434 435 ISSN 2229-547X VIDEHA 'विदेह' ११३ म अंक ०१ सितम्बर २०१२ (वर्ष ५ मास ५७ अंक ११३) ऐ अंकमे अछि:- १. संपादकीय संदेश २. गद्य २.१.आशीष अनचिन्हार- काफिया आ बहर २.२.१.पूनम मण्डल- मैथिलीक तेसर विकीलीक्स २.नवेंदु कुमार झा-पटना मे पसरत हीराक चमक/निगरानी विभागक लेल बनि रहल विशिष्ट संवर्ग/ प्रदेश मे शौचालय सॅ वंचित अछि पैघ आबादी २.३.१.कामिनी कामायनी- उत्तराक नोर २.सत्यनारायण झा-दुटा बात पुत्रक जन्म दिन पर ३.कैलास दास, खोजय पड़त मातृत्व बालगीत २.४.डॉ.अरुण कुमार सिंह-मातृभाषाक माध्यमसँ उच्चशिक्षा २.५.बेचन ठाकुर- बाप भेल पित्ती २.६.१.जगदीश प्रसाद मण्डल- पाँचटा विहनि कथा २.राम विलास साहु-दूटा विहनि कथा ३. चन्दन कुमार झा-विहनि कथा- टटका रचना २.७.१.दुर्गानन्द मण्डल-बेटीक अपमान/ जीवन-मरण २.शिवकुमार झा ‘टिल्लू’-पृथ्वीपुत्र/ राजकमल ३.डा.राजेन्द्र विमल- नव–नव क्षितिजक सन्धान करैत सुजीतक जिद्दी २.८.१.विदेह बाल साहित्य सम्मान २०११ सँ सम्मानित ले.क. मायानाथ झासँ उमेश मण्डलक साक्षात्कार २.हम पुछैत छी: विदेह मैथिली समानान्तर रंगमंचक संस्थापक मैथिली नाटक आ रंगमंचक आइ धरिक सभसँ पैघ नाम बेचन ठाकुरसँ मुन्नाजीक गपशप ३. पद्य ३.१.१.अनामिका राज- नवका बाट २.नगीना कुमारी झा३.इरा मल्लिक- गीत ३.२.१.पंकज चौधरी “नवलश्री” - गजल २.राम विलास साहुक कविता-रौदी३.प्रमोद रंगीले ३.३.जगदीश प्रसाद मण्डल-११ गोट गीत ३.४.१. राजदेव मण्डल २.ओमप्रकाश झा ३.५.१.लालबाबू मण्डल २.किशन कारीगर ३.६.चंदन कुमार झा ३.७.१.जगदानन्द झा 'मनु' २.राजेश कुमार झा (कन्हैया) ३.शशिधर कुमर- पूणा प्रवास ३.८.१.जगदीश चन्द्र ठाकुर ‘अनिल’- की भेटल आ की हेरा गेल (आत्म गीत)- (आगाँ)२.सत्यनारायण झा- ओहिना मोन अछि ओ दिन बालानां कृते-१.इरा मल्लिक -बालगीत२.जगदानन्द झा मनु- संंकल्पक धनी विल्मा रुडोंल्फ भाषापाक रचना-लेखन -[मानक मैथिली], [विदेहक मैथिली-अंग्रेजी आ अंग्रेजी मैथिली कोष (इंटरनेटपर पहिल बेर सर्च-डिक्शनरी) एम.एस. एस.क्यू.एल. सर्वर आधारित-Based on ms-sql server Maithili-English and English-Maithili Dictionary.] विदेह ई-पत्रिकाक सभटा पुरान अंक ( ब्रेल, तिरहुता आ देवनागरी मे ) पी.डी.एफ. डाउनलोडक लेल नीचाँक लिंकपर उपलब्ध अछि। All the old issues of Videha e journal ( in Braille, Tirhuta and Devanagari versions ) are available for pdf download at the following link. विदेह ई-पत्रिकाक सभटा पुरान अंक ब्रेल, तिरहुता आ देवनागरी रूपमे Videha e journal's all old issues in Braille Tirhuta and Devanagari versions विदेह ई-पत्रिकाक पहिल ५० अंक
विदेह ई-पत्रिकाक ५०म सँ आगाँक अंक ↑ विदेह आर.एस.एस.फीड एनीमेटरकेँ अपन साइट/ ब्लॉगपर लगाऊ। ब्लॉग "लेआउट" पर "एड गाडजेट" मे "फीड" सेलेक्ट कए "फीड यू.आर.एल." मे http://www.videha.co.in/index.xml टाइप केलासँ सेहो विदेह फीड प्राप्त कए सकैत छी। गूगल रीडरमे पढ़बा लेल http://reader.google.com/ पर जा कऽ Add a Subscription बटन क्लिक करू आ खाली स्थानमेhttp://www.videha.co.in/index.xml पेस्ट करू आ Add बटन दबाउ। Join official Videha facebook group. Join Videha googlegroups विदेह रेडियो:मैथिली कथा-कविता आदिक पहिल पोडकास्ट साइट http://videha123radio.wordpress.com/ मैथिली देवनागरी वा मिथिलाक्षरमे नहि देखि/ लिखि पाबि रहल छी, (cannot see/write Maithili in Devanagari/ Mithilakshara follow links below or contact at ggajendra@videha.com) तँ एहि हेतु नीचाँक लिंक सभ पर जाउ। संगहि विदेहक स्तंभ मैथिली भाषापाक/ रचना लेखनक नव-पुरान अंक पढ़ू। http://devanaagarii.net/ http://kaulonline.com/uninagari/ (एतए बॉक्समे ऑनलाइन देवनागरी टाइप करू, बॉक्ससँ कॉपी करू आ वर्ड डॉक्युमेन्टमे पेस्ट कए वर्ड फाइलकेँ सेव करू। विशेष जानकारीक लेल ggajendra@videha.com पर सम्पर्क करू।)(Use Firefox 4.0 (from WWW.MOZILLA.COM )/ Opera/ Safari/ Internet Explorer 8.0/ Flock 2.0/ Google Chrome for best view of 'Videha' Maithili e-journal athttp://www.videha.co.in/ .) Go to the link below for download of old issues of VIDEHA Maithili e magazine in .pdf format and Maithili Audio/ Video/ Book/ paintings/ photo files. विदेहक पुरान अंक आ ऑडियो/ वीडियो/ पोथी/ चित्रकला/ फोटो सभक फाइल सभ (उच्चारण, बड़ सुख सार आ दूर्वाक्षत मंत्र सहित) डाउनलोड करबाक हेतु नीचाँक लिंक पर जाउ। VIDEHA ARCHIVE विदेह आर्काइव भारतीय डाक विभाग द्वारा जारी कवि, नाटककार आ धर्मशास्त्री विद्यापतिक स्टाम्प। भारत आ नेपालक माटिमे पसरल मिथिलाक धरती प्राचीन कालहिसँ महान पुरुष ओ महिला लोकनिक कर्मभमि रहल अछि। मिथिलाक महान पुरुष ओ महिला लोकनिक चित्र 'मिथिला रत्न' मे देखू। गौरी-शंकरक पालवंश कालक मूर्त्ति, एहिमे मिथिलाक्षरमे (१२०० वर्ष पूर्वक) अभिलेख अंकित अछि। मिथिलाक भारत आ नेपालक माटिमे पसरल एहि तरहक अन्यान्य प्राचीन आ नव स्थापत्य, चित्र, अभिलेख आ मूर्त्तिकलाक़ हेतु देखू 'मिथिलाक खोज' मिथिला, मैथिल आ मैथिलीसँ सम्बन्धित सूचना, सम्पर्क, अन्वेषण संगहि विदेहक सर्च-इंजन आ न्यूज सर्विस आ मिथिला, मैथिल आ मैथिलीसँ सम्बन्धित वेबसाइट सभक समग्र संकलनक लेल देखू "विदेह सूचना संपर्क अन्वेषण" विदेह जालवृत्तक डिसकसन फोरमपर जाउ। "मैथिल आर मिथिला" (मैथिलीक सभसँ लोकप्रिय जालवृत्त) पर जाउ। ऐ बेर मूल पुरस्कार(२०१२) [साहित्य अकादेमी, दिल्ली]क लेल अहाँक नजरिमे कोन मूल मैथिली पोथी उपयुक्त अछि ? Thank you for voting! श्री राजदेव मण्डलक “अम्बरा” (कविता-संग्रह) 12.5% श्री बेचन ठाकुरक “बेटीक अपमान आ छीनरदेवी”(दूटा नाटक) 10.83% श्रीमती आशा मिश्रक “उचाट” (उपन्यास) 6.39% श्रीमती पन्ना झाक “अनुभूति” (कथा संग्रह) 4.72% श्री उदय नारायण सिंह “नचिकेता”क “नो एण्ट्री:मा प्रविश (नाटक) 5.28% श्री सुभाष चन्द्र यादवक “बनैत बिगड़ैत” (कथा-संग्रह) 5% श्रीमती वीणा कर्ण- भावनाक अस्थिपंजर (कविता संग्रह) 5.28% श्रीमती शेफालिका वर्माक “किस्त-किस्त जीवन (आत्मकथा) 8.61% श्रीमती विभा रानीक “भाग रौ आ बलचन्दा” (दूटा नाटक) 6.67% श्री महाप्रकाश-संग समय के (कविता संग्रह) 5.28% श्री तारानन्द वियोगी- प्रलय रहस्य (कविता-संग्रह) 5% श्री महेन्द्र मलंगियाक “छुतहा घैल” (नाटक) 9.72% श्रीमती नीता झाक “देश-काल” (कथा-संग्रह) 5.56% श्री सियाराम झा "सरस"क थोड़े आगि थोड़े पानि (गजल संग्रह) 7.22% Other: 1.94% ऐ बेर युवा पुरस्कार(२०१२)[साहित्य अकादेमी, दिल्ली]क लेल अहाँक नजरिमे कोन कोन लेखक उपयुक्त छथि ? Thank you for voting! श्रीमती ज्योति सुनीत चौधरीक “अर्चिस” (कविता संग्रह) 27.44% श्री विनीत उत्पलक “हम पुछैत छी” (कविता संग्रह) 7.32% श्रीमती कामिनीक “समयसँ सम्वाद करैत”, (कविता संग्रह) 6.1% श्री प्रवीण काश्यपक “विषदन्ती वरमाल कालक रति” (कविता संग्रह) 4.27% श्री आशीष अनचिन्हारक "अनचिन्हार आखर"(गजल संग्रह) 21.95% श्री अरुणाभ सौरभक “एतबे टा नहि” (कविता संग्रह) 6.1% श्री दिलीप कुमार झा "लूटन"क जगले रहबै (कविता संग्रह) 7.32% श्री आदि यायावरक “भोथर पेंसिलसँ लिखल” (कथा संग्रह) 6.1% श्री उमेश मण्डलक “निश्तुकी” (कविता संग्रह) 11.59% Other: 1.83% ऐ बेर अनुवाद पुरस्कार (२०१३) [साहित्य अकादेमी, दिल्ली]क लेल अहाँक नजरिमे के उपयुक्त छथि? Thank you for voting! श्री नरेश कुमार विकल "ययाति" (मराठी उपन्यास श्री विष्णु सखाराम खाण्डेकर) 32.08% श्री महेन्द्र नारायण राम "कार्मेलीन" (कोंकणी उपन्यास श्री दामोदर मावजो) 12.26% श्री देवेन्द्र झा "अनुभव"(बांग्ला उपन्यास श्री दिव्येन्दु पालित) 12.26% श्रीमती मेनका मल्लिक "देश आ अन्य कविता सभ" (नेपालीक अनुवाद मूल- रेमिका थापा) 16.98% श्री कृष्ण कुमार कश्यप आ श्रीमती शशिबाला- मैथिली गीतगोविन्द ( जयदेव संस्कृत) 14.15% श्री रामनारायण सिंह "मलाहिन" (श्री तकषी शिवशंकर पिल्लैक मलयाली उपन्यास) 11.32% Other: 0.94% फेलो पुरस्कार-समग्र योगदान २०१२-१३ : समानान्तर साहित्य अकादेमी, दिल्ली Thank you for voting! श्री राजनन्दन लाल दास 50% श्री डॉ. अमरेन्द्र 28.26% श्री चन्द्रभानु सिंह 19.57% Other: 2.17% 1.संपादकीय १ मैथिली प्रतिभा पुरस्कारसँ ७ गोटे राजबिराजमे सम्मानित -मैथिली कवि परिषद (मैथिली साहित्य परिषदक शाखा)क , द्वारा ई पहिने मैथिली बाल प्रतिभा पुरस्कार रूपेँ देल जाइ छल। ई पुरस्कार मैथिली कवि परिषदक अध्यक्ष श्री महेन्द्र मण्डल बनबारी द्वारा प्रारम्भ कएल गेल रहए। ऐ बेरसँ एकर नाम मैथिली प्रतिभा पुरस्कार राखल गेल अछि। -कवि सागर वीर कादरी, रेडियो नाटक कलाकार जीबछ दास, भूपेन्द्र मण्डल, गायक देवेन्द्र साहा सोनी आ शिवशंकर यादव, मैथिली संगीतक क्षेत्रमे राम अधीन साहा आ प्रीति अधिकारीकेँ ई पुरस्कार देल गेलन्हि। २ सुभाष चन्द्र यादव "बनैत- बिगड़ैत" सँ जातिवादी मानसिकताक मैथिली साहित्यकारक कष्टक कारण स्पष्ट अछि। सुभाष चन्द्र यादव जै कम्यूनिटीसँ आबै छथि ओकरा धोखा नै दै छथि, ओकर समस्या, ओकर भाषा लेल संघर्षरत छथि, समझौता नै करै छथि, आइडियोलोजीमे स्थिरता छन ्हि (जे तारानन्द वियोगी आ महेन्द्र नारायण राममे नै छन्हि), आ सएह कारण अछि जे ओ ओइ जातिवादी मानसिकताक मोहन भारद्वाज, योगानन्द झा, रामदेव झा आदिक कोपक शिकार छथि (जखन कि तारानन्द वियोगी आ महेन्द्र नारायण राम स्वीकृत)। यएह कारण अछि जे जखन मैथिली लेखक संघमे सुभाषचन्द्र यादवक "बनैत बिगड़ैत"पर परिचर्चा आयोजित भेल तखन अशोक आ तारानन्द वियोगी अपन आलेख रखबाक हिम्मत जुटेलन्हि मुदा योगानन्द झा आ मोहन भारद्वाज मौन धारण केने रहलाह (नवेन्दु कुमार झा ओइ परिचर्चामे उपस्थित रहथि)। मुदा जखन कबिलपुरक ब्लैकमेलर सभक पत्र "विद्यापति टाइम्स" हम देखलौं तँ चकित रहि गेलौं- एकटा हेडिंग रहै - "घरदेखियासँ आगाँ नै बढ़ि सकला बनैत-बिगड़ैत केर लेखक- मोहन भारद्वाज"!!! -मैथिली लेखक संघक परिचर्चाक रिपोर्ट!!! योगानन्द झाक घृणित मानसिकता सोझाँ आएल छल हमरा लग। मोहन भारद्वाज ओइ खबरिक आइ धरि खण्डन नै केलनि, माने हुनकर सहमतिसँ ई झूठ प्रकाशित भेल। घर-बाहरमे आ मिथिला दर्शनमे कमल मोहन चुन्नूक "महेन्द्र मलंगिया" आ "मोहन भारद्वाज" सन जातिवादी मानसिकताक लोक लेल साहित्य अकादेमी पुरस्ककार वकालति जखन लगातार प्रारम्भ भेल तखन अनायास हमरा "विद्यापति टाइम्स" मोन पड़ि गेल आ पूरा साजिश सोझाँ आबि गेल। की ई सुभाष चन्द्र यादव बनैत-बिगड़ैतक विरुद्ध साजिश नै अछि? जखन नचिकेताक "नो एण्ट्री मा प्रविश"क विरुद्ध अमरेश पाठक, चन्द्रनाथ मिश्र अमर आ मायानन्द मिश्र एकजुट भऽ गेला आ प्रतिक्रियावादी कवि उदयचन्द्र झा विनोदकेँ पछिला साल अकादेमी पुरस्कार दिया देल गेल तखनो सभ किछु स्पष्ट छल। पढ़ू बनैत-बिगड़ैत http://sites.google.com/a/shruti-publication.com/shruti-publication/Home/Banait_Bigrait_SubhashChandraYadav.pdf?attredirects=0 ३ घर-बाहरक जातिवादी रंगमंचसँ जुड़ल वा सहिष्णु सम्पादक मण्डलक (वासुकीनाथ झा, रमानन्द झा रमण आ कमल मोहन चुन्नू) कृत्य: घर-बाहर जुलाई २०१२: ब्राह्मणवादी तेवर, माने चोरिक खुलेआम समर्थन। पंकज पराशर नामक चोरकेँ जुग-जुग जीबथु कॉलममे स्थान देल गेल अछि,जै मिथिलाक समाजमे बारहो वर्ण चोरकेँ खेहारि कऽ बाहर कऽ दै छै, ओतै मैथिली साहित्यक ब्राह्मणवादी सम्पादक मण्डल चोरक खुलेआम समर्थक बनि गेल, कारण चोर ओकर जातिक अछि। दोसर ऐ चित्र मे आनन्द कुमार झाकेँ युवा नाटककार सम्मान भेटलापर ऐ जातिवादी रंगमंचक सम्पादक लोकनिकेँ कष्ट छन्हि, - चयन प्रक्रियापर की सवाल उठल छल से अनुत्तरित अछि, माने ब्राह्मणवादी ब्लैकमेलिंग, जातिवादी रंगमंचसँ जुड़ु, सहयोगी बनू आ नै तँ ब्लैकमेलिंग झेलू। ४ ऐ बेरुका बाल साहित्य पुरस्कार मैथिलीमे अ-बाल साहित्य, मुरलीधर झाक "पिलपिलहा गाछ", केँ देल गेल, मुरलीधर झा निर्लज्जतापूर्वक फूल-माला-पाग पहीरि रहल छथि आ किछु जातिवादी लोक निर्लज्जतापूर्वक ई सभ हुनका पहिरा रहल अछि। प्रस्तुत अछि ऐ अंकमे ऐपर रिपोर्ट आ चन्द्रनाथ मिश्र अमर-रामदेव झाक तेसर पीढ़ीक गारिक अपशब्द। किछु मेल आ एस.एम.एस. सँ आएल गारिक संकलन ओइ रिपोर्टमे अछि। जिनका विजयदेव झा वा शंकरदेव झा (चन्द्रनाथ मिश्र अमर-रामदेव झाक तेसर पीढ़ी)क गारियुक्त पोस्टकार्ड-ई-मेल (वा अखबार-पत्रिकामे ब्लैकमेलिंगबला न्यूज) वा अपशब्दयुक्त एस.एम.एस. भेटल छन्हि ओ हमर ई-मेल ggajendra@videha.com पर स्कैन कॉपी अग्रसारित करथु वा मेल फॉरवार्ड करथु। एकर सभक अपशब्दयुक्त एस.एम.