर देतन्‍हि‍- सत बनि‍ कखनो राज वि‍राजए रज बनि‍-बनि‍ शासन करए धरि‍ते धारण तम तम-तमा झहरि‍-झहरि‍ फुनगीसँ गि‍रए.... ऐ पद्यांशमे गि‍रए केर स्‍थानपर खसए रहबाक चाही मुदा गि‍रए वा खसए जे लि‍खल जाए ई तँ अक्षरश: सत्‍य अछि‍ समाजक परि‍दृश्‍यमे अधोगति‍ शि‍खरकेँ छूबि‍ लेलक। “बान्‍हसँ खाधि‍ ऊँच” अनि‍श्‍चयवाचक लोकोक्‍ति‍ छल मुदा मि‍थि‍लाक समाजमे आब ई नि‍श्चि‍यवाचक भऽ गेल। अंग्रेजीमे कहबी छै “Nature and signature remains constant” मुदा मि‍थि‍ला क्षेत्र एकर अपवाद ि‍थक। मंचीय भाषणमे जीवन शैलीक उद्वोधन कतबो साफ रहए मुदा वास्‍तवि‍क रूप कि‍छु आर भेटैत अछि‍। वि‍वादि‍त पृष्‍ठभूमि‍सँ जगदीशजी कतबो दूर होथि‍ मुदा साहि‍त्‍यकार कुकर्मीक हाथसँ फेकल अक्षतकेँ माॅथसँ लगा कऽ सम्‍यक जीवनक कतबो उद्वोधन करए परंच जखन लेखनी उठाएत तँ सत्‍य अवश्‍य परि‍लक्षि‍त भऽ जाएत। “नङरकट घोड़ा” एकर प्रत्‍यक्ष प्रमाण मानल जाए। कवि‍ समाजसँ मात्र सि‍नेह चाहैत अछि‍। कोनो आत्‍मि‍क कवि‍ स्‍वार्थी नै आ ने ओकरा समाजसँ पि‍रही वा सम्‍मानक आश... ओ तँ मात्र चाहैत अछि‍ जे वि‍द्वतमंडली ओकर रचनाकेँ जन-जन धरि‍ पहुँचा कऽ ओकर दृष्‍टि‍कोणकेँ परि‍लक्षि‍त करथि‍। जकर अभाव मैथि‍ली साहि‍त्‍यक वास्‍तवि‍क रूपकेँ पाठक धरि‍ पहुँचबा रहल अछि‍। अर्थात् ऐ साहि‍त्‍यमे पारदर्शीकेँ कहए पारभासक समालोचक सेहो एखन धरि‍ नै आएल छथि‍। “गीत-1” द्वारा कवि‍ एकटा ि‍नर्भीक समालोचकसँ मैथि‍ली साहि‍त्‍यक रक्षाक आश रखैत छथि‍ ई संभव हएत वा नै ई तँ भवि‍ष्‍यक वि‍षय थि‍क मुदा जगदीशजी इंद्रधनुषी अकासक द्वारा की देलनि‍ ऐपर मंथन कएलासँ उत्तर आधुनि‍क मैथि‍ली काव्‍य जगतकेँ अवश्‍य स्‍वस्‍थ चि‍न्‍तन भेटत। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। सुजीत कुमार झा कथा केहन सजाय? कामनी मैडम काज समाप्त कएलाक बाद चश्मा उतारलीह । हुनका जाढ़क अनुभव भऽ रहल छल । आइ आठ बाजि गेल । साँझ रात्रीमे परिवर्तित भऽ गेल छल । चौकीदारकँे आफिस बन्द करबाक आदेश दऽ ओ साल ओढ़लीह आ अपन रुम दिस बढ़ि गेलीह । कामनी मैडमकेँ एतऽ अएला एक हप्ता मात्र भेल अछि । एकटा सरकारी विद्यालयक प्रधानाध्यपक पदसँ अवकाश प्राप्त मैडम अपन घर जाए चाहैत छलीह । मुदा मारवाड़ी सेवा समितिक अध्यक्ष रामरतन शर्माजी हुनका महिला सदन होस्टलके जिम्मेवारी स्वीकारबाक लेल बाध्य कऽ देलैन्हि । महिला सदनकँे मारवाड़ी सेवा समिति चला रहल अछि । चारि हजार विद्यार्थीक प्रधानाध्यापक लेल ई सदन छोट छल । शर्माजी एहि सदनके लेल कोनो अनुभवी व्यक्ति ताकि रहल छलाह । तँए कामनी मैडमसँ ई पदभार ग्रहण करबाक आग्रह कएलैन्हि, जकरा मैडम अस्वीकार नहिकऽ सकलीह । एतऽ पचास महिला, भोजन बनाबऽ बला तीन गोटे भनसिया आ किछु कार्यालयक कर्मचारी छल । एतऽ रहऽ बला कुल ५७ सदस्य छल । सदनके नियमानुसार ९ बजे प्रार्थनाक लेल सभ सदस्य सभाहलमे उपस्थित होइत छल । तँए मैडम महिलासभकँे चिन्हऽ लागल छलीह । एहिमे किछु विवाहित सेहो छल । केओ सरकारी कर्मचारी, केओ बिमा कम्पनी, केओ शिक्षिका, केओ एनजीओकर्मी तऽ किछु इञ्जिनियर सेहो छल । हरेक दिन अपन काजक हिसाबसँ ओ सभ जाइत छल मुदा साँझ आठ बजेधरि कोनो हालतमे घूरि जाएकेँ नियम छल । ओना मार्केटिङ्ग वा एनजीओमे काज करऽबलाके राति ९ बजेधरिके लेल छुट छल । आवश्यकता पड़लापर ओ राति १० बजेधरि बाहर रहि सकैत छल मुदा एहिके लेल मैडमकेँ पहिले सूचित करबाक नियम छल । आत्मविश्वास आ बुद्धिमतासँ काज करऽबला उच्च शिक्षित महिलाकेँ देखिकऽ मैडम स्त्रीक बदलैत प्रतिभापर बहुत प्रशन्न होइत छलीह । असगर रहैत अवलाकँे सवला बनैत देखि हुनका नीक लगैत छल । ओ एतऽ एक वर्षक लेल अनुबन्धित छलीह । सदनमे अलग–अलग वर्ग छल । एटैच बाथरुम बला रुम, तीन बेड बला रुम आ फेर चारि बेड बला रुम । चारि बेड बला रुमक लेल बाथरुम बाहर छल । मैडमक प्रभावसँ एक्के हप्ता भितर होस्टलमे सफाइ तथा अन्य कार्य नियमपूर्वक होबऽ लागल । एतऽ रहऽबाली लड़की नेपालक सभ ठामक छल । किछु मैथिल, किछु वीरगञ्ज दिसक, किछु पहाड़क तऽ किछु हुम्ला, जुम्ला दिसक लोक सेहो छल । एहि लड़कीमे एकटा श्याम रंगक, जे मौनताक चद्दरि ओढ़ने, ओकर व्यक्तित्व अलग छल । पातर–छितर युवती । बड़का–बड़का आँखि एक्के बेरमे सभकेँ अपना दिस आकर्षितकऽ लैत छल । ओकर भोला चेहरामे तऽ गजवके हाव–भाव अबैत जाइत छल । आँखिमे डेराएल सन देखाइत छल । कोनो बनाबटी श्रृंगार नहि । ओ पाउडर, काजर, टिकुलीधरि नहि लगबैत छल । समान्यतया एतऽके लड़की आत्मनिर्भर भेलाक कारण अपन रुप सज्जापर विशेष ध्यान दैत छल । काटल केश, मीलल भँओ, नीपल–पोतल चेहरा, पैmशनेबुल कपड़ा । कमाउ सभ छल तँए बनिठनिकऽ रहैत छल । एहनमे भोजपुरी भाषी ओ लड़कीक सादगी उभरिकऽ देखाइ देबऽ लगैत छल । हलका रंग बला सलवार–कुर्ती पहिरने, नहि आइरन, नहि किछु । रातिमे टिभी देखैत लड़कीक अवाज, हल्ला वा हँस्सीसँ सभागृह गुञ्जित होइत रहैत छल । मुदा ओ लड़की कोनो कोणमे ठेहुनपर दाढ़ी अड़काकऽ आ दुनू हाथसँ पएरकँे घेरने नहि जानि कतऽ देखैत रहैत छल । टिभी दिस प्रायः ओकर ध्याने नहि रहैत छल । अपने संसारमे ध्यानमग्न अपने विचारमे हेराएल रहैत छल । ओकर आँखिमे देखऽबला उदासी मैडमकेँ बेर–बेर चिन्तित करैत रहैत छल । ओकरा कोन बिपत्ति पड़ल छैक मैडमकँे ई बात डङ्क मारैत रहैत छल । बेरियामे सदन खाली रहैत छल । एक दिन बेरियामे मैडमक कानमे गीतक एकटा सुन्दर स्वर सुनाइ पड़ल । ओ स्वंयकँे नहि रोकि सकलैथि । शीघ्रतासँ ओ स्वरकँे पाछू ओहि रुम तक गेलीह जतऽ भोजपुरी भाषामे गीत गाबि रहल छल । देवालमे ओत लगओने गीतमे निमग्न बन्द आँखिसँ नोरक बर्षा भऽ रहल छल । दर्दमे डूबल स्वर गुञ्जित भऽ रहल छल । रुमक बाहरसँ मैडम किछु देर गीत सुनैत रहलीह । एकाग्रता भंग करब ठीक नहि बूझि मैडम ओतयसँ घूरि एलीह । बेर–बेर ओ इएह प्रश्नक उत्तर ताकि रहल छलीह, आखिर ओकरा कोन दुःख अछि । किए ओ एतेक उदास रहैत अछि ? दोसर दिन मैडम ओहि रुमसँ झगड़ाक आवाज सुनलैन्हि । रुमक अन्य लड़कीसँ ओकरा उकटा–पैची भऽ गेल छल । तँए हेतु ई लड़की चिचिया–चिचियाकऽ गाढ़ि पढ़ि रहल छल । ओकरा कोनो होश नहि छल, कि बाजि रहल छल । मैडम शीघ्र ओतऽ पहुँचलीह आ ओकरा देखिते बूझि गेलीह जे ओकर मानसिक अवस्था ठीक नहि अछि । ओकरा ने अपन कपड़ाक होश छल आ ने बूझि पाबि रहल छल जे ओ कि बाजि रहल अछि । चढ़Þल आँखि ओकर अस्वस्थताक बखानकऽ रहल छल । ओ भोजपुरी, मैथिली आ नेपाली भाषाक मिश्रणमे किछु बरबरा रहल छल । मैडम ओकरा निन्नक गोली आ दूध दऽकऽ जवरदस्ती सुता देलीह । ओकर नाम चमेली छल । मैडमकेँ आब ओकर चिन्ता होबऽ लागल । एखनधरि चमेलीके प्रति हुनकर जे उत्सुकता छल से आब परेशानीमे बदलि गेल छल । आब ओ सोचऽ लगलीह जे कोनो प्रकारे चमेलीकेँ बातचितक लेल तैयार कएल जाए । ओकर मोनमे विश्वास बढ़ाओल जाए । मैडम सोचैत छलीह जे कहुना ओ खूलिकऽ अपन बात कहि मोनक बोझ हल्लुक करए । मुदा एहिमे कोनो शक नहि छल जे ई लड़की बहुत बड़का दुर्घटना मोनमे दवओने अछि वा कोनो एहन कारण अछि जाहिसँ ओ कुण्ठाग्रस्त अछि । चमेलीक विषयमे मैडम एक प्रकारसँ अनुसन्धान शुरु कएलैन्हि । होस्टलक आफिसक रजिष्टरपर ओकर पूरा नाम–पता नहि छल । चमेली कम्प्युटर टाइपिङ्गकऽ किछु पैसा कमइत छल । समान्यतया होस्टलक लड़कीकेँ ओकरासँ शिकायत रहैत छल । ओ बेसी समय चुप रहैत छल, ककरोसँ ओकरा कोनो सरोकार नहि रहैत छल । मुदा कहियो–कहियो छोटको बातपर लड़ि जाइत छल । गाड़ि पढ़ैत कोनो दिन स्वयं चिरचिराकऽ बरबराए लगैत छल । दोसर लड़कीसँ दूर नहि झगड़ा लगाबएबला बात वा नहि हँस्सी–मजाक सभसँ दूर रहैत छल । ओकरा कोनो ने कोनो समस्या अवश्य अछि । मैडम ओकरासँ बात करवाक कोशिसक क्रममे कोने ने कोनो बहन्ना बना एक–दू बेर अपना रुममे बजओलैन्हि । मुदा चमेली कोनो सन्तोषजनक उत्तर नहि देलक ओ मात्र हँ वा नहिमे जबाब दऽ दैक । किछु दिनक बाद चमेलीक रुमक एकटा लड़की आबिकऽ बाजल, ‘चमेलीकँे बहुत बोखार अछि ।’ मैडम तुरन्त ओकर रुममे गेलीह । बोखारसँ तड़पैत चमेली ओछाएनपर पड़ल छल । मैडम ओकर माथपर हाथ रखलैन्हि । माथ पूरे दहैकि रहल छल । ओकरा तुरन्त दवाइ पिअओलैन्हि । बोखार कम करबाक लेल मैडम ओकर माथ लग बैसिकऽ ठण्ढा पानिक पट्टि देबऽ लगलीह । बोखारसँ चमेलीक बेहोशी जेहन अवस्था छल । ओ बरबरा रहल छल, ‘मम्मीके घर जाएब’ घर जाएब, अपन घर जाएब । ओकर बात सूनिकऽ मैडमके हृदय कानि उठल । बेचारी असगरे अछि । एकरा घरो अछि कि नहि, घर जाए चाहैत अछि, माए बाबुके स्मरणकऽ रहल अछि । बेहोशीक अवस्थामे हृदयक बात मुँहसँ निकलि रहल छल । एकर घर तऽ अछिए नहि, कि एहिसँ पहिने एकर माता पिता कतौ बाहर छल वा ई एकर सपना अछि ? मैडम किछु बूझि नहि पाबि रहल छलीह । भोरमे बोखार कम छल मुदा चमेली बहुत कमजोर भऽ गेल छल । मुँह सुखा गेल छलै । आँखि धँसि गेल छलै । बाथरुमधरि जएबाक शक्ति ओकरामे नहि छलै । मैडम ओकर शारिरीक आ मानसिक अवस्था देखि सही इलाज कराएब अपन दायित्व बुझलैन्हि । हुनका साह डाक्टर दम्पति स्मरण अएलैन्हि । नोकरीसँ अवकाश पओलाक बाद ई दम्पति अपन नर्सिङ्ग होम खोलि लेने छल । डाक्टर पति पत्नी दुनू मैडमके मित्र छल । ओ सभ मैडमकेँ बहुत सम्मान करैत छल । चमेलीक उपचार डाक्टर सोनिया साह बढियाँ जकाँ कऽ सकत एकर पूर्ण विश्वास मैडमकेँ छल । मैडम डाक्टर सोनियाके चमेलीक विषयमे टेलिफोनपर कहलैन्हि आ चमेलीकेँ लऽकऽ नर्सिङ्ग होम पहुँचलीह । चमेली कमजोरी आ बोखारक थकानक कारण बेहोशी सन हालमे छल । डाक्टर ओकरा ठीकसँ जाँच कएलैन्हि । नर्सक सहयोगसँ ओकरा कपड़ा बदलाओल गेल । दवाइ आ इञ्जेक्शन देलाक बाद आश्वस्त भऽ डाक्टर सोनिया मैडम लग आबि बजलीह, ‘घवराएके कोनो आवश्यकता नहि अछि, कमजोरी बहुत अछि दू–तीन दिनमे ठीक भऽ जाएत, हम ओकरा एडमिटकऽ लेलहुँ अछि ।’ कनि रुकिकऽ डाक्टर सोनिया फेर बजलीह, ‘ओकरा गर्भपात कएल गेल अछि । एखनधरि ओ किछु कहबाक अवस्थामे नहि अछि । अपने जे कहलहुँ अछि ओकरा देखिते मानसिक शान्तिक लेल आवश्यक दवाइ शुरुकऽ देने छी । स्वस्थ्य भेलाक बादे ओकरासँ बात करब बढ़ियाँ हएत ।’ मैडमके कनी सोचमे पडैÞत सन देखलाक बाद ओ कहलीह, ‘अपने मैडम चिन्ता नहि करु हम टेलिफोनपर खबरि दैत रहब, अपने तीन दिनक बाद आउ आशा अछि ओ स्वस्थ्य भऽ जाएत । हमसभ एकरा बढ़ियाँ जकाँ ध्यान देब ।’ चमेलीकेँ अस्पतालमे छोड़िकऽ मैडम होस्टल चलि अएलीह । लड़की सभकेँ कहलैन्हि जे चमेलीकेँ बोखार अछि । अतः अस्पतालमे भर्ती करा देल गेल अछि, चिन्ताक कोनो बात नहि, तीन–चारि दिनक बाद ओकरा आनि लेब । एतेक कहिकऽ मैडम अपना रुममे चलि गेलीह । मुदा मैडमक मोनमे उथल–पूथल मचले रहल । चमेलीकेँ लऽकऽ अनेक विचार मस्तिष्कमे घूमि रहल छल । हुनका स्वयंपर विश्वास छल । अनुभवी नजरिसँ ओहि व्यक्तिकेँ परख सही छल वा कम उमेरबला चमेलीकेँ बुझऽमे तऽ नहि गल्ती भऽ गेल छलैन्हि ? चमेली खराब, वद्चलन, भूmठ अछि ई मानऽके लेल हुनकर मोन तैयार नहि छल । अनेक सम्भावना छल जे शायद केओ एकरा असगरे रहलाक कारण फाइदा उठा लेने हो वा काज देवाक लालच दऽकऽ एकर इज्जति लूटि लेने हुअए । मैडम सोचि रहल छलीह, ‘ चमेली वद्चलन तऽ नहि अछि, कारण ओकरा लग ने पैसा आ ने कपड़ा, गहना । एक दू–टा सलवार–कुर्ती अछि ओकरा भेटवाक लेल केओ अएबो नहि करैत अछि । नहि कोनो चिठ्ठी, नहि कोनो फोन ।’ तीन दिनक बाद चमेलीक विचारमे ओझराएल मैडम दैनिक काम–काज समाप्तकऽ अस्पताल पहुँचलीह । बेरीयाधरि डाक्टर सोनिया व्यस्ततासँ मुक्त भऽ जाइत छथि । मैडम चमेलीक रुममे पहुँचलीह, ओ ओछाएनपर सूतल छल । ओकर मुँहपर आभा चलि आएल छल । शान्त, असहाय चमेलीकेँ देखिकऽ मैडमके हृदयमे ममत्व चलि आएल छल । ओ चमेलीके माथपर स्नेहसँ हाथ रखलैन्हि, तखने चमेली आँखि खोललक । मैडमके दुनू हाथ कसिकऽ पकड़ि बाजल,‘ मैडम हमरा गलत नहि बुभूm । हम खराब नहि छी । हमरापर विश्वास करु हम कोनो गलत काज नहि कएने छी । रितेश चाहैत छलाह बच्चाकेँ पालन–पोषण बढ़ियाँ जकाँ होइक । हमरा सभ जकाँ तकलिफ ओकरा नहि होइक । आर्थिक अस्थिरता आ माए बापक प्रेम, वात्सल्य भेटैक सही माहौलमे बच्चाकेँ बढ़ियाँ जकाँ देखभाल होएबाक चाही ..........’ बहुत मुश्किलसँ एतेक कहि स्वयंकेँ सम्हारऽमे असमर्थ चमेली हिचुकि–हिचुकिकऽ कानऽ लगल । मैडम ओकर पीठ थप–थपओलैन्हि तऽ स्नेहिल स्पर्श पाबिकऽ चमेली किछु शान्त भेल । ओ बहुत किछु बाजऽ चाहैत छल । डाक्टर ओकरा किछु देर शान्त भऽ बैसबाक लेल कहलक । ओकरा चाह पिवाक लेल देलक, एकर बाद चमेली दिस तकैत कहलैन्हि, ‘देखू एहि बातकेँ बढ़ियाँ जकाँ बूझि लिअ हम सभ अहाँके शुभ चिन्तक छी । विना किछु नुकओने सभ किछु कहि देब यथा सम्भव हम सभ अहाँकेँ सहयोग करब ।’ डाक्टरक ई शव्द चमेलीकेँ किछु कहबाक हौशला बढ़ओलक । ओ बाजल, ‘मैडम हमही अहाँके सभ बात कहऽबला छलहुँ । अहाँ आ डाक्टर दिदी के छी हमरा बुझऽमे नहि आबि रहल अछि, अहाँ सभ हमरा बचएलहुँ अछि । मैडम अहाँ हमरा होस्टलसँ नहि निकालब हम प्रार्थना करैत छी, हम ओहिठाम बढियाँ जकाँ रहब । ककरो तकलिफ नहि देब । चमेली जे अपना विषयमे कहलक से सूनि मैडम आश्चर्य चकित छलीह । एहनो लोक होइत अछि । एतेक निष्ठुर, पत्थरक हृदयबला । बराबर देखऽमे अबैत अछि जे कुकुर–बिलाइयक वच्चा घरक सदस्य बनि जाइत अछि । पालतु जानवरसँ सेहो हम सभ जुड़ि जाइत छी । अगल–बगलकेँ बच्चा सेहो नीक लगाऽ लगैत अछि । एका–एक पालतु कुकुर–विलाइकेँ छोड़ि देबाक कल्पना असम्भव लगैत अछि । फेर एतऽ तऽ घरमे पलल एक दशकसँँ नित्य संग होइतो एहि लड़कीकेँ छोड़ि देब सोचिकऽ मैडम सिहरि उठलीह । ओ केहन माँ अछि वा माँ संज्ञा सेहे ओकरा लेल अनुचित अछि । की महिलाक एतेक स्वार्थीरुप सेहो भऽ सकैत अछि ? जाहि बच्चाकेँ पोसपुते किए नहि बनओने हुए मुदा अपन पुत्री तऽ मानने छल, अपन नाम तऽ देने छल, पाइल–पोसिकऽ पढ़ओने छल । ओहि बेटीकेँ बस स्टेण्डपर निर्ममतासँ छोड़ि देलक मैडम किछु देर सोचिते रहलीह । चमेली वीरगञ्जके सम्पन्न यादव परिवारमे पलल–बढ़ल छल । जतऽ ओ सामान्य आ सुरक्षित सहज वाल्यावस्था व्यतित कएने छल । भड़ल–पूड़ल परिवारक कौशिल्याकेँ बच्चा नहि होइत छल । बच्चा होएबाक कोनो सम्भावना नहि देखलाक बाद कौशिल्या अनाथाश्रमसँ दू वर्षक बच्चाकेँ अनने छलीह । ओहि बच्चाक नाम चमेली राखल गेल । अपन पितियौत भाइ–वहिनक संग चमेली बड़का भेल । प्रेम, संरक्षण आ संस्कार ओ पाबि रहल छल । परिवारक अन्य बच्चा जेकाँ एकरो लेल हरेक प्रकारक प्रवन्ध छल । ओ बुझैत छल जे ओकरा गोद लेल गेल अछि । मुदा एहि बातकेँ नहि कहियो नुकाएल गेल आ नहि कहियो उच्चारण कएल गेल । एकटा लम्बा समय बित गेल । चमेली एक–एक सिढ़ी चढैÞत यौवना अवस्थामे पहुँच रहल छल । बुद्धिमान चमेली ८मे पढ़ैत छल । आश्चर्यजनक रुपमे कौशिल्या ढलैत उमेरमे गर्भवती भऽ गेलीह, हुनका मातृत्वक आहट भेल । घरमे सभ खुशी छल । चमेली सहित सभ आँखि पथने छल । चमेली आ ओकर पापाकेँ खुशीके ठेकान नहि छल । समयपर कौशिल्या पुत्रकेँ जन्म देलीह । शायद एतहिसँ चमेलीके खराब दिन शुरु भेल । अपन कोखिसँ जनमल पुत्रकेँ पाबि कौशिल्या धन्य छलीह । ओ जोड़ल सम्बन्धकेँ तोड़बाक निर्णय कएलीह । एक दिन चमेलीके पापा कहलैन्हि जे चमेलीकेँ मुन्सीजीके सङे गाम जएबाक अछि मुदा, चमेली बूझि नहि पाबि रहल छल जे पढाइयक समयमे किए ओकरा पठाओल जारहल अछि । मुंसीजी तऽ हरेक समय कामकाजसँ घुमैत रहैत छलाह । गर्मी वा दुर्गा पूजाक छुट्टीमे बच्चाक मामा वा मौसी लग पहुँचबैत छलाह । मुदा असगरे मुंसीजीके संग जाएब चमेलीकेँ किछु जमि नहि रहल छल । ओकरा अस्वीकार कएलाक बाद मम्मी बहुत सम्झओने छल की दू–तीन दिनक बात अछि गाम जाएब जरुरी अछि । छोटका बेगमे दू–चारिटा कपड़ा राखिकऽ चमेलीकँे बिदा कऽ देल गेल । घरक सभ बच्चा मुंसीजीके कोरामे पलल–बढ़ल छल । तँए चमेली हुनका संग बिदा भऽगेल । ई यात्रा चमेलीक जीवनके धार बदलि देत ओकरा कि पता छल । मध्य रातिमे चमेली सूतल छल । तखने मुंसीजी ओकरा जगओलक । कोनो बस स्टैण्ड चलि आएल छल । जतऽ ततऽ लोक सूतल छल । बस स्टैण्डक एकटा कोन्हपर खाली बेञ्चपर मुंसीजी सुतऽ लेल कहलैन्हि आ ओकर माथ लग बसि रहलाह । दू घण्टाक बाद बस आएत से बिना कोनो आशंकाके चमेली सूति रहल । तखने मुंसीजी चुपचाप ओतऽसँ निकलि गेलैथि । बहुत समय बित गेल । माथ लग ठकठकके आबाज सूनिकऽ चमेली जल्दीसँ उठल, रौद आबि गेल छल । किछु देरक लेल चमेलीकँे किछु बुझऽमे नहि आबि रहल छल कि ओ कतऽ अछि । पुलिस किछु कहि रहल छल, लोक जम्मा भऽ रहल छल । पुलिस किछु गरैज रहल छल । चिचियाकऽ किछु पूछि रहल छल । मुदा ओकर भाषा चमेलीकेँ बुझऽमे नहि आबि रहल छल । मुंसीजीके कोनो अता–पता नहि छल । चमेली लग नहि पैसा छल आ नहि किछु । ओहि ठाम रहल पुलिस मुंसीजीकेँ किछु देर खोजलक आ जखन नहि भेटल तऽ चमेलीकेँ अनाथ आश्रममे पठा देलक । अनाथ आश्रममे चमेलीक हालत बहुत खराब छल । ओतऽके भाषा, वातावरण, भोजन सभमे बहुत अन्तर छल । ओ बूझि रहल छल जे कोनो दुर्घटनाक कारण मुंसीजी ओकरासँ अलग भऽ गेल अछि । पापा ओकरा लेबाक लेल तुरन्त एताह । घरपर सभ परेशान हएत । कानि–कानि कऽ बिताएल दिन निराशाक अन्हारकँे आओर घनघोरकऽ रहल छल । एतऽके काम करऽ बाली, रहऽ बला सभ मूर्ख आ गन्दामे रहबाक आदी छल । खुब गारि बाजि रहल छल । लड़की सभकँे पिटब समान्य बात छल । चमेली भयभित छल ककरो ओकरासँ सहानुभूति नहि छल । व्यवस्थापिकासँ चमेली किछु पुछैत छल तऽ कोनो ध्यान नहि दैत छल, उल्टे चमेलिएकेँ डाँटि दैत छल । ओ सभ कहैत छल, ‘कथिलए कनैत छेँ, जीवनभरि कनिते रहबेँ, तोरासँ भेटऽ केओ नहि एतहु, तोरा अपना लग राखबाक रहितहु तऽ छोडितहुँ किए ?’ चमेलीकँे एक–एक क्षण ओतऽ रहब मुश्किल भऽ रहल छल । मुदा समय ककरो लेल रुकैत नहि अछि । एक–एक दिन बित रहल छल चमेली हताश, निराश आ उदाश छल । अनाथ आश्रमक भोजन ओकर कण्ठमे नहि ससरि रहल छल । घरपर ओकरा अँचार, चटनी, तरकारी, माछ, माउस आ स्वादिष्ट भोजनसँ भड़ल थारी भेटैत छल । रसगुल्ला बिना ओकर भोजने पुरा नहि होइत छल । आश्रममे मोट–मोट काँच–पाकल दूटा रोटी, बिना स्वादक दालि वा तरकारी आ हप्तामे दू दिन एक बाटी भात भेटैत छल । ओतऽ रहऽ बला लड़की सभ ओकरा बहुत समझबैत छल । अपन भात चुपचाप चमेलीकँे देबाके कोशिस करैत छल । उएह लड़कीसभसँ ओकरा किछु सहानुभूति भेटैत छल । आश्रमके नियम अनुसार चमेलीकेँ विद्यालयमे नामांकन कराओल गेल । नेपाली माध्यमसँ ओकरा किछु बुझऽमे नहि आबि रहल छल । कोनो तरहें एस.एल.सी. पास कराओल गेल । आब चमेली परिस्थितिसँ सम्झौता करऽ चाहलक । मुदा अनाथ आश्रमक नियम अनुसार १८ वर्षक उमेर पुरा होइते अनाथ आश्रममे रहबाक अनुमति नहि अछि । एहि क्रममे ओ अपन पापाके कतेको पत्र पठओलक । मुदा कोनो उत्तर नहि अएलाक बाद अन्तिम प्रयासक रुपमे अपन मौसीकँे एकटा पत्र लिखलक । मौसीसँ चमेलीकँे बहुत स्नेह छल । मौसी एहि शहरक अनाथ आश्रमसँ सम्पर्क कएलैन्हि आ कहुनाकऽ होस्टलमे राखएबाक प्रयास कऽ देलैन्हि । जेठ बहिनद्वारा काएल गेल पापक प्रायश्चित छोट बहिन यानी मौसी एहि प्रकार कएलक । ई होस्टल स्वच्छ आ स्वतन्त्र छल । एहि ठाम रहैत काल चमेली कम्प्युटर टाइप सिखलक आ जल्दिए अपन पएरपर ठाढ़ हएबाक कोशिस करऽ लागल । १२ कक्षाक पढाइ सेहो शुरु कएलक । चमेली कम्प्युटर टाइपिङ्गके लेल जतऽ जाइत छल ओतऽ बेरियाक छुट्टीमे ओ खाली रहैत छल । ओतऽ छोट फुलवारीमे चमेली घण्टोधरि रहैत छल । फुलवारीक बाहर रिक्सा स्टैण्ड छल । ओ रिक्सा स्टैण्ड लग रितेश दैनिक अबैत छल । स्कूलक बच्चा साँझ चारि बजे जाइत छल । ओ १० बजे बच्चाकेँ स्कूलमे छोड़लाक बाद अहिना पुलवारीमे सुस्ताए अबैत छल । ओ चुपचाप चमेलीकेँ प्रत्येक दिन देखैत रहैत छल । रितेश ओकरासँ परिचय बढओलक । रितेशक अपनत्व आ सहानुभूति चमेलीकँे मलहमके काज कएलक । चमेली हुनकासँ घूलि–मीलि गेल । धीरे–धीरे ओ रितेशकँे अपन बितल घटना सुनओलक । रितेश सान्तवनो देलैन्हि, जीबाक इच्छा बढ़ओलैन्हि । स्वयं रितेश अपन काकाके घरमे रहि रहल छलाह । ओ चमेलीक पिड़ा बुझैत छलाह । एक समान दुनू एक दोसरकँे पसिन करऽ लागल । संसारक सताओल चमेली रितेशसँ अलग होबऽ नहि चाहैत छल । ओ रितेशकँे विवाहक पवित्र बन्धनमे बान्हयके लेल कहैत रहल, दिन बितैत गेल एहि क्रममे पेटमे बच्चा भऽ गेल । मैडम पुछलैन्हि, ‘तोँ वीरगञ्ज जाए चाहैत छेँ ? तोरा हम स्वयं लऽ जएबौ ।’ चमेली तुरन्त बाजल, ‘नहि मैडम, नहि हम वल पूर्वक ककरोसँ किछु नहि चाहैत छी । मुदा, मोन करैत अछि एक बेर हुनका सभसँ भेटकऽ पुछी जे, कोन अधिकारसँ ओ हमरा पोसलैन्हि आ फेर हमरा जनसागरमे भँसा देलैन्हि । हम जन्मसँ अनाथ छी । ओतहि पलितहुँ, एहि गन्दा वातावरणक असरि तऽ नहि पड़ितए । किए हमर विश्वासकेँ तोड़ल गेल ।’ ‘अनाथ आश्रमक अनुभव कि कहू, छोट उमेरमे हमरा अचानक संसारक सभसँ खराब दृश्य देखा देलक । हमर बुद्धिमता व्यर्थ भऽ गेल । महत्वपूर्ण शिक्षाक वर्ष वर्वाद भऽ गेल । यदि पहिलेसँ आश्रममे रहितहुँ तऽ अपन मार्ग दोसर हिसावसँ बढ़बितहुँ । हमरा कतहुके नहि छोड़लैन्हि ओ सभ । मौसी आ रितेश हमराजँ सहारा नहि देने रहितैथि तऽ या मरिगेल रहितहुँ वा पागलखानामे अवश्य पहुँच गेल रहितहुँ ।’ मैडम ओकर माथ सहलओलैन्हि । डाक्टर सोनिया बातके बदललैन्हि । ओ कहलैन्हि, ‘जे भऽ गेल से भऽ गेल एहि परिस्थितिसँ अहाँकेँ लड़बाक अछि । तीन–चारि दिन हमरा लग रहू । हम अहाँ आ रितेशक विषयमे अवश्य किछु सोचब । मैडम खोजिकऽ रितेशकेँ बजओलैन्हि । ओ सज्जन, मेहनती आ इमान्दार लड़का छल । दिन भरि स्कूलक रिक्सा चलबैत छल आ रातिमे पढ़ैत छल । स्नातकक पढाइके अन्तिम वर्षक छात्र छल । मैडम आ डाक्टर सोनियाक सल्लाहसँ रितेश चमेलीसँ बियाह कएलैन्हि । डाक्टर सोनिया चमेलीकँे अपन अस्पतालमे नोकरी देलैन्हि । आखिर चमेलीकेँ जीवनक एकटा किनारा भेटिए गेल । ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। सत्यनारायण झा डायरी बैसाख मासक बर महत्व छैक मुदा एहि बेर एहि मास मे असहनीय घाम भ’ रहल छैक |कइएक ठाम सं नोत  पता छल |ब्याह ,द्विरागमन ,उपनयन सं पूरा मिथिला पटल छल |घाम त’ बर रहैक ,तैयो दिनांक १४ ४ ०१२ जुड सि तल दिन बिदा भेलौ अपन देस,अपन गाम |गाड़ी लेलौ आ अपने चलबैत बिदा भेलौ |संग मे पत्नी रेणुजी रहथि आ पितयौत अनुज चि० जी० सुरेश जे पतरातु थर्मल कॉलेज मे शिक्षक छथि |ओ एक दिन पहिनहि आबि गेल छलाह |छह  वजे भोर मे बिदा भेलौ आ पहिल पराव दरभंगा मे छोट साढू डा० महादेव जी ओहिठाम छल जे हम सभ नौ वजे पहूँच गेलौ |एक तरह बुझू पहुनाइ प्रारम्भ भ’ गेल छल |जखन हमर ब्याह भेल रहय त’ हमर सारि कंचन झा मात्र दु सालक रहथि मुदा आब, आब त’ ओ बुढ़िया नानी जकाँ गप्प करैत छथि |कियैक नहि आखिर उमरो त’ पुरे तेतालीस  भ’ गेल छनि |काँलेज टीचर छथि तै गप्प हकबा मे पटु भ’ गेल छथि |सुन्दर चाह पियेलनि आ जलखइ त’ एहन सुन्दर बनेने रहथि जे मोन हुए आंगुर चटिते रही |दुनू बहिन मे नैहर क’ गप्प ततेक ने होमय लगलनि  जे बुझाय जे आइ एतहिये  ने रहय परय |जखन बहिन बहिन क’ भेट होयत छैक तखन दुनिया मे दोसर रहिये नहि जायत छैक |बस नैहर |से हम देखल गप्प तुरत खतम होयबाला नहि छैक| जलखइ क’  कने देह सोझ करय लगलौ ता आँखि लागि गेल |आँखि फुजल त’ देखैत छी बारह पर घड़ीक दुनू सूई छल |एम्हर देखल दुनू बहिनिक  गप्पक प्रबाह रुकबाक नाम नहि छल |बहुत कहला सुनला पर दुनू गोटाक गप्प रुकल |एम्हर पुनः आग्रह होमय लागल जे बसिया बड़ी खा लिअ|आइ जुड़सितल छैक |नहिये मानलनि दुटा बड़ी खाइए परल | मधुबनी २ बजे पहुचलौ |सुखद आनन्द भेल जे पचासी बरखक हमर सासु बालकोनी मे ठाढ़ हमरा सभक बाट तकैत रहैथि |पहुचते पहिने त’ माय ,बेटी क’ डटलखीन जे कतेक देरी क’ देलही |भोरे सं बाट देखैत छलियौक \फेर माय कहलखिन ,नहा ले आ फेर किछु खा ले तखन गप्प करिहे |स्नान त’ हम सभ पटने मे केने रही |  हिनकर छोटकी भाउजि ,विभा सरबत बनेलनि ,मैझली चाह बनेलनि आ जेटकी सरहोजि पुछलनि,ओझा ,आइ त’जुड़सितल छैक |ओहुना बरकी बौआ लेल बड़ी त’ बनेबे करितियनि |नैहर मे बेटी आबय त’ बड़ी सं स्वागत होयत छैक |से देखियौ जुड़सितल छैक तै बड़ीक त’ ई पावनिए छैक |ओहुना अहाँक सार कहलखिन्ह जे ओझा अबैत छथीन तै माछ त’ बनबे करय |से अहाँ आजुक दिन माछ खेबैक ?हम कहलियैन ,आहाँ केहन बताहि जकाँ गप्प करैत छी |आजुक दिन ज’ माछ भेट जाय त’ बुझू भरि सालक यात्रा बनि गेल |जल्दी थारी लगाउ |भोजनोप्रांत साझ मे मधुबनी सं अपन गाम पिलखवार चलि गेलौ | मधुबनी सं गाम गेलौ त’ रास्ता मे सड़क दीस ध्यान गेल |२००५ मे नीतीश जी पहिल बेर मुख्यमंत्री भेलाह आ एहि क्षेत्र सं श्री विनोद नारायण झा जीतलाह त’ एहि क्षेत्रक लोकक सुबिधा लेल रांटी चौक सं राजनगर तक पक्की सड़क बनायल गेल |मुदा चारि पाँच बरखक अंदर सड़क जीर्ण शीर्ण भ’ टूइट गेल अछि |एहि रोड पर एखन तक मेंटिनेन्स नहि भेल अछि |ई स्थित रहतैक त’ फेर १० साल पहिने वाला स्थिति भ’ जेतैक | गाम पहुँचलौ |दरवाजा लोक सभ सं पूरा भरल छलैक |मिन्टूक ब्याह काल्हि छैक |हमर पूज्य अग्रज श्री रघुबंश झा जी पहुँच गेल छलाह |अनुज सर्व नारायण जी सेहो उपस्थित छलाह |अन्य पितियौत सभ सभ ठाम सं आबि गेल छलाह |मास्टर साहेब बेटाक ब्याह छनि | मास्टर साहेब श्री अमरनाथ झा हमर पितयौत अनुज छथि |हम सभ भाई जखन कोनो काज मे पहुचैत छी त’ आनन्दक समुद्र मे नहाय लगैत छी |सभहक  आकर्षण हमर अग्रज रहैत छथि |हुनका दसटा लोक घेरने रहैत छनि आ ओ सुन्दर सुन्दर अपन गप्प सभ दैत रहैत छथिन |गुप्तचर अधिकारी छलाहे ,तै गप्पक कमी रहिते नहि छनि |गाम अबिते लगैत अछि जेना सभटा तनाव समाप्त भ’ गेल |अपन गाम ,अपन लोक , बचपनक बाल संगी सभ ,काकी ,काका सभ सं गप्प क’ मोन आनन्दित भ’ जायत अछि |एहि सं आनंदक बात आओर की हेतैक |बाल संगी यार जखन भेटैत अछि त’ मोन अनेरे प्रसन्न भ’ जायत अछि |भोर मे सभ कलम गाछी गेलौ |पूरा गाम आमरस भ’ गेल छैक |ब्रह्मस्थान मे पहिलुका बर –पाकरि गाछ एखनो याद भ’ जायत अछि |हमर प्रपितामह सुनाम धन्य नैयायकि पं० कैलाश झाक लगाओल ओ बर –पाकरि पूरा टोल क’ सितलता प्रदान करैत छलैक |मुदा एकदिन ओ बिहारिक वेग सहन नहि क’ सकल आ धड़ाम सं खसि परल |कतबो बाउंड्री परौक,मंदिर बनैक मुदा पहिलुका नैसर्गिक सुंदरता आब कहाँ ?दुर्गा घर विशाल बनि गेल छैक |मुदा दुर्गा स्थान आ माध्यमिक विद्यालयक जमीनक अतिक्रमण भ’ रहल छैक | आइ सवेरे सं चहल पहल छैक |साँझ मे मिंटूक  व्याह चचराहा गाँव मे हेतनि |बरियाती लेल सभ तैयारी क’ रहल छैक | उपेंद्रा सभक दाढ़ी मोछ कपचि रहल छैक |बगुला सन्  उज्जर  धोती  पहिर यार दलान पर पहुँचि गेल छैक |साँझ मे मार्शल आ सुमो सं वरियाती गंतब्य दिस बिदा भ’ गेल |रांटी ,मंगरौनी ,पिलखवार मिथिलाक प्राचीनतम गाम थीक |एखनो मिथिलाक संस्कृति एहि गाम सभ मे भेटत |शुद्ध मैथिली भाषा ,मैथिल भेषभूषा,आ मैथिल संस्कार एखनो एहिठाम जिबैत छैक |मैथिलीक गीत एखनो ललना सभ बर टोप टहंकार सं गबैत छथि |अयलै शुभ क’ लगनमा शुभे हे शुभे क’ संग वरियाती विदा भेल |मधुबनी सं जितवारपुर वेल्ह्वार सिविपटी होयत कलुआही चौक पहुचलौ आ नरार कोठी होयत चच्रराहा |सड़क कतौ ठीक नहि छल |बिहारक विकास एहि सभ ठाम नहि छैक | अखबार मे जे पढ़ैत छी ओ अखबारे तक छैक |हमरा गाम मे दु मास सं विजली देवी गुम छथि |ट्रांसफोर्मर जरि गेल छैक |पूरा गाँव जेनेरेटर सं लाइन नेने अछि |मधुबनी में १० वजे राति क’ बाद लाइन अबैत छैक \बिहारक विकास देहात मे देखायत |आखिर ई सरकार की क’ रहल अछि ? मैथिलक बरियातीक भोजन आब आधुनिक भ’ गेलैक अछि |पहिने कम बरियाती रहैत छलैक त’ स्वागतो सत्कार नीक होयत छलैक ,आब लोक की करत |जस्य जनारो तस्य गिर गिरी |पहिलुका बरियाती ,आह पुछू नहि |खाय मे आ खुआबै मे होर रहैत छलैक |सात्विक भोजन रहैत छलैक |आसन लगैक ,पात लगैक ,दोना मे सचार लगैक |मुदा आब ने ओ  लोक आ ने ओ कराह |आबक बौअया सभ क’ पुछियोन जे बिझकी केकरा कहैत छैक |सौजन केकरा कही |नहि कहता |मैथिलक अपन परम्परा छैक जे बर अल्प खर्च मे निमहि सकैत छैक मुदा आडम्बर बेसी भ’ गेल छैक |एक दोसर सं प्रतियोगिता भ’ गेल छैक |गरीबक बेटी कतबो संस्कारी रहय ,कतबो सुन्दर रहय ,ज  ओकरा  बाप क’ टाका नहि होयक त’ नीक ब्याह नहि होयतैक |मुदा टाका बाला अपन कुरूपो कन्याक ब्याह नीक सं नीक घर मे करैत छथि |ई समस्या मिथिले मे नहि पूरा देस मे पसरल अछि |एकर निदान सरकारे टा क’ सकैत अछि मुदा वोटक राजनीति नीक काज करहि नहि देतैक  |एकर परिणाम पूरा समाज भोगि रहल अछि |१० -१५ प्रतिशत क’ लेल ८० -८५ प्रतिशत कियैक कष्ट करत ? बरियाती मे पायर धोबाक परम्परा समाप्त भ’ गेल ओना आब पायर मे माटियो नहि लागल रहैत छैक |आज्ञाक डाला एखनो अबैत छैक |परिछनि सं ब्याह तक पहिलका आ एखुनका मे फर्क नहि |एकटा बात नीक देखल |बरियाती खा क’ तुरत चलि देलक |पहिने हमरा सभक गाम मे रहैक जे ब्याह भेलाक बाद बरियाती भोजन करैक आ भोजन क’ कनियाँ क’ सोहाग अर्थात आशीर्बाद द’ बरियाती तुरत बिदा भ’ जायक | खर्चक हिसाबे बरियाती ओही दिन चलि जाय से नीक ब्यबस्था |हमहू सभ ओही दिन भोर मे १६ ४ ०१२ क’ गाम चलि एलौ |सभ भरि दिन सुतले रहल |साँझ मे चाह पीबि बाध बोन घुमय चलि गेलौ |पूरा बाँध हरियर लगैत छल |शुद्ध वायु ,शुद्ध वातावरण | १८. ०४. ०१२ –आइ जूहीक ब्याह छैक |जुही हमर भगिनी छी |जरैल जेबाक अछि |जरैल बेनीपटीक नजदीके छैक |घरक बच्चा बच्चा जरैल जेतैक |२१ आदमी जरैल पहुचलौ |मधुबनी सं धकजरी तक नीक रास्ता छल मुदा धकजरी सं जरैल बहुत खराब रास्ता छल |बिजली ओहू एरिया में नहि छलैक |विकासक कोनोटा चिह्न नहि देखायल |बेनीपटी मधुबनी जिलाक एकटा अनुमंडल छैक |जरैल बेनीपटी सं ५-६ कि० मी० हेतैक |मुदा बर पिछरल |ब्याह नीक जकाँ संपन्न भ’ गेलैक |१९ ०४ .२०१२ क’ जरैल सं पुनः गाम चलि अयलौ | एक दिन २१.०४.२०१२ क’ कपिलेश्वर स्थान गेलौ मुदा रोड बर खराब | रहिका प्रखंड कार्यालय देखबाक मोन भेल |११ वजे तक कियो नहि आयल छल |प्रखंड कार्यालय मे विकासक नहि गंद्गीक वयार बहैत छल| पता चलल जेकरा जखन मोन हेतैक  आबि जायत ,बेसी कर्मचारी भागले रहैत छैक |सेवा यात्राक बढ़िया प्रभाव छैक | गाम पर २३.४.२०१२ ,२५ .०४ .०१२ क’ फेर कइएक ब्याह,द्विरागमन छलैक मुदा हम गामे रहलौ |गमैया भोज खेलौ |आ भोरे २६.०४ ०१२ क’ मधुबनी पहुचलौ |आइ आयूषक उपनयन मे विष्णु –बरुआर जेबाक छैक |आयुष हमर ज्येष्ठ सार श्री प्रमोद जीक नैत छनि अर्थात अलकाक पुत्र |अलकाक बर इच्छा जे हम सभ उपनयन मे बरुआर आबी |अपनो इच्छा छल जे बरुआर जाय |बरुआर मधुबनी सं ४० कि० मी० छैक |समस्त परिवार क’ जेबाक रहैक |तीन टा गाड़ी सं हम सभ बिदा भेलौ |मधुबनी ,राजनगर ,पिपराघाट , बाबूबरही होयत मिर्जा पुर चौक पहुचलौ |एतबा दुर नीक सड़क छलैक |मिर्जापुर सं बरुआर ४-५ कि० मी० छैक |४ -५ कि० मी० एहन बिकट मार्ग रहैक जेकर वर्णन कइए  नहि सकैत छी |पैघ पैघ खाधि ,उभर खाभर रास्ता |बाबा आदम ज़माना क’ वाट |लागे नहि जे पहुचब|मुदा पहुचलौ |अलकाक घर पुस्तैनी छलैक |वाटक दर्द दरवाजा पर आबि बिसरा गेल |लागे जेना कोनो पिकनिक स्पॉट पर आनन्द ल’ रहल छी |गाम मे एकटा विष्णुक सुन्दर मंदिर छैक |कुल मिलाक’ बरुआरक यात्रा सुखद छल |ओही दिन ११वजे रात्रि मे वापस मधुबनी आबि गेलौ |२७ .४ .२०१२ क’ आराम केलौ आ २८ .४.२०१२ क’पटना वापस भ’ गेलौ |   ई डायरी लिखबाक किछु उद्येश्य अछि |मिथिलाक कइएक गामक भ्रमण कयल |कतेक लोक सभ सं भेट भेल |मिथिलाक विकासक अवलोकन कयल |सरकार एहि बेरक टेन्योर में लोक के खाली परतारि रहल अछि |पाँच साल पहिने जे काज जाहि स्थिति में रहैक ओहिना छैक |जे काज रोडक भेल छलैक ओहो टूइट रहल छैक |ग्रामीण क्षेत्रे नहि मिथिलाक कोनो शहर में विजली नहि |उद्योग धंधा बंद छैक |बच्चाक स्कूल ठीक सं नहि चलैत छैक |मिथलाक हृदयस्थली मधुबनी छैक आ मधुबनीक हृदयस्थली पंचकोसी छैक \ रांटी ,मंगरौनी ,पिलखवार पंच कोसीक हृदय छैक ,जतय सं मिथिला ,मैथिली भाषाक विकास भेलैक |ओ तीनू गाम मधुबनीक सटल छैक मुदा ने सड़क ,ने विजली ,ने नहर ,ने बढ़िया स्कूल –किछु नहि |मुदा सरकारी तंत्र ढोल पिटैत अछि |हमरा जबाब चाही ,हमरा हिसाब चाही | ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। अतुलेश्वर मिथिला राज्य आन्दोलन आ शहीद रञ्जु झा मिथिलाक जनमानसमे एकटा आस जागल छल जे यदि नेपालमे मिथिला राज्यक निर्माण होइत अछि तँ एकर प्रभाव भारतमे सेहो पड़त। एहि विषय पर अपन-अपन विचार आ प्रभावक बारे मे टीका-टिप्पणी भ रहल अछि । ज्ञातव्य अछि जे नेपाल मे मिथिला राज्यक विरुद्ध षडयंत्र कयला पर नेपालक मैथिल जनता एकर विरुद्ध अपन स्वर उठौलन्हि। हुनका लोकनिक  पहिल डेग छल शान्तिपूर्ण ढंग सँ अपन गप्प सरकार ओ सांसद लोकनिक समक्ष राखब आ संगहि जनमानसमे एहि प्रति भावना जागरूक करब। हुनका सभक एहि प्रयासकेँ जनताक सकारात्मक सहयोग भेटब प्रारम्भ भेलासँ किछु स्वार्थी तत्त्वकेँ बहुत जोरसँ धक्का लगलनि आ तकरहि प्रतिक्रियामे विगत जानकी नवमी दिन चलि रहल शान्तिपूर्ण धरना कार्यक्रममे एक अतिवादी उग्रवादी संगठन द्वारा बम विस्फोट कएल गेल, जकर कतबो निन्दा कएल जाए, कमे होएत। हमरा जनैत ई कार्य मिथिला राज्य आन्दोलनकेँ शिथिल करबाक लेल कयल गेल छल । कारण मैथिलक विषय मे लोकक ई भावना छनि जे ओ जतेक बजैत छथि ओतेक कए नहि पबैत छथि, मुदा मिथिला राज्यक लेल चलि रहल आन्दोलनमध्य आन्दोलनी मैथिलक मानसिकता देखि स्वार्थी तत्त्वकेँ डर पैसि गेलनि, ओ सभ सोचबाक हेतु बाध्य भए गेलाह जे आइ धरि जे किछु सुनि रहल छलहुँ ओ हमरा लोकनिक भ्रम छल। हुनका सभकेँ एतबा डर पैसि गेलनि जे संघर्षक अन्तिम चरणमे पहुँचि मारि-काट पर उतरि गेलाह। स्मरण अबैछ ओ क्षण, जखन हम बम विस्फोटक समाचार कान्तिपुर नेपाली दैनिक मे पढ़लहुँ, तँ रोइयाँ ठाढ़ भए गेल आ सोचबाक हेतु बाध्य भए गेलहुँ जे कि शान्तिपूर्ण आन्दोलनक ई गति उचित? सङहि स्मरण भए उठलाह मिथिला राज्य संघर्ष समितिक अध्यक्ष प्रा. परमेश्वर कापड़ि, जनिका फोन कए मात्र ई पूछलियैन्ह जे- ‘ई की?’ । एहनो विकट परिस्थितिमे हुनक धैर्य आ साहसपूर्ण शब्द सुनि हमर मोन किछु क्षणक लेल भावुक भए भेल, मुदा एकटा योद्धाकेँ समक्ष पएबाक गौरव बोध सेहो भेल। हुनक वक्तव्य छल- ‘ई मात्र धरना पर बैसल लोक पर कयल आक्रमण नहि छल, ई छल सम्पूर्ण मैथिल पर कयल आक्रमण। जेकर जवाब हमरा लोकनि अपन अधिकार लऽकऽ देखयबाक लेल संघर्षमे गति आनब।’ एहिना जखनि कान्तिपुर क संवाददाता आ नेपाली मैथिली साहित्यकार प्रा. श्याम सुन्दर शशि सँ,  जनिका सङ हमर पारिवारिक संबंध अछि आ माँक आदेश पाबि हुनक खोज खबरि लेल, तँ ओ मात्र एतबे कहलनि- ‘जे एहि लेल शहादत दिअ पड़तैक बौआ’। एहि तरहक उक्ति सुनि हुनका लोकनिक प्रति श्रद्धा सँ माथ झुकि गेल। सम्पूर्ण घटना आ षडयंत्र पर विचार कएलाक पश्चात हमर धारणा इएह बनल जे ई सांस्कृतिक अस्मिता समाप्त करबाक षडयंत्र छल। जगत्जननी सीताक ई भूमि युग-युगसँ श्रेष्ठ सांस्कृतिक क्षेत्र रहल अछि, इएह श्रेष्ठता किछु गोटएकेँ सह्य नहि भए रहल छनि। ओसभ एहि क्षेत्रक विरुद्ध सामाजिक आ सांस्कृतिक रूप सँ किछु नहि क सकलाह, तखन क्षुद्र राजनीतिकेँ अपनएबाक विचार कए एहि तरहक घिनाएल कार्य कएलनि। एही क्रममे वृहत्त मधेशक सपना देखा मिथिलाक नाम मिटेबाक प्रयत्न कयल गेल। एहि प्रकारक राजनीतिक षडयंत्रक बीच मिथिला अपन अस्तित्वक लेल लड़ि रहल अछि, मुदा बाँचत कि नहि ओ हम नहि कहि सकैत छी।  हमर एकटा मित्र छथि मणिपुरक डा. लोंगजम आनन्द सिंह, जखनि हुनका सँ मिथिला राज्य आ मैथिली भाषाक विषयमे चर्चा कएल तँ ओ कहलनि जे – अहाँक कहनाम आ वर्तमान अध्ययनक अनुसारे हम कहि सकैत छी जे  मिथिला आ मैथिलीक संग ई दूर्भाग्य भ गेलैक जे ओ जाधरि अपन स्वतंत्रता अक्षुण्ण रखने रहल ताधरि कतेको प्रदेशक भाषा, साहित्य  आ संस्कृतिकेँ प्रभावित करैत रहल, मुदा जहिया सँ ओकर राजनीतिक प्रभाव क्षीण होइत गेलैक, ओ एकटा वृहत्त संरचनाक माँझमे फँसैत गेल आ आइ अपन भाषा आ क्षेत्रक अस्मिता बचेबाक लेल लड़ैत देखल जा रहल अछि। एहि दुर्भाग्यकेँ समाप्त करबाक लेल सर्वप्रथम अपन राज्यक स्थापना दिस सम्पूर्ण मैथिल लोककेँ अग्रसर होएबाक चाही।- हुनक ई कथन हमरा नेपालमे मिथिला राज्यक लेल संघर्ष क रहल मैथिल जनताक सोच मे समानता देखौलक। कहि सकैत छी जे ओ लोकनि पुनः अपन अस्मिता आ पूर्वमे मिथिलाक संग कयल गेल व्यवहार प्रति सचेष्ट भए उठलाह अछि आ सद्य:घटल घटनासभसँ आओर बेसी उर्जा प्राप्त करताह। आइ धरि हमरा जनैत राजा शिवसिंह आ हुनक मैथिल सिपाही केँ छोड़ि केओ मैथिल मिथिला राज्यक लेल शहीद भेलाह अछि से हमरा बुझल नहि अछि। मुदा एहि बेर मैथिल जनता अपन धरती पर डटि संघर्षक मार्ग धएलनि आ ओहि यज्ञ मे अपन प्राणक आहूति तक दए देलन्हि। हम प्रत्येक शहीदक प्रति नमन व्यक्त करैत छी, ओसभ अनचिन्हार होयतहुँ चिन्हार छलाह कारण ओ सभ मैथिल छलाह,  मुदा ओहि प्राण आहुति देनिहारि एकटा शहीद, जनिका हम मात्र मैथिलक रूपमे नहि, एकटा संघर्षशील कलाकारक रूपमे जनैत छलहुँ, छलीह शहीद रञ्जु झा। जनकपुर मे रहबाक समय वा कालक्रममे कखनो जयबा काल हुनका सँ भेंट निश्चय होइत छल मुदा बेसी परिचय नहि, कारण ओ एकटा नाट्यकर्मी छलीह आ हम छलहुँ एकटा शोधार्थी, जे अपन कम सँ कम शोधक समय अपन विषय सँ इत्तर जएबाक प्रयास नहि करैत रही, आर जे करैत होथु मुदा हम इएह करैत छलहुँ। मिनाप मे एकटा सशक्त महिला कलाकारक नाम छल रेखा कर्ण आ रेखा कर्णक पश्चात सभसँ लगनशील आ कर्मशील महिला कलाकार हमरा मिनाप मे देखाएल छलीह रञ्जु। हुनक विषय मे बहुत किछु एहि सँ पहिने पढ़ने छलहुँ आ सुनैत छलहुँ आ जहिया सँ शहीद भेलीह तँ आर बेशी हुनक विषय मे जानल । मुदा जखनि हम हुनक विषय मे पढ़ैत छलहुँ तँ हमर मोन मे अनायास एकटा भावना आयल छल जे एहि बेर जनकपुर जायब तँ निश्चय हुनका सँ भेंट करब, आ एकटा रंगकर्मीक जीवन पर उपन्यास लिखबाक प्रयास करब। कारण हमरा लोकनि बहुत किछु एहि दुआरे नहि क पबैत छी जे एहि लेल अर्थ चाही , व्यवस्था चाही, एहन परिस्थितिमे कोना होएत, मुदा रञ्जु मिथिला सन परम्परावादी सोचक तीर्थ स्थान मे अपन उद्देश्य आ लक्ष्य पूरा करैत रहलीह। एहि लेल हुनका कतहुँ भेटैत छलनि मान तँ कतहु अपमान। मुदा ओ एकटा उपन्यासक कथा नायिका जेकाँ डटल रहलीह, कतहु ओहि मे ब्रेक नहि, सहज-निर्मल धार जेकाँ बढ़ैत। हमरा सभक जीवनमे जखनि कठिनता अबैत अछि आ ओहि सँ लड़बामे अपनाकेँ सामर्थ्यहीन भपैत छी,  तखनि एहन–एहन मैथिलक जीवनसँ ऊर्जा भेटैत अछि, ओहि समस्यासभसँ लड़बा लेल सशक्त मानसिकताक जन्म होइत अछि। जहिना सीताक चरित्र एखनहुँ हमरासभक लेल आदर्शतम रुपमे उपलब्ध अछि, ठीक तहिना रञ्जु सेहो सम्पूर्ण मिथिलाबासीक हृदयमे बसतीह। रञ्जु भौतिक रुपेँ अपन शरीरकेँ त्यागि देल, मुदा हुनक आत्मा मिथिलाक बसात, पानि, ओकर परिवेश आ लोकक आत्मा मे जीबैत रहत सदिखन। एतए डा. धीरेन्द्र क ओहि पाँतिक, जाहिमे नारीक आदर्शतम रुपकेँ प्रतिष्ठापित कएल गेल अछि,  सङ शहीद रञ्जूक प्रति श्रद्धांजलि व्यक्त करैत छी- नारी थिक आधार पुरुषकेर , जाहि रूपमे देखी, जनना, भगिना, मित्र, पत्नी वा दुहिता लए पेखी। नारी थिक पर्याय ममत्वक,सहनशीलता भारी जते बतहपन पुरुष करैए, सहए सदासँ नारी। सर्वंसही धरती थिक नारी, आर पुरुष आकाश, जे वर्षण कए अपन मोनसँ उपजबैत अछि चास। नारी पुरुषक कागज थिक जइ पर लिखइछ ओ कविता, नारी शितल चन्द्र-ज्योत्सना रहओ ओना नर सविता।। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। चंदन कुमार झा सररा, मदनेश्वर स्थान मधुबनी, बिहार विहनि-कथा सद्गति अनहेर भ गेलै......कोना के आब कटतै ओकर परिवारक दिन......? कंठ लागल बेटी छै घर मे...... दू टा संतान मे बेटीए जेठ छै......कोना हेतइ ओकर बियाह? किशन..असेसरक बेटा ...चौदहे बरखक छै.......कोना के सम्हारतै घर.? कोना करतै बहिनक बियाह......?बेशी जथो-पात नहि छै जे बेच लेत. पाँचे कट्ठा खेत छैक. ओकरो यदि बेच लेत तखन खेतै कथी.? अनेको प्रश्न..अनेको मुँह...सगरो संवेदना...सगरो गाम एकहि टा' बात..जुलुम भ' गेलै........भरल जुआनी मरि गेल असेसर......चालीसे बरखक अबस्था मे...नहि जानि कोन बेमारी धेलकै..ओह ....कन्नारोहट...नहि देखल जाइछ किशुनमा मायक कानब..हे भगवान...ई की भइ गेलै.....? हाक-डाक छै......के जेतै कठियारी......एगारह गोटे हिम्मत क के विदा भेल. आगाँ-आगाँ किशन हाथ मे आगिक कोहा नेने विदाह भेल...मुखाग्नि देलकै..धधकि उठल अछिया..कक्का .....हबोढकार भ' कानय लागल किशुनमा हमरा कान्ह पर मूड़ी रखने...संतोष बान्ह.....नहि भेल एहि सँ आगाँ किछु कहल हमरो..कंठ बाझि गेल जेना. तीन दिन बीतल..बैसार छै आइ..कोना हेतै काज..गंगे कात मे बढ़िया हेतै-कहलियै हम."नहि-नहि, ई ठीक नइ हेतइ"- चट द' कहलखिन्ह पढुआ कका. चुप भ' गेल रही हम."कनिञा, अहाँ कोनो तरहक चिन्ता नहि करू..हमरा लेल जेहने हमर अप्पन बेटा-पुतोहु अछि तहिना अहूँ छी. हम करबइ असेसरक श्राद्ध. ओकर श्राद्ध गामे मे हेतइ. अहाँक जतेक खर्च करबाक हो से करू. अहाँक जे केने संतोष भेटै से करू. कोनो तरहक बिथुति नहि रहतैक." -असेसरक कनिञा के कहलखिन्ह पढुआ कका. केबारक अढ़ मे बैसलि किशुनमा माय आ' दरबज्जा पर बैसल किशन, किछु नहि बाजल रहय. "हाँ-हाँ, नीक जेकाँ श्राद्ध त' हेबाके चाही जाहि सँ मृतक के सद्गति प्राप्त हो"- बजलथि पण्डित कका. पंचदान श्राद्ध आ दुनू साँझ सौजनिया होयब निश्चित भेल.एकादशा......द्वादशा...बड़..बड़ी..पचमेर..बड्ड नीक काज भेलइ. जेहने पवित्र असेसरक मोन रहैक तेहने पवित्र काज भेलै.सभ सामग्री एक पर एक..... जस दैत नोतहारी....सौँसे गाम. माछ-मौसक प्रात, आगाँ-आगाँ किशुन आ' पाछाँ ओकर माय के चौक दिस सँ अबैत देख मोन मे शंका भेल.लग अबितहि पुछलियै-कत' सँ अबैत छह.? "झंझारपुर सँ"-कहलक किशुन.मोनक शंका आओर बढ़ि गेल. तखनहि पाछाँ सँ पढ़ुआ कका के अबैत देख सभ शंका दूर भ' गेल छल.रजिस्ट्री आफिस सँ?...मुँह सँ बहरा गेल हमरा..मूड़ी झुका लेलक किशुन..किशुनक हाथ मे झुलैत रसगुल्ला भरल पन्नी देख अनायास मुँह सँ बहरा गेल-"सद्गति भेट गेल असेसर के". ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। डॉ. कैलाश कुमार मि‍श्र कथा चन्‍दा राघवकेँ चन्‍दाक संगति‍ सोहनगर लगैत छलन्‍हि‍। राघव आ चन्‍दा समवयस्‍क रहथि‍- लगभग पंद्रह बर्खक। दू-चारि‍ मासक दुनूमे कि‍यो छोट तँ कि‍यो पैघ। चन्‍दा छलीह सांवरि‍, सुन्‍दरि‍। शरीरसँ पुष्‍ट मुदा लोथगर नै। सांमरि‍ चाम मुदा चमकैत। आँखि‍ मध्‍यम कदक मुदा रसगर। ठोर मोट मुदा चहटगर। नाक पातर आ नोक लेने। शायद राघव केर दृष्‍टि‍मे सुन्‍दरताक नीक वि‍वरण यएह छलन्‍हि‍। चन्‍दा छलीह चंचल, कनीक ठसकसँ भरल आ ऐ गुमानमे तनल जे ओ दबंग पि‍ता एवं दबंग परि‍वारसँ छथि‍! चन्‍दाकेँ केवल दू बहि‍न आरो छलथि‍न्‍ह। एक्को भाइ नै। ताहि‍ चन्‍दा अपने-आपकेँ बेटा बुझैत छलीह। पन्‍द्रहम वयसि‍मे अएलाक उपरान्‍तो चन्‍दा अपन उन्नत वक्षकेँ नै झपैत छलीह। ऐमे हुनक उदेस अपने-आपकेँ कामुक बनेबाक नै छलन्‍हि‍ बल्‍कि‍ बेटा जकाँ बेटी छथि‍ तइ बातक गुमान! मुदा जुआनीक दरबज्‍जा खटखटबैत वक्ष, नाक, आँखि‍क गुमानसँ की मतलब! चन्‍दाक गुमानमे हुनकर शारीरि‍क अंग अपन कामुकताक भावकेँ अनेरे  प्रदर्शन करए लगैत छलन्‍हि‍। आर-तँ-आर चन्‍दा राघव एवं अन्‍य समवयस्‍की छौड़ा सभ संगे कखनो कबड्डी तँ चोरा-नुक्की खेलाए लगैत छलीह। जखन कबड्डी खेलाइत छलीह तँ चेतऽकऽबऽड्डी..... डी...डी...