524 525 ISSN 2229-547X VIDEHA 'विदेह' १११ म अंक ०१ अगस्त २०१२ (वर्ष ५ मास ५६ अंक १११) ऐ अंकमे अछि:- १. संपादकीय संदेश २. गद्य २.१.१.मुन्नाजी:बाल गजलः पुरान देहक नव चेहरा २.ओमप्रकाश झा: मैथिली बाल गजलक अवधारणा ३.जगदानन्द झा 'मनु' -बाल गजलक अवधारणा ४.आशीष अनचिन्हार- की थिक बाल गजल ५.चंदन कुमार झा- मैथिली बाल-साहित्य आ' बाल-गजल २.२.१.योगेन्द्र पाठक ‘वियोगी’- लघुकथा- देववाणी २.नवेंदु कुमार झा- बिजलीक क्षेत्र मे आत्म निर्भरताक लेल सरकार कऽ रहल प्रयास २.३.१.अमित मिश्र- बाल गजल: कोमल करेजक आखर २.मिहिर झा- बाल गजल २.४.श्री राज- यात्रीक कवितामे गाम २.५.मुन्नाजी-विहनि कथा संसार २.६.आशीष अनचिन्हार द्वारा श्री जगदीश प्रसाद मण्डलजीसँ लेल साक्षात्कार २.७.१. राजदेव मण्डल- जगदीश प्रसाद मण्डलक कविता संग्रह राति-दिनक समीक्षा २.डॉ. धनाकर ठाकुर- समीक्षा – फूल तितली आ तुलबुल (लेखक -श्री सियाराम झा 'सरस') २.८.१.जवाहर लाल काश्यप- विहनि कथा- जमाना बदलि गेलै २.जगदानन्द झा 'मनु'- विहनि कथा- मसोमात/ रहस्य ३.सुजीत कुमार झा- मिथिला पेन्टिङ्गक विदेशमे मांग बढल -छत्तामे मिथिला पेन्टिड्ड४.श्री जगदीश प्रसाद मण्डल- लघुकथा-सूदि भरना ३. पद्य ३.१.१.मुन्नी कामत-सातटा कविता २.रूबी झा- बाल गजल ३.श्रीमती इरा मल्लिक-- बाल गजल ३.२.१. मुन्ना जी २.प्रशांत मैथिल-बाल गजल ३.पंकज चौधरी (नवलश्री)४.जवाहर लाल काश्यप५.क्रांति कुमार सुदर्शन ३.३.१.जगदीश चन्द्र ठाकुर अनिल- १.बाल गजल/ २.की भेटल आ की हेरा गेल (आत्म गीत)(आगाँ...) २.कामिनी कामायनी- चिडैक अभिलाष ३.४.१.अमित मिश्र-बाल गजल २. ओमप्रकाश झा- बाल गजल ३.५.१.शिव कुमार यादव- बाल गजल २.शिव कुमार झा- कविता/ गजल३.किशन कारीगर- हास्य कविता ३.६.चंदन कुमार झा- बाल गजल ३.७.१.जगदानन्द झा 'मनु' -बाल गजल २.राजेश कुमार झा- दूटा कविता ३. जगदीश प्रसाद मण्डलक किछु गीत/ कविता ३.८.१. राजीव रंजन मिश्र- बाल गजल २. मिहिर झा- बाल गजल ३.गजेन्द्र ठाकुर- बाल गजल ४. मिथिला कला-संगीत १. ज्योति झा चौधरी २.राजनाथ मिश्र (चित्रमय मिथिला) ३. उमेश मण्डल (मिथिलाक वनस्पति/ मिथिलाक जीव-जन्तु/ मिथिलाक जिनगी) 5.बालानां कृते-१.मुन्नी कामत-जड़ैत ज्योत२.पंकज चौधरी (नवलश्री)- मेघक चोर 6. भाषापाक रचना-लेखन -[मानक मैथिली], [विदेहक मैथिली-अंग्रेजी आ अंग्रेजी मैथिली कोष (इंटरनेटपर पहिल बेर सर्च-डिक्शनरी) एम.एस. एस.क्यू.एल. सर्वर आधारित -Based on ms-sql server Maithili-English and English-Maithili Dictionary.] 7.VIDEHA FOR NON RESIDENTS 7.2.8.2.Maithili poem by Sh.Jagdish Prasad Mandal translated from Maithili into English by Sh.Vinit Utpal) विदेह ई-पत्रिकाक सभटा पुरान अंक ( ब्रेल, तिरहुता आ देवनागरी मे ) पी.डी.एफ. डाउनलोडक लेल नीचाँक लिंकपर उपलब्ध अछि। All the old issues of Videha e journal ( in Braille, Tirhuta and Devanagari versions ) are available for pdf download at the following link. विदेह ई-पत्रिकाक सभटा पुरान अंक ब्रेल, तिरहुता आ देवनागरी रूपमे Videha e journal's all old issues in Braille Tirhuta and Devanagari versions विदेह ई-पत्रिकाक पहिल ५० अंक
विदेह ई-पत्रिकाक ५०म सँ आगाँक अंक ↑ विदेह आर.एस.एस.फीड एनीमेटरकेँ अपन साइट/ ब्लॉगपर लगाऊ। ब्लॉग "लेआउट" पर "एड गाडजेट" मे "फीड" सेलेक्ट कए "फीड यू.आर.एल." मे http://www.videha.co.in/index.xml टाइप केलासँ सेहो विदेह फीड प्राप्त कए सकैत छी। गूगल रीडरमे पढ़बा लेल http://reader.google.com/ पर जा कऽ Add a Subscription बटन क्लिक करू आ खाली स्थानमे http://www.videha.co.in/index.xml पेस्ट करू आ Add बटन दबाउ। Join official Videha facebook group. Join Videha googlegroups विदेह रेडियो:मैथिली कथा-कविता आदिक पहिल पोडकास्ट साइट http://videha123radio.wordpress.com/ मैथिली देवनागरी वा मिथिलाक्षरमे नहि देखि/ लिखि पाबि रहल छी, (cannot see/write Maithili in Devanagari/ Mithilakshara follow links below or contact at ggajendra@videha.com) तँ एहि हेतु नीचाँक लिंक सभ पर जाउ। संगहि विदेहक स्तंभ मैथिली भाषापाक/ रचना लेखनक नव-पुरान अंक पढ़ू। http://devanaagarii.net/ http://kaulonline.com/uninagari/ (एतए बॉक्समे ऑनलाइन देवनागरी टाइप करू, बॉक्ससँ कॉपी करू आ वर्ड डॉक्युमेन्टमे पेस्ट कए वर्ड फाइलकेँ सेव करू। विशेष जानकारीक लेल ggajendra@videha.com पर सम्पर्क करू।)(Use Firefox 4.0 (from WWW.MOZILLA.COM )/ Opera/ Safari/ Internet Explorer 8.0/ Flock 2.0/ Google Chrome for best view of 'Videha' Maithili e-journal at http://www.videha.co.in/ .) Go to the link below for download of old issues of VIDEHA Maithili e magazine in .pdf format and Maithili Audio/ Video/ Book/ paintings/ photo files. विदेहक पुरान अंक आ ऑडियो/ वीडियो/ पोथी/ चित्रकला/ फोटो सभक फाइल सभ (उच्चारण, बड़ सुख सार आ दूर्वाक्षत मंत्र सहित) डाउनलोड करबाक हेतु नीचाँक लिंक पर जाउ। VIDEHA ARCHIVE विदेह आर्काइव भारतीय डाक विभाग द्वारा जारी कवि, नाटककार आ धर्मशास्त्री विद्यापतिक स्टाम्प। भारत आ नेपालक माटिमे पसरल मिथिलाक धरती प्राचीन कालहिसँ महान पुरुष ओ महिला लोकनिक कर्मभमि रहल अछि। मिथिलाक महान पुरुष ओ महिला लोकनिक चित्र 'मिथिला रत्न' मे देखू। गौरी-शंकरक पालवंश कालक मूर्त्ति, एहिमे मिथिलाक्षरमे (१२०० वर्ष पूर्वक) अभिलेख अंकित अछि। मिथिलाक भारत आ नेपालक माटिमे पसरल एहि तरहक अन्यान्य प्राचीन आ नव स्थापत्य, चित्र, अभिलेख आ मूर्त्तिकलाक़ हेतु देखू 'मिथिलाक खोज' मिथिला, मैथिल आ मैथिलीसँ सम्बन्धित सूचना, सम्पर्क, अन्वेषण संगहि विदेहक सर्च-इंजन आ न्यूज सर्विस आ मिथिला, मैथिल आ मैथिलीसँ सम्बन्धित वेबसाइट सभक समग्र संकलनक लेल देखू "विदेह सूचना संपर्क अन्वेषण" विदेह जालवृत्तक डिसकसन फोरमपर जाउ। "मैथिल आर मिथिला" (मैथिलीक सभसँ लोकप्रिय जालवृत्त) पर जाउ। ऐ बेर मूल पुरस्कार(२०१२) [साहित्य अकादेमी, दिल्ली]क लेल अहाँक नजरिमे कोन मूल मैथिली पोथी उपयुक्त अछि ? Thank you for voting! श्री राजदेव मण्डलक “अम्बरा” (कविता-संग्रह) 12.5% श्री बेचन ठाकुरक “बेटीक अपमान आ छीनरदेवी”(दूटा नाटक) 9.88% श्रीमती आशा मिश्रक “उचाट” (उपन्यास) 6.69% श्रीमती पन्ना झाक “अनुभूति” (कथा संग्रह) 4.65% श्री उदय नारायण सिंह “नचिकेता”क “नो एण्ट्री:मा प्रविश (नाटक) 5.52% श्री सुभाष चन्द्र यादवक “बनैत बिगड़ैत” (कथा-संग्रह) 4.94% श्रीमती वीणा कर्ण- भावनाक अस्थिपंजर (कविता संग्रह) 5.52% श्रीमती शेफालिका वर्माक “किस्त-किस्त जीवन (आत्मकथा) 8.72% श्रीमती विभा रानीक “भाग रौ आ बलचन्दा” (दूटा नाटक) 6.98% श्री महाप्रकाश-संग समय के (कविता संग्रह) 5.52% श्री तारानन्द वियोगी- प्रलय रहस्य (कविता-संग्रह) 5.23% श्री महेन्द्र मलंगियाक “छुतहा घैल” (नाटक) 9.01% श्रीमती नीता झाक “देश-काल” (कथा-संग्रह) 5.81% श्री सियाराम झा "सरस"क थोड़े आगि थोड़े पानि (गजल संग्रह) 7.27% Other: 1.74% ऐ बेर युवा पुरस्कार(२०१२)[साहित्य अकादेमी, दिल्ली]क लेल अहाँक नजरिमे कोन कोन लेखक उपयुक्त छथि ? Thank you for voting! श्रीमती ज्योति सुनीत चौधरीक “अर्चिस” (कविता संग्रह) 27.45% श्री विनीत उत्पलक “हम पुछैत छी” (कविता संग्रह) 7.19% श्रीमती कामिनीक “समयसँ सम्वाद करैत”, (कविता संग्रह) 6.54% श्री प्रवीण काश्यपक “विषदन्ती वरमाल कालक रति” (कविता संग्रह) 4.58% श्री आशीष अनचिन्हारक "अनचिन्हार आखर"(गजल संग्रह) 18.95% श्री अरुणाभ सौरभक “एतबे टा नहि” (कविता संग्रह) 6.54% श्री दिलीप कुमार झा "लूटन"क जगले रहबै (कविता संग्रह) 7.84% श्री आदि यायावरक “भोथर पेंसिलसँ लिखल” (कथा संग्रह) 6.54% श्री उमेश मण्डलक “निश्तुकी” (कविता संग्रह) 12.42% Other: 1.96% ऐ बेर अनुवाद पुरस्कार (२०१३) [साहित्य अकादेमी, दिल्ली]क लेल अहाँक नजरिमे के उपयुक्त छथि? Thank you for voting! श्री नरेश कुमार विकल "ययाति" (मराठी उपन्यास श्री विष्णु सखाराम खाण्डेकर) 32.65% श्री महेन्द्र नारायण राम "कार्मेलीन" (कोंकणी उपन्यास श्री दामोदर मावजो) 13.27% श्री देवेन्द्र झा "अनुभव"(बांग्ला उपन्यास श्री दिव्येन्दु पालित) 13.27% श्रीमती मेनका मल्लिक "देश आ अन्य कविता सभ" (नेपालीक अनुवाद मूल- रेमिका थापा) 14.29% श्री कृष्ण कुमार कश्यप आ श्रीमती शशिबाला- मैथिली गीतगोविन्द ( जयदेव संस्कृत) 14.29% श्री रामनारायण सिंह "मलाहिन" (श्री तकषी शिवशंकर पिल्लैक मलयाली उपन्यास) 11.22% Other: 1.02% फेलो पुरस्कार-समग्र योगदान २०१२-१३ : समानान्तर साहित्य अकादेमी, दिल्ली Thank you for voting! श्री राजनन्दन लाल दास 53.09% श्री डॉ. अमरेन्द्र 24.69% श्री चन्द्रभानु सिंह 20.99% Other: 1.23% 1.संपादकीय १ १ ई अंक विदेहक बाल गजल विशेषांक अछि। विदेह प्रारम्भेसँ बाल साहित्य लेल अलग पन्ना रखने अछि, एक बेर बाल साहित्य विशेषांक सेहो निकलि चुकल अछि, मुदा बाल गजल नाम्ना नव विधापर एतेक रास आलेख आ गजल जेना आएल अछि तकर श्रेय आशीष अनचिन्हारकेँ जाइत छन्हि। बाल गजल स्थापित भऽ बच्चा सभक कण्ठपर चढ़ए आ मैथिलीकेँ जीवन्त राखए तइ आशाक संग। २ सुकान्त सोमक एकटा आएल छन्हि मिथिला दर्शनमे। ओइ आलेखमे बहुत रास गलत तथ्य अछि। अतीत मंथन २००७ सँ २००९ मे छपले नै छै से हुनका नै बुझल छन्हि। गामक जिनगी मैथिली साहित्यक सर्वश्रेष्ठ कथा संग्रह छै ई तथ्य ओ स्वीकार नै कऽ सकला। मैथिलीमे कोहुना कोनो पोथीकेँ पुरस्कार भेटौ ई घुमा कऽ कहि अपन मंशा ओ प्रकट कऽ देलन्हि। भगलपुरिया जूरीकेँ ओ दरभंगिया जूरी सन बना कऽ प्रस्तुत केलन्हि, आ अहूमे हुनकर निरपेक्षता घास चरै लेल गेल बुझाइत अछि| सुकान्त सोमकेँ बुझल छन्हि जे कार्यक्रम बंगलोर मे भेलै! जखनकि कार्यक्रम कोच्चिमे भेल रहै। सुकान्त सोम टैगोर साहित्य सम्मानकेँ रवीन्द्र पुरस्कार कहि रहल छथि!! सुकान्त सोमक अघोषित जातिवाद बहुत किछु कहि जाइत अछि। ३ सन् सैंतालीस... भारतक स्वतंत्रताक त्रिवार्णिक झण्डा फहरा रहल छल। मुदा कम्यूनिस्ट पार्टीक माननाइ छल जे भारत स्वतंत्र नै भेल अछि। असली स्वतंत्रता भेटब बाँकी छै... मिथिलाक एकटा गाम… जन्म होइत अछि एकटा बच्चाक.. ओही बर्ख ... ओइ स्वतंत्र वा स्वतंत्र नै भेल भारतमे... पिताक मृत्यु...गरीबी.. केस मोकदमा... वंचितक लेल संघर्षमे भेटलै स्वतंत्र भारतक वा स्वतंत्र नै भेल भारतक जेल.... आइ बेरमामे पाँच-दस बीघासँ पैघ जोत ककरो नै.. ओइ गाम मे जीवित अछि आइयो किसानी आत्मनिर्भर संस्कृति... पुरोहितवादपर ब्राह्मणवादक एकछत्र राज्यक जतऽ भेल समाप्ति.. संघर्षक समाप्तिक बाद जिनकर लेखन मैथिली साहित्यमे आनि देलक पुनर्जागरण... जगदीश प्रसाद मण्डल- एकटा बायोग्राफी...गजेन्द्र ठाकुर द्वारा उन्नैस सए साठिक पछाति। केजरीबाल हाइ स्कूलमे नाओं लिखा लेने रहथि। स्कूल अबै-जाइक परेशानीसँ साइकिल कीनैक विचार परिवारमे भऽ गेल। ओना जखन टेन्थ (स्पेशल नाइन्थ) मे रहथि तखन दू सए बासठि रूपैयामे सैब्रो साइकिल कीनि लेलनि। मुदा जहिना सीमा परक सिपाहीकेँ दुश्मन सिपाहीक हाथ पकड़ेलासँ होइए तहिना समस्याक सिपाही चारू दिससँ परिवारकेँ घेर लेलकन्हि। दुनू पिसियौत भाय (जेठ गोनर मण्डल आ तइसँ छोट कारी मण्डल) केँ अपन बाप-दादाक डीह-डाबर जगलनि। कोसी धारक मुँह जे पछिम दिस जोर केने छलै ओ आब पूब दिस जोर केलक, जइसँ किछु गाम जेना हरिनाही, मैनही अमही हरड़ी इत्यादिक गामक जमीनक किछु भाग जागलै। भागल-पड़ाएल गामक लोक, अपन बाप-दादाक डूमल सम्पतिक आशामे कान ठाढ़ केनहि रहथि, गाम (हरिनाही) घुमबाक विचार केलनि। बनल-बनाएल गाममे लोकक एहेन कने स्वार्थी प्रवृत्ति बनिए जाइए जे सौंसे गामक सभ किछु हमरे भऽ जाए। प्रवृत्ति बेजाए नै, मुदा खाली सम्पत्तिये नै मनुक्खोक भार जँ उठा लेथि। हरिनाहीक कियो कतौ, कियो कतौ, कतौ-कतौ एहनो जे पान-सात परिवार एकोठाम छलाह। अपन कुटुमैतीक संग-संग नेपाल धरि पसरि गेल छलाह। सभसँ दुखद स्थिति गामक तखन भेल जखन सुभ्यस्त परिवार सबहक, जइ परिवारक लोक अपन घर-अंगनाक काजसँ बाहर नै भेल छलि, ओ सभ जखन बोनिहारिन बनि भरि-भरि दिन अनका खेतमे जिनका घरमे पचसमनी कोठी-बखारी सभ छलनि, एक पसेरी (कच्ची) अन्नपर अपन श्रम बेचैले मजबूर भेली। मुदा उपाये की? ई बात सत्य छी जे समयानुसार हाथकेँ हथियार नै भेटत तँ ओ पाछू भगबे करत, हरहरा-हरहरा कऽ पाकल जामुन जकाँ हुनका सबहक जिनगी उतरि गेलनि। जिनगीक सभ किछु हराए लगलनि। हराइये गेलनि। भागल-पड़ाएल लोकक आन देश आ आन गाममे सरकारी सहायताक कते आशा होइत ओ तँ सबहक सोझहेमे अछि। जे अखनो गाममे ओहन गरीब लोककेँ इन्दिरा आवास नै भेट रहल छन्हि जिनका अपना नामे जमीनक कागज नै छन्हि। साठि इसवीक कातिक। अपन गाम देखैले पिसियौत भाय गोनर मण्डल हरिनाही गेलाह। घोघरडीहामे ट्रेनसँ उतरि भाँज लगौलनि तँ पता लगलनि जे पहिने हटनी, हटनीसँ नौआ-बाखरि, नौआ बाखरिसँ अमही तेकर बाद हरिनाही। कते दूर हएत तँ दू कोस। दू कोस बूझि मनमे उत्साह जगलनि जे दू कोस जाइमे बेसी-सँ-बेसी दू घंटा लागतन्हि। मुदा ई नै बूझि पौलनि जे घोघरडीहा हटनीयेक बीच तीनटा धार पार करए पड़तन्हि। तहूमे गमैया सवारी छिऐ किने, लोकेक विचारे ने चलैत अछि। चारि घंटामे हटनी पहुँचलाह। हटनी नौआ-बाखरिक बीचक सीमामे एकटा सेहो नीक धार माने नम्हर धार। सूर्यास्त भेलापर हरिनाही पहुँचलाह। गोनर मण्डलक एकटा दियाद पहिनहि आबि गेल छलाह जइसँ ओ बीघा डेढ़ेक जमीनक मालिक बनि रसाएल खेतक उपजा पाबि कुटुम-परिवार दिस सेहो ताकए लगलाह। हरिनाही पहुँचते दियादी भाय चुल्हाइ मण्डलक पाहुन बनि गेलाह। गरूगर रास्ता देखि दू दिन रहैक आग्रह चुल्हाइ मण्डल केलखिन। गामक जे पहिलुका बास-भूमि छलन्हि ओ गहींर भऽ गेल रहै आ बाध ऊँच बनि गेल छलै। मुदा ओ अखन सुपौल जिलाक सीमा कात। घर मधुबनी जिलाक हरिनाही गाममे आ सभ अगवास सुपौल जिलाक हरड़ी गाममे। जइठामक हेमलताजी छथि जे फुलपराससँ विधायक रहि चुकल छथि। करीब पनरह परिवार आबि गाममे बसि गेल। तइमे दू परिवारक खूँटापर बड़दो आबि गेल। बाकी सभ कोदारिक जिनगीमे। अपन जागल घराड़ी आ पोखरि देखि गोनर मण्डल आकर्षित भऽ गेलाह। बास जोग तँ नै मुदा चास जोग जमीन देखि चुल्हाई मण्डलकेँ कहलखिन- “भैया अगिला आठम एतै छी।” चारिम दिन बेरमा आबि मामीकेँ कहलखनि- “मामी, हम अपन गाम हरिनाही जाएब।” मामी- “केना जेबहक?” गोनर- “बाँस अपना अछिये। एकटा लऽ जा कऽ पहिने घर बनाएब तखन बूझल जेतैक।” जहिना कोनो ब्रह्मचारी ब्रह्माश्रमसँ निकलि दुनियाँ दिस देखिते सतरंगी दुनियाँ देखए लगैत तहिना ओहो (गोनर मण्डल) देखलनि। केना नै देखितथि। पूर्बक हराएल गाम-घर, दियाद-वाद, सर-समाज जे इतिहास बनि चुकल छलनि, से जे सोझामे आबए लगलनि। ओना हुनका (गोनर मण्डल) एक बीघा धनहर आ अढ़ाइ कट्ठा बासक भूमि माम (जगदीश प्रस मण्डल जीक पिताजी) कीनि देने छलखिन। ओहो दुनू भाँइ (गोनर मण्डल आ कारी मण्डल) हरिनाही बिसरि गेल छलाह। केना नै बिसरितथि हराएलो जमीनक दस्ताबेज, खतियान जँ हाथमे छै तँ आशा बनल रहैत छै। जइठाम ओहो (दस्ताबेज, खतियान) नै रहल ओ तँ पानिक पाथर जकाँ कतए डुमल अछि तेकर कोन ठेकान। आ जँ हेलबैया (पानिक भाँज बुझिनिहार) रहल तँ भाँजो-भुज लगा सकैए मुदा अनाड़ी तँ अनाड़िये छी। सातम दिन एकटा बाँस काटि पाँङि-पुङि कऽ गोनर मण्डल तैयार केलनि जे काल्हि गाम जाएब। बेरमासँ हरिनाही जाएब। चारि दिन रहि, पहिने रहै जोकर घर बना लेब, तखन आगू बूझल जेतैक। मामीकेँ गोनर मण्डल कहलखिन- “मामी, चारि दिन रहि पहिने घर बना लेब। पाँचम दिन फेरि एतै छी।” मामी- “बड़बढ़िया, एक अढ़ैया चाउर आ एक अढ़ैया चूड़ासँ तँ काज चलि जेतह?” असमंजसमे गोनर पड़ि गेलाह। जते अधिक बेसी खाइक ओरियान करब ओते रस्तामे भारियो हएत। एक तँ सात-आठ कोस धार-धुरक रास्ता, तइपर बाँस आ खेबाक समान। बहुत भारी हएत। गाममे माने बेरमामे भरि पेट जलखै कऽ लेलथि आ रास्तोले बान्हि लेलथि। अपन लोटा-थारी, आ लत्ता-कपड़ा नै लेब, सेहो नै बनत। अंतमे एकटा छिपली, एकटा लोटा, बिछबैले दूटा बोरा, एक अढ़ैया-चूड़ा आ एक अढ़ैया चाउर लऽ कऽ दोसर दिन बिदा भेलाह। एक तँ ओहन भारी काज जिनगीमे कहियो नै केने रहथि। हँ एते जरूर छलनि जे बँसबारिसँ बाँस काटि आ बाधसँ धानक बोझ उघि कऽ अनैत छलाह तहिना बाधसँ हर जोता दूगोरा चौकी अनै-लऽ जाइ छलाह, मुदा एते भारी काजसँ पहिल दिन भेँट भेलनि। बेरमासँ निकलि कछुबी-तमुरिया होइत सुन्दर-बिराजीत जाइत-जाइत बेदम भऽ गेलाह। पाछू हिअबैत तँ दुइये कोस टपला, आगू हिअबैत, तँ अखन पौनी-चपराम, कलिकापुर, मेटरस तँ कोसी बान्हक बाहरे भेल। मेटरसमे ने कोसी बान्ह टपि भीतर हेता। तैयो तँ मेटरस टपि दू कोस भीतरो जाइये पड़तन्हि। अबूह लागि गेलनि। जिनगीक बाटमे बच्चा जकाँ बुकौर लागि गेलनि। सुसतेलाक किछु काल बाद फेर हूबा केलनि। पानि पीब बाँस उठा विदा भेला। मेटरस बान्हपर पहुँचैत-पहुँचैत धाह-जाड़ आबि गेलनि। एहेन जगहमे के भेँट हएत? क्यो चिन्हारे नै। गाम-घरमे ने माए-बाप रहने बच्चा फोसरियोकेँ गुड़-घाव कहै छै मुदा नै रहने तँ गुड़ो-घाव फोसरिये भऽ जाइ छै। बेरमाक पच्चीसोसँ बेसी कुटुमैती मेटरसमे तहियो छल आ अखनो अछि। कोसी बान्हपर बाँस राखल आ हिनका (गोनर मण्डलकेँ) पड़ल देखि एक गोटे लगमे एलनि। ओ बाधसँ गाम पर जाइत रहथि। लगमे आबि पुछलखिन- “कतए रहै छी?” धाह-जाड़सँ कँपैत गोनर मण्डल कहलखिन- “बेरमा।” “कतए जाएब?” “हेरनाही।” “एहेन अवस्थामे केना जाएब?” “सएह ने किछु फुड़ैए।” “एकटा काज करू। हमहूँ कियो आन नै छी। हमरो बहिन अहीं गाममे बसैए। कुटुमे भेलौं।” कुटुमक नाओं सुनितहि जेना एकाएक कतौसँ होश एलनि। कहलखिन- “कुटुम नारायण, कहुना-कहुना जँ गाम (बेरमा) घूमि जाएब तँ जान बचि जाएत, नै तँ नै बचब।” “ऐठामसँ घोघरडीहा गेल हएत?” “खाली देहे चलि जाएब।” “सभ समान हमरा ऐठीम राखि दिऔ आ अहाँ चलि जाउ। यएह (बान्हसँ सटले पूब) हमर घर छी।” आशा पाबि गोनर बजलाह- “अपना संगमे चूड़ो अछि। चलू कनिये खाइयो लेब आ रखि कऽ चलियो जाएब।” जोशपर तँ घोघरडीहा स्टेशन विदाह भेला मुदा रास्तामे एहेन स्थिति भऽ गेलनि। जे ने बाट सुझन्हि आ ने डेगे उठनि। ओइ समए चारि बजे गाड़ी निरमलीसँ अबैत रहै। संजोग नीक बैसलनि। गाड़ी पकड़ा गेलनि। सात बजे साँझमे गाम (बेरमा) पहुँचलाह। एक तँ भरि दिनक थाकल तइपर बोखार, गाम अबिते बोम फाड़ि ओहिना कानए लगलाह जेना माए-बापक सोजहाँमे बेटा-बेटी कनैए। अपन पोसलक दशा देखि मामी (जगदीश प्रसाद मण्डल जीक माए) ऐ रूपे कानए लगलीह (डाक स्वरमे) जना भागिन नै बँचतनि। ताधरि दुनू भाँइक बिआह-दुरागमन भऽ गेल रहनि। दुनू दियादिनीयो बेरमेमे। ले बलैया जहिना साँझू पहर एकटा नढ़िया कोनो झारीसँ निकलि पू-पहैत आकि जहाँ-तहाँसँ नढ़िया भूकए लगैत। ततबे नै, पास-पड़ोसक नढ़िया सभ समटा-समटा एकठाम भऽ समवैत स्वरमे भुकए लगैए। किअए ने भूकत? डरे जे भरि दिन झाड़ी धेने रहैए, ओकरा तँ अन्हारे ने संगी हेतइ। जहिना चोर दुनू रंगक होइए दिनुको आ रौतुको, तहिना ने नढ़ियोकेँ चरौर करैक समए भेटै छै। तहिना मामीकेँ कनिते दुनू दियादिनी सेहो झौहरि करए लगली। झौहरि सुनि एके-दुइये टोलक लोक ससरि-ससरि आबए लगली। गोनर भैयाकेँ बिनु देखनौं लोक आँखि मीड़ि-मीड़ि कियो ठुनकए लगली तँ कियो पोथी-पतरा उनटाबए लगलीह। पाँच दिन पहिने भदबा बीत चुकल छल मुदा एकटा बुढ़ीकेँ, अंतिम दिन भदबाक पता लगलनि। ओ ओही दिनसँ जोड़ैत जे आइ छठम दिनक भदबा छी। बजली- “केना पहिले-पहिल डेग भदबामे उठौलक। जानि कऽ आगिमे पाकए जाएब तँ जरब नै।” जइठाम सभ कननिहारे जमा भऽ जाएत तइठाम चुप के करत। खैर जे हौ....। मास दिनक पछाति ओ (गोनर) काज-उदेम करैबला भेलाह। अगहनक कटनी बजरि गेल रहै। तहूमे १९५७ ई.मे सेहो नमहर बाढ़ि आएल रहै। कहैले तँ बाढ़ि दहारक कारण छी मुदा उपजोक कारण छी। ई िनर्भर करैत गाम-गामक जमीनक बुनाबटिपर। कोनो गाममे गहींर खेत बेसी अछि जइमे जँ शुरूहोमे दूटा नमहर बरखा भऽ जाएत तँ पानि पकड़ि लैत आ एहनो ऊँचगर गाम सभ अछि (बहुआहा गाम) जइमे जतबे काल बरखा भेल ततबे काल पानि रहल, बाकी बरखो गेल पानियो गेल। गाम सुखल कऽ सुखले रहि गेल। ओहन गामक लेल बाढ़ि खेलौना छी, तँए जँ छहरो-बान्ह काटि कऽ खेल-खेलल जाए तँ की हर्ज जे एहेन खेल नै हुअए। दुश्मन सिपाही हाथे घेराएल सिपाही जकाँ परिवार घेरा गेल रहए। एक तँ १९५८ ई.क बाढ़िसँ परिवार धँसि गेल रहए। किअए ने धँसैत। एक बाढ़ि वा रौदी, कृषि आधारित परिवारकेँ पाँच साल धक्का मारैत अछि। शुरूहे फागुनमे दुनू भाँइ (पिसियौत) एकटा बाँस, खेबा-खरचाक संग हरिनाही गेला। बाँसक खुट्टापर मनेजरक कोरो-बातीक घर ठाढ़ कऽ काशसँ छाड़ि लेलनि। रहैक ठौर होइते अपन पोखरिबला जमीनकेँ साफ कऽ ताम-कोर करए लगलाह। खट्ठा पटेर-झौआक बोन। जहिना बादमे वियतनामक लोक एक-एक इंच भूमि, जे बम-बारूदमे नष्ट भऽ चुकल छल, खेती योग्य बनौलनि। तहिना हरिनाहीक लोक गामक बोन उजाड़ए लगलाह। बोन एहेन जे दस धुर तमनिहार अपनाकेँ मेहनती बुझैत। दुनू भाँइ बोनो तोड़थि आ गाम (बेरमा) आबि-आबि खरचो लऽ जाथि। छह मासक बाद पहिल उपजा हाथ लगलनि। ढेनुआर गाए जकाँ एक संग जली (धान), मकइ, काउन इत्यादि हाथ लगलनि। परिवारक काज बढ़लनि। खेतीक लेल एकटा बड़द सेहो कीनि कऽ लऽ गेलाह। परिवारक एकटा रूप रेखा तैयार भऽ गेलनि। अखन धरि हरिनाही गाममे बीस परिवार बसि चुकल छलाह। तीनटा चापाकल सेहो गरि चुकल छल। पानिक सुविधा से भऽ गेल छलै। बीस फीट पाइप, छह फीट फील्टरमे भऽ जाइ। नगदी फसल पटुआक खेती शुरू भेल। तीस-पेंतीस बीधा जमीन उपजाउक हरिनाही गाम बनि गेल। १९६२ ई.मे कारी मण्डल (जगदीश प्रसाद मण्डल जीक छोट पिसियौत भाए) बीमार पड़लाह। नीक बीमार। इलाजक कोनो सुविधा हरिनाहीमे नै। तइ समैमे दरभंगा जिलाक झगडुआ गामक एक गोटे बेरमेमे डॉक्टरी करैत छलाह। मुसलमान छलाह। मनसारा मात्रिक। मनसारा-झगड़ुआ सटले दुनू गाम। जइसँ हिनका सभक मामा-भगिनाक संबंध ओइ डाॅक्टर सहाएबक संग बनल छलन्हि। ओना ओ रहै छला मुसलमान टोलमे, मुदा मात्रिकक अनेसँ बेसी काल अहीठाम रहै छलाह। हुनका माए कहलकनि जे भैया, भागिन बड़ दुखित अछि। ओ जाइले तैयार भऽ गेलाह। ओइ समए बेरमामे दूटा वैद्य छलाह। पहिल सुन्दर ठाकुर आ दोसर छलाह नीरस महतो। सुन्दर ठाकुर पंडित छलाह। आचार्य छलाह। मुदा शरीरसँ अबाह (नांगर) छलाह आ थोड़ेक बोली तोतराइ छलनि। मुदा ओ जिनगीकेँ एते लगसँ देखै छेलखिन जे परिवारसँ किछु हटि अपन आश्रम बनौने छलाह। औषधालय नाम छलैक। खेत-पथारबला परिवार रहने औषधालय अइल-फइलसँ बनौने छलाह। औषधालयक आंगनमे सइयो रंगक जड़ी-बूटी सभ लगौने छलाह। निअमबद्ध जिनगी छलनि। ओना निअम भंग सेहो होइत छलनि। निअम भंगक कारण रहनि वैदागरी करब। वैदागरी (डॉक्टरी) ओहन पेशा छी जे जिनगीक अंतिम घाट धरि बसैत अछि। तँए कखन कोन घाटक यात्री चलि आओत तेकर ठेकान नै। मुदा वैद्यजी मे किछु कर्मक प्रति मजगुतियो रहनि। मजगूती ई रहनि जखन ओ पूजा करए लगथि तखन कियो हुनका टोकि नै पबैत। तइले ओ एकटा ओगरबाह रखै छलाह। मुदा मनमे ई कचोट रहबे करनि जे जइले पूजा करै छी जँ ओ देवता आगूमे चलि आबथि तखन की करब? मुदा किछुए दिनक पछाति रूटिंग बदलि लेलनि। चौबीस घंटाक गाड़ीमे लोक अपना-अपना ढंगसँ रूटिंग (काजक हिसाबे) बना लैत अछि। तहिना ओहो दिनक पूजा करब छोड़ि रातिमे करए लगलाह। जइसँ सभकेँ बराबरे लाभ हुअए लगलनि। जिनगियो नमहर बनौने छलाह, अठबारे घोड़ापर चढ़ि आन-आन गामक वैद्य सभ ऐठाम जाइ छलाह, हिनको ऐठाम अबै छलनि। जइसँ वैचारिक संबंधसँ लऽ कऽ बेवहारिक (जड़ी-बूटीक गाछ लगबैक संबंधसँ लऽ कऽ दवाइ बनबैक ढंग धरि) संबंध मजगूत छलनि। दोसर वैद्य छलाह नीरस महतो। पं. सुन्दर ठाकुर जकाँ पढ़ल-लिखल नै मुदा मनुक्खोक तँ अजीव बुनाबटि अछि। कियो कओलेजसँ पढ़ि डाॅक्टर-इंजीनियर बनैत छथि तँ कियो गामे-घरमे घूमि-फिरि बनि जाइत छथि। तहिना ओहन रामायण आ महाभारत पढ़निहार (गाबि कऽ पढ़निहार) कतेको छथि जिनका अपन नाओं-गाओं लिखए नै अबैत छन्हि। माटिसँ उपजल वैद्य नीरस महतो छलाह। गाममे दुनू गोटेक इलाज चलैत छलनि। मुदा एलोपैथी दवाइक आगमन गाममे सेहो भऽ चुकल छल। जइसँ बेरमाक बगलक गामक टूनीबाबू आ बुचकुन बाबूक आबा-जाही सेहो भऽ गेल छलनि। झगड़ुआबला डाॅक्टर करीब पनरह बर्ख बेरमामे रहलाह। ओना हुनकर नाओं अखनो नै ककरो बूझल छै। तेकर कारण छै जे सभ ममे कहै छलन्हि आ ओहो भगिने कहै छलखिन्ह। जगदीश प्रसाद मण्डलक माइयो भइये कहनि आ ओहो बहीनिये कहथिन। टोलक (मुसलमान) लोक डाॅक्टर सहाएब कहनि तँ किछु टोलक लोक मोलबी सहाएब कहनि। ओना ओ नवाजी सेहो छलाह। किछु टोलक लोक मोलबी सहाएब डाॅक्टर कहनि तँए हुनकर असल नाउँए हरा गेल रहनि। जगदीश प्रसाद मण्डलक जेठ भाय (कुलकुल मण्डल) माए आ मामा (डॉक्टर) तीनू गोटे तमुरियामे गाड़ी पकड़ि घोघडीहा बान्ह (कोसी) तक तँ उत्साहसँ गेला, मुदा बान्हपरसँ जे देखलनि तँ माइयो आ भैयोक मन डरि गेलनि। आगू डेग बढ़बैक हिआउए ने होन्हि। बान्हक बगलेमे नमहर धार। जेकर पानि काफी तेज गतिमे चलैत। मामा बूझि गेलखिन। ओ धैर्य बढ़बैत कहलखिन- “बहिन, ई कोन धार छिऐ, ऐसँ नमहर-नमहर धारमे नाव चलबै छी आ हेलबो करै छी। केहन बढ़िया नाव छै। जहिना सभ पार करत तहिना हमहूँ सभ पार करब।” तइ बीच एक गोटे हरिनाहियेक भेट गेलनि। बान्हेपर पूछ-आछसँ भाँज लागि गेलनि। शहर-बाजारमे बिना मतलबे किछु पूछब नीक नै होइ छै मुदा धारक इलाका, बोनक इलाका, मरूभूमिक इलाकामे ओहन नीक होइ छै जे संगी भेट जाइ छै। तीनू गोटे हरिनाही पहुँचलाह। डॉक्टरक नाओं सुनिते आनो-आन परिवारक लोक जमा भऽ गेल। पहुँचते सूइया-दवाइ चालू केलनि। कारी मण्डलक इलाज शुरू भेल। चाहक नीक अभ्यासी डॉक्टर सहाएब। ओना चाहे टा अमलो रहनि। गाममे चाहक दोकानक कोन बात जे चाहपत्ती चिनियोक दोकान नै। बेरमासँ जखन विदा भेला वा घोघडीहामे जखन गाड़ीसँ उतरलाह तैयो नै मन पड़लनि। मनो केना पड़ितनि? बिनु देखल जगह केहेन अछि केहेन नै तइ दिस नजरि किअए पड़ितनि। पहिल दिन तँ कहुना खेपि गेलाह मुदा दोसर दिन तबाही हुअए लगलनि। बिनु चाह पीने मने भङठि गेलनि। इमहर माइयो आ भैयोकेँ बूझि पड़नि जे कतए आबि गेलौं। पहिल दिनक इलाजसँ हुनका (कारी मण्डल) मे किछु सुधार भेलनि। मामाकेँ (डॉक्टर सहाएब) एक दिस चाहक झपनी धेने रहनि तँ दोसर दिस रोगक इलाजसँ मनमे खुशियो उपकैत रहनि। अखन धरि गाममे गोर दसेक महिसो-गाए भऽ गेल छलै। सहरसा जिला (अखन सुपौल) आ मधुबनी जिलाक सीमाक कातमे हरिनाहियो आ हरड़ियो बसल अछि। बीचमे एकटा मरने धार, जे हरिनाहियो आ जएह धार दुनू गामकेँ उपटौने छल। भैयाक घर (गोनर मण्डलक) गाममे सभसँ पछिम। किएक तँ जहिना बजार आगू मुँहे कऽकऽ घुसकैत चलैए तहिना ने नव गामो चलैए। पूवे-पच्छिमे गाम, ओना ओ सूर्यमंडल गाम भेल। जे बासक हिसाबसँ (पहिलुका) नीक नै भेल, किएक तँ आगि-छाय आ हवा-बिहारिक दृष्टिसँ उजार बेसी हएत। धारक भीता-काते-काते जहिना पच्छिम तहिना पूब। जगदीश प्रसाद मण्डलक अपन दियाद चुल्हाइ मण्डल कहलखिन जे सभ दियाद लगाइये कऽ घर बान्हब। पछबारि भाग हुनकर घर तँए जगदीश प्रसाद मण्डलक भैयो पच्छिमे दिस घर बन्हलनि। ओइ समए सभसँ पच्छिम घर रहनि मुदा अखन ओइसँ बहुत पच्छिम तक गाम बढ़ि गेल अछि। दिनक करीब तीन बजे, हरिनाहियोक महींस आ हरड़ियोक पछबारि टोल (जइ टोल परक हेमलताजी छथि।) जे फुलपरासक पूर्व विधायक रहि चुकल छथि।) हरिनाही बीस-पच्चीस घरक गाम आ हरड़ी तीन टोलमे बँटल। जे थोड़े हटि-हटि कऽ बसल। धारेक पेट आ किनछरिमे दुनू गामक महींस सभ चरैत रहै, कि नै आकि चरबाहा सभमे झगड़ा शुरू भेलै। दुनू गाम लगे-लगे। हँसेरा-हँसेरी भऽ गेल। खूब नमहर मारि (लाठी-लठौबलि) भेल। कते गोटेकेँ कपार फुटल, हाथ-पएर टुटल। दू जातिक दुनू टोल, खूब मनसँ मारि भेल। कम घर रहितो हरिनाहीक किछु परिवार सिंहेश्वर स्थान दिससँ आबि बसल रहए, तीनटा सेसर खलीफा रहए, तँए मारि बेसी हरड़ीबला खेलक। मुदा केश-फौदारी नै भेल। तेकर कारणो रहै जे एम्हर फुलपरासकेँ थाना चारि धार टपि आबए पड़ैत तँ ओम्हर सुपौल सन्मुख कोसीक कते छाँट-छुँट पार करए पड़ैत। गोनर मण्डलक घरसँ करीब पाँच बीघा पच्छिम मारि भेल। मरदा-मरदी तँ मारि करए गेल रहथि मुदा स्त्रीगण आ बच्चा सभ तमाशा देखलक। बेरमोक तीनू गोटे- डाँक्टरो सहराएब माइयो आ भैयो मारि देखलनि। मारि देखि तीनू भयभीत भऽ जाइ गेलाह। तीनूक पाछू अपन-अपन कारण रहनि। डाॅक्टर सहाएब थाना-कचहरी जनैत रहथि तँए भयभीत रहथि। अंदाज रहनि जे जखने थाना औत तखने मारि केनिहार गाम छोड़ि देत। मुदा जगदीश प्रसाद मण्डलक.....। तहिना जगदीश प्रसाद मण्डलक माए आ भायकेँ सेहो बेरमाक १९५६-५७ ई.क पुलिसक दौड़ देखल रहनि। साँझू पहर सभ विचार केलनि जे काल्हि भारे ऐठामसँ मरीज (कारी मण्डल) केँ लेने गाम (बेरमा) चलि जाएब। सहए केलनि। अपना ऐठाम (बेरमामे) तीनटा महींस आ दूटा बड़द खूँटापर रहैत छलन्हि। समांग घटने महींस तीनसँ एक भऽ गेल। बड़द बिना बनैबला नै। चारि-पान साल पहिनहि १९५६-५७ ई.मे भाय मिड्ल स्कूल छोड़ि अमानत (अमीनी) मे नाओं लिखा लेलनि छबे मासक पढ़ाइ। मुजफ्फरपुरसँ एकटा शिक्षक (अमीन) आबि गाममे स्कूल चलौने रहथि। जइमे पहिने दस गोटे नाओं लिखौलनि। मुदा किछु दिन पछाति आबि छह गोटे छोड़ि देलनि। चारि गोटे अन्तो-अन्त पढ़ि अमीन बनलाह। अखन धरि जगदीश प्रसाद मण्डल महींस पाछू तँ नीक जकाँ नै पड़ल रहथि मुदा भाय सबहक संगे चरबए जाइत रह्थि। समांग घटने भारे पड़़ि गेलन्हि। परिवारक आमदनी रहन्हि। पिसिऔत भाइक परिवार गेने (हरिनाही गेने) परिवार कमलन्हि। जइसँ परिवारक काजो घटलन्हि। अखन तक माए घरसँ निकलि खेत-पथार नै जाइत छलन्हि, सेहो जाए लगलीह। जगदीश प्रसाद मण्डलक भैयाकेँ (गोनर मण्डल) जे जमीन देल गेल रहनि ओ बेचि कऽ लऽ गेला। जइसँ खेतो कमलन्हि। उपजो कमलन्हि। मुदा चारिम पीढ़ीमे आइयो ओइ परिवारक संग ओहने संबंध बनल छन्हि जहिना पहिने छलन्हि। अखनो उमेश मण्डल (पुत्र) संग जे संजय रहैए ओ पिसिऔते भाइक पोता छियनि। हाइये स्कूलमे रहथि तखन दुरागमन भेलन्हि। बिआह पहिनहि भऽ चूकल छलन्हि। पिसिऔत भायकेँ गेलासँ परिवारे नै कमलन्हि, घरक कारोबार कमि गेलन्हि। परिवारक भीतर अन्दरूनी विवादक जन्म सेहो भेल। जगदीश प्रसाद मण्डलक पढ़ब विवादक कारण मूलमे छल। जेकर दूटा सिर (स्रोत) छलै। पहिल भाय सहाएबक आ दोसर समाजक हित-अपेछितक। खुल्लम-खुल्ला तँ परिवारमे नै छल मुदा भाय सहाएबक क्रिया-कलाप बदलए लगलनि। जइसँ घरक काज छोड़ि भरि दिन नाचक पाछू पड़ि गेला। सासुरोमे नाच पार्टी चलनि। १९६७ ई.क चुनाव आएल। जगदीश प्रसाद मण्डलो कम्युनिस्ट पार्टीक सदस्य बनि गेल रहथि। चुनावमे जिला भरिक बूथपर खूब धाँधली भेल। ओना जहिना खूब धाँधली भेल तहिना गामे-गाम मारियो-पीट खूब भेल। केश-मोकदमा खूब बढ़ल। जहलक आबा-जाही सेहो बढ़ल। केश-मोकदमा भेने कोट-कचहरीक काज बढ़ल। राज्यमे (बिहार) सत्तरहे टा जिला छलै। ओइमे बढ़ोत्तरीक संभावना बढ़ल। सवडिवीजन, ब्लौक इत्यादि सभमे बढ़ोत्तरीक संभावना बढ़ल। १९६७ ई.क चुनावमे (अखुनका मधुबनी जिला, तइ समए अनुमंडले छल) कम्युनिस्ट पार्टीक एम.पी. भोगेन्द्र जी (भोगेन्द्र झा) भेलाह। दूटा पार्लियामेंट सीटमे एकटा कम्युनिस्ट पार्टीकेँ आ एकटा सोशलिस्ट पार्टी (शिवचन्द्र झा) केँ भेल। ओना जिलासँ काँग्रेस जहिना पार्लियामेंटसँ हारल तहिना विधान सभामे सेहो हारल। कम्युनिस्ट पाटीकेँ चारिटा एम.एल.ए. आ एकटा एम.पीक सीट भेटल। राज्यक सरकार बदलि गेल मुदा देशक (दिल्लीक) सरकार नै बदलल। मुदा विरोधी दलक सदस्य बढ़ल। जइ-जइ राज्यमे काँग्रेसी सरकार टुटल ओइ-ओइ राज्यमे विरोधीक सरकार बनल। मुदा एकछाहा कतौ ने बनल। खिचड़ी सरकार बनल। काँग्रेस पार्टीसँ एक ग्रुप टूटि जनक्रान्ति दल बिहारमे बनौने छल। जेकर नेतृत्व माहामाया बाबू करैत छलाह। मुख्यमंत्री बनलाह। अखन भ्रष्टाचार मुख्य समस्या बनि गेल अछि। मुदा ओहू समैमे चोरनुकबा खूब रहए। चाहे जे कोनो विभाग रहै भ्रष्टाचारसँ आक्रान्त छल। माहामाया बाबूक सरकार पछिला काँग्रेसी मंत्रीक विरोधमे सुप्रीम कोर्टक जजक नेतृत्वमे जाँच आयोग बनौलक। अय्यर आयोग नाओं पड़ल। बैद्यनाथ राम अय्यर सुप्रीम कोर्टक जज छलाह। दक्षिणक छथि। करीब पनचानबे-छियानबे बर्खक छथि। जीविते छथि। पूर्व बिहार सरकारक छहटा मंत्रीक विरूद्ध अपन जाँच रिपोर्ट दऽ देलखिन। करोड़ोक लूट सावित कऽ देने रहथिन। १९६६ ई.मे बिहार रौदीक चपेटिमे आबि गेल। ओना पहिल बर्ख रहने ओते बुझियो नै पड़लै। जँ बूझि पड़ितै तँ १९६७ ई.क चुनावी मुद्दा बनैत से नै बनल। मुदा सरकार बनला उत्तर दोसर बर्ख खूब बूझि पड़ए लगलै। भुखमरी हुअए लगल। सरकारक सोझा जबर्दस्त सबाल उठि कऽ ठाढ़ भेल। जमाखोर सबहक विरोधमे अभियान चलबैक िनर्णए भेल। मुदा तेहेन नाटक ठाढ़ भऽ गेल जे अभियान मजाक बनि गेल। नाटक ई भेल जे दस बीसटा ओहन सभ पकडाए लगल जेकर कारोबार (अन्नक कारोबार) घोड़ा-घोड़ीपर चलैत रहए। मुदा सोलहन्नी सएह नै भेल, किछु एहनो जमाखोर पकड़ाएल जेकरा गोदाममे लाखो क्वीन्टल अनाज रहए। पार्लियामेंटक शपथ ग्रहण केला पछाति भोगेन्द्र जी जखन मधुबनी घुमलाह तँ सकरीमे पहिल आम सभा केलनि। एक तँ नव सदस्य रहने दोसर अपन पार्टीक रहने करीब पनरह-बीस गाम (बेरमा) सँ सभामे भाग लिअ गेलथि। गाड़ीक सुविधा रहबे करन्हि। तहूमे लाल झंडाबला सभ दिल्ली तक प्रदर्शन करिते छल। ओना भोगेन्द्र जीक भाषणक गुण रहलनि जे ओ पहिने बाजि दइ छलखिन जे जिनका जे प्रश्न पुछैक हुअए ओ पूछि दिअ। जबाब देब हुनका भाषणक मूल बिन्दु छलनि। भाषणो नमहर करैत छलाह। समए भेटलापर तीन-तीन, चरि-चरि घंटा बजिते रहि जाइत छलाह। ओइ समए िनर्मलीसँ समस्तीपुर एकटा गाड़ी चलैत रहए। बड़ी लाइनक कतौ पता नै। मुदा कम्युनिस्ट पार्टीक लड़ाइक एकटा मुद्दा ईहो रहए। कखनो उग्र तँ कखनो धीमी गतिसँ चलिते रहए। ओना पूबोसँ आ पच्छिमोसँ अबैबला गाड़ीक मेल सकरियेमे रहै मुदा से नै भेलै। ककरघटीमे मेल भेने पछबरिया गाड़ी पछुआ गेल। स्टेशनसँ थोड़बे हटि कऽ दछिनबारि भाग सभाक आयोजन भेल। जगदीश प्रसाद मण्डल- एकटा बायोग्राफी...गजेन्द्र ठाकुर द्वारा (अनुवर्तते...) ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। गजेन्द्र ठाकुर ggajendra@videha.com http://www.maithililekhaksangh.com/2010/07/blog-post_3709.html २.गद्य २.१.१.मुन्नाजी:बाल गजलः पुरान देहक नव चेहरा २.ओमप्रकाश झा: मैथिली बाल गजलक अवधारणा ३.जगदानन्द झा 'मनु' -बाल गजलक अवधारणा ४.आशीष अनचिन्हार- की थिक बाल गजल ५.चंदन कुमार झा- मैथिली बाल-साहित्य आ' बाल-गजल २.२.१.योगेन्द्र पाठक ‘वियोगी’- लघुकथा- देववाणी २.नवेंदु कुमार झा- बिजलीक क्षेत्र मे आत्म निर्भरताक लेल सरकार कऽ रहल प्रयास २.३.१.अमित मिश्र- बाल गजल: कोमल करेजक आखर २.मिहिर झा- बाल गजल २.४.श्री राज- यात्रीक कवितामे गाम २.५.मुन्नाजी-विहनि कथा संसार २.६.आशीष अनचिन्हार द्वारा श्री जगदीश प्रसाद मण्डलजीसँ लेल साक्षात्कार २.७.१. राजदेव मण्डल- जगदीश प्रसाद मण्डलक कविता संग्रह राति-दिनक समीक्षा २.डॉ. धनाकर ठाकुर- समीक्षा – फूल तितली आ तुलबुल (लेखक -श्री सियाराम झा 'सरस') २.८.१.जवाहर लाल काश्यप- विहनि कथा- जमाना बदलि गेलै २.जगदानन्द झा 'मनु'- विहनि कथा- मसोमात/ रहस्य ३.सुजीत कुमार झा- मिथिला पेन्टिङ्गक विदेशमे मांग बढल -छत्तामे मिथिला पेन्टिड्ड४.श्री जगदीश प्रसाद मण्डल- लघुकथा-सूदि भरना १.मुन्नाजी:बाल गजलः पुरान देहक नव चेहरा २.ओमप्रकाश झा: मैथिली बाल गजलक अवधारणा ३.जगदानन्द झा 'मनु' -बाल गजलक अवधारणा ४.आशीष अनचिन्हार- की थिक बाल गजल ५.चंदन कुमार झा- मैथिली बाल-साहित्य आ' बाल-गजल १. मुन्नाजी बाल गजलः पुरान देहक नव चेहरा घड़ीक पेण्डुलम सन झुलैत जिनगीमे स्थिरता भागल फिरैए। ने देह स्थिर आ ने चित्त। केखनो क' तँ अपनो ठर-ठेकान हेराएल सन लगैए लोककेँ। जँ चिन्तनशील भ' ताकब तँ ठकाएल सन अनुभव हएत। एहन स्थितिमे कोनो नव सोच वा नव अवधारणाकेँ घीचा-तीरीमे फँसि जेबाक आशंका घेरि लैए। मुदा रक्षात्मको भ' वएह नव अवधारणा, नव प्रयोग,नव रचना साहित्यकेँ जिया क' रखबाक क्षमता देखबैए। पद्य विधाक एकटा रूप गजल अपन आ समाजक सौन्दर्यबोध करबैए। हासिक, रसिक भ' प्रेममे ओझरा उब-डुब करैत अपन बाट पर ससरल जाइत देखाइए। गजलक बढ़ैत लोकप्रियता आब अपन विस्तार तकैए। आब गजल सभ भावमे चतरल-पसरल जा रहल अछि। ऐ बीच चर्चित युवा गजलकार आशीष अनचिन्हार जी गजलक क्षेत्रमे एकटा नव अवधारणा रखलन्हि। साहित्य अकादेमी आ मैलोरंगक संयुक्त तत्वावधानमे भेल कथा गोष्ठी २४ मार्च २०१२केँ अनचिन्हार जी बाल गजलक अवधारणाकेँ स्पष्ट करैत कहलन्हि "जेना गद्य विधा वा अन्य विधामे बाल साहित्य लिखल जाइत अछि तहिना गजलमे सेहो बाल मनोविज्ञान पर आधारित बाल गजल लिखल जाए"।