278 279 ISSN 2229-547X VIDEHA 'विदेह' ११२ म अंक १५ अगस्त २०१२ (वर्ष ५ मास ५६ अंक ११२) ऐ अंकमे अछि:- १. संपादकीय संदेश २. गद्य २.१.आशीष अनचिन्हार- काफिया २.२.जगदानन्द झा 'मनु'- दूटा विहनि कथा २.३.कैलास दास- अंगना सुखल घरमे पानि २.४.मुन्नी कामत- नाटक/ विहनि कथा २.५.बलराम साहु- विस्मित होइत हमर लोक संस्कृति २.६.जगदीश प्रसाद मण्डल- तीनटा विहनि कथा-एकटा लघुकथा २.७.१.नवेंदु कुमार झा- गंगा नदी पर पूलक माध्यम सँ बढ़त कारोबारक चालि/ महिषीमे आयोजित होयत सांस्कृतिक महोत्सव/ सर्वसम्मतिसँ सभापति आ उपाध्यक्षक निर्वाचित/ बिहारमे शिक्षाक लेल मदति करत विश्व बैंक २.अमित मिश्र- कतिआएल आखर २.८.शिव कुमार झा- कृष्णजन्म :: कथाकाव्यक सूत्रपात/ क्षणप्रभा ३. पद्य ३.१.१.बलराम साह २.मुन्नी कामत ३.२.विनीत उत्पल ३.३.१. जगदीश प्रसाद मण्डल२.मुकुन्द मयंक ३.४.१. राजदेव मण्डल २.ओमप्रकाश झा ३.५.१.शिव कुमार झा किशन कारीगर ३.६.१.मो. गुल हसन २.चंदन कुमार झा ३.७. १.कपिलेश्वर राउतमातृभाषा २.जगदानन्द झा 'मनु' -हम एहन किएक छी?/ कोना मदर डे हैप्पी ? ३.राजेश कुमार झा (कन्हैया)- देश भक्ति ३.८.१.जगदीश चन्द्र ठाकुर ‘अनिल’- की भेटल आ की हेरा गेल (आत्म गीत)- (आगाँ)२. नारायण झा- एखनहुँ जकड़ल छी/ एकता ४. मिथिला कला-संगीत १.राजनाथ मिश्र (चित्रमय मिथिला) २. उमेश मण्डल (मिथिलाक वनस्पति/ मिथिलाक जीव-जन्तु/ मिथिलाक जिनगी) ५.गद्य-पद्य भारती:१.प्रो. चम्पा शर्माक डोगरी कविताक हिन्दी अनुवाद: श्रीमती रजनी शर्मा आ मैथिली अनुवाद : डॉ. शंभु कुमार सिंह, २.कुमार संभव ‘भारद्वाज’ क हिन्दी कविताक मैथिली अनुवाद: मैथिली अनुवादक: डॉ. शंभु कुमार सिंह ६.बालानां कृते-अमित मिश्र- १५ अगस्तपर एकटा गजल आ एकटा कविता ७. भाषापाक रचना-लेखन -[मानक मैथिली], [विदेहक मैथिली-अंग्रेजी आ अंग्रेजी मैथिली कोष (इंटरनेटपर पहिल बेर सर्च-डिक्शनरी) एम.एस. एस.क्यू.एल. सर्वर आधारित -Based on ms-sql server Maithili-English and English-Maithili Dictionary.] 8.VIDEHA FOR NON RESIDENTS विदेह ई-पत्रिकाक सभटा पुरान अंक ( ब्रेल, तिरहुता आ देवनागरी मे ) पी.डी.एफ. डाउनलोडक लेल नीचाँक लिंकपर उपलब्ध अछि। All the old issues of Videha e journal ( in Braille, Tirhuta and Devanagari versions ) are available for pdf download at the following link. विदेह ई-पत्रिकाक सभटा पुरान अंक ब्रेल, तिरहुता आ देवनागरी रूपमे Videha e journal's all old issues in Braille Tirhuta and Devanagari versions विदेह ई-पत्रिकाक पहिल ५० अंक
विदेह ई-पत्रिकाक ५०म सँ आगाँक अंक ↑ विदेह आर.एस.एस.फीड एनीमेटरकेँ अपन साइट/ ब्लॉगपर लगाऊ। ब्लॉग "लेआउट" पर "एड गाडजेट" मे "फीड" सेलेक्ट कए "फीड यू.आर.एल." मे http://www.videha.co.in/index.xml टाइप केलासँ सेहो विदेह फीड प्राप्त कए सकैत छी। गूगल रीडरमे पढ़बा लेल http://reader.google.com/ पर जा कऽ Add a Subscription बटन क्लिक करू आ खाली स्थानमे http://www.videha.co.in/index.xml पेस्ट करू आ Add बटन दबाउ। Join official Videha facebook group. Join Videha googlegroups विदेह रेडियो:मैथिली कथा-कविता आदिक पहिल पोडकास्ट साइट http://videha123radio.wordpress.com/ मैथिली देवनागरी वा मिथिलाक्षरमे नहि देखि/ लिखि पाबि रहल छी, (cannot see/write Maithili in Devanagari/ Mithilakshara follow links below or contact at ggajendra@videha.com) तँ एहि हेतु नीचाँक लिंक सभ पर जाउ। संगहि विदेहक स्तंभ मैथिली भाषापाक/ रचना लेखनक नव-पुरान अंक पढ़ू। http://devanaagarii.net/ http://kaulonline.com/uninagari/ (एतए बॉक्समे ऑनलाइन देवनागरी टाइप करू, बॉक्ससँ कॉपी करू आ वर्ड डॉक्युमेन्टमे पेस्ट कए वर्ड फाइलकेँ सेव करू। विशेष जानकारीक लेल ggajendra@videha.com पर सम्पर्क करू।)(Use Firefox 4.0 (from WWW.MOZILLA.COM )/ Opera/ Safari/ Internet Explorer 8.0/ Flock 2.0/ Google Chrome for best view of 'Videha' Maithili e-journal at http://www.videha.co.in/ .) Go to the link below for download of old issues of VIDEHA Maithili e magazine in .pdf format and Maithili Audio/ Video/ Book/ paintings/ photo files. विदेहक पुरान अंक आ ऑडियो/ वीडियो/ पोथी/ चित्रकला/ फोटो सभक फाइल सभ (उच्चारण, बड़ सुख सार आ दूर्वाक्षत मंत्र सहित) डाउनलोड करबाक हेतु नीचाँक लिंक पर जाउ। VIDEHA ARCHIVE विदेह आर्काइव भारतीय डाक विभाग द्वारा जारी कवि, नाटककार आ धर्मशास्त्री विद्यापतिक स्टाम्प। भारत आ नेपालक माटिमे पसरल मिथिलाक धरती प्राचीन कालहिसँ महान पुरुष ओ महिला लोकनिक कर्मभमि रहल अछि। मिथिलाक महान पुरुष ओ महिला लोकनिक चित्र 'मिथिला रत्न' मे देखू। गौरी-शंकरक पालवंश कालक मूर्त्ति, एहिमे मिथिलाक्षरमे (१२०० वर्ष पूर्वक) अभिलेख अंकित अछि। मिथिलाक भारत आ नेपालक माटिमे पसरल एहि तरहक अन्यान्य प्राचीन आ नव स्थापत्य, चित्र, अभिलेख आ मूर्त्तिकलाक़ हेतु देखू 'मिथिलाक खोज' मिथिला, मैथिल आ मैथिलीसँ सम्बन्धित सूचना, सम्पर्क, अन्वेषण संगहि विदेहक सर्च-इंजन आ न्यूज सर्विस आ मिथिला, मैथिल आ मैथिलीसँ सम्बन्धित वेबसाइट सभक समग्र संकलनक लेल देखू "विदेह सूचना संपर्क अन्वेषण" विदेह जालवृत्तक डिसकसन फोरमपर जाउ। "मैथिल आर मिथिला" (मैथिलीक सभसँ लोकप्रिय जालवृत्त) पर जाउ। ऐ बेर मूल पुरस्कार(२०१२) [साहित्य अकादेमी, दिल्ली]क लेल अहाँक नजरिमे कोन मूल मैथिली पोथी उपयुक्त अछि ? Thank you for voting! श्री राजदेव मण्डलक “अम्बरा” (कविता-संग्रह) 12.82% श्री बेचन ठाकुरक “बेटीक अपमान आ छीनरदेवी”(दूटा नाटक) 9.69% श्रीमती आशा मिश्रक “उचाट” (उपन्यास) 6.55% श्रीमती पन्ना झाक “अनुभूति” (कथा संग्रह) 4.56% श्री उदय नारायण सिंह “नचिकेता”क “नो एण्ट्री:मा प्रविश (नाटक) 5.41% श्री सुभाष चन्द्र यादवक “बनैत बिगड़ैत” (कथा-संग्रह) 5.13% श्रीमती वीणा कर्ण- भावनाक अस्थिपंजर (कविता संग्रह) 5.41% श्रीमती शेफालिका वर्माक “किस्त-किस्त जीवन (आत्मकथा) 8.83% श्रीमती विभा रानीक “भाग रौ आ बलचन्दा” (दूटा नाटक) 6.84% श्री महाप्रकाश-संग समय के (कविता संग्रह) 5.41% श्री तारानन्द वियोगी- प्रलय रहस्य (कविता-संग्रह) 5.13% श्री महेन्द्र मलंगियाक “छुतहा घैल” (नाटक) 9.4% श्रीमती नीता झाक “देश-काल” (कथा-संग्रह) 5.7% श्री सियाराम झा "सरस"क थोड़े आगि थोड़े पानि (गजल संग्रह) 7.12% Other: 1.99% ऐ बेर युवा पुरस्कार(२०१२)[साहित्य अकादेमी, दिल्ली]क लेल अहाँक नजरिमे कोन कोन लेखक उपयुक्त छथि ? Thank you for voting! श्रीमती ज्योति सुनीत चौधरीक “अर्चिस” (कविता संग्रह) 28.21% श्री विनीत उत्पलक “हम पुछैत छी” (कविता संग्रह) 7.69% श्रीमती कामिनीक “समयसँ सम्वाद करैत”, (कविता संग्रह) 6.41% श्री प्रवीण काश्यपक “विषदन्ती वरमाल कालक रति” (कविता संग्रह) 4.49% श्री आशीष अनचिन्हारक "अनचिन्हार आखर"(गजल संग्रह) 18.59% श्री अरुणाभ सौरभक “एतबे टा नहि” (कविता संग्रह) 6.41% श्री दिलीप कुमार झा "लूटन"क जगले रहबै (कविता संग्रह) 7.69% श्री आदि यायावरक “भोथर पेंसिलसँ लिखल” (कथा संग्रह) 6.41% श्री उमेश मण्डलक “निश्तुकी” (कविता संग्रह) 12.18% Other: 1.92% ऐ बेर अनुवाद पुरस्कार (२०१३) [साहित्य अकादेमी, दिल्ली]क लेल अहाँक नजरिमे के उपयुक्त छथि? Thank you for voting! श्री नरेश कुमार विकल "ययाति" (मराठी उपन्यास श्री विष्णु सखाराम खाण्डेकर) 33.33% श्री महेन्द्र नारायण राम "कार्मेलीन" (कोंकणी उपन्यास श्री दामोदर मावजो) 12.75% श्री देवेन्द्र झा "अनुभव"(बांग्ला उपन्यास श्री दिव्येन्दु पालित) 12.75% श्रीमती मेनका मल्लिक "देश आ अन्य कविता सभ" (नेपालीक अनुवाद मूल- रेमिका थापा) 14.71% श्री कृष्ण कुमार कश्यप आ श्रीमती शशिबाला- मैथिली गीतगोविन्द ( जयदेव संस्कृत) 14.71% श्री रामनारायण सिंह "मलाहिन" (श्री तकषी शिवशंकर पिल्लैक मलयाली उपन्यास) 10.78% Other: 0.98% फेलो पुरस्कार-समग्र योगदान २०१२-१३ : समानान्तर साहित्य अकादेमी, दिल्ली Thank you for voting! श्री राजनन्दन लाल दास 54.12% श्री डॉ. अमरेन्द्र 23.53% श्री चन्द्रभानु सिंह 20% Other: 2.35% 1.संपादकीय १ ओइ समए िनर्मलीसँ समस्तीपुर एकटा गाड़ी चलैत रहै। बड़ी लाइनक कतौ पता नै। मुदा कम्युनिस्ट पार्टीक लड़ाइक एकटा मुद्दा ईहो रहै। कखनो उग्र तँ कखनो धीमी गतिसँ चलिते रहए। ओना पूबोसँ आ पच्छिमोसँ अबैबला गाड़ीक मेल सकरियेमे रहै मुदा से नै भेलै। ककरघटीमे मेल भेने पछबरिया गाड़ी पछुआ गेलनि। जइ कारणे सभाक आयोजन किछु बिलमि कऽ भेल। सकरी स्टेशनसँ थोड़बे हटि कऽ दछिनबारि भाग सभाक आयोजन भेल। गाड़ीसँ उतरि झंडा फहरबैत आ नारा लगबैत जूलूस बनि सभा स्थल पहुँचला। तइ संग झंझारपुरक इर्द-िगर्दक सेहो बहुत गोटे संग भऽ गेल रहथिन्ह। आयोजक रहथिन्ह चीनी मिलक श्रमिक-संगी। ओइ समए छबे मास मिल चलै। सालमे छह मास काज भेने छह मास बैसारीक समस्या रहबे करै। तइ संग किसानकेँ नहिये कुशियारक कटनी होइ आ नहिये समैपर दाम भेटै। सेहो सभ समस्या रहबे करै। कुशियारक एके किस्मक खेती होइ जे अगहनमे तैयार भऽ जाइ। मुदा नमहर इलाकामे खेती भेने, समैपर कटनी नै भऽ पबै। मिले कम। जतबे ओ पेड़ि सकत ततबे ने लेत। तहूमे चलाकी ओकर ई रहै जे शुरूमे तैयार भेने शुरूहेसँ नीक उत्पादन (चीनीक मात्रा) हुअए लगै आ जते पछुआइत तते रस गाढ़ भेने चीनीक मात्रा बढ़ि जाइ। पच्छिमसँ गाड़ी अबिते दरभंगा-जालेक विधायक खादिम हुसेन संगे भोगेन्द्र जी हाथमे चमड़ाक बैग लटकौने आगू-आगू आ दस पनरह गोटे पाछू-पाछू स्टेशनसँ सभा स्थल पहुँचला। हाफ शर्ट धोती पहिरने। पएरमे चमड़ाक जूता। मंचपर सँ नारा हुअए लागल। आधासँ बेसी मंच भरल। जे वक्ता बजैत रहथि ओ अपन विचार सम्पन्न केलनि। चीनी मिलक ट्रेड-युनियनक जे नेता रहथि ओ विस्तारसँ अपन समस्या रखलनि। जगदीश प्रसाद मण्डल सभ आगूसँ निच्चामे बैसल रहथि। भोगेन्द्रजी दिससँ बजैसँ पहिने आने सभा जकाँ प्रश्नक आग्रह भेल। किछु प्रश्न एबो कएल। अढ़ाइ-तीन घंटाक पछाति सभा विसर्जन भेल। सभामे भाग लेनिहार चारू कातक लोक चलि गेलाह, मुदा गाड़ीबला सभ स्टेशनपर आबि गेला। दुनू गाड़ी (निरमली आ जयनगरवाली) मे एक-डेढ़ घंटा देरी रहै। स्टेशनेपर भोगेन्द्रजीसँ पहिल भेँट आ सोझा-सोझी परिचए भेलन्हि। पहिले-पहिल भोगेन्द्रजी पार्लियामेंटक सदस्य भेल रहथि। जहिना १९४२ई.मे अंग्रेजक खिलाफ देशक जन-जनमे राजनीतिक नव चेतना जागल रहै तहिना १९६७ ई.क चुनावक पछाति सेहो भेल। बिहारोमे ओहन-ओहन राजनीतिक पार्टी बहुमतमे आएल जे अखन धरि (१९६७) विधान सभामे नै पहुँचल छल। जे पार्टी (काँग्रेस) अखन धरि बिहारोमे सत्ता-सीन रहल ओ नीक हारिक मुँह देखलक। ओना बिहारे मात्रमे नै आनो-आनो राज्यमे भेल। काँग्रेसो एक ग्रुप टूटि कऽ जनक्रांति दल कऽ कऽ पार्टीमे उतरल छल। काँग्रेस विरोधी दलक स्पष्ट बहुमत भेल छल। मुख्य पार्टीक रूपमे सोशलिस्ट पार्टी आ कमो-बेशी आनो-आनो पार्टी जीतल। िसर्फ विधान सभामे एहेन परिवर्त्तन भेल से बात नै, गाम-गामक जन-गणमे अपन हार-जीत सेहो महसूस भेल। बेवहारिक दौड़मे जे किछु मुदा भाषणक क्रम (सिद्धान्तिक) मे तँ जनताक सभ समस्या सामने ऐबे कएल। कारण जे सभ पार्टीक अपन-अपन विचार तँ लोकक बीच पहिनेसँ आबि रहल छल। ३४ टा सीट माने ३४ टा विधायक विधान सभामे आ पान-सातटा पार्लियामेंटोमे पहुँचलाह। आजादीक पछाति पहिल बेर आम जन सत्ता (शासन) दिस तकलक। ओना अखन धरि सरकारक अर्थ आम जन-गण कोटाक शासनक मटिया तेल आ जे मुख्य विन्दु कोटाक वस्तु बनल छल। डीलरक काजक लेखा-जोखा भरि शासन चलै छल। आन-आन समस्या तँ भाषणेक क्रममे छल। किछु-ने-किछु बाढ़ि-रौदी चलिते छल ओकरे बचबैक उपाए सरकारक कहब रहै छलै। नवका तूर (आजादीक करीब आ पछातिक) सेहो जुआन भेल। जइसँ आनो-आनो काज (सरकारक) सोझामे आएल। अखुनका मधुबनी जिला जे ओइ दिनमे अनुमंडल छल। एगारहटा एम.एल.ए. आ दूटा एम.पी.मे बँटाएल छल। छह-छहटा एम.एल.ए. पर एम.पी. तँ दरभंगाक जाले क्षेत्र सेहो मधुबनियेमे। ओना अखुनका मधुबनी जिलाक पछिमी भागमे जमीनक लड़ाई सेहो नीक जकाँ चलि रहल छल, मुदा मुख्य छल पछिमी कोसी नहर। मिथिलांचलमे कोसी, कमला, बागमतीक जे उपद्रव साले-साल चलि रहल छै आ क्षति पहुँचबै छै, भरिसक ततेटा बजटो ने कते सरकारकेँ होइ छै। खैर जे होउ! उनैस सए साठिक दशकक सवाल, समस्या आ लड़ाई कम्युनिस्ट पार्टीक मुख्य लड़ाई रहल जेकर दशा, मनुष्यक एक जिनगीक (६५-६६ बर्ख) उपरान्तो कि अछि, सबहक सोझेमे अछि। जौं योजना हिसाबसँ काज होइत तँ आजुक मिथिला ई मिथिला नै, ओ मिथिला बनि गेल रहैत जइ मिथिलामे ऋृषि-मुनि इच्छानुसार बर्खा बरिसबैत छलाह। एते पनिबिजलीक उत्पादन होइत जे घर-घरमे पहुँचल रहैत। जइसँ जापान जकाँ लघु-उद्योगक संग-संग भारियो उद्योग लागि गेल रहैत। मुदा आइ कि देखै छी। चुनाव होइत रहल, एमेले-एमपी बदलैत रहलाह। मुदा समस्या आइ ओहन विकराल रूप लऽ लेलक अछि जे आर्थिक तंगीक चलैत दिन-दहार लूट-पाट भऽ रहल अछि। जँ जापान, जर्मनी आ पड़ोसी देश चीनक जमीनक प्रति एकड़ उपजाक तुलना अपन मिथिलांचलक भूमिसँ करब तँ आश्चये नै बिसवासो नै हएत। कि मिथिलामे िसर्फ साढ़े तीन हाथक मनुखेटा अछि जेकरा मात्र पेटेटा छै आकि ओकरा दूटा हाथो-पएर छै आ मातृभूमियो छै। मिथिलांचलक ओ भूमि आ जलवायु अछि जे दुनियाँमे कतौ नै अछि। ने एते सुन्दर मुलाइम माटि अछि आ ने एहेन नीक पानि अछि आ ने एते रंगक मौसम अछि। मुदा आइ कि देखै छी? ने अखन धरि नेपाल सरकारसँ नीक जकाँ समझौता भेल अछि आ ने कोसीक पछिमी-पूर्बी नहरिक समुचित विकास। एक तँ योजनाक काज पछुआएल तइपर काजक एहेन पेंच-पाँच अछि जे एक नहर बनब कठिन अछि, दोसर बनलापर ओ समुचित काज कठिन अछि। पानि ऊपरसँ निच्चाँ असानीसँ अबैत अछि। मुदा निच्चासँ ऊपर असानीसँ जाएत? नै जाएत। जँ गहींरमे नहर खुनि देल जाए तँ ओकर पानि ऊपर केना जेतइ। हँ मशीनक माध्यमसँ जा सकैए, मुदा घरमे फुसि-फासि, सोम दिन बिआह। जइठाम त्रेता युगक तीन िवत्ता हर, आ सतयुगक बसहा बड़दसँ एखनो खेती होइए तइठाम केना मानल जाएत। स्टेशनपर प्लेटफार्म आबि सभ गोलिया कऽ बैसला। पल्था मारि भोगेन्द्रजी सभकेँ सेहो तहिना बैसए कहलखिन। गाड़ी पकड़ैले सबहक मन छनगल। पल्था मािर बैसैक अर्थ निश्चिन्ती। पहिने ओ सभकेँ नाओं-ठेकान पुछलखिन। नाओं-ठेकान पुछला उत्तर कहलखिन, कम्युनिस्ट अपन पार्टी छी, अपन पार्टीक ई अर्थ नै जे कोनो जाति-मजहबक होइ, मनुख-मात्रक पार्टी छी। हमरा सभकेँ ओहन समाज बनाएबाक अछि जइमे ने कियो भूखल रहत आ ने नांगट। सबहक बाल-बच्चा पढ़तै, सभकेँ रोग-व्याधिक इलाज हेतइ तखन ने सभ आगू मुँहेँ बढ़ैक कोशिश करता। अपना ऐठाम जे ऋृषि-मुनि भेलाह, ओ की केलनि? हुनका नै अपन सुखक चिन्ता छलनि। किअए ओ सभ अपन जिनगी गला लेलनि। ओ सभ बहुत केलनि। जँ से नै केलनि तँ एक कट्ठा जमीनमे जीवन बसर करैत केना छला। मुदा अपन धरोहरिकेँ जँ ताला लगा रखबै तँ के बूझत? लखनजी (डॉ. लक्ष्मण झा) मिथिलांचलक लेल जे जिनगी समर्पित केलनि से कि केलनि। के बूझत? तीन दिनक व्यस्त कार्यक्रममे हुनकर पाँचठामक प्रोग्राम रहनि, ओइ समाप्तिक तारीख बिता तेसर दिनक प्रोग्राम ओ जगदीश प्रसाद मण्डलजी केँ दऽ देलनि। जगदीश प्रसाद मण्डल- एकटा बायोग्राफी...गजेन्द्र ठाकुर द्वारा (अनुवर्तते...) ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। गजेन्द्र ठाकुर ggajendra@videha.com http://www.maithililekhaksangh.com/2010/07/blog-post_3709.html २.गद्य २.१.आशीष अनचिन्हार- काफिया २.२.जगदानन्द झा 'मनु'- दूटा विहनि कथा २.३.कैलास दास- अंगना सुखल घरमे पानि २.४.मुन्नी कामत- नाटक/ विहनि कथा २.५.बलराम साहु- विस्मित होइत हमर लोक संस्कृति २.६.जगदीश प्रसाद मण्डल- तीनटा विहनि कथा-एकटा लघुकथा २.७.१.नवेंदु कुमार झा- गंगा नदी पर पूलक माध्यम सँ बढ़त कारोबारक चालि/ महिषीमे आयोजित होयत सांस्कृतिक महोत्सव/ सर्वसम्मतिसँ सभापति आ उपाध्यक्षक निर्वाचित/ बिहारमे शिक्षाक लेल मदति करत विश्व बैंक २.अमित मिश्र- कतिआएल आखर २.८.शिव कुमार झा- कृष्णजन्म :: कथाकाव्यक सूत्रपात/ क्षणप्रभा आशीष अनचिन्हार- काफिया काफिया मने तुकान्त। आ तुकान्त मने स्वर-साम्यक तुकान्त चाहे ओ वर्णक स्वर-साम्य हो की मात्राक स्वर-साम्य। रदीफसँ पहिने जे तुकान्त होइत छैक तकरा काफिया कहल जाइत छैक। आ ई रदीफे जकाँ गजलक हरेक शेरक (मतला बला शेरकेँ छोड़ि) दोसर पाँतिमे रदीफसँ पहिने अनिवार्य रुपें अएबाक चाही। काफिया दू प्रकारक होइत छैक (क) वर्णक स्वर-साम्य आ (ख) मात्राक स्वर-साम्य। वर्णक काफिया लेल शेरक हरेक पाँतिमे रदीफसँ पहिने समान वर्ण आ तकरासँ पहिने समान स्वर-साम्य होएबाक चाही। एकटा गप्प आर, बहुतों शाइर खाली रदीफक बाद बला वर्ण वा मात्राकँे काफिया बूझि लैत छथि से गलत। काफियाक निर्धारण काफिया लेल प्रयुक्त शब्दकेँ अंतसँ बीच वा शुरू धरि कएल जा सकैए। उदाहरण देखू--------- करेज घसैसँ साजक राग निखरै छै बिना धुनने तुरक नै ताग निखरै छै एहि शेरक पहिल पाँतिमे रदीफ "निखरै छै" छैक। आ रदीफसँ ठीक पहिने "राग" शब्द छैक। जँ अहाँ "राग" शब्द पर धेआन देबै तँ पता लागत जे ऐ शब्दक अंतिम वर्ण "ग" छैक मुदा ऐ "ग" संग "आ" ध्वनि (रा) सेहो छैक। तहिना दोसर पाँतिमे रदीफ "निखरै छै"सँ पहिने "ताग" शब्द अछि। आब फेर अहाँ सभ "ताग" शब्दकेँ देखू। ऐमेे अंतिम वर्ण "ग" तँ छैके संगहि-संग "आ" ध्वनि (ता) सेहो छैक। मतलब जे उपरक शेरक दुनू पाँतिमे रदीफ "निखरै छै" सँ पहिने "ग"वर्ण अछि, "आ" स्वर (ध्वनि)क संग। अर्थात "आ" ध्वनि संगे "ग" वर्ण ऐ शेरक काफिया भेल। आब ऐठाम ई मोन राखू जे जँ उपरक ई दुनू शेर कोनो गजलक मतला छैक तँ ओइ गजलक हरेक शेरक कफिया "ग" वर्णक संग "आ" ध्वनि होएबाक चाही। अन्यथा ओ गजल गलत भए जाएत। आब ऐ गजलक दोसर शेरकेँ देखू-- इ दुनिया मेहनतिक गुलाम छै सदिखन बहै घाम तखन सुतल भाग निखरै छै ऐ शेरमे पहिल पाँतिमे ने रदीफ छैक आ ने काफिया मुदा दोसर पाँतिमे रदीफ सेहो छैक आ रदीफसँ पहिने शब्द "भाग" अछि। ऐ शब्दक अंतमे "ग" वर्ण तँ छैके संगहि-संग "ग"सँ पहिने "आ" ध्वनि सेहो छैक। ऐ गजलक आन काफिया सभ अछि "लाग", "बाग", "पाग"। एकटा आर दोसर उदाहरण देखू-- कहू की, कियो बूझि नै सकल हमरा हँसी सभक लागल बहुत ठरल हमरा ऐ मतलाक शेरमे "हमरा" रदीफ अछि। आ रदीफसँ पहिने पहिल पाँतिमे "सकल" शब्द अछि। संगहि-संग दोसर पाँतिमे "ठरल" शब्द अछि। आब हमरा लोकनि जँ एहिमे काफिया निर्धारण करी। दुनू शब्दकेँ नीक जकाँ देखू। दुनू शब्दक अंतिम वर्ण "ल" अछि मुदा पहिल पाँतिमे "ल"सँ पहिने "अ" ध्वनि अछि (क) आ दोसरो पाँतिमे "ल"सँ पहिने "अ" ध्वनि अछि (र)। तँ एहि दुनू शब्दक मिलानके बाद हमरा लोकनि देखै छी जे दुनूमे "ल" वर्ण समान अछि। संगहि-संग वर्ण "ल" सँ पहिने "अ" स्वर अछि। आब सभ व्यंजन हलन्तमे अ लगिते छै तखने ओ गुणिताक्षर बनै छै (कचटतप, य-ह) तँए ऐ गजलक काफिया कोनो कचटतप वर्ग(कवर्ग, चवर्ग, टवर्ग, तवर्ग, पवर्ग) वा य-ह संग "ल" वर्ण भेल। आब शाइरकेँ बाँकी शेरमे काफियाक रूपमे एहन शब्द चुनए पड़तन्हि जकर अंतमे "ल" वर्ण अबैत हुअए एवं तइसँ पहिने कोनो "कचटतप, य-ह" भऽ सकैए। ऐ गजलमे प्रयुक्त भेल आन काफिया अछि-"जरल ", "खसल", "रहल" "कहल"| तेसर उदाहरण सेहो देखू- रानी मेघ सगरो जल पटाएत ना बौआ हमर खेलत आ नहाएत ना ऐ मतलामे "ना" रदीफ अछि। आ रदीफसँ पहिल पाँतिमे "पटाएत" शब्द अछि आ दोसर पाँतिमे "नहाएत"। जँ दुनू शब्दमे मिलान करबै तँ "एत" दुनू पाँतिक काफियामे कामन छै आ "एत" सँ पहिने "आ" स्वरक मात्रा छै (पहिल पाँतिमे "टा" आ दोसर पाँतिमे "हा"। ऐ मतलामे काफिया हएत "आ" मात्राक संग "एत" वर्ण समूह। ऐ गजलमे लेल गेल आन काफिया अछि बहाएत, बनाएत, चलाएत आ खाएत। जँ मतलाक दुनू पाँतिक काफियामे किछु वर्ण समूह कामन रहै छै तँ ओकरा तहलीली रदीफ कहल जाइत छै। उपरका मतलामे "एत"केँ तहलीली रदीफ कहल जाइत छै। काफियाक ऐ विवरणकेँ एना बूझी तँ नीक रहत- १) जँ कोनो मतलामे "छन" आ "दन" काफिया छै तँ ऐमे "न" वर्ण मूल वर्ण भेलै (काफियाक मिलान सदिखन अंतसँ कएल जाइत छै) आ ओइसँ पहिलुक वर्णक स्वर सेहो बराबर हेबाक चाही। उपरका उदाहरणमे "न" वर्णक बाद क्रमशः "छ" आ "द" वर्ण बचै छै आ दुनूक स्वर "अ" छै मने अकारान्त छै तँए कोनो मतलामे ई काफिया सही हएत। आब ऐ गजलमे आन शेर सभमे एहने काफिया हेतै जेना- "हन", "मन", "जीबन" आदि। ऐठाम ई बात बुझबाक अछि जे जँ मतलामे "छन" आ "धुन" रहितै तँ काफिया गलत भऽ जेतै कारण मूल वर्ण "न" केर बादक स्वरक मात्रा सेहो अनिवार्य रूपें मिलबाक चाही मुदा ऐ उदारहरणक एकटा काफियामे "न" केर बाद "अ" स्वरक गुणिताक्षर छै तँ दोसरमे मूल वर्ण "न" केर बाद "उ" स्वर छै, तँए ई गलत भेल। ऐठाम ईहो मोन राखू जे "छन" आ "दन" केर बाद कोनो आन शेरमे "धुन", "आन", "निन" आदि काफियाकेँ नै लऽ सकैत छी। ईहो मोन राखू जे एकै गजलक आन-आन शेरमे मूल वर्ण एकै रहतै। जेना उपरका उदाहरणमे "छन" आ "दन" काफिया छै तँ आन शेरक काफियाक अंतमे "न" वर्ण अनिवार्य रूपसँ रहतै। २) जँ कोनो मतलामे "जीवन" आ "तीमन" छै तँ काफिया "अ" स्वरक संग "न" मूल वर्ण हएत। आ तँए आन शेरक काफिया लेल "धूमन", "केहन", "पावन" एहन शब्द उपयुक्त रहत। ३) जँ कोनो मतलामे काफिया "तीमन" आ "नीमन" शब्द छै तखन कने धेआन राखए पड़त। दुनू शब्दकेँ धेआनसँ देखू, अंतमे "मन" वर्ण समूह उभयनिष्ठ छै तँ एहन काफियामे "मन" मूल वर्ण समूह भेल आ तइसँ पहिने दुनूमे "ई" स्वरक मात्रा छै (ती, नी) तँए एकर काफिया भेल "ई" स्वरक मात्राक संग "मन" वर्णक समूह। जँ कोनो शाइर "तीमन" आ "नीमन" केर बाद कोनो आन शेरमे "जीबन", "धूमन", "केहन", "पावन" काफिया लेताह तँ गलत हएत। सही काफिया हेत- "परिसीमन" आदि। ऐठाम ईहो मोन राखू जे जँ कोनो मतलामे "तीमन" आ "धूमन" काफिया छै तँ ओ गलत हएत कारण "मन" वर्ण समूहसँ पहिने एकटामे "ई" स्वरक मात्रा छै तँ दोसरमे "उ" स्वरक मात्रा। तेनाहिते "खाएत" एवं "आएत" काफियामे अंतसँ "एत" उभयनिष्ठ छै एवं तइसँ पहिने "आ" स्वरक मात्रा छै, तकर बाद आन शेरमे "जाएत", "नहाएत", "पाएत", "बुड़िआएत" आदि काफिया सही हेतै। ४) कोनो मतलामे "खौंझाएत" आ "बुझाएत" शब्दक काफिया नै भए सकैए से आब अहाँ सभ नीक जकाँ बुझि गेल हेबै। जँ कोनो शाइर एहन काफिया लै छथि तँ काफियामे "सिनाद दोष" आबि जाइत छै। ५) केखनो काल किछु एहन शब्द आबि जाइत छै काफियामे, जे अधिकांशतः एकसमान रहैत छै जेना- "पसार" एवं "सार"। ऐ दूटा शब्दमे अंतसँ "सार" उभयनिष्ठ छै आ केओ कहता जे "सार" सँ पहिने बला स्वरक मात्रा सेहो मिलबाक चाही। मने "पसार" एवं "सार" मे "प" अनकामन छै तँए " सार" सँ पहिने "अ" स्वर हेबाक चाही, मुदा शाइरीक निअमक हिसाबेँ मतलामे एहन काफियाक प्रयोग गलत होइत छै। अर्थात कोनो मतलामे अहाँ "पसार" एवं "सार", तेनाहिते "विचार" क संग "चार" आदि काफिया नै लऽ सकैत छी। ६) आब कने संयुक्ताक्षर बला काफियाकेँ देखी। किछु आर विवरणसँ पहिने किछु संयुक्त शब्द सभकेँ देखल जाए। प्रस्थान, चुस्त, दुरुस्त, किस्मत। आब ई देखू जे संयुक्त वर्ण अंतसँ कोन स्थानपर पड़ैत अछि। जँ ई अंतसँ तेसर आ ओकर बाद मने चारिम या पाँचम स्थानपर अबैत हो तँ काफियाक निअम पहिने जकाँ हएत। मुदा जँ इएह संयुक्त वर्ण काफिया बला शब्दक अंतसँ दोसर स्थान पर अबैत हो तँ कने धेआन देबए पड़त। मानि लिअ जे मतलाक पहिल पाँतिमे "मस्त" काफिया छैक। तँ आब हरेक काफियाक अंतमे "स्त" रहबाक चाही। उदाहरण लेल "मस्त" क काफिया "दस्त", "पस्त", "हरस्त" आदि भऽ सकैए। उदाहरण रूपमे एकटा शेरकेँ देखल जाए-- हएत कोना गुदस्त जीबन भेल चिन्तासँ हरस्त जीबन आब ऐ शेरमे रदीफ "जीबन" भेल आ पहिल पाँतिमे काफिया "गुदस्त" अछि, आब संयुक्ताक्षर बला निअमक हिसाबें काफिया बला शब्दमे अंतसँ दोसर वर्ण "स्त" होएबाक चाही। आब दोसर पाँतिके देखू रदीफसँ पहिने काफियाक रूपमे "हरस्त" अछि जकर अंतसँ "स्त" संगे-संग "अ" वर्णक स्वर साम्य सेहो छै जे निअमक मोताबिक सही अछि। ऐ गजलमे आन काफिया सभ एना अछि- "व्यस्त", "मदमस्त", "मस्त", "सस्त" आदि। उपरके निअम जकाँ मतलाक पहिल पाँतिमे जँ "मस्त" काफिया छै तँ ओकर बाद आन शेरमे "चुस्त" "सुस्त" आदि काफिया नै आबि सकैए। संयुक्ताक्षरक ई निअम मात्रा बला काफिया लेल कने अलग ढ़ंगसँ छैक। ७) तँ आब आबी कने "ए" आ "य" बला प्रसंगपर। ए आ य : मैथिलीक वर्तनीमे ए आ य दुनू लिखल जाइत अछि। मुदा "ए" केर प्रयोग प्राचीन मैथिलीए सँ अछि। प्राचीन वर्तनी- कएल, जाए, होएत, माए, भाए, गाए आदि। नवीन वर्तनी- कयल, जाय, होयत, माय, भाय, गाय आदि। सामान्यतया शब्दक शुरूमे ए मात्र अबैत अछि। जेना एहि, एना, एकर, एहन आदि। एहि शब्द सभक स्थानपर यहि, यना, यकर, यहन आदिक प्रयोग नै करबाक चाही। यद्यपि मैथिलीभाषी थारू सहित किछु जातिमे शब्दक आरम्भोमे “ए”केँ य कहि उच्चारण कएल जाइत अछि। मैथिलीक सर्वसाधारणक उच्चारण-शैली " य "क अपेक्षा "ए"सँ बेसी निकट छैक। खास कऽ कएल, हएब आदि कतिपय शब्दकेँ कैल, हैब आदि रूपमे कतहु-कतहु लिखल जाएब सेहो “ए”क प्रयोगकेँ बेसी समीचीन प्रमाणित करैत अछि। एतेक जनलाक बाद आबी "ए" वा "य" केर ध्वनि लोप पर। ओना "ए" वा "य" क संगे-संग आन ध्वनि लोप सेहो होइत छै मुदा ओकर चर्चा एतए आवश्यक नै। तँ देखी ध्वनि लोपक निअम- ध्वनि-लोप : निम्नलिखित अवस्थामे शब्दसँ "ए" वा "य" केर ध्वनि-लोप भऽ जाइत अछि: (क) क्रियान्वयी प्रत्यय अयमे य वा ए लुप्त भऽ जाइत अछि। ओइ सँ पहिने अंक उच्चारण दीर्घ भऽ जाइत अछि। ओकर आगाँ लोप-सूचक चिह्न वा विकारी (’ / ऽ) लगाओल जाइछ। जेना- पूर्ण रूप : पढ़ए (पढ़य) गेलाह, कए (कय) लेल, उठए (उठय) पड़तौक। अपूर्ण रूप : पढ़’ गेलाह, क’ लेल, उठ’ पड़तौक। पढ़ऽ गेलाह, कऽ लेल, उठऽ पड़तौक। (ख) पूर्वकालिक कृत आय (आए) प्रत्ययमे य (ए) लुप्त भऽ जाइछ, मुदा लोप-सूचक विकारी नै लगाओल जाइछ। जेना- पूर्ण रूप : खाए (य) गेल, पठाय (ए) देब, नहाए (य) अएलाह। अपूर्ण रूप : खा गेल, पठा देब, नहा अएलाह। आब एक बेर फेर घुरि जाइ उच्चारण पर। उच्चारणमे लोप-सूचक चिह्न ( ' ) वा विकारी (ऽ) केर कोनो महत्व नै होइत छैक। मने लोप सूचक चिन्ह वा विकारीसँ पहिने जे वर्ण छै तकरे पूरा-पूरी उच्चारण हेतै कनेक नमहर उच्चारणक संग ( मुदा ऐ कने नमहर उच्चारणक कारण ओ वर्ण दीर्घ नै मानल जाएत। डा. रामावतार यादव ऐ नमहर उच्चारणकेँ दीर्घ तँ मानै छथि मुदा गनतीमे शब्दकेँ लघु मानै छथि )। जेना "लए" शब्दमे ल केर बाद ए केर उच्चारण होइत अछि मुदा जखन ओही "लए" शब्दकेँ "ल'" वा "लऽ" लिखबै तखन ओकर उच्चारण बदलि जाएत आ एकर उच्चारण "ल" केर बराबर हएत। मतलब जे "ल'" वा "लऽ" केर उच्चारण "लए" वा "लय" शब्दसँ बिल्कुल अलग अछि। तेनाहिते "खस'" वा "खसऽ" केर उच्चारण "खसए" वा "खसय" शब्दसँ अलग अछि। एहन-एहन शब्द जकर अंतमे "ए" वा "य" लोप होइत होइ तकरा लेल एहने सन निअम हेतै। जँ कोनो शाइर ध्वनि लोपक चिन्ह वा विकारी बला शब्दक काफिया बनबै छथि तँ ओ धेआन राखथि जे हरेक काफियामे लोप-सूचक चिह्न ( ' ) वा विकारी ( ऽ) सँ पहिनुक वर्ण एकसमान राखथि। जेना "ल'" वा "लऽ" केर काफियाक बाद शाइर एहन शब्द चुनथि जकर अंतमे लोप-सूचक चिह्न ( ' ) वा विकारी ( ऽ) लागल हो तकरा बाद वर्ण "ल" हो जेना "चल'" वा "चलऽ"। जँ कोनो शाइर "राख'" वा "राखऽ" केर काफिया "बाज'" या "बाजऽ" रखताह तँ ओ गलत हेतै। "बाज'" या "बाजऽ" केर बाद "साज'" वा "साजऽ" काफिया हेतै। संगे-संग काफियाक उपरका बला निअम सभ पहिनेहें जकाँ अहूमे लागू रहत। जँ कोनो एहन शब्द जकर अंतमे "ए" वा "य" केर लोप भेल छै आ तइसँ पहिने कोनो मात्रा छै तँ ओकर