डी... करैत हुनकर वक्ष सेहो शब्‍दक लयक संग संगीतक धूनमे मस्‍त भऽ ऊपर-नीचा होमए लगैत छलन्‍हि‍। जेना चन्दा रंगमंचक कुनो नर्तकी होथि! कतेको बेर जखन चन्‍दा कबड्डी पढ़ैत राघव दि‍स अबैत छलीह, राघवकेँ मारबाक हेतु तँ राघव चन्‍दाकेँ पकड़बाक प्रयास करैत छलाह। प्रयास ई जे चन्‍दाक सांस टूटि‍ जाइन्‍हि‍। मुदा चन्‍दा ऐ प्रयासमे जे बि‍ना सांस तोड़ने राघवकेँ छू ली, आ बि‍ना राघवक चंगुलमे कबड्डी पढ़ैत अपना दि‍सि‍ आपस भऽ जाइ। एक-आध बेर चन्‍दा अपन रणनीति‍मे सफलो भेलीह। मुदा अन्‍तत: छलीह लड़की। केना सकतथि, राघवक ठोस, बलीष्‍ठ कद-काठीक समक्ष? अधि‍कतर समैमे राघव चन्‍दाकेँ पकड़ि‍ लैत छलथि‍न्‍ह। आब चन्‍दा राघवसँ अपने-आपकेँ छोड़ेबाक हेतु पूरा प्रयास करैत छलीह। राघव सेहो अपने-आपकेँ ऐ प्रयासमे लगा लैत छलाह जे बि‍ना सांस टुटने चंन्‍दा नै छुटथि‍। ऐ नोक-झोकमे बि‍ना कुनो गलत भावनाकेँ कतेको बेर छीना-झपटी करैत राघव केर हाथ अनायास चन्‍दाक वक्षपर लागि‍ जाइत छलन्‍हि‍। चन्‍दा बुझैत छलीह जे राघव कुनो दोसर वि‍चारसँ ई सभ नै कऽ रहलाह अछि‍। तँए चन्‍दाक मुँहपर कुनो तामस, लज्‍जाक भाव, प्रति‍कार, घृणा आदि‍क भाव नै अबैत छलन्‍हि‍। बि‍ल्‍कुल स्‍वभावि‍क रहैत छलीह। मुदा कहि‍ नै कि‍एक राघवक कठोर हाथक स्‍पर्शकेँ अनुभव करैत छलीह। हुनका कि‍छु-कि‍छु होमय लगैत छलन्‍हि‍। आँखि‍ अनेरे आनन्‍दाति‍रेकमे मुना जाइत छलन्‍हि‍। की होइत छलहि‍ तकरा ओ शायद केवल अनुभव कऽ सकैत छलीह, ओकर बखान शब्‍दक माध्‍यमसँ संभव नै। एहने हालति‍ राघवोकेँ होइत छलन्‍हि‍। नहु-नहु  राघवकेँ एना लागए लगलन्‍हि‍ जेना चन्‍दाक वगैर जीवन अर्थहीन हुअए। चन्‍दासँ जइ दि‍न राघव भेँट नै करथि‍ तइ दि‍न मोन खि‍न्न भऽ जान्‍हि‍। चन्‍दा सेहो राघवसँ ओतबे सि‍नेह करैत छलीह। मुदा राघव आर चन्‍दाक सि‍नेह छल नि‍श्‍छल! राघव छलाह आर्थिक रूपसँ वि‍पन्न ब्राह्मण कूलक बालक। एकर ठीक वि‍परीत चन्‍दा छलीह एक सुभस्‍य ब्राह्मण कन्‍या। चन्‍दाक पि‍ताकेँ तेरह बीघा ठोस खेतीहर जमीन आ खूब नीक लगानी केर कार्य चलैत छलन्‍हि‍। चन्‍दाक पि‍ताक नाओं छलन्‍हि‍ बुलेसर। बुलेसर बलंठ छलाह। छह फूट्टा मर्द, पहलवान, केवल अपन नाओं आ संख्‍याक ज्ञान छलन्‍हि‍। लगानीक ललका बहीकेँ कऽ टऽ कऽ लि‍खैत-पढ़ैत छलाह। गरीब लोक सभकेँ सूदि‍पर टाका दैत छलथि‍न्‍ह‍। बन्‍धकमे गहना, वर्तन, जमीनक कागत इत्‍यादि‍ राखि‍ लैत छलथि‍न्‍ह। सूदि‍क दरसूदि‍ जखन गरीब लोक सभ आसीन-काति‍क मासमे भूखे मरय लगैत छल तँ बुलेसर बाबू ओतए सबैया-डेओढ़ापर धान अथवा आन अन्न लेमय जाइत छल। बुलेसर बाबू अपने हाथे अन्न जोखैत छलाह। एक मोनक बदला हमेसा 38 सेर दैत छलथि‍न्‍ह। ओहूमे अनाजमे धूल-माटि‍ मि‍लल। छाँटल पखरा अथवा आन कुनो मोटका धान। आ लेबय काल एक मोनक बदला 41 सेरक आसपास लैत छलाह। कतेको लोक पाइ दैयो दैत छलन्‍हि‍ तैयो अपन लगानीक ललाक बहीसँ नाओं कटैत छलथि‍न्‍ह। चारि‍-पाँच बर्ख चुप भऽ जाइत छलाह। फेर एकाएक एक दि‍न बही लऽ कऽ ओइ व्‍यक्‍ति‍क घरपर महाजन बनि‍ पहुँचि‍ जाइत छलाह, तगेदा हेतु। बेचारा परेशान! मुदा अपन बलंठीसँ चूर बुलेसर बाबू ओइ व्‍यक्‍ति‍केँ गरदनि‍ अपन गमछासँ जकड़ि‍ लैत छलाह। फेर ओकरा लाचार कऽ दैत छलथि‍न्‍ह पंचैती बैसेबाक लेल। पंच की तँ छह-सात चमचाक दल। सभ बुलेसर बाबूकेँ हँ-मे-हँ मि‍लबैबला। सभ हुनके सबहक बात कहएबला। बेचारा असहायक बातकेँ के सुनैत अछि‍? लाचार कऽ ओइ व्‍यक्‍ति‍सँ ओकर जमीन आर गहना इत्‍यादि‍ हथि‍या लैत छलाह। अही प्रक्रि‍यासँ चारि‍ बीघासँ तेरह बीघा जमीन भऽ गेल छलन्‍हि‍ बुलेसर बाबूकेँ। एकबेर तँ बुलेसर बाबू एहेन काज केलन्‍हि‍ जेकरा लोक अखनो धरि‍ नै बि‍सरल अछि‍- नृशंसकारी, जघन्‍य, हत्‍या समान, बल्‍कि‍ साक्षात हत्‍या! एना भेलैक जे टुनटुनमा मलाह बुलेसर बाबूसँ अपन पत्नीक इलाजक हेतु तीन सए टाका सूदि‍पर लेलकन्‍हि‍। ई कहि‍ जे छह मासमे सूदि‍क संग आपस कऽ देतन्‍हि‍। मुदा कि‍छु कारणवश एक बर्ख धरि‍ आपस नै कऽ सकलन्‍हि‍। एक दि‍न प्रचण्‍ड जाड़सँ कपैत टुनटुनमा राघवक दरबज्‍जापर आबि‍ राघवकेँ पि‍तामह संगे घूर तापि‍ रहल छल। तमाकूल चुना राघवक पि‍तामहकेँ देलकन्‍हि‍ आ अपनो खेलक। कि‍छु कालक बाद अपन एक लठैतक संग बुलेसर बाबू सेहो राघव केर दरबज्‍जापर घूर तापअ आबि‍ गेलाह। टुनटुनमाकेँ देखैत मातर हुनका तामस चढ़ि‍ गेलन्‍हि‍। वि‍भत्‍स गारि‍ देमय लगलथि‍न्‍ह ओकरा - “रौ बहान ...ोद! तूँ एखन धरि पाइ आपस नै केलयँ?” टुनटुनमा कहए लगलन्‍हि‍- “मालि‍क! हमर हाथ तंग अछि‍। बेटा कलकत्तासँ आबैबला अछि‍। अबि‍ते मातर दऽ देब, बि‍थुत नै करब।” मुदा बुलेसर बाबूक तामसे दुर्वाक्षा बनल छलाह। आरो गारि‍ पढ़ैत गमछा टुनटुनमाकेँ गरदनि‍मे फँसा उठा लेलथि‍न्‍ह। टुनटुनमा लाचार भऽ घेँघयाए लगल। बुलेसर बाबू सोहाइ चमेटा ओकरा ओकरा कानक जाड़ि‍मे मारलथि‍न्‍ह। हे भगवान! जाड़क मास, बुढ़ शरीर, भुखाएल पेट, जीने काया, बेचारा टुनटुनमाक कानसँ खून बहए लगलैक। मुदा तखनो बुलेसर बाबूकेँ संतोष नै भेलन्‍हि‍। गमछासँ टुनटुनमाकेँ घि‍सि‍याबए लगलाह। ई देखि‍ राघवकेँ पि‍तामहकेँ भेलन्‍ह जे कहीं टुनटुनमा हुनके दरबज्‍जापर नै मरि‍ जान्‍हि‍। ओ बीचमे आबि‍ गेलाह आ कहखि‍न्‍ह- “हौ बुलेसर! ई हमरा दरबज्‍जापर आएल अछि‍। मरि‍ जएतैक। अतए कि‍छु नै करहक।” ऐ बातपर बुलेसर बाबू कहलखि‍न्‍ह- “ठीक छै कारी कक्का, हम ऐ सार मलहाकेँ धोबि‍या गाछी लऽ जाइ छी।” ई कहि‍ टुनटुनमाक गरदनि‍मे फँसाओल गमछा घि‍चैत धोबि‍यो गाछी दि‍सि लऽ गेलन्‍हि‍। ‘मरता क्‍या नहीं करता'  बेचारा टुनटुनमा जेना कसाइ लग गाए जाइत अछि‍ तहि‍ना बुलेसर बाबूक संग वि‍दा भेल।‍ आ बुलेसर बाबू जखन धोबि‍या गाछी गेलाह तँ एक लात मारि‍ टुनटुनमाकेँ धरतीपर पाड़ि‍ पुन: एक ऐँर मारलखि‍न्‍ह। फेर अपन ठेंगा ओकर नि‍कासमार्ग -गुदामार्ग-मे घुसा देलथि‍न्‍ह। खूनक फुचुक्का नि‍कलि‍ पड़लैक। बेचारा ओतहि‍ कनैत बेहोश भऽ गेल। मुदा बुलेसर बाबूक चेहरापर अफसोस नहि भेलन्हि  आ मुँहसँ नि‍कलन्‍हि‍- “ठेंगो अपवि‍त्र भऽ गेल!” टुनटुनमाकेँ ओतहि‍ ओही हालति‍मे छोड़ि‍ अपन घर दि‍सि‍ वि‍दा भऽ गेलाह। लगभग आधा घंटाक पछाति‍ ऐ घटनाक जानकारी टुनटुनमाक बेटाकेँ  लगलैक। जो ओकरा उठा कऽ घर लऽ गेलैक। पैसा नै रहैक तँए देसी दबाइ प्रारम्‍भ केलकैक। भरि‍ पेट खेबाक सेहो सामर्थ्‍य नै, तइ मनुक्‍खपर एहेन अत्‍याचार! बेचारा टुनटुनमा 10 दि‍नक भीतर कराहि‍-कराहि‍ कऽ मरि‍ गेल। मरी गेल से नीके भेलैक! अन्यथा दर्द स अनेरे परेशान रहैत ।  मनुक्‍खपर मनुक्‍ख द्वारा एहेन अत्‍याचार! हे भगवान कि‍एक नै देखैत छी एहेन लोक सभकेँ। कि‍छु अही तरहक वि‍चार राघव केर लोक कि‍शोर मनमे अएलन्‍हि‍ जखन टुनटुनमाक सम्‍बन्‍धमे पता लगलन्‍हि‍। मुदा बुलेसर बाबूक हृदैपर कुनो प्रभाव नै पड़लन्‍हि‍। ओ अपन बलंठगरीरीमे लागल रहलाह। बुलेसर बाबूक दू व्‍यक्‍ति‍त्‍व छलन्‍हि‍। लहनाक मामलामे ओ बलंठ, हृदैहीन, कसाइ आ कईंया छलाह। ठीक एकर वि‍परीत पि‍ताक रूपमे स्‍नेहशील, उदार आ अनुरागी। राघवकेँ चन्‍दाक नेनपनक दृश्‍य यादि‍ आबए लगलन्‍हि‍। जखन चन्‍दा चारि‍-पाँच बर्खक छलीह तँ बुलेसर बाबू सदि‍काल चन्‍दाकेँ अपना कन्‍हापर चढ़ेने रहैत छलाह। दुलारक अन्‍त नै। चन्‍दाकेँ सदि‍काल चन्‍दा बेटा कहि‍ सम्‍बोधि‍त करैत छलाह। चन्‍दा अगर कुनो कारणे रूसि‍ जाइत छलीह कि‍ंवा कनैत छलीह तँ बुलेसर बाबू चन्‍दाकेँ कोरामे उठा गीत गाबि‍-गाबि‍ बौसैक प्रयास करैत छलाह। गीतक आखरि‍ कि‍छु ऐ प्रकारक होइत छलैक- “चन्‍दा तोरे देबौ गे सभ धन तोरे देबौ गे तेरह बीघा के जोता चन्‍दा तोरे देबौ गे गहना तोरे देबौ गे सोना-रूपा तोरे देबौ गे....।” आ गुमानसँ तनल चन्‍दा शनै: शनै: कानब बन्न कए अपन पि‍ताक चौरगर छातीसँ चीपकि जाइत छलीह। पि‍ता-पुत्रीक अगाध प्रेम। एहेन प्रेम जइमे प्रेमाधि‍क्‍य आ सि‍नेहक धार सदि‍खन बहैत रहैत छल। राघवक कि‍शोर मनमे बुलेसर बाबूक प्रति‍ धोर घृणा उत्पन्न होमय लगलन्‍हि‍। मन होन्‍हि‍ जे ‘बुलेसराकेँ उठा कऽ पटकि‍ दी बीच चौबट्टि‍यापर। लाते-लाते खनि‍ दी।’ मुदा ई हुनका नीक जकाँ ज्ञात छलन्‍हि‍ जे बुलेसर बाबूक  समक्ष हुनकर परि‍वारक अस्‍ति‍त्‍व शुन्‍य छन्‍हि‍। आर-तँ-आर राघव केर पि‍ता सेहो बुलेसर बाबूसँ ऋृण लेने छलथि‍न्‍ह। फेर राघवकेँ वि‍चार अएलन्‍हि‍ जे कि‍एक नै चन्‍दासँ बात कएल जाए? मुदा फेर ओ अपना-आपकेँ चेतलाह। चन्‍दा तँ थीकीह अन्‍तत: बुलेसरेक बेटी ने। साँपक गर्भसँ कुनो हंस जन्‍म लेलकैक अछि‍। साँपक नेना साँपे जकाँ डॅसबे करतै। चन्‍दाकेँ कहने की लाभ? ऊपरसँ अगर चन्‍दा अपन पि‍तासँ शि‍काइत करतीह तँ हमरो घरमे वि‍पत्ति‍क भूकम्‍प आबि‍ जाए! ...ई सोचैत राघव चुप्‍पी साधि‍ लेलन्‍हि‍। मुदा जखन-जखन टुनटुनमा बेटाकेँ बापक कर्म करैत देखैत छलाह तखन-तखन घृणा आ पश्चातापक ज्‍वारि‍मे जरए लगैत छलाह। मुदा छलाह बेवश! लचार!! मरता क्‍या नहीं करता!!! कहि‍ नै कि‍एक चन्‍दा राघवकेँ बि‍ना अपने-आपके अनेरे बेचैन अनुभव करए लगलन्‍हि‍। एकबेर राघव आठ दि‍नक हेतु मातृक गेलाह। चन्‍दाकेँ बि‍ना कहने। चन्‍दा राघव केर घर लगका पोखरि‍मे नहाए अएलीह। जखन राघवकेँ नै देखलन्‍हि‍ तँ मनमे ई भेलन्‍हि‍ जे राघव कतौ इम्‍हर-उम्‍हर चलि‍ गेल छथि‍ कि‍छु क्षणक हेतु। मन तँ नै लगलन्‍हि‍। चुप-चाप जल्‍दी-जल्‍दी स्‍त्रगनाही घाटपर जाए पोखरि‍मे दू-चारि  डुम देलीह। एक लोटा अछिंजल लए ओतुक्के पंचमुखी महादेवपर आधा मनसँ जल ढारलन्‍हि‍। राघवसँ भेँट नै भेलन्‍हि‍ ऐ बातक कचोट करैत घर चलि‍ गेलीह। घर जाए आधा मनसँ आधा-छीधा अन्न खेलीह आ सोझे आमक गाछी आम ओगरए लेल चलि‍ अएलीह। आमोक गाछीमे चन्‍दाकेँ मन नै लगलन्‍हि‍। चन्‍दा मोने-मन भगवानसँ प्रार्थना करए लगलीह- “हे भगवान! जल्‍दी-जल्‍दी राति‍ करू। सूति‍ रही। जल्‍दी-जल्‍दी भोर करू जे राघव भेट जाए।” मुदा राघव तँ आठ दि‍नक हेतु गामेसँ बाहर भऽ गेल छलाह। खैर! चन्‍दा मुन्‍हारि‍ साँझक बाद घर अएलीह। माए पुछलखि‍न्‍ह- “चन्‍दा, अतेक देरीसँ कि‍अए अएलेँह?” चन्‍दा बजलीह- “चोरा सभ आम तोरबाक फि‍राकमे छल। सोचलौं जखन मखना रखबार आबि‍ जाएत तखने कलम छोड़ब।” चन्‍दाक ऐ जबाबसँ प्रसन्न भऽ बुलेसर बाबू अपन सीना चौड़ा करैत पत्नीकेँ कहलखि‍न्‍ह- “बुझलि‍ऐक, कतेक ज्ञानी आ बुझनुक अछि‍ अप्‍पन चन्‍दा? चन्‍दा सन भगवान अगर बेटी देथि‍ तँ बेटाक कुन प्रयोजन?” तइपर चन्‍दाक माए कहलखि‍न्‍ह- “अहाँ अनेरे बजैत छी। लड़कीकेँ कुनो हालति‍मे साँझ भेला उत्तर घरसँ बाहर नै रहबाक चाही। समए-साल खराप चलि‍ रहल छैक। कुनो ऊँच-नीच भऽ गेलैक तँ की हेतैक।” मुदा बुलेसर बाबू कतए चुप हुअएबला छलाह। कहलखि‍न्‍ह- “की बाजि‍ रहल छी? केकरा हि‍म्मति‍ छैक जे हमर चन्‍दा संग कनीकबो बद्तमीजी करए। जे सोचबो करत तकर आँखि‍ नि‍कालि‍ लेबैक।” मुदा चन्‍दा अपन माता-पि‍ताक वाक्-युद्धमे हि‍स्‍सा नै लेलन्‍हि‍। बि‍ना कुनो हर्ष-वि‍षादक चुपचाप ठाढ़ि‍ रहलीह। क्रमश: ...................... ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। सन्दीप कुमार साफी विहनि कथा अन्ध विश्वास काकी गोर लगै छियनि, बैसथु। -के, उड़ीसावाली कनियाँ। -हँ काकी, निके रहै छथि। -की ठीक रहब कनियाँ, तैयो ठीक छी। बुढ़-पुरान भेलौं, हमरा सभकेँ तँ ई पुरबा हवा जान लेबऽ लगैए। सौँसे डाँर ठेहुन बातरससँ कनकनाइए। कोनो दवाइ नै काज करैए। -आबथि, बैसथु। एक तँ कतेक दिन पर भेँट भेलथियऽ। -नै कनियाँ। आँगनमे बड्ड काज छै। आइँ यै कनियाँ, भुखनो बच्चा आएल अछि? -हँ काकी, मरनीक बाबुओ एलखिन। -कनियाँ बच्चा सभ सेहो एल्न्हि। -नै काकी। अखैन बच्चा सभक गरमीक परीक्षा चलै छै, तहि दुआरे ओकरा सभकेँ नै अनलिऐ। आब गर्मी छुट्टीमे सभ आम लिच्ची खाइ लए अबै छन्हि। -आँइ यै कनियाँ, मरनी तँ आब बियाहैवाली भऽ गेल हएत। -हँ काकी, ओकरे कतौ लड़का ताकै गेल छथिन। काकी माँथ केहेन लागै छनि। आबथु कनी तेल दऽ दै छियनि। -नै कनियाँ। आइ जाए दिअ, आउर दोसरो दिन आएब। -माँथ फहराइ छनि तेल बिनु। -से तँ ठीके कहै छी कनियाँ। हमर रुसना डिल्लीसँ हमरा लए एगो नवरतन तेल ठंढ़ा बला, पाँचटा साबुन नहाइ बला, दू किलो सर्फ पठा देलक, जे माय लगा आ जे किछु घटतौ तँ फोन करिहिएँ। ने अखैन कनियाँ रवि रायकेँ समय छै, भूसा गर्दा सभ माथमे भरि जाइत छै। -बड्ड गपशप केलौं कनियाँ, आब कनी जाए दिअ कनियाँ। -ठीक छै काकी जाथु। हमहूँ भानस करऽ जाइ छी काकी। काकी हिनका भनसा भऽ गेलनि। -नै कनियाँ। हमहूँ जाइ छी। कनीक पछुआरमे सँ भोरे अरिकौंछ तोड़लिऐ, तकरे चक्का बना कऽ झोरेबै, कनीक आमिल दऽ कऽ। तेहन हमर पुतोहु भेल कनियाँ जे अखैन तक दालि तरकारी नून, से नून-जाउर बना दैए, कहियो अनूने। कहियो अन तीमन नीक नै बनबैए। कनियाँ अहाँकेँ नीक लगैए अरिकौंछ। -हँ काकी, हमरा सबकेँ ई कतऽ पाबी। -ठीक छै तऽ हम अपना छोटा नातिन दिया पठा देब बाटीमे। जाइ छी कनियाँ। … -बड़की दीदी, बड्ड गप्प सरक्का चलै छलै रुसना माएसँ। की बात छै, अहूँकेँ गुण जादू सिखबाक अछि की? -नै छोटकी। तोरा सभकेँ यएह पपियाहा मन सभ दिन मन खराप राखै छौ। -नै यै दीदी। एको महिना नै भेलै, सुगौनावालीकेँ देहपर पाँचटा देवी पठौने छलै। कतेक ओझा गुणी एलै, तखन जा कऽ कनीक अन्न-पानि खाए लगलैए। सभ कहै छै हकल डाइन छै। छोटका बेटाकेँ मारि कऽ सिखलकैए। -छोड़ ई सभ बात। तूँ सभ गामघरमे रहि कऽ अहिना सबकेँ डाइन आउर जोगिन कहै छिहिन। ई सभ अन्धविश्वास छिऐ। समाजमे ईएह सभ बातसँ झगड़ा होइत रहैए आउर एक दोसरकेँ डाइन कहैए। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। किशन कारीगर आब हम जबान भ गेलहुँ (हास्य कथा) समाचार पढ़ि के स्टूडियो सँ निकलले रही कि मोबाइलक घंटी बाजल हम धरफरा के फोन उठेलहुँ की ओम्हर सँ अवाज आयल हौ कारीगर आब हम जवान भ गेलहुँ। ई सुनि त हमरा किछु ने फुरा रहल छल मुदा तइयो हम सहास कए के बजलहुँ अहाँ के बाजि रहल छी। ओम्हर सँ फेर अवाज आयल हौ कारीगर एना किएक बताह जेंका बजैत छह अवाजो ने चिन्हैत छहक। कहअ त इहे गप ज कोनो बचिया तोरो फोन कए के कहने रहितह त तोरो मोन धनकुटिया मशिन जेंका धक-धक करितह। मुदा हम कहैत छियह त तों बहन्ना बतियाअैत छह। हम बजलहुँ से गप त ठीके मुदा अहाँ के बाजि रहल छी से कहू ने तखने चिन्हब ने कि ओम्हर सँ फेर अवाज आएल हौ बच्चा हम बाबा भोलेनाथ बाजि रहल छी तोरे स भेंट करैए लेल आएल छलहुँ। ई सुनि हम बाबा के प्रणाम कए पुछलियैन यौ बाबा अहाँ कतेए छी। ओ खिसियाअैत बजलाह हौ बच्चा हम यूनिवार्ता लक ठाढ़ भेल छी तोहर आकाशवाणीबला सभ कहलक जे बसहा बरद लए के भीतर नहि जाए देब। तहि दुआरे  हम यूनिवार्ता चलि अएलहुँ अहि ठाम कोनो रोक टोक नहि बसहो बरद मगन स घास खा रहल अछि आ हमहूँ रौद मे बैसल छी। तूं जल्दी आबह देखैत छहक सस्पेन महक चाह उधिया-उधिया कहि रहल अछि जे आब हम जवान भ गेलहु। दुनू गोटे चाहो पीअब आ गपो नाद करब।हम बजलहुँ ठीक छै बाबा अहाँ ओतए रहू हम 5 मिनट मे आबि रहल छी। बाबा सँ भेंट करबाक लेल हम आकाशवाणी के गेट न0-2 स बाहर निकैलि रोड टपि के पीटीआई बिल्डिंग लक आएले रहि कि फेर फोनक घंटी बाजल। कान मे हेडफोन लगले रहैए बिना नम्बर देखनहियै हम फोन उठेलहुँ कि ओम्हर सँ अवाज आयल यौ किशन बौआ अहाँ कहिया गाम आबि रहल छी आब हम जवान भ गेलहुँ। हम धरफराइत बजलहुँ ग ग गोर लगैत छि काकी। ओम्हर सँ फेर कोनो महिलाक अवाज आयल अई यौ बौआ अहाँ सभ दिन बकलेले रहबैह भौजी के लोक कहूं काकी कहलकैए ओ खिखिया के हँसैत बजलीह अप्पन सप्पत कहैत छी यौ बौआ आब हम जवान भ गेलहुँ। अहाँ त साफे हमरा बिसैर गेलहुँ कहियो मोनो ने पड़ैत छी। ई सुनि त एक बेर फेर हमरा किछु ने फुरा रहल छल मुदा तइओ हम बजलहुँ अहाँ कतए स बाजि रहल छि यै काकी। महिलाक अवाज आयल यौ बौआ हम भराम वाली भाउजी बाजि रहल छी। एक्को रति मोन पड़ल ।हम अपसियाँत भेल हकमैत बजलहुँ ह ह भाउजी मोन पड़ल अच्छा त अहाँ छि भराम वाली। भाउजीक गप सुनि त हँसि स हमरा रहल नहि गेल हा हा क हँसैत हम बजलहुँ अई यै भाउजी अहाँक चिल्का बच्चा नमहर भ गेल आ तइयो अहाँ कहैत छी जे आब हम जवान भ गेलहुँ ठीके मे की मजाक कए रहल छी। भाउजी खिखिया क हँसैत बजलीह अप्पन सप्पत कहैत छि यौ बौआ अहाँ एक बेर गाम आबि देखू हमरा देखि त बुढ़बो सबहक धोति निचा माथे ससैर जायत छैक। आ तहू स बेसी हाल त मैटिक वला विद्यार्थी सभहक हाल त और बेहाल छैक। टीशन पढै जायत काल हमरे घूरि घूरि क देखैत रहैत छैक आ सबटा सुध बुध बिसैर के धरफड़ा के साइकिलो पर स खसि पड़ैत छैक। सबटा गप कि कहू यौ बौआ गाम-गमाइत जेनिहार अनठिया लोक सभ त मोटरसाइकिल पर सँ ओंघरा पोंघरा के खसि पडैत छैक आ मुँहो कान चिक्कन भए जायत छैक।हम बजलहुँ अई यौ भाउजी भैया नहि किछु कहैत छथि हुनका ने किछु होइत छैन्हि। भाउजी बजलीह धू जी महराज की कहू आनहरो लोक अहाँ भैया स बेसी देखैत हेतै। पामर वला चश्मा मे एक्को रति कि अहाँ भैया के देखाइए। सबटा गप कि कहू अहाँ भैया के हकैम-हकैम के कहैत कहैत हम थाकि गेलहुँ जे आब हम जवान भ गेलहुँ। मुदा तइयो अहाँ भैया के वैहए गउलहे गीत इस्कूल पर सँ गाम आ गाम पर सँ इस्कूल सेहो आखि मुनने जाउ आ आउ। रस्ता पेरा कि सभ भेलै सेहो ने बुझबाक काज। ई गप सुनि त हँसि स हमरा रहल नहि गेल हा हा क हँसैत हम बजलहुँ आहि रे बा एहेन जुलुम त देखल नहि। हमर गप सुनि भाउजि खूब जोर स खिखिया क हँसैत बजलीह जुलुम की महाजुलुम कहियोअ। ओना अहूँ कि अपना भैया स एक्को रति कम छी। अहाँ त हरदम समाचार बनबै-सुनबै मे बेहाल रहैत छी हमर हाल के पुछैए। आई काल्हि त आनहरो लोक ईशारा स गप बुझि जायत छैक मुदा अहुँक हाल त निछटे आनहर वला अछि ने गबैए जोकर ने सुनैए जोकर। अहाँ स नीक त कोनो अनठिया के कहने रैहतियै जे आब हम जवान भ गेलहुँ त निछोहे पराएल ओ गाम चलि आएल रहितैह मुदा अहाँ त गाम अएबाक नामे नहि लैत छी। हम बजलहुँ भाउजी अहाँ जुनि खिसियाउ अहि बेर नहि त अगिला बेर हम जरूर आएब आ दुनू दिअर भाउज उला ला उ ला ला मदमस्त होरी खेलाएब। एखन हम फोन राखि रहल छी केकरो फोन आबि रहल छैक। भाउजी बजलीह मारे मुँह ध के  अहूँ के मोबाइल हरदम टनटनाइते रहैए भरि मोन गप करब सेहो आफद। जहिना जवान लोक फेनाइते रहैए तहिना अहाक फोन टनटनाइते रहैए बड्ड बढ़िया त राखू। भाउजीक फोन डिसकनेक्ट करैते मातर फेर कोनो अनठिया नम्बर सँ फेर फोनक घंटी बाजल अवाज सुनि हमर मोन धकधकाएल जे आब फेर के अछि। हम हेल्लो बजलहुँ कि ओम्हर स अवाज आएल एकटा गप बुझहलियै अहाँ । हम बजलहुँ बिना कहनहिए अपनेमने अन्तरयामी केना बुझि जेबैए ओना कोन एहेन जुलुम भए गेलैए से जल्दीए कहू। कोनो महिलाक अवाज आयल यौ पाहुन हम कोना क कहू हमरा त लाज होइए। हम बजलहुँ अहाँ के लाजो होइए आ उल्टे हमरा पाहुनो कहैत छी। ओम्हर स फेर अवाज आयल चुपु ने अनठिया अनठा-अनठा के बजैत छी जेना अहाँ के बुझहले ने हुएअ ।हम बजलहुँ सत्ते कहैत छी हमरा त एक्को मिसीया ने बुझहल अछि जल्दी कहू। एतबाक मे फेर अवाज आयल अहा कहैत छी त हयैए लियअ सुनू आब हम जवान भ गेलहुँ। एतबाक बाजि ओ हा हा के खूब जोर स हँसैए लगलीह। हुनकर गप सुनि त हँसि स हमरा रहल नहि गेल मुदा तइयो हम बजलहुँ जबान भ गेलहुँ त अपना माए बाप के कहियौअ अहि मे हम कि करू। ओ बजलीह अई यौ बुढ़बा पाहुन अहूँ बरि खान्हे बुझहैत छियैक। कहू त इहो गप केकरो कहैए पड़तैह लोक अपने मने नहि बुझतैह जे घोरि घोरि के कहैए पड़तैह जे आब हम जबान भ गेलहुँ। एतबका बाजि ओ खूब जोर स हाँ हाँ के हसैए लगलीह। ओइ महिलाक हँसि सुनि त बुझहु हमर मोन धनकुटिया मशिन जेंका धक-धक करैए लागल। हकमैत हकमैत अपसियात भेल हम बजलहुँ अईं यै मैडम अहाँ जबान नहि भेलहुँ कि बुढ़ारि मे हमरा जहल टा कराएब। ओ बजलीह अईं यौ पाहुन अहाँ के डर किएक होइए एतेक काल त कोनो अनठिया गाम चलि आएल रहैतैए आ अहाँ के त होरी मे गाम अबैत बड्ड माश्चर्ज लगैए अहाँ होरी खेलाए लेल गाम आएब कि नहि। हम बजलहुँ अहाँक पाहुन से कहिया स त ओ बजलीह अईं यौ  पाहुन हम जवान भेलहु आ हमरा अहा साफे बिसैर गेलहु। हम नीलू बाजि रहल छी एक्को रति मोन पड़ल कि नहि। हम बजलहुँ अच्छा त अहाँ छी बड्ड जल्दी जबान भ गेलहुँ। ओ महिला बजलीह त अहाँ मने कि अगिला कोजगरा तक अहाँक बाट तकितहुँ कि अपन जबान भ गेलहुँ। आब बुढ़ लोकक जमाना गेलैए आई काल्हि त जबान लोकक जमाना एलैए बुढ़ारी मे अहाँ भसिया गेलहुँ की। हमरे छोटकी सारि नीलू छलीह। हुनकर एहेन सुनर बचन सुनि त  हम अपना देह मे अपने मने बिट्ठू काटैए लगलहु खुशि सँ मोन मयूर जेंका नाचए लागल। भेल जे सासुरे मे तिलकोरक तरूआ खा रहल छी मुदा फोन दिसि देखि इ भ्रम टूटल जे हम त संसंद मार्ग दिल्ली मे छी आ फोन पर गप कए रहल छी।  हम बजलहुँ यै नीलू ठीक छैक ई बुझहु जे अगिला होरी मे हम एब्बे टा करब एतबाक कहि हम फोन राखि देलियै। फोन पर गप करैते करैते हम चाह दोकान लक चलि आएल रहि सेहो नहि बुझहलियै। हमरा देखैत मातर  बाबा बजलाह अईं हौ कारीगर तोहर गप सधलहे नहि देखैत छहक तोरा फेरी मे चाहो ठंढ़ा गेल तहि दुआरे चाहो वला हमरे पर मुँह फुलेने अछि। बाबाक गप सुनि हुनका हम प्रणाम कए पुछलियैन से किएक यौ बाबा। त ओ बजलाह चाहवला के कहब छैक जे अहि दारही वला बाब दुआरे कएक टा न्यू कपल्स माने जबान छौड़ा-छौंड़ी बिना चाह पीने आपिस चलि गेलैह। आब तोंही कहअ त कारीगर छौंड़ा-छौंड़ी त अपना फेरी मे गेल चाह नहि बिकेलै त एहि मे हमर कोन दोष। चाहवला अपने मिथिला के रहैए ओकरा हम कहलियै हौ भाए दू कप चाह बनाबह  बाबा सेहो पिथहिन। हम बाबा के कहलियैन बड्ड दिन बाद अपने दिल्ली अएलहुँ त गाम घरक हाल समाचार कहू। बाबा बजलाह हौ बच्चा जुनि पुछह गाम घरक हाल बुझहक छौंड़ा छौंड़ी अगिया बेताल। हम बजलहुँ से किएक यौ बाबा त ओ बजलाह  हौ बच्चा गामो घर  रहबा जोग नहि रहि गेल। आई काल्हिक छौंड़ा छौंड़ी एकदम निरलज भए गेल एक्को रति लाज धाक नहि रहि गेलैए आब त मंदिरो मे रहब परले काल भए गेल। हम बजलहुँ से किएक यौ बाबा त ओ बजलाह हौ बच्चा सबटा गप तोरा कि कहियअ आब त छौंड़ा मारेर सभ पूजा करैत काल  उला ला उला ला गबैत अछि एतबाक सुनैते मातर छौंड़ियो सभ कुदि-कुदि के कहतह छुबू ने छुबू हमरा आब हम जवान भ गेलहुँ। कह त के जबान के बुढ़ पुरान से त पूरा गौंआ बुझैत छैक एहि मे हल्ला करबाक कोन काज जे आब हम जबान भ गेलहुँ। देखैत छहक इ गप सुनि त बुढ़बो सबहक धोति निच्चा माथे ससैर जाएत छैक। ई भागेसर पंडा हमरा सुखचेन स नहि रहैए देत। एतबाक मे चाह वला 2 गिलास चाह देलक दुनू गोटे चाह पिबअ लगलहुँ एक घोंट चाह पिनैहे रहि कि हम पुछलियैन भागेसर कि केलक यौ बाबा। ओ बजलाह हौ कारीगर की कहियअ भागेसर पंडा त आब निरलज भ गेल। एतेक दिन ओम नमः शिवाय के जाप करैत छल आब उला ला उला ला गबै मे मगन रहैए हम जे किछु कहैत छियैक हौ भागेसर एना किएक अगिया बेताल भेल छह। त ओ हमरा कहैत अछि यौ बाबा किछु कहू ने हमरा आब हम जबान भ गेलहुँ। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com  पर पठाउ। ३. पद्य ३.१.१.सन्दीप कुमार साफी २.शि‍वकुमार झा ‘टि‍ल्‍लू‘३. श्यामल सुमन ४.जगदीश प्रसाद मण्‍डल ३.२.१.डॉ॰ शशिधर कुमर “विदेह”२.रामवि‍लास साहु ३.३.१.जगदीश चन्द्र ठाकुर अनिल २.जवाहरलाल कश्यप३.उमेश पासवान ३.४.१.अयोध्यानाथ चौधरी २.ओमप्रकाश झा ३.५.रवि भूषण पाठक ३.६.चंदन कुमार झा ३.७.जगदानन्द झा 'मनु' ३.८.१. अमित मिश्र- गजल २.मुन्नाजी-रुबाइ १.सन्दीप कुमार साफी २.शि‍वकुमार झा ‘टि‍ल्‍लू‘३. श्यामल सुमन ४.जगदीश प्रसाद मण्‍डल १ सन्दीप कुमार साफी अप्पन गाँव अप्पन गाँव अछि साफ लग-लगमे कलम गाछ स्वच्छ हवाक सुगन्ध सुंगहाएत बाट बटोहीक मन बहलाएत हँटि-हँटि कऽ पोखरि इनार स्नान करै छी ओइ किनार महारपर सुन्दर पाखैर गाछ कौआ मएना करए किलोल भोरे देखै छी कौल्ह चलैए रस-गुड़क सुगन्ध आबैए हरियर-हरियर गहुमऽ खेत कालसँ बहैए कमला रेत गाँवसँ बनल शहर बजार खूब बनए पापड़ अचार गामक छी ई रीति-रिवाज सभक करए आदर सत्कार २ शि‍वकुमार झा ‘टि‍ल्‍लू‘ कवि‍ता- एकटा छली आरती एकटा छली आरती भदेसक भारती आगाँ ‘राय’ की लागल ओ सभ बूझि‍ गेलथि‍ कि‍छु आर वि‍द्रूप वा होशि‍यार छलनि‍ खड़ाम देबाक आश भदेसक कांता महा भदेसमे छथि‍- हुनका पड़ाइन लागि‍ गेल छन्‍हि‍ आन कि‍एक जाएत केना पड़ाएत कि‍न्नौं नै होमए देलक मुक्‍तक काव्‍याक आश पूर केओ नै गेल भागलपुर आरती रूसि‍ गेली क्षणि‍क नै अन्‍तर्आत्‍मासँ हुसि‍ गेली मुँहजोड़ भाषामे जे राखत आत्‍मासँ वि‍देह-तनुजासँ सि‍नेह आत्‍मासँ गेह सबहक हएत वएह दशा भाेगए पड़तनि‍ उत्तराधि‍कारीकेँ क्‍लेश सभ दि‍नक लेल बि‍ला देतनि‍ जहानसँ भगा देतनि‍ मात्र हमहीं टा नाचब हमहीं देखब के सूतल के जागल के नै बूझय जे करत प्रयास ओ भऽ जाएत अभागल ऐ माटि‍सँ उपटल वैदेहीकेँ आन भूमि‍क लोक माटि‍मे मि‍ला देलनि‍ मुदा अपन आरतीकेँ अपने साङह खसा देलकनि‍.....। ३ श्यामल सुमन १ मैथिल मिथिला नाज हमर भेद भाव बिनु सबकय जोड़ू, बाँचत तखन समाज हमर सबकियो मिलिकय बाजू सगरे, चाही मिथिला राज हमर