एस. हमर मोबाइल नम्बर ०९९११३८२०७८ पर अग्रसारित करू। ई सभ व्यक्ति जकर स्थान जेल छिऐ ओ नपुंशक जातिवादी साहित्यिक (!!) लोक सभक चलैत साहित्य अकादेमीक माध्यमसँ मैथिली साहित्यकेँ पछिला ४५ सालसँ ब्लैकमेल करैत रहल, मुदा तकर आइ अन्तिम दिन छल। एकटा अखबारमे ब्लैकमेलिंगबला न्यूज-रिपोर्टमे ई सभ ब्लैकमेलर नचिकेताकेँ मैथिल नै मानैए। नचिकेता, भीमनाथ झा आदि सेहो ऐ सभ लेल परोक्ष रूपसँ जिम्मेवार छथि, जे ऐ तरहक गारि-गरौअलि सुनैत रहला आ एकर सभक मोन बढ़ैत रहलै। मैथिलीक ब्राह्मणवादी आ कायस्थवादी (यएह दूटा वाद मे मैथिलीक पत्र-पत्रिका सभ बँटल अछि) पत्र-पत्रिकामे आपसमे घोर मतविभिन्नता छै, मारि-काटि छै मुदा विदेहक विरुद्ध ई सभ एक भऽ जाइए। नचिकेता जीक "मिथिला दर्शन" सेहो आब ब्राह्मणवादी पत्रिका भऽ गेल अछि, आ प्रधान सम्पादक जिम्मेवारीसँ बचि नै सकै छथि, हुनकर ई कर्तव्य छन्हि जे ओ अपन सम्पादक मण्डलमे सुधार करथु आ ओइमे किछु गोटेमे साहसक संचार करथु। ५ दिल्ली जाइसँ पहिने भोगेन्द्रजी कम्युनिस्ट पार्टीक जिला-कार्यालयमे जगदीश प्रसाद मण्डल जी केँ कहि देलखिन जे आब जे आएब तँ बेरमो जेबे करब, तँए ओइपर नजरि राखब। जहिना हाटो-बजारमे आ गामो-घरमे वस्तुक लेन-देन तीन तरहक लोकक बीच होइत अछि, एक वस्तुबला, दोसर लेबाल (कीनैबला)क बीचमुदा ऐ बीच तेसरो फड़ि जाइए, ओ फड़बैए गर्ज। जखन वस्तु बेचिनिहारो आ लेनिहारोकेँ समानक गर्ज रहैए तखुनका बेवहार सुलभ होइए। कारणो होइ छै जे वस्तु बेचि वा कीनि कऽ अमुख काज करब, जे जरूरी अछि। दोसर तरहक होइए जे बेचिनिहारकेँ काजक दुआरे अधिक गर्ज रहल आ कीनिनिहार अगधाएल रहल। तइठाम बेचिनिहार कटाइए आ कीनिनिहार नफगर रहैए। तहिना कतौ लेबाल (कीनिनिहार) गरजू रहल आ बेचिनिहार ना-गरजू। तइठाम कीनिनिहार कटाइए आ बेचिनिहार नफामे रहैए। किएक तँ मने-मन अगधाइत रहल जे पानिमे पाथर सड़ैए। तहिना लेबालोक बीच होइत रहै छै जे पाइ कि कोनो कुट-कुट कटैए जे अनेरे कतौ फेकि देब। यएह बिचला दुनियाँक कलाकार छी, जे अपने संग दुनियोकेँ नचबैए। अदौसँ एक दिसक लोक दोसर दिसक दुनियाँ लेल विकट परिस्थिति पैदा करैत रहल अछि आ कंठ दबैत रहल अछि। मुदा से नै भेल। जहिना भोगेन्द्र जीक कार्यक्रमक जिज्ञासा बेरमा लोककेँ छल तहिना भोगेन्द्रोजी आ कम्युनिस्ट पार्टियोकेँ छलै। सकरी सभाक बात बेरमा गाममे जोर-शोरसँ चलए लागल। नीकसँ नीक कार्यक्रम हुअए, तइ पाछू सभ लागल, तँ दोसर दिस नव क्षेत्र भेटने भोगेन्द्रोजी आ पार्टियो कार्यक्रमकेँ नीकसँ नीक बनबैक फिराकमे लागल। ओना आइसँ १९६७ ई.सँ पूर्व एकबेर कम्युनस्ट पार्टी बेरमामे सेहो बनल छल मुदा बेबहारिक पक्ष कमजोर रहने टिक नै पाएल रहए। नव-युवक बीच पार्टी बनल, कमोबेश अधिकतर युवक पढ़ल-लिखल। सबहक बीच पार्टीक कोनो तौर-तरीका नै बूझल तँए थाहि-थाहि किछु-किछु सिखैत, अकाससँ पताल धरिक बात उड़ि-उड़ि सभककानमे आबै जइसँ किछु-ने-किछु उत्साह तँ जगिते रहै। जँ से नै होइतै तँ आन पार्टीक (पँूजीवादी) अपेक्षा चरित्र िनर्माण केना एतऽ होइ छै? संघर्षे चरित्र खरादै छै। संसद बैसार समाप्तिक तेसर दिन भोगेन्द्रजी मधुबनी पहुँच गेला। अखन धरि भोगेन्द्रजी केँ तेना भऽ कऽ लोक नै चिन्हैत रहनि तँए औता कि नै औताह सेअसमंजस बनल रहै, बनबो स्वाभाविके रहै किएक तँ आन-आन कतेक कार्यक्रम एहेन भऽ चुकल रहै जइमे नेता नै पहुँचल रहथि। संसद समाप्तिक पराते भेने भोगेन्द्रजी पटना पहुँच गेल रहथि। पहिल बेर बिहारसँ कांग्रेसक विरोधी दलक सांसद बहुमतमे दिल्ली पहुँचल रहथि। बिहारोमे विरोधिये दलक सरकार महामाया प्रसाद सिंहक नेतृत्वमे बनल रहए। कर्पूरी ठाकुर उपमुख्यमंत्री बनलाह। ओना महामाया बाबू कांग्रेससँ टूटि कऽ आबि जनक्रान्ति दल बनौने रहथि। बिहार सरकारमे सभसँ बेसी सोशलिस्ट पार्टीक विधायक रहथि जइसँ सरकारोमे अधिक भागीदारी भेलनि। पहिल बेर धनिकलाल मण्डल जीत कऽ गेल रहथि, मुदा तैयो विधान सभा अध्यक्ष बनलाह। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टीक कोटामे दूटा केबिनेट आ दूटा राज्य मंत्री बनलाह। दरभंगा जिलाक कोटामे तेजनारायण जी (श्री तेज नारायण झा) राज्य मंत्री बनलाह। ओना चारू गोटे अपना-अपना क्षेत्रमे कर्मठ रहथि। जहिना इन्द्रदीप भाय (श्री इन्द्रदीप सिंह) विद्वान (अर्थशास्त्री) रहथि तहिना चन्द्रशेखर भाय (श्री चन्द्र शेखर सिंह) सेहो क्रान्तिकारी रहथि। श्री शत्रुध्न बेसरा आदिवासीक नेता रहथि तँ तेजनारायण जी किसान नेता। एक तँ ओहिना सरकार दल-दलमे डोलैत रहए तइपर रौदी आरो डोलबैत रहै। किसान नेताक संग-संग भोगेन्द्र जी बिहारक नेता सेहो रहथि तँए काजक भार बहुत अधिक पड़ि गेल रहनि। पटना आबि राज्यक स्थितिक विचार-विमर्श करैत-करैत पहिल दिन बीति गेलनि। मुदा पराते भनेसँ क्षेत्रक समए बना लेने रहथि। राता-राती मधुबनी आबि गेलाह। मधुबनी अबिते सभकेँ खबड़ि भऽ गेल जे काल्हि भोगेन्द्र जी बेरमाक कार्य-क्रममे रहताह। ओना सभ प्रचार करिते रहथि, पर्चो छपबाइये नेने रहथि, दिनमे आम सभा करताह आ रातिमे कार्यकर्ता-मीटिंग। खाइयो-पीबैक ओरियान भेल रहै। आम सभाक अंतिम समए पाँच बजेक बाद भोगेन्द्रजी जीपसँ बेरमा पहुँचलाह। आम सभामे उपस्थित सबहक मनमे भऽ गेलै जे आब ओ नै औताह। फौनो-फान अखुनका जकाँ नहिये रहै, भोगेन्द्र जीकेँ अबैसँ पहिने, आम सभा मरहन्ने जकाँ रहल मुदा हुनका अबिते जना रंगे-रूप बदलि गेल। कते गोटे जे उठि-उठि कऽ रस्ता पकड़ि नेने रहथि, ओहो सभ घुमलाह। संग-संग किछु नवो लोक पहुँचलाह। जीपसँ उतरि भोगेन्द्र जी बजलाह- “एक गिलास पानि आ चाह पिआउ। ताबे मंचपर बैसै छी।” लोक धड़फड़ाएल जे जखन भोगेन्द्रजी पहुँच गेला तखन हुनक समैकेँ अनेरे दुइर करै छियनि। मंचपर भोगेन्द्रजी चुपचाप बैस देखैत-सुनैत रहथि। पानि पीब चाह पीलनि। चाह पीबैते बजैक आग्रह भेलनि। आग्रह होइते ओ कहलखिन जे सभकेँ पूछि लिअनु जे किनको किछु पुछबाक छन्हि। मुदा सभ तँ सुनैले उत्सुक तँए एकोटा प्रश्न नै आएल रहए। उठिते दिल्लीक कांग्रेसी सरकारक खेरहा संक्षेपमे ओ कहलखिन जे केना अखन पूँजीपति, कारखानादार आ सामंत (राजा-महराजाक) क बीच विवाद फँसल अछि। विवादक चर्च करैत कहलखिन जे देशक विकास अवरूद्ध भऽ गेल अछि। मुदा से बात कमे लोक बुझलक। किएक तँ गामक लोक सरकारक माने कोटाक गहुम आ थाना मात्र बुझैत छल, गोटि-पंगरा चापा-कलो गड़ा जाइ छलै। ताबत चीनी-मटिया तेलक कोटाे भेल रहै ओना गहुमो कोटेक हिसाबसँ भेटै मुदा लेबालक अभाव (पाइक दुआरे) रहने से नै बूझि पड़ै। दिल्ली सरकारक लगले बिहार सरकारक चर्च केलखिन। रौदीक स्थिति भयावहता आ बिहार सरकारक आँट-पेट खोलि कऽ राखि देलखिन। कोसी-नहरिक चर्च विस्तारसँ केेलखिन जे ई योजना मिथिलांचलक लेल की अछि?मिथिलांचल चर्चक क्रममे ऐठामक सामाजिक शोषण, जे एक-दोसरकेँ आगू बढ़ैसँ रोकैत अछि, क विस्तारसँ चर्च केलखिन। ओना भोगेन्द्र जीक भाषण दू घंटासँ चारि घंटा होइत छल, मुदा से नै भेल। घंटा पुरैत-पुरैत समए समाप्त भऽ गेल। सभा समाप्ति होइते ओ कहलखिन जे ओना कार्यकर्ता-बैसार करैक कार्यक्रम सेहो अछि मुदा से नीक जकाँ नै भऽ सकत। मुदा तैयो अहाँ सभ तैयारी करब जते काल छी तहीमे ओहो भइये जेतै। तइ बीच चाह एलै, ओ जलखै नै केलनि। चाहे पिबैत काल अय्यर-आयोगक चर्च सेहो केलखिन। किछु कांग्रेसी नेता, जे सभ सरकारमे रहलाह, गोल-मालक जाँच करताह। ओना जइ हिसाबसँ कम्युनिस्ट पार्टीक पहिल आम सभा छल तइ हिसाबसँ बहुत नीक भेल छलै, जे भोगेन्द्रजी अपनो बजलाह। कार्यकर्ता मीटिंग शुरू होइते जना भोगेन्द्र जीक रूप बदलि गेलनि। बजलाह- “कम्युनिस्ट पार्टी राजनीतिक पार्टी छिऐ, अहाँ सभ पार्टीक सदस्य बनि पार्टी बनेलौं, एकरा सम्हारबोक भार अहीं सबहक ऊपर रहत। अहाँ सभ अपनाकेँ क्रान्तिकारी पार्टीक सदस्य बूझि सामाजिक बेवस्थाकेँ बदलि सुधारू, जाधरि सामाजिक बेवस्था नै बदलत ताधरि सर्व-कल्याणकारी समाज नै बनत। जाधरि सर्व-कल्याणकारी समाज नै बनत ताधरि किछु गोटे लुटबे करत आ किछु गोटे लुटेबे करत। कमाएब अहाँ, खा जाएत दोसर। मुदा पार्टी तँ गामसँ लऽ कऽ दुनियाँ भरिमे पसरल अछि। तँए एक-दोसरमे जुटि कऽ केना रहब, ई तौर-तरीका सीखए पड़त। गामसँ लऽ कऽ दुनियाँ भरिमे लूट-खसोट चलि रहल अछि, जे साधारण नै अछि, सभ तरहक शक्ति ओकरा छै। ओइ शक्तिक मुकाबला करैक जे शक्ति छैक ओ बनबए पड़त। अखन तँ हमहूँ औगताएले छी तँए नीक जकाँ नै बुझा पाएब। कनी निचेन होइ छी तखन फेर आएब। अखन किछु मूल बात जे छै से कहि दइ छी। अहाँ गाममे पार्टी बनेलौं, गामक जे समस्या अछि ओकरा पकड़ू। पार्टीक सभ सदस्य एकठाम बैस ओइ समस्यापर विचार करू। लोके लऽ कऽ समाज बनै छैक। जते गोटे अहाँ सभ छी जँ ओतबो गोटे एकजुट भऽ समाधान करब तँ असानीसँ समाधान होइत जाएत। ओना जते असान बुझै छिऐ बेवस्था तोड़ब ओते असान नै छै। विरोधीक आक्रमणक संग अपना पार्टियोमे मतभेद हएत, तइ संग परिवारोमे हएत। बड़-बढ़िया खाइ-पीबैक जोगार सेहो केने छी। सभ एकठाम बैस खाएब-पीब तखन ने खाइ-पीबैक छुआछुतक रोग जे अछि, से टुटत। जाबे से नै टुटत ताबे मन-भेद होइते रहत। नियमित बैसार करू। जाबे अपना पार्टी कार्यालय नै भेल अछि ताबे टोले-टोल बैसार करू। ओइ टोलक की समस्या छै आ ओकर समाधान केना हेतै, बैसारक मुख्य काज भेल। ई तँ सामाजिक स्तरपर भेल मुदा ऐ संग आरो क्षेत्र अछि। कोनो समस्या लऽ कऽ ब्लौकमे प्रदर्शन करब, ब्लौक भरिक पार्टीक प्रदर्शन हएत। ओहीमे बेरमाक जे समस्या अछि ओकरो मुद्दा बनाएब। अहिना जिलोमे होइ छै। राज्यक राजधानियोमे होइ छै, दिल्लियोमे होइ छै। सभमे भाग लेब। दुनू दिसक समस्या रहत, तँए ऊपरका समस्या प्रमुख भेल।” ओ धड़फड़ाएल रहबे करथि, नअ बजे करीब विदा भऽ गेला। हुनका गेला पछाति खेनाइ-पिनाइ भेल। कार्यक्रम समाप्त भेल। गाममे एकटा नव नजरिक जन्म भेल। जेना पहिने गामकेँ लोक बुझैत छल तइसँ भिन्न बुझैक प्रक्रिया शुरू भेल। ओहुना चारि गोटे एकठाम भऽ कोनो काज शुरू केलक। ओना पहिनौं किछु लोक सामाजिक काजमे समाज सहयोगी बनैत छलाह, मुदा ओ दायरा कमि गेल। किछु परिवार धरि समटा गेल छल। अपन काज,अपन बातकेँ छिपा कऽ राखब स्वभाव बनि गेल छल, अखनो अछि। अंतमे, चारि गोटेक बीच रहला आ बजलासँ बजबाक अभ्यास हुअए लगै छै। तइ संग ईहो होइ छै जे दोहरा-तेहरा कऽ एके बात बाजी वा किछु नव गप बाजी। पार्टीमे जुटलासँ दिल्लीक रैली तक जगदीश प्रसाद मण्डल भाग लिअए लगला। नव-नव लोकसँ भेँट-घाँट, क्षेत्रक हिसाबसँ नव-नव कला-संस्कृति देखैक अवसर जगदीश प्रसाद मण्डलकेँ भेटए लगलन्हि। तइ संग ईहो भेलन्हि जे दू-आना, चारि आनामे नीक किताब भेटए लगलन्हि जइसँ नव-नव जानकारी हुअए लगलन्हि। सन् सैंतालीस... भारतक स्वतंत्र त्रिवार्णिक झण्डा फहरा रहल छल। मुदा कम्यूनिस्ट पार्टीक माननाइ छल जे भारत स्वतंत्र नै भेल अछि। असली स्वतंत्रता भेटब बाँकी छै... मिथिलाक एकटा गाम… जन्म भेल रहए एकटा बच्चाक.. ओही बर्ख ... ओइ स्वतंत्र वा स्वतंत्र नै भारतमे... पिताक मृत्यु...गरीबी.. केस मोकदमा... वंचितक लेल संघर्षमे भेटलै स्वतंत्र भारतक वा स्वतंत्र नै भेल भारतक जेल.... आइ बेरमामे पाँच-दस बीघासँ पैघ जोत ककरो नै.. ओइ गाममे जीवित अछि आइयो किसानी आत्मनिर्भर संस्कृति... पुरोहितवादपर ब्राह्मणवादक एकछत्र राज्यक जतऽ भेल समाप्ति.. संघर्षक समाप्तिक बाद जिनकर लेखन मैथिली साहित्यमे आनि देलक पुनर्जागरण... जगदीश प्रसाद मण्डल- एकटा बायोग्राफी...गजेन्द्र ठाकुर द्वारा (अनुवर्तते...) ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। गजेन्द्र ठाकुर ggajendra@videha.com http://www.maithililekhaksangh.com/2010/07/blog-post_3709.html २.गद्य २.१.आशीष अनचिन्हार- काफिया आ बहर २.२.१.पूनम मण्डल- मैथिलीक तेसर विकीलीक्स २.नवेंदु कुमार झा-पटना मे पसरत हीराक चमक/निगरानी विभागक लेल बनि रहल विशिष्ट संवर्ग/ प्रदेश मे शौचालय सॅ वंचित अछि पैघ आबादी २.३.१.कामिनी कामायनी- उत्तराक नोर २.सत्यनारायण झा-दुटा बात पुत्रक जन्म दिन पर ३.कैलास दास, खोजय पड़त मातृत्व बालगीत २.४.डॉ.अरुण कुमार सिंह-मातृभाषाक माध्यमसँ उच्चशिक्षा २.५.बेचन ठाकुर- बाप भेल पित्ती २.६.१.जगदीश प्रसाद मण्डल- पाँचटा विहनि कथा २.राम विलास साहु-दूटा विहनि कथा ३. चन्दन कुमार झा-विहनि कथा- टटका रचना २.७.१.दुर्गानन्द मण्डल-बेटीक अपमान/ जीवन-मरण २.शिवकुमार झा ‘टिल्लू’-पृथ्वीपुत्र/ राजकमल ३.डा.राजेन्द्र विमल- नव–नव क्षितिजक सन्धान करैत सुजीतक जिद्दी २.८.१.विदेह बाल साहित्य सम्मान २०११ सँ सम्मानित ले.क. मायानाथ झासँ उमेश मण्डलक साक्षात्कार २.हम पुछैत छी: विदेह मैथिली समानान्तर रंगमंचक संस्थापक मैथिली नाटक आ रंगमंचक आइ धरिक सभसँ पैघ नाम बेचन ठाकुरसँ मुन्नाजीक गपशप आशीष अनचिन्हार- काफिया आ बहर तँ आब आबी कने काफियाक दोसर प्रसंगपर--------- मैथिली आ उर्दू वर्णमालामे अंतर जखन मैथिली गजलमे निअम सभ लागू होमए लागल तखन बहुत लोक सभकेँ कष्ट शुरु भेलन्हि। जिनका सभकेँ कष्ट एखनो छन्हि ओहिमे दू तरहँक आदमी छथि। पहिल तरहँक तँ ओ भेलाह जे पहिनेसँ गजल लिखै छथि मुदा बिना कोनो निअमक आ निअम लागू भेलासँ हुनक सभ रचनापर प्रश्न चिन्ह लागि गेल तँए ओ सभ निअमक विरोध करए लगलाह। दोसर तरहँक आदमी ओ छथि जे गजल तँ नै लिखै छथि मुदा गजल विधाक विकास नै सोहेलन्हि तँए ओहो विरोध करए लगलाह। तँ हमरा लग एकटा एहन आदमी छथि जे अपने गजल तँ नै लिखै छथि मुदा निअमक विरोध करै छथि। पेशासँ ओ राज्य सरकारक उच्चस्थ पदाधिकारी छथि। एक दिन ओ कतहुँसँ उर्दूक एकटा नीक शाइर केर गजल पोथी किनलन्हि जे की देवनागरीमे लिप्यंतरण भेल रहै। आब भाइ मैथिली आ उर्दू तँ अलग भाषा छै से ओ पदाधिकारी नै बूझि सकलाह आ हमरासँ प्रश्न पूछि देलाह जे ई महान उर्दू शाइर फल्लाँ केर पोथी थिक आ ऐमे " त " अक्षर केर काफिया " थ " अक्षर छै मुदा अहाँ मैथिलीमे तँ " त" आ "थ" केर अलग निअम बना देने छिऐ। जे निअम उर्दूमे नै चललै से मैथिलीमे कोना चलत आदि-आदि। हम तँ गुम्म रहि गेलहुँ। बहुत हिम्मति कए हम हुनकासँ पुछलिअन्हि जे श्रीमान् अपने पढ़ि कए पास केने छिऐ की पाइ दए क'। आब तँ ओहि सरकारी पदाधिकारीकेँ तामस जे चढ़लन्हि से की कहू---| ई एकटा खिस्सा अछि मुदा एहन घटना अहाँ संग सेहो भए सकैत अछि। मानि लिअ जे अहूँ कोनो उर्दू गजलक देवनागरी लिप्यंतरण भेल पोथी किनलहुँ आ पढ़लापर देखलहुँ जे " भ " केर काफिया " ब" भेल छै तँ अहूँ भ्रममे पड़ि जाएब। मुदा ऐठाम मोन राखू जे उर्दू आ मैथिली भाषा अलग छै आ ओकर लिपि सेहो अलग-अलग छै तँए काफियाक निअम दूनू भाषामे थोड़े अलग रहतै। इहो मोन राखू जे उर्दू केर जन्म भारतमे भेलै मुदा लालन-पालन अरबी-फारसी बला सभ केलकै। फलस्वरूप उर्दू भाषामे भारतीय भाषाक संगे-संग अरबी-फारसीक निअम चलैत अछि।