काफिया लेल मात्राक काफिया बला निअम लागत जकर विवरण आगू देल जा रहल अछि। आब अहाँ सभ ई बूझि सकैत छिऐ जे -- लए---- ह्रस्व-दीर्घ लs------ह्रस्व ल'------ह्रस्व लय----- ह्रस्व- ह्रस्व वा दीर्घ आ दए, कए आदि लेल एहने सन निअम रहत। आशा अछि जे एतेक उदाहरणसँ ई निअम सभ बुझबामे आएल हएत। ८) पञ्चमाक्षर आ अनुस्वार: पञ्चमाक्षरान्तर्गत ङ, ञ, ण, न एवं म अबैत अछि। संस्कृत भाषाक अनुसार शब्दक अन्तमे जइ वर्गक अक्षर रहैत अछि ओही वर्गक पञ्चमाक्षर अबैत अछि। जेना- अङ्क (क वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ङ् आएल अछि।) पञ्च (च वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ञ् आएल अछि।) खण्ड (ट वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ण् आएल अछि।) सन्धि (त वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे न् आएल अछि।) खम्भ (प वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे म् आएल अछि।) उपर्युक्त बात मैथिलीमे कम देखल जाइत अछि। पञ्चमाक्षरक बदलामे अधिकांश जगहपर अनुस्वारक प्रयोग देखल जाइछ। जेना- अंक, पंच, खंड, संधि, खंभ आदि। व्याकरणविद पण्डित गोविन्द झाक कहब छनि जे कवर्ग, चवर्ग आ टवर्गसँ पूर्व अनुस्वार लिखल जाए तथा तवर्ग आ पवर्गसँ पूर्व पञ्चमाक्षरे लिखल जाए। जेना- अंक, चंचल, अंडा, अन्त तथा कम्पन। मुदा हिन्दीक निकट रहल आधुनिक लेखक ऐ बातकेँ नहि मानैत छथि। ओ लोकनि अन्त आ कम्पनक जगहपर सेहो अंत आ कंपन लिखैत देखल जाइत छथि। नवीन पद्धति किछु सुविधाजनक अवश्य छैक। किएक तँ ऐ मे समय आ स्थानक बचत होइत छैक। मुदा कतोक बेर हस्तलेखन वा मुद्रणमे अनुस्वारक छोट सन बिन्दु स्पष्ट नै भेलासँ अर्थक अनर्थ होइत सेहो देखल जाइत अछि। अनुस्वारक प्रयोगमे उच्चारण-दोषक सम्भावना सेहो ततबए देखल जाइत अछि। एतदर्थ क सँ लऽ कऽ पवर्ग धरि पञ्चमाक्षरेक प्रयोग करब उचित अछि। यसँ लऽ कऽ ज्ञ धरिक अक्षरक सङ्ग अनुस्वारक प्रयोग करबामे कतहु कोनो विवाद नै देखल जाइछ। आब कने आबी काफिया पर (ऐठाम हमर आग्रह जे पंचमाक्षरक प्रयोग कएल जाए। ओना पहिने हम अपने अनुस्वारक प्रयोग करैत छलौं मुदा आब पंचमाक्षरक प्रयोग करैत छी आ ईएह मैथिलीक हितमे छै) जँ मतलाक कोनो काफिया मे पंचमाक्षर वा अनुस्वारक प्रयोग छैक तँ हरेक शेरक काफियामे अनुस्वार वा पंचमाक्षर हेबाक चाही ओहो ठीक ओही स्थान पर जइ पर पहिल काफियामे छैक। जेना मानि लिअ कोनो मतलाक पहिल पाँतिक काफिया "बसंत" छैक, तँ आब अहाँकेँ ओहन शब्द काफियामे देबए पड़त जकर अंतसँ दोसर वर्ण पर अनुस्वार वा पंचमाक्षर अबैत होइक जेना की "अनंत", "दिगंत" इत्यादि। आ एहने सन निअम चंद्रबिंदु लेल सेहो छैक। एकटा बात आर जँ कोनो मतलाक दुनू पाँतिमे अनुस्वार बला काफिया छै तँ ओकर बाद बला शेरक काफिया लेल पंचमाक्षर बला शब्द सेहो लए सकैत छी जेना--- जँ मतलामे की "बसंत" आ "अनंत" छै तँ बाद बला शेरक काफिया लेल "दिगन्त" सेहो लए सकैत छी। आन सभ पंचमाक्षर लेल एहने निअम बुझू। मुदा एहन ठाम ई मोन राखू जे पंचमाक्षर अपने वर्गक हेबाक चाही। मात्रा बला काफिया पर विचार करबासँ पहिने कनेक फेरसँ तहलीली रदीफ आ मैथिली विभक्ति पर विचार करी। कारण जे मैथिली विभक्ति मूल शब्दमे सटि जाइत छैक। आ तँए ओ केखन काफियाक रूप लेत आ केखन रदीफक से बुझनाइ परम जरूरी। विभक्ति------ मैथिलीमे विभक्ति चिन्ह समान्यतः पाँच गोट अछि। कर्म---- केँ करण--- एँ /सँ अपादान-- सँ सम्बन्ध---क अधिकरण--मे /पर ऐकेँ अतिरिक्त विद्वान लोकनि कर्ताक चिन्हकेँ सुन्नाक रूपमे लैत छथि। ई पाँचो चिन्ह मूल शब्दमे सटि जाइत छैक। आ ऐ पाँचोमेसँ "एँ" चिन्ह मूल शब्दक ध्वनि बदलि दैत छैक। उदाहरण लेल देखू-- "बाट" शब्दमे "एँ" चिन्ह सटने " बाटेँ" होइत छैक। "हाथ" शब्दमे सटने "हाथेँ" इत्यादि। आब कने ई विचारी जे जँ कोनो शाइर एहन शब्द, जइमे विभक्ति सटल होइक जँ ओकर काफिया बनेता तँ की हेतै। ऐ लेल किछु एहन शब्द ली जइमे विभक्ति सटल होइक। उदाहरण लेल-- मूल शब्द-------------- विभक्तिसँ सटल शब्द हाथ------------------- हाथक /हाथेँ/ हाथसँ/ हाथमे/ हाथकेँ फूल-------------------- फूलक /फूलसँ /फूलेँ संग-------------------- संगमे /संगेँ राति------------------- रातिएँ/ रातिसँ /रातिमे ऐ विवरणकेँ हमरा लोकनि दू भागमे बाँटि सकै छी------ १) एहन मूल शब्द जे अंतसँ अकारान्त हुअए, आ २) एहन मूल शब्द जकर अंतमे मात्राक प्रयोग होइक १) आब जँ कोनो शाइर एहन मूल शब्द जे अकारान्त छैक आ ओइमे विभक्ति लागल छैक तकरा काफिया बनबै छथि तँ हुनका ई मोन राखए पड़तन्हि जे बादमे आबए बला हरेक आन-आन काफियामे वएह विभक्ति कोनो आन मूल शब्दमे आबै जे अकारान्त होइक संगहि-संग स्वर-साम्य सेहो रखैत हो। उदाहरण लेल----- मानू जे केओ मूल "हाथ" शब्दमे "क" विभक्ति जोड़ि "हाथक" काफिया बनेलक। दोसर आन-आन काफिया लेल ई मोन राखू जे आबए बला ओइ काफियाक अंतमे "क" विभक्ति तँ एबै करतै, मुदा विभक्ति "क"सँ ठीक पहिने अकारान्त वर्ण एवं स्वर-साम्य होएबाक चाही जेना की मानू "बात" शब्दमे विभक्ति "क"जुटला पर "बातक" शब्द बनैत अछि। आब पहिल काफिया "हाथक" आ दोसर काफिया "बातक" मिलान करु (काफियाक मिलान सदिखन शब्दक अंतसँ कएल जाइत छैक)। देखू पहिल काफिया "हाथक" आ दोसर काफिया "बातक" दुनूक अंतमे विभक्ति "क" अछि संगहि-संग विभक्ति "क" केर बाद दुनू काफियाक शब्द "थ" आ "त" अकारान्त अछि, संगहि-संग "हा" केर स्वर-साम्य "बा" सँ छैक। आब फेर तेसर शब्द "पात" लिअ आ जँ ओइमे "क" विभक्ति जोड़बै तँ "पातक" शब्द बनतै। आब पहिल काफिया "हाथक" आ दोसर काफिया "पातक" मिलान करु। देखू अंतसँ दुनू शब्दमे "क" विभक्ति छैक आ ठीक ओइसँ पहिने दुनू शब्द अकारान्त छैक आ संगहि-संग "हा" क स्वर-साम्य "पा"सँ छैक। एनाहिते दोसर उदाहरण देखू- मूल शब्द "पात" विभक्ति "मे" जुटला पर "पातमे" शब्द बनैत अछि। फेर दोसर शब्द "बाट" विभक्ति "मे" जुटला पर "बाटमे"। आब फेरसँ मिलान करु- दुनू शब्दक अंतमे विभक्ति "मे" लागल छैक। विभक्ति "मे" सँ ठीक पहिने अकारान्त वर्ण सेहो छैक संगहि-संग "पा" केर स्वर-साम्य "बा"सँ छैक। किछु आर उदाहरण लिअ- "कलमसँ", "पतनसँ", "बापकेँ", "आबकेँ" इत्यादि। मुदा ऐठाम ई बात एकदम धेआन राखू जे जँ कोनो शाइर लेखनमे हिन्दीक प्रभावसँ मूल शब्दमे विभक्ति नै सटबै छथि तैओ उच्चारणमे मूल शब्द आ विभक्ति स्वतः सटि जाइत छै तँए विभक्ति सटा कऽ लिखू वा हटा कए बिना रदीफक गजल हेबे करत। एकरा एना बूझी--- कोनो मतलामे " कलमसँ " आ " पतनसँ " काफिया बनि सकैए आ संगे-संग मतलामे " कलम सँ " आ " पतन सँ " सेहो काफिया बनि सकैए आ एकरा बिना रदीफक गजल कहल जाएत तेनाहिते "आँखिसँ" आ चाँकिसँ " काफिया सेहो ठीक रहत आ "आँखि सँ" आ चाँकि सँ " सेहो । ओना जँ कोनो उर्दू-हिन्दीक शाइर कोनो गजलमे " कलमसँ " आ " पतनसँ " वा " कलम सँ " आ " पतन सँ " काफिया देखताह तँ ओकरा गलत कहि देताह, मुदा ई बात सदिखन मोन राखू जे उर्दू-हिन्दी भाषा अलग छै आ मैथिली भाषा अलग छै, एकर व्याकरण आ उच्चारण पद्धति अलग छै तँए अरबीमे पारित पूरा-पूरी निअम मैथिलीमे लागू नै भऽ सकैए। २) एहन मूल शब्द जकर अंतमे मात्रा होइक ओकर काफिया लेल धेआन राखू जे विभक्तिक बाद ठीक वएह मात्रा स्वर-साम्यक संग एबाक चाही। उदारहरण लेल- आँखिसँ----चाँकिसँ----बाँहिसँ, इत्यादि रातिमे----जातिमे--- जाठिमे, इत्यादि घुटठीकेँ---गुड्डीकेँ---चुट्टीकेँ, इत्यादि पानिक--आनिक, इत्यादि केखनो काल दूटा विभक्ति एकै संग जुटि जाइत छैक जेना "रातिएँसँ" एहन समयमे अहाँकेँ दोसरो काफिया ओहने लेबए पड़त जइमे दुनू विभक्त समान होइक स्वर-साम्यक संगे। उदाहरण लेल " रातिएँसँ" केर काफिया "छातिएँसँ" "हाथिएँसँ" "बाटिएँसँ" आदि-आदि भऽ सकैत अछि। विभक्ति बला काफियाक संबंधमे एकटा आर खास गप्प। कोनो एहन मूल शब्द जकर अंत कोनो एकटा खास विभक्तिसँ साम्य रखैत हुअए, विभक्तिसँ पहिने बला वर्ण अकारान्त वा मात्रा युक्त (जेहन स्थिति) हुअए संगहि-संग ओइसँ पहिने स्वर-साम्य हुअए तँ ओ दुनू काफियाक रूपमे लेल जा सकैए। उदाहरण लेल एकटा विभक्ति बला शब्द "पातक" वा "बाटक" लिअ। आ आब एहन मूल शब्द ताकू जकर अंतमे "क" होइ, "क" सँ पहिने अकारान्त वर्ण होइक (जँ अकारान्त वर्णसँ पहिने स्वर-साम्य होइ तँ आरो नीक) तँ ओ दुनू (एकटा विभक्ति युक्त आ दोसर मूल) शब्द काफिया भऽ सकैत अछि। उदाहरण लेल उपर लेल दुनू विभक्त युक्त शब्द "पातक" आ "बाटक"क मूल शब्द "बालक" पालक" वा "चालक"सँ मिलाउ। जँ गौरसँ देखबै तँ पता लागत जे ई शब्द सभ काफिया लेल एकदम्म उपयुक्त अछि। तेनाहिते मात्रा बला शब्द जइमे विभक्ति सटल हुअए आ ओहन मूल शब्द जे ओकरासँ मिलैत हुअए एकदोसराक काफिया बनि सकैत अछि। जँ कोनो मतलाक अंत मूल शब्दसँ सटल विभक्तिसँ होइक तँ ओकरा बिना रदीफक गजल मानू। उदाहरण लेल- पसरल छै शोणित सगरो बाटपर घर-आँगन-बाड़ी-झाड़ी घाटपर ऐ गजलक आन अंतिम शब्द अछि---- "हाटपर", "खाटपर", "टाटपर"। देखू ऐ सभमे अंतसँ " पर " सेहो छै एवं " आ " स्वरक संग " ट " वर्ण सेहो छै। मुदा तैओ एकरा बिना रदीफक गजल मानल जाएत। आब कने मात्रा बला काफिया पर विचार करी। मैथिली वर्णमालामे १६ गोट स्वर देखाओल गेल अछि। अ, आ, इ, ई उ, ऋ, ॠ, लृ,( आ लृक आर एकटा दीर्घ रूप) ऊ, ए, ऐ. ओ. औ, अं एवं अः। जइमे "अ" तँ हरेक वर्णक (जइमे हलन्त् नै लागल होइक)मे अंतमे अबिते छैक। अन्य छह गोट स्वर ( ऋ,ॠ, लृ आ लृक आर एकटा दीर्घ रूप, अं एवं अः) खाली तत्सम शब्दमे अबैत छैक। बचल नओ गोट स्वर आ, इ, ई, उ, ऊ, ए, ऐ, ओ, एवं औ (एकर लेख रूप क्रमशः--ा, ि, ी, ु, ू, े, ै, ो एवं ौ अछि)। संगे-संग हम मैथिलीमे रेफ बला काफिया पर सेहो बिचार करब। मतलब जे ऐठाम हम कुल दस गोट मात्रा पर बिचार करब। मुदा ऐ दसोमे "इ", "उ" आ रेफ पर बिचार हम बादमे करब। एकर कारण जे मैथिलीमे ऐ तीनूक उच्चारण कने अलग ढंगसँ होइत अछि। तँ चली मात्रा बला काफिया पर। मतलामे रदीफसँ पहिने जँ वर्णमे कोनो मात्रा छैक तँ गजलक हरेक शेरक काफिया मे वएह मात्रा अएबाक चाही चाहे ओइ मात्राक संग बला वर्ण दोसरे किएक ने हो। पूब मे उगल ललका थारी त' देखू दूइभक घर चमा चम मोती त' देखू (अमित मिश्र) ऐ गजलमे लेल गेल आन काफिया सभ अछि- किलकारी, बेमारी, पारी, साड़ी आ तरकारी। ऐठाम ई धेआन देबए बला बात अछि जे मतलामे जे काफिया प्रयोग भेल छै तकर अंतमे " ई " केर मात्रा छै वर्ण मुदा अलग-अलग छै मुदा ओइसँ पहिने बला स्वर नै मीलि रहल छै एकर मतलब ई भेल जे मात्रा बला काफिया लेल शब्दक अंतमे जे मात्रा छै सएह आन शब्दक अंतमे अएबाक चाही बशर्ते कि वर्ण अलग-अलग हुअए। आब ऐठाम ई देखू जे जँ मतलामे " थारी " क संग साड़ी रहितै तखन आन काफियामे "ड़ी" वा " री" कामन रहितै आ तइसँ पहिने " आ" केर स्वर साम्य रहितै। जेना " बाड़ी ", उधारी, अधकपारी इत्यादि। जँ " थारी " आ " बाड़ी" केर बाद "मोती" शब्दक काफिया लै छी तँ सिनाद दोष आबि जाएत आ काफिया गलत भऽ जाएत। तेनाहिते जँ कोनो मतलामे " मोती " आ कोठी" काफिया लेबै तखन साड़ी, उधारी आदि काफिया भऽ सकैए। कोना से आब अहाँ सभ नीक जकाँ बुझि गेल हेबै। ऐ निअमक अधार पर हमर प्रकाशित पोथी " अनचिन्हार आखर " केर बहुत रास काफिया गलत अछि। मुदा ओइ समय हमरा लग काफिया जतेक समझ छल ओइ हिसाबसँ ओकर प्रयोग कएल। आ तँए ओइ पोथी महँक किछु काफियाक निअम आब पूर्णतः बेकार भऽ चुकल अछि। संगे संग ईहो धेआन राखू जे आन मात्रा बला कफिया लेल एहने निअम रहत। एकटा गलत उदाहरण देबासँ हम अपनाकेँ रोकि नै रहल छी। ई शेर हमरे थिक---- एनाइ जँ अहाँक सूनी हम नहुँएसँ सपना बूनी हम" (काफिया "ई"क मात्रा) गजलक अन्य काफिया अछि---- "चूमी", "पूछी", "बूझी", "खूनी", ,"लूटी", "सूती" आदि। आब ऐ शेरमे देखू दुनू पाँतिक काफियामे " नी " कामन छै आ तइ हिसाबसँ हमरा एहन काफिया चुनबाक छल जकर अंतमे " नी " अबैत हो आ तइसँ पहिने " ऊ " केर मात्रा हुअए। ऐ शेरमे " ऊ " केर मात्रा तँ लेल गेल अछि मुदा " नी " केर पालन नै भेल अछि तँए ऐ गजल महँक एकटा काफिया " खूनी " छोड़ि आन सभ ( जेना चूमी", "पूछी", "बूझी ""लूटी", "सूती" ) आदि गलत अछि| अन्य बचल मात्राक लेल एहने समान निअम अछि आ हरेक मात्राक एक-एकटा उदाहरण देल जा रहल अछि। १) छोड़ि कऽ जे बिनु बजने जा रहल अछि हृदै चिरैत आगि सुनगा रहल अछि ( काफिया " आ " केर मात्रा) ( गजेन्द्र ठाकुर ) ऐ गजल आन काफिया सभ अछि------कना, भसिया, जा, खा इत्यादि। २) "जँ तोड़ब सप्पत तँ जानू अहाँ फाँसिए लगा मरब मानू अहाँ" (काफिया "ऊ" क मात्रा) (आशीष अनचिन्हार, सरल वार्णिक) ऐ गजलमे लेल गेल अन्य कफिया- "गानू", "आनू", "टानू" आदि। ३) "मोन तंग करबे करतै देह भाषा पढबे करतै" (काफिया "ए"क मात्रा) ऐ गजलमे लेल गेल अन्य कफिया ---"खुजबे", "उड़बे", "सटबे" आदि अछि। ४) भोरे उठि मैदान गेलै बौआ ओम्हरहिसँ दतमनि तँ लेतै बौआ (आशीष अनचिन्हार ) (काफिया "ऐ"क मात्रा) ऐ गजलक आन काफिया सभ अछि- एतै, जेतै, बनतै, चलतै आदि-आदि। ऐ केर मात्राक एकटा आर उदाहरण देखू---- करबा नै मजूरी माँ पढबै हमहूँ नै रहबै कतौ पाछू बढबै हमहूँ (ओमप्रकाश ) ऐ गजलमे लेल गेल आन काफिया अछि------चढ़बै, मढ़बै, गढ़बै आदि-आदि। केखनो काल "ऐ" केर उच्चारण "अइ" जकाँ होइत अछि। जेना "सैतान" बदलामे सइतान, बैमानक बदलामे "बइमान" इत्यादि। ५) आब हरजाइकेँ तों बिसरि जो रे बौआ मोन ने पड़ौ एहन सप्पत खो रे बौआ (काफिया "ओ"क मात्रा) (आशीष अनचिन्हार, सरल वार्णिक) ऐ गजलमे लेल गेल अन्य कफिया------ओ, खसो, पड़ो इत्यादि अछि। ६) एक बेर फेर हँसिऔ कनेक ओही नजरि सँ देखिऔ कनेक (काफिया "औ"क मात्रा) (आशीष अनचिन्हार, सरल वार्णिक) ऐ गजलमे लेल गेल अन्य कफिया ---"रहिऔ", "चलिऔ", "बुझबिऔ" आदि अछि। **** केखनो काल "औ" केर उच्चारण "अउ" जकाँ होइत अछि। आब हमरा लोकनि फेरसँ एकबेर संयुक्ताक्षर बला शब्दपर चली। मात्रा बला संयुक्ताक्षर लेल पहिनेसँ कने अलग ढङसँ देखू। ई गप्प उदाहरणसँ बेसी फड़िच्छ हएत। मानू जे मतलाक पहिल पाँतिमे काफियाक रूपमे "चुट्टी" शब्द लेल गेल। आब दोसर काफिया लेल मोन राखू जे "ई" मात्रा युक्त कोनो शब्द भऽ सकैत अछि। उदाहरण लेल "चिन्नी", "बुच्ची", "खटनी" आदि "चुट्टी"क काफिया भऽ सकैत अछि। मुदा जँ मतलाक काफिया "मुट्ठी" आ "घुट्ठी" छैक तखन आन शेरक काफिया "चिन्नी" या "बुच्ची" नै भऽ सकैत अछि। कारण तँ अहाँ सभ बुझिए गेल हेबै। उम्मेद अछि जे उपर देल गेल मात्रा बला उदाहरणसँ काफिया संबंधी निअम बेसी फड़िच्छ भेल हएत। तँ आब चली "इ", "उ" आ रेफ पर। मैथिलीमे "इ" आ "उ" लेख आ उच्चारण दुनू पहिने लिखल आ कएल जाइत छैक। एकरा हम उदाहरणसँ देखाएब, तँ पहिने "इ" केर उदाहरणसँ शुरु करी। शब्द "राति" मुदा ओकर उच्चारण भेल "राइत", लिखल जाइए "गानि" मुदा बाजल जाइए "गाइन", तेनाहिते "पानि" केर उच्चारण "पाइन" भऽ गेल। मैथिलीमे वर्ण "इ" तेहन उत्फाल मचेलक जे बहुत आन शब्द सभ "इ" वर्णक संग लिखल जाए लागल जेना की "जाइत", "खाइत" आदि। एकटा आर महत्वपूर्ण गप्प, मैथिलीमे "इ"कार दू रूपमे प्रयोग होइत अछि- पहिल रूप भेल जइमे मात्रा अबैत अछि आ दोसर रूपमे "इ"कार वर्णक रूपमे अबैत अछि। पहिल रूपक उदाहरण "राति", "जाति" सभ भेल आ दोसर रूपक उदाहरण "जाइत", खाइत" सभ भेल। आब कने हमरा लोकनि काफिया पर आबी। जँ अहाँ कोनो एहन शब्दक काफिया बना रहल छी जकर अंतिम वर्ण "इ"कार युक्त अछि तँ अहाँकेँ आन-आन काफिया लेल "इ" कार युक्त वएह वर्ण लेबए पड़त जे पहिल काफियामे अछि। उदाहरण लेल जँ अहाँ "राति" शब्द काफिया लेल लेलौं तँ आब अहाँकेँ दोसर काफिया लेल "त" वर्ण "इ"कार युक्त हेबाक चाही। जेना कि "पाँति", "जाति", आदि अथवा एहन शब्द लिअ जकर अंतमे "त" होइक आ तइसँ पहिने "इ" वर्णक रूपमे रहए जेना की "जाइत"। एकर मतलब जे "राति" शब्दक काफिया लेल "जाति", "पाँति" क संगे "जाइत", "खाइत", "नहाइत" सेहो आबि सकैत अछि। आ हमरा जनैत ऐठाम मैथिली गजल उर्दू गजलसँ पूर्णतः अलग भऽ जाइत अछि। आ संगहि-संग ई विशेषता मैथिली गजलक एकटा अपन अलग छवि बनैैत अछि। आ ई विशेषता ह्रस्व "उ", "ऐ, "औ", आ रेफ बलामे सेहो अबैत अछि। आब कने ह्रस्व "उ" पर धेआन दी। मैथिलीमे जँ शब्दक अंतमे "उ" अबैत हो आ ठीक ओइसँ पहिने अकारान्त वर्ण हुअए तखन "उ" केर उच्चारण प्रायः औ/ अउ जकाँ होइत अछि। उदाहरण लेल मधु शब्दक उच्चारण मौध/ मउध होइत अछि। आ जँ "उ"सँ पहिने आकारान्त वर्ण हो तखन "इ"ए जकाँ "उ" केर उच्चारण पहिने होइत अछि। उदाहरण लेल "साधु" केर उच्चारण "साउध", "बालु" केर उच्चारण "बाउल" इत्यादि। ओना उच्चारण लेल आनो शब्द लेल जा सकैए। आब ई देखी जे ऐ प्रकारक शब्दक काफिया कोना बनतै। जँ अहाँ "उ" सँ पहिने अकारान्त बला वर्णसँ बनल शब्द काफिया लेल लैत छी तँ धेआन राखू जे आन-आन काफियाक उच्चारण "कोनो वर्ण( एक वा एकसँ बेसी) + औ/अउ + अंतिम निश्चित वर्ण" आबै। आब उपरकेँ बला शब्द "मधु"केँ लिअ। एकर उच्चारण "म + औ/अउ + ध" अछि, तँए एकर दोसर काफिया "कोनो वर्ण( एक वा एकसँ बेसी) + औ/अउ + ध" हेतै। आब जँ अहाँ दोसर शब्द "पौध" लेलहुँ, तँ एकर उच्चारण "प + औ/अउ + ध " अछि। अर्थात "मधु" केर उच्चारण "पौध" केर बराबर अछि। तँए "मधु" केर काफिया "पौध" हएत। एनाहिते आन-आन शब्द सभ काफियाक लेल ताकल जा सकैए। आब आबी ओहन शब्दपर जकर अंत "उ" होइक आ ठीक ओइसँ पहिने आकारान्त वर्ण होइक (जेना कि उपरमे एकर उच्चारण पद्धित देखा देल गेल अछि, तँए सोझे काफिया पर चली)। ठीक ह्रस्व "उ" जकाँ निअम छैक एकरो। मानि लिअ जँ अहाँ "बालु" शब्द लेलहुँ, तँ मोन राखू दोसर काफियाक उच्चारण "आकारान्त कोनो वर्ण + उ + ल" होइक जेना की "भालु" इत्यादि। संगहि-संग ह्रस्व "इ"ए जकाँ "चाउर" केर काफिया "चारु" एवं "बालु" केर काफिया "आउल" ( owl) भए सकैत अछि। मैथिलीमे बहुत काल "उ" आ चन्द्रबिंदु एकै संग अबैत अछि। जेना "कहलहुँ" ,"सुनलहुँ", "रहलहुँ" आदि। मानि लिअ जँ ई शब्द सभ जँ काफियाक रूपमे आबि रहल अछि तँ एहन समयमे धेआन राखू जे काफियामे ठीक वएह वर्ण "उ" आ चन्द्रबिंदुक संग आबए। से नै भेला पर काफिया गलत भऽ जाएत। उपरमे देल तीनू शब्दकेँ देखू । तीनू शब्दक अंत "ह" सँ अछि, ओहो "उ" आ चन्द्रबिंदुक संग। मने ई तीनू काफिया लेल उपयुक्त अछि। आघात बला शब्दक काफिया------- मैथिलीमे दू प्रकारक आघात अछि मात्रात्मक आ बलाघात। मुदा मात्रात्मक आघात ओतेक महत्व नै रखैत अछि, तँए हम एतए खाली बलाघात पर बिचार करब। मैथिलीमे कोन शब्दमे कतए आघात पड़त तकरा देखल जाए- १) दू वर्ण धरि बला एहन शब्द जइमे एकौटा गुरू वर्ण नै हुअए- एहन शब्दमे अंतसँ दोसर शब्द पर आघात पड़ैत छैक। जेना "घर", "बर"। एकर उच्चारण "घऽर", "बऽर" आदि होइत अछि। मतलब "घ" आ "ब" पर आघात पड़ल छैक। जँ एक या एकसँ बेसी दीर्घ हुअए तँ पहिल दीर्घ पर आघात पड़ैत छैक। जेना "हाथ", "खत्ता" आदि। मतलब "हा" आ "त्ता" पर आघात छैक। "हाथी" "माछी" । ऐ शब्द सभमे पहिल गुरू "हा" एवं "मा" पर आघात छैक। २) तीन वर्ण बला एहन शब्द जइमे तीनू लघु वर्ण हो- एहन शब्दमे अंतसँ दोसर वर्ण पर आघात पड़ैत छैक। जेना "तखन", अगहन" । ऐमेे "ख" आ "ह" पर आघात छैक। जँ एक या एकसँ बेसी दीर्घ हुअए तँ पहिल दीर्घ पर आघात पड़ैत छैक। जेना "ओसारा"मे "ओ" पर आघात छैक। "बतासा" मे "ता" पर आघात छैक। ३) चारि वर्ण बला शब्दमे अंतसँ दोसर वर्ण पर आघात पड़ैत छैक। उदाहरण लेल "भिनसर" मे "स" पर आघात छैक, "अगहन" मे "ह" वर्ण पर छैक। जँ चारि वर्ण बला ओहन शब्द जइमे दीर्घ सेहो छैक तकर आघात उपरमे देल गेल आने निअम जकाँ अछि। जेना "उच्चारण" मे च्चा पर आघात छैक। कुल मिला कऽ एकसँ चारि वर्ण धरिक शब्द लेल एकै रंगक निअम अछि। ३) पाँच वर्ण बला शब्दमे अंतसँ तेसर वर्ण पर होइत छैक चाहे ओ लघु हो की दीर्घ। मने पाँच वर्णमे आघात सदिखन बीच बला वर्ण पर पड़ैत छैक। उदाहरण लेल "देखलहक" मे अंतसँ तेसर वर्ण "ल" पर आघात छैक, तेनाहिते "कमरसारि" मे "र" पर आघात छैक, "कनपातर" मे "पा" पर आघात छैक। ४) छह आ छहसँ बेसी वर्ण बला शब्दमे दू ठाम आघात पड़ैत छैक। शब्दक अंतसँ दोसर वर्ण पर आ अंतेसँ चारिम वर्ण पर चाहे ओ लघु हुअए की दीर्घ। ऐठाम इहो मोन राखू जे शब्दक अंतसँ दोसर वर्ण पर पड़ल आघात बेसी कठोर मुदा चारिम स्थान पर पड़ल आघात मन्द होइत अछि। * विभक्ति बला शब्दमे आघात निर्धारित करबाक लेल विभक्तिकेँ हटा कऽ गणना करु। जेना की "पातक" शब्दमे आघात गणना "त" वर्णसँ शुरु हएत ने कि अंतिम वर्ण "क" सँ। सभ विभक्ति जुटल शब्द लेल इएह मोन राखू। आब कने आघात बला शब्दक काफिया देखी। एहन ठाम ई मोन राखू जे आघात बला स्थान आ वर्णक मात्रा समान रहए। उदाहरण लेल "घर" आ "मजूर" दुनूमे दोसर स्थान पर आघात छैक मुदा मात्रा अलग-अलग छैक, तँए ई दुनू एक-दोसराक काफिया नै बनि सकैए। तँ "घर" शब्दक काफिया लेल "बर", "तर", " हर", “भिनसर" आदि उपयुक्त रहत । आ "मजूर" लेल "मयूर", "हजूर" आदि उपयुक्त रहत। आनो-आन आघात बला शब्दक काफिया लेल ईएह निअम बुझू। ऐठाम हम फेर मोन पाड़ी जे काफियाक निर्धारण खाली मतलामे होइत छैक आ बाँकी शेरमे ओकर पालन। तँए जँ केओ मतलामे विभक्ति बला शब्दकेँ "फूलक" आ हाथक" काफिया लेताह तँ सही हएत आ बादबाँकी शेरमे "अक" काफियाक प्रयोग हेतैक। मुदा जँ केओ गोटे मतलामे "फूलक" आ "अड़हूलक" लेलक आ तकरा बादक शेरमे "हाथक" प्रयोग करत तँ ओ बिल्कुल गलत हएत। "फूलक" आ "अड़हूलक" बाद आन शेर लेल काफिया "ूलक" होएबाक चाही। आब कने "रेफ" बला काफिया पर बिचार करी। रेफ "र" वर्णक एकटा रूप अछि जे "र्" मने आधा "र्" मानल जाइत अछि। मैथिलीमे रेफ आ ओकर पूर्ण रूप ( र वर्ण ) दुनू चलैत अछि। जेना- मर्द------ मरद बर्खा-----बरखा बर्ख-----बरख चर्चा----चरचा उपरका चारिटा शब्द देखलासँ ई बुझाइत अछि जे रेफक पूर्ण रूप आ रेफ बला शब्दक उच्चारणमे कनेक अंतर भऽ जाइत छै। संगे-संग किछुए शब्द अपन रेफकेँ छोड़ि पूर्ण र केर स्वरूपमे अबैत अछि। तँए काफियाक संबंधमे हमर ई विचार अछि जे जँ शब्द रेफ युक्त हुअए मुदा बिना मात्राक हुअए तँ समान स्वर आ उच्चारणक प्रयोग करी। जेना मानि लिअ अहाँ मतलामे " सर्द " आ "पर्द" काफिया लेलहुँ आ तकरा बादक शेरमे " मरद" काफियाक प्रयोग हमरा हिसाबें गलत हएत कारण स्पष्ट रूपेँ "गर्द" आ "पर्द" शब्दक उच्चारण "मरद" शब्दसँ अलग अछि। तेनाहिते मतलामे "सर्द" आ "मरद" शब्दक काफिया गलत हएत। "मरद" शब्दक बाद "बड़द", "शरद", "दरद" आदि काफिया ठीक रहत। मुदा जँ कोनो एहन शब्द जकर अन्तमे रेफ हुअए आ संगे-संग ओ शब्द मात्रा बला हुअए तँ निअम बदलि जेतै। मतलब जे शाइर तखन बिना कोनो दिक्कतक काफिया बना सकैत छथि। कहबाक मतलब जे जँ अहाँ मतलाक पहिल पाँतिमे काफिया "गर्दा" लेलहुँ आ तकरा बाद आन काफिया बर्खा या बरखा लेलहुँ तँ बिलकुल सही हएत। आब अहाँ सभ बुझि सकैत छिऐ जे कोनो मतलामे "बर्खी" आ "करची" बनि सकैत अछि। स्वर साम्य, सिनाद दोष आ ईता दोष बला प्रसंग सभ आने काफिया जकाँ अहूमे लागू हएत। तेनाहिते ई मोन राखू जे जँ रेफ शब्दकेँ अंत छोड़ि (शुरूमे वा बीचमे कतौ) छैक तँ संस्कृतक शब्दमे तँ रेफे रहत मुदा विदेशज खास कऽ अरबी-फारसी आ उर्दू बला शब्दमे "र" भऽ जाइत अछि। जेना कि पर्वतकेँ " परवत" नै लिखल जा सकैए मुदा शर्बतकेँ "शरबत" जरूर लीखि सकैत छी। ऐठाम ई मोन राखू पर्वत आ शरबत दुनू एक दोसराक काफिया भऽ सकैए। काफियाक संबंधमे एकटा गप्प आर- काफियामे वर्ण "र" केर उच्चारण "ड़" क बराबर मानू संगहि-संग "स", "श" आ "ष" केर उच्चारण सेहो समान मानू। जइठाम "ष"क उच्चारण "ख" जकाँ हएत ततए पूर्ण "ख" काफियाक रूपमे आबि सकैत अछि। जँ "ढ" अक्षर शब्दक शुरूमे छैक तँ ओकर उच्चारण "ढ" जकाँ होइत छैक मुदा तकरा बाद ओकर उच्चारण "रह्" जकाँ छैक। आ हमरा विचारे काफियामे "ढ", "र" एवं "ड़" समान अछि। उदाहरण लेल "ठाढ़"क काफिया "विचार", "हुराड़" आदि भऽ सकैत अछि। केखनो काल "त्र" केर लेख रूप "तर्" आ "क्ष" केर लेख रूप "च्छ" अबैत अछि। शाइर उपरके निअमक हिसाबे एकर काफिया बनाबथि। आब कने शुरुआत बला प्रश्न पर चली। पहिल प्रश्न छल जे जँ कोनो मतलामे "छोड़ए" आ "फोड़ए" काफिया हुअए तँ बाद बला शेरमे काफिया की हेतै। उत्तर स्पष्ट अछि बाद बाँकी शेरमे काफिया "ओड़ए" वा "ओरए" हेबाक चाही। नै तँ गजल गलत भऽ जाएत। संगहि-संग दोसर प्रश्न छल जे जँ "छोड़ए" आ "फोड़ए" क बाद "जाए" हुअए तँ सही हएत की गलत। एकरो उत्तर स्पष्ट अछि- जाए क उच्चारण "ओड़ए" वा "ओरए" सँ नै मिलैत अछि तँए "जाए" काफिया "छोड़ए" आ "फोड़ए" क बाद गलत हएत। आब कने एक बेर काफियामे ईता दोष देखल जाए--- ईता दोष काफियामे बहुत बड़का दोष मानल जाइत छै। ऐपर कने विचार कऽ ली। एकरा चारि भागमे देखू---- १) ईता दोष मात्र मतलामे होइत छै। २) जँ मतलाक दुनू काफिया मात्रा युक्त हुअए वा प्रत्ययसँ बनल हो वा सन्धिसँ बनल शब्द तँ दुनू काफियाक मात्रा हटा दिऔ, वा प्रत्यय हटा दिऔ वा सन्धि विच्छेद कऽ दिऔ। आब ई देखू जे मात्रा, प्रत्यय वा विच्छेदक बाद जे पहिल शब्द बचल शब्द छै से सार्थक छै की निरर्थक। जँ दुनूमेसँ एकौटा निरर्थक अछि तँ चिन्ता करबाक गप्प नै कारण एहन स्थितिमे ईता दोष नै रहत। ३) जँ दुनू शब्द (मात्रा, प्रत्यय हटेलाक बाद वा विच्छेदक बाद) सार्थक छै आ ओइ बचल पहिल सार्थक शब्दक आपसमे काफिया बनि रहल छै तखन मात्रा वा प्रत्यय वा सन्धिबला शब्द सेहो काफिया बनत आ ऐमे ईता दोष नै हएत। ४) मुदा जँ दुनू शब्द (मात्रा, प्रत्यय हटेलाक बाद वा विच्छेदक बाद) सार्थक छै आ ओइ बचल पहिल सार्थक शब्दक आपसमे काफिया नै बनि रहल छै तखन मात्रा वा प्रत्यय वा सन्धि बला शब्द सेहो काफिया नै बनत आ ऐमे ईता दोष हएत। आब कने उदाहरणसँ देखी ऐ प्रकरणक- मानू जे मतलामे "बिमारी" आ "आदमी" काफिया छै। तँ आब जँ दुनूक मात्रा हटेबै तँ क्रमशः " बिमार " आ " आदम " शब्द बचै छै जे की सार्थक छै। मुदा "बिमार" आ " आदम" एक दोसराक काफिया नै बनि सकैए। तँए मतलामे "बिमारी" एवं " आदमी" काफिया नै बनत। उर्दूमे जँ केओ एहन काफिया बनबै छथि तँ ओकरा ईता दोषसँ ग्रस्त मानल जाइत छै। एकटा दोसर उदाहरण लिअ-- दोस्ती आ दुश्मनी मतलामे काफिया नै बनि सकैए। कारण वएह मात्रा हटेलाक बाद दोस्त आ दुश्मन शब्द बचै छै जे की दुनू सार्थक छै आ दुनू एक दोसराक काफिया नै बनै छै तँए दोस्ती आ दुश्मनी मतलामे काफिया नै बनि सकैए। मैथिलीमे प्रत्यय बला शब्द संग सेहो एना कएल जा सकैत अछि। प्रत्यय बला शब्दक किछु उदाहरण देखू- धान शब्दमे गर प्रत्यय लगेलासँ नव शब्द बनै छै "धनगर"। तेनाहिते मोन शब्दमे गर प्रत्यय लगेलासँ "मनगर" शब्द बनै छै (किछु गोटेँ मोनगर सेहो लिखै छथि)। एनाहिते आन प्रत्ययसँ बहुत रास नव शब्द बनै छै। आब कने ऐ नव शब्दक काफियापर आउ- जँ धनगर शब्दक काफिया मनगर बनेबै तँ ईता दोष नै रहतै। कारण जँ ऐ दुनू नव शब्दमे सँ गर प्रत्यय हटेबै तँ क्रमशः धन आ मन बचै छै आ दुनूमे काफिया सेहो बनि रहल छै (ऐठाम ई मोन राखू जे प्रत्यय हटलाक बाद धन शब्द मिलाएल जेतै ने की धान, तेनाहिते मन मिलाएल जेतै ने की मोन)। आब जँ मतलामे धनगर संगे दुधगर आबै तँ देखू की हेतै। प्रत्यय हटलाक बाद क्रमशः धन आ दुध बचै छै मुदा दुनू एक-दोसराक काफिया नै बनि रहल छै तँए धनगर आ दुधगर एक-दोसराक काफिया नै बनि रहल अछि। आन-आन प्रत्यय वा सन्धि वा मात्रा लेल एहने सन बुझल जाए। आब जँ बिमारी संग उधारी आबै तँ देखू की हेतै। बिमार एवं उधार दुनू शब्द (मात्रा, प्रत्यय हटेलाक बाद वा विच्छेदक बाद) सार्थक छै आ संगे संग दुनू एक दोसरक काफिया बनि रहल छै तँए बिमारी आ उधारी सेहो एक दोसरक काफिया बनत आ ऐमे ईता दोष नै रहतै। आब जँ बिमारी संग जिनगी लेबै तँ देखू की हेतै। बिमार एवं जिनग (मात्रा, प्रत्यय हटेलाक बाद वा विच्छेदक बाद) बिमार शब्द सार्थक छै मुदा जिनग शब्द निरर्थक तँए बिमारी आ जिनगी सेहो एक दोसरक काफिया बनि सकैए। किछु शब्द एहन होइत छै जकरा पर मात्रा रहैत छै तखन अलग मतलब होइत छै आ मात्रा हटलाक बाद दोसरे मतलब बनि जाइत छै जेना "कारी" तँ एकर मतलब भेलै रंग कारी। मुदा जँ एकर मात्रा हटा देबै तँ बचतै "कार" जे की गाड़ीक संदर्भमे सार्थक शब्द तँ छै मुदा मतलब दोसर छै। तँए अहूँ काफियामे ईता दोष नै रहत। आन शब्द एनाहिते ताकल जा सकैए। आब केओ कहि सकै छथि जे बिमार आ बिमारी शब्द अलग-अलग छै मुदा हमर कहब जे बिमार आ बिमारी दुनूक अर्थ एकदोसरामे निहित छै मुदा कारी आ कार शब्दमे से नै छै। अस्तु ई भेल ईता दोष प्रकारण। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। जगदानन्द झा 'मनु', ग्राम पोस्ट- हरिपुर डीहटोल, मधुबनी १.रोटीक स्वाद आई दस बर्खक बाद कियोक पाहून छोटकी काकीक अँगना एलैंह | पहुनो परख गरीबक घर अँगना किएक एता | छोटकी काकी ओनाहितो गरीब मसोमात एहनठाम कि सेबासत्कार भेटक उम्मीद | पाहुनो केँ तँ हुनकर बहिनक बेटा | ओकरा ओ बारह बर्ख पहीले देखने रहथि आ आब ओ सत्रह बरखक पाँच हाथक जबान भए गेल अछि | आबिते अपन मौसी केँ पएर छू कए गोर लगलक | "केँ बौआ चिन्हलहुँ नहि ?" "मौसी ! हम लोटन, अहाँक बहीन मालती केँ बेटा |" मौसी (छोटकी काकी) दुनू हाथे स्नेह सँ लोटन केँ माथ पकैर अपन करेजा सँ सटा -" चिन्हबौ कोना, मूडने में पाँच बर्खक अवस्था में जे देखलीयै से देखने देखने, आई कोना ई गरीब मौसीक इआद आबि गेलौ |" लोटन - "मौसी मधुबनी में हमर परीक्षाक सेंटर परल छल आई परीक्षा खत्म भेल तँ मोन में भेल मौसीक घर सौराठ तँ एहिठाम सँ कनिके दूर छैक भेट कए आबि " मौसी -" जुग- जुग जीबअ नेन्ना, एहि दुखिया मौसीक इआद तँ रहलै | आ मालती केहन ? ओझाजी केहन ?" लोटन -"सब कियो एकदम फस्ट किलास, दनादन, ओ सब आब छोरु पहिले किछ नास्ता कराऊ, मधुबनी सँ सौराठ पएरे अबैत-अबैत बड्ड भूख लागि गेल |" सुनिते मातर मौसीक छाती में धक सँ उठल, ओ मने- मन सोचए लगलि - नेन्ना केँ की खुवाऊ ? घर में किछो नहि अपने तँ माँगि बेसए क गुजरा कए लै छी एकर नास्ता भोजनक व्यवस्था कतए सँ होएत | " हुनक सोच केँ बिचे में तोरैत लोटन फेर सँ बाजल -" मौसी जल्दी बड्ड भूख लागल |" अपना केँ सम्हारैत मौसी -"हाँ एखने हम भात, दालि, भुजिया, तरुआ, नीक सँ बना कए नेन्ना केँ दै छी, अहाँ कनी बैसू |" इ कहैत मौसी भंसा घर दिस बिदा भेली, जहन की हुनका बुझल जे घर में किछ नहि अछि | मुदा हुनका पाँछा-पाँछा लोटन सेहो आबि -" नहि मौसी एतेक काल हम नहि रुकब पाँच बजे मधुबनी सँ बाबूबरहीक अन्तीम बस छै आ चारि एखने बाजि गेलै |" मौसी अपन घरक हालत देखि लोटनक गप्पक उतर नहि दए सोचय लगलि - "आह ! मजबूरी नेन्ना केँ रूकैयो लेल नहि कैह सकै छी |" एतबा में लोटन भंसा घरक बर्तन सब केँ देखि बाजल -" एहि बर्तन सब में सँ जे किछ अछि दए दिए |' "हे राम !"- मौसीक मन कनाल, बर्तन में किछ रहैक तहन नहि | आगु हुनक मूह बंद भए गेलैंह, बकोर लगले केँ लगले रहलनि | बड्ड सहास सँ गप्प केँ समटैत बजली -"नहि बौआ किछ नहि छौ, हम एखने बिना देरी केने बनाबै छी |" लोटन -"नहि नहि मौसी बनाबै केँ नहि छै, बस छुटि जाएत |" एतबे में लोटनक नजैर टीनही ढकना सँ झाँपल कोनो समान पर परल | आगु जा ढकना उठा -"हे मौसी ई की ?" मौसी अबाक, कि बजति, पहील बेर नेन्ना आएल आ ओकरा खूददीक रोटी खुआउ ओहो राइते केँ बनल | राति में एकटा खूददीक रोटी बनेने रहथि, आधा खा आधा ढकनी सँ झाँपि राइख देने रहथि | लोटन ओहि रोटी केँ दाँत सँ काटि कए खाइत आगाँ बाजल -" एतेक नीक रोटी तँ हम कहीयो खेन्हें नहि छलहुँ, मए तँ खाली छाल्ही भात, दूध-भात, दूध-रोटी, खुआ-खुआ कए मोन घोर क दैए | आहा एतेक स्वाद तँ पहील बेर भेट रहल अछि |" मौसी लोटनक गप्प आ ओकर खएक तेजी देख बजली - "रुक-रुक कनी आचारो तँ आनि देबअ दए |" ई कहि मौसी अचार ताकै लेल एम्हर -उम्हर ताकै लगली मुदा अचार कतौ रहै तहन तँ भेटै | लोटन -"रहअ दीयौ, एतेक नीक इ मोटका रोटी रहै अचार केँ कोन काज | रोटी तँ खतम भए गेल | मौसी बकर-बकर ओकर मूह तकैत रहली | लोटन -" अच्छा आब हम जाई छी, घर देख लेलीयै फेर मधुबनी एलहुँ तँ अहाँ लग जरुर आएब, मुदा हाँ एहने नीकगर मोटका रोटी बनेने रहब " इ कहैत मौसी केँ गोर लागि लोटन गोली जकाँ बाहर आबि गेल | मुदा बाहर एला बाद मौसीक दयनीय हालत देखि ओकर दुनू आँखि सँ नोरक धार बहैत रहै |
२. अन्तिम जगह फेकना | मए बाऊ की नाम रखलकै गाम में केकरो नहि बुझल आ किंचीत ओकरा अपनों इआद होए की नहि | ओ एहि उपनाम सँ गाम भरि में जानल जाइत छल | खेतिहर मजदूर मुदा जीवन भरि उर्मील बाबूक छोरि दोसर केँ खेत पर काज नहि कएलक | हुनके जमीन पर जनमल आ हुनक एवं हुनके परिवार केँ जीवन भरि सेबा करैत एहि संसार सँ अपन पार्थिक शरीर छोरि बिदा भए गेल | जेकर जन्म भेलैक ओकर मृत्यु निश्चिन्त छैक एहि सत्य केँ मोन राखि फेकनाक समांग सब ओकर अन्तिम क्रियाक तैयारी में लागि गेल | उर्मिल बाबू नोत पुरै लेल दोसर गाम गेल रहथि | गामक सीमा में पएर राखिते मांतर कएकरो सँ फेकनाक मृत्युक समाचार भेट गेलैंह | सुनि दुखी मोने घर दिस डेग झटकारलैंह | किछु दूर एला बाद रस्ते में हुनका फेकनाक शवयात्राक दर्शन भेलैंह | फेकनाक समांग सभ हुनका देख ठमैक गेल | उर्मिल बाबू चटे जा कए फेकनाक झाँपल मूह उघारि ओकरा मूह देखला आ नम आँखि सँ फेकनाक बेटा सँ पूछलथि - "अग्निदाह केँ व्यबस्था कतए छैक |" " ठूठी गाछी में मालीक |" " दूर बुरि कहिंके, कनीक हमरो आबैक इंतजार तँ करै जैतअ, जीवन भरि हमर जमीन पर काज केलक आ आब मूइला बाद ठूठी गाछी.... | चलअ हमर कsलम चलअ, हमर कsलम में नहि जगह केँ कमी अछि आ नहि गाछक ओतए दुनूक व्यबस्था छैक " ई कहैत उर्मिलबाबू आगू-आगू आ सभ हुनक पाछु-पाछु हुनकर कsलम दीस बिदा भए गेल | ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। कैलास दास, पत्रकार, जनकपुर 'अंगना सुखल घरमे पानि' 'अंगना सुखल, घरमे पानि, भरि बर्खा उपछु पानि ।' एकर मतलव स्पष्ट रुपे सभ किओ बुझि गेल होएब जे वर्षा होइते नगरमे रहयवाला सभकेँ कतेक सुख आ कतेक आनन्द अबैत अछि । आनन्दक मतलब सडक पर गंगा जमुना जेकाँ पानिक धार बहैत रहैत अछि आ लोक सभ मोटरसाइकिल, साइकिल, जीपकार चला-चला कऽ आनन्द लैत रहैत अछि । ओतबे नै, बौआ बुच्ची सभ पानिक आनन्द अओर बेसीए लैत रहैत अछि। ओ सभ अपन दुर्दशा बिसरि जाइत अछि, पानिमे खेलबाक क्षणमे । ओतबे कहाँ, बुद्धिजीवी सभ सडकक दुनू कात बड आनन्द पूर्वक ठाढ. पानिक आनन्द उठबैत रहैत अछि । देखबामे अबैत अछि, सडक कातमे रहल दोकान सभमे पानि घुसल अछि । कोनो दोकानदार समान सभ निचाँ-उपर करएमे व्यस्त नजरि अबैत छथि तँ कोनो पानि उपछैत-उपछैत अपसिहात भेल रहैत छथि । ओइ समयमे ओ दृश्यकेँ कतेको गोटे मनोरञ्जनकेँ रुपमे लैति छथि तँ कतेको गोटे दु:ख व्यक्त करैत छथि। ओना वर्षा बन्द भेलाक बाद दू-चारि घण्टामे सडकक पानि बहि नदीमे चलिए जाइत अछि। मुदा घरमे पैसल पानि एकटा पोखरिक आकार लऽ कऽ दू चारि दिन धरि घर विहीन कऽ दैत अछि । जिनकर बीस/पच्चीस वर्ष पुरान घर अछि, हुनका घर रहितो गाम घरसँ बेकार जीवन रहय लेल बाध्य कऽ दैत अछि। उपरसँ वर्षा आ निचा घरमे पोखरि जकाँ पानि । आखिर सोचियौ एकर दोषी के छथि? नगरमे रहयवाला लोक वा नगर विकासक सम्बन्धमे सोचएवाला बुद्धिजीवी, कर्मचारी अथवा नेपाल सरकार? कोनो नगर विकासक लेल एकटा कानून होइत अछि । आ ओइ कानूनक दायरामे रहि कऽ विकास करबाक दायित्व सभ गोटेकेँ होइत अछि । मुदा एहेन प्रावधान जनकपुरमे नै अछि । नहिये अखन धरि छलै । एकर नतीजा अछि 'अंगना सुखल घरमे पानि' । प्रत्येक वर्ष नयाँ घर बनैत अछि । पुरनका घर सँ दू चारि फिट उपर । नयाँ सडक बनैत अछि एक दू फिट उपर । एहने यदि बेरबेर होइत रहलैक तँ नगर भितर रहएबला कहियो शहरक अनुभूति नहिए कऽ सकैत अछि। घर निर्माणक लेल घरक ऊँचाइ, सड़क उचाइक मापदण्ड लाबही टा पड़तै । ओतबे नै आब बनयवाला घर शहरक अनुरुप होएबाक चाही तइपर सभ गोटेकेँ विचार करए पड़तैक । नै तँ जहिनाक तहिना। ई तँ वर्षाक समस्या भेल। गर्मीक समस्या सेहो किछु कम नै अछि। सड़कसँ आगि उगलैत रहैत अछि । बाटमे चलबाक ककरो हिम्मत नै होइत अछि । ओतबे कहाँ जनकपुरक प्राय: सभ कलक पानि सेहो सुखा जाइत अछि । जनकपुर धार्मिक पर्यटकीय स्थल मात्र नै अछि, र्इ एकटा मिथिलाक राजधानी सेहो अछि । धर्म संस्कृति, कला, भेषभूषा आ माता जानकीक जन्म स्थल। किन्तु शहरक जे संरचना होएबाक चाही, विकासक गति आ सोच होएबाक चाही से कोशो दूर पाछु अछि। जनकपुरमे आबि कऽ माता जानकीक दर्शन कएला सँ पर्यटक मात्र धन्य-धन्य नै हएत । पर्यटक लेल पर्यटकीय वातारणकेँ बनाबए पड़तै। पर्यटकक लेल मनोरञ्जनात्क, दार्शनिक, घुमफिर करयवाला शुद्ध वातावरण होएबाक चाही। पर्यटक सभ कोनो समय, मौसम, दिन, महिनामे आबि सकैत छथि । मुदा सोचियौ यदि पर्यटक चैत बैशाखक कडा धूपमे आबि जाए तँ हुनका सभक लेल कोनो पार्किङ्ग, आनन्द करयवाला स्थल, घुमफिर करयवाला बाटघाट नै अछि। कडा धूपमे एक ठाम सँ दोसर ठाम नै आबि जा सकैत छी । सडकपर नाक मुँह कपडासँ झाँपि कऽ चलए पडैत छैक । साउन भादबमे पर्यटक आएल तँ नै नाला आ नै सडकक पता लगा सकैत अछि । सभ गोटेकेँ जनकपुरक बात बुझल अछि मुदा सभक चुप्पी प्रश्न चिन्ह ठाढ. कऽ दैत अछि। जनकपुरक बुद्धिजीवी सभ जनकपुरक शहरीकरण आ धार्मिक पर्यटकीय स्थल बनेबाक लेल कतए हेरा गेल छथि। विचार विमर्श आ विकास दिस अग्रसर होबए लेल हुनका सभकेँ कोन गेठरीमे बान्हि देल गेल अछि से नै खुलि रहल अछि । एकटा कहावत छैक 'आवश्यकता अविष्कारक देन होइत अछि ।' तँए यदि जनकपुरक विकासक आवश्यकता बुझाइत अछि तँ जनताकेँ सडकपर आबहे पडतै । नै तँ 'अंगना सुखल, घरमे पानि, भरि बरखा उपछु पानि ।' ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। मुन्नी कामत १ नाटक अंधविश्वास प्रथम दृश्य गंगा- बउआ………..बउआ, सुतल छहक की, देखहक बाबू दरबाजा पर बजबै छऽ। शंकर- कि, आ..हू हू हू…। गंगा- कि भेलऽ। एना किए कराहै छहक। माय गे, माय हो, देेह तँ झरकैत छह। बउआ आँखि खोलऽ, (रूदन स्वरमे) हयौ सुनै छिऐ, दौड़ू यौ, देखियौ बउआ कऽ कि भेल। यौ, आँखि ताँखि उलटेने छै यौ, जल्दी आउ ने। (रामाक धोती सम्हारैत आंगनमे प्रवेश) रामा- एना चिकरनाइ भोकरनाइसँ काम नै चलत। जाउ दौड कऽ गोसाईं घरसँ गंगाजल नेने आउ। (गंगा दौड कऽ जाइत अछि आ गंगाजलक डिब्बा नेने अबैत अछि आ कनैत-कनैत कहैत छथि।) गंगा- हे काली माइ, हमरा कोइखक लाज राखब। हमर लालकेँ ठीक कइर दिअ। हम सहि कऽ सांझ देब। रामा- पहिले गंगाजल लाउ ने तब कोबला-पाती करैत रहब। (रामा अपन पत्नीकेँ हाथसँ झटैक कऽ गंगाजलक डिब्बा छीन लैत अछि आ शंंकरक उपर गंगाजल छीट हुनकर मुॅंह वएह जलसँ धोइ दैत अछि।) रामा- बउआ उठऽ, केना लगै छऽ आब। शंंकर- बाबूजी, हमर माथा दर्दसँ फाटल जाइत अछि आ जाड़ सेहो होइत अछि। रामा- अच्छा लै ई कम्बल ओढ़ि कऽ सुइत रहऽ, कनिकबे कालमे सभ ठिक भऽ जेतऽ। यै सुनै छिऐ शंकरक माय। गंगा- कि कहै छिऐ। रामा- बउआक माथपर पीरी परहक भभूत लगाउ आ अकरा अराम करऽ दियौ। पटाक्षेप दोसर दृश्य (पति-पत्नी अपन कक्षमे बेटाक हालत पर विचार विमर्श करैत।) गंगा- कि भेल, किए अहाँ काल्हिसँ चुप छिऐ? कि कोनो अभास भऽ रहल अछि? कहू ने, के भइडाही केने छइ। एक बेर अहाँ नाम कहि दिअ, अखने झोटा पकड़ि पोटा निकालि देबै आ घिसियाबैत पूरा गाम ओंघरेबै। सँइखोउकी बेटखोइकी सभ ककरो नीक देखै लेल नै चाहै छइ। रामा- (जोरसँ) बन्द करु अपन सत्यनरायलनक कथा। ई ककरो केलहा नै अपने घरक गोसाँइ अछि। आइ तक ककरो एहेन बोखार देखने रहिऐ। अपन देहमे अतेक आगि देविये रखैत अछि। जरूर हमरासँ कोनो गलती भेल जे हमरा पर मइया तमसा गेलखिन। हमरा हिनका शांत करै लेल गुहार लगबइये पड़त। गंगा- अहाँ तँ अपने भगत छी। कौल्हका दिन निक अछि, काल्हिये बैसकी बैठाउ। हम जाइ छी, पूजाक सामग्री जुटबै लेल। (गंगाक प्रस्थान होइत अछि आ रामा गम्भीर सोचमे डुबल रहैत अछि।) पटाक्षेप तेसर दृश्य (एगो दौरामे पूजा सामग्री एकट्ठा करि गंगा आ शंंकरक आगमन, हुनके पाछू दू-चाइर लोकनी सेहो अबैत अछि।) गंगा- बउआ बाबू आबै छऽ, ताबे तूँ पूजा करऽ। ई फूल अक्षत चढा कऽ धूप देखबऽ। शंकर- (फूल जल चढबैत कहैत छथि) आब की करब? गंगा- अतऽ कल जोइड़ बैठू। (रामाक संगे चारि लोग जे ढोल आ झाइल लेन अछि, हुनकर प्रवेश।) रामा- शंकरक माय सभ तैयारी कऽ लेलौं? गंगाजल संगेमे राखने रहब। (रामा गोसाँइ निपैत अछि आ फूल अक्षत चढा कऽ माँक प्रार्थना करऽ लगैत अछि। चारू लोकनी डाला बिचमे रखैत माँक गुहार लगबैत अछि आ ढोल झाइल सेहो बजबैत अछि।) चारू लोकनी- तोहरे दुआरे मइया हम अर्जी लगैलियइ हेऽऽऽऽऽऽऽऽऽ हूंऽऽऽऽऽऽऽ बोल जय गंगे, बोल जय गंगे, बोल जय गंगे। बोल कि कष्ट छउ, किए बजेलऽ हमरा, बोल, बोल, कि भेलउ? गंगा- हे मइया, कि गलती भेल हमरासँ आ हमरा घरवालासँ। सभ दिन तँ अहींक पिरी निपैत आँखि खुलैत यऽ हमर, कि अपराध भेल जे हमरा बेटाकेँ अहाँ चारि दिनसँ मतेने छी। रामा- अहिना भूइज कऽ खेबउ। अपना खाय छऽ छप्पन प्रकार आ हमरा लऽ फूल अक्षत। एक दिशसँ सभकेँ भूइज-भूइज खेबउ। गंगा- एना किए कहै छऽ, अगर हमरासँ कोनो कुघटी भेल तँ हमरा माफ कइर दिअ, अहाँ जे कहब हम सभ करै लेल राजी छी। रामा- तँअ ठिक छइ, हमरा जानक बदले जान चाही। हमरा हर अमावश्याक राइतमे इकरंगा खस्सीक बैल देबही तँ तोहर कल्याण भऽ जेतउ। ले ले, लेह अक्षत, बोल बोल जय गंगे, बोल बोल जय गंगे, बोल बोल जय गंगे। गंगा- अहिना हएत भगवान, हम जानक बदले जान देब। रामा- होऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽ हएऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽ बोल जय गंगा, बोल बोल जय गंगे, बोल बोल जय गंगे। आब हम चलै छी। पटाक्षेप चौथा दृश्य (ग्रामीणक बीचमे) गंगा- हयोउ, जब घरक देवता बैल मांगै छइ तँ अहाँकेँ दइमे कि हिचकिचाहट भऽ रहल अछि। बउआ दिश देखियौ तँ, आइ पॉंच दिन भेल, बेदरा एक बेर नै आँखि खोलइ यऽ। रामा- आब अपन गहबरमे बैल नै पड़ैत अछि, हमर बाबा अपन अंगोरिया आंगुर चिर कऽ बैल सौपने रहथि, ओही कऽ बदले लरू चढबैत रहथि। केना फेरोसँ बैल दी वएह सोचै छी। गंगा- अहाँकेँ बेटाक चिंंता नै अछि? हम बैल देबै, हम वचन देने छी। एगो ग्रामीण- हो रामा, किए अतेक सोचै छऽ तूँ। अपना मने तँ नइ दै छऽ। माँ मांगलकऽ। जाधरि तूँ बैल नइ देबहक शंंकर ठीक नइ हेतऽ। बेटा लऽ दऽ दहक। गंगा- सुगनी लग एक रंगा खस्सी छइ। लऽ आनू गऽ। हम कहने रहियै तँ कहलकै, लऽ जाउ। पटाक्षेप अंतिम दृश्य (ग्रामीणक भीड़क बीच बेहोस अवस्थामे शंंकर।) गीत- काली मइया हे कनिये, काली मइया हे कनिये. होइयो न सहायऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽ रघुनाथ- हयोउ, कि बात छिऐ। यौ रामा, कक्काक अइठाम अतेक भीड़ कथी कऽ छिऐ। एगो ग्रामीण- हुनका बेटा कऽ देहमे काली समैल छइ, कहै छइ कि जानक बदले जान नइ देबही तँ अकरा भूइज कअ खेबउ। अखन वएह बैइल दैत अछि, ओकरे भीड़ छिऐ। रघुनाथ- कहिया तक ई अंधविश्वास रहत अहि गाममे। चलू चलि कऽ देखै छी। (रामाक घरमे रघुनाथक आगमन) रघुनाथ- काकी, कतऽ अछि बउआ, देखू। गंगा- रघुनाथ बउआ, आइब गेलहक सहरसँ। अए, देखहक ने आइ छऽ सात दिन भऽ गेलैए, आँखि नइ खोलै छइ। जाधरि बैइल नइ देबइ, नइ छोड़थिन मइया। (रघुनाथ शंंकरक नब्ज देखैत आ सिर पर हाथ राखि आँखि देखैत कहैत छथि।) रघुनाथ- काकी अहाँ सभ अपन मुर्खताक कारण अकरा जानसँ माइर देबइ। अकरा दिमागी बुखार भेल अछि। अगर इलाजमे देर करबै तँ बेटा कतौ नइ मिलत। रामा- बेसी तूँ इंगलिस नइ बतिया, ई कोनो बुखार नइ देवीक केलहा छिऐ, हमरा अपन काज करऽ दे। रघुनाथ- हो कक्का, एगो बातक जबाब तूँ सभ ग्रामीण मिल क दए। तोरा दुगो पुत्र छऽ, एगो बिमार छऽ तँ कि तूँ एगो पुत्रक जान लऽ कऽ दोसर पुत्रक जान बचेबहक, नइ ने। तँ फेर माँ काली ई कोना करथिन। हुनका लेल तँ अहि संसारमे रहैबला हर जीव माँक संतान छी। फेर ओ ई कोना करथिन। अंधविश्वासक चादरमे नइ लिपटल रहऽ। जागऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽ आबो तँ जागऽ। रामा- तूँ आइ हमर आँखि खोइल देलहक। चलऽ बउआकेँ अस्पताल लऽ चली। “जानक बदले जान देनाइ अछि ई अंधविश्वासक बाइन करि परन हमसभ ई कि नइ लेब आब ककरो प्राण। इति। २ विहनि कथा टूटल मन एगो जान छल हमरा संगे, ९ महिनाक सुख-दुखक संगी। अनेकानेक सपना हमर, अनेक सवालक जवाब छल। बहुत खुश रहए हमर परिवार। रहै इंतजार सबहक नयनमे कि कहिया ई मास खत्म हएत आ गुॅंजत किलकारी आंगनमे। आइ ओ इंतजार खत्म भेल। हम एगो मासूमकेँ जन्म देलौं, हम अपन अंशकेँ ऐ संसारमे आनलौं। हमरा लेल ओ ने बेटा छल ने बेटी। बस हमर संतति छल, हमर अरमान, हमर सपना, हमर भविष्य छल। पर कोइ नै बुझलक हमर ई आश, कहलक कि दुनियामे आँखि खोलैसँ पहिले ओ आँखि मूइन लेने छल। हम संतोष कइर लेलौं, ई नै बुझलौं कि बेटाक लालचमे ओ बेटीकेँ माइर देलनि। जे हाथ ओइ मासुमक गला पर छल उ एक बेर नै कांपल, ओकर कान अकर रूदनकेँ नै सुनलक। ई हमरे टा नै बहुत नारीक कथा छी। हम अवला नै पर ऐ समाज आ अपनाकेँ आगु अवला बनैल गेल छी, जबतक हम जुर्म सहैत रहै छी तबतक हम परित्याग, शांति आ ममताक मूर्ति छी। जब ओकर जुर्मकेँ आगु खरा उतरै छी तँ हम कुलच्छनी आ कलंकनी छी। आखिर हमहूँ ऐ संसारक गारीक एगो पहिया छी, अगर एगो पहिया निकलि जएत तँ असगर कतेक दूर तक अहाँ नै संसारकेँ लऽ जा सकब। कहिया तक बेटीक बली चढ़बैत रहब आ मायक कलेजाकेँ छन्नी-छन्नी करैत रहब। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। बलराम साहु विस्मित होइत हमर लोक संस्कृति काठक खराम, मुजक चटकुनी, हाथसँ लिखल कोहवर, बिआहक गीत, सोहर-समदाउन, फगुआक जोगीरा, भोरका पराती, बटलगनी, डोमकच, जट-जटीन, शामा-चकेबा, भगैत, नचारी, अल्हा–ऊदल, ब्रजभान, सीत-बसंत, राजा-सल्हेशक अमर गाथाक नौटंकी, विभिन्न अध्यात्मिक-समाजिक घटनाक्रमपर आधारित नाटक आ नौटंकी, गामक घूर आ घूर लग होइत पंचपती, पचमेड़क जलखै, ताबापर तरल तिलकोरक तरूआ, कोजगराक मखान, चूड़ा-मुरहीक सनेश, पुरनीक पात, ओहार लागल बैलगाड़ी, जवारी भोज, ससूर-भैंसूरक धाक, पैघक पएर छूबि लेल असीरवाद यएह सभ तँ मिथिलाक अद्वितीय संस्कार आ संस्कृति अछि। मुदा अत्याधुनिक भौतिकवाद आ अधकचरा पश्चिमी संस्कृतिक समागमक कारणें उपरोक्त विशुद्ध देशी शब्दक अनेकानेक शब्द नवका पीठीक लेल अनभुआर भऽ गेल। नवतुरिया लोकनि ऐ शब्दकेँ विदेशज बूूझि रहल छथि। जौं किछु परम्परागत संस्कृति अवशेषक रूपमे बँचलो अछि तँ नव पीढ़ी ओकरा ओछ, घटिया आ हीनताक प्रतीक मानैत छथि। दोसर दिस किछु परम्परागत लोक संस्कृति आजुक भौतिकवादी व्यवस्थाक प्रभावमे अपन स्वरूप बदलि नव नाम आ स्वरूपसँ प्रचलित भऽ स्वयंकेँ विकसित कहेबाक प्रयास कए रहल छथि। सोहर-समदाउन, जट-जटीन, पराती, भगैत, अल्हाक स्थान आॅरकेस्ट्रा आ फुहर भोजपूरी गीत तँ अल्हा-ऊदल, दीनाभद्री, राजा सल्हेसक अमर गाथा नंग-धरंग अपसंस्कृतिक परिचायक थियेटरसँ विस्थापित भऽ गेल, भाँगक गोली विदेशी शराब आ देशी पाउचमे हेरा गेल, गामक पंचायत इतिहासक हिस्सा बनि गेल, फगुआक जोगीरा आ जूरशीतलक नचारीपर बैशाखीक भाँगड़ा भारी पड़ि गेल, गामक मेला, हाट-बाजारक मौल संस्कृतिमे पूर्ण रूपेण समावेसित भऽ अपन अस्तित्व मेटा देलक अछि। हमर समाज विभिन्न अवसरपर अल्हा-ऊदल, कुमर व्रजभान, दीना भद्री, सीत-बसंतक अमरगाथा देखि आ सूनि स्वयंकेँ गौरवान्वित बुझैत राजा हरिश्चन्द्रक सत्यवादी स्वरूपसँ प्रेरणा लैत छल तँ श्रवणकुमारक नाटकसँ मातृ-पितृ भक्तिक ज्ञान प्राप्त करैत स्वयंकेँ श्रवण कुमार बनबाक प्रयाश करैत छल। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। जगदीश प्रसाद मण्डल तीनटा विहनि कथा-एकटा लघुकथा (1) पटोर किशोरी ऐठाम बिआहक काज तेतरी सोहो देखलक। पक्का पति परायण तेतरी। राति-दिन पतिक विचारक सेवा हृदैसँ करैत। रंग-रंगक पटोर साड़ी पहिरल देखि लाड़-झाड़ करैत पति-गुलेतीकेँ तेतरी कहलक- “हमरो पटोर साड़ी कीन दिअ?” अनुकूल रखै दुआरे गुलेती अनुकूल शब्दक सहारा लैत सोचए लगल जे जहिना अन्हार घर साँपे-साँप होइ छै तहिना ने दुनू गोरे छी। रंगक चमकी देखि ओ (तेतरी) लटुआएल अछि आ अनुकूलक अपने लटुआएल छी। मुदा छी तँ दुनू एक्के रंग। जखन एक्के रंग छी तखन बीचमे बाधा कथीक। जेहने अपने पटोर साड़ीक सम्बन्धमे जननिहार, किनिनिहार छी तेहने ने ओहो अछि। तखन तँ भेल जे, की परसै छी, तँ फूसि। तहन कनी लगा कऽ देबै। ओना अपन आँट-पेट देखि गुलेती सहमल नै। बुझलक जे जहिना गुलेतीक शिकार तहिना ने मुँहक शिकार होइए। दुनूक सोल्हैनी गाराँटी थोड़े अछि। तहूमे चोबिसो घंटा संग रहनिहारि नारीक नश-नश नै बुझी तँ ई केकर दोख। जहिना कलीसँ गुलाब छिटैक छिटकए लगैत तहिना चौवन्निया मोती छिटकबैत गुलेती बाजल- “केहेन पटोर लेब?” जहिना स्वर्गक आशामे लोक, सभ किछु दान करैले तैयार रहैत अछि तहिना पटोरक आशामे तेतरी भेल। हजारोक भीड़मे जहिना प्रेमी प्रेमीकेँ पकड़ि सटि जाइत, तहिना गुलेतीक हृदैमे तेतरी सटि गेल। गोदीक बच्चाक सुतैक भार जहिना गोद लैत तहिना एेलिसाएल तेतरी बाजल- “जेहने किशोरीक अंगनामे देखलिऐ।” “एक्के रंगक देखलिऐ?” “नै, सभ रंगक रहै।” एकटा संगी रहने ने लोक हराइए जौं तइसँ बेसी होइ तँ केना हराएत? जेतइ हराए लागल ततै संगी भेट जेतै। पत्नीकेँ हराइत देख गुलेती बाजल- “अहाँक विचार नै मानब तँ दुनियाँमे केकर विचार मानै बला अछि। अहाँकेँ हाथ पकड़ि अनने छी तहन विचार केना नै मानब। अहाँक मांग मानि लेलौं। कागजमे लिख लेलौं। जइ दिन बजार जाएब तइ दिन किनने आएब। खाली बजार जाइ घड़ी पुरजी मोन पाड़ि देब अहाँ। अच्छा एकटा बात बूझल अछि, ओ साड़ी (पटोरबला) एक्के बेर पहिरला बाद खिंचल जाइ छै से। से सभ दिन कतए खिंचबै?” साड़ी खिंचब सूनि तेतरीकेँ तरास उपकल। उपकिते पिआससँ बाजलि- “तहन ऐबेर छोड़ि दिऔ। आगू साल अगते कीन देब।” भार घुसकैत गुलेती दुनू जाँघपर हाथक शान पिजबैत बाजल- “कहू तँ भला, अच्छा अहीं माेन पाड़ि दिअ जे एतेक उमेरमे अहाँक कोन गप कहिया कटलौं?” केकरो गप अपने टूटि जाइ छै तँ ऐमे केकर दोख। हँ तखन ई बात जरूर भेल अछि जे गामक चालि बदलल! पहिने गाममे चोरकेँ अबिते जएह देखलक सएह चोर-चोर हल्ला करए लगैत छल मुदा अर्थक चक्का तेहेन दिशा पकड़ि लेलक जे सामाजिकता तहस-नहस भऽ गेल अछि। जहिना राम-रावणक बीचक जे तीर चलए आ दस-दस बीस-बीस गर्दनि कटि हवामे उधियाइत एकठाम भऽ सटि जाइत तहने ने भऽ रहल अछि। (ई कथा, पटोर मुन्नाजी लेल...) (2) अजाति- (2) गुरु काका, बड़का काका, पढ़ुआ काका, लाल काका, भैया काका, दोस काका, संगी काका सभ एकठाम बैस रघुनाथक गप चलौलनि। गुरु काका बजलाह- “शेतानक चरखी अछि रघुनाथा।” सह मारैत बड़का काका कहलखिन- “एहेन छुतहर एकोटा ने कुल-खनदानमे भेल।” एकमुरही गप देखि दोस काका बजलाह- “एना गौं-गौं केने नै हएत? किछु स्पष्ट विचार करए पड़त।” अपन भार हटबैत पढ़ुआ काका टपकि गेलाह- “भने दोसक विचार छै। लाल भाय अहीं अपन िनर्णए सुना दिऔ।” गंभीर होइत लाल काका फैसला देलखिन- “रघुनाथ अजाति भऽ गेल।” (3) फुसियाह (3) सुभितगर समए भेने अनुकूल काजक वृद्धि जिनगीकेँ आगू मुँहेँ ओहिना ससारैत अछि जहिना प्रतिकूल भेने विपरीत दिशामे पछु मुँहेँ ससारैत अछि। मुदा किछु भेद तँ भइये जाइत अछि। ओ छी कम-बेशीक गणित। साँझक आठ बजैत। ओना माघक आठ राति कहबैत अछि मुदा से नै साओन-भादोक आठ साँझे कहबैए। आठ घंटा दमकल चला घरपर आबि कमलदेव गद्गदाएल मने पत्नी-सुचित्राकेँ कहलनि- “पहिने चाह पिआउ, पछाति एकटा गप कहब?” जहिना कर्म कऽ वचन सदति दबैत रहैत अछि तहिना सुचित्रा चाह बनबैसँ पहिने हठ करैत बजलीह- “सुनल रहत तँ चाहो बनबै बेर विचारब, ओना खट-खुट मन केने कहीं चाहो ने दुइर भऽ जाए।” पत्नीक बात सुनि कमलदेव सोचमे पड़ि गेलाह। शुभ काजमे अशुभ बात ओहन करामात कऽ दैत जहिना एकटा छिक्का हाइ कोटक फैसला उनटा-पुनटा दैत अछि। हो ने हो कहीं अही गपक धूनिमे चाहक धूनि बिसरि जाथि। तखन तँ दिन-भरिक मेहनति तँ मेहनते रहि जाएत, बाजल- “अनेरे कोन झूठ-फुसिक फेरिमे पड़ै छी पहिने चाह पिआउ, तखन दुनियाँ-दारीक गप-सप हेतइ।” मुस्की दैत सुचित्रा उत्तर देलनि- “तँए ने पहिने घर-परिवारक काज निबटा लिअ चाहै छी। अहीं सन पुरुख हम थोड़े छी जे भरि दिन छाती भरे खटै छी आ गामक लोक फुसियाहा कहैए।” पत्नीक बात सुनि कमलदेवक मनमे झोंक एलनि। जहिना गुम हवामे सूर्यक ताप अपन करामात करैत तहिना एक तँ कमलदेवक मनमे चाहक झोंक चढ़ल तइपरसँ पत्नीक मुँहेँ फुसियाह सुनि झोंक तेज भऽ गेलनि, बजलाह- “ने अहाँ कहने कटहर हएत आ ने गौआँ कहने बरहर हएत। कटहर कटहरे रहतै, बरहर बरहरै रहतै। एक रंग आँठी-कमड़ी भेनहि की हएत?” पतिक विचारकेँ अंकैत सुचित्रा बजलीह- “अहाँ तमसा गेलौं। तमसाउ नै। लोक जे अहाँकेँ फुसियाह कहैए तेकर कारण अछि जे काजक हिसाबसँ समए नै दइ छिऐ, घड़ीक हिसावसँ समए दऽ दइ छिऐ।” पत्नीक विचारकेँ आंकति अमलदेव दोहड़बैत बाजला- “कनी फरिछा कऽ कहियौ?” सुचित्रा- “केकरो खेत पटबैक जे समए दइ छिऐ ओ खेतक हिसाबसँ समए दिऔ। काजक समए दोसर होइ छै आ घड़ीक समए दोसर।” लघुकथा जन्म तिथि तीस बर्ख नोकरी केला उत्तर रविकान्त आइ.जी. पदसँ सेवा निवृत्ति भेलाह। जखन कि रविशंकर आइ.जी.सँ आगू बढ़ि डी.जी.