राज बहुत पहिने सँ मिथिला, छिना गेल अछि साजिश मे जाबत ओ सम्मान भेटत नहि, बाँचत कोना लाज हमर

विविध विषय के ज्ञानी मैथिल, दुनिया मे भेटत सगरे   मुँह बन्द राखब कहिया तक, के सुनतय आवाज हमर

आजादी के बादो सब दिन, भेल उपेक्षा सरकारी बहल विकासक गंगा प्रायः, बाँचल खाली काज हमर

सज्जनता श्रृंगार सुमन छी, दिल्ली बुझलक कमजोरी जागू मिथिलावासी आबो, मैथिल मिथिला नाज हमर २ हँसी मुँह पर साटय छी धीया-पुता दुख नहि बूझय, हँसी मुँह पर साटय छी खरचा एक पुराबय खातिर, दोसर खरचा काटय छी

आजुक युग मे कम्प्यूटर बिनु, नवतुरिया सब की पढ़तय मुदा माँग पर, टाका नहि तेँ, बच्चा सब केँ डाँटय छी

बनल बसूला सम्बन्धी-जन, बाजय मीठगर बोली यौ दुख मे रहितहुँ पर विवेक सँ, सभहक हिस्सा बाँटय छी

अपन हृदय मे भाव जेहेन छल, बुझलहुँ छै तेहने दुनिया चीन्हा गेल अछि अप्पन-अदना, हुनके सबकेँ छाँटय छी

सुमन संगिनी जीवन भेटल, रूप मनोहर काया संग दुख भीजल तऽ चोकर आमक, रूप देखिकय फाटय छी ३ ई खटहा अंगूर छी किछु कुबेर के चक्रव्यूह मे, कानूनन मजबूर छी रही कृषक आ खेत छिनाओल, तहिये सँ मजदूर छी

छलय घर मे जमघट हरदम, हित नाता सम्बन्धी के  कतऽ अबय छथि आब एखन ओ, प्रायः सब सँ दूर छी 

काज करय छी राति दिना हम, तैयो मोन उदास हमर  साहस दैत बुझाओल कनिया, अहाँ हमर सिन्दूर छी

एहेन व्यवस्था हो परिवर्तित, लोकक सँग आवाज दियौ  एखनहुँ आगि बचल अछि भीतर, झाँपल तोपल घूर छी

बलिदानी संकल्प सुमन के, कहुना दुनिया बाँचि सकय   नहि बाजब नढ़िया केर भाषा, ई खटहा अंगूर छी ४ संस्कार सन्तान मे स्वजन मृत्यु पर कानैत बाजैत, गेल छलहुँ शमशान मे आनल जायब एहिना हमहुँ, आयल अचानक ध्यान मे

बाजी सब कियो राम नाम संग, सभहक गाति एहने होइछै बाहर आबिते फूसि फटक्कर, केलहुँ शुरू दलान मे

बात सदरिखन की लऽ एलहुँ, की लऽ जायब दुनिया सँ मुदा सहोदर सँ झगड़ा नित, होई छै नहि अन्जान मे

भाग्य लिखल जे हेबे करतय, काज करय के काज की चिकरि चिकरि केँ बाजू एतबे, दास मलूक सम्मान मे

सुमन मनुक्खक जीवन भेटल, घटना छी अनमोल यौ सफल तखन पल पल जीवन के, संस्कार सन्तान मे ५ कियो हमर संगी बनू चलू ताकय छी मिलि भगवान, कियो हमर संगी बनू। कतऽ भेटला छी फुसिये हरान, कियो हमर संगी बनू।।

कियो कहय कण-कण मे, कियो कहय मन मे। कियो कहय गंगा मे, कियो पवन मे। नहि भेटल कुनु पहचान, कियो हमर संगी बनू।।

सुमरय छी दुख मे, बिसरय छी सुख मे। पूजा के भाव कतय, नामे टा मुख मे। छथि भक्तो बहुत अनजान, कियो हमर संगी बनू।।

करू लोक सेवा, तखन भेटत मेवा। लोक-हित काज करू, लोके छी देवा। सुमन कत्तेक बनब नादान, कियो हमर संगी बनू।। ६ रहबय कोहबर कत्तेक दिन रहबय कोहबर कत्तेक दिन बनिकय अजगर कत्तेक दिन

शादी तऽ एक संस्कार छी जीबय असगर कत्तेक दिन

बिना काज के मान घटत नित फूसिये दीदगर कत्तेक दिन

बैसल देहक काज कोन छै एहने मोटगर कत्तेक दिन

आबहुँ जागू सुमन आलसी खेबय नोनगर कत्तेक दिन ४ जगदीश प्रसाद मण्‍डल गीत- हाल-बेहाल देखि‍ राग-रागनि‍क कुशल फूल सजबैत रहै छै। रंग चढ़ि‍ करि‍या कारी भ्रमर रस पान करैत रहै छै। भ्रमर........। हाल-बेहाल देखि‍ राग-रागनि‍क कुशल फूल सजबैत रहै छै। डगडगाएल हाल पाबि‍ उस्‍सरक फूल उस्‍सर सि‍रजैत रहै छै। घूरि‍ ताकि‍ नै भरमए भौरा दि‍वा रसराज कहबैत रहै छै। दि‍वा रस........। हाल-बेहाल देखि‍ राग-रागनि‍क कुशल फूल सजबैत रहै छै। आसनसँ सिंघासन बनि‍-बनि‍ चटाइ नाओं धड़बैत रहै छै पूजा आसन बनि‍ सदए लोक सुर सजबैत रहै छै। लोक सुर........। हाल-बेहाल देखि‍ राग-रागनि‍क कुशल फूल सजबैत रहै छै। उठि‍ अंजलि‍ चढ़ि‍ मंजलि‍ मंगल गीत गबैत रहै छै। मंगल गीत........। हाल-बेहाल देखि‍ राग-रागनि‍क कुशल फूल सजबैत रहै छै। • गीत- शीला शील देखि‍-देखि‍ हंस‍ कानि‍ कहैत एलैए। एक शील श्रंृग चढ़ि‍-चढ़ि‍ दोसर श्रंृगार बनैत एलैए। दोसर........। शीला शील देखि‍-देखि‍ हंस कानि‍ कहैत एलैए। चढ़ि‍ श्रंृग गढ़ि‍ धनुखी अकास ि‍सर बेधैत एलैए। हंसराज राजहंस रमकि‍ सि‍र श्रंृगार सजैत एलैए। सि‍र........। शीला शील देखि‍-देखि‍ हंस कानि‍ कहैत एलैए। शील सुशील सुर बदलि‍ ति‍रछि‍त-मि‍रछि‍त देखैत एलैए। चि‍ड़चि‍ड़ाइत चि‍ड़ै बूझि‍ सुनि सुशील-कुश्‍ाील बनैत एलैए। सुशील........। शीला शील देखि‍-देखि‍ हंस कानि‍ कहैत एलैए। पगलखना पागल ऐ संसारमे पगलपनी खेल चलैत रहै छै। पगला पागल पकड़ि‍ पगलखाना बनबैत रहै छै। लटखेना दोकान जहि‍ना मि‍रचाइ-मि‍सरी संग रहै छै। संसारक झखुराएल वन तहि‍ना पगलपाना गाछ पनपैत रहै छै। पागल ऐ संसारमे पगलपनी खेल चलैत रहै छै। कि‍यो पगलाएल खेत कीनैले तँ कि‍यो पगलाएल चुमै खेतले। कि‍यो पगलाएल डाक-डाकनि‍ तँ कि‍यो पगलाइत अगवास ले। रहि‍तो सबहक एक मंशा बाट-घाट बौराइत चलै छै। सभकेँ सभ पागल कहि‍ नाच पगलपनी नचैत रहै छै। पागल ऐ संसारमे पगलपनी खेल चलैत रहै छै। कि‍यो पगलाएल सुख-शान्‍ति‍ ले कि‍यो मधुशाला बौराएल रहै छै। तेज सवारी पकड़ि‍ चढ़ि‍ बैलेंस जि‍नगी मि‍लबैत चलै छै। पागल ऐ संसारमे पगलपनी खेल चलैत रहै छै। लपकि‍-झपकि‍ मासूम मौसममे झाखुर वन बनबैत चलै छै। पागल ऐ संसारमे पगलपनी खेल चलैत रहै छै। एक-भग्‍गू लूरि‍-बुधि‍ संग एकबट्टू बाट बना चलै छै। सुखाएल हाड़ स्‍वान जहि‍ना अपने रस पीबैत जीबै छै। जहि‍ये जनमल मानव धरती संग स्‍वान अबैत रहल छै। कटने-चटने सेर बरोबरि‍ संग मि‍ल संग नचैत रहै छै। पागल ऐ संसारमे पगलपनी खेल चलैत रहै। ~ ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। १.डॉ॰ शशिधर कुमर “विदेह”२.रामवि‍लास साहु १ डॉ॰ शशिधर कुमर “विदेह” एम॰डी॰(आयु॰) – कायचिकित्सा कॉलेज ऑफ आयुर्वेद एण्ड रिसर्च सेण्टर, निगडी – प्राधिकरण, पूणा (महाराष्ट्र) – ४११०४४ १ विरह गीत किए भेलियै, पिया ! अहाँ एहेन कठोर । स्नेह सलिल केर बदला मे,  देल किए नोर ।। आयब शिघ्रहि, पिया जाइत कहलहुँ अहाँ । मुदा जानि ने,  कतऽ जाय बैसलहुँ अहाँ । चान एकसरि अछि बैसल अहाँ बिनु चकोर । स्नेह सलिल केर बदला मे,  देल किए नोर ।। दिन  बीतल  अनेक,  मास  बीतल  कतेक । बीतल सरस बसन्त, आयल साओन केर मेघ । मेघ रहितहुँ ने पिया आइ नचइछ मन मोर । स्नेह सलिल केर बदला मे,  देल किए नोर ।। किए अएलाह ने पिया, मोन कङ्गना पुछय । बन्न पिञ्जरा सनि, जेना ई अङ्गना लगय । भेल केहेन ई राति जकर अबइछ ने भोर । स्नेह सलिल केर बदला मे,  देल किए नोर ।। भेल आन्हर ई नैन, बाट अहँ केर तकैत । उड़ि गेल मोर चैन,  याद अहाँ केँ करैत । भेल पाथर जेना, पिया ! बिहुँसय ने ठोर । स्नेह सलिल केर बदला मे,  देल किए नोर ।। की गेलियै बिसरि, अहाँ कोहबर केर राति । की यादहु ने अबइछ, ओ पावनि बरिसाति । कोना   बनलहुँ पिया   अहाँ एहेन    निशोख । स्नेह सलिल केर बदला मे,  देल किए नोर ।। २ मिलनोत्सुका गीत सखी ! कुचरल अछि वायस, किए अहल भोर । आई  लगइत  अछि  अओथिन्ह  हमर चितचोर ।। आइ अओथिन्ह जँ पिया, हम रूसि रहबै । घोघ तानि,  मूँह फेरि,  हऽम बैसि रहबै । मुदा, रोकबै   कोना   सखी ! मोनक   हिलोर । आई  लगइत  अछि  अओथिन्ह  हमर चितचोर ।। कहुखन एहि चार पर, कहुखन ओहि चार पर । कखनहु  दुआरि  पर,   कखनहु  ईनार  पर । किए कुचरै   अछि   कौआ, एना जोर – जोर । आई  लगइत  अछि  अओथिन्ह  हमर चितचोर ।। पिया कतबहु मनओथिन्ह, ने हऽम बजबै । हास कतबहु हँसओथिन्ह, ने  हऽम हँसबै । हाल हम्मर   कहत   सखी ! नयनक  ई नोर । आई  लगइत  अछि  अओथिन्ह  हमर चितचोर ।। घोघ उठबैत सखी, लऽग अओताह पिया । स्नेह  हाथेँ  पकड़ि,   लगा   लेताह   हिया । नोर नयनक    पोछैत, चूमि   लेताह   ओ   ठोर । आई  लगइत  अछि  अओथिन्ह  हमर चितचोर ।। हम लाजहि ओतहि, गड़ि जयबै सखी । हम लाजहि तँ मरि – मरि जयबै सखी । कोना   पुछबै, किए   भेलाह, एहेन    कठोर । आई  लगइत  अछि  अओथिन्ह  हमर चितचोर ।। ३ मिलन गीत सखी ! की हम कहू, फुजय लाजेँ ने ठोर । हम बुझलियै ने आई,  कोना भऽ गेलै भोर ।। सखी धक् – धक् करैत छल हमर जिया । ता बजलाह,  सुनू  हे  ऐ  प्राण – प्रिया ! आउ ! पहिरायब   हऽम   आई, अहाँ  केँ  पटोर । हम  बुझलियै ने आई,  कोना भऽ गेलै भोर ।। हाथ धयलन्हि पिया, गेलहुँ हम तँ लजाय । पुनः  लेलन्हि  मोरा, अपन छाती सटाय । चूमि   लेलन्हि, ओ  चट  दऽ, हमर   दुहु   ठोर । हम  बुझलियै ने आई,  कोना भऽ गेलै भोर ।। मेरु  पर  सँ  देलन्हि पिया अम्बर हटाय । पुनः  लेलन्हि  सखी, निज  अंक  बैसाय । सखी ! लाजेँ   सिहरि   उठल, हमर  पोर – पोर । हम  बुझलियै ने आई,  कोना भऽ गेलै भोर ।। आँखि   मुनने   छलहुँ,  जेना  छुई – मुई । पिया अचकहि मे सखी, फोलि देलन्हि नीबी । आ कि, एतबहि  मे  सखी, मिझा  गेलै  ईजोत । हम  बुझलियै ने आई,  कोना भऽ गेलै भोर ।। २ रामवि‍लास साहु कवि‍ता- बाबा बले फौदारी की केलौं की पेलौं जेहेन करब तेहेन पएब बाबाक थैली भरोषे नै चलत कोनो काज अपना भरोषे होइ छै काज जौं बाबा भरोषे फौजदारी लड़ब तखन पराजय हएत जे काज जहि‍ना हेतइ ओहि‍ना ने करए पड़त अनका भरोषे नै होइ छै काज अपन काज जौं अपने करब तखन प्रगति‍ दि‍न-राति‍ हएत स्‍वावलंबी जाधरि‍ नै बनब ताधरि‍ परजीवी बनल रहब की करब सोचि‍ करब समए संग काज करब तखन जि‍नगीक महत रहत वर्त्तमानमे करब तँ भवि‍ष्‍य बनत भूत तँ बीत गेल वर्त्तमानपर भवि‍ष्‍य उज्‍जवल रहत संसार काजसँ चलैए जाधरि‍ अपन काज अपनासँ नै करब ताधरि‍ आत्‍म ि‍नर्भर नै बनब आत्‍मनि‍र्भर भेनाइ सबहक कर्त्तव्‍य बनैए नै तँ एक-दोसराक संग जि‍नगीक पि‍साइत रहैए अपन जि‍नगीक भारसँ लोक स्‍वयं दबल रहैए दोसराक भार केना सहैत रहैए दबि‍-दबि‍ जि‍नगी मरैत रहैए की कहब कहल नै जाइए से हाल प्रमात्‍मा जनै छथि‍ अपन वि‍कास जौं सभ करत केकरोपर नै ि‍नर्भर रहत सभ सुखी, दुखी नै कोइ रहतै। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। १.जगदीश चन्द्र ठाकुर अनिल २.जवाहरलाल कश्यप३.उमेश पासवान १ जगदीश चन्द्र ठाकुर अनिल गजल गाछी  लुबधल आम साढू चलू चलै  छी  गाम साढू | हम नहि जायब वरियातीमे मोने अछि ओ जाम साढू | लोक बहुत छोट-सन लागल जकर बड़ीटा  नाम साढू | एकेटा अछि घ’र रावणक भरि गाँ अछि बदनाम साढू | हमरा खातिर गाम स्वर्ग थिक आ घर चारू-धाम साढू | २ जवाहरलाल कश्यप हम नहि लिखैत छी कविता सब स पहिले टुटैत छी हम खत्म होइत अछि हम्मर इगो नष्ट होइत अछि हम्मर व्यक्तित्व तखन बनैत अछि कविता महान हम नहि लिखैत छी कविता कविता करैत अछि हम्मर निर्माण ३ उमेश पासवानक दूटा कवि‍ता जगदीश बाबू हम छी सेवक मैथि‍ल जगदीश बाबूक चेला नै हमरा लड़ू खि‍यौलनि‍ नै देलथि‍ मि‍श्रीक ढेला तैयाे हम छी मैथि‍ल जगदीश बाबूक चेला गुरुजी छथि‍न हमर बड्ड महान् साहि‍त्‍यक छथि‍ पइघ वि‍द्वान मधेश मि‍थि‍लामे हि‍नक अलग पहि‍चान जएह बजै छथि‍ वहए करै छथि‍ वएह लि‍खबो करै छथि‍ तमोरि‍या लग बेरमा अछि‍ हि‍नक गाम दर्शन करबाक मोन होइए हमरा बहुत मुदा छी हम अकेला तैयो हम छी मैथि‍ल जगदीश बाबूक चेला गामक जि‍नगी मौलाइल गाछक फूल मि‍थि‍लाक बेटी जीवन-सघर्ष, जीवन-मरण उत्‍थान-पतन पढ़ि‍ कऽ हमर उत्‍साहसँ बढ़ल मोन उठेलौं हमहूँ कलम लि‍खै छी कवि‍ता तँए हम छी सेवक मैथि‍ल........। उजरल घर उजरल घर तवाहीक मंजर देखि‍ कऽ हम वेदनामे डुमल रहै छी खुला आसमानक नि‍च्‍चा जानवरसँ बत्तर रौद-बसातमे कष्‍ट सहि‍ कऽ रहै छी गरजैत मेघ घनघोर बादल पानि‍-बर्खाक संग बाढ़ि‍मे दहाइत लहाश उजरल घर लोकक चि‍तकार देखै-सुनै छी गरीबक जि‍नगी नि‍हत्‍था योद्धा रेतपर बनल घर जकाँ अखन बुझै छी कष्‍टक मारल वि‍पत्ति‍क आगाँ हारल छी जि‍ऐ छी नै मरै छी बीचमे परि‍ कऽ हुकुर-हुकुर करै छी उजरल घर तबाहीक मंजर। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। १.अयोध्यानाथ चौधरी २.ओमप्रकाश झा १ अयोध्यानाथ चौधरी कोनो किम्मत पर मिथिला महान चाही

अपन धरती, अपन आसमान चाही कोनो किम्मत पर मिथिला महान चाही

आब जागि गेल छी, नहि सूतल छी हम अन्याय बहुत सहलहुँ ,नहि बुभूm हमरा कम अहाँक बन्दुक आ गोली के नहि परबाहि हमरा पीठ पर सहाय छथि राम आ लखन जिनका संगे मे तीर आ कमान सदिखन तंै ...कोनो किम्मत पर मिथिला महान चाही

बहुत शोषण कएलहुँ,विचार करु आब भाइचारा क नाम पर,अहाँ कयलहुँ हलाल हम स्वंय छी सक्षम,नहि आन चाही शासक नहि अहाँसन बेइमान चाही सभ मैथिलक मुँहपर मुस्कान चाही कोनो किम्मत पर मिथिला महान चाही

हमरे अन्न–धन्न सँ पालित छी अहाँ हमरे आम–माँछ खा आहलादित छी अहाँ कृतज्ञता सँ वढिकऽकोनो धर्म नहि होइछ कृतघ्नता सँ वढिकऽकोनो क्लेश नहि दैछ हम की कहब,अपने विचार चाही कोनो किम्मत पर मिथिला महान चाही

बरु सोनाक लंका होवऽअहींके नसीब हमरा फुस्से मे अपन पहिचान चाही अहाँक भाग मे रावण छथिहे ओतऽ हमरा त’ एतऽ अपन राम चाही कहू अहाँ सँ कथी मे छी हम कम कोनो किम्मत पर मिथिला ललाम चाही

कृषि योग्य उर्बर भूमि पसरल हमर हरीतिमाक अनुपम पसार छै एतऽ सुरभित समीर बहैत अछि सदैब कल–कल,छल–छल गीत गुनगुनाइत सदिखन हमरा वागमती,कोशी आ बलान चाही कोनो किम्मत पर मिथिलाधाम चाही

छठि पावनि मे सजल जल –किछेर केहन दिव्य दीपावली मे दीपक कतार केहन भव्य हमरा सूर्य –रश्मि रंजित भोर चाही राति के नौतैत गोधुलि चाही कोजागरा क पान आ मखान सन दिव्य कोनो किम्मत पर मिथिलाधाम चाही