आ तँए हम अतए देवनागरी ( संगे संग मिथिलाक्षर सेहो ) आ उर्दू लिपिमे अंतर दए रहल छी जाहिसँ अहाँ सभ ओहि पदाधिकारी जकाँ भ्रमित नै हएब।---- देवनागरी ( संगे-संग मिथिलाक्षरमे सेहो ) कुल 16टा स्वर आ 36टा व्यंजन अछि मतलब जे हरेक ध्वनि लेल अलग-अलग अक्षर बनाएल गेल छै मुदा उर्दूमे किछुए अक्षर छै आ तकरामे नुक्ता लगा वा " ह" ध्वनिक प्रयोग कए नव शब्द बनाएल जाइत छै।नुक्ता लगा वा " ह ' मिला कए जे नव शब्द बनैत छै तकरा उच्चारणक हिसाबसँ चारि भागमे बाँटि सकैत छी-------------- a) जे लिखलो जाइत छै आ तकरा उच्चारणों कएल जाइत छै ( हर्फे मक्तूबा मलफूजा )------ई सरल बात छै आशा अछि जे एकरा बुझि गेल हेबै। b) जे लिखल तँ जाइ छै मुदा ओकर उच्चारण नै कएल जाइत छै ( हर्फे मक्तूबा गैर मलफूजा )------उर्दूमे बहुत रास एहन शब्द छै जाहिमे किछु अक्षर लिखल तँ जाइ छै मुदा ओकर उच्चारण नै होइत छै आ मात्रा गनबा काल सेहो ओकरा नै गनल जाइत छै जेना---- "तुम अपनी" ऐकेँ आवश्यकता पड़लापर "तुमपनी" सेहो उच्चारित कएल जाइत छै। आब देखू जे "तुम अपनी"मे अ लिखल छै मुदा ओकर उच्चारण नै भए रहल छै ( आवश्यकता पड़लापर ) । शब्दकेँ ऐ तरीकासँ मिलेनाइकेँ " अलिफ वस्ल'क निअम कहल जाइत छै। जे लिखल तँ नै जाइ छै मुदा ओकर उच्चारण नै कएल जाइत छै ( हर्फे मलफूज गैर मक्तूबा )----जेना पढ़ल तँ बिल्कुल जाइ छै मुदा लिखल बालेकुल जाइ छै। आ चूँकि उच्चारणमे आबि रहल छै तँए मात्रा सेहो गनल जाइत छै। एहन-एहन आर उदाहरण सभ अछि। एहन अक्षर जकर अंतमे " ह" केर उच्चारण होइक ( हाए मख्तूली )------------लगभग कुल चौदहटा अक्षर उर्दू वर्णमालामे संस्कृत वर्णमालासँ लेल गेल छै। ई अक्षर सभ अछि-----------ख, घ, ङ, छ, झ,ठ,ढ,थ, ध,फ,भ, ल्ह,म्ह आ न्ह। उर्दूमे ऐ शब्द सभकेँ एना लिखल जाइत छै------ क संग ह जोड़लापर ख ग संग ह जोड़लापर घ च संग ह जोड़लापर छ ज संग ह जोड़लापर झ ट संग ह जोड़लापर ठ ड संग ह जोड़लापर ढ़ त संग ह जोड़लापर थ द संग ह जोड़लापर ध प संग ह जोड़लापर फ ब संग ह जोड़लापर भ ङ, ल्ह, म्ह आ न्ह स्वतंत्र रूपेँ लिखल जाइत छै। आब अहाँ सभ देखि सकै छी जे देवनागरीमे तँ ख,घ इत्यादि लेल स्वतंत्र अक्षर आ तकर ध्वनि छै मुदा उर्दूमे एकरा लेल " ह' मिलाबए पड़ैत छै संगे संग ङ आदिक उच्चारणमे तँ " ह " छैके।आब जँ कोनो उर्दू शाइर " ह " फेंटाएल अक्षरक काफिया बनबै छथि तँ ओ उर्दूक उच्चारण परंपराक अनुसार " ह " केर उच्चारण नै करै छथि। तँए उर्दूमे " बात " शब्दक काफिया " साथ " बनि सकै छै। कारण " साथ "मे जे "थ" छै तकर "ह" निकालि देल जाइत छै। आन-आन " ह " मिश्रित शब्दक काफिया लेल एनाहिते बुझू। ऐठाँ ईहो मोन राखू जे मात्रा सेहो उच्चारणक हिसाबसँ गानल जाइत छै उर्दूमे तँए जँ कोनो देवनागरी लिप्यंतरण बला पोथी केर अधार पर मात्रा निकालि रहल छी तँ गड़बड़ भए सकैए। मूल उर्दू लिपि सीखू आ तकर उच्चारण सेहो तखने अहाँ उर्दू गजलक सही मात्रा पकड़ि सकै छी। 2) वर्तमान सभ भारतीय भाषा लिपि बामसँ दहिन लिखल जाइत अछि मुदा उर्दू दहिनासँ बाम। तेनाहिते देवनागरीमे शब्द रचना काल अक्षरक स्वरूप नै बदलै छै मुदा उर्दूमे बदलि जाइत छै। ऐकेँ अतिरिक्तो आन-आन अंतर छै जे व्यवहारिक स्तरपर बूझल जा सकैए। आब हमरा पूरा विश्वास अछि जे अहाँ सभ ओहि पदाधिकारी जकाँ भ्रमित नै हएब। एक बेर फेर मोन राखू जे देवनागरीक अलग-अलग ध्वनि लेल अलग-अलग अक्षर छै ( गाम घरक उच्चारणमे स, श आदि एसमान उच्चारण होइत छै जकर विवरण आगू देल जाएत ) मुदा उर्दूमे नै तँए देवनागरी ( मिथिलाक्षर )मे " त " केर काफिया " थ " नै बनि सकैए वा " प " केर काफिया " फ " नै बनि सकैए। ऐ विवरणक बाद आबी बहरपर---- बहर ---- गजल सदिखन कोने ने कोने बहरमे होइत छैक। बिना बहरक गजलक कल्पना असंभव। जेना छन्दक आधार लय होइत छैक तेनाहिते बहरक आधार अऱूज वा अऱूद होइत छैक। अऱूज वा अऱूद मने शेर मे निहित मात्रा-क्रम होइत छैक। अऱूज वा अऱूदके वज़न सेहो कहल जाइत छैक। बहरक चर्च आगाँ बढ़एबासँ पहिने एकटा गप्प आर| एहिठाम हम उर्दू बहर केर वर्णन कए रहल छी। आ मैथिली गजलमे इ बहर सभक प्रयोग मैथिली गजलक 100सालक इतिहासमे कहिओ नहि भेल | मैथिलीमे बहर नै छल मतलब कृत्रिम रूपेँ बहर नै छल। योगानंद हीरा जी बहुत पहिनेसँ अरबी बहरमे मैथिली गजल लिखैत छलाह, मुदा मैथिलीक बहर-अज्ञानी संपादक सभ हुनका कात कए देलक जाहिकेँ फलस्वरूप मैथिली गजलमे बहरक चर्चा नै भए सकल। मुदा हालहिमे गजेन्द्र ठाकुर द्वारा बहरे-मुतकारिबमे सफलतापूर्वक गजल लिखल गेल। तँए आब एकर चर्चा आवश्यक। ओना मैथिलीमे वार्णिक बहरक खोज सेहो गजेन्द्र ठाकुर द्वारा भेल अछि जकर अनुकरण प्रायः हरेक नव गजलकार कए रहल छथि। एहि लेखमे जतेक उदाहरण देल गेल अछि से वार्णिक बहर पर आधारित अछि। ओना एहि बहरक चर्चा हम बादमे सेहो करब। तँ पहिने उर्दूक बहर देखी। अऱूज वा अऱूदक अविष्कार हिजरीक दोसर सदीमे खलीले इब्ने अहमद बसरी केने छलाह। हुनका इ विचार मक्काक ठठेरा बजारमे बर्तन बनेबाक अवाज सूनि अएलन्हि। प्राचीन कालमे मक्काके अऱूज वा अऱूद सेहो कहल जाइत छलैक तँए बसरी ओहि मात्रा क्रमके अऱूज वा अऱूदक नाम देलथि। अरबी साहित्यमे 16 बहरक प्रयोग भेल। बादमे इरानमे तीन टा बहरक अविष्कार भेल। आब हम एहिठाम बहरक संक्षिप्त परिचय दए रहल छी। अरबी साहित्यमे बहर तीन खंडमे बाँटल गेल अछि 1) सालिम मने मूल बहर, 2 ) मुरक्कब मने मिश्रित बहर आ 3) मुदाइफ मने परिवर्तित बहर। एहि तीनूमेसँ मुदाइफ बहरके चर्चा हम बादमे करब| अरबीमे सालिम मने मूल बहर मे सात टा बहर अबैत अछि। आ मुरक्कबमे बारह टा। बादमे एही बारहके उलट-फेर करैत आठ टा आर बहर बनाएल गेल। कुल मिला कए मुरक्कब बहर बीस टा भेल। हम अपना सुविधा लेल मुरक्कब बहरकेँ दू खंडमे बाँटि देने छी। संगहि-संग सालिम बहरके हम "समान बहर" नाम देने छिऐक। आ मुरक्कब बहरक पहिल खंड (जाहिमे कुल सात टा बहर अछि) तकरा अर्धसमान बहर नाम देलिऐक आ मुरक्कब बहरक दोसर खंड जाहिमे तेरह टा बहर अछि तकर नाम "असमान बहर" देलिऐ। तँ आब एकर विवरण निच्चा देखू।। बहरसँ पहिने रुक्नकेँ बूझी। संस्कृतक गण जकाँ अरबी मे सेहो होइत छैक जकरा "रुक्न" कहल जाइत छैक। इ रुक्न आठ प्रकारके होइत अछि। जकर विवरण एना अछि------- रुक्नक स्वरूप मात्रा रुक्नक नाम मात्रा क्रम खमासी रुक्न 5 फऊलुन ( फ/ऊ/लुन) ISS (I/S/S) खमासी रुक्न 5 फाइलुन (फा/इ/लुन) SIS (S/I/S) सुबाई रुक्न 7 फाइलातुन (फा/इ/ला/तुन) SISS ( S/I/S/S ) सुबाई रुक्न 7 मफाईलुन (म/फा/ई/लुन) ISSS ( I/S/S/S ) सुबाई रुक्न 7 मुस्तफइलुन (मुस्/तफ/इ/लुन SSIS ( S/S/I/S ) सुबाई रुक्न 7 मुफाइलतुन (मु/फा/इ/ल/तुन ) ISIIS ( I/S/I/I/S ) सुबाई रुक्न 7 मुतफाइलुन (मु/त/फा/इ/लुन IISIS ( I/I/S/I/S ) सुबाई रुक्न 7 मफऊलातु (मफ/ऊ/ला/तु SSSI ( S/S/S/I ) ****** एहिठाम I मने 1 मने हस्व आ S मने 2 मने दीर्घ भेल संगे-संग खमासी मने पाँच मात्राक आ सुबाई मने सात मात्राक रुक्न भेल | एहि रुक्न सभकेँ इयाद रखबाक लेल गणितीय रूपसँ एना बुझू--------- a) एकटा लघुकेँ बाद जँ दूटा दीर्घ हो तँ ओकरा "फऊलुन" कहल जाइत छैक। b) एकटा लघुकेँ बाद जँ तीनटा दीर्घ हो तँ ओकरा "मफाईलुन" कहल जाइत छैक। c) जँ "मफाईलुन" केँ उल्टा करबै तँ "मफऊलात" बनि जाएत मने तीनटा दीर्घकेँ बाद एकटा लघु। d) दूटा दीर्घकेँ बीचमे जँ एकटा लघु रहए तखन ओकरा "फाइलुन" कहल जाइत छैक। e) "फाइलुन" केर अंतमे जँ एकटा आर दीर्घ जोडबै तँ ओ "फाइलातुन" बनि जाएत। f) "फाइलातुन" केर उल्टा रूप "मुस्तफइलुन" होइत छैक। g) शुरुमे एकटा लघु तकरा बाद एकटा दीर्घ तकरा बाद फेर दूटा लघु आ तकरा अंतमे एकटा दीर्घ हो तँ "मुफाइलतुन" कहल जाइत छैक h) "मुफाइलुन" केर अंतसँ तेसर या दोसर लघु हटा कए पहिल लघु लग बैसा देबै तँ "मुतफाइलुन" बनि जाएत। मने शुरुमे टूटा लघु तकरा बाद एकटा दीर्घ तकरा बाद फेर एकटा लघु आ तकरा बाद अंतमे एकटा दीर्घ। 1) समान ध्वनि---------एहि खंडमे कुल सात गोट बहर राखल जाइत अछि। जकर विवरण एना अछि-------- क) बहरे-हज़ज---------- एकर मूल ध्वनि अछि "मफाईलुन" मतलब I-S-S-S (1-2-2-2) मने हस्व् -दीर्घ-दीर्घ-दीर्घ| इ ध्वनि शाइर अपना सुविधानुसार प्रयोग कए सकैत छथि। मतलब कोनो शाइर एक पाँतिमे एक बेर, वा दू बेर वा ...... कतेको बेर ( बेसीसँ बेसी सोलह बेर ) प्रयोग कए सकैत छथि, मुदा मात्रा-क्रम नहि टुटबाक चाही।आ जँ एहि ध्वनि के शेर के रुप मे देबै तँ एना हेतैक------ I-S-S-S I-S-S-S I-S-S-S + I-S-S-S I-S-S-S + I-S-S-S I-S-S-S + I-S-S-S + I-S-S-S I-S-S-S + I-S-S-S + I-S-S-S I-S-S-S + I-S-S-S + I-S-S-S + I-S-S-S I-S-S-S + I-S-S-S + I-S-S-S + I-S-S-S....................................... तँ इ भेल बहरे-हज़ज केर ढ़ाँचा। एहिठाम फेर एक बेर गौरसँ देखू। उपरका ढ़ाँचा सभमे दूनू पाँतिमे मात्रा क्रम एकै छैक। अर्थात ह्रस्व के निच्चा ह्रस्व आ दीर्घ। आ मोन राखू जँ अहाँ बहरे-हज़जमे गजल लीखि रहल छी तँ हरेक शेरक मात्रा क्रम इएह देबए पड़त। नहि तँ गजल बे-बहर कहाओत। श्री गजेन्द्र ठाकुर द्वारा लिखित बहरे हजज केर एकटा उदाहरण देखू--------------------- महामाला महाडाला करै स्वाहा लगैए ई अकासी आस छै सोझाँ झझा देतै लगैए ई कहैए ई मिलेबै आइ नोरोमे कने गोला जँ भांगे पीबि एतै, भावना पीतै लगैए ई जहाँ ताकी लगैए प्रेम बाझै छै सरैलामे खने भोकारि पाड़ैए हँसै नै छै लगैए ई टिपौड़ी छै बुझेबै बात की, धाही कनी देखू कटैया पानि जेना ओ, नचै नै छै लगैए ई गजेन्द्र पूब सुरुजक रहत देतै सूर्यकेँ झाँखी चढ़त आकास देखै बानसब्बरै लगैए ई अमित मिश्र द्वारा लिखल बहरे हज़ज केर उदाहरण देखू---------- उड़ल सबटा चिड़ैयाँ गाछपर फुर्रसँ जँ बैसल चारपर चारो खसल चुर्रसँ हमर गाड़ी लतामक डाढ़ि आ सनठी चलै छै तेज अपने मुँह करै हुर्रसँ गिलासक दूध मिसियो नीक नै लागै भरल तौला दही आँङुर लगा सुर्रसँ अपन बाछी अपन गैया त ता थैया अपन झबरा करै अपनपर नै गुर्रसँ फटक्का फूटलै ब्राम ब्रम ब्रूमसँ जड़ै छै छूरछूरी छूर्र छू छुर्रसँ मफाईलुन 1222 तीन बेर बहरे हजज ख) बहरे-रमल------- एकर मूल ध्वनि एना अछि--- फाइलातुन मने ----- S-I-S-S,अर्थात दीर्घ-ह्रस्व-दीर्घ-दीर्घ। आब जँ एहि ध्वनि के शेर मे प्रयोग करबै तँ एना हेतैक--- S-I-S-S + S-I-S-S + S-I-S-S + S-I-S-S S-I-S-S + S-I-S-S + S-I-S-S + S-I-S-S (एहिठाम हम खाली चारि-चारि ध्वनिके उदाहरण देलहुँ अछि, मुदा शाइर एकसँ लए कए कतेको बेर ( बेसीसँ बेसी सोलह बेर ) ध्वनिके प्रयोग कए सकैत छथि।) इ भेल बहरे-रमल। अमित मिश्र द्वारा लिखल बहरे रमल केर उदाहरण देखू---------- घोघ हुनकर उतरि गेलै पवन संगे ससरि गेलै आँखि रहि गेलै खुजल यौ रूप यौवन निखरि गेलै टोह मे छल मोन बगुला राशि सुन्नर उचरि गेलै चउरचन मे चान पूजब पावइन सब बिसरि गेलै जेठ मे मधुमास एलै गाछ नव दिल मजरि गेलै मधुप केलक आक्रमण बड काम मे सब लचरि गेलै अंशु आशक झाँपि लेलनि कुकुर पर जे नजरि गेलै पाप भेलै ,घोघ ससरल अमितके मन हहरि गेलै फाइलातुन ( I-U-U-U ) बहरे-रमल ग) बहरे-कामिल----- एकर मूल ध्वनि अछि "मुतफाइलुन" मने I-I-S-I-S मने ह्रस्व-ह्रस्व-दीर्घ-ह्रस्व-दीर्घ। शेरमे एकर ढ़ाँचा एना छैक------ I-I-S-I-S + I-I-S-I-S + I-I-S-I-S + I-I-S-I-S + I-I-S-I-S I-I-S-I-S + I-I-S-I-S + I-I-S-I-S + I-I-S-I-S + I-I-S-I-S (एहिठाम हम खाली चारि-चारि ध्वनिके उदाहरण देलहुँ अछि, मुदा शाइर एकसँ लए कए कतेको बेर ( बेसीसँ बेसी सोलह बेर ) ध्वनिके प्रयोग कए सकैत छथि।) इ भेल बहरे-कामिल|अमित मिश्र द्वारा लिखल बहरे कामिल केर उदाहरण देखू---------- किछु बात एहन भेल छै घर घर त' रावण भेल छै बम फोड़ि छाउर देश छै जड़ि देह जाड़न भेल छै प्रिय नै विरह जनमै बहुत सजि दर्द गायन भेल छै जिनगी भ' गेल महग कते झड़कैत सावन भेल छै दस बात सूनब की "अमित" सब ठाम गंजन भेल छै मुतफाइलुन 11212 दू बेर बहरे -कामिल घ) बहरे-मुतकारिब-------- एकर मूल ध्वनि फऊलुन अछि मने I-S-S मने ह्रस्व-दीर्घ-दीर्घ। एकर ढ़ाँचा देखू------- I-S-S + I-S-S + I-S-S + I-S-S + I-S-S I-S-S + I-S-S + I-S-S + I-S-S + I-S-S (एहिठाम हम खाली चारि-चारि ध्वनिके उदाहरण देलहुँ अछि, मुदा शाइर एकसँ लए कए कतेको बेर ( बेसीसँ बेसी सोलह