२४ मार्च २०१२ के प्रस्तुत कएल गेल बाल गजलक परिकल्पनाक विधिवत् घोषणा अनचिन्हार आखर आ विदेहक फेसबुक वर्सन पर २७ मार्च २०१२केँ होइते बहुत रास परिपक्व बाल गजल सभ सोंझा आएल। घोषणा होइते ऐ विधाक पहिल रचनाकार भेलाह आशुतोष मिश्रा जे की नेपालसँ छथि मुदा यदा-कदा लिखैत छथि। दोसर स्थान पर भेलाह जगदानंद झा मनु आ तकरा बाद तँ अमित मिश्रा, रुबी झा, नवल श्री पंकज, चंदन झा, मिहिर झा, मुन्ना जी आ आन गजलकार सभहँक बाल गजलक प्रकाशनक क्रम बनि गेल। आ ऐँ तरहेँ ऐ अवधारणाक प्रथमे चरण ठोस भ' सोंझा आएल , जाहिसँ एकर मजगूत भविष्यक आकलन कएल जा सकैए। संगे एकर पूर्ण संभावना सेहो जागल देखाइए। अनचिन्हार आखर द्वारा बाल गजलक महत्वकेँ देखैत " गजल कमला-कोसी-बागमती-महानंदा सम्मान" अलगसँ देबाक घोषणा सेहो कएल गेल। आ ई मार्च माससँ प्रभावी मानल गेल। आ श्रीमती प्रिती ठाकुर जीकेँ मुख्यचयनकर्ती बनाएल गेल। एखन धरि जून मास धरिक प्रारंभिक चरणक चयन भेल अछि जे एना अछि----------------- १) मार्च लेल श्री मती रूबी झा जीकेँ चूनल गेल। २) अप्रैल लेल नवलश्री पंकज जीकेँ चूनल गेल। ३) मइ लेल अमित मिश्रा जीकेँ चूनल गेल। ४) जून लेल चंदन झा जीकेँ चूनल गेल। संप्रति विदेह द्वारा प्रस्तुत बाल गजल विशेषांक एकर आधारकेँ मजगूत करबाक दिशामे एकटा सशक्त प्रयास अछि जाहिसँ एकर विकासक संभावना अक्षुण्ण रहए। २. ओमप्रकाश झा मैथिली बाल गजलक अवधारणा जेना कि नाम सँ स्पष्ट अछि, बाल गजल माने भेल नेना-भुटकाक लेल गजल। बाल गजलक अवधारणा मैथिली मे एकदम नब अछि आ पहिल बेर २४ मार्च २०१२ केँ श्री आशीष अनचिन्हार ऐ अवधारणा केँ सामने आनलथि। बहुत अल्प समय मे बाल गजल बहुत प्रसिद्धि पओलक आ बाल गजल कहनिहार गजलकार सभक एकटा विशाल पाँति ठाढ भऽ गेल। ऐ मे सर्वश्री गजेन्द्र ठाकुर आ आशीष अनचिन्हार जकाँ स्थापित गजलकार तँ छथि, एकर अलावे नब गजलकार सब सेहो बाल गजल कहबा मे विशेष अभिरूचि देखौलन्हि। बाल गजल कहनिहार नब गजलकार सभ मे सर्वश्री मिहिर झा, मुन्ना जी, इरा मल्लिक, अमित मिश्रा, चन्दन झा, पंकज चौधरी 'नवलश्री', राजीव रंजन झा, जगदानंद झा 'मनु', रूबी झा, प्रशांत मैथिल आदि अनेको गजलकार छथि। "अनचिन्हार आखर", जे मैथिली गजलक एकमात्र ब्लाग अछि, देखला पर पता लागैत अछि जे बाल गजलक अवधारणा अयलाक बाद सँ एखन धरि(ई आलेख लिखबा तक) ७३(तिहत्तरि) टा बाल गजल ऐ ब्लाग पर पोस्ट भऽ चुकल अछि, जे अपने आप मे एकटा कीर्तिमान अछि। खास कऽ एतेक कम समय मे एतेक पोस्ट आएब बाल गजलक लोकप्रियताक खिस्सा कहि रहल अछि। बाल गजलक विधा एकटा स्वतन्त्र विधा बनबाक बाट मे अग्रसर अछि, जे एतेक कम समय मे एतेक संख्या मे बाल गजल कहनिहार गजलकार आ बाल गजलक संख्या सँ स्पष्ट अछि। संगहि किछु लोक केँ मिरचाई सेहो लागब शुरू अछि आ ओ लोकनि बाल गजलक सम्पूर्ण अवधारणा केँ नकारबाक कुत्सित असफल प्रयास मे जत्र कुत्र अंट शंट पोस्ट देबऽ लागलाह। ई गप आर स्पष्ट करैत अछि जे बाल गजलक विधा मजबूती सँ स्थापित भऽ रहल अछि। कियाक तँ सफल व्यक्ति आ विधा सभक आकर्षणक केन्द्र बनैत अछि आ बाल गजल सेहो सभक आकर्षणक केन्द्र बनि चुकल अछि, चाहे ओ गजलकार होईथि, पाठक होईथि, आलोचक होईथि वा जरनिहार लोक सभ होईथि। जखन मैथिलि गजलक चर्च भऽ रहल अछि, तखन श्री आशीष अनचिन्हारक चर्चा स्वभाविक अछि। मैथिली गजलक विकास मे हुनकर योगदान हुनकर धुर विरोधी लोकनि सेहो मानैत छथिन्ह। मैथिली बाल गजलक अवधारणा लेल श्री आशीष अनचिन्हार मैथिली साहित्य मे अपन अनुपम स्थान बना चुकल छथि। बाल गजलक अवधारणा सेहो हुनके छैन्हि, जे बहुत सफल भेल अछि। आब किछु गप करी मैथिली बाल गजलक रचना सभक संबंध मे। हमरा विचार सँ बाल गजल नेना भुटकाक लेल रूचिगर तँ हेबाके चाही, संगहि ऐ मे कोनो स्पष्ट सामाजिक सनेस होइ तँ ई सोन मे सोहाग जकाँ हएत। ओना तँ सभ बाल गजल कहनिहार गजलकार सभ ऐ मे सक्षम छथि आ नीक सँ नीक बाल गजल लिख रहल छथि, मुदा ऐ सन्दर्भ मे हम श्री गजेन्द्र ठाकुरजीक बाल गजलक उल्लेख करब उचित बूझि रहल छी। हुनकर एकटा बाल गजलक मतला अछिः- कनियाँ पुतरा छोड़ू आनू बार्बी जँ रंग गुलाबी छै तँ जानू बार्बी ऐ गजल केँ पूरा पढि कऽ कने देखियौ। ई गजल कनिया पुतराक उल्लेख करैत नेना-भुटकाक मनोरंजन तँ करिते अछि, संगहि अजुका बाजारवादक बलिवेदी पर कुर्बान भेल मनुक्खक मार्मिक विवेचना सेहो करैत अछि। एहन आरो कतेको बाल गजल सभ "अनचिन्हार आखर" पर भेंटैत अछि, जकरा ऐ ब्लाग पर पढल जा सकैत अछि। ई गजलकार सभक सामाजिक संवेदना केँ प्रकट करैत अछि आ हम ऐ लेल सभ गजलकार केँ साधुवाद दैत छियैन्हि। हम एहने बाल गजलक आस गजलकार सभ सँ लगओने छी। कियाक तँ गजलकारक सामाजिक दायित्व सेहो छै, जे पूरा हेबाक चाही। आधुनिक मैथिली गजलकार सब मे ई क्षमता अछि आ ओ दिन दूर नै अछि जखन एक सँ एक सुन्नर आ बालोपयोगीक संगे सामाजिक समस्या पर बाल गजलक भरमार हएत। व्याकरणक हिसाबेँ मैथिली बाल गजल नीक बाट धएने अछि। अनचिन्हार आखरक टीमक परिश्रमक कारणेँ मैथिली मे बहरयुक्त गजलक काल शुरू भऽ चुकल अछि आ सरल वार्णिक बहर(जकर अवधारणा श्री गजेन्द्र ठाकुरजी देलखिन्ह) केर अलावे आब अरबी बहर मे गजल कहनिहार गजलकारक कमी नै छै। बाल गजल अपन शुरूआते सँ बहरयुक्त अछि, जे बाल गजलक लेल शुभ संकेत अछि। शुरूआतिए समय मे जे आ जतबा बाल गजल लिखल गेल अछि, ओ सभ बहर मे अछि, चाहे सरल वार्णिक बहर होइ वा अरबी बहर। बहरक अलावे रदीफ आ काफियाक नियमक पालन सेहो पूरा पूरा भऽ रहल अछि। व्याकरण पालनक ई प्रतिबद्धता निश्चित रूपे बाल गजलक सफलताक गाथा लिखबा मे सहायक हएत। मैथिली गजलक बढैत डेग संग आब मैथिली बाल गजलक डेग सेहो उठि गेल अछि। मैथिली बाल गजल जाहि द्रुत गति सँ अपन डेग उठओलक अछि, ऐ सँ तँ यैह लागैत अछि जे अगिला साल आबैत आबैत मैथिली बाल गजलक पोथी प्रकाशित भऽ सकैत अछि। संगहि इसकूलक पाठ्यक्रम मे बाल गजल सम्मिलित हेबाक संभावना सेहो साकार रूप लऽ सकत। पाठ्यक्रम मे सम्मिलित हेबाक बाद मैथिली बाल गजल सभ पढनिहार-पढौनिहारक संज्ञान मे नीक जकाँ आओत आ सामाजिक विकासक संरचना मे अपन महत्वपूर्ण योगदान, जे अपेक्षित अछि, सेहो दऽ सकत। ३. जगदानन्द झा 'मनु' ग्राम पोस्ट- हरिपुर डीह्टोंल, मधुबनी बाल गजलक अवधारणा बाल गजलक अवधारणा कोनो बेसी पुरान नहि अछि | आँखिक देखले- देखले चारि महिना भेल होएत | मुदा जेना कहल जाई छैक, कोनो कार्यक अथबा अबधारनाक सुरुवात कतौ नहि कतौ सँ होएते छैक | आ हम सब एखुनका समकालीन गजलकार (विशेष कए विदेह आ अनचिन्हार आखर सँ जुरल ) शोभाग्यशाली छी जे एहि महान घटनाक्रम केँ परोक्ष अपन आँखि सँ देख रहल छी आ इतिहास में धारनाक गवाह बनि कए आएब | ओना कोनो कार्य केँ हरदम दूगोट पक्ष होएत छैक एकटा पक्ष में तँ दोसर बिपक्ष में | बहुत रास बिपक्षक लोक केँ एखन तक मैथिली में गजल, सेहो नहि पचि रहल छैन आ अगुलका पीढी हुनका सब केँ सामने मैथिली में बाल गजल लए कँ उपस्थित भए गेल | ई हुनका सब केँ लेल अविश्वसनीय आ अपच भेनाई तँ स्वभाबिक छनि | किएक तँ बाल गजलक अब्धारनाक उत्पति एखन तक उर्दू आ हिंदीयो में चुप्पे अछि, ओहि ठाम मैथिली में गजल नहि पचबै बला सब केँ सोँझां में करीब चारि महिना में लगभग सय सँ बेसी सुन्नर-सुन्नर नेनपन सँ भरल बाल गजल हुनका सब लेल आश्चर्ज मुदा हमरा सबहक लेल प्रश्नताक विषय अछि | किछु लोक साँप केँ गेलाक बाद लाठी पितै में लागल रहैत छथि तँ किछु लोक एकटा सार्थक श्रीजन में, मुदा इतिहास बनाबै बला में नाम सदिखन श्रीजनकर्ता केँ अबैत छैक | हम सब केँ सब एखनका समय केँ श्रीजनकर्ता छी | बाल गजलक अबधारना कोना सम्भब भेलै आ कोन-कोन महिना में एकर पूर्ण जानकारी चन्दन झा जीक आलेख में नीक सँ अछि मुदा हम एतेक जरुर कहब जें एहि अबधारनाक जन्म आशीष अनचिन्हार जीक मोन सँ भेलैंह आ बहुत जल्दीए ई अपन स्वतंत्र छाप जन-जन केँ मोन पर छोरत | बाल मोनक कल्पना केँ कोनो सीमा नहि छैक, बस ओ कल्पना ओ चरित्र जे जीवनक भागमभाग में कतौ हमरा सब सँ हरा गेल, कनी काल केँ लेल सब किछ बिसरि कए बच्चा बनि कलम चलेने बाल गजल | एहि सन्दर्भ में गजेन्द्र ठाकुर जीक ई उक्ति सय टका ठीक छैन -"जे जतेक बच्चा बनि जेता ओ ओतेक नीक बाल गजल कहता " | बिनु पानिक नाउ चलाएब हम बिनु चक्काक गाडी बनाएब हम नहि बिना पानिक नाऊक कोनो प्रयोजन आ नहि बिनु चक्काक गाड़ीक कोनो प्रयोजन मुदा उपरका शेर में बाल मोनक परिकल्पना अछि आ ओ बाल मोन किछो कए सकैत अछि | बिनु पानिक नाऊ चला सकैत अछि, बिनु चाक्कक गाड़ी बना सकैत अछि, बाबा केँ घोरा बना सकैत अछि | ओहे बाल मोन जखन गंभीर होएत अछि तँ परदेश में बसल काका बाबु केँ बजाबैक हेतु चीत्कार करैत अछि - 'मनु' दै सपत घर घुरि आउ काका बाबु नेन्ना केँ कखन तक कोँढ ठोराएब ४ आशीष अनचिन्हार की थिक बाल गजलः किछु लोक "बाल गजल"क नामसँ तेनाहिते चौंकि उठल छथि जेना केओ हुनका अनचोकेमे हुड़पेटि देने हो। जँ एहन बात मात्र मैथिलिए टामे रहितै तँ कोनो बात नै, मुदा ई चौंकब हिन्दी आ उर्दूमे सेहो भए रहल छै। कारण ई अवधारणा मात्र मैथिलिए टामे छै आर कोनो भारतीय भाषामे नै। जँ हम कोनो हिन्दी-उर्दू भाषी गजलकार मित्रसँ "बाल गजल"क चर्च करैत छी तँ चोट्टे कहैत छथि जे उर्दूक बहुत गजलकार सभ बहुत शेरमे बाल मनोविज्ञानक वर्णन केने छथि खास कए ओ सुदर्शन फाकिर द्वारा कहल आ जगजीत सिंह द्वारा गाओल गजल----- "ये कागज की कश्ती वो बारिस का पानी" बला संदर्भ दै छथि आ ई बात ओना सत्य छै मुदा " बाल गजल"केँ फुटका कए ओकरा लेल अलग स्थान मात्र मैथिलिए टामे देल गेलैए। आ ई मैथिलीक सौभाग्य थिक जे ओ "बाल गजल"क अगुआ बनि गेल अछि भारतीय भाषा मध्य। आ विदेह एकर विशेषांक निकालल ताहि लेल हम एकरा धन्यवाद नै दए सकैत छीऐ कारण विदेह हमहूँ छी आ लोक अपना आपकेँ धन्यवाद कोना देत। जहाँ धरि बाल गजलक विषय चयन केर बात थिक तँ नामेसँ बुझा जाइत अछि ऐ गजलमे बाल मनोविज्ञान केर वर्णन रहैत छै। तथापि एकटा परिभाषा हमरा दिससँ ----" एकटा एहन गजल जाहि महँक हरेक शेर बाल मनोविज्ञानसँ बनल हो आ गजलक हरेक नियमकेँ पूर्ववत् पालन करैत हो ओ बाल गजल कहेबाक अधिकारी अछि"। जँ एकरा दोसर शब्दमे कही तँ ई कहि सकैत छी जे बाल गजल लेल नियम सभ वएह रहतै जे गजल लेल होइत छै बस खाली विषय बदलि जेतै। आब आबी बाल गजलक अस्तित्व पर। किछु लोक कहता जे गजल दार्शानिकतासँ भरल रहै छै तँए बाल गजल भैए ने सकैए। मुदा ओहन-ओहन लोक विदेहक ई अंक जे बाल गजल विशेषांक अछि तकर हरेक बाल गजल पढ़थि हुनका उत्तर भेटि जेतन्हि। ओना दोसर बात ई जे कविता-कथा आदि सभ सेहो पहिने गंभीर होइत छल मुदा जखन ओहिमे बाल साहित्य भए सकैए तँ बाल गजल किएक नै ? ओनाहुतो मैथिलीमे गजल विधाकेँ बहुत दिन धरि सायास ( खास कए गजलकारे सभ द्वारा ) अवडेरि देल गेल छलै तँए बहुत लोककेँ बाल गजलसँ कष्ट भेनाइ स्वाभाविक छै। की बाल गजल लेल नियम बदलि जेतैः जेना की उपरमे कहल गेल अछि जे बाल गजल लेल सभ नियम गजले बला रहतै बस खाली एकटा नियमसँ समझौता करए पड़त। माने जे बहर-काफिया-रदीफ आ आर-आर नियम सभ तँ गजले जकाँ रहतै मुदा गजलमे जेना हरेक शेर अलग-अलग भावकेँ रहैत अछि तेना बाल गजलमे कठिन बुझाइए। तँए हमरा हिसाबेँ ऐठाम ई नियम टूटत मुदा तैओ कोनो दिक्कत नै कारण मुस्लसल गजल तँ होइते छै। अर्थात बाल गजल एक तरहेँ " मुस्लसल गजल " भेल। बाल गजलक पूर्व भूमिकाः तारीखक हिसाबें बाल गजलक उत्पति २४.०३.२०१२ केँ मानल जाएत मुदा ओकर स्वरूप मैथिलीमे पहिनेहें फड़िच्छ भए चुकल छल। ०९ दिसम्बर २०११ केँ अनचिन्हार आखर पर प्रकाशित श्रीमती शांति लक्ष्मी चौधरी जीक ई गजल देखल जाए ( बादमे ई गजल मिथिला दर्शनक अंक मइ-जून २०१२मे सेहो प्रकाशित भेलै) आ सोचल जाए जे बिना कोनो घोषणाकेँ एतेक नीक बाल गजल कोना लिखल गेलै------------ शिशु सिया उपमा उपमान छियै हमर आयुष्मति बेटी मैत्रेयी गार्गीक कोमल प्राण छियै हमर आयुष्मति बेटी टिमकैत कमलनयन, धव-धव माखन सन कपोल पुर्णमासीक चमकैत चान छियै हमर आयुष्मति बेटी बिहुसैत ठोर मे अमृतधारा बिलखैत ठोर सोमरस शिशु स्वरुपक श्रीभगवान छियै हमर आयुष्मति बेटी नौनिहाल किहकारी सरस मिश्रीघोरल मनोहर पोथी दा-दा-ना-ना-माँ सारेगामा गान छियै हमर आयुष्मति बेटी सकल पलिवारक अलखतारा जन्मपत्रीक सरस्वती अपन मैया-पिताश्रीक जान छियै हमर आयुष्मति बेटी ज्ञानपीठक बेटी छियै सुभविष्णु मिथिलाक दीप्त नक्षत्र मातृ पितृ कुलक अरमान छियै हमर आयुष्मति बेटी "शांतिलक्ष्मी" विदेहक घर-घर देखय इयह शिशुलक्ष्मी बेटीजातिक भविष्णु गुमान छियै हमर आयुष्मति बेटी ..................वर्ण २२................ तेनाहिते एकटा हमर बिना छंद बहरक गजल अनचिन्हार आखर आ विदेहक फेसबुक वर्सन पर 6/6/2011केँ आएल छल से देखू-------------- होइत छैक बरखा आ रे बौआ कागतक नाह बना रे बौआ
देखिहें घुसौ ने चोरबा घर मे हाथमे ठेंगा उठा रे बौआ
तोरे पर सभटा मान-गुमान माएक मान बढ़ा रे बौआ
छैक गड़ल काँट घृणाक करेजमे प्रेमसँ ओकरा हटा रे बौआ
नहि झुकौ माथ तोहर दुशमन लग देशक लेल माथ कटा रे बौआ तेनाहिते ४ अक्टूबर २०१०केँ अनचिन्हार आखर पर प्रकाशित गजेन्द्र ठाकुर जीक ऐ गजलकेँ देखल जाए----- जे शब्दावलीक आधार पर बाल गजल अछि मुदा अर्थ विस्तारक कारणें बाल आ बूढ़ दूनू लेल अछि----- बानर पट लैले अछि तैयार बिरनल सभ करू ने उद्धार गाएक अर्र-बों सुनि अनठेने दुहै समऐँ जनताक कपार पुल बनेबाक समचा छैक नै अर्थशास्त्र-पोथीक छलै भण्डार कोरो बाती उबही देबाक लेल आउ बजाउ बुढ़ानुस - भजार डरक घाट नहाएल छी हम से सहब दहोदिश अत्याचार ऐरावत अछि देखा - देखा कए सभटा देखैत अछि ओ व्यापार ऐ तीनटा गजलक आधार पर ई कहब बेसी उचित जे बाल गजलक भूमिका बहुत पहिने बनि गेल छल मुदा विस्फोट 24/3/2012केँ भेलै। आ ऐ विस्फोटमे जतेक हमर भूमिका अछि ततबए हिनका सभकेँ सेहो छन्हि। 1 बाल गजल ई छौंड़ी थिक बिढ़नी सन सौंसे नाचै घिरनी सन बदमाशीकेँ तगमा छै मूँहक लागै हिरणी सन बैसल भूतक नानी बनि लागै छै मुँहचिरनी सन बच्चा लग बच्चा लागै बुढ़िया लग बततिरनी सन ई दुनियाँ झाँपै तैओ बेटी चमकै किरणी सन हरेक पाँतिमे दीर्घ-दीर्घ-दीर्घ-दीर्घ-दीर्घ-दीर्घ-दीर्घ 2 बाल गजल भोरे उठि मैदान गेलै बौआ ओम्हरहिसँ दतमनि तँ लेतै बौआ पोखरिमे नीकसँ नहेतै धोतै चिक्कन चुनमुन बनि क' एतै बौआ सरिएतै पोथी पहिरतै अंगा इस्कूलो खुब्बे तँ जेतै बौआ नै रखतै दोस्ती खरापक संगे पढ़ि बड़का डाक्टर तँ बनतै बौआ सभहँक करतै मदति सोना बेटा सदिखन नीके बाट चलतै बौआ हरेक पाँतिमे दीर्घ-दीर्घ-दीर्घ-दीर्घ-दीर्घ-ह्रस्व-दीर्घ-दीर्घ-दीर्घ-दीर्घ ५. चंदन कुमार झा सररा, मदनेश्वर स्थान मधुबनी, बिहार मैथिली बाल-साहित्य आ' बाल-गजल मैथिली साहित्यक इतिहास करीब ८०० बरख पुरान छैक आ' से एकर समृद्धि विश्व-साहित्य जगत मे अपन फराक आ' बेछप स्थान बनौने अछि ताहि मे कोनो दू मत नहि.मुदा, जखन मैथिली साहित्यक एहि समृद्धि केँ ध्यान मे रखैत मैथिली बाल-साहित्य पर दृष्टिपात करैत छी वा' आन-आन भाषाक बाल-साहित्य सँ एकर तुलना करैत छी तऽ फेर ई नगण्यप्राय बुझना जाइत अछि.मैथिली भाषा मे बाल-साहित्य बहुत कम लिखल गेलैए एखनधरि. लेकिन, एकटा बात जरूर छैक जे मिथिला क्षेत्र मे घरक बुढ़-पुरान द्वारा धिया-पुता सभकेँ विभिन्न तरहक प्रेरणादायी खिस्सा पिहानी सुनयबाक प्रचलन बहुत पुरान छैक मुदा, एकरा बाल-साहित्य केऽ अंतरगत मान्यता नहि देल जायत किएक तऽ ई लिखित रूप मे नहि उपलब्ध अछि. बिभिन्न जगह पर एकर विभिन्न स्वरूप मे कथानक बदलैत रहैत छैक.लिखित रूप मे नहि हेबाक कारणेँ ई खिस्सा-पिहानी सुनब आ' सुनेबाक परंपरा सेहो विलुप्त भेल जाऽ रहल छैक. मैथिली बाल साहित्यक प्रादुर्भावकाल प्रायः बीसम शताब्दीक उत्तरार्ध केँ मानल जायत.ओना हमरा लग एखनधरि एकर कोनो प्रामाणिक तारीख तऽ उपलब्ध नहि अछि मुदा, बाल-साहित्य लिखनिहार पुरान साहित्यकार सभक रचनाकाल केँ धेयान मे रखैत हम ई बात अपन अनुमानक आधार पर कहि रहल छी.एहि समय मे पं.चंन्द्रनाथ मिश्र "अमर", पं. गोविन्द झा, मुरलीधर झा,कालीकान्त झा "बुच", रामलोचन ठाकुर सदृश मुर्धन्य विद्वान, स्थापित साहित्यकार आ' मैथिलीसेवी सभ अपन कलमक मोसि पिया मैथिली बाल-साहित्य केँ पोसलनि.फेर जीवकांत, सियाराम झा "सरस", सन लोकप्रिय साहित्यकार एकरा अपन आंगुर धरा डेगा-डेगी चलौलनि.एकैसम सदीक शुरुआत मे तारानन्द वियोगी,ले.क. मयानाथ झा, जगदीश प्रसाद मण्डल,गजेन्द्र ठाकुर आ' प्रिती ठाकुर, ईत्यादि सँ मैथिली बाल-साहित्य केँ बेश दुलार-मलार भेटि रहल छैक.वर्तमान मे ऋषि वशिष्ठ आ' डा. शशिधर कुमरक बाल-साहित्यक लेल कयल जा रहल अवदान सेहो उल्लेखनीय अछि.तखन आब ई आशा निश्चित रुपेँ कयल जाऽ सकैत अछि जे मैथिली बाल-साहित्य सेहो क्रमशः जवानी आ' प्रौढ़ावस्था केँ प्राप्त करत आ' चिरंजीवि बनत.एकर एहने उज्जवल भविष्य केँ देखैत साहित्य अकादमी दिल्ली सेहो मैथिली बाल-साहित्य केँ मान्यता दैत एकरा लेल पुरस्कारक प्रावधान कयलक अछि.अस्तु. मैथिली साहित्य जगत मे गजल सेहो कमोवेश नवके विधा कहल जायत.ओना एकर उद्भव मैथिली मे करीब सय बरख पूर्व भेल रहैक आ' फेर कहियो गजल तऽ कहियो गीतल के रुप मे ई अड़ल रहल मुदा, एहि गीतल-गजल सभ मे गजलक व्याकरण केँ कमोवेश एकात कऽ देल गेलैक.परिणामस्वरूप, मैथिली गजल आ' गजलकार मैथिली काव्यधारा सँ सभदिन कतिआएले रहल आ गजल सेहो सभदिन अपन अस्तित्वक लड़ाई लड़ैत रहल अछि. एकैसम सदीक एखनधरिक बारह बरख मैथिली गजलक इतिहास मे अन्यतम स्थान रखैत अछि. एहि समयावधि मे श्री गजेन्द्र ठाकुर आ' आशीष अनचिन्हारक अवदान अविस्मरणीय अछि. गजेन्द्र जी गजल व्याकरणकेँ पुष्ट करैत नहि खाली गजल लिखलाह अपितु सरल वर्णिक आ' सरल मात्रिक बहरक रूप मे मैथिली गजल संसार केँ दूटा अनमोल बहर वा गजल-छंदक ढाँचा देलखिन्ह जे हमरा सन-सन कतेको नवतुरिया आ' नवसिखुआ केs लेल गजल लिखबा हेतु सहायक सिद्ध भेल अछि.एहि सँ मैथिली गजल केँ अभूतपूर्व समृद्धि भेटि रहल छैक. वर्तमान मे मैथिली गजलक लेल आशीष अनचिन्हारक समर्पण वर्णनातीत अछि. आशीष जी उर्दू आ' अरबीक समृद्ध गजल व्याकरण केँ मैथिली भाषाक आवश्यकतानुसार जाहि तरहेँ सरलीकरण केलथि आ' फेर अनचिन्हार आखरक माध्यम सँ आम जनमानस मे बहर आधारित गजल कहबाक (लिखबाक) लेल रुचि जगा रहल छथि से जा'धरि मैथिली गजल इतिहास रहत ता' धरि हिनकर एहि अवदानक चर्चा अवस्से कयल जायत. मैथिली मे बाल-गजल एकदम टटका परिकल्पना अछि.आन भाषाक बाल-साहित्य सभ मे सेहो बाल-गजल किन्साइते हेतैक.उर्दू मे गजल माने प्रेमालापे बुझल जाइत छलैक पहिने मुदा, फेर गजलकार सभ एकरा विस्तार दैत एहि मे सामाजिक सरोकार केs सेहो समावेशित कयलनि लेकिन बाल-गजल ओत्तहु जनमल हेतैक ताहि मे हमरा शंके बुझना जाइत अछि. मैथिली मे बाल-गजलक परिकल्पना सर्वप्रथम २४ मार्च २०१२ केs आशीष अनचिन्हार द्वारा कयल गेल आ' फेर २७ मार्च केs आशीष जी सूचना देलनि जे २५ वा २६ मार्च केs मैथिलीक पुरान आ' स्थापित गजलकार मुन्ना जी द्वारा एकटा बाल-गजल लिखल गेल अछि.एहि तरहेँ मुन्नाजीक ई बाल-गजल मैथिली बाल-गजलक इतिहास मे प्रथम होयबाक गौरव पौने अछि.आशा करैत छी जे विदेहक एहि बाल-गजल विशेषांक मे ई बाल-गजल प्रकाशित होयत. बाल-साहित्य सृजनकाल मे बाल मनोविज्ञान केँ धेयान मे राखब परमावश्यक.एकटा उत्कृष्ट साहित्य लेल जरुरी छैक जे ओ' सरल, बोधगम्य आ' प्रेरणास्पद हो.जखन बाल-गजलक परिकल्पना मैथिली गजलकार सभक सोझाँ एलनि तऽ स्वाभाविक रुपेँ हुनका सभक मोन मे ई प्रश्न उठलनि जे एकर रुपरेखा केहन हेतइ.....एकर व्याकरण आ' भावपक्ष केहन हेबाक चाही...ईत्यादि.हुनकर सभक एहि जिज्ञासा केs शांत करैत गजेन्द्रजी कहलखिन्ह जे कायदा-कानून तऽ सामान्ये गजल जेकाँ रहतैक मुदा भावपक्ष एहन हेबाक चाही जे छोट-छोट धिया-पुता के रुचई.ओकर सभक मन-मस्तिष्क केँ पचई आ' तइँ जे गजलकार जतेक बच्चा बनि बाल-गजल कहताह(लिखताह) ओ' ओतेक सफल हेताह. उत्साह आ प्रतिभा सँ भरल अमित मिश्र,पंकज चौधरी "नवलश्री",जगदानन्द झा "मनु",रुबी झा, मिहिर झा,ईत्यादि सन नवगजलकार सभ गजेन्द्रजीक उपरोक्त कहल बात के पुर्णतः आत्मसात कयलनि.फलस्वरुप, २४ सँ ३१ मार्च २०१२ अबैत-अबैत, एक्के सप्ताह के भीतर गोट दसेक सँ बेशी बाल-गजल हमरा सभक सोझाँ आयल.एहि क्रम मे हमहू एक-दूटा बाल-गजल लिखबाक प्रयास कयलहुँ.मुदा,एहिठाम उल्लेखनीय बात ई जे मैथिली बाल-गजल प्रायः सोइरीये सँ अपन रूप आ भाव सँ आम जनमानस के आकर्षित-प्रभावित करय लागल.बहर आ'व्याकरणक मापदण्ड पर सोंटल आ' बिम्ब आ' भावसँ ओत-प्रोत मैथिली बाल-गजल अपन जन्महि कालसँ संकेत देमय लागल जे मैथिली बाल-साहित्य मे ओकर भविष्य बेश उज्जवल छैक आ'से लगभग चारिए मासक अल्पावधि मे एकसय सँ बेशी बाल-गजल एहि बातक प्रत्यक्ष प्रमाण अछि. अमित मिश्र एखन जीवनक छात्रावस्था मे छथि आ'से एखन हिनकर एकटा पएर नेनपन तऽ दोसर जुआनीक सोपान पर छन्हि आ' तकरे प्रतिफल छैक जे हिनका बाल मनोभावक सागर मे डूबकी लगबैत देरी नहि लगैत छन्हि.यैह कारण छैक जे ई बाल-गजलकारक पाँति मे सभसँ आगू ठाढ़ भेटैत छथि.एखनधरि गोट तीसेक सँ बेशीए बाल-गजल रचि चूकल छथि आ तइमे अधिकांश अरबी बहर पर आधारित अछि जे हिनकर गजलकारक रूप मे प्रतिभाक परिचायक अछि.ई दरभंगा मे रहैत छथि से हिनकर बाल-गजल सभ मे शहरी आ' ग्राम्य परिवेश मे बच्चा सभक मनोभावक अद्भुत चित्रण-वर्णन भेटैत अछि.ई कतहु- माटिक चाउर पानिक दूध पातक थारी बनेबै माटिक चुल्हा पर खीर रान्हि,तरकारी बनेबै आ' बालुक चिन्नी कादो के दही गेना फूलक चूडा़ हेतै घैलक (खपटा) चकला संठी के बेलना से पूड़ी बनेबै ....कहैत भेटताह त' कतहुः- पीठ पर छै बैग बौआ चलल इस्कुल लाल पियर ड्रेस चमके भरल इस्कुल नै पहाड़ा पढ़ब नै सीखब ककहरा आब छै कंपुटर सिखा रहल इस्कुल....आ' फेर व्यस्त माय-बाप आ' एकाकी होइत बचपन दिशि इशारा करैत कहैत छथि - नै जो पढ़ाबै के लेल इस्कुल माँ तू जाइ छैँ बदलै घर त' वनवास मे पंकज चौधरी "नवलश्री" सेहो प्रवासी छथि आ' गाम सँ दूर हिनका बेर-बेर नेना मे बितायल दिन इयाद अबैत छन्हि.तैँ सहजहि कहैत भेटताहः- देखि भूख सँ लोहछल नेन्ना दुख-सुख सभटा लोप भेलै भंसा घर मे घाम सँ भीजल काज करै सभ चुट-चुट माँ होय कहाँ अनका देखबैलै "नवल" ई मायक माया-तृष्णा भेर निन्न तइयो कहि खिस्से दूध पियाबय घुट-घुट माँ.....आगाँ कहैत भेटताह... मोन पड़ल ई किये अनेरे बात पुरनगर बचपन के आँखि नोरेलै मोन जड़ेलक याद रमनगर बचपन के बाबुक कनहा मायक कोरा अनुपम झूला सन घुआ-मुआँ ता-ता-ता थैया आर ठेहुनिया खेल छमसगर बचपन केँ. रूबी झा एकटा गजलकारि हेबाक संग-संग माय सेहो छथि से हिनकर बाल-गजल मे मायक ममता स्पष्ट दृष्टिगोचर होइत अछि.जेनाः- रुसिये गेल बौआ मनाएब कोना कए निर्धन माय बौआ बुझाएब कोना कए...फेर आगाँ कहैत भेटतीहः- चलल ठुमकि बौआ कते सोहावन लागै छै बाजल बौआ तोतल माँ मनभावन लागै छै. मनुजी बेशीकाल बालमन के अपन प्रेरक बाल-गजल सभक माध्यम सँ प्रेरित करैत भेटताह से अहूँ सभ देखू:- मुठ्ठी भरि बिया भागक अपन हम रोपि अपने माटि में हँसि हँसि कँ गौराएब आ' फेर... हमरा कहैत अछि "मनु" मूर्ख चरबाहा पढ़ि कए सभ चरबाहा के पढ़ेबौ हम माय नहि चरबै लेल गाय जेबौ हम पठा हमरा इस्कुल कॉपी पेन लेबौ हम. उपरोक्त शेर वा गजलांश सभ तऽ एकटा बानगी मात्र अछि.एखनधरिक बाल-गजल शतक पर यदि दृष्टिपात करब तऽ माय-बापक दुलार-मलार,भाय-बहिनक झगड़ा-झाँटी सँ लऽ के लक्ष्यप्राप्ति हेतु प्रेरणा आ संकल्प सभ किछु भेटि जायत. आ' फेर ई कहबा मे कोनो अतिशयोक्ति नहि रहत जे मैथिली बाल-गजल अपन छठिहारे सँ जीवकांत,सरसजी सन-सन निसन्न कवि सभक बाल-कविताक समकक्षी बनि गेल अछि अछि. अंत मे कहय चाहब जे विदेह जे ई बाल-गजल विशेषांक बहार करबाक नेयार केलक अछि से निःसंदेह मैथिली बाल-गजल आ' बाल-साहित्य इतिहासक विकास मार्गपर एकटा माइलक पाथर साबित होयत.एकरा आरो ठोस रूप देबाक मादेँ हमर सुझाव रहत जे एहि अंक मे सम्मिलित बाल-गजल आ' बाल-गजल सँ संबंधित आलेख केँ संग-संग एखनधरिक किछु उल्लेखनीय बाल-गजल सभकेँ एकठ्ठा कऽ एकटा छोट-छीन पोथीक रूप मे विदेह परिवार प्रकाशित कराबय आ' संपूर्ण मिथिला क्षेत्रक विद्यालय आ' पुस्तकालय सभमें उपलब्ध कराबय जाहि सँ बाल-गजलक परिकल्पना अपन उद्देश्य के प्राप्त करत.गाम-घरक नेना-भुटका बाल-गजल सँ परिचित हेताह आ' हुनका सभ मे मैथिली बाल-साहित्य पढ़बाक प्रति रुचि जगतैन संगहि मैथिली बाल-साहित्यक गजलकार सभक मेहनति सोकाज लगतनि.एहिठाम हम मिथिला क्षेत्रक ओहन विद्यालय,सामाजिक आ' शैक्षणिक संस्था,गायक,संगीतकार,ईत्यादि, सभ जे आर्थिक रुपेँ सबल छथि,सँ नेहोरा करब जे ओ बाल-गजल के ऑडियो-विडियो कैसेट,सीडी,डीविडी बना गामघरक अंगना-घर मे पहुँचेबाक प्रयास करथि.मैथिली बाल-गजलक भविष्यमे विकासक मादेँ हमर मनोरथ अछि जे ई धिया-पुताक ठोर पर ओहिना सजय जेना मैथिलानीक ठोर पर गोसाउनिक गीत,सोहर,चौमासा,बारहमासा,समदाउन बसल छैक.अस्तु. ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। १.योगेन्द्र पाठक ‘वियोगी’- लघुकथा- देववाणी २.नवेंदु कुमार झा- बिजलीक क्षेत्र मे आत्म निर्भरताक लेल सरकार कऽ रहल प्रयास १ योगेन्द्र पाठक ‘वियोगी’ लघुकथा- देववाणी
हम ई नवका पंडितजी’क कने परीक्षा लऽ रहल छी। पंडित जी जे पुरना छलाह से तँ कहिया ने स्वर्गवासी भेलाह।ओ परोपट्टा मे नामी लोक छलाह पंडित संस्कार नाथ मिश्र। पंडितजी व्याकरणाचार्य, साहित्याचार्य, आयुर्वेदाचार्य आर नहि जानि कोन कोन विषयक आचार्य छलाह। हमरा गाम अर्थात् माहीपुर मे महामाया संस्कृत विद्यालय हुनके प्रयासे ँ स्थापित भेल छल जाहि मे सुनैत छियैक महाराजा लक्ष्मीश्वर सिंह स्वयं उद्घाटन करबा लेल आएल छलखिन्ह आ विद्यालय प्रांगण मे एकटा आम आ एकटा पीपर के गाछ रोपने छलखिन्ह। आमक गाछ तँ सन् सत्तावन के बाढ़ि मे सुखा गेलैक मुदा पीपर तँ एखनहुँ छैके जे अहूँ सब देखिते छियैक। नवका पंडित जी भेलाह हुनकर प्रपौत्र।पंडित संस्कार नाथ मिश्र जी के ँ चारिम बियाह मे एकटा बालक भेलखिन्ह। ताहि सँ पहिने तीन बियाह मे चारि चारि टा कन्या रत्न प्राप्त भेलन्हि जेना लक्ष्मी सरस्वती सीता गौरी सब अपन अपन सखी बहिनपा’क संग अवतरित भेल होथि।पंडित जी जिद्दी लोक।चारिम बियाह सँ पूर्व जखन किछु आत्मीय सब हुनका बुझबए गेलखिन्ह जे “ देखू आब वयसो भऽ गेल। एहि बारह टा बेटी के पालन पोषण आ कन्यादान आदि मे अपनेक जे दशा भऽ रहल अछि से तँ अपनहि जनैत छिऐक। ते ँ हमरा सबहक कहब जे फेर बियाह करबाक ई विचार छोड़ि दियौक। मानि लिअऽ जे बेटा भाग्य मे नहि अछि।” तँ पंडित जी खिसिया कए बाजल छलखिन्ह “ देखू ई भक्त आ भगवान के लड़ाइ छियैक।यदि भगवान के ँ जिद्द लागल छन्हि जे बेटा नहिए दऽ कए परीक्षा लियैक तँ भक्त के सेहो प्रतिज्ञा छन्हि जे बेटा लइए कए रहताह। हमरा ई लड़ाइ लड़ए दिअऽ आ अहाँ सब कात सँ तमासा देखैत रहू।” अस्तु, जेना कि पौराणिक काल सँ होइत रहलैक अछि, सुच्चा भक्त’क सोझाँ भगवाने हारि मानैत रहलखिन्ह अछि, सएह भेलैक एहू बेर आ चारिम बियाह’क बाद करीब पचपन वर्षक उमेर मे पंडितजीक तपस्या सफल भेलन्हि आ आइमाइ सब गौलन्हि सोहर “ललना रे घर घर बाजे बधाई कि कृष्णजी जन्म लेल रे…” । नवजात’क नाम पंडित संस्कार नाथ मिश्र अपनहि चुनलन्हि।परोपट्टाक लोक तँ हुनका सँ नामकरण करबैत छल, ओ कतए जइतथि। से नाम राखल गेल भूजानाथ। आब जे सूनए सएह हँसए। सब बूझए लागल जे सत्ते मे पंडितजी सठिया गेलाह’ए। कियो कियो ईहो अर्थ लगाबए जे पंडितजी के ँ भूजा बड़ पसिन्न छन्हि। किछु ईहो बाजए जे एहि सँ नीक तँ ‘अनाथ’ नाम होइतैक, किछु अर्थ तँ रहितैक। जखन चारू कात खिधांस होअए लगलन्हि तँ नवकी पंडिताइने एक दिन टोकलखिन्ह जे बारह टा बेटीक बाद तँ एकटा बेटा भेल तकर की नाम राखि देलियैक जे सौ ँसे गाम हँसैत अछि। पंडितजी कने दुअनियाँ मुसकी दैत नवकी के ँ बुझेलखिन्ह “ लोक की बुझतैक ? ओकरा सब के ँ ज्ञाने कतेक छैक ? देखू ई नाम अपूर्व छैक। एकरा एनाकए बुझियौक : भू ट्ट जा ट्ट नाथ। भू माने पृथ्वी, जा माने ताहि सँ उत्पन्न अर्थात् भूजा भेलीह सीता आ भूजानाथ भेलाह साक्षात् भगवान राम। अहीं सोचियौक यदि सोझे राम नाम राखि दितियैक बच्चा’क तँ संस्कार नाथ मिश्र’क ज्ञान’क कोन काज ? फेर ओहेन नाम तँ हरेक टोल परोस मे भेटत आ थोड़बे दिन मे राम भऽ जइतथि रमुआ।रमुआ ककरो हरबाह, रमुआ कोनो बोनिहर, रमुआ ककरो चाकर आ रमुआ कोनो पंडित’क बच्चा। फेर अन्तर की भेलैक ?” आब जे ई व्याख्या सूनए सएह कहए वाहवाह, पंडित संस्कार नाथ मिश्र सन व्याकरणाचार्य के ँ छोड़ि के एतेक सुन्दर नाम सोचि सकैत छल ? नामकरण मे हुनकर ख्याति आर वेशी बढ़ि गेलन्हि। मुदा सब किछु होइतो एहि परिवार मे आगू दू पुस्त तक व्याकरण आ साहित्य के ँ के कहए संस्कृत पढ़बो बन्द भऽ गेल। भेलैक एना जे संस्कार नाथ मिश्र भगवान सँ एकटा बाजी तँ जीत गेलाह परन्तु पूरा खेल तँ हुनका बूझल छलन्हि नहि। भूजानाथ के ँ तीन टा बड़का माए आ बारह टा बहीन।सब मिला कए एहि सोलह स्त्रीगण’क ओ अति दुलारू बच्चा। लीखब पढ़ब सँ ओ तहिना पड़ाथि जेना नबका बियाह भेला पर पंडितजी पुरना कनियाँ सबसँ पड़ाथि। एहि शोक सँ बूझू आ कि उमेरक गुण दोष, पंडितजी अस्वस्थ रहए लगलाह। पाँचम वर्ष मे भूजानाथ’क उपनएन भेलन्हि आ तकर किछुए दिनक बाद पंडितजी भगवान सँ भेंट करए स्वर्ग चल गेलाह। भूजानाथ भठ्ठा नहिए धेलन्हि। भूजानाथ बढ़ैत गेलाह आ ओतबे बेशी अबंड होइत गेलाह। हुनका पहुनाइ करऽ मे आ तिलकोर तोरै मे वेश आनन्द अबन्हि। जमीन जाल तँ पिताजी बारह टा कन्यादान मे प्रायः शेषे कऽ देने छलखिन्ह ते ँ घर गृहस्थीक चिन्ते कोन। बारह टा बहिन’क सासुर आ चारि टा मात्रिक मे बूलि बूलि ओ पहुनाइ करथि। भरदुतिया मे ओ बेशी परेशान भऽ जाथि। एक दिन मे बारह गाम कोना जेताह ? कोन बहिन सँ नोत लेथिन्ह आ किनकर उपराग सुनताह ? मुदा एकरो संयोगे कही जे पंडितजी अपन बारहो बेटीक बियाह जाहि गाम सब मे केलन्हि से सबटा गाम रेलबे लाइन के दूनू कात सकरी सँ निरमली के बीच आ कि सकरी सँ जयनगर के बीच एक कोस सँ कमे दूर पर।फेर बहीने सब अपना मे विचार क कए हुनका रस्ता बता देलखिन्ह जे एक बरख मे ओ चारि ठाम जाथि। भरदुतिया सँ एक दिन पहिने एक गोटे ओतए पहुँचि जाथि आ ओतए अगिला दिन एकदम सकाल नोत लऽ कए दोसर गाम पहुँचि जाथि। ओतए नोत लऽ कए फेर बरहबजिया गाड़ी पकड़ि बाकी दू बहिन के गाम जा कए नोत लेथि। एवम् प्रकारे ँ दिन अछैते ओ सब ठाम पार पुरि लेताह। एहि प्रकारे ँ हर चारिम बरख मे सब बहिन के ँ भाइ के ँ नोतबाक सऽख पूर होइत रहतन्हि। एहि मे भूजानाथ के ँ एकटा नफा ई भेलन्हि जे भार दोर के झंझट खतम भऽ गेलन्हि। चारि चारि ठामक भार तँ एक संगे लऽ जइतथि नहि। मुदा पैघ घाटा ई भेलन्हि जे भरि दिन एक गाम सँ दोसर गाम दौड़ैत रहला सँ कत्तौ इच्छा भरि तिलकोर नहि खा पबैत छलाह। अस्तु, उचित समय पर भूजानाथ के बियाहो भेलन्हि। अबंड छलाह आ कि संस्कृत नहि पढ़लन्हि तै सँ की ? मिथिला मे ने कोनो वर कुमार रहलैक’ए आ ने कोनो कन्या कुमारि रहलैक’ए। लूल्हि नाङर कनियाँ आ आन्हर बहीर आ कि ढहलेल बकलेल वर, सबहक बियाह भेबे केलैए, घटक टा होशियार रहल चाही। तखन भूजानाथ तँ पंडित संस्कार नाथ मिश्र’क पुत्र छलखिन्ह। घटक दरिद्र नारायण चौधरी एहि काज मे सहायक भेलखिन्ह। कोसिकनहा कात’क एकटा मसोमात’क लूल्हि किन्तु सुन्दरी कन्या स्वर्गीय पंडित संस्कार नाथ मिश्र’क पुतोहु बनिकए माहीपुर एलीह। ओ फेर घूरि कए नैहर तँ नहि गेलीह, माइए मास दू मास पर खोज खबरि लेबा लेल आबि जाइत छलखिन्ह। समय पाबि भूजानाथ के ँ पहिले प्रयास मे पुत्र भेलन्हि। हुनका पिता जकाँ तपस्या नहि करए पड़लन्हि। मुदा एहि समय एकटा दोसरे विचित्र घटना भेलैक।सौरी सँ बहराइते एकटा अगलटेंट छौंड़ी बाजि उठल जे उएह मुसरी भेलैक। ई मात्र ओहि बच्चा’क लिंग निर्धारण सूचक शब्द छलैक। मुदा से ओहि बच्चा के नामकरणे भऽ गेलैक आ. ओ मुसरीए भऽ कए रहि गेल। नाम किछु विचित्र तँ जरूर छलैक मुदा मिथिलाक गौरवमय इतिहास मे कतेको मुसरी भऽ गेल छथि से तँ अहूँ सब जनिते छिऐक। आ नामो सब एक सँ एक विचित्र जेना कि खुद्दी, फुद्दी, तिनकौड़ी, पलटू सलटू आदि। ते ँ एहि बात पर कोनो बेशी ध्यान नहि देल गेलैक। ओना स्वर्ग मे पंडित संस्कार नाथ मिश्र अपन पौत्रक एहि नामकरण पर की सोचने होएताह से हमरा सब कहियो बूझि नहि सकब। मुसरीक माए लूल्हि जरूर छलखिन्ह मुदा छलखिन्ह होशियार। हुनका अपना बच्चा के ँ पढ़ेबा पर बेशी ध्यान छलन्हि। मुसरी स्कूल जाए लगलाह। संस्कृत विद्यालय नहि, गाम’क सरकारी प्राथमिक विद्यालय। रजिष्टर मे नाम लिखाएल मुसरी नाथ मिश्र। आ तकर बाद हुनकर नाम लिखाएल गेल माहीपुर सँ करीब डेढ़ कोस दूर सरपतिया चऽर के पुबरिया सीमा पर स्थित गाम कनकटोली के माता यशोदा हाई स्कूल जे हमरा सबहक नवका एम एल ए यादव जी किछुए बर्ष पहिने स्थापित कएने छलाह। मुसरी गामहिं सँ स्कूल जाइत अबैत छलाह। मुसरी पढ़बा मे कोनो वेशी कुशागबुद्ध्रि नहि छलाह। लागल लागल कहुना दशवीं पास केलन्हि। आगू पढ़बाक ने इच्छा रहन्हि आ ने साधन। रोजीक ताक मे गामैक किछु लोक’क संग ओ पहिने कलकत्ता एलाह आ ओतए सँ एकटा ठीकेदारक संग कोरबा चल गेलाह जतए बड़का बड़का थरमल पावर स्टेशन बनि रहल छलैक। एतए ओ ठीकेदार’क मुन्सी के असिस्टेंट भऽ गेलाह आ नाम भऽ गेलन्हि श्री एम एन मिसरा जी। नाम छोट करैक ई अंगरेजिया तरीका सेहो कमाल के छैक। हमर एम एन मिसरा के ठीकेदार मकान आदि बनबैत छलाह। मिसराजी’क काज भेलन्हि मजदूर सब के पाछू रहब। मजदूर सब ठीक सँ काज करए, सूति बैसि नहि रहए आ किछु सामान चोरा नहि लिअए तकरे देखभाल करब भेल काज हुनक। मुन्सी अपने तँ टेन्ट मे आराम करथि आ एम एन मिसरा के ँ रौद बसात पानि बिहारि मे मजदूर’क संगे रहए पड़न्हि। गाम मे खबरि गेलैक जे भूजानाथ’क बेटा के ँ नीक नौकरी भेटि गेलन्हि। घटक दरिद्र नारायण चौधरी बूढ़ो भेला पर सक्रिय छलाहे। ओ आबि भूजानाथ के ँ मनौलन्हि आ किछु साधारण टाका’क लोभ दऽ कए हुनक बेटाक बियाह ठीक करा देलखिन्ह। समय पर मुसरी अर्थात् एम एन मिसरा’क बियाह भेलन्हि आ फेर पितामह’क तपस्या’क फले ँ पुत्ररत्न के प्राप्ति सेहो। नाम राखल गेल दिलीप कुमार। नब परम्परा’क अनुसार पारिवारिक नाम ‘मिश्र’ हटा देल गेल। × × × × × × × आब आउ असली खिस्सा पर जे पंडित संस्कार नाथ मिश्र’क प्रपौत्र एहि आधुनिक कम्प्यूटर युग मे पंडित कोना भऽ गेलाह। एम एन मिसरा जखन कोरबा मे रौद बसात पानि बिहारि मे मजदूर सबहक ओगरबाही करैत रहथि तखन हुनका डेराक बगल मे हरलाखी लगहक कोनो गाम के एकटा पाँड़ेजी रहैत छलखिन्ह जे ओतए पंडिताई करैत छलाह। पाँड़ेजी कम्मे पढ़ल लिखल किन्तु व्यावहारिक लोक।अपन पंडिताई मे संस्कृत कम हिन्दीए सँ बेशी काज चलबैत छलाह। हनुमान चालीसा पढ़ि कए ओ महादेवक पूजा सेहो कऽ दैत छलखिन्ह आ कतेक ठाम कन्यादान सेहो। मुदा तैयो खूब व्यस्त रहैत छलाह आ नीक टाका कमा लैत छलाह। एम एन मिसरा जी दसवीं पास आ ठीकेदार’क मुन्सी के असिस्टेंट मात्र पाँच हजार कमाइत छलाह आ पाँड़ेजी सुखारो ऋतु मे पचीस तीस हजार उठा लैत छलाह। भादव, कातिक, माघ, बैसाख आदि मास मे तँ पचासो हजार पार कऽ लैत छलाह।टाका तँ जे से, मान सम्मान सेहो खूब बेशी। यजमान सब अपन अपन वित्तक अनुसार रिक्सा वा गाड़ी पठा हुनका बजबैत छलखिन्ह। ते ँ रौद बसातक झंझट हुनका कहियो नहि परेन्हि। पाँड़ेजीक कमाई आ मान सम्मान सँ एम एन मिसरा जी बहुत प्रभावित भेलाह। एक दिन पाँड़ेजी हुनका लऽग अपन विचार व्यक्त केलखिन्ह “ देखियौ मिसरा जी, आइ कालि सबहक बेटा बेटी कम्प्यूटर इंजिनीयर भऽ रहलैक’ए। सब बंगलोरे मे नौकरी करए चाहैत अछि आ कि अमेरिके जाए चाहैत अछि। मुदा पंडित’क संख्या कतेक कम भऽ गेलैक अछि। एतेक टा कोरबा मे हम सब मात्र दश गोटे छी आ हरदम एक यजमान सँ दोसर के ओहि ठाम दौड़ैत रहैत छी। पंडित सब कम्प्यूटर इंजिनीयर सँ कोन कम कमाइत छथि यदि अपने ठीक सँ जोरियौक। सुनै छी अहाँक पितामह नामी पंडित छलाह से अहूँक परिवार सँ ई परम्परा उठि गेल। हमरा तँ लगैत अछि अगिला पुश्त मे पंडित जातिए विलुप्त भऽ जाएत।” एम एन मिसरा जी’क पुत्र दिलीप कुमार गामहि मे सरकारी प्राथमिक विद्यालय मे पढ़ैत छलखिन्ह आ अगिला साल हुनकर विचार छलन्हि माता यशोदा हाइ स्कूल मे भर्ती करेबाक।एही समय पाँड़ेजी सँ प्रभावित भए ओ एकटा क्रांतिकारी निर्णय लेलन्हि जे बेटा के ँ महामाया संस्कृत विद्यालय मे पढ़ौताह आ अपन पितामहक सुयश के ँ पुनः स्थापित करताह। दिलीप कुमार महामाया संस्कृत विद्यालय मे भर्ती भऽ गेलाह आ लगलाह लघु सिद्धान्त कौमुदी आ अमर कोष रटए। मुदा हुनक प्रपितामह’क युग सँ एहि युग तक बहुत परिवर्तन भऽ गेल छलैक जाहि मे संस्कृत विद्यालय आ मदरसा आदि मे सरकार नवका पाठ्यक्रम लागू करा देने छलैक। नवका पाठ्यक्रम’क अनुसार विद्यार्थी के ँ आनो बिषय जेना गणित, इतिहास आ विज्ञान आदि सेहो पढ़ए पड़ैत छलन्हि। उचिते, संस्कृत’क प्राथमिकता कने कम भऽ गेल छलैक। मध्यमा पास केलाक बाद दिलीप कुमार आबि गेलाह कोरबा आ पाँड़ेजीक संरक्षण मे लगलाह पंडिताइ के व्यावहारिक ज्ञान प्राप्त करबा मे। अथवा कहू अपरेन्टिस भऽ कए प्रशिक्षण लेबए लगलाह। पाँड़ेजी दिलीप कुमार के पढ़बा लिखबाक ज्ञानक परीक्षा किछुए क्षणक गपसप मे लऽ लेलखिन्ह। तकर बाद ओ एक प्रकारक क्रैश कोर्स के पाठ्यक्रम बनौलन्हि जाहि मे सत्यनारायण पूजा आ दुर्गा शप्तशती पाठ मूल संस्कृत मे छलैक। आ सब देवी देवता’क प्रार्थना सेहो संस्कृते मे। बाकी हनुमान चालीसा आ रामचरित मानस के विभिन्न उद्धरण छलैक। एकर अतिरिक्त किछु छिटफुट वेदपाठ सेहो। ई सब दिलीप के ँ कण्ठस्थ करबाक छलन्हि। एहि किताबी ज्ञान के अतिरिक्त व्यावहारिक ज्ञान’क लेल पाँड़ेजी दिलीप के ँ अपना संगे किछु किछु ठाम आयोजन सब मे लऽ जाए लगलखिन्ह। ओतए दिलीप हुनकर असिस्टेंट जकाँ काज करथि, जेना यजमान सँ विभिन्न वस्तुक ओरिआओन कराएब, पूजाक सामग्री सजाएब, आदि। पाँड़ेजीक अनुभव छलन्हि जे जतेक विस्तृत रूपे ँ सामग्री सजाओल जाए, यजमान वर्ग पर ओतबे वेशी प्रभाव पड़ैत छैक। विन्यास’क लूड़ि सीखब मंत्र सीखब सँ वेशी महत्वपूर्ण। एकर अतिरिक्त दिलीप पूजा’क समय पाँड़ेजीक प्रत्येक भाव भंगिमाक सूक्ष्म अध्ययन करथि। सत्यनारायण पूजा मे कथा’क समय भाषा टीका द्वारा हिन्दी मे लोक के ँ ओकर महत्त्व बुझाएब पाँड़ेजीक विशेषता छलन्हि। समय जरूर वेशी लगैत छलैक मुदा एहि सँ पाँड़ेजीक पांडित्यक धाख बढ़ैत छलन्हि। ओ दिलीप के ँ गर्व सँ सुनबथिन्ह “गाम पर पूजा होइत छैक तँ कथा’क समय यजमान आ आनो लोक सब बैसल बैसल ओंघाए लगैत छथि, मात्र पुरहित जी अपने कथा बँचैत रहैत छथि। हमरा कथा बँचैत काल अहाँ देखियौक, लोक आनन्द सँ झूलैत रहैत अछि। बीच बीच मे हमरा संगे सत्यनारायण भगवान के जयजयकार सेहो करैत रहैत अछि। कारण स्पष्ट छैक। संस्कृत मे कथा भेला सँ ककरो किछु बूझऽ मे तँ अबैत नहि छैक। पुरहितजी’क सस्वर पाठ ओहने होइत छन्हि जेना बच्चा के ँ सुतबै कालक लोरी गीत। कथा एहेन भाषा मे कहियौक जे लोक बूझए। बस, अपनहि सब अहाँक संगे एकाकार भऽ जाएत।” दिलीप एक दिन मन्द विरोधक स्वर मे कहलखिन्ह जे संस्कृत तँ देववाणी छिऐक। तै पर पाँड़ेजी हुनका बड़ नीक जकाँ बुझेलखिन्ह “ देखियौक, संस्कृत देववाणी तखन छलैक जखन सब लोक संस्कृते बजैत छल। देवता’क कोनो वाणी नहि छन्हि। हमरे अहाँक वाणी सँ देवता बजैत छथि।वाल्मीकि रामायण छैक संस्कृत मे आ तुलसीदास रामयण लिखलन्हि हमरा अहाँक भाषा मे। लोक ककरा वेशी पढ़ैत छैक ? एखन अहाँ भगवान’क आरती गबैत छी कि लक्ष्मीजी’क आरती कि आन कोनो देवता’क आरती। सबटा तँ हिन्दी मे छैक आ कतेक आनन्द अबैत छैक लोक के ँ आरती गबैत। एकरे संस्कृत मे बना दियौक, कम्मे लोक बचत अहाँ के ँ संग दै बला। ” दिलीप बूझि गेलाह असली गप्प। एवम् प्रकारे ँ ओ ट्रेन्ड होबए लगलाह। छोटछीन आयोजन सब मे यजमानक हैसियत देखि पाँड़ेजी दिलीप के ँ एकसरे पठबए लगलखिन्ह। हुनका अतीव खुसी छलन्हि जे लुप्तप्राय पंडित प्रजाति मे एकटा सदस्य जोड़ा रहल अछि। एक दिन पाँड़ेजी एम एन मिसरा जी सँ दिलीप कुमारक भविष्य के लेल विचार विमर्श केलन्हि। हुनकर विचार छलन्हि जे दिलीप कोरबा छोड़ि कोनो नव जगह चल जाथि। एतए ओ पंडिताइ सिखलन्हि अछि। बारीक पटुआ तीत होइते छैक। अपना इलाका मे कोनो विद्वान के ँ यश नहि भेटैत छन्हि। ते ँ विद्वान के ँ विदेश मे अपन विद्वत्ताक प्रचार करबाक चाही। तहिना पंडित के ँ अपरिचित जगह मे यजमनिका’क प्रसार करबाक चाही। शूरवीर के ँ अनचिन्हार लोक’क बीच जा कए राज करैक चाही। बाहरक लोक के गुण अवगुण’क थाह जल्दी नहि लगैत छैक। ते ँ ई सब दीर्घायु होइत छैक जेना अपना देश मे अंग्रेजक राज। करीब दू साल तक व्यावहारिक ज्ञान प्राप्त केलाक बाद पंडित दिलीप कुमार पहुँचि गेलाह सिलबासा जे एकटा नवका औद्योगिक केन्द्र भऽ रहल छलैक। ओतए किछु दिन स्थानीय हनुमान मन्दिर पर एकसरे दिन राति हनुमान चालीसा., किछु रामायण’क उद्धरण आ विभिन्न देवी देवता’क प्रार्थना संस्कृत मे सस्वर पाठ करैत रहलाक बाद शनैः शनैः यजमान सब भेटए लगलन्हि। एतए ओ नवका पंडितजी नाम सँ विख्यात भऽ गेलाह। × × × × × × × हम सब सिलबासा आएल छी जतए हमर जमाए एकटा फैक्ट्री मे इंजीनियर छथि। ओ एकटा नवका फ्लैट लेलन्हि अछि तकरे गृहप्रवेश’क पूजा छिऐक। एही आयोजन मे नवका पंडितजी बजाओल गेल छथि। हमर बेटी कहलन्हि जे नवका पंडित छथि हमरे ग्रामीण दिलीप कुमार, स्वर्गीय पंडित संस्कार नाथ मिश्र’क प्रपौत्र। ओना मुम्बई मे हमर दीर्घ प्रवास मे गामक ई एकटा परिवत्र्तन हमरा बूझल नहि भेल छल। हम पूरा आयोजन मे हुनका सँ नजरि बचा कए हुनकर व्यवहार’क अध्ययन कऽ रहल छी। हुनका ईहो नहि बूझल छन्हि जे हम हुनकर ग्रामीण छिएन्हि। ओ अपन काज एकटा नीक प्रोफेसनल जकाँ सम्पादित करैत छथि जाहि मे संस्कृत कम हिन्दीए बेशी रहैत छैक। एकटा आमंत्रित बूढ़ व्यक्ति हुनका टोकैत छथिन्ह “ पंडितजी, हिन्दी मे जे अर्थ बुझेलियैक से तँ नीक लागल मुदा संस्कृत मे पूजा पाठ’क विशेषता किछु भिन्ने छैक। हमरा बुझने तँ संस्कृते वेशी रहितैक तँ नीक।” पंडितजी बड़े संयत भावे ँ हुनका कटलखिन्ह “एतए प्रायः साठि सत्तरि लोक छी। बताउ कते गोटे संस्कृत बूझैत छी ?” सब चुप। पंडितजी आगू बजलाह “ देखू देववाणी सँ लोकवाणी वेशी प्रमुख होइत छैक। इएह बात तँ कवि विद्यापति कहि गेलाह। जे बुझियैक सएह वाणी। नहि तँ हम संस्कृत मे पूजा करी आ कि तमिल मे, दूनू एक्के।” नवका पंडितजी अपन पांडित्यक प्रभाव बना लेलन्हि। हमरा ई देखि खुसी होइत अछि जे अपन प्रपितामह’क पंडिताइ के किछु अंश जरूर दिलीप कुमार जी बचा रहल छथि। ओना हमरा ई नहि बूझल अछि जे देववाणी’क ई परिवर्तित रूप स्वर्ग मे विराजमान पंडित संस्कार नाथ मिश्र के ँ केहन लागल हेतन्हि।