राजधानी त’ बनले छै अदौ सँ एतए एहि मे मीन–मेष करबाक वात छै कतए विदेहक नगरी सँ उत्तम स्थान कोन हैत राम –जानकी क प्रणय कथा ककरा नहि मोन केओ की वनाओत, इ त वनले छैक कानो किम्मत पर जनकपुरधाम चाही

ज्ञान –पुञ्जक प्रसार एहीठाम सँ भेल शंकर–मण्डन आ याज्ञबल्यक धाम थिक ई गुरु गूड आ चेला चिनी वूझि गुमान करतै छी ज्ञान क श्रोत विसरि अनजान बनल छी नैतिकताक कनिञो त’ ध्यान चाही कोनो किम्मत पर मिथिला महान चाही

सीता, मैत्रेयी आ गार्गीक धाम छी ई उर्मिला–सन पतिव्रताक ठाम छी ई हमरे सँ अहाँक पहिचान बनल अइ एहि वात के सत्त् अहाँके ध्यान चाही नहि त कहु कतेक आओर वलिदान चाही कोनो किम्मत पर मिथिला महान चाही......... २ ओमप्रकाश झा गजल कहू की, कियो बूझि नै सकल हमरा हँसी सभक लागल बहुत ठरल हमरा

कियो पूछलक नै हमर हाल एतय कपारे तँ भेंटल छलै जरल हमरा

करेजा सँ शोणित बहाबैत रहलौं विरह-नोर कखनो कहाँ खसल हमरा

तमाशा बनल छी, अपन फूँकि हम घर जरै मे मजा आबिते रहल हमरा

रहल "ओम" सदिखन सिनेहक पुजारी इ दुनिया तँ 'काफिर' मुदा कहल हमरा बहरे-मुतकारिब फऊलुन (ह्रस्व-दीर्घ-दीर्घ) - प्रत्येक पाँति मे चारि बेर ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। रवि भूषण पाठक बामे गाम दहिने गाम 1 बागमती आ करेहक बीच ठाढ़ ई कोन चीजक पहाड़ हयौ कविकुलगुरू ई अहांक धर्मदण्‍ड नइ जे धरती के क्षणेक्षण नापैत हो ई थिक हम्‍मर गाम ताकैत चारूदिस इतिहासक अखण्‍ड आवागमनक साक्षी बनि तौलैत ब्रह्माण्‍डक पानि कखनो झुकि जाइत बागमती दिस कखनो करेह दिस ले ...ले...तू ले जेकरा काज हो जलक ई पानि केवल हाईड्रोजन आ ऑक्‍सीजनक यौगिके नइ मोनक पानि आत्‍माक पानि सेहो केवल मुंहक पानि नइ कालिदास आत्‍माक पानि मरै नइ बस एतबे लेल ठाढ़ ई करियन गाम ई गाम जानै छैक पानिक मोल तीन-चारि सौ फीट नीचा कअल ईनार गाम जेकर कुरसी बनल बाभन,कुरमी,धानुक गुआर दुसाधक हड्डी सँ सूरखी चूना बनि माटि मे मिलैत गेलै आ पहाड़ बरहैत गेलै एत्‍ते ऊंच.... एत्‍ते ऊंच.... कि नेपाल ,तिब्‍बत ,चीन मिलिओ के नइ डूबा पाबैछ करियन गाम 2 धनि जिरात धनि जिरात के नापै तोहर ऊर्वरता के जांचै तोहर जोस बस एक बेर सम्‍हरि के उपजि जो खुआ देबै पूरा दुनिया के एक सांझ सोहारी तीमन तरकारी आ बता देबै झिकुटी क’ मोल आ बस एके बेर सम्‍‍हरि के फरि जाइ खुटेरी बाबूक गाछी कलकतिया मालदह फौजली आ बीज्‍जू क’ असंख्‍य वर्णरस आ ई गंध फैलैत चलि जाइ दूर खूब दूर पूब दिस ...पूब दिस सहरसा ,पूर्णिया ,कटिहार आ ओहियो सँ आगू जत’ सँ बाबा आनै छथिन लाल-लाल झूमका ......... ओ गीत ओ सपना ...आ ओ जिनगी जुड़ाइत रहै ...जुड़ाइत रहै 3 उदयनाचार्य तऽ नहिये छथिन मुदा आचार्य लोकनि सँ जक-थक गाम इसकूल मे परहैत परहाबैत आचार्य हअर नेने कनहा पर आडि़ तोड़ैत बालि नोचैत आचार्य जजाति काटैत गारियो दैत बँटैया वला अधहा सँ चौथाई बनबैत आचार्य श्राद्ध मे वियाहक ,वियाह मे श्राद्धक उल्‍टा-पुल्‍टा मंत्र परहैत भोर पुतौह सांझ भाबौह के चुट्टी काटैत सोहराबैत आचार्य कष्‍ट काटैत जोगबैत बनबैत बेटा कें परहाबैत पटना दिल्‍ली नोकरी करत वियाह करब तिजौरी के साफ करैत आचार्य हम हमही बस हमरे टा अछि देखबैत सुनबैत आजुक आचार्य केओ एक-दू श्‍लोक किताबक नाम एक-दू प्रसंग सही गलत दोहराबैत तेहराबैत आचार्य । 4 चन्‍दा चूटकी क’ बाउल सीमेंट चूना सूरखी लेपैत एकटा गोर दक्‍क संगमरमरिया मूर्ति आनि जग जीत लेलकै हम्‍मर गौंआ मूरती क’ मुंह,आंखि बंद करैत बैसल मुद्रा मे मूरती के शुभ क्षण मे स्‍थापित करैत एकदम सक्‍कत सीमेंट सँ ’ हे आचार्य उठब बैसब नइ’ आ दू कुइंटल लोहा क ग्रिल बान्हि ’हे आचार्य निकलब नइ’ आ मूरती क’ हाथ मे एकटा किताब राखि ’ हे आचार्य दोसर पोथी नइ मांगब ‘ आ मूर्तिस्‍थापना क बरखी मनबैत ’ हे आचार्य आन दिन यादि नइ करब’ एक लाख ईंटा सँ बाउंडरी बान्हि ’हे आचार्य एमहर ओमहर बौएनए बंद करू’ 5 हे महाकवि यात्री एक दिन हमरो गाम आबू बैसू एक पहिर रूकू कनेक काल बतियाउ राति भरि वैह बेनीपुर ,बहेड़ी टपैत बरियाही घाट पार करैत दू कोसक चौरस हरियरी मे डूबल मिथिलाक ऐ भूखंड के थाहैत पहुंचू हमर गाम जत’ सूतल हजार बरिख सँ एकटा महावृद्ध । आबिते बात सुनिते अहांके बूढ़बाक हजार बरिस पुरान हड्डी मे फूटि उठतै नवपल्‍लव मिथिलाक भूगोल मे फैलल ओकर छाउर सांद्रित भ’ धनधान्‍य सँ भरि जेतै गामक आम मौह गाब’ लागतै मधुर संगीत मज्‍जर टिकुला ऐंठतै कोयली क’ कान ओहुना विद्यापतिनगर ,चौमथा ,झमोटिया क’ यात्री एक कोस पश्चिमे सँ बदलैत बाट बचैत करियनक झिकुटी सँ बनाबैत सुगम सुविधासंपन्‍न यात्रा मुदा देखिते अहांके बूढ़बा यादि कर’ लागतै ओ महायात्रा आ समाज ,इतिहासक ओ क्षण धर्मदर्शन मे लपटल ओ कालखंड यद्यपि अहांक विचार अलग आ बूढ़बो एकदम अलग तैयो ई भेंट सधारण नइ हेतै सधारण नइ...... 6 भगवान जगन्‍नाथक ऐश्‍वर्य के ललकारैत ई गाम डूबि रहल अपन छोटपन मे संस्‍कृत बूझबा सूझबा बाजबा बतियेबाक अहंकार आ अहंकार क’ कतेको वृत्‍त ठोप चंदने तक रूकल ठमकल किछु वृत्‍त एक-दोसर मे घुसियाइत नोकरी ,कुल ,जमीन ,पैसा आ बुद्धिक वृत्‍त आ सब घर मे एकटा मास्‍टर हेबाक दस सँ पांच तक पढ़ेबा आ नइ पढ़ेबाक ओतबे पुरस्‍कार महीने महीने दरमाहा उठेबा आ एकटा लिमिटेड दुनिया मे रहबाक खतरनाक संस्‍कार तहिना पूजापाठ ,गपशप ,दैनंदिनी नव-नव अहंकार गाम के घेरि रहल के कत्‍त’ कमाए छैक सरकारी आ बिन सरकारी एक नम्‍मर आ दू नम्‍मर बाउग कम काटए क’ बेशी हूनर बैंक मे अस्‍पताल मे ठीकेदारी सँ चोरि छिनरपन सँ...... गामक अहंकार त’ वैह छैक बस ओकर हुलिये बदललै आ वौआ जत’ रहै छें जे करै छें बस कमाइत रह आ अहंकारे संग बढ़बैत रह खोपड़ी सँ खपड़ा एकचरिया पक्‍का दूमहला तीनमहला ,चरिमहला....... ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। चंदन कुमार झा सररा, मदनेश्वर स्थान मधुबनी, बिहार गजल-१ नैनक बाण चलाके हम्मर अपटी खेत मे प्राण लेलौँ झूठहि छल जे प्रेम-पिहानी से सभटा हम जानि गेलौँ सप्पत खयने रही अहाँ जे आयब हम्मर सपना मे सपना देखब सपने रहल निन्नो अहाँ दफानि लेलौँ रहै मोन जे प्रेम-रस सँ भीजा गढ़ब नूतन जिनगी हम एहि मे सौरभ मिझरेलौँ अहाँ नोर सँ सानि देलौँ मोन छल जे मूक्त गगन मे उड़ब अहाँ आ' हम संगे उड़ि गेलौँ कतऽ अहाँ ने जानि हमरा एहिठाँ छानि गेलौँ हमरा बिनु जँ जीबि सकी तऽ जीबू अहाँ सुखक जिनगी बाट तकिते अहीँ के "चंदन" काटब जिनगी ठानि लेलौँ --------वर्ण-२१----------- गजल-२ उजरल गाछी जँका लगैछै गाम हमर चुप्पी सधने किएक कनैछै गाम हमर नवकी कनिञा जँका छलैजे गाम हमर विधवा नारी बनल कनैछै गाम हमर भरले-पुरले हँसै छलैजे गाम हमर टूअर टापर जँका फिरैछै गाम हमर प्रीतक पाँती गबय छलैजे गाम हमर उकटा-पैंची किएक करैछै गाम हमर निर्मल-निश्छल बास छलैजे गाम हमर "चंदन" किए डेरौन लगैछै गाम हमर -----वर्ण-१६------- गजल-३ करेजकेँ पाथर बना लिअ पिरीतकेँ आखर मिटा दिअ सपन जनम भरिकेर देखल कहूतऽ की नोरहि भसा दिअ जड़ैत छै जे आगि विरहक कहैत छी तकरा मिझा दिअ जनमक संगी बनकि बदला कहैत छी नाता कटा लिअ रकटल "चंदन" मोन बेकल कियोतऽ प्रीतम के बुझा दिअ 12-1222-122 गजल-४ मिथिला राजक खातिर मैथिल लड़बे करतै खूनसँ भिजलै धरती मिथिला बनबे करतै निज मातृभूमि उत्थानक हेतु लड़िते रहतै मायक लाजक खातिर संतति मरबे करतै मिथिला-मैथिल-मैथिलीक स्वाभिमानक रक्षार्थ निज प्राणहु के उत्सर्ग मैथिल करबे करतै कमला-गंगा-कोशी-गंडकक सप्पत खा' मैथिल अलगहि राजक सपना पूरा करबे करतै जेतै ने ब्यर्थ बलिदान आब कोनो बलिदानी के "चंदन" ठोस प्रतिकार मैथिल करबे करतै -------वर्ण-१८------- मिथिला-मैथिल-मैथिली अस्मिताक रक्षाक हेतु लड़निहार,समस्त बलिदानी के समर्पित. गजल-५ कहिये सँ कतिआयल कनै छथि जानकी कहिये सँ रिरिआयल फिरै छथि जानकी मिथिला सँ बिधुआयल लगै छथि जानकी मैथिल सँ खिसिआयल लगै छथि जानकी घर-घर सँ बौआयल फिरै छथि जानकी घर-घर तऽ छिछिआयल फिरै छथि जानकी रामहि सँ डेरायल लगै छथि जानकी जिनगी सँ अकछायल लगै छथि जानकी अपराध की कयलनि पुछै छथि जानकी चुप्पहि जनक "चंदन" कनै छथि जानकी 2212 + 2212 + 2212 -बहरे-रजज. गजल-६ किछु बात एहन जे कना गेल हमरा जिनगीक नव माने सिखा गेल हमरा सपनाक दुनिया छलहुँ झूलैत झूला तखनहि उठल बिर्ड़ो जगा गेल हमरा पालन अपन पेटक  करैए  कुकूरो आनोक हित जीबू बुझा गेल हमरा अप्पन हरख हरखित रहैछै सभ क्यो अनके दुखहि कानब बता गेल हमरा "चंदन"मनुज जीवन बितै नहि अकारथ जिनगीक सभ मकसदि गना गेल हमरा 2212-2212-2122 गजल-७ नैनक नीर भीजल चीर जमुना तीर मे करेजा क्षीर सींचल वीर जमुना तीर मे बैसल नीड़ कूक अधीर जमुना तीर मे लागल भीड़ मूक बहीर जमुना तीर मे आसक सीर सुखै नै नीर जमुना तीर मे चासक सीर गरै छै सीर जमुना तीर मे देशक वीर भेल फकीर जमुना तीर मे नेताक भीड़ गिरैछै खीर जमुना तीर मे सनले खून द्रौपदी चीर जमुना तीर मे लागल घून काया प्रवीर जमुना तीर मे ------वर्ण-१६------- गजल-८ मन वीणा तार झंकार भरल मैथिल जन के हुंकार प्रबल बहुत आँखि केर नोर बहल बहुत जगक दुत्कार सहल आब उचित उपचार करब शत्रुक प्रहार जे खून बहल निज अधिकारक हेतु लड़ब सौभाग्य जँ प्राण तियागै परल मिथिला-राजक तऽ माँग अटल "चंदन" मैथिल लड़िते डटल ------वर्ण-१२-------- हजल कनिया हम्मर बड़ गुणवन्ती बुझा गेल हमरा किएक कुमारहि लोक मरैए जना गेल हमरा शांती जहिए घर मे पैसली तहिए सँ छी अशांत क्रांति घरमे मचल तेहन जे मिटा गेल हमरा सासु लगै छन्हि सौतिन ससुर लगैन्ह चरबाह गारि अलौकिक हुनका मुँहक लजा गेल हमरा संग गोतनी के लड़थि भैंसुर के नहि परबाह आबतऽ देखू दुनू भाइयो बिच बझा गेल हमरा रौ दैवा नहि जनलौ किछुओ फँसलौ ब्याहक फाँस "चंदन" रूपक माया फँसरी लटका गेल हमरा रुबाइ-1 बरू बिनु दबाइ चलि गेलै ओकर जान श्राद्ध तऽ मुदा करजा लऽ भेलै गौदान खाय अधहे पेट कटलक जिनगी सकल मरल तऽ सौजनी मारैत छै सुरकान । रूबाइ-2 नोरसँ सिक्त आँचर आब निचोड़ि दिऔ जँ आँगुर कियो देखबै कर तोड़ि दिऔ त्यागू भय सीता मैया के सपथ धरू मिथिला राजक शत्रू मूण्ड मचोड़ि दिऔ । रूबाइ-3 टूटल बान्ह बहलै गामक गाम फेर गेल दहा जिनगी कतेको ठाम फेर कागतक नाव, सरकारो तत्पर छलै मुदा, बाढि भासल कतेको जान फेर  । रुबाइ-4 दू टुक कहलौ दू फाँक भेल संबंध चुप्पहि जँ रहलौ फोँका गेल संबंध पस भरल टीसैत पसीझैत घाव सन सत्यक शूल गाड़ि बहा देल संबंध । रुबाइ-5 संध्या-वंदन,काठ सिरिखण्ड घसै छी भोर-साँझ आरती घरिघण्ट पिटै छी भाँग पीबि मस्तक तिरपुण्ड लेपै छी रुचि-रुचि रोहु मूड़ा मुरिघण्ट चभै छी । कता-1 मन वीणा सँ उठि रहल छैक करूण राग माटि मिथिलाक किएक कऽ रहलै विलाप सनल किएक शोणित सँ मैथिल भू-भाग सुनऽ मे नहि किए अबैछ कोकिल-अलाप ? आकाशवाणीक दरभंगा केन्द्र सँ दिनांक १०-०३-२००४ के तरुण-कुसुम कार्यक्रम मे प्रसारित एकटा कविताः- (1) बेटी बन्हलीह परिणय डोर ।। मुँह पर मूस्की आँखि मे नोर कन्यागत के लागल बकोर खेलैत छलीह जे बाबाक कोर से बन्हलीह आइ परिणय डोर। छलीह चान से भेलीह चकोर घर ससुरक हेतैन्हि ईजोर माय करेजा केलनि कठोर बाबू आँखि सँ झर-झर नोर,बेटी बन्हलीह परिणय डोर ।। 2.मायक सपथ छी दऽ रहल मैथिली के खून सँ देखू जनक नगरी रंगल जानकी अँगना मे देखू रावणो घुमिए रहल। देखू सियाके रक्त सँ जनक-खेतक रज सनल घायल मिथिला मैथिली बाट बिचे छथि पड़ल। माय अप्पन पुत्र सँ आह्वान छथि कइए रहल उठू जागू वीर मैथिल किए छी अहाँ चुप पड़ल । देखू मिथिला राजक सपना शोणितक धारे बहल आउ मिलि एकरा बचाउ छी मायक सपथ दऽरहल । 3.घुमि अयलहु कुशेश्वर-स्थान पग-पग खत्ता पोखरि धार चर-चाँचर मे नाव सवार छानि रहल अछि माछ-मखान घुमि अयलहु कुशेश्वर-स्थान । चैतहु मास झल-झल पानि उबडुब पोखरि भरले मोनि छोपैछ कृषक गरमा धान घुमि अयलहु कुशेश्वर-स्थान । धप-धप बाउल पुनिमक चान पुरबाक सिहकी सुधा समान बुढ़बो मटकय जेना जुआन घुमि अयलहु कुशेश्वर-स्थान । खत्ते मे जनु सड़क नुकायल टूटल पुलिया बान्हो भासल खेत बनल अछि सिन्धु समान घुमि अयलहु कुशेश्वर-स्थान । हर-हर-हर सगरो अनघोल सुनल नचारी बजिते ढो़ल बमभोला छथि बड़ा महान घुमि अयलहु कुशेश्वर-स्थान हाइकु गद्दह बेर गिरगिट बाजय पहिले साँझ। घुरक धुआँ धुआयल अकास मालक थैरि। बारल साँझ गोसाउनिक गीत गमकै धूप। गोइठा आँच लहलह लहके राति अन्हार । मरुआ रोटी गमकैत फोरन माछक झोर । अँगना पिढ़ी बैसल खेनहार नेना भुटका । निःशब्द राति प्रियतम संगमे हँसी-ठिठोली । प्रेमहि लीन गमकैत कामिनी भोरबा राति । ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। जगदानन्द झा 'मनु' ग्राम पोस्ट- हरिपुर डीह्टोंल, मधुबनी गजल- १ छुपि-छुपि क' सदिखन कनै छी हम घुटि-घुटि क' दिन राति मरै छी हम लगन एहन है छै छल नै बुझल विरह के आगि में आब जरै छी हम छन भरि के दूरी सहलो नै जाइए छन-छन घुटि-घुटि क' कनै छी हम सब त बताह कहैत अछि हमरा हुनक ध्यान में रमल रहै छी हम जाहि बाट पर चलि प्रियतम गेला मनु ओ बाट के निहारि तकै छी हम (सरल वार्णिक बहर, वर्ण-१४) ------------------------------------ गजल-२ ज' नाराज छी मानि जाऊ पिया प्रेम बिधि जानि जाऊ महिस भेल पारी तरे अछि घरक खीरसा सानि जाऊ मरल माछ पौरल दही अछि हिया हमर  सभ गानि जाऊ करीया बडद मुइल परसू किछो नै कनी कानि जाऊ छिटल रोपनी हेत कोना घरो घुरि अहाँ जानि जाऊ (बहरे-मुतकारिब, 122 -122-122) -------------------------------------------------- गजल-३ हम जन्म कें टुगर छी प्रेमक लेल तरसैत रहलौं भेटल किरण एक आसक तकरो त' मिझबैत रहलौं दुख एहि कें केखनो नै की प्रेम किछ नै पएलौं अफसोस की एहि दुनिआ में हमहुँ जीबैत रहलौं चमकैत सभ बस्तु कें हम अनजान में सोन बुझलौं सोना जखन हम पएलौं नै बुझि क' हरबैत रहलौं किछु नै रहल आब अपने कें बिसरि में लागि गेलौं लोटा भरल भाँग में सब किछु अपन गमबैत रहलौं आँखिक बिसरि गेल आसा,अनुराग सबटा बिसरलौं गेलौं हराएब दुख तन-मन अपन बिसरैत रहलौं ( बहरे मुजस्सम वा मुजास 2212-2122, दु-दु बेर सभ पांति में ) ------------------------------------------- गजल-४ खून सँ भिजलै धरती  मिथला बनबे करतै आब  जोड लगाबे कियो झंडा फहरेबे करतै सुनु बलिदानी सुनु शैनानी आब दिन दूर नै विश्वक नक्सा में मिथिलाक नाम देखेबे करतै कतबो चलतै बम निकलै चाहे हमर दम क्रांति बढल आगु आब जुनि इ रुकबे करतै बहुत छिनलक सभ नै सहबौ आब ककरो गर्म सोनित त आब हिलकोर मारबे करतै एक खुनक बूंद सँ सय-सय रंजू जन्म लेतै आताताई सँ बदला ओ चूनि-चूनि लेबे करतै (सरल वर्णिक बहर, वर्ण-१८) जगदानन्द झा 'मनु' ----------------------------------------------------- गजल-५ हमर जीवन भरि करेजा तुटिते रहल सब कियो हमरा सँ आई फुटिते रहल जेकरा हम अपन तन मन सब सोपलौं मोन कें ओ हमर सदिखन लुटिते रहल हमर भागक कनिक लिखलाहा देखियौ किछ जए लिखलौं छने में मिटिते रहल पीठ  पाँछा आब रेतै गरदैन अछि प्रेम एक दोसर सँ सबतरि छुटिते रहल आब बैसल मनु झमारल हारल कनै जोडलौं कतबो मुदा मन तुटिते रहल बहरे जदीद -2122-2122-2212 ---------- ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। १. अमित मिश्र- गजल २.मुन्नाजी-रुबाइ १ अमित मिश्र गजल

भूख जाड़ल लोक कोना हँसि सकैए नोर कानल लोक कोना हँसि सकैए

देखने जे होइ अर्थी अपन लोकक दर्द जागल लोक कोना हँसि सकैए

लोभ जागल मोह मोहल लोक हँसतै साँस काटल लोक कोना हँसि सकैए

जहर बनबै जे कहाँ ओ नोर बहबै जहर चाटल लोक कोना हँसि सकैए

दर्द दै जे छी कने अपने ल' देखू चोट लागल लोक कोना हँसि सकैए

राखि हमरो नोर अपना आँखि सोचू "अमित" मारल लोक कोना हँसि सकैए

फाइलातुन 2122 तीन बेर सब पाँति मे बहरे-रमल

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गजल

खिड़की सँ सीधे देखै छलौँ हम चान घन तिमिर मोनक छाँटै छलौँ हम चान

हेतै अपन फेरो भेँट ओतै जा क' तेँ जागि आशा लगबै छलौँ हम चान

दिन भरि समाजक पहरा कतेको नयन छवि संग तोहर भटकै छलौँ हम चान

लागै तरेगण लोचन पलक झपकैत बनि मेघ घोघट लागै छलौँ हम चान

शुभ राति फेरो भेटब अमिय नेहक ल' सब दिन "अमित" नव आबै छलौँ हम चान

मुस्तफइलुन-मफऊलातु-मफऊलातु {दीर्घ-दीर्घ-ह्रस्व-दीर्घ-दीर्घ-दीर्घ-दीर्घ-ह्रस्व-दीर्घ-दीर्घ-दीर्घ-ह्रस्व} बहरे-सलीम