बेर ) ध्वनिके प्रयोग कए सकैत छथि।) इ भेल बहरे-मुतकारिब| अमित मिश्र द्वारा लिखल बहरे मुतकारिब केर उदाहरण देखू---------- जखन राति आएल कारी पिया यौ अहाँ मोन पड़लौ जखन होइ घर मोर खाली पिया यौ अहाँ मोन पड़लौ अहाँ दूर बैसल सताबैत छी साँझ-भोरे सदिखने सनेसोँ जँ आएल देरी पिया यौ अहाँ मोन पड़लौ बरसलै प्रथम बूँद वर्षा मिलन यादि आबै तखन यौ विरह केर तानल दुनाली पिया यौ अहाँ मोन पड़लौँ पिया जी जखन बहल पवना मधुर गीत गाबैत कोयल जखन काँट मे फसल साड़ी पिया यौ अहाँ मोन पड़लौँ जँ देखब कतौ छिपकली डर सँ बोली फुटै नै हमर यौ जँ धड़कै हमर सून छाती पिया यौ अहाँ मोन पड़लौँ कने आबि नेहक जड़ल भाग फेरो सँ चमका दिऔ यौ अमित आश देखैत रानी पिया यौ अहाँ मोन पड़लौ बहरे -मुतकारिब {ह्रस्व-दीर्ध-दीर्ध 6बेर सब पाँतिमे } बहरे मुतकारिब बहुत लोकप्रिय आ संगीतमय बहर छै। आदि शंकराचार्य आ गोस्वामी तुलसी दास सेहो ऐ बहरक प्रयोग केने छथि। पहिने आदि शंकराचार्यक ई निर्वाण षट्कम देखू----------- मनो बुद्ध्यहंकारचित्तानि नाहम् न च श्रोत्र जिह्वे न च घ्राण नेत्रे न च व्योम भूमिर् न तेजॊ न वायु: चिदानन्द रूप: शिवोऽहम् शिवॊऽहम् न च प्राण संज्ञो न वै पञ्चवायु: न वा सप्तधातुर् न वा पञ्चकोश: न वाक्पाणिपादौ न चोपस्थपायू चिदानन्द रूप: शिवोऽहम् शिवॊऽहम् न मे द्वेष रागौ न मे लोभ मोहौ मदो नैव मे नैव मात्सर्य भाव: न धर्मो न चार्थो न कामो ना मोक्ष: चिदानन्द रूप: शिवोऽहम् शिवॊऽहम् न पुण्यं न पापं न सौख्यं न दु:खम् न मन्त्रो न तीर्थं न वेदा: न यज्ञा: अहं भोजनं नैव भोज्यं न भोक्ता चिदानन्द रूप: शिवोऽहम् शिवॊऽहम् न मृत्युर् न शंका न मे जातिभेद: पिता नैव मे नैव माता न जन्म न बन्धुर् न मित्रं गुरुर्नैव शिष्य: चिदानन्द रूप: शिवोऽहम् शिवॊऽहम् अहं निर्विकल्पॊ निराकार रूपॊ विभुत्वाच्च सर्वत्र सर्वेन्द्रियाणाम् न चासंगतं नैव मुक्तिर् न मेय: चिदानन्द रूप: शिवोऽहम् शिवॊऽहम् आब देखू तुलसी दास जी द्वारा लिखल ई स्त्रोत------------- नमामी शमीशान निर्वाण रूपं विभू व्यापकम् ब्रम्ह वेदः स्वरूपं पहिल पाँतिकेँ मात्रा क्रम अछि---- ह्रस्व-दीर्घ-दीर्घ-ह्रस्व-दीर्घ-दीर्घ-ह्रस्व-दीर्घ-दीर्घ-ह्रस्व-दीर्घ-दीर्घदोसरो पाँतिकेँ मात्रा क्रम अछि-----ह्रस्व-दीर्घ-दीर्घ-ह्रस्व-दीर्घ-दीर्घ-ह्रस्व-दीर्घ-दीर्घ-ह्रस्व-दीर्घ-दीर्घ नोट--- दोसर पाँतिमे ब्रम्हकेँ गेबा कालमे बर् = दीर्घकएल जाइत छै। ङ) बहरे-मुतदारिक--------एकर मूल ध्वनि अछि "फाइलुन" मने S-I-S मने दीर्घ-ह्रस्व-दीर्घ अछि। एकर ढ़ाँचा एना अछि------ S-I-S + S-I-S + S-I-S + S-I-S S-I-S + S-I-S + S-I-S + S-I-S (एहिठाम हम खाली चारि-चारि ध्वनिके उदाहरण देलहुँ अछि, मुदा शाइर एकसँ लए कए कतेको बेर ( बेसीसँ बेसी सोलह बेर ) ध्वनिके प्रयोग कए सकैत छथि)| इ भेल बहरे-मुतदारिक। अमित मिश्र द्वारा लिखल बहरे मुतदारिक केर उदाहरण देखू कुकुर उनटल पड़ल लार पर बंदरो बैसलै चार पर मूस दौगै गहुँम भरल घर कोइली तन दै तार पर नादि पर गाय दै दूध छै नजर देने श्रवन ढार पर स्वागत लेल बौआ कए फूल मुस्कै गुथल हार पर भोर भेलै उठल राजा यौ अमित बौआ चढ़ल कार पर दीर्घ- हर्स्व -दीर्घ 3 बेर च) बहरे-रजज------ एकर मूल ध्वनि "मुस्तफइलुन" छैक। मने S-S-I-S मने दीर्घ-दीर्घ-ह्रस्व-दीर्घ। एकर ढ़ाँचा एना हेतैक------ S-S-I-S + S-S-I-S + S-S-I-S + S-S-I-S S-S-I-S + S-S-I-S + S-S-I-S + S-S-I-S (एहिठाम हम खाली चारि-चारि ध्वनिके उदाहरण देलहुँ अछि, मुदा शाइर एकसँ लए कए कतेको बेर ( बेसीसँ बेसी सोलह बेर ) ध्वनिके प्रयोग कए सकैत छथि।) इ भेल बहरे-रजज |अमित मिश्र द्वारा लिखल बहरे रजज केर उदाहरण देखू---------- बाल गजल कारी महिस के दूध उज्जर छै कते भरि मोन पारी पीबि दुब्बर छै कते रसगर जिलेबी गरम नरमे नरम छै लड्डू बनल बेसनक बज्जर छै कते छै पात हरियर फूल शोभित गाछ छै जामुन लिची आमक इ मज्जर छै कते दू एक दू आ चारि दूनी आठ छै अस्सी कते नै जानि सत्तर छै कते भालू बला देखाब' सबके नाँच हौ झट आगि छड़पै दौड़ चक्कर छै कते मुस्तफइलुन 2212 तीन बेर बहरे रजज छ) बहरे-वाफिर------------ एकर मूल ध्वनि "मुफाइलतुन" छैक मने I-S-I-I-S मने ह्रस्व-दीर्घ-ह्रस्व-ह्रस्व-दीर्घ। एकर ढ़ाँचा देखू------ I-S-I-I-S + I-S-I-I-S + I-S-I-I-S + I-S-I-I-S I-S-I-I-S + I-S-I-I-S + I-S-I-I-S + I-S-I-I-S (एहिठाम हम खाली चारि-चारि ध्वनिके उदाहरण देलहुँ अछि, मुदा शाइर एकसँ लए कए कतेको बेर ( बेसीसँ बेसी सोलह बेर ) ध्वनिके प्रयोग कए सकैत छथि। इ भेल बहरे-वाफिर | अमित मिश्र द्वारा लिखल बहरे वाफिर केर उदाहरण देखू---------- खतम सब काज भेल हमर स्वतंत्र मिजाज भेल हमर कतौ जिनगी छलै धधकै खुशी पर राज भेल हमर पुरान जँ गाछ , मज्जर नव अपन त' अवाज भेल हमर सरस पल भेल बड दिनपर सदेह इलाज भेल हमर सदिखन गजल लिखैत रहब अमित नव साज भेल हमर बहरे-वाफिर मुफाइलतुन U-I-U-U-I 2 बेर सब पाँतिमे 2) अर्धसमान बहर-------- एहि खंडमे कुल 56 बहर अछि मुदा मात्र 7 टा प्रचलित अछि। एकरा हम अर्धसमान बहर एहि द्वारे कहैत छिऐक जे एहिमे हरेक पाँतिमे कमसँ-कम अनिवार्य रुपसँ दूटा ध्वनिके समान रुपमे प्रयोग करए पड़ैत छैक। आब शाइर एहि दूनू ध्वनिके एक पाँतिमे जाए बेर ( बेसीसँ बेसी सोलह बेर ) प्रयोग कए सकथि ओ हुनका ऊपर छन्हि। आ एहि खंडक सभ बहर लेल एहने सन बूझू।। एकर विवरण निच्चा देल जा रहल अछि। 1) फऊलुन + फाइलुन ( एकर उल्टा रूप सेहो छै.....) फाइलुन + फऊलुन 2) फऊलुन + फाइलातुन ( एकर उल्टा रूप सेहो छै.....) फाइलातुन + फऊलुन आ निच्चाक सभ बाँचल 26 टा बहरक लेल एनाहिते नियम छै। आ ऐ तरहें ऐ खंडमे कुल 56 टा बहर भेल। 3) फऊलुन + मफाईलुन 4) फऊलुन + मुस्तफइलुन 5) फऊलुन + मुफाइलतुन 6) फऊलुन + मुतफाइलुन 7) फऊलुन + मफऊलातु 8) फाइलुन + फाइलातुन 9) फाइलुन + मफाईलुन 10) फाइलुन+ मुस्तफइलुन 11) फाइलुन + मुफाइलतुन 12) फाइलुन + मुतफाइलुन 13) फाइलुन + मफऊलातु 14)फाइलातुन + मफाईलुन 15) फाइलातुन + मुस्तफइलुन 16) फाइलातुन + मुफाइलतुन 17) फाइलातुन + मुतफाइलुन 18) फाइलातुन + मफऊलातु 19) मफाईलुन + मुस्तफइलुन 20) मफाईलुन + मुफाइलतुन 21) मफाईलुन + मुतफाइलुन 22) मफाईलुन + मफऊलातु 23) मुस्तफइलुन + मुफाइलुन 24) मुस्तफइलुन + मुतफाइलुन 25) मुस्तफइलुन + मफऊलातु 26) मुफाइलतुन + मुतफाइलुन 27) मुफाइलतुन + मफऊलातु 28) मुतफाइलुन + मफऊलातु आब अहाँ सभ जरूर कहब जे जखन मात्र साते टा बहर प्रचलित छै तखन एतेक देबाक कोन काज। मुदा बेसी प्रचलित नै हेबाक मतलब ई नै छै जे ई गलत छै। वस्तुतः बहरक प्रयोग अभ्यास पर निर्भर छै आ हरेक शाइर अपना हिसाबसँ बहरक चुनाब करैत छथि। भए सकैए जे जाहि बहरकेँ अरबी जीह पर कठिनाह लागल हो से मैथिलीमे सहज लागए तँए ई सभ देल गेल अछि। तँ देखी ई सात टा बहु-प्रचलित बहर आ ओकर नामकेँ। क) बहरे-तवील--------- एकर मूल ध्वनि छैक " फऊलुन-मफाईलुन"। एकर ढ़ाँचा देखू------- I-S-S + I-S-S-S I-S-S + I-S-S-S I-S-S + I-S-S-S + I-S-S + I-S-S-S I-S-S + I-S-S-S + I-S-S + I-S-S-S I-S-S + I-S-S-S + I-S-S + I-S-S-S + I-S-S + I-S-S-S I-S-S + I-S-S-S + I-S-S + I-S-S-S + I-S-S + I-S-S-S........................... एहि बहर आ एहि खंडक बाँकी अन्य छहो बहरक लेल एकटा आर बात मोन राखू जे ध्वनि जाहि क्रममे देल गेल अछि ताही क्रममे रहबाक चाही। जेना की बहरे-तवीलमे अहाँ देखलहुँ जे एकर ध्वनि एना छैक " फऊलुन-मफाईलुन" मुदा जँ अहाँ एकरा " मफाईलुन- फऊलुन" बला क्रममे रखबै तँ इ बहरे-तवील नहि हएत। अमित मिश्र जीक लिखल बहरे तवील देखल जाए------------ पुन: जोडि लेबै नेहकेँ डोर राजा जी कनेको बहै नै जानकेँ नोर राजा जी कने आउ राजा जानि नै की भ' जेतै यौ कनेको नचाबू प्रेमकेँ मोर राजा जी किए सुन्न भेलौं आइ बेमौत मारै छी कने आइ मस्तीमे करू शोर राजा जी जमाना मिलेतै नै सुनू बैलगा देतै अनाड़ी बुझै छै प्रेम छै चोर राजा जी चटा देब संगे प्यार के चाशनी हमरा अमीतो बुझू भेलै सराबोर राजा जी हरेक पाँतिमे "फऊलुन-मफाईलुन" अर्थात ( ह्रस्व-दीर्घ-दीर्घ + ह्रस्व-दीर्घ-दीर्घ-दीर्घ सँ बनल बहरे तवील ) ख) बहरे-मदीद-----------एकर मूल ध्वनि अछि "फाइलातुन-फाइलुन"। एकर ढ़ाँचा एना छैक-------- S-I-S-S + S-I-S अमित मिश्र जीक लिखल बहरे मदीद देखल जाए------------ कोन टोना केलकै जोगिया सदिखन करेजा हमर जरिते रहल चोरि केने चैन होशो हमर सदिखन अनेरे उड़िते रहल नै छलै डर एत' मरबाक आ नै मोन मे दर्द अंदेशा छलै देख नवका एत' बहिते हवा से आब नेहक गजल मरिते रहल भागि गेलै कोन नगरक गली मे आइ देखा क' सतरंगी सपन बाट जोहैते भ' जेतै कखन की आँखिमे नोर बड भरिते रहल उजरि गेलै जखन कोनो उपवनक कोनटा परक गाछक फूल यौ तखन सबटा कोयलक मधुर बोली संग दर्दक हवा उड़िते रहल आइ खोजै छी अपन ओहि जादूगर कए फेर खेला खेलबै अमित केने आश नेहक सदिखने भीतरे-भीतर जरिते रहल बहरे मदीद फाइलातुन-फाइलुन ( I-U-I-I+ I-U-I ) 3 बेर ग) बहरे बसीत----- एकर मूल ध्वनि " मुस्तफइलुन-फाइलुन" छैक। एकर ढ़ाँचा एना हएत------------------ S-S-I-S + S-I-S देखू अमित मिश्र द्वारा लिखल ई गजल जे की बहरे बसीतमे अछि----- बेटा अपन मुर्खके सोटासँ हम अकछ छी बाबाक फूटलहबा लोटासँ हम अकछ छी पेट्रोल कखनो त' कखनो गैस सब्जी महग काला बजारी करै कोटासँ हम अकछ छी बेटी कपारपर छै चिन्ता इ सदिखन बनल कनियाक नेहक भरल मोटासँ हम अकछ छी छै आगि धरती बनल नै पानि आकाश मे पीबैत कारी धुआँ मोटासँ हम अकछ छी दै यै भगा काज छोड़ा जीब कोना बचब छै खसल टाकाक लंगोटासँ हम अकछ छी रचना करै छी त' खर्चा होइ यै नै मुदा अतिथी अमित एत' दस गोटासँ हम अकछ छी मुस्तफइलुन-फाइलुन दू बेर बहरे-बसीत घ) बहरे-मुजस्सम वा मुजास----------------------------- एकर मूल ध्वनि " मुस्तफइलुन-फाइलातुन" छैक। एकर ढ़ाँचा एहन छैक--------- S-S-I-S + S-I-S-S अमित मिश्र जीक लिखल बहरे मुजास देखल जाए------------ बसलौँ अहाँ जखन मनमे हमरा चमकि गेल जिनगी अनमोल नेहक उड़ल खुशबूमे गमकि गेल जिनगी माधुर्य माँखैत खुजलै जखने कमल ठोर रानी लवणी सँ छलकैत ताड़ी बूझू छलकि गेल जिनगी गाबी अहाँ गीत मोने मोने जँ तैयौ गजब धुन मुस्की द' देलौँ चहटगर अमृत झमकि गेल जिनगी नीरीह जानबर बनि नैनक मारि खेलौँ सदिखने फूले छलै बाण नैनक तेँए धड़कि गेल जिनगी सगरो अहाँ के लिखल छवि डूबल कलम नेहमे यै गाबै अमित गजल लिखलक देखू दमकि गेल जिनगी बहरे मुजास ङ) बहरे- मुन्सरह----------- एकर मूल ध्वनि "मुस्तफइलुन-मफऊलात"। एकर ढ़ाँचा छैक--------------- S-S-I-S + S-S-S-I अमित मिश्र जीक लिखल बहरे मुन्सरह देखल जाए------------ आखर जखन रूपक लिखल उपमा सजल फूलक लिखल आदर्श छी रूपक बनल काजर नयन कातक लिखल सरगम अहाँक स्वर सजल मुस्की नगर तानक लिखल कहलौँ करेजक सब कहल किछु बात हम राजक लिखल चमकैत नभ मे छी चान तारा गजल हाटक लिखल मुस्तफइलुन-मफऊलातु च) बहरे-मजरिअ-------------- एकर मूल ध्वनि छैक "मफाईलुन-फाइलातुन" एकर ढ़ाँचा एना छैक-------- I-S-S-S+S-I-S-S छ) बहरे-मुक्तजिब------- एकर मूल ध्वनि छैक " मफऊलात-मुस्तफइलुन"। एकर ढ़ाँचा छैक----------- S-S-S-I +S-S-I-S ओम प्रकाश जीक लिखल बहरे मुक्तजिबमे लिखल ई गजल देखल जाए------------------- धारक कात रहितो पियासल रहि गेल जिनगी हमर मोनक बात मोनहि रहल, दुख सहि गेल जिनगी हमर मुस्की हमर घर आस लेने आओत नै आब यौ पूरै छै कहाँ आस सबहक, कहि गेल जिनगी हमर सीखेलक इ दुनिया किला बचबै केर ढंगो मुदा बचबै मे किला अनकरे टा ढहि गेल जिनगी हमर पाथर बाट पर छी पडल, हमरा पूछलक नै कियो कोनो बन्न नाला जकाँ चुप बहि गेल जिनगी हमर जिनगी "ओम" बीतेलकै बीचहि धार औनाइते भेंटल नै कछेरो कतौ, बस दहि गेल जिनगी हमर (बहरे मुक्तजिब) 49टा बाँचल बहरक नाम हमरो एखन धरि नै पता लागल अछि। पता लगिते जरूर कहब। 3) असमान बहर--------- एहि खंडमे कुल 213 गोट बहर अछि मुदा मात्र 13 टा प्रचलित अछि। एकरा हम असमान बहर एहि द्वारे कहैत छिऐक जे एहिमे हरेक पाँतिमे कमसँ-कम अनिवार्य रुपसँ तीनटा ध्वनिके समान रुपमे प्रयोग करए पड़ैत छैक।आब शाइर एहि तीनू ध्वनिके एक पाँतिमे जाए बेर ( बेसीसँ बेसी सोलह बेर ) प्रयोग कए सकथि ओ हुनका ऊपर छन्हि। आ एहि खंडक आर अन्य बहर लेल एहने सन बूझू। एकर विवरण निच्चा देल जा रहल अछि। ऐ असमान बहरक दू भागकेँ हमरा लोकनि देखी। पहिल भाग ओ भेल जाहिमे तीनटा अलग-अलग रुक्नकेँ एक पाँतिमे एक बेरमे प्रयोग कए जाइत छै। आ दोसर भाग ओ भेल जाहिमे दूटा एक समान रुक्न आ एकटा दोसर रुक्न लेल जाइत छै। तँ पहिने देखी ओ बहर जाहिमे तीनटा अलग-अलग रुक्नकेँ एक पाँतिमे एक बेरमे प्रयोग कए जाइत छै। 1) फऊलुन + फाइलुन + फाइलातुन ( एकर दूटा आर रूप हेतै) a) फाइलुन + फाइलातुन+फऊलुन b) फाइलातुन + फऊलुन + फाइलुन एनाहिते निच्चो बला सभक दू-दूटा आर रूप हेतै। कुल मिला ऐ खंडमे 45टा बहर प्राप्त भेल। 