VIDEHA — Issue 108 / अंक १०८

Publication: VIDEHA · Issue: 108
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410 411 ISSN 2229-547X VIDEHA 'विदेह' १०८ म अंक १५ जून २०१२ (वर्ष ५ मास ५४ अंक १०८) वि  दे  ह विदेह Videha বিদেহ http://www.videha.co.in  विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका Videha Ist Maithili Fortnightly ejournal  नव अंक देखबाक लेल पृष्ठ सभकेँ रिफ्रेश कए देखू। Always refresh the pages for viewing new issue of VIDEHA. Read in your own script Roman(Eng)Gujarati Bangla Oriya Gurmukhi Telugu Tamil Kannada Malayalam Hindi ऐ अंकमे अछि:- १. संपादकीय संदेश २. गद्य २.१.जगदीश प्रसाद मण्‍डल-कथा २.२.१.सुजीत कुमार झा-कथा २.सत्यनारायण झा २.३.राजदेव मण्‍डलक उपन्‍यास- हमर टोल २.४.जगदानन्द झा 'मनु' २.५.अतुलेश्वर- सोचब आवश्यक जे...... २.६.१.डॉ. इन्‍दुधर झा-दू-पत्र : एक वि‍श्लेषण २.डॉ॰ शशिधर कुमर “विदेह”- पोथी समीक्षा - अम्बरा २.७.दुर्गानन्‍द मण्‍डल- टैगोर साहि‍त्‍य पुरस्‍कारक बहन्ने २.८.चंदन कुमार झा १. बिहनि-कथा - ठकबुद्धि२.आलेख-भीड़तंत्र बनाम् भ्रष्टतंत्र ३. पद्य ३.१.जगदीश प्रसाद मण्‍डल ३.२.डॉ॰ शशिधर कुमर “विदेह” ३.३.१.जगदीश चन्द्र ठाकुर अनिल  २.मुन्नी कामत ३.४.शि‍वकुमार झा ‘टि‍ल्‍लू’-मि‍थि‍ला-पुत्र ३.५.१.किशन कारीगर२.नारायण झा-सम्‍मान३.श्यामल सुमन ३.६.चंदन कुमार झा ३.७.जगदानन्द झा 'मनु' ३.८.सन्तोष कुमार मिश्र- इतिहासहिन इतिहास ४. मिथिला कला-संगीत१.वनीता कुमारी ३.राजनाथ मिश्र (चित्रमय मिथिला) ४. उमेश मण्डल (मिथिलाक वनस्पति/ मिथिलाक जीव-जन्तु/ मिथिलाक जिनगी) बालानां कृते-डॉ॰ शशिधर कुमर “विदेह” भाषापाक रचना-लेखन -[मानक मैथिली], [विदेहक मैथिली-अंग्रेजी आ अंग्रेजी मैथिली कोष (इंटरनेटपर पहिल बेर सर्च-डिक्शनरी) एम.एस. एस.क्यू.एल. सर्वर आधारित -Based on ms-sql server Maithili-English and English-Maithili Dictionary.] विदेह ई-पत्रिकाक सभटा पुरान अंक ( ब्रेल, तिरहुता आ देवनागरी मे ) पी.डी.एफ. डाउनलोडक लेल नीचाँक लिंकपर उपलब्ध अछि। All the old issues of Videha e journal ( in Braille, Tirhuta and Devanagari versions ) are available for pdf download at the following link. विदेह ई-पत्रिकाक सभटा पुरान अंक ब्रेल, तिरहुता आ देवनागरी रूपमे Videha e journal's all old issues in Braille Tirhuta and Devanagari versions विदेह ई-पत्रिकाक पहिल ५० अंक

विदेह ई-पत्रिकाक ५०म सँ आगाँक अंक विदेह आर.एस.एस.फीड। "विदेह" ई-पत्रिका ई-पत्रसँ प्राप्त करू। अपन मित्रकेँ विदेहक विषयमे सूचित करू। ↑ विदेह आर.एस.एस.फीड एनीमेटरकेँ अपन साइट/ ब्लॉगपर लगाऊ। ब्लॉग "लेआउट" पर "एड गाडजेट" मे "फीड" सेलेक्ट कए "फीड यू.आर.एल." मे http://www.videha.co.in/index.xml टाइप केलासँ सेहो विदेह फीड प्राप्त कए सकैत छी। गूगल रीडरमे पढ़बा लेल http://reader.google.com/ पर जा कऽ Add a  Subscription बटन क्लिक करू आ खाली स्थानमे http://www.videha.co.in/index.xml पेस्ट करू आ Add  बटन दबाउ। Join official Videha facebook group. Join Videha googlegroups विदेह रेडियो:मैथिली कथा-कविता आदिक पहिल पोडकास्ट साइट http://videha123radio.wordpress.com/ Videha Radio मैथिली देवनागरी वा मिथिलाक्षरमे नहि देखि/ लिखि पाबि रहल छी, (cannot see/write Maithili in Devanagari/ Mithilakshara follow links below or contact at ggajendra@videha.com) तँ एहि हेतु नीचाँक लिंक सभ पर जाऊ। संगहि विदेहक स्तंभ मैथिली भाषापाक/ रचना लेखनक नव-पुरान अंक पढ़ू। http://devanaagarii.net/ http://kaulonline.com/uninagari/  (एतए बॉक्समे ऑनलाइन देवनागरी टाइप करू, बॉक्ससँ कॉपी करू आ वर्ड डॉक्युमेन्टमे पेस्ट कए वर्ड फाइलकेँ सेव करू। विशेष जानकारीक लेल ggajendra@videha.com पर सम्पर्क करू।)(Use Firefox 4.0 (from WWW.MOZILLA.COM )/ Opera/ Safari/ Internet Explorer 8.0/ Flock 2.0/ Google Chrome for best view of 'Videha' Maithili e-journal at http://www.videha.co.in/ .) Go to the link below for download of old issues of VIDEHA Maithili e magazine in .pdf format and Maithili Audio/ Video/ Book/ paintings/ photo files. विदेहक पुरान अंक आ ऑडियो/ वीडियो/ पोथी/ चित्रकला/ फोटो सभक फाइल सभ (उच्चारण, बड़ सुख सार आ दूर्वाक्षत मंत्र सहित) डाउनलोड करबाक हेतु नीचाँक लिंक पर जाऊ। VIDEHA ARCHIVE विदेह आर्काइव भारतीय डाक विभाग द्वारा जारी कवि, नाटककार आ धर्मशास्त्री विद्यापतिक स्टाम्प। भारत आ नेपालक माटिमे पसरल मिथिलाक धरती प्राचीन कालहिसँ महान पुरुष ओ महिला लोकनिक कर्मभमि रहल अछि। मिथिलाक महान पुरुष ओ महिला लोकनिक चित्र 'मिथिला रत्न' मे देखू। गौरी-शंकरक पालवंश कालक मूर्त्ति, एहिमे मिथिलाक्षरमे (१२०० वर्ष पूर्वक) अभिलेख अंकित अछि। मिथिलाक भारत आ नेपालक माटिमे पसरल एहि तरहक अन्यान्य प्राचीन आ नव स्थापत्य, चित्र, अभिलेख आ मूर्त्तिकलाक़ हेतु देखू 'मिथिलाक खोज' मिथिला, मैथिल आ मैथिलीसँ सम्बन्धित सूचना, सम्पर्क, अन्वेषण संगहि विदेहक सर्च-इंजन आ न्यूज सर्विस आ मिथिला, मैथिल आ मैथिलीसँ सम्बन्धित वेबसाइट सभक समग्र संकलनक लेल देखू "विदेह सूचना संपर्क अन्वेषण" विदेह जालवृत्तक डिसकसन फोरमपर जाऊ। "मैथिल आर मिथिला" (मैथिलीक सभसँ लोकप्रिय जालवृत्त) पर जाऊ। ऐ बेर मूल पुरस्कार(२०१२) [साहित्य अकादेमी, दिल्ली]क लेल अहाँक नजरिमे कोन मूल मैथिली पोथी उपयुक्त अछि ? Thank you for voting! श्री राजदेव मण्डलक “अम्बरा” (कविता-संग्रह)  12.88% श्री बेचन ठाकुरक “बेटीक अपमान आ छीनरदेवी”(दूटा नाटक)  10.43% श्रीमती आशा मिश्रक “उचाट” (उपन्यास)  6.13% श्रीमती पन्ना झाक “अनुभूति” (कथा संग्रह)  4.91% श्री उदय नारायण सिंह “नचिकेता”क “नो एण्ट्री:मा प्रविश (नाटक)  5.83% श्री सुभाष चन्द्र यादवक “बनैत बिगड़ैत” (कथा-संग्रह)  5.21% श्रीमती वीणा कर्ण- भावनाक अस्थिपंजर (कविता संग्रह)  5.83% श्रीमती शेफालिका वर्माक “किस्त-किस्त जीवन (आत्मकथा)  8.59% श्रीमती विभा रानीक “भाग रौ आ बलचन्दा” (दूटा नाटक)  7.06% श्री महाप्रकाश-संग समय के (कविता संग्रह)  5.52% श्री तारानन्द वियोगी- प्रलय रहस्य (कविता-संग्रह)  5.21% श्री महेन्द्र मलंगियाक “छुतहा घैल” (नाटक)  7.98% श्रीमती नीता झाक “देश-काल” (कथा-संग्रह)  6.13% श्री सियाराम झा "सरस"क थोड़े आगि थोड़े पानि (गजल संग्रह)  7.06% Other:  1.23% ऐ बेर बाल साहित्य पुरस्कार(२०१२) [साहित्य अकादेमी, दिल्ली]क लेल अहाँक नजरिमे कोन मूल मैथिली पोथी उपयुक्त अछि ? (Poll Closed) श्री जगदीश प्रसाद मण्डल जीक “तरेगन”(बाल-प्रेरक कथा संग्रह)  47.3% श्री जीवकांत - खिखिरक बिअरि  27.03% श्री मुरलीधर झाक “पिलपिलहा गाछ  24.32% Other:  1.35% ऐ बेर युवा पुरस्कार(२०१२)[साहित्य अकादेमी, दिल्ली]क लेल अहाँक नजरिमे कोन कोन लेखक उपयुक्त छथि ? श्रीमती ज्योति सुनीत चौधरीक “अर्चिस” (कविता संग्रह)  22.12% श्री विनीत उत्पलक “हम पुछैत छी” (कविता संग्रह)  7.96% श्रीमती कामिनीक “समयसँ सम्वाद करैत”, (कविता संग्रह)  6.19% श्री प्रवीण काश्यपक “विषदन्ती वरमाल कालक रति” (कविता संग्रह)  4.42% श्री आशीष अनचिन्हारक "अनचिन्हार आखर"(गजल संग्रह)  23.89% श्री अरुणाभ सौरभक “एतबे टा नहि” (कविता संग्रह)  6.19% श्री दिलीप कुमार झा "लूटन"क जगले रहबै (कविता संग्रह)  7.96% श्री आदि यायावरक “भोथर पेंसिलसँ लिखल” (कथा संग्रह)  5.31% श्री उमेश मण्डलक “निश्तुकी” (कविता संग्रह)  14.16% Other:  1.77% ऐ बेर अनुवाद पुरस्कार (२०१३) [साहित्य अकादेमी, दिल्ली]क लेल अहाँक नजरिमे के उपयुक्त छथि? Thank you for voting! श्री नरेश कुमार विकल "ययाति" (मराठी उपन्यास श्री विष्णु सखाराम खाण्डेकर)  33.7% श्री महेन्द्र नारायण राम "कार्मेलीन" (कोंकणी उपन्यास श्री दामोदर मावजो)  13.04% श्री देवेन्द्र झा "अनुभव"(बांग्ला उपन्यास श्री दिव्येन्दु पालित)  11.96% श्रीमती मेनका मल्लिक "देश आ अन्य कविता सभ" (नेपालीक अनुवाद मूल- रेमिका थापा)  15.22% श्री कृष्ण कुमार कश्यप आ श्रीमती शशिबाला- मैथिली गीतगोविन्द ( जयदेव संस्कृत)  13.04% श्री रामनारायण सिंह "मलाहिन" (श्री तकषी शिवशंकर पिल्लैक मलयाली उपन्यास)  11.96% Other:  1.09% फेलो पुरस्कार-समग्र योगदान २०१२-१३ : समानान्तर साहित्य अकादेमी, दिल्ली Thank you for voting! श्री राजनन्दन लाल दास  54.05% श्री डॉ. अमरेन्द्र  25.68% श्री चन्द्रभानु सिंह  18.92% Other:  1.35% 1.संपादकीय १ १ विदेह भाषा सम्मान २०१२-१३ (वैकल्पिक साहित्य अकादेमी पुरस्कार रूपेँ प्रसिद्ध) - बाल साहित्य लेल विदेह सम्मान २०१२- श्री जगदीश प्रसाद मण्डल जी केँ हुनकर बाल-प्रेरक विहनि कथा संग्रह "तरेगन" लेल ई पुरस्कार देल जा रहल अछि। ई पुरस्कार विदेह नाट्य उत्सव २०१३ क समारोहमे देल जाएत। “तरेगन” केँ सभसँ बेशी वोट भेटलै। तीनटा पोथी १.जगदीश प्रसाद मण्डलक तरेगन, २. जीवकान्तक “खिखिरक बीअरि” आ ३.मुरलीधर झा क “पिलपिलहा गाछ” केँ विदेह www.videha.co.in  पर भऽ रहल ऑनलाइन वोटिंगमे राखल गेल छल। विशेषज्ञक मतानुसार “पिलपिलहा गाछ”मे बहुत रास कथा अछि जकरा बाल कथा नै कहल जा सकैए, तइ दुआरे ऐ पोथीकेँ लिस्टसँ हटा देल गेल कारण ई पुरस्कार बाल साहित्य लेल अछि, ओनाहितो ऐ पोथीकेँ सभसँ कम वोट भेटल रहै। ऐ पोथी सभक अतिरिक्त आन पोथी सभपर विचार नै कएल गेल कारण ओ सभ पोथीक आकारक नै वरन् बुकलेटक आकारक छल।

श्री जगदीश प्रसाद मण्डल (जन्म १९४७- ) मात्र मैथिलीमे लिखै छथि आ ओ ढेर रास विहनि कथा, लघु कथा, दीर्घ कथा, उपन्यास, कविता आ नाटक लिखने छ्हथि। हुनका मैथिलीक सर्वश्रेष्ठ भूत आ वर्तमानक लेखकक रूपमे जानल जाइत अछि। हुनका “गामक जिनगी” (लघुकथा संग्रह) लेल विदेह समानान्तर साहित्य अकादेमी पुरस्कार २०११ आ टैगोर साहित्य पुरस्कार २०११ सेहो देल गेल अछि।

तरेगन (२०१०) जगदीश प्रसाद मण्डल जी लिखित बाल-प्रेरक विहनि कथा संग्रह थिक। श्री जगदीश प्रसाद मण्डल जी केँ बाल सहित्य २०१२ लेल विदेह सम्मान प्राप्त करबा लेल बधाइ। समानान्तर साहित्य अकादेमी पुरस्कार २०१२-१३ विदेह सम्मान २०१२- बाल साहित्य लेल (वैकल्पिक साहित्य अकादेमी पुरस्कार रूपमे प्रसिद्ध) श्री जगदीश प्रसाद मण्डल केँ तरेगन (२०१०) - बाल-प्रेरक विहनि कथा संग्रह लेल विदेह मूल साहित्य पुरस्कार २०१२, विदेह युवा पुरस्कार २०१२ आ विदेह अनुवाद पुरस्कार २०१३(वैकल्पिक साहित्य अकादेमी पुरस्कार रूपमे प्रसिद्ध) केर घोषणा शीघ्र कएल जाएत। २ प्राकृत आ पालि:  प्राकृतसँ वैदिक संस्कृत बहार भेल आकि वैदिक संस्कृतसँ प्राकृत? वेदमे नाराशंसी नाम्ना जन आख्यान यएह सिद्धकरैत अछि जे दुनू समानान्तर रूपेँ बहुत दिन धरि चलल। ई समानान्तर परम्परा दुनूकेँ प्रभावित केलक। आब ऋगवेद देखू- ओतए दुर्लभ लेल- दूलभ, (ऋगवेद ४.९.८) प्रयोग की सिद्ध करैत अछि? अथर्ववेदमे पश्चात् लेल पश्चा (अथर्ववेद १०.४.१०) की सिद्ध करैत अछि? गोपथ ब्राह्मणमे प्रतिसन्धाय लेल प्रतिसंहाय की सिद्द करैत अछि? (गोपथ ब्राह्मण २.४)। आ वैदिक आ लौकिक संस्कृतकेँ ओइ कालमेे संस्कृत नै वरन क्रमसँ छन्दस (वैदिक संस्कृतकेँ यास्क आ पाणिनी छन्दस कहै छथि) आ भाषा (लौकिक संस्कृतकेँ पाणिनी भाषा कहै छथि) कहल जाइ छल। आ जकरा आइ प्राकृत कहै छिऐ से पालिक बाद ओइ रूपमे बुझल गेल (साहित्य लेखन सम्बन्धमे)। भरतक नाट्यशास्त्रमे ७ टा आ वररुचि ४ टा प्राकृतक चर्चा करै छथि। ओना तँ महावीरक वचन अर्ध-मागधी प्राकृत आ बुद्धक वचन मागधी-प्राकृतमे देल गेल मुदा ई दुनू मूलतः जनभाषा रहए।  मुदा जखन विभिन्न क्षेत्रक लोक जुमलाह तँ बुद्ध सभकेँ अपन क्षेत्रक भाषामे बुद्धवचन सिखबा लेल कहलन्हि: अनुजानामि भिक्खवे, सकायनिरुत्तियाबुद्धवचनं परियापुणितं- माने भिक्षु लोकनि, अपन-अपन भाषामे बुद्धवचन सिखबाक अनुमति दै छी। आ बुद्धवचनमे प्रधान तत्व जनभाषा मागधीक रहल मुदा आन आन भाषाक तत्व सेहो फेंटाएल; आ से भाषा पालि भऽ गेल। पालिमे: “ऋ”, “लृ”, “ऐ”, “औ” आ “अः” नै होइए आ “अं” स्वर नै व्यंजन होइए। तालव्य श आ मूर्धन्य ष सेहो नै होइए मात्र दन्त स होइए। संस्कृतक “ळ” व्यंजन होइए। संस्कृतक संयुक्त व्यंजन “क्ष”, “त्र” आ “ज्ञ” नै होइए। “ऋ” बदलि कऽ “अ”, “इ”, “अ,इ”, “इ,उ” भऽ जाइए। “वृ” बदलि कऽ “रु” भऽ जाइए। “लृ” बदलि कऽ “उ”भऽ जाइए। “ऐ” बदलि कऽ “इ” वा “ए” भऽ जाइए। “औ” बदलि कऽ “उ” आ “ओ” भऽ जाइए। संस्कृतक ह्रस्वक दीर्घ भेनाइ: सिंहः= सीहो संस्कृतक दीर्घक ह्रस्व भेनाइ: मुनीन्द्रः= मुनिन्दो निकटकस्वर: निषण्णः= निसिन्नो बलाघात: मध्यमः= मज्झिमो प्रसार: जयति=जेति स्वरलोप: इति= ति पालिमे ड आ ढ सेहो नै होइत अछि। तालव्य श आ मूर्धन्य ष लेल “स” वा “छ” प्रयुक्त होइए; ड लेल”ळ” आ ढ लेल “ल्ह” प्रयोग होइए। क बदलैए “य” मे: जेना लौकिकः= लोकियो वा “व” मे जेना शुकः= सुवो आगाँ-पाछाँ सेहो होइए: जेना मशकः=मकसोः, करेणुः=कणेरु कवर्ग चवर्गमे बदलैए: कुन्दः=चुन्दो तवर्ग टवर्गमे बदलैए: प्रथमः=पठमो “ख” उष्मीकृत भऽ “ह”मे बदलैए: प्रखरः= पहरो “क” घोषीकृत भऽ “ग” भऽ जाइए: मूकः=मूगो “ग” अघोषीकृत भऽ “क” बनि जाइए: तडागम् = तळाकं “झ” अल्पप्राणीकृत भऽ“ज” बनि जाइए: झल्लिका = जल्लिका “प” महाप्राणीकृत भऽ “फ” बनि जाइए: परश्ः= फरसु व्यञ्जनक लोप सेहो होइए: पविसिष्यामि= पविस्सामि दुर्बल संयुक्त व्यंजनक लोप: क्षत्रियः= खत्तियो ध्वजः= धजो आब सरलताक संधान देखो” गर्हा= गरहा; रत्नम् = रतनं पालिमे तीनटा सन्धि अछि: स्वर, व्यंजन आ अनुस्वार (निग्गहीत) सन्धि। स्वर सन्धि: स्वरक बाद स्वरमे पूर्ववर्ती/ परवर्ती स्वरक लोप वा ककरो लोप नै होइत अछि। व्यंजन सन्धि: ह्रस्व वा दीर्घ स्वरक बाद व्यंजन एलापर ओ स्वरक्रमसँ दीर्घ आ ह्रस्व भऽ जाइए। निग्गहीत सन्धि: अनुस्वार (निग्गहेत)क कतौ आगमन तँ कतौ लोप भऽ जाइए। जेना- त+खणे= तंखणे ;आ सं+रागो= सारागो पालिमे दुइयेटा वचन होइत अछि- एकवचन आ बहुवचन; आ सात टा विभक्ति: पठमा, दुतिया, ततिया, चतुत्थी,पञ्चमी, छट्ठी, सत्तमी, आलपन। ५०० सँ ८०० धरि धातु नौ गणमे आठ लकार (आशीर्लिङ आ लुट् लकार नै होइत अछि) होइत अछि।  पालिमे समास संस्कृत सन होइत अछि। प्राकृतमे: ओना मूल बात यएह अछि जे सभ प्राकृत शब्दक संस्कृत रूप नै अछि। साहित्यिक प्राकृतक कएक प्रकार होइत अछि। पैशाची प्राकृतमे “ट” लेल “त” आ “ल” लेल”ळ” अर्धमागधी प्राकृतमे मध्यक स्वतंत्र “क” बदलि जाइए “ग”, “त” वा “य” मे। दू टा स्वरक बीच “प” बदलि जाइए “व” मे। शौरसेनी प्राकृतमे दू टा स्वरक बीचक स्वतंत्र “त” बदलि जाइए “द” मे आ “थ” बदलि जाइए “ह” वा ध” मे।  मागधी प्राकृतमे “र” क स्थानपर “ल”, “य” केर स्थानपर “य्य” वा “ज्ज”, “स” आ “ष” क स्थानपर “श” क प्रयोग होइत अछि। प्राकृत मे ह्रस्व आ दीर्घ “ऋ”, “लृ”, “ऐ” आ “औ” नै होइत अछि। न केर बदला “ण” होइत अछि। ऋ बदलि जाइए: अ, आ, ई, उ, रि  लृ बदलि जाइए: इलि ऐ बदलि जाइए: ए औ बदलि जाइए: उ  दू स्वरक बीच क, ग, च, ज, त, द, य, व केर लोप होइत अछि जेना: लोक=लोअ, लावण्य= लाअण्ण ख परिवर्तित भऽ जाइए ह मे: शाखा= शाहा प्रारम्भक य भऽ जाइए ज, जेना: यम=जम श आ ष भऽ जाइए स; क्ष भऽ जाइए ख वा छ वा झ; ज्ञ भऽ जाइए ण; त्व भऽ जाइए च; थ्व भऽ जाइए छ, द्व भऽ जाइए ज; ध्व भऽ जाइए झ। सन्धि संस्कृत सन अछि। वचन दू- एकवचन आ बहुवचन, विभक्ति सात। संस्कृत जेकाँ धातु दस गण मे रहैत अछि, तुदादिगणक रूपक लोप भऽ जाइत अछि । भूत आ भविष्य मे एक्के-एक्के टा रूप होइत अछि। प्राकृतमे समास संस्कृत सन होइत अछि। ३ साहित्य अकादेमीक टैगोर लिटरेचर अवार्ड २०११ मैथिली लेल श्री जगदीश प्रसाद मण्डल केँ हुनकर लघुकथा संग्रह "गामक जिनगी" लेल देल गेल। कार्यक्रम कोच्चिमे १२ जून २०१२केँ भेल। मैथिली लेल विवादक अन्तक कोनो सम्भावना नै देखबामे आबि रहल अछि। ऐ पुरस्कारक ग्राउण्ड लिस्ट बनेबा लेल एकटा तथाकथित साहित्यकारकेँ चुनल गेल जे प्राप्त सूचनाक अनुसार जातिक आ संकीर्णताक आधारपर पोथीक नाम देलन्हि जाइमे नहिये नचिकेताक पोथी रहए, नहिये सुभाष चन्द्र यादवक आ नहिये जगदीश प्रसाद मण्डलक; संगहि ई ग्राउण्डलिस्ट बनौनिहार तथाकथित साहित्यकार विदेहक सहायक सम्पादक मुन्नाजीकेँ कहलन्हि जे जगदीश प्रसाद मण्डलकेँ ऐ जिनगीमे टैगोर साहित्य पुरस्कार नै देल जेतन्हि!। रेफरी जखन ७ टा पोथीक नाम पठेलन्हि तखन ओइमे चन्द्रनाथ मिश्र "अमर"क अतीत मंथन सेहो रहए जखन कि ओ पोथी निर्धारित अवधि २००७-२००९ मे छपले नै अछि, तँ की बिनु देखने पोथी अनुशंसित कएल गेल? ऐ तरहक ग्राउण्ड लिस्ट बनेनिहार आ बिनु पढ़ने पोथी अनुशंसित केनिहार रेफरीकेँ साहित्य अकादेमी चिन्हित करए, आ नाम सार्वजनिक कऽ स्थायी रूपसँ प्रतिबन्धित करए, से आग्रह; तखने मैथिलीक प्रतिष्ठा बाँचल रहि सकत। एतए ईहो तथ्य अछि जे साहित्य अकादेमीक मैथिली विभागक संयोजक श्री विद्यानाथ झा विदित अखन धरि ने पुरस्कार भेटबाक सूचने आ ने पुरस्कार लेल बधाइये श्री जगदीश प्रसाद मण्डलजी केँ देलन्हि अछि जखनकि मण्डल जी पुरस्कार लऽ कऽ घुरि कऽ आबियो गेल छथि; संगहि टैगोर साहित्य पुरस्कार मैथिली लेल पहिल बेर श्री जगदीश प्रसाद मण्डल जीकेँ देल जएबा सम्बन्धमे दरभंगा आकाशवाणी कोनो प्रकारक सूचना प्रसारित नै केलक आ दरभंगा, मधुबनी आदिक हिन्दी समाचार-पत्र सेहो ऐ सम्बन्धमे कोनो समाचार प्रकाशित नै केलक जखनकि देशक सभ राष्ट्रीय अंग्रेजी पत्र ( http://esamaad.blogspot.in/2012/06/tagore-literature-awards-national-media.html ) एकर सूचना बिनु कोनो अपवादक प्रकाशित केलक। साहित्य अकादेमीक मैथिली विभागक, आकाशवाणी दरभंगाक आ दरभंगा-मधुबनीक हिन्दी समाचार पत्रक पत्रकार लोकनिक संकीर्ण जातिवादी चेहरा नीक जेकाँ सोझाँ आबि गेल। मुदा ई तँ मात्र प्रारम्भ अछि। साहित्य अकादेमीक मैथिली विभागक असली चेहरा तखन सोझाँ आओत जखन ऐ बर्खक मूल साहित्य अकादेमी पुरस्कारक घोषणा हएत। श्री जगदीश प्रसाद मण्डल जीक "गामक जिनगी" मैथिली साहित्यक इतिहासक सर्वश्रेष्ठ लघु कथा संग्रह अछि। जगदीश प्रसाद मण्डल जीकेँ बधाइ। सूचना (स्रोत समदिया): टैगोर साहित्य पुरस्कार दक्षिण कोरियाक एम्बैसी (स्पॉन्सर सैमसंग इण्डिया लिमिटेड) क आग्रहपर साहित्य अकादेमी द्वारा शुरू कएल गेल अछि। टैगोर साहित्य पुरस्कार गुरुदेव रवीन्द्र नाथ ठाकुरक १५०म जयन्तीक उपलक्ष्यमे शुरू भेल छल। सभ साल ८ टा भाषा आ तीन सालमे साहित्य अकादेमी द्वारा मान्यता प्राप्त सभटा २४ भाषाकेँ ऐमे पुरस्कृत कएल जाइत अछि। मैथिली लेल ई पुरस्कार पहिल बेर देल जा रहल अछि। गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुरक १५०म जयन्तीक उपलक्ष्यमे साहित्य अकादेमी आ सैमसंग इडिया (सैमसंग होप प्रोजेक्ट) द्वारा २००९ ई. मे स्थापित कएल गेल छल टैगोर साहित्य पुरस्कार। २४ भाषाक श्रेष्ठ पोथीकेँ तीन सालमे पुरस्कार (सभ साल आठ-आठ भाषाक सर्वश्रेष्ठ पोथीकेँ एक सालमे पुरस्कार) देल जाएत। पुरस्कारमे प्रत्येककेँ ९१ हजार टाका आ प्रशस्ति-पत्र देल जाइत अछि। चारिम साल पहिल सालक आठ भाषाक समूहक फेरसँ बेर आएत। टैगोर जयन्तीक लगाति अवसरपर ई पुरस्कार देल जाइत अछि।

टैगोर साहित्य पुरस्कार २००९ बांग्ला, गुजराती, हिन्दी, कन्नड, काश्मीरी, पंजाबी, तेलुगु आ बोडो भाषामे २००५ सँ २००७ मध्य प्रकाशित पोथीपर देल गेल। -बांग्ला (आलोक सरकार, अपापभूमि, कविता) -गुजराती ( भगवान दास पटेल, मारी लोकयात्रा) -हिन्दी (राजी सेठ, गमे हयात ने मारा, कथा संग्रह) -कन्नड (चन्द्रशेखर कांबर, शिकारा सूर्य, उपन्यास) -काश्मीरी (नसीम सफाइ, ना थसे ना आकास, कविता) -पंजाबी (जसवन्त सिंह कँवल, पुण्य दा चानन, आत्मकथा) -तेलुगु (कोवेला सुप्रसन्नाचार्य, अंतरंगम, निबन्ध) -बोडो (ब्रजेन्द्र कुमार ब्रह्मा, रैथाइ हाला, निबन्ध)

टैगोर साहित्य पुरस्कार २०१० असमी, डोगरी, मराठी, ओड़िया, राजस्थानी, संथाली, तमिल आ उर्दू भाषामे २००६ सँ २००८ मध्य प्रकाशित पोथीपर देल गेल।

-असमी (देवव्रत दास, निर्वाचित गल्प) -डोगरी (संतोष खजूरिया, बडलोनदियन बहारां) -मराठी (आर. जी. जाधव, निवादक समीक्षा) -ओड़िया (ब्रजनाथ रथ, सामान्य असामान्य) -राजस्थानी (विजय दान देथा, बातां री फुलवारी) -संथाली (सोमाइ किस्कू, नमालिया) -तमिल (एस. रामकृष्णन, यामम) -उर्दू (चन्दर भान खयाल, सुबह-ए-मश्रिक-की अजान)

टैगोर साहित्य पुरस्कार २०११ मैथिली, अंग्रेजी, कोंकणी, मलयालम, मणीपुरी, नेपाली आ सिंधी लेल २००७ सँ २००९ मध्य प्रकाशित पोथीपर देल गेल। संस्कृत लेल पुरस्कार नै देल जा सकल। -मैथिली (जगदीश प्रसाद मण्डल, "गामक जिनगी") -अंग्रेजी (अमिताव घोष, "सी ऑफ पॉपीज") -कोंकणी (शीला कोलाम्बकर, "गीरा") -मलयालम (अकितम अचुतम नम्बूदरी, "अंतिमहक्कलम") -मणीपुरी (एन. कुंजामोहन सिंह, "एना केंगे केनबा नट्टे") -नेपाली (इन्द्रमणि दरनाल, "कृष्णा-कृष्णा") -संस्कृत- -सिंधी (अर्जुन हसीद, "ना इएन ना") गजेन्द्र ठाकुर ggajendra@videha.com http://www.maithililekhaksangh.com/2010/07/blog-post_3709.html २.गद्य २.१.जगदीश प्रसाद मण्‍डल-कथा २.२.१.सुजीत कुमार झा-कथा २.सत्यनारायण झा २.३.राजदेव मण्‍डलक उपन्‍यास- हमर टोल २.४.जगदानन्द झा 'मनु' २.५.अतुलेश्वर- सोचब आवश्यक जे...... २.६.१.डॉ. इन्‍दुधर झा-दू-पत्र : एक वि‍श्लेषण २.डॉ॰ शशिधर कुमर “विदेह”- पोथी समीक्षा - अम्बरा २.७.दुर्गानन्‍द मण्‍डल- टैगोर साहि‍त्‍य पुरस्‍कारक बहन्ने २.८.चंदन कुमार झा १. बिहनि-कथा - ठकबुद्धि२.आलेख-भीड़तंत्र बनाम् भ्रष्टतंत्र जगदीश प्रसाद मण्‍डल जगदीश प्रसाद मण्‍डलक पाँचटा कथा- लफक साग, न्‍याय चाही, पनि‍याहा दूध, कर्ज, ति‍लकोरक तरूआ आ फाँसी लफक साग गाममे खेतीक चर्च उठि‍ते लालकाकीक लफक सागक चर्च उठि‍‍ये जाइत अछि‍। ओना चरचोक क्रम अछि‍, मुदा लालकाकीक अलग पहि‍चान रहने उपजासँ उठैत चर्चक संग व्‍यक्‍ति‍त्‍वक चर्च उठि‍ते रामायण-महाभारतक प्रमुख पद्यक चर्च जकाँ हुनको होइते छन्‍हि‍‍। चरचोक भि‍न्न-भि‍न्न क्रममे एना होइत जे कतौ-कतौ खाली गहुमेक चर्च चलैत तँ कतौ अगबे धानक। कतौ खइहनक संग दलहनोक चर्च चलैत तँ कतौ खइहन, दलि‍हन, तेलहनोक उठि‍ जाइत। कतौ अन्नक संग तीमनो-तरकारीक उठैत तँ कतौ तीमन-तरकारीक संग फलो-फलहरि‍क। कतौ एहनो होइत जे खेतीक संग माछो आ दूधोक चर्च उठि‍ जाइत। भनडाराक भजनमे जहि‍ना कतौ साखीसँ भजन शुरू होइत तँ कतौ भजनक बीच-बीचमे, तँ कतौ साखि‍येसँ वि‍सर्जनो होइत। तहि‍ना लालकाकीक सेहो छन्‍हि‍‍। लफ सागक संग लालकाकीक सि‍नेह खाली सि‍नेहे नै जि‍नगी सेहो ओहन छन्‍हि‍ जेहन वैवाहि‍क बंधन होइत। जहि‍ना कनाह-खोरसँ लऽ कऽ दि‍बड़ा भीड़मे बसैबलाक संग एकसँ एक देवसुनरि‍ अपन जि‍नगी समर्पित कऽ अपन कुल-खनदानक संग समाजक पाग मुरेठा सम्‍हारि‍ रखैत तहि‍ना लालकािकयो छथि‍ये। जइ दि‍न लालकाकी सासुर एली तही दि‍नसँ लफ साग सेहो संगे-संग एलनि‍। दुरागमन भेलापर जखन लालकाकी सासुर वि‍दा हुअए लगली तँ सतरि‍या धान खोछि‍मे दइले जे राखल रहनि‍ तहीमे लफ सागक बीआ छि‍पा कऽ ओही धानमे ई सोचि‍ मि‍ला लेलनि‍ जे जँ कागजक पुड़ि‍यामे वा लत्तामे बान्‍हि‍ राखब तँ खोछि‍ भरनि‍हारि‍ देखि‍ये जेतीह, जखने देखती तँ खोलबे करती। जखने खोलती आ सागक बीआ देखती तँ हो-ने-हो डाइन-जोगि‍नक फसाद ने कहीं उठि‍ जाए। नि‍छौहैमे कनी समयै ने लगत मुदा कि‍यो बूझत तँ नै। सएह केलनि‍। सागक बीआ नैहरसँ सासुर अनैक कारणो रहनि‍। जहि‍ना हजारोक भीड़मे प्रेमीक नजरि‍ प्रेमि‍कापर रहैत तहि‍ना लालकाकीक प्रेमी साग तँए संग नै छोड़ए चाहथि‍। ओना मनमे ईहो होइत रहनि‍ जे अनेरे कि‍अए सागेक बीआ लऽ जाएब, जइ गाम जाएब तोहू गामे तँ लफ साग होइते हेतै, मुदा मन नै मानलकनि‍। मनोक मानब तँ साधारण नहि‍ये अछि‍। भलहिं साधारणो बात वा काज कहि‍ मना लेब, ई अलग अछि‍। लालकाकीक मन ऐ दुआरे नै मानलकनि‍ जे गाम-गाममे जहि‍ना धानक खेती होइतो एकरंगाहो धान होइत आ नहि‍यो होइत। तहि‍ना ने सागोक अछि‍, कतौ मतौना, ढेकी साग होइत तँ कतौ पालक-ठढ़ि‍या। कतौ ललका ठढ़ि‍या तँ कतौ हरि‍अरका। कतौ उजड़ा भुल्‍ला होइत तँ कतौ सतरंगा सेहो होइत। तँए जहि‍ना गाम-गामक पानि‍, तहि‍ना वाणि‍, तहि‍ना खेती तहि‍ना बाड़ी तहि‍ना झाड़ी, तहि‍ना फुलवाड़ी तहि‍ना ने आनो-आन होइत। तँए कोनो जरूरी नै अछि‍ जे लफ साग ओहू गाममे होइते हेतै। जँ नै होइत हेतै तँ लल्‍लो-वि‍हल्‍लो भऽ जाएब। लइये जाइमे की लागत बूझब जे धाने अछि‍। यएह सब सोचि‍ लालकाकी जहि‍ना तीर्थस्‍थानक यात्री पनपीबा बर्तनक संग सि‍दहो-समर संगे लऽ चलैत तहि‍ना लफ सागक बीआ सेहो लऽ लेलनि‍। लफ सागक गुण लालकाकीकेँ बूझल रहनि‍। कि‍एक तँ नैहरोमे बेसी काल खेबो करथि‍ आ उपजेबो करथि‍। खेति‍यो हल्‍लुक। जखन सागक गाछ जुआ जाइत तखन ओइमे फड़ल बीआ सेहो रसे-रसे पाकि‍ जाइत। जहि‍ना बुढ़-बुढ़ानुसक वि‍चार बि‍नु पुछनौं फूटि‍-फूटि‍ झड़ए लगैत तहि‍ना सागोक बीआ गाछक आशा छोड़ि‍ खापड़ि‍क लाबा जकाँ चनकि‍-चनकि‍ बहरा जाइत। कतबो पानि‍-पाथर बरसौ आकि‍ ठनका खसौ पृथ्‍वीक कोरामे छअ मसि‍या बच्‍चा जकाँ माइक छातीमे सूति‍ रहैत तहि‍ना सागोक बीआ सूति‍ रहैत। मुदा अचेतन रहि‍तो चेतन भऽ ओइ दि‍न फुड़फुड़ा कऽ उठि‍ जाइत जइ दि‍न उठैक समए होइत। तँए कि‍यो बीआ जोगा समैपर खेतकेँ तामि‍-कोरि‍ बागु करैत तँ नहि‍यो बागु केने ओइ खेतमे अपनो उगि‍ जाइत जइमे पछि‍ला साल भेल रहैक। लफक सागमे लालकाकी जहनि‍क कारण छन्‍हि‍ जे ओ जनै छथि‍ जे जइठाम लोक नून-भात आकि‍ नून-रोटी खा जीवन बसर करैत अछि‍ तइठाम जँ चारि‍टा लफ सागक पत्ताकेँ एकलोटा पानि‍मे कनी नून दऽ मेरचाइक फाेरनसँ फोरना देबै तँ तेहेन सि‍नेही भऽ भात-रोटीमे सटि‍ ओहन गति‍ पकड़ि‍ लैत जेना खाली सड़कमे बाहन धड़ैत। चारि‍ये पातक मेजनक संग अाधा कि‍लो मीटर ससारि‍ लि‍अ। जि‍नगी संग पुरनि‍हार साग अपन कथा-बेथा ललकारी छोड़ि‍ केकरा लग बाजत। जे ओकरा दि‍स घुमि‍यो कऽ ने तकैए तेकरा कहि‍ये कऽ की हेतै। खेतक आड़ि‍पर पहुँचते भुखाएल नेरू-पर्ड़ू जकाँ लालोकाकीकेँ साग कहैत- “काकी, आइ नइ हजारो बर्खसँ गेनहारी बथुआ-नोनी इत्‍यादि‍ संगे-संग चलैत एलौं कि‍यो हवाइ जहाजपर भोज-भात करैए मुदा हमरापर कि‍अए ने ककरो नजरि‍ पड़लै। जँ नजरि‍ पड़ल रहि‍तै तँ एहि‍ना धरती धेने रहि‍तौं।” सागक दुखनामा सूनि‍ लालकाकी वि‍ह्वल भऽ कहलखि‍न- “बहीन, कि‍यो अपना भागे-करमे जीबै-मरैए। तइले अनेरे कि‍अए दुख करै छह। जइ दि‍न उपटि‍ जेबह तइ दि‍न बुझि‍हक जे या तँ ई धरती नै रहए दि‍अए चाहैए वा ई धरती रहै जोकर नइए।” साग बाजल- “लालकाकी, लोक बड़ कुभेला करैए। नै तँ कहू जे सि‍मटीक अांगन-घर बना कऽ रहैए आ हमरो जँ अखारमे कनी माटि‍ छि‍ड़ि‍या सि‍मटीक अंगनोमे आकि‍ छज्‍जि‍योपर लगा देत तँ कि‍ अासीन-काति‍क तक भाँज नउ पुरबै। मुदा आने साग जकाँ जे फुटा देत जे ई गरमीक छी तँ ई जाड़क। भदवारि‍मे साग खेबोक नै चाही से कहू जे ई होइ?” सान्‍त्वना दैत लालकाकी कहलखि‍न- “अइले कि‍अए दुख करै छह, तोहर तँ मान-मरजादा एते छह जे बि‍नु तोरे अपन माइयो-बापक उद्धार नै कऽ सकैए। करह दहक जते कुभेला करतह से करह।” मि‍थि‍लांचलक भोज जहि‍ना अदौसँ आइ धरि‍क भोजनक इति‍हास अपना पेटमे समेटने अछि‍ तहि‍ना गामो ने समेटने अछि‍। एक दि‍स भात दालि‍क संग तरकारी, तइ संग संग पानि‍मे बनल अदौरी, तँ तेलमे बनल बर-बरीक संग, दही-चि‍न्नीक संग वि‍सर्जन होइत। जे भोज्‍यक इति‍हास प्रदर्शित करैत तहि‍ना बाधक बनल रखबारक खोपड़ीक संग बहुमंजि‍ला मकानक बीच आदि‍क मनुखसँ लऽ कऽ सभ्‍य -आधुनि‍क- मनुष्‍य तकक इति‍हासक झलकी सेहो दैत अछि‍। जइ दि‍न लालकाकी सासुर एली तइ दि‍न ओ पनरहे-सोलहे बर्खक रहथि‍। आने-आन जकाँ दुइये बर्खक पछाति‍ पति‍केँ मुइने वि‍धवा भऽ गेली। मुदा दुइये बर्खक अभि‍यन्‍तर लालभौजी, लालकाकी, लालदादीक माला समाज पहि‍रा देलकनि‍। एकोटा संतान नै भेल छलनि‍। जइ दि‍न पति‍ मुइलनि‍ तइ दि‍न एहेन ओझरीमे लालकाकी ओझरा गेली जे भरि‍ पोख कानि‍यो नै सकलीह। ओझरी लगलनि‍ जे जइ समाजमे वैधव्‍य बान्‍ह एते सक्कत अछि‍ जे ता-जि‍नगी वैधव्‍य धारण केने रहैत। तइपर अशुभक उपराग ऊपरसँ। मुदा कि‍ समाज ई भार लइए जे ओकर जि‍नगी इज्‍जतक संग केना चलतै। जे समाज केकरो जीवन नै दऽसकैए कि‍ ओइ समाजकेँ केकरो ओङरी बतबैक अधि‍कार छै? वि‍धवाक संग जे-जे कि‍रदानी समाज करैत आएल अछि‍ आ कइयो रहल अछि‍ कि‍ ओ समाज सामाजि‍क बंधन बनबैक अधि‍कार रखैए? नारी जागरणक लेल ओकर सुरक्षाक पक्का बेवस्‍था सेहो हेबाक चाही जँ से नै तँ ने ओ परि‍वारक संग अपन प्रति‍ष्‍ठा बचा सकैए आ ने बाहर बचा सकैए। पति‍क परोछ भेलापर माइयो-बाप आ सरो-समाज लालकाकीकेँ कतबो हि‍लौलखि‍न-डोलौलखि‍न, मुदा लालकाकी अड़ि‍ गेलखि‍न जे समाजमे हमरा सन बहुतो छथि‍, जहि‍ना हुनका सबहक जि‍नगी कटतनि‍ तहि‍ना हमरो कटत। जते भोग-पारसमे छल तते भोगलौं आ माँ मि‍थि‍लाक फुलवारी छाेड़ि‍ कतौ ने जाएब। जखन अपने हँसुआ, खुरपी कोदारि‍ चलबैक लूरि‍ अछि‍, तखन कतौ रहि‍ जीवन-यापन कऽ सकै छी। अपन मान-मर्यादा अपने नै बि‍गाड़ब। अस्‍सी बर्ख पार केलापर लालकाकीक नजरि‍ ओइ दि‍स गेलनि‍ जे-जे नजरि‍सँ देखने रहथि‍। नजरि‍सँ नजरि‍ मि‍लाएब, टकराएब दुनू होइत तहि‍ना लालकाकीक मनमे सेहो उठलनि‍। एहेन नि‍चेनसँ जि‍नगीमे कहि‍यो बैसबो ने कएल रहथि‍ जे बुझबो करि‍तथि‍ आ सोचबो करि‍तथि‍। जइ ि‍जनगीमे बुधि‍-वि‍चार जँ जि‍नगीक संग नै चलत ओ जि‍नगि‍ये केहेन? गुनधुनमे पड़ल एकटा मन कहलकनि‍- “हमरा सन-सन लोकक लेल जे बेवहार चलि‍ रहल अछि‍ ओकर नि‍मरजना के करत?” दोसर मन उत्तर देलकनि‍- “जे नि‍मरजना करैबला छथि‍ ओ अपने चालि‍ये ओंघराएल छथि‍ तखन अनका कि‍ देखथि‍न। पछि‍म मुहेँक गाड़ी पकड़ि‍ पूब मुहेँ जाए चाहै छथि‍, से केना हेतइ।” मनक घाेंघौज देखि‍ लालकाकी काल्हि‍ये जे ओराहैले बदाम अनने रहथि‍, ओराहैले वि‍दा भेलीह। ~ न्‍याय चाही झुनाएल धान जकाँ पचासी बर्खक शंभुकाकाकेँ ओछाइन छौड़ैसँ पहि‍नहि‍ मनमे उठलनि‍ जे आब तँ चल-चालौए छी से नै तँ जि‍नगीक अपन हि‍साब-कि‍ताब दइये दि‍अनि‍, सएह नीक। नै तँ शासनक कोन बि‍सवास केकरो दोख गारा मढ़ि‍ सजा केकरो भेटै छैक। मुदा सोझामे एते तँ जरूर हएत जे अपन बात अपने रखि‍ सकै छी। तइपर जँ नै मानत तँ हमहूँ नै मानबै। लड़ि‍ मरी कि‍ सड़ि‍, शेषे कि‍ बचल अछि‍। जहि‍ना नमहर काजमे समयो अधि‍क लगैत अछि‍ आ छोट काजमे थोर मुदा काज तँ दुनू कहबैत अछि‍। कि‍यो काहू मगन कि‍यो काहू मगन, मगन तँ सभ अछि‍ये। गंभीर प्रश्नमे ओझराएल शंभुकाका, तँए मन-चि‍त्त-देह एकबट्ट भेल रहनि‍। पत्नी कुमुदनीक मनमे उठलनि‍ जे भरि‍सक सूतले तँ ने रहि‍ जेताह। लगमे पहुँचि‍ छाती डोलबैत बजलीह- “अखन धरि‍ किअए बि‍छान पकड़ने छी?” पत्नीक स्‍वरलहरीमे लहराइत शंभुकाका हलसि‍ बजलाह- “अखन धरि‍ यएह बुझै छलौं जे अपने केलहाक भागी कि‍यो बनैए, मुदा....?” बजैत शंभुकाका ओछाइनपरसँ उठि‍ जहि‍ना उगैत सूर्जक दर्शन लोक दुनू हाथ जोड़ि‍ प्रणाम करैत करैए तहि‍ना दुनू हाथ जोड़ि‍ पत्नी-कुमुदनीक आगूमे ठाढ़ होइत बजलाह- “माफी मंगै छी। गल्‍ती भेल अछि‍ मुदा दोसराक गल्‍ती ऊपर मढ़ल गेल अछि‍।” अकचकाइत कुमुदनी, बि‍नु कि‍छु सोचनहि‍ बाजि‍ उठलीह- “से की, से की, एना कि‍अए भोरे-भोर पाप चढ़बै छी।” “पाप नै चढ़बै छी जि‍नगीक जे घटल-घटना अछि‍, तइ नि‍मि‍त्ते मांगि‍ रहल छी।” “जखन एते कहबे केलौं तखन कि‍अए ने मनो पाड़ि‍ देब। अहाँ तँ बुझि‍ते छि‍ऐ जे बसि‍या भात खेनि‍हारि‍ बि‍सराह होइए मुदा रतुका उगड़ल अन्न फेकि‍ देब नीक हएत।” पतालसँ अबैत बलुआएल पानि‍ जहि‍ना छन-छनाइत पवि‍त्र भऽ अबैत अछि‍ तहि‍ना कुमुदनीक वि‍चार सुनि‍ प्रोफेसर शंभुकाकाकेँ भेलनि‍, बजलाह- “अपना दुनू गोटेक एक जि‍नगी ऐ धरतीपर रहल अछि‍। आकि‍ नै?” “हँ से तँ रहले अछि‍। तँए ने अर्द्धांगि‍नी छी।” “हमर देहक अर्द्धांगि‍नी छी आकि‍ जि‍नगीक?” “ई बात अहाँ बुझेलौं कहि‍या जे पुछै छी।” पत्नीक प्रश्न सुनि‍ प्रोफेसर शंभुकाका सकदम भऽ गेलाह। मुदा लगले मनमे उठलनि‍ जे टटको घटना बसि‍या जाइ छै आ बसि‍यो घटना टटका भऽ जाइ छै। ई ि‍नर्भर करैए कारीगरपर। जेहेन कारीगर रहत तेहेन टटकाकेँ बसि‍या आ बसि‍याकेँ टटका बनबैत रहत। खएर जे होउ। पत्नीकेँ पुछलखि‍न- “अपना दुनू गोटे एकठाम केना भेलि‍ऐ?” “एना अरथा-अरथा कि‍अए पुछै छी। जे कहैक अछि‍ से सोझ डारि‍ये कहूँ। एना जे हरसीकार दीरघीकार लगा-लगा बजै छी से नै बाजू। जेकरा नीक बुझबै तेकरा नीक कहब आ जेकरा अधला बुझबै तेकरा अधला कहब। अहाँ लग जे कनी दबो-उनार भऽ जाएत तँ हारि‍ मानि‍ लेब। सएह ने हएत आकि‍ छाउर-गोबर जकाँ छि‍ट्टामे उठा बाध दऽ आएब।” जहि‍ना पोखरि‍क पवि‍त्र जलमे स्‍नान कऽ पूजाक मूर्ति गढ़ि‍ मंत्र पढ़ैत दान कएल जाइत तहि‍ना शंभुकाका बड़बड़ाए लगलाह- “जखन हम चौबीस बर्खक रही तखन अहाँ चौदह बर्खक छलौं। दस बर्खक अन्‍तर। आइ धरि‍ कहाँ कतौ देखि‍ पेलौं जे पुरुष-नारीक बीच उम्रोक वि‍भाजन भेल। जँ से नै तँ....? जँ एको औरूदे दुनू गोटे जीब तैयो तँ अहाँ दस बर्ख वि‍धबे बनि‍ रहब। ऐ वि‍धवाक सर्जक के? समाजमे कलंकक मोटरी देनि‍हार के? की ई बात झूठ जे जइ घरमे जते कम वस्‍तु रहै छै आगि‍ लगलापर ओतबे कम जरै छै मुदा जइ घरमे अधि‍क वस्‍तु रहै छै, आगि‍ लगलापर जरबो बेसी करै छै। पचास बर्खक तपल-तपाएल जि‍नगीक अन्‍त केना हएत।” दुनू हाथ जोड़ि‍ पत्नीसँ माफी मंगलनि‍। मुदा जहि‍ना बच्‍चाकेँ नव दाँत रहने अधि‍क-सँ-अधि‍क काज लि‍अए चाहैत, नव औजार हाथमे एने अधि‍क-सँ-अधि‍क काजो आ अधि‍क-सँ-अधि‍क समेओ संग मि‍लि‍ बि‍तबए चाहैत तहि‍ना कुमुदनीक सि‍नेह आरो जगलनि‍। बजलीह- “माॅफी-ताॅफी नइ मानब? पति‍ छी तँए पुछै छी। एहन गल्‍ती भेल कि‍अए, से जाबे‍ नै कहब ताबे‍ कि‍छु ने मानब।” पत्नीक प्रश्न सुनि‍ शंभुकाका स्‍तब्‍ध भऽ गेलाह। मन कछमछाए लगलनि‍। सत् बड़ कटु होइत अछि‍। मुदा जँ पत्नि‍यो लग सत्यक उद्घाटन नै कऽ सकब तँ दुनि‍याँमे दोसरठाम कइये कतए सकै छी। शम्‍भुकाका साँप-छुछुनरि‍क स्‍थि‍ति‍मे पड़ि‍ गेलाह। एहेन कोनो वि‍चार मनमे उठबे ने करनि‍ जइसँ मन मानि‍ लइतनि‍ जे ऐसँ पत्नी मानि‍ जेतीह। अल्ल-बल्ल कि‍छु बच्‍चाकेँ कहल जाइ दै, एक तँ सि‍यान कि‍ सि‍यानोक अगि‍ला खाड़ीमे पहुँचल छथि‍ दोसर अर्द्धांगि‍नी सेहो छथि‍। कोनो वि‍चारकेँ बलजोरी थोपि‍ नै सकै छि‍यनि‍, जँ थोपि‍यो देबनि‍ तँ मानि‍ये लेतीह सेहो नै कहल जा सकैए। जेत्ते दबाब दऽ कऽ बजबाक अधि‍कार हमरा अछि‍ तत्ते तँ हुनको छन्‍हि‍ये। जँ कि‍छु नै कहबनि‍ तखन तँ आरो स्‍थि‍ति‍ बि‍गड़ि‍ जाएत। जहि‍ना हुनका मनमे गंेठी जकाँ जन्‍मगाँठ पड़ि‍ जेतनि‍ तहि‍ना तँ अपनो मन नहि‍ये बचत। जँ से नै बचत तँ आँखि‍ उठा देखि‍ केना पेबनि‍। जँ से नै देखि‍ पाएब तँ पति‍ कथीक। ि‍सर्फ रंगे-रभस टा तँ पत्नीक संबंध नै छी। जँ ओतबे मानि‍ बुझबनि‍ तँ पति‍-पत्नीक संबंध बुझब थोड़े हएत। पति‍-पत्नीक संबंध तँ ओ छी, जहि‍ना जनकक एक हाथ हवन-कुंडमे आ दोसर पत्नीक करेजपर रहैत छलनि‍, तहि‍ना मुदा जहि‍ना नव जीवनक दि‍शा वि‍पत्ति‍क अंति‍म अवस्‍थामे भेटैत अछि‍ तहि‍ना शंभुओकाकाकेँ भेटलनि‍। थालमे गड़ल मोती जहि‍ना जहुरी हाथमे देखि‍ते नयन कमलनयन बनि‍ जाइत तहि‍ना कक्कोक नजरि‍केँ भेलनि‍। मन मुस्‍कि‍एलनि‍। पति‍क मुस्‍की देखि‍ कुमुदनी मने-मन नमन केलकनि‍। जि‍ज्ञासु छात्र जकाँ पत्नीक जि‍ज्ञासु नजरि‍केँ देखि‍ प्रो. शंभु कहलखि‍न- “देखू, प्रश्न एकेटा नै घनेरो अछि‍, जँ एक-एक प्रश्नक उत्तरो दि‍अए लगब तँ प्रश्ने छूटि‍ जाएत। जँ प्रश्ने छूटि‍ जाएत तखन उत्तरे केना देब। कि‍छु नै, बुढ़ि‍या फूसि‍।” पति‍क वि‍चार सुनि‍ कुमुदनी अधखि‍ल्‍लू कुमुदनी जकाँ जइ अवस्‍थामे भौंरा फरि‍च्‍छ तँ देखैत मुदा अधखि‍ल्‍लू कपाटसँ नि‍कलि‍ नै पबैत तहि‍ना कुमुदि‍नी असमंजसमे पड़ि‍ गेलीह। पत्नीकेँ असमंजसमे पड़ैत देरी प्रो. शंभुक मनमे उठलनि‍ जे जहि‍ना माटि‍क ढेपा, गोला, चेका जोड़ि‍-जोड़ि‍ पैघसँ पैघ बान्‍ह बान्‍हल जाइए तहि‍ना जँ बान्‍हि‍ दि‍अनि‍ तँ जरूर ठमकि‍ जेतीह। मुदा मन नै मानलकनि‍। पत्नीक बातमे तँ अखन धरि‍ ओझराएल रहलौं। जरूर माए-बापक काज मानल जाएत। मुदा कि‍ हमरे टा परि‍वारमे एना भेल आकि‍ दोसरो-तेसरो परि‍वारमे? जँ एक समाज नै, एक गाम नै अनेक समाज आ अनेक गाममे होइत अछि‍ तँ जरूर दोषक जड़ि‍ कतौ अन्‍तै छै। अन्‍तए कतए छै से कहि‍ देबनि‍, मानती तँ मानती नै आगू कहबनि‍ नेति‍-नेति‍। जहि‍ना उगैत गुज्‍जर, उगैत कलशकेँ कहैत जे दुनू गोटे संगे-संग रहि‍ दुनि‍याँ देखब। तहि‍ना प्रो. शंभु कहलखि‍न- “सुनू, सभ बात सबहक नजरि‍पर सदि‍खन नै रहै छै, भऽ सकैए जे जे बात दस-बीस बर्ख पहि‍ने कहि‍ देबाक चाहै छल, से नै कहलौं। अपनो धि‍यानमे नै रहल। जहि‍ना असगरे धान तौलि‍नि‍हार गनि‍-गनि‍ तौलबो करत आ उठि‍-उठि‍ लि‍खबो करत तँ गि‍नती-गि‍नतीमे झगड़ा हेबे करैत, जे जोरगर रहैत ओ मन रहैत जे अब्‍बल रहैत ओ हरा जाएत। तहि‍ना ने अपनो दुनू गोटेक बीच अछि‍।” “दुनू गोटे” सुनि‍ कुमुदनी कछमछेलीह। पाछू उनटि‍-उनटि‍ देखए लगली। प्रो. शंभु बूझि‍ गेलाह जे शि‍कारीक वाण सटीक बैसल। जहि‍ना बाल-बोधक उनटा-पुनटा काज देख सि‍यानकेँ हँसी-लगैत तहि‍ना प्रोफेसर शंभुकेँ हँसी लगलनि‍। मुदा लगले मनमे उठलनि‍ जे अपनो पछि‍ला कएल काज मन पड़ने तँ से होइए। एकाएक मुँह बन्न भऽ गेलनि‍। आने-आन पुरुख जकाँ अपन पुरुषत्‍व देखबैत प्रो. शंभु बजलाह- “आइ धरि‍, अखन धरि‍ कहि‍यो हमरा मुँहसँ फुटल जे हम न्‍यायालयसँ दण्‍डि‍त भेल जि‍नगी जीब रहल छी। कि‍यो एको दि‍न पुछाड़ि‍यो करए आएल जे केना जीबै छी। समाजमे जाधरि‍ बूढ़-बुढ़ानुसक पूछ नै हएत, ताधरि‍ समाजक पछि‍ला पीढ़ी नागरि‍ पकड़ि‍ वैतरणी पार केना हएत। हँ ई जरूर जे साँपकेँ डोरी नै कही, मुदा वि‍चार तँ हेबाके चाही।” घरमे चौंकल बर्तनक ढनमनी जकाँ कुमुदनी ढनमनाइत बजलीह- “जखन अहाँ दुनि‍याँक नजरि‍मे दण्‍डि‍त छी तखन....?” पत्नीक चि‍न्‍तासँ चि‍न्‍ति‍त भऽ प्रो. शंभु कहलखि‍न- “अखन धरि‍ तँ छि‍पेने रहलौं जे अपन दोख अहाँकेँ कि‍अए दी।” पति‍क बेथासँ बेथि‍त भऽ कुमुदनी बजलीह- “कनी फरि‍च्‍छा कऽ कहू?” प्रो. शंभु- “सेवा-ि‍नवृत्त होइसँ छह मास पहि‍ने प्रि‍ंसि‍पल बनाओल गेलौं। कॉलेजक भार बढ़ल। परीक्षा वि‍भाग सेहो छै। सुननहि‍ हेबे जे कते हो-हल्‍ला भेल। मामला न्‍यायालय चलि‍ गेल। गोल-माल जरूर भेल रहए, जानकारीमे नै रहए। मुदा तैयो जबाबदेहक रूपमे फॅसलौं।” कुमुदनी- “अहाँक कि‍छु दोष नै रहए?” प्रो. शंभु- “एकदम नै।” कुमुदनी- “फैसला केना भेल?” प्रो. शंभु- “सेवा ि‍नवृत्त लग देखि‍ न्‍यायालय दोषी बना छोड़ि‍ देलक।” कुमुदनी- “हुनका सभकेँ?” प्रो. शंभु- “कमो दोखबला बेसी सजा पौलक आ बेसि‍यो दोखबला कम सजा पौलक।” कुमुदनी- “एना कि‍अए भेल?” प्रो. शंभु- “जँ पहि‍ने बुझि‍तौं तँ ऐ भीर जेबो ने करि‍तौं मुदा से नै भेल। जाधरि‍ लि‍खि‍त-मौखि‍क रूपमे बेवस्‍था चलत ताधरि‍ एहि‍ना हएत।” ~ पनि‍याहा दूध आंगन बहारि‍, बाढ़नि‍ धोय पछबरि‍या दावा लगा राखि‍, सुनयना दरबज्‍जा दि‍स तकलनि‍ तँ बूझि‍ पड़लनि‍ जे मास्‍टर सहाएब (पति‍) भरि‍सक सुतले छथि‍ उठा देब उचि‍त हएत मुदा मन ठमकि‍ गेलनि‍। आठमे दि‍न गाम आएल रहथ तँ चारि‍ बजे भोरेसँ हरवि‍र्ड़ो केने रहै छलाह‍ जे घरमे कोढ़ि‍याक बाढ़ि‍ आबि‍ गेल अछि‍, जे काजक बेरमे सूतल रहत ओकरा कहि‍यो भाभन्‍स हेतइ? मुदा आठे िदनक दूरीमे एना कि‍अए देखै छी। फेर मन घूमि‍ कहलकनि‍ उमेरोक दोख होइ छै, ओना सठि‍या तँ गेले हेताह। तत्-मत् करैत सुनयना दरबज्‍जा–आंगनक बीच ठकुआ कऽ ठाढ़ भऽ गेली, ने आगू डेग उठनि‍ आ ने पाछू। ओना जीवानन्‍दक नीन समैयेपर टूटि‍ गेल रहनि‍, एक तँ ओहुना उमेर बढ़ने खूनो पनि‍या लगै छै आ नीनो पतरा जाइ छै। नीन टुटि‍ते जीवानन्‍दक मनमे उठलनि‍ जे उठि‍ये कऽ की करब? काजे कोन अछि‍ जइ पाछू लागब। आँखि‍ बन्न केने सोचैत रहथि‍। जहि‍ना चि‍न्‍तक चि‍न्‍तन अवस्‍थामे नि‍स्‍तेज भऽ जाइत तहि‍ना रहनि‍। ओना आँखि‍यो खुजैक आ बन्न होइक ढेरो कारण अछि‍ मुदा हुनका से नै रहनि‍। मनमे कतेको रंगक वि‍चार टकराइत रहनि‍, तँए अगि‍ला रास्‍ता देखैमे एकदि‍शाह भऽ गेल रहनि‍। आलमारीक कि‍ताब जकाँ रंग-रंगक वि‍षयक एकेठाम सैंतल रहनि‍, असल वि‍चार परि‍वारमे गड़ल रहनि‍। मुदा परि‍वारसँ पहि‍ने जे अपनापर नजरि‍ पड़लनि‍ ततए गड़ि‍ गेलाह। सेवा-नि‍वृत्त भऽ गेलौं, जीवैक उपाय भलहि‍ं जे हुअए मुदा काज तँ हरा गेल। काजे की अछि‍ जइ अनमेनामे समए गुदस करब। जखन काजे हरा गेल तखन जि‍नगी केना चलत। जँ जि‍नगी चलत नै तँ जीवि‍त-मृत्‍युमे अन्‍तरे की भेल? मनमे लधले रहनि‍ आकि‍ दोसर उठि‍ गेलनि जे करबो केकरा ले करब? पैछला (पूर्वज) कि‍यो छथि‍ये नै अगि‍लो उड़ि‍ये गेल। बीचमे अपनाकेँ पाबि‍ मन दहलि‍ गेलनि‍। सेवा-नवृत्ति‍क तँ एक अर्थ ईहो होएत ने जे काज करै जोगर नै रहलौं। फेर मन ओझरा गेलनि‍। अंधेर नगरी चौपट राजा टके सेर भाजी टके सेर खाजाक पइर भऽ गेल। काजो तँ दू रंगक होइत अछि‍, एक शरीरक शक्‍ति‍सँ कएल जाइत अछि‍ दोसर बौद्धि‍क शक्‍ति‍सँ। हम तँ शरीरक शक्‍ति‍सँ नै बौद्धि‍क शक्‍ति‍सँ करैत छलौं तखन कि‍अए नै करैबला रहलौं। आमक आॅठी जहि‍ना कोइलीसँ धीरे-धीरे सक्कत बनि‍ सृजन शक्‍ति‍ प्राप्‍त करैत, से कहाँ भेल? जँ बौद्धि‍क शक्‍ति‍केँ शरीरक शक्‍ति‍क सीमांकन कएल जाएत तँ केहेन हएत? खैर जे होउ, ठनका ठनकै छै तँ कि‍यो अपना माथपर हाथ दइए। मुदा सेहो तँ नै भऽ रहल अछि‍। जे ठनका शरीरक के कहए जे घरो-दुआर आ गाछो-वि‍रीछकेँ तोड़ि‍-फाड़ि‍ दइए ओही ठनकाकेँ हाथ कते काल बचा सकैए।‍ फेर मन ठमकलनि‍। मुइल धार जकाँ परि‍वारो भऽ गेल अछि‍, कि‍ हमरा बचौने बचत। बचबो केना करत? ने पछि‍ला घूमि‍ औताह आ ने अगि‍ला आबए चाहत। लऽ दऽ कऽ दू प्राणी भेलौं, तहूमे तेहेन पाकल आम जकाँ भऽ गेल छी जे कखन तूबि खसब तेकर कोन ठेकान अछि‍। खैर जे होउ, जाबे आँखि‍ तकै छी ताबे तँ जीबए पड़त आ जाबे जीब ताबे जीबैक उपाए करै पड़त। अपने जीने जि‍नगी आ अपने मुइने मृत्‍यु। गुन-धुनमे पड़ल जीवानन्‍दक मन समाज दि‍स बढ़लनि‍। समाजे ले की केलि‍ऐ जे हमरा ले करत। जहि‍ना देवस्‍थान दस गोटेक सहयोगसँ ठाढ़ो होइत आ चलबो करैत तहि‍ना तँ समाजो अछि‍। मुदा से तँ कि‍छु ने केलि‍ऐ। थकथकाएल मन कहलकनि‍- “कि‍ ओछाइने धेने रहब आकि‍ उठबो करब?” मुदा लगले दोसर मन कहलकनि‍- “उठि‍ये कऽ की करब?” मन आगू बढ़ि‍ शि‍क्षक समाज दि‍स बढ़लनि‍। सभ सेवा-नि‍वृत्ति‍ होइ छथि‍। मुदा कि‍ हमरे जकाँ सभकेँ हेतनि‍। भलहि‍ं सभकेँ होन्‍हि‍ वा नै कि‍छु गोटेकेँ तँ हेबे करतनि‍। जखन सबहक जि‍नगी एक वृत्तमे बीतल तखन कि‍अए सभकेँ सभ रंग हेतनि‍। परि‍वारो आ समाजो तँ सबहक सभ रंग छन्‍हि‍। से तँ छन्‍हि‍ये। दीनानाथ बाबूकेँ देखै छि‍यनि‍ जे सेवा-नि‍वृत्ति‍क उपरान्‍तो वि‍द्यालय छोड़ि‍ नै रहलनि‍हेँ। जखन कि‍ सुखदेव बाबू सेवा-नि‍वृत्ति‍ होइसँ पूर्वहि‍ जे तीन बर्ख ओछाइन धेलनि‍ से अखनो धेनहि‍ छथि‍। परि‍वारमे जँ केकरो कि‍छु अढ़बै छथि‍न तँ मुँह दूसि‍ कहै छन्‍हि‍ जे भरि‍ दि‍न कौआ जकाँ काँइ-काँइ करैत रहै छथि‍। मनुक्‍खकेँ जँ कौआ मानि‍ लेल जाए तँ बोलकेँ की कहबै? जीवानन्‍दक मन आरो घुरि‍या गेलनि‍। फेर मनमे उठलनि‍ जे अनेरे औनाइ छी। जतबे रहए ततबे टाँग पसारी नै तँ पओल जाएब। सुतले-सूतल पत्नीकेँ सोर पाड़लखि‍न- “कनी एमहर आउ?” आंगन-दरबज्‍जाक बीच जे सुनयना ठाढ़ छलीह से आगू डेग बढौलनि‍। केबाड़ लग ठाढ़ भऽ हि‍या-हि‍या देखए लगलीह। पहि‍लुका (सेवा-नि‍वृत्ति‍सँ पूर्वक) अपेक्षा बदलल-बदलल रूप बूझि‍ पड़लनि‍। एना केना भेलनि‍, अखन धरि‍ तँ कि‍छु कहबो ने केलनि‍हेँ। तखन कि‍अए पानि‍ उतरल बूझि‍ पड़ै छन्‍हि‍। केबाड़क एकटा पट्टा खोलि‍ देने रहथि‍न आ दोसर ओहि‍ना लगल रहै। तही बीच जीवानन्‍दक मनमे उठलनि‍ जे जाबे नोकरी करै छलौं ताबे बाहरसँ कमा कऽ आनि‍ पत्नीक हाथमे दैत छलि‍यनि‍, आ अपने अपनाकेँ गारजन बुझैत छलौं। से तँ आब नै हएत। जँ से नै हएत तँ परि‍वार आगू मुँहे केना ससरत? पाहुन जकाँ आठ दि‍नपर अबै छलौं आ कमासुत बनि‍ जाइ छलौं। पति‍क बदलल रूप देखि‍ सुनयनाक मनमे उठलनि‍ जे अखन धरि‍ कि‍छु करबो ने केलनि‍हेँ आ तरे-तर फटि‍ रहल छथि‍। नवकवि‍रयाक चुटकीक अवाज जकाँ सुनयनाक आगमन बुझि‍तो जीवानन्‍दकेँ उठैक हूबा देहमे नै रहलनि‍। मनोक बोझ तँ माथकेँ ओहि‍ना भरि‍या दैत जहि‍ना कोनो वस्‍तुक बोझ भरि‍अबैत। मनकेँ जि‍नगीक बाेझ ऐ रूपे दबने जेना सवारी कसल घोड़ा वा खलीफा होइत। जाबे धरि‍ बाहरसँ कमा घर अनैत छलौं, जइ बले परि‍वार ससरैत छल ओ तँ टूटि‍ गेल। ओहीपर ने अपनो छहर-महर आ घरो-परि‍वारक छल। मुदा से नै भेने तँ ओहि‍ना भऽ जाइ छै जहि‍ना माटि‍क बनल रास्‍ताकेँ पानि‍क धार काटि‍ अवरूद्ध कऽ दैत अछि‍। की कमाइयेपर गारजनी छल? पत्नि‍येकेँ की सुख हमरासँ भेलनि‍? घर-गि‍रहस्‍ती सम्‍हारैमे दि‍न-राति‍ एकबट्ट केने रहै छथि‍। एक तँ मि‍थि‍लांचलक कि‍सान परि‍वारक अजीव गढ़नि‍ अछि‍, जइठाम एलापर देवि‍यो-देवता भोथि‍या गेलाह। सौंसे जनकपुरमे जनकेक दरवार जकाँ बूझि‍ पड़लनि‍। नान्‍हि‍टा बात थोड़े छी। गाम-गाम व्‍यास भागवत बचै छथि‍, गाम-गाम कीर्तन-भजन, भोज-भनडारा होइत रहैत अछि‍, तइठाम समाज वि‍परीत दि‍शामे बहि‍ गेल, मुदा देखलनि‍ कोइ ने। दरबाजाक सौभाग्‍य छल नीक-नीक बात-वि‍चार करब। तइठाम दरबज्‍जा टूटि‍ आंगन घरक कोठरी बनि गेल अछि‍, जइठाम कम-सँ-कम लोकक पैठ रहैए, जइठाम आनक सुख-दुख सुनैक आ सुख-दुखक दबाइ बुझैक अवसर नै भेटैत तइठाम पति‍-पत्नीक संबंधक आधार कि‍ बनि‍ सकैए। देखा-देखीक दुनि‍याँमे चि‍न्‍ता–चि‍न्‍तन कि‍अए रहत। जँ से नै रहत तँ मनक सुखक दि‍शाक धारा कि‍अए ने बदलत। जीवि‍त-मृत्‍युक ि‍नर्णए के करत? केना हएत? कोनो मुसरा गाछ होइ आकि‍ लति‍आएल लत्तीक होइ, ओकर बाढ़ि‍ ताधरि‍ समीचीन होइत जाधरि‍ ओकरा अनुकूल वातावरण भेटैत रहैत। ओना लाखो कीड़ी-मकौड़ी कोमल कि‍सलयकेँ नष्‍ट करैबला अछि‍ मुदा प्रकृतोक तँ गजब गढ़नि‍ अछि‍, एक-दोसराक नष्‍ट करैबला सेहो मौजूद अछि‍। बि‍नु मुँहक गाछ वा लत्तीक दशा तँ ओहने होइ छै जेहेन साँपक मुँह थकुचेलाक पछाति‍ होइ छै। जीवानन्‍दकेँ एहसास भेलनि‍ जे हमरापर नै पत्नीपर घर-ठाढ़ अछि‍। जँए घर ठाढ़ अछि‍ तँए समाजक परि‍वार कहबैक लाली अछि‍। मुदा समाज तँ ओहि‍ना नै केकरो महत दैत? सेवाक अनुकूल केकरो महत दैत अछि‍। से हमरा से की भेलै? जखन कि‍छु ने भेलै तखन कते महत हेबाक चाही? मुदा जकरा घर-परि‍वार गाम बुझै छी, तेकरा छोड़ि‍ये केना देब। मुदा ई प्रश्न तँ गामक छि‍ऐ, अपन नै। परि‍वारमे जे छहर-महर भेल ओइमे हमरा कमाइसँ की भेल? यएह ने भेल जे बेटीक बि‍आह केलौं, बेटाकेँ पढ़ेलौं-लि‍खेलौं। अंति‍म अवस्‍थामे अपन घर बनेलौं। मुदा बेटीक बि‍आह, पढ़ाइ-लि‍खाइ एते भारी कि‍अए अछि‍ जे जि‍नगी भरि‍क कमाइसँ लोककेँ पारो ने लगै छै। जँ एतबेमे सभ ओझरा जाए तँ समाजक गति‍ केहेन हएत? जँ समाज दुरगति‍क चालि‍ पकड़ि‍ चलत तँ मनुष्‍यक पैदाइस केहेन हएत। जइठामक जेहेन मनुष्‍य तइठाम तेहने दुनि‍याँ। करोट फेरते जीवानन्‍दक मनमे उठलनि‍ जे हारि‍ मानी झगड़ा पड़ि‍आए। पत्नीसँ क्षमा माँगि‍ लेब। जँ से नै माँगब तँ हुनकर वि‍चार छि‍यनि‍ जे घरमे रहए दथि‍ वा नै। समाजक संग तँ वएह रहलीह। पत्नीक प्रति‍ जे प्रेम हेबाक चाही से कहाँ कहि‍यो भेल। क्षण-पलक संबंध रहल जीवन-लीलाक संबंध कहाँ रहल। हुनकर दुनि‍याँ हमरासँ भि‍न्न रहलनि‍। मुदा आइ तँ ओही दुनि‍याँक जरूरति‍ हमरो भऽ गेल अछि‍। खंड वि‍कसि‍त देशमे जहि‍ना जनता-सरकारक बीच संबंध रहैत, तहि‍ना ने भऽ गेल अछि‍। जेना पति‍ रूपमे ओ सेवा केलनि‍ तेना कहाँ केलि‍यनि‍। जँ से करि‍ति‍यनि‍ तँ ओ ओहि‍ना ओतै अँटकल रहि‍तथि‍, जतए नाओं-गाँवो नै सीखि‍ पेलीह। जतबो समए गाममे बि‍तेलौं, हुनकर कमाइ खेलि‍यनि‍ ततबो तँ हुनका नै कऽ सकलि‍यनि‍। ततबे नै, दरबज्‍जापर जे माल अछि‍, हुनका (पत्नी) देखि‍ भूख-पि‍यास कहए लगै छन्‍हि‍ मुदा हमरा देखि‍ घि‍रनी जकाँ नाचि‍ भगबए चाहैए। अठबारेयो जँ अबैत रहलौं तैयो तँ अपन बूझि‍ खाइ-पीबै ले कि‍छु ने केलि‍ऐ। कोनो कि‍ मनुख छी जे घड़ी-मोबाइल देखि‍ मि‍नट-सेकेण्‍ड बूझत, ओकरा लेल तँ अठबारैओ सटले-दि‍न भेल। तहि‍ना तँ गाछि‍यो-बि‍रछीक अछि‍। जूरशीतल दि‍नसँ ओकरा जलढार हेबाक चाही, से अनका तँ कहलि‍ऐ, मुदा...? .....कि‍अए ओ अपन बूझत? जहि‍ना सासुरमे जमाए सासु-ससुरक आगू लाड़-झाड़ करैत जे ई नै अछि‍ ओ नै अछि‍। तहि‍ना जीवानन्‍द ओछाइनसँ उठि‍, बैसैत पत्नी दि‍स देखि‍ बजलाह- “एते दि‍नक जि‍नगीमे कहयो नि‍ठूर दूध नै खेलौं? आब अहाँक दरबारमे छी, जेना राखी।” पति‍क बात सुनि‍ सुनयना वि‍ह्वल भऽ गेलीह। अपन कर्तव्‍यक बोध भेलनि‍। पति‍क सेवा पत्नीक पहि‍ल दायि‍त्‍व। लटारम्‍ह करैत बजलीह- “एना संस्‍कृतमे नै कहू, भखि‍औटीमे कहू जे कि‍ कहै छी?” पत्नीक बात सुनि‍ जीवानन्‍दक मन हरा गेलनि‍। जइठाम सुग्‍गा-मेना संस्‍कृत पाठ करैत छल तइठाम मनुष्‍यक दूरी एते कि‍अए भेल? प्रश्नमे ओझराइते बुकौर लगि‍ गेलनि‍। बोली नै फुटलनि‍। आजुक शि‍क्षक जकाँ जीवानन्‍दक जि‍नगी नै रहलनि‍। शि‍क्षक समाजक प्रति‍ समर्पित छलाह। ओइ समाजक बीच पढ़ाइ-लि‍खाइ प्रति‍ष्‍ठाक मूल बि‍न्‍दु छल। ओ सभ मानैत छथि‍ जे जइ वि‍षयक जरूरति‍ वि‍द्यार्थीकेँ टयूशन पढ़बाक होइ छै ओइ वि‍षयक पढ़ाइमे कमी छै। वि‍द्यार्थीक लेल कि‍छु सहज वि‍षय होइत अछि‍ कि‍छु कठि‍न। मुदा जइ वि‍षयक जे शि‍क्षक होइ छथि‍ हुनका लेल तँ ई समस्‍या नै भेल। जँ हुनकामे शि‍क्षण-कलाक पूर्णता हेतनि‍ तँ वि‍द्यार्थीकेँ कि‍अए समस्‍या ग्रस्‍त रहए देथि‍न। की वजह छैक जे अपना ऐठाम अदौसँ लऽ कऽ अखन धरि‍ शि‍क्षण-संस्‍थानमे छड़ीक चलनि‍ नै रहल मुदा तँए कि‍ कि‍यो पढ़ि‍-लि‍खि‍ विद्वान नै भेलाह। भेलाह। जइ हाइ स्‍कूलमे जीवानन्‍द शि‍क्षण कार्य करैत छलाह ओइ वि‍द्यालयकेँ अपन छात्रावास सेहो छैक। जइमे पचाससँ ऊपर छात्रो आ आधासँ बेसी शि‍क्षको रहैत छथि‍। मेसमे भोजन बनै छैक आ जएह वि‍द्यार्थीक लेल सहए शि‍क्षको लेल होइत छैक। ओना शि‍क्षक सभ अलगसँ दूध कीनि‍ राति‍मे सुतै बेर पीबै छथि‍। जीवानन्‍दो पीबै छथि‍। जहि‍ना बाटमे हराएल बटोही दोसरकेँ पुछैत, मुदा उत्तर देनि‍हारो बटोही तँ रंग-बि‍रंगक होइत अछि‍। कि‍यो एहनो होइत जे अपने हरेबाक चर्च करैत तँ कि‍यो हराएब छि‍पबैत आरो दोसरकेँ हराएल बाट देखा दैत आ कि‍यो एहनो होइत जे कहैत जे संगे चलू। ऐ आशाक संग चलैक बात कहैत जे जँ कि‍छु नै कहबै तँ गोंग कहत, मुदा बि‍नु बूझलमे कि‍ जबाबो देल जा सकैए। ओ संग केने ताधरि‍ चलैत रहैए जाधरि‍ आँखि‍गर नै भेट जाइत अछि‍। अर्द्धांगि‍नीक रूपमे सुनयना पुछलखि‍न- “कि‍ सुच्‍चा दूध कहलि‍ऐ?” जीवानन्‍द- “पैंतीस सालक नोकरीमे कहि‍यो सुच्‍चा दूध नै पीब सकलौं। पीलौं जरूर मुदा एकरा आधासँ बेसी खाएब थोड़े कहल जेतैक।” जहि‍ना मृत्तासनपर चढ़ल राहीकेँ सर-समाज आ कुटुम-परि‍वारक लोक आबि‍-आबि‍ जि‍ज्ञासा करैत जे भैया, कि‍ काका, आकि‍ बाबा की खेबा-पीबाक मन होइए तहि‍ना सुनयना पुछलखि‍न- “एते दि‍न जतए अहाँ छेलौं छेलौं, हम छेलौं छलौं। मुदा आब तँ ओतए अहुँ रहब जतए हम छी।” पत्नीक वि‍चारक गांमीर्यसँ जीवानन्‍द आँखि‍ पड़ल अजगर साँपक सोझसँ पड़ा नै पाबि‍, बजलाह- “कहलौं तँ बेस बात मुदा मनुष्‍य तँ मनुष्‍यक बीच कि‍छु बंधन ि‍नर्धारि‍त कऽ रहैत अछि‍। डोरी-पगहाक जरूरति‍ तँ पशुक लेल होइत। मुदा बान्‍ह तँ एकमुड़ि‍या नै भऽ सकैए। ओकरा लेल तँ जाधरि‍ दू-मुड़ि‍या नै लटपटौल जाएत, ताधरि‍ गीरह केना पड़तै। जाधरि‍ कुशि‍यारक गाछ जकाँ गीरह नै बनत ताधरि‍ रस-जल केना समटाएल रहत।” पत्नीक प्रश्न सुनि‍ जीवानन्‍द जि‍नगीक ओझरी देखए लगलाह जे ई बन्‍धन छूटल कहि‍या। तड़सैत मन पत्नीक करेजमे पहुँचलनि‍। जहि‍ना नि‍शाएल लोक अपने अड़-दड़ बजैत तहि‍ना जीवानन्‍द बाजए लगलाह- “कामि‍नी, सेवि‍काक रूप छोड़ि‍ संगी कहि‍या बुझलयनि‍। ई दोख केकर। मुदा दोख तँ दुनू दि‍स देखए पड़त। पत्नी कोन रूप देखलनि‍। सभ दि‍न ओ पति‍ बूझि‍ सेवा करैत एली। कहि‍यो कि‍छु नै मंगलनि‍। अपन परि‍वारक स्‍तर बूझि‍ अपनाकेँ सम्‍हारि‍ रखलीह।” बड़बड़ाइत पति‍केँ देखि‍ सुनयना बजलीह- “हारि‍ मानी झगड़ा फड़ि‍आए। एके बेर बाजि‍ जाउ जे जे हूसल से हराएल। जे जीबए से खेलए फागु।” मरैत रोगी जकाँ जीवानन्‍द बजलाह- “सुच्‍चा दूध आबो नै पीब सकै छी?” “पीब सकै छी। जखन गाए पोसैक लूरि‍ अछि‍ तखन कि‍अए ने पीब सकै छी। मुदा जइठाम दि‍न-राति‍ लुटनि‍हार लूटि‍ रहल अछि‍ तइठाम थनक दूधक कंठ लग पहुँचत कि‍ नै, तेकर कोन बि‍सवास अछि‍।” पत्नीक प्रश्न सुनि‍ जीवानन्‍द जी-जी कऽ उठलाह। बि‍सरल बात मन पड़लापर जहि‍ना ओकर रूपो-रेखा सोझमे अाबए लगैत तहि‍ना भेलनि‍। बजलाह- “शुद्ध-अशुद्ध दूध ने एक परि‍वारक समस्‍या छी आ ने एक गामक। दूधमे पानि‍ देब चलनि‍ भऽ गेल अछि‍। ओना जे अपने गाए-महींस पोसि‍ दूध खाइ छथि‍ ति‍नकर संख्‍या कम छन्‍हि‍‍। जे बेचि‍नि‍हार छथि‍ ओ दूध बेचि‍ चाउर-दालि‍, तरकारी इत्‍यादि‍ कीनै छथि‍, खाली दूधेटामे पानि‍ नै देखै छथि‍न। आनो-आनो तहि‍ना, तखन कएल कि‍ जाए। कुल-मि‍ला कऽ देखलापर यएह ने देखि‍ पड़ैत जे ताड़ी पीयाक गांजा पीयाककेँ गारि‍ पढ़ि‍ कहैत जे फोकटि‍या अछि‍। एहि‍ना एक-दोसरमे सटल संबंध अछि‍। सभकेँ सभ गारि‍ पढ़ैत आ सबहक सभ सुनैत अछि‍। तहूसँ टपि‍ अपने मुँहे गरि‍या अपने सेहो सुनैत अछि‍।” वि‍ह्वल भऽ सुनयना पुछलखि‍न- “तखन उपाय?” “उपाय एतबे जे जते परि‍वारमे खर्च हएत कम-सँ-कम तते उपारजन कऽ लेब तखन परि‍वारक पाड़़ लगि‍ जाएत। गाममे जते खर्च अछि ओते गौआँ मि‍लि‍ उपारजन कऽ लेताह तँ गामक पाड़ लगि‍ जाएत। समाजेक कल्‍याण ने देशक कल्‍याण छी।‍” कर्ज जमीन नि‍लामीक नोटि‍श पाबि‍ बरीसलालक सभ आशा ओहि‍ना झड़ए लगल जहि‍ना वसन्‍तसँ पूर्व गाछक पतझर होइत वा फलसँ पहि‍ने फूल झड़ए लगैत अछि‍। हलसैत जि‍नगीक आशा देखि‍ बरीसलाल खेती लेल, बैंकसँ कर्ज लऽ बोरि‍ंग-दमकल करौलक। मुदा समैपर कर्ज अदा नै कए पाबि‍, जइले कर्ज लेलक सएह हाथसँ नि‍कलैत देखि‍ सोगसँ सोगाएल अखड़े चौकीपर पेटकान दऽ मने-मन सोचैत जे की करैत की भेल। साओनक मेघ जकाँ दुनू आँखि‍ नोरसँ बोझि‍ल। बीसम शताब्‍दीक आठम दशकमे हरि‍त-क्रान्‍ति‍क हवा घुसकैत-घुसकैत गाम धरि‍ पहुँचल। नव हवाक सुगंध नाके-नाक खेत-खरि‍हानमे पहुँचल। गामक कि‍सानक सीमांकन शुरू भेल। ओना सीमांक नाम-मात्रेक भेल मुदा भेल तँ। नाम-मात्र एे लेल जे सैद्धान्‍ति‍क रूपमे तँ सीमांकनक रूप रेखाा तैयार भेल मुदा जमीनक ओझरी कँटहा बाँस जकाँ ओझराएल। कड़चीसँ बेसी काँट। एक-एक कड़चीमे सइयो काँट। सोरगर-मोटगर पाकल देखि‍ भलहि‍ं आरीसँ जड़ि‍ काटि‍ दि‍यौ मुदा झोझसँ नि‍कालब तँ असान नै। जइसँ बेवहारि‍क पक्ष कमजोर पड़ल। चारि श्रेणीक अन्‍तर्गत कि‍सानकेँ राखल गेलनि‍। ढाइ एकड़सँ नि‍च्‍चा एक श्रेणी, चारि‍ एकड़सँ नि‍च्‍चा दोसर श्रेणी, दससँ नि‍च्‍चा तेसर आ तइसँ ऊपर चारि‍म। नि‍चला कि‍सानक लेल सरकारी खजाना खुजल। रंग-रंगक प्रोत्‍साहनक घोषणा भेल। सरकारी घोषणा तँए सभले भेल। मुदा बैंकक माध्‍यमसँ भेटत। जइ माध्‍यमसँ भेटत सएह नगण्‍य। एक दि‍स फौज जकाँ कि‍सान दोसर दि‍स जइठामसँ भेटत, सएह नै। मुदा तैयो गोटि‍ पंगरा तँ दलैहे। सरकारी सुवि‍धा सब्‍सि‍डीक रूपमे भेटत। तेकर कार्यालय भि‍न्न बनल। कि‍सानक बीच प्रोत्‍साहनक घोषणासँ नव जागरणक संचार भेल। गाम-गाममे भी.एल. डब्‍लूक माध्‍यमसँ काजक सूत्र तैयार भेल। आने कि‍सान जकाँ पाँचम श्रेणीक कि‍सान बरि‍सालोक डेग बढ़ल। एक-ति‍हाइ सब्‍सि‍डी सुनि‍ केना नै बढ़ैत। जखने कि‍सानक हाथ पानि‍ आैत तखने चौमसि‍या खेती बारहमसि‍या बनि‍ जाएत। जखने बारहमसि‍या बनत तखने ने कि‍सान डारि‍-डारि‍ झूला लगा बारहमासा गाओत। नै तँ छह मासे, चौमासे ने गाओत। जे चौमास कि‍सानक बराबरी छी, तेहीमे ने भाँग-धुथुर उपजैए। वस्‍तुगत काज तँ नै मुदा चौरीसँ चौमास धरि‍क, चारि‍ गुणा उपजाक नक्‍शा तँ कि‍सानक मनमे बनबे कएल। बीघा-एकड़क हि‍साब भलहं अखनो धरि‍ नै फड़ि‍आएल मुदा-एकड़-हेक्‍टेयर तँ आबि‍ये गेल। कि‍छु एनए कि‍छु ओनए कऽ कि‍सान हि‍साब तँ बैसाइये लेलक। अखन धरि‍क जे छोट आ मध्‍यम कि‍सान महाजनीक कर्जमे डूबल छल ओइमे पूँजीपति‍क प्रवेशक दुआर खूजल। कम सूदि‍क बात तँ आएल मुदा छअ मास पछाति‍ सूद मूड़ बनि‍ जाइत से एबे ने कएल। अखन धरि‍ सूदि‍क-सूदि‍ प्रथा नै छल से आएल। भलहि‍ं कतौ महाजन सप्पत खा केकरो घराड़ी लऽ लेने होइ आकि‍ कतौ सप्‍पत खा कर्जा डूमल होइ, ई अलग बात। आजुक दहेज ओते भारी नै छल जते माए-बापक सराध। ओना दहेजोक जड़ि‍ मजगूत बनि‍ रहल छल, कि‍एक तँ शहरक आमदनी गाम दि‍स आबए लगल छल। गाममे छोट -सीमान्‍त-माध्‍यम- पैघ लगा कि‍सानोक संख्‍या बेसी मुदा बोनि‍हारक संख्‍यासँ कम अछि‍। ओना सभ गामक रूपो-रेखा एक रंग नहि‍ये अछि‍। कोनो गाम एहेन जइमे पाँच प्रति‍शतसँ कम जनसंख्‍या नवे-पनचानबे प्रति‍शत जमीन पकड़ने, तँ कोनो गाम एहेन जइमे दस पनरह-प्रति‍शतक अंतर। एहनो कि‍सान जि‍नका अपन जमीनक अता-पता नै बूझल तँ एहनो कि‍सान जे अपने सबतूर मि‍लि‍ खेती करैत। तइ संग एहनो जे खेतक आड़ि‍पर पहुँचि‍ जूति‍-भाँति‍ तँ लगबैत मुदा अपने हाथे कि‍छु नै करैत। गाछी-खरहोरि‍, बँसबाड़ि‍, घराड़ी लगा बसीसलालकेँ पाँच बीघा जमीन। दू बीघा बेख-बुनि‍यादि‍मे फँसल बाकी तीन बीघा जोतसीम। एकटा बड़द रखने। सफटैती कऽ खेती करैत। ओहू तीन बीघा जोतसीम जमीनमे तीन मेल। पनरह कट्ठा चौरीमे मलगुजारीक संग लगतो साले-साल डुमैत। मुदा छोड़ि‍यो केना देत, आखि‍र खेत तँ खेत छी। रौदी भेने ओहीमे ने उपजा होइ छै। बाकी सवा दू बीघा मध्‍यमसँ भीठ धरि‍। दसो कट्ठा भीठमे मरूआ, भदै-गदैरक संग कुरथी-तेबखा होइत। गहुमक खेती तँ आबि‍ गेल मुदा खेतीक लेल पानि‍ चाही। पटबैक साधन पोखरि‍, जइसँ करीनसँ कि‍छु अगल-बगलक खेती होइत। लोकक बीच ने पढ़बै-लि‍खबैक जि‍ज्ञासा रहै आ ने सुवि‍धा। गनल-गूथल वि‍द्यालय-महावि‍द्यालय। बरीसलालो दुनू बेटाकेँ गामक स्‍कूल धरि‍ पढ़ा‍ खेति‍एक काजमे लगौने। मि‍थि‍लाक कि‍सान खेतक ओहन प्रेमी बनल रहला जेहन पति‍व्रता नारी जे बाल वि‍धव होइतो प्रति‍ष्‍ठाकेँ कमलक माला बना गरदनि‍मे लटका हँसि‍ रहली अछि‍ तहि‍ना कि‍सानो। जँ से नै रहल छथि‍ तँ भागि‍-पड़ा अर्थशास्‍त्री बनि‍ कि‍अए अपन खेत-पथारक अर्थ नै बूझि‍ प्रति‍ष्‍ठाक वस्‍तु बूझि‍ रहल छथि‍। की ओहि‍ना खेतीकेँ उत्तम आ नोकरीकेँ मध्‍यमक वि‍चार देलनि‍। जँ एकरा मुहावरा-कहावत बना देखब तँ मिथि‍लाक चि‍न्‍तनधारा धरि‍ नै पहुँचि‍ पाएब। जइठाम खेतकेँ अपन अधि‍कारक वस्‍तु बूझि‍ अपना हाथक हथि‍हार बना अपन स्‍वतंत्रताकेँ अक्षुण्‍य रखैक वि‍चार सेहो देलनि‍। ई तँ अपन-अपन वि‍चार होइ छै जे कि‍यो हथि‍यारकेँ बम-बारूद बुझैत तँ कि‍यो हाथक यार माने प्रेमी बूझि‍ वि‍चारक बाट बनबैक वि‍चार व्‍यक्‍त करैत अछि‍। तहि‍ना अस्‍त्र–शस्‍त्र सेहो अछि‍। मध्‍यम कि‍सान वा लघु कि‍सानक जीबैक जि‍नगी ब्‍लौटि‍ंग पेपर सदृश बनि‍ गेल छन्‍हि‍ जेकरामे लालो रोशनाइ सोंखैक शक्‍ति‍ छै आ करि‍यो रोशनाइक। बाढ़ि‍-रौदी एकैसम शताब्‍दीक ऊपज नै अदौसँ रहल अछि‍। भलहि‍ं कहि‍ सकै छी जे धार-धूड़क बान्‍ह-छान्‍ह दुआरे हुअए लगल अछि‍, भऽ सकै छै कतौ-होइत  हेतै, मुदा प्रश्न धारेक पानि‍क नै अछि‍। तहि‍ना रौदि‍यो रहल अछि‍। धारोक कटनी-खोंटनी कम नै अछि‍। मि‍थि‍लांचलकेँ कोसी-कमला तेखार कऽ दुब्‍बरसँ धोधि‍गर धरि‍ अछि‍। पानि‍क एक साधन भेल, दोसर बरखा भेल। ओहन-ओहन बरखा होइत रहल अछि‍ जे पनरह दि‍न हथि‍याक बरखाक ओरि‍यान कऽ कऽ पर्वज रखैत छलाह। हथि‍या मात्र एक नै जेकरा बरखा ऋृतुक अंति‍म नक्षत्र कहि‍ टारि‍ देब। ओना पानि‍क कोनो ठेकान नै, माघोमे पाथर खसि‍ उपजल उपजाकेँ नाश करैत रहल अछि‍। अंति‍मक जन्‍म ताधरि‍ नै होइत जाधरि‍ आदि‍ नै होइत बरखा ऋृतुक आदि‍ आद्रा छी। तँए “आदि‍ आद्रा अंत हस्‍त” ई भेल बरखाक आँट-पेट। पूर्वज सभ स्‍पष्‍ट वि‍चार देने छथि‍ जे बरखाक कोनो बि‍सवास नै, कते हएत। 1971 ई.मे बंगला देशक लड़ाइक लगभग सालो भरि‍ बरखा होइते रहल, ओहन-ओहन बरखा होइत रहल अछि‍ जइमे सएक-सए घर खसैत रहल अछि‍। घरमे दबल-बाल-वृद्ध, धान-सम्‍पति‍ नष्‍ट होइत रहल अछि‍ मुदा तैयो ब्‍लौटि‍ंग पेपर जकाँ सोखि‍ कि‍अए जीबैक बाट धेने आबि‍ रहल अछि‍। दुनि‍याँमे ने सााधकक कमी आ ने साधना भूमि‍क, मुदा मि‍थि‍लांचल श्रेष्‍ट कि‍अए? कतौक जाड़क साधना तँ कतौक तापक तप, जइमे तपि‍ तपस्‍या करैत, तँ कतौ पानि‍क सौभरी ऋृषि‍ बनि‍ करैत। मुदा मि‍थि‍लांचल साधनााक फुलवाड़ी लगा रखने अछि‍। ओइ फुलवारीक फूल सजबै छलीह सीता। ने मि‍थि‍लाक भूमि‍ बदलल, आ ने बदलल ऋृतु ऋृतुराज बदलि‍ रहल अछि‍ खाली बोतलक रस। घरक समस्‍या कहाँ? समस्‍या तँ तखन उठैत जखन रहैक घरसँ घर भाड़ा असुलैक ि‍वचार जगैत। गाछक नि‍च्‍चा सात-हाथ नौ हाथक घरमे जीवन-यापन कऽ वेद-पुराण सि‍रजलनि‍। की दुनि‍याँ देखि‍नि‍हार मि‍ि‍थलांचल छोड़ि‍ देखि‍ रहला अछि‍, जँ से नै तँ समस्‍याकेँ कोन रूपे देखलनि‍। यएह ने सरकारी योजना जहि‍ना कागजपर औषधालय बना साले-साल मरम्‍मतक नामपर योजना लुटज्ञइत रहैत आ पान सालक बाद माटि‍पर खसा मलबा हटबैक खर्च होइत। खेतसँ उपजल खढ़, बाँस साबेक घर बना समस्‍याक समाधान करैत छलाह। ओ सभ अपन वि‍चारकेँ स्‍वतंत्र रखि‍ स्‍वतंत्र जीवन व्‍यतीत करैत छलाह। पढ़ै-लि‍खैक ओते समस्‍या नै, जेहन जि‍नगी रहत ततबे बुधि‍क ने जरूरत। बेसी भेलासँ तँ लोक छड़पि‍-छड़पि‍ अनको गाछक आम तोड़ए गलैत अछि‍। भलहि‍ं अपन पूर्वजक घराड़ीपर नढ़ि‍या कि‍अए ने भुकए, मुदा दुनि‍याँकेँ मातृभूमि‍ कहि‍ सेवारत् रहैत छी। ओही रूपक फूसघर बना जि‍नगीक गारंटी केने छलाह। अखुनका जकाँ नै जे एक दि‍स लग्‍गी लगा भाँटा तोड़ैक बाट धेने छी आ दोसर दि‍स हजार-दस हजार जीबैबला ऋृषि‍-मुनि‍क दुहाइ दैत छी। एकैसम सदीमे कि‍यो अपनाकेँ अगि‍ला पीढि‍क नजरि‍क पुतली बना रहल छी। जहि‍ना बरखा, तहि‍ना जाड़ तहि‍ना रौद-ताप, बाल जीवनसँ लऽ कऽ वृद्ध तकक अनुभव कऽ अपन जि‍नगीकेँ असथि‍र बना नीक-नीक उमेर पबैत रहला अछि‍। पश्न उठैत जे की एहेन वि‍चार मरि‍ गेल आकि‍ जीवि‍त अछि‍? ने मरल आ ने स्‍वस्‍थ भऽ जीवि‍त अछि‍। गाम-समाजमे लटपटज्ञएइत जीवि‍त जरूर अछि‍ मुदा.....। जीवि‍त ऐ रूपे अछि‍ जे अखनो खेतीकेँ उत्तम मानल जाइत अछि‍। कृषि‍ जि‍नगीकेँ थ्‍ज्ञाहि‍ चलबैत अछि‍। तहूमे सामाजि‍क स्‍तरपर तँ आरो थाहल अछि‍। जँ जि‍नगीमे दोसराक जरूरत नै हुअए तँ ऐ सँ नीक जीवन ककरा कहबै। आजुक हवा भलहि‍ं जते जोर मारए मुदा हवा असथि‍र वस्‍तुकेँ कहाँ कि‍छु बि‍गाड़ि‍ पबैत अछि‍। अनभुआर धारमे ने नमहर-नमहर जलचरक भय रहै छै कि‍एक तँ धुमैत धारमे जे गहींर-गहींर मोइन खुना जाइ छै तइमे ने डुमैक डर, जँ से नै तँ डुमैक डर कतए। तहि‍ना ने धरति‍योक बीच अछि‍। जहि‍ना पानि‍मे गोहि‍, नकार आदि‍ रहैए तहि‍ना ने धरति‍योपर बाघ सि‍ंह, नाग बास करैए। थाहल जि‍नगीक अर्थ ई जे जँ तीन बीघा वा दू बीघा जमीनकेँ जँ समुचि‍त बेवस्‍था कऽ खेती कएल जाए तँ युगानुकूल मनुष्‍य बनब बड़ भारी नै। जि‍नगी तखन भारी बनैत अछि‍ जखन गरथाहमे जि‍नगी पड़ि‍ जाइत अछि‍। कि‍सानक जि‍नगीकेँ पंगु बना देल गेल अछि‍। जँ से नै तँ सरकारी बेवस्‍था कोन -कि‍सान हि‍तैषी- जि‍नगीक कोन जरूरति‍केँ पूरा नै कऽ पाबि‍ सकैए, मुदा नीको-नीको -दस बीघासँ ऊपरबला कि‍सान- परि‍वार ने अपना बेटाकेँ नीक शि‍क्षा दऽ पाबि‍ रहल अछि‍ आ ने जनमारा बेमारि‍क इलाज कऽ पाबि‍ रहल अछि‍। जहि‍ना सुति‍ उठि‍ सीता-राम, राधा-कृष्‍ण वा सतनामक नाम लेल जाइत तहि‍ना ने आब टाटा-पापा लैत उठै छी। मुदा कि‍ हम सभ नढ़रा मकैक सदृश जि‍नगी नै जीबै छी जे भोगार गाछ रहि‍तो अन्नक कतौ पता नै। कृषि‍ तँ आमक बगीचा वा खीराक लत्ती सदृश अछि‍। जहि‍ना गाछक पल्‍लवक मुँहसँ गि‍रहे-गि‍रहे पल्‍लव नि‍कालि‍ डारि‍ बनैत रहैए, खीरा लत्तीक मुँहसँ लत्ती बनि‍ फुलाइत-फड़ैत रहैए तहि‍ना ने जि‍नगि‍यो छी जे धरतीसँ जनमि‍ फुलाइत-फड़ैत वि‍सरजन करत। खेत तँ ओहन सम्‍पत्ति‍ छी जे जि‍नगीकेँ आगू-बढ़बैक शक्‍ति‍ रखैए। कतबो शक्‍ति‍शाली कि‍अए ने आगि‍ हुअए मुदा जँ ओइमे नव ज्‍वलनशील वस्‍तुक समागम नै हेतै, तँ कते काल ओ टि‍क सकैए। जाधरि‍ धार टपनि‍हार वा सरोवरमे स्‍नान केनि‍हारकेँ पानि‍क थाह नै लगि‍ जाएत ताधरि‍ धार टपब वा स्‍नान करब तँ अथाहे अछि‍। जाधरि‍ अथाह रहत ताधरि‍ असंका रहबे करत। जाधरि‍ आशंका रहत ताधरि‍ वि‍चार प्रभावित हेबे करत। मुदा एतेकक बावजूद हम कि‍अए.....? की हम नै जनै छी जे जाधरि‍ कृषि‍केँ सर्वांगि‍न वि‍कासक प्रक्रि‍या नै अपनौल जाएत ताधरि‍ नचारी-सोहर कते काल सोहनगर हएत। हर आदमी हर परि‍वारकेँ ठाढ़ भऽ चलैक प्रश्न अछि‍, नै कि‍ एक दोसराकेँ छि‍टकी मारि खसबैक। पाँचटा कि‍सानक संग बरीसलाल सेहो बोरि‍ंग-दमकलक वि‍चारकेँ आगू बढ़ौलक। प्रखण्‍ड कार्यालयसँ फार्म लऽ बैंकमे आवेदन केलक। संगीक जरूरति‍ तँ पड़बे केलै कि‍एक तँ जि‍नगीमे पहि‍ल खेप प्रखण्‍ड कार्यालय आ बैंक पहुँचैक अवसर भेटलै। नव योजनाक काज बैंकमे आएल। ओना गामक आ गामक कि‍सानक हि‍साबे बैंकक संख्‍या दूधक डाढ़ि‍ये छल, मुदा छल तँ। बरीसलालक आवेदन स्‍वीकृति‍ करैत जमीनक बाैण्‍ड बना माइनर एरीगेशनकेँ काज करैक भार देलक। बैंक-कर्जक सूद शुरू भेल। माइनर एरीगेशनक आँट-पेट छोट। एकाएक काजमे बढ़ोत्तरी भेल। ने काज करैक औजार अधि‍क आ ने करैबला। तँए ठीकेदारीक चलनि‍। तहूमे एक अनुमंडलक बीच एकटा कार्यालय। लेनि‍हार हजार हाथ देनि‍हार एक। मुदा तैयो बरीसलालक आदेश पत्रकेँ फाइलमे लगा देल गेल। एक-ति‍हाइ सब्‍सि‍‍डीक लेल सब्‍सि‍डी कार्यालयक जरूरत। सब्‍सि‍डी कार्यालय जि‍लाक अन्‍तर्गत। दौड़-बरहा करैत बरीसलालकेँ खर्चक संग-संग साल बीत गेल। बरसातमे एक तँ धसना धसैक डर दोसर लोक खेती कहि‍या करत। बोरि‍ंगक काज छोड़ि‍ बरीसलाल खेतीमे लगि‍ गेल। साल बीतल दोसर साल शुरू भेल। ताधरि‍ बैंकक कर्जक चक्रवृद्धि‍ ब्‍याजक दरसँ एते मोटा गेल जे सब्‍सि‍डी उधि‍या गेल। दोसर साल शुरूहेसँ बरीसलाल काजक -वोरि‍ंग-दमकलक- पाछू पड़ि‍ गेल। आइ-काल्हि‍ करैत माइनरो-गरीगेशनक काज आ सब्‍सि‍डीयो ऑफि‍सक काज लटकले रहलै। चढ़ैत बैसाख -दोसर साल- बरीसलाल रघुनन्‍दनकेँ कहलक- “बौआ, छोड़ि‍ दहक। बोरि‍ंग नइ भेल तँ करजो तँ नहि‍ये भेल। बुझबै जे एते दि‍न घुमबे-फि‍रबे केलौं।” बैंकक प्रक्रि‍या रघुनन्‍दनकेँ बूझल। बरीसलालक बात सुनि‍ अवाक् भऽ गेल। मन कलपि‍ उठलै बाप रे, सूदि‍-मूड़ लदा गेलै, कोट-कचहरीक मुद्दा बनि‍ गेलै। दोख केकरा लगतै। कोन मुँह लऽ कऽ समाजमे रहब। ग्‍लानि‍सँ मन बि‍साइन भऽ गेलै। साहस बटोरि‍ रघुनन्‍दन बाजल- “काका, जँए एते दि‍न तँए दू मास आरो। बैसाख-जेठ बचल अछि‍। काल्हि‍ चलू या तँ अपन काज वापस लेब वा हाथ पकड़ि‍ काज कराएब। तइले जे हेतै से देखल जेतै।” रघुनन्‍दनक बात सुनि‍ बरि‍सलाल ठमकि‍ गेल। बाजल- “बौआ, हम तँ तोरेपर छी, आगि‍मे जाइले कहह आकि‍ पानि‍मे तोरासँ बाहर थोड़े हएब।” बरीसलालक वि‍चार सुनि‍ रघुनन्‍दनक मनमे उत्‍साह जगल। दोसर दि‍न दुनू गोटे -बरीसलाल, रघुनन्‍दन- माइनर एगरीगेशनक कार्यालयसँ बोरिंग गाड़ैक सामान नेने आएल। गाड़ैक दि‍न तकबए गेल तँ आगूमे भदबा पड़ैत रहए। जोड़-घटाओ करैत आठ दि‍न पछाति‍ बोर करब शुरू भेल। ि‍सर्फ ठीकेदारे टा आएल बाकी सभ काज गामेक मजदूर करत। ओना बोरि‍ंगक काजमे गामक मजदूर अनाड़ि‍ये छल मुदा अनाड़ि‍यो तँ कते रंगक होइ छै। जते काज तते जीवनी तते अनाड़ी। जखने काजक लूरि‍ भऽ गेल तखने जीवनी, जाधरि‍ नै भेल ताधरि‍ अनाड़ी। ततबे नै एक काजक जीवनी दोसर काजक अनाड़ी सेहो होइत। तँए जीवनी-अनाड़ीक भेद करब कठि‍न अछि‍। ओना काजक भीतरो जीवनी-अनाड़ी होइत। जहि‍ना एकपर सए खड़ा अछि‍। कहैले तँ एक पहि‍ल सीमा भेल आ सए दोसर सीमा मुदा दुनूक बीच अंतर ओते अछि‍ जते एक प्रति‍शत आ सए प्रति‍शत। तहि‍ना काजोक अछि‍। एके काजक भीतर सइयो रंगक काजक अंश होएत। कि‍छु अंशक बादे जीवनी मानल जाए लगैत मुदा जीवनी -लूरि‍गर- होइतो पूर्ण लूरि‍गर नै मानल जाएत। पूर्ण लूरि‍गर तखन मानल जाएत जखन काज समए सीमाक भीतर होइत। ओना काजोक सीमाक ि‍नर्धाणरण व्‍यास पद्धति‍क अनुकूल होएत। जँ से नै होएत तँ कि‍छु एहनो काज केनि‍हार होइत जे समयो-सीमासँ पहि‍नहि‍ कऽ लैत आ कि‍छु एहनो होइत जे काज तँ कऽ लैत मुदा समए सीमा टपि‍ कऽ करैत। तँए कि‍ ओकरा अनाड़ी कहल जेतैक। पहाड़ी माटि‍ रहने सबा साए फीट बोर आठे दि‍नमे भऽ गेल। लेयरो बढ़ि‍याँ। चालीस फीट लेयर। ओना जँ नीक लेयर होइत तँ पनरहो फीटमे पाँच हार्स पावरक इंजन पूर्ण पानि‍ दैत, मुदा लेयरोक तँ ठेकान नै। नीक-अधला संगे होइत। कोनो बालु -सौतबी- एहेन होइत जइमे पानि‍क मात्रा पनरह प्रति‍शतक आस-पास होइत आ कोनो एहेन होइत जइमे अस्‍सी प्रति‍शत धरि‍ पानि‍ रहैत। मुदा बरीसलालक बोरक लेयरक स्‍थि‍ति‍ कि‍छु भि‍न्न छल। नि‍च्‍चाक तीस फीट लेयरमे अस्‍सी प्रति‍शत पानि‍ छल आ ऊपरकामे कम। तँए ठीकेदार बाजल- “बरीसलालबाबू, अहाँक तकदीर नीक अछि‍। कहि‍यो बोरि‍ंग भथन नै हएत। कि‍एक तँ तेहेन नि‍चला बालु अछि‍ जे सभ दि‍न पानि‍ दनदनाइते रहत। तँए नीक हएत जे जहि‍ना भीत घरमे ठेमा-ठेमा रद्दा पड़ैए तहि‍ना कि‍छु दि‍न जे बोर ठेमा जाएत तँ धँसना धसैक संभावना समाप्‍त भऽ जाएत। ओना क्रेसि‍ंग-पाइपसँ बोर कएल अछि‍, पाइप लोड करैमे कोनो दि‍क्कत हेबे ने करत, मुदा अहीं हि‍तमे कहै छी।” ठीकेदारक मुँहसँ तकदीर सुनि‍ बरीसलालक मन उधि‍या गेल। ठीकेदारक अगि‍ला बात नीक नहाँति‍ सुनबो ने केलक। अंति‍म हि‍तक चर्च सुनि‍ बरीसलाल बाजल- “ठीकेदार सहाएब, अहाँ कि‍ कि‍यो वीरान थोड़े छी जे अधला करब। अहाँ तँ सद्य: इन्‍द्र भगवान छी, जेमहर ताकि‍ देबइ तेमहर ताड़ि‍ देबै। जेना-जेना अहाँ कहब तेना-तेना करैले तैयार छी।” ठीकेदार- “हमरो गाम गेना बहुत दि‍न भऽ गेल। अखन ऑफि‍सक छुट्टीक काजो ने अछि‍। कि‍एक तँ बोर करैक सीमा जते अछि‍ तइ पूरैमे एकबेर गामसँ घूमि‍ आएब। अहूँक काज नीक हएत आ अपनो काज भऽ जाएत।” कहि‍ ठीकेदार गाम चलि‍ गेल। पनरह दि‍न बीत गेल। जेठ चलए लगल। रोहणि‍ नक्षत्रक आगमन भऽ गेल। संयोगो नीक रहल जे अगते वि‍हरि‍या हाल सेहो भऽ गेल। जहि‍ना भक्‍त भगवानक मि‍लन होइत तहि‍ना बरीसलालक मनमे भेल। अपनो हाथ पानि‍ आबि‍ गेल, ऊपरसँ भगवानो देताह। पानि‍क धनि‍क बनि‍ जाएब। जहि‍ना टि‍कुली अपन पाँखि‍क होश केने बि‍ना हवामे उधि‍आइत ओतए पहुँचए लगल जतए ओकर पाँखि‍ बेकाबू भऽ टुटि‍ जाइत। माि‍टक चुट्टी वा गाछक घोड़नकेँ पाँखि‍ होइते मरैक दि‍न लगि‍चा जाइत, मुदा बूझि‍ नै पबैत तहि‍ना बरीसलालोकेँ हुअए लगल। रोहणि‍या हाल जहि‍ना धरतीक शक्‍ति‍मे नव उर्जा दैत तहि‍ना बरीसलालोक मनमे आएल। पत्नि‍यो आ दुनू बेटोकेँ शोर पाड़लक। तेल वि‍हीन बच्‍चाक मुँह लाली धरैत अनरनेबा जकाँ हरि‍अरसँ लाल होइत जाइत देखलक। तहि‍ना पत्नि‍योक ओ दि‍न मन पड़लै जइ दि‍न हाथ पकड़ि‍ जि‍नगीक भार उठौने रहए। मुदा, कि‍अए ने लोक भार उठाओत? एकटा नव शब्‍द -word- ताधरि‍ संग पूरैत जा धरि‍ ओकर मथन होइत। नै तँ कअए रहत। बड़ीटा दुनि‍याँ छै कतौ बौरु जाएत। पत्नीक नव रूप देखि‍ बेटाकेँ सम्‍बोधि‍त करैत बरीसलाल बाजल- “बौआ, तोरा सभकेँ जहि‍ना कोरा-काँखमे खेलेलि‍यह तहि‍ना हँसी-खुशीसँ जीबैक ओरि‍यान सेहो कऽ देलि‍यह।” पति‍क बात सुनि‍ पत्नी सुशीलालक मन पहाड़क झरनासँ झड़ैत पनि‍क चमकैत रेत जकाँ चमकए लगलनि‍। बजलीह- “सोझे दीक्षा देने नै हाएत। एक-एक दि‍न, एक-एक क्षणक काजक बात बुझा दि‍औ तखन हएत?” अखन धरि‍ बरीसलाल कोट-कचहरी करैत बहुत कि‍छु सीख नेने छल। गाम-गामक खेती-पथारी, गाम-गामक माल-जाल पोसब, गाम-गाम फल-फलहरी, तीमन-तरकारीक खेती, माछ पोसब इत्‍यादि‍ सुनि‍ चुकल छल। जहि‍ना मि‍ड्ल स्‍कूलक बच्‍चा हाइ स्‍कूलमे प्रवेश नव-नव पोथी देखि‍ ललाए लगैत तहि‍ना बरीसलालक दुनू बेटाक जि‍ज्ञासा जगल। जि‍ज्ञासा देखि‍ बरीसलाल बाजल- “बौआ, माटि‍मे धन छि‍ड़ि‍आएल छै, बीछि‍नि‍हार चाही।” अखन धरि‍ दुनू भाँइ आमक टि‍कुलासँ लऽ कऽ पाकल आम धरि‍ बीछि‍ चुकल छल तँए बीछैक बात सुनि‍ जेठका बेटा महावीर पुछलक- “केना बि‍छबै बाबू?” बरीसलाल बेटाक प्रश्न सुनि‍ खुशि‍या गेल। आजुक बेटा जकाँ नै जे नोकरि‍यो करैत आ नोकरो रखैत। जखन अपने काज अछि‍ तखन अपनासँ जे समए बचत सहए ने दोसरकेँ देब। बाजल- “बौआ, अखन तँू सभ भारी काज करै जेकर नै भेलहहेँ। ओना कनी-कनी कऽ हेन्‍डि‍ल मारब सीख हलेबह तँ दमकलो चलाएल भइये जेतह। मुदा जँ दस कट्ठामे सालो भरि‍ तरकारीक खेती करबह तँ ओते कोन परदेशि‍या कमाएत। हँ समए बदलने लोक रंग-बि‍रंगक वृति‍यो बदलि‍ लेलकहेँ। जइसँ कि‍छु अनाप-सनाप सेहो भऽ रहल छै। मुदा बुधि‍क संग पूँजी आ पूँजीक संग बुधि‍ नै चलत तँ अनेरे दब-उनाड़ होइत रहत।” जेठक पूर्णिमा दि‍न बोरि‍ंग लोड भेल। लोड होइसँ तीन दि‍न पहि‍ने अपन ऊषा मशीन आबि‍ गेल रहै। बोरि‍ं लोड कऽ ठीकेदार-मजदूर मि‍लि‍ माछक भोज खा, सोलह घंटा पानि‍ चला काज सम्पन्न केलक। अखाढ़ चढ़ि‍ते मानसून उतड़ि‍ गेल। पहि‍लुके दि‍न एहेन बरखा भेल जे खेत-पथारमे पानि‍ लगि‍ गेल। नीचला खेती बुड़ैक लक्षण धऽ लेलक। तेसरे दि‍न बाढ़ि‍ चल आएल। पोखरि‍-झाखड़ि, चर-चांचर भरि‍ गेल। पानि‍पर पानि‍ आ बाढ़ि‍पर बाढ़ि‍ कते बेर आबि‍ गेल। दहार भऽ गेल। एहेन दहार भेल जे नवान पावनि‍यो लोक बि‍सरि‍ गेल। मुदा काति‍क अबैत-अबैत रब्‍बी-राय छीटब शुरू भेल। गहुमक खोती नै भऽ सकल। अन्नमे गहुमक खेती सभसँ महग खेती होइत। मुदा धान नै भेने कि‍सानक स्‍थि‍ति‍ बि‍गड़ि‍ गेल। एक तँ आेहि‍ना बरीसलालक स्‍थि‍ति‍ दू सालक दौड़-बरहामे वि‍गड़ि‍ गेल तइपर दही आरो बि‍गाड़ि‍ देलक। सालो भरि‍ बोरि‍ंग-दमकल बैसल रहि‍ गेल। तरकारी खेतीक ओहन दशा बनि‍ गेल जे बजार नै। कच्‍चा सौदा, नष्‍ट होएत। देखैत-देखैत सतासीक बाढ़ि‍ आ अट्ठासीक भूमकम आबि‍ गेल। जर-जर बसीसलाल फड़-फड़ करैत फड़फड़ा गेल। तही बीच बैंकक पक्षसँ जमीनक नि‍लामीक नोटि‍श भेटलै। ति‍लकोरक तरूआ जहि‍ना नमहर दोकानमे प्रवेश करि‍ते जीवनोपयोगी वस्‍तु देखि‍ मन उबि‍आए लगैत जे ईहो कीन लेब, आेहो कीन लेब। मुदा पाइयो आ वि‍चारो तँ ओतै रहैए जतए पहि‍नेसँ वि‍चार भेल अबैए। इच्‍छा रहि‍तो कि‍सुनलाल डेरामे डाइनिंग टेबुल नै लगा ओसारेपर अपनो दुनू परानी आ अति‍थि‍यो-अभ्‍यागतकेँ खुअबैत। कम दरमाहा साधारण जि‍नगी। शहरमे रहि‍तो गामक चालि‍-ढालि‍ बेसी, कारणो स्‍पष्‍ट जे शहरी बनैले शहरी जि‍नगी बनबए पड़ैत। जे ओहि‍ना नै पाइक हाथे बनैत। पाइयक काज मुँहसँ थोड़े होइ छै। भलहिं मुँहक आगू पाइक मोल जेहेन होइ। खास्‍ता कचौड़ी मुँहमे लाड़ैत-चाड़ैत गर लगबैत देवकान्‍त बजलाह- “आह, बुझलह कि‍ने कि‍सुनलाल कि‍छु होउ, दुनि‍याँ सात बेर कि‍अए ने उनटै-पुनटै मुदा अपना ऐठाम गामक जे ति‍लकाेरक तरूआ अछि‍, ओकर तुलना कतए हएत?” देवकान्‍त भाइक बात सुनि‍ कि‍सुनलालक मनमे कनि‍यो हि‍लकोर नै उठलै। कि‍एक तँ मनमे यएह नाच होइत रहै जे डेरामे गौआँ एलाहेँ तँए ई नै अजस हुअए जे खेनाइयोमे ठकि‍ लेलक। नीक कि‍ दब भरि‍ पेट कहुना खाथि‍। जँ से नै हेतनि‍ तँ दसठाम बजताह जे खाइयो ले भरि‍ पेट नै देलक। तही बीच मनमे उठलै जे पूछि‍-पूछि‍ खुआएब नीक। जे कम-सँ-कम पहि‍लबेर तँ कहता जे हँ इच्‍छापूर्ण खेलौं आब कने अराम करैक ओरि‍यान करह आ तोहूँ सभ खा-पीअह, काज-उदम देखहक। दैन्‍य दृष्‍टि‍ये देखि‍ कि‍सुनलाल बाजल- “भाय सहाएब, खेबा जोकर बनल छै की नै। कहाँ खाइ छि‍ऐ चारि‍टा आरो नेने आबी?” पहि‍लुक ढकार ढेकड़ैत देवकान्‍त उत्तर देलक- “अँए हौ, तँू हमरा राक्षस बूझै छह जे आगूमे एत्ते वस्‍तु ढेरि‍या देलह हेँ आ तइपर सँ परसन लइले कहै छह?” जहि‍ना डारि‍मे लागल मचकीक पहि‍ल आस होइत तहि‍ना, कि‍सुनलालक मनमे आस जगि‍ते बाजल- “भाय सहाएब, कनि‍ये-कनि‍ये समान सभ परसै ले घरवालीकेँ कहने छलि‍ऐ। जेना-जेना भोजन करैत जेताह तेना-तेना परसि‍-परसि‍ दैत जेबनि‍।” तहसाना जकाँ तहि‍आएल भोजन पाबि‍ देवकान्‍त भाइक मन गदगदाएल। कि‍सुनलालक बात अंतो ने भेल छलै आकि‍ बि‍च्‍चेमे देवकान्‍त बाजि‍ उठलाह- “अँए हौ कि‍सुनलाल, तँू अनठि‍या बूझै छह। अपन घर छी जे खगत आकि‍ बेसी खाइक मन हएत ओ मांगि‍ कऽ लेब। तइले तोरा मनमे कि‍अए होइ छह जे भुखले उठि‍ जाएब। हम ओहन लोक नै ने छी जे खाइओ लेब आ दुसि‍यो देब।” तखने कि‍सुनलालकेँ पत्नी- सिंहेश्वरी हाथक इशारासँ शोर पाड़ि‍ कहलखि‍न- “ति‍लकोरक तरूआ दऽ भैया की कहलखि‍न?” “कि‍अए?” कि‍सुनलाल पुछलक। “ति‍लकोरक साग आ चटनी तँ खाइ छी, बनबैयोक लूरि‍ अछि‍ मुदा तरूआ नै खेने छी।” ओना सिंहेश्वरी देवकान्‍तसँ अढ़ भऽ कहैत मुदा बोलीमे एहेन टाँस देने जे देवकान्‍तो बुझथि‍न। साग आ चटनी सुनि‍ते मनमे उठलनि‍ जे साग तँ कत्ते दि‍न खेने छी। तहूमे जखन पेशाबक गड़बड़ी रहए तँ पथ्‍यमे यएह चलैए। मुदा चटनी तँ नै खेने छी। लाज-संकोच तँ ओकरा ने होइ छै जेकरा बूझि‍ पड़ै छै जे भारी छी। मुदा हम कोन भारी छी जँ भारी रहि‍तौं तँ बुझले रहैत। नै बूझल अछि‍ तँ बूझि‍ लेब कोन अधला हएत। जँ कहि‍यो खाइयेक मन हएत, बुझलेहे ने काज देत। अचार मुँहमे लैत मुँहक कर समेटि‍ कऽ घोटैत बजलाह- “कि‍सुन, ई की कोनो गाम-घर छी जे कनि‍याँ एत्ते संकोच करै छथि‍। एतै आबह कने एकटा बातो बुझैक अछि‍।” देवकान्‍तक बात सुनि‍ कि‍सुनलाल तँ ससरि‍ कऽ लगमे आबि‍ गेल। मुदा सिंहेश्वरी -पत्नी- कि‍छु आगू बढ़ि‍, कि‍छु पाछू दि‍स आबि‍ कऽ ठाढ़ भऽ गेलीह। जहि‍ना कोनो बच्‍चोसँ कोनो गप बुझए बेरमे रंग-रंगक प्रश्न, पूरक प्रश्न पूछि संतुष्‍ट होइत अछि‍। तहि‍ना देवकान्‍तोक मनमे होन्‍हि‍ जे कोनो बात‍ बूझैले सोझा-सोझी नीक होइ छै लजकोटर तँ बहुत बात छोड़ि‍ये दैत अछि‍ आ बहुत बि‍सरि‍यो जाइत अछि‍। दोखाह तँ दुनू भेल। अपनाकेँ नि‍च्‍चा उतरि‍ सिंहेश्वरीकेँ ऊपर चढ़बैत देवकान्‍त कहलखि‍न- “कनि‍याँ आइ ने कि‍सुनलाल दू-पाइ कमाएल हेँ तँ फुलपेंटो पहि‍रने देखै छि‍ऐ, मुदा जखन गाममे छल तखन तँ वएह एकटा चरि‍हत्थी गामछा छै। डाँड़मे लपेटने रहै छल। गप-सप्‍प करैमे कोनो-लाज-धाक नै हेबाक चाही। हम जे बुझै छि‍ऐ से अहूँ पूछू आ जे नै बुझै छि‍ऐ से हमहूँ कि‍अए ने पूछब। तइले लाज-संकोचक कोन काज छै।” कि‍सुनलाल- “भाय सहाएब, कहैले तँ गाममे नै छी मुदा गामे जकाँ एतौ छी। ने ओते कमाइ होइए जे होटल घुमब, ज्‍वेलरी घुमब। बस डेरासँ कारखाना आ कारखानासँ डेरा अबै-जाइ छी। अठबारे -छुट्टी दि‍न- कनी-मनी घूमि‍ लइ छी सेहो पएरे।” पति‍क बात सुनि‍ सिंहेश्वरी पाछूसँ ससरि‍ कनी आगू बढ़ि‍ ति‍रछि‍या कऽ ठाढ़ भऽ बजलीह- “कि‍ कहलखि‍न?” देवकान्‍त- “कहलौं यएह जे ति‍लकोरक चटनी केना बनबै छि‍ऐ?” देवकान्‍तक प्रश्न सुनि‍ सिंहेश्वरी बजलीह- “भैया, हि‍नका कि‍ कोनो नै बूझल हेतनि‍।” देवकान्‍त- “कनि‍याँ, कोनो कि‍ हमरा जँचैक अछि‍, धरमागती कहै छी, नै बूझल अछि‍।” तइ बीच सामंजस्‍य करैत ि‍कसुनलाल बाजल- “भाय सहाएब, ओना हम तरूओ खेने छी, सागो खेने छी आ चटनि‍यो खेने छी। धीया-पुतामे पाकल ति‍लकोरक फड़ सेहो खेने छी। जाबे माए जीबैत रहए ताबे आन दि‍न तँ नहि‍ये मुदा जुरशीतल पाबनि‍मे ति‍लकोरक तरूआ अवस्‍से तड़ए। बड़ खर्चाक चीज छी। ओते खर्च कऽ खाएब असान थोड़े छै।” पति‍क सह पबि‍ते सि‍ंहेश्वरी बजलीह- “भैया, हमर माए-बाप बड़ गरीब छलाह। भरि‍ पेट अन्नो नै भेटैत छलनि‍ तखन जे तरूआ-बगहरूआक सेहन्‍ते करि‍तथि‍ से पार लगि‍तनि‍।” सि‍ंहेश्वरीक बात सुनि‍ मुड़ी डोलबैत देवकान्‍त बजलाह- “हँ, से तँ ठीके। हमहूँ की कोनो बेसी खेने छी। जहि‍या कहि‍यो घरदेखीमे कतौ जाइ छी तखन खाइ छी। सेहो आब उठाबे भेल जाइए। आब तँ सहजहि‍ लोक तेहेन चि‍कनि‍या भऽ गेल जे अल्‍लुऐक पाँचटा पूरा लइए। नवका तूर तँ खाइक कोन गप जे बुझबो ने करैत हेतइ। पात-पुत कहि थोड़े खाएत। अच्‍छा छोड़ू ऐ सभकेँ, असल बात तँ छुटले अछि‍।” वि‍चारक सामंजस्‍य पाबि‍ सि‍ंहेश्वरीक उत्‍साह जगलनि‍, बाजलीह‍- “भैया, साग तँ बुझले हेतनि‍ जहि‍ना कदीमा पात, अड़ि‍कंचन पातकेँ कत्तासँ काटि‍ भुजल जाइ छै तहि‍ना ति‍लकोरो पातक होइ छै।” हूँहकारी भरैत सि‍ंहेश्वरीक बातकेँ मानि‍ देवकान्‍त बजलाह- “हँ-हँ, ति‍लकोरक साग तँ केत्ता दि‍न खेने छी। मुदा चटनी नै।” जहि‍ना नव काज केने, नव जगहपर पहुँचने वा नव लोकसँ दोस्‍ती भेने मनमे खुशी होइत तहि‍ना दस बर्ख पहि‍लुका खेलहाक चरचा करैमे सि‍ंहेश्वरीकेँ सेहो मनमे खुशी उपकलनि‍। मुस्‍कुराइत बजलीह- “भैया, अड़ि‍कंचन पातकेँ कदीमा पात वा आन पातक तरमे दऽ पतौड़ा बना आगि‍मे पकौल जाइ छै, तहि‍ना ति‍लकोरो पातकेँ पकौल जाइ छै। जखन उपरका पात झड़कि‍ जाइ छै तखन बूझि‍ जाइऔ जे ति‍लकोरोक पात सीझ गेल हएत। ओकरा चुल्हि‍सँ नि‍कालि‍ चाहे पानि‍क वर्तनमे दऽ दि‍औ नै तँ कनीकाल सराइले छोड़ि‍ दि‍औ। जखन सरा जाएत तखन ओकरा पतौड़ासँ नि‍कालि‍ सि‍लौटपर थकुचि‍ कऽ पीसि‍ लि‍अ। बहुत मसल्‍लाक काजो नै पड़ै छै। चसगरसँ नून मि‍रचाइ दऽ दि‍औ। बस भऽ गेल। ओना लोक भातोमे खाइए मुदा रोटीक तँ बुझि‍औ जे जहि‍ना भातक दालि‍ तहि‍ना रोटीक ति‍लकोरक चटनी छी।” सि‍ंहेश्वरीक बात सुनि‍ तेसर ढकार ढेकरैत देवकान्‍त लोटा उठा पानि‍ पीबि‍ बजलाह- “कि‍सुनलाल, बहुत खेलि‍अह समानक आगू खेनि‍हार थोड़े ठठत। बड़ ओरि‍यान केने छेलह।” जहि‍ना नीक वि‍द्याथी बोर्ड वा युनि‍वर्सिटीमे टॉप केलोपर झुड़झुड़ाइत जे दुइयो प्रति‍शत नम्‍बर आरो रहैत तँ अस्‍सी प्रति‍शत पूरि‍ जइतए। तहि‍ना कि‍सुनलाल कहलकनि‍- “भाय सहाएब, कनि‍ओ आर खाइऔ।” आग्रह सुनि‍ देवकान्‍त बजलाह- “हम कि‍ कोनो राक्षस छी जे कतबो खाएब तँ पेटे ने भरत। मनुखक जे भोजन छि‍ऐ से तँ खेबे केलौं। तो नै अंदाज केलहक जे लोक कते खाइए। पेटेक कोन बात जे मनो भरि‍ गेल। अच्‍छा एकटा बात कहह जे अपन गौआँ के सभ ऐठाम, बम्‍बइमे रहै छथि‍?” देकान्‍तक प्रश्न सुनि‍ कि‍सुनलाल मने-मन सोचए लगल बम्‍बइ सनक शहरमे के कतए रहैए ई भाँज तँ मात्र दुइये गोटोकेँ रहै छै। पहि‍ल जे काज नै करैए, दोसर जे कोनो कम्‍पनीक एजेंसी करैए। बाकीकेँ कोन जरूरत छै। अठबारे छुट्टी होइए तइमे कि‍ सभ करब। कपड़ा-लत्ता खींचब आकि‍‍ सप्‍ताह भरि‍क अधखड़ुआ नीन पुराएब, आकि‍ दुनू परानी मि‍लि‍ कोनो नव जगह देखि‍ लेब, आकि‍ भेँट-घाँट करब। तखन तँ ओहुना कि‍यो-ने-कि‍यो दर्शनीय जगहपर भेँट-घाँट भइये जाइ छथि‍। गाम-घरक हालो-चाल बूझि‍ लइ छी आ संग मि‍लि‍ चाहो-पान कऽ लइ छी। अपन मजबूरीकेँ छि‍पबैत कि‍सुनलाल बाजल- “भाय सहाएब, अहूँक जेठजन तँ परि‍वारे लऽ कऽ रहै छथि‍, हुनकासँ सभ भाँज लगि‍ जाएत। तखन हम एत्ते जरूर कहब जे जइ करखानामे काज करै छी‍ तइमे तीन गोटे छी। कहैले तँ उठे काज अछि‍ मुदा सभ दि‍न काजो लगैए आ एकेठाम सात दि‍नक पगारो भेटैए। तइमे रवि‍ दि‍नक सेहो भेटैए।” देवकान्‍त- “अझुका तँ छुट्टी लि‍अए पड़ल हेतह?” “कि‍अए छुट्टी लि‍अए पड़त। कोनो कि‍ ओकर दरमाहाबला नोकरी करै छि‍ऐ। अझुका बदला रवि‍ दि‍न काज कऽ देबै। कोनो की स्‍कूल-आँफि‍स छी जे सोलहन्नी बन्न होइए। करखाना छि‍ऐ ने। सभ दि‍न चलि‍ते रहै छै।” “परि‍वार कि‍अए गामसँ लऽ अनलहक ऐठामसँ कमे खर्चमे गामक परि‍वार चलैए?” “भाय सहाएब, अहूँ अनठा कऽ बजै छी। गाम-घरक लोकक कि‍रदानी नै देखै छी जे ताड़ी-दारू पीब-पीब कि‍ सभ कि‍रदानी करैए। अपन इज्‍जत अपने सोझामे नीको होइ छै आ लोक बचाइयो सकैए। तखन देखि‍यौ ज मनमे तँ अछि‍ये जे जखने गाममे रहै जोकर, कोनो काज ठाढ़ करै जोकर पूजी भऽ जाएत चलि‍ जाएब।” “कते महीना बचै छह?” “एते दि‍न तँ बूझू जे कहुना कऽ गुजल केलौं मुदा आब छह माससँ गोटे महीना हजार रूपैया आ गोटे पनरहो सौ बचि‍ जाइए।” “बैंकमे जमा करैत जाइ छह कि‍ने?” “बैक जाएब से छुट्टी होइए। एजेंट-फेजेंट तँ ढेरी अबैए मुदा ओकरा सबहक भाँजमे नै पड़ए-चाहै छी।” “कमो पूजीसँ तँ गाममे काज चलै छै। बि‍नु पूजि‍योक चलै छै।” “हँ से तँ चलै छै। जेकरा अपन कारोबार नै छै ओ दोसराक काज करैए। मुदा देखते छि‍ऐ जे कते बोनि‍ दइ छै। तहूमे आब कहुना-कहुना दुनू परानीमे आठ हजार महीना उठबै छी, ऐठाम महगी अछि‍ तँए कम बचैए। मुदा गाममे तँ कमसँ कम ओते कमाइ हुअए जे जहुना गुजर कटै छी तहुना पूरा सकी।” “अपन कि‍ अन्‍दाज छह जे कते दि‍नमे पूरा लेबह?” “जँ भगवान नि‍केना रखलनि‍ तँ डेढ़-दू साल मे जरूर पूरि‍ जाएत। अहाँ भाय-सहाएब सबहक दोसरे दि‍न-दुनि‍याँ छन्‍हि‍।” भाय सहाएबक नाओं सुनि‍ते जहि‍ना भरल पेटक गरमी होइ छै तहि‍ना देवकान्‍तकेँ फूकि‍ देलकनि‍। मुदा अपनाकेँ सम्‍हारैत बजलाह- “सुथनी भाय-सहाएब। मन भेल जे कनी बमै देखी, दरभंगामे टि‍कट कटेलौं चलि‍ एलौं। तोहर नाओं-ठेकान लऽ लेने रहि‍हह। तँए तोरा डेरापर चलि‍ एलौं। भाइये छि‍आह तँ कि‍ ओइसँ सतरह-बर नीक तँू छह। कम-सँ-कम समाज बूझि‍ तँ सुआगत केलह।” अपन प्रशंसाा सुनि‍ कि‍सुनलाल वि‍ह्वल भऽ गेल। बाजल- “भाय सहाएब, ओते तँ कमाइये ने अछि जे‍ अइल-फइलसँ खर्च करब मुदा समाजक जँ कि‍यो डेरापर औताह तँ अनका जकाँ मुँह नै घुमा लेब।” कि‍सुनलालक सह पबैत देवकान्‍त बजलाह- “कि‍सुनलाल परि‍वारे सभ कोकणि‍ गेल तँ समाज केहेन हएत। मुदा तँए सोलहो आना परि‍वार कोकणि‍ये गेल सेहो बात नइए। जाबे धरतीपर धरम नै छै ताबे चलै केना-ए‍।” कि‍सुनलाल- “भाय सहाएबक भेँट करबनि‍ की नै?” “मन तँ एको पाइ नै अछि‍ मुदा जखन ऐठाम आबि‍ गेलौं तखन नहि‍यो भेँट करब उचि‍त नहि‍ये हएत। तोरा तँ हुनकर मोबाइल नम्‍बर बूझल हेतह कि‍ने?” “हँ से तँ लि‍खल अछि‍। मुदा मोबाइल अपना कहाँ अछि‍?” “बुथपर सँ तोहीं कहि‍ दहुन जे देवकान्‍त गामसँ ऐला अछि‍। जँ गप करए चाहता तँ अपने कहथुन नै तँ जानकारी तँ भेटि‍ये जेतनि‍।” भायपर बि‍गड़ल देखि‍ सि‍ंहेश्वरी देवकान्‍तकेँ पुछलकनि‍- “भैया, एना खि‍सि‍आएल कि‍अए छथि‍न?” देवकान्‍त- “कनि‍याँ, की कहब कहैले तँ पाइ-कौड़ीबला कहबै छथि‍। तहि‍ना घरक घरोवाली छथि‍न। अपना तँ कनी-मनी कुल-खनदानक लाजो होइ छन्‍हि‍ मुदा घरवाली जे छथि‍न से तँ भगवाने देल छथि‍न।‍” सि‍ंहेश्वरी- “जखन अपने नीक छथि‍ तखन हुनका घरवालीसँ कोन मतलब छन्‍हि‍?” देवकान्‍त- “मतलब पुछै छी। की कहब, बजि‍तो लाज होइए जे एके परि‍वारक छी तखन एना कि‍अए बजै छी। मुदा नहि‍यो बाजब सेहो तँ गलति‍ये हएत। अपने जे भाय सहाएब छथि‍ से मरदे-ने-मौगि‍ये, बलि‍गोबना छथि‍। जहाँ कि‍छु बाजए लगताह आ पत्नीक आँखि‍पर नजरि‍ पड़तनि‍ आकि‍ बोलि‍ये बदलि‍ जाइ छन्‍हि‍।” ~ फाँसी काल्हि‍ बारह बजे बलदेवकेँ फाँसी हएत, रेडि‍यो-अखबार कान-कान जना देलक अछि‍। जहि‍ना बलदेव बुझैत तहि‍ना जहलक उत्तराधि‍कारि‍यो बुझैत अछि‍। जहि‍ना बलदेवक परि‍वार बुझैत अछि‍ तहि‍ना सर-समाज, दोस-महि‍म सेहो बुझैत अछि‍। सबहक मन बारह बजेपर अॅटकल। वएह बारह बजे दि‍न वा राति‍ अपन प्रखर रूपमे दि‍शा दि‍स मैदानक रस्‍ता धड़ैत अछि‍। जहलक एक नंबर सेल घर। जे घर ओइ अपराधीकेँ ओइ बीच भेटैत अछि‍ जखन न्‍यायालयसँ फाँसीक ति‍थि‍ ि‍नर्धारि‍त होइत अछि‍। सेलक बुनाबटि‍यो, आन सेलो आ वार्डोसँ भि‍न्न बनल अछि‍। ओना सेलक बुनाबटि‍ वि‍चि‍त्र अछि‍ मुदा आनसँ अलग तँ अछि‍ये। कोठरीनुमा घर, कोठरि‍येक आँट-पेट सेहो अछि‍। एक कोठरी ओहन होइत जे नमहर घरमे बनैत आ एक कोठरी ओहन होइत जे घरे कहबैत अछि‍। एक नंबर सेलो तहि‍ना बनल अछि‍। चि‍मनीक एक नम्‍बर ईंट, क्‍यूल-लक्‍खीसरायक बीचक पथराएल बालु, दू-एक सि‍मटीक जोड़सँ देबाल बनल अछि‍। सात एस्‍क्‍वाइर फुटक घर, जे घरक कोठरीओसँ हीने अछि‍। पौने दू फुट आगूक दरबज्‍जा, खि‍ड़की दरबज्‍जा नै, जे भीतर-बाहर अबैत-जाइत अछि‍। लोहाक बनल केबाड़ लगल अछि‍। शेष कोनो देवालमे ने खि‍ड़की-खोलि‍या अछि‍ आ ने पूब-पछि‍म दि‍शा देखबैक कोनो दोसर साधन अछि‍। एक तँ ओहुना जइठाम सभ कि‍छु -दि‍शा-वोधक- रहैत अछि‍ तहूठाम दि‍शान्‍स लगि‍ जाइ छै। आ पूबकेँ पछि‍म, पछि‍मकेँ पूब कहए लगै छै। जि‍नगीक पूर्ण लीला बलदेवकेँ ओइ कोठरीनुमा घरमे पनरह दि‍नसँ होइत अछि‍। ओना तइसँ पूर्वो -१५ दि‍नसँ पहि‍ने- सेहो सात नम्‍बर सेलमे तीन सालसँ रहैत आबि‍ रहल अछि‍। ओना एक नंबर सेलमे एलापर एतेक सुवि‍धा जरूर भेट गेल छलै जे पहि‍नेसँ नीक भोजन, नीक ओढ़ना-बि‍छौना भेट‍ गेल छलैक। भलहि‍ं घरमे नेहि‍ये बि‍जलीक तार आ ने बाैल लागल मुदा दरबज्‍जा सोझे एहन बाैल लागल छलै जइसँ कोठरि‍योक भीतर इजोत पहुँचैत छल। मुदा कोठरीक बाहर स्‍पेशल सि‍पाहीक बेवस्‍था सेहो भऽ गेलै। बारह बजे राति‍क घंटी टावरक मुरेड़ापर बाजल। राति‍-दि‍नक पाशा बदलैक समए भऽ गेल। जहि‍ना भूत-वर्तमान आ वर्तमान भवि‍ष्‍यमे बदलैत अछि‍ सएह मुहूर्त अछि‍। राति‍-दि‍नक बाट पकड़त मुदा दूत-भूत एतेक प्रबल जे आरो बेसी उग्र बनैत अछि‍। जहि‍ना राति‍क जनमल बच्‍चा दि‍नेक होइत तहि‍ना बलदेवक राति‍ सेहो दि‍ने भऽ गेलै। राति‍-दि‍न भऽ गेलैक आकि‍ नि‍नि‍ये देवी वि‍ध्‍नवादि‍नीक संग डरे पड़ा गेलखि‍न, से नै कहि‍। ओछाइनपर पड़ल बलदेव उठि‍ कऽ बैस कोठरीक चारू देवाल दि‍स तकलक। अन्‍हारमे सभ हराएल बूझि‍ पड़ल, कि‍एक तँ बाहरक बि‍जलीक इजोत सेहो अन्‍हार चद्दरि‍ ओढ़ि‍ ओहन भऽ गेल जे अपनो भरि‍ नै देखि‍ पड़ैत। देह दि‍स तकलक। हाथ-हाथ नै सुझैत‍, बलदेव अजमा कऽ घरक मुँह लग ससरि‍ कऽ पहुँचल। हाथ बढ़ा देखलक तँ बूझि‍ पड़लै जे यएह घरक मुँह छी। घरक मुँह देखि‍ मनमे बि‍सवास जगलै जे ऐठामसँ अन्‍हार-इजोतक सभ कि‍छु देखब। हि‍या कऽ बि‍जली खूॅटामे लटकल बौलपर नजरि‍ देलक। मरि‍याएल इजोत तइपर असंख्‍यो मच्‍छर-माछी जान गमबैले तैयार नाचि‍ रहल अछि‍। खूॅटापर गि‍रगीटक झुंड। मुँह बाबि‍ खाइले तैयार आसन लगौने अछि‍। नि‍च्‍चामे बेंगक जेर कुदैत। तइ बीच मच्‍छरक जेर‍ गीत गबैत फाटक टपि‍ भीतर पहुँचल। मुदा बलदेवक धि‍यान मच्‍छरपर नै गेल। जहि‍ना शरीरमे अनेको रोग रहलापर बड़का रोग छोटकाकेँ चापि‍ रखैत तहि‍ना बलदेव बाहरक मच्‍छरक भोगकेँ दाबि‍ देलक। केना नै दाबैत, जइठाम जि‍नगीक खूनक कोनो महत नै तइठाम मच्‍छर कत्ते पीबे करत। मुदा तहूसँ बेसी बलदेवक मनमे जागि‍ गेल जे जखन बारह बजे अन्‍ते भऽ रहल छी तइ बीच जँ कनि‍यो उपकार दोसरक भऽ जाइ छै तँ ओहो धर्मे छी कि‍ ने? बलदेवक मनमे पनपए लगलै। तखने पएर दाबि‍ सि‍पाहीक झुंड सेलक चारूकात चक्कर कटए लगल। अन्‍हारमे सभ हराएल। पएरक धमकसँ बलदेव बूझि‍ गेल। जहि‍ना गाए-महि‍ंस मनुक्‍खक संग कुत्तो-बि‍लाइक चालि‍ अन्‍हारोमे परेखि‍ लैत तहि‍ना बलदेवो परेखि‍लक। मुदा सभ चुप्प। बलदेवक मनमे उठलै, जब कि‍ बारह बजेमे फाॅसि‍येपर चढ़ब तखन कि‍अए एते ओगरबाहि‍क जरूरति‍ छै। एक तँ ओहि‍ना बड़का छहर-देबालीक बीच जेल बनल छै, तइ बीच वार्ड-सेल बनल छै, तइ बीच एते ओगरबाहि‍क कोन जरूरति‍ छै। मुदा लगले वि‍चार बदलि‍ गेलै। वार्ड सभक कैदी तँ अबैत-जाइत रहैए। सभ दि‍न दू-चारि‍ एबो करैए आ नि‍कलबो करैए। मुदा हम तँ आब नि‍कलि‍ नै पाएब। नि‍कलबे नै करब आ कि‍ जि‍नगि‍ये अंत भऽ रहल अछि‍। आँखि‍ उठा आगू तकलक तँ बूझि‍ पड़लै जे साल-महि‍नाक कोन गप जे मात्र कि‍छु घंटाक लेल छी। जइ दि‍न फाँसीक आदेश न्‍यायालयसँ भेल ओही दि‍न कि‍अए ने फाँसि‍यो भऽ गेल। अनेरे कोन सोग-सन्‍ताप देखै-भोगैले पनरह दि‍न जीआ कऽ राखल गेल अछि‍। मन शान्‍त केलक। शान्‍त होइते, जहि‍ना पोखरि‍क अगम पानि‍केँ पूर्बा-पछबा हवा डोलबैत रहैए तहि‍ना मन डोललै। डोलि‍ते उठलै, फाँसी कि‍अए हएत? प्रश्नपर नजरि‍ अॅटकि‍ते उठलै जे फाँसीपर सपूत-कपूत दुनू चढ़ैए। फेर उठलै जे तइ सपूत-कपूतमे हम की छी? अन्‍हर उठैसँ पहि‍ने जहि‍ना हवा खसि‍ पड़ैत अछि‍, वायुमंडल शान्‍त भऽ जाइत अछि‍ तहि‍ना बलदेवक मन सेहो शान्‍त भऽ गेलै। कोनो तरहक तरंग नै। मुदा लगले मनमे उठलै जे जि‍नगीक अंति‍म सीमापर पहुँच‍ गेल छी। जहि‍ना गामक सीमा टपि‍ते दोसर गाम आबि‍ जाइत अछि‍ तहि‍ना जीवनलोकसँ मृत्‍युलोक चलि‍ जाएब। मुदा एते तँ हेबे करत जे अखन ठेकानल जि‍नगी अछि‍ पछाति‍ बेठेकानलमे पहुँचि‍ जाएब। फेर उठलै, जीवनलोक तँ खाली मृत्‍युक लोक नै छी। जीवनो तँ लोक छी। जहि‍ना कोनो जंगलसँ पड़ाएल जानवर दोसर जंगलक सीमापर पहुँचते चारूकात नजरि‍ उठा कऽ देखैत जे रहै जोकर अछि‍ वा नै, तहि‍ना जीवन-मृत्‍युक सीमापर बलदेवक मन अॅटकि‍ गेलै। धरतीपर जहि‍ना एक-दि‍शासँ दोसर दि‍स बहैत धार रास्‍ताकेँ बाधि‍त कऽ दैत तहि‍ना बलदेवकेँ जीवन धार बाधि‍त कऽ देलक। आगू टपैक आशा नै देखि‍ बलदेव बामा-दहि‍ना दि‍शा पकड़ैत वि‍चार केलक। एक दि‍स पहाड़सँ नि‍कलैत धार धरती टपैत समुद्रमे मि‍लैत तँ दोसर धरती टपि‍ समुद्रमे मि‍लैत। आगू तँ कि‍छु घंटा शेष अछि‍ मुदा पाछू तँ सौंसे जि‍नगी पड़ल अछि‍। कि‍ एक बेरक फाँसी फाँसी, छी आकि‍ फाँस चढ़ल जि‍नगीक फँसरी फाँसी छी। मन ठमकि‍ गेलै। मुदा लगले मनमे उठलै जे गुमसुम भऽ समए काटब नीक नै। कत्तेकाल पहि‍ने बारह बजेक घंटी बजल। जहि‍ना धरतीपर आएल बच्‍चा आस्‍ते-आस्‍ते सकताए लगैत तहि‍ना बलदेवक मन सेहो सकताए लगलै। मन पड़लै पनरह दि‍न पहि‍लुका फाँसीक सजए। मनमे खौंझ उठलै जखन फाँसीक आदेश भेल तखन फेर पनरह दि‍न जहल कि‍अए भेल? कोन अपराधक फल भेटल। जौं ओही दि‍न फाँसी भऽ जाइत तँ पनरह दि‍न जे सोग-सन्‍ताप भेल से तँ नै होइताए। ततबे नै अपनो ऊपर अनेरे भार कि‍अए बढ़ौलक? फेर मनमे उठलै जे अनेरे ओझराइ छी। मन शान्‍त केलक। शान्‍त होइते मनमे उपकलै, सपूत बनि‍ दुनि‍याँ छोड़ब आ कि‍ कपूत बनि‍। कि‍यो हि‍लसैत, पुलसैत दुनि‍याँ छोड़ैए आ कि‍यो वि‍लखैत, डुमैत दुनि‍याँ छोड़ैए। मुदा जे हि‍लसैत-फुलसैत छोड़ैए ओ छोड़ैत कहाँ अछि‍? ओ तँ जीवात्‍माकेँ एहेन चुहुटि‍ कऽ पकड़ैत अछि‍ जे छोड़ौनौं नै छुटैत अछि‍। मुदा हम तँ से नै छी। फेर मन घुमलै। दुनि‍याँ बड़ीटा अछि..,‍ बड़ छोट अछि‍...। बड़ीटा ओकरा लेल छै जे बरी पाबए चाहैए। मुदा बरी तँ भोजोक अंति‍म पराव नै, घरक मध्‍य सेहो छी। तखन कि‍अए ओकरा लि‍अ चाहैए। फेर मन ठमकि‍ गेलै। अनेरे अछाहे कुकुड़ भूकब नीक नै। अपनो तँ संसार अछि‍। जइमे अकास-पताल, चान-सूर्ज, नदी-सरोवर सभ कि‍छु अछि‍। तखन अपन छोड़ि‍ दोसराक देखब अपनासँ दूर हएब हएत। अपन कर्म, अपन धर्मक मर्म बुझब उचि‍त हएत। जाबे से बूझि‍ दुनि‍याँक रंगमंचमे नै उतरब ताबे कौआ कान नेने जाइए, तइ पाछू दौगब हएत। अपन रंगमंच आ अपन अभि‍नय लग अबि‍ते मन ठमकि‍ कऽ ठाढ़ भऽ गेलै। ठाढ़ होइते अनायास मनमे उठलै। अभि‍नाइयो तँ देखि‍नि‍हारोक लेल आ संसारोक लेल रंग-बि‍रंगक, कतेक स्‍तरक होइत अछि‍। मुदा कहल तँ अभि‍नाइये जाइ छै। कि‍यो लीला रचि‍ अभि‍नय करैत, तँ कि‍यो गुण-गुणाइत अभि‍नय करैए। कि‍यो मूक भऽ करैत अछि‍ तँ कि‍यो प्रेमावेशमे करैत अछि‍। केना एकरा बि‍‍लगाएब? एक दि‍स चि‍त्र-वि‍चि‍त्र बनल अछि‍ तँ दोसर दि‍स कुचि‍त्र सेहो बनल अछि‍। ओझराइत मन झमान भऽ झमा उठलै। अनेरे ओझड़ेने समए ससरि‍ जाएत। गनल कुटि‍या नापल झोर जकाँ समए बचल अछि‍, तेकरा जौं ओझरौठेमे राखब सेहो नीक नै। बारह बजेक घंटी कतेखान पहि‍ने बाजि‍ चुकल अछि‍। हाथमे जौं घड़ी रहैत तँ ठीक-ठीक समैयोक बोध होइत, सेहो नहि‍ये अछि‍। जइ दि‍न जेलमे प्रवेश केलौं तेही दि‍न जहलक मुँहपर जमा कऽ लेलक। जइ दि‍न नि‍कलब तइ दि‍न देत। मुदा नि‍कलब कहि‍या? आइ तँ फाँसि‍येपर लटकि‍ जि‍नगीक वि‍सर्जन करब तखन घड़ी केना लेब आ पहि‍र कऽ समए बुझब? मुदा तँए कि‍ जइ गाममे मुर्गी नै रहै छै तइ गाममे भोर नै होइ छै? पाँच-दस मि‍नट आगू-पाछू, अनुमान तँ कऽ सकै छी। मुदा काजक संग जे समए चलैए ओकर अनुभव आ बि‍नु काजक अनुभवोमे तँ अन्‍तर होइते अछि‍। काजक दौड़क अनुभव बेसी बढ़ि‍याँ होइत अछि‍। कि‍एक तँ काजक संग समए सटि‍ चलैत अछि‍। मुदा हमरा तँ सेहो ने अछि‍। बस दू बेर खाइ छी, ढेंग जकाँ ओंघराएल पड़ल रहै छी। कखन जागल रहै छी आकि‍ सूतल रहै छी, से आनक कोन बात जे अपनो नै बूझि‍ पबै छी। पछतेनौं तँ कि‍छु ने भेटत। फेर मनमे उठलै- फाँसी कि‍अए? कि‍छु समए गुम्‍म रहलाक पछाति‍ अनायास मनमे उठलै जौं भक्‍ति‍-भावसँ समए कटने रहि‍तौं तँ हँसी-खुशीसँ चढ़ि‍तौं, से नै केलौं तँ कुहरि‍-कलपि‍ चढ़ब। जहि‍ना शक्‍ति‍क स्रोत ज्ञान छी तहि‍ना ने भक्‍ति‍क स्रोत श्रमो छी। फेर मन ठमकलै। जौं भक्‍ति‍क स्रोत श्रम छी तँ हमहूँ तँ श्रमि‍क छि‍हे। जौं से नै रहि‍तौं तँ एत्ते खेल केना केलौं। अचताइत-पचताइत मुँहसँ नि‍कललै। से तँ जरूर केलौं। एक पसीना पत्‍थर तोड़ैमे चुबैए, दोसर पत्‍थर बनबैमे चुबैए। हँ से तँ दुनूमे चुबैए। मुदा कि‍ दुनूक मि‍ठास एक्के रंग छै? से तँ नै छै। तखन श्रम -सेवा- केकरा कहबै? फेर बलदेवक मन ठमकि‍ नजरि‍ उठा-उठा चौकन्ना होइत चारू दि‍स तकए लगल। मुदा अन्‍हारमे कि‍छु देखबे ने करए। मनमे उठलै, अनेरे श्रमक पाछू बौआइ छी। गेल जमाना फेर नै लौटए। आब तँ जि‍नगीक अंति‍म खाड़ीपर चलि‍ एलौं। ने श्रमि‍क छी आ ने श्रमक सि‍रजन कर्ता। अनेरे अनका पाछू बौआए रहल छी। सभकेँ अपन-अपन जि‍नगी छै। अपन-अपन जगह छै, जे समैयोक आ प्रकृतोक प्रभावसँ प्रभावि‍त होइत रहै छै तँए अपन बात जेना लोक अपने बुझैत अछि‍ तेना आन थोड़े बूझत। चारू दि‍ससँ घुमैत-फि‍ड़ैत मन अपना लग बलदेवकेँ एलै। मनमे खौंझ उठलै। यएह मन छी जेकर कि‍रदानीसँ कि‍यो भगवान बनि‍ जाइए आ कि‍यो हत्‍यारा बनि‍ दुनि‍याँक सोझामे फाँसीपर लटकि‍ जाइए। मुदा कहबै केकरा आ सुनत के? मन ठमकलै। हत्‍यारा के? हत्‍या की? आ के पैदा करैए? जहि‍ना कम माछी-मच्‍छर रहने खेबो काल आ सूतबो काल ओते परेशानी नै होइत जते अधि‍क रहने होइत। बलदेवक मन फेर ओझरा गेलै। ओझरी छुटि‍ते अपनापर ग्‍लानि‍ हुअए लगलै। हमहूँ तँ दुनि‍याँक चुनल अपराधीमे छी। जि‍नगी भरि‍ अपनेमे बेहाल रहलौं मुदा बेहाले केना रहि‍ गेलौं, से कहाँ बूझि‍ पेलौं। जहि‍ना धरतीकेँ बेहाल भेने सृजन शक्‍ति‍ कमि‍ जाइ छै तहि‍ना ने हमरो भेल। मन उफनि‍ गेलै। चि‍चि‍आइत बाजल- “हम अपराधी छी, अपराध केने छी। डकैतीक संग हत्‍या केने छी। अखने हमरा फाँसी हुअए?” पि‍तोक मास्‍चर्य ओइ बेटासँ ओही दि‍नसँ कमए लगै छै जइ दि‍न सुपात्र कुपात्र दि‍स जाइत देखै छै। तहि‍ना बलदेवक कलपैत आत्‍मा मनसँ हटि‍ रहल छै। अनधुन मुँह पटकि‍ रहल छै। अपराधी छी, अपराध केलौं। एक अपराध नै, अनेको, एक दि‍न नै जि‍नगीयो भरि‍। बहुत वि‍लमि‍ कऽ फाँसी भऽ रहल अछि‍। बहुत पहि‍नहि‍ भऽ जाइक चाहै छल। मुदा भेल कि‍अए नै? एकाएक मुँहमे पर्दा लगल हुमड़ैत मन पाछू दि‍स ससरलै। अंति‍म हत्‍या आ डकैतीक फल फाँसी छी, मुदा आरो जे जि‍नगी भरि‍ केलौं, तेकर की‍ भेल? मध्‍यमासक स्‍नान जहि‍ना आन मासक स्‍नानसँ अधि‍क सुन्‍दर, अधि‍क शीतल होइत तहि‍ना जि‍नगीक अपराधक बीच बलदेवक मन अॅटकि‍ गेलै। एक दि‍स जि‍नगी दोसर दि‍स अपराध। शीतल भेल शान्‍त मनमे उठलै, कि‍ हमर जन्‍म अपराधि‍ये बनैक लेल भेल छल जे अपराधीक जि‍नगी बि‍‍तेलौं। मुदा बुझि‍यो कहाँ पेलौं जे अपराध करै छी, अपराधी बनै छी। ओझराइत मनकेँ सोझरबैत बलदेव जि‍नगीक एक-एक दि‍न आ एक-एक घटना मोन पाड़ए लगल। मुँहसँ नि‍कललै- “अपन जि‍नगीक बात जत्ते अपना मनमे अछि‍ ओत्ते थोड़े दोसराकेँ हेतइ। ि‍सर्फ हत्‍ये-लूट टा तँ नै केने छी, माए-बहि‍नि‍क संबंध सेहो तोड़ने छी।” मन कलपि‍ कऽ बजलै- “एकबेर नै हजार बेर फाँसी हेबाक चाही।” मन बेकल हुअए लगलै। केकरा ले केलौं? ई बात मनमे उठि‍ते धि‍यान परि‍वार दि‍स बढ़लै। अंति‍म दि‍न पत्नी आ बेटाक दर्शन हएत? ओ सभ बेचैनीसँ भेँट करए जरूर औत। मुदा कि‍ जहि‍ना परि‍वारमे भेँट होइत छल तहि‍ना हएत? से केना हएत? सि‍पाहीक घेरावंदीमे हम रहब आ ओ सभ हटि‍ कऽ कातमे ठाढ़ रहत। मन घुमलै। अनेरे कि‍अए कि‍यो भेँट करए औत? कोन मुँह देखत आ कोन देखौत। तइसँ नीक जे भने हमहूँ हराएल छी आ ओहो सभ हराएले रहए। दुनि‍याँक सभ तँ नै ने चि‍न्‍हतै-जनतै। जौं समाजमे लोक ओंगरी देखौते तँ समाज छोड़ि‍ दोसर समाजमे चलि‍ जाएत। जखने एक समाजसँ दोसर समाजमे जाइए तखने पछि‍ला समाजक बान्‍ह टूटि‍ जाइ छै। बान्‍हक भीतर बनल समाज अपन हि‍तक बात सौचैए। मुदा समाज तँ समुद्र छी, जइमे घोंघा-घोंघीसँ लऽ कऽ गोहि‍-गमार तक छै। बलदेवक मन ठमकि‍ गेल। जहि‍ना जन्‍म-जन्‍मान्‍तरसँ वा कुरीति‍-कुसमए पाबि‍ बाँसक छाँहमे जनमल लतामक गाछ सेहो समए पाबि‍ कलशि‍ जाइत तहि‍ना बलदेवक मन कलशल। अबोध बच्‍चाक हाथसँ गि‍रल अइना, माए-बापक दुख जकाँ नै मुदा तैयो टुकड़ी बीछि‍-बीछि‍ जोड़ैक कोशि‍श करैत अछि‍ तहि‍ना बलदेवक कलशल मनमे उपकलै। तीन बर्ख जहल एला भऽ गेल। राता-राती घरसँ पकड़ा बन्‍दूकक हाथे जहल आएल रही। नव-नव लोक, नव-नव जगहसँ भेँट भेल। जहि‍ना देशक मि‍थि‍लांचलोक वासी दुनि‍याँक कोण-कोणक बीच बसि‍ अपन पूर्ब परि‍वारक स्‍मरण करै छथि‍ तहि‍ना बलदेवक मनमे परि‍वार सेहो आएल। मुदा लगले जहलक परि‍वार अगुआ गेलै। एक-फाटक टपि‍ दोसरमे घेराएल रही। तलाशीक संग सभ कि‍छु घेरा गेल। बाहरसँ आओत नै अपने घेराइये गेलौं। मुदा तैयो नव-नव चेहरासँ भेँट भेल। भीतर अबि‍ते -वार्डमे- घूस्‍सा-मुक्काक सलामी भेल। जहि‍ना अखड़ाहापर उतरैत खलीफाकेँ पानि‍ उतरए लगैत तहि‍ना उतरल। जि‍नगीक पहि‍ल बेर जहल देखलौं। स्‍वागतक बाद मेट लग पहुँचाओल गेलौं। अखड़ाहा बदलने खलीफाक पानि‍यो बदलि‍ जाइ छै। मुदा.....। मेटक रजि‍ष्‍टरमे नाओं चढ़ि‍ते ढेर हुकुम एक संग उठल। झाड़ू लगबैक ड्यूटी, पैखानामे पानि‍ पहुँचाबैक ड्यूटी इत्‍यादि‍-इत्‍यादि‍। काजक भारसँ मन दबाइत जा रहल छल आ कि‍ मसलनपर पसरल मेटक हुकुम भेल- “एम्‍हर आ, पहि‍ने जाँत तखन दोसर काज हेतइ।” अवग्रहमे फँसल मन हल्लुक भेल। मनमे खुशी उपकल जे कनि‍यो-कनि‍यो कान ऐंठैत तँ काने उखड़ि‍ जइतए। जान बचल तँ लाख उपाइ। एक करोट घूमैत मेटक मैनजन बाजल- “पहि‍ल दि‍न छि‍औ, आइ तोरा खेनाइ नै भेटतौ।” जहि‍ना मुर्दापर अस्‍सी मनसँ नब्‍बे मन जारनि‍ चढ़ि‍ जाइए तहि‍ना चढ़ि‍ गेल। असबि‍सो नै कऽ सकलौं। मुदा तैयो सबुर भेल जे नै खाइले देत, सुतैक तँ जगह भेट गेल कि‍ ने। तइ बीच मैनजनक हुकुम भेल- “कोन केसमे एलेहेँ?” केसक नाओं सूनि‍ मन दलदल भऽ गेल। जहि‍ना सोग-पीड़ामे नोर बहा केकरो सान्‍त्‍वना दैत काल होइत, तहि‍ना। जहलसँ नि‍कलैक आशाक अँकुर बलदेवकेँ जगलै। हलसि‍ कऽ बाजल- “सरकार, डकैती आ खून संगे छै।” डकैतीक संग खून सूनि‍ मेटक मन ठमकल। अधि‍क दि‍नक संगी हएत। तँए दोसति‍ये करब नीक। पड़ले-पड़ल हुकुम चलौलक- “नवका कैदीकेँ खइयो आ सूतैयो ले दि‍हक।” जहि‍ना जि‍नगीक सुख, खाएब-सूतबमे अबै छै तहि‍ना सूतबक आश देखि‍ बलदेवक मनमे खुशी उपकलै। खुशी उपकि‍ते मन बौआए लगलै। तही बीच मेटक मुँहसँ फुटलै- “तेलक शीशी छेबे करौ, काल्हि‍सँ गोदामे सँ लऽ लऽ अनि‍हेँ।” गोदामक नाओं सुनि‍ते वार्डमे गल-गूल शुरू भेल। “नवका कैदीकेँ गोदाम केना जाए देब। ई अन्‍याय छी।” एक कैदी ठीकेदारकेँ पुछलक- “कि‍ बात छि‍ऐ हौ ठीकेदार भैया? एना कि‍अए हड़बि‍र्ड़ो केने छह?” ठीकेदार बाजल- “तूँ अखन तड़ी-घटी नै बुझबि‍ही।” “से कि‍अए हौ भैया, सुनने लोक सुनबो करैए आ नहि‍यो सुनैए। बुझौने लोक बुझबो करैए आ नहि‍यो बुझैए। पहि‍ने बजबहक तब ने?” “रौ बूड़ि‍बक, सभ गप सभठीम बाजब नीक थोड़े होइ छै। नीको अधला भऽ जाइ छै आ अधलो नीक भऽ जाइ छै।” “एकबेर अजमा कऽ देखहक। नरकोमे ठेलम-ठेल करै छह। बहरामे लोक कि‍छु करैए तँ भीतर -जहल- अबैए। ऐठामसँ कतए जाएत। बाजह, तोरा कि‍ बूझि‍ पड़ै छह जे हम ओहि‍ना आएल छी। आकि‍ कि‍छु कए कऽ आएल छी।” ठीकेदारक बढ़ैत संगी देखि‍ कठहँसी हँसि‍ मेट बाजल- “कि‍ रे ठीकेदरबा, कथीक बमकी धेने छौ। सुन....।” एक दि‍सि‍ ठीकेदारकेँ अपन घटैत आमदनी मनमे नचैत तँ दोसर दि‍सि‍ मेटक आदेश। घुसुकि‍ कऽ ठीकेदार लगमे आबि‍ फुसफुसा कऽ बाजल- “मेट भैया, अहाँसँ कि‍ कोनो बात छि‍पल रहैए। बुझि‍ते छि‍ऐ जे दू पाइ बचा कऽ गाम पठबै छी।” ठीकेदारक बातसँ मेटक मनक आगि‍ नै ठंढ़ाएल। मुदा हवाक लहकी जकाँ जरूर लागल। मनमे उठलै दस लंठ तखन ने महंथ, जँ से नै तँ असगर वरसपति‍यो फूसि‍। जहि‍ना गुलाबी लाल आल-अड़हुल बनि‍ जाइत, रंग बदलि‍ अपराजि‍त उज्‍जर-कारी बनि‍ जाइत, दि‍न-राति‍क खेलमे पूर्णिमा अमावस्‍या आ अमावस्‍या पूनो बनि‍ जाइए तहि‍ना बलदेवक मनमे जि‍नगीक जुआरि‍ उठए लगलै। मुदा बि‍ना जारनक आगि‍ जहि‍ना, पि‍यासल बि‍नु पानि‍ जहि‍ना, खेति‍हर बि‍नु खेत जहि‍ना शक्‍ति‍ रहि‍तो हीनशक्ति‍का बनि‍ जाइत अछि‍ तहि‍ना जि‍नगीकेँ सुता कऽ राखब छी। मुदा प्रश्नो तँ अजनव अछि‍। नीक भोजन, नीक नीन इन्‍द्रासनक मुख्‍य द्वार छी, तखन जि‍नगी....? जि‍नगीक आवश्‍यक तत्वमे सूतबो -नीन- तँ अनि‍वार्य छी। तखन अधला केना भेल? मुदा जखन दस कोठरी बहारैक, साफ करैक भार रहत तखन एक्के कोठरी बहारबो तँ उचि‍त नै। मेटक मन ठमकल। ने आगूक बाट देखै आ ने पाछू घूमि‍ ताकब नीक बुझै। मनमे पुन: उठलै, कि‍यो जोग क्रि‍यामे जोगी बनि‍ जोगि‍या जाइत अछि‍, कि‍यो भोगी बनि‍ भोगि‍या जाइत अछि‍ तहि‍ना तँ कि‍यो काजोमे कजि‍या जाइए। मुदा कज्‍जी भेने तँ अबाहो भइये जाइए। जइठाम नि‍रोगक बलि‍ प्रदान होइत तइठाम अबाहक पूछ केतेक? सामंजस करैत मेट भाव-वि‍ह्वल भऽ बाजल- “बौआ ठीकेदार, ई दुनि‍याँ खेल छी। अपना सभ जहलमे तीत-मीठ करै छी, आ कि‍यो खुलल धरती-अकास बीच खूलि‍ कऽ खेलाइए। तइठाम तोहीं कहह जे कि‍ नीक हेतइ?” जहि‍ना चोरोक भरमार अछि‍, कि‍सि‍म-कि‍सि‍मक चाेर अछि‍, तहि‍ना ने एकरंगाहो चोरक भरमार अछि‍। अमती काँटमे ओझराएल जकाँ ठीकेदार ओझरा गेल। जँ चोर चोरि‍ कए कऽ आनए आ जरूरतमन्‍द लोककेँ दऽ दइ तखन ओकरा की कहब? चोरि‍ तँ ओ ने होइत जे चुपचाप आनि‍ चुपचाप रही। जइसँ कि‍यो बुझबो ने करत आ तरे-तर मखड़ैत रहब। ठीकेदारकेँ गुम देखि‍ मेट पुछलक- “गुम कि‍अए छह, ठीकेदार? तोरेपर छोड़ि‍ देलि‍यह जे जे तूँ कहबह सएह करब। जाधरि‍ प्रेम-प्रेमसँ नै मि‍लि‍, आत्‍मा-आत्‍मासँ नै मि‍लि‍, मन-मनसँ मि‍लि‍ कऽ नै चलत ताधरि‍ भरि‍ मन सि‍नेह कतए सि‍ंगार करत।” जबाबक तगेदा सुनि‍ ठीकेदारक मनकेँ नै रहल गेलै बाजल- “मेट भाय, जखन किलो-कि‍लो तेल अहाँकेँ पहुँचैबि‍ते छी, तखन नवका कैदीकेँ कि‍अए गोदाम जाइले कहलि‍ऐ?” “बौआ, मालीमे तेल हथुड़ैत देखलि‍ऐ, तँए बजा गेल।” अपन बढ़ैत पक्ष देखि‍ ठीकेदारक मनमे खुशी पनपल। खुशि‍आएल मन बजलै- “जे आदमी आइये जहल आएल अछि‍, ओकरा सोझे गोदाम पठाएब नीक नै। चोर अछि‍ कि‍ छुलाह अछि‍, से अखन लगले केना बूझि‍ जेबै? जखन हमरे हाथमे गोदाम अछि‍ तखन अहाँकेँ अभाव नै हएत सएह ने?” ठीकेदारक बात सुनि‍ते मेटक मन तीआइर जालमे फँसल माछ जकाँ ओझरा गेल। चोर तँ चोर भेल, मुदा छुलाह कि‍ भेल? मुदा मेट भऽ पूछबो नीक नै। जेकरे हाथ सभ कि‍छु, सएह नै बुझै, मेटक मनकेँ घुरि‍अबए लगल। एते दि‍नसँ जहलमे छी, ठीकेदारक हि‍साबे छुलाहोक संख्‍या कम नै अछि‍, मुदा नै बूझि‍ पेलौं से केहेन भेल? शब्‍दक मोड़ बदलैत मेट पुछलक- “कते रंगक छुलाह जहलमे हएत ठीकेदार?” जहि‍ना नारद धरतीक रि‍पोर्ट अकासमे करैत तहि‍ना ठीकेदार अपनाकेँ महसूस करैत बाजल- “भाय सहाएब, तेहन घुरछी लगल सबाल अछि‍ जे धड़फड़मे छूटि‍ जाएत। तँए वि‍हि‍या कऽ देखए पड़त। पान-सात दि‍नमे पूरा-पूरी कहि‍ देब।” बलदेवक मनमे जहलक पहि‍ल दि‍न नाचए लगलै। पुन: मनमे उठलै, मात्र कि‍छु घंटाक लेल दुनि‍याँमे छी, तखन एक्के दि‍नक काजमे घेराएल रहब नीक नै। मुदा कहबो केकरा करबै आ सुनबो के करत। आगू बढ़ि‍ते मनमे उठलै, जि‍नगीमे जे कि‍छु जे करैए ओ आन देखौ, बुझौ आकि‍ नै देखौ-बुझौ मुदा केनि‍हार तँ जरूर देखबो करैए आ बुझबो करैए। मनमे ग्‍लानि‍ उठए लगलै। जहि‍ना बर्खाक बहैत बुन्नक बेग, घेरामे घेरा जमा हुअए लगैए तहि‍ना जि‍नगीक चलैत चक्रक चालि‍ बलदेबक मनमे समटाए लगलै। कते भारी अपराधी छी जे धरतीक भार बनि‍ गेल छी, जँ हमरा सन अपराधीकेँ फाँसी नै होइ, सेहो अनुचि‍त हएत। मन असथि‍र भऽ गेलै। मनुखे ने मानवो आ दानवो बनैए। दुनि‍याँक ऐ रंगमंचपर कि‍यो वीर बनि‍ तँ कि‍यो कायर बनि‍, पार्ट अदा करैए। मन ठमकलै। पुन: उठलै, जइ धरतीक भार उठबए आएल छलौं ओइ धरतीक भार बनि‍ गेलौं, एना कि‍अए भेल? की जि‍नगी भरि‍ हाथ-पएर मारि‍ रहलौं, सेहो तँ नै अछि‍। चलबैत अाएल छी। तखन भार कि‍अए बनि‍ गेलौं। मन अँटकि‍ गेलै। आइ जरूर बूझि‍ पड़ैए जे जि‍नगी भरि‍ वि‍परीत -बे-पीरि‍त- दि‍शा चलि‍ कुमार्ग पकड़ि‍ लेलौं मुदा से ओइ दि‍न कहाँ बुझलि‍ऐ जे कुमार्ग छी आकि‍ सुमार्ग। काजोमे कतौ बाधा कहाँ उपस्‍थि‍त भेल? जहि‍ना धारक धारा सि‍रासँ भठ्ठा दि‍सि‍ धड़धड़ाइत चलैए मुदा भठ्ठाकेँ सि‍रा दि‍सि‍ ससरैमे सामना करए पड़ै छै। केना-पानि‍ये पानि‍केँ रोकैत रहैए। मुदा बीचमे एकटा तँ होइ छै सि‍रोक पानि‍ आ भठ्ठोक पानि‍ एक-दोसरसँ रोकाइत, ठाढ़ हुअए लगैत अछि‍। ताधरि‍ ठाढ़ होइत जाइत जाधरि‍ धारसँ ऊपर उठि‍ धरतीपर नै छि‍ड़ि‍आए लगैत। मुदा धरति‍योपर तँ दि‍शा अवरूद्ध करि‍ते अछि‍। आइ धरि‍ जे नै बूझि‍ सकलौं ओ अपने केना बूझि‍ पाएब। मुदा नै, जि‍नगीक अंति‍म छोरपर भलहिं सब बात नै बूझि‍ सकि‍ऐ, मुदा कि‍छु नव तँ जरूर बूझि‍ पाबि‍ रहल छी। जँ से नै, तँ कहि‍यो नै बूझि‍ पेलौं जे फाँसी हएत? हमहीं नै सभ एहने वृत्ति‍ करैए, मुदा सभकेँ फाँसि‍ये कहाँ होइ छै। जइठाम पुरजा-पुरजी मनुखक अंग बनल अछि, सभ अंगमे गुण-दोष छै, तइठाम केना जोड़ि‍ कऽ चलाओल जा सकैए। समए पाबि‍ कि‍यो दौड़ए लगैए आ कुसमए पाबि‍ थकथका जाइए। तइठाम सौंसे मनुख बनब, धीया-पुताक खेलौना नै छी। समए अनुकूल बनए-बनबए पड़ै छै, से नै तँ रग्‍गड़मे लोक रगड़ाए कि‍अए जाइए। बि‍सरि‍ गेल बलदेव बारह बजेक फाँसी। मन आगू दि‍सि‍ बढ़लै। जइठाम अधि‍कांश फूल ओहन अछि‍ जे अनेको रंगक होइए। गंध, रूप, अाकार समान रहि‍तो एक-दोसराक अनुकूलो‍ आ प्रति‍कूलो अछि‍। तहि‍ना गुलाबी आ लाल आलो-लाल आ गाढ़ो लाल बनैए तहि‍ना तँ अपराजि‍त करि‍यो बनैए आ उजरो। आ जँ उजरोपर करि‍ये रंग चढ़ि‍ जाए, जेना एक-दोसरपर चढ़ैए। भलहिं थलकमल उज्‍जरसँ लाल भऽ जाए मुदा सभ तँ थलकमले ने छी। जहि‍ना फुलवाड़ी फलवाड़ी वा वंशबाड़ी टहललाक उपरान्‍त छाहरि‍मे बैसैक मन होइए तहि‍ना बलदेवकेँ सेहो भेल। दुनि‍याँक दृश्‍य देखि‍ मन हहि‍आए लगलै। ऐठाम के देत? केकरासँ मंगबै? जँ मंगबो करबै तँ जरूरी नै अछि‍ जे नीके देत। अधलोकेँ नीक कहि‍ दैत अछि‍। जुग-जुगसँ रंग-बि‍रंगक फूल-फलक गाछ रहि‍तो अखनो हराएल अछि‍ आ हराइयो रहल अछि‍। भरि‍सक हराइ-जीताइक खेले ने तँ चलैए। बलदेवकेँ अपने-आपपर शंका उठलै। अखन जहलक सेलमे छी, अकलबेड़ामे फाँसीपर चढ़ब, कहीं बुइधे तँ ने भगंठि‍ रहल अछि‍। भंगठले बुधि‍ ने बताह कहबै छै। मुदा बि‍नु भंगठलोकेँ तँ बताह कहै छै। जहि‍ना धान-रब्‍बीक रग्‍गड़सँ हाँसू मुरछि‍ जाइए तहि‍ना बलदेवक मन मुरछि‍ गेलै। कि‍छु समए नि‍कलि‍ते मनमे उठलै, अझुका बाद के हमरा मन राखत। कोनो कि‍ हम असगरे मृत्‍युदंड पेलौं आकि‍ पबै छी। ि‍कयो गाछपरसँ खसि‍ तँ कि‍यो पानि‍मे डूमि‍, कि‍यो बीखहा दबाइ पीब, तँ कि‍यो वि‍षैला साँपकट्टीसँ....? मुदा हम तँ ओइ सभसँ भि‍न्न छी? दुनि‍याँक बीच अपराधी छी, ओहन अपराधी जेकरा दुनि‍याँ थूक फेक भगबैए। मनमे हुमड़ैत वायुक दरद बूझि‍ पड़लै। केकरा लेल एते अपराध केलौं? कि‍ अपना ले आकि‍ परि‍वार ले। आइ के हमरा संग फाँसीपर चढ़त? जँ अपना ले केलौं तँ कि‍ हाथ-पएर नै अछि‍। मनमे एकाएक समुद्रक शीतल समीरक झटका लगलै। झटका लगि‍ते मुँहसँ नि‍कलए लगलै- ओ फाँसी केहेन होइए, जे हँसैत अपने हाथे गरदनि‍मे लगबैए। ओहि‍ना हँसैत मुँह लोकक सोझामे हँसैत रहैए। आ ओ फाँसी केहेन जेकरा थूक फेक लोक आँखि‍ मूनि‍ लइए। कि‍यो सपूत बनि‍ फाँसीपर चढ़ि‍ अमर ज्‍योति‍ जरबैत अछि‍ आ कि‍यो करि‍आएल इजोतमे अन्‍हराएल रहैत अछि‍। ऐ धरतीपर केकरो संग कि‍यो नै जाइत अछि‍। सभ अपन-अपन स्‍वार्थक पाछाँ रहैत अछि‍। मन ठमकलै। मनमे उठलै, केना नै जाइत अछि‍। आत्‍माक संग आत्‍मा जरूर जाइत अछि‍। नीकक संग नीक आ अधलाक संग अधला तँ जाइते अछि‍। राति‍क अंति‍म पहर। एक दि‍सि‍ राति‍ उसरैक बेर तँ दोसर दि‍सि‍ दि‍न चढ़ैक समए। अर्द्धचेत बलदेवक भक्क तखन पुन: खुजल जखन अन्‍हारमे हराएल परुकी संगीक बीच अपन उपस्‍थि‍ति‍ दर्ज करबाक लेल घूटकल, अवाज देलक। अपन-अपन आवेशी अवाजमे गामसँ अान गाम, आ एकसँ अनेक कि‍सि‍मक गाछपर एक जुटताक अवाज देलक। यएह समए छी जे गौतमो ऋृषि‍केँ चन्‍द्रमा धोखा देलकनि‍। सराप चाहे गौतम जे देलखि‍न मुदा एते तँ भेबे केलनि‍ जे आत्‍मासँ खसि‍ देहलोकमे उतरि‍ गेलाह। चन्‍द्रमामे जखन गहन लगि‍ जेतै तखन अन्‍हारमे धरतीपर केकरा के चि‍न्‍हत? परुकी सबहक अवाज सुनि‍ते बलदेवक मनमे जहि‍ना तरेगन रहि‍तो भुरुकबा तरेगन आल-लाल ज्‍योति‍ धरतीपर हँसैत आबि‍ प्रकाशि‍त करैक परि‍यास करैत, तहि‍ना बलदेवक मनमे सेहो पतराएल प्रकाशक आगमन भेलै। ज्‍योति‍क आगमन होइते उठलै, कोनो कि‍ हमरेटा फाँसी हएत आकि‍ अदौसँ होइते एलै आ भवि‍ष्‍योमे होइत रहतै। मुदा हमरा जि‍नगीमे फाँसी चढ़ैक बाट पकड़ाएल कहि‍या? बलदेव पाछू उनटि‍ ताकए लागल। हम तँ ओइ दि‍न फाँसीक बाट पकड़ि‍ लेलौं जइ दि‍न डगर छोड़ि‍ डगहर पकड़ि‍ लेलौं। डगरक तँ सीमा-सरहद होइ छै, नि‍श्चि‍त जगहसँ नि‍श्चि‍त जगह पहुँचैए, मुदा डगहर तँ से नै होइत। घुरि‍या-फिड़ि‍या बौअबैत रहैए। मनुष्‍यक तँ डगर होइ छै, डगहर तँ पशु लेल होइ छै जे जंगलमे चरैले जाइत छैक। कि‍ हमहूँ पशुए भऽ गेलौं। मुदा पशुओ तँ जीबे छी आ मनुखो जीबे छी। दुनूक बीच आत्‍माक बास होइ छै। मुदा आत्‍माक बास रहि‍तो पशु कहाँ बूझि‍ पबै छै जे हमरा बीच आत्‍माक बास अछि‍। मुदा मनुष्‍यकेँ तँ से नै होइ छै। मनुष्‍ये नै जीव-जन्‍तुओसँ प्रेम करैत अछि‍ आ प्रेम पबैत अछि‍। सहयोगी बनि‍ जि‍नगीमे सहयोगो करैत अछि‍ आ सहयोगक अपेक्षो रखैत अछि‍। जँ से नै तँ ओ अपन रहैक बेवस्‍था कि‍अए ने कऽ पबैत अछि‍। जेकरा रहैक बेवस्‍था नै हेतै तेकरा जि‍नगीक गारंटी कि‍ भऽ सकै छै। भलहिं बौआ-ढहना घास-पात वा अन्‍य भोज्‍य पदार्थ ताकि‍ पेट भरि‍ लि‍अए मुदा मनुष्‍य जकाँ तँ जि‍नगी जीबैक गारंटी नै कऽ सकैए। मनुष्‍य तँ पातालसँ पानि‍ आनि‍ पीब सकैए, धरतीसँ भोज्‍य–पदार्थ उपजा सकैए। फेर मन ठमकलै। सोचती बन्न भेलै! सोचनशक्‍ति‍ रूकलै! जहि‍ना कटल वा टुटल रास्‍ता देखि‍ राही ठमकि‍ जाइत जे ओइ पार केना जाएब। मुदा कटबो आकि‍ टुटबो तँ रंग-बि‍रंगक होइत अछि‍। एक टुटब ओहन होइत अछि‍ जइमे पानि‍-थाल-कीच होइत अछि‍ आ दोसर ओहन होइत जे सुखले रहैत अछि‍। जइमे सावधानीसँ नि‍च्‍चाँ उतरि‍ पार कएल जाइत अछि‍। तहि‍ना तँ पनि‍आएलो-थलाहमे होइत। कतौ अगम होइत कतौ कम होइत जइठाम कम होइत तइठाम कने कठि‍ने सही मुदा पार तँ कएल जा सकैए। मुदा अगममे तँ डुमबोक आ गड़बोक संभावना बनले रहै छै। फाँसी लगा, गरदनि‍ दाबि‍ हमर प्राण लेत, मुदा फँसरि‍यो लगा तँ लोक मरि‍ते अछि‍। एहेन-एहेन परि‍स्‍थि‍ति‍ पैदा कऽ दैत जे बेवस भऽ लोक अपन गरदनि‍मे फँसरी लगा प्राण गमबैत अछि‍। कि‍ ओ अपराधी छी आकि‍ अपराधीक सजा पबैए। जखन ओ अपराधी नै छी, तखन अपराधीक सजा कि‍अए भेटलै? वोनक बाघ सि‍ंह कि‍अए दोसराक प्राण लऽ लऽ खून पीबैए? ओकर कि‍ दोख छै? यएह ने जे ओकरा आगू ओ अब्‍बल अछि‍। फेर मन ठमकलै। कि‍यो इनार-पोखरि‍मे डूमि‍ मरैए, कि‍यो आगि‍, पानि‍-पाथर, वि‍र्ड़ोमे मरैए। ततबे नै कि‍यो गाछपर सँ खसि‍ मरैए, तँ कि‍यो गाछपर चढ़ैत-उतरैत काल खसि‍ मरैत अछि‍। प्रकृति‍क तँ अद्भुत लीला अछि‍। क्षण-क्षण पल-पल बाटो पकड़बैत अछि‍ आ धकेल-धकेल नि‍च्‍चाे करैत अछि‍। ऊपर-नि‍च्‍चाक खाढ़ा बना जीवन-मृत्‍युक सीमा बनोनै अछि‍। एक तँ ओहि‍ना आगि‍मे अगि‍आएल अछि‍, पानि‍मे पनि‍आएल अछि‍, हवामे हवि‍‍आएल अछि‍, तखन केना परेखि‍ पाएब। परखैले जेहेन आँखि‍क इजोत चाही तेहेन ने करि‍आएल बादलमे अछि‍ जे बर्खासँ सि‍क्‍त करत आ ने डभि‍आएल धरतीमे अछि, जे धरतीक परतकेँ तेना सि‍र गछाड़ने अछि‍ जे शक्‍ति‍हीन बना देने अछि‍। सूखल माइक छातीमे दूध कहाँ अछि‍ जे चाहि‍यो कऽ बेचारी दऽ सकती। अन्‍हारो राति‍मे, जखन हाथ-हाथ नै सुझैत, जखन अपन देहो हरा जाइत, देहक सभ अंग नि‍ष्‍क्रि‍य भऽ जाइत, तखनो तँ कि‍छु रहि‍ते अछि‍ जे हँथोरि‍यो-हँथोरि‍ कि‍छु दूर धरि‍ लइये जाइत अछि‍। मुदा हम तँ सोलहन्नी आन्‍हरा गेलौं। जखन पीबैयो बला पानि‍ बसि‍या गेने फेका जाइत, तहि‍ना आइ दुनि‍याँसँ फेका रहल छी। अपन फेकाइत जि‍नगीपर नजरि‍ पड़ि‍ते बलदेवक मन सहमि‍ गेलै। ने आगूक बाट देखै आ ने पाछू घुसुकि‍ पाबए। जहि‍ना जि‍नगीक ओहि‍ मोड़पर कि‍यो चारू दि‍ससँ दुश्‍मनसँ घेरा, हारि‍-जीतक तारतम्‍य नै कऽ पबैत तहि‍ना बलदेव सेहो घेरा गेल। हारि‍यो मानने दुश्‍मनक हाथे प्राण गमेबे करब, तखन प्राणक मोह राखि‍ हारि‍यो मानब उचि‍त नै। तइसँ नीक जे सामना करैत सामनेमे जत्तेकाल ठाढ़ रहब ओत्तेकालक जि‍नगीक महत तँ आरो कि‍छु हएत। मुदा ठाढ़ रहि‍ के सकैए? जेकर शरीर टी.बी., केन्‍सर सन रोगसँ जर्जर भऽ खोखला भऽ गेल रहैए ओ ठाढ़ केना रहि‍ सकैए। पएरमे ओ शक्‍ति‍ कहाँ छै जे ठाढ़ रखतै। बलदेवक मन वि‍चलि‍त भऽ गेलै। कि‍छु क्षण बाद मनमे उठलै, फाँसी तँ पोखरि‍क जाइठ‍ सदृश जि‍नगीक छी। कि‍यो अगम पानि‍मे डुबकुनि‍याँ काटि‍, माटि‍ नि‍कालि‍ जाइठक मुरेड़ापर लगबैए तँ कि‍यो कि‍नछैरे-कि‍नछैरमे पि‍छड़ि‍ कऽ खसि‍, पि‍छड़ैत-पि‍छड़ैत अगम पानि‍मे डूमि‍, सड़ि‍-सड़ि‍ सड़ैनि‍क गंध पसारैत अछि‍। मुदा जि‍नगीक अंति‍म छोड़पर बुझनहि‍ की हुअए? कमसँ कम जँ अपनो लेल केने रहि‍तौं तँ कनैत कि‍अए, हँसैत कि‍अए ने दुनि‍याँ छोड़ि‍तौं। जि‍नगीक अचूक उपाय कहाँ बूझि‍ पेलौं। सूर्योदय भऽ गेल। बलदेवक पत्नी कामि‍नी आ बेटा सुशील गुमसुम भेल अपन-अपन काजमे लागल, मुदा मनमे वि‍चि‍त्र स्‍थि‍ति‍ बनल रहैक। ने सुशील माएकेँ कि‍छु कहैत आ ने माए बेटाकेँ। दुनूक मनकेँ बलदेवक फाँसी भीतरे-भीतर खिंचैत रहए। जइसँ मनक पीड़ा बढ़ैत रहैक। मनक पीड़ा ताधरि‍ बढ़ैत जाधरि‍ ओकरा नि‍कालि‍ दोसरकेँ नै कहल जाइत अछि‍। तखने अकासमे एकटा कौआ बाजल। कौआक बोलमे कामि‍नीकेँ अपशगुन बूिझ पड़लनि‍, मुदा सुशीलकेँ सगुन बूझि‍ पड़ल। गुम्‍मी  तोड़ैत कामि‍नी बाजलि‍- “बौआ, कौआक बोल केहेन ओल सन भेल।” ओना बलदेवक फाँसी दुनूकेँ बूझल, मुदा तैयो मनकेँ फुसलबैत बहलबैत कामि‍नी बजलीह। माइक बेथाकेँ सुशील बूझि‍ गेल, मुदा जि‍नगीमे एहि‍ना सोग-पीड़ा अबै-जाइ छैक। छोटसँ-छोट पीड़ा होय आकि‍ पैघसँ-पैघ होय मुदा समैक संग तँ लोक ससरि‍ये जाइत अछि‍। जइसँ धीरे-धीरे कमैत-कमैत मेटा जाइत अछि‍। जहि‍ना चलैले रास्‍ता चाही, से तँ नीक कि‍ बेजाए अछि‍ये। समाज तँ ओहन समुद्र छी जइमे करोड़ो-अरबो जीव-जन्‍तु स्‍वछंद भऽ जीवन-यापन करैत रहैए, भलहिं एक-दोसराक बाटो घेरैत रहै छै, पकड़ि‍-पकड़ि‍ खेबो करै छै मुदा, तैयो तँ रहबे करैए। नीक कि‍ अधला, मनुख मनुखे बीच रहैत अछि‍। माइक पीड़ाकेँ सुशील भाँपि‍ गेल। मने-मन सोचलक जे एक तँ बेचारीकेँ जि‍नगी भरि‍क संगी छूटि‍ रहल छन्‍हि‍ तइपर जँ हमहूँ ओहने बात कहबनि‍ तँ आरो मनमे धक्का लगतनि‍। चोटपर-चोट लगने आरो अधि‍क वेदनाक अनुभव होइ छै। मुदा जहि‍ना कड़ू लगने लोक पानि‍ पीब कड़ू कम करैए तहि‍ना जे दर्द मेटबैक उपाए करब तँ दर्द आगू नै बढ़ि‍ या तँ ठमकल रहतनि‍ वा कमतनि‍। समगम होइत सुशील माएकेँ उत्तर देलक- “माए, कौआ तँ केहेन सुन्नर बाजल। कबकबाएल कहाँ?” सुशीलक बात सुनि‍ कामि‍नी बजलीह- “आन दि‍न केहेन सुन्नर भि‍नसुरका बोली नि‍कालै छलै आइ केहेन सबसबाएल बोल नि‍काललक।” माइक हृदैक वेदनाकेँ सुशील भाँपि‍ लेलक। ओना मनुष्‍यक हृदैक थाह नै छैक। एक दि‍स रूइयाक फाहा जकाँ बि‍नु हवोक उड़ैए तँ दोसर दि‍स जुआन पति‍, कमाइबला जुआन बेटाक मृत्‍यु, सेहो तँ सहबे करैए। बाट टुटल वा कटल होउ आकि‍ छोटसँ नमहर खाधि‍ होउ, लोककेँ चलैले तँ बाट चाहबे करी। एकठाम बैसलासँ तँ जि‍नगी नहि‍ये चलै छै। कोनो-ने-कोनो उपाए तँ करै पड़ै छैक। कतौ लोक कूदि‍ कऽ खाधि‍ पार करैत अछि‍ तँ कतौ बगलक माटि‍ काटि‍ वा छीलि‍ कऽ ओकरा पहेटि‍ चलैत अछि‍। कतौ एहनो होइ छै जे नमहर टुटान वा कटान रहै छै तँ ओकरा छोड़ि‍ दोसर बाट बना लइए। माइक पीड़ाकेँ कमैत नै देखि‍ सुशीलक मनमे उठल। एक-एक ढेपासँ सेहो बाटक खाधि‍ भरल जाइत अछि‍ आ खाधि‍क हि‍साबसँ चेकान काटि‍ सेहो भरल जा सकैत अछि‍। सुशील बाजल- “माए, हमरा तँ कौआक बोलमे सकुन बूझि‍ पड़ल। जहि‍ना केकरो कोनो वस्‍तु  हरेलासँ दुख होइ छै तहि‍ना ने भेटि‍नि‍हारकेँ खुशि‍यो होइ छै। बीचक वस्‍तु तँ एकेटा रहै छै। एक्के बात वा वस्‍तु एकक लेल नीक अछि‍ तँ दोसराक लेल अधलो भऽ जाइत अछि‍। जीवन रक्षक पति‍यो होइत अछि‍ आ बेटो होइत अछि‍। मुदा एक काज रहि‍तो दुनूक करैक वि‍धि‍मे कि‍छु-ने-कि‍छु अन्‍तर तँ भइये जाइत अछि‍। वएह अन्‍तर तँ एक-दोसराक बीच अन्‍तरो पैदा करैत अछि‍।” सुशीलक वि‍चार कामि‍नीक वि‍चारक सोझा-सोझी ठाढ़ भऽ गेल। कामि‍नीक वि‍चार ठमकलनि‍। एकाएक ठाढ़ भेने जहि‍ना शरीरमे झोंक अबैत छैक तहि‍ना कामि‍नीकेँ एलनि‍। मनमे झोंक लगि‍ते डोललनि‍। डोलि‍ते नजरि‍ एक दि‍स पति‍पर तँ दोसर दि‍स पुत्रपर वि‍भाजि‍त हुअए लगलनि‍। जइ छत्रछायामे अखन धरि‍ रहलौं ओ तँ टूटि‍ रहल अछि‍। मन नि‍राश हुअए लगलनि‍, मुदा लगले आगूमे पुत्र देखि‍ आशा जगलनि‍। पुत्रो तँ पति‍ये जकाँ प्रहरी होइत अछि‍। नि‍राशाक मचकीमे आशाक आश लगलनि‍। हृदय सि‍हरलनि‍। सि‍हरि‍ते पुत्रक प्रति‍ प्रेम जगलनि‍। ओ प्रेम नै जे प्रेम माइक आशामे पुत्रकेँ होइत। बल्‍कि‍ ओ प्रेम जइ आशामे पुत्रक आश्रयमे माए जीबैत छथि‍। जहि‍ना जलसँ जलकण आ ओससँ ओसकण बनि‍ पुन: जल वा ओसक सृजन करैत अछि‍, तहि‍ना। नि‍राश मनमे खुशीक संचार भेलनि‍। संचार होइते खि‍लैत कली जकाँ मन खि‍ललनि‍। जहि‍ना खापड़ि‍मे मकै वा धानक लाबा एक्के-दुइये फुटि‍-फुटि‍ रंग बदलैत तहि‍ना मनक रंग बदलए लगलनि‍। केना लोक कहैए जे कोनो बीआक लेल अनुकूले वातावरण भेटलापर अंकुर होइ छै। अंकुरक लेल तँ वएह वातावरण अनुकूल भऽ जाइत अछि‍ जइ मूलक ओ बीआ आ बीआक गाछ होइत अछि‍। जँ से नै तँ एक दि‍स अगम पानि‍बला समुद्रमे बीआ अकुरि पनि‍गाछक जन्‍म दैत अछि‍ तँ दोसर माटि‍-पानि‍ बीच सेहो दैत अछि‍। ततबे कि‍अए? दोखरा बालुओ आ चखान भेल पाथरोमे तँ कोनो-ने-कोनो गाछक बीआ तँ अकुरिते अछि‍। जखन दुनि‍याँक सभठाम शक्‍ति‍ मौजूद अछि‍ तखन मि‍थि‍लाक भूमि‍ कि‍अए शक्‍ति‍हीन भऽ जाएत। जे बीत भरि‍क पेटक रच्‍छा नै कऽ सकैत अछि‍। जे धरती भि‍खारीकेँ भि‍क्‍क्षु बना सकैए, भोगीकेँ जोगी बना सकैए, ओ जोगीकेँ कि‍अए ने भोगी आ भि‍क्‍क्षुकेँ भि‍खारी बना सकैए। एक नव शक्‍ति‍क उदय कामि‍नीक मनमे भ‍ऽ चुकल छलनि‍। साैंसे धानक लाबा जकाँ मन दू फाँक भऽ गेल छलनि‍। जहि‍ना खापड़ि‍मे एक-फाँक, दू-फाँक, तीन-फाँक होइत लाबा खापड़ि‍सँ उड़ए चाहैत अछि‍, उड़बो करैत अछि‍ तहि‍ना कामि‍नीक वि‍चार उड़लनि‍। मुदा मुँहक बोल सुखा गेलनि‍। कंठक तरास बढ़ए लगलनि‍। मुदा पति‍-पुत्रक बीच चलैत धारमे अपनाकेँ पाबि‍ कामि‍नीक हृदय छटपटेलनि‍। सुशीलक आँखि‍मे आँखि गाड़ैत बजलीह- “बाउ सुशील, अहाँक पि‍ता आ अपन पति‍क तँ अंति‍म दि‍नक क्षण क्षणकि‍ रहल हेताह‍। चलि‍ कऽ आइ दुनू माए-बेटा भेँट कऽ लि‍अनु?” माइक बात सुनि‍ सुशीलक मन ठमकल। केकरो मनमे फुलक वर्षा होइत अछि‍ तँ केकरो पानि‍-पाथर बनल ओला-पाथर बरसैए। मुदा जहि‍ना मरबो दुनू करैए तँ जीबो तँ करि‍ते अछि‍। भेँट करए चालैले माए कहै छथि‍ मुदा कि‍ ई उचि‍त हएत? हम सभ जेबे करब तइसँ कि‍ हुनका भेटतनि? आ हमरे सभकेँ भेटत? अस्‍ताचल गामी सूर्यक लाभ तँ ओकरे भेटैत छै जे उदीयमान अछि‍। जे उदीयमान नै अछि‍ ओकरा लेल तँ जेहने दि‍न तेहने राति‍, तखन अस्‍ताचलक महत्‍वे की? हुनका -पि‍ता- कि‍छु ने भेटतनि‍, भेटतनि‍ वएह जे अपना ले फाँसीपर चढ़ि‍ रहला अछि‍ आ परि‍वारक लेल। जँ परि‍वारक लेल तँ कि‍ अधले काजपर परि‍वार चलि‍ सकैए आ नीक काजपर नै चलि‍ सकैए। जँ चलि‍ सकैए तँ ओ खुद नीक बाट छोड़ि‍ अधला बाटपर चलि‍ अंति‍म दर्शन देखा रहला अछि‍। अंति‍म दर्शन की? यएह ने जे धरतीपर कनैत एलौं हँसैत जाएब आकि‍ जहि‍ना कनैत एलौं तहि‍ना कनैत जाएब, तँ कि‍ एहेन जि‍नगीकेँ सुभर जि‍नगी मानबै? कथमपि‍ नै? जखने घरसँ डेग उठाएब तखनेसँ लोक कहबो करत आ थूकबो करत जे खुनि‍या-अधरमीक बहु-बेटाकेँ देखि‍यौ? नि‍रलज जकाँ केहेन धमौड़ दैत जा रहल अछि‍। माइक प्रश्नक उत्तर दैत सुशील बाजल- “माए, कोन मुँह देखए आ देखबए जाएब। सोझ पड़लापर पि‍ता यएह ने कहता जे अहीं सभले जा रहल छी? मुदा अपना सभ कि‍ पुछबनि?” सुशीलक वि‍चार कामि‍नीक मनमे अभि‍भावकक रूपमे जगलनि‍। जहि‍ना सइयो हाथक लत्ती बि‍ना सहाराक धरतीसँ नै उठि‍ सकैत अछि‍ तहि‍ना ने नारि‍यो अछि‍। डाॅड़मे चोट मारि‍ ने वि‍धातो वि‍धि‍क रचना केलनि‍। बेटाक सहारा देखि‍ कामि‍नीक मनमे अगि‍ला जि‍नगीक आस जगले रहनि‍। वि‍ह्वल भऽ बजलीह- “बेटा, बेटा बनि‍ जँ धरतीपर आबी तँ बेटा कहबैत चली। आब तँ तोंही ने सभ कि‍छु भेलह। वैधव्‍य भेने एक आकुश मात्र लगत। मुदा आरो जि‍नगी तँ संग मि‍लि‍ चलबे करबह कि‍ने, तोहर जे वि‍चार हेतह सएह ने हमरो वि‍चार हएत। कहुना भेलह तँ तूँ पुरुष-पात भेलह? हम कतबो हएब तँ घरे भरि‍ हएब।” माइक बात सुनि‍ सुशीलक मन पसीज गेल। अपन दायि‍त्वक भान भेलै। मुदा लगले मन मुरुछि‍ गेलै। एक दि‍स धरती सदृश नि‍श्चल माए तँ दोसर दि‍स कुकर्मी अपराधी, धरतीक पापात्मा पि‍ता देखए लगल। पि‍ताक प्रति‍ मनक उष्‍मा तेज भऽ गेलै। बाजल- “माए, परि‍वारक बड़का बोझ उतरैक दि‍न........।”‍ सुशीलक बोल बन्न भऽ गेलै। वि‍स्‍मि‍त अवस्‍थामे सुशीलकेँ देखि‍ कामि‍नी बाजलि‍- “सोग नै करह। जइ दि‍नक जे भवि‍तव्‍य छलै ओ भेलै। जहि‍ना जरल-मरल धरती आद्राक बुन्न पाबि‍ ि‍सर्फ जीवि‍ते नै सृजक सेहो बनि‍ जाइत अछि‍। तों तँ सहजे पुरुख छि‍अह। आन के केकरा कहत आ केकर के सुनत। मुदा जहि‍ना तोहर पि‍ता तहि‍ना तँ हमरो पति‍ छथि‍ये। तँए अन्‍ति‍म घड़ीमे श्रद्धापूर्वक स्‍मरण कऽ वि‍सरि‍ जाह। चलह अंगनेक ओसारपर बैस चाहो बना पीब आ गपो-सप करब। दुनि‍याँ कि‍छु कहह, मुदा तोहर मुँह देखि‍ एहेन खुशी भऽ रहल अछि‍ जे जि‍नगीमे कहि‍यो नै भेल छल।” माइक बात सुनि‍ सुशीलक मन ओहि‍ना फड़फड़ा उठल। बाजल- “असगरे लोक जन्‍म लइए आ अपने आशा सभकेँ करैक चाहि‍ये।” बेटाक आस भरल बात सुनि‍ कामि‍नीक हृदए पसीज गेलनि‍। बजलीह- “बौआ, आब तूँ बौआ नै बेटा भेलह। बापक काज कऽ देखि‍ परेखि‍ दुनि‍याँक संग चलैक एक सि‍पाही भेलह। परि‍वार-समाज कर्मभूमि‍ भेलह। ने अनका पढ़ने आनकेँ ज्ञान होइत आ ने अनकर ज्ञान अनका ले सबतरि‍ उचि‍ते होएत। तँए अपन समए, परि‍स्‍थि‍ति‍केँ अॅकैत परि‍वारकेँ आगू मुँहेँ ससारैक तँ भार माथपर आबि‍ये गेल छह। केहेन मनुख बनि‍ धरतीक धारण केलौं, यएह ने जि‍नगीक परीछा छी।” माए-बेटाक बीच जि‍नगी परि‍वारक गप-सपक बीच कामि‍नीक मन कखनो पति‍सँ हटि‍यो जाइत मुदा लगले पुन: आबि‍ मनकेँ पकड़ि‍ लैत। जखन मनसँ हटैत तखन अपनो हाथ-पएर नि‍हारि‍-नि‍हारि‍ देखथि‍ आ सुशीलोकेँ नि‍हारि‍-नि‍हारि‍ देखथि‍। मनमे उठलनि‍ पाँखि‍ तँ टि‍कुलि‍योकेँ होइ छै, अकासमे उड़बो करैए मुदा तँए ओ चि‍ड़ै तँ नै कहाइत। चि‍ड़ै लेल तँ पाँखि‍मे दम चाही। से कहाँ टि‍कुलीमे होइ छै। कनि‍यो कि‍छु होइ छै कि‍ पाँखि‍ टुटि‍ जाइ छै। जइसँ अकास उड़बे बन्न भऽ जाइ छै। तहि‍ना तँ अखन अपनो परि‍वार भऽ गेल अछि‍। हम उमरदार छी तँ घरसँ बहार कि‍छु करबे ने केलौं आ सुशील तँ सहजे कोनो भार बुझबे ने केलक। नै बहराइक कारणो भेल जे अपनाकेँ घरेक सीमामे रखलौं। जे उचि‍तो भेल आ अनुचि‍तो भेल। अर्द्धांगि‍नी होइक नाते जि‍नगीक सभ वृत्ति‍सँ परि‍चि‍त हेबाक चाहै छल से नै भेल। जँ से भेल रहैत तँ जरूर नीक-अधला वृत्ति‍क वि‍चार करि‍तौं। मुदा, अपसोचो केने तँ नहि‍ये कि‍छु हएत। बाजलि‍- “बेटा, जँ ऐ धरतीपर बेटा बनि‍ आबी तँ कि‍छु कऽ देखाबी। जँ से नै तँ बेटाक महत्ते की?” माइक बात सुनि‍ सुशीलक मन नव कलशल टुस्‍सा जकाँ नव रूपमे पनगल। माइक आँखि‍मे आँखि‍ गाड़ि‍ बाजल- “माए, दुनि‍याँमे सभ अपन-अपन भाग-तकदीर लऽ जि‍नगी बनबैत अछि‍। जेहेन जेकर जि‍नगी जीबैक बाट रहै छै तेहेन से भार उठा चलैत अछि‍।” सुशीलक बात सुनि‍ कामि‍नी वि‍ह्वल होइत बजलीह- “बेटा, जहि‍ना एक बेटा बनल-बनाएल परि‍वार-खनदानकेँ नाश कऽ दैत अछि‍ तहि‍ना एक बेटा बनल-बनाएल परि‍वारकेँ उठा ठाढ़ो कऽ दैत अछि‍।” जहि‍ना कल्‍पवृक्षक नि‍च्‍चा बैसि‍नि‍हार बौड़ाइत रहैए तहि‍ना फाँसीपर चढ़ैत बलदेवक परि‍वारक मन बौड़ा रहल अछि‍। असमसान जाइकाल मुर्दाक पाछू कठि‍यारीबला ‘राम-नाम सत् है, सबको यही गत है।’, कहैत चलैत मुदा घुमति‍यो काल जखन कि‍ मुर्दा नै रहैत, वएह कहैत जे ‘राम नाम सत् है, सबको यही गत है।’ भलहिं मृत्‍युक आंगन आबि‍ लोह-पाथर, आगि‍ छूबि‍ बि‍सरि‍ जाइत वा छोड़ि‍ दैत। जइठाम बच्‍चासँ सि‍यान धरि‍ मंत्र जपैत तइठाम एहेन जि‍नगीक दशा कि‍एक? जहि‍ना रस्‍ता चलैत बताह कखनो रस्‍तासँ हटि‍ तँ कखनो सटि‍ ललकारो भरैत आ कखनो असथि‍र भऽ बौको बनि‍ जाइत तहि‍ना माए-बेटाक अर्थात् सुशील-कामि‍नीक मन पि‍ता-पति‍क फाँसीक कि‍छु समए पूर्व पुरबा-पछबा जकाँ रस्‍सा-कस्‍सी करैत। कामि‍नी- “बेटा, तीन गोरेक परि‍वारमे एकक अंत भऽ रहल अछि‍ तैयो तँ दू गोरे बँचलौं। तोहर बि‍आह होइते फेर तीन गोरे भइये जाएब।” माइक बात सुनि‍ सुशील बाजल- “एहि‍ना परि‍वार कम-बेसी होइत एलैए आ होइत चलतै। तइले कत्ते माथ धूनब। तखन तँ एकटा बात बुझए पड़त जे आनकेँ केकर परि‍वारक भार उठबैए, अपन परि‍वारक भार तँ अपने उठबए पड़त।” कामि‍नी- “हँ, ई तँ बेस बजलह।” सुशील- “दुखे कि‍ सुखे परि‍वारक बोझ तँ परि‍वारेक लोककेँ उठबए पड़तै।” सुशीलक बात सुनि‍ कामि‍नीक मन सहमि‍ गेलनि‍। बेटा सहजहि‍ अनाड़ि‍ये अछि‍, अपने कहि‍यो भारे ने बुझलौं। तखन.....? बकार बन्न भऽ गेलनि‍। जहि‍ना भुमकमक समए धरतीक सभ कि‍छु डोलए लगैत तहि‍ना कामि‍नीक भीतर-बाहर डोलए लगलनि‍। धारक बहैत पानि‍मे जहि‍ना पएर असथि‍रो कऽ टपैमे थरथड़ाइत तहि‍ना कामि‍नीकेँ हुअए लगलनि‍। सुशीलोक मन वि‍चलि‍त होइत मुदा मनकेँ थीर करैत बाजल- “माए, प्रश्न तँ छुटि‍ये गेल अछि‍। उत्तर कहाँ देलँह।” सुशीलक प्रश्न मन पाड़ि‍ कामि‍नी बजलीह- “अर्द्धांगि‍नी बनि‍ जइ पुरुखक संग पकड़लौं हुनका चीन्‍हि‍ नै सकलि‍यनि‍। आइ बुझै छी जे पुरुखक भीतर सेहो, पुरुख होइ छै आ नारीक भीतर सेहो नारी होइ छै। जँ से बुझने रहि‍तौं तँ एतेक दूरी नै बनि‍ पबैत। ओना परि‍वारक भीतर अपन भार नि‍माहैमे कहि‍यो कोताही नै केलौं मुदा....। आब उपाऐ कि‍ अछि‍?” बजैत-बजैत कामि‍नी ठमकि‍ गेलीह। जहि‍ना नदी-नालाक पानि‍क बेग आगूमे बान्‍ह  पाबि‍ रूकि‍ जाइत तहि‍ना कामि‍नीकेँ भेलनि‍। सहत बेधल माछ जकाँ छटपटाए लगलीह। छटपटाइत मनमे आबए लगलनि‍, एक दि‍स तत्‍ववेत्ता तात्वि‍क चि‍न्‍तन-वि‍वेचनमे लगल रहैत अछि‍ तँ दोसर दि‍स व्‍यक्‍ति‍-व्‍यक्‍ति‍क बीच सेहो होड़ लगल अछि‍। सभ सभसँ आगू बढ़ए चाहैत अछि‍। जइसँ संगे चलब छूटि‍ जाइत अछि‍। समाज वि‍खंडि‍त भऽ जाइत अछि‍। श्रमि‍क अश्रमि‍कक बीच दि‍शा-दि‍शान्‍तरक अंतर बनि‍ जाइत अछि‍। दुनू माए-बेटा गुमसुम भेल एक-दोसराक मुँह देखैत। गुम्‍मी तोड़ि‍ सुशील बाजल- “माए, तोहर की इच्‍छा छउ?” बेटाक बात सुनि‍ कामि‍नीक मन शान्‍त भऽ गेलनि‍। पति‍क फाँसी मनसँ हटि‍ गेलनि‍। मन पाड़ि‍ बाजए लगलीह- “बेटा, बहुत दुनि‍याँ देखलौं। नाना-नानी, दादा-दादी, बाप-माए, मामा-मामी, केत्ते कहबह। पाछू उनटि‍ तकै छी तँ सभ कि‍छु देखै छी मुदा आगू तकै छी तँ तोरा छोड़ि‍ कि‍छु ने देखै छी। जहि‍ना नमहर गाछ खसि‍ रस्‍ता रोकि‍ दइए तहि‍ना आगू बूझि‍ पड़ैए।” माइक बात सुनि‍ सुशील बाजल- “माए, तोहर जे इच्‍छा छोउ, ओकरा जहाँधरि‍ भऽ सकत पूरबैक कोशि‍श करब। जे धरती छोड़ि‍ चलि‍ गेल, ओ तँ सहजे चलि‍ गेल। ओकरा संग कि‍छु थोड़बे जेतइ। मुदा जे अछि‍ ओकर तँ आशा अछि‍ये।” आशा भरल सुशीलक वि‍चारमे आस लगबैत माए बजलीह- “दुनि‍याँक खेल छि‍ऐ जे एकपर सए ठाढ़ अछि‍ आ कखनो सए सए दि‍सि‍ छि‍ड़ि‍आएल रहैए। तँए सभ कि‍छु बि‍सरि‍ जाह। बीतलाहा काल्हि‍ मन राखह आ अगि‍ला काल्हि‍ ले हाथ-पएर उठाबह।” नअ बजि‍ते जहलक भीतर ओहने चलमली आबि‍ गेल जेहने नमहर बर्खा भेलापर वा भूमकम भेलापर होइत अछि‍। कि‍छु गोटे -सि‍पाही- नहाइ-खाइले गेला। तँ कि‍छु गोटे दस बजे जहलसँ नि‍कलैक कागज-पत्तर सरि‍यबैमे लगि‍ गेला। ओना अनदि‍नासँ ऑफि‍सोक रंग बदलल। जेना घंटा-घंटा भरि‍ ऑफि‍सरक अभावमे गेटपर ठाढ़ भऽ प्रति‍क्षा करए पड़ैत रहैत तेना नै। ऑफि‍स समैयेपर खुजि‍ गेल। केना नै खुजैत, आइ बलदेवकेँ जहलक सजाए जे समाप्‍त भऽ रहल अछि‍। फाँसी तँ जि‍नगीक छी। ि‍सर्फ दूटा सि‍पाही बलदेवकेँ सेलसँ नि‍कालि‍ अग्‍नेयक गाछक नि‍च्‍चामे सबजि‍येपर बैसि‍ गप-सप्‍प करए लगल। तहूमे एक गोटे चीलमक भॉजमे लगि‍ गेल आ दोसर बलदेवसँ गप-सप्‍प करए लगल। मुदा तीनू गोटे माने दुनू सि‍पाही आ बलदेवक मन तीन दि‍स बौआइत ढहनाइत। चीलमक भॉज-भूॅज केनि‍हार -पहि‍ल सि‍पाही- तमाकुलबलापर बि‍गड़ि‍ गरि‍अबैत जे साला सभ पानि‍ छीटि‍ अधलो पत्ताकेँ तेहेन डगडगी आनि‍ दइए जे लेनि‍हारकेँ बूझि‍ पड़ैत जे टि‍पगर अछि‍। मुदा स्‍नो-पोडर लगौलहा मुँह तँ ओतबे काल ने चमकैत जतेकाल ओकरा चमकैक शक्‍ति‍ छै, मुदा तँए की सभ मुँह ओहने होइए जे लगले चमकत लगले दबि‍ जाएत, बि‍लि‍न भऽ जाएत। तमाकुलक तामस सि‍पाहीकेँ आगू बढ़ा सरकार दि‍स‍ लऽ गेल। सरकारपर नजरि‍ पड़ि‍ते हँसी‍ लगलै। बड़बड़ाए लगल- “अजीब मदारी-नाच सरकारो करैए। एक दि‍स‍ तमाकुल खेती करैक लाइसेंस, गुटका बनबैक लाइसेंस दइए आ दोसर दि‍स कैंसर रोगक कारण कहि‍ मनाही करैए। मुदा लगले मन घूमि‍ कऽ अपनापर चलि‍ एलै। तीस बर्खक नोकरीक कमाइ अही-गाॅजा-भॉगमे चलि‍ गेल। जखन रि‍टायर करब, आ आधा दरमाहा भेटत तखन कि‍ करब। एक तँ देहमे कि‍छु ने रहल जे दोसरो काज करब, खेनाइ-पीनाइक अभाव सेहो हेबे करत। तइपर बुढ़ाड़ि‍यो तँ बीमारीक जड़ि‍ये छी, कहि‍यो दाँत टुटत तँ कहि‍यो आँखि‍क इजोत कमत। कहि‍यो कानक बहीर हएब तँ कहि‍यो बातरस ठेहुनमे पकड़त। मुदा अपना वि‍षयमे अपने सोचलौं कहि‍या जे बूझब। सि‍पाही दोसर जे बलदेवक आगूमे बैसल रहए, ओकर मन ि‍भन्ने बौआइत। जहि‍ना शराबीकेँ शराबक बोतल आगूमे अबि‍ते शरावक खुमारी आबि‍-आबि‍ नाचए लगैत तहि‍ना ने मृत्‍यु वा फाँसीसँ पूर्वक क्षण होइत। फाँसीसँ पूर्व धरि‍ ने बलदेव अपराधी छी आ हम ओकर पहरुदार सि‍पाही मुदा कि‍छु काल बाद अर्थात् बारह बजेक पछाति‍ के कतए रहब तेकर कोन ठेकान अछि‍। से नै तँ अखन ने हम सि‍पाही आ ने बलदेव अपराधी। कि केने बलदेव एत्ते पैघ अपराधी भेल आ हम ओकर सि‍पाही छी। बलदेवक मन बीरान होइत ऐ दुनि‍याँकेँ देखैत जे जहि‍ना फलसँ लुबधल आमक गाछ बि‍हाड़ि‍क झोकमे खसि‍ पानि‍ फेरि‍ दैत तहि‍ना ने अपनो आ परि‍वारोकेँ भऽ रहल अछि‍। मुदा आब तँ ने सोचै-बि‍चारैक समए रहल आ ने ओकरा पुरबैक।” तीनू गोटे अपने-आपमे मस्‍त। मुदा जहि‍ना तीर्थस्‍थानमे अनठि‍या यात्री एक-दोसर लग बैसि‍ अबैक कारणो पुछैत आ रस्‍ताक भीड़-कुभीड़ सेहो पुछैत तहि‍ना दोसर सि‍पाही चुप्‍पी तोड़ैत बलदेवकेँ पुछलक- “भाय, आइ तँ फाँसि‍येपर चढ़ि‍ जि‍नगीक अन्‍त‍ करबह। मुदा एकटा बात कहह जे केना-केना करैत एहेन सजाएक भागी भेलह?” सि‍पाहीक प्रश्न सुनि‍ बलदेव मर्माहत भऽ जि‍नगीक समुद्रमे डूमि‍ गेल। जहि‍ना पोखरि‍मे पानि‍क ऊपरक आवाज तँ पानि‍क भीतरोमे पहुँचैत मुदा पानि‍क भीतरक आवाज ऊपर नै अबैत तहि‍ना बलदेवकेँ भेलै। बकार बन्न रहै मुदा कलपैत मन कि‍छु बजैत जरूर रहै। जि‍नगीक समुद्रमे डुमैत बलदेवकेँ, जहि‍ना छठि‍आरीक दूध बच्‍चाकेँ मन पड़ि‍ जाइत छैक तहि‍ना जि‍नगीक ओइ धरतीपर पहुँचि‍ गेल जतए अवोधे नै छेहा अवोध रहैए। मन पड़लै ओ दि‍न जइ दि‍न दोसर बच्‍चाक खेलौना छीनि‍ नुका धेलौं आ माइयो झूठ बाजि‍ लाथ कऽ लेलकै। मन पड़ि‍ते सुबहक सूर्ज जकाँ, लालीसँ दप-दपी चेहरामे आबए लगलै। मुसि‍कि‍याइत बलदेव बाजल- “सि‍पाही भाय, बच्‍चाक ओ दि‍न मनसँ नि‍कलैले छटपटाइए तँए पहि‍ने वएह कहै छी।‍” बलदेवक बात सुनि‍ सि‍पाहीक मन सेहो अपन बालपन आ परि‍वारक बच्‍चापर पड़लै। सड़क नपैत दूरबीन जकाँ कतौ-सँ-कतौ दुनू गोटे नापए लगल। सगतरि‍ बच्‍चे-बच्‍चा देखि‍ पड़ैत। आगूओ बच्‍चा पाछूओ बच्‍चा तइ बीच अपनो दुनू बच्‍चा। बच्‍चाक वनमे दुनू गोटे हरा गेल। हराइते दुनू गोटे सहटि‍ कऽ आरो लग आबि‍ गपकेँ आगू बढ़ौलक। जहि‍ना दुखक नि‍वारण बोल आ नोर दुनूसँ होइत अछि‍ तहि‍ना बलदेव अपन दुखनामा बजैत बाजल- “भैयारी, बच्‍चामे हम दोसर बच्‍चाक खेलौना छीन कऽ चोरा रखलौं। कनैत ओ बच्‍चा आंगन जा माएकेँ कहलक। बच्‍चाक संगे माए आबि‍ पुछलक। नठि‍ गेलौं। मुदा रखैले माएकेँ दऽ देने रहि‍ऐ। माइयो नठि‍ गेल। तेसर दि‍न वएह खेलौना लेने ओकरे आंगन खेलाइले गेलौं। दुनू माए-बेटा चि‍न्‍ह गेल। कहलक तँ कि‍छु नै मुदा चोरबा नाओं राखि‍ देलक।‍” बलदेवक बात सुनि‍ ठहाका मारि‍ सि‍पाही अपन संगी, दोसर सि‍पाही दि‍स इशारा करैत बाजल- “भैयारी, संगी तँ गाजा पीब मस्‍त छथि‍। बचलौं दुइये गोटे, जेकरा सभक राज-पाट छि‍ऐ से सभ अपन सम्‍हारह। तइसँ हमरा की। अच्‍छा तेकर बाद की भेल?‍” सि‍पाहीक बात सुनि‍ बलदेव गुम्‍म भऽ गेल। कने काल गुम रहि‍ बाजल- “ओइ दि‍नक नीक आइ अधला बूझि‍ पड़ैए।‍” बलदेवक उत्तर सुनि‍ चौंकैत सि‍पाही बाजल- “से केना, से केना भैयारी?‍” वि‍स्‍मि‍त होइत बलदेव बाजल- “भैयारी, बात ओतबेपर नै अॅटकल। आगू बढ़ि‍ गेल।‍” “की आगू बढ़ि‍ गेल?‍” “पानि‍ भरैले माइयो इनारपर गेल आ ओहो दुनू माइपूत आएल। आरो गोटे सभ रहए। तइ बीच ओ माएकेँ कहलक, अहींक बेटा हमरा बेटाक खेलौना चोरा लेलक। एतबे बजैत, अँएले, वँएले, पछि‍यामे पजड़ल पसाही जकाँ लगि‍ गेलै। दुनूक बीच कहा-कही शुरू भेल। कहा-कहीसँ गारा-गारी हुअए लगल। जहि‍ना सात पुरुखाकेँ हमर माए उकटए लगलै तहि‍ना ओहो उकटए लगल। तइ बीच एक्के-दुइये आनो-आन कहा-कहीमे शामि‍ल हुअए लगल। हल्‍ला सुनि‍ लोको सभ आबए लगल। जे अबै से कोनो दि‍स सन्‍हि‍या जाए। दू पाटीमे बँटि‍‍ खूब गारि‍-गरौबलि‍ चलए लगलै।‍” बलदेव बात समाप्‍तो नै केने छल आकि‍ बीचेमे दोसर सि‍पाही टोनि‍ देलक- “ई तँ नाहकमे एत्ते बात बढ़ल?‍” “से कि‍ ओतबेपर अॅटकल। आरो बेसि‍या गेल। दुनू दि‍सक गबाही कमलेसरि‍ये माता हुअए लगलखि‍न। कारण जे सभ तँ कानो ने कोनो दि‍सक पाटी बनि‍ झगड़ा, गारि‍-गरौबलि‍मे शामि‍ल रहए।” जहि‍ना फुलाएल पानकेँ मुँह बन्न कऽ आनन्‍द लेल जाइत अछि‍ तहि‍ना आनन्‍द लैत सि‍पाही बाजल- “स्‍त्रीगणेक बीच झगड़ा भऽ कऽ रहि‍ गेल। आकि‍ आगू बढ़ल?‍” सि‍पाहीक प्रश्न सुनि‍ बलदेव बाजल- “मरद स्‍त्रीगणमे कोनो भेद अछि‍। ने मरद‍ मरद जकाँ रहैए आ ने स्‍त्रीगण स्‍त्रीगण जकाँ। मरदो मौगि‍आही चालि‍ पकड़ि‍ मौगी बनि‍ गेल अछि‍ आ मौगि‍यो मरदनमा चलि‍ पकड़ि‍ मरद बनि‍ गेल अछि‍। स्‍त्रीगणक गारि‍-गरौबलि‍ पुरुखक मुँहमे चलि‍ आएल। जहि‍ना एक चम्मच दही तौला भरि‍ दूधकेँ दही बना दइए, जइसँ एक तौलाकेँ के कहए जे कतेको तौला दूध दही बनि‍ जाइए तहि‍ना स्‍त्रीगणक मुँहक गारि‍ पुरुखमे चलि‍ आएल।” सि‍पाही- “‍होतसँ होतान भऽ गेल।” बलदेव- “अँए एतबे भेल, स्‍त्रीगण ने भोरसँ साँझ धरि‍ गारि‍येक माला जपि‍ सकैए मुदा पुरुखमे तँ से नै होइए। एकसँ दू गारि‍ मुँहसँ नि‍कालि‍ते हाथ उठए लगै छै। जखने हाथ उठल आकि‍ दोसर‍पर खसल। सएह भेल।” रस चुसैत सि‍पाही बाजल- “तखन तँ मारि‍ भऽ गेल हएत?‍” सि‍पाहीक जि‍ज्ञासु प्रश्न बलदेवकेँ उत्‍साहि‍त करए लगल। उत्‍साहि‍त होइत बलदेव बाजल- “मारि‍ये भेल की गधकि‍च्‍चनि‍ मारि‍ भेल। मुदा दुनू दि‍स‍ एक रंग नै भेल। हमर दि‍यादी नमहर, तहूमे तेहेन छड़े-छाँट समांग सभ अछि‍ जे देखबोमे राक्षसे जकाँ लगबो करैए। ओकर दि‍यादी छोट माने कम संख्‍याक अछि‍ तँए वएह सभ बेसी मारि‍ खेलक।” सामंजस करैत सि‍पाही बाजल- “‍एतए तँ दुइये गोरे छी, तेसर हमर संगी- पहि‍ल सि‍पही अछि‍, ओ तँ भकुआएले अछि‍। नि‍च्‍चा धरती ऊपर अकास अछि‍। तँए दुइये गोरेक बीच पनचैती करू जे नीक भेल कि‍ अधला?” सि‍पाहीक बात सुनि‍ बलदेव आगू बढ़ैत बाजल- “पनचैती पछाति‍ करब। अखने अगुता गेलौं भैयारी! अखन तँ पेनि‍यो नै छनाएल अछि‍।‍” बलदेवक बात सुनि‍ सि‍पाही घड़ी देखलक। साढ़े नअोए बाजल। एक तँ ओहि‍ना प्रतीक्षाक समए गड़ूगर होइ छै तइपर जहलक बीचक प्रति‍क्षा! समए पाबि‍ सि‍पाही बाजल- “आरो बात अछि‍ भैयारी?‍” आरो सुनि‍ जहि‍ना आदि‍-इत्‍यादि‍ नेनमुँह बच्‍चाकेँ हरा दैत अछि‍ तहि‍ना बलदेव हरा गेल। बाजल- “आरो कि‍ कनि‍ये अछि‍ जे धक दऽ नजरि‍ चलि‍ जाएत। मारे-अमार लगल अछि‍। तइ बीचमे सँ बीछए पड़त कि‍ने। नै तँ ओही नेनमुँह बच्‍चा जकाँ जि‍नगी भरि‍ आदि‍-इत्‍यादि‍ करैत रहब, मुदा ओकरा बीछि‍ नै पएब।‍” बलदेवक थीर वि‍चार सुनि‍ सि‍पाही अपनाकेँ थीर करैत बाजल- “अच्‍छा होउ। अखन दू घंटासँ बेशि‍ये समए अछि‍।‍” दू घंटासँ बेसी समए सुनि‍ बलदेव बाजल- “‍दू घंटामे तँ वि‍द्यार्थी परीक्षा पास कऽ लइए। तइसँ बेसी समए लगने बोर्ड-युनि‍वसि‍टीसँ डि‍ग्री लऽ अबैए। अखन बहुत समए अछि‍।” समए पाबि‍ सपाही जेबीसँ सलाइ-सि‍गरेट नि‍कालि‍ एकटा अपनो आंगुरसँ दबलक आ दोसर बलदेवोकेँ देलक। सलाइ खरड़ि‍ सि‍गरेट सुनगा दुनू पीबए लगल। दुनू मुँहक घुआँ मुँहसँ नि‍कलि‍ते तेना मि‍लैत जाए जे फुटा कऽ देखब असंभव भऽ गेल। मुँहक सि‍गरेट सठि‍ते बलदेब बाजल- “भैयारी, कि‍छु घंटाक मेहमान छी, अहाँ कतए रहब हम कतए रहब तेकर कोन ठेकान। मुदा मनमे जे अछि‍ ओ केकरा कहि‍ सकबै। तँए जाबे एकठीम छी ताबे सुनू। जतए धरि‍ भऽ सकत ओते तँ मन हल्लुक रहत।‍” बलदेवक बात सुनि‍ सि‍पाही बाजल- “जखन सुनै लगलौं तँ सुनाउ, जत्ते सुनाएब सभ सुनि‍ लेब। तहूमे बाल-बोधक गप छी, हम सभ नै सुनब तँ के सुनतै। आखि‍र गारजनो तँ छि‍यन्‍हि‍हेँ।‍” मुस्‍कुराइत बलदेव बाजए लगल- “ठीकसँ मन नइए। मुदा वएह सात-आठ बर्खक रही।‍” बीचेमे सि‍पाही टोकलक- “ने सात ने आठ, साढ़े सात भेल। तइले एत्ते ततमताइ कि‍अए छी।‍” बलदेव- “एते नीक नहाँति‍ मन अछि‍ जे अनका बाड़ीसँ नेबो, दाड़ीम, लताम चोरा-चोरा खूब आनी। पड़ोसि‍येक नेबो बाड़ी हमरा भाँगक चहटि‍ लगौलक।‍” जि‍ज्ञासा करैत सि‍पाही- “से केना, से केना?‍” “बाड़ी-झाड़ी लगबैमे एकटा पड़ोसि‍या बड़ माहि‍र। भरि‍ दि‍न ओही पाछू बेहाल। मुदा गुणो रहनि‍, ने केकरो‍ बाड़ी-झाड़ी जाइसँ रोकथि‍न आ ने सोझामे छुच्‍छे हाथे केकरो घुमऽ देथि‍न। हुनके बाड़ीसँ सभ दि‍न दूटा नेबो तोड़ि‍ ली, आ चौकपर बेचि‍, भांगो आ पानो खा ली। गुजर करै जोकर खेत-पथार तँ नहि‍ये रहए मुदा तैयो सात-आठ मास खेतक उबजासँ गुजर चलि‍ जाए। कट्ठा दसे-बारहेक करीब बटाइयो खेत बाबू करैत रहथि‍। तइ सब मि‍ला साल-माल लगि‍ जाइत छल। ओना साँझू पहर कऽ जे अन्‍ट-सन्‍ट काजो करी आ बजबो करी तइसँ बाबू बूझि‍ गेल रहथि‍ जे छौड़ा बहबाड़ि‍ भेल जाइए। संगति‍ खराब भऽ गेल छै।” सि‍पाही- “बाबू कि‍छु कहथि‍ नै?‍” बलदेव- “कहि‍तथि‍ की माइयक ने दुलारू बेटा रही। जँ कहि‍यो कि‍छु बजौ चाहथि‍ तँ तेना कऽ माए झपटि‍ लन्‍हि‍ जे मुँहे बन्न भऽ जानि‍। अोना भैयारीमे असगरे रही तहूसँ कहि‍यो तेना भऽ नै कहए चाहथि‍।‍” सि‍पाही- “तब की भेल?‍” बलदेव- “एक दि‍न कनी पहि‍ने पि‍सुआ भांगक गोली खा लेलाैं तइपर सँ पान सौ नम्‍मर जरदा देल पान कनी पुष्‍टसँ चढ़ा देलि‍ऐ। घरपर अबैत-अबैत खूब नि‍शां लगि‍ गेल। बाबू दरबज्‍जेपर रहथि‍। कहलनि‍ जे एकटा बात पूछि‍यौ, कहलि‍यनि‍ जे एकटा कि‍अए एक हजार पूछू। हमहूँ हाथि‍येपर सवार रही।‍” हाथीपर सवार सुनि‍ सि‍पाहीकेँ हँसि‍ लगि‍ गेल। हँसि‍केँ सम्‍हारि‍ बाजल- “आ जे हाथीपर सँ खसि‍ पड़ि‍तौं तखन की होइतए?‍” मुस्‍कुराइत बलदेव बाजल- “हद करै छी भैयारी। से जँ बुझैत रहि‍ति‍ये तँ एहि‍ना करि‍तौं। यएह ने नै बुझलि‍ऐ जे केना लोक उट्ठी-बैसी खेल खेलाइए। केना खसलाहा अपनाकेँ चढ़ल बुझैए।‍” सि‍पाही- “बाबू की पुछलनि‍?‍” “पुछलनि‍ जे अन्न-पानि‍ तँ जेना-तेना बटाइयो-खोटाइ कऽ साल-माल लगि‍ये जाइए मुदा दूध-दहीक नसीब नै होइए। दूध-दहीक नाओं सुनि‍ अपनो मन चमकल। कहलि‍यनि‍ से कि‍ कहै छहक। कहलनि‍, एकटा महींस पोसि‍या लऽ लइतौं। आब तोहूँ चरबै-बझबै जोकर भइये गेलह।‍” बीचेमे ि‍सपाही टोनलक- “‍बड़ सुन्‍दर बात कहलनि‍।” बलदेव- “हँ-हँ। से तँ अपनो नीक लागल। मनमे उठल जे जहि‍ना खेतक उबजाक अगो, तीमन-तरकारीक पहि‍ल फड़क हकदार आने होइत तहि‍ना गाए-महींसबला परि‍वारमे डारहीक हकदार तँ धि‍ये-पुते ने होएत। एक तँ डारहीसँ छालही धरि‍, दोसर दूधसँ दही धरि‍क ओरि‍यान हएत। तइपर सवारी बना महींसपर चढ़ि‍ सौंसे गामो घूमब। बि‍नु कि‍छु केनहुँ काजक मोजर सेहो हेबे करत। आ कनी-मनी संगति‍यो मँुहेँ सुनि‍ र्इहो बुझैत‍ रहि‍ऐ जे गजेरी-भंगेरीक पथ्‍य दूधे-दही छी। जँ से नै खाएत तँ उनटे गांजा-भांग खा जेतइ। जानि‍ये कऽ तँ भांग खाइते छी। अहीमे रमल रहै छी। जे काजुल अछि‍ ओ ने काजमे रमैए आकि‍ जे चि‍न्‍तक अछि‍ ओ चि‍न्‍तनमे। मुदा हम तँ तइ सभमे नै छी। जि‍नगी जँ रमता जोगी बहता पानी नै बनल तँ जि‍नगी सराठि‍ये ने भऽ जाइए।‍” चौंकैत सि‍पाही बाजल- “सराठी जि‍नगी केकरा कहै छि‍ऐ?‍” सि‍पाहीक बात सुनि‍ बलदेवकेँ हँसी लागल। जहि‍ना एको दाना नून आकि‍ चि‍न्नी अपन सुआद जना दइए। तहि‍ना बलदेवकेँ अपन ज्ञानक सुआद लगलै। मुस्‍की दैत बाजल- “जहि‍ना धारक पानि‍ ताधरि‍ चलता रहैए जाधरि‍ संगे-संग चलैत रहैए। मुदा जखने कोनो खत्ता-खुत्तीमे फँसि‍ जाइए आ बहाउ रूकि‍ जाइ छै तखन माटि‍क संग सड़ए लगैए। सड़ैत-सड़ैत एत्ते सड़ि‍ जाइए जे नहाइ-पीबैक कोन गप जे अपन सड़नि‍सँ ओहन-ओहन बि‍मरि‍याह कीड़ी सभकेँ जनमबए लगैए जे हाथि‍यो सन-सन जानवर आेइमे फँसि‍ जान गमबैए। महींस चरबै जोकर भइये गेल रही। कि‍एक तँ देखि‍ये जे हमरोसँ छोट-छोट छौड़ा सभ चरबैए। कहलि‍यनि‍ नीक काजमे एक्को दि‍न देरी नै करबाक चाही बाबू। जे देरी करैए वएह पछताइए। बाबूओकेँ गप नीक लगलनि‍। एकटा पोसि‍या महींस लऽ अनलनि‍।‍” महींसक नाओं सुनि‍ सि‍पाही बाह-बाही भरैत बाजल- “जखने कमाइ-खटाइ लोक करए लगैए तखनेसँ अपन धरतीक भार उतारए लगैए।‍” सि‍पाहीक बात बलदेवकेँ नीक लगलै। जहि‍ना एके अन्न पेट भरैक संग-संग मनमे आनन्‍दो दइ छै तहि‍ना बलदेवोक मनमे भेलै। गद-गदाएल बाजल- “असलाहा बात तँ कहबे ने केलौं।‍” कहि‍ चुप भऽ कि‍छु मन पाड़ए लगल। जहि‍ना खि‍स्‍सकरक संग हूँहकारी भरने ओकर उत्‍साह उठैत रहै छै तहि‍ना बलदेवोक उठल। राज-काजसँ हूसल रागी-भोगी जकाँ दोहरबैत बलदेव बाजल- “ओह, सुखक दि‍न चलि‍ गेल। आब थोड़े देखब आकि‍ भोगब। ओ हो हो।‍” दुनूक मनसँ बारह बजेक फाँसी हराएल। एक फाँसी ओहनो होइत जइमे संकल्‍प रूपी कल्‍याणी माइक गोदमे बैसि‍ हँसैत-चढ़ैत दोसर एहनो होइत जे खण्‍ड-खण्‍ड टुटल-छि‍ड़ि‍आएल मन शरीरकेँ छौड़ैत। हूँहकारी भरैत सि‍पाही बाजल- “से की। से की?‍” चानि‍ ठोकैत बलदेव बाजल- “महींससँ दूध-दही हेबे करए। पाँच गोटे एहेन छड़े-छाँट महींसवार रही जे महींस चरा साँझू पहर घुमती काल‍ लोकक खेतक जजातो चरा लि‍ऐ आ धानक महीनामे धानो नोचि‍ लि‍ऐ आ नारो बान्‍हि‍ महींसपर लादि‍ लऽ अनि‍यै। तते अन्न घरमे ढेरि‍या जाए जे खाइक दुखे हरा गेल रहए।” सि‍पाही- “सभ  दि‍न महींसे चरबैत रहलि‍ऐ?‍” आँखि‍-भौं चमकबैत बलदेव बाजल- “हद करै छी अहूँ भैयारी। बुधि‍-बलक संग जि‍नगि‍यो ने घटै-बढ़ै छै। ठीकसँ तँ नै मन अछि‍। मुदा एते मन अछि‍ जे दुरागमन भऽ गेल रहए। बाबूओ मरि‍ गेल रहथि‍। जहि‍ना खेत-पथार बेचि‍ लोक नोकरी करए जाइए तहि‍ना महींस बेचि‍ लेलौं। मुदा पाँचो महींसवारक संबंध आरो बढ़ि‍ गेल। खेनाइ-पीनाइ कथा-कुटुमैतीक संग पनचैती सभ करए लगलौं। गामेमे बहरबैया मालि‍कक जमीनो आ कचहरि‍यो रहए। कचहरीक बराहि‍लसँ दोस्‍ती सेहो भऽ गेल। संजोगो नीक रहल, बराहि‍लगि‍रीक नोकरी भऽ गेल। सए बीघा जमीनक मालि‍क भऽ गेलौं।‍” मालि‍कक नाअों सुनि‍ सि‍पाही बाजल- “तखन तँ मानो-दान हुअए लगल हएत?‍” मानदान सुनि‍ कठ-मुस्‍की दैत बलदेव अपसोच करैत बाजल- “सोझामे जहि‍ना मान-दान बढ़ल परोछमे तहि‍ना गारि‍यो बढ़ि‍ गेल।‍” “से कि‍अए?‍” कि‍छु मन पाड़ैत बलदेव बालज- “करबो तहि‍ना करि‍ऐ। जेना गमैया नेता सभकेँ देखबै जे उपरका नेताक आगूमे जे कि‍छु बाजत आ करत, लोकक बीच उनटि‍ कऽ मुँहो आ चालि‍यो बदलि‍ लेत। तहि‍ना करए लगलौं। मालि‍कक -जमीनदार- आदमीक बीच कि‍छु आ लोकक बीच कि‍छु करए लगलौं।‍” उनटैत-पुनटैत पाशा देखि‍ सि‍पाही बाजल- “से की?‍” बलदेव- “गामक लोककेँ कोनो मोजर दि‍ऐ। अनेरे केकरो गरि‍या देलौं, बलजोरी कोनो चीज लऽ लेलौं। तहि‍ना स्‍त्रीगणो सभकेँ, केकरो कि‍छु कहि‍ दि‍ऐ, केकरो कि‍छु।‍” “कि‍यो जबाब नै दि‍अए?‍” “जबाब कि‍ दइत, जहि‍ना पर्ड़ू खुट्टा देखि‍ चुकड़ै छै तहि‍ना ने रहए। एक दि‍स मालि‍कक धाक दोसर अपन बलउमकी।‍” बीचेमे सि‍पाही बाजल- “की अपन उल-उमकी?‍” “जहि‍ना शरीरेक मुख्‍य अंग आँखि‍यो छी आ कानो छी। मुदा दुनूमे कते अन्‍तर छै से देखै छि‍ऐ। कान बेचारा एहेन सज्‍जन अछि‍ जे नीकसँ नीक आ अधलासँ अधला सुनि‍ कि‍छु नै करैत, मुदा आँखि‍ केहेन लुच्‍चा अछि‍ जे देखि‍ते छि‍ऐ, कखनो ललि‍या कऽ अगि‍या जाइत तँ कखनो कनखि‍या जाइत तँ कखनो गैंचि‍या जाइए। तहि‍ना अपनो अलेल खेने-पीने सदि‍काल रमकी चढ़ले रहैत छलए।‍” सि‍पाहीक मनमे तरंग उठलै। तरंगि‍ कऽ बाजल- “गामक पढ़ल-लि‍खल लोक ऐ बातकेँ नै बुझैत?‍” सि‍पाहीक प्रश्न सुनि‍ बलदेव गुलाबी हँसी हँसि‍ बाजल- “जहि‍ना कृष्‍ण एक दि‍स भदवरि‍या बूझल‍ जाइ छथि‍ तँ दोसर परव्रह्म सेहो छथि‍। मुदा छथि‍न तँ सभ ले। तँए जे जेहेन तेकरा ले तेहन। तहि‍ना वीणा वादि‍नी सेहो ने छथि‍। जेहेन कर्म तेहेन वोध। तही बीचमे ने समाजक पढ़लो-लि‍खल लोक छथि‍। जखन जेहेन तखन तेहेन।” “से केना?‍” ि‍सपाहीक प्रश्न सुनि‍ अपनाकेँ सम्‍हारि‍ बलदेव बाजल- “जहि‍ना काजोमे लोक एहेन रमान रमि‍ जाइए जे खेनाइ-पीनाइसँ लऽ कऽ अपन जि‍नगीक कि‍रि‍या-कलापक संग घरो-परि‍वार बि‍सरि‍ जाइए तहि‍ना दोसर दि‍स बेरागी सेहो ने व्रह्ममे लीन भऽ सभ कि‍छु बि‍सरि‍ जाइए। रमता जोगी तँ दुनू बनि‍ जाइए। मुदा की‍ दुनू एक्के भेल?‍” बलदेवक बात सि‍पाही नै बूझि‍ सकल। बाजल- “कनी फरि‍या कऽ कहि‍यौ।” जहि‍ना कारखानाक बनल कपड़ाक थानसँ दरजी काटि‍-काटि‍ रंग-रंगक वस्‍त्र बनबैत तहि‍ना बलदेव बनबैत बाजल- “देखि‍यौ, सप्‍ताह मास आ सालेक लि‍अ। आइ तारीख एक महीना एक छी। ई दू सालक बीचक सीमानपर अछि‍। एकक अंत दोसराक आरंभ छी। बाकी जते अछि‍ से सभ कचि‍या अछि‍। जेना मासक भीतर बाइस दि‍नकेँ कि‍ कहबै? तहि‍ना सप्‍ताहक भीतर पाँच दि‍नकेँ की कि‍ कहबै?‍” बलदेवक बात सुनि‍ सामंजस करैत सि‍पाही बाजल- “खैर, छोड़ू दुनि‍यादारीकेँ। ठनका ठनकै छै तँ कि‍यो अपना माथपर हाथ दइए।‍” सि‍पाहीक बात अन्‍तो नै भेल छल कि‍ बीचेमे बलदेव बाजल- “भैयारी, आइ बूझि‍ पड़ैए जे गलती नै भेल गलति‍क बाटे पकड़ा गेल।‍” चौंक कऽ ि‍सपाही बाजल- “से की! से की?‍” उदास होइत बलदेव बजए लगल- “भैयारी, कहैले तँ जते मुँह तते बाट अछि‍। जँ से नै रहैत तँ हृदैसँ नि‍कलि‍ दोसर हृदैमे सटैत केना अछि। मुदा ओते कहैक अखन समए नइए। तँए एतबे कहब जे मनुष्‍यक बीच दू रास्‍ता बनल अछि‍। एक रास्‍ताकेँ लोक‍ मनुखक रास्‍ता बूझि‍ केकरो कि‍यो चलैसँ रोकैत नै अछि‍ आ दोसर अछि‍ जे अपना छोड़ि‍ दोसरकेँ मनुख बुझि‍ते ने अछि‍। रास्‍तासँ हटि‍ जहि‍ना जंगल-झाड़मे चलैत-चलैत डगर बनि‍ जाइ छै, तहि‍ना डगर धड़ा देने अछि‍।‍” जहि‍ना लोहाक कोनो औजार जखन भोति‍याए लगैत तखन कारीगर ओकरा आगि‍मे धीपा, पीटि‍ पानि‍मे पनि‍या दैत, जकरा पानि‍ चढ़ब कहल जाइ छै। तहि‍ना या तँ पाथरपर पानि‍ दऽ दऽ रगड़ि‍ सान चढ़बैए तहि‍ना सि‍पाहीक कारीगर सि‍गरेट पीबाक इच्‍छा जगौलकनि‍। जेबीसँ सि‍गरेट नि‍कालि‍ एकटा अपनो संगी -जे गांजा पीब मस्‍त भऽ सुनैत छल- केँ आ एकटा बलदेवो हाथमे दैत सलाइ खरड़लक। एक दम पीब पहि‍ल सि‍पाही धुँआ फेकैत बाजल- “अनेरे अहाँ दुनू गोरे मगजमारी करै छी। एते छि‍लनि‍ करैक कोन बेगरता अछि‍। देखबै जे भोजमे दर्जनो समान रहने खेनि‍हार एक-दूटा पर चोट करैए। परसनि‍हारक काज छि‍ऐ पूछि‍-पूछि‍ देनाइ। खेनि‍हारक मन छि‍ऐ जे खाएब कि‍ नै। आइ जइ गति‍क फल पबए चलब से केना भेल?‍” सि‍पाहीक प्रश्नसँ बलदेवकेँ दुख नै भेल। संगीक एहसास भेल। जहि‍ना जुआन-जहानकेँ सासुरक रंगोली कथा संगीकेँ सुनबैत आनन्‍द अबैत तहि‍ना बलदेवकेँ भेल। दुखो तँ दोसरकेँ कहने कमैए। जँ से नै तँ नोरक संग कि‍यो कि‍अए अपन पति‍-वि‍योगक खेरहा सुनबैए। बात मन पाड़ैक समए बनबैत बलदेव बाजल- “भाय सहाएब, औझुका खुशी सन जि‍नगीमे कहि‍यो खुशी नै भेल छल।‍” सि‍पाही- “से की?‍” बलदेव- “अपन बेथा-कथाकेँ जँ एकोटा सुनि‍नि‍हार भेट जाए‍ तँ आेइसँ नीक की हएत। तहि‍ना हृदैक वेदना जँ अहाँ सुनए चाहलौं तँ जि‍नगीक अंति‍म दि‍नक अंति‍म पहरमे सीढ़ीक अन्‍ति‍म पौदानक बात कहए चाहै छी।” बलदेवक वि‍चार सुनैक खुशीमे सि‍पाही वि‍ह्वल भऽ बाजल- “जहि‍ना भतभोजक अंति‍म वि‍न्‍यास चीनी होइत तहि‍ना जँ अहाँक मधुर वाणी वाणीक -अपन वाणी- संग मि‍लत तखने ने मि‍श्री बनि‍ पाथर सदृश सक्कत हएत। यएह ने जि‍नगीक ओर-छोर छी।‍” सि‍पाहीक बात सुनि‍ दोसर सि‍पाही बाजल- “भैया, अहाँ भकुआएल मने भकुआ लगा देलि‍ऐ आ भकुआ गेलौं।‍ कनी चि‍क्कन जकाँ कहि‍यौ।‍” सि‍पाहीक बात सुनि‍ पहि‍ल सि‍पाही बाजल- “सभ दि‍न तँ दस कि‍लोक बन्‍दूक कन्‍हामे लटकौने रहै छह, तखन फुलसन वि‍चार पाथर सन भारी कोन कान्‍हमे लटकेबह। वहि‍ना तँ कान्‍ह बदलि‍ दुनू कान्‍ह भकभकाइत रहै छह तखन माटि‍ तँ माटि‍ये छी।” सि‍पाही- “कनी फरि‍छा कऽ कहि‍यौ।” सि‍पाही- “देखहक जहि‍ना ई दुनि‍याँ माटि‍क बनल अछि‍ तहि‍ना ने ई देहो माटि‍येक छी। तँए देह बुझैले माटि‍ बुझए पड़तह। रंग-रंगक माटि‍सँ ई दुनि‍याँ बनल अछि‍। एकर गि‍नती करब साधारण नै। जहि‍ना देखबहक जे साते रंग तते रंग बनि‍ गेल अछि‍ जे डोराक दोकान, जे साइयो रंगक डोरा बेचैए तेकरो दोकानपर दर्जी घूमि‍ जाइए जे ऐ रंगक डोरा नइए। तहि‍ना माटि‍यो अछि‍। एक माटि‍ थाल बनबैए तँ दोसर चि‍क्कन। ततबे नै एक पाथर सन सक्कत पत्‍थर बनबैए तँ दोसर पानि‍ सनक वस्‍तुकेँ पैदा करैबला लेयर -जल मि‍श्रि‍त माटि‍-। अच्‍छा छोड़ह अपना सभ गप। बेचारा बलदेवक अंति‍म समए गुजरि‍ रहल अछि‍ तँए पहि‍ने ओहि‍ना सूनब होएत जहि‍ना सूर्यास्‍तक समए कोनो दूर जाइत बटोही अनभुआर जगहपर आबि‍ अॅटकैक ओरि‍यान करए चहैत। पहि‍ने अहाँ अपन बात वि‍सर्जन करू बलदेव भाय तखन जे हेतै से हेतै। जे जीबए से खेलए फागु, जे मरए से लेखे जागु।‍” अंति‍म तीर नि‍कलैत जहि‍ना हजारो वाणसँ वेधल ति‍राएलक हृदए सुखसागरक घाटपर पहुँचि‍ हि‍यबैत जे सभसँ सुन्नर जल कोनठाम छै, जइठाम स्‍नान करब। जाधरि‍ पवि‍त्र पानि‍सँ पथ नै पखारब ताधरि‍ पएर पि‍छड़ि‍ते रहत। जाधरि‍ पएर पि‍छड़ैत रहत ताधरि‍ सोझ भऽ चलि‍ नै सकै छी। जाधरि‍ सोझ भऽ ठाढ़ नै भऽ पएब ताधरि‍ कमलासन देखि‍ नै पएब। जाधरि‍ कमलासन देखि‍ नै पएब ताधरि‍ रंग बदलैत कमल कुमुदनीक संग भौराकेँ पराग-जालमे ओझरा लाल-उज्‍जर आॅचरे समेटि‍ राति‍ भरि‍क जीवन-रक्षण ओइ मातृ सदृश करैत जइ सदृश छातीमे सटा मैया यशोदा अपन लाड़लाकेँ जि‍नगीक कथा-बेथा सुना-सुना सुनबैत।‍‍ अंति‍म तीरसँ ति‍राएल वा वाणसँ वेधाएल बलदेवक संकल्‍प-शक्ति‍ जागल। शर्त लगबैत बलदेव बाजल- “भैयारी, दुनि‍याँमे हि‍त-अपेछि‍त, दोस-महि‍म आदि‍ अनेको तरहक होइत अछि‍, मुदा से नै जि‍नगी तँ ओकरे जि‍नगी ने सार्थक होएत जे संकल्‍पि‍त हुअए। भलहिं छोटसँ-छोट संकल्‍प कि‍अए ने होए। मनुष्‍यक पहि‍ल वाण तँ संकल्‍पे वाण ने होइत जँ से नै तँ जि‍नगी की। आइ हमरा ओहनो वि‍चार वोध भऽ रहल अछि‍ जे सपनोमे नै सपनाएल छलौं। ओना सपनो तँ सपने छी। कोनो दवाइ जहाजक सैर करबैत, तँ कोनो मलेरि‍या मच्‍छड़क मेलामे सैर करैत।‍” जहि‍ना कोनो वस्‍तुक जि‍ज्ञासा एते बढ़ि‍ जाइत जे सभ कि‍छु बि‍सरि‍ ओकरा पकड़ैले बाबल बनि‍ जाइत तहि‍ना सि‍पाही बाजल- “समैपर धि‍यान रखए पड़त। कालक गति‍ केकरो बुते ने राेकाइ छै। तँए अपनाकेँ ओइमे समावेश करू।” जहि‍ना भोजक वारीक चंगेरामे खाजा रखि‍ एकटा हाथमे नेने पंचक आगूमे आग्रह करैत, तेहने तगेदा बूझि‍ बलदेव बाजल- “भैयारी, अहाँ तँ भाइक संग, जे माइक संग अबैत ओ यार छी तँए संकल्‍प बूझू जे झूठ नै कहै छी। ई बात आइ बुझै छी अनकर मेहनति‍केँ तागति‍क बलपर लूटैत-चोरबैत एलौं। जेकर चोरोलि‍ऐ ओहो हमरे सन मनुख दूटा हाथ-पएरबला ने छै। हम कि‍अए छुलि‍ऐ। हमरा ओही दि‍न फाँसीपर समाज चढ़ा सकै छल आ अपन नि‍अममे सुधार कऽ सकै छल। मुदा से नै भेल। हम गल्‍ती कहाँ कतौ केलौं गल्‍तीक बाटक जे कर्तव्‍य छै वएह ने केलौं। हम तँ तखन बुझि‍ति‍ऐ जे जखन अपने टा एहेन रहि‍तौं। से तँ नै आगू-पाछू दुनू दि‍स भरल देखलि‍ऐ!‍” सि‍पाही- “भैयारी, एहेन सजाए कि‍अए भेल, से कहाँ कहलि‍ऐ?” एक टकसँ दुनू सि‍पाहीपर नजरि‍ राखि‍ बलदेव टकटकी लगा देखए लगल। जहि‍ना हजारो मील हटि‍ कोनो वि‍चार जन्‍म लऽ सटि‍ जाइत तहि‍ना सि‍पाही अपराधीक दूरी मेटा गेल। ने सि‍पाही किछु बजैत आ ने बलदेव। मुदा डयूटीक तीर सि‍पाहीकेँ लगल। घड़ी देखि‍ बाजल- “भैयारी, आब सुनैक समए नै पाबि‍ रहल छी।” समैक अभाव देखि‍ बलदेव ओहन कथाकार जकाँ जे जि‍नगीक बेथाकेँ कथा कहैत। घटना-वि‍शेष तँ ओहनो होइत जइसँ गढ़गर घटना सुनि‍नि‍हार भोगने रहैत। मुदा तँए की हुनकर वि‍चारकेँ वि‍चार नै मानबनि‍। तँए समाजक वस्‍तु साहि‍त्‍य छी। वि‍चार-सुझावक लेल पाठक-श्रोताक दरबज्‍जा सदति‍ खुजल रहैक चाहि‍ये। समाधानक अनेको उपाए अछि‍। तँए जाधरि‍ साहि‍त्‍य समाजक सचि‍त्र नै बनि‍ व्‍यक्‍ति‍-चि‍त्र -वक्रचि‍त्र- बनैत रहत ताधरि‍ दुनूक बीच वि‍षमत नै रहए ओहो अनुचि‍त। जि‍नगीक अंति‍म मोहक बात अंति‍म मोड़पर आबि‍ बलदेव बाजल- “भैयारी, सरकार वि‍रोधमे हवा उठल। हमहूँ बराहि‍लगि‍री छोड़ि‍ नेता बनि‍ गेलौं। हमरा सबहक जीत भेल। अपनेमे टुटान शुरू भेल सभमे, कि‍सान, बेपारी, वुद्धि‍जीवी, अपराधीमे टुटान भेल। इलाकामे जाल पसरल छल। बुझबे ने केलि‍ऐ जे नेताक टुटानसँ हमहँू टूटि‍ गेलौं। ऊपरे-ऊपर अपेछा रहल, भीतरे-भीतर दुश्‍मनी भऽ गेल। जहि‍ना तीतहा रोगक तीतहो दवाइ होइत आ मीठहो होइत। तेहने टुटानमे फँसि‍ गेलौं। चुनावक समए एलै दोसराकेँ ऐठाम धन लूटैक योजना बनल। मुदा ई नै बुझलि‍ऐ जे ग्रुपमे ओहनो अछि‍ जे खून करए जाइए। भेलै सएह। खून केलक कि‍यो नाओं लागल हमर। अपनो मन कहैए जे खुनी हम नै छी। मुदा सोझामे खून भेल तखन हम केम्‍हर रहि‍ऐ।” तही बीच दर्जनो तैयार सि‍पाहीक प्रवेश भेल। सि‍पाहीकेँ देखि‍ते सि‍पाहि‍यो आ बलदेवाे चौंक गेल। उठि‍-उठि‍ सभ ठाढ़ भेल। जहलसँ नि‍कलि‍ सभ सभकेँ देखए लगल। ~~ ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। १.सुजीत कुमार झा २.सत्यनारायण झा १ सुजीत कुमार झा कथा लाल डायरी

साँझ भऽ गेल छल । घरपर असगरे छलहुँ, अतः लनसँ लागल गेटकेँ बन्देकऽ दी । रुमसँ गेटक दुरी अतेक छल जे ओकरा खुलब आ बन्द करबाक आभास तक नहि होइत छल । केओ धीरेसँ नुकाकऽ बाउण्ड्री–वाल भितर चलि आबे तऽ पते नहि चलत । बच्चा बाहर पढैÞत अछि । पति अपन बहिनक गाम गेल छथि । वा कही घर पुरे खाली–खाली अछि । ओना घरपर एकटा नोकर अछि । जेकरा ओ बहुत निर्देशन दऽकऽ गेल छथि, मुदा कहियो ओ ९ बजेसँ पहिने नहि अबैत अछि । खालीपनक ई क्रममे टिभीकँे आविस्कार करऽ बलाकें हृदयसँ आभार प्रगट करैत छी । जखन पत्र–पत्रिकासँ मोन भरि जाइत अछि, हम टिभीक कार्यक्रममे डूबि जाइत छी । सिरियल शुरु होबऽमे एखन समय छल तँए हम सोचलहुँ ताबत अपना लेल दूटा रोटी बना ली । बच्चा आ पति बाहर रहलाक कारणे हम भानस घरक प्रति एकदम लापरवाह भऽगेल छी । एकटा तरकारी बनबैत छी ओकरो तीन बेर खा लैत छी, कखनो फलफूल खा लैत छी, कखनो दिनक भोजन तऽ गोलेकऽ दैत छी । मोनेमोन अपन निर्णयकेँ सही कहैत चलू कम भोजन कएलासँ स्वास्थ्य बढियाँ रहैत अछि । आब के ओतेक मेहनत करए, भात–दालि आ बहुत प्रकारक तरकारी बनाबऽमे किए समय लगाबी । ओना आइ–काल्हि बड़ समय रहैत अछि । ग्यास जराकऽ हम ताबाकें चुल्हापर राखि देलहुँ आ फ्रिजमेसँ सानल आँटा निकालिकऽ एकटा रोटी बेल ताबापर रखलहुँ आ दोसर बेलऽ लगलहुँ । पहिल रोटी सेकनहे छलहुँ की मूल गेटसँ घण्टीक आवाज आएल । ओह..... के भऽ सकैत अछि, एहि समय ? ‘आबि रहल छी,’ घण्टी बजबऽ बलाके सन्तुष्टिक लेल हम जोड़सँ जबाब देलहुँ, मुदा फटाफट दोसर रोटी सेकऽ लगलहुँ । किए कि गेट खोलऽसँ पहिने हम अपन सभ काजकऽ लेबऽके पक्षमे छलहुँ । कहूँ बगलमे रहल रामपुर बाली भेलीह तऽ गेलहुँ काजसँ । पाँच मिनट कहिकऽ ओ पुरे घण्टाभरि समय लऽ लैत छथि । पुरे संसारक समाचार, गपक पुरे पेटारा हुनका लग भड़ल रहैत अछि । कोनो विषयपर चाहिकऽ बात कऽ ली । संविधान निर्माण हो वा माओवादी समस्या, मधेशी नेतासभक स्थिति सभ हुनका लग रहैत अछि । कहियो–कहियो हम सोचैत छी यदि ओ राजनीतिमे होइतथि तऽ खुब नाम कमैतथि । रामपुरबालीके अएबाक आशङ्कासँ एखन हम हाथमे लागल आँटा धोए रहल छलहुँ कि कल वेल अपन सम्पूर्ण शक्तिसँ घनघना उठल । ‘एस कमिङ्ग–कमिङ्ग ।’ हाथ पोछैत हम गेट दिस बढ़लहुँ । ‘ओह ! केहन–केहन लोक होइत अछि । एतेक लम्बा घण्टी बजबैत अछि की कमजोर लोकके धड़कन ओतऽके ओतहि बन्द भऽ जाएत ।’ मोनेमोन हम बजैत जारहल छलहुँ, मुदा जहिना गेटक नजदिक पहुँचलहुँ हम अपन हाथसँ अपन केस ठीक कएलहुँ, साड़ीकँे ढंगसँ अपन कान्हपर रखलहुँ आ मुँहपर कृत्रिम मुस्की अनैत अतिथिके मोनसँ स्वागत करबाक लेल तैयार भऽ गेलहुँ । ‘ओह अपने छी !’हम खुशीसँ बजलहुँ, ‘प्रणाम, प्रणाम यादव जी ।’ विश्वास करु ई हमर अभिवादन लेस मात्र बनाबटी नहि छल । अभिवादनक ढङ्ग आ बातचितक शब्दे व्यक्ति विशेषसँ अपनाक अन्तरङ्गता उजागरकऽ दैत अछि । आगा अभिवादनकें हात जोड़ने पतिक प्रिय मित्र सेवक नारायण यादव ठाढ़ छला । ‘बहुत दिनक बाद अपनेकेँ चरण पड़ल अछि,’ हम गेँट बन्द कऽ ड्राइँग रुम दिस बढ़लहुँ । ‘फुरसते नहि भेटैत अछि भौजी, जखन लोक काममे लागि जाइत अछि तऽ बस....., हमर वकिल साहेब नहि छथि घरपर की !’ स्कूल क्याम्पस सभमे संङे पढ़ल आ तर्कशिला भेलाक कारण यादवजी सहितक हिनकर सभ मित्र हिनका ‘वकील साहेब’ नामसँ सम्बोधित करैत छथि । ‘नहि, ओ तऽ चारि–पाँच दिनसँ बहिनक गाम गेल छथि ।’ ‘आ अएताह कहियाधरि ......’ ‘एखन दू–चारि दिन आओर लागिए जाएत आबऽमे, शायद २० गतेधरि अएताह ?’ ‘चलू बढ़िएँ भेल ओ नहि छथि । हमरा अहाँक बीच कबाबमे हड्डी बनितैथि । हम आ अहाँ जमिकऽ चलू गप्प मारैत छी,’ यादव जी दुनू हाथकें रगरैत बजलाह । ‘हँ .....हँ.... हँ किए नहि, हम असगरे बोर भऽ रहल छलहुँ, अपने बैसू हम दू मिनटमे अबैत छी ।’ ‘कथी लाए एमहर, ओमहर करैत छी बैसू भौजी, ’यादव जी निःसंकोच हाथ पकड़िकऽ बैसबाक लेल अनुरोधकऽ देलैथि । हुनकर ई व्यवहार, ई अपनापन लोककेँ बात नहि टालबाक लेल मजबुरकऽ दैत अछि । ‘अहाँ जाति हएब उएह चाह–ताह बनाबऽ वा एहिसँ मीलल–जूलल मेहनत करऽ । बेकारके झमेलामे नहि परु भौजी । जतेक मीठ अपनेक बातमे हएत ओतेक चाहमे कतऽसँ भऽ सकैत अछि ।’ हुनकर स्पष्टतापर हम मुिस्कया उठलहुँ आ बैसैत कहलहुँ, ‘से तऽ ठीके अछि मुदा अहाँक हाथ एतेक ठण्ढा किएक अछि आब तऽ फागुनो समाप्त भऽ गेल, एतेक ठण्ढो नहि अछि ।’ ‘मुदा हम जतऽसँ आबि रहल छी, ओतऽ बहुत ठण्ढ छैक ।’ ‘ठीक छैक ओना जनकपुरमे किछु ठण्ढ बेसी पड़ैत अछि ।’ ‘ओना वकील साहेबके बिना अहाँ रहि कोना लैत छी, हमहुँ किछु कम थोरहे छी , कोनो आवश्यकता हएत तऽ कहब । ’ ‘छल परपञ्च आ बनाबटीसँ दूर यादवजीके बातके कोनो दोसर व्यक्ति सूनि लिअ तऽ हुनकर चरित्रपर सन्देहकऽ सकैत अछि, मुदा जे हुनका चिन्हैत अछि सएह हुनकर साफ हृदयके बूझि सकैत अछि ।’ ‘आ कहू बच्चा अपनेके कतऽ पढ़ि रहल अछि ? दिव्या केहन छथि, हमरा यादो करैत छथि वा नहि ?’ ‘सभ किछु बूझि गेलहुँ अपने लग गप्पक कोनो स्टक नहि अछि, तखने चालू गप्प शुरु भऽ गेल, बच्चा केहन अछि, दिव्या केहन अछि आ सुनाउ ........इएह नहि !’ कोनो बात स्पष्टसँ कहि देब यादव जी के आदत छल । ‘ओना हमर इच्छा सेहो अपनेकें बेसी बोर करबाक नहि अछि । चलैत छी ।’ ‘नहि..नहि यादवजी अपने तऽ ....’ हम की सहीमे रुक्ख व्यवहारकऽ रहल छलहुँ हम स्वंयके तौललहुँ आ परेशान भऽ गेलहुँ ।’ ‘नहि भौजी, एहन कोनो बात नहि अछि । सहीमे माएके स्वास्थ्य खराब भऽ गेल अछि ओकरे देखऽ आएल छी दोसर बेर आएब तऽ दिव्याकँे सेहो लेने आएब तहियाधरि वकील साहेब सेहो आबि जएतहा तखन जमिकऽ बैसब । यादवजी उठैत कहलैन्हि, ‘एकटा चीज तऽ हम बिसरि रहल छलहुँ ।’ यादवजी पुनः सोफापर बैसला आ एकटा डिब्बा निकालैत कहलाह, ‘भौजी ई लिअ, ई डायरी अहाँके लेल अनलहुँ अछि । किछु अबेर अवश्य भऽ गेल मुदा कि करितहुँ जनवरी–फरवरीमे फुरसते नहि भेटल अएबाक । सोचलहुँ कुरियरसँ पठा दी मुदा हम तऽ डायरी अपन हाथसँ अपनेकँे प्रजेण्ट करऽ चाहैत छलहुँ ।’ यादवजी कनी माथ झुकाकऽ डायरी हमरा दिस बढा देलाह । ‘धन्यवाद ।’ हम डायरी लैत कहलहुँ । ‘ओह फेर उएह रुक्ख सन धन्यवाद, ईदमे जेना गारा मिलैत अछि तहुना गरा मिलकऽ सेहो खुशी प्रकट कएल जासकैत अछि भौजी ।’ फेर ओ जोड़सँ हँसलाह । वकील साहेव होइतथि तऽ इष्र्यासँ जड़िजैतथि सही बात छैक ने भौजी ! ठीक छै ओ अएताह तऽ नमस्कार कहि देवैन्हि,’ आ उठिकऽ ठाढ़ होइत कहलैन्हि, ‘चलैत छी भौजी । ’ ‘नमस्कार’ !’ हम हुनका गेट तक छोडऽ अएलहुँ, फेर आएब ।’ ‘हँ–हँ अबैत रहब अपनेक सपनामे,’ ओ आकर्षित मुस्कान मुँहपर आनैत कहलाह । गेटपर आबऽधरि कतेको बेर पाछू घूमि–घूमिकऽ हाथ हिलओलैन्हि । रघु ओतहि ठाढ़ छल ओकर प्रणामके जवाव देलैन्हि आ गेटसँ बाहर चलि गेलाह । हम रघुकेँ ताला लगएबाक आदेश देलहुँ आ भितर चलि एलहुँ । सोन जकाँ मेटलकेँ मेढ़ल सुन्दर डायरी शोफापर राखल छल । हम ओकर सुन्दरताकेँ देखिकऽ हाथसँ सहलाकऽ देखलहुँ आ पृष्ठ उण्टेलहुँ भितर सुन्दर आ सुदृढ अक्षरमे लिखल छल । वकील साहेब आ भौजीकेँ सप्रेम भेट सेवक प्रसाद यादव । नीचा आजुक गते सेहो लीखल छल । लिखवाक तरिका गजव छल । सेवक प्रसाद यादव एकटा एहने व्यक्ति छथि गोर रंग, लम्बा आ भारी शरीर, उन्नत ललाट हुनकर स्पष्ट बाजब हरेक अवसरकेँ महत्वपूर्ण आ उन्मुक्त हँसी हजारोमे अलग पहिचान देने छल । एहने लाल एलबममे अपन एक फोटो संग हमरा प्रजेण्ट कएने छलथि । जहिया हम विवाह कऽकऽ आएल छलहुँ ।ओ अन्य मित्रक बाद विशेष तरिकासँ यादवजीसँ परिचय करबैत कहलैन्हि, ‘ ई छथि हमर सेवक । ओना हम हुनका अपन मित्र बना लेने छी, काज बढ़ियाँ करैत छथि तँए ठीक कहलहुँ ने यादव जी ।’ ‘हँ, हँ फेकैत जाउ, फेकैत जाउ मुदा बूझि लिअ अहाँके बातमे ई नहि आबऽ बला छथि,’ हमरा दिस तकैत कहलैन्हि, ‘एखनो समय अछि , हिनका भगाउ वकिली वाहेक हिनका किछु नहि अबैत छैन्हि । दू दिनमे अहाँ हिनकासँ उबि नहि जाएब तऽ फेर हमरा कहब ।’ फेर पति दिस तकैत कहलाह, अहाँक विषयमे एक्कहिटा बात कहऽके मोन करैत अछि कौवाक चोचमे अनारकली । आब हमर परिचय ठीकसँ कराएब वा खोलि दिअ अहाँक सभ पोल । ’ ‘ठीक छैक...ठीक छैक ...कहि दैत छियैक,’ पति हथियार रखैत कहलैन्हि, ‘एहि लम्बा चौड़ा पहाड़ जेहन शरीरक नाम अछि, सेवक ...., नहि नहि सेवक प्रसाद यादव ।’ यादवजीकेँ शरीर तानल देखिकऽ हमर पति हँसैत कहलैन्हि, ‘मुदा हम सभ हिनका कहैत छी यादवजी...’ ‘मुदा अहाँ चाही तऽ सेवक सेहो कहि सकैत छी भौजी ।’ यादवजी रोकैत कहलैन्हि । ओना हम विना कहने अपनेकेँ सेवक छी आ जखन–जखन एहि वकील साहेबसँ मोन उबिया जाए विना कोनो सङ्कोचके हमरा लग आबि सकैत छी ।’ यादवजीके कहलाक बाद जोड़सँ हँसी बजरल । ओहि दिन अछि आ आजुक दिन । २५ सालक लम्बा समय बित गेल सभ मित्रके केश उज्जर भऽ गेल, सभ एक दूटा नाती–पोता बला भऽ गेल छथि । मुदा हुनक स्पष्टता, हुनकर उन्मुक्त हँसी अखनो जहिनाकेँ तहिना अछि । कोनो समारोहक ओ जान होइत छथि । जतऽ ओ बैसथि छथि ततऽ हुनकर अगल–बगलमे लोक ओहिना आबि जाइत अछि । हरेक उमेरक लोक हुनकर बातमे इण्ट्रेष्ट लैत अछि । कहियो ओ कहैत छथि, ‘ई जीवनकेँ हँसी ठहक्के तऽ आगाँ बढ़बैत अछि । मित्र ई नहि होइत तऽ जीवनके उजार आ रुक्ख बनाबऽमे कोनो कसर नहि छोड़ने अछि ई समय ? जिन्दा आ मुर्दामे कोनो फरक देखाइत अछि कनीकाल लेल हँसि आ बाजि लैत छी । फेर तऽ चिन्ताक पहाड़ अछि आगाँमे ठाढ, नहि जानि कोन समय उपरसँ बोलाहट आबि जाइ फेर तऽ दू गज जमीन आ किछु मित्रक स्मरण ?’ बात हुनकर सारगर्भित आ सय प्रतिशत सही होइत छल , मुदा हुनकापर ई गम्भीर विषय विल्कुल नहि जँचैत छल । केओ नहि केओ कहिए दैत छल, ‘कि यादवजी अहूँ सन्तक वाणी बाजऽ लागल छी अहाँ तऽ हँसिते नीक लगैत छी ।’ ‘ठीक छै चलैत छी ।’ यादवजी जखन गम्भीर होइत छलाह तऽ उठिकऽ जएबाक लेल उद्यत भऽ जाइत छलैथि फेर मुँहपर एकटा कृत्रिम मुस्कान लबैत कहैथि,‘ नमस्कार ।’ हुनका एहिना उठिकऽ जाइत देखि लगैत छल जेना हुनका दुःखक रागकेँ किओ छू देलक अछि । ओ आइयो ओहिना उठिकऽ चलि देलाह, हम अपन कएल गेल हरेक व्यवहारकेँ टटोइल रहल छलहुँ । एतेक दिनपर ओ आएल छलाह हमर पति सेहो एतऽ नहि छलाह, हमर कोनो बात हुनका खराव वा अपमान जकाँ तऽ नहि लागल । एहि विश्लेषणमे डुबैत हम डायरीकेँ उठाकऽ अपन डोरमे राखिकऽ सुतबाक तैयारी करऽ लगलहुँ । आइ २० गते अछि । हुनका आइए आबि जएबाक छैन्हि । कोन बससँ अबैत छथि एकर सूचना सेहो ओ देने छलैथि आइ कए दिनक बाद हमर भानस घर चमकल छल । घर तऽ ठीके छल किछु विशेष देखाबए लेल हम लनसँ दू–चारि पूmल आ पात तोड़लहुँ ओकरा गुलदस्ताक रुप देलियै आ एकटा गिलासमे किछु पानि राखि गुलदस्ताकेँ सजा ओकरा डाइनिङ्ग टेवुलपर रखलहुँ । पूmल तऽ आखिर पूmले होइत अछि । माथमे लगाउ वा टेवुलपर राखी, निखार तऽ आबिए जाइत अछि । स्वयंपर बढैÞत जारहल लापरवाहीकेँ तत्कालक लेल हम त्यागि देने छलहुँ, केना ने केना हमर चालमे सेहो तेजी आबि गेल छल । अवचेतन मोनमे बैसल एकटा पतिक प्रेमे तऽ कहल जा सकैत अछि । बच्चा घरपर नहि अछि तऽ कहियो–कहियो अधेर अवस्थामे सेहो युवा अवस्थाक आभास वा दोसर ढंगसँ कही तऽ आनन्द होइत अछि । अबेर भऽ रहल छल हम बेर–बेर मेन गेट दिस तकैत छलहुँ । घण्टी बजिते हम एक्के धापमे मेन गेटपर पहुँच गेल छलहुँ पतिक मुँह उदास देखि हम असमञ्जसमे छलहुँ जे हिनका की भेलैन्हि अछि ? आखिर पुछिए लेलहुँ, ‘ की भेल अछि ? मोन तऽ ठीक अछि ?’ ‘नहि ....’ उदासी भड़ल जवाव भेटल,‘ थाकल छी कनी आरामकऽ लिअ वा हाथ मुहँ धो लेब तऽ भोजन लगाएब,’ हम चाह दैत पुछलहुँ । पति चाहकेँ टेवुलपर राखि देलैन्हि आ ठण्ढा साँस छोड़ैत जुत्ता सहिते शोफापर पड़ि रहलाह । की भऽ गेल छैन्हि हुनका कतहु वल्डप्रेसर तऽ नहि भऽ गेल छैन्हि हमरा बहुतरास चिन्ता घेर लेलक । ‘हमर मित्र सेवक प्रसाद यादव स्मरण अछि अहाँकेँ,’ किछु देर चुप रहलाक बाद शुरु कएलैन्हि । ‘स्मरण किए नहि रहत ? अहाँ एना किए पूछि रहल छी एखन ...........’ एहिसँ पहिने हम अपन बात पूरा करितहुँ एहिसँ पहिने निर्मेष दृष्टि लैत धाराप्रवाह कहऽ लगलाह, ‘ सेवक प्रसाद यादव हमरा सभक प्रिय मित्र, पतिक नोराएल आँखि किछु अनहोनीक संकेत दऽ रहल छल । हमर पूरा शरीर कानमे केन्द्रीत भऽ गेल ।’ हमरा सभसँ रुसिकऽ चलि गेल साक्षी..........।’ ‘की ? .......आकाशपरसँ खसबाक पार आब हमर छल । हम किछु कहऽ चाहि रहल छलहुँ मुदा किछु सुनबाक अवस्थामे हमर पति कहाँ छलथि, ओतऽ मात्र बाजि रहल छलाह, ‘हुनकर माय विमार छल, देखवाक लेल अफिसक जीपसँ आबि रहल छलाह । हुनकर आदत छैन्हि, ड्राइवरकेँ ओ पाछू बैसा देलाह आ स्वयं जीप ड्राइव करऽ लगैत छलाह । ओना ओ ड्राइव बढियाँ करैत छलाह, मुदा ओहि दिन नहि जाइन की भेल, शायद सड़कपार करैत एकटा मालकेँ बचएबाक चक्करमे हुनकर जीप उनैट गेल आ खधियामे खसि पड़ल । ड्राइभरकेँ तऽ कनी–मनी चोट लागल मुदा स्टेरिङ्ग छातीमे घूसि गेलाक कारण यादवजीकेँ घटने स्थलपर मृत्यु भऽ गेल । एखने हुनकर घरसँ आबि रहल छी । दिव्याकेँ तऽ हाले नहि पुछू । हुनकर माए वेचारी कानि–कानिकऽ अधमरु भऽ गेल छल । ४७ वर्षक कोनो मरबाक उमेर होइत अछि । तीन–तीनटा वच्चा अछि । की हएत ओकर ? हे भगवान अहाँ चूनि–चूनिकऽ लोककेँ लऽ जाइत छी । हुनका बजा तऽ नहि सकैत छी । ‘काल्हि अहूँ ओतऽ चलि जाएब, लोककेँ सान्तवनो मलहमके काज करैत अछि । ’ ‘सुनू हमरो किछु सुनू’ हमर बात नहि सूनि रहलाक कारण हमरा तामस आबि रहल छल । हुनक मृत्यु कए गतेकऽ भेल छल ।’ ‘ १७ गते कऽ ।’ ‘१७ गते कऽ ....एहि १७ गते कऽ ।’ हमर आँखि आश्चर्य आ रोमाञ्चसँ भड़ल जा रहल छल ।‘ हँ.. हँ.. इएह १७ गते कऽ ।’ ‘मुदा एना कोना भऽ सकैत अछि हमर मतलव एहि १८ गते कऽ अहाँक अनुपस्थितीमे ओ अपना घरपर आएल छलाह आ एही ठाम बैसल छलैथि ...। हमरा संग बातोचित कएने छलैथि ।’ ‘की कहि रहल छी अहाँ ? ...होशमे तऽ छी, हुनकर मृत्यु फागुन १७ गते भोरेमे भेल छल आ १८ गते भोरमे अन्तिमो संस्कार भऽ गेल एहि बातक सयकड़ो लोक गवाह अछि । अहाँ कहैत छी जे १८ गतेक साँझमे ओ आएल छलाह । जे मोनमे आएल से कहि दैत छी । किछु स्मरणो–तस्मरणो रहैत अछि की नहि ?’ हमर पति हमरापर अनाप–सनाप कहि रहल छलैथि मुदा, हमर शरीर एहि बातकेँ स्वीकारयके पक्षमे नहि छल बातक सत्यताक ज्ञान एखन मात्र हमरे छल हमर हाथ–पएर काँपिकऽ ठण्ढा भऽ गेल छल । यादवजीद्वारा पकरल गेल हाथक अनुभव हमरा वेहोशीके अवस्थामे आनि देने छल, मुदा हमरा सत्यताक प्रमाण देवाक छल । शक्ति जमाकऽ हम कहलहँु, ‘ हमरा बढ़ियाँ जकाँ स्मरण अछि ओ १८ गतेक साँझ छल ओहि दिन हम दुधबलाकेँ हिसाब देने छलहुँ हमर बातपर विश्वास नहि हुअए तऽ रघुसँ पुछि लिअ । हुनका जाइत समय ओहो गेटपर ठाढ़ छल । उएह तऽ गेट वन्द कएने छल ।’ ‘हँ मालिक मलिकानि ठीक कहैत छथि हमर नमस्कारकेँ ओ हाथ उठाकऽ जवाव सेहो देलैन्हि । बरण्डापर ठाढ़ रघु हमर बातकेँ पुष्टि कएलक । ‘ मुदा एना .....कोना भऽ सकैत अछि ।’ पतिपर एखनो अविश्वासक बादल छाएल छल । तखने हमरा एका–एक यादवजीद्वारा देल गेल डायरीक स्मरण आएल, हम दौड़ैत डोर दिस बढ़लहुँ ओ डायरी एखनो ओहिठाम राखल छल । थरथराइत हाथसँ ओहि डायरीकेँ निकालहुँ हमरा हाथमे छल हमर सत्यताक प्रमाण । ओ हमर पाछू आबिकऽ ठाढ़ भऽ गेलाह । ‘देखू ई डायरी यादवजी अपने हाथसँ हमरा देने छलैथि । दूइए दिनक बात अछि डायरीक पन्ना उनटऽबैत हम कहलहुँ हमरा अहाँकेँ सम्बोधितकऽ देल गेल डायरीपर हुनकर हस्ताक्षर आ १८ गते लिखल अछि । ई रोमाञ्चक बात सूनिकऽ हमर पति मित्रक दुःखसँ उबरिकऽ एहि सोचमे डूवि गेलैथि जे मृत्युक बाद ककरो आत्माकेँ एहि प्रकारे कतहु जाएब आएब सम्भव अछि । की आजुक युगमे केओ एहिपर विश्वासकऽ सकत ? मुदा जतेक ई सत्य अछि यादवजीकेँ मृत्यु १७ गते भेल अछि, ओतवे निर्विवाद सत्य अछि फागुन १८ गतेक साँझ हमरा घरपर हुनक आएब, जेकर सत्यता ई लाल डायरी प्रमाणितकऽ रहल छल । हमर पति श्रद्धासँ डायरी सहलौलैन्हि । पहिल पन्नापर लिखल वकील साहेब आ भौजीकेँ सप्रेम भेट । सेवक प्रसाद यादव । यादवजीक नाम देखिकऽ ओ पुनः दःुखित भऽकऽ कहलाह, ‘हमरासँ भेटकऽ जइतहुँ मित्र, एकटा स्मरण छोड़िकऽ गेलहुँ मात्र । ओ एक–एकटा पृष्ठकेँ एना उण्टाबि रहल छलैथि ओकर मध्य हुनकर मित्र बैसल हो । मुदा की ! भितर पन्नापर जेना घड़ि रुकि गेल हुए । हरेक पन्नापर एकहिटा गते लिखल छल फागुन १८ गते आ मात्र फागुन १८ गते ............।

२ सत्यनारायण झा पाहुन: प्रयाग राजक शिव कोटिक नारायणी आश्रम |गंगाकात मे एहि आश्रमक अनुपम सौंदर्य छैक |पुबारिकात गंगाक कल कल छल छल धारा बहैत छैक |एहि  आश्रम सं सटले बगल मे एकटा फूसक मरैया छैक ,जे बाबाक  प्रेम  कुटी सं प्रसिद्ध छैक |ओहि कुटी मे एकटा साधु लगभग बारह बरख सं रहैत छैक |साधु बर बुढ़ लगैक छैक |सोन सन  उज्जर केस आर पैघ पैघ दाढ़ी आ मोछ |साधु केकरो सं बात  नहि करैत छैक |हँ भोरे चारि  बजे साधु गंगा स्नान करैत छैक आ घंटो गंगा कात मे बैसल गंगाक कल कल छल छल जल  क’ बर ध्यान सं  देखैत रहैत छैक |दु साल पहिने तक साधु कतौ चलि जाइत छलैक ,कइएक दिन तक गायब रहैत छलैक मुदा एम्हर दु साल सं कतौ नहि जायत  छैक |बस नारायणी आश्रम मे कोनो समागम रहैत छैक त’ अवश्य कतौ कोनो कोन मे बैसल प्रवचन सुनैत रहैत छैक | एहि चारि पाँच दिन सं साधु कतौ नहि जाइत छैक ,भरि दिन कुटी मे परल रहैत छैक |प्रायः बीमार रहैत छैक |उठियो नहि होयत छैक |राति बारह बजे साधु क’ बर मोन खराब भ’ गेलैक ,लगैक आइ नहि बचतै  ?कियो लग मे नहि छैक |ओकरा छैहे के ?कुटी मे मुसक बिहरि बहुत छैक |दुटा मुस ओकरा  टुकुर टुकुर  ताकि रहल छैक | साधु करोट फेरलक |ओकरा मानस पटल पर ओहिना सबटा दृश्य देखाय लगलैक |ओ सोचैत अछि कियो ओकरा महात्मा कहैत छैक आ कियो ओकरा पागल कहैत छैक |कियो ओकरा अंदर मे ओकर दुःख नहि देखैत छैक |ओकरा देखि सभ हँसैत छैक मुदा ओकरा लोकक उपेक्षाक कोनो ध्यान नहि रहैत छैक |ओकरा याद परलैक ,”एकदिन माय बजा क’ कहने रहैक ,रे बउआ ,गरमीक छुट्टी  मे बहिनक सासुर चलि जो |  ,माय आँहा सही कहैत छी |हम काल्हिये लालगंज चल जायब ,हम माय क’ कहने रहियैक |  ठीके बहुत दिन भ’ गेल बहिन सं भेट केना |आ सही मे हम भोरे बहिनक सासुर लालगंज चलि गेलौ |ओहि समय हमर आयु  पन्द्रह –सोलह बरखक  छल होयत |दु मासक गरमीक छुट्टी रहैक |दु मास ओतहि रहि गेल रही |जेठ मास रहैक |रोहनिया आम पाकय लागल रहैक |सभ बच्चा –बुढ़ आमक गाछी मे जखन तखन जायत रहैत छलैक |केखनो क’ बिहारि उठैक त बाले –बच्चे सभ गाछी  दिस भागैक |हमहू ओही बच्चा सभक संग गाछी भागइ  छलियैक |ओहि अन्हर बिहारि मे ने सरिता सं भेट भेल रहय |सरिता हमरे बहिनिक एकटा फरिकक बेटी छलीह |सम्बन्धे हमरा बहिनिक ननदि रह्थीन |सरिता तेरह –चौदह बरखक छलीह |एक दिन साँझ में बिहारि उठलैक |सभक संगे हमहू गाछी दिस भागलौ |गाछीक दृश्य बर मनमोहक रहैक |बिहारि ततेक पैघ रहैक जे एक गाछ दोसर क’ छुबैक |सभ गाछ जोर जोर सं हिलैत छलैक |चारुकात आम भट भट खसैत छलैक |सभ धिया पुता दौड़ दौड़ क’ आम बिछैक |हमहू खुब दौड़ धुप करी |बच्चा सभ जिम्हरे सं भट शब्द सुनैक तिम्हरे दौड़ लगाबैक |एक बेर एकटा आम खसलैक |भट शब्द सुनिते हम उम्हरे भागलौ |जहिना हम आम उठाबय लगलौ तहिना हमरा सं पहिने सरिताक हाथ आम पर परलैक |हमर हाथ सरिताक हाथक उपर परल |बरीकाल तक ओही हालत मे रहलौ |बरीकालक बाद कोकिल कंठी आवाज सुनलौ |यौ ,पाहुन ,ई आम हमर भेल |पहिने हमर हाथ आम पर परल अछि |हम कहलियनि ,सत्ते कहलौ !अहीक आम भेल |मुदा हम तखन सं दौरिते छी मुदा एकोटा आम हमरा नहि भेटल अछि |खाली हाथ जायब त’ बहिन की कहती |कहती तोरा कोनो लुरि नहि छह |एकोटा आम अनितह त’ कम सं कम चटनी त’ बनितैक ,तै ई आम हमरा द’ दिअ |सरिता बजलीह , यौ पाहुन, एहन बात कियैक बजैत छी |एकेटा आम ल’ क’ जायब त’ भउजी  हँसतीह नहि ?अपना झोरी सं ओ दसटा आम हमरा देलनि |हमरो मोन प्रसन्न भ’ गेल |ओहि दिन सं सरिता सं सभ दिन गाछी मे भेट होमय लागल |आब सरिता सं भेट करय हम असगरो गाछी जाय लगलौ |गाछी मे आओर छोड़ी सभ रहैत छलैक |गाछी मे कइएक प्रकारक खेल सभ होयत छलैक |डारि पत्ता ,चोर सिपाही ,कबड्डी ,पचीसी ,कौआ ठुठी आ गोटरस |हुनके सभक संग खेलायत छलौ |एक दिन चोर सिपाही खेल प्रारम्भ भेलैक |एहि खेल मे सभ चोर बनैक आ एकटा सिपाही बनैक |सिपाही जहिना जहिना चोर सभ क’ तकने जाय ,ओ चोर सिपाही बनि जाय आ दुनू मिलि आब ताकब सुरुह करैक ,एहिना जे भेटल जायक ओ सिपाहीक संग  भ’ दोसर क’ तकै |अंत मे जे पकराय  ओ सिपाही बनैक आ बांकी सभ चोर बनैक |हम सभ चोर बनि नुकाय गेलौ आ एकगोटा  सिपाही बनलाह |सभ जतय ततय नुकाय लेल गेल |कियो कोनो आमक गाछक अढ़ मे ,कियो गाछक झुरमुट मे ,कियो कतौ त’ कियो कतौ |हम देखलौ जे एकठाम बहुत धानक पुआलक टाल रहैक ,हम उम्हरे नुकाय गेलौ |एकठाम देखलियैक तीन चारिटा टाल सटले सटले रहैक ,ओहि मे दोगी सेहो बनल रहैक |हम उम्हरे बिदा भेलौ |ओही दोगी सं सरिता हमरा इशारा केलनि |हमहू ओही दोगी मे सरिता सं सइट नुका रहलौ |पहिने त’ सिपाही दिस ध्यान रहे मुदा धीरे धीरे लागे जेना  देह में रोमांच होमय लागल |मोन मे एकटा अज्ञात आनन्दक अनुभव होमय लागल |दिल दिमाग पर जेना नसा चढ़ल जायत छल | सरिताक डाँर पर हमर हाथ  अनायास चलि गेल आ धीरे धीरे हाथ हुनका पीठ पर चलि गेल |सरिता सेहो हमरा पांखुर पर अपन माथ ध’ देलनि आ बेसुध जकाँ अपन हाथ हमरा गरदनि पर ध’ देलनि |हमर मोन घबराय लागल आ ओही मुद्रा मे सरिता क’ अपना छाती सं सटा देलियनि |सरिता एकोरत्ती प्रतिरोध नहि केलनि |एही बीच सिपाही सभ पहुँचि हल्ला करय लागल जे दुटा चोर संगहि पकरायल \दुनू क’ सिपाही बनय परतैक|हम दुनू संगहि सिपाही बनलौ मुदा हमरा त’ किछु देखेबे नहि करय |एखन तक हम मदहोशे रही |बुझेबे नहि करय जे कतय सं की भ’ गेलैक |देह एखनो कोनों अज्ञात आनन्द सं थर थराइत छल | राति मे भोजन करैत रही मुदा मोन कोनों आनन्द सं आनन्दित छल |बहिन कइएक बेर बजबो  केलनि जे एना मथसुन्न जकाँ कियैक छह |पूछै छियह किछु त’ जबाब नहि दैत छह ?मोन ठीक छह कि नहि ?हम कहलियैन ,बहिन मोन त’ ठीक अछि ,कनेक माथ दुखा रहल अछि |खा कय सुतय चलि गेलौ |नींद की होयत ?खाली वैह दृश्य दिमाग मे घुमैत छल |एहि सं पहिने एहि तरहक अनुभव कहाँ कहियो भेल छल |ओ आनन्द स्मरण होयते मोन आओर आनन्दित भ’ जायत छल |कहुना क’ नींद भेल | दोसर दिन कोनों काज सं सरिता बहिनक घर आयल छलीह |बहिन भनसा घर में कोनों काज में ब्यस्त छलीह |सरिताक नजरि हमरा पर परलनि |पहिने त’ कनेक लजा गेलीह मुदा पुनः हमरा कहलनि ,यौ ,पाहुन ,भउजी कतय छथिन |हम भनसा घर दिस इशारा केलियनि |ओ बहीन सं जोरन मंगलखिन |बहिन एकटा कटोरी मे कनिक दही जोरन लेल देलखिन |ओ जाय काल कहलनि ,पाहुन ,आइ गाछी नहि जेबैक ?हम कहलियैन , भोजन कयलाक बादे बहिन गाछी जाय देतीह |ओहि दिन तीन बजे क’ बाद गाछी गेलौ |एखन गाछी मे दोसर कियो नहि आयल रहैक |सरिता सं ओहिना किछु गप्प होमय लागल |हमरा पुछला पर कहलनि जे पढ़य में मोन बर लगैत अछि मुदा गणित बर कमजोर अछि |गाम मे कियो पढ़बै बाला नहि छैक |सरिता वर्ग नवम् मे पढ़ैत छलीह |हम ओहि समय ग्यारह अर्थात मैट्रिक मे चलि आयल रही | दोसर दिन सं हम सरिता क’ गणित पढ़ाबय लगलियनि |हम बहुत मनोयोग सं पढ़बैत छलियनि आ ओहो खुब मोन लगाके पढ़ैत छलीह |पढ़बैत काल हम कतबो डटैत छलियनि ओ  हंसय लगैत छलीह |हुनका हसैत देखि हमारो हँसी लागि जायत छल |एहिना मे दस पन्द्रह दिन आओर बित गेलैक | एक दिन हम गाम बिदा भ’ गेलौ |      जाय काल सरिता भेट करय आयल छलीह |याद अछि एकांत पाबि कहने छलीह ,यौ पाहुन ,आब कहिया दर्शन हेतैक ?गाम जाकय त’ हमरा बिसारिये जायब ?सरिताक आँखि ढबढबा गेल छलनि |एकटा कोनों अदृश्य आकर्षण रहैक जे हमरा दुनू क’ एक दोसर दिस आकर्षित करैत छल |हमरा गाम जेबाक मोन नहि रहय मुदा स्कूल फूजि गेल छल तै जाय परल |हम सरिता क’ कहलियनि ,हम शीघ्रे आयब | गाम आबि पराते दरिभंगा चल गेलौ |ओतय मोन त’ नहि लागे मुदा एक दु दिनक बाद पढ़नाय पर ध्यान देबय लगलौ |पढ़ाय एकटा साधना छैक |साधना मे जतेक लिप्त रहै छैक ,साधक क’तदनुसार फल भेटैत छैक |हमहू एकसाल कतौ नहि गेलौ आ अपन पूरा ध्यान पढ़ाय मे लगेलौ |एहि एकसाल हम सरिता सं सेहो संपर्क नहि कएल |मैट्रिकक परीक्षा समाप्त भ’ गेल |दु मासक फेर छुट्टी भ’ गेल |हम अपन गाम आबि गेलौ |एक दिन माय क’ कहलियनि जे एक साल भ’ गेल बहिन क’ भेट नहि केलियैक अछि से लालगंज जेबाक मोन होयत अछि ?माय तुरत आज्ञा देलनि जे बहिन क’ गाम चलि जाय लेल |दोसर दिन भोरे लालगंज गेलौ |साँझ मे लालगंज पहुचलउ|बहिन बर प्रसन्न भेलीह |सांझे सं सरिता सं भेट करय लेल मोन छटपट करे मुदा सरिता भेट भेलीह दोसर दिन |सबेरे ओ बहिनक अंगना अयलीह |हमरा असोरा पर बैसल देखि हिनका बर खुशी भेलनि |एकटक सं हमरा दिस तकैत रहथि |हमरो नजरि सरिता पर गेल |ओ नजरि झुका लेलनि |सरिता क’ देखि हम त’ अबाक भ’ गेलौ |अय ,एक साल पहिने जे सरिता फूलक कोढ़ी छलीह से आब अर्द्ध बिकसित फूल भ’ गेल छथि |जे सरिता पहिने एकटा फ्राक पहिरने रहैत छलीह से आब ओढ़नी ओढ़ने छलीह |चंचल सरिता आब गंभीर भ’ गेल छथि |हुनका देखि हम हरबरा गेलौ |सहसा हमरा मुँह सं निकलि गेल  ,आउ ,सरिता , अहींक बाट  हम रातिये सं  तकैत छी  |सरिता बजलीह ,यौ पाहुन ,एके साल मे आहाँ झुठो बाजय लगलौ अछि |एहन हमरा दिस ध्यान रहैत त’ एकोटा समाद दि तौ ?ओ त’आइ भोरे मदन भाइजी कहैत छलखिन जे साँझ में हमर सार कमल अयलाह अछि |जहिना हम अहाँक नाम सुनलौ ,दौडल आयल छी |सरिता हमरा माफ करू ,गलती भ’ गेल |ओना हम गाम सं अहींक भेट करय आयल छी |सरिता चुप चाप अपन अंगना चल गेलीह |एहिबीच एकटा घटना भ’ गेलैक |हँ ,घटने कहक चाही |बहिन कहलनि ,कमल ,तू आबिये गेल छह ,हमरा दु चारि दिन लेल गंगा स्नान करय सिमरिया जाय क’ अछि |केकरा पर घर छोड्बैक |तू रह्बह त’ हम दुनू गोटा निश्चिन्त भ’ जायब |तोहर भोजन ताबे सरिता बना देतह |हम हुनका माय क’ कहि देलियनि अछि |   ओना बहिन नहि रहती से सुनि नीक नहि लागल मुदा पता नहि एकटा अदृश्य कोनों शक्ति देह मे रोमांच उत्पन्न क’ रहल छल | भोरे बहिन मिसरक संग गंगा स्नान करय सिमरिया चल गेलीह |बहिन भोरे हमरा लेल भोजन तैयार क’ देने छलीह |राति में ठीक सं नींद नहि भेल छल |दस बजे स्नान केलौ |तत्पश्चात भोजन क’ सुति रहलौ |चारि बजे उठलौ आ बहार निकलि पोखरिक मोहार पर टहलय लगलौ |सूर्यास्त भेलाक बाद घर लौटलौ |सरिता कनेक कालक बाद अयलीह |दीप ज़रा हमरा लग बैसलीह |हम कहलियैन ,आइ त’ आहाँ अपना पाहुन क’ एको बेर खोजो नहि केलियनि |ओ कहलनि ,नइ यौ पाहुन !हमरा माँ क’ बुझल छलैक जे दिनक भोजन अहाँक लेल भउजी बना क’ गेल छथि |ओना हम आयल रही त’ आहाँ सुतल रही |हम घूमि गेल रही |सरिता फेर पुछलनि ,बाजू ,की खायब ?आहाँ जे खुआयब सैह हमरा लेल अमृत छैक |सत् पूछी त’ अहांके देखिये क’ हमर पेट भरि गेल |यौ पाहुन ,कतेक झूठ बजैत छी |सरिता भोजन बनाबय भनसा घर चलि गेलीह आ हम छत पर जा घुमय लगलौ |सरिता एक घंटाक उपरान्त छत पर अयलीह |हम आ  ओ ,पटिया बिछा एकहि  ठाम बैस गेलौ | पूर्णिमा दिन रहैक |चान अपन पूरा प्रकाश पसारि देने छलखिन |बसंतक  मादकता प्रकृति  मे पसरल छलैक |आमक  सुगंध चारुकात गमकैत छलैक |भौरा गुंजायमान केने छलैक |कोयलीक कु कु वाताबरण मे मिठास भरि देने रहैक |केखनो क’ दक्षिण पवन मंद मंद बहैत छलैक | शान्ति ब्याप्त छलैक |दुटा हृदयक धरकनक आवाज हमरा दुइए गोटा  क’ बुझा रहल छल |हम दुनू गोटा पटिया पर बैसल छी |मलयानिल जोर सं चललैक आ सरिताक ओढ़नी उरि हमरा देह क’ झाँपि देलक |हुनकर केसक लट हुनक लाल लाल कोमल कपोल पर लहरि मारय  लगलनि जेना मेघ चान क’ ढकि दैत छैक |हम सरिताक ओढ़नी हुनका माथ सं ओढ़ा घूँघट बना दैत छियैन आ हुनकर दुनू कपोल पर अपन दुनू हाथ द’ ओहि चान क’ निहारैत छी |सरिता एक बेर हमरा दिस तकैत छथि आ नजरि झुका लैत छथि |हुनक ई रूप हमरा एतेक आंदोलित केलक जे हम अपना क’ नहि रोकि सकलौ |हुनका अपना करेज सं सटा लेलियनि |बरीकाल तक एहिना हुनका अपना करेज सं सटेने रहलियनि |सरिता अपन दुनू हाथ उठा हमरा गरदनि पर दय अपन माथ हमरा हृदय पर समर्पण क’ देलखिन |लागल जेना चान क’ मेघ झाँपि देलकै ,पुरा अन्हार भ’ गेलैक |हमर मोन जेना अपना नियंत्रण सं बाहर होमय चाहैत छल |ओही समय में बाँसक झुरमुट सं एकेबेर पक्षीक समूह कोलाहल करय लगलैक |हमर चेतना घूमि आयल |सरिताक बात त’ मोन क’ आओर स्थिर क’ देलक |ओ हमरा जांघ पर अपन माथ द’ कहलनि ,प्रियतम ,चान मे आहाँ की देखैत छियैक ?चानक प्रकाश देखैत छियैक ,चानक मुस्कराहट देखैत छियैक |सरिता पुनः कहलनि मुदा चान में ओ दाग देखैत छियैक |सरिताक बात हमरा अंतरात्मा क’ छू लेलक |हम कहलियनि ,प्रिये ,ओहि चान जकाँ हमरा चान क’ दाग नहि लगतैक |हमर चान त’ ओहू चान सं बेसी चमकतै |हम बारी काल तक हुनका माथ में अपन आंगुर चलबैत रहलियनि |आकाश मे चान हमरा सभ क’ देखि स्थिर भ’ गेलैक |पक्षी सभ जे कनेक काल पहिने कलरव करैत रहैक  अपना खोता मे शांत भ’ गेलैक ||जेना पक्षी सभ क’ हमरा प्रेम पर विश्वाश भ’ गेलैक |बाताबरण मे निरवता पसरि गेलैक | नीला आकाशक नीचा मात्र हम आ सरिता |कोनो शब्द नहि |कोनो आवाज नहि |मात्र हमरा दुनुक साँसक आवाजक अनुभूति होयक | हम दुनू प्रकृतस्थ भेलौ |मुदा सरिता हमरा जांघ पर अपन माथ द’ आकाश दिस तकैत रहथि |हुनका माथ क’ सह्लाबैत हम पुछलियनि ,सरिता की सोचैत छी ,की देखैत छी ?ओ कहलनि ,प्रियतम ,हम बहुत दुर टिमटिमायत ओहि तारा क’ देखैत छियैक |हमरो जीबन ओही तारा जकाँ टिमटिमा क’ रहि जायत |टिमटिमाइत ओही तारा जकाँ हमहू एहि संसार मे ने रहि जाय ?सभक ध्यान त’ झिलमिल चाने पर रहैत छैक |यौ पाहुन ,हम आइ नीक कएल की बेजाय से हम नहि जनैत छी मुदा हमर रोम रोम अहाँक’ समर्पित अछि |आब इ जिनगी अहाँक संग ,नहि त’ फेर एहि देहक स्पर्श मृत्वे करतैक | हमर हृदय चित्कार क’ उठल |हम अपन प्रियतमाक मुँह पर अपन हाथ ध’ देलियनि आ हुनका अपना करेज सं सटा लेलियनि |प्रियतमा अहूँ एहि बात  क’ गेठ बान्हि लेब जे प्रियतमा छोरि एहि देह पर मृत्वेटाक बस चलतैक |सरिता सेहो हमरा  मुँह पर हाथ ध’ देलखिन |सरिता खुशी सं हमर गरदनि मे दुनू हाथ द’ झुलि गेलीह |” दुनू बर प्रसन्न |प्रेमालिंगन मे दुनू डूबल |तेसर दिन बहिन बह्नोई गाम अयलखिन |एक सप्ताह के बाद कमल गाम चलि गेलाह |रिजल्ट निकलनि |प्रथम श्रेणी सं पास केलनि |गाम सं पटना आबि गेलाह |पटना साइंस कओलेज मे नाम लिखेलाह |अपना गति सं जिनगी चलय लगलैक |कमल पढ़ाई पर ध्यान देबय लगलाह |बीच बीच में सरिता सं पत्र द्वारा गप्प होयत रहलनि |सरिता सेहो पढ़य पर ध्यान देबय लगलीह |एहि तरहे समय बितैत गेलैक |कमल पटना मे एम् एस सी मे पहुचलाह आ सरिता सी एम कओलेज ,दरभंगा में बी ० ए ० मे पहुचलीह |सरिताक पिताजी विश्व विद्यालय मे काज करैत रहथिन |तै सरिता दरभंगा मे नाम लिखेलनि |दुनुक बीच पत्र ब्यबहार अबाध गति सं होयत छलनि |एहि बीच कहियो कहियो कमल दरभंगा आबि सरिता सं कओलेजक परिसर में भेट क’ जाइत छलखिन |दुनुक बीच प्रेम प्रसंग अबाध गति सं चलैत छलैक |सरिता आब गुलाबक कोढ़ी वा अर्द्ध विकसित फूल नहि छलीह ,आब ओ गुलाबक पूर्ण फुलायल फूल छलीह ,पूर्ण नव यौवना अ कमल सुन्दर ,सुशील युवक एकबेर महात्मा करोट फेरबाक प्रयास केलक मुदा निरर्थक |देह मे मात्र अस्थियेटा शेष छैक |एकबेर जोर सं निःश्वास लेलक आ कनेक स्थिर भेल |पुनः ओकरा मानस पटल पर चलचित्र जकाँ  दृश्य  घुमय लगलैक | “कतेक खुशी सं जीबन बितैत रहय |सरिता सन प्रेमिका भेटल छल जिनकर प्रेरणा सं सभ किछु सुन्दर गति सं चलैत छल |प्रेम आ कर्तब्यक बीच झुलैत नहि छलौ |सुन्दर ढंग सं समय बितैत छल |एम० ए० मे विश्वविद्यालय मे प्रथम आयल रही |पटना साइंस कओलेज मे ब्याख्याताक पद पर आरूढ़ भ’ गेल छलौ |” कमलक प्रत्येक सफलता  सं सरिता खुश  रहैत  छलीह |दुनुक संपर्क सूत्र जुटल छलनि |सरिता सेहो बी० ए० क’ गेल रहथि |सरिताक रिजल्ट देखि कमल दरिभंगा आयल रहय |दुनूक भेट साँझ मे भेलैक |विश्वविद्यालयक सकटमोचन मंदिर मे, दुनू गोटा बजरंगबली क’ दर्शन केलाक बाद नौरगना पैलेसक सामने पार्क मे एकठाम बैसल |कमल पूछने रहैक   ,आगुक पढ़ाईक बारे मे मुदा सरिता कहने रहैक  ,पाहुन ,आहाँ पढ़ाइक बात नहि करू |पाहुन ,हम अहाँक प्रेमक आगि मे जरि रहल छी आ हमर पिताजी हमर ब्याहक गप्प सुरुह क’ देने छथि |हम आहाँ कोना परिणय सूत्र में बन्हायब ताहि लेल सोचू |कमल कहने रहैक जे सरिता स्थिर रहू |सभ ठीके रहतैक |कमल घूमि क’ पटना चल गेलाह |किछु दिन एहिना बितलैक |कमल सोचैत छल|  कोना प्रस्ताव पठायल जाय ,ताबे बीचे मे सरिताक पत्र भेटलैक   |                                                                                लालगंज , दि० १५.०२.१९७५. प्रियतम ,प्रणाम , हम अपन हाल की लिखू |हमर स्थिति त’ ओहि स्वाती चिरइ जकाँ अछि जे बरखाक  एक बूंद जल लेल आकाश दिस तकैत रहैत अछि |हमर एक एक क्षण कोना बितै अछि कहि नहि सकैत छी |हमर ब्याह हमर पिताजी ठीक क’ लेलखिन |ब्याहक दिन फागुन शुदि पंचमी रवि अर्थात १० मार्च क’ निर्धारित भेलैक अछि |हे प्रियतम ,आहाँ कत ’ नुकायल छी |आहाँ त’ बुझते छी हमर ब्याह त’ कतेक दिन पहिने भ’ गेल अछि |आब एहि देह क’ पर पुरुष कोना छूअत |एहि सं  त’ मरि गेनाइ  नीक |हे पाहुन ,हमरा एहि जाल सं मुक्त करू |शीघ्र आउ ,नहि त’ फेर एहि लोक मे नहि भेटब |               अहींक प्रतीक्षा मे ,सरिता | कमल क’ हाथ मे जहिना पत्र भेटलैक ,लगलैक जेना ई संसार घूमि रहल छैक |कमल क’ बुझेबे नहि करैक जे कोना एहि बिपति क’ पार लगायब |ओ तुरत दरिभंगा बिदा भेल |सीधे सरिताक पिताजी सं भेट केलक आ अपन सभ स्थिति स्पस्ट क’ देलकनि |सरिताक पिताजी कमल क’ आश्वस्त केलखिन आ कहलखिन जे सरिता जतय चाहतैक ओतहि ब्याह हेतैक मुदा नव स्थितिक कारण किछु समय लागत |कमल प्रसन्न भ’ पटना लौट गेल मुदा किछु दिनक बाद पुनः एकटा पत्र भेटलैक | प्रियतम , पिताजी आहाँ क’ ठकि लेलनि |हमर ब्याह आइ भ’ गेल |समाजक डर सं हमहू किछु बाजि नहि सकलौ |हमरा सिउथ मे जे सिंदूर देलक अछि ,हमर मोन में त’ ओ नहि  अछि |तै हम निर्णय केलौ अछि जे अपन जीबन लीला समाप्त क’ ली |तै ब्याहक बादे हम घर सं भागि गेलौ |हम अहूँ लग कोन मुँह ल’ क’ जायब ?हमरा आहाँ  लग गेने आहाँ क’  पराभव भ’ जायत |आब हमर जीबन नरक भ’ गेल |आब केकरा ल’ जीयब |पाहुन ,आब एहि जन्म  मे भेट नहि होयत |हमर सभ कहल सुनल माफ करब | मरैयो काल अहाँक हाथक स्पर्श हमरा रोमांचित क’ रहल अछि |पाहुन ,झूठ नहि कहैत छी अहाँक स्मरण होयते पुरा देह ओहिना  काँपि रहल अछि जेना प्रथम अभिसारक समय देह काँपल छल | बस आब किछु नहि कहब |अहूँके दुखे होयत |भ’ सकय त’ हमरा बिसरि जायब |पाहुन ,हमर अंतिम प्रणाम |      अहींक अभागल ,सरिता | पत्र देखि कमलक आँखि सं अश्रुपात होमय लगलैक |ओ भाव विह्वल भ’ गेल |तुरत पेंट शर्ट पहिर बिदा भेल, सरिताक ताकय |कतय कतय ने सरिता के ताकय लेल गेल मुदा सरिता कतौ नहि भेटलैक |कमल सोचलक ई संसार बेकार छैक |जखन सभ सं  प्रिय  हृदये हेरा गेल तखन आब जीबन मे रहिये की गेल अछि |” आइ बारह बरख सं एहि शिव कोटिक कुटी मे रहैत अछि |संसार मे ओकरा लेल रहिये की गेलैक जेकरा लेल चिंता करत |कियो किछु द’ दैत छैक त’ खा लैत अछि ,नहि कियो किछु देलकै त’ कतेको दिन भुखले रहि जायत अछि |मुदा नित गंगा स्नान करैत अछि आ नित गंगाक कल कल छल छल प्रबाह के देखैत रहैत छैक  |गंगाक प्रबाहे जकाँ ने ओकर सरिताक प्रबाह रहैक |एहिना ने ओहो कल कल छल छल करैत रहैत छलैक |गंगाजले जकाँ ओ हो ने स्वच्छ ,निर्मल आ सीतल छलैक |ओकरा होयत छलैक जे गंगाकाते में ओकरा सरिता सं कहियो ने कहियो भेट हेतैक मुदा एखन तक कहाँ सरिता अयलैक ? साधुक’ बुझेलैक आब साँसों लेबा में दिक्कत होयत अछि |मुदा ई की, दुर बहुत दुर की देख रहल छैक  ?उपर नीला आसमान मे सरिता नव बधुक रूप मे ओकरा निहारि रहल छैक | पता ने   ओकरा कतय  सं शक्ति आबि गेलैक  आ जोर सं भागल आ सरिता क’ भरि पाँज क’ पकरि कानय लागल | भोरे कुटी लग बर भीर रहैक |आश्रमक लोक ठठरी बना नेने रहैक |साधु क’ उठा ओहि पर ध’ देने रहैक |लोक सभ कुटी क’ अंदर देखय लगलैक जे कि सभ छैक |सरिताक पत्र छोरि किछु नहि रहैक |लोक आब बुझलकै जे साधु त’ प्रेमक पुजारी छल |ओहि कुटीक नाम प्रेम कुटी राखि देल गेलैक | ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। राजदेव मण्‍डलक उपन्‍यास हमर टोल गतांशसँ आगू- खेलावन भगत चौबटि‍यापर चक्कर पूजि‍ रहल छै। एकश दि‍स तकलकै। लगलै जेना अधरति‍या भऽ गेलै। ओना तँ साँझो-परात लोक एनए नै अबै छै तँ राति‍क कोन गप। लोककेँ डर पैसल छै- जे सुनहटमे बाधक चौबटि‍यापर मुँहरगड़ा प्रेत रहै छै। एक दि‍न उचि‍तवक्ताक कक्का चोटपर चढ़ि‍ गेल रहै। खून बोकरैत-बोकरैत आँखि‍ उनटि‍ गलै। के जानि‍-बूझि‍ कऽ आगि‍पर टाँग राखत। “जानि‍ बूझि‍ नर करै ढि‍ठाइ....।” कि‍नकर मैया बाघि‍न जनमे। केकरा ओतेक हि‍म्मति‍ छै जे एमहर एतै। खेलावन भगत पूरा नि‍चेन अछि‍। ओकर आँखि‍ अड़हूल फूल जकाँ लाले-लाल भऽ गेल छै। धोतीकेँ डाँरमे कसने अछि‍। चाकड़-चौरठ देह, नंग-धड़ंग। आगूमे सजावटि‍क संग पसरल अछि‍। अड़हूल फूल, अरबा चाउर सि‍नूर। एक कातमे मनुक्‍खक खोपड़ीक कंकाल, दाँत कि‍चने। धधकै आहूत। पाँति‍मे जरैत दी। धूमन आ घी जोरसँ झाेंकैत अछि‍। तँ आहूत धधकि‍ उठैत अछि‍। नि‍शि‍भाग अन्‍हरि‍या राति‍मे धरमडीहीवालीक चेहरा चमकि‍ उठैत छै। नमरह-नमहर खुगल केश। पैघ-पैघ आँखि‍मे नीनक छाँह। जेना नि‍शाँमे मातल होइ। अधभि‍ज्‍जू साड़ीसँ देहक कि‍छु भाग झाँपल, कि‍छु भाग उघाड़। बन्न होइत आँखि‍ खेलावनक गर्जनसँ चौंकि‍ उठैत अछि‍। “जय काली-वन्‍दी-जोगनी भद्रकाली-कपाली...।” आगूमे जरैत दीप दि‍श ताकए लगैत अछि‍। “ओने नै एमहर देख। धधकैत आगि‍ दि‍श।” खेलावन गरजैत अछि‍- “जेना कहै छि‍यौ तहि‍ना करैत जो। हमरा औडरकेँ अवहेलना करबै तँ अलटरबाकेँ स्‍त्री जकाँ सौंसे देह आगि‍ धधकि‍ उठतौ।” धरमडीहीवालीक ठोर सुखा रहल छै। बजतै से सट्ठा नै दै। “नै यौ भगतजी। जहि‍ना कहबै तहि‍ना करबै।” “हँ, करैत जो। तइमे कल्‍याण छौ। जय काली।” ऊपर दि‍स तकैत चि‍चि‍या उठैत अछि‍। “गे छुलही गात छोड़ नै तँ जरा कऽ भसम कऽ देबौ।” भगत आँखि‍ गुड़रि‍ धरमडीहीवाली दि‍स तकैत अछि‍। “एमहर देख, हमरा दि‍स। मुँह कि‍अए गाड़ने छेँ। कलशा कऽ जल उठा कऽ पी ले।” “आब हम नै पी सकब। हमरा बुत्ते नै हएत। घंटा भरि‍सँ तँ पीते छी- घोंटे-घोटे। गलामे जलन भऽ रहल अछि‍। देहम जेना आगि‍ नेश देने अछि‍। नि‍न्नसँ आँखि‍ बन्न भऽ रहल अछि‍। लगै छै जेना आसमानमे उड़ि‍ रहल छी। कहीं बेहोश भऽ जाएब तब।” “चुप छुलाही देखै छी- ब्रह्म पि‍शाचक देल बेंत। ऐसँ अखने....। मन साधि‍ कऽ। पी ले। इलाज भऽ रहल छौ तँ राति‍ भरि‍ कष्‍ट हेबै करतौ।” डरे थर-थर कापैत धरमडीहीवाली कलशा उठा कऽ मुँहसँ लगा लेलक। साड़ी छातीपरसँ ससरि‍ गेल। भगत जीक आँखि‍ नाचए लगल। कामनाक चि‍ल्हौड़ सुनहट पाबि‍ गन-गना कऽ उड़ए लगल। स्‍पर्शक लेल हाथ आतुर भऽ गेल। मन बन्‍धन मुक्‍त भऽ बनमे बौआए गेलै। कलशाक बचल नीरसँ अपन पि‍यास मेटबए लगल। श्राद्ध कर्म एक मास पहि‍ने बीतलै। तहि‍यासँ अजय गप्‍पकेँ भजि‍या रहल छै कि‍न्‍तु कुछो पता नै लगि‍ रहल अछि‍। ओकर भौजाइ कखनो जोगनी जकाँ प्रगट भऽ जाइ छै तँ कखनो भूत जकाँ अँगनासँ नि‍प्पता भऽ जाइ छै। परसू शीलाक गपसँ ओकर माथा ठनकल जखैनसँ धर्मडीहीवाली आ भगतक खि‍स्‍सा ओ सुनलक तखैनसँ जेना ओकरा देहमे आगि‍ नेश देलकै। “अरे तोरी के। पूरा टज्ञेलकेँ सुधारेबला ठीकेदारक घरेमे भोंकार। लाक मने-मन कहैत हेतै- अपन घर-पलि‍बार सम्‍हरबे नै करै छै आ दोसराकेँ उपदेश देने घुड़ै छै। पर उपदेश कुशल...। अँगना लेल तँ अजय बेकूफ छै। पता नै खेलावन भगत की भरने छै दि‍मागमे।” साँझेसँ अजय अपना भौजाइक चमक-दमक देखि‍ रहल छै। बि‍ना कारणे टि‍टही नै लगै छै। अजय ओकरेपर नजरि‍ गड़ौने छलै। कि‍न्‍तु छनेमे छनाक। कखैन नि‍पत्ता भऽ गेलै। अजय टाँर्च लेलक आ सभ घरमे इजोत घुमेलक। कहाँ छै कतौ। दुआरि‍पर ओकर भाय जागेसर खोंखि‍या रहल अछि‍। अजय सोझे दौगल- गहवर दि‍स। हाय रौ तोरी। भगत गहबरसँ पार भऽ गेल छै। कतए हेतै? शीला चौबटि‍या परक नाओं कहने रहै। घोड़ा जकाँ दौगल अजय। हकमैत चौबटि‍यापर जूमि‍ गेल आगूमे देखैत अछि‍। खेलावन भगत धरमडीहीवालीक साड़ी खोलि‍ रहल अछि‍। एहनो हालति‍मे धरमडीहीवाली साड़ीकें भरि‍ मुट्ठीसँ धेने अछि‍। चीरहरण सफल नै भऽ रहल अछि‍। अजय लपकि‍ कऽ भगत जीक बेंत उठौलक आ तड़ाक-तड़ि‍ खेलावनक पीठपर बरसबए लगल। ऐ अप्रत्‍याशि‍त आक्रमणक लेल भगत तैयार नै छल। ओकर दि‍मागक काज जेना बन्न भऽ गेल। तैयो पलटि‍ कऽ गरजल- “के छेँ? आइ जरा कऽ तोरा राख कऽ देबौ। जय माँ काली.....।” अगि‍ला शब्‍द ओकरा मुँहसँ नै नि‍कलि‍ सकल। फटा-फट बेंत ओकरा कपारेपर खसए लगल। छड़-छड़ा कऽ कपारसँ लहु बहए लगलै। माथ पकड़ने पड़ेबाक कोशि‍श केलक। धधकैत आहूत अजय ओकरा देहपर उझलि‍ देलकै। “हौ बाप हौ। गे माइ गे।” डि‍रि‍या उठल। अजय पाछूसँ गरजल- “ठहर सार, आइ सभटा तंत्र-मंत्र तोरा पाछाँसँ भीतर ठूसि‍ दै छि‍यौ।” “हौ बाप आब मरि‍ जेबइ हौ।” कहैत लंक लऽ कऽ भागल भगत। अजय कि‍छु दूर रबारलक। फेर आपस आबि‍ धरमडीहीवालीकेँ सम्‍हारि‍ कऽ उठौलक कहुना घिसि‍याबैत टोल दि‍स चलि‍ देलक। ..................................... ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। जगदानन्द झा 'मनु' ग्राम पोस्ट- हरिपुर डीह्टोंल, मधुबनी विहनि कथा १ माड  बाडहैन तेसरो बेटीए हेमंत बाबूक बेटी रोशनी, अपन नामक अनुरूपे अपन कृतीक पताका  चारू कात लहराबति, आईएएस केँ परीक्षा में भारत वर्ष में प्रथम दस में अपन स्थान अनलथि | समाचार सुनि हेमंत बाबू दुनू परानीक   प्रशन्नताक कोनो ठीकोने नइँ | जे सsर सम्बंधी आ समाजक लोक सुनलनि सेहो सभ  दौड-दौड आबि हेमंत बाबूकेँ बधाइ दैत | रोशनी बड्डका जेठका सभ केँ प्रणाम करैत आशीर्वाद लैत | फूलो काकी फूल जकाँ हँसैत- बजैत एलि, रोशनी हुनक दुनू पैर पकरि आशीर्वाद लेबैक लेल झुकलि | फूलो काकी रोशनी के अपन करेजा सँ लगबैत टपाक सँ बजलि- "हे यौ हेमंत बौआ, अहाँक तेसर ई  फेक्लाही बेटी त ' सगरो खनदान केँ जगमगा देलक |" हुनकर  एहि गप्प पर सभ कियो ठहाका मारि क ' हँसय लागल | मुदा हेमंत बाबूक आई सँ एक्किश बर्ख पाछूक यादि में विलीन भय गेला - - दुटा बेटी भेला बाद कोना ओ बेटाक इक्षा में मंदिरे -मंदिरे  देवता पितर केँ आशीर्वाद लेल  भटकैत   रहथि | मुदा  हुनकर सबटा मेहनत बेकार भेलनि जखन हुनक कनियाँक तेसर प्रसब पीड़ा केँ बाद फूलो काकीक  अबाज हुनकर कान में परलनि -"मार बाडहैन ई तेसरो बेटीए जन्म लेलक....." एहि  बातक आँगा हुनका किछु नहि सुनाई देलकैंह | जेना की अपार दुख सँ मोन में कोनो झटका लागल होइन, ओ अपन जगह पर ठार केँ ठारे रहि गेल रहथि    | २ - की भगवती हमर घर एती ? मोहंती बाबा | सगरो गामक बाबा | गाम में सब हुनका बाबा कहि कय संबोधित करै छनि जेकर कारण छैक  हुनकर बएस  | पनचानबे बर्खक मोहंती बाबा अपन कद काठी आ डीलडोल सँ एखनो अपन उम्र केँ पछुआबैत, लाठी टेक क ' गामक दू चक्कर लगा क ' आबि जाई छथि | मुदा अपन गाम भगवतीक दर्शन करैक हेतु कहियो नहि जाई छथि | गाम में बनल विशाल भगवतीक मंदिर, भगवती बड्ड जागरन्त चारू कातक बीस गाम में भगवतीक महिमाक चर्चा छैन्ह | गामक मानयता केँ हिसाबे गामक  सब कियो एक ने एक बेर भगवती घर दर्शन हेतु अबश्य जाई जै छथि | गर्मीक छुट्टी में बाबाक पोता जे की दिल्ली में कोनो प्रतिष्ठित काज करै छला, गर्मी बिताबै आ आम खेबाक इक्छा सँ गाम एला | ओहो गामक परम्पराक निर्वाह करैत भगवतीक दर्शन कय क' एला | एला बाद दलान पर बैसल बाबा संगे गप सप होइत रहलै | गपक बिच संजय बाबा सँ पुछलाह-" बाबा अहाँ भगवती घर नइँ जाई छियैक |" बाबा -"नइँ" संजय -"किएक" बाबा -"हौ बौआ, भगवती घर त' सब कियो जाइत अछि, मुदा भगवती केकरो-केकरो घर जाइ  छथिन | हम अपन मन आ स्वभाब केँ एहेन बनाबैक प्रयास में छी जे भगवती हमर घर आबथि |" संजय बाबाक मुँह सँ एहेन दार्शनिक गप सुनि अबाक रहिगेल आ सोचय लागल जे की ओकर मन आ स्वभाब  एहेन छैक जे कहियो  भगवती ओकर घर एती ? आ ओकर अबाक रहैक कारण रहै सायद नइँ | ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। अतुलेश्वर सोचब आवश्यक जे...... ‘मिथिला’ शब्द ककरो लेल अपरिचित नहि, अपने देश वा विदेशक कोनो कोनमे चलि जाउ मात्र ‘मिथिलाक छी’ कहब तँ ओ अहाँक परिचय बुझि जएताह। सभक मोनमे स्वत: आबि जएतनि जतए राजा जनकक राज-दरबार छल, जतए जनकनन्दनी सीताक जन्म भेल छल, जे महाकवि विद्यापतिक जन्मस्थान थिक। हमरा मोन अछि हम जखन बहुत छोट रही तँ जनकपुरमे एक बेर कोनो धार्मिक समारोह भेल रहए, जाहिमे एक दिस जतए साधुलोकनि जुटल छलाह तँ दोसर दिस बहुतो विद्वान लोकनि सेहो। ओहि मध्य एकगोट विद्वान कहलथिन्ह जे ओ जखन मास्को गेल छलाह तँ ओतए रामायण, महाभारतक सङ-सङ विद्यापतिक पदावली सेहो भेटल छलनि। सभास्थ ओ कहलथिन्ह जे –ओतए एकटा पाठक ओहि पदावलीक विषयमे अपन टिप्पणी देने रहथिन्ह जे मैथिली मधुर भाषा नहि अछि। हुनक ओ उक्ति सुनि हमर बालमोनकेँ बड़का झटका लागल, कारण हमर घर मिथिला-मैथिल-मैथिलीक लेल पूर्ण रुपेँ समर्पित छल, जतए आन-आन भाषा मात्र पाहुन भए अबैत छल,  ओहि परिवेशमे बहैत बसात सभ किछु मैथिलीक लेल छल आ तेँ हमरा ओ उक्ति सुनि बड़ चोट लागल छल। मुदा किछु क्षणक विरामक बाद ओ विद्वान आगाँ बजलाह जे मैथिली मधुर नहि, सुमधुर भाषा थिक आ हम आइ ओहि धरती पर आयल छी जतुक्का भाषा सुमधुर अछि जे माँ सीताक पर्यायवाची शब्द थिक। हुनक ओ कहब हमर बालमनमे पैसि गेल आ हम निश्चय कए लेल जे आबसँ हम अपन परिचय मिथिलाबासीक रुपमे देब। ओ क्षण आयल, जखन हम पहिल बेर मिथिला सँ बाहर पूर्वोत्तरक राज्य असम पहुँचलहुँ। हमरासँ पूछल गेल ओएह प्रश्न आ हमर उत्तरो पूर्व सोचक अनुसारहिँ निकलल। हमर उत्तर सूनि ओ लोकनि सहजहिँ चर्च प्रारम्भ कए देलनि राजा जनक ओ हुनक जगत्जननी सुपुत्री सीताक, अद्वितीय महाकवि विद्यापतिक आ बहुतो मनीषीलोकनिक। हमर छाती गौरवसँ तनि गेल। हमरहि सङ रहथि एकगोट बिहारी मित्र, जे परिचयमे बिहारी शब्द जोड़लन्हि आ विभिन्न तरहक तानासँ ग्रस्त भए गेलाह। केओ चारा घोटालाक विषयमे जिज्ञासु भए गेलाह तँ केओ लालू माहात्म्यमे, केओ दरिद्रताक विषयमे सोचब प्रारम्भ कएलनि तँ केओ ट्रेनक चोड़ीक खिस्सा, जतेक मूह ततेक खिस्सा। एहि प्रसङकेँ उठएबाक कारण अछि हमर-अहाँक सोचक विषयमे किछु सोचब। मिथिलाकेँ बिहारीपनसँ तँ जुझए पड़ैत छैक, मुदा जखन खोआ-राबड़ी-अमिरतीक गप्प अबैत अछि तँ मिथिलाकेँ ताहूसँ वंचिते रहए पड़ैत छैक, ई किएक?  की! मैथिलमे पौरुषक कमी आबि गेल अछि वा हमसभ एखन धरि अपन अधिकारक महत्तेकेँ चीन्हि नहि सकलहुँ अछि? वा आने कोनो गप्प, मुदा एतबा अवश्य जे हमसभ एखनहुँ दही-चूड़ा-चीनीमे लटपटाएल छी। मिथिलाक स्वर्णीम इतिहास, ओहि ठामक अद्वितीय बौद्धिक प्रकाश, मिथिलाक सांस्कृतिक प्रवासमे आबि आन सभ केओ अपनाकेँ भाग्यशाली बुझैत छथि, मुदा ई क्षेत्र सब दिनसँ अपनहिँ द्वारा ठकल गेल अछि, अपनहिँ द्वारा साधल गेल अछि, ई किऐक? एकरहि फरिछएबाक हेतु जखन एहि ठामक मिथिला राज्य आन्दोलनक अभिप्राय विषय पर विषय-वस्तु ताकब प्रारम्भ कएल तँ एकटा आलेख भेटल- ‘हिन्दी भाषा मे अलग राज्य की माँग क्यों सन्दर्भ मिथिला’ ओहि मे बिहारक प्रशासन आ मीडियाक मानसिकताक पर संजय मिश्र लिखने छथि-  “सन्दर्भ की बात चली तो थोड़ी बात बिहार की कर लें .......मिथिला के मानस के उद्वेग की। आपके जेहन में उमड़ रहे कई सवालों के जवाब शायद आप तलाश पायें। मिथिला इसी राज्य बिहार का एक अंग है। पौराणिक-एतिहासिक मिथिला का दो-तिहाई हिस्सा बिहार में और शेष नेपाल में पड़ता है। कभी मौक़ा मिले और समय हो तो बिहार के हुक्मरानों के भाषण सुने। इन्हें ही क्यों ....बिहार की मीडिया पर भी नजर गड़ाएं । बिहार की महिमा का जब ये बखान करते तो भगवान् बुध ही इन्हें नजर आते। भगवान् महावीर कभी-कभार याद आते....पर जनक नहीं...माता सीता नहीं। मिथिला का स्मरण करा दें तो इनकी भावें तन जाती। इस इलाके की मिटटी, पानी, हवा...ये सब बिहार की संपदा हुई पर ' मिथिला' शब्द और यहाँ के लोगों से परहेज। यहाँ की विरासत पर गर्व करने की बजाए इन्हें शर्म का अनुभव क्यों ?  आगू लिखने छथि जे - सूना होगा आपने की मैथिली भाषा संविधान की आठवीं सूची में दर्ज है...वो साहित्य अकादमी में भी है। यानि इन जगहों पर बिहार का मान बढ़ा रही । पर क्या राज्य के शाषकों को इस पर नाज है ? हर सेन्सस रिपोर्ट में मैथिली भाषियों की संख्या कम बताने की इनकी साजिस क्या किसी से छुपी रह गई है ? थोड़ा पीछे जाएं...शिव पूजन सहाए जैसे ख्यातिलब्ध साहित्यकारों ने मैथिली की परिचिति खत्म करने का बीड़ा क्यों उठाया था ? पाठ्यक्रमों से मैथिली को बार-बार हटाने के कुचक्र क्या राजकीय गर्व का अहसास हैं? मैथिली जब आठवीं अनुसूची में शामिल की गई तो राष्ट्रीय टीवी चैनलों ने भी इसे प्रमुखता से दिखाया। संविधान संशोधन करना पडा था...लिहाजा ये न्यूज़ थी। लेकिन बिहार के सर्वाधिक लोकप्रिय चैनल ने इस खबर को दिखाने की जहमत नहीं उठाई। इस चैनल को बिहार की स्वर कोकिला शारदा सिन्हा की आवाज नहीं सुहाती...क्योंकि वो मिथिला क्षेत्र से आती हैं...जबकि मनोज तिवारी ' अप्पन ' बने हुए हैं। देश के किसी कोने में चले जाएं...गैर बिहारियों से बात करें। बिहार का नाम लेते ही वो भोजपुरी का जिक्र करेंगे। यही हाल इन जगहों के समझदार समझे जाने वाले पत्रकारों का है। अधिकाँश को पता नहीं की मैथिली बिहार की ही भाषा है। बिहार सरकार की गर्व की अनुभूति और काबिलियत ( ? ) का ये जीता जागता नतीजा है। पटना से छपने वाले हिन्दी के अखबारों को पलट कर देखें। हेडिंग्स और कार्टून के टेक्स्ट आपको भोजपुरी में मिलेंगे। इन अखबारों की ये किर्दानी सालों से है....अछा है...पर मैथिली में क्यों नहीं। इन्हें मिथिला का पाठक/ खरीदार चाहिए पर मैथिली नहीं चाहिए...बिलकुल वैसे ही जैसे राज्यके नेताओं को मिथिला के ' लोग ' चाहिए जिन पर सत्ता की धौंस जमाएं पर इन " लोग ' के हित की परवाह नहीं।” एहि ठाम उपर्युक्त उक्ति रखबाक पाछाँ हमर ध्येय ई अछि जे हमसभ किछुओ काल लेल एहि दिशामे सोची। सोची जे, आखिर एहन मानसिकताक जन्म किएक होइत छैक? की! एकर पाछाँ मात्र एतबहि सिद्ध करब अछि जे मिथिला आ मैथिलीकेँ उचित अधिकार निरर्थक छी? की! एखनहु एकर विरोधीलोकनि इएह सोचि रहल छथि जे मैथिल मात्र चूड़ा-दहीमे विश्वास करैत छथि? की! मैथिल एखनहुँ ‘सूतल छी, बिआह होइत अछि’मे विश्वास करैत छथि? नहि तँ एहन मानसिकता किऐक? हमरा लगैत अछि जे एहि मानसिकताक पोषण भेल आर-आर तत्वक सङ दरभंगा राजालोकनिक शासनक समयमे। यदि ओ हिन्दी, देवनागरी, उर्दू, फारसी आ अंग्रेजीकेँ सम्पोषित नहि कएने रहतथि तँ आइ मिथिला-मैथिलीक ई दशा नहि भेल रहितैक। एहि प्रकारक उक्ति देबाक पाछाँ ध्येय अछि ओहि कारणकेँ ताकब, जाहि बलेँ मिथिला-मैथिल-मैथिलीकेँ उचित अधिकारसँ वंचित रखबाक साहस प्राप्त कएल जाए रहल अछि, दरभंगा राजक दूरदृष्टिक अभाव आइ धरि मिथिलाकेँ सता रहल छैक। ओना कारण मात्र ओतबे नहि अछि। हम मैथिल जन सेहो एको पाइ कम दोषी नहि छी, एकर पाछाँ। हमसब आइओ अपन क्षेत्र-अपन मातृभाषाक प्रति सजग-सतर्क नहि भए सकलहुँ अछि, प्राय: एखनहुँ एकर महत्ताकेँ नहि आँकि सकलहुँ अछि। मिथिलाक हृदयस्थली मधुबनी जिलाक झंझारपुर विधानसभाक सदस्य श्री नीतिश मिश्र अपन क्षेत्रमे साधारणो जनसँ मैथिलीमे नहि बाजि पबैत छथि, प्राय: प्रयासो नहि करैत छथि। जँ कदाचित् केओ मैथिल एहि पर टिप्पणी करितो छथि तँ नेताजीक चमचासभ आ मिथिलाक तथाकथित बुद्धिजीवी लोकनिक उक्ति होइत छनि- ‘आह, डाक्टर साहबेक बेटा ने छथिन, सभ दिन बाहरे पढ़लनि, तेँ ई क्षम्य अछि।’ औजी, मिथिलासँ बाहर पढ़बाक परम्परा मात्र मिश्रेजीक परिवारमे छनि कि आओरो लोक पढ़ि रहल छैक। जँ बाहरे पढ़ि ओहि बुद्धिकेँ प्रयोग करब छल तँ ओहि हेतु आन कतेको माध्यम छैक। मुदा, ई जननेता बनबाक लेल जनसँ जूड़ब आवश्यक आ जनसँ जुड़बाक हेतु जन-जनकेर भाषासँ जूड़ब परम आवश्यक, जन-जनकेर मातृभाषाकेँ पूरब आवश्यक। यद्यपि एहनो राजनेताक अभाव नहि जे मैथिल जनक सङ सभ दिशामे पूरि रहल छथि, नहि तँ मैथिलीक उपर उठब असम्भव छल। मुदा, एहि ठाम ई कहबामे कोनो असौकर्यक गप्प नहि जे मिथिलामे नेतृत्त्वक पूर्व अभाव अछि। केओ राजनेता एहि हेतु कृतसंकल्पितो नहि बुझाइत छथि। परञ्च, एकबेर फेर समस्या आबि ठाढ़ भए जाइत अछि हम-अहाँ साधारण मैथिलक लग। जँ सम्पूर्ण मैथिलबासी एहि हेतु कृत-संकल्पित भए उठथि तँ ककर मजाल जे मिथिला-मैथिल-मैथिलीकेँ उचित अधिकार नहि देत। मुदा, की हमसभ एहि दिशामे साकांक्ष भए सकलहुँ अछि? हमरा तँ नहि लगैत अछि, ओना अहाँ सभक जे विचार हो। एहि बीच दरभंगा गेल रही, ओतहि रहनिहार एकटा हमर मित्रक पारिवारिक भाषा हिन्दी सुनि चकबिदोर लागि गेल। ओ अपन मैथिल पत्नीसँ हमर परिचय हिन्दीमे करौलनि आ हम हुनक मूह तकैत रहि गेलहुँ। अपनाकेँ सम्हारैत-सम्हारैत अपन परिचय मैथिलीमे देल। जँ दरभंगामे ई परिस्थिति तँ बाहरक गप्पे करब व्यर्थ। एकरा कि कहब? की, ई अपनाकेँ साधारण मैथिलसँ एक ईंच उपर देखएबाक प्रवृत्ति थिक? आ कि आने किछु। मुदा विषय अवश्य विचारणीय अछि, सोचनीय अछि। एकर पाछाँ फेर कारण तकला पर जेना बुझबामे अबैत अछि जे साधारण मैथिल अपनाकेँ मुख्य धारासँ कटैत गेलाह। एतए द्रष्टव्य थिक एकटा उक्ति, जाहिमे   डा.तारानन्द वियोगी रमेश रञ्जनक कविता संग्रह रक्त क आमुख मध्य लिखने छथि – भाषाशास्त्रीलोकनि जनैत छथि जे मैथिलीक जन्म जन-बोनिहार गरीब-गुरवा द्वारा अपन सांस्कृतिक तत्वसभक अभिव्यक्ति हेतु, संस्कृतक विरोधमे भेल छल। आ वैह मैथिली आगू चलिकऽ तेहन सम्भ्रान्त आ संस्कृतिनिष्ठ बना देल गेल जे आम लोक अपन भाषा आ भावके लेल ओहिठाम कोनो जगह नहि पौलनि। मुदा, यैह मैथिली जँ संस्कृतक स्थानापन्न भऽ जइतै, एहिमे धर्म-कर्म पूजा-पाठ होबऽ लगितै, शास्त्र-चर्चा होब’ लागितै तँ एक बात छल। मुदा से किए? संस्कृत अपन बादशाहत तँ कायम कयनहि रहल, एम्हर मैथिली रजनी-सजनीक भाषाटा बनिकऽ रहि गेल।-  एहि उक्तिसँ आन जे किछु हो, एतबा तँ अवश्य कहल जाए सकैत अछि जे मैथिली साधारणजनसँ दूर होइत गेलीह, गुटबाजीक प्रवृत्तिसँ आहत होइत गेलीह आ तेँ अपन उचितो अधिकार प्राप्त करबासँ वंचित होइत रहलीह। अपनेसभ देखि सकैत छी जे किछु मैथिल अपनहिँ पएर पर अपनहिँ कुड़हरि भाँजि हिन्दीक सेवा लेल नाङरि ढ़ोलौने फिरैत छथि, सोच ई जे साहित्यिक प्रभाव एकहि बेरमे हिमालय पहाड़ पर चढ़ि जाएत। ई सभ यथार्थकेँ बिसरि जाइत छथि जे हिन्दीक समृद्धिमे अछि मैथिलीक भूमिका। जँ आइ मैथिली हिन्दीक उपेक्षा करए लागय तँ हिन्दीक स्थिति मिथिलामे सेहो पूर्वोत्तर आ दक्षिण जकाँ भए जाएत, जतए हिन्दी प्रसार समिति आ कि-कि ने खोलए पड़ि रहल छैक। मुदा हमरा लोकनि तँ अपन अस्मिताकेँ ताक पर राखि दोसराकेँ सहेजबामे विश्वास करैत छी, अपन सबकिछु न्योछावर कए दोसराकेँ जीवन दए गर्वक अनुभव करैत छी। स्मरण अबैछ सद्य: बीतल ओ दिन, जनकपुर मे मिथिला संघर्ष समिति लेल आन्दोलनक समय बम बिस्फोटमे पांच गोटए शहीद भेल, जाहिमे एकटा मिथिलाक रंगकर्मी रञ्जु झा सेहो छलीह। ओ आइ धरि बिना कोनो स्वार्थकें मैथिली आ मिथिलाक लेल लड़ैत रहलीह आ अन्तमे मिथिलाक लेल अपन बलिदान तक दए देलन्हि, मुदा नेपाली मिडिया खास कए कान्तीपुर मात्र, हुनका प्रति श्रद्धाञ्जलि अर्पित करब अपन कर्त्तव्य बुझलक। एहन बलिदानीक हेतु नेपाल आ भारतक कोनो वरिष्ठ साहित्यकार किछु नहि बजलाह। कोन कारण छल जे भारतीय साहित्यकारलोकनिक सङ नेपालक साहित्यकारलोकनिमे सँ डा.राजेन्द्र प्रसाद विमल, प्राज्ञ रामभरोस कापड़ि भ्रमर, श्री अयोध्या नाथ चौधरी आ महेन्द्र मलंगिया आदिक कोनो वक्तव्य प्रकाशमे नहि आएल? आइ काल्हि छोट सँ छोट खबरि मीडिया मे रहैत अछि, मुदा हिनकालोकनिक संवेदनायुक्त कोनो समाद कतहु देखबामे नहि आएल। पता नहि एकर पाछाँ कोन असंमजसता छलनि। किछु व्यक्तिक सोच छनि जे हमरासभकेँ राजनीतिक सहयोगक आवश्यकता अछि। मुदा, वाह रे ! अपनेक मानसिकता। जाहि राजनेताकेँ हम-अहाँ बनबैत छी ओ सहायता करताह तखन हम डेग उठायब, की उचित? हमरातँ बुझबामे आबि रहल अछि जे किछु एहि प्रकारक लेखक आ साहित्यकार मैथिलीक प्रतिनिधित्व क रहल अछि जनिक मानसिकतामे मिथिला आ मैथिली सँ बेसी अपन हित छनि, अपन अस्तित्वक चिन्ता छनि। मुदा एहन-एहन व्यक्तिक चर्चासँ घबड़एबाक गप्प नहि छैक, कारण आइओ धीरेन्द्र प्रेमर्षि, श्याम सुन्दर शशि, का. रामचन्द्र झा, प्रा. परमेश्वर कापड़ि, गायक सुनील मल्लिक, प्राज्ञ रमेश रञ्जन, का. रोश जनकपुरी सनक लोक नेपालमे सक्रिय छथि जनिक कृतित्त्व आ व्यक्तित्वसँ मिथिलाकेँ गर्व करबाक अवसर बेर-बेर भेटैत रहैत अछि, मुदा प्रश्न ठाढ़क ठाढ़े अछि जे की हमसभ अपन मातृभाषाक लेल कृतसंकल्पित छी? ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। १.डॉ. इन्‍दुधर झा-दू-पत्र : एक वि‍श्लेषण २.डॉ॰ शशिधर कुमर “विदेह”- पोथी समीक्षा - अम्बरा १ डॉ. इन्‍दुधर झा मैथि‍ली वि‍भाग ल.ना.ति‍. महावि‍द्यालय मुजफ्फरपुर। दू-पत्र : एक वि‍श्लेषण दू-पत्र वस्‍तुत: पत्रात्‍मक शैलीमे लि‍खल मैथि‍लीक पहि‍ल उपन्‍यास थि‍क। मात्र दू गोट पत्रमे समाएल समग्र कथानक। मात्र दू गोट पत्रमे भारतीय नारीक नि‍श्छल, ि‍नर्मल, शालीन ओ प्रौढ़ चि‍त्रांकन। पहि‍ल पत्र अपन स्‍वामी सुरेन्‍द्रकेँ लि‍खने छथि‍ श्रीमती इन्‍दू देवी आ दोसर पत्र एक अमेरि‍कन महि‍ला जेसि‍का द्वारा अपन भारतीय मि‍त्र रमेशक नामे लि‍खल गेल अछि‍। मात्र चारि‍ गोट पात्रक प्रयोग ऐ उपन्‍यासक एक अलग वि‍शेषता अछि‍। सुरेन्‍द्र ि‍नर्विवाद रूपेँ ऐ उपन्‍यासक नायक छथि‍, आ नायि‍का भारतीय नारी श्रीमती इन्‍दू देवीकेँ सेहो कहि‍ सकैत छी आ एक अमेरि‍कन महि‍ला जेसि‍काकेँ सेहो। रमेश छथि‍ मुख्‍य सह-नायक। इन्‍दग देवीक दूर-दराजे सम्‍बन्‍धी भाए आ सुरेन्‍द्रक सार। कथानक दू गोट पत्रक माध्‍यमसँ जे मुख्‍य कथानक पाठकक मन:चेतनापर चि‍त्र उकेरैत अछि‍ से ई जे सुरेन्‍द्र अपन बाइसम वर्षक अवस्‍थामे पन्‍द्रह वर्षीय इन्‍दूसँ अपन पूर्ण सहमति‍सँ वि‍वाह कएने छथि‍, जकर माध्‍यस्‍थता आंशि‍क रूपेँ कएने छथि‍ रमेश। रौराठ-सभासँ वि‍आह नि‍श्चि‍त भेल छल। सुरेन्‍द्र इन्‍जीनि‍यरि‍ंगक चारि‍म वर्षक छात्र रहथि‍ आ इन्‍दू नवम वर्गक छात्रा। ओना इन्‍दू दू वर्ष पहि‍नहि‍ गामक स्‍त्रीगण समालक मध्‍य अजग्‍नि‍ सन भऽ गेल रहथि‍ मुदा ओइ सभामे दुनू भाँइ मीलि‍ कथा स्‍थि‍र कऽ लेने रहथि‍। सुरेन्‍द्रक बि‍आह पूर्ण मैथि‍ल रीति‍ऍं इन्‍दूसँ भेलनि‍। इन्दू, माने श्रीमती इन्‍दू देवी, आब दू बच्‍चाक माए छथि‍ आ सुरेन्‍द्र अमेरि‍कामे रमि‍ गेल छथि‍। आब तँ नअ वर्षसँ कोनो सम्‍पर्क नै रहि‍ गेल छन्‍हि‍, मात्र दू-आखर चि‍ट्ठीक सम्‍पर्क छोड़ि‍ कऽ। असह्य पीड़ासँ झामरि‍ भऽ गेलीह अछि‍। बि‍आहक बाद दू-चारि‍ वर्ष धरि‍ तँ सुरेन्‍द्रकेँ इन्दूसँ दाम्‍पत्‍य प्रेम छलनि‍ आ तकरहि‍ परि‍णाम भेल रहनि‍ दू गोट सखा-सन्‍तान मुदा तँए कि‍ आब तँ अमेरि‍काक एक गौरांगी रमणीक रंग तेनामे तेना ओझराएल छथि‍ जे सम्‍बन्‍ध-वि‍च्‍छेदक प्रस्‍ताव इन्‍दू  देवीकेँ पठओने छथि‍। असलमे पहि‍ल पत्र सुरेन्‍द्रक सम्‍बन्‍ध-वि‍च्‍छेदक प्रस्‍तावक जबाब अछि‍। अपन लोक-वेद, घर आंगन, इष्‍ट-परि‍जनसँ नि‍स्‍पृह भेल नअ वर्षसँ अमेरि‍कामे रहैत अपन जीवन, इच्‍छा-आकांक्षाक एकमात्र आधार, सोहाग-भागक अधि‍ष्‍ठाता, सुख साम्राज्‍यक स्‍वामी, अग्‍नि‍-साक्षि‍त पति‍ सुरेन्‍द्रकेँ लि‍खल हुनक प्रत्‍यागमनक बाट तकैत, पलकक सेज सजौने, वि‍रहाग्‍नि‍मे तड़पैत श्रीमती इन्‍दू देवीक पत्र। ओना जेसि‍का प्रभावि‍त छथि‍ सुरेन्‍द्रसँ। तहूसँ पहि‍ने रमेशसं भेँट पहि‍ने हुनका सुरेन्‍द्रसँ होइत छन्‍हि‍ आ प्रभावि‍त जे होइत छथि‍ सेहो सुरेन्‍द्रहि‍सँ मुदा अचानक जे रमेश इण्‍डि‍या अबैत छथि‍ तँ रमेशसँ सेाहे प्रभावि‍त भऽ जाइत छथि‍। मुदा रमेशमे भारतीयता ततेक ने वेशी देखैत छथि‍ जेसि‍का जे क्रमश: भारतीयतासँ प्रभावि‍त होइत गेलीह आ रमेशसँ दूरी बनैत गेलनि‍। मुदा इन्‍द्र देवीकेँ वि‍च्‍छेदक प्रस्‍ताव पठौलाक उपरान्‍त सुरेन्‍द्र जेसि‍काक समक्ष अपन मोनक बात स्‍पष्‍ट कऽ देलनि‍। जेसि‍कासँ पहि‍ल भेँट सुरेन्‍द्रकेँ जर्मन क्‍लासमे भेल रहनि‍। दुनूक आवासमे मात्र चारि‍ ब्‍लाकक अन्‍तर रहनि‍। दुनू असगर रहथि‍। मोन मनएबाक हेतु एक-दोसराक घर आबए-जाए लागल रहथि‍। जेसि‍का सुरेन्‍द्रक ओहि‍ठाम जाए भानस भात सेहो करथि‍, कारण, सुरेन्‍द्रकेँ तकर अवगति‍ नै रहनि‍ आ ऐ बातसँ जेसि‍का मि‍श्र रहथि‍। संग उठनाइ-बैसनाइ, पार्क घुमनाइ, सि‍नेमा देखनाइ आदि‍ बात तँ सहजे होमए लगलनि‍। सुरेन्‍द्रक संग जीवन बि‍तएबामे जेसि‍काकेँ कोनो तरहक आपत्ति‍ नै रहनि‍, से ओ मोने-मोन जनैत रहथि‍ आ तँए जे सुरेन्‍द्र इन्‍दू देवीसँ वि‍च्‍छेद आ हुनका संग सम्‍पर्कक प्रस्‍ताव स्‍पष्‍ट कऽ देने रहथि‍न आ संगहि‍ हुनक सम्‍मति‍ मंगने रहथि‍न से जेसि‍काकेँ अस्‍वाभावि‍क नै लागल नहनि‍। जेसि‍का ई जनैत रहथि‍ जे सुरेन्‍द्र पहि‍नौं भारतमे बि‍आह कएने छथि‍, संगहि‍ सुरेन्‍द्रक ऐ तर्कसँ, जे आब वि‍गत नअ वर्षसँ हुनका अपन पत्नीसँ कोनो संपर्क नै छन्‍हि‍ सेहो सहमत रहथि‍ आ सुरेन्‍द्रसँ सम्‍बन्‍ध स्‍थापि‍त करबामे एकरा कोनोटा बाधा नै बुझैत रहथि‍, कारण अमेरि‍की संस्‍कृति‍मे एकर कोनो मूल्‍य नै छैक। मुदा रमेश जे अपन छोट-छीन पत्रक संग सुरेन्‍द्रक नामे लि‍खल इन्‍दू देवीक विस्‍तृत पत्रक अंग्रेजी अनुवाद जेसि‍काकेँ पठओने रहथि‍न तकरा पढ़ि‍ जेसि‍का कि‍ंकर्त्तव्‍यवि‍मूढ़ रहथि‍। एखन इन्‍दू देवीक अंग्रेजी अनुवाद हाथमे अएलनि‍ तँ भारतीयताक असली स्‍वरूपसँ अवगत भेलीह। ओहुना भारतीय आचार-बेवहार, रीति‍-रेवाज, धर्म-कर्म आदि‍सँ प्रभावि‍त रहबे करथि‍। क्रमश: २. डॉ॰ शशिधर कुमर “विदेह” पोथी समीक्षा - अम्बरा कोनहु भाषाक जिबैत होयबाक प्रमाण की ? इएह जे जाहि क्षेत्र विशेष मे ओ भाषा बाजल जाइत अछि ओहि क्षेत्रविशेष केर हरेक व्यक्ति (वा अधिकांश व्यक्ति) ओहि भाषा केँ अपन मातृभाषाक रूप मे बजैत हो । “हरेक” मतलब हर वर्गविशेषक लोक – चाहे ओ कोनहु वयसमूहक हो,  चाहे ओ कोनहु जातिक हो, चाहे ओ कोनहु धर्मक हो अथवा कोनहु व्यापार / व्यवसाय सँ जुड़ल हो । मात्र बजैत हो - सएह टा नञि, अपितु ओहि भाषाविशेष मे अपन रचनात्मक ओ सर्जनात्मक योगदान सेहो करैत हो । “मैथिली” केँ सम्पुर्ण रूपेँ ई सौभाग्य आइ धरि कहियो नञि भेँटि सकल । एक दिशि, कोनहु “एक समूह” कोनहु “दोसर समूह” केँ मैथिली नञि बाजय देलखिन्ह वा नञि पढ़ए - लिखए देलखिन्ह आ “मैथिली” केँ अपन बपौती सम्पत्ति बना कऽ रखलन्हि । दोसर दिशि, चुँकि “पहिल समूह” मैथिली केँ अपन बपौती सम्पत्ति कहि देलन्हि तेँ “दोसर समूह” सेहो मैथिली बाजब वा मैथिली पढ़ब – लिखब छाड़ि देलन्हि । मैथिलीक लेल ई परम दुर्भाग्यक गप्प रहल । घऽर - घरारी आ सम्पत्तिक बँटवारा भऽ सकैत छै, माएक नञि; मैथिल लोकनि केँ से बात बुझबा मे बहुत विलम्ब भेलन्हि । कारण जे हो, पर “माए मैथिली” केँ ई सौभाग्य आन समकक्ष भाषाक अपेक्षा बहुत काल धरि नञि भेँटि सकलन्हि । सम्प्रति खुशीक बात ई जे पछिला किछु वर्ष सञो समय बदलल अछि आ हरेक वर्गविशेषक लोक अपन रचनाशीलता सँ माए मैथिलीक आँचर भरि रहल छथि । शुरुआत मे गति बहुत सुस्त छल आ श्री विलट पासवान “विहंगम” वा स्व॰ फजलुर्रहमान हासमीजी सन एक – आधहि टा नऽव नाम देखबा मे अबैत छल पर आइ एहेन नाँव सभक संख्या बहुत तेजी सञो बढ़ल अछि । एहने एक गोट वरिष्ठ रचनाकार छथि श्री राजदेव मण्डलजी । आइ हुनिकहि लिखल एक गोट काव्य संग्रह “अम्बरा” केर समिक्षा लऽ कऽ हम अपनेक सोझाँ उपस्थित छी । “अम्बरा” - रचनाकारक गोटेक पचहत्तरि टा काव्य रचना केँ अपना मे समाहित कएने अछि । सभटा कविता “अमित्राक्षर छन्द” मे अछि । पर डेरएबाक काज नञि; “अमित्राक्षर छन्द” रहितहुँ “मित्राक्षर छन्द” केर रचना सन प्रतीत होयत आ पढ़बा मे ओहने लयबद्ध आ रुचिगर लागत । यथा :- अहाँ कहैत छी – कायर बनबसँ नीक हिंसक भऽ जाएब से अछि ठीक लोक कहत - वाह-वाह किन्तु हमरा लगैत अछि ई अधलाह ......................... “अहिंसक वीर” बिनु उचित शब्द केर भाव मरि जाइत अछि आ बिनु भावक शब्द तँ शब्दकोशहि बुझू । पर ई दोष एहि कविता संग्रह मे कतहु देखबा मे नहि आओत । उचित शब्द ओ समीचीन भाव केर अजगुत संगम देखबा मे अबैछ । जेना कि तप्त रेतपर फरफड़ाइत माछ कानि – कानि कऽ रहल नाच रेतापर फाड़ैत चीस उड़बाक लेल आसमान दिश अभागल देहसँ झड़ए लागल चाँदीकेँ कण झूमि उठल कतेको आँखिक मन जरि रहल माछक तन ........................ “बाउल परक माछ” सम्पुर्ण काव्य रचना विशुद्ध खाँटी मैथिली मे थिक; हँ कत्तहु – कत्तहु किछु हिन्दी शब्दावलीक प्रयोग ठीक सँ मेल नञि खाइत अछि, पर से अत्यल्प । भाषा बहुतहि सहज ओ स्वभाविक थिक आ ताहि कारणेँ पढ़बा काल घटनाक्रम वा वर्णित विषय पाठककेँ अपना समक्ष घटित होइत प्रतीत होएतन्हि । जेना कि देखल जाओ शब्द नहि रहल दिलक बोल तेँ नहि रहल ओकर मोल ......................... ................. बजैत रहैत छी अमरीत बोल भीतर रखने बीखक घोल ......................... “दिलक बोल” कोनहु साहित्य मे जँ विविधता नञि हो तँ ओ सम्पुर्ण नञि कहबैछ । जहिना भोजन मे षड्‌रस केँ भेनाइ आवश्यक तहिना साहित्य मे नवरस ओ तकर उपरस सभक समावेश परमावश्यक । मात्र शिंगार ओ भक्ति रसोपरस सँ साहित्य समग्र नञि भऽ सकैछ – एहि प्रकारक साहित्य श्रृजन एकभगाह ओ असन्तुलित कहबैछ । “अम्बरा” मे ई दोष नञि । एहि छोट – क्षिण काव्य संग्रह मे बहुत अधिक “विषय - वैविध्य” थिक । हरेक रचना भाव – स्वभाव मे एक दोसरा सँ भिन्न । आ इएह एकर सभसँ पैघ विशेषता थिक । एक दिशि “जाति” आ “हम फेर उठब” सन रचना जञो सामाजिक वैषम्य पर प्रहार करैछ तँ दोसर दिशि “ज्ञानक झण्डा” सन कविता समाज मे पसरल अंधविश्वास आ अशिक्षा पर । कमजोर वा दलित व्यक्तिक मनोदशाक केहेन मार्मिक चित्रण कएल गेल अछि से देखू टप – टप चुबैत खूनक बूनसँ धरती भऽ रहल स्नात पूछि रहल अछि चिड़ै अपना मन सँ ई बात आबऽ बाला ई कारी आ भारी राति कि नहि बाँचत हमर जाति ..... ? ......................... “चीड़ीक जाति” “हथियारक सभा” आ “अहिंसक वीर” सन रचना कोनहु समस्याक शान्तिपुर्ण समाधान करबा पर ओ अहिंसा पर जोर दैछ आ अनेरोक रक्तपात व नक्शलवादी प्रवृत्ति केँ विरोध करैत बुझना जाइछ । देखल जाओ सुनह लगाबह ध्यान खोलह अपन अपन कान तब भेटतह आजुक सम्मान बिनु देहसँ गिरौने रकत कऽ सकैत छह दोसर जुगत ................................................ ......... बिनु हिंसाकेँ जे कएने होयत हृदयपर राज ओकरे भेटत ई अमूल्य ताज ........................ “हथियारक सभा” एहि पोथी मे “मुनियाँक चिन्ता” आ “कथीक गाछ” नामक बालकविता सेहो अछि, जाहिमे बहुत सुन्नर ढंग सँ बाल मनोभाव केँ व्यक्त कयल गेल अछि । मुनियाँक छोट भाए केर जन्म भेलै, पूरा परिवार खुशी मना रहल छल आ मुनियाँ कानि रहलि छलि । पुछला पर की उत्तर भेटलैक से अपनहु सभ सुनू ई तँ छै खुशीक बात जनमल तोरा भाए कतेक खुशी छह तोहर माए दादी, सबटा जानै छी हम ओहि लए नहि कानैत छी चिन्ता अछि हमरा आब के कोराकेँ लेत दूधो माए पिबऽ नहि देत ........................ “मुनियाँक चिन्ता” “गाछक हिस्सा” आ “गाछक बलिदान” पर्यावरण असन्तुलन ओ तकर रक्षण दिशि ध्यानाकृष्ट करैछ जखन कि “मनोवाणछित चान” आ “परेमक अधिकार” किञ्चित् शिंगार रसक कविता थिक । “बाढ़िक चित्र” नामक कविता मे २००८ ई॰ मे कुसहा लऽग टुटल कोसीक बान्ह सँ आयल बाढ़िक बहुत मर्मस्पर्शी आ सजीव चित्रण कयल गेल अछि । किछु अंश द्रष्टव्य थिक एहसरि अर्धनग्न स्त्री परिश्रान्त मुख क्लान्त बैसल अछि धारक कात देह स्नात जिअत अछि कि मुइल साइत सोचि रहल अछि इएह बात एखनहि निकलल अछि संघर्ष कऽ बाढ़िक धारा सँ ........................ “बाढ़िक चित्र” सम्प्रति मैथिली साहित्यक दशा – दिशा, मैथिलीक प्रति कविक प्रतिबद्धता ओ ताहि सन्दर्भ मे देल गेल स्पष्टीकरण देखल जाओ दोसरोक माय अछि हमरे माय तँ कि यौ भाय अपना मायकेँ बिसरि जाइ .......................................... मैथिलीक अछि असीम भण्डार एहि बात केँ हम सोचि ली घर भरल हो जखन दोसरासँ किएक पैंच ली राखि संतोष करी उपाय की यौ भाय । ........................ “माय” ओना तँ हरेक कविता चर्चाक अपेक्षा रखैत अछि पर से सम्भव नञि । जहिना भात सीझलै कि नञि से ओहि मे सँ मात्र एक टा दाना केँ छूबि अन्दाज लगाओल जा सकैछ आ तहिना उपरोक्त किछु उदाहरण सभ सँ समग्र पोथीक अनुमान । व्याकरण केर दृष्टिकोन सँ एहि पोथीक एक गोट खास विशेषता अछि जे विभक्ति (कारक चिन्ह वा शब्द) प्राचीन मैथिली जेकाँ मूलशब्द केर संगहि लिखल गेल अछि ।* अन्त मे मैथिलीप्रेमी पाठक लोकनि सँ एतबहि कहए चाहबन्हि कि ई कविता संग्रह हुनिका आशा सञो बेसी रुचिगर लगतन्हि । पोथीक नाँव :– अम्बरा ( मैथिली कविता संग्रह) लेखक :– श्री राजदेव मंडल प्रकाशक :– श्रुति प्रकाशन ८/२१, भूतल, न्यू राजेन्द्र नगर, नई दिल्ली - ‍११०००८ दाम :– ‍१०० टाका मात्र * प्राचीन मैथिली मे संस्कृतक प्रभावक कारणेँ कारक चिन्ह वा विभक्ति मूलशब्दक संगहि लिखल जाइत छल । आधुनिक मैथिली मे बहुधा फुटका कऽ लिखल जाइत अछि अथवा मिश्रित स्वरूप मे ।  मिश्रित स्वरूप - माने कि किछु कारक चिन्ह संग मे (यथा – कारणेँ) आ किछु फुटका कऽ (यथा – चौकी पर) । संस्कृत मे विभक्ति चिन्ह वा शब्द नञि होइत अछि अपितु मूल शब्द मे विकार उत्त्पन्न कए “शब्द वा धातु रूप” बनाओल जाइत अछि तेँ ओ हमेशा मूलशब्दक संगहि रहैछ । पर मैथिली समेत आन आधुनिक भारतीय आर्यभाषा सभ मे ई शब्दविकृति वा धातु विकृति नञि होइछ (अधिकांशतः) आ तेँ कारक केर विभक्ति निरूपनार्थ अलग आखर वा शब्द होइत अछि । ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। :: दुर्गानन्‍द मण्‍डल टैगोर साहि‍त्‍य पुरस्‍कारक बहन्ने तारीख 10/6/2012 दि‍न रवि‍, ि‍नरमलीसँ पटना जेबाक हेतु, स्‍थानि‍य मि‍लानपथसँ संध्‍या 8 बजे सरकारी बस द्वारा गोसाइ-पीतरकेँ सुमरि‍, आरक्षि‍त जगहपर बैसल। मनमे सदि‍खन देव-पीतरक यादि‍, ताकि‍ यात्रा शुभ हुअए। ि‍नर्धारि‍त समैसँ बस खुजल। भुतहा, नरहि‍या, फुलपरास होइत चनौरागंजमे काका (श्री जगदीश प्रसाद मण्‍डल) केँ गोर लागि‍ आदरक संग बैसाओल। हुनका छोड़क हेतु बेरमा गामक कतौक लोक जेना कपि‍लेश्वर राउत, लक्ष्‍मी दास, शि‍वकुमार मि‍श्रा, अखि‍लेश, सुरेश, मि‍थि‍लेश आदि‍ आएल छलन्‍हि‍। राति‍ भरि‍ देव-पीतरकेँ सुमरैत तीन बजे भोरमे दुनू बापुत पटना पहुँचलौं। बससँ उतरि‍ पलेटफार्मकेँ गमछासँ झारि‍ बैसलौं। ओंघीसँ आँखि‍ डोका सन-सन आ रंग अरहुल सन। जाकि‍ आँखि‍ मुनलौं आकि‍ काका उठौलन्‍हि‍ जे उठु-उठु प्रात भऽ गेल। से ने तँ नदी-तदी तरगरे फीर लि‍अ। फरीच्‍छ भेलासँ सुलभ शौचालाइयोमे नम्‍मर लगाबए पड़त। सएह कएल। आँखि‍ मि‍ड़ैत डेग शौचालय दि‍सि‍ बढ़ौल। बेरी-बेरी दुनू बापुत नदी फि‍रलौं। गामक बनाओल दतमनि‍, जेकर अगि‍ला मुँह थकुचल आ पछि‍ला भाग चीरल। मुँहमे दऽ चारि‍ये घुस्‍सा ऐ कातसँ आेइ कात धरि‍ दऽ कुरूर-आचमनि‍ कऽ आगू बढ़लौं। एम्‍हर काका अखि‍यासै छलाह जे चाहक दोकान केम्‍हर छैक। जे पहि‍ने एक-हक गि‍लास चाह पीब लैतौं तखन जे होइतै से होइतै। गाँधीमैदानक उत्तरवारि‍ कातमे धुआँ होइत देखलि‍ऐ। तखन भरोस भेल। सहटि‍ कऽ लग गेलौं। चुल्‍हि‍ पजारनहि‍ छल। ब्रेंचपर बैसेत दू गि‍लास चाहक आग्रह केलौं। समए साफ भऽ गेल रहैक। काका कहलनि‍ जे से नै तँ कोनो टेक्‍सीबलाकेँ ताबत भाँजि‍ ने लि‍अ, जे ओ हवाइ अड्डा जाएत जौं जाएत तँ पाइ कत्ते लेत? एकटा मुँहसच्‍च आदमीकेँ देखि‍ हाक देलि‍ऐ। आबि‍ गछलक। भाड़ा एक साए लेत सेहो कहलक। चाह पीब दुनू बापूत टेक्‍सीमे बैसलौं, बैसि‍ते वि‍दा भेल। दुनू बापूत अनभ्‍ाुआरे रही। नै जानि‍ हमरा कहैमे गलती भेल आकि‍ ओकरा सुनैमे। ओ तँ हवाइ अड्डाक बदला मि‍ठापुर बस अड्डा लऽ अनलक। आब तँ भेल तीतम्‍हा, ओ कहए जे नै सर हमरा तँ अहाँ बस अड्डा कहलौं, हवाइ अड्डा नै। से ने तँ हमरा भाड़ा दि‍अ आ हम जाएब। कनी काल तँ केनादन लागल, मुदा फेर ओकरे कहलि‍ऐ बरनी जे लेबह से लि‍हह मुदा हमरा सभकेँ हवाइ अड्डा उतारह। ओ कहलक ओतए जेबइ तँ और एक साए टाका लेब। ऐ तरहेँ दू साए रूपैआमे हवाइ अड्डा पहुँचलौं। हवाइ अड्डामे जइठाम परम सि‍नेही श्रीमान् गजेन्‍द्र बाबूसँ साक्षात्‍ दर्शन भेल। नमस्‍कार पाती भेलाक बाद बहुत बेसी उत्‍साहक संग हमरा लोकनि‍केँ अपना गाड़ीसँ हवाइ अड्डाक भीतर लऽ गेलाह। लऽ जाइत जनौलन्‍हि‍ जे हवाइ जहाजक यात्राक की केना नि‍अम होइत छैक। गाड़ीसँ उतरलाक बाद गजेन्‍द्र बाबू हमरा दुनू बापुतक पाँच-सात गोट फोटो खिचलन्‍हि‍। हमहूँ हुनक फोटो अपना कैमरामे लेलौं। मोबाइलक घड़ीमे सात बाजि‍ गेल छल। हमरा लोकनि‍ एक-दोसरासँ फराक होबक स्‍थि‍ति‍मे आबि‍.....। गजेन्‍द्र बाबू अपना बासापर गेलाह आ हम दुनू बापूत अपन-अपन पहि‍चान पत्र लऽ नीक लोक जकाँ लाइनमे ठाढ़ भऽ गेलौं। जनीजाति‍ जकाँ मोटरी-चोंटरी तँ बेसी छल नै आ ने पंजबि‍या (पंजाब कमाइबला) जकाँ गरमि‍यो मासमे कम्‍मलक मोटा। तँए कोनो दि‍क्‍कतो नहि‍ये भेल। जाँच-परताल करा लेलाक बाद प्रतीक्षालय जा आरामसँ बैसि‍लौं। काकाकेँ कने चाहक खगता बूझि‍ आग्रह करैत अपनो सुतारलौं। ओना आदति‍ भलहि‍ं काकाकेँ छन्‍हि‍ आ से नि‍त्‍य दू बजे स्‍वयं बना कऽ पीबक, मुदा हमरा से नै, पहि‍नहि‍ कहि‍ आएल छी जे भरि‍ रातुक जगरना छल। तँए प्रति‍ कप चालि‍स टाका देबामे अखरल नै। ऐ तरहेँ कि‍छु कालक पछाति‍ पुन: घोषणा भेल आ फेर दुनू बापूत लाइनमे लागि‍ हवाइ अड्डाक भीतर मैदानमे गेलौं। दुइयो डेग तँ ने होइतै तइले अनेरे एकटा बड़का बस छल। जइपर चढ़ि‍ हवाइ-जहाज लग गेलौं। पहि‍ले भरि‍ मन नि‍गहारि‍-नि‍गहारि‍ कऽ देखलौं। पुन: अपना देवता-पीतरकेँ सुमरि‍ हवा-जहाजक सीढ़ीपर चढ़ि‍ भीतर गेलौं। मुँहेपर सि‍लेब रंगक चारि‍टा बच्‍चि‍या नाक-भौह चमका-चमका स्‍वागतमे हाथ जोड़ि‍ अंग्रेजीमे कहलक- वेल्‍कम सर। आ भभा कऽ हँसि‍ देलक जेना पढ़ौल सुगा हुअए। हवाइ जहाजमे सीट दुनू बापूतक एक्केठाम छल। सीट हेरि‍ दुनू बापूत पहि‍ने हबा-जहाजक भीतरक वातावरणक अवलोकन कएल। एना लगए जेना भरि‍ जहाजमे बरफ खसि‍ रहल होइ आ तइपरसँ गम-गम से करैत। बाहरमे जत्ते गर्मी भीतर ओतबए ठंढा कनि‍ये कालक बाद मन एकदम्म शान्‍त भऽ गेल। तेकर बाद दूटा वयस्‍क बालक आबि‍ अंग्रेजीमे कि‍दैन-कहाँदन कहि‍ हि‍न्‍दीमे दोहरौलक। जेकर भाव छल जे हमरा लोकनि‍सँ आग्रह करैत कहल गेल जे आब ई हाबा-जहाज अपना स्‍थानसँ ससमए मुम्‍बइ लेल उड़ान भरत। कुल तीन घंटा तीस मि‍नटक भीतर अपना स्‍थानपर पहुँचत। तँए अपने अपने लोकनि‍ अपना-अपना सीटपर राखल बेल्‍टसँ डाँढ़ बान्‍हि‍ ली। सएह करइ गेलौं। हवाइ-जहाज गुड़कए लगल। करीब बीघा दसे गुड़कलाक बाद वाया मुँहे घूमि‍ अपन दि‍शा आ दशा बना बड़ी जोरसँ गुड़कए लगल। गुड़कैत-गुड़कैत एक्केबर हबा-जहाज साफे कऽ धरतीकेँ छोड़ि‍ अकासमे उड़ए लगल। जी तँ सन् रहि‍ गेल। मुदा कि‍छु कालक बाद स्‍थि‍र भेल। खिड़कीसँ नि‍च्‍चाँ तकलौं। आहि‍रे बल्‍लैया ई तँ कि‍छु कतौ ने देखि‍ऐ। सौंसे उज्जर-उज्जर बादलेटा। बादलक संग हबा-जहाज उड़ल जा रहल छल। हबा-जहाजक भीतर टेम-टेमपर चाह-जलखै भेटैत रहल मुदा बड़ मगह..। खएर छोड़ू। नअ पाँचमे जे हबा-जहाज खुलल ओ एक-पैंति‍समे मुम्‍बइ हवाइ-अड्डापर पहुँचलौं। करीब पनरह मि‍नटक बाद लोक सभ उतरए लगलाह। पाछू-पाछू हमहूँ दुनू बापूत उतरलौं। उतरि‍ते मुम्‍बइ हवाइ-अड्डा देखि‍ चकबि‍दोर लगि‍ गेल। सभटा तँ देखलो सुनलो नहि‍ये। काकाक सह पाबि‍ कल्‍लौ करबाक लेल एकटा होटल पहुँचलौं। भोजन-साजन कऽ पुन: घूमि‍ हवाइ-अड्डापर आबि‍ लाइनमे लागि‍ सामान चेक-चाक करा टीकट लऽ भीतर प्रवेश कएलौं। काकाक चाह पीबाक समए सेहो भऽ गेल रहनि‍। ई हमरा बूझल छल जे गाममे अपनेसँ बना साढ़े तीन बजेक लबधब पीबै छथि‍न। जहाज तँ चारि‍ चालि‍समे छल। हाथमे एक घंटा समए देखि‍ एक-कप काैफी चारि‍ बीस दस टाकामे कि‍न दुनू बापूत पीबलौं। कनि‍ये कालक पछाति‍ घोषणा भेल पटने जकाँ लाइनमे लागि‍ मुम्‍बइसँ कोच्‍चि‍ लेल भीतर जा बैसलौं। बैसि‍ते अपन घरक गोसाइ आ देव-पीतरकेँ सुमरब सहजहि‍ मनमे आबए लगल। पहुलके जकाँ सभ अनुभव करैत कोच्‍चि‍ पहुँचलौं समए होइत रहै छह चालि‍स। मोबाइलक सुइच ऑन केलौं होइते एकटा संदेश अाएल जे अंग्रेजीमे छल जेकर मैथि‍ली रहए- हम प्रवीन कुमार सहयोगी मोहि‍त रावत दि‍ल्‍ली, उज्जर आ नील रंगक कमीज पहि‍र निकास द्वार लग ठाढ़ छी। हमरा दुनू बापूतकेँ धोती-कुर्ता देखि‍ ओ पुछलनि‍- “अपने जगदीश प्रसाद मण्‍डल? हम प्रवीण कुमार। आउ अपनेक लोकनि‍क गाड़ी ठाढ़ अछि‍ जे होटल छोड़ि‍ देत।” गाड़ीक चालक आगू बढ़ि‍ दुनू बैंग लऽ सम्‍हारि‍ कऽ रखलनि‍। दुनू बापूत गाड़ीमे बैसलौं आ गाड़ी आगाँ ससरल। करीब चालि‍स मि‍नटक उपरान्‍त एकटा दस मंजि‍ला मकान पूर्णत: वातानुकुलि‍त, गोकुलम पार्क होटल कोच्‍चि‍, लग रूकल। यूनीफार्ममे सजल दरमान होटलक दरबज्‍जा खोलि‍ ठाढ़ छल। गाड़ीक ड्राइवर बाहरक दरबज्‍जा खोललक। दुनू बापूत बहर भेलौं। दरमान झुकि‍ कऽ स्‍वागत केलनि‍। भीतर गेलौं आकि‍ नजरि‍ एकटा अठारह बर्खक नवयौवना अति‍ वि‍लक्षण स्‍वभाववाली हि‍न्‍दी आ अंग्रेजीमे नीपुण अपन परि‍चए अंग्रेजीमे देलक। जेकर भाव छल, हम पूर्णिमा सैमसंग कम्‍पनीक तरफसँ सेवामे ठाढ़ छी। कहू हम अपनेक की मदति‍ कऽ सकैत छी? पूर्णिमाक दुनू हाथ जोड़ब, नि‍च्‍चा उज्‍जर तंग जीन्‍स आ ऊपर सुगापाखि‍ रंगक टीसर्ट, नम्‍हर-नम्‍हर कारी भौर केशक कि‍छु लट दहि‍ना कातक छातीपर खसल। ति‍लकोरक फड़ सनक दुनू ठोर लाल टुहटुह। भरि‍ आँखि‍ काजर। खूब नम्‍हर-नम्‍हर हाथ आ पोरगर-पोरगर ओगरी सभ जे कोनो नीक कम्‍पनीक चमकीबला नहरंगासँ रँगल। दुनू हाथ जोड़ि‍ मूर्ति जकाँ ठाढ़ छल। देखि‍ते मन गद्गद् भऽ गेल। जे एहि‍ वयस्‍क वालि‍का एतेक शालीन! हमरा अपनो भाग्‍यपर गौरव भेल जे धनि‍ हमर मि‍थि‍ला, धनि‍ हम मैथि‍ल आ धन्‍य हमर मैथि‍ली। जइ प्रतापे हम दुनू बापूत टैगोर साहि‍त्‍य पुरस्‍कार प्राप्‍त करबाक हेतु मि‍थि‍लाक गाम बेरमा, भाया तमुरि‍या, जि‍ला मधुबनीसँ चलि‍ कोच्‍चि‍ पहुँचलौं। रि‍सेप्‍सनपर उचि‍त आदर-भावोपरान्‍त रूममे नम्‍बर चारि‍ साए छह केर कुंजी जे ए.टी.एम कार्ड जकाँ छल। पूर्णिमा हमरा सबहक संग आइ ओइ कुंजीसँ रूम खोलल। संगे ओही कार्ड रूपी कुंजीकेँ एकटा दोसर खोल्हि‍यामे पैसौलक तँ भरि‍ घर इजोत पसरि‍ गेल। दू बेडक रूप। उज्जर धप्-धप् गद्दा-तोसक तकि‍या आदि‍ अत्‍याधुनि‍क छल। सामने टेबुलपर एकटा एल.सी.डी, फोन आ चाह बनेबाक सभ सरमजाम छल। चाहक सरमजान देखि‍ते काका तँ गद्गद् भऽ गेलाह कहलनि‍- “दुर्गानन्‍दजी, सभसँ पहि‍ले एकटा चाह पीबू।” सएह कएल। चाह पीबैत टीबी खोलि‍ कने काल देखलौं। तात् पूर्णिमा मन पड़लीह हुनकासँ हमरा एकटा बेगरतो छल। ओ अपन नम्‍बर देने छलीह डायल केलौं पाँचे मि‍नटक पछाति‍ भीतर एलीह ओही अदाक संग। आग्रहपर बैसलीह। खगता कहलनि‍यनि‍ जे हमर कैमराक बेटरी डॉन भऽ गेल अछि‍ कने चार्ज होइतए। पूर्णिमा हर्षक संग बेटरी लऽ रातुक भोजनक वि‍षयमे सेहो बता देलनि‍। आ ई कहैत बाहर जेबाक अनुमति‍ चाहलनि‍ जे हम अही फ्लोरपर रूप नम्‍बर चारि‍ साए दूमे छी। अपने लोकनि‍केँ कोनो खगता हुअए तँ नि‍:संकोच बजा लेब। हम अहीं सबहक सेवार्थ आएल छी। धन्‍यवाद कहैत दुनू ठोरकेँ वि‍हँुसबैत पूर्णिमा रूमसँ बाहर भेलीह। लागल एना जेना बि‍जली चल गेल हुअए आ रूम अन्‍हार गुज-गुज भऽ गेल हुअए। पछाति‍ थोड़ेकालक, काका मोन पाड़लनि‍ जे भोजनो करबै? हम कहलि‍यनि‍- नि‍श्‍तुकी। अपन-अपन कुर्ता पहि‍र दुनू बापूत भोजनक लेल द्वि‍तीय तलपर पहुँचलौं। एक नजरि‍ घुमा चारू कात देखलौं। अलग-अलग टेबुल आ कुर्सी लागल। सभ टेबुलपर कनि‍ये टा-टा तोलि‍या, प्‍लेट, उज्‍जर धप्-धप् गि‍लास, पानि‍क बोतल आ काँटा चम्‍मच राखल छल। कने काल धरि‍ दुनू बापूत गुमसुम रहलौं। जे पूछि‍-पूछि‍ परसि‍-परसि‍ खुआओत। मुदा ओतए तँ अपने-अपने परसि‍ खाइबला हि‍साब छल। बड़नी बड़ बेस। एकहक टा प्‍लेट लऽ दुनू बापूत आगाँ बढ़लौं। जे चीज-बौस चि‍न्‍है छेलि‍ऐ ओ एकाधटा टुकड़ी उठा-उठा अपनो प्‍लेटमे राखी आ कक्कोकेँ दि‍यनि‍। मुदा जे अनचि‍‍न्‍हार चीज-वौस छल तइमे पूछए पड़ए। सेहो हि‍न्‍दीमे नै कि‍एक तँ हि‍न्‍दी तँ कि‍यो बुझबे ने करए। मैथि‍ली कथे कोन जे मैथि‍लो आब टाटा-बाइ-बाइ करैए। तखन पूछि‍-पाछि‍ अपन-अपन पसि‍नक सभ सामग्री लऽ भोजन केलौं। भोजनक तँ वि‍न्‍यासे जुनि‍ पूछू, उत्तर भारतसँ लऽ दक्षि‍न भारतक सभ कि‍थुक पूर्ण बेवस्‍था छल। भरि‍ पोख भोजन दऽ दुनू बापूत आगाँ बढ़लौं देखलौं जे एकटा कराहीमे खीर सन कि‍छु खाद्य पदार्थ छलैक। अपना जोगरक लेलौं। खाइते मन गद्गद् भऽ गेल। तत्‍पश्चात आइसक्रीम लऽ भोजन सम्‍पन्न करि‍ते रही ताबत् मोहि‍त रावत जी हमरा लोकनि‍क खोज-पुछाड़ि‍ करैत लग पहुँचलाह। हाल-चाल भेल। आराम करए गेलौं। भीनसर तरगरे उठि नहा धो कऽ तैयार भेलौं। जलपान केलाक बाद दुनू बापूत होटलक नि‍चला तलपर आबि‍ सामाचार पत्र आदि‍ देखि‍ रहल छलौं तखने रेणुका वातरा जी एलीह। सबहक कुशल-छेम जानि‍ आनन्‍दि‍त भेलीह। एक-दोसरक परि‍चए-पात भेल। आ हमरा लोकनि‍ ए.जे हाॅलक लेल वि‍दा भेलौं। हॉल देखि‍ मन गद्गद् भऽ गेल। ए.जे.हॉल पूर्णत: वातानुकुलि‍त बैस पैघ हॉल। जइमे हजारक-हजार वि‍द्वान लोकनि‍ बैस सकैत छथि‍। बेस ऊँचगर मंच। जइपर दहि‍नासँ चढ़क लेल आ वायसँ उतरक हेतु सीढ़ी बनल छल। कथाकार-साहि‍त्‍यकार लोकनि‍क बैसैक बेवस्‍था, मि‍डि‍याबलाक आ आमंत्रि‍त अति‍थि‍क सबहक अलग‍-अलग बेवस्‍था छल। दि‍नक तीन बजे पत्रकार लोकनि‍क संग भेँटवार्ता छल। एक कात सातो वि‍द्वान, कथाकार, उपन्‍यासकार आ कवि‍ लोकनि‍ आदि‍क बैसैक बेवस्‍था छल जि‍नका आगाँ नाओं लि‍खल नेमप्‍लेट छल। आही दीर्घामे रेणुका वात्रा सेहो बैसलीह। बेराबरी सभ वि‍द्वान लोकनि‍ अपन-अपन पोथीक एक झलक अंग्रेजीमे रखलनि‍। तकर पछाति‍ काका अपन पोथी संबंधी वि‍चार मातृभाषा मैथि‍लीमे रखलनि‍। पूरा कक्ष वि‍भि‍न्न प्रकारक कैमराक फ्लैशसँ चमकि‍ रहल छल जेना साओन-भादवक बद्रीमे रहि‍-रहि‍ बि‍जलोका चमकैत रहैत। वि‍चार रखलाक बाद सभ वि‍द्वान लोकनि‍सँ वि‍भि‍न्न प्रकारक प्रश्न लऽ लऽ पत्रकार लोकनि‍ लूझि‍ पड़ला। सौभाग्‍यसँ हमहुँ वि‍देह प्रथम ई पाक्षि‍क पत्रि‍काक सह सम्‍पादकक प्रति‍नि‍धि‍त्‍व करबाक हेतु उपस्‍थि‍ति‍ रही। आ पत्रकार लोकनि‍केँ मैथि‍लीसँ हि‍न्‍दी आ अंग्रेजीमे भरि‍ पोख संतोष प्रदान कएल। पाँच केम्‍हर दऽ कऽ बजलै सेहो नै बूझि‍ पेलौं। सभ कि‍यो ए.जे. हॉलक सभाकक्षमे प्रवेश कएल। अपन-अपन स्‍थान ग्रहण केलौं। आ शुरू भेल टैगोर लि‍टरेचर अवार्डक कार्यक्रम। ई तेसर पुरस्‍कार समारोह छल जेकर आयोजन ऐबेर कोच्‍चि‍मे भेल रहए। जइमे वि‍भि‍न्न भाषामे साहि‍त्‍यक योगदान हेतु सातटा भारतीय भाषाकेँ चुनल गेल, अंग्रेजी, कोंकणी, मैथि‍ली, मलयालम, मणि‍पुरी, नेपाली आ सि‍न्‍धी रहए। जे पुरस्‍कृत कएल गेल। कोच्‍चि‍क बारह जूनक संध्‍या सैमसंग इण्‍डि‍या आ साहि‍त्‍य अकादेमी द्वारा साहि‍त्‍यमे स्‍वोत्तम योगदानक लेल सातो भाषाक लेखककेँ पुरस्‍कृत करबाक लेल तैयार छल। जेकर चयन साहि‍त्‍य अकादेमीक पंच-परमेश्वर द्वारा भेल छल। एक झलक ओइ महान वि‍भूति‍क लेल जे क्रमश: ऐ तरहेँ उपस्‍थि‍ति‍ छलाह- 1. श्री अमि‍ताभ घोष, अंग्रेजी, सी ऑफ पॉपि‍ज, 2. श्रीमती शीलाकोलम्‍बकर, कोंकणी गैर्र, 3. श्री जगदीश प्रसाद मण्‍डल, मैथि‍ली, गामक जि‍नगी, 4. श्री अॅकि‍थम अच्‍युतम् नामबुदरी, मलयालम- अंथि‍मानाकालम, 5. श्री एन. कुंजमोहन सि‍ंह, मणि‍पुरी, एना कैंगे केनवा माटे, 6. श्रीमती इंद्रमणि‍ दरनाल, नेपाली, कृष्‍णा–कृष्‍णा आ 7म श्री अर्जन हसीद, सि‍ंधी, ना अएना ना। एे कार्यक्रमक मुख्‍य अति‍थि‍, डॉ. एम. वि‍रापा मोइली, ओ.एन.भी कुरूप, एम.पी. वि‍रेन्‍द्र कुमार, श्री अग्रहारा कृष्‍णमूर्ति, सचि‍व साहि‍त्‍य अकादेमी दि‍ल्‍ली आ श्री बी.डी. पार्क प्रेसीडेन्‍ट एण्‍ड सी.ई.ओ. साउथ-वेस्‍ट एसि‍या, मुख्‍य कार्यालय एच.क्‍यू, सैमसंग इलेक्‍ट्रॉनि‍क्‍स छलाह। कार्यक्रमक दौरान नोवेल पुरस्‍कारसँ पुरस्‍कृत महाकवि‍ रवि‍न्‍द्रनाथ टैगोर केर संबंधमे अपन-अपन बहुमुल्‍य वि‍चार रखलनि‍। कार्यक्रमक उद्-घोषि‍काक रूपमे साहि‍त्‍य एवं कलाक दुनि‍याँक प्रसि‍द्ध टी.भी. एंकर, मॉडल रजनी हरि‍दास द्वारा जबर्दस्‍त प्रस्‍तुति‍ सबहक मनकेँ मोहि‍ लेलक। कार्यक्रममे पुरस्‍कार वि‍तरण हेतु उद्घोषणक पछाति‍ वि‍जेता वि‍द्वान लोकनि मंचासीन होथि‍ आ पुरस्‍कृत भऽ अपन-अपन स्‍थानपर आपस आबथि‍। पुरस्‍कारक रूपमे गुरूदेव रवि‍न्‍द्रनाथ टैगोरक एकटा बेस कि‍मती मूर्ति, एकटा चि‍क्कन साल एवं एकानबे हजार रूपैयाक चेक प्रदान कएल गेल। बीच-बीच मि‍डि‍याक कैमरा बि‍जलोका जकाँ लौकैत रहल। पुरस्‍कार पाबि‍ श्री जगदीश प्रसाद मण्‍डलजी अपन लि‍खल पोथी गामक जि‍नगीक वि‍षयसँ पूर्व पोथी प्रकाशक श्रुति‍ प्रकाशनकेँ धन्‍यवाद दैत वि‍स्‍तारसँ मातृभाषामे अपन वानगी प्रस्‍तुत कऽ मि‍थि‍ला आ मैथि‍लीक मर्यादाकेँ बढ़ौलनि‍। कार्यक्रमक समापन भरत नाट्यमक प्रसि‍द्ध नरर्तकी, कलाकार पद्मश्री शोभनाचन्‍द्र कुमार द्वारा भयंकर उत्‍साहपूर्ण स्‍तरीय नृत्‍यक संग भेल। पाँच बजे संध्‍यासँ दस बजे राति‍ धरि‍ बूझू जे छओ आंगुर घीऐमे छल जकर सफलताक श्रेय सुश्री रूचि‍का बत्ता, रेणुका भान, सैमसंग इण्‍डि‍या, बी.डी.पार्क आदि‍केँ छन्‍हि‍। जे समस्‍त कार्यक्रमक दौरान काग चेष्‍टा आ बकोध्‍यानम् रूपमे रहला/रहलीह। ऐ सबहक पश्चात हमरा लोकनि‍ होटल आबि‍ स्‍वरूचि‍‍ भोजन कऽ आराम केलौं। प्रात: भने चारि बजे भोरमे अभि‍वादनक संग हाथ हि‍लबैत गाड़ीमे बैसलौं। मुदा अखनो ओ हमरा मने अछि‍......। ताबत गाड़ी कोच्‍चि‍ हवाइ-अड्डाक लेल प्रस्‍थान‍ कऽ चुकल छल। राति‍ दस-बजैत-बजैत यात्राक सम्‍पूर्ण आनन्‍द लैत दुनू बापूत गाम बेरमा-गोधनपुर आबि‍ गेलौं। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। चंदन कुमार झा सररा, मदनेश्वर स्थान मधुबनी, बिहार १. बिहनि-कथा - ठकबुद्धि२.आलेख-भीड़तंत्र बनाम् भ्रष्टतंत्र १ बिहनि-कथा - ठकबुद्धि विलट राम पहिल बेर दूनू प्राणी गाम आयल अछि.संग मे दूनू बच्चा सभ सेहो अयलहि अछि.गंगाधर पण्डित कार सँ उतरैत विलट, ओकर कनिञा आ' बच्चा सभके देखने रहथि.अनमन विदेशी लगैछै. गोर धप-धप बच्चा सभ. कनिञा सेहो बड्ड सुन्नरि छैक.विलट त' पहिनहि जँका अछि.गहुँमक रंग सन मुदा मूँहक चमक बढ़ि गेलैक अछि.किएक नहि बढतै कलक्टरक पोस्ट कोनो मामूली पोस्ट नहि होइ छै.जिलाक राजा होइत अछि कलक्टर.तखन राजसी ठाठ-बाठक चमक त' एबे करतै.कनिञा बिभा कुमार सेहो एस.डी.ओ.छैक.दू बरखक जुनियर छै कनिञा विलट सँ.दिल्लीए मे दुनू प्रेम विवाह केने रहए.बेचनी, विलटक माय दियामान सँ फाटल जा रहल छै.पाँच बरखक पोता राकेश आ' दू बरखक पोती रश्मि के देख ओकर खुशीक कोनो ठेकान नहि छै.बेर-बेर दुनू के करेजा सँ सटाबैत अछि.राकेशक मुँह सँ "दादी" शब्द सुनतहि ओकर आँखि नोरा जाइत छै.आँचरक खूट सँ बेर-बेर अपन आँखि पोछि लैत अछि बेचनी. भरि गामक लोक करमान लागल छै विलटक दलान पर. गंगाधर पण्डित जी, दयाकांत मास्टर साहेब,किरतु मुखिया,...गामक मुँहपुरूख बच्चा बाबू सेहो कुरसी लगा बैसल छथिन्ह.एतबे मे रश्मि के कोरा मे नेने विलट सेहो आँगन सँ दलान पर अबैत अछि.विलटक अबिते ओहिठाम कुरसी पर बैसल सभ लोक ठाढ़ भऽ जाइत अछि.विलट,बच्चा बाबू,पण्डितजी,मास्टर साहेब,सभ के पएर छूबि गोर लगैत अछि.मास्टर साहेब विलट के भरि पाँज पकरि छाती सँ सटा लैत छथिन्ह.हुनका मूँह पर गर्वक भाव स्पष्ट देखार भऽ रहल छैन्ह जे हुनकर विद्यार्थी आइ कलक्टर बनि गेल.विलट सभ के विनम्र भावे बैसबाक आग्रह करैत अछि.सभ बैसथि अछि. भरि गौँआ के आइ गर्व भऽ रहल छैक जे ओकरा गाम मे एकटा कलक्टर सेहो छैक-बच्चा बाबू विलट दिस तकैत बजलाह........एक्केटा नहि दू टा बच्चा बाबू -पण्डित जी बिचहि मे बच्चा बाबूक बात कटैत कहलखिन्ह.कनिञा सेहो अगिला साल धरि कलक्टर बनिए जेतीह ने...पण्डित जी आँगा बजलाह.विलट किछु नहि बाजल.खाली मुस्कियाएल रहए कने. आँगन सँ गोपीया, विलटक पितियौत एकटा छिपली मे पाँच-छह कप चाह नेने आयल.सभ गोटे चाह पिबै लगलाह.एतबे मे बुद्धिनाथ सेहो विलटक दलानक आँगा बाटे कोम्हरो जाइत रहथि....कतौ जाइत नहि रहथि..ओ त' विलटे सँ भेँट करय आयल रहथि मुदा विलट ल'ग बच्चा बाबू के देखि दोसर बाट पकड़ि लेलथि.सात पुरूखा सँ दुनूक परिवार मे एक-दोसराके निच्चा देखेबाक होर मचल छन्हि.पुस्तैनी दुश्मनी चलैत छन्हि."देखहक बच्चा बाबू केहन निर्लज्ज भऽ गेल, बेचनीक दुआरि पर बैसि आब चाह पिबैत अछि....चमारक दुआरि पर..राम-राम." -ई बात कंटीर सँ कहैत काल बुद्धिनाथक स्वर मे अपन दुश्मन सँ पाँछा भऽ जेबाक खौँझी स्पष्ट प्रतीत भऽ रहल छलैन्हि. राकेश हाथ मे एकटा गेन नेने दलान पर आयल आ' विलट के अपना सँग खेलबाक लेल जिद्द करय लागल. बच्चा बाबू ओकरा अपना कोरा मे बैसा लेलखिन्ह आ' गाल पर चुम्मा लऽ लऽ दुलारऽ लगलखिन्ह.बच्चा बाबूक कोरा मे  अपन पोता के बैसल देखि बेचनी के करीब तीस बरख पहिलुका बात मोन परि गेलइ.छहे मासक रहैक विलटु..हाँ विलट..भरि गौँआ आ' बेचनी सभ तऽ विलटुए कहैत छलै विलट के.बेचनी लेल तऽ विलट एखनहु विलटुए अछि. ओहि दिन बेचनी एसगरे रहए घर मे.सासु नैहर गेल रहए.ससुर सासु के पहुँचाब गेल रहथिन्ह.विलटक पिता सेहो कोनो आन गाम गेल रहय रसनचौकी बजबै लेल.नवहथ बाली गिरहतनी माने बच्चा बाबू गिरहतक घरबालीके बच्चा होनहारी रहए.प्रसवपीड़ा उठि गेल रहए.बच्चा बाबू गिरहत के हुनकर बाबू माने बड़का गिरहत पठेने रहथिन्ह माय के बजा अनय लेल.असमंजस मे परि गेल रहए बेचनी......घर मे पुरूष-पात नहि छै.ओकरा एखन सालो नहि पुरलैए सासुर बसना. कोना जेतइ घर से बाहर...? छह मासक बच्चा के कत' रखतइ...?.ओ'तऽ आई धरि कहियो, ककरो परसौती करेबो नहि केलकइ....मुदा, नहि जेतइ त' पसारी छियैक गिरहत छुटि जेतइ....बोनि मरि जेतइ....मालिक की कहतइ....तहू मे बड़का गिरहत.....सौसे गाम हुनकर धाक करै छै....बड़का कलेवर बला लोक छथि...अन्ततः बेचनी अपन पितीया सौस के संग कऽ गेल रहए.विलटु के सेहो संगे नेने गेल रहए. छए मासक बच्चा के कत' रखितइ. सूरेश बाबू जनमल रहथिन्ह.बड़का गिरहत, बच्चा गिरहत सभ गिरहतनि,सभ केयो बड्ड हरखित रहथिन्ह.बेचनी सेहो मोने मोन निचेन भेल रहए जे गिरहत नहि छुटलै.बेटा जनमलैन्ह तै बोइनो बेशी कऽ के भेटतइ.घोघ तनने, विलटुके कोरा मे उठेने विदाह भेल रहए कि तखने पएर मे किछु अभरल रहए.घोघ त'र से नहि देखायल रहए ओकरा. अरे बाप रे ..जुलूम भऽ गेलै..मैँयाक पितरिया लोटा छुआ गेलै...कोनो बच्चा चिकरि उठल  रहए.बेचनी के देह जेना पथरा गेल रहै ई बात सुनितहि देरी...बु......दी,ख...राही..,असर्ध-असर्ध गारि पढ़ैत बच्चा बाबू बेचनी दिस मारय लेल हुरकल रहै..ओ'तऽ बेचनी के पितिया सौस पएर पर खसि परल रहै बच्चा बाबू आ' बड़का गिरहत के तँइ जान बचलै.एकएक टा बात,एकएक टा गारि बेचनी के एखनहु ओहिना मोन छै.एखन धरि नहि बिसरल भेलैए ओहि अपमान के...विलटुआ के बाप जखन गाम अयलहि तऽ सभटा बात बेचनी कहि देलकै आ' दुनू परानि ओही दिन सप्पत खैने रहै जे आब ओ ककरो पसारी बनि के नहि रहत.छुटि गेलै गिरहत..छुटलै कि छोड़ि देलकै...फेर विलटुआक बाप रसनचौकी बजाके आ' बेचनी खेत मे बोइन कऽ के विलटु के पढेलकै.......कलक्टर बनेलकै.परूका साल विलटु के बाप चलि गेलै बेचनी के असगरे छोड़ि के.नहि...नहि ओ एसगर कहाँ अछि......भरल-पुरल परिवार छै.एहन परिवार जकरा देख ककरा ने सेहन्ता लगैत छै.बेचनी के आँखि फेर नोरा गेल रहै.ओ फेर आँचर सँ आँखि पोछि लेलक.एतेक दिन बेचनी के एकटा प्रश्न बेर-बेर मोन मे उठैत छलै जे बच्चा बाबूक पुतोहु डाक्टरनी छै.ओहो तऽ परसौती करबै छै लेकिन ओकर छूअल किछो किएक नहि छुआएत छैक...?..मुदा आई अपना दलान पर बच्चा बाबू के चाह पिबैत देख बेचनी के एहि प्रश्नक उत्तर सेहो भेट गेलै. मंच सजल छैक.मंच पर विलट बैसल अछि.गामक गणमान्य लोक सभ सेहो बैसल छथि.विलटक सम्मान समारोह आयोजित कयल गेल अछि.सभटा खर्च बच्चा बाबू केलखिन्ह.माइक पर किरतु मुखिया भाषण दऽ रहल छथिन्ह.-"हमर गामक श्री विलट राम,कलक्टर बनि गेलाह. ई हमरा सभक लेल गौरव के बात अछि.हम सभ आइ हुनका समस्त ग्रामीणक तरफ सँ सम्मानित करब..." बच्चा बाबू विलट के पाग, माल आ' दोपटा पहिराय सम्मानित करैत छथिन्ह.विलटक मुँह पर एखनो बस मुस्की टा छै.ओकरा सभटा बुझल छैक.बच्चा बाबूक किरदानी...मायक ब्यथा...समाजक चापलूसी..सभ जनैत अछि विलट आ तइँ ओकरा माथक पाग कोनो ठकक द्वारा पहिराओल टोपी सँ बेशी नहि लगैत छैक.मुदा,आब विलट ठकाइ बला नहि अछि आर तइँ ओकरा बच्चा बाबूक ठकबुद्धि पर हँसी लगैत छैक. २ आलेख भीड़तंत्र बनाम् भ्रष्टतंत्र भ्रष्टचारक विरूद्ध वर्तमान सामाजिक आंदोलनक "प्रतीक पुरुष" श्री अन्ना हजारे जखन सरकार के अपन कर्तव्यबोध करौलन्हि तखन सत्ता पर बैसल तथाकथित जनसेवक सभके ई आंदोलन संविधान विरूद्ध लागय लागल. सांसद के संसदीय गरिमा पर आघात बुझाय लागल. लोकतंत्र के "तंत्र"क वचाव मे सत्तातंत्र संविधानक दोहाइ देबय लागल. मुदा, लोक के सभ बिसरि गेल. लोकक पीड़ा के सभ महत्वहीन बुझय लागल. चौहत्तरि बर्षक बुजूर्ग के मात्र एक आह्वान पर जखन देशक कड़ोरो जनता सड़क पर आबय लागल आ' अपन अधिकारक हेतु लड़य लागल तऽ "सत्ता"क नजरि मे ई "भीड़" बनि गेल. सत्तासीन लोक कहय लागल जे देश मे लोकतंत्र अछि भीड़तंत्र नहि. कानून बनयबाक अधिकार मात्र संसद के छैक. मतलब साफ जे चुनावक बाद जनप्रतिनिधि अपना के शासक बुझैत छथि और जनता पर अपन हुकूम चलायब संविधान प्रदत्त अधिकार.जनसेवाक सपथ धय सिंहासन धरि पहुँचला उपरांत ओ सेवा आ शासन मे भेद बिसरि जाइत छथि.ओ बिसरि जाइत छथि जे लोकतंत्र मे लोक प्रधान होइत छैक तंत्र नहि. यैह भीड़ जखन कोनो चुनावी रैली मे कोनो राजनैतिक दलक झण्डा उठौने एकठ्ठा होइत अछि तखन ई मतदाता बनि जाइत अछि, तखन ई देशक जनता रहैत अछि.नेता एकरा अपन भाग्य-विधाता बुझैत छथि और राजनैतिक रैली मे गेल जनताक प्रत्येक उचित-अनुचित कृत्य जनभावनाक द्योतक कहबैत अछि किएक तऽ यैह मतदाता प्रत्येक नेताक लेल सत्ता-प्राप्तिक साधन होइत अछि.वर्तमान राजनैतिक परिदृश्य मे राजनीतिज्ञक दृष्टिकोण सँ "मत"क मतलब मात्र चुनाव दिन एकटा वोट सँ अछि.मतदाता के चुनावक बाद अपन अभिमत प्रकट करब चूनल प्रतिनिधि के बर्दाश्त नहि होलइत छैक. ओ एकरा अपन अधिकार मे हस्तक्षेप बुझैत छथि. जनता जखन नेताक जय कहैत अछि तखन ई देशक जागरूक नागरिक कहबैत अछि. राजनेता सभकेँ ई तखन लोकतंत्रक कर्णधार बुझना जाइत छन्हि.लेकिन यैह जनता जखन सरकारी तंत्रक तन्द्रा तोड़बाक हेतु "भारत माताक जय" कहैत अछि किंवा "वंदे मातरम्" के नारा लगबैत अछि और हाथ मे राष्ट्रध्वज लय कुव्यवस्थाक विरोध मे आवाज उठबैत अछि तखन ई सरकार आ राजनेताक नजरि मे असभ्य, उदण्ड, आ लोकतंत्रक ओ संविधानक विरोधी बनि जाइत अछि. बात सत्य छैक जे जनता अपन प्रतिनिधि के चुनाव करैत अछि आ बहुमतक आधार पर चुनल एहि प्रतिनिधि सभके भारतीय संविधान जनहित मे नियम-कानून बनयबाक अधिकार दैत छैक मुदा जखन जनप्रतिनिधि आ सरकारी तंत्र अपन एहि संवैधानिक अधिकार के समुचित उपयोग नहि कऽ पबैत अछि और जनहितार्थ कानून बनेबा मे विफल भऽ जाइत अछि तखन जनता अपन अस्तित्व बचेबाक हेतु, अपन भविष्यक निर्माणक हेतु एवं लोक कल्याण हेतु स्वयं ठाढ़ हेबाक लेल बाध्य होइत अछि आ फेर जनभावना आंदोलनक रूप धारण करैत अछि.सामजिक सरोकार लोकतंत्रक आधार होइत छैक लेकिन जखन सरोकारक अर्थ सरकारी शब्दकोषमे संकुचित भऽ जाइत छैक अथवा किछु खास वर्गक लोकक विशेषाधिकार बनि जाइत छैक तखन वंचित समाज अपन सरोकारक हेतु लड़बा लेल मजबूर भऽ जाइत अछि. भ्रष्टाचारक विरूद्ध वर्तमान जनभावना, यथास्थितवादी भऽ चुकल जनता मे नव-चेतनाक प्रतीक अछि. खास कऽ एहि मे युवावर्गक सहभागिता भ्रष्टतंत्रक लेल स्पष्ट चेतावनी अछि जे आबय बला समय सामाजिक परिवर्तनक समय अछि. समाजक मध्यम एवं निम्नवर्ग मे आयल जागृति ई संकेत दऽ रहल अछि जे लोकतंत्र मे राजा आ प्रजाक बीच कोनो भेद नहि होइत छैक, ई एकटा समतामूलक एवं विकसित समाजक निर्माणक दिशा मे एकटा पैघ एवं महत्वपूर्ण संकेत अछि. सामाजिक न्याय, समानता एवं वंचित समाजक उत्थान, जे एखन धरि मात्र नारा तक सीमित अछि एवं विभिन्न राजनैतिक दलक वोटबैंक-राजनीति के शिकार अछि, एहि दिशा मे आब जन-जागृतिक प्रवल आशा कयल जा सकैत अछि. संभबतः राजनैतिक दल सभ सेहो एहि बदलैत व्यवस्था सँ किछु सिखत और राजनीति मे जनताक सेवा के सर्वोपरि बूझल जायत. स्वतंत्रता प्राप्तिक बाद एखनधरि समाज के जाति-धर्म, अमीर-गरीब, ईत्यादि विभिन्न वर्गक आधार पर बाँटि प्रत्येक राजनैतिक दल सत्तासुख प्राप्त कयलक अछि. निजी स्वार्थ भारतीय राजनीति के एखन धरि मूल भावना रहल अछि और दिनानुदिन आम जनता एकात होइत गेल अछि. वर्तमान आंदोलन के तोड़बाक हेतु सेहो सत्ता लोलुप समाजक दिस सँ प्रयास कयल गेल मुदा एहिबेर एकर मार्ग मे जे कोनो बाधा-विघ्न आकि कानूनी दाँव-पेचक तिकड़म आयल सभटा घोटाला आ घुसखोरी सँ तंग जनाक्रोशक ज्वारि मे बहि गेल संगहि एकबेर फेर साबित भेल जे दृढ़ इच्छाशक्ति, आत्मबल, आ संयम लक्ष्यप्राप्तिक अमोघ अस्त्र अछि. ई तखन और आसान भऽ जाइत छैक जखन केयो एहन मार्गदर्शक समाज के भेटि जाय जकरा पर सभ के विश्वास हो. एहना मे जखन देशक प्रधानमंत्री, देशक सर्वोच्च संवैधानिक संस्था, संसदक पटल सँ एहि आंदोलन और आंदोलनकारी के सलाम ठोकैत छथि और देर-सवेर समस्त जन-प्रतिनिधि जनता के अपन मालिक मानय लेल बाध्य भऽ जाइत अछि तखन " जनताक इच्छा संसदक इच्छा" बनि जाइत छैक. संगहि सत्तालोलूप और चाटुकारी सभके संकेत दैत अछि जे जनआंदोलन लोकतंत्रक कारक होइछ संहारक नहि. करीब एकबर्ख पहिने "मिथिला समाद " मे प्रकाशित ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com  पर पठाउ। ३. पद्य ३.१.जगदीश प्रसाद मण्‍डल ३.२.डॉ॰ शशिधर कुमर “विदेह” ३.३.१.जगदीश चन्द्र ठाकुर अनिल  २.मुन्नी कामत ३.४.शि‍वकुमार झा ‘टि‍ल्‍लू’-मि‍थि‍ला-पुत्र ३.५.१.किशन कारीगर२.नारायण झा-सम्‍मान३.श्यामल सुमन ३.६.चंदन कुमार झा ३.७.जगदानन्द झा 'मनु' ३.८.सन्तोष कुमार मिश्र- इतिहासहिन इतिहास जगदीश प्रसाद मण्‍डल जगदीश प्रसाद मण्‍डलक दूटा गीत गीत-1 गाछक रंग बदलि‍ रहल छै मौसम संग सुधरि‍ रहल छै। थल-कमल जकाँ कहि‍यो गाढ़-लाल-उज्‍जर बनै छै। तहि‍ना फूल-फल कोढ़ि‍ जकाँ झरि-झरि‍ कोनो फलो बनै छै‍। गाछक रंग बदलि‍ रहल छै मौसम संग.......। आशा आश लगा-लगा जीत अपराजि‍त बनैत रहै छै। सुधरि‍ रूप बदलि‍ चालि‍ कारी काजर चमकि‍ उठै छै। गाछक रंग बदलि‍ रहल छै मौसम संग.......। लत्ती पानि‍ रूप बदलि‍ थल-कमल कहबैत चलै छै तहि‍ना लत्ती अपराजि‍त गाछ बनि‍ गछाड़ि‍ धड़ै छै। गाछक रंग बदलि‍ रहल छै मौसम संग.......। गीत-2 मुँहक हँसी केहेन अबै छै ठोरक रूप देखैत चलू। छाती केना दलकि‍ रहल छै सूर-तान भजैत चलू। मुँहक हँसी केहेन अबै छै ठोरक रूप.......। जि‍नगी जेकर जेहेन रहै छै छाती तेहने तेकर बनै छै। हलसि‍-कलशि‍ कहैत रहै छै पारदर्शी एना बनैत रहै छै। मुँहक हँसी केहेन अबै छै ठोरक रूप.......। जखने पालि‍स शीशा लगतै झल अन्‍हार बनि‍ते रहतै। झल अन्‍हार अन्‍हार बदलि‍ एक्कभग्‍गु बनि‍ शीशा कहतै। मुँहक हँसी केहेन अबै छै ठोरक रूप.......। देखि‍-देखि‍, सुनि‍-सुनि ‍‍हँसैत डेग उठबैत चलू। मुँहक हँसी केहेन अबै छै ठोरक रूप.......। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। डॉ॰ शशिधर कुमर “विदेह” एम॰डी॰(आयु॰) – कायचिकित्सा कॉलेज ऑफ आयुर्वेद एण्ड रिसर्च सेण्टर, निगडी – प्राधिकरण, पूणा (महाराष्ट्र) – ४११०४४ अप्पन नैना सम्हार ! हाय  !  सहलो  ने जाइछ,  तीर  तेज - तर्रार । अप्पन नैना सम्हार ! गोरी कनखी ने मार ! केओ कहइत अछि नैन जेना सागर वा झील । मीन युगल करय केलि वा हो कमलदल नील । मुदा       हमरा      लगैछ     ई     सद्यः     कटार । अप्पन नैना सम्हार ! गोरी कनखी ने मार ! आँखि  सुन्नर  एहेन   की  पाओत  हरीन । की  तुलना  करत  गोरी   तोरा  सँ  मीन । धन्य  काजर  भऽ  गेल  बनि एकर शिंगार । अप्पन नैना सम्हार ! गोरी कनखी ने मार ! थिक   कारी   मुदा   मनोहारी   ई   नैन । दूर  रहितहुँ  हमर  छीनि  लेलक  ई  चैन । बिनु  आहटिअहि  कयलक हृदय आर – पार । अप्पन नैना सम्हार ! गोरी कनखी ने मार ! देन   भगवानक   तोरा   ई  अनमोल  छौ । मुल्य  किछु  नञि  मुदा बड़ एकर मोल छौ । एकर   आगाँ   निछाउर   ई  सौंसे  संसार । अप्पन नैना सम्हार ! गोरी कनखी ने मार ! हम नञि रोकब अहँ जाइ छी तऽ जाउ, हम नञि रोकब । किछु  सुनितहि जाउ, बरु नञि टोकब । हम प्रेम कयल,  थिक दोष हमर,  सच  मानल  सपनहि  जे  देखल ।। हम  नेह लगा, गलती  कयलहुँ । हम प्रीति जगा,  गलती कयलहुँ । नञि दोष अहाँ केर अछि कनिञो,  हम अपन विकट छवि नञि देखल ।। हम स्नेहक धुनि मे, नञि सोचल । की अहाँ, की हम, से नञि देखल । छी  दण्डक  भागी  हमहि  सखी, हो अहँक हरेक दिन शुभ - मंगल ।। अहँ जतय रही, सुख  सदिखन । हो  अहँक संग, सातो  सरगम । हम्मर  हिस्सा  मे  भलहि  नोर,  हो अहँक  हरेक पल मधु बोड़ल ।। तोहर जिनगी मे वसन्तक लय तोहर जिनगी मे वसन्तक लय, हम्मर पतझड़  परवाहि ने अछि । तोहर  नेहक  भग्नावशेष  पर, प्रेम विजय निज  चाह ने अछि ।। तोँ हमर ने भऽ सकलेँ, सरिपहु अनकर होयबा पर आह ने अछि । तोहर सुख मे  हम्मर सुख छी, स्वीकार्य तोहर दुख छाँह ने अछि ।। हम प्यासल मरु मे  पानि बिना, मरि जायब - से परवाहि ने अछि । बस  तोहर  जिनगी  हो  सुन्नर, मन मे तोहर  अधलाहि ने अछि ।। छल हमरहि प्रेम मे  दोष कोनहु, तोरा पर सखि  अवसाद ने अछि । हो पूर तोहर  हर -  एक सपना, नञि भेल हमर, से आह ने अछि ।। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। १.जगदीश चन्द्र ठाकुर अनिल २.मुन्नी कामत १ जगदीश चन्द्र ठाकुर अनिल गजल १ हम तमसायब गजल सुनायब अहाँ अगुतायब गजल सुनायब | ई सौंसे आकाश हमर छी उडि-उडि आयब गजल सुनायब | माइक करजा माटिक करजा हमहूँ  चुकायब गजल सुनायब | पाप कते भरि गेल मोनमे गंगा बनायब गजल सुनायब | लगतै आगि अहू जंगलमे कतहु पड़ायब गजल सुनायब | अहाँक हृदयमे घ’र हमर अछि घुरि– घुरि आयब गजल सुनायब | ताकब बाट अहाँक जीवन भरि सपन सजायब गजल सुनायब | गजल २ घरसँ होउ बहार बेटी बाट तकैछ पहाड बेटी | खपटा थिक सोना आ चानी उत्तम स्नेहक धार बेटी | गेल जमाना तिलक दहेजक सरस्वतीक संसार बेटी | नैहर सासुर तीर्थ धाम सब भ’ गेल आइ बजार बेटी | आब पताल ने जेती सीता सुन्दर यैह विचार बेटी। २ मुन्नी कामत दूटा कवि‍ता‍ कवि‍ता- हमर मि‍थि‍ला हमर प्राण हमर मि‍थि‍ला हमर जननी‍ हमर इएह परान अछि‍ देखलौं तँ बर दुनि‍याँ आगू मुदा मि‍थि‍ले हमर जान अछि‍। एतुक्का माटिमेे खुशबू संस्‍कारक जे नै बुझै केकरो आन अछि‍ आनोकेँ अपना बनबैए यएह मि‍थि‍लाक पहि‍चान अछि‍। जतए गोबरक होइत अछि‍ पूजा बगरोकेँ मि‍लैत दुलार अछि‍ ई पावन धरती हमर एतए जननी‍ धाम अछि‍। जे एलाह एतए बसि‍ गेलाह कखनो राम तँ कखनो उगना छेलाह देवतो ऐ माटिसँ करैत दुलार अछि‍ एहेन पवि‍त्र हमर भूमि‍ एहेन सुन्‍दर हमर गाम अछि‍। नारी ि‍नर्मल अछि‍, ओ ममता अछि‍ ि‍नर्मल हुनकर दुलार ओ नारी अछि‍ ऐ समाजक जइमे रचल-बसल अछि‍ संसार। नै भेटलनि‍ अनुकूल परि‍वेश हुनका ने ज्ञानक सार तैयो हैरत छी देखि‍ कऽ कतेक उच्‍च, आदर्श अछि‍ हि‍नकर वि‍चार हर युगमे दबबैत आएल हि‍नका अगुआए समाज। मुदा कहि‍ रहल अछि‍ आइ नारी जननी छी हम समाजक हमहीं बदलब एकर सोच-वि‍चार पैदा करब अपन कृति‍सँ संस्‍कार ि‍नर्मल रहब हम, ममता रखब बाँटब जन-जनमे प्‍यार। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। शि‍वकुमार झा ‘टि‍ल्‍लू’ मि‍थि‍ला-पुत्र मि‍थि‍लाक बेटीकेँ सहए पड़लनि‍ झमेलि‍या बि‍आहक दंश सतभैंया पोखरि‍सँ पंचवटी धरि‍ ि‍कसुन तकलौं कतहु नै भेटल सभ राकश सभ कंश नअ मास नहि‍ पैंसठि‍ बरख धरि‍ मयना उठबैत रहलीह प्रसव वेदनाक टीस तखन जा कऽ भेल जीवन संघर्षक जीत दि‍वसेमे तरेगन बहकल वि‍देहक आङन जनमल जगदीश मौलाइल गाछक फूल गमकल तापसमे भैंटक लाबा चमकल पूर्वाग्रहक चपेटि‍मे जाति‍-पजाति‍क गेठमे ओझरा कऽ मैथि‍ली भऽ गेल छलि‍ ि‍नर्मूल बेदम्म गजेनक आश जागल सुखैत गुल्‍लरि‍मे फूल लागल रमकल जि‍नगीक जीत वैयक्ति‍क नै- पसि‍झैत गामक जि‍नगी मात्र मेंहथ आ बेरमा नै मौरंगसँ सि‍मरि‍या धरि‍ चमकि‍ उठल इंद्रधनुषी अकास केकरो नै छल वि‍श्वास द्वि‍जक मुरदैयाक संग-संग अक्षोपक सोती बहत...? स्‍वाभावि‍क छल उपहास हएब मुदा! ति‍रस्‍कारक क्षोश्र नै जीवन-मरण तँ प्रकृति‍स्‍थ लीला तखन केकरोसँ केहेन द्वेष? अवतारवादक सेहो होइछ पराभव केओ पनही देत की नै कोनो तृष्‍णा नै नै उत्‍थानक आश पतनसँ घृणा नै अकाल भेल तँ बि‍साँढ़ चि‍बा कऽ राि‍त-दि‍न समरसता दीप जड़बैत रहल अपन गीतांजलि‍ गाबि‍ कम्‍प्रोमाइज करैत रहल कोनो कलुष कम्‍प्रोमाइज नै गत्र-गत्रमे समन्‍वयवाद कलमे टा सँ नै जीवन दर्शनमे सेहो चलि‍ गेला भोगेन्‍द्र नै तँ उत्तर भेटि‍ जइतए यात्री, आरसी आ फजलुरसँ सेहो कोनो तुलना नै आन इचना-पोठीक कोन गप्‍प लोक चानी नै टलहा कहए विज्ञ नै बुड़ि‍बक बूझए संस्‍कार नै छोडब खॉटी कि‍सान मजदूरक रूप ब्रह्म बेलामे कलम खि‍याबथि‍ सरल धवल बेरमाक भूप एहन साम्‍यवादी- फाँसीपर चढ़ि‍ जाएब मुदा बटोहीकेँ अधलाह बाट नै देखाएब केकरो नै सुनलक संतति‍क कोन कथा अर्द्धांगि‍नी सेहो सहैत रहलीह ऐ लेलि‍नक सेहो देल ब्‍यथा ने केकरो तर करब ने केकरोसँ ऊपर जाएब सबहक शोणि‍त एक्कहि‍ रंग कएलक वि‍रोध व्‍यवस्‍था बेढंग मरल गरीबक बाप मुदा की पुरहि‍त-पात्रकेँ भरि‍गर चाही धूर-धूर बास बि‍का गेल काहि‍ काटि‍ लुटबैत बाहवाही लेस मात्र नै दया अग्रजकेँ सि‍हरि‍-सि‍हरि‍ अश्रु-उच्‍छवास कहि‍यो नै अगि‍ला पएर पुजाबथि‍ कतए राम धर भूत पि‍शाच? सभा बजौलनि‍ धानुक टोलक अपनहि‍ जाति‍मे पंडि‍त देखू भॉज पुराएब जटि‍ल कर्मकाण्‍डक माइक समान नै धरती बेचू मात्र बाटपर आनय खाति‍र करै छथि‍ प्रति‍क्षण सामान्‍त वि‍रोध सम्‍यक समाज मि‍थि‍लेमे बनतै जगा रहलाह समभाव बोध अक्षेपसँ नै गंग छुआबथि‍ तखन केना कऽ हाड़ छुआइत मन: दीपसँ ि‍हयमे तकबै मि‍थि‍ला पुत्रक स्‍पन्‍दन हएत...। (श्री जगदीश प्रसाद मण्‍डल जीकेँ समर्पित..) ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। १.किशन कारीगर२.नारायण झा-सम्‍मान३.श्यामल सुमन १ किशन कारीगर पद के दुरूपयोग          (हास्य कविता)

फेर भेटत नहि एहेन सुयोग अपना स्वार्थ द्वारे कानून बनाऊ-तोरू मनमर्जी सँ करू ओकर उपयोग अहाँ करू अपना पद के दुरूपयोग

सत्ताक कुर्सी पर बैसल छि अहाँ कोनो समस्या देखैत छि कहाँ मोन मोताबिक सी.बी.आइ के करू उपयोग अहाँ करू अपना पद के दुरूपयोग !

अरब-खरब घोटाला करू मुदा दाँत चिआरैत तिहर जेल सँ निकलू फेर मंत्री पद हथिआउ आ घोटाला करू सरकारी खजाना सुडाह क बैसू !

सत्ता कुर्सी आ सरकारी धन जन्मजात अहाँक बपौती छि अहाँ करू एककर खूब उपयोग करू अपना पद के दुरूपयोग

मूलभूत समस्याक समाधान किएक करब ? एही सँ किछु ने होयत ताहि दुआरे एहने योजना बनाऊ जाही सँ अहाँ अप्पन जेबी टा भरब

करू अन्याय मुदा बर्दी चमकाऊ अपनों घुस खाऊ नेताजी के सेहो खुआउ डरे कियो किछु बाजत कोना दमनकारी नीति अहाँ अपनाऊ

न्यायक कुर्सी बिका गेल देशक रक्षक बनी गेल भक्षक कागजी पन्ना पर आर्थिक योजना आम आदमीक कष्ट बुजहब कोना

मंत्री छि लालाबती गाड़ी में घूमूं जनताक खोज खबरि एकदम नहि करू एक्के बेर आब अगिला इलेक्शन में भोंट दुआरे जनता के मुहं देखू

दंगा फसाद अहींक इशारा पर पहिने सँ फिक्स भेल अछि वोट बैंक पोलिसी के करू उपयोग अहाँ करू अपना पद के दुरूपयोग !! २ नारायण झा कवि‍ता सम्‍मान हे जगदीश, एहेन दि‍न देखलौं ऐ मण्‍डल बीच, मण्‍डल पद पएलौं आरंभ कएल लेखन ऐ रहुआ धरतीसँ पहि‍ल कथा संग्रह, गामक जि‍नगीक कथासँ रचना रसधार पटा जेना गंगा जट्टासँ सुवास गमकैछ कथा, नाटक, उपन्‍याससँ। हे युगपुरुष, टैगोर पुरस्‍कार पएलौं रहुआवासीक संग पारसमणि‍ पुस्‍ताकलयक नयना जुड़ेलौं। अहाँक वि‍वि‍ध वि‍धा, जेना पसरल तरेगन जीवनक उत्थान-पतनसँ जीवन-मरण संग इन्‍द्रधनुषी अकास देखैत छी राति‍-दि‍न आँजुरि‍ भरि‍ अछि‍ पंचवटी, गीतांजलि‍ नीमन अपनेक लेखनी बढ़ि‍ अकास चढ़हय सदि‍खन। हे जगदीश एहेन दि‍न देखलौं ऐ मण्‍डल बीच, मण्‍डल पएलौं।। ३ श्यामल सुमन निरीक्षण अपने सँ देखब दोष कहिया अपन ध्यान सँ साफ दर्पण मे देखू नयन

बात बड़का केला सँ नञि बडका बनब करू कोशिश कि सुन्दर बनय आचरण

माटि मिथिला के छूटल प्रवासी भेलहुँ मातृभाषा विकासक करू नित जतन

नौकरीक आस मे नहिं बैसल रहू राखू नूतन सृजन के हृदय मे लगन

खूब कुहरै छी बेटीक विवाहक बेर अपन बेटाक बेर मे दहेजक भजन

व्यर्थ जिनगी अगर मस्त अपने रही करू सम्भव मदद लोक भेटय अपन

सत्य-साक्षी बनू नित अपन कर्म केर आँखि चमकत फुलायत हृदय मे सुमन सम्बन्ध साँच जिनगी मे बीतल जे गाबैत छी। वेदना हम हृदय के सुनाबैत छी।।

कहू माता केर आँचर मे की सुख भेटल। चढ़िते कोरा जेना सब हमर दुःख मेटल। आय ममता उपेक्षित कियै रति-दिन, सोचि कोठी मे मुंह कय नुकाबैत छी। साँच जिनगी मे बीतल जे गाबैत छी। वेदना हम हृदय के सुनाबैत छी।।

खूब नेनपन मे खेललहुं बहिन-भाय संग। प्रेम सँ भीज जाय छल हरएक अंग-अंग। कोना सम्बन्ध शोणित केर टूटल एखन, एक दोसर के शोणित बहाबैत छी। साँच जिनगी मे बीतल जे गाबैत छी। वेदना हम हृदय के सुनाबैत छी।।

दूर अप्पन कियै अछि पड़ोसी लगीच। कटत जिनगी सुमन के बगीचे के बीच। बात घर घर के छी इ सोचब ध्यान सँ, स्वयं दर्पण स्वयं केँ देखाबैत छी। साँच जिनगी मे बीतल जे गाबैत छी। वेदना हम हृदय के सुनाबैत छी।। बेटी माँगू दहेज भरमार यौ, चलू बड़का कहाबी।। भेटल पड़ोसी कय जे किछु दहेज। रखला एखन तक सबटा सहेज। कम नहि करब स्वीकार यौ। चलू बड़का कहाबी।। बेटा अपन छी बेटी छी आन। नहि दऽ सकै छी बेटी लऽ प्राण। दुनियाँ बनल व्यापार यौ। चलू बड़का कहाबी।। बेटा आ बेटी के अन्तर मेटाबू। बेटी जनम लियै थपड़ी बजाबू। बेटी सुमन श्रृंगार यौ। चलू बड़का कहाबी।। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। चंदन कुमार झा सररा, मदनेश्वर स्थान मधुबनी, बिहार गजल-1 गुप्फ अन्हार, नहि हाथो-हाथ सुझैए आनक बात कोन, परिजनो हुथैए जकरा ले सर्वस्व अर्पण कएलहुँ सैह हमरा मतलबी लोक बुझैए खून पसेना बहाबी,मुदा छी दरिद्र भिखमंगा बौसैए, धनिकहा लुझैए कत्तौ करोट फेरै लोक सड़क पर कतहु कुक्कुरो पलंग पर सुतैए केओ भूखे पेट,रकटल प्राण,कानै "चंदन" पाचकक चुर्णो खाय कुथैए --------------वर्ण-१४------------- गजल-2 राति सपन मे प्रियतम एलाह कर-कौशल सँ हमरा जगेलाह काँच निन्न टूटल,मोन कछमछ उड़ीबिड़ी लगा अपने नुकेलाह देहक पानि बनि बहल पसेना अधरतिये मोन प्यास लगेलाह कसमस आञ्गि नख लागि फाटल चेन्ह सगर देह नह गरेलाह हमरा संग कत खेल खेलेलाह "चंदन" तखन जा मोन जुड़ेलाह ----वर्ण-१३------- गजल-3 दू लबनी केर खेला देखू लागल रेलम रेला देखू फुसिए ठेलम ठेला देखू बलजोड़िक झमेला देखू मत्त गुरू संग चेला देखू नाच करै अलबेला देखू जीवन के संध्यावेला देखू कानै अनाथ कोरेला देखू विषले लागल मेला देखू अमृत भेल करेला देखू ------वर्ण-१०------ गजल-4 फूल नै बनलौँ तऽ की,काँट बनि गड़ैत तऽ छी प्रेम नै केलौँ तऽ की, संग हमर लडैत तऽ छी अन्हार छै घर तऽ की, दीप बनि जड़ैत तऽ छी सोँझा नै हँसलौँ तऽ की,परोछ मे कनैत तऽ छी अपना नै सकलौँ तऽ की, संगमे रहैत तऽ छी भऽनै जाइ आनक संगी,से सोचि मरैत तऽ छी सुख नै देलौँ तऽ की, संगे दुख कटैत तऽ छी मीत नै भेलौ तऽ की, रूसल मे बौँसैत तऽ छी बुझि कऽ बकलेले हमरा, अहाँ हँसैत तऽ छी छी अकछायल तऽ की, बात तैयो सुनैत तऽ छी ----------वर्ण-१७--------------- हाइकु- बकः धेयान नारी इज्जति पर लगौने नर। सगरो छैक मड़राइत गिद्ध मौस तकैत। चित्त बाघिन गिद्दर सभ मिलि देह नोचैत । शक्तिस्वरूपा चण्ड-मुण्डक पाँजे कछमछाय । भीष्म आ' द्रोण बनले धृतराष्ट्र मूड़ी गाड़ने । अर्जुन भीम पाण्डवक सैनिक हारल योद्धा । लाज बचाउ चिकरैछ द्रौपदी हे गिरधारी ! ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। जगदानन्द झा 'मनु' ग्राम पोस्ट- हरिपुर डीह्टोंल, मधुबनी १-गजल घोड कलियुग घडी केहन आबि गेलै    एकटा कंस घर घर में  पाबि गेलै  

बनल अछि  रक्षके भक्षक आब  सगरो    विवश जनताक हक सबटा  दाबि गेलै 

अन्न खा ' थाह पेटक किछु नै पएलक   मालकेँ सगर भूस्सा चुप  चाबि गेलै  

शहर नै गाम आ  घर- घर आब देखू  पूव देशक हबा में सभ आबि गेलै  

आजु  फेशन कए नव पोसाक  में डुबि एक गज में अरज देहक पाबि गेलै  

(बहरे असम, मात्रा क्रम- २१२२-१२२२-२१२२)

------------------------------------ २-गजल

मारी माछ नहि ऊपछी खत्ता भरि समाज घोडन केँ छत्ता 

परचट्ट बनल जनता छी  खाई छी गरदनि पर कत्ता

कांकोड बिएल कांकोडे खए  भय  गेल देशक लत्ता-लत्ता 

सगरो  नाँघल जाईत अछि  छन छन मरीयादा केँ हत्ता   

रहब भरोसे कतेक दिन  भेटे एक दिन हमरो भत्ता   

(सरल वार्णिक बहर,  वर्ण-११) ------------------------------------ ३-गजल भ्रष्टाचार केँ ठेका आजुक सरकार लेने  कारी रुपैयाक करमान धर्माचार लेने 

बोगला भगत छै बैसल घाट-घाट पर  खून पिबैक लेल तैयार हथियार लेने 

कर्तव्य बिसरल अछि मिडिया समाज में  नीक बेजाए  छोरि कमाऊ समाचार लेने 

प्रेमक भाषा सिमैट गेल अछि पाई तक  पाई  अछि एक दोसर सँ सरोकार लेने 

सुनलौं कोयला दलाली में मुँह कारी हैछै  सगरो मुँह कारी छैक मिथ्या प्रचार लेने 

(सरल वार्णिक बहर,  वर्ण-१६ )

---------------------------------------

४-गजल  सोना दहेल जाइए जुनि काँटी केँ पकरू  छोरि अपन भाषा नहि खराँटी केँ पकरू 

दोसर  घर धेने भेटत नहि ओ सनेह  छोरि आनक बोझ अपन आँटी केँ पकरू  

आदी काल सँ अपन शिक्षा लेने विश्व अछि  नवीनता केँ धार में नहि काँटी केँ  पकरू   

संपन्न हमर संस्कृति मधुर भाषा अछि  लात मारि टल्हा केँ अपन खाँटी केँ पकरू 

छोरु दिल्ली मुंबई घुरि आऊ अपन घ 'र आब  दरभंगा मधुबनी  राँटी केँ पकरू 

(सरल वार्णिक बहर,  वर्ण-१६) ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। –सन्तोष कुमार मिश्र इतिहासहिन इतिहास

हवाके कलम आ हल्लाके मसिसँ लिखल एकटा इतिहास ओ इतिहास जे शब्दहिन, अर्थहिन, विश्वाशहिन अछि । तैयो, ओ इतिहास किताबमे सिमित यार्थाथसँ बञ्चित मुदा परिवर्तनक शिल्लानास कैनिहार अछि ।

परिवर्तन एकटा आशके, विश्वासके, भविश्यके आ उच्चकोटीक परिचयके आशा रखने अछि ।

मुदा ओ विश्वास अनुशासनहिन, ब्यवहारहिन, दण्डहिन आ ब्यवस्थापनहिन भगेल अछि ।

ओ इतिहास, जे कामक नहि नामक इतिहास परिवर्तनक कल्पनाके इतिहास किताबक पन्नामे सीमित रहिगेल अछि ।

मुदा, चलैत हवा द्वारा सुनाइत हल्ला पुनः प्रयासरत अछि एकटा इतिहासके जे अर्थहिन, दण्डहिन, आओर कि कि मुदा इतिहास, एहन इतिहास जे इतिहासहिन अछि । ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। विदेह नूतन अंक मिथिला कला संगीत राजनाथ मिश्र चित्रमय मिथिला स्लाइड शो चित्रमय मिथिला (https://sites.google.com/a/videha.com/videha-paintings-photos/ ) २. उमेश मण्डल मिथिलाक वनस्पति स्लाइड शो मिथिलाक जीव-जन्तु स्लाइड शो मिथिलाक जिनगी स्लाइड शो मिथिलाक वनस्पति/ मिथिलाक जीव जन्तु/ मिथिलाक जिनगी  (https://sites.google.com/a/videha.com/videha-paintings-photos/ ) ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। विदेह नूतन अंक गद्य-पद्य भारती १. मोहनदास (दीर्घकथा):लेखक: उदय प्रकाश (मूल हिन्दीसँ मैथिलीमे अनुवाद विनीत उत्पल) मोहनदास (मैथिली-देवनागरी) मोहनदास (मैथिली-मिथिलाक्षर) मोहनदास (मैथिली-ब्रेल) २.छिन्नमस्ता- प्रभा खेतानक हिन्दी उपन्यासक सुशीला झा द्वारा मैथिली अनुवाद छिन्नमस्ता ३.कनकमणि दीक्षित (मूल नेपालीसँ मैथिली अनुवाद श्रीमती रूपा धीरू आ श्री धीरेन्द्र प्रेमर्षि) भगता बेङक देश-भ्रमण बालानां कृते डॉ॰ शशिधर कुमर “विदेह” एम॰डी॰(आयु॰) – कायचिकित्सा कॉलेज ऑफ आयुर्वेद एण्ड रिसर्च सेण्टर, निगडी – प्राधिकरण, पूणा (महाराष्ट्र) – ४११०४४, पर्यावरण बचाउ (बाल कविता) एक छल  राजा, एक  छलि रानी, सुनने  होयब  कतोक  पिहानी । आइ   कहानी  मे  नञि  राजा, नहिञे   थिकीह  कोनहु  रानी ।। सुनू  आइ  एहने  एक  खिस्सा, जकर  पात्र  हम  सभ  प्राणी । सुरूजक  धियापुता नवग्रह अछि, धरा  -  दुलारी - धी  - रानी ।। इएह माटिक उपजा छी हम सभ, हम सभ इएह धरतीक सन्तान । एकरहि  छाती  चीरि  उगैत’छि, गहूम धान  आ  आम लताम ।। ओकरहि हरियर - हरियर आँचर, गाछ बिरिछ  पोषए अछि प्राण । माए थिकीह हम आओर कहू की, करू की हुनि महिमा गुणगान ?? ई  धरती  अनुपम   छी  बौआ, जिनगी   केर  प्रत्यक्ष  ठेकान । आन  कतहु  एखनहु धरि दैय्या, जिनगी तँ अछि  बस अनुमान ।। आइ एखन धरि  जे बूझल अछि, धरती   सभसँ   अजगुत  छी । एहि धरती केर  जैवक्षितिज पर, मनुखक  रचना  अद्भुत   छी ।। पर  “अद्भुत”  केर  अहङ्कार  मे, अपनहि  नाश  करै  छी   हम । ठोहि  पारि  विज्ञान  कनै  अछि, देखि  अपन  अनुचित  उपक्रम ।। हबा   बहै  अछि   जहर   भरल, आ पानि  प्रदूषित कलुषित अछि । कतेक   अनेरो    हल्ला – गुल्ला, माथ  मनुक्खक  बोझिल अछि ।। अपन  माए  केर  प्राण  बचाबी, आउ   आइ   संकल्प    करी । हाबा – पानि  आ  माटि  बचाबी, पर्यावरण    प्रशस्त     करी ।। कम - सँ - कम   ततबा   रोपी, जतबा  गाछी  हम  नष्ट  करी । विज्ञानक    सद्‌ - अर्थ    बुझी, नञि अनुचित बूझि  अनर्थ करी । ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com  पर पठाउ। बच्चा लोकनि द्वारा स्मरणीय श्लोक १.प्रातः काल ब्रह्ममुहूर्त्त (सूर्योदयक एक घंटा पहिने) सर्वप्रथम अपन दुनू हाथ देखबाक चाही, आ’ ई श्लोक बजबाक चाही। कराग्रे वसते लक्ष्मीः करमध्ये सरस्वती। करमूले स्थितो ब्रह्मा प्रभाते करदर्शनम्॥ करक आगाँ लक्ष्मी बसैत छथि, करक मध्यमे सरस्वती, करक मूलमे ब्रह्मा स्थित छथि। भोरमे ताहि द्वारे करक दर्शन करबाक थीक। २.संध्या काल दीप लेसबाक काल- दीपमूले स्थितो ब्रह्मा दीपमध्ये जनार्दनः। दीपाग्रे शङ्करः प्रोक्त्तः सन्ध्याज्योतिर्नमोऽस्तुते॥ दीपक मूल भागमे ब्रह्मा, दीपक मध्यभागमे जनार्दन (विष्णु) आऽ दीपक अग्र भागमे शङ्कर स्थित छथि। हे संध्याज्योति! अहाँकेँ नमस्कार। ३.सुतबाक काल- रामं स्कन्दं हनूमन्तं वैनतेयं वृकोदरम्। शयने यः स्मरेन्नित्यं दुःस्वप्नस्तस्य नश्यति॥ जे सभ दिन सुतबासँ पहिने राम, कुमारस्वामी, हनूमान्, गरुड़ आऽ भीमक स्मरण करैत छथि, हुनकर दुःस्वप्न नष्ट भऽ जाइत छन्हि। ४. नहेबाक समय- गङ्गे च यमुने चैव गोदावरि सरस्वति। नर्मदे सिन्धु कावेरि जलेऽस्मिन् सन्निधिं कुरू॥ हे गंगा, यमुना, गोदावरी, सरस्वती, नर्मदा, सिन्धु आऽ कावेरी  धार। एहि जलमे अपन सान्निध्य दिअ। ५.उत्तरं यत्समुद्रस्य हिमाद्रेश्चैव दक्षिणम्। वर्षं तत् भारतं नाम भारती यत्र सन्ततिः॥ समुद्रक उत्तरमे आऽ हिमालयक दक्षिणमे भारत अछि आऽ ओतुका सन्तति भारती कहबैत छथि। ६.अहल्या द्रौपदी सीता तारा मण्डोदरी तथा। पञ्चकं ना स्मरेन्नित्यं महापातकनाशकम्॥ जे सभ दिन अहल्या, द्रौपदी, सीता, तारा आऽ मण्दोदरी, एहि पाँच साध्वी-स्त्रीक स्मरण करैत छथि, हुनकर सभ पाप नष्ट भऽ जाइत छन्हि। ७.अश्वत्थामा बलिर्व्यासो हनूमांश्च विभीषणः। कृपः परशुरामश्च सप्तैते चिरञ्जीविनः॥ अश्वत्थामा, बलि, व्यास, हनूमान्, विभीषण, कृपाचार्य आऽ परशुराम- ई सात टा चिरञ्जीवी कहबैत छथि। ८.साते भवतु सुप्रीता देवी शिखर वासिनी उग्रेन तपसा लब्धो यया पशुपतिः पतिः। सिद्धिः साध्ये सतामस्तु प्रसादान्तस्य धूर्जटेः जाह्नवीफेनलेखेव यन्यूधि शशिनः कला॥ ९. बालोऽहं जगदानन्द न मे बाला सरस्वती। अपूर्णे पंचमे वर्षे वर्णयामि जगत्त्रयम् ॥ १०. दूर्वाक्षत मंत्र(शुक्ल यजुर्वेद अध्याय २२, मंत्र २२) आ ब्रह्मन्नित्यस्य प्रजापतिर्ॠषिः। लिंभोक्त्ता देवताः। स्वराडुत्कृतिश्छन्दः। षड्जः स्वरः॥ आ ब्रह्म॑न् ब्राह्म॒णो ब्र॑ह्मवर्च॒सी जा॑यता॒मा रा॒ष्ट्रे रा॑ज॒न्यः शुरे॑ऽइषव्यो॒ऽतिव्या॒धी म॑हार॒थो जा॑यतां॒ दोग्ध्रीं धे॒नुर्वोढा॑न॒ड्वाना॒शुः सप्तिः॒ पुर॑न्धि॒र्योवा॑ जि॒ष्णू र॑थे॒ष्ठाः स॒भेयो॒ युवास्य यज॑मानस्य वी॒रो जा॒यतां निका॒मे-नि॑कामे नः प॒र्जन्यों वर्षतु॒ फल॑वत्यो न॒ऽओष॑धयः पच्यन्तां योगेक्ष॒मो नः॑ कल्पताम्॥२२॥ मन्त्रार्थाः सिद्धयः सन्तु पूर्णाः सन्तु मनोरथाः। शत्रूणां बुद्धिनाशोऽस्तु मित्राणामुदयस्तव। ॐ दीर्घायुर्भव। ॐ सौभाग्यवती भव। हे भगवान्। अपन देशमे सुयोग्य आ’ सर्वज्ञ विद्यार्थी उत्पन्न होथि, आ’ शुत्रुकेँ नाश कएनिहार सैनिक उत्पन्न होथि। अपन देशक गाय खूब दूध दय बाली, बरद भार वहन करएमे सक्षम होथि आ’ घोड़ा त्वरित रूपेँ दौगय बला होए। स्त्रीगण नगरक नेतृत्व करबामे सक्षम होथि आ’ युवक सभामे ओजपूर्ण भाषण देबयबला आ’ नेतृत्व देबामे सक्षम होथि। अपन देशमे जखन आवश्यक होय वर्षा होए आ’ औषधिक-बूटी सर्वदा परिपक्व होइत रहए। एवं क्रमे सभ तरहेँ हमरा सभक कल्याण होए। शत्रुक बुद्धिक नाश होए आ’ मित्रक उदय होए॥ मनुष्यकें कोन वस्तुक इच्छा करबाक चाही तकर वर्णन एहि मंत्रमे कएल गेल अछि। एहिमे वाचकलुप्तोपमालड़्कार अछि। अन्वय- ब्रह्म॑न् - विद्या आदि गुणसँ परिपूर्ण ब्रह्म रा॒ष्ट्रे - देशमे ब्र॑ह्मवर्च॒सी-ब्रह्म विद्याक तेजसँ युक्त्त आ जा॑यतां॒- उत्पन्न होए रा॑ज॒न्यः-राजा शुरे॑ऽ–बिना डर बला इषव्यो॒- बाण चलेबामे निपुण ऽतिव्या॒धी-शत्रुकेँ तारण दय बला म॑हार॒थो-पैघ रथ बला वीर दोग्ध्रीं-कामना(दूध पूर्ण करए बाली) धे॒नुर्वोढा॑न॒ड्वाना॒शुः धे॒नु-गौ वा वाणी र्वोढा॑न॒ड्वा- पैघ बरद ना॒शुः-आशुः-त्वरित सप्तिः॒-घोड़ा पुर॑न्धि॒र्योवा॑- पुर॑न्धि॒- व्यवहारकेँ धारण करए बाली र्योवा॑-स्त्री जि॒ष्णू-शत्रुकेँ जीतए बला र॑थे॒ष्ठाः-रथ पर स्थिर स॒भेयो॒-उत्तम सभामे युवास्य-युवा जेहन यज॑मानस्य-राजाक राज्यमे वी॒रो-शत्रुकेँ पराजित करएबला निका॒मे-नि॑कामे-निश्चययुक्त्त कार्यमे नः-हमर सभक प॒र्जन्यों-मेघ वर्षतु॒-वर्षा होए फल॑वत्यो-उत्तम फल बला ओष॑धयः-औषधिः पच्यन्तां- पाकए योगेक्ष॒मो-अलभ्य लभ्य करेबाक हेतु कएल गेल योगक रक्षा नः॑-हमरा सभक हेतु कल्पताम्-समर्थ होए ग्रिफिथक अनुवाद- हे ब्रह्मण, हमर राज्यमे ब्राह्मण नीक धार्मिक विद्या बला, राजन्य-वीर,तीरंदाज, दूध दए बाली गाय, दौगय बला जन्तु, उद्यमी नारी होथि। पार्जन्य आवश्यकता पड़ला पर वर्षा देथि, फल देय बला गाछ पाकए, हम सभ संपत्ति अर्जित/संरक्षित करी। 8.VIDEHA FOR NON RESIDENTS 8.1 to 8.3 MAITHILI LITERATURE IN ENGLISH 8.1.1.The Comet   -GAJENDRA THAKUR translated by Jyoti Jha chaudhary 8.1.2.The_Science_of_Words- GAJENDRA THAKUR translated by the author himself 8.1.3.On_the_dice-board_of_the_millennium- GAJENDRA THAKUR translated by Jyoti Jha chaudhary 8.1.4.NAAGPHANS (IN ENGLISH)- SHEFALIKA VERMA translated by Dr. Rajiv Kumar Verma and Dr. Jaya Verma विदेह नूतन अंक भाषापाक रचना-लेखन Input: (कोष्ठकमे देवनागरी, मिथिलाक्षर किंवा फोनेटिक-रोमनमे टाइप करू। Input in Devanagari, Mithilakshara or Phonetic-Roman.) Output: (परिणाम देवनागरी, मिथिलाक्षर आ फोनेटिक-रोमन/ रोमनमे। Result in Devanagari, Mithilakshara and Phonetic-Roman/ Roman.) English to Maithili Maithili to English इंग्लिश-मैथिली-कोष / मैथिली-इंग्लिश-कोष  प्रोजेक्टकेँ आगू बढ़ाऊ, अपन सुझाव आ योगदान ई-मेल द्वारा ggajendra@videha.com पर पठाऊ। Top of Form विदेहक मैथिली-अंग्रेजी आ अंग्रेजी मैथिली कोष (इंटरनेटपर पहिल बेर सर्च-डिक्शनरी) एम.एस. एस.क्यू.एल. सर्वर आधारित -Based on ms-sql server Maithili-English and English-Maithili Dictionary. १.भारत आ नेपालक मैथिली भाषा-वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक शैली आ २.मैथिलीमे भाषा सम्पादन पाठ्यक्रम १.नेपाल आ भारतक मैथिली भाषा-वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक शैली

१.१. नेपालक मैथिली भाषा वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक  उच्चारण आ लेखन शैली (भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक धारणाकेँ पूर्ण रूपसँ सङ्ग लऽ निर्धारित) मैथिलीमे उच्चारण तथा लेखन १.पञ्चमाक्षर आ अनुस्वार: पञ्चमाक्षरान्तर्गत ङ, ञ, ण, न एवं म अबैत अछि। संस्कृत भाषाक अनुसार शब्दक अन्तमे जाहि वर्गक अक्षर रहैत अछि ओही वर्गक पञ्चमाक्षर अबैत अछि। जेना- अङ्क (क वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ङ् आएल अछि।) पञ्च (च वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ञ् आएल अछि।) खण्ड (ट वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ण् आएल अछि।) सन्धि (त वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे न् आएल अछि।) खम्भ (प वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे म् आएल अछि।) उपर्युक्त बात मैथिलीमे कम देखल जाइत अछि। पञ्चमाक्षरक बदलामे अधिकांश जगहपर अनुस्वारक प्रयोग देखल जाइछ। जेना- अंक, पंच, खंड, संधि, खंभ आदि। व्याकरणविद पण्डित गोविन्द झाक कहब छनि जे कवर्ग, चवर्ग आ टवर्गसँ पूर्व अनुस्वार लिखल जाए तथा तवर्ग आ पवर्गसँ पूर्व पञ्चमाक्षरे लिखल जाए। जेना- अंक, चंचल, अंडा, अन्त तथा कम्पन। मुदा हिन्दीक निकट रहल आधुनिक लेखक एहि बातकेँ नहि मानैत छथि। ओ लोकनि अन्त आ कम्पनक जगहपर सेहो अंत आ कंपन लिखैत देखल जाइत छथि। नवीन पद्धति किछु सुविधाजनक अवश्य छैक। किएक तँ एहिमे समय आ स्थानक बचत होइत छैक। मुदा कतोक बेर हस्तलेखन वा मुद्रणमे अनुस्वारक छोट सन बिन्दु स्पष्ट नहि भेलासँ अर्थक अनर्थ होइत सेहो देखल जाइत अछि। अनुस्वारक प्रयोगमे उच्चारण-दोषक सम्भावना सेहो ततबए देखल जाइत अछि। एतदर्थ कसँ लऽ कऽ पवर्ग धरि पञ्चमाक्षरेक प्रयोग करब उचित अछि। यसँ लऽ कऽ ज्ञ धरिक अक्षरक सङ्ग अनुस्वारक प्रयोग करबामे कतहु कोनो विवाद नहि देखल जाइछ। २.ढ आ ढ़ : ढ़क उच्चारण “र् ह”जकाँ होइत अछि। अतः जतऽ “र् ह”क उच्चारण हो ओतऽ मात्र ढ़ लिखल जाए। आन ठाम खाली ढ लिखल जएबाक चाही। जेना- ढ = ढाकी, ढेकी, ढीठ, ढेउआ, ढङ्ग, ढेरी, ढाकनि, ढाठ आदि। ढ़ = पढ़ाइ, बढ़ब, गढ़ब, मढ़ब, बुढ़बा, साँढ़, गाढ़, रीढ़, चाँढ़, सीढ़ी, पीढ़ी आदि। उपर्युक्त शब्द सभकेँ देखलासँ ई स्पष्ट होइत अछि जे साधारणतया शब्दक शुरूमे ढ आ मध्य तथा अन्तमे ढ़ अबैत अछि। इएह नियम ड आ ड़क सन्दर्भ सेहो लागू होइत अछि। ३.व आ ब : मैथिलीमे “व”क उच्चारण ब कएल जाइत अछि, मुदा ओकरा ब रूपमे नहि लिखल जएबाक चाही। जेना- उच्चारण : बैद्यनाथ, बिद्या, नब, देबता, बिष्णु, बंश, बन्दना आदि। एहि सभक स्थानपर क्रमशः वैद्यनाथ, विद्या, नव, देवता, विष्णु, वंश, वन्दना लिखबाक चाही। सामान्यतया व उच्चारणक लेल ओ प्रयोग कएल जाइत अछि। जेना- ओकील, ओजह आदि। ४.य आ ज : कतहु-कतहु “य”क उच्चारण “ज”जकाँ करैत देखल जाइत अछि, मुदा ओकरा ज नहि लिखबाक चाही। उच्चारणमे यज्ञ, जदि, जमुना, जुग, जाबत, जोगी, जदु, जम आदि कहल जाएबला शब्द सभकेँ क्रमशः यज्ञ, यदि, यमुना, युग, यावत, योगी, यदु, यम लिखबाक चाही। ५.ए आ य : मैथिलीक वर्तनीमे ए आ य दुनू लिखल जाइत अछि। प्राचीन वर्तनी- कएल, जाए, होएत, माए, भाए, गाए आदि। नवीन वर्तनी- कयल, जाय, होयत, माय, भाय, गाय आदि। सामान्यतया शब्दक शुरूमे ए मात्र अबैत अछि। जेना एहि, एना, एकर, एहन आदि। एहि शब्द सभक स्थानपर यहि, यना, यकर, यहन आदिक प्रयोग नहि करबाक चाही। यद्यपि मैथिलीभाषी थारू सहित किछु जातिमे शब्दक आरम्भोमे “ए”केँ य कहि उच्चारण कएल जाइत अछि। ए आ “य”क प्रयोगक सन्दर्भमे प्राचीने पद्धतिक अनुसरण करब उपयुक्त मानि एहि पुस्तकमे ओकरे प्रयोग कएल गेल अछि। किएक तँ दुनूक लेखनमे कोनो सहजता आ दुरूहताक बात नहि अछि। आ मैथिलीक सर्वसाधारणक उच्चारण-शैली यक अपेक्षा एसँ बेसी निकट छैक। खास कऽ कएल, हएब आदि कतिपय शब्दकेँ कैल, हैब आदि रूपमे कतहु-कतहु लिखल जाएब सेहो “ए”क प्रयोगकेँ बेसी समीचीन प्रमाणित करैत अछि। ६.हि, हु तथा एकार, ओकार : मैथिलीक प्राचीन लेखन-परम्परामे कोनो बातपर बल दैत काल शब्दक पाछाँ हि, हु लगाओल जाइत छैक। जेना- हुनकहि, अपनहु, ओकरहु, तत्कालहि, चोट्टहि, आनहु आदि। मुदा आधुनिक लेखनमे हिक स्थानपर एकार एवं हुक स्थानपर ओकारक प्रयोग करैत देखल जाइत अछि। जेना- हुनके, अपनो, तत्काले, चोट्टे, आनो आदि। ७.ष तथा ख : मैथिली भाषामे अधिकांशतः षक उच्चारण ख होइत अछि। जेना- षड्यन्त्र (खड़यन्त्र), षोडशी (खोड़शी), षट्कोण (खटकोण), वृषेश (वृखेश), सन्तोष (सन्तोख) आदि। ८.ध्वनि-लोप : निम्नलिखित अवस्थामे शब्दसँ ध्वनि-लोप भऽ जाइत अछि: (क) क्रियान्वयी प्रत्यय अयमे य वा ए लुप्त भऽ जाइत अछि। ओहिमे सँ पहिने अक उच्चारण दीर्घ भऽ जाइत अछि। ओकर आगाँ लोप-सूचक चिह्न वा विकारी (’ / ऽ) लगाओल जाइछ। जेना- पूर्ण रूप : पढ़ए (पढ़य) गेलाह, कए (कय) लेल, उठए (उठय) पड़तौक। अपूर्ण रूप : पढ़’ गेलाह, क’ लेल, उठ’ पड़तौक। पढ़ऽ गेलाह, कऽ लेल, उठऽ पड़तौक। (ख) पूर्वकालिक कृत आय (आए) प्रत्ययमे य (ए) लुप्त भऽ जाइछ, मुदा लोप-सूचक विकारी नहि लगाओल जाइछ। जेना- पूर्ण रूप : खाए (य) गेल, पठाय (ए) देब, नहाए (य) अएलाह। अपूर्ण रूप : खा गेल, पठा देब, नहा अएलाह। (ग) स्त्री प्रत्यय इक उच्चारण क्रियापद, संज्ञा, ओ विशेषण तीनूमे लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना- पूर्ण रूप : दोसरि मालिनि चलि गेलि। अपूर्ण रूप : दोसर मालिन चलि गेल। (घ) वर्तमान कृदन्तक अन्तिम त लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना- पूर्ण रूप : पढ़ैत अछि, बजैत अछि, गबैत अछि। अपूर्ण रूप : पढ़ै अछि, बजै अछि, गबै अछि। (ङ) क्रियापदक अवसान इक, उक, ऐक तथा हीकमे लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना- पूर्ण रूप: छियौक, छियैक, छहीक, छौक, छैक, अबितैक, होइक। अपूर्ण रूप : छियौ, छियै, छही, छौ, छै, अबितै, होइ। (च) क्रियापदीय प्रत्यय न्ह, हु तथा हकारक लोप भऽ जाइछ। जेना- पूर्ण रूप : छन्हि, कहलन्हि, कहलहुँ, गेलह, नहि। अपूर्ण रूप : छनि, कहलनि, कहलौँ, गेलऽ, नइ, नञि, नै। ९.ध्वनि स्थानान्तरण : कोनो-कोनो स्वर-ध्वनि अपना जगहसँ हटि कऽ दोसर ठाम चलि जाइत अछि। खास कऽ ह्रस्व इ आ उक सम्बन्धमे ई बात लागू होइत अछि। मैथिलीकरण भऽ गेल शब्दक मध्य वा अन्तमे जँ ह्रस्व इ वा उ आबए तँ ओकर ध्वनि स्थानान्तरित भऽ एक अक्षर आगाँ आबि जाइत अछि। जेना- शनि (शइन), पानि (पाइन), दालि ( दाइल), माटि (माइट), काछु (काउछ), मासु (माउस) आदि। मुदा तत्सम शब्द सभमे ई निअम लागू नहि होइत अछि। जेना- रश्मिकेँ रइश्म आ सुधांशुकेँ सुधाउंस नहि कहल जा सकैत अछि। १०.हलन्त(्)क प्रयोग : मैथिली भाषामे सामान्यतया हलन्त (्)क आवश्यकता नहि होइत अछि। कारण जे शब्दक अन्तमे अ उच्चारण नहि होइत अछि। मुदा संस्कृत भाषासँ जहिनाक तहिना मैथिलीमे आएल (तत्सम) शब्द सभमे हलन्त प्रयोग कएल जाइत अछि। एहि पोथीमे सामान्यतया सम्पूर्ण शब्दकेँ मैथिली भाषा सम्बन्धी निअम अनुसार हलन्तविहीन राखल गेल अछि। मुदा व्याकरण सम्बन्धी प्रयोजनक लेल अत्यावश्यक स्थानपर कतहु-कतहु हलन्त देल गेल अछि। प्रस्तुत पोथीमे मथिली लेखनक प्राचीन आ नवीन दुनू शैलीक सरल आ समीचीन पक्ष सभकेँ समेटि कऽ वर्ण-विन्यास कएल गेल अछि। स्थान आ समयमे बचतक सङ्गहि हस्त-लेखन तथा तकनीकी दृष्टिसँ सेहो सरल होबऽबला हिसाबसँ वर्ण-विन्यास मिलाओल गेल अछि। वर्तमान समयमे मैथिली मातृभाषी पर्यन्तकेँ आन भाषाक माध्यमसँ मैथिलीक ज्ञान लेबऽ पड़ि रहल परिप्रेक्ष्यमे लेखनमे सहजता तथा एकरूपतापर ध्यान देल गेल अछि। तखन मैथिली भाषाक मूल विशेषता सभ कुण्ठित नहि होइक, ताहू दिस लेखक-मण्डल सचेत अछि। प्रसिद्ध भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक कहब छनि जे सरलताक अनुसन्धानमे एहन अवस्था किन्नहु ने आबऽ देबाक चाही जे भाषाक विशेषता छाँहमे पडि जाए। -(भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक धारणाकेँ पूर्ण रूपसँ सङ्ग लऽ निर्धारित) १.२. मैथिली अकादमी, पटना द्वारा निर्धारित मैथिली लेखन-शैली

१. जे शब्द मैथिली-साहित्यक प्राचीन कालसँ आइ धरि जाहि वर्त्तनीमे प्रचलित अछि, से सामान्यतः ताहि वर्त्तनीमे लिखल जाय- उदाहरणार्थ-

ग्राह्य

एखन ठाम जकर, तकर तनिकर अछि

अग्राह्य अखन, अखनि, एखेन, अखनी ठिमा, ठिना, ठमा जेकर, तेकर तिनकर। (वैकल्पिक रूपेँ ग्राह्य) ऐछ, अहि, ए।

२. निम्नलिखित तीन प्रकारक रूप वैकल्पिकतया अपनाओल जाय: भऽ गेल, भय गेल वा भए गेल। जा रहल अछि, जाय रहल अछि, जाए रहल अछि। कर’ गेलाह, वा करय गेलाह वा करए गेलाह।

३. प्राचीन मैथिलीक ‘न्ह’ ध्वनिक स्थानमे ‘न’ लिखल जाय सकैत अछि यथा कहलनि वा कहलन्हि।

४. ‘ऐ’ तथा ‘औ’ ततय लिखल जाय जत’ स्पष्टतः ‘अइ’ तथा ‘अउ’ सदृश उच्चारण इष्ट हो। यथा- देखैत, छलैक, बौआ, छौक इत्यादि।

५. मैथिलीक निम्नलिखित शब्द एहि रूपे प्रयुक्त होयत: जैह, सैह, इएह, ओऐह, लैह तथा दैह।

६. ह्र्स्व इकारांत शब्दमे ‘इ’ के लुप्त करब सामान्यतः अग्राह्य थिक। यथा- ग्राह्य देखि आबह, मालिनि गेलि (मनुष्य मात्रमे)।

७. स्वतंत्र ह्रस्व ‘ए’ वा ‘य’ प्राचीन मैथिलीक उद्धरण आदिमे तँ यथावत राखल जाय, किंतु आधुनिक प्रयोगमे वैकल्पिक रूपेँ ‘ए’ वा ‘य’ लिखल जाय। यथा:- कयल वा कएल, अयलाह वा अएलाह, जाय वा जाए इत्यादि।

८. उच्चारणमे दू स्वरक बीच जे ‘य’ ध्वनि स्वतः आबि जाइत अछि तकरा लेखमे स्थान वैकल्पिक रूपेँ देल जाय। यथा- धीआ, अढ़ैआ, विआह, वा धीया, अढ़ैया, बियाह।

९. सानुनासिक स्वतंत्र स्वरक स्थान यथासंभव ‘ञ’ लिखल जाय वा सानुनासिक स्वर। यथा:- मैञा, कनिञा, किरतनिञा वा मैआँ, कनिआँ, किरतनिआँ।

१०. कारकक विभक्त्तिक निम्नलिखित रूप ग्राह्य:- हाथकेँ, हाथसँ, हाथेँ, हाथक, हाथमे। ’मे’ मे अनुस्वार सर्वथा त्याज्य थिक। ‘क’ क वैकल्पिक रूप ‘केर’ राखल जा सकैत अछि।

११. पूर्वकालिक क्रियापदक बाद ‘कय’ वा ‘कए’ अव्यय वैकल्पिक रूपेँ लगाओल जा सकैत अछि। यथा:- देखि कय वा देखि कए।

१२. माँग, भाँग आदिक स्थानमे माङ, भाङ इत्यादि लिखल जाय।

१३. अर्द्ध ‘न’ ओ अर्द्ध ‘म’ क बदला अनुसार नहि लिखल जाय, किंतु छापाक सुविधार्थ अर्द्ध ‘ङ’ , ‘ञ’, तथा ‘ण’ क बदला अनुस्वारो लिखल जा सकैत अछि। यथा:- अङ्क, वा अंक, अञ्चल वा अंचल, कण्ठ वा कंठ।

१४. हलंत चिह्न निअमतः लगाओल जाय, किंतु विभक्तिक संग अकारांत प्रयोग कएल जाय। यथा:- श्रीमान्, किंतु श्रीमानक।

१५. सभ एकल कारक चिह्न शब्दमे सटा क’ लिखल जाय, हटा क’ नहि, संयुक्त विभक्तिक हेतु फराक लिखल जाय, यथा घर परक।

१६. अनुनासिककेँ चन्द्रबिन्दु द्वारा व्यक्त कयल जाय। परंतु मुद्रणक सुविधार्थ हि समान जटिल मात्रापर अनुस्वारक प्रयोग चन्द्रबिन्दुक बदला कयल जा सकैत अछि। यथा- हिँ केर बदला हिं।

१७. पूर्ण विराम पासीसँ ( । ) सूचित कयल जाय।

१८. समस्त पद सटा क’ लिखल जाय, वा हाइफेनसँ जोड़ि क’ ,  हटा क’ नहि।

१९. लिअ तथा दिअ शब्दमे बिकारी (ऽ) नहि लगाओल जाय।

२०. अंक देवनागरी रूपमे राखल जाय।

२१.किछु ध्वनिक लेल नवीन चिन्ह बनबाओल जाय। जा' ई नहि बनल अछि ताबत एहि दुनू ध्वनिक बदला पूर्ववत् अय/ आय/ अए/ आए/ आओ/ अओ लिखल जाय। आकि ऎ वा ऒ सँ व्यक्त कएल जाय।

ह./- गोविन्द झा ११/८/७६ श्रीकान्त ठाकुर ११/८/७६ सुरेन्द्र झा "सुमन" ११/०८/७६

  २. मैथिलीमे भाषा सम्पादन पाठ्यक्रम २.१. उच्चारण निर्देश: (बोल्ड कएल रूप ग्राह्य):- दन्त न क उच्चारणमे दाँतमे जीह सटत- जेना बाजू नाम , मुदा ण क उच्चारणमे जीह मूर्धामे सटत (नै सटैए तँ उच्चारण दोष अछि)- जेना बाजू गणेश। तालव्य शमे जीह तालुसँ , षमे मूर्धासँ आ दन्त समे दाँतसँ सटत। निशाँ, सभ आ शोषण बाजि कऽ देखू। मैथिलीमे ष केँ वैदिक संस्कृत जकाँ ख सेहो उच्चरित कएल जाइत अछि, जेना वर्षा, दोष। य अनेको स्थानपर ज जकाँ उच्चरित होइत अछि आ ण ड़ जकाँ (यथा संयोग आ गणेश संजोग आ गड़ेस उच्चरित होइत अछि)। मैथिलीमे व क उच्चारण ब, श क उच्चारण स आ य क उच्चारण ज सेहो होइत अछि। ओहिना ह्रस्व इ बेशीकाल मैथिलीमे पहिने बाजल जाइत अछि कारण देवनागरीमे आ मिथिलाक्षरमे ह्रस्व इ अक्षरक पहिने लिखलो जाइत आ बाजलो जएबाक चाही। कारण जे हिन्दीमे एकर दोषपूर्ण उच्चारण होइत अछि (लिखल तँ पहिने जाइत अछि मुदा बाजल बादमे जाइत अछि), से शिक्षा पद्धतिक दोषक कारण हम सभ ओकर उच्चारण दोषपूर्ण ढंगसँ कऽ रहल छी। अछि- अ इ छ  ऐछ (उच्चारण) छथि- छ इ थ  – छैथ (उच्चारण) पहुँचि- प हुँ इ च (उच्चारण) आब अ आ इ ई ए ऐ ओ औ अं अः ऋ ऐ सभ लेल मात्रा सेहो अछि, मुदा ऐमे ई ऐ ओ औ अं अः ऋ केँ संयुक्ताक्षर रूपमे गलत रूपमे प्रयुक्त आ उच्चरित कएल जाइत अछि। जेना ऋ केँ री  रूपमे उच्चरित करब। आ देखियौ- ऐ लेल देखिऔ क प्रयोग अनुचित। मुदा देखिऐ लेल देखियै अनुचित। क् सँ ह् धरि अ सम्मिलित भेलासँ क सँ ह बनैत अछि, मुदा उच्चारण काल हलन्त युक्त शब्दक अन्तक उच्चारणक प्रवृत्ति बढ़ल अछि, मुदा हम जखन मनोजमे ज् अन्तमे बजैत छी, तखनो पुरनका लोककेँ बजैत सुनबन्हि- मनोजऽ, वास्तवमे ओ अ युक्त ज् = ज बजै छथि। फेर ज्ञ अछि ज् आ ञ क संयुक्त मुदा गलत उच्चारण होइत अछि- ग्य। ओहिना क्ष अछि क् आ ष क संयुक्त मुदा उच्चारण होइत अछि छ। फेर श् आ र क संयुक्त अछि श्र ( जेना श्रमिक) आ स् आ र क संयुक्त अछि स्र (जेना मिस्र)। त्र भेल त+र । उच्चारणक ऑडियो फाइल विदेह आर्काइव  http://www.videha.co.in/ पर उपलब्ध अछि। फेर केँ / सँ / पर पूर्व अक्षरसँ सटा कऽ लिखू मुदा तँ / कऽ हटा कऽ। ऐमे सँ मे पहिल सटा कऽ लिखू आ बादबला हटा कऽ। अंकक बाद टा लिखू सटा कऽ मुदा अन्य ठाम टा लिखू हटा कऽ– जेना छहटा मुदा सभ टा। फेर ६अ म सातम लिखू- छठम सातम नै। घरबलामे बला मुदा घरवालीमे वाली प्रयुक्त करू। रहए- रहै मुदा सकैए (उच्चारण सकै-ए)। मुदा कखनो काल रहए आ रहै मे अर्थ भिन्नता सेहो, जेना से कम्मो जगहमे पार्किंग करबाक अभ्यास रहै ओकरा। पुछलापर पता लागल जे ढुनढुन नाम्ना ई ड्राइवर कनाट प्लेसक पार्किंगमे काज करैत रहए। छलै, छलए मे सेहो ऐ तरहक भेल। छलए क उच्चारण छल-ए सेहो। संयोगने- (उच्चारण संजोगने) केँ/  कऽ केर- क ( केर क प्रयोग गद्यमे नै करू , पद्यमे कऽ सकै छी। ) क (जेना रामक) –रामक आ संगे (उच्चारण राम के /  राम कऽ सेहो) सँ- सऽ (उच्चारण) चन्द्रबिन्दु आ अनुस्वार- अनुस्वारमे कंठ धरिक प्रयोग होइत अछि मुदा चन्द्रबिन्दुमे नै। चन्द्रबिन्दुमे कनेक एकारक सेहो उच्चारण होइत अछि- जेना रामसँ- (उच्चारण राम सऽ)  रामकेँ- (उच्चारण राम कऽ/ राम के सेहो)। केँ जेना रामकेँ भेल हिन्दीक को (राम को)- राम को= रामकेँ क जेना रामक भेल हिन्दीक का ( राम का) राम का= रामक कऽ जेना जा कऽ भेल हिन्दीक कर ( जा कर) जा कर= जा कऽ सँ भेल हिन्दीक से (राम से) राम से= रामसँ सऽ , तऽ , त , केर (गद्यमे) एे चारू शब्द सबहक प्रयोग अवांछित। के दोसर अर्थेँ प्रयुक्त भऽ सकैए- जेना, के कहलक? विभक्ति “क”क बदला एकर प्रयोग अवांछित। नञि, नहि, नै, नइ, नँइ, नइँ, नइं ऐ सभक उच्चारण आ लेखन - नै त्त्व क बदलामे त्व जेना महत्वपूर्ण (महत्त्वपूर्ण नै) जतए अर्थ बदलि जाए ओतहि मात्र तीन अक्षरक संयुक्ताक्षरक प्रयोग उचित। सम्पति- उच्चारण स म्प इ त (सम्पत्ति नै- कारण सही उच्चारण आसानीसँ सम्भव नै)। मुदा सर्वोत्तम (सर्वोतम नै)। राष्ट्रिय (राष्ट्रीय नै) सकैए/ सकै (अर्थ परिवर्तन) पोछैले/ पोछै लेल/ पोछए लेल पोछैए/ पोछए/ (अर्थ परिवर्तन) पोछए/ पोछै ओ लोकनि ( हटा कऽ, ओ मे बिकारी नै) ओइ/ ओहि ओहिले/ ओहि लेल/ ओही लऽ जएबेँ/ बैसबेँ पँचभइयाँ देखियौक/ (देखिऔक नै- तहिना अ मे ह्रस्व आ दीर्घक मात्राक प्रयोग अनुचित) जकाँ / जेकाँ तँइ/ तैँ/ होएत / हएत नञि/ नहि/ नँइ/ नइँ/ नै सौँसे/ सौंसे बड़ / बड़ी (झोराओल) गाए (गाइ नहि), मुदा गाइक दूध (गाएक दूध नै।) रहलेँ/ पहिरतैँ हमहीं/ अहीं सब - सभ सबहक - सभहक धरि - तक गप- बात बूझब - समझब बुझलौं/ समझलौं/ बुझलहुँ - समझलहुँ हमरा आर - हम सभ आकि- आ कि सकैछ/ करैछ (गद्यमे प्रयोगक आवश्यकता नै) होइन/ होनि जाइन (जानि नै, जेना देल जाइन) मुदा जानि-बूझि (अर्थ परिव्र्तन) पइठ/ जाइठ आउ/ जाउ/ आऊ/ जाऊ मे, केँ, सँ, पर (शब्दसँ सटा कऽ) तँ कऽ धऽ दऽ (शब्दसँ हटा कऽ) मुदा दूटा वा बेसी विभक्ति संग रहलापर पहिल विभक्ति टाकेँ सटाऊ। जेना ऐमे सँ । एकटा , दूटा (मुदा कए टा) बिकारीक प्रयोग शब्दक अन्तमे, बीचमे अनावश्यक रूपेँ नै। आकारान्त आ अन्तमे अ क बाद बिकारीक प्रयोग नै (जेना दिअ , आ/ दिय’ , आ’, आ नै ) अपोस्ट्रोफीक प्रयोग बिकारीक बदलामे करब अनुचित आ मात्र फॉन्टक तकनीकी न्यूनताक परिचायक)- ओना बिकारीक संस्कृत रूप ऽ अवग्रह कहल जाइत अछि आ वर्तनी आ उच्चारण दुनू ठाम एकर लोप रहैत अछि/ रहि सकैत अछि (उच्चारणमे लोप रहिते अछि)। मुदा अपोस्ट्रोफी सेहो अंग्रेजीमे पसेसिव केसमे होइत अछि आ फ्रेंचमे शब्दमे जतए एकर प्रयोग होइत अछि जेना raison d’etre एतए सेहो एकर उच्चारण रैजौन डेटर होइत अछि, माने अपोस्ट्रॉफी अवकाश नै दैत अछि वरन जोड़ैत अछि, से एकर प्रयोग बिकारीक बदला देनाइ तकनीकी रूपेँ सेहो अनुचित)। अइमे, एहिमे/ ऐमे जइमे, जाहिमे एखन/ अखन/ अइखन केँ (के नहि) मे (अनुस्वार रहित) भऽ मे दऽ तँ (तऽ, त नै) सँ ( सऽ स नै) गाछ तर गाछ लग साँझ खन जो (जो go, करै जो do) तै/तइ जेना- तै दुआरे/ तइमे/ तइले जै/जइ जेना- जै कारण/ जइसँ/ जइले ऐ/अइ जेना- ऐ कारण/ ऐसँ/ अइले/ मुदा एकर एकटा खास प्रयोग- लालति‍ कतेक दि‍नसँ कहैत रहैत अइ लै/लइ जेना लैसँ/ लइले/ लै दुआरे लहँ/ लौं गेलौं/ लेलौं/ लेलँह/ गेलहुँ/ लेलहुँ/ लेलँ जइ/ जाहि‍/ जै जहि‍ठाम/ जाहि‍ठाम/ जइठाम/ जैठाम एहि‍/ अहि‍/ अइ (वाक्यक अंतमे ग्राह्य) / ऐ अइछ/ अछि‍/ ऐछ तइ/ तहि‍/ तै/ ताहि‍ ओहि‍/ ओइ सीखि‍/ सीख जीवि‍/ जीवी/ जीब भलेहीं/ भलहि‍ं तैं/ तँइ/ तँए जाएब/ जएब लइ/ लै छइ/ छै नहि‍/ नै/ नइ गइ/ गै छनि‍/ छन्‍हि‍  ... समए शब्‍दक संग जखन कोनो वि‍भक्‍ति‍ जुटै छै तखन समै जना समैपर इत्‍यादि‍। असगरमे हृदए आ वि‍भक्‍ति‍ जुटने हृदे जना हृदेसँ, हृदेमे इत्‍यादि‍। जइ/ जाहि‍/ जै जहि‍ठाम/ जाहि‍ठाम/ जइठाम/ जैठाम एहि‍/ अहि‍/ अइ/ ऐ अइछ/ अछि‍/ ऐछ तइ/ तहि‍/ तै/ ताहि‍ ओहि‍/ ओइ सीखि‍/ सीख जीवि‍/ जीवी/ जीब भले/ भलेहीं/ भलहि‍ं तैं/ तँइ/ तँए जाएब/ जएब लइ/ लै छइ/ छै नहि‍/ नै/ नइ गइ/ गै छनि‍/ छन्‍हि‍ चुकल अछि/ गेल गछि २.२. मैथिलीमे भाषा सम्पादन पाठ्यक्रम नीचाँक सूचीमे देल विकल्पमेसँ लैंगुएज एडीटर द्वारा कोन रूप चुनल जेबाक चाही: बोल्ड कएल रूप ग्राह्य: १.होयबला/ होबयबला/ होमयबला/ हेब’बला, हेम’बला/ होयबाक/होबएबला /होएबाक २. आ’/आऽ आ ३. क’ लेने/कऽ लेने/कए लेने/कय लेने/ल’/लऽ/लय/लए ४. भ’ गेल/भऽ गेल/भय गेल/भए गेल ५. कर’ गेलाह/करऽ गेलह/करए गेलाह/करय गेलाह ६. लिअ/दिअ लिय’,दिय’,लिअ’,दिय’/ ७. कर’ बला/करऽ बला/ करय बला करैबला/क’र’ बला / करैवाली ८. बला वला (पुरूष), वाली (स्‍त्री) ९ . आङ्ल आंग्ल १०. प्रायः प्रायह ११. दुःख दुख १ २. चलि गेल चल गेल/चैल गेल १३. देलखिन्ह देलकिन्ह, देलखिन १४. देखलन्हि देखलनि/ देखलैन्ह १५. छथिन्ह/ छलन्हि छथिन/ छलैन/ छलनि १६. चलैत/दैत चलति/दैति १७. एखनो अखनो १८. बढ़नि‍ बढ़इन बढ़न्हि १९. ओ’/ओऽ(सर्वनाम) ओ २० . ओ (संयोजक) ओ’/ओऽ २१. फाँगि/फाङ्गि फाइंग/फाइङ २२. जे जे’/जेऽ २३. ना-नुकुर ना-नुकर २४. केलन्हि/केलनि‍/कयलन्हि २५. तखनतँ/ तखन तँ २६. जा रहल/जाय रहल/जाए रहल २७. निकलय/निकलए लागल/ लगल बहराय/ बहराए लागल/ लगल निकल’/बहरै लागल २८. ओतय/ जतय जत’/ ओत’/ जतए/ ओतए २९. की फूरल जे कि फूरल जे ३०. जे जे’/जेऽ ३१. कूदि / यादि(मोन पारब) कूइद/याइद/कूद/याद/ यादि (मोन) ३२. इहो/ ओहो ३३. हँसए/ हँसय हँसऽ ३४. नौ आकि दस/नौ किंवा दस/ नौ वा दस ३५. सासु-ससुर सास-ससुर ३६. छह/ सात छ/छः/सात ३७. की  की’/ कीऽ (दीर्घीकारान्तमे ऽ वर्जित) ३८. जबाब जवाब ३९. करएताह/ करेताह करयताह ४०. दलान दिशि दलान दिश/दलान दिस ४१ . गेलाह गएलाह/गयलाह ४२. किछु आर/ किछु और/ किछ आर ४३. जाइ छल/ जाइत छल जाति छल/जैत छल ४४. पहुँचि/ भेट जाइत छल/ भेट जाइ छलए पहुँच/ भेटि‍ जाइत छल ४५. जबान (युवा)/ जवान(फौजी) ४६. लय/ लए क’/ कऽ/ लए कए / लऽ कऽ/ लऽ कए ४७. ल’/लऽ कय/ कए ४८. एखन / एखने / अखन / अखने ४९. अहींकेँ अहीँकेँ ५०. गहींर गहीँर ५१. धार पार केनाइ धार पार केनाय/केनाए ५२. जेकाँ जेँकाँ/ जकाँ ५३. तहिना तेहिना ५४. एकर अकर ५५. बहिनउ बहनोइ ५६. बहिन बहिनि ५७. बहिन-बहिनोइ बहिन-बहनउ ५८. नहि/ नै ५९. करबा / करबाय/ करबाए ६०. तँ/ त ऽ तय/तए ६१. भैयारी मे छोट-भाए/भै/, जेठ-भाय/भाइ, ६२. गि‍नतीमे दू भाइ/भाए/भाँइ ६३. ई पोथी दू भाइक/ भाँइ/ भाए/ लेल। यावत जावत ६४. माय मै / माए मुदा माइक ममता ६५. देन्हि/ दइन दनि‍/ दएन्हि/ दयन्हि दन्हि/ दैन्हि ६६. द’/ दऽ/ दए ६७. ओ (संयोजक) ओऽ (सर्वनाम) ६८. तका कए तकाय तकाए ६९. पैरे (on foot) पएरे  कएक/ कैक ७०. ताहुमे/ ताहूमे ७१. पुत्रीक ७२. बजा कय/ कए / कऽ ७३. बननाय/बननाइ ७४. कोला ७५. दिनुका दिनका ७६. ततहिसँ ७७. गरबओलन्हि/ गरबौलनि‍/ गरबेलन्हि/ गरबेलनि‍ ७८. बालु बालू ७९. चेन्ह चिन्ह(अशुद्ध) ८०. जे जे’ ८१ . से/ के से’/के’ ८२. एखुनका अखनुका ८३. भुमिहार भूमिहार ८४. सुग्गर / सुगरक/ सूगर ८५. झठहाक झटहाक ८६. छूबि ८७. करइयो/ओ करैयो ने देलक /करियौ-करइयौ ८८. पुबारि पुबाइ ८९. झगड़ा-झाँटी झगड़ा-झाँटि ९०. पएरे-पएरे पैरे-पैरे ९१. खेलएबाक ९२. खेलेबाक ९३. लगा ९४. होए- हो – होअए ९५. बुझल बूझल ९६. बूझल (संबोधन अर्थमे) ९७. यैह यएह / इएह/ सैह/ सएह ९८. तातिल ९९. अयनाय- अयनाइ/ अएनाइ/ एनाइ १००. निन्न- निन्द १०१. बिनु बिन १०२. जाए जाइ १०३. जाइ (in different sense)-last word of sentence १०४. छत पर आबि जाइ १०५. ने १०६. खेलाए (play) –खेलाइ १०७. शिकाइत- शिकायत १०८. ढप- ढ़प १०९ . पढ़- पढ ११०. कनिए/ कनिये कनिञे १११. राकस- राकश ११२. होए/ होय होइ ११३. अउरदा- औरदा ११४. बुझेलन्हि (different meaning- got understand) ११५. बुझएलन्हि/बुझेलनि‍/ बुझयलन्हि (understood himself) ११६. चलि- चल/ चलि‍ गेल ११७. खधाइ- खधाय ११८. मोन पाड़लखिन्ह/ मोन पाड़लखि‍न/ मोन पारलखिन्ह ११९. कैक- कएक- कइएक १२०. लग ल’ग १२१. जरेनाइ १२२. जरौनाइ जरओनाइ- जरएनाइ/ जरेनाइ १२३. होइत १२४. गरबेलन्हि/ गरबेलनि‍ गरबौलन्हि/ गरबौलनि‍ १२५. चिखैत- (to test)चिखइत १२६. करइयो (willing to do) करैयो १२७. जेकरा- जकरा १२८. तकरा- तेकरा १२९. बिदेसर स्थानेमे/ बिदेसरे स्थानमे १३०. करबयलहुँ/ करबएलहुँ/ करबेलहुँ करबेलौं १३१. हारिक (उच्चारण हाइरक) १३२. ओजन वजन आफसोच/ अफसोस कागत/ कागच/ कागज १३३. आधे भाग/ आध-भागे १३४. पिचा / पिचाय/पिचाए १३५. नञ/ ने १३६. बच्चा नञ (ने) पिचा जाय १३७. तखन ने (नञ) कहैत अछि। कहै/ सुनै/ देखै छल मुदा कहैत-कहैत/ सुनैत-सुनैत/ देखैत-देखैत १३८. कतेक गोटे/ कताक गोटे १३९. कमाइ-धमाइ/ कमाई- धमाई १४० . लग ल’ग १४१. खेलाइ (for playing) १४२. छथिन्ह/ छथिन १४३. होइत होइ १४४. क्यो कियो / केओ १४५. केश (hair) १४६. केस (court-case) १४७ . बननाइ/ बननाय/ बननाए १४८. जरेनाइ १४९. कुरसी कुर्सी १५०. चरचा चर्चा १५१. कर्म करम १५२. डुबाबए/ डुबाबै/ डुमाबै डुमाबय/ डुमाबए १५३. एखुनका/ अखुनका १५४. लए/ लिअए (वाक्यक अंतिम शब्द)- लऽ १५५. कएलक/ केलक १५६. गरमी गर्मी १५७ . वरदी वर्दी १५८. सुना गेलाह सुना’/सुनाऽ १५९. एनाइ-गेनाइ १६०. तेना ने घेरलन्हि/ तेना ने घेरलनि‍ १६१. नञि / नै १६२. डरो ड’रो १६३. कतहु/ कतौ कहीं १६४. उमरिगर-उमेरगर उमरगर १६५. भरिगर १६६. धोल/धोअल धोएल १६७. गप/गप्प १६८. के के’ १६९. दरबज्जा/ दरबजा १७०. ठाम १७१. धरि तक १७२. घूरि लौटि १७३. थोरबेक १७४. बड्ड १७५. तोँ/ तूँ १७६. तोँहि( पद्यमे ग्राह्य) १७७. तोँही / तोँहि १७८. करबाइए करबाइये १७९. एकेटा १८०. करितथि /करतथि १८१. पहुँचि/ पहुँच १८२. राखलन्हि रखलन्हि/ रखलनि‍ १८३. लगलन्हि/ लगलनि‍ लागलन्हि १८४. सुनि (उच्चारण सुइन) १८५. अछि (उच्चारण अइछ) १८६. एलथि गेलथि १८७. बितओने/ बि‍तौने/ बितेने १८८. करबओलन्हि/ करबौलनि‍/ करेलखिन्ह/ करेलखि‍न १८९. करएलन्हि/ करेलनि‍ १९०. आकि/ कि १९१. पहुँचि/ पहुँच १९२. बत्ती जराय/ जराए जरा (आगि लगा) १९३. से से’ १९४. हाँ मे हाँ (हाँमे हाँ विभक्त्तिमे हटा कए) १९५. फेल फैल १९६. फइल(spacious) फैल १९७. होयतन्हि/ होएतन्हि/ होएतनि‍/हेतनि‍/ हेतन्हि १९८. हाथ मटिआएब/ हाथ मटियाबय/हाथ मटियाएब १९९. फेका फेंका २००. देखाए देखा २०१. देखाबए २०२. सत्तरि सत्तर २०३. साहेब साहब २०४.गेलैन्ह/ गेलन्हि/ गेलनि‍ २०५. हेबाक/ होएबाक २०६.केलो/ कएलहुँ/केलौं/ केलुँ २०७. किछु न किछु/ किछु ने किछु २०८.घुमेलहुँ/ घुमओलहुँ/ घुमेलौं २०९. एलाक/ अएलाक २१०. अः/ अह २११.लय/ लए (अर्थ-परिवर्त्तन) २१२.कनीक/ कनेक २१३.सबहक/ सभक २१४.मिलाऽ/ मिला २१५.कऽ/ क २१६.जाऽ/ जा २१७.आऽ/ आ २१८.भऽ /भ’ (’ फॉन्टक कमीक द्योतक) २१९.निअम/ नियम २२० .हेक्टेअर/ हेक्टेयर २२१.पहिल अक्षर ढ/ बादक/ बीचक ढ़ २२२.तहिं/तहिँ/ तञि/ तैं २२३.कहिं/ कहीं २२४.तँइ/ तैं / तइँ २२५.नँइ/ नइँ/  नञि/ नहि/नै २२६.है/ हए / एलीहेँ/ २२७.छञि/ छै/ छैक /छइ २२८.दृष्टिएँ/ दृष्टियेँ २२९.आ (come)/ आऽ(conjunction) २३०. आ (conjunction)/ आऽ(come) २३१.कुनो/ कोनो, कोना/केना २३२.गेलैन्ह-गेलन्हि-गेलनि‍ २३३.हेबाक- होएबाक २३४.केलौँ- कएलौँ-कएलहुँ/केलौं २३५.किछु न किछ- किछु ने किछु २३६.केहेन- केहन २३७.आऽ (come)-आ (conjunction-and)/आ। आब'-आब' /आबह-आबह २३८. हएत-हैत २३९.घुमेलहुँ-घुमएलहुँ- घुमेलाें २४०.एलाक- अएलाक २४१.होनि- होइन/ होन्हि/ २४२.ओ-राम ओ श्यामक बीच(conjunction), ओऽ कहलक (he said)/ओ २४३.की हए/ कोसी अएली हए/ की है। की हइ २४४.दृष्टिएँ/ दृष्टियेँ २४५ .शामिल/ सामेल २४६.तैँ / तँए/ तञि/ तहिं २४७.जौं / ज्योँ/ जँ/ २४८.सभ/ सब २४९.सभक/ सबहक २५०.कहिं/ कहीं २५१.कुनो/ कोनो/ कोनहुँ/ २५२.फारकती भऽ गेल/ भए गेल/ भय गेल २५३.कोना/ केना/ कन्‍ना/कना २५४.अः/ अह २५५.जनै/ जनञ २५६.गेलनि‍/ गेलाह (अर्थ परिवर्तन) २५७.केलन्हि/ कएलन्हि/ केलनि‍/ २५८.लय/ लए/ लएह (अर्थ परिवर्तन) २५९.कनीक/ कनेक/कनी-मनी २६०.पठेलन्हि‍ पठेलनि‍/ पठेलइन/ पपठओलन्हि/ पठबौलनि‍/ २६१.निअम/ नियम २६२.हेक्टेअर/ हेक्टेयर २६३.पहिल अक्षर रहने ढ/ बीचमे रहने ढ़ २६४.आकारान्तमे बिकारीक प्रयोग उचित नै/ अपोस्ट्रोफीक प्रयोग फान्टक तकनीकी न्यूनताक परिचायक ओकर बदला अवग्रह (बिकारी) क प्रयोग उचित २६५.केर (पद्यमे ग्राह्य) / -क/ कऽ/ के २६६.छैन्हि- छन्हि २६७.लगैए/ लगैये २६८.होएत/ हएत २६९.जाएत/ जएत/ २७०.आएत/ अएत/ आओत २७१ .खाएत/ खएत/ खैत २७२.पिअएबाक/ पिएबाक/पि‍येबाक २७३.शुरु/ शुरुह २७४.शुरुहे/ शुरुए २७५.अएताह/अओताह/ एताह/ औताह २७६.जाहि/ जाइ/ जइ/ जै/ २७७.जाइत/ जैतए/ जइतए २७८.आएल/ अएल २७९.कैक/ कएक २८०.आयल/ अएल/ आएल २८१. जाए/ जअए/ जए (लालति‍ जाए लगलीह।) २८२. नुकएल/ नुकाएल २८३. कठुआएल/ कठुअएल २८४. ताहि/ तै/ तइ २८५. गायब/ गाएब/ गएब २८६. सकै/ सकए/ सकय २८७.सेरा/सरा/ सराए (भात सरा गेल) २८८.कहैत रही/देखैत रही/ कहैत छलौं/ कहै छलौं- अहिना चलैत/ पढ़ैत (पढ़ै-पढ़ैत अर्थ कखनो काल परिवर्तित) - आर बुझै/ बुझैत (बुझै/ बुझै छी, मुदा बुझैत-बुझैत)/ सकैत/ सकै। करैत/ करै। दै/ दैत। छैक/ छै। बचलै/ बचलैक। रखबा/ रखबाक । बिनु/ बिन। रातिक/ रातुक बुझै आ बुझैत केर अपन-अपन जगहपर प्रयोग समीचीन अछि‍। बुझैत-बुझैत आब बुझलि‍ऐ। हमहूँ बुझै छी। २८९. दुआरे/ द्वारे २९०.भेटि/ भेट/ भेँट २९१. खन/ खीन/  खुना (भोर खन/ भोर खीन) २९२.तक/ धरि २९३.गऽ/ गै (meaning different-जनबै गऽ) २९४.सऽ/ सँ (मुदा दऽ, लऽ) २९५.त्त्व,(तीन अक्षरक मेल बदला पुनरुक्तिक एक आ एकटा दोसरक उपयोग) आदिक बदला त्व आदि। महत्त्व/ महत्व/ कर्ता/ कर्त्ता आदिमे त्त संयुक्तक कोनो आवश्यकता मैथिलीमे नै अछि। वक्तव्य २९६.बेसी/ बेशी २९७.बाला/वाला बला/ वला (रहैबला) २९८ .वाली/ (बदलैवाली) २९९.वार्त्ता/ वार्ता ३००. अन्तर्राष्ट्रिय/ अन्तर्राष्ट्रीय ३०१. लेमए/ लेबए ३०२.लमछुरका, नमछुरका ३०२.लागै/ लगै ( भेटैत/ भेटै) ३०३.लागल/ लगल ३०४.हबा/ हवा ३०५.राखलक/ रखलक ३०६.आ (come)/ आ (and) ३०७. पश्चाताप/ पश्चात्ताप ३०८. ऽ केर व्यवहार शब्दक अन्तमे मात्र, यथासंभव बीचमे नै। ३०९.कहैत/ कहै ३१०. रहए (छल)/ रहै (छलै) (meaning different) ३११.तागति/ ताकति ३१२.खराप/ खराब ३१३.बोइन/ बोनि/ बोइनि ३१४.जाठि/ जाइठ ३१५.कागज/ कागच/ कागत ३१६.गिरै (meaning different- swallow)/ गिरए (खसए) ३१७.राष्ट्रिय/ राष्ट्रीय Festivals of Mithila DATE-LIST (year- 2011-12) (१४१९ साल) Marriage Days: Nov.2011- 20,21,23,25,27,30 Dec.2011- 1,5,9 January 2012- 18,19,20,23,25,27,29 Feb.2012- 2,3,8,9,10,16,17,19,23,24,29 March 2012- 1,8,9,12 April 2012- 15,16,18,25,26 June 2012- 8,13,24,25,28,29 Upanayana Days: February 2012- 2,3,24,26 March 2012- 4 April 2012- 1,2,26 June 2012- 22 Dviragaman Din: November 2011- 27,30 December 2011- 1,2,5,7,9,12 February 2012- 22,23,24,26,27,29 March 2012- 1,2,4,5,9,11,12 April 2012- 23,25,26,29 May 2012- 2,3,4,6,7 Mundan Din: December 2011- 1,5 January 201225,26,30 March 2012- 12 April 2012- 26 May 2012- 23,25,31 June 2012- 8,21,22,29 FESTIVALS OF MITHILA Mauna Panchami-20 July Madhushravani- 2 August Nag Panchami- 4 August Raksha Bandhan- 13 Aug Krishnastami- 21 August Kushi Amavasya / Somvari Vrat- 29 August Hartalika Teej- 31 August ChauthChandra-1 September Karma Dharma Ekadashi-8 September Indra Pooja Aarambh- 9 September Anant Caturdashi- 11 Sep Agastyarghadaan- 12 Sep Pitri Paksha begins- 13 Sep Mahalaya Aarambh- 13 September Vishwakarma Pooja- 17 September Jimootavahan Vrata/ Jitia-20 September Matri Navami- 21September Kalashsthapan- 28 September Belnauti- 2 October Patrika Pravesh- 3 October Mahastami- 4 October Maha Navami - 5 October Vijaya Dashami- 6 October Kojagara- 11 Oct Dhanteras- 24 October Diyabati, shyama pooja-26 October Annakoota/ Govardhana Pooja-27  October Bhratridwitiya/ Chitragupta Pooja-28 October Chhathi-kharna -31 October Chhathi- sayankalik arghya - 1 November Devotthan Ekadashi- 17 November Sama poojarambh- 2 November Kartik Poornima/ Sama Bisarjan- 10 Nov ravivratarambh- 27 November Navanna parvan- 29 November Vivaha Panchmi- 29 November Makara/ Teela Sankranti-15 Jan Naraknivaran chaturdashi- 21 January Basant Panchami/ Saraswati Pooja- 28 January Achla Saptmi- 30 January Mahashivaratri-20 February Holikadahan-Fagua-7 March Holi-9 Mar Varuni Yoga-20 March Chaiti  navaratrarambh- 23 March Chaiti Chhathi vrata-29 March Ram Navami- 1 April Mesha Sankranti-Satuani-13 April Jurishital-14 April Akshaya Tritiya-24 April Ravi Brat Ant- 29 April Janaki Navami- 30 April Vat Savitri-barasait- 20 May Ganga Dashhara-30 May Somavati Amavasya Vrata- 18 June Jagannath Rath Yatra- 21 June Hari Sayan Ekadashi- 30 June Aashadhi Guru Poornima-3 Jul VIDEHA ARCHIVE १.विदेह ई-पत्रिकाक सभटा पुरान अंक ब्रेल, तिरहुता आ देवनागरी रूपमे Videha e journal's all old issues in Braille Tirhuta and Devanagari versions विदेह ई-पत्रिकाक पहिल ५० अंक

विदेह ई-पत्रिकाक ५०म सँ आगाँक अंक २.मैथिली पोथी डाउनलोड Maithili Books Download ३.मैथिली ऑडियो संकलन Maithili Audio Downloads ४.मैथिली वीडियोक संकलन Maithili Videos ५.मिथिला चित्रकला/ आधुनिक चित्रकला आ चित्र Mithila Painting/ Modern Art and Photos "विदेह"क एहि सभ सहयोगी लिंकपर सेहो एक बेर जाऊ। ६.विदेह मैथिली क्विज  :  http://videhaquiz.blogspot.com/ ७.विदेह मैथिली जालवृत्त एग्रीगेटर : http://videha-aggregator.blogspot.com/ ८.विदेह मैथिली साहित्य अंग्रेजीमे अनूदित http://madhubani-art.blogspot.com/ ९.विदेहक पूर्व-रूप "भालसरिक गाछ"  : http://gajendrathakur.blogspot.com/ १०.विदेह इंडेक्स  : http://videha123.blogspot.com/ ११.विदेह फाइल : http://videha123.wordpress.com/ १२. विदेह: सदेह : पहिल तिरहुता (मिथिला़क्षर) जालवृत्त (ब्लॉग) http://videha-sadeha.blogspot.com/ १३. विदेह:ब्रेल: मैथिली ब्रेलमे: पहिल बेर विदेह द्वारा http://videha-braille.blogspot.com/ १४.VIDEHA IST MAITHILI  FORTNIGHTLY EJOURNAL ARCHIVE http://videha-archive.blogspot.com/ १५. विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका मैथिली पोथीक आर्काइव http://videha-pothi.blogspot.com/ १६. विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका ऑडियो आर्काइव http://videha-audio.blogspot.com/ १७. विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका वीडियो आर्काइव http://videha-video.blogspot.com/ १८. विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका मिथिला चित्रकला, आधुनिक कला आ चित्रकला http://videha-paintings-photos.blogspot.com/ १९. मैथिल आर मिथिला (मैथिलीक सभसँ लोकप्रिय जालवृत्त) http://maithilaurmithila.blogspot.com/ २०.श्रुति प्रकाशन http://www.shruti-publication.com/ २१.http://groups.google.com/group/videha VIDEHA केर सदस्यता लिअ Top of Form Bottom of Form ईमेल : एहि समूहपर जाऊ २२.http://groups.yahoo.com/group/VIDEHA/ Top of Form Subscribe to VIDEHA Powered by us.groups.yahoo.com Bottom of Form २३.गजेन्द्र ठाकुर इ‍डेक्स http://gajendrathakur123.blogspot.com २४. नेना भुटका http://mangan-khabas.blogspot.com/ २५.विदेह रेडियो:मैथिली कथा-कविता आदिक पहिल पोडकास्ट साइट http://videha123radio.wordpress.com/ २६.Videha Radio २७. Join official Videha facebook group. २८. विदेह मैथिली नाट्य उत्सव http://maithili-drama.blogspot.com/ २९.समदिया http://esamaad.blogspot.com/ ३०. मैथिली फिल्म्स http://maithilifilms.blogspot.com/ ३१.अनचिन्हार आखर http://anchinharakharkolkata.blogspot.com/ ३२. मैथिली हाइकू http://maithili-haiku.blogspot.com/ ३३. मानक मैथिली http://manak-maithili.blogspot.com/ ३४. विहनि कथा http://vihanikatha.blogspot.in/ ३५. मैथिली कविता http://maithili-kavita.blogspot.in/ ३६. मैथिली कथा http://maithili-katha.blogspot.in/ ३७.मैथिली समालोचना http://maithili-samalochna.blogspot.in/ महत्त्वपूर्ण सूचना:(१) 'विदेह' द्वारा धारावाहिक रूपे ई-प्रकाशित कएल गेल गजेन्द्र ठाकुरक  निबन्ध-प्रबन्ध-समीक्षा, उपन्यास (सहस्रबाढ़नि) , पद्य-संग्रह (सहस्राब्दीक चौपड़पर), कथा-गल्प (गल्प-गुच्छ), नाटक(संकर्षण), महाकाव्य (त्वञ्चाहञ्च आ असञ्जाति मन) आ बाल-किशोर साहित्य विदेहमे संपूर्ण ई-प्रकाशनक बाद प्रिंट फॉर्ममे। कुरुक्षेत्रम्–अन्तर्मनक खण्ड-१ सँ ७ Combined ISBN No.978-81-907729-7-6 विवरण एहि पृष्ठपर नीचाँमे आ प्रकाशकक साइट http://www.shruti-publication.com/ पर । महत्त्वपूर्ण सूचना (२):सूचना: विदेहक मैथिली-अंग्रेजी आ अंग्रेजी मैथिली कोष (इंटरनेटपर पहिल बेर सर्च-डिक्शनरी) एम.एस. एस.क्यू.एल. सर्वर आधारित -Based on ms-sql server Maithili-English and English-Maithili Dictionary. विदेहक भाषापाक- रचनालेखन स्तंभमे। कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक- गजेन्द्र ठाकुर गजेन्द्र ठाकुरक निबन्ध-प्रबन्ध-समीक्षा, उपन्यास (सहस्रबाढ़नि) , पद्य-संग्रह (सहस्राब्दीक चौपड़पर), कथा-गल्प (गल्प गुच्छ), नाटक(संकर्षण), महाकाव्य (त्वञ्चाहञ्च आ असञ्जाति मन) आ बालमंडली-किशोरजगत विदेहमे संपूर्ण ई-प्रकाशनक बाद प्रिंट फॉर्ममे। कुरुक्षेत्रम्–अन्तर्मनक, खण्ड-१ सँ ७ Ist edition 2009 of Gajendra Thakur’s KuruKshetram-Antarmanak (Vol. I to VII)- essay-paper-criticism, novel, poems, story, play, epics and Children-grown-ups literature in single binding: Language:Maithili ६९२ पृष्ठ : मूल्य भा. रु. 100/-(for individual buyers inside india) (add courier charges Rs.50/-per copy for Delhi/NCR and Rs.100/- per copy for outside Delhi)

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Details for purchase available at print-version publishers's site website: http://www.shruti-publication.com/ or you may write to e-mail:shruti.publication@shruti-publication.com विदेह: सदेह : १: २: ३: ४ तिरहुता : देवनागरी "विदेह" क, प्रिंट संस्करण :विदेह-ई-पत्रिका (http://www.videha.co.in/) क चुनल रचना सम्मिलित। विदेह:सदेह:१: २: ३: ४ सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। Details for purchase available at print-version publishers's site http://www.shruti-publication.com  or you may write to shruti.publication@shruti-publication.com २. संदेश- [ विदेह ई-पत्रिका, विदेह:सदेह मिथिलाक्षर आ देवनागरी आ गजेन्द्र ठाकुरक सात खण्डक- निबन्ध-प्रबन्ध-समीक्षा,उपन्यास (सहस्रबाढ़नि) , पद्य-संग्रह (सहस्राब्दीक चौपड़पर), कथा-गल्प (गल्प गुच्छ), नाटक (संकर्षण), महाकाव्य (त्वञ्चाहञ्च आ असञ्जाति मन) आ बाल-मंडली-किशोर जगत- संग्रह कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक मादेँ। ] १.श्री गोविन्द झा- विदेहकेँ तरंगजालपर उतारि विश्वभरिमे मातृभाषा मैथिलीक लहरि जगाओल, खेद जे अपनेक एहि महाभियानमे हम एखन धरि संग नहि दए सकलहुँ। सुनैत छी अपनेकेँ सुझाओ आ रचनात्मक आलोचना प्रिय लगैत अछि तेँ किछु लिखक मोन भेल। हमर सहायता आ सहयोग अपनेकेँ सदा उपलब्ध रहत। २.श्री रमानन्द रेणु- मैथिलीमे ई-पत्रिका पाक्षिक रूपेँ चला कऽ जे अपन मातृभाषाक प्रचार कऽ रहल छी, से धन्यवाद । आगाँ अपनेक समस्त मैथिलीक कार्यक हेतु हम हृदयसँ शुभकामना दऽ रहल छी। ३.श्री विद्यानाथ झा "विदित"- संचार आ प्रौद्योगिकीक एहि प्रतिस्पर्धी ग्लोबल युगमे अपन महिमामय "विदेह"केँ अपना देहमे प्रकट देखि जतबा प्रसन्नता आ संतोष भेल, तकरा कोनो उपलब्ध "मीटर"सँ नहि नापल जा सकैछ? ..एकर ऐतिहासिक मूल्यांकन आ सांस्कृतिक प्रतिफलन एहि शताब्दीक अंत धरि लोकक नजरिमे आश्चर्यजनक रूपसँ प्रकट हैत। ४. प्रो. उदय नारायण सिंह "नचिकेता"- जे काज अहाँ कए रहल छी तकर चरचा एक दिन मैथिली भाषाक इतिहासमे होएत। आनन्द भए रहल अछि, ई जानि कए जे एतेक गोट मैथिल "विदेह" ई जर्नलकेँ पढ़ि रहल छथि।...विदेहक चालीसम अंक पुरबाक लेल अभिनन्दन। ५. डॉ. गंगेश गुंजन- एहि विदेह-कर्ममे लागि रहल अहाँक सम्वेदनशील मन, मैथिलीक प्रति समर्पित मेहनतिक अमृत रंग, इतिहास मे एक टा विशिष्ट फराक अध्याय आरंभ करत, हमरा विश्वास अछि। अशेष शुभकामना आ बधाइक सङ्ग, सस्नेह...अहाँक पोथी कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक प्रथम दृष्टया बहुत भव्य तथा उपयोगी बुझाइछ। मैथिलीमे तँ अपना स्वरूपक प्रायः ई पहिले एहन  भव्य अवतारक पोथी थिक। हर्षपूर्ण हमर हार्दिक बधाई स्वीकार करी। ६. श्री रामाश्रय झा "रामरंग"(आब स्वर्गीय)- "अपना" मिथिलासँ संबंधित...विषय वस्तुसँ अवगत भेलहुँ।...शेष सभ कुशल अछि। ७. श्री ब्रजेन्द्र त्रिपाठी- साहित्य अकादमी- इंटरनेट पर प्रथम मैथिली पाक्षिक पत्रिका "विदेह" केर लेल बधाई आ शुभकामना स्वीकार करू। ८. श्री प्रफुल्लकुमार सिंह "मौन"- प्रथम मैथिली पाक्षिक पत्रिका "विदेह" क प्रकाशनक समाचार जानि कनेक चकित मुदा बेसी आह्लादित भेलहुँ। कालचक्रकेँ पकड़ि जाहि दूरदृष्टिक परिचय देलहुँ, ओहि लेल हमर मंगलकामना। ९.डॉ. शिवप्रसाद यादव- ई जानि अपार हर्ष भए रहल अछि, जे नव सूचना-क्रान्तिक क्षेत्रमे मैथिली पत्रकारिताकेँ प्रवेश दिअएबाक साहसिक कदम उठाओल अछि। पत्रकारितामे एहि प्रकारक नव प्रयोगक हम स्वागत करैत छी, संगहि "विदेह"क सफलताक शुभकामना। १०. श्री आद्याचरण झा- कोनो पत्र-पत्रिकाक प्रकाशन- ताहूमे मैथिली पत्रिकाक प्रकाशनमे के कतेक सहयोग करताह- ई तऽ भविष्य कहत। ई हमर ८८ वर्षमे ७५ वर्षक अनुभव रहल। एतेक पैघ महान यज्ञमे हमर श्रद्धापूर्ण आहुति प्राप्त होयत- यावत ठीक-ठाक छी/ रहब। ११. श्री विजय ठाकुर- मिशिगन विश्वविद्यालय- "विदेह" पत्रिकाक अंक देखलहुँ, सम्पूर्ण टीम बधाईक पात्र अछि। पत्रिकाक मंगल भविष्य हेतु हमर शुभकामना स्वीकार कएल जाओ। १२. श्री सुभाषचन्द्र यादव- ई-पत्रिका "विदेह" क बारेमे जानि प्रसन्नता भेल। ’विदेह’ निरन्तर पल्लवित-पुष्पित हो आ चतुर्दिक अपन सुगंध पसारय से कामना अछि। १३. श्री मैथिलीपुत्र प्रदीप- ई-पत्रिका "विदेह" केर सफलताक भगवतीसँ कामना। हमर पूर्ण सहयोग रहत। १४. डॉ. श्री भीमनाथ झा- "विदेह" इन्टरनेट पर अछि तेँ "विदेह" नाम उचित आर कतेक रूपेँ एकर विवरण भए सकैत अछि। आइ-काल्हि मोनमे उद्वेग रहैत अछि, मुदा शीघ्र पूर्ण सहयोग देब।कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक देखि अति प्रसन्नता भेल। मैथिलीक लेल ई घटना छी। १५. श्री रामभरोस कापड़ि "भ्रमर"- जनकपुरधाम- "विदेह" ऑनलाइन देखि रहल छी। मैथिलीकेँ अन्तर्राष्ट्रीय जगतमे पहुँचेलहुँ तकरा लेल हार्दिक बधाई। मिथिला रत्न सभक संकलन अपूर्व। नेपालोक सहयोग भेटत, से विश्वास करी। १६. श्री राजनन्दन लालदास- "विदेह" ई-पत्रिकाक माध्यमसँ बड़ नीक काज कए रहल छी, नातिक अहिठाम देखलहुँ। एकर वार्षिक अ‍ंक जखन प्रिं‍ट निकालब तँ हमरा पठायब। कलकत्तामे बहुत गोटेकेँ हम साइटक पता लिखाए देने छियन्हि। मोन तँ होइत अछि जे दिल्ली आबि कए आशीर्वाद दैतहुँ, मुदा उमर आब बेशी भए गेल। शुभकामना देश-विदेशक मैथिलकेँ जोड़बाक लेल।.. उत्कृष्ट प्रकाशन कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक लेल बधाइ। अद्भुत काज कएल अछि, नीक प्रस्तुति अछि सात खण्डमे।  मुदा अहाँक सेवा आ से निःस्वार्थ तखन बूझल जाइत जँ अहाँ द्वारा प्रकाशित पोथी सभपर दाम लिखल नहि रहितैक। ओहिना सभकेँ विलहि देल जइतैक। (स्पष्टीकरण-  श्रीमान्, अहाँक सूचनार्थ विदेह द्वारा ई-प्रकाशित कएल सभटा सामग्री आर्काइवमे https://sites.google.com/a/videha.com/videha-pothi/ पर बिना मूल्यक डाउनलोड लेल उपलब्ध छै आ भविष्यमे सेहो रहतैक। एहि आर्काइवकेँ जे कियो प्रकाशक अनुमति लऽ कऽ प्रिंट रूपमे प्रकाशित कएने छथि आ तकर ओ दाम रखने छथि ताहिपर हमर कोनो नियंत्रण नहि अछि।- गजेन्द्र ठाकुर)...   अहाँक प्रति अशेष शुभकामनाक संग। १७. डॉ. प्रेमशंकर सिंह- अहाँ मैथिलीमे इंटरनेटपर पहिल पत्रिका "विदेह" प्रकाशित कए अपन अद्भुत मातृभाषानुरागक परिचय देल अछि, अहाँक निःस्वार्थ मातृभाषानुरागसँ प्रेरित छी, एकर निमित्त जे हमर सेवाक प्रयोजन हो, तँ सूचित करी। इंटरनेटपर आद्योपांत पत्रिका देखल, मन प्रफुल्लित भऽ गेल। १८.श्रीमती शेफालिका वर्मा- विदेह ई-पत्रिका देखि मोन उल्लाससँ भरि गेल। विज्ञान कतेक प्रगति कऽ रहल अछि...अहाँ सभ अनन्त आकाशकेँ भेदि दियौ, समस्त विस्तारक रहस्यकेँ तार-तार कऽ दियौक...। अपनेक अद्भुत पुस्तक कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक विषयवस्तुक दृष्टिसँ गागरमे सागर अछि। बधाई। १९.श्री हेतुकर झा, पटना-जाहि समर्पण भावसँ अपने मिथिला-मैथिलीक सेवामे तत्पर छी से स्तुत्य अछि। देशक राजधानीसँ भय रहल मैथिलीक शंखनाद मिथिलाक गाम-गाममे मैथिली चेतनाक विकास अवश्य करत। २०. श्री योगानन्द झा, कबिलपुर, लहेरियासराय- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पोथीकेँ निकटसँ देखबाक अवसर भेटल अछि आ मैथिली जगतक एकटा उद्भट ओ समसामयिक दृष्टिसम्पन्न हस्ताक्षरक कलमबन्द परिचयसँ आह्लादित छी। "विदेह"क देवनागरी सँस्करण पटनामे रु. 80/- मे उपलब्ध भऽ सकल जे विभिन्न लेखक लोकनिक छायाचित्र, परिचय पत्रक ओ रचनावलीक सम्यक प्रकाशनसँ ऐतिहासिक कहल जा सकैछ। २१. श्री किशोरीकान्त मिश्र- कोलकाता- जय मैथिली, विदेहमे बहुत रास कविता, कथा, रिपोर्ट आदिक सचित्र संग्रह देखि आ आर अधिक प्रसन्नता मिथिलाक्षर देखि- बधाई स्वीकार कएल जाओ। २२.श्री जीवकान्त- विदेहक मुद्रित अंक पढ़ल- अद्भुत मेहनति। चाबस-चाबस। किछु समालोचना मरखाह..मुदा सत्य। २३. श्री भालचन्द्र झा- अपनेक कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक देखि बुझाएल जेना हम अपने छपलहुँ अछि। एकर विशालकाय आकृति अपनेक सर्वसमावेशताक परिचायक अछि। अपनेक रचना सामर्थ्यमे उत्तरोत्तर वृद्धि हो, एहि शुभकामनाक संग हार्दिक बधाई। २४.श्रीमती डॉ नीता झा- अहाँक कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़लहुँ। ज्योतिरीश्वर शब्दावली, कृषि मत्स्य शब्दावली आ सीत बसन्त आ सभ कथा, कविता, उपन्यास, बाल-किशोर साहित्य सभ उत्तम छल। मैथिलीक उत्तरोत्तर विकासक लक्ष्य दृष्टिगोचर होइत अछि। २५.श्री मायानन्द मिश्र- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक मे हमर उपन्यास स्त्रीधनक जे विरोध कएल गेल अछि तकर हम विरोध करैत छी।... कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पोथीक लेल शुभकामना।(श्रीमान् समालोचनाकेँ विरोधक रूपमे नहि लेल जाए।-गजेन्द्र ठाकुर) २६.श्री महेन्द्र हजारी- सम्पादक श्रीमिथिला- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़ि मोन हर्षित भऽ गेल..एखन पूरा पढ़यमे बहुत समय लागत, मुदा जतेक पढ़लहुँ से आह्लादित कएलक। २७.श्री केदारनाथ चौधरी- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक अद्भुत लागल, मैथिली साहित्य लेल ई पोथी एकटा प्रतिमान बनत। २८.श्री सत्यानन्द पाठक- विदेहक हम नियमित पाठक छी। ओकर स्वरूपक प्रशंसक छलहुँ। एम्हर अहाँक लिखल - कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक देखलहुँ। मोन आह्लादित भऽ उठल। कोनो रचना तरा-उपरी। २९.श्रीमती रमा झा-सम्पादक मिथिला दर्पण। कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक प्रिंट फॉर्म पढ़ि आ एकर गुणवत्ता देखि मोन प्रसन्न भऽ गेल, अद्भुत शब्द एकरा लेल प्रयुक्त कऽ रहल छी। विदेहक उत्तरोत्तर प्रगतिक शुभकामना। ३०.श्री नरेन्द्र झा, पटना- विदेह नियमित देखैत रहैत छी। मैथिली लेल अद्भुत काज कऽ रहल छी। ३१.श्री रामलोचन ठाकुर- कोलकाता- मिथिलाक्षर विदेह देखि मोन प्रसन्नतासँ भरि उठल, अंकक विशाल परिदृश्य आस्वस्तकारी अछि। ३२.श्री तारानन्द वियोगी- विदेह आ कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक देखि चकबिदोर लागि गेल। आश्चर्य। शुभकामना आ बधाई। ३३.श्रीमती प्रेमलता मिश्र “प्रेम”- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़लहुँ। सभ रचना उच्चकोटिक लागल। बधाई। ३४.श्री कीर्तिनारायण मिश्र- बेगूसराय- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक बड्ड नीक लागल, आगांक सभ काज लेल बधाई। ३५.श्री महाप्रकाश-सहरसा- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक नीक लागल, विशालकाय संगहि उत्तमकोटिक। ३६.श्री अग्निपुष्प- मिथिलाक्षर आ देवाक्षर विदेह पढ़ल..ई प्रथम तँ अछि एकरा प्रशंसामे मुदा हम एकरा दुस्साहसिक कहब। मिथिला चित्रकलाक स्तम्भकेँ मुदा अगिला अंकमे आर विस्तृत बनाऊ। ३७.श्री मंजर सुलेमान-दरभंगा- विदेहक जतेक प्रशंसा कएल जाए कम होएत। सभ चीज उत्तम। ३८.श्रीमती प्रोफेसर वीणा ठाकुर- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक उत्तम, पठनीय, विचारनीय। जे क्यो देखैत छथि पोथी प्राप्त करबाक उपाय पुछैत छथि। शुभकामना। ३९.श्री छत्रानन्द सिंह झा- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़लहुँ, बड्ड नीक सभ तरहेँ। ४०.श्री ताराकान्त झा- सम्पादक मैथिली दैनिक मिथिला समाद- विदेह तँ कन्टेन्ट प्रोवाइडरक काज कऽ रहल अछि। कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक अद्भुत लागल। ४१.डॉ रवीन्द्र कुमार चौधरी- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक बहुत नीक, बहुत मेहनतिक परिणाम। बधाई। ४२.श्री अमरनाथ- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक आ विदेह दुनू स्मरणीय घटना अछि, मैथिली साहित्य मध्य। ४३.श्री पंचानन मिश्र- विदेहक वैविध्य आ निरन्तरता प्रभावित करैत अछि, शुभकामना। ४४.श्री केदार कानन- कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक लेल अनेक धन्यवाद, शुभकामना आ बधाइ स्वीकार करी। आ नचिकेताक भूमिका पढ़लहुँ। शुरूमे तँ लागल जेना कोनो उपन्यास अहाँ द्वारा सृजित भेल अछि मुदा पोथी उनटौला पर ज्ञात भेल जे एहिमे तँ सभ विधा समाहित अछि। ४५.श्री धनाकर ठाकुर- अहाँ नीक काज कऽ रहल छी। फोटो गैलरीमे चित्र एहि शताब्दीक जन्मतिथिक अनुसार रहैत तऽ नीक। ४६.श्री आशीष झा- अहाँक पुस्तकक संबंधमे एतबा लिखबा सँ अपना कए नहि रोकि सकलहुँ जे ई किताब मात्र किताब नहि थीक, ई एकटा उम्मीद छी जे मैथिली अहाँ सन पुत्रक सेवा सँ निरंतर समृद्ध होइत चिरजीवन कए प्राप्त करत। ४७.श्री शम्भु कुमार सिंह- विदेहक तत्परता आ क्रियाशीलता देखि आह्लादित भऽ रहल छी। निश्चितरूपेण कहल जा सकैछ जे समकालीन मैथिली पत्रिकाक इतिहासमे विदेहक नाम स्वर्णाक्षरमे लिखल जाएत। ओहि कुरुक्षेत्रक घटना सभ तँ अठारहे दिनमे खतम भऽ गेल रहए मुदा अहाँक कुरुक्षेत्रम् तँ अशेष अछि। ४८.डॉ. अजीत मिश्र- अपनेक प्रयासक कतबो प्रश‍ंसा कएल जाए कमे होएतैक। मैथिली साहित्यमे अहाँ द्वारा कएल गेल काज युग-युगान्तर धरि पूजनीय रहत। ४९.श्री बीरेन्द्र मल्लिक- अहाँक कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक आ विदेह:सदेह पढ़ि अति प्रसन्नता भेल। अहाँक स्वास्थ्य ठीक रहए आ उत्साह बनल रहए से कामना। ५०.श्री कुमार राधारमण- अहाँक दिशा-निर्देशमे विदेह पहिल मैथिली ई-जर्नल देखि अति प्रसन्नता भेल। हमर शुभकामना। ५१.श्री फूलचन्द्र झा प्रवीण-विदेह:सदेह पढ़ने रही मुदा कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक देखि बढ़ाई देबा लेल बाध्य भऽ गेलहुँ। आब विश्वास भऽ गेल जे मैथिली नहि मरत। अशेष शुभकामना। ५२.श्री विभूति आनन्द- विदेह:सदेह देखि, ओकर विस्तार देखि अति प्रसन्नता भेल। ५३.श्री मानेश्वर मनुज-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक एकर भव्यता देखि अति प्रसन्नता भेल, एतेक विशाल ग्रन्थ मैथिलीमे आइ धरि नहि देखने रही। एहिना भविष्यमे काज करैत रही, शुभकामना। ५४.श्री विद्यानन्द झा- आइ.आइ.एम.कोलकाता- कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक विस्तार, छपाईक संग गुणवत्ता देखि अति प्रसन्नता भेल। अहाँक अनेक धन्यवाद; कतेक बरखसँ हम नेयारैत छलहुँ जे सभ पैघ शहरमे मैथिली लाइब्रेरीक स्थापना होअए, अहाँ ओकरा वेबपर कऽ रहल छी, अनेक धन्यवाद। ५५.श्री अरविन्द ठाकुर-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक मैथिली साहित्यमे कएल गेल एहि तरहक पहिल प्रयोग अछि, शुभकामना। ५६.श्री कुमार पवन-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक पढ़ि रहल छी। किछु लघुकथा पढ़ल अछि, बहुत मार्मिक छल। ५७. श्री प्रदीप बिहारी-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक देखल, बधाई। ५८.डॉ मणिकान्त ठाकुर-कैलिफोर्निया- अपन विलक्षण नियमित सेवासँ हमरा लोकनिक हृदयमे विदेह सदेह भऽ गेल अछि। ५९.श्री धीरेन्द्र प्रेमर्षि- अहाँक समस्त प्रयास सराहनीय। दुख होइत अछि जखन अहाँक प्रयासमे अपेक्षित सहयोग नहि कऽ पबैत छी। ६०.श्री देवशंकर नवीन- विदेहक निरन्तरता आ विशाल स्वरूप- विशाल पाठक वर्ग, एकरा ऐतिहासिक बनबैत अछि। ६१.श्री मोहन भारद्वाज- अहाँक समस्त कार्य देखल, बहुत नीक। एखन किछु परेशानीमे छी, मुदा शीघ्र सहयोग देब। ६२.श्री फजलुर रहमान हाशमी-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक मे एतेक मेहनतक लेल अहाँ साधुवादक अधिकारी छी। ६३.श्री लक्ष्मण झा "सागर"- मैथिलीमे चमत्कारिक रूपेँ अहाँक प्रवेश आह्लादकारी अछि।..अहाँकेँ एखन आर..दूर..बहुत दूरधरि जेबाक अछि। स्वस्थ आ प्रसन्न रही। ६४.श्री जगदीश प्रसाद मंडल-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक पढ़लहुँ । कथा सभ आ उपन्यास सहस्रबाढ़नि पूर्णरूपेँ पढ़ि गेल छी। गाम-घरक भौगोलिक विवरणक जे सूक्ष्म वर्णन सहस्रबाढ़निमे अछि, से चकित कएलक, एहि संग्रहक कथा-उपन्यास मैथिली लेखनमे विविधता अनलक अछि। समालोचना शास्त्रमे अहाँक दृष्टि वैयक्तिक नहि वरन् सामाजिक आ कल्याणकारी अछि, से प्रशंसनीय। ६५.श्री अशोक झा-अध्यक्ष मिथिला विकास परिषद- कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक लेल बधाई आ आगाँ लेल शुभकामना। ६६.श्री ठाकुर प्रसाद मुर्मु- अद्भुत प्रयास। धन्यवादक संग प्रार्थना जे अपन माटि-पानिकेँ ध्यानमे राखि अंकक समायोजन कएल जाए। नव अंक धरि प्रयास सराहनीय। विदेहकेँ बहुत-बहुत धन्यवाद जे एहेन सुन्दर-सुन्दर सचार (आलेख) लगा रहल छथि। सभटा ग्रहणीय- पठनीय। ६७.बुद्धिनाथ मिश्र- प्रिय गजेन्द्र जी,अहाँक सम्पादन मे प्रकाशित ‘विदेह’आ ‘कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक’ विलक्षण पत्रिका आ विलक्षण पोथी! की नहि अछि अहाँक सम्पादनमे? एहि प्रयत्न सँ मैथिली क विकास होयत,निस्संदेह। ६८.श्री बृखेश चन्द्र लाल- गजेन्द्रजी, अपनेक पुस्तक कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक पढ़ि मोन गदगद भय गेल , हृदयसँ अनुगृहित छी । हार्दिक शुभकामना । ६९.श्री परमेश्वर कापड़ि - श्री गजेन्द्र जी । कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक पढ़ि गदगद आ नेहाल भेलहुँ। ७०.श्री रवीन्द्रनाथ ठाकुर- विदेह पढ़ैत रहैत छी। धीरेन्द्र प्रेमर्षिक मैथिली गजलपर आलेख पढ़लहुँ। मैथिली गजल कत्तऽ सँ कत्तऽ चलि गेलैक आ ओ अपन आलेखमे मात्र अपन जानल-पहिचानल लोकक चर्च कएने छथि। जेना मैथिलीमे मठक परम्परा रहल अछि। (स्पष्टीकरण- श्रीमान्, प्रेमर्षि जी ओहि आलेखमे ई स्पष्ट लिखने छथि जे किनको नाम जे छुटि गेल छन्हि तँ से मात्र आलेखक लेखकक जानकारी नहि रहबाक द्वारे, एहिमे आन कोनो कारण नहि देखल जाय। अहाँसँ एहि विषयपर विस्तृत आलेख सादर आमंत्रित अछि।-सम्पादक) ७१.श्री मंत्रेश्वर झा- विदेह पढ़ल आ संगहि अहाँक मैगनम ओपस कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक सेहो, अति उत्तम। मैथिलीक लेल कएल जा रहल अहाँक समस्त कार्य अतुलनीय अछि। ७२. श्री हरेकृष्ण झा- कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक मैथिलीमे अपन तरहक एकमात्र ग्रन्थ अछि, एहिमे लेखकक समग्र दृष्टि आ रचना कौशल देखबामे आएल जे लेखकक फील्डवर्कसँ जुड़ल रहबाक कारणसँ अछि। ७३.श्री सुकान्त सोम- कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक मे  समाजक इतिहास आ वर्तमानसँ अहाँक जुड़ाव बड्ड नीक लागल, अहाँ एहि क्षेत्रमे आर आगाँ काज करब से आशा अछि। ७४.प्रोफेसर मदन मिश्र- कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक सन किताब मैथिलीमे पहिले अछि आ एतेक विशाल संग्रहपर शोध कएल जा सकैत अछि। भविष्यक लेल शुभकामना। ७५.प्रोफेसर कमला चौधरी- मैथिलीमे कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक सन पोथी आबए जे गुण आ रूप दुनूमे निस्सन होअए, से बहुत दिनसँ आकांक्षा छल, ओ आब जा कऽ पूर्ण भेल। पोथी एक हाथसँ दोसर हाथ घुमि रहल अछि, एहिना आगाँ सेहो अहाँसँ आशा अछि। ७६.श्री उदय चन्द्र झा "विनोद": गजेन्द्रजी, अहाँ जतेक काज कएलहुँ अछि से मैथिलीमे आइ धरि कियो नहि कएने छल। शुभकामना। अहाँकेँ एखन बहुत काज आर करबाक अछि। ७७.श्री कृष्ण कुमार कश्यप: गजेन्द्र ठाकुरजी, अहाँसँ भेँट एकटा स्मरणीय क्षण बनि गेल। अहाँ जतेक काज एहि बएसमे कऽ गेल छी ताहिसँ हजार गुणा आर बेशीक आशा अछि। ७८.श्री मणिकान्त दास: अहाँक मैथिलीक कार्यक प्रशंसा लेल शब्द नहि भेटैत अछि। अहाँक कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक सम्पूर्ण रूपेँ पढ़ि गेलहुँ। त्वञ्चाहञ्च बड्ड नीक लागल। ७९. श्री हीरेन्द्र कुमार झा- विदेह ई-पत्रिकाक सभ अंक ई-पत्रसँ भेटैत रहैत अछि। मैथिलीक ई-पत्रिका छैक एहि बातक गर्व होइत अछि। अहाँ आ अहाँक सभ सहयोगीकेँ हार्दिक शुभकामना। विदेह मैथिली साहित्य आन्दोलन (c)२००४-१२. सर्वाधिकार लेखकाधीन आ जतए लेखकक नाम नहि अछि ततए संपादकाधीन। विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। सह-सम्पादक: उमेश मंडल। सहायक सम्पादक: शिव कुमार झा आ मुन्नाजी (मनोज कुमार कर्ण)। भाषा-सम्पादन: नागेन्द्र कुमार झा आ पञ्जीकार विद्यानन्द झा। कला-सम्पादन: वनीता कुमारी आ रश्मि रेखा सिन्हा। सम्पादक-शोध-अन्वेषण: डॉ. जया वर्मा आ डॉ. राजीव कुमार वर्मा। सम्पादक- नाटक-रंगमंच-चलचित्र- बेचन ठाकुर। सम्पादक- सूचना-सम्पर्क-समाद- पूनम मंडल आ प्रियंका झा। सम्पादक- अनुवाद विभाग- विनीत उत्पल। रचनाकार अपन मौलिक आ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि) ggajendra@videha.com केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx, .rtf वा .txt फॉर्मेटमे पठा सकैत छथि। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेताह, से आशा करैत छी। रचनाक अंतमे टाइप रहय, जे ई रचना मौलिक अछि, आ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। मेल प्राप्त होयबाक बाद यथासंभव शीघ्र ( सात दिनक भीतर) एकर प्रकाशनक अंकक सूचना देल जायत। ’विदेह' प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका अछि आ एहिमे मैथिली, संस्कृत आ अंग्रेजीमे मिथिला आ मैथिलीसँ संबंधित रचना प्रकाशित कएल जाइत अछि। एहि ई पत्रिकाकेँ श्रीमति लक्ष्मी ठाकुर द्वारा मासक ०१ आ १५ तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि। (c) 2004-12 सर्वाधिकार सुरक्षित। विदेहमे प्रकाशित सभटा रचना आ आर्काइवक सर्वाधिकार रचनाकार आ संग्रहकर्त्ताक लगमे छन्हि। रचनाक अनुवाद आ पुनः प्रकाशन किंवा आर्काइवक उपयोगक अधिकार किनबाक हेतु ggajendra@videha.co.in पर संपर्क करू। एहि साइटकेँ प्रीति झा ठाकुर, मधूलिका चौधरी आ रश्मि प्रिया द्वारा डिजाइन कएल गेल। सिद्धिरस्तु वि दे ह विदेह Videha বিদেহ  www.videha.co.in www.videha.com विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका Videha Ist Maithili Fortnightly ejournal  विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका 'विदेह' १०८ म अंक १५ जून २०१२ (वर्ष ५ मास ५४ अंक १०८) मानुषीमिह संस्कृताम् ISSN 2229-547X VIDEHA वि दे ह विदेह Videha বিদেহ  www.videha.co.in www.videha.com विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका Videha Ist Maithili Fortnightly ejournal  विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका 'विदेह' १०८ म अंक १५ जून २०१२ (वर्ष ५ मास ५४ अंक १०८) मानुषीमिह संस्कृताम् ISSN 2229-547X VIDEHA

BRAT Ey, @ 3628; yan | a j pr e i | Wee — दर पे दो | . ce

TAGORE Lirerature AWARDS ae 2077 Winner Profiles MMS. SHEELA KOLAMBKAR ‘Awarded for Geera Language - Konkani Gonre - Short Stories Ms. Sheela Kolambkar is a renowned writer, who has written several short stories, poems and essays which have been translated in various languages such 9s English, Portuguese, French, Marathi, Hindi, Telugu and Malayalam, She has been bestowed with Sahitya Akademi Award for 'Bhuim-Chafim’ and *Bhangarachen Sukne’ in the year 997 and 2007 respectively. Ms Kolambker's: ‘collection of short stories: is an eloquent display of the agonies faced by women in @ male dominated society. Her work demonstrates her prowess in describing the finer nuances of a woman's relationships with the men who ‘come in her life —a child, husband, friends, and even acquaintances snd well-wishers. As one of the first femaie Konkani writers; Ms Kolambkar's path breaking writing has contributed immensely to the shaping of the Konkani literature. Geera collection covers literary work of the author spanning aver 25 years. MR. K. KUNJAMOHAN SINGH Awarded for Eina Kenge Kenba Natte Language — Manipuri Gonre - Short Stories. ‘Mr. Kunjamohan's book containing हैं short stories and spread over 08 pages, displays his mastery in the art of storytelling. In almost all the stories featured in the book, the contemporary situations of Manipur are beautifully portrayed in 8 language familiar to common people. N. Kunjamonan Singh is widely known 28.2 writar af short stories and he has algo translated from Bangla into Manipuri, Rabindranath Tagore's famous novel ‘Gore’. mr uAGbjsid pita hawt’ Awarded for Gaamak Jing? Language ~ Maithill Genre — Short Stories Mr, Jagdish Prasad Mandal is a well Known wiiter with @ Masters in Arts. His Work spans genres of novels, short storles, seed stories, long slories or posms thet present vivid description of life in Mithils initiating resurgence in Maithili literature. First published in 2009, Gaamak Jingi is & collection of Maithili ‘short stories which depict different facets of village life. The stories here represent the joys and sorraws, pleasures and pain, agony and ecstasies of the life of people of these villages. The way these stories. capture the nuances of language of men and women of different castes and classes in Mithilanchal makes this collection worthy of this award. Some of his other famous works Includes novels such 25. Maulail Gachhak Phool, Jingik Jeet, and Uthan Patan, anthology of poems like Indradhanushi Aakash, Gitanjali and Raiit Din & plays such as Compromise and Jhameliya Biyah,