२ मुन्नाजी रुबाइ 1 जड़ब अहाँ जरू दिया बाती जकाँ गाएब तँ गाउ जेना पराती जकाँ ताकि कनखिये मोन ने रिझाउ अहाँ करू जुनि उकपाती जकाँ 2 दिअए सिनेह अपन नेना जानि कए हमहूँ टुग्गर निमहब अपना मानि कए जँ छोड़बै अनेरुआ सन हमरा तँ फफकि मरब एकसर कानि कए 3 टूटल छल नेह आब तँ जोड़ भए गेलै छलै दुश्मन मुदा चितचोर भए गेलै जखने लिखलकै पाँतीमे मोनक बात दूनूक नेहक तँ भंडाफोड़ भए गेलै 4 हिला देलक गगनकेँ मारि तीर बचा लेलक जे अर्धनग्न चीर द्रौपदीकेँ बढ़ा वस्त्र केलक रक्षा संसार भरि बेटल छल वएह वीर 5 उमरे वर्षक संग बढ़ि जुआइ छै नजरि सोंझा-सोंझी भए क' लजाइ छै प्रेमक भाव जे नै पढ़ि पाबै अछि तखन बुझू जे ओ हृदैसँ कसाइ अछि 6 मोन भए उठल दुखित होहकारीसँ उठि दर्शक भागल मारामरीसँ प्रायोजक तँ पथने रहल कान अपन कर्ता देखार भेला जतियारीसँ 7 जखन सभ केओ देखू नेहाल भेलै तखन बुझू जे गोटी तँ लाल भेलै दर्शक जखने झूमि उठल मनसँ तखने तँ संयोजक मालोमाल भेलै 8 ऐ शत्रुकेँ तँ तोड़ै लेल दम चाही मात्र चित्रगुप्त नै ऐ लेल यम चाही अहाँसँ किछु नै बिगड़तै एकर एकरा शोधै लेल तँ खाली हम चाही 9 जतेक चाही जी लिअ सपनामे राखू यथार्थ संजोगि अपनामे उधियाउ नै एकपेड़िया बाटपर नै तँ जाएत नापल जिनगी नपनामे 10 ताकि कनडेड़िए कतए नुकेलहुँ कहू फेर किए नजरि फेरि लेलहुँ बिहुँसैत बैसल छी सोंझा अहाँ आब कहू अहीँ कोना फेर एलहुँ 11 दै छिऐ आशीर्वाद लगा क' फानी छी जोगारमे ऐखनो जे कते तानी वाह की जमाना देखाइए हमरा सत्य छै इएह मानी की नै मानी ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। विदेह नूतन अंक मिथिला कला संगीत राजनाथ मिश्र चित्रमय मिथिला स्लाइड शो चित्रमय मिथिला (https://sites.google.com/a/videha.com/videha-paintings-photos/ ) २. उमेश मण्डल मिथिलाक वनस्पति स्लाइड शो मिथिलाक जीव-जन्तु स्लाइड शो मिथिलाक जिनगी स्लाइड शो मिथिलाक वनस्पति/ मिथिलाक जीव जन्तु/ मिथिलाक जिनगी  (https://sites.google.com/a/videha.com/videha-paintings-photos/ ) ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। विदेह नूतन अंक गद्य-पद्य भारती १. मोहनदास (दीर्घकथा):लेखक: उदय प्रकाश (मूल हिन्दीसँ मैथिलीमे अनुवाद विनीत उत्पल) मोहनदास (मैथिली-देवनागरी) मोहनदास (मैथिली-मिथिलाक्षर) मोहनदास (मैथिली-ब्रेल) २.छिन्नमस्ता- प्रभा खेतानक हिन्दी उपन्यासक सुशीला झा द्वारा मैथिली अनुवाद छिन्नमस्ता ३.कनकमणि दीक्षित (मूल नेपालीसँ मैथिली अनुवाद श्रीमती रूपा धीरू आ श्री धीरेन्द्र प्रेमर्षि) भगता बेङक देश-भ्रमण ४ इप्सिता सारंगीक ओड़िया कविता- ओड़ियासँ इंग्लिश इप्सिता सारंगी द्वारा स्वयं, इंग्लिशसँँ मैथिली गजेन्द्र ठाकुर द्वारा हिलकोर कियो नै सिखेलक कहियो एक ठोप माहिर देनाइ बासनमे निर्दोख सरलताक। हम पूर्ण रूपेँ हारि गेलौं। फूसिक मरैत पानि सुच्चा सत्यमे- वा दोसर, जीवन नै अछि जीवन, किंशाइत। हम हेरा गेलौं। कोन माहुर विश्वासकेँ संक्रमित केलक, जे लागल सदिखन मात्र टुकड़ी-टुकड़ी हेबा लेल। अकाशक टुकड़ी चिड़ैक दहाइत पाँखिमे; नहिये अकाश नहिये छाह छल एकर चांगुरमे। विश्वास, जेना पूर्णिमाँक रातिक समुद्र जे घुरबैए सभटा लेल बौस्त जखन ओ घुरबैए हिलकोर। की हिलकोर घुरैए विश्वासक आरि छोट हाथसँ बालुपर बनल? की हिलकोर घुरा सकैए एकान्त जिनगीमे निराउ बर्खा? पनिसोखाक द्वीपसँ स्वप्न आवेशसँ छोट कागचक नाहमे? आ, जीबाक स्थितप्रज्ञ अभिलाषा समयसँ ध्यान हटा कऽ? की हिलकोर घुरा सकैए- पराजय? आ, हेरा गेनाइ? (इप्सिता सारंगीक ओड़िया कविता "धेउ कान") बालानां कृते १.जगदीश चंद्र ठाकुर ‘अनिल’ २.डॉ॰ शशिधर कुमर “विदेह” १ जगदीश चंद्र ठाकुर ‘अनिल’ बाल गीत हमरहि खातिर सुरुज उगइ छथि हमरहि खातिर चान हमरहि खातिर कोटि तरेगन हमरहि ले’ आसमान | हमरहि खातिर साँझ पडइए राति सं होइए प्रात हमरहि खातिर रौद अबैए हमरहि लेल बसात हमरहि खातिर गाछ फडइए जामुन, आम, लताम | पानि तपैए, भाफ बनैए भाफ उडइए, मेघ बनैए सेहो हमरे ले’ ऊपरसं धरती पर रिमझिम बरसैए हमरहि खातिर धरती मैया देथि गहूम आ धान | हमरहि खातिर फूल फूलाइछ उज्जर- पीयर- लाल कतहु असीमित सागर अछि तं पर्वत कतहु विशाल सभटा हमरहि लेल बनाक’ नुका गेला भगवान | २ डॉ॰ शशिधर कुमर “विदेह” एम॰डी॰(आयु॰) – कायचिकित्सा कॉलेज ऑफ आयुर्वेद एण्ड रिसर्च सेण्टर, निगडी – प्राधिकरण, पूणा (महाराष्ट्र) – ४११०४४, हमहूँ आई सँ इस्कूल जयबै (बालगीत) हमहूँ आई सँ इस्कूल जयबै, सीखबै  बहुते  बात । आब ने रहबै मूरूख बनि कऽ, करबै ने कोनो लाथ ।। धनरोपनी - कमठैनी लए ने, करब पढ़ाई केँ कात । आब ने पेट – दरद फुसिये, ने आब दुखेतै माथ ।। हमहूँ पढ़बै भरि संसार, आ मिथिला केर इतिहास । पढ़बै कोना हेतै भारत, आ मिथिला केर विकास ।। की   विद्यापति,   प्रेमचन्द, गोर्की, होमर लिखलाह । कतऽ ठाढ़ छी, की करैत छी, नीक छी की, अधलाह ?? हमहूँ पढ़बै चान – सुरूज आ ग्रह - उपग्रहक खगोल । मिथिला – भारत केर चौहद्दी, दुनिञा  केर   भूगोल ।। हमहूँ सीखबै नापब – जोखब, गणितक औना पथारी । नञि हिसाब सँ हम घबड़एबै, कतबो  हो  ओ भारी ।। हमहूँ बुझबै जीव – जन्तु केर, बनल  कोना  छै  देह । कोना यन्त्र सभ काज करै छै, अणु – परमाणुक  भेद ।। धियापुता मिथिलाक नान्हि टा, पर  बड़का  अभिलाषा । साक्षर भारत, साक्षर मिथिला, शिक्षित  मिथिलाभाषा ।। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com  पर पठाउ। बच्चा लोकनि द्वारा स्मरणीय श्लोक १.प्रातः काल ब्रह्ममुहूर्त्त (सूर्योदयक एक घंटा पहिने) सर्वप्रथम अपन दुनू हाथ देखबाक चाही, आ’ ई श्लोक बजबाक चाही। कराग्रे वसते लक्ष्मीः करमध्ये सरस्वती। करमूले स्थितो ब्रह्मा प्रभाते करदर्शनम्॥ करक आगाँ लक्ष्मी बसैत छथि, करक मध्यमे सरस्वती, करक मूलमे ब्रह्मा स्थित छथि। भोरमे ताहि द्वारे करक दर्शन करबाक थीक। २.संध्या काल दीप लेसबाक काल- दीपमूले स्थितो ब्रह्मा दीपमध्ये जनार्दनः। दीपाग्रे शङ्करः प्रोक्त्तः सन्ध्याज्योतिर्नमोऽस्तुते॥ दीपक मूल भागमे ब्रह्मा, दीपक मध्यभागमे जनार्दन (विष्णु) आऽ दीपक अग्र भागमे शङ्कर स्थित छथि। हे संध्याज्योति! अहाँकेँ नमस्कार। ३.सुतबाक काल- रामं स्कन्दं हनूमन्तं वैनतेयं वृकोदरम्। शयने यः स्मरेन्नित्यं दुःस्वप्नस्तस्य नश्यति॥ जे सभ दिन सुतबासँ पहिने राम, कुमारस्वामी, हनूमान्, गरुड़ आऽ भीमक स्मरण करैत छथि, हुनकर दुःस्वप्न नष्ट भऽ जाइत छन्हि। ४. नहेबाक समय- गङ्गे च यमुने चैव गोदावरि सरस्वति। नर्मदे सिन्धु कावेरि जलेऽस्मिन् सन्निधिं कुरू॥ हे गंगा, यमुना, गोदावरी, सरस्वती, नर्मदा, सिन्धु आऽ कावेरी  धार। एहि जलमे अपन सान्निध्य दिअ। ५.उत्तरं यत्समुद्रस्य हिमाद्रेश्चैव दक्षिणम्। वर्षं तत् भारतं नाम भारती यत्र सन्ततिः॥ समुद्रक उत्तरमे आऽ हिमालयक दक्षिणमे भारत अछि आऽ ओतुका सन्तति भारती कहबैत छथि। ६.अहल्या द्रौपदी सीता तारा मण्डोदरी तथा। पञ्चकं ना स्मरेन्नित्यं महापातकनाशकम्॥ जे सभ दिन अहल्या, द्रौपदी, सीता, तारा आऽ मण्दोदरी, एहि पाँच साध्वी-स्त्रीक स्मरण करैत छथि, हुनकर सभ पाप नष्ट भऽ जाइत छन्हि। ७.अश्वत्थामा बलिर्व्यासो हनूमांश्च विभीषणः। कृपः परशुरामश्च सप्तैते चिरञ्जीविनः॥ अश्वत्थामा, बलि, व्यास, हनूमान्, विभीषण, कृपाचार्य आऽ परशुराम- ई सात टा चिरञ्जीवी कहबैत छथि। ८.साते भवतु सुप्रीता देवी शिखर वासिनी उग्रेन तपसा लब्धो यया पशुपतिः पतिः। सिद्धिः साध्ये सतामस्तु प्रसादान्तस्य धूर्जटेः जाह्नवीफेनलेखेव यन्यूधि शशिनः कला॥ ९. बालोऽहं जगदानन्द न मे बाला सरस्वती। अपूर्णे पंचमे वर्षे वर्णयामि जगत्त्रयम् ॥ १०. दूर्वाक्षत मंत्र(शुक्ल यजुर्वेद अध्याय २२, मंत्र २२) आ ब्रह्मन्नित्यस्य प्रजापतिर्ॠषिः। लिंभोक्त्ता देवताः। स्वराडुत्कृतिश्छन्दः। षड्जः स्वरः॥ आ ब्रह्म॑न् ब्राह्म॒णो ब्र॑ह्मवर्च॒सी जा॑यता॒मा रा॒ष्ट्रे रा॑ज॒न्यः शुरे॑ऽइषव्यो॒ऽतिव्या॒धी म॑हार॒थो जा॑यतां॒ दोग्ध्रीं धे॒नुर्वोढा॑न॒ड्वाना॒शुः सप्तिः॒ पुर॑न्धि॒र्योवा॑ जि॒ष्णू र॑थे॒ष्ठाः स॒भेयो॒ युवास्य यज॑मानस्य वी॒रो जा॒यतां निका॒मे-नि॑कामे नः प॒र्जन्यों वर्षतु॒ फल॑वत्यो न॒ऽओष॑धयः पच्यन्तां योगेक्ष॒मो नः॑ कल्पताम्॥२२॥ मन्त्रार्थाः सिद्धयः सन्तु पूर्णाः सन्तु मनोरथाः। शत्रूणां बुद्धिनाशोऽस्तु मित्राणामुदयस्तव। ॐ दीर्घायुर्भव। ॐ सौभाग्यवती भव। हे भगवान्। अपन देशमे सुयोग्य आ’ सर्वज्ञ विद्यार्थी उत्पन्न होथि, आ’ शुत्रुकेँ नाश कएनिहार सैनिक उत्पन्न होथि। अपन देशक गाय खूब दूध दय बाली, बरद भार वहन करएमे सक्षम होथि आ’ घोड़ा त्वरित रूपेँ दौगय बला होए। स्त्रीगण नगरक नेतृत्व करबामे सक्षम होथि आ’ युवक सभामे ओजपूर्ण भाषण देबयबला आ’ नेतृत्व देबामे सक्षम होथि। अपन देशमे जखन आवश्यक होय वर्षा होए आ’ औषधिक-बूटी सर्वदा परिपक्व होइत रहए। एवं क्रमे सभ तरहेँ हमरा सभक कल्याण होए। शत्रुक बुद्धिक नाश होए आ’ मित्रक उदय होए॥ मनुष्यकें कोन वस्तुक इच्छा करबाक चाही तकर वर्णन एहि मंत्रमे कएल गेल अछि। एहिमे वाचकलुप्तोपमालड़्कार अछि। अन्वय- ब्रह्म॑न् - विद्या आदि गुणसँ परिपूर्ण ब्रह्म रा॒ष्ट्रे - देशमे ब्र॑ह्मवर्च॒सी-ब्रह्म विद्याक तेजसँ युक्त्त आ जा॑यतां॒- उत्पन्न होए रा॑ज॒न्यः-राजा शुरे॑ऽ–बिना डर बला इषव्यो॒- बाण चलेबामे निपुण ऽतिव्या॒धी-शत्रुकेँ तारण दय बला म॑हार॒थो-पैघ रथ बला वीर दोग्ध्रीं-कामना(दूध पूर्ण करए बाली) धे॒नुर्वोढा॑न॒ड्वाना॒शुः धे॒नु-गौ वा वाणी र्वोढा॑न॒ड्वा- पैघ बरद ना॒शुः-आशुः-त्वरित सप्तिः॒-घोड़ा पुर॑न्धि॒र्योवा॑- पुर॑न्धि॒- व्यवहारकेँ धारण करए बाली र्योवा॑-स्त्री जि॒ष्णू-शत्रुकेँ जीतए बला र॑थे॒ष्ठाः-रथ पर स्थिर स॒भेयो॒-उत्तम सभामे युवास्य-युवा जेहन यज॑मानस्य-राजाक राज्यमे वी॒रो-शत्रुकेँ पराजित करएबला निका॒मे-नि॑कामे-निश्चययुक्त्त कार्यमे नः-हमर सभक प॒र्जन्यों-मेघ वर्षतु॒-वर्षा होए फल॑वत्यो-उत्तम फल बला ओष॑धयः-औषधिः पच्यन्तां- पाकए योगेक्ष॒मो-अलभ्य लभ्य करेबाक हेतु कएल गेल योगक रक्षा नः॑-हमरा सभक हेतु कल्पताम्-समर्थ होए ग्रिफिथक अनुवाद- हे ब्रह्मण, हमर राज्यमे ब्राह्मण नीक धार्मिक विद्या बला, राजन्य-वीर,तीरंदाज, दूध दए बाली गाय, दौगय बला जन्तु, उद्यमी नारी होथि। पार्जन्य आवश्यकता पड़ला पर वर्षा देथि, फल देय बला गाछ पाकए, हम सभ संपत्ति अर्जित/संरक्षित करी। 8.VIDEHA FOR NON RESIDENTS 8.1 to 8.3 MAITHILI LITERATURE IN ENGLISH 8.1.1.The Comet   -GAJENDRA THAKUR translated by Jyoti Jha chaudhary 8.1.2.The_Science_of_Words- GAJENDRA THAKUR translated by the author himself 8.1.3.On_the_dice-board_of_the_millennium- GAJENDRA THAKUR translated by Jyoti Jha chaudhary 8.1.4.NAAGPHANS (IN ENGLISH)- SHEFALIKA VERMA translated by Dr. Rajiv Kumar Verma and Dr. Jaya Verma विदेह नूतन अंक भाषापाक रचना-लेखन Input: (कोष्ठकमे देवनागरी, मिथिलाक्षर किंवा फोनेटिक-रोमनमे टाइप करू। Input in Devanagari, Mithilakshara or Phonetic-Roman.) Output: (परिणाम देवनागरी, मिथिलाक्षर आ फोनेटिक-रोमन/ रोमनमे। Result in Devanagari, Mithilakshara and Phonetic-Roman/ Roman.) English to Maithili Maithili to English इंग्लिश-मैथिली-कोष / मैथिली-इंग्लिश-कोष  प्रोजेक्टकेँ आगू बढ़ाऊ, अपन सुझाव आ योगदान ई-मेल द्वारा ggajendra@videha.com पर पठाऊ। Top of Form विदेहक मैथिली-अंग्रेजी आ अंग्रेजी मैथिली कोष (इंटरनेटपर पहिल बेर सर्च-डिक्शनरी) एम.एस. एस.क्यू.एल. सर्वर आधारित -Based on ms-sql server Maithili-English and English-Maithili Dictionary. १.भारत आ नेपालक मैथिली भाषा-वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक शैली आ २.मैथिलीमे भाषा सम्पादन पाठ्यक्रम १.नेपाल आ भारतक मैथिली भाषा-वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक शैली

१.१. नेपालक मैथिली भाषा वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक  उच्चारण आ लेखन शैली (भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक धारणाकेँ पूर्ण रूपसँ सङ्ग लऽ निर्धारित) मैथिलीमे उच्चारण तथा लेखन १.पञ्चमाक्षर आ अनुस्वार: पञ्चमाक्षरान्तर्गत ङ, ञ, ण, न एवं म अबैत अछि। संस्कृत भाषाक अनुसार शब्दक अन्तमे जाहि वर्गक अक्षर रहैत अछि ओही वर्गक पञ्चमाक्षर अबैत अछि। जेना- अङ्क (क वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ङ् आएल अछि।) पञ्च (च वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ञ् आएल अछि।) खण्ड (ट वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ण् आएल अछि।) सन्धि (त वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे न् आएल अछि।) खम्भ (प वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे म् आएल अछि।) उपर्युक्त बात मैथिलीमे कम देखल जाइत अछि। पञ्चमाक्षरक बदलामे अधिकांश जगहपर अनुस्वारक प्रयोग देखल जाइछ। जेना- अंक, पंच, खंड, संधि, खंभ आदि। व्याकरणविद पण्डित गोविन्द झाक कहब छनि जे कवर्ग, चवर्ग आ टवर्गसँ पूर्व अनुस्वार लिखल जाए तथा तवर्ग आ पवर्गसँ पूर्व पञ्चमाक्षरे लिखल जाए। जेना- अंक, चंचल, अंडा, अन्त तथा कम्पन। मुदा हिन्दीक निकट रहल आधुनिक लेखक एहि बातकेँ नहि मानैत छथि। ओ लोकनि अन्त आ कम्पनक जगहपर सेहो अंत आ कंपन लिखैत देखल जाइत छथि। नवीन पद्धति किछु सुविधाजनक अवश्य छैक। किएक तँ एहिमे समय आ स्थानक बचत होइत छैक। मुदा कतोक बेर हस्तलेखन वा मुद्रणमे अनुस्वारक छोट सन बिन्दु स्पष्ट नहि भेलासँ अर्थक अनर्थ होइत सेहो देखल जाइत अछि। अनुस्वारक प्रयोगमे उच्चारण-दोषक सम्भावना सेहो ततबए देखल जाइत अछि। एतदर्थ कसँ लऽ कऽ पवर्ग धरि पञ्चमाक्षरेक प्रयोग करब उचित अछि। यसँ लऽ कऽ ज्ञ धरिक अक्षरक सङ्ग अनुस्वारक प्रयोग करबामे कतहु कोनो विवाद नहि देखल जाइछ। २.ढ आ ढ़ : ढ़क उच्चारण “र् ह”जकाँ होइत अछि। अतः जतऽ “र् ह”क उच्चारण हो ओतऽ मात्र ढ़ लिखल जाए। आन ठाम खाली ढ लिखल जएबाक चाही। जेना- ढ = ढाकी, ढेकी, ढीठ, ढेउआ, ढङ्ग, ढेरी, ढाकनि, ढाठ आदि। ढ़ = पढ़ाइ, बढ़ब, गढ़ब, मढ़ब, बुढ़बा, साँढ़, गाढ़, रीढ़, चाँढ़, सीढ़ी, पीढ़ी आदि। उपर्युक्त शब्द सभकेँ देखलासँ ई स्पष्ट होइत अछि जे साधारणतया शब्दक शुरूमे ढ आ मध्य तथा अन्तमे ढ़ अबैत अछि। इएह नियम ड आ ड़क सन्दर्भ सेहो लागू होइत अछि। ३.व आ ब : मैथिलीमे “व”क उच्चारण ब कएल जाइत अछि, मुदा ओकरा ब रूपमे नहि लिखल जएबाक चाही। जेना- उच्चारण : बैद्यनाथ, बिद्या, नब, देबता, बिष्णु, बंश, बन्दना आदि। एहि सभक स्थानपर क्रमशः वैद्यनाथ, विद्या, नव, देवता, विष्णु, वंश, वन्दना लिखबाक चाही। सामान्यतया व उच्चारणक लेल ओ प्रयोग कएल जाइत अछि। जेना- ओकील, ओजह आदि। ४.य आ ज : कतहु-कतहु “य”क उच्चारण “ज”जकाँ करैत देखल जाइत अछि, मुदा ओकरा ज नहि लिखबाक चाही। उच्चारणमे यज्ञ, जदि, जमुना, जुग, जाबत, जोगी, जदु, जम आदि कहल जाएबला शब्द सभकेँ क्रमशः यज्ञ, यदि, यमुना, युग, यावत, योगी, यदु, यम लिखबाक चाही। ५.ए आ य : मैथिलीक वर्तनीमे ए आ य दुनू लिखल जाइत अछि। प्राचीन वर्तनी- कएल, जाए, होएत, माए, भाए, गाए आदि। नवीन वर्तनी- कयल, जाय, होयत, माय, भाय, गाय आदि। सामान्यतया शब्दक शुरूमे ए मात्र अबैत अछि। जेना एहि, एना, एकर, एहन आदि। एहि शब्द सभक स्थानपर यहि, यना, यकर, यहन आदिक प्रयोग नहि करबाक चाही। यद्यपि मैथिलीभाषी थारू सहित किछु जातिमे शब्दक आरम्भोमे “ए”केँ य कहि उच्चारण कएल जाइत अछि। ए आ “य”क प्रयोगक सन्दर्भमे प्राचीने पद्धतिक अनुसरण करब उपयुक्त मानि एहि पुस्तकमे ओकरे प्रयोग कएल गेल अछि। किएक तँ दुनूक लेखनमे कोनो सहजता आ दुरूहताक बात नहि अछि। आ मैथिलीक सर्वसाधारणक उच्चारण-शैली यक अपेक्षा एसँ बेसी निकट छैक। खास कऽ कएल, हएब आदि कतिपय शब्दकेँ कैल, हैब आदि रूपमे कतहु-कतहु लिखल जाएब सेहो “ए”क प्रयोगकेँ बेसी समीचीन प्रमाणित करैत अछि। ६.हि, हु तथा एकार, ओकार : मैथिलीक प्राचीन लेखन-परम्परामे कोनो बातपर बल दैत काल शब्दक पाछाँ हि, हु लगाओल जाइत छैक। जेना- हुनकहि, अपनहु, ओकरहु, तत्कालहि, चोट्टहि, आनहु आदि। मुदा आधुनिक लेखनमे हिक स्थानपर एकार एवं हुक स्थानपर ओकारक प्रयोग करैत देखल जाइत अछि। जेना- हुनके, अपनो, तत्काले, चोट्टे, आनो आदि। ७.ष तथा ख : मैथिली भाषामे अधिकांशतः षक उच्चारण ख होइत अछि। जेना- षड्यन्त्र (खड़यन्त्र), षोडशी (खोड़शी), षट्कोण (खटकोण), वृषेश (वृखेश), सन्तोष (सन्तोख) आदि। ८.ध्वनि-लोप : निम्नलिखित अवस्थामे शब्दसँ ध्वनि-लोप भऽ जाइत अछि: (क) क्रियान्वयी प्रत्यय अयमे य वा ए लुप्त भऽ जाइत अछि। ओहिमे सँ पहिने अक उच्चारण दीर्घ भऽ जाइत अछि। ओकर आगाँ लोप-सूचक चिह्न वा विकारी (’ / ऽ) लगाओल जाइछ। जेना- पूर्ण रूप : पढ़ए (पढ़य) गेलाह, कए (कय) लेल, उठए (उठय) पड़तौक। अपूर्ण रूप : पढ़’ गेलाह, क’ लेल, उठ’ पड़तौक। पढ़ऽ गेलाह, कऽ लेल, उठऽ पड़तौक। (ख) पूर्वकालिक कृत आय (आए) प्रत्ययमे य (ए) लुप्त भऽ जाइछ, मुदा लोप-सूचक विकारी नहि लगाओल जाइछ। जेना- पूर्ण रूप : खाए (य) गेल, पठाय (ए) देब, नहाए (य) अएलाह। अपूर्ण रूप : खा गेल, पठा देब, नहा अएलाह। (ग) स्त्री प्रत्यय इक उच्चारण क्रियापद, संज्ञा, ओ विशेषण तीनूमे लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना- पूर्ण रूप : दोसरि मालिनि चलि गेलि। अपूर्ण रूप : दोसर मालिन चलि गेल। (घ) वर्तमान कृदन्तक अन्तिम त लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना- पूर्ण रूप : पढ़ैत अछि, बजैत अछि, गबैत अछि। अपूर्ण रूप : पढ़ै अछि, बजै अछि, गबै अछि। (ङ) क्रियापदक अवसान इक, उक, ऐक तथा हीकमे लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना- पूर्ण रूप: छियौक, छियैक, छहीक, छौक, छैक, अबितैक, होइक। अपूर्ण रूप : छियौ, छियै, छही, छौ, छै, अबितै, होइ। (च) क्रियापदीय प्रत्यय न्ह, हु तथा हकारक लोप भऽ जाइछ। जेना- पूर्ण रूप : छन्हि, कहलन्हि, कहलहुँ, गेलह, नहि। अपूर्ण रूप : छनि, कहलनि, कहलौँ, गेलऽ, नइ, नञि, नै। ९.ध्वनि स्थानान्तरण : कोनो-कोनो स्वर-ध्वनि अपना जगहसँ हटि कऽ दोसर ठाम चलि जाइत अछि। खास कऽ ह्रस्व इ आ उक सम्बन्धमे ई बात लागू होइत अछि। मैथिलीकरण भऽ गेल शब्दक मध्य वा अन्तमे जँ ह्रस्व इ वा उ आबए तँ ओकर ध्वनि स्थानान्तरित भऽ एक अक्षर आगाँ आबि जाइत अछि। जेना- शनि (शइन), पानि (पाइन), दालि ( दाइल), माटि (माइट), काछु (काउछ), मासु (माउस) आदि। मुदा तत्सम शब्द सभमे ई निअम लागू नहि होइत अछि। जेना- रश्मिकेँ रइश्म आ सुधांशुकेँ सुधाउंस नहि कहल जा सकैत अछि। १०.हलन्त(्)क प्रयोग : मैथिली भाषामे सामान्यतया हलन्त (्)क आवश्यकता नहि होइत अछि। कारण जे शब्दक अन्तमे अ उच्चारण नहि होइत अछि। मुदा संस्कृत भाषासँ जहिनाक तहिना मैथिलीमे आएल (तत्सम) शब्द सभमे हलन्त प्रयोग कएल जाइत अछि। एहि पोथीमे सामान्यतया सम्पूर्ण शब्दकेँ मैथिली भाषा सम्बन्धी निअम अनुसार हलन्तविहीन राखल गेल अछि। मुदा व्याकरण सम्बन्धी प्रयोजनक लेल अत्यावश्यक स्थानपर कतहु-कतहु हलन्त देल गेल अछि। प्रस्तुत पोथीमे मथिली लेखनक प्राचीन आ नवीन दुनू शैलीक सरल आ समीचीन पक्ष सभकेँ समेटि कऽ वर्ण-विन्यास कएल गेल अछि। स्थान आ समयमे बचतक सङ्गहि हस्त-लेखन तथा तकनीकी दृष्टिसँ सेहो सरल होबऽबला हिसाबसँ वर्ण-विन्यास मिलाओल गेल अछि। वर्तमान समयमे मैथिली मातृभाषी पर्यन्तकेँ आन भाषाक माध्यमसँ मैथिलीक ज्ञान लेबऽ पड़ि रहल परिप्रेक्ष्यमे लेखनमे सहजता तथा एकरूपतापर ध्यान देल गेल अछि। तखन मैथिली भाषाक मूल विशेषता सभ कुण्ठित नहि होइक, ताहू दिस लेखक-मण्डल सचेत अछि। प्रसिद्ध भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक कहब छनि जे सरलताक अनुसन्धानमे एहन अवस्था किन्नहु ने आबऽ देबाक चाही जे भाषाक विशेषता छाँहमे पडि जाए। -(भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक धारणाकेँ पूर्ण रूपसँ सङ्ग लऽ निर्धारित) १.२. मैथिली अकादमी, पटना द्वारा निर्धारित मैथिली लेखन-शैली

१. जे शब्द मैथिली-साहित्यक प्राचीन कालसँ आइ धरि जाहि वर्त्तनीमे प्रचलित अछि, से सामान्यतः ताहि वर्त्तनीमे लिखल जाय- उदाहरणार्थ-

ग्राह्य

एखन ठाम जकर, तकर तनिकर अछि

अग्राह्य अखन, अखनि, एखेन, अखनी ठिमा, ठिना, ठमा जेकर, तेकर तिनकर। (वैकल्पिक रूपेँ ग्राह्य) ऐछ, अहि, ए।

२. निम्नलिखित तीन प्रकारक रूप वैकल्पिकतया अपनाओल जाय: भऽ गेल, भय गेल वा भए गेल। जा रहल अछि, जाय रहल अछि, जाए रहल अछि। कर’ गेलाह, वा करय गेलाह वा करए गेलाह।

३. प्राचीन मैथिलीक ‘न्ह’ ध्वनिक स्थानमे ‘न’ लिखल जाय सकैत अछि यथा कहलनि वा कहलन्हि।

४. ‘ऐ’ तथा ‘औ’ ततय लिखल जाय जत’ स्पष्टतः ‘अइ’ तथा ‘अउ’ सदृश उच्चारण इष्ट हो। यथा- देखैत, छलैक, बौआ, छौक इत्यादि।

५. मैथिलीक निम्नलिखित शब्द एहि रूपे प्रयुक्त होयत: जैह, सैह, इएह, ओऐह, लैह तथा दैह।

६. ह्र्स्व इकारांत शब्दमे ‘इ’ के लुप्त करब सामान्यतः अग्राह्य थिक। यथा- ग्राह्य देखि आबह, मालिनि गेलि (मनुष्य मात्रमे)।

७. स्वतंत्र ह्रस्व ‘ए’ वा ‘य’ प्राचीन मैथिलीक उद्धरण आदिमे तँ यथावत राखल जाय, किंतु आधुनिक प्रयोगमे वैकल्पिक रूपेँ ‘ए’ वा ‘य’ लिखल जाय। यथा:- कयल वा कएल, अयलाह वा अएलाह, जाय वा जाए इत्यादि।

८. उच्चारणमे दू स्वरक बीच जे ‘य’ ध्वनि स्वतः आबि जाइत अछि तकरा लेखमे स्थान वैकल्पिक रूपेँ देल जाय। यथा- धीआ, अढ़ैआ, विआह, वा धीया, अढ़ैया, बियाह।

९. सानुनासिक स्वतंत्र स्वरक स्थान यथासंभव ‘ञ’ लिखल जाय वा सानुनासिक स्वर। यथा:- मैञा, कनिञा, किरतनिञा वा मैआँ, कनिआँ, किरतनिआँ।

१०. कारकक विभक्त्तिक निम्नलिखित रूप ग्राह्य:- हाथकेँ, हाथसँ, हाथेँ, हाथक, हाथमे। ’मे’ मे अनुस्वार सर्वथा त्याज्य थिक। ‘क’ क वैकल्पिक रूप ‘केर’ राखल जा सकैत अछि।

११. पूर्वकालिक क्रियापदक बाद ‘कय’ वा ‘कए’ अव्यय वैकल्पिक रूपेँ लगाओल जा सकैत अछि। यथा:- देखि कय वा देखि कए।

१२. माँग, भाँग आदिक स्थानमे माङ, भाङ इत्यादि लिखल जाय।

१३. अर्द्ध ‘न’ ओ अर्द्ध ‘म’ क बदला अनुसार नहि लिखल जाय, किंतु छापाक सुविधार्थ अर्द्ध ‘ङ’ , ‘ञ’, तथा ‘ण’ क बदला अनुस्वारो लिखल जा सकैत अछि। यथा:- अङ्क, वा अंक, अञ्चल वा अंचल, कण्ठ वा कंठ।

१४. हलंत चिह्न निअमतः लगाओल जाय, किंतु विभक्तिक संग अकारांत प्रयोग कएल जाय। यथा:- श्रीमान्, किंतु श्रीमानक।

१५. सभ एकल कारक चिह्न शब्दमे सटा क’ लिखल जाय, हटा क’ नहि, संयुक्त विभक्तिक हेतु फराक लिखल जाय, यथा घर परक।

१६. अनुनासिककेँ चन्द्रबिन्दु द्वारा व्यक्त कयल जाय। परंतु मुद्रणक सुविधार्थ हि समान जटिल मात्रापर अनुस्वारक प्रयोग चन्द्रबिन्दुक बदला कयल जा सकैत अछि। यथा- हिँ केर बदला हिं।

१७. पूर्ण विराम पासीसँ ( । ) सूचित कयल जाय।

१८. समस्त पद सटा क’ लिखल जाय, वा हाइफेनसँ जोड़ि क’ ,  हटा क’ नहि।

१९. लिअ तथा दिअ शब्दमे बिकारी (ऽ) नहि लगाओल जाय।

२०. अंक देवनागरी रूपमे राखल जाय।

२१.किछु ध्वनिक लेल नवीन चिन्ह बनबाओल जाय। जा' ई नहि बनल अछि ताबत एहि दुनू ध्वनिक बदला पूर्ववत् अय/ आय/ अए/ आए/ आओ/ अओ लिखल जाय। आकि ऎ वा ऒ सँ व्यक्त कएल जाय।