2) फऊलुन + मफाईलुन + मुस्तफइलुन 3) फऊलुन + मुफाइलतुन + मुतफाइलुन 4) फाइलुन + फाइलातुन + मफाईलुन 5) फाइलुन + मुस्तफइलुन + मुफाइलतुन 6) फाइलुन + मुतफाइलुन + मफऊलातु 7) फाइलातुन + मफाईलुन + मुस्तफइलुन 8) फाइलातुन + मुफाइलतुन + मुतफाइलुन 9) मफाईलुन + मुस्तफइलुन + मुफाइलतुन 10) मफाईलुन + मुतफाइलुन + मफऊलातु 11) मुस्तफइलुन + मुफाइलतुन + मुतफाइलुन 12) मुफाइलतुन + मुतफाइलुन + मफऊलातु 13) मफऊलातु + मुतफाइलुन + मुफाइलतुन 14) मफऊलातु + मुस्तफइलुन + मफाईलुन 15) मफऊलातु + फाइलातुन + फाइलुन आब आबी दोसर भागमे जाहिमे दूटा एक समान रुक्न आ एकटा दोसर रुक्न लेल जाइत छै........... हरेक पाँतिमे फाइलातुन केर दू बेर प्रयोग आ मफाईलुन केर एक बेर प्रयोग ( एकर तीन रूप हेतै ) फाइलातुन+ फाइलातुन+ मफाईलुन ( मने-----दीर्घ-ह्रस्व-दीर्घ-दीर्घ+ दीर्घ-ह्रस्व-दीर्घ-दीर्घ+ह्रस्व-दीर्घ-दीर्घ- दीर्घ) मफाईलुन+फाइलातुन+ फाइलातुन फाइलातुन+मफाईलुन+फाइलातुन आ) हरेक पाँतिमे मफाईलुन केर दू बेर प्रयोग आ फाइलातुन केर एक बेर प्रयोग ( एकरो तीन रूप हेतै ) मफाईलुन+ मफाईलुन+फाइलातुन फाइलातुन+मफाईलुन+ मफाईलुन मफाईलुन+फाइलातुन+मफाईलुन इ) हरेक पाँतिमे फाइलातुन केर दू बेर प्रयोग आ मुस्तफइलुन केर एक बेर प्रयोग ( एकरो तीन रूप हेतै) फाइलातुन+ फाइलातुन+ मुस्तफइलुन मुस्तफइलुन+फाइलातुन+ फाइलातुन फाइलातुन+ मुस्तफइलुन+फाइलातुन ई) हरेक पाँतिमे मुस्तफइलुन केर दू बेर प्रयोग आ फाइलातुन केर एक बेर प्रयोग (एकरो तीन रूप हेतै) मुस्तफइलुन +मुस्तफइलुन + फाइलातुन फाइलातुन+मुस्तफइलुन +मुस्तफइलुन मुस्तफइलुन +फाइलातुन+मुस्तफइलुन उ) हरेक पाँतिमे फाइलातुन केर दू बेर प्रयोग आ मुफाइलतुन केर एक बेर प्रयोग (एकरो तीन रूप हेतै) फाइलातुन +फाइलातुन + मुफाइलतुन मुफाइलतुन+फाइलातुन +फाइलातुन फाइलातुन +मुफाइलतुन+ फाइलातुन ऊ) हरेक पाँतिमे मुफाइलतुन केर दू बेर प्रयोग आ फाइलातुन केर एक बेर प्रयोग (एकरो तीन रूप हेतै) मुफाइलतुन+ मुफाइलतुन+फाइलातुन फाइलातुन +मुफाइलतुन+ मुफाइलतुन मुफाइलतुन+ फाइलातुन+मुफाइलतुन ए) हरेक पाँतिमे फाइलातुन केर दू बेर प्रयोग आ मुतफाइलुन केर एक बेर प्रयोग (एकरो तीन रूप हेतै) फाइलातुन+ फाइलातुन+मुतफाइलुन मुतफाइलुन +फाइलातुन+ फाइलातुन फाइलातुन+ मुतफाइलुन+फाइलातुन ऐ) हरेक पाँतिमे मुतफाइलुन केर दू बेर प्रयोग आ फाइलातुन केर एक बेर प्रयोग (एकरो तीन रूप हेतै) मुतफाइलुन +मुतफाइलुन + फाइलातुन फाइलातुन+मुतफाइलुन +मुतफाइलुन मुतफाइलुन +फाइलातुन+मुतफाइलुन ओ) हरेक पाँतिमे फाइलातुन केर दू बेर प्रयोग आ मफऊलात केर एक बेर प्रयोग (एकरो तीन रूप हेतै) फाइलातुन+ फाइलातुन+मफऊलात मफऊलात +फाइलातुन+ फाइलातुन फाइलातुन+ मफऊलात +फाइलातुन औ) हरेक पाँतिमे मफऊलात केर दू बेर प्रयोग आ फाइलातुन केर एक बेर प्रयोग (एकरो तीन रूप हेतै) मफऊलात +मफऊलात + फाइलातुन फाइलातुन+मफऊलात +मफऊलात मफऊलात +फाइलातुन+मफऊलात अं) हरेक पाँतिमे मफाईलुन केर दू बेर प्रयोग आ मुस्तफइलुन केर एक बेर प्रयोग ( एकरो तीन रूप हेतै) मफाईलुन +मफाईलुन + मुस्तफइलुन मुस्तफइलुन+मफाईलुन +मफाईलुन मफाईलुन +मफाईलुन+मफाईलुन अः) हरेक पाँतिमे मुस्तफइलुन केर दू बेर प्रयोग आ मुफाईलुन केर एक बेर प्रयोग (एकरो तीन रूप हेतै) मुस्तफइलुन+ मुस्तफइलुन+ मुफाईलुन मुफाईलुन+मुस्तफइलुन+ मुस्तफइलुन मुस्तफइलुन+मुफाईलुन+ मुस्तफइलुन क) हरेक पाँतिमे मफाईलुन केर दू बेर प्रयोग आ मुफाइलतुन केर एक बेर प्रयोग ( एकरो तीन रूप हेतै) मफाईलुन+ मफाईलुन+ मुफाइलतुन मुफाइलतुन+मफाईलुन+ मफाईलुन मफाईलुन+ मुफाइलतुन + मफाईलुन ख) हरेक पाँतिमे मुफाइलतुन केर दू बेर प्रयोग आ मफाईलुन केर एक बेर प्रयोग (एकरो तीन रूप हेतै) मुफाइलतुन +मुफाइलतुन +मफाईलुन मफाईलुन +मुफाइलतुन +मुफाइलतुन मुफाइलतुन +मफाईलुन+मुफाइलतुन आब आगूक हरेक वर्ग लेल एनाहिते तीन-तीनटा बहर बनैत रहत। हम समयक अबाभकेँ कारणै नै दए रहल छी। अहाँ सभ समय-समय पर एकरा बनबैत रहब। आब ऐठाम देखू जे कुल मिला कए ऐ विवरणमे 56टा वर्ग अछि आ हरेक वर्गमे तीन-तीन टा बहर अछि मने ऐ खंडमे कुल 168टा बहर भेल। ग) हरेक पाँतिमे मफाईलुन केर दू बेर प्रयोग आ मुतफाइलुन केर एक बेर प्रयोग( एकरो तीन रूप हेतै) घ) हरेक पाँतिमे मुतफाइलुन केर दू बेर प्रयोग आ मफाईलुन केर एक बेर प्रयोग ( एकरो तीन रूप हेतै) ङ) हरेक पाँतिमे मफाईलुन केर दू बेर प्रयोग आ मफऊलात केर एक बेर प्रयोग ( एकरो तीन रूप हेतै) च) हरेक पाँतिमे मफऊलात केर दू बेर प्रयोग आ मफाईलुन केर एक बेर प्रयोग ( एकरो तीन रूप हेतै) छ) हरेक पाँतिमे मुस्तफइलुन केर दू बेर प्रयोग आ मुफाइलतुन केर एक बेर प्रयोग(एकरो तीन रूप हेतै) ज) हरेक पाँतिमे मुफाइलतुन केर दू बेर प्रयोग आ मुस्तफइलुन केर एक बेर प्रयोग(एकरो तीन रूप हेतै) झ) हरेक पाँतिमे मुस्तफइलुन केर दू बेर प्रयोग आ मुफाइलतुन केर एक बेर प्रयोग(एकरो तीन रूप हेतै) ञ) हरेक पाँतिमे मुफाइलतुन केर दू बेर प्रयोग आ मुस्तफइलुन केर एक बेर प्रयोग(एकरो तीन रूप हेतै) ट) हरेक पाँतिमे मुस्तफइलुन केर दू बेर प्रयोग आ मफऊलात केर एक बेर प्रयोग(एकरो तीन रूप हेतै) ठ) हरेक पाँतिमे मफऊलात केर दू बेर प्रयोग आ मुस्तफइलुन केर एक बेर प्रयोग(एकरो तीन रूप हेतै) ड) हरेक पाँतिमे मुफाइलतुन केर दू बेर प्रयोग आ मुतफाइलुन केर एक बेर प्रयोग(एकरो तीन रूप हेतै) ढ़) हरेक पाँतिमे मुतफाइलुन केर दू बेर प्रयोग आ मुफाइलतुन केर एक बेर प्रयोग(एकरो तीन रूप हेतै) ण) हरेक पाँतिमे मुफाइलतुन केर दू बेर प्रयोग आ मफऊलात केर एक बेर प्रयोग(एकरो तीन रूप हेतै) त) हरेक पाँतिमे मफऊलात केर एक बेर प्रयोग आ मुफाइलतुन केर एक बेर प्रयोग(एकरो तीन रूप हेतै) थ) हरेक पाँतिमे मुतफाइलुन केर एक बेर प्रयोग आ मफऊलात केर एक बेर प्रयोग(एकरो तीन रूप हेतै) द) हरेक पाँतिमे मफऊलात केर दू बेर प्रयोग आ मफऊलात केर एक बेर प्रयोग(एकरो तीन रूप हेतै) ध) हरेक पाँतिमे फऊलुन केर दू बेर प्रयोग आ फाइलुन केर एक बेर प्रयोग(एकरो तीन रूप हेतै) न) हरेक पाँतिमे फाइलुन केर दू बेर प्रयोग आ फऊलुन केर एक बेर प्रयोग(एकरो तीन रूप हेतै) प) हरेक पाँतिमे फऊलुन केर एक बेर प्रयोग आ फाइलातुन केर एक बेर प्रयोग(एकरो तीन रूप हेतै) फ) हरेक पाँतिमे फाइलातुन केर दू बेर प्रयोग आ फऊलुन केर एक बेर प्रयोग(एकरो तीन रूप हेतै) ब) हरेक पाँतिमे फऊलुन केर दू बेर प्रयोग आ मफाईलुन केर एक बेर प्रयोग(एकरो तीन रूप हेतै) भ) हरेक पाँतिमे मफाईलुन केर दू बेर प्रयोग आ फऊलुन केर एक बेर प्रयोग(एकरो तीन रूप हेतै) म) हरेक पाँतिमे फऊलुन केर दू बेर प्रयोग आ मुस्तफइलुन केर एक बेर प्रयोग(एकरो तीन रूप हेतै) य) हरेक पाँतिमे मुस्तफइलुन केर दू बेर प्रयोग आ फऊलुन केर एक बेर प्रयोग(एकरो तीन रूप हेतै) र) हरेक पाँतिमे फऊलुन केर दू बेर प्रयोग आ मुफाइलतुन केर एक बेर प्रयोग(एकरो तीन रूप हेतै) ल) हरेक पाँतिमे मुफाइलतुन केर दू बेर प्रयोग आ फऊलुन केर एक बेर प्रयोग(एकरो तीन रूप हेतै) व) हरेक पाँतिमे फऊलुन केर दू बेर प्रयोग आ मुतफाइलुन केर एक बेर प्रयोग(एकरो तीन रूप हेतै) श) हरेक पाँतिमे मुतफाइलुन केर दू बेर प्रयोग आ फऊलुन केर एक बेर प्रयोग(एकरो तीन रूप हेतै) ष) हरेक पाँतिमे फऊलुन केर दू बेर प्रयोग आ मफऊलात केर एक बेर प्रयोग(एकरो तीन रूप हेतै) स) हरेक पाँतिमे मफऊलात केर दू बेर प्रयोग आ फऊलुन केर एक बेर प्रयोग(एकरो तीन रूप हेतै) ह) हरेक पाँतिमे फाइलुन केर दू बेर प्रयोग आ फाइलातुन केर एक बेर प्रयोग(एकरो तीन रूप हेतै) क्ष) हरेक पाँतिमे फाइलातुन केर दू बेर प्रयोग आ फाइलुन केर एक बेर प्रयोग(एकरो तीन रूप हेतै) त्र) हरेक पाँतिमे फाइलुन केर दू बेर प्रयोग आ मफाईलुन केर एक बेर प्रयोग(एकरो तीन रूप हेतै) ज्ञ) हरेक पाँतिमे मफाईलुन केर दू बेर प्रयोग आ फाइलुन केर एक बेर प्रयोग(एकरो तीन रूप हेतै) ऋ) हरेक पाँतिमे फाइलुन केर दू बेर प्रयोग आ मुस्तफइलुन केर एक बेर प्रयोग(एकरो तीन रूप हेतै) लृ) हरेक पाँतिमे मुस्तफइलुन केर दू बेर प्रयोग आ फाइलुन केर एक बेर प्रयोग(एकरो तीन रूप हेतै) कृ) हरेक पाँतिमे फाइलुन केर दू बेर आ मुफाइलतुन केर एक बेर प्रयोग(एकरो तीन रूप हेतै) खृ) हरेक पाँतिमे मुफाइलतुन केर दू बेर प्रयोग आ फाइलुन केर एक बेर प्रयोग(एकरो तीन रूप हेतै) गृ) हरेक पाँतिमे फाइलुन केर दू बेर प्रयोग आ मुतफाइलुन केर एक बेर प्रयोग(एकरो तीन रूप हेतै) घृ) हरेक पाँतिमे मुतफाइलुन केर दू बेर प्रयोग आ फाइलुन केर एक बेर प्रयोग(एकरो तीन रूप हेतै) चृ) हरेक पाँतिमे फाइलुन केर दू बेर प्रयोग आ मफऊलात केर एक बेर प्रयोग(एकरो तीन रूप हेतै) छृ) हरेक पाँतिमे मफऊलात केर दू बेर प्रयोग आ फाइलुन केर एक बेर प्रयोग(एकरो तीन रूप हेतै) मुदा ऐ 213 बहरमेसँ मात्र तेरहे टा बहुप्रचलित छै। आ बाद बाँकी केर उपयोग मुजाइफ रूपमे होइत छै। आब अहाँ सभ जरूर कहब जे जखन मात्र तेरहे टा बहर प्रचलित छै तखन एतेक देबाक कोन काज। मुदा बेसी प्रचलित नै हेबाक मतलब ई नै छै जे ई गलत छै। वस्तुतः बहरक प्रयोग अभ्यास पर निर्भर छै आ हरेक शाइर अपना हिसाबसँ बहरक चुनाब करैत छथि। भए सकैए जे जाहि बहरकेँ अरबी जीह पर कठिनाह लागल हो से मैथिलीमे सहज लागए तँए ई सभ देल गेल अछि। तँ देखी ई तेरह टा बहु-प्रचलित बहर आ ओकर नामकेँ। ई तेरहटा बहर एना अछि-------- क) बहरे-खफीफ------एकर मूल ध्वनि छैक "फाइलातुन-मुस्तफइलुन-फाइलातुन"| एकर ढ़ाँचा छैक------ S-I-S-S + S-S-I-S + S-I-S-S ख) बहरे-जदीद----- एकर मूल ध्वनि छैक "फाइलातुन- फाइलातुन-मुस्तफइलुन"| एकर ढ़ाँचा छैक---------- S-I-S-S + S-I-S-S + S-S-I-S देखू अमित मिश्र द्वारा लिखल ई गजल जे की बहरे जदीदमे अछि- चादरो फाटल सड़ल बड उठबै कखन बाढ़ि एलै भासलै घर बनतै कखन कोन कोना नाह भेटत मजधार मे राति दिनकर दिन क' चन्ना बूझै कखन चोरि भेलै चैन आ चाहो के अमल देह टूटै दोष अनका देबै कखन डाँग लागै दैब के अधगेरे जखन पानि मानव एक बूँदो माँगै कखन बेचबै बेटा जँ जिनगी बचतै तखन अमित कह ने पानि सगरो घटतै कखन फाइलातुन-फाइलातुन-मुस्तफइलुन { I-U-I-I-I-U-I-I-I-I-U-I} एक बेर सब पाँति मे बहरे-जदीद ग) बहरे-सरीअ----- एकर मूल ध्वनि छैक " मुस्तफइलुन- मुस्तफइलुन-मफऊलात" | एकर ढ़ाँचा छैक------- S-S-I-S + S-S-I-S + SSSI देखू अमित मिश्र द्वारा लिखल ई गजल जे की बहरे सरीअमे अछि----- भेटल अहाँके संग हमरा जहियेसँ जिनगी हमर लेलक करोटो तहियेसँ हम एकरा की कहब छल एहन भाग बैसल छलौँ हम बाटमे दुपहरियेसँ गेलौँ शिखरपर भेल जे एगो स्पर्श जुड़ि गेल श्वास प्राण संगे तहियेसँ छी ग्यानके पेटी अहाँ जादू गजल शाइरक कोनो कलम लागै हँसियेसँ हम भेल नतमस्तक लिखब कोना शब्द शाइर अमित छी संग हमरा जहियेसँ मुस्तफइलुन-मुस्फइलुन-मफऊलात ( I-I-U-I +I-I-U-I + I-I-I-U ) बहरे-सरीअ घ) बहरे-करीब------ एकर मूल ध्वनि छैक " मफाईलुन- मफाईलुन- फाइलातुन"| एकर ढ़ाँचा छैक---- I-S-S-S + ISSS + S-I-S-S देखू अमित मिश्र द्वारा लिखल ई गजल जे की बहरे करीबमे अछि---- बिसरलौँ जग पिबै छी बोतल शराबक मनक मारल चुमै छी बोतल शराबक हमर छै जीत तड़िखानामे पियाबू अपन नामे लिखै छी बोतल शराबक हमर छै जान ई अंगुरक पानि नै छै बनै शोणित किनै छी बोतल शराबक शहर के कोन मैखान जत' पिलौँ नै जहर दर्दक कहै छी बोतल शराबक गिलाससँ आब पल भरि दोस्ती क' देखू घर स्वर्गक रहै छी बोतल शराबक जनम भेलै इयादक तहियेसँ झूमैँ अमित संगे रखै छी बोतल शराबक मफाईलुन-मफाईलुन-फाइलातुन बहरे-करीब ङ) बहरे-मुशाकिल------- एकर मूल ध्वनि छैक " फाइलातुन- मफाईलुन- मफाईलुन | एकर ढ़ाँचा छैक---- S-I-S-S + I-S-S-S + I-S-S-S देखू अमित मिश्र द्वारा लिखल ई गजल जे की बहरे मुशाकिलमे अछि— हमर नेहक सजा जिनगी जड़ा देलक गीत दर्दक बना जिनगी कना देलक छै अनचिन्हार अपने नाम एखन यौ खेल झूठक जमा जिनगी हरा देलक नोर बहतै त' हमरे पर हँसत दुनियाँ कसम झूठे गना जिनगी लिखा देलक जहर के प्रेम मे खूनो जहर भेलै दाँत विरहक गड़ा जिनगी विषा देलक गाम उजड़ल शहर कानल हँसल जत' ओ भवर एहन फँसा जिनगी बझा देलक नै मवाली अहाँ हमरा कहू देखिक' नेह पागल बना जिनगी डरा देलक जीब कोना बचल जिनगी कहू एखन अमित मौतसँ सटा जिनगी मुआ देलक फाइलातुन-मफाईलुन-मफाईलुन बहरे-मुशाकिल च) बहरे-कलीब-------- एकर मूल ध्वनि छैक "फाइलातुन—फाइलातुन--- मफाईलुन" | एकर ढ़ाँचा छैक--- SISS--- SISS---- ISSS देखू अमित मिश्र द्वारा लिखल ई गजल जे की बहरे कलीबमे अछि----- युग विज्ञानक शोध एखन क' देखै छी अपन मन परबोध एखन क' देखै छी रहत जगमे अमर मानव मरत दानव नव मशीनक रोध एखन क' देखै छी भाग बनतै मात्र दस खा क' रसगुल्ला शक्ति के हम बोध एखन क' देखै छी सत्त सी ओ टू बनल झूठ आँक्सीजन कार्बनक अबरोध एखन क' देखै छी डाहि हम संस्कार संस्कृति मुस्कै छी मान लेल क्रोध एखन क' देखै छी देश चलबै छी त' सब राज के देखू जोड़ि कर अनुरोध एखन क' देखै छी बहरे-कलीब छ) बहरे असम------- एकर मूल ध्वनि छैक फाइलातुन--- मफाईलुन--- फाइलातुन | एकर ढ़ाँचा छैक---SISS---- ISSS--- SISS देखू अमित मिश्र द्वारा लिखल ई गजल जे की बहरे असममे अछि— आब आगिक पता पुछतै पानि ऐठाँ नै जड़त यौ कतौ घर लिअ जानि ऐठाँ कखन धरि लोक जड़तै चुप जानवर बनि तोड़बै जउर से लेतै ठानि ऐठाँ छै दहेजो त' महगाई कम कहाँ छै ओझरी सोझरेतै लिअ मानि ऐठाँ बदलतै समय सगरो नवका जमाना नै जँ बदलत त' ओ मरतै कानि ऐठाँ जे जनम