२ नवेंदु कुमार झा बिजलीक क्षेत्र मे आत्म निर्भरताक लेल सरकार कऽ रहल प्रयास बिजलीक संकट झेलि रहल बिहार के अगिला पांच वर्ष मे आत्म निर्भर बनैबाक लक्ष्य राखल गेल अछि। एहि वास्ते सरकार पुरान बिजली घरक मरम्मति संगहि नव बिजली घर बनैबाक दिस डेग उठौलक अछि। ऊर्जा मंत्री विजेन्द्र प्रसाद यादव जनतब देलनि जे प्रदेश मे एखन बिजलीक पैघ कमी अछि। सरकार एहि दिस डेग उठा रहल अछि। पुरान बिजली घरक मरम्मति आ नव बिजली घर सेहो बनाओल जा रहल अछि। एकर अलावा बिजलीक खरीदक लेल निजी कम्पनी सभ सॅ पैघ अवधिक समझौता कयल गेल अछि। उम्मीद अछि जे अगिला तीन वर्ष मे प्रदेश के मांगक अनुरूप बिजली भेटय लागत। सरकारक प्रयास अछि जे अगिला पांच वर्ष मे मांग सॅ बेसी बिजली उत्पादन कयल जाय। ओना प्रदेश मे गोटेक 3500 मेगावाट बिजलीक आवश्यकता अछि। केन्द्रीय पुल सॅ बिहार के गोटेक 1300 मेगावाट बिजली भेटि रहल अछि। श्री यादव जनौलनि जे वर्तमान स्थिति सॅ निपटबाक लेल खुलल बजार सॅ बिजलीक खरीद कयल जा रहल अछि। सरकार प्रदेश मे तीनटा नव बिजली घर बनाओल जा रहल अछि। औरंगाबाद नवीनगर मे एनटीपीसीक संग 2000 मेगावाटक बिजली घर बनाओल जा रहल अछि जे 2015 धरि चालू भऽ जायत। एहि ठाम सॅ 75 प्रतिशत बिजली बिहार के भेटत। बरौनी आ कांटी स्थित बिजली घटक क्षमता बढ़ाओल जा रहल अछि। कांटी मे 195 मेगावाटक आ बरौनी मे 200 मेगावाटक दू-दूटा इकाई स्थापित कयल जा रहल अछि। प्रदेश के बिजली संकट सॅ मुक्ति देयैबाक लेल सरकार पुरान बिजली घर सभक मरम्मति सेहो करा रहल अछि। एहि दिस तेजी सॅ काज भलि रहल अछि। उम्मीद अछि जे अगिला वर्षक अंत धरि कांटी आ बरौनी बिजली घरक मरम्मतिक काज पूरा भऽ जायत। एहि सॅ प्रदेश के गोटेक 400 मेगावाट बिजली भेटत ओतहि सरकार आब खुलल बजार सॅ सेहो बिजलीक खरीद कयल जा रहल अछि। मंत्री जनतब देलनि जे सरकार एनटीपीसी आ अदाणी पावर सॅ बिजली खरीद रहल अछि हालांकि एहि वास्ते सरकार के प्रति यूनिट 4.10 टाका बेसीक दाम लागि रहल अछि। पैघ अवधिक बिजली खरीदक समझौता सेहो कयल गेल अछि। एकर अंतर्गत तिलैया स्थित रिलांयंस पावरक मेगा थर्मल पावर प्रोजेक्ट सॅ बिजली खरीदक निर्णय लेल गेल अछि आ लातेहार स्थित एस्सा पावरक निर्माणाधीन बिजली घर सॅ 1000 मेगावाट बिजलीक खरीद कयल जायत। प्रदेशक कारोबारी बिजलीक क्षेत्र मे सरकार द्वारा कयल जा रहल प्रयास सॅ खुश छथि। हालाकि किछु कारोबारी बिहार राज्य विद्युत बोर्डक पारेषण क्षमता पर प्रश्न चिन्ह ठाढ़ कऽ रहल छथि। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। १.अमित मिश्र- बाल गजल: कोमल करेजक आखर २.मिहिर झा- बाल गजल १ अमित मिश्र बाल गजल: कोमल करेजक आखर
आइ समाज के भेद-भाव ,ऊँच -नीच . जाति-पाति गसिया क' पकड़ने अछि । सब काज मे छल-कपट भ' रहल अछि मुदा इ जातिसँ अलग एकटा और जाति अछि । जहिना गाछमे अरहुल-गेँदा -गुलाब आकर्षित करैत अछि ओहिना इ जाति समाजक सब वर्ग के चुटकी मे अपन बना लैत अछि । इ ओ जाति अछि जै सँ जँ लोकक वश चलत त' कहियो बाहर नै हएत । इ जाति अछि "बाल जाति" । एहि दुनियासँ फराक बाल-मोनक एकटा अलगे दुनियाँ अछि । एत' ए .सी बला कार त' नै मुदा घुरकुन्ना अछि , एत' पुआ -पकवानसँ बेसी स्वादिष्ट तिलकोर पातक पूरी . जनेरक कुट्टी के तरकारी आ बालुक चिन्नी अछि । एहि दुनियाँ मे खेलक अंदाज अजुबा अछि , खेल बेसी अछि आ सबसँ बेसी अछि आपसी प्रेम । कोनो खेल होइ मिल-जुलि क' खेलै छथि । कखनो बाबा जकाँ खैनी चुनाबै छथि त' कखनो मास्टर जीक नकल करै छथि । कखनो हँसैत ,रूसैत छथि त' कखनो रूसल मे हँसै छथि । हिनकर हँसनाइ , कननाइ ,रूसनाइ , खेलनाइ सब नीक लागै छै आ इएह कारण छै जे लोक एहि दुनियाँ मे बेर-बेर आब' चाहै छथि । आखिर किएक नै औता , कहल गेलै यै ,"बच्चा भगवानक रूप होइ छथि ।" जहिना भगवानक महिमा अपार छै तहिना बाल मोन के कोनो सीमासँ नै बान्हल जा सकै यै । बाल मोन के शब्द मे बन्हनाइ जतबे आसान छै ओतबे कठीन सेहो छै ।बच्चाक करेज बड कोमल होइ छै तेँए एहन बात लिखबाक चाही जैसँ हुनक मोन प्रसन्न होइ , जे ओ सब दिन अपन दैनिक जीवन मे करै छथि । दोसर बात हम कह' चाहब जे बाल-विधा के सदिखन आशावादी हेबाक चाही ।
किएक त' जँ नेनपन सँ आशा लागल रहतै त' जीवनक सब वाधा के हँसैत-खेलैत पार कएल जा सकै यै । बाल विधाक शब्द सदिखन सरल हेबाक चाही । एहन पाँति जे सरल होइ आ जल्दीए भाव समझ मे आबि जाई . बाल मोन के क्षण मे प्रसन्न क' दै अछि । संगे जँ राइम्स मे लिखल गेल होइ त' नेनाक जीभ पर एहन चढ़त जे वयस्क भेलोपर नै उतरत । ऐ के लेल गजल उपयुक्त विधा अछि किएक त' गजल मूल रूपसँ राइम्से के खेला अछि । काफिया , रदीफ सब तुकान्ते के पालन करैत अछि । हरेक दोसर पाँति एहि नियम के पालन करैत अछि । कविता मे पाँतिक संख्याँ निश्चित नै अछि मुदा गजल मे कमसँ कम दस टा पाँति हेबाक चाही आ एते पाँति के इयाद करब कठीन नै अछि । एकटा बात और मोन राखू जे बाल-गजल मे गजलक व्याकरण मे कोनो परिवर्तन नै होइ छै । बाल-गजल मे मतल , मकता , काफिया , रदीफ आ बहर ओनाहिते रहतै जेना वयस्क गजल मे रहैत अछि । बाल मोनक सटीक आखर लिखबाक लेल , आँखि मुनि अपन नेनपन इयाद करू , इयाद करू जँ अहाँ की सब करै छलियै नेनपन मे , आ जे दृश्य देखाइ पड़ैए ओकर गजलक रूप मे शब्दबद्ध क' लिअ , नै त' अपन आस-पड़ोसक नेनाक आचरण देखू हुनक दैनिक क्रिया देखू , ओ की करै छथि देखू आ ओकरा शब्दसँ बान्हि लिअ । बाल मोनक कोनो सीमा नै अछि तेँए जे मोन अछि से लिखू मुदा शब्द सरल राखू । अपन रचना मे ग्यान-विग्यानक तड़का लगाबैत रहू आ कोमल करेजक आखर रचैत रहू । २ मिहिर झा बाल गजल कसीदा केर एक हिस्सा होएत छैक "नसीब" | "नसीब" मे कवि के केन्द्रविंदु ओकर अदम्य चाह, ओकर अपन प्रेमिका सों अगाध प्रेम, अपन प्रेमिका सों विरह आ ओहि विरह सों उत्पन्न असह्य विरह पीडा | एहि "नसीब" से जन्म भेल गजल के | गजल शुरुआत मे आ बहुत दिन धरी एहि विषयवस्तु (सृंगार, प्रेम,विरह आदि) पर आधारित छल | भौतिक रूप से छोट रहबाक कारण आ मनुखक सब सों आकर्षणक विषय वस्तु रहबाक कारण गजल सब से लोकप्रिय भ गेल आ धीरे धीरे कसीदा मृतप्राय भ गेल | गजल जखन विकसित भेल, सृंगार, प्रेम आ विरह के अलावा अपना मे नव नव आयाम जोडैत चल गेल | सामाजिक, भक्ति, राजनीतिक, व्यंग्य एकर अंग बनैत चल गेल | एतबहि ने, ई फ़ारसी, अरबी, उर्दू होइत अँग्रेज़ी आ आन पश्चिमी भाषाक संग हिन्दी, मराठी, गुजराती आ मैथिली मे अपन आत्मा के अक्षुण्ण रखने अपन रूप परिवर्तित करैत चल गेल |गजल के प्रभाव एतेक तीक्ष्ण रहल जे भाषा कोनो होउक, लोकक करेज मे ई सीधा स्थान बना लेलक | मैथिली गजल मे किछु मास पूर्व ग़जालकार लोकनि एक टा नव प्रयोग शुरू केलन्हि - "बाल गजल" | हमरा ज्ञातव्य मे एखन धरी कोनो भाषा मे बाल विषय वस्तु पर गजल नहि लिखल गेल अछि | शायद ई प्रयोग मात्र मैथिली गजल मे पहिल बेर शुरू भेल आ विदेह पर बहुत रास बाल गजल लिखल आ सराहल गेल | ई बाल गजल सब सरल वार्णिक बहर आ अरबी बहर दुनु मे समान मात्रा मे लिखल गेल | किछु बाल गजल बच्चा लोकनि के एतेक प्रिय लगलन्हि जे ओ सब अपन धुन मे ओहि गजल के घर पर गुनगुनाबय लगलाह | गजल के कोनो भाषा मे प्रवेश कय अपन स्थान बनेनाइ आब बहुत महत्वपूर्ण घटना नहि रहि गेल | लेकिन गजल विधा मे नया आयाम देनाइ एखनहु महत्वपूर्ण घटना छैक आ मैथिली और विशेष कय विदेह लेल ई सम्मान के वस्तु छैक जे ई गजल मे ई नव आयाम अनलक | सब बाल गजलकार के हार्दिक अभिनंदन आ धन्यवाद विदेह के जे बाल गजल विशेषांक निकाललथि | ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। श्री राज यात्राीक कवितामे गाम स्थानीयतासँ सार्वभौमिकता तकक निरंतर कविता-यात्रा केनिहार, लेखन आ देखनमे अति साधरण लगनिहार अति विशिष्ट, असाधारण आ अप्रतिरूत कविक नाम-ए यात्री। श्रेष्ठतम रचनाकारे नै श्रेष्ठ नवमानवतावादी युगक उन्नायक, उद्गाता आ शलाका पुरूष। यात्रीक कविता गम्हारिक शील भेल करैए जे देखबामे तँ सभसँ अनुपयोगी लकड़ी पिट्ठाक समतूल लगैए मगर उपयोगितामे एके ठाम विविध काठक गुण आ वैशिष्ट्य उपलब्ध करा दैए। कोनो अतिरिक्त मानस संवेदनक बिना। हुनकर कविता सभक लेल भेल करैए। जत्ते आ जतबे जकर ग्राह्यता आकि अभिरूचि। जै तीमनमे अपने स्वाद गुण छै, ओइमे बेसी मर-मसल्लाक कोन खाँहिंस। जे वास्तविक रूपमे बिना अतिरंजनक ‘सत्यम्’ छै ओ अनारोपित ‘सुन्दरम’ हेबे करतै। ज्ञान आ अनुभवक काशीमे लोक अस्सी बरिस सोझे बिताइयो लेत तैयो कि दूनूमे सँ किछु बिना प्रयासक थोड़बे भेट सकतै। तैं बहुतो भौतिक प्राप्तिक भट्टीमे भँाडे़टा झोंकैत रहि जाइ-ए। बर्तज बाबा यात्रीयेक ‘चानन बुझि देहमे किदन लेपैत रहि जाइए’ आकि कथीदन पर फूल-घी चढ़ा-औंसि पुण्य लाभक दुराशा आ भ्रमक परसादी लेने घुमि-फिरि अबैए। यात्राी बाबा अपन कथ्यकेँ कोनो सँाचमे गढ़ि कऽ पाठकक आगू नै राखि सोझ-सोझ बिना कोनो रंग-टीप क उपस्थित कऽ दै छथि, तैं पाठक हुनकर कविताक कथ्यसँ सोझे जुटि जाइ छथि। आलंकारिकता आकि कल्पनाशीलतामे बोरिया पाठक बाम-बूच नै जा सकैए। यात्री अपन कवितासँ सम्पूर्ण रूपसँ मिथिलांचलक किसान आ गमैया मजदूर आ मुख्यतः ओही नजैर सँ पूरा भारतीय समाज केँ ओकर प्रबलता आ दुर्बलता संग देखैत उजागर करै छथि। तैं हुनक कवितामे वर्णित सामग्री सोझे समाजसँ ओतऽ गेल रहैए आ हमरे बात कहैए। अपन परिवेश आ अपन संवेदना द्वारा यथार्थकेँ टोहियेबाक एगो चेष्टा यात्राीक कवितामे सभतैर भेटैए। जिनगीक यथार्थ सँ सरोकार रखनिहार एगो खँाटी रचनाकार मात्रा ऐन्द्रिक सुन्नरते केँ नै चित्रित करैए अपितु ओ जिनगीक कुरूपताकेँ सेहो अँाकैए। ओजह ई छै जे जिनगीमे सभ किछु सुढब-सुन्नरे नै छै। ओइ जघ सुन्नरताक पीठ-पाछू कुढब, चँाछल आ धोखाधरियोक अस्तित्व छै। यदि एक दिस गामक अपार आ असीमित सुन्नरता छै तँ दोसर दिस गाममे बसनिहार लोक टोला-परोसक उधेसल- पुधेसल, उजरल-अपटल जिनगीक दर्दनाक कुरूपता सेहो। एतेक थाकल-हारल आ थकुचल जिनगी कि सुखक सभ बात गामक रहरहँा लोकक लेल रूप कथे बुझाइत रहै छै। फेर मुट्ठी-दू मुट्ठी भात आकि किछु टुक्का-साबुत सोहारी आ दालि कि तीमनक झोर जुमि गेलापर ओ दिल्लीक दरबार आकि रंगमहलक सुध किए लेत? यएह तँ अछि ऐ जिनगीक असीमित विरोधभास। यात्री अपन कविताकेँ ग्रामीण परिवेश आ अपन संवेदना द्वारा यथार्थ केँ देखैक प्रयास निरंतर करै छथि। सभसँ खास बात तँ यात्राीक कविता मे ई ऐ जे ओ कविकर्म केँ प्रतिष्ठामूलक नै, अपन विशिष्ट संवेदनशीलताक दायित्व पूर्वक व्यवहार करब मानैत रहल छथि। यात्री जेहन काव्य युगक निर्माण केलनि, ओकर तरूमे नै जा बेसी रचनाकार ओकर आकृतिकेँ स्वीकार आकि खारिज करैत रहलाह। ऐ फाँटक रचनाकार लग गामक अति जरूरी मुदा उपेक्षित थीतिक खबैर तँ रहै छनि बलू गोबर केँ गणेश आकि पाथर केँ भगवान बनेबाक मुद्रा आ चेष्टामे। यात्रीक कवितामे पाथर बनि गेल लोकक सुधि आ संधान भेटैए। गाम घुरू (भुसपुतरा) आकि ठठरीक ‘फोटो’ जेकँा हुनकर कविता मे नै अबैए। जेतऽ यथार्थ युग-सत्य बनि जेबाक ओजह सँ विज्ञापनी मंडीमे थोक रूपसँ उतरैए जरूर, बलू ओइमे नै तँ गामक आम जनक थीते उजागर भऽ पबैए, आने खास लोकक चरित्रो उघारल-उधेसल जा सकैए। जहिना वर्तमान समयमे वैश्विकता सुनबामे तँ वसुध्ैव कुटुम्बकम् अथवा मार्क्सक दुनिया भरिक मजदूरक एकताक आह्वान सन उदात्त बूझि पडै़ए बलू क्रिया आ असैर मे एकर विपरीत एक छत्रा साम्राज्यवादिक सूत्र सौन्दर्यवादी सुकुमार कविक गाम सँ फराक यात्रीक गाम तखने ऐ जे मूल रूप सँ किसान आ खेत-मजदूरक पक्षधरता हिनकर कविताक गामक प्रतिबद्धता ऐ, कोनो ‘फैशन’ नै। आ अही ओजह सँ अपन जिनगीक सभसँ कम, जटिल आ आरंभिके काल खंड अपन जनमथान तरौनी मे बितबितो हुनक कवि ओकर गुरूत्त्वाकर्षण सँ मुक्त नै भऽ पबैए। देश-विदेश सभतरि सर्वाधिक रहनिहार ई यात्री कवि कोनो शहरी उद्यान; पार्कमे ब्योंतल आ करतब, ड्रिल कराओल मौसमी फूल आकि पत्ताबहार, क्रोटन क चाक-चिकपर आकृष्ट नै होइ छथि बलू ओत्तौ गामक चर-चाँचरमे अगराइत भेंट-कुमुदिन, माछ-मखान, लीची आ आम सभ कथूक नैसर्गिक सुन्दरता केँ नै बिसरि पबै छथि- कत्ते दीब लगैए हमरा अपन ओ तरौनी गाम। मोन पड़ैए लीची आ आम। मोन पडै़ए कुमुदिनी आ ताल मखान। गाम सँ दूर रहबाक कचोट स्पष्ट रूप सँ व्यक्त करैत अपन विवशताकेँ फरिछाकऽ रखै छथि यात्री अपन कवितामे। खाहें तन सँ कतौ रहथु बलू मोन मैथिल जातीय भारतीयता सँ हेंठ नै भऽ पबैए। होइ कोनहुँ ठाम। किछु भै जाइ। रही बहुतो दूर वा लगीच। बंधुगण बरू दुरदुराबथु किंतु। जननि राखब भाव अँह जननीक। एकरा आर फरिछाबैत एक ठाम ओ कहै छथि- किंतु की हम बिसैर पाएब। तरौनी सन गाम? गड़हरा सन आम? दीदिक इनारक पानि। अपन पोखरिक ओ ठुट्ठ पातर जाठिं।... धनरूर बाध कोसक कोस। हुनकर अनुराग सिन्दूर तिलकित भाल पर केन्द्रिते रहैए। आकृष्ट करैए कवि केँ नेनाक थोंथ हँसी, जेकरामे महज सुन्नरते नै, संजीवनी शक्तिक संचारक छेमता ओ पबै छथि। अहल भोरे जाड़ मासमे गाममे ओरियाओल छूराकेँ तपैत, जिनगीक सुख-दुःख मादे निष्कपट बतियैत, घूराक सोन्हगर गमैया गंधक पता ओहन आत्मीय भाव सँ कोनो यात्राीये सन माटि-पानिक कवि केँ भऽ सकै छै। आंचलिक बोलीक मिज्झरक, मिक्सचर अर्थात् संकीर्णता सँ हेंठ अनगढ़ बोली कोनो कवि यात्राीयेक कान जुरा सकै छै। जूता-मोजाक टीप-टाप पर नै ठेला आ बेमाय फाटल गोर पर कोनो कवि यात्राीयेक नजैर जा सकै छै। दू-गो बिम्ब जे खँाटी गमैया ऐ, आम लोकक आशा-आकंाक्षाक प्रतीक ऐ- दूधिया शीश आकि बालि ओ श्रमक फलाफल सोनिम पाकल शीश अधिक ठाम श्रमक गायक ऐ कविक कविता मे अबैत रहै-ए। वर्तमान व्यवस्थापक प्रतीक ध्ूरू (भुस्सा भरल झामलाल बिजुका) क माध्यम सँ तँ कवि पूरा व्यवस्थापक चरित्र ओ थीत केँ बेपर्द करै छथि। चेतना हीन जनतंत्रक मालिक जनता साकांक्ष नै भऽ गफलैत मे पड़ल रहैए आ ओकर ओगरबारू प्रतिनिधि अपनेमे टर्र भाँजटा पूरैत रहै-ए। उपरका जँ सरङमे बिचरैत रहैए तँ निचलका दिन-दिन पताले धँसल जा रहल-ए। दूनू फँाट अपचक शिकार। बेसी कदन्न सँ तँ कम अधिक पौष्टिकता सँ। प्रतिनिधिक मगज आ करेज मे भुस्सा भरल बुझा पडै़-ए जै पर खद्धर, स्वदेशीक आङरक्षक खाल चढ़ल ऐ। अकालक ओजह सँ स्वतंत्र गामक अस्सी प्रतिशत लोकक त्रासदीक केहन सजीव चित्र यात्राीक कवितामे संभव भेल ऐ-’ बिना पजारक मन्हुवाएल चूल्हि, कामहि जँात-चकरी, अन्नदाताक संग समान जिनगी बसर तै त- बरतैत आश्रिता कनही पिलिया, लाभर-जीभर अहरा प्राप्त केनिहार गिरगिट, मूसआ कौवा सभक उदासी, हतासी आ फेर आंशिक जरूरैत पूर्ति सँ टुकटुकाएल ओकर सभक चेष्टा आ चुहुल केँ भला कोन ‘फेन्सी’ कवि एते कममे एते विराटताक संग प्रस्तुत करबाक सामरथ राखि सकैए। भाखा केँ हम अभिव्यक्तिक माध्यम टा मानैत रहल छी तैं यात्राी आ नागा जनमे अंतर करबामे असोकर्जक अनुभव करैत छी। मूल वस्तु तँ छिऐ कथ्य। गोल कऽ दियौ तँ लालमोहन, नाम तँ गुलाबजामुन। हलवाइ तँ एकेगो- यात्री कहियौ कि नागार्जुन। गरीब-गुरबा, किसान आ मजूरक आत्मीय समाङ। कतौ पं वैद्यनाथ मिश्र नै कलगणारक रूप मे। मनुख तँ वास्तविक रूपमे अगबे मनुखेटा रहै छै। दोखी तँ भेल करै छै कोनो व्यवस्था माने संचालन तंत्र। जँातक काज छिऐ पिसनाइ। अखियासबाक तँ एतबे छै कि ओइमे ढारल की जा रहल छै- कोदो-मरूवा आकि चाउर-गहूम। सद्यः व्यवस्थाकेँ खेलौड़िया मुद्रामे लुल्हुवा देखेबामे बाबा यात्राी-नार्गाजुन हिन्दीक माध्यमसँ भाव व्यक्त्त केनिहार किसान कवि त्रिलोचन आ केदारनाथ अग्रवालो सँ सहज आ पटु देखनामे अबै छथि। जनसंकुल टीसनो पर कवि गामेक अँाखिक प्रयोग करैत देखल जाइ छथि। ओइ लोक वरक अपार भीड़ोमे लोक-मन अर्थात निम्नवर्गीय ग्रामीणे परिवेशक दुरगमनियँा कनियँा-बरे पर कविक अँाखि जाइए। पारंपरिक रङल-टीपल बाकस पर ओङठलि घोघ-मरद काढ़ने नवकनियँा आ ओकर रछिया लेल बहाल लोकनियाँ चानीक टकहीक हर पहिरने, माङुर माछ सन काठी आ सिमरताइवाली आँखिसँ गामेक अनगढ़ सुन्नरताक पारखी कोनो कविक अँाखिटा देखि सकैए। तेज सबारीक बिरड़ो आ घटाटोपक अछैतो भदबारिक भीजल घोंघा सन (सूक्ष्म गमै उपमा) मंद ससरैत ट्रामे पर कविक अँाखि जाइ छनि। गामक हरेक मोर्चा पर यात्राीक कवि साकंक्ष ठाढ़ भेटैए। माटिक सभ स्पंदन हुनकर कवितामे निनादित होइए। तत्कालीन सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक सभ प्रकारक विद्रूपताक खबैर यात्री लैत चलैत छथि, संगे गामक सम्पूर्ण जिनगीकेँ रूपायित सेहो करै छथि। गामक लोकक सभ आशा-आकांक्षा, दुःख दरेग, हँसी-खुशी, सौन्दर्य-कुरूपता, जय-पराजय, उत्थान-पतन, कमजोरी-मजगूती, समटा समभाव सँ हुनकर कविता-यात्रा मे सरीक रहैए। कविकर्म हुनकर धर्म छनि, जिनगीक मर्म छनि। कतौ लौल, सौख आकि प्रदर्शनकामिता नै। यएह ओजह ऐ जे प्रगतिशीलताक प्रर्दशन मे ओ अपन मैथिल समाजक ;स्थानीयताक सभसँ ज्वलंत आ अपरिहार्य समस्या वैवाहिक दुर्गुण सभसँ सेहो मुँह नै मोडै़ छथि। ‘यत्-यत् पिण्डे, तत् ब्रह्माण्डे, स्थानीयता सँ सार्वभौमिकता हुनक आदर्श बुझा पडै़ए। सरजमीन सँ कटि अकासक गप्प कखनौं नै। तैं मिथिलांचलमे व्याप्त बेमेल बियाह, बहु बियाह आदि दुर्गुण सार्वभौमिकताक हुनक विशद दृष्टिक अछैतो ओत नै भेल ऐ। तत्कालीन मैथिल समाजक खाहें बेमेल बियाहक स्पष्ट चित्रण हो आकि चरित्रक उद्घाटनक संग तहियाक पेशेवर घटकक सजीव आकलन जेना यात्रीक कवि कऽ सकल ऐ, निस्संदेह मिथिला केन्द्रित आन कोनो कवि सँ संभव नै भऽ सकल। संस्कृतिक एहन सम्यक आ निठुर व्याख्याक संयम अंतऽ कतौ भेटब दुर्लभ। गामक-घर, माटि-पानि सँ केहन संव्यक्त्त छला ओ एकर परिचय तँ सुगमताक संग जेतऽ–तेतऽ भेटते ऐ, तैयो बानगी सरूप किछु पतियानी उदघृत करबाक इच्छा केँ नै रोकि सकबाक विवशताक संग एतऽ राखऽ चाहै छी जे बाल-विधवाक दुःख दैन्यकेँ सूक्ष्मताक संग उजागर करैए ‘‘भुस्साक आगि जेकँा नहूँ-नहूँ। जरै छी मने-मने हमहूँ। फटै छी कुसियारक पोर जेकँा। चैतक पछबा मे ठोर जेकँा। काते रहै छी जनु घैल छुतहर.....।’’ यात्राी अपना केँ कतौ विशिष्ट नै, अपन कवित्त्व केँ सामान्ये मानैत रहल छथि। जहनि कि सभ मतक माननिहार सारस्वत चेतनाक सर्वोपरि सिद्धि मानैत रहल छथि, तेनाहितियो मे यात्री अवसरक अनुकूलते केँ आने सफलता जेकँा सर्वोपरि मानै छथिथ। परम मेधवी कते बालक जेतऽ। मूर्ख रहि गायटा चरबैत छथि। .......कालिदास कते। विद्यापति कते। छथि हेरायल महिंसबारक हेंड़मे। यात्राीक शिल्पी गामक ‘कमर्शियल’ सौन्दर्य केँ प्रस्तुत करब मात्र अपन अभिष्ट किन्नौं ने रखने ऐ। ओ यथार्थक एहन समतल भूमि तैयार करैत चलै छथि कि ओ अनायास ‘सुन्दरम्’ भऽ कवितामे प्रकट भऽ जाइए, वनफूलक महमही जेकँा। जौं एक दिस हुनका फसिलक मंजरीक दुर्लभ महमही अभिभूत करै छनि तँ दोसर दिस जेठक तिक्ख आतप केँ सहैत कृषि कर्म मे साधनारत बीया बाउग केनिहार हाथ ओ मुँहक दूरीक सुरता सेहो सतबैत रहल छनि। ग्रामीण क्षेत्र दऽ’ बुलैतहैत तीरभुक्त्तिक माला हुनका नै सिहाबै छनि। थलहा कृषि –कर्मसँ लऽ जल-कृषक मलाहक जिनगी तकक शैली ओ संास्कृतिक चेतनाक सूक्ष्म ज्ञान बाबाक ओतऽ जतबा ऐ, आनठाम एहन आ एते दुर्लभ ऐ। एकर संगे नदी सभक प्रलयंकारी ताण्डव आ ओइसँ उपजल ओबा-टुनकी, मरकी-फौती सँ सेहो छगाइत छथि बाबा यात्री। एकर विभीषिका सँ कोन फाँट पर कोन असैर पडै़ छै नीमन जगती बूझल छनि कवि यात्राीकेँ। एकेगो थीत केना ककरो गोटी लाल करैए, ककरो उफँाटि तँ ककरो पबन्नी लगबैए आ ककरो खेले उसरि दैए। सहज सपर्द भाखामे विराट शब्द अभिव्यंजना जे यात्राीक ओतऽ भेटैए ओ कोनो खँाटी ग्रामीणे संस्कारक कवि ओतऽ संभव छै। नव निर्मित मुलकी व्यवस्थाक प्रति मोह- भंगक मादे स्पष्ट आ संधानल कसगर चोट करितो फूलगेना सँ प्रहारक मुद्रा ऐ महान कविक अपन विशेषता रहल-ऐ। यात्री अपन लोकदृष्टिकेँ गमैया संस्कारक ओजहसँ घोघटामे बादरिक चान सन भँापि, अपवाद थीतिकेँ छोड़ि, प्रस्तुत करैत रहल छथि जे निश्चित रूपसँ ग्राम्य संस्कारेक असरि ऐ। स्वदेशी त्रुुटिपूर्ण आ जंगलशाही वर्त्तमान व्यवस्थापक प्रति मोहभंग केँ यात्री सोझ-सहज हाड़ तक छूबऽ बला शुरमे व्यक्त्त करबाक सामरथ रखै छथि तै पर थोड़ेक दीठि देल जाय - चानन बुझि हम किदन लेपल देह मे। वाहरे ! महान कविक शब्द अभिव्यंजना। आम लोक केँ उमेद रहै चाननक शीतलताक, बलू भेटलै वएह निर्घिन अवशिष्ट-नव व्यवस्थाक चरित्र केँ केहन मर्यादित गमइ संस्कारक संग उधेसबामे सफल होइ छथि- पूँछ उठाकर नाच रहे हैं ‘पार्लिया-मेन्ट्री मोर’। बिखिन-बिखिन बिम्बक प्रयोगक अनिवार्यताक अछैतो भारतीय ग्राम्य संस्कारक केहन निर्वहन। अखारा पर दम प्रदर्शन सँ बेसी दम पचेबाक प्रक्रिया बेसी कुशलताक मानल जाइ छै। ई बात भिन्न जे ऐ ग्राम्य सहज चेतना केँ गरियेबाक उदेस सँ गमार आकि भदेसी विशेषण सँ अभिहीत किए ने कएल जाउक। यात्री नव मानवताकेँ आकृतिक आधार पर छोट-पैघ आङुरक छपाटि हाथकेँ सुरुब बनेबाक दलील देनिहार मिथ्याकार सभक फाँटक नै भऽ सकै छथि, ओजह जे हाथ ‘स्वस्ति-स्वाहा’ सभ कथूमे सक्षम आ मूल भेल करैए जहनि कि सुरूब अनुकृति मात्र। ओ कोनो प्रणालीक संचालनक सामरथ नै राखि चमचा चालन मात्र कऽ सकैए। साम्यक अर्थ युगकवि यात्री सभंजन जेकि भारतीय दर्शनोक मूलाधार ऐ, सएहटा लगबैत रहल छथि। कोनो वायवीय अर्थक आधारपर सत्यकेँ खारिज करबाक कुप्रयास ओहन महामना कवि भला किए करत? एतावता जनवादी चेतना आ ग्रामीण सौंदर्य-बोध महान कवि यात्राीक जिनगीक सहज उच्छवास आ ऊर्जा, करेजक ध्ुकध्ुकी आ धमनीक प्रवाहित रक्त्त रहल ऐ। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। मुन्नाजी विहनि कथा संसार अदौ कालसँ चलि आबि रहल अछि कहबाक परिपाटी। कहबाक लेल समाद होइ छै। मुदा ओ क्षणिक सूचना मात्रा होइछ। कहबाक बेगरताक मूलमे यदि कथ्य वा कथानक हुअए। कहबाक लेल समादक विस्तार हुअए ओ कोनो फलकपर विस्तार लऽ कहऽ बलाक पूर्ण विचारकंे संप्रेषित करए, सएह कथाक नाम पबैछ। कथा एक लोकसँ दोसरा लोक धरि एक पीढ़ीसँ दोसरा पीढ़ी धरि मौखिक रूपेँ हस्तान्तरित होइत रहल। से तहिया भेल जहिया लिखबाक जनतब वा सरंजामक अभाव छल। कथा लेखनक प्रारम्भमे कथ्यकेँ सोझाँ-सोझी राखि देल जाइत छल। ओकर मूल बातकेँ बढ़ा-चढ़ा प्रस्तुत कएल जाइत छल, मुदा हुबहु। जेना पहिने मौखिक हल तकरे प्रतिरूप। ई प्रतिरूप समायन्तरे क्रमिक स्तरपर परिवर्तित होइत रहल। कथाक लेल अंग्रेजीमे स्टोरी शब्द अछि। आगू एकरा गढ़बाक प्रक्रिया आ पछाति मढ़बाक प्रक्रिया शुरू भेल, जे शैलीक रूपेँ सोझाँ आएल। फेर विकासक क्रमे एकरा अगिला चरणमे एकटा औसत सीमामे बान्हल जाए लागल, ओहो कथा रहल मुदा अंग्रेजी शब्द परिवर्तन कऽ नाम फरिछाएल शॉर्ट स्टोरी। मैथिली सहित अन्यान्यो भाषामे शॉर्ट स्टोरीक शाब्दिक अर्थ लघुकथा कहि प्रारम्भ भेल छोट-छोट कथा रचना। आ ओइ लघुकथाक छोट आकारकेँ सेहो लघुकथाक नामे लिखल आ प्रकाशित कएल जाए लागल। आब लोककेँ व्यस्ततामे ई छोट-छोट कथा सोहाए लगलै। आ पाठकीय उत्साह रचनाकार मनोबल बढ़बैत आत्मविश्वासकेँ दूना केलक। परिणाम स्वरूप ध्ुरझार लिखाए लागल अतिलघुकथा। ‘लघुकथा’ अछि हिन्दी भाषासँ लेल गेल शॉर्ट स्टोरीक उधारी शब्दकोषीय अनुवाद। तकर कारण रहल-पहिल, एकटा नव विधा देखिते मैथिली रचनाकार सब देखाउँसे लिखऽ लगला छोट अकारक कथा। दोसर, जेना हिन्दी साहित्य लेखन अंग्रेजी साहित्यसँ प्रभावित हेबाक संकटसँ उबरि नै पबैए तहिना मैथिली साहित्य रचना, विदेह मैथिली साहित्य आन्दोलसँ पहिने, बहुत लग धरि (पूर्णतः नै) हिन्दी साहित्य लेखनसँ आच्छादित छल। तेँ मैथिली रचनाकारकेँ कखनो एकर मैथिली शब्द जेना हिन्दीक ‘कहानी’ मैथिलीमे ‘कथा’ अछि, (हिन्दीयोमे ठाम ठीम स्टोरीकेँ ‘कथा’ शब्देँ प्रयुक्त देखल जाइए) से नै फुराएल हेतन्हि। तेँ ओ अपने अतिलघुकथाकेँ लिखैत रहलाह लघुकथा। ईहो सोलह आना सत्य अछि जे ई नव विधा जहन मैथिलीमे हस्तान्तरित भेल तखन सनातनीये अतिलघु आकार-मात्राक कथा छल । एकर विकसित रूप तँ बीसम सदीक अन्तिम दशकमे देखाए लागल। जहन कि तकनीकी शिक्षा वा व्यावसायिक शिक्षासँ लगीच एवं वैश्विक परिवर्तनसँ प्रभावित नवका लोकक नव सोच विकसित भेल। अइ विधाक स्वतंत्र रूपक फरिछौट भेलाक पछाति बेगरता भेल ऐ विधा लेल अपन माटि-पानिसँ जुड़ल, अप्पन भाषिक शब्दक। वर्ष १९९५ मे ‘सहयात्री मंच’ लोहना, मध्ुबनीक साहित्यिक विमर्श प्रस्ताव रखलौं। जकरा हुलसैत सहृदये मैथिलीक कवि, कथाकार श्री राज द्वारा समर्थन कएल गेल। उपस्थित सम जन समवेते स्वीकार कएलनि। उपस्थित जन छलाह- श्री शैलेन्द्र आनन्द, भवनाथ भवन, कुमार राहुल, विजयानन्द हीरा, सच्चिदानन्द सच्चू एवं अन्यान्य। विहनि कथा (सीड स्टोरी), बीज कथा; स्वयंमे कथाक पूर्ण रूप अछि विहनि कथा। ई ने छोट अकारक कथा छी, आ ने कोनो कथाक छेँट। सामान्येतया कथा कतेको बिन्दुकेँ छुबैत बिरड़ो जकाँ उधियाइत पाठककेँ अपन उद्वेश्य कहबामे सक्षम भऽ पबैए। मुदा विहनि कथा माने बीज कथा स्वयंमे संपूर्ण कथा अछि। जे पाठककेँ एक मात्र अपने खुटापर खुटेसल सन राखि अपन उद्देश्यक पूर्णताकेँ एक क्रममे बिकछा लेखकीय मनस्थितिकेँ फरिछा दैए। आ पाठक ओइ सोचकेँ हुबहु मगजमे समा स्थिर भऽ जाइए। विहनि कथा एकटा बीया सन छोट की पैघ संपूर्ण गाछ हेबाक सामर्थ्य रखैए। तहिना विहनि कथा आकारेँ लघु होइतो कथाक सभ पक्ष, कथ्य, शिल्पकेँ एक खास बिन्दुपर समेटि कथाक संपूर्णता प्रदर्शित करबामे सक्षम अछि। जेना बीया पारबाक पछाति अँकुराइए, फेर दुपतिया सन देखाइत एकटा गाछक रूपमे अपन संपूर्णता पबैए तहिना विहनि कथा भूमिका, कथ्यक स्पष्टीकरणक संग सोद्देश्ये गढ़ल आ मढ़ल जाइए आ लेखकक समस्त विचारकेँ छोट आकारमे सोद्देश्यपूर्ण बना उजागर करबामे सक्षम होइए। जेना कोनो बीया अंकुरा कऽ गाछक सभ पक्ष यथा डारि, पात आदिसँ युक्त होइछ एकटा ठुट्ठ गाछ मात्र नै। तहिना विहनि कथा समस्त गुणेँ भरल-पूरल कथा छी। एहेन कथा नै जे दृष्टांत मात्र भऽ ठमकि जाए। एहेन कथा नै जकर कोनो ओर-छोड़ नै हुअए। विहनि कथा एहनो कथा नै अछि जकरा पूरा पढ़लाक पछाति लेखकक लेखन उद्देश्य बुझबाक लेल कात-करोट मुरियारी देबऽ पड़ए। एकर उद्देश्य सोझाँ सोझी फरिछाएल होइछ। विहनि कथा लघु अकारे शुरू भेल। आइ ई लघुकायमे ओइ लघुकथाक एकटा विकसित रूप अछि जे संभवतः मैथिलीमे बीसम सदीक अन्तिम दशकमे अपन स्वतंत्र रूपक वा विधाक फरिछौट करबामे सक्षम भऽ सकल। विहनि कथाक संपूर्णताकेँ ऐ तरहँे कहल जा सकैछ- विहनि कथा कथाक संपूर्ण गुणक संग ओइसँ ऊपर उठि, अपन लघुकायमे समेटल एक निश्चित बिन्दुपर ठाढ़ भेल लेखकक उद्देश्यक पूर्ति करबाक संग पाठकक मगजक भरपूर खोराक अछि। विहनि कथा २१म सदीमे रचनाकार, सम्पादक संग-संग पाठकक बीच सेहो फरिछाएल अछि। तकरे कारण अछि जे आब विहनि कथा छोट गातमे अपन सभ संपूर्णता नेने कागजपर उतरि सोझाँ अबैए। आबक समयमे दृष्टि विहीन नै, दृष्टि सम्पन्न रचनाकार सभ अइ विधाक विकासमे लागल छथि। तेँ ई आब नहिये चुटुक्का कहाइए आ नहिये कथाक छेँट वा दृष्टांत। हम पुनः ई स्पष्ट करैत कहब जे- विहनि कथा ठोस कथ्य, माँजल शिल्पमे कोनो विषयपर वर्णित ओ वौस्तु थिक जे पाठकक मन-मस्तिष्कपर चोट कऽ ओकरा सम्वेदित कऽ चिरकालिक छाप छोड़ि सकबामे सामर्थ्यवान होइए। विहनि कथा, मात्र गुदगुदी करैबला वा चुट्टी काटि बिसबिसी दैबला वौस्तु नै रहि गेल आब। ई रचनाकार आ पाठकक मोनमे समा स्थिर भऽ जाइ बला कथा थिक। आजुक व्यस्त जीवन मध्य लोककेँ कखनो ओतेक पलखति नै भऽ पबै छै जे ओ आब घंटा-घंटा भरि बैसकी लगा एके रचना पढ़ि मोनकेँ सांत्वना देत। क्षण-क्षण बदलैत परिस्थिति, बदलैत छेब-छटा आ तइ हेतु अधिकसँ अधिक अर्थक जोगार मध्य कटि जाइछ लोकक जिनगी। आजुक लोककेँ मीडियासँ क्षण-क्षण नव आ रोमांचित करएबला खोराक भेटि जाइत अछि तेँ साहित्यक प्रति बहुत रूचि नै बाँचब स्वाभाविक अछि। ओना आइयो उपन्यासकेँ खूब पढ़ल जाइछ। मुदा ओकरा आम पाठक मात्रक खोराक नै कहि सकै छी। तेँ रचनाकारकेँ सेहो आब सम्हरि कऽ सशक्त आ अल्प पलखतिक बीच सामंजस्य बैसाबऽ बला रचना करब आवश्यक अछि। रचनाकार, विशेष कऽ विहनि कथाकारक ई पहिल दायित्व बनैए जे ओ समयक संग चलि पाठकक समय संग भेल व्यस्तताकेँ देखि ओज आ सरल भाषिक रचनासँ विहनि कथा संसारमे योगदान सामर्थ्य हासिल करथु। पाठकक आजुक क्षण-क्षण बदलैत परिस्थिति मध्य विहनि कथाकारो जिबैत छथि। तँ ओ यदि आजुक बेहाल अर्थ तंत्र, मशीनी युगक मध्य लोकक मशीन सन हएब परिस्थितिकेँ गसिया कऽ पकड़थु। आ अही परिस्थितिकेँ पाठकक सोझाँ परसि कऽ पाठककेँ मजगूती देबामे अपनाकेँ सक्षम करबाक शक्ति अर्जित कऽ रचनारत रहथु। तहन विहनि कथा, विहनि कथाकार आ पाठकक मध्य सामंजस्य बैसि पाओत। पाठकक प्रत्येक क्षणक व्यस्तता, किछु नव करबाक सनक, अर्थोपार्जनक पाछाँ भगैत रहलासँ उपजल तनावसँ मुक्तिक साधन सेहो अछि विहनि कथा। पाठक जखन सभसँ विलग अल्पावधिक लेल खाली भेटल समयक उपयोग करऽ चाहैए तँ ओकर संग देबामे सक्षम अछि विहनि कथा। ऐ सभ बेगरता पूर्ति करबामे सक्षम विहनि कथा अपन फराक जगह छेकबामे सक्षम भेल अछि। आब विहनि कथाकार जखन समय संग चलि पाठकक मनोस्थितिक अनुकूल रचना देबामे सामर्थ्यवान छथि। ओ अपन पहिल दायित्व पाठकक मोनकेँ भाँपि तदनुकूल रचनासँ पाठककेँ बन्हवामे सक्षम भेल छथि। तहन बेगरता उठै छै एकर मूल्यांकनक। वर्तमानमे एहेन कोनो दृष्टि फरिच्छ समीक्षक वा समालोचक देखार भऽ ऐ विद्यापर काज करबामे सक्षम नै भऽ पौलाह अछि। तकर ठोस कारण अछि बदलैत समय आ परिस्थिति मध्य ओहने सोचक सामंजस्य। जे स्थापित समीक्षक छथि से दू तीन दशक पछातिक नजरिये रचनाकेँ देखबाक प्रयास करताह। हुनका ऐ मे भऽ सकैए किछु नै देखाइन। कारण जे ओ सभ कथाक जइ मूलकेँ देखैत भोगैत एलाह अछि विहनि कथा ओइसँ ऊपरक सोच आ फराक शैलीमे अछि। एकर सत्य आ पूर्ण गात तहिया फरिछाएल जहिया मठाधीश समीक्षक सबहक सोच ओइ कथा, ओकर प्राचीन चरित्र मध्य सन्हिया बैसि गेल। समाजक एकटा समस्या मँहगाइ उदाहरण स्वरूप सनातनी आ चिरायु अछि। ई कहियो खत्म होइबला चीज नै अछि। मुदा तैयो एकर चरित्र आ चेहरा सीढ़ी दर सीढ़ी बदलैत रहैए। आ ओइ संग ओइ मँहगाइक प्रतिफल सेहो ओहिना बदलैत नजरि अबैए। यथा यात्रीजीक कवितामे वर्णित मँहगाइ साहित्यमे चर्चित अछि। आइ ओहेन कोनो नव ठोस रचना मँहगाइपर नै अछि। तहिया लोक भूखे मरैत छल, पेट काटि कऽ जिबैत छल। गदैली ओढ़ि सर्दी कटै छल। आजुक मँहगाइ मध्य कियो भूखे नै मरैए। आ सामान्यो वर्गक लोक कम्मल ओढ़ि आ हीटर जरा सर्दी बितबैए। की ई फर्क सनातनी समीक्षक फरिछेबामे सफल भऽ सकताह? किन्नहुँॅ नै। किएक तँ अइ बदलल स्थितिपर ध्यान देबाक पलखति कहाँ छनि। ओ तँ प्रतिक्षा करै छथि रचनाकारकेँ जुएबाक, रचना चाहे खिज्जा रहि जाउन। कथासँ जुड़ल लोक विहनि कथा मादे विचार कऽ सकैत छलाह। मुदा हुनकर सभक दृष्टि ‘विहनि कथा’क प्रति फरिच्छ नै छनि, उदाहरणतः रंगकर्मी कुणाल, जे नाटकक संभ्रान्त, परिपक्व ज्ञाता छथि ओहो कथापर लिखबा काल विहनि कथाकेँ अस्तित्वहीन कहि बेरा दै छथि। मायानन्द मिश्र मैथिली कथा धाराक मजगूत खाम्ह छथि, ओ लघुकथा (विहनि कथा)केँ चुटुक्काक संज्ञा देलनि। माया बाबूक सोच समीचीन अछि किएक तँ ओ जइ दशकक सोचक लोक छथि तइमे लघुकथा (विहनि कथा) विद्या फरीछ नै छल। तेँ हुनको ऐ प्रति दृष्टि फरीछ नै हएब स्वाभाविक। ओ कथा विकासक आलेखमे लघुकथा (विहनि कथा)क चर्चे केलन्हि सएह बहुत अछि। [मैथिली कथाक विकास नामक आलेख, साहित्य अकादमी दिल्ली सँ प्रकाशित पोथी -‘मैथिली कथाक विकास’- सं. वासुकी नाथ झा, २००३]. विहनि कथा वा कथाकारक मूल्यांकन हेतु विहनि कथाकार स्वयं ऐ दिशामे कान्ह उठाबथि तँ सही मूल्यांकन संभव भऽ पाओत। मैथिली समीक्षाक एकटा कमजोर तत्व ईहो रहल जे ओ रचनात्मक दृष्टियेँ सड़क छाप होइत छथि। फरिछेबाक ई जे ओ अपन गुणगान मात्रा सुनऽ चाहै छथि। आलोचनामे कमी नै वाह वाही हेबाक चाही। जँ समीक्षक द्वारा हुनकर रचनात्मक दोष वा कमीकेँ उघारि सभक सोझाँ कऽ देल गेल तँ समीक्षक भऽ गेला हुनक कट्टर दुश्मन। आ तकर पछाति हुनका, रचनाकारक मुँहे, अज्ञानी, उदण्ड, स्वार्थी आदि संज्ञासँ जानए लागब। ईहो सोलह आना सत्य अछि जे मैथिली समीक्षामे किछु गोटे कृतित्वसँ पहिने व्यक्तित्वकेँ प्राथमिकता दऽ समीक्षा लिखि रइल छथि। तँ जा धरि रचनाकारमे आलोचनात्मक विचार वा कमी सहबाक सामर्थ्य नै हएत, स्वथ्य आलोचना कतऽ सँ टंाग पसारि सकत वा अपन बैसकीपर बैसि अराम कऽ सकत? ओहने किछु रचनाकार सभ द्वारा समीक्षाकेँ ओलि सधेबाक सूत्रक रूप सेहो ठाम-ठीम प्रयुक्त होइत देखाइत रहल अछि। आजुक विहनि कथा पहिने हिन्दी भाषासँ उधारी लेल शब्द ‘लघुकथा’ नामे लिखाइत रइल। अखन धरिक मौखिक जनतब अनुसारे लघुकथा शब्द प्रयोगे छपल पहिल कथा १९६८ मे मिथिला मिहिर मे काली कुमार दास लिखित ‘बुड़िबक वर’ छल। अइसँ पहिने छेँट कथा, कटपीस कथा, मिनी कथा, फिलर कथा........