ह./- गोविन्द झा ११/८/७६ श्रीकान्त ठाकुर ११/८/७६ सुरेन्द्र झा "सुमन" ११/०८/७६

  २. मैथिलीमे भाषा सम्पादन पाठ्यक्रम २.१. उच्चारण निर्देश: (बोल्ड कएल रूप ग्राह्य):- दन्त न क उच्चारणमे दाँतमे जीह सटत- जेना बाजू नाम , मुदा ण क उच्चारणमे जीह मूर्धामे सटत (नै सटैए तँ उच्चारण दोष अछि)- जेना बाजू गणेश। तालव्य शमे जीह तालुसँ , षमे मूर्धासँ आ दन्त समे दाँतसँ सटत। निशाँ, सभ आ शोषण बाजि कऽ देखू। मैथिलीमे ष केँ वैदिक संस्कृत जकाँ ख सेहो उच्चरित कएल जाइत अछि, जेना वर्षा, दोष। य अनेको स्थानपर ज जकाँ उच्चरित होइत अछि आ ण ड़ जकाँ (यथा संयोग आ गणेश संजोग आ गड़ेस उच्चरित होइत अछि)। मैथिलीमे व क उच्चारण ब, श क उच्चारण स आ य क उच्चारण ज सेहो होइत अछि। ओहिना ह्रस्व इ बेशीकाल मैथिलीमे पहिने बाजल जाइत अछि कारण देवनागरीमे आ मिथिलाक्षरमे ह्रस्व इ अक्षरक पहिने लिखलो जाइत आ बाजलो जएबाक चाही। कारण जे हिन्दीमे एकर दोषपूर्ण उच्चारण होइत अछि (लिखल तँ पहिने जाइत अछि मुदा बाजल बादमे जाइत अछि), से शिक्षा पद्धतिक दोषक कारण हम सभ ओकर उच्चारण दोषपूर्ण ढंगसँ कऽ रहल छी। अछि- अ इ छ  ऐछ (उच्चारण) छथि- छ इ थ  – छैथ (उच्चारण) पहुँचि- प हुँ इ च (उच्चारण) आब अ आ इ ई ए ऐ ओ औ अं अः ऋ ऐ सभ लेल मात्रा सेहो अछि, मुदा ऐमे ई ऐ ओ औ अं अः ऋ केँ संयुक्ताक्षर रूपमे गलत रूपमे प्रयुक्त आ उच्चरित कएल जाइत अछि। जेना ऋ केँ री  रूपमे उच्चरित करब। आ देखियौ- ऐ लेल देखिऔ क प्रयोग अनुचित। मुदा देखिऐ लेल देखियै अनुचित। क् सँ ह् धरि अ सम्मिलित भेलासँ क सँ ह बनैत अछि, मुदा उच्चारण काल हलन्त युक्त शब्दक अन्तक उच्चारणक प्रवृत्ति बढ़ल अछि, मुदा हम जखन मनोजमे ज् अन्तमे बजैत छी, तखनो पुरनका लोककेँ बजैत सुनबन्हि- मनोजऽ, वास्तवमे ओ अ युक्त ज् = ज बजै छथि। फेर ज्ञ अछि ज् आ ञ क संयुक्त मुदा गलत उच्चारण होइत अछि- ग्य। ओहिना क्ष अछि क् आ ष क संयुक्त मुदा उच्चारण होइत अछि छ। फेर श् आ र क संयुक्त अछि श्र ( जेना श्रमिक) आ स् आ र क संयुक्त अछि स्र (जेना मिस्र)। त्र भेल त+र । उच्चारणक ऑडियो फाइल विदेह आर्काइव  http://www.videha.co.in/ पर उपलब्ध अछि। फेर केँ / सँ / पर पूर्व अक्षरसँ सटा कऽ लिखू मुदा तँ / कऽ हटा कऽ। ऐमे सँ मे पहिल सटा कऽ लिखू आ बादबला हटा कऽ। अंकक बाद टा लिखू सटा कऽ मुदा अन्य ठाम टा लिखू हटा कऽ– जेना छहटा मुदा सभ टा। फेर ६अ म सातम लिखू- छठम सातम नै। घरबलामे बला मुदा घरवालीमे वाली प्रयुक्त करू। रहए- रहै मुदा सकैए (उच्चारण सकै-ए)। मुदा कखनो काल रहए आ रहै मे अर्थ भिन्नता सेहो, जेना से कम्मो जगहमे पार्किंग करबाक अभ्यास रहै ओकरा। पुछलापर पता लागल जे ढुनढुन नाम्ना ई ड्राइवर कनाट प्लेसक पार्किंगमे काज करैत रहए। छलै, छलए मे सेहो ऐ तरहक भेल। छलए क उच्चारण छल-ए सेहो। संयोगने- (उच्चारण संजोगने) केँ/  कऽ केर- क ( केर क प्रयोग गद्यमे नै करू , पद्यमे कऽ सकै छी। ) क (जेना रामक) –रामक आ संगे (उच्चारण राम के /  राम कऽ सेहो) सँ- सऽ (उच्चारण) चन्द्रबिन्दु आ अनुस्वार- अनुस्वारमे कंठ धरिक प्रयोग होइत अछि मुदा चन्द्रबिन्दुमे नै। चन्द्रबिन्दुमे कनेक एकारक सेहो उच्चारण होइत अछि- जेना रामसँ- (उच्चारण राम सऽ)  रामकेँ- (उच्चारण राम कऽ/ राम के सेहो)। केँ जेना रामकेँ भेल हिन्दीक को (राम को)- राम को= रामकेँ क जेना रामक भेल हिन्दीक का ( राम का) राम का= रामक कऽ जेना जा कऽ भेल हिन्दीक कर ( जा कर) जा कर= जा कऽ सँ भेल हिन्दीक से (राम से) राम से= रामसँ सऽ , तऽ , त , केर (गद्यमे) एे चारू शब्द सबहक प्रयोग अवांछित। के दोसर अर्थेँ प्रयुक्त भऽ सकैए- जेना, के कहलक? विभक्ति “क”क बदला एकर प्रयोग अवांछित। नञि, नहि, नै, नइ, नँइ, नइँ, नइं ऐ सभक उच्चारण आ लेखन - नै त्त्व क बदलामे त्व जेना महत्वपूर्ण (महत्त्वपूर्ण नै) जतए अर्थ बदलि जाए ओतहि मात्र तीन अक्षरक संयुक्ताक्षरक प्रयोग उचित। सम्पति- उच्चारण स म्प इ त (सम्पत्ति नै- कारण सही उच्चारण आसानीसँ सम्भव नै)। मुदा सर्वोत्तम (सर्वोतम नै)। राष्ट्रिय (राष्ट्रीय नै) सकैए/ सकै (अर्थ परिवर्तन) पोछैले/ पोछै लेल/ पोछए लेल पोछैए/ पोछए/ (अर्थ परिवर्तन) पोछए/ पोछै ओ लोकनि ( हटा कऽ, ओ मे बिकारी नै) ओइ/ ओहि ओहिले/ ओहि लेल/ ओही लऽ जएबेँ/ बैसबेँ पँचभइयाँ देखियौक/ (देखिऔक नै- तहिना अ मे ह्रस्व आ दीर्घक मात्राक प्रयोग अनुचित) जकाँ / जेकाँ तँइ/ तैँ/ होएत / हएत नञि/ नहि/ नँइ/ नइँ/ नै सौँसे/ सौंसे बड़ / बड़ी (झोराओल) गाए (गाइ नहि), मुदा गाइक दूध (गाएक दूध नै।) रहलेँ/ पहिरतैँ हमहीं/ अहीं सब - सभ सबहक - सभहक धरि - तक गप- बात बूझब - समझब बुझलौं/ समझलौं/ बुझलहुँ - समझलहुँ हमरा आर - हम सभ आकि- आ कि सकैछ/ करैछ (गद्यमे प्रयोगक आवश्यकता नै) होइन/ होनि जाइन (जानि नै, जेना देल जाइन) मुदा जानि-बूझि (अर्थ परिव्र्तन) पइठ/ जाइठ आउ/ जाउ/ आऊ/ जाऊ मे, केँ, सँ, पर (शब्दसँ सटा कऽ) तँ कऽ धऽ दऽ (शब्दसँ हटा कऽ) मुदा दूटा वा बेसी विभक्ति संग रहलापर पहिल विभक्ति टाकेँ सटाऊ। जेना ऐमे सँ । एकटा , दूटा (मुदा कए टा) बिकारीक प्रयोग शब्दक अन्तमे, बीचमे अनावश्यक रूपेँ नै। आकारान्त आ अन्तमे अ क बाद बिकारीक प्रयोग नै (जेना दिअ , आ/ दिय’ , आ’, आ नै ) अपोस्ट्रोफीक प्रयोग बिकारीक बदलामे करब अनुचित आ मात्र फॉन्टक तकनीकी न्यूनताक परिचायक)- ओना बिकारीक संस्कृत रूप ऽ अवग्रह कहल जाइत अछि आ वर्तनी आ उच्चारण दुनू ठाम एकर लोप रहैत अछि/ रहि सकैत अछि (उच्चारणमे लोप रहिते अछि)। मुदा अपोस्ट्रोफी सेहो अंग्रेजीमे पसेसिव केसमे होइत अछि आ फ्रेंचमे शब्दमे जतए एकर प्रयोग होइत अछि जेना raison d’etre एतए सेहो एकर उच्चारण रैजौन डेटर होइत अछि, माने अपोस्ट्रॉफी अवकाश नै दैत अछि वरन जोड़ैत अछि, से एकर प्रयोग बिकारीक बदला देनाइ तकनीकी रूपेँ सेहो अनुचित)। अइमे, एहिमे/ ऐमे जइमे, जाहिमे एखन/ अखन/ अइखन केँ (के नहि) मे (अनुस्वार रहित) भऽ मे दऽ तँ (तऽ, त नै) सँ ( सऽ स नै) गाछ तर गाछ लग साँझ खन जो (जो go, करै जो do) तै/तइ जेना- तै दुआरे/ तइमे/ तइले जै/जइ जेना- जै कारण/ जइसँ/ जइले ऐ/अइ जेना- ऐ कारण/ ऐसँ/ अइले/ मुदा एकर एकटा खास प्रयोग- लालति‍ कतेक दि‍नसँ कहैत रहैत अइ लै/लइ जेना लैसँ/ लइले/ लै दुआरे लहँ/ लौं गेलौं/ लेलौं/ लेलँह/ गेलहुँ/ लेलहुँ/ लेलँ जइ/ जाहि‍/ जै जहि‍ठाम/ जाहि‍ठाम/ जइठाम/ जैठाम एहि‍/ अहि‍/ अइ (वाक्यक अंतमे ग्राह्य) / ऐ अइछ/ अछि‍/ ऐछ तइ/ तहि‍/ तै/ ताहि‍ ओहि‍/ ओइ सीखि‍/ सीख जीवि‍/ जीवी/ जीब भलेहीं/ भलहि‍ं तैं/ तँइ/ तँए जाएब/ जएब लइ/ लै छइ/ छै नहि‍/ नै/ नइ गइ/ गै छनि‍/ छन्‍हि‍  ... समए शब्‍दक संग जखन कोनो वि‍भक्‍ति‍ जुटै छै तखन समै जना समैपर इत्‍यादि‍। असगरमे हृदए आ वि‍भक्‍ति‍ जुटने हृदे जना हृदेसँ, हृदेमे इत्‍यादि‍। जइ/ जाहि‍/ जै जहि‍ठाम/ जाहि‍ठाम/ जइठाम/ जैठाम एहि‍/ अहि‍/ अइ/ ऐ अइछ/ अछि‍/ ऐछ तइ/ तहि‍/ तै/ ताहि‍ ओहि‍/ ओइ सीखि‍/ सीख जीवि‍/ जीवी/ जीब भले/ भलेहीं/ भलहि‍ं तैं/ तँइ/ तँए जाएब/ जएब लइ/ लै छइ/ छै नहि‍/ नै/ नइ गइ/ गै छनि‍/ छन्‍हि‍ चुकल अछि/ गेल गछि २.२. मैथिलीमे भाषा सम्पादन पाठ्यक्रम नीचाँक सूचीमे देल विकल्पमेसँ लैंगुएज एडीटर द्वारा कोन रूप चुनल जेबाक चाही: बोल्ड कएल रूप ग्राह्य: १.होयबला/ होबयबला/ होमयबला/ हेब’बला, हेम’बला/ होयबाक/होबएबला /होएबाक २. आ’/आऽ आ ३. क’ लेने/कऽ लेने/कए लेने/कय लेने/ल’/लऽ/लय/लए ४. भ’ गेल/भऽ गेल/भय गेल/भए गेल ५. कर’ गेलाह/करऽ गेलह/करए गेलाह/करय गेलाह ६. लिअ/दिअ लिय’,दिय’,लिअ’,दिय’/ ७. कर’ बला/करऽ बला/ करय बला करैबला/क’र’ बला / करैवाली ८. बला वला (पुरूष), वाली (स्‍त्री) ९ . आङ्ल आंग्ल १०. प्रायः प्रायह ११. दुःख दुख १ २. चलि गेल चल गेल/चैल गेल १३. देलखिन्ह देलकिन्ह, देलखिन १४. देखलन्हि देखलनि/ देखलैन्ह १५. छथिन्ह/ छलन्हि छथिन/ छलैन/ छलनि १६. चलैत/दैत चलति/दैति १७. एखनो अखनो १८. बढ़नि‍ बढ़इन बढ़न्हि १९. ओ’/ओऽ(सर्वनाम) ओ २० . ओ (संयोजक) ओ’/ओऽ २१. फाँगि/फाङ्गि फाइंग/फाइङ २२. जे जे’/जेऽ २३. ना-नुकुर ना-नुकर २४. केलन्हि/केलनि‍/कयलन्हि २५. तखनतँ/ तखन तँ २६. जा रहल/जाय रहल/जाए रहल २७. निकलय/निकलए लागल/ लगल बहराय/ बहराए लागल/ लगल निकल’/बहरै लागल २८. ओतय/ जतय जत’/ ओत’/ जतए/ ओतए २९. की फूरल जे कि फूरल जे ३०. जे जे’/जेऽ ३१. कूदि / यादि(मोन पारब) कूइद/याइद/कूद/याद/ यादि (मोन) ३२. इहो/ ओहो ३३. हँसए/ हँसय हँसऽ ३४. नौ आकि दस/नौ किंवा दस/ नौ वा दस ३५. सासु-ससुर सास-ससुर ३६. छह/ सात छ/छः/सात ३७. की  की’/ कीऽ (दीर्घीकारान्तमे ऽ वर्जित) ३८. जबाब जवाब ३९. करएताह/ करेताह करयताह ४०. दलान दिशि दलान दिश/दलान दिस ४१ . गेलाह गएलाह/गयलाह ४२. किछु आर/ किछु और/ किछ आर ४३. जाइ छल/ जाइत छल जाति छल/जैत छल ४४. पहुँचि/ भेट जाइत छल/ भेट जाइ छलए पहुँच/ भेटि‍ जाइत छल ४५. जबान (युवा)/ जवान(फौजी) ४६. लय/ लए क’/ कऽ/ लए कए / लऽ कऽ/ लऽ कए ४७. ल’/लऽ कय/ कए ४८. एखन / एखने / अखन / अखने ४९. अहींकेँ अहीँकेँ ५०. गहींर गहीँर ५१. धार पार केनाइ धार पार केनाय/केनाए ५२. जेकाँ जेँकाँ/ जकाँ ५३. तहिना तेहिना ५४. एकर अकर ५५. बहिनउ बहनोइ ५६. बहिन बहिनि ५७. बहिन-बहिनोइ बहिन-बहनउ ५८. नहि/ नै ५९. करबा / करबाय/ करबाए ६०. तँ/ त ऽ तय/तए ६१. भैयारी मे छोट-भाए/भै/, जेठ-भाय/भाइ, ६२. गि‍नतीमे दू भाइ/भाए/भाँइ ६३. ई पोथी दू भाइक/ भाँइ/ भाए/ लेल। यावत जावत ६४. माय मै / माए मुदा माइक ममता ६५. देन्हि/ दइन दनि‍/ दएन्हि/ दयन्हि दन्हि/ दैन्हि ६६. द’/ दऽ/ दए ६७. ओ (संयोजक) ओऽ (सर्वनाम) ६८. तका कए तकाय तकाए ६९. पैरे (on foot) पएरे  कएक/ कैक ७०. ताहुमे/ ताहूमे ७१. पुत्रीक ७२. बजा कय/ कए / कऽ ७३. बननाय/बननाइ ७४. कोला ७५. दिनुका दिनका ७६. ततहिसँ ७७. गरबओलन्हि/ गरबौलनि‍/ गरबेलन्हि/ गरबेलनि‍ ७८. बालु बालू ७९. चेन्ह चिन्ह(अशुद्ध) ८०. जे जे’ ८१ . से/ के से’/के’ ८२. एखुनका अखनुका ८३. भुमिहार भूमिहार ८४. सुग्गर / सुगरक/ सूगर ८५. झठहाक झटहाक ८६. छूबि ८७. करइयो/ओ करैयो ने देलक /करियौ-करइयौ ८८. पुबारि पुबाइ ८९. झगड़ा-झाँटी झगड़ा-झाँटि ९०. पएरे-पएरे पैरे-पैरे ९१. खेलएबाक ९२. खेलेबाक ९३. लगा ९४. होए- हो – होअए ९५. बुझल बूझल ९६. बूझल (संबोधन अर्थमे) ९७. यैह यएह / इएह/ सैह/ सएह ९८. तातिल ९९. अयनाय- अयनाइ/ अएनाइ/ एनाइ १००. निन्न- निन्द १०१. बिनु बिन १०२. जाए जाइ १०३. जाइ (in different sense)-last word of sentence १०४. छत पर आबि जाइ १०५. ने १०६. खेलाए (play) –खेलाइ १०७. शिकाइत- शिकायत १०८. ढप- ढ़प १०९ . पढ़- पढ ११०. कनिए/ कनिये कनिञे १११. राकस- राकश ११२. होए/ होय होइ ११३. अउरदा- औरदा ११४. बुझेलन्हि (different meaning- got understand) ११५. बुझएलन्हि/बुझेलनि‍/ बुझयलन्हि (understood himself) ११६. चलि- चल/ चलि‍ गेल ११७. खधाइ- खधाय ११८. मोन पाड़लखिन्ह/ मोन पाड़लखि‍न/ मोन पारलखिन्ह ११९. कैक- कएक- कइएक १२०. लग ल’ग १२१. जरेनाइ १२२. जरौनाइ जरओनाइ- जरएनाइ/ जरेनाइ १२३. होइत १२४. गरबेलन्हि/ गरबेलनि‍ गरबौलन्हि/ गरबौलनि‍ १२५. चिखैत- (to test)चिखइत १२६. करइयो (willing to do) करैयो १२७. जेकरा- जकरा १२८. तकरा- तेकरा १२९. बिदेसर स्थानेमे/ बिदेसरे स्थानमे १३०. करबयलहुँ/ करबएलहुँ/ करबेलहुँ करबेलौं १३१. हारिक (उच्चारण हाइरक) १३२. ओजन वजन आफसोच/ अफसोस कागत/ कागच/ कागज १३३. आधे भाग/ आध-भागे १३४. पिचा / पिचाय/पिचाए १३५. नञ/ ने १३६. बच्चा नञ (ने) पिचा जाय १३७. तखन ने (नञ) कहैत अछि। कहै/ सुनै/ देखै छल मुदा कहैत-कहैत/ सुनैत-सुनैत/ देखैत-देखैत १३८. कतेक गोटे/ कताक गोटे १३९. कमाइ-धमाइ/ कमाई- धमाई १४० . लग ल’ग १४१. खेलाइ (for playing) १४२. छथिन्ह/ छथिन १४३. होइत होइ १४४. क्यो कियो / केओ १४५. केश (hair) १४६. केस (court-case) १४७ . बननाइ/ बननाय/ बननाए १४८. जरेनाइ १४९. कुरसी कुर्सी १५०. चरचा चर्चा १५१. कर्म करम १५२. डुबाबए/ डुबाबै/ डुमाबै डुमाबय/ डुमाबए १५३. एखुनका/ अखुनका १५४. लए/ लिअए (वाक्यक अंतिम शब्द)- लऽ १५५. कएलक/ केलक १५६. गरमी गर्मी १५७ . वरदी वर्दी १५८. सुना गेलाह सुना’/सुनाऽ १५९. एनाइ-गेनाइ १६०. तेना ने घेरलन्हि/ तेना ने घेरलनि‍ १६१. नञि / नै १६२. डरो ड’रो १६३. कतहु/ कतौ कहीं १६४. उमरिगर-उमेरगर उमरगर १६५. भरिगर १६६. धोल/धोअल धोएल १६७. गप/गप्प १६८. के के’ १६९. दरबज्जा/ दरबजा १७०. ठाम १७१. धरि तक १७२. घूरि लौटि १७३. थोरबेक १७४. बड्ड १७५. तोँ/ तूँ १७६. तोँहि( पद्यमे ग्राह्य) १७७. तोँही / तोँहि १७८. करबाइए करबाइये १७९. एकेटा १८०. करितथि /करतथि १८१. पहुँचि/ पहुँच १८२. राखलन्हि रखलन्हि/ रखलनि‍ १८३. लगलन्हि/ लगलनि‍ लागलन्हि १८४. सुनि (उच्चारण सुइन) १८५. अछि (उच्चारण अइछ) १८६. एलथि गेलथि १८७. बितओने/ बि‍तौने/ बितेने १८८. करबओलन्हि/ करबौलनि‍/ करेलखिन्ह/ करेलखि‍न १८९. करएलन्हि/ करेलनि‍ १९०. आकि/ कि १९१. पहुँचि/ पहुँच १९२. बत्ती जराय/ जराए जरा (आगि लगा) १९३. से से’ १९४. हाँ मे हाँ (हाँमे हाँ विभक्त्तिमे हटा कए) १९५. फेल फैल १९६. फइल(spacious) फैल १९७. होयतन्हि/ होएतन्हि/ होएतनि‍/हेतनि‍/ हेतन्हि १९८. हाथ मटिआएब/ हाथ मटियाबय/हाथ मटियाएब १९९. फेका फेंका २००. देखाए देखा २०१. देखाबए २०२. सत्तरि सत्तर २०३. साहेब साहब २०४.गेलैन्ह/ गेलन्हि/ गेलनि‍ २०५. हेबाक/ होएबाक २०६.केलो/ कएलहुँ/केलौं/ केलुँ २०७. किछु न किछु/ किछु ने किछु २०८.घुमेलहुँ/ घुमओलहुँ/ घुमेलौं २०९. एलाक/ अएलाक २१०. अः/ अह २११.लय/ लए (अर्थ-परिवर्त्तन) २१२.कनीक/ कनेक २१३.सबहक/ सभक २१४.मिलाऽ/ मिला २१५.कऽ/ क २१६.जाऽ/ जा २१७.आऽ/ आ २१८.भऽ /भ’ (’ फॉन्टक कमीक द्योतक) २१९.निअम/ नियम २२० .हेक्टेअर/ हेक्टेयर २२१.पहिल अक्षर ढ/ बादक/ बीचक ढ़ २२२.तहिं/तहिँ/ तञि/ तैं २२३.कहिं/ कहीं २२४.तँइ/ तैं / तइँ २२५.नँइ/ नइँ/  नञि/ नहि/नै २२६.है/ हए / एलीहेँ/ २२७.छञि/ छै/ छैक /छइ २२८.दृष्टिएँ/ दृष्टियेँ २२९.आ (come)/ आऽ(conjunction) २३०. आ (conjunction)/ आऽ(come) २३१.कुनो/ कोनो, कोना/केना २३२.गेलैन्ह-गेलन्हि-गेलनि‍ २३३.हेबाक- होएबाक २३४.केलौँ- कएलौँ-कएलहुँ/केलौं २३५.किछु न किछ- किछु ने किछु २३६.केहेन- केहन २३७.आऽ (come)-आ (conjunction-and)/आ। आब'-आब' /आबह-आबह २३८. हएत-हैत २३९.घुमेलहुँ-घुमएलहुँ- घुमेलाें २४०.एलाक- अएलाक २४१.होनि- होइन/ होन्हि/ २४२.ओ-राम ओ श्यामक बीच(conjunction), ओऽ कहलक (he said)/ओ २४३.की हए/ कोसी अएली हए/ की है। की हइ २४४.दृष्टिएँ/ दृष्टियेँ २४५ .शामिल/ सामेल २४६.तैँ / तँए/ तञि/ तहिं २४७.जौं / ज्योँ/ जँ/ २४८.सभ/ सब २४९.सभक/ सबहक २५०.कहिं/ कहीं २५१.कुनो/ कोनो/ कोनहुँ/ २५२.फारकती भऽ गेल/ भए गेल/ भय गेल २५३.कोना/ केना/ कन्‍ना/कना २५४.अः/ अह २५५.जनै/ जनञ २५६.गेलनि‍/ गेलाह (अर्थ परिवर्तन) २५७.केलन्हि/ कएलन्हि/ केलनि‍/ २५८.लय/ लए/ लएह (अर्थ परिवर्तन) २५९.कनीक/ कनेक/कनी-मनी २६०.पठेलन्हि‍ पठेलनि‍/ पठेलइन/ पपठओलन्हि/ पठबौलनि‍/ २६१.निअम/ नियम २६२.हेक्टेअर/ हेक्टेयर २६३.पहिल अक्षर रहने ढ/ बीचमे रहने ढ़ २६४.आकारान्तमे बिकारीक प्रयोग उचित नै/ अपोस्ट्रोफीक प्रयोग फान्टक तकनीकी न्यूनताक परिचायक ओकर बदला अवग्रह (बिकारी) क प्रयोग उचित २६५.केर (पद्यमे ग्राह्य) / -क/ कऽ/ के २६६.छैन्हि- छन्हि २६७.लगैए/ लगैये २६८.होएत/ हएत २६९.जाएत/ जएत/ २७०.आएत/ अएत/ आओत २७१ .खाएत/ खएत/ खैत २७२.पिअएबाक/ पिएबाक/पि‍येबाक २७३.शुरु/ शुरुह २७४.शुरुहे/ शुरुए २७५.अएताह/अओताह/ एताह/ औताह २७६.जाहि/ जाइ/ जइ/ जै/ २७७.जाइत/ जैतए/ जइतए २७८.आएल/ अएल २७९.कैक/ कएक २८०.आयल/ अएल/ आएल २८१. जाए/ जअए/ जए (लालति‍ जाए लगलीह।) २८२. नुकएल/ नुकाएल २८३. कठुआएल/ कठुअएल २८४. ताहि/ तै/ तइ २८५. गायब/ गाएब/ गएब २८६. सकै/ सकए/ सकय २८७.सेरा/सरा/ सराए (भात सरा गेल) २८८.कहैत रही/देखैत रही/ कहैत छलौं/ कहै छलौं- अहिना चलैत/ पढ़ैत (पढ़ै-पढ़ैत अर्थ कखनो काल परिवर्तित) - आर बुझै/ बुझैत (बुझै/ बुझै छी, मुदा बुझैत-बुझैत)/ सकैत/ सकै। करैत/ करै। दै/ दैत। छैक/ छै। बचलै/ बचलैक। रखबा/ रखबाक । बिनु/ बिन। रातिक/ रातुक बुझै आ बुझैत केर अपन-अपन जगहपर प्रयोग समीचीन अछि‍। बुझैत-बुझैत आब बुझलि‍ऐ। हमहूँ बुझै छी। २८९. दुआरे/ द्वारे २९०.भेटि/ भेट/ भेँट २९१. खन/ खीन/  खुना (भोर खन/ भोर खीन) २९२.तक/ धरि २९३.गऽ/ गै (meaning different-जनबै गऽ) २९४.सऽ/ सँ (मुदा दऽ, लऽ) २९५.त्त्व,(तीन अक्षरक मेल बदला पुनरुक्तिक एक आ एकटा दोसरक उपयोग) आदिक बदला त्व आदि। महत्त्व/ महत्व/ कर्ता/ कर्त्ता आदिमे त्त संयुक्तक कोनो आवश्यकता मैथिलीमे नै अछि। वक्तव्य २९६.बेसी/ बेशी २९७.बाला/वाला बला/ वला (रहैबला) २९८ .वाली/ (बदलैवाली) २९९.वार्त्ता/ वार्ता ३००. अन्तर्राष्ट्रिय/ अन्तर्राष्ट्रीय ३०१. लेमए/ लेबए ३०२.लमछुरका, नमछुरका ३०२.लागै/ लगै ( भेटैत/ भेटै) ३०३.लागल/ लगल ३०४.हबा/ हवा ३०५.राखलक/ रखलक ३०६.आ (come)/ आ (and) ३०७. पश्चाताप/ पश्चात्ताप ३०८. ऽ केर व्यवहार शब्दक अन्तमे मात्र, यथासंभव बीचमे नै। ३०९.कहैत/ कहै ३१०. रहए (छल)/ रहै (छलै) (meaning different) ३११.तागति/ ताकति ३१२.खराप/ खराब ३१३.बोइन/ बोनि/ बोइनि ३१४.जाठि/ जाइठ ३१५.कागज/ कागच/ कागत ३१६.गिरै (meaning different- swallow)/ गिरए (खसए) ३१७.राष्ट्रिय/ राष्ट्रीय Festivals of Mithila DATE-LIST (year- 2011-12) (१४१९ साल) Marriage Days: Nov.2011- 20,21,23,25,27,30 Dec.2011- 1,5,9 January 2012- 18,19,20,23,25,27,29 Feb.2012- 2,3,8,9,10,16,17,19,23,24,29 March 2012- 1,8,9,12 April 2012- 15,16,18,25,26 June 2012- 8,13,24,25,28,29 Upanayana Days: February 2012- 2,3,24,26 March 2012- 4 April 2012- 1,2,26 June 2012- 22 Dviragaman Din: November 2011- 27,30 December 2011- 1,2,5,7,9,12 February 2012- 22,23,24,26,27,29 March 2012- 1,2,4,5,9,11,12 April 2012- 23,25,26,29 May 2012- 2,3,4,6,7 Mundan Din: December 2011- 1,5 January 201225,26,30 March 2012- 12 April 2012- 26 May 2012- 23,25,31 June 2012- 8,21,22,29 FESTIVALS OF MITHILA Mauna Panchami-20 July Madhushravani- 2 August Nag Panchami- 4 August Raksha Bandhan- 13 Aug Krishnastami- 21 August Kushi Amavasya / Somvari Vrat- 29 August Hartalika Teej- 31 August ChauthChandra-1 September Karma Dharma Ekadashi-8 September Indra Pooja Aarambh- 9 September Anant Caturdashi- 11 Sep Agastyarghadaan- 12 Sep Pitri Paksha begins- 13 Sep Mahalaya Aarambh- 13 September Vishwakarma Pooja- 17 September Jimootavahan Vrata/ Jitia-20 September Matri Navami- 21September Kalashsthapan- 28 September Belnauti- 2 October Patrika Pravesh- 3 October Mahastami- 4 October Maha Navami - 5 October Vijaya Dashami- 6 October Kojagara- 11 Oct Dhanteras- 24 October Diyabati, shyama pooja-26 October Annakoota/ Govardhana Pooja-27  October Bhratridwitiya/ Chitragupta Pooja-28 October Chhathi-kharna -31 October Chhathi- sayankalik arghya - 1 November Devotthan Ekadashi- 17 November Sama poojarambh- 2 November Kartik Poornima/ Sama Bisarjan- 10 Nov ravivratarambh- 27 November Navanna parvan- 29 November Vivaha Panchmi- 29 November Makara/ Teela Sankranti-15 Jan Naraknivaran chaturdashi- 21 January Basant Panchami/ Saraswati Pooja- 28 January Achla Saptmi- 30 January Mahashivaratri-20 February Holikadahan-Fagua-7 March Holi-9 Mar Varuni Yoga-20 March Chaiti  navaratrarambh- 23 March Chaiti Chhathi vrata-29 March Ram Navami- 1 April Mesha Sankranti-Satuani-13 April Jurishital-14 April Akshaya Tritiya-24 April Ravi Brat Ant- 29 April Janaki Navami- 30 April Vat Savitri-barasait- 20 May Ganga Dashhara-30 May Somavati Amavasya Vrata- 18 June Jagannath Rath Yatra- 21 June Hari Sayan Ekadashi- 30 June Aashadhi Guru Poornima-3 Jul VIDEHA ARCHIVE १.विदेह ई-पत्रिकाक सभटा पुरान अंक ब्रेल, तिरहुता आ देवनागरी रूपमे Videha e journal's all old issues in Braille Tirhuta and Devanagari versions विदेह ई-पत्रिकाक पहिल ५० अंक

विदेह ई-पत्रिकाक ५०म सँ आगाँक अंक २.मैथिली पोथी डाउनलोड Maithili Books Download ३.मैथिली ऑडियो संकलन Maithili Audio Downloads ४.मैथिली वीडियोक संकलन Maithili Videos ५.मिथिला चित्रकला/ आधुनिक चित्रकला आ चित्र Mithila Painting/ Modern Art and Photos "विदेह"क एहि सभ सहयोगी लिंकपर सेहो एक बेर जाऊ। ६.विदेह मैथिली क्विज  :  http://videhaquiz.blogspot.com/ ७.विदेह मैथिली जालवृत्त एग्रीगेटर : http://videha-aggregator.blogspot.com/ ८.विदेह मैथिली साहित्य अंग्रेजीमे अनूदित http://madhubani-art.blogspot.com/ ९.विदेहक पूर्व-रूप "भालसरिक गाछ"  : http://gajendrathakur.blogspot.com/ १०.विदेह इंडेक्स  : http://videha123.blogspot.com/ ११.विदेह फाइल : http://videha123.wordpress.com/ १२. विदेह: सदेह : पहिल तिरहुता (मिथिला़क्षर) जालवृत्त (ब्लॉग) http://videha-sadeha.blogspot.com/ १३. विदेह:ब्रेल: मैथिली ब्रेलमे: पहिल बेर विदेह द्वारा http://videha-braille.blogspot.com/ १४.VIDEHA IST MAITHILI  FORTNIGHTLY EJOURNAL ARCHIVE http://videha-archive.blogspot.com/ १५. विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका मैथिली पोथीक आर्काइव http://videha-pothi.blogspot.com/ १६. विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका ऑडियो आर्काइव http://videha-audio.blogspot.com/ १७. विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका वीडियो आर्काइव http://videha-video.blogspot.com/ १८. विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका मिथिला चित्रकला, आधुनिक कला आ चित्रकला http://videha-paintings-photos.blogspot.com/ १९. मैथिल आर मिथिला (मैथिलीक सभसँ लोकप्रिय जालवृत्त) http://maithilaurmithila.blogspot.com/ २०.श्रुति प्रकाशन http://www.shruti-publication.com/ २१.http://groups.google.com/group/videha VIDEHA केर सदस्यता लिअ Top of Form Bottom of Form ईमेल : एहि समूहपर जाऊ २२.http://groups.yahoo.com/group/VIDEHA/ Top of Form Subscribe to VIDEHA Powered by us.groups.yahoo.com Bottom of Form २३.गजेन्द्र ठाकुर इ‍डेक्स http://gajendrathakur123.blogspot.com २४. नेना भुटका http://mangan-khabas.blogspot.com/ २५.विदेह रेडियो:मैथिली कथा-कविता आदिक पहिल पोडकास्ट साइट http://videha123radio.wordpress.com/ २६.Videha Radio २७. Join official Videha facebook group. २८. विदेह मैथिली नाट्य उत्सव http://maithili-drama.blogspot.com/ २९.समदिया http://esamaad.blogspot.com/ ३०. मैथिली फिल्म्स http://maithilifilms.blogspot.com/ ३१.अनचिन्हार आखर http://anchinharakharkolkata.blogspot.com/ ३२. मैथिली हाइकू http://maithili-haiku.blogspot.com/ ३३. मानक मैथिली http://manak-maithili.blogspot.com/ ३४. विहनि कथा http://vihanikatha.blogspot.in/ ३५. मैथिली कविता http://maithili-kavita.blogspot.in/ ३६. मैथिली कथा http://maithili-katha.blogspot.in/ ३७.मैथिली समालोचना http://maithili-samalochna.blogspot.in/ महत्त्वपूर्ण सूचना:(१) 'विदेह' द्वारा धारावाहिक रूपे ई-प्रकाशित कएल गेल गजेन्द्र ठाकुरक  निबन्ध-प्रबन्ध-समीक्षा, उपन्यास (सहस्रबाढ़नि) , पद्य-संग्रह (सहस्राब्दीक चौपड़पर), कथा-गल्प (गल्प-गुच्छ), नाटक(संकर्षण), महाकाव्य (त्वञ्चाहञ्च आ असञ्जाति मन) आ बाल-किशोर साहित्य विदेहमे संपूर्ण ई-प्रकाशनक बाद प्रिंट फॉर्ममे। कुरुक्षेत्रम्–अन्तर्मनक खण्ड-१ सँ ७ Combined ISBN No.978-81-907729-7-6 विवरण एहि पृष्ठपर नीचाँमे आ प्रकाशकक साइट http://www.shruti-publication.com/ पर । महत्त्वपूर्ण सूचना (२):सूचना: विदेहक मैथिली-अंग्रेजी आ अंग्रेजी मैथिली कोष (इंटरनेटपर पहिल बेर सर्च-डिक्शनरी) एम.एस. एस.क्यू.एल. सर्वर आधारित -Based on ms-sql server Maithili-English and English-Maithili Dictionary. विदेहक भाषापाक- रचनालेखन स्तंभमे। कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक- गजेन्द्र ठाकुर गजेन्द्र ठाकुरक निबन्ध-प्रबन्ध-समीक्षा, उपन्यास (सहस्रबाढ़नि) , पद्य-संग्रह (सहस्राब्दीक चौपड़पर), कथा-गल्प (गल्प गुच्छ), नाटक(संकर्षण), महाकाव्य (त्वञ्चाहञ्च आ असञ्जाति मन) आ बालमंडली-किशोरजगत विदेहमे संपूर्ण ई-प्रकाशनक बाद प्रिंट फॉर्ममे। कुरुक्षेत्रम्–अन्तर्मनक, खण्ड-१ सँ ७ Ist edition 2009 of Gajendra Thakur’s KuruKshetram-Antarmanak (Vol. I to VII)- essay-paper-criticism, novel, poems, story, play, epics and Children-grown-ups literature in single binding: Language:Maithili ६९२ पृष्ठ : मूल्य भा. रु. 100/-(for individual buyers inside india) (add courier charges Rs.50/-per copy for Delhi/NCR and Rs.100/- per copy for outside Delhi)

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Details for purchase available at print-version publishers's site website: http://www.shruti-publication.com/ or you may write to e-mail:shruti.publication@shruti-publication.com विदेह: सदेह : १: २: ३: ४ तिरहुता : देवनागरी "विदेह" क, प्रिंट संस्करण :विदेह-ई-पत्रिका (http://www.videha.co.in/) क चुनल रचना सम्मिलित। विदेह:सदेह:१: २: ३: ४ सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। Details for purchase available at print-version publishers's site http://www.shruti-publication.com  or you may write to shruti.publication@shruti-publication.com २. संदेश- [ विदेह ई-पत्रिका, विदेह:सदेह मिथिलाक्षर आ देवनागरी आ गजेन्द्र ठाकुरक सात खण्डक- निबन्ध-प्रबन्ध-समीक्षा,उपन्यास (सहस्रबाढ़नि) , पद्य-संग्रह (सहस्राब्दीक चौपड़पर), कथा-गल्प (गल्प गुच्छ), नाटक (संकर्षण), महाकाव्य (त्वञ्चाहञ्च आ असञ्जाति मन) आ बाल-मंडली-किशोर जगत- संग्रह कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक मादेँ। ] १.श्री गोविन्द झा- विदेहकेँ तरंगजालपर उतारि विश्वभरिमे मातृभाषा मैथिलीक लहरि जगाओल, खेद जे अपनेक एहि महाभियानमे हम एखन धरि संग नहि दए सकलहुँ। सुनैत छी अपनेकेँ सुझाओ आ रचनात्मक आलोचना प्रिय लगैत अछि तेँ किछु लिखक मोन भेल। हमर सहायता आ सहयोग अपनेकेँ सदा उपलब्ध रहत। २.श्री रमानन्द रेणु- मैथिलीमे ई-पत्रिका पाक्षिक रूपेँ चला कऽ जे अपन मातृभाषाक प्रचार कऽ रहल छी, से धन्यवाद । आगाँ अपनेक समस्त मैथिलीक कार्यक हेतु हम हृदयसँ शुभकामना दऽ रहल छी। ३.श्री विद्यानाथ झा "विदित"- संचार आ प्रौद्योगिकीक एहि प्रतिस्पर्धी ग्लोबल युगमे अपन महिमामय "विदेह"केँ अपना देहमे प्रकट देखि जतबा प्रसन्नता आ संतोष भेल, तकरा कोनो उपलब्ध "मीटर"सँ नहि नापल जा सकैछ? ..एकर ऐतिहासिक मूल्यांकन आ सांस्कृतिक प्रतिफलन एहि शताब्दीक अंत धरि लोकक नजरिमे आश्चर्यजनक रूपसँ प्रकट हैत। ४. प्रो. उदय नारायण सिंह "नचिकेता"- जे काज अहाँ कए रहल छी तकर चरचा एक दिन मैथिली भाषाक इतिहासमे होएत। आनन्द भए रहल अछि, ई जानि कए जे एतेक गोट मैथिल "विदेह" ई जर्नलकेँ पढ़ि रहल छथि।...विदेहक चालीसम अंक पुरबाक लेल अभिनन्दन। ५. डॉ. गंगेश गुंजन- एहि विदेह-कर्ममे लागि रहल अहाँक सम्वेदनशील मन, मैथिलीक प्रति समर्पित मेहनतिक अमृत रंग, इतिहास मे एक टा विशिष्ट फराक अध्याय आरंभ करत, हमरा विश्वास अछि। अशेष शुभकामना आ बधाइक सङ्ग, सस्नेह...अहाँक पोथी कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक प्रथम दृष्टया बहुत भव्य तथा उपयोगी बुझाइछ। मैथिलीमे तँ अपना स्वरूपक प्रायः ई पहिले एहन  भव्य अवतारक पोथी थिक। हर्षपूर्ण हमर हार्दिक बधाई स्वीकार करी। ६. श्री रामाश्रय झा "रामरंग"(आब स्वर्गीय)- "अपना" मिथिलासँ संबंधित...विषय वस्तुसँ अवगत भेलहुँ।...शेष सभ कुशल अछि। ७. श्री ब्रजेन्द्र त्रिपाठी- साहित्य अकादमी- इंटरनेट पर प्रथम मैथिली पाक्षिक पत्रिका "विदेह" केर लेल बधाई आ शुभकामना स्वीकार करू। ८. श्री प्रफुल्लकुमार सिंह "मौन"- प्रथम मैथिली पाक्षिक पत्रिका "विदेह" क प्रकाशनक समाचार जानि कनेक चकित मुदा बेसी आह्लादित भेलहुँ। कालचक्रकेँ पकड़ि जाहि दूरदृष्टिक परिचय देलहुँ, ओहि लेल हमर मंगलकामना। ९.डॉ. शिवप्रसाद यादव- ई जानि अपार हर्ष भए रहल अछि, जे नव सूचना-क्रान्तिक क्षेत्रमे मैथिली पत्रकारिताकेँ प्रवेश दिअएबाक साहसिक कदम उठाओल अछि। पत्रकारितामे एहि प्रकारक नव प्रयोगक हम स्वागत करैत छी, संगहि "विदेह"क सफलताक शुभकामना। १०. श्री आद्याचरण झा- कोनो पत्र-पत्रिकाक प्रकाशन- ताहूमे मैथिली पत्रिकाक प्रकाशनमे के कतेक सहयोग करताह- ई तऽ भविष्य कहत। ई हमर ८८ वर्षमे ७५ वर्षक अनुभव रहल। एतेक पैघ महान यज्ञमे हमर श्रद्धापूर्ण आहुति प्राप्त होयत- यावत ठीक-ठाक छी/ रहब। ११. श्री विजय ठाकुर- मिशिगन विश्वविद्यालय- "विदेह" पत्रिकाक अंक देखलहुँ, सम्पूर्ण टीम बधाईक पात्र अछि। पत्रिकाक मंगल भविष्य हेतु हमर शुभकामना स्वीकार कएल जाओ। १२. श्री सुभाषचन्द्र यादव- ई-पत्रिका "विदेह" क बारेमे जानि प्रसन्नता भेल। ’विदेह’ निरन्तर पल्लवित-पुष्पित हो आ चतुर्दिक अपन सुगंध पसारय से कामना अछि। १३. श्री मैथिलीपुत्र प्रदीप- ई-पत्रिका "विदेह" केर सफलताक भगवतीसँ कामना। हमर पूर्ण सहयोग रहत। १४. डॉ. श्री भीमनाथ झा- "विदेह" इन्टरनेट पर अछि तेँ "विदेह" नाम उचित आर कतेक रूपेँ एकर विवरण भए सकैत अछि। आइ-काल्हि मोनमे उद्वेग रहैत अछि, मुदा शीघ्र पूर्ण सहयोग देब।कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक देखि अति प्रसन्नता भेल। मैथिलीक लेल ई घटना छी। १५. श्री रामभरोस कापड़ि "भ्रमर"- जनकपुरधाम- "विदेह" ऑनलाइन देखि रहल छी। मैथिलीकेँ अन्तर्राष्ट्रीय जगतमे पहुँचेलहुँ तकरा लेल हार्दिक बधाई। मिथिला रत्न सभक संकलन अपूर्व। नेपालोक सहयोग भेटत, से विश्वास करी। १६. श्री राजनन्दन लालदास- "विदेह" ई-पत्रिकाक माध्यमसँ बड़ नीक काज कए रहल छी, नातिक अहिठाम देखलहुँ। एकर वार्षिक अ‍ंक जखन प्रिं‍ट निकालब तँ हमरा पठायब। कलकत्तामे बहुत गोटेकेँ हम साइटक पता लिखाए देने छियन्हि। मोन तँ होइत अछि जे दिल्ली आबि कए आशीर्वाद दैतहुँ, मुदा उमर आब बेशी भए गेल। शुभकामना देश-विदेशक मैथिलकेँ जोड़बाक लेल।.. उत्कृष्ट प्रकाशन कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक लेल बधाइ। अद्भुत काज कएल अछि, नीक प्रस्तुति अछि सात खण्डमे।  मुदा अहाँक सेवा आ से निःस्वार्थ तखन बूझल जाइत जँ अहाँ द्वारा प्रकाशित पोथी सभपर दाम लिखल नहि रहितैक। ओहिना सभकेँ विलहि देल जइतैक। (स्पष्टीकरण-  श्रीमान्, अहाँक सूचनार्थ विदेह द्वारा ई-प्रकाशित कएल सभटा सामग्री आर्काइवमे https://sites.google.com/a/videha.com/videha-pothi/ पर बिना मूल्यक डाउनलोड लेल उपलब्ध छै आ भविष्यमे सेहो रहतैक। एहि आर्काइवकेँ जे कियो प्रकाशक अनुमति लऽ कऽ प्रिंट रूपमे प्रकाशित कएने छथि आ तकर ओ दाम रखने छथि ताहिपर हमर कोनो नियंत्रण नहि अछि।- गजेन्द्र ठाकुर)...   अहाँक प्रति अशेष शुभकामनाक संग। १७. डॉ. प्रेमशंकर सिंह- अहाँ मैथिलीमे इंटरनेटपर पहिल पत्रिका "विदेह" प्रकाशित कए अपन अद्भुत मातृभाषानुरागक परिचय देल अछि, अहाँक निःस्वार्थ मातृभाषानुरागसँ प्रेरित छी, एकर निमित्त जे हमर सेवाक प्रयोजन हो, तँ सूचित करी। इंटरनेटपर आद्योपांत पत्रिका देखल, मन प्रफुल्लित भऽ गेल। १८.श्रीमती शेफालिका वर्मा- विदेह ई-पत्रिका देखि मोन उल्लाससँ भरि गेल। विज्ञान कतेक प्रगति कऽ रहल अछि...अहाँ सभ अनन्त आकाशकेँ भेदि दियौ, समस्त विस्तारक रहस्यकेँ तार-तार कऽ दियौक...। अपनेक अद्भुत पुस्तक कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक विषयवस्तुक दृष्टिसँ गागरमे सागर अछि। बधाई। १९.श्री हेतुकर झा, पटना-जाहि समर्पण भावसँ अपने मिथिला-मैथिलीक सेवामे तत्पर छी से स्तुत्य अछि। देशक राजधानीसँ भय रहल मैथिलीक शंखनाद मिथिलाक गाम-गाममे मैथिली चेतनाक विकास अवश्य करत। २०. श्री योगानन्द झा, कबिलपुर, लहेरियासराय- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पोथीकेँ निकटसँ देखबाक अवसर भेटल अछि आ मैथिली जगतक एकटा उद्भट ओ समसामयिक दृष्टिसम्पन्न हस्ताक्षरक कलमबन्द परिचयसँ आह्लादित छी। "विदेह"क देवनागरी सँस्करण पटनामे रु. 80/- मे उपलब्ध भऽ सकल जे विभिन्न लेखक लोकनिक छायाचित्र, परिचय पत्रक ओ रचनावलीक सम्यक प्रकाशनसँ ऐतिहासिक कहल जा सकैछ। २१. श्री किशोरीकान्त मिश्र- कोलकाता- जय मैथिली, विदेहमे बहुत रास कविता, कथा, रिपोर्ट आदिक सचित्र संग्रह देखि आ आर अधिक प्रसन्नता मिथिलाक्षर देखि- बधाई स्वीकार कएल जाओ। २२.श्री जीवकान्त- विदेहक मुद्रित अंक पढ़ल- अद्भुत मेहनति। चाबस-चाबस। किछु समालोचना मरखाह..मुदा सत्य। २३. श्री भालचन्द्र झा- अपनेक कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक देखि बुझाएल जेना हम अपने छपलहुँ अछि। एकर विशालकाय आकृति अपनेक सर्वसमावेशताक परिचायक अछि। अपनेक रचना सामर्थ्यमे उत्तरोत्तर वृद्धि हो, एहि शुभकामनाक संग हार्दिक बधाई। २४.श्रीमती डॉ नीता झा- अहाँक कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़लहुँ। ज्योतिरीश्वर शब्दावली, कृषि मत्स्य शब्दावली आ सीत बसन्त आ सभ कथा, कविता, उपन्यास, बाल-किशोर साहित्य सभ उत्तम छल। मैथिलीक उत्तरोत्तर विकासक लक्ष्य दृष्टिगोचर होइत अछि। २५.श्री मायानन्द मिश्र- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक मे हमर उपन्यास स्त्रीधनक जे विरोध कएल गेल अछि तकर हम विरोध करैत छी।... कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पोथीक लेल शुभकामना।(श्रीमान् समालोचनाकेँ विरोधक रूपमे नहि लेल जाए।-गजेन्द्र ठाकुर) २६.श्री महेन्द्र हजारी- सम्पादक श्रीमिथिला- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़ि मोन हर्षित भऽ गेल..एखन पूरा पढ़यमे बहुत समय लागत, मुदा जतेक पढ़लहुँ से आह्लादित कएलक। २७.श्री केदारनाथ चौधरी- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक अद्भुत लागल, मैथिली साहित्य लेल ई पोथी एकटा प्रतिमान बनत। २८.श्री सत्यानन्द पाठक- विदेहक हम नियमित पाठक छी। ओकर स्वरूपक प्रशंसक छलहुँ। एम्हर अहाँक लिखल - कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक देखलहुँ। मोन आह्लादित भऽ उठल। कोनो रचना तरा-उपरी। २९.श्रीमती रमा झा-सम्पादक मिथिला दर्पण। कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक प्रिंट फॉर्म पढ़ि आ एकर गुणवत्ता देखि मोन प्रसन्न भऽ गेल, अद्भुत शब्द एकरा लेल प्रयुक्त कऽ रहल छी। विदेहक उत्तरोत्तर प्रगतिक शुभकामना। ३०.श्री नरेन्द्र झा, पटना- विदेह नियमित देखैत रहैत छी। मैथिली लेल अद्भुत काज कऽ रहल छी। ३१.श्री रामलोचन ठाकुर- कोलकाता- मिथिलाक्षर विदेह देखि मोन प्रसन्नतासँ भरि उठल, अंकक विशाल परिदृश्य आस्वस्तकारी अछि। ३२.श्री तारानन्द वियोगी- विदेह आ कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक देखि चकबिदोर लागि गेल। आश्चर्य। शुभकामना आ बधाई। ३३.श्रीमती प्रेमलता मिश्र “प्रेम”- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़लहुँ। सभ रचना उच्चकोटिक लागल। बधाई। ३४.श्री कीर्तिनारायण मिश्र- बेगूसराय- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक बड्ड नीक लागल, आगांक सभ काज लेल बधाई। ३५.श्री महाप्रकाश-सहरसा- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक नीक लागल, विशालकाय संगहि उत्तमकोटिक। ३६.श्री अग्निपुष्प- मिथिलाक्षर आ देवाक्षर विदेह पढ़ल..ई प्रथम तँ अछि एकरा प्रशंसामे मुदा हम एकरा दुस्साहसिक कहब। मिथिला चित्रकलाक स्तम्भकेँ मुदा अगिला अंकमे आर विस्तृत बनाऊ। ३७.श्री मंजर सुलेमान-दरभंगा- विदेहक जतेक प्रशंसा कएल जाए कम होएत। सभ चीज उत्तम। ३८.श्रीमती प्रोफेसर वीणा ठाकुर- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक उत्तम, पठनीय, विचारनीय। जे क्यो देखैत छथि पोथी प्राप्त करबाक उपाय पुछैत छथि। शुभकामना। ३९.श्री छत्रानन्द सिंह झा- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़लहुँ, बड्ड नीक सभ तरहेँ। ४०.श्री ताराकान्त झा- सम्पादक मैथिली दैनिक मिथिला समाद- विदेह तँ कन्टेन्ट प्रोवाइडरक काज कऽ रहल अछि। कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक अद्भुत लागल। ४१.डॉ रवीन्द्र कुमार चौधरी- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक बहुत नीक, बहुत मेहनतिक परिणाम। बधाई। ४२.श्री अमरनाथ- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक आ विदेह दुनू स्मरणीय घटना अछि, मैथिली साहित्य मध्य। ४३.श्री पंचानन मिश्र- विदेहक वैविध्य आ निरन्तरता प्रभावित करैत अछि, शुभकामना। ४४.श्री केदार कानन- कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक लेल अनेक धन्यवाद, शुभकामना आ बधाइ स्वीकार करी। आ नचिकेताक भूमिका पढ़लहुँ। शुरूमे तँ लागल जेना कोनो उपन्यास अहाँ द्वारा सृजित भेल अछि मुदा पोथी उनटौला पर ज्ञात भेल जे एहिमे तँ सभ विधा समाहित अछि। ४५.श्री धनाकर ठाकुर- अहाँ नीक काज कऽ रहल छी। फोटो गैलरीमे चित्र एहि शताब्दीक जन्मतिथिक अनुसार रहैत तऽ नीक। ४६.श्री आशीष झा- अहाँक पुस्तकक संबंधमे एतबा लिखबा सँ अपना कए नहि रोकि सकलहुँ जे ई किताब मात्र किताब नहि थीक, ई एकटा उम्मीद छी जे मैथिली अहाँ सन पुत्रक सेवा सँ निरंतर समृद्ध होइत चिरजीवन कए प्राप्त करत। ४७.श्री शम्भु कुमार सिंह- विदेहक तत्परता आ क्रियाशीलता देखि आह्लादित भऽ रहल छी। निश्चितरूपेण कहल जा सकैछ जे समकालीन मैथिली पत्रिकाक इतिहासमे विदेहक नाम स्वर्णाक्षरमे लिखल जाएत। ओहि कुरुक्षेत्रक घटना सभ तँ अठारहे दिनमे खतम भऽ गेल रहए मुदा अहाँक कुरुक्षेत्रम् तँ अशेष अछि। ४८.डॉ. अजीत मिश्र- अपनेक प्रयासक कतबो प्रश‍ंसा कएल जाए कमे होएतैक। मैथिली साहित्यमे अहाँ द्वारा कएल गेल काज युग-युगान्तर धरि पूजनीय रहत। ४९.श्री बीरेन्द्र मल्लिक- अहाँक कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक आ विदेह:सदेह पढ़ि अति प्रसन्नता भेल। अहाँक स्वास्थ्य ठीक रहए आ उत्साह बनल रहए से कामना। ५०.श्री कुमार राधारमण- अहाँक दिशा-निर्देशमे विदेह पहिल मैथिली ई-जर्नल देखि अति प्रसन्नता भेल। हमर शुभकामना। ५१.श्री फूलचन्द्र झा प्रवीण-विदेह:सदेह पढ़ने रही मुदा कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक देखि बढ़ाई देबा लेल बाध्य भऽ गेलहुँ। आब विश्वास भऽ गेल जे मैथिली नहि मरत। अशेष शुभकामना। ५२.श्री विभूति आनन्द- विदेह:सदेह देखि, ओकर विस्तार देखि अति प्रसन्नता भेल। ५३.श्री मानेश्वर मनुज-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक एकर भव्यता देखि अति प्रसन्नता भेल, एतेक विशाल ग्रन्थ मैथिलीमे आइ धरि नहि देखने रही। एहिना भविष्यमे काज करैत रही, शुभकामना। ५४.श्री विद्यानन्द झा- आइ.आइ.एम.कोलकाता- कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक विस्तार, छपाईक संग गुणवत्ता देखि अति प्रसन्नता भेल। अहाँक अनेक धन्यवाद; कतेक बरखसँ हम नेयारैत छलहुँ जे सभ पैघ शहरमे मैथिली लाइब्रेरीक स्थापना होअए, अहाँ ओकरा वेबपर कऽ रहल छी, अनेक धन्यवाद। ५५.श्री अरविन्द ठाकुर-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक मैथिली साहित्यमे कएल गेल एहि तरहक पहिल प्रयोग अछि, शुभकामना। ५६.श्री कुमार पवन-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक पढ़ि रहल छी। किछु लघुकथा पढ़ल अछि, बहुत मार्मिक छल। ५७. श्री प्रदीप बिहारी-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक देखल, बधाई। ५८.डॉ मणिकान्त ठाकुर-कैलिफोर्निया- अपन विलक्षण नियमित सेवासँ हमरा लोकनिक हृदयमे विदेह सदेह भऽ गेल अछि। ५९.श्री धीरेन्द्र प्रेमर्षि- अहाँक समस्त प्रयास सराहनीय। दुख होइत अछि जखन अहाँक प्रयासमे अपेक्षित सहयोग नहि कऽ पबैत छी। ६०.श्री देवशंकर नवीन- विदेहक निरन्तरता आ विशाल स्वरूप- विशाल पाठक वर्ग, एकरा ऐतिहासिक बनबैत अछि। ६१.श्री मोहन भारद्वाज- अहाँक समस्त कार्य देखल, बहुत नीक। एखन किछु परेशानीमे छी, मुदा शीघ्र सहयोग देब। ६२.श्री फजलुर रहमान हाशमी-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक मे एतेक मेहनतक लेल अहाँ साधुवादक अधिकारी छी। ६३.श्री लक्ष्मण झा "सागर"- मैथिलीमे चमत्कारिक रूपेँ अहाँक प्रवेश आह्लादकारी अछि।..अहाँकेँ एखन आर..दूर..बहुत दूरधरि जेबाक अछि। स्वस्थ आ प्रसन्न रही। ६४.श्री जगदीश प्रसाद मंडल-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक पढ़लहुँ । कथा सभ आ उपन्यास सहस्रबाढ़नि पूर्णरूपेँ पढ़ि गेल छी। गाम-घरक भौगोलिक विवरणक जे सूक्ष्म वर्णन सहस्रबाढ़निमे अछि, से चकित कएलक, एहि संग्रहक कथा-उपन्यास मैथिली लेखनमे विविधता अनलक अछि। समालोचना शास्त्रमे अहाँक दृष्टि वैयक्तिक नहि वरन् सामाजिक आ कल्याणकारी अछि, से प्रशंसनीय। ६५.श्री अशोक झा-अध्यक्ष मिथिला विकास परिषद- कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक लेल बधाई आ आगाँ लेल शुभकामना। ६६.श्री ठाकुर प्रसाद मुर्मु- अद्भुत प्रयास। धन्यवादक संग प्रार्थना जे अपन माटि-पानिकेँ ध्यानमे राखि अंकक समायोजन कएल जाए। नव अंक धरि प्रयास सराहनीय। विदेहकेँ बहुत-बहुत धन्यवाद जे एहेन सुन्दर-सुन्दर सचार (आलेख) लगा रहल छथि। सभटा ग्रहणीय- पठनीय। ६७.बुद्धिनाथ मिश्र- प्रिय गजेन्द्र जी,अहाँक सम्पादन मे प्रकाशित ‘विदेह’आ ‘कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक’ विलक्षण पत्रिका आ विलक्षण पोथी! की नहि अछि अहाँक सम्पादनमे? एहि प्रयत्न सँ मैथिली क विकास होयत,निस्संदेह। ६८.श्री बृखेश चन्द्र लाल- गजेन्द्रजी, अपनेक पुस्तक कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक पढ़ि मोन गदगद भय गेल , हृदयसँ अनुगृहित छी । हार्दिक शुभकामना । ६९.श्री परमेश्वर कापड़ि - श्री गजेन्द्र जी । कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक पढ़ि गदगद आ नेहाल भेलहुँ। ७०.श्री रवीन्द्रनाथ ठाकुर- विदेह पढ़ैत रहैत छी। धीरेन्द्र प्रेमर्षिक मैथिली गजलपर आलेख पढ़लहुँ। मैथिली गजल कत्तऽ सँ कत्तऽ चलि गेलैक आ ओ अपन आलेखमे मात्र अपन जानल-पहिचानल लोकक चर्च कएने छथि। जेना मैथिलीमे मठक परम्परा रहल अछि। (स्पष्टीकरण- श्रीमान्, प्रेमर्षि जी ओहि आलेखमे ई स्पष्ट लिखने छथि जे किनको नाम जे छुटि गेल छन्हि तँ से मात्र आलेखक लेखकक जानकारी नहि रहबाक द्वारे, एहिमे आन कोनो कारण नहि देखल जाय। अहाँसँ एहि विषयपर विस्तृत आलेख सादर आमंत्रित अछि।-सम्पादक) ७१.श्री मंत्रेश्वर झा- विदेह पढ़ल आ संगहि अहाँक मैगनम ओपस कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक सेहो, अति उत्तम। मैथिलीक लेल कएल जा रहल अहाँक समस्त कार्य अतुलनीय अछि। ७२. श्री हरेकृष्ण झा- कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक मैथिलीमे अपन तरहक एकमात्र ग्रन्थ अछि, एहिमे लेखकक समग्र दृष्टि आ रचना कौशल देखबामे आएल जे लेखकक फील्डवर्कसँ जुड़ल रहबाक कारणसँ अछि। ७३.श्री सुकान्त सोम- कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक मे  समाजक इतिहास आ वर्तमानसँ अहाँक जुड़ाव बड्ड नीक लागल, अहाँ एहि क्षेत्रमे आर आगाँ काज करब से आशा अछि। ७४.प्रोफेसर मदन मिश्र- कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक सन किताब मैथिलीमे पहिले अछि आ एतेक विशाल संग्रहपर शोध कएल जा सकैत अछि। भविष्यक लेल शुभकामना। ७५.प्रोफेसर कमला चौधरी- मैथिलीमे कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक सन पोथी आबए जे गुण आ रूप दुनूमे निस्सन होअए, से बहुत दिनसँ आकांक्षा छल, ओ आब जा कऽ पूर्ण भेल। पोथी एक हाथसँ दोसर हाथ घुमि रहल अछि, एहिना आगाँ सेहो अहाँसँ आशा अछि। ७६.श्री उदय चन्द्र झा "विनोद": गजेन्द्रजी, अहाँ जतेक काज कएलहुँ अछि से मैथिलीमे आइ धरि कियो नहि कएने छल। शुभकामना। अहाँकेँ एखन बहुत काज आर करबाक अछि। ७७.श्री कृष्ण कुमार कश्यप: गजेन्द्र ठाकुरजी, अहाँसँ भेँट एकटा स्मरणीय क्षण बनि गेल। अहाँ जतेक काज एहि बएसमे कऽ गेल छी ताहिसँ हजार गुणा आर बेशीक आशा अछि। ७८.श्री मणिकान्त दास: अहाँक मैथिलीक कार्यक प्रशंसा लेल शब्द नहि भेटैत अछि। अहाँक कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक सम्पूर्ण रूपेँ पढ़ि गेलहुँ। त्वञ्चाहञ्च बड्ड नीक लागल। ७९. श्री हीरेन्द्र कुमार झा- विदेह ई-पत्रिकाक सभ अंक ई-पत्रसँ भेटैत रहैत अछि। मैथिलीक ई-पत्रिका छैक एहि बातक गर्व होइत अछि। अहाँ आ अहाँक सभ सहयोगीकेँ हार्दिक शुभकामना। विदेह मैथिली साहित्य आन्दोलन (c)२००४-१२. सर्वाधिकार लेखकाधीन आ जतए लेखकक नाम नहि अछि ततए संपादकाधीन। विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। सह-सम्पादक: उमेश मंडल। सहायक सम्पादक: शिव कुमार झा आ मुन्नाजी (मनोज कुमार कर्ण)। भाषा-सम्पादन: नागेन्द्र कुमार झा आ पञ्जीकार विद्यानन्द झा। कला-सम्पादन: वनीता कुमारी आ रश्मि रेखा सिन्हा। सम्पादक-शोध-अन्वेषण: डॉ. जया वर्मा आ डॉ. राजीव कुमार वर्मा। सम्पादक- नाटक-रंगमंच-चलचित्र- बेचन ठाकुर। सम्पादक- सूचना-सम्पर्क-समाद- पूनम मंडल आ प्रियंका झा। सम्पादक- अनुवाद विभाग- विनीत उत्पल। रचनाकार अपन मौलिक आ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि) ggajendra@videha.com केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx, .rtf वा .txt फॉर्मेटमे पठा सकैत छथि। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेताह, से आशा करैत छी। रचनाक अंतमे टाइप रहय, जे ई रचना मौलिक अछि, आ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। मेल प्राप्त होयबाक बाद यथासंभव शीघ्र ( सात दिनक भीतर) एकर प्रकाशनक अंकक सूचना देल जायत। ’विदेह' प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका अछि आ एहिमे मैथिली, संस्कृत आ अंग्रेजीमे मिथिला आ मैथिलीसँ संबंधित रचना प्रकाशित कएल जाइत अछि। एहि ई पत्रिकाकेँ श्रीमति लक्ष्मी ठाकुर द्वारा मासक ०१ आ १५ तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि। (c) 2004-12 सर्वाधिकार सुरक्षित। विदेहमे प्रकाशित सभटा रचना आ आर्काइवक सर्वाधिकार रचनाकार आ संग्रहकर्त्ताक लगमे छन्हि। रचनाक अनुवाद आ पुनः प्रकाशन किंवा आर्काइवक उपयोगक अधिकार किनबाक हेतु ggajendra@videha.co.in पर संपर्क करू। एहि साइटकेँ प्रीति झा ठाकुर, मधूलिका चौधरी आ रश्मि प्रिया द्वारा डिजाइन कएल गेल। सिद्धिरस्तु वि दे ह विदेह Videha বিদেহ  www.videha.co.in www.videha.com विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका Videha Ist Maithili Fortnightly ejournal  विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका 'विदेह' १०६ म अंक १५ मइ २०१२ (वर्ष ५ मास ५३ अंक १०६) मानुषीमिह संस्कृताम् ISSN 2229-547X VIDEHA वि दे ह विदेह Videha বিদেহ www.videha.co.in www.videha.com विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका Videha Ist Maithili Fortnightly e Magazine  विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई 'विदेह' १०६ म अंक १५ मइ २०१२ (वर्ष ५ मास ५३ अंक १०६) मानुषीमिह संस्कृताम् ISSN 2229-547X VIDEHA

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