देलकै हुनका बिसरलै सब माँथ पर जनकके रखतै फानि ऐठाँ भाइ मे उठम-बजड़ा नै आब हेतै आइ त' स्वर्ग के देबै आनि ऐठाँ आगि पर पानि नेहक हँसि ढ़ारि दिअ ने अमित सब के मिला सुख लिअ सानि ऐठाँ फाइलातुन-मफाईलुन-फाइलातुन ( I-U-I-I + U-I-I-I + I-U-I-I ) बहर-असम ज) बहरे कबीर----- एकर मूल ध्वनि छैक मफऊलातु--- मफऊलातु--- मुस्तफइलुन| एकर ढ़ाँचा छैक ---SSSI--- SSSI--- SSIS देखू अमित मिश्र द्वारा लिखल ई गजल जे की बहरे कबीरमे अछि----- असगर जनम लेलहुँ असगरे जी रहल अपने भाग अपनेपर भरोसा बचल मोनक खेतपर बजड़ा अपन खाइ छी गलती अपन तेँए बाट काँटसँ भरल मोजर नै सिनेहक भेल कहियो हमर अपने तोड़ि नाता शहर मे जी रमल दै छी दोष नेताके किए आब यौ अपने भोट दै छी घेँट अपने कटल लोभी छी अधम छी अमित भटकै सगर पक्षक नै अपक्षक मोन अपने बनल मफऊलातु-मफऊलातु-मुस्तफइलुन ( दीर्घ-दीर्घ-दीर्घ-ह्रस्व+ दीर्घ-दीर्घ-दीर्घ-ह्रस्व +दीर्घ-दीर्घ-ह्रस्व-दीर्घ सँ बनल बहरे-कबीर ) झ) बहरे सगीर----- एकर मूल ध्वनि छैक मुस्तफइलुन--- फाइलातुन---- मुस्तफइलुन| एकर ढ़ाँचा छैक --SSIS--- SISS--- SSIS देखू अमित मिश्र द्वारा लिखल ई गजल जे की बहरे सगीरमे अछि----- ञ) बहरे-सरीम----- एकर मूल ध्वनि छैक मफाईलुन--- फाइलातुन--- फाइलातुन | एकर ढ़ाँचा छैक------- ISSS + SISS + SISS देखू अमित मिश्र द्वारा लिखल ई गजल जे की बहरे सरीममे अछि-किए एखन मोन हमर शाइर बनल छै लिखल जेकर नाम ओ एखन कटल छै बनाबी हम रूप जे शब्दक नगरमे नगर ओकर नैनके लागै जहल छै गजल जेहन हम लिखै सबदिन छलौँ से कहाँ हमरा मोनमे ओहन गजल छै दिनक काटै रौद रातिक चान धधकै बहर मारै जान पथ काँटक बनल छै कखन हारब जीवनक अनमोल पारी अमित जा धरि छी करै शेरक कहल छै मफाईलुन-फइलातुन-फइलातुन बहरे -सरीम ट) बहरे सलीम----- एकर मूल ध्वनि छैक --- "मुस्तफइलुन-- मफऊलातु---मफऊलातु"| एकर ढ़ाँचा छैक---- SSIS + SSSI + SSSI देखू अमित मिश्र द्वारा लिखल ई गजल जे की बहरे सलीममे अछि-- खिड़कीसँ सीधे देखै छलौँ हम चान घन तिमिर मोनक छाँटै छलौँ हम चान हेतै अपन फेरो भेँट ओतै जा क' तेँ जागि आशा लगबै छलौँ हम चान दिन भरि समाजक पहरा कतेको नयन छवि संग तोहर भटकै छलौँ हम चान लागै तरेगण लोचन पलक झपकैत बनि मेघ घोघट लागै छलौँ हम चान शुभ राति फेरो भेटब अमिय नेहक ल' सब दिन अमित नव आबै छलौँ हम चान मुस्तफइलुन-मफऊलातु-मफऊलातु {दीर्घ-दीर्घ-ह्रस्व-दीर्घ-दीर्घ-दीर्घ-दीर्घ-ह्रस्व-दीर्घ-दीर्घ-दीर्घ-ह्रस्व} बहरे-सलीम ठ)बहरे हमीद----- एकर मूल ध्वनि छैक--- "मफऊलातु----मुस्तफइलुन----मफऊलातु"| एकर ढ़ाँचा छैक--- SSSI + SSIS + SSSI देखू अमित मिश्र द्वारा लिखल ई गजल जे की बहरे हमीदमे अछि— नै जीयत शराबक नशा लागल लोक कोना हँसत कोनो दुखक खेहारल लोक काठी फेकबै आगि उठतै बोतलसँ नै रहतै जवानी अपन जाड़ल लोक के कानत कतौ आन लेए क'ह एत' नै छै समय ककरो अपन भागल लोक दै छै साँस कखनो अपन धोखा आब एहन नेहमे छै किए पागल लोक जड़तै एक दोसर सँ जिनगी मे जखन कटतै घेँट अपने सबर हारल लोक क्षण भरि के नवल दोस्त नै चाही आब हमरा अमित चाही अपन झाड़ल लोक मफऊलातु-मुस्तफइलुन-मफऊलातु बहरे-हमीद ड) बहरे हमीम--- एकर मूल ध्वनि छैक-- "फाइलातुन--- मुस्तफइलुन--- मुस्तफइलुन" |एकर ढ़ाँचा छैक-- SISS + SSIS + SSIS देखू अमित मिश्र द्वारा लिखल ई गजल जे की बहरे हमीममे अछि- आइ नौला* मे माछ चल मारब कने जाल मच्छरदानी वला फेकब कने बहुत टिकुला छै खसल गाछी भरल छै ओकरो झोरी भरि क' चल आनब कने माछ चटनी खाएब रोटी भात रौ डोलपाती चल संग मे खेलब कने छोट बौआ छी पैघ सन छै सोच रौ आब कखनो संसार नै बाँटब कने एक छी हम सब एक थारी मे रहब अमित नवका मिथिला अपन माँगब कने फाइलातुन-मुस्तफइलुन-मुस्तफइलुन बहरे-हमीम ऐकेँ अतिरिक्त केओ चारि-चारिटा रुक्नक समूह सेहो बना सकैत छथि। मुदा ऐठाम ई मोन राखू जे गजल पूरा-पूरी उच्चारण आ संगीतक नियम पर आधारित छै तँए बड़का-बड़का पाँति गेबामे नै बनतै तँए ई चारि आ ओहिसँ बेसी रुक्न बला गजलक सफलता बहुत कम्म भेटतै। आ जखन देखिए रहल छिऐ जे जखन 213 मे टा मात्र तेरहे टा प्रचलित छै जे की तीन रुक्नक समूह थिक। तखन चारि आ ओहिसँ बेसी बलाक सफलता कतेक हेतै से अंदाजा लगा सकैत छी अहाँ। आब हमरा लोकनि इ जानी जे अरबीक एहि आठो रुक्नकेँ मैथिलीमे केना बदलि सकैत छी। मैथिलीमे दू प्रकारक छंद पद्धति अछि-----मात्रिक आ वार्णिक | A) मात्रिक------ एहिमे दू, तीन, चारि, पाँच आ छह मात्रा खंडके जोड़ि कए अक्षर विन्यास कएल जाइत छैक। आ एहि अक्षर विन्यासकेँ गण कहल जाइत छैक। मात्रिक छंदमे पाँच टा गण होइत अछि----- क) ण (णगण) = द्विकल मने दू मात्राक खंड ख) ढ ( ढगण) = त्रिकल मने तीन मात्राक खंड ग) ड ( डगण) = चतुष्कल मने चारि मात्राक खंड घ) ठ ( ठगण) = पंचकल मने पाँच मात्राक खंड ङ) ट ( टगण) = षटकल मने छह मात्राक खंड एहि गणकेँ अतिरिक्त मैथिलीमे एक मात्रा, सात मात्रा आ आठ मात्राक वर्ण विन्यास सेहो होइत छैक। मुदा ओकरा गण नहि मानल जाइत छैक। कारण एक मात्रा अपूर्ण भेल। तेनाहिते सात वा आठ मात्रा बला विन्यास कोनो ने कोनो रुपेँ उपरक पाँचो गणसँ मिलैत अछि। उदाहरण लेल सात मात्राक वर्ण विन्यास देखू---" पहिराओल" = IISSI । आब एहिमे देखू पहिल तीन मात्रा मने ( IIS) चतुष्कलक रुप थिक आ अंतिम दूनू मात्रा मने ( SI ) त्रिकलक रुप थिक। आठ मात्राक लेल एहने सन गप्प। उपरक पाँचो मात्रा विन्यासकेँ अलग-अलग रुपेँ लिखल जा सकैए आ एहि हिसाबें ------ द्विकल- दू रूप मे लिखल जाइत अछि----- 1) घर = II 2) ओ = S त्रिकल- तीन रूप मे लिखल जाइत अछि----- 1) भिजा = IS 2) अपन = III 3) आब = SI चतुष्कल- पाँच रूप मे लिखल जाइत अछि----- 1) छौंड़ी = SS 2) तकरा = IIS 3) चुमान = ISI 4) फेकल = SII 5) सदिखन = IIII पंचकल- आठ रूप मे लिखल जाइत अछि----- 1) लड़ाकू = ISS 2) तिलकोर = IISI 3) हौहत्ती = SIS 4) तरेगन = ISII 5) सरधुआ = IIIS 6) जागरण = SIII 7) अंगूर = SSI 8) चहटगरि = IIIII षटकल - तेरह रूप मे लिखल जाइत अछि-- 1) सोहारी = SSS 2) बपखौकी = IISS 3) सुधामयी = ISIS 4) मादकता = SIIS 5) असगरुआ = IIIIS 6) सिताएल = ISSI 7) लालटेन = SISI 8) खटखटाह = IIISI 9) मोताबिक = SSII 10) अधमौगति = IISII 11) सुरेबगर = ISIII 12) राजभवन = SIIII 13) चपलचरण = IIIIII तँ चलू आब एहि पाँचो गणसँ अरबी रुक्न बनाबी। इ अरबी रुक्न आठ अछि । तँ देखू एकर नियम----- 1) जँ द्विकलक (णगनक) एहन रूप जाहिमे एकसरें दीर्घ मने--SS (जेना-जे, गे, खो, जो आदि) रहए आ तकरा बाद पंचकल (ठगण)क ओ रूप रहए जाहिमे पहिल वर्ण लघु आ तकरा बाद दूनू दीर्घ (ISS) हो तँ जे रूप बनत से उर्दू मे "फाइलातुन" कहबैत छैक। एकटा उदारहरण लिअ " गे सुशीला" एकर मात्रा क्रम अछि (SISS) ---- आब एकरा "फाइलातुन" (SISS) सँ मिलाउ| एकरा एना देखू------ S + ISS = SISS 2) जँ पंचकल (ठगण)क ओ रूप जाहिमे पहिने दूटा दीर्घ आ तकरा बाद एकटा लघु हो (SSI) तकरा द्विकल (णगन)क ओहन रूपसँ जोड़ू जाहिमे एकसरें दीर्घ (S) हो। तँ ओ "मुस्तफइलुन" ( SSIS) बनत। एकरा एना देखू---------SSI + S = SSIS 3) जँ त्रिकल (ढगण)क ओहन रूप जाहिमे पहिल लघु आ दोसर दीर्घ (IS) हो तकरा चतुष्कल (डगण)क ओहन रूपसँ जोड़ू जाहिमे दूनू दीर्घ (SS) छैक। तखन जे बनत तकरा "मफाईलुन" (ISSS) बनत मने। उदाहरण लेल---निशा एलै (ISSS)। एकरा एना देखू-----IS + SS = ISSS 4) जँ चतुष्कल (डगण)क ओहन रूप जकर शुरूआतमे दूटा लघु आ अंतमे एकटा दीर्घ होइ मने (IIS) तकरा त्रिकल (ढगण)क ओहन रूपसँ जोड़ू जाहिमे पहिल लघु आ अंतिम दीर्घ मने (IS) तँ "मुतफाइलुन" (IISIS) बनि जाएत। एकरा एना देखू-------IIS + IS = IISIS 5) जँ पंचकल (ठगण)क ओहन रूप जाहिमे पहिल लघु दोसर दीर्घ आ तकरा बाद अंतिम दूनू लघु मने (ISII) हो तकरा द्विकल (णगण)क ओहन रूपसँ जोड़बै जाहिमे एकटा दीर्घ होइक मने (S) तँ मफाइलतुन बनि जाएत। एकरा एना देखू------ISII + S = ISIIS 6) जँ चतुष्कल (डगण)क ओहन रूप जाहिमे दूनू दीर्घ हो (SS) मने तकरा त्रिकल (ढगण)क ओहन रूपसँ जाहिमे पहिल दीर्घ आ अंतिम लघु (IS) मने हो तँ "मफऊलात" (SSIS) बनत। एकरा एना देखू-----SS + IS = SSIS 7) पंचकल (ठगण)क ओहन रूप जाहिमे पहिल लघु आ तकरा बाद दूनू दीर्घ हो मने (ISS) से "फऊलुन" कहाइत अछि। एकरा एना देखू------ ISS 8) पंचकल (ठगण)क ओहन रूप जाहिमे पहिल दीर्घ आ तकरा बाद लघु तकरा बाद फेर दीर्घ हो मने (SIS) से "फाइलुन" कहल जाइत अछि। एकरा एना देखू------SIS *****मात्रा गनबाक लेल मोन राखू जाहि अक्षरमे "अ", "इ", "उ", "ऋ" एवं "लृ" नुकाएल हो तकरा लघु मानू आ तकरा बाद सभकेँ दीर्घ। संगहि संग अनुस्वार तँ दीर्घ अछि मुदा चन्द्रबिंदु लघु।संगहि-संग जँ कोनो शब्दमे संयुक्ताक्षर हुअए तँ ताहिसँ पहिलेक अक्षर दीर्घ भए जाइत छैक चाहे ओ लघु किएक ने हुअए। उदाहरण लेल--प्रत्यक्ष शब्दमे दूटा संयुक्ताक्षर अछि पहिल त्य एवं क्ष। आब एहिमे देखू "त्य" सँ पहिने "प्र" अछि तँए ई दीर्घ भेल आ "क्ष" सँ पहिने "त्य" अछि तँए इहो दीर्घ भेल। ई नियम जँ दू टा अलग-अलग शब्द हो तैयो लागू हएत जेना उदाहरण लेल--- हमर प्रेम छी अहाँ... ऐमे "प्रे" संयुक्ताक्षर भेल आ ताहिसँ पहिने बला शब्द " र" दीर्घ भए जाएत। मतलब जे "हमर" शब्दक अंतिम अक्षर "र" दीर्घ भए जाएत । मुदा इ मोन राखू "न्ह" आ "म्ह" संयुक्ताक्षरसँ पहिने बला शब्दमे लघु दीर्घ नहि होइत छैक। जेना की "कुम्हार" मे "म्ह" सँ पहिने "कु" दीर्घ नहि भेल तेनाहिते "कन्हाइ" शब्दमे सेहो "न्ह"सँ पहिने "क" वर्ण दीर्घ नहि भेल। क्ष, त्र आ ज्ञ संयुक्ताक्षर अछि।तेनाहिते.... प्र, र्व, आदि सेहो संयुक्ताक्षर अछि। बहुत गोटेंकेँ समस्या होइत छन्हि जे इ लघु-दीर्घ कोना होइत छै। प्रस्तुत अछि किछु उदाहरण--- बिगड़ि-----------एहि शब्दकेँ ह्रस्व-दीर्घ मानू वा दीर्घ-ह्रस्व मानू। बहरक जेहन जरूरति हो। अरबी बहरमे तीन टा लघु सँ कोनो बहर नै छै तँए लघु-लघु-लघु मानबाक कोनो जरूरति नै। हुनकर---------- एहि शब्दकेँ दीर्घ-दीर्घ मानू वा दीर्घ-लघु-लघु मानू वा लघु-लघु-दीर्घ दीर्घ मानू जेहन जरूरति हो। अरबी बहरमे चारिटा लघु सँ कोनो बहर नै छै तँए लघु-लघु-लघु-लघु मानबाक कोनो जरूरति नै। घर------- एहि शब्दकेँ दीर्घ मानू वा लघु-लघु बहरक जेहन जरूरति हो। चोर------ इ साफे तौर पर दीर्घ-लघु अछि। जँ कोनो शेरमे एना पाँति छै--- बिगड़ि चलै । आब एहि दू शब्दकेँ बान्हू। या तँ अहाँ " बिग" मने एकटा दीर्घ मानू आ "ड़ि" मने एकटा लघु फेर "च" एकटा लघू भेल आ "लै" एकटा दीर्घ। एकर मतलब जे " बिगड़ि चलै" केर संभावित बहर भेल--दीर्घ-ह्रस्व-ह्रस्व-दीर्घ। एहि शब्दकेँ एकटा आर रूप दए सकैत छी जेना की---- "बि" के लघु मानू "गड़ि"केँ दीर्घ मानू आ फेर "च" एकटा लघू भेल आ "लै" एकटा दीर्घ। एकर मतलब जे " बिगड़ि चलै" केर संभावित बहर भेल--- लघु-दीर्घ-लघु-दीर्घ। आब एहि दू रूपकेँ अहाँ बहरक हिसाबें प्रयोग करू। कतेको आदमी " बिग" केँ दीर्घ मानताह फेर "ड़ि" "च" केँ मिला दीर्घ मानताह आ "लै" भेल दीर्घ मने दीर्घ-दीर्घ -दीर्घ मुदा इ रूप गलत भेल। किछु दिन पहिने हम ओम प्रकाश आ अमित जीकेँ कहने छलिअन्हि जे एना कए सकैत छी। मुदा तखन हमर ज्ञान कम्म छल। हुनका दूनू गोटेँकेँ अलावे सभ गोटेसँ आग्रह जे ओ आब एना नै करथि। मैथिलीमे वर्तनीकेँ हिसाबेँ ई उदाहरण देखू---- लए---- ह्रस्व-दीर्घ लs------ह्रस्व ल'------ह्रस्व लय--- ह्रस्व-ह्रस्व वा दीर्घ इएह निअम कए, कs वा स', भए भs वा भ' लेल छै आन प्रारूप लेल एहने बात बूझल जाए। B) वार्णिक छंदमे तीन-तीन मात्रा खंडक आठ विन्यास कएल जाइत अछि। एहि तीन-तीन खंडक गनणा "दशाक्षरी" पद्धतिसँ कएल जाइत अछि। इ एक प्रकारक सूत्र अछि। इ सूत्र अछि-----"यमाताराजभानसलगा"। एहि दसो अक्षरमेसँ पहिल आठ अक्षर आठो गणक नामक पहिल अक्षर थिक। आ इ आठ गण अछि----- य = यगण मा = मगण ता = तगण रा = रगण ज = जगण भा = भगण न = नगण स = सगण आ अंतिम दूटा अक्षर "लगा" कोनो गण नहि अछि। कारण इ जे वार्णिक छंदमे तीन-तीन मात्रा होइत छैक। मुदा "लगा" केर बाद कोनो अक्षर नहि अछि। तँए "स" के बाद कोनो गण नहि बनि सकैत अछि। आब गण बनेबाक तरीका देखू---- अहाँ जे गण बनबए चाहैत छी तकर पहिल अक्षर आ तकरा बादक दू अक्षर आरो लिअ। जे अक्षर क्रम आएत तकर मात्रा गणक मात्रा कहाएत। उदाहरण लेल मानू हमरा "मगण" बनेबाक अछि तँ सभसँ पहिने "मा" लिअ तकरा बादक दूशब्द अछि "तारा"। आब एकरा एकठाम लेने "मातारा" बनत। आब एकर मात्रा अछि---SSS | तँ इ भेल "मगण"। एकटा आर उदाहरण लिअ मानू हमरा जगण बनेबाक अछि तँ ज लिअ आ तकरा बाद दू शब्द अछि "भान"। तँ दूनू मिला कए "जभान" बनत मने "जगण" केर मात्रा क्रम ISIअछि। एनाहिते आठो गण बनैत अछि। आठो गणक रुप देल जा रहल अछि----- गणक नाम दशाक्षरी खंड मात्रा क्रम यगण यमाता ISS मगण मातारा SSS तगण ताराज SSI रगण राजभा SIS जगण जभान ISI भगण भानस SII नगण नसल III सगण सलगा IIS तँ चलू आब एहि आठो गणसँ अरबी रुक्न बनाबी। इ अरबी रुक्न आठ अछि । तँ देखू एकर नियम---- 1) यगण (ISS)सँ पहिने एकटा दीर्घ लगेने " फाइलातुन" बनत। मने S + यमाता = SISS = फाइलातुन ( वैकल्पिक रुपें एनाहुतो कए सकैत छी------- रगण मने (SIS) केँ बाद एकटा आर दीर्घ लगेने "फाइलातुन" बनत।