पीक पदभार सम्हारलनि। साल भरि ऐ पदपर रहताह। ओते नोकरीक अवधि वचल छन्हि। तीन दिन रविशंकरकेँ पदभार सम्हारला उत्तर रविकान्तकेँ मन पड़लनि जे मीत-रविशंकरकेँ बधाइ कहाँ देलियनि। कारणो भेलनि जे पनरह दिन पहिनेसँ जे कार्य-भार दिअए लगलखिन ओ नोकरीक अंतिम दिन धरि नै फरिछौट भऽ सकलनि। मनमे एलनि जे मोबाइलेसँ बधाइ दऽ दिअनि। मुदा एक्के काजक तँ भिन्न-भिन्न जुइत होइत अछि। जुइतिक अनुकूले ने काज अनुकूल होइत अछि, तँए मोबाइलसँ बधाइ देब उचित नै बूझि पड़लनि। ओना तत्काल जानकारीक रूपमे दऽ समए लेल जा सकैत छल। मुदा से नै भेलनि। चाहक कप टेबुलपर रखि, दहिना बाँहि उठबैत पत्नी-रश्मिकेँ कहलखिन- “की ऐ बाँहिक शक्ति क्षीण भऽ गेल जे काज नै कऽ सकैए। मुदा.....?” रश्मि अपना धुनिमे छलीह। ओना एके टुबलपर बैसि चाहो पीबैत छलीह आ मेद-मेदीन चिड़ै जकाँ मुँहमिलानी गपो-सप करैत छलीह। अपने धुनिमे मनो बौआइत छलनि। एकठाम बैसि चाह पीबितो मन दुनूक दुदिशिया छलनि। रश्मिक मनमे रविशंकरक पत्नी किरण नचै छलखिन। जिनगी भरि सखी-बहीनपा जकाँ रहलौं, मुदा आइ? आइ ओ रानीसँ महरानी बनि गेली आ....? की हम ओइ बटोहिनी सदृश तँ ने भऽ गेलौं जेकरा सभ किछु छीनि घरसँ निकालि देल जाइ छैक। जहिना कोनो नीनभेर बच्चा माइक उठौलापर चहाइत उठैत बेसुधमे बजैत तहिना पतिक प्रश्नक उत्तर रश्मि देलखिन- “ऐ बाँहिक शक्ति ओतबे काल रहै छै जते काल शान चढ़ाएल हथियार ओकरा हाथमे रहै छै। नै तँ प्राणशक्ति निकलला उत्तर शरीर जहिना माटि बनि जाइ छै तहिना बनि कऽ रहि जाइत अछि। हाथसँ हथिहार हटिते जिनगी हहरए लगै छै।” पुन: चाहक कप उठा चुस्की लैत रविकान्त बजलाह- “बच्चेसँ दुनू गोरे संगे रहलौं। खेनाइ-पीनाइ, खेलेनाइ-धुपेनाइ, घुमनाइ-फीरनाइ सभ संगे रहल। कहाँ कहियो मनमे उठल जे दुनू गोरेमे कोनो दूरी अछि। अपनाकेँ के कहए जे घरो-परिवार आ सरो-समाज कहाँ कहियो बुझलनि। मुदा आइ....?” “मुदा आइ की?” “इहए जे...। आइ बहुत दूरी बूझि पड़ि रहल अछि। बूझि पड़ैए जे जेना अकास-पतालक अंतर भऽ गेल अछि। कोन मुँह लऽ कऽ आगू जाएब, से मन िनर्णये ने कऽ पाबि रहल अछि।” “तखन?” “सएह ने मन असथिर नै भऽ रहल अछि। जिनगी भरिक संगीकेँ ऐहेन शुभ अवसरपर केना नै बधाइ दिअनि। मुदा एते दिन बराबरीक विचार छल आब ओ थोड़े रहत। कहाँ ओ सिंह द्वारपर विराजमान केनिहार आ कहाँ हम देशक अदना एकटा नागरिक। कि अपनाकेँ ओइ कुर्सीक बुझी जइसँ हेट भेलौं। सीकपर राखल वा तिजोरीमे राखल वस्तु ओतबे काल ने जते काल ओ ओतए रहैत। रविशंकर आइ ओतऽ छथि जतऽ हमरा सन-सन जिनगी अंतिम छोड़पर पहुँचनिहार हुनकर हुकुमदारी करैत अछि। कोन नजरिये ओ देखै छल आ आइ कोन नजरिये देखताह?” रविकान्तक अन्तरमनकेँ रश्मि आंकि रहल छलीह। मुदा जते अाँकए चाहै छलीह तइसँ बेसी घबाएल माछ जकाँ अपन सड़नि बढ़ल जाइत रहनि। कि आँखिक सोझक देखल झूठ भऽ जाएत। केना नै भऽ सकैए। दू गोटे बीचक बात तँ ओतबे काल धरि सत्य रहैए जते काल धरि दुनू मानैत अछि। काज थोड़े छी जे गरजि कऽ कहत जे तोरा पलटने हम थोड़े पलटि जाएब। मन असथिर होइते रश्मिक मनमे विचार जगलनि। दुखक दवाइ नोर छी। पैघ-सँ-पैघ दुख लोक नोरक धारमे बहा वैतरणी पार करैत अछि। बजलीह- “जहिना अहाँक मनमे उठि रहल अछि तहिना हमरो मनमे रंग-बिरंगक बात उठि रहल अछि। कहाँ रविशंकरक पत्नी किरण राजरानी आ कहाँ हम....? कहाँ राधा संग कृष्ण आ कहाँ....? काल्हि धरि दुनू गोरे एकठाम बैसि एक थारीमे खेबो करै छलौं आ एके गिलासमे पानियो पीबै छलौं, मुदा आइ संभव अछि। आखिर किअए?” हवाक तेज झोंकमे जहिना डारि-डारिक पात डोलि-डोलि एक-दोसरमे सटबो करैत आ हटबो करैत तहिना रश्मिक डोलैत विचार सुनि रविकान्त स्वयं डोलए लगलाह। एक तँ पहिनेसँ मन डोलि रहल छलनि तइपर रश्मिक विचार आरो डोला देलकनि। गन्तव्य जगह पहुँचलापर जहिना सभ हरा जाइत तहिना हराएल मने रविकान्त बजलाह- “कानसँ सुनितो, आँखिसँ देखितो किछु बूझि नै पाबि रहल छी जे कि नीक कि अधला। की करी की नै करी। मुदा साठि बर्खक संगीकेँ एते दूर केना बूझब। मुदा लगो केना बूझब। साठि बर्खक पथिक संगी जँ दू दिशामे संगे चली तखन कते दूरी हएत। मुदा साठि बर्खक जिनगियो तँ छोट नै भेल?” रविकान्तक विचार सुनि रश्मि टपकि पड़लीह- “जिनगी तँ एक दिन, एक क्षण, एक घटनामे बदलि जाइए आ साठि-बर्ख कि धो-धो चाटब।” “तखन?” “सएह नै बूझि रहल छी। एतेटा जिनगी एक संग बितेलौं मुदा आइ जइ जिनगीमे पहुँचि गेल छी तइ जिनगीक संबंधमे किछु विचार कहियो नै केलौं।” पत्नीक बात सुनि रविकान्तकेँ जहिना आन गामक चौबट्टी, तीनबट्टीपर पहुँचिते भक्क लगि जाइत, जइसँ पूब-पच्छिमक दिशे बदलि जाइत। मुदा एहनो तँ होइते अछि जे लगलो भक्क ओहने चौबट्टी, तीनबट्टीपर खुजितो अछि। अपन भक्क तँ तेना भऽ कऽ नै खुजलनि, खाली एकटा प्रश्नेटा उठलनि जे बच्चासँ सियान भेलौं, सियानसँ चेतन भेलौं, चेतनसँ बुढ़ाड़ीक प्रमाणपत्र भेट गेल। हरवाह थोड़े छी जे अधमड़ुओ अवस्थामे बुढ़ाड़ीक प्रमाण नै भेटै छैक। केना भेटिते प्रमाणपत्रक संग पेन्शनो ने अबै छै। मुदा मन किअए धक-धका रहल अछि। जिनगीक चारिम अवस्था वानप्रस्त होइ छै, संयासीक होइ छै जे दिन-राति दौड़ैत दुनियाँक हाल-चाल जानए चाहैत अछि। से कहाँ मन मानि कऽ बूझि रहल अछि। पतिकेँ गंभीर अवस्थामे देखि रश्मि टिपलनि- “अहाँक मनमे जे नाचि रहल अछि उहए हमरो मनमे नाचि रहल अछि। मुदा ईहो बात तँ झूठ नहिये छी जे जिनगीक संग बोटो बनै छै। आ बाटे संग बटोहियो बाट बनबै छै।” रविकान्त- “की बाट?” पतिक प्रश्न सुनि रश्मि विह्वल भऽ गेलीह। हेराइत संगीकेँ बाट देखाएब बहुत पैघ काज छी। मुदा लगले मनमे उठि गेलनि जे तखन अपने किअए एते बौआइ छी। कम-सँ-कम चाह पीबै काल बैसारियोमे ऐ बातक विचार करैत अबितौं तँ आझुका जकाँ तँ नै बौऐतौं। जहिना जोतल आ बिनु जोतल खेतमे चललासँ पहिने धड़िआइ छै, धड़िएलाक पछाति पतिआइ छै, पतिएलाक पछाति पेरिआइत पेरा बनै छै। वहए एकपेरिया बहुपेरिया बनैत चलै छै। रश्मि बजलीह- “अहाँ कओलेज छोड़ला उत्तर जिम्मा उठा सरकारी बाट पकड़ि साठि बर्ख पूरा लेलौं। ने कहियो जमीन दिस तकैक जरूरति महसूस भेल आ ने तकलौं। मुदा आइ तँ ओतइ उतरि आबि गेल छी जेकर रस्ता अखन धरिक रास्तासँ भिन्न अछि।” पत्निक विचार सुनि रविकान्त मुड़ी डोलबैत आँखि उठा कखनो पत्नीक आँखिपर रखैत तँ कखनो उतारि धरतीपर दइत। जहिना आगिपर चढ़ल कोनो बरतनक पानि निच्चासँ ताउ पाबि ऊपर उठि उधियाइक परियास करैत तहिना रविकान्तक वैचारिक मन सेहो उधियाइक परियास करैत रहनि। मुदा जहिना पिजराक बाघ पिजरेमे गुम्हरि कऽ रहि जाइत, तहिना आइ धरिक जे मन रूपी बाघ एहेन शरीर रूपी पिजरामे फँसि गेल छलनि जे जत्ते आगू मुँहेँ डेग उठबैक कोशिश करैत ओत्ते समुद्री बादल जकाँ आस्ते-आस्ते ढील होइत रहनि। आगूक झलफलाइत बाट देखि रमाकान्त बजलाह- “विचारणीय बात जरूर अछि, मुदा बिनु बुझलक जिनगीक संग तँ अहुँक जिनगी चलल। कहाँ कतौ बेवधान भेल। आइ जे कहलौं ओ तँ ओहू दिन कहि सकै छलौं, जइ दिनसँ बहुत आगू धरि बढ़ि गेलौं। से तँ रोकि कऽ मोड़ि सकै छलौं। मुदा आइ तँ जानल-बिनु (ज्ञानी-मूर्ख) जानल दुनू संगे बौआए चाहै छी!” पतिक बात सुनि रश्मि मने-मन विचार करए लगलीह जे दुनियाँमे एहनो लोकक कमी नै अछि जेकरा जरूरति भरि लूरि-बुधि नै छै, मुदा ईहो तँ झूठ नै जे जेकरा छेबो करै ओइमे बेसी ओहने अछि जे या तँ उनटा वाण चलबैए वा नहिये चलबैए। तखन सुनटा वाण केना आगू बढ़त जँ बढ़बे करत तँ कते आगू बढ़त जेकरा आगू दुश्मन जकाँ चौबगली उनटा वाण घेरने अछि। मुदा उपाए की? शुद्ध तेल-मोबिल देल मजगूत इंजनो चढ़ाइपर दम तोड़ए लगै छै मुदा टुटलो चक्का बिनु तेलो-मोबिलक भट्ठा गरे दौगैत बिनु ब्रेकक गाड़ी जकाँ केत्तेकेँ जानो जइए आ केत्तेकेँ मुँहोँ-कानो फोड़ैए। डेग आगू उठाएब जरूर कठिन अछि। मुदा लगले मनमे उठलनि जे जइ बाट पकड़ि आइ धरि चललौं जौं ओही बाटकेँ छोड़ि दोसर बाट पकड़ि नव बटोही जकाँ विदा होइ, ई तँ संभव अछि। जहिना चिन्हार जगहक चोर पड़ा दूर देश जा अपन क्रिया-कलाप बदलि नव-मनुष्यक जिनगी बना जीबए चाहैत ओ तँ संभव छै...। वाण लागल पंछी जकाँ पतिकेँ देखि अनुभवक सान्त्वना भरल शब्द निकालि रश्मि बजलीह- “जहिना अहाँक जिनगी तहिना ने हमरो बनि गेल अछि। यएह बुढ़ापा अहाँक सएह ने हमरो अछि। मुदा एकठाम तँ दुनू गोटे एक छी। एके दवाइक जरूरति दुनू गोरेकेँ ने अछि। तँए विचार दइ छी जे आब ने ओ रूतबा रहल आ ने ओकाइत, तखन जानि कऽ जहरो-माहूर खा लेब सेहो नीक नै।” रश्मिकेँ आगूक बात पेटेमे घुरिआइत रहनि तइ बीचेमे रविकान्त टिप देलखिन- “बेसी दुख तँ नै बूझि पड़ैए मुदा साठि बर्खक प्रोढ़ा अवस्था धरि हमरा सबहक नजरि नै गेल। सरकारीक पैघ जिन्मामे रहलौं। समायानुसार काज करितो मुदा अपन जिनगी तँ सुरक्षित रखितौ। साठि बर्खक पछातियो तँ चालीस बर्ख जीबाक अछि। कि नै जनैत छलौं जे दरमाहा टूटि जाएत जिनगीक आवश्यकता बढ़ैत जाएत ओहन स्थितिमे कि कएल जा सकै छै।” पतिक विचारकेँ गहराइत समुद्र दिस जाइत देखि मुँहक दसो वाण साधि रश्मि छोड़लनि- “अनेरे मनमे जूर-शीतलक पोखरिक पानि जकाँ घोर-मट्ठा करै छै। घोरे मट्ठा ने घीओ निकालैए आ अनहै सेहो निकालैए। संयासी सभ केना फटलाहा कमलक मोटरी बान्हि कन्हामे लटका लइए आ सौंसे दुनियाँ घुमैए। अहाँकेँ तँ सहजहि चरि-चकिया गाड़ी चलबैक लूरियो अछि।” पत्नीक विचार सुनि रविकान्त ओझरा गेलाह। एक दिस संयासीक बात बाजि कहि रहल छथि जे जहिना कानूनी अधिकारसँ जीवन-रक्षा होइत तहिना ने संयास अवस्था -वानप्रस्त- पवित्र मनुष्यक नैतिक अधिकार सेहो छी। दोसर दिस चरि चकिया गाड़ीक चर्चा सेहो करै छथि जे भरिसक अपनो लगा कऽ कहै छथि। संगी देखि रविकान्त दहलाए लगलाह। जहिना कोसी-कमलाक बाढ़िमे भँसैत घरपर बैसि घरवारी वंशियो खेलाइए आ कमला-कोसीक गीतो गवैए, तहिना विह्वल भऽ रविकान्त बजलाह- “हँसी-मजाक छोड़ू। आब कोनो बाल-बोध नै छी। हम सभ अपन जीवन अपन सामाजिक जीवन नै बनाएब तँ देखिते छिऐ जे मनुष्य एक दिस चान छूबैए तँ दोसर दिस सीकीक वाणक जगह बम-वारूद लऽ मनुष्यक बीच केहेन खेल दुनियाँमे खेल रहल अछि। खैर, ओते सोचैक समए आब नै रहल। जेकर तिल खेलिऐ ओकरा बहि देलिऐ। अपन चलीस बर्खक जिनगी अछि, ने हमर कियो मालिक आ ने हम केकरो मालिक छिऐक। भगवान रामकेँ जहिना अपन वानप्रस्त जीवनमे अनेको ऋृषि-मुनि, योगी-संयासी सभसँ भेँट भेलनि आ अपनो जा-जा भेँटो केलखिन। तहिना ने अपनो दोसराक ऐठाम जाइ आ ओहो अपना ऐठाम आबए। मुदा विचारणीय प्रश्न ई अछि जे रामकेँ के सभ भेँट करए एलनि आ किनका-किनका ओतए भेँट करए स्वयं गेलाह। ई प्रश्न मनमे अबिते गाछसँ खसल पघिलाएल कटहर जकाँ मन छँहोछित्त भऽ गेलनि। खोंइचा-कमरी संग एक दिस तँ दोसर दिस कोह उड़ि-उड़ि कौआ आगू पहुँचि जाइत। आँठी छड़पि-छड़पि बोन-झारमे बच्चा दइ दुआरे जान बँचबैत, तँ नेरहा उत्तर-दछिने सिरहाना दऽ पड़ल-पड़ल सोचैत जे जते पकबह तते सक्कत हेबह तँए समए रहैत भोजन बना लैह नै तँ दुइर भऽ जाएब। रविकान्त सोचैत-सौचैत जेना अलिसाए लगलाह। हाफी भेलनि। रविकान्तकेँ हाफी होइत देखि रश्मिक मनमे उठलनि जे हाफी तँ निनिया देवीक पहिल सिंह दुआरिक घंटी छी। भने नीक हेतनि जे सुति रहताह नै तँ एे उमेरमे जौं निन उड़लनि तँ अनेरे सोलो-महीनेमे बदलि जेतनि। फटकारि कऽ बजलीह- “जते माथ धुनैक हुअए वा देह धुनैक हुअए अपन धुनू। हमर जे काज अछि तइमे हम विथूत नै हुअए देव। हमरा लिये तँ अहीं ने सभ किछु छी।” तीन सए घरक बस्ती बसन्तपुर। छोट-नमहर चालीस टा किसान परिवार शेष सभ खेत-बोनिहारसँ लऽ कऽ आनो-आनो रोजगार कऽ जीवन-बसर करैत अछि। अनेको जाति गाममे। ओना मझोलका किसान बेसी। ओकरो दशा-दिशा भिन्न-भिन्न। तेकर अनेको कारणमे दूटा प्रमुख। जइसँ विधि-बेबहारमे सेहो अंतर। किछु जातिक लोक अपने हाथे हरो-जाेइत लैत आ खेतक काजो करैत जइसँ आमदनीक बचतो होइत आ किछु एहनो जे अपने हाथसँ काज-उदम नै करैत तँए बचत कम। कम बचत भेने परिवार दिनानुदिन सिकुड़ैत जाइत। ओना गामक बनाबटो भिन्न अछि। एक तँ ओहुना दू गामक बनाबट एक रंग नै अछि। तेकर अनेको कारणमे प्रमुख अछि, खेतक बुनाबट, जनसंख्या जाति इत्यादि। बसन्तपुरक बुनाबटि आरो भिन्न। ऊँचगर जमीन बेसी निचरस कम अछि जाइसँ गाछी-बिरछी सेहो बेसी अछि आ घर-घ्राड़ी, रस्ता-पेरा सेहो ऐल-फइल अछि। बसन्तपुरमे दूटा नमहर किसान बाँकी छोट। नमहर किसान परिवार रहने गामोक आ अगल-बगलक आनो गामक लोक जेठरैयती परिवारो बुझैत आ जेठरैयत कहबो करैत अछि। राजक जमीन्दार तँ नै मुदा गमैया जमीन्दार सेहो किछु गोटे बुझैत। तेकर कारण जे दुनूक महाजनियो चलैत आ गामक झड़-झंझटक पनचैतियो करैत। कनी-मनी अनचितो काजकेँ गामक लोक अनठिया दैत। तइमे राधाकान्त आ कुसुमलाल दुनू गोटेक जमीनोक बनाबटि आरो भिन्न अछि। चौबगली टोल सभ बसल अछि आ बीचक जे तीस-पेंतीस बीघाक प्लॉट छै ओ मध्यम गहींर अछि। जइसँ अधिक बर्खा भेने नाला होइत पानिक निकासी कऽ लैत, कम भेने चाैबगलीक ओहासी एने रौदियाहो समैमे उपजिये जाइत। ओना दुनू गोरे बोरिंग सेहो गरौने छथि। तँए रौदियाहो समए भेने खेतक लाभ उठाइये लैत छथि। पच्चीस-तीस बीघाक बीचक दुनू किसान। मुदा दुआरपर बखारियो आ पोखरिक महारपर दू-सलिया तीन-सलिया नारोक टाल रहिते छन्हि। राघाकान्तो आ कुसुमलालोक परिवार बीच तीन पुस्तसँ उपरेक दोस्ती रहल छन्हि। ओना दुनू दू जातिक मुदा अपेक्षा-भाव एहेन जे चालि-ढालिसँ अनठिया नै बूझि पबैत जे दुनू दू जातिक छथि। किअए तँ कोनो काज-उदेममे एक-दोसराक बाले-बच्चे एक-दोसरठाम जाइत। ओना आने गामक कुटुम जकाँ दुनू परिवारक बीच कपड़ा-लत्ताक वर-विदाइक चलनि सेहो अछि। मुदा तैयो सराध-बिआह आदि पारिवारिक काजमे दुनू दू जातिक परिचय देबे करैत अछि। नमहर भूमकम होइसँ पहिने जहिना नहियो होइबला बच्चा सबहक जनम भऽ जाइत अछि जइसँ दोस्तिआरेक संभावना अनेरो बढ़ि जाइत अछि, मुदा से नै राधाकान्त आ कुसुमलाल दुनू गोटेकेँ एक्के दिन बेटा भेलनि। ओना कियो-केकरो ऐठाम जिगेसा करै नै गेलखिन तेकर कारण भेलै जे अपने-अपन घर ओझड़ा गेलनि। ओना पमरिया-हिजरनी महीना दिन धरि दौड़-बड़हा करैत रहल। दाइयो-माइ छठियारमे रविदिन एकक नाओं रविकान्त आ दोसराक नाओं रविशंकर रखि देलकनि। अनेरे फूलक बोनमे टहलितथि आकि साँप-कीड़ाक बोनमे। बोन तँ बोने छी, दुनूक छी। तँए हरहर-खटखटसँ नीक दिनेकेँ पकड़ि लेलनि। ओना एकटा आरो केलनि जे दुनूमे सँ केकरो जातिक पदवी नै लगौलनि। सुभ्यस्त परिवार रहने तीन बर्खक पछातिये स्कूल जाइ जोकर भऽ गेल मुदा चारिम बर्खमे दुनूक नाओं गामेक स्कूलमे लिखौल गेल। ओना जेहने सेझमतिया राधाकान्त तेहने कुसुमलालो। मुदा नाओं लिखबै दिन रविकान्तक पिता गेलखिन आ राधाकान्त अपने नै जा भायकेँ पठौलखिन आ रविशंकरक पित्ती एक बर्ख घटबी कऽ कऽ लिखौलखिन। ओना राधाकान्तकेँ स्कूलपर जेबाक मनो ने होइत छन्हि। किएक तँ स्कूल सबहक जे किरदानी भऽ गेल ओ देखबा जोग नै अछि। शिक्षक सभ विद्यार्थीकेँ नहिये पढ़ैक लेल प्रेरित आ नहिये पढ़ैक जिज्ञासा जगा पबैत छथि। छड़ी हाथे पढ़बए चाहैत छथि। एक तँ एक रंगाह परिवार तहूमे दोस्ती। दुनू गोरे तेहेन चन्सगर जे गामेक स्कूलसँ पटका-पटकी करैत निकलल। पटका-पटकी ई जे एक साल रविकान्त फस्ट करैत तँ दोसर साल रविशंकर ओना हाइ स्कूलमे थोड़े गजपट भेल, स्कूलक शिक्षक आंकि लेलनि जे केतबो उपरा-उपरी छै तैयो सोचन शक्तिमे दुनूमे अन्तर किछु जरूर छै। कओलेज तँ बिना माए-बापक होइए, केकरा के देखत। मुदा आनर्सक संग दुनू गोटे प्रथम श्रेणीमे निकलल। आइ.पी.एस. कऽ दुनू गोटेक ट्रेनिंग आ ज्वानिंग सेहो भेल। अपेक्षामे बढ़ोत्तरी होइते गेल। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। १.नवेंदु कुमार झा- गंगा नदी पर पूलक माध्यम सँ बढ़त कारोबारक चालि/ महिषीमे आयोजित होयत सांस्कृतिक महोत्सव/ सर्वसम्मतिसँ सभापति आ उपाध्यक्षक निर्वाचित/ बिहारमे शिक्षाक लेल मदति करत विश्व बैंक २.अमित मिश्र- कतिआएल आखर १ नवेंदु कुमार झा गंगा नदी पर पूलक माध्यम सँ बढ़त कारोबारक चालि/ महिषीमे आयोजित होयत सांस्कृतिक महोत्सव/ सर्वसम्मतिसँ सभापति आ उपाध्यक्षक निर्वाचित/ बिहारमे शिक्षाक लेल मदति करत विश्व बैंक १ गंगा नदी पर पूलक माध्यम सँ बढ़त कारोबारक चालि प्रदेश मे गंगा नदी पर पूलक कमीक कारण प्रदेश मे कारोबार के गति नहि भेटि रहल अछि। नीतीश कुमारक नेतृत्व बला राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन सरकार प्रदेशमे विकासक गति देबाक संगहि कारोबारकेँ गति देबाक दिस सेहो डेग उठौलक अछि। कारोबारक एहि समस्याक समाधानक लेल सरकार गंगा नदी पर पूल बनैबा पर विशेष जोर दऽ रहल अछि। एखन गंगा नदी पर तीनटा पूल बनि रहल अछि आ चारिम पूलक लेल सेहो केन्द्र सरकार सॅ अनुमति भेटि गेल अछि। ओ तँ एखन गंगा नदी पर चारिटा पूल अछि जाहि मे पटनाक महात्मा गांधी सेतू आ मोकामाक राजेन्द्र पूल पर बेसी भार रहैत अछि। एक दिस महात्मा गांधी सेतू संरचनात्मक खराबीक कारण मात्र एक लेन चालू अछि जाहि सॅ हरदम पूल पर जाम लागल रहैत अछि। तऽ दोसर दिस राजेन्द्र पूल बेसी पुरान होयबाक कारण बेर-बेर मरम्मतिक लेल बंद करय पड़ैत अछि। एहि स्थिति मे प्रदेशक पूर्वी आ पश्चिमी भागक मध्यक आबाजाही मे परेशानी बढ़ि गेल अछि। सरकार एहि समस्याक जनतब लेलक अछि आ एहि समस्याक समाधानक प्रयास कऽ रहल अछि। गंगा नदीक ऊपर पूल यातायात लोक सुविधा आ कारोबारक लेल आवश्यक अछि तें राज्य सरकार प्रदेश मे नव पूल बनैबाक काज तेजी सॅ चलि रहल अछि। पथ निर्माण मंत्री नंदकिशोर यादव जनतब देलनि जे एखन सरकार गंगा नदी पर दू टा पूल बनैबाक योजना बनौलक अछि। एहि मे एकटा ताजपुर-बख्तियारपुरक मध्य बनाओल जा रहल अछि। ई पूल सार्वजनिक-निजी-भागीदारी (पीपीपी)क अंतर्गत बनि रहल अछि। चारि लेनक एहि पूल पर गोटेक 1700 करोड़ टाका खर्च होयत। एकर 20-20 प्रतिशत टाका केन्द्र आ राज्य सरकार दऽ रहल अछि तथा 60 प्रतिशत टाका निजी साझेदार कम्पनी लगा रहल अछि। श्री यादव जनौलनि जे महत्वक एकटा योजनाक अंतर्गत ई पूल बनाओल जा रहल अछि। एकर अंतर्गत सरकार प्रदेश के उड़ीसाक पारादीप बन्दरगाह सॅ जोड़बाक योजना बनौलक अछि। एहि परियोजनाक मंजूरिक लेल केन्द्र सरकार सॅ लगातार गपसप चलि रहल अछि। ज्यों एकर मंजूरि भेटि जाईत अछि तऽ ई प्रदेशक लेल महत्वपूर्ण होयत आ कारोबारी गतिविधि मे सेहो तेजी आओत। ओना ताजपुर-बख्तियारपुर पूल वर्ष 2016 धरि बनि कऽ तैयार भऽ जायत। सरकार के पटनाक महात्मा गांधी सेतूक समानान्तर सेहो नव पूल बनैबाक अनुमति केन्द्र सॅ भेटि गेल अछि। पथ निर्माण मंत्री जनौलनि जे सरकार कतेको दिन सॅ एहि पूल के बनैबाक अनुमति केन्द्र सॅ मांगि रहल छल। दरअसल महात्मा गांधी सेतु आब आवश्यकताक पूर्ति करबा मे छोट पड़ि रहल अछि। पटना प्रदेशक आर्थिक गतिविधिक केन्द्र अछि। तें एहि ठाम आधुनिक आ नव पुलक आवश्यकता अछि। केन्द्र सरकार महात्मा गांधी सेतुक समानांतर छह लेन एहि पुलक अनुमति देलक अछि। एहि सॅ प्रदेशक आवश्यकताक पूरा भऽ सकत। एहि सॅ उŸार आ दक्षिण बिहारक मध्य आबा जाही आसान भऽ सकत। संगहि प्रदेश मे संगहि गंगा नदी पर बनल पूल पर बोझ कम होयत। ई पूल लोक निजी साझेदारी (पीपीपी)क आधार पर बनाओल जायत। एहि लेल साझेदारक खोज कयल जा रहल अछि। एकर अलाबा सरकारक नजरि रेलवेक परियोजना पर सहो अछि। दरअसल एखन पटना आ मुंगेर मे दू-दूटा सड़क सह रेल पूल रेलवे द्वारा बनाओल जा रहल अछि। हालांकि रेलवेक खाली खजाना के देखि ई योजना सभ जल्दी पूरा भऽ सकत। एकर भरोसा राज्य सरकार के सेहो नहि अछि। राजधानी पटनाक दीघा आ सोनपुरक परमानन्दपुर मध्य बनि रहल रेल सह सड़क पूलक निर्माण स्थिति रेलवेक वास्तविकता जाहिर कऽ रहल अछि। पछिला दस वर्ष सॅ ई परियोजना चलि रहल अछि आ एखन धरि पूरा नहि भेल अछि। वर्तमान स्थिति केँ देखि संभावित समय सीमा 2015-16 धरि पूरा होयबाक उम्मीद नहि अछि। पथ निर्माण मंत्री जनौलनि जे राज्य सरकार दीघा आ परमानन्दपुरक मध्य बनि रहल रेल सह सड़क पूल के जल्दी पूरा करबाक आग्रह केन्द्र सॅ करता एहि वास्ते राज्य सरकार अन हिस्साक टाका उपलबध करा देलक अछि। २ महिषीमे आयोजित होयत सांस्कृतिक महोत्सव मिथिलांचल ऐतिहासिक शक्ति पीठ उग्रतारा स्थान मे नवरात्राक अवसर पर उग्रतारा सांस्कृतिक महोत्सव आयोजित कयल जायत। सहरसाक महिषी स्थित उग्रतारा स्थान मे 17 आ 18 अक्टूबर केँ आयोजित एहि दू दिनक महोत्सवक उद्घाटन बिहारक मुख्यमंत्री नीतीश कुमार करताह। एहि दरमियान मिथिलांचलक सांस्कृतिक, सामाजिक आ धार्मिक विरासतक महत्व पर विचार-विमर्श होयत आ मिथिलाक सांस्कृतिक परम्परा सॅ लोकसभ केँ अवगत कराओल जायत। एहि महोत्सवक लऽ कऽ मिथिलांचल सहित पड़ोसी देश नेपालक तराई वला क्षेत्रक लोक सभ मे उत्साह देखल जा रहल अछि। ३ सर्वसम्मतिसँ सभापति आ उपाध्यक्षक निर्वाचित बिहार विधान मंडलक मॉनसून सत्रक दरमियान बिहार विधान सभाक उपाध्यक्ष आ बिहार विधान परिषद्क सभापतिक चुनाव सम्पन्न भेल। भाजपाक वरिष्ठ नेता अवधेश नारायण सिंहक विधान परिषद्क सभापति आ एहि दलक अमरेन्द्र प्रताप सिंह विधान सभाक उपाध्यक्षक पद पर सर्वसम्मति सॅ निर्वाचित घोषित भेलाह। दूनू पदक लेल मात्र एक-एकटा नामांकन होयबाक कारण हुनका निर्वाचित घोषित कयल गेल। ४ बिहारमे शिक्षाक लेल मदति करत विश्व बैंक विश्व बैंक बिहार मे गुणात्मक शिक्षाक लेल 1600 करोड़ टाकाक मदति करत। एहि पर सैद्धांतिक रूप सॅ सहमति बनि गेल अछि। शिक्षा मंत्री पी.के. शाही विधान मंडलक मॉनसून सत्रक दरमियान ई जनतब दैत कहलनि जे ई टाका दिसम्बर मास धरि उपलब्ध भऽ जायत। एहि टाका सॅ प्रदेशक प्रशिक्षण संस्थानक आधारभूत संरचना के मजगूत कयल जायत। २ अमित मिश्र कतिआएल आखर
बात चारि बर्ष पहिलुक अछि हमरा संगे एकटा संगी हमरे रूम मे रहैत छल । पढ़ैमे कने कमजोर छलै मुदा कंपटीसनमे हमरासँ 2-3 घंटा बेसीए राति कऽ जागै छल आ एकर फलस्वरूप 10 टा मे 4 टा सबाल जरूर हल कऽ लै छलै ।ओना तऽ हमरासँ बेशी बात नै करैत छल मुदा भोर होइते बाँकी बचल सबालक लेल हमरा लऽग जरूर आबि जाइत छल आ एखन ओ मित्र बी .टेक कऽ रहल अछि ।इ घटना चारि सालक बाद मोन पड़ल मुन्ना जीक एकटा शेर पढ़िकऽ
डाहसँ पहुँचब कोस-दू कोस आगू बढ़बा लेल तँ प्रेम चाही
पिछला डेढ़ महिनासँ मुन्नाजीक गजल संग्रह "माँझ आँगनमे कतिआएल छी " थोड़े-थोड़े पढ़ै छलौँह मुदा काल्हि भरि राति एकर गहन अध्ययन केलौँ ।कुल 50 टा गजल आ 10 टा रूबाइ के संग्रह अछि "माँझ आँगन मे कतिआएल छी" ।पोथीक नाम पढ़ि मोनमे किदन-कहाँदन बात सब उठऽ लागल ।कतिआएल उहो माँझ आँगनमे बिचित्र सन लागल मुदा पढ़लाक बाद हमरा लागैत अछि जे शाइर एहि समाजके आँगन आ एहि समाज रुपि आँगनक माँझ मे अपन बैसार बनेने छथि ।इ भऽ सकैए जे समाजक किछु भागसँ इ कतिआएल हेताह मुदा पूरा समाजसँ किन्नौह कतिआएल नै लागै छथि । हमर इ कथनक सत्यता एहि संग्रह के पढ़लाक बाद बुझा जाएत । इ तऽ प्रेमो केलनि तऽ समाजके ध्यान मे राकि तेँए तँ कहै छथि
सब उमरि वर्ग के प्रेम चाही मरितो दम धरि कुशल छेम चाही आशा आ निराशाके फरिछाबैत कहलनि
निराशा संग आशापर टिकल छै दुनियाँ जँ देखलँहुँ भगजोगनी तँ दिबाली बुझू
बिहारक ताकत आ कमजोरी के समेटने इ शेर
बिहारक सिरखारी बदलि गेल सन लगैए आब श्रमिक घटलासँ कंपनी मालिक लगै बिहारी जकाँ एहन-एहन कतेको दमदार शेर सबसँ सजल इ गजल संग्रह अपना-आप मे अलग पहचान बनबैत अछि ।
पहिले गजल के देखलापर एकटा बात हमरा खटकल जे छल मात्र चारि टा शेर । गजलमे कमसँ-कम पाँच टा शेर रहबाक चाही मुदा एहि संग्रहक गजल संख्याँ 1,2,7,10,11,19,22,23,24,25,27,28,32,34,35,37,39,42,43,44,47,48 मे मात्र चारिए टा शेर अछि जे की गलत अछि ।ओना शाइर आमुखक अंतीममे इ गलती स्वीकार करै छथि आ एकर जिम्मेदार अपना के मानैत भविष्यमे एकर सुधारक वादा करैत छथि मुदा हुनक शब्दक पकड़ आ भावक अध्ययन केला के बाद हमरा लागैत अछि जे शाइरक लेल उपरोक्त गजलमे एक-एक टा शेर बढ़ेनाइ कोनो भारी बात नै छलै तेँए हम एकरा आलस मानै छी ।
आब चलु काफियापर । एहि संग्रहक किछु गजलमे एकै काफियाक प्रयोग भेल अछि जेना 26म गजल मे तीन ठाम काफिया "चाहैए" अछि ।29मे पाँच ठाम "एखनो" 31मे पाँच ठाम "उघारू" 46म मे पाँच ठाम"केकरो-केकरो" अछि ।किछु और गजलमे इ बात अछि ।ओना काफियाक दोहरेलासँ गजल गलत नै होइ छै । तेसर गजलमे मतला नै अछि किएक तँ इ गजलक पहिल शेर अछि फाटैत छल जतए मेघ आ जमीन पहुँचल पहिने ओतहि अभागल
बचल चारिटा शेरमे "अभागल" के काफिया मानि क्रमश: "राँगल ,भाँजल , माँजल आ साधल लिखल अछि ।4म गजलक मतलामे "करैए" आ राखैए" "ऐए" तुकान्त संग अछि मुदा पाँचम शेर मे काफिया "होइए" अछि । छठम गजलक अंतीम शेरमे"कहाइ" के बदला गलत काफिया "कहाइत" लिखा गेल । 32म गजलक मतला अछि हमरा तँ सुख भेटैए गजलक गाँतीमे ओहिना जेना जाड़ मे गर्मी भेटैए गाँतीमे
एहिठाम "गाँतीमे" रदीफ भेल आ काफियाक अता-पता- नै अछि ।ओना आन शेरमे काफिया "आतीमे" तुकान्त संग अछि ।
41म गजलक मतलामे काफिया "झमका आ चमका " तुकान्त "मका" संग अछि मुदा दोसर शेरमे काफिया "उठा" अछि । 44म गजल मे काफियाक तुकान्त "एल" अछि मुदा दोसर शेरमे काफिया "रखैल" "ऐल" तुकान्त अछि । 17म गजलमे अंग्रेजी शब्दक काफिया "गेम" आ "ब्लेम" लिखल अछि ।
एहि संग्रहक सबटा गजल सरल वार्णिक बहरमे अछि ।ओना तँ इ बहर गजलक सबसँ हल्लुक बहर अछि मुदा शाइर इहो बहरमे बहुते बेर धोखा खाइत छथि । हमरा जानैत 26टा गजल गजलक कोनो शेरमे एक-दू टा वर्ण बढ़ा देलनि तँ कोनो मे घटा देलनि ।जेना दोसर गजलक अंतीम शेरमे 15 के बदले 16 वर्ण अछि ।7म गजलक तेसर शेरमे 18 के बदले 19 वर्ण अछि । 9म मे दोसर शेरमे 11 के बदले 10 वर्ण अछि । 11म गजलक अंतीम शेरक अंतीम पाँतिमे 18 के बदले 17 वर्ण अछि ।एहन गजती गजल संख्याँ 12,14,15,18,19,20,22,24,26,28,29,30,31,32,34,35,38,42,43,46,47आ 48 मे सोहो भेल अछि ।
ओना जँ भावक बात करी तँ एहि गजल संग्रहके ऊँचाइ पर पहुँचा देने अछि एकर भाव । सबटा गजल हृदय के छू लैत अछि आ सोचबाक लेल मजबूर करैत अछि तेँए इ आन संग्रह सबसँ बिल्कुल अलग अछि आ एकर आखर आन संग्रहक आखरसँ कतिआएल अछि । भावक कारणे इ संग्रहक "कतिआएल आखर" पढ़बाक योग्य अछि ।हमर सलाह अछि जे एकबेर एकरा अजमा कऽ जरूर देखू । बेस तँ अहूँ सब पढ़ू आ हम जाइ छी दोसर गजलक खोजमे . . . ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। शिव कुमार झा १ कृष्णजन्म :: कथाकाव्यक सूत्रपात मैथिली साहित्यमे महाकाव्यक पहिलुक छाँह रतिपति भगतक “गीत-गोविन्द”सँ सन 1723ई.