VIDEHA — Issue 107 / अंक १०७

Publication: VIDEHA · Issue: 107
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606 607 ISSN 2229-547X VIDEHA 'विदेह' १०७ म अंक ०१ जून २०१२ (वर्ष ५ मास ५४ अंक १०७) वि  दे  ह विदेह Videha বিদেহ http://www.videha.co.in  विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका Videha Ist Maithili Fortnightly ejournal  नव अंक देखबाक लेल पृष्ठ सभकेँ रिफ्रेश कए देखू। Always refresh the pages for viewing new issue of VIDEHA. Read in your own script Roman(Eng)Gujarati Bangla Oriya Gurmukhi Telugu Tamil Kannada Malayalam Hindi ऐ अंकमे अछि:- १. संपादकीय संदेश २. गद्य २.१.१.डा.राजेन्द्र विमल, ‘घरमुहाँ’ – प्रभाव आ प्रतिक्रिया २. जगदीश प्रसाद मण्‍डल- कथा-सतभैंया पोखर २.२.सुजीत कुमार झा-कथा-मेनका २.३.राजदेव मण्‍डलक उपन्‍यास- हमर टोल २.४.विहनि कथा १.जवाहरलाल कश्यप २.रवि भूषण पाठक ३.जगदानन्द झा 'मनु'४.चंदन कुमार झा २.५.  डा0 अरुण कुमार सिंह- भाषा जातिगत सम्पत्ति नहि अपितु सामाजिक २.६.डॉ. कैलाश कुमार मि‍श्र- कथा- चन्‍दा २.७.कामिनी कामायनी-संटू क उपनैन २.८.१.दुर्गानन्‍द मण्‍डल-कथा- कुकर्मा २. परमेश्वर कापड़ि, संयोजक मिथिला राज्य संघर्ष समिति/ परमेश झा अनिलचन्द्र झा ३.पूनम मण्डल-मिथिला विभूति स्मृति पर्व समारोह २०१२ ३. पद्य ३.१.१.जगदीश प्रसाद मण्‍डल २.रमेश रञ्जन ३.प्रकाश प्रेमी ३.२.१.डॉ॰ शशिधर कुमर “विदेह”२.रामवि‍लास साहु ३.३.१.जगदीश चन्द्र ठाकुर अनिल २.उमेश पासवान ३.४.१.पंकज झा २.ओमप्रकाश झा ३.रुबी झा ३.५.किशन कारीगर ३.६.चंदन कुमार झा ३.७.जगदानन्द झा 'मनु' ३.८.१.डा. धनाकर ठाकुर २.नवीन कुमार आशा ४. मिथिला कला-संगीत१.राजनाथ मिश्र (चित्रमय मिथिला) २. उमेश मण्डल (मिथिलाक वनस्पति/ मिथिलाक जीव-जन्तु/ मिथिलाक जिनगी) बालानां कृते-१.चंदन कुमार झा- बाल गजल २.डॉ. दमन कुमार झ-एकैसम शताब्दीक पहिल दशकमे मैथिली  बालसाहित्य३.डॉ॰ शशिधर कुमर “विदेह” भाषापाक रचना-लेखन -[मानक मैथिली], [विदेहक मैथिली-अंग्रेजी आ अंग्रेजी मैथिली कोष (इंटरनेटपर पहिल बेर सर्च-डिक्शनरी) एम.एस. एस.क्यू.एल. सर्वर आधारित -Based on ms-sql server Maithili-English and English-Maithili Dictionary.] विदेह ई-पत्रिकाक सभटा पुरान अंक ( ब्रेल, तिरहुता आ देवनागरी मे ) पी.डी.एफ. डाउनलोडक लेल नीचाँक लिंकपर उपलब्ध अछि। All the old issues of Videha e journal ( in Braille, Tirhuta and Devanagari versions ) are available for pdf download at the following link. विदेह ई-पत्रिकाक सभटा पुरान अंक ब्रेल, तिरहुता आ देवनागरी रूपमे Videha e journal's all old issues in Braille Tirhuta and Devanagari versions विदेह ई-पत्रिकाक पहिल ५० अंक

विदेह ई-पत्रिकाक ५०म सँ आगाँक अंक विदेह आर.एस.एस.फीड। "विदेह" ई-पत्रिका ई-पत्रसँ प्राप्त करू। अपन मित्रकेँ विदेहक विषयमे सूचित करू। ↑ विदेह आर.एस.एस.फीड एनीमेटरकेँ अपन साइट/ ब्लॉगपर लगाऊ। ब्लॉग "लेआउट" पर "एड गाडजेट" मे "फीड" सेलेक्ट कए "फीड यू.आर.एल." मे http://www.videha.co.in/index.xml टाइप केलासँ सेहो विदेह फीड प्राप्त कए सकैत छी। गूगल रीडरमे पढ़बा लेल http://reader.google.com/ पर जा कऽ Add a  Subscription बटन क्लिक करू आ खाली स्थानमे http://www.videha.co.in/index.xml पेस्ट करू आ Add  बटन दबाउ। Join official Videha facebook group. Join Videha googlegroups विदेह रेडियो:मैथिली कथा-कविता आदिक पहिल पोडकास्ट साइट http://videha123radio.wordpress.com/ Videha Radio मैथिली देवनागरी वा मिथिलाक्षरमे नहि देखि/ लिखि पाबि रहल छी, (cannot see/write Maithili in Devanagari/ Mithilakshara follow links below or contact at ggajendra@videha.com) तँ एहि हेतु नीचाँक लिंक सभ पर जाऊ। संगहि विदेहक स्तंभ मैथिली भाषापाक/ रचना लेखनक नव-पुरान अंक पढ़ू। http://devanaagarii.net/ http://kaulonline.com/uninagari/  (एतए बॉक्समे ऑनलाइन देवनागरी टाइप करू, बॉक्ससँ कॉपी करू आ वर्ड डॉक्युमेन्टमे पेस्ट कए वर्ड फाइलकेँ सेव करू। विशेष जानकारीक लेल ggajendra@videha.com पर सम्पर्क करू।)(Use Firefox 4.0 (from WWW.MOZILLA.COM )/ Opera/ Safari/ Internet Explorer 8.0/ Flock 2.0/ Google Chrome for best view of 'Videha' Maithili e-journal at http://www.videha.co.in/ .) Go to the link below for download of old issues of VIDEHA Maithili e magazine in .pdf format and Maithili Audio/ Video/ Book/ paintings/ photo files. विदेहक पुरान अंक आ ऑडियो/ वीडियो/ पोथी/ चित्रकला/ फोटो सभक फाइल सभ (उच्चारण, बड़ सुख सार आ दूर्वाक्षत मंत्र सहित) डाउनलोड करबाक हेतु नीचाँक लिंक पर जाऊ। VIDEHA ARCHIVE विदेह आर्काइव भारतीय डाक विभाग द्वारा जारी कवि, नाटककार आ धर्मशास्त्री विद्यापतिक स्टाम्प। भारत आ नेपालक माटिमे पसरल मिथिलाक धरती प्राचीन कालहिसँ महान पुरुष ओ महिला लोकनिक कर्मभमि रहल अछि। मिथिलाक महान पुरुष ओ महिला लोकनिक चित्र 'मिथिला रत्न' मे देखू। गौरी-शंकरक पालवंश कालक मूर्त्ति, एहिमे मिथिलाक्षरमे (१२०० वर्ष पूर्वक) अभिलेख अंकित अछि। मिथिलाक भारत आ नेपालक माटिमे पसरल एहि तरहक अन्यान्य प्राचीन आ नव स्थापत्य, चित्र, अभिलेख आ मूर्त्तिकलाक़ हेतु देखू 'मिथिलाक खोज' मिथिला, मैथिल आ मैथिलीसँ सम्बन्धित सूचना, सम्पर्क, अन्वेषण संगहि विदेहक सर्च-इंजन आ न्यूज सर्विस आ मिथिला, मैथिल आ मैथिलीसँ सम्बन्धित वेबसाइट सभक समग्र संकलनक लेल देखू "विदेह सूचना संपर्क अन्वेषण" विदेह जालवृत्तक डिसकसन फोरमपर जाऊ। "मैथिल आर मिथिला" (मैथिलीक सभसँ लोकप्रिय जालवृत्त) पर जाऊ। ऐ बेर मूल पुरस्कार(२०१२) [साहित्य अकादेमी, दिल्ली]क लेल अहाँक नजरिमे कोन मूल मैथिली पोथी उपयुक्त अछि ? Thank you for voting! श्री राजदेव मण्डलक “अम्बरा” (कविता-संग्रह) 12.85% श्री बेचन ठाकुरक “बेटीक अपमान आ छीनरदेवी”(दूटा नाटक) 10.66% श्रीमती आशा मिश्रक “उचाट” (उपन्यास) 6.27% श्रीमती पन्ना झाक “अनुभूति” (कथा संग्रह) 5.02% श्री उदय नारायण सिंह “नचिकेता”क “नो एण्ट्री:मा प्रविश (नाटक) 5.96% श्री सुभाष चन्द्र यादवक “बनैत बिगड़ैत” (कथा-संग्रह) 5.02% श्रीमती वीणा कर्ण- भावनाक अस्थिपंजर (कविता संग्रह) 5.96% श्रीमती शेफालिका वर्माक “किस्त-किस्त जीवन (आत्मकथा) 8.15% श्रीमती विभा रानीक “भाग रौ आ बलचन्दा” (दूटा नाटक) 6.9% श्री महाप्रकाश-संग समय के (कविता संग्रह) 5.64% श्री तारानन्द वियोगी- प्रलय रहस्य (कविता-संग्रह) 5.33% श्री महेन्द्र मलंगियाक “छुतहा घैल” (नाटक) 7.84% श्रीमती नीता झाक “देश-काल” (कथा-संग्रह) 6.27% श्री सियाराम झा "सरस"क थोड़े आगि थोड़े पानि (गजल संग्रह) 7.21% Other: 0.94% ऐ बेर बाल साहित्य पुरस्कार(२०१२) [साहित्य अकादेमी, दिल्ली]क लेल अहाँक नजरिमे कोन मूल मैथिली पोथी उपयुक्त अछि ? श्री जगदीश प्रसाद मण्डल जीक “तरेगन”(बाल-प्रेरक कथा संग्रह) 48.57% श्री जीवकांत - खिखिरक बिअरि 27.14% श्री मुरलीधर झाक “पिलपिलहा गाछ 22.86% Other: 1.43% ऐ बेर युवा पुरस्कार(२०१२)[साहित्य अकादेमी, दिल्ली]क लेल अहाँक नजरिमे कोन कोन लेखक उपयुक्त छथि ? श्रीमती ज्योति सुनीत चौधरीक “अर्चिस” (कविता संग्रह) 22.52% श्री विनीत उत्पलक “हम पुछैत छी” (कविता संग्रह) 8.11% श्रीमती कामिनीक “समयसँ सम्वाद करैत”, (कविता संग्रह) 6.31% श्री प्रवीण काश्यपक “विषदन्ती वरमाल कालक रति” (कविता संग्रह) 4.5% श्री आशीष अनचिन्हारक "अनचिन्हार आखर"(गजल संग्रह) 24.32% श्री अरुणाभ सौरभक “एतबे टा नहि” (कविता संग्रह) 6.31% श्री दिलीप कुमार झा "लूटन"क जगले रहबै (कविता संग्रह) 8.11% श्री आदि यायावरक “भोथर पेंसिलसँ लिखल” (कथा संग्रह) 4.5% श्री उमेश मण्डलक “निश्तुकी” (कविता संग्रह) 13.51% Other: 1.8% ऐ बेर अनुवाद पुरस्कार (२०१३) [साहित्य अकादेमी, दिल्ली]क लेल अहाँक नजरिमे के उपयुक्त छथि? Thank you for voting! श्री नरेश कुमार विकल "ययाति" (मराठी उपन्यास श्री विष्णु सखाराम खाण्डेकर) 34.44% श्री महेन्द्र नारायण राम "कार्मेलीन" (कोंकणी उपन्यास श्री दामोदर मावजो) 13.33% श्री देवेन्द्र झा "अनुभव"(बांग्ला उपन्यास श्री दिव्येन्दु पालित) 11.11% श्रीमती मेनका मल्लिक "देश आ अन्य कविता सभ" (नेपालीक अनुवाद मूल- रेमिका थापा) 14.44% श्री कृष्ण कुमार कश्यप आ श्रीमती शशिबाला- मैथिली गीतगोविन्द ( जयदेव संस्कृत) 13.33% श्री रामनारायण सिंह "मलाहिन" (श्री तकषी शिवशंकर पिल्लैक मलयाली उपन्यास) 12.22% Other: 1.11% फेलो पुरस्कार-समग्र योगदान २०१२-१३ : समानान्तर साहित्य अकादेमी, दिल्ली Thank you for voting! श्री राजनन्दन लाल दास 53.52% श्री डॉ. अमरेन्द्र 25.35% श्री चन्द्रभानु सिंह 19.72% Other: 1.41% 1.संपादकीय १ साहित्य अकादेमीक टैगोर लिटरेचर अवार्ड २०११ मैथिली लेल श्री जगदीश प्रसाद मण्डल केँ हुनकर लघुकथा संग्रह "गामक जिनगी" लेल देल जाएत। कार्यक्रम कोच्चिमे १२ जून २०१२केँ हएत। मैथिली लेल विवादक अन्तक कोनो सम्भावना नै देखबामे आबि रहल अछि। ऐ पुरस्कारक ग्राउण्ड लिस्ट बनेबा लेल एकटा तथाकथित साहित्यकारकेँ चुनल गेल जे प्राप्त सूचनाक अनुसार जातिक आ संकीर्णताक आधारपर पोथीक नाम देलन्हि जाइमे नहिये नचिकेताक पोथी रहए, नहिये सुभाष चन्द्र यादवक आ नहिये जगदीश प्रसाद मण्डलक। रेफरी जखन ७ टा पोथीक नाम पठेलन्हि तखन ओइमे चन्द्रनाथ मिश्र "अमर"क अतीत मंथन सेहो रहए जखन कि ओ पोथी निर्धारित अवधि २००७-२००९ मे छपले नै अछि, तँ की बिनु देखने पोथी अनुशंसित कएल गेल? ऐ तरहक ग्राउण्ड लिस्ट बनेनिहार आ बिनु पढ़ने पोथी अनुशंसित केनिहारकेँ साहित्य अकादेमी चिन्हित करए, आ नाम सार्वजनिक कऽ स्थायी रूपसँ प्रतिबन्धित करए, से आग्रह; तखने मैथिलीक प्रतिष्ठा बाँचल रहि सकत। मुदा ई तँ मात्र प्रारम्भ अछि। साहित्य अकादेमीक मैथिली विभागक असली चेहरा तखन सोझाँ आओत जख ऐ बर्खक मूल साहित्य अकादेमी पुरस्कारक घोषणा हएत। श्री जगदीश प्रसाद मण्डल जीक "गामक जिनगी" मैथिली साहित्यक इतिहासक सर्वश्रेष्ठ लघु कथा संग्रह अछि। जगदीश प्रसाद मण्डल जीकेँ बधाइ। सूचना (स्रोत समदिया): जगदीश प्रसाद मण्डल जी केँ हुनकर मैथिली लघुकथा संग्रह "गामक जिनगी" लेल टैगोर साहित्य पुरस्कार २०११ देबाक घोषणा। कार्यक्रम १२ जून २०१२ ई. केँ कोच्चि (केरल) मे। ई पुरस्कार दक्षिण कोरियाक एम्बैसी (स्पॉन्सर सैमसंग इण्डिया लिमिटेड) क आग्रहपर साहित्य अकादेमी द्वारा शुरू कएल गेल अछि। टैगोर साहित्य पुरस्कार गुरुदेव रवीन्द्र नाथ ठाकुरक १५०म जयन्तीक उपलक्ष्यमे शुरू भेल छल। सभ साल ८ टा भाषा आ तीन सालमे साहित्य अकादेमी द्वारा मान्यता प्राप्त सभटा २४ भाषाकेँ ऐमे पुरस्कृत कएल जाइत अछि। मैथिली लेल ई पुरस्कार पहिल बेर देल जा रहल अछि। गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुरक १५०म जयन्तीक उपलक्ष्यमे साहित्य अकादेमी आ सैमसंग इडिया (सैमसंग होप प्रोजेक्ट) द्वारा २००९ ई. मे स्थापित कएल गेल छल टैगोर साहित्य पुरस्कार। २४ भाषाक श्रेष्ठ पोथीकेँ तीन सालमे पुरस्कार (सभ साल आठ-आठ भाषाक सर्वश्रेष्ठ पोथीकेँ एक सालमे पुरस्कार) देल जाएत। पुरस्कारमे प्रत्येककेँ ९१ हजार टाका आ प्रशस्ति-पत्र देल जाएत। चारिम साल पहिल सालक आठ भाषाक समूहक फेरसँ बेर आएत। टैगोर जयन्तीक लगाति अवसरपर ई पुरस्कार देल जाइत अछि।

टैगोर साहित्य पुरस्कार २००९ (पुरस्कार समारोहक नामवर सिंह, अशोक वाजपेयी, कृष्णा सोबती आ केदारनाथ सिंह द्वारा बहिष्कार कएल गेल छल) बांग्ला, गुजराती, हिन्दी, कन्नड, काश्मीरी, पंजाबी, तेलुगु आ बोडो भाषामे २००५ सँ २००७ मध्य प्रकाशित पोथीपर देल गेल। -बांग्ला (आलोक सरकार, अपापभूमि, कविता) -गुजराती ( भगवान दास पटेल, मारी लोकयात्रा) -हिन्दी (राजी सेठ, गमे हयात ने मारा, कथा संग्रह) -कन्नड (चन्द्रशेखर कांबर, शिकारा सूर्य, उपन्यास) -काश्मीरी (नसीम सफाइ, ना थसे ना आकास, कविता) -पंजाबी (जसवन्त सिंह कँवल, पुण्य दा चानन, आत्मकथा) -तेलुगु (कोवेला सुप्रसन्नाचार्य, अंतरंगम, निबन्ध) -बोडो (ब्रजेन्द्र कुमार ब्रह्मा, रैथाइ हाला, निबन्ध)

टैगोर साहित्य पुरस्कार २०१० असमी, डोगरी, मराठी, ओड़िया, राजस्थानी, संथाली, तमिल आ उर्दू भाषामे २००६ सँ २००८ मध्य प्रकाशित पोथीपर देल गेल।

-असमी (देवव्रत दास, निर्वाचित गल्प) -डोगरी (संतोष खजूरिया, बडलोनदियन बहारां) -मराठी (आर. जी. जाधव, निवादक समीक्षा) -ओड़िया (ब्रजनाथ रथ, सामान्य असामान्य) -राजस्थानी (विजय दान देथा, बातां री फुलवारी) -संथाली (सोमाइ किस्कू, नमालिया) -तमिल (एस. रामकृष्णन, यामम) -उर्दू (चन्दर भान खयाल, सुबह-ए-मश्रिक-की अजान)

टैगोर साहित्य पुरस्कार २०११ मैथिली, अंग्रेजी, कोंकणी, मलयालम, मणीपुरी, नेपाली, संस्कृत आ सिंधी लेल २००७ सँ २००९ मध्य प्रकाशित पोथीपर देल जाएत। २ मैथिलीक भिखारी ठाकुर “रामदेव प्रसाद मण्‍डल ’झारुदार’” दै छथि माटि आ कहै छथि “हमरा बि‍नु जगत सुन्ना छै”। मैथिली साहित्य वा कोनो भाषाक साहित्यमे झारु नामक काव्य विधा सुनने रहिऐ? रामदेव प्रसाद मण्‍डल “झारुदार” जीक झारुकेँ छोड़ि कऽ? नै ने! कारण रामदेव प्रसाद मण्‍डल “झारुदार” महीसक पीठ, खेतक आड़ि-धूर आ रस्ता चौबटियापर स्वतः स्फूर्त जे नव विधाक आविष्कार केने छथि से समाजक दुर्गुणकेँ खरड़ासँ खरड़बा लेल छै। फुलझाड़ूसँ खरिहान नै बहारल हएत, आ खरड़ा सँ ओसारा नै बहारि सकै छी। लाठीमे राहड़िक डाँटक झारुसँ झोल-झाल साफ कएल जाइए। से तरह-तरहक बाढ़नि, आ खरड़ाक प्रचलन अछि। रामदेव जी गीत सेहो लिखै छथि, आ पनिसोखा सन रंग बिरंगक झारु सेहो। जेहेन समस्या तेहने झारु। आ मैथिलीमे जखन गोत्र-मूलक उपनाम रखबाक प्रवृत्ति किछु नव आ पुरान लेखकमे देखल जा रहल अछि तखन ई “झारुदार” उपनाम की सभ बिनु कहने कहि जाइए? आ कविक आत्मविश्वास, हम नै तँ किछु नै। हमरासँ पहि‍ले कोनो नै शासन। नै छै कोनो धर्मक वि‍धान।। हमरा बि‍नु जगत सुन्ना छै। हटैबला छै पशु समान।। आब ताकि लिअ ऐ झारुमे बौद्ध दर्शनक शून्यवाद आ शंकरक अद्वैत दर्शन! हुनका पैसाक रोग नै चाही तँ अंध्विश्वासक रोग सेहो नै। सभ बनल छै पैसा रोगी, अन्‍धवि‍श्वास, कुरीतक जोगी मुदा ऐ लेल रामक तीर कमान चाही की? कारण तइ लेल तँ रामक अवतारक प्रतीक्षा करए पड़त। नै, स्वयंपर करू विश्वास, कारण जँ समस्या अहाँ छी तँ समाधान सेहो अहीं। अहाँ बि‍ना के ई दुख हरतै अहींसँ ई सभ दानव मरतै कलमकेँ एक बेर फेर बनाबू रामक तीर कमान यौ। आपसी एकताक महत्व कवि नीक जेकाँ बुझै छथि, मुदा एकता कोना आओत, तकर समाधान देखू: एकता बनैले सहए पड़ै छै घटो लगा कऽ बहए पड़ै छै अपन गलतपर लहए पड़ै छै। नारीक स्थिति, से ओ नारी गामक होथि वा नेता ने किए बनि गेल होथि, अखनो टीस उठबैत अछि, आ कवि जँ झारुदार होथि तँ ओइ टीसक वर्ण एना होइत अछि: नारी सीता राधा अंश, पुरूष बनल छै रावण कंश। फेर कोना कऽ चलतै, ई घर दुनि‍याँदारी यौ। मुदा तकर उपाय, की पुरुष बदलत नारीक दशा? नै, ई आत्मविश्वास स्वयंनारीमे छन्हि, ओ शिक्षाक डोर पकड़ती आ… आब नै नारी रहब अनारी, बनबै सख्‍त कठोर यौ। ना....। तँ की वएह नारी, जाति-पाति आदिक समस्या टा पर ध्यान छन्हि कविक? नै, ओ प्रदूषण सन विज्ञानक देनपर सेहो चिन्तित छथि: वि‍ज्ञानक ई देन प्रदूषण बनि घर घुसल चुहार यौ। बाघ बनि‍ ई मुँह बौने अछि‍ दुि‍नयाँ बनल सि‍कार यौ आ प्रदूषण कोना कम हएत, सेहो नव खाढ़ीकेँ राह देखबै छथि: इंजन हो पूरा कंडीसन धुआँ नै छोड़ै बेकार यौ। करू खि‍याल कि‍छु अगि‍ला पि‍ढ़ी कोना रचत संसार यौ। आ ऐ पर हुनकर एकटा झारु सेहो छन्हि, ओ वने टा नै वनवासीक सेहो संरक्षण चाहै छथि: वन झी‍ल नदी‍ आ वनवासी पहार पठार संग रेगि‍स्‍तान। करू सुरक्षा पर्यावरण केर ऐ सँ देश बनत धनवान।। दहेज आ काटर प्रथापर रामदेव जी लिखै छथि: आइ हर घरमे सीता रोऐ छै राइत-राइत भरि‍ नै जनक सुतै छै कतए सँ एतै दहेजक पैसा हेतै केना कन्‍यादान यौ मिथिलापर झारुदारकेँ गर्व छन्हि, कोन मिथिलापर: जगतरनी जतए गंगा धारा, ज्‍योति‍ लि‍ंग केर जतए उज्‍यारा। हजरत तुलसी बाल्‍मि‍कक गुँजि‍ रहल उपदेश। मुदा बिहार अन्तर्गत जे मिथिला छै तकर दशापर झारुदार चिन्तित छथि आ बिहारक मुख्यमंत्री नीतिश कुमार, जे विकास पुत कहल जाइ छथि हुनका झारुदार किछु देखबऽ चाहै छथि: केमरासँ तस्वी‍र बनेबै मि‍थिला मैथि‍ल परि‍वार केर। तकरा देखेबै पटना जा कऽ वि‍कास पुत नीि‍तश कुमारकेँ। फोटो बनेबै खेत असि‍ंचि‍त सि‍ंचाइ पानि‍ वि‍जलीसँ वंचि‍त। मानवता ककरामे हेतै, मानवे मे ने। आ तकरे ने भेटतै दुनियाँक ताज आ सएह ने जीतै बनि झारुदार! ताज मि‍लै सम्‍पूर्ण जगतक आ बनि‍ जीबए झारूदार मानवमे मानवता होइ तँ बदलै नै ओकर अवतार तँ झारु आ गीत, जे बोन-झाँकुरमे खेत-पथारमे घुमैत-फिरैत लिखाएल से तँ विशिष्ट हेबे करतै आ ओकर लिखैबलाकेँ से ताज भेटबे करतै। मिथिलाक भिखारी ठाकुर ओइ ताजकेँ पहीरि झारुदार कहेबे करतै। ३ उमेश पासवानक कविता संग्रह “वर्णित रस” कविकेँ युवापर भरोस छन्हि, आ तेँ युवाकेँ सम्बोधितो करै छथि आ आह्वानो करै छथि। “हम युवा” कवितामे जाति‍-धर्म मजहब केर नामपर षडयंत्र रचैए कि‍यो हमर देशकेँ भीतर आबि‍ कऽ आतंकवादक गाछ रोपैए कि‍यो आ तकर सम्बन्ध हुनकर “जीतक झण्डा” कवितामे जरै जाउ वतनक दुश्‍मन आगि‍ सुनगाएल करू देखबामे अबैए। ई जे दुश्मन अछि सएह फहरबाबइए जीतक झण्डा जरै जाउ वतन केर दुश्‍मन आगि‍ सुनगाएल करू जीत केर झंडा फहराएल करू आ “हम युवा”मे सेहो ओ कहै छथि आतंकवादक गाछ रोपैए कि‍यो भारतवासी शेर छी शेरकेँ मादमे आबि‍ कऽ जगबैए कि‍यो कारण जे देशक युवा छथि से हम छी गोली, हम छी बारूद हमही खंजर तलवार छी तखन ऐ गोली लेल पेस्तौल, बारुद लेल आगि के छथि? ओ छथि युवा जे छथि खंजर आ तलवार। तँ की दुश्मनी आधारित जोश छन्हि हुनकर कविता? नै से नै अछि- जौं दोस्‍तीक लेल हाथ बढ़ाएब तँ हमही फूलक माला गला केर हार छी कविकेँ टंगघिच्चा-घिच्चीक खेल नै पसिन्न छन्हि। आ कवि कहै छथि। ऊपरसँ नूनू बौआ भि‍तरे-भि‍तर कहैए बकलेल बर्षोसँ देखि‍ रहल छी हर तरहसँ दलि‍तक उपेक्षा बाढ़िक प्रकोप कविकेँ कहबापर विवश करै छन्हि: केना कऽ ऐबेर खेतक आड़ि‍पर जा कऽ कहब सेर-बरोबरि‍ उखैर सन बीट समाठ सन सि‍स गबहा संक्रान्तिपर कविकेँ कहऽ पड़ै छन्हि: केना कऽ गुजर चलत उपजा कऽ कास-पटेर ओ कोसीकेँ कहै छथि: कऽ देलि‍ऐ मि‍थि‍लाकेँ दू-भागमे अहाँ पूबमे सहरसा-सुपौल पछि‍ममे मधुबनी-दरभंगा बि‍चमे अगबे बालु आ धूल मुदा फेर निर्मल्लीक पुल बनबाक चर्च: कहू आब कतेक चुप रहब ऐबेर हम बना देलौं पुल पढ़ल-लिखल दलितक सामान्य दलितक प्रति व्यवहारपर जतेक अम्बेडकर दुखी रहथि ततबे चिन्ता उमेश पासवानकेँ सेहो छन्हि: स्‍वयं दलि‍त छी दलि‍तक दरद जनै छी कि‍छु व्‍यक्‍ति‍क कि‍रदानीसँ चकि‍त छी दलि‍त भऽ कऽ ओ व्‍यक्‍ति‍ अपनो समाजकेँ बि‍सरि‍ गेल अप्‍पन भाषा-भेष छोड़ि‍ कऽ दोसरक रंग-ढंगमे ढलि‍ गेल ओ समाजसँ पुछै छथि: हम दलि‍त छी मेहनति‍-मजदुरी कए कऽ बि‍तबै छी अपन जीवन तैयो जरैत अछि‍ कवि जगदीश प्रसाद मण्डल जी सँ प्रभावित छथि आ से ओ एकटा कविताक माध्यमे कहै छथि: हम छी सेवक मैथि‍ल जगदीश बाबूक चेला नै हमरा लड़ू खि‍यौलनि‍ नै देलथि‍ मि‍श्रीक ढेला मुदा हास्यसँ ओ दूर नै गेल छथि: झोटा झोटौबलि‍ हेतौ नटि‍नि‍या तोरा संग अही बेर गे वसन्तक आगमनसँ मात्र फूल-पात नै आन-आन जीवनसँ सम्बन्धित वौस्तपर ध्यान जाइ छन्हि हुनकर: गाछ-वृक्षमे नव कनोजरि‍क संग मोजर फूल ि‍नकलैत अछि‍ खेतमे गहुम-खेसारी ति‍सी-मसुरी तोरीक फूलसँ समुच्‍चा बाध गमकैत अछि‍ मधुमाछी लगौने सेनुरि‍या आमक गाछपर छत्ता देखि‍ कऽ लुक्‍खी डरैत अछि‍ अरहुलक फूल चूसि‍ कऽ फुलचोभी चि‍हुकैत अछि‍ कौआ आ कोइलीमे भेल अछि‍ कनाइर पानि नै चलबाक गप नै बुझाइ छन्हि हुनका: देहसँ देह केना छुबाइ छै कि‍एक नै चलैए हमर छुअल पानि‍ यौ कोन जुलुमक सजा हमरा दऽ रहल छी कि‍अए बुझै छी हमरा अपमानी यौ सुदामा आ कृष्णक दोस्तीकेँ सभ अलग कऽ देलक: दुनू दोसकेँ अलग कऽ देलक लोक अप्‍पन रास्‍ताक दि‍वार जकाँ हँसैत खेलैत...। आ ई दशा किए भेल? सहलौं सभ कि‍छु सलहेशक संतान रहि‍तो जहि‍या तक चुप रहलौं हम आ कहै छथि: कतेक लि‍खब दलि‍तक बेथा सलहेश गामक संदेश। मुदा की मिथिलाक भाषा संस्कृति ककरो अनकर छी? नै ई तँ हमर छी आ तै पर गर्व करै छथि कवि: हरक पाछाँ बगुला घुमैए हरबाहा जोरसँ बरदकेँ बाबू भैया कहि‍ हँकैए देशक विकास आ नेता पर हुनका आक्रोश छन्हि: ऐठामक नेता छै माला-माल रोड-सड़ककेँ देखि‍यौ तँ कदबा गजार सन छै थाल आ जे बड़का-बड़का राष्ट्रीय राजमार्ग (नेशनल हाइवे, एन.एच.) छै से तकर विवरण किछु एना छै: मौतक चौराहा बनल अछि‍ एन.एच भुतहा मोड़। आ लोकक दशा-दिशापर मुर्दा सेहो चिन्तित अछि: गारल मुर्दा छटपटा रहल अछि‍ भि‍तरसँ अंगुरी अप्‍पन उठा रहल अछि‍ नारीक कर्मनिष्ठ स्वभावपर हिनकर लेखनी खूब चलल छन्हि: ओमहर बि‍आ जे उखारै छै महि‍ला जन कोइ करै छै, सासु-ननदि‍क नि‍ना-बि‍ना कोइ गबै छै सोहर-समदाैन कवि तुकमिलानीमे सेहो ढेर रास गप कहि जाइ छथि, पंजाबमे होइत मजदूरक पलायनक चर्च देखू: जौं अखार महि‍नामे बुढ़ बड़द, पजरामे दरद पंजाबमे मरद अछि‍ तँ समझू हे गेलहे घर छी। ओ आह्वान करै छथि: साहि‍त्‍यक दलि‍दर कतेक जुलुम करैए हमरापर कि‍यो तँ बाजू कि‍यो हमरा दि‍ससँ अवाज उठाउ आ अधिकार तँ चाहबे करी: अप्‍पन सोल्‍हनी बला रसा आब नै सुनब हम बर्खा तोड़ि दैए बान्हकेँ आ बना दैए गाम केँ कोसी आ कमला: लधने छल सतहि‍या ढौसाबेंग कि‍ड़ी-मकौड़ी करै छल सोर भुरुकुबा कनी उगल छल चुह-चुहि‍या तँ की कहल जाए ऐ “वर्णित रस” सभकेँ। की कविक वसन्त मात्र फूल-पात देखैए जे मात्र सुगन्ध दैए, आँखिकेँ सुख दैए, मुदा जरल पेटकेँ से नीक लगतै? ते कविक वर्णित वसन्तक रस ओ फल विहीन सुन्दर फूल नै भऽ सकैए, आ से नहिये अछि। दलित विमर्श दलित द्वारा, आ ओइ दलित द्वारा जेकर धुआधजा छै सलहेश सन, नै बिसरल अछि अपन संस्कृति, बोली-वाणी, नै बिसरल अछि सोहर-समदौन। आ से छथि उमेश पासवान। आ जे हुनकर वसन्तकेँ देखबाक, एन.एच.क चौराहाकेँ देखबाक दृष्टि फराक अछि तेँ हुनकर कविता सेहो फराक अछि। ४ “रथक चक्का उलटि चलै बाट” ई रामवि‍लास साहु जीक कविता, हाइकू, शेर्न्यू आ टनका संग्रहक नाम अछि। खाँटी शब्दावलीक प्रयोग आ ओइ माध्यमसँ तीन पाँतिक हाइकू आ पाँच पाँतिक टनकामे हिनकर प्रकृति-प्रेमक माध्यमसँ भावोद्गार एतेक रास तथ्य सोझाँ अनैए, समस्या आ समाधान तकैए जे पढ़निहार बाजि सकैए, हँ ई हम किए नै सोचि सकलौं, मुदा आब सोचि सकब। रथक चक्‍का उलटि‍ चलै बाट चाक चलै छै ठामे ठाम नचैत दुनु करै दू काम जापानक बाशो नै मोन पड़ि जाइ छथि रामविलास साहु जीक ऐ टनकासँ: सावन मास जलक बुन्‍न पड़ै आसमानसँ बेंगक बाजा बजै खन्‍ता डबरा भरै हिनकर मानव आ प्रकृतिक मेल कतेक अद्भुत लगैत अछि: कारी काजर मुखड़ा ि‍बगारैत कारी कोइली मधुर गीत गबै सभकेँ ललचाबै मुदा कारी काजरक उपमा एतै खतम नै भेल अछि: कारी काजर आँखि‍ देत सुखाय कारी बादल बरखासँ डुबाय मुखरा देत बि‍गाड़ि‍ रौदक गुण तँ प्रकृति-प्रेमी कवि पढ़ि लैए, वसन्त आ हेमन्त वर्णनासँ की ई कम अछि? चैतक रौद तपाबै माटि‍-पानि‍ पछि‍या हवा पकाबै चना-गहुम बहारै धूर-कण कविता कहैमे कवि सेहो पाछाँ नै छथि, कोसी धार हुनका हिलोरै छन्हि: जि‍नगी बनल अछि‍ हमर कंगाल झौआ, पटेर, काश खगरा हमरासँ करैए रगड़ा बाल बच्‍चाक जि‍नगी बाउलमे समाएल अन्धविश्वासपर कविक कलम चलै छन्हि: गाेसाँइ खेले भगता-भगति‍नि‍याँ छत्तीस देवी चौदहो देबान अखन छौ देहपर ि‍वरजमान जे मांगब से पूरा करतौ कारनीक सभ रोग वि‍याधि‍ हरतौ फूल-अच्‍छतसँ वरदान देतौ बि‍गरल काज मनोकामना चुट्की बजि‍ते पूरा करतौ बदलामे लड्डु-छागर-पाठी मांगतौ कवि किसान छथि तँ किसानी कोना बिसरताह: बि‍हानेसँ गजार कदबा हुअए लगल खेत हर जोतैत हरबाह बि‍रहा गाबैत आ फेर… “हरक नाश आ खेतक चासपर पेट भरबाक अछि‍ सभकेँ आश।” आ तखन…… गहुमक दाना कोठीमे भरलौं भूसीकेँ भुसकाँरमे टलि‍येलौं चारि‍ मासक गहुमक फसलि‍ दि‍न-राति‍ खटि‍ कऽ घर केलौं साल-भरि‍ रोटि‍यो खाए जीअब गामक शब्दावली फकरा-कहबीक माध्यमसँ बहुत रास गप कहि जाइ छथि कवि: हाटक चाउर बाटक पानि‍ बनि‍याँ घरक तरजूकेँ नै होइ छै कोनो माइन कारण.. हाटक चाउर बाटे बि‍लाएल घाटक पानि‍ घाटे सुखाएल देशी इलाज आ रोगक रोकथाम सेहो कविकेँ बुझल छन्हि: इचना, पाेठी माछक चटनी संगे जे खाइ मरूआ रोटी नहि‍ बनत रोगी मोटी रक्‍तचाप, मधुमेह, जलोदर रामवि‍लास साहु जी चैतावर गबै (लिखै) छथि, बिरहा सुनै छथि, धनरोपनीपर आ किसानीपर कविता कहै छथि। आ ऐ सभ विषयपर हिनकर कविताक जोड़ा साहित्यमे भेटब कठिन। ई सभ विषय मैथिली कविताकेँ विस्तार देलक अछि, आ ओइपर लिखबाक सामर्थ्य रामवि‍लास साहु जीमे छन्हि, ओकर भीतरमे ढुकि कऽ लिखबाक सामर्थ्य रामवि‍लास साहु जीमे छन्हि। ५ उमेश मण्डल जीक “निश्तुकी” कविता, लघु-कविता, हाइकू/ टनका आ गजलक संग्रह थिक। मैथिलीक नव तुर मात्र उमेरकेँ प्रतिष्ठा नै देबऽ चाहैए, जँ ओ उमेर अग्रगामी नै होथि। आ से हेबाको चाही, काजक सम्मान छै उमेरक आ पुरानक नै। आ तेँ पुरान आ उमेरगर जँ अग्रगामी छथि तँ तिनका प्रतिष्ठा किए नै भेटन्हु? ई टनका देखू: समस्‍या आप्‍त सोलहनी सजल साहि‍त्‍यकार लेखे पुरान छै आप्‍त केना एतै यथार्थ आ तेँ “बूढ़ाढीमे” लघु कवितामे ओ कहै छथि: जीनगी चाह करैए कर्मक बाट देखबैए आ कर्मका बाट जँ पकड़ि लेब तखन धुधुएबे करब: भुरकी-सँ-भार बनि बील बोहरि‍ धरि‍ बनि‍-बनि‍ असंतोष धोधरि‍ बनि‍ धुधुआ रहल अछि मिथिलासँ पड़ाइन भऽ रहल छै। से रहि-रहि कचोटै छन्हि कविकेँ। आ जँ वसन्तक आगमन भऽ जाए तखन तत्व ज्ञान भैये ने जाएत! बसंत आएल गाम जाएब आब एतए रहि‍ नै पएब बसंतेक खोजमे तँ छी बौआएल ऐ पड़ाइनसँ:- गामक मुँहथरि‍ जंगल बनल अछि‍ हुनका विचारक फाँट सेहो रहि-रहि देखा पड़ै छन्हि: अहाँक गप अपन मन दुनू मि‍लैए मि‍लि‍ दुनू अछि‍ चौचंग खोजि‍ रहल अछि‍ वसंत मुदा बसंतक चि‍ड़ैकेँ संग नै राखए चाहै छी हम हुनका बुझऽमे आबि रहल छन्हि : भकोभन ओइ अन्‍हार कोठरीमे आ ओ अहाँसँ पूछि रहल छथि: तखन शीशामे केना देखाएत ओकर चि‍त्र केना आएत? आ कियो नै सुनऽ चाहै छथि ओ गीत जतऽ मात्र आ मात्र गाओल जा रहल अछि संस्कृतिक गीत: हनहनाइत, भनभनाइत ओइ स्‍वरकेँ सुनैले नै‍ छथि‍ कि‍यो तैयार किए नै सुनै लेल छथि तैयार, कारण अछि डर, दर्दक डरे ओ नै सुनऽ चाहै छथि हनहनाइत, भनभनाइत ओइ स्‍वरकेँ। किछु अजीब बात सभ हुनका असहज लगै छन्हि: आगि‍-पानि‍केँ मनक माइनकेँ कारण सेहो छै, अगिलहीक बिम्ब देखू: सप्‍पत खाइ काल देवता लोकक घर जड़बैकाल मि‍त्ता ज्ञान आ ज्ञानी आ ज्ञानक प्रकाश सेहो हुनका कखनो ओझरीमे धऽ दै छन्हि: ज्ञानो भऽ जाइत अछि‍ गुलाम सांकृत्‍यायन पड़ै छथि‍ मोन घराम लहास जे अहाँकेँ बुझा पड़ैए सेहो आब बाजत: आब ओ बाजत बजैत-बजैत हँसत अहाँक कृति‍पर बनल संस्‍कृति‍पर मंगल आ मंगला हुनकर कवितामे सेहो कएक ठाम आएल अछि। विवशताक प्रतीक अछि मंगला! कातमे ठाढ़ भऽ मंगला आ आगाँ… अपनाकेँ केलक एकोर तँ सुखाएल घाटक घटवारी मंगलापर देखू ओकर विवशता: सुखलौ घाटक लेतै खेबाइ नै देबै तँ देत ई रेबाड़ि।‍‍ सएह भेल मंगला घुरि‍ गेल पछि‍मे मुरि‍‍ गेल कवि कुम्हरौटक बिम्ब एना अनै छथि: काँच माटि‍क मूर्ति जहि‍ना ढाॅचा मात्र कहबैए। तहि‍ना तँ फूलोसँ बनल फल सि‍रखार मात्र कहबैए। आ वएह सि‍रखार ने आशा बान्‍हि‍-बान्‍हि‍ रौद-बसात सहैए आ अपने सन आर बटोही सेहो हिनका भेटि जाइ छन्हि: हमरे सन इहो सभ बटोही हराएल बाट बढ़ए चाहैए कविकेँ कोनो भ्रम नै छन्हि जे जेहने बाट चलब तेहने घाट भेटत आ तखन ओइ घाटपर पानि सेहो तेहने भेटत: जहि‍ना चलैक बाट होइ छै तहि‍ना तँ बुझैयोक बाट छै जेहेन जे बाट चलै छै तेहने घाट पहुँचै छै ई बाट आ विचार हुनकर एकटा आरो कवितामे अबैत अछि: वि‍चारक संग जँ चालि‍ रहल घाटपर जाइसँ कि‍यो नै रोकत आ नीक वा अधलाह बाट कियो केना धरैए, तहूपर हुनकर लेखनी चलै छन्हि: जेहने घरक लोक रहै छै घरक मुँहथरि‍ तेहने होइ छै। जेहने घरक मुँहथरि‍ रहै छै तेहने ने बाटो धड़ै छै आ ई बाट हुनकर पछोड़ गजलमे सेहो नै छोड़ै छन्हि: गोर मौगी गौरबे आन्हर भेलि‍ अड़ल करि‍या बाट बुझाइए चलू घुरि‍ चली ओ निराश कखनो नै होइ छथि: मरलेमे मारि‍ खा-खा मारल बुइध कहबै छी आ एकर कारण छै, ओ कहै छथि: जहि‍ना पबि‍ते अद्राक पानि‍ मुइलहो धार जीबै छै। भलहि‍ं जीतहा धार बीच तीन-मसुआ ओ कहबै छै आ ऐ आशा-आक्रोश आ निराशाक मध्य ओ लिखै छथि: छोड़ि‍ देने टूटि‍ जाएत समाज अपन उमेश जोड़तै तँ चहकतै लगैए ई‍। उमेश मण्डल जे किछु कहै छथि निश्तुकी कहै छथि, घुरछी, ओझरी सभटा चारू कात पसरल छन्हि। मुदा सोझराबै छथि, ओझराबै नै छथि। ६ “माँझ आंगनमे कतिआएल छी” मुन्नाजीक रुबाइ आ गजल संग्रहक नाम अछि। कतिआएल आ सेहो माँझ आंगनमे! की कबीरक उलटबासीक प्रभाव अछि ई आकि गजलक स्वभाव अछि ई? नहिये ई कबीरक उलटबासीक प्रभाव अछि नहिये ई गजलक स्वभाव अछि, ई एकटा यथार्थ अछि। मुन्नाजी सन कतेको लोक कतिआएल छथि, प्रतिभा अछैत हेराएल छथि। मुदा गजलकार सभटा दोख अपनेपर लऽ लै छथि। आब तँ माँझ आँगनमे कतिआएल छी अपने चालिसँ आब बेरा गेलहुँ हम आ सएह कारण अछि जे ओ नोरक सुख भोगऽ लागै छथि। नोर तँ खसैए मुदा मजा सन लगैए केहन नीक प्रेमक दुख लेलहुँ हम बड़का खाधिमे खसै छथि आ तहू लेल अपनेकेँ दोखी मानै छथि: छोटको ठेससँ नै सबक लेलहुँ हम तँए बड़का खाधिमे खसि गेलहुँ हम तँ की गजलकार प्रेमक महत्व बिसरि गेल छथि, नै प्रेम तँ सभकेँ चाही। सभ उमेर वर्गकेँ प्रेम चाही मरितो धरि कुशल-छेम चाही आ हिनका जँ कोस दू-कोस मात्र चलबाक रहितन्हि तखन ने, हिनका तँ बहुत आगाँ बढ़बाक छन्हि तेँ प्रेम चाही। डाहसँ पहुँचब कोस-दू कोस आगू बढ़बा लेल तँ प्रेम चाही आ से सभ ठाम। एकटा हमर संगी छल, एकटा परीक्षामे टॉप केलक तँ बाजल- नै कम्पीट करै छी तँ नै करै छी, आ करै छी तँ टॉप करै छी। ओ गजलकार नै छल जँ रहिते तँ अहिना लिखितए: बदरी लादल रहै कोनो बात नै जदि बरसी तँ बरिसात बनि कऽ आ नजरि-नजरिक फेर आ हाफ ग्लास फुल ई दुनूटा अवधारणा ऐ रूपमे ओ राखै छथि: नजरि उठा कऽ देखबै तँ खाली बुझाएत ई दुनियाँ नजरि गरा कऽ देखबै तँ सभ देखाएत ई दुनियाँ समालोचना आ विरोध दुनूकेँ गजलकार नीक मानै छथि। पक्षधरसँ राखू अपनाकेँ बचा कऽ विपक्षीक सभ बातकेँ नै तीत बुझू महगाइसँ लोक बेकल अछि मुदा तकरा लेल झुमैत मचानक बिम्ब देखू: महगाइसँ खूने नै हड्डियो सुखाइए आब झुलैत मचान सन लगैए लोक आ ई उलटबासी देखू, बिम्ब नव, भावना शाश्वत: हम तँ घूर जड़ेलौ गर्मी मासमे मिझाएल आगिसँ पसाही कहियो ई कोन गोष्ठी छी जे अछि कोन पत्रिकाक प्रायोजित चिट्ठी छपबाक राजनीति सन, ई रुबाइ देखू: मोन भए उठल दुखित होहकारीसँ उठि दर्शक भागल मारामरीसँ प्रायोजक तँ पथने रहल कान अपन कर्ता देखार भेला जतियारीसँ मुदा बाढ़िक विषय जँ मैथिली गजलक अंग नै बनए तँ बुझू जे गजलकार समाजसँ कतिआएल छथि। मुदा से नै अछि। धार एखन धरि तँ उफानपर अछि लोक ताका-ताकी करैत बान्हपर अछि आब पड़ाइन घटल अछि, मिथिलासँ पड़ाइन। बाहरी लोक बिहारीकेँ मजदूर आ श्रमिकक पर्यायवाची मानि लेने छथि। तहूपर गजलकारक कलम चलल अछि। बिहारक सिरखारी बदलि गेल सन लगैए आब श्रमिक घटलासँ कंपनी-मालिक लगै बिहारी जकाँ मुन्नाजीक गजल आ रुबाइ स्वच्छन्द रूपसँ बमकोला जेकाँ बहल अछि। शेरक स्वभाव होइ छै जे जँ ओकरा नेकासँ कहल जाए तँ आह-बाह लोक करिते अछि। मैथिलीमे गजल-रुबाइ जइ तरहेँ प्रसारित भऽ रहल अछि से देखि कऽ यएह लागि रहल अछि जे जतेक ई विधा अपनाकेँ पसारि रहल अछि तइसँ बेशी मैथिली लाभान्वित भऽ पसरि रहल अछि। ७ मुन्नाजीक मैथिली विहनि कथाक संग्रह “प्रतीक” विहनि कथाक प्रतीकात्मकताक प्रतीक बनि गेल अछि। बिरारसँ विहनि उपारि धान आ मेरचाइ रोपबाक प्रक्रिया ऐ संग्रहक सभ कथा सभमे देखमामे आओत। तेँ ई छिटुआ नै रोपुआ धानक खेती बनि गेल अछि आ तीन मोनक कट्ठा सभ गोटे सुनैत होएब, मुदा एतऽ देखब। विहनि कथा हास्य कणिका नै अछि, ई कथाक जड़ि अछि बीआ अछि, छिटुआ धानसँ भेल पौध आ विहनिसँ भेल पौधमे बड्ड अन्तर छै। छिटुआ धान फौदाइ नै छै। से हास्य कणिका बिठुकट्टा होइ छै, ऐ मे हँसी अबै छै, मुदा ओ छिटुआ धान जेकाँ अछि। दोसर बेर ओइ बिठुकट्टा कथाकेँ, हास्य कणिकाकेँ सुनब तँ ने हँसिये लागत आ नहिये छगुणते। तखन जँ बिनु सिझने विहनि कथा लिखाएत, बिनु सिझेने विहनि कथा लिखब तँ लतीफा बनबे टा करत। आ हास्य कणिका विहनि, लघु आ दीर्घ कथा वा उपन्यासमे लेखकीय सामर्थ्यक अनुसार प्रयुक्त होइत रहल अछि आ होइत रहत। मुदा उसना धानसँ बिराड़मे विहनि नै बहराएत। से बिनु उसीनने बीआ बाउग करऽ पड़त। बिनु उसीनने सिझाबऽ पड़त आ तइ लेल बेशी मेहनति करऽ पड़त। आ बीआ छीटब तैयो सभ धानसँ विहनि नै बहराएत किछु सँ नहियो बहराएत। से विहनि कथाकेँ सफल हेबाक प्रतिशत कम छै, लघुकथाक सफलताक प्रतिशत कने बेशी छै, दीर्घ-कथा आ उपन्यासक सफलताक प्रतिशत आर बेशी छै। मुदा उपन्यास झंझटिया काज छै, मोन घोर कऽ दै छै, बेशी समए लागै छै। विहनि कथा धाँइ-धाँइ लिखाइ छै। मुदा जहिना कविता लेल आवेग चाही तहिना विहनि कथा लेल, नै तँ ने धाँइ-धाँइ लिखेबे करत आ पद्यक गद्य आ गद्यक पद्य बनबाक आशंका सेहो रहत। सभ उपन्यासकार कतेक रास विहनि उपाड़ि कऽ सजबैए, उपन्यास गद्य छिऐ मुदा ओइमे कोनो पात्र जँ गीत गाबऽ लागए तँ ओकरा अहाँ रोकि देबै? जे उपन्यासकार रहैए ओ विहनि देखि उपन्यासक धनखेती देखऽ लगैए, कखनो ओ विहनि कथा लिखियो दैए, फेर लोभ संवरण नै भेलासँ ओइ विहनिक प्रयोग उपन्यासमे, दीर्घकथामे, लघुकथामे सेहो करैए। तखन मुन्नाजीक विहनि कथाक की विशेषता। मुन्नाजी हमर पड़ोसी सुरजु भाइ छथि, ओ बिराड़मे जतेक बीआ लगबै छथि ओकर दशो प्रतिशत अपन खेतमे नै लगा पबै छथि। बाढ़िक इलाका छै से लोकक खेत पड़ल रहि जाइ छै बिनु विहनिक। से सुरजू भाइक पड़ोसी ओइसँ लाभ उठबै छथि कारण बाढ़िमे कखनो काल तीन-तीन बेर धनरोपनी होइ छै, एक बेर रोपू बाढ़ि आएल, दोसर बेर रोपू फेर बाढ़ि आएल। आ सुरजू भाइ छथि तेँ लोक निश्चिन्त रहैए। आ मुन्नाजीक विहनि कथा सेहो निश्चिन्त करैए। “रेवाज” विहनि कथा लिअ। गाम घरमे मसोमातकेँ लोक डाइन कहै छै मुदा मुइलाक बाद घराड़ी लेल ओकरा आगि देबा लेल उपरौंझ होइ छै। एतऽ मुदा विहनि लेल जे बीआ छीटल गेल छै से कने उच्च स्तरक छै। एतऽ मृतककेँ बेटा नै छै मुदा पत्नी आ बेटी छै। से जखन मृतकक भाइ कोहा उठबऽ चाहैए तँ विधवा ओकरा रोकै छै आ बेटीकेँ कोहा उठबैले कहै छै। आ संग के देत ऐ नव रेवाजमे, जे आइयेसँ प्रारम्भ भेल अछि। तखन उत्तरो भेटैए- निपुतराहा सभ। तहिना “कमरुनिसा” विहनि कथा अछि। हसीना मंजिल सन एकटा आरो श्रेष्ठ उपन्यास ऐ विहनि कथा (सीड स्टोरी)सँ मुन्नाजी नै बना सकै छथि की? कमरुनिसाक पिता रहमान। लहठीक काज जेकाँ दम्मा सेहो ओकर सभक पुश्तैनी वौस्त छलै। कमरुनिसाक अब्बा-अम्मीक जान ई दम्मा लेलकै आ फेर कमरुनिसा… “जिया जरए सगर राति”मे एड्सक समस्या आ लिविंग रिलेशनक चर्च अछि तँ “दियाद”मे पनहीक ऊपरसँ चिक्कन चुनमुन हेबाक मुदा नीचाँसँ खलओदार केने जेबाक विवरण देल गेल अछि। “नपना” मे स्त्रीक काजक स्वरूप तय कएल गेल छै। अखनो जनगणना कालमे सरकार घरक काजकेँ आमदनीमे नै जोड़ैत अछि, आ ऐ कथामे अन्त होइए जखन एकटा स्त्रीक चर्च अबैए जे नोकरीयो करैए आ घरक काजो। आइ काल्हि जखन लोकक जिनगी गति पकड़ि लेने अछि तखन विहनि कथाक महत्व बढ़ि गेल अछि। मुन्नाजी विहनि कथा लेल समर्पित छथि आ ई संग्रह हुनकर ऐ समर्पणक गुणात्मक अभिव्यक्ति छन्हि। ८ विदेह सम्मान -मैथिली नाटक/ संगीत/ कला/ मूर्तिकला/ फिल्मक समानान्तर दुनियाँक अभिलेखन आ सम्मान सेहो हएत विदेह सम्मानक घोषणा द्वारा -ई घोषणा दिसम्बरक अन्त वा जनवरी २०१२ मे हएत -मैथिली नाटक/ संगीत/ कला/ मूर्तिकला/ फिल्मक समानान्तर दुनियाँक अभिलेखन आ सम्मान कएल जाएत -विदेह नाट्य उत्सव २०१२ क अवसरपर प्रदान कएल जाएत ई सम्मान।" विदेह सम्मान ["पूनम मंडल आ प्रियंका झाक मैथिली न्यूज पोर्टल। -अगस्त २०११ सँ सभ मास "ऐ मासक सभसँ नीक समदिया" सम्मानक घोषणा कएल जा रहल अछि -समदिया- पूनम मंडल आ प्रियंका झाक मैथिली न्यूज पोर्टल। विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA सम्पादक-सूचना-सम्पर्क-समाद पूनम मंडल आ प्रियंका झा। - द्वारा "ऐ मासक सभसँ नीक समदिया"क घोषणा सभ मास भऽ रहल अछि - सालक अन्तमे "सर्वश्रेष्ठ मैथिली पत्रकारिता" लेल ऐ १२ टा देल सम्मानमे सँ सर्वश्रेष्ठकेँ "विदेह पत्रकारिता सम्मान" देल जाएत। -अगस्त २०१२ मे हएत "विदेह पत्रकारिता सम्मान"क घोषणा। विदेह सम्मान समदिया- पूनम मंडल आ प्रियंका झाक मैथिली न्यूज पोर्टल।विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA सम्पादक-सूचना-सम्पर्क-समाद पूनम मंडल आ प्रियंका झा। अपन इलाकाक कोनो समाचार ऐ अन्तर्जाल (http://esamaad.blogspot.com/)पर देबा लेल , समाचार poonamberma@gmail.com वा priyanka.rachna.jha@gmail.com पर पठाउ वा एतए http://www.facebook.com/groups/samadiya/ फेसबुकपर राखू।"] नेपाल प्रज्ञा प्रतिष्ठानक सदस्यता (नेपाल देशक भाषा-साहित्य,  दर्शन, संस्कृति आ सामाजिक विज्ञानक क्षेत्रमे  सर्वोच्च सम्मान) नेपाल प्रज्ञा प्रतिष्ठानक सदस्यता श्री राम भरोस कापड़ि 'भ्रमर' (2010) श्री राम दयाल राकेश (1999) श्री योगेन्द्र प्रसाद यादव (1994) नेपाल प्रज्ञा प्रतिष्ठान मानद सदस्यता स्व. सुन्दर झा शास्त्री नेपाल प्रज्ञा प्रतिष्ठान आजीवन सदस्यता श्री योगेन्द्र प्रसाद यादव फूलकुमारी महतो मेमोरियल ट्रष्ट काठमाण्डू, नेपालक सम्मान फूलकुमारी महतो मैथिली साधना सम्मान २०६७ - मिथिला नाट्यकला परिषदकेँ फूलकुमारी महतो मैथिली प्रतिभा पुरस्कार २०६७ - सप्तरी राजविराजनिवासी श्रीमती मीना ठाकुरकेँ फूलकुमारी महतो मैथिली प्रतिभा पुरस्कार २०६७ -बुधनगर मोरङनिवासी दयानन्द दिग्पाल यदुवंशीकेँ साहित्य अकादेमी  फेलो- भारत देशक सर्वोच्च साहित्य सम्मान (मैथिली) १९९४-नागार्जुन (स्व. श्री वैद्यनाथ मिश्र “यात्री” १९११-१९९८ ) , हिन्दी आ मैथिली कवि। २०१०- चन्द्रनाथ मिश्र अमर (१९२५- ) - मैथिली साहित्य लेल। साहित्य अकादेमी भाषा सम्मान ( क्लासिकल आ मध्यकालीन साहित्य आ गएर मान्यताप्राप्त भाषा लेल):- २०००- डॉ. जयकान्त मिश्र (क्लासिकल आ मध्यकालीन साहित्य लेल।) २००७- पं. डॉ. शशिनाथ झा (क्लासिकल आ मध्यकालीन साहित्य लेल।) पं. श्री उमारमण मिश्र साहित्य अकादेमीक टैगोर साहित्य पुरस्कार २०११- जगदीश प्रसाद मण्डल (गामक जिनगी, लघु कथा संग्रह) साहित्य अकादेमी पुरस्कार- मैथिली १९६६- यशोधर झा (मिथिला वैभव, दर्शन) १९६८- यात्री (पत्रहीन नग्न गाछ, पद्य) १९६९- उपेन्द्रनाथ झा “व्यास” (दू पत्र, उपन्यास) १९७०- काशीकान्त मिश्र “मधुप” (राधा विरह, महाकाव्य) १९७१- सुरेन्द्र झा “सुमन” (पयस्विनी, पद्य) १९७३- ब्रजकिशोर वर्मा “मणिपद्म” (नैका बनिजारा, उपन्यास) १९७५- गिरीन्द्र मोहन मिश्र (किछु देखल किछु सुनल, संस्मरण) १९७६- वैद्यनाथ मल्लिक “विधु” (सीतायन, महाकाव्य) १९७७- राजेश्वर झा (अवहट्ठ: उद्भव ओ विकास, समालोचना) १९७८- उपेन्द्र ठाकुर “मोहन” (बाजि उठल मुरली, पद्य) १९७९- तन्त्रनाथ झा (कृष्ण चरित, महाकाव्य) १९८०- सुधांशु शेखर चौधरी (ई बतहा संसार, उपन्यास) १९८१- मार्कण्डेय प्रवासी (अगस्त्यायिनी, महाकाव्य) १९८२- लिली रे (मरीचिका, उपन्यास) १९८३- चन्द्रनाथ मिश्र “अमर” (मैथिली पत्रकारिताक इतिहास) १९८४- आरसी प्रसाद सिंह (सूर्यमुखी, पद्य) १९८५- हरिमोहन झा (जीवन यात्रा, आत्मकथा) १९८६- सुभद्र झा (नातिक पत्रक उत्तर, निबन्ध) १९८७- उमानाथ झा (अतीत, कथा) १९८८- मायानन्द मिश्र (मंत्रपुत्र, उपन्यास) १९८९- काञ्चीनाथ झा “किरण” (पराशर, महाकाव्य) १९९०- प्रभास कुमार चौधरी (प्रभासक कथा, कथा) १९९१- रामदेव झा (पसिझैत पाथर, एकांकी) १९९२- भीमनाथ झा (विविधा, निबन्ध) १९९३- गोविन्द झा (सामाक पौती, कथा) १९९४- गंगेश गुंजन (उचितवक्ता, कथा) १९९५- जयमन्त मिश्र (कविता कुसुमांजलि, पद्य) १९९६- राजमोहन झा (आइ काल्हि परसू, कथा संग्रह) १९९७- कीर्ति नारायण मिश्र (ध्वस्त होइत शान्तिस्तूप, पद्य) १९९८- जीवकान्त (तकै अछि चिड़ै, पद्य) १९९९- साकेतानन्द (गणनायक, कथा) २०००- रमानन्द रेणु (कतेक रास बात, पद्य) २००१- बबुआजी झा “अज्ञात” (प्रतिज्ञा पाण्डव, महाकाव्य) २००२- सोमदेव (सहस्रमुखी चौक पर, पद्य) २००३- नीरजा रेणु (ऋतम्भरा, कथा) २००४- चन्द्रभानु सिंह (शकुन्तला, महाकाव्य) २००५- विवेकानन्द ठाकुर (चानन घन गछिया, पद्य) २००६- विभूति आनन्द (काठ, कथा) २००७- प्रदीप बिहारी (सरोकार, कथा) २००८- मत्रेश्वर झा (कतेक डारि पर, आत्मकथा) २००९- स्व.मनमोहन झा (गंगापुत्र, कथासंग्रह) २०१०-श्रीमति उषाकिरण खान (भामती, उपन्यास) २०११- श्री उदयचन्द्र झा "विनोद" (अपक्ष, कविता संग्रह) साहित्य अकादेमी मैथिली अनुवाद पुरस्कार १९९२- शैलेन्द्र मोहन झा (शरतचन्द्र व्यक्ति आ कलाकार-सुबोधचन्द्र सेन, अंग्रेजी) १९९३- गोविन्द झा (नेपाली साहित्यक इतिहास- कुमार प्रधान, अंग्रेजी) १९९४- रामदेव झा (सगाइ- राजिन्दर सिंह बेदी, उर्दू) १९९५- सुरेन्द्र झा “सुमन” (रवीन्द्र नाटकावली- रवीन्द्रनाथ टैगोर, बांग्ला) १९९६- फजलुर रहमान हासमी (अबुलकलाम आजाद- अब्दुलकवी देसनवी, उर्दू) १९९७- नवीन चौधरी (माटि मंगल- शिवराम कारंत, कन्नड़) १९९८- चन्द्रनाथ मिश्र “अमर” (परशुरामक बीछल बेरायल कथा- राजशेखर बसु, बांग्ला) १९९९- मुरारी मधुसूदन ठाकुर (आरोग्य निकेतन- ताराशंकर बंदोपाध्याय, बांग्ला) २०००- डॉ. अमरेश पाठक, (तमस- भीष्म साहनी, हिन्दी) २००१- सुरेश्वर झा (अन्तरिक्षमे विस्फोट- जयन्त विष्णु नार्लीकर, मराठी) २००२- डॉ. प्रबोध नारायण सिंह (पतझड़क स्वर- कुर्तुल ऐन हैदर, उर्दू) २००३- उपेन्द दोषी (कथा कहिनी- मनोज दास, उड़िया) २००४- डॉ. प्रफुल्ल कुमार सिंह “मौन” (प्रेमचन्द की कहानी-प्रेमचन्द, हिन्दी) २००५- डॉ. योगानन्द झा (बिहारक लोककथा- पी.सी.राय चौधरी, अंग्रेजी) २००६- राजनन्द झा (कालबेला- समरेश मजुमदार, बांग्ला) २००७- अनन्त बिहारी लाल दास “इन्दु” (युद्ध आ योद्धा-अगम सिंह गिरि, नेपाली) २००८- ताराकान्त झा (संरचनावाद उत्तर-संरचनावाद एवं प्राच्य काव्यशास्त्र-गोपीचन्द नारंग, उर्दू) २००९- भालचन्द्र झा (बीछल बेरायल मराठी एकाँकी-  सम्पादक सुधा जोशी आ रत्नाकर मतकरी, मराठी) २०१०- डॉ. नित्यानन्द लाल दास ( "इग्नाइटेड माइण्ड्स" - मैथिलीमे "प्रज्वलित प्रज्ञा"- डॉ.ए.पी.जे. कलाम, अंग्रेजी) २०११- श्री खुशीलाल झा (उपरवास कथात्रयी, रघुवीर चौधरीक गुजराती उपन्यास) साहित्य अकादेमी मैथिली बाल साहित्य पुरस्कार २०१०-तारानन्द वियोगीकेँ पोथी "ई भेटल तँ की भेटल"  लेल २०११- ले.क. मायानाथ झा "जकर नारी चतुर होइ" लेल साहित्य अकादेमी युवा पुरस्कार २०११- श्री आनन्द कुमार झा (हठात परिवर्तन, नाटक) प्रबोध सम्मान प्रबोध सम्मान 2004- श्रीमति लिली रे (1933- ) प्रबोध सम्मान 2005- श्री महेन्द्र मलंगिया (1946- ) प्रबोध सम्मान 2006- श्री गोविन्द झा (1923- ) प्रबोध सम्मान 2007- श्री मायानन्द मिश्र (1934- ) प्रबोध सम्मान 2008- श्री मोहन भारद्वाज (1943- ) प्रबोध सम्मान 2009- श्री राजमोहन झा (1934- ) प्रबोध सम्मान 2010- श्री जीवकान्त (1936- ) प्रबोध सम्मान 2011- श्री सोमदेव (1934- ) प्रबोध सम्मान 2012- श्री चन्द्रभानु सिंह (१९२२- ) श्री रामलोचन ठाकुर (१९४९- ) यात्री-चेतना पुरस्कार २००० ई.- पं.सुरेन्द्र झा “सुमन”, दरभंगा; २००१ ई. - श्री सोमदेव, दरभंगा; २००२ ई.- श्री महेन्द्र मलंगिया, मलंगिया; २००३ ई.- श्री हंसराज, दरभंगा; २००४ ई.- डॉ. श्रीमती शेफालिका वर्मा, पटना; २००५ ई.-श्री उदय चन्द्र झा “विनोद”, रहिका, मधुबनी; २००६ ई.-श्री गोपालजी झा गोपेश, मेंहथ, मधुबनी; २००७ ई.-श्री आनन्द मोहन झा, भारद्वाज, नवानी, मधुबनी; २००८ ई.-श्री मंत्रेश्वर झा, लालगंज,मधुबनी २००९ ई.-श्री प्रेमशंकर सिंह, जोगियारा, दरभंगा २०१० ई.- डॉ. तारानन्द वियोगी, महिषी, सहरसा २०११ ई.-  डॉ. राम भरोस कापड़ि भ्रमर (जनकपुर) भारतीय भाषा परिषद, कोलकाता युवा पुरस्कार (२००९-१०) गौरीनाथ (अनलकांत) केँ मैथिली लेल। भारतीय भाषा संस्थान (सी.आइ.आइ.एल.) , मैसूर रामलोचन ठाकुर:- अनुवाद लेल भाषा-भारती सम्मान २००३-०४ (सी.आइ.आइ.एल., मैसूर) जा सकै छी, किन्तु किए जाउ- शक्ति चट्टोपाध्यायक बांग्ला कविता-संग्रहक मैथिली अनुवाद लेल प्राप्त।  रमानन्द झा 'रमण':- अनुवाद लेल भाषा-भारती सम्मान २००४-०५ (सी.आइ.आइ.एल., मैसूर) छओ बिगहा आठ कट्ठा- फकीर मोहन सेनापतिक ओड़िया उपन्यासक मैथिली अनुवाद लेल प्राप्त। विदेह सम्मान विदेह समानान्तर साहित्य अकादेमी सम्मान १.विदेह समानान्तर साहित्य अकादेमी फेलो पुरस्कार २०१०-११ २०१० श्री गोविन्द झा (समग्र योगदान लेल) २०११ श्री रमानन्द रेणु (समग्र योगदान लेल) २.विदेह समानान्तर साहित्य अकादेमी पुरस्कार २०११-१२ २०११ मूल पुरस्कार- श्री जगदीश प्रसाद मण्डल (गामक जिनगी, कथा संग्रह) २०११ बाल साहित्य पुरस्कार- ले.क. मायानाथ झा (जकर नारी चतुर होइ, कथा संग्रह) २०११ युवा पुरस्कार- आनन्द कुमार झा (कलह, नाटक) २०१२ अनुवाद पुरस्कार- श्री रामलोचन ठाकुर- (पद्मानदीक माझी, बांग्ला- मानिक बंद्योपाध्याय, उपन्यास बांग्लासँ मैथिली अनुवाद) नाटक, गीत, संगीत, नृत्य, मूर्तिकला, शिल्प आ चित्रकला क्षेत्रमे विदेह सम्मान २०१२ क घोषणा नाटक, गीत, संगीत, नृत्य, मूर्तिकला, शिल्प आ चित्रकला क्षेत्रमे विदेह सम्मान २०१२ क घोषणा अभि‍नय- मुख्य अभिनय , सुश्री शि‍ल्‍पी कुमारी, उम्र- 17 पि‍ता श्री लक्ष्‍मण झा श्री शोभा कान्‍त महतो, उम्र- 15 पि‍ता- श्री रामअवतार महतो, हास्‍य-अभिनय सुश्री प्रि‍यंका कुमारी, उम्र- 16, पि‍ता- श्री वैद्यनाथ साह श्री दुर्गानंद ठाकुर, उम्र- 23, पि‍ता- स्‍व. भरत ठाकुर नृत्‍य सुश्री सुलेखा कुमारी, उम्र- 16, पि‍ता- श्री हरेराम यादव श्री अमीत रंजन, उम्र- 18, पि‍ता- नागेश्वर कामत चि‍त्रकला श्री पनकलाल मण्डल, उमेर- ३५, पिता- स्व. सुन्दर मण्डल, गाम छजना श्री रमेश कुमार भारती, उम्र- 23, पि‍ता- श्री मोती मण्‍डल संगीत (हारमोनियम) श्री परमानन्‍द ठाकुर, उम्र- 30, पि‍ता- श्री नथुनी ठाकुर संगीत (ढोलक) श्री बुलन राउत, उम्र- 45, पि‍ता- स्‍व. चि‍ल्‍टू राउत संगीत (रसनचौकी) श्री बहादुर राम, उम्र- 55, पि‍ता- स्‍व. सरजुग राम शिल्पी-वस्तुकला श्री जगदीश मल्लिक,५० गाम- चनौरागंज मूर्ति-मृत्तिका कला श्री यदुनंदन पंडि‍त, उम्र- 45, पि‍ता- अशर्फी पंडि‍त काष्ठ-कला श्री झमेली मुखिया,पिता स्व. मूंगालाल मुखिया, ५५, गाम- छजना किसानी-आत्मनिर्भर संस्कृति श्री लछमी दास, उमेर- ५०, पिता स्व. श्री फणी दास, गाम वेरमा अनचिन्हार आखर ( http://anchinharakharkolkata.blogspot.com ) द्वारा प्रायोजित "गजल कमला-कोसी-बगमती-महानंदा सम्मान" बर्ख 2011 लेल ओस्ताद सदरे आलम गौहर जीकेँ प्रदान कएल गेलैन्ह। एहि बेरुक मुख्यचयनकर्ता ओस्ताद सियाराम झा"सरस" छलखिन्ह।.. गजेन्द्र ठाकुर ggajendra@videha.com http://www.maithililekhaksangh.com/2010/07/blog-post_3709.html २.गद्य २.१.१.डा.राजेन्द्र विमल, ‘घरमुहाँ’ – प्रभाव आ प्रतिक्रिया २. जगदीश प्रसाद मण्‍डल- कथा-सतभैंया पोखर २.२.सुजीत कुमार झा-कथा-मेनका २.३.राजदेव मण्‍डलक उपन्‍यास- हमर टोल २.४.विहनि कथा १.जवाहरलाल कश्यप २.रवि भूषण पाठक ३.जगदानन्द झा 'मनु'४.चंदन कुमार झा २.५.  डा0 अरुण कुमार सिंह- भाषा जातिगत सम्पत्ति नहि अपितु सामाजिक २.६.डॉ. कैलाश कुमार मि‍श्र- कथा- चन्‍दा २.७.कामिनी कामायनी-संटू क उपनैन २.८.१.दुर्गानन्‍द मण्‍डल-कथा- कुकर्मा २. परमेश्वर कापड़ि, संयोजक मिथिला राज्य संघर्ष समिति/ परमेश झा अनिलचन्द्र झा ३.पूनम मण्डल-मिथिला विभूति स्मृति पर्व समारोह २०१२ १.डा.राजेन्द्र विमल, ‘घरमुहाँ’ – प्रभाव आ प्रतिक्रिया २. जगदीश प्रसाद मण्‍डल- कथा-सतभैंया पोखरि‍ १ डा.राजेन्द्र विमल

‘घरमुहाँ’ – प्रभाव आ प्रतिक्रिया

कार्य–कारण–श्रृंखलामे सुगुम्फित ओहि गद्य कथानककेँ उपन्यास कहल जाइत अछि, जाहिमे अपेक्षाकृत अधिक विस्तारसं जीवने–जगतमे अनुभव कएल यथार्थकेँ कल्पनासँ रङि कए रसात्मक विचारोत्तेजक रुपमे प्रस्तुत कएल जाइछ । मैथिलीक ख्यातनामा आख्यानकरि श्री रामभरोस कापड़ि ‘भ्रमर’क पहिल उपन्यास ‘घरमुहाँ’ नेपालक मधेस–आन्दोलनसँ उपजल उमड़ल जनआकांक्षा, मोहभंग, विकृति, पीड़ा, भावनात्मक उद्वेलन, विक्षोभ आ जटिलताकें घोर यथार्थपरक चित्रावली उरेहैत समन्वय दर्शनसंग मर्मस्मर्शी इति पबैत अछि । आन्दोलन जखन एक गोट ऐतिहासिक उँचाई ल’ रहल होइत अछि तँ ओहिमे आन्दोलनकारीक छदम श्वेत भेष द्वारा सामाजिक प्रतिष्ठाक नकली खोल ओढ़बामे सफल गुन्डाक सरदार कामेश्वर–सन आपराधिक मनोवृत्तिक व्यक्ति सचक निरन्तर प्रवेश होबए लगैत छैक । हत्या, अपहरण, आतंक आ डर–धमकी द्वारा ई वर्ग खास कए पहाड़ी समुदायसँ पैसाक उगाही करैत अछि । अपन अधिकार, पहिचान आ विकसित मुद्दाक एहि विराट जनक्रान्तिमे शहादत दैत युवकसभक प्रत्येक दिन लहासपर लहास खासि रहल छै आ ओहर ई लुटेरा–तत्व पहाड़ीक दोकान सभमे आगि लगा रहल अछि, सामान लूटि रहल अछि, ओकरा सभक घरपर पाथर फेकि–आतङ्क पसारि रहल अछि । आतङ्कभरल एहि वातावरणमे पहाड़ी होइतो धोतीकुर्ताधारी मास्टर रमेश उपाध्याय अपना घरमे डरे दबकल रहैत छथि । मोन तँ मास्टरो साहेबक होइ छैन्हि जे – अपन मधेसी मित्र जगमोहन अधिकारी जेकाँ जुलुसमे जा जोर–जोरसँ नारा लगा आन्दोलनकेँ समर्थन दिऐक, मुदा सोचै छथि –“जे उन्माद एखन युवा सभमे छै ओ की हमर (पहाड़ी) अनुहारकेँ पचा सकत ?” अदंकसँ भरल मास्टर साहेबकेँ अपन घर ल’ अनबाक विचार जगमोहनकेँ होइत छन्हि, मुदा मास्टर रमेश एहि दुआरेँ अपन मधेश–आन्दोलनक अगुआ मित्र जगमोहनक घर जाएसँ अस्वीकार कए दैत छथि जे कलहु आन्दोलन कमजोर ने पड़ि जाइक । १ जून २००७, २५ जुलाई २००७, २८ जुलाई २००७, ५ अगस्त २००७ क वार्ता असफल भेलाक बाद ३० अगस्त २००७क’ २६ बूँदापर सहमति होएब मुदा कायान्वयनमे आनाकानीसँ आन्दोलनक फेर उग्र लपट ऊठब – ऐतिहासिक दस्तावेज अछि, जे उपन्यासमे प्रस्तुत भेल अछि । मास्टर रमेश उपाध्यायक विपत्तिक तमिस्रा अओर सघन तखन अओर सघन भ’ जाइत छैन्हि जखन हुनका पता चलैत छैन्हि जे हुनकर बेटी किरण दछिनबरिया टोलक कामेश्वरक बेटा राजीवसँ पे्रम करैति अछि । ताबत ई ककरो ने बूझल छैक जे गामक सम्पन्न आ सम्भ्रान्त मानल जाएबला व्यक्तित्व कामेश्वर गाममे व्याप्त हत्या, अपहरण, चन्दा–आतंक आदिमे संलग्न गिरोहक मुख्य सूत्रधार आ खलनायक अछि । मास्टर महाविपत्तिक समुद्रमे उबडुब कैए रहल छथि कि बेटी किरणक अपहरण भए जाइ छैन्हि आ दश लाख टाका फिरौतीक लेल फोनसँ दिन–राति धमकी आबए लगैत छैन्हि । मास्टर अपन सम्पूर्ण सम्पत्ति बेचिकए विस्थापित होएबाक लेल बाध्य छथि ओमहर कामेश्वरक एकलौता बेटा राजीव अपन बापक कुकृत्यसँ परिचित भ’ जाइत अछि आ मायक माध्यमसँ किरणक मुक्तिक लेल दबाब बनबैत अछि । कामेश्वरकेँ ईं जानि ग्लानि होइत छैक जे ई उएह किरण थिक जकरा पुतहु बना घर अनबाक मोन हुनक परिवार बना चुकल अछि । बसमे चढ़ि चुकल मास्टर रमेश उपाध्यायक ओकर परम मित्र जगमोहन आ अपहरणकारी कामेश्वर गाम घुरा अनबामे सकल होइत छथि । आख्यानकार ‘भ्रमर’ अपना समयक प्रामाणिक खिस्सा आबएबला पीढ़ी–दर–पीढ़ीधरि सुनएबामे उत्सुक छथि । तेँ प्रस्तुत उपन्यास मूक इतिहासक मुखर सहोदर भए गेल अछि । राजनैतिक घटनाक्रमक धरातलपर कल्पनाक फट्ठा, मृत्तिका, सन्ढी, स’न आदिसँ समकालीन मधेसक जीवन्त मूर्ति तैयारक’ सामाजिक सम्बन्ध–बन्धक रागमयताक रंग ढ़ेउरल गेल अछि जे हृदयहारी अछि । उपन्यास ऐतिहासिक महत्वक दाबेदार एहू कारणें अछि जे ई पहिल नेपालीय मैथिली उपन्यास थिक जे समकालीन राजनैतिक घटनाक्रमपर आधारित अछि । रमेश उपाध्याय, जगमोहन, कामेश्वर, राजीव, किरण, बन्ठा, लुखिया आदि सभ वर्गीय प्रतिनिधि पात्र अछि । सम्बादमे स्वाभाविकता आ सजीवता छैक । भाषाशैलीक नाटकीयता आ चित्रात्मकताक कारण उपन्यास आदिसँ अन्तभरि सिनेमाक रीलजेकाँ चलैत अछि, जे पाठककेँ आरम्भसँ अन्तधरि बन्हने रहैत अछि । पहाड़ी–मधेसीक एकता संबर्धनक उद्देश्यसँ प्रणित एहि उपन्यासक यात्रा उबड़खाबड़, पहाड़–जंगल, खुरपेड़ियाक जटिल यात्रा नहि, सोझ–सपाट मैदानक सरल–सरस यात्रा थिक जे सरसराकए अपन गन्तव्यधरि पहुँचैत अछि । तेँ उपन्यासक संरचनामे पेँच–पाँच आ ओझराहटि नहि अछि । मधेस–मिथिलाक आम लोकक भाषामे प्रयुक्त ‘लल्हका’, ‘लभका’, ‘बढ़का’, ‘खुर्सीं’ आदि शब्दक सचेत उपयोग उपन्याक भाषाकेँ सहज स्वाभाविकता आ अभिनवता प्रदान करैत अछि । आख्यानकार श्री ‘भ्रमर’क ई सद्यःजात कृति नेपालीय मैथिली उपन्यास साहित्यक एक गोट उपलब्धि थिक, ताहिमे सन्देह नहि ।

२ जगदीश प्रसाद मण्‍डल कथा- सतभैंया पोखरि‍ पोखरि‍ कहि‍या खुनौल गेल, के खुनौलनि‍? मि‍थि‍लांचलक इति‍हासे जकाँ अखन धरि‍ हराएले अछि‍ मुदा एते गामक सभ मानैत अछि‍ जे पोखरि‍क बतारी ने एकोटा गाछ-बि‍रीछ अछि‍ आ ने आन कोनो दोसर वस्‍तु। ओना पोखरि‍ नमहर रहने रंग-बि‍रंगक कि‍स्‍सा-पहानी अछि‍ये। कि‍यो दैंतक खुनौल कहैत अछि‍ तँ कि‍यो राजा-रजवारक। मुदा जे होउ, हजार बर्खसँ ऊपरक पोखरि‍ जरूर अछि‍ जे सभ मानैत अछि‍। शुरूमे पोखरि‍क महार वा अग्‍नेय जेहेन रहल हुअए मुदा अखन महारो झड़ि‍-झुड़ि‍ गेल अछि‍ आ पोखरि‍क पेटो गदि‍याह भऽ गेल अछि‍। गाममे एकेटा पोखरि‍ मुदा एहेन अछि‍ जे एते सघन गाम रहि‍तो पोखरि‍क अभाव गौंआकेँ नै हुअए दैत अछि‍। चाकर-चौड़गर पेट अखनो अछि‍ये। मुनहर जकाँ दर्जनो ठेक-बखारी सदृश तँ अछि‍ये। गाममे सभसँ पुरानो आ झमटगरो परि‍वार मात्र सतभैंयाकेँ रहलनि‍। पोखरि‍यो हुनके सबहक छि‍यनि‍। केना भेलनि‍ से तँ नीक जकाँ कि‍नको नै बुझल छन्‍हि‍ मुदा जहि‍यासँ देखै छी तहि‍यासँ हुनके सबहक कब्‍जामे रहलनि‍ अछि‍। ओना पोखरि‍ तँ गामे-गाम अछि‍ मुदा आन गामक पोखरि‍सँ अलग पहि‍चान अखनो अछि‍ये। ने एते नमहर कोनो गामक पोखरि‍ अछि‍ आ ने एना चारू महार घाट अछि‍। एक घाट रहने पारो नै लगैत जेना आन-आन गामक पोखरि‍मे अछि‍। आन गामक पोखरि‍मे बड़ बेसी अछि‍ तँ एकटा दूटा घाट अछि‍। एकटा मरद लेल आ दोसर जनाना हेतु। तहूमे रंग-बि‍रंगक बेवहार बनल अछि‍। जइक चलैत जँ कहि‍यो गाममे आगि‍-छाइ लगैए तँ गामे सुन भऽ जाइए, मुदा एकोटा पोखरि‍ आइ धरि‍क इति‍हासमे कहि‍यो ऐ गाममे नै भेल अछि‍। ओना गामक बनाबटि‍सँ आन गामसँ भि‍न्न अछि‍। कते गाम पूबे-पछि‍मे सूर्यमंडल गढ़नि‍क बनल अछि‍ जइसँ पूर्बा-पछबाक झोंकमे, आगि‍ लगने धुआ-पोछा जाइए। बि‍नु जाठि‍क पोखरि‍ रहने, अनगाैंआ तँ पोखरि‍ मानबे ने करैत मुदा पोखरि‍क सभ काज पूर्ति होइत, गौंआ धैन-सन। कि‍यो अनगौंआँक गपपर धि‍यानो ने दैत। सभ यएह मानि‍ चलैत जे कि‍यो अपन मुँह दुइर‍ करैए। नीककेँ अधला कहने थोड़े अधला भऽ जाएत आ अधलाकेँ नीक कहने थोड़े नीक भऽ जाएत जँ एहेन बजनि‍हार अछि‍ तँ ओ अपन मुँह दुइर करैए। सभकेँ अपन-अपन गुण-धर्म होइ छै से तँ अछि‍ये। चारू महार घाट रहने सबहक काजो चलि‍ते अछि‍। तहूमे आन गाम जकाँ कोनो रोक-राक अछि‍ये नै जे ई घाट पुरुखक छि‍ऐ तँ ई घाट जनानाक। ई फल्‍लांक खुनौल छि‍यनि‍ तँए दोसरकेँ नहा देथि‍न आकि‍ नै, ई हुनकर मन-मरजी छि‍यनि‍। कि‍यो जाठि‍ गाड़ि‍ पोखरि‍क पहि‍चान बनौने छथि‍ तँ हेतै। पोखरि‍क पहि‍चान भलहिं जाठि‍ होउ मुदा झील-सरोवर धारमे जाठि‍ कहाँ रहैए। तँए कि‍ ओकरा कुमार कहि‍ कात कऽ देबै। आम खेनि‍हारकेँ आम चाही आकि‍ गाछ आ गाछी गनत। हँ, ई बात जरूर जे आमक गाछ केना होइ छै, केना लगौल जाइ छै, केना ओकर सेवा कएल जाइ छै एकर जानकारी जरूर रहक चाही। जइ जाठि‍ लऽ लऽ अनगौंआँ नचै छथि‍ ओ तँ ईहो कहता ने जे जाठि‍क काज की होइ छै। जँ बीच पोखरि‍क पानि‍क नाप मानल जाए तँ जइ पोखरि‍क कि‍नछड़ि‍येमे उपयोग करै जोकर -नहाइ-धोइ-क पानि रहत ओकर बीचक नाप नपैक जरूरते की रहत। ओहन पोखरि‍क मानि‍ये कते हएत जे एकटा घाट जे भलहिं सि‍मटि‍ये-ईटाक कि‍अए ने होउ, बना बाकी भागमे मोथी रोपि‍ खेत बना लेब। जँ कहीं आगि‍ लागत तँ‍ छूत-अछूत कहि‍ गामे जरा देब, मुदा आगि‍ लगबे ने करै से ने सोचब आ करब। जनि‍येँ कऽ पोखरि‍केँ अघट बना दुइर कऽ लेब, नहाइ-धोइ जोकर नै रहए देब तँ ओइमे दोख केकर? खएर जे होउ मुदा चारू महार घाटो आ बि‍नु जाठि‍क पोखरि‍ तँ अछि‍ये। शुरूहेसँ गामक सतभैंया परि‍वार जोतल-चौकि‍औल खेत जकाँ समतल रहल अछि‍। बीच-बीचमे बाढ़ि‍-भुमकममे थोड़-बहुत ऊवर-खावर बनबो कएल तँ ओकरा पुन: सरि‍या समतल बना लेल गेल। मुदा भवि‍ष्‍य दि‍स नै देखि‍, भूते दि‍स देखने तँ भूत लगबे करै छै। मुदा तेकरो भगबैक तँ उपाए होइते अछि‍। बाबेक अमलदारीसँ सतभैंया अपन परि‍वारक पहि‍चान परोपट्टामे बनौने रहल अछि‍। ओना सात भाँइक भैयारीमे तीन भाँइक परि‍वार नावल्‍द भऽ गेलनि‍ जइसँ अगि‍ला पीढ़ी अबैत-अबैत सातसँ चारि‍ भैयारी रहि‍ गेल। सात भाँइसँ सतरह हेबाक चाहै छल से नै भऽ चारि‍पर उतरि‍ गेल तेकर कारण भेल जे एक भाँइ बेटीक बाढ़ि‍मे दहा गेलाह। ढेनुआर नक्षत्र जकाँ बेटीक आगमन जोड़ा-पल्‍ला जे अाबए लगलनि‍ से ठीके सातसँ सतरह तँ नै मुदा  एकसँ एगारह जरूर भऽ गेलनि‍। मुदा एकसँ एगारह होइतो हुनकर मुँह कहि‍यो मलीन नै भेलनि‍। मनक वि‍श्वास अंत धरि‍ बनले रहि‍ गेलनि‍ जे प्रकृति‍केँ अपन गति‍ छै, ओ अपन नि‍अम-नि‍ष्‍ठासँ चलैत अछि‍। से नै तँ एक कम्‍पनीक वस्‍तु एक रंग होइ छै मुदा तइमे ओहन मेल-पाँच केना भऽ जाइ छै जे मेल-पाँच भेलोपर चारि‍-पाँच वा पाँच-छअसँ आगू-पाछू नै होइत अछि‍। भऽ तँ ईहो सकैत छल जे एक रंगाहे होइत वा एकसँ पाँचो होइत वा आरो अन्‍तर भऽ सकैत छल। मुदा से कहाँ होइए। जहि‍ना एकसँ सय धरि‍ गनू आ सएसँ एक दि‍स गनू पचास तँ बीचेमे रहत। तँए बेटा-बेटीक बाढ़ि‍ आबौ कि‍ रौदी होउ, मुदा अपन व्‍यासक अनुकूले रहैत आएल अछि‍ आ रहबो करत। दोसर भाए जे बच्‍चेमे कुभेला भेलासँ गाम छोड़ि‍ परदेश गेलाह। से पुन: घूमि‍ कऽ नहि‍ये एलाह। बाल-बोधकेँ सेवाक जरूरति‍ होइ छै, होइत एलैए आ सभ दि‍न होइत रहतै। मुदा जखन वएह बाल-बोध चेतन भऽ जाइ छथि‍ तखन हुनक वि‍वेक कि‍ कहै छन्‍हि‍ से तँ आनक-आन नै बूझि‍ सकत। ओ अपने अपन कर्तव्‍यकेँ ि‍नर्धारि‍त कऽ जीवन-पथपर चलताह। खैर जखन धड़ति‍ये भूमि‍ छी तँ जतए बास करब ओकरे मातृभूमि‍ बना लेब। तहूमे ओइ बच्‍चाक तँ अधि‍कार बनि‍ये जाइए जेकर जन्‍म जतए बनि‍ गेल हुअए। मुदा प्रश्‍न तँ अहूसँ आगू अछि‍। जँ धरती स्‍वर्ग वा वैकुण्‍ठ बनए चाहए तखन अपनामे बँटि‍ कऽ बनत आकि‍ सम्‍मलि‍त भऽ कऽ। जँ से नै तँ हम कतए छी, ई तँ देखए पड़त। मुदा मि‍थि‍लांचलोक भूमि‍ तँ वएह भूमि‍ छी जे सभ दि‍न प्रकृति‍ प्रदत्त रहल अछि‍, अखनो अछि‍ आ आगूओ रहबे करत। जँ से नै तँ कहाँ अरब-करोड़पर लटकल वा करोड़ लाखपर। सभ दि‍न जहि‍ना रहल तहि‍ना अखनो अछि‍। भलहि‍ं कतौसँ हमहूँ कहि‍ऐ जे छीहे। तेसर भाइक परि‍वार ऐ लेल आगू नै बढ़लनि‍ जे शरीरसँ ि‍नरोग रहि‍तो मन सनक बच्‍चेसँ भऽ गेलखि‍न। जइसँ ने बि‍आह केलनि‍ आ ने कोनो भाइक बात-वि‍चारमे कहि‍यो रहलनि‍। तहि‍ना बाँकी भाय मि‍लि घरक मोजरे समाप्‍त कऽ देलकनि‍। मुदा तइले हुनको मनमे कहि‍यो दुखो नहि‍ये जन्‍म लेलकनि‍। जखन भाय सभ लगमे बैसथि‍ तँ गरजि‍-गरजि‍ बजथि‍ जे मने सभ कि‍छु छी। जे मनक मालि‍क ओ सबहक मालि‍क। मुदा भाइयो सभ बि‍ना कि‍छु टोकारा देने चुपे-चाप सुनि‍ लैत जे अनेरे टोकने आरो बरदि‍आएब। से नै तँ एक झोंक बाजि‍ नारद जकाँ वीणा हाथमे लेताह आ जेमहर मन हेतनि‍ तेमहर वि‍दा हेताह। असगरूआ परि‍वारमे एककेँ बौड़ने परि‍वारेक उसरन होइए मुदा गनगुआरि‍ जकाँ एकटा टाँग टुटनहि‍ कि‍ हएत। एक तँ परि‍वार, टोल, समाज गढ़ि‍ लइए। हम सभ तँ कहुना तैयो चारि‍ भाँइ बँचल रहबे करब। बाॅझी लगने डारि‍ फड़ै नै छै मुदा तँए ओ गाछसँ हटल रहैत एहेन तँ नै होएत। पि‍ताक अमलदारीमे चाकर-चौड़गर, चौघारा घरक आंगन हथि‍सार सन दरबज्‍जा, चन्‍द्रकूपसँ इनार सरोवर सदृश बि‍नु जाठि‍क पोखरि‍क बीच जि‍नगि‍यो संयमि‍त तँए हर-हर खट-खटक प्रश्ने कि‍अए उठत। ओना सातो भाँइक सातो काज सात रंगक। ओना जि‍नगीक लेल सातो उपयोगी मुदा गुण, बेवहार आ उपयोगक हि‍साबसँ छोट-पैघ। हर-हर खट-खट नै होइक कारण एकटा देासरो छल जे अपन-अपन बुधि‍क उपयोग कऽ स्‍वतंत्र रूपसँ अपन-अपन काज सम्‍हारैत छलाह। एक काजमे ने करैक बखेरा ठाढ़ होइत जे एना-हेतइ, एना नै हेतइ। मुदा एक वि‍चारमे तँ से नै होएत। मुदा समटल बि‍छानक सुख जेहेन सुति‍नि‍हारकेँ होएत, तहि‍ना ने समटल परि‍वारोकेँ होएत। छोट ओसार रहत आ बच्‍चा बेसी रहत तँ ओंघरा-ओंघरा खसबे करत। खाइ काल भि‍न्ने छि‍पली-बाटी फुटत जहि‍ना वस्‍तु व्‍यापारक सहायक छी तहि‍ना व्‍यापार उपयोगक। जइ वस्‍तुक जते उपयोग जि‍नगीक लेल होएत ओ व्‍यापार ओते चतड़ैत अछि‍। मुदा प्रश्न अछि‍ जँ सभ फूल फूले छी तँ देवताक बीच बटाएल कि‍अए अछि‍? जँ देवताक परसाद परसादे छी तखन महादेव कि‍अए बॉतर। अखन धरि‍ सतभैंया परि‍वारमे घराड़ीसँ लऽ कऽ बाध धरि‍क जमीनमे दुइये बेर बटबारा भेल छलनि‍ जे खूटे-खूट भेल छलनि‍ मुदा ऐबेर रूप बदलि‍ गेलनि‍। भीतरि‍या गुमराहटि‍ आबि‍ गेल छलनि‍। मुदा खुलि‍ कऽ आगू भऽ बजैले कि‍यो डेग आगू नै बढ़बए चाहैत। मुदा जहि‍ना सूखल जरनाक बीच आगि‍ हवा पबि‍ते लहरि‍ उठैए तहि‍ना पोखरि‍क लहरि‍ जकाँ उठए लगलनि‍। कारणो छन्‍हि‍ जे कहि‍या कतए जे कँचका ईटापर खपड़ा घर बनौलनि‍ सएह अखनो धरि‍ चलि‍ अबैत छनहि‍। नि‍च्‍चा जहि‍ना मुसहनि‍ माटि‍ भरल तहि‍ना अकासक तरेगन जकाँ फुटल खपड़ा लग इजोत होइत। शुद्ध कि‍सानक घर। चाहे खेतमे रहि‍ बरखा हुअए आकि‍ सुतली राति‍क बरखा हुअए कोनो अन्‍तर नै। जहि‍ना गोनरि‍क दुनू भाग एक्के रंग भेने उनटा-पुनटाक प्रश्ने नै। पहि‍लुका चद्दरि‍क चारू भाग बराबरे होइत छलै आ जे बँचल अछि‍ ओ अखनो अछि‍ये। तहि‍ना धोति‍योक मुदा आजुक जे सि‍ंह-मांगबला चद्दरि‍ वा अन्‍य जे वस्‍त्र अछि‍ ओ एक भग्‍गुए नै, संयुक्‍त परि‍वारक एकांकी रूप जकाँ बनि‍ गेल अछि‍। जहि‍ना जनमौटी बच्‍चा छोटसँ पैघ बढ़ैत ि‍सर्फ मानवे नै महाभानवो बनैत अछि‍ मुदा वएह मनुष्‍य मृत्‍युक पश्चात अछि‍यामे जखन जरबए जाए लगैत अछि‍ तँ पैघसँ छोट बनैत-बनैत लोथरा जकाँ बनि‍ जाइत अछि‍ तहि‍ना ने भऽ रहल अछि‍। ओना खूटे-खूट बटनौं छुतकाक केश कटबैकाल सभ बराबरे भऽ जाइत छथि‍। बाधक जमीनमे कनी घटि‍यो-बढ़ी भेलनि‍ मुदा घराड़ी आ पोखरि‍मे कोनो तरहक कमी-बेशी नहि‍ये भेल छलनि‍। अपन-अपन उपयोगक अनुकूल रहैत आएल छथि‍। मुदा सतभैंया परि‍वारकेँ गामक लोक एके परि‍वार बूझि‍ ने कि‍यो कि‍छु बजैत आ ने कि‍छु पुछैत। जइसँ पूर्बा-पछबाक कोनो लसरि‍ नहि‍ये लगल छलनि‍। जखन लसरि‍ये नै तँ असरि‍ कि‍अए। ततबे नै ईहो बुझैत जे जहि‍ना गाछक डारि‍ फुटने -छि‍टकने- फूल-फड़ थोड़े बदलि‍ जाइ छै। अनेरे देह रगड़ने तँ अपनो रगड़ा लगबे करै छै। मुदा से नै भेल, भऽ ई गेल जे सात भैयारीमे तीन भाँइकेँ सुखने गाछक डारि‍ जकाँ चारि‍ये टा रहि‍ गेलनि‍। तहू चारि‍मे दूटा बँझि‍आइये गेलनि‍ तँए फल-फूलक असे नै रहलनि‍। मुदा दुइयो भाँइ रहने चारि‍ भैयारीक परि‍वार पसारै जोकर तँ भइये गेलनि‍। गड़बड़ एतबे भेल जे एक भायकेँ एक आ एक भायकेँ तीन बेटा भेलनि‍। एक रहि‍तो मानवीय वि‍चार आर्थिक वि‍चारमे बदलि‍ते रगड़ा-रगड़ी शुरू भेल। जखने तीन भाँइ एक दि‍स हएत आ दोसर दि‍स कि‍यो असगरे पड़त तँ नि‍श्चि‍ते छह हाथ पएरक जगह दूटा हाथ-पएर झँपेबे करत। मुदा चद्दरि‍ तँ ओइठाम ने झाँपि‍ चारूकात अड़ि‍अबैत जइठाम ओढ़ि‍नि‍हारसँ डेढ़ि‍या-दोबर होइत, से तँ परि‍वारमे भइये गेल छन्‍हि‍। वि‍चारवान परि‍वार सभ दि‍नसँ रहलनि‍ जँ से नै रहलनि‍ तँ आन-आन गाममे एहेन-एहेन परि‍वार मटि‍यामेट भऽ गेल। मटि‍येमेट नै कते जहल भोगलक तँ कते अस्‍पताल, कते फाँसीपर लटकल तँ कते कपार फोड़ा मरल। मगर वि‍चारेक चलैत ने परि‍वारमे ने कहि‍यो सम्‍प्रादायि‍क आ ने जाइति‍क हवा कनि‍यो डोलौलकनि‍। ओना समैक प्रभाव तँ सभ कि‍छुपर पड़ि‍ते अछि‍ से तँ परि‍वारोमे भेलनि‍। ओना जेकरा समए कहै छि‍ऐ -दि‍न-राति‍- ओइमे ओते बदलाव कहाँ आएल, कि‍एक तँ अखनो बारहो मास आ छबो ऋृतु होइते अछि‍। अपन-अपन गुण-धर्म तँ सभ बचौने अछि‍। मुदा एकटा गड़बड़ तँ परि‍वारमे भइये गेलनि‍। ओ ई जे एक भाइक बेटा श्‍याम, भैयारीमे असगरे छथि‍न। असगर भेनाइ तँ बड़ पैघ बात नहि‍ये भेल मुदा पि‍ताक भैयारीमे छोट भाइक बेटा रहने कि‍छु गड़बड़क संभावना तँ जनमि‍ये गेलनि‍। बाबाक अमलदारीमे सातो भाँइक बीच बटबारा भेलनि‍ मुदा ओ पुन: समटा गेलनि‍। कारण ई जे शुरूमे तँ बटबारा भेलनि‍ मुदा तीन भाँइक परि‍वार घटने फेर समटा गेलनि‍। केना नै समटाइत, तीनूकेँ कियो पानि‍यो देनि‍हार तँ नहि‍ये रहलनि‍। चारू भाइक बीच एहेन संबंध बनल रहलनि‍ जे भीन-भीनौजीक परि‍स्‍थि‍ति‍ये पैदा नै लेलकनि‍। तेकर कारण भेल जे चारू भाइक चारि‍ तरहक कारोबार रहलनि‍। एक काजमे चारि‍ गोटोकेँ रहने वैचारि‍क मतभेद होइक संभावना रहै छै। कि‍एक तँ एक्के काज कते ढंगसँ कएल जा सकैत अछि‍। तहूमे जखन समैक मोड़ अबै छै तखन काजोमे मोड़ अबै छै। सभठाम भलहि‍ं नै आबौ मुदा नहि‍ये अबै छै सेहो नै कहल जा सकैए। चारू भायकेँ परोछ भेने परि‍वारमे भि‍नौजि‍क संभावना बनलनि‍। संभावनाक कारण भेलनि‍ जे एक भायकेँ एकेटा बेटा जखन कि‍ दोसरकेँ तीन भेलनि‍। दू भाँइ तँ मेटाइये गेलखि‍न। छोट भाइक बेटा रहि‍तो श्‍याम भैयारीमे सभसँ जेठ खाली भैयारि‍येमे जेठ नै पढ़ै-लि‍खै दि‍स वि‍शेष झुकान रहनि‍। एक तँ पढ़ैक लगन दोसर सुभ्‍यस्‍त परि‍वार रहबे करनि‍। मुदा तीनू भाँइ घनश्‍याम खेलौड़ि‍या बेसी। सदि‍खन सि‍नेमे-पत्रि‍का आ खेले पत्रि‍का उनटा-पुनटा देखैत। पढ़ैपर तँ ओते नजरि‍ नै, मुदा फोटोपर बेसी नजरि‍ पड़ैत। ओना अखन धरि‍ श्‍यामक वि‍चारमे कोनो दूजा-भाव नै आएल छलनि‍ जइसँ कोनो तरहक नीक-अधलाक प्रश्ने नै उठल छल। जे कि‍छु कारोबार छलनि‍ सामूहि‍क छलनि‍। तहूमे एकटा जबर्दस्‍त गुण श्‍याममे छन्‍हि‍ जे घरसँ बाहर धरि‍क जे कोनो काज होइ छन्‍हि‍ ओ तीनू भाँइ -अपना लगा चारू- केँ जरूर जानकारीमे दइये दैत छथनि‍। मुदा भैयारीक संग दि‍यादनि‍यो तँ बराबर भइये जाइत अछि‍। एक बाप-माए वा सहोदर पीती-पि‍ति‍आइनि‍क बीच जे सि‍नेह रहैत ओ तँ चारि‍ गामक चारि‍ दि‍यादि‍नी एने तँ कि‍छु-ने-कि‍छु गड़बड़ भइये जाइत अछि‍। कारणो अछि‍ मि‍थि‍लांचलोमे एक सीमा कातक गाम आ दोसर सीमा कातक गामक बीचक दूरी कि‍छु-ने-कि‍छु खान-पान, रहन-सहन, बोली-वाणीमे कि‍छु ने दूरी बनले आबि‍ रहल अछि‍। तहूमे जइ इलाकामे बाढ़ि‍क उपद्रव कम छै आ जइ इलाकामे बेसी छै, दुनूक जीवन शैलीमे बदलाब अबै छै। जखने जीवन-शैली बदलत तखन जीव पद्धति‍ बदलत। जखने जीवन पद्धति‍ बदलत तखने जीवन लीला बदलए लगैत अछि‍। तहि‍ना गाममे अखड़ाहा रहने कि‍छु-ने-कि‍छु लूरि‍ कुस्‍तीक भइये जाइ छै। तहि‍ना मध्‍य मि‍थि‍लांचलक भाषामे पश्चि‍म भोजपुरी सीमा क्षेत्रक सुआसि‍न एने भाषामे कि‍छु-ने-कि‍छु रूप बदलले रहै छै। जइसँ भाषा -बोली-वाणी- मे प्रभाव पड़ै छै। तहि‍ना पूवरि‍या इलाका वा दछि‍नवरि‍या इलाकाक प्रभावसँ पड़ि‍ते आबि‍ रहल अछि‍। जहाँ धरि‍ कुटुमैतीक प्रश्न अछि‍ ओ तँ भागलपुरसँ मोति‍हारी आ जनकपुरसँ सि‍मरि‍या धरि‍ होइते आबि‍ रहल अछि‍। एकाएक श्‍यामक मनमे भाइक प्रति‍ सि‍नेह कि‍छु कमए लगलनि‍। सि‍नेहमे कमी एने काजमे कमी आबए लगलनि‍। जेना शुरूसँ परि‍वारक काजक जानकारी सभकेँ दैत अबैत छेलखि‍न तइमे कि‍छु कमी आबए लगलनि‍। तीनू भाँइ खेलौड़ि‍या स्‍वाभावक रहबे करनि‍, तइ बीच काजक आदेश कम पाबि‍ आरो खेलौड़ि‍या भऽ गेल। अखन धरि‍ घनश्‍यामक नजरि‍मे श्‍याममे कोनो कमी नै देखि‍ पड़नि‍। हि‍साबक जरूरते ने बुझथि‍। श्‍यामक मनमे िसनेह कमैक कारण भेल जे पत्नी सदति‍ काल कानमे घोरि‍-घोरि‍ पि‍अबनि‍ जे सम्‍पत्ति‍ अपन आ सुख-मौज दि‍याद सभ करैए। पहि‍ने तँ श्‍याम पत्नीकेँ सेवक बुझैत आबि‍ रहल छलाह। ई नै बुझैत छलाह जे दि‍आदि‍नीसँ दि‍यादि‍यो ठाढ़ करैत अछि‍। मुदा वि‍चारो तँ कि‍छु छिऐ अड़ि‍ कऽ पत्नी पूजे करैकाल खि‍सि‍या-खि‍सि‍या बाजए लगलखि‍न- “जइ पुरुखकेँ कोनो बात बुझैक ज्ञाने ने छै, ओ पुरुख नै पुरुखक झड़ छी।” पत्नीक बात श्‍यामकेँ छातीमे धक्का देलकनि‍। मन कहए लगलनि‍ जे झड़क अर्थ तँ ओ होइत जे कखन अछि‍ आ कखन अपने झड़ि‍ जाएत तेकर कोनो ठेकान नै। जे पाछू दि‍स ससरत ओ पौरुष केना पाबि‍ सकैए। मुदा अखन मुँह खोलैक तँ समए नै अछि‍ ि‍सर्फ सुनैक समए अछि‍। जहि‍ना बाल्‍टी भरि‍ पानि‍मे ि‍नेबो आ चीनी रखि‍ये देने तँ सरबत नै बनैत अछि‍। नेबोकेँ काटि‍ कऽ गाड़ि‍ रस मि‍लौल जाइत अछि‍ तहि‍ना चीनि‍योक अछि‍। जँ एक शब्‍द वा एक पाँति‍ पढ़लासँ बूझि‍मे नै अबैत तं या तँ दोहरा-दोहरा पढ़लासँ वा अगि‍ला-पछि‍ला पाँति‍क मि‍लानसँ बुझल जाइत अछि‍ तहि‍ना अगि‍ला बातक प्रतीक्षामे श्‍याम आँखि‍ उठा पत्नीपर देलनि‍। नजरि‍क पानि‍ देखि‍ पत्नी बूझि‍ गेलखि‍न जे अगि‍ला बात सुनैक प्रतीक्षा कऽ रहला अछि‍। जहि‍ना मधुमाछीक सभ छत्तामे एक्के रंग मधु नै रहैत छैक, कोनोमे कम तँ कोनोमे बेसि‍यो रहैत आ संग-संग नव-पुरान -पहि‍लुका-पछि‍ला- सेहो रहैत अछि‍। तँए ठि‍कि‍या कऽ ओइ छत्ताकेँ पकड़ब बुद्धि‍यारी छी जइमे डगडगी भरल नवका मधु रहैत अछि‍। पुरना तँ दवाइ-दारूक लेल नीक, खेबा लेल तँ नवके नीक। वकील जकाँ अपन पक्ष रखैत पत्नी बजलीह- “अखन धरि‍ अहाँ एतबो ने बुझै छि‍ऐ जे चारू भाँइक बीच पनरहटा बाल-बच्‍चा आंगनमे अछि‍। पनरहोक खर्च तँ सम्मि‍लि‍तेसँ चलैए। एके रंग लत्ता-कपड़ा, खेनाइ-पीनाइ अछि‍ मुदा ई बुझै छि‍ऐ जे ऐमे अपन कते हएत आ दि‍याद-वादक कते हएत?” श्‍यामक नजरि‍ धसए लगलनि‍। पत्नीक वि‍चारमे कि‍छु तत्व बूझि‍ पड़लनि‍ मुदा स्‍पष्‍ट नै भऽ सकलनि‍। प्रतीक्षाक नजरि‍ उठा आगू तकलनि‍। अवसरक लाभ उठबैत पत्नी दोहरौलनि‍- “पनरहटा बाल-बच्‍चामे अपन तीनटा अछि‍। बाकी बारह तँ भैयारि‍येक भेल। तइ संग अपने दू परानी छी आ ओ छअ परानी अछि‍। कनी जोड़ि‍ कऽ देखि‍यौ जे अधा हि‍स्‍सामे अपन कते हएत आ कते हुनका सबहक।” श्‍यामक मन सहमलनि‍। मन कहलकनि‍ जे पत्नी अक्षरत: सत्‍य कहलनि‍। सम्‍पत्ति‍क अर्थ होइत छै सुख-भोग आकि‍ परसादी बाँटब। पूजासँ उठि‍ भोजन कऽ श्‍याम घनश्‍यामकेँ सोर पाड़ि‍ कहलखि‍न- “घनश्‍याम, दुनि‍याँक तँ बेवहारे भैयारीमे भीन होएब रहल अछि‍। अपनो सभकेँ कम नै नि‍महल। गाममे देखै छि‍ऐ जे कते छौड़ाकेँ मोछक पम्‍हो ने आएल रहै छै आ बापसँ भि‍न भऽ जाइए अपना सभ तँ सहजहि‍ धीगर-पूतगर भेलौं। भीन भऽ जाह।” जेना धनश्‍यामो प्रतीक्षेमे रहए तहि‍ना धाँइ दऽ बाजल- “भैया, सभ दि‍न अहाँक आदेश मानैत एलौं, आइ नै मानब से उचि‍त हएत। मुदा अहाँ जहि‍ना जेठ भाय छी तहि‍ना तँ रामो-बलराम छी। भलहि‍ं ओ छोट भाए छी, जे करबै से करत। मुदा तैयो बि‍ना पुछने कि‍छु नै कहब।” “बड़ बढ़ि‍या, अखन जा कऽ पूछि‍ लहक। सुति‍ कऽ उठै छी तखन फेर गप करब।” घनश्‍याम उठि‍ कऽ वि‍दा भेल। भाइयो आ तीनू दि‍यादनि‍यो आ दुनू भाइयोक एकत्रि‍त कऽ घनश्‍याम बाजल- “सबहक बीचमे कहै छी। भैया बजा कऽ कहलनि‍ जे भीन भऽ जाह। से कि‍ वि‍चार?” बलराम- “वि‍चार की भैया, ओ असगर छथि‍ तँ जीवि‍ये लेताह आ हम तँ सहजहि‍ तीन भाँइ छी। हुनका जे मनो खराप हेतनि‍ तँ ने कि‍यो डॉक्‍टर ऐठाम लऽ जाइबला हेतनि‍ आ ने बजारसँ दवाइ कीनि‍ कऽ अनैबला हेतनि‍।” घनश्‍याम- “सबहक की वि‍चार भेल?” पहि‍ल दि‍यादि‍नी- “अपन परि‍वार बूझि‍ नौरी जकाँ दि‍न-राति‍ खटै छी तइपर जे पाँचो मि‍नट चाहमे देरी हेतनि‍ तँ साँढ़-पाड़ा जकाँ गर्द करए लगताह। भने नीक हएत। जानो हल्‍लुक हएत।” सुति‍ उठि‍ चाह पीब पान खा श्‍याम घनश्‍यामकेँ सोर पाड़लखि‍न। अबि‍ते घनश्‍याम लगमे बैसि‍ बाजल- “जे वि‍चार अहाँक अछि‍ भैया, से हमरो अछि‍। अखने बाँटि‍ लि‍अ।” घनश्‍यामक बोली सुनि‍ श्‍याम सहमलाह। मनमे उठलनि‍ जे हम जे बुझै छि‍ऐ तइसँ भि‍न्न ने तँ बुझैए। मुदा बात तँ आगू बढ़ि‍ गेल आब जँ पाछू हटब सेहो नीक नै। श्‍याम- “बटवारामे कोनो व्‍यवधान तँ छहै नै। सभ कि‍छु अधा-अधी भेलह। तखन बाप-पुरुखाक बनौल जेठांश होइए से तँ तोंही बजबह।” श्‍यामक वि‍चार सुनि‍ घनश्‍याम बाजल- “अहाँ पि‍तासँ हमर पि‍ता जेठ छलाह। संयोग नीक रहलनि‍ जे भि‍नौजी नै भेलनि‍। जखन पि‍ताक अधि‍कारक हि‍साबसँ आइ बटै छी तँ हुनकर जेठांश कते हेतनि‍ से तँ हमर हएत कि‍ने।” श्‍याम- “देखह, तमसा कऽ नै बाजह। सभ दि‍न अपन सतभैंया परि‍वार वि‍चारक परि‍वार मानल जाइत रहल अछि‍, तइठाम कनी-मनी चीज ले झगड़ब नीक नै।” घनश्‍याम- “बात तँ बड़ सुन्‍दर आ बड़ सोझगर कहलौं मुदा एक वंशक सभ रहि‍तो अहाँकेँ अइल-फइलसँ रही आ हम सभ बटाइत-बटाइत एते बँटा जाइ जे घसाएल सि‍क्का जकाँ सभ कि‍छु रहि‍तो चलबे ने करी, से केहेन हएत?” श्‍याम- “तोहर की वि‍चार?” घनश्‍याम- “तीनू भाँइक वि‍चार अछि‍ जे घरसँ घराड़ी, खरि‍हानसँ खेत धरि‍ चारू भाँइ एकरंग कऽ लि‍अ। से नै तँ.....।” श्‍याम- “तँ की?” घनश्‍याम- “ई तँ माटि‍क चर्च केलौं। पोखरि‍ सेहो तहि‍ना बाँटब। जँ से दइले तैयार नै हएब तँ जमीनक फैसला जमीनपर हएत।” श्‍याम- “सएह।” घनश्‍याम- “हँ, सोलहन्नी सहए।” ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। सुजीत कुमार झा कथा मेनका

शहर बदैल गेलासँ बहुत किछु बदैल जाइत अछि । ओतऽ ओ महिला क्याम्पसमे बर्षोसँ पढ़ा रहल छलीह । तँए सह शिक्षणके लेल एहि क्याम्पसक माहोल किछु अजिब सन लागि रहल छलैन्हि । मुदा कुल मिला कऽ ई परिवर्तन मनकेँ निके लागि रहल कहल जा सकैए । एक रस्तासँ शायद ओहो एखनधरि अगुता गेल छलीह । नया स्थान, नया परिवर्तन .... धीरे–धीरे ओ सभसँ परिचित भऽ रहल छलीह । समस्या एक्केटा छलैन्हि कि पहिल पिरियडकेँ लेल घरसँ भोरे–भोर निकलऽ पड़ैत छलैन्हि । बहुत प्रयासक बाद हुनका भाड़ा बला घर भेटल रहैन्हि आ ओहो क्याम्पससँ बहुत दूर । ‘अहाँ राजीव सरसँ कहिकऽ अपन समय किए नहि बदलबा लैत छी ?’ गौरी हुनका सल्लाह देलीह । ‘राजीव सर .....,’मेनका किछु चौंकली । ‘हँ, ओहे तऽ सहायक क्याम्पस चिफ छथि । टाइम टेवल ओहे बनबैत छथि ।’ ‘कतऽके छथि ?’ ‘गजव छी मैडम । अतेक दिन भऽगेल एखन धरि अहाँके राजीव सरसँ परिचय नहि भेल अछि ।’ मेनका किछु लजा सन गेलीह । फेर ओहि दिन ओ हुनकर कार्यालयमे पहुँचलीह । फर्मपर माथ झुकाकऽ किछु चेककऽ रहल छली । हुनका देखिते उल्टे कहलैन्हि, ‘बैसू मेनका जी ।’ ‘मेनका .....’एक्कहि संग कएटा प्रश्न चिन्ह उभैर आएल हुनकर मुखाकृतिपर । ‘अहाँके शायद स्मरण नहि अछि अहाँक पुरनका क्याम्पसमे भेल कथा गोष्ठीमे अहाँसँ भेट भेल रहए,’ राजीव मुँहपर कनी मुस्कान अनैत बजलाह । ‘ओह.....,’ तखने हुनका राजीवक नाम किछु परिचित सन लागल छल । ओ मनेमन स्वयंसँ कहलीह,‘ हमहूँ कतेक बिसराह छी ।’ फेर एक्के स्वरमे सभ किछु बाजि गेलीह, ‘हमरा अपन पिरियडके समय बदलएबाक अछि । बहुत समस्या होइत अछि, घर बहुत दूर अछि । सवारी तक नहि भेटैत अछि ।’ ‘ओ ..........,’ गम्भिरतासँ बजलाह राजीव, ‘मूल समस्या अपनेक घरक अछि ने ? अहाँ एना किए नहि करैत छी हमरे घरमे आबि जाउ ? उपरका तल्ला खालिए रहैत छैक । घर एहि क्याम्पसक लगेमे अछि,’ कहिकऽ राजीव सर एकटा प्रश्न सूचक दृष्टि हुनकर मुँहपर देलैन्हि । ‘जी.........’ओ कनी अकचका गेलीह । ‘ठीक छैक, पहिने अपने घर देखि लिअ, तखन तय करब ।’ हुनकर घरसँ एलाक बाद मेनका बहुत दुविधामे पड़ि गेलीह । की करु ? हुनका पुरा–पुर अस्वीकार कऽ देबऽ चाहैत छल ? मुदा नहि जानि किए ओ चुप रहली । किए नहि कहि सकलीह की हुनका महल्लाबला घर पसिन नहि अबैत अछि ? हुनका तऽ दूर एकान्त चाही । जतऽ पत्ता तक नहि हिलए । एहने वातावरण पसिन छलैन्हि हुनका । मुदा आब की करतीह ? मोन मारि कऽ राजीव सर संगे जाए पड़लैन्हि । ओतऽ परिचय भेलैन्हि राजीव सरके कनियाँ आरती आ हुनकर दूटा बच्चासँ । ओ सुखद गृहस्थीकें देखिकऽ मोन भितर उठऽ बला टीसके ओ बहुत मुस्किलसँ दबा सकलीह । आरती हुनका खुब आदर–सत्कार कएलीह । बच्चा तऽ पहिल भेटेमे घूलिमिल गेल छल । आश्चर्य अतेक दिनक बाद कोनो घर परिवारमे अपनापनमे डूबल जेकाँ लागल । ‘दिदी, आइए अहाँ अपन सभ समान आनि लिअ । सभ गोटे मीलिकऽ रहब,’ आरती बहुत आत्मियतासँ बजलीह । हुनकर आग्रहकँे अस्वीकार नहिकऽ सकलीह मेनका । धीरे–धीरे ओ परिवारके विषयमे बहुत किछु जानि गेल छलीह । राजीव सर किछु लजकोटर छलाह । बेसी काल अपने अध्ययन, लेखनमे व्यस्त रहैत छलाह । सहायक क्याम्पस चिफ भेलाक बादो विभिन्न राजनीतिक गोष्ठी सभसँ दूरे रहैत छलाह । आरती बहुत मिलनसार आ गृहणी प्रवृतिकें छलीह । बहुत पढ़ल–लिखल नहि भेलाक बादो अपन आत्मियता आ सहजपनासँ सभके मोन मोहि लैत छलीह । ओहि दिन राजीव सर अपन नयाँ कथा पूरा कएलाह । जाढ़Þक साँझ छल, चाहक चुस्कीक संग ओकर चर्चाकऽ रहल छलाह । आरती तरकारी काटऽमे व्यस्त छलीह । मेनका धैर्यताक संग ओ कथाक प्लट सूनि रहल छलीह । राजीव सर जाही ढंगसँ नायिकाक चरित्र चित्रण कएने छलाह, हुनका किछु जँचल नहि । ओ भावावेशमे बजलीह, ‘हमरा बुझऽमे नहि अबैत अछि कि जे नायिका अतेक पढ़ल–लिखल, बुभऽय बाली अछि ओ परिस्थितिसँ लड़बाक सार्मथ्य किए नहि रखैत अछि ? किए नियतिके हाथमे सोपि दैत अछि ।’ तखने लागल जे राजीव सर एकटक हुनका देखि रहल छलाह । की छल हुनकर आँखि भितर ......... सिहरिकऽ ओ दृष्टि झुका लेलीह । ओहि समय आरती भितर जाकऽ धीया–पुताकें पढ़ऽ लेल कहि रहल छलीह । ओ चुपचाप उठिकऽ अपन रुममे चलि अएलीह । मुदा ओ दृष्टि...... अबेरधरि ओ आँखि हुनका स्मरण अबैत रहल । राजीव सर कहियो काल हुनका एना किए देखऽ लगैत छथि ? ओह, नहि ...... फेर एक हप्ताक बाद राजीव सर ओही कथाक पाण्डूलीपि हुनका हाथमे धऽ देलाह । रातिमे अबेरधरि ओहिमे डूवल रहलीह । सुखद आश्चर्य हृदयकेँ छूबि गेल छल । सत्ये..... कि हुनका कहला मात्रसँ राजीव सर अपना कथामे अतेक परिवर्तनकऽ देलाह, नायिकाक चरित्र पुरापुर बदैल देलाह । ‘कहू, आब तऽ पसिन आएल ?’ ओकर दोसर दिन राजीव सर पुछलैन्हि । ओ मुस्कियाकऽ रहि गेलीह । राजीव सर अबेरधरि अपन ओहि कथाक विषयमे बात करैत रहलाह । ओ सेहो बीच–बीचमे अपन सल्लाह दऽ दैत छलीह । अहाँ पढ़बैत छी तऽ बोटनी, मुदा साहित्यमे अहाँकें बढ़ियाँ पकड़ अछि । किए नहि अहू कथा कविता लिखैत छी ?’ राजीव सरक अवाज हुनका कतहु दूरसँ अबैत लागल । कथा, कविता..... तऽ की राजीव सरकेँ ई पता छैन्हि हमर स्वंयके जीवन कोनो कथा उपन्याससँ कम थोरहे अछि, जकरा ओ चाहिकऽ सेहो नहि लिख सकैत छलीह । मात्र स्मृति कतेको घाओकेँ खखोरि दैत अछि आ दऽ दैत अछि एकटा असहनीय पीड़ा । ओहि राति सेहो उएह स्मृति फेरसँ सजीव भऽ उठल छल । चन्द्रभूषणसँ परिचय । फेर वियाहक बाद हुनका संग बिताएल दू बर्षक मधुर सम्बन्ध । हँ, आब स्मरणे शेष रहि गेल अछि । की चन्द्रभूषण सेहो स्मरण करैत हएताह, ओ बितल क्षणकेँ ? घरपरिवारमे डूबल कहियो सोचि पबैत हएताह ? एकटा सिसकी निकलि गेल हुनक मुँहसँ । कतेक सुख दैथि ओ । किए नहि ओ एहि सभसँ निकलि पबैत छथि ? किए नहि .... शायद कोनो गरम बाउलमे धँसि गेल छथि । भागऽ चाहैत छथि, मुदा फेर ओहिमे धँसि जाइत छथि । कहियो मुक्त भऽ पएतिह एहि धीपल रेगीस्तानसँ ? ओ जेना निन्नमे चिचिया उठल छलीह । रातिमे उठिकऽ पुरे एक जग पानि ढ़ारि लेने छलीह । भोरमे सहीमे हुनका बोखार लागि गेल छल । भोजन आदिसँ निपैटकऽ उपर अएलीह आरती । हुनका सूतल देखि हुनकर देह छुलिह फेर चांैककऽ कहलीह,‘ अँएयै दिदी एतेक बोखार अछि..... आ अहाँ खबरो नहि कएलहुँ अछि ?’ आरती तत्काले डाक्टर बजओलिह, दबाइ मंगबओलैन्हि । अर्धविक्षिप्त सन अवस्थामे आरती देखैत रहलीह । ‘रहऽ दियौ नहि ई दबाइ । एहिसँ किछु नहि हएत, हम आब अपने ठीक भऽ जाएब,’ ओ कमजोर अवाजमे प्रतिवाद करैत रहलीह । ओ कोना कहतिह मोनक विकार दबाइसँ थोरहे जाएत । धीरे–धीरे जखन स्मृति सभक दंश कम हएत तखन अपने सभ समान्य भऽ जाएत । पता नहि आरती की सोचलैन्हि उपरसँ निच्चा उतैर गेलीह । साँझमे राजीव सर उपर अएलाह । चद्दरि हँटाकऽ ओ उठिकऽ बैसऽ चाहलिह मुदा, हुनका चक्कर आबि गेल । ‘ओहो ! अहाँ पड़ले रहू ने, ’तकिया उठाकऽ राजीव सर सहारा दैत कहलाह, ‘देखू दबाइ अहाँकें दुश्मन नहि अछि, फेर किए अहाँ अपनाके समाप्त करऽमे लागल छी ?’ कहैत राजीव सर अपना हाथसँ दबाइ आ पानिक गिलास एना बढ़ओलैन्हि जेना ई हुनकर आग्रह नहि बल्कि आदेश हुअए । ओ आदेशके अवहेलना मेनका नहि कऽ सकलीह । चुपचाप ओ गोटीकें घोटि लेलैन्हि । ‘बस आब चुपचाप सूतल रहू । आरती सुप आ फलपूmल लऽकऽ अबैत हएतिह । किछु खाएब–पीयब नहि तऽ विमारीसँ कोना लड़ि पाएब ?’ मौन आ नोराएल दृष्टिसँ ओ राजीव सर दिस देखैत रहलीह । के अछि आब एहि संसारमे जे हुनकर चिन्ता करए ? फेर किए नहि पुरा जञ्जालसँ छूटि जाइत छथि । राति भरि एहने सन विचार मोनकेँ उद्वेलित करैत रहल । राजीव सरके एहि प्रकारक अधिकारपूर्वक बात करब देखि हुनकर मोन भेलैन्हि जे ओ तकियामे मुँह झाँपि सिसकऽ लगलैथि । चिचिया–चिचियाकऽ कहथि, ‘किए नहि हमरा मरऽ दैत छी ? ककरा लेल जिबू ?’ तऽ की राजीव सर हुनकर मोनक बात बूझि लेने छथि, नहि तऽ क्षण भरिक लेल हुनक समीप किए आबि गेल छलाह । हुनकर गरम साँस अचेतन अवस्थामे सेहो निकटसँ अनुभव कएने छलीह । ‘मेनका ........... ’ओ हुनकर माथपर हाथ धऽकऽ कहने छलाह, ‘हम बुझैत छी कि अहाँकें अतीत सुखद नहि रहल अछि मुदा की स्मृतिक संसारमे हेराकऽ अपनाकेँ मेटा देब नीक बात भेलैक ? क्षण भरिक लेल सुखद आ अन्धकारसँ बाहर निकलू आ वर्तमान तऽ एतेक खराब नहि अछि ।’ कहैत–कहैत राजीव सरक स्वर भावुक भऽ गेल छल । ओहि समय मेनकाक इच्छा भेल ओ हुनकर बाँहिपर माथ राखि खुब कानथि । सभ किछु बता दैथि । हुनकर मन शायद एहिसँ किछु हल्लुक भऽ जाइन । ‘नहि ..........,’ दोसरे क्षण विचार आएल छल । अपन पीड़ाकेँ ओ ककरोसँ नहि बटती । राजीव सर संगे सेहो नहि । दबाइक प्रभावसँ आँखि किछु मुनाए लागल छलैन्हि । बाँहिपर हाथ थपथपाकऽ राजीव सर निचा उतरि गेलाह । एहि विमारीक बाद ओ राजीव सरके किछु आओर निकट आबि गेल छलीह । अखनधरि गम्भिरताकें जे मुखौटा ओ सदैब सावधानीसँ ओढ़ने रहैत छलीह, ओ धीरे–धीरे किछु घटि रहल छल । कहियो–कहियो मुस्किआइके, किछु गुनगुनाएके इच्छा भऽ जाइत छलैन्हि । ओहि दिन क्याम्पससँ किछु पहिने आबि गेलीह । देखलीह आरती आ राजीव सर निच्चा ठाढ़ छलाह । हुनका अबिते आरती बजलीह, ‘दिदी चलू चौरी दिस घुमऽ ।’ ‘हम ?’मेनका चौँककऽ बजलीह । ‘हँ बस, दस मिनट दैत छी झटपट तैयार भऽकऽ आउ,’ राजीव सर आग्रहक स्वरमे कहलैन्हि । हाथ–मुँह धोकऽ मेनका फटाफट सारी बदलि लेलीह । माथमे क्लिप ठीक करैत निच्चा उतैर गेलीह । ‘चलू । अहाँ दस मिनट कहलहुँ हम आओर जल्दी आबि गेलहुँ ।’ हुनकर बात सूनि आरती मुस्किया देलीह । तखने मेनका देखली राजीव सर चोराकऽ हुनका दिस ताकि रहल होथि । चौरी दिस घुमब हुनका नीक लागि रहल छलैन्हि । बहुत दिनक बाद ओ अपनाकँे तनावसँ दूर पाबि रहल छलीह । मोनू आ सञ्जूकें लऽकऽ ओ आगाँ बढ़ि गेलीह आ हुनके कोनो बातपर ठहक्का मारिकऽ हँसि देलीह तखने राजीव सरक धीरेसँ आवाज सुनाइ देलक,‘अहाँ हँसैत काल कतेक नीक लगैत छी ।’ स्वरक गहराइ हुनका भितर तक बिन्ह देने छल । हुनकर मुँह लाल भऽगेल छल । लजाकऽ चौरमे रहल गुलमोहरके पूmल दिस ताकऽ लगलीह । राजीव सरके एहि प्रकारक एकटक देखैत रहब, भितर गहींर तक उतरि जाएबला ओ दृष्टि किछु नहि कहऽ बला बहुत किछु कहि दैत छल । हुनका लागल केओ अपनाकेँ जतेक समेटकऽ राखबाक प्रयास करैत छल ओ ओतबे बन्हैत जा रहल छलीह । आरती किछु दिनक लेल नैहर गेल छलीह । बच्चाक बिना घरमे किछु बुझाइ नहि रहल छल । राजीव सर अपन अध्ययन कक्षमे व्यस्त रहैत छलाह आ ओ अपना कक्षमे । बेर–बेर निच्चा उतरऽमे हुनका सङ्कोच लगैत छलैन्हि । ओहि दिन क्याम्पसेमे हुनका थकान जकाँ लागि रहल छल । घर पहुँचकऽ भोजन के बनाओत, ई सोचिकऽ ओ बाटेसँ पाउरोटीके एकटा प्याकेट अनने छलीह । भोजन शुरुए कएने छलीह जे कतऽसँ नहि कतऽसँ राजीव सर उपर चलि अएलाह । ओ देखिते चाँैक गेलीह । ‘ओहो ! हम तऽ ई उम्मिदमे आएल छलहुँ की हमरा अहाँ भोजनपर आमंत्रित करब, मुदा अहाँ तऽ स्वंय पाउरोटीसँ ......,’ बहुत मजकिया स्वरमे राजीव सर बजलाह । ‘जी .......,’ मेनका लजा गेलीह । सहीमे हुनका ध्याने नहि रहल छल राजीव सर असगरे कोना आ की खाइत हेताह ? कमसँ कम औपचारिकताक नातासँ आमंत्रित करबाक चाहैत छल । ‘एखने सभ बनि जाएत, अपने बैसल जाउ ने ।’ राजीब सर टेबुल लग राखल कुर्सीपर बैसि रहलाह आ टेबुलपर राखल पत्रिका ओ अपना हाथमे राखि लेलाह । देखिते–देखिते मेनका बहुत चीज बना लेलीह । ककरो मात्र उपस्थिति कतेक सुख दैत अछि अन्यथा भोजन तऽ ओ दैनिक बनबैत छथि मुदा कतेक मोनसँ । ओहि दिन सेहो राजीव सर भोजन कऽकऽ उठले छलाह कि दू कप कफी बना लेलीह । राजीव सरके हाथमे कप पकड़ऽबैत हुनका किछु स्मरण आएल । बजलीह, ‘काल्हि तऽ आरती सेहो आबि जएतिह, ’हुनकर स्वरमे बितल दिनक स्मरण झलैक उठल । ‘ हँ, ’ कहिकऽ राजीव सर चुपचाप कपमे चम्मच घुमबैत रहलाह । कप फेरसँ टेबुलपर राखिकऽ अपन हाथ मेनकाके हाथपर राखि देलाह । एहि स्पर्शसँ ओ सिहरि उठलीह, मुदा हाथ हँटा नहि सकलीह । मेनु, की अहाँ एहि तरहे आजन्म हमरा संग नहि रहि सकब ? अहाँकँे नहि बूझल अछि अहाँ हमर कतेक आवश्यकता बनि चूकल छी ।’ राजीव सरक ई स्वर हुनका झिकझोरि देलक । ‘नहि सर, हम अपना कारण ककरो संसार नहि उजारि सकैत छी । राति–दिन जे शब्द मष्तिस्कपर रहैत छल ओहे बात ठोरपरसँ पिछड़िकऽ बाहर आबि गेल छल । राजीव सर चाहियोकऽ किछु नहि कहि सकलाह । ओहि राति क्षण भरिके लेल सेहो नहि सूतल छली । दुःखद स्मृतिक बन्द पन्ना फेरसँ फर–फराए लागल । अहिना कहियो नीनासँ चन्द्रभूषण कहने हएताह , ‘हम अहाँक बिना नहि रहि सकब ।’ मोनमे कचोट उठलैन्हि । चन्द्रभूषणक पत्रक ओ पंक्ति, ‘हम नीनासँ विवाह कऽ रहल छी ।’ हुनका लागल छल ओ कागजपर लिखल मात्र पंक्ति नहि बिषसँ भरल बाण छल, पापा, भैया, दिदी, पाहुन कतेक तमसाएल छल । ‘मेनु, तों कतेक कायर छेँ ? चन्द्रभूषण तोरा धोखा देलकौ आ तों प्रतिकारक एक शव्द नहि कहि सकलएँ ।’ ओ चुपचाप सुनैत रहलीह । कोना कहितथि, सम्बन्ध तऽ मोनक होइत अछि हृदयक होइत अछि । जखन ओ हृदयसँ निकालि देलाह तऽ केहन प्रतिकार ? कोन बातक प्रतिकार ? तखनसँ ओ एकटा मुखौटा चढ़ा लेने छलीह । आब ओ हरेक क्षण खिलखिलाकऽ हँसऽ बाली मेनु नहि कक्षामे गम्भिरतासँ बोटनीपर भाषण देबऽबला प्राध्यापिका छलीह । मुदा राजीव सर आब हुनकर मोनसँ ओढ़ल ओ मुखौटा किए तोडऽ चाहैत छथि ? ओ किए चाहि रहल छथि मेनका फेरसँ मेनु बनऽ ...... उएह पुरनाका मेनकु आरतीक एलाक बाद सेहो मेनका निच्चा जाए कम कऽ देने छलीह राजीव सरके आगाँ तऽ पड़बे नहि करैत छलीह । ‘की बात छैक ? शायद हम एहि बेर नैहर असगरे चलि गेलहुँ तऽ अपने तमशा गेलियै की ? मुदा दोसर बेर तऽ संगे चलबाक कार्यक्रम बनओने छी ,’ कहैत ओहि दिन आरती हुनकर शयन कक्षमे आबि गेलीह । नोटस तैयार करैत मेनका हुनकर आवाजपर चौँककऽ बजलीह, ‘कतऽ ?’ ‘होरीके छुट्टीमे पोखरा घुमऽ जारहल छी । ओ कहैत छलाह जे अहूँकें संग लऽ जएबाक छैक ।’ मेनका चुप रहलीह । राजीव सरके संग ...... मोनमे फेर किछु हलचल जकाँ भेलैन्हि । धीरेसँ बजलीह, ‘नहि, आरती हम कहाँ जा सकब छुट्टीमे हम एकटा सम्मेलनमे जारहल छी, कार्यक्रम तय भऽ चूकल छैक ।’ सूनिकऽ आरतीके उत्साह समाप्त भेल सन लागल । हुनक उदासी देखि मेनका मधुर स्वरमे फेर बजलीह, ‘कोनो बात नहि । एहि बेर अहाँ सभ घूमि आउ, फेर कहियो संगे चलबाक कार्यक्रम बना लेब । आरतीके गेलाक बाद सेहो ओ बहुत अबेरधरि गम्भीर चिन्तन करैत रहलीह । तऽ की राजीव सर ई सभ जानि–बूझिकऽ कहि रहल छथि ? तऽ फेर हुनकासँ निच्चा एक–दू बेर भेट भेल तऽ कतराकऽ किए चलि गेलाह । मेनकाकेँ हुनकर व्यवहारमे कोनो रुसल व्यक्ति जँका लागल । ओ की करथि ? प्रश्न बहुत विचित्र छल । ई सत्य छल जे सम्मेलनके असानीसँ छोड़ल जासकैत छल अन्ततः ओ निर्णय लेलीह ठीक छैक जखन राजीव सर स्वंय किछु कहता तऽ ओ पोखरा घुमऽ जएतीह । मुदा राजीव सर जाइतो नहि बजलाह । आरती चुपचाप सभ तैयारी करैत रहलीह । मेनकाके मोनमे किछु टीस छल,‘ठीक छैक, ओ छथिए के ?’ जाइत समय सभकेँ छोड़ऽ लेल रिक्सा तक आएल छलीह । आरती आ हुनकर बच्चा हुनका प्रणाम कएलक मुदा राजीव सर मुँह नुकबैत रिक्सापर बसि रहलाह । सभकँे जाइत देखि मेनकाके मोन भेलैन्हि जे जोड़–जोड़सँ कानऽ लागैथि । ओ किनका की बिगारने छथि, जे सभ हुनका दुःखे पहुँचबैत अछि । फेर उएह उदास क्षण........... उएह अकेला पन । मोन भेलैन्हि असगरे चलि जाइ मुदा कतऽ ? ओ प्रत्येक दिन पोखरा जएबाक दिन किए गनैत छलीह । छोटको आहटसँ किए चौँकि जाइत छथि ? किए बेर–बेर इच्छा होइत छैन्हि राजीब सरक फोन आबय ? आठम दिन सहीमे द्वार पर प्रवेश भेल । ‘के ?’ भोर चारि बजे राजीव सरकेँ अबैत देखि ओ घबरा गेलीह । तखने राजीव सर आगा बढ़ि हुनकर कान्हपर हाथ राखि देलाह । ‘एहि तरहे स्वंय सेहो परेशान रहलहुँ आ हमरो चयनसँ नहि रहऽ देलहुँ,’ राजीव सर धीरेसँ बजलैन्हि, ‘जनैत छी, मोन नहि लागल घुमऽमे । बहुत दिन सोचलहुँ फोन करी मुदा..........’ ‘आरती कहाँ छथि ?’ मेनकाकेँ स्मरण आएल आखिर राजीव सर संग हुनकर परिवार सेहो गेल छल । ‘घुमैत काल हुनकर बहिन रोकि लेलक बादमे अएतीह ।’ राजीब सर धीरेसँ मेनकाकेँ आओर अपन निकट आनि लेलाह । फेर स्नेहक स्वरमे बजलाह, ‘सुनू, हम आरतीसँ बात कऽ लेने छी हम तीनू गोटे अहिना सँग–सँग रहि सकैत छी आब तऽ रहब ने हमरा संग ?’ राजीव सरक मुँह मेनकाके माथपर भूmकि गेल । तीब्र चुम्बकीय आकर्षणमे बान्हल ओ ओहिना हुनकर छातीसँ लागल रहलीह । ‘ठीक छैक चलू । भोरे एकटा बैसारमे भाग लेबऽ जएबाक अछि । बाँहिपर हाथ थप–थपबैत अपना रुम दिस राजीव सर घूमि गेलाह । हुनका गेलाक बाद मेनकाकेँ किछु सोचबाक समय भेटल । किए एना भऽगेल ? किए ओ एना बहि गेलीह ? किए नहि प्रतिकार कएलीह ? फेर स्मरण आएल राजीव सरक ओ शब्द, ‘आरतीकें कोनो आपत्ती नहि अछि ।’ मुदा मोनमे फेर किछु सेहो खटकलैन्हि । कोन एहन महिला हएत जे चुप–चाप सभ किछु लुटैत देखि सकत । चन्द्रभूषणके नीनाक संग विवाहक बात सूनि कोना ओ कनैत रहलीह । लोक गेट पीट–पीटकऽ हारि गेल छल मुदा, हुनकर उएह जिद्द छल । फेर ओ क्षण की, ओ अखनोधरि नीनाके गाढ़ि पढैÞत नहि छथि ? हुनका लागल अनेरे फेर नीना आगाँ आबि गेल अछि आ हँसैत पूछि रहल अछि, ‘की आब तऽ अहूँ नीना बनि गेल छी ।’ ‘नहि,’ ओ चिचिएलीह । देवालक सहारा नहि रहैत तऽ ओ चक्कर खा कऽ खसि परितैथि । आधा घण्टाधरि ओ अहिना चुपचाप बैसल रहली । बस स्टैण्डपर कनी–मनी लोक छल वातावरणमे बेरियाक खालीपन व्याप्त छल मुदा मोनमे तऽ बहुतरास बिहारि घेरने छलैन्हि । शायद किछु क्षणक बाद कोनो बस आएत आ हुनका लऽ जाएत मुदा कतऽ ? स्मरण आएल ओ आवेदन–पत्र । एकटा लम्बा छुट्टी आ दोसर बदलीके । बस आएल । बसक हर्न हुनकर ध्यान तोड़लक हुनकर चाल यन्त्रवत् ओहि दिस बढ़ल । आगाँ दूर तक सुनसान सड़क देखाइ दऽ रहल छल । छुटैत हरियर वृक्ष शायद ओ अहिना अपन प्राप्त सुखकेँ एक बेर फेर छोड़ि अएलीह । हुनकर आँखि नोराए लागल छल, जकरा नियतकँे कठोर हात पोछि देने छल । ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। राजदेव मण्‍डलक उपन्‍यास हमर टोल गतांशसँ आगू- गामक चौबटि‍या। असलमे तीनबटि‍याकेँ सभगोटे चौबटि‍या नाम राखि‍ देलकै। दस गोटे जे कहलकै सएह साँच। गाए बाहलै तँ हँ। बड़द बाहलै तँ हँ। की करबै, गामक तँ एहने रूल छै। पीपरक गाछ तर अजय धि‍या-पुताकेँ पढ़ा रहल छै। ई गप्‍प कतेक दि‍न टोलबैयाकेँ कहलकै लेकि‍न कोइ धि‍यान नै देलकै। केना कऽ धि‍यान देतै, फुरसत हेतै तब ने। खेती-गि‍रहस्‍ती आ बीच-बीचमे सराध-बि‍आह आबि‍ जाइ छै। फेर पावनि‍-ि‍तहार संगहि‍ झगड़ा-लड़ाइ तँ सभ दि‍न होइते रहै छै। एक-दोसराक टाँग पकड़ि‍ कऽ घि‍चैक तैयारी। दुसमनक काजमे बाधा नै देल हुए तँ सोझामे हवा जरूर छोडि‍ देत। दुरगन्‍धे नि‍कलतै। दोसराकेँ बढ़ैत देखि‍ चुप रहब बड़ कठि‍न। एहन टोलपर अजय धि‍या-पुताकेँ पढ़ेबाक कोशि‍श कऽ रहल छै। लोकक दुआरि‍पर गप उड़ि‍ रहल छै। “सरकारी नोकरी तँ भेटलै नै। आब चचलै, गामकेँ सुधारै वास्‍ते।” “अपना जेना बड़ सुधरल। दोसरो धि‍या-पुताकेँ नि‍कम्‍मा ने बना देलक तँ फेर कथीले।” “बकटेट भऽ गेलै। नै घरकेँ अहि‍त ने घाटकेँ। कहै छलै जे सभगोटे पैखाना कोठली बनाउ। रूपैया कतएसँ लबतै लोक।” “बकरी-गाए चरेतै तँ दू पाइक उन्नति‍ करतै, धि‍या-पुता। जँ अजैयाक सभटा गुण सि‍खतै तँ समाजमे सभसँ लड़ैत रहतै।” कि‍छु लोक सभ जगह अलग तरहक होइत छै। ओकर सबहक सोच भि‍न्न छलै। “धि‍या-पुता उच्‍चका जकाँ भरि‍ दि‍न खेलाइते रहै छै। ऐठाम पढ़लासँ फ्रीमे दू अछरक बोध भऽ जेतै। अजैया केहनो छै तइसँ की। काज तँ नीके कऽ रहल छै।” “लोक सभ कि‍छो कहौ हमरा सबहक धि‍या-पुता पढ़तै।” रसे-रस गाछ तरक स्‍कूल चलतै की, दौड़ए लगलै। आ ढोढ़ाइ गुरुजी तामसे भेर। दि‍यादक संगे अकलू मड़रक पलि‍वार ढाठल छै। जाति‍ आगि‍ पानि‍ बन्न कऽ देने छै। ओकरा छौड़ा बीचेमे बैसि‍ कऽ ककहारा पढ़ि‍ रहल छै। अजय कनीकालक लेल कोनो चलि‍ गेल छलै। ताबे छौड़ा सभ हड़-हड़ खट-खट शुरू कऽ देलकै। “हे रौ, तूँ तँ ढाठल-बान्‍हल छी। हमरा सबहक बीचमे कि‍एक एलही।” “ई केकरो दुआरि‍ थोड़बे छै। ऐठाम कि‍अए ने एबै।” “नै रहए देबौ ऐठाम। भागि‍ जो, नै तँ बापसँ भेँट करा देबौ।” “बापक नाम लेबही।” “चटाक-फट्ट” “दुनू तरफसँ थप्‍पर-मुक्‍का शुरू भऽ गेलै। पेंट-गंजी फटि‍ गेलै। ठोरसँ खून छड़-छड़ बहए लगलै। छौड़ा कनैत अंगना दि‍स भगलै।” अजय तेजीसँ पहुँचल। सभकेँ फटकारैत पाँितमे बैसौलक। ओकरा सबहक दि‍स तकलक। सभटा बनैया धि‍या-पुता सन लगैत अछि‍। हजारोक भवि‍ष्‍य अन्‍हार दि‍स जा रहल छै। बचेबाक प्रयासमे अपनो भवि‍ष्‍य अन्‍हारमे चलि‍ जेतै बलि‍दान तँ करए पड़तै। प्राप्‍त करबाक लेल कि‍छु हरा जाएब स्‍वभावि‍के छै। अकलूक पि‍ति‍यौता भाय रामरती मड़र गरजैत आबि‍ रहल छै। “ई झटकूक बेटा माहटर बनि‍ गेलै। खूनि‍याँ माहटर। ठीके कहै छलै, ढोढाइ गुरुजी- हम तँ धान-चाउर लऽ कऽ पढ़बै छलौं। लेकि‍न अजैया खून लेत।” “की भेल मड़र?” “ई कालू मड़र, सार अपनाकेँ लाइट सहाएब समझै छै। अपना धि‍या-पुताकेँ सनका देलकै। धरहा कुत्ता जकाँ लोककेँ काटनो फि‍ड़ै छै। हमरा छौड़ाकेँ अंगा फाड़ि‍ देलक। मारैत-मारैत खून बोकरा देलकै। ई बहींचो मैनजन छी आकि‍ काल। ओकरे धि‍या-पुताकेँ आइ हम थकुचि‍ देबै।” कालू मड़र ओमहरसँ अबैत छलै। गारि‍ सुनि‍ते गरजैत कहलकै- “ऐ रामरती, मुँह खाली नै कर। मरदक बेटा छेँ तँ हमर कोनो बेदराकेँ हाथ लगा कऽ देखही। ओहीठाम हाथ काटि‍ देबौ।” कुत्ताक झुंड एक दोसरपर भूकए लगलै। धि‍या-पुता सभ कि‍ताब लऽ कऽ पड़ाएल। “भाग रौ खून खतरा हेतौ। दूनूक दि‍यादवाद लाठी-भाला लऽ कऽ नि‍कलि‍ गेल छै। टोलमे हड़कम्‍प मचि‍ गेलै।” मुँहपुरुख सभ बीच-बचाव कऽ रहल छै। “आपसमे कि‍एक लड़ै छी। सबूर करू। शान्‍त रहू मड़र। गपकेँ नै बढ़ाउ।” ढोढाइ गुरुजीकेँ दाउ सुतरि‍ गेलै। फेर क, ख, पढ़बैक बदला एक बोड़ा धान लेतै। कुदि‍ कऽ आगाँ अबैत बजल- “सभटा नाटक अजैया कऽ रहल छै। झगड़ाक जड़ि‍।” दुनू पक्षकेँ लोक सभ ठेल-ठालि‍ कऽ हटा देलकै। असगरे अजय गाछ तर ठाढ़ अछि‍। गाछसँ स्‍वर नि‍कलि‍ रहल छै- एकटा बीयासँ हमर जनम भेल। छोट-छीन बीयामे नुकाएल छलौं। बाहर एलापर हजारो बीया हमरासँ नि‍कलि‍ रहल अछि‍। एकसँ अनेक। हमरा छाँहमे कतेक जीव-जन्‍तु सुखक नि‍साँस लऽ रहल अछि‍। तैयो हमरेपर झटहा......। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। विहनि कथा १.जवाहरलाल कश्यप २.रवि भूषण पाठक ३.जगदानन्द झा 'मनु'४.चंदन कुमार झा १ जवाहर लाल कश्यप विहनि कथा ड्युटी रमेसरा हाथ मे दवाई के पार्सल लेने घुमि रहल छल / बार- बार पता बला पर्ची के देखैत छल / कतेक आदमी स ओ पता पुछि चुकल छल / कियौ सही उत्तर नहि देने छल / जेठक गरमी मे गाम स आयल सीधा- सादा बच्चा बंबई सन शहर मे परेशान भ गेल   /गर्मी स बेहाल पुरा मुह लाल भेल पशीना स भीजल सरीर आ संगे भीजल  कपडा ओ एक रोड स दोसर रोड, एक गली स दोसर गली, मे घुमि रहल छल /आ पता छलहि जे भेट नाहि रहल छल / दुपहरिया मे लोक सबहक आन जान सेहो कम छल ताहि लेल पता खोजय मे और दिक्कत भ रहल छल /  तखने ओ एकटा बुड्डा के देखलक ओकरा जान मे जान आयल, जे शायद  ई सही पता बता सकैत अछि /ओ पता के पर्ची देखेलक नवनीत बिलडिंग अपोजिट बैंक आफ इंडिआ बान्द्रा ईस्ट/ बुड्डा  कहलक आगे से राईट लेकर पहला छोरकर दुसरा लेफ्ट् लेना वहीं है / सामने बैंक आफ इंडिआ  देखि मोन खुशी स भरि गेल/ बैंक आफ इंडिआ के सामने बला बिलडिंग  मे ओ घुसि गेल / गेट पर वाचमैन नहि रहै ओ अंदर घुसि गेल  /सामने स एकटा साहेब के आबैत देखि ओ ठाढ भ गेल / साहेब क्रोध मे पुछलखिन्ह किधर जाना है ? बिना पुछे अंदर कैसे आ गया ?  वाचमैन किधर है ? ताबटिधरि मे वाचमैन आबि गेल / साहेब तमकि क पुछलथि तुम लोग किधर रहता है ? चोर -उच्चका अंदर घुस जाता है / वाचमैन आव देखलक ने ताव, थप्परे-थप्पर रमेसरा के मारय लागल आ अप्पन ड्युटी के निर्वाह  करय लागल / २ रवि भूषण पाठक तीनटा विहनि कथा १ तीन-चारि सालक छौड़ी मुदा अलबत्‍ते चरफर ।बाजै भूकै ,चलै-फिरै ,दौड़ै-घूमै मे केकरो बूझि नइ पड़ै जे ई एत्‍ते छोट छैक आ माए कें हरदम सर्टिफिकेट दिय’ पड़ै ।छोट मोट टोहल होए ,दोकानक काज ,कंसार जेनए ,बथुआ तोरनए ,हकार देनए आ जनी-जाति सबक बीच मे बैसि के गीत-नाद मे पाछू पाछू सूर मिलेनइ.....अलबत्‍ते रहै राम सोहागक बेटी ।आ बुचिया के माए कहबो करै ...ई रहै त’ बेटे मुदा भगवान के नीन्‍न आबि गेलेन आ ई बेटी भ’ गेलै ।                      आ जखन बोखार लागलै ,तखन पूरा दू महीना तक भूपेंद्र डॉक्‍टर आबिते जाइत रहलै ,कखनो ई दवाए त’ कखनो ऊ दवाए .....आब ई टॉनिक दियओ , आब छोटका गोट्टी शुरू करू आ जखन बेमारी कम हेबाक कोनो लक्षण नइ देखेलकए तखन कहलखिन जे एकरा दरभंगा मे फलां बाबू ओइ ठाम देखाबू ।आ फलां बाबू देखिते कहि देलखिन ,जे एकरा त’ बड़का बोखार अछि ,मुदा कहलखिन एना जे भूपेंद्रक प्रति मोन मे ककरो कोनो शंका नइ जनमै ......आखिर चेला त’ हुनके रहेन ।

आब बात एना फसलै जे ठीक हेतै त’ कते हेतै आ पैसा लागतै त’ कत्‍ते लागतै ......राम सोहागक ओकादि क’ पूरा मानचित्र डॉक्‍टर साहेब एक-दू दिन मे बना देलखिन ,आ पूरा दया देखबैत मात्र महीसे बेचेलखिन .......बेटी जाइत बला बात.....फलां बाबू जे अपन डिग्री क’ अंत मे एफ0आर0सी0एस0 लगबैत छथिन स्‍पष्‍टे कहलखिन जे यदि बेटा रहत तखन त’ हम आर किछु कहतौं ,मुदा ई त’ बेटिए अछि तें आब जत’ अछि कथा के ओतै समाप्‍त करू आ राम सोहाग अपन छोटकी बेटी के नेने गाम आबि गेला ।बेटी जे ने बाजि सकै छलै ,ने उठि-बैस सकै छलै ।सूतले सूतल खाए आ पैखाना करै ।टोल पड़ोसक लोक सब शुरू मे आबैत गेलै ,कुशल क्षेम आ भगवानक नाम.......राम सोहाग सेहो पंजाब चलि गेला....आब बचलै केवल बुचिया आ ओकर माए ......आ माए सेवा कर’ लागलै ,भगवान ,भाग के गारि-बात कहैत .......ओइ दिनक प्रतीक्षा कर’ लागलै जखन कि बुचिया क’ प्राण छूटतै आ बुचिया कें ऐ कष्‍ट सँ मुक्ति मिलतै........... २ भाय साहेब कार सँ मामा गाम जेबा के विचार बनेलखिन ।भौजी निच्‍चे आंखिए एना देखलखिन जेना ऐ यात्रा मे भाय साहेब सब किछु लुटा देता । फेर भौजी कें बौंसए क कम सँ कम पनरह साल पुरान तरीका अपनाबैत कहलखिन ‘चिन्‍ता नइ करू ।बहुत दिन बाद जा रहल छी ,खाली हाथ कोना आबए देता , आ माए सेहो कत्‍ते दिन बाद गेलै हन ।‘ भौजी क’ चिंता तैयो समाप्‍त नइ भेलेन ,तखन भाए साहेब बड़का बेटा के सेहो तैयार क देलखिन ।मानि लियओ जे जेना खरचा हेतइ त हेतइ विदाइयो त ऽ   हेबे करतइ । आ विदाइ के समै बेटा के पांच सौ टका मामा देब ऽ   लागलखिन त ऽ   छौड़ा बाप दिस देख ऽ    लागलए । भाए साहेब के पित्‍त चढ़ेन जे छौड़ा लै किएक नइ छइ आ वौआ बूझइ जे लेला क ऽ   बाद पप्‍पा डांटि ने देथि । आ माए गुम्‍मे रहलखिन भाए कें पैसा खर्च होए के चिंता अलग आ वौआ गाड़ी सँ आयल से चिंता अलगे ............ ३ एकात वला रस्‍ता दूनू कवि भोरूका टहलौनी मे एहन रस्‍ता खोजि लेलखिन ,जइ रस्‍ता मे केओ नइ देखाइ ।कखनो काल कोनो सर‍लहिया कुकुर ,कखनो कोनो कबाड़ी तेजी सँ आबादी दिस बढ़ैत ,बस यैह हलचल ।ने एक्‍कोटा अखबार वला कऽ   सायकिल ने इसकुलिया बस क धूम-धक्‍कर ,कखनो-कखनो हनुमान मंदिर सँ भजन कऽ   आवाज आबै ।भजनो नबका धुन पर ,कविगण ऐठाम निचेन सँ अपन पेट पर ढ़ोल बजा सकैत छला ,पेटे नइ ,पीठो दिस आ नीच्‍चों ,ऐठाम के देखए वला ।आ ऐठाम खूब नीक जँका विरोधी पर टिप्‍पणी कएल जा सकैत छलै आ रंगबिरही गारि सेहो । ३ जगदानन्द झा 'मनु' ग्राम पोस्ट- हरिपुर डीह्टोंल, मधुबनी दूटा विहनि कथा १-एक करोड़क दहेज संजना आ संजय  केँ विवाहक तैयारी में जोर-सोर सँ संजना केँ  पिताजी आ हुनक सभ परिबार तन-मन-धन सँ लागल | संजना आ संजय दुनु एक्के संगे मेडिकल में पढ़ै छल ओहि बिच दुनु में पिआर भेलैंह आ आब सभहक बिचार  सँ विवाह भय रहल अछि | चूकी संजय केँ  पिताजी अपन ऑफिस कए काज सँ युएसए गेल रहथि आ एहि ठाम हुनक अभाब में हुनकर सबटा काज हुनक छोट भाई अर्थात संजय केँ कक्का केलन्हि | आब  काईल्ह विवाह छैक त' ओ आई गाम एलाह | गाम परक सभ तैयारी देख ओ प्रशन्न भेला | बातक  क्रम में हुनका ज्ञात भेलन्हि जे कन्यागत दिस सँ पंद्रह लाख रुपैया दहेज सेहो संजय कें  कक्का तय केलन्हि आ कन्यागत देबैक लेल सेहो मानि गेल छथि | मानितथि किएक नहि उच्च कुल-खनदान, वर डॉक्टर,वरक बाबू बड्डका डॉक्टर, गाम में सय बीघा खेत, बेनीपट्टी में शहरक बीचो-बिच चारि बीघाक घडारी | मुदा  संजयक बाबू केँ ई बात सँ किएक नहि जानि खुसी  नहि भेलैंह | ओ तुरंत ड्रायबर केँ  कहि गाड़ी निकलबा कन्यागत ओहिठाम पहुँचलाह | काईल्ह विवाह छै आ आई वरक बाबूजी उपस्थीत, मोनक संका केँ  नुकबैत कन्यागत दिस सँ कन्याँक बाबू सहीत सभ दासोदास उपस्थीत | पानि, चाह शरबत, नास्ता,पंखा सब प्रस्तुत कएल गेल | संजयक बाबू ओई सभ केँ  नकारैत दू टूक बात संजनाक बाबू सँ बजलाह -" समधि कनी हमरा अपने सँ एकांत में गप्प करैक अछि |" हुनक  संकेत पाबि सभ गोते ओहि ठाम सँ हति गेलाह,मुदा सभहक मोन में अंदेसा भरल, कतेको गोटा दलानक कोंटा सँ सुनैक चेष्टा में सेहो | सभ केँ गेला बाद संजयक बाबू संजनाक बाबू सँ -"समधि ! हम त' एखने दू घंटा पहिने युएसए सँ एलहुँ क्षमा करब पहिने समाय नहि निकालि पएलहुँ, मुदा ई की सुनलहुँ अपने पन्द्रह लाख रुपैया दहेज में दय रहल छी |" संजनाक बाबू दूनू हाथ जोरने -"हाँ समधि जतेक अपनेक सबहक मांग रहनि हम अबस्य पूरा करबनि |" संजयक बाबू -"जखन मांगेक बात छैक त' हमरा एक करोड़  रुपैया चाही |" ई सुनिते संजनाक बाबुक आँखिक आँगा अन्हार भय गेलैंह, आ आनो जे सुनलक सेहो दांते आँगुर कटलक | संजनाक बाबू पुर्बबत दूनू हाथ  जोड़ने -"एहेन बात नहि कहु समधि पंद्रह लाख जोडै में त' असमर्थ छलहुँ आ ई एक करोड़ त' हम अपनों बीका क' नहि आनि सकै छी |" कहैत निचा झुकलनि शायद संजयक बाबूक पएर पकडैक चेष्टा में मुदा निचा झुकै  सँ पहिले संजयक बाबू हुनका उठा अपन करेजा सँ लगा -"ई की पाप दय रहल छी, पएर त' हमरा अपनेक पकरबा चाही जे अपने अपन बेटी दय रहल छी | आ रहल पाई त' हमरा एक्को रुपैया नहि चाही भगबानक कृपा सँ हुनक देल सब किछ अछि | आ एक करोड़क बात तकरा क्षमा करब ओ छ्नीक ठीठोली छल, जखन मांगने पंद्रह लाख भेटत त' एक करोड़ किएक नहि जे आगु कोनो काजो नहि कर' परए | आ दोसर की अपनेक बेटी आ हमर पुतौह एक करोड़ सँ कम केँ  छथि हा हा हा .... | एका एक चारू कात नोराएल आँखि सँ ड़बड़बेल खुशिक ठहाका पसरए लागल | २-उपकार रग्घू कनियाँ पीलिया सँ ग्रस्त अंतिम अवस्था में दिल्लीक लोकनायक जयप्रकाश अस्पताल में आई दस दिन सँ भर्ती जीवन आ मृत्युक बिच संघर्ष करैत | पीलिया केँ अधिकता आ कोनो आन कारणे आँखि में से इन्फेक्सन भय गेलनि |  लोकनायक जयप्रकाश अस्पतालक डाक्टर रग्घू सँ कहलकनि जे कनियाँक आँखि लोकनायक जयप्रकाश अस्पतालक बगले में आँखिक अस्पताल गुरुनानक आई हॉस्पिटल छैक ओहिठाम सँ जाँच करा क' आनै लेल | रग्घू  डाक्टरक बात मानि एहि काज में लागि गेला | लोकनायक आ गुरुनानक दुनु सरकारी अस्पताल छैक तैं खर्चाक बात नहि मुदा   रग्घू केँ  बोनि मजुरी रहैन रोज कमाऊ आ रोज खाऊ आ आई दस दिन सँ अपन बोनि छोरि कनियाँ संगे एहि ठाम अस्पताल में छथि | दस दिन सँ नव काज नै | जमा पूंजी खत्म | एखन तत्काल लोकनायक सँ गुरुनानक अस्पताल तक जाई में पन्द्रह रुपैया जईती आ पन्द्रह रुपैया आईबती, कुल तिस रुपैया चाहि | हुनका लग छलनि कुल दस रुपैया | ओहि दस रुपैया में अपन किछ नास्ता भोजन सेहो, कनियाँ केँ  त' अस्पताले में भेट जाइ छलनि | ओई ठाम सँ काज करै लेल कतौ जेबों करता ताकी पाई होईन त' कम सँ कम दस रुपैया बस भारा चाहियैन | इ सब समस्या केँ जनैत रग्घूक कनियाँ रग्घू सँ कहलनि- " फोन कय क' अपन भैया सँ दू सय रुपैया मईन्ग लिय, काइल्ह-परसु काज केला बाद पाई होएत त' दय  देबैन |" रग्घू अपन कनियाँ केँ कन्हा पर उठा लोकनायक सँ गुरुनानक अस्पताल केँ  लेल बिदा भ' गेला आ चलैत-चलैत बजला -"अहाँ जुनि चिंता करु, रिक्सा सँ नीक सबारी हमर पिठक होएत आ रहल इ मुसीबत त' ई त' चारि दिन बाद खत्म भय जाएत मुदा केकरो उपकार सधबै में पूरा जीवनों कम परत |" ४ चंदन कुमार झा सररा, मदनेश्वर स्थान,मधुबनी, बिहार बिहनि-कथा - लोहनावाली भोरक करीब सात बजैत रहै. लोहनावाली भनसाघर मे चुल्हा पजारति रहय.सिमसल चेरा पजरैत नहि रहय खाली धुआँइत छलैक. धुआँ भरल भनसाघर. फुकैत-फुकैत अकच्छ मोन भेल छै. आँखि फुटि रहल छलैक ओहि धुआँभरल भनसाघर मे. आँखि लाल बून्न भ' गेल रहय. आँखि सँ नोर बहय लागल रहय मुदा कनैत नहि रहय एखन लोहनावाली. ओ त' आँखि मे धुआँ लागि गेल रहय तइँ नोरा गेल रहय.कानल त' राति मे रहय ओ. भरि राति कानल रहय...भरि राति कि जीवन भरि त' कनिते रहल अछि. ...नहि..नहि..जीवन भरि नहि .....जहिया से एहि घर मे वियाहि के आयल अछि तहिया से..जा धरि वियाह नहि भेल रहै, नैहर मे रहैत रहय, कहियो कोनो दुख-दर्दक भान नहि भेलै.बेटी भऽ जनम नेने छल तइयो बड्ड प्रेम भेटैत छलै माय-बापक.तीन भाय-बहिन मे एसगर बहिन तहू मे सबसे छोट.सभक मुहलगुआ..मायक रधिया..बाबूक राधा बेटी,......लोहनावाली........चुल्हि फुकैत लोहनावाली. राति मे फेर जुगेसरा पी के आयल रहय.बड़का पियक्कर निकलि गेलैए.रोज ताडी-दारू चाही.सभटा जथा-पात बेचि पीबि गेलै.बड्ड मना करैत छैक लोहनावाली मुदा के सुनैए ओकर गप्प. बेचारी के रोज गारि-फज्झति सुन' पड़ैत छै उनटे.की करतइ अबला नारी, सहि लैत छैक सभटा.मुदा आब ओकरो कखनो-काल बर्दाश्त सँ बाहर भऽ जाइत छैक.मोन होइछै जे मरि जाय.एहन जीवन से त' मुइनहि नीक.फेर, दूनू बच्चा के मुँह देखि शांत भऽ जाइत अछि.आठ बरखक सुधीर आ पाँच बरखक सरिता छैक.इसकुलक मास्टर कहैत छथिन्ह जे सुधीर पढ़ै मे बड्ड तेज छैक आ' तइँ एतेक मारि-गारि खेलाक बादो लोहनावालीक एकेटा मनोरथ जियौने छैक जे सुधीर पढ़ि लेतै त' सभटा कलेश दूर भऽजेतइ.सरिता त' बेटी छियैक.अनकर धन.बस कोनो नीक ठाम बियाह भऽ जेतइ तँ सभ चिन्ता दूर भऽ जेतइ लोहनावाली के....आँच एखनो नहि पजरलैए...बियनि तकैत लोहनावाली. रामावतार, लोहनावालीक जेठ भाय. बड्ड स्नेह करै छै लोहनावाली से रामावतार. कोनो एहन मास नहि होइछै जे ओ' नैहर से लोहनावाली ले सनेस नहि अनैत हो...सनेस की आब त' लोहनावालीक गुजरो नैहरेक बल पर होइ छै. हरदम पाइ-कौड़ी नैहर से अबैत रहैत छै.पन्द्रहो दिन नहि भेलैए दू गारी आमक चेरा पठा देने रहै रामावतार.एखनो सौसे दरबज्जा पसरल छै. पानि मरैले रौद मे देने रहए.ओही चेरा मे से एकटा घीचि के जुगेसरा राति मे मारने रहै लोहना बाली के. पाँजर मे एखनो कारी-सियाह चेन्ह भेल छै. ई चेन्ह त' तइयो मेटा जेतइ मुदा करेजा मे जे अपमान आ' दुत्कारक चेन्ह लागल छै से त' मुइनहि मेटैते....आँचर सँ नोर पोछैत लोहनावाली. परसू रामावतार आयल रहै. जाइत काल गोरलगाइ मे एक सय टाका दैत गेल रहै लोहनावाली के. एकमास से सुधीर किताब कीनि दै ले हल्ला मचौने छेलइ.पचास टाका किताबे किनइ मे खर्च भऽ गेल रहय.बीस टाका गामबाली काकी से पैँच लेने छल.सरिताक दबाइक खातिर. ओहो सधा देलकै. तीस टाका बचल छेलै.ओहे तीस टाका काल्हि साँझ मे जुगेसरा के देने रहै लोहनावाली आ' बेर-बेर बुझा के कहने रहय जे घर मे सिधहा खतम भऽ गेल छै से ई पाय कत्तौ अनतऽ नहि खर्च करबा लेल.....अनतऽ की......एहि पाय के पीबै लेल नहि.मुदा हेहर भऽ गेल छै जुगेसरा.कोनो मतलब नहि छै ओकरा जेना बहु बच्चा से. दारू भेट जाउ बस आर किछ नहि चाही.भरि दिन टहलानी मारैत रहै छै.कोने-कोन गाजा तकैत रहैत छै.महा निशाँबाज भऽ गेल छै...पीबि गेलै ओहो तीस टाकाक दारू.साँझखन छूछै हाथ डोलबैत अबैत देख लोहनावाली के तामश चढ़ि गेल रहए.तामश एहि दुआरे नहि चढ़ल रहए जे ओ की खायत,लेकिन धिया-पुता के कोना भूखले सूत' देतइ.साँझे सँ बाट तकैत छल चुल्हि लग बैसलि.एकोरत्ती मोन मे विचार नहि अछि? कोना के पी गेलियै?...एतबे बाजल रहै लोहनावाली कि धेले चेरा मारि देलकै जुगेसरा.लोक-लाजक डर की बाजत.चुप्पे रहि गेल लोहनावाली.ओहन झाँट-बिहाड़ि एलै किछु नहि बुझलकै ओ.सून्न भऽ गेल रहैक ओकर दिमाग जेना.सभटा चेरा भीजि गेलइ.सुधीर आ' सरिता मायक कोरा मे मूड़ी नुकौने निन्न पड़ि गेलै.भुखले सूति रहलै...आ टक-टक तकैत रहि गेल लोहनावाली....भरि राति कनैत रहल लोहनावाली. जखन लाल बहादुर शास्त्री देशक प्रधानमंत्री बनल रहथि तखन देशमे अन्न-संकट छल आ' ओहि समय मे गाम-घर मे एकटा प्रथा जनमल जे गृहणी लोकनि जखन सिधहा लगाबय लागथि तखन ओहि मे सँ एकमूठ्ठी चाउर निकालि के अलग राखि लैत छलीह आ' एकरा मुठिया चाउर कहल जाइत छल.एहि जोगाओल चाउरक उपयोग ओ' विपरीत काल मे घर चलैबाक लेल किनइ-बेसाहइ मे करैत छलीह.लोहनावाली सेहो माय के देखने रहै मुठिया चाउर जोगबैत आ' तइँ ओहो जोगा के रखइत छल मुठिया चाउर. पैर नहि उठैछै भनसाघर दिस जाइक लेल.की करतइ ? भरि राति धीया-पुता भूखले छै.जल्दी-जल्दी चुल्हा लग आयल जे किछ बना के देतइ बच्चा सभ के. सुधीर के बजेलक आ एकटा तौला मे राखल मुठिया चाउर के पोटरी बान्हि दालि किनबा ले दोकान पठा देलकै.ओही तौला मे सँ सिधहा सेहो निकाललक.आँच धधकि गेलै.कतेक दिन तक ओ चलेतै घर एहि मुठिया चाउरक बलेँ...सोचैत अछि लोहनावाली..अधहन चढ़बैत लोहनावाली...सुधीरक बाट तकैत लोहनावाली.आब तऽ एकटा सुधीरे सँ आशा छैक जकरा बलै दिन काटत लोहनावाली. ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। डा0 अरुण कुमार सिंह                                           मैसूर, कर्णाटक भाषा जातिगत सम्पत्ति नहि अपितु सामाजिक सम्पत्ति भाषाक उत्पति समाजमे भेल अछि आओर समाजक विकास भाषाक आधार पर होइछ। एहि तरहेँ भाषा आओर समाज दुनू अन्योन्याश्रित अछि। एहि मादे हम कहए चाहैत छी जे मैथिली भाषा कोनो जाति विशेषक सम्पत्ति नहि अपितु ई तँ सामाजिक सम्पत्ति थिक। सामाजिक व्यवहारे भाषाक मुख्य उद्देश्य अछि। भाषाक विकास आ संरक्षण समाजमे होइछ आओर एकर प्रयोग सेहो समाजमे होइछ। मैथिलीकेँ दूरगामी क्षति पहुँचाबैवला किछु लोकक कहब अछि जे घर-घरारी सदृश मैथिली सेहो हमरा सभक पैतृक संपत्ति अछि, जे कि सर्वथा अनुपयुक्त, किएकतँ सम्पूर्ण मिथिलामे रहएवला सभ वर्गक नेना जन्मेसँ अपन मातृभाषा मैथिली बजैछ। हमसब भाषाक बलेँ असगरमे सोचैत एवं मनन करैत छी मुदा ओ भाषा एहि सामान्य यादृच्छिक ध्वनि-प्रतीक पर आधारित भाषासँ भिन्न होइछ। भाषा आद्योपांत समाजसँ संबंधित होइछ।भाषा एक सामाजिक सम्पत्ति अछि। एहि सँ स्पष्ट होइत अछि जे कोनो साहित्यकार वा भाषाप्रेमी भाषाक निर्माता नहि भए सकैछ। भाषामे होइबला परिवर्तन व्यक्तिकृत नहि भएकें समाजकृत होइछ। भाषाक सामाजिक स्तर पर अन्तर भए जाइछ। विस्तृत क्षेत्रमे बाजल जायवला भाषाक आपसी भिन्नता देखल जाए सकैछ। सामान्य रूपमे सम्पूर्ण मिथिलाक लोक मैथिलीक प्रयोग करैछ,मुदा अलग-अलग क्षेत्रक मैथिलीमे पर्याप्त भिन्नता होइछ। एहन भिन्नता ओकर शैक्षिक, आर्थिक, व्यावसायिक, सामाजिक,सांस्कृतिक तथा भौगोलिक स्तरक कारणेँ होइछ। पढल-लिखल लोक जतबा साकांक्ष भएकेँ भाषाक प्रयोग करैछ, साधारण अथवा बिनु पढल-लिखल लोक ओतेक साकांक्ष भएकेँ भाषाक प्रयोग नहि कए सकैछ। एहन स्तरीय बात कोनो भाषाक समय विशेषमे कएल गेल भाषा-प्रयोगसँ अनुभव कएल जाए सकैछ। विश्वक सबटा काजक संपादन प्रत्यक्ष वा परोक्ष रूपेँ भाषेक माध्यमसँ होइछ इ तथ्य सर्वमान्य अछि। सबटा ज्ञान भाषे पर आधारित अछि। व्यक्ति-व्यक्तिक संबंध वा समाज-व्यक्तिक संबंध भाषाक अभावमे असंभव अछि, इहो भाषाक सर्वव्यापकताक प्रबल प्रमाण अछि। मनुष्यक संग-संग भाषा सतत गतिशील रहैछ। समाजक संग भाषाक आरंभ भेल आओर आइ धरि गतिशील अछि। मानव समाज जा धरि रहत ता धरि भाषाक अस्तित्व बनल रहत। कोनो व्यक्‍ति वा समाजक द्वारा भाषामे कमोवेश परिवर्त्तन कएल जाए सकैछ, परंच एकरा समाप्‍त करबाक सामर्थ्य ककरोमे नहि रहैछ। भाषाक परिवर्त्तनशीलताकेँ व्यक्‍ति वा समाज द्वारा रोकल नहि जा सकैछ। संसारक सभ वस्तु सदृश भाषा सेहो परिवर्त्तनशील अछि। जेना-संस्कृतमे ‘साहस’ शब्दक अर्थ अनुचित वा अनैतिक काजक लेल उत्साह देखाएब छल, मुदा आब ई शब्द मैथिलीमे नीक काजमे उत्साह देखैबाक अर्थमे प्रयुक्त होइछ। भाषा परिवर्त्तनशील अछि। इएह कारण अछि जे सब भाषा एक युगक बाद दोसर युगमे पहुँचि कए बहुत फराक भए जाइछ। एहि प्रकारेँ परिवर्त्तनक कारणेँ भाषामे विविधता आबि जाइछ। जँ भाषा-परिवर्त्तन पर साफे नियंत्रण नहि राखल जाएत तँ तेजीसँ परिवर्त्तनक परिणामस्वरूप किछुए दिनमे भाषाक रूप अबोध्य भए जाएत। भाषा-परिवर्त्तन पूर्ण रूपसँ रोकल तँ नहि जा सकैछ, परंच भाषामे बोधगम्यता बनाकेँ रखबाक लेल ओकर परिवर्त्तनक क्रममे एकटा मानक रूप रहब अति आवश्यक। अन्ततः हम कहए चाहब जे भाषा अपन समाजक संप्रेषणक अन्यतम साधन थिक। एकर माध्यमसँ वर्त्तमान एवं अतीतकेँ परखल जा सकैछ संगहि ओकर भूत एवं वर्त्तमानक पृष्‍ठभूमि पर भविष्यकेँ देखल जा सकैत अछि। भाषा मुखरित भए व्यक्‍तिकेँ सम्प्रेषित करैछ, मुदा कतेको बेर मौन रहि सम्पूर्ण समाजक भावनाकेँ अभिव्यक्‍त कए दैत अछि। भाषाकेँ भाषेक माध्यमसँ बुझल जाइछ आ तेँ ई प्रक्रिया एतेक सरल प्रतीत होइत अछि। यद्‍यपि इहो देखल जाए सकैत अछि जे हमसब एकर सही क्षमताकेँ नहि आंकि दिगभ्रमित भए जाइत छी। अंततः समाजेकेँ बहुत रास चीज गमाकेँ एकर क्षतिक आकलन करए पड़ैत छैक, जे कि कोनो भाषाक विकासकेँ अवरूद्ध ओ गतिहीन बनबैछ। *************** ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। डॉ. कैलाश कुमार मि‍श्र कथा चन्‍दा (गतांशसँ आगू..) चन्‍दा मोने-मन प्रसन्न भेलीह- “चलू, बाबूजी हमरा अतेक सि‍नेह करैत छथि‍। हे भवाबान! जन्‍म-जन्‍म भरि‍ एहने पि‍ता देब। ओना माइयो कुनो अधलाह नै कहलनि‍। अतेक सांझ धरि‍ आमक गाछीमे हमरा नै रहबाक चाही।” मुदा माता-पि‍ताक प्रसंगसँ चन्‍दाकेँ एक लाभ ई भेलनि‍ जे चन्‍दा राघवक कमीकेँ कि‍छु क्षणक हेतु बि‍सरि‍ गेलीह। भोजन-भात करैत राति‍क आठ बाजि‍ गेलैक। चन्‍दा अपन दू छोट बहि‍न सबहि‍क संग सूति‍ रहलीह। कनीकाल राघवकेँ स्‍मरण एलन्‍हि‍। तामसो चढ़लन्‍हि‍- “कतए चलि‍ गेलाह राघव! भेँट नै भेलाह।” फेर भेलन्‍हि‍, “भऽ सकैत अछि‍ कुनो प्रयोजनसँ कतौ गेल होथि‍। काल्‍हि‍ तँ भेँट भइये जाएत। मोन भेलन्‍हि‍, राघवकेँ पुछबनि‍ जे कतए गेल रही। मुदा लोक अगर सुनत तँ की कहत। राघव सेहो की सोचताह! फेर वि‍चारलन्‍हि‍, कि‍छु नै कहबन्‍हि‍।” अही तरहक अनेक वि‍चारक श्रृंखलामे चन्‍दा तल्लीन भऽ गेलीह। पता नै सोचैत-सोचैत कखन नि‍सभेर भऽ गेलीह। भोरे उठि‍ चन्‍दा नवका पोखरि‍ दि‍स स्‍नान करक हेतु वि‍दा भेलीह। सोमक दि‍न रहैक। माय कहलथि‍न्‍ह- “चन्‍दा, पंचमुखी महादेवकेँ आइसँ हरेक सोम एगारह लोटा अछि‍ंजल चढ़ाउ। गंगेश पण्‍डि‍त कहलन्‍हि‍ अछि‍ जे ऐसँ अहाँक कल्‍याण हएत।” बुलेसर बाबू पत्नीसँ पुछलखि‍न्‍ह- “गंगेश पण्‍डि‍तजी कल्‍याणक अर्थ की कहलन्‍हि‍?” चन्‍दाक माय- “कल्‍याणक अर्थ ई भेल जे चन्‍दाकेँ योग्‍य घर-वर भेटतनि‍। सोम दि‍न महादेव आ पार्वतीक दि‍न छन्‍हि‍। सोमक जल ढारक बड्ड महत छैक। ताहि‍सँ सोलचौं, गंगेश पण्‍डि‍त जीक उक्‍ति‍सँ चन्‍दाकेँ अवगत करा दि‍यन्‍हि‍।” बुलेसर बाबू पत्नीक बातकेँ स्‍वीकृति‍ गर्दनि‍ हि‍ला देलखि‍न्‍हि‍। कि‍दु बजलाह नै। मोने-मन भोलानाथसँ व्‍याहुत बेटी लेल नीक वरक वरदान अवश्‍य मंगलन्‍हि‍। सभकेँ ठसकसँ लगानीपर द्रव्‍य आ वस्‍तु देनि‍हारक हाथ आइ भगवान भोलानाथ लग आर्त-भावसँ लेबाक लेल पसरल छलन्‍हि‍। कनीक क्षण लेल अनुभव भेलन्‍हि‍ जे बेटीक बाप भेनाइ केकरा कहैत छैक!! खैर! चन्‍दा फुलडाली, फुलही लोटा, वस्‍त्र, बांसक कर्चीक दतमनि‍ लऽ नवका पोखरि‍ दि‍स वि‍दा भेलीह। एकपेरि‍या रस्‍तामे चलैत मोने-मन उमंगमे डूमल जे आ राघवसँ भेँट हएत। उल्‍लसि‍त मोनसँ चलैत नायि‍का सेहो एकपेरि‍या रस्‍तापर अपन शरीर आ सोचक संग एक अनुपम सामंजस्‍य स्‍थापि‍त कऽ लैत अछि‍। मोन जेना-जेना अपन सोचमे उतार-चढ़ाव, गति‍, उद्वेग, तरंग अनैत छैक, तहि‍ना शरीरक अंग सभ प्रदर्शन कए मोनक भावनाकेँ व्‍यक्‍त करैत छैक। चन्‍दो संग सएह भेलन्‍हि‍। भरि‍ रस्‍ता चन्‍दा कखनो राघव तँ कखनो अपन माइक कहल आदेशक सम्‍वन्‍धमे सोचैत रहली। राघवपर चन्‍दाकेँ तामस आ सि‍नेहक भाव एक्के संग आबए लगलन्‍हि‍। तामस ऐ हेतु जे राघव कतए गेला बि‍ना कहने।” सि‍नेह ऐ दुआरे जे राघव बड्ड नीक लोक अछि‍। सोचलन्‍हि‍- गरीब तँ छथि‍ राघव, मुदा छथि‍ व्‍यवहार आ वि‍चारसँ नीक। चन्‍दाकेँ एक क्षण लेल पहि‍ल बेर ई एहसास भेलन्‍हि‍ जे शायद राघव हुनका जीवनमे बहुत पैघ स्‍थान रखैत छथि‍न्‍ह। चन्‍दाकेँ यादि‍ आबए लगलन्‍हि‍ कबड्डी आ नूका-चोरी। चन्‍दाकेँ यादि‍ एलन्‍हि‍ तीन-चारि‍ वर्षक पूर्वक एक घटना जखन चन्‍दा कि‍छु आर लड़का-लड़की संगे मि‍लि‍ कऽ कनि‍या-पुतराक खेल खेलाइत छलीह। राघव सेहो आइ खेलक पात्र छलाह। राघवकेँ घरमे कि‍यो नै रहन्‍हि‍। दुपहरि‍याक समए छलैक। पाँच-छह नेना सभ कनि‍या-पुतरा खेलाए लागल। भेलैक ई जे ऐ खेलमे एक बर आ एक कनि‍या हेतैक। कनि‍याक पि‍ता आ माता हेतैक। बर आ कनि‍याक बि‍आह हेतैक। गीत-नाद आ वि‍धि‍ बेवहार हेतैक। चन्‍दा बनलनि‍ कनि‍या आ राघव बर। दुनुक बि‍आह भेलन्‍हि‍। गीत-नाद भेलैक। चतुर्थी भेलन्‍हि‍। कोहबर बनलै। कोहबर घरमे चन्‍दा आ राघव बर कनि‍या बनि‍ आराम करए गेलाह। कोहबर घर की तँ राघवकेँ पि‍ताक मच्‍छरदानी टांगि‍ ओकर चारू कात नूआसँ झांपि‍ देल गेलैक। राघव आ चन्‍दाकेँ कोहबर घरमे राखि‍ सभ बच्‍चा सभ थोड़ेक कालक हेतु बाहर चलि‍ गेल। राघव आ चन्‍दा अपना-आपकेँ ठीकेमे बर-बनि‍या मानि‍ एक दोसरकेँ पकड़ि‍ सूति‍ रहलनि‍। कनीक-कालक बाद बच्‍चा सभ आबि‍ गेलैक। चन्‍दा यएह सभ सोचैत-सोचैत नवका पोखरि‍ दि‍स जाइत छलीह। कखनो कमर लचकन्‍हि‍ तँ कखनो वक्ष हि‍लय लगन्‍हि‍। कखनो नि‍तम्‍ब डग-मग करए लगन्‍हि‍ तँ कखनो आनंदाति‍रेकमे अवते चलबाक गति‍ तेज भऽ जाइन्‍हि‍। जखन तेज चलथि‍ तँ वक्ष आ जखन नहु-नहु आनन्‍दि‍त होइत चलैत तँ नि‍तम्‍ब डोलए लागन्‍हि‍। दुनू अवस्‍थामे चन्‍दा लगैत छलीह सुन्‍दरि‍, आकर्षक......। फेर चन्‍दाकेँ भेलन्‍हि‍ जे राघव तँ हमर कुनो मूलो-गोत्रक नै छथि‍। तखन की चन्‍दा आ राघवकेँ बि‍आह भऽ सकैत छन्‍हि‍? फेर सोचलन्‍हि‍, केना हेतैक? एक्के टोलमे जे छी। आर राघव तँ गरीब घरसँ छथि‍। हमर पि‍ता कखनो ऐ लेल तैयार नै हेताह। ई सोचैत चन्‍दाक चालि‍ मध्‍यम भऽ जाइन्‍ह। माथपर पसीना आबए लगलन्‍हि‍। चेहरा उदास भऽ गेलन्‍हि‍। मुदा सुन्‍दरता अपन दोसर रूपमे प्रस्‍फुटि‍त होइत रहलन्‍हि‍। नि‍तम्‍ब नहु-नहु उभारक प्रदर्शित करए लगलन्‍हि‍। आब चन्‍दा अपन बि‍आहक संबंधमे सेचए लगलीह। केकरासँ बि‍अाह हएत? ओ लड़का केहेन हेतैक! हमरा संग ठीक बेवहार करत की नै? छोटकी बहि‍न सभकेँ जि‍म्‍मेवारी माय असगरि‍ केना सम्‍हारतीह। आदि‍-आदि‍। फेर चन्‍दा अपना-आपकेँ भगवान भोलानाथपर छोड़ि‍ देलन्‍हि‍। मोने-मन गाबए लगलीह- “पूजाक हेतु शंकर, आएल छी हम भीखारी।” यएह सोचैत-सोचैत चन्‍दा आबि‍ गेलीह नवका पोखरि‍ लग। पोखरि‍सँ ठीक पहि‍ने राघव केर दलान। दलानपर राघवकेँ पुन: नै देखलखि‍न्‍ह। मोन रोष आ अव्‍यक्‍त वि‍रहसँ वि‍दग्‍ध भऽ गेलन्‍हि‍। चारू कात देखलनि‍। मुदा राघव कतौ नै। चन्‍दाक मुँह ओइ फूल जकाँ मुरझा गेलन्‍हि‍ जकरा तोड़ि‍ लोक जेठक प्रचण्‍ड रौदमे छोड़ि‍ दैत छैक। नि‍ष्‍ठुर राघव कि‍एक कतौ बि‍ना कहने चलि‍ गेलैक। खैर! चन्‍दा चारू कात राघवकेँ तकलन्‍हि‍। मुदा राघव जखन घरपर रहतथि‍ तखन ने चन्‍दाकेँ भेट होइतन्‍हि‍। अन्‍तमे चन्‍दा मन्‍दि‍रक पाछाँ फुलवारीमे फूल लोढ़ए गेलीह। चम्‍पाक गाछमे पीअर-पीअर रमनगर आ सुगन्‍धि‍त चम्‍पा फुलाएल रहैक। रहैक मुदा बड़ ऊँचका ठाढ़ि‍पर फुलाएल। चंदा सोचलीह चलू अही बहाने राघवक घर जाइत छी। ई सोचैत चंदा राघवक घरपर आबि‍ गेलीह। राघवक माएकेँ पुछलखि‍न्‍ह- “काकी, हमरा चम्‍पा-फूल पंचमुखी महादेवकेँ चढ़ेबाक अछि‍। मुदा फूल तँ बड्ड ऊँचका डारि‍पर फड़ल छैक। हम नै पबैत छी। कनी राघवकेँ कहबनि‍ जे कि‍छु फूल तोड़ि‍ देताह?” राघवक माए कहलखि‍न्‍ह- “बुच्‍ची, राघव तँ मातृक काल्‍हि‍ भाेरे गेल। कलकत्तासँ ओकर छोटका मामा-मामी सपरि‍वार आएल छथि‍न्‍ह। कहि‍ कऽ गेल अछि‍ जे सात-आठ दि‍नक बाद आओत। आब अहीं कहू जे केना फूल टुटत?” फेर कि‍छु देर सोचैत राघव केर माए अंगनासँ एक गोट पाहुनकेँ बजेलखन्‍हि‍। जे जरैलसँ अपन बहि‍न लग आएल छलाह। ओइ पाहुनकेँ कहलखि‍न्‍ह- “यौ पाहुन, ई थीकीह चन्‍दा, हम्‍मर गामक बेटी। हि‍नकर पि‍ता बड्ड कलामा। ई भगवान पंचमुखी महादेवकेँ चढ़ेबाक लेल कि‍छु चम्‍पा फूल तोड़ए चाहैत छथि‍। मुदा फूल गाछक फुनगीपर लागल छैक। कनी अहाँ हि‍नका फूल तोड़ि‍ दि‍यौन्‍ह। फूल तोड़ैबला सेहो फूल चढ़बैबला अतेक धर्म होइ छैक। राघव रहैत तँ कुनो बाते नै। ओ मातृक गेल अछि‍। कनी, अहीं फूल तोड़ि‍ दि‍यौन्‍ह चन्‍दाकेँ।” पाहुन हाथमे लग्‍गी लऽ बि‍ना कि‍छु कहने चम्‍पा फूल तोड़ए लेल चन्‍दा संग बि‍दा भेलाह। क्रमश: ...................... ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। कामिनी कामायनी

संटू क उपनैन बसकट्टी धरि त’ सब किछु बड नीक जकॉ चलि रहल छल . ।मंझौल वाली काकी अपन .चारों पोता के उपनैन लेल कहिया .सॅ नहि देवता पीतर के भखनै छलीह. . . . . . चारों परदेया बेटा आखिर छुट्टी ल क’ गाम में आबि क’ उपनैन करए लेल तैयार की भेला . . कका काकी के जेना बूडल राज्य भेंट गेलन्हि. . .चारू दिस जेना रोनके रौनक । पूरा घर दलान ढौरल गेल. . .खेत खरिहान साफ सफाई भेल ।दलान क सोझा राखल जारैन गोरहा सब के पछुअ‍ैती में आमक गाछक तर तेना क’ तह लगा क’ राखल गेल जे क’ल’ प’ हाथ पैर धोबै लेल आबय वला लोकक नजरि में नै गडै । पछवारि टोल .. .टोलबा प’ कत्त कत्त नै लोक दौडैत रहै दिन भरि. . . काजक ब्योंत में .. । “हे .. ओकरा सब के साफ सुथरा में चलए. . बूलए के आदति छैक .. . .ई गामक रस्ता .. .आ’ ओहि में बसबिट्टी. . . . . . . कनि महेसबा के कहियौ. . .नीक जकॉ एतए सॅ अपन बसबिट्टी धरि के रस्ता साफ करि देतै. . .भरि टोलक लोक त’ जेना . . . ।” काकी. महेसबा के माय सॅ बजैत बजैत. .नाक भौं सिकोडति अपन ऑचरि उठा क’ नाक प’ राखि नेने छलीह ।ओ कठजीव. . . तुरंते आबि क ल’ग में ठाढ़ ‘हजार रूपैया सॅ कम नञि लेब .. .एतेक गंदा है ऊहॉ .. . .।”ओ अलगे नाक ऑखि मूनैत. . भिनकैत भिनकैत जेना बाजल त’ काकी तुरंते हामी भरि देलखिन्ह. ‘रे .. .जो. . न । .. पाय कौडी जे हेतै से त’ देबे करबौ न।’ आ. बसकट्टी के बाद महेसर. . अपन गाल बजबैत .. . जनानी सॅ भरल ऑगन में अंगेठी. मोचाड लईत बाजि रहल छल. ‘दू .दिन से. . बलू. . . . . . टोली वला सब के रोकने रहियै. . .ऊहॉ गंदा नै करै लै .. .छौडा सब के बिस्कुट चॉकलेटक लालच देलियै. . . देखलियै . . .आहॉ सब कत्ते साफ सुथरा हल्लै. . .सडक . .. आ’ बसबिट्टी. . . एतेक साफ त’ कलक्टरो के नै रहै. . . ।’ गणेश .सुरेश .. .दिनेश तीनों संगहि बाजल. . . “तैं न तोरा प’ ई बडका काज छोडल गेल छलौ. . .तू बड काबील छै. . .।’ ताबैत में सॅझला भाय मॉ के तकैत आंगन में अयला . ‘हलवाय के कत्त बैसैल जाए. ।’ काकी झट दनी भगवती घर सॅ कोनो काज छोडि बहरेली. “ललन बाबूके दरवज्जा प’ बैसाबही नै .. . ओतय अ’ड’ छै. . . आ’ जगहो चौरस. . ।’ म्ॉझला भाय जे चारों कात खरिहान सॅ ल’क’ पिछुबाडि धरि साफ सफाई भेल जगह के फेर सॅ साफ करबा में लागल छलाह ‘कुटुम सब के एला सॅ पहिनहीं चारों लैट्रिन बाथरूम एकदम चकाचक भ’ जेबाके चाही।” छत के ऊपर मॅडबा बनाओल गेल छल .. मॅडवा. छाजए के .. . .. .चरखट्टी के .मधुर .. गीत नाद सॅ चारो कातक वातावरण मॅह मॅह करए लागल छल . .. लाल पीयर धोती .. .अंगना सॅ छत धरि डोरी प’ सुखैत. .बड मनोरम दृश्य उत्पन्न केने छलै. . । कुम्हैनिया के ऑगन में पैसैत मातर .. .दीसपुर वाली पीसी चिकरए लगलीह ‘आय गै. . .आब तोरो सबके बिदागिरीए करबा क’ आनल जेतौ .. . .दू दिन सॅ मुनमा . .दौग दौग क’ जा रहल छै. . कुम्हर टोली .. .आ’ तोरा सब के कनियो दरेग नैं .. जे जल्दी जल्दी हाथी घोडा रैंग ढोर क’ पठाबी. . . अखन बरूआ सब बरमस्थान जेतै .. .घोडा चढाबए लेल. . . आ’ तू एखने आबि रहल छैं. . मार बाढैन तोरा. . ।’ कुम्हैंनियॉ .. .गोगैं करैत बाजल “दीदी. . .केते लगन हैक भरि गाम में . . .मूडन . .उपलैन. . .वियाह. . . हाली हाली त’ सबके समान पहुॅचाईये रहल छिये . .”आ हुनक क्रोध सॅ बचाबा लेल दॉत निपोरि क’ ठिठियाय लगलै. . . । “नेग दियौ. . बडकी पीसी बरूआ के. ।” “हे . .हम बरूआ के बापे के पीसी छिए. . . .छिनरो .. .ई हो नै .. बूझल छौ. . .।” बडकी पीसी ओकरा दबाडैत. . . .चिकरैत बजली ‘गै आबै जाही बरूआ के पीसी सब. . .कुम्हेंनिया के नेग दै जाही ।” नेग खोंईछ में राखैत. .ओकरा मुॅह प’ प्रसन्नता के लहरि दौड गेल रहै । गोटागोटी करैत सब कुटुम सब आबि गेलाह. . .दलान प’ पूरूख आ’ घर ओसारा प’ स्त्रीगण . .. । बिध बाध सबटा ऊपर छत प’ मॅडबा लग भ’ रहल छलै. . .जेठ मास. . .सरबत लस्सी सब के इंतजाम करि क’ राखल छल. तौला के तौला जमल दही बोरा मे भरल चूडा. मूॅगबा पैनतोआ . मुदा परसनहारे निपता . .. हलवैया .. .एखनधरि. . .आगि नै पजारने . “ मार बाढनि जनपिट्टा के. . .रै बौआ .. .केहेन हलबैया आनलैंहै. ।” संझला भाय कुरसों वाली पीसी के गप प’ ही ही करि क’ हॅसए लगला “ततेक लगन छै. . .सबटा हलवैया .. .पहिनहीं सॅ बुक .. . एक गोट पीपरौलिया बाला गछने छल. . .एन मौका प’ धोखा द’ देलकै. . .ई नब छै. . .हमरे ओतए सॅ काज सीखतै. . . ।” “केहेन जुलुम केलही तुहु रे .. ऐ सॅ’ नीक त’ हमरे कहितहि त’ सब मिल जुल क’ भानस करि दैतियौ।” किनको पानि भेटन्हि त’ चाह नै. . .किनको दबाए खेबाके रहैन्ह .. मुदा भिनसरे सॅ बासी मुॅहे. . .।भीषण अव्यवस्था . .... ब्डकी कनिया घोघ तर. सॅ छोटकी ननदि के बजौलखिन्ह .. “कीचन में जाकए फटाफट .. कुकर में भात चढा दियौ. . .दीदी सब भूखले छथिन्ह .. .हलबाई सॅ दालि तीमन आनि क’ हिनका सब के खुआ दैतियैन्ह . ।” मॅझिला भाय के सासुर सॅ बड बेशी पाहुन आ’ सबसॅ कम चुमौन .. . .. ।पाहुनक खातिर दारी हुनके प’ छलैन्ह .. .मुदा बडका पद सॅ रिटायर्ड ससुर के कुरसी लग नीचा बैस क’ ओ हुनकर म्ूॅह देखैत पैर में चुरूक भरि तेल पचब ‘में लागि गेल छलथि ।बडका भाय ब्रह बनल मडॅवे प’बैसल .. .सॅझिला हलुवाई के टीक प’ ठाढ़ . .कतहॅू किछु चोरा नै लिअ .. .छोटका. . जै पाहुन दिस खेनाय पिनाय ल’क’ जाथि. . . ओहि ठाम बैस मुख्यमंत्री बनबा के अपन उत्कृष्ट महत्वकांछा के घोडा प’ घोडसवारी करए लागैथ. . . बचला . .कका स्वयं . . .त’ अस्सी बरखक अथबल . . सुनाईयो नहि पडैन्ह. . ।