मने SIS + S = SISS 2) रगण (SIS)सँ पहिने एकटा दीर्घ लगेने " मुस्तफइलुन " बनत। मने S + रगण = SSIS = मुस्तफइलुन (वैकल्पिक रुपें एनाहुतो कए सकैत छी----- तगण मने (SSI) केँ बाद एकटा आर दीर्घ लगेने "मुस्तफइलुन" बनत। मने SSI + S = SSIS) 3) यगण (ISS)केँ बाद एकटा दीर्घ लगेने "मफाईलुन" बनत। मने ISS + यगण = ISSS = मफाईलुन (वैकल्पिक रुपें एनाहुतो कए सकैत छी---- मगण मने (SSS) सँ पहिने एकटा लघु लगेने "मफाईलुन" बनत। मने I+SSS = ISSS 4) रगण (SIS) सँ पहिने दूटा लघु लगेने "मुतफाइलुन" बनत। मने II + रगण = IISIS = मुतफाइलुन ( वैकल्पिक रुपें एनाहुतो कए सकैत छी--- सगण मने (IIS) केँ बाद एकटा लघु आ तकरा बाद एकटा दीर्घ लगेने "मुतफाइलुन" बनत। मने IIS + I + S = IISIS = 5) जगण मने (ISI) केँ बाद एकटा लघु आ तकरा बाद एकटा दीर्घ लगेने "मुफाइलतुन" बनत। मने ISI + I + S = ISIIS 6) मगण मने (SSS) के बाद एकटा लघु लगेने "मफऊलात" बनत। मने SSS + I = SSSI = मफऊलात ( वैकल्पिक रुपें एनाहुतो कए सकैत छी----- तगण मने (SSI)सँ पहिने एकटा दीर्घ लगेने “मफऊलात” बनत। मने S + SSI = SSSI 7) यगण मने (ISS) पूरा-पूरी "फऊलुन" केँ बराबर अछि। 8) रगण मने (SIS) पूरा-पूरी "फाइलुन" केँ बराबर अछि। तँ दूनू प्रकारक छंद आ तकरा रुक्नमे बदलनाइ हमरा लोकनि सेहो देखलहुँ। तँ आब चलू तैआर भए जाउ गजल लिखए आ पढ़ए लेल। एहि लेखक सहायतासँ खाली मैथिलीए नहि कोनो आन भाषामे सेहो सही गजल लीखि सकैत छी, खाली काफियाकेँ नियम बदलि जेतै भाषाकेँ हिसाबें। मैथिलीमे बहर उपरमे हमरा लोकनि जतेक बहर देखलहुँ ताहि उपर मैथिलीमे आइ धरि गजल कहले नहि गेल। अर्थात जीवन झासँ लए कए 2008 धरि मैथिलीमे बहर नहि छल। बहर नै छल मतलब कृत्रिम रूपेँ बहर नै छल। योगानंद हीरा जी बहुत पहिनेसँ अरबी बहरमे मैथिली गजल लिखैत छलाह, मुदा मैथिलीक बहर-अज्ञानी संपादक सभ हुनका कात कए देलक जाहिकेँ फलस्वरूप मैथिली गजलमे बहरक चर्चा नै भए सकल। 2008क बाद गजेन्द्र ठाकुर उपरका बहरमे गजल तँ कहबे केलाह संगहि-संग मैथिली लेल एकटा अन्य बहर सेहो तकलाह जकर नाम देल गेल---वार्णिक बहर। एहि बहरक मतलब छैक मतलाक पहिल पाँतिमे जतेक वर्ण छैक ओहि गजलक आन हरेक शेरक पाँतिमे ओतबए वर्ण हेबाक चाही। उपरमे उदाहरण लेल हम अपन जतेक शेर देने छी ओ सभ सरल वार्णिक बहरमे अछि।तथापि एकटा उदाहरण आर----- जहिआ धरि हमरा श्वास रहत तहिआ धरि हुनक आस रहत आब एकरा गानू। एहि दूनू पाँतिमे 13-13 वर्ण अछि। इ भेल सरल वार्णिक बहर। वर्ण कोना गानल जाए ताहि लेल इ धेआन राखू----- हलंत बला अक्षरकेँ 0 मानू संयुक्ताक्षरमे संयुक्त अक्षरके 1 मानू। जेना की "हरस्त" मे स्त=1 भेल। तकरा बाद सभ अक्षरकेँ 1 मानू चाहे ओकर मात्रा लघु हो की दीर्घ। वार्णिक बहर दू तरहक अछि--- सरल वार्णिक बहर, आ वार्णिक 1) सरल वार्णिक बहर----- उपरका सभ उदाहरण सरल वार्णिकक अछि। 2) वार्णिक-------- एहिमे वर्णक संग-संग मात्राक सेहो धेआन राखए पड़ैत छैक। मने वर्णक संख्या तँ निश्चित हेबाके चाही संगहि-संग ह्रस्व के निच्चा ह्रस्व आ दीर्घ के निच्चा दीर्घ हेबाके चाही। उदाहरण लेल----- नचनी नाच नचा गेल प्रेम हुनकर जिनगी बाँझ बना गेल प्रेम हुनकर आब एहि शेरके देखू दूनू पाँतिमे 15 वर्ण तँ छैके संगे-संग पहिल पाँतिमे जाहि ठाम जे मात्रा छैक वएह मात्रा दोसरो पाँतिमे ओही ठाम छैक। तँ इ भेल वार्णिक बहर| जँ अहाँ एकरा मात्रा क्रम देबै तँ पता चलत जे एकर रुप एना छैक---- SSSI-ISSS-SISS आब कने इ विचारी जे मैथिलीमे कोन बहरके प्रधानता दी। जेना की हमरा लोकनि जनैत छी "सरल वार्णिक बहर" सभसँ बेसी हल्लुक अछि तँए गजलगो ( शाइर) शुरुआतमे एही बहर मे गजल लिखैत तँ नीक। तकरा बाद अभ्याससँ दोसर बहर (वार्णिक बहर) पर आबथि आ तकरा बाद उर्दू बला बहर पर हाथ अजमाबथि। एखन मैथिलीमे दोसर बहर अर्थात वार्णिक बहरक प्रारंभिक चरण चलि रहल अछि। अंतमे सबसँ खास गप्प गजल चाहे अहाँ कोनो बहर मे किएक ने लिखब रदीफ आ काफियाक नियम सभ लेल एकै रंग रहत। (ई आलेख शब्द साधक श्री जगदीश प्रसाद मंडल जीकेँ समर्पित छन्हि।) ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। १.पूनम मण्डल- मैथिलीक तेसर विकीलीक्स २.नवेंदु कुमार झा-पटना मे पसरत हीराक चमक/ निगरानी विभागक लेल बनि रहल विशिष्ट संवर्ग/ प्रदेश मे शौचालय सॅ वंचित अछि पैघ आबादी १ पूनम मण्डल मैथिलीक तेसर विकीलीक्स -साहित्य अकादेमीक मैथिली बाल साहित्य पुरस्कार प्रौढ कथा संग्रह(रामदेव झाक भातिज मुरलीधर झाक पिलपिलहा गाछ) केँ देबा लेल जिम्मेवार जूरीक खुलासा- ब्लैकमेलर ब्राह्मणवादी समालोचक मोहन भारद्वाज एण्ड कम्पनीक कुकृत्य सोझाँ आएल -मोहन भारद्वाज विद्यानाथ झा विदितक चमचागिरीमे बहुत दिनसँ लागल छथि। -विद्यानाथ झा "विदित"क निम्न कोटिक उपन्यास "विप्लवी बेसरा"क कएक पन्नाक गदगदी समीक्षा "पक्षधर" नाम्ना पत्रिकामे मोहन भारद्वाज केने रहथि, मैथिली समालोचनाक क्षेत्रमे ई एकटा कारी अध्याय अछि। -मोहन भारद्वाज रमानाथ झा ग्रन्थावलीमे पी.सी. रायचौधुरीक रचना रमानाथ झाक नामसँ अपन सम्पादकत्वमे छपबा देलन्हि। -टैगोर साहित्य सम्मानमे हिनको पोथी फाइनल धरि पहुँचल रहए, मुदा एकटा गएर ब्राह्मण, गएर कर्ण कायस्थ जूरी हिनकर लिलसापर पानि फेरि देने रहथि आ पुरस्कार जगदीश प्रसाद मण्डल जीकेँ भेटि गेल छल। -हालेमे चेतना समितिक मुख -पत्र घर-बाहर श्रीमान मोहन भारद्वाजकेँ साहित्य अकादेमी पुरस्कार देबा लेल फतवा जारी केने अछि। ऐ फतवा अन्तर्गत अशोक आ महेन्द्र मलंगियाकेँ सेहो साहित्य अकादेमी पुरस्कार देल जएबाक गप अछि। -प्रबोध सम्मान लेल महेन्द्र मलंगियाक संग मिलि कऽ जे ई कैनवेसिंग केने रहथि आ दुनू गोटेकेँ ओ प्राइज भेटल रहन्हि से जगत ख्यात अछि। -मोहन भारद्वाजक जातिवादी चेहरा जगत ख्यात अछि, हिनकर असल नाम आनन्द मोहन मिश्र अछि। "विद्यापति टाइम्स" मे योगानन्द झा आ विद्यानाथ झा विदितक जमाए शंकरदेव झा (रामदेव झाक बेटा) संग मिलि कऽ जे ई सुभाष चन्द्र यादवक "बनैत बिगड़ैत" क खिलाफ अभियान शुरू केने रहथि से जगत ख्यात अछि, मैथिली समालोचनाक क्षेत्रमे ई एकटा कारी अध्याय अछि।। -आब एतेक केलाक बादो जँ ऐ बेरुका साहित्य अकादेमी पुरस्कार मोहन भारद्वाज विद्यानाथ झा विदितक राजमे नै लऽ सकथि वा महेन्द्र मलंगिया/ अशोककेँ नै दिअबा सकथि तँ से आश्चर्ये हएत। -साहित्य अकादेमीक मैथिली बाल साहित्य पुरस्कार प्रौढ कथा संग्रह(विद्यानाथ झा विदितक समधि रामदेव झाक भातिज मुरलीधर झाक पिलपिलहा गाछ) केँ दिएबामे ब्राह्मणवादी मोहन भारद्वाजक संग देलनि एकटा आर मैथिल ब्राह्मण भाग्यनारायण झा आ चेतना समितिक कोषाध्यक्ष रहल कर्ण कायस्थ महेन्द्र नारायण कर्ण। पूर्वपीठिकासँ पहिने: -रामदेव झाक भातिज मुरलीधर झा केँ प्रौढ़ साहित्य (!!) लेल मैथिलीक साहित्य अकादेमी बाल साहित्य पुरस्कार २०१२ -मुरलीधर झा केँ ई पुरस्कार अ-बाल कथा संग्रह "पिलपिलहा गाछ" लेल देल जा रहल अछि। -मुरलीधर झाक पोथीक आमुखमे सेहो "पिलपिलहा गाछ" मे सेहो ऐ पोथीक किछु कथाक पैघ लोकक लेल हेबाक संकेत अछि, आ मुरलीधर झा लिखलन्हि जे ओ अपन कक्का (रामदेव झा) क कहलापर ऐ पोथीकेँ बाल साहित्यक रूपमे छपबा रहल छथि। हालेमे मिथिला दर्शन मे ऐ पोथीक प्रकाशित समीक्षामे सेहो ई गप कहल गेल छै जे एकर किछु कथा पैघ लोकक लेल छै। विदेह बाल साहित्य पुरस्कार २०१२ (वैकल्पिक साहित्य अकादेमी पुरस्कार रूपमे प्रसिद्ध) लेल भऽ रहल वोटिंग (www.videha.co.in )सँ "पिलपिलहा गाछ" पोथी केँ एकर अ-बाल साहित्य भेलाक कारणसँ हटा लेल गेल छल। -रामदेव झाक भातिज मुरलीधर झा केँ प्रौढ़ साहित्य (!!) लेल मैथिलीक साहित्य अकादेमी बाल साहित्य पुरस्कार २०१२ भेटबाक सूचना श्री शंकर झा १७ अगस्त २०१२ केँ बेरमा गाम जा कऽ श्री जगदीश प्रसाद मण्डल जी केँ देलन्हि। ओ कहलन्हि जे "पिलपिलहा गाछ" पोथी केँ साहित्य अकादेमी बाल साहित्य पुरस्कार २०१२ देल जएबाक निर्णय भऽ गेल छै आ शीघ्र साहित्य अकादेमी, दिल्ली एकर घोषणा करत। ओना श्री शंकर झा पहिने एक बेर विवादमे आबि चुकल छथि जखन "साहेब राम दास" विनिबन्ध पोथी "भारतीय साहित्यक निर्माता शृंखला"मे हुनकासँ साहित्य अकादेमी द्वारा लिखबाओल गेल छल!! "साहेब राम दास"पर डॉ. पालन झा पी.एच.डी. केने छथि आ ई शोध श्री दुर्गानाथ झा श्रीश (आब स्वर्गीय) केर अन्तर्गत भेल छल। "साहेब राम दास"पर डॉ. पालन झाक निबन्ध विदेह ई-पत्रिका (www.videha.co.in ) मे सेहो आएल छल आ ल.ना.मिथिला वि.वि.क मैथिली विभागमे ऐ शोधक एक प्रति राखल सेहो अछि, तकर बादो "साहेब राम दास" विनिबन्ध श्री शंकर झाक नामसँ छपल !!! ऐ गपसँ साहित्यिक क्षेत्रमे आक्रोश व्याप्त भऽ गेल छल। ब्राह्मणवादी समीक्षक मोहन भारद्वाज द्वारा पी.सी.रायचौधुरीक रचनाक कॉपीराइट हनन: अपन सम्पादकत्वमे रायचौधुरीक रचना रमानाथ झाक नामसँ छप्लनि: सहयोगी रहल सी.आइ.आइ.एल. ब्राह्मणवादी समीक्षक मोहन भारद्वाज: रामदेव झासँ मिलि कऽ भोंकलनि सुभाष चन्द्र यादवक पीठमे जातिवादी छुरा विद्यानाथ झा विदितक चमचागिरीमे लागल ब्राह्मणवादी समीक्षक मोहन भारद्वाज: मैथिली समालोचनाक कारी अध्याय: चमचागिरी समीक्षाक मोहन भारद्वाज द्वारा स्थापना रामदेव झाक मूर्ख बेटा विजयदेव झाक फोन नम्बरसँ उमेश मण्डलकेँ पठाओल एस.एम.एस. "गजेन्द्रक पोसुआ अपन परतर हमर परिवारसँ जुनि करू बाउ आ फेसबुकपर जे नाटक क' रहल छी ओइसँ पैघ नाटक हमरा अबैए। कहबी छै फल्लाँ धोबीकेँ लूरिसँ बनल भगता मंडल अपन बापकेँ परतर आ तुलना ककरासँ क' रहल छी बाउ पहने फल्लाँ धो आउ तखन हमरा परिवारक योगदानपर चर्चा करब बाउ अपनेक पिताकेँ कोना अकेदमी एवार्ड भेटल आब ओइपर अहाँ लेख पढ़ब बुरी रे लिखनाइ की होइ छै से हम सीखा देब।" महेन्द्र मलंगियाक मूर्ख बेटा ललित कुमार झाक हाथ जे रामदेव झाक मूर्ख बेटा विजयदेव झाक फोन नम्बरसँ उमेश मण्डलकेँ पठाओल ऐ एस.एम.एस. सँ सिद्ध होइए। "बहुत-बहुत धन्यवाद, समदिया पहिल बेर नीक समाचार सुनौलक हमरा, हमर एक हेराएल मित्र हमरा नाइजीरियासँ फोन केलनि, फूइसक खेती चालू रहय मण्डल" (+२३४८०३९४७२४५३नाइजिरिया ललित कुमार झा) (विजयदेव झा +९१९४७०३६९१९५) विजयदेव झाक ड्रग एडिक्ट बला भ्रष्ट-अशुद्ध अंग्रेजीमे पठाओल अभद्र ई-मेल, पैरवीसँ पास करैक निशानी Vijay Deo Jha Mar 19 to Gajendra Dear, Sri Gajendra Thakurji I am writing you this mail in response to sustained campaign by your close group forming E-Samadiya and others including Umesh Mandal and one ghost lady Priyanka Jha against me that I obtained assignment from the Sahitya Akademi. I have attached scanned copy of the reply of Sahitya Akademi in this regard. Dear sir, as your supported E magazine had published the report of an RTI indicating my name one who has obtained translation assignment that you people propagated some sort of Wikileaks. Dear Sir, your energetic team did not apply its mind to ascertain the fact of the assignment and thereafter. Though during the debate I found your esteemed literary colleague Priyanka Jha down to the gutter--she had neither the manner nor mind to enter into a debate of literary kind. I rest this matter here. But I will like you to publish this letter and my version with same prominence the way I was targeted. I don't have mail id and phone number of Shree Umesh Mandal and Priyanka Jha to reply them. I mailed you also because of the reason that you have been in touch with these two. Regards Vijay Deo Jha Jun 4 to Gajendra Dear Sir, Please refer to my previous mail along with attachment. I had requested you to give space to my statement in you E Samadiya blog against libelous content published against me regarding taking benefit from Sahatiya Akademi. I understand that you have a busy schedule in politics of literature apart from your job. I understand that you people are prone to forget to repair mistakes and nonsense delivery of allegation. Sir let me be very specific that you had leveled certain charges against me and I made my reply along with official communication received from SA. Don't you think that you should act as a gentleman to publish my version and the letter to clear my stand. Sir I am frivolous and flippant kind of person rather I am a very no-nonsense kind of people. You must be wondering that I am chasing you like anything over a petty issue. The charges you leveled against me could be petty in your consideration but for me it a serious matter. I am amazed that how person like you who is calmouring to be maker of Maithili Literature has been behaving shamelessly. Some two and half month back I had sent you the mail with