क लगिचमे देखएमे आएल। जइ छाहरिकेँ स्पष्ट बिम्बक रूप मनवोध द्वारा 18म शताब्दीक मध्यमे “कृष्ण जन्म” स्वरूपे देल गेल। मनबोध मध्यकालीन मैथिलीक विशिष्ट रचनाकार मानल जाइत छथि। जौं पदावलीकेँ छोड़ि देल जाए तँ ज्योतिरीश्वर आ विद्यापतिक अधिकांश रचना तत्समसँ लीपित छल। मनबोधक प्रवेश मैथ्ज्ञिली काव्य जगतमे अत्यन्त महत्वपूर्ण किएक तँ “कृष्णजन्म” तत्सम परम्पराकेँ तोड़लक मात्र नै संग-संग चन्दा झा रचित मिथिला भाया रामायणसँ आधारशीला सेहो प्रदान कएलक। डाॅ. ग्रियर्सनक मते कृष्णजन्म महाकवि विद्यापति आ आधुनिक मैथिलीक हर्षनाथ झा आर तत्कालीन अन्य महाकाव्यक योजक कड़ी थिक। ई िनर्विवाद सत्य जे कृष्णजन्मक भाषा ओ शैली संस्कृत, प्राकृत, अपभ्रंश ओ अवहट्ठसँ विलग जनभाषामे रचत पहिलुक काव्य थिक। रतिपति भगतक गीत-गोविन्दक विपरीत कृष्णजन्मक व्यापक प्रचार-प्रसार भेल किएक तँ कतौ भाषामे क्लिष्टता नै। तँए प्राय: सभ समालोचक एक मतेँ स्वीकार करैत छथि जे तुलसीकृत रामचरित मानस जकाँ “कृष्णजन्म” मैथिली साहित्यकेँ प्रबंध काव्यक पहिलुक सबल स्तंभ प्रदान कएलक। विद्यापतिक रचना रीतिकाव्यात्मक मुदा मनवोध ऐ परम्पराकेँ तोड़ि जे नवल बिम्ब ओ शैलीक सृजन कएलनि ओइसँ चन्दा झा अवश्य प्रेरित छथि। सुभाषचन्द्र यादव लिखैत छथि “मनवोध” कथाकाव्यक परम्पराक आरंभ कएलनि। श्रृंगारिक काव्य परम्पराकेँ विराम दऽ कऽ ओ वात्सल्य भावसँ युक्त रचनामे विशेष रूचि देखैलनि। मनवोध विषय आ शिल्प दुनू स्तरपर परम्पराक अतिक्रमण करैत छथि। विषयक स्तरपर कृष्णक नेनपन आ पराक्रम हुनका आकृष्ट करैत छन्हि तँ शिल्पक स्तरपर चौपाइ। लोक भाषासँ सम्पृक्ति सन विद्यापतिक परम्पराकेँ मनवोध अखुण्ण बनौने रखैत छथि। दुर्गानाथ झा श्रीशक शब्दमे “अठारहम शताब्दीक अंतिम चरणमे मनवोध अवश्य कृष्णजन्मक रचना कएलनि ओ अद्भुत लोक भाषात्मक प्रवाह ओ विलक्षण संक्षिप्त मुदा सजीव वर्णनक दृष्टिसँ लोकप्रिय सेहो भेल। परन्च कृष्णजन्मसँ प्रबंधकाव्यक विकास परम्परा स्थापित नै भेल। ई स्थापित भेल कवीश्वर चन्दा झाक मिथिला भाषा रामायण एवं लालदासक रमेश्वर चरित रामायणसँ। “कृष्णजन्म झुझुआन काव्य तँए महाकाव्य वा प्रबंध काव्यक श्री गणेश श्रीष एकरा नै मानैत छथि संग-संग महाकाव्यीय परम्पराक सर्ग विभाजन ऐमे नै भऽ कऽ अध्यायमे बिभक्त अछि। एकर एकटा आर िनर्वल पक्ष जे अठारह अध्यायमे विभक्त ऐ कृतिक पहिल दस अध्याय मात्र मौलिक आ खॉटी मैथिलीमे रचित अछि। अन्य आठ अध्याय जनभाषा ओ रचनाक दृष्टिऍं विवादित तँए श्रीश जीक मत अंशत: सत्य मानल जाए मुदा महाकाव्यीय मरम्पराक पहिलुक अनुपालन कृष्णजन्ममे भेल तकर प्रणाण एकर पहिल अध्यायक उल्लेखमे तँ मंगलाचनण नै थिक मुदा आर्यभाषाक महाकाव्यक मूल बिन्दु मंगलाचरणक छाँह ऐठाम अवश्य भेटैत अछि- प्रणमो गिरिवर कूमारि-चरण जे वल कवि सभ त्रिभुवन वरन हमहू कएल अछि मन मड़ गोट कृष्णजन्म परिणय नै छोट कोनपर होएत तकर निरवाह एखन लगै अछि अगम अथाह... मनबोध सोलह कलासँ निपुण कृष्णकेँ ऐमे कोनो अभिसार पथपर विहुँसैत राधाक सिनेही नै बनौने छथि। मनवोधक कृष्ण वास्तममे नायक छथि। ‘धर्म संस्थापनार्थाय सम्भामि युगे-युगे’क हुंकार भरैबला कृष्णक मात्र जन्म कथा नै, मात्र प्रीति गाथा नै हुनक समग्र जीवन दर्शनक अभिप्राय थिक ‘कृष्णजन्म’ भागवत ओ हरिवंश पुराणक कथापर आधारित ‘कृष्णजन्म‘क नायक कृष्ण राम जकाँ गंभीर, लक्ष्मण जकाँ मर्यादित सिनेही, स्वंय कृष्ण जकाँ वात्सल्य भावसँ भरल शिशु आ नरसिंह जकाँ आक्रोशित दुष्ट नाशक छथि। ऐमे पहिलुक क्रांति जे कृष्ण जीवन वृतांतक धार श्रृंगारसँ कर्त्तव्यवोध धरि चलि आएल। बाल मनोविज्ञानक विश्लेशणक दृष्टिऍं कृष्णजन्म पहिलुक वास्तविक वाल्य शैलीसँ भल महाकाव्य थिक- गुड़कल-गुड़कल भिडुकल जाए जतय अछल दुइ िवर्छ अकाय जमला अर्जुन कनला-नाथ जुगुति उपारल छुइल न हाथ खसल महातरू हँसल मुरारि भेल अघात जगतपर चारि.... डाॅ. चेतकर झाक शब्दमे वस्तुत: ई पौराणिक महाकाव्य मात्र थिक आकि महाकाव्य ई अखन चरि विद्वत समाजमे विवादक विषय बनल अछि। विवादक विषय ईहो अछि जे अठारह अध्यायमे विभक्त“ कृष्णजन्म” सम्पूर्ण रूपेँ मौलिक अछि आकि मात्र दस अध्याय धरि। समालोचकक मन्तव्य जे होन्हि मुदा ई अक्षरश: सत्य जे कृष्णजन्मक रीति नीति आधार-विचार, खान-पान, बात-विचारक संग-संग व्यवहार मिथिलाकसँ प्रभावित अछि। लगैछ जेना कृष्णक कथा गोकुलक कथा नै मिथिलाक कोनो भूभागक कथा थिक। गाम भरि हकार, चुमाओन, तेल-सेनूर, नाच-गान, भदवा, सोहर, वटगवनी, झटहा आ ठेंपा फेंकब, टेलवा टेलइक खेल खेलाएब सन खाँटी मैथिल परम्परा ऐ काव्यकेँ मिथिला धरापर जीवन्त कऽ देलक। म. म. डाॅ. उमेश मिश्रक अनुसार ई कथा दशम अध्याय धरि श्रीमद्भागवतक दशम स्कंधक पूर्वाधक आधारपर लिखल गेल अछि, एगारहमक अध्यायसँ अन्त धरि हरिवंश विष्णुपर्वक आधारपर लिखल गेल अछि। प्रो. रमानाथ झाक कहब छन्हि- “मनवोध पहिल कवि छलाह जे अपन कृष्णजन्ममे श्रृंगार रससँ शून्य भक्ति रसमय एकछन्द मे जे राग ताल प्रभृति गीतक विषयसँ रहित अछि अपन एक गोट नूतन शैलीमे काव्यक रचना कएलनि। ई छन्द आब चौपाइ कहल जाइत अछि परन्तु ताहि दिन ई गाहिक मेर बूझल जाइत छल।” राग-लय, गति, यति ओ नियतिक रचनात्मक मर्यादा जे हुअए अपितु ई अक्षरश: सत्य जे कृष्ण जन्मक महाकाव्यीय सृजनतामे वएह मौलिक स्थान जे स्थान संस्कृत साहित्यमे वेदव्यास ओ वाल्मीकिक अछि। अर्थातृ वेद व्यास ओ वाल्मीकि हदृश मनवोध मैथिली महाकाव्यक शलाका पुरुष छथि। सुमन जीक शब्दमे प्रकृति वर्णन, भने ओ जड़ प्रकृति होअ अथवा मानव प्रकृति मनवोधक रचनामे सहज, सुबोध एवं हृदयावर्जक बनल अछि। संज्ञा, क्रिया विशेषण, नामधातु ओ अनुध्वनिक विलक्षण प्रयोग ऐमे भेटैत अछि। मैथिली काव्यमे गीत-शिल्पक जे परम्परा छल तकरा लागि स्वतंत्र कथा-काव्यक पहिल प्रयोग “कृष्णजन्म”मे भेल। बाल साहित्यक दृष्टिसँ जौं देखल जाए तँ प्रयोगकेँ वादक धरातलपर आनि महाकाव्यक रूप रेखामे बाल मनोविज्ञानकेँ पूर्णत: स्पर्श मनबोधसँ पूर्व कियो नै कऽ सकलाह। शब्द-शब्दमे प्रवाह हास्य स्पर्शी ओ सजीव अछि। तँए दशम अध्याय धरि उत्तर आधुनिक काव्यक लेल सेहो अनुगामी तँ रचनाकालमे एकर महत्व की हएत ई मंथनक विषय थिक। तँए ई सत्य मानल जाए जे मात्र एक छन्दमे लिखल समस्त महाकाव्यक शैलीक ई मैथिलीक प्रयोग ग्रंथ थिक जे भाषा विन्यासक संग-संग बिम्बक मौलिक स्पर्श आ बाल साहित्यक लेल अखन धरि उपयोगी अछि। २ क्षणप्रभा “क्षणप्रभा”क अर्थ होइछ बिजरी जेकरा प्रबुद्ध जन तड़ित कहैत छथि। हम कोनो नैसर्गिक कवि नै, क्षणिक भावना कविताक रूपेँ अभिव्यक्त भेल जेकर प्रासंगिकताक िनर्णए पाठकगणपर छन्हि। हमर कहब मात्र इएह जेे हमर ई पहिलुक प्रयास थिक ऐमे काव्य लक्षणा ओ व्यंजनाक अनुपालन भेल वा नै ऐ विषयमे हम किछु नै कहि सकैत छी, मात्र इएह कहबाक लेल नीति संगत हएत जे जइ भाषाकेँ बाल कालहिंसँ िहआमे लगा कऽ रखलौं ओइ भाषामे अपन किछु अभिव्यक्ति पाठकगण लग परसि रहल छी। हमर जन्म अपन मातृक बेगूसराय जिलाक मालीपुर मोड़तर गाममे भेल। कहिओ ई भूमि मैथिलीक प्रांजल कवि फजलुर रहमान हासमी जीक कर्मभूमि छल। हमर पिता मैथिलीक चर्चित आशुकवि कालीकान्त झा ‘बूच’ आ हासमी जीमे बड़ आत्मीयता छलनि। माए चन्द्रकला देवी सेहो मैथिलीमे किछु पद्य लिखने छलीह। बालकाल मातृकमे बीतल, तकर बाद पैतृक गाम उदयनाचार्यक भूमि करियनक माटि-पानिमे रमि आगाँ बढ़ैत गेलौं। पिताक कवित्वक कारणेँ महाकवि आरसी, चन्द्रभानु सिंह, प्रवासी प्रो. नरेश कुमार विकल, प्रो. विद्यापति झा, प्रो. राम कृपाल चौ. राकेशसँ परिचय भेल। तकर परिणाम थिक ई छोट-छीन कृति। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। ३. पद्य ३.१.१.बलराम साह २.मुन्नी कामत ३.२.विनीत उत्पल ३.३.१. जगदीश प्रसाद मण्डल२.मुकुन्द मयंक ३.४.१. राजदेव मण्डल २.ओमप्रकाश झा ३.५.१.शिव कुमार झा किशन कारीगर ३.६.१.मो. गुल हसन २.चंदन कुमार झा ३.७. १.कपिलेश्वर राउतमातृभाषा २.जगदानन्द झा 'मनु' -हम एहन किएक छी?/ कोना मदर डे हैप्पी ? ३.राजेश कुमार झा (कन्हैया)- देश भक्ति ३.८.१.जगदीश चन्द्र ठाकुर ‘अनिल’- की भेटल आ की हेरा गेल (आत्म गीत)- (आगाँ)२. नारायण झा- एखनहुँ जकड़ल छी/ एकता १.बलराम साह २.मुन्नी कामत १ बलराम साह जन्म- 21/11/1973 पिताक नाओं श्री जीबछ साह, गाम- नौआबाखर, पत्रालय- हटनी, भाया- घोघरडीहा, जिला- मधुबनी (बिहार) संप्रति- अधिवक्ता, जिला न्यायलय, मधुबनी सांसद प्रतिनिधि, झंझारपुर। द्वन्दक मझधार एकटा एहेन लोक जेकरा करिया आखरसँ भेँट नै एकटा एहेन लोक जेकरा हाथमे अखवार अछि। एकटा एहेन नेना जेकरा पेटमे अन्न नै एकटा एहेन नेना जेकरा खेलौनाक भरमार अछि। एकटा ओ समाज जे खाइत नित मारि अछि तँ एकटा ओ समाज जेकरा हाथमे तरूआरि अछि। एकटा ओ जाति जिनक बौआक पएर पवित्र अछि एकटा ओ जाति जेकरा छुनिहार पापक भागीदार अछि। देखबामे कहबामे हम सभ छी एक्के मुदा हमरा मोनमे आइयो द्वन्दक मझधार अछि। २ मुन्नी कामत मुन्नी कामत १ बेटी बेटी अभिशाप नै वरदान अछि। तिलकक बिहारिसँ बेटीकेँ नै बहाबू ई छी घरक लक्ष्मी अकरा नै समान बनाबू। नै अछि ई बोझ नै अभागी शक्तिक ई प्रतिरूप अछि अकरा नई शापित बनाबू। दुर्गा, काली, लक्ष्मी, सरस्वती संगे सीतो अइमे समाइल अछि हिनकर आॅंचलमे हमर काल्हि अछि अकरा नै कलंकित बनाबू। २ दहेजक आइग। सुनथुन यै सासुमा हमहूॅं छी किनको बेटी हमहूॅं किनको दुलार छी हमहूॅं ९ महिना किनको कोइखमे आस आ ममता सँ सिंचल छी। नै बुझियौ आन हमरा हमहूॅं एगो मायक अंश छी लऽ कऽ आइल छेलौं आश एगो कि, माय कऽ छोड़ि, माय लग जाइ छी, बाबू छोड़ि बाबू लग यएह अरमान बसैनउ हम सपना सजेने एलौं हम। बाबू हमर अछि गरीब बेटीक कन्यादान कऽ कए तँ राजा जनको भऽ गेल छल फकीर जब दिलक टुकड़े सोंइप देलकनि तँ कि आगाँ चाह रखैत छी। दहेजक खातिर कतनो बेर अहॉं हमरा जरैब तइयो नै अहॉं अपन एक बितक पेटक अग्निकेँ बुझा पएब छोड़ू ई लालच, मोह अहूॅं तँ ककरो बेटी छी। आइक नै तँ काल्हिक चिंता करू घरमे बेटी अछि अहूँक जवान अपन नै तँ ओकर परवाह करू। ३ ओइ पार तूँ बता रे माझी कि छै ओइ पारमे माय, बाप,भाइ, बहिन अपन, पराया सभ नाता, रिश्ता मिलतै ओइ संसारमे। सुनै छिऐ राजा हुअए या रंक छोड़ऽ पड़तै सभकेँ ई देहक संग तूँ बता रे माझी बिन देहक वएह मलार मिलतै ओइ संसारमे। नै मंजिलक अछि खबर नै रस्ताक पहचान तूँ बता रे माझी अन्हार राह पर चलैत हम एकोगो राह बना पेबै ओइ पारमे। ४ नेताजी सफेद लिबासमे लिपटल नेताजी हाथ जोड़ि, नतमस्तक नेताजी जुबान खामोश, अबोध नेताजी देखियौ आइल हमर गाम हमर पालन हार, नेताजी। मॉंगै लेल भीख आश लगौने नेताजी भिखक नाम पर खून मॉंगैत अछि, नेताजी। कतेक सालसँ हम सभ चुसाइत छी आब बस पाइन अछि देहमे यौ नेताजी। ब्ुझि रहल छी करतुत अहॉंक सफेद वस्त्रक भीतर कारी मन अहॉंक नेताजी। कतनो खाइ छी तइयो दैतक खुनल पेट नै भरैत अछि अहॉंक नेताजी। ज्यों फेर पकड़ा देब बंदूक हवलदार बनि हमरे सभ पर दहारब अहॉं यौ नेताजी। ५ पहिल बरखा छू कऽ हमर मनकेँ गुदगुदेलक ओ प्यारसँ छुलक हवाक झोका हमरा अपन शीतलताक मलारसँ। छिटका रहल छल चॉंद-चॉंदनी जे थपथपैलक हमरा गालकेँ अपन ममतामय दुलारसँ। झमौक कऽ ऐल कारी मेघ नहलाकऽ गेल अइ जहाँ केँ अपन होठक मिठास सँ। छू कऽ हमर अंग-अंगकेँ चुइम कऽ धरतीक कण-कणकेँ पुचकारलक सहलैलक अपन स्नेहक बरखा सँ। ६ किसान होइत भिनसरे अजबे नजारा सभ गामक कोइ पकड़ि बड़दक जुआ कोइ खाय रोटी संग नुनमा दौड़ल अपन काम पर। सबे परानी माइट संगे अपन जीवन बिताबैए बच्चा तँ बच्चा बड़को अहिना पोसाइए। दिन-राइत मेहनत कइर ई धरतीक कौइख सँ अन्न उपजाबैत अछि नै कोनो थकान अकरा नै ककरो सँ शिकाइत अछि। एहन निर्मल अछि हमर किसान जिनकर प्रतिदान आ संतोषे संस्कार आ पहचान अछि। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। विनीत उत्पल १ राजनीति कतेक रास गप करैक अछि अहाँ सँ जिनगीकेँ लऽ कऽ घर-बाहर केँ लऽ कऽ साहित्य केँ लऽ कऽ राजनीति केँ लऽ कऽ एकटा गप पुछैत छी की हमर आपन सबहक जिनगी राजनीति क बिसात मे जकड़ल अछि शतरंजक मोहरा जना हम सभ छी जे जेना खिलाड़ी चलत तना हम चलब घर मे राजनीति भाय-भौजायक-भाबौक राजनीति बहिन-बहिनाय- साढ़ूक राजनीति कका-काकी-बाबाक राजनीति खाना खाइक, बड़ी-भातक राजनीति खेत मे राजनीति बांट-बटेदार, खेत-पथारक राजनीति पइन पटैबा, बिआ बुनइक राजनीति फसल चराबैक, फसल चोराबैक राजनीति फसल काटैक, फसल बेचबाक राजनीति ऑफिस मे राजनीति प्रमोशन, डिमोशनक राजनीति कर्मयोगी, अकर्मयोगीक राजनीति बॉसक आगाँ-पाछाँ करैक राजनीति तेल लगाबैक राजनीति मुदा, एकटा गप मन मे आबैत अछि ई सभ राजनीति कोन राजनीति अछि आ एकर स्थान कतए अछि जखन साहित्यक राजनीति धरगर भऽ रहल अछि साहित्यक नाम पर सरकारी संस्थासँ पाइ वसूलैक राजनीति बेटी-बहिनकेँ बदनाम कऽ आपन धौंस आ ब्लैकमेलिंगक राजनीति एनजीओ बनाकऽ संस्थाक नाम पर पाइ उघाबैक राजनीति नाटक, गीत-नाद, कला आ संस्कृतिक नंगा नाच देखबाक राजनीति जखन एहन राजनीति दमगर अछि तखन देशक विकास आ शासनक राजनीतिक स्थान कतए अछि गांधी आ अंबेडकरक देसमे ईहो राजनीतिक हिस्सा अछि जेकरा कोनो स्कूलमे नै पढ़ाऔल जाइत अछि मुदा हम वा अहाँ सभ नेनासँ घोंटि-घोंटि कऽ पीने छी ताहिसँ रग-रगमे अछि राजनीति। २ भाषा भाषाक एकटा इतिहास होइत अछि जहिना-जहिना दंड-पल बदलैत अछि तहिना-तहिना भाषामे सेहो बदलाव आबैत अछि ओहिनो कोस-कोसपर भाषा तँ बदलिते अछि मुदा भाषा की होबाक चाही, एकर उत्तर के देत? भाषाक विकृतीकरण एकटा शब्द अछि जेकरा लेल विद्वानजन गहींर-गंभीर अछि कियो हिंदीक पाछाँ भागैत अछि केकरो अंग्रेजीक नशा चढ़ल अछि ओना हिंदीक लोक हिंग्लिशसँ तंग अछि मुदा मैथिलीमे कोनो 'मैथिलीश" क कोनो कांसेप्ट नै अछि भाषाक परिवर्तन वा परिमार्जनक गप बेसी गंभीर अछि परिवर्तन गतिशील अछि आ संस्कृतिकरण सेहो एकटा शब्द अछि एकटा भाषाकेँ दोसर भाषामे घुसपैठ आ अंतरंगता कोनो मुद्दा नै अछि अंग्रेजी आ हिन्दीक आधिपत्य स्वीकार करहि बला संस्कार जखन रग-रगमे विचरण कऽ रहल अछि तखन अहाँ की कऽ सकैत छी आ की कहि सकैत छी? मैथिलीक विद्वतजन जखन घरमे हिन्दी वा अंग्रेजीमे टिपिर-टिपिर करैत अछि लंद-फंदसँ जागत, लंद-फंदसँ सुतत़ जकर हर सांसमे अछि लंद-फंद प्रगतिशील कहाबैक लेल पर-गतिक बाटपर अछि तखन भाषाविद कतेक गंभीर भऽ सकैत अछि, एकरा आशंका जता जा सकैत अछि। ३ शंका दुनियाँमे अछि बड़ रास बीमारी माथ दुखा रहल अछि केकरो तँ कियो अछि पेट गुड़-गुड़सँ तंग आँखिसँ नोर बहि रहल अछि तेँ कानमे दर्द अछि केकरो सूगर बेसी भेल तँ जिनगी भरि मीठ नै खा सकैत छी सूगर कम भेल तँ तुरंते अहाँकेँ गूलकोज पीबए पड़त केकरो हाइ ब्लड प्रेशर अछि तँ केकरो लो कियो एड्ससँ ग्रसित अछि तँ कियो कैंसरमे जकड़ल जतेक रास बीमारी अछि ततेक रास दवाइयो कियो नीम-हकीम लग जाइए तँ कियो कराबैए एलोपैथी, होमियोपैथी आ आयुर्वेदिक इलाज। दुनिया भरिक डॉक्टर आ वैज्ञानिक नब-नब रोग आ ओकर छुटाबैक दवा बनाबैमे लागल अछि मुदा, हमरा जानल एकटा एहन बीमारी अछि जकर इलाज नै आजुक बाजारवाद, तथाकथित प्रगतिशीलवाद जुगमे बाप करैए बेटा पर शंका बेटा करैए बाप पर शंका माय करैए पुतोहु पर शंका पुतोहु करैए माय पर शंका ननद करैए भौजाइ पर शंका भौजाइ करैए ननद पर शंका जतए देखि ओतए शंके शंका घर मे शंका, ऑफिस मे शंका बॉस केँ शंका, कर्मचारी केँ शंका किनै मे शंका, बेचै मे शंका रौद मे शंका, मेघ मे शंका पानि मे शंका, दूध मे शंका प्रेम मे शंका, घृणा मे शंका दोस्ती मे शंका, दुश्मनी मे शंका साँस मे शंका, पलक झपकै मे शंका खाइ मे शंका, पीबै मे शंका बुलै मे शंका, सुतै मे शंका नोचै मे शंका, खुजलाबै मे शंका शंके शंका, सनातन शंका शंका ब्रह्मा, शंका विष्णु, शंका देवो महेश्वर शंका साक्षात परम ब्राह्म, तस्मै श्री शंकायै नम:। जोर सँ बाजू शंका रहए मन मे शंका रहए तन मे शंका खाएब, शंका पीअब, शंका सुतब, शंका मूतब एक-दोसर पर शंका करब, हम नै प्रेमसँ रहब ओम शंकाय नमः । ४ स्मृति लोप हमर स्मृति लोप भऽ रहल अछि ई गप एतेक धरगर अछि जइ सँ हम कतेको काज सँ बरजि जाइत छी एकरा सँ हमरा कियो चरियाबै नै अछि आब हमर धर्म भऽ गेल अछि, काज कम बपराहिट बेसी। हमर जे मनक मुताबिक नै होइत अछि ओकरा लेल सीधे फूइस बाजि दैत छी जे हमरा कोनो काज-धाज ख्याल नै रहैत अछि ई कहि कऽ हम घर संगे ऑफिस मे दयाक पात्र बनैत छी एकरा सँ देहक आराम भेटि जाइत अछि किएकि हमर देह आ मोन आब कामचोर बनि रहल अछि। काल्हि कार्यालय मे हमरा एकटा भारी-भरकम काज देल गेल छल ओतेक भारी नै जतेक हम वर्णन कऽ रहल छी महत्वपूर्ण गप ई जे आब हम बूढ़ा गेलौं मन आ तन दुनू सँ किए कि हमरा आब कोनो प्लानिंग नै अछि जिनगीक तइसँ दोसर दिन कहि देलौं जे हमरा ख्याल नै रहल। ओना अहि “स्मृति लोप" क पाछाँक खेला बड़ पैघ अछि एकर आर मे नै जानि कतेक रास गप अछि कोनो नीक गपक लेल लेल कोनो आहटक जरूरतो आब नै अछि मुदा अधलाह गप तँ स्मृति मे मृत नै होइत अछि आइ धरि हमर कक्का, काकी, बाबू, माय, बहिन-भैयारी की केने अछि, की बाजल अछि, सभटा ख्याल अछि। हम नेना मे जेना ककहरा कक्षा मे सुनाबैत छलौं तहिना हम सभटा गप सुना सकैत छी जे कियो हमरा संग नीक काज करलक ओकरा तँ जरूर बिसुरि गेल छी मुदा अधलाह काज, अधलाह गप सभटा ख्याल अछि हमरा सेहो गपक ख्याल अछि जे अपना हिसाबे हमरा संग नीक करलक मुदा हम ओकरा अधलाहे लेलौं आ बुझलौं। ५ प्रश्न अहाँ केँ बुझल अछि एकटा प्रश्नक उत्तर अहाँ प्रश्न सुनि कऽ कहब जे ई कोनो प्रश्न अछि अहाँ बूरबक छी जे एहन प्रश्न करैत छी बुझि गेलौं जे अहाँ पढ़ल-लिखल भेलाक बादो अज्ञानी छी मुदा, हम सत कहैत छी एकटा प्रश्न हमर आँखि केँ चौन्हरा रहल अछि हमर शांतिकेँ नाश करए मे लागल अछि हमरा नीन नै होइत अछि ओइ प्रश्नक उत्तर ताकहि मे बताह भऽ रहल छी हमर प्रश्न बड़ सोझ अछि मुदा ओकर उत्तर ततबे ओझराएल अछि तइ सँ कतेको रास प्रयत्न करबाक बादो हम ओकरा सोझराबै मे सफल नै भेलौं ओझराएल आ सोझराएल शब्द मे हमहूँ हेरा गेल छी प्रश्न कतेको रास भऽ सकैत अछि अहाँ खाइत किए छी अहाँ बाजैत किए छी अहाँ गाइर किए दैत छी अहाँ फूइस किए बजैत छी अहाँ दोष आरोपित किए करैत छी अहाँ पाइक लेल हाइ-हाइ किए करैत छी अहाँ केकरो बेटीकेँ बदनाम किए करैत छी जखन अहाँ एक दिन मरबे करब अहाँ केँ बुझले हएत जे मरलाक बाद अंतिम संस्कार लेल बस चार हाथि धरती चाही आ ओकर दाम आना मे होइत अछि अहाँ जइ दाममे मकान बनबाक लेल जमीन रजिस्ट्री करेलौं ओइ दामक तुलनामे ई किछु नै अछि मुदा जहिया श्मशान ओइ चार हाथ जमीनक दाम रजिस्ट्रार ऑफिस तय करए लागत तहिया अहाँ केँ कोन ठाम स्थान भेटत, ई कनी सोचू यएह प्रश्न अछि जे हमरा देह-दिमागकेँ सुन कए रहल अछि अहाँ की सोचए लागलौं, कनी एकर उत्तर दिअ। ६ नामर्दक शहरमे आइ जइ कालमे हम सभ रहि रहल छी, ओ नामर्दक जुग अछि हमर कवितामे नामर्द कोनो जाति नै अछि वा कोनो मनुष्यक शारीरिक अवगुणक उपहास नै कएल जा रहल अछि ई छी मानसिक दिवालियापनकेँ लऽ कऽ एकटा शब्द कहैत छी जे हम वैश्विक भऽ गेलौं ग्लोबल विलेजक कांसेप्ट आगू राखि रहल छी ट्विटर, फेसबुकक जमानामे रहैत छी मुदा रहैत छी नामर्दक शहरमे आइ सांस्कृतिक आ सामाजिक दिवालियापनक ई हाल अछि जे कोनो स्त्री जातिकेँ कोनो तरहेँ अहाँ सहायता नै कऽ सकैत छी कोनो दलित जातिकेँ कोनो तरहेँ अहाँ सहायता नै कऽ सकैत छी कोनो हासियासँ बहराएल लोकक सहायता नै कऽ सकैत छी ऐ नामर्दक शहरमे जौँ अहाँ अपन सहृदएता देखाएब अहाँक चरित्र, व्यवहार, मेल-जोलक प्रति विषवमन हएत, गारि-फजीहत हएत साहित्यिक विद्वान छद्म नामसँ अहाँक माय-बहिन एक करत अहाँकेँ नै बुझाएल हएत जे हुनकर शब्दकोषमे केहन-केहन शब्द अछि केहन-केहन सोच अछि, केहन-केहन वाक्य अछि ओना चिन्ताक कोनो गप नै अछि, जौँ अहाँ अपना दिससँ नीक छी जकरा लग जे शब्द हएत, जेहन संस्कार भेटल हएत, जेहन मायक दूध पीने हएत ओकरासँ बहराइक ताकति ओकरामे नै छै यएह ओकर असली रूप छै, जे रहैत अछि नामर्दक शहर मे। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। १. जगदीश प्रसाद मण्डल२.मुकुन्द मयंक १ जगदीश प्रसाद मण्डल- पाँच गोट गीत- सुखले मे सभ.... सुखले मे सभ पिछड़ि रहल छै मुँह-कान सभ तोड़ि रहल छै। सूखल जानि पएर जतऽ रोपै छै काह-कूह सभ ततऽ जमल छै। सुखले मे सभ.....। सूखल धरती जतए पड़ल छै झल-फल नजरि ततए जाइ छै। सुखले मे सभ......। अन्हर-जाल फरिच्छ मानि बूझि भोर-भुरुकबा सूर्य बुझै छै। सुखले मे सभ......। दीनक दिन केना..... दीनक दिन केना कऽ चढ़तै मन कहाँ कहियो मानै छै। रतुके काजे दिनो काटि-खोंटि बढ़ती कहाँ तानि पबै छै। दीनक दिन केना.....। बिनु तनने घोकचि-मोकचि जाड़ माघ अबैत रहै छै। चैतक चेत चेतौनी चेति सिर जेठ धड़ैत रहै छै। दीनक दिन केना.....। तीन जेठ एगारहम माघ तीनू लोक देखैत सुनै छै। देह-पसेना सुरकि चाटि माघे ने माघो कहबै छै। दीनक िदन केना.....। कोढ़ पकड़ि.....। कोढ़ पकड़ि कोढ़ी कहै छै कोंढ़िया कोढ़ पकड़ने छै। केना कऽ फड़बै-फुलेबै रेहे-देहे पकड़ने छै। कोढ़ पकड़ि.....। देखबोमे नहि देख पड़ै छै सुनबोमे नहि सुनि पबै छै। टीश-पीड़ा टीशा पीड़ा घोर-घोर मन बनौने छै। कोढ़ पकड़ि.....। नहि कहियो फड़बै-फुलेबै झखि-झखि आशा तोड़ने छै। सकारथ भऽ अकारथ बनि-बनि दिन-राति अनियाय करै छै। कोढ़ पकड़ि.....। मीत यौ, जाल समाज..... जाल समाज महजाल बनल छै हाना बनि परिवार सजल छै। जाल समाज महजाल बनल छै। बिनु नाप हाना बनल छै हाना मध्य खाना सजल छै। हाना बूझि खाना लपकि खानामे जा-जा फँसै छै। मीत यौ, जाल समाज.....। जान गमाएब खेल खेलि बचैक नहि उपाए करै छै ऊपर कूदि-कूदि फानि चाहि गोरिया-गोरिया गुहारि करै छै। मीत यौ, जाल समाज.....। मीत यौ, देहक पानि..... मीत यौ, देहक पानि तखन फुलाइ छै कोढ़ी बनि काज रूप लगै छै। देहक पानि तखन फुलाइ छै। कोढ़िये ने फुलो-फड़ो संग बाँहि पकड़ि संकल्प कुदै छै। देहक पानि.....। जाधरि मन संकल्पित नहि ताबे केना उद्देश्य कहबै छै संकल्पे ने तन-मन बीच सीमा दइत डेग बढ़बै छै। मीत यौ, देहक पानि.....। काम-धाम जहिना बनै छै तहिना ने कर्मो-धर्म कहबै छै धर्मे ने धारण करैत पथ-पानि चढ़बैत चलै छै। मीत यौ, देहक पानि.....। २ मुकुन्द मयंक कविता कनियाँक आयल लगबो नै कएल एक्को साल भs गेल कनियाँ मास्टरीमे बहाल जहिया सँ भेली ओ टिचर बदलि गेल हमर फ्युचर पहिने करै छलौं मालिकक जी हजुरी आब बनि गेलौं घरक बिल्ली हम करै छी घरक काज बुढ़िया करैए बच्चाक परिस्कार बुढ़बाकेँ छै आब देखनाहर सोचै बुढ़िया करितौं मुर्खे कनिया काटए तँ नै पड़ितए घुसकुनियाँ ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। १. राजदेव मण्डल २.ओमप्रकाश झा १ राजदेव मण्डल कविता- अकाल परसाल तँ बचलौं बाल-बाल ऐबेर धऽ लेलक असुर अकाल खाली पेट नै फुटतै गाल सबहक भेल अछि हाल-बेहाल। हर-हर पुरबा बहि रहल अछि कानि-कानि काका कहि रहल अछि- झर-झर आगि बरिस रहल अछि धानक बीआ झड़कि रहल अछि। पियाससँ धरती फाटि रहल अछि मवेशी दूबिकेँ चाटि रहल अछि कतेको माससँ नै खसल एको बून पानि की भेलै केना भेलै से नै जानि अपनहि उजारलहक अपन सुख-चैन गाछ कटौलहक फानि-फानि। जलक महत बुझए पड़त नै तँ ई दुख सहए पड़त काल चढ़ए तँ बिगड़ए बानि घुन सँगे सतुआ देलहक सानि चारूभर पसरल घुसखोरबा पापी खसल पड़ल अछि पूरा चापी टक-टक तकैत अछि अफारे खेत पानि बिनु उड़ैत अछि सूखल रेत पछिला करजासँ हाल-बेहाल ऐबेर बिका जाएत देहक खाल नै रोपल जाएत एको कट्ठा धान केना कऽ बचत सालभरि प्राण ऊपर अछि धूरा भरल आसमान नीचा अछि परिवारक मान-सम्मान लोक कहैत अछि- धीरज धरह सरकार देतह हम कहैत छी- तेजगर लोक सभटा खेतह रहब छूच्छे केर छूच्छे आमजनकेँ कतौ ने कियो पूछए बाहर कतए जाएब यौ भाय बेंगू परदेशमे धऽ लेत डेंगू ने खेबाक नीक आ ने सुतबाक ठीक जेबीसँ पाइ लेत उचक्का झपटि-झींंक कियो लेत बेचि कियो लेत कीनि ठामहि रहि जाएत कपार परक ऋृण कतए बेचब कतएसँ आनब पाइ नै रहत तँ कथी लऽ कऽ फानब। आब अछि आशा अगिला जेठ यौ अन्नदाता घटा दियौ अन्नक रेट सभ काटि रहल एक-दोसरकेँ घेंट केना कऽ भरतै सबहक पेट। मनमे छल चाह धियाकेँ करब बिअाह धऽ लेलक अकालक ग्राह आब केना कऽ करब निरवाह केना कऽ पढ़तै धिया-पुता फाटल वस्त्र आ टुटल जूत्ता देहमे नै बचल आब तागत-बुत्ता दुआरिपर कनैत अछि भूखल कुत्ता। सभमे परिवर्त्तन सभमे उत्थान ठामहिपर अछि हमर गहुम-धान धन्य हे ज्ञान धन्य विज्ञान हमरो दिस दियौ एकबेर धियान वएह खेत-पथार, वएह खरिहान घरो छै टुटले कतए देखबै मकान कतए बेचबै कतए रखबै धान नै छै बजार नै छै गोदाम वएह खाद-बीआ ओहिना पानिक दाम वएह हड़-बड़द ओहिना बथान। यौ सरकार करू जलक प्रबन्ध फेर उठतै धरासँ धानक गन्ध दमकल, नलकूपक करू उपाए चन्द धार-नदीपर करू तटबन्ध। हम छी ऐ अंचलक किसान देशक बढ़ेबाक अछि मान-सम्मान बचेबाक अछि सबहक प्राण भूखसँ दिएबाक अछि त्राण हम करब संघर्ष नै छी बेजान फेरसँ गाएब कजरी गान। २ ओमप्रकाश झा रूबाइ जागल आँखि केर सपना बनल जिनगी कुहरल आश केर झपना बनल जिनगी फाटल छल करेज हम सीबैत रहलौँ रूसल सुखक आब नपना बनल जिनगी गजल चमकल मुख अहाँक इजोर भऽ गेलै अधरतिए मे लागै जेना भोर भऽ गेलै काजर बूझि हमरा नैन मे बसा लिअ अहाँक नैना मारूक चितचोर भऽ गेलै कुचरै कौआ रहि रहि मोर आंगन मे जानि अबैया अहाँक मोन मोर भऽ गेलै नैनक इशारा दैए प्रेमक निमन्त्रण आब लाजे कठुआ कऽ बन्न ठोर भऽ गेलै बनल नाम अहींक "ओम"क प्राण-डोरी अहाँक आस मे करेज चकोर भऽ गेलै सरल वार्णिक- १५ वर्ण ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। १.शिव कुमार झा किशन कारीगर १ शिव कुमार झा अस्तित्वक प्रश्न? ककरासँ कहबै के पतियेतै अपने तरंगमे भीजल दुनियाँ बड़ अथाह स्वार्थक अर्णव ई शुभ बनि गेलै लोलुप बनियाँ शोणित बोरि-बोरि टाट बनएलौं खर खोड़ि टिटही लऽ गेलै फाटल आॅचरसँ कोना कऽ झॅपबै खाली चिनुआर बेपर्द भऽ गेलै व्याल दृष्टिसँ राकस गुड़कए चिहुकि-बिचुकि कऽ कानए रनियाँ कर्मक नाहमे भेलै भोकन्नर वामे हाथे पानि उपछलौं भदवरिएमे पतवारि हेराएल दहिना हाथक लग्गा बनएलौं सभटा आङुर पानि खा गेलै, कोना बजतै दर्दक हरमुनियाँ कछेरमे विषनारि उगल छै थलथल पॉक पएर धॅसि गेलै अन्हार मोनिमे कछमछ कऽ रहलौं बिनु जाले टेंगड़ा फॅसि गेलै कोनो कऽ हमरा बाहर करतै नोर चाटि हहरए सोनमनियाँ... किछु छिद्दीक तरमे दबि कऽ पंद्रह अाना अकसक कऽ रहलै भारी भेल कुकर्मक सोती ओकरे धारमे गंगा बहलै घनन दरिद्रा तांडव करतै, अस्तित्वक- प्रश्न बनल पैजनियाँ... २ किशन कारीगर घोंघाउज आ उपराउंज (हास्य कविता) हम अहाँ के गरिअबैत छि अहाँ हमरा गरिआउ बेमतलब के करू उपराउंज धक्कम-धुक्की करू खूम घोघाउंज. कोने काजे कहाँ अछि आब ताहि दुआरे त आरोप-प्रत्यारोप मे ओझराएल रहू मुक्कम-मुक्की क करू उपराउंज . श्रेय लेबाक होड़ मचल अछि अहाँ जूनि पछुआउ कंट्रोवर्सी मे बनल रहू फेसबुक पर करू खूम घोघाउंज. मिथिला-मैथिल के नाम पर अहाँ अप्पन रोटी सेकू अपना-अपना चक्कर चालि मे रंग-विरंगक गोटी फेकू. अहाँ चक्कर चालि मे लोक भन्ने ओझराएल अछि अहाँ फेसबूकिया ग्रुप बनाऊ अपनों ओझराएल रहू हमरो ओझराऊ. ई काज हमही शुरू केलौहं नहि नहि एक्कर श्रे त हमरा अछि धू जी ई त फेक आई.डी छि अहाँ माफ़ी किएक नहि मंगैत छी? बेमतलब के बड़-बड़ बजैत छी त अहाँ मने की हम चुप्पे रहू? हम की एक्को रति कम छी फेसबुक फरिछाऊ मुक्कम-मुक्की करू. आहि रे बा बड्ड बढियां काज गारि परहू, लगाऊ कोनो भांज कोनो स्थाई फरिछौठ नहि करू सभ मिली करू उपराउंज आ घोंघाउज. ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। १.मो. गुल हसन २.चंदन कुमार झा १ मो. गुल हसन गीत मो. गुल हसन सभटा किसानमे हमहीं बकलेल अंगना सन जोति-जोति खेत हम बनेलौं डी.ए.पी. पोटास संग गहुम बुनलौं सभटा किसानमे हमहीं हमहीं बकलेल दौगू-गौगू यौ काका जुलुम भऽ गेल। एहेन सुन्दर गहुम काका परा चरि गेल दौगू-दौगू यौ काका जुलुम भऽ गेल। कच्ची आध कोस धरि पाइपो पसारलौं महग पानि कीनि एकरो पटेलौं नै जानि दैवा ई विपत्ति किअए देल दौगू-गौगू यौ काका डाका परि गेल। अहीं सरपंच काका आँखि खोलि देखियौ घसबहिनी-चरबाहाक उपद्रवकेँ देखियौ खर्चा जोड़ैत-जोड़ैत हमर खून सूखि गेल दौगू-दौगू यौ काका गहुम बकरी चरि गेल। लिखैत ई बात गुल हसन कहैए कि कहूँ काका आब किछु ने फुड़ैए। केलहा-धेलहा सभटा पानिमे चलि गेल दौगू-दौगू यौ काका डाका पड़ि गेल। २ चंदन कुमार झा सररा, मदनेश्वर स्थान मधुबनी, बिहार गजल-1 मोनक बात मोनहि मे रखैत छी चुप्पी लाधि हम जिनगी कटैत छी चकमक जगत,लागल चौन्ह लोकके घर अन्हार चैनक निन सुतैत छी झूठक लेल आमिल लोक छै पिने हम सत्तो जनेबा ले कुथैत छै पिने बेचल खेत डाबर-डीह गुजर ले तैयो केस कित्ता दस लडैत छी जुन्ना जड़ल ऐंठन एखनो बचल "चंदन" बोल तै ऐंठल बजैत छी २२२१ २२२१ २१२ गजल -2 ककरो तऽ जुन्ना आँत भेल छै केयो खा-खा अप्सयाँत भेल छै पिसा रहलै देशक जनता कानूने-व्यवस्था जाँत भेल छै बुड़िबके लोक नेता बनलै विकास नेनाक खाँत भेल छै समाज बुड़लै बरु खत्ता मे संसद भोजक पाँत भेल छै ------------वर्ण-११----------- गजल-3 द्वेशक धाह सँ बेशी स्नेहक छाह छै शीतल नैनक नोर सँ बेशी देहक घाम छै तीतल देहक खून सँ बेशी लोकक मोन छै धीपल अप्पन सोच सँ बेशी आनक सोच छै रीतल ककरो हाथ सँ बेशी ककरो गात छै भीजल खूनक छाप सँ देखू सगरो बाट छै तीतल ककरो खाप सँ बेशी कत्तहु आम छै बेढ़ल ककरो सगर जिनगी धार-कात छै बीतल ककरो बोल समदाउनक भास छै भरले गाबय "चंदन" उदासी जग बुझै छै गीतल -----------वर्ण-१७-------- गजल-4 हम रूकल छी, लेखनी ठमकल अछि सभ कल्पना ठामे-ठाम दरकल अछि प्रगतिक पहिया आइ बिच्चे बाट पर भ्रष्टाचारक ओठ लागि अरकल अछि भोगी भूपति सभ धयने बाना योगी के रोटी प्रजाके खाय क्रमशः सरकल अछि ज्ञान-शील, तप-त्याग संकुचित भेल छै मुदा संकीर्ण सोच सौंसे फलकल अछि "चंदन"लोकके निश्चय प्रतिकार चाही कि फेर अनेरुए मेघ ढनकल अछि ? ---------------वर्ण-१५-------------- जे भान नहि !! आजादीक पैंसठि बरख बितलाक बादो एखनो मोन अछि जे कहिया विदेशी जिंजीरक बनहन सँ मुक्त भेल रही | मुदा, देशी जुन्ना सँ कहिया गछारल गेलहुँ से भान नहि । ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। १.कपिलेश्वर राउतमातृभाषा २.जगदानन्द झा 'मनु' -हम एहन किएक छी?/ कोना मदर डे हैप्पी ? ३.राजेश कुमार झा (कन्हैया)- देश भक्ति १ कपिलेश्वर राउत कविता- मातृभाषा माइक ओद्रमे जे भाषा सिखलक परदेश जा सभ बिसरलक। गाम आबि काहे-कुहे बजैए लोक कहैत आब बड्ड बुझैए। पढ़ल-लिखल तँ आर बिगारलक बाल-बच्चाकेँ कनभेन्ट धरेलक। चालि-ढालि अंग्रेजिया पकड़ि मातृभाषाक खिल्ली उड़ौलक। अप्पन भाषा बिसरि बहरबैया भाषा अपनौलक। अहाँ मैथिलीकेँ केना आगू केलौं अपने तँ गेबे केलौं बच्चोकेँ भँसिएलौं। जेतबो इज्जत गौआँ दइए परदेशी ओकरा थकुचैए। गौआँ-घरूआ मैथिली जियाबए परदेशिया बाहर भगाबए। कनिये अंग्रेजिया जोर लगबिऔ मैथिलीकेँ आगाँ देखबिऔ। जनक आ सीताक भाषा अपनाउ कर्म छोड़ू नै अपनाकेँ बनाउ। विद्यापति आ यात्री कहि गेला मण्डन आ अयाची कर्मवीर भेला। अप्पन भाषा सभ जन मिठ्ठा एकरा नै बुझू हँसी ठठ्ठा। माइक ओद्रमे जे भाषा सिखलक परदेश जा सभ बिसरलक। १ जगदानन्द झा 'मनु' ग्राम पोस्ट- हरिपुर डीह्टोंल, मधुबनी हम एहन किएक छी ?
हम एहन किएक छी ? माटि-पानि छोरि कए जाति-पाति पर लडैत किएक छी ? हम एहन किएक छी ?
आएल कियो हाँकि लेलक जाति-पाति पर बँटि देलक ऊँच-निच केँ झगरा में अपन विकास छोरि देलहुँ हम एहन किएक छी ?
केँ छी अगरा केँ छी पछरा सभ मिथिलाक संतान छी फोरि कपार देखु तँ सबहक सोनित एके छी हम एहन किएक छी ?
मुठ्ठी भरि लोक अपन स्वारथक कारणे अपना सब केँ तोर रहल अछि मोर रहल अछि जाति पाति में ओझरा कए मिथिलाक विकाश रोकि रहल अछि
धरति केँ कोनो जाति है छैक ? मएक कोनो जाति है छैक ? तँ हम सब सन्तान बटेलौंह कोना ? हम एहन किएक छी ?
आबो हम सँकल्प करि जाति-पाति पर नहि लरि अपन मिथला हमहि संभारब सप्पत मात्र एतबे करि हम एहन किएक छी ?
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कोना मदर डे हैप्पी ?
आब केहन जमाना आबि गेल बर्ख में एक्के दिन मए केँ यादि करै छी, 'मदर डे' केँ नाम पर मए केँ याद करै छी की हुनक सुखएल घा केँ काठी कए कँ जगाबै छी |
हम बिसैर गेलहुँ अपन मए केँ मुदा ओ नहि बिसरली, जाहिखन हुनका भेटलैन्ह सुन्दर कार्ड 'हैप्पी मदर डे' लिखल भेलैन्ह करेजा तार-तार नोर टघैर कए अपन स्पर्श सँ गाल केँ छुबैत हुनक करेजा तक चलि गेल आ करेजा में बंद महामए केँ कोंढ़ सँ सोनित में डुबल शव्द निकलल आह! की ई हमर ओहे लाल ? जेकरा पोसलौं खून सँ पाललहुँ अपन दूध सँ अपने सुतलहुँ भिजल में ओकरा लगेलहुँ करेज सँ | आई चारि बर्ख सँ भेटल नहि रहि रहल अछि परदेश अपन कनियाँ सँग बिसरि गेल बिधवा मए केँ आई अकस्मात मए यादि एलैह ई सुन्दर चिट्ठी (कार्ड) पठेलक मुदा की लिखल ? 'हैप्पी मदर डे' नमहर साँस लैत हुनक मन आगु बाजल जखन मदरे नहि हैप्पी तँ कोना मदर डे हैप्पी तँ कोना मदर डे हैप्पी ? २ राजेश कुमार झा (कन्हैया), पिताक नाम :- श्री विजय कुमार झा, गाम :- घोघरडीहा (पुबाई टोल), पोस्ट ऑफिस + थाना : -घोघरडीहा , जिला :- मधुबनी, (बिहार ) -847402 देश भक्ति भारत देश यऽसभदेशमे महान हम सब छी, अही मायक संतान
राम-कृष्णक धाम छी, ई यऽ एहेन पावन गंगा-यमुना बहै छथि, अमृत धार जेहेन
भारत देश यऽ सभ देशमे महान हम सभ छी, अही मायक संतान
ई छी ब्रह्मंडक, सृष्टिक शान एतऽ जनम लऽ बढ़ल हमर मान
भारत देश यऽ सभ देशमे महान हम सभ छी, अही मायक संतान
एही गोद मे खेलिकऽ भेलौं जबान यएह हमरा लेल, उपजेलथि अन्न-पानि
भारत देश यऽ सभ देशमे महान हम सभ छी एही मायक संतान
हम बनऽ चाहै छी, एहन सुंदर संतान जिनकर माला जपैए एहन वीर जबान
भारत देश यऽ सभ देशमे महान हम सभ छी एही मायक संतान
निकालब कट्टरता-आतंकबादक जान मिटा देबै ऐ दुश्मनक नामो निशान
भारत देश यऽ सभ देशमे महान हम सभ छी एही मायक संतान
लड़ैत-लड़ैत जौं चलि गेल जान करै छथिन भगवानो ओकर सम्मान
भारत देश यऽ सभ देशमे महान हम सभ छी एही मायक संतान
भारत माँ पर, भऽ जाउ बलिदान ओइ वीरक, होइ छै सृष्टिमे पहचान
भारत देश यऽ सभ देशोमे महान हम सभ छी एही मायक संतान
दिया दिअ माइसँ एकटा इहै वरदान हर बार जनम ली एत्तै चाही बनी हिन्दू-मुसलमान भारत देश यऽ सभ देशमे महान हम सभ छी एही मायक संतान ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। १.जगदीश चन्द्र ठाकुर ‘अनिल’- की भेटल आ की हेरा गेल (आत्म गीत)- (आगाँ)२. नारायण झा- एखनहुँ जकड़ल छी/ एकता १ जगदीश चन्द्र ठाकुर ‘अनिल’ की भेटल आ की हेरा गेल (आत्म गीत)- (आगाँ) लिखबा आ पढबा केर नशा सूनब आ सुनयबा केर नशा शब्दक सोना, हीरा, मोती देखब आ देखयबा केर नशा सदिखन आनन्दित रहबाले जीवनक अर्थ छल बुझा गेल हम सोचि रहल छी जीवनमे की भेटल आ की हेरा गेल । ऽ हम गाम-गाम घूमय लगलहुं सभठां सभ किछु देखय लगलहुं ‘नवतुरिया’कें ताकय लगलहुं ‘दुखमोचन’कें चीन्हय लगलहुं ‘मरनी’,‘बिल्टू’ केर देखि बगय छल अपन सभ दुख पडा गेल, हम सोचि रहल छी जीवनमे की भेटल आ की हेरा गेल। कवितामे देखलहुं हिमगिरिकें कवितामे देखलहुं गंगाकें कवितामे देखलहुं अपनहि सन नहि जानि कते भिखमंगाकें छल नाम, मूल आ गोत्र सभक कवितामे सभटा बुझा गेल, हम सोचि रहल छी जीवनमे की भेटल आ की हेरा गेल। ऽ हम आंखि खोलि चलइत रहलहुं घुमइत रहलहुं, देखइत रहलहुं पढइत रहलहुं, सुनइत रहलहुं गुनइत रहलहुं, धुनइत रहलहुं अहिनामे क्रमशः हमरहुसं ‘तोरा अंगनामे’ लिखा गेल, हम सोचि रहल छी जीवनमे की भेटल आ की हेरा गेल । ऽ शशिकान्त-सुधाकान्तक जोडी हमरा शब्दहुकें पांखि देलनि उडि गेल शब्द सभ गाम-गाम, पटना, दिल्ली आ कोलकाता गुरूजन, प्रियजनक प्रशंसासं छल हमर आत्मा जुडा गेल, हम सोचि रहल छी जीवनमे की भेटल आ की हेरा गेल। ऽ सतनारायणक कथा सुनलहुं ‘सपता-विपता’क व्यथा सुनलहुं चौरचनमे खीर आ पूरी, तं छठिमे ठकुआ-भुसबा खेलहुं दुर्गापूजामे बलिप्रदान छल प्रश्न मोनमे उठा गेल हम सोचि रहल छी जीवनमे की भेटल आ की हेरा गेल । ऽ २ नारायण झा, ग्राम पोस्ट रहुआ . संग्राम। प्रखण्ड. मधेपुर, जिला. मधुबनी ;बिहार। पिन कोड 847408
कविता
1. एखनहु जकड़ल छी
अप्पन देस आ अप्पन गॅाव पर पूर्वहि पड़ल स्वच्छन्दताक छॉव एखनहु धरि छी हम जकड़ल डेन पकड़ि जाइछ पकड़ल । परम्परा आ मनगढ़ बात डेग . डेग पर खींचॅए हाथ विचार सदिखन राखि सुविचार गढै़त रही नीक आचार । आजादीक दिन होयत तखन पवित्र जखन आनोक नयना सॅ देखव चित्र नीकक सदिखन गमकए सुगंध बेजाइक पल पल गन्हकए गंध । देखाबी हम मेहनत कॅ फुलाबी छाती अपनहि मेहनत सॅ मेहनतक फल होइछ मीठ छीनल संपदा सदिखन तीत । हे शिक्षार्थीए हे नवतुरिया खोलू चौपतल ज्ञानक पुरिया दुनिया अछि लोक भॅाति . भॅाति सॅ बनल एखनहु धरि ठाड़ छी परतंत्रक पॉति मे अड़ल । अप्पन देष आ अप्पन गॅाव पर पूर्वहि पड़ल स्वच्छन्दताक छॉव एखनहु धरि छी हम जकड़ल डेन पकड़ि जाइछ पकडल ।
2.
एकता बंधू एकताक डोर सॅं बॉंटू सूत-सूत कॅं डोर मे नहि चोट खाउ अनेकताक रोड सॅं गढू एकताक जोर मे। न केयो हिन्दु न मुसलमान सभ थिकहु विवेकी इंसान न केयो सिक्ख न ईसाई सभ थिकहु छोट-पैघ भाई-भाई। सभ तनक लहुक कण मिलाउ देखु एकहि सन किया करब मानवताक डाह सोचव तँ नीनो मे आयत आह। जे थिकाह अल्ला, हुनकहि राम जे थिकाह ईसा, कहैत छी श्याम कखनहुँ बनि साई, कखनहुँ हनमान सभ देव-देवीक थीक नाना नाम। जाति -पाति छूआ-छुत एहि सॅं रहु सभ अछुत पूत बनि भारत मॉं कए जुनि दुतकारू एहि मॉं कए एक भॅं लगाउ जयकारा गुंजा दिअयो भू-नभ-तारा जय भारत-भूमि जय हे माता अपनेक छी सभहक विधाता बंधू एकताक डोर सॅं बॉंटू सूत-सूत कॅं डोर मे नहि चोट खाउ अनेकताक रोड सॅं गढू एकताक जोर मे। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। विदेह नूतन अंक मिथिला कला संगीत १.राजनाथ मिश्र (चित्रमय मिथिला) २. उमेश मण्डल (मिथिलाक वनस्पति/ मिथिलाक जीव-जन्तु/ मिथिलाक जिनगी) १. राजनाथ मिश्र चित्रमय मिथिला स्लाइड शो चित्रमय मिथिला (https://sites.google.com/a/videha.com/videha-paintings-photos/ ) २. उमेश मण्डल मिथिलाक वनस्पति स्लाइड शो मिथिलाक जीव-जन्तु स्लाइड शो मिथिलाक जिनगी स्लाइड शो मिथिलाक वनस्पति/ मिथिलाक जीव जन्तु/ मिथिलाक जिनगी (https://sites.google.com/a/videha.com/videha-paintings-photos/ ) ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। विदेह नूतन अंक गद्य-पद्य भारती १. मोहनदास (दीर्घकथा):लेखक: उदय प्रकाश (मूल हिन्दीसँ मैथिलीमे अनुवाद विनीत उत्पल) मोहनदास (मैथिली-देवनागरी) मोहनदास (मैथिली-मिथिलाक्षर) मोहनदास (मैथिली-ब्रेल) २.छिन्नमस्ता- प्रभा खेतानक हिन्दी उपन्यासक सुशीला झा द्वारा मैथिली अनुवाद छिन्नमस्ता ३.कनकमणि दीक्षित (मूल नेपालीसँ मैथिली अनुवाद श्रीमती रूपा धीरू आ श्री धीरेन्द्र प्रेमर्षि) भगता बेङक देश-भ्रमण १.प्रो. चम्पा शर्माक डोगरी कविताक हिन्दी अनुवाद: श्रीमती रजनी शर्मा आ मैथिली अनुवाद : डॉ. शंभु कुमार सिंह, २.कुमार संभव ‘भारद्वाज’ क हिन्दी कविताक मैथिली अनुवाद: मैथिली अनुवादक: डॉ. शंभु कुमार सिंह डोगरी कविता मूल : प्रो. चम्पा शर्मा (अवकाश प्राप्त संस्थापक अध्यक्ष, स्नातकोत्तर डोगरी विभाग, जम्मू विश्वविद्यालय, जम्मू) हिन्दी अनुवाद : श्रीमती रजनी शर्मा मैथिली अनुवाद : डॉ. शंभु कुमार सिंह स्नेह-भरल सनेस बाजू सैनिक! कोन ठाम? स्नेह-भरल सनेस पठाबी अहाँक नाम? रहबाक अहाँक नहि कोनो ठेकान, आइ ‘सियासी’ काल्हि ‘पुलगामा’ आँखिएमे अहाँ काटी राति, जड़कल्ला आकि हो बरसाति। पठाबी स्नेहक मनि-आडर, पूँछ’ ‘रजौरी’ ‘डोडा’, ‘पाडर’ अहाँ लिखि भेजू, कतए पठाबी, अहाँक नाम? बाजू सैनिक! कोन ठाम? स्नेह-भरल सनेस पठाबी अहाँक नाम? कनहा पर सभदिन बोझ उठौने, ठाम-कुठाम अहाँ डेग बढौने। गरम सीरकमे हमसभ सूती, अहाँ छातीसँ बन्दूक लगौने। एक बरोबरि दिन आ राति, की साँझ आ की परात। कतए करै छी अहाँ विश्राम? कोन ठाम? बाजू सैनिक! कोन ठाम? स्नेह-भरल सनेस पठाबी अहाँक नाम? ‘सियाचीन’मे कोना रहै छी, बर्फ-बिछौना कोना सहै छी? सहैत हएब अहाँ बहुत ठंढ नहाएब तँ बुझू हैत दंड। नीक-सन एकटा पैटर्न चूनिकए, स्नेहक एकटा स्वीटर बुनिकए छी रखने, बाजू कतए पठाबी अहाँक नाम? बाजू सैनिक! कोन ठाम? स्नेह-भरल सनेस पठाबी अहाँक नाम? उत्तरलाई आ जैसलमेर भेल अहाँक ड्यूटी कैक बेर। चलैत बलुआही तुफ़ान भेल हैब अहाँ केहन हरान? करैत अमावस-सन अन्हार, अपनहुँ चेहरा भेल अनचिन्हार। स्नेह भरल हम चान चढ़ाबी अहाँक नाम। बाजू सैनिक! कोन ठाम? स्नेह-भरल सनेस पठाबी अहाँक नाम? जहाज उड़ाएब भ’ जाए सरल, सदिखन सीमान पर आँखि गरल। दुश्मन बैसल अछि ताकमे, नहि ओकर इरादा पाक अछि। छल-कपट करि ओ घेरए नहि, अहाँक मति ओ फेरए नहि। स्नेहक हम बरखा बरसाबी, अहाँक नाम। बाजू सैनिक! कोन ठाम? स्नेह-भरल सनेस पठाबी अहाँक नाम? कोच्चि, गोवा, विशाखापट्टनम् अंडमान आ चेन्नई दक्खिन। जल-सेना केर बेड़ा तारल, देशक दुश्मनकेँ अहाँ मारल। विश्व प्रशंसक अछि अहाँक, स्वयं वरूण छथि रक्षक अहाँक। एहिसँ बढ़िकए हम कहि की सकै छी? अहाँक नाम? बाजू सैनिक! कोन ठाम? स्नेह-भरल सनेस पठाबी अहाँक नाम? साहस ऊँच, जेना की ‘पीर’ कारगिल जाउ आकि कश्मीर। रक्षा अहाँक करताह महेश, गौरी-नन्दन श्रीगणेश। देश बचाएब, धरम निभाएब, ‘जोरावर’ सन यश अहाँ पाएब। आशीर्वचनक खाता फुजाबी अहाँक नाम। बाजू सैनिक! कोन ठाम? स्नेह-भरल सनेस पठाबी अहाँक नाम? खाखी, चिट्टी, लीलहा वर्दी अछि सरिपहुँ हमरा हमदर्दी। माथ सँ ल’ कए पयर धरि, बुझू ईश्वर केर रूप अनेक। मिलत जखन वीरता केर तगमा, रचब एकटा सुन्नर-सन नगमा। तार मुबारक केर पठायब अहाँक नाम। बाजू सैनिक! कोन ठाम? स्नेह-भरल सनेस पठाबी अहाँक नाम? जखन सुनै छी अहाँके फोन, प्रमुदित भ’ उठैछ हमर मोन। चिन्तामुक्त भ’ हम सुतै छी, मुक्त गगनमे हम उड़ै छी। सभ कुछ लागए हमरा मीत। मोन करए लिखू कोनो गीत, अहाँक नाम। बाजू सैनिक! कोन ठाम? स्नेह-भरल सनेस पठाबी अहाँक नाम? यौ विक्की, गुरदीप कि तारक, होमए अहाँकेँ जनम दिन मुबारक। समय भेटए तँ गौशाला जाएब, हरियर घास गायकेँ ओगारब। घूरि कए करब फोन जलंधर, दादी संग एखन जाइ छी मंदिर। अशेष स्नेह लेल धूप जरायब अहाँक नाम। बाजू सैनिक! कोन ठाम? स्नेह-भरल सनेस पठाबी अहाँक नाम? भूल्ली भैंसक दूधक घी, सेहो छी हम संजोगने । कुलदेवता केर पूजासँ पहिने, खा ने केओ सकता जे हो। श्री-पुलाव अहाँकेँ भाबए, ‘जल्दी बनाउ’ आबि कही ‘माए’! सभ इच्छा हम पूर करब खाइत छी किरिया हम? बाजू सैनिक! कोन ठाम? स्नेह-भरल सनेस पठाबी अहाँक नाम? बहुतो दिनसँ एकादशीक हम व्रत छी रखने, करब उद्यापन आएब अहाँ घूरि घर जखने, काज तँ आओरो.... छैक घर पर दिल खोलि हम ककरा देखाउ? हम्मर प्राण! बाजू सैनिक! कोन ठाम? स्नेह-भरल सनेस पठाबी अहाँक नाम? पागल-सन भेल अछि अहाँक बहिन, कुशल पूछैत छथि ओ सभ दिन। ‘राहड़ा’* करैत छथि अहाँके नामक, चर्च करैत छथि अहाँके काजक। वीर हमर युद्ध जीतकेँ औताह, कबुला करथि जा कए बाहवे। देवी माँ केँ भेंट चढौती अहाँक नाम। बाजू सैनिक! कोन ठाम? स्नेह-भरल सनेस पठाबी अहाँक नाम? युद्ध जीत कए अहाँ जे आएब, करब यज्ञ आ भोज कराएब। ठाम-ठाम पर फूल बिछायब, रंगोलीसँ घर-द्वार सजायब। अमृतसर, बाहवे, सतवारी जाएब ओतए हम बेरा-बेरी। पीर-मज़ार पर रोट चढ़ाएब अहाँक नाम। बाजू सैनिक! कोन ठाम? स्नेह-भरल सनेस पठाबी अहाँक नाम? देखि अहाँकेँ चान चढ़ए, केतनहुँ किएक नहि काज बढ़ए। देखी अहाँके सूरत कोमल, सदिखन रहए मोन अति हुलसल, चहुँ-दिस आबि जाएत बहार, बसात गबै अछि मेघ-मल्हार। गीत प्रीत केर गबै अछि कोयल अहाँक नाम। बाजू सैनिक! कोन ठाम? स्नेह-भरल सनेस पठाबी अहाँक नाम? *‘राहड़ा’ (जम्मू क्षेत्रमे मनाओल जाएवला भाय-बहिनक एकटा महत्वपूर्ण पर्व) *** २ कुमार संभव ‘भारद्वाज’ (उम्र-12 बर्ष, कक्षा-8, ग्राम- लहुआर, पत्रालय तेलहर, अंचल-महिषी, जिला-सहरसा, बाबू चतुर्भुज सिंहक प्रथम पौत्र छथि। मूल रूपसँ हिन्दीमे लिखल गेल ‘मेरा भारत देश महान’ हिनक पहिल कविता छियनि।) मैथिली अनुवादक: डॉ. शंभु कुमार सिंह हमर भारत देश महान हमर भारत देश महान जकर हम गाबी गुणगान विद्या केर भंडार एतय अछि कुरीति केर विनाशक अछि आन कलामे परिपूर्ण अछि व्यापक अछि ई अनुपम अछि, हमर भारत देश महान जकर हम गाबी गुणगान कहल जाइछ एहि देशक आगू सब क्यो माथ झुकौने अछि आन नदी आ पर्वत सभ सेहो एकर गुणकेँ गौने अछि, एहि धरती पर गंगा-यमुना केर बहैत निर्मल धारा अछि, हमर भारत देश महान जकर हम गाबी गुणगान वीर पुरूषसँ भरल पड़ल ई हमर मुल्क हमर समाज ई कुँवर सिंह आ गाँधीजी केर यैह निवास स्थान अछि, एहि धरती पर जनम नेने छथि राम, कृष्ण ओ बुद्ध सेहो एहि धरती पर जनम नेने छथि सीता ओ सावित्री सेहो, हमर भारत देश महान जकर हम गाबी गुणगान। **** ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। बालानां कृते अमित मिश्र १५ अगस्तपर एकटा गजल आ एकटा कविता गजल तीन रंगक सजल फहरेबै आइ हम गीत झंडा के लिखल गेबै आइ हम गाम मे घुमबै कहै छथि मास्टर हमर अमर नारा सबसँ लगबेबै आइ हम हाथ मे झंडा परेडक चल संग मे मंचपर भाषण अपन देबै आइ हम भगत गाँधी कहब गाथा आजाद के तीन रंगक भेद समझेबै आइ हम तानि छातीके सलामी हम देब रौ भेटतै टाँफी "अमित" खेबै आइ हम फाइलातुन-फाइलातुन-मुस्तफइलुन 2122-2122-2212 बहरे-जदीद ***** कविता- तीन रंगक पताका तीन रंगक पताका फहरेबै आकाशमे ता धरि लड़ब जा धरि ताकत अछि साँसमे नुका गेला माँ-बाबु एकने बदलि लहाशमे जानपर खेल रोक लगेलौँ दुश्मनक विकाशमे कतेक नव कनियाँ भेली विधवा मुदा खुश छथि उज्जर लिवाशमे आइ 1947 अगस्त पनरह आजादी भेँटि गेलै धरती सजल जेना मधुमासमे आइ 2012 मे फेरसँ गुलाम छी भ्रष्टाचार घुसखोरी , दहेजक आशमे चोरी अपहरण ,बम धमाका फँसल छै सब लचारीके फाँसमे कहिया भेटत आजादी के सब लड़त सेँध लागल "अमित" हम्मर विश्वासमे ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। बच्चा लोकनि द्वारा स्मरणीय श्लोक १.प्रातः काल ब्रह्ममुहूर्त्त (सूर्योदयक एक घंटा पहिने) सर्वप्रथम अपन दुनू हाथ देखबाक चाही, आ’ ई श्लोक बजबाक चाही। कराग्रे वसते लक्ष्मीः करमध्ये सरस्वती। करमूले स्थितो ब्रह्मा प्रभाते करदर्शनम्॥ करक आगाँ लक्ष्मी बसैत छथि, करक मध्यमे सरस्वती, करक मूलमे ब्रह्मा स्थित छथि। भोरमे ताहि द्वारे करक दर्शन करबाक थीक। २.संध्या काल दीप लेसबाक काल- दीपमूले स्थितो ब्रह्मा दीपमध्ये जनार्दनः। दीपाग्रे शङ्करः प्रोक्त्तः सन्ध्याज्योतिर्नमोऽस्तुते॥ दीपक मूल भागमे ब्रह्मा, दीपक मध्यभागमे जनार्दन (विष्णु) आऽ दीपक अग्र भागमे शङ्कर स्थित छथि। हे संध्याज्योति! अहाँकेँ नमस्कार। ३.सुतबाक काल- रामं स्कन्दं हनूमन्तं वैनतेयं वृकोदरम्। शयने यः स्मरेन्नित्यं दुःस्वप्नस्तस्य नश्यति॥ जे सभ दिन सुतबासँ पहिने राम, कुमारस्वामी, हनूमान्, गरुड़ आऽ भीमक स्मरण करैत छथि, हुनकर दुःस्वप्न नष्ट भऽ जाइत छन्हि। ४. नहेबाक समय- गङ्गे च यमुने चैव गोदावरि सरस्वति। नर्मदे सिन्धु कावेरि जलेऽस्मिन् सन्निधिं कुरू॥ हे गंगा, यमुना, गोदावरी, सरस्वती, नर्मदा, सिन्धु आऽ कावेरी धार। एहि जलमे अपन सान्निध्य दिअ। ५.उत्तरं यत्समुद्रस्य हिमाद्रेश्चैव दक्षिणम्। वर्षं तत् भारतं नाम भारती यत्र सन्ततिः॥ समुद्रक उत्तरमे आऽ हिमालयक दक्षिणमे भारत अछि आऽ ओतुका सन्तति भारती कहबैत छथि। ६.अहल्या द्रौपदी सीता तारा मण्डोदरी तथा। पञ्चकं ना स्मरेन्नित्यं महापातकनाशकम्॥ जे सभ दिन अहल्या, द्रौपदी, सीता, तारा आऽ मण्दोदरी, एहि पाँच साध्वी-स्त्रीक स्मरण करैत छथि, हुनकर सभ पाप नष्ट भऽ जाइत छन्हि। ७.अश्वत्थामा बलिर्व्यासो हनूमांश्च विभीषणः। कृपः परशुरामश्च सप्तैते चिरञ्जीविनः॥ अश्वत्थामा, बलि, व्यास, हनूमान्, विभीषण, कृपाचार्य आऽ परशुराम- ई सात टा चिरञ्जीवी कहबैत छथि। ८.साते भवतु सुप्रीता देवी शिखर वासिनी उग्रेन तपसा लब्धो यया पशुपतिः पतिः। सिद्धिः साध्ये सतामस्तु प्रसादान्तस्य धूर्जटेः जाह्नवीफेनलेखेव यन्यूधि शशिनः कला॥ ९. बालोऽहं जगदानन्द न मे बाला सरस्वती। अपूर्णे पंचमे वर्षे वर्णयामि जगत्त्रयम् ॥ १०. दूर्वाक्षत मंत्र(शुक्ल यजुर्वेद अध्याय २२, मंत्र २२) आ ब्रह्मन्नित्यस्य प्रजापतिर्ॠषिः। लिंभोक्त्ता देवताः। स्वराडुत्कृतिश्छन्दः। षड्जः स्वरः॥ आ ब्रह्म॑न् ब्राह्म॒णो ब्र॑ह्मवर्च॒सी जा॑यता॒मा रा॒ष्ट्रे रा॑ज॒न्यः शुरे॑ऽइषव्यो॒ऽतिव्या॒धी म॑हार॒थो जा॑यतां॒ दोग्ध्रीं धे॒नुर्वोढा॑न॒ड्वाना॒शुः सप्तिः॒ पुर॑न्धि॒र्योवा॑ जि॒ष्णू र॑थे॒ष्ठाः स॒भेयो॒ युवास्य यज॑मानस्य वी॒रो जा॒यतां निका॒मे-नि॑कामे नः प॒र्जन्यों वर्षतु॒ फल॑वत्यो न॒ऽओष॑धयः पच्यन्तां योगेक्ष॒मो नः॑ कल्पताम्॥२२॥ मन्त्रार्थाः सिद्धयः सन्तु पूर्णाः सन्तु मनोरथाः। शत्रूणां बुद्धिनाशोऽस्तु मित्राणामुदयस्तव। ॐ दीर्घायुर्भव। ॐ सौभाग्यवती भव। हे भगवान्। अपन देशमे सुयोग्य आ’ सर्वज्ञ विद्यार्थी उत्पन्न होथि, आ’ शुत्रुकेँ नाश कएनिहार सैनिक उत्पन्न होथि। अपन देशक गाय खूब दूध दय बाली, बरद भार वहन करएमे सक्षम होथि आ’ घोड़ा त्वरित रूपेँ दौगय बला होए। स्त्रीगण नगरक नेतृत्व करबामे सक्षम होथि आ’ युवक सभामे ओजपूर्ण भाषण देबयबला आ’ नेतृत्व देबामे सक्षम होथि। अपन देशमे जखन आवश्यक होय वर्षा होए आ’ औषधिक-बूटी सर्वदा परिपक्व होइत रहए। एवं क्रमे सभ तरहेँ हमरा सभक कल्याण होए। शत्रुक बुद्धिक नाश होए आ’ मित्रक उदय होए॥ मनुष्यकें कोन वस्तुक इच्छा करबाक चाही तकर वर्णन एहि मंत्रमे कएल गेल अछि। एहिमे वाचकलुप्तोपमालड़्कार अछि। अन्वय- ब्रह्म॑न् - विद्या आदि गुणसँ परिपूर्ण ब्रह्म रा॒ष्ट्रे - देशमे ब्र॑ह्मवर्च॒सी-ब्रह्म विद्याक तेजसँ युक्त्त आ जा॑यतां॒- उत्पन्न होए रा॑ज॒न्यः-राजा शुरे॑ऽ–बिना डर बला इषव्यो॒- बाण चलेबामे निपुण ऽतिव्या॒धी-शत्रुकेँ तारण दय बला म॑हार॒थो-पैघ रथ बला वीर दोग्ध्रीं-कामना(दूध पूर्ण करए बाली) धे॒नुर्वोढा॑न॒ड्वाना॒शुः धे॒नु-गौ वा वाणी र्वोढा॑न॒ड्वा- पैघ बरद ना॒शुः-आशुः-त्वरित सप्तिः॒-घोड़ा पुर॑न्धि॒र्योवा॑- पुर॑न्धि॒- व्यवहारकेँ धारण करए बाली र्योवा॑-स्त्री जि॒ष्णू-शत्रुकेँ जीतए बला र॑थे॒ष्ठाः-रथ पर स्थिर स॒भेयो॒-उत्तम सभामे युवास्य-युवा जेहन यज॑मानस्य-राजाक राज्यमे वी॒रो-शत्रुकेँ पराजित करएबला निका॒मे-नि॑कामे-निश्चययुक्त्त कार्यमे नः-हमर सभक प॒र्जन्यों-मेघ वर्षतु॒-वर्षा होए फल॑वत्यो-उत्तम फल बला ओष॑धयः-औषधिः पच्यन्तां- पाकए योगेक्ष॒मो-अलभ्य लभ्य करेबाक हेतु कएल गेल योगक रक्षा नः॑-हमरा सभक हेतु कल्पताम्-समर्थ होए ग्रिफिथक अनुवाद- हे ब्रह्मण, हमर राज्यमे ब्राह्मण नीक धार्मिक विद्या बला, राजन्य-वीर,तीरंदाज, दूध दए बाली गाय, दौगय बला जन्तु, उद्यमी नारी होथि। पार्जन्य आवश्यकता पड़ला पर वर्षा देथि, फल देय बला गाछ पाकए, हम सभ संपत्ति अर्जित/संरक्षित करी। 8.VIDEHA FOR NON RESIDENTS 8.1 to 8.3 MAITHILI LITERATURE IN ENGLISH 8.1.1.The Comet -GAJENDRA THAKUR translated by Jyoti Jha chaudhary 8.1.2.The_Science_of_Words- GAJENDRA THAKUR translated by the author himself 8.1.3.On_the_dice-board_of_the_millennium- GAJENDRA THAKUR translated by Jyoti Jha chaudhary 8.1.4.NAAGPHANS (IN ENGLISH)- SHEFALIKA VERMA translated by Dr. Rajiv Kumar Verma and Dr. Jaya Verma Maithili poem by Sh.Jagdish Prasad Mandal translated from Maithili into English by Sh.Vinit Utpal) Mind gem
Mold your mind's gem light your soul catching the flamed carcase identify the divine land.
when mind seems to be gem light sprinkle on the land show your own path oneself walk gracefully on the ground.
suffering erase slowly obligate are singing and dance vocalizing pray with aggrieved tone telling their agony own.
human body is invaluable unidentified medicine is headache develop sense and consciousness told you your brother own.
human is glorious organism humanity is its stance razing the discrimination among the men religion their own. Send your comments to ggajendra@videha.com विदेह नूतन अंक भाषापाक रचना-लेखन Input: (कोष्ठकमे देवनागरी, मिथिलाक्षर किंवा फोनेटिक-रोमनमे टाइप करू। Input in Devanagari, Mithilakshara or Phonetic-Roman.) Output: (परिणाम देवनागरी, मिथिलाक्षर आ फोनेटिक-रोमन/ रोमनमे। Result in Devanagari, Mithilakshara and Phonetic-Roman/ Roman.) English to Maithili Maithili to English इंग्लिश-मैथिली-कोष / मैथिली-इंग्लिश-कोष प्रोजेक्टकेँ आगू बढ़ाऊ, अपन सुझाव आ योगदान ई-मेल द्वारा ggajendra@videha.com पर पठाऊ। Top of Form विदेहक मैथिली-अंग्रेजी आ अंग्रेजी मैथिली कोष (इंटरनेटपर पहिल बेर सर्च-डिक्शनरी) एम.एस. एस.क्यू.एल. सर्वर आधारित -Based on ms-sql server Maithili-English and English-Maithili Dictionary. १.भारत आ नेपालक मैथिली भाषा-वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक शैली आ २.मैथिलीमे भाषा सम्पादन पाठ्यक्रम १.नेपाल आ भारतक मैथिली भाषा-वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक शैली
१.१. नेपालक मैथिली भाषा वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक उच्चारण आ लेखन शैली (भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक धारणाकेँ पूर्ण रूपसँ सङ्ग लऽ निर्धारित) मैथिलीमे उच्चारण तथा लेखन १.पञ्चमाक्षर आ अनुस्वार: पञ्चमाक्षरान्तर्गत ङ, ञ, ण, न एवं म अबैत अछि। संस्कृत भाषाक अनुसार शब्दक अन्तमे जाहि वर्गक अक्षर रहैत अछि ओही वर्गक पञ्चमाक्षर अबैत अछि। जेना- अङ्क (क वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ङ् आएल अछि।) पञ्च (च वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ञ् आएल अछि।) खण्ड (ट वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ण् आएल अछि।) सन्धि (त वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे न् आएल अछि।) खम्भ (प वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे म् आएल अछि।) उपर्युक्त बात मैथिलीमे कम देखल जाइत अछि। पञ्चमाक्षरक बदलामे अधिकांश जगहपर अनुस्वारक प्रयोग देखल जाइछ। जेना- अंक, पंच, खंड, संधि, खंभ आदि। व्याकरणविद पण्डित गोविन्द झाक कहब छनि जे कवर्ग, चवर्ग आ टवर्गसँ पूर्व अनुस्वार लिखल जाए तथा तवर्ग आ पवर्गसँ पूर्व पञ्चमाक्षरे लिखल जाए। जेना- अंक, चंचल, अंडा, अन्त तथा कम्पन। मुदा हिन्दीक निकट रहल आधुनिक लेखक एहि बातकेँ नहि मानैत छथि। ओ लोकनि अन्त आ कम्पनक जगहपर सेहो अंत आ कंपन लिखैत देखल जाइत छथि। नवीन पद्धति किछु सुविधाजनक अवश्य छैक। किएक तँ एहिमे समय आ स्थानक बचत होइत छैक। मुदा कतोक बेर हस्तलेखन वा मुद्रणमे अनुस्वारक छोट सन बिन्दु स्पष्ट नहि भेलासँ अर्थक अनर्थ होइत सेहो देखल जाइत अछि। अनुस्वारक प्रयोगमे उच्चारण-दोषक सम्भावना सेहो ततबए देखल जाइत अछि। एतदर्थ कसँ लऽ कऽ पवर्ग धरि पञ्चमाक्षरेक प्रयोग करब उचित अछि। यसँ लऽ कऽ ज्ञ धरिक अक्षरक सङ्ग अनुस्वारक प्रयोग करबामे कतहु कोनो विवाद नहि देखल जाइछ। २.ढ आ ढ़ : ढ़क उच्चारण “र् ह”जकाँ होइत अछि। अतः जतऽ “र् ह”क उच्चारण हो ओतऽ मात्र ढ़ लिखल जाए। आन ठाम खाली ढ लिखल जएबाक चाही। जेना- ढ = ढाकी, ढेकी, ढीठ, ढेउआ, ढङ्ग, ढेरी, ढाकनि, ढाठ आदि। ढ़ = पढ़ाइ, बढ़ब, गढ़ब, मढ़ब, बुढ़बा, साँढ़, गाढ़, रीढ़, चाँढ़, सीढ़ी, पीढ़ी आदि। उपर्युक्त शब्द सभकेँ देखलासँ ई स्पष्ट होइत अछि जे साधारणतया शब्दक शुरूमे ढ आ मध्य तथा अन्तमे ढ़ अबैत अछि। इएह नियम ड आ ड़क सन्दर्भ सेहो लागू होइत अछि। ३.व आ ब : मैथिलीमे “व”क उच्चारण ब कएल जाइत अछि, मुदा ओकरा ब रूपमे नहि लिखल जएबाक चाही। जेना- उच्चारण : बैद्यनाथ, बिद्या, नब, देबता, बिष्णु, बंश, बन्दना आदि। एहि सभक स्थानपर क्रमशः वैद्यनाथ, विद्या, नव, देवता, विष्णु, वंश, वन्दना लिखबाक चाही। सामान्यतया व उच्चारणक लेल ओ प्रयोग कएल जाइत अछि। जेना- ओकील, ओजह आदि। ४.य आ ज : कतहु-कतहु “य”क उच्चारण “ज”जकाँ करैत देखल जाइत अछि, मुदा ओकरा ज नहि लिखबाक चाही। उच्चारणमे यज्ञ, जदि, जमुना, जुग, जाबत, जोगी, जदु, जम आदि कहल जाएबला शब्द सभकेँ क्रमशः यज्ञ, यदि, यमुना, युग, यावत, योगी, यदु, यम लिखबाक चाही। ५.ए आ य : मैथिलीक वर्तनीमे ए आ य दुनू लिखल जाइत अछि। प्राचीन वर्तनी- कएल, जाए, होएत, माए, भाए, गाए आदि। नवीन वर्तनी- कयल, जाय, होयत, माय, भाय, गाय आदि। सामान्यतया शब्दक शुरूमे ए मात्र अबैत अछि। जेना एहि, एना, एकर, एहन आदि। एहि शब्द सभक स्थानपर यहि, यना, यकर, यहन आदिक प्रयोग नहि करबाक चाही। यद्यपि मैथिलीभाषी थारू सहित किछु जातिमे शब्दक आरम्भोमे “ए”केँ य कहि उच्चारण कएल जाइत अछि। ए आ “य”क प्रयोगक सन्दर्भमे प्राचीने पद्धतिक अनुसरण करब उपयुक्त मानि एहि पुस्तकमे ओकरे प्रयोग कएल गेल अछि। किएक तँ दुनूक लेखनमे कोनो सहजता आ दुरूहताक बात नहि अछि। आ मैथिलीक सर्वसाधारणक उच्चारण-शैली यक अपेक्षा एसँ बेसी निकट छैक। खास कऽ कएल, हएब आदि कतिपय शब्दकेँ कैल, हैब आदि रूपमे कतहु-कतहु लिखल जाएब सेहो “ए”क प्रयोगकेँ बेसी समीचीन प्रमाणित करैत अछि। ६.हि, हु तथा एकार, ओकार : मैथिलीक प्राचीन लेखन-परम्परामे कोनो बातपर बल दैत काल शब्दक पाछाँ हि, हु लगाओल जाइत छैक। जेना- हुनकहि, अपनहु, ओकरहु, तत्कालहि, चोट्टहि, आनहु आदि। मुदा आधुनिक लेखनमे हिक स्थानपर एकार एवं हुक स्थानपर ओकारक प्रयोग करैत देखल जाइत अछि। जेना- हुनके, अपनो, तत्काले, चोट्टे, आनो आदि। ७.ष तथा ख : मैथिली भाषामे अधिकांशतः षक उच्चारण ख होइत अछि। जेना- षड्यन्त्र (खड़यन्त्र), षोडशी (खोड़शी), षट्कोण (खटकोण), वृषेश (वृखेश), सन्तोष (सन्तोख) आदि। ८.ध्वनि-लोप : निम्नलिखित अवस्थामे शब्दसँ ध्वनि-लोप भऽ जाइत अछि: (क) क्रियान्वयी प्रत्यय अयमे य वा ए लुप्त भऽ जाइत अछि। ओहिमे सँ पहिने अक उच्चारण दीर्घ भऽ जाइत अछि। ओकर आगाँ लोप-सूचक चिह्न वा विकारी (’ / ऽ) लगाओल जाइछ। जेना- पूर्ण रूप : पढ़ए (पढ़य) गेलाह, कए (कय) लेल, उठए (उठय) पड़तौक। अपूर्ण रूप : पढ़’ गेलाह, क’ लेल, उठ’ पड़तौक। पढ़ऽ गेलाह, कऽ लेल, उठऽ पड़तौक। (ख) पूर्वकालिक कृत आय (आए) प्रत्ययमे य (ए) लुप्त भऽ जाइछ, मुदा लोप-सूचक विकारी नहि लगाओल जाइछ। जेना- पूर्ण रूप : खाए (य) गेल, पठाय (ए) देब, नहाए (य) अएलाह। अपूर्ण रूप : खा गेल, पठा देब, नहा अएलाह। (ग) स्त्री प्रत्यय इक उच्चारण क्रियापद, संज्ञा, ओ विशेषण तीनूमे लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना- पूर्ण रूप : दोसरि मालिनि चलि गेलि। अपूर्ण रूप : दोसर मालिन चलि गेल। (घ) वर्तमान कृदन्तक अन्तिम त लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना- पूर्ण रूप : पढ़ैत अछि, बजैत अछि, गबैत अछि। अपूर्ण रूप : पढ़ै अछि, बजै अछि, गबै अछि। (ङ) क्रियापदक अवसान इक, उक, ऐक तथा हीकमे लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना- पूर्ण रूप: छियौक, छियैक, छहीक, छौक, छैक, अबितैक, होइक। अपूर्ण रूप : छियौ, छियै, छही, छौ, छै, अबितै, होइ। (च) क्रियापदीय प्रत्यय न्ह, हु तथा हकारक लोप भऽ जाइछ। जेना- पूर्ण रूप : छन्हि, कहलन्हि, कहलहुँ, गेलह, नहि। अपूर्ण रूप : छनि, कहलनि, कहलौँ, गेलऽ, नइ, नञि, नै। ९.ध्वनि स्थानान्तरण : कोनो-कोनो स्वर-ध्वनि अपना जगहसँ हटि कऽ दोसर ठाम चलि जाइत अछि। खास कऽ ह्रस्व इ आ उक सम्बन्धमे ई बात लागू होइत अछि। मैथिलीकरण भऽ गेल शब्दक मध्य वा अन्तमे जँ ह्रस्व इ वा उ आबए तँ ओकर ध्वनि स्थानान्तरित भऽ एक अक्षर आगाँ आबि जाइत अछि। जेना- शनि (शइन), पानि (पाइन), दालि ( दाइल), माटि (माइट), काछु (काउछ), मासु (माउस) आदि। मुदा तत्सम शब्द सभमे ई निअम लागू नहि होइत अछि। जेना- रश्मिकेँ रइश्म आ सुधांशुकेँ सुधाउंस नहि कहल जा सकैत अछि। १०.हलन्त(्)क प्रयोग : मैथिली भाषामे सामान्यतया हलन्त (्)क आवश्यकता नहि होइत अछि। कारण जे शब्दक अन्तमे अ उच्चारण नहि होइत अछि। मुदा संस्कृत भाषासँ जहिनाक तहिना मैथिलीमे आएल (तत्सम) शब्द सभमे हलन्त प्रयोग कएल जाइत अछि। एहि पोथीमे सामान्यतया सम्पूर्ण शब्दकेँ मैथिली भाषा सम्बन्धी निअम अनुसार हलन्तविहीन राखल गेल अछि। मुदा व्याकरण सम्बन्धी प्रयोजनक लेल अत्यावश्यक स्थानपर कतहु-कतहु हलन्त देल गेल अछि। प्रस्तुत पोथीमे मथिली लेखनक प्राचीन आ नवीन दुनू शैलीक सरल आ समीचीन पक्ष सभकेँ समेटि कऽ वर्ण-विन्यास कएल गेल अछि। स्थान आ समयमे बचतक सङ्गहि हस्त-लेखन तथा तकनीकी दृष्टिसँ सेहो सरल होबऽबला हिसाबसँ वर्ण-विन्यास मिलाओल गेल अछि। वर्तमान समयमे मैथिली मातृभाषी पर्यन्तकेँ आन भाषाक माध्यमसँ मैथिलीक ज्ञान लेबऽ पड़ि रहल परिप्रेक्ष्यमे लेखनमे सहजता तथा एकरूपतापर ध्यान देल गेल अछि। तखन मैथिली भाषाक मूल विशेषता सभ कुण्ठित नहि होइक, ताहू दिस लेखक-मण्डल सचेत अछि। प्रसिद्ध भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक कहब छनि जे सरलताक अनुसन्धानमे एहन अवस्था किन्नहु ने आबऽ देबाक चाही जे भाषाक विशेषता छाँहमे पडि जाए। -(भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक धारणाकेँ पूर्ण रूपसँ सङ्ग लऽ निर्धारित) १.२. मैथिली अकादमी, पटना द्वारा निर्धारित मैथिली लेखन-शैली
१. जे शब्द मैथिली-साहित्यक प्राचीन कालसँ आइ धरि जाहि वर्त्तनीमे प्रचलित अछि, से सामान्यतः ताहि वर्त्तनीमे लिखल जाय- उदाहरणार्थ-
ग्राह्य
एखन ठाम जकर, तकर तनिकर अछि
अग्राह्य अखन, अखनि, एखेन, अखनी ठिमा, ठिना, ठमा जेकर, तेकर तिनकर। (वैकल्पिक रूपेँ ग्राह्य) ऐछ, अहि, ए।
२. निम्नलिखित तीन प्रकारक रूप वैकल्पिकतया अपनाओल जाय: भऽ गेल, भय गेल वा भए गेल। जा रहल अछि, जाय रहल अछि, जाए रहल अछि। कर’ गेलाह, वा करय गेलाह वा करए गेलाह।
३. प्राचीन मैथिलीक ‘न्ह’ ध्वनिक स्थानमे ‘न’ लिखल जाय सकैत अछि यथा कहलनि वा कहलन्हि।
४. ‘ऐ’ तथा ‘औ’ ततय लिखल जाय जत’ स्पष्टतः ‘अइ’ तथा ‘अउ’ सदृश उच्चारण इष्ट हो। यथा- देखैत, छलैक, बौआ, छौक इत्यादि।
५. मैथिलीक निम्नलिखित शब्द एहि रूपे प्रयुक्त होयत: जैह, सैह, इएह, ओऐह, लैह तथा दैह।
६. ह्र्स्व इकारांत शब्दमे ‘इ’ के लुप्त करब सामान्यतः अग्राह्य थिक। यथा- ग्राह्य देखि आबह, मालिनि गेलि (मनुष्य मात्रमे)।
७. स्वतंत्र ह्रस्व ‘ए’ वा ‘य’ प्राचीन मैथिलीक उद्धरण आदिमे तँ यथावत राखल जाय, किंतु आधुनिक प्रयोगमे वैकल्पिक रूपेँ ‘ए’ वा ‘य’ लिखल जाय। यथा:- कयल वा कएल, अयलाह वा अएलाह, जाय वा जाए इत्यादि।
८. उच्चारणमे दू स्वरक बीच जे ‘य’ ध्वनि स्वतः आबि जाइत अछि तकरा लेखमे स्थान वैकल्पिक रूपेँ देल जाय। यथा- धीआ, अढ़ैआ, विआह, वा धीया, अढ़ैया, बियाह।
९. सानुनासिक स्वतंत्र स्वरक स्थान यथासंभव ‘ञ’ लिखल जाय वा सानुनासिक स्वर। यथा:- मैञा, कनिञा, किरतनिञा वा मैआँ, कनिआँ, किरतनिआँ।
१०. कारकक विभक्त्तिक निम्नलिखित रूप ग्राह्य:- हाथकेँ, हाथसँ, हाथेँ, हाथक, हाथमे। ’मे’ मे अनुस्वार सर्वथा त्याज्य थिक। ‘क’ क वैकल्पिक रूप ‘केर’ राखल जा सकैत अछि।
११. पूर्वकालिक क्रियापदक बाद ‘कय’ वा ‘कए’ अव्यय वैकल्पिक रूपेँ लगाओल जा सकैत अछि। यथा:- देखि कय वा देखि कए।
१२. माँग, भाँग आदिक स्थानमे माङ, भाङ इत्यादि लिखल जाय।
१३. अर्द्ध ‘न’ ओ अर्द्ध ‘म’ क बदला अनुसार नहि लिखल जाय, किंतु छापाक सुविधार्थ अर्द्ध ‘ङ’ , ‘ञ’, तथा ‘ण’ क बदला अनुस्वारो लिखल जा सकैत अछि। यथा:- अङ्क, वा अंक, अञ्चल वा अंचल, कण्ठ वा कंठ।
१४. हलंत चिह्न निअमतः लगाओल जाय, किंतु विभक्तिक संग अकारांत प्रयोग कएल जाय। यथा:- श्रीमान्, किंतु श्रीमानक।
१५. सभ एकल कारक चिह्न शब्दमे सटा क’ लिखल जाय, हटा क’ नहि, संयुक्त विभक्तिक हेतु फराक लिखल जाय, यथा घर परक।
१६. अनुनासिककेँ चन्द्रबिन्दु द्वारा व्यक्त कयल जाय। परंतु मुद्रणक सुविधार्थ हि समान जटिल मात्रापर अनुस्वारक प्रयोग चन्द्रबिन्दुक बदला कयल जा सकैत अछि। यथा- हिँ केर बदला हिं।
१७. पूर्ण विराम पासीसँ ( । ) सूचित कयल जाय।
१८. समस्त पद सटा क’ लिखल जाय, वा हाइफेनसँ जोड़ि क’ , हटा क’ नहि।
१९. लिअ तथा दिअ शब्दमे बिकारी (ऽ) नहि लगाओल जाय।
२०. अंक देवनागरी रूपमे राखल जाय।
२१.किछु ध्वनिक लेल नवीन चिन्ह बनबाओल जाय। जा' ई नहि बनल अछि ताबत एहि दुनू ध्वनिक बदला पूर्ववत् अय/ आय/ अए/ आए/ आओ/ अओ लिखल जाय। आकि ऎ वा ऒ सँ व्यक्त कएल जाय।
ह./- गोविन्द झा ११/८/७६ श्रीकान्त ठाकुर ११/८/७६ सुरेन्द्र झा "सुमन" ११/०८/७६
२. मैथिलीमे भाषा सम्पादन पाठ्यक्रम २.१. उच्चारण निर्देश: (बोल्ड कएल रूप ग्राह्य):- दन्त न क उच्चारणमे दाँतमे जीह सटत- जेना बाजू नाम , मुदा ण क उच्चारणमे जीह मूर्धामे सटत (नै सटैए तँ उच्चारण दोष अछि)- जेना बाजू गणेश। तालव्य शमे जीह तालुसँ , षमे मूर्धासँ आ दन्त समे दाँतसँ सटत। निशाँ, सभ आ शोषण बाजि कऽ देखू। मैथिलीमे ष केँ वैदिक संस्कृत जकाँ ख सेहो उच्चरित कएल जाइत अछि, जेना वर्षा, दोष। य अनेको स्थानपर ज जकाँ उच्चरित होइत अछि आ ण ड़ जकाँ (यथा संयोग आ गणेश संजोग आ गड़ेस उच्चरित होइत अछि)। मैथिलीमे व क उच्चारण ब, श क उच्चारण स आ य क उच्चारण ज सेहो होइत अछि। ओहिना ह्रस्व इ बेशीकाल मैथिलीमे पहिने बाजल जाइत अछि कारण देवनागरीमे आ मिथिलाक्षरमे ह्रस्व इ अक्षरक पहिने लिखलो जाइत आ बाजलो जएबाक चाही। कारण जे हिन्दीमे एकर दोषपूर्ण उच्चारण होइत अछि (लिखल तँ पहिने जाइत अछि मुदा बाजल बादमे जाइत अछि), से शिक्षा पद्धतिक दोषक कारण हम सभ ओकर उच्चारण दोषपूर्ण ढंगसँ कऽ रहल छी। अछि- अ इ छ ऐछ (उच्चारण) छथि- छ इ थ – छैथ (उच्चारण) पहुँचि- प हुँ इ च (उच्चारण) आब अ आ इ ई ए ऐ ओ औ अं अः ऋ ऐ सभ लेल मात्रा सेहो अछि, मुदा ऐमे ई ऐ ओ औ अं अः ऋ केँ संयुक्ताक्षर रूपमे गलत रूपमे प्रयुक्त आ उच्चरित कएल जाइत अछि। जेना ऋ केँ री रूपमे उच्चरित करब। आ देखियौ- ऐ लेल देखिऔ क प्रयोग अनुचित। मुदा देखिऐ लेल देखियै अनुचित। क् सँ ह् धरि अ सम्मिलित भेलासँ क सँ ह बनैत अछि, मुदा उच्चारण काल हलन्त युक्त शब्दक अन्तक उच्चारणक प्रवृत्ति बढ़ल अछि, मुदा हम जखन मनोजमे ज् अन्तमे बजैत छी, तखनो पुरनका लोककेँ बजैत सुनबन्हि- मनोजऽ, वास्तवमे ओ अ युक्त ज् = ज बजै छथि। फेर ज्ञ अछि ज् आ ञ क संयुक्त मुदा गलत उच्चारण होइत अछि- ग्य। ओहिना क्ष अछि क् आ ष क संयुक्त मुदा उच्चारण होइत अछि छ। फेर श् आ र क संयुक्त अछि श्र ( जेना श्रमिक) आ स् आ र क संयुक्त अछि स्र (जेना मिस्र)। त्र भेल त+र । उच्चारणक ऑडियो फाइल विदेह आर्काइव http://www.videha.co.in/ पर उपलब्ध अछि। फेर केँ / सँ / पर पूर्व अक्षरसँ सटा कऽ लिखू मुदा तँ / कऽ हटा कऽ। ऐमे सँ मे पहिल सटा कऽ लिखू आ बादबला हटा कऽ। अंकक बाद टा लिखू सटा कऽ मुदा अन्य ठाम टा लिखू हटा कऽ– जेना छहटा मुदा सभ टा। फेर ६अ म सातम लिखू- छठम सातम नै। घरबलामे बला मुदा घरवालीमे वाली प्रयुक्त करू। रहए- रहै मुदा सकैए (उच्चारण सकै-ए)। मुदा कखनो काल रहए आ रहै मे अर्थ भिन्नता सेहो, जेना से कम्मो जगहमे पार्किंग करबाक अभ्यास रहै ओकरा। पुछलापर पता लागल जे ढुनढुन नाम्ना ई ड्राइवर कनाट प्लेसक पार्किंगमे काज करैत रहए। छलै, छलए मे सेहो ऐ तरहक भेल। छलए क उच्चारण छल-ए सेहो। संयोगने- (उच्चारण संजोगने) केँ/ कऽ केर- क ( केर क प्रयोग गद्यमे नै करू , पद्यमे कऽ सकै छी। ) क (जेना रामक) –रामक आ संगे (उच्चारण राम के / राम कऽ सेहो) सँ- सऽ (उच्चारण) चन्द्रबिन्दु आ अनुस्वार- अनुस्वारमे कंठ धरिक प्रयोग होइत अछि मुदा चन्द्रबिन्दुमे नै। चन्द्रबिन्दुमे कनेक एकारक सेहो उच्चारण होइत अछि- जेना रामसँ- (उच्चारण राम सऽ) रामकेँ- (उच्चारण राम कऽ/ राम के सेहो)। केँ जेना रामकेँ भेल हिन्दीक को (राम को)- राम को= रामकेँ क जेना रामक भेल हिन्दीक का ( राम का) राम का= रामक कऽ जेना जा कऽ भेल हिन्दीक कर ( जा कर) जा कर= जा कऽ सँ भेल हिन्दीक से (राम से) राम से= रामसँ सऽ , तऽ , त , केर (गद्यमे) एे चारू शब्द सबहक प्रयोग अवांछित। के दोसर अर्थेँ प्रयुक्त भऽ सकैए- जेना, के कहलक? विभक्ति “क”क बदला एकर प्रयोग अवांछित। नञि, नहि, नै, नइ, नँइ, नइँ, नइं ऐ सभक उच्चारण आ लेखन - नै त्त्व क बदलामे त्व जेना महत्वपूर्ण (महत्त्वपूर्ण नै) जतए अर्थ बदलि जाए ओतहि मात्र तीन अक्षरक संयुक्ताक्षरक प्रयोग उचित। सम्पति- उच्चारण स म्प इ त (सम्पत्ति नै- कारण सही उच्चारण आसानीसँ सम्भव नै)। मुदा सर्वोत्तम (सर्वोतम नै)। राष्ट्रिय (राष्ट्रीय नै) सकैए/ सकै (अर्थ परिवर्तन) पोछैले/ पोछै लेल/ पोछए लेल पोछैए/ पोछए/ (अर्थ परिवर्तन) पोछए/ पोछै ओ लोकनि ( हटा कऽ, ओ मे बिकारी नै) ओइ/ ओहि ओहिले/ ओहि लेल/ ओही लऽ जएबेँ/ बैसबेँ पँचभइयाँ देखियौक/ (देखिऔक नै- तहिना अ मे ह्रस्व आ दीर्घक मात्राक प्रयोग अनुचित) जकाँ / जेकाँ तँइ/ तैँ/ होएत / हएत नञि/ नहि/ नँइ/ नइँ/ नै सौँसे/ सौंसे बड़ / बड़ी (झोराओल) गाए (गाइ नहि), मुदा गाइक दूध (गाएक दूध नै।) रहलेँ/ पहिरतैँ हमहीं/ अहीं सब - सभ सबहक - सभहक धरि - तक गप- बात बूझब - समझब बुझलौं/ समझलौं/ बुझलहुँ - समझलहुँ हमरा आर - हम सभ आकि- आ कि सकैछ/ करैछ (गद्यमे प्रयोगक आवश्यकता नै) होइन/ होनि जाइन (जानि नै, जेना देल जाइन) मुदा जानि-बूझि (अर्थ परिव्र्तन) पइठ/ जाइठ आउ/ जाउ/ आऊ/ जाऊ मे, केँ, सँ, पर (शब्दसँ सटा कऽ) तँ कऽ धऽ दऽ (शब्दसँ हटा कऽ) मुदा दूटा वा बेसी विभक्ति संग रहलापर पहिल विभक्ति टाकेँ सटाऊ। जेना ऐमे सँ । एकटा , दूटा (मुदा कए टा) बिकारीक प्रयोग शब्दक अन्तमे, बीचमे अनावश्यक रूपेँ नै। आकारान्त आ अन्तमे अ क बाद बिकारीक प्रयोग नै (जेना दिअ , आ/ दिय’ , आ’, आ नै ) अपोस्ट्रोफीक प्रयोग बिकारीक बदलामे करब अनुचित आ मात्र फॉन्टक तकनीकी न्यूनताक परिचायक)- ओना बिकारीक संस्कृत रूप ऽ अवग्रह कहल जाइत अछि आ वर्तनी आ उच्चारण दुनू ठाम एकर लोप रहैत अछि/ रहि सकैत अछि (उच्चारणमे लोप रहिते अछि)। मुदा अपोस्ट्रोफी सेहो अंग्रेजीमे पसेसिव केसमे होइत अछि आ फ्रेंचमे शब्दमे जतए एकर प्रयोग होइत अछि जेना raison d’etre एतए सेहो एकर उच्चारण रैजौन डेटर होइत अछि, माने अपोस्ट्रॉफी अवकाश नै दैत अछि वरन जोड़ैत अछि, से एकर प्रयोग बिकारीक बदला देनाइ तकनीकी रूपेँ सेहो अनुचित)। अइमे, एहिमे/ ऐमे जइमे, जाहिमे एखन/ अखन/ अइखन केँ (के नहि) मे (अनुस्वार रहित) भऽ मे दऽ तँ (तऽ, त नै) सँ ( सऽ स नै) गाछ तर गाछ लग साँझ खन जो (जो go, करै जो do) तै/तइ जेना- तै दुआरे/ तइमे/ तइले जै/जइ जेना- जै कारण/ जइसँ/ जइले ऐ/अइ जेना- ऐ कारण/ ऐसँ/ अइले/ मुदा एकर एकटा खास प्रयोग- लालति कतेक दिनसँ कहैत रहैत अइ लै/लइ जेना लैसँ/ लइले/ लै दुआरे लहँ/ लौं गेलौं/ लेलौं/ लेलँह/ गेलहुँ/ लेलहुँ/ लेलँ जइ/ जाहि/ जै जहिठाम/ जाहिठाम/ जइठाम/ जैठाम एहि/ अहि/ अइ (वाक्यक अंतमे ग्राह्य) / ऐ अइछ/ अछि/ ऐछ तइ/ तहि/ तै/ ताहि ओहि/ ओइ सीखि/ सीख जीवि/ जीवी/ जीब भलेहीं/ भलहिं तैं/ तँइ/ तँए जाएब/ जएब लइ/ लै छइ/ छै नहि/ नै/ नइ गइ/ गै छनि/ छन्हि ... समए शब्दक संग जखन कोनो विभक्ति जुटै छै तखन समै जना समैपर इत्यादि। असगरमे हृदए आ विभक्ति जुटने हृदे जना हृदेसँ, हृदेमे इत्यादि। जइ/ जाहि/ जै जहिठाम/ जाहिठाम/ जइठाम/ जैठाम एहि/ अहि/ अइ/ ऐ अइछ/ अछि/ ऐछ तइ/ तहि/ तै/ ताहि ओहि/ ओइ सीखि/ सीख जीवि/ जीवी/ जीब भले/ भलेहीं/ भलहिं तैं/ तँइ/ तँए जाएब/ जएब लइ/ लै छइ/ छै नहि/ नै/ नइ गइ/ गै छनि/ छन्हि चुकल अछि/ गेल गछि २.२. मैथिलीमे भाषा सम्पादन पाठ्यक्रम नीचाँक सूचीमे देल विकल्पमेसँ लैंगुएज एडीटर द्वारा कोन रूप चुनल जेबाक चाही: बोल्ड कएल रूप ग्राह्य: १.होयबला/ होबयबला/ होमयबला/ हेब’बला, हेम’बला/ होयबाक/होबएबला /होएबाक २. आ’/आऽ आ ३. क’ लेने/कऽ लेने/कए लेने/कय लेने/ल’/लऽ/लय/लए ४. भ’ गेल/भऽ गेल/भय गेल/भए गेल ५. कर’ गेलाह/करऽ गेलह/करए गेलाह/करय गेलाह ६. लिअ/दिअ लिय’,दिय’,लिअ’,दिय’/ ७. कर’ बला/करऽ बला/ करय बला करैबला/क’र’ बला / करैवाली ८. बला वला (पुरूष), वाली (स्त्री) ९ . आङ्ल आंग्ल १०. प्रायः प्रायह ११. दुःख दुख १ २. चलि गेल चल गेल/चैल गेल १३. देलखिन्ह देलकिन्ह, देलखिन १४. देखलन्हि देखलनि/ देखलैन्ह १५. छथिन्ह/ छलन्हि छथिन/ छलैन/ छलनि १६. चलैत/दैत चलति/दैति १७. एखनो अखनो १८. बढ़नि बढ़इन बढ़न्हि १९. ओ’/ओऽ(सर्वनाम) ओ २० . ओ (संयोजक) ओ’/ओऽ २१. फाँगि/फाङ्गि फाइंग/फाइङ २२. जे जे’/जेऽ २३. ना-नुकुर ना-नुकर २४. केलन्हि/केलनि/कयलन्हि २५. तखनतँ/ तखन तँ २६. जा रहल/जाय रहल/जाए रहल २७. निकलय/निकलए लागल/ लगल बहराय/ बहराए लागल/ लगल निकल’/बहरै लागल २८. ओतय/ जतय जत’/ ओत’/ जतए/ ओतए २९. की फूरल जे कि फूरल जे ३०. जे जे’/जेऽ ३१. कूदि / यादि(मोन पारब) कूइद/याइद/कूद/याद/ यादि (मोन) ३२. इहो/ ओहो ३३. हँसए/ हँसय हँसऽ ३४. नौ आकि दस/नौ किंवा दस/ नौ वा दस ३५. सासु-ससुर सास-ससुर ३६. छह/ सात छ/छः/सात ३७. की की’/ कीऽ (दीर्घीकारान्तमे ऽ वर्जित) ३८. जबाब जवाब ३९. करएताह/ करेताह करयताह ४०. दलान दिशि दलान दिश/दलान दिस ४१ . गेलाह गएलाह/गयलाह ४२. किछु आर/ किछु और/ किछ आर ४३. जाइ छल/ जाइत छल जाति छल/जैत छल ४४. पहुँचि/ भेट जाइत छल/ भेट जाइ छलए पहुँच/ भेटि जाइत छल ४५. जबान (युवा)/ जवान(फौजी) ४६. लय/ लए क’/ कऽ/ लए कए / लऽ कऽ/ लऽ कए ४७. ल’/लऽ कय/ कए ४८. एखन / एखने / अखन / अखने ४९. अहींकेँ अहीँकेँ ५०. गहींर गहीँर ५१. धार पार केनाइ धार पार केनाय/केनाए ५२. जेकाँ जेँकाँ/ जकाँ ५३. तहिना तेहिना ५४. एकर अकर ५५. बहिनउ बहनोइ ५६. बहिन बहिनि ५७. बहिन-बहिनोइ बहिन-बहनउ ५८. नहि/ नै ५९. करबा / करबाय/ करबाए ६०. तँ/ त ऽ तय/तए ६१. भैयारी मे छोट-भाए/भै/, जेठ-भाय/भाइ, ६२. गिनतीमे दू भाइ/भाए/भाँइ ६३. ई पोथी दू भाइक/ भाँइ/ भाए/ लेल। यावत जावत ६४. माय मै / माए मुदा माइक ममता ६५. देन्हि/ दइन दनि/ दएन्हि/ दयन्हि दन्हि/ दैन्हि ६६. द’/ दऽ/ दए ६७. ओ (संयोजक) ओऽ (सर्वनाम) ६८. तका कए तकाय तकाए ६९. पैरे (on foot) पएरे कएक/ कैक ७०. ताहुमे/ ताहूमे ७१. पुत्रीक ७२. बजा कय/ कए / कऽ ७३. बननाय/बननाइ ७४. कोला ७५. दिनुका दिनका ७६. ततहिसँ ७७. गरबओलन्हि/ गरबौलनि/ गरबेलन्हि/ गरबेलनि ७८. बालु बालू ७९. चेन्ह चिन्ह(अशुद्ध) ८०. जे जे’ ८१ . से/ के से’/के’ ८२. एखुनका अखनुका ८३. भुमिहार भूमिहार ८४. सुग्गर / सुगरक/ सूगर ८५. झठहाक झटहाक ८६. छूबि ८७. करइयो/ओ करैयो ने देलक /करियौ-करइयौ ८८. पुबारि पुबाइ ८९. झगड़ा-झाँटी झगड़ा-झाँटि ९०. पएरे-पएरे पैरे-पैरे ९१. खेलएबाक ९२. खेलेबाक ९३. लगा ९४. होए- हो – होअए ९५. बुझल बूझल ९६. बूझल (संबोधन अर्थमे) ९७. यैह यएह / इएह/ सैह/ सएह ९८. तातिल ९९. अयनाय- अयनाइ/ अएनाइ/ एनाइ १००. निन्न- निन्द १०१. बिनु बिन १०२. जाए जाइ १०३. जाइ (in different sense)-last word of sentence १०४. छत पर आबि जाइ १०५. ने १०६. खेलाए (play) –खेलाइ १०७. शिकाइत- शिकायत १०८. ढप- ढ़प १०९ . पढ़- पढ ११०. कनिए/ कनिये कनिञे १११. राकस- राकश ११२. होए/ होय होइ ११३. अउरदा- औरदा ११४. बुझेलन्हि (different meaning- got understand) ११५. बुझएलन्हि/बुझेलनि/ बुझयलन्हि (understood himself) ११६. चलि- चल/ चलि गेल ११७. खधाइ- खधाय ११८. मोन पाड़लखिन्ह/ मोन पाड़लखिन/ मोन पारलखिन्ह ११९. कैक- कएक- कइएक १२०. लग ल’ग १२१. जरेनाइ १२२. जरौनाइ जरओनाइ- जरएनाइ/ जरेनाइ १२३. होइत १२४. गरबेलन्हि/ गरबेलनि गरबौलन्हि/ गरबौलनि १२५. चिखैत- (to test)चिखइत १२६. करइयो (willing to do) करैयो १२७. जेकरा- जकरा १२८. तकरा- तेकरा १२९. बिदेसर स्थानेमे/ बिदेसरे स्थानमे १३०. करबयलहुँ/ करबएलहुँ/ करबेलहुँ करबेलौं १३१. हारिक (उच्चारण हाइरक) १३२. ओजन वजन आफसोच/ अफसोस कागत/ कागच/ कागज १३३. आधे भाग/ आध-भागे १३४. पिचा / पिचाय/पिचाए १३५. नञ/ ने १३६. बच्चा नञ (ने) पिचा जाय १३७. तखन ने (नञ) कहैत अछि। कहै/ सुनै/ देखै छल मुदा कहैत-कहैत/ सुनैत-सुनैत/ देखैत-देखैत १३८. कतेक गोटे/ कताक गोटे १३९. कमाइ-धमाइ/ कमाई- धमाई १४० . लग ल’ग १४१. खेलाइ (for playing) १४२. छथिन्ह/ छथिन १४३. होइत होइ १४४. क्यो कियो / केओ १४५. केश (hair) १४६. केस (court-case) १४७ . बननाइ/ बननाय/ बननाए १४८. जरेनाइ १४९. कुरसी कुर्सी १५०. चरचा चर्चा १५१. कर्म करम १५२. डुबाबए/ डुबाबै/ डुमाबै डुमाबय/ डुमाबए १५३. एखुनका/ अखुनका १५४. लए/ लिअए (वाक्यक अंतिम शब्द)- लऽ १५५. कएलक/ केलक १५६. गरमी गर्मी १५७ . वरदी वर्दी १५८. सुना गेलाह सुना’/सुनाऽ १५९. एनाइ-गेनाइ १६०. तेना ने घेरलन्हि/ तेना ने घेरलनि १६१. नञि / नै १६२. डरो ड’रो १६३. कतहु/ कतौ कहीं १६४. उमरिगर-उमेरगर उमरगर १६५. भरिगर १६६. धोल/धोअल धोएल १६७. गप/गप्प १६८. के के’ १६९. दरबज्जा/ दरबजा १७०. ठाम १७१. धरि तक १७२. घूरि लौटि १७३. थोरबेक १७४. बड्ड १७५. तोँ/ तूँ १७६. तोँहि( पद्यमे ग्राह्य) १७७. तोँही / तोँहि १७८. करबाइए करबाइये १७९. एकेटा १८०. करितथि /करतथि १८१. पहुँचि/ पहुँच १८२. राखलन्हि रखलन्हि/ रखलनि १८३. लगलन्हि/ लगलनि लागलन्हि १८४. सुनि (उच्चारण सुइन) १८५. अछि (उच्चारण अइछ) १८६. एलथि गेलथि १८७. बितओने/ बितौने/ बितेने १८८. करबओलन्हि/ करबौलनि/ करेलखिन्ह/ करेलखिन १८९. करएलन्हि/ करेलनि १९०. आकि/ कि १९१. पहुँचि/ पहुँच १९२. बत्ती जराय/ जराए जरा (आगि लगा) १९३. से से’ १९४. हाँ मे हाँ (हाँमे हाँ विभक्त्तिमे हटा कए) १९५. फेल फैल १९६. फइल(spacious) फैल १९७. होयतन्हि/ होएतन्हि/ होएतनि/हेतनि/ हेतन्हि १९८. हाथ मटिआएब/ हाथ मटियाबय/हाथ मटियाएब १९९. फेका फेंका २००. देखाए देखा २०१. देखाबए २०२. सत्तरि सत्तर २०३. साहेब साहब २०४.गेलैन्ह/ गेलन्हि/ गेलनि २०५. हेबाक/ होएबाक २०६.केलो/ कएलहुँ/केलौं/ केलुँ २०७. किछु न किछु/ किछु ने किछु २०८.घुमेलहुँ/ घुमओलहुँ/ घुमेलौं २०९. एलाक/ अएलाक २१०. अः/ अह २११.लय/ लए (अर्थ-परिवर्त्तन) २१२.कनीक/ कनेक २१३.सबहक/ सभक २१४.मिलाऽ/ मिला २१५.कऽ/ क २१६.जाऽ/ जा २१७.आऽ/ आ २१८.भऽ /भ’ (’ फॉन्टक कमीक द्योतक) २१९.निअम/ नियम २२० .हेक्टेअर/ हेक्टेयर २२१.पहिल अक्षर ढ/ बादक/ बीचक ढ़ २२२.तहिं/तहिँ/ तञि/ तैं २२३.कहिं/ कहीं २२४.तँइ/ तैं / तइँ २२५.नँइ/ नइँ/ नञि/ नहि/नै २२६.है/ हए / एलीहेँ/ २२७.छञि/ छै/ छैक /छइ २२८.दृष्टिएँ/ दृष्टियेँ २२९.आ (come)/ आऽ(conjunction) २३०. आ (conjunction)/ आऽ(come) २३१.कुनो/ कोनो, कोना/केना २३२.गेलैन्ह-गेलन्हि-गेलनि २३३.हेबाक- होएबाक २३४.केलौँ- कएलौँ-कएलहुँ/केलौं २३५.किछु न किछ- किछु ने किछु २३६.केहेन- केहन २३७.आऽ (come)-आ (conjunction-and)/आ। आब'-आब' /आबह-आबह २३८. हएत-हैत २३९.घुमेलहुँ-घुमएलहुँ- घुमेलाें २४०.एलाक- अएलाक २४१.होनि- होइन/ होन्हि/ २४२.ओ-राम ओ श्यामक बीच(conjunction), ओऽ कहलक (he said)/ओ २४३.की हए/ कोसी अएली हए/ की है। की हइ २४४.दृष्टिएँ/ दृष्टियेँ २४५ .शामिल/ सामेल २४६.तैँ / तँए/ तञि/ तहिं २४७.जौं / ज्योँ/ जँ/ २४८.सभ/ सब २४९.सभक/ सबहक २५०.कहिं/ कहीं २५१.कुनो/ कोनो/ कोनहुँ/ २५२.फारकती भऽ गेल/ भए गेल/ भय गेल २५३.कोना/ केना/ कन्ना/कना २५४.अः/ अह २५५.जनै/ जनञ २५६.गेलनि/ गेलाह (अर्थ परिवर्तन) २५७.केलन्हि/ कएलन्हि/ केलनि/ २५८.लय/ लए/ लएह (अर्थ परिवर्तन) २५९.कनीक/ कनेक/कनी-मनी २६०.पठेलन्हि पठेलनि/ पठेलइन/ पपठओलन्हि/ पठबौलनि/ २६१.निअम/ नियम २६२.हेक्टेअर/ हेक्टेयर २६३.पहिल अक्षर रहने ढ/ बीचमे रहने ढ़ २६४.आकारान्तमे बिकारीक प्रयोग उचित नै/ अपोस्ट्रोफीक प्रयोग फान्टक तकनीकी न्यूनताक परिचायक ओकर बदला अवग्रह (बिकारी) क प्रयोग उचित २६५.केर (पद्यमे ग्राह्य) / -क/ कऽ/ के २६६.छैन्हि- छन्हि २६७.लगैए/ लगैये २६८.होएत/ हएत २६९.जाएत/ जएत/ २७०.आएत/ अएत/ आओत २७१ .खाएत/ खएत/ खैत २७२.पिअएबाक/ पिएबाक/पियेबाक २७३.शुरु/ शुरुह २७४.शुरुहे/ शुरुए २७५.अएताह/अओताह/ एताह/ औताह २७६.जाहि/ जाइ/ जइ/ जै/ २७७.जाइत/ जैतए/ जइतए २७८.आएल/ अएल २७९.कैक/ कएक २८०.आयल/ अएल/ आएल २८१. जाए/ जअए/ जए (लालति जाए लगलीह।) २८२. नुकएल/ नुकाएल २८३. कठुआएल/ कठुअएल २८४. ताहि/ तै/ तइ २८५. गायब/ गाएब/ गएब २८६. सकै/ सकए/ सकय २८७.सेरा/सरा/ सराए (भात सरा गेल) २८८.कहैत रही/देखैत रही/ कहैत छलौं/ कहै छलौं- अहिना चलैत/ पढ़ैत (पढ़ै-पढ़ैत अर्थ कखनो काल परिवर्तित) - आर बुझै/ बुझैत (बुझै/ बुझै छी, मुदा बुझैत-बुझैत)/ सकैत/ सकै। करैत/ करै। दै/ दैत। छैक/ छै। बचलै/ बचलैक। रखबा/ रखबाक । बिनु/ बिन। रातिक/ रातुक बुझै आ बुझैत केर अपन-अपन जगहपर प्रयोग समीचीन अछि। बुझैत-बुझैत आब बुझलिऐ। हमहूँ बुझै छी। २८९. दुआरे/ द्वारे २९०.भेटि/ भेट/ भेँट २९१. खन/ खीन/ खुना (भोर खन/ भोर खीन) २९२.तक/ धरि २९३.गऽ/ गै (meaning different-जनबै गऽ) २९४.सऽ/ सँ (मुदा दऽ, लऽ) २९५.त्त्व,(तीन अक्षरक मेल बदला पुनरुक्तिक एक आ एकटा दोसरक उपयोग) आदिक बदला त्व आदि। महत्त्व/ महत्व/ कर्ता/ कर्त्ता आदिमे त्त संयुक्तक कोनो आवश्यकता मैथिलीमे नै अछि। वक्तव्य २९६.बेसी/ बेशी २९७.बाला/वाला बला/ वला (रहैबला) २९८ .वाली/ (बदलैवाली) २९९.वार्त्ता/ वार्ता ३००. अन्तर्राष्ट्रिय/ अन्तर्राष्ट्रीय ३०१. लेमए/ लेबए ३०२.लमछुरका, नमछुरका ३०२.लागै/ लगै ( भेटैत/ भेटै) ३०३.लागल/ लगल ३०४.हबा/ हवा ३०५.राखलक/ रखलक ३०६.आ (come)/ आ (and) ३०७. पश्चाताप/ पश्चात्ताप ३०८. ऽ केर व्यवहार शब्दक अन्तमे मात्र, यथासंभव बीचमे नै। ३०९.कहैत/ कहै ३१०. रहए (छल)/ रहै (छलै) (meaning different) ३११.तागति/ ताकति ३१२.खराप/ खराब ३१३.बोइन/ बोनि/ बोइनि ३१४.जाठि/ जाइठ ३१५.कागज/ कागच/ कागत ३१६.गिरै (meaning different- swallow)/ गिरए (खसए) ३१७.राष्ट्रिय/ राष्ट्रीय DATE-LIST (year- 2012-13) (१४२० फसली साल) Marriage Days: Nov.2012- 25, 26, 28, 29, 30 Dec.2012- 5,9, 10, 13, 14 January 2013- 16, 17, 18, 23, 24, 31 Feb.2013- 1, 3, 4, 6, 8, 10, 14, 15, 18, 20, 24, 25 April 2013- 21, 22, 24, 26, 29 May 2013- 1,2,3,5,6,9,12,13,17,19,20,22,23,24,26,27,29,30,31 June 2013- 2,3 July 2013- 11, 14, 15 Upanayana Days: January 2013- 16 February 2013- 14, 15, 20, 21 April 2013- 22 May 2013- 20, 21 Dviragaman Din: November 2012- 25, 26, 28, 29 December 2012- 2, 3, 14 February 2013- 14, 15, 18, 20, 21, 22, 27, 28 March 2013- 1 April 2013- 18, 22, 24, 26, 28, 29 May 2013- 12, 13 Mundan Din: November 2012- 26, 30 December 2012- 3 January 2013- 18, 24 February 2013- 1, 14, 15, 20, 28 April 2013- 17 May 2013- 13, 23, 29 June 2013- 13, 19, 26, 27, 28 July 2013- 10, 15 FESTIVALS OF MITHILA (2012-13) Mauna Panchami-08 July Madhushravani- 22 July Nag Panchami- 24 July Raksha Bandhan- 02 Aug Krishnastami- 10 August Kushi Amavasya / Somvari Vrat- 17 August Vishwakarma Pooja- 17 September Hartalika Teej- 18 September ChauthChandra-19 September Karma Dharma Ekadashi-26 September Indra Pooja Aarambh- 27 September Anant Caturdashi- 29 Sep Agastyarghadaan- 30 Sep Pitri Paksha begins- 30 Sep Jimootavahan Vrata/ Jitia-08 October Matri Navami- 09 October SomvatiAmavasya Vrat- 15 October Kalashsthapan- 16 October Belnauti- 20 October Patrika Pravesh- 21 October Mahastami- 22 October Maha Navami - 23 October Vijaya Dashami- 24 October Kojagara- 29 Oct Dhanteras- 11 November Diyabati, shyama pooja-13 November Annakoota/ Govardhana Pooja-14 November Bhratridwitiya/ Chitragupta Pooja- 15 November Chhathi -19 November Devotthan Ekadashi- 24 November ravivratarambh- 25 November Navanna parvan- 25 November KartikPoornima- Sama Visarjan- 28 November Vivaha Panchmi- 17 December Makara/ Teela Sankranti-14 Jan Naraknivaran chaturdashi- 08 February Basant Panchami/ Saraswati Pooja- 15 February Achla Saptmi- 17 February Mahashivaratri-10 March Holikadahan-Fagua-26 March Holi- 28 March Varuni Trayodashi-07 April Chaiti navaratrarambh- 11 April Jurishital-15 April Chaiti Chhathi vrata-16 April Ram Navami- 19 April Ravi Brat Ant- 12 May Akshaya Tritiya-13 May Janaki Navami- 19 May Vat Savitri-barasait- 08 June Ganga Dashhara-18 June Somavati Amavasya Vrata- 08 July Jagannath Rath Yatra- 10 July Hari Sayan Ekadashi- 19 July Aashadhi Guru Poornima-22 Jul VIDEHA ARCHIVE १.विदेह ई-पत्रिकाक सभटा पुरान अंक ब्रेल, तिरहुता आ देवनागरी रूपमे Videha e journal's all old issues in Braille Tirhuta and Devanagari versions विदेह ई-पत्रिकाक पहिल ५० अंक
विदेह ई-पत्रिकाक ५०म सँ आगाँक अंक २.मैथिली पोथी डाउनलोड Maithili Books Download ३.मैथिली ऑडियो संकलन Maithili Audio Downloads ४.मैथिली वीडियोक संकलन Maithili Videos ५.मिथिला चित्रकला/ आधुनिक चित्रकला आ चित्र Mithila Painting/ Modern Art and Photos "विदेह"क एहि सभ सहयोगी लिंकपर सेहो एक बेर जाउ। ६.विदेह मैथिली क्विज : http://videhaquiz.blogspot.com/ ७.विदेह मैथिली जालवृत्त एग्रीगेटर : http://videha-aggregator.blogspot.com/ ८.विदेह मैथिली साहित्य अंग्रेजीमे अनूदित http://madhubani-art.blogspot.com/ ९.विदेहक पूर्व-रूप "भालसरिक गाछ" : http://gajendrathakur.blogspot.com/ १०.विदेह इंडेक्स : http://videha123.blogspot.com/ ११.विदेह फाइल : http://videha123.wordpress.com/ १२. विदेह: सदेह : पहिल तिरहुता (मिथिला़क्षर) जालवृत्त (ब्लॉग) http://videha-sadeha.blogspot.com/ १३. विदेह:ब्रेल: मैथिली ब्रेलमे: पहिल बेर विदेह द्वारा http://videha-braille.blogspot.com/ १४.VIDEHA IST MAITHILI FORTNIGHTLY EJOURNAL ARCHIVE http://videha-archive.blogspot.com/ १५. विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका मैथिली पोथीक आर्काइव http://videha-pothi.blogspot.com/ १६. विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका ऑडियो आर्काइव http://videha-audio.blogspot.com/ १७. विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका वीडियो आर्काइव http://videha-video.blogspot.com/ १८. विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका मिथिला चित्रकला, आधुनिक कला आ चित्रकला http://videha-paintings-photos.blogspot.com/ १९. मैथिल आर मिथिला (मैथिलीक सभसँ लोकप्रिय जालवृत्त) http://maithilaurmithila.blogspot.com/ २०.श्रुति प्रकाशन http://www.shruti-publication.com/ २१.http://groups.google.com/group/videha VIDEHA केर सदस्यता लिअ Top of Form Bottom of Form ईमेल : एहि समूहपर जाउ २२.http://groups.yahoo.com/group/VIDEHA/ Top of Form Subscribe to VIDEHA Powered by us.groups.yahoo.com Bottom of Form २३.गजेन्द्र ठाकुर इडेक्स http://gajendrathakur123.blogspot.com २४. नेना भुटका http://mangan-khabas.blogspot.com/ २५.विदेह रेडियो:मैथिली कथा-कविता आदिक पहिल पोडकास्ट साइट http://videha123radio.wordpress.com/ २६.Videha Radio २७. Join official Videha facebook group. २८. विदेह मैथिली नाट्य उत्सव http://maithili-drama.blogspot.com/ २९.समदिया http://esamaad.blogspot.com/ ३०. मैथिली फिल्म्स http://maithilifilms.blogspot.com/ ३१.अनचिन्हार आखर http://anchinharakharkolkata.blogspot.com/ ३२. मैथिली हाइकू http://maithili-haiku.blogspot.com/ ३३. मानक मैथिली http://manak-maithili.blogspot.com/ ३४. विहनि कथा http://vihanikatha.blogspot.in/ ३५. मैथिली कविता http://maithili-kavita.blogspot.in/ ३६. मैथिली कथा http://maithili-katha.blogspot.in/ ३७.मैथिली समालोचना http://maithili-samalochna.blogspot.in/ महत्त्वपूर्ण सूचना:(१) 'विदेह' द्वारा धारावाहिक रूपे ई-प्रकाशित कएल गेल गजेन्द्र ठाकुरक निबन्ध-प्रबन्ध-समीक्षा, उपन्यास (सहस्रबाढ़नि) , पद्य-संग्रह (सहस्राब्दीक चौपड़पर), कथा-गल्प (गल्प-गुच्छ), नाटक(संकर्षण), महाकाव्य (त्वञ्चाहञ्च आ असञ्जाति मन) आ बाल-किशोर साहित्य विदेहमे संपूर्ण ई-प्रकाशनक बाद प्रिंट फॉर्ममे। कुरुक्षेत्रम्–अन्तर्मनक खण्ड-१ सँ ७ Combined ISBN No.978-81-907729-7-6 विवरण एहि पृष्ठपर नीचाँमे आ प्रकाशकक साइट http://www.shruti-publication.com/ पर । महत्त्वपूर्ण सूचना (२):सूचना: विदेहक मैथिली-अंग्रेजी आ अंग्रेजी मैथिली कोष (इंटरनेटपर पहिल बेर सर्च-डिक्शनरी) एम.एस. एस.क्यू.एल. सर्वर आधारित -Based on ms-sql server Maithili-English and English-Maithili Dictionary. विदेहक भाषापाक- रचनालेखन स्तंभमे। कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक- गजेन्द्र ठाकुर गजेन्द्र ठाकुरक निबन्ध-प्रबन्ध-समीक्षा, उपन्यास (सहस्रबाढ़नि) , पद्य-संग्रह (सहस्राब्दीक चौपड़पर), कथा-गल्प (गल्प गुच्छ), नाटक(संकर्षण), महाकाव्य (त्वञ्चाहञ्च आ असञ्जाति मन) आ बालमंडली-किशोरजगत विदेहमे संपूर्ण ई-प्रकाशनक बाद प्रिंट फॉर्ममे। कुरुक्षेत्रम्–अन्तर्मनक, खण्ड-१ सँ ७ Ist edition 2009 of Gajendra Thakur’s KuruKshetram-Antarmanak (Vol. I to VII)- essay-paper-criticism, novel, poems, story, play, epics and Children-grown-ups literature in single binding: Language:Maithili ६९२ पृष्ठ : मूल्य भा. रु. 100/-(for individual buyers inside india) (add courier charges Rs.50/-per copy for Delhi/NCR and Rs.100/- per copy for outside Delhi)
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Details for purchase available at print-version publishers's site website: http://www.shruti-publication.com/ or you may write to e-mail:shruti.publication@shruti-publication.com विदेह: सदेह : १: २: ३: ४ तिरहुता : देवनागरी "विदेह" क, प्रिंट संस्करण :विदेह-ई-पत्रिका (http://www.videha.co.in/) क चुनल रचना सम्मिलित। विदेह:सदेह:१: २: ३: ४ सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। Details for purchase available at print-version publishers's site http://www.shruti-publication.com or you may write to shruti.publication@shruti-publication.com २. संदेश- [ विदेह ई-पत्रिका, विदेह:सदेह मिथिलाक्षर आ देवनागरी आ गजेन्द्र ठाकुरक सात खण्डक- निबन्ध-प्रबन्ध-समीक्षा,उपन्यास (सहस्रबाढ़नि) , पद्य-संग्रह (सहस्राब्दीक चौपड़पर), कथा-गल्प (गल्प गुच्छ), नाटक (संकर्षण), महाकाव्य (त्वञ्चाहञ्च आ असञ्जाति मन) आ बाल-मंडली-किशोर जगत- संग्रह कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक मादेँ। ] १.श्री गोविन्द झा- विदेहकेँ तरंगजालपर उतारि विश्वभरिमे मातृभाषा मैथिलीक लहरि जगाओल, खेद जे अपनेक एहि महाभियानमे हम एखन धरि संग नहि दए सकलहुँ। सुनैत छी अपनेकेँ सुझाओ आ रचनात्मक आलोचना प्रिय लगैत अछि तेँ किछु लिखक मोन भेल। हमर सहायता आ सहयोग अपनेकेँ सदा उपलब्ध रहत। २.श्री रमानन्द रेणु- मैथिलीमे ई-पत्रिका पाक्षिक रूपेँ चला कऽ जे अपन मातृभाषाक प्रचार कऽ रहल छी, से धन्यवाद । आगाँ अपनेक समस्त मैथिलीक कार्यक हेतु हम हृदयसँ शुभकामना दऽ रहल छी। ३.श्री विद्यानाथ झा "विदित"- संचार आ प्रौद्योगिकीक एहि प्रतिस्पर्धी ग्लोबल युगमे अपन महिमामय "विदेह"केँ अपना देहमे प्रकट देखि जतबा प्रसन्नता आ संतोष भेल, तकरा कोनो उपलब्ध "मीटर"सँ नहि नापल जा सकैछ? ..एकर ऐतिहासिक मूल्यांकन आ सांस्कृतिक प्रतिफलन एहि शताब्दीक अंत धरि लोकक नजरिमे आश्चर्यजनक रूपसँ प्रकट हैत। ४. प्रो. उदय नारायण सिंह "नचिकेता"- जे काज अहाँ कए रहल छी तकर चरचा एक दिन मैथिली भाषाक इतिहासमे होएत। आनन्द भए रहल अछि, ई जानि कए जे एतेक गोट मैथिल "विदेह" ई जर्नलकेँ पढ़ि रहल छथि।...विदेहक चालीसम अंक पुरबाक लेल अभिनन्दन। ५. डॉ. गंगेश गुंजन- एहि विदेह-कर्ममे लागि रहल अहाँक सम्वेदनशील मन, मैथिलीक प्रति समर्पित मेहनतिक अमृत रंग, इतिहास मे एक टा विशिष्ट फराक अध्याय आरंभ करत, हमरा विश्वास अछि। अशेष शुभकामना आ बधाइक सङ्ग, सस्नेह...अहाँक पोथी कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक प्रथम दृष्टया बहुत भव्य तथा उपयोगी बुझाइछ। मैथिलीमे तँ अपना स्वरूपक प्रायः ई पहिले एहन भव्य अवतारक पोथी थिक। हर्षपूर्ण हमर हार्दिक बधाई स्वीकार करी। ६. श्री रामाश्रय झा "रामरंग"(आब स्वर्गीय)- "अपना" मिथिलासँ संबंधित...विषय वस्तुसँ अवगत भेलहुँ।...शेष सभ कुशल अछि। ७. श्री ब्रजेन्द्र त्रिपाठी- साहित्य अकादमी- इंटरनेट पर प्रथम मैथिली पाक्षिक पत्रिका "विदेह" केर लेल बधाई आ शुभकामना स्वीकार करू। ८. श्री प्रफुल्लकुमार सिंह "मौन"- प्रथम मैथिली पाक्षिक पत्रिका "विदेह" क प्रकाशनक समाचार जानि कनेक चकित मुदा बेसी आह्लादित भेलहुँ। कालचक्रकेँ पकड़ि जाहि दूरदृष्टिक परिचय देलहुँ, ओहि लेल हमर मंगलकामना। ९.डॉ. शिवप्रसाद यादव- ई जानि अपार हर्ष भए रहल अछि, जे नव सूचना-क्रान्तिक क्षेत्रमे मैथिली पत्रकारिताकेँ प्रवेश दिअएबाक साहसिक कदम उठाओल अछि। पत्रकारितामे एहि प्रकारक नव प्रयोगक हम स्वागत करैत छी, संगहि "विदेह"क सफलताक शुभकामना। १०. श्री आद्याचरण झा- कोनो पत्र-पत्रिकाक प्रकाशन- ताहूमे मैथिली पत्रिकाक प्रकाशनमे के कतेक सहयोग करताह- ई तऽ भविष्य कहत। ई हमर ८८ वर्षमे ७५ वर्षक अनुभव रहल। एतेक पैघ महान यज्ञमे हमर श्रद्धापूर्ण आहुति प्राप्त होयत- यावत ठीक-ठाक छी/ रहब। ११. श्री विजय ठाकुर- मिशिगन विश्वविद्यालय- "विदेह" पत्रिकाक अंक देखलहुँ, सम्पूर्ण टीम बधाईक पात्र अछि। पत्रिकाक मंगल भविष्य हेतु हमर शुभकामना स्वीकार कएल जाओ। १२. श्री सुभाषचन्द्र यादव- ई-पत्रिका "विदेह" क बारेमे जानि प्रसन्नता भेल। ’विदेह’ निरन्तर पल्लवित-पुष्पित हो आ चतुर्दिक अपन सुगंध पसारय से कामना अछि। १३. श्री मैथिलीपुत्र प्रदीप- ई-पत्रिका "विदेह" केर सफलताक भगवतीसँ कामना। हमर पूर्ण सहयोग रहत। १४. डॉ. श्री भीमनाथ झा- "विदेह" इन्टरनेट पर अछि तेँ "विदेह" नाम उचित आर कतेक रूपेँ एकर विवरण भए सकैत अछि। आइ-काल्हि मोनमे उद्वेग रहैत अछि, मुदा शीघ्र पूर्ण सहयोग देब।कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक देखि अति प्रसन्नता भेल। मैथिलीक लेल ई घटना छी। १५. श्री रामभरोस कापड़ि "भ्रमर"- जनकपुरधाम- "विदेह" ऑनलाइन देखि रहल छी। मैथिलीकेँ अन्तर्राष्ट्रीय जगतमे पहुँचेलहुँ तकरा लेल हार्दिक बधाई। मिथिला रत्न सभक संकलन अपूर्व। नेपालोक सहयोग भेटत, से विश्वास करी। १६. श्री राजनन्दन लालदास- "विदेह" ई-पत्रिकाक माध्यमसँ बड़ नीक काज कए रहल छी, नातिक अहिठाम देखलहुँ। एकर वार्षिक अंक जखन प्रिंट निकालब तँ हमरा पठायब। कलकत्तामे बहुत गोटेकेँ हम साइटक पता लिखाए देने छियन्हि। मोन तँ होइत अछि जे दिल्ली आबि कए आशीर्वाद दैतहुँ, मुदा उमर आब बेशी भए गेल। शुभकामना देश-विदेशक मैथिलकेँ जोड़बाक लेल।.. उत्कृष्ट प्रकाशन कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक लेल बधाइ। अद्भुत काज कएल अछि, नीक प्रस्तुति अछि सात खण्डमे। मुदा अहाँक सेवा आ से निःस्वार्थ तखन बूझल जाइत जँ अहाँ द्वारा प्रकाशित पोथी सभपर दाम लिखल नहि रहितैक। ओहिना सभकेँ विलहि देल जइतैक। (स्पष्टीकरण- श्रीमान्, अहाँक सूचनार्थ विदेह द्वारा ई-प्रकाशित कएल सभटा सामग्री आर्काइवमे https://sites.google.com/a/videha.com/videha-pothi/ पर बिना मूल्यक डाउनलोड लेल उपलब्ध छै आ भविष्यमे सेहो रहतैक। एहि आर्काइवकेँ जे कियो प्रकाशक अनुमति लऽ कऽ प्रिंट रूपमे प्रकाशित कएने छथि आ तकर ओ दाम रखने छथि ताहिपर हमर कोनो नियंत्रण नहि अछि।- गजेन्द्र ठाकुर)... अहाँक प्रति अशेष शुभकामनाक संग। १७. डॉ. प्रेमशंकर सिंह- अहाँ मैथिलीमे इंटरनेटपर पहिल पत्रिका "विदेह" प्रकाशित कए अपन अद्भुत मातृभाषानुरागक परिचय देल अछि, अहाँक निःस्वार्थ मातृभाषानुरागसँ प्रेरित छी, एकर निमित्त जे हमर सेवाक प्रयोजन हो, तँ सूचित करी। इंटरनेटपर आद्योपांत पत्रिका देखल, मन प्रफुल्लित भऽ गेल। १८.श्रीमती शेफालिका वर्मा- विदेह ई-पत्रिका देखि मोन उल्लाससँ भरि गेल। विज्ञान कतेक प्रगति कऽ रहल अछि...अहाँ सभ अनन्त आकाशकेँ भेदि दियौ, समस्त विस्तारक रहस्यकेँ तार-तार कऽ दियौक...। अपनेक अद्भुत पुस्तक कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक विषयवस्तुक दृष्टिसँ गागरमे सागर अछि। बधाई। १९.श्री हेतुकर झा, पटना-जाहि समर्पण भावसँ अपने मिथिला-मैथिलीक सेवामे तत्पर छी से स्तुत्य अछि। देशक राजधानीसँ भय रहल मैथिलीक शंखनाद मिथिलाक गाम-गाममे मैथिली चेतनाक विकास अवश्य करत। २०. श्री योगानन्द झा, कबिलपुर, लहेरियासराय- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पोथीकेँ निकटसँ देखबाक अवसर भेटल अछि आ मैथिली जगतक एकटा उद्भट ओ समसामयिक दृष्टिसम्पन्न हस्ताक्षरक कलमबन्द परिचयसँ आह्लादित छी। "विदेह"क देवनागरी सँस्करण पटनामे रु. 80/- मे उपलब्ध भऽ सकल जे विभिन्न लेखक लोकनिक छायाचित्र, परिचय पत्रक ओ रचनावलीक सम्यक प्रकाशनसँ ऐतिहासिक कहल जा सकैछ। २१. श्री किशोरीकान्त मिश्र- कोलकाता- जय मैथिली, विदेहमे बहुत रास कविता, कथा, रिपोर्ट आदिक सचित्र संग्रह देखि आ आर अधिक प्रसन्नता मिथिलाक्षर देखि- बधाई स्वीकार कएल जाओ। २२.श्री जीवकान्त- विदेहक मुद्रित अंक पढ़ल- अद्भुत मेहनति। चाबस-चाबस। किछु समालोचना मरखाह..मुदा सत्य। २३. श्री भालचन्द्र झा- अपनेक कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक देखि बुझाएल जेना हम अपने छपलहुँ अछि। एकर विशालकाय आकृति अपनेक सर्वसमावेशताक परिचायक अछि। अपनेक रचना सामर्थ्यमे उत्तरोत्तर वृद्धि हो, एहि शुभकामनाक संग हार्दिक बधाई। २४.श्रीमती डॉ नीता झा- अहाँक कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़लहुँ। ज्योतिरीश्वर शब्दावली, कृषि मत्स्य शब्दावली आ सीत बसन्त आ सभ कथा, कविता, उपन्यास, बाल-किशोर साहित्य सभ उत्तम छल। मैथिलीक उत्तरोत्तर विकासक लक्ष्य दृष्टिगोचर होइत अछि। २५.श्री मायानन्द मिश्र- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक मे हमर उपन्यास स्त्रीधनक जे विरोध कएल गेल अछि तकर हम विरोध करैत छी।... कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पोथीक लेल शुभकामना।(श्रीमान् समालोचनाकेँ विरोधक रूपमे नहि लेल जाए।-गजेन्द्र ठाकुर) २६.श्री महेन्द्र हजारी- सम्पादक श्रीमिथिला- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़ि मोन हर्षित भऽ गेल..एखन पूरा पढ़यमे बहुत समय लागत, मुदा जतेक पढ़लहुँ से आह्लादित कएलक। २७.श्री केदारनाथ चौधरी- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक अद्भुत लागल, मैथिली साहित्य लेल ई पोथी एकटा प्रतिमान बनत। २८.श्री सत्यानन्द पाठक- विदेहक हम नियमित पाठक छी। ओकर स्वरूपक प्रशंसक छलहुँ। एम्हर अहाँक लिखल - कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक देखलहुँ। मोन आह्लादित भऽ उठल। कोनो रचना तरा-उपरी। २९.श्रीमती रमा झा-सम्पादक मिथिला दर्पण। कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक प्रिंट फॉर्म पढ़ि आ एकर गुणवत्ता देखि मोन प्रसन्न भऽ गेल, अद्भुत शब्द एकरा लेल प्रयुक्त कऽ रहल छी। विदेहक उत्तरोत्तर प्रगतिक शुभकामना। ३०.श्री नरेन्द्र झा, पटना- विदेह नियमित देखैत रहैत छी। मैथिली लेल अद्भुत काज कऽ रहल छी। ३१.श्री रामलोचन ठाकुर- कोलकाता- मिथिलाक्षर विदेह देखि मोन प्रसन्नतासँ भरि उठल, अंकक विशाल परिदृश्य आस्वस्तकारी अछि। ३२.श्री तारानन्द वियोगी- विदेह आ कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक देखि चकबिदोर लागि गेल। आश्चर्य। शुभकामना आ बधाई। ३३.श्रीमती प्रेमलता मिश्र “प्रेम”- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़लहुँ। सभ रचना उच्चकोटिक लागल। बधाई। ३४.श्री कीर्तिनारायण मिश्र- बेगूसराय- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक बड्ड नीक लागल, आगांक सभ काज लेल बधाई। ३५.श्री महाप्रकाश-सहरसा- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक नीक लागल, विशालकाय संगहि उत्तमकोटिक। ३६.श्री अग्निपुष्प- मिथिलाक्षर आ देवाक्षर विदेह पढ़ल..ई प्रथम तँ अछि एकरा प्रशंसामे मुदा हम एकरा दुस्साहसिक कहब। मिथिला चित्रकलाक स्तम्भकेँ मुदा अगिला अंकमे आर विस्तृत बनाऊ। ३७.श्री मंजर सुलेमान-दरभंगा- विदेहक जतेक प्रशंसा कएल जाए कम होएत। सभ चीज उत्तम। ३८.श्रीमती प्रोफेसर वीणा ठाकुर- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक उत्तम, पठनीय, विचारनीय। जे क्यो देखैत छथि पोथी प्राप्त करबाक उपाय पुछैत छथि। शुभकामना। ३९.श्री छत्रानन्द सिंह झा- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़लहुँ, बड्ड नीक सभ तरहेँ। ४०.श्री ताराकान्त झा- सम्पादक मैथिली दैनिक मिथिला समाद- विदेह तँ कन्टेन्ट प्रोवाइडरक काज कऽ रहल अछि। कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक अद्भुत लागल। ४१.डॉ रवीन्द्र कुमार चौधरी- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक बहुत नीक, बहुत मेहनतिक परिणाम। बधाई। ४२.श्री अमरनाथ- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक आ विदेह दुनू स्मरणीय घटना अछि, मैथिली साहित्य मध्य। ४३.श्री पंचानन मिश्र- विदेहक वैविध्य आ निरन्तरता प्रभावित करैत अछि, शुभकामना। ४४.श्री केदार कानन- कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक लेल अनेक धन्यवाद, शुभकामना आ बधाइ स्वीकार करी। आ नचिकेताक भूमिका पढ़लहुँ। शुरूमे तँ लागल जेना कोनो उपन्यास अहाँ द्वारा सृजित भेल अछि मुदा पोथी उनटौला पर ज्ञात भेल जे एहिमे तँ सभ विधा समाहित अछि। ४५.श्री धनाकर ठाकुर- अहाँ नीक काज कऽ रहल छी। फोटो गैलरीमे चित्र एहि शताब्दीक जन्मतिथिक अनुसार रहैत तऽ नीक। ४६.श्री आशीष झा- अहाँक पुस्तकक संबंधमे एतबा लिखबा सँ अपना कए नहि रोकि सकलहुँ जे ई किताब मात्र किताब नहि थीक, ई एकटा उम्मीद छी जे मैथिली अहाँ सन पुत्रक सेवा सँ निरंतर समृद्ध होइत चिरजीवन कए प्राप्त करत। ४७.श्री शम्भु कुमार सिंह- विदेहक तत्परता आ क्रियाशीलता देखि आह्लादित भऽ रहल छी। निश्चितरूपेण कहल जा सकैछ जे समकालीन मैथिली पत्रिकाक इतिहासमे विदेहक नाम स्वर्णाक्षरमे लिखल जाएत। ओहि कुरुक्षेत्रक घटना सभ तँ अठारहे दिनमे खतम भऽ गेल रहए मुदा अहाँक कुरुक्षेत्रम् तँ अशेष अछि। ४८.डॉ. अजीत मिश्र- अपनेक प्रयासक कतबो प्रशंसा कएल जाए कमे होएतैक। मैथिली साहित्यमे अहाँ द्वारा कएल गेल काज युग-युगान्तर धरि पूजनीय रहत। ४९.श्री बीरेन्द्र मल्लिक- अहाँक कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक आ विदेह:सदेह पढ़ि अति प्रसन्नता भेल। अहाँक स्वास्थ्य ठीक रहए आ उत्साह बनल रहए से कामना। ५०.श्री कुमार राधारमण- अहाँक दिशा-निर्देशमे विदेह पहिल मैथिली ई-जर्नल देखि अति प्रसन्नता भेल। हमर शुभकामना। ५१.श्री फूलचन्द्र झा प्रवीण-विदेह:सदेह पढ़ने रही मुदा कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक देखि बढ़ाई देबा लेल बाध्य भऽ गेलहुँ। आब विश्वास भऽ गेल जे मैथिली नहि मरत। अशेष शुभकामना। ५२.श्री विभूति आनन्द- विदेह:सदेह देखि, ओकर विस्तार देखि अति प्रसन्नता भेल। ५३.श्री मानेश्वर मनुज-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक एकर भव्यता देखि अति प्रसन्नता भेल, एतेक विशाल ग्रन्थ मैथिलीमे आइ धरि नहि देखने रही। एहिना भविष्यमे काज करैत रही, शुभकामना। ५४.श्री विद्यानन्द झा- आइ.आइ.एम.कोलकाता- कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक विस्तार, छपाईक संग गुणवत्ता देखि अति प्रसन्नता भेल। अहाँक अनेक धन्यवाद; कतेक बरखसँ हम नेयारैत छलहुँ जे सभ पैघ शहरमे मैथिली लाइब्रेरीक स्थापना होअए, अहाँ ओकरा वेबपर कऽ रहल छी, अनेक धन्यवाद। ५५.श्री अरविन्द ठाकुर-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक मैथिली साहित्यमे कएल गेल एहि तरहक पहिल प्रयोग अछि, शुभकामना। ५६.श्री कुमार पवन-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक पढ़ि रहल छी। किछु लघुकथा पढ़ल अछि, बहुत मार्मिक छल। ५७. श्री प्रदीप बिहारी-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक देखल, बधाई। ५८.डॉ मणिकान्त ठाकुर-कैलिफोर्निया- अपन विलक्षण नियमित सेवासँ हमरा लोकनिक हृदयमे विदेह सदेह भऽ गेल अछि। ५९.श्री धीरेन्द्र प्रेमर्षि- अहाँक समस्त प्रयास सराहनीय। दुख होइत अछि जखन अहाँक प्रयासमे अपेक्षित सहयोग नहि कऽ पबैत छी। ६०.श्री देवशंकर नवीन- विदेहक निरन्तरता आ विशाल स्वरूप- विशाल पाठक वर्ग, एकरा ऐतिहासिक बनबैत अछि। ६१.श्री मोहन भारद्वाज- अहाँक समस्त कार्य देखल, बहुत नीक। एखन किछु परेशानीमे छी, मुदा शीघ्र सहयोग देब। ६२.श्री फजलुर रहमान हाशमी-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक मे एतेक मेहनतक लेल अहाँ साधुवादक अधिकारी छी। ६३.श्री लक्ष्मण झा "सागर"- मैथिलीमे चमत्कारिक रूपेँ अहाँक प्रवेश आह्लादकारी अछि।..अहाँकेँ एखन आर..दूर..बहुत दूरधरि जेबाक अछि। स्वस्थ आ प्रसन्न रही। ६४.श्री जगदीश प्रसाद मंडल-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक पढ़लहुँ । कथा सभ आ उपन्यास सहस्रबाढ़नि पूर्णरूपेँ पढ़ि गेल छी। गाम-घरक भौगोलिक विवरणक जे सूक्ष्म वर्णन सहस्रबाढ़निमे अछि, से चकित कएलक, एहि संग्रहक कथा-उपन्यास मैथिली लेखनमे विविधता अनलक अछि। समालोचना शास्त्रमे अहाँक दृष्टि वैयक्तिक नहि वरन् सामाजिक आ कल्याणकारी अछि, से प्रशंसनीय। ६५.श्री अशोक झा-अध्यक्ष मिथिला विकास परिषद- कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक लेल बधाई आ आगाँ लेल शुभकामना। ६६.श्री ठाकुर प्रसाद मुर्मु- अद्भुत प्रयास। धन्यवादक संग प्रार्थना जे अपन माटि-पानिकेँ ध्यानमे राखि अंकक समायोजन कएल जाए। नव अंक धरि प्रयास सराहनीय। विदेहकेँ बहुत-बहुत धन्यवाद जे एहेन सुन्दर-सुन्दर सचार (आलेख) लगा रहल छथि। सभटा ग्रहणीय- पठनीय। ६७.बुद्धिनाथ मिश्र- प्रिय गजेन्द्र जी,अहाँक सम्पादन मे प्रकाशित ‘विदेह’आ ‘कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक’ विलक्षण पत्रिका आ विलक्षण पोथी! की नहि अछि अहाँक सम्पादनमे? एहि प्रयत्न सँ मैथिली क विकास होयत,निस्संदेह। ६८.श्री बृखेश चन्द्र लाल- गजेन्द्रजी, अपनेक पुस्तक कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़ि मोन गदगद भय गेल , हृदयसँ अनुगृहित छी । हार्दिक शुभकामना । ६९.श्री परमेश्वर कापड़ि - श्री गजेन्द्र जी । कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़ि गदगद आ नेहाल भेलहुँ। ७०.श्री रवीन्द्रनाथ ठाकुर- विदेह पढ़ैत रहैत छी। धीरेन्द्र प्रेमर्षिक मैथिली गजलपर आलेख पढ़लहुँ। मैथिली गजल कत्तऽ सँ कत्तऽ चलि गेलैक आ ओ अपन आलेखमे मात्र अपन जानल-पहिचानल लोकक चर्च कएने छथि। जेना मैथिलीमे मठक परम्परा रहल अछि। (स्पष्टीकरण- श्रीमान्, प्रेमर्षि जी ओहि आलेखमे ई स्पष्ट लिखने छथि जे किनको नाम जे छुटि गेल छन्हि तँ से मात्र आलेखक लेखकक जानकारी नहि रहबाक द्वारे, एहिमे आन कोनो कारण नहि देखल जाय। अहाँसँ एहि विषयपर विस्तृत आलेख सादर आमंत्रित अछि।-सम्पादक) ७१.श्री मंत्रेश्वर झा- विदेह पढ़ल आ संगहि अहाँक मैगनम ओपस कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक सेहो, अति उत्तम। मैथिलीक लेल कएल जा रहल अहाँक समस्त कार्य अतुलनीय अछि। ७२. श्री हरेकृष्ण झा- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक मैथिलीमे अपन तरहक एकमात्र ग्रन्थ अछि, एहिमे लेखकक समग्र दृष्टि आ रचना कौशल देखबामे आएल जे लेखकक फील्डवर्कसँ जुड़ल रहबाक कारणसँ अछि। ७३.श्री सुकान्त सोम- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक मे समाजक इतिहास आ वर्तमानसँ अहाँक जुड़ाव बड्ड नीक लागल, अहाँ एहि क्षेत्रमे आर आगाँ काज करब से आशा अछि। ७४.प्रोफेसर मदन मिश्र- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक सन किताब मैथिलीमे पहिले अछि आ एतेक विशाल संग्रहपर शोध कएल जा सकैत अछि। भविष्यक लेल शुभकामना। ७५.प्रोफेसर कमला चौधरी- मैथिलीमे कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक सन पोथी आबए जे गुण आ रूप दुनूमे निस्सन होअए, से बहुत दिनसँ आकांक्षा छल, ओ आब जा कऽ पूर्ण भेल। पोथी एक हाथसँ दोसर हाथ घुमि रहल अछि, एहिना आगाँ सेहो अहाँसँ आशा अछि। ७६.श्री उदय चन्द्र झा "विनोद": गजेन्द्रजी, अहाँ जतेक काज कएलहुँ अछि से मैथिलीमे आइ धरि कियो नहि कएने छल। शुभकामना। अहाँकेँ एखन बहुत काज आर करबाक अछि। ७७.श्री कृष्ण कुमार कश्यप: गजेन्द्र ठाकुरजी, अहाँसँ भेँट एकटा स्मरणीय क्षण बनि गेल। अहाँ जतेक काज एहि बएसमे कऽ गेल छी ताहिसँ हजार गुणा आर बेशीक आशा अछि। ७८.श्री मणिकान्त दास: अहाँक मैथिलीक कार्यक प्रशंसा लेल शब्द नहि भेटैत अछि। अहाँक कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक सम्पूर्ण रूपेँ पढ़ि गेलहुँ। त्वञ्चाहञ्च बड्ड नीक लागल। ७९. श्री हीरेन्द्र कुमार झा- विदेह ई-पत्रिकाक सभ अंक ई-पत्रसँ भेटैत रहैत अछि। मैथिलीक ई-पत्रिका छैक एहि बातक गर्व होइत अछि। अहाँ आ अहाँक सभ सहयोगीकेँ हार्दिक शुभकामना। विदेह मैथिली साहित्य आन्दोलन (c)२००४-१२. सर्वाधिकार लेखकाधीन आ जतए लेखकक नाम नहि अछि ततए संपादकाधीन। विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। सह-सम्पादक: उमेश मंडल। सहायक सम्पादक: शिव कुमार झा आ मुन्नाजी (मनोज कुमार कर्ण)। भाषा-सम्पादन: नागेन्द्र कुमार झा आ पञ्जीकार विद्यानन्द झा। कला-सम्पादन: ज्योति झा चौधरी आ रश्मि रेखा सिन्हा। सम्पादक-शोध-अन्वेषण: डॉ. जया वर्मा आ डॉ. राजीव कुमार वर्मा। सम्पादक- नाटक-रंगमंच-चलचित्र- बेचन ठाकुर। सम्पादक- सूचना-सम्पर्क-समाद- पूनम मंडल आ प्रियंका झा। सम्पादक- अनुवाद विभाग- विनीत उत्पल। रचनाकार अपन मौलिक आ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि) ggajendra@videha.com केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx, .rtf वा .txt फॉर्मेटमे पठा सकैत छथि। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेताह, से आशा करैत छी। रचनाक अंतमे टाइप रहय, जे ई रचना मौलिक अछि, आ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। मेल प्राप्त होयबाक बाद यथासंभव शीघ्र ( सात दिनक भीतर) एकर प्रकाशनक अंकक सूचना देल जायत। ’विदेह' प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका अछि आ एहिमे मैथिली, संस्कृत आ अंग्रेजीमे मिथिला आ मैथिलीसँ संबंधित रचना प्रकाशित कएल जाइत अछि। एहि ई पत्रिकाकेँ श्रीमति लक्ष्मी ठाकुर द्वारा मासक ०१ आ १५ तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि। (c) 2004-12 सर्वाधिकार सुरक्षित। विदेहमे प्रकाशित सभटा रचना आ आर्काइवक सर्वाधिकार रचनाकार आ संग्रहकर्त्ताक लगमे छन्हि। रचनाक अनुवाद आ पुनः प्रकाशन किंवा आर्काइवक उपयोगक अधिकार किनबाक हेतु ggajendra@videha.co.in पर संपर्क करू। एहि साइटकेँ प्रीति झा ठाकुर, मधूलिका चौधरी आ रश्मि प्रिया द्वारा डिजाइन कएल गेल। सिद्धिरस्तु वि दे ह विदेह Videha বিদেহ www.videha.co.in www.videha.com विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका Videha Ist Maithili Fortnightly ejournal विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका 'विदेह' ११२ म अंक १५ अगस्त २०१२ (वर्ष ५ मास ५६ अंक ११२) मानुषीमिह संस्कृताम् ISSN 2229-547X VIDEHA वि दे ह विदेह Videha বিদেহ www.videha.co.in www.videha.com विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका Videha Ist Maithili Fortnightly ejournal विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका 'विदेह' ११२ म अंक १५ अगस्त २०१२ (वर्ष ५ मास ५६ अंक ११२) मानुषीमिह संस्कृताम् ISSN 2229-547X VIDEHA
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