मॅझली भौजी . . .अपन तीनों भौजाई . .बहिन आ’ माय के ल’क’ घरक पट बंद करि लेलथि ।दू घंटा के बाद पट खुजलै. . .त’ छोटकी ननदि सबहक कान में फुसफुसा क’ कहि रहल छलीह ‘देखलियै .. जादू. . .आयल छलैथ त’ सब केहेन कारी कारी झमारल झमारल . . . .आ’ घर बंद करि क’ कोन एहेन क्रीम पाउडर लगैेलथ जे सब गोर गोर. . .कि कपडा लत्ता. . .बनारसी . पटोर. . ।” बडकी भौजी छोटका भायके बरूआ के केश नेने छलथि ताहि लेल ओ अनौने .. . .।काकी .कहनौ छलखिन्ह. “बडकी बीमारे रहै छै. . .मझॅलीए ल’ लैतै केश. . ।” त’ मॅझली चट सॅ चमकि क’ बजलीह “ंंमॉ हमरा सधा क’ पठौतिह. . ।” हारि क’ बडकीए कनिया के लेबए पडलै केश . .। सबसॅ मुॅहजोर मैझिली. . . . . कत्थी लेल ककरो एक रत्ती पानियो लेल पूछतथि ।बेर बेर नूआ फेर क’ अपन संबंधी लग जा बैसैथ ।बिध लेल सोर होय “है मॅझली भौजी .. .है. . संटु के धोती दियौ नै. . .।’ कनि भन भनाइत कनि मुॅह चमकाबैत .. . रानी रूपमती के अंदाज में अपन पएर उठबैत आबैथ । “चारू बरूआ के समान एक ठाम डाला प’ राखि दियौ. . ।बेर बेर आबए पडै छै. . .।’ ननकू बाजल त’ मॅझली अपन करिया मुॅह चमकाबैत .. . बजलीह “सबहक हम ठेका नेने छी की. . . हमरा संटु बाबू सॅ मतलब अछि ।’ दनौही में . . .बरूआ सब नहा ‘क’ ठाढ़ . .बडकी भौजी छोटका बरूआ के बिधकरी .. .ओकरे में लागल. . .अपन बेटा के धोती कुरता बिसरि गेलथि ।काकी के तामस चढय लगलै. . मॅझली के छोट बुद्वि के जबाब नै. . एतेक दिन सॅ बाहरि रहै छै. . तैयो. .किछो बाजबै त’ भरल आंगन में घिनमाघिन करए लागत ।” कल्याणपुर वाली पीसी एईठ क’ बजली” ऐ बाहर रहने की होय छै. . चालि .. प्रकृति .. बेमाय .. ई तीनों संगहि जाय. . .माय केहेन छै. . ककरो सॅ बजबो नहिकेलकै. . दछिनाहा सब. . ।” ननदि सब फेर ननकू के निहोरा करि क दौडेली . ‘जो बौआ भगवती के सोझा में ललका डाला प’ शुभम के पीरा धोती राखल छै. नेने आ दौडल .. ।”ओ बिफरल “हम त’ मझली भौजी के पहिनहि कहने रहियै. . कहलखिन्ह जे ठेका लेने छियै ।” मुदा ननकू जल्दी सॅ सायकिल सॅ जाकए धोती नेने आयल । उम्हर पोखरि सॅ घुरि क’ ऑगन पहुॅचैत मातर दोसरे दृश्य . . .हलवैया एखन धरि भोजन नै बनौने .. . तरकारी बनि क’ एक दिस राखल . . .आब पूडी छानय लेल लोहिया चढा रहल छल. . . “एै रौ. . .एतेक देर किएक भेलौ. ।सांझ पडि रहल छै .. कुटुम सब भुखलै. . बैसल छथि .. ।”बडकी पीसी के गप प’ हलवैया बाजल. . . ‘तखनी सॅ चाह कौफी. . बनाय रहल छलीयै. . मंझली कनिया आबि क’ कहलखिन्ह. .दस बीस गो परोठा बना दिय हुनकर बाबू भाय सब नै खेने छथिन्ह .. ।” “हलबैया लग सॅ सब टा रसगुल्ला गायब छै. . कन्हैया कहलकै .. मॅझली कनिया कोठरी में पहुॅचा दै लेल कहने छलखिन्ह ।”छोटकी ननदि का्रेध मगज प’ चढल .।काकी क’ ल जोरि के बेटी के चुप करौलन्हि. ‘ . घिना नै . .कत्तो सॅ सुनतौ त’ जुलुम भ’ जेतै .।’ “छोटका दियर आबि क’ मॅझली भौजी के कहलखिन्ह “भौजी अहॉ अपना सर कुटुम के त’ भोजन करा दियौ ।” रंगल टीपल मुॅह प’ विचित्र सन भाव आनैत पटुआ सन तित स्वर में बाजि उठलीह ‘लाज नै होईत अछि .. ।’ई वाक्य के व्याख्या तखन भेल जखन पोल खूजलै जे ओ त’ पहिनहीं अपन कुटुम सब के खुआ पिया चुकल छलीह .. मुदा चाहै छली जे सब कियो हुनके कुटुम के आव भगत में लागल रहै . मॅडबा प’ बरूआ सब के भीख देबा काल .. मॅझली फेर अडि गेली “पहिनै हुनके माय भौजाय भीख देथिन्ह. ।”काकी के मन घोर भ’ गेलन्ह ।बडकी पीसी आगॉ बढि क’ बजलीह “कनिया पहिने घरक लोक भीख देतै ..तखन बाहरक़ . ।अहिना बिध होईत छै. . .।हुनक ऑखि लाल होमय लगलैन्ह . .माथ प’ कनि घोघ तानैत .. .कन्हुआ क’ बडकी दियादिनी दिस देखली .. । ‘एकरे खातिर माथ प’ नूआ आ घोघ तानए पडैत अछि .. ।’मोने मोन गरीयेने छलीह ।मुदा मोन मसोसि क’ भिक्षाटनक विधि संपन्न होमय देलखिन्ह । उपनैनक परात चारूकात अहि बातक चर्च होमय लगलै. . ‘मंझली कनिया के सबटा कुटुम बिगैड क’ चलि जायथ रहलखिन्ह. . .नीक जकॉ सुआगत जे नहि भेल रहैन्ह. . ।’ छोटका भाय अपन कपार ठोकैत बजला “आहि रे बा. . सब के छोडि क’ हुनके सब में लागल रहितहू सब गोटे. ..अपन जमाय बेटी त’ सब लाज धाक तजि क’ लागले छलैन्ह ।जै कुटुम के आव भगत में त्रुटि रहि गेलन्हि. . ओ बेचारा सब त’ किछु नहि बजलखिन्ह. . ।” काकी ऑखि सॅ ईसारा करि ओहि प्रसंग के समाप्त करबा लेल कहि क’ ओहि ठाम सॅ उठि क’ जायत रहल छलीह। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। १.दुर्गानन्‍द मण्‍डल-कथा- कुकर्मा २. परमेश्वर कापड़ि, संयोजक मिथिला राज्य संघर्ष समिति/ परमेश झा अनिलचन्द्र झा ३.पूनम मण्डल-मिथिला विभूति स्मृति पर्व समारोह २०१२ १ दुर्गानन्‍द मण्‍डल कथा- कुकर्मा मि‍थि‍लांचलक राजधानी जि‍ला मधुबनी धरमपुर गाममे एकटा प्रकाण्‍ड वि‍द्वान ज्‍योति‍षी रहै छलाह। ज्‍योति‍षी वि‍द्यामे एकदम नि‍पुण जइसँ भूत, वर्त्तमान आ भवि‍ष्‍यक नीक ज्ञाताक रूपमे जानल जाइ छलाह। एक दि‍न मधेपुर प्रखण्‍डक लौफा गामसँ सत्‍यनारायण भगवानक चौपहरा पूजा करा सबेरे-सकाल गाम अबै छलाह। बाटमे, जोरला गाम जखन एलाह तँ देखलनि‍। हाइ स्‍कूल जोरलाक पाछाँमे बहति मरता धारमे एकटा नरमुण्‍ड धारक कातमे राखल छैक। जइपर लि‍खल छलै “कि‍छु कर्म भऽ गेलै आ कि‍छु बाकी अछि‍। एकटाक जनम आ तीनक मृत्‍यु।” ज्‍योति‍षी जीकेँ हरलनि‍ ने फुड़लनि‍, नरमुण्‍डकेँ उठा झोरामे रखि‍ लेलनि‍। घर आबि‍ चुपचाप, एकटा उज्‍जर कप्‍पासँ बान्‍हि‍, चि‍नवारमे खोंसि‍ देलनि‍। मुदा पण्‍डि‍ताइनकेँ ऐ संबंधमे कि‍छु ने कहलकनि‍। एक-आध दि‍नक बाद पण्‍डि‍ताइनक नजरि‍ ओइ उज्‍जर कप्‍पापर पड़लनि‍। सोचथि‍ आखि‍र की बात छिऐ जे आन दि‍न जे कि‍छु ज्‍योति‍षीजी लाबथि‍ तँ हलसि‍ कऽ कहथि जे पण्‍डि‍ताइन ई लि‍अ उ लि‍अ, हे एकरा राखू ओकरा उसारू। मुदा.....।‍ पण्‍डि‍ताइनकेँ हरलनि‍ ने फुड़लनि‍ ओ जि‍ज्ञासावस कप्‍पामे बान्‍हलकेँ उतारि‍ कऽ देलखनि‍, नरमुण्‍ड देखि‍ते बताहि‍ भऽ गेलीह आ तामसे ओइ नरमुण्‍डकेँ उक्‍खरि‍मे दऽ समाठ लऽ बढ़ि‍यासँ कुटि‍ बुकनी-बुकनी कऽ देलनि‍। आ एकटा सीसीमे ओइ बुकनीकेँ भरि‍ भनसा घरक चारमे खोंसि‍ देलनि‍। आ सगर पोखरि‍मे एकटा मात्र पोठी जे कहबी छै, अति‍ सुन्नरि‍ नाम सुनयना वएस सोलह बर्ख अपन बेटीकेँ कहलनि‍- “ऐ सीसीमे माहुर अछि‍। एकरा कि‍यो ने छुअए आ ने खाए, जौं खएत तँ मरि‍ जाएत।” सुनयना नामक अनुरूप ओतबे सुन्नरि‍। बेस गोरि‍-नारि‍ नमगर-छड़गर-पोरगर केराक वीर जकाँ कोमन आ सुन्‍दर। सोल्‍हम साउन पार केने, अनेरे आँखि‍योक भाषासँ गप्‍प करैवाली। सुनयनाक आँखि‍मे धार तेहेन जे बि‍नु कटनहि‍ आँखि‍सँ घाएल करैवाली। दि‍न-राति‍ प्रेमक बोखारमे बौआइतो मुदा ज्‍योति‍षीक मर्यादाकेँ अखन धरि‍ बचौने। उमेरक संग जे लांछन होइ छै से एक-कान-दू-कान होइत पण्‍डि‍ताइ आ ज्‍योति‍षी जीक कानमे पहुँचए लगल। कहबि‍यो ठीके छै जे बेटी जखन जुआन होइ छै तँ घरबैयाकेँ बादमे मुदा बहरबैयाकेँ पहि‍ने पता लागि‍ जाइ छै। टोल-पड़ाेसक लोक काना-फुसी करए लगल जे पण्‍डि‍ताइक बेटी तँ फल्‍लमाक बेटासँ बुढ़ि‍यागाछीमे गप-सप्‍प करै छलै। एक-आध दि‍नक फेर कि‍यो गप्‍प उखाड़ि‍ दइ जे ज्‍योति‍षी जीक बेटी तँ अरूण डाक्‍टरसँ हँसि‍-हँसि‍ कऽ काली स्‍थानमे गप करै छलै। एकदि‍न सुखेतोवाली कनि‍या बाजलि‍ छलीह जे पण्‍डि‍ताइक बेटी रामदेब बाबूक खेतमे बदामक साग तोड़ै छलै। आ हुनक मझि‍ला बेटा आड़ि‍पर ठाढ़ भऽ रेडी बजबै छलै आ बड़ीकाल धरि‍ दुनू गोटे हँसि‍-हँसि‍ कऽ गप-सप्‍प करै छलै। अर्थात् एक-आध दि‍नक पछाति‍ सुनायनासँ जुड़ल कोनो-ने-कोनो गप्‍प-सप्‍प चलि‍ते रहैत छलै। ज्‍योति‍षीजी बेटीक ई कि‍रदानी सूनि‍ सत्‍यनारायण भगवानकेँ कहथि‍न- “हे भगवान एक तँ एकटा कुलकन्‍या देलह, तहूपर एतेक मानि‍ हानि‍क गप्‍प! एे सँ तँ खनदानक बड़ हानि‍ भऽ रहल अछि‍। ऐसँ तँ नीक होइत जे सुनायना जहरो-माहुर खा लइतए आ ऐ दुनि‍याँसँ उठि‍ जइतए।” ई गप्‍प बूझू जे हरि‍दम ज्‍योति‍षी जीक मुँहसँ नि‍कलैत रहै छलनि‍। सुनायना एकदि‍न सुनलक, दोसर दि‍न सुनलक आ तेसर दि‍न जखन सुनैत-सुनैत बरदाससँ फाजि‍ल भऽ गेलैक तँ सोचलक जे भनसा घरक चारमे माए तँ माहुरक एकटा सीसी खोंसि‍ रखने अछि‍। से आइ उ माहुर खा अपन प्राण ति‍यागब। सुनायना ओइ राति‍ सएह केलक। मुदा ओ तँ जहरक सीसी छल नै। छल तँ ओइ नरमुण्‍डक चूर्ण जइपर लि‍खल छलै, कि‍छु भऽ गेल आ कि‍छु बाकी..। जे खएलासँ सुनायना मरल तँ नै मुदा गर्भवती जरूर भऽ गेलीह। आब तँ दि‍न बी‍तल, मास बीतल। एक-कानसँ-दू-कान गुल-गुल हुअए लगल जे ज्‍योि‍तषीक बेटी तँ आब पेटसँ छैक। एत्ते दि‍न कहै छलि‍यनि‍ तँ ज्‍योति‍षी जी आ पण्‍डि‍ताइन मुँहपर माछि‍यो ने बैसए दैत छल। वि‍सबासे ने होइत छलनि‍। अाब देखथुन अपन बेटीक कि‍रदानी। जे बापक दुलारू धि‍या दूरि‍ गेली दूरि‍ गेली। आ माथापर तम्‍मा लऽ कऽ उड़ि‍ गेली उड़ि‍ गेली। आब देखथुन जे बेटी केहेन कुल गोरनि‍ छन्‍हि‍। देखि‍ते-देखि‍ते नअो मास बीतल आ सुनायना देलनि‍ एकटा अति‍ सुन्‍दर बालकक जन्‍म। जेकर भाग्‍यक रेखा कि‍छु औरे कहि‍ रहल अछि‍। मुदा पण्‍डि‍ताइन आ ज्‍योति‍षी जी ओकर नाओं रखलनि‍ ‘कुकर्मा’। शेष अागू....। २ परमेश्वर कापड़ि संयोजक मिथिला राज्य संघर्ष समिति

नेपाल संघीयताक दिशामे डेग बढारहल समयमे विभिन्न क्षेत्र, वर्ग, धर्म, लिङ, जाति आ भाषाभाषी तथा समूहसब अपन अपन अधिकारक माँग करैत विभिन्न प्रकारसँ आन्दोलन करैत आविरहल अछि । जे सबहक लोकतान्त्रिक अधिकार छैक । लोकतान्त्रिक आचरण अनुरुप भ’ रहल आ होबएबला हरेक अधिकारवादी आन्दोलनक नामपर किछु समूह देशभरि पसरिरहल अराजकताप्रति समितिक गम्भीर ध्यानाकर्षण भेल अछि । मिथिला राज्यक माँगप्रति समर्थन कएने कहैत नेपाली काँग्रेसक नेता विमलेन्द्र निधिक जनकपुरस्थित घरपर तोड़फोर कएल गेल घटनाके मिथिलाराज्य संघर्ष समिति भत्र्सना करैत अछि । तहिना राजधानीमे सञ्चारकर्मी उपर भेल आक्रमणके निन्दा करैत अछि । एहन अराजकतत्वके पहिचान क’ कारवाही करए समिति सरकारसँ माँग करैत पीडितके क्षतिपूर्तिक माँग करैत अछि ।

२ परमेश झा अनिलचन्द्र झा सदस्य महासचिव मैथिली विकास कोष मिथिला नाट्यकला परिषद

मिथिला राज्यक आन्दोलनप्रति ऐक्यबद्धता जनौने कारण नेपाली काँग्रेसक नेता विमलेन्द्र निधिक जनकपुर – १ स्थित घरपर कएलगेल तोड़फोरके घटनाप्रति गम्भीर ध्यानाकर्षण भेल अछि । एहन अलोकतान्त्रिक कृयाकलापके भत्र्सना करैत दोषीउपर कारवारी आ पीडितके क्षतिपूर्तिक माँग करैत अछि । लोकतन्त्रमे अपन विचार राखएके नागरिक अधिकारउपरके अहि हस्तक्षेपकारी काजके तत्काल बन्द करए अपील सेहो करैत छी।

३ पूनम मण्डल मिथिला विभूति स्मृति पर्व समारोह २०१२ दिल्लीक रफी मार्गपर अवस्थित मावलंकर सभागारमे २० मइ २०१२ केँ मिथिला विभूति स्मृति पर्व समारोह २०१२ सम्पन्न भेल। दिल्लीक विकासमे बिहारीक योगदान सभसँ बेशी अछि, ई गप दिल्लीक मुख्यमंत्री शीला दीक्षित २० मइ २०१२ ई. केँ अखिल भारतीय मिथिला संघ द्वारा आयोजित मिथिला विभूति स्मृति पर्व समारोह २०१२ मे मिथिलाक विशिष्ट विभूति सभकेँ सम्मानित करबाक बाद देल अपन भाषणमे  कहलन्हि। ई जे दिल्लीक प्रशंसा विश्व भरिमे भऽ रहल अछि से बिहारी लोकनिक योगदानसँ विशिष्ट बनल अछि, ओइमे सँ किछु गोटेकेँ सम्मानित कऽ हुनका खुशी भेल छन्हि से ओ कहलन्हि। ओ महाबल मिश्र सांसदकेँ मैथिलीक प्रयोगमे लाज करबा लेल हँसी मे आलोचना सेहो केलन्हि, ओ कहलन्हि जे मैथिलीक प्रचार-प्रसार एकर विकास लेल जरूरी अछि, ओ कहलन्हि जे जँ महाबल मिश्र मैथिलीक प्रयोग करितथि तँ ऐ सँ हुनकर मैथिलीक ज्ञानमे अभिवृद्धि होइतन्हि। ओ भाजपा सांसद प्रभात झासँ कहलन्हि जे ओ अपन मूल प्रदेशक मैथिली भाषी सांसदसँ संसदमे मैथिलीक प्रयोग लेल प्रेरित करथि। शीला दीक्षित दिल्लीक मैथिली-भोजपुरी अकादमीक काज असंतोषजनक हेबाक गप कहलन्हि आ ओकर काज आगाँ ब्ढ़ेबामे सरकार सहयोग देत से कहलन्हि। महाबल मिश्र मिथिला विभूति स्मृति पर्व समारोह २०१२ मे मैथिलीमे अपन भाषण देलन्हि। ऐ अवसर पर पूर्व सांसद श्री गौरीशंकर राजहंस आ दिल्लीक पूर्व विधायिका आ सांसद कीर्ति आजादक पत्नी श्रीमती पूनम आजाद सेहो रहथि। सांसद प्रभात झा सीताक जन्मस्थली पुनौरा (सीतामढ़ी), विद्यापतिक जन्मस्थली बिस्फी (जिला दरभंगा) आ कालिदासक ज्ञानप्राप्ति स्थली उच्चैठ (जिला मधुबनी) क पर्यटन उद्देश्यसँ बढ़ावा देबाक आवश्यकता जनौलनि, ऐ स्थल सभक वर्तमान दुर्दशाक ओ चर्च केलन्हि आ ऐ संगे आन पर्यटन स्थल सभक विकास हेबाक आवश्यकता जनौलनि। अखिल भारतीय मिथिला संघक महासचिव श्री विजय चन्द्र झा  अखिल भारतीय मिथिला संघ द्वारा कएल जा रहल कार्यक जनतब देलन्हि आ मैथिलीक विकास लेल सभकेँ आगाँ एबाक आह्वान केलन्हि। मिथिला विभूति स्मृति पर्व समारोह २०१२ मे रंगमंच अभिनेत्री श्रीमती प्रेमलता मिश्र प्रेम, नाट्यकार श्री महेन्द्र मलंगिया, नाट्य निर्देशक श्री उत्पल झा, मैथिलीक ई-पत्रकार आ राष्ट्रीय सहाराक श्री हितेन्द्र गुप्ता, ध्रुपद गायक श्री अभय नारायण मल्लिक, शतरंज खिलाड़ी श्री श्रीराम झा, गोल्फ खिलाड़ी श्री अशोक कुमार,  चिकित्सक डॉ. राज्यवर्धन आजाद, चिकित्सक डॉ. अजय चौधरी , उद्यमी श्री अनिल कुमार शर्मा, गायिका श्रीमती कुमुद झा, श्री रवीन्द्रनाथ ठाकुर (गीत-संगीत), श्री गजेन्द्र नारायण सिंह (संगीत) आ दिल्ली नगर निगमक हालक निर्वाचित पाँच टा पार्षद श्री सुनील झा, श्री रामदयाल महतो, श्रीमती तिलोत्तमा चौधरी, श्रीमती विमला देवी आ श्रीमती कल्पना झा सहित १९ गोटेकेँ मिथिला विभूति सम्मानसँ सम्मानित कएल गेल।  श्री गजेन्द्र ठाकुरकेँ “पुरातात्विक तिरहुता भोजपत्र अभिलेखक पुनरोद्धार आ गूढ़ाक्षरकेँ स्पष्ट कऽ तकर देवनागरीमे  लिप्यंतरण” लेल मिथिला विभूति सम्मानसँ  सम्मानित कएल जेबाक छल मुदा कोनो कारणवश ओ सम्मान लेबा लेल नै एलाह। (स्रोत समदिया) ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com  पर पठाउ। ३. पद्य ३.१.१.जगदीश प्रसाद मण्‍डल २.रमेश रञ्जन ३.प्रकाश प्रेमी ३.२.१.डॉ॰ शशिधर कुमर “विदेह”२.रामवि‍लास साहु ३.३.१.जगदीश चन्द्र ठाकुर अनिल २.उमेश पासवान ३.४.१.पंकज झा २.ओमप्रकाश झा ३.रुबी झा ३.५.किशन कारीगर ३.६.चंदन कुमार झा ३.७.जगदानन्द झा 'मनु' ३.८.१.डा. धनाकर ठाकुर २.नवीन कुमार आशा १.जगदीश प्रसाद मण्‍डल २.रमेश रञ्जन ३.प्रकाश प्रेमी १ जगदीश प्रसाद मण्‍डल गीत- ओस बनि‍ आंसू पकड़ि‍ धार खून बहबैत एलैए। प्रेम सि‍क्त प्रेमाश्रु पकड़ि‍ देह बेमाए कहबैत एलैए। ओस बनि‍........। हाथक हस्‍ति‍ पकड़ि‍ फाड़ि‍ रूप बेमाए धड़ैत एलैए। बाँहि‍ पकड़ि‍-पकड़ि‍ हाथ पएर पकड़ि‍ कहैत एलैए। ओस बनि‍........। आंगुर पकड़ि‍ पकड़ि‍ छीनि‍ पएर सि‍र चढ़बैत एलैए। हस्‍ति‍ हाथ मेटा-मेटा नाम पएर जपैत एलैए। ओस बनि‍........। २ रमेश रञ्जन

बारुद

कतेक धृष्ट छै बरुदक वेगवान कण छेदैत चलि जाइत छै शरीर कमसँ कम जाति भेद तँ करितै

आन्दोलनक जाति आन्दोलनकारीक जाति मिथिला आन्दोलनक विध्वन्सक चौसरपर तेहने चीत्त–पट्टक खेल रचने अछि

आन्दोलनपर गढ़गर जातिक रंग लेपन कऽ कऽ नरसंहारसँ रक्तच्छादित अपना देहके आकाशमे भूर कऽ कऽ वर्षाब चाहैत अछि मुसलाधार पानि रक्तरञ्जित शरीर साफ–सफाइक लेल

मुदा वारुद वेगवानके पलखति कहाँ जे सोचैत पुछैत आन्दोेलनकारीक जाति आ तखन शरीरक अन्तर भाग तकक यात्रा करैत ३ प्रकाश प्रेमी रे गोधिया तो कोन्नी छे ? रे गोधिया तो कोन्नी छे , एन्हर आ चल देखे तमासा । माईयक छाति चिरे खातिर , नेतवा आउर फेकै हई पासा ।। रे गोधिया तो कोन्नी छे , एन्हर आ ..........................

रे जई अचराने दुध पिने हई, तकरे इज्जत लुटाबेला, जाइतक नाम पसाहि लेस, ठहक्का माईर पिटै हई तासा । माईयक छाति चिरे खातिर, नेतवा आउर फेकै हई पासा ।। रे गोधिया तो कोन्नी छे , एन्हर आ ..........................

छुच्छ दुलार अन्हरोने हई, पितियाईनक शान सोहरोने हई, माइयक ममता बिसैरके देखहि, कईने हई परोसिया पर आसा । माईयक छाति चिरे खातिर, नेतवा आउर फेकै हई पासा ।। रे गोधिया तो कोन्नी छे , एन्हर आ ..........................

रे बिसैरके देखहि घुघुवामना, डिगडिगथैया चनामना , झिझिरकोना आ सुरसुरके , हरिमे ठोकि करतै दुर्दाशा । माईयक छाति चिरे खातिर, नेतवा आउर फेकै हर्ई पासा ।। रे गोधिया तो कोन्नी छे , एन्हर आ ..........................

नै एक खण्ड नै दू खण्ड, कऽ कऽ देखहि खण्ड खण्ड, कहै हई माईयक बोलिके, ई त हई बभनाके भाषा । माईयक छाति चिरे खातिर,नेतवा आउर फेकै हई पासा ।। रे गोधिया तो कोन्नी छे , एन्हर आ .......................... ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। १.डॉ॰ शशिधर कुमर “विदेह”२.रामवि‍लास साहु १ डॉ॰ शशिधर कुमर “विदेह” एम॰डी॰(आयु॰) – कायचिकित्सा कॉलेज ऑफ आयुर्वेद एण्ड रिसर्च सेण्टर, निगडी – प्राधिकरण, पूणा (महाराष्ट्र) – ४११०४४ बिसरि ने सकब (गीत) भेटि  सकलहुँ ने, सरिपहु बिसरि ने सकब । दूर  रहितहुँ,  हृदय  मे  अहीं  तँ  रहब ।। एहि जिनगीक बाटेँ कतेको भेटत । संग लागत अनेको, अनेको छँटत । मुदा हृदयक ओ कोना अहीं लए अनामति, पवित्रहि रहत । ओ पवित्रे रहत ।। थीक जिनगी प्रवाहित, प्रवाहित रहत । संग अपना मे बहुतो समाहित करत । मुदा चञ्चल आवेगक श्रोतेँ प्रतिष्ठित, अहीं टा रहब । से अहीं टा रहब ।। दीप  बहुतो जरत,  चान  बहुतो उगत । सूर्य बहुतो उगत, उगि कऽ डुबिते रहत । मुदा जिनगी मे ध्रुव सन दिशाबोधकारी, अहीं टा छलहुँ । आ अहीं टा रहब ।। सातो समुद्रो मे जल थिक बहूते । छै सरिता अनेको, सरोवर बहूते । मुदा ओ सरोवर पूरित प्रीति पय सँ, अहाँ लग रहए जे, कतहुँ नञि भेटत । ऐ कतहु नञि भेटत ।। अहँक नेह केर छोट सनि जे छवि अछि (गीत) अहाँ सञो जे भेटल क्षणिक नेह हमरा, तकर  मुल्य  कहियो,  चुका ने सकै छी । अहँक नेह केर छोट सनि जे छवि अछि, ततेक  गाढ़  अंकित,  मेटा ने सकै छी ।। टाकाक  जोरेँ  बहुत  किछु  भेटै  छै, की काया, की मोन – सब सद्यः बिकै छै । एहेन प्रीत निश्छल, बिना स्वार्थ भावेँ, छी दुर्लभ वा शायद कतहु नञि भेटै छै ।। छी जल तँ धरा पर, प्रति चारि तीनेँ, मुदा  प्यास, बहुतो  मेटा ने सकैत’छि । किञ्चित् जँ तृट्नाश सामर्थ्येँ सक्षम, तदपि तृप्ति - अमृत - परम ने भेटैत’छि ।। हरेक  राति  प्रायः  उगैत’छि  चानहु, पुनमि चान मासेँ एकहि बेर अबैत’छि । पुनमि तँ पुनमि छी, मुदा स्वच्छ निर्मल, शरद राति पुनिमक बहुत कम भेटैत’छि ।। बहुत छी  सरोवर – सरित  एहि धरा पर, ओ मानस – सरोवर एकहि टा एतए अछि । जतए जा भेटैत’छि, मनक शान्ति अनुपम, ओ  कैलास  एक्कहि  आ सद्यः एकहि अछि ।। हम की करू ? (गीत) हमर  चेतना  हेरायल अछि, हम की करू ? सम्वेदना  बिलायल  अछि,  हम की करू ? हे ऐ देखल जखन सञो अहाँ केँ प्रिय, हमर सुधि बुधि हेरायल अछि, हम की करू ?? अहाँ  छी  ने  उर्वशी, अहाँ छी  ने मेनका । मुदा  तइयो  हमर  लेल  चित्त  केँ  चोरा । अहँक सुन्नर छवी (वि) हमर चञ्चल मनेँ, बड़  थीर  भए  समायल  अछि, हम की करू ?? अछि  बूझल,  अहूँक अछि, एहने सनि गति । हृदयफाँस लेपटायल अछि, सुन्नर सनि मति । अहँक चञ्चल चरण आ नयन ओ वयन, एखन जड़वत बन्हायल अछि, हम की करू ?? आइ मधुरिम मिलन, कत’ प्रतिक्षा केर बाद । बड़ प्रतिक्षा कराओल, अछि अपरूब तेँ स्वाद । अहँक सुन्नर सुकोमल अरुण ठोर पर, मन्द हास छिरिआएल अछि, हम की करू ?? २ रामवि‍लास साहु कवि‍ता- कर्म बि‍नु जग सुन्ना सूर्ज बि‍नु अकास सुन्ना बि‍जुरी बि‍नु वादल सुन्ना जीव बि‍नु धरती सुन्ना कोयल बि‍नु वगि‍या सुन्ना फूल बि‍नु फुलवारी सुन्ना शेर बि‍नु वन सुन्ना नयन बि‍नु जग सुन्ना प्राण बि‍नु देह सुन्ना प्राजा बि‍नु राज्‍य सुन्ना सत्‍य बि‍नु न्‍याय सुन्ना वाद्य बि‍नु संगीत सुन्ना नारी बि‍नु समाज सुन्ना दूध बि‍नु भोजन सुन्ना पानि‍ बि‍नु नदी सुन्ना देव बि‍नु मंदि‍र सुन्ना दया बि‍नु धर्म सुन्ना प्रेम बि‍नु भक्‍ति‍ सुन्ना कर्म बि‍नु जग सुन्ना। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। १.जगदीश चन्द्र ठाकुर अनिल २.उमेश पासवान १ जगदीश चन्द्र ठाकुर अनिल जगदीश चंद्र ठाकुर ‘अनिल’ किछु एहने-सन लागि रहल अछि चोरे जोर सं बाजि रहल अछि | रहता लाखो युवक  कुमारे सएह जमाना आबि रहल अछि | दुलहा आ दुलहिन उदास छथि वरियाती टा नाचि रहल अछि | जकर मूँह चिन्है छै बारीक वएह मुंगबा  पाबि रहल अछि | ककरहु ले’ मुनहारि साँझ ई कियो पराती गाबि रहल अछि | एहि भीड़मे चीन्हब मोसकिल कंठ ककर के दाबि रहल अछि | हाँ जे तकलियै,हम बुझि गेलियै ताकि मुसुकेलियै, हम बुझि गेलियै | कोइली कुहुकलै आमक डारि पर अहाँ जे बजलियै, हम बुझि गेलियै | रिमझिम-रिमझिम साओन आ भादो अहाँ जे कनलियै, हम बुझि गेलियै | गुमकीक  बाद बिजलोका आ अन्हड अहाँ चुप भेलियै, हम बुझि गेलियै | रुसबाक मतलब इ दुनिया हमर छी २ सभ्यता आ संस्कृति ( कविता ) हम कहलियनि हमरा नोकरी भेटि गेल बाबूजी प्रसन्न भ' गेलाह हम कहलियनि हम अपन विवाह सेहो ठीक क' लेलहुँ बाबूजी  नाराज भ' गेलाह हम कहलियनि विवाहमे दस लाख भेटत बाबूजी प्रसन्न भ' गेलाह हम कहलियनि  टाका कनियाँक नाम पर बैकमे जमा रहत बाबूजी  नाराज भ' गेलाह हम कहलियनि कनियाँ सेहो नोकरी करैत छथि बाबूजी प्रसन्न भ' गेलाह हम कहलियनि कनियाँ सेहो संगे आबि गेल छथि बाबूजी सन्न रहि  गेलाह ! २ उमेश पासवान उमेश पासवान कवि‍ता- वर्णित रस जनकल्‍याणक लेल पहि‍ल अथक प्रयास छी वर्णित रस। देशमे बढ़ल भ्रष्‍टाचारक वैदि‍क इलाज छी वर्णित रस। जनाधि‍कारक लेल बुलंद अावाज छी वर्णित रस। दलि‍त उपेझि‍त वर्गक पहि‍चान छी वर्णित रस। ऊँच-नीचक भेद-भाव रखनि‍हारक ऊपर शब्‍दक प्रहार छी वर्णित रस। साहि‍त्‍य-पुरुष जगदीश प्रसाद मण्‍डल, गजेन्‍द्र ठाकुर जीक असि‍रवाद छी वर्णित रस। साहि‍त्‍य सेवामे जुटल व्‍यक्‍ति‍ उमेश मण्‍डलक प्रेरणाक परि‍णाम छी वर्णित रस। मैथि‍ल-मथि‍लाक आ अपन मातृभाषाक गुणगाण छी वर्णित रस। शब्‍दकेँ समेटि‍ पोथि‍क रूप देनि‍हार श्रुति‍ प्रकाशन केर अवि‍ष्‍कार छी वर्णित रस। कागज सादा कागज छी हम सादगी समाएल अछि‍ हमरामे मुदा तखनो हम गुलाम बनल छी सतरंगी रंगक कलमकेँ पूर्ण अधि‍कार जमौने अछि‍ हमरा ऊपर घेरल रही छी हम कलमक मोइखसँ आबद्घ भऽ देबालसँ घेरल रहै छी हम शान्‍तचि‍त्त नि‍श्चल मनसँ मुदा तखनो असंख्‍य शब्‍द–चि‍त्रसँ दबल रहै छी हम ति‍याग-बलि‍दान दऽ कऽ हम अपन एक देशभक्‍त सन समाज केर सेवामे लगल रहै छी हम सादा कागज छी हम सादगी समाएल अछि‍ हमरामे। समाज खुशामदी आ ने बेगारी करब हम अपन कर्मक बाटपर सदि‍खन चलब हम मेहनति‍ कऽ अपन भाग्‍यक लेल परि‍लक्षि‍त भऽ कऽ सदि‍खन आगू बढ़ब हम पुरान अवधारणाकेँ समाज अखनो धरि‍ पजि‍औने अछि‍ ऊँच-नीच जाति‍-पाति‍ अनुसारे काम-काजकेँ ओकरा बदलब हम दाब-चाप, दहेज-अशि‍क्षा, अन्‍धवि‍श्वासक जालकेँ तोड़ब हम मृत्‍युसैय्या जे धेएने अछि‍ दलि‍तक अधि‍कार ओकर समानता हेतु लड़ब हम। रावण-कंश मूर्छित भऽ खसल भूमि‍पर गुमानक ढेरपर जा कऽ बैसल छल ओ तृष्‍णा प्रति‍सोधक आगि‍मे जरैत सि‍याह सन लगैत छल ओ बि‍नु परबाह केने सुकर्म ति‍यागि‍ कऽ अधर्मक बाटपर चलल छल ओ जि‍तबाक लेल पुरे वि‍श्वकेँ लैस भऽ कऽ आधुनि‍क परमाणु हथयारक संग वि‍नाशक डंका बजेने छल ओ खूनसँ रँगि‍ कऽ अपन हाथ अमेरि‍काक वर्ल्‍ड ट्रेड सेन्‍टरसँ शुरूआत केने छल ओ कि‍छु छनक लेल थर्ड़ा उठल ओ मानव हृदए सोचमे पड़ि‍ गेल की रावण-कंश अखन धरि‍ नै मारल गेल जना हू-ब-हू कर्मसँ एक्के साँचमे गढ़ल सन लगै छल ओ पापक घैल जखन भरल एक दि‍न मूर्छित भऽ खसल भूमि‍पर। भरल घैल शीतल पानि‍सँ भरल घैल आइ लड़ि‍ रहल अछि‍ अपन असति‍त्‍व बचैबाक लेल बचौने अछि‍ अपन डंढक मोस्‍कि‍लमे पड़ल अछि‍ सूर्जक ि‍करण गुस्‍सा रहल अछि‍ ओ उम्मस भरल गर्मीपर जे बेर-बेर प्रयास केलाक बादो भेद नै पाबि‍ रहल अछि‍ शीतल पानि‍सँ भरल घैलक कमजोर पड़ि‍ गेल सूर्जक कि‍रण कि‍एक तँ पानि‍ सहने अछि‍ सभ दुख-दर्दकेँ लड़ि‍ कऽ पहाड़सँ खसि‍ कऽ झरनासँ बहैत नदीक धारामे नि‍श्चल-अवि‍चल मनसँ पहुँचल अछि‍ आइ घैल तक। कलजुग शि‍शक टुकड़ीकेँ बि‍छौन बनाकेँ हम सुतैत छी अपन करेजमे काँटकेँ नुका रखैत छी हम गरदनि‍मे भ्रष्‍टाचारक माला पहि‍रने रहैत छी हम रोजे करबै छी नव-नव घटना लूट-हत्‍या, चोरी-डकैती तखनो चैनसँ रहै छी जाति‍ धर्म मजहब केर नाओंपर पैघ-पैघ फसाद हम करबै छी जँ अहूसँ मन नै भड़ैए हमरा तँ जंगलक वि‍नास परमाणु हथि‍यार आतंकवाद-उग्रवादसँ दंगा-फसाद करबै छी लहु-लहुआन कऽ प्रकृतिक-सृष्‍टि‍केँ हम हँसैत रहै छी तखनो मनुक्‍ख कऽ रहल अछि‍ वि‍कासक बात की चि‍न्‍हलौं अपने हम के छी कलजुग। उमर-अवस्‍था-मन कतेक बर्खक बाद मि‍लल सि‍नेहक पीर जरमति‍ वैह अछि‍ नोरक संग अधि‍र शाश्‍वत पि‍ड़ा बूझि‍ मन समस्‍याक धनधोर बादलमे चमकैत बि‍जलीमे भेटल आइ प्रेमक तरंग देखि‍ कऽ ठमकल हमर माथ सभ दि‍न‍ तकैत रहलौं अर्थक बाट अन्‍हार जि‍नगीमे भेल ज्ञानक वि‍हान तखनो हम पाछाँ रहि‍ गेलौं बहुत भऽ गेल देर समैक सदुपयोग नै कए सकलौं छुटकारा लेल कऽ रहल छी लाखो जतन अंत समैमे अर्थी सजाओल जा रहल अछि‍ हमर सभ छोड़ि‍ जा रहल छी खाली हाथे बनि‍ फकि‍र। संग छोड़ि‍ रहल अछि‍ उमर-अवस्‍था-मन आ शरीर। पि‍यासल सोन सन सुरति‍केँ कि‍छु नै अछि‍ मोल बाजू हे मैथि‍ल अपन मातृभाषामे मधु सन मीठ बोल राजा वि‍देहक ई गाम सि‍नेहक पि‍यासल ई मि‍ि‍थला जगत-जननी माता सीताक जन्‍मभूमि‍ एतए माटि‍क कण-कणमे अछि‍ भरल वि‍द्वता स्‍वर्ग सन सुशोभि‍त देवलोक सन सुन्‍दर अछि‍ हमर मि‍थि‍ला ओहन महान जतए सुग्‍गाे पढ़ैत छल वेद-पुराण मुदा यौ श्रीमान् शि‍शा पि‍घला कानमे ढारल जाइत छल सेहो सुनैत छी यौ श्रीमान्। अन्न-धन भरल अछि‍ पोर-पोरमे कुहकैत चि‍ड़ै-चुनमुन करैए कि‍लोल सोना सन सुरति‍क अछि‍ नै कोनो मोल। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। १.पंकज झा २.ओमप्रकाश झा ३.रुबी झा १. पंकज झा स्वयं के रीढ़ युक्त बनाबय मे लागल छी भ्रस्टाचार स त्रस्त, लोक छिलमिला रहल छैथ, आंदोलनक बिगुल बजा रहल छैथ, मुदा ओ बेखबर छैथ, जे हुनको रक्त मे भ्रस्ट आचरण दौर रहल छैन, हुनक जन्म स पहिलही, हुनकर पिता, समाज, दहेजक दूषित बिचार स, हुनकर निर्माण प्रारंभ केलैन, विवाहे स- आधारे स, निर्माण के प्रारम्भे स, अपन दुर्बल्तक आर मे, हुनका जन्म देलखिन, आ समयक क्रम मे, हुनकर अब्चेतन मन के, हर  भाग मे, भ्रस्टताक उदहारण भैर देलखिन, हुनक रक्त मे ओ तेज कहाँ, जहिना अनाज, फल, फसल , कित्रिम  खाद के प्रयोग स, रश  हिन् भ गेल  अई, तहिना आइ के युवा उर्जा बिहीन छैथ, जिनका  सिर्फ गर्दभ गान अबै छैन, अपन स्वाभिमान नै, ओ पिता के आर मे, आ  पिता हुनकर आर मे, पुनः  वैह चक्र चलबैत छैथ, आब  कहू यौ युवा, कि  बिना ध्यान, ज्ञान, विज्ञान के, अहाँ  अई स उबैर सके छी, अहाँ लग समय कहाँ अई, मूल्य  के मूल्य आंक्कै के, अहाँ लग उर्जा कहाँ अई, तटस्त रहै के, हमरा त बुझाना जैत अई, अहाँ वैह राक्षस छी, जेकरा स्त्री और धन दुनु देल जैत छल, आ समय के प्रवाह मे, कोनो वीर, अहाँ के छाती पर बज्र प्रहार कै, अहाँ के अंत करै छलाह, मुदा  अई घोर कलयुग मे, ओ  वीर कतय छैथ, से  नै जनैत छी, मुदा ! स्वयं के रीढ़ युक्त बनाबय मे लागल छी, २ मानु ने मानु, नव चेतना स दूर, हम मैथिल मजबूर, सभ्य होबाक मुखौटा लगौने, स्वयं अपन रीढ़क हड्डी तोरै छी, जगलो में किछ नई बुझै छी, युवा छी, पर साहस कहाँ ? स्वाभिमान बनेबाक सामर्थ्य कहाँ ? समय संग चलैक, दृष्टी कहाँ ? प्रतिकार करैक, तर्क कहाँ ? मानु ने मानु, अहाँक अधोगतिक, बिज पहिनहि रोपल गेल अई, दहेजक   बिष पैन स, अहाँक नहौल गेल, अहाँ  महिक गेल छी, भिनैक गेल छी, प्रखर संस्कृति स लुढैक गेल छी, आनक पुरुसार्थ पर, ठाढ़ होबाक कोशिस, अपहिजे  त बनाओत, क्रमशः  और, २ ओमप्रकाश झा रूबाई कखनो तँ हम अहाँ केँ मोन पडिते हैब यादिक दीप बनि करेज मे जरिते हैब बनि सकलहुँ नै हम फूल अहाँक कहियो यै मुदा काँट बनि नस नस मे तँ गडिते हैब ३ रुबी झा गजल कहियौ छोड़ब नै  अहाँक पछोर यौ अहाँ जायब कतऽ राखब संगे अहाँ के साँझ सँ भोर यौ अहाँ जायब कतऽ चिन्हलौ नहि जानलौ अहाँ किएक एखन धरि हमरा प्रेम बरखा सँ करब सराबोर यौ अहाँ जायब कत़ऽ अहाँ लेल तियागल लाजो तियागल धाखो अहीँक लेल प्रेम सरिता बहाएल पोरे पोर यौ अहाँ जायब कतऽ छोरलहुँ हम नैहर सासुरो छोरलहुँ अहिँक लेल मायक ममताक छोड़लहुँ कोर यौ अहाँ जाएब कतऽ अहाँ बाजु एकबेर  किरीया खाउ हम ककरा लगा के मात्र अहीँ टा छी" रूबी "के चितचोर यौ अहाँ जाएब कतऽ (सरळ वार्िणक़ बहर ) बर्ण-२१ 2 ओ नहि भेलाह कहियो जौँ हमर त' की भेल होयत आब हुनके बिन गुजर त' की भेल जेठक दिवस काटल भदबरियाक रैन आइ बितइत नहि अछि पहर त' की भेल बिलक्षण आर मधुर बजैत छलथि बोल एकबेर बाजि देलथि जौ जहर त' की भेल प्रेम मे मीरा सनक भऽ गेल छी बताहि हम हुनका यदि परबाह नहि तकर त' की भेल युग-युग सँ गाबै छी गीत हुनक पथपर नहि एलाह एकोबेर एहि डगर त' की भेल हुनक आश मे अछि फाटल साड़ी आ चुनरी जोगिनिये कहैत अछि जौ नगर त' की भेल हुनके आश तकैत पिबि गेलहु बिषक प्याला बदनाम भेलहुँ जौ जग सगर त' की भ गजल 

 अहाँक साधना मात्र सौं हम प्रेम करै छी

 अहाँक भावना मात्र सौं हम प्रेम करै छी 

 देखू त' हमरा अगल- बगल नै छी मुदा 

 अहाँक कामना मात्र सौं हम प्रेम करै छी 

 कहिओ एको घरी अहूँ याइद केने हैब 

 त' ओहि धारणा मात्र सौं हम प्रेम करै छी

 हम जतए छी अहिंक छी आ सपना सेहो 

 त' ओहि सपना मात्र सौं हम प्रेम करै छी

 एको दिन हमरा सौं अहूँ प्रेम केने हैब

 अहाँक प्रेरणा मात्र सौं हम प्रेम करै छी 

 प्रतिक्षा करैत रहे छी ब्याकुल भ' अहाँ के

 अहाँक सामना मात्र सौं हम प्रेम करै छी 

 सरल वर्णिक बहर---वर्ण १६

 रूबी झा गजल       सिहकल जखन पुरबा बसात अहाँ अयलहु किये नहि मोन उपवन गमकल सूवास अहाँ अयलहु किये नहि चिहुकि उठि जगलहु आध-पहर राति सपन हेरायल आँखि खुजितहि टुटिगेल भरोस अहाँ अयलहु किये नहि चेतना हमर प्रियतम फेर किएक देलहु अहाँ बौराय बेकल उताहुल भेलहु हताश अहाँ अयलहु किये नहि नम्र-निवेदन हम करइत छी अहाँ सँ प्रियतम हमर  गेलहु कतय नुकाय जगा आस अहाँ अयलहु किये नहि भेल आतुर मोन रूबी केर निरखि-निरखि  सुरत अहाँके फागुन-चैत बित गेल मधुमास अहाँ अयलहु किये नहि रुबी झा गजल प्रेमक दीप जरा क' राखब कनेक बताहि हम छी जनु अपन जान चोरा क' राखब कनेक बताहि हम छी जनु कतेक पैघ-पैघ चोट भेंटल तखनो नै अनुमान भेल  विरह तीर गरा क' राखब कनेक बताहि हम छी जनु सपना में त' पिया मिलन के हम स्वप्न सजा के राखए छी  सिनेह घैल भरा क' राखब कनेक बताहि हम छी जनु आँचर सौं बाट बहारब झार पात हटायेब पिपनी सौं  आँगन सौं त' परा क' राखब कनेक बताहि हम छी जनु इ त' प्रेमक अनुभूति छैक कोना बूझत जे नै प्रेम करै रूबी आइंख नोरा क' राखब कनेक बताहि हम छी जनु  --------------सरल वार्णिक बहर वर्ण -२२ --------------- (रूबी झा ) गजल धूर जाउ सम्मान क' बात करै छी तौरे तोर छल सौं आघात करै छी नित बान्हि बैसई छी बरका पाग निर्लज बनि बिश्वासघात करै छी भोरे- भोर  देब की भाषणे बैस क' छी निठ्ठला मुदा माँछ भात करै छी लुच्चा लफाईर जेकाँ  सौंसे  घुमै छी राखि काँख तौर छुरी मात करै छी गुण-दोख अपन सभ क्यो जानैथ जनितो किएक बज्रपात करै छी जागु मैथिल जगाबू मिथिला चलू भ्रस्टाचार ''रूबी'' एक कात करै छी सरल वार्णिक बहर वर्ण-13 रूबी झा गजल हम त' छी कनेक नादान ताहि लेल चुप छी   ई जग अछि बेसी सियान ताहि लेल चुप छी कतेक नुकाएल अन्देख में निर्मम निर्दय  अखनो अछि बड़ हेवान ताहि लेल चुप छी नित मार काट  खून  खुनामय  होएत  रहै मांगे अछि  दुष्ट वरदान  ताहि  लेल चुप छी सभदिन होए अछि गर्भे में बेटी केर हत्या  मुदा बनलि सब अंजान ताहि लेल चुप छी जौं कहूना मैर क' बांचल जे बेटी समाज में  दहेज प्रथा लेतेन जान ताहि लेल चुप छी कहवाक हिम्मत बहुते राखने छैक ''रूबी'' किन्नो भ्रष्ट नै होय सम्मान ताहि लेल चुप छी --------सरल वार्णिक बहर वर्ण --१७---------- ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। किशन कारीगर ऐना किएक ई की ?                     हास्य कविता

एक्के कोइख सँ जनमल दुनू  बेटा के डाक्टरी इंजीनियरिंग कराऊ मुदा बेटी के संस्कृते सँ मध्यमा कराऊ एहेन बेईमानी ऐना किएक ई की ?

दूल्हा अहाँ गरम-गरम खीर खाऊ  अप्पन सुखलाहा देह के फुलाऊ  दुल्हिन भुखले सन्ठी जेंका सुखाऊ  ओकरा ने अहाँ सब पढाऊ-लिखाऊ ||

बेटी के पढ़ा लिखा के करब की ? ओकरा त चूल्हे फूकै लेल कहैत छी मुदा बेटा के पढ़ा लिखा के  दाम दिग्गर में रुपैया खूब गनबैत छी ||

हाय रे नारा लगौनिहार सभ  कागजी पन्ना पर बेटा बेटी एक समान मुदा असलियत में बेटा तों स्कूल जो  बेटी तों भनसा-भात के कर ओरीयान ||

दुनू त अहींक संतान छी  फेर एहेन बेईमानी ई की? बेटियों के पढ़ा लिखा मनूख बनाऊ अहाँ ओकरो त शिक्षित प्रशिक्षित बनाऊ ||

बेटा के पढबय के खर्चा  अहाँ बेटीवाला सँ वसूल करैत छी  हाय रे दहेज़ लोभी दलाल  अहाँ के तैयो संतोख नहि भेल ई की ?

सामाजिक विकास लेल कही लेल "कारीगर"  मुदा अहाँ इ गप किएक नहि बुझहैत छी  समाज सँ पैघ अहाँक अप्पन स्वार्थ  एहेन जुलुम ऐना किएक ई की ?

रुपैया गनै सँ नीक त ई  जे बेटी के शिक्षित बनाऊ  नहि गनाब रुपैया आ नहि केकरो सँ गनायब एखने सभ गोटे मिली सप्पत खाऊ ||

समाज आगू बढ़त त उन्नति होयत  ई गप अहाँ किएक नहि बुझहैत  छी आबो संकीर्ण सोच बदलू  एही सँ बेसी फरिछा के "कारीगर" कहत की ? ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। चंदन कुमार झा सररा, मदनेश्वर स्थान मधुबनी, बिहार गजल-1 मोन एहन जे मानबे नहि करैए आगि विरहा तैँ साउनो मे जरैए नोर झहरै छै आँखि से, कंठ सुखले बुन्न भरि नेहक लेल तैयो मरैए जेठ के रौदहु जकर छाहरि जुरेलौँ बिनु बसाते से पात आसक झरैए डारि पर प्रीतक,फरल संबंध छल जे पाथरे चोटायल, सड़ल फर झरैए बाट 'चंदन' टकटक अहीँके तकैए मोन बहसल,ने आस किन्नहु धरैए 2122-2212-2122/बहरे-खफीफ गजल-2 राति तरेगण गनिते कटै छी आगि विरहके जड़िते रहै छी बाट अहीँकय तकिते रहै छी रूप अहीँलय सजिते रहै छी बनल बताहे हँसिते रहै छी कोनहि बैसल कनिते रहै छी गीत विरह के गबिते रहै छी तामस मोनक पिबिते रहै छी मोनहि अपने लड़िते रहै छी "चंदन"लागय जिविते मरै छी 2-1 +1-2 + 2-1 + 1-2+ 1-2-2 ---------वर्ण-१२----------- गजल-3 मलय पवन के मदिर गंध सँ श्वास रोग उपचार करब दुषित वायु अवरूद्ध साँस जे तकर आब प्रतिकार करब जड़वत बनल जे जीवन जगमे तकरा पुनः बना चेतन मधु-पराग सँ नहाके ओहिमे नवल उर्जाक संचार करब निज अवलंबन हेतु जगायब बिसरल सभटा श्रम-शक्तिके कर्मेक बलपर विजय प्राप्ति लय कर्मयुद्ध हुंकार करब रहत आब नहि हारल-थाकल घर-बैसल मानव एक्कहु चलू आब कर्मक प्रकाश सँ करिखल घर उजियार करब एकप्रण एकनिष्ठ श्रद्धासँ निश्छल भावहि गाँथब श्रममाल श्रमक फल भेटब छै निश्चित "चंदन" जगत प्रचार करब --------------------वर्ण-२४------------------------- गजल-4 आँखि खूनसँ भरल जेना काँट हृदय गरल जेना पानि खौलय अनल जेना आगि लगए ठरल जेना नोर पोखरि भरल जेना धार खूनक बहल जेना गाछ छलए फरल जेना आब लगए झरल जेना गाम छलए सजल जेना आब "चंदन" मरल जेना 2122-2122/--------वर्ण-१०------- गजल-5 जकरे पाय छलौँ तर-उपर सैह पूत कमौआ धेलकै घर मरचर बनले भरले घर ठाठ उछेहल आँटिओ नै खर ढनढन कोठीओ बखारी ढक उनटल बासन भनसाघर रकटै नेना सटकल उदर बेदम उकासी दबाइ बेगर चंदन' कोनाकऽ जिनगी कटत ॠण पैच कोना चलत गुजर -------वर्ण-१२----------- गजल-6 मोन केर बात सदति लिखिते रहब चौबटिया ठाढ़ गजल कहिते रहब जिनगीक बाट कतबो गड़ै काँट-कूश हँसिते गुलाब सन गमकिते रहब समाजो बरु घिसिऔत हमरा कादो मे कदबे कमल बनि फुलाइते रहब बरू कतबो झाँट-बिहाड़ि ऐत रस्ता मे मुदा तैयो दीप आसक लेसिते रहब 'चंदन' पाथर समाजक छाती पिजाय कलमक धार सँ शत्रू हनिते रहब --------------वर्ण-१५----------- गजल-7 आब सूतल लोक जागि रहलैए तइँ बेछोहे चोर भागि रहलैए देखू लागल भीड़ चौबटिया पर बेटा माँ-बापके बेलागि रहलैए बजरोक भीड़ तकैछ एकांत सूतय लेल लोक जागि रहलैए चैतक पछबा सुड्डाह भेल घर भादबो मे धधकि आगि रहलैए तबधल धरती दहेतै फेरो सँ सुगरकोना मेघ लागि रहलैए जड़लै घर, दहेलै डीह "चंदन" डटले लोक क्यो ने भागि रहलैए --------------वर्ण-१३------------ हजल गुरूजी बैसलाह खोलि खटाल चेलवा बनलनि गुरू घंटाल । घूर जरौलन्हि पोथी केर टाल दूध बेचि कऽ देखू भेला नेहाल । ईसकुल जाऽकऽ भेलाह कंगाल माल पोसिकऽ भेलाह मालामाल। पशुगणना कऽ फुटलनि भाल पशुपालन सँ रुपैयाक टाल । घी-दूध पीबि भेलनि देह लाल आब अखाड़ा बिच ठोकथि ताल । गुरुआनिक गजबे रंगताल ठोरक संग-संग रांगथि गाल । गुरुजी बैसलाह खोलि खटाल ज्ञानक पूँजीओ गेलनि पताल ।-------वर्ण-१२----------- रुबाइ-1 देखू पियक्कर बताह जमाना के सून्न मंदिर भरले ताड़ीखाना के कनैत लोक हँसी किनबा ले लुटबैछ पेट काटि जोगाओल खजाना के । रुबाइ-2 दूध सँ बेशी स्वाद लगैए ताड़ी मे खेत बिकैल लागल हाथ घराड़ी मे एखन तऽ अमृत लगैए चिखना संगे बुझबै जखन लीवर सड़त बुढ़ारी मे रुबाइ-3 ताड़ी छानब छोड़ि छानू निज विचार दारू ताकब त्यागि ताकू संस्कार अप्पन घर जाड़ि भट्ठी मे छी बैसल नजरि उठा देखू जड़ल केहन कपार । रुबाइ-4 सत्ते अहाँ कखनो मोन नहि पड़ैत छी, किएकतऽ सदिखन मोने मे रहैत छी फूल बनि सदिखन हृदय मे गमकैत छी अहीँक नेहक जोत सँ हम चमकैत छी । रुबाइ-5 अहीँक प्रेमक छाह जीब' चाहै छी अहीँक आँचरक हवा पीब' चाहै छी अपन फाटल करेजा सीब' चाहै छी अहीँक नैनक शराब पीब' चाहै छी रुबाइ-6 करेजक तह मे चौपैत रखलौँ जकरा खून अपन पिया पोसैत रहलौँ जकरा जुआनीक मद बौरायल सैह लगैछ परल एकात समाज मे बनलौँ फकरा | रुबाइ-7 अहीँक प्रेमक छाह जीब' चाहै छी अहीँक आँचरक हवा पीब' चाहै छी अपन फाटल करेजा सीब' चाहै छी अहीँक नैनक शराब पीब' चाहै छी । रुबाइ-8 सूर्यक प्रखर रश्मि सन चमकैत रहू शरदक इजोरिया सन दमकैत रहू कामिनी रातरानी सन गमकैत रहू रुन-झून पायल पहिरि छमकैत रहू । रुबाइ-9 अहाँक केश सँ झहरैत पानिक बुन्नी अहाँक गाल सँ ससरैत पानिक बुन्नी अहाँक ठोर सँ टपकैत पानिक बुन्नी हमरो देह सँ टघरैत पानिक बुन्नी । रुबाइ-10 घोरनक छत्ता झाड़ि पानि ढ़ारि देबौ एकहि चाट मे धरती पर पारि देबौ रै खचराहा खचरै सभ घोसारि देबौ मैथिलीक अपमान करब विसारि देबौ । रुबाइ-11 जौँ डेनधऽ चलबे संग तऽ तारि देबौ नैतऽ कलमक मारि, गत्र ससारि देबौ मिथिलाक विरोधी, मारि खेहारि देबौ रचलाहा प्रपंच पर पानि ढ़ारि देबौ । रुबाइ-12 महगीक आगि मे जरलै जनता के बटुआ दिन-राति एक तीमन पिबैछी झोर पटुआ सरकार के विरोध मे लगबैत छल जे नारा खसल छै सड़क पर से लोक लटुआ-लटुआ । रुबाइ-13 छाक भरि के आइ पीबय दिअ' हमरा पोख भरि के जिनगी जीबय दिअ' हमरा खोँचाह बात से लागल खोँच, फाटल, गुदरी भेल जिनगी सीबय दिअ' हमरा । रुबाइ-14 सीता चरण नूपुर झनक झमकैत रहय बाड़ी अयाची फूल सदति गमकैत रहय जनकक खेतक माटि माथ सजबैत रहय मैथिल-मिथिला कीर्ति जगत पसरैत रहय । रुबाइ-15 धिया सिया सन घर-घर मे जनमैत रहय शंकर बनिकऽ पूत अंगना मे खेलैत रहय उगना सन केर चाकर बाँहि पुरैत रहय हरियर खेत-पथार सदति बिहुँसैत रहय रुबाइ-16 कल-कल कमला कोशी निर्मल बहैत रहय छल-छल गंगाक निश्छल जल छलकैत रहय बागमती गंडक धरती जी जुड़बैत रहय माछ मखानक डाला नित सजबैत रहय रुबाइ-17 उज्जर परती हरिया गेलै जेना दियादी झगड़ा फरिया गेलै जेना लागल भीड़ छिड़िया गेलै जेना मोनक बात मरिया गेलै जेना । रुबाइ-18 अनका कनिते देख भभाकऽ लोक हँसैए अपन विपति के बेला देखू कोना कनैए अनकर कान्ह कोदारि हल्लुक लगैछै जकरा अपना हाथ सँ धरिते बेंट सैह लोक कुथैए । रुबाइ-19 नाङट गरीब, माने हकन्न कनैए फैशने चूर धनिको, नङटे नचैए देखू नङटा, नङटे के देखि हँसैए एकदोसर के देख संतोष धरैए । आकाशवाणीक दरभंगा केन्द्र सँ दिनांक १० मार्च २००४ के "तरुण-कुसुम" कार्यक्रम मे कविताः- (1)"दीप" दीप जड़ैत अछि, हवा सामान्य रहैत छैक जखन, कञ्पित होइत छैक दीप-शिखा, जेना हँसैत हो दीप । पवनक वेग बढ़ि जाइत छैक- अचानक...एकाएक...अकस्मात् जोर-जोर सँ, कञ्पित होमय लगैत अछि दीप-शिखा, जेना जोर-जोर सँ हँसऽ लागल हो दीप । पवनक संग लड़ैत अछि दीप । मुदा, तखनहि- पवन अपन वेग आओर बढ़ा दैत अछि, हारि जाइत अछि दीप, मरि जाइत अछि दीप, मिझा जाइत छैक दीप-शिखा, मुदा, मरियो के हमरा सभकेँ, जीवन-पर्यन्त हँसैत रहबाक, हँसैत-हँसैत लड़ैत रहबाक, सनेस दऽ जाइत अछि दीप । (2)"भय" हे प्रिय हम अनंतकाल सँ, तकैत छी अहाँक बाट । दिन-राति हमर अनिमेष दूनू नेत्र सँ, बहइछ गंगा-जमुनाक धार । करैत छी अहाँक स्मरण कऽ-कऽ- करूण क्रन्दन । अहाँक एक झलक देखबा' लेल, आकुल रहैछ हमर, सर्वांग, तन-मन, संगहि- मोन रहैछ भयभीत- अहाँके देखिकऽ, अहाँके देखबाके, हमर ई व्याकुलता नहि कम भऽ जाइ| (3).।।बज्जर धरती पर।। चम्मच सँ खुनलौँ खत्ता बज्जर धरती पर। ठूठ गाछ कलशल पत्ता बज्जर धरती पर।। हरित बाग प्रकृति सत्ता बज्जर धरती पर। चिड़ खोप लागल कत्ता बज्जर धरती पर।। सहसह लोक घोरन छत्ता बज्जर धरती पर। रंग-बिरंग पहिरन लत्ता बज्जर धरती पर।। लागल भीड़ भासल हत्ता बज्जर धरती पर। चालि जगत के अलबत्ता बज्जर धरती पर ।। (4)."मोन होइए जे-" मोन होइए जे पसेनेक बुन्न सँ सुखसागर निर्माण करी । मोनो होइए जे कोनो कर्मयोगीए के भगवान कही । मोन होइए जे जीवनक रणक्षेत्र मे कर्मयुद्धक आह्वान करी । मोन होइए जे अलसायल परती कोड़ि कर्मयुगक आधार रची । मोन होइए जे जिनगी मे जे किछु करी मात्र तकरे पर अभिमान करी । मोनो होइए जे फेर उठी,सम्हरि,लक्ष्य संधान करी कर्मेक बाट प्रस्थान करी । मोन होइए जे मोनक बात बात मोनहि नै रहै से कोनो अनुसंधान करी । (5).हमर करेजा छन सँ उठलै हमर करेजा जखन अहाँके नेह मे डुबलै चन सँ उठलै हमर करेजा जखन अहीँके नेह मे टुटलै । धक दऽ रहलै हमर करेजा जखन अहाँके सोँझा पड़लै फक सँ मरलै हमर करेजा जखन अहीँबिनु एसगर पड़लै (6)."बिडम्बना" एकदिश भरले डकैत-चोर दोसरदिश डरले कनैत-लोक कोना कटतइ राति अन्हार क्षण-क्षण बितैब भेल पहाड़ । एकदिश कोठा-महल ठाढ़ दोसरदिश ककरो चुबै चार केयो नञ्गटे घूमै बजार ककरो कुक्कुरो के ओहार । एकदिश छप्पन भोग सचार दोसरदिश ककरो नून-अचार दुश्मन हाथ सँ लऽ के कटार मीता के खून करैछ भजार । एकदिश अभिमानक पहाड़ दोसरदिश मोहक अंध-इनार बिच मे समतल एकपैरिया संधानि चलू जिनगीक बाट। (7)."मोनक बात" आइ फेर जनु भरले घर एकात भेल छी हँसैत परिजनक बीच ठोहि पाड़ि कनैत छी। बाबू बिमार छथि गाम मे तैँ माय कनैत गेलीह कनिते छोड़ि गेलीह हमरा हँसैत दुधमुँहा नेना के कोरा मे लऽ बैसल कनैत छी । एसगरि कनिञा की-की करतीह, कोना के घर डेबतीह एहि अनचिन्हार नगर मे ? अनंत सोच मे पड़ल छी । माथ पर लाखो कर्जा कमा-कमा सूदि चुकबै छी मूल कोना सधत कोनो ने बाट देखै छी । समाजक नजरि मे कमौआ पूत बनल छी फेर के बुझत जे हकन्न कनै छी । आब तऽ दोसरक मिसिया भरि सुख लोक पहाड़ सन बुझैत अछि आ' तै तऽ तुरंते ओकर जड़ि खोधय लगैत अछि मुदा, अनकर पहाड़ सनक दुख ककरो नहि सुझैत छै ककरो हृदय के नहि चिरैत छै लोक तऽ ओकरा फुल सन हल्लुक बुझैत अछि ओहि सँ सुख पबैत अछि । मोनक बात मोनहि मे रहल सभटा आस नोरहि मे बहल ककरा कहबै,के पतिएतै, तैँ एसगरे लड़ैत छी उदीग्न मोन बुझबैत छी कर्मण्येवाधिकारस्ते ...पढ़ैत छी कर्म करैत छी जिनगीक बाट चलैत छी छिड़िआयल काँट-कुश बिछैत छी दुधमुँहा नेनाक संग बिहुसैत छी नहाइत काल कनैत छी बकोर लागल अछि बकार नहि फुटैए फेर, मोनक बात कहब कोना तैँ लिखैत छी । (8.) मूरख मंत्री, निरपट सरकार तकरा संग आफिसर बुधियार जनता संगहि करैछ खेलबार हनि रहल महगीक तलवार। एमहर गरीब गुरबा लचार ओमहर ककरो बढ़ल बेपार ककरो देह जनु सूखल अचार ककरो धोधि जनु उठल पहाड़। कतहु सौजनिया नोत हकार तीमन तरुआ मधुर सचार ककरो सेहन्ता नोन अचार कोना के कटतै जिनगी पहाड़ ? जनता के बुझि गाय धेनुआर दुहि रहलै निष्ठुर सरकार टुटतै मूँह आ' फुटतै कपार जहिया परतै एकर लथार । हाइकू पाथर तोड़ै जेठ दुपहरिया टपके घाम । नञ्गटे देह जरठुआ रौदहि जड़लै चाम । गुमकी सौँसे पात डोलय नहि विधातो वाम। ढनकै मेघ चमकल विजुरी सुखल घाम । सुपक्क गोपी खसल छहोछित पकलै आम । अगता खेती नक्षत्र अरदारा सुखी किसान । हाइकु बेघर बच्चा ढेरिऔलक बालु बनेतै घर । सिन्धु कछेर उधियाइत पानि दहेलै घर । गाछक तर सिखैछ लिखनाइ बच्चा 'घर' ! कहाँ छै ठर बुढ-पुरान केर अपने घर । अँगना घर बनल मरचर घरहि-घर । ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। जगदानन्द झा 'मनु' ग्राम पोस्ट- हरिपुर डीह्टोंल, मधुबनी रुबाइ-१ आँचर नहि उठाबू आँखि सँ  तँ पिबअ दिय  हम जन्म सँ पियासल करेज जुड़बअ दिय  केँ कहैत अछि निसाँ शराब में बड अछि  कनीक अपन प्रेमक निसाँ तँ पाबअ दिय रुबाइ-२ छी हम पिबैत सभ कहलक शराबी अछि हमरो  आँखि सँ देखू की खराबी अछि बुझलौं अहाँ  सभ   दुनियाक  ठेकेदार आबू संग पीबि केँ नहि शराबी अछि रुबाइ-३ पीबू  नै शराब   हम जीबू कोना क' फाटल करेज केँ हम सीबू कोना क' सगरो जमाना भेल दुश्मन शराबक सबहक सोंझा तँ आब पीबू कोना क' रुबाइ-४ पीलौं शराब तँ दुनिआ कहलक बताह नहि पिने ई दुनिआ लगैत अछि कटाह बिन पिने सभतरि मचल अछि हाहाकार तँ पिबिए क' किएक नहि बनि जाइ घताह रुबाइ-५ ढोलक  धम-धमा-धम बजैत किएक छै घुघरू  खन-खना-खन खनकैत किएक छै दुनू भीतर सँ छैक एक्केसन  खाली दुनू अपन गप नहि बुझहैत किएक छै रुबाइ-६ भेटल नहि स्नेह तँ  हम शराबे पीलौं रहितौं  अहाँक संग तँ जुनि किछु छुबितौं केँ कहैत अछि छथि भगबान मंदिर में हुनकर  दर्शन  अहाँक स्नेह में पेलौं रुबाइ-७ पीलौं नहि शराब  तँ हम किछ बूझब की बिन पीने दुनिआ में करब तँ करब की एक दोसर केँ सभ अछि खून पिबैत नहि पीने खूनक घोंट  पी क' रहब की ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। १.डा. धनाकर ठाकुर २.नवीन कुमार आशा १ डा. धनाकर ठाकुर (26.5.2012क फारबिसगंजमे 24म अन्तरराष्ट्रिय मैथिला सम्मेलनक काव्य संध्यामे मंच पर रचित आशु कविता।) जँ हो अपना पर विश्वास

चाही त सुना सकैत छी राति भरि अहाँकेँ बना-बनाकेँ कविता चाही त झुमा सकैत छी राति भरि अहाँकेँ बना-बनाकेँ कविता

मुदा करब नहि से सुनु बस किछु पांति पांति अछि इ भोगल पांति अछि इ भीजल जीवनक धारमे डूबैत-उतराइत अपन मंझधारमे।

जरैत रौदमे पैघ बाधमे एक हरियर गाछ हारलकेँ जीवनक आश

गर्मीमे पीपरिक हरियर-हरियर पात जरैत जीवनक आश।

भादवक घटाटोप मेघक रातिमे बिजलीक इजोत भटकल पथिककेँ देखाइत बाट भेटल जीवनक आश।

दाहल कोशीमे दहाइत लोक देखल एक गाछक लबदलि डारि भेटल जीवनक आश।

नागक फूफकारसँ गेल जीवनक आश उड़ैत बाजक झपट भागल नाग भेटल जीवनक आश। शीतमे हरियर-हरियर दूबि पर ओसक धवल बिन्दु उगलाह सूर्य सप्ताह पर भेटल जीवनक आश।

समुद्रमे डूबैत जहाजीक लग डगल जमीनक ढ़ेप डूबैतकेँ भेटल जीवनक आश।

जीवन जखन हारैत देखाइत अछि कतहुसँ भेटैत अछि जीवनक आश जँ हो अपना पर विश्वास।

२ नवीन कुमार आशा विदेह परिवार बिनु रहब कोना फाटल करेज के सिबब कोना विरह गीत मेँ सेहो नहि सुर ओहि मय तान लगायब कोना कलम जे चलल छल सजि के ओकरा उजर नुआ पहिनाबु कोना ज्ञान क अलख जे जगोलथि हमरा मय ओ प्रनेता के बिसरब कोना मचान पर बैसल सोचि ऐतबा बिछरल परिवार सँ मिली कोना विदेह परिवार छमा माँगु कोना बिना क्षमा के रहब कोना जीवन के इ शौक अछि बिनु रोजगारे रहब कोना ऐतबा लिख रहब कोना बिनु आशीष जियब कोना विदेह लेल रहब सदिखन उपस्थित पर किछु दिनक मोहलत माँगु कोना। [अपने सब सँ दूर रहेक उदासी अछि  पर बिनु रोजगारे जीवन खाली अछि। विदेहक जनक गजेन्द्र ठाकुर आ समस्त परिवार के समर्पित] ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। विदेह नूतन अंक मिथिला कला संगीत राजनाथ मिश्र चित्रमय मिथिला स्लाइड शो चित्रमय मिथिला (https://sites.google.com/a/videha.com/videha-paintings-photos/ ) २. उमेश मण्डल मिथिलाक वनस्पति स्लाइड शो मिथिलाक जीव-जन्तु स्लाइड शो मिथिलाक जिनगी स्लाइड शो मिथिलाक वनस्पति/ मिथिलाक जीव जन्तु/ मिथिलाक जिनगी  (https://sites.google.com/a/videha.com/videha-paintings-photos/ ) ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। विदेह नूतन अंक गद्य-पद्य भारती १. मोहनदास (दीर्घकथा):लेखक: उदय प्रकाश (मूल हिन्दीसँ मैथिलीमे अनुवाद विनीत उत्पल) मोहनदास (मैथिली-देवनागरी) मोहनदास (मैथिली-मिथिलाक्षर) मोहनदास (मैथिली-ब्रेल) २.छिन्नमस्ता- प्रभा खेतानक हिन्दी उपन्यासक सुशीला झा द्वारा मैथिली अनुवाद छिन्नमस्ता ३.कनकमणि दीक्षित (मूल नेपालीसँ मैथिली अनुवाद श्रीमती रूपा धीरू आ श्री धीरेन्द्र प्रेमर्षि) भगता बेङक देश-भ्रमण बालानां कृत १.चंदन कुमार झा- बाल गजल २.डॉ. दमन कुमार झ-एकैसम शताब्दीक पहिल दशकमे मैथिली  बालसाहित्य३.डॉ॰ शशिधर कुमर “विदेह” १ चंदन कुमार झा सररा, मदनेश्वर स्थान मधुबनी, बिहार बाल-गजल दऽ रहल छी अपन शपथ, नै कानू बौआ लेबनचूस लऽ पप्पा औताह, कुचरे कौआ हम तऽ माय छी सत्ते,मुदा बेबस लाचारे कीनि खेलौना देब कतऽसँ,नहि अछि ढौआ भरना लागल खेत, महाजन के तगेदा फेर कोना के सख पुरौताह बाप कमौआ अहीँ पुरायब सख सेहन्ता आस धेने छी अहीँ जुड़ायब छाती बनिकऽ पूत कमौआ कबुला,पाती,विनय,नेहोरा, करैछी भोला बेलपात "चंदन" चढ़ायब खूब चढ़ौआ --------वर्ण-१६---------- २ डॉ. दमन कुमार झा, अध्यक्ष, मैथिली विभाग,  जगदीश नंदन महाविद्यालय,  मधुबनी . एकैसम शताब्दीक पहिल दशकमे मैथिली  बालसाहित्य बालसाहित्य नेनाक साहित्य थिक, नेनाक हेतु लिखल साहित्य थिक, नेनाक हेतु अर्थात नेनाकें सत्पथपर अनबाक हेतु लिखल साहित्य. ओ सत्पथपर कोना आओत, कोन माध्यमसं आओत,तकर  प्रमुख स्रोत अछि बालसाहित्य. बालसाहित्यक प्रति नेनाक आकर्षण ओहि मनोवैज्ञानिक प्रक्रियाक परिणाम थिक जे ओकरा आकर्षक वस्तुक प्रति जिज्ञासु बनबैत छैक. जिज्ञासा शांत करबाक इच्छा एतेक प्रबल रहैत छैक जे से ओकरा पाठशालामे शांत नहि भ’ पबैत छैक.ओ ओकरा जेना-तेना शान्त कर’ चाहैत अछि. साक्षर भेलापर तें ओकरा पोथी पढबाक रूचि जगैत छैक. तें बालसाहित्यक स्वतंत्र अस्तित्व छैक. अपना सभक समक्ष बालसाहित्यक की स्थिति अछि, से ककरो सं नुकायल नहि अछि.  बालसाहित्य समृद्ध नहि अछि, ई तथ्य थिक. किएक नहि अछि – ई चिन्ताक विषय थिक .ताहू सं अधिक चिन्तनक विषय थिक. सभसं प्रधान कारण अछि प्राथमिक विद्यालयमे मैथिलीकें शिक्षाक माध्यम नहि होयब .एखन हमरालोकनि  एहि प्रयासमे लागल छी जे कहुना ई सरकारी स्कूलमे शिक्षाक माध्यम रूपमे स्वीकृत भ’ जाओ .सरकार कहैत अछि जे -- से तं अछिए .विद्यार्थी पढिते नहि अछि ,अभिभावक अपन पाल्यकें पढ़वहि नहि चाहैत अछि .ताहिमे सरकार की क’ सकैत अछि ?ई तं एक समस्या भेल. मानि लिय’ ताहिमे हमरालोकनि कने सफलो भ’ गेलहुँ ,प्राइमरी स्कूलमे मैथिलीक माध्यमसं पढ़ौनी शुरूहो भ’ जायत तं ताहि सं की समस्याक समाधान भ’ जायत ? हम बुझैत छी नहि .कारण ,कतेक प्रतिशत नेना सरकारी स्कूल मे पढ़’ जाइत अछि ?असल समस्या तं अछि पब्लिक स्कूलक .जाधरि मिथिलाक सभ पब्लिक स्कूलमे मैथिली नहि लागू होयत ,विषयक रूपमे सेहो आ माध्यम रूपमे सेहो ,तावत धरि नेनाकें अपन मातृभाषाक दिस आकृष्ट करब आकास-कुसुमे रहत . नेनाकें जैह पढाइ होयतैक ,सैह ने ओ पढतैक ?की ओकरा सं ई अपेक्षा करबैक जे ओ कहय जे हम हिन्दीमे नहि पढब ,अंगरेजीमे नहि पढब, हम मैथिलीए मे पढब ? नेना ई नहि कहत. ई कहत नेनाक माता-पिता, अभिभावक .मुदा नेनाक बेसी अभिभावक कें ई बुझले नहि छनि जे मैथिलीओ मे बालसाहित्य छैक . हम कहैत छी छैक, आन भाषाक तुलनामे कम भने रहौक ! एक्कैसम शताब्दीक पहिल दशकपर ध्यान दी तं अनेको बालसाहित्यक पोथी विभिन्न विधामे प्रकाशित अछि . कविता ,कथा ,जीवनी ,निबंध ,विज्ञानविषयक पोथी, चित्रकथा आदि .ई दशक मैथिली बालसाहित्यक लेल एक आओर कारणे महत्वपूर्ण रहल अछि. एही दशकमे साहित्य अकादेमी द्वारा मैथिली बालसाहित्य पुरस्कार सेहो प्रदान कयल जाय लागल . अद्यावधि दू गोट पोथीकेँ पुरस्कृत कयल गेल अछि . ओ थिक तारानंद वियोगीक दीर्घबालकथा – ‘ई भेटल तं की भेटल’ ?आ दोसर थिक ले.कर्नल मायानाथ झाक बालकथासंग्रह  – ‘जकर नारि चतुर होइ’ . ‘ई भेटल तँ की भेटल’ तारानंद वियोगीक कथा-पोथी थिक. एहिमे मोद्गल आ ग्लावक खिस्सा अछि. दुनू ऋषि छथि, दुनू शिष्यकें शिक्षा दैत छथिन . मुदा ग्लाव मोद्गल कें कखनो मोजर नहि दैत छथिन . ओ सदिखन अहंकारमे जीबैत छथि. एकदिन मोद्गल ग्लावक शिष्य सुतापी द्वारा समाद पठौलथिन जे अहाँक गुरु ग्लाव चारिम वेदक विषयमे की बुझैत छथि? जखन सुतापी चारिम वेदक विषयमे पुछलथिन तं ग्लाव बजलाह – तीन वेद कोन कम भेलै जे ओ चारिम लेल झखै छथि ? मोद्गल ई सुनि बुझि गेलाह जे ओ असली ऋषि नहि छथि. मोद्गल हुनका सं एक प्रश्न पुछलनि. प्रश्न छल –‘एकटा कियो छथि, हुनका बारह टा मिथुन छनि, चौबिस योनि छनि, एक आँखि भृगु छथिन, दोसर आँखि अंगिरा छथिन. बुझनिहार हुनका शक्ति कहै छनि, हुनके असरापर सभ टिकल अछि. अहाँक गुरूजी कहथु जे वास्तवमे ओ के छथि ? हुनक रहस्य की छनि? हुनका कियो कोना पाबि सकैत अछि?---प्रश्नक उत्तर ओ जहिया चाहथि, तहिया देथि. खोज क’ लेथि, मुदा जं उत्तर नहि द’ सकताह तं हुनक नाश निश्चित  अछि . ई सुनि गलावक हाथ–पयर सुन्न हुअ’ लगलनि. राति–राति भरि जगल रहला .अंतमे ओ मोद्गलक शिष्य बनि गेलाह .ज्ञानप्राप्तिक  बाद जखन उपदेशक बेर अयलनि तं मोद्गल गायकें देखा हुनक सेवा करवाक हेतु कहलथिन. एक साल बाद मोद्गल गलाव सं पुछलथिन की सिखलहुँ---गाय कें घमण्ड नहि छनि . घमण्ड व्यर्थ चीज थिक. पुनः मोद्गल बेंग सं शिक्षा लेबा लेल कहलथिन .एक साल बाद पुछलथिन ,तं गलाव बजलाह ---ओ जीवनक पारखी होइत छथि भगवन् ! कोनो हालमे जीबी सकै छथि. ओ समय कें चिन्है छथि. दुर्दिनकें बर्दास्त करै छथि . ठीक अछि, एखन उपदेशक समय नहि आयल अछि .अहाँ गाछ–बृक्ष सं शिक्षा लिय’ . गलावकें गाछ –वृक्ष कें सेवा करैत असली ज्ञानक प्राप्ति भेलनि. ओ बजलाह–गाछ अपना लेल किछु नहि करैत अछि. ओ दोसरेक हेतु होइत अछि .जखन एहि बातक भान गलावकें भेलनि तं ओ गाछकें पकड़ि क’ कान’ लगलाह . ई दृश्य देखि मोद्गल गदगद भ’ गेलाह .गलाव मोद्गलकें देखि चिकरि उठलाह ---भेटि गेल गुरुदेव ....हमरा सभ-किछु भेटि गेल .ग्लावक मुखमण्डल पर ज्ञानक अखंड ज्योति जगमगा रहल छल .कथाकार ई कह’ चाहैत छथि जे सभसँ पैघ सेवा परोपकार  थिक . दोसर पुरस्कृत पोथी थिक ले.कर्नल मायानाथ झाक – ‘जकर नारि चतुर होइ’ .एहिमे एक्कैस गोट कथा संगृहीत अछि .सभ कथा मनोरंजक आ उपदेशात्मक अछि .जे नेना कें मनोरंजनक संग ज्ञानक ज्योति सेहो देखबैत अछि. सभ कथा बुद्धिक महिमा देखबैत अछि ,ज्ञान दैत अछि जे बिना सोचने किछु नहि करी ,नारीक चतुर्य, निरंतर अध्यवसाय, समयक पाबंद होयब आदि बीजमंत्र सिखबैत अछि. कथाक भाषा सरल , सरस आ बोधगम्य अछि . बालमनक संग–संग किशोर मनकें सेहो ई कथा सभ उद्वेलित करैत अछि . एहि महक अधिकांश दादा-दादी, माय-पितिआइनिसं कथा सुनि क’ लिखल गेल अछि .कथाकार जेना कथा सुनलनि, ठीक तहिना लिखबाक प्रयास कयलनि अछि. मात्र छओ गोट कथा लेखकक अपन छनि, यथा ----ख्याली पुलाव ,लुच्चा गीदर, उपाय आ अपाय, अकठ-विकठ , प्रभुलीला एवं  भगवान जे करैत छथिन. सुनल कथामे एक अछि – साहसी फुद्दी. ई कथा नेनामे सभ गोटे सुनने होयब .कथा कहबाक ढंग गद्य–पद्यमय अछि .एहि कथामे ई शिक्षा देल गेल अछि जे हारि नहि मनवाक चाही. लगन रहत तं सफलता भेटबे  करत . एहने एकटा कथा अछि – टिकरमबाजी. एहि महक किछु कथा दीर्घ अछि .किछु प्रमुख कथा थिक—प्रारब्ध ,प्रेतवास, भन्नू, आंतरिक प्रेम . हिनके दोसर बालकथा संग्रह थिकनि--- ‘इजोत’. जाहिमे नबासी गोट कथा अछि . एहि कथा सभपर प्रकाश दैत प्रो. भीमनाथ झा कहैत छथि-----‘’सभ कथा प्रेरक अछि ,ज्ञानवर्धक अछि ,मनुष्यक उदात्त  भावनाकें जगोनिहर अछि ,कुसंस्कारी अन्हार घरमे संस्कारक इजोत खिरौनिहार अछि .विशेषतः किशोर लोकनिक हेतु तं ई प्रकाशपुन्जे थिक’’.१  से ठीके ले. कर्नल मायानाथ झा धियापुताक हेतु प्रकाश पुन्जे भ’ क’ अवतरित भेलाह अछि. ई एहिना लागल रहताह तं नेना लोकनिक हेतु एक-सं-एक कथा जे विलुप्त भ’ रहल अछि ,से सामने अबैत रहत . एहि महक किछु प्रमुख कथा अछि ---साहस ,विषक बदला , क्षमा ,बलिदानी ,शिक्षा ,मातृभाषाक सेवा . ‘दहीक खोंइचा’---पंडित श्री चन्द्रनाथ मिश्र ‘अमर’ कें लिखल छनि. एहिमे छबीस गोट कथा संगृहीत अछि. अमरजीक लिखल कथा हो, सेहो नेना लोकनिक हेतु हो, तँ मनोरंजक होयबे करत. ताहिमे संदेह नहि. कहबाक छटा एकदम रम्य अछि. पढैत जाउ, हँसैत जाऊ. पहिले कथा – दहीक खुइंचा मे कोनो कविजी दहीक छाल्हीकें दहीक खुइंचा कहलनि. तकरे रोचक वर्णन भेल अछि .तहिना, एकटा कथा कहबाक लुतुक पर आधारित अछि – ‘अहाँके...’ . जाहिमे सभ बातमे अहाँके लगाक’ कथाके रोचक बना देल गेल अछि .तहिना, बकरीक हसबैंड, तामस , मुट्ठी आ चुटकी ,कचोट ,सोहारीक जरुआ मनलग्गू कथा अछि . एहि महक ‘भूजा’ कथा देखल जाय ---------------‘’जलखैमे भूजा हमरा सभ दिन सं प्रिय रहल अछि .एक दिन भूजा फंकैत काल भूजा शब्दक अर्थ दिस ध्यान चल गेल. एकाएक एक टा अर्थ बिजली जकाँ माथमे चमकि उठल ------‘भू’  मने पृथ्वी ,ताहिमे ‘जा’  अर्थात जन्म लेने छथि जे, से  अर्थात  सीता .तुरंत दुनू पयर मोड़ि, ठेहुन भरें बैसि, भूमिमे माथ सटा भूजाकें प्रणाम कयल आ गुरूजीकें जा क’ कहि देलियनि ---अपने नहि बुझबै. संस्कृतक बात थिकै .’’२ ‘प्रेत कथा’----एकर लेखक हंसराज थिकाह .एहिमे छओ गोट कथा अछि .’प्रेतविवाहपद्धति’ आ ‘यावत पढबह रूद्र’ बाललोककथा थिक. एहिमे प्रेतयोनिक अद्भुत् कृत्य सभकें रोचक ढंगसं प्रस्तुत कयल गेल अछि . ‘मैथिली लोककथा’----रामलोचन ठाकुरक लिखल छनि. एहिमे छतीस गोट लोककथा संगृहीत अछि. लोककथाक मादे स्वयं लेखकक मंतव्य छनि जे ------‘’लोककथाक सभसँ प्रमुख विशेषता थिक जे ई अलिखित अछि आ आरंभ कालसं आइ धरि एक कंठसं दोसर कंठमे प्रवाहित आबि रहल अछि .एहि कारणे एकर बाहरी रूपमे परिवर्तन अबस्से भेलै-ए, परन्च आंतरिक रूपमे कोनो टा परिवर्तन नहि भेलै-ए. एकर मौलिकता ओहिना छैक.’’३ एहि महक किछु कथा दीर्घ अछि .सभ कथा रोचक आ मनोरंजक अछि .यथा-–गदहा, खेने कोनो ने दोष, काजरि, एकटा गरीब वाभन रहथि, नारद मुनि आ साँप, लालबुझक्कर आदि. ‘पिलपिलहा गाछ’ -----मुरलीधर झाक ई बालकथा संग्रह थिक .एहिमे एक्कैस गोट कथा संगृहीत अछि.  कथा सभ सरल आ छोट-छोट  वाक्यमे लिखल अछि .एहि पोथीक पाठक बारहसं सत्रह वर्षक नेना भ’ सकैत अछि, जखन ओकर मानसिक स्तर ऊँच भ’ जायत छैक . एहि संग्रहक प्रसंग डॉ. रामदेव झा लिखैत छथि जे -----‘’एहि संग्रहक कथा सभ मे पुरान मानसिकताक अनुरूप बालमानसकें बोझिल बना देनिहार अकर्तव्यताक निषेध ,कर्तव्यताक आदेश अथवा नैतिकताक उपदेश देवाक बलात्  चेष्टाक स्थान मे घटित घटना ,पात्रक स्वभाव ओ चरित्र अथवा आचरणक माध्यमे अनायास सहज रीतिसं सद्भावना ओ सत्प्रेरणाक सन्देश सम्पुटित अछि  जे बाल वर्गीय पाठकक चरित्र –निर्माणमे परोक्ष भावसं सहायक भ’ सकैछ .’’४    कथामे ठाम –ठाम चित्रक प्रयोग कयल गेल अछि जे कथाकें आकर्षक बना देलक अछि .कथाक नामकरण ‘पिलपिलहा गाछ’ आमक गाछ पर कयल गेल अछि ,जे अत्यन्त दुर्वल ,क्षीणकाय ,मरदुआरी अछि .अन्य कथा सभमे भैयारी , धैर्य , हर्षक नोर , कृतज्ञ , मर्यादा ,तृप्त ,जुग-जुग जीबू आदि प्रमुख अछि .संग्रहक कलेवर आकर्षक अछि . वर्तमान कालमे बाल साहित्यक क्षेत्र मे ऋषि वशिष्ट बढियाँ काज क’ रहल छथि. हिनक किछु बालपोथी आयल अछि .यथा --- ‘कोढ़िया घर स्वाहा’ ,’झुठपकरा मशीन’ आ ‘जे हारय से नाक कटाबय’ . ‘कोढ़िया घर स्वाहा’ मे आलसी मनुष्यक चित्रण कयल गेल अछि .आलस कें अपना भीतर पैसय नहि दी जाहि सं कोनो भारी नोकसान भ’ जाय . ‘झूठपकरा मशीन’ नैतिक शिक्षा पर आधारित अछि. एहिमे छात्रसं तंग आबि क’ गार्जियन झूठ पकर’ वाला मशीन होयबाक बात सोचैत छथि, जाहिसँ ओ झूठ नहि बाजय तकर प्रयास करइ छथि. ‘जे हारय से नाक कटाबय’ लोक कथा पर आधारित अछि. ई तीनू पोथी  मैथिली बालसाहित्यक विकासमे  सहायक सिद्ध भेल अछि. श्री जगदीश प्रसाद मंडलक – ‘तरेगन’  प्रेरककथाक एक महत्वपूर्ण संग्रह थिक . मैथिली बालसाहित्यक क्षेत्रमे बाल-चित्रकथा एकटा अपूर्व आनंदक सृष्टि कयलक अछि. ई एकटा आंदोलन थिक . एहि  क्षेत्रमे देवांशु वत्स आ प्रीति ठाकुर नीक काज क’ रहल छथि .हिनका लोकनि सं आगुओ आशा कयल जाइत अछि .देवांशु वत्स ‘नताशा’ नामक पहिल मैथिली चित्रश्रृंखला प्रकाशित क’ नेनाक हाथमे पोथी पहुंचा देलनि .ओकरा सुन्दर-सुन्दर चित्र आ  सटीक आ छोट-छोट  वाक्यक माध्यमसं मनोरंजनक वस्तु प्रदान क’ देलनि. एहि पोथीमे अठतालीस गोट रोचक घटना अछि .एही क्रम कें आगू बढबैत प्रीति ठाकुर सेहो नीक काज क’ रहलीह अछि .हुनक ‘गोनू झा आ आन मैथिली चित्रकथा’ एवं ‘मैथिली चित्रकथा’ ई दू टा पोथी प्रकशित भेलनि अछि .एहिमे गोनू झाक छोट-छोट खिस्साकें चित्रक माध्यम सं प्रस्तुत कयल गेल अछि. जे नेना लोकनिकें मनोरंजन प्रदान करैत अछि . बालकविता ==== मैथिली बालकविताक क्षेत्रमे नव-पुरान दुनू कोटिक कवि विशेष रूपसं आकृष्ट भेलाह अछि. ताहिमे प्रमुख छथि--- गोविन्द झा ,चन्द्रनाथ मिश्र ‘अमर’, जीवकांत , सरसजी ,भोला झा विमल ,कालीकांत झा ‘बूच’, सत्यनारायण झा, डॉ.आर.के.रमण, गजेन्द्र ठाकुर आदि . सभसं पहिने मैथिलीक सुप्रतिष्ठित साहित्यकार जीवकांतक चर्चा करब .हिनक लगातार चारि गोटे बालकविता संग्रह एहि अवधिमे प्रकाशित भेलनि अछि. गाछ झूल-झूल में 63 गोट कविता छनि, छाह सोहाओनमे 57 गोट, खिखिरक बिअरिमे 12 गोट आ ‘हमर अठन्नी खसलइ वनमे’ मे 20 गोट बालकविता संगृहीत अछि . जीवकान्तक बालसाहित्यकें डॉ.प्रेमशंकर सिंह चरि भागमे विभाजित कयलनि अछि—‘’वात्सल्य भावमया, वात्सल्य समय, शिशु बोध आ शिशु कल्पना’’.५  जीवकान्तक  बालकवितामे खेलकूद, पढाइ-लिखाइ, प्राकृतिक सुषमाक विविध स्वरूपक चित्रण भेटैत अछि, ताहिमे जीवनक विभिन्न पक्ष, बाध-बोन, महापुरुषक जीवनी आदि सहजतासं ताकल जा सकैत अछि .यैह कारण थिक जे जीवकांत नव क्षितिजक अन्वेषण करैत सार्थक जीवनमूल्यकें स्थापित करबाक प्रयासमे लागल छथि. नेनाक जिद्दकें जीवकांत कोन तरहें चित्रित कयलनि अछि से देखल जाय ‘’बाबक पेन’मे ---        ‘’ लेब अहाँकें पेन बाबा / ए बी सी डी हमहूँ करबै / लेब अहाँ कें पेन ...... गंदा पेन अहाँ हमरा दय / किए ठकै छी / अपने निकहा पेन नुकाकए / खूब लिखइ छी .... देशप्रेमक-सन्देश सूचक हिनक ‘देश’ कविता देखल जाय’’ ....६ ‘’धोन्हि फाड़ि कए उगय गोसैयाँ हमर देशमे / चारि रंग केर छइ सतभैया हमर देशमे. पर्वत टपि कए पक्षी आबइ हमर देशमे / लोल भिजाओलक बहुते जलमे हमर देशमे’’ ...७ ‘छाह सोहाओन’क भूमिकामे पंडित गोविन्द झा हिनक बालकविताक प्रसंग लिखैत छथि जे -----‘’हमरा जनैत प्रस्तुत पुस्तकमे कमसं कम दू गोट कविता एहन अछि जे ‘बाबा ब्लैकशिप’ आ ‘ट्विंकल –ट्विंकल’ सं टक्कर ल’ सकैत अछि .पहिल थिक---एक एक दिन ताक धिनाधिन .......आ दोसर थिक ---पिपरक पात हवा मे डोल......’’ ८ हमरा विश्वास अछि जे एहन गीत सभकें जं एक बेर मैथिल नेनाक ठोर पर चढाय देल जाय ,तं इहो बाबा ब्लैकशिप जकां मिथिलाक घर-घर मे पसरि जायत .हिनक पद्यकथा पर आधरित दू गोट पोथी अछि. ‘खिखिरक बीयरि’ एवं ‘हमर अठन्नी खसलइ वनमे’ . खिखिरक बीयरिक  सरल शब्दावली आ तुक–छंद, नेनाकें सहजें अपना दिस आकर्षित करैत अछि.  ’नवान’ मे मिथिलाक चित्र देखल जाय .....’’..सुगा खोलल ललका लोल / बाजल ओ बोली अनमोल / धानक खेत झुकइए शीश / हम लाएब दाना दस-बीस . आएल सुन्दर अगहन मास / धान भरल अछि पूरा चास / करब नबान देखायब मेल /सभ मिलि करबै उत्सव खेल’’९  . तहिना ‘हमर अठन्नी खसलइ वनमे ‘क सभ कविता मिथिलाक संग-संग पोराणिक –ऐतिहासिक चरित पर आधारित अछि .हिनक बाल कविताक प्रसंग डॉ. भीमनाथ झा लिखैत छथि ----‘’जहिना कथानकक भिन्नता तहिना छंदक विविधता आकृष्ट करैछ ,चमत्कृत सेहो .कोनो छंद प्राय: दोहराओल नहि गेल अछि .प्रत्येक छंद कसल-सधल अछि. काव्यप्रवाह कलकल करैत अछि .कथा सभक मूलमे अछि पाठककें शिक्षित करब, देशप्रेमक भावना भरब, आलस्य कें हरब तथा मानवताक सेवा लेल प्रेरित करब.’’१०  एहि तरहें जीवकान्तक कवितामे ठेठ मैथिली शब्दक प्राचुर्य अछि ,लोकोक्तिक सुन्दर प्रयोग भेल अछि. हिनक बालकविता संग्रह मैथिलीक बालकाव्य साहित्यक अनुपम धरोहर थिक . पं. श्री गोविन्द झाक बालसाहित्यक क्षेत्र मे महत्वपूर्ण योगदान छनि. हिनक ‘पाकल आम’ कविता ककर ठोरपर नहि आयल छैक? एम्हर हिनक ‘प्रलाप’ नामक कविता संग्रह आयलनि अछि, ताहि मे किछु बाल कविता सेहो छनि. ओही महक ‘हेंको-हेंको’ कविताक निम्नलिखित पंक्ति देखल जाय ,जे नेना कें उपदेशपरक छैक ------- ‘’सभसं पैघ बुद्धिकें मानह बुद्धिक बिनु सब गुन हो गोबर खूब पढ़ह ओ बुद्धि बढाबह मन लगाय पहिनहुं सं दोबर नहि तं तोहूँ  कहयबह  गदहा उघबह मोटा हेंको –हेंको पएबह नित सब ठाम अनादर खएबह सोंटा  हेंको-हेंको’’११ पं.श्री चन्द्रनाथ मिश्र ‘अमर’क कवितासंग्रह ‘’ठाहि-पठाहि’’ मे किछु बालकवित संगृहीत अछि . ‘दिगदिग थैया लड़ेलड़े’ क किछु अंश  देखल जाय, जे अबोध नेना पर आधारित अछि -------‘’दिग दिग थैया लड़ेलड़े / काज करक अछि बड़ेबड़े / लड़िते चललहुँ जें सय डेग / बढ़िते चल जायत ई वेग /मा , मामा ,बाबा,सब बोल / सिखलाहु ,करइत छी अनघोल’’ ...१२ गजेन्द्र ठाकुर अपन पोथी –‘कुरुक्षेत्रम अन्तर्मनक’ ल’क’ बालसाहित्यक क्षेत्रमे प्रमुखताक संग उपस्थित भेलाह अछि. वर्तमान जीवनशैलीक सभपक्षकें हिनक बालकविता समाहित कयने अछि. हिनक बाल कवितामे शहरी आ ग्रामीण परिवेशकें सहजे देखल जा सकैत अछि .यथा क्रिकेट खेल पर हिनक कविता देखू ----------हम बाबा करू की पहिने/ बालिंग आ की बैटिंग /बालिंग कय हम जायब थाकि / बैटिंग करि हम खायब मारि ?/ पहिले दिन तू भासि गेलह / से सुनह ई बात बौ़आ / बैटिंग –बालिंग छोड़ि  छाड़ि / पहिने करह ग’ फिल्डिंग हथौआ .. १३                     (पृष्ठ -७.१२१ ) एकर अतिरिक्त भोला झा विमलक-- ‘सुप्रभात’ ,कालीकांत झा ‘बूचक’—‘कलानिधि’ ,आ ललित कुमार झाक—‘सोन्हगर –सोन्हगर गीत’ संग्रहमे सेहो बालकविता आंशिक रूप मे छपल अछि . विज्ञान ==== ‘हमर बीच विज्ञान’ ई पोथी विज्ञानविषयक थिक. दैनिक जीवन मे उपयोग होएवला वैज्ञानिक उपकरणक प्रति जिज्ञाशाकें ई शांत कर’वला अछि .एहिमे विशिष्ट वैज्ञानिकक व्यक्तित्व आ सौरमण्डलक गतिविधिक विशद चर्चा भेल अछि. एहि पोथीक लेखक छथि प्रो.धीरेन्द्र कुमार झा, जे स्वयं भौतिकीक विद्वान ओ प्रोफेसर छथि. एहि पोथीमे लेखक नेनाक उत्सुकताकें तार्किक रूप सं ,सहज ,सरल शब्दमे शांत करवाक प्रयास कयलनि अछि .ई पोथी ने केवल नेनाक अपितु वयस्कोक हेतु ओतबे लाभकारी अछि .कतहु-कतहु अर्थ व्यापकताक हेतु अंगरेजी शब्दक उपयोग भेल अछि .एहिमे 43 गोट निबंध अछि ,जे विभिन्न विषयक अछि ,यथा ----ग्रह-उपग्रह की थिक, विज्ञान विभूति नोबेल पुरस्कार विजेता डॉ. सुब्रमण्यम चंद्रशेखर, एटम बम : उद्भव ओ विकास , यन्त्र मानव रोबोटकें बुझू ,विज्ञानक चमत्कार ‘कम्प्यूटर’ , मंगलग्रहक अनुसन्धान आदि. किछु लेख प्रदूषणपर आधारित सेहो अछि. जीवनी ==== ‘कालजयी’ नामक पोथी डॉ. हरिप्रसाद वर्माक लिखल छनि ,जाहिमे 20 गोट जीवनी अछि. भाषा सहज एवं बोधगम्य अछि .कम शब्दमे बहुत बात समेटल गेल अछि .एहिमे जाहि महापुरुषक व्यक्तित्वकें चित्रित कयल गेल अछि ,ताहिमे प्रमुख छथि ---झाँसीक रानी लक्ष्मीबाइ  ,राम प्रसाद विस्मिल, विरसा मुंडा ,भगत सिंह ,चंद्रशेखर आजाद, खुदीराम बोस आदि .झाँसीक रानी लक्ष्मीबाइक एक अंश देखल जाय -------‘’मणिकणी उर्फ मनुक जन्म 16 नवंबर 1834 ई. मे भेल छल .मात्र चारि वर्षक अवस्था मे मायक छत्रच्छाया सं वंचित भ’ गेली .पिता श्री मोरोपंत हिनक शिक्षा–दीक्षा क व्यवस्था घरे पर कयल. मात्र 13 वर्षक अवस्था मे झाँसीक महराज गंगाधर राव संग हिनक विवाह भेलनि .विवाहोपरांत हिनक नाम रानी लक्ष्मीबाइ राखल गेल .’’१४  सभ जीवनी आदर्श एवं उत्प्रेरक अछि . उपन्यास ==== उपन्यासक  रूपमे ‘चन्द्रहास’ नामक अनूदित बालउपन्यास आयल अछि ,जकर अनुवादक प्रो. अमरनाथ झा छथि .ई रायबहादुर ए.सी. मुखर्जीक मूल अंगरेजी उपन्यास –The story of Chandrahas’क मैथिली अनुवाद थिक .एहिमे एकटा नेनाक खिस्सा अछि जे बाद मे चन्द्रहास भ’ राजा बनाओल जायत अछि. चन्द्रहास जखन नेने रहैत अछि तं एकरा भगवतभजन नीक लगैत छैक. इएह गबैत-गबैत एकदिन कन्तलक राजभवन धरि पहुँचि गेल. ओत’ राजा पंडित लोकनि कें उपहार बांटि रहल छलाह,एकर भजन सुनि ठमकि गेलाह .ओकरा भीतर बजाओल गेल .पांच वर्षक नेनाक आकर्षक दीप्त आँखि ओ सुन्दर मुँह देखि सभ मुग्ध छल.ओ भजन गयबाक उद्देश्यकें स्पष्ट करैत कहलक – ‘’एकमात्र अभिलाषा ईश्वरमे विश्वास रखवाक अछि आ ओहि विश्वासकें जन-जनमे प्रचार करब कर्तव्य बुझैत छी.’’ राजाक मुख्य पुरोहित बालकक पूरा शरीर देखि राजासँ कहलनि जे ई बालक राजकुमार प्रतीत होइत अछि .ओकर ललाट पर राज चिह्नों देखलनि. ओ एकरा अपने राजदरबारमे राखि उचित शिक्षा-दीक्षाक संग अपन कन्यासं विवाह कराय राजसिंहासनक भावी उत्तराधिकारी धरि बनयबाक बात कहलनि. एम्हर राजाकमंत्री घृत दुष्ट छल. ओकरा ई नहि सोहयलैक. ओ राजाक बेटीसं अपन बालक मदनक विवाह करबय चाहैत छल.ओ एकरा अपहरण क’ मरबा देबाक योजना बनओलक. ताहिमे ओ सफल नहि भ’ सकल .चांडाल सभ भगवानक प्रति एकर असीम भक्ति देखि छोडि देलकैक आ ओहो सभ भगवत भजनमे लागि गेल . ओ बालक कोना –कोना संकटसं उबरैत अछि आ अन्ततः गद्दीनसीन होइत अछि ,तकर रोचक – रोमांचक वर्णन अछि. नेनाक उत्सुकताकें बढबैत कथा चरमधरि जायत अछि.अनुवाद सुन्दर अछि. एहिमे बच्चेसं भगवानक प्रति आस्था देखाओल गेल अछि. पत्रिका ====एम्हर नव कलेवरमे आकर्षक रूप-सज्जाक संग नचिकेताक संपादनमे कोलकातासं ‘’मिथिला दर्शन’’ नामक  द्वैमासिक पत्रिका  प्रकाशित भ’ रहल अछि .ताहू मे ‘नेना-भुटका’ नामसं बाल स्तम्भ अछि . नचिकेताक कथा -‘उकरू काकाक उनटा पुरान, डॉ.अणिमा सिंहक –शिशु गीत,जीवकान्तक –लिख रे सोनू ,रामलोचन ठाकुरक –अटकन मटकन ,करिया झुम्मरी ,चेत कबड्डी ,हुक्कालोली ,अप्पन गाम, ऋषि वशिष्टक कथा – ने घरक ने घाटक, आदि प्रमुख रचना थिक.एकर मुख्य आकर्षण वर्ग–पहेली थिक, जे नेना लोकनिकें मनोरंजनक संग ज्ञानवर्धन सेहो करैत अछि. कुमार राधारमण धन्यवादक पात्र छथि, जे ओ नेनालोकनिक जिज्ञासा कें बुझलनि आ ओहि अनुरूप वर्ग –पहेली कें रखलनि. पत्रिकाक छपाई –सफाई अत्यंत उच्चकोटिक अछि ,जे नेनाकें आकर्षित करैत अछि. नेपालक श्री रामानन्द युवा क्लव ,जनकपुरधामसं सेहो एक गोट पत्रिका प्रकाशित भेल अछि ,जकर नाम –‘मैथिली चौपाड़ि’ अछि. एहू मे उच्चस्तरीय बाल रचना प्रकाशित होइ़त रहैत अछि. बाल साहित्य एतबे किन्नहुं नहि अछि. एहिसं कतोक बेसी अछि .हमरा जे तत्काल उपलब्ध भ’ सकल तकर मात्र सूचना टा देल अछि .नेनालोकनिकें पोथीओ किनबाक अभ्यास लगयबाक चाही . ई काज नीक जकाँ अभिभावके क’ सकैत छथि. ई संतोषक बात थिक जे मैथिलीमे किछु नवागन्तुक कवि –साहित्यकार शिशु साहित्यक निर्माणमे सफल भेलाह अछि .परन्तु हुनक संख्या कम अछि .एहिमे आओर विकासक आवश्यकता अछि .अंत में गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोरक एहि कथन सं अपन बात समाप्त कर’ चाहैत छी .ओ कहैत छथि -----‘’बालसाहित्यक सृजन सर्वश्रेष्ठ साहित्यिक कर्म थिक .यदि पैघ लेल लिख’वला साहित्यकार नेनाक लेल नहि लिखलनि ,ओहिसँ पैघ अभागल आर के होयत जे ओ अपन नेनपन कें फेर सं जीवि सकबाक सुअवसर गमा देलनि ?’’ सन्दर्भ –संकेत १.      इजोत-ले.कर्नल मायानाथ झा ,प्र.-अंतिका प्रकाशन ,दरभंगा ,प्र.सं.-२०११. भूमिका –भीमनाथ झा पृ-७ २.      दहीक खुइंचा –श्री चंद्रनाथ मिश्र ‘अमर’, प्र.-नवरत्न गोष्ठी ,प्र.सं.-२००७, दरभंगा, पृ.६९ . ३.      मैथिली लोककथा –रामलोचन ठाकुर ,प्र.-अरुणोदय प्रकाशन ,कोलकाता, दो.सं.-२००६. सन्दर्भ –कथा . ४.      पिलपिलहा गाछ –श्री मुरलीधर झा ,प्र.-मिथिला रिसर्च सोसाइटी,लहेरियासराय, प्र.सं.-२०१०,भूमिका- डॉ.रामदेव झा पृ -८ . ५   मैथिली बाल-साहित्यक स्थिति ओ अपेक्षा –सम्पादक.डॉ.सत्य नारायण मेहता .प्र.-चेतना समिति ,पटना ,प्र.सं-२०११, लेख-मैथिली-बाल-काव्यधारा –प्रो. प्रेमशंकर सिंह पृ.-१२. ६. गाछ झूल-झूल-जीवकांत, प्र.-चतुरंग प्रकशन ,बेगुसराय ,प्र.सं.-२००४.पृ.-३५. ७. छाह सोहओन –जीवकांत, प्र.-शेखर प्रकशन,पटना,प्र.सं.-२००६, पृ.-१८. ८. तत्रैव-भूमिका-पंडित गोविन्द झा ९. खिखिरक बीअरि- जीवकांत, प्र.-किसुन संकल्प लोक ,सुपौल प्र.सं.-२००७, पृ.-३७. १०. हमर अठन्नी खसलइ वनमे –जीवकांत,प्र,-जखन तखन,दरभंगा, प्र.सं.-२००९, भूमिका-भीमनाथ झा ११. प्रलाप-गोविन्द झा ,प्र.-नंदन प्रकाशन ,पटना,प्र.सं.-२००१,पृ.-६३. १२. ठाँहि-पठाँहि –श्री चंद्र नाथ मिश्र ‘अमर’,प्र.-नवरत्न गोष्ठी ,दरभंगा,प्र.सं.-२००१. १०९. १३. कुरुक्षेत्रम अन्तर्मनक –सं.-गजेन्द्र ठाकुर पृ.-७.१२१. १४. कालजयी –डॉ.हरिप्रसाद वर्मा ,प्र.-हरिप्रभा ,दरभंगा. पृ.-१८. २ डॉ॰ शशिधर कुमर “विदेह” एम॰डी॰(आयु॰) – कायचिकित्सा कॉलेज ऑफ आयुर्वेद एण्ड रिसर्च सेण्टर, निगडी – प्राधिकरण, पूणा (महाराष्ट्र) – ४११०४४, रौदी – दाही (बाल कविता) ई  विदेह – मिथिला  केर  धरती, अजबहि एक्कर खिस्सा यौ । एहि ठाँ  जिनगी  हारि ने मानय, केहनो विषम  समस्या यौ ।। देखू   सूरज   माथ  चढ़ै  अछि । माथ सँ टप - टप घाम चुबै अछि । धरती जरइत अछि  धह - धह कऽ, बरखा  दाइ   निपत्ता  यौ । एहि ठाँ  जिनगी  हारि ने मानय, केहनो विषम  समस्या यौ ।। रस्तेँ  –  पएरेँ,    धूर    उड़ैए । कुक्कुरहु  हकमए,  छाँह  तकैए । कोन   दैत्य   केर  पहरा  पड़लै, पोखरि – सूखल   खत्ता यौ । एहि ठाँ  जिनगी  हारि ने मानय, केहनो विषम  समस्या यौ ।। जोतल  खेत  पड़ल अछि परती । दमकल केर अछि बाढ़ल चलती । दमकल केर सेहो दम अछि निकलल, जड़ि गेल बीया  कत्ता  यौ । एहि ठाँ  जिनगी  हारि ने मानय, केहनो विषम  समस्या यौ ।। पानि पतालहि धँसैत गेल अछि । कऽल ईनारहु भँसकि गेल अछि । सूतल   इन्द्रदेव   केँ   मनबथि, झिझिया खेलथि  धीया यौ । एहि ठाँ  जिनगी  हारि ने मानय, केहनो विषम  समस्या यौ ।। बरखा बरिसल,  लोक नचैतछि । हऽर - बरद आ बीया तकैतछि । जहिना - तहिना, जतबा - जे हो, धनरोपनी भेल  बढ़िञा यौ । एहि ठाँ  जिनगी  हारि ने मानय, केहनो विषम  समस्या यौ ।। बरखा झर – झर बरसि रहल अछि । हृदय लोक केर  हहरि  रहल अछि । इन्द्रक कोप,  की  सभ मेहनति केँ, करत   फेर  बेपत्ता  यौ  ? एहि ठाँ  जिनगी  हारि ने मानय, केहनो विषम  समस्या यौ ।। कोशी  उमरल,  कमला  उफनल । बागमती – गण्डक  सेहो  चतरल । सहमि  गेल   हँसइत   जिनगी, की करतीह कोसी मैय्या यौ ? एहि ठाँ  जिनगी  हारि ने मानय, केहनो विषम  समस्या यौ ।। बान्ह टुटल कत धार फुटल नव । भाँसि दहायल, जलमज्जित सभ । लोक   मरैए,   हक्कन   कनैए, गामक – गाम  निपत्ता यौ । एहि ठाँ  जिनगी  हारि ने मानय, केहनो विषम  समस्या यौ ।। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com  पर पठाउ। बच्चा लोकनि द्वारा स्मरणीय श्लोक १.प्रातः काल ब्रह्ममुहूर्त्त (सूर्योदयक एक घंटा पहिने) सर्वप्रथम अपन दुनू हाथ देखबाक चाही, आ’ ई श्लोक बजबाक चाही। कराग्रे वसते लक्ष्मीः करमध्ये सरस्वती। करमूले स्थितो ब्रह्मा प्रभाते करदर्शनम्॥ करक आगाँ लक्ष्मी बसैत छथि, करक मध्यमे सरस्वती, करक मूलमे ब्रह्मा स्थित छथि। भोरमे ताहि द्वारे करक दर्शन करबाक थीक। २.संध्या काल दीप लेसबाक काल- दीपमूले स्थितो ब्रह्मा दीपमध्ये जनार्दनः। दीपाग्रे शङ्करः प्रोक्त्तः सन्ध्याज्योतिर्नमोऽस्तुते॥ दीपक मूल भागमे ब्रह्मा, दीपक मध्यभागमे जनार्दन (विष्णु) आऽ दीपक अग्र भागमे शङ्कर स्थित छथि। हे संध्याज्योति! अहाँकेँ नमस्कार। ३.सुतबाक काल- रामं स्कन्दं हनूमन्तं वैनतेयं वृकोदरम्। शयने यः स्मरेन्नित्यं दुःस्वप्नस्तस्य नश्यति॥ जे सभ दिन सुतबासँ पहिने राम, कुमारस्वामी, हनूमान्, गरुड़ आऽ भीमक स्मरण करैत छथि, हुनकर दुःस्वप्न नष्ट भऽ जाइत छन्हि। ४. नहेबाक समय- गङ्गे च यमुने चैव गोदावरि सरस्वति। नर्मदे सिन्धु कावेरि जलेऽस्मिन् सन्निधिं कुरू॥ हे गंगा, यमुना, गोदावरी, सरस्वती, नर्मदा, सिन्धु आऽ कावेरी  धार। एहि जलमे अपन सान्निध्य दिअ। ५.उत्तरं यत्समुद्रस्य हिमाद्रेश्चैव दक्षिणम्। वर्षं तत् भारतं नाम भारती यत्र सन्ततिः॥ समुद्रक उत्तरमे आऽ हिमालयक दक्षिणमे भारत अछि आऽ ओतुका सन्तति भारती कहबैत छथि। ६.अहल्या द्रौपदी सीता तारा मण्डोदरी तथा। पञ्चकं ना स्मरेन्नित्यं महापातकनाशकम्॥ जे सभ दिन अहल्या, द्रौपदी, सीता, तारा आऽ मण्दोदरी, एहि पाँच साध्वी-स्त्रीक स्मरण करैत छथि, हुनकर सभ पाप नष्ट भऽ जाइत छन्हि। ७.अश्वत्थामा बलिर्व्यासो हनूमांश्च विभीषणः। कृपः परशुरामश्च सप्तैते चिरञ्जीविनः॥ अश्वत्थामा, बलि, व्यास, हनूमान्, विभीषण, कृपाचार्य आऽ परशुराम- ई सात टा चिरञ्जीवी कहबैत छथि। ८.साते भवतु सुप्रीता देवी शिखर वासिनी उग्रेन तपसा लब्धो यया पशुपतिः पतिः। सिद्धिः साध्ये सतामस्तु प्रसादान्तस्य धूर्जटेः जाह्नवीफेनलेखेव यन्यूधि शशिनः कला॥ ९. बालोऽहं जगदानन्द न मे बाला सरस्वती। अपूर्णे पंचमे वर्षे वर्णयामि जगत्त्रयम् ॥ १०. दूर्वाक्षत मंत्र(शुक्ल यजुर्वेद अध्याय २२, मंत्र २२) आ ब्रह्मन्नित्यस्य प्रजापतिर्ॠषिः। लिंभोक्त्ता देवताः। स्वराडुत्कृतिश्छन्दः। षड्जः स्वरः॥ आ ब्रह्म॑न् ब्राह्म॒णो ब्र॑ह्मवर्च॒सी जा॑यता॒मा रा॒ष्ट्रे रा॑ज॒न्यः शुरे॑ऽइषव्यो॒ऽतिव्या॒धी म॑हार॒थो जा॑यतां॒ दोग्ध्रीं धे॒नुर्वोढा॑न॒ड्वाना॒शुः सप्तिः॒ पुर॑न्धि॒र्योवा॑ जि॒ष्णू र॑थे॒ष्ठाः स॒भेयो॒ युवास्य यज॑मानस्य वी॒रो जा॒यतां निका॒मे-नि॑कामे नः प॒र्जन्यों वर्षतु॒ फल॑वत्यो न॒ऽओष॑धयः पच्यन्तां योगेक्ष॒मो नः॑ कल्पताम्॥२२॥ मन्त्रार्थाः सिद्धयः सन्तु पूर्णाः सन्तु मनोरथाः। शत्रूणां बुद्धिनाशोऽस्तु मित्राणामुदयस्तव। ॐ दीर्घायुर्भव। ॐ सौभाग्यवती भव। हे भगवान्। अपन देशमे सुयोग्य आ’ सर्वज्ञ विद्यार्थी उत्पन्न होथि, आ’ शुत्रुकेँ नाश कएनिहार सैनिक उत्पन्न होथि। अपन देशक गाय खूब दूध दय बाली, बरद भार वहन करएमे सक्षम होथि आ’ घोड़ा त्वरित रूपेँ दौगय बला होए। स्त्रीगण नगरक नेतृत्व करबामे सक्षम होथि आ’ युवक सभामे ओजपूर्ण भाषण देबयबला आ’ नेतृत्व देबामे सक्षम होथि। अपन देशमे जखन आवश्यक होय वर्षा होए आ’ औषधिक-बूटी सर्वदा परिपक्व होइत रहए। एवं क्रमे सभ तरहेँ हमरा सभक कल्याण होए। शत्रुक बुद्धिक नाश होए आ’ मित्रक उदय होए॥ मनुष्यकें कोन वस्तुक इच्छा करबाक चाही तकर वर्णन एहि मंत्रमे कएल गेल अछि। एहिमे वाचकलुप्तोपमालड़्कार अछि। अन्वय- ब्रह्म॑न् - विद्या आदि गुणसँ परिपूर्ण ब्रह्म रा॒ष्ट्रे - देशमे ब्र॑ह्मवर्च॒सी-ब्रह्म विद्याक तेजसँ युक्त्त आ जा॑यतां॒- उत्पन्न होए रा॑ज॒न्यः-राजा शुरे॑ऽ–बिना डर बला इषव्यो॒- बाण चलेबामे निपुण ऽतिव्या॒धी-शत्रुकेँ तारण दय बला म॑हार॒थो-पैघ रथ बला वीर दोग्ध्रीं-कामना(दूध पूर्ण करए बाली) धे॒नुर्वोढा॑न॒ड्वाना॒शुः धे॒नु-गौ वा वाणी र्वोढा॑न॒ड्वा- पैघ बरद ना॒शुः-आशुः-त्वरित सप्तिः॒-घोड़ा पुर॑न्धि॒र्योवा॑- पुर॑न्धि॒- व्यवहारकेँ धारण करए बाली र्योवा॑-स्त्री जि॒ष्णू-शत्रुकेँ जीतए बला र॑थे॒ष्ठाः-रथ पर स्थिर स॒भेयो॒-उत्तम सभामे युवास्य-युवा जेहन यज॑मानस्य-राजाक राज्यमे वी॒रो-शत्रुकेँ पराजित करएबला निका॒मे-नि॑कामे-निश्चययुक्त्त कार्यमे नः-हमर सभक प॒र्जन्यों-मेघ वर्षतु॒-वर्षा होए फल॑वत्यो-उत्तम फल बला ओष॑धयः-औषधिः पच्यन्तां- पाकए योगेक्ष॒मो-अलभ्य लभ्य करेबाक हेतु कएल गेल योगक रक्षा नः॑-हमरा सभक हेतु कल्पताम्-समर्थ होए ग्रिफिथक अनुवाद- हे ब्रह्मण, हमर राज्यमे ब्राह्मण नीक धार्मिक विद्या बला, राजन्य-वीर,तीरंदाज, दूध दए बाली गाय, दौगय बला जन्तु, उद्यमी नारी होथि। पार्जन्य आवश्यकता पड़ला पर वर्षा देथि, फल देय बला गाछ पाकए, हम सभ संपत्ति अर्जित/संरक्षित करी। 8.VIDEHA FOR NON RESIDENTS 8.1 to 8.3 MAITHILI LITERATURE IN ENGLISH 8.1.1.The Comet   -GAJENDRA THAKUR translated by Jyoti Jha chaudhary 8.1.2.The_Science_of_Words- GAJENDRA THAKUR translated by the author himself 8.1.3.On_the_dice-board_of_the_millennium- GAJENDRA THAKUR translated by Jyoti Jha chaudhary 8.1.4.NAAGPHANS (IN ENGLISH)- SHEFALIKA VERMA translated by Dr. Rajiv Kumar Verma and Dr. Jaya Verma विदेह नूतन अंक भाषापाक रचना-लेखन Input: (कोष्ठकमे देवनागरी, मिथिलाक्षर किंवा फोनेटिक-रोमनमे टाइप करू। Input in Devanagari, Mithilakshara or Phonetic-Roman.) Output: (परिणाम देवनागरी, मिथिलाक्षर आ फोनेटिक-रोमन/ रोमनमे। Result in Devanagari, Mithilakshara and Phonetic-Roman/ Roman.) English to Maithili Maithili to English इंग्लिश-मैथिली-कोष / मैथिली-इंग्लिश-कोष  प्रोजेक्टकेँ आगू बढ़ाऊ, अपन सुझाव आ योगदान ई-मेल द्वारा ggajendra@videha.com पर पठाऊ। Top of Form विदेहक मैथिली-अंग्रेजी आ अंग्रेजी मैथिली कोष (इंटरनेटपर पहिल बेर सर्च-डिक्शनरी) एम.एस. एस.क्यू.एल. सर्वर आधारित -Based on ms-sql server Maithili-English and English-Maithili Dictionary. १.भारत आ नेपालक मैथिली भाषा-वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक शैली आ २.मैथिलीमे भाषा सम्पादन पाठ्यक्रम १.नेपाल आ भारतक मैथिली भाषा-वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक शैली

१.१. नेपालक मैथिली भाषा वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक  उच्चारण आ लेखन शैली (भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक धारणाकेँ पूर्ण रूपसँ सङ्ग लऽ निर्धारित) मैथिलीमे उच्चारण तथा लेखन १.पञ्चमाक्षर आ अनुस्वार: पञ्चमाक्षरान्तर्गत ङ, ञ, ण, न एवं म अबैत अछि। संस्कृत भाषाक अनुसार शब्दक अन्तमे जाहि वर्गक अक्षर रहैत अछि ओही वर्गक पञ्चमाक्षर अबैत अछि। जेना- अङ्क (क वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ङ् आएल अछि।) पञ्च (च वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ञ् आएल अछि।) खण्ड (ट वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ण् आएल अछि।) सन्धि (त वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे न् आएल अछि।) खम्भ (प वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे म् आएल अछि।) उपर्युक्त बात मैथिलीमे कम देखल जाइत अछि। पञ्चमाक्षरक बदलामे अधिकांश जगहपर अनुस्वारक प्रयोग देखल जाइछ। जेना- अंक, पंच, खंड, संधि, खंभ आदि। व्याकरणविद पण्डित गोविन्द झाक कहब छनि जे कवर्ग, चवर्ग आ टवर्गसँ पूर्व अनुस्वार लिखल जाए तथा तवर्ग आ पवर्गसँ पूर्व पञ्चमाक्षरे लिखल जाए। जेना- अंक, चंचल, अंडा, अन्त तथा कम्पन। मुदा हिन्दीक निकट रहल आधुनिक लेखक एहि बातकेँ नहि मानैत छथि। ओ लोकनि अन्त आ कम्पनक जगहपर सेहो अंत आ कंपन लिखैत देखल जाइत छथि। नवीन पद्धति किछु सुविधाजनक अवश्य छैक। किएक तँ एहिमे समय आ स्थानक बचत होइत छैक। मुदा कतोक बेर हस्तलेखन वा मुद्रणमे अनुस्वारक छोट सन बिन्दु स्पष्ट नहि भेलासँ अर्थक अनर्थ होइत सेहो देखल जाइत अछि। अनुस्वारक प्रयोगमे उच्चारण-दोषक सम्भावना सेहो ततबए देखल जाइत अछि। एतदर्थ कसँ लऽ कऽ पवर्ग धरि पञ्चमाक्षरेक प्रयोग करब उचित अछि। यसँ लऽ कऽ ज्ञ धरिक अक्षरक सङ्ग अनुस्वारक प्रयोग करबामे कतहु कोनो विवाद नहि देखल जाइछ। २.ढ आ ढ़ : ढ़क उच्चारण “र् ह”जकाँ होइत अछि। अतः जतऽ “र् ह”क उच्चारण हो ओतऽ मात्र ढ़ लिखल जाए। आन ठाम खाली ढ लिखल जएबाक चाही। जेना- ढ = ढाकी, ढेकी, ढीठ, ढेउआ, ढङ्ग, ढेरी, ढाकनि, ढाठ आदि। ढ़ = पढ़ाइ, बढ़ब, गढ़ब, मढ़ब, बुढ़बा, साँढ़, गाढ़, रीढ़, चाँढ़, सीढ़ी, पीढ़ी आदि। उपर्युक्त शब्द सभकेँ देखलासँ ई स्पष्ट होइत अछि जे साधारणतया शब्दक शुरूमे ढ आ मध्य तथा अन्तमे ढ़ अबैत अछि। इएह नियम ड आ ड़क सन्दर्भ सेहो लागू होइत अछि। ३.व आ ब : मैथिलीमे “व”क उच्चारण ब कएल जाइत अछि, मुदा ओकरा ब रूपमे नहि लिखल जएबाक चाही। जेना- उच्चारण : बैद्यनाथ, बिद्या, नब, देबता, बिष्णु, बंश, बन्दना आदि। एहि सभक स्थानपर क्रमशः वैद्यनाथ, विद्या, नव, देवता, विष्णु, वंश, वन्दना लिखबाक चाही। सामान्यतया व उच्चारणक लेल ओ प्रयोग कएल जाइत अछि। जेना- ओकील, ओजह आदि। ४.य आ ज : कतहु-कतहु “य”क उच्चारण “ज”जकाँ करैत देखल जाइत अछि, मुदा ओकरा ज नहि लिखबाक चाही। उच्चारणमे यज्ञ, जदि, जमुना, जुग, जाबत, जोगी, जदु, जम आदि कहल जाएबला शब्द सभकेँ क्रमशः यज्ञ, यदि, यमुना, युग, यावत, योगी, यदु, यम लिखबाक चाही। ५.ए आ य : मैथिलीक वर्तनीमे ए आ य दुनू लिखल जाइत अछि। प्राचीन वर्तनी- कएल, जाए, होएत, माए, भाए, गाए आदि। नवीन वर्तनी- कयल, जाय, होयत, माय, भाय, गाय आदि। सामान्यतया शब्दक शुरूमे ए मात्र अबैत अछि। जेना एहि, एना, एकर, एहन आदि। एहि शब्द सभक स्थानपर यहि, यना, यकर, यहन आदिक प्रयोग नहि करबाक चाही। यद्यपि मैथिलीभाषी थारू सहित किछु जातिमे शब्दक आरम्भोमे “ए”केँ य कहि उच्चारण कएल जाइत अछि। ए आ “य”क प्रयोगक सन्दर्भमे प्राचीने पद्धतिक अनुसरण करब उपयुक्त मानि एहि पुस्तकमे ओकरे प्रयोग कएल गेल अछि। किएक तँ दुनूक लेखनमे कोनो सहजता आ दुरूहताक बात नहि अछि। आ मैथिलीक सर्वसाधारणक उच्चारण-शैली यक अपेक्षा एसँ बेसी निकट छैक। खास कऽ कएल, हएब आदि कतिपय शब्दकेँ कैल, हैब आदि रूपमे कतहु-कतहु लिखल जाएब सेहो “ए”क प्रयोगकेँ बेसी समीचीन प्रमाणित करैत अछि। ६.हि, हु तथा एकार, ओकार : मैथिलीक प्राचीन लेखन-परम्परामे कोनो बातपर बल दैत काल शब्दक पाछाँ हि, हु लगाओल जाइत छैक। जेना- हुनकहि, अपनहु, ओकरहु, तत्कालहि, चोट्टहि, आनहु आदि। मुदा आधुनिक लेखनमे हिक स्थानपर एकार एवं हुक स्थानपर ओकारक प्रयोग करैत देखल जाइत अछि। जेना- हुनके, अपनो, तत्काले, चोट्टे, आनो आदि। ७.ष तथा ख : मैथिली भाषामे अधिकांशतः षक उच्चारण ख होइत अछि। जेना- षड्यन्त्र (खड़यन्त्र), षोडशी (खोड़शी), षट्कोण (खटकोण), वृषेश (वृखेश), सन्तोष (सन्तोख) आदि। ८.ध्वनि-लोप : निम्नलिखित अवस्थामे शब्दसँ ध्वनि-लोप भऽ जाइत अछि: (क) क्रियान्वयी प्रत्यय अयमे य वा ए लुप्त भऽ जाइत अछि। ओहिमे सँ पहिने अक उच्चारण दीर्घ भऽ जाइत अछि। ओकर आगाँ लोप-सूचक चिह्न वा विकारी (’ / ऽ) लगाओल जाइछ। जेना- पूर्ण रूप : पढ़ए (पढ़य) गेलाह, कए (कय) लेल, उठए (उठय) पड़तौक। अपूर्ण रूप : पढ़’ गेलाह, क’ लेल, उठ’ पड़तौक। पढ़ऽ गेलाह, कऽ लेल, उठऽ पड़तौक। (ख) पूर्वकालिक कृत आय (आए) प्रत्ययमे य (ए) लुप्त भऽ जाइछ, मुदा लोप-सूचक विकारी नहि लगाओल जाइछ। जेना- पूर्ण रूप : खाए (य) गेल, पठाय (ए) देब, नहाए (य) अएलाह। अपूर्ण रूप : खा गेल, पठा देब, नहा अएलाह। (ग) स्त्री प्रत्यय इक उच्चारण क्रियापद, संज्ञा, ओ विशेषण तीनूमे लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना- पूर्ण रूप : दोसरि मालिनि चलि गेलि। अपूर्ण रूप : दोसर मालिन चलि गेल। (घ) वर्तमान कृदन्तक अन्तिम त लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना- पूर्ण रूप : पढ़ैत अछि, बजैत अछि, गबैत अछि। अपूर्ण रूप : पढ़ै अछि, बजै अछि, गबै अछि। (ङ) क्रियापदक अवसान इक, उक, ऐक तथा हीकमे लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना- पूर्ण रूप: छियौक, छियैक, छहीक, छौक, छैक, अबितैक, होइक। अपूर्ण रूप : छियौ, छियै, छही, छौ, छै, अबितै, होइ। (च) क्रियापदीय प्रत्यय न्ह, हु तथा हकारक लोप भऽ जाइछ। जेना- पूर्ण रूप : छन्हि, कहलन्हि, कहलहुँ, गेलह, नहि। अपूर्ण रूप : छनि, कहलनि, कहलौँ, गेलऽ, नइ, नञि, नै। ९.ध्वनि स्थानान्तरण : कोनो-कोनो स्वर-ध्वनि अपना जगहसँ हटि कऽ दोसर ठाम चलि जाइत अछि। खास कऽ ह्रस्व इ आ उक सम्बन्धमे ई बात लागू होइत अछि। मैथिलीकरण भऽ गेल शब्दक मध्य वा अन्तमे जँ ह्रस्व इ वा उ आबए तँ ओकर ध्वनि स्थानान्तरित भऽ एक अक्षर आगाँ आबि जाइत अछि। जेना- शनि (शइन), पानि (पाइन), दालि ( दाइल), माटि (माइट), काछु (काउछ), मासु (माउस) आदि। मुदा तत्सम शब्द सभमे ई निअम लागू नहि होइत अछि। जेना- रश्मिकेँ रइश्म आ सुधांशुकेँ सुधाउंस नहि कहल जा सकैत अछि। १०.हलन्त(्)क प्रयोग : मैथिली भाषामे सामान्यतया हलन्त (्)क आवश्यकता नहि होइत अछि। कारण जे शब्दक अन्तमे अ उच्चारण नहि होइत अछि। मुदा संस्कृत भाषासँ जहिनाक तहिना मैथिलीमे आएल (तत्सम) शब्द सभमे हलन्त प्रयोग कएल जाइत अछि। एहि पोथीमे सामान्यतया सम्पूर्ण शब्दकेँ मैथिली भाषा सम्बन्धी निअम अनुसार हलन्तविहीन राखल गेल अछि। मुदा व्याकरण सम्बन्धी प्रयोजनक लेल अत्यावश्यक स्थानपर कतहु-कतहु हलन्त देल गेल अछि। प्रस्तुत पोथीमे मथिली लेखनक प्राचीन आ नवीन दुनू शैलीक सरल आ समीचीन पक्ष सभकेँ समेटि कऽ वर्ण-विन्यास कएल गेल अछि। स्थान आ समयमे बचतक सङ्गहि हस्त-लेखन तथा तकनीकी दृष्टिसँ सेहो सरल होबऽबला हिसाबसँ वर्ण-विन्यास मिलाओल गेल अछि। वर्तमान समयमे मैथिली मातृभाषी पर्यन्तकेँ आन भाषाक माध्यमसँ मैथिलीक ज्ञान लेबऽ पड़ि रहल परिप्रेक्ष्यमे लेखनमे सहजता तथा एकरूपतापर ध्यान देल गेल अछि। तखन मैथिली भाषाक मूल विशेषता सभ कुण्ठित नहि होइक, ताहू दिस लेखक-मण्डल सचेत अछि। प्रसिद्ध भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक कहब छनि जे सरलताक अनुसन्धानमे एहन अवस्था किन्नहु ने आबऽ देबाक चाही जे भाषाक विशेषता छाँहमे पडि जाए। -(भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक धारणाकेँ पूर्ण रूपसँ सङ्ग लऽ निर्धारित) १.२. मैथिली अकादमी, पटना द्वारा निर्धारित मैथिली लेखन-शैली

१. जे शब्द मैथिली-साहित्यक प्राचीन कालसँ आइ धरि जाहि वर्त्तनीमे प्रचलित अछि, से सामान्यतः ताहि वर्त्तनीमे लिखल जाय- उदाहरणार्थ-

ग्राह्य

एखन ठाम जकर, तकर तनिकर अछि

अग्राह्य अखन, अखनि, एखेन, अखनी ठिमा, ठिना, ठमा जेकर, तेकर तिनकर। (वैकल्पिक रूपेँ ग्राह्य) ऐछ, अहि, ए।

२. निम्नलिखित तीन प्रकारक रूप वैकल्पिकतया अपनाओल जाय: भऽ गेल, भय गेल वा भए गेल। जा रहल अछि, जाय रहल अछि, जाए रहल अछि। कर’ गेलाह, वा करय गेलाह वा करए गेलाह।

३. प्राचीन मैथिलीक ‘न्ह’ ध्वनिक स्थानमे ‘न’ लिखल जाय सकैत अछि यथा कहलनि वा कहलन्हि।

४. ‘ऐ’ तथा ‘औ’ ततय लिखल जाय जत’ स्पष्टतः ‘अइ’ तथा ‘अउ’ सदृश उच्चारण इष्ट हो। यथा- देखैत, छलैक, बौआ, छौक इत्यादि।

५. मैथिलीक निम्नलिखित शब्द एहि रूपे प्रयुक्त होयत: जैह, सैह, इएह, ओऐह, लैह तथा दैह।

६. ह्र्स्व इकारांत शब्दमे ‘इ’ के लुप्त करब सामान्यतः अग्राह्य थिक। यथा- ग्राह्य देखि आबह, मालिनि गेलि (मनुष्य मात्रमे)।

७. स्वतंत्र ह्रस्व ‘ए’ वा ‘य’ प्राचीन मैथिलीक उद्धरण आदिमे तँ यथावत राखल जाय, किंतु आधुनिक प्रयोगमे वैकल्पिक रूपेँ ‘ए’ वा ‘य’ लिखल जाय। यथा:- कयल वा कएल, अयलाह वा अएलाह, जाय वा जाए इत्यादि।

८. उच्चारणमे दू स्वरक बीच जे ‘य’ ध्वनि स्वतः आबि जाइत अछि तकरा लेखमे स्थान वैकल्पिक रूपेँ देल जाय। यथा- धीआ, अढ़ैआ, विआह, वा धीया, अढ़ैया, बियाह।

९. सानुनासिक स्वतंत्र स्वरक स्थान यथासंभव ‘ञ’ लिखल जाय वा सानुनासिक स्वर। यथा:- मैञा, कनिञा, किरतनिञा वा मैआँ, कनिआँ, किरतनिआँ।

१०. कारकक विभक्त्तिक निम्नलिखित रूप ग्राह्य:- हाथकेँ, हाथसँ, हाथेँ, हाथक, हाथमे। ’मे’ मे अनुस्वार सर्वथा त्याज्य थिक। ‘क’ क वैकल्पिक रूप ‘केर’ राखल जा सकैत अछि।

११. पूर्वकालिक क्रियापदक बाद ‘कय’ वा ‘कए’ अव्यय वैकल्पिक रूपेँ लगाओल जा सकैत अछि। यथा:- देखि कय वा देखि कए।

१२. माँग, भाँग आदिक स्थानमे माङ, भाङ इत्यादि लिखल जाय।

१३. अर्द्ध ‘न’ ओ अर्द्ध ‘म’ क बदला अनुसार नहि लिखल जाय, किंतु छापाक सुविधार्थ अर्द्ध ‘ङ’ , ‘ञ’, तथा ‘ण’ क बदला अनुस्वारो लिखल जा सकैत अछि। यथा:- अङ्क, वा अंक, अञ्चल वा अंचल, कण्ठ वा कंठ।

१४. हलंत चिह्न निअमतः लगाओल जाय, किंतु विभक्तिक संग अकारांत प्रयोग कएल जाय। यथा:- श्रीमान्, किंतु श्रीमानक।

१५. सभ एकल कारक चिह्न शब्दमे सटा क’ लिखल जाय, हटा क’ नहि, संयुक्त विभक्तिक हेतु फराक लिखल जाय, यथा घर परक।

१६. अनुनासिककेँ चन्द्रबिन्दु द्वारा व्यक्त कयल जाय। परंतु मुद्रणक सुविधार्थ हि समान जटिल मात्रापर अनुस्वारक प्रयोग चन्द्रबिन्दुक बदला कयल जा सकैत अछि। यथा- हिँ केर बदला हिं।

१७. पूर्ण विराम पासीसँ ( । ) सूचित कयल जाय।

१८. समस्त पद सटा क’ लिखल जाय, वा हाइफेनसँ जोड़ि क’ ,  हटा क’ नहि।

१९. लिअ तथा दिअ शब्दमे बिकारी (ऽ) नहि लगाओल जाय।

२०. अंक देवनागरी रूपमे राखल जाय।

२१.किछु ध्वनिक लेल नवीन चिन्ह बनबाओल जाय। जा' ई नहि बनल अछि ताबत एहि दुनू ध्वनिक बदला पूर्ववत् अय/ आय/ अए/ आए/ आओ/ अओ लिखल जाय। आकि ऎ वा ऒ सँ व्यक्त कएल जाय।

ह./- गोविन्द झा ११/८/७६ श्रीकान्त ठाकुर ११/८/७६ सुरेन्द्र झा "सुमन" ११/०८/७६

  २. मैथिलीमे भाषा सम्पादन पाठ्यक्रम २.१. उच्चारण निर्देश: (बोल्ड कएल रूप ग्राह्य):- दन्त न क उच्चारणमे दाँतमे जीह सटत- जेना बाजू नाम , मुदा ण क उच्चारणमे जीह मूर्धामे सटत (नै सटैए तँ उच्चारण दोष अछि)- जेना बाजू गणेश। तालव्य शमे जीह तालुसँ , षमे मूर्धासँ आ दन्त समे दाँतसँ सटत। निशाँ, सभ आ शोषण बाजि कऽ देखू। मैथिलीमे ष केँ वैदिक संस्कृत जकाँ ख सेहो उच्चरित कएल जाइत अछि, जेना वर्षा, दोष। य अनेको स्थानपर ज जकाँ उच्चरित होइत अछि आ ण ड़ जकाँ (यथा संयोग आ गणेश संजोग आ गड़ेस उच्चरित होइत अछि)। मैथिलीमे व क उच्चारण ब, श क उच्चारण स आ य क उच्चारण ज सेहो होइत अछि। ओहिना ह्रस्व इ बेशीकाल मैथिलीमे पहिने बाजल जाइत अछि कारण देवनागरीमे आ मिथिलाक्षरमे ह्रस्व इ अक्षरक पहिने लिखलो जाइत आ बाजलो जएबाक चाही। कारण जे हिन्दीमे एकर दोषपूर्ण उच्चारण होइत अछि (लिखल तँ पहिने जाइत अछि मुदा बाजल बादमे जाइत अछि), से शिक्षा पद्धतिक दोषक कारण हम सभ ओकर उच्चारण दोषपूर्ण ढंगसँ कऽ रहल छी। अछि- अ इ छ  ऐछ (उच्चारण) छथि- छ इ थ  – छैथ (उच्चारण) पहुँचि- प हुँ इ च (उच्चारण) आब अ आ इ ई ए ऐ ओ औ अं अः ऋ ऐ सभ लेल मात्रा सेहो अछि, मुदा ऐमे ई ऐ ओ औ अं अः ऋ केँ संयुक्ताक्षर रूपमे गलत रूपमे प्रयुक्त आ उच्चरित कएल जाइत अछि। जेना ऋ केँ री  रूपमे उच्चरित करब। आ देखियौ- ऐ लेल देखिऔ क प्रयोग अनुचित। मुदा देखिऐ लेल देखियै अनुचित। क् सँ ह् धरि अ सम्मिलित भेलासँ क सँ ह बनैत अछि, मुदा उच्चारण काल हलन्त युक्त शब्दक अन्तक उच्चारणक प्रवृत्ति बढ़ल अछि, मुदा हम जखन मनोजमे ज् अन्तमे बजैत छी, तखनो पुरनका लोककेँ बजैत सुनबन्हि- मनोजऽ, वास्तवमे ओ अ युक्त ज् = ज बजै छथि। फेर ज्ञ अछि ज् आ ञ क संयुक्त मुदा गलत उच्चारण होइत अछि- ग्य। ओहिना क्ष अछि क् आ ष क संयुक्त मुदा उच्चारण होइत अछि छ। फेर श् आ र क संयुक्त अछि श्र ( जेना श्रमिक) आ स् आ र क संयुक्त अछि स्र (जेना मिस्र)। त्र भेल त+र । उच्चारणक ऑडियो फाइल विदेह आर्काइव  http://www.videha.co.in/ पर उपलब्ध अछि। फेर केँ / सँ / पर पूर्व अक्षरसँ सटा कऽ लिखू मुदा तँ / कऽ हटा कऽ। ऐमे सँ मे पहिल सटा कऽ लिखू आ बादबला हटा कऽ। अंकक बाद टा लिखू सटा कऽ मुदा अन्य ठाम टा लिखू हटा कऽ– जेना छहटा मुदा सभ टा। फेर ६अ म सातम लिखू- छठम सातम नै। घरबलामे बला मुदा घरवालीमे वाली प्रयुक्त करू। रहए- रहै मुदा सकैए (उच्चारण सकै-ए)। मुदा कखनो काल रहए आ रहै मे अर्थ भिन्नता सेहो, जेना से कम्मो जगहमे पार्किंग करबाक अभ्यास रहै ओकरा। पुछलापर पता लागल जे ढुनढुन नाम्ना ई ड्राइवर कनाट प्लेसक पार्किंगमे काज करैत रहए। छलै, छलए मे सेहो ऐ तरहक भेल। छलए क उच्चारण छल-ए सेहो। संयोगने- (उच्चारण संजोगने) केँ/  कऽ केर- क ( केर क प्रयोग गद्यमे नै करू , पद्यमे कऽ सकै छी। ) क (जेना रामक) –रामक आ संगे (उच्चारण राम के /  राम कऽ सेहो) सँ- सऽ (उच्चारण) चन्द्रबिन्दु आ अनुस्वार- अनुस्वारमे कंठ धरिक प्रयोग होइत अछि मुदा चन्द्रबिन्दुमे नै। चन्द्रबिन्दुमे कनेक एकारक सेहो उच्चारण होइत अछि- जेना रामसँ- (उच्चारण राम सऽ)  रामकेँ- (उच्चारण राम कऽ/ राम के सेहो)। केँ जेना रामकेँ भेल हिन्दीक को (राम को)- राम को= रामकेँ क जेना रामक भेल हिन्दीक का ( राम का) राम का= रामक कऽ जेना जा कऽ भेल हिन्दीक कर ( जा कर) जा कर= जा कऽ सँ भेल हिन्दीक से (राम से) राम से= रामसँ सऽ , तऽ , त , केर (गद्यमे) एे चारू शब्द सबहक प्रयोग अवांछित। के दोसर अर्थेँ प्रयुक्त भऽ सकैए- जेना, के कहलक? विभक्ति “क”क बदला एकर प्रयोग अवांछित। नञि, नहि, नै, नइ, नँइ, नइँ, नइं ऐ सभक उच्चारण आ लेखन - नै त्त्व क बदलामे त्व जेना महत्वपूर्ण (महत्त्वपूर्ण नै) जतए अर्थ बदलि जाए ओतहि मात्र तीन अक्षरक संयुक्ताक्षरक प्रयोग उचित। सम्पति- उच्चारण स म्प इ त (सम्पत्ति नै- कारण सही उच्चारण आसानीसँ सम्भव नै)। मुदा सर्वोत्तम (सर्वोतम नै)। राष्ट्रिय (राष्ट्रीय नै) सकैए/ सकै (अर्थ परिवर्तन) पोछैले/ पोछै लेल/ पोछए लेल पोछैए/ पोछए/ (अर्थ परिवर्तन) पोछए/ पोछै ओ लोकनि ( हटा कऽ, ओ मे बिकारी नै) ओइ/ ओहि ओहिले/ ओहि लेल/ ओही लऽ जएबेँ/ बैसबेँ पँचभइयाँ देखियौक/ (देखिऔक नै- तहिना अ मे ह्रस्व आ दीर्घक मात्राक प्रयोग अनुचित) जकाँ / जेकाँ तँइ/ तैँ/ होएत / हएत नञि/ नहि/ नँइ/ नइँ/ नै सौँसे/ सौंसे बड़ / बड़ी (झोराओल) गाए (गाइ नहि), मुदा गाइक दूध (गाएक दूध नै।) रहलेँ/ पहिरतैँ हमहीं/ अहीं सब - सभ सबहक - सभहक धरि - तक गप- बात बूझब - समझब बुझलौं/ समझलौं/ बुझलहुँ - समझलहुँ हमरा आर - हम सभ आकि- आ कि सकैछ/ करैछ (गद्यमे प्रयोगक आवश्यकता नै) होइन/ होनि जाइन (जानि नै, जेना देल जाइन) मुदा जानि-बूझि (अर्थ परिव्र्तन) पइठ/ जाइठ आउ/ जाउ/ आऊ/ जाऊ मे, केँ, सँ, पर (शब्दसँ सटा कऽ) तँ कऽ धऽ दऽ (शब्दसँ हटा कऽ) मुदा दूटा वा बेसी विभक्ति संग रहलापर पहिल विभक्ति टाकेँ सटाऊ। जेना ऐमे सँ । एकटा , दूटा (मुदा कए टा) बिकारीक प्रयोग शब्दक अन्तमे, बीचमे अनावश्यक रूपेँ नै। आकारान्त आ अन्तमे अ क बाद बिकारीक प्रयोग नै (जेना दिअ , आ/ दिय’ , आ’, आ नै ) अपोस्ट्रोफीक प्रयोग बिकारीक बदलामे करब अनुचित आ मात्र फॉन्टक तकनीकी न्यूनताक परिचायक)- ओना बिकारीक संस्कृत रूप ऽ अवग्रह कहल जाइत अछि आ वर्तनी आ उच्चारण दुनू ठाम एकर लोप रहैत अछि/ रहि सकैत अछि (उच्चारणमे लोप रहिते अछि)। मुदा अपोस्ट्रोफी सेहो अंग्रेजीमे पसेसिव केसमे होइत अछि आ फ्रेंचमे शब्दमे जतए एकर प्रयोग होइत अछि जेना raison d’etre एतए सेहो एकर उच्चारण रैजौन डेटर होइत अछि, माने अपोस्ट्रॉफी अवकाश नै दैत अछि वरन जोड़ैत अछि, से एकर प्रयोग बिकारीक बदला देनाइ तकनीकी रूपेँ सेहो अनुचित)। अइमे, एहिमे/ ऐमे जइमे, जाहिमे एखन/ अखन/ अइखन केँ (के नहि) मे (अनुस्वार रहित) भऽ मे दऽ तँ (तऽ, त नै) सँ ( सऽ स नै) गाछ तर गाछ लग साँझ खन जो (जो go, करै जो do) तै/तइ जेना- तै दुआरे/ तइमे/ तइले जै/जइ जेना- जै कारण/ जइसँ/ जइले ऐ/अइ जेना- ऐ कारण/ ऐसँ/ अइले/ मुदा एकर एकटा खास प्रयोग- लालति‍ कतेक दि‍नसँ कहैत रहैत अइ लै/लइ जेना लैसँ/ लइले/ लै दुआरे लहँ/ लौं गेलौं/ लेलौं/ लेलँह/ गेलहुँ/ लेलहुँ/ लेलँ जइ/ जाहि‍/ जै जहि‍ठाम/ जाहि‍ठाम/ जइठाम/ जैठाम एहि‍/ अहि‍/ अइ (वाक्यक अंतमे ग्राह्य) / ऐ अइछ/ अछि‍/ ऐछ तइ/ तहि‍/ तै/ ताहि‍ ओहि‍/ ओइ सीखि‍/ सीख जीवि‍/ जीवी/ जीब भलेहीं/ भलहि‍ं तैं/ तँइ/ तँए जाएब/ जएब लइ/ लै छइ/ छै नहि‍/ नै/ नइ गइ/ गै छनि‍/ छन्‍हि‍  ... समए शब्‍दक संग जखन कोनो वि‍भक्‍ति‍ जुटै छै तखन समै जना समैपर इत्‍यादि‍। असगरमे हृदए आ वि‍भक्‍ति‍ जुटने हृदे जना हृदेसँ, हृदेमे इत्‍यादि‍। जइ/ जाहि‍/ जै जहि‍ठाम/ जाहि‍ठाम/ जइठाम/ जैठाम एहि‍/ अहि‍/ अइ/ ऐ अइछ/ अछि‍/ ऐछ तइ/ तहि‍/ तै/ ताहि‍ ओहि‍/ ओइ सीखि‍/ सीख जीवि‍/ जीवी/ जीब भले/ भलेहीं/ भलहि‍ं तैं/ तँइ/ तँए जाएब/ जएब लइ/ लै छइ/ छै नहि‍/ नै/ नइ गइ/ गै छनि‍/ छन्‍हि‍ चुकल अछि/ गेल गछि २.२. मैथिलीमे भाषा सम्पादन पाठ्यक्रम नीचाँक सूचीमे देल विकल्पमेसँ लैंगुएज एडीटर द्वारा कोन रूप चुनल जेबाक चाही: बोल्ड कएल रूप ग्राह्य: १.होयबला/ होबयबला/ होमयबला/ हेब’बला, हेम’बला/ होयबाक/होबएबला /होएबाक २. आ’/आऽ आ ३. क’ लेने/कऽ लेने/कए लेने/कय लेने/ल’/लऽ/लय/लए ४. भ’ गेल/भऽ गेल/भय गेल/भए गेल ५. कर’ गेलाह/करऽ गेलह/करए गेलाह/करय गेलाह ६. लिअ/दिअ लिय’,दिय’,लिअ’,दिय’/ ७. कर’ बला/करऽ बला/ करय बला करैबला/क’र’ बला / करैवाली ८. बला वला (पुरूष), वाली (स्‍त्री) ९ . आङ्ल आंग्ल १०. प्रायः प्रायह ११. दुःख दुख १ २. चलि गेल चल गेल/चैल गेल १३. देलखिन्ह देलकिन्ह, देलखिन १४. देखलन्हि देखलनि/ देखलैन्ह १५. छथिन्ह/ छलन्हि छथिन/ छलैन/ छलनि १६. चलैत/दैत चलति/दैति १७. एखनो अखनो १८. बढ़नि‍ बढ़इन बढ़न्हि १९. ओ’/ओऽ(सर्वनाम) ओ २० . ओ (संयोजक) ओ’/ओऽ २१. फाँगि/फाङ्गि फाइंग/फाइङ २२. जे जे’/जेऽ २३. ना-नुकुर ना-नुकर २४. केलन्हि/केलनि‍/कयलन्हि २५. तखनतँ/ तखन तँ २६. जा रहल/जाय रहल/जाए रहल २७. निकलय/निकलए लागल/ लगल बहराय/ बहराए लागल/ लगल निकल’/बहरै लागल २८. ओतय/ जतय जत’/ ओत’/ जतए/ ओतए २९. की फूरल जे कि फूरल जे ३०. जे जे’/जेऽ ३१. कूदि / यादि(मोन पारब) कूइद/याइद/कूद/याद/ यादि (मोन) ३२. इहो/ ओहो ३३. हँसए/ हँसय हँसऽ ३४. नौ आकि दस/नौ किंवा दस/ नौ वा दस ३५. सासु-ससुर सास-ससुर ३६. छह/ सात छ/छः/सात ३७. की  की’/ कीऽ (दीर्घीकारान्तमे ऽ वर्जित) ३८. जबाब जवाब ३९. करएताह/ करेताह करयताह ४०. दलान दिशि दलान दिश/दलान दिस ४१ . गेलाह गएलाह/गयलाह ४२. किछु आर/ किछु और/ किछ आर ४३. जाइ छल/ जाइत छल जाति छल/जैत छल ४४. पहुँचि/ भेट जाइत छल/ भेट जाइ छलए पहुँच/ भेटि‍ जाइत छल ४५. जबान (युवा)/ जवान(फौजी) ४६. लय/ लए क’/ कऽ/ लए कए / लऽ कऽ/ लऽ कए ४७. ल’/लऽ कय/ कए ४८. एखन / एखने / अखन / अखने ४९. अहींकेँ अहीँकेँ ५०. गहींर गहीँर ५१. धार पार केनाइ धार पार केनाय/केनाए ५२. जेकाँ जेँकाँ/ जकाँ ५३. तहिना तेहिना ५४. एकर अकर ५५. बहिनउ बहनोइ ५६. बहिन बहिनि ५७. बहिन-बहिनोइ बहिन-बहनउ ५८. नहि/ नै ५९. करबा / करबाय/ करबाए ६०. तँ/ त ऽ तय/तए ६१. भैयारी मे छोट-भाए/भै/, जेठ-भाय/भाइ, ६२. गि‍नतीमे दू भाइ/भाए/भाँइ ६३. ई पोथी दू भाइक/ भाँइ/ भाए/ लेल। यावत जावत ६४. माय मै / माए मुदा माइक ममता ६५. देन्हि/ दइन दनि‍/ दएन्हि/ दयन्हि दन्हि/ दैन्हि ६६. द’/ दऽ/ दए ६७. ओ (संयोजक) ओऽ (सर्वनाम) ६८. तका कए तकाय तकाए ६९. पैरे (on foot) पएरे  कएक/ कैक ७०. ताहुमे/ ताहूमे ७१. पुत्रीक ७२. बजा कय/ कए / कऽ ७३. बननाय/बननाइ ७४. कोला ७५. दिनुका दिनका ७६. ततहिसँ ७७. गरबओलन्हि/ गरबौलनि‍/ गरबेलन्हि/ गरबेलनि‍ ७८. बालु बालू ७९. चेन्ह चिन्ह(अशुद्ध) ८०. जे जे’ ८१ . से/ के से’/के’ ८२. एखुनका अखनुका ८३. भुमिहार भूमिहार ८४. सुग्गर / सुगरक/ सूगर ८५. झठहाक झटहाक ८६. छूबि ८७. करइयो/ओ करैयो ने देलक /करियौ-करइयौ ८८. पुबारि पुबाइ ८९. झगड़ा-झाँटी झगड़ा-झाँटि ९०. पएरे-पएरे पैरे-पैरे ९१. खेलएबाक ९२. खेलेबाक ९३. लगा ९४. होए- हो – होअए ९५. बुझल बूझल ९६. बूझल (संबोधन अर्थमे) ९७. यैह यएह / इएह/ सैह/ सएह ९८. तातिल ९९. अयनाय- अयनाइ/ अएनाइ/ एनाइ १००. निन्न- निन्द १०१. बिनु बिन १०२. जाए जाइ १०३. जाइ (in different sense)-last word of sentence १०४. छत पर आबि जाइ १०५. ने १०६. खेलाए (play) –खेलाइ १०७. शिकाइत- शिकायत १०८. ढप- ढ़प १०९ . पढ़- पढ ११०. कनिए/ कनिये कनिञे १११. राकस- राकश ११२. होए/ होय होइ ११३. अउरदा- औरदा ११४. बुझेलन्हि (different meaning- got understand) ११५. बुझएलन्हि/बुझेलनि‍/ बुझयलन्हि (understood himself) ११६. चलि- चल/ चलि‍ गेल ११७. खधाइ- खधाय ११८. मोन पाड़लखिन्ह/ मोन पाड़लखि‍न/ मोन पारलखिन्ह ११९. कैक- कएक- कइएक १२०. लग ल’ग १२१. जरेनाइ १२२. जरौनाइ जरओनाइ- जरएनाइ/ जरेनाइ १२३. होइत १२४. गरबेलन्हि/ गरबेलनि‍ गरबौलन्हि/ गरबौलनि‍ १२५. चिखैत- (to test)चिखइत १२६. करइयो (willing to do) करैयो १२७. जेकरा- जकरा १२८. तकरा- तेकरा १२९. बिदेसर स्थानेमे/ बिदेसरे स्थानमे १३०. करबयलहुँ/ करबएलहुँ/ करबेलहुँ करबेलौं १३१. हारिक (उच्चारण हाइरक) १३२. ओजन वजन आफसोच/ अफसोस कागत/ कागच/ कागज १३३. आधे भाग/ आध-भागे १३४. पिचा / पिचाय/पिचाए १३५. नञ/ ने १३६. बच्चा नञ (ने) पिचा जाय १३७. तखन ने (नञ) कहैत अछि। कहै/ सुनै/ देखै छल मुदा कहैत-कहैत/ सुनैत-सुनैत/ देखैत-देखैत १३८. कतेक गोटे/ कताक गोटे १३९. कमाइ-धमाइ/ कमाई- धमाई १४० . लग ल’ग १४१. खेलाइ (for playing) १४२. छथिन्ह/ छथिन १४३. होइत होइ १४४. क्यो कियो / केओ १४५. केश (hair) १४६. केस (court-case) १४७ . बननाइ/ बननाय/ बननाए १४८. जरेनाइ १४९. कुरसी कुर्सी १५०. चरचा चर्चा १५१. कर्म करम १५२. डुबाबए/ डुबाबै/ डुमाबै डुमाबय/ डुमाबए १५३. एखुनका/ अखुनका १५४. लए/ लिअए (वाक्यक अंतिम शब्द)- लऽ १५५. कएलक/ केलक १५६. गरमी गर्मी १५७ . वरदी वर्दी १५८. सुना गेलाह सुना’/सुनाऽ १५९. एनाइ-गेनाइ १६०. तेना ने घेरलन्हि/ तेना ने घेरलनि‍ १६१. नञि / नै १६२. डरो ड’रो १६३. कतहु/ कतौ कहीं १६४. उमरिगर-उमेरगर उमरगर १६५. भरिगर १६६. धोल/धोअल धोएल १६७. गप/गप्प १६८. के के’ १६९. दरबज्जा/ दरबजा १७०. ठाम १७१. धरि तक १७२. घूरि लौटि १७३. थोरबेक १७४. बड्ड १७५. तोँ/ तूँ १७६. तोँहि( पद्यमे ग्राह्य) १७७. तोँही / तोँहि १७८. करबाइए करबाइये १७९. एकेटा १८०. करितथि /करतथि १८१. पहुँचि/ पहुँच १८२. राखलन्हि रखलन्हि/ रखलनि‍ १८३. लगलन्हि/ लगलनि‍ लागलन्हि १८४. सुनि (उच्चारण सुइन) १८५. अछि (उच्चारण अइछ) १८६. एलथि गेलथि १८७. बितओने/ बि‍तौने/ बितेने १८८. करबओलन्हि/ करबौलनि‍/ करेलखिन्ह/ करेलखि‍न १८९. करएलन्हि/ करेलनि‍ १९०. आकि/ कि १९१. पहुँचि/ पहुँच १९२. बत्ती जराय/ जराए जरा (आगि लगा) १९३. से से’ १९४. हाँ मे हाँ (हाँमे हाँ विभक्त्तिमे हटा कए) १९५. फेल फैल १९६. फइल(spacious) फैल १९७. होयतन्हि/ होएतन्हि/ होएतनि‍/हेतनि‍/ हेतन्हि १९८. हाथ मटिआएब/ हाथ मटियाबय/हाथ मटियाएब १९९. फेका फेंका २००. देखाए देखा २०१. देखाबए २०२. सत्तरि सत्तर २०३. साहेब साहब २०४.गेलैन्ह/ गेलन्हि/ गेलनि‍ २०५. हेबाक/ होएबाक २०६.केलो/ कएलहुँ/केलौं/ केलुँ २०७. किछु न किछु/ किछु ने किछु २०८.घुमेलहुँ/ घुमओलहुँ/ घुमेलौं २०९. एलाक/ अएलाक २१०. अः/ अह २११.लय/ लए (अर्थ-परिवर्त्तन) २१२.कनीक/ कनेक २१३.सबहक/ सभक २१४.मिलाऽ/ मिला २१५.कऽ/ क २१६.जाऽ/ जा २१७.आऽ/ आ २१८.भऽ /भ’ (’ फॉन्टक कमीक द्योतक) २१९.निअम/ नियम २२० .हेक्टेअर/ हेक्टेयर २२१.पहिल अक्षर ढ/ बादक/ बीचक ढ़ २२२.तहिं/तहिँ/ तञि/ तैं २२३.कहिं/ कहीं २२४.तँइ/ तैं / तइँ २२५.नँइ/ नइँ/  नञि/ नहि/नै २२६.है/ हए / एलीहेँ/ २२७.छञि/ छै/ छैक /छइ २२८.दृष्टिएँ/ दृष्टियेँ २२९.आ (come)/ आऽ(conjunction) २३०. आ (conjunction)/ आऽ(come) २३१.कुनो/ कोनो, कोना/केना २३२.गेलैन्ह-गेलन्हि-गेलनि‍ २३३.हेबाक- होएबाक २३४.केलौँ- कएलौँ-कएलहुँ/केलौं २३५.किछु न किछ- किछु ने किछु २३६.केहेन- केहन २३७.आऽ (come)-आ (conjunction-and)/आ। आब'-आब' /आबह-आबह २३८. हएत-हैत २३९.घुमेलहुँ-घुमएलहुँ- घुमेलाें २४०.एलाक- अएलाक २४१.होनि- होइन/ होन्हि/ २४२.ओ-राम ओ श्यामक बीच(conjunction), ओऽ कहलक (he said)/ओ २४३.की हए/ कोसी अएली हए/ की है। की हइ २४४.दृष्टिएँ/ दृष्टियेँ २४५ .शामिल/ सामेल २४६.तैँ / तँए/ तञि/ तहिं २४७.जौं / ज्योँ/ जँ/ २४८.सभ/ सब २४९.सभक/ सबहक २५०.कहिं/ कहीं २५१.कुनो/ कोनो/ कोनहुँ/ २५२.फारकती भऽ गेल/ भए गेल/ भय गेल २५३.कोना/ केना/ कन्‍ना/कना २५४.अः/ अह २५५.जनै/ जनञ २५६.गेलनि‍/ गेलाह (अर्थ परिवर्तन) २५७.केलन्हि/ कएलन्हि/ केलनि‍/ २५८.लय/ लए/ लएह (अर्थ परिवर्तन) २५९.कनीक/ कनेक/कनी-मनी २६०.पठेलन्हि‍ पठेलनि‍/ पठेलइन/ पपठओलन्हि/ पठबौलनि‍/ २६१.निअम/ नियम २६२.हेक्टेअर/ हेक्टेयर २६३.पहिल अक्षर रहने ढ/ बीचमे रहने ढ़ २६४.आकारान्तमे बिकारीक प्रयोग उचित नै/ अपोस्ट्रोफीक प्रयोग फान्टक तकनीकी न्यूनताक परिचायक ओकर बदला अवग्रह (बिकारी) क प्रयोग उचित २६५.केर (पद्यमे ग्राह्य) / -क/ कऽ/ के २६६.छैन्हि- छन्हि २६७.लगैए/ लगैये २६८.होएत/ हएत २६९.जाएत/ जएत/ २७०.आएत/ अएत/ आओत २७१ .खाएत/ खएत/ खैत २७२.पिअएबाक/ पिएबाक/पि‍येबाक २७३.शुरु/ शुरुह २७४.शुरुहे/ शुरुए २७५.अएताह/अओताह/ एताह/ औताह २७६.जाहि/ जाइ/ जइ/ जै/ २७७.जाइत/ जैतए/ जइतए २७८.आएल/ अएल २७९.कैक/ कएक २८०.आयल/ अएल/ आएल २८१. जाए/ जअए/ जए (लालति‍ जाए लगलीह।) २८२. नुकएल/ नुकाएल २८३. कठुआएल/ कठुअएल २८४. ताहि/ तै/ तइ २८५. गायब/ गाएब/ गएब २८६. सकै/ सकए/ सकय २८७.सेरा/सरा/ सराए (भात सरा गेल) २८८.कहैत रही/देखैत रही/ कहैत छलौं/ कहै छलौं- अहिना चलैत/ पढ़ैत (पढ़ै-पढ़ैत अर्थ कखनो काल परिवर्तित) - आर बुझै/ बुझैत (बुझै/ बुझै छी, मुदा बुझैत-बुझैत)/ सकैत/ सकै। करैत/ करै। दै/ दैत। छैक/ छै। बचलै/ बचलैक। रखबा/ रखबाक । बिनु/ बिन। रातिक/ रातुक बुझै आ बुझैत केर अपन-अपन जगहपर प्रयोग समीचीन अछि‍। बुझैत-बुझैत आब बुझलि‍ऐ। हमहूँ बुझै छी। २८९. दुआरे/ द्वारे २९०.भेटि/ भेट/ भेँट २९१. खन/ खीन/  खुना (भोर खन/ भोर खीन) २९२.तक/ धरि २९३.गऽ/ गै (meaning different-जनबै गऽ) २९४.सऽ/ सँ (मुदा दऽ, लऽ) २९५.त्त्व,(तीन अक्षरक मेल बदला पुनरुक्तिक एक आ एकटा दोसरक उपयोग) आदिक बदला त्व आदि। महत्त्व/ महत्व/ कर्ता/ कर्त्ता आदिमे त्त संयुक्तक कोनो आवश्यकता मैथिलीमे नै अछि। वक्तव्य २९६.बेसी/ बेशी २९७.बाला/वाला बला/ वला (रहैबला) २९८ .वाली/ (बदलैवाली) २९९.वार्त्ता/ वार्ता ३००. अन्तर्राष्ट्रिय/ अन्तर्राष्ट्रीय ३०१. लेमए/ लेबए ३०२.लमछुरका, नमछुरका ३०२.लागै/ लगै ( भेटैत/ भेटै) ३०३.लागल/ लगल ३०४.हबा/ हवा ३०५.राखलक/ रखलक ३०६.आ (come)/ आ (and) ३०७. पश्चाताप/ पश्चात्ताप ३०८. ऽ केर व्यवहार शब्दक अन्तमे मात्र, यथासंभव बीचमे नै। ३०९.कहैत/ कहै ३१०. रहए (छल)/ रहै (छलै) (meaning different) ३११.तागति/ ताकति ३१२.खराप/ खराब ३१३.बोइन/ बोनि/ बोइनि ३१४.जाठि/ जाइठ ३१५.कागज/ कागच/ कागत ३१६.गिरै (meaning different- swallow)/ गिरए (खसए) ३१७.राष्ट्रिय/ राष्ट्रीय Festivals of Mithila DATE-LIST (year- 2011-12) (१४१९ साल) Marriage Days: Nov.2011- 20,21,23,25,27,30 Dec.2011- 1,5,9 January 2012- 18,19,20,23,25,27,29 Feb.2012- 2,3,8,9,10,16,17,19,23,24,29 March 2012- 1,8,9,12 April 2012- 15,16,18,25,26 June 2012- 8,13,24,25,28,29 Upanayana Days: February 2012- 2,3,24,26 March 2012- 4 April 2012- 1,2,26 June 2012- 22 Dviragaman Din: November 2011- 27,30 December 2011- 1,2,5,7,9,12 February 2012- 22,23,24,26,27,29 March 2012- 1,2,4,5,9,11,12 April 2012- 23,25,26,29 May 2012- 2,3,4,6,7 Mundan Din: December 2011- 1,5 January 201225,26,30 March 2012- 12 April 2012- 26 May 2012- 23,25,31 June 2012- 8,21,22,29 FESTIVALS OF MITHILA Mauna Panchami-20 July Madhushravani- 2 August Nag Panchami- 4 August Raksha Bandhan- 13 Aug Krishnastami- 21 August Kushi Amavasya / Somvari Vrat- 29 August Hartalika Teej- 31 August ChauthChandra-1 September Karma Dharma Ekadashi-8 September Indra Pooja Aarambh- 9 September Anant Caturdashi- 11 Sep Agastyarghadaan- 12 Sep Pitri Paksha begins- 13 Sep Mahalaya Aarambh- 13 September Vishwakarma Pooja- 17 September Jimootavahan Vrata/ Jitia-20 September Matri Navami- 21September Kalashsthapan- 28 September Belnauti- 2 October Patrika Pravesh- 3 October Mahastami- 4 October Maha Navami - 5 October Vijaya Dashami- 6 October Kojagara- 11 Oct Dhanteras- 24 October Diyabati, shyama pooja-26 October Annakoota/ Govardhana Pooja-27  October Bhratridwitiya/ Chitragupta Pooja-28 October Chhathi-kharna -31 October Chhathi- sayankalik arghya - 1 November Devotthan Ekadashi- 17 November Sama poojarambh- 2 November Kartik Poornima/ Sama Bisarjan- 10 Nov ravivratarambh- 27 November Navanna parvan- 29 November Vivaha Panchmi- 29 November Makara/ Teela Sankranti-15 Jan Naraknivaran chaturdashi- 21 January Basant Panchami/ Saraswati Pooja- 28 January Achla Saptmi- 30 January Mahashivaratri-20 February Holikadahan-Fagua-7 March Holi-9 Mar Varuni Yoga-20 March Chaiti  navaratrarambh- 23 March Chaiti Chhathi vrata-29 March Ram Navami- 1 April Mesha Sankranti-Satuani-13 April Jurishital-14 April Akshaya Tritiya-24 April Ravi Brat Ant- 29 April Janaki Navami- 30 April Vat Savitri-barasait- 20 May Ganga Dashhara-30 May Somavati Amavasya Vrata- 18 June Jagannath Rath Yatra- 21 June Hari Sayan Ekadashi- 30 June Aashadhi Guru Poornima-3 Jul VIDEHA ARCHIVE १.विदेह ई-पत्रिकाक सभटा पुरान अंक ब्रेल, तिरहुता आ देवनागरी रूपमे Videha e journal's all old issues in Braille Tirhuta and Devanagari versions विदेह ई-पत्रिकाक पहिल ५० अंक

विदेह ई-पत्रिकाक ५०म सँ आगाँक अंक २.मैथिली पोथी डाउनलोड Maithili Books Download ३.मैथिली ऑडियो संकलन Maithili Audio Downloads ४.मैथिली वीडियोक संकलन Maithili Videos ५.मिथिला चित्रकला/ आधुनिक चित्रकला आ चित्र Mithila Painting/ Modern Art and Photos "विदेह"क एहि सभ सहयोगी लिंकपर सेहो एक बेर जाऊ। ६.विदेह मैथिली क्विज  :  http://videhaquiz.blogspot.com/ ७.विदेह मैथिली जालवृत्त एग्रीगेटर : http://videha-aggregator.blogspot.com/ ८.विदेह मैथिली साहित्य अंग्रेजीमे अनूदित http://madhubani-art.blogspot.com/ ९.विदेहक पूर्व-रूप "भालसरिक गाछ"  : http://gajendrathakur.blogspot.com/ १०.विदेह इंडेक्स  : http://videha123.blogspot.com/ ११.विदेह फाइल : http://videha123.wordpress.com/ १२. विदेह: सदेह : पहिल तिरहुता (मिथिला़क्षर) जालवृत्त (ब्लॉग) http://videha-sadeha.blogspot.com/ १३. विदेह:ब्रेल: मैथिली ब्रेलमे: पहिल बेर विदेह द्वारा http://videha-braille.blogspot.com/ १४.VIDEHA IST MAITHILI  FORTNIGHTLY EJOURNAL ARCHIVE http://videha-archive.blogspot.com/ १५. विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका मैथिली पोथीक आर्काइव http://videha-pothi.blogspot.com/ १६. विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका ऑडियो आर्काइव http://videha-audio.blogspot.com/ १७. विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका वीडियो आर्काइव http://videha-video.blogspot.com/ १८. विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका मिथिला चित्रकला, आधुनिक कला आ चित्रकला http://videha-paintings-photos.blogspot.com/ १९. मैथिल आर मिथिला (मैथिलीक सभसँ लोकप्रिय जालवृत्त) http://maithilaurmithila.blogspot.com/ २०.श्रुति प्रकाशन http://www.shruti-publication.com/ २१.http://groups.google.com/group/videha VIDEHA केर सदस्यता लिअ Top of Form Bottom of Form ईमेल : एहि समूहपर जाऊ २२.http://groups.yahoo.com/group/VIDEHA/ Top of Form Subscribe to VIDEHA Powered by us.groups.yahoo.com Bottom of Form २३.गजेन्द्र ठाकुर इ‍डेक्स http://gajendrathakur123.blogspot.com २४. नेना भुटका http://mangan-khabas.blogspot.com/ २५.विदेह रेडियो:मैथिली कथा-कविता आदिक पहिल पोडकास्ट साइट http://videha123radio.wordpress.com/ २६.Videha Radio २७. Join official Videha facebook group. २८. विदेह मैथिली नाट्य उत्सव http://maithili-drama.blogspot.com/ २९.समदिया http://esamaad.blogspot.com/ ३०. मैथिली फिल्म्स http://maithilifilms.blogspot.com/ ३१.अनचिन्हार आखर http://anchinharakharkolkata.blogspot.com/ ३२. मैथिली हाइकू http://maithili-haiku.blogspot.com/ ३३. मानक मैथिली http://manak-maithili.blogspot.com/ ३४. विहनि कथा http://vihanikatha.blogspot.in/ ३५. मैथिली कविता http://maithili-kavita.blogspot.in/ ३६. मैथिली कथा http://maithili-katha.blogspot.in/ ३७.मैथिली समालोचना http://maithili-samalochna.blogspot.in/ महत्त्वपूर्ण सूचना:(१) 'विदेह' द्वारा धारावाहिक रूपे ई-प्रकाशित कएल गेल गजेन्द्र ठाकुरक  निबन्ध-प्रबन्ध-समीक्षा, उपन्यास (सहस्रबाढ़नि) , पद्य-संग्रह (सहस्राब्दीक चौपड़पर), कथा-गल्प (गल्प-गुच्छ), नाटक(संकर्षण), महाकाव्य (त्वञ्चाहञ्च आ असञ्जाति मन) आ बाल-किशोर साहित्य विदेहमे संपूर्ण ई-प्रकाशनक बाद प्रिंट फॉर्ममे। कुरुक्षेत्रम्–अन्तर्मनक खण्ड-१ सँ ७ Combined ISBN No.978-81-907729-7-6 विवरण एहि पृष्ठपर नीचाँमे आ प्रकाशकक साइट http://www.shruti-publication.com/ पर । महत्त्वपूर्ण सूचना (२):सूचना: विदेहक मैथिली-अंग्रेजी आ अंग्रेजी मैथिली कोष (इंटरनेटपर पहिल बेर सर्च-डिक्शनरी) एम.एस. एस.क्यू.एल. सर्वर आधारित -Based on ms-sql server Maithili-English and English-Maithili Dictionary. विदेहक भाषापाक- रचनालेखन स्तंभमे। कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक- गजेन्द्र ठाकुर गजेन्द्र ठाकुरक निबन्ध-प्रबन्ध-समीक्षा, उपन्यास (सहस्रबाढ़नि) , पद्य-संग्रह (सहस्राब्दीक चौपड़पर), कथा-गल्प (गल्प गुच्छ), नाटक(संकर्षण), महाकाव्य (त्वञ्चाहञ्च आ असञ्जाति मन) आ बालमंडली-किशोरजगत विदेहमे संपूर्ण ई-प्रकाशनक बाद प्रिंट फॉर्ममे। कुरुक्षेत्रम्–अन्तर्मनक, खण्ड-१ सँ ७ Ist edition 2009 of Gajendra Thakur’s KuruKshetram-Antarmanak (Vol. I to VII)- essay-paper-criticism, novel, poems, story, play, epics and Children-grown-ups literature in single binding: Language:Maithili ६९२ पृष्ठ : मूल्य भा. रु. 100/-(for individual buyers inside india) (add courier charges Rs.50/-per copy for Delhi/NCR and Rs.100/- per copy for outside Delhi)

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Details for purchase available at print-version publishers's site website: http://www.shruti-publication.com/ or you may write to e-mail:shruti.publication@shruti-publication.com विदेह: सदेह : १: २: ३: ४ तिरहुता : देवनागरी "विदेह" क, प्रिंट संस्करण :विदेह-ई-पत्रिका (http://www.videha.co.in/) क चुनल रचना सम्मिलित। विदेह:सदेह:१: २: ३: ४ सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। Details for purchase available at print-version publishers's site http://www.shruti-publication.com  or you may write to shruti.publication@shruti-publication.com २. संदेश- [ विदेह ई-पत्रिका, विदेह:सदेह मिथिलाक्षर आ देवनागरी आ गजेन्द्र ठाकुरक सात खण्डक- निबन्ध-प्रबन्ध-समीक्षा,उपन्यास (सहस्रबाढ़नि) , पद्य-संग्रह (सहस्राब्दीक चौपड़पर), कथा-गल्प (गल्प गुच्छ), नाटक (संकर्षण), महाकाव्य (त्वञ्चाहञ्च आ असञ्जाति मन) आ बाल-मंडली-किशोर जगत- संग्रह कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक मादेँ। ] १.श्री गोविन्द झा- विदेहकेँ तरंगजालपर उतारि विश्वभरिमे मातृभाषा मैथिलीक लहरि जगाओल, खेद जे अपनेक एहि महाभियानमे हम एखन धरि संग नहि दए सकलहुँ। सुनैत छी अपनेकेँ सुझाओ आ रचनात्मक आलोचना प्रिय लगैत अछि तेँ किछु लिखक मोन भेल। हमर सहायता आ सहयोग अपनेकेँ सदा उपलब्ध रहत। २.श्री रमानन्द रेणु- मैथिलीमे ई-पत्रिका पाक्षिक रूपेँ चला कऽ जे अपन मातृभाषाक प्रचार कऽ रहल छी, से धन्यवाद । आगाँ अपनेक समस्त मैथिलीक कार्यक हेतु हम हृदयसँ शुभकामना दऽ रहल छी। ३.श्री विद्यानाथ झा "विदित"- संचार आ प्रौद्योगिकीक एहि प्रतिस्पर्धी ग्लोबल युगमे अपन महिमामय "विदेह"केँ अपना देहमे प्रकट देखि जतबा प्रसन्नता आ संतोष भेल, तकरा कोनो उपलब्ध "मीटर"सँ नहि नापल जा सकैछ? ..एकर ऐतिहासिक मूल्यांकन आ सांस्कृतिक प्रतिफलन एहि शताब्दीक अंत धरि लोकक नजरिमे आश्चर्यजनक रूपसँ प्रकट हैत। ४. प्रो. उदय नारायण सिंह "नचिकेता"- जे काज अहाँ कए रहल छी तकर चरचा एक दिन मैथिली भाषाक इतिहासमे होएत। आनन्द भए रहल अछि, ई जानि कए जे एतेक गोट मैथिल "विदेह" ई जर्नलकेँ पढ़ि रहल छथि।...विदेहक चालीसम अंक पुरबाक लेल अभिनन्दन। ५. डॉ. गंगेश गुंजन- एहि विदेह-कर्ममे लागि रहल अहाँक सम्वेदनशील मन, मैथिलीक प्रति समर्पित मेहनतिक अमृत रंग, इतिहास मे एक टा विशिष्ट फराक अध्याय आरंभ करत, हमरा विश्वास अछि। अशेष शुभकामना आ बधाइक सङ्ग, सस्नेह...अहाँक पोथी कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक प्रथम दृष्टया बहुत भव्य तथा उपयोगी बुझाइछ। मैथिलीमे तँ अपना स्वरूपक प्रायः ई पहिले एहन  भव्य अवतारक पोथी थिक। हर्षपूर्ण हमर हार्दिक बधाई स्वीकार करी। ६. श्री रामाश्रय झा "रामरंग"(आब स्वर्गीय)- "अपना" मिथिलासँ संबंधित...विषय वस्तुसँ अवगत भेलहुँ।...शेष सभ कुशल अछि। ७. श्री ब्रजेन्द्र त्रिपाठी- साहित्य अकादमी- इंटरनेट पर प्रथम मैथिली पाक्षिक पत्रिका "विदेह" केर लेल बधाई आ शुभकामना स्वीकार करू। ८. श्री प्रफुल्लकुमार सिंह "मौन"- प्रथम मैथिली पाक्षिक पत्रिका "विदेह" क प्रकाशनक समाचार जानि कनेक चकित मुदा बेसी आह्लादित भेलहुँ। कालचक्रकेँ पकड़ि जाहि दूरदृष्टिक परिचय देलहुँ, ओहि लेल हमर मंगलकामना। ९.डॉ. शिवप्रसाद यादव- ई जानि अपार हर्ष भए रहल अछि, जे नव सूचना-क्रान्तिक क्षेत्रमे मैथिली पत्रकारिताकेँ प्रवेश दिअएबाक साहसिक कदम उठाओल अछि। पत्रकारितामे एहि प्रकारक नव प्रयोगक हम स्वागत करैत छी, संगहि "विदेह"क सफलताक शुभकामना। १०. श्री आद्याचरण झा- कोनो पत्र-पत्रिकाक प्रकाशन- ताहूमे मैथिली पत्रिकाक प्रकाशनमे के कतेक सहयोग करताह- ई तऽ भविष्य कहत। ई हमर ८८ वर्षमे ७५ वर्षक अनुभव रहल। एतेक पैघ महान यज्ञमे हमर श्रद्धापूर्ण आहुति प्राप्त होयत- यावत ठीक-ठाक छी/ रहब। ११. श्री विजय ठाकुर- मिशिगन विश्वविद्यालय- "विदेह" पत्रिकाक अंक देखलहुँ, सम्पूर्ण टीम बधाईक पात्र अछि। पत्रिकाक मंगल भविष्य हेतु हमर शुभकामना स्वीकार कएल जाओ। १२. श्री सुभाषचन्द्र यादव- ई-पत्रिका "विदेह" क बारेमे जानि प्रसन्नता भेल। ’विदेह’ निरन्तर पल्लवित-पुष्पित हो आ चतुर्दिक अपन सुगंध पसारय से कामना अछि। १३. श्री मैथिलीपुत्र प्रदीप- ई-पत्रिका "विदेह" केर सफलताक भगवतीसँ कामना। हमर पूर्ण सहयोग रहत। १४. डॉ. श्री भीमनाथ झा- "विदेह" इन्टरनेट पर अछि तेँ "विदेह" नाम उचित आर कतेक रूपेँ एकर विवरण भए सकैत अछि। आइ-काल्हि मोनमे उद्वेग रहैत अछि, मुदा शीघ्र पूर्ण सहयोग देब।कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक देखि अति प्रसन्नता भेल। मैथिलीक लेल ई घटना छी। १५. श्री रामभरोस कापड़ि "भ्रमर"- जनकपुरधाम- "विदेह" ऑनलाइन देखि रहल छी। मैथिलीकेँ अन्तर्राष्ट्रीय जगतमे पहुँचेलहुँ तकरा लेल हार्दिक बधाई। मिथिला रत्न सभक संकलन अपूर्व। नेपालोक सहयोग भेटत, से विश्वास करी। १६. श्री राजनन्दन लालदास- "विदेह" ई-पत्रिकाक माध्यमसँ बड़ नीक काज कए रहल छी, नातिक अहिठाम देखलहुँ। एकर वार्षिक अ‍ंक जखन प्रिं‍ट निकालब तँ हमरा पठायब। कलकत्तामे बहुत गोटेकेँ हम साइटक पता लिखाए देने छियन्हि। मोन तँ होइत अछि जे दिल्ली आबि कए आशीर्वाद दैतहुँ, मुदा उमर आब बेशी भए गेल। शुभकामना देश-विदेशक मैथिलकेँ जोड़बाक लेल।.. उत्कृष्ट प्रकाशन कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक लेल बधाइ। अद्भुत काज कएल अछि, नीक प्रस्तुति अछि सात खण्डमे।  मुदा अहाँक सेवा आ से निःस्वार्थ तखन बूझल जाइत जँ अहाँ द्वारा प्रकाशित पोथी सभपर दाम लिखल नहि रहितैक। ओहिना सभकेँ विलहि देल जइतैक। (स्पष्टीकरण-  श्रीमान्, अहाँक सूचनार्थ विदेह द्वारा ई-प्रकाशित कएल सभटा सामग्री आर्काइवमे https://sites.google.com/a/videha.com/videha-pothi/ पर बिना मूल्यक डाउनलोड लेल उपलब्ध छै आ भविष्यमे सेहो रहतैक। एहि आर्काइवकेँ जे कियो प्रकाशक अनुमति लऽ कऽ प्रिंट रूपमे प्रकाशित कएने छथि आ तकर ओ दाम रखने छथि ताहिपर हमर कोनो नियंत्रण नहि अछि।- गजेन्द्र ठाकुर)...   अहाँक प्रति अशेष शुभकामनाक संग। १७. डॉ. प्रेमशंकर सिंह- अहाँ मैथिलीमे इंटरनेटपर पहिल पत्रिका "विदेह" प्रकाशित कए अपन अद्भुत मातृभाषानुरागक परिचय देल अछि, अहाँक निःस्वार्थ मातृभाषानुरागसँ प्रेरित छी, एकर निमित्त जे हमर सेवाक प्रयोजन हो, तँ सूचित करी। इंटरनेटपर आद्योपांत पत्रिका देखल, मन प्रफुल्लित भऽ गेल। १८.श्रीमती शेफालिका वर्मा- विदेह ई-पत्रिका देखि मोन उल्लाससँ भरि गेल। विज्ञान कतेक प्रगति कऽ रहल अछि...अहाँ सभ अनन्त आकाशकेँ भेदि दियौ, समस्त विस्तारक रहस्यकेँ तार-तार कऽ दियौक...। अपनेक अद्भुत पुस्तक कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक विषयवस्तुक दृष्टिसँ गागरमे सागर अछि। बधाई। १९.श्री हेतुकर झा, पटना-जाहि समर्पण भावसँ अपने मिथिला-मैथिलीक सेवामे तत्पर छी से स्तुत्य अछि। देशक राजधानीसँ भय रहल मैथिलीक शंखनाद मिथिलाक गाम-गाममे मैथिली चेतनाक विकास अवश्य करत। २०. श्री योगानन्द झा, कबिलपुर, लहेरियासराय- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पोथीकेँ निकटसँ देखबाक अवसर भेटल अछि आ मैथिली जगतक एकटा उद्भट ओ समसामयिक दृष्टिसम्पन्न हस्ताक्षरक कलमबन्द परिचयसँ आह्लादित छी। "विदेह"क देवनागरी सँस्करण पटनामे रु. 80/- मे उपलब्ध भऽ सकल जे विभिन्न लेखक लोकनिक छायाचित्र, परिचय पत्रक ओ रचनावलीक सम्यक प्रकाशनसँ ऐतिहासिक कहल जा सकैछ। २१. श्री किशोरीकान्त मिश्र- कोलकाता- जय मैथिली, विदेहमे बहुत रास कविता, कथा, रिपोर्ट आदिक सचित्र संग्रह देखि आ आर अधिक प्रसन्नता मिथिलाक्षर देखि- बधाई स्वीकार कएल जाओ। २२.श्री जीवकान्त- विदेहक मुद्रित अंक पढ़ल- अद्भुत मेहनति। चाबस-चाबस। किछु समालोचना मरखाह..मुदा सत्य। २३. श्री भालचन्द्र झा- अपनेक कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक देखि बुझाएल जेना हम अपने छपलहुँ अछि। एकर विशालकाय आकृति अपनेक सर्वसमावेशताक परिचायक अछि। अपनेक रचना सामर्थ्यमे उत्तरोत्तर वृद्धि हो, एहि शुभकामनाक संग हार्दिक बधाई। २४.श्रीमती डॉ नीता झा- अहाँक कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़लहुँ। ज्योतिरीश्वर शब्दावली, कृषि मत्स्य शब्दावली आ सीत बसन्त आ सभ कथा, कविता, उपन्यास, बाल-किशोर साहित्य सभ उत्तम छल। मैथिलीक उत्तरोत्तर विकासक लक्ष्य दृष्टिगोचर होइत अछि। २५.श्री मायानन्द मिश्र- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक मे हमर उपन्यास स्त्रीधनक जे विरोध कएल गेल अछि तकर हम विरोध करैत छी।... कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पोथीक लेल शुभकामना।(श्रीमान् समालोचनाकेँ विरोधक रूपमे नहि लेल जाए।-गजेन्द्र ठाकुर) २६.श्री महेन्द्र हजारी- सम्पादक श्रीमिथिला- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़ि मोन हर्षित भऽ गेल..एखन पूरा पढ़यमे बहुत समय लागत, मुदा जतेक पढ़लहुँ से आह्लादित कएलक। २७.श्री केदारनाथ चौधरी- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक अद्भुत लागल, मैथिली साहित्य लेल ई पोथी एकटा प्रतिमान बनत। २८.श्री सत्यानन्द पाठक- विदेहक हम नियमित पाठक छी। ओकर स्वरूपक प्रशंसक छलहुँ। एम्हर अहाँक लिखल - कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक देखलहुँ। मोन आह्लादित भऽ उठल। कोनो रचना तरा-उपरी। २९.श्रीमती रमा झा-सम्पादक मिथिला दर्पण। कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक प्रिंट फॉर्म पढ़ि आ एकर गुणवत्ता देखि मोन प्रसन्न भऽ गेल, अद्भुत शब्द एकरा लेल प्रयुक्त कऽ रहल छी। विदेहक उत्तरोत्तर प्रगतिक शुभकामना। ३०.श्री नरेन्द्र झा, पटना- विदेह नियमित देखैत रहैत छी। मैथिली लेल अद्भुत काज कऽ रहल छी। ३१.श्री रामलोचन ठाकुर- कोलकाता- मिथिलाक्षर विदेह देखि मोन प्रसन्नतासँ भरि उठल, अंकक विशाल परिदृश्य आस्वस्तकारी अछि। ३२.श्री तारानन्द वियोगी- विदेह आ कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक देखि चकबिदोर लागि गेल। आश्चर्य। शुभकामना आ बधाई। ३३.श्रीमती प्रेमलता मिश्र “प्रेम”- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़लहुँ। सभ रचना उच्चकोटिक लागल। बधाई। ३४.श्री कीर्तिनारायण मिश्र- बेगूसराय- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक बड्ड नीक लागल, आगांक सभ काज लेल बधाई। ३५.श्री महाप्रकाश-सहरसा- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक नीक लागल, विशालकाय संगहि उत्तमकोटिक। ३६.श्री अग्निपुष्प- मिथिलाक्षर आ देवाक्षर विदेह पढ़ल..ई प्रथम तँ अछि एकरा प्रशंसामे मुदा हम एकरा दुस्साहसिक कहब। मिथिला चित्रकलाक स्तम्भकेँ मुदा अगिला अंकमे आर विस्तृत बनाऊ। ३७.श्री मंजर सुलेमान-दरभंगा- विदेहक जतेक प्रशंसा कएल जाए कम होएत। सभ चीज उत्तम। ३८.श्रीमती प्रोफेसर वीणा ठाकुर- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक उत्तम, पठनीय, विचारनीय। जे क्यो देखैत छथि पोथी प्राप्त करबाक उपाय पुछैत छथि। शुभकामना। ३९.श्री छत्रानन्द सिंह झा- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़लहुँ, बड्ड नीक सभ तरहेँ। ४०.श्री ताराकान्त झा- सम्पादक मैथिली दैनिक मिथिला समाद- विदेह तँ कन्टेन्ट प्रोवाइडरक काज कऽ रहल अछि। कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक अद्भुत लागल। ४१.डॉ रवीन्द्र कुमार चौधरी- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक बहुत नीक, बहुत मेहनतिक परिणाम। बधाई। ४२.श्री अमरनाथ- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक आ विदेह दुनू स्मरणीय घटना अछि, मैथिली साहित्य मध्य। ४३.श्री पंचानन मिश्र- विदेहक वैविध्य आ निरन्तरता प्रभावित करैत अछि, शुभकामना। ४४.श्री केदार कानन- कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक लेल अनेक धन्यवाद, शुभकामना आ बधाइ स्वीकार करी। आ नचिकेताक भूमिका पढ़लहुँ। शुरूमे तँ लागल जेना कोनो उपन्यास अहाँ द्वारा सृजित भेल अछि मुदा पोथी उनटौला पर ज्ञात भेल जे एहिमे तँ सभ विधा समाहित अछि। ४५.श्री धनाकर ठाकुर- अहाँ नीक काज कऽ रहल छी। फोटो गैलरीमे चित्र एहि शताब्दीक जन्मतिथिक अनुसार रहैत तऽ नीक। ४६.श्री आशीष झा- अहाँक पुस्तकक संबंधमे एतबा लिखबा सँ अपना कए नहि रोकि सकलहुँ जे ई किताब मात्र किताब नहि थीक, ई एकटा उम्मीद छी जे मैथिली अहाँ सन पुत्रक सेवा सँ निरंतर समृद्ध होइत चिरजीवन कए प्राप्त करत। ४७.श्री शम्भु कुमार सिंह- विदेहक तत्परता आ क्रियाशीलता देखि आह्लादित भऽ रहल छी। निश्चितरूपेण कहल जा सकैछ जे समकालीन मैथिली पत्रिकाक इतिहासमे विदेहक नाम स्वर्णाक्षरमे लिखल जाएत। ओहि कुरुक्षेत्रक घटना सभ तँ अठारहे दिनमे खतम भऽ गेल रहए मुदा अहाँक कुरुक्षेत्रम् तँ अशेष अछि। ४८.डॉ. अजीत मिश्र- अपनेक प्रयासक कतबो प्रश‍ंसा कएल जाए कमे होएतैक। मैथिली साहित्यमे अहाँ द्वारा कएल गेल काज युग-युगान्तर धरि पूजनीय रहत। ४९.श्री बीरेन्द्र मल्लिक- अहाँक कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक आ विदेह:सदेह पढ़ि अति प्रसन्नता भेल। अहाँक स्वास्थ्य ठीक रहए आ उत्साह बनल रहए से कामना। ५०.श्री कुमार राधारमण- अहाँक दिशा-निर्देशमे विदेह पहिल मैथिली ई-जर्नल देखि अति प्रसन्नता भेल। हमर शुभकामना। ५१.श्री फूलचन्द्र झा प्रवीण-विदेह:सदेह पढ़ने रही मुदा कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक देखि बढ़ाई देबा लेल बाध्य भऽ गेलहुँ। आब विश्वास भऽ गेल जे मैथिली नहि मरत। अशेष शुभकामना। ५२.श्री विभूति आनन्द- विदेह:सदेह देखि, ओकर विस्तार देखि अति प्रसन्नता भेल। ५३.श्री मानेश्वर मनुज-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक एकर भव्यता देखि अति प्रसन्नता भेल, एतेक विशाल ग्रन्थ मैथिलीमे आइ धरि नहि देखने रही। एहिना भविष्यमे काज करैत रही, शुभकामना। ५४.श्री विद्यानन्द झा- आइ.आइ.एम.कोलकाता- कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक विस्तार, छपाईक संग गुणवत्ता देखि अति प्रसन्नता भेल। अहाँक अनेक धन्यवाद; कतेक बरखसँ हम नेयारैत छलहुँ जे सभ पैघ शहरमे मैथिली लाइब्रेरीक स्थापना होअए, अहाँ ओकरा वेबपर कऽ रहल छी, अनेक धन्यवाद। ५५.श्री अरविन्द ठाकुर-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक मैथिली साहित्यमे कएल गेल एहि तरहक पहिल प्रयोग अछि, शुभकामना। ५६.श्री कुमार पवन-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक पढ़ि रहल छी। किछु लघुकथा पढ़ल अछि, बहुत मार्मिक छल। ५७. श्री प्रदीप बिहारी-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक देखल, बधाई। ५८.डॉ मणिकान्त ठाकुर-कैलिफोर्निया- अपन विलक्षण नियमित सेवासँ हमरा लोकनिक हृदयमे विदेह सदेह भऽ गेल अछि। ५९.श्री धीरेन्द्र प्रेमर्षि- अहाँक समस्त प्रयास सराहनीय। दुख होइत अछि जखन अहाँक प्रयासमे अपेक्षित सहयोग नहि कऽ पबैत छी। ६०.श्री देवशंकर नवीन- विदेहक निरन्तरता आ विशाल स्वरूप- विशाल पाठक वर्ग, एकरा ऐतिहासिक बनबैत अछि। ६१.श्री मोहन भारद्वाज- अहाँक समस्त कार्य देखल, बहुत नीक। एखन किछु परेशानीमे छी, मुदा शीघ्र सहयोग देब। ६२.श्री फजलुर रहमान हाशमी-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक मे एतेक मेहनतक लेल अहाँ साधुवादक अधिकारी छी। ६३.श्री लक्ष्मण झा "सागर"- मैथिलीमे चमत्कारिक रूपेँ अहाँक प्रवेश आह्लादकारी अछि।..अहाँकेँ एखन आर..दूर..बहुत दूरधरि जेबाक अछि। स्वस्थ आ प्रसन्न रही। ६४.श्री जगदीश प्रसाद मंडल-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक पढ़लहुँ । कथा सभ आ उपन्यास सहस्रबाढ़नि पूर्णरूपेँ पढ़ि गेल छी। गाम-घरक भौगोलिक विवरणक जे सूक्ष्म वर्णन सहस्रबाढ़निमे अछि, से चकित कएलक, एहि संग्रहक कथा-उपन्यास मैथिली लेखनमे विविधता अनलक अछि। समालोचना शास्त्रमे अहाँक दृष्टि वैयक्तिक नहि वरन् सामाजिक आ कल्याणकारी अछि, से प्रशंसनीय। ६५.श्री अशोक झा-अध्यक्ष मिथिला विकास परिषद- कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक लेल बधाई आ आगाँ लेल शुभकामना। ६६.श्री ठाकुर प्रसाद मुर्मु- अद्भुत प्रयास। धन्यवादक संग प्रार्थना जे अपन माटि-पानिकेँ ध्यानमे राखि अंकक समायोजन कएल जाए। नव अंक धरि प्रयास सराहनीय। विदेहकेँ बहुत-बहुत धन्यवाद जे एहेन सुन्दर-सुन्दर सचार (आलेख) लगा रहल छथि। सभटा ग्रहणीय- पठनीय। ६७.बुद्धिनाथ मिश्र- प्रिय गजेन्द्र जी,अहाँक सम्पादन मे प्रकाशित ‘विदेह’आ ‘कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक’ विलक्षण पत्रिका आ विलक्षण पोथी! की नहि अछि अहाँक सम्पादनमे? एहि प्रयत्न सँ मैथिली क विकास होयत,निस्संदेह। ६८.श्री बृखेश चन्द्र लाल- गजेन्द्रजी, अपनेक पुस्तक कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक पढ़ि मोन गदगद भय गेल , हृदयसँ अनुगृहित छी । हार्दिक शुभकामना । ६९.श्री परमेश्वर कापड़ि - श्री गजेन्द्र जी । कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक पढ़ि गदगद आ नेहाल भेलहुँ। ७०.श्री रवीन्द्रनाथ ठाकुर- विदेह पढ़ैत रहैत छी। धीरेन्द्र प्रेमर्षिक मैथिली गजलपर आलेख पढ़लहुँ। मैथिली गजल कत्तऽ सँ कत्तऽ चलि गेलैक आ ओ अपन आलेखमे मात्र अपन जानल-पहिचानल लोकक चर्च कएने छथि। जेना मैथिलीमे मठक परम्परा रहल अछि। (स्पष्टीकरण- श्रीमान्, प्रेमर्षि जी ओहि आलेखमे ई स्पष्ट लिखने छथि जे किनको नाम जे छुटि गेल छन्हि तँ से मात्र आलेखक लेखकक जानकारी नहि रहबाक द्वारे, एहिमे आन कोनो कारण नहि देखल जाय। अहाँसँ एहि विषयपर विस्तृत आलेख सादर आमंत्रित अछि।-सम्पादक) ७१.श्री मंत्रेश्वर झा- विदेह पढ़ल आ संगहि अहाँक मैगनम ओपस कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक सेहो, अति उत्तम। मैथिलीक लेल कएल जा रहल अहाँक समस्त कार्य अतुलनीय अछि। ७२. श्री हरेकृष्ण झा- कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक मैथिलीमे अपन तरहक एकमात्र ग्रन्थ अछि, एहिमे लेखकक समग्र दृष्टि आ रचना कौशल देखबामे आएल जे लेखकक फील्डवर्कसँ जुड़ल रहबाक कारणसँ अछि। ७३.श्री सुकान्त सोम- कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक मे  समाजक इतिहास आ वर्तमानसँ अहाँक जुड़ाव बड्ड नीक लागल, अहाँ एहि क्षेत्रमे आर आगाँ काज करब से आशा अछि। ७४.प्रोफेसर मदन मिश्र- कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक सन किताब मैथिलीमे पहिले अछि आ एतेक विशाल संग्रहपर शोध कएल जा सकैत अछि। भविष्यक लेल शुभकामना। ७५.प्रोफेसर कमला चौधरी- मैथिलीमे कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक सन पोथी आबए जे गुण आ रूप दुनूमे निस्सन होअए, से बहुत दिनसँ आकांक्षा छल, ओ आब जा कऽ पूर्ण भेल। पोथी एक हाथसँ दोसर हाथ घुमि रहल अछि, एहिना आगाँ सेहो अहाँसँ आशा अछि। ७६.श्री उदय चन्द्र झा "विनोद": गजेन्द्रजी, अहाँ जतेक काज कएलहुँ अछि से मैथिलीमे आइ धरि कियो नहि कएने छल। शुभकामना। अहाँकेँ एखन बहुत काज आर करबाक अछि। ७७.श्री कृष्ण कुमार कश्यप: गजेन्द्र ठाकुरजी, अहाँसँ भेँट एकटा स्मरणीय क्षण बनि गेल। अहाँ जतेक काज एहि बएसमे कऽ गेल छी ताहिसँ हजार गुणा आर बेशीक आशा अछि। ७८.श्री मणिकान्त दास: अहाँक मैथिलीक कार्यक प्रशंसा लेल शब्द नहि भेटैत अछि। अहाँक कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक सम्पूर्ण रूपेँ पढ़ि गेलहुँ। त्वञ्चाहञ्च बड्ड नीक लागल। ७९. श्री हीरेन्द्र कुमार झा- विदेह ई-पत्रिकाक सभ अंक ई-पत्रसँ भेटैत रहैत अछि। मैथिलीक ई-पत्रिका छैक एहि बातक गर्व होइत अछि। अहाँ आ अहाँक सभ सहयोगीकेँ हार्दिक शुभकामना। विदेह मैथिली साहित्य आन्दोलन (c)२००४-१२. सर्वाधिकार लेखकाधीन आ जतए लेखकक नाम नहि अछि ततए संपादकाधीन। विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। सह-सम्पादक: उमेश मंडल। सहायक सम्पादक: शिव कुमार झा आ मुन्नाजी (मनोज कुमार कर्ण)। भाषा-सम्पादन: नागेन्द्र कुमार झा आ पञ्जीकार विद्यानन्द झा। कला-सम्पादन: वनीता कुमारी आ रश्मि रेखा सिन्हा। सम्पादक-शोध-अन्वेषण: डॉ. जया वर्मा आ डॉ. राजीव कुमार वर्मा। सम्पादक- नाटक-रंगमंच-चलचित्र- बेचन ठाकुर। सम्पादक- सूचना-सम्पर्क-समाद- पूनम मंडल आ प्रियंका झा। सम्पादक- अनुवाद विभाग- विनीत उत्पल। रचनाकार अपन मौलिक आ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि) ggajendra@videha.com केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx, .rtf वा .txt फॉर्मेटमे पठा सकैत छथि। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेताह, से आशा करैत छी। रचनाक अंतमे टाइप रहय, जे ई रचना मौलिक अछि, आ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। मेल प्राप्त होयबाक बाद यथासंभव शीघ्र ( सात दिनक भीतर) एकर प्रकाशनक अंकक सूचना देल जायत। ’विदेह' प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका अछि आ एहिमे मैथिली, संस्कृत आ अंग्रेजीमे मिथिला आ मैथिलीसँ संबंधित रचना प्रकाशित कएल जाइत अछि। एहि ई पत्रिकाकेँ श्रीमति लक्ष्मी ठाकुर द्वारा मासक ०१ आ १५ तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि। (c) 2004-12 सर्वाधिकार सुरक्षित। विदेहमे प्रकाशित सभटा रचना आ आर्काइवक सर्वाधिकार रचनाकार आ संग्रहकर्त्ताक लगमे छन्हि। रचनाक अनुवाद आ पुनः प्रकाशन किंवा आर्काइवक उपयोगक अधिकार किनबाक हेतु ggajendra@videha.co.in पर संपर्क करू। एहि साइटकेँ प्रीति झा ठाकुर, मधूलिका चौधरी आ रश्मि प्रिया द्वारा डिजाइन कएल गेल। सिद्धिरस्तु वि दे ह विदेह Videha বিদেহ  www.videha.co.in www.videha.com विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका Videha Ist Maithili Fortnightly ejournal  विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका 'विदेह' १०७ म अंक ०१ जून २०१२ (वर्ष ५ मास ५४ अंक १०७) मानुषीमिह संस्कृताम् ISSN 2229-547X VIDEHA वि दे ह विदेह Videha বিদেহ www.videha.co.in www.videha.com विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका Videha Ist Maithili Fortnightly e Magazine  विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई 'विदेह' १०७ म अंक ०१ जून २०१२ (वर्ष ५ मास ५४ अंक १०७) मानुषीमिह संस्कृताम् ISSN 2229-547X VIDEHA

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