the request. I had sent mail to Umesh Ji also. Your silence suggests you people are standing nowhere on the integrity index and how a so called intellectual and writer like you can be third rate cheat. I am also looking for that fantastic lady Priyanka Jha. Hadn't she been a lady I would have given her piece of my mind. Sorry for being harsh but you have forced me to be so. 29 AUGUST 2012 09.15 PM मैं इस बात के लिए खेद प्रकट करता हूँ की मेरी वजह से आपका लीटर भर खून जल गया होगा. आप और आपके अनुचरों की भाषा उस तिलमिलाहट को दिखाती है वैसे मुझे बहुत सारे सज्जनों ने फोन पर आपसे मूह न लगाने की सलाह दी क्यूँ की आपने किसी को नहीं छोड़ा है सब को गाली दी है ऐसे में मैं क्या. छोड़िये इन बातों को, मेरा मेल आप खूब प्रकाशित कर रहे हैं आप. मैं ने आपको एक और मेल भेजा था हिंदी में क्यूँ की मेरी अंग्रेजी या तो बुरी है या फिर आपके समझ से बाहर है. वह मेल भी प्रकाशित करें हाँ लेकिन ईमानदारी होनी चाहिए क्यूँ की मेरे ड्रग एडिक्टेड टेक्स्ट को आप अपने करप्ट एडिटिंग के द्वारा अपने लायक बना देते हैं. मूल सवाल यह देखने में आया है की आप मेरे सवालों को अपने ब्लॉग और साईट पर जगह नहीं देते. अगर आप वह मेल प्रकाशित कर दें तो मुझ जैसे मुर्ख के असलियत के साथ साथ लोगों को आप जैसे महान इंटरनेटी फेसबुकिया साहित्यकार के असलियत का भी पता चल जायेगा. आप एक महान फेसबुक साहित्यकार हैं आपका बस चले तो मैथिली के सारे साहित्यकारों का संहार कर दें. अपने सभ्य तमीजदार टीम और उसके भाषा में बारे में क्या ख़याल रखते हैं गजेन्द्र सर. अच्छा है की लोग उन्हें भी पढ़ रहें हैं. एक बात तो है की अगर साहित्य अकादमी में मैथिली न होता तो आप जैसे पैसा पीटने वाले लोग साहित्यकार बनने की कोशिश नहीं करते. आप किसी साहित्य की सेवा नहीं कर रहे हैं. जब आदमी पैसा कमा लेता है तो उसे यश कमाने की भूख लगती है लेकिन वह पैसे से नहीं कमाया जा सकता है ना सर. मुर्ख हूँ आपके शब्दों में लेकिन है यह है पते की बात. सर बहुत सीधा सा सवाल पूछता हूँ की आप इतना बड़ा ढोंग कैसे कर लेते हैं मसलन घोर ब्रामहण विरोधी आदि आदि. यह जो जातिसूचक टाईटिल आपने लगा रखा है उसे तो पहले हटायें फिर जनेऊ हटायें फिर यह सब बाचन करें. यह बात मैंने आपको पिछले बार भी पुछा था जब आप प्रियंका झा बन कर हम से पेंच लड़ा रहे थे. मैं आप के किस रूप की पूजा करू आप कब किस रूप में दर्शन देते हैं श्रीमान यह बड़ा गंभीर तत्व ज्ञान का विषय हैं. श्रीमान यह बताएं की जब आपको यह दिव्यज्ञान प्राप्त हुआ था की आपको साहित्य में भी हाथ आजमाना चाहिए उस वक्त आपकी उम्र क्या थी? क्या मेरे पिताजी के उम्र से अधिक या उनके बराबर. जबाब देने से पहले सोच लें क्यूँ की मेरे पिताजी (आपके शब्दों में बाप, यह आपका तमीज है) और आपके पूजनीय पिताजी हमउम्र ही होंगे. यह आप तय करेंगे की मेरे पिताजी साहित्यकार हैं या नहीं या आपका वह गुमास्ता आशीष तय करेगा? अच्छा आप एक बात बताएं बुरा न मानें तो क्या आपलोग अपने पिताजी को बाप ही कहते हैं. एक काम करें अपना मूह उठायें और थूकें और देखें की थूक कहाँ गिरता है आपके चेहरे पर या सूर्य पर. कौन सा डिबेट आप कर रहे थे आप? आपको इस बात की जानकारी भी नहीं होगी की मैं आपका बहुत बड़ा प्रसंशक रहा था मेरे पास आप के द्वारा पंजी प्रथा पर काम किया गया अद्भुत सीडी है जिसे मैं लोगों को दीखता था. लेकिन आपने अपने टुच्चे हरकत से मुझे तो ज़लील किया ही मेरा विस्वाश भी तोडा की आप सही में आदरणीय हैं. मुझे क्या पड़ी है की किसको अवार्ड मिले लेकिन आपने मुझे अपने घटिया राजनीति का शिकार बनाया. मेरे लिए सारे साहित्यकार बराबर हैं और सम्माननीय क्यूँ की वह साहित्य की सेवा कर रहें हैं. मैं ने पिछली बार भी आप लोगों को तभी रोका और टोका था जब आप लोगों ने मायानादं मिश्र को गन्दी गन्दी गलियां दी थी. लेकिन गाली गलौज करते हुए आप उस सीमा तक चले गए जहां आप जाहिल नज़र आते हैं और मैं किस जाहिल से बहस कर रहा हूँ? किसी का अपमान ना करें और किसी पर गलत आरोप न लगायें. आश्चर्य है की आप ने मुझे क्यूँ साहित्य अकादमी के विवाद में घसीटा जब मुझे पता ही नहीं की क्या हो रहा है ? एक अच्छे और ज़िम्मेदार व्यक्ति की तरह मैं ने अपनी सफाई दी थी और यह आशा किया की आप मेरी बातों को भी रखेंगे. लेकिन आप ने ये क्या किया? सर जी घटियापन की एक हद होती है और आपका वह हद कहाँ ख़तम होता है और कहाँ शुरू वह बस आप बता सकते हैं. यह मेल मैं आपको उत्तेजित करने के ख़याल से कतई नहीं लिख रहा हूँ. आप इसे पढ़े और मनन करें की आप कैसे कैसे अपने इज्ज़त का बट्टा खुद ही लगा रहे हैं क्यूँ की आपके बारे में लोगों के विचार सुन कर मैं सकते में पड़ गया. यह जीवन आपका है इसके मालिक आप खुद हैं. मैं तो बस आपके लिए प्रार्थना कर सकता हूँ ऊपर वाला मेरी बात सुने. आप मेरे बड़े भाई की तरह हैं. और हाँ यह सब मैं आपके चापलूसी के लिए नहीं लिख रहा हूँ. स्वभावतः मैं लड़ाकू नहीं हूँ लेकिन लड़ने से पीछे नहीं रहता. सादर चरण स्पर्श आपका अनुज विजय (हाँ आपको मेरे मोबाईल लोकेसन को ट्रेस करने के लिए मेहनत नहीं करनी चाहिए आपका मेरे ऊपर आपका स्वाभाविक अधिकार है जो किसी साहित्यिक इज्म से ऊपर है. यह मेरा आपको,लिखा गया अंतिम मेल है) आशीष अनचिन्हारकेँ फेसबुक मैसेजपर सेहो ई मूर्ख विजदेव मैसेज केलक एखने हमर फेसबुक मैसेजमे रामदेव झाक मूर्ख बेटा विजयदेव झाक मैसेज आएल अछि जे हम बिना काँट-छाँटकेँ दए रहल छी। ऐ मैसेजसँ अहाँकेँ ई पता लागि जाएत जे कोना रामदेव झा आ हुनक दूनू बेटा मने विजय देव झा आ शंकर देव झा गारि बलेँ मैथिलीकेँ बहुत दिन धरि ब्लैकमेलिंग केलकै। संगे-संग हम ईहो कहए चाहब जे ऐ ब्लैकमेलिंगमे रामदेव झा आ हुनक बेटा संगे मोहन भारद्वाज, महेन्द्र मलंगिया, चेतना समीति आ आर किछु साहित्यकार सभ अनवरत सहयोगी रहल छथि। मुदा आब जे विदेह आंन्दोलन भए रहल अछि ताहिसँ घबड़ा कए ई सभ अभद्रता कए रहल अछि। मुदा आब से चलए बला नै छै। तँ पढ़ू हुनक मूल मैसेज---- हे रे अशीषवा, गजेन्द्र के पोसुवा, पतचटवा औकात देख क बात कर बालगोविन्द जनामि क ठाड़ भेलौं ने की कहै जे छै नबका जोगी के गांडी में जट्टा SATISH VERMA LIKHAI CHHATHI...Satish Verma Isi Bhagwa Shankardev jha ko maine bahut pahle apne lekh me khub lapeta tha. Darsal Agnipushp sampadit samvad patrika me Gujrat danga aur Narendra modi ke role par meri ek kahani chapi thi,jis par usne badi hi behuda tippani ki thi,jiska jawab maine rachna,darbhanga,vishwanathjee ke patrika ke jariye diya tha.shunt ho gaye the shankardev babu,aukat nap gayi thi unki. VINIT UTPAL..LIKHAI CHHATHI .. Vinit Utpal क्षमा शोभती उस भुजंग को जिसके पर गरल हो, वह क्या जो दन्तहीन, विषहीन और अत्यंत सरल हो.गाली देब परम्परा अछि. जिनकर जेहन संस्कार, हुनकर मुंह से तहिने बोली.रचनात्मकता में जीवन अनुभव के बड़ रास योगदान होयत अछि. फेर संस्कार ते घर से भेटैत अछि. अशीषवा,पोसुवा, गांडी, जट्टा एहन शब्द अलंकारक प्रयोग करहिक अर्थ अछि जे अखनो लोक में आदिम संस्कार से जुडल अछि. ई सब शब्द साहित्य से दूर भ रहल अछि. ताहि सं विजयदेव झा सहित तमाम मैथिली से जुडल अहिने प्रबुद्ध लोक सें आग्रह जे अहां सब शब्दक संगे आओर एहिने शब्दक प्रयोग क मिथिलाक शब्दकोष के समृद्ध करल जाय. कियाकि तथाकथित ब्राहमणवादी साहित्यकार घर में ते एहन शब्दक प्रयोग करैत छथिन आ अप्पन नेना सभ के सिखाबैत अछि मुदा अप्पन लेखनी में प्रयोग नहि करैत अछि. रामदेव झा, शंकरदेव झा आ विजयदेव झा:ब्लैकमेलर फैमिलीक आज अखबारमे निकालल न्यूज रामदेव झा, शंकरदेव झा आ विजयदेव झा:ब्लैकमेलर फैमिलीक आज अखबारमे निकालल न्यूज रामदेव झा, शंकरदेव झा आ विजयदेव झा:ब्लैकमेलर फैमिलीक आज अखबारमे निकालल न्यूज पूर्वपीठिका: -रामदेव झाक बेटा विजयदेव झा द्वारा फोन नम्बर +९१९४७०३६९१९५ सँ उमेश मण्डलकेँ धमकी -रामदेव झाक बेटा विजयदेव झा जइ नम्बरसँ फोनपर धमकी देलक से लोकेशन ट्रेस कऽ लेल गेल अछि -फोन नम्बर +91-9470369195- location-Bihar- signalling GSM- longitude 26.11346972320883 latitude 85.27224719999998 -BIHAR & JHARKHAND- Operator : BSNL- Signaling :CDMA -उमेश मण्डलकेँ देख लेबाक आ उठा लेबाक धमकी देलक विजयदेव झा -हालेमे साहित्य अकादेमी बाल साहित्य पुरस्कारमे प्रौढ़ साहित्यपर पुरस्कार ओकर पितयौत भाइ मुरलीधर झा केँ देल गेल, जकर घोर विरोध भऽ रहल अछि -विजयदेव झा गाड़ि-गलौज सेहो केलक -विजयदेव झा एक दिससँ सुभाष चन्द्र यादव, प्रियंका झा, प्रीति ठाकुर, प्रबोध नारायण सिंह, उदय नारायण सिंह नचिकेता, उमेश मण्डल, ज्योत्सना चन्द्रम, विभूति आनन्द, भीमनाथ झा, उषाकिरण खान, यात्री, शरदिन्दु चौधरी, सुधांशु शेखर चौधरी सभकेँ गरियेलक। -ओ ईहो कहलक जे प्रीति ठाकुरकेँ बाल साहित्य पुरस्कार नै देल गेल, तेँ सभ विरोध कऽ रहल अछि, ऐसँ पहिने ओ फरबरीमे कहने छल जे जगदीश प्रसाद मण्डलकेँ मूल साहित्य अकादेमी पुरस्कार नै देल गेलै तँइ विरोध भऽ रहल अछि। -विजयदेव झा कहलक जे प्रीति ठाकुर, सुभाष चन्द्र यादव, नचिकेता, जगदीश प्रसाद मण्डल आ गजेन्द्र ठाकुर केँ ऐ जन्ममे ओ सभ साहित्य अकादेमी पुरस्कार नै प्राप्त करऽ देतै। २ नवेंदु कुमार झा-पटना मे पसरत हीराक चमक/ निगरानी विभागक लेल बनि रहल विशिष्ट संवर्ग/ प्रदेश मे शौचालय सॅ वंचित अछि पैघ आबादी पटना मे पसरत हीराक चमक
देश मे हीराक तराशीक पैघ उद्योग अछि जे एखन धरि महाराष्ट्र आ गुजरात मे केन्द्रित अछि। एहि उद्योग मे पैघ संख्या मे बिहारी मजदूर कार्य रतहऽथि। बिहार सरकार आब राजधानी पटना के सेहो हीरा तराशबाक केन्द्रक रूप मे विकसित करबाक तैयारी मे लागि गेल अछि। सरकार एहि प्रयासक सकारात्मक परिणाम सेहो सोझा आबि रहल अछि आ निवेशक सेहो सरकारक एहि प्रयास केऽ मूर्त रूप देबाक लेल सोझा अपलनि अछि। जनवरी मास मे सम्पन्न प्रवासी भारतीय सम्मेलनक दरमियान किछु निवेशक निवेश करबाक इच्छा व्यक्त कयने छलाह। सरकार लगातार हुनक सम्पर्क मे अछि। एहि क्रम मे मुम्बईक श्रीनुज प्राइवेट लिमिटेड कम्पनी के पाटलिपुत्रा औद्योगिक क्षेत्र मे जमीन उपलब्ध कराओल गेल अछि। ई कम्पनी नवम्बर मास सॅ कारखाना बनायब प्रारंभ करत। कम्पनी सूत्रक अनुसार ई कारखाना गोटेक दू वर्ष मेब नि कऽ तैयार भऽ जायत। सरकारक पटनाक लग-पासक क्षेत्र मे डायमंड कटिंग सेंटर स्थापित करबाक योजना सेहो बनौलक अछि। सरकारी सूत्र जनतब देलक अछि जे ज्यों एहि क्षेत्र मे बेसी निवेशक रूचि देखौलनि तऽ सरकार डायमंड कटिंग सेंटर स्थापित कऽ सकैत अछि। पटनाक लग-पास मे जमीनक कोनो दिक्कत नहि होयत आ सभ आवश्यक बुनियादी सुविधा उपलब्ध कराओल जायत। प्रदेश मे हीरा तराशीक कारखाना खोलबाक लेल आगा आयल श्रीनुज प्राइवेट लिमिटेडक प्रवक्ता जनौलनि जे ई निर्णय सोच-विचारि कऽ लेल गेल अछि। एहि कारोबारक पारम्परिक केन्द्र गुजरात आ महाराष्ट्र अछि। एहि ठाम बेसी कारीगर आ श्रमिक बिहारक छथि। हीराक लेल प्रसिद्ध सूरत मे एहि क्षेत्र मे कार्यरत गोटेक तीस प्रतिशत श्रमिक बिहार छथि। पटना मे केन्द्र स्थापित भेलाक बाद एहि क्षेत्र मे कार्यरत प्रवासी बिहारी अपन घर आपस आबि एकताह आ हुनका रोजगारक नीक अवसर भेटि सकत। कम्पनीक प्रवक्ता जनौलनि जे एहि विषय मे पछिला दू वर्ष सॅ विशेषज्ञ सभ सॅ रायक बाद कम्पनी एहि योजना के अंतिम रूप देलक अछि। बिहार गहनाक पैघ बजारक रूपम े विकसित भऽ रहल अछि आ एहि ठाम कुशल श्रमिक सेहो छथि। गहनाक मांग बढ़त तें एहि ठाम कारखाना लगायब लाभदायक होयत। निगरानी विभागक लेल बनि रहल विशिष्ट संवर्ग प्रदेश मे भ्रष्टाचार पर पूरा तरहे रोक लगैबाक लेल निगरानी विभाग मे फराक सॅ सवर्ग गठित कयल जा रहल अछि। एहि विशिष्ट संवर्गक अधिकारी कें सीधा नियुक्त कयल जायता सरकार एहि वास्ते बिहार अन्वेषण संवर्ग नियमावली 2012 केऽ स्वीकृति दऽ देलक अछि। एकर अंतर्गत निगरानी अन्वेषण ब्यूरो आ विशेष निगरानी इकाईक अंतर्गत एकटा विशिष्ट संवर्ग तैयार कयल जायत। ई स्वतंत्र रूप सॅ काज करत। एकर पदाधिकारी के निगरानी विभाग सॅ बाहर स्थानांन्तरित नहि कयल जा सकत। एहि संवर्ग मे पुलिस उपाधीक्षकक 43 पद, पुलिस अधीक्षक स्तरक 13 पद आ पुलिस अवर निरीक्षक 21 पद होयत। प्रदेश मे शौचालय सॅ वंचित अछि पैघ आबादी देश भरि मे सभ परिवार के शौचालयक सुविधा नहि होयबाक कारण पैघ आबादी एखनो खुजल जगह पर शौच करबाक लेल मजबूर अछि। एहि मे अधिकतर ग्रामीण क्षेत्रक लोक छथि जिनका बरसात आ बाढ़ि मे विकट स्थितिक सामना करऽ पड़ैत अछि। बिहार मे सेहो स्थिति एहने अछि। एहि ठाम 70 लाख 51 हजार 769 परिवार शौचालयक सुविधा सॅ वंचित छथि। ग्रामीण क्षेत्रक आबादी एहि मे बेसी अछि जे एहि विषम परिस्थितिक सामना करबाक लेल मजबूर छथि। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। १.कामिनी कामायनी- उत्तराक नोर २.सत्यनारायण झा-दुटा बात पुत्रक जन्म दिन पर ३.कैलास दास, खोजय पड़त मातृत्व बालगीत १ कