388 389 ISSN 2229-547X VIDEHA 'विदेह' १०९ म अंक ०१ जुलाइ २०१२ (वर्ष ५ मास ५५ अंक १०९) वि दे ह विदेह Videha বিদেহ http://www.videha.co.in विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका Videha Ist Maithili Fortnightly ejournal नव अंक देखबाक लेल पृष्ठ सभकेँ रिफ्रेश कए देखू। Always refresh the pages for viewing new issue of VIDEHA. Read in your own script Roman(Eng)Gujarati Bangla Oriya Gurmukhi Telugu Tamil Kannada Malayalam Hindi ऐ अंकमे अछि:- १. संपादकीय संदेश २. गद्य २.१.जगदीश प्रसाद मण्डल-लघुकथा-परदेशी बेटी २.२.१.सुजीत कुमार झा-लघुकथा-निष्ठा कि देखाबा २.३.दुर्गानन्द मण्डल-लघुकथा-कुकर्मा २.४.आशीष अनचिन्हार-आधुनिकताक समस्या ( आलोचना ) २.५.कामिनी कामायनी-महानगरमे सुनीता २.६.नारायण झा- रहुआ संग्राममे गृष्मकालीन शैक्षिक शिविर सह टैगोर पुरस्कारसँ सम्मानित श्री जगदीश प्रसाद मण्डलक सम्मान समारोह- २०१२ २.७.दुर्गानन्द मण्डल-समीक्षा- जीवन-संघर्ष २.८.१.डॉ. कैलाश कुमार मिश्र- लघुकथा- चन्दा २. उमेश मण्डल- मैथिली युवा रचना-धर्मिता :: परंपरा परिवर्त्तन आ भविष्य ३. पद्य ३.१.जवाहर लाल काश्यप ३.२.डॉ॰ शशिधर कुमर “विदेह” ३.३.१.मुन्नी कामत २.जगदीश चन्द्र ठाकुर अनिल ३.४.रामदेव प्रसाद मण्डल झारुदार ३.५.नारायण झा ३.६.चंदन कुमार झा ३.७.जगदानन्द झा 'मनु' ३.८.दमन कुमार झा ४. मिथिला कला-संगीत १. मोना पाण्डेय २.ज्योति झा चौधरी३.राजनाथ मिश्र (चित्रमय मिथिला) ४. उमेश मण्डल (मिथिलाक वनस्पति/ मिथिलाक जीव-जन्तु/ मिथिलाक जिनगी) बालानां कृते-1.जगदीश प्रसाद मण्डल 2.डॉ॰ शशिधर कुमर भाषापाक रचना-लेखन -[मानक मैथिली], [विदेहक मैथिली-अंग्रेजी आ अंग्रेजी मैथिली कोष (इंटरनेटपर पहिल बेर सर्च-डिक्शनरी) एम.एस. एस.क्यू.एल. सर्वर आधारित -Based on ms-sql server Maithili-English and English-Maithili Dictionary.] विदेह ई-पत्रिकाक सभटा पुरान अंक ( ब्रेल, तिरहुता आ देवनागरी मे ) पी.डी.एफ. डाउनलोडक लेल नीचाँक लिंकपर उपलब्ध अछि। All the old issues of Videha e journal ( in Braille, Tirhuta and Devanagari versions ) are available for pdf download at the following link. विदेह ई-पत्रिकाक सभटा पुरान अंक ब्रेल, तिरहुता आ देवनागरी रूपमे Videha e journal's all old issues in Braille Tirhuta and Devanagari versions विदेह ई-पत्रिकाक पहिल ५० अंक
विदेह ई-पत्रिकाक ५०म सँ आगाँक अंक ↑ विदेह आर.एस.एस.फीड एनीमेटरकेँ अपन साइट/ ब्लॉगपर लगाऊ। ब्लॉग "लेआउट" पर "एड गाडजेट" मे "फीड" सेलेक्ट कए "फीड यू.आर.एल." मे http://www.videha.co.in/index.xml टाइप केलासँ सेहो विदेह फीड प्राप्त कए सकैत छी। गूगल रीडरमे पढ़बा लेल http://reader.google.com/ पर जा कऽ Add a Subscription बटन क्लिक करू आ खाली स्थानमे http://www.videha.co.in/index.xml पेस्ट करू आ Add बटन दबाउ। Join official Videha facebook group. Join Videha googlegroups विदेह रेडियो:मैथिली कथा-कविता आदिक पहिल पोडकास्ट साइट http://videha123radio.wordpress.com/ मैथिली देवनागरी वा मिथिलाक्षरमे नहि देखि/ लिखि पाबि रहल छी, (cannot see/write Maithili in Devanagari/ Mithilakshara follow links below or contact at ggajendra@videha.com) तँ एहि हेतु नीचाँक लिंक सभ पर जाउ। संगहि विदेहक स्तंभ मैथिली भाषापाक/ रचना लेखनक नव-पुरान अंक पढ़ू। http://devanaagarii.net/ http://kaulonline.com/uninagari/ (एतए बॉक्समे ऑनलाइन देवनागरी टाइप करू, बॉक्ससँ कॉपी करू आ वर्ड डॉक्युमेन्टमे पेस्ट कए वर्ड फाइलकेँ सेव करू। विशेष जानकारीक लेल ggajendra@videha.com पर सम्पर्क करू।)(Use Firefox 4.0 (from WWW.MOZILLA.COM )/ Opera/ Safari/ Internet Explorer 8.0/ Flock 2.0/ Google Chrome for best view of 'Videha' Maithili e-journal at http://www.videha.co.in/ .) Go to the link below for download of old issues of VIDEHA Maithili e magazine in .pdf format and Maithili Audio/ Video/ Book/ paintings/ photo files. विदेहक पुरान अंक आ ऑडियो/ वीडियो/ पोथी/ चित्रकला/ फोटो सभक फाइल सभ (उच्चारण, बड़ सुख सार आ दूर्वाक्षत मंत्र सहित) डाउनलोड करबाक हेतु नीचाँक लिंक पर जाउ। VIDEHA ARCHIVE विदेह आर्काइव भारतीय डाक विभाग द्वारा जारी कवि, नाटककार आ धर्मशास्त्री विद्यापतिक स्टाम्प। भारत आ नेपालक माटिमे पसरल मिथिलाक धरती प्राचीन कालहिसँ महान पुरुष ओ महिला लोकनिक कर्मभमि रहल अछि। मिथिलाक महान पुरुष ओ महिला लोकनिक चित्र 'मिथिला रत्न' मे देखू। गौरी-शंकरक पालवंश कालक मूर्त्ति, एहिमे मिथिलाक्षरमे (१२०० वर्ष पूर्वक) अभिलेख अंकित अछि। मिथिलाक भारत आ नेपालक माटिमे पसरल एहि तरहक अन्यान्य प्राचीन आ नव स्थापत्य, चित्र, अभिलेख आ मूर्त्तिकलाक़ हेतु देखू 'मिथिलाक खोज' मिथिला, मैथिल आ मैथिलीसँ सम्बन्धित सूचना, सम्पर्क, अन्वेषण संगहि विदेहक सर्च-इंजन आ न्यूज सर्विस आ मिथिला, मैथिल आ मैथिलीसँ सम्बन्धित वेबसाइट सभक समग्र संकलनक लेल देखू "विदेह सूचना संपर्क अन्वेषण" विदेह जालवृत्तक डिसकसन फोरमपर जाउ। "मैथिल आर मिथिला" (मैथिलीक सभसँ लोकप्रिय जालवृत्त) पर जाउ। ऐ बेर मूल पुरस्कार(२०१२) [साहित्य अकादेमी, दिल्ली]क लेल अहाँक नजरिमे कोन मूल मैथिली पोथी उपयुक्त अछि ? Thank you for voting! श्री राजदेव मण्डलक “अम्बरा” (कविता-संग्रह) 12.73% श्री बेचन ठाकुरक “बेटीक अपमान आ छीनरदेवी”(दूटा नाटक) 10.3% श्रीमती आशा मिश्रक “उचाट” (उपन्यास) 6.36% श्रीमती पन्ना झाक “अनुभूति” (कथा संग्रह) 4.85% श्री उदय नारायण सिंह “नचिकेता”क “नो एण्ट्री:मा प्रविश (नाटक) 5.76% श्री सुभाष चन्द्र यादवक “बनैत बिगड़ैत” (कथा-संग्रह) 5.15% श्रीमती वीणा कर्ण- भावनाक अस्थिपंजर (कविता संग्रह) 5.76% श्रीमती शेफालिका वर्माक “किस्त-किस्त जीवन (आत्मकथा) 8.48% श्रीमती विभा रानीक “भाग रौ आ बलचन्दा” (दूटा नाटक) 7.27% श्री महाप्रकाश-संग समय के (कविता संग्रह) 5.45% श्री तारानन्द वियोगी- प्रलय रहस्य (कविता-संग्रह) 5.15% श्री महेन्द्र मलंगियाक “छुतहा घैल” (नाटक) 8.18% श्रीमती नीता झाक “देश-काल” (कथा-संग्रह) 6.06% श्री सियाराम झा "सरस"क थोड़े आगि थोड़े पानि (गजल संग्रह) 6.97% Other: 1.52% ऐ बेर युवा पुरस्कार(२०१२)[साहित्य अकादेमी, दिल्ली]क लेल अहाँक नजरिमे कोन कोन लेखक उपयुक्त छथि ? श्रीमती ज्योति सुनीत चौधरीक “अर्चिस” (कविता संग्रह) 28.67% श्री विनीत उत्पलक “हम पुछैत छी” (कविता संग्रह) 7.69% श्रीमती कामिनीक “समयसँ सम्वाद करैत”, (कविता संग्रह) 6.29% श्री प्रवीण काश्यपक “विषदन्ती वरमाल कालक रति” (कविता संग्रह) 4.9% श्री आशीष अनचिन्हारक "अनचिन्हार आखर"(गजल संग्रह) 18.88% श्री अरुणाभ सौरभक “एतबे टा नहि” (कविता संग्रह) 6.29% श्री दिलीप कुमार झा "लूटन"क जगले रहबै (कविता संग्रह) 7.69% श्री आदि यायावरक “भोथर पेंसिलसँ लिखल” (कथा संग्रह) 5.59% श्री उमेश मण्डलक “निश्तुकी” (कविता संग्रह) 12.59% Other: 1.4% ऐ बेर अनुवाद पुरस्कार (२०१३) [साहित्य अकादेमी, दिल्ली]क लेल अहाँक नजरिमे के उपयुक्त छथि? Thank you for voting! श्री नरेश कुमार विकल "ययाति" (मराठी उपन्यास श्री विष्णु सखाराम खाण्डेकर) 33.33% श्री महेन्द्र नारायण राम "कार्मेलीन" (कोंकणी उपन्यास श्री दामोदर मावजो) 13.98% श्री देवेन्द्र झा "अनुभव"(बांग्ला उपन्यास श्री दिव्येन्दु पालित) 11.83% श्रीमती मेनका मल्लिक "देश आ अन्य कविता सभ" (नेपालीक अनुवाद मूल- रेमिका थापा) 15.05% श्री कृष्ण कुमार कश्यप आ श्रीमती शशिबाला- मैथिली गीतगोविन्द ( जयदेव संस्कृत) 12.9% श्री रामनारायण सिंह "मलाहिन" (श्री तकषी शिवशंकर पिल्लैक मलयाली उपन्यास) 11.83% Other: 1.08% फेलो पुरस्कार-समग्र योगदान २०१२-१३ : समानान्तर साहित्य अकादेमी, दिल्ली Thank you for voting! श्री राजनन्दन लाल दास 53.33% श्री डॉ. अमरेन्द्र 26.67% श्री चन्द्रभानु सिंह 18.67% Other: 1.33% 1.संपादकीय १ १ जे आर्य छथि से भारतक पच्छिम भागसँ मिथिलामे एलाह, आ हुनका सभक एबासँ पूर्व वेदक किछु अंश विद्यमान छल, तेँ ने बहुत रास शब्द जे मैथिलीमे अछि, बहुत रास उच्चारण जे मैथिलीमे अछि ओ वैदिक संस्कृतमे अछि, मुदा लौकिक संस्कृतमे नै अछि। अविद्या, कर्मसिद्धान्त, जन्म आ पुनर्जन्मक आवाजाही आ मोक्ष ई सभ अनार्यसँ आर्यकेँ भेटलै। तेँ ने उपनिषदमे मोक्ष प्राप्तिक मार्ग छै, स्वर्ग प्राप्तिक नै। मोक्ष भेटत कोना? यज्ञ केलासँ? नै, ई भेटत ज्ञानसँ आ मनन-चिन्तन आ समाधिसँ। राजा जनकक संरक्षणमे याज्ञवल्क्य बृहदारण्यक उपनिषदक तिरहुतक अनार्य क्षेत्रमे रचना केलन्हि। वाचस्पति मिश्र सांख्यकारिकाक सन्तावनम सूत्रक व्याख्या करैत कहै छथि जे की ई कहि सकै छी जे अचेतन दूध केर पोषणसँ परु पोसाइए आ अचेतन प्रकृतिक संचालनसँ जीवकेँ मुक्तिक ज्ञान भेटैए? ईश्वर तँ स्वयंमे पूर्ण छथि तँ ओ कोन उद्देश्ये विश्वक सृष्टि करताह आ जीव लेल जँ ओ सृष्टि करताह तँ सृष्टिक बादे तँ जीव बन्हाइए आ सृष्टिसँ पूर्व तँ बन्हेबाक प्रश्ने नै अछि, तखन जीवक प्रति कथीक दया? से प्रकृति द्वारा सृष्टि होइए आ जीव अपन प्रयाससँ अपवर्गक प्राप्ति करै छथि। आ विवेकसँ होइए प्रलय। से ईश्वरवाद नै निरीश्वरवाद अछि वाचस्पतिक व्याख्या। प्रकृति संचालनमे जँ ईश्वर भाग लै छथि तँ ओ चेतन प्रक्रिया हएत जे कोनो उद्देश्येसँ हएत आ तकर कोनो खगता ईश्वरकेँ छन्हिये नै। न्यायसूत्रक रचना केनिहार मिथिलाक गौतम सोलह पदार्थक ज्ञानसँ जीवक निःश्रेयस प्राप्त करबाक चर्च करै छथि, मुदा ऐ सभमे ईश्वरक कतौ चर्च नै अछि जे हुनको द्वारा मुक्ति सम्भव अछि। वैशेषिक सूत्र कहैए जे वेद विद्वान लोकनि द्वारा रचल गेल अछि नै कि ईश्वर द्वारा। कुमारिल भट्ट कहै छथि जे सृष्टिक पूर्व ईश्वरक विषयमे कोनो विश्वसनीय चर्चा असम्भव अछि। २ विद्यापति पुरस्कार कोषक पुरस्कार- मैथिली भाषा, साहित्य, कला संस्कृतिक लेल नेपाल सरकार द्वारा स्थापित नेपालमे सभसँ बड़का राशिक पुरस्कार। विद्यापति पुरस्कार कोषक लेल विभिन्न पाँच विद्यामे २०१२ (२०६८ कातिक १८ गते नेपाल सरकार एक करोड रुपैयाक विद्यापति पुरस्कार कोषक स्थापना कएने छल, तकरा बाद र्इ पुरस्कार पहिल वेर देल जा रहल अछि।) दु लाखक नेपाल विद्यापति मैथिली भाषा साहित्य पुरस्कार मैथिलीक वरिष्ठ साहित्यकार डा. राजेन्द्र विमलकेँ। एक लाखक नेपाल विद्यापति मैथिली कला संस्कृति पुरस्कार शहीद रंजु झाकेँ एक लाखक नेपाल विद्यापति मैथिली अनुसन्धान पुरस्कार डा. रामावतार यादवकेँ एक लाखक नेपाल विद्यापति मैथिली पाण्डुलिपी पुरस्कार साहित्यकार परमेश्वर कापडिकेँ एक लाखक नेपाल विद्यापति मैथिली अनुबाद पुरस्कार डा. रामदयाल राकेशकेँ गजेन्द्र ठाकुर ggajendra@videha.com http://www.maithililekhaksangh.com/2010/07/blog-post_3709.html २.गद्य २.१.जगदीश प्रसाद मण्डल-लघुकथा-परदेशी बेटी २.२.१.सुजीत कुमार झा-लघुकथा-निष्ठा कि देखाबा २.३.दुर्गानन्द मण्डल-लघुकथा-कुकर्मा २.४.आशीष अनचिन्हार-आधुनिकताक समस्या ( आलोचना ) २.५.कामिनी कामायनी-महानगरमे सुनीता २.६.नारायण झा- रहुआ संग्राममे गृष्मकालीन शैक्षिक शिविर सह टैगोर पुरस्कारसँ सम्मानित श्री जगदीश प्रसाद मण्डलक सम्मान समारोह- २०१२ २.७.दुर्गानन्द मण्डल-समीक्षा- जीवन-संघर्ष २.८.१.डॉ. कैलाश कुमार मिश्र- लघुकथा- चन्दा २. उमेश मण्डल- मैथिली युवा रचना-धर्मिता :: परंपरा परिवर्त्तन आ भविष्य जगदीश प्रसाद मण्डल लघुकथा-परदेशी बेटी उबानि होइते घटक काका दाँत पीसैत काकीपर बिगड़ैत घर छोड़ि विदा भेला। मनमे उठलनि जे एहेन पड़ाइन पड़ा जाइ जे दोहरा कऽ ने घरक मुँह देखी आ ने घरेवालीक। मुदा ओहन क्रोधे आकि हँसऽबे कि जे दोसरपर नै बिसाए। घरक बात (पति-पत्नीक बीचक) तँए अनका कहबो उचित नै। दुनियाँमे केकरो कोइ ने कहै छै। भलहिं बिनु कहनौ दुनियाँ किअए ने बुझैत होउ। मने मन घटक काकाक पकिया िनर्णए भऽ गेलनि। लोकोकेँ कोन मतलब जे बताह जकाँ अनेरो अनका देखि हँसि देब अाकि बिनु मतलबोक घंटा भरि सोखर पसारि देब। आन जकाँ नै जे आंगनसँ निकलि डेढ़ियोपर सँ पाछू घूमि-घूमि देखैत, देखबो केना करितथि? कोनो कि अदी-गुदी विचारक चोट लागल छन्हि, पुरुखे छियाह जे अखनो धरि बरदास केने छथि नै तँ मूसक दबाइ पीब नेने रहितथि। एक तँ ओहुना अखन घटक काकाकेँ टोकैक लग्न नै, कारण लगनक समए नै छी, लगनक समैमे ने पतिआनी लागल काज रहै छन्हि कुसमैमे तँ दुनियाँक निअमे छै जे अपनो लोक पूछैले तैयार नै होइत अछि, घटक काका तँ सहजहि विदाइ लेनिहार छथि। बिनु रेटक आमदनी। जेहेन मुँह तेहने आमद। नै टोकैक इहो कारण रहनि जे मध-असरेसक गिरहस्ती चलैत, जते समए लोक केकरोसँ गप करत तते काल जँ देहे कुरिया लेत तँ ओइसँ बेसी नीक। भगवान केकरो अधला बना पठबै छथिन, भलहिं रोगे-व्याधि किअए ने होउ। जँ सभ अधले रहैत तँ किअए कियो देह कुरिअबैले सोनाक सिक्का बना-बना आगूमे रखैत। ओहिना पैघ शैरीकार कहै छथि- “हौहटिमे मजा है कि कलकलि में है, खुदा ने दिया खुजली, कुरियाने में मजा है।” खैर जे होउ। ओना किसकारक समए रहने देवियो देवता अखन छुट्टी लऽ लेने छथि, चौरचनक पछाति ज्वाइन करताह। जहिना फुलही थारीमे जते काल दही रहैत ओते बेसी कसाइन होइत, तहिना घटक काकाक मन कसाइन होइत जाइत रहनि। जहिना भरल पेटक प्रेम गीतक स्वर आ जरल पेटक प्रेम गीतक स्वरमे मात्राक भेद होइत तहिना घटक काकाक मनमे उठैत रहनि, जे आइ धरि कहियो नै उठल रहनि। केना नै उठितनि? सभ दिन दस गोटेक बीच हँसि-बाजि समए खटियबैत रहला आब जखन शिव लिंग फुल जकाँ वा नारियल-ताड़ जकाँ फड़एबला भेला तँ आनक कोन गप जे जाँघ तर बसैवाली पत्नियो दुतकारि देलकनि। ई तँ हुनके चाबस्सी होन्हि जे जहर-माहुरक कोन गप जे केकरो लग बजौ नै चाहैत छथि। कसाइन बीच बिसाइन घटक काकाक मन उठलनि। जिनगी भरि घरे बसबैक काज करैत एलौं मुदा......? बेटा प्रेमसँ चाहे बिगड़ि कऽ आकि पड़ा कऽ परदेश चलि गेल तँ चलि गेल। सबहक बेटी सासुर बास करैए, ओहो करह। मुदा पत्नी तँ पत्नी छी। जँ घरे नै तँ घरवाली की, आ घरेवाली नै तँ घर केहेन। भाड़ा घर जँ अपना घर सन होइतै तँ मुसे किअए घरमे घर बनबैत। ओकरो तँ पानिये पाथरसँ ने जान बँचबैक छै। मुदा किअए? अपन घर कियो अपन विचार अपन आँट-पेट आ लम्बाइ-चौड़ाइ नापि बनबैत तँए बेसी सुरक्षित होएत। मुदा गणेशजी अपन वाहनकेँ ई बात ने किअए बुझा देलखिन जे लोकक घरमे जे घर बनबै छेँ, से अपने जोकर बनबिहेँ। जइ भीतपर घर ठाढ़ अछि ओकरे किअए जंजल बना देइए। जखन भीते-जंजल भऽ जाएत तखन हथियाक झाँट केना बरदास करत। मुदा घर खसत घर बन्हनिहारकेँ ओ तँ बीलमे अन्नक ढेरीपर अरामसँ पड़ल रहत। अकाससँ धरतीपर घर खसत, मुदा ओ तँ पताल दिस बनौने अछि। किअए ने ओकर जान बँचले रहतै। तइ बीच घटक काकाक मनमे एकटा घटकैती आबि गेलनि। मन पड़िते मुस्की आबि गेलनि। ठोर वरदास नै कऽ सकलनि। खापड़िक तीसी जकाँ चनचना उठलनि। कहू जे बेंगबा सन छौड़ाकेँ इन्द्रक परी सन कन्या केकरा किरतबे भेलै। मुदा कलयुगक उपकार हत्या बराबरि। जौं से नै तँ जँ ओकरा अपन उपकार मन पाड़ि देबै तँ कि ओ नै कहत जे पाँचो टूक कपड़ा आ दैछना कथीक लेने रहिऐ। ओ खुशनामा देने रहए आकि काज करैक बोइन। मन घूमि पत्नीक ओइ बातपर आबि अँटकि गेलनि जे कहू ई केहेन भेल जे मुँह फोड़ि दुसैत कहलनि जे आगू-पाछू किछु सोचै नै छी आ जहाँ कोसीकातक बकेनमा दूधक दही आ तिलकोरक तरूआ आगू पड़ैए आकि बुद्धिये बिगड़ि जाइए। जइ परिवार लेल जिनगी भरि झूठ-फूसि बाजि, नीक-अधला काजक विचार नै केलौं तइ परिवारमे एहेन गंजन हुअए तँ मनुक्ख केना रहत? खौंझ आरो तेज भेलनि। ओ (पत्नी) रस्तामे रोड़ा अँटकौनिहार के? दस गाम घूमै छी, दस लोकमे रहै छी हम आ उपदेश देती ओ? जे सभ दिन जाँघक निच्चा रहल ओ छड़पि कऽ छातीपर चढ़ि मुक्का देखाओत; एहेन पुरुष हम नै छी। जहिया जे हेतै से हेतै अखन घरसँ नै पड़ाएब। भक्क खुजलनि तँ देखलनि जे किलोमीटर हटि दोसर टोल लग पहुँचि गेल छी। घूमि कऽ अांगन केना जाएब? केतबो किछु भेल तँ भेल पुरुष अपन पुरुखपाना केना छोड़ि देत? नेराओल थूक केना चाटत? मुदा अपने फुरने घुमऽबो केहेन हएत? मरदक बात वाण समान होइत जे धनुषसँ निकलि गेल निकलि गेल। कहि दुनू हाथक तरहत्थी माथपर लऽ बैसि रहलाह। जहिना किसान, बिनु खुरपियोक गाछक जड़ि लग बैसि चुटकियेसँ खढ़ उपाड़ि कमठौन करए लगैत, तहिना घटक काका घुमैक ओरियान सोचए लगलाह। मुदा लगले मन तुरुछए लगलनि। ई तँ धोबियो कुकुड़सँ टपब हएत जे, घरक आ ने घाटक। जँ बलजोरी घरमे रहौ चाहब तँ ओ (पत्नी) कत्ते मोजर देतीह। मन घुमलनि। हमरो एते नै अगुतेबाक चाहै छल। गल्ती अपनो भेल। एना जे लोक छोट-छोट बातपर घरसँ पड़ाएत तँ कहियो कुकुड़-बिलाइ जकाँ अपन घर हेतै। साँझू पहर कऽ जखन लोक बाध-बोनसँ अबैए तखन केकरा घरमे ने हर-हर, खट-खट होइ छै, मुदा कहाँ कियो हमरे जकाँ फूलि कऽ पड़ा जाइए। जँ एक रत्ती दब-उनार बात पत्नी कहबे केलनि तँ कि होइतै। कोनो कि जड़ि भीरा कऽ टिक काटि लेलनि। अर्द्धांगिनी छथि, बाल-बच्चा आ परिवारपर जते अधिकार पतिक होइत तइसँ कम कि पत्नियोक होइत अछि। बेटा-बेटी तँ दुनूक छी। ई तँ समैक दोख छी जे कखनो गरमी चढ़ा (रौदमे) गरमा दैत अछि तँ कखनो ठंढा दैत अछि। सझुका झगड़ा राति खसैत-खसैत मेटाइये जाइए किने। आकि हमरे जकाँ दिन-राति धेने रहब। भोर होइते दुनू परानी घर-अंगनाक काजमे लगि जाइए। कहाँ एको मिसिया मान-दोख मनमे रखैए। जहिना डिक्शनरीक नवका शब्द अबितो अछि आ जाइतो अछि तहिना ने घरोमे किछु-ने-किछु अबैत रहैए आ किछु-ने-किछु जाइत रहैए। मन आगू घुसुकलनि। मन पड़लनि बिआहक दिन? समाजक बीच सरिआती-बरिआती, तँ हमहीं ने हाथ पकड़ि जिनगी भरि संगे रहैक वादा केने रही, से कि भेल? जहिना कटही गाड़ी कुमड़क रस्तामे कनी दब-उनार भऽ उनटिये जाइए तँए कि गाड़ीवान गाड़ी रखनाइये छोड़ि देत। जँ छोड़ि देत तँ आगू केना घुसकत? औगुताइमे एहेन भारी गल्ती नै करक चाही। कोन दुरमतिया चढ़ि गेल जे एना केलौं। एको रत्ती उम्रोक लेहाज-विचार केलौं। जुआन लोक जकाँ िनर्णए केलौं। कहू जे आब हमर उमेर अछि जे संगी छोड़ि असकरे रहब। कोनो कि संयासी छी जे दोसर नै सोहाएत। अपने दिन-राति घीमे डुमल रहब मुदा दोसरकेँ कुत्ता जकाँ पचै नै देब। भरि दिन शनियाही गुड़-चाउर चिबबैत रहब आ अनका देखबे ने करब। मुदा कतौ जाएब तँ पेट संगे जाएत। पेटक आगि जेहने परिवारमे तेहने तीर्थ-स्थानमे जगैत अछि। ओकरा तृप्ति करब आवश्यक होइत। जँ से नै तँ भूखे भजन किअए ने होइत। खाइले के देत? जँ देबो करत तँ एक मुट्ठी देत? एक दिन खेलासँ जिनगीक भूख मेटाएत। जँ से होइत तँ डिबियो लऽ कऽ तकलापर एकोटा भिखमंगा नै भेटैत। मन घुमलनि। हारि मानी झगड़ा फड़िआए। जहिना बाढ़िक तेसरा दिन पानि ठाढ़ भऽ उनटा-पुनटा दिशा पकड़ए लगैत तहिना घटक काकाक मनमे सेहो भेलनि। अपन विचारक अनुकूल बात केकरा अधला लगै छै। संयोगो नीक रहलनि। मुदा मनमे खरोच लगलनि। समाजो तेहेन भऽ गेल अछि जे केकरा के पूछत? जहिना भोजक जएह बारीक मिठाइ पड़सैत अछि सएह माछो-मासु। कहू ई केहेन भेल। सभ तरहक पनचैती बड़के काका करताह। जमीनोक पनचैती आ दुनू परानियोक झगड़ा हुनके चाही। जँ जमीनक पनचैती अमीन नै करत, एहिना सभ गुणक आधार से आदमी नै करत तँ खीर-खिचड़ीमे कोनो भेद नै रहत। एते मनमे रहबे करनि कि देखिते सुनरलाल कहलकनि- “भाय सहाएब, अहीं ऐठाम जाइ छी?” अहीं ऐठाम जाइ छी सुनि घटक काका औना गेलाह। अपन ठौर कतए अछि जे जाएत। कि कहबै, भरमे-सरम आँखि मूिन लइ छी जे बूझत हवामे अलिसा गेल छथि। उत्तर नै पाबि सुनरलाल दोहरा देलकनि- “भाय सहाएब झखाएल छी, भक्क खोलू।” अकचकाइत घटक काका बजलाह- “नै, नै! कनी आँखि लागि गेल। की कहलह?” सुनरलाल- “घरपर चलू। निचेनसँ बुझा देब। रस्ता-पेराक गप नै छी।” एक तँ राकश दोसर नौतल। घटक काका हरे-हरे कऽ घर दिस बिदा भेलाह। मनमे उठलनि जे कोनो विचार दोहराइयो कऽ होइत अछि, किअए ने दुनू परानी मिलि फेरसँ विचारि लेब। घर दिस विदा होइते घटक काका पुछलखिन- “गपो शुरू करह। जते भेल रहत ओते तँ काजे ने भेल रहत?” छुब्द होइत सुनरलाल बाजल- “देखिऔ भाय, बिअाह भेल केकरो आ जहलमे अछि हमर बेटा।” अकचकाइत घटक भाय बजलाह- “से कि, से केना?” मने-मन महावीरजी केँ गोड़ लगलनि। निसाँस छोड़ैत, सोचए लगलाह जे बाप रे एकटा काजमे जँ एना भेल, हम तँ जिनगी भरि इएह केलौं। खुनी केसमे बेसी दिनक सजा होइ छै। मुदा खुदरो-खुदरी केश मिला तँ ओहूसँ बेसिआइये जाइ छै। हे भगवान रच्छ रखलह। आबो छोड़ि देबाक चाही। मुदा जइ इंजीनियरकेँ जइ मशीनक बोध भऽ गेल अछि, जँ मशीनक तकनीक बदलि जाएत तखन की हएत? दोसर काजक लूरि कहिया भेल जे करब। हे भगवान जनिहह तूँ। सुनरलाल कहए लगलनि- “भैया देखियौ, हमरे बेटा फुलबाक बिआह बंगलोरमे करा देलकै। ओहन-ओहनकेँ गाममे के पूछै छै। मुदा ट्रन्सपोर्टमे नोकरी भेने दिन-दुनियाँ बदलि गेलै। भषो सीखि लेलक। अलगरजा कमाइ हुअए लगलै। बी.ए. पास लड़ीक संग बिआह करा देलकै।” घटक काका- “बी.ए. पास लड़की गछलकै केना?” सुनरलाल- “केहेन गप करै छी। जखने लोक कमाए-खटाए लगैए तखने ने सर्टिफिकेटक ओरियान करए लगैए। एम.ए. पासक सर्टिफिकेट कीन लेने अछि।” घटक काका- “लड़कीबला कतक छिऐ?” सुनरलाल- “नवटोलीक छिऐ। तीस-पेइतीस बर्ख पहिने गामसँ पड़ा कऽ गेल। नोकरी करए लगल। ओतै परिवारो रखैए, घरो-दुआर बना लेलक। अपन इलाकाक जाति बूझि कुटुमैती कऽ लेलक।” घटक काका- “आब की भेल?” सुनरलाल- “बिआहक बाद लड़की जोर केलक जे गाम जाएब। एबो कएल। मुदा जहिना पढ़ल सुग्गा बौक होइत तहिना वेचारीकेँ भऽ गेलै। पनरहे दिनमे नाकोदम भऽ गेलै। जहिना सासु अल्हरि कहए लगलै तहिना ससुरो माथा ठोकैत। सर-समाजक तँ चर्चे कोन? ने भाषाक ताल-मेल बैसैत आ ने खाइ-पीबैक वस्तुक।” घटक काका- “जा, ई तँ भारी जुलुम भेल! तखन की भेलै?” सुनरलाल- “लड़की पड़ा कऽ दरभंगामे गाड़ी पकड़ि बंगलोर चलि गेल। हमरा बेटापर केश कऽ देलक। जेलमे पड़ल अछि।” डेढ़ियापर अबिते घटक काका बजलाह- “एहेन खच्चरपन्नी गाममे चलतै। अच्छा कनी ओहू पार्टीक बात बूझि लेब तखन कहबह। अखैन जाह, कनी हमहूँ औगुताएले छी।” दरबज्जापर गल-गूल सुनि रेखा आंगनसँ आबि, खरिहानक मेह जकाँ बीचमे आबि ठाढ़ भऽ सोचए लगली जे केहेन पुरुख छथि जे थूक फेकि पड़ाएल रहथि जे घूमि कऽ ऐ घरक मुँह नै देखब, से सालक कोन गप जे दिनो भरि नै निमाहि सकलाह। मुदा मन ठमकलनि। सप्पत-किरिया लोककेँ थोड़े टिक पकड़ि उखाड़ै छै, जँ से उखाड़ितै तँ भरि दिन लोक किअए सभ बातमे जय गंगाजी आकि माटि उठा-उठा बजैत अछि। जहिना लोक भात-रोटी खाइए तहिना ने सप्पतो-किरिया खाइक वस्तु भेल। खेलक पचलै फेर खेलक फेर पचलै। रसे-रसे एहेन पचान पचि जाइ छै जेहन झूठ-सच्चमे पचल अछि सच्च–झूठमे। जँ तुकबन्दी करैक लूरि भऽ जाए तँ कवि, शायर बनबे करब आ जँ झूठ-सच्च पचबैक लूरि भऽ गेल तँ वक्ताक के कहए सेसर अनुभवी वक्ता बनबे करब। तहिना तँ हिनको (पतिक) जिनगी तेहने रहल छन्हि। तहूमे समाज तेहन लाइसेंस दऽ देने छन्हि जे साले-साल थोड़े रिनुअल करबए पड़तनि, ताजिनगीक लेल बनि गेल छन्हि। आँखि उठा घटक काकापर देलनि तँ देखलनि जे मुँह धुआँ केने लटकौने छथि आ जहिना कोयलाक धुआँमे चमकैत बिजली बनैत तहिना उपदेश झाड़ि रहल अछि। मन रोषा गेलनि। घरे परिवारक लोक िकअए ने होथि मुदा गलत गलत छी तहिना सहियो तँ सही छिहे। गल्तीक कोनो पारावार छै रावण जकाँ लाख-सबा लाख धिया-पुता जहिना त्रेतामे छलै, जे घटि कऽ द्वापरमे सय-सैकड़ापर चलि एलै, तहिना ने अखनो अछि। तहूमे कलयुग छी। पापेक युग। देवतो सभ पड़ा कऽ उनीकुटी चलि गेल छथि। जाए तँ चाहलनि समुद्र दिस मुदा भोर होइते लाजे सभ रस्तेमे रहि गेला। रोषाएल रेखा झपटि कऽ बजलीह- “बौआ, अहीं सभ ने सर-समाज छी। जेहने समाज रहैए तेहने लोक काजो-उदेम करैए।” रेखाक बात सुनि सुनरलालक मनमे पंचक एहसास भेलै। पंचक एहसास होइते अपन बात बिसरि गेल। बिसरि गेल बेटाक जहलक उपाए। दमकलक चक्का जकाँ पहियाक रूप बदलि एक सूरे मुड़ी डोलबैत बाजल- “हँ, से तँ छिहे। केकरो कटने समाज कटै छै। तेहेन लस्सा बनल छै जे कतबो कटतै तैयो सटिते रहतै।” “नइ बुझलौं अहाँक बात?” रेखाक मुँहसँ निकलल। जहिना नमहर नागड़ि नमहर जानवरक पहिचान छी तहिना ने काजक नागड़ि मनुक्खोक होइ छै। जँ से नै तँ रावणसँ पैघ आसन हनुमान कथीक बनौलनि। ओही नागड़िक बले ने सौंसे लंका जरा देलनि आ अपना किछु ने भेलनि। बूझल-बिनु बूझल दुनियाँमे केहेन हएत जे नै हएत। कोनो प्रश्नक उत्तर दुनूक एक भऽ सकैए। मुदा होइ छै। बुझिनिहार संग बुझिनिहार रहैत तँ बिनु बुझिनिहारोक संग तँ बिनु बुझिनिहार हेबे करतै। जइ काजमे सुनरलाल अपने ओझराएल तही काजक ओझरी छोड़बैक भार लैत बाजल- “भौजी, अहाँ-हमरामे कोन भेद अछि। नीक-अधला सभ गप तँ िदओर-भौजीमे होइते अछि। से कि कोनो आइये अछि आकि अदौसँ आबि रहल अछि। देखियौ, जहिना करौटन फूलक पत्ता-पत्तामे गाछ पैदा करैक शक्ति अछि, तहिना ने समाजोक बनबै-मेटबैक दुनू शक्ति छै।” सुनरलालक विचारमे सूर-मे सूर मिलबैत रेखा बजलीह- “बौआ, पहिने कनी भैयाकेँ बुझा दिअनु जे रूसि कऽ जे भगलाह से कोन अनचित बात कहलियनि।” नमहर झगड़ा देखि सुनरलालकेँ नमहर पंचक एहसास भेल। जहिना नमहर लबि जाइत, तहिना सुनरलाल लबैत बाजल- “भौजी, केना कहबनि हम। सँए-बहुक झगड़ामे लबड़े टा पड़ैए। अहाँकेँ कहलौं से तँ भाइयो-सहाएब सुनबे केलनि।” जहिना एक चुरुक जलसँ सौंसे घरक वस्तु पवित्र बनि जाइत तहिना घटक काका अपन गनजन सम्हारैत बजलाह- “हौ सुनरलाल, जहिना तूँ छोट भाए भेलह तहिना ओहो घरेवाली भेलीह। तँए बजैमे थोड़े कोनो धड़ी-धोखा हएत। जुआनमे मौगी घरसँ पड़ाइत अछि आ उमेर बढ़ने पुरुख। तँ तोहीं कहह जे कोन गल्ती केलौं।” मुड़ी डोलबैत सुनरलाल बाजल- “से के कहैए जे अहाँ अधला केलौं।” पाशा बदलैत देखि रेखा बजली- “बौआ, नौंए-कौंए कऽ भगवान एकटा बेटा देलनि। अपने दुनू परानी ने सोचब जे केहेन पुतोहु एने घरक गाड़ी ससरत। सिनेमा-नाटक जकाँ थोड़े मनुक्खक जिनगी क्षणे-झण बदलि सकैए आकि क्षणे-झण आगू-पाछू भऽ सकैए।” रेखाक बात सुनि, मुड़ी डोलबैत सुनरलाल बाजल- “हँ, से तँ होइते छै। अहीं कहू भौजी, केकरा चलैत हमहीं एते तबाह छी। उएह छोड़ा माने हमरे बेटा एहेन किरदानी किअए केलक। जहिना बिआह भेने अनेरे लोक घटक बनि जाइए तहिना किअए बनल। नइ बनल तँ जहलमे किअए अछि।” रेखा- “अहाँ अपनापर नै लिऔ। बेटा केलहा काजक दोखी बाप नै होइए मुदा माए-बाप.....। काल्हि भऽ कऽ जे कोनो दोख लगा बेटाकेँ कहबै तँ ओ नै मुँह दुसैत कहत जे केकर केलहा छिऐ। जहिना अपन बेटीकेँ पोसि-पािल बिआह करै छिऐ तहिना ने सभ करैए। मुदा घरक मिलानी जँ नै करबै तखन पढ़ल सुग्गा बौक नै हेतै।” पत्नीक बात सुनि घटक काका सहमलाह। पाछू घूमि तकलनि तँ बूझि पड़लनि जे कते घूर-बहूर काज भेल अछि। र्इहो हएत। यएह ने दस गोटेमे बजलौं। कोनो कि इएह टा बात बजलौं। सदिखन तँ एहेन-एहेन बात चलिते रहैए। बड़ हएत तँ बाजब जे पत्नीक विचार नै भेलनि। तहूमे के एहेन छथि जे पत्नीक बात काटि सकै छथि। मन झिलहोरि खेलाए लगलनि। जहिना पघिलल कटहर गाछसँ खसिते छहोछित भऽ उड़ि जाइत तहिना घटक काकाक मन छहोछित भऽ गेलनि। ~ ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। सुजीत कुमार झा लघुकथा निष्ठा कि देखाबा
घरक कलवेलक घण्टी बाजल । हमर परम मित्र सोहन गेटपर चुपचाप भाव हीन मुद्रामे ठाढ़ छलाह संगमे हुनकर कनियाँ नीमा सेहो । हम आह्लादित होइत सोहनकँे अपन हृदयसँ लगएलहुँ । ओ धड़फड़एलैथि । दम्माक रोगी जकाँ हकमऽ लगलैथि, ‘श्रीनाथ हमरा छोड़ब नहि, अन्यथा खसि पड़ब ।’ हम घबराकऽ हुनका अपन बाँहिसँ पकड़ि लेलहु, ‘सोहन अहाँक मुँह सुखा किए गेल अछि ?’ ‘हिनका बोखार छैन्हि, तीन–चारि महिनासँ,’ नीमा बाजि उठलीह । बहुत दुःख भेल । ‘भितर चलू ।’ हम हुनका सहारा दैत कहलहुँ । मुदा ओ आगा नहि बढ़ि सकलैथि । ठाढ़े रहलाह । हुनका आँखिमे मजबुरीक भाव छलैकि आएल, ‘श्रीनाथ, हम स्वयं चलियो नहि सकैत छी ।’ हम हुनका कोरामे उठा लेलहुँ आ ड्राइंगरुम दिस बढ़ि गेलहुँ । ‘ओमहर नइँ जाहिमे हमरा राखब, ओतऽ लऽ चलू । थाकि गेल छी, विश्राम करब ।’ हम हुनका अपन शयनकक्षक बगलबला रुममे लऽगेलहुँ । ‘श्रीनाथ, आब हम एकटा बोझ भऽ गेल छी ।’ हुनकर आँखि बन्द छल । ओ लम्बा–लम्बा साँस लऽ रहल छलाह । ‘घबराउ नहि मित्र, सभ ठीक भऽ जाएत ।’ ‘आब किछु नहि भऽ सकत । डाक्टर जबाब दऽ देने अछि । नीमाक जिद्द छल धरानमे देखएबाक तँए आबऽ पड़ल । हमर किडनी खराब भऽगेल अछि शायद ।’ ‘हम अहाँकेँ डाक्टर सरोज कोइरालासँ देखाएब । एहि रोगक विशेषज्ञ छथि । हुनकर बहुत नाम छैन्हि । मुर्दामे सेहो जान पूmकि सकैत छथि । हम एखने नम्बर लगाबऽ जारहल छी । अबेर कएलासँ नम्बर नहि भेटत ।’ घरसँ प्रस्थान करऽसँ पूर्व हम अपन कनियाँसँ कहलहुँ, ‘ई हमर विशेष पाहुन छथि । स्वागत सत्कारमे कमी नहि हएबाक चाही ।’ ‘बूझल अछि, अपने निश्चिन्त रहू,’ओ कहलीह । डाक्टर सरोज कोइरालाक क्लिनिकमे बहुत लम्बा लाइन छल मुदा पछिलका द्वारसँ जा कऽ अपन जोगाड़ कऽ लेलहुँ । घूमिकऽ अएलाक बाद हुनका सभकेँ लऽकऽ जल्दीसँ डाक्टर लग पहुँचलहुँ । तखन प्रारम्भ भेल हुनकर जाँचक चक्र । ‘हिनकर दुनू किडनी सड़ि गेल अछि ।’ ‘डाक्टर साहेब ई बदलल सेहो जा सकैए ।’ ‘भारतक भेल्लोरमे किडनीके प्रत्यारोपण होइत अछि ।’ ‘हम हिनकर इलाज ओतहि कराएब , अपने रेफर कऽ देल जाउ ।’ ‘बढियाँ बात अछि । तहियाधरि हिनका हमर लीखल दबाइ चला दियौ । एक हप्ताक कोर्ष अछि । प्रत्येक दिन एकटाकऽ सुइ । मुदा ध्यान राखब कोनो प्रशिक्षित कम्पाउण्डर सँ मात्र सुइया लगाएब । नशमे सुइ लागत एहि दवाइसँ बोखार उतरि जाएत तथा हिनका राहत महशुस हएत ।’ हम डाक्टर सरोज कोइरालाक क्लिनिक आगा रहल दवाइ दोकानसँ दवाइ किनलहुँ । तखन नीमा धीरेसँ हमरा कहलैन्हि, ‘श्रीनाथ जी, दवाइ फिर्ताकऽ दियौ ।’ ‘....किए ?’ ‘एतऽसँ सीधा अपन गाम जाएब । हमरा सभकँे एकटा गाड़ी रिजर्वकऽ दिय कनिक जीप टाइपक हएवाक चाही । उबर–खाबर गामक सड़कपर जीपे चलि सकैत अछि ।’ हम अकचका गेलहुँ । ‘ई की कहि रहल छी ?’ इलाज नहि करएबाक अछि की ? ‘श्रीनाथजी अपनेकँे कनी उटपटाङ्ग लागत, मुदा एखन अपनेकेँ सम्झाइयो नहि सकैत छी । हमरा लग एतेक समय नहि अछि । हिनका होश रहिते घरपर पहुँचब आवश्यक अछि । कतेको आवश्यक कागजपर हिनकर सही लेवाक अछि । पेन्सन कागजपर सेहो ।’ ‘नीमा आश्र्चयक बात करैत छी, अहाँ अपन स्वार्थमे आन्हर तऽ नहि भऽगेल छी ? किछु आओर कठोर बात कहबाक मोन भेल मुदा अपनाकेँ रोकि लेलहुँ । वा ई कही हुनकर पतिभक्ति आ निष्ठाक सम्बन्धमे एहिसँ पहिने कोनो दोष नहि देखने छलहुँ । सोहन हुनकर सभ दिन बराइए करैत रहैत छलाह । .....सम्भव अछि ..... किडनी सड़बाक बात सूनिकऽ घबरा गेल होइथ, तँए हम शान्त स्वरमे स्मरण करएलहुँ, ‘अहाँक गाममे प्रशिक्षित कम्पाउण्डर नहि हएत । ई सुइया ककरासँ लगाएब ?’ ‘एकटा कम्पाउण्डर सेहो ठीककऽ दिअ जे सङे जाए, जे मगत ओ देल जएतै ।’ हुनकर स्वर बदलल–बदलल छल । आग्रह नहि, बरु टालमटोल बला । हुनका प्रति हमरा विभिन्न शङ्का सभ होबऽ लागल मुदा बीच सड़कपर हुनकासँ झगड़ा करब हम नीक नहि बुझलहुँ तँए कनी धीरेसँ हम कहलहुँ, ‘सभ व्यवस्थाकऽ देब, मुदा एहिमे किछु समय लागत । अहाँ सभ ताधरि हमर घर चलू । हम जल्दिए जीप आ कम्पाउण्डर लऽकऽ अबैत छी । अहाँ सभ ओतहि रहब ।’ हुनकाधथसभकँे सम्झएला बुझएलाक बाद ओ सभ हमर घर दिस विदा भेल आ हम चैनक साँस लेलहुँ, मुदा स्वयं घर जाएबाक हिम्मत नहि जुटा पाबि रहल छलहुँ । किछु देरक बाद घर पहुँचिते नीमा अपन घर जाएके बात करऽ लगलीह । तखन हमरा वर्दास्त नहि भेल । तत्काल सोहनकँे सुइ लगाएब हमर प्राथमिकतामे छल । सात दिनधरि हुनका कोनो हालतमे रोकि हम योजना बनाबऽ लगलहुँ । मोनमे विचारक बिहारि उठि रहल छल । ओ नीमाक रुप छल वा विरोधक उपाय ? एनामे हुनका भेल्लोर कोना लऽ जा सकब ? एहि चिन्तामे किछु देर सोचैत रहलहुँ । साँझ भऽगेल तखन एकटा कम्पाउण्डर लऽकऽ घर पहुँचलहुँ । सोहन आँखि मूनिकऽ ओछाएनपर पड़ल छलाह । हम घबराकऽ हुनका दिस बढ़लहुँ । हुनकर नाड़ी असमान्य गतिसँ चलि रहल छल । ओ वेहोशीक अवस्थामे छलाह । ‘कम्पाउण्डर साहेब कनी जल्दी इन्जेक्शन लगाउ ।’ ‘श्रीनाथ जी हम दवाइ फिर्ताकऽ देलहुँ अछि,’ नीमा कहलीह । ‘किए ? हम डपैटकऽ हुनकासँ पुछलहुँ । ओ डरा गेलीह । ‘इएह कहने छलाह ।’ओ सोहन दिस इशारा करैत बजलीह । हमर टेम्पे्रचर बढ़ि गेल, ‘ई अहाँसँ जहर मगता तऽ ओहो अहाँ दऽदेबै ? छी ।’ हम जमीनपर थूकि देलहुँ । ओतऽ हुनकर छाया छल । हम दौड़ैत फेरसँ सात दिनक लेल दबाइ किनकऽ लऽ अनलहुँ । कम्पाउण्डर हुनका सुइ लगओलक । हम ओकरा पैसा दऽकऽ विदा कएलहुँ । किछु देरक बाद सोहनके आँखि खूजल । हमरा चिन्ह लेलाह, ‘श्रीनाथ अहाँ कखन अएलहुँ । बहुत प्रतीक्षा करओलहुँ । हमरा जाएके व्यवस्था भऽ गेल ?’ ‘बहुत निष्ठुर छी अहाँ । हमरासँ अपन मृत्यु मागि रहल छी । अरे हम अहाँके मित्र छी यमदूत नहि । हम अहाँक यमफाँसकँे काटि देब । भेल्लोर लऽ जाएब अहाँकेँ । ई हमर निवेदन अछि । एकरा अपने हमर हठ सेहो बूझि सकै छी ।’ ‘एतेक रुपैया नहि अछि हमरा लग । सेवा निवृतिक बाद दूटा बेटीक बियाह कएलहुँ हम, से अहूँकेँ बूझल अछि । एहि बियाहमे हमर सव पैसा समाप्त भऽ गेल आओर जे किछु बाँकी छल बिमारीमे लागि गेल ।’ ‘पैसाक चिन्ता नहि करु । एकर उपाय अछि हमरा लग । एतेक रुपैया अछि हमरा लग ।’ ‘आइधरि हम ककरोसँ कर्जा नहि लेने छी आ जाधरि जीव लेबो नइँ करब ।’ ‘एकरा हमर सहयोग बुभूm ।’ ‘हम ककरो एहसान उधार नहि रखने छी आब उतारबाक सामथ्र्य नहि अछि, तँए नहि लेब,’ सोहन दृढ स्वरमे कहलैन्हि । नीमाक मुँहपर परम तृप्तिक भाव पसरि गेल, ‘श्रीनाथजी अपने अनावश्यक रुपसँ हमरापर तमसा रहल छलहुँ, अपने सेहो सम्झाकऽ बूझि गेलहुँ ने ।’ हम हुनकर जवाब तमैककऽ देलहुँ, कर्जा नहि, एहसान नहि, अहाँ अपन जमीनक किछु भाग बेच लिअ, अहाँके दू–चारि बिग्घा जमीन अछिए, ओहिमेसँ किछु हटा दियौ ।’ ‘एतेक जल्दी बढियाँ ग्राहक नहि भेटत, भेटबो करत तऽ सही दाम नहि देत । किनऽ बला हमर आवश्यकताके मजबुरी बूझिकऽ कम मोलमे किनऽ चाहत,’ नीमा ठीक कहि रहल छथि । हम हुनका बहुत सम्झएलहुँ, मुदा ओ नहि मानलथि । तखन हुनकापर हम कसिकऽ बरसि गेलहुँ, ‘जीवनदायनी दवाइ किनबाक समय रुपैयाके मोह त्यागऽ पडैÞत छै । भाव मोलक समय वर्वाद नहि करबाक चाही । फेर अहाँ सभ एहि परिस्थितिके घुमा किए रहल छी । ई केहन पति भक्ति भेल अहाँके ? ई केहन निष्ठा ? महिला जातिक लेल अहाँ कलङ्क छी । अहाँकेँ मात्र अपनासँ मतलव अछि । पेन्सन पेपरपर सही लेवाक स्वार्थ ।’ ‘श्रीनाथ, नीमाक अपमान नहि करीयौ ई सभ आरोप अछि, हमही कहने छलहुँ मृत्यु पूर्व कागज सभके ठीक करबऽ लेल । ई एक पति–परायण महिला छथि । ई हमरा खुब सेवा करैत छथि । हमरा हिनकासँ कोनो शिकायत नहि अछि, ’ सोहन कड़ा प्रतिवाद कएलैन्हि । ओ अपन इज्जत नुका रहल छलाह । ओ अपन आँखि खोलला मुदा हुनका सत्य नहि देखा रहल छल । अर्ध चेतनमे ओ सही आ गलतक आकलन सेहो नहि कऽ रहल छलाह । ‘नीमा अहाँ अपन जमीनक मोल लगाउ अहाँक इच्छा अनुसार मोलपर हम जमीन किनब । हमरा लग बन्हकी सेहो राखि सकैत छी । सुविधा अनुसार रुपैया दऽकऽ छोड़ा सेहो सकैत छी ।’ मुदा नीमा चुप भऽ गेली । एना किए ? हमर प्रस्ताव सर्वथा स्वागत योग्य छल तैयो ओ कोन उल्झनमे छथि । कतहु हुनकर सम्वेदना देखाबटी तऽ नहि अछि ? अपन पति प्रति हुनकर निष्ठा कृत्रिम तऽ नहि अछि ? ‘की अहाँक पति भक्ति एकटा ढोङ मात्र अछि ?’ ‘नहि श्रीनाथ ई नहि ..... अपन जमीन बिक्री होबऽ नहि देब । हमर कनियाँ आ धीया–पुता की खाएत ? इएह हिनका सभक लेल एक मात्र आधार रहि गेल अछि ।’ सोहन अपना कनियाँकेँ बचाब कएलैन्हि । अपन मुक्तिक मार्ग प्रशस्त करबाक लेल हुनकर युक्ति छल । किछु होउक, मुदा हम उपचारसँ विमुख नहि होबऽ देब । तँए अन्तमे हम ब्रह्मास्त्रक प्रयोग कएलहुँ, ‘नीमा अहाँ लग किछु गहना अछि, ई बात हमरा बूझल अछि, एहिसँ पतिक इलाज कराउ ई अहाँक पति निष्ठाक अन्तिम परीक्षा अछि ।’ मुदा नीमा अपन गर्दैनि झुका लेलीह । हमरा दुःख लागल । हम आश्चर्यमे छलहुँ । हम चुपचाप माता जानकीक प्रार्थना करऽ लगलहुँ, हे माता ! हिनका सभकेँ सद्बुद्धि दिऔ ।’ ‘श्रीनाथ हमर बात सुनऽ हमर स्थिर मन प्राणके अवाज सुनऽ भाइ । हमर सूर्य अस्त होबऽ बला अछि । हमरा एकर अभाष भऽ रहल अछि । हम विदेशमे शरीर त्यागऽ नहि चाहैत छी । हम भेल्लोर कोनो हालतमे नहि जाएब , ई हमर अन्तिम इच्छा अछि । घर जएबाक व्यवस्था कऽ दिअ मित्र ।’ सोहन निराश भऽगेल छलाह । हुनका अपन चारु दिस अपन मृत्यु नजर आबि रहल छल । मृत्युक भयसँ डेराएल ई हुनकर वेदना छल । मुदा नीमा हुनका झुठोके सान्त्वना देवाक औपचारिकता नहि बुझलीह, ओ हुनकर मृत्यु गीतक कनिको विरोध नहि कएलैन्हि । आखिर किए ? किए ?? हम फेरसँ सक्रिय भेलहुँ, ‘ई अहाँके मात्र भावुकता अछि मित्र । जीवन आ मृत्युमे बहुत अन्तर होइत अछि जेना दिन आ रातिमे । जाधरि साँस ताधरि आश अछि बुझऽ पड़त । ई हमरा सभक कर्तव्य सेहो अछि । अहाँ सेहो एहिना करितहुँ । अहाँक स्थानपर यदि नीमा होइतथि तऽ अहाँ की करितहुँ ? हिनका अहाँ भेल्लोर नहि लऽ जएतहुँ ।’ सोहन पुनः अपन आँखि बन्दकऽ लेलाह अपन मुँह सेहो बन्दकऽ लेलाह ओ झुठ नहि बाजि सकैत छलाह । सत्य सेहो स्वीकार नहि कऽ सकैत छलाह ओ । ओ मात्र रुसि सकैत छलाह, जिद्द कऽ सकैत छलाह, जीवाक लेल किछु तऽ चाही, ओ नीमामे नहि छल हम हुनकर मोनक अर्थ बूझि गेल छलहुँ । नीमा स्वयं जीप गाडी रिजर्व कऽ अनलीह । संगमे कम्पाउण्डर नहि जाएत एकर व्यवस्था अपने लगक शहरसँ ओ कऽ लेतिह । हम भरि राति एहि बातकेँ लऽकऽ चिन्तित रहलहुँ । हमर मोन कोना–कोना भऽ रहल छल । भोरमे जखन हमरासँ बिदा लेबऽ आएल तखन हम हुनकासँ पुछलहुँ, ‘इलाज नहि करएबाक छल तऽ एहि ठाम एलहुँ किए ?’ ‘नहि लबितहुँ तऽ गामक लोक हमरा धिक्कारैत तँए । घर–घरमे फुसुर–फुसुर होइत .... नीमा पतिकँे बढियाँ इलाज नहि करओलैन्हि । जहियाधरि चलैत–फिरैत रहथि तहिया लगक शहरमे हिनका उपचार करबैत रहलियैन्हि, मुदा एहिपर केओ ध्यान नहि देलक । सोचैत छल हएत पेन्सन लेबऽ लेल जाइत । जीपपर लादिकऽ गामसँ हिनका लेलहुँ अछि तखन गामक बच्चा–बच्चा बूझि गेल, आब केओ हमर इमानपर आङुर नहि उठाओत ।’ हुनकर सम्वेदनशीलता पुरा–पुरा कुण्ठित भऽगेल छल । हुनकर कर्तव्य परायणता आ पतिनिष्ठा खोखला भऽगेल छल । ओ एक यांत्रिक महिला छलिह । अपन गामक लोकक अभिमतके लेल अपन पतिक इलाजक नाटक कएलैन्हि । हम जाइतो जाति व्यंङ्गवाण छोड़य सँ पाछू नहि रहलहुँ, ‘ड्राइभर साहेब साँझसँ पूर्वे प्रवेश करियह, कारण गामक लोक जल्दी सूति रहैत अछि । धीरेसँ गाडी चलबियह आ जोड़सँ लगातार हर्न बजबियह । कारण सभ लोककँे पता चलि जाइक सती–सावित्री सत्यवाणकँे ल कऽ चलि आएल छथि । तीन दिनक बाद सोहन स्वर्ग विदा भऽ गेलाह । ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। दुर्गानन्द मण्डल लघुकथा- कुकर्मा मिथिलांचलक राजधानी जिला मधुबनी धरमपुर गाममे एकटा प्रकाण्ड विद्वान ज्योतिषी रहै छलाह। ज्योतिषी विद्यामे एकदम निपुण जइसँ भूत, वर्त्तमान आ भविष्यक नीक ज्ञाताक रूपमे जानल जाइ छलाह। एक दिन मधेपुर प्रखण्डक लौफा गामसँ सत्यनारायण भगवानक चौपहरा पूजा करा सबेरे-सकाल गाम अबै छलाह। बाटमे, जोरला गाम जखन एलाह तँ देखलनि। हाइ स्कूल जोरलाक पाछाँ बहति मरता धारमे एकटा नरमुण्ड धारक कातमे राखल छैक। जइपर लिखल छलै “किछु कर्म भऽ गेलै आ किछु बाकी अछि। एकटाक जनम आ तीनक मृत्यु।” ज्योतिषी जीकेँ हरलनि ने फुड़लनि, नरमुण्डकेँ उठा झोरामे रखि लेलनि। घर आबि चुपचाप, एकटा उज्जर कप्पासँ बान्हि, चिनवारमे खोंसि देलनि। मुदा पण्डिताइनकेँ ऐ संबंधमे किछु ने कहलकनि। एक-आध दिनक बाद पण्डिताइनक नजरि ओइ उज्जर कप्पापर पड़लनि। सोचथि आखिर की बात छिऐ जे आन दिन जे किछु ज्योतिषीजी लाबथि तँ हलसि कऽ कहथि जे पण्डिताइन ई लिअ उ लिअ, हे एकरा राखू ओकरा उसारू। मुदा.....। पण्डिताइनकेँ हरलनि ने फुड़लनि ओ जिज्ञासावस कप्पामे बान्हलकेँ उतारि कऽ देलखनि, नरमुण्ड देखिते बताहि भऽ गेलीह आ तामसे ओइ नरमुण्डकेँ उक्खरिमे दऽ समाठ लऽ बढ़ियासँ कुटि बुकनी-बुकनी कऽ देलनि। आ एकटा सीसीमे ओइ बुकनीकेँ भरि भनसा घरक चारमे खोंसि देलनि। आ सगर पोखरिमे एकटा मात्र पोठी जे कहबी छै, अति सुन्नरि नाम सुनयना वएस सोलह बर्ख अपन बेटीकेँ कहलनि- “ऐ सीसीमे माहुर अछि। एकरा कियो ने छुअए आ ने खाए, जौं खएत तँ मरि जाएत।” सुनयना नामक अनुरूप ओतबे सुन्नरि। बेस गोरि-नारि नमगर-छड़गर-पोरगर केराक वीर जकाँ कोमल आ सुन्दर। सोल्हम साउन पार केने, अनेरे आँखियोक भाषासँ गप्प करैवाली। सुनयनाक आँखिमे धार तेहेन जे बिनु कटनहि आँखिसँ घाएल करैवाली। दिन-राति प्रेमक बोखारमे बौआइतो मुदा ज्योतिषीक मर्यादाकेँ अखन धरि बचौने। उमेरक संग जे लांछन होइ छै से एक-कान-दू-कान होइत पण्डिताइन आ ज्योतिषी जीक कानमे पहुँचए लगल। कहबियो ठीके छै जे बेटी जखन जुआन होइ छै तँ घरबैयाकेँ बादमे मुदा बहरबैयाकेँ पहिने पता लागि जाइ छै। टोल-पड़ाेसक लोक काना-फुसी करए लगल जे पण्डिताइनक बेटी तँ फल्लमाक बेटासँ बुढ़ियागाछीमे गप-सप्प करै छलै। एक-आध दिनक बाद फेर कियो गप्प उखाड़ि दइ जे ज्योतिषी जीक बेटी तँ अरूण डाक्टरसँ हँसि-हँसि कऽ काली स्थानमे गप करै छलै। एकदिन सुखेतोवाली कनिया बाजलि छलीह जे पण्डिताइनक बेटी रामदेब बाबूक खेतमे बदामक साग तोड़ै छलै। हुनक मझिला बेटा आड़िपर ठाढ़ भऽ रेडी बजबै छलै आ बड़ीकाल धरि दुनू गोटे हँसि-हँसि कऽ गप-सप्प करै छलै। अर्थात् एक-आध दिनक पछाति सुनायनासँ जुड़ल कोनो-ने-कोनो गप्प-सप्प चलिते रहैत छलै। ज्योतिषीजी बेटीक ई किरदानी सूनि सत्यनारायण भगवानकेँ कहथिन- “हे भगवान एक तँ एकटा कुलकन्या देलह, तहूपर एतेक मानि हानिक गप्प! एे सँ तँ खनदानक बड़ हानि भऽ रहल अछि। ऐसँ तँ नीक होइत जे सुनायना जहरो-माहुर खा लइतए आ ऐ दुनियाँसँ उठि जइतए।” ई गप्प बूझू जे हरिदम ज्योतिषी जीक मुँहसँ निकलैत रहै छलनि। सुनायना एकदिन सुनलक, दोसर दिन सुनलक आ तेसर दिन जखन सुनैत-सुनैत बरदाससँ फाजिल भऽ गेलैक तँ सोचलक जे भनसा घरक चारमे माए तँ माहुरक एकटा सीसी खोंसि रखने अछि। से आइ उ माहुर खा अपन प्राण तियागब। सुनायना ओइ राति सएह केलक। मुदा ओ तँ जहरक सीसी छल नै। छल तँ ओइ नरमुण्डक चूर्ण जइपर लिखल छलै, किछु भऽ गेल आ किछु बाकी..। जे खएलासँ सुनायना मरल तँ नै मुदा गर्भवती जरूर भऽ गेलीह। आब तँ दिन बीतल, मास बीतल। एक-कानसँ-दू-कान गुल-गुल हुअए लगल जे ज्योितषीक बेटी तँ आब पेटसँ छैक। एत्ते दिन कहै छलियनि तँ ज्योतिषीजी आ पण्डिताइन मुँहपर माछियो ने बैसए दैत छल। विसबासे ने होइत छलनि। अाब देखथुन अपन बेटीक किरदानी। जे बापक दुलारू धिया दूरि गेली दूरि गेली, आ माथापर तम्मा लऽ कऽ उड़ि गेली उड़ि गेली। आब देखथुन जे बेटी केहेन कुलगोरनि छन्हि। देखिते-देखिते नअो मास बीतल आ सुनायना देलनि एकटा अति सुन्दर बालकक जन्म। जेकर भाग्यक रेखा किछु औरे कहि रहल अछि। मुदा पण्डिताइन आ ज्योतिषीजी ओकर नाओं रखलनि ‘कुकर्मा’। एक दिनक गप छी। जे ओइ राज्यक रानीकेँ माछ खएबाक मोन भेलनि। राजाक आदेश भेल, मलाह बजाओल गेल। नीकसँ-नीक माछ मारबाक आदेश दऽ देल गेल। संयोग एहेन जे कनिये कालमे निक्के माछ ऊपर भेल। मलाह राजाक आदेश पाबि सोझे रनिवास धरि गेल आ रानीक हाक देलकनि। हाक सुनि रानी महलसँ बाहर एलीह। तँ देखै छथि जे आंगनमे बड़ सुन्दर माछ राखल अछि। मुदा माछ देखि जेतबए मन प्रसन्न भेलनि मल्लाहकेँ देखि मन ततबए दुखी। किएक तँ मल्लाह रानीकेँ देखि लेलकनि। रानीकेँ तँ तामसे मन माहुर-माहुर भऽ गेलनि। मनमे उठलनि जे केहेन मुर्ख राजा छथि जे हमर इज्जतिकेँ इज्जति नै बूझि जेकरे-तेकरे महलमे पठा दैत छथि। ई तँ नीक बात नै भेल। आ तामसे मलहाकेँ, अनाप-सनाप बजैत धक्का दऽ बाहर करबा देलकनि। आंगनमे जे माछ राखल छल। ओ ई सभ खेला देखि जखन बर्दास्त नै भेलै तँ ओ माछ हँसि पड़ल। आब तँ रानीकेँ कोनो अर्थे नै लगनि जे माछ हँसल तँ किअए? आब रानी राजाकेँ कहलनि- “ई माछ हँसल किअए, से कहू नै तँ हम अन्न-पानि तियागि देब।” रानीक गप सुनि राजाकेँ किछु फुरबे नै करनि। असमंजसक स्थितिमे आबि राजा भरि राज्यमे ढोलहो दिआ देलखिन जे रानीकेँ देखि माछ किअए हँसल? जे ई बात बता देत ओकरा भरपुर इनाम भेटत अन्यथा छअ मासक जहल दऽ देल जाएत। राज्यक पैघसँ पैघ विद्वान, पण्डित, ज्योतिषी लोकनि एलाह। दरबार लागल। मुदा माछ किअए हँसल रहए से कारण कियो नै बता सकलाह। जइ कारणे हुनका सभकेँ छअ मासक जहल दऽ देल गेलनि। अंतमे धरमपुरक ज्योतिषीजी बजाओल गेलाह। अबेर भेने ज्योतिषीजी राजाकेँ समाद पठा देलनि जे आइ तँ आब अबेर भऽ गेल तँए आइ नै, काल्हि तरगरे आएब। प्रात भने ज्योतिषी स्नान-धियान कऽ चानन-ठोप दऽ विदा भेला राज-दरबार दिस। कुकर्मा जे बथानपर मालक थैरमे खेलाइत छल, देखलक जे ज्योतिषीजी चलला राज-दरबार दिस। कुकर्मा बाजल- “नाना, यौ नाना कतए जाइ छिऐ? हमहूँ जाएब यौ नाना।” ज्योतिषीजी अनेक प्रकारे कुकर्माकेँ फुसलौलनि। मुदा तखनो कुकर्मा बात मानक हेतु तैयार नै। एक्केटा जिद्द धेने जे आइ हमहूँ जाएब अहाँ कतए जाइ छिऐ। हारि-थाकि ज्योतिषीजी बजलाह- “राज-दरबार।” “किअए?” -कुकर्मा बाजल। ज्योतिषीजी कहलखिन- “रानीकेँ देखि माछ किअए हँसल, राजा ऐ रहस्यकेँ जानए चाहै छथि। जे सही उत्तर देथिन तेकरा उचित इनाम भेटतैक अन्यथा छअ मासक जहल। से तूँ अखन धिया-पुता छह नै जाह।” मुदा तैयो कुकर्मा मानैले तैयार नै। फेर बाजल- “नाना अहाँ बुतै ऐ बातक जबाक नै देल हएत। अहाँकेँ तँ ई बुझले नै अछि जे हमर माए कोन कुकर्म केलक आ तइ दुआरे हमर नाम कुकर्मा राखल गेल। की अहाँ वा कियो देखने छेलिऐ? से नै तँ अहाँ राजाकेँ जबाक की देबै। अहाँ हमरा नेने चलू राजाकेँ हम जबाब देबै। नै तँ अहाँकेँ छअ मासक जेल हेबे करत।” ज्योतिषीजी कुकर्माकेँ संग कऽ लेलनि। पहुँचला राज-दरबार। दरबार लागल। प्रश्नक संग शर्त राखल। सुनि ज्योतिषी बजलाह- “ई छोट-छीन प्रश्न हमरासँ नै पूछल जाए। एकर जबाब हमर नाति कुकर्मा देत।” राजा एक िदस कुकर्माकेँ देखथि तँ दोसर दिस प्रश्नक जटिलताकेँ। मनमे भेलनि जे आइ दुनू गोटाकेँ जलह लिखले छन्हि। प्रश्न सुनि कुकर्मा बाजल- “राजा सहाएब, ऐ प्रश्नक रहस्यकेँ नहिये बूझू तहीमे कल्याण अछि।” मुदा राजाक जिज्ञासा बढ़िते गेल। अंतमे राजा आदेश पाबि कुकर्मा बाजल- “राज सहाएब, अखनो सोचि लिअ। भलाइ अहीमे अछि जे नै बुझियौ। अन्यथा अकल्याण निश्चित।” मुदा राजा बातकेँ मानैले तैयारे नै होथि। तखन कुकर्मा बाजल- “जौं अपने ऐ रहस्यकेँ बुझबे करब तँ रानीकेँ राज-दरबारमे बजाओल जाए।” राजाकेँ आदेश पाबि रानी आ हुनक दुनू दाइ सेहो बजाओल गेल। कुकर्मा बाजल- “राजा सहाएब, दस हाथक दुरीपर दूटा खम्हा गारल जाउ। आ भरि जाँघ ऊपरमे एक खम्हासँ दोसर खम्हामे एकटा मजगूत रस्सी बन्हबा देल जाउ।” तहिना कएल गेल। ओकर बाद कुकर्मा रानीकेँ कहलक- “रानी, आब अहाँ ऐ रस्सीकेँ फानू।” रानी रस्सीकेँ फानि गेलीह। तकर बाद रानीक संग आएल एकटा दाइकेँ कहलक जे आब अहँू ऐ रस्सीकेँ फानू। दाइ फानए लगल। तखने कुकर्मा हुनक साड़ीक एकटा खुट पकड़ि लेलक। दाइ फानल सारी खूजि गेल। भरल दरबारमे दाइ चिन्हार भऽ गेलीह जे ओ दाइक रूपमे मौगी नै मरद छल। तहिना दोसरो दाइक सएह रूप। उहो दाइ मरदे। सबहक पोल खूजि गेल। तखन कुकर्मा बाजल- “राजा सहाएब, अखनो बुझलिऐ जे माछ किअए हँसल छलै? जइ रानीकेँ अपन प्रजाकेँ पुत्र वत्सल मानक चाही तकरा देखि ओ अनेरे क्रोधसँ आन्हर भऽ गेलीह। आ अनेको तरहक बात कहलनि। मुदा जे स्वयं स्त्रीक भेषमे दूटा मरदकेँ अपन भजार बना मौगीक रूपमे रखने छथिन। तकर कोनो लाजे-गराइन नै। यएह सभ किरदानी देखि, तखन उ माछ हँसल छल।” राजा सभ वृतान्त देखि सुनि म्यानसँ तलबार निकालि रानी सहित दुनू मरदकेँ दू-दू खण्ड काटि देलक। जहलमे भरल सभ विद्वान आ ज्योतिषी लोकनिकेँ मुक्त कऽ देल गेल। धरमपुरक ज्योतिषी जीकेँ उचित आदर-सम्मानक संग प्रयाप्त अशर्फी पुरस्कार स्वरूप देल गेल। ज्योतिषी जीकेँ कुकर्मा प्रतापे जय-जयकार भेल। ऐ तरहेँ ओइ मुण्डपर लिखल ई बात सत्य भऽ गेल- जे किछु होतब से भऽ गेल, किछु बाँकी छै एकक जन्म आ तीनक मृत्यु। ऐ तरहेँ कुकर्मा अपनो खूब नाम कमेलक आ अपन माए सुनायनाक लाज बचेलक। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। आशीष अनचिन्हार आधुनिकताक समस्या ( आलोचना ) जागरण, पुनर्जागरण वा नवजागरण दुनियाँक हरेक हिस्सामे अपना समय पर होइत एलैए मुदा ओकर व्याख्या हरेक समयमे अलग-अलग ढ़गसँ होइत छै। एकटा घटना जकरा पहिल लोक जागरण मानैत अछि तँ दोसर ओकरा पुनर्जागरण मानैत अछि तँ तेसर नवजागरण। आ एही तीनूक दृष्टिकोणक व्याख्यासँ आधुनिकताक सूत्रपात होइत छै। पश्चिमक पुनर्जागरणसँ प्रभावित मनुख सभ सुविधाकेँ अपना नाम कए लेलक। ई पुनर्जागरण मात्र सुविधा नै बल्कि हमर सभहँक मान्यता, भावना, विचार, आचरण, व्यवस्था आदिमे सेहो परिवर्तन केलक। एही पुनर्जागरणक कारण परस्पर विरोधी संस्था आ व्यवस्थाक जन्म भेल। राष्ट्रीय आ अंतरराष्ट्रीय सत्ता एवं नियंत्रणक चालि-चलन आएल। आ एही कारणें परंपरागत आस्था आ प्रेर मूल्यमे कमी आएल।साहित्य आ कलाक क्षेत्रमे अतियथार्थवादक जन्म भेल, साझी आश्रमक विघटन भेल आ मनुख एकौर भए गेल जाहि कारणें मनुखक विवेक आ आत्मनियंत्रणमे कमी आएल। महानगरसँ होइत नग्र आ गामक संबंध जटिल बनि गेल छै। जीबनमे नीरसता, असुरक्षा, दुश्चिन्ता, विक्षिप्ता आदि बढ़ि गेल छै। नव-नव बेमारी उपकि रहल छै खास कए हृद्य रोग,बल्डप्रेसर आ अनिन्द्रा। तहिना लोकक रुचि सेहो बदलि गेल छै। जतेक तेज गीत-संगीत बाजत ओतेक नीक मानल जाइत अछि। तेनाहिते साहित्यमे सेहो अभूतपूर्व परिवर्तन भेल अछि। अपराध कथा, सत्यकथा, आ मनोहर कहानी सन साहित्य केर डिमांड जोर पर अछि। आ ऐ तरहें मनुखक जीवन शैलीमे सेहो परिवर्तन भए रहल अछि। संगे संग मनोवृतिमे बहुत बेसी। आजुक समयमे मनुख लग ने सहनशीलता छै आ ने बात बुझबाक समय। आ एही दुआरे आब लोक बात-बात पर हतोत्साहित भए जाइत अछि। आशा,उम्मेद जाहि कौआ केर नाम छै से आब केकरो टाट पर नै कुचरैए। एखन हम साल 2006मे बनल आ मे गिब्सन द्वारा निर्देशित फिल्म एपोक्लिप्टो बाइसम बेर देखि कए उठलहुँ अछि। ई फिल्म मेक्सिको केर भाषामे जकर नाम Yucatec छै आ "माया" सभ्यता पर आधारित छै। ऐ फिल्मक शुरुआतमे एकटा कबीला अपना गाममे शांतिपूर्वक खा-पीक आनंद मना रहल अछि। तखने दोसर कबीला दिससँ हमला भेलै। पहिल कबीला हारि गेल आ ओकर गामकेँ जरा देल गेलै। नायक सहित अधिकांश आदमीकेँ बन्ही बना लेल गेलै। मुदा गर्भवती नायिका अपन एक मात्र बच्चाक संग बचि निकलैत अछि आ सुरक्षा लेल गँहीर खत्तामे शरण लैत अछि। बंदी बनेलाक बाद विजेता बंदी सभकेँ अपना कबीला लए जाइत अछि। भाट भरि नायक अपनाकेँ आ अपन संगीकेँ बचेबाक प्रयास करैत अछि मुदा से सफल नै होइ छै। एम्हर नायिका जे खत्तामे छै से नाना प्रकारक कष्ट सहैत बच्चा संग समय बितबैत अछि। एकाएक बर्खा अबैत छै आ सेहो झमटगर। नहुँ-नहुँ खत्ता भरए लागैत छै। पानि जखन डाँड़ भरि भए जाइत छै तखन नायिकाकेँ प्रसव पीड़ा होइत छै....................आ ओही पानिमे बच्चाक जन्म होइत छै। नायक अपन संगी सभहँक संग विजेताक राज्यमे आबि गेल अछि। राज्यक हाटमे किछु बंदीकेँ बेचल जाइत अछि आ किछुकेँ राजाक सामने देल जाइत अछि। राजाक सामने उपस्थित भेला पर राजपुरोहित द्वारा पर सूर्यपूजा केला बाद बलि लेल अयोग्य बंदी सभकेँ छाँटि योग्य बंदीकेँ नायकक सामने बलि चढ़ा देल जाइत छै। अंतमे नायककेँ वेदी पर सुताएल जाइत छै कि तखने...........................मेघ झाँपि लेलकै। आ तखने राजपुरोहित सूर्यकोप मानि ओहि दिन लेल बंद करबा देलक। आ नायक बलिसँ एना बाँचि गेल। मुदा मृत्यु एखनो लीखल छलै। नायक सहित सभ बाँचल अयोग्य बंदीकेँ एकटा मैदानमे आनल गेलै आ सभकेँ भागए कहलकै। आ भागैत बंदी सभकेँ निशाना साधि-साधि मारकल। मुदा नायक एतहुँ बाँचल आ भागि पड़ाएल। विजेता सभ ओकर पाँछा केलक आ करैत रहल मुदा नायक भागैत आ बाँचैत रहल। आ भागैत-भागैत नायक समुद्रक कछेरमे पहुँचैत अछि आ देखैत अछि जे ओम्हरसँ एकटा जहाज आबि रहल छै। नायक फेर पाछू तकलक, ओकरा पकड़बाक लेल विजेता तैयार मुदा ओहो सभ जहाजकेँ देखि सहमि गेल छल आ पाछू हटए लागल छल। आ एना नायक बाँचि गेल आ अपन परिवार लग पहुँचल। ऐ फिल्ममे हमरा सभसँ नीक गप्प लागैए जे हरेक सीन, हरेक कथन आशासँ भरल छै। खास कए तीन ठाम पहिल- जखन खत्ताक पानिमे बच्चाक जन्म होइत छै, दोसर--जखन नायककेँ बलिवेदी पर सुताएल जाइत छै आ तेसर-- जखन नायक जहाज आ अपन दुश्मन बीचमे रहैत अछि। ई कथानक पढ़लासँ आशाक कनेकबे दर्शन भेल हएत। फिल्म देखू हरेक शाट आशामे भीजल छै। ई फिल्म आधुनिक कालक थिक मुदा जखन कालिदास मेघदूत लिखला तखन की सोचि यक्ष द्वारा मेघकेँ दूत बनेलाह। मेघ निर्जीव छै ई बात कालिदासकेँ पता छलन्हि आ नायक यक्षकेँ सेहो। की ई आशावादक चरम नै थिक। आ जा धरि मेघ यक्षणी लग समाद लए पहुँचैत अछि ता धरि श्रापक समय खत्म। बात जखन मैथिल कोकिल विद्यापतिकेँ ( ओ विद्यापति जे की गीत लिखला) तखन हुनक गीतमे भक्ति आ श्रृंगार जतेक रहैए ताहिसँ बेसी आशा रहैत अछि। किछु भए जाए विद्यापति अपन आशाकेँ नै छोड़ै छथि। चाहे पति परदेशमे होथिन्ह मुदा ओ नायिकाकेँ जरूर कहै छथिन्ह जे चिन्ता नै करह तोहर प्रिय जरूर अबिते हेतह। एहन बहुत उदाहरण अछि, किछु देखल जाए---- 1 लोचन धाय फोघायल हरि नहिं आयल रे ! सिव-सिव जिव नहिं जाय आस अरुझायल रे !१! …....................................... सुकवि विद्यापति गओल धनि धइरज धरु रे ! अचिरे मिलत तोर बालमु पुरत मनोरथ रे !४! 2 कान्ह हेरल छल मन बड़ साध ! कान्ह हेरइत भेलएत परमाद !१! …................... विद्यापति कह सुनु बर नारि ! धैरज धरु चित मिलब मुरारि !७! 3 के पतिआ लय जायत रे, मोरा पिअतम पास ! हिय नहि सहय असह दुखरे, भेल माओन मास !१! …........................ विद्यापति कवि गाओल रे, धनि धरु मन मास ! आओत तोर मन भावन रे, एहि कातिक मास !४! ई मात्र किछु उदाहरण अछि। उपर जतेक गीत हम देलहुँ ताहिमे गौर कए देखू भक्ति आ श्रृगांर तँ मात्र बहन्ना छै। मूल बात तँ छै आशा देब, केकरो नोर पोछब। भक्ति आ श्रृगांर विद्यापतिक गीतमे मात्र साधन अछि साध्य नै। साध्य तँ छै निराशाकेँ हटाएब। विद्यापतिक गीतकेँ बहुत आलोचना भेलभक्ति आ श्रृगांरक चश्मा लगा मुदा आशावादक दृष्टिकोणसँ संभवतः ई पहिल आलोचना अछि ( जँ पहिले केओ केने हेताह आ प्रकाशित हेतै तँ एकरा हमर अज्ञानता बूझल जाए)। आ तँए विद्यापति हमर प्रिय कवि छथि। बात जखन लोकगीतक करी तँ एही आशा केर कारण " सोहर " हमर प्रिय गीत अछि। आ जखन हमरा लग किछु नै बचैत अछि तखन बेर-बेर हम विद्यापति गीत पढ़ैत-सुनैत छी। सोहर सुनैत छी, मेघदूतक यक्ष बनि जेबाक प्रयास करैत छी आ एपोक्लिप्टो देखैत छी। आइसँ तीन साल पहिने हमरा गामक जिनगी पढ़बाक मौका भेटल छल। लेखक छथि जगदीश प्रसाद मंडल आ ऐमे कुल 19टा कथा अछि। ऐ पोथीकेँ जाहि तरीकासँ हम पढ़लहुँ से रोचक प्रसंग अछि। भए सकैए जे ई प्रसंग अहाँ सभ लेल नीरस हो आ एकरा आलोचनाकेँ कमजोर कड़ी सेहो मानी मुदा हमरा बुझने आलोचना तखने सार्थक होइत छै जखन की कोनो पोथी मात्र " पाठक "क दृष्टिकोणसँ पढ़ला बाद आलोचकीय विवेकसँ लिखाइत हो। ऐठाम तँ किछु समीक्षक पोथीक नाम लिखै छथि, कथा पात्रक नाम आ घटना लीखै छथि आ अंतमे प्रकाशक नाम, पोथीक दाम आदि लीखि आपना आपकेँ समीक्षक मानि लै छथि। वस्तुतः ऐ प्रकारक आलेखकेँ पोथी परिचय तँ मानल जा सकैए मुदा समीक्षा वा आलोचना नै। तँ आबी कने अपन प्रसंग पर। अपान कम्पनीक टेन्डर भरबाक लेल हरिद्वार गेल छलहु भेल( BHEL ) मे। मात्र भरबाके नै छल बल्कि पूरा रेट हमरे तय करबाक छल। हम अपन बुद्धि हिसाबें रेट तय कए टेन्डर जमा कए देलिऐ। लगभग दस बजे रातिमे जखन टेन्डर खुजलै तखन पता लागल जे ओ हमरा हाथसँ निकलि चुकल अछि। हमर कम्पटीटर हमरासँ पाँच लाख कम रेट देने रहै। कुल मिला ओहि समयमे हम हतोत्साहित भए गेल छलहुँ। ई अलग बात जे तखनसँ एखन धरि हम 118टा टेन्डर जमा कए चुकल छी आ ओहिमेसँ 44टामे सफल सेहो भेलहुँ। मुदा हरिद्वारमे हम असफल भेल छलहुँ। मोन दुखी छल। मुदा ऐ घटना पर हमर कोनो वश नै छल। कुल मिला दू बजे रातिमे बस पकड़लहुँ। निन्न हेबाक प्रश्ने नै। हारि-थाकि कए ई पोथी निकाललहुँ ( हमर बैगमे हरदम किताब, हाजमोला आ मंच नामक चाकलेट रहैए ) आ सोझे-सोझ बीचक कथा " चूनबाली"क अंतिक पन्ना नजरि पर पड़ल आ ताहूमे अंतिमे पाँति सभ पर............................" फुलियोक नजरि मटकुरियाकेँ मुसकियाइत देखलक। एकटकसँ एक दोसराक आँखि गरौने अपन जिनगी देखए लगल" आ कि हमरो अपन जिनगी देखाए लागल। पूरा कता पढ़ि गेलहुँ। आ तकरा बाद पलथी ( बसक सीट पर पलथी मारि बैसब खतरनाक होइ छै ) मारि शुरू केलहुँ आ गुड़गाम अबैत-अबैत खत्म। सभ कथा पढी गेलहुँ। एक-एक पाँति पढ़ि गेलहुँ। मुदा हरेक कथाक अंतिम दू-तीन पाँति बहुत नीक लागल। कारण ई पाँति सभ हमर नोर पोछबाक काज केने रहए। ओहन समयमे जखन की हम अपन असफलता पर दोसर नग्रमे कनैत रही तखन " बिसाँढ़"क पाँति आएल " सुगिया दिस.........................परानी विदा भेल "। जखन हम दोसरक आशा चाहैत रही तखन " पछताबा " केर पाँति आबि गेल " पतिक............. गिनगी देखए लगलीह"। जखन हम ई सोचैत रही जे आब हम अपन सीनीयर लग की कहबै तखन हमरा लग " भेंटक लावा " केर पाँति आएल " मुँहसँ ठहाका............कैंचा गनए लगल"। मतलब जे हरेक कथा हमर नोरकेँ पोछबाक काज केलक। हमर हाथ पकड़ि उठेबाक काज केलक। आ तँए हमरा ई पोथी मेघदूत, पदावली, सोहर आ एपोक्लिप्टो नाकम फिल्मक आधुनिक स्वरूप लगैए। अर्थात कहबाक ई मतलब अछि जे जगदीश प्र.मंडल कालिदास, विद्यापति, सोहर पदक अज्ञात रचनाकार आ मेल गिब्सनक आधुनिक अवतार छथि। ऐठाम प्रस्तुत पोथीक आर बहुत रास विशेषता छै। जँ अहाँ महात्मा गाँधीक स्वराज दर्शन बूझए चाहैत छी तँ " गामक जिनगी " पढ़ू। जँ राजाराम मोहन रायक कुरीति भगेबाक अवधारणा चाही तँ " गामक जिनगी " पढ़ू। जेना सरदार पटेल राज्यसँ राज्यकेँ जोड़लाह तेनाहिते जगदीश जी गामकेँ गामसँ जोड़लाह आ ताहूसँ बेसी ओ लोककेँ लोकसँ जोड़बाक पक्षमे छथि। जँ गीताक कर्तव्य चाही तैयो " गामक जिनगी " पढ़ू आ जँ सन्यासक क्रम बुझबाक हो तैयो " गामक जिनगी " पढ़ू। कुल मिला कए ई पोथी हमरा हिसाबें डिप्रेस्ड आदमीकेँ समान्य करबाक क्षमता रखैए। आधुनिकतासँ जन्मल जते समस्या छै ताहिमे ई डिप्रेशन सभसँ बेसी खतरनाक छै ( कारण चाहे जे हो )। एहन समयमे जँ " गामक जिनगी " पढ़ल जाए तँ अपेक्षित लाभ भेटतै। ओना ई आशावादी दृष्टिकोण जगदीश जीक हरेक रचनामे भेटत आ ताहिमे एकटा प्रमुख नाम थिक हुनक उपन्यास " उत्थान-पतन "। तँए हम पाठक सभसँ ई अपेक्षा रखैत छी जे जगदीश जीक हरेक रचनाकेँ ऐ दृष्टिकोणसँ पढ़थि...... एना केलासँ निश्चित रूपें समाजक भलाइ हेतै। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। कामिनी कामायनी महानगर मे सुनीता “हाली हाली खा लू भनसा हो गैल है. . आ’ भीतरी से कुंडी लगा के सूति रहब।आ’ हे गे निसा .. तू देखीहै बौआ के .. . कोठरिये मे खेलीहै सब कोनो ।’अपन घरक सबटा काज निबटा क’ . . . तीनों धिया पुत्ता के खुआपिया क’एक गोट डिब्बा मे सूती साडी के लत्ता मे गिन गिन क’ सोहारी रखलक़ . दू गो नीसा. . दू गो रीता .. एगो बऊआ. . दू गो हम. . नीसा के पप्पा त’ खाईए लेलकै. . भाई जखनी औतै. . तखनी देखल जैतै. . ।अखनी त’ हम चाह पी के चल जाए छी .. ओ ठीना कोनो नै कोनो घर मे चाह बिस्कुट भेंटिए जाए है. .. आ’ दुपहरिया के खाना बनाब सॅ निचिन्त. . .आ जहिया नहि बनाबै . . भोर मे देर से ऑखि खुजै. . .त’ नीसा अपन सबके रोटी बना लैत छै. . पप्पा आ’ मामा के खुआ क’ ओकर लंच से हो बान्हि दैत छै. . मन मे सोचैत गुनैत मुस्कैत. ..नीसा के काबीलती पर गुम्हरैत . चप्पल पहिर क’ घर से निकलबा सॅ पहिने सोझा ठाढ तीनों धियापुत्ता प’ एक नजरि फेरैत ओ नीसा के फेर से सब बात बूझौलकै. . .घरवला एक कोना मे बैसल चुपचाप बीडी धूकि रहल छल. ।मुॅह प’ कोनो भाव नै. . कहियो नै रहलै आब कत्त से हौक . । जल्दी जल्दी ओ घरक सीढी उतरि गेल . . मुदा भरि बाट अपना संग चलय वाली संग फदकैत रहलै. . “हे गे सोनी .. कनियो देर हो जेत्तौ. .. .त’ ऊ जे बारह नंबर बाली हौ. . आगि उगले लगतउ मूॅह से ‘एत्ता देर क्यों हूआ. ..।’ हमरो बडा खीस बडलौ. . ।ठामे जबाब देलियै. . कोनो सरकारी नौकरी है .. जो हमको ऐसे डॉटते हो ।’मुॅह चुप्पे रहि गेलै ।आ उ जे सात नंबर बाली हौ. . .एक कप चाह पिया क’ बेटा बेटा करि के’ढेर के ढेर काज कराबे लगतौ . . ।कोनो नीम्मन घर पकडा जैतै .. त’ हम ओकरा छोडि देतीयै .. ।फोन अतउ त’ कहतौ .. तुम्हारा तो बहुत फोन आता है ।’ काज से घुरती काल टहटहौआ रौद .. .सुशीला के काज सेहो एक बजे धरि खतम हो जाय छै. . त’ एक घर बचलै . .कपडा वला. . जे काल्हियो हो जैतै .. कौन बेगरता है. . सोचि के ओहो ओकरा संग घर चलि पडल छल .. ।सुरेनदर भेटलै रस्ता मे. . .ई चिकरल ‘हौ जीजा .. .बिजली बला काम हमे डेढ सौ से एक दमडी कम मे नहीं करबौ. . .।’ओ चुपचाप मुस्कैत जाईत रहल छल .. .। ‘आहॉ के बिजलियो के काज आबै है।’सुसीला अकचका क पुछलकै त’ ओ फुलि क’ तुम्मा होईत बाजल “हे हम सब काज कयले हीयै. . .घर बनाबे के रोजा मिसतिरी बला .. माली बला .. सब्जी उपजाबए बला. . . .सब काज केले छिए इहॉ पर .. .गाव मे रहिए त’ हमर बडकी दियादिनी. . राति क ले जाए रहै खेत मे कटनी करवाबै ।’ घर पहुॅचल त’ दरवज्जा खूजल देखि क’ ओकर करेज हिल गेलै. . .नीसा के बाबू. . फोंफ काटैत नीचा मे बीछल चादर पर ओंघडायल. . .तीनों मे से एको धियापुत्ता ने घर मे. . उनटे पैरिए भागल जेना बिच्छा डंक मारि देने होय पैर मे .. .पाछॉ बाला पारक मे ताकल .. पीपरीक गाछ तरे मझली बेटी रीता कानैत ठाढ .. .माय के देखिक ओकर कोढ आर फैट गेलै. . “मम्मी बौआ हेराय गेलौ. . दीदी गेलौ है खोजे. . .।’ ओ त’ पहिनहीं सॅ आतंकित. . .बिन क्षण गमेने. . लग के मस्जिद मे मौलवी लग पहुॅचल. . .आ मौलवी के कही सुनी के निहोरा पाती करैत माईक सॅ एनाउंस करबा देलकै. “डेढ बरक के बच्चा. . रंग गोरा. . गरा मे करिया तागा .. लाल रंगक टी शर्ट पहिरने. . माथ पर बडका बडका झोंट .. .हेरा गेल छै. . जे भले आदमी के भेटै. . .कृपाकरी क’ ओकरा सेक्टर तीन के महजिद पर आनय के नेक काज करौ ।त एही काजक एवज मे अहू के अल्ला दौलते असबाब से भरि देत।’ मौलवी के बोल भरोस पर ओ कनी हल्लुक भ क’ अप्पन घर दिसा बढल त’ बडकी बेटी नीसा सेहो पारक दिस से आबैत छलै.। .मम्मी लग दौडल . . ‘पप्पा सूति रहलौ .. .दरवज्जा खूजल देखि के बऊआ नीचा जाय लेल जीना से एतना तेजी से उतरलौ. . कि जाबेत हम चप्पल पहीरिय पएर मे ताल्ले त उ निपात्ता .. .।’ भायक प्रेम से बेसी मतारी के भयानक आतंक .. आब त’ झोंट पकडि क’ हमरे मारत ई सोचि क’ सात बरखक नीसा ऑखि से ढरढर नोर बहाबैत जोर जोर से कानय लागल छल। दूनू बेटी के ल’ क’ ओ घर आयल .. घरबाला तखनि धरि फोंफे कटैत रहै. . ।पीत्त से आन्हर सुनीता पहिने त’ अप्पन माथ कपार के’ पीट अपन भाग्यके सरापलक़ . जे केहेन निकम्मा जोरे भगमान ओकरा बॉध देने हथीन .. .।तेकरा बाद सूतल आदमी के पएर झीक झीक क’ उठौलक .. “हे उठू नै .. इहॉ परलय मचल है आ अहॉ निभेर भेल सूतल हती .. देखीयौ. . .बौआ काहॉ चल गेलइ .. .माय गे माय ।’आ’ कानय लागल ।. . .. “बौआ कहॉ चली गेलै. .’ई वाक्य जेना ओकरा कान मे घुसि माथ फोडैत निकैल गेल होय .. ।बौआ .. पाथर पर के दूब .. .सोरह सोमबारी कैलकै. . तखनी भगमान देलखिन .. ततेक धडफडा के उठलै . . . जे खिडकी के पल्ला से माथ मे ठॉय चोट लगलै. . कपार दबने उठी के बैस त’ रहल मुदा एको आखर मूॅह से बहरैलै नहिं ।सुनीता बजैत रहलै . .कनैत रहलै. . ।फेर पाछॉ घुरि क’ कहलहक ‘दूनू बहिनी घर बन्न केने रहिए कोनो आदमी कहतौ त न खोलिहै. . .आ’ अहॉ चलू हमरा जोरे . .पुलिस लग .. आ’ जीजा के सेहो फोन करि दैत छिए।’ भाय परसू सेहो ताधरि डिउटी पर से आबि चुकल छल । सब मिलक’ फेर से मस्जिद पर पहुॅचल .. .ताबैत घंटा भरि भ’ गेल छलै . .आ’ कियो अनठिया सेक्तर तीन के झूलाबाला पारक के गेट पर कानैत ओही डेढ बरखक बच्चा के उठा क’ मस्जिद प’आनि क’ राखि देने छलै. . . बौआ के देखक सुनीता के जान मे जान अयलै।हुलसि क’ ओकरा कोरा लेलक आ दूनू हाथ से कसि क’ अपन करेज मे सटा लेलकै. . .अनमोल धन हमर. . । अहि अलबा दोलबा मे सांझ पडय लगलै. . त’ दौडल सांझ बला काज लेल । .. .राति क’ भनसा बन्ोबा काल. . .घरबला के खूब खूब लोहछि क’ कुबोल सुनोलक़ . . ‘बच्चा तक अॉहा के देखे पार नै लगैय. . . . मकान मालिक किराया मॉगे आबै है त’ अहॉ लुका जाय छी .. एतनो नै .बोलल होइय जे दू तीन दिनक बाद आऊ . .बा घरे प किराया पहुॅचा देबए. . .पेठिया से तीमन तरकारिए आनि क’ राखि लीअ. . खाली मुॅह लटकौने . .धौना गिरौने बैसल रहता जे बलु है न सुनीता सरदार ।’ “तू ही न पहिलुका नौकरी छोडबा के ई लगबा देले है. . जे इहॉ बेसी पैसा भेटत. . आब नाइट गाड के दूनू सिप्ट के नौकरी करि के त’हमर पराने निकल जेतै. . .हम नै करबौ ई नोकरी गावे चल जैबे .. ऊहें खेती पथारी करबै. . .।’ गाव के नाम सुनि सुनीता के दिमाग जेना आसमान से धरती पर आ गेलै .. . ‘नै .. दूनू सिप्ट के नोकरी नै करू एके बेर करू. . तनिका आरामो त जरूरी है.इए है .. .।’ ओकर अकड कनि कमजोर पडलै .. स्वर सेहो कनि मोलायम .. .”सूतू त’ तनिका कुंडी त लगा लैतीयै भीतर से केत्ते फिरीशानी होलै . ।” “हे हम कुंडी लगाबए लगलियै त’ नीसा चिकरए लगलै. . नै करहू बन्न .हम नीचा खेलय जेबै त’ हमे की करितीयै. . ।’पति अपन पल्ला झाडि सात बरखक बेटी के माथ प’ राखि देलकै. . .जेकरा इसकूल छोडबा के दूनू छोट भाई बहिनी के देखभाल करै के जिम्मेवारी के संगे आटा सानब .. रोटी पकायब बरतन मॉजब दोकान से बीडी गूटका आनब आ’ आर आर काजक संग कतेको काज करए पडैत छलै. . .उठौलक माय छोलनी आ’ दे दनादन .. .पीठ प’ दू चारिये छोलनी सॅ कमजोर बच्चा . .फर्श प’ खैस पडले. . चान्ह आबि गेलय जनू .. . ई देखि ओकर मगजक पारा तुरंते नीच्चा आबि गेलै. . .”हे संतोषी माय .. ई की भेलै .. .. गै .. बऊआ .. .नीसा .. गै .. ऑखि खोल नीसा .. .’ कोरा मे ल’ क’ पानि छिटलकै मुॅह प’. .ठोर अलगा क’ पानि ढारलकै मुॅह मे .. . .. .कनी काल मे नीसा ऑखि खोललकै. . . । “धिया पुत्ता के एना नै मारे के चाही ।’ बाप कुनमुनेलै. . त’ मूॅह लटकौने माए .. .सब के भोजन भात कराक’ अपनहू खा पीबी क’ सूति रहल छल. . .घरवला के त’ रतुका डिउटी .. .ओ त’ गेल काज प’ । “हे दिन त’ सब कोने के फिरीसानिए मे कटै हैक . . निफिकिर चाही त’ गावे मे न रहितीयै. . ।ऑय हे. . राति एतना हो हल्ला मारपीट काहे भेल. . .।’ “क़थी कहियो बहिना .. .छोटका बौआ के फल फुला के तुम्मा भ’ गेल है भरि भरि राति कानैत रहै है. . ई त’ भिनसरे खा पीबि क’ अपन टैंपू निकालि क’ काम पर चल जाए है. . .. कनिये हटि क’ हमर बाप मतारी के घर है ।त’ काल्हि खुन बच्चा के ले के हम डाकडर के देखाबे गेलीयै. . .आबैत जात बेरो हो गलई आ थाक़ सेहो गलियै .. .हम माय भीरा खा लेलीयै. . .सोचलियै. . .जे एकर पप्पा त’ रोज बाहरे खाय है. . ।काल्हि बाहर न खैले रहै. . .रोटी के डिब्बा खोललक त’ खाली .. .बस पीत्ते आन्हर. . .सूतलाहा बच्चा के डेंगा उठा के जाय रहै फेके बाहर . . दारू के नसा मे सांड बनल. . त’ हमहूॅ पीत्ता गेली. . गैस के पाईप खोलिक अपना देह मे आग लगबै लगलियौ. . ओ’ त’ पडोसिया हल्ला सुनि के दौडलै. . आ’ हम्मर चुन्नी से आगि मिझैलकै. . .दू थापड मरदावा के मारबो कैलकै .. .तखनि जा क’ सांत भेलै ।’ “जे बूझे छियै . .त’ कथी लै नहिं दू गो रोटी बना के सदिखन घर मे रखने रहै छी. . ऊ न खतई त’ धिया पुत्ता खा लेतै. . कोनो जिआन थोडे न होत. .।’ मीना के हिरदय एखेन धरि ओही आगि मे झुलसि रहल छलै. . ।ओकर स्वर बदलि गेलै. . “मार मू झौंसा के ओकर करेज नै डाहब जे आब दलीद्दर के भनसा करि क’ खुएबै. . .हम त’ जाय हिए माय भीरे ।’ सुनीता के करेज ओकर दुख से पसीझ गेलय ।ओ ओकर मदैद करए चाहलकै. . “के भर जिनगी बैठा के खुऔत. . .कोनो काज किए नै पकडि लैत छी. . काज के कोन कम्मी है. . ईहॉ पैसा बरसै है. . .कोठी वाली सब के कनि आटा सानि दिऔ त’ दू सौ टाका. . सब्जी काटि दियौ ..एक टैम खेनाई बनाए के अढाई हजार .. .। अहॉ के बीमार बच्चा ठीक हो जाएत त’ पकडि लेब माय तनि बच्चा के त’ राखिये लेत न. . ।’ ओकर नजरि एके संग पानी के टैंकर आ’ अपना घर के सोझा खटौली प’ बैसल बुधनी प’ पडलै. . “हे बुधनी पानी के गाडी अलौह जो भर ले डिब्बा सब मे. ।’ ओकर सलाह प’ बुधनी उछलि क’ बाजल ‘ओ जंग त’ मारा पीटी हो रहल है ।’’ ‘है चल. . हमहू चलै छियो देखे हिये केकर बाप के मजाल है . . . न भरे देतई. . .।’पॉच पॉच लिटर के दू डिब्बामे .. .भीड मे घुसि घासि क’ कहुना ओ भरिये नेने छल।बुधनी के कहलकै. ‘जखनी देखीहै ..टैंकर हमरा फोन करि दीहै. . हम दौडल आबि के पाानि भरबा लेब तोरो आ’ अपनो।’चार चार दिन प’ पानी आबै है .. त’ लोक की करतै. । सडक टपि क’ सीधा पबलीक इसकूल छलै . .. आ’ ओकरे सीधा मे ओ कालोनी जाहि सॅ सटल ई गाम.. जतय किराया प’ कोठरी ल’क’ ई सब रहै छलै. . . ।काज प’ अबैत जायत ओकर नजरि इसकूल के गेट प’ ठाढ माली प’ पडलै. . कई दिन सॅ ओ सोचैत रहै ओकरा सॅ गप करए के. ।ओही दिन ओ झटकि क’ ओकरा दिस बढल आ गप सप्प मे पता चललै जे ओहो ओकरे ईलाका दिसुका छै. . . अही ठिना माली गिरी के ठिका नेने हैय. . .। ‘ माली के काम त’ हमहूॅ करैत रहलियै ह’ बिजबासन के फारम मे . .. बडकी चूकी नरसर्ररी रहलै ह. . बडका बडका गमला उठाबी राखी. . .खाद पानी दियै. . निकौनी करियै. . बडी दिन तलक हम ऊ सब काम कयले हियै. . .।’. . . “त’ काहे छोडलू. . .उहॉ . ।’ “फारम के मालिक त’ बडा मानैत छलै हमरा. . .ओही मे ओकर बडका कोठी रहलै ह’. . हमरा बौआ के जनम मे हमर कोठरीपर आके पच्चीस सौ रूपीया देने रहै .. कहलकै. . “जे एकर जनम हमरे जनम दिन हुआ ह’ै देखना ई कतना बडा आदमी . बनेगा. . .मुदा ओ त’ सदिखन बाहरे रहैत छलै. . . आ ऊ ठेकेदरबा पैसा देबै मे.. .बडा हरामी . .. सब सनि रबि के पैसा के खातिर ओकरा से झगडा फसाद होय. . . ।अही से इहवा चलि अलीयै .. ।” आ बड चलाकी सॅ मुसैक मुसैक क’ ओ अपन घर बाला आ’ भाय लेल माली के काज गछबा लेलक़ “कि होतै. . रात मे डिउटी करथिन आ’ दिन मे माली के काज क’ लेथीन. . दूनू सिप्ट गाड के काम मे बडा परेसानी तनिको आराम नै. . .।.’ प्रसन्नता के मारे ओकर पएर जेना हवा से बात करए चाहै. . .हाली हाली पहुॅची घर आ’ हाली से बताबी ई खबरि . . । “कि है. . काहे एतना धडफडी देखा रहल छहू .. . ।” जीजा सेहो कोठरिये मे बैसल भेट गेलय. . ।आ डबल नोकरी के गप सुनि सब कियो के मन ताताथैया करए लगलै. . .। ‘चलू कुछो नींम्मन पकाऊ. . .खीर पूडी बनाऊ ।. .पाटी करू. . ।आय हमरा तरफ से. . ... जो गे नीसा . . लछमीया के दोकान से .. .एक पैकेट दूध आ’ आधा लीटर तेल नेने आ. . .. . आटा है न कि उहो मॅगाबे के पडतै. . . .. ।’ सुनीता के जबाब मे ‘कि आटा हो जैते’ ओ बड अधिकार सॅ अपन शर्ट के जेब सॅ नमरी निकालि नीसा दिस बढौलकै. . त’ नीसा उछेल पडलै. ‘हम चिप्स लेबै. ।’ अपन उदारता के परिचय दैत जीजा पचास टाका और निकाललक . .. .रीता सेहो ठुमकल. . हम टॉफी लेबै .. ।’ . “जो जो जे मन होउ खरीद लिहै . .।’ जीजा सुनीता के बूझैलकै. . ‘अब एतना पैसा के की करबहक़ . . दूनू के नाम पर एल आई सी खोलबा दियौ. . .महीने महीने हजार वा पनरह सौ जमा करै के होयत .. आ’ छौ साल मे एके बेर छौ लाख उठैब त’ देखाईयो पडत. . .. नाईट गाड बला पैसा खा पीब घरे भेज .. .आ माली बला पैसा जमा करए .. दू गो बेटी है बियाहे के. ।’छौ लाख के नाम सुनि सुनीता के मुॅह खूजल के खूजले रहि गेलै. . .। फेर कनि काल मे बाजल . ‘ठीके त’ कहैत हथीन जीजा .. खोलि दहु आ’ हमहूॅ त’ कमेटी लगौने छियै. . . ई सामने वाला कोठी. है न ललका फूल बाला . .इहॉ जे अंटी रहै है .. आ’ ओकर बेटा दूनु मिल क’ कमेटी चलाबे हैई ।बडा भला आदमी है. . बोली केहेन मीठ .. जेना मौध चुबे हई. . .सब के समय काल पडला प’ मददियो करे है. . ।’ “हॅ. . हॅ जनेत हीय ए महल्ला मे भला ओकरा लोकनि के के नहिं जानै है. ।’ ‘इंनिरा आवास मे जे पैंतीस हजार के चेक दु मरतबे मिलतै. . .त’ हम पहिले जाकए ईंट ..सूरखी .. गिरा लेबै. . आ’ पनरह दिन के भीतर खाली जमीन पर मकान के जोडैया करबा देबै. . . .ताकि दोसर चेक .. जल्दी से मिल जाए. . ताले . हलबैया बला दू कट्टा जे घरे के सोझा मे बिकाऊ है. . ओ खरीद क’ छोडि देबै ..” ।अपन भविष्यके योजना मे लीन सुनीता मूडी झूका क’ पूडी बेलैत बाजि रहल छल .. .। ‘आहॉ के घर नै ह’ की . .।’जीजा पूडी आ’ खीर के अचार संग सुआद लैत पूछलक .त’ मुडी उठा क’ सुनीता चमैक क’ बाजल ‘घऽऽऽऽऽर ।बियाह से पहिनहीं के है. . पक्का के मकान है. . ई पंजाब मे रहै हलखिन तहिये बनौने छलखिन. . .।’ “त फेर .. अहॉ के इनिरा आवास के पईसा कोना भेटल. . .।’. . “सबके भेटलै परोपट्टा मे .. दू हजार दे क’ आइल रहियै. . पोरकॉ .. .जे हमर नाम गरीबी रेखा के नीचे बाला लिस्ट मे आबे के चाही .. न त’ हम सूद सहित पईसा बोकरा लेनाय जाने हियै . .।’घरवला एकदम चुप्प .. जेना सुनीता मालकिन .. आ ओ ओकर खवास. . .।भाय सेहो चुप्प ।हब्बर हब्बर सबके खुआ पिया क’ ओ अईंठ बासन समेटय लागल छल .. दूनू नाइट गार्ड अपन अपन कम्म्ल. .ओढना झोरा झपटा ल’ क’ ओही पूसक थरथराति हाड हाड कॅपाबैत राति मे डियूटी पर जाय लेल निकलल ।छोटका बच्चा त’ सांझे सूति रहल छल. . दूनू बहिनी खाईत मातर पटापट ओछेना पर खसि क’ बेसुध ।तीनो के पतियानी से सुता के कम्मल चद्दरि ओढबैत झॉपि तोपि क’ निचिंत भेल . .।पछवारी देबाल प बडका कलेंडर टॉगल रहै. . हॅसैत लडकी के ।ई की. . ई त’ फाटल है. .कनि सुन अटकल. . .ओकर दिमाग फेर सॅ गरमाय लगलै. . ई हे छौडी सब के करिस्तानी होतै. . ।मन भेलै. . सूतले मे एक एक लात दूनू के मारी घींच क’ .. मुदा चुपचाप मन के बलजोरी काबू मे राखि .. कनिसून आटा घोरी क’ आगि प’ बरकौलक़ . आ’ तपते तपते चमस सॅ उठा क’ देबार प’ कलेंडर के साटि देलकै. . .। जीजा सेहो दूनू गोटे के संगे निकलि गेल रहै. . .मुदा कनिकबे काल के बाद ओ आपस कोठरी मे आबि गेलै।सुनीता बरतन धोकए दरबज्जा बन्न करितै कि ओ कोठरी मे पइस गेल रहै. . कनि काल लेल त’ ओकर मुॅह सूखा गेलै .. .मुदा की बजितै. . .। ‘हे देखियौ आय बिदेसी बोतल अनने हियै. . .अहू पीबियौ न एक घोंट. . ।’आ जबरदस्ती बोतल खोलि क’ ओकर मुॅह मे लगा देलकै. . सात रंगक मूॅह बनबैत ओ बाजल . ‘धूर मंसा .. अहू नै हद करै हीयै. . जाउ न मेहरारू रस्ता देखैत होयत . ।’ ‘ कनि देरे से जेबे त’ कोन जुलुम भै जेतै. . ।’आ’ सौंसे बोतल एके बेर मे पीबी गेलई । गोर नार . . लमगर पारत नीक नाक नक्स. . .बाली सुनीता . . . बीतबा कारी बूढ घरबाला. . .तखन जै जमाना मे बियाह भेल छलै. . सुखीतगर घर छलै. . लडिका पंजाब मे कमाइत छलै. ।. ओ बजाज के गमकौआ तेल. . पचास रूपया बाला. . .. . चमचमौआ नूआ पहिर छडी सन देह . . मलकैन बाली शेखी सॅ चलै त’ छोटका के संग बडका लोक के नजरि सेहो ओकरा प’ अटकि जाय .। ‘ओ पंजबिया के घर छोडि देलियै. . .अंटी जी त’ भिनसरहीं काज पर निकलि जाए. . आ साहब भरि दिन घरे मे .. कहै “सुनीता पैर दबा .. माथ दुखाता है माथ दबा. . ।’बजै जे हबाई जहाज के उडाबै है. . मुदा भर दिन त’ घरे मे घुसल देखीयै. . ।जेने जेने काज करियै. . .गिलास मे दारू नेने ठाढ भ’ जाय. . कहै. . जे तूमको पलौट लिख देंगे. . .।ओकरे पलौट लेल हम खग्गल हीयै. . .मन त’ कहिया से घोर मठ्ठा हो रहल छलै. . मुदा बेटा के बियाह के दिन ओकर घर के काज छोड देलीयै .. .।कत्तनो कहलकै. . मैडम जी तैयो न गेलियै. . पइसो लेबे न गेलियै ।’ रानू के सुनबैत चलल जाय रहल छल । “ है हाली हाली किएक चलल जाए छी ।’ सुशीला ओकरा बडका बडका डेग मारैत देखि क पूछलकै त’ चलिते चलिते ओ बाजल. . “कुछ न पूछू दिमाग खराप भेल है. . नीसा के पप्पा के ठंढी मार देलकै. . .जीजा के फोन आयल छलै. . .जाय हिए डाकडर लग।’ घर आबि क’ लहसून तेल बरका क’ सौंसे देह मे मालिस कैलकै. . .गरम गरम चाह बना क’ देलकै. . दलदल्ली तइयो नै कम भेलै .. ।तखन पडोस मे रहय बला डाकडर ओत्त ल’ गेलय. . देह मे गरमी आनै के सूईया देलकै . . .।गार्ड के ठेकेदार के फोन नंबर ओकर मोबाईल मे फीड छलै. . कोनो नै कोनो चेन्हासी लगा देने छलै जीजा. . .सब नंबर के सोझा .. जाहि से ओकरा कोनो प्रकारक फिरीसानी नै होय फोन करय मे . . .तुरंत ओ ओकर घंटी बजौलकै. . “हैलौ. . हम सुनीता बोलता है. . नीसा का पप्पा को ठंढी मार दिया है. . डाकडर के पास है. . आज रात का डियुटि नहीं करेगा . . ।आ’ हे भाई साहब उसको दिन का डियुटि दे दो न .. बडी ठंढी है. .गरम कपडा भी जादा नहीं है. एतना त’ कीरपा करो भैया .।’आ ओकर डियुटि किछु दिन क लेल बदलबा देलकै. . । इम्हर किछु दिन से ओकर माथ चकरायल रहै छलै. . कुछ न कुछ गडबड हो रहल है. . .तेसरा महीना चढि गेलै. . ।जेठ मे बौआ के मूडन गछने हीयै भगता के इहॉ. . सब गुड गोबर हो जेतै. . ओ अपने नसबंदी करौने है. . ।ओकर मन धुक धुक करैत बेसुध होबय लगलै. . .कि करू कि नै करू किछु फुरैत नै है. . तुरंते फेर जीजा के फोन लगौलक़ . ‘हे जीज्जा .. . . . ।’ ओ ओकरा भरिपोख भरोस देलकै. . . ‘अहि मे फीरीसान होबै के कोैना बात है. . सनिच्चर के दू बजे दिन मे आबै हिय .।’ घरबाला घरे मे रहै बजलक ‘ बडा तबियत खराप लागे है. . पेट मे मोचाड . .दस्त .. जाड .. जेकॉ लगैहै. डाकडर लग जाय हीये .. नीसा खेनाय बना देत त’ खा पी क’ डिउटी पर चल जायब. . उहॉ त’ देखबे केले हीयै कतना भीड रहै है. . .।’ ंमहिपालपुरक एक गोट किलनिक मे जतय ओ एक बेर और आयल छल. . सुरेन्दर संगे. .पहुॅच त गेल मुदा डाकडरक टेबुले पर ओ बेहोस भ’ गेलै. . चारि बोतल गुलकोज चढैल गेलै तीन घंटा के बाद ऑखि खूजलै .. त ऑटो मे बैसा क’ ओकर घर से तनिका पहिनही उतारि जीजा अपन घर जैत रहल. . .।कहुना लडखडाति .. .हॉफैत .. .ई अप्पन कोठरी मे आबि पहिनहीं से बिछौल चदरि प’ धडाम सॅ पडि रहल. . “मम्मी मम्मी’ धिया पुत्ता सब हल्ला कयने रहै त बड मोसकिल . से ऑखि खोलि क’ अंगुरी ठोर प’ राखि क चुप रहबा के ईसारा केलकै. .। सात बरखक नीसा बड बूझनूक तुरंत बूझि गेलै .. मम्मी के मोन जादा कराप है. . गिलास मे बोतल से ढारि क पानि देलकै. . अपन छोट छोट हाथ से माथ मे गमकौआ तेल लगेलकै. . हाथ पएर जॅतलकै. . .ओ निन्न पडि गेल छल । देह पीयर . . . ऑखि पीयर. .. .एकदम कमजोर । कोठी बाली सब फोन प’ फोन करय लगलै. . .त’ फोन के स्वीच ऑफ करि क’ राखि देलकै. . . मने मन गरियैलकै. . ‘जरलाही सब मरलो मे चैन नही लेबए देत. ।चारि दिन अपने से बरतन मॉजि ल्ोतै त’ हाथ घीस जतई।’ आठ दिनुका बाद कहुना करि क’ काज प’ पहुचल .. त’ दू टा काज त’ छुटिये गेलए. . .के ओतेक दिन बिन कोनो सूचना के .बिन आस के इंतजार करितै. . । “हे ई की हल्ला सुनै हीयै. . .।सब कहै है. . लाल फूल बाला कोठी के अंटीजी राताराति अपन मकान बेच के भागि गेलय. . .दूनु माय बेटा. .।’ “आय .. भागि गलई. . दादा हो दादा . .हमर एक लाख रूपया ओकरे हिया जमा रहै हो दादा .. . दू बरख से हाड हाड गला के .रिक्सा खींच खींच के .. पेट काटि काटि के ढेऊआ जमा कयने रही हो दादा. . ।’बीरेन साह बेसुद्व भेल अपन माथ प’ मुक्का मारैत ठामे के ठामे बैस रहल छलै. ।नथुनी राय से फराक अपन छाती कपार पीटय लागल .. ‘हमर डेढ लाख .. . रूपीया .. कतबो कहलकै. . मालिक .. पोस्टापीस मे राखे लेल. . मुदा नै मानलियै .. हमे. . .कहलियै जे हमरा लोकनि के अंटीये बैंक आ’ पोस्टापीस है. . न कोनो फारम भरे के झंझट .. .नै .. लिखा पढी करे के. . एको रजिसटर पर लिख लै है. . आ’ अंगूठा छाप लगबा लैत है. . ओ भगतीन बेचारी सदिखन मातारानी के नाम लैत रहै है.. .।’ जहीर अल्ला के नाम ल’ल’ क’ करेज मे मुक्का मारय लागल छल .. “अल्ला हो अल्ला. . ड़ूबि गेलो सब रूपा. . . हो अल्ला .. आब काहॉ से खरादिबौ अपन एसकूटर हो अल्ला ।’ सुसीला. मालती .मीरा .जोती. .सबहक ऑखि कनैत कनैत लाल टरेस. . “आब की होतै हो बाबा .. दुरगतिया पर दुरगतिया. . . .. बेटी के बियाहे लेल रखले रही पैसा. . .अब कइसे होखी बियाह. . .”। एतबे मे पी पी पी पी करैत सोर मचबैत .. मीडिया के गाडी सब आबे लगलै .. .लोक सब अपन ब्याकुल चेहरा नेने न्याय के आस मे ओकरा घेर लेलकै .. .” . ..आजतक बाला के टीम अपन कैमरा ल’ क’ कखनो फूलबाला कोठी के फोटो लै. . कखनो उपस्थित .. जन समुदाय के. . .।एकाध गो पुरूख पात से पूछताछ करि. चिक्कन चुनमुन जनानी सब प’अपन कैमरा फोकस करय लगलै. . .।आगॉ खडा सुनीता सॅ माइक नेने पुछलकै. . ‘अहॉ बताउ .कहिया से ओकरा सब के जनैत छलीयै। आ’ अहॉके कत्तेक पाय ले क’ भागल. . ।” “हम त’ इहॉ साल भर से हीयै. . .इलाका मे अंटी जी के बड इज्जत छलै. . भंडारा करै रहै. . कीरतन करै. . सब लोक पएर छूबै. . .।हमर त’ अस्सी हजार छलै. . मुदा हमर भाय के एक लाख पचीस हजार .. ।’ गाडी जहीना पींपा करैत आयल छलै. . तहिना पीं पां करैत चलि गेलै. . .। ओय दिन भरि ‘आजतक’ प इएह समाचार आबैत रहल छल .. .।हजारों लोक के रूपैया ठैक क’ ओ सब नै जाने कोन पताल मे घुसि गेल रहै. . पुलिस के थू थू होबैत रहल. . । कनि दिन सब कानि खींज क’ गारि सराप द’ क’ अपन मन के आगि मिझबैत रहल. . . ।एक दोसर के बोल भरोस दैत बाजै. . “चलू बूझबै जे कमेबे नञि कयली. . ।समांग रहतै त’ आरो कमा लेबे. . .लेकिन ओही पपीयहबा सब के नरक मे से गिंजन होतै. . ।’ “एकनी के की कहल जाव अपन घराडी आ’ जनानी दूनू बेच बिकिन क रूपीया कमाय मे माहिर .. .जनानियो एकर सब के एहने होबै है. ।न कऊनो दीन न ईमान. .।’ “परदेस हीकै की करबीही भाय. . .केकरा भीरे जेबीही. . .टीभी मे त’ देखेलकौ की होलै. . .गरीबन के आबाज के सुनै है ..।’टप टप टप ऑखि सै नोर मात्र खसि रहल छल सबहक .। बड दिन से जीजा के फोन नै आबै है. . करबो करै हियै. . त’ कहै है. .जे ई नंबर मोज्ूाद नै है. . ।कहले रहथिन जे कत्त दन त सौ गजा पलाट खरीदै हिये. . पचास गज आहॉ के आ पचास गज हम्मर. . दूनू गोडे उहे मिलके घर बनायब. . ।पइसो पचास हजार देने रहियै. . ।कि भेलै. . जमीन के रजीसटीरी भेले की नोई .. .।’अपन कोठरी मे बैसल . .बडका थारी मे आटा सानैत सोचि रहल छलै कि भाय आबि गेलै. . “हो भैया तनी देखहू त’ सुरेन्दर जीजा के बड दिन से कोनो खोज पुछारी नै भेलै. . कहैत रहै जनू अपन बेटी के बियाह करतै. गाम घर त’ नै चलि गेलै. . .।ओकर आंगन बाली सेहो नै फोन उठाबै है. . तनि ओकर कोठरी प’ जा के बूझतीय्ौ . .हाल चाल निम्मन है न।’ परसूराम अपन देह से कंबल उतारेत. . उनटे पएरे विदा भेल. . ।जायके त’ तनिको मोन नै करे. . .सोचने रहै. . कोठरी मे जाकए खायब आ’ सूति रहब. . मुदा जौं सुनीता के बात नै मानतै त’ ओ बेनग्गन करि देतै. . .।ई गली छोडि के तेसरा गली मे त’ ओकर कोठरी छलै. . .।पतरकी सीरही चढि क’ ऊपर तीन तल्ला प’ पहॅुचल त’ देखैत अछि. . .दरबज्जा प’ ललका परदा टांगल. . .।केबाड खूजल रहै. . .परदा हटा क’ भीतर घुसय चाहलक .. त’ कोठरी के कोना मे इसटोप प’ भनसा करैत जनानी दबाडलकै. . .”के छहू . .एना अनठिया लोक केना घूसल जाय है. . ।”फेर ओ बाहर निकैल क’ पूछलके “केकरा ताकै हियै ।’ परसू अकबकायल सन बाजि उठल. . “ओ बिजली मिसतीरी सुरेन्दर अही ठिना रहेत हथिन नै.. ।’ जनानी के किछू नै बूझैले सिरही के दोसर दिस आंगूर देखबैत बाजल “ हुनकारा से पुछियौन ओही जानैत होथिन्ह ।हम सब नाया किरायेदार हीयै ।’ परसू के उदास उतरल मूॅह देखि सुनीता तुरंत चुल्ही पर से ताबा उतारि गैस बन्न क’ बेकल भ’ पुछलक़ . “ बीमार सीमार है की ..।’भाय के किछु नहिं बाजैत देखि क’ ओ तेजी से उठि क’ घर से बाहर जयबा लेल पएर मे चट्टी पहिरए लागल कि भाय के मुॅह से फुटलै ‘कहिया से जानैत छलही ओकरा. . .’ओकर माथ प’ ओही ठंढी मे सेहो पसीना चुहचुहा गेल छलै. . “किएक पूछै छहू. . . दू तीन बरख से जनितै रहलियै ह’।” “ओकर कोनो पता ठेकाना मालूम हौ. . ।” “से त’ नई अ. . .कहने रहै जे बलु अहॉ के गामे के बगल के गाम मे हमर ससुरारी है. . .. अब कोन गाम से त’ नई पूछले रहियै. . .। से की भेलै. . ई लाल बूझक्कड जेना काहै बूझाबय लगलहू .. .हाली हाली कहू नै की बात है ।नै त’ हम अपने जाय ही ओकरा घर ।” “अब जाय के कोन फायदा .. . होतौ. . .ऊ त’ कोठरी छोडि के कतहू आर चलि गेलै. . यैलाईसी के नकली एजेंट बनी .. कतना आदमी के पईसा ठकि लेलकै. . अपन मकान मालिक के सेहो चूना लगा के भगलै. हम्मर किसमत हे भगबान. ।’ सुनीता के चक्कर आबि गेलय ओ एक डेग आगॉ डू डेग पाछॉ झूमैत झूमैत. . .ठाढे ठाढ धडाम सॅ जमीन पर खसि क’ बेहोस भ’ चुकल छल ।। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। नारायण झा रहुआ संग्राममे गृष्मकालीन शैक्षिक शिविर सह टैगोर पुरस्कारसँ सम्मानित श्री जगदीश प्रसाद मण्डलक सम्मान समारोह- २०१२ ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। :: दुर्गानन्द मण्डल समीक्षा- जीवन-संघर्ष मैथिली साहित्याकाशमे एकटा एहेन नक्षत्र जे अद्रा नक्षत्र जकाँ सुधी पाठककेँ सभ तरहेँ मनोरंजनसँ लऽ आदर्शवादी समाज, व्यक्ति, व्याक्तिक कुत्सिष्त एवं दमित भावना, मनमे उठैत विभिन्न प्रकारक समस्या आ ओकर निदानक रूपमे भरिपोख मार्ग दर्शन करैत अछि, जीवन-संघर्ष। जीवन संघर्ष थिक आ संघर्षे जीवन। जौं जीवन अछि आ जीवनमे संघर्ष नै तँ ओ जीवन जीवन नै। तहिना जदी संघर्ष अछि तँ ओ संघर्षे जीवन थिक। एक-दोसराक बिना दुनू शब्द अक्षुण्न सन बुझना जाइत अछि। जीवन अछि तँ संघर्षसँ अपने बचि नै सकै छी आ जौं संघर्षेकेँ जीवन मानि लेब जीवन थिक। अर्थात् जीवन-संघर्ष उपन्यास अपन संज्ञाक अनुसार आदिसँ अंत धरि खड़ा उतरल अछि। सम्पूर्ण उपन्यासमे जे पात्र लोकनि छथि ओ कखनो संघर्षसँ अलग नै भऽ सकला अछि। जे संघर्षकेँ स्वीरकार कऽ लेलन्हि हुनका जीवनक लेल एक नै अनेको बाट स्वागतार्थ प्रकृतिक संग नैसर्गिक सुख लऽ उपस्थित भेल। उपन्यासकार एकटा लब्ध प्रतिष्ठित जाहुरी जकाँ विभिन्न प्रकारक संघर्षकेँ जे देखौलन्हि तँ ओकर समाधानो तकबामे कतौ पाछाँ नै रहला। जीवनमे संघर्षक समाधाने तँ जीवनक अभिप्राय थिक। ऐ बातकेँ स्पष्ट करबामे उपन्यासकार शत-प्रतिशत सफल भेलाह। उपन्यासक आदियेमे उपन्यासकार बँसपुरा गामक एक गोट नवविवाहित यौवना जे जीवनक आ यौवनक सुआद मात्र बुझने हेतीह। गामक सटले आयोजित दुर्गापूजाक मेला देखए गेलीह। गनगनाइत मेला चहुओर लॉडस्पीकरक गगनभेदी आबाज चरिकोसिक नीन्न उड़ेने, गामक तीनटा लफुआ छौड़ा बहला-फुसला कऽ भनडार घर लऽ जा हुनका संग बलत्कार.....। समाजक सामंतवादी व्यवस्थाक ज्वलंत उदाहरण अछि। आखिर ऐ तरहक जे बेवस्थाक हमरा समाजक बीच बाल-बच्चामे व्याप्त अछि जे माए-बहिनक संग बलात्कारक संग प्रस्तुत हुअए तखन इज्जत केकर बँचि पाओत? के इज्जतदार रहताह? एकटा प्रश्नचिन्ह छोड़बामे उपन्या्सकार पूर्णत: सफल भेलाह अछि। समाजमे व्याप्त ई जे कुबेवस्था अखनो अछि निश्तुकी ओ हमरा सभकेँ लज्जित करबामे कनियो धोखा-धड़ी नै। जइसँ संभव अछि जे समाजक ऐ कुबेवस्थासँ गाम-घरक धारमे पानिक बदला शोनित बहए लागत। उपन्यासकारक उपन्यासक उदाहरणसँ स्पाष्ट जे पत्नी-बेटीक मुँहक बात सुनैत-सुनैत पतिकेँ कहलक- “जहिना हमर बेटीक इज्जत सिसौनीबला लुटलक तहिना सिसौनीक दुर्गास्थानमे मनुखक बलि परत।” मुदा बाह-रे उपन्यासकार! जखन सम्पूर्ण बँसपुराबला सिसौनीबलाकेँ कचरमबध कऽ लहाशक ढेरी आ शोनितक बहबैले तैयार रणक लेल शंखनादक ध्वनि, लाठी, फरसा, ग्रांस लऽ मरै आ मारैले सिसौनी दिस बिदा भेल तखन गामक सभसँ बेसी उमेरक मनधन बाबा द्वारा रस्तापर चेन्ह दऽ ई कहब- “ऐ ढाँहिसँ जौं कियो एक्को डेग पएर आगाँ बढ़ेबह तँ हम एत्ते प्राण गमा देब।” मनधन बाबाक ई एक वाक्य, आगिमे पानिक काज केलक। सभ शान्त भऽ जाइ छथि। तखन सिसौनी दुर्गापूजाक प्रतिरूप बँसपुरामे कालीपूजा ठानल गेल। अध्यक्ष, उपाध्यक्ष चुनल गेलाह। एक्कैस आदमीक कमिटी बनाओल गेल। कोनो काज हुअए ओ सर्वसम्मपतिसँ हुअए। ऐठाम उपन्यासकार सामाजिक सद्भावनाकेँ स्पष्ट करबामे शत-प्रतिशत सफल भेलाह। जे उत्तर आधुनिक कालक मध्य उन्नत समाजवादी दर्शनक कसौटीक झलक सहजहि भेल। समाजकेँ आगाँ बढ़ेबामे दसगर्दा काज जरूरी अछि। जाधरि लोकक मनमे दसनामा काजक प्रति झुकाउ नै हेतैक ताधरि समाज आगू मुँहेँ बढ़त केना? समाजेक बीच मंगल सन सोझमतिया लोक अछि तँ गणेश सन ठकहर सेहो। जइ संबंधमे उपन्यासकार कहए चाहैत छथि- “एक्के कुम्हारक बनाओल पनिपीबा घैल सेहो छी आ छुतहरो। मुदा देखैमे दुनू एक्के रंग होइ छै।” उपन्यासकारक नजरि लगिचाइत अमवसिया दिन साँझे दिवाली आ निशा रातिमे कालीपूजा। गाममे आएल धी-बहिनसँ बेसी साइरे-सरहोजि, तहूमे परदेशिया सारि-सरहोजि आबि कऽ गामक तँ रंगे बदलि देलक। मेलाक लेल मुजफ्फरपुरसँ नाटक आ मेल-फिमेल कौव्वालीसँ लऽ महिसोंथाक नाचक आयोजनक संग विभिन्न प्रकारक दोकान सभपर नजरि सेहो छन्हि। मेलामे विभिन्न प्रकारक दोकानक बीच, चेस्टरबला दोकान सेहो उपन्यानसकारक नजरिसँ नै बचि सकल तँ दोसर दिस रमेसरा सन लोकक ई कथन- “धूर बूड़ि दिल्लीस तँ हौआ छिऐ।” अर्थात् पलायनवादी संस्कारकेँ चुनौती दैत गामेमे आयोजित कालीपूजामे बाजार देखि चारि-पाँच हजारक समान बनौलक। जे नोकर नै बनि मालिक बनब! कतेक पैघ स्वाभिमानक परिचायक अछि? एवं प्रकारे विभिन्न प्रकारक जाति विशेषसँ जुड़ल व्यवसायपर बल दऽ ग्रामीण उद्योगकेँ बढ़ाबा देलन्हि , जे सम्राज्यवादी प्रदुषणकेँ साफ करैत अछि। ऐ प्रकारे उपन्यासक सार समस्त मिथिला आ मैथिल समाजक समस्याकक चित्रण करै छथि। समाजक बीच व्याप्त विभिन्न प्रकारक समस्या जे खाहे पलायनवादी होइ वा किसान मजदूरक। सरकारी मसोमातक होइ वा सामाजिक मसोमातक। विभिन्न प्रकारक जाति विशेषसँ जुड़ल व्यवसायसँ हुअए वा कोसी कहरक समस्या। हमरा समाजक बीच धर्मक आड़िमे राजनैतिक समस्या सभपर उपन्यासकारक दूर दृष्टि छन्हि। खास कऽ विधवाक लेल कएल गेल प्रयासक पाछाँ बूझना जाइत अछि जे उपन्यासकार कोनो-ने-कोनो रूपमे नायकक भूमिकामे होथि। चूँकि विधवाक समस्याकेँ एतेक लगसँ देखब आ ओतेक बढ़िया समाधान निकालब साधारण व्यक्तिक लेल संभब नै। अधंविश्वासक आड़िमे भगति खेला केकरो शीलभंग करब आ जहल खटब, सेहो उपन्यासकारक नजरिसँ नै बचि सकल। समाजेक मंगलक विचार जोगिन्दारकेँ नीक लागब आ सामाजिक विधवाक सहायताक उपाए करब, किनको नीक लागि सकैत अछि। एतबे नै, दुखनीक विचारकेँ दुखनियेक शब्दमे उपन्यासकार लिखलन्हि- “हमहूँ तँ पाइयेबला ऐठीन रहलौं मुदा सभ सुख-सुविधा रहितो ओकरा एहेन नीन कहाँ होइ छै।'' देखै छी जे पेट खपटा जकाँ खलपट छै, भरिसक खेबो केने अछि कि नै। तखन जोगिन्दिर घुट्ठी हिलबैत बाजल- “काकी, काकी....।” आ मोटरी खोलि जोगिन्दनर जोर भरि साड़ी, साया आ एकटा आंगीक संग दसटा दस टकही आगूमे राखि देलक। ऐ तरहक समाजक दबल, कुचलक मसोमात वर्गक सेवाधारीक रूपमे हुनक यथार्थ सेवा भावना ओहिना झलकि रहल अछि, जे ओ कतेक पैघ समाजसेवी छथि। ऐ तरहेँ उपन्यासक एक-एक पाँति जीवन-संघर्षक सार्थकताकेँ प्रमाणित करैत अछि। पाठककेँ उपन्यास- जीवन एकटा संघर्षक रूपमे बुझना जाइत अछि। प्रस्तुत उपन्यासमे सभ तरहक उदाहरण- हँसब, बाजब, कानब, मारि-पीट इत्यादिसँ लऽ नव उत्साह, नव चेतना आ नव दिशा भेटैत अछि। आन कोनो ओझराएल उपन्यासकार जकाँ जिनगीकेँ कोनो चौबट्टीपर नै छोड़ि बल्कि एकटा नव सृजनात्मक रास्ता खोजि पाठकक संग समाजोक लोककेँ देखौलन्हि अछि। जहिना नदीक पानि अपना जीवनमे अनेको उतार-चढ़ाबकेँ पार करैत अपन बाट अपने बनबैत अछि तहिना प्रस्तुत उपन्यासमे उत्पन्न भेल समस्याक समाधान करैत समाजोकेँ एकटा प्रशस्त मार्ग देखबैत निर्विरोध आगाँ बढ़ल जा रहल अछि। उपन्यासमे एकटा समस्या नै अपितु अनेको समस्या उपस्थित होइत अछि मुदा ओइ समस्याक स्वत: बुधि-विवेक द्वारा निदान सेहो समस्येसँ निकलैत अछि। समाजक सभ वर्ग चाहे ओ दुखनी हुअए आकि पवित्री, श्यामा हुअए आकि तमोरियावाली भौजी। नारीक एकटा सशक्त शक्तिक रूपमे देखा उपन्यासकार एकटा कृत केलन्हि अछि। सम्पूर्ण उपन्याससमे उपन्यासकार मिथिला समाजक सभ्यता एवं मान्यताकेँ देखाएब सेहो नै बिसरला अछि। मैथिल बेटीक प्रेम माए-बापक प्रति श्यामा द्वारा आनल गेल पाँच गो दलिपुरी, एक धारा चाउर, सेर तीनियेक खेसारी दालि, एकटा उदाहरण अछि। ओतबए नै, मसोमात दुखनीक बेटा भुखना द्वारा आनल रूपैयाक गड्डी देखि ई बाजब आ सोचब- “झाँपह-झाँपह नै तँ लोक सभ देखि लेतह। आखिर ढहलेलो अछि तँ बेटे छी किने।” मने-मन भगवानकेँ गोड़ लागि बाजल- “भगवान केकरो अधलाह नै करै छथिन।” उपन्याँस जेना-जेना आगाँ बढ़ैत अछि सारगर्भित भेल जा रहल अछि। पाठक एकसूरे पढ़ैक लेल बाघ्य छथि। उपन्यासक मादे भोजनो-भातक धियान नै रहि जाइत अछि। अंत: उपन्यासक सारक रूपमे प्रोफेसर कमलनाथ द्वारा प्रस्तुत कथन- “रतुका घटना दुखद भेल। मुदा ओ काल्हुक भेल। कालक तीन गति, भूत, वर्त्तमान आ भविष्य । जे समए बीत गेल वएह समए वर्त्तमान आ भविष्यक रास्ता देखबैत अछि। ढंगसँ एकरा बुझैक खगता अछि। दुखक भागब माने आएब भेल।” ऐ प्रकारे जीवन-संघर्ष उपन्यास कल्पना नै अपितु यथार्थपर आधारित बुझना जाइत अछि। तँए अंतमे ई कहब जे आशाक संग जिनगीकेँ आगू मुँहेँ ठेलैत पहाड़पर चढ़ा अकाशमे फेक दियौक। स्पष्ट अछि जे जीवन संघर्ष थिक आ संघर्ष जीवन, अर्थात् जगदीश प्रसाद मण्डलक जीवन-संघर्ष। आ प्रकाशक छथि नागेन्द्र कुमार झा जे मैथिली साहित्याकाशमे पोथी प्रकाशनक झंडा फहरा-फहरा कऽ बहुत किछु कहि रहल छथि। ऐ लेल श्रुति प्रकाशनक संग उपन्यासकारकेँ सेहो दुर्गानन्द तरफसँ बहुत-बहुत साधुवाद। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। १.डॉ. कैलाश कुमार मिश्र- लघुकथा- चन्दा २. उमेश मण्डल- मैथिली युवा रचना-धर्मिता :: परंपरा परिवर्त्तन आ भविष्य १ डॉ. कैलाश कुमार मिश्र लघुकथा- चन्दा राघवकेँ चन्दाक संगति सोहनगर लगैत छलन्हि। राघव आ चन्दा समवयस्क रहथि- लगभग पंद्रह बर्खक। दू-चारि मासक दुनूमे कियो छोट तँ कियो पैघ। चन्दा छलीह सांवरि, सुन्दरि। शरीरसँ पुष्ट मुदा लोथगर नै। सांमरि चाम मुदा चमकैत। आँखि मध्यम कदक मुदा रसगर। ठोर मोट मुदा चहटगर। नाक पातर आ नोक लेने। शायद राघव केर दृष्टिमे सुन्दरताक नीक विवरण यएह छलन्हि। चन्दा छलीह चंचल, कनीक ठसकसँ भरल आ ऐ गुमानमे तनल जे ओ दबंग पिता एवं दबंग परिवारसँ छथि! चन्दाकेँ केवल दू बहिन आरो छलथिन्ह। एक्को भाइ नै। ताहि चन्दा अपने-आपकेँ बेटा बुझैत छलीह। पन्द्रहम वयसिमे अएलाक उपरान्तो चन्दा अपन उन्नत वक्षकेँ नै झपैत छलीह। ऐमे हुनक उदेस अपने-आपकेँ कामुक बनेबाक नै छलन्हि बल्कि बेटा जकाँ बेटी छथि तइ बातक गुमान! मुदा जुआनीक दरबज्जा खटखटबैत वक्ष, नाक, आँखिक गुमानसँ की मतलब! चन्दाक गुमानमे हुनकर शारीरिक अंग अपन कामुकताक भावकेँ अनेने प्रदर्शन करए लगैत छलन्हि। आर-तँ-आर चन्दा राघव एवं अन्य समवयस्की छौड़ा सभ संगे कखनो कबड्डी तँ चोरा-नुक्की खेलाए लगैत छलीह। जखन कबड्डी खेलाइत छलीह तँ चेतऽकऽबऽड्डी..... डी...डी...डी... करैत हुनकर वक्ष सेहो शब्दक लयक संग संगीतक धूनमे मस्त भऽ ऊपर-नीचा होमए लगैत छलन्हि। कतेको बेर जखन चन्दा कबड्डी पढ़ैत राघव दिस अबैत छलीह, राघवकेँ मारबाक हेतु तँ राघव चन्दाकेँ पकड़बाक प्रयास करैत छलाह। प्रयास ई जे चन्दाक सांस टूटि जाइन्हि। मुदा चन्दा ऐ प्रयासमे जे बिना सांस तोड़ने राघवकेँ छू ली, आ बिना राघवक चंगुलमे कबड्डी पढ़ैत अपना दिसि आपस भऽ जाइ। एक-आध बेर चन्दा अपन रणनीतिमे सफलो भेलीह। मुदा अन्तत: छलीह लड़की। केना सकतथि, राघवक ठोस, बलीष्ठ कद-काठीक समक्ष? अधिकतर समैमे राघव चन्दाकेँ पकड़ि लैत छलथिन्ह। आब चन्दा राघवसँ अपने-आपकेँ छोड़ेबाक हेतु पूरा प्रयास करैत छलीह। राघव सेहो अपने-आपकेँ एे प्रयासमे लगा लैत छलाह जे बिना सांस टुटने चंन्दा नै छुटथि। ऐ नोक-झोकमे बिना कुनो गलत भावनाकेँ कतेको बेर छीना-झपटी करैत राघव केर हाथ अनायास चन्दाक वक्षपर लागि जाइत छलन्हि। चन्दा बुझैत छलीह जे राघव कुनो दोसर विचारसँ ई सभ नै कऽ रहलाह अछि। तँए चन्दाक मुँहपर कुनो तामस, लज्जाक भाव, प्रतिकार, घृणा आदिक भाव नै अबैत छलन्हि। बिल्कुल स्वभाविक रहैत छलीह। मुदा कहि नै किएक राघवक कठाेर हाथक स्पर्शकेँ अनुभव करैत छलीह। हुनका किछु-किछु होमय लगैत छलन्हि। आँखि अनेरे आनन्दातिरेकमे मुदा जाइत छलन्हि। की होइत छलहि तकरा ओ शायद केवल अनुभव कऽ सकैत छलीह, ओकर बखान शब्दक माध्यमसँ संभव नै। एहने हालति राघवोकेँ होइत छलन्हि। नहुु-नहु राघवकेँ एना लागए लगलन्हि जेना चन्दाक वगैर जीवन अर्थहीन हुअए। चन्दासँ जइ दिन राघव भेँट नै करथि तइ दिन मोन खिन्न भऽ जान्हि। चन्दा सेहो राघवसँ ओतबे सिनेह करैत छलीह। मुदा राघव आर चन्दाक सिनेह छल निश्छल! राघव छलाह आर्थिक रूपसँ विपन्न ब्राह्मण कूलक बालक। एकर ठीक विपरीत चन्दा छलीह एक सुभस्य ब्राह्मण कन्या। चन्दाक पिताकेँ तेरह बीघा ठोस खेतीहर जमीन आ खूब नीक लगानी केर कार्य चलैत छलन्हि। चन्दाक पिताक नाओं छलन्हि बुलेसर। बुलेसर बलंठ छलाह। छह फूट्टा मर्द, पहलवान, केवल अपन नाओं आ संख्याक ज्ञान छलन्हि। लगानीक ललका बहीकेँ कऽ टऽ कऽ लिखैत-पढ़ैत छलाह। गरीब लोक सभकेँ सूदिपर टाका दैत छलथिन्ह। बन्धकमे गहना, वर्तन, जमीनक कागत इत्यादि राखि लैत छलथिन्ह। सूदिक दरसूदि जखन गरीब लोक सभ आसीन-कातिक मासमे भूखे मरय लगैत छल तँ बुलेसर बाबू ओतए सबैया-डेओढ़ापर धान अथवा आन अन्न लेमय जाइत छल। बुलेसर बाबू अपने हाथे अन्न जोखैत छलाह। एक मोनक बदला हमेसा 38 सेर दैत छलथिन्ह। ओहूमे अनाजमे धूल-माटि मिलल। छाँटल पखरा अथवा आन कुनो मोटका धान। आ लेबय काल एक मोनक बदला 41 सेरक आसपास लैत छलाह। कतेको लोक पाइ दैयो दैत छलन्हि तैयो अपन लगानीक ललाक बहीसँ नाओं कटैत छलथिन्ह। चारि-पाँच बर्ख चुप भऽ जाइत छलाह। फेर एकाएक एक दिन बही लऽ कऽ ओइ व्यक्तिक घरपर महाजन बनि पहुँचि जाइत छलाह, तगेदा हेतु। बेचारा परेशान! मुदा अपन बलंठीसँ चूर बुलेसर बाबू ओइ व्यक्तिकेँ गरदनि अपन गमछासँ जकड़ि लैत छलाह। फेर ओकरा लाचार कऽ दैत छलथिन्ह पंचैती बैसेबाक लेल। पंच की तँ छह-सात चमचाक दल। सभ बुलेसर बाबूकेँ हँ-मे-हँ मिलबैबला। सभ हुनके सबहक बात कहएबला। बेचारा असहायक बातकेँ सुनैत अछि? लाचार कऽ ओइ व्यक्तिसँ ओकर जमीन आर गहना इत्यादि हथिया लैत छलाह। अही प्रक्रियासँ चारि बीघासँ तेरह बीघा जमीन भऽ गेल छलन्हि बुलेसर बाबूकेँ। एकबेर तँ बुलेसर बाबू एहेन काज केलन्हि जेकरा लोक अखनो धरि नै बिसरल अछि- नृशंसकारी, जघन्य, हत्या समान, बल्कि साक्षात हत्या! एना भेलैक जे टुनटुनमा मलाह बुलेसर बाबूसँ अपन पत्नीक इलाजक हेतु तीन सए टाका सूदिपर लेलकन्हि। ई कहि जे छह मासमे सूदिक संग आपस कऽ देतन्हि। मुदा किछु कारणवश एक बर्ख धरि आपस नै कऽ सकलन्हि। एक दिन प्रचण्ड जाड़सँ कपैत टुनटुनमा राघवक दरबज्जापर आबि राघवकेँ पितामह संगे घूर तापि रहल छल। तमाकूल चुना राघवक पितामहकेँ देलकन्हि आ अपनो खेलक। किछु कालक बाद अपन एक लठैतक संग बुलेसर बाबू सेहो राघव केर दरबज्जापर घूर तापअ आबि गेलाह। टुनटुनमाकेँ देखैत मातर हुनका तामस चढ़ि गेलन्हि। विभत्स गारि देमय लगलथिन्ह ओकर- “रौ बहान ...ोद! तूँ एखन धरि पाइ आपस नै केलयँ?” टुनटुनमा कहए लगलन्हि- “मालिक! हमर हाथ तंग अछि। बेटा कलकत्तासँ आबैबला अछि। अबिते मातर दऽ देब, बिथुत नै करब।” मुदा बुलेसर बाबूक तामसे दुर्वाक्षा बनल छलाह। आरो गारि पढ़ैत गमछा टुनटुनमाकेँ गरदनिमे फँसा उठा लेलथिन्ह। टुनटुनमा लाचार भऽ घेँघयाए लगल। बुलेसर बाबू सोहाइ चमेटा ओकरा ओकरा कानक जाड़िमे मारलथिन्ह। हे भगवान! जाड़क मास बुढ़ शरीर, भुखाएल पेट, जीने काया, बेचारा टुनटुनमाक कानसँ खून बहए लगलैक। मुदा तखनो बुलेसर बाबूकेँ संतोष नै भेलन्हि। गमछासँ टुनटुनमाकेँ घिसियाबए लगलाह। ई देखि राघवकेँ पितामहकेँ भेलन्ह जे कहीं टुनटुनमा हुनके दरबज्जापर नै मरि जान्हि। ओ बीचमे आबि गेलाह आ कहखिन्ह- “हौ बुलेसर! ई हमरा दरबज्जापर आएल अछि। मरि जएतैक। अतए किछु नै करहक।” ऐ बातपर बुलेसर बाबू कहलखिन्ह- “ठीक छै कारी कक्का, हम ऐ सार मलहाकेँ धोबिया गाछी लऽ जाइ छी।” ई कहि टुनटुनमाक गरदनिमे फँसाओल गमछा घिचैत धोबियो गाछी दिसि लऽ गेलन्हि। ‘मरता क्या नहीं करता, बेचारा टुनटुनमा जेना कसाइ लग गाए जाइत अछि तहिना बुलेसर बाबूक संग विदा भेल। आ बुलेसर बाबू जखन धोबिया गाछी गेलाह तँ एक लात मारि टुनटुनमाकेँ धरतीपर पाड़ि पुन: एक ऐँर मारलखिन्ह। फेर अपन ठेंगा ओकर निकासमार्ग -गुदामार्ग-मे घुसा देलथिन्ह। खूनक फुचुक्का निकलि पड़लैक। बेचारा ओतहि कनैत बेहोश भऽ गेल। मुदा बुलेसर बाबूक चेहरापर अफसोस पसरि गेलनि आ मुँहसँ निकलन्हि- “ठेंगो अपवित्र भऽ गेल!” टुनटुनमाकेँ ओतहि ओही हालतिमे छोड़ि अपन घर दिसि विदा भऽ गेलाह। लगभग आधा घंटाक पछाति ऐ घटनाक जानकारी टुनटुनमाक बेटाकेँ पता लगलैक। जो ओकरा उठा कऽ घर लऽ गेलैक। पैसा नै रहैक तँए देसी दबाइ प्रारम्भ केलकैक। भरि पेट खेबाक सेहो सामर्थ्य नै, तइ मनुक्खपर एहेन अत्याचार! बेचारा टुनटुनमा 10 दिनक भीतर कराहि-कराहि कऽ मरि गेल। मनुक्खपर मनुक्ख द्वारा एहेन अत्याचार! हे भगवान किएक नै देखैत छी एहेन लोक सभकेँ। किछु अही तरहक विचार राघव केर लोक किशोर मनमे अएलन्हि जखन टुनटुनमाक सम्बन्धमे पता लगलन्हि। मुदा बुलेसर बाबूक हृदैपर कुनो प्रभाव नै पड़लन्हि। ओ अपन बलंठगरीरीमे लागल रहलाह। बुलेसर बाबूक दू व्यक्तित्व छलन्हि। लहनाक मामलामे ओ बलंठ, हृदैहीन, कसाइ आ कईंया छलाह। ठीक एकर विपरीत पिताक रूपमे स्नेहशील, उदार आ अनुरागी। राघवकेँ चन्दाक नेनपनक दृश्य यादि आबए लगलन्हि। जखन चन्दा चारि-पाँच बर्खक छलीह तँ बुलेसर बाबू सदिकाल चन्दाकेँ अपना कन्हापर चढ़ेने रहैत छलाह। दुलारक अन्त नै। चन्दाकेँ सदिकाल चन्दा बेटा कहि सम्बोधित करैत छलाह। चन्दा अगर कुनो कारणे रूसि जाइत छलीह किंवा कनैत छलीह तँ बुलेसर बाबू चन्दाकेँ कोरामे उठा गीत गाबि-गाबि बौसैक प्रयास करैत छलाह। गीतक आखरि किछु ऐ प्रकारक होइत छलैक- “चन्दा तोरे देबौ गे सभ धन तोरे देबौ गे तेरह बीघा के जोता चन्दा तोरे देबौ गे गहना तोरे देबौ गे सोना-रूपा तोरे देबौ गे....।” आ गुमानसँ तनल चन्दा शनै: शनै: कानब बन्न कए अपन पिताक चौरगर छातीसँ चीपकि जाइत छलीह। पिता-पुत्रीक अगाध प्रेम। एहेन प्रेम जइमे प्रेमाधिक्य आ सिनेहक धार सदिखन बहैत रहैत छल। राघवक किशोर मनमे बुलेसर बाबूक प्रति धोर घृणा उत्पन्न होमय लगलन्हि। मन होन्हि जे ‘बुलेसराकेँ उठा कऽ पटकि दी बीच चौबट्टियापर। लाते-लाते खनि दी।’ मुदा ई हुनका नीक जकाँ ज्ञात छलन्हि जे बुलेसर बाबूक समक्ष्ज्ञ हुनकर परिवारक अस्तित्व शुन्य छन्हि। आर-तँ-आर राघव केर पिता सेहो बुलेसर बाबूसँ ऋृण लेने छलथिन्ह। फेर राघवकेँ विचार अएलन्हि जे किएक नै चन्दासँ बात कएल जाए? मुदा फेर ओ अपना-आपकेँ चेतलाह। चन्दा तँ थीकीह अन्तत: बुलेसरेक बेटी ने। साँपक गर्भसँ कुनो हंस जन्म लेलकैक अछि। साँपक नेना साँपे जकाँ डॅसबे करतै। चन्दाकेँ कहने की लाभ? ऊपरसँ अगर चन्दा अपन पितासँ शिकाइत करतीह तँ हमरो घरमे विपत्तिक भूकम्प आबि जाए! ...ई सोचैत राघव चुप्पी साधि लेलन्हि। मुदा जखन-जखन टुनटुनमा बेटाकेँ बापक कर्म करैत देखैत छलाह तखन-तखन घृणा आ पश्चातापक ज्वारिमे जरए लगैत छलाह। मुदा छलाह बेवश! लचार!! मरता क्या नहीं करता!!! कहि नै किएक चन्दा राघवकेँ बिना अपने-अापकेँ अनेरे बेचैन अनुभव करए लगलन्हि। एकबेर राघव आठ दिनक हेतु मातृक गेलाह। चन्दाकेँ बिना कहने। चन्दा राघव केर घर लगका पोखरिमे नहाए अएलीह। जखन राघवकेँ नै देखलन्हि तँ मनमे ई भेलन्हि जे राघव कतौ इम्हर-उम्हर चलि गेल छथि किछु क्षणक हेतु। मन तँ नै लगलन्हि। चुप-चाप जल्दी-जल्दी स्त्रगनाही घाटपर जाए पोखरिमे हम डुम देलीह। एक लोटा अछिंजल लए ओतुक्के पंचमुखी महादेवपर आधा मनसँ जल ढारलन्हि। राघवसँ भेँट नै भेलन्हि ऐ बातक कचोट करैत घर चलि गेलीह। घर जाए आधा मनसँ आधा-छीधा अन्न खेलीह आ सोझे आमक गाछी आम ओगरए लेल चलि अएलीह। आमोक गाछीमे चन्दाकेँ मन नै लगलन्हि। चन्दा मोने-मन भगवानसँ प्रार्थना करए लगलीह- “हे भगवान! जल्दी-जल्दी राति करू। सूति रही। जल्दी-जल्दी भोर करू जे राघव भेट जाए।” मुदा राघव तँ आठ दिनक हेतु गामेसँ बाहर भऽ गेल छलाह। खैर! चन्दा मुन्हारि साँझक बाद घर अएलीह। माय पुछलखिन्ह- “चन्दा, अतेक देरीसँ किअए अएलेँह?” चन्दा बजलीह- “चोरा सभ आम तोरबाक फिराकमे छल। सोचलौं जखन मखना रखबार आबि जाएत तखने कलम छोड़ब।” चन्दाक ऐ जबाबसँ प्रसन्न भऽ बुलेसर बाबू अपन सीना चौड़ा करैत पत्नीकेँ कहलखिन्ह- “बुझलिऐक, कतेक ज्ञानी आ बुझनुक अछि अप्पन चन्दा? चन्दा सन भगवान अगर बेटी देथि तँ बेटाक कुन प्रयोजन?” तइपर चन्दाक माय कहलखिन्ह- “अहाँ अनेरे बजैत छी। लड़कीकेँ कुनो हालतिमे साँझ भेला उत्तर घरसँ बाहर नै रहबाक चाही। समए-साल खराप चलि रहल छैक। कुनो ऊँच-नीच भऽ गेलैक तँ की हेतैक।” मुदा बुलेसर बाबू कतए चुप हुअएबला छलाह। कहलखिन्ह- “की बाजि रहल छी? केकरा हिम्मति छैक जे हमर चन्दा संग कनीकबो बद्तमीजी करए। जे सोचबो करत तकर आँखि निकालि लेबैक।” मुदा चन्दा अपन माता-पिताक वाक्-युद्धमे हिस्सा नै लेलन्हि। बिना कुनो हर्ष-विषादक चुपचाप ठाढ़ि रहलीह। चन्दा मोने-मन प्रसन्न भेलीह- “चलू, बाबूजी हमरा अतेक सिनेह करैत छथि। हे भवाबान! जन्म-जन्म भरि एहने पिता देब। ओना माइयो कुनो अधलाह नै कहलनि। अतेक सांझ धरि आमक गाछीमे हमरा नै रहबाक चाही।” मुदा माता-पिताक प्रसंगसँ चन्दाकेँ एक लाभ ई भेलनि जे चन्दा राघवक कमीकेँ किछु क्षणक हेतु बिसरि गेलीह। भोजन-भात करैत रातिक आठ बाजि गेलैक। चन्दा अपन दू छोट बहिन सबहिक संग सूति रहलीह। कनीकाल राघवकेँ स्मरण एलन्हि। तामसो चढ़लन्हि- “कतए चलि गेलाह राघव! भेँट नै भेलाह।” फेर भेलन्हि, “भऽ सकैत अछि कुनो प्रयोजनसँ कतौ गेल होथि। काल्हि तँ भेँट भइये जाएत। मोन भेलन्हि, राघवकेँ पुछबनि जे कतए गेल रही। मुदा लोक अगर सुनत तँ की कहत। राघव सेहो की सोचताह! फेर विचारलन्हि, किछु नै कहबन्हि।” अही तरहक अनेक विचारक श्रृंखलामे चन्दा तल्लीन भऽ गेलीह। पता नै सोचैत-सोचैत कखन निसभेर भऽ गेलीह। भोरे उठि चन्दा नवका पोखरि दिस स्नान करक हेतु विदा भेलीह। सोमक दिन रहैक। माय कहलथिन्ह- “चन्दा, पंचमुखी महादेवकेँ आइसँ हरेक सोम एगारह लोटा अछिंजल चढ़ाउ। गंगेश पण्डित कहलन्हि अछि जे ऐसँ अहाँक कल्याण हएत।” बुलेसर बाबू पत्नीसँ पुछलखिन्ह- “गंगेश पण्डितजी कल्याणक अर्थ की कहलन्हि?” चन्दाक माय- “कल्याणक अर्थ ई भेल जे चन्दाकेँ योग्य घर-वर भेटतनि। सोम दिन महादेव आ पार्वतीक दिन छन्हि। सोमक जल ढारक बड्ड महत छैक। ताहिसँ सोलचौं, गंगेश पण्डित जीक उक्तिसँ चन्दाकेँ अवगत करा दियन्हि।” बुलेसर बाबू पत्नीक बातकेँ स्वीकृति गर्दनि हिला देलखिन्हि। किछु बजलाह नै। मोने-मन भोलानाथसँ व्याहुत बेटी लेल नीक वरक वरदान अवश्य मंगलन्हि। सभकेँ ठसकसँ लगानीपर द्रव्य आ वस्तु देनिहारक हाथ आइ भगवान भोलानाथ लग आर्त-भावसँ लेबाक लेल पसरल छलन्हि। कनीक क्षण लेल अनुभव भेलन्हि जे बेटीक बाप भेनाइ केकरा कहैत छैक!! खैर! चन्दा फुलडाली, फुलही लोटा, वस्त्र, बांसक कर्चीक दतमनि लऽ नवका पोखरि दिस विदा भेलीह। एकपेरिया रस्तामे चलैत मोने-मन उमंगमे डूमल जे आ राघवसँ भेँट हएत। उल्लसित मोनसँ चलैत नायिका सेहो एकपेरिया रस्तापर अपन शरीर आ सोचक संग एक अनुपम सामंजस्य स्थापित कऽ लैत अछि। मोन जेना-जेना अपन सोचमे उतार-चढ़ाव, गति, उद्वेग, तरंग अनैत छैक, तहिना शरीरक अंग सभ प्रदर्शन कए मोनक भावनाकेँ व्यक्त करैत छैक। चन्दो संग सएह भेलन्हि। भरि रस्ता चन्दा कखनो राघव तँ कखनो अपन माइक कहल आदेशक सम्वन्धमे सोचैत रहली। राघवपर चन्दाकेँ तामस आ सिनेहक भाव एक्के संग आबए लगलन्हि। तामस ऐ हेतु जे राघव कतए गेला बिना कहने।” सिनेह ऐ दुआरे जे राघव बड्ड नीक लोक अछि। सोचलन्हि- गरीब तँ छथि राघव, मुदा छथि व्यवहार आ विचारसँ नीक। चन्दाकेँ एक क्षण लेल पहिल बेर ई एहसास भेलन्हि जे शायद राघव हुनका जीवनमे बहुत पैघ स्थान रखैत छथिन्ह। चन्दाकेँ यादि आबए लगलन्हि कबड्डी आ नूका-चोरी। चन्दाकेँ यादि एलन्हि तीन-चारि वर्षक पूर्वक एक घटना जखन चन्दा किछु आर लड़का-लड़की संगे मिलि कऽ कनिया-पुतराक खेल खेलाइत छलीह। राघव सेहो आइ खेलक पात्र छलाह। राघवकेँ घरमे कियो नै रहन्हि। दुपहरियाक समए छलैक। पाँच-छह नेना सभ कनिया-पुतरा खेलाए लागल। भेलैक ई जे ऐ खेलमे एक बर आ एक कनिया हेतैक। कनियाक पिता आ माता हेतैक। बर आ कनियाक बिआह हेतैक। गीत-नाद आ विधि बेवहार हेतैक। चन्दा बनलनि कनिया आ राघव बर। दुनुक बिआह भेलन्हि। गीत-नाद भेलैक। चतुर्थी भेलन्हि। कोहबर बनलै। कोहबर घरमे चन्दा आ राघव बर कनिया बनि आराम करए गेलाह। कोहबर घर की तँ राघवकेँ पिताक मच्छरदानी टांगि ओकर चारू कात नूआसँ झांपि देल गेलैक। राघव आ चन्दाकेँ कोहबर घरमे राखि सभ बच्चा सभ थोड़ेक कालक हेतु बाहर चलि गेल। राघव आ चन्दा अपना-आपकेँ ठीकेमे बर-बनिया मानि एक दोसरकेँ पकड़ि सूति रहलनि। कनीक-कालक बाद बच्चा सभ आबि गेलैक। चन्दा यएह सभ सोचैत-सोचैत नवका पोखरि दिस जाइत छलीह। कखनो कमर लचकन्हि तँ कखनो वक्ष हिलय लगन्हि। कखनो नितम्ब डग-मग करए लगन्हि तँ कखनो आनंदातिरेकमे अवते चलबाक गति तेज भऽ जाइन्हि। जखन तेज चलथि तँ वक्ष आ जखन नहु-नहु आनन्दित होइत चलैत तँ नितम्ब डोलए लागन्हि। दुनू अवस्थामे चन्दा लगैत छलीह सुन्दरि, आकर्षक......। फेर चन्दाकेँ भेलन्हि जे राघव तँ हमर कुनो मूलो-गोत्रक नै छथि। तखन की चन्दा आ राघवकेँ बिआह भऽ सकैत छन्हि? फेर सोचलन्हि, केना हेतैक? एक्के टोलमे जे छी। आर राघव तँ गरीब घरसँ छथि। हमर पिता कखनो ऐ लेल तैयार नै हेताह। ई सोचैत चन्दाक चालि मध्यम भऽ जाइन्ह। माथपर पसीना आबए लगलन्हि। चेहरा उदास भऽ गेलन्हि। मुदा सुन्दरता अपन दोसर रूपमे प्रस्फुटित होइत रहलन्हि। नितम्ब नहु-नहु उभारक प्रदर्शित करए लगलन्हि। आब चन्दा अपन बिआहक संबंधमे सेचए लगलीह। केकरासँ बिअाह हएत? ओ लड़का केहेन हेतैक! हमरा संग ठीक बेवहार करत की नै? छोटकी बहिन सभकेँ जिम्मेवारी माय असगरि केना सम्हारतीह। आदि-आदि। फेर चन्दा अपना-आपकेँ भगवान भोलानाथपर छोड़ि देलन्हि। मोने-मन गाबए लगलीह- “पूजाक हेतु शंकर, आएल छी हम भीखारी।” यएह सोचैत-सोचैत चन्दा आबि गेलीह नवका पोखरि लग। पोखरिसँ ठीक पहिने राघव केर दलान। दलानपर राघवकेँ पुन: नै देखलखिन्ह। मोन रोष आ अव्यक्त विरहसँ विदग्ध भऽ गेलन्हि। चारू कात देखलनि। मुदा राघव कतौ नै। चन्दाक मुँह ओइ फूल जकाँ मुरझा गेलन्हि जकरा तोड़ि लोक जेठक प्रचण्ड रौदमे छोड़ि दैत छैक। निष्ठुर राघव किएक कतौ बिना कहने चलि गेलैक। खैर! चन्दा चारू कात राघवकेँ तकलन्हि। मुदा राघव जखन घरपर रहतथि तखन ने चन्दाकेँ भेट होइतन्हि। अन्तमे चन्दा मन्दिरक पाछाँ फुलवारीमे फूल लोढ़ए गेलीह। चम्पाक गाछमे पीअर-पीअर रमनगर आ सुगन्धित चम्पा फुलाएल रहैक। रहैक मुदा बड़ ऊँचका ठाढ़िपर फुलाएल। चंदा सोचलीह चलू अही बहाने राघवक घर जाइत छी। ई सोचैत चंदा राघवक घरपर आबि गेलीह। राघवक मायकेँ पुछलखिन्ह- “काकी, हमरा चम्पा-फूल पंचमुखी महादेवकेँ चढ़ेबाक अछि। मुदा फूल तँ बड्ड ऊँचका डारिपर फड़ल छैक। हम नै पबैत छी। कनी राघवकेँ कहबनि जे किछु फूल तोड़ि देताह?” राघवक माय कहलखिन्ह- “बुच्ची, राघव तँ मातृक काल्हि भाेरे गेल। कलकत्तासँ ओकर छोटका मामा-मामी सपरिवार आएल छथिन्ह। कहि कऽ गेल अछि जे सात-आठ दिनक बाद आओत। आब अहीं कहू जे केना फूल टुटत?” फेर किछु देर सोचैत राघव केर माय अंगनासँ एक गोट पाहुनकेँ बजेलखन्हि। जे जरैलसँ अपन बहिन लग आएल छलाह। ओइ पाहुनकेँ कहलखिन्ह- “यौ पाहुन, ई थीकीह चन्दा, हम्मर गामक बेटी। हिनकर पिता बड्ड कलामा। ई भगवान पंचमुखी महादेवकेँ चढ़ेबाक लेल किछु चम्पा फूल तोड़ए चाहैत छथि। मुदा फूल गाछक फुनगीपर लागल छैक। कनी अहाँ हिनका फूल तोड़ि दियौन्ह। फूल तोड़ैबला सेहो फूल चढ़बैबला अतेक धर्म होइ छैक। राघव रहैत तँ कुनो बाते नै। ओ मातृक गेल अछि। कनी, अहीं फूल तोड़ि दियौन्ह चन्दाकेँ।” पाहुन हाथमे लग्गी लऽ बिना किछु कहने चम्पा फूल तोड़ए लेल चन्दा संग बिदा भेलाह। चन्दाक मुँह जेना लटकि गेलन्हि। गाल जेना सियाह भऽ गेलन्हि। आँखि नोराह भऽ गेलन्हि। ठोर सुखाए लगलन्हि। छाती धरकए लगलन्हि। मुदा जवानी केर दरबज्जापर आबि गेल चन्दा सोचल्नि जे कनिया काकी अर्थात् राघवक मायकेँ धन्यवाद अवश्य देल जाए। जाइत-जाइत कहनखिन्ह- “कनियाँ काकी, पाहुन खराप तँ नै सोचताह?” राघवक माय झट दऽ उत्तर देलखिन्ह- “की सोचै छी बुच्ची? पाहुन आन कियोक ने छथि। जरैलवाली कनियाँक भाय छथिन। बहिनक ननदि लेल फूल कनी तोरि देलखिन्ह तँ की भऽ जेतन्हि। अहाँ निश्चिन्तसँ जाऊ।” चम्पा फूल अपन फुलडालीमे राखि चंदा स्त्रीगनाही घाटमे स्नान केलनि। माइक आज्ञाकेँ मानै डोले-डोले अछिंजल लऽ एगारह लोटा जल पंचमुखी महादेवक ऊपर ढाड़लनि। लगभग 15 मिनट घर महेशवानी, नचारी इत्यादि सेहो गेलीह। आ अन्तत: घर दिस बिदा भेलीह। घरपर माय पुछलखिन्ह- “चन्दा, पंचमुखी महादेवकेँ जल चढ़ेलौं बेटी?” चन्दा बिना किछु कहने गर्दनि हिलबैत हँ कहि देलखिन्ह। माइक मोन तीरपीत। जल्दीसँ चन्दाक आगूमे भोजन परसि देलखिन्ह। मुदा चन्दा मोनसँ नै खेलीह। राघवकेँ यादिमे डुमल रहलीह। केकरो लग नै बजलीह अपन वेदना। समए बीतए लगलैक। एक दिन बुलेसर बाबूक पत्नी अर्थात् चन्दाक माय बुलेसर बाबूकेँ कहलखिन्ह- “सुनै छी, चन्दा आब बिआह जोगरक भऽ गेल अछि। हमरा सभकेँ बेटा ई तीनू बेटिये अछि। तँए नीक घर-बर ताकि ऐ तीनूकेँ बिआह कऽ दिऔक। सम्पति राखि की करब? जखन तीनू बेटीकेँ बिआह भऽ जाएत आ ओ सभ अपन-अपन सासुर बसए लागत तँ धराड़ी आ किछु कलम छोड़ि तमाम सम्पति बेच, सभ पैसाकेँ बैंकमे राखि अपने दुनू प्राणी काशी चलि जाएब। बैंकक सूदिसँ जीवन चलत। नौमनी तीनू बहिनकेँ बना देबैक। मुदा ई सभ तखन सम्भव अछि जखन अहाँ जीमन, लगानी, वस्तु, पैसा इत्यादिकेँ बँटवारा कऽ लेब। कहियनु कन्हाइ बाबूकेँ जे बाँटि कऽ सभ वस्तु ब-हिस्सा बराबरि कऽ कऽ दऽ देथि।” बुलेसर बाबू कहलखिन्ह- “हँ, हँ। कन्हैया किएक नै देत। ओकरा तँ तरीकासँ हमरा जेठाँस देमाक चाही। बपौती सम्पतिक अलाबे जे अर्जन भेल अछि तइमे हम्मर योगदान कन्हैयासँ बहुत ज्यदा अछि। हम काल्हिये कन्हैय्या लग ई प्रस्ताव राखैत छी।” बुलेसरकेँ पत्नी कहलखिन्ह- “जखन कन्हाइ बाबू दऽ देताह तखने कहब। कहि नै किएक हमर मोन बड्ड घबरा रहल अछि।” बुलेसर बाबू बजलाह- “अहाँ अनेरे घबराइ छी। स्त्री छी स्त्रीगन जकाँ रहू। जाउ भोजन-भात बनाउ गऽ। हम काल्हिये कन्हैया लग ई प्रस्ताव राखब आ एक मासक भीतर सभ चीज बाँटि लेब। फेर नीक जकाँ तीनू बेटीकेँ बिआह करब। आब ऐ केर अलाबा हमरा सभकेँ कार्ये की?” दोसर दिन दुपहरमे बुलेसर बाबू दरबज्जापर अपन छोट भाए कन्हाइ बाबू लग बैसल रहथि। कन्हाइ बाबू कनीक बुलेसर बाबूसँ ज्यादा पढ़ल छलाह। मुदा पाँचसँ ज्यादे नै। एक नम्बरक घुइयाँ आ कइयाँ। कन्हाइ बाबूकेँ चारि बालक आ दू बालिका। बालक सभ पढ़ैमे भोथ मुदा कन्हाइ बाबू घरेमे मिडिल स्कूल केर एक मास्टर साहेबकेँ रखैत छलाह। हुनका मुफ्तमे भोजन आ रहबाक व्यवस्था कऽ देने छलखिन्ह। कखनौं कालकेँ किछु आर्थिक मदति सेहो कऽ दैत छलखिन्ह। कृतज्ञ मास्टर नियमित रूपसँ कन्हाइ बाबूकेँ भोथ आ नालायक बेटा सभकेँ पढ़बैत रहैत छलाह। कन्हाइ बाबू चोरा-चोरा कऽ पैसा इत्यादि अपन पत्नी तथा बेटा सबहक नामसँ गामक पोस्ट आॅफिस तथा अपन सासुरमे रखैत छलाह। ऐ बातक जानकारी बुलेसर बाबूकेँ नै छलन्हि। कन्हाइ बाबू मोने-मोने ई प्लान कऽ रहल छलाह जे बुलेसर बाबूकेँ बेटीक बिआह कुनो सामान्य परिवारमे करा बुलेसर बाबूक तमाम जमीन आ चल-अचल सम्पतिकेँ हथिया लेताह। बुलेसर बाबू कहलखिन्ह- “कन्हैया, हम आ तूँ दुनू भाँइ एके संग रहलौं। मिल कऽ सम्पति बनेलौं। तोरा भगवान चारिटा लड़का देने छथुन्ह। मुदा हमरा तीनटा बेटिये अछि। ई तीनू बेटी हमरा लेल बेटासँ कम नै अछि। आब चन्दा बिआह जोगरक भऽ गेल अछि। आनो सभ उपरे-नीचा छैक। चन्दाक माय हमरा सदिखन एकर सबहिक बिआह करा देबक हेतु कहैत रहैत छथि। हम सोचैत छी, जे मरला उत्तर हम्मर सम्पतिकेँ हकदार यएह सभ हएत। फेर हम अपन जीबैत सम्पति बेचि एकर सभकेँ नीक घरमे कएक नै बिआह करा दिऐक? मुदा हमरा तँ अधिकार केवल अपन हिस्सापर अछि। सझिया-साझपर नै। तँए दुनू भाँइ अपन तमाम सम्पतिक बँटवारा कऽ लैत छी। तोहर की विचार करतौक। तों अनेरे चिन्ता नै कर।” ई बात होइते रहैक ताबतेमे चन्दाक माय आंगनसँ दरबज्जापर आबि गेलीह। कहए लगलखिन्ह- “सभ चीज ठीक छै कन्हाइ बाबू। मुदा बँटवारा तँ भऽ जेबाक चाही। सझिया-साझमे हमरा समस्या अछि कुनो चीज करहौक मन हएत तँ मोन मसौसि कऽ रहए पड़त। बिआह-दानक बाद जे सम्पति रहतैक से अहुना अहिंक बच्चा सभकेँ रहत। अहाँ हमरा सभकेँ सभ सम्पति बाँटि दिअ।” कन्हाइ बाबू ऐ बातपर चिचिआइत बजलाह- “भौजी! अहाँ आंगन जाउ। हमरा दुनू भैयारीमे अहाँ नै बाजू। हमरा सभकेँ जेना हएत तेना करब। अहाँ जाउ। लप्प दनी दरबज्जापर आबि जाइत छी। जएब की नै?” बुलेसर बाबू बीचेमे अपन पत्नीक बातक समर्थन करैत बाजि उठलाह- “कन्हैया, भौजी तँ वएह बात कहै छथुन्ह जे हम कहि रहल छिअह। तों तामस नै कर आ सम्पति बाँटि ले। सभटा लहनाकेँ बही, द्रव्य-जात, पैसा इत्यादि एकठाम कर आ बाँट।” कन्हैया तामसे घोर भऽ गेलाह। कहए लगलखिन्ह- “भैया, लगानीमे बारह अना हम्मर अछि केवल चारि अना तोहर। तों घरमे जोखैत छेँ, खेती करैत छेँ।” हम चारू बापुते गामे-गामे, घरे-घरे जा कऽ तगादा करैत छी आ डुमल पाइ वापस लबैत छी।” बुलेसर बाबूकेँ आँखिक आगु अन्हार भऽ गेलन्हि। बजलाह- “हम की नै केलौं। कर्म-कुकर्म सभ। राति-दिन तोहर संग देलयौक। लोक सभसँ झगरा-फसाद केलौं। आब कहैत छेँ जे द्रव्य-जात एवं पैसापर हम्मर हक केवल चारि आना? हे भगवानक डांगसँ डर कन्हैया!!! चल पाँचटा पंच बैसबैत छी। काल्हिये ऐ बातक निबटारा भऽ जेबाक चाही।” कन्हैया कहलखिन्ह- “निवटारा की हेतैक भैया, निबटारा भेले बूझ। तोरा चारि आना हिस्सा भेटतै द्रव्य-जात अा लटनामे।” ई कहि कन्हैया अपन बरका बेटाकेँ लगानी बला सन्दूर चाभी देमए लगलाह।” ई चीज बुलेसर बाबूकेँ बरर्दास्त नै भेलन्हि। तुरत झपटि कऽ चाभी छन्हि लेलन्हि आ बाजय लगलाह- “रे ककर मजाल छैक जे हमर आधा हिस्सा रोकि लेत। तकरा कुट्टी-कुट्टी काटि देबैक।” बुलेसर बाबू सन्दुक चाभी छीनि घर दिस बिदा भेलाह। पाछाँसँ कन्हाइ बाबू हुनका भरि-पाज कऽ पकरलन्हि आ हुनकर हाथसँ चाभी छीनए लगलाह। बुलेसर बाबू छलाह बलिस्ठ। एकै बेरमे कन्हाइकेँ उठा कऽ पटकि हुनकर छातीपर चढ़ि गेलाह। मुदा पाछाँसँ कन्हाइ केर ई बालक लाठी लऽ ताबर-तोर बुलेसर बाबूपर प्रहारक देलकन्हि। कपार फूटि गेलन्हि। माथक शोनित पोछए लगलाह। अतबेमे कन्हाइ बाबू हुनकर हाथसँ चाभी छीनए लगलथिन्ह। मुदा बुलेसर बाबू चाभी नै देलखिन्हि। आब कन्हाइ बाबू तीनू-बाप बेटा मिल बुलेसर बाबूपर प्रहार करए लगलखिन्ह। हत्थम, लत्तम, श्रुत्तम आ लाठीक प्रहार। असगर बुलेसर बाबू की करितथि? देह चूर-चूर भऽ गेलन्हि। चाभी सेहो छिना गेलन्हि। बेचारी पत्नी लाचार भऽ अपन देअर आ देअरक बेटा सभकेँ गारि दैत रहलीह। सरापैत रहतीह। “निपुत्रीपर हाथ उठेलक अछि। सर्वनाश भऽ जएतैक। तड़पि-तड़पि कऽ मरत कन्हैया सरधुआ! कुस्टी फुटतैक। वाक् बन्द भऽ जएतैक। देहसँ गन्ध निकलतैक। अपन संतान आ घरवाली तक काज नै अएतैक।” बुलेसर बाबूक पत्नी गारि पढ़ैत रहलीह आ अपन ढेर भेल पतिकेँ मरहम पट्टी करैत रहलीह। कनीक कालक बाद चौकसँ जीतू कम्पाउण्डर अएलाह आ बुलेसर बाबूकेँ मल्हम-पट्टी केलन्हि। दर्द बड्ड रहन्हि तकर निवारण हेतु दूटा सूई आ बहुत रास दबाइ सेहो देलकन्हि। बुलेसर बाबू कराहैत रहलाह। छटपटाइत रहलाह। चंदा पाथर भेल ठाढ़ छलीह। आँखिसँ नोर दहो-बहो खसैत रहलन्हि। गुमान जेना धरासाइ भऽ गेलन्हि। जखन ऐ घटनाक जानकारी राघवकेँ भेटलन्हि तँ राघव मोने-मोन बड़ प्रसन्न भेलाह। राघवकेँ भेलन्हि जे आइ गुलेसर मलाहक अपमान आ ओकरा सतेबाक बदला बुलेसरकेँ नीक जकाँ भेटलन्हि। हलांकि भोरे-भोर जखन पोखरिक कछेरपर चन्दाक मुँहकेँ देखलनि तँ कनीक कष्ट जरूर भेलन्हि। सदतिकाल गुमान आ ठसकसँ चूर चन्दा आइ ग्लानि आ बेदनाक मूद्रामे छलीह खीन्न आ शान्त। शायद असहाय सेहो। फेर यादि अएलन्हि बेचारा लाचार मल्लाहक दशा- आइ गाय जकाँ जे ई जनैत अछि जे ओ कसाइ लग बाध्य हेबाक लेल जा रहल अछि। तथापि ओ लाचार भऽ डंटाक भयसँ जाइत अछि कसाइखानामे। तहिना अपन फँसल गर्दनिक संग असहाय भय गुलेसरा बुलेसर बाबू संगे अखाड़ा गाछी गेल छल। आ ओतय एहन यातना भेटलैक जे ओही बेथे तड़पि-तड़पि कऽ प्राण तियागि देलक। जखन राघवकेँ ई बात सभ स्मरण अएलन्हि तँ फेर मोन प्रसन्न भेलन्हि। सोचलाह। नीक भेल सार बुसेराकेँ! कसाई बनैत छल। अपन तागत आ सम्पतिक नाशामे बतहा कुकुड़ बनल छल। आब बुझह। मुदा राघव चन्दाक प्रति प्रेमक भाव रखैत छलाह। कहि नै किएक राघवो चन्दाकेँ चन्दासँ कम सिनेह नै करैत छलाह। ऐ घटनाक तीन दिनक बाद चन्दा दुपहरमे नवका पोखरिपर आबि पंचमुखी महादेवक मन्दिर केर पाछाँ फुलवारीमे अएलीह। राघव ओतय पहिनेसँ छलाह। आर कियोक नै छलैक। राघवकेँ देखैत चन्दा कहलखिन्ह- “राघव, अहाँकेँ एगो बात बूझल अछि?” राघव बजलाह- “की?” चन्दा कहलखिन्ह- “कन्हाइ काका हम्मर पिताकेँ बड्ड मारलखिन्ह अछि। हमर पिता छलाह असगर आ कन्हाइ काका तीन बापुते। गलती हमर पिताकेँ केवल एतेक जे ओ कहलखिन्ह जे तमाम सम्पतिक बॅटबारा कऽ लिअ। ओ सभ जानवर जकाँ मारलकन्हि। कपार फोर देलकन्हि। शरीरमे कम-सँ-कम 25 लाठी लागल छन्हि। पपियाहा चण्डेश्वर पंच जे अपनाकेँ सरकार बुझैत अछि हमर पिताकेँ थाना नै जाय देलकन्हि। कहलकन्हि जे ऐसँ कन्यादानमे व्यवधान हएत। की ई हेबाक चाही?” राघव बजलाह- “हँ चन्दा, हमरा सभ बात काल्हि जखन हम मातृकसँ एलौं तँ ज्ञात भेल।” एकाएक राघव केर धियान चन्दा दिस गेलन्हि तँ देखैत छथि चन्दाक आँखिसँ नोर खसि रहल छन्हि। राघव केर मोनमे चन्दाक प्रति दयाक भाव उमरि गेलन्हि। चन्दा लग गेलाह आ अपन गमछासँ चन्दाक नोर पोछए लगलाह। फुलवारीमे राघव आ चन्दाक अलाबे आर कियोक नै छलैक। चन्दो राघवकेँ पकडि कानय लगलीह। राघव चन्दाकेँ भरि पाँज कऽ पकड़ि लेलन्हि। राघवकँ चन्दाक हृदैक धरकन स्पष्ट सुनाइत छलन्हि। बुझेलनि जेना चन्दा आ राघव हमेशाक लेल एक भऽ गेल छथि। चन्दा सेहो राघवकेँ बाहिसँ ग्रसित भऽ अपना-आपकेँ सुरक्षित बुझैत छलीह। मुदा कनीकबे कालक बाद दुनू अलग भऽ गेलाह। भलन्हि लोक देखत तँ की कहत??? कन्हाइ बाबू पंच लोकनिकेँ कहलखिन्ह– “अहाँ सभ चारिम दिन बैसारमे आऊ। हम आब बुलेसर भैय्यासँ बॅटबारा कऽ लेब।” इम्हर कन्हाइ बाबूक बेटा आ पत्नी सभ मिलि कऽ दलाल रूपी लोभी पंच सभकेँ किछु-किछु प्रलोभन दऽ सभकेँ अपना पक्षमे कऽ लेलन्हि। ऐ तमाम प्लॉटसँ बुलेसर बाबू अनजान छलाह। िनर्धारित दिन आ समैपर पंच सभ अएलाह। पंचायत शुरू भेलैक। पंच सभ काचें गाए खेलाह। केवल 30 प्रतिषत लहना आ नगदी हिस्सा बुलेसर बाबूकेँ भेटलन्हि। खेत-पथार-घड़ारी इत्यादिमे आधा हिस्सा जरूर भेटलन्हि। चन्दाक माय भरि इच्छे पंच सभकेँ गारि पढ़लन्हि- “एक कप चाह, एक सेर तेल, पाँच सेर धानमे अपन इमान बेचैत अछि सरधुआ पंच। आ ई चन्द्रशेखर सरकार। ई तँ साक्षात यमराज अछि। बहुखौका! जवानीमे घरवालीकेँ खा गेल। दिन भरि चौकपर चाहक जोगारमे लागल रहैत अछि। बेटा कचरी-मुरही आ चाह बेचैत छैक। ओहीसँ गुजर चलैत छैक। सरधुआ के जरूर कन्हैयाक बहु सए-सैकड़ाक प्रलोभन देने हेतैक। अगर भगवान कतौ हेताह तँ गुँह गीज कऽ मरत सरधुआ सरकार!!” बॅटबाराक बाद बुलेसर बाबूक पहिल उद्देश्य छलन्हि चन्दाक बिआह। एक दिन ओलारपर बैसल छलाह बुलेसर बाबू तँ बाध दिससँ लूटन एलखिन्ह आ कहलखिन्ह- “बुलेसर भाय, अहाँ कन्हाइ लेल की नै केलौं। से कन्हाइ सम्बन्धक मर्यादाकेँ िबसरि गेल। अपने तँ मारबे केलक बेटा सभसँ सेहो मरबेलक अहाँकेँ। एहेन जधन्य कृत्य! फाटू हे धरती!” बुलेसर बाबू कनैत बाजए लगलाह- “की कहूँ लूटन भाय, ई भाए नै कसाइ थिक। हम साँपक पोवाकेँ पोसलौं। कून-कून कर्म नै कएल कन्हैया लेल। सभ बिसरि गेल। हे महादेव जनिहेँ तुहीं। जहिना हमरा कना रहल अछि तहिना ओहो कानत।” लूटन बाबू बजलाह- “भाय, एक बात कहूँ?” जटैतकेँ बंगट पहलमानक दोसर बेटाकेँ पहिल कनियाँ मरि गेल छैक। प्रथम पत्नीसँ मात्र एक पूत्र दैक अपार संपति तँ छैक। लाठी केर जोरगर ओ सभ सेहो अछि अगर अहाँ कही तँ चन्दाक बिआहक चर्चा करी। अगर ई काज भऽ गेल तँ कन्हाइ औकातमे आबि जएताह। अहाँ ताकतवर भऽ जाएब। चन्दा आ लड़कामे करीब चौदह बर्खक अन्तर छैक। ताहि लेल कुनो बात नै। पहलमान छै, अपना उमेरसँ दस बर्ख कम्मे लगैत ैछक। आ चन्दो तँ ऊँचाइमे ठीक अछि। लूटन केर प्रस्ताव बुलेसर बाबूकेँ नीक लगलन्हि। बजलाह- “कन्हैयाकेँ औकात देखेनाइ जरूरी।” फेर कहलखिन्ह- “लूटन भाय, ई कार्य हमरा पसन्द अछि। चन्दा सभ तरहेँ ओइ घरमे राज करत। नौकर-चाकर सभ छैक। कुनो वस्तुक कमी नै छैक। लड़काकेँ पहिल पत्नीसँ एक बेटा छैक तँ की भेलै? मुदा हमरा ऐ सम्बन्धमे कनिक चन्दाक मायसँ विमर्श करबाक अछि। हमरा विश्वास अछि ओ मना नै करतीह। काल्हि हम अहाँकेँ नीचाेड़ बता देब।” घर जाइते मातर बुलेसर बाबू चन्दाक मायसँ जरैलक बंगट पहलमानक बेटाक सम्बन्धमे बात केलन्हि। दोती बर छैक ई जानि चन्दाक माय कनी दुखी भेलीह परन्तु जखन आरो बातक जानकरी भेलन्हि तँ मानि गेलखिन्ह। फेर की छल, 15 दिनक अन्दर चन्दाक बिआह भऽ गेलन्हि। जहिया बिआह रहन्हि चन्दाकेँ तहिया राघव सेहो सरियाती दिससँ छलाह। जखन राघव चन्दाक वरकेँ देखलखिन्ह तँ मोन दग्ध भऽ गेलन्हि। 17 बर्खक चन्दाकेँ 31 बर्खक वर। बाहिं सभपर गांठ पड़ल। चौरगर हाथ। माथपर तलबार आ कह्टाक चारि नीशान! हे भगवान! चन्दा तँ बानरक हाथमे नारिकेर भऽ गेलीह। खैर! पीअर परिधानमे सजलि चन्दा बड्ड आकर्षक लगैत छलीह। बिआहमे बुलेसर बाबू तीन बीघा खेत बेचलाह। छह मासक बाद चन्दा सासुर गेलीह। इम्हर राघव दिल्ली आबि गेलाह। राघव जखन चारि-पाँच बर्खक बाद गाम गेलाह तँ संयोगसँ चन्दा सेहो आएल छलीह। हलि कऽ काँट-काँट भेल! लोक सभकेँ पुछलखिन्ह तँ पता चललन्हि जे चन्दाकेँ कुनो असाध्य बिमारी भऽ गेल छन्हि जकर इलाज संभव नै छैक। चन्दा श्रीहीन भऽ गेल छलीह। अधिकांश समए नैहरमे बितबैत छलीह। चन्दाक छोट बहिनक बिआह सेहो भऽ गेल छलन्हि। छह मासक बाद चन्दा मरि गेलीह। चन्दाकेँ कुनो संतान नै भेलन्हि। चन्दाक मृत्युक समाचार सुनि बुलेसर बाबू ओछाइन पकड़ि लेलन्हि। लुटन बाबू एक बेर फेरो चन्दाक माय लग आबि कहलखिन्ह जे चन्देक वरसँ चन्दाक सभसँ छोट बहिनक बिआह करा देल जाए। चन्दाक माय मानि गेलीह। बुलेसर बाबू सुधिहीन भऽ गेलाह। चन्दाक छोट बहिनक बिआह चन्दाक दोती वरसँ भऽ गेलन्हि जे चन्दाक बहिन लेल तृती वर छलखिन्ह। बिआहक सोल्हमे दिन द्विरागमन भऽ गेलैक। द्विरागमनक दस दिनक भीतर बुलेसर बाबू प्राण त्यागि देलाह। चन्दाक माय नीकसँ श्राद्ध-शुरू केलथिन्ह। आब लगभग चारि बीघा जमीन आ घराड़ी शेष छलन्हि। चन्दाक माय सभ बेचि दरिभंगामे एक कमरा भाड़ा लऽ चलि गेलीह। पैसा बैंकमे राखि देलथिन्ह। ओही पैसाक सूदिसँ गुजर चलए लगलन्हि। इम्हर कन्हाइ बाबूकेँ कंठमे घाव भऽ गेलन्हि। पैघ ऑपरेशन कराबए पड़लन्हि। जखन ऑपरेशन भऽ गेलन्हि तँ पता चललैक जे कैंसर छन्हि। धीरे-धीरे आबाज समाप्त भऽ गेलन्हि। गर्दनिसँ सदरिकाल पीज चूबए लगलन्हि। मुँह आ गर्दनिसँ दुर्गन्ध गन्हाए लगलन्हि। बड़ बेटा-पुतोहु कियोक आगाँ लग नै आबन्हि। धन्य कहीं एक बेरोजगार नातिकेँ जे नानाक किछु-किछु सेवा करन्हि। वाकहीन कन्हाइ बाबू सन्दूकसँ चोरा कऽ अपन पाइमे सँ लाख टका अपन नातिकेँ दऽ देलथिन्ह। बहुत किछु बाजए चाहैत छलाह कन्हाइ बाबू मुदा वाक् बन्द भऽ गेल छलन्हि। घावमे पिलुआ सेहो फरि गेल छलन्हि। शायद ओ मोनहि मोन अपन कर्मपर पश्चाताप करैत छलाह। ऐ घोर कष्टमे सेहो कन्हाइ बाबू नौ मास छटपटाइत रहलाह आ जीलाह। अन्तत: एक दिन कन्हाइ बाबू अपन शरीरक त्याग केलन्हि। शरीरसँ अतेक गन्ध अबैत छलन्हि जे एग्यारह आदमी कठियारीमे जएबाक लेल तैय्यार नै। राघव संयोगसँ गाम आएल छलाह। माय कहलथिन्ह- “राघव, अहाँ जाउ। हमरा लोकनि ऐ समाजमे रहैत छी। अहूँ नै जएबैक तँ अहूँक माता-पिता बेरमे कियोक नै आएत।” राघव माइक आज्ञाकेँ सम्मान करैत कन्हाइ बाबूक दाह संस्कारमे गेलाह। जखन मृतक केर शरीरमे आगिक ज्वाला बढ़लैक तँ राघवकेँ लगलन्हि जेना ओतए ओइ मृत्युपर गुलेसरा मल्लाह, बुलेसर बाबू आ चन्दा जेना समवेत रूपसँ जश्न मना रहल छथि। गुलेसरा मल्लाह जेना डंटा उठा बुलेसर बाबू आ कन्हाइ बाबूकेँ डांग मारि-मारि अपन बदला लऽ रहल हो। आ चन्दा गुलेसरा मल्लाहसँ अपन पिताक रक्षाक निवेदन करैत छलीह। अही प्रक्रियामे कन्हाइ बाबूक शरीर खाक् मे विलिन भऽ गेलन्हि। सबहक संग राघव सेहो कठियारीसँ आपस आबि गेलाह। मोने-मोन सोचए लगलाह राघव- स्वर्ग नर्क तँ अतहि अछि। जे जेहेन करत से तेहेन पाऔत। २ उमेश मण्डल मैथिली युवा रचना-धर्मिता :: परंपरा परिवर्त्तन आ भविष्य “रचनाक धर्मिता, साहित्य सृजनक धर्म एवं ओकर भविष्य” कतेक महत्वपूर्ण विषय अछि। प्रतिपाद्य विषयपर जतबा रचना पढ़ल गेल संभव, विचारणीय अछि। सन्दर्भक मूल अछि इमानदारीसँ, निष्पक्ष भऽ रचना करब, रचना एवं रचनाकारक धर्म-कर्म यएह थिक। धर्म-कर्म, काम-धाम दुनूक प्रयोग अपना सबहक बीच होइत आएल अछि, सभ बजैत आएल छी, रहै छी। विचारणीय अछि जे जहिना कर्म-धर्म, ओहन काजकेँ कहल जाइत जे धर्मक रास्तासँ चलैत अछि। आ कर्मक अर्थ काम सेहो होइत अछि। जेकरा संग धाम शब्दक प्रयोग होइत अछि- काम-धाम। धाम अलंकार रूपमे प्रयोग होइत अछि जेकर तात्पर्य स्थानसँ होइत अछि जेना वैद्यनाथ धाम। स्पष्ट अछि अपना सबहक धाम मिथिला थिक, मिथिला धाम। आ मिथिलाक विकास उद्देश्य। जइ देशमे अनेको भाषा, अनेको जाति-सम्प्रदय एक संग डेग-मे-डेग मिला चलैत आबि रहल अछि। हमरा सभकेँ ओइ शक्तिकेँ चिन्हबाक अछि, पकड़बाक अछि एवं मजगूतीसँ पकड़ि रखबाक अछि। जे एतेक पैघ देशकेँ एक तागमे बान्हि कऽ रखने अछि। आ ई चीज कोनो आइये नै भेल, अदौसँ आबि रहल अछि। उदाहरण लेल अहाँ कोनो गामकेँ लऽ लिअ। गामक श्रेष्टता ओइ गामकेँ होइ छैक जइ गाममे छत्तिसो वर्णक बास अछि। ऐ छत्तिसो वर्णकेँ आर्थिक आ वौद्धिक रूपमे देखल जाए तँ गरीबसँ गरीब (भिखमंगा) आ अमीरसँ अमीर छथि। जहिना निम्नसँ निम्न जाति एवं उच्चसँ उच्च जाति सेहो गाममे समाजमे बसै छथि। मुदा सामाजिक बंधन ओहन अछि जे सभ अपना-अपना सीमामे स्वतंत्र रूपसँ जीब रहल छथि। देखि सकै छी, सोचि सकै छी जे एक्के गामक एक धरतीपर भिन्न-भिन्न सम्प्रदायक उत्सव-समारोह साले-साल होइत आएल अछि, होइत रहैए। हमरा सभकेँ ऐ सभ महत्वपूर्ण विन्दुपर विचार कऽ ओइ शक्तिकेँ अक्षुण्न रखबाक दायित्व बनैत अछि। जइसँ मात्र वर्त्तमाने नै भविष्य सेहो सशक्त रहत एवं दुनियाँक समक्ष जइ विशेषताक लेल अपन सबहक पहिचान अछि सेहो बनल रहत। समस्या जटील जरूर बूझि पड़ैए मुदा समाधानक उपाय सेहो समाजेमे अछि। समाजेक भीतर अछि। जे सनातनी पद्धति माने परिवत्तनीय पद्धतिसँ समाधान कएल जा सकैए। हँ एहेन जरूर भऽ गेल अछि जे आकाश-पातालक दूरी बीचमे बनि गेल अछि। मुदा की हम सभ हाथ-पएर समेटि थुसुकुनिया मारि ली? सीरा नै भट्ठा दिसि दहाइत रही? अपना महत्वकेँ बिसरि जाय? नै। बल्कि, कान ठाढ़ कऽ सुनबाक, बुझबाक एवं किछु करबाक लेल अपनाकेँ तैयार करबाक चाही। अपन मिथिलाक वैदिक पद्धतिपर नजरि लऽ जाए इमानदारीसँ बुझबाक अछि। भारतीय चिन्तनधारामे पातालोसँ आकाश आ आकाशोसँ पाताल आबि जाए तकर संवाद परिचालन होइत रहल अछि। दृढ़ता अनबाक लेल ऐठाम एकटा कहावत मोन पड़ि रहल अछि जे कहबी छै ‘बिना कारणे टिटही नै लगै छै।’ मूल प्रश्न अछि- समाज केना सशक्त बनए, देश केना सशक्त बनए। ऐ दायित्वकेँ बूझि रचनाक सृजन हेबाक चाही। तँए साहित्य की? साहित्य दर्पण आकि दर्शन? साहित्य दर्पण थिक, मात्र कहने व्यापकताक अभाव बनल रहि जाइत अछि। दर्पणक शीशाक एक भागमे पॉलिश कएल रहैत अछि। जेकर परिणाम होइत अछि जे ओ एकभगाह भऽ जाइए। युवा साहित्य सृजक भाय-बहिन, अपना सभकेँ विचार करबाक आवश्यकता अछि जे साहित्य आखिर छी की? दर्पण आकि दर्शन? जइमे चारू दिशा देखल जाइत अछि। भौगोलिक भाषामे दिशा िनर्धारित अछि, पूब-पश्चिम, उत्तर-दक्षिण, ऊपर-नीचा इत्यादि। मुदा दर्शानिक भाषामे वएह चीज विचारधारा कहबैत अछि। जे परिवक्व भेलापर दर्शनसँ दिग्दर्शन बनि जाइत अछि। आ वएह विचारधार रूपमे आगू सेहो बढ़ैत अछि। अहीठाम हम सभ विचार करी जे हमरा सबहक लक्ष्य केहेन हेबाक चाही ओइ पॉलिश कएल एकभग्गु शीशा सन जे मात्र एक दिशा देखि एकभग्गु भेल रहत? नै। बल्कि ई सोचबाक अछि जे चारू दिशा केना देखब, चौमुखी एवं सर्वांगिन विकास केना होएत। तइ लेल ओहन दर्शन, ओहन दृष्टिकोण या फेर ओहन विचारधारकेँ पकड़ि चलबाक अछि आ रचना करबाक अछि। जइमे हमर सबहक विविधता, व्यापकताक रक्षा भऽ सकए। साहित्य समाज वा देशक ओहन सम्पति छी जे कठीन-सँ-कठीन परिस्थितिक रस्तो बतबैत अछि आ आगू बढ़ैक उपाए सेहो करैत अछि। मुदा तइ लेल समाज आ देश-दुनियाँक गहन अध्ययन, चिन्तन-मननक संग रचनाक जरूरति अछि। भारतीय चिन्तनधारा ओहन िचन्तनधारा थिक जेकरा समुचित ढंगसँ रखलापर केहनो अन्हर-तुफान किएक ने उठौ मुदा ओहन डोलान नै डोलत जेहन डोलैत रहैए या फेर डोलबाक भय बनि गेल अछि। मुदा तइ लेल हमरा सभकेँ थोड़ेक व्यापकता दिसि बढ़ए पड़त, समाज दिशि बढ़ए पड़त। व्यक्तिवादी आ जातिवादी सोचसँ ऊपर उठि सामाजवादी एवं साम्यवादी सोचक पूजारी बनबाक खगता अछि। हमरा अहाँक मात्र नै जन-जनक दायित्व अछि जे संग-संग चलि दुनियाँक बीच अपन मातृभूमि, मातृभाषा, साहित्य, संस्कृतिकेँ ओइ रूपेँ जीवित बना कऽ राखी जे समृद्धशाली देशक मुख्य पहिचान अछि। आब अपन वक्तव्यमे विराम दैत एक फराक प्रसंगपर विचार करब आवश्यक बूझि आदेश लिअए चाहब आ कहब चाहब जे आजुक ऐ संगोष्ठिक आयोजक साहित्य अकादेमी अछि। जे प्राय: साहित्य समृद्धि लेल गोष्ठी-संगोष्ठि करबैत रहल अछि। किछु दिन पूर्व कोलकातामे सेहो भेल छल। आ होइते रहैत अछि। से प्राय: राजधानी, नगर-महानगरमे होइत रहैए। ओना प्रवासी मैथिली सेवी लेल हेबाको चाही। जे सभ जनै छी। मुदा गोष्ठी गामो-घरक शहर-कसबामे हुअए जेना झंझारपुर, मधेपुर, सकरी, धनश्यामपुर, मधुबनी, जयनगर, लोकहा, फुलपरास, िनर्मली, कुनौली, भपटियाही, सरायगढ़, या फेर पूर्णिया-समस्तीपुरक गामक कसबामे। ई सभ मैथिलीक नेटिव स्पीकर क्षेत्र छी। ऐ सभ क्षेत्रमे सेहो गोष्ठी-संगोष्ठी हेबाक चाही। ऐसँ आरो साहित्यकार सभ सोझा औताह। संभव, जे दिल्ली-मुम्बइ, कोलकाता आ पांडीचेरीक गोष्ठीसँ बेसी लाभदायक सिद्ध हुअए। खरचो कम आ लाभो बेसी, जइसँ एकान्त बासक साहित्य सृजक लोकनि मात्र नै अपितु पाठाकोक संख्यामे अप्रत्याशित वृद्धि होएत। जन-जनमे उत्साह सेहो जगत जइसँ हम सभ मजगूत हएब। काल्हियो कवि गोष्ठीक आयोजन हुअएबला अछि संभत: अही परिसरमे। ओइमे एकैसम शताब्दीक पहिल दसकक सर्वश्रेष्ठ कवि राजदेव मण्डल आ आन-आन कतेको कविकेँ कोनो सूचना नै छन्हि। जे दुखत अछि। आ ऐ तरहक सूची बनौनिहार लोकनिक सोचमे कि छन्हि से वएह सभ बता सकताह। ओ लोकनि गामक माटि-पानिमे लटा कऽ जीवकोपार्जनक संग साहित्य सृजन करैत रहलाहेँ। हुनको सभकेँ सूचना हेबाक चाहैत छल। ओतबे नै, अझुको गोष्ठीमे बहुतो युवा रचनाकार जेना उमेश पासवान, आशीष अनचिन्हार, चन्दन झा, संजीव साफी, विनीत उत्पल, संजय कुमार मण्डल, ज्योति सुनीत चौधरी, मुन्नी कामत, अमित मिश्र, अखिलेश कुमार मण्डल, सुमित आनन्द आ मनोज कुमार आदिकेँ कोनो सूचना नै देल गेलनि। अंतमे, प्रसंगसँ हटि चरचा कएल जे आवश्यक छल। जौं ऐसँ किनको दुख पहुँचल हेतनि तइ लेल क्षमा मंगैत एकबेर फेर साहित्य अकादेमीक संग अपने लोकनिक प्रति सादर आभार व्यक्त करैत अपन वाणीकेँ विराम दैत छी। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। ३. पद्य ३.१.जवाहर लाल काश्यप ३.२.डॉ॰ शशिधर कुमर “विदेह” ३.३.१.मुन्नी कामत २.जगदीश चन्द्र ठाकुर अनिल ३.४.रामदेव प्रसाद मण्डल झारुदार ३.५.नारायण झा ३.६.चंदन कुमार झा ३.७.जगदानन्द झा 'मनु' ३.८.दमन कुमार झा जवाहर लाल काश्यप यौ मीत, गाबु कोन गीत लिखु कोना गजल, जिन्दगी नहि छै, सुर-ताल मे सजल नहि छै कोनो मुखरा, ने कोनो अंतरा नहि वर्णक विचार, ने कोनो मात्रा बस अतुकांत कविता जेना, एकटा गति छै शुरु हेबाक, चलैत रह्बाक, खत्म हेबाक... ने कोनो मतलब, ने कोनो महत्व बस आकंक्छा के बलिवेदि पर जीवनक वलि देबाके छै ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। डॉ॰ शशिधर कुमर “विदेह” एम॰डी॰(आयु॰) – कायचिकित्सा कॉलेज ऑफ आयुर्वेद एण्ड रिसर्च सेण्टर, निगडी – प्राधिकरण, पूणा (महाराष्ट्र) – ४११०४४ मधुश्रवणी गीत - १ सखी हे ! चलू मधुबन फूल - पात लोढ़य लए । आयल मधुश्रावणी, अहिबात पूजय लए ।। बितल आषाढ़, आयल अछि साओन । ऋतु बरसातक परम सोहाओन । लागय वसुधा सुन्नर अनुपम । चहु दिशि बाट करैत’छि गमगम । सखी हे ! प्रकृतिक मनभाओन शिंगार देखय लए । आयल मधुश्रावणी, अहिबात पूजय लए ।। कारी घटा देखि नाचय मयूर । शोभित जहँ - तहँ बहु - विधि फूल । हरियर घास लसित भेल विपुला । उमड़ल जल सञो पोखरि - सरिता । सखी हे ! मह - मह शीतल बसात बहइए । आयल मधुश्रावणी, अहिबात पूजय लए ।। फूल फुलायल भरि – भरि डारि । चम्पा – चमेली आ नेवारि । देखितहि बनय कनैलक कुञ्ज । लुबुधल जाहि पर मधुपक पुञ्ज । सखी हे ! कामिनी - कञ्चन – कनैल लोढ़य लए । आयल मधुश्रावणी, अहिबात पूजय लए ।। बैसलि डारि करैछ खग कलरव । गूँजय बेकल पपीहाक मधु – स्वर । सखी हे ! कोइलियो प्रेमक गीत गाबैए । आयल मधुश्रावणी, अहिबात पूजय लए ।। मधुश्रवणी गीत - २ चलै गे बहिना ! फुलडाली लय फूल तोड़य लए । अड़हूल तोड़य लए । सखी ! अड़हूल तोड़य लए ।। भाँति – भाँति केर फूल फुलायल, लुबुधल भरि - भरि डारि । बेला – बेली, जाही – जूही, गेना - गुलाब - नेवारि । चलै गे बहिना ! फुलडाली लय फूल तोड़य लए । अड़हूल तोड़य लए । सखी ! अड़हूल तोड़य लए ।। बेलपात आ फूल सखी हे, तोड़ब भरि – भरि डाली ।* बिसहरि - गौड़ - महादेव पूजब, माँगब सिनुरक लाली । चलै गे बहिना ! फुलडाली लय फूल तोड़य लए । अड़हूल तोड़य लए । सखी ! अड़हूल तोड़य लए ।। आदिकाल सञो यज्ञभूमि, मिथिला केर अछि ई तिहार । छी मिथिला केर बेटी, तेँ ई जन्मसिद्ध अधिकार । चलै गे बहिना ! फुलडाली लय फूल तोड़य लए । अड़हूल तोड़य लए । सखी ! अड़हूल तोड़य लए ।। * डाली = मैथिलीक “बाँसक कमचीक बनल वस्तुविशेष”, नञि कि हिन्दीक “गाछक शाखा” सिनुरदानक गीत सखी हे ! चलू आजु मिथिलाधाम । होयतन्हि सिय केर सिन्दुरदान ।। मड़बा अछि चारू दिशि साजल, केरा गाछ सञो द्वारि बनाओल । भाँति - भाँति केर चित्र लिखल अछि,* साजल बहुविधि फूल आ पल्लव । गाबय सखि सभ मंगल – गान । होयतन्हि सिय केर सिन्दुरदान ।। सकल महीप पराभव जखने, शिवक महाधनु तोड़ल रघुवर । कतेक विघ्न केर बाद आयल अछि, ई पुणीत शुभदिवस सुअवसरि । लागल मिथिला शोभा महान । होयतन्हि सिय केर सिन्दुरदान ।। माथ उघाड़ि सिया छथि बैसलि, दर्शन दिव्य, देवगण उमरल । वरण कयल मन, वर सम्मुख छथि, धनि शिव-गौड़ मनोरथ पूरल ।** देथिन्ह सिऊँथेँ सिनूर श्रीराम । होयतन्हि सिय केर सिन्दुरदान ।। * प्राचीन मैथिली मे “चित्र लिखब” शब्द थिक ”चित्र बनायब” या “चित्र पाड़ब” शब्द आधुनिक मैथिलीक देन अछि । ** पुष्पवाटिका मे देल गेल माए पार्वतीक आशिर्वाद । परिछनि गीत (द्विरागमन / दुरागमन / गौना केर बादक परिछनि) चलू – चलू सखी आजु अयोध्या, परिछऽ रघुवर श्रीराम केँ । नेने आयल छथि संग मे बहुरिया, जनकपुर केर चान केँ ।। गेल छलाह यज्ञक रक्षा लए, मुनि कौशिक केर संग । जाय जनकपुर कयलन्हि ओहिठाँ, शिवक धनुषकेँ भंग । जाय मिथिला नगरिया रखलन्हि ओ, मिथिलेशक मान – सम्मान केँ । चलू – चलू सखी आजु अयोध्या, परिछऽ रघुवर श्रीराम केँ ।। कान दुहु कुण्डल लटकै छन्हि, गला मे कञ्चन हार । डाँढ़ शोभन्हि बिअहुतिया धोती, माथ पर ललका पाग । सुन्नर हिनकर सुरतिया लगय छन्हि, आ मुँह पर मधुर मुस्कान गे । चलू – चलू सखी आजु अयोध्या, परिछऽ रघुवर श्रीराम केँ ।। श्रीराम – सिया, भरत ओ माण्डवी, लखनोर्मिल, शत्रुघ्न – श्रुतिकीर्त्ति । मोनहि मोन होइछ हर्षित सभ, देखि ई अनुपम चारू जोड़ी । सुन्नर चारू ई जोड़िया लगैत’छि, सखी जेना चकोर आ चान गे । चलू – चलू सखी आजु अयोध्या, परिछऽ रघुवर श्रीराम केँ ।। कनक दीप ओ घी केर बाती, कञ्चन थार सजल दुहु हाथ । हर्षित मन परिछथि तीनू माता, एकाएकी बारम्बार । देखि चारू बहुरिया, होइ छथि हर्षित, सभ बासी अयोध्या धाम केर । चलू – चलू सखी आजु अयोध्या, परिछऽ रघुवर श्रीराम केँ ।। उच्चारण संकेत :- अंग्रेजी आदिक पोथी सभ मे “आन भाषा – भाषी”क लेल वा “नवसिखिया” सभक लेल कोष्ठ मे “उच्चारण संकेत” (Pronunciations / Phœnetic symbols) देल रहैत छै । मैथिली मे ई परिपाटी नहि, तथापि हमरा लगैत अछि जे देबाक चाही, तेँ एहि बेर सञो शुरू कए रहल छी । मैथिली मे बहुधा “साहित्यिक शब्द लेखन” ओ “शब्दोच्चारण”क बीच थोड़ेक अन्तर देखल जाइछ, जकरा “आन भाषा – भाषी मैथिली शिक्षणार्थी” लोकनि वा “नवसिखिया” लोकनि ठीक सँ नञि बूझि पबैत छथि आ “हिन्दी व्याकरण” केर आधार पर उच्चारण करैत छथि । बहुत बेर “मैथिल” लोकनि “सर्व – साधारण गप्प – शप” मे तँ सही उच्चारण करैत छथि परञ्च जञो “लिखित मैथिली” केँ पढ़ि कऽ उच्चारण करबाक हो तँ ओ “हिन्दी” व्याकरणक आधार पर उच्चारण करैत पाओल जाइत छथि । एहि सभ कारण सँ कए बेर लिखल कविता वा गीत वा गजल सभक उच्चारण, लय, ताल, मात्रा आदि बदलि जाइत अछि । ओना तँ एहि बदलाव सभ केँ रोकब पुर्णतः सम्भव नञि आ पाठक ओ गायक लोकनिक व्यक्तिगत स्वतंत्रता सेहो । पर कएक बेर ई बदलाव एहि स्वरूपक होइछ जे अभिप्रेत लय, ताल पुर्णतया बदलि जाइत अछि । नचरी, डिस्को भऽ जाइत अछि आ सुगम संगीत पॉप या रैप । तेँ उपरोक्त कारण सभक द्वारेँ, हम अप्पन रचना मे प्रयुक्त किछु शब्द सभक उच्चारण संकेत एहि बेर सँ देअब शुरू कएल अछि । क्रम संख्या गीत वा कविता सं॰ लिखित शब्द अभिप्रेत उच्चारण १ १ अहिबात अहिबात, ऐहबात २ १ साओन साओन, साउन ३ १ सोहाओन सोहाओन, सओहावन ४ १ मनभाओन मनभाओन, मनभावन ५ १ करैत’छि करैतैछ, करै अछि ६ १ सरिता सैरता ७ १ पोखरि पोखैर ८ १,२ भरि भइर, भैर ९ १,२ डारि डाइर, डाइढ़ १० १,२ नेवारि नेवाइर ११ १ देखितहि देखितहि, देखिते १२ १ जाहि जाहि, जइ १३ १ बैसलि बैसैल १४ २ अड़हूल अड़हूल, अढ़ूल १५ २,३ भाँति भाँइत,भाँति १६ २ बिसहरि बिसहैर १७ २ आदिकाल आदिकाल, आइदकाल १८ २ अधिकार अधिकार, अइधकार, ऐधकार १९ ३ सखी सखी सखि सखि, सइख, सैख २० ३ होयतन्हि होयतन्हि, हेतन्हि, हेतैन्ह, हेतैन २३ ३ दिशि दिशि, दिश २४ ३ द्वारि द्वारि, द्वाइर, दुआइर २५ ३ अवसरि अवसइर, अवसैर २६ ३ उघाड़ि उघाइड़, उघाइर २७ ३ धनि धनि, धैन २८ ३ सिऊँथ स्यूँथ, सीथ २९ ४ परिछनि परिछैन, परिछनि ३० ४ लए लए, लेऽ ३१ ४ कयलन्हि कयलन्हि, केलन्हि, केलैन्ह, केलैन ३२ ४ छलाह छलाह, छला ३३ ४ मुनि मुनि, मुइन ३४ ४ शोभन्हि शोभन्हि, शोभैन्ह, शोभैन ३५ ४ बिअहुतिया बिअहुतिया, बिहौतिया ३६ ४ परिछथि परिछथि, परिछइथ, परिछैथ, पइरछैथ, पैरछैथ ३७ ४ देखि देखि, देइख ३८ सर्वत्र केर (सम्बन्ध कारक विभक्ति) केर (।।, एकमात्रक दू आखर/अक्षर), के (ऽ, द्विमात्रिक एक आखर/अक्षर ) ३९ सर्वत्र केँ (कर्म ओ सम्प्रदान कारक विभ॰) केँ (ऽ, द्विमात्रिक), के (ऽ, द्विमात्रिक) ४० सर्वत्र के (प्रश्नवाचक सर्वनाम वा प्रश्नवाचक सार्वनामिक सम्बोधन) के (एक-, द्वि- या त्रिमात्रिक) ४१ सर्वत्र अछि अछि, अइछ, ऐछ, अइ ४२ सर्वत्र छन्हि छन्हि, छैन्ह, छैन ४३ सर्वत्र छथि छथि, छैथ ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। १.मुन्नी कामत २.जगदीश चन्द्र ठाकुर अनिल १ मुन्नी कामत दूटा कविता नोराएल आँखि उजरल घरमे पोखरिक पानि पीब रहल अछि अखनो लोक पूछि रहल अछि मासुम बच्चा कहिया तक भोगबै हम ई सोग। केना उजरल घर बसतै केना एकर नोर सुखतै आैर कतेक दिन अहिना भोगतै ई भोग। सबहक दाता वएह एगो माता जिनकर अछि समान पूत कोइ कहाबए हिन्दू-मुस्लिम आ कोइ अछूत। भाइ-भाइकेँ जातिमे बाँटि धुतकारैत देखैत छी समाजमे की कहब हम ई विडम्बना कतेक चोट लगैत अछि काेढ़मे। किअए छी हम अछूत वएह विधना हमरो बनौलक वएह रँग-रूप-गुण देलक पर अबिते ऐ संसारमे परजाति कहि कऽ सभ धुतकारलक। पहिले जाति बारि कऽ गाम बँटलक मनक संग पाइनो बँटलक नै ई कोइ सोचलक हमरा मनुख देखि कऽ सभ मुँह फेरलक। कहू पर हे बुधिजीवि हमरेसँ सभ उद्धार होइए हमर बनेलहा दौरा देवताक सिरपर चढ़बैत अछि वएह माटिपर हमहूँ ठाढ़ छी तँ हम किअए अछूत कहाइ छी!! २ जगदीश चन्द्र ठाकुर अनिल सभ्यता आ संस्कृति ( कविता ) हम कहलियनि हमरा नोकरी भेटि गेल बाबूजी प्रसन्न भ' गेलाह हम कहलियनि हम अपन विवाह सेहो ठीक क' लेलहुँ बाबूजी नाराज भ' गेलाह हम कहलियनि विवाहमे दस लाख भेटत बाबूजी प्रसन्न भ' गेलाह हम कहलियनि कनियाँक नाम पर बैकमे जमा रहत बाबूजी नाराज भ' गेलाह हम कहलियनि कनियाँ सेहो नोकरी करैत छथि बाबूजी प्रसन्न भ' गेलाह हम कहलियनि कनियाँ सेहो संगे आबि गेल छथि बाबूजी सन्न रहि गेलाह ! ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। रामदेव प्रसाद मण्डल झारुदार झारू- काम-क्रोध मद लोभ मोह सन, सभ खेतमे दुक्खक बीज। जँ पनपल ई मौका पा कऽ सुख केर भऽ गेल पावर सीज।। गीत- देखियो सभ बाबू-भैया ई सभ की करै छै सुख ले एलै बोड़ा लऽ कऽ दुख किअए भरै छै लोभ-मोहमे सभ अन्हरेलै पढ़लो-लिखलो लोक बनरेलै दुनियाँ-दारी के बताबए भाइयोसँ लड़ै छै सुख..........। करोध-कठोरता सभ छै धेने अहंकार छै बेबस केने दोर केर सुख-शांति देखि किअए ई जरै छै सुख........। बहुत कम छै एहन कलामी जे नै करै छै कामक गुलामी जेकरा चढ़लै ई गिरगिटिया नरकमे सड़ै छै सुख..........। झारू- किछु ने देतै मंदिर-मस्जिद, देतै ने किछु गिरिजाघर। मनक सपना पूरा हेतै, जीव-जगत केर सेवा करतै।। गीत- धरम करैत जे हुअए हानि तैयो ने छोड़ि धरमक बानि हमर माए ई सिखबैत रहए साँझ-भोर-दुपहर दिन रानि। जानि बूझि ने केकरो सतैहनि सदिखन सत्तक रोटी खैहिहेँ भऽ सकौ किछु सेवा करिहेँ दिन-दुखी दुख अपन जानि धरम..........। दया प्रेमक रखिहेँ आगाँ टुटौ ने मानवता धागा भुखलकेँ तूँ अन्न खियैहेँ पियासलकेँ पियबिहेँ पानि धरम........। सत् डगर कखनो नै छुटौ असत् अन्हार लोभ नै लुटौ नैतिकता निष्ठा–मर्यादा धरम इमान कऽ जीबिहेँ मानि धरम.............। झारू- बचल जीवन छै घोर अन्धेरा, जराउ प्यारसँ ज्ञानक दीप। वर्णा देखेतै एतए नै किछो, मोती भरल सागरमे शीप।। गीत- कर भला तब हो भला कर भला तब हो भला। हम नै कहै छी ज्ञानी गुणी सबहक नीक लेल कहि गेलाह। दोसर सता कऽ दुख नै किनू सुख-शांति ले सेवा बुनू। जानै नै जे परक पीड़ा जगमे अन्धा रहि गेला। कर भला.........। जे जानलकै परक पीड़ा तकरा मिललै सच्चा हीरा। नाम अमर छै धरा धाममे गैर खड़ा छै धरम किला। कर भला...........। हिंसा छोड़ि सेवाकेँ पकड़ू डोरी प्रेममे सभकेँ जकड़ू। नै केकरोसँ शिकबा-सिकाइत केकरासँ ने कोनो गिला। कर भला...........। स्वागत गीत हम नै छी अहाँ योग यौ पाहुन अहाँ छी बड़ महान स्वागत स्वीकारू श्रीमान्। अहाँ छी गंगा अहाँ छी यमुना पग धूलसँ पावन भेल अंगना। अहाँक सेवाक ज्ञान नै हमरा हम बालक अज्ञान स्वागत.........। अहाँ छी अल्ला अहाँ छी शंकर अहाँ छी हीरा हम छी कंकर चरण धूल हम माथ लगा कऽ कल जोड़ि करै छी परनाम स्वागत..............। हमरा नै सोना सिंघासन मन दै छी हम आसन बैस बिराजू देव अतिथि हम छी गरीब महान स्वागत............। झारू- चलए समैसँ सूरज-चंदा, समैसँ होइ छै सुबहो-शाम। समैसँ बान्हल सौंसे दुनियाँ, अहूँ करू सभ समैसँ काम।। गीत- बाबू समए कम छै काम छै बेसी डटू ना आब तँ पाछाँ हट्टू नै यौ। भुदानी सभ छै अमीरकेँ पास ऐमे गरीबकेँ नै छै आश। फेरसँ भूमि भुदानी पुर्नविचारसँ विचारू ना आब तँ..........। चलता-फिरता बनबू न्यायालय गाम होइ जकर कार्यालय। गौआँ-अफसर मिल कऽ केस फाइलकेँ छाँटू ना। आब तँ............। विकास पहाड़ पड़ल छै आगू आबो युवा वर्ग सभ जागू। एकताक डोर पकड़ि कऽ भेद-विष्मता काटू ना। आब तँ.........। जब पौरुषे धीरज खोतै ऐठाम केना कऽ जनता जितै। निष्ठावानक बेटा सुख जन-जनमे बाॅटू ना। आब तँ.............। झारू- शासक होइ जन-जनमे स्नेही, हर जनपर होइ हुनकर प्यार। होइत साकार शब्द प्रजा-वत्सल, होएत देश खिल कऽ गुलजार।। गीत- बहिना आब नै रहतै पाछाँ अपन बिहार गै एलैए नीतीश कुमार गै ना। सभटा सड़क ढलेतै पक्का आब नै धँसतै गाड़ी चक्का बहिना विकासमे बनतै नव-नव मिनार गै। एलैए.........। न्यायमे लगतै लबका दाउ मिटतै सबहक पुरना घाउ आब नै रहतै कोर्टमे केस फाइलक पहाड़ गै एलैए...........। खेत हेतै चकबन्दी सिंचित रहतै कतौ नै बिलजी वंचित। बहिना खेतमे हेतै लबका हरा-बहार गै। एलैए...........। एतै मेल एकतामे जोड़ हेतै सुख-शांति केर भोर। सभ मिलि धकेलि गिरेबै जाति-धर्मक देबाल गे। एलैए............। झारू- दीप जराबू प्रेमक बाती, भरि कऽ तइमे सिनेहक तेल। फुटै आभा सुख-शांतिक, जन-जनमे होइ सम्मत मेल।। गीत- बनि जीबै हम सभ भैयारी हम बाके बिहारी। जाति-धरमकेँ करबै पाछाँ तब ने राज कहेतै अच्छा हिन्दु-मुस्लिम सिख-इसाई सभ छिऐ पहिले बिहारी यौ हम बाके.........। एकताक प्रमाण चढेबै अपना बिहारकेँ आगाँ बढेबै हर हाथमे रोजी दिएबै मूलसँ मेटेबै वेरोजगारी यौ हम बाके.............। अन्धविश्वासक राज हटेबै कुरीतिकेँ धूल चटेबै भूख-गरीबी रोग अशिक्षा और भगेबै भ्रष्टाचारी यौ हम बाके..........। झारू- राज हुनकेसँ चलि सकै छै, जिनका रगमे दानी खून। स्वामी भाव अंग-अंगमे भरल होइ, और भरल होइ सेवा गुण।। गीत- केकरोसँ नै रहबै पाछाँ सभसँ जेबै अगारी यौ सिर उठा गौरवसँ कहबै हम छी बाबू बिहारी यौ मेल एकताक फूल खिलेबै घर-घर शांति दीप जरेबै जग अमन केर झोरा लऽ कऽ घर-घर बनबै भिखाड़ी यौ सिर उठा...........। हक हमर जे आब कियो छिनतै अपना ले दुख अपने छिनतै आब ने केकरो मारल जेतै दसो नहक देहारी यौ सिर उठा..........। न्याय विकास प्रमाण चढेबै राजक नाम दुनियाँमे बढ़ेबै अन्धविश्वास अज्ञान-कुरीति सभकेँ करबै पछाड़ी यौ सिर उठा.........। झारू- चलि गेला सभ कहैबला, जग अमन केर रोपू जड़ि। के पढ़तै आब फेर ई फकरा, चिन्तित छै सभ पेट पोखरि।। गीत- यार दिलदार यार, की रौ भजार यार तूँ बिहारमे जा कऽ की देखलेँ। राजकर्मीकेँ सुतैत देखलौं फुहरीकेँ घूमि-घूमि मुतैत देखलौं। न्याय केर नामपर लुटैत देखलौं जनताकेँ राजा कुटैत देखलौं। न्याय मरै छल घूस अभावे राज धृष्टराष्टक चलैत देखलौ। यार दिलदार यार, की रौ भजार यार तूँ पटनामे जा कऽ की देखलेँ। राजभवनमे गदहा चलैत देखलौं पदगौरवमे राजा मरैत देखलौं। सभ गाड़ीमे पुलीश उड़ैत देखलौं मंदिरमे महिला मुड़ैत देखलौं। लुच्चा-लंपट कुर्सी धऽ धऽ मांसु मदिरापर पलैत देखलौं। यार दिलदार यार, की रौ भजार यार रेलगाड़ीमे चढ़ि कऽ की देखलेँ। सही टिकटपर फाइन लगैत देखलौं यात्रीकेँ नरक भोगैत देखलौं। पुलीसक वर्दीमे डकैत देखलौं टीटीकेँ पैसा ठकैत देखलौं। पुलीश टीटी सभ दल बना कऽ मुँह दुबराकेँ लुटाइत देखलौं। यार.............। झारू- जनता बनू अयोध्यावासी, गुणि कऽ मानवताक मंत्र। तन धुअल संतोष जलसँ, गला बान्हल होइ मर्याया यंत्र।। गीत- छूक-छूक-छूक-छूक रेल विकासी आब चलेबै पटरीसँ। आब सभ कुछ बिजलीसँ हेतै चलतै नै किछो बैटरीसँ। राजकर्मी बनतै मधुमेबा जमि कऽ करतै जनता सेवा। अमन चैनक फल खियेतै खोलि-खोलि विद्या मोटरीसँ। आब सभ कुछ..............। गामे-गामे एकता बनेबै अपन काज अपनेसँ करेबै। आब नै केकरो घूसमे जेतै बान्हल पैसा गठरीसँ। आब सभ कुछ.............। शिक्षा केर अाब लगतै झड़ी घर-घर बनतै ज्ञानक बरी। सभसँ कम जे पढ़ल रहतै कम नै रहतै मेट्रिकसँ। आब सभ कुछ..................। झारू- चाहे ओला पुस गिराबै, टपकि रहल होइ जेठक घाम। लिखलक किष्मत कहाँ विधाता, बैस घरमे करी आराम।। गीत- कतेक कहब हे बाबा वनजरैया अपना मनक मुराद हे। कहिया देखतै गरीब आजादी केना कऽ हेतै आजाद हे। आबो दलाली जीविते रहतै अनबूझकेँ खून पिबतै रहतै। साफ हेतै ई कचरा केना देश हेतै केना आवाद हे। कहिया............। के लेतै ऐ गरीबक जिम्मा एकरा हक ले सोच धिम्मा। ऐ गरीबक दुख हरै कऽ के देतै बुनियाद हे। कहिया............। सभ गरीब मजदूर मेहनतकस बनि जीबै छै देशमे बेबस। आजादी घर-घर पहुँचेतै पैदा करह औलाद हे। कहिया.............। झारू- हे भूमिक भाग्य विधाता, जगक अन्नदाता भगवान। कहाँ पता तोरा शिबा छै केकरो, छूपल कतए छै खेतमे धान।। गीत- सुनह हौ बाबू सुनह हौ भैया केना होइ छै ई टोना हौ। माटिमे जौं गोबर मिलै छै तब बनै छै सोना हौ। जे मिलबै छै खेतमे गोबर तकरा घरमे अन्न छै दोबर। ई जेकरा महकै छै बाबू दुखमे करै छै घौना हौ। माटिमे..........। जे कोइ चुल्हीमे जरबै छै समझू सोनाकेँ हरबै छै। जे फेकै छै एने-ओने तकर िवकास छै बौना हौ। माटिमे.............। जे नै करै गोबरक आदर फटले रहतै तकर चादर। आदर नमन जे एकरा करै छै हरदम रहै दिवाना हौ। माटिमे..............। झारू- पैसासँ सभ इज्जतबला, काज करै चाहै सैतान। तैयो पुजै ओकरे दुनियाँ, किएक तँ ओ छै पैसामान। गीत- आंगनबाड़ी खेत खेसारी बनि उजडै छै भाय हो। सभटा खाइ छै भैंस अनेरबा कोइ रोमए नै जाइ हौ। रोमैले जेकरा भेजै गिरहतबा दइ छै आजादी खाउ भरिपेटबा। हमर भाग हमरा ले छोड़ू जे छै हरा केलाइ हौ। सभटा..........। के करतै एकर निगरानी गिरल छै सबहक आँखिक पानी। नीति-धरम निष्ठा-मर्यादा सभटा गेलै बिलाए हौ। सभटा............। कर्मी संग रजो छै अन्धा तँए छै चौपट्ट विकासी धंधा निहित हएत राजकोषक पैसा सभटा गेलै समाए हौ। सभटा............। झारू- जगि कऽ रहब बाबू-भैया, और रहब चौकस हथियार। फेर नै पाबए राजक कुर्सी, लुच्चा-लंपट चोर-चुहार।। गीत- सुनह हौ बाबू सुनह हौ भैया बाके बिहारी बन्धु मन मित। ई एलेक्शन एहेन बुझाइ छै असत्यक ऊपर सत्यक जीत। सभ कोइ कहियौ हम नीतीश छी सोलह नै सभ कोइ बत्तीस छी। भूख गरीबी रोग अशिक्षा सभ मिलि कऽ करबै विस्मित। ई............। गामे-गामे एकटा बनेबै घर-घर शान्ति दीप जरेबै। जाति-धरमसँ मनसँ भगा कऽ गाबबै सभ मानवताक गीत। ई..............। स्वाभिमानकेँ सभ कोइ जगेबै लोभ-लालचकेँ मनसँ भगेबै। सभ मिल ऊजरल घर सजेबै सभ कोइ जपबै जय-जनहीत। ई...............। झारू- तरे स्वर्ग पण्डित पूजासँ, जे देखलक नै आइ तक कोइ। जौं सच्चा ई जानैत मानव, पण्डितसँ नै पुजाबैत कोइ।। गीत- अन्धविश्वास अज्ञान कुरीति भूख गरीबी भ्रष्टाचार। ई अंग्रेज केना कऽ भगतै बाबू-भैया करू विचार। हरदम घुमै चन्दा केर चक्कर धरम करैत लोक भेलै फक्कर। छप्पन करोड़केँ पुजैत-पुजैत उजरल जाइ छै घर-दुआर। ई.............। मुर्ख पढ़लमे की छै अन्तर सभ पढ़ै छै एक्के मंतर। बेचि धरम-निष्ठा–मर्यादा लगबै छै पैसाक जोगार। ई..............। देखियौ ई अज्ञानक धंधा गाड़ने छै कुरीतक झंडा। भूख गरीबी बढ़बै खातिर कऽ रहलै घर-घर परचार। ई...............। झारू- छोड़ि सत्य इमान-धरमकेँ, ताकै अज्ञानसँ तनक सुख। मिट सकै छै भूख तात्कालिक, मेटाइ नै ऐसँ केकरो दुख।। गीत- एबरी हमरा जीताबह हौ बाबू विकासक करबह काम हौ। आब केकरो सतेबह हौ बाबा आब पकड़ै छी कान हौ। गली-कुच्चीमे सड़क दौगैबह घर-घरे हम कल गड़ेबह। ई सभटा कागजेपर हेतह अपन भरबै मकान हौ। आब नै..................। सौर ऊर्जाले फरम भरेबह अपना चुल्हा लग तकरा गड़ेबह। जौं कुच्छो कोइ बजबह बाबू तकर धरब हम कान हौ। आब नै....................। फन्ड विकासी घर ढुकेबह सभ जनताकेँ घून पिसेबह। केकरो शिकाइत तँ काेइ ने सुनै छै विधि छै देशक बाम हौ। आब नै....................। झारू- पैसा होइ छै शशिसँ शीतल, जौं पाबै ज्ञानी-होशियार। कऽ कऽ सेवा दीन-दुखीकेँ, कऽ लेलक अप्पन बेड़ा पार।। गीत- झुमका देबौ बाली देबौ गै बेटी तूँ पढ़ गै। धरापर लटकल ज्ञानक डोरी पकड़ि कऽ ऊपर चढ़ गै। श्रद्धा रखिहेँ गुरु-गोसाँइ गुरुचरण गहि धड़ गै। जौं पढ़ैमे मन नै लगतौ जोतमेँ केना घर गै। धरापर...........। पढ़ विज्ञान तूँ गढ़ि-गढ़ि कऽ जगसँ मेटा कहर गै। लोक खड़ा अज्ञान आगिमे पी-पी बिख जहर गै। धरापर.............। जनहित केर तूँ पोथी पढ़ि कऽ नेता बन तूँ बड़ गै। गला लगा मानवता माला गिरलकेँ कर ऊपर गै। धरापर..............। झारू- सादी रीति सभ धर्ममे, छोट नै छै अति छोट छै। फँसि कऽ ई अज्ञान-अंधेरा, घर उजाड़ि कऽ जरबै नोट।। गीत- कनी देखही गै दाइ कनी सुनही रौ भाय कनी मानही गै माइ सासु अज्ञानवश बनलै कसाइ। नोट गीन-गीन कऽ नोट गनै छै अपने फाँसी आप बनबै छै। ई अज्ञानक देन कुरीति कऽ रहल दहेज छै सबहक धुलाइ। कनी..............। लोभक कारण लोभी बनै छै बँचतै नै किछो सेहो जनै छै। तब नै किअए आदर्श देखा कऽ मस्जिद-मन्दिरमे करै सगाइ। कनी...............। सासु-पुतोहुकेँ रोज कनबै छै कम-जहेजक रोब जमबै छै। सदी एक्केसम चलै छै बेटी सासुकेँ दही किछु सबक सिखाइ। कनी...............। झारू- हम और हमरा केर जालमे, फँसल एतए छै सभटा बन्दा। एही मोहकेँ कारण मानब, कर्म करै छै बनि कऽ अन्धा।। गीत- पढ़ै छेलिऐ लिखै छेलिऐ सिखै छेलिऐ ज्ञान केना देशक हाल सुधरतै दुखक हेतै केना निदान। बाजू भैया रामे-राम रामे-राम हाै भाय सभ अन्हरेलै अज्ञानक अन्हारमे। सबहक मनमे लोभ जकरलक सुझै नै नीति विधान। गला दाबि कऽ दहेज गिनाबै रिस्ता भेल बदनाम। बाजू...........। सभ उजरलै दहेजक लहरिमे। अन्धविश्वासक डंका पीट-पीट नोटक बान्है बोझ। कुरीतिक जाल फैला कऽ सभकेँ केने छै सोझ। बाजू..............। बिहार फँसल छै कुरीतिक जालमे। जनसेवाक पाठ बिसरि कऽ सेबैए मूर्ति-भगवान। छोड़ि अपना कर्त्तव्य-कर्मकेँ देवीपर देने छै धियान। बाजू..............। लोक ओझरेलै अन्धविश्वासक जालमे। झारू- मानवता १ ताज मिलै सम्पूर्ण जगतकेँ, आ बनि जीबए झारूदार। मानवमे मानवता होइ तँ, बदलै नै ओकर अवतार।। २ रंगू नै जीवन जाइत धरमसँ, सभकेँ मानू अप्पन मीत।। नीच ऊँचक भेद भुलि कऽ, गबैत रहु मानवता गीत।। ३ सत्ता हमर सारे जगतपर, मानवता हमर मेघा विधान।। पालनमे जे करए ढिठाइ, स्वीकारए ओ नरकक खान।। ४ जन-जनपर हम्मर शासन छै, हर चिजपर हम्मर अधिकार।। कोनो प्रप्त अप्राप्त कहाँ छै, तर्क लगा करू स्वीकार।। ५ हर अेा मानव हमर सिपाही, जिनका छन्हि मानवता ज्ञान।। मारू कुचलि दियौ बेमानवता, बढ़ाउ जगमे अपन नाम।। ६ हमरासँ पहिले कोनो नै शासन, नै छै कोनो धर्मक विधान।। हमरा बिनु जगत सुन्ना छै, हतैबला छै पशु समान।। ७ हमरा लेल छै कियो नै ऊँचा, नहि कियो नीच नादान।। जे बरतलक ऐ धर्मकेँ, अटल जगतमे हुनकर नाम।। ८ हम मानवक मूलाधार छी, सभ धरमक पिता समान।। पाप पुण्यसँ अति परे छी, देवतो छी हम्मर संतान।। ९ मानव वास्ते सीमा सरहद, मानवताकेँ सक्कर खेद।। जाति धरम सरहदसँ अलग छै, मानवतामे कोनो नै भेद।। १० जब धरै मानवता मानव, रहै नै भीतर जाइत धरम।। निष्ठा इमान कऽ करए आदर, और पुजै नित्य सत् कर्म।। ११ जब मानव धरै मानवता, तब बढ़ै जन-जनसँ मेल।। दूर रहै घरसँ सभ टेन्शन, ब्यापै नै कोनो झगड़ा झेल।। १२ जब धरै मानवता मानव, पक्का होइ ओकर इमान।। डर लगै छै असत् कर्मसँ, किन्नौं नै बदलै ओकर जुवान।। १३ जब मानवता धरै मानव, तब उपजै मन लाज लेहाज।। आदर दीली बड़ा पाबै छै, रहै नै छोट प्यारसँ बाज।। १४ मानव जब धरै मानवता, ओकरासँ कोइ दुखै नै जीव। और नै दुनियाँ ओकरा सताबै, जीवमे देखै अल्ला शिव।। १५ मानव जब मानवता धरै, तन पहिर नैतिक परिधान।। धरम इमानक रक्षा खातिर, करै न्यौछावर धन आ जान।। १६ मानवता जब धरै मानव, मिट जाए निच ऊँचक शान।। दुनियाँ देखाबै सम बराबर, देखै ने कियो अप्पन आन।। १७ धरै जब मानवता मानव, ब्यापै नै ओकरा त्रिविध ताप।। काम क्रोध ने लोभ सताबै, अन्धविश्वासमे करै नै जाप।। १८ मानवता जब शासक धरै, सुख सम्पन्न होइ जनता तमाम।। मिटै मूलसँ भूख गरीबी, रहै नै पाछाँ विकाशी काम।। १९ मानवता जौं न्याय कर्मी धरै, कम हेतै केश फाइलक थान।। कहल मुक्त भऽ साड़ी जनता, देखतै फेरसँ नया बिहान।। २० जौं मानवता धरै सिपाही, शुद्ध शासन कऽ रचै विधान।। झगड़ै नै जन-जनसँ कियो, शान्ति होएत सबहक परिधान।। २१ मानव जब मानवता धरै, प्रगट होइ भीतर नीत इमान।। निष्ठा मर्यादा नैतिकता, दया धरम सतकरम विधान।। २२ जब त्यागै मानवता मानव, भऽ गेल ओकर शान्ति भंग।। जकरा अखन तक कहै छल अप्पन, ओकरेसँ भऽ गेल भारी जंग।। २३ मानवता जब छोरै मानव, भऽ गेल अेाकर बेड़ा गर्क।। चिक्कारे जगवासी ओकरा, जीबै जीवन बना कऽ नर्क।। २४ अमूल रत्न मानवता मानू, जे पाॅलक ई जनहित भाव।। दुख तँ हुनका रहिते नै छन्हि, रहै नै कोनो सुक्खक अभाव।। झारू- ज्ञान १ कऽ रहलौं वन्दना सभकेँ, हम अज्ञानी नीच नादान। कऽ कऽ क्षमा सभ भूल-चूककेँ, सभ मिलि देबै अभयकेँ दान। २ जीवन-मरण पालन केर रचना, प्रकृति केर गजब विधान। ऐ रचनाकेँ भेदि-भेदि कऽ, जानि गेल अछि ई विज्ञान।। ३ सूर्या ताप जलवायुक संग, धरती आैर गगणक तीर। सूत्रवत् सयाेग करै छै, जइसँ जनम-मरण जंजीर।। ४ अही पंचशक्ति केर ज्ञानी, नाम देलनि अल्ला-भगवान। कियो कहै छथि राम प्यारसँ, ईसा-मूसा सुक्खक धाम।। ५ एकर प्रमान स्कूली पुस्तक, किछु बिसवास करू श्रीमान्। पढ़ि कऽ जेकरा आइ जगत भरि, कऽ रहल लोक गजब केर काम।। ६ आबू जानू वायुमण्डल, नाइट्रो अठहत्तर प्रसेंट। ओ एक्कैस अन एक प्रतिशत, रहए घेरने हरदम प्रजेन्ट।। ७ आर्गोन कार्वण हिलियम हाइड्रो, ओजोन नियोनमे एक प्रसेन्ट। कोहरा आंधी-बर्खा बादल, संग तुफान बिजली करेन्ट।। ८ एकर ऊँचाइ अठारह किमी, मानू एकरा प्रकृति गर्भ। प्रलय-प्रभव अहीसँ संभव, अहीसँ चलित जीवन सर्ग।। ९ तपि कऽ भीज कऽ सूखि कऽ जमि कऽ, करै छै नाइट्रो जग निरमान। जग रचियता तत्व बेरानबे, सबहक लेल छै ई वरदान।। १० नाइट्रोजनमय सौंसे जगत छै, अधिक छै सभमे एकरे अंश। होइ चाहे सौंसे जीव-जगत केर, खाहे ओकर सारा वंश।। ११ जहिना अक्षर ग्रन्थ रचै छै, तहिना तत्व रचै छै जीव। रचना एकर ईसा-मूसा, हजरत तुलसी राम और शिव।। १२ पृथ्वीक गुरूत्वाकर्षणसँ, सटल वायु धरतीपर। छी प्रभावित अहीसँ हम सभ, धरती केर सभ चेतन-जड़ि।। १३ गोल-गोल छै अनु-प्रमाणु, रचल छै जइसँ ई जग काण्ड। सूरज चंदा तारा गोल छै, गोल बनल छै ई ब्रह्माण्ड।। १४ कऽ रहलै प्रकृति नियंत्रण, सभकेँ कहाँ छै एकर ज्ञान। ओ भेद एकर की जनतै, जे नै पढ़लक भूगोल-विज्ञान। १५ तन अहाँ केर क्षेत्र मात्र छी, ज्ञाता मात्र प्रकृति जानू। जे दुनूक भेद जानलक, गीता कहै छै ज्ञानी मानू।। १६ गूथल छी हमसब प्रकृतिमे, जहिना धागामे मोती। अभिन्न छी हम सभ एक-दोसरसँ, जहिना बातीसँ ज्योति।। १७ प्रकृति एक तरू लता छी, फल-फूल छी जीव तमाम। कहाँ कल्पना हमर ऐ बिनु, हिनका नै छै हमर काम।। १८ प्रकृति छी गाए दुधारू, जइ खिबै जग सिनेहक गाछ। तकरा भेटै छै दूध दया केर, दुख नै रहै छै तकरा पास।। १९ प्रकृति छै धागा जइसन, जीव गूथल माला मोती। सभ रहि जाइ छै मैला पत्थल, किछुमे जरि जाइ छै ज्योति।। २० की इच्छा अपनेकेँ नै छै, हमहूँ चमकी बनि स्टार।। निश्चित पूड़त अहुँक आसा, छोड़ि असत् करू सत्य स्वीकार।। २१ आबू जानू संख्या रेखा, मानू एकरा जीवन आधार। एकरा िवचारि कऽ बाबू-भैया, देखि सकै छी स्वर्गक द्वार।। २२ सुन्यकेँ मानू संत बराबर, दाया पलस केर सुख आधार। वाया माइनस असत् बराबर, एनए ठाढ़ छै दुखक पहाड़।। २३ सम रहनाइये काफी मानू, भवसारग केर नौका बीच। धियान हमेशा एते राखू, असत् ने लिअए काँटा खिंच।। २४ सेवाक बटिखारा चढ़ाबू, काँटा झूकतै पलस केर ओर। सुख-शांति जश कृत्ति लऽ कऽ, सभ दिन एतै लबका भोर।। २५ ज्ञान दबाबै पलसमे काँटा, माइनसमे दबबै अज्ञान। सम-बराबरि रहनाइ काफी, सममे सदा अटल भगवान।। २६ ज्ञान बराबर ऐ दुनियाँमे, छै नै कियो नाशी-पाप। करू साफ बस तन-मन अपन, बैसतै आबि कऽ अपने आप।। २७ विष-अमृत सारे जगत भरल छै, लिअए ज्ञानसँ अमृत चूनि। अज्ञानक कुचक्रमे पड़ि कऽ, किअए मरै छी माथा धूनि।। २८ मुश्कील बहुत छै ऐ धरतीपर, िमलए कतौसँ सत्यक ज्ञान। जीवन जौं पावन करनाइ अछि, छोड़ि सतेनाइ सेवा ठान।। झारू- कर्म १ बहुत कोइ देलकै ऐ दुनियाँकेँ, बाबा बनि-बनि कऽ उपदेश। दऽ की सकै छी हम झारूदार, सूनि लिअ कर्मक सन्देश।। २ मानव धारए धनुष धर्मक, नीत इमानक चढ़ा कऽ तीर। खिंचै प्रत्यन्चा ज्ञानक गुस्सा, लक्ष्य कऽ कऽ असत् लकीर।। ३ कर्म करब अज्ञानक दमपर, हरदम जइमे दुखक आस। सुख भेटै छै ओइ वन्दाकेँ, जेकरा भीतर ज्ञानक बास।। ४ दुनियाँ भरिक सुख होइ हमरा, चाहि रहल अछि सारे लोक। लेकिन संभव कहाँ छै केकरो, मात्र भेटै सुखक संयोग।। ५ सुख-दुख पड़ल छै गोद प्रकृति, भेटतै केना जानू तंत्र। निश्चित सुक्खक ओ छै भागी, जे जानलनि सत्कर्मक मंत्र।। ६ सुख भेटत अछि केकरा चाहने, चाहि कऽ दुख भेल केकर दूर। ई अज्ञान छी बाबू-भैया, ई नै प्रकृतिक दसतूर।। ७ धियान धरू रेडियो धर्मिता, केना चलाबै छै बेतार। तन-तरंगसँ फलक िनर्णए, करए प्रकृति सेचि-विचारि।। ८ एकरे मानू नभ-मण्डलमे, जीव जगत केर फल खतिआन। कर्म-फलक सबहक लेखा, सत् अटल प्रकृति विधान।। ९ हवा जल आ सूर्या तापसँ, बनल छै सारे देह स्थूल। सत् कर्ममे एकरा जोरू, जोड़ि असत् मे करू नै भूल।। १० सत् कर्मसँ ऐ दुनियाँमे, शांतिक संग छै सुख छै कुल। असत् संग संगति करब तँ, जीवन गुजरत बनि कऽ शूल।। ११ कर्म मात्र दुइये दुनियाँमे, एक सच्चा दूजा छी भूल। सत् असत् केर ऐ चक्करमे, फँसल छै ऐठाम मानव कुल।। 12 जीव दुखाइ नै जानि-बूझि कऽ, भऽ सकए जत्ते बाँटू प्यार। शत्रू-मित्र ने बैरी कियो, यएह तँ छी सत् कर्म हमर यार।। १३ सत् कर्मपर सेवा जानू, जइसँ होइ छै जग िनर्माण। सूजश मान प्रतिष्ठा धनसँ, भरल रहै घर-वार मकान।। १४ असत् कर्मपर पीड़ा जानू, जीवन जइसँ होइ वदनाम। अपजस और नरक केर भारी, जग द्रोही होइ सभटा काम।। १५ बड़ा ने कियो जाति लऽ कऽ, नै बड़ा कियो धर्मसँ। कियो बड़ा अछि ऐ धरतीपर, वस अपने सत् कर्मसँ।। १६ जब-जब कर्मकेँ कर्मसँ जोड़ू, मन धरू सत् कर्मक धियान। दुखै ने जगवासी कियो, यएह तँ छी सत् कर्मक ज्ञान।। १७ काम सभ प्रकृति केर छी, अलग-अलग छै सबहक सूत्र। अही सूत्रमे जोड़ि तनकेँ, पलि रहल सभ जीवक पुत्र।। १८ काम सभ प्रकृति केर छी, जइ करै छी अहाँ-हम। चाहै मेटाउ दुख जगतक, या बूनू दुनियाँमे गम।। १९ असत् कर्मसँ नाता तोड़लक, जोड़ि लेलक सत् कर्मक डोरि। दुखू हुनका चलि पड़ल अछि, खूलल द्वार जन्नत केर ओर।। २० पुण्य मात्र छी परसुख देनाइ, पाप मात्र परदुक्खक दान। आइक ने सदियोक बात छी, कहि गेला ज्ञानी िवद्वान।। २१ धन बल भेटल तँ की भेटल, जौं भेटैत किछु सेवा कर्म। लऽ लिअ शिक्षा सत् गुरूसँ, फेराे जानबै एकर मर्म।। २२ सेवा तँ भगवान मात्र छी, कर्मकेँ जौं मानबै पूजा। अहीसँ सद्गतिकेँ भेटबै, राह नै छै कोनो दुजा।। २३ काम-क्रोध मद लोभ मोहसँ, लागल सभ धर्मीमे जंग। सभ धर्मक कहै छै पोथी, पकड़ू सभ सत् कर्मक संग।। २४ कर्मक जे कियो देलनि सत्ता, मानलक एकरे अपन भगवान। जगमे भेटलै ओकरे शांति, सुख सम्पन्न अछि ओ इन्सान।। २५ कर्म करू सभ नित्य धर्मसँ, बनैत रहत अहाँक बात। फलक इच्छा करू ने कखनो, ई तँ अछि प्रकृतिक हाथ।। २६ शरीर अहाँक यंत्र मात्र छी, किछु कराउ एहेन काम। धरतीपर जे अमर कराबए, ऊँचा करए जगमे नाम।। २७ जिनाइ तँ ओकरे जिनाइ छी, जे जानलक ई गहरा राज। धन जीवनक दाउ लगा कऽ, कऽ रहल जगसेवा कार्य।। झारू- रामायण १ पहिल वन्दना गुरु चरणमे, दुजे चरण शंकर भगवान। दुनू चरण अहीं केर नीचाँ, स्वीकाररू सत् सत् प्रणाम।। २ ओइ घरकेँ तँ अयोध्ये मानू, जइ घर करए रामायण बास।। कर्म रँगल होइ रामायणसँ, दुख नै रहतै तेकरा पास।। ३ श्याम रँग हे राम गोसाँइ, जाति-मानवक चश्मा उतार। कर्म-कथा बस देखए रमायण, पूजा-पाठक उतरए बोखार।। ४ कर्म-कथा छी राम-रामयण, सुख-शांतिक सत्यक प्रतीक। अपनाकेँ ऐ सत्य कर्म कऽ, सभ पहुँचै सुखक नजदीक।। ५ जइसँ सुधरइ जग-भरि मानव, लिखलनि कथा मुनि वाल्मिक। ओ की जानतै एकर भाषा, लागल जिनका अज्ञानक दीक।। ६ सभ पढ़ि सुनै छथि एकरा, पुजै छथि सभ आरती उतारि। कर्म घारक मूल मंत्रपर, करै नै छथिन कियो विचारि।। ७ सभ पढ़ै-सुनै छथि एकरा, भरल अछि भीतर एकर कथा। ज्ञान मात्रसँ किछु नै होइ छै, धरू भीतर किछु कर्म-बेथा।। ८ जूटल अछि मानव केर रिस्ता, धरती केर सभ जीवक संग। एकरा निमाहू सत् कर्मसँ, रिस्तेदार कियो होइ ने तंग।। ९ दादा-पोता-बाप आ बेटा, सभ बनै छथि एक्के लोक। करम-धरम छै सबहक अपन, मिलाउ रामायणसँ संयोग।। १० पिता बनू अहाँ राजा दशरथ, पुत्र बनू राम भगवान। भाय भरत लक्ष्मण-शत्रुध्न, माता बनू कौशल्या समान।। ११ पिता बनू अहाँ राजा दशरथ, पुत्रमे देखू अपन प्राण। पोसू एकरा सत्यक कमाइ, और दिलाबू सत्तकर्मक ज्ञान।। १२ पिता बनू अहाँ राजा दशरथ, बच्चा भेजू नित्य स्कूल। ज्ञान-विज्ञानक पढ़ा कऽ पोथी, सभमे खिलाबू ज्ञानक फूल।। १३ भाय बनू अहाँ लक्ष्मण सन, छोड़ू ने भारी दुखमे संग। अहूँ ओहीमे हाथ बटाबू, राज-काज जौं कऽ दिअए तंग।। १४ भाइक खातिर सभ किछु तियागू, सुख-शांति और राजमहल। निभा कऽ रिस्ता धरा धामक, जगमे करू मर्यादा अटल।। १५ पुत्र बनू अहाँ रामचन्दजी, पिता वचन लऽ तियागलनि सुख। नीति इमान मर्यादा खातिर, ईस नै केलनि बनबासक दुख।। १६ बेटी बनू सिया सुकुमारि, टारू नै किन्नौं बड़क बात। रहए प्रतिक्षा हुकुमक सदिखन, जेठ, पुस, साैनु आकि दिन-राति। १७ कन्या बनू सिया सुकुमारि, ऊँच करू पिताक पाग।। हुअए भूल ने कोनो एहेन, जइसँ लगए पागमे दाग। १८ पुत्री बनू सिया सुकुमारि, बड़ा कऽ सदिखनि करू लिहाज। कऽ कऽ सेवा जगवासीक, चढ़ा दिऔ सिर पिताक ताज।। १९ पत्नी बनू सिया सुकुमारि, पतिक खातिर तियागू सुख। हुनके खुशीमे मात्र खुशी होइ, हुनके दुखसँ मात्र होइ दुख।। २० पत्नी बनू सिया सुकुमारि, अहूँ पतिकेँ मानू राम।। दियौ नै आदेशक मौका, समझि कऽ हुनकर मनक काम।। २१ पत्नी बनू सतीअनुसुइया, जुबा ने उतरे पतिक नाम। पर पुरुष सपनो नै देखल, पतिकेँ मानलनि चारू धाम।। २२ पत्नी बनू मनदोदरी रानी, पतिकेँ दिऔ सत् नीत सलाह। दियौ ने गुस्सा केर मौका, कऽ कऽ कोनो नीच गुनाह।। २३ पुतोहु बनू अहाँ सीता-रानी, सासु पाबए माता केर मान। ससुर-भैसुर होइ पिता बराबरि, ननदि-दिअर भाए-बहिन समान।। २४ पुतोहु बनू अहाँ रानी सीता, ससुक छीनू हाथक काम। गोतनी जेठानी सगी बहिन सन, जेठ लगै भाय बड़ा समान।। २५ शासक बनू अहाँ रमचन्द्रजी, जन-जनमे सुख भरू भरपुर। होइ उत्थान दबल-कुचलकक, और होइ देशक गरीबी दूर।। २६ पहिर कऽ माला मानवताक, देश विकासक लगा दियौ होड़। अहाँ बनि जाउ चाँद गगनक, निहारए जनता बनि चकौर।। २७ जनहितकेँ कोनो ठेँस ने पहुँचै, होइ एकताक नारा बुलन्द। निष्ठा चढ़ि कऽ ऊँच शिखरपर, करए फूटक कारा बन्द।। २८ जे जेतए करै छी जे किछु, देश सेवाक सभ छी काम। रक्खू सुरक्षित अपन नीति, खाउ नै ओइमे अपन इमान।। २९ जनता बनू अयोध्यावासी, शांति केर पकड़ू आधार। दुखी ने होइ जन-जनसँ कियो, सभमे होइ सेवाक विचार।। ३० जनता बनू अयोध्यावासी, सदिखन पाबू सत्यक साग। नीति धरम इमान जलसँ, हरा-भरा होइ सबहक बाग।। ३१ जनता बनू अयोध्यावासी, भायचाराक पढ़ि कऽ पाठ। गुनि कऽ प्रेम दयाक डोरी, बान्हु सभ मानव केर गाँठ।। ३२ सबहक सत्रु सबहक दुश्मन, काम-क्रोध-लोभ-अज्ञान। लोभ छै तइमे सबहक नाशी, दया-धरम और नीति इमान।। ३३ की कऽ सकल चतुरेगी सेना, की केलनि जोग जप विज्ञान। ध्वष्त भेल अयोध्या नगरी, जब धेलनि केकइ अज्ञान।। ३४ भेल अज्ञान वस रानी केकइ, की पुरा भेल उनकर आस। जे प्यारा राजगद्दी पाबैत, भेज देलनि हुनका बनवास।। ३५ ई करामात अज्ञानक छी, उनटा दइ छथि जजबात। उलटि गेल अज्ञानसँ सभटा, ऐ धरतीकेँ मानव जात।। ३६ पाइये टामे सभटा सुख छै, घेरि लेलक सभकेँ अज्ञान। झोंकि देलनि सभ शक्ति ऐ लेल, गमा कऽ निष्ठा धरम-इमान।। ३७ काम-क्रोध मद लोभ मोह सन, सभ खेतमे दुखक बीज। जौं पनपल ई मौका पाबि कऽ, सुख केर भऽ गेल पावर सीज।। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। नारायण झा कविता सम्मान हे जगदीश, एहेन दिन देखलौं ऐ मण्डल बीच, मण्डल पद पएलौं आरंभ कएल लेखन ऐ रहुआ धरतीसँ पहिल कथा संग्रह, गामक जिनगीक कथासँ रचना रसधार पटा जेना गंगा जट्टासँ सुवास गमकैछ कथा, नाटक, उपन्याससँ। हे युगपुरुष, टैगोर पुरस्कार पएलौं रहुआवासीक संग पारसमणि पुस्ताकलयक नयना जुड़ेलौं। अहाँक विविध विधा, जेना पसरल तरेगन जीवनक उत्थान-पतनसँ जीवन-मरण संग इन्द्रधनुषी अकास देखैत छी राति-दिन आँजुरि भरि अछि पंचवटी, गीतांजलि नीमन अपनेक लेखनी बढ़ि अकास चढ़हय सदिखन। हे जगदीश एहेन दिन देखलौं ऐ मण्डल बीच, मण्डल पएलौं।। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। चंदन कुमार झा सररा, मदनेश्वर स्थान मधुबनी, बिहार 1.बाड़ी बदलल वृन्दावन मे उमड़ि-घुमड़ि घन भरल गगन मे मोर मगन नाचय उपवन मे महमह गमके धरणीक कण-कण जेना मलय मिझरायल पवन मे ।। छन-छन,झम-झम,बुन्नी झर-झर झिंगुर केर स्वर, बेंगक टर-टर्र खोंता बिच करब चिड़ैक फर-फर्र जनु प्रेम राग पसरल कूंजन मे उमड़ि-घुमड़ि घन भरल गगन मे ।। कलश नवल ओढ़लक तरुवर नवयुवती सन मटकय निर्झर हँसइत धार मुस्कय सरवर सुख बरसय प्रकृति केर भवन मे उमड़ि-घुमड़ि घन भरल गगन मे ।। चमकय बिजुरी ढनकइत जलद पपीहा के पिहु-पिहु बोल सुखद स्वर्गक लावण्य धरणी उतरल बाड़ी बदलल जेना वृन्दावन मे उमड़ि-घुमड़ि घन भरल गगन मे ।। 2. सिखनिहार सँ बेशी सिखौनिहार छै जगमे सिखौनहार सँ बेशी परिछनहार छै जगमे परिछनहारो सँ बेशी फरिछेनिहार छै जगमे सभसँ बेशी प्रमाणपत्र बटनिहार छै जगमे । आहार सँ बेशी परसनिहार छै जगमे परसनिहार सँ बेशी खेनिहार छै जगमे खेनिहारहु सँ बेशी लुझिनिहार छै जगमे लुझिनिहारो सँ बेशी लुटनिहार छै जगमे । रोजगारो सँ बेशी कमेनिहार छै जगमे कमेनिहारो सँ बेशी बेरोजगार छै जगमे बेरोजगारो सँ बेशी मंगनिहार छै जगमे सभसँ सँ बेशी भूखे मरनिहार छै जगमे ।। हाइकु दलान पर मचलै हरबिर्रो बरात एलै ! वरक बाप फनैछ नौ-नौ हाथ टाका खातिर ! आजुक मैना कोना परिछतीह राम जमाय ? बेटीक बाप पएर पकड़ने वर-बाप के । चण्डीक रूप फेर धेलकै बेटी एलै दलान । गर्दमिसान घुमा देलकै वर भेलै अजुबा !! हाइकु गरजे मेघ चमकय बिजुरी मास अषाढ़ । बरखे बर्षा तिरपित धरती मेटलै प्यास । गुड़के डोका फनकैछ कबइ पोखरि नाञ्घि । नञ्गटा छौड़ा उपछय डबरा पोठी खातिर । बंशी पथने रोहुक जोगार मे बैसल कक्का । सगरो बाध छै छपछप पानि जगलै आश । तानल छत्ता चमकय घोघही खेत पथार । हर-बड़द कृषक परिवार लगलै चास । ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। जगदानन्द झा 'मनु' ग्राम पोस्ट- हरिपुर डीह्टोंल, मधुबनी मोनक व्यथा किनका कहियौन पतिएता केँ हमर मोनक व्यथा बुझता केँ
बंद पिंजरा केँ चीडै जेकाँ दिन भरि हम फरफराईत छी जुनि बुझु हम नारी मिथिला केँ हम त ' मकड जाल में ओझरेल छी
दुनियाँ केँ त ' बात नइँ पुछू कोना की केलक व्यबहार यौ जननी केँ गर्भ में अबिते देखू बिधाता मुनलैन्ह केबार यौ
मयो बाबू हमरे दूख सँ पिचा गेला जीवनक पहाड़ में नैन्हेंटा सँ पैन्ख गेल काटल उडियो नइँ पएलहुँ संसार में
बाबू केँ आँगुर छोडियो नइँ पएलहुँ पति केँ हाथ धराए गएलहुँ नइँ किछु बुझलहुँ रित दुनिआ केँ अपन किएक सभ बिसराए गएलहुँ
नव घर आँगन नव समाज में जल्दी कियोक कोना अपनेता दोख नइँ किछु हुनको छनि लेकिन हमरा किएक कियोक बुझता
घर सँ कहियो नइँ बाहर निकललहुँ ऊँच -नीच केँ ज्ञान नइँ पएलहुँ अर्जित छल नइँ बुद्धि-बिद्या किछु नैन्हेंटा में सासूर हम एलहुँ
कोन अपराध जन्मे सँ कएलहुँ बाबू अहाँ अपन संग नइँ रखलहुँ नइँ पतिएलहुँ हमरो में जीवन मोटरी बुझि क ' दूर भगएलहुँ ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। दमन कुमार झा एकरा की कहबै...........? १. अहाँक नजरि कतौ शून्य दिस तकैत बिना कोनो प्रयोजनकें जोरसं हँसैत हाथक चूड़ी एखन हरदम खनकैत पैरक नूपुर बिन प्रयोजने झनकैत बिना कोनो उत्सबकें लटकें सीटैत माथक बिन्दियाकें दर्पण हेरैत एकरा की कहबै ........? २. वर्षा भेला पर निंद उड़ि गेनाइ बिजली चमकला पर सर्द भ’ गेनाइ बेंगक टरटरी सं व्याकुल भेनाइ मोरक स्मरण सं छटपट केनाइ गीतक कोनो तान सुनि चंचल भेनाइ कनियो कोनो आहट सुनि पुलकित भेनाइ एकरा की कहबै .......? ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। विदेह नूतन अंक मिथिला कला संगीत १. मोना पाण्डेय २.ज्योति झा चौधरी ३.राजनाथ मिश्र (चित्रमय मिथिला) ४. उमेश मण्डल (मिथिलाक वनस्पति/ मिथिलाक जीव-जन्तु/ मिथिलाक जिनगी) १. मोना पाण्डेय २. ज्योति झा चौधरी ३. राजनाथ मिश्र चित्रमय मिथिला स्लाइड शो चित्रमय मिथिला (https://sites.google.com/a/videha.com/videha-paintings-photos/ ) ४. उमेश मण्डल मिथिलाक वनस्पति स्लाइड शो मिथिलाक जीव-जन्तु स्लाइड शो मिथिलाक जिनगी स्लाइड शो मिथिलाक वनस्पति/ मिथिलाक जीव जन्तु/ मिथिलाक जिनगी (https://sites.google.com/a/videha.com/videha-paintings-photos/ ) ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। विदेह नूतन अंक गद्य-पद्य भारती १. मोहनदास (दीर्घकथा):लेखक: उदय प्रकाश (मूल हिन्दीसँ मैथिलीमे अनुवाद विनीत उत्पल) मोहनदास (मैथिली-देवनागरी) मोहनदास (मैथिली-मिथिलाक्षर) मोहनदास (मैथिली-ब्रेल) २.छिन्नमस्ता- प्रभा खेतानक हिन्दी उपन्यासक सुशीला झा द्वारा मैथिली अनुवाद छिन्नमस्ता ३.कनकमणि दीक्षित (मूल नेपालीसँ मैथिली अनुवाद श्रीमती रूपा धीरू आ श्री धीरेन्द्र प्रेमर्षि) भगता बेङक देश-भ्रमण बालानां कृते 1.जगदीश प्रसाद मण्डल 2.डॉ॰ शशिधर कुमर 1. जगदीश प्रसाद मण्डल बाल कथा मान तराजूक दुनू पलड़ा बीच डंडी लगल रहैत, जइ सहारासँ वस्तु-जातक वजन मानल जाइत तहिना जिनगीक तराजू सेहो होइत अछि। कमल फूलक डंटीक सहारासँ जहिना फूलक सभ अंग समान रूपे खिल-खिल खिलैत तहिना जिनगियोक होइत मुदा से कहाँ होइए? जिनगीक तरजूक पलड़ा दू रंग होइए, एक इमान दोसर बैमान। पलड़ाक घटी-बढ़ी भेने तरजू पसङाह भऽ जाइए जइसँ घटैत-बढ़ैत जिनगी जीवनक दू धारामे प्रवाहित होइत चलए लगैए। एक महिना अखार रहितो दू नक्षत्रमे विभाजित होइत, ओना एक पूर्ण ऊपर ऐ बीच आद्रा नक्षत्र अपन पूर्ण जिनगी बितबैत अछि। भलहिं अखाढ़क पहिल भाग हो वा मध्य वा अंत। पनरह दिन अन्हार बीत आठ इजोरिया मास टपि गेल। हाजरी भुकबए लेल मौसम जोगार लगा नेने अछि मुदा आद्राक उपस्थिति दर्ज नै भेल अछि। ओना कहैले सालक पाँच बरखा भऽ चुकल अछि मुदा तैयो आद्राक जगह उम्मस अपन पूर्ण जुआनीमे जगमगा रहल अछि। गोनू झाक हरबाहिक जलखैक खीर जकाँ हाल धरतीकेँ छुछुओनहि अछि। दिन उगिते जेना दीनानाथक दर्शन होइत तहिना किसानक बीच नव दर्शन आएल। ओ थिक श्री-विधिसँ खेती करब। मास दिन पूर्व धानक बीआ, जैविक खाद, कीटनाशक दबाइ इत्यादिक बँटबारा, पछिला हिसाबे इमानदारीसँ भेल। इमानदारी ऐ लेल जे जहिना बैंकक कर्जकेँ लोक चौक परक भुज्जा खा सठा दैत तहिना अखन धरिक बीआ-बालिक हिसाब रहल। वैचारिक रूपमे बीआ पाड़ि खेतीक करैक समए सेहो पौलक। संयोगो नीक रहल जे एकटा बरखा सेहो भेल। बरखा हाथ लगने किछु गोटे बीआ खसौलनि। देखबामे बरखा भेल, मुदा बीआ पाड़ैक नै भेल। जइसँ बीआ अधा-छिधा जनमल। किछु गोटे कल आ घैलसँ पटा डूमा हाल बना खसौसनि। जनमबैमे ओ जीतलाह। मुदा किदु गोटे अखनो बीआ घरेमे आद्राक आशापर रखने छथि। ओना अद्रोसँ रोहिणीक बीआकेँ निराग मानल गेल अछि। मुदा रोहिणीक पछातिक हिसाबकेँ अनदेखी केने बीरारेमे बीआ जडबो करैत। खेतीक एक उपाय तँ हाथ आएल मुदा मूल उपाय पानि नै आएल। एक पाशापर भगवान बैसल दोसर २००८ ई.क कोसीक विभिवषिका नहर खा गेल, तइ लागल १९८७क बाढ़ि आ अठासीक भुमकम बीस बर्ख पहिनहि बोरिंग खा गेल छल। जूर-शीतल पावनिक चलती कमने पोखरिक उड़ाही रूकि गेल जइसँ ओ अपने तेहेन रोगा गेल अछि जे जान लेल रविक संग एकादशियो करैए। मनुष्यक जन्म संस्कार ओतए पनपब शुरू होइत जतए ओकर जन्म होइत अछि। ई दीगर बात जे कतौ पेटक बच्चाक सेवा पोनगैक पहिनेसँ हुअए लगैत आ कतौ रस्ते–पेड़े जन्मो लैत आ पाललो-पोसलो जाइत। आद्राक कर्त्तव्यक लापरवाहीसँ जन-जनक बीच तबाही तँ अछिये श्रमक घटबी सेहो बेसिआइये गेल अछि। मुदा किछुओ किअए ने हुअए आखिर वसन्तक उनाड़ियो मास तँ छी। किअए ने बाग-बगीचामे बगवार वसन्तक संग चैतावर आ बारहमासा गाऔत। आमक संग-संग जमुनिया धार सेहो बहैत अछि। टोलक पाँच गोटेक गाछी एकठाम। साधारण परिवार तँए छोट-छोट गाछी। मुदा कलमी-सरही सभ आम लुबधल। करीब पच्चीस तीस गाछ सभ मिला कऽ पाँचो परिवारक जीवन-शैली एक रंग तँए विचारोमे एकरूपता छन्हि। एते जरूर छन्हि जे बिनु कहने कियो कोनो गाछपर ने ढेला फेकैत आ ने हाथसँ तोड़ैत। मुदा खसल आमक कोनो रोक नै। जइसँ चेतन तँ अपन-आनक ठेकान जरूर बुझैत, मुदा बाल-बोध नै। पाँचो परिवारक धिया-पुता एकेठाम खेलबो करैत आ आम खसलापर दौड़बो करैत। ओना अबोध बच्चा रहने, अवाजकेँ ठीकसँ नै अकानि कियो केम्हरो कियो केम्हरो दौग जाइत मुदा केकरो भेटलापर एते खुशी सभकेँ जरूर होइ जे हराएल भेटल। रातिक दू बजैत। उमस भरल दिनक संग अधा रातियो बीत गेल। एक बजेक बाद पूरबाक लहकी उठल। दिन भरिक गुमराएल मन नीन दिस दौगल। दुनू बेटाक संग गुलजारी आमक गाछी विदा भेल। अष्टमीक चान लुप्त भऽ गेल छल। जइसँ अन्हारक साम्राज्य पसरि गेल। आठ गोटेक परिवार जुलजारीक। तीनू बापूत मिला आठटा पाकल आम भेटलै। आंगन आबि डिबियाक इजोतमे आठो आम गनि छोटका बेटा राधेश्याम बाजल- “जते गोरे घरमे छी एक-एकक हिसाबसँ आमो अछि।” राधेश्यामक बात सुनि जेठका भाय गौरीशंकर बाजल- “जहिना छोट-पैघ आम अछि तहिना तँ घरमे लोको अछि किने। तँए....।” राधेश्याम- “अखन माएकेँ रखैले दऽ दहक। खाइ बेरमे खाएब।” 2. डॉ॰ शशिधर कुमर “विदेह” एम॰डी॰(आयु॰) – कायचिकित्सा कॉलेज ऑफ आयुर्वेद एण्ड रिसर्च सेण्टर, निगडी – प्राधिकरण, पूणा (महाराष्ट्र) – ४११०४४, बर्खा रानी - १ बर्खा रानी ! आऽ गे आऽ । राति अएबेँ, से एखने आऽ । इस्कूल जा - जा रोजे थकलहुँ, आइ अपन तोँ खेल देखा ।। एखने आ, गए एखने आऽ । आइ अपन नञि भाओ बढ़ा । एतेक बरस तोँ झमकि झमकि कऽ, रस्तेँ – पएरेँ हो नञि थाह ।। बर्खा रानी ! एहि ठाँ आऽ । अप्पन रिमझिम गीत सुना । दुपहरिया धरि खूब बरसिहेँ, फेर कने लीहेँ सुस्ता ।। बर्खा रानी ! आब ने आऽ । दम्म धरै, तोँ ले सुस्ता । संगी – साथी शोर करैए, खेलब - कूदब – करब मजा ।। बर्खा रानी - २ बर्खा रानी ! आब ने आऽ । दम्म धरै तोँ ले सुस्ता । हाथ – पएर सभ ठिठुरि गेल अछि, आब तोँ रौदक दरस देखा । बर्खा रानी ! आब ने आऽ ।। खेल – कूद सभ बन्न पड़ल अछि, संगी – साथी पड़ल बेमार । सर्दी–खाँसी, ढों–ढों, खिच–खिच, ककरो धएने अछि बोखार । सभठाँ एहने सनि किछु चर्चा, एहने सनि किछु दुखद समाद । पसरल कए ठाँ रोग मलेरिया, हैजा डेंगू कालाजार । आङ्गन सगरो चाली सह – सह, आब ने एहेन रूप देखा । बर्खा रानी ! आब ने आऽ ।। बाट – घाट कादो – किचकाँही, डूबल सौंसे खेत - पथार । माल–जाल सभ ठिठुरि मरै अछि, मच्छर – माछीक बढ़ल पसार । लेन कटल अछि, फेज उड़ल अछि, देखब टी॰ भी॰ तोहर कपार । दुष्कर सौंसे आबाजाही, कतेक लोक करतै बैसार ? जतहि सञो अएलेँ ततहि पड़ा जो, आब ने अप्पन मूँह देखा । बर्खा रानी ! आब ने आऽ ।। बच्चा लोकनि द्वारा स्मरणीय श्लोक १.प्रातः काल ब्रह्ममुहूर्त्त (सूर्योदयक एक घंटा पहिने) सर्वप्रथम अपन दुनू हाथ देखबाक चाही, आ’ ई श्लोक बजबाक चाही। कराग्रे वसते लक्ष्मीः करमध्ये सरस्वती। करमूले स्थितो ब्रह्मा प्रभाते करदर्शनम्॥ करक आगाँ लक्ष्मी बसैत छथि, करक मध्यमे सरस्वती, करक मूलमे ब्रह्मा स्थित छथि। भोरमे ताहि द्वारे करक दर्शन करबाक थीक। २.संध्या काल दीप लेसबाक काल- दीपमूले स्थितो ब्रह्मा दीपमध्ये जनार्दनः। दीपाग्रे शङ्करः प्रोक्त्तः सन्ध्याज्योतिर्नमोऽस्तुते॥ दीपक मूल भागमे ब्रह्मा, दीपक मध्यभागमे जनार्दन (विष्णु) आऽ दीपक अग्र भागमे शङ्कर स्थित छथि। हे संध्याज्योति! अहाँकेँ नमस्कार। ३.सुतबाक काल- रामं स्कन्दं हनूमन्तं वैनतेयं वृकोदरम्। शयने यः स्मरेन्नित्यं दुःस्वप्नस्तस्य नश्यति॥ जे सभ दिन सुतबासँ पहिने राम, कुमारस्वामी, हनूमान्, गरुड़ आऽ भीमक स्मरण करैत छथि, हुनकर दुःस्वप्न नष्ट भऽ जाइत छन्हि। ४. नहेबाक समय- गङ्गे च यमुने चैव गोदावरि सरस्वति। नर्मदे सिन्धु कावेरि जलेऽस्मिन् सन्निधिं कुरू॥ हे गंगा, यमुना, गोदावरी, सरस्वती, नर्मदा, सिन्धु आऽ कावेरी धार। एहि जलमे अपन सान्निध्य दिअ। ५.उत्तरं यत्समुद्रस्य हिमाद्रेश्चैव दक्षिणम्। वर्षं तत् भारतं नाम भारती यत्र सन्ततिः॥ समुद्रक उत्तरमे आऽ हिमालयक दक्षिणमे भारत अछि आऽ ओतुका सन्तति भारती कहबैत छथि। ६.अहल्या द्रौपदी सीता तारा मण्डोदरी तथा। पञ्चकं ना स्मरेन्नित्यं महापातकनाशकम्॥ जे सभ दिन अहल्या, द्रौपदी, सीता, तारा आऽ मण्दोदरी, एहि पाँच साध्वी-स्त्रीक स्मरण करैत छथि, हुनकर सभ पाप नष्ट भऽ जाइत छन्हि। ७.अश्वत्थामा बलिर्व्यासो हनूमांश्च विभीषणः। कृपः परशुरामश्च सप्तैते चिरञ्जीविनः॥ अश्वत्थामा, बलि, व्यास, हनूमान्, विभीषण, कृपाचार्य आऽ परशुराम- ई सात टा चिरञ्जीवी कहबैत छथि। ८.साते भवतु सुप्रीता देवी शिखर वासिनी उग्रेन तपसा लब्धो यया पशुपतिः पतिः। सिद्धिः साध्ये सतामस्तु प्रसादान्तस्य धूर्जटेः जाह्नवीफेनलेखेव यन्यूधि शशिनः कला॥ ९. बालोऽहं जगदानन्द न मे बाला सरस्वती। अपूर्णे पंचमे वर्षे वर्णयामि जगत्त्रयम् ॥ १०. दूर्वाक्षत मंत्र(शुक्ल यजुर्वेद अध्याय २२, मंत्र २२) आ ब्रह्मन्नित्यस्य प्रजापतिर्ॠषिः। लिंभोक्त्ता देवताः। स्वराडुत्कृतिश्छन्दः। षड्जः स्वरः॥ आ ब्रह्म॑न् ब्राह्म॒णो ब्र॑ह्मवर्च॒सी जा॑यता॒मा रा॒ष्ट्रे रा॑ज॒न्यः शुरे॑ऽइषव्यो॒ऽतिव्या॒धी म॑हार॒थो जा॑यतां॒ दोग्ध्रीं धे॒नुर्वोढा॑न॒ड्वाना॒शुः सप्तिः॒ पुर॑न्धि॒र्योवा॑ जि॒ष्णू र॑थे॒ष्ठाः स॒भेयो॒ युवास्य यज॑मानस्य वी॒रो जा॒यतां निका॒मे-नि॑कामे नः प॒र्जन्यों वर्षतु॒ फल॑वत्यो न॒ऽओष॑धयः पच्यन्तां योगेक्ष॒मो नः॑ कल्पताम्॥२२॥ मन्त्रार्थाः सिद्धयः सन्तु पूर्णाः सन्तु मनोरथाः। शत्रूणां बुद्धिनाशोऽस्तु मित्राणामुदयस्तव। ॐ दीर्घायुर्भव। ॐ सौभाग्यवती भव। हे भगवान्। अपन देशमे सुयोग्य आ’ सर्वज्ञ विद्यार्थी उत्पन्न होथि, आ’ शुत्रुकेँ नाश कएनिहार सैनिक उत्पन्न होथि। अपन देशक गाय खूब दूध दय बाली, बरद भार वहन करएमे सक्षम होथि आ’ घोड़ा त्वरित रूपेँ दौगय बला होए। स्त्रीगण नगरक नेतृत्व करबामे सक्षम होथि आ’ युवक सभामे ओजपूर्ण भाषण देबयबला आ’ नेतृत्व देबामे सक्षम होथि। अपन देशमे जखन आवश्यक होय वर्षा होए आ’ औषधिक-बूटी सर्वदा परिपक्व होइत रहए। एवं क्रमे सभ तरहेँ हमरा सभक कल्याण होए। शत्रुक बुद्धिक नाश होए आ’ मित्रक उदय होए॥ मनुष्यकें कोन वस्तुक इच्छा करबाक चाही तकर वर्णन एहि मंत्रमे कएल गेल अछि। एहिमे वाचकलुप्तोपमालड़्कार अछि। अन्वय- ब्रह्म॑न् - विद्या आदि गुणसँ परिपूर्ण ब्रह्म रा॒ष्ट्रे - देशमे ब्र॑ह्मवर्च॒सी-ब्रह्म विद्याक तेजसँ युक्त्त आ जा॑यतां॒- उत्पन्न होए रा॑ज॒न्यः-राजा शुरे॑ऽ–बिना डर बला इषव्यो॒- बाण चलेबामे निपुण ऽतिव्या॒धी-शत्रुकेँ तारण दय बला म॑हार॒थो-पैघ रथ बला वीर दोग्ध्रीं-कामना(दूध पूर्ण करए बाली) धे॒नुर्वोढा॑न॒ड्वाना॒शुः धे॒नु-गौ वा वाणी र्वोढा॑न॒ड्वा- पैघ बरद ना॒शुः-आशुः-त्वरित सप्तिः॒-घोड़ा पुर॑न्धि॒र्योवा॑- पुर॑न्धि॒- व्यवहारकेँ धारण करए बाली र्योवा॑-स्त्री जि॒ष्णू-शत्रुकेँ जीतए बला र॑थे॒ष्ठाः-रथ पर स्थिर स॒भेयो॒-उत्तम सभामे युवास्य-युवा जेहन यज॑मानस्य-राजाक राज्यमे वी॒रो-शत्रुकेँ पराजित करएबला निका॒मे-नि॑कामे-निश्चययुक्त्त कार्यमे नः-हमर सभक प॒र्जन्यों-मेघ वर्षतु॒-वर्षा होए फल॑वत्यो-उत्तम फल बला ओष॑धयः-औषधिः पच्यन्तां- पाकए योगेक्ष॒मो-अलभ्य लभ्य करेबाक हेतु कएल गेल योगक रक्षा नः॑-हमरा सभक हेतु कल्पताम्-समर्थ होए ग्रिफिथक अनुवाद- हे ब्रह्मण, हमर राज्यमे ब्राह्मण नीक धार्मिक विद्या बला, राजन्य-वीर,तीरंदाज, दूध दए बाली गाय, दौगय बला जन्तु, उद्यमी नारी होथि। पार्जन्य आवश्यकता पड़ला पर वर्षा देथि, फल देय बला गाछ पाकए, हम सभ संपत्ति अर्जित/संरक्षित करी। 8.VIDEHA FOR NON RESIDENTS 8.1 to 8.3 MAITHILI LITERATURE IN ENGLISH 8.1.1.The Comet -GAJENDRA THAKUR translated by Jyoti Jha chaudhary 8.1.2.The_Science_of_Words- GAJENDRA THAKUR translated by the author himself 8.1.3.On_the_dice-board_of_the_millennium- GAJENDRA THAKUR translated by Jyoti Jha chaudhary 8.1.4.NAAGPHANS (IN ENGLISH)- SHEFALIKA VERMA translated by Dr. Rajiv Kumar Verma and Dr. Jaya Verma विदेह नूतन अंक भाषापाक रचना-लेखन Input: (कोष्ठकमे देवनागरी, मिथिलाक्षर किंवा फोनेटिक-रोमनमे टाइप करू। Input in Devanagari, Mithilakshara or Phonetic-Roman.) Output: (परिणाम देवनागरी, मिथिलाक्षर आ फोनेटिक-रोमन/ रोमनमे। Result in Devanagari, Mithilakshara and Phonetic-Roman/ Roman.) English to Maithili Maithili to English इंग्लिश-मैथिली-कोष / मैथिली-इंग्लिश-कोष प्रोजेक्टकेँ आगू बढ़ाऊ, अपन सुझाव आ योगदान ई-मेल द्वारा ggajendra@videha.com पर पठाऊ। Top of Form विदेहक मैथिली-अंग्रेजी आ अंग्रेजी मैथिली कोष (इंटरनेटपर पहिल बेर सर्च-डिक्शनरी) एम.एस. एस.क्यू.एल. सर्वर आधारित -Based on ms-sql server Maithili-English and English-Maithili Dictionary. १.भारत आ नेपालक मैथिली भाषा-वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक शैली आ २.मैथिलीमे भाषा सम्पादन पाठ्यक्रम १.नेपाल आ भारतक मैथिली भाषा-वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक शैली
१.१. नेपालक मैथिली भाषा वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक उच्चारण आ लेखन शैली (भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक धारणाकेँ पूर्ण रूपसँ सङ्ग लऽ निर्धारित) मैथिलीमे उच्चारण तथा लेखन १.पञ्चमाक्षर आ अनुस्वार: पञ्चमाक्षरान्तर्गत ङ, ञ, ण, न एवं म अबैत अछि। संस्कृत भाषाक अनुसार शब्दक अन्तमे जाहि वर्गक अक्षर रहैत अछि ओही वर्गक पञ्चमाक्षर अबैत अछि। जेना- अङ्क (क वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ङ् आएल अछि।) पञ्च (च वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ञ् आएल अछि।) खण्ड (ट वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ण् आएल अछि।) सन्धि (त वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे न् आएल अछि।) खम्भ (प वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे म् आएल अछि।) उपर्युक्त बात मैथिलीमे कम देखल जाइत अछि। पञ्चमाक्षरक बदलामे अधिकांश जगहपर अनुस्वारक प्रयोग देखल जाइछ। जेना- अंक, पंच, खंड, संधि, खंभ आदि। व्याकरणविद पण्डित गोविन्द झाक कहब छनि जे कवर्ग, चवर्ग आ टवर्गसँ पूर्व अनुस्वार लिखल जाए तथा तवर्ग आ पवर्गसँ पूर्व पञ्चमाक्षरे लिखल जाए। जेना- अंक, चंचल, अंडा, अन्त तथा कम्पन। मुदा हिन्दीक निकट रहल आधुनिक लेखक एहि बातकेँ नहि मानैत छथि। ओ लोकनि अन्त आ कम्पनक जगहपर सेहो अंत आ कंपन लिखैत देखल जाइत छथि। नवीन पद्धति किछु सुविधाजनक अवश्य छैक। किएक तँ एहिमे समय आ स्थानक बचत होइत छैक। मुदा कतोक बेर हस्तलेखन वा मुद्रणमे अनुस्वारक छोट सन बिन्दु स्पष्ट नहि भेलासँ अर्थक अनर्थ होइत सेहो देखल जाइत अछि। अनुस्वारक प्रयोगमे उच्चारण-दोषक सम्भावना सेहो ततबए देखल जाइत अछि। एतदर्थ कसँ लऽ कऽ पवर्ग धरि पञ्चमाक्षरेक प्रयोग करब उचित अछि। यसँ लऽ कऽ ज्ञ धरिक अक्षरक सङ्ग अनुस्वारक प्रयोग करबामे कतहु कोनो विवाद नहि देखल जाइछ। २.ढ आ ढ़ : ढ़क उच्चारण “र् ह”जकाँ होइत अछि। अतः जतऽ “र् ह”क उच्चारण हो ओतऽ मात्र ढ़ लिखल जाए। आन ठाम खाली ढ लिखल जएबाक चाही। जेना- ढ = ढाकी, ढेकी, ढीठ, ढेउआ, ढङ्ग, ढेरी, ढाकनि, ढाठ आदि। ढ़ = पढ़ाइ, बढ़ब, गढ़ब, मढ़ब, बुढ़बा, साँढ़, गाढ़, रीढ़, चाँढ़, सीढ़ी, पीढ़ी आदि। उपर्युक्त शब्द सभकेँ देखलासँ ई स्पष्ट होइत अछि जे साधारणतया शब्दक शुरूमे ढ आ मध्य तथा अन्तमे ढ़ अबैत अछि। इएह नियम ड आ ड़क सन्दर्भ सेहो लागू होइत अछि। ३.व आ ब : मैथिलीमे “व”क उच्चारण ब कएल जाइत अछि, मुदा ओकरा ब रूपमे नहि लिखल जएबाक चाही। जेना- उच्चारण : बैद्यनाथ, बिद्या, नब, देबता, बिष्णु, बंश, बन्दना आदि। एहि सभक स्थानपर क्रमशः वैद्यनाथ, विद्या, नव, देवता, विष्णु, वंश, वन्दना लिखबाक चाही। सामान्यतया व उच्चारणक लेल ओ प्रयोग कएल जाइत अछि। जेना- ओकील, ओजह आदि। ४.य आ ज : कतहु-कतहु “य”क उच्चारण “ज”जकाँ करैत देखल जाइत अछि, मुदा ओकरा ज नहि लिखबाक चाही। उच्चारणमे यज्ञ, जदि, जमुना, जुग, जाबत, जोगी, जदु, जम आदि कहल जाएबला शब्द सभकेँ क्रमशः यज्ञ, यदि, यमुना, युग, यावत, योगी, यदु, यम लिखबाक चाही। ५.ए आ य : मैथिलीक वर्तनीमे ए आ य दुनू लिखल जाइत अछि। प्राचीन वर्तनी- कएल, जाए, होएत, माए, भाए, गाए आदि। नवीन वर्तनी- कयल, जाय, होयत, माय, भाय, गाय आदि। सामान्यतया शब्दक शुरूमे ए मात्र अबैत अछि। जेना एहि, एना, एकर, एहन आदि। एहि शब्द सभक स्थानपर यहि, यना, यकर, यहन आदिक प्रयोग नहि करबाक चाही। यद्यपि मैथिलीभाषी थारू सहित किछु जातिमे शब्दक आरम्भोमे “ए”केँ य कहि उच्चारण कएल जाइत अछि। ए आ “य”क प्रयोगक सन्दर्भमे प्राचीने पद्धतिक अनुसरण करब उपयुक्त मानि एहि पुस्तकमे ओकरे प्रयोग कएल गेल अछि। किएक तँ दुनूक लेखनमे कोनो सहजता आ दुरूहताक बात नहि अछि। आ मैथिलीक सर्वसाधारणक उच्चारण-शैली यक अपेक्षा एसँ बेसी निकट छैक। खास कऽ कएल, हएब आदि कतिपय शब्दकेँ कैल, हैब आदि रूपमे कतहु-कतहु लिखल जाएब सेहो “ए”क प्रयोगकेँ बेसी समीचीन प्रमाणित करैत अछि। ६.हि, हु तथा एकार, ओकार : मैथिलीक प्राचीन लेखन-परम्परामे कोनो बातपर बल दैत काल शब्दक पाछाँ हि, हु लगाओल जाइत छैक। जेना- हुनकहि, अपनहु, ओकरहु, तत्कालहि, चोट्टहि, आनहु आदि। मुदा आधुनिक लेखनमे हिक स्थानपर एकार एवं हुक स्थानपर ओकारक प्रयोग करैत देखल जाइत अछि। जेना- हुनके, अपनो, तत्काले, चोट्टे, आनो आदि। ७.ष तथा ख : मैथिली भाषामे अधिकांशतः षक उच्चारण ख होइत अछि। जेना- षड्यन्त्र (खड़यन्त्र), षोडशी (खोड़शी), षट्कोण (खटकोण), वृषेश (वृखेश), सन्तोष (सन्तोख) आदि। ८.ध्वनि-लोप : निम्नलिखित अवस्थामे शब्दसँ ध्वनि-लोप भऽ जाइत अछि: (क) क्रियान्वयी प्रत्यय अयमे य वा ए लुप्त भऽ जाइत अछि। ओहिमे सँ पहिने अक उच्चारण दीर्घ भऽ जाइत अछि। ओकर आगाँ लोप-सूचक चिह्न वा विकारी (’ / ऽ) लगाओल जाइछ। जेना- पूर्ण रूप : पढ़ए (पढ़य) गेलाह, कए (कय) लेल, उठए (उठय) पड़तौक। अपूर्ण रूप : पढ़’ गेलाह, क’ लेल, उठ’ पड़तौक। पढ़ऽ गेलाह, कऽ लेल, उठऽ पड़तौक। (ख) पूर्वकालिक कृत आय (आए) प्रत्ययमे य (ए) लुप्त भऽ जाइछ, मुदा लोप-सूचक विकारी नहि लगाओल जाइछ। जेना- पूर्ण रूप : खाए (य) गेल, पठाय (ए) देब, नहाए (य) अएलाह। अपूर्ण रूप : खा गेल, पठा देब, नहा अएलाह। (ग) स्त्री प्रत्यय इक उच्चारण क्रियापद, संज्ञा, ओ विशेषण तीनूमे लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना- पूर्ण रूप : दोसरि मालिनि चलि गेलि। अपूर्ण रूप : दोसर मालिन चलि गेल। (घ) वर्तमान कृदन्तक अन्तिम त लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना- पूर्ण रूप : पढ़ैत अछि, बजैत अछि, गबैत अछि। अपूर्ण रूप : पढ़ै अछि, बजै अछि, गबै अछि। (ङ) क्रियापदक अवसान इक, उक, ऐक तथा हीकमे लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना- पूर्ण रूप: छियौक, छियैक, छहीक, छौक, छैक, अबितैक, होइक। अपूर्ण रूप : छियौ, छियै, छही, छौ, छै, अबितै, होइ। (च) क्रियापदीय प्रत्यय न्ह, हु तथा हकारक लोप भऽ जाइछ। जेना- पूर्ण रूप : छन्हि, कहलन्हि, कहलहुँ, गेलह, नहि। अपूर्ण रूप : छनि, कहलनि, कहलौँ, गेलऽ, नइ, नञि, नै। ९.ध्वनि स्थानान्तरण : कोनो-कोनो स्वर-ध्वनि अपना जगहसँ हटि कऽ दोसर ठाम चलि जाइत अछि। खास कऽ ह्रस्व इ आ उक सम्बन्धमे ई बात लागू होइत अछि। मैथिलीकरण भऽ गेल शब्दक मध्य वा अन्तमे जँ ह्रस्व इ वा उ आबए तँ ओकर ध्वनि स्थानान्तरित भऽ एक अक्षर आगाँ आबि जाइत अछि। जेना- शनि (शइन), पानि (पाइन), दालि ( दाइल), माटि (माइट), काछु (काउछ), मासु (माउस) आदि। मुदा तत्सम शब्द सभमे ई निअम लागू नहि होइत अछि। जेना- रश्मिकेँ रइश्म आ सुधांशुकेँ सुधाउंस नहि कहल जा सकैत अछि। १०.हलन्त(्)क प्रयोग : मैथिली भाषामे सामान्यतया हलन्त (्)क आवश्यकता नहि होइत अछि। कारण जे शब्दक अन्तमे अ उच्चारण नहि होइत अछि। मुदा संस्कृत भाषासँ जहिनाक तहिना मैथिलीमे आएल (तत्सम) शब्द सभमे हलन्त प्रयोग कएल जाइत अछि। एहि पोथीमे सामान्यतया सम्पूर्ण शब्दकेँ मैथिली भाषा सम्बन्धी निअम अनुसार हलन्तविहीन राखल गेल अछि। मुदा व्याकरण सम्बन्धी प्रयोजनक लेल अत्यावश्यक स्थानपर कतहु-कतहु हलन्त देल गेल अछि। प्रस्तुत पोथीमे मथिली लेखनक प्राचीन आ नवीन दुनू शैलीक सरल आ समीचीन पक्ष सभकेँ समेटि कऽ वर्ण-विन्यास कएल गेल अछि। स्थान आ समयमे बचतक सङ्गहि हस्त-लेखन तथा तकनीकी दृष्टिसँ सेहो सरल होबऽबला हिसाबसँ वर्ण-विन्यास मिलाओल गेल अछि। वर्तमान समयमे मैथिली मातृभाषी पर्यन्तकेँ आन भाषाक माध्यमसँ मैथिलीक ज्ञान लेबऽ पड़ि रहल परिप्रेक्ष्यमे लेखनमे सहजता तथा एकरूपतापर ध्यान देल गेल अछि। तखन मैथिली भाषाक मूल विशेषता सभ कुण्ठित नहि होइक, ताहू दिस लेखक-मण्डल सचेत अछि। प्रसिद्ध भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक कहब छनि जे सरलताक अनुसन्धानमे एहन अवस्था किन्नहु ने आबऽ देबाक चाही जे भाषाक विशेषता छाँहमे पडि जाए। -(भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक धारणाकेँ पूर्ण रूपसँ सङ्ग लऽ निर्धारित) १.२. मैथिली अकादमी, पटना द्वारा निर्धारित मैथिली लेखन-शैली
१. जे शब्द मैथिली-साहित्यक प्राचीन कालसँ आइ धरि जाहि वर्त्तनीमे प्रचलित अछि, से सामान्यतः ताहि वर्त्तनीमे लिखल जाय- उदाहरणार्थ-
ग्राह्य
एखन ठाम जकर, तकर तनिकर अछि
अग्राह्य अखन, अखनि, एखेन, अखनी ठिमा, ठिना, ठमा जेकर, तेकर तिनकर। (वैकल्पिक रूपेँ ग्राह्य) ऐछ, अहि, ए।
२. निम्नलिखित तीन प्रकारक रूप वैकल्पिकतया अपनाओल जाय: भऽ गेल, भय गेल वा भए गेल। जा रहल अछि, जाय रहल अछि, जाए रहल अछि। कर’ गेलाह, वा करय गेलाह वा करए गेलाह।
३. प्राचीन मैथिलीक ‘न्ह’ ध्वनिक स्थानमे ‘न’ लिखल जाय सकैत अछि यथा कहलनि वा कहलन्हि।
४. ‘ऐ’ तथा ‘औ’ ततय लिखल जाय जत’ स्पष्टतः ‘अइ’ तथा ‘अउ’ सदृश उच्चारण इष्ट हो। यथा- देखैत, छलैक, बौआ, छौक इत्यादि।
५. मैथिलीक निम्नलिखित शब्द एहि रूपे प्रयुक्त होयत: जैह, सैह, इएह, ओऐह, लैह तथा दैह।
६. ह्र्स्व इकारांत शब्दमे ‘इ’ के लुप्त करब सामान्यतः अग्राह्य थिक। यथा- ग्राह्य देखि आबह, मालिनि गेलि (मनुष्य मात्रमे)।
७. स्वतंत्र ह्रस्व ‘ए’ वा ‘य’ प्राचीन मैथिलीक उद्धरण आदिमे तँ यथावत राखल जाय, किंतु आधुनिक प्रयोगमे वैकल्पिक रूपेँ ‘ए’ वा ‘य’ लिखल जाय। यथा:- कयल वा कएल, अयलाह वा अएलाह, जाय वा जाए इत्यादि।
८. उच्चारणमे दू स्वरक बीच जे ‘य’ ध्वनि स्वतः आबि जाइत अछि तकरा लेखमे स्थान वैकल्पिक रूपेँ देल जाय। यथा- धीआ, अढ़ैआ, विआह, वा धीया, अढ़ैया, बियाह।
९. सानुनासिक स्वतंत्र स्वरक स्थान यथासंभव ‘ञ’ लिखल जाय वा सानुनासिक स्वर। यथा:- मैञा, कनिञा, किरतनिञा वा मैआँ, कनिआँ, किरतनिआँ।
१०. कारकक विभक्त्तिक निम्नलिखित रूप ग्राह्य:- हाथकेँ, हाथसँ, हाथेँ, हाथक, हाथमे। ’मे’ मे अनुस्वार सर्वथा त्याज्य थिक। ‘क’ क वैकल्पिक रूप ‘केर’ राखल जा सकैत अछि।
११. पूर्वकालिक क्रियापदक बाद ‘कय’ वा ‘कए’ अव्यय वैकल्पिक रूपेँ लगाओल जा सकैत अछि। यथा:- देखि कय वा देखि कए।
१२. माँग, भाँग आदिक स्थानमे माङ, भाङ इत्यादि लिखल जाय।
१३. अर्द्ध ‘न’ ओ अर्द्ध ‘म’ क बदला अनुसार नहि लिखल जाय, किंतु छापाक सुविधार्थ अर्द्ध ‘ङ’ , ‘ञ’, तथा ‘ण’ क बदला अनुस्वारो लिखल जा सकैत अछि। यथा:- अङ्क, वा अंक, अञ्चल वा अंचल, कण्ठ वा कंठ।
१४. हलंत चिह्न निअमतः लगाओल जाय, किंतु विभक्तिक संग अकारांत प्रयोग कएल जाय। यथा:- श्रीमान्, किंतु श्रीमानक।
१५. सभ एकल कारक चिह्न शब्दमे सटा क’ लिखल जाय, हटा क’ नहि, संयुक्त विभक्तिक हेतु फराक लिखल जाय, यथा घर परक।
१६. अनुनासिककेँ चन्द्रबिन्दु द्वारा व्यक्त कयल जाय। परंतु मुद्रणक सुविधार्थ हि समान जटिल मात्रापर अनुस्वारक प्रयोग चन्द्रबिन्दुक बदला कयल जा सकैत अछि। यथा- हिँ केर बदला हिं।
१७. पूर्ण विराम पासीसँ ( । ) सूचित कयल जाय।
१८. समस्त पद सटा क’ लिखल जाय, वा हाइफेनसँ जोड़ि क’ , हटा क’ नहि।
१९. लिअ तथा दिअ शब्दमे बिकारी (ऽ) नहि लगाओल जाय।
२०. अंक देवनागरी रूपमे राखल जाय।
२१.किछु ध्वनिक लेल नवीन चिन्ह बनबाओल जाय। जा' ई नहि बनल अछि ताबत एहि दुनू ध्वनिक बदला पूर्ववत् अय/ आय/ अए/ आए/ आओ/ अओ लिखल जाय। आकि ऎ वा ऒ सँ व्यक्त कएल जाय।
ह./- गोविन्द झा ११/८/७६ श्रीकान्त ठाकुर ११/८/७६ सुरेन्द्र झा "सुमन" ११/०८/७६
२. मैथिलीमे भाषा सम्पादन पाठ्यक्रम २.१. उच्चारण निर्देश: (बोल्ड कएल रूप ग्राह्य):- दन्त न क उच्चारणमे दाँतमे जीह सटत- जेना बाजू नाम , मुदा ण क उच्चारणमे जीह मूर्धामे सटत (नै सटैए तँ उच्चारण दोष अछि)- जेना बाजू गणेश। तालव्य शमे जीह तालुसँ , षमे मूर्धासँ आ दन्त समे दाँतसँ सटत। निशाँ, सभ आ शोषण बाजि कऽ देखू। मैथिलीमे ष केँ वैदिक संस्कृत जकाँ ख सेहो उच्चरित कएल जाइत अछि, जेना वर्षा, दोष। य अनेको स्थानपर ज जकाँ उच्चरित होइत अछि आ ण ड़ जकाँ (यथा संयोग आ गणेश संजोग आ गड़ेस उच्चरित होइत अछि)। मैथिलीमे व क उच्चारण ब, श क उच्चारण स आ य क उच्चारण ज सेहो होइत अछि। ओहिना ह्रस्व इ बेशीकाल मैथिलीमे पहिने बाजल जाइत अछि कारण देवनागरीमे आ मिथिलाक्षरमे ह्रस्व इ अक्षरक पहिने लिखलो जाइत आ बाजलो जएबाक चाही। कारण जे हिन्दीमे एकर दोषपूर्ण उच्चारण होइत अछि (लिखल तँ पहिने जाइत अछि मुदा बाजल बादमे जाइत अछि), से शिक्षा पद्धतिक दोषक कारण हम सभ ओकर उच्चारण दोषपूर्ण ढंगसँ कऽ रहल छी। अछि- अ इ छ ऐछ (उच्चारण) छथि- छ इ थ – छैथ (उच्चारण) पहुँचि- प हुँ इ च (उच्चारण) आब अ आ इ ई ए ऐ ओ औ अं अः ऋ ऐ सभ लेल मात्रा सेहो अछि, मुदा ऐमे ई ऐ ओ औ अं अः ऋ केँ संयुक्ताक्षर रूपमे गलत रूपमे प्रयुक्त आ उच्चरित कएल जाइत अछि। जेना ऋ केँ री रूपमे उच्चरित करब। आ देखियौ- ऐ लेल देखिऔ क प्रयोग अनुचित। मुदा देखिऐ लेल देखियै अनुचित। क् सँ ह् धरि अ सम्मिलित भेलासँ क सँ ह बनैत अछि, मुदा उच्चारण काल हलन्त युक्त शब्दक अन्तक उच्चारणक प्रवृत्ति बढ़ल अछि, मुदा हम जखन मनोजमे ज् अन्तमे बजैत छी, तखनो पुरनका लोककेँ बजैत सुनबन्हि- मनोजऽ, वास्तवमे ओ अ युक्त ज् = ज बजै छथि। फेर ज्ञ अछि ज् आ ञ क संयुक्त मुदा गलत उच्चारण होइत अछि- ग्य। ओहिना क्ष अछि क् आ ष क संयुक्त मुदा उच्चारण होइत अछि छ। फेर श् आ र क संयुक्त अछि श्र ( जेना श्रमिक) आ स् आ र क संयुक्त अछि स्र (जेना मिस्र)। त्र भेल त+र । उच्चारणक ऑडियो फाइल विदेह आर्काइव http://www.videha.co.in/ पर उपलब्ध अछि। फेर केँ / सँ / पर पूर्व अक्षरसँ सटा कऽ लिखू मुदा तँ / कऽ हटा कऽ। ऐमे सँ मे पहिल सटा कऽ लिखू आ बादबला हटा कऽ। अंकक बाद टा लिखू सटा कऽ मुदा अन्य ठाम टा लिखू हटा कऽ– जेना छहटा मुदा सभ टा। फेर ६अ म सातम लिखू- छठम सातम नै। घरबलामे बला मुदा घरवालीमे वाली प्रयुक्त करू। रहए- रहै मुदा सकैए (उच्चारण सकै-ए)। मुदा कखनो काल रहए आ रहै मे अर्थ भिन्नता सेहो, जेना से कम्मो जगहमे पार्किंग करबाक अभ्यास रहै ओकरा। पुछलापर पता लागल जे ढुनढुन नाम्ना ई ड्राइवर कनाट प्लेसक पार्किंगमे काज करैत रहए। छलै, छलए मे सेहो ऐ तरहक भेल। छलए क उच्चारण छल-ए सेहो। संयोगने- (उच्चारण संजोगने) केँ/ कऽ केर- क ( केर क प्रयोग गद्यमे नै करू , पद्यमे कऽ सकै छी। ) क (जेना रामक) –रामक आ संगे (उच्चारण राम के / राम कऽ सेहो) सँ- सऽ (उच्चारण) चन्द्रबिन्दु आ अनुस्वार- अनुस्वारमे कंठ धरिक प्रयोग होइत अछि मुदा चन्द्रबिन्दुमे नै। चन्द्रबिन्दुमे कनेक एकारक सेहो उच्चारण होइत अछि- जेना रामसँ- (उच्चारण राम सऽ) रामकेँ- (उच्चारण राम कऽ/ राम के सेहो)। केँ जेना रामकेँ भेल हिन्दीक को (राम को)- राम को= रामकेँ क जेना रामक भेल हिन्दीक का ( राम का) राम का= रामक कऽ जेना जा कऽ भेल हिन्दीक कर ( जा कर) जा कर= जा कऽ सँ भेल हिन्दीक से (राम से) राम से= रामसँ सऽ , तऽ , त , केर (गद्यमे) एे चारू शब्द सबहक प्रयोग अवांछित। के दोसर अर्थेँ प्रयुक्त भऽ सकैए- जेना, के कहलक? विभक्ति “क”क बदला एकर प्रयोग अवांछित। नञि, नहि, नै, नइ, नँइ, नइँ, नइं ऐ सभक उच्चारण आ लेखन - नै त्त्व क बदलामे त्व जेना महत्वपूर्ण (महत्त्वपूर्ण नै) जतए अर्थ बदलि जाए ओतहि मात्र तीन अक्षरक संयुक्ताक्षरक प्रयोग उचित। सम्पति- उच्चारण स म्प इ त (सम्पत्ति नै- कारण सही उच्चारण आसानीसँ सम्भव नै)। मुदा सर्वोत्तम (सर्वोतम नै)। राष्ट्रिय (राष्ट्रीय नै) सकैए/ सकै (अर्थ परिवर्तन) पोछैले/ पोछै लेल/ पोछए लेल पोछैए/ पोछए/ (अर्थ परिवर्तन) पोछए/ पोछै ओ लोकनि ( हटा कऽ, ओ मे बिकारी नै) ओइ/ ओहि ओहिले/ ओहि लेल/ ओही लऽ जएबेँ/ बैसबेँ पँचभइयाँ देखियौक/ (देखिऔक नै- तहिना अ मे ह्रस्व आ दीर्घक मात्राक प्रयोग अनुचित) जकाँ / जेकाँ तँइ/ तैँ/ होएत / हएत नञि/ नहि/ नँइ/ नइँ/ नै सौँसे/ सौंसे बड़ / बड़ी (झोराओल) गाए (गाइ नहि), मुदा गाइक दूध (गाएक दूध नै।) रहलेँ/ पहिरतैँ हमहीं/ अहीं सब - सभ सबहक - सभहक धरि - तक गप- बात बूझब - समझब बुझलौं/ समझलौं/ बुझलहुँ - समझलहुँ हमरा आर - हम सभ आकि- आ कि सकैछ/ करैछ (गद्यमे प्रयोगक आवश्यकता नै) होइन/ होनि जाइन (जानि नै, जेना देल जाइन) मुदा जानि-बूझि (अर्थ परिव्र्तन) पइठ/ जाइठ आउ/ जाउ/ आऊ/ जाऊ मे, केँ, सँ, पर (शब्दसँ सटा कऽ) तँ कऽ धऽ दऽ (शब्दसँ हटा कऽ) मुदा दूटा वा बेसी विभक्ति संग रहलापर पहिल विभक्ति टाकेँ सटाऊ। जेना ऐमे सँ । एकटा , दूटा (मुदा कए टा) बिकारीक प्रयोग शब्दक अन्तमे, बीचमे अनावश्यक रूपेँ नै। आकारान्त आ अन्तमे अ क बाद बिकारीक प्रयोग नै (जेना दिअ , आ/ दिय’ , आ’, आ नै ) अपोस्ट्रोफीक प्रयोग बिकारीक बदलामे करब अनुचित आ मात्र फॉन्टक तकनीकी न्यूनताक परिचायक)- ओना बिकारीक संस्कृत रूप ऽ अवग्रह कहल जाइत अछि आ वर्तनी आ उच्चारण दुनू ठाम एकर लोप रहैत अछि/ रहि सकैत अछि (उच्चारणमे लोप रहिते अछि)। मुदा अपोस्ट्रोफी सेहो अंग्रेजीमे पसेसिव केसमे होइत अछि आ फ्रेंचमे शब्दमे जतए एकर प्रयोग होइत अछि जेना raison d’etre एतए सेहो एकर उच्चारण रैजौन डेटर होइत अछि, माने अपोस्ट्रॉफी अवकाश नै दैत अछि वरन जोड़ैत अछि, से एकर प्रयोग बिकारीक बदला देनाइ तकनीकी रूपेँ सेहो अनुचित)। अइमे, एहिमे/ ऐमे जइमे, जाहिमे एखन/ अखन/ अइखन केँ (के नहि) मे (अनुस्वार रहित) भऽ मे दऽ तँ (तऽ, त नै) सँ ( सऽ स नै) गाछ तर गाछ लग साँझ खन जो (जो go, करै जो do) तै/तइ जेना- तै दुआरे/ तइमे/ तइले जै/जइ जेना- जै कारण/ जइसँ/ जइले ऐ/अइ जेना- ऐ कारण/ ऐसँ/ अइले/ मुदा एकर एकटा खास प्रयोग- लालति कतेक दिनसँ कहैत रहैत अइ लै/लइ जेना लैसँ/ लइले/ लै दुआरे लहँ/ लौं गेलौं/ लेलौं/ लेलँह/ गेलहुँ/ लेलहुँ/ लेलँ जइ/ जाहि/ जै जहिठाम/ जाहिठाम/ जइठाम/ जैठाम एहि/ अहि/ अइ (वाक्यक अंतमे ग्राह्य) / ऐ अइछ/ अछि/ ऐछ तइ/ तहि/ तै/ ताहि ओहि/ ओइ सीखि/ सीख जीवि/ जीवी/ जीब भलेहीं/ भलहिं तैं/ तँइ/ तँए जाएब/ जएब लइ/ लै छइ/ छै नहि/ नै/ नइ गइ/ गै छनि/ छन्हि ... समए शब्दक संग जखन कोनो विभक्ति जुटै छै तखन समै जना समैपर इत्यादि। असगरमे हृदए आ विभक्ति जुटने हृदे जना हृदेसँ, हृदेमे इत्यादि। जइ/ जाहि/ जै जहिठाम/ जाहिठाम/ जइठाम/ जैठाम एहि/ अहि/ अइ/ ऐ अइछ/ अछि/ ऐछ तइ/ तहि/ तै/ ताहि ओहि/ ओइ सीखि/ सीख जीवि/ जीवी/ जीब भले/ भलेहीं/ भलहिं तैं/ तँइ/ तँए जाएब/ जएब लइ/ लै छइ/ छै नहि/ नै/ नइ गइ/ गै छनि/ छन्हि चुकल अछि/ गेल गछि २.२. मैथिलीमे भाषा सम्पादन पाठ्यक्रम नीचाँक सूचीमे देल विकल्पमेसँ लैंगुएज एडीटर द्वारा कोन रूप चुनल जेबाक चाही: बोल्ड कएल रूप ग्राह्य: १.होयबला/ होबयबला/ होमयबला/ हेब’बला, हेम’बला/ होयबाक/होबएबला /होएबाक २. आ’/आऽ आ ३. क’ लेने/कऽ लेने/कए लेने/कय लेने/ल’/लऽ/लय/लए ४. भ’ गेल/भऽ गेल/भय गेल/भए गेल ५. कर’ गेलाह/करऽ गेलह/करए गेलाह/करय गेलाह ६. लिअ/दिअ लिय’,दिय’,लिअ’,दिय’/ ७. कर’ बला/करऽ बला/ करय बला करैबला/क’र’ बला / करैवाली ८. बला वला (पुरूष), वाली (स्त्री) ९ . आङ्ल आंग्ल १०. प्रायः प्रायह ११. दुःख दुख १ २. चलि गेल चल गेल/चैल गेल १३. देलखिन्ह देलकिन्ह, देलखिन १४. देखलन्हि देखलनि/ देखलैन्ह १५. छथिन्ह/ छलन्हि छथिन/ छलैन/ छलनि १६. चलैत/दैत चलति/दैति १७. एखनो अखनो १८. बढ़नि बढ़इन बढ़न्हि १९. ओ’/ओऽ(सर्वनाम) ओ २० . ओ (संयोजक) ओ’/ओऽ २१. फाँगि/फाङ्गि फाइंग/फाइङ २२. जे जे’/जेऽ २३. ना-नुकुर ना-नुकर २४. केलन्हि/केलनि/कयलन्हि २५. तखनतँ/ तखन तँ २६. जा रहल/जाय रहल/जाए रहल २७. निकलय/निकलए लागल/ लगल बहराय/ बहराए लागल/ लगल निकल’/बहरै लागल २८. ओतय/ जतय जत’/ ओत’/ जतए/ ओतए २९. की फूरल जे कि फूरल जे ३०. जे जे’/जेऽ ३१. कूदि / यादि(मोन पारब) कूइद/याइद/कूद/याद/ यादि (मोन) ३२. इहो/ ओहो ३३. हँसए/ हँसय हँसऽ ३४. नौ आकि दस/नौ किंवा दस/ नौ वा दस ३५. सासु-ससुर सास-ससुर ३६. छह/ सात छ/छः/सात ३७. की की’/ कीऽ (दीर्घीकारान्तमे ऽ वर्जित) ३८. जबाब जवाब ३९. करएताह/ करेताह करयताह ४०. दलान दिशि दलान दिश/दलान दिस ४१ . गेलाह गएलाह/गयलाह ४२. किछु आर/ किछु और/ किछ आर ४३. जाइ छल/ जाइत छल जाति छल/जैत छल ४४. पहुँचि/ भेट जाइत छल/ भेट जाइ छलए पहुँच/ भेटि जाइत छल ४५. जबान (युवा)/ जवान(फौजी) ४६. लय/ लए क’/ कऽ/ लए कए / लऽ कऽ/ लऽ कए ४७. ल’/लऽ कय/ कए ४८. एखन / एखने / अखन / अखने ४९. अहींकेँ अहीँकेँ ५०. गहींर गहीँर ५१. धार पार केनाइ धार पार केनाय/केनाए ५२. जेकाँ जेँकाँ/ जकाँ ५३. तहिना तेहिना ५४. एकर अकर ५५. बहिनउ बहनोइ ५६. बहिन बहिनि ५७. बहिन-बहिनोइ बहिन-बहनउ ५८. नहि/ नै ५९. करबा / करबाय/ करबाए ६०. तँ/ त ऽ तय/तए ६१. भैयारी मे छोट-भाए/भै/, जेठ-भाय/भाइ, ६२. गिनतीमे दू भाइ/भाए/भाँइ ६३. ई पोथी दू भाइक/ भाँइ/ भाए/ लेल। यावत जावत ६४. माय मै / माए मुदा माइक ममता ६५. देन्हि/ दइन दनि/ दएन्हि/ दयन्हि दन्हि/ दैन्हि ६६. द’/ दऽ/ दए ६७. ओ (संयोजक) ओऽ (सर्वनाम) ६८. तका कए तकाय तकाए ६९. पैरे (on foot) पएरे कएक/ कैक ७०. ताहुमे/ ताहूमे ७१. पुत्रीक ७२. बजा कय/ कए / कऽ ७३. बननाय/बननाइ ७४. कोला ७५. दिनुका दिनका ७६. ततहिसँ ७७. गरबओलन्हि/ गरबौलनि/ गरबेलन्हि/ गरबेलनि ७८. बालु बालू ७९. चेन्ह चिन्ह(अशुद्ध) ८०. जे जे’ ८१ . से/ के से’/के’ ८२. एखुनका अखनुका ८३. भुमिहार भूमिहार ८४. सुग्गर / सुगरक/ सूगर ८५. झठहाक झटहाक ८६. छूबि ८७. करइयो/ओ करैयो ने देलक /करियौ-करइयौ ८८. पुबारि पुबाइ ८९. झगड़ा-झाँटी झगड़ा-झाँटि ९०. पएरे-पएरे पैरे-पैरे ९१. खेलएबाक ९२. खेलेबाक ९३. लगा ९४. होए- हो – होअए ९५. बुझल बूझल ९६. बूझल (संबोधन अर्थमे) ९७. यैह यएह / इएह/ सैह/ सएह ९८. तातिल ९९. अयनाय- अयनाइ/ अएनाइ/ एनाइ १००. निन्न- निन्द १०१. बिनु बिन १०२. जाए जाइ १०३. जाइ (in different sense)-last word of sentence १०४. छत पर आबि जाइ १०५. ने १०६. खेलाए (play) –खेलाइ १०७. शिकाइत- शिकायत १०८. ढप- ढ़प १०९ . पढ़- पढ ११०. कनिए/ कनिये कनिञे १११. राकस- राकश ११२. होए/ होय होइ ११३. अउरदा- औरदा ११४. बुझेलन्हि (different meaning- got understand) ११५. बुझएलन्हि/बुझेलनि/ बुझयलन्हि (understood himself) ११६. चलि- चल/ चलि गेल ११७. खधाइ- खधाय ११८. मोन पाड़लखिन्ह/ मोन पाड़लखिन/ मोन पारलखिन्ह ११९. कैक- कएक- कइएक १२०. लग ल’ग १२१. जरेनाइ १२२. जरौनाइ जरओनाइ- जरएनाइ/ जरेनाइ १२३. होइत १२४. गरबेलन्हि/ गरबेलनि गरबौलन्हि/ गरबौलनि १२५. चिखैत- (to test)चिखइत १२६. करइयो (willing to do) करैयो १२७. जेकरा- जकरा १२८. तकरा- तेकरा १२९. बिदेसर स्थानेमे/ बिदेसरे स्थानमे १३०. करबयलहुँ/ करबएलहुँ/ करबेलहुँ करबेलौं १३१. हारिक (उच्चारण हाइरक) १३२. ओजन वजन आफसोच/ अफसोस कागत/ कागच/ कागज १३३. आधे भाग/ आध-भागे १३४. पिचा / पिचाय/पिचाए १३५. नञ/ ने १३६. बच्चा नञ (ने) पिचा जाय १३७. तखन ने (नञ) कहैत अछि। कहै/ सुनै/ देखै छल मुदा कहैत-कहैत/ सुनैत-सुनैत/ देखैत-देखैत १३८. कतेक गोटे/ कताक गोटे १३९. कमाइ-धमाइ/ कमाई- धमाई १४० . लग ल’ग १४१. खेलाइ (for playing) १४२. छथिन्ह/ छथिन १४३. होइत होइ १४४. क्यो कियो / केओ १४५. केश (hair) १४६. केस (court-case) १४७ . बननाइ/ बननाय/ बननाए १४८. जरेनाइ १४९. कुरसी कुर्सी १५०. चरचा चर्चा १५१. कर्म करम १५२. डुबाबए/ डुबाबै/ डुमाबै डुमाबय/ डुमाबए १५३. एखुनका/ अखुनका १५४. लए/ लिअए (वाक्यक अंतिम शब्द)- लऽ १५५. कएलक/ केलक १५६. गरमी गर्मी १५७ . वरदी वर्दी १५८. सुना गेलाह सुना’/सुनाऽ १५९. एनाइ-गेनाइ १६०. तेना ने घेरलन्हि/ तेना ने घेरलनि १६१. नञि / नै १६२. डरो ड’रो १६३. कतहु/ कतौ कहीं १६४. उमरिगर-उमेरगर उमरगर १६५. भरिगर १६६. धोल/धोअल धोएल १६७. गप/गप्प १६८. के के’ १६९. दरबज्जा/ दरबजा १७०. ठाम १७१. धरि तक १७२. घूरि लौटि १७३. थोरबेक १७४. बड्ड १७५. तोँ/ तूँ १७६. तोँहि( पद्यमे ग्राह्य) १७७. तोँही / तोँहि १७८. करबाइए करबाइये १७९. एकेटा १८०. करितथि /करतथि १८१. पहुँचि/ पहुँच १८२. राखलन्हि रखलन्हि/ रखलनि १८३. लगलन्हि/ लगलनि लागलन्हि १८४. सुनि (उच्चारण सुइन) १८५. अछि (उच्चारण अइछ) १८६. एलथि गेलथि १८७. बितओने/ बितौने/ बितेने १८८. करबओलन्हि/ करबौलनि/ करेलखिन्ह/ करेलखिन १८९. करएलन्हि/ करेलनि १९०. आकि/ कि १९१. पहुँचि/ पहुँच १९२. बत्ती जराय/ जराए जरा (आगि लगा) १९३. से से’ १९४. हाँ मे हाँ (हाँमे हाँ विभक्त्तिमे हटा कए) १९५. फेल फैल १९६. फइल(spacious) फैल १९७. होयतन्हि/ होएतन्हि/ होएतनि/हेतनि/ हेतन्हि १९८. हाथ मटिआएब/ हाथ मटियाबय/हाथ मटियाएब १९९. फेका फेंका २००. देखाए देखा २०१. देखाबए २०२. सत्तरि सत्तर २०३. साहेब साहब २०४.गेलैन्ह/ गेलन्हि/ गेलनि २०५. हेबाक/ होएबाक २०६.केलो/ कएलहुँ/केलौं/ केलुँ २०७. किछु न किछु/ किछु ने किछु २०८.घुमेलहुँ/ घुमओलहुँ/ घुमेलौं २०९. एलाक/ अएलाक २१०. अः/ अह २११.लय/ लए (अर्थ-परिवर्त्तन) २१२.कनीक/ कनेक २१३.सबहक/ सभक २१४.मिलाऽ/ मिला २१५.कऽ/ क २१६.जाऽ/ जा २१७.आऽ/ आ २१८.भऽ /भ’ (’ फॉन्टक कमीक द्योतक) २१९.निअम/ नियम २२० .हेक्टेअर/ हेक्टेयर २२१.पहिल अक्षर ढ/ बादक/ बीचक ढ़ २२२.तहिं/तहिँ/ तञि/ तैं २२३.कहिं/ कहीं २२४.तँइ/ तैं / तइँ २२५.नँइ/ नइँ/ नञि/ नहि/नै २२६.है/ हए / एलीहेँ/ २२७.छञि/ छै/ छैक /छइ २२८.दृष्टिएँ/ दृष्टियेँ २२९.आ (come)/ आऽ(conjunction) २३०. आ (conjunction)/ आऽ(come) २३१.कुनो/ कोनो, कोना/केना २३२.गेलैन्ह-गेलन्हि-गेलनि २३३.हेबाक- होएबाक २३४.केलौँ- कएलौँ-कएलहुँ/केलौं २३५.किछु न किछ- किछु ने किछु २३६.केहेन- केहन २३७.आऽ (come)-आ (conjunction-and)/आ। आब'-आब' /आबह-आबह २३८. हएत-हैत २३९.घुमेलहुँ-घुमएलहुँ- घुमेलाें २४०.एलाक- अएलाक २४१.होनि- होइन/ होन्हि/ २४२.ओ-राम ओ श्यामक बीच(conjunction), ओऽ कहलक (he said)/ओ २४३.की हए/ कोसी अएली हए/ की है। की हइ २४४.दृष्टिएँ/ दृष्टियेँ २४५ .शामिल/ सामेल २४६.तैँ / तँए/ तञि/ तहिं २४७.जौं / ज्योँ/ जँ/ २४८.सभ/ सब २४९.सभक/ सबहक २५०.कहिं/ कहीं २५१.कुनो/ कोनो/ कोनहुँ/ २५२.फारकती भऽ गेल/ भए गेल/ भय गेल २५३.कोना/ केना/ कन्ना/कना २५४.अः/ अह २५५.जनै/ जनञ २५६.गेलनि/ गेलाह (अर्थ परिवर्तन) २५७.केलन्हि/ कएलन्हि/ केलनि/ २५८.लय/ लए/ लएह (अर्थ परिवर्तन) २५९.कनीक/ कनेक/कनी-मनी २६०.पठेलन्हि पठेलनि/ पठेलइन/ पपठओलन्हि/ पठबौलनि/ २६१.निअम/ नियम २६२.हेक्टेअर/ हेक्टेयर २६३.पहिल अक्षर रहने ढ/ बीचमे रहने ढ़ २६४.आकारान्तमे बिकारीक प्रयोग उचित नै/ अपोस्ट्रोफीक प्रयोग फान्टक तकनीकी न्यूनताक परिचायक ओकर बदला अवग्रह (बिकारी) क प्रयोग उचित २६५.केर (पद्यमे ग्राह्य) / -क/ कऽ/ के २६६.छैन्हि- छन्हि २६७.लगैए/ लगैये २६८.होएत/ हएत २६९.जाएत/ जएत/ २७०.आएत/ अएत/ आओत २७१ .खाएत/ खएत/ खैत २७२.पिअएबाक/ पिएबाक/पियेबाक २७३.शुरु/ शुरुह २७४.शुरुहे/ शुरुए २७५.अएताह/अओताह/ एताह/ औताह २७६.जाहि/ जाइ/ जइ/ जै/ २७७.जाइत/ जैतए/ जइतए २७८.आएल/ अएल २७९.कैक/ कएक २८०.आयल/ अएल/ आएल २८१. जाए/ जअए/ जए (लालति जाए लगलीह।) २८२. नुकएल/ नुकाएल २८३. कठुआएल/ कठुअएल २८४. ताहि/ तै/ तइ २८५. गायब/ गाएब/ गएब २८६. सकै/ सकए/ सकय २८७.सेरा/सरा/ सराए (भात सरा गेल) २८८.कहैत रही/देखैत रही/ कहैत छलौं/ कहै छलौं- अहिना चलैत/ पढ़ैत (पढ़ै-पढ़ैत अर्थ कखनो काल परिवर्तित) - आर बुझै/ बुझैत (बुझै/ बुझै छी, मुदा बुझैत-बुझैत)/ सकैत/ सकै। करैत/ करै। दै/ दैत। छैक/ छै। बचलै/ बचलैक। रखबा/ रखबाक । बिनु/ बिन। रातिक/ रातुक बुझै आ बुझैत केर अपन-अपन जगहपर प्रयोग समीचीन अछि। बुझैत-बुझैत आब बुझलिऐ। हमहूँ बुझै छी। २८९. दुआरे/ द्वारे २९०.भेटि/ भेट/ भेँट २९१. खन/ खीन/ खुना (भोर खन/ भोर खीन) २९२.तक/ धरि २९३.गऽ/ गै (meaning different-जनबै गऽ) २९४.सऽ/ सँ (मुदा दऽ, लऽ) २९५.त्त्व,(तीन अक्षरक मेल बदला पुनरुक्तिक एक आ एकटा दोसरक उपयोग) आदिक बदला त्व आदि। महत्त्व/ महत्व/ कर्ता/ कर्त्ता आदिमे त्त संयुक्तक कोनो आवश्यकता मैथिलीमे नै अछि। वक्तव्य २९६.बेसी/ बेशी २९७.बाला/वाला बला/ वला (रहैबला) २९८ .वाली/ (बदलैवाली) २९९.वार्त्ता/ वार्ता ३००. अन्तर्राष्ट्रिय/ अन्तर्राष्ट्रीय ३०१. लेमए/ लेबए ३०२.लमछुरका, नमछुरका ३०२.लागै/ लगै ( भेटैत/ भेटै) ३०३.लागल/ लगल ३०४.हबा/ हवा ३०५.राखलक/ रखलक ३०६.आ (come)/ आ (and) ३०७. पश्चाताप/ पश्चात्ताप ३०८. ऽ केर व्यवहार शब्दक अन्तमे मात्र, यथासंभव बीचमे नै। ३०९.कहैत/ कहै ३१०. रहए (छल)/ रहै (छलै) (meaning different) ३११.तागति/ ताकति ३१२.खराप/ खराब ३१३.बोइन/ बोनि/ बोइनि ३१४.जाठि/ जाइठ ३१५.कागज/ कागच/ कागत ३१६.गिरै (meaning different- swallow)/ गिरए (खसए) ३१७.राष्ट्रिय/ राष्ट्रीय DATE-LIST (year- 2012-13) (१४२० फसली साल) Marriage Days: Nov.2012- 25, 26, 28, 29, 30 Dec.2012- 5,9, 10, 13, 14 January 2013- 16, 17, 18, 23, 24, 31 Feb.2013- 1, 3, 4, 6, 8, 10, 14, 15, 18, 20, 24, 25 April 2013- 21, 22, 24, 26, 29 May 2013- 1,2,3,5,6,9,12,13,17,19,20,22,23,24,26,27,29,30,31 June 2013- 2,3 July 2013- 11, 14, 15 Upanayana Days: January 2013- 16 February 2013- 14, 15, 20, 21 April 2013- 22 May 2013- 20, 21 Dviragaman Din: November 2012- 25, 26, 28, 29 December 2012- 2, 3, 14 February 2013- 14, 15, 18, 20, 21, 22, 27, 28 March 2013- 1 April 2013- 18, 22, 24, 26, 28, 29 May 2013- 12, 13 Mundan Din: November 2012- 26, 30 December 2012- 3 January 2013- 18, 24 February 2013- 1, 14, 15, 20, 28 April 2013- 17 May 2013- 13, 23, 29 June 2013- 13, 19, 26, 27, 28 July 2013- 10, 15 FESTIVALS OF MITHILA (2012-13) Mauna Panchami-08 July Madhushravani- 22 July Nag Panchami- 24 July Raksha Bandhan- 02 Aug Krishnastami- 10 August Kushi Amavasya / Somvari Vrat- 17 August Vishwakarma Pooja- 17 September Hartalika Teej- 18 September ChauthChandra-19 September Karma Dharma Ekadashi-26 September Indra Pooja Aarambh- 27 September Anant Caturdashi- 29 Sep Agastyarghadaan- 30 Sep Pitri Paksha begins- 30 Sep Jimootavahan Vrata/ Jitia-08 October Matri Navami- 09 October SomvatiAmavasya Vrat- 15 October Kalashsthapan- 16 October Belnauti- 20 October Patrika Pravesh- 21 October Mahastami- 22 October Maha Navami - 23 October Vijaya Dashami- 24 October Kojagara- 29 Oct Dhanteras- 11 November Diyabati, shyama pooja-13 November Annakoota/ Govardhana Pooja-14 November Bhratridwitiya/ Chitragupta Pooja- 15 November Chhathi -19 November Devotthan Ekadashi- 24 November ravivratarambh- 25 November Navanna parvan- 25 November KartikPoornima- Sama Visarjan- 28 November Vivaha Panchmi- 17 December Makara/ Teela Sankranti-14 Jan Naraknivaran chaturdashi- 08 February Basant Panchami/ Saraswati Pooja- 15 February Achla Saptmi- 17 February Mahashivaratri-10 March Holikadahan-Fagua-26 March Holi- 28 March Varuni Trayodashi-07 April Chaiti navaratrarambh- 11 April Jurishital-15 April Chaiti Chhathi vrata-16 April Ram Navami- 19 April Ravi Brat Ant- 12 May Akshaya Tritiya-13 May Janaki Navami- 19 May Vat Savitri-barasait- 08 June Ganga Dashhara-18 June Somavati Amavasya Vrata- 08 July Jagannath Rath Yatra- 10 July Hari Sayan Ekadashi- 19 July Aashadhi Guru Poornima-22 Jul VIDEHA ARCHIVE १.विदेह ई-पत्रिकाक सभटा पुरान अंक ब्रेल, तिरहुता आ देवनागरी रूपमे Videha e journal's all old issues in Braille Tirhuta and Devanagari versions विदेह ई-पत्रिकाक पहिल ५० अंक
विदेह ई-पत्रिकाक ५०म सँ आगाँक अंक २.मैथिली पोथी डाउनलोड Maithili Books Download ३.मैथिली ऑडियो संकलन Maithili Audio Downloads ४.मैथिली वीडियोक संकलन Maithili Videos ५.मिथिला चित्रकला/ आधुनिक चित्रकला आ चित्र Mithila Painting/ Modern Art and Photos "विदेह"क एहि सभ सहयोगी लिंकपर सेहो एक बेर जाउ। ६.विदेह मैथिली क्विज : http://videhaquiz.blogspot.com/ ७.विदेह मैथिली जालवृत्त एग्रीगेटर : http://videha-aggregator.blogspot.com/ ८.विदेह मैथिली साहित्य अंग्रेजीमे अनूदित http://madhubani-art.blogspot.com/ ९.विदेहक पूर्व-रूप "भालसरिक गाछ" : http://gajendrathakur.blogspot.com/ १०.विदेह इंडेक्स : http://videha123.blogspot.com/ ११.विदेह फाइल : http://videha123.wordpress.com/ १२. विदेह: सदेह : पहिल तिरहुता (मिथिला़क्षर) जालवृत्त (ब्लॉग) http://videha-sadeha.blogspot.com/ १३. विदेह:ब्रेल: मैथिली ब्रेलमे: पहिल बेर विदेह द्वारा http://videha-braille.blogspot.com/ १४.VIDEHA IST MAITHILI FORTNIGHTLY EJOURNAL ARCHIVE http://videha-archive.blogspot.com/ १५. विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका मैथिली पोथीक आर्काइव http://videha-pothi.blogspot.com/ १६. विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका ऑडियो आर्काइव http://videha-audio.blogspot.com/ १७. विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका वीडियो आर्काइव http://videha-video.blogspot.com/ १८. विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका मिथिला चित्रकला, आधुनिक कला आ चित्रकला http://videha-paintings-photos.blogspot.com/ १९. मैथिल आर मिथिला (मैथिलीक सभसँ लोकप्रिय जालवृत्त) http://maithilaurmithila.blogspot.com/ २०.श्रुति प्रकाशन http://www.shruti-publication.com/ २१.http://groups.google.com/group/videha VIDEHA केर सदस्यता लिअ Top of Form Bottom of Form ईमेल : एहि समूहपर जाउ २२.http://groups.yahoo.com/group/VIDEHA/ Top of Form Subscribe to VIDEHA Powered by us.groups.yahoo.com Bottom of Form २३.गजेन्द्र ठाकुर इडेक्स http://gajendrathakur123.blogspot.com २४. नेना भुटका http://mangan-khabas.blogspot.com/ २५.विदेह रेडियो:मैथिली कथा-कविता आदिक पहिल पोडकास्ट साइट http://videha123radio.wordpress.com/ २६.Videha Radio २७. Join official Videha facebook group. २८. विदेह मैथिली नाट्य उत्सव http://maithili-drama.blogspot.com/ २९.समदिया http://esamaad.blogspot.com/ ३०. मैथिली फिल्म्स http://maithilifilms.blogspot.com/ ३१.अनचिन्हार आखर http://anchinharakharkolkata.blogspot.com/ ३२. मैथिली हाइकू http://maithili-haiku.blogspot.com/ ३३. मानक मैथिली http://manak-maithili.blogspot.com/ ३४. विहनि कथा http://vihanikatha.blogspot.in/ ३५. मैथिली कविता http://maithili-kavita.blogspot.in/ ३६. मैथिली कथा http://maithili-katha.blogspot.in/ ३७.मैथिली समालोचना http://maithili-samalochna.blogspot.in/ महत्त्वपूर्ण सूचना:(१) 'विदेह' द्वारा धारावाहिक रूपे ई-प्रकाशित कएल गेल गजेन्द्र ठाकुरक निबन्ध-प्रबन्ध-समीक्षा, उपन्यास (सहस्रबाढ़नि) , पद्य-संग्रह (सहस्राब्दीक चौपड़पर), कथा-गल्प (गल्प-गुच्छ), नाटक(संकर्षण), महाकाव्य (त्वञ्चाहञ्च आ असञ्जाति मन) आ बाल-किशोर साहित्य विदेहमे संपूर्ण ई-प्रकाशनक बाद प्रिंट फॉर्ममे। कुरुक्षेत्रम्–अन्तर्मनक खण्ड-१ सँ ७ Combined ISBN No.978-81-907729-7-6 विवरण एहि पृष्ठपर नीचाँमे आ प्रकाशकक साइट http://www.shruti-publication.com/ पर । महत्त्वपूर्ण सूचना (२):सूचना: विदेहक मैथिली-अंग्रेजी आ अंग्रेजी मैथिली कोष (इंटरनेटपर पहिल बेर सर्च-डिक्शनरी) एम.एस. एस.क्यू.एल. सर्वर आधारित -Based on ms-sql server Maithili-English and English-Maithili Dictionary. विदेहक भाषापाक- रचनालेखन स्तंभमे। कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक- गजेन्द्र ठाकुर गजेन्द्र ठाकुरक निबन्ध-प्रबन्ध-समीक्षा, उपन्यास (सहस्रबाढ़नि) , पद्य-संग्रह (सहस्राब्दीक चौपड़पर), कथा-गल्प (गल्प गुच्छ), नाटक(संकर्षण), महाकाव्य (त्वञ्चाहञ्च आ असञ्जाति मन) आ बालमंडली-किशोरजगत विदेहमे संपूर्ण ई-प्रकाशनक बाद प्रिंट फॉर्ममे। कुरुक्षेत्रम्–अन्तर्मनक, खण्ड-१ सँ ७ Ist edition 2009 of Gajendra Thakur’s KuruKshetram-Antarmanak (Vol. I to VII)- essay-paper-criticism, novel, poems, story, play, epics and Children-grown-ups literature in single binding: Language:Maithili ६९२ पृष्ठ : मूल्य भा. रु. 100/-(for individual buyers inside india) (add courier charges Rs.50/-per copy for Delhi/NCR and Rs.100/- per copy for outside Delhi)
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Details for purchase available at print-version publishers's site website: http://www.shruti-publication.com/ or you may write to e-mail:shruti.publication@shruti-publication.com विदेह: सदेह : १: २: ३: ४ तिरहुता : देवनागरी "विदेह" क, प्रिंट संस्करण :विदेह-ई-पत्रिका (http://www.videha.co.in/) क चुनल रचना सम्मिलित। विदेह:सदेह:१: २: ३: ४ सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। Details for purchase available at print-version publishers's site http://www.shruti-publication.com or you may write to shruti.publication@shruti-publication.com २. संदेश- [ विदेह ई-पत्रिका, विदेह:सदेह मिथिलाक्षर आ देवनागरी आ गजेन्द्र ठाकुरक सात खण्डक- निबन्ध-प्रबन्ध-समीक्षा,उपन्यास (सहस्रबाढ़नि) , पद्य-संग्रह (सहस्राब्दीक चौपड़पर), कथा-गल्प (गल्प गुच्छ), नाटक (संकर्षण), महाकाव्य (त्वञ्चाहञ्च आ असञ्जाति मन) आ बाल-मंडली-किशोर जगत- संग्रह कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक मादेँ। ] १.श्री गोविन्द झा- विदेहकेँ तरंगजालपर उतारि विश्वभरिमे मातृभाषा मैथिलीक लहरि जगाओल, खेद जे अपनेक एहि महाभियानमे हम एखन धरि संग नहि दए सकलहुँ। सुनैत छी अपनेकेँ सुझाओ आ रचनात्मक आलोचना प्रिय लगैत अछि तेँ किछु लिखक मोन भेल। हमर सहायता आ सहयोग अपनेकेँ सदा उपलब्ध रहत। २.श्री रमानन्द रेणु- मैथिलीमे ई-पत्रिका पाक्षिक रूपेँ चला कऽ जे अपन मातृभाषाक प्रचार कऽ रहल छी, से धन्यवाद । आगाँ अपनेक समस्त मैथिलीक कार्यक हेतु हम हृदयसँ शुभकामना दऽ रहल छी। ३.श्री विद्यानाथ झा "विदित"- संचार आ प्रौद्योगिकीक एहि प्रतिस्पर्धी ग्लोबल युगमे अपन महिमामय "विदेह"केँ अपना देहमे प्रकट देखि जतबा प्रसन्नता आ संतोष भेल, तकरा कोनो उपलब्ध "मीटर"सँ नहि नापल जा सकैछ? ..एकर ऐतिहासिक मूल्यांकन आ सांस्कृतिक प्रतिफलन एहि शताब्दीक अंत धरि लोकक नजरिमे आश्चर्यजनक रूपसँ प्रकट हैत। ४. प्रो. उदय नारायण सिंह "नचिकेता"- जे काज अहाँ कए रहल छी तकर चरचा एक दिन मैथिली भाषाक इतिहासमे होएत। आनन्द भए रहल अछि, ई जानि कए जे एतेक गोट मैथिल "विदेह" ई जर्नलकेँ पढ़ि रहल छथि।...विदेहक चालीसम अंक पुरबाक लेल अभिनन्दन। ५. डॉ. गंगेश गुंजन- एहि विदेह-कर्ममे लागि रहल अहाँक सम्वेदनशील मन, मैथिलीक प्रति समर्पित मेहनतिक अमृत रंग, इतिहास मे एक टा विशिष्ट फराक अध्याय आरंभ करत, हमरा विश्वास अछि। अशेष शुभकामना आ बधाइक सङ्ग, सस्नेह...अहाँक पोथी कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक प्रथम दृष्टया बहुत भव्य तथा उपयोगी बुझाइछ। मैथिलीमे तँ अपना स्वरूपक प्रायः ई पहिले एहन भव्य अवतारक पोथी थिक। हर्षपूर्ण हमर हार्दिक बधाई स्वीकार करी। ६. श्री रामाश्रय झा "रामरंग"(आब स्वर्गीय)- "अपना" मिथिलासँ संबंधित...विषय वस्तुसँ अवगत भेलहुँ।...शेष सभ कुशल अछि। ७. श्री ब्रजेन्द्र त्रिपाठी- साहित्य अकादमी- इंटरनेट पर प्रथम मैथिली पाक्षिक पत्रिका "विदेह" केर लेल बधाई आ शुभकामना स्वीकार करू। ८. श्री प्रफुल्लकुमार सिंह "मौन"- प्रथम मैथिली पाक्षिक पत्रिका "विदेह" क प्रकाशनक समाचार जानि कनेक चकित मुदा बेसी आह्लादित भेलहुँ। कालचक्रकेँ पकड़ि जाहि दूरदृष्टिक परिचय देलहुँ, ओहि लेल हमर मंगलकामना। ९.डॉ. शिवप्रसाद यादव- ई जानि अपार हर्ष भए रहल अछि, जे नव सूचना-क्रान्तिक क्षेत्रमे मैथिली पत्रकारिताकेँ प्रवेश दिअएबाक साहसिक कदम उठाओल अछि। पत्रकारितामे एहि प्रकारक नव प्रयोगक हम स्वागत करैत छी, संगहि "विदेह"क सफलताक शुभकामना। १०. श्री आद्याचरण झा- कोनो पत्र-पत्रिकाक प्रकाशन- ताहूमे मैथिली पत्रिकाक प्रकाशनमे के कतेक सहयोग करताह- ई तऽ भविष्य कहत। ई हमर ८८ वर्षमे ७५ वर्षक अनुभव रहल। एतेक पैघ महान यज्ञमे हमर श्रद्धापूर्ण आहुति प्राप्त होयत- यावत ठीक-ठाक छी/ रहब। ११. श्री विजय ठाकुर- मिशिगन विश्वविद्यालय- "विदेह" पत्रिकाक अंक देखलहुँ, सम्पूर्ण टीम बधाईक पात्र अछि। पत्रिकाक मंगल भविष्य हेतु हमर शुभकामना स्वीकार कएल जाओ। १२. श्री सुभाषचन्द्र यादव- ई-पत्रिका "विदेह" क बारेमे जानि प्रसन्नता भेल। ’विदेह’ निरन्तर पल्लवित-पुष्पित हो आ चतुर्दिक अपन सुगंध पसारय से कामना अछि। १३. श्री मैथिलीपुत्र प्रदीप- ई-पत्रिका "विदेह" केर सफलताक भगवतीसँ कामना। हमर पूर्ण सहयोग रहत। १४. डॉ. श्री भीमनाथ झा- "विदेह" इन्टरनेट पर अछि तेँ "विदेह" नाम उचित आर कतेक रूपेँ एकर विवरण भए सकैत अछि। आइ-काल्हि मोनमे उद्वेग रहैत अछि, मुदा शीघ्र पूर्ण सहयोग देब।कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक देखि अति प्रसन्नता भेल। मैथिलीक लेल ई घटना छी। १५. श्री रामभरोस कापड़ि "भ्रमर"- जनकपुरधाम- "विदेह" ऑनलाइन देखि रहल छी। मैथिलीकेँ अन्तर्राष्ट्रीय जगतमे पहुँचेलहुँ तकरा लेल हार्दिक बधाई। मिथिला रत्न सभक संकलन अपूर्व। नेपालोक सहयोग भेटत, से विश्वास करी। १६. श्री राजनन्दन लालदास- "विदेह" ई-पत्रिकाक माध्यमसँ बड़ नीक काज कए रहल छी, नातिक अहिठाम देखलहुँ। एकर वार्षिक अंक जखन प्रिंट निकालब तँ हमरा पठायब। कलकत्तामे बहुत गोटेकेँ हम साइटक पता लिखाए देने छियन्हि। मोन तँ होइत अछि जे दिल्ली आबि कए आशीर्वाद दैतहुँ, मुदा उमर आब बेशी भए गेल। शुभकामना देश-विदेशक मैथिलकेँ जोड़बाक लेल।.. उत्कृष्ट प्रकाशन कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक लेल बधाइ। अद्भुत काज कएल अछि, नीक प्रस्तुति अछि सात खण्डमे। मुदा अहाँक सेवा आ से निःस्वार्थ तखन बूझल जाइत जँ अहाँ द्वारा प्रकाशित पोथी सभपर दाम लिखल नहि रहितैक। ओहिना सभकेँ विलहि देल जइतैक। (स्पष्टीकरण- श्रीमान्, अहाँक सूचनार्थ विदेह द्वारा ई-प्रकाशित कएल सभटा सामग्री आर्काइवमे https://sites.google.com/a/videha.com/videha-pothi/ पर बिना मूल्यक डाउनलोड लेल उपलब्ध छै आ भविष्यमे सेहो रहतैक। एहि आर्काइवकेँ जे कियो प्रकाशक अनुमति लऽ कऽ प्रिंट रूपमे प्रकाशित कएने छथि आ तकर ओ दाम रखने छथि ताहिपर हमर कोनो नियंत्रण नहि अछि।- गजेन्द्र ठाकुर)... अहाँक प्रति अशेष शुभकामनाक संग। १७. डॉ. प्रेमशंकर सिंह- अहाँ मैथिलीमे इंटरनेटपर पहिल पत्रिका "विदेह" प्रकाशित कए अपन अद्भुत मातृभाषानुरागक परिचय देल अछि, अहाँक निःस्वार्थ मातृभाषानुरागसँ प्रेरित छी, एकर निमित्त जे हमर सेवाक प्रयोजन हो, तँ सूचित करी। इंटरनेटपर आद्योपांत पत्रिका देखल, मन प्रफुल्लित भऽ गेल। १८.श्रीमती शेफालिका वर्मा- विदेह ई-पत्रिका देखि मोन उल्लाससँ भरि गेल। विज्ञान कतेक प्रगति कऽ रहल अछि...अहाँ सभ अनन्त आकाशकेँ भेदि दियौ, समस्त विस्तारक रहस्यकेँ तार-तार कऽ दियौक...। अपनेक अद्भुत पुस्तक कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक विषयवस्तुक दृष्टिसँ गागरमे सागर अछि। बधाई। १९.श्री हेतुकर झा, पटना-जाहि समर्पण भावसँ अपने मिथिला-मैथिलीक सेवामे तत्पर छी से स्तुत्य अछि। देशक राजधानीसँ भय रहल मैथिलीक शंखनाद मिथिलाक गाम-गाममे मैथिली चेतनाक विकास अवश्य करत। २०. श्री योगानन्द झा, कबिलपुर, लहेरियासराय- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पोथीकेँ निकटसँ देखबाक अवसर भेटल अछि आ मैथिली जगतक एकटा उद्भट ओ समसामयिक दृष्टिसम्पन्न हस्ताक्षरक कलमबन्द परिचयसँ आह्लादित छी। "विदेह"क देवनागरी सँस्करण पटनामे रु. 80/- मे उपलब्ध भऽ सकल जे विभिन्न लेखक लोकनिक छायाचित्र, परिचय पत्रक ओ रचनावलीक सम्यक प्रकाशनसँ ऐतिहासिक कहल जा सकैछ। २१. श्री किशोरीकान्त मिश्र- कोलकाता- जय मैथिली, विदेहमे बहुत रास कविता, कथा, रिपोर्ट आदिक सचित्र संग्रह देखि आ आर अधिक प्रसन्नता मिथिलाक्षर देखि- बधाई स्वीकार कएल जाओ। २२.श्री जीवकान्त- विदेहक मुद्रित अंक पढ़ल- अद्भुत मेहनति। चाबस-चाबस। किछु समालोचना मरखाह..मुदा सत्य। २३. श्री भालचन्द्र झा- अपनेक कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक देखि बुझाएल जेना हम अपने छपलहुँ अछि। एकर विशालकाय आकृति अपनेक सर्वसमावेशताक परिचायक अछि। अपनेक रचना सामर्थ्यमे उत्तरोत्तर वृद्धि हो, एहि शुभकामनाक संग हार्दिक बधाई। २४.श्रीमती डॉ नीता झा- अहाँक कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़लहुँ। ज्योतिरीश्वर शब्दावली, कृषि मत्स्य शब्दावली आ सीत बसन्त आ सभ कथा, कविता, उपन्यास, बाल-किशोर साहित्य सभ उत्तम छल। मैथिलीक उत्तरोत्तर विकासक लक्ष्य दृष्टिगोचर होइत अछि। २५.श्री मायानन्द मिश्र- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक मे हमर उपन्यास स्त्रीधनक जे विरोध कएल गेल अछि तकर हम विरोध करैत छी।... कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पोथीक लेल शुभकामना।(श्रीमान् समालोचनाकेँ विरोधक रूपमे नहि लेल जाए।-गजेन्द्र ठाकुर) २६.श्री महेन्द्र हजारी- सम्पादक श्रीमिथिला- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़ि मोन हर्षित भऽ गेल..एखन पूरा पढ़यमे बहुत समय लागत, मुदा जतेक पढ़लहुँ से आह्लादित कएलक। २७.श्री केदारनाथ चौधरी- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक अद्भुत लागल, मैथिली साहित्य लेल ई पोथी एकटा प्रतिमान बनत। २८.श्री सत्यानन्द पाठक- विदेहक हम नियमित पाठक छी। ओकर स्वरूपक प्रशंसक छलहुँ। एम्हर अहाँक लिखल - कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक देखलहुँ। मोन आह्लादित भऽ उठल। कोनो रचना तरा-उपरी। २९.श्रीमती रमा झा-सम्पादक मिथिला दर्पण। कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक प्रिंट फॉर्म पढ़ि आ एकर गुणवत्ता देखि मोन प्रसन्न भऽ गेल, अद्भुत शब्द एकरा लेल प्रयुक्त कऽ रहल छी। विदेहक उत्तरोत्तर प्रगतिक शुभकामना। ३०.श्री नरेन्द्र झा, पटना- विदेह नियमित देखैत रहैत छी। मैथिली लेल अद्भुत काज कऽ रहल छी। ३१.श्री रामलोचन ठाकुर- कोलकाता- मिथिलाक्षर विदेह देखि मोन प्रसन्नतासँ भरि उठल, अंकक विशाल परिदृश्य आस्वस्तकारी अछि। ३२.श्री तारानन्द वियोगी- विदेह आ कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक देखि चकबिदोर लागि गेल। आश्चर्य। शुभकामना आ बधाई। ३३.श्रीमती प्रेमलता मिश्र “प्रेम”- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़लहुँ। सभ रचना उच्चकोटिक लागल। बधाई। ३४.श्री कीर्तिनारायण मिश्र- बेगूसराय- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक बड्ड नीक लागल, आगांक सभ काज लेल बधाई। ३५.श्री महाप्रकाश-सहरसा- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक नीक लागल, विशालकाय संगहि उत्तमकोटिक। ३६.श्री अग्निपुष्प- मिथिलाक्षर आ देवाक्षर विदेह पढ़ल..ई प्रथम तँ अछि एकरा प्रशंसामे मुदा हम एकरा दुस्साहसिक कहब। मिथिला चित्रकलाक स्तम्भकेँ मुदा अगिला अंकमे आर विस्तृत बनाऊ। ३७.श्री मंजर सुलेमान-दरभंगा- विदेहक जतेक प्रशंसा कएल जाए कम होएत। सभ चीज उत्तम। ३८.श्रीमती प्रोफेसर वीणा ठाकुर- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक उत्तम, पठनीय, विचारनीय। जे क्यो देखैत छथि पोथी प्राप्त करबाक उपाय पुछैत छथि। शुभकामना। ३९.श्री छत्रानन्द सिंह झा- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़लहुँ, बड्ड नीक सभ तरहेँ। ४०.श्री ताराकान्त झा- सम्पादक मैथिली दैनिक मिथिला समाद- विदेह तँ कन्टेन्ट प्रोवाइडरक काज कऽ रहल अछि। कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक अद्भुत लागल। ४१.डॉ रवीन्द्र कुमार चौधरी- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक बहुत नीक, बहुत मेहनतिक परिणाम। बधाई। ४२.श्री अमरनाथ- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक आ विदेह दुनू स्मरणीय घटना अछि, मैथिली साहित्य मध्य। ४३.श्री पंचानन मिश्र- विदेहक वैविध्य आ निरन्तरता प्रभावित करैत अछि, शुभकामना। ४४.श्री केदार कानन- कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक लेल अनेक धन्यवाद, शुभकामना आ बधाइ स्वीकार करी। आ नचिकेताक भूमिका पढ़लहुँ। शुरूमे तँ लागल जेना कोनो उपन्यास अहाँ द्वारा सृजित भेल अछि मुदा पोथी उनटौला पर ज्ञात भेल जे एहिमे तँ सभ विधा समाहित अछि। ४५.श्री धनाकर ठाकुर- अहाँ नीक काज कऽ रहल छी। फोटो गैलरीमे चित्र एहि शताब्दीक जन्मतिथिक अनुसार रहैत तऽ नीक। ४६.श्री आशीष झा- अहाँक पुस्तकक संबंधमे एतबा लिखबा सँ अपना कए नहि रोकि सकलहुँ जे ई किताब मात्र किताब नहि थीक, ई एकटा उम्मीद छी जे मैथिली अहाँ सन पुत्रक सेवा सँ निरंतर समृद्ध होइत चिरजीवन कए प्राप्त करत। ४७.श्री शम्भु कुमार सिंह- विदेहक तत्परता आ क्रियाशीलता देखि आह्लादित भऽ रहल छी। निश्चितरूपेण कहल जा सकैछ जे समकालीन मैथिली पत्रिकाक इतिहासमे विदेहक नाम स्वर्णाक्षरमे लिखल जाएत। ओहि कुरुक्षेत्रक घटना सभ तँ अठारहे दिनमे खतम भऽ गेल रहए मुदा अहाँक कुरुक्षेत्रम् तँ अशेष अछि। ४८.डॉ. अजीत मिश्र- अपनेक प्रयासक कतबो प्रशंसा कएल जाए कमे होएतैक। मैथिली साहित्यमे अहाँ द्वारा कएल गेल काज युग-युगान्तर धरि पूजनीय रहत। ४९.श्री बीरेन्द्र मल्लिक- अहाँक कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक आ विदेह:सदेह पढ़ि अति प्रसन्नता भेल। अहाँक स्वास्थ्य ठीक रहए आ उत्साह बनल रहए से कामना। ५०.श्री कुमार राधारमण- अहाँक दिशा-निर्देशमे विदेह पहिल मैथिली ई-जर्नल देखि अति प्रसन्नता भेल। हमर शुभकामना। ५१.श्री फूलचन्द्र झा प्रवीण-विदेह:सदेह पढ़ने रही मुदा कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक देखि बढ़ाई देबा लेल बाध्य भऽ गेलहुँ। आब विश्वास भऽ गेल जे मैथिली नहि मरत। अशेष शुभकामना। ५२.श्री विभूति आनन्द- विदेह:सदेह देखि, ओकर विस्तार देखि अति प्रसन्नता भेल। ५३.श्री मानेश्वर मनुज-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक एकर भव्यता देखि अति प्रसन्नता भेल, एतेक विशाल ग्रन्थ मैथिलीमे आइ धरि नहि देखने रही। एहिना भविष्यमे काज करैत रही, शुभकामना। ५४.श्री विद्यानन्द झा- आइ.आइ.एम.कोलकाता- कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक विस्तार, छपाईक संग गुणवत्ता देखि अति प्रसन्नता भेल। अहाँक अनेक धन्यवाद; कतेक बरखसँ हम नेयारैत छलहुँ जे सभ पैघ शहरमे मैथिली लाइब्रेरीक स्थापना होअए, अहाँ ओकरा वेबपर कऽ रहल छी, अनेक धन्यवाद। ५५.श्री अरविन्द ठाकुर-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक मैथिली साहित्यमे कएल गेल एहि तरहक पहिल प्रयोग अछि, शुभकामना। ५६.श्री कुमार पवन-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक पढ़ि रहल छी। किछु लघुकथा पढ़ल अछि, बहुत मार्मिक छल। ५७. श्री प्रदीप बिहारी-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक देखल, बधाई। ५८.डॉ मणिकान्त ठाकुर-कैलिफोर्निया- अपन विलक्षण नियमित सेवासँ हमरा लोकनिक हृदयमे विदेह सदेह भऽ गेल अछि। ५९.श्री धीरेन्द्र प्रेमर्षि- अहाँक समस्त प्रयास सराहनीय। दुख होइत अछि जखन अहाँक प्रयासमे अपेक्षित सहयोग नहि कऽ पबैत छी। ६०.श्री देवशंकर नवीन- विदेहक निरन्तरता आ विशाल स्वरूप- विशाल पाठक वर्ग, एकरा ऐतिहासिक बनबैत अछि। ६१.श्री मोहन भारद्वाज- अहाँक समस्त कार्य देखल, बहुत नीक। एखन किछु परेशानीमे छी, मुदा शीघ्र सहयोग देब। ६२.श्री फजलुर रहमान हाशमी-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक मे एतेक मेहनतक लेल अहाँ साधुवादक अधिकारी छी। ६३.श्री लक्ष्मण झा "सागर"- मैथिलीमे चमत्कारिक रूपेँ अहाँक प्रवेश आह्लादकारी अछि।..अहाँकेँ एखन आर..दूर..बहुत दूरधरि जेबाक अछि। स्वस्थ आ प्रसन्न रही। ६४.श्री जगदीश प्रसाद मंडल-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक पढ़लहुँ । कथा सभ आ उपन्यास सहस्रबाढ़नि पूर्णरूपेँ पढ़ि गेल छी। गाम-घरक भौगोलिक विवरणक जे सूक्ष्म वर्णन सहस्रबाढ़निमे अछि, से चकित कएलक, एहि संग्रहक कथा-उपन्यास मैथिली लेखनमे विविधता अनलक अछि। समालोचना शास्त्रमे अहाँक दृष्टि वैयक्तिक नहि वरन् सामाजिक आ कल्याणकारी अछि, से प्रशंसनीय। ६५.श्री अशोक झा-अध्यक्ष मिथिला विकास परिषद- कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक लेल बधाई आ आगाँ लेल शुभकामना। ६६.श्री ठाकुर प्रसाद मुर्मु- अद्भुत प्रयास। धन्यवादक संग प्रार्थना जे अपन माटि-पानिकेँ ध्यानमे राखि अंकक समायोजन कएल जाए। नव अंक धरि प्रयास सराहनीय। विदेहकेँ बहुत-बहुत धन्यवाद जे एहेन सुन्दर-सुन्दर सचार (आलेख) लगा रहल छथि। सभटा ग्रहणीय- पठनीय। ६७.बुद्धिनाथ मिश्र- प्रिय गजेन्द्र जी,अहाँक सम्पादन मे प्रकाशित ‘विदेह’आ ‘कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक’ विलक्षण पत्रिका आ विलक्षण पोथी! की नहि अछि अहाँक सम्पादनमे? एहि प्रयत्न सँ मैथिली क विकास होयत,निस्संदेह। ६८.श्री बृखेश चन्द्र लाल- गजेन्द्रजी, अपनेक पुस्तक कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़ि मोन गदगद भय गेल , हृदयसँ अनुगृहित छी । हार्दिक शुभकामना । ६९.श्री परमेश्वर कापड़ि - श्री गजेन्द्र जी । कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़ि गदगद आ नेहाल भेलहुँ। ७०.श्री रवीन्द्रनाथ ठाकुर- विदेह पढ़ैत रहैत छी। धीरेन्द्र प्रेमर्षिक मैथिली गजलपर आलेख पढ़लहुँ। मैथिली गजल कत्तऽ सँ कत्तऽ चलि गेलैक आ ओ अपन आलेखमे मात्र अपन जानल-पहिचानल लोकक चर्च कएने छथि। जेना मैथिलीमे मठक परम्परा रहल अछि। (स्पष्टीकरण- श्रीमान्, प्रेमर्षि जी ओहि आलेखमे ई स्पष्ट लिखने छथि जे किनको नाम जे छुटि गेल छन्हि तँ से मात्र आलेखक लेखकक जानकारी नहि रहबाक द्वारे, एहिमे आन कोनो कारण नहि देखल जाय। अहाँसँ एहि विषयपर विस्तृत आलेख सादर आमंत्रित अछि।-सम्पादक) ७१.श्री मंत्रेश्वर झा- विदेह पढ़ल आ संगहि अहाँक मैगनम ओपस कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक सेहो, अति उत्तम। मैथिलीक लेल कएल जा रहल अहाँक समस्त कार्य अतुलनीय अछि। ७२. श्री हरेकृष्ण झा- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक मैथिलीमे अपन तरहक एकमात्र ग्रन्थ अछि, एहिमे लेखकक समग्र दृष्टि आ रचना कौशल देखबामे आएल जे लेखकक फील्डवर्कसँ जुड़ल रहबाक कारणसँ अछि। ७३.श्री सुकान्त सोम- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक मे समाजक इतिहास आ वर्तमानसँ अहाँक जुड़ाव बड्ड नीक लागल, अहाँ एहि क्षेत्रमे आर आगाँ काज करब से आशा अछि। ७४.प्रोफेसर मदन मिश्र- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक सन किताब मैथिलीमे पहिले अछि आ एतेक विशाल संग्रहपर शोध कएल जा सकैत अछि। भविष्यक लेल शुभकामना। ७५.प्रोफेसर कमला चौधरी- मैथिलीमे कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक सन पोथी आबए जे गुण आ रूप दुनूमे निस्सन होअए, से बहुत दिनसँ आकांक्षा छल, ओ आब जा कऽ पूर्ण भेल। पोथी एक हाथसँ दोसर हाथ घुमि रहल अछि, एहिना आगाँ सेहो अहाँसँ आशा अछि। ७६.श्री उदय चन्द्र झा "विनोद": गजेन्द्रजी, अहाँ जतेक काज कएलहुँ अछि से मैथिलीमे आइ धरि कियो नहि कएने छल। शुभकामना। अहाँकेँ एखन बहुत काज आर करबाक अछि। ७७.श्री कृष्ण कुमार कश्यप: गजेन्द्र ठाकुरजी, अहाँसँ भेँट एकटा स्मरणीय क्षण बनि गेल। अहाँ जतेक काज एहि बएसमे कऽ गेल छी ताहिसँ हजार गुणा आर बेशीक आशा अछि। ७८.श्री मणिकान्त दास: अहाँक मैथिलीक कार्यक प्रशंसा लेल शब्द नहि भेटैत अछि। अहाँक कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक सम्पूर्ण रूपेँ पढ़ि गेलहुँ। त्वञ्चाहञ्च बड्ड नीक लागल। ७९. श्री हीरेन्द्र कुमार झा- विदेह ई-पत्रिकाक सभ अंक ई-पत्रसँ भेटैत रहैत अछि। मैथिलीक ई-पत्रिका छैक एहि बातक गर्व होइत अछि। अहाँ आ अहाँक सभ सहयोगीकेँ हार्दिक शुभकामना। विदेह मैथिली साहित्य आन्दोलन (c)२००४-१२. सर्वाधिकार लेखकाधीन आ जतए लेखकक नाम नहि अछि ततए संपादकाधीन। विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। सह-सम्पादक: उमेश मंडल। सहायक सम्पादक: शिव कुमार झा आ मुन्नाजी (मनोज कुमार कर्ण)। भाषा-सम्पादन: नागेन्द्र कुमार झा आ पञ्जीकार विद्यानन्द झा। कला-सम्पादन: ज्योति झा चौधरी आ रश्मि रेखा सिन्हा। सम्पादक-शोध-अन्वेषण: डॉ. जया वर्मा आ डॉ. राजीव कुमार वर्मा। सम्पादक- नाटक-रंगमंच-चलचित्र- बेचन ठाकुर। सम्पादक- सूचना-सम्पर्क-समाद- पूनम मंडल आ प्रियंका झा। सम्पादक- अनुवाद विभाग- विनीत उत्पल। रचनाकार अपन मौलिक आ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि) ggajendra@videha.com केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx, .rtf वा .txt फॉर्मेटमे पठा सकैत छथि। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेताह, से आशा करैत छी। रचनाक अंतमे टाइप रहय, जे ई रचना मौलिक अछि, आ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। मेल प्राप्त होयबाक बाद यथासंभव शीघ्र ( सात दिनक भीतर) एकर प्रकाशनक अंकक सूचना देल जायत। ’विदेह' प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका अछि आ एहिमे मैथिली, संस्कृत आ अंग्रेजीमे मिथिला आ मैथिलीसँ संबंधित रचना प्रकाशित कएल जाइत अछि। एहि ई पत्रिकाकेँ श्रीमति लक्ष्मी ठाकुर द्वारा मासक ०१ आ १५ तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि। (c) 2004-12 सर्वाधिकार सुरक्षित। विदेहमे प्रकाशित सभटा रचना आ आर्काइवक सर्वाधिकार रचनाकार आ संग्रहकर्त्ताक लगमे छन्हि। रचनाक अनुवाद आ पुनः प्रकाशन किंवा आर्काइवक उपयोगक अधिकार किनबाक हेतु ggajendra@videha.co.in पर संपर्क करू। एहि साइटकेँ प्रीति झा ठाकुर, मधूलिका चौधरी आ रश्मि प्रिया द्वारा डिजाइन कएल गेल। सिद्धिरस्तु वि दे ह विदेह Videha বিদেহ www.videha.co.in www.videha.com विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका Videha Ist Maithili Fortnightly ejournal विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका'विदेह' १०९ म अंक ०१ जुलाइ २०१२ (वर्ष ५ मास ५५ अंक १०९) मानुषीमिह संस्कृताम् ISSN 2229-547X VIDEHA वि दे ह विदेह Videha বিদেহ www.videha.co.in www.videha.com विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका Videha Ist Maithili Fortnightly ejournal विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका'विदेह' १०९ म अंक ०१ जुलाइ २०१२ (वर्ष ५ मास ५५ अंक १०९) मानुषीमिह संस्कृताम् ISSN 2229-547X VIDEHA
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