आदि नामे ई छपैत रहल छल। एकर पछाति जे रचनाकार विहनि कथामे सक्रिय भेला ओ नाम अछि- डॉ हंसराज, ए. सी. दीपक, तकर पछाति लिली रे, राजमोहन झा, एम. मणिकान्त, अमरनाथ, रामलोचन ठाकुर आदि। अइ नाममे सँ बेशी गोटे विहनि कथा लिखबाक प्रयोगधर्मिता मात्रक निर्वहन केलनि। हँ एम. मणिकान्त मिथिला मिहिरक माध्यमे कतेको वर्ष धरि विहनि कथा लेखनक नियमितता बनौने रहला। मुदा दुखद वा हास्यास्पद बात ई जे वर्त्तमानमे हुनक एको टा रचना उपलब्ध नै अछि। डा. हंसराज जी क मैथिलीक पहिल विहनि कथा संग्रह ‘जे की ने से’ (प्रकाशित १९७२ ई.) मैथिली विहनि कथा पेटारक पहिल सनेस कइल जा सकैए। ऐमे हास्य व्यंग्यसँ भरल लघुकायक कुल ३५ गोट विहनि कथा संग्रहित अछि। पन्नापर अंकित वर्षक अधारे एकर सभ रचना १९६३ सँ १९७२ मध्य लिखल रचना अछि। एकर कथा सभ तत्कालीन राजनैतिक सामाजिक कुव्यवस्थापर चोट करैत लिखल गेल अछि। किछु रचना आइयो प्रासंगिक अछि। हंसराज निश्चित रूपसँ विहनि कथा आन्दोलनक बीया बाउग केलनि आ तेँ आइ विहनि कथाक गाछ झमटगर होइत देखाइए। किछुए वर्ष पछाति हिनकर अगिला पीढ़ीक श्री अमरनाथ अपन ‘क्षणिका’ विहनि कथा संग्रह प्रस्तुत केलन्हि (वर्ष १९७५ ई. पुर्नप्रकाशन २०११ ई.) आ एकरा एक सीढ़ी आओर ऊपर लऽ जेबाक ठोस प्रयास केलनि। ऐ संग्रहक कथा सभ खलील जिब्रानक कथाक लगीच बुझाइए आ सभ बिन्दुकेँ छुबैत रचना कएल गेल बुझाइए। एकर अधिकांश रचना आइयोक समयसँ मेल खाइत बुझाइए। मुदा लेखकसँ दूरभाषिक वार्तालापक अनुसार राजहंस जकाँ हिनको कोनो रचना तत्कालीन पत्रिकामे प्रकाशित नै भऽ सोझे संग्रहित अछि। वर्ष १९७५ विहनि कथाक स्वर्णिम शुरूआत वर्षक रूपमे देखार भेल बुझाइए जखन ‘मिथिला मिहिर’ (पाक्षिक) अपन विहनि कथा विशेषांक (लघु कथा विशेषांक नामसँ) निकालि मोकाम तँ नै मुदा बाट अवश्ये देखार केलक। ई साहसिक काज भेल कविक द्वारा ऐ नव विधाक लेल। मिथिला मिहिरक अइ विशेषांकक समय सम्पादक छलाह आदरणीय भीमनाथ झा। ओना तँ ‘अन्हरीक गाए बियेलै तँ सभ डाबा लऽ कऽ दौड़ल’ बला कहावत चरितार्थ होइत देखाएल। फेर २३ बर्ख बीति गेल। खएर! बाँझ गाए गाभिन तँ भेबे कएल.....। कथानकक नब्जक सुन्नर पकड़ि रखनिहार श्री विभूति आनन्द जी जेबी पत्रिका ‘कुश’ क नवम अंक वर्ष-१९७८ मे पत्रिकाक गातक अनुसार छओ गोट विहनि कथाक समावेश कऽ निकाललनि विहनि कथा विशेषांक (लघुकथांक विशेषांक नामसँ)। अही वर्ष १९७८ जुलाइमे साहित्य अकादमी, दिल्ली द्वारा कथापर आयोजित सेमिनारमे परिचित कथाकार श्री रामदेव झा, कथापर प्रसंगे विहनि (लघु) कथाकेँ शामिल कऽ एक अनुच्छेद लिखि एकर विशिष्टता जतौने छलाह। जइमे विहनि (लघु) कथाक वैश्विक पटलपर खलील जिब्रानक चर्चा आ तुलना एवं मैथिली विहनि (लघु) कथाकार मे सँ अमरनाथ जीक योगदानक चर्चा कएने छलाह। आठम दशक विहनि कथाक संगोरसँ वंचित रहल। मुदा ई विहनि कथा लिखनिहारक एक टा पैघ हेँज तैयार केलक, जइमे प्रमुख नाम अछि- विभूति आनन्द, शैलेन्द्र आनन्द, श्रीराज, प्रेमकान्त झा, वैकुण्ठ झा, देवशंकर नवीन, प्रदीप बिहारी, ताराचन्द्र वियोगी, चण्डेश्वर खाँ आदि। ई समूह रचनाक दृष्टिये नव अँाखि पाँखिबला छल। साम्यवादी विचारसँ प्रभावित मुदा आपत कालक दुर्दशासँ प्रेरित आ पीड़ित। विहनि कथाक पहिल संग्रह १९७२ मे बहराएल दोसर १९७५ ई. मे आ तकर पछाति अकाल! किएक? २२ वर्षक एहेन खालीपन विहनि कथाक इतिहासकेँ ठमकि जेबाक लेल बाध्य केलक। एकर बाधक छलाह तत्कालीन संपादक, सरकारी आ निजी समिति-संस्था आ प्रकाशक। मुदा तहूँसँ बेशी जिम्मेवार ऐ पीढ़ीक रचनाकार छला जे अपनाकेँ दुनू विधापर कलम चला भरमा लेलनि वा गद्यक ऐ प्रकारक उस्सर खेत देखि डरि कऽ अपनाकेँ कतिया लेलनि। अइ पीढ़ीक कतिपय रचनाकार ऐ विहनि कथा विधाक राशि नवका रचनाकार सभकेँ पकड़ा निश्चिन्त भऽ सुस्ताए लगलाह। कारण छल जे एकर फरिछाएल रूप मध्य अपन अस्तित्व वा कोनो लाभक जोगार वा प्रतिष्ठिा नै नजरि एलनि। अही बीच आएल तन्त्रनाथ झा समग्र, ओइमे सेहो किछु विहनि कथा संकलित अछि। मैथिली साहित्यक जिरात मध्य विहनिकथाक प्रसंस्कृत बीया नव रूपे बाउग केलनि अइ पीढ़ीक नवतुरिया। जइमे नाम छल ज्योति सुनीत चौधरी, दुर्गानन्द मंडल, कपिलेश्वर राउत, धीरेन्द्र कुमार, राजदेव मंडल, बेचन ठाकुर, राम प्रवेश मंडल, भारत भूषण झा, मानेश्वर मनुज, उमेश मण्डल, जगदीश प्रसाद मण्डल (बाल विहनि कथा संग किछु सुन्दर विहनि कथा जेना थल-कमल/ घरडीह/ खाता-खेसरा/ सबूत/ कौआक मैनजन), रामकृष्ण मण्डल ‘छोटू', परमेश्वर कापड़ि, रघुनाथ मुखिया, ऋषि वशिष्ठ, शिव कुमार झा “टिल्लू”, मिथिलेश कुमार झा, सत्येन्द्र कुमार झा, नवनीत कुमार झा, कौशल कुमार, अनमोल झा, कुमार मनोज कश्यप, विनीत उत्पल, धनाकर ठाकुर, आशीष अनचिन्हार, सतीश चन्द्र झा, गजेन्द्र ठाकुर, भवनाथ भवन, राम विलास साहु, मुन्नी कामत, शंभु कुमार सिंह, संजय कुमार मंडल, मिथिलेश मंडल, लक्ष्मी दास, अमित मिश्र, जगदानन्द झा 'मनु', चन्दन झा, ओमप्रकाश झा, सन्दीप कुमार साफी, जवाहर लाल कश्यप, मिहिर झा, रामदेव प्रसाद मण्डल झारूदार, प्रेमचन्द्र पंकज, अखिलेश मंडल, अमलेन्दु शेखर पाठक, मध्ुकर भारद्वाज, श्रीधरम, देवेन्द्र झा, सच्चिदानन्द सच्चु, मिथिलेश कुमार झा, कुमार राहुल, दिलीप कुमार झा “लूटन”, मुन्नाजी आदिक। ऐ पीढ़िक समूह द्वारा विहनिकथा पर ध्ुरझार काज भेल। अइ ठामसँ असली फरिछौट भेल विहनि कथाक। आ हिन्दीक उधारी शब्द लघुकथा सँ विलग खाँटी शब्द- विहनिकथा स्थापित भेल। बीसम सदीक अन्तिम दशकक पहिल काज भेल स्व. ए. सी. दीपक जी द्वारा ‘विविध विहनि (लघु) कथा विशेषांक (मार्च-१९९४ मे)। तकरा पछाति नवका पीढ़ी सेहो कान्हपर वीरा उठेलक आ शुरू भेल वैश्विक बदलल सामाजिक परिदृश्य, तकनीकीय भेल नव-नव क्रान्तिक संग जनमल नव अवधरणाक संग विहनि कथा लेल नव-नव काज। १९७५ ई.मे आएल ‘क्षणिका’ क दू दशक बाद १९९५ ई. केँ विहनि कथाक स्मृतिवर्ष कहि सकैत छी। २० फरवरी १९९५ केँ मुन्नाजी एवं मलयनाथक संयोजनमे हटाढ़ रूपौली, मध्ुबनीमे आयोजित भेल विहनि कथा गोष्ठी, जकर अध्यक्षता केलनि पं यन्त्रनाथ मिश्र आ एकर मंच संचालन कुमार राहुल द्वारा भेल। ऐ अवसरपर उपस्थित विहनि कथा पाठ केनिहार छलाह- भवनाथ भवन, मलययाथ मण्डन, प्रेमचन्द्र पंकज, मुन्नाजी, शैलेन्द्र आनन्द, प्रभु कुमार मंडल, मतिनाथ मिश्र, उमाशंकर पाठक, श्यामाचन्द्र ठाकुर, कुमार राहुल, मीरा कर्ण, ललन प्रसाद, सुनील कर्ण, सच्चिदानन्द सच्चु एवं करणजी। पढ़ल गेल रचना सभपर समीक्षीय टिप्पणीकार छलाह- शैलेन्द्र आनन्द, मुन्नाजी, भवनाथ भवन एवं प्रेमचन्द्र पंकज। हमरा जनतबे विहनि कथाक ई पहिल गोष्ठी छल। ५ मार्च १९९५ केँ सहयात्री मंच लोहना, मध्ुबनी द्वारा मुन्नाजीक विहनि कथा ‘नामरद’ क एकल पाठ आ अइ पर ‘बहस’ क आयोजन कएल गेल। अइमे प्रमुख विचारक छलाह- श्रीराज, शैलेन्द्र आनन्द, विजयानन्द हीरा, भवनाथ भवन एवं प्रेमचन्द्र पंकज। हमरा जनतबे विहनि कथा आ कथाकारपर एहेन ‘बहस’ केर ई पहिल आयोजन छल। जुलाइ १९९५ मे कानपुर सँ बहराइत नवतुरिया त्रैमासिक पत्रिकाक विहनि कथा विशेषांक आएल, संपादक छलाह- प्रेमकान्त झा एवं वैकुण्ठ झा। अइमे १९ गोटेक कुल १९ गोट विहनि कथाक समायोजन छल, आ अइ विहनि कथा विधाक फरिछौट कऽ एकरा नव दिशा देखेबाक प्रयास करैत मुन्नाजीक आलेख अछि, जे कि कोनो विहनि कथा विशेषांकमे ऐ तरहक पहिल आलेख थिक। अही दशकमे प्रारम्भ भेल कथा गोष्ठी सेहो विहनि कथाक बाट बनेबा वा फरिछेबामे उत्प्रेरकक काज करैत रहल। कथा गोष्ठीक जुलाइ १९९७ क महिषीक आयोजनमे एके संग दु गोट पोथीक लोकार्पण भेल, ‘खंड-खंड जिनगी’ (प्रदीप बिहारी) आ ‘शिलालेख’ (तारानन्द वियोगी, जइमे कुल ३५ गोट रचना संकलित भेल अछि)। २१म सदीमे समय आ परिस्थितिकेँ अकानैत सभ रचनाकार खुलि कऽ विहनिकथा दिस जुमल छथि। पत्रिकाक संपादक सभ किछु कोना अइ लेल समर्पित करऽ लगलाह। अइ नव सदीक नव सोचक पहिल विहनि कथा संग्रह आयल- ‘बुझनूक’ (२००२ ई.), एकर रचनाकार श्री वैकुण्ठ झा जी अपन ३६ गोट रचना लऽ ऐ विधाकेँ बाट देखेबाक ठोस प्रयास केलन्हि। एकर बाद तँ संग्रहक झड़ी लागि गेल बुझू। अगिला संगोर हिन्दी मैथिलीक संयुक्त रचनाकार विहनिक कथाक दिशावाहक श्री देवेशंकर नवीन जी अपना कथा संग्रह-‘हाथी चलय बजार’ (२००४ ई. मे ३१ गोट विहनि कथाक संगोर) संग उपस्थिति दर्ज करौलनि। तँ २००५ ई. मे पुरान सोचक ठोस कथाकार श्री मनमोहन झा जी अपन विहनि कथाक संगोर, मिथिलाक निशापुर मे’ आनि एकरा एक डेग आओर आगाँ बढ़ेबाक प्रयास कएलनि। एकर आमुखमे श्री विजय मिश्र जी एकरा गद्य काव्यक संज्ञा देलनि अछि। वास्तवित रूपेँ तँ गद्य काव्य, काव्यक गद्यात्मक शैली थिक। ईहो सत्य अछि जे विहनि कथा गद्य रहि कविताक पूर्णतः लगीच मानल जाइए। मुदा अइमे संकलित २४ गोट रचना विहनि कथे थिक, आन किछु नै। वर्ष २००७ मे “अहींकेँ कहै छी” (सत्येन्द्र कुमार झाक ५१ गोट विहनि कथाक संग्रह) आएल। ई संग्रह विहनि कथाक प्रति पूर्ण सोझराएल आ दृष्टि फरीछ रचना सबहक संगोर थिक। युवा पीढ़ीक बहुविध, प्रतिभा संपन्न लेखक ओ संपादक श्री गजेन्द्र ठाकुर अपन रचना समग्र- कुरूक्षेत्रम् अर्न्तमनक- मे लघुकथाक संग १६ गोट ठोस आ कथ्य ओ शिल्पगते फरिछाएल विहनि कथा आनि विहनिकथा संसारमे श्रीवृद्धि केलनि अछि। अखन धरि एक लिखे चलैत विहनि कथाक लिख सँ हँटि २०१० ई. मे श्री जगदीश मण्डल जी सभसँ इतर बाल मनोवैज्ञानिक विहनि कथा संग्रह ‘तरेगन’ क संग आन रचनाकार केँ सम्मोहित केलनि। २१ म सदीक पहिल दशकक अन्तिम चरणमे मैथिली ई पाक्षिक ‘विदेह’ अइ विहनि कथाक नव इतिहास लिखबा वा बनेबामे अग्रणी मानल जाएत। अपन ६७म अंक विहनि कथा समायोजनमे देशी आ विदेशी ठोस रचनाक संगोर, एवं अइ विहनि कथाक शास्त्रीय विवेचन कऽ अएना स्वरूप झलका एकर बाटकेँ मोकामक लगीच अनबामे ई पूर्णतः सफल भेल अछि। अइ अंकमे कुल ३२ रचनाकारक ७९ गोट रचना अइ विधाकेँ पूर्णतः फरिछा, सभक सोझाँ अनबामे सौ प्रतिशत सक्षम भऽ देखार भेल अछि। संपादकक अलाबे एकर सफलताक श्रेय छन्हि अइ अंकक अतिथि संपादक-मुन्नाजीकेँ। मुन्नाजी जी बड गम्भीरता पूर्वक सभक समायोजन एवं अपन आलेखेँ दोसरो रचननात्मक प्रकृतिकेँ फरिछेबाक सफल प्रयास केलनि अछि। लगभग दू दशकसँ अइ विधामे रचनात्मक उपस्थिति दर्ज करबैत रहलाह, आ परिणाम “समय साक्षी थिक” २०११ मे आएल, ई संग्रह श्री अनमोल झा जीक कुल १५० रचनाक अपन जिनगीक भोगल यर्थाथक अएना थिक। २०१२ मे “टेक्नलजी” (अनमोल झा) एवं “टीस” (मिथिलेश झा) संग्रह सेहो विहनि कथाक बखारी भरबामे समर्थ बुझना जाइछ। अनमोल जीक १४९ रचनाक संग्रह सनातनी यथार्थ परसैए। ततै मिथिलेश झा जीक ‘टीस’ क ४५ गोट रचना पाठकक मानसिकताकेँ झंकृत करैए। जे कि विहनि कथाक थाती वा धराउ सदृश अनुभव करैए। १० दिसम्बर २०११केँ ‘सगर राति दीप जरय’क ७५म कथा गोष्ठीुक आयोजन पटनामे कएल गेल, ऐ अवसरपर मुन्नाजी द्वारा मैथिलीक पहिल विहनि कथा पोस्टर प्रदर्शनी कएल गेल छल। ऐ तरहंे विहनि कथा संसारक परिदृश्य पूर्णतः भरल पूरल भऽ गेल अछि। आइ सभ दिन कियो ने कियो स्वाभाविक रूपेँ जुड़ि अपन योगदान दैत एकरा मोकामक ड्योढ़िपर आनि पट खुलबाक प्रतिज्ञामे ठाढ़ देखाइत छथि। मोकाम भेटि गेलै तँ घर पैसैमे समय नै लगतै। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। १९ जुलाइ २०१२ केँ आशीष अनचिन्हार द्वारा श्री जगदीश प्रसाद मण्डलजीसँ लेल साक्षात्कार आ. अनचिन्हार- काल्हि चेतना सम्मानसँ सम्मानित भेलौं, तइ लेल विदेह परिवार दिससँ बधाइ। ज.प्र. मण्डल- आशीषजी, एकरा अहाँ व्यक्तिगत नै विदेह परिवारक चेतनताक प्रतीक बुझियौ। जे चेतना समितिक पत्रिका (घर-बाहर) दोसरे पन्नामे जीवित-मृत्युक सूची प्रकाशित करैत अछि, ओइ सूचीसँ विदेह परिवार (ई-पत्रिका) अखनो धरि काते रहल अछि, भलहिं गाम-घरक संस्कृतिमे किअए ने लोहोक इंजन दूबि-धान, सिनुर-पीठारसँ सुशोभित होइत हुअए। विदेह परिवार दिससँ आग्रह (चेतना समितिकेँ) करैत छन्हि जे समाजक बदलैत स्वरूप (सामाजिक, आर्थिक, बौधिक, वैचारिकपर) नजरि दथि तइ लेल सुझाव अछि जे मैिथली साहित्यक जते सम्पादक छथि, ओ अपना हाथसँ अपन पत्रिकाक इतिहास लिखि अपन-अपन परिचय दथि। एक दिस मिथिलाक उद्धारक विचार रखै छिऐ दोसर दिस पत्रिका सभ पाछू मुँहेँ घुसुकि रहल अछि। ऐ लेल के करताह? आइ कोनो समारोहमे धोती-कुर्तासँ लऽ कऽ चुस्त पेंट धरिक आगमन भऽ रहल अछि, धोतीबला तरेतर गुम्हरै छथि जे देखू ने किरदानी। तँ दोसर दिस चुस्त पैंटबला अँखिया-अँखिया सुसकारी दइ छथि जे शुभ काजमे पीड़ा धोती पहिरिये कऽ नै आएल छथि। खैर जे होउ, हमरा सभकेँ विचार कऽ एकटा रास्ता बनबए पड़त जे वस्त्रक बदलाव समायानुकुल होइत रहल अछि। पुरुषोत्तम राम बलकल धारी छलाह। आब ओ युग रहलै। आ. अनचिन्हार- अहाँकेँ चेतना समिति सम्मान सुनि हृदए गद्गद् भऽ गेल। आरो बुझैक जिज्ञासा जगल। सूचना केना भेटल? ज.प्र. मण्डल- चेतना समितिक स्थापना दिवस १८ जुलाइ छी। १९५४ ई.क १८ जुलाइकेँ किछु संगीक संग यात्रीजी चेतना समितिक स्थापना केलनि। ओना आनो-आन समारोह समितिक बीच होइते रहैए मुदा स्थायी रूपे १८ जुलाइ स्थापना दिवसक अवसरपर सभ साल किछु विशेष रूपमे होइते अछि। आठ-दस दिन पहिने विवेका बाबू (विवेकानन्द ठाकुर) जे समितिक सचिव छथि, फोन केलनि जे १८ जुलाइकेँ चेतना समितिक स्थापना दिवस छी जाहि अवसरपर समिति किछु गोटेकेँ सम्मानित करैक िनर्णए केलनि अछि। अहाँक आएब अनियार्य अछि। ओना डाक द्वारा लिखित सूचना सेहो पठा देने छी, मुदा पोस्ट–ऑफिसक जे क्रिया-कलाप छै ताहिमे समैपर नहियो पहुँचए। विवेकानन्द जीसँ गुआहाटीमे छह मास पूर्व दिसम्बरमे धर्मशालामे भेँट भेल छल। किछु प्रश्नपर गपो-सप भेल रहए। ममताजी (श्रीमती ममता ठाकुर) दूटा सोहरो गौलनि। श्री राम भरोस कापड़ि भ्रमर, राजाराम सिंह राठौर एवं नेपालक आरो कतेक लोक सभ रहथि हुनको सभसँ पहिल भेँट भेल छल। जखन विवेकानन्द जी फोनपर जानकारी देलनि तखन हम गुआहाटीक धर्मशालामे पहुँच गेल रही। जबाव देलियनि जे जरूर आएब। मुदा दू-तीन दिनक पछाति संगी सभ फोन केलनि जे बिना लिखित सूचनाक जाएब उचिन नै। ओ सभ चेतना समितिक क्रिया-कलापसँ नाखुश छथि। प्रश्न उठल जे आब हम कि करब? एके बात कविता आ कथामे दू-िवधामे बँटि जाइए। एक तँ रौदियाह समए भेने किसानक मन ओहिना तबधल अछि तइपर सँ आरो तबधि गेल। जाइ कि नै जाइ, विचित्र ओझरी लागि गेल। मनमे हुअए जे विवेका बाबू किछु करए चाहै छथि तइठाम सहयोग नै करब उचित नै हएत? मुदा जखन संगी सबहक दोहरा-दोहरा फोन आबए लगल तखन ओरो मन दुबिधमे पड़ए लगल। १८ जुलाईक ६ बजे सुबह। हम विवेकानन्द जीकेँ फोन केलियनि जे अपनेक कार्यक्रममे कोनो व्यवधान तँ नै भेल अछि? ओ भरिसक ओछाइनेपर रहथि। आँखि मीड़िते कहलनि जे नै, ई तँ सभ सालक कार्यक्रम छी हेबे करत। ओना ऐ बीचमे दिल्ली चल गेल रही तँए दोहरा कऽ सम्पर्क नै भऽ सकल। परसुए एलौं आ काजमे लागल छी। पुछलियनि- समए केहेन अछि? ऐठाम (गाम) पानि भऽ रहल अछि। ओ कहलनि- मेघौन तँ एतौ अछि मुदा बून्न नै पड़ैए। हुनकर जबाब सुनि मन मानि गेल एहेन खुशनुमा मौसममे भोज-भात नै हुअए तँ केहेन समैमे हुअए। फोनपर विवेका जी ईहो कहि देलनि जे न्यायमूर्ति किशोर कुमार मण्डल विशिष्ट अतिथि रहताह। तइ संग न्यायमूर्ति राजेन्द्र प्रसाद जी, डाॅक्टर सहाएब, विजय बाबू, सभ रहबे करताह। हिनके सबहक काजो छियनि। एक तँ रौदियाह समए दोसर भिनसुरका झकास रहने सुहावन मौसम रहबे करए, तैयारीक विचार केलौं। झमटगर परिवार रहने संगी भेटिये जाइए।फेर कहि देलियनि जे आठ-नअ बजेक बस पकड़ि लेब। आ. अनचिन्हार- कते समए गामसँ पटना जाइमे लगैए? ज.प्र. मण्डल- आशीषजी, की कहब। ऐबेर हवाई सफरक मौका भेटल। एते-एते दूरीक बीच एको मिनटक हेर-फेर नै देखलिऐ। मुदा अपना सबहक तँ भगवाने ने मालिक छथि। जेना कऽ रखबह भोला तहिना ने हम रहबह। गाड़ीक (ट्रेन) रास्ता एहेन बनि गेल अछि जे डेढ़ दू दिन तक लागि जाइए। मुदा एन.एच भेलासँ थोड़े सुविधा बढ़ल अछि मुदा तैयो पाँच-छह घंटा तँ लगिये जाइए। आ. अनचिन्हार- जखन पानि होइत रहए तखन बस स्टेण्ड जाइमे तँ दिक्कत भेल हएत? ज.प्र. मण्डल- दिक्कत कि दिक्कत भेल। ओना गाड़ीक (दू पहिया) सुविधा अछि, मुदा पीच्छड़मे तँ चारि पएरबला हाथी पिछड़ि खसि पड़ैए आ दू पहियाक कोन ठेकान। पएरे तीन किलो मीटर जाइक विचार कऽ लेलौं। तखन मन भेल जे छत्ता लऽ लेब। मुदा कते बेर छत्ता बिसरिये गेलौं आ कते बेर हराइये गेल। तँए छत्ता नै लऽ जेबाक विचार भेल पानियो कमलै। बूंदा-बुन्दीपर आबि गेल रहए। आ. अनचिन्हार- कते बजे पटना पहुँचलिऐ? ज.प्र. मण्डल- सवा चारि बजे पहुँचलौं। जलखैये कए कऽ चलल रही। भूखो लगि गेल रहए। पुले (गाँधी पुल) लग उतरि पहिने खेलौं। खेलाक पछाति टेम्पू पकड़ि एकटा विद्यार्थी डेरापर पहुँचलौं। ओ निरमलियेक छथि रविन्द्रजी। ओइठाम देह-हाथ पोछि फ्रेश भेलौं। पौने छह बजे राजेन्द्र नगर विद्यापति भवन लग पहुँच गेलौं। गेटपर पहुँचलौं आकि आनन्दजी (आनन्द कुमार झा) सेहो भेट गेलाह। नीक भवन नीक बेवस्था। जेना राजधानीक हेबाक चाही तइमे कमी नै। पंखा ताकि बैसलौं। पाँच मिनटक पछाति चुन्नूजी (कमल मोहन चुन्नू, घर-बाहर पत्रिकाक सहयोगी सम्पादक) देखलनि। देखिते दोसर ठाम बैसा पुछलनि जे किछु खेबो-पीबो करबै। कहलियनि जे रस्तेमे खा नेने छी। पानि पीलौं। समए छहसँ आगू बढ़ि गेल। छह बजे शुरू होइक समए रहैक, गप-सप करैले आनन्दजी लगेमे रहथि, मुदा बूझि पड़ल जेना चुन्नूजी आ विवेका बाबू काजमे जमि कऽ जुटल छथि। पुछलियनि- चुन्नूजी, रमणजी (डाॅ. रमानन्द झा रमण) केँ नै देखै छियनि? कहलनि ओ कथा गोष्ठीमे गेल छथि। कहि अपन हेमलेट, बैगक जिम्मा सुमझा कहलनि जे कने एकटा काज केने अबै छी। चुन्नू जीक काज बाधित करैक अर्थ होएत जे काजमे (समारोह) बाधा उपस्थित करब। कहलियनि, हम कतौ पड़ाएल जाइ छी, अखन जे काज लाधल अछि पहिने ओकरा सम्हाररू। चुन्नूजी तँ उठि कऽ चलि गेलाह, मुदा मनमे एकटा नव प्रश्न आबि गेल। ओ ई जे ‘घर-बाहर’ पत्रिकाक सम्पादक रमणजी छथि, तखन अपन जबाबदेहीक काज छोड़ि मद्रास चलि गेलाह, आ गोष्ठी तँ १४-१५ जुलाइक रातिमे रहै, १५ तारीखकेँ बिदा भेने १७ धरि तँ आबिये गेल हेता। खएर ! एना किअए भेल? जखन कि चेतना समितिक स्थापना दिवस १८ जुलाई छी, भरिसक यात्रीयो जी (ठीकसँ मोन नै अछि मुदा अनुमान करै छी) जखन माँ मिथिलाकेँ प्रणाम कए पड़ा कऽ अकासमे उड़ैत ओइ चिड़ै जकाँ जे उड़िते-उड़िते अंडो दैत अछि तहिना केलनि। प्रश्न घुरिआए लगल जे अपनो बेटाक मूड़न वा बिआह रहए आ साढ़ूओ बेटाक एक्के दिन होइ तखन कि कएल जाएत? कियो अपन घर सम्हारत आकि भोज खाइले जाएत। मुदा ऐठाम तँ अँटावेसक संभावना छल। चेतना समितिक तिथि अट्ठावन वर्षसँ मनकेँ पकड़ने अछि, कथा गोष्ठीक तिथि िनर्धारित कएल जाइत अछि, तइठाम समए आ दूरीक विचार केने बिना, जँ तिथि िनर्धारित कएल जाए तँ कि कहबै? एक तँ ओहिना हम सभ मिथिलांचलक काजक दौड़मे पछुआएल छी तइपर जँ काजे काजक बाधा बनत तँ कते दूर जा सकब, से तँ सभ बुझिते छी। तइ बीच विवेकाजी तीन-चारि गोटेक संग आबि किछु-किछु काजक बात पुछलनि। कहलियनि। तइ बीच अध्यक्षा प्रमीला झा सेहो एलीह। चुन्नूजी धड़फड़ाएल आबि हेलमेट हाथमे लैत चिन्हा देलनि। ओना चेतना समितिक सदस्य सबहक जानकारी अछि, मुदा चेहरासँ चिन्हारए नै छल। तँए अनभुआर जकाँ रही। मुदा कार्यकर्ताक अभाव जरूर बूझि पड़ल विलंबोसँ शुरू भेने बहुत बढ़िया कार्यक्रम भेल। आ. अनचिन्हार- विधिवत् कते बजे कार्यक्रम शुरू भेल? ज.प्र. मण्डल- ऐ प्रश्नक उत्तर ठीक-ठीक नै दऽ सकब। किएक तँ ने अपने घड़ी रखै छी आ ने मोबाइल। मुदा बैसकसँ बूझि पड़ल जे एक-डेढ़ घंटा बिलंबसँ कार्यक्रम शुरू भेल। हँ तइ बीच दूटा बात आरो भेल। इन्द्रकान्त बाबू (डॉ. इन्द्रकान्त झा) दोसर कतारक कुर्सीपर आगूमे बैसल रहथि, ओ अपन चिन्हारए देलनि। मनमे रहबे करए मुदा ओहन बीच रहने गुम रही। हुनकासँ पहिल परिचय ओइ दिन भेल छल जइ दिन मिथिला दर्शनमे छपल कथा चुनवाली पढ़ि पहिल बधाइ देलनि। गपे-सपक बीच अखिलेश बाजल जे लालकक्का (उमेश मण्डल) फोन केलनि जे साढ़े दस बजेक बसक टिकट कटा लेलौं। तेरह-चौदह नम्बर सीट अछि। आ. अनचिन्हार- कार्यक्रम केहेन भेल? ज.प्र. मण्डल- पहिल सम्मान कार्यक्रम भेल। यात्री जीक स्थापित चेतना समितिक सम्मान पाबि बहुत खुशी भेल। उच्च न्यायालयक न्यायमूर्ति किशोर कुमार मण्डलक हाथसँ सैकड़ो गण्यमान्य लोकनिक बीच, जइमे बिहार सरकारक पूर्व मुख्यमंत्री विधान परिषदक पूर्व अध्यक्ष, उच्च न्यायालयक पूर्व मुख्य न्यायमूर्तिक संग माननीय पूर्व सांसद, माननीय विधान पार्षद, अधिवक्ता, अध्यापक, डॉक्टर इत्यादि चेतना समितिक सभ छलाह। आ. अनचिन्हार- साहित्यिक माहौलमे कार्यक्रम भेल हएत? ज.प्र. मण्डल- आशीषजी, ई बहुत गंभीर प्रश्न अछि। ओना साहित्यिक माहौल अवश्य छल मुदा राजनीतिक बेसी बूझि पड़ल। अध्यक्ष जीक (चेतना समितिक अध्यक्ष) वक्तव्य विधिवत् छलनि, नीक छलनि। मुदा मंचक वक्ता लोकनि साहित्यकेँ मोड़ि राजनीति दिस घुसका देलखिन। जे गोष्ठीक अनुकूल नै रहल। मुख्य वक्ता छलाह पंडित ताराकान्त झाजी (विधान परिषदक पूर्व अध्यक्ष) जे तेना कऽ विचार मोड़ि देलखिन जे बादक वक्ताकेँ बेकावू भऽ गेलनि। ओना पूर्व मुख्यमंत्री डॉ. जगन्नाथ मिश्र, विधान पार्षद आ चेतना समितिक संरक्षक विजय बाबू (श्री विजय कुमार मिश्र) विधिवत अपन विचार रखलनि। यात्री जीक स्थापित चेतना समितिक विचार विन्दु गौण पड़ि गेल। तहूमे मैथिली साहित्यक बीच, टैगोर साहित्य सम्मान पहिल-पहिल भेटल, जेकर चरचो नै भेल। माननीय न्यायमूर्ति राजेन्द्र प्रसादजी, अपन वक्तव्यकेँ किछु हद-तक मोड़लनि। ओ यात्री जीक विचारकेँ पकड़ि चेतनाक विषद व्याख्या केलनि। भाषो मनोरंजक छलनि। मनोरंजक ऐ लेल जे मैथिली-मगहीक सीमापर रहने कखनो मैथिली कखनो मगही आ कखनो मैथिली-मगही मिला कऽ बजलाह। मुदा अंग्रेजी माहौलमे रहनिहार एको शब्द अंग्रेजीक प्रयोग नै केलनि, ई सभसँ आश्चर्य लागल। समए सेहो बेशी भऽ गेल छलैक। तहूमे बसक टिकटक नाओं सुनि आरो मन दोसर दिस जाए लगल। हुअए जे बस ने छूटि जाए। आ. अनचिन्हार- अहाँ कि सभ बजलिऐ? ज.प्र. मण्डल- आभारो व्यक्त करैक अवसर नै भेटल। आ. अनचिन्हार- भोजन भात केहेन रहलै? ज.प्र. मण्डल- नीक रहलै। स्पष्ट शब्दमे विवेकाजी कहि देलखिन जे अल्पाहारक बेवस्था अछि। मुदा खीर-पूड़ी खुआएब। आ. अनचिन्हार- कते बजे सभा भवनसँ निकललौं? ज.प्र. मण्डल- दससँ ऊपर बजि गेल। मन छटपटाए लगल जे एक तँ गली-कुच्ची रस्ता, दोसर थाल-कीच सेहो, रिक्शा-टेम्पू भेटत नै। हारि-थाकि बस स्टेण्ड विदा भेलौं। सरकारी बसक टिकट, तँए हुअए जे बस नहिये पकड़ाएत। मुदा किछु दूर गेलापर रिक्शा भेट गेल। ओ कहलक जे हमरा बूझल अछि, बस निश्चित पकड़ाएत। संगमे आनन्द कुमार झाजी सेहो रहथि, हुनका टिकट नै भेलनि। भोर होइत घरपर पहुँच गेलौं। आ. अनचिन्हार- छुटल-बढ़ल जे भेल होइ, तइ संबंधमे किछु कहियौ? ज.प्र. मण्डल- ओना चेतना समितिक िनर्णयानुसार चारि गोटेकेँ सम्मानित करैक विचार छलनि। पहिल, टैगोर साहित्य सम्मानसँ सम्मानित हम (जगदीश प्रसाद मण्डल), दोसर, साहित्य अकादेमीसँ सम्मानित कवि विनोद जीक (श्री उदय चन्द्र झा विनोद), तेसर, युवा साहित्यकार आनन्द जीक आ चारिम, अनुवादक खुशीलाल बाबूकेँ (श्री खुशी लाल झा)। मुदा ओ दुनू गोटे (विनोदजी आ खुशीलाल बाबू) नै पहुँच सकल छलाह। चेतना समितिक सभ नै, मुदा किछु गोटे एहेन सक्रिय छलाह जिनका विषयमे किछु कहने बिना नै रहि सकै छी। ओ छलाह विजय बाबू (श्री विजय कुमार मिश्र), जे खेबा काल घूमि-घूमि देखैत रहलाह। दोसर छलीह श्रीमती प्रमीला झा। जे एते उमेर भेलोपर, तहूमे जेहेन परिवारक छथि, क्रियाशील जिनगी बना जीवि रहली अछि। जे धन्यवादक पात्र छथि। विवेका बाबू आ चुन्नूजी हृदैसँ चाहितौ, नीक जकाँ नै कऽ पाबि रहल छलाह, तेकर कारण छल दुनू गोटे नव छथि (कार्यक्रमक भारक खियालसँ) मुदा जे जिज्ञासा करैक ललक आ उत्साह छन्हि, जँ सही दिशामे बढ़ाबथि तँ जरूर किछु कऽ देखौता। तइ लेल दुनू गोटेकेँ धन्यवाद दैत छियनि। विवेका बाबूक ई गुण स्पष्ट देखाएल जे स्पष्टवादी छथि। इमानदारीक अनेको कारणमे स्पष्ट बाजब सेहो एकटा कारण होइत छैक। सभसँ अंतिम दृश्य आरो रोचक अछि। दस बजैत रहए। कतारबंदी भोजन शुरू भेल। धड़फड़ाएल रहबे करी, जा कऽ पाँतिमे लगि गेलौं। पाँति नमहर, तैयो पान-सात मिनट घुसुकि कऽ किछु आगू बढ़लौं। तीनू गोटे ( हम, आनन्दजी आ अखिलेस) एके ठाम रही। तही बीच धड़फराएल घुमैत चुन्नूजी पहुँचलाह। देखिते पाँतिसँ निकालि कुर्सीपर बैसा देलनि आ कहलनि जे नेने अबै छी। गेला तँ धड़फड़ाएले मुदा गरे ने अँटनि। दोसर ठाम गरे ने भेटनि। हमर मन छनगल जाए जे बस छूटि जाएत। नहिये खाएब तँ कि हेतै, गाड़ी-बसमे अधपेट्टे चलब नीक होइ छै। हुअए जे चुपे-चाप उठि कऽ विदा भऽ जाइ। फेर हुअए जे नाँहक हंगामा ठाढ़ भऽ जेतैक जे दुनू गोटे बीचेमे सँ हेरा गेला। विचार ठमकि गेल। मन पड़ि गेल, बरिआती। अपेछित बेटाक बिआहमे बरिआती गेल रही। ओहन बरिआती जिनगीक पहिल छल। खाइले बैसलौं, नीक-नीक विन्यास बनल रहै। शुरूहेमे भरि पेट चढ़ा देलिऐ। चढ़ौलाक बाद चारू कात चकोना हुअए लगलौं जे कियो एको गोटे उठताह तखन ने उठब। से किम्हरो देखबे ने करिऐ। गर-फेरि-फेरि बैसए लगलौं। आसन नमहर तँए गर लगा सुतियो सकै छी। मुदा जखने सूतब कि अनेरे हल्ला हेतै जे एक गोटे खाइते-खाइते ओंघरा गेलाह। अपनेपर खौंझ उठए जे अनेरे एते किअए खेलौं। मुदा करितौं की। चारि घंटा खाइमे बरिआती लगौलनि। अधमौगति भऽ गेल। हुअए जे ऐसँ नीक जहले जे भुखलो तँ लोक आेंघरा-ओंघरा सुतैए। एतबे नै ऐसँ आगू भेल जे खाइकाल तेहेन गप-सपक ठाहाका चलै जे हुअए कहीं पेटक गुदगुदीक संग खेलहो ने निकलए लगए। कहुना-कहुना कऽ अपनाकेँ दाबि-दुबि पार लगेलौं। हाथे धोइकाल ओही भिजलाहा हाथे कान पकड़ि सप्पत खेलौं जे एहेन बरिआती नै जाएब। कुल मिला कऽ समारोह प्रशंसनीय रहल। अगिला साल आरो बेसी नीक होइ, ई शुभकामना। देखैक हकार भेटए, तेकर प्रतीक्षा रहत। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। १. राजदेव मण्डल- जगदीश प्रसाद मण्डलक कविता संग्रह राति-दिनक समीक्षा २.डॉ. धनाकर ठाकुर- समीक्षा – फूल तितली आ तुलबुल (लेखक -श्री सियाराम झा 'सरस') १ राजदेव मण्डल जगदीश प्रसाद मण्डलक कविता संग्रह राति-दिन :: समीक्षक राजदेव मण्डल मैथिलीक नव कविताक निरन्तर विकास भऽ रहल अछि। श्री जगदीश प्रसाद मण्डल पूर्ण निष्ठा आ तल्लीनताक संग ऐ विकास कर्ममे संलग्न छथि। आ तेकर प्रतिफल सम्मुख अछि- कविता पोथी- राति-दिन। ऐ पोथीमे 52 गोट कविता संकलित अछि। कविता भाव, बुधि कल्पना आर शैलीक समन्वित परिणाम थीक। ऐ गुण आदिसँ अलंकृत मानस सृजनक गम्भीर, सचेत प्रक्रियासँ संचालित भऽ सकैत अछि। तइ कारणे कवि अत्यधिक सवेंदनशील होइत अछि। हरेक कालावधिमे मनुखक अन्तसमे अभीप्सा पालित-पोषित होइत रहै छै आ ओइपर जखन तुषारापात होइ छै तँ जन मानस आन्तरिक वेदनासँ भरि जाइत छै। मोह भंग भऽ जाइत छै। बेकतीक अन्तसँ उपजै छै। विद्रोह, कंुठा, आक्रोश, संत्रास, क्षुब्धता, आत्म रक्षाक सबालादि। अही सबहक अभिव्यक्ति मैथिलीक नव कविता थीक। मण्डलजी सन सवेंदनशील कवि जे ऐ यथार्थकेँ भोगने छथि से केना चुप्प रहि सकैत छथि। हुनका लेखनीसँ तँ संघर्षक स्वर निकलबे करतैक। “जिनगीक होइत संघर्ष। सीमा बीच जखन अबैत मचबए लगैत दुर-घर्ष। घर्ष-दुरघर्ष बीच जखन जिनगी करए रस्सा-कस्सी। बीच समुद्र सिरजि मथान पकड़ए लगैत अपन-अपन रस्सी।” (संघर्ष) कवि अखण्ड राज भोगी सभपर व्यंग्य प्रहार करैत कहैत छथि- “मुसक खुनल बील पकड़ि नाग-नागिन कहबए लगैए। नागे तँ धरती टेकने छै अखण्ड राज भोगै छै।” (मानव गुण) किछु लोक बहुरूपिया बनल अछि। हरेक क्षण गिरगिट जकाँ रंग बदलैत रहैत अछि। समाजकेँ दिशा भ्रमित करैत अछि। ऐ सम्बन्धमे कविक उक्ति अछि- “गिरगिटिया मनुक्खो तहिना दिन-राति बदलैत चलैए गीरगिटेक जहर सिरजि-सिरजि बीख उगलैत चलैए। भेद-कुभेद मर्म बिनु बुझने देखा-देखी ओढ़ैत चलैए ओढ़ि-ओढ़ि ओझरा-पोझरा डुबकुनिया काटि मरैए।” (घोड़ मन, भाग-२) मनुखक रीत-नीत आ बेवहारमे कतेक परिवर्त्तन भऽ गेलैक अछि। बदलैत जुग-जमानापर हिनकर कहब छन्हि- “जुग बदलल जमाना बदलल बदलि गेल सभ रीति-बेवहार। चालि-ढालि सेहो बदलि गेल बदलि गेल सभ आचार-विचार। मुदा, राति-दिन एको ने बदलल नै बदलल चान, सूर्ज, अकास। पूरबा-पछबा सेहो ने बदलल नै बदलल जिनगीक बिसवास।” (जुग बदलल जमाना बदलल) अंग्रेजी भाषापर शब्दक प्रहार करैत कहैत छथि- “अंग्रेजी पढ़ि अंग्रेजिया बनि-बनि पप्पा-मम्मी आनत घर। बाप-दादाक कि भेद ओ बुझत अड़ि-अड़ि बाजत निडर।” (घरक लोटिया बुड़ले अछि) समाजक रूप वर्णन ऐ पाँतिसँ लक्षित भऽ रहल अछि- “अगम-अथाह रूप समाजक असथिर भऽ सागर कहबैए। बर्खा बुन्नी बीच-बीच ओला-पाथर बरिसा दइए। पबिते पाबि पृथ्वी पसरि धरिया-चालि धड़ए लगैए। उट्ठी-बैसी खेल खेलैत मोइन-धार बनबए लगैए। टूक सुपारी समाज कटि-कटि टुकड़ी जाति बनल छै।” (अपनेपर) नव बिम्वक प्रयोग संवेदनशीलता आ मार्मिकताकेँ संगे होएबाक चाही। आ से मण्डल जीक कवितामे विषयक अनुरूप बिम्बक प्रयोग भेल अछि। “झिलहोरि झील खेलाइत रश्मि आकर्षित-आकर्षण करैए। प्रेमास्पद पबिते पाबि प्रेम-प्रेमी कहबए लगैए। पाबि प्रेमी प्रेमी जखन सागर गंगा मिलए चाहैए। बॉसक पुल बना समुद्र गंगा-सागर स्नान करैए।” (शील) “अजस्र धार भवसार सजल छै। नाओं एक खाली पड़ल छै।” (संघर्ष) स्थितिक अनुकूल बिम्ब, नव उपमान, प्रतीक नव कविताक लेल साधन मानल गेल अछि। आ से ऐ संग्रहक सभ कवितामे परिलक्षित भऽ रहल अछि। “जहिना धरती अकास बीच गाछ-विरीछ लहलह करैत। तहिना विवेक विचार संग सदि हँसि-गाबि कहैत।” (प्रिय) मण्डलजी प्रिय कवितामे शैली आ भाषाक सम्बन्धमे कहने छथि- “सम्पन्न शब्द, शैली सम्पन्न शब्द कोष सिरजए लगै छै। जड़ि-छीप पकड़ि भाषाक संसार-साहित्य गढ़ए लगै छै।” रातिक अवसान भेलापर दिनक आगमन निश्चिते होइत अछि। जे कटुसत्य अछि। राति-दिन सर्वजन परिचित शब्द अछि। शब्दमे व्यापकता सेहो अछि। राति-दिन कविता संग्रहक शीर्षक अनुकूल अछि। कविता सबहक भाव, विषय, उद्देश्य इत्यादि ऐ शीर्षकमे छिपल अछि। साँझ-भोर कवितामे कविक कथन उजागर भेल अछि- “केकरो साँझ केकरो भाेर छी केकरो उदय केकरो अस्त छी। दिनक अस्त साँझ अगर छी राइतिक तँ उदये छी। बारहे घंटा दिनो चलै छै ततबे टा ने राइतियो होइ छै।” पुरान ठाठ आ खूँटा विछिन्न भऽ रहल छै। नवका-नवका जिनगीक खूँटा आ घर ठाठ करए पड़तै। तँए कवि “चेतन चाचा” कविताक माध्यमे कहने छथि जे ई काल चेतबाक थिक- “चेत-चेत चलू चेतन चाचा सरसड़ाइत समए ससरैए। समए छोड़ि कतबाहि जखने ठहकि-ठहकि नक्षत्र कहैए। आगू डेग उठबैसँ पहिने चारू दिशा देखैत चलू। चारू कोण ठेकना-ठेकना आगू डेग बढ़बैत चलू।” तँए जिनगीमे सीखबाक उपक्रम होएबाक चाही। बिनु सीखने किछु नै भऽ सकैत अछि। “जिनगीमे किछु करब सीखू जिनगीमे किछु लड़ब सीखू। सभ जनै छी, सभ देखै छी अज्ञान-अबोध बनि-बनि अबै छी। सज्ञान-सुबोध तखने बनब संघर्षक बाट जिनगी धड़ब।” (किछु सीखू किछु करू) “मुँहक झालि” कवितामे कवि ललकारि कऽ कहि रहल छथि- “मुँहक झालि बजौने कि हएत, काजक झालि बजबए पड़त। फोकला-खाख अन्ने की सुभर दाना उपजबए पड़त।” कहबाक तातपर्य ई अछि जे सिरिफ गाल बजौने किछु नै होएत। कर्म करै पड़त। जइसँ देस-दुनियाँक कल्याण संभव भऽ सकत। तँए कर्मशील होएब परमावश्यक अछि। तखने अपन इतिहास लिखि सकैत छी। “कर्मक स्वरलहरी सीखू अपन इतिहास अपने हाथसँ स्वार्णाक्षरमे लिखनाइ सीखू।” अपन इतिहास अपनेसँ सृजन करब बहुत कठिन कर्म अछि। ऐ लेल सतत कर्म आ वश्वास चाही तखनहि संभव भऽ सकैत अछि। हम अज्ञ छी तथापि एतबा धरि जरूर कहब जे प्रस्तुत “राति-दिन” पोथीमे बोधक अनुकूल नव बिम्ब, प्रतीक, नव उपमान इत्यादिक प्रयोग भेल अछि। भाषा-शैलीमे आंचलिकता अछि। मिथिलांचलक गंध समाहित अछि। सुधी पाठकगण स्वागत करताह। आ संगहि नवाकुंरक लेल पाथेय बनत। २ डॉ. धनाकर ठाकुर समीक्षा – फूल तितली आ तुलबुल (लेखक -श्री सियाराम झा 'सरस') समीक्षक –- डॉ. धनाकर ठाकुर ३.६.२०१२क श्री सियाराम झा 'सरस'क पोथी ‘फूल तितली आ तुलबुल’क लोकार्पण रांचीमे भेलन्हि जाहिमे श्रीरमणजी, पटना मुख्य अतिथि छलाह। पोथी बै नी आ ह पि ना ला -१ यानी सतरंगी इन्द्रधनुषक रंगक जकां आबयबला सात कड़ीमे ई प्रथम अछि तकर विशेष संकेत पृष्ठ ४८मे (बाबा दिनकरमे पनिबोडा गीतके भीतर सातो रंग फरिछा देबाक छल). पोथीक अनेक पन्ना रंगीन अछि , बालोपयोगी अछि आ संस्कारवर्धक (पृ. २०मे अंटी-बँटी नहि कहू), आ ज्ञानवर्धक प्रायः सब पन्ना अछि जेना दिनक नाम(पृ. ३८), गाडीक प्रकार(पृ. ३९-४०), बापूक चरखा, सचिन, धोनी, विद्यापति, मंडेला, आवश्यकता आ आविष्कारमे मेट्रो रेलसँ मिसाइल कंप्यूटर तक, टाकाक लाथे (पृ.४२-४३मे) रूपाक नव निशान, खेल-खेलमे(पृ.४४-४५) कुश्तीस ओलम्पिक तक. विज्ञान लेखकक प्रिय विषय अछि (पृ.१८-१९,बिजली रानीमे पवन बिजली तकके चर्चा अछि संगही मिथिला-मैथिलीस प्रेमवर्धक (नेनाक मायस पृ. ६-७ मे नीक बात कहल गेल अछि जे मैथिली बाजय पढयबला सेहो नीक पद पर पहुँचैत अछि), मिथिलाक्षरहूँ अछि अंतमे. मिथिलाक एक नक्शा कतहु रहितय से नीक (अगिला कड़ीमे देल जाय), खेल -खेलमे सेहो राम, कृष्णक चर्चा(पृ. ४४-४५), जगदीशचन्द्र बसुक हँसैत-कनैत गाछक रूपमे ऋतु वर्णन(पृ.४९), सागरक वैविध्य वर्णन(पृ.६३-६४), विज्ञान प्रश्नोत्तरी(पृ. ६८), आविष्कारक माय आवश्यकता(पृ ७२) मे भारतक अंक- शून्यक अवदान आदि. म स मिथिला आर लेखक क गाम मेहथसँ आर की की नै ( पृ.६५)- एक कड़ी एहिना अ, आ सँ ज्ञ तक बनायल जा सकैत छैक बच्चाके अपन संस्कृतिक ज्ञान दैत. सब पन्ना सचित्र अछि ताकि नेना बुझि सकय अधिकाश गीत गेय अछि लगैत अछि बालोपयोगी जानि बहुत ठाम व्याकरणक नियम पालन नै भेल - जेना पोथीक नाममे फूलक बाद अल्पविराम (कोमा) बच्चा चुलबुलक नामके नेना भुटकाक उच्चारण तुलबुल आ एहेन अनेक ठाम (पृ.१४,.... ) बालक -बालिकाक जे चित्र मुखपृष्ठ पर देखावल गेल अछि ओहिमे कोनो गामक नहि, शहरीआ विकासकक परिचायक (पृ.२४) जखन की गामक चीज पर बहुत चर्चा अछि -चेत कबड्डी(पृ.५०), सोचु, सोचु(पृ.५१)मे किसानक महिमा) आ पर्यावरण(पृ.१२,२२,२३),आ रंगीन आर्ट पेपर पार्क फूलआ तितली, टून मून रे क जंतु संसार छपर छैयांक पनिबोडाक रंग, गाछ रोपिह फलदार, दादा-दादीक रोपल गुलाबक फूल(?) आ आन फूल पर बहुत चर्चा अछि, सौरमंडल , दुतियाक चान, (पृ.२५)क चुन्मुनी, २६, २७, २९ क आम, पृ.३३क बगुला, पृ.३५क फूलवती, बाबा दिनकर, ई धरती, सागरक संपदा, धरतीक सिगार चिडी-चुन्मुनी, गीध जकां दुर्लभ चिड़ी के बचबयके आग्रह, जाडक रौद, ऋतू वर्णनमे गाछ (पृ.४९), गाछ रोपीह (पृ.५७), सागरक सैर (पृ.६३),चिंता कचड़ास बचाब जल-नभ-स्थलके(पृ.६६), कछ्मछी(पृ.६७). एही लेल आ स्वतंत्रता हेतु, बाबा पोता गीत(पृ. ७१) मे अछि पर्यवरण, जल जीवन अछि (पृ.७६-७७ )मे जल संचय आ जल छाजनक बात अछि,बाघ मारक विरोध(पृ. ७९-८०) आदि. मुदा 'हैप्पी बल्थ डे'(पृ.१४)आआर्ट पेपर पर पर सेहो शुभ जन्मदिन आ तहिना दू-ददू बेर हैप्पी दिवाली आ हुक्का लोली(पृ.५४मे) मुदा भरदुतिया आ होली नहि भेटल जे सबस अधिक प्रिय बच्चाके स्वास्थ्य संबंधी नीक जानकारी(पृ.१५) संतुलित आहार (पृ.५५) नीक अछि जे नून आ चीनी कम खेबाक अछि आ फल फूल साग खेबाक आ पौष्टिक आहारक (पृ.१५,) मुदा टाफी चर्चा नै रहितय त नीक (पृ.२८), आमा माइक पेटारीमे (पृ.५२) ग्रामीण नुश्खा मे तुलसी, नेबो आदि ठीक मुदा धात्री फलं सदा पथ्यम नै देखल . संस्कार लेल अनेक बात अछि ((पृ.१६,३४) नब जटा - जटीन, विद्यार्थीक पञ्च लक्षणक सचित्र विवरण(पृ.५९), सर-कुटुम (पृ.४८), सीखक लेल भीख(पृ.८२), बालश्रमक विरोध(पृ.८३) ई ठीक बात नै . समाजक बिविध भागक जानकारी लेल मुस्लिम लेल अलीखान (पृ.६०), कारीगर (पृ. ६१-६२), राहुलक माता यशोधरास प्रश्न मार्मिक अछि (पृ.६९ )पिताजी कत गेलाह? आखर यागक धुआं मे शिक्षाक महत्ता अछि (पृ. ७०), मूलमंत्र(पृ. ७३-७४मे) सत्यनिष्ठा, समर्पणस गांधी, सचिन, कलाम बनक गाथा चिरई,चुट्टी, मूसक सतत कर्म जकां. भारत भक्तिक संग संगीतक वर्णन (पृ.७७), प्रकृति चित्रण अछि(पृ. ७८) आबी गेले अलेदाले भोर आ अनेक बालसुलभ गीत यथा (पृ.८१), अनेक सुधार अगिला संस्करणमे संभव अछि- बै नी आ ह पि ना ला क मैथिली पूरा रूप देनाई नीक जे केवल पीअ र लेल लिखी देलासँ भयजाइत (पि नहि) पृ.९- 'मात्रा के यात्रा' नहि 'मात्रक यात्रा'मे (आ तहिना बाबाक अंगुरी (पृ. ८१) 'बाबा के अंगुरी' क जगह), दीर्घे कीस दादीजी नीक रहैत -(स्कूलमे आब मिस पढ्बैत छथि दीदी कहाँ ?) पृ.१० एम् एल अ क उदहारण सटीक नै पृ.११- चटापटा शब्द ? पृ.४७- 'बड़े- बड़े' सपनामे, पृ.६३ सागरक 'सैर' मे हिन्दीक छाप अछि ( से आन अनेक आनो ठाम अछि) पृ.१२- स्कूलमे जाईबला बच्चा लेल हाती आ एहिना सब शब्द कियैक- या त नर्सरीक बच्चा लेल केवल अलग अध्याय हो (बादक बच्चा लेल ई अनुपयोगी गलत उच्चारण सीखबयबला जेना बिरस्पति(पृ. ३८) ? पृ. ३८- ६० अलीखानक इम्तिहान छनि त हुनक पिताजी नै अब्बाके आबक छल आ मायके नै अम्मीके आ तपक हुनका प्रयोजन? एहिना बहुत ठाम ध्यान राखी जे कोनो किताबक पाठकवर्गक आयु यदि तय अछि तखनहु ओकर विशेष आयु वर्ग लेल चीज बाँटल होयबाक चाही इन्द्रधनुषक सात रंग नै सात वर्ष तकके बच्चा लेल पोथी हर वर्ष लेल अलग अध्यायमे रहक छल आ जाहीमे पहिल माय लेल दोसर तुलबुल लेल आ एहिना होइत पांचम छठम लेल लिखैत काल शंकरक 'अपूर्णे पंचमे वर्षे.' जरूर याद राखक चाही - कार्यक्रममे गीतके प्रस्तुत करयबला जे बालक-बालिका छलथि ओहिमे अधिकांश शुद्ध उच्चारण कय सकयबला आयुवर्गक छलथि (पृ. ३०, ३१, ३७) ई ध्यान रखैत अध्यायभाजन अगिला कड़ीमे जरूर हो. लगैत अछि एतेक परिश्रमसँ तैयार किताबक ठीक सम्पादन नहि कयल गेल आ जे कियो सरसक गीतक प्रशंसक छलाह ओ सब एकर गीत बेर-बेर सुनि-सुनिकय सेहो केवल नीक -नीक बात बजयबला मुदा समाजमे स्वस्थ आलोचकक सेहो कमी नै पोथी लेखक सरस भनही दादा नहि भेलाह अछि (जे बादमे बात केला पर मालूम भेल) हमरा लागी रहल छल जे ई सरस ककाक(पृ.५ )नहि सरस दादाक उपहार अछि नेना भुटका लेल जे अनेक ठाम आयल अछि - बाबा, पोता संवाद(पृ. ७१), बाबाक अंगुरी (पृ. ८१) ('बाबा के अंगुरी' नहि). ८४ पृष्ठ + २४ आर्ट पृष्ठ पोथीक मूल्य १०१ रूपा अधिक नै अछि (जे कियो २०० रूपा राखि सकैत छल)- सरसजीक संपर्क – 9931346334, 0651-2560786 (NOTE-टाकाक जगह बेगुसरायक रूपा लिखब हमरा नीक लगैत अछि जे रानी विक्टोरियाक चांदीक/ सिक्का/ रूपा चाल जाहीस एक टाका बनल अछि) ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। १.जवाहर लाल काश्यप- विहनि कथा- जमाना बदलि गेलै २.जगदानन्द झा 'मनु'- विहनि कथा- मसोमात/ रहस्य ३.सुजीत कुमार झा- मिथिला पेन्टिङ्गक विदेशमे मांग बढल -छत्तामे मिथिला पेन्टिड्ड४.श्री जगदीश प्रसाद मण्डल- लघुकथा-सूदि भरना १ जवाहर लाल काश्यप विहनि कथा जमाना बदलि गेलै रमेश बाबा दलान पर बैसल रहैत आ रामायण गाबैत छलाह। बाहर दू टा बच्चा खेल रहल छल । ओ दुनु बहुत हल्ला कऽ रहल छल जइ लेल बाबा केँ बहुत दिक्कत भऽ रहल छल । ओ बेर- बेर बच्चा केँ चुप रहय लेल कहैत छलाह मुदा बच्चा चुप नहि भऽ रहल छल। ई देखि हमरा सेहो तामस आबि गेल । हम दुनु बच्चा केँ दु थापर लगा देलियै । बच्चा कानैत आंगन चलि गेल । आंगन मे बच्चा केँ माय पुछलखिन्ह "के मारलकौ"? बाबा हमरा कहलथि बौआ जमाना बदलि गेलै । पहिले जे बच्चा आंगन मे कानैत पहुँचैत छल तँ माय पुछैत छल किएक मारलखुन्ह ? अर्थात कि गलती केलहीं, आब पुछैत अछि के मारलकौ"? मतलब ककर अतेक हिम्मत भेलै जे तोरा मारलकौ । २ जगदानन्द झा 'मनु' ग्राम पोस्ट- हरिपुर डीह्टोंल, मधुबनी दूटा विहनि कथा १. मसोमात चारि बरखक बाद, गामक माटि-पानि जेँ देह में बहि रहल अछि हिलकोर मारलक तँ सभ काज-बाज छोरि नोकरी सँ सात दिनक छुट्टी लय कए गाम बिदा भेलहुँ | जेना-जेना गामक दुरी कम भेल जए तेना-तेना हृदयक बेग आओर गामक माटिक गंध दुनू तेज भेल जए | ट्रेन आ बसक यात्रा क्रमसँ खत्म भेला बाद गामक चौक सँ पएरे गाम हेतु बिदा भेलहुँ जेकर दुरी करीब एक किलोमीटर रहै | ओनाहितो असगर, समानक नाम पर कन्हा पर एकटा बैग आ दोसर गाम देखक लौलसा, रिक्सा छोरि पएरे चलैक लेल प्रेरित कएलक | अपन टोल में प्रबेश करिते सभसँ पहिले छोटकी काकी पर नजैर परल | ओना गामक सम्बन्ध में ओ हमर बाबी लगैत छलथि मुदा गाम में सभ कियो हुनका छोटकी काकी कहि सम्बोधित करैत छलनि तइँ हमहुँ हुनका छोटकी काकी कहैत छलियैन | उज्जर पढिया सारी पहीरने आँचर सँ माथ आ एकटा खूट सँ नाक तक मुह झपने | रस्ता सँ आँगन जाईत घरक कोन्टा पर ओहो हमरा देखलथि, जा हुनका गोर लागि आशीर्वाद लेलहुँ | "केँ... बच्चू" छोटकी काकी केँ मुह सँ खडखराइत अबाज निकलल "हाँ काकी " "कहीया एलअ" "एखन आबिए रहल छी काकी " "एसगरे एलअ हेँ " "हाँ " "आ दिल्ली में कनियाँ, धिया-पुता सब ठीक" "अहाँक आशीर्वाद सँ सभ कुशल-मंगल, अहाँक की समाचार नीके छी ? " ई प्रश्न सुनिते हुनका आँखि सँ नोर झहरअ लगलनि नोर रोकैक असफल प्रयास करैत -" कि बौआ, एहि मसोमात केँ की नीक आ की बेजए, बेजए तँ ओहि दिन भय गेलहुँ जहिया अहाँक काका नबाडिये में छोरि स्वर्ग चलि गेला, आब तँ एहि बुढ़ारी में कियोक धूओ नहि देखए चाहैए, देखला सँ सभ केँ अमंगल होएत छैक | नहि जानि बिधाता एहि अभागनि केँ आओर कतेक ओरदा देने छथि | आई महीनों केँ बाद ककरो सँ दूमुह गप्प केलहुँ आ कियो हमरो द पुछलक ....." ई कहैत काकी अपन नोर केँ नुकबैत कोन्टा सँ अँगना दीस चलि गेली आ हमहुँ गामक जिनगीक, बिधबा, मसोमात, बुढ़ारी सोचैत आगु बढि गेलहुँ | २. रहस्य बाबा-बाबीक विवाहक चालीसम बर्खगांठ | दुनू गोटे अपन सम्पूर्ण परिवार केँ बिच घेरएल बैसल | चारूकात एकटा खुशीक वातावरण बनल | सभ केँ मुह पर हँसी, खुशी आ प्रशन्ता झलकि रहल छल | बाबीक पंद्रह बरखक पोती, बाबीक गरदनि पर पाछू सँ लटकि कए झुलति पुछलक -"बाबी एकटा गप्प पुछू |' बाबी -" हाँ पूछै" पोती -"बाबा-बाबी हम अहाँ दुनू केँ कहियो झगडा करति नहि देखलहुँ, एकर की रहस्य छैक |" बाबी लजाईत अपन पोती केँ कन्हा सँ उतारैत -"चल पगली, एकरा ई की फुरा गेलै |" बाबीक छोटका बेटा -"नहि मए ई तँ हमरो बुझैक अछि, ओनाहितो हमर नव-नव विवाह भेलए ई मन्त्र तँ चाहबे करी |" बाबी -" चल निर्लज, सब एक्के रंग भए गेलै, अपन बाबू सँ पूछै हुनका सब बुझल छनि |" छोटका बेटा बाबू सँ -"हाँ बाबू अहीँ कहु न अपन सफल विवाहिक जीवनक रहस्य | हमहुँ अहाँ दुनू में कहियो झगडा नहि देखलहुँ, ई मन्त्र हमरो दिय न ' ( अपन कनियाँ दिस देख क') देखू ने निर्मल तँ सदिखन हमरा सँ लडिते रहैत अछि |" बाबा, एकटा नमहर साँस लैत जेना अतीत केँ देखैक प्रयास कए रहल छथि | छोटका केँ माथ पर स्नेह सँ हाथ सहलाबैत बजला -"एकरा कियो झगडा कहैत छैक ? अहाँ दुनू में जे स्नेह अछि ओहि में किछु नोक-झोंक भेनाई सेहो आवश्यक छैक | जेना भोजन में चटनी, जीवन में सब पक्ष केँ अपन-अपन महत्व छैक मुदा हाँ ई मात्र नोक-झोंक तक रहवा चाहि झगडा नहि, नहि तँ एहि सँ आगू जीवन नर्क भए जाईत छैक | पती पत्नीक बिचक आपसी सम्बन्ध नीक अछि तँ स्वर्गक कोनो जरुरी नहि आ यदि सम्बन्ध नीक नहि अछि तँ नर्कक कोनो आवश्यकता नहि ओहि अवस्था में ई जीवने नर्क अछि |" सभ कियो एकदम चूप एकाग्रता सँ हुनक गप्प सुनैत | चुप्पी केँ तोडैत बाबा आगू बजलाह -"रहल हमर आ तोहर मए केँ बिचक सम्बन्ध तँ ई बहुत पुरान गप्प छैक, जखन हमर दुनू केँ विवाह भेल आ हम दुनू एक दोसर केँ पहिल बेर देखलहुँ तखने हम तोहर मए सँ वचन लेलहुँ जे जखन हमर मोन तमसे ' तँ ओ नहि तमसेती आ जखन हुनकर मोन तमसेतनि तखन हम नहि तमसाएब | बस ओ दिन आ आई तक हमरा दुनू केँ बिच नोक-झोंक भेल झगडा कहियो नहि |" ***** ३ सुजीत कुमार झा मिथिला पेन्टिङ्गक विदेशमे मांग बढल -छत्तामे मिथिला पेन्टिड्ड मिथिला पेन्टिङ्गकेँ देश विदेशमे मांग भऽ रहल समयमे पेन्टिङ्ग व्यावसायीसभ नयाँ नयाँ चीजमे पेन्टिङ्ग बना कऽ बजारमे आनए लागल अछि । एहि क्रममे जनकपुरक नारी कला केन्द्र कुवा छत्तामे मिथिला पेन्टिङ्ग पारि बजारमे आनएकेँ तैयारी कऽ रहल अछि । केन्द्रक प्रमुख संतोष मिश्रक अनुसार जल्दीए अन्तराष्ट्रिय बजारमे मात्र नहि जनकपुर सहित सभ ठाम एहन छत्ता भेटत । साढे तीन सय रुपैया सँ साढे चारि सय रुपैयामे ओ छत्ता उपलब्ध हएत । नारी कला केन्द्रक मंजुला ठाकुरक नेतृत्वक कलाकार मिथिला पेन्टिङ्ग बला छत्ताकेँ आकृति देने छथि । केन्द्रक प्रमुख मिश्रक अनुसार छत्तामे मिथिला पेन्टिङ्ग राखएकेँ सल्लाह अष्ट्रेलियन नागरिक टोनी सेन्ड्रेस देने छलथि । हुनके सल्लाह अनुसार छत्तामे मिथिला पेन्टिङ्गक रुप देल गेल ओ कहलन्हि । मिथिला पेन्टिङ्ग बला छत्ता अमेरिकाक सन्ताफेमे होबएबला सांस्कृतिक प्रदर्शनीमे सेहो राखल जाएत । १९८९ ई. मे जनकपुर नगरपालिका १२ कुवामे स्थापित नारी कला केन्द्रमे मिथिला पेन्टिङ्ग सँ जुडल विभिन्न आकृतिसभ बनाओल जाइत अछि । जनकपुरमे बनल मिथिला पेन्टिङ्गकेँ अन्तराष्ट्रीय स्तरमे बहुत मांग रहल अछि । एहि ठाम नेपाली कागजमे मिथिला पेन्टिङ्ग, अएना, कप, सिलाई कढाई, सेरामिक्सक सामानसभ बनाओल जाइत अछि । अमेरिकी नागरिक क्लियर वर्कटद्वारा शुरु कएल गेल नारी कला केन्द्रकेँ एखन अष्ट्रेलियन दूतावास सहयोग कऽ रहल अछि । ४ श्री जगदीश प्रसाद मण्डल लघुकथा सूदि भरना बालपनमे लागल चोट जहिना अधवेशू वा बुढ़ाड़ीमे उपकि जाइत तहिना डोमीकाकाकेँ बेटी बिआहक चोट मास दिनक पछाति उपकलनि। रोगाएल अवस्थामे जखन कियो जिनगी-मृत्युक मचकीपर झुलए लगैत तखन जहिना धर्मराजक दरवार लगैत तहिना हुअए लगलनि। निष्पक्ष समीक्षक जहिना साहित्यक कोण-कोणक समीक्षा करैत तहिना डोमीकाका सेहो करए लगलाह। अन्तो-अन्त अही िनर्णएपर पहुँचलाह जे गाममे रहने जीवन-यापन नै कऽ पाएब तँए बिनु परदेश गेने जीब असंभव अछि। केना नै असंभव होएत? पाँच बीघा जमीनबला डोमीकाकाकेँ दू बीघा घर-घराड़ीसँ लऽ कऽ गाछी-बिरछी, खरहोरिमे बरदाएल बाकी तीन बीघा जोतसीम। समाजोक देखा-देखी आ कुटुमो-परिवारक स्तरक अनुकूल तँ करए पड़तनि। जहिना धरमोक स्वरूप समायानुसार बदलि जाइ छै तहिना ने समाजोमे जे बेसी लाम-झामसँ बेटीक बिआह आ माए-बापक सराध करैत ओ समाजमे ओते ऊपर होइत। ततबे नै जइ समाजमे दोससँ बेसी दुश्मन रहैत तइ समाजमे ईहो पुरौनाइ तँ जरूरिये होइत जे अनकासँ कि मोर छी। दलानक ओसारक दछिनबरिया चौकीपर चित्त भेल पड़ल, दहिना हाथ मोरि दुनू आँखिपर लेने डोमीकाका परिवारक बदलैत स्वरूपपर आँखि गड़ा सोचि रहला अछि। मनमे उठलनि गलती अपनो भेल। ई तँ नजरिपर आएल जे समाज आ कुटुम-परिवारक देखौंस करब जरूरी अछि मुदा ई नै आबि सकल जे ओहूमे पतिआनी लगल अछि। एकठाम सभ समटल कहाँ छथि। भैयारियोमे तँ होइते अछि जे संगे-संग जिनगी बनौनिहारि पितिऔत बहिनक बीच एककेँ इंजीनियर, डाॅक्टर संगी भेटैत तँ दोसरकेँ ऑफिसक किरानी वा स्कूलक शिक्षक भेटैत अछि। भूल भेल, आगू दिस तकलौं मुदा पजरबािह आ पाछू दिस नै तकलौं। एकरा के उचित कहत जे एक-ओद्रक बेटा-बेटीक बीच इमान-बेइमान बनि जाउ। पाँच बीघा जमीन अछि चारू भाए-बहिन हिस्साक संग पाँचम अपनो दुनू परानीक हेबे करत। जँ से नै हएत तँ अपन जिनगी अनका हाथमे जेबे करत। मुदा गलती भेल, धड़फड़ी केने। तहूमे पत्नी आरो मन घोर कऽ देलनि। ई कहू जे अर्द्धांगिनी भऽ केहेन विचार देलनि जे ऐ गाममे कर्ज नै भेटत तँ हम नैहरसँ आनि देब। एकटा मुर्गी जँ दसठाम हलाल हुअए तँ ओकरा की कहबै? एक तँ ओहिना परिवार महजालमे ओझराएल अछि तइपर हमरा किरतबे समाजक ऊपर आन समाजक कर्ज आबि जाए, एहेन काज जीता-जिनगी नै करब। मुदा तइमे कनी औगताइ भेल। औगताइ ई भेल जे पच्चीस-तीस हजार रूपैये कट्ठाक चीज पाँचे हजार रूपैये भरना लगा देलिऐ। मुदा बीतलकेँ बिसरबे नीक। जँ से नै करब तँ भूतलग्गू जकाँ अपन देह-हाथ अपने नोचए पड़त। फेर मन भरना जमीनपर घुमलनि। केना लोक पावनि-तिहारमे सेर-पसेरी लऽ खेतो भरना लगबैए आ बेचबो करैए। मनमे खौंझ उठलनि, कानूने बनने कि सुथनी हएत जे आठ बर्खक पछाति भरना जमीन घूमि जाएत, मुदा होइ कि अछि। ततबे किअए, जहिना महाजनीक सूदिकेँ सीमामे बान्हि देल गेल जे दोबरसँ बेसी कहियो ने हएत, तहिना बैंकक कर्जकेँ किअए ने बान्हल जाइए, जे ग्रामीण-दशा (गामक लोकक जिनगी) आगू मुँहे नै ससरि पाछुए मुँहे ससरि रहल अछि। जइठाम एते महग पढ़ाइ भऽ गेल अछि, लाखक इलाज (शरीरक) भऽ गेल अछि, लाखक घर बनि रहल अछि तइठाम, कि उपाए अछि। हँ एते जरूर हेबाक चाही जे जखन सभ अपने छी तखन बीचमे इमान-बेइमान नै बनए। जहिना बरसातक मासमे एक दिसुका पानिकेँ दोसर दिसुका रोकि तेसर दिसक रास्ता पकड़ैत तहिना घीचा-तीरीमे डोमीकाकाक मन असथिर भेलनि। पड़ले-पड़ल पत्नीकेँ सोर पाड़लखिन। आंगनक ओसारक शीतल पाटीपर बैसि दायरानी बिआहक उनटा गिनगी करैत रहथि। फल्लांक करौछ हरा गेलइ, ओकरा तँ कहब जरूरी अछि। जँ से नै कहबै तँ अनेरे ओ दस ठाम बाजत जे फल्लाँ करौछ राखि लेलक। कोन चीज छी जखन एते खर्च भेबे कएल तखन एकटा करौछे कि छी। जहिना जिनगी बनबैमे जिनका जेहेन कठिन मेहनति भेल रहैए तहिना ने तिनकर जिनगीयो ठाढ़ होइए। जँ से नै तँ लाखक जिनगी केना पाँच-दसमे हारि मानत। फेर दायरानीक मनमे खुशी एलनि, अपना जँ बौको डाँड़ लागल तैयो बैहरी दादीकेँ नफे भेलनि। टुटल चंगेरा लेलियनि, नवका कीनि कऽ देलियनि। केना नै दैतियनि ओ थोड़े बुझलखिन जे हमरा चंगेरामे केरा-आम छोड़ि दोसर चीज जाइबला नै अछि। ओना हमरो तँ काज चलिऐ गेल भने पुरना गेल नव आएल से नीके भेल। पतिक अवाज सुनि ओसारेपर सँ एते जोरसँ बजलीह जे डोमीकाकाकेँ बूझि पड़लनि जे लगमे नै कनी हटल छथि। डोमीकाका लग तँ दायरानी काकी पहुँचि गेली मुदा मनमे अपने घिरनी नचैत रहनि। एक चालि चलि जहिना घिरनी विश्राम लैत तहिना काकीकेँ सेहो भेलनि। आँखि उठा तकलनि तँ देखलखिन जे ग्रीष्मकालीन घास-पात जकाँ कुम्हलाएल मुँह, जेठुआ गरेक मेघ जकाँ चिन्तासँ लादल आँखि, निरजन वनमे हेराएल बटोही जकाँ देखि मन सहमि गेलनि। अपन कर्तव्यक एहसास भेलनि। पियासल लेल जहिना पानि, तबधल लेल पंखाक हवाक जरूरति होइत तहिना चिन्ताएल मनक लेल सेहो मीठ बोलक जरूरत होइत अछि। आँचरसँ ढबढबाएल पतिक दुनू आँखि पोछैत बजलीह- “एहेन सकल-सूरत किअए बनौने छी?” सिकीक वाण सदृश पत्नीक बोल डोमीकाकाक हृदैमे बेधि देलकनि। छटपटाइत बजलाह- “उपाये कि अछि जे.....?” दायरानी- “तखन?” डोमीकाका- “परदेश जाएब। दुनू बेटोकेँ नेने जाएब, नहियो कमा कऽ देत पेट तँ पालत ने। जँ दसो हजार महीना कमाएब ते एक बरखे नै दू बरखे, पाँचो बरखे ते खेत छोड़ाइये लेब।” दायरानी- “तइ बीच?” डोमीकाका- “अहाँकेँ जाबे धरि बरदास हएत ताबे धरि रहब नै तँ भाएकेँ नैहर समाद पठा देबनि।” नैहरक नाओं सुनिते दायरानी बजलीह- “अहाँ सभ जखन चलिऐ जाएब तखन घरमे कोठिये-भरली लऽ कऽ की करब। मसोमातक चुड़ी जकाँ किअए ने ओकरो सभकेँ फोड़ि-फाड़ि कऽ फेकिये देबइ।” पत्नीक बातकेँ डोमीकाका ताड़ि गेलाह। कहलखिन- “हँसी-ठठा छोड़ू एहेन गरूगर समए केना टपब, से विचार दिअ। आखिर अहूँ तँ अर्द्धांगिनिये छी किने?” पतिक विचार सुनि विचारवान पत्नी जकाँ दायरानी कहलखिन- “पच्चीस-तीस हजार रूपैये कट्ठाक जमीन अछि। दस-बारह कट्ठा बेचि लेब, भरना छूटि जाएत। बुझबै जे तीन बीघा जोतसीम नै अढ़ाइये बीघा अछि।” अखाढ़क पहिल बरखाक पहिल बुन पड़लासँ जे जमीनक सुगंध निकलैत ओहने सुगंध डोमीकाकाकेँ पत्नीक विचारमे लगलनि। मुस्की दैत आँखि-पर-आँखि गड़ा धन्यवाद देलखिन। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। ३. पद्य ३.१.१.मुन्नी कामत-सातटा कविता २.रूबी झा- बाल गजल ३.श्रीमती इरा मल्लिक-- बाल गजल ३.२.१. मुन्ना जी २.प्रशांत मैथिल-बाल गजल ३.पंकज चौधरी (नवलश्री)४.जवाहर लाल काश्यप५.क्रांति कुमार सुदर्शन ३.३.१.जगदीश चन्द्र ठाकुर अनिल- १.बाल गजल/ २.की भेटल आ की हेरा गेल (आत्म गीत)(आगाँ...) २.कामिनी कामायनी- चिडैक अभिलाष ३.४.१.अमित मिश्र-बाल गजल २. ओमप्रकाश झा- बाल गजल ३.५.१.शिव कुमार यादव- बाल गजल २.शिव कुमार झा- कविता/ गजल३.किशन कारीगर- हास्य कविता ३.६.चंदन कुमार झा- बाल गजल ३.७.१.जगदानन्द झा 'मनु' -बाल गजल २.राजेश कुमार झा- दूटा कविता ३. जगदीश प्रसाद मण्डलक किछु गीत/ कविता ३.८.१. राजीव रंजन मिश्र- बाल गजल २. मिहिर झा- बाल गजल ३.गजेन्द्र ठाकुर- बाल गजल १.मुन्नी कामत-सातटा कविता २.रूबी झा- बाल गजल ३.श्रीमती इरा मल्लिक-- बाल गजल १ मुन्नी कामत १ जिंदगीक मरीचिका लटैक रहल छल गुच्छा गाछमे रसभरल मीठ आमक शरारती मन ललचाइत जी कहलक तोड़ि खाइ अकरा मुदा कि करी भय छल पहरेदारेक। मन नै मानलक पाइन मुँॅहमे भरि गेल फेर सोचलूँ बस एगो तोरू तक डर केहन यएह तँ निअम अछि संसारक। सभ खाइत अछि छुपि कऽ कखनो घरमे तँ कखनो बाहरमे ऊँच,नीच सँ बनै यऽ अतऽ सभ अपन यएह पथ पर तँ चलैत अछि सभक सभ। पर सच जे अनभिग अछि सभसँ ई अछि ई मीठ फल नै जहर अछि कोनो जे बदलि रहल अछि हमर नियत आ हमर संस्कार जे दऽ कऽ अपन मिठासक लालच झोंकि रहल अछि धधकैत भट्ठीमे। जिन्दगीक राहमे ऐत नित्य कतेक मरीचिका पर सिखब हम अकरेसँ संघर्षक रोज नया सलीका । २ ताकैत जिनगी कूड़ा ढ़ेरमे। देह सुखल पेट हाड़ी आँखि दुनू लाल छल। टुकुर, टुकूर ताकैत छल हमरा दिस ओ ओकरा मुखमे अनंत सवाल छल। पटनाक रेलवे लाइन पर ठार एगो मासुम बच्चा फटल पुरान लटकौने टाँगने छल एगो बोरा अपन पीठ पर देखि कऽ ओकरा एना लागल जेना ताकि रहल अछि अपन जिन्दगी गन्दगीक ढ़ेरमे। पर नै जानि कतेक मासुम कहिना पनपैत अछि अहि संसारमे। नित ताकैत अछि अपन मंजिल, अपन भविष्य अहिना कूड़ाक ढ़ेरमे। ३ संकल्प छोड़ि जाएत माझी पतवार उफनैत जिन्दगीक राहमे अछि हसरत हुनकर कि, थामैय पतवार हुनके अंश अहि मजधारमे। छी गर अहाँ कृति हुनकर तँ राही बनू अहि राहक उठाउ पतवार आ माझी बनू जिन्दगीक अपन राहक। ऐल छी अहां जतऽ तक ओइसँ आगुक कल्पना करू देख रहल अछि राह मंजिल अहाँक मुस्कुराइत ओइ पारमे। छोड़ि कऽ मोह वट वृक्षक समना करू हवा आ पानिक तब बनत व्यक्तित्व अहाँक अहाँक नामसँ अहि संसारमे। अहाँ अगर अंश छी हुनकर तँ बुझाइ नै कहियो ई दीप जे छोड़ि गेल अपन सब कुछ बस एगो अहींक विश्वासमे। ४ ठमकल शब्द रूकि जाइत ई हवा ई नजारा ई बहार, दुनियाक हम भऽ जाएब विलीन कतैव रूकि जाइत ई कलम आर हरा जाइत शब्द कतैव। नै उठत वेदना मनमे नै उमड़त भावना कोनो। जब जाएब खामोश अतऽ सँ तँ मेटौ जएत सब हसरत दिलक ने आएब हम याद ककरो ने करब हम याद किनको ओइ अज्ञात सफरमे नै मिलत हमराही कोनो बरसैत मेघ, चिलमिलाइत धूप सबहक बीचमे रहब हम असगर ठार ने लऽ जएब, ने छोड़ि जएब किछो बस एगो दिया जे जरत अहि ठाम सदखन, सबहक मनमे हएत ओ हमर कृति, हमर करमक ज्योत। ५ दहेजक बिहाड़ि। कहिया तक रहबै हम समान यौ भइया कहिया मिटतै ई अभिशाप यौ हमरो तँ परमतमे भेजलक मुदा अबैत ऐ संसारमे सब हेय सँ देखलक कोय कुलच्छनि तँ कोय कलंकनी कहलक। भइयाकेँ दुलार केलक हमरा धुतकाइर कऽ माय भगौलक दिन-राइत हम मायक हाथ बटै छी बाबू-दायक सेवा करै छी तइयो किए ई फटकार सुनै छी सुनि रहल छी सबहक मुॅंहसँ दहेज बिनु नै हएत हमर व्याह जे थामत हाथ हमर बाबू भरत पहिले जेब ओकर। हम बेटी छी आ कि समान जे गाम-गाम सँ आउत लोग करै लऽ हमर दाम छाम। आब सजबऽ पड़त सभ बेटीकेँ अपन आत्मदाहक साज आर कहिया तक पिसाइत रहतै बेटीक समाज। ६ हरैल हमर रूप जब एलौं तँ रूइ छेलौं कोमलताक सागरमे डूबल छेलौं प्यार सँ छुबै छल सभ हमरा हम सपनामे सूतल छेलौं। अंजान छेलौंव दुनियाक हकीकत सँ ऐ शोर शराबा, ऐ धधकैत भट्ठीसँ छिन गेल ओ स्वरूप देलक दुनिया हमरा नया रूप। देख कऽ दुनियाक रंग कॉंइप रहल अछि हमर अंग छल, कपट, धोखाधरी सब अछि सबहक संग। कतेक अरब रामक ऐमे पड़त करै लेल अतऽ सँ पापक अंत देखकऽ ई हम छी दंग आइ सबहक मनमे बसल अछि हजारो रावणक अंग। ७ विदाइ जो गै बेटी, आब कि निहारि रहल छी नोराइल आँखिसँ ककरा ताकि रहल छी। अतै तक लिखल छेलै साथ अतै तक छेलियौ हम तोहर बाप। एक जनम तूँ अतऽ गमेलऽ हमरा संगे सभ सुख दुख हँसि कऽ बितेलऽ अहिना तूँ ओतौ रहिअ खुशीक दीप जराइयहँ केलियौ आइ हम तोरा पराइ मन रोबैत अछि ठोर हंसैत अछि कऽ रहल छी आइ तोहर विदाइ। २ रूबी झा 1 बाल गजल निन्न सँ मातल अछि बौआ आबि कऽ सूताउ यै कतय गेलि बौआ माए ओछैन तँ ओछाउ यै खेलके नै ओ दिने सँ केहेन कठोर माइ छी भेल नै भानस तँ चड़े दूध नेना बुझाउ यै खन बाबा खन हमरा कोरा झुकि खसय छी अहाँ झट सँ जा किछु तँ बौआकेँ खुआउ यै कते महग गए किनलौं दुलरा पोता लेल नेना काया मे दूध बुन्न नै झट सँ पिआउ यै आबू यौ बौआ हमही दै छी अहाँकेँ दूध पिआ कनी ''रूबी'' आबि नेनाकेँ लोड़ियो तँ सुनाउ यै आखर -१७ 2 बाल गजल दाइ कने दे तँ हमरो तेल गमकौआ लगेबै माँथ परमे हमहुँ टिक़ुली झलकौआ लगेबै तेल लगा हम गुहबै जुट्टी लाल बान्हब फित्ता जुट्टी मे फूल फित्ता केर हम फलकौआ लगेबै भैर भैर हाथ हमरो दाइ गै चूडी पहिरा दे आगु पाछु दुनु कात कंगन खनकौआ लगेबै सोनरा सँ दलहिन एहन सन पायल किन दे ओइमे हम सौंसे झुनकी तँ झनकौआ लगेबै एकेटा चीज आर छै ललका साडी ओहो किन दे साड़ीमे हम चान आ सितारा चमकौआ लगेबै आखर~१८ 3 बाल गजल आ रौ छौरा बान्हि दियौ तोहर हम झोट्टा रौ ढील लिख सोहैर गेलौ आब हेतौ जट्टा रौ हे रौ कने छौरा कऽ पकड़ि कऽ आन भगतौ देख तँ कसि कऽ पकड़ जा ओकर गट्टा रौ दलान पर सँ बजा आनलौं फेर भगलै आब जौँ पकरबौ तँ तोरा मारबौ सट्टा रौ ऐ बेर दुर्गा मे कटबा देब तोहर लापेट छागरो तँ दाइ कबूलने छथुन जोट्टा रौ छोर नै छूबौ तोहर केश खएले कने आ राखने छी आ नै चुड़ा दही भऽ जेतौ खट्टा रौ आखर~१६ 4 बाल गजल चलहिन आइ तूँ गाम पर खुएबौ हम तोरा मारि गै चोरी कऽ के हाथ नुका कऽ बड़ बनल छैं तों होशियाइर गै पहिने खेत सँ मटर चोरेलैं गाछक तों बैर झटाहलैं हम जौं माँगी तोरा सँ तँ बिखिन्न बिखिन्न पढ़ै छैं गाइर गै नानाक देलहा फराको तों फारलहीं माँ कऽ जा कहबौ हम अपनों तोरा काँट गरलौ बैरोक तोड़लहिन डाइर गै मोन छौ की उलहन माँ क बटेदार सँ सुनेबे करेभिन सौंसे देह तँ चुट्टा बिन्हलकौ कतेक चलबें तों झाइर गै पढ़ लिखमे नै मोन लगे छौ उचक्की बनि घूमल चलै छैं के तोरा संग बियाहो करतौ कोना बसबें ससुराइर गै आखर -२२ ५ बाल गजल हे रौ बौआ तों एना रुसल छेँ किए दूध-भात लेल तों बैसल छेँ किए रे तोरा तँ खुएबौ कोरामे सुतेबौ माएके दूध लेल अरल छेँ किए कीनि देबौ लाल गेन आ घुरकुन्ना छोड़ ने जिद्दपन डटल छेँ किए आबो दहुन बाबा के देथुन्ह पेरा पेरा सन नीक की नठल छेँ किए कहबै नाना के देथुन्ह धेनु गैया आबो बड़ेरीपर चढ़ल छेँ किए वर्ण-१३ बाल गजल ६ चलय ठुमकि बौआ कते सोहावन लागय छै बाजय बौआ तोतल माँ मनभावन लागय छै दादी केर आँचर तर जाए नुकाय गेल बौआ खेलै चोरीया नुकैया मोन भुलावन लागय छै दादी केर पनबसन सँ बौआ खाय लेल पान ठोर लाल पिक दाढी पर लुभावन लागय छै उल्टे खराम बाबा केर एना पहिर लेल बौआ खसय खन उठय जिया जुरावन लागय छै जिद्द ठानलैन बौआ लेब देवी आगुक मिसरी डटलैन माँ फुसीये नोर बहावन लागय छै वर्ण १८- ७ रुसिये गेल बौआ मनाएब कोना कए निर्धन माय बौआ बुझाएब कोना कए ठाढ भेल कटोरी भरि माँगय छै दूध चिक्कस के झोर ले बजाएब कोना कए एहन किए निर्धन बनाओल विधाता दूधो नहि जूडय जुड़ायब कोना कए देलक जे जन्म पुराओत सैह विधाता लाज हुए अनका बताएब कोना कए मानि जाउ बाबू अहाँ छी बड्ड बुधियार छूछ माय जिद्द के पुराएब कोना कए (वर्ण १५) रुबी झा ८ बाल -गजल कंटीरबा आ कंटीरबी माँ बापक लेल दुनू आँखिक पुतली एकटा अछि हीरा त' दोसर मोती भेल दुनू आँखिक पुतली बौआ खेलय गेल गेंद कब्बडी बुच्ची खेलय कनिआ-पुतरा डाँर में घुघरू पैर पाजेब बाजि गेल दुनू आँखिक पुतली ठुमैक चलै अछि बौआ ललन छ्मैक चलै बुच्चीया लालपरी जुडबै छाती माँ के बापक ओ शान भेल दुनू आँखिक पुतली बौआ खेलक खोआ मिश्री बुच्ची खेलक करकर कचरी माछ फरिछ बाजै बुच्ची बौआ त' तोतला गेल दुनू आँखिक पुतली रूबी लेल दुनू गौरब छै बौआ राजाबाबू बुच्ची छै लालपरी बनै कोनो हाकिम बच्चे ओ माँ बाप लेल दुनू आँखिक पुतली वर्ण-२३ ९ हे रौ गुलेटेनमा सुन रौ टुनटुनमा एलै छुट्टी गर्मी क' चल इस्कूल क' कहिये हम टाटा आब भेलै छुट्टी गर्मी क' अन्हर बताश में खूब हम घुमब गाछी जा आमो चुनब पाकल आमक रस निचोरब आई चढ़लै छुट्टी गर्मी क' मेघ बुन्नी में खूब नहायेब माई क' हम बातो नै मानब हत्ता-खत्ता में चल मान्छ जा' क' मारब बढ़लै छुट्टी गर्मी क' हाट बजार में त' बाबु संग जेबै लेमंचुस बिस्कुट खेबै मेला में जा' क' हम झुला झुलब कम बचलै छुट्टी गर्मी क' इस्कूल क' गृहकार्य बांचल अछि रत्तियो नै त' वक्त छैक अछि मोन विधुआयेल किये ख़तम भ' गेलै छुट्टी गर्मी क' सरल वार्णिक बहर वर्ण -२२ १० टुअर टापर बहिन कs टुअरे एकटा भाई छैक सड्क कात मे बैस कs कोना झिल्ली मुरही खाई छैक माँथ मे नै तेल छैक एको बुन छिट्टा जकाँ केश छैक सभ कियो क रहतो ओ केहन टुअर बुझाई छैक तन नै चिथरो देने पढेता लिखेता की साढ़े बाईस देशक भविष्य देखियौ किये एहन कs घिनाई छैक दर्जन पुराब मे निर्लज्ज कs लागये छै मोन कतेक छी तs हम बड्क़ा एको बेर कहितो नै लजाई छैक कतबो करता बाप- बाप रोकल जाई जनसंख्याँ पढ़ल लिखल गदहा एता बड़ बेशी देखाई छैक कतै करब बखान मातबरी मे नुकैल गरीबी कs नेना सभक दशा देखि 'रुबी' कs किछ नै फुराई छैक आखर --२० ११ मए गै आकाश सौ ओ चन्ना मंगा दे हनुमान जी ध्वजा केर फन्ना मंगा दे े रोज ईस्कुल जा क भ गेलहु हरान सर सौ आई छुट्टी क बहन्ना मंगा दे दाई केलेन अनोना माँ क एकसन्झा दाई आगु सौ आलू केर सन्ना मंगा दे िददी खेलक बर्फ ललका धान बेिच हमरो कनेक दाई सौ मरधन्ना मंगा दे नै िलखब िसलेट पर नै चोक माटी बाबु सौ कलम एकोटा पन्ना मंगा दे आखर~१४ १२ कक्का के अंगना में लीची केर गाछ फरल बेजौर गै गेन खेलय गेल दुलरुआ गेन खेलल बेजौर गै काकी बजथिन कोठा चढ़ी सुनु ऊपराग बौआ माय अहाँ केर बौआ लड़ीकबा लीची क' तोरल बेजौर गै आंखि मे नोर भैर क' बजै बौआ सुन गै माई हमर माँ हम किछुओ नै जानि लीची कतए छल बेजौर गै मांथ धय बैसली बौआ माई कोन करू हम उपाए सच बजै छै काकी नेनोक छै नोर बहल बेजौर गै असमन्जस परलै रूबी बौआ बिहुँशे मुख दबाई पाछु हाथ नुकेने झोरा अछि लीची भरल बेजौर गै सरल वार्णिक बहर आखर -- २० १३ बाल गजल जए दे हमरो दिदी केर सासुर गै माँ हमहु खेबै माँछ भात आ काकुर गै माँ जिजा भए क संग हम खेलब कबड्डी बहिन संग मे पकरबै दादुर गै माँ दिदी देलकै चुप्पे चिट्ठी देबै जा जिजा क भेंट करै ल दिदी भेल छै आतुर गै माँ बहला फुसला मना जिजा के ल आनब ध घिसिया क आनब नै त पाखुर गै माँ एना नै डांटे हमहु आब बरका भेलौ मुह फुला बैसै नै हो पित्ते माहुर गै माँ आखर~१५ रुबी झा ३ श्रीमती इरा मल्लिक 1 डेग हमर छोट एखन लछ्य बहुत दूर अछि नापि लेबै सफलताक बाट मेहनतिसँ बुझै छी केतबो बाधा एतय बाटमे ढकेलि आगू बढ़बै मनमे जँ ठानि लेलौँ फेर पाछु मुड़ि नहि सकै छी मिथिलाक गौरवगाथासँ कहाँ कियौ अनजान छै छलै कहियो दिव्य मिथिला एखन तँ माटि फकै छी खूब पढ़ि आगू बढ़बै देशक हित काज करबै स्वर्णिम मिथिलाके सपना अपन आँखिमे तकै छी मिथिला अछि सुँदर ठोप भारतक ललाट केर विश्वमे सम्मानित हो से भगीरथ प्रयास करै छी (वर्ण -19) 2 सौँसे गाम तूँ मारने फिरैछेँ भरिके खूब टहल्ला रौ जँ पढ़ै लिखै लेल कहबौ तँ बहुत करै छेँ हल्ला रौ छौँरा सब सँग खेलै छे भरि दिन कबड्डी गुल्ली डँडा नहि परलौ एखन धरि तोरा बपहियासँ पल्ला रौ आबय दहिन गाम हुनका देखथुन तोहर लिल्ला दैवो नहिँ बचेथुन जखन तोरथुन तोर कल्ला रौ हम्मर बातक मोजर नै कैन्को ख़ूब कर्हि बदमस्ती एकै बेरक सटकानि सँ खुलि जेतौ ग्यानके तल्ला रौ आखर 20 ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। १. मुन्ना जी २.प्रशांत मैथिल-बाल गजल ३.पंकज चौधरी (नवलश्री)४.जवाहर लाल काश्यप५.क्रांति कुमार सुदर्शन १ मुन्ना जी बाल गजल 1 शुन्य भेल स्वप्न नुका क' राखू अपन संस्कार जोगा क' राखू अछि सूट-बूट शिक्षोमे लागू मोनकेँ मैथिल बना क' राखू कंप्यूटर गेम अछि सुन्नर मगज टटका बना क' राखू नेना लक्ष्यहीन नहि हुअए तकर जोगार धरा क' राखू केकरो बानि रहए केहनो हृदेसँ अपन बना क' राखू वर्ण----11 2 अ सँ अनार अछि मिट्ठ कसगर आ सँ आम लागैए बड्ड रसगर पिज्जा बर्गर तँ घुसि गेल मोनमे केखनो कतौ दबा दैछ असगर शिक्षा माध्यममे अंग्रेजी भेल हावी फैशन अंग्रेजिया छै रभसगर पीढ़ी नवकाकेँ नव रूपेँ सजाउ अपन संस्कृति भ' गेल अजगर तकनीकी ज्ञानमे नेना बढ़ए आगू पितोक मोन होइछ हुलसगर वर्ण-----13 3 "ए"सँ एप्पल सेव कहाइए "बी"सँ बुक ज्ञान दए जाइए अंग्रेजीमे लीन भ' नेना सभ माइक बोली बिसरि जाइए निज खगता जानि क' पढ़ाइ विकासक सनेश द' जाइए बूढ़ लोक अछि धरती पर नेनाक बास चान भ' जाइए वाइसँ यंग छै किछुए दिन ज़ेडसँ सभ जीरो भ' जाइए वर्ण----11 २ प्रशांत मैथिल बाल गजल शब्दक मूर्त्ती गढ'क चाही खूब मोन स पढ'क चाही हमही अयाचीक शंकर इतिहास के रच'क चाही थैआ डेगा डेगी लऽरे लऽरे खसि उठिक बढ'क चाही नञि बाँचल फुनगी डारि आ चान पर चढ'क चाही कनिञा पुतरा साम चको नाम भारती मढ'क चाही वर्ण-१० ३. पंकज चौधरी (नवलश्री), बाबूजी- श्री भागेश्वर चौधरी (लोक स्वास्थ्य अभियंत्रणा विभाग, बिहार सरकार (जमूई) मे कार्यरत), माताश्री- श्रीमती वंदना देवी (गृहणी), जन्मतिथि : ११.०९.१९८०, स्थायी पता: ग्राम+पोस्ट- सुगौना, प्रखंड- राजनगर, जिला- मधुबनी, मिथिला, वर्तमान निवास : नई दिल्ली, शैक्षणिक योग्यता : राम कृष्ण महाविद्यालय, मधुबनी (मिथिला) सँ वाणिज्य विषयक संग स्नातक वर्तमान मे अध्ययन ( ICAI, नई दिल्ली सँ C.A.(फाइनल) एवं I.C.S.I.,नई दिल्ली सँ C.S.(प्रोफेसनल) क संगे एकटा प्राइवेट कंपनी मे सहायक प्रबंधक (वित्त एवं कर) क पदपर कार्यरत। 1 बाल गजल संचमंच भऽ रह्बौ सदिखन आब नै करबौ हुलहुल गै मोन लगा कऽ पढ़बौ देखिहन्हि जेबौ सभ दिन इसकुल गै संगी संगे हिल - मिल रहबै पैघ के सभटा कहल करबै कान पकड़लौं आब ने करबौ बदमाशी हम बिलकुल गै खाय-काल नकधुन्नी केलहुं तैं लटि कऽ हम एहन भेलहुं डाँड़ सँ पेंटो सर-सर ससरल अंगो होई छै झुलझुल गै सागो खेबय सन्नो लेबय आब नै कखनो मुंह बिचकेबय परसन देऽ तीमन - तरकारी दालि दे आरो दू करछुल गै दूध पीबि हम सुरकब दही खूब खेबय खाजा-पनतोआ तइ पर सँ हम आमो खेबऊ पीयर-पाकल गुलगुल गै देह्गर-दशगर संगी-तुरिया हमरा आंइख देखाबै जे कसरत करबै देह बनेबै करतै डरे ओ छुलछुल गै आशीर्वचन तोहर अमृत सन आँचरि आँगन ममता के राजा बेटा "नवल" तोहर माँ चहकत बनि कऽ बुलबुल गै ***आखर-२३ 2 बाल गजल-८ आमक गाछपर झूला लगाएब ना अपनों झूलब सभके झुलाएब ना केरा डम्फोरि आ लत्ती मोटका आनब सउन बाँऽटि कऽ जउड़ बनाएब ना कखनहुं ऊंचगर निच्चा कखनहुं झूले संग हमहुँ आएब-जाएब ना खसतय गोपी धऽपर -धऽपर- धप झूला के बहन्ने ठाईढ डोलाएब ना कियो बीछय गोपी हेतै नहि झगड़ा हम सभ संगी मिल-जुलि खाएब ना कसि-कसि कऽ आर झूलाबय हमरा ऊँचगर जा हम चान के पाएब ना ठाढ़ि ओदरतय झूला जों टूटतय "नवल" चट सभ दौड़ पड़ाएब ना ***आखर-१४ 3 बाल गजल इसकुल के बस्ता छै भारी हम नञि टंगबौ टांगै तू पाइनक थरमस हमरा चाही माँ दऽ दे नै मांगै तू मोरक चित्र बना कऽ आनऽ देलथि हमरा मैडम जी फोटो तोड़े पाड़य पड़तउ सुन लेकिन नै रांगै तू छिट्टा तर जे धैल नुका कऽ भनसा घर गमकलै माँ संग सोहारी पाकल कोआ खेबय कटहर भांगै तू ओलती के काते-काते हम ठाढि गुलाबक रोपने छी ओरिया कऽ धान पसारय माँ फूलक गाछ नै धांगै तू "नवल" छोट नञि आब ओते काज अढा किछ हमरो हमरा हाथ पघरिया दऽ दे माँ जारणि नञि पांगै तू ***आखर-२० 4 बाल गजल काँचे खटहा सरही पड़ मे मारय मूस हबक्का यौ लड्डूओ नञि खा हेतय ओकरा दांत कोंतेतै पक्का यौ राति दिवालिक दीप जड़ेबै खेबै हम बताशा लड्डू हुक्कालोली गेनी भंजबय फोड़बय खूब फटक्का यौ चिप्स-चरौरी चूड़ा भूजल लागत करू तइयो खेबै बीछ-बीछ मिरचाय दीयउ भूजा हमरो दू फक्का यौ बारी मे जा कोना चलेबै अप्पन छोटकी कठही गाड़ी माटिक नमहर ढेपा तर फँसतै गाड़ी के चक्का यौ पन्नी ताकू गेन बनाकऽ अंगनें मे किरकेट खेलेबै गेंद दियौ गुड़कौवा हमरा हमहूँ मारब छक्का यौ बंटी सँ नञि मीत लगेबै सी नम्मर के छै बदमाश अपने मारि बझाबै सभ सँ हमरा कहै उचक्का यौ इस्कुल के बस्ता मे राखल मुरही नै मसुवाई कहीं "नवल" हाट के बाट तकै छै कचरी आनब कक्का यौ ***आखर-२० ५ अहि बाटी मे अगबे रोटी चिन्नी संग-संग दूधो कम ई बाटी छऊ तोहर भईया ई बाटी नहि लेबौ हम चोरा-चोरा क चिन्नी फंक्लैं माँ के जा कहि देबौ हम नञि त एकटा फाँक अचारक दे उताइर क खेबौ हम खुरलुच्ची बनि लुच-लुच करबैं नानी मोन पड़ेबौ हम आब जों बिठुआ कटबैं भैया दांते कैट कनेबौ हम सुन गे बहिना तोरो अहिना कहियो मजा चखेबौ हम ककरो स जो झगड़ा हेतौ आब नञि तोरा बचेबौ हम हासिल पड़का जोड़ ने कहियो तोरा आब बतेबौ हम चलहिन इस्कूल मैडम जी सँ पक्का माईर खुएबौ हम नवलश्री "पंकज" ६ निश्छल-निर्मल कोमल बचपन धिया-पुता केर अलगहिं जीवन चलैत रहछि सभके अंतर्मन भावक अजबहिं कूटन - पीसन छै देह लेढायल मोन ई कंचन कमल-फूल सन लागै अनमन क्षण ठिठियै क्षण कानै अनढन चट सलाह आ झट द अनबन बस टांट सोहारी बसिया तीमन उठि भोरहरबा सभ सँ नीमन इस्कूल सँ बचबा लेल धरछन नीक लगई छई मरुआ मीरन कितकित पाड़ल सगरो आँगन चईत-कबड्डी मुँह मे सदिखन हो मेघ-सुरुज या चान-तरेगन जहि पर हाथ धेलक से अप्पन "नवल"कथी फुरि जेतय कक्खन बाल-मनक नै किछु परिसीमन वर्ण- १३ (सरल वर्णिक बहर) ७ मोन पड़ल ई कियै अनेरे बात पुरनगर बचपन के आंखि नोरेलै मोन जड़ेलक याद रमनगर बचपन के बचपन दाबल - गाड़ल - बिसरल यौवन के मादकता मे खोलि रहल छी खाली मोटरी बैसल असगर बचपन के बाबुक-कनहा मायक-कोरा अनुपम झूला सन घुआ-मुआँ ता-ता-ता थैया आर ठेहुनिया खेल छमसगर बचपन के ठकि-फुसला क कते खुयेलइन्ह दूध-भात आ गूड़क पूआ चंदा-मामा आर मौसी-बिलाय नेह हिलसगर बचपन के बस फूईसक खेती द्वेषक दोषी "नवल" जुआनी निर्संतोषी धाह जुआनिक जड़ा गेलै ओ गाछ झमटगर बचपन के --- वर्ण - २३ --- (सरल वर्णिक बहर) ८ कीन दे कचरी-झिल्ली-बऽरी लवणचूस आ कुट-कुट माँरी लोढि बाधसँ धान जे अनलौं भूजि दे मुरही भुट-भुट माँ धान अगोअं केऽ जेऽ उसरगल तकर कीन दे फीता-बाला काकी जे देलखिन्ह बाला से हाथमे होई छई छुट-छुट माँ ललका फीता गूहल जुट्टी तेल सँ माथा गमकै गम-गम थकरै केश जहन ककबा लऽ ढील केऽ मारै पुट - पुट माँ देखि भूख सँ लोहछल नेन्ना दुःख-सुख सभटा लोप भेलै भंसा घर मे घाम सँ भीजल काज करै सभ चुट-चुट माँ होय कहाँ अनका देखबैलै "नवल" इ मायक माया-तृष्णा भेड़ निन्न तइयो कहि खिस्से दूध पियाबय घुट-घुट माँ --- वर्ण- २२ --- (सरल वार्णिक बहर) ४ जवाहर लाल काश्यप खसलै पर नहिं कनलै बौआ खसलै पर फेर उठलै बौआ हाथ पकडि चललै बौआ हाथ छोडि क चललै बौआ अपने पैर पर दौडलै बौआ चान के छू लेलकै बौआ ५ क्रांति कुमार सुदर्शन एखन देख'मे छोट लगै छी तैयो कछुआ चालि चलै छी पएर हमर डगमग करैए तैयो हम नभ-चान देखै छी बोली हमर क क ट ट प प तैयो महान बनब से स्वपन देखै छी बहुत दूर अछि दिल्ली अमेरिकाक नाम सेहो सुनै छी चढ़ब हम चान आ मंगल पर आब कहू की हम अँहासँ कम लगै छी ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। १.जगदीश चन्द्र ठाकुर अनिल- १.बाल गजल/ २.की भेटल आ की हेरा गेल (आत्म गीत)(आगाँ...) २.कामिनी कामायनी- चिडैक अभिलाष १ जगदीश चन्द्र ठाकुर अनिल १ बाल गजल
रोज उठैछी भोरे-भोरे घूमि अबैछी भोरे-भोरे ।
दूर-दूर धरि हरियर धरती देखि अबैछी भोरे-भोरे ।
धरती मैया सभहक मैया निहुरि कहैछी भोरे-भोरे ।
आम-डारि पर गाबय कोइली गीत सुनैछी भोरे-भोरे ।
माए-बाबू भगवान हमर छथि चरण छुबैछी भोरे-भोरे ।
माटि-पानि ले’ तन-मन-जीवन प्रण ई करैछी भोरे-भोरे । २ की भेटल आ की हेरा गेल (आत्म गीत)- (आगाँ...) छल सुप्त हिमालय बरकि उठल अंतरमे धधरा धधकि उठल सय सय कोसी-कमला-गंडक कत घाव मोनमे टहकि उठल हम देखलहुं दूनू हाथ अपन मुट्ठी छल अपनहि कसा गेल हम सोचि रहल छी जीवनमे की भेटल आ की हेरा गेल । ऽ हम थाकि गेलहुं चलइत-चलइत हम कानि गेलहुं हंसइत-हंसइत अनवरत अभावक दुर्दिनसं हम हारि गेलहुं लडइत-लडइत नहि जानि कखन के सूतलमे कविताकेर अमृत चटा गेल हम सोचि रहल छी जीवनमे की भेटल आ की हेरा गेल ।
चलिते-चलिते भेटलाह रमण आ भेटि गेला श्री सोमदेव कोइलख विद्यापति पावनिमे भेटल आषीश मधुप किरणक सस्वर दू रचना केर पाठ छल पीठ हमर थपथपा गेल हम सोचि रहल छी जीवनमे की भेटल आ की हेरा गेल । ऽ कविता अयली जहिया संगमे भ’ गेल पैघ परिवार हमर यात्री, हरिमोहन, जीवकान्त शेखर, रवीन्द्र, मणिपद्म, अमर बाबू कक्का आ भैया सन छल नाम कतेको जोडा गेल हम सोचि रहल छी जीवनमे की भेटल आ की हेरा गेल ।
कविता संग हम जीबय लगलहुं बूलय लगलहुं झूलय लगलहुं जीवनकें उत्सव मानि सतत नाचय लगलहुं झूमय लगलहुं कवितासं प्रेमक बात हमर छल गाम-गाम गनगना गेल हम सोचि रहल छी जीवनमे की भेटल आ की हेरा गेल ।
‘पारो’ पढिक’ छल कना गेल ‘खट्टर कक्का’सं हंसा गेल ‘बाबा डंडोत बच्चा जय सियाराम’ चिंतित मनकें गुदगुदा गेल ‘वस्तु’केर पिहानी ‘नानी’ पढि नहि जानि कते की सोचा गेल हम सोचि रहल छी जीवनमे की भेटल आ की हेरा गेल । (अनुवर्तते...) २ कामिनी कामायनी चिडैक अभिलाष एक पाखी मीत सॅ किछु कहि रहल छल डारि कत्तेक हम देखल अहि जनम में भेट नहि पाओल हमरा कत्तौ बसेरा आस के एक खड नेने ठाढ एत्त । कखनो त’ कत्तो कोनो बिरीछ भेटत घर के एक नींव राखि .. . .. . . . खोंता सॅ बाहर हमहूॅ भरि पोख हेरब हमरो अंडा हमरो चिल्का हमरो संगी हमहूॅ कत्तौ चैन सॅ किछु राग टेरब मीत घूरल देर धरि निःचेष्ट भ’ क’ छोट एतेक स्वप्न कतैक ई अकिंचन भॉपि क’ ओकर एहेन मनोभावना के उडि चलल घबडा क’ ओ कमजोर पंखी। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। १.अमित मिश्र-बाल गजल २. ओमप्रकाश झा- बाल गजल १ अमित मिश्र बाल गजल 1 भनसा धर दिश दौड़लनि बौआ अपन जलखइ माँगलनि बौआ बीच आँगन मे ऊँच पिढ़ी लगेला छरपला , डोलल खसलनि बौआ देखलनि माँ के ठाढ़ हाथ फैलेने चोट बिसरि कोरा बैसलनि बौआ दादी एलखिन लेने बाटी बौआ के दूध देख क' बाटी फेकलनि बौआ बाबू खेलखिन मिरचाइ सोहारी हुँनको चाही से जीद धेलनि बौआ गेँद गुड्डा हाथी , देब मोटर कार बहुते मनेलौँ नै मानलनि बौआ संग मे जाएब घुमै लए सर्कस अमित सँ चारि लड्डू लेलनि बौआ बर्ण-13 2 सखी सब गेल लागल छैक रेला चल चलेँ गै माइ घूमै लेल मेला चल कहै छल सरबतीया सजल छै सर्कस कुकुर बानरक देखै लेल खेला चल कते छै भीड़ छोड़े नै पकड़ आँङुर उठा ले अपन गोदी तखन मेला चल स सीँ पू पीँ करत बड पीपही फूक्का गुड़ीया कीन दे सब भरल ठेला चल कने छै भूख झिल्ली देख लागल गै गरम कचरी कने मुरही ल' केला चल मफाईलुन [U-I-I-I तीन बेर सब पाँतिमे] बहरे हजज 3 कुकुर उनटल पड़ल लार पर बंदरो बैसलै चार पर मूस दौगै गहुँम भरल घर कोइली तन दै तार पर नादि पर गाय दै दूध छै नजर देने श्रवन ढार पर स्वागत लेल बौआ कए फूल मुस्कै गुथल हार पर भोर भेलै उठल राजा यौ अमित बौआ चढ़ल कार पर दीर्घ- हर्स्व -दीर्घ 3 बेर बहरे -मुतदारिक 4 आइ तारा केर नगरीसँ एथिन माँ अपन कोरा झट द' हमरा उठेथिन माँ खेलबै माँ संग आ रूसबै हँसबै पकड़ि आँङुर गाम-घर मे बुलेथिन माँ थाकि जेबै जखन भोजन करा हमरा गाबि लोड़ी आँचरक त'र सुतेथिन माँ राम कक्का के परू छैक मरखहिया सुरज के बकरी सँ हमरा बचेथिन माँ हमर संगी संग माँ के घुमै सर्कस आबि घर हमरो सिनेमा ल' जेथिन माँ कत' सँ एलै मेघ कारी इ अंबर मे अमित मन डेराइ यै कखन एथिन माँ फाइलातुन-फाइलातुन-मफाईलुन बहरे-कलीब 5 कोइली कहलकै सूगासँ हम बड पैघ छी तोरासँ सूगा कहलकै जुनि बाज तोड़िये देबौ लोल रोड़ासँ गाछी-बिरछी तूँ घुमै छहीँ कारी रूप देख ले ऐनासँ कोइली तुनकि क' बाजल मीठ बाजै छी हम तोरासँ हम घुमै छी अप्पन मोनेँ बान्हल रहेँ तूँ पिँजरासँ उठम-बजड़ा , धक्का -मुक्की खूने-खूनाम भेल पैनासँ मोर जी तखन कहलनि नै ल'ड़ तूँ अपने भैयासँ सूगा अमित राम गाबै छेँ सीख ले कोइली गबैयासँ वर्ण- 10 6 माँटिक चाउर पानिक दूध पातक थारी बनेबै माँटिक चुल्हि पर खीर राइन्ह तरकारी बनेबै बालुक चिन्नी कादो के दही गेना फूलक चूरा हेते घैलक चकुला सनठी के बेलना सँ पूरी बनेबै मैया के फोटो आनि झूठ-मूठ के पूजा-पाठ करब बाबी सँ एकरंगा माँगि कुमारि लेल साड़ी बनेबै फेर करब गुड्डा के वियाह गुड़िया खूब सजेबै साजि एतै बरियाती बाबा के लाठी के गाड़ी बनेबै नै डर मास्टर के आइ छुट्टी छै चल मीता खेलब आइ अमित नाचबै-गेबै बड़का खेलाड़ी बनेबै वर्ण -१९ 7 संग चल ने मिल क' सब खेल खेलेबै एक दोसर के पकड़ि रेल देड़ेबै कोइली के गीत बंदर नचेबै हम चान तारा धरि पहुँचि आइ देखेबै कागजक नैया बना फूल कमलक चल चल बड़ी पोखरि भसा नाव नेहेबै दीप माटिक गढ़ि क' सब देबता पूजब रोपि अरहुल खेत मे चल पटा एबै माँटि लोटाएब आ साँझ धरि खेलब अमित पढ़बै मन सँ बड़का त' बनि जेबै फाइलातुन-फाइलातुन-मफाईलुन बहरे-कलीब 8 बौआ एहिठाम कानै छै माँ जलखइ बनबै छै बाबा आनलनि टिकुला बाबी चटनी बनबै छै कक्का लगाबै छथि सानी काकीयो अंगना नीपै छै बलहा बाली पानि भरै जुगेसरो चेरा फारै छै पापा छथि परदेश मे ट्रिन-ट्रिन फोन बाजै छै दीदी पढ़' गेल इस्कुल सोनू भैया खेत जोतै छै सब लागल छै काज मे तेँ अमित बौआ कानै छै वर्ण-9 9 भोरे-भोरे मुर्गा बाजै छै सोना बौआ के उठाबै छै नबकी बाछी दूध देतै तीरो कक्का दूध दूहै छै माँ देलनि चुसनि भरि गुटुर-गुटुर पिबै छै दूये दाँत के हँसै बौआ आ हपकुनियाँ काटै छै भरल कठौत पानि मे बौआ नहाइ छै कूदै छै पाउडर काजर ठोप्पा नव कपड़ा चमकै छै हाथी घोड़ा आ झुनझुना अमित बौआ बजबै छै वर्ण-9 10 डरकडोरि मे झुनझुना बड मीठ बाजै छै जुता मे लागल पिपहू पीँ पीँ राग सुनाबै छै तीन टंगा गुरकुन्ना धेधै बौआ घूमै अंगना बकरी के बच्चा देखिते कूदि कूदि क' नाचै छै भालू वला नाच देखाबै बौआ के दलान पर दू टाँग पर नाचल भालू बौओ नाचि हँसै छै भरि कटोरी दूध पिबै लेए ढंग ध' कानै छै जखन पूछौँ नाम त' माएक नाम बताबै छै नाचैत रहैए सब ललना एहि संसार मे बोआ के हँसी देख अमित कलम चलाबै छै वर्ण-17 11 आइ नौला* मे माछ चल मारब कने जाल मच्छरदानी वला फेकब कने बहुत टिकुला छै खसल गाछी भरल छै ओकरो झोरी भरि क' चल आनब कने माछ चटनी खाएब रोटी भात रौ डोलपाती चल संग मे खेलब कने छोट बौआ छी पैघ सन छै सोच रौ आब कखनो संसार नै बाँटब कने एक छी हम सब एक थारी मे रहब अमित नवका मिथिला अपन माँगब कने फाइलातुन-मुस्तफइलुन-मुस्तफइलुन बहरे-हमीम *नौला{पोखरि के नाम} 12 सूगाके आइ वियाह हेतै मैना रानी कनियाँ बनलै पेड़ा वर्फी और रसगुल्ला पूरी सब्जी पलाऊ बनतै कोइली बहिन गीत गेतै जुगनू संगी बाँल्ब जरेतै बंदर मामा ढोल बजेतै मोर चाची झूमि क' नाचतै हाथी दादा लड़का ल' जेतै खरहा खूब बम फोड़तै जंगल के सब बरियाती भालू भैया सब के बैसेतै शेर देतै आशीष अमित गीदर सब मंत्र पढ़ेतै सरल वार्णिक बहर वर्ण-10 13 सखी सब चल तोड़ब आमके गै सफेदा गाछपर फेकब झामके गै बहै छै पवन केहन मीठगर छै मन भयानक रौद जड़बै छै चामके गै कने ले बरफ बोतल मे पानि भरि ले करब वनभोज छै बड़का जामके गै झहड़तै मारतै चोभा जखन कौआ ठकै छै फेँकि ढेपा नव नामके गै अपन झोरी भरल हेतै साँझमे गै अमित कतरा कते हेतै दामके गै मफाईलुन-मफाईलुन-फाइलातुन वहरे-करीब 14 पीठ पर छै बैग बौआ चलल इस्कुल लाल पियर ड्रेस चमकै भरल इस्कुल मांथ टोपी घेँट मे छै लंच लटकल दाइ संगे चलल मोने रमल इस्कुल खेल सेहो नीक खेलै छोट बौआ वर्ग छै मैदान खेलक बनल इस्कुल चित्र पाड़ै मे लगै छै मोन ओकर मीठ झगड़ो पर त' खूबे हँसल इस्कुल नै पहाड़ा पढ़ब नै सीखब ककहरा आब छै कंपुटर सीखा रहल इस्कुल भेल छुट्टी संग हल्ला घर चलल ओ नाम जहिया अमित अपनो लिखल इस्कुल फाइलातुन I-U-I-I तीन बेर बहरे-रमल 15 माँ धरा मामा चान छै सूर्य दादा नै आन छै छै बिलाई मौसी चतुर लैत मूसा के जान छै कुकुर खेहारे चोर के उड़ल चोरक त' प्राण छै आम सब बनरा खेलकै डाढ़ि तोड़ै शैतान छै चलल हाथी जी ट्रेन चढ़ि सूढ़ बड़का टा कान छै बाघ छै हम सब छी तखन शेर जंगाल के शान छै फाइलातुन-मुस्तफाइलुन 16 दौरू कक्का दौरू काकी देखू बौआ छीनै बाटी दाँतो काटै केशो घीचै मारै छै लेने ओ लाठी चिन्नी लेतै चूरा लेतै छाली लेए माँगै चाभी दीदी छी तोरे रौ बौआ तोरे लेए कीनै राखी कोरा मे तूँ शोभै छेँ रौ मानेँ खेबै संगे रोटी आठ टा दीर्घ सब पाँति मे अमित मिश्र 17 बाल गजल बौआ पानि बरसै कखन फाटै जखन मेघक वसन नाचै मोर बजबै ढोल गाबै कोइली नव भजन हरियर गाछ फूलाएत देता रौद दिनकर जखन खरहा तखन जीतत दौड़ आलस छोड़ि काजे मगन छै एरोपलेनक आश पढ़ि लिख लिअ त' चानो अपन धरती के बसेलनि राम भोरे भोर करियौ नमन आँङुर पकड़ि बढ़बै डेग राखू "अमित" खुजले नयन मफऊलातु{2221} दू बेर सब पाँतिमे अमित मिश्र 18 बाल गजल फूलल कचौरी छै मीठगर छै खीर सुअदगर छै छोला छौँक मे छल जीर रूसल किए सोना आब खेबै संग जल्दी चलू खा जाएत कौआ खीर टाँछी ल' इस्कूलो चलब खेलब पढ़ब ओतौ अहाँ सन नेनाक लागल भीड़ छै लाल कक्काके लाल पाकल आम जामुन खसल कारी , भेल कारी चीर दिनकर अहाँ चन्ना राम आ लक्षमण जीतब अहाँ माँछक आँखि मारू तीर मुस्तफइलुन-मफऊलातु-मफऊलातु 2212-2221-2221 बहरे-- सलीम अमित मिश्र 19 उड़ल सबटा चिड़ैयाँ गाछपर फुर्रसँ जँ बैसल चारपर चारो खसल चुर्रसँ हमर गाड़ी लतामक डाढ़ि आ सनठी चलै छै तेज अपने मुँह करै हुर्रसँ गिलासक दूध मिसियो नीक नै लागै भरल तौला दही आँङुर लगा सुर्रसँ अपन बाछी अपन गैया त ता थैया अपन झबरा करै अपनपर नै गुर्रसँ फटक्का फूटलै ब्राम ब्रम ब्रूमसँ जड़ै छै छूरछूरी छूर्र छू छुर्रसँ मफाईलुन 1222 तीन बेर बहरे हजज अमित मिश्र 20 बाल गजल कारी महिस के दूध उज्जर छै कते भरि मोन पारी पीबि दुब्बर छै कते रसगर जिलेबी गरम नरमे नरम छै लड्डू बनल बेसनक बज्जर छै कते छै पात हरियर फूल शोभित गाछ छै जामुन लिची आमक इ मज्जर छै कते दू एक दू आ चारि दूनी आठ छै अस्सी कते नै जानि सत्तर छै कते भालू बला देखाब' सबके नाँच हौ झट आगि छड़पै दौड़ चक्कर छै कते मुस्तफइलुन 2212 तीन बेर बहरे रजज अमित मिश्र 21 फाटले पहिरब भूखले हम रहब गै माइ गै हम इस्कूल जेबे करब गै महिस पोसब सब दिन चराएब साँझक' बैस ओकर पीठपर पोथी पढ़ब गै खेत जोतब कोरब पटाएब मोनसँ मस्त पानिक धारा जकाँ हम बहब गै चान के पूजै छै सगर लोक जग मे नाम चमकाबै लेल चन्ना बनब गै छीन ले खेलौना हमर ढोल डमरू आब हम काँपी कलम बिन नै रहब गै फाइलातुन-मुस्तफइलुन-फाइलातुन 2122-2212-2122 बहरे-खफीफ अमित मिश्र 22 बाल गजल रानी मेघ सगरो जल पटाएत ना बौआ हमर खेलत आ नहाएत ना चलतै ढेह पानिक बीच सड़कपर ना तै पर कागजक नैया बहाएत ना देहसँ घाम चूबै रौद छै काल ना हीटर आब तन के नै बनाएत ना रोपत धान बैसल खेत के आड़ि ना कादो करत पालो ह'र चलाएत ना हेलत साल भरि पोखरि भरल पानि ना बौआ "अमित" माँछक झोर खाएत ना मफऊलातु-मफऊलातु-मुस्तफइलुन 2221-2221-2212 बहरे--कबीर अमित मिश्र 23 पाकल पियर पियर केरा खाएत सब मीठ पेड़ा खाजा मिठाई जिलेबी बौआ भरल छै चगेँरा मुँह मोर राजाक सुन्नर चन्ना लजा गेल डेरा डाँरक त' घुँघरु छनकलै लेलक जखन घरक फेरा माएक ओ करत सेबा फाड़त "अमित" खूब चेरा मुस्तफइलुन-फाइलातुन 2212-2122 बहरे मुजस्सम 24 चल रे बटोही निनियाँक नव गाम चल सुतल हमर बौआ चल परी धाम चल खिस्सा कहेँ गोनू झाक तू चान रे पवना सिहकि सूखाबैत तूँ घाम चल मिथिलाक पाहुन सीताक तू भाग क'ह टूटल घनुष कोनो ब'र बनल राम चल माटिक त' छै एते मोल एलनि शिवम ई जनम के चूकाबैत तू दाम चल लोड़ी जपै छी निनियाँक बजबैत छी श्वप्न परी बनि बैसल "अमित" बाम चल मुस्तफइलुन-मफऊलातु-मुस्तफइलुन 2212-2221-2212 25 हमर कटहर खाइ लेए देब तोरा अपन टाका छै लतामक पात जोड़ा दौड़ कखनो सड़कपर तूँ नै लगा रौ आगि छूबेँ हाथ मे जेतौ भ' फोड़ा खेल खेलाएब तीती आ कबड्डी चोर पुलिसक खेल मे के बनत चोरा सुरज दादा भोर मे सबके जगाबै सीतबै छै सगर रातिक' माँ ल' कोरा फिलम बाबू संग देखब हँल जेबै "अमित" चलिहेँ करब बाबू के निहोरा फाइलातुन 2122 तीन बेर बहरे-रमल 26 देखियौ छै इ केहन अजनास बच्चा लोक के ओ बनेनै छै दास बच्चा छै बहसि गेल नेना सबहक दुलारसँ साग फेकै कहै कतरा घास बच्चा खेल मे मस्त सदिखन गर्दासँ पोतल पढ़त नै नै बनेतै इतिहास बच्चा ककर हिम्मत इ मेला ठेला घुमेतै जीद मे कानतै एकै भास बच्चा डांस मे गीत मे नंबर एक छै ओ "अमित" तेँ मानलौँ सब खटरास बच्चा फाइलातुन-मफाईलुन-फाइलातुन 2122-1222-2122 बहरे-- असम 27 पंखी लगा उड़ि जाएब आकाश मे बनि कोइली हम गाएब नव भास मे नै जो पढ़ाबै के लेल इस्कूल माँ तू जाइ छेँ बदलै घर त' वनवास मे बाबा अपन खैनी खाइ छथि क'ह किए की छै मजा जे बाबू रमल ताश मे हम बीच आँगन एगो बनेबै महल सोना बहुत उपजेबै अपन चास मे खरहा पकड़ि रोटी चाह देबै "अमित" एतै मजा बानर के सफल रास मे मुस्तफइलुन-मफऊलातु-मुस्तफइलुन 2212-2221-2212 अमित मिश्र 28 भेल मामा के शगुन हमरो करा दे सेँट काजर आ पाग पौडर लगा दे लूटबेँ लेमनचूष आ गीत गाबेँ सर्ट नवका दे जीँस नवके अना दे चल फिलम हमरो कैमरा मे बना दे आब बाबी काकी कने माँ चुमा दे बंद घर मे नाना कहू की करै छी कत'सँ एलौ नानी इ टाका बता दे हम त' बुझलौँ छै खेल कोनो इ नवका आब नै मानब "अमित" गाड़ी सजा दे फाइलातुन-मुस्तफइलुन-फाइलातुन 2122-2212-2122 बहरे--खफीफ 29 पढ़तै लिखतै बौआ डाँक्टर बनतै गामे गामे सबहक सेबा करतै रोगसँ लड़तै रोगी हँसतै गेतै एकर नामसँ सबटा रोगो डरतै अपनो बोखारक चिन्ता नै करतै फर्जी डाँक्टर के चोरी नै चलतै नामी लोकक किछु कहलो नै करतै कमजोरो के ओ भैयारी बुझतै टाका के लोभी कहियो नै बनतै आशीर्वादे टा के इच्छा रहतै मिथिला माँ के मैथिल बेटा छी ने संकट हटतै दुश्मन संगे लड़तै दस टा दीर्घ सब पाँति मे ३० आइ मेला मे माँ झुनझुना किने दे चल सिया झा के मीठ पेड़ा किने दे कह कटै छै छागर किए खून पसरल लिखल छै जत' कटनाइ पतरा किने दे लाल पूक्का दे गै पियर फूल छापल लाल देबै मिरचाइ सूगा किने दे नाच नाचै नटुआ कते भीड़ लागल हमहुँ सीखब बजेनाइ बाजा किने दे दीप चल बारब हमहुँ मंदीर जगमग "अमित" करबै उपवास केरा किने दे फाइलातुन-मुस्तफाइलुन-फाइलातुन 2122-2212-2122 बहरे-खफीफ २ ओमप्रकाश झा बाल गजल करबा नै मजूरी माँ पढबै हमहूँ नै रहबै कतौ पाछू बढबै हमहूँ हम छी छोट सपना पैघ हमर छै गे कीनब कार जकरा पर चढबै हमहूँ टूटल छै मडैया आस मुदा ई छै सोना अपन छत कहियो मढबै हमहूँ चारू कात पसरल दुखक अन्हरिया छै कटतै ई अन्हरिया आ बढबै हमहूँ पढि-लिख खूब सब तरि नाम अपन करबै जिनगी "ओम" सुन्नर ई गढबै हमहूँ दीर्घ-दीर्घ-दीर्घ-ह्रस्व दीर्घ-दीर्घ-दीर्घ-ह्रस्व ह्रस्व-दीर्घ-दीर्घ-दीर्घ (मफऊलातु-मफाऊलातु-मफाईलुन)- एक बेर प्रत्येक पाँति मे ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। १.शिव कुमार यादव- बाल गजल २.शिव कुमार झा- कविता/ गजल३.किशन कारीगर- हास्य कविता १ शिव कुमार यादव 1 बाल ग़ज़ल पूर्णिमा मेला ऐलए गे माँ मेला देखऽ हमहुँ जेबए गे माँ इस्कुल मे सेहो छुट्टी देलकए गे माँ दोस-मीत मेलाक ओरिओन कैलकए गे माँ बड़की दैया के संग लऽ लेबए गे माँ दाए-बाबा के सेहो कहि देबए गे माँ गामक कतेक लोक मेला चलतए गे माँ काका-काकी आ बौआ सेहो तैयार भेलए गे माँ मेला गाम सँ दुर लगए गे माँ पैरे-पैर नए, तोरा कोरा मे बैठबए गे माँ मेला मे बड़ भीड़ लगलए गे माँ आँगुर तोहर धरने रहबए गे माँ खुब जतन सँ मेला देखबए गे माँ "शिकुया" घिरनी-मिठाइ-झिल्ली कीनबए गे माँ २ शिव कुमार झा- कविता/ गजल कविता- सुखार काल रहसल त्रास बहकल मधुमासे संत्रास महकल अषाढ़ कुपित इन्द्र रूसल जल बुन्न बिनु बिआ विहुसल आड़ि चहकल खेत दड़कल प्रशान्तक प्रकोपे मनसून सरकल शोषित कलकल जुआनी गरकल रोहिणी-आरदरा सुखले रमकल “ग्लोबल-वार्मिग” फनकल क्षुब्ध प्रकृति सनकल विज्ञानक चमत्कारमे उच्छ्वास छनकल गाछ काटि फोर लेन बनेलौं पहिने किअए नै नवगछुली लगेलौं अपने गतिक स्टेयरिंग पकड़लौं मजूर किसानकेँ घर बैसेलौं कृषि प्रधान देशमे नोरक स्नात आँखिक शोणितसँ केना भीजत पात? ऐ बेर सुखाड़ साउनो बीतल दीनक आत्मा तीतल भदैया बूड़ल रब्बीक कोन आश सुक्खल मुरदैया मरूझल कास अगिला साल आओत बाढ़ि देलौं खेतिहरकेँ ताड़ि? वाह रौ विज्ञान वाह रौ धनमान बिनु हथिहारें लेलें गरीब-गुरवाक जान जकर भऽ सकए संलयन आ विघटन आयुर्वेदमे तइ रसायनक चर्चा विज्ञानक बाढ़िमे सगरो पाॅलीथीन कागत छोड़ि वाॅटि रहलौं प्लास्टिकक पर्चा आजुक रसायनसँ माटिक कोखि उजड़ल ठुट्ठ डाॅट किछु नै मजड़ल प्लास्टिक छोड़ि लिअ जूटक बोरा पाॅलीथीन नै ठोंगा-झोरा छोड़ रौ धनचक्कर एडभान्स बनबाक चक्कर पकड़ेँ अपन बाप पुरुखाक देल हथियार धरे मौलिक संस्कार केमिकलसँ नहा तँ लेबें मुदा! की चिबेबें....? दूटा गजल (1) कालरात्रिमे महमह दिनमान कोना आएत मोनमे पाप झबरल भगवान कोना आएत नहि जड़ै प्राण वायु मरल सरल देह संग अधम नीचाँ खसत धर्म गगनमे बिलाएत माँझ आंगन काँटक बोन नहि रोपू प्रियतम काग कोइली सन कोमल संतान कोना पाएत विरह मासमे ने सोहर सोहनगर लगै छै कंठमे पित्त चभटल मधुगीत कोना गाएत अपने करू रास लीला नेना दूध बिनु कानए कर्मभीरू पुरुखकेँ जयकार कहेन हाएत (2) कहू की बात हम मानिनि कलुष भऽ गेल अछि अर्पण कोना सहबै अखल कंटक दबै छै टीसतर तर्पण सोहाबै नै खुशी सरगम समाजक हास परिलक्षित धुनै छी देल कालक गति गदराबै नै विकल जीवन पतित नियति आकुल भेलै जड़ल अर्णव तरंगे छै सूतल ईश सभ पंथक एलै समभावमे विचलन बाहरसँ जे जत्ते गुमसुम हिआसँ ओ ओते बिखधर चानन बहलै उषाकाले वाह रौ जहानक संकर्षण भेटल जेकरा जतऽ अवसरि हाथ धोलक हलालीसँ नीतिक मंचपर चढ़िते करै माटि नेह प्रति गर्जन ३ किशन कारीगर अहींटा एकटा नीक लोक छी . हास्य कविता "कारीगर" कतेक दिन बाद परीक्षा पास केलक ओ त बड्ड बुडिबक अछि अहाँ त बड्ड पहिने बड़का हाकिम बनि गेलौहं ताहि द्वारे अहींटा एकटा नीक लोक छी .
अहाँक सफलताक राज त कहियो ने कियो कही सकैत अछि अहाँ अपने लेल हरान रहैत छी आ अहींटा एकटा नीक लोक छी .
सर समाज सँ कोनो मतलब नहि रखलौहं परदेश मे दूमंजिला मकान बना लेलौहं गाम घर सँ स्नेह रखनिहर कें अपनेमने अहाँ बुडिबक बुझहैत छी .
अप्पन सभ्यता संस्कृति अकछाह लगइए ओकरा अहाँ बिसरै चाहैत छी परदेश मे रंग-बिरंगक संस्कृति मे अहाँ के नीक लगइए खूब मगन रहैत छी.
धियो-पूता के मातृभाषा नहि सिखबैत छि ओकरा अंग्रेजी टा बजै लेल कहैत छी मत्रिभाषक आंदोलन चलौनिहर बुडिबक आ अहींटा एकटा नीक लोक छी. गाम घर पछुआएल अछि रहिए दिऔ नहि कोनो माने मतलब राखू अहाँ ए.सी. मे बैसल आराम करैत छि अहींटा एकटा नीक लोक छी.
सर-समाज सँ स्नेह रखलौहं तहि द्वारे हम बकलेल बुडिबक घोषित भेल छी अहाँ रुपैया कम ढ़ेरी लगेलौहं तहि द्वारे अहींटा एकटा नीक लोक छी.
खली रुपैया टा चिन्हैत छी अहाँ बिधपुरौआ बेबहर करैत छी. पाइए अहाँ लेल सभ किछु आ अहीं टा एकटा नीक लोक छी.
कियो पहिने कियो बाद मे मेहनत करनिहार त सफल हेबे करत ओकरा अहाँ प्रोत्साहित कियक नहि करैत छी? यौ सफलतम मनूख अहींटा एकटा नीक लोक छी. ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। चंदन कुमार झा सररा, मदनेश्वर स्थान मधुबनी, बिहार बाल-गजल 1 चार पर छै कौआ बैसल, माँझ अँगना बौआ बैसल । घुट-घुट खाथि दूध-भात, मायक कोरा बौआ बैसल । राजा-रानी सुनथि पिहानी, मइयाँ कोरा बौआ बैसल । ओ-ना-मा-सी सिखथि-पढ़थि, बाबाक कोरा बौआ बैसल । सुग्गा-मेना संग खेलै छथि, "चंदन" अँगना बौआ बैसल । वर्ण-१० 2 बाल गजल कुकरुकू जखन मुरगा बाजल, किरिण सुरूजक मूँह मेँ लागल । कौआ डकलक कोइली बाजल, आँखि मिड़ैते चुनमुन जागल । नहा-सोना के कयलनि जलखै, इसकुल गेलथि घंटी बाजल दीदीजी बड्ड नीक लगैत छन्हि, मास्टर जी के छड़ी लय भागल । कान पकड़ि के उठक-बैठक, तैयो खेले पर मोन छै टाँगल । "चंदन" टन-टन घंटी बजलै , छुट्टी भेलइ घर दिस भागल वर्ण-१३ 3 बेंग बजय छै टर-टर-टर्र बगरा उड़य फर-फर-फर्र । झरना झहरे झर-झर-झर्र, बाँस बजय छै कर-कर-कर्र । मिल चलय छै धर-धर-धर्र, साँप ससरलै सर-सर-सर्र । चुनमा छाती धक-धक-धक्क, डरसँ कापय थर-थर-थर्र । पप्पा एलखिन भागि गेल डर, बात पदाबय चर-चर-चर्र । वर्ण-१२ 4 कौआ कूचरल भोरे अँगना साँझ परैत औथिन्ह सजना, छम-छम-छम-छम पायल बाजे खनकि उठल कंगना । सासुक बोली लगैए पियरगर ननदि बनल बहिना, गम-गम-गमकय तुलसीक चौरा चानन सन अँगना । रचि-रचि साजल रूप मनोहर कत'बेर देखल ऐना, टिकुली-काजर जुट्टी-खोपा नवका-नुआ चमकय गहना । पहिलहि साँझ बारल दीप-बाती जगमग घर-अँगना, उगल चान असमान हृदय मे उठल विरह वेदना । सेज सजौने बाट तकैत छी एताह कखन घर सजना, "चंदन" सजनी गुनधुन बैसलि की मांगब मुँह बजना । वर्ण-२२ 5 साँझ परल, बैसि पिपर पर चिड़ै करय पंचैती, सूगा-मैना ब्याह रचाओत बगुला करय घटकैती । फुदकि-फुदकि के फुद्दी नाचय फेर हेतै वनभोज, कौआ पिजबैछ लोल कोइली गाबि रहल छइ चैती । बगरा-परबा अपस्याँत अछि इंतजाम मे लागल, डकहर बैसल सोचि रहल कोना हेतै कुटमैती । पोरकी पिपही बजा रहल छै टिटही पिटै ढोलक, मोर नचैछै ता-ता-थैया "चंदन" अद्भुत ई कुटमैती । वर्ण-२० 6 नवका कुर्ती नवके सलवार पहिर कय बुच्ची भेल तैयार ललका फीताक गुहलक जुट्टी बाजे रुनझुन पायल झन्कार हाथक बाला खन-खन-खनके टम-टम चढि के गेल बजार ढोलक-पिपही आ तमाशा-नाच सूनल देखल हरख अपार बाबाक हाथ पकड़ि कए बुच्ची प्रमुदित घुमय हाट-बजार वर्ण-१२ 7 मस्जिद जखने परल अजान कोइली ठनलक पराती गान कौआ डकलक खेत खरिहान बगुला खत्ता बिच करय स्नान गर-गर दुध दुहैछ बथान टक-टक पड़रू लगौने ध्यान बाबा छथि बाड़ी बान्हथि मचान बाबी अँगना मेँ लगाबथि पान टुह-टुह लाल पूब असमान 'चंदन'जलखै मे दूध मखान वर्ण-१२ 8 दऽ रहल छी अपन शपथ, नै कानू बौआ लेबनचूस लऽ पप्पा औताह, कुचरे कौआ हम तऽ माय छी सत्ते,मुदा बेबस लाचारे कीनि खेलौना देब कतऽसँ,नहि अछि ढौआ भरना लागल खेत, महाजन के तगेदा फेर कोना के सख पुरौताह बाप कमौआ अहीँ पुरायब सख सेहन्ता आस धेने छी अहीँ जुड़ायब छाती बनिकऽ पूत कमौआ कबुला,पाती,विनय,नेहोरा, करैछी भोला बेलपात "चंदन" चढ़ायब खूब चढ़ौआ वर्ण-१६ 9 भैया के नबका बुशर्ट आ हमरा दीदी के फेरन ओ'तऽ सौंसे गाम घूमै छौ हमरा अंगनो मे बेढ़न चूल्हा-चेकी,बर्तन-बासन, आगाँ से नैकरबौ हम हमरो चाही कापी-पिल्सिन, बेटा के देलहीजेहन बौआ छुच्छे छाल्हि खेतौ हमरा नै दूधो परपइठ जौँ नै करबौ टहल तखन लगतौ मोन केहन बहुत सहलियौ आब नै चलतौ तोहर दूनेती हमरो चाही बखरा आब नै चलतौ कलछप्पन गै माय युग बदलि गेलैए बेटी नै बेटा से कम "चंदन"गमकैत भविष्य रचबै हमहूँ अपन वर्ण-१९ १० एकदिन हमरो हेतइ मकान एकदिन हमरो हेतइ बथान एकदिन हमहुँ कीनब समान हमरो घर बनतै पू-पकवान एकदिन हमहुँ बुलबइ चान अंतरिक्ष मे हेतै हमरो दलान सभकेयो अपने केयो नहि आन हमहुँ बनबै गाँधी सन महान विद्या-वैभव के लेल अनुसंधान करय जे "चंदन" बनय महान -----------वर्ण-१३- ११ चिक्का कबड्डी खेलबइ खेत पथार मे हमर नाह चलतइ ओलती धार मे इसकुल सँ जखन घुमबइ साँझ मे बाबा संग मे घुमबइ धारक पार मे आमक गाछी खोपड़ी तर मचान पर काका संगे हमहुँ बैसबै रखबार मे गीजल-गाँथल हम नहि खेबौ बाटी मे माय गै हमरो साँठि के दहीन थार मे मुरही कचरी झिल्ली खेतै छैक सेहन्ता "चंदन"तैँ छैक लोढ़हा लोढ़ैत नार मे ----------वर्ण-१५------ १२ पकड़ि के दाबा चलइ छै खने ठेहुनियाँ भरइ छै मधुर सनके बोल लागै जखन माँ-पप्पा बजइ छै चढ़िकऽ छाती पर कका केँ भभा के लगले हँसइ छै सुगा मैना जखन बाजय सुनिकऽ थपड़ी पिटइ छै मनोरथ सभटा पुरौतै बइस के चंदन गुनइ छै ---------वर्ण-१०------- १२२२ २१२२ बहरे-मजरिअ १३ माय गै हमरो कीनि देऽ नेऽ चान एकटा देऽ नेऽ गुड़क पूरी फोका मखान एकटा चमकै इजोरिया लागै छै कोजगरे छै बाबा हमरो दीअ ने खिल्ली पान एकटा चकलेट-बिस्कुटो भऽ गेलै कत्ते महग पप्पा हमहूँ करबइ दोकान एकटा छोटको चच्चा केतऽ आब भऽ गेलै ब्याह गै मैंया हमरो कनिया कऽ दे जुआन एकटा चान पर घर हेतै तारा पर दलान "चंदन"हमहूँ भरबै उड़ान एकटा --------------वर्ण-१५------------------ १४ भोर भेलै शोर भेलै काँचे निन्न खोर भेलै माघ मास शीत जल दहो-बहो नोर भेलै काँट कंठ मे गड़लै भोग नहि झोर भेलै भैंस भेलै पारी तरे छाल्ही डाढ़ी घोर भेलै थारी बाटी पिटैत छै माय मोन घोर भेलै ---वर्ण-८---- ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। १.जगदानन्द झा 'मनु' -बाल गजल २.राजेश कुमार झा- दूटा कविता ३. जगदीश प्रसाद मण्डलक किछु गीत/ कविता १ जगदानन्द झा 'मनु' ग्राम पोस्ट- हरिपुर डीह्टोंल, मधुबनी बाल गजल १ हेरौ कोआ खसा दे एगो आम हमरो लेल देबौ बाली मए जे देतै दाम हमरो लेल चल-चल गे बूचनी चलै आब खेलएब भ ' गेल देलकै जे मए काम हमरो लेल नहि छ्मकै एना लए कँ अपन गुडिया तोरा सँ सुन्नर देथीन राम हमरो लेल बहुत केलहुँ काज कमेलहुँ बड्ड राज आबो तँ घुरि आउ बाबू गाम हमरो लेल सबकेँ नाम गे मए कते सुन्नर-सुन्नर किएक नहि 'मनु' सन नाम हमरो लेल (सरल वार्णिक बहर, वर्ण-१६) २ नेन्ना हम मए केँ आँखि जूराएब मिथिला केँ अपन सोना सँ चमकाएब मूरत सभ घरे रामे सिया केँ देखु एहन आँन कतए मेल देखाएब गंगा बसति पावन घर घरे मिथिलाक डुबकी मारि कमला घाट नाहाएब मुठ्ठी भरि बिया भागक अपन हम रोपि अपने माटि में हँसि हँसि कँ गौराएब 'मनु' दै सपत घर घुरि आउ काका बाबु नेन्ना केँ कखन तक कोँढ ठोराएब (बहरे रजज, २२२१) ३ चम चम चम चम तारा चमके बौआ कए हाथक तरुआ गमके कारी बकरी,नब उज्जर महिष लाल बाछी किए दौर-दौर बमके बौआक घोरा सय-सय कए देखू काका कें घोरा पिद्दी कतेक कमके बाबी कें साडी मए कें लहंगा बहे बौआ कें गघरी त कतेक झमके बौआ हमर आब गुमशुम किए किएक नै ठुमुक-ठुमुक ठुमके (सरल वार्णिक, वर्ण-१३ ) ४ मएगै हमर फुकना की भेल दाई हमर झुनझुना की भेल बाबा कें कहबैन सब हरेलौं सबटा हमर खिलौना की भेल दूध-भात आब हम नहि खेबौ पेटमुका हमर सन्ना की भेल हम जे बुललौं बाबा-बाबी संगे रातिक हमर सपना की भेल चंदामामा कईल्ह जे अनलैंह हमर निकहा चुसना की भेल (सरल वार्णिक बहर, वर्ण-१२) ५ हे मए नहि चरबै लए गाए जेबौ हम पठा हमरा इस्कूल कोपी पेन लेबौ हम अपन भाग्य आब हम अपने सँ लिखबौ कुकूर जकाँ नै माँडे तिरपीत हेबौ हम रोगहा-रोगहा सभ कियो कहए हमरा एक दिन बनि डाक्टर रोग हरेबौ हम टूटल- फूटल अपन फुसक घर तोरि सुन्नर सभ सँ पैघ महल बनेबौ हम हमरा कहैत अछि 'मनु' मुर्ख चरबाहा पढि कए सभ चरबाहा केँ पढेबौ हम (सरल वार्णिक बहर, वर्ण- १६) ६ बिनु पानिक नाउ चलाएब हम बिनु चक्काक गाडी बनाएब हम हमर मोन में तँ जेँ किछु आएत बिन सोचने सभ सुनाएब हम अपन ब्याह में हम नहि जाएब सराध दिन बजा बजाएब हम कनियाँ केँ लय ओकर नैहर सँ सासुर सँ खूब कतियाएब हम 'मनु' मन चंचल टोनए सभकेँ केकरो हाथ नै घुरि आएब हम (सरल वार्णिक बहर, वर्ण-१३) २ राजेश कुमार झा (कन्हैया), पिताक नाम :- श्री विजय कुमार झा, गाम :- घोघरडीहा (पुबाई टोल), पोस्ट ऑफिस + थाना : -घोघरडीहा , जिला :- मधुबनी, (बिहार ) -847402 १ छोड़ू छोड़ू ई पश्चिमी सभ्यता, मानव समाजक अपन सभ्यता पुकारैय माय - बाप क सेवा परम कर्तव्य छी, ओ बालिग होयते ठुकारावैय. सेवा- काल तन -मन सँ सेवा करै छी, ओ वृधाश्रम मे पहुँचावैय. छोड़ू छोड़ू ई पश्चिमी सभ्यता, मानव समाजक अपन सभ्यता पुकारैय पुकारैय .. अर्धांगिनी संग जीवन बिताबै छी, ओ जीवनमे छोड़ैय जोड़ैय छोड़ू छोड़ू ई पश्चिमी सभ्यता, मानव समाज क अपन सभ्यता पुकारैय. रिश्ता - नाता लेल त्याग करै छी, ओ अकरा पाइसँ तौलैय . संगी - साथी लेल जान दै छी, ओ दिनमे दू चारिटा जोड़ैय तोड़ैय. छोड़ू छोड़ू ई पश्चिमी सभ्यता, मानव समाज क अपन सभ्यता पुकारैय संयुक्त परिवारमे ख़ुशीसँ रहै छी, ओ तनहा असगर रहैय. अकेलापन तँ महसूसे नै होइ छै, ओ अइ लेल नशा पान करैय . छोड़ू छोड़ू ई पश्चिमी सभ्यता, मानव समाज क अपन सभ्यता पुकारैय नै सिखु हुनकर ई अवगुण, ओ डिस्को पबमे शराब- सिगरेट पिबैय , सिनेमा इंटरनेटसँ दुइर भऽ, ओते नाबलिको गलत सम्बन्ध बनबैय. छोड़ू छोड़ू ई पश्चिमी सभ्यता, मानव समाज क अपन सभ्यता पुकारैय सिखु हुनकर किछु निक गुण , ओ शहर सड़ककेँ गन्दा नै करैय. हुनके चलते आइ औरतो , खुलिकऽ अपन बिचार प्रगट करैय. छोड़ू छोड़ू ई पश्चिमी सभ्यता, मानव समाज क अपन सभ्यता पुकारैय २ देखियौ देखियौ ई बढ़ैत तामस, अन्यायक बीज अन्कुरेनेयऽ, . सहनशक्ति हुनका नै छनि, बात-बात पर लड़ैय. मरै-मारैपर उतारू होइ छथि, बात किछु नै रहैय. एक दिन सड़कपर देखलौं, बेकसूर गरीबकेँ मारैय. तहन शोर मचेलौं, तैयो लोक नै एतऽ आबैय . लोक देखैत जाइय, कियो नै एतऽ रुकैय. तहन ओ आयल हमरा लग, धक्का दैत भगैय. अबाक देखते रहलौं, ई एना किए करैय, ओकरा जाइते सब पूछैय चोट तँ बेसी नै लागलय. पुछलिअनि अपना सभकेँ अकर आदति नै पड़लय, जखन देश गुलामे छल तखने सँ खूनमे तँ नै बसलय, पड़ोसी अइ ठान अन्याय होइ छै लोक गेट लगौनेय अपना सबहक सहन शक्तिए ओकरा बढ़ावा देनेय उठू उठू आबाज दियौ जों एक नै छी तैं तँ ई डरेनेय. छोड़ू छोड़ू ई मांस मदिरा यएह तँ तामसी बनेनैय आउ सपथ लिअ अइ तामसकेँ शरीरसँ भगौनैय ३ जगदीश प्रसाद मण्डलक गीत-१ झोंक जुआनी झोंकए लगै छै उष्मा पाबि उमसए लगै छै। झोंक जुआनी.......। जाधरि सिर सृजै शिशिर छै हार-मासु सिहरैत रहै छै। सुनिते कोकिल कुहुकि वसंती भनभनाइत मन तनतनाए लगै छै। झोंक जुआनी.........। रंग-विरंगक वन-उपवनमे रंग-रंगक फूल खिलए लगै छै पाबि रस मधुमाछी सिरजए कोनो बिख चुभकैत रहै छै। झोंक जुआनी.......। गीत-२ बैसले-बैसल नाचि रहल छै गुड़-चाउर मन फाँकि रहल छै। सिसकैत-सिहरैत कतौ देखि संग मिलि कऽ कानि रहल छै बैसले-बैसल.......। उफनैत-उधियाइत धार देखि संग मिलि कऽ दाबि रहल छै। घट-घट घाट बना-बना धार-विचार बहा रहल छै। बैसले-बैसल.........। गीत-३ गुमकीमे बौआए रहल छी औल-बौल टौआए रहल छी। गुमकीमे..........। कखनो अन्हर-बिहारि देखै छी झाँट-पानि बिच पड़ए लगै छी। गुमकीमे............। घाम-पसिना बहि रहल छै आश-िनराश चलि रहल छै। धक्कम-धुक्कम चलि रहल छै औलाइत-बौलाइत मन कहै छै। गुमकीमे..........। गीत-४ भूत बनि भुतिआएल छी मित यौ बनि भूत भुतिआएल छी। संगे-संग जगलौं संगे-संग उठलौं संगे-संग चालि चलि संगे हेराएल छी। संगिया मरि गेल हम भुतिआएल छी। केकरा कहबै भूत भविष्य वर्त्तमान छिड़िआएल छै। रग्गर बिच फक्कर बनि लाजे-पड़ाएल छै लाजे पड़ाएल छै। भूत बनि भुतिआएल छै बनि भूत भुतिअाएल छै। कविता १ दिन-रातिक खेल अपने हाथक खेल मीत यौ अपने हाथ खेल। संगे-संग दुनू चलैए। इजोत-अन्हार बनैत रहैए। हँसि-हँसि कानि-कानि पटका-पटकी करैत रहैए। एके गाछक डारि छी दुनू सुफल-कुफल फड़ैत रहैए। रस रंग सुआद गढ़ि-गढ़ि तीत-मीठ बनबैत रहैए। अपने हाथक खेल मीत यौ संगे-संग खेलैत रहैए। लपकि-लपकि कतौ-कतौ इजोत-अन्हार दबैत रहैए पीठी चढ़ि पीठिया-पीठिया एेरावत सजबैत रहैए। तँए कि अन्हार हारि मानि हरदा कहियो कबूल करैए। जहिना झपटि बिलाई बाझकेँ जिनगीक खेल देखबैत रहैए। अपने हाथक खेल मीत यौ संग मिलि संगे चलैए। मंत्र एक रहितो दुनूक विधा दू कहबैत चलैए। विधि-विधान रचि-बसि दुनू गद्य-पद्य गढ़ैत रहैए। चढ़ि गाछ तनतना-तनतना गीत-कवित्त सुनबैत रहैए। ताना दऽ दऽ विहुँसि-विहुँसि मारि तानि हँसि-हँसि कहैए। एके गाछक खेल मीत यौ संगे मिलि दुनू खेलैए। बजा पीहानी नाचि-नाचि रंगमंच दुनियाँ सजबैए। कंठ कोकिल कवित्त कवि कविकाठी बजबैत रहैए। कतौ ने किछु छै दुनियाँमे मन मानव गढ़ैत चलू। मानव मनुख खरादि-खरादि राति-दिन बनबैत चलू। अपने हाथक खेल मीत यौ हाथ-हथियार बदलैत चलू। २ किछु ने बूझै छी के केकर हित के केकर मुद्दै दिन-राति देखैत रहै छी। गरदनि पकड़ि जे कानए कलपए पकड़ि गरदनि तोड़ैत देखै छी। किछु ने बुझै छी। हित बनि मिलि संग चलैए मुद्दै बनि-बनि लड़ैत रहैए। सोझमतिया चालि पकड़ि-पकड़ि झाँखुर-बोन ओझराइत रहैए। डारि-पात देखैत रहै छी किछुन ने बुझै छी। छत्ता-मधु दुनू बसि-बसि विष मधु गढ़ैत रहैए। हित मुद्दै बनि-बनि दुनू राति-दिन झगड़ैत रहैए। देखि झगुंंता पड़ल रहैए छी किछु ने बुझै छी। संग मिलि पाथर तोड़ए जे पाथर ऊपर फेकैत रहैए। पाथर मन गढ़ि-मढ़ि पाथर बूझि देखैत रहैए। पथराएल पथ देखैत रहै छी किछु ने बुझै छी। आगि चढ़ि अन्न जहिना पथरा पाथर बनैत रहैए। जीवन दाता कुहुकि-कुहुकि पेट पाथर बनैत रहैए। विषमित भेल बिसबिसाइत रहै छी किछु ने बुझै छी। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। १. राजीव रंजन मिश्र- बाल गजल २. मिहिर झा- बाल गजल ३. गजेन्द्र ठाकुर- बाल गजल १ राजीव रंजन मिश्र 1 भोरहिं भोर उठल बौआ अंगना में खेलय छै भूलि बिसरी कए सभटा चारू कोने दौरय छै ओकरा ने कोनो मतलब ककरो सँ कखनहु दौरि धुपि थाकै जखने भूख लगै त कनय छै बौआ खुर खुर दौरय आँगन आर दरवज्जा बाबा के देलहा डाँरक् टुनटुनिया बाजय छै देखइ बाबा दाइ कक्का आ दीदी सभ विभोर भ बौआ सभके तोतर बोली में बात सुनाबय छै माँ चौका सए घोघ तानि ऐली बाटी में दूध लेने देखि परैल कोन्टा पर माँ बौआ के नीहोरय छै बाबु आनि उठा कोरा में चूमि चाटी क नीक जकाँ बैसेला ओकरा माय ठन ओ तैय्यो अकरय छै माय हूलसि कए चुचकारि नेन्ना के कोरा लए घोटे घोंट दूध पियाबै बौआ पिबै बोकरय छै राजीव अनुपम छवि बिलोकि माय सन्तानक विभोर भ मायक पैर पर माथ झुकाबय छै (सरल वार्णिक बहर) वर्ण-१८ 2 हम भारत के वीर जवान बनब हम मिथिलाक पुत महान बनब घर हमर जे उजरल लचरल बसबय के एकर समान बनब माय गे पढ़बौ हम खुब मोन लगा नै पढ़ल लिखल बईमान बनब घर समाज के देखति सुनति हम पुरजोर इजोरियाक चान बनब पछुआयल छै देश कोस मिथिला के अगुआ भए सुधारक तान बनब काज करब हम सबके संग लए आ मैथिल जन मुहंक गान बनब हम सप्पत खाइत छी आइ माय गे मातृभूमि मिथिला केर मान बनब (सरल वार्णिक वर्ण-१४) 3 माँ गै आइ बता किया चंदा में कारी छै हमरा कह किया सवाल ई भारी छै देखल सदिखन तोरा काज करैत मुदा बैसल बाबु कियाक बेगारी छै हम्मर अंगा सभ फाटल पुरान आ तोरो त बस गानल दुय्ये टा सारी छै सब खाय अपन घर नीक निकुद हमरा लेल किया जे नून सोहारी छै भातक संग अगबे सन्ना सब दिन दाईलो राहरिक बदले खेसारी छै कनिके टा घर दुआरि अपन छैक आँगन में नहि एक्क्हू टा गै-पारी छै बुझी हमहूँ सबटा नहिं नेन्ना छी गे जे ई सभटा टाका केर मारामारी छै हमहूँ पढ़बै आ बड्ड पाई कमेबै लिखल तोरो भागे महल अटारी छै धीरज राखि तू जीबैत रह माय गे बेटा तोहर बुझै सब बुधियारी छै (सरल वर्णिक वर्ण-१४) 4 पढि लिखि कए बौआ बाहर रहतै सत बाबा के कहल आखर रहतै दिन पलटतय हमरो सबहक भरल घर नोकर चाकर रहतै लक्षण करम एकर लागैत अछि बौआ सबतरि भए धाकर रहतै मोनक हमरो सुनथिन भगवान करेज अपन भए चाकर रहतै माय बहिन खानदानक पुरतय बौआ सबहक लेल सागर रहतै बढ़तय दिन दुना राति चारिगुन्ना भरल नित बौआक गागर रहतै (सरल वार्णिक बहर, वर्ण- १४ ) २ मिहिर झा बाल गजल 1 झमझम बरखै बुन्नी रौ टमटम चलबै मुन्नी रौ आगू पाछू मलहा डोलय खत्ता मे बड गडचुन्नी रौ आम तोडय झाम गूडय डोमा देलक चुनचुन्नी रौ राजा के बेटा मारय ढेपा कुकुर भुकै मधुबन्नी रौ 2 उजरा भात गढका दूध बड़का थारी चाही नै खेलेबौ कनिया पुतरा नबका गाड़ी चाही भैया पहिरै नबका अंगा दशमी आ फगुआ बेटा हमहु छियौ तोहर आब नै छारी चाही भैया गेन खेलाई छौ टुकटुक हम छी ताकै दूध भात भ कात नै हेबौ हमरो पारी चाही काकाजी कान मचोरथि तोडी जखन टुकला अपन लीची अपने झाँटी हमरा बाड़ी चाही श्यामा लाई खूब खुवाबे टाटक भुरकी बाटे ओहि टाटके काटि खसाबी हमरा आरी चाही ३ खा ले रे बौआ दूधे भात ठुनकि नै हो ठाढ कात पढि बनबे तू बी डी ओ मोन राख हमर बात पैघे के सब दै छै ध्यान तोंही पेबें पहिल पात छौ जे दुत्कारैत एखन कान पाथि सुनतौ बात मोन लगा जॉं पढबे तू टाका के हेतौ बरसात ४ छुनकी हीरा गीतिया सोनू पाछू लागि सब रेल बनू ईंजन बनि हम आगू छी गार्ड बनता अपन मोनू दूध सोहारी कोयला पानी सकरी टीसन ठाढ गोनू फ्री टिकट सब आबि चढु सीट सबटा अपने जानू ३ गजेन्द्र ठाकुर बाल गजल कनियाँ पुतरा छोड़ू आनू बार्बी जँ रंग गुलाबी छै तँ जानू बार्बी बोने-बोने फिरैए जे दैता सभ वनसप्तो लऽ घूरलि मानू बार्बी सात रंग लऽ भोर भेले गाममे परी रहैए गाम अकानू बार्बी कननी दूर हेतै बच्चा सभमे भरल आँखि बिसरी ठानू बार्बी पानि अकास धरती जा-जा घूमी पंख लगा टिकुली अकानू बार्बी धम्म गुड़िया संग खेलू कूदू राति सपनाउ निन्न आनू बार्बी सुता दियौ ऐ गुड़ियाकेँ आ सुतू चढ़ि ऐरावत दिन गानू बार्बी ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। विदेह नूतन अंक मिथिला कला संगीत १. ज्योति झा चौधरी २.राजनाथ मिश्र (चित्रमय मिथिला) ३. उमेश मण्डल (मिथिलाक वनस्पति/ मिथिलाक जीव-जन्तु/ मिथिलाक जिनगी) १. ज्योति झा चौधरी २. राजनाथ मिश्र चित्रमय मिथिला स्लाइड शो चित्रमय मिथिला (https://sites.google.com/a/videha.com/videha-paintings-photos/ ) ३. उमेश मण्डल मिथिलाक वनस्पति स्लाइड शो मिथिलाक जीव-जन्तु स्लाइड शो मिथिलाक जिनगी स्लाइड शो मिथिलाक वनस्पति/ मिथिलाक जीव जन्तु/ मिथिलाक जिनगी (https://sites.google.com/a/videha.com/videha-paintings-photos/ ) ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। विदेह नूतन अंक गद्य-पद्य भारती १. मोहनदास (दीर्घकथा):लेखक: उदय प्रकाश (मूल हिन्दीसँ मैथिलीमे अनुवाद विनीत उत्पल) मोहनदास (मैथिली-देवनागरी) मोहनदास (मैथिली-मिथिलाक्षर) मोहनदास (मैथिली-ब्रेल) २.छिन्नमस्ता- प्रभा खेतानक हिन्दी उपन्यासक सुशीला झा द्वारा मैथिली अनुवाद छिन्नमस्ता ३.कनकमणि दीक्षित (मूल नेपालीसँ मैथिली अनुवाद श्रीमती रूपा धीरू आ श्री धीरेन्द्र प्रेमर्षि) भगता बेङक देश-भ्रमण बालानां कृते १.मुन्नी कामत-जड़ैत ज्योत२.पंकज चौधरी (नवलश्री)- मेघक चोर १. मुन्नी कामत जड़ैत ज्योत माय गे, कतेक दिन तक हम बच्चा रहबै बकरी संगे खेलैत रहबै हमरो दुनियाकेँ जानैक एगो मौका दऽ दे माय हमरा बस्ता दिया दे। छै छोट हमरासँ मालिकक बेटा अंगरेजियेमे फटर-फटर करै छै हम नै बुझै छी देवनागरीयोक एगो अक्षर माय गे, हमरो स्कूल जाए दे। मालिकसँ जा कऽ तूँ कहि दही नै चरेबइ आब हम भैंस हुनकर नै खेबै तरकारी, रोटी हमरा नूने रोटी खा दे मुदा माय गे, हमरा तूँ पढ़ै लेल जाय दे। पढ़ि लिख हम अफसर बनबै तोरा लऽ लब साड़ी अनबै बाबूक बुरहक सहारा बनि हम दुनियामे नाम करबै माय गे, आब हमरा अपन भविष्य बनाबऽ दे हमरा जिनगी सवारऽ दे। २ पंकज चौधरी (नवलश्री), बाबूजी- श्री भागेश्वर चौधरी (लोक स्वास्थ्य अभियंत्रणा विभाग, बिहार सरकार (जमूई) मे कार्यरत), माताश्री- श्रीमती वंदना देवी (गृहणी), जन्मतिथि : ११.०९.१९८०, स्थायी पता: ग्राम+पोस्ट- सुगौना, प्रखंड- राजनगर, जिला- मधुबनी, मिथिला, वर्तमान निवास : नई दिल्ली, शैक्षणिक योग्यता : राम कृष्ण महाविद्यालय, मधुबनी (मिथिला) सँ वाणिज्य विषयक संग स्नातक वर्तमान में अध्ययन ( ICAI, नई दिल्ली सँ C.A.(फाइनल) एवं I.C.S.I.,नई दिल्ली सँ C.S.(प्रोफेसनल) क संगे एकटा प्राइवेट कंपनी में सहायक प्रबंधक (वित्त एवं कर) क पदपर कार्यरत। बाल कविता- मेघक चोर
माँ गैऽ तूँ ई कहलें हमरा मेघ में नै छै पोखरि-डबरा झम-झम मेघ अतेऽ बरसै छै कहै कतऽ सँ पाइन अबै छै ? घैलक-घैल जे उझलि रहल छै मेघ में चोरबा टहलि रहल छै !
माँ गै माँ ई बात बता तूँ सुरुज जनै की कोनो जादू ? पूब सँ उगलै पश्चिम डुबलै पूबे सँ फेर कोना निकललै ! वैह चोरबा ई काज करै छै सुरुज उठा कऽ पूब धरै छै
माँ गैऽ चानक गोल कटोरी कियो करै छै राइत कऽ चोरी किछ दिन पहिने सउँसे देखल आइ राइत में अदहा भेटल मेघो में बड्ड चोर रहै छै चोरा-चोरा जे चान कटै छै
कतेक तरेगन संग उगै छै चोरबा के नै कियो धरै छै भरिसक सभ अपने लेल जागल मनुखक आदत ओकरो लागल छोड़ की ककरो मुँह लागब हम आइ राइत अपने जागब हम !!! ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। बच्चा लोकनि द्वारा स्मरणीय श्लोक १.प्रातः काल ब्रह्ममुहूर्त्त (सूर्योदयक एक घंटा पहिने) सर्वप्रथम अपन दुनू हाथ देखबाक चाही, आ’ ई श्लोक बजबाक चाही। कराग्रे वसते लक्ष्मीः करमध्ये सरस्वती। करमूले स्थितो ब्रह्मा प्रभाते करदर्शनम्॥ करक आगाँ लक्ष्मी बसैत छथि, करक मध्यमे सरस्वती, करक मूलमे ब्रह्मा स्थित छथि। भोरमे ताहि द्वारे करक दर्शन करबाक थीक। २.संध्या काल दीप लेसबाक काल- दीपमूले स्थितो ब्रह्मा दीपमध्ये जनार्दनः। दीपाग्रे शङ्करः प्रोक्त्तः सन्ध्याज्योतिर्नमोऽस्तुते॥ दीपक मूल भागमे ब्रह्मा, दीपक मध्यभागमे जनार्दन (विष्णु) आऽ दीपक अग्र भागमे शङ्कर स्थित छथि। हे संध्याज्योति! अहाँकेँ नमस्कार। ३.सुतबाक काल- रामं स्कन्दं हनूमन्तं वैनतेयं वृकोदरम्। शयने यः स्मरेन्नित्यं दुःस्वप्नस्तस्य नश्यति॥ जे सभ दिन सुतबासँ पहिने राम, कुमारस्वामी, हनूमान्, गरुड़ आऽ भीमक स्मरण करैत छथि, हुनकर दुःस्वप्न नष्ट भऽ जाइत छन्हि। ४. नहेबाक समय- गङ्गे च यमुने चैव गोदावरि सरस्वति। नर्मदे सिन्धु कावेरि जलेऽस्मिन् सन्निधिं कुरू॥ हे गंगा, यमुना, गोदावरी, सरस्वती, नर्मदा, सिन्धु आऽ कावेरी धार। एहि जलमे अपन सान्निध्य दिअ। ५.उत्तरं यत्समुद्रस्य हिमाद्रेश्चैव दक्षिणम्। वर्षं तत् भारतं नाम भारती यत्र सन्ततिः॥ समुद्रक उत्तरमे आऽ हिमालयक दक्षिणमे भारत अछि आऽ ओतुका सन्तति भारती कहबैत छथि। ६.अहल्या द्रौपदी सीता तारा मण्डोदरी तथा। पञ्चकं ना स्मरेन्नित्यं महापातकनाशकम्॥ जे सभ दिन अहल्या, द्रौपदी, सीता, तारा आऽ मण्दोदरी, एहि पाँच साध्वी-स्त्रीक स्मरण करैत छथि, हुनकर सभ पाप नष्ट भऽ जाइत छन्हि। ७.अश्वत्थामा बलिर्व्यासो हनूमांश्च विभीषणः। कृपः परशुरामश्च सप्तैते चिरञ्जीविनः॥ अश्वत्थामा, बलि, व्यास, हनूमान्, विभीषण, कृपाचार्य आऽ परशुराम- ई सात टा चिरञ्जीवी कहबैत छथि। ८.साते भवतु सुप्रीता देवी शिखर वासिनी उग्रेन तपसा लब्धो यया पशुपतिः पतिः। सिद्धिः साध्ये सतामस्तु प्रसादान्तस्य धूर्जटेः जाह्नवीफेनलेखेव यन्यूधि शशिनः कला॥ ९. बालोऽहं जगदानन्द न मे बाला सरस्वती। अपूर्णे पंचमे वर्षे वर्णयामि जगत्त्रयम् ॥ १०. दूर्वाक्षत मंत्र(शुक्ल यजुर्वेद अध्याय २२, मंत्र २२) आ ब्रह्मन्नित्यस्य प्रजापतिर्ॠषिः। लिंभोक्त्ता देवताः। स्वराडुत्कृतिश्छन्दः। षड्जः स्वरः॥ आ ब्रह्म॑न् ब्राह्म॒णो ब्र॑ह्मवर्च॒सी जा॑यता॒मा रा॒ष्ट्रे रा॑ज॒न्यः शुरे॑ऽइषव्यो॒ऽतिव्या॒धी म॑हार॒थो जा॑यतां॒ दोग्ध्रीं धे॒नुर्वोढा॑न॒ड्वाना॒शुः सप्तिः॒ पुर॑न्धि॒र्योवा॑ जि॒ष्णू र॑थे॒ष्ठाः स॒भेयो॒ युवास्य यज॑मानस्य वी॒रो जा॒यतां निका॒मे-नि॑कामे नः प॒र्जन्यों वर्षतु॒ फल॑वत्यो न॒ऽओष॑धयः पच्यन्तां योगेक्ष॒मो नः॑ कल्पताम्॥२२॥ मन्त्रार्थाः सिद्धयः सन्तु पूर्णाः सन्तु मनोरथाः। शत्रूणां बुद्धिनाशोऽस्तु मित्राणामुदयस्तव। ॐ दीर्घायुर्भव। ॐ सौभाग्यवती भव। हे भगवान्। अपन देशमे सुयोग्य आ’ सर्वज्ञ विद्यार्थी उत्पन्न होथि, आ’ शुत्रुकेँ नाश कएनिहार सैनिक उत्पन्न होथि। अपन देशक गाय खूब दूध दय बाली, बरद भार वहन करएमे सक्षम होथि आ’ घोड़ा त्वरित रूपेँ दौगय बला होए। स्त्रीगण नगरक नेतृत्व करबामे सक्षम होथि आ’ युवक सभामे ओजपूर्ण भाषण देबयबला आ’ नेतृत्व देबामे सक्षम होथि। अपन देशमे जखन आवश्यक होय वर्षा होए आ’ औषधिक-बूटी सर्वदा परिपक्व होइत रहए। एवं क्रमे सभ तरहेँ हमरा सभक कल्याण होए। शत्रुक बुद्धिक नाश होए आ’ मित्रक उदय होए॥ मनुष्यकें कोन वस्तुक इच्छा करबाक चाही तकर वर्णन एहि मंत्रमे कएल गेल अछि। एहिमे वाचकलुप्तोपमालड़्कार अछि। अन्वय- ब्रह्म॑न् - विद्या आदि गुणसँ परिपूर्ण ब्रह्म रा॒ष्ट्रे - देशमे ब्र॑ह्मवर्च॒सी-ब्रह्म विद्याक तेजसँ युक्त्त आ जा॑यतां॒- उत्पन्न होए रा॑ज॒न्यः-राजा शुरे॑ऽ–बिना डर बला इषव्यो॒- बाण चलेबामे निपुण ऽतिव्या॒धी-शत्रुकेँ तारण दय बला म॑हार॒थो-पैघ रथ बला वीर दोग्ध्रीं-कामना(दूध पूर्ण करए बाली) धे॒नुर्वोढा॑न॒ड्वाना॒शुः धे॒नु-गौ वा वाणी र्वोढा॑न॒ड्वा- पैघ बरद ना॒शुः-आशुः-त्वरित सप्तिः॒-घोड़ा पुर॑न्धि॒र्योवा॑- पुर॑न्धि॒- व्यवहारकेँ धारण करए बाली र्योवा॑-स्त्री जि॒ष्णू-शत्रुकेँ जीतए बला र॑थे॒ष्ठाः-रथ पर स्थिर स॒भेयो॒-उत्तम सभामे युवास्य-युवा जेहन यज॑मानस्य-राजाक राज्यमे वी॒रो-शत्रुकेँ पराजित करएबला निका॒मे-नि॑कामे-निश्चययुक्त्त कार्यमे नः-हमर सभक प॒र्जन्यों-मेघ वर्षतु॒-वर्षा होए फल॑वत्यो-उत्तम फल बला ओष॑धयः-औषधिः पच्यन्तां- पाकए योगेक्ष॒मो-अलभ्य लभ्य करेबाक हेतु कएल गेल योगक रक्षा नः॑-हमरा सभक हेतु कल्पताम्-समर्थ होए ग्रिफिथक अनुवाद- हे ब्रह्मण, हमर राज्यमे ब्राह्मण नीक धार्मिक विद्या बला, राजन्य-वीर,तीरंदाज, दूध दए बाली गाय, दौगय बला जन्तु, उद्यमी नारी होथि। पार्जन्य आवश्यकता पड़ला पर वर्षा देथि, फल देय बला गाछ पाकए, हम सभ संपत्ति अर्जित/संरक्षित करी। 8.VIDEHA FOR NON RESIDENTS 8.1 to 8.3 MAITHILI LITERATURE IN ENGLISH 8.1.1.The Comet -GAJENDRA THAKUR translated by Jyoti Jha chaudhary 8.1.2.The_Science_of_Words- GAJENDRA THAKUR translated by the author himself 8.1.3.On_the_dice-board_of_the_millennium- GAJENDRA THAKUR translated by Jyoti Jha chaudhary 8.1.4.NAAGPHANS (IN ENGLISH)- SHEFALIKA VERMA translated by Dr. Rajiv Kumar Verma and Dr. Jaya Verma Maithili poem by Sh.Jagdish Prasad Mandal translated from Maithili into English by Sh.Vinit Utpal) Mind gem
Mold your mind's gem light your soul catching the flamed carcase identify the divine land.
when mind seems to be gem light sprinkle on the land show your own path oneself walk gracefully on the ground.
suffering erase slowly obligate are singing and dance vocalizing pray with aggrieved tone telling their agony own.
human body is invaluable unidentified medicine is headache develop sense and consciousness told you your brother own.
human is glorious organism humanity is its stance razing the discrimination among the men religion their own. Send your comments to ggajendra@videha.com विदेह नूतन अंक भाषापाक रचना-लेखन Input: (कोष्ठकमे देवनागरी, मिथिलाक्षर किंवा फोनेटिक-रोमनमे टाइप करू। Input in Devanagari, Mithilakshara or Phonetic-Roman.) Output: (परिणाम देवनागरी, मिथिलाक्षर आ फोनेटिक-रोमन/ रोमनमे। Result in Devanagari, Mithilakshara and Phonetic-Roman/ Roman.) English to Maithili Maithili to English इंग्लिश-मैथिली-कोष / मैथिली-इंग्लिश-कोष प्रोजेक्टकेँ आगू बढ़ाऊ, अपन सुझाव आ योगदान ई-मेल द्वारा ggajendra@videha.com पर पठाऊ। Top of Form विदेहक मैथिली-अंग्रेजी आ अंग्रेजी मैथिली कोष (इंटरनेटपर पहिल बेर सर्च-डिक्शनरी) एम.एस. एस.क्यू.एल. सर्वर आधारित -Based on ms-sql server Maithili-English and English-Maithili Dictionary. १.भारत आ नेपालक मैथिली भाषा-वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक शैली आ २.मैथिलीमे भाषा सम्पादन पाठ्यक्रम १.नेपाल आ भारतक मैथिली भाषा-वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक शैली
१.१. नेपालक मैथिली भाषा वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक उच्चारण आ लेखन शैली (भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक धारणाकेँ पूर्ण रूपसँ सङ्ग लऽ निर्धारित) मैथिलीमे उच्चारण तथा लेखन १.पञ्चमाक्षर आ अनुस्वार: पञ्चमाक्षरान्तर्गत ङ, ञ, ण, न एवं म अबैत अछि। संस्कृत भाषाक अनुसार शब्दक अन्तमे जाहि वर्गक अक्षर रहैत अछि ओही वर्गक पञ्चमाक्षर अबैत अछि। जेना- अङ्क (क वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ङ् आएल अछि।) पञ्च (च वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ञ् आएल अछि।) खण्ड (ट वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ण् आएल अछि।) सन्धि (त वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे न् आएल अछि।) खम्भ (प वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे म् आएल अछि।) उपर्युक्त बात मैथिलीमे कम देखल जाइत अछि। पञ्चमाक्षरक बदलामे अधिकांश जगहपर अनुस्वारक प्रयोग देखल जाइछ। जेना- अंक, पंच, खंड, संधि, खंभ आदि। व्याकरणविद पण्डित गोविन्द झाक कहब छनि जे कवर्ग, चवर्ग आ टवर्गसँ पूर्व अनुस्वार लिखल जाए तथा तवर्ग आ पवर्गसँ पूर्व पञ्चमाक्षरे लिखल जाए। जेना- अंक, चंचल, अंडा, अन्त तथा कम्पन। मुदा हिन्दीक निकट रहल आधुनिक लेखक एहि बातकेँ नहि मानैत छथि। ओ लोकनि अन्त आ कम्पनक जगहपर सेहो अंत आ कंपन लिखैत देखल जाइत छथि। नवीन पद्धति किछु सुविधाजनक अवश्य छैक। किएक तँ एहिमे समय आ स्थानक बचत होइत छैक। मुदा कतोक बेर हस्तलेखन वा मुद्रणमे अनुस्वारक छोट सन बिन्दु स्पष्ट नहि भेलासँ अर्थक अनर्थ होइत सेहो देखल जाइत अछि। अनुस्वारक प्रयोगमे उच्चारण-दोषक सम्भावना सेहो ततबए देखल जाइत अछि। एतदर्थ कसँ लऽ कऽ पवर्ग धरि पञ्चमाक्षरेक प्रयोग करब उचित अछि। यसँ लऽ कऽ ज्ञ धरिक अक्षरक सङ्ग अनुस्वारक प्रयोग करबामे कतहु कोनो विवाद नहि देखल जाइछ। २.ढ आ ढ़ : ढ़क उच्चारण “र् ह”जकाँ होइत अछि। अतः जतऽ “र् ह”क उच्चारण हो ओतऽ मात्र ढ़ लिखल जाए। आन ठाम खाली ढ लिखल जएबाक चाही। जेना- ढ = ढाकी, ढेकी, ढीठ, ढेउआ, ढङ्ग, ढेरी, ढाकनि, ढाठ आदि। ढ़ = पढ़ाइ, बढ़ब, गढ़ब, मढ़ब, बुढ़बा, साँढ़, गाढ़, रीढ़, चाँढ़, सीढ़ी, पीढ़ी आदि। उपर्युक्त शब्द सभकेँ देखलासँ ई स्पष्ट होइत अछि जे साधारणतया शब्दक शुरूमे ढ आ मध्य तथा अन्तमे ढ़ अबैत अछि। इएह नियम ड आ ड़क सन्दर्भ सेहो लागू होइत अछि। ३.व आ ब : मैथिलीमे “व”क उच्चारण ब कएल जाइत अछि, मुदा ओकरा ब रूपमे नहि लिखल जएबाक चाही। जेना- उच्चारण : बैद्यनाथ, बिद्या, नब, देबता, बिष्णु, बंश, बन्दना आदि। एहि सभक स्थानपर क्रमशः वैद्यनाथ, विद्या, नव, देवता, विष्णु, वंश, वन्दना लिखबाक चाही। सामान्यतया व उच्चारणक लेल ओ प्रयोग कएल जाइत अछि। जेना- ओकील, ओजह आदि। ४.य आ ज : कतहु-कतहु “य”क उच्चारण “ज”जकाँ करैत देखल जाइत अछि, मुदा ओकरा ज नहि लिखबाक चाही। उच्चारणमे यज्ञ, जदि, जमुना, जुग, जाबत, जोगी, जदु, जम आदि कहल जाएबला शब्द सभकेँ क्रमशः यज्ञ, यदि, यमुना, युग, यावत, योगी, यदु, यम लिखबाक चाही। ५.ए आ य : मैथिलीक वर्तनीमे ए आ य दुनू लिखल जाइत अछि। प्राचीन वर्तनी- कएल, जाए, होएत, माए, भाए, गाए आदि। नवीन वर्तनी- कयल, जाय, होयत, माय, भाय, गाय आदि। सामान्यतया शब्दक शुरूमे ए मात्र अबैत अछि। जेना एहि, एना, एकर, एहन आदि। एहि शब्द सभक स्थानपर यहि, यना, यकर, यहन आदिक प्रयोग नहि करबाक चाही। यद्यपि मैथिलीभाषी थारू सहित किछु जातिमे शब्दक आरम्भोमे “ए”केँ य कहि उच्चारण कएल जाइत अछि। ए आ “य”क प्रयोगक सन्दर्भमे प्राचीने पद्धतिक अनुसरण करब उपयुक्त मानि एहि पुस्तकमे ओकरे प्रयोग कएल गेल अछि। किएक तँ दुनूक लेखनमे कोनो सहजता आ दुरूहताक बात नहि अछि। आ मैथिलीक सर्वसाधारणक उच्चारण-शैली यक अपेक्षा एसँ बेसी निकट छैक। खास कऽ कएल, हएब आदि कतिपय शब्दकेँ कैल, हैब आदि रूपमे कतहु-कतहु लिखल जाएब सेहो “ए”क प्रयोगकेँ बेसी समीचीन प्रमाणित करैत अछि। ६.हि, हु तथा एकार, ओकार : मैथिलीक प्राचीन लेखन-परम्परामे कोनो बातपर बल दैत काल शब्दक पाछाँ हि, हु लगाओल जाइत छैक। जेना- हुनकहि, अपनहु, ओकरहु, तत्कालहि, चोट्टहि, आनहु आदि। मुदा आधुनिक लेखनमे हिक स्थानपर एकार एवं हुक स्थानपर ओकारक प्रयोग करैत देखल जाइत अछि। जेना- हुनके, अपनो, तत्काले, चोट्टे, आनो आदि। ७.ष तथा ख : मैथिली भाषामे अधिकांशतः षक उच्चारण ख होइत अछि। जेना- षड्यन्त्र (खड़यन्त्र), षोडशी (खोड़शी), षट्कोण (खटकोण), वृषेश (वृखेश), सन्तोष (सन्तोख) आदि। ८.ध्वनि-लोप : निम्नलिखित अवस्थामे शब्दसँ ध्वनि-लोप भऽ जाइत अछि: (क) क्रियान्वयी प्रत्यय अयमे य वा ए लुप्त भऽ जाइत अछि। ओहिमे सँ पहिने अक उच्चारण दीर्घ भऽ जाइत अछि। ओकर आगाँ लोप-सूचक चिह्न वा विकारी (’ / ऽ) लगाओल जाइछ। जेना- पूर्ण रूप : पढ़ए (पढ़य) गेलाह, कए (कय) लेल, उठए (उठय) पड़तौक। अपूर्ण रूप : पढ़’ गेलाह, क’ लेल, उठ’ पड़तौक। पढ़ऽ गेलाह, कऽ लेल, उठऽ पड़तौक। (ख) पूर्वकालिक कृत आय (आए) प्रत्ययमे य (ए) लुप्त भऽ जाइछ, मुदा लोप-सूचक विकारी नहि लगाओल जाइछ। जेना- पूर्ण रूप : खाए (य) गेल, पठाय (ए) देब, नहाए (य) अएलाह। अपूर्ण रूप : खा गेल, पठा देब, नहा अएलाह। (ग) स्त्री प्रत्यय इक उच्चारण क्रियापद, संज्ञा, ओ विशेषण तीनूमे लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना- पूर्ण रूप : दोसरि मालिनि चलि गेलि। अपूर्ण रूप : दोसर मालिन चलि गेल। (घ) वर्तमान कृदन्तक अन्तिम त लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना- पूर्ण रूप : पढ़ैत अछि, बजैत अछि, गबैत अछि। अपूर्ण रूप : पढ़ै अछि, बजै अछि, गबै अछि। (ङ) क्रियापदक अवसान इक, उक, ऐक तथा हीकमे लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना- पूर्ण रूप: छियौक, छियैक, छहीक, छौक, छैक, अबितैक, होइक। अपूर्ण रूप : छियौ, छियै, छही, छौ, छै, अबितै, होइ। (च) क्रियापदीय प्रत्यय न्ह, हु तथा हकारक लोप भऽ जाइछ। जेना- पूर्ण रूप : छन्हि, कहलन्हि, कहलहुँ, गेलह, नहि। अपूर्ण रूप : छनि, कहलनि, कहलौँ, गेलऽ, नइ, नञि, नै। ९.ध्वनि स्थानान्तरण : कोनो-कोनो स्वर-ध्वनि अपना जगहसँ हटि कऽ दोसर ठाम चलि जाइत अछि। खास कऽ ह्रस्व इ आ उक सम्बन्धमे ई बात लागू होइत अछि। मैथिलीकरण भऽ गेल शब्दक मध्य वा अन्तमे जँ ह्रस्व इ वा उ आबए तँ ओकर ध्वनि स्थानान्तरित भऽ एक अक्षर आगाँ आबि जाइत अछि। जेना- शनि (शइन), पानि (पाइन), दालि ( दाइल), माटि (माइट), काछु (काउछ), मासु (माउस) आदि। मुदा तत्सम शब्द सभमे ई निअम लागू नहि होइत अछि। जेना- रश्मिकेँ रइश्म आ सुधांशुकेँ सुधाउंस नहि कहल जा सकैत अछि। १०.हलन्त(्)क प्रयोग : मैथिली भाषामे सामान्यतया हलन्त (्)क आवश्यकता नहि होइत अछि। कारण जे शब्दक अन्तमे अ उच्चारण नहि होइत अछि। मुदा संस्कृत भाषासँ जहिनाक तहिना मैथिलीमे आएल (तत्सम) शब्द सभमे हलन्त प्रयोग कएल जाइत अछि। एहि पोथीमे सामान्यतया सम्पूर्ण शब्दकेँ मैथिली भाषा सम्बन्धी निअम अनुसार हलन्तविहीन राखल गेल अछि। मुदा व्याकरण सम्बन्धी प्रयोजनक लेल अत्यावश्यक स्थानपर कतहु-कतहु हलन्त देल गेल अछि। प्रस्तुत पोथीमे मथिली लेखनक प्राचीन आ नवीन दुनू शैलीक सरल आ समीचीन पक्ष सभकेँ समेटि कऽ वर्ण-विन्यास कएल गेल अछि। स्थान आ समयमे बचतक सङ्गहि हस्त-लेखन तथा तकनीकी दृष्टिसँ सेहो सरल होबऽबला हिसाबसँ वर्ण-विन्यास मिलाओल गेल अछि। वर्तमान समयमे मैथिली मातृभाषी पर्यन्तकेँ आन भाषाक माध्यमसँ मैथिलीक ज्ञान लेबऽ पड़ि रहल परिप्रेक्ष्यमे लेखनमे सहजता तथा एकरूपतापर ध्यान देल गेल अछि। तखन मैथिली भाषाक मूल विशेषता सभ कुण्ठित नहि होइक, ताहू दिस लेखक-मण्डल सचेत अछि। प्रसिद्ध भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक कहब छनि जे सरलताक अनुसन्धानमे एहन अवस्था किन्नहु ने आबऽ देबाक चाही जे भाषाक विशेषता छाँहमे पडि जाए। -(भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक धारणाकेँ पूर्ण रूपसँ सङ्ग लऽ निर्धारित) १.२. मैथिली अकादमी, पटना द्वारा निर्धारित मैथिली लेखन-शैली
१. जे शब्द मैथिली-साहित्यक प्राचीन कालसँ आइ धरि जाहि वर्त्तनीमे प्रचलित अछि, से सामान्यतः ताहि वर्त्तनीमे लिखल जाय- उदाहरणार्थ-
ग्राह्य
एखन ठाम जकर, तकर तनिकर अछि
अग्राह्य अखन, अखनि, एखेन, अखनी ठिमा, ठिना, ठमा जेकर, तेकर तिनकर। (वैकल्पिक रूपेँ ग्राह्य) ऐछ, अहि, ए।
२. निम्नलिखित तीन प्रकारक रूप वैकल्पिकतया अपनाओल जाय: भऽ गेल, भय गेल वा भए गेल। जा रहल अछि, जाय रहल अछि, जाए रहल अछि। कर’ गेलाह, वा करय गेलाह वा करए गेलाह।
३. प्राचीन मैथिलीक ‘न्ह’ ध्वनिक स्थानमे ‘न’ लिखल जाय सकैत अछि यथा कहलनि वा कहलन्हि।
४. ‘ऐ’ तथा ‘औ’ ततय लिखल जाय जत’ स्पष्टतः ‘अइ’ तथा ‘अउ’ सदृश उच्चारण इष्ट हो। यथा- देखैत, छलैक, बौआ, छौक इत्यादि।
५. मैथिलीक निम्नलिखित शब्द एहि रूपे प्रयुक्त होयत: जैह, सैह, इएह, ओऐह, लैह तथा दैह।
६. ह्र्स्व इकारांत शब्दमे ‘इ’ के लुप्त करब सामान्यतः अग्राह्य थिक। यथा- ग्राह्य देखि आबह, मालिनि गेलि (मनुष्य मात्रमे)।
७. स्वतंत्र ह्रस्व ‘ए’ वा ‘य’ प्राचीन मैथिलीक उद्धरण आदिमे तँ यथावत राखल जाय, किंतु आधुनिक प्रयोगमे वैकल्पिक रूपेँ ‘ए’ वा ‘य’ लिखल जाय। यथा:- कयल वा कएल, अयलाह वा अएलाह, जाय वा जाए इत्यादि।
८. उच्चारणमे दू स्वरक बीच जे ‘य’ ध्वनि स्वतः आबि जाइत अछि तकरा लेखमे स्थान वैकल्पिक रूपेँ देल जाय। यथा- धीआ, अढ़ैआ, विआह, वा धीया, अढ़ैया, बियाह।
९. सानुनासिक स्वतंत्र स्वरक स्थान यथासंभव ‘ञ’ लिखल जाय वा सानुनासिक स्वर। यथा:- मैञा, कनिञा, किरतनिञा वा मैआँ, कनिआँ, किरतनिआँ।
१०. कारकक विभक्त्तिक निम्नलिखित रूप ग्राह्य:- हाथकेँ, हाथसँ, हाथेँ, हाथक, हाथमे। ’मे’ मे अनुस्वार सर्वथा त्याज्य थिक। ‘क’ क वैकल्पिक रूप ‘केर’ राखल जा सकैत अछि।
११. पूर्वकालिक क्रियापदक बाद ‘कय’ वा ‘कए’ अव्यय वैकल्पिक रूपेँ लगाओल जा सकैत अछि। यथा:- देखि कय वा देखि कए।
१२. माँग, भाँग आदिक स्थानमे माङ, भाङ इत्यादि लिखल जाय।
१३. अर्द्ध ‘न’ ओ अर्द्ध ‘म’ क बदला अनुसार नहि लिखल जाय, किंतु छापाक सुविधार्थ अर्द्ध ‘ङ’ , ‘ञ’, तथा ‘ण’ क बदला अनुस्वारो लिखल जा सकैत अछि। यथा:- अङ्क, वा अंक, अञ्चल वा अंचल, कण्ठ वा कंठ।
१४. हलंत चिह्न निअमतः लगाओल जाय, किंतु विभक्तिक संग अकारांत प्रयोग कएल जाय। यथा:- श्रीमान्, किंतु श्रीमानक।
१५. सभ एकल कारक चिह्न शब्दमे सटा क’ लिखल जाय, हटा क’ नहि, संयुक्त विभक्तिक हेतु फराक लिखल जाय, यथा घर परक।
१६. अनुनासिककेँ चन्द्रबिन्दु द्वारा व्यक्त कयल जाय। परंतु मुद्रणक सुविधार्थ हि समान जटिल मात्रापर अनुस्वारक प्रयोग चन्द्रबिन्दुक बदला कयल जा सकैत अछि। यथा- हिँ केर बदला हिं।
१७. पूर्ण विराम पासीसँ ( । ) सूचित कयल जाय।
१८. समस्त पद सटा क’ लिखल जाय, वा हाइफेनसँ जोड़ि क’ , हटा क’ नहि।
१९. लिअ तथा दिअ शब्दमे बिकारी (ऽ) नहि लगाओल जाय।
२०. अंक देवनागरी रूपमे राखल जाय।
२१.किछु ध्वनिक लेल नवीन चिन्ह बनबाओल जाय। जा' ई नहि बनल अछि ताबत एहि दुनू ध्वनिक बदला पूर्ववत् अय/ आय/ अए/ आए/ आओ/ अओ लिखल जाय। आकि ऎ वा ऒ सँ व्यक्त कएल जाय।
ह./- गोविन्द झा ११/८/७६ श्रीकान्त ठाकुर ११/८/७६ सुरेन्द्र झा "सुमन" ११/०८/७६
२. मैथिलीमे भाषा सम्पादन पाठ्यक्रम २.१. उच्चारण निर्देश: (बोल्ड कएल रूप ग्राह्य):- दन्त न क उच्चारणमे दाँतमे जीह सटत- जेना बाजू नाम , मुदा ण क उच्चारणमे जीह मूर्धामे सटत (नै सटैए तँ उच्चारण दोष अछि)- जेना बाजू गणेश। तालव्य शमे जीह तालुसँ , षमे मूर्धासँ आ दन्त समे दाँतसँ सटत। निशाँ, सभ आ शोषण बाजि कऽ देखू। मैथिलीमे ष केँ वैदिक संस्कृत जकाँ ख सेहो उच्चरित कएल जाइत अछि, जेना वर्षा, दोष। य अनेको स्थानपर ज जकाँ उच्चरित होइत अछि आ ण ड़ जकाँ (यथा संयोग आ गणेश संजोग आ गड़ेस उच्चरित होइत अछि)। मैथिलीमे व क उच्चारण ब, श क उच्चारण स आ य क उच्चारण ज सेहो होइत अछि। ओहिना ह्रस्व इ बेशीकाल मैथिलीमे पहिने बाजल जाइत अछि कारण देवनागरीमे आ मिथिलाक्षरमे ह्रस्व इ अक्षरक पहिने लिखलो जाइत आ बाजलो जएबाक चाही। कारण जे हिन्दीमे एकर दोषपूर्ण उच्चारण होइत अछि (लिखल तँ पहिने जाइत अछि मुदा बाजल बादमे जाइत अछि), से शिक्षा पद्धतिक दोषक कारण हम सभ ओकर उच्चारण दोषपूर्ण ढंगसँ कऽ रहल छी। अछि- अ इ छ ऐछ (उच्चारण) छथि- छ इ थ – छैथ (उच्चारण) पहुँचि- प हुँ इ च (उच्चारण) आब अ आ इ ई ए ऐ ओ औ अं अः ऋ ऐ सभ लेल मात्रा सेहो अछि, मुदा ऐमे ई ऐ ओ औ अं अः ऋ केँ संयुक्ताक्षर रूपमे गलत रूपमे प्रयुक्त आ उच्चरित कएल जाइत अछि। जेना ऋ केँ री रूपमे उच्चरित करब। आ देखियौ- ऐ लेल देखिऔ क प्रयोग अनुचित। मुदा देखिऐ लेल देखियै अनुचित। क् सँ ह् धरि अ सम्मिलित भेलासँ क सँ ह बनैत अछि, मुदा उच्चारण काल हलन्त युक्त शब्दक अन्तक उच्चारणक प्रवृत्ति बढ़ल अछि, मुदा हम जखन मनोजमे ज् अन्तमे बजैत छी, तखनो पुरनका लोककेँ बजैत सुनबन्हि- मनोजऽ, वास्तवमे ओ अ युक्त ज् = ज बजै छथि। फेर ज्ञ अछि ज् आ ञ क संयुक्त मुदा गलत उच्चारण होइत अछि- ग्य। ओहिना क्ष अछि क् आ ष क संयुक्त मुदा उच्चारण होइत अछि छ। फेर श् आ र क संयुक्त अछि श्र ( जेना श्रमिक) आ स् आ र क संयुक्त अछि स्र (जेना मिस्र)। त्र भेल त+र । उच्चारणक ऑडियो फाइल विदेह आर्काइव http://www.videha.co.in/ पर उपलब्ध अछि। फेर केँ / सँ / पर पूर्व अक्षरसँ सटा कऽ लिखू मुदा तँ / कऽ हटा कऽ। ऐमे सँ मे पहिल सटा कऽ लिखू आ बादबला हटा कऽ। अंकक बाद टा लिखू सटा कऽ मुदा अन्य ठाम टा लिखू हटा कऽ– जेना छहटा मुदा सभ टा। फेर ६अ म सातम लिखू- छठम सातम नै। घरबलामे बला मुदा घरवालीमे वाली प्रयुक्त करू। रहए- रहै मुदा सकैए (उच्चारण सकै-ए)। मुदा कखनो काल रहए आ रहै मे अर्थ भिन्नता सेहो, जेना से कम्मो जगहमे पार्किंग करबाक अभ्यास रहै ओकरा। पुछलापर पता लागल जे ढुनढुन नाम्ना ई ड्राइवर कनाट प्लेसक पार्किंगमे काज करैत रहए। छलै, छलए मे सेहो ऐ तरहक भेल। छलए क उच्चारण छल-ए सेहो। संयोगने- (उच्चारण संजोगने) केँ/ कऽ केर- क ( केर क प्रयोग गद्यमे नै करू , पद्यमे कऽ सकै छी। ) क (जेना रामक) –रामक आ संगे (उच्चारण राम के / राम कऽ सेहो) सँ- सऽ (उच्चारण) चन्द्रबिन्दु आ अनुस्वार- अनुस्वारमे कंठ धरिक प्रयोग होइत अछि मुदा चन्द्रबिन्दुमे नै। चन्द्रबिन्दुमे कनेक एकारक सेहो उच्चारण होइत अछि- जेना रामसँ- (उच्चारण राम सऽ) रामकेँ- (उच्चारण राम कऽ/ राम के सेहो)। केँ जेना रामकेँ भेल हिन्दीक को (राम को)- राम को= रामकेँ क जेना रामक भेल हिन्दीक का ( राम का) राम का= रामक कऽ जेना जा कऽ भेल हिन्दीक कर ( जा कर) जा कर= जा कऽ सँ भेल हिन्दीक से (राम से) राम से= रामसँ सऽ , तऽ , त , केर (गद्यमे) एे चारू शब्द सबहक प्रयोग अवांछित। के दोसर अर्थेँ प्रयुक्त भऽ सकैए- जेना, के कहलक? विभक्ति “क”क बदला एकर प्रयोग अवांछित। नञि, नहि, नै, नइ, नँइ, नइँ, नइं ऐ सभक उच्चारण आ लेखन - नै त्त्व क बदलामे त्व जेना महत्वपूर्ण (महत्त्वपूर्ण नै) जतए अर्थ बदलि जाए ओतहि मात्र तीन अक्षरक संयुक्ताक्षरक प्रयोग उचित। सम्पति- उच्चारण स म्प इ त (सम्पत्ति नै- कारण सही उच्चारण आसानीसँ सम्भव नै)। मुदा सर्वोत्तम (सर्वोतम नै)। राष्ट्रिय (राष्ट्रीय नै) सकैए/ सकै (अर्थ परिवर्तन) पोछैले/ पोछै लेल/ पोछए लेल पोछैए/ पोछए/ (अर्थ परिवर्तन) पोछए/ पोछै ओ लोकनि ( हटा कऽ, ओ मे बिकारी नै) ओइ/ ओहि ओहिले/ ओहि लेल/ ओही लऽ जएबेँ/ बैसबेँ पँचभइयाँ देखियौक/ (देखिऔक नै- तहिना अ मे ह्रस्व आ दीर्घक मात्राक प्रयोग अनुचित) जकाँ / जेकाँ तँइ/ तैँ/ होएत / हएत नञि/ नहि/ नँइ/ नइँ/ नै सौँसे/ सौंसे बड़ / बड़ी (झोराओल) गाए (गाइ नहि), मुदा गाइक दूध (गाएक दूध नै।) रहलेँ/ पहिरतैँ हमहीं/ अहीं सब - सभ सबहक - सभहक धरि - तक गप- बात बूझब - समझब बुझलौं/ समझलौं/ बुझलहुँ - समझलहुँ हमरा आर - हम सभ आकि- आ कि सकैछ/ करैछ (गद्यमे प्रयोगक आवश्यकता नै) होइन/ होनि जाइन (जानि नै, जेना देल जाइन) मुदा जानि-बूझि (अर्थ परिव्र्तन) पइठ/ जाइठ आउ/ जाउ/ आऊ/ जाऊ मे, केँ, सँ, पर (शब्दसँ सटा कऽ) तँ कऽ धऽ दऽ (शब्दसँ हटा कऽ) मुदा दूटा वा बेसी विभक्ति संग रहलापर पहिल विभक्ति टाकेँ सटाऊ। जेना ऐमे सँ । एकटा , दूटा (मुदा कए टा) बिकारीक प्रयोग शब्दक अन्तमे, बीचमे अनावश्यक रूपेँ नै। आकारान्त आ अन्तमे अ क बाद बिकारीक प्रयोग नै (जेना दिअ , आ/ दिय’ , आ’, आ नै ) अपोस्ट्रोफीक प्रयोग बिकारीक बदलामे करब अनुचित आ मात्र फॉन्टक तकनीकी न्यूनताक परिचायक)- ओना बिकारीक संस्कृत रूप ऽ अवग्रह कहल जाइत अछि आ वर्तनी आ उच्चारण दुनू ठाम एकर लोप रहैत अछि/ रहि सकैत अछि (उच्चारणमे लोप रहिते अछि)। मुदा अपोस्ट्रोफी सेहो अंग्रेजीमे पसेसिव केसमे होइत अछि आ फ्रेंचमे शब्दमे जतए एकर प्रयोग होइत अछि जेना raison d’etre एतए सेहो एकर उच्चारण रैजौन डेटर होइत अछि, माने अपोस्ट्रॉफी अवकाश नै दैत अछि वरन जोड़ैत अछि, से एकर प्रयोग बिकारीक बदला देनाइ तकनीकी रूपेँ सेहो अनुचित)। अइमे, एहिमे/ ऐमे जइमे, जाहिमे एखन/ अखन/ अइखन केँ (के नहि) मे (अनुस्वार रहित) भऽ मे दऽ तँ (तऽ, त नै) सँ ( सऽ स नै) गाछ तर गाछ लग साँझ खन जो (जो go, करै जो do) तै/तइ जेना- तै दुआरे/ तइमे/ तइले जै/जइ जेना- जै कारण/ जइसँ/ जइले ऐ/अइ जेना- ऐ कारण/ ऐसँ/ अइले/ मुदा एकर एकटा खास प्रयोग- लालति कतेक दिनसँ कहैत रहैत अइ लै/लइ जेना लैसँ/ लइले/ लै दुआरे लहँ/ लौं गेलौं/ लेलौं/ लेलँह/ गेलहुँ/ लेलहुँ/ लेलँ जइ/ जाहि/ जै जहिठाम/ जाहिठाम/ जइठाम/ जैठाम एहि/ अहि/ अइ (वाक्यक अंतमे ग्राह्य) / ऐ अइछ/ अछि/ ऐछ तइ/ तहि/ तै/ ताहि ओहि/ ओइ सीखि/ सीख जीवि/ जीवी/ जीब भलेहीं/ भलहिं तैं/ तँइ/ तँए जाएब/ जएब लइ/ लै छइ/ छै नहि/ नै/ नइ गइ/ गै छनि/ छन्हि ... समए शब्दक संग जखन कोनो विभक्ति जुटै छै तखन समै जना समैपर इत्यादि। असगरमे हृदए आ विभक्ति जुटने हृदे जना हृदेसँ, हृदेमे इत्यादि। जइ/ जाहि/ जै जहिठाम/ जाहिठाम/ जइठाम/ जैठाम एहि/ अहि/ अइ/ ऐ अइछ/ अछि/ ऐछ तइ/ तहि/ तै/ ताहि ओहि/ ओइ सीखि/ सीख जीवि/ जीवी/ जीब भले/ भलेहीं/ भलहिं तैं/ तँइ/ तँए जाएब/ जएब लइ/ लै छइ/ छै नहि/ नै/ नइ गइ/ गै छनि/ छन्हि चुकल अछि/ गेल गछि २.२. मैथिलीमे भाषा सम्पादन पाठ्यक्रम नीचाँक सूचीमे देल विकल्पमेसँ लैंगुएज एडीटर द्वारा कोन रूप चुनल जेबाक चाही: बोल्ड कएल रूप ग्राह्य: १.होयबला/ होबयबला/ होमयबला/ हेब’बला, हेम’बला/ होयबाक/होबएबला /होएबाक २. आ’/आऽ आ ३. क’ लेने/कऽ लेने/कए लेने/कय लेने/ल’/लऽ/लय/लए ४. भ’ गेल/भऽ गेल/भय गेल/भए गेल ५. कर’ गेलाह/करऽ गेलह/करए गेलाह/करय गेलाह ६. लिअ/दिअ लिय’,दिय’,लिअ’,दिय’/ ७. कर’ बला/करऽ बला/ करय बला करैबला/क’र’ बला / करैवाली ८. बला वला (पुरूष), वाली (स्त्री) ९ . आङ्ल आंग्ल १०. प्रायः प्रायह ११. दुःख दुख १ २. चलि गेल चल गेल/चैल गेल १३. देलखिन्ह देलकिन्ह, देलखिन १४. देखलन्हि देखलनि/ देखलैन्ह १५. छथिन्ह/ छलन्हि छथिन/ छलैन/ छलनि १६. चलैत/दैत चलति/दैति १७. एखनो अखनो १८. बढ़नि बढ़इन बढ़न्हि १९. ओ’/ओऽ(सर्वनाम) ओ २० . ओ (संयोजक) ओ’/ओऽ २१. फाँगि/फाङ्गि फाइंग/फाइङ २२. जे जे’/जेऽ २३. ना-नुकुर ना-नुकर २४. केलन्हि/केलनि/कयलन्हि २५. तखनतँ/ तखन तँ २६. जा रहल/जाय रहल/जाए रहल २७. निकलय/निकलए लागल/ लगल बहराय/ बहराए लागल/ लगल निकल’/बहरै लागल २८. ओतय/ जतय जत’/ ओत’/ जतए/ ओतए २९. की फूरल जे कि फूरल जे ३०. जे जे’/जेऽ ३१. कूदि / यादि(मोन पारब) कूइद/याइद/कूद/याद/ यादि (मोन) ३२. इहो/ ओहो ३३. हँसए/ हँसय हँसऽ ३४. नौ आकि दस/नौ किंवा दस/ नौ वा दस ३५. सासु-ससुर सास-ससुर ३६. छह/ सात छ/छः/सात ३७. की की’/ कीऽ (दीर्घीकारान्तमे ऽ वर्जित) ३८. जबाब जवाब ३९. करएताह/ करेताह करयताह ४०. दलान दिशि दलान दिश/दलान दिस ४१ . गेलाह गएलाह/गयलाह ४२. किछु आर/ किछु और/ किछ आर ४३. जाइ छल/ जाइत छल जाति छल/जैत छल ४४. पहुँचि/ भेट जाइत छल/ भेट जाइ छलए पहुँच/ भेटि जाइत छल ४५. जबान (युवा)/ जवान(फौजी) ४६. लय/ लए क’/ कऽ/ लए कए / लऽ कऽ/ लऽ कए ४७. ल’/लऽ कय/ कए ४८. एखन / एखने / अखन / अखने ४९. अहींकेँ अहीँकेँ ५०. गहींर गहीँर ५१. धार पार केनाइ धार पार केनाय/केनाए ५२. जेकाँ जेँकाँ/ जकाँ ५३. तहिना तेहिना ५४. एकर अकर ५५. बहिनउ बहनोइ ५६. बहिन बहिनि ५७. बहिन-बहिनोइ बहिन-बहनउ ५८. नहि/ नै ५९. करबा / करबाय/ करबाए ६०. तँ/ त ऽ तय/तए ६१. भैयारी मे छोट-भाए/भै/, जेठ-भाय/भाइ, ६२. गिनतीमे दू भाइ/भाए/भाँइ ६३. ई पोथी दू भाइक/ भाँइ/ भाए/ लेल। यावत जावत ६४. माय मै / माए मुदा माइक ममता ६५. देन्हि/ दइन दनि/ दएन्हि/ दयन्हि दन्हि/ दैन्हि ६६. द’/ दऽ/ दए ६७. ओ (संयोजक) ओऽ (सर्वनाम) ६८. तका कए तकाय तकाए ६९. पैरे (on foot) पएरे कएक/ कैक ७०. ताहुमे/ ताहूमे ७१. पुत्रीक ७२. बजा कय/ कए / कऽ ७३. बननाय/बननाइ ७४. कोला ७५. दिनुका दिनका ७६. ततहिसँ ७७. गरबओलन्हि/ गरबौलनि/ गरबेलन्हि/ गरबेलनि ७८. बालु बालू ७९. चेन्ह चिन्ह(अशुद्ध) ८०. जे जे’ ८१ . से/ के से’/के’ ८२. एखुनका अखनुका ८३. भुमिहार भूमिहार ८४. सुग्गर / सुगरक/ सूगर ८५. झठहाक झटहाक ८६. छूबि ८७. करइयो/ओ करैयो ने देलक /करियौ-करइयौ ८८. पुबारि पुबाइ ८९. झगड़ा-झाँटी झगड़ा-झाँटि ९०. पएरे-पएरे पैरे-पैरे ९१. खेलएबाक ९२. खेलेबाक ९३. लगा ९४. होए- हो – होअए ९५. बुझल बूझल ९६. बूझल (संबोधन अर्थमे) ९७. यैह यएह / इएह/ सैह/ सएह ९८. तातिल ९९. अयनाय- अयनाइ/ अएनाइ/ एनाइ १००. निन्न- निन्द १०१. बिनु बिन १०२. जाए जाइ १०३. जाइ (in different sense)-last word of sentence १०४. छत पर आबि जाइ १०५. ने १०६. खेलाए (play) –खेलाइ १०७. शिकाइत- शिकायत १०८. ढप- ढ़प १०९ . पढ़- पढ ११०. कनिए/ कनिये कनिञे १११. राकस- राकश ११२. होए/ होय होइ ११३. अउरदा- औरदा ११४. बुझेलन्हि (different meaning- got understand) ११५. बुझएलन्हि/बुझेलनि/ बुझयलन्हि (understood himself) ११६. चलि- चल/ चलि गेल ११७. खधाइ- खधाय ११८. मोन पाड़लखिन्ह/ मोन पाड़लखिन/ मोन पारलखिन्ह ११९. कैक- कएक- कइएक १२०. लग ल’ग १२१. जरेनाइ १२२. जरौनाइ जरओनाइ- जरएनाइ/ जरेनाइ १२३. होइत १२४. गरबेलन्हि/ गरबेलनि गरबौलन्हि/ गरबौलनि १२५. चिखैत- (to test)चिखइत १२६. करइयो (willing to do) करैयो १२७. जेकरा- जकरा १२८. तकरा- तेकरा १२९. बिदेसर स्थानेमे/ बिदेसरे स्थानमे १३०. करबयलहुँ/ करबएलहुँ/ करबेलहुँ करबेलौं १३१. हारिक (उच्चारण हाइरक) १३२. ओजन वजन आफसोच/ अफसोस कागत/ कागच/ कागज १३३. आधे भाग/ आध-भागे १३४. पिचा / पिचाय/पिचाए १३५. नञ/ ने १३६. बच्चा नञ (ने) पिचा जाय १३७. तखन ने (नञ) कहैत अछि। कहै/ सुनै/ देखै छल मुदा कहैत-कहैत/ सुनैत-सुनैत/ देखैत-देखैत १३८. कतेक गोटे/ कताक गोटे १३९. कमाइ-धमाइ/ कमाई- धमाई १४० . लग ल’ग १४१. खेलाइ (for playing) १४२. छथिन्ह/ छथिन १४३. होइत होइ १४४. क्यो कियो / केओ १४५. केश (hair) १४६. केस (court-case) १४७ . बननाइ/ बननाय/ बननाए १४८. जरेनाइ १४९. कुरसी कुर्सी १५०. चरचा चर्चा १५१. कर्म करम १५२. डुबाबए/ डुबाबै/ डुमाबै डुमाबय/ डुमाबए १५३. एखुनका/ अखुनका १५४. लए/ लिअए (वाक्यक अंतिम शब्द)- लऽ १५५. कएलक/ केलक १५६. गरमी गर्मी १५७ . वरदी वर्दी १५८. सुना गेलाह सुना’/सुनाऽ १५९. एनाइ-गेनाइ १६०. तेना ने घेरलन्हि/ तेना ने घेरलनि १६१. नञि / नै १६२. डरो ड’रो १६३. कतहु/ कतौ कहीं १६४. उमरिगर-उमेरगर उमरगर १६५. भरिगर १६६. धोल/धोअल धोएल १६७. गप/गप्प १६८. के के’ १६९. दरबज्जा/ दरबजा १७०. ठाम १७१. धरि तक १७२. घूरि लौटि १७३. थोरबेक १७४. बड्ड १७५. तोँ/ तूँ १७६. तोँहि( पद्यमे ग्राह्य) १७७. तोँही / तोँहि १७८. करबाइए करबाइये १७९. एकेटा १८०. करितथि /करतथि १८१. पहुँचि/ पहुँच १८२. राखलन्हि रखलन्हि/ रखलनि १८३. लगलन्हि/ लगलनि लागलन्हि १८४. सुनि (उच्चारण सुइन) १८५. अछि (उच्चारण अइछ) १८६. एलथि गेलथि १८७. बितओने/ बितौने/ बितेने १८८. करबओलन्हि/ करबौलनि/ करेलखिन्ह/ करेलखिन १८९. करएलन्हि/ करेलनि १९०. आकि/ कि १९१. पहुँचि/ पहुँच १९२. बत्ती जराय/ जराए जरा (आगि लगा) १९३. से से’ १९४. हाँ मे हाँ (हाँमे हाँ विभक्त्तिमे हटा कए) १९५. फेल फैल १९६. फइल(spacious) फैल १९७. होयतन्हि/ होएतन्हि/ होएतनि/हेतनि/ हेतन्हि १९८. हाथ मटिआएब/ हाथ मटियाबय/हाथ मटियाएब १९९. फेका फेंका २००. देखाए देखा २०१. देखाबए २०२. सत्तरि सत्तर २०३. साहेब साहब २०४.गेलैन्ह/ गेलन्हि/ गेलनि २०५. हेबाक/ होएबाक २०६.केलो/ कएलहुँ/केलौं/ केलुँ २०७. किछु न किछु/ किछु ने किछु २०८.घुमेलहुँ/ घुमओलहुँ/ घुमेलौं २०९. एलाक/ अएलाक २१०. अः/ अह २११.लय/ लए (अर्थ-परिवर्त्तन) २१२.कनीक/ कनेक २१३.सबहक/ सभक २१४.मिलाऽ/ मिला २१५.कऽ/ क २१६.जाऽ/ जा २१७.आऽ/ आ २१८.भऽ /भ’ (’ फॉन्टक कमीक द्योतक) २१९.निअम/ नियम २२० .हेक्टेअर/ हेक्टेयर २२१.पहिल अक्षर ढ/ बादक/ बीचक ढ़ २२२.तहिं/तहिँ/ तञि/ तैं २२३.कहिं/ कहीं २२४.तँइ/ तैं / तइँ २२५.नँइ/ नइँ/ नञि/ नहि/नै २२६.है/ हए / एलीहेँ/ २२७.छञि/ छै/ छैक /छइ २२८.दृष्टिएँ/ दृष्टियेँ २२९.आ (come)/ आऽ(conjunction) २३०. आ (conjunction)/ आऽ(come) २३१.कुनो/ कोनो, कोना/केना २३२.गेलैन्ह-गेलन्हि-गेलनि २३३.हेबाक- होएबाक २३४.केलौँ- कएलौँ-कएलहुँ/केलौं २३५.किछु न किछ- किछु ने किछु २३६.केहेन- केहन २३७.आऽ (come)-आ (conjunction-and)/आ। आब'-आब' /आबह-आबह २३८. हएत-हैत २३९.घुमेलहुँ-घुमएलहुँ- घुमेलाें २४०.एलाक- अएलाक २४१.होनि- होइन/ होन्हि/ २४२.ओ-राम ओ श्यामक बीच(conjunction), ओऽ कहलक (he said)/ओ २४३.की हए/ कोसी अएली हए/ की है। की हइ २४४.दृष्टिएँ/ दृष्टियेँ २४५ .शामिल/ सामेल २४६.तैँ / तँए/ तञि/ तहिं २४७.जौं / ज्योँ/ जँ/ २४८.सभ/ सब २४९.सभक/ सबहक २५०.कहिं/ कहीं २५१.कुनो/ कोनो/ कोनहुँ/ २५२.फारकती भऽ गेल/ भए गेल/ भय गेल २५३.कोना/ केना/ कन्ना/कना २५४.अः/ अह २५५.जनै/ जनञ २५६.गेलनि/ गेलाह (अर्थ परिवर्तन) २५७.केलन्हि/ कएलन्हि/ केलनि/ २५८.लय/ लए/ लएह (अर्थ परिवर्तन) २५९.कनीक/ कनेक/कनी-मनी २६०.पठेलन्हि पठेलनि/ पठेलइन/ पपठओलन्हि/ पठबौलनि/ २६१.निअम/ नियम २६२.हेक्टेअर/ हेक्टेयर २६३.पहिल अक्षर रहने ढ/ बीचमे रहने ढ़ २६४.आकारान्तमे बिकारीक प्रयोग उचित नै/ अपोस्ट्रोफीक प्रयोग फान्टक तकनीकी न्यूनताक परिचायक ओकर बदला अवग्रह (बिकारी) क प्रयोग उचित २६५.केर (पद्यमे ग्राह्य) / -क/ कऽ/ के २६६.छैन्हि- छन्हि २६७.लगैए/ लगैये २६८.होएत/ हएत २६९.जाएत/ जएत/ २७०.आएत/ अएत/ आओत २७१ .खाएत/ खएत/ खैत २७२.पिअएबाक/ पिएबाक/पियेबाक २७३.शुरु/ शुरुह २७४.शुरुहे/ शुरुए २७५.अएताह/अओताह/ एताह/ औताह २७६.जाहि/ जाइ/ जइ/ जै/ २७७.जाइत/ जैतए/ जइतए २७८.आएल/ अएल २७९.कैक/ कएक २८०.आयल/ अएल/ आएल २८१. जाए/ जअए/ जए (लालति जाए लगलीह।) २८२. नुकएल/ नुकाएल २८३. कठुआएल/ कठुअएल २८४. ताहि/ तै/ तइ २८५. गायब/ गाएब/ गएब २८६. सकै/ सकए/ सकय २८७.सेरा/सरा/ सराए (भात सरा गेल) २८८.कहैत रही/देखैत रही/ कहैत छलौं/ कहै छलौं- अहिना चलैत/ पढ़ैत (पढ़ै-पढ़ैत अर्थ कखनो काल परिवर्तित) - आर बुझै/ बुझैत (बुझै/ बुझै छी, मुदा बुझैत-बुझैत)/ सकैत/ सकै। करैत/ करै। दै/ दैत। छैक/ छै। बचलै/ बचलैक। रखबा/ रखबाक । बिनु/ बिन। रातिक/ रातुक बुझै आ बुझैत केर अपन-अपन जगहपर प्रयोग समीचीन अछि। बुझैत-बुझैत आब बुझलिऐ। हमहूँ बुझै छी। २८९. दुआरे/ द्वारे २९०.भेटि/ भेट/ भेँट २९१. खन/ खीन/ खुना (भोर खन/ भोर खीन) २९२.तक/ धरि २९३.गऽ/ गै (meaning different-जनबै गऽ) २९४.सऽ/ सँ (मुदा दऽ, लऽ) २९५.त्त्व,(तीन अक्षरक मेल बदला पुनरुक्तिक एक आ एकटा दोसरक उपयोग) आदिक बदला त्व आदि। महत्त्व/ महत्व/ कर्ता/ कर्त्ता आदिमे त्त संयुक्तक कोनो आवश्यकता मैथिलीमे नै अछि। वक्तव्य २९६.बेसी/ बेशी २९७.बाला/वाला बला/ वला (रहैबला) २९८ .वाली/ (बदलैवाली) २९९.वार्त्ता/ वार्ता ३००. अन्तर्राष्ट्रिय/ अन्तर्राष्ट्रीय ३०१. लेमए/ लेबए ३०२.लमछुरका, नमछुरका ३०२.लागै/ लगै ( भेटैत/ भेटै) ३०३.लागल/ लगल ३०४.हबा/ हवा ३०५.राखलक/ रखलक ३०६.आ (come)/ आ (and) ३०७. पश्चाताप/ पश्चात्ताप ३०८. ऽ केर व्यवहार शब्दक अन्तमे मात्र, यथासंभव बीचमे नै। ३०९.कहैत/ कहै ३१०. रहए (छल)/ रहै (छलै) (meaning different) ३११.तागति/ ताकति ३१२.खराप/ खराब ३१३.बोइन/ बोनि/ बोइनि ३१४.जाठि/ जाइठ ३१५.कागज/ कागच/ कागत ३१६.गिरै (meaning different- swallow)/ गिरए (खसए) ३१७.राष्ट्रिय/ राष्ट्रीय DATE-LIST (year- 2012-13) (१४२० फसली साल) Marriage Days: Nov.2012- 25, 26, 28, 29, 30 Dec.2012- 5,9, 10, 13, 14 January 2013- 16, 17, 18, 23, 24, 31 Feb.2013- 1, 3, 4, 6, 8, 10, 14, 15, 18, 20, 24, 25 April 2013- 21, 22, 24, 26, 29 May 2013- 1,2,3,5,6,9,12,13,17,19,20,22,23,24,26,27,29,30,31 June 2013- 2,3 July 2013- 11, 14, 15 Upanayana Days: January 2013- 16 February 2013- 14, 15, 20, 21 April 2013- 22 May 2013- 20, 21 Dviragaman Din: November 2012- 25, 26, 28, 29 December 2012- 2, 3, 14 February 2013- 14, 15, 18, 20, 21, 22, 27, 28 March 2013- 1 April 2013- 18, 22, 24, 26, 28, 29 May 2013- 12, 13 Mundan Din: November 2012- 26, 30 December 2012- 3 January 2013- 18, 24 February 2013- 1, 14, 15, 20, 28 April 2013- 17 May 2013- 13, 23, 29 June 2013- 13, 19, 26, 27, 28 July 2013- 10, 15 FESTIVALS OF MITHILA (2012-13) Mauna Panchami-08 July Madhushravani- 22 July Nag Panchami- 24 July Raksha Bandhan- 02 Aug Krishnastami- 10 August Kushi Amavasya / Somvari Vrat- 17 August Vishwakarma Pooja- 17 September Hartalika Teej- 18 September ChauthChandra-19 September Karma Dharma Ekadashi-26 September Indra Pooja Aarambh- 27 September Anant Caturdashi- 29 Sep Agastyarghadaan- 30 Sep Pitri Paksha begins- 30 Sep Jimootavahan Vrata/ Jitia-08 October Matri Navami- 09 October SomvatiAmavasya Vrat- 15 October Kalashsthapan- 16 October Belnauti- 20 October Patrika Pravesh- 21 October Mahastami- 22 October Maha Navami - 23 October Vijaya Dashami- 24 October Kojagara- 29 Oct Dhanteras- 11 November Diyabati, shyama pooja-13 November Annakoota/ Govardhana Pooja-14 November Bhratridwitiya/ Chitragupta Pooja- 15 November Chhathi -19 November Devotthan Ekadashi- 24 November ravivratarambh- 25 November Navanna parvan- 25 November KartikPoornima- Sama Visarjan- 28 November Vivaha Panchmi- 17 December Makara/ Teela Sankranti-14 Jan Naraknivaran chaturdashi- 08 February Basant Panchami/ Saraswati Pooja- 15 February Achla Saptmi- 17 February Mahashivaratri-10 March Holikadahan-Fagua-26 March Holi- 28 March Varuni Trayodashi-07 April Chaiti navaratrarambh- 11 April Jurishital-15 April Chaiti Chhathi vrata-16 April Ram Navami- 19 April Ravi Brat Ant- 12 May Akshaya Tritiya-13 May Janaki Navami- 19 May Vat Savitri-barasait- 08 June Ganga Dashhara-18 June Somavati Amavasya Vrata- 08 July Jagannath Rath Yatra- 10 July Hari Sayan Ekadashi- 19 July Aashadhi Guru Poornima-22 Jul VIDEHA ARCHIVE १.विदेह ई-पत्रिकाक सभटा पुरान अंक ब्रेल, तिरहुता आ देवनागरी रूपमे Videha e journal's all old issues in Braille Tirhuta and Devanagari versions विदेह ई-पत्रिकाक पहिल ५० अंक
विदेह ई-पत्रिकाक ५०म सँ आगाँक अंक २.मैथिली पोथी डाउनलोड Maithili Books Download ३.मैथिली ऑडियो संकलन Maithili Audio Downloads ४.मैथिली वीडियोक संकलन Maithili Videos ५.मिथिला चित्रकला/ आधुनिक चित्रकला आ चित्र Mithila Painting/ Modern Art and Photos "विदेह"क एहि सभ सहयोगी लिंकपर सेहो एक बेर जाउ। ६.विदेह मैथिली क्विज : http://videhaquiz.blogspot.com/ ७.विदेह मैथिली जालवृत्त एग्रीगेटर : http://videha-aggregator.blogspot.com/ ८.विदेह मैथिली साहित्य अंग्रेजीमे अनूदित http://madhubani-art.blogspot.com/ ९.विदेहक पूर्व-रूप "भालसरिक गाछ" : http://gajendrathakur.blogspot.com/ १०.विदेह इंडेक्स : http://videha123.blogspot.com/ ११.विदेह फाइल : http://videha123.wordpress.com/ १२. विदेह: सदेह : पहिल तिरहुता (मिथिला़क्षर) जालवृत्त (ब्लॉग) http://videha-sadeha.blogspot.com/ १३. विदेह:ब्रेल: मैथिली ब्रेलमे: पहिल बेर विदेह द्वारा http://videha-braille.blogspot.com/ १४.VIDEHA IST MAITHILI FORTNIGHTLY EJOURNAL ARCHIVE http://videha-archive.blogspot.com/ १५. विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका मैथिली पोथीक आर्काइव http://videha-pothi.blogspot.com/ १६. विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका ऑडियो आर्काइव http://videha-audio.blogspot.com/ १७. विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका वीडियो आर्काइव http://videha-video.blogspot.com/ १८. विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका मिथिला चित्रकला, आधुनिक कला आ चित्रकला http://videha-paintings-photos.blogspot.com/ १९. मैथिल आर मिथिला (मैथिलीक सभसँ लोकप्रिय जालवृत्त) http://maithilaurmithila.blogspot.com/ २०.श्रुति प्रकाशन http://www.shruti-publication.com/ २१.http://groups.google.com/group/videha VIDEHA केर सदस्यता लिअ Top of Form Bottom of Form ईमेल : एहि समूहपर जाउ २२.http://groups.yahoo.com/group/VIDEHA/ Top of Form Subscribe to VIDEHA Powered by us.groups.yahoo.com Bottom of Form २३.गजेन्द्र ठाकुर इडेक्स http://gajendrathakur123.blogspot.com २४. नेना भुटका http://mangan-khabas.blogspot.com/ २५.विदेह रेडियो:मैथिली कथा-कविता आदिक पहिल पोडकास्ट साइट http://videha123radio.wordpress.com/ २६.Videha Radio २७. Join official Videha facebook group. २८. विदेह मैथिली नाट्य उत्सव http://maithili-drama.blogspot.com/ २९.समदिया http://esamaad.blogspot.com/ ३०. मैथिली फिल्म्स http://maithilifilms.blogspot.com/ ३१.अनचिन्हार आखर http://anchinharakharkolkata.blogspot.com/ ३२. मैथिली हाइकू http://maithili-haiku.blogspot.com/ ३३. मानक मैथिली http://manak-maithili.blogspot.com/ ३४. विहनि कथा http://vihanikatha.blogspot.in/ ३५. मैथिली कविता http://maithili-kavita.blogspot.in/ ३६. मैथिली कथा http://maithili-katha.blogspot.in/ ३७.मैथिली समालोचना http://maithili-samalochna.blogspot.in/ महत्त्वपूर्ण सूचना:(१) 'विदेह' द्वारा धारावाहिक रूपे ई-प्रकाशित कएल गेल गजेन्द्र ठाकुरक निबन्ध-प्रबन्ध-समीक्षा, उपन्यास (सहस्रबाढ़नि) , पद्य-संग्रह (सहस्राब्दीक चौपड़पर), कथा-गल्प (गल्प-गुच्छ), नाटक(संकर्षण), महाकाव्य (त्वञ्चाहञ्च आ असञ्जाति मन) आ बाल-किशोर साहित्य विदेहमे संपूर्ण ई-प्रकाशनक बाद प्रिंट फॉर्ममे। कुरुक्षेत्रम्–अन्तर्मनक खण्ड-१ सँ ७ Combined ISBN No.978-81-907729-7-6 विवरण एहि पृष्ठपर नीचाँमे आ प्रकाशकक साइट http://www.shruti-publication.com/ पर । महत्त्वपूर्ण सूचना (२):सूचना: विदेहक मैथिली-अंग्रेजी आ अंग्रेजी मैथिली कोष (इंटरनेटपर पहिल बेर सर्च-डिक्शनरी) एम.एस. एस.क्यू.एल. सर्वर आधारित -Based on ms-sql server Maithili-English and English-Maithili Dictionary. विदेहक भाषापाक- रचनालेखन स्तंभमे। कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक- गजेन्द्र ठाकुर गजेन्द्र ठाकुरक निबन्ध-प्रबन्ध-समीक्षा, उपन्यास (सहस्रबाढ़नि) , पद्य-संग्रह (सहस्राब्दीक चौपड़पर), कथा-गल्प (गल्प गुच्छ), नाटक(संकर्षण), महाकाव्य (त्वञ्चाहञ्च आ असञ्जाति मन) आ बालमंडली-किशोरजगत विदेहमे संपूर्ण ई-प्रकाशनक बाद प्रिंट फॉर्ममे। कुरुक्षेत्रम्–अन्तर्मनक, खण्ड-१ सँ ७ Ist edition 2009 of Gajendra Thakur’s KuruKshetram-Antarmanak (Vol. I to VII)- essay-paper-criticism, novel, poems, story, play, epics and Children-grown-ups literature in single binding: Language:Maithili ६९२ पृष्ठ : मूल्य भा. रु. 100/-(for individual buyers inside india) (add courier charges Rs.50/-per copy for Delhi/NCR and Rs.100/- per copy for outside Delhi)
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Details for purchase available at print-version publishers's site website: http://www.shruti-publication.com/ or you may write to e-mail:shruti.publication@shruti-publication.com विदेह: सदेह : १: २: ३: ४ तिरहुता : देवनागरी "विदेह" क, प्रिंट संस्करण :विदेह-ई-पत्रिका (http://www.videha.co.in/) क चुनल रचना सम्मिलित। विदेह:सदेह:१: २: ३: ४ सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। Details for purchase available at print-version publishers's site http://www.shruti-publication.com or you may write to shruti.publication@shruti-publication.com २. संदेश- [ विदेह ई-पत्रिका, विदेह:सदेह मिथिलाक्षर आ देवनागरी आ गजेन्द्र ठाकुरक सात खण्डक- निबन्ध-प्रबन्ध-समीक्षा,उपन्यास (सहस्रबाढ़नि) , पद्य-संग्रह (सहस्राब्दीक चौपड़पर), कथा-गल्प (गल्प गुच्छ), नाटक (संकर्षण), महाकाव्य (त्वञ्चाहञ्च आ असञ्जाति मन) आ बाल-मंडली-किशोर जगत- संग्रह कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक मादेँ। ] १.श्री गोविन्द झा- विदेहकेँ तरंगजालपर उतारि विश्वभरिमे मातृभाषा मैथिलीक लहरि जगाओल, खेद जे अपनेक एहि महाभियानमे हम एखन धरि संग नहि दए सकलहुँ। सुनैत छी अपनेकेँ सुझाओ आ रचनात्मक आलोचना प्रिय लगैत अछि तेँ किछु लिखक मोन भेल। हमर सहायता आ सहयोग अपनेकेँ सदा उपलब्ध रहत। २.श्री रमानन्द रेणु- मैथिलीमे ई-पत्रिका पाक्षिक रूपेँ चला कऽ जे अपन मातृभाषाक प्रचार कऽ रहल छी, से धन्यवाद । आगाँ अपनेक समस्त मैथिलीक कार्यक हेतु हम हृदयसँ शुभकामना दऽ रहल छी। ३.श्री विद्यानाथ झा "विदित"- संचार आ प्रौद्योगिकीक एहि प्रतिस्पर्धी ग्लोबल युगमे अपन महिमामय "विदेह"केँ अपना देहमे प्रकट देखि जतबा प्रसन्नता आ संतोष भेल, तकरा कोनो उपलब्ध "मीटर"सँ नहि नापल जा सकैछ? ..एकर ऐतिहासिक मूल्यांकन आ सांस्कृतिक प्रतिफलन एहि शताब्दीक अंत धरि लोकक नजरिमे आश्चर्यजनक रूपसँ प्रकट हैत। ४. प्रो. उदय नारायण सिंह "नचिकेता"- जे काज अहाँ कए रहल छी तकर चरचा एक दिन मैथिली भाषाक इतिहासमे होएत। आनन्द भए रहल अछि, ई जानि कए जे एतेक गोट मैथिल "विदेह" ई जर्नलकेँ पढ़ि रहल छथि।...विदेहक चालीसम अंक पुरबाक लेल अभिनन्दन। ५. डॉ. गंगेश गुंजन- एहि विदेह-कर्ममे लागि रहल अहाँक सम्वेदनशील मन, मैथिलीक प्रति समर्पित मेहनतिक अमृत रंग, इतिहास मे एक टा विशिष्ट फराक अध्याय आरंभ करत, हमरा विश्वास अछि। अशेष शुभकामना आ बधाइक सङ्ग, सस्नेह...अहाँक पोथी कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक प्रथम दृष्टया बहुत भव्य तथा उपयोगी बुझाइछ। मैथिलीमे तँ अपना स्वरूपक प्रायः ई पहिले एहन भव्य अवतारक पोथी थिक। हर्षपूर्ण हमर हार्दिक बधाई स्वीकार करी। ६. श्री रामाश्रय झा "रामरंग"(आब स्वर्गीय)- "अपना" मिथिलासँ संबंधित...विषय वस्तुसँ अवगत भेलहुँ।...शेष सभ कुशल अछि। ७. श्री ब्रजेन्द्र त्रिपाठी- साहित्य अकादमी- इंटरनेट पर प्रथम मैथिली पाक्षिक पत्रिका "विदेह" केर लेल बधाई आ शुभकामना स्वीकार करू। ८. श्री प्रफुल्लकुमार सिंह "मौन"- प्रथम मैथिली पाक्षिक पत्रिका "विदेह" क प्रकाशनक समाचार जानि कनेक चकित मुदा बेसी आह्लादित भेलहुँ। कालचक्रकेँ पकड़ि जाहि दूरदृष्टिक परिचय देलहुँ, ओहि लेल हमर मंगलकामना। ९.डॉ. शिवप्रसाद यादव- ई जानि अपार हर्ष भए रहल अछि, जे नव सूचना-क्रान्तिक क्षेत्रमे मैथिली पत्रकारिताकेँ प्रवेश दिअएबाक साहसिक कदम उठाओल अछि। पत्रकारितामे एहि प्रकारक नव प्रयोगक हम स्वागत करैत छी, संगहि "विदेह"क सफलताक शुभकामना। १०. श्री आद्याचरण झा- कोनो पत्र-पत्रिकाक प्रकाशन- ताहूमे मैथिली पत्रिकाक प्रकाशनमे के कतेक सहयोग करताह- ई तऽ भविष्य कहत। ई हमर ८८ वर्षमे ७५ वर्षक अनुभव रहल। एतेक पैघ महान यज्ञमे हमर श्रद्धापूर्ण आहुति प्राप्त होयत- यावत ठीक-ठाक छी/ रहब। ११. श्री विजय ठाकुर- मिशिगन विश्वविद्यालय- "विदेह" पत्रिकाक अंक देखलहुँ, सम्पूर्ण टीम बधाईक पात्र अछि। पत्रिकाक मंगल भविष्य हेतु हमर शुभकामना स्वीकार कएल जाओ। १२. श्री सुभाषचन्द्र यादव- ई-पत्रिका "विदेह" क बारेमे जानि प्रसन्नता भेल। ’विदेह’ निरन्तर पल्लवित-पुष्पित हो आ चतुर्दिक अपन सुगंध पसारय से कामना अछि। १३. श्री मैथिलीपुत्र प्रदीप- ई-पत्रिका "विदेह" केर सफलताक भगवतीसँ कामना। हमर पूर्ण सहयोग रहत। १४. डॉ. श्री भीमनाथ झा- "विदेह" इन्टरनेट पर अछि तेँ "विदेह" नाम उचित आर कतेक रूपेँ एकर विवरण भए सकैत अछि। आइ-काल्हि मोनमे उद्वेग रहैत अछि, मुदा शीघ्र पूर्ण सहयोग देब।कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक देखि अति प्रसन्नता भेल। मैथिलीक लेल ई घटना छी। १५. श्री रामभरोस कापड़ि "भ्रमर"- जनकपुरधाम- "विदेह" ऑनलाइन देखि रहल छी। मैथिलीकेँ अन्तर्राष्ट्रीय जगतमे पहुँचेलहुँ तकरा लेल हार्दिक बधाई। मिथिला रत्न सभक संकलन अपूर्व। नेपालोक सहयोग भेटत, से विश्वास करी। १६. श्री राजनन्दन लालदास- "विदेह" ई-पत्रिकाक माध्यमसँ बड़ नीक काज कए रहल छी, नातिक अहिठाम देखलहुँ। एकर वार्षिक अंक जखन प्रिंट निकालब तँ हमरा पठायब। कलकत्तामे बहुत गोटेकेँ हम साइटक पता लिखाए देने छियन्हि। मोन तँ होइत अछि जे दिल्ली आबि कए आशीर्वाद दैतहुँ, मुदा उमर आब बेशी भए गेल। शुभकामना देश-विदेशक मैथिलकेँ जोड़बाक लेल।.. उत्कृष्ट प्रकाशन कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक लेल बधाइ। अद्भुत काज कएल अछि, नीक प्रस्तुति अछि सात खण्डमे। मुदा अहाँक सेवा आ से निःस्वार्थ तखन बूझल जाइत जँ अहाँ द्वारा प्रकाशित पोथी सभपर दाम लिखल नहि रहितैक। ओहिना सभकेँ विलहि देल जइतैक। (स्पष्टीकरण- श्रीमान्, अहाँक सूचनार्थ विदेह द्वारा ई-प्रकाशित कएल सभटा सामग्री आर्काइवमे https://sites.google.com/a/videha.com/videha-pothi/ पर बिना मूल्यक डाउनलोड लेल उपलब्ध छै आ भविष्यमे सेहो रहतैक। एहि आर्काइवकेँ जे कियो प्रकाशक अनुमति लऽ कऽ प्रिंट रूपमे प्रकाशित कएने छथि आ तकर ओ दाम रखने छथि ताहिपर हमर कोनो नियंत्रण नहि अछि।- गजेन्द्र ठाकुर)... अहाँक प्रति अशेष शुभकामनाक संग। १७. डॉ. प्रेमशंकर सिंह- अहाँ मैथिलीमे इंटरनेटपर पहिल पत्रिका "विदेह" प्रकाशित कए अपन अद्भुत मातृभाषानुरागक परिचय देल अछि, अहाँक निःस्वार्थ मातृभाषानुरागसँ प्रेरित छी, एकर निमित्त जे हमर सेवाक प्रयोजन हो, तँ सूचित करी। इंटरनेटपर आद्योपांत पत्रिका देखल, मन प्रफुल्लित भऽ गेल। १८.श्रीमती शेफालिका वर्मा- विदेह ई-पत्रिका देखि मोन उल्लाससँ भरि गेल। विज्ञान कतेक प्रगति कऽ रहल अछि...अहाँ सभ अनन्त आकाशकेँ भेदि दियौ, समस्त विस्तारक रहस्यकेँ तार-तार कऽ दियौक...। अपनेक अद्भुत पुस्तक कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक विषयवस्तुक दृष्टिसँ गागरमे सागर अछि। बधाई। १९.श्री हेतुकर झा, पटना-जाहि समर्पण भावसँ अपने मिथिला-मैथिलीक सेवामे तत्पर छी से स्तुत्य अछि। देशक राजधानीसँ भय रहल मैथिलीक शंखनाद मिथिलाक गाम-गाममे मैथिली चेतनाक विकास अवश्य करत। २०. श्री योगानन्द झा, कबिलपुर, लहेरियासराय- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पोथीकेँ निकटसँ देखबाक अवसर भेटल अछि आ मैथिली जगतक एकटा उद्भट ओ समसामयिक दृष्टिसम्पन्न हस्ताक्षरक कलमबन्द परिचयसँ आह्लादित छी। "विदेह"क देवनागरी सँस्करण पटनामे रु. 80/- मे उपलब्ध भऽ सकल जे विभिन्न लेखक लोकनिक छायाचित्र, परिचय पत्रक ओ रचनावलीक सम्यक प्रकाशनसँ ऐतिहासिक कहल जा सकैछ। २१. श्री किशोरीकान्त मिश्र- कोलकाता- जय मैथिली, विदेहमे बहुत रास कविता, कथा, रिपोर्ट आदिक सचित्र संग्रह देखि आ आर अधिक प्रसन्नता मिथिलाक्षर देखि- बधाई स्वीकार कएल जाओ। २२.श्री जीवकान्त- विदेहक मुद्रित अंक पढ़ल- अद्भुत मेहनति। चाबस-चाबस। किछु समालोचना मरखाह..मुदा सत्य। २३. श्री भालचन्द्र झा- अपनेक कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक देखि बुझाएल जेना हम अपने छपलहुँ अछि। एकर विशालकाय आकृति अपनेक सर्वसमावेशताक परिचायक अछि। अपनेक रचना सामर्थ्यमे उत्तरोत्तर वृद्धि हो, एहि शुभकामनाक संग हार्दिक बधाई। २४.श्रीमती डॉ नीता झा- अहाँक कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़लहुँ। ज्योतिरीश्वर शब्दावली, कृषि मत्स्य शब्दावली आ सीत बसन्त आ सभ कथा, कविता, उपन्यास, बाल-किशोर साहित्य सभ उत्तम छल। मैथिलीक उत्तरोत्तर विकासक लक्ष्य दृष्टिगोचर होइत अछि। २५.श्री मायानन्द मिश्र- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक मे हमर उपन्यास स्त्रीधनक जे विरोध कएल गेल अछि तकर हम विरोध करैत छी।... कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पोथीक लेल शुभकामना।(श्रीमान् समालोचनाकेँ विरोधक रूपमे नहि लेल जाए।-गजेन्द्र ठाकुर) २६.श्री महेन्द्र हजारी- सम्पादक श्रीमिथिला- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़ि मोन हर्षित भऽ गेल..एखन पूरा पढ़यमे बहुत समय लागत, मुदा जतेक पढ़लहुँ से आह्लादित कएलक। २७.श्री केदारनाथ चौधरी- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक अद्भुत लागल, मैथिली साहित्य लेल ई पोथी एकटा प्रतिमान बनत। २८.श्री सत्यानन्द पाठक- विदेहक हम नियमित पाठक छी। ओकर स्वरूपक प्रशंसक छलहुँ। एम्हर अहाँक लिखल - कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक देखलहुँ। मोन आह्लादित भऽ उठल। कोनो रचना तरा-उपरी। २९.श्रीमती रमा झा-सम्पादक मिथिला दर्पण। कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक प्रिंट फॉर्म पढ़ि आ एकर गुणवत्ता देखि मोन प्रसन्न भऽ गेल, अद्भुत शब्द एकरा लेल प्रयुक्त कऽ रहल छी। विदेहक उत्तरोत्तर प्रगतिक शुभकामना। ३०.श्री नरेन्द्र झा, पटना- विदेह नियमित देखैत रहैत छी। मैथिली लेल अद्भुत काज कऽ रहल छी। ३१.श्री रामलोचन ठाकुर- कोलकाता- मिथिलाक्षर विदेह देखि मोन प्रसन्नतासँ भरि उठल, अंकक विशाल परिदृश्य आस्वस्तकारी अछि। ३२.श्री तारानन्द वियोगी- विदेह आ कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक देखि चकबिदोर लागि गेल। आश्चर्य। शुभकामना आ बधाई। ३३.श्रीमती प्रेमलता मिश्र “प्रेम”- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़लहुँ। सभ रचना उच्चकोटिक लागल। बधाई। ३४.श्री कीर्तिनारायण मिश्र- बेगूसराय- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक बड्ड नीक लागल, आगांक सभ काज लेल बधाई। ३५.श्री महाप्रकाश-सहरसा- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक नीक लागल, विशालकाय संगहि उत्तमकोटिक। ३६.श्री अग्निपुष्प- मिथिलाक्षर आ देवाक्षर विदेह पढ़ल..ई प्रथम तँ अछि एकरा प्रशंसामे मुदा हम एकरा दुस्साहसिक कहब। मिथिला चित्रकलाक स्तम्भकेँ मुदा अगिला अंकमे आर विस्तृत बनाऊ। ३७.श्री मंजर सुलेमान-दरभंगा- विदेहक जतेक प्रशंसा कएल जाए कम होएत। सभ चीज उत्तम। ३८.श्रीमती प्रोफेसर वीणा ठाकुर- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक उत्तम, पठनीय, विचारनीय। जे क्यो देखैत छथि पोथी प्राप्त करबाक उपाय पुछैत छथि। शुभकामना। ३९.श्री छत्रानन्द सिंह झा- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़लहुँ, बड्ड नीक सभ तरहेँ। ४०.श्री ताराकान्त झा- सम्पादक मैथिली दैनिक मिथिला समाद- विदेह तँ कन्टेन्ट प्रोवाइडरक काज कऽ रहल अछि। कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक अद्भुत लागल। ४१.डॉ रवीन्द्र कुमार चौधरी- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक बहुत नीक, बहुत मेहनतिक परिणाम। बधाई। ४२.श्री अमरनाथ- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक आ विदेह दुनू स्मरणीय घटना अछि, मैथिली साहित्य मध्य। ४३.श्री पंचानन मिश्र- विदेहक वैविध्य आ निरन्तरता प्रभावित करैत अछि, शुभकामना। ४४.श्री केदार कानन- कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक लेल अनेक धन्यवाद, शुभकामना आ बधाइ स्वीकार करी। आ नचिकेताक भूमिका पढ़लहुँ। शुरूमे तँ लागल जेना कोनो उपन्यास अहाँ द्वारा सृजित भेल अछि मुदा पोथी उनटौला पर ज्ञात भेल जे एहिमे तँ सभ विधा समाहित अछि। ४५.श्री धनाकर ठाकुर- अहाँ नीक काज कऽ रहल छी। फोटो गैलरीमे चित्र एहि शताब्दीक जन्मतिथिक अनुसार रहैत तऽ नीक। ४६.श्री आशीष झा- अहाँक पुस्तकक संबंधमे एतबा लिखबा सँ अपना कए नहि रोकि सकलहुँ जे ई किताब मात्र किताब नहि थीक, ई एकटा उम्मीद छी जे मैथिली अहाँ सन पुत्रक सेवा सँ निरंतर समृद्ध होइत चिरजीवन कए प्राप्त करत। ४७.श्री शम्भु कुमार सिंह- विदेहक तत्परता आ क्रियाशीलता देखि आह्लादित भऽ रहल छी। निश्चितरूपेण कहल जा सकैछ जे समकालीन मैथिली पत्रिकाक इतिहासमे विदेहक नाम स्वर्णाक्षरमे लिखल जाएत। ओहि कुरुक्षेत्रक घटना सभ तँ अठारहे दिनमे खतम भऽ गेल रहए मुदा अहाँक कुरुक्षेत्रम् तँ अशेष अछि। ४८.डॉ. अजीत मिश्र- अपनेक प्रयासक कतबो प्रशंसा कएल जाए कमे होएतैक। मैथिली साहित्यमे अहाँ द्वारा कएल गेल काज युग-युगान्तर धरि पूजनीय रहत। ४९.श्री बीरेन्द्र मल्लिक- अहाँक कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक आ विदेह:सदेह पढ़ि अति प्रसन्नता भेल। अहाँक स्वास्थ्य ठीक रहए आ उत्साह बनल रहए से कामना। ५०.श्री कुमार राधारमण- अहाँक दिशा-निर्देशमे विदेह पहिल मैथिली ई-जर्नल देखि अति प्रसन्नता भेल। हमर शुभकामना। ५१.श्री फूलचन्द्र झा प्रवीण-विदेह:सदेह पढ़ने रही मुदा कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक देखि बढ़ाई देबा लेल बाध्य भऽ गेलहुँ। आब विश्वास भऽ गेल जे मैथिली नहि मरत। अशेष शुभकामना। ५२.श्री विभूति आनन्द- विदेह:सदेह देखि, ओकर विस्तार देखि अति प्रसन्नता भेल। ५३.श्री मानेश्वर मनुज-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक एकर भव्यता देखि अति प्रसन्नता भेल, एतेक विशाल ग्रन्थ मैथिलीमे आइ धरि नहि देखने रही। एहिना भविष्यमे काज करैत रही, शुभकामना। ५४.श्री विद्यानन्द झा- आइ.आइ.एम.कोलकाता- कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक विस्तार, छपाईक संग गुणवत्ता देखि अति प्रसन्नता भेल। अहाँक अनेक धन्यवाद; कतेक बरखसँ हम नेयारैत छलहुँ जे सभ पैघ शहरमे मैथिली लाइब्रेरीक स्थापना होअए, अहाँ ओकरा वेबपर कऽ रहल छी, अनेक धन्यवाद। ५५.श्री अरविन्द ठाकुर-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक मैथिली साहित्यमे कएल गेल एहि तरहक पहिल प्रयोग अछि, शुभकामना। ५६.श्री कुमार पवन-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक पढ़ि रहल छी। किछु लघुकथा पढ़ल अछि, बहुत मार्मिक छल। ५७. श्री प्रदीप बिहारी-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक देखल, बधाई। ५८.डॉ मणिकान्त ठाकुर-कैलिफोर्निया- अपन विलक्षण नियमित सेवासँ हमरा लोकनिक हृदयमे विदेह सदेह भऽ गेल अछि। ५९.श्री धीरेन्द्र प्रेमर्षि- अहाँक समस्त प्रयास सराहनीय। दुख होइत अछि जखन अहाँक प्रयासमे अपेक्षित सहयोग नहि कऽ पबैत छी। ६०.श्री देवशंकर नवीन- विदेहक निरन्तरता आ विशाल स्वरूप- विशाल पाठक वर्ग, एकरा ऐतिहासिक बनबैत अछि। ६१.श्री मोहन भारद्वाज- अहाँक समस्त कार्य देखल, बहुत नीक। एखन किछु परेशानीमे छी, मुदा शीघ्र सहयोग देब। ६२.श्री फजलुर रहमान हाशमी-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक मे एतेक मेहनतक लेल अहाँ साधुवादक अधिकारी छी। ६३.श्री लक्ष्मण झा "सागर"- मैथिलीमे चमत्कारिक रूपेँ अहाँक प्रवेश आह्लादकारी अछि।..अहाँकेँ एखन आर..दूर..बहुत दूरधरि जेबाक अछि। स्वस्थ आ प्रसन्न रही। ६४.श्री जगदीश प्रसाद मंडल-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक पढ़लहुँ । कथा सभ आ उपन्यास सहस्रबाढ़नि पूर्णरूपेँ पढ़ि गेल छी। गाम-घरक भौगोलिक विवरणक जे सूक्ष्म वर्णन सहस्रबाढ़निमे अछि, से चकित कएलक, एहि संग्रहक कथा-उपन्यास मैथिली लेखनमे विविधता अनलक अछि। समालोचना शास्त्रमे अहाँक दृष्टि वैयक्तिक नहि वरन् सामाजिक आ कल्याणकारी अछि, से प्रशंसनीय। ६५.श्री अशोक झा-अध्यक्ष मिथिला विकास परिषद- कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक लेल बधाई आ आगाँ लेल शुभकामना। ६६.श्री ठाकुर प्रसाद मुर्मु- अद्भुत प्रयास। धन्यवादक संग प्रार्थना जे अपन माटि-पानिकेँ ध्यानमे राखि अंकक समायोजन कएल जाए। नव अंक धरि प्रयास सराहनीय। विदेहकेँ बहुत-बहुत धन्यवाद जे एहेन सुन्दर-सुन्दर सचार (आलेख) लगा रहल छथि। सभटा ग्रहणीय- पठनीय। ६७.बुद्धिनाथ मिश्र- प्रिय गजेन्द्र जी,अहाँक सम्पादन मे प्रकाशित ‘विदेह’आ ‘कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक’ विलक्षण पत्रिका आ विलक्षण पोथी! की नहि अछि अहाँक सम्पादनमे? एहि प्रयत्न सँ मैथिली क विकास होयत,निस्संदेह। ६८.श्री बृखेश चन्द्र लाल- गजेन्द्रजी, अपनेक पुस्तक कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़ि मोन गदगद भय गेल , हृदयसँ अनुगृहित छी । हार्दिक शुभकामना । ६९.श्री परमेश्वर कापड़ि - श्री गजेन्द्र जी । कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़ि गदगद आ नेहाल भेलहुँ। ७०.श्री रवीन्द्रनाथ ठाकुर- विदेह पढ़ैत रहैत छी। धीरेन्द्र प्रेमर्षिक मैथिली गजलपर आलेख पढ़लहुँ। मैथिली गजल कत्तऽ सँ कत्तऽ चलि गेलैक आ ओ अपन आलेखमे मात्र अपन जानल-पहिचानल लोकक चर्च कएने छथि। जेना मैथिलीमे मठक परम्परा रहल अछि। (स्पष्टीकरण- श्रीमान्, प्रेमर्षि जी ओहि आलेखमे ई स्पष्ट लिखने छथि जे किनको नाम जे छुटि गेल छन्हि तँ से मात्र आलेखक लेखकक जानकारी नहि रहबाक द्वारे, एहिमे आन कोनो कारण नहि देखल जाय। अहाँसँ एहि विषयपर विस्तृत आलेख सादर आमंत्रित अछि।-सम्पादक) ७१.श्री मंत्रेश्वर झा- विदेह पढ़ल आ संगहि अहाँक मैगनम ओपस कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक सेहो, अति उत्तम। मैथिलीक लेल कएल जा रहल अहाँक समस्त कार्य अतुलनीय अछि। ७२. श्री हरेकृष्ण झा- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक मैथिलीमे अपन तरहक एकमात्र ग्रन्थ अछि, एहिमे लेखकक समग्र दृष्टि आ रचना कौशल देखबामे आएल जे लेखकक फील्डवर्कसँ जुड़ल रहबाक कारणसँ अछि। ७३.श्री सुकान्त सोम- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक मे समाजक इतिहास आ वर्तमानसँ अहाँक जुड़ाव बड्ड नीक लागल, अहाँ एहि क्षेत्रमे आर आगाँ काज करब से आशा अछि। ७४.प्रोफेसर मदन मिश्र- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक सन किताब मैथिलीमे पहिले अछि आ एतेक विशाल संग्रहपर शोध कएल जा सकैत अछि। भविष्यक लेल शुभकामना। ७५.प्रोफेसर कमला चौधरी- मैथिलीमे कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक सन पोथी आबए जे गुण आ रूप दुनूमे निस्सन होअए, से बहुत दिनसँ आकांक्षा छल, ओ आब जा कऽ पूर्ण भेल। पोथी एक हाथसँ दोसर हाथ घुमि रहल अछि, एहिना आगाँ सेहो अहाँसँ आशा अछि। ७६.श्री उदय चन्द्र झा "विनोद": गजेन्द्रजी, अहाँ जतेक काज कएलहुँ अछि से मैथिलीमे आइ धरि कियो नहि कएने छल। शुभकामना। अहाँकेँ एखन बहुत काज आर करबाक अछि। ७७.श्री कृष्ण कुमार कश्यप: गजेन्द्र ठाकुरजी, अहाँसँ भेँट एकटा स्मरणीय क्षण बनि गेल। अहाँ जतेक काज एहि बएसमे कऽ गेल छी ताहिसँ हजार गुणा आर बेशीक आशा अछि। ७८.श्री मणिकान्त दास: अहाँक मैथिलीक कार्यक प्रशंसा लेल शब्द नहि भेटैत अछि। अहाँक कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक सम्पूर्ण रूपेँ पढ़ि गेलहुँ। त्वञ्चाहञ्च बड्ड नीक लागल। ७९. श्री हीरेन्द्र कुमार झा- विदेह ई-पत्रिकाक सभ अंक ई-पत्रसँ भेटैत रहैत अछि। मैथिलीक ई-पत्रिका छैक एहि बातक गर्व होइत अछि। अहाँ आ अहाँक सभ सहयोगीकेँ हार्दिक शुभकामना। विदेह मैथिली साहित्य आन्दोलन (c)२००४-१२. सर्वाधिकार लेखकाधीन आ जतए लेखकक नाम नहि अछि ततए संपादकाधीन। विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। सह-सम्पादक: उमेश मंडल। सहायक सम्पादक: शिव कुमार झा आ मुन्नाजी (मनोज कुमार कर्ण)। भाषा-सम्पादन: नागेन्द्र कुमार झा आ पञ्जीकार विद्यानन्द झा। कला-सम्पादन: ज्योति झा चौधरी आ रश्मि रेखा सिन्हा। सम्पादक-शोध-अन्वेषण: डॉ. जया वर्मा आ डॉ. राजीव कुमार वर्मा। सम्पादक- नाटक-रंगमंच-चलचित्र- बेचन ठाकुर। सम्पादक- सूचना-सम्पर्क-समाद- पूनम मंडल आ प्रियंका झा। सम्पादक- अनुवाद विभाग- विनीत उत्पल। रचनाकार अपन मौलिक आ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि) ggajendra@videha.com केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx, .rtf वा .txt फॉर्मेटमे पठा सकैत छथि। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेताह, से आशा करैत छी। रचनाक अंतमे टाइप रहय, जे ई रचना मौलिक अछि, आ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। मेल प्राप्त होयबाक बाद यथासंभव शीघ्र ( सात दिनक भीतर) एकर प्रकाशनक अंकक सूचना देल जायत। ’विदेह' प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका अछि आ एहिमे मैथिली, संस्कृत आ अंग्रेजीमे मिथिला आ मैथिलीसँ संबंधित रचना प्रकाशित कएल जाइत अछि। एहि ई पत्रिकाकेँ श्रीमति लक्ष्मी ठाकुर द्वारा मासक ०१ आ १५ तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि। (c) 2004-12 सर्वाधिकार सुरक्षित। विदेहमे प्रकाशित सभटा रचना आ आर्काइवक सर्वाधिकार रचनाकार आ संग्रहकर्त्ताक लगमे छन्हि। रचनाक अनुवाद आ पुनः प्रकाशन किंवा आर्काइवक उपयोगक अधिकार किनबाक हेतु ggajendra@videha.co.in पर संपर्क करू। एहि साइटकेँ प्रीति झा ठाकुर, मधूलिका चौधरी आ रश्मि प्रिया द्वारा डिजाइन कएल गेल। सिद्धिरस्तु वि दे ह विदेह Videha বিদেহ www.videha.co.in www.videha.com विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका Videha Ist Maithili Fortnightly ejournal विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका'विदेह' १११ म अंक ०१ अगस्त २०१२ (वर्ष ५ मास ५६ अंक १११) मानुषीमिह संस्कृताम् ISSN 2229-547X VIDEHA वि दे ह विदेह Videha বিদেহ www.videha.co.in www.videha.com विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका Videha Ist Maithili Fortnightly ejournal विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका 'विदेह' १११ म अंक ०१ अगस्त २०१२ (वर्ष ५ मास ५६ अंक १११) मानुषीमिह संस्कृताम् ISSN 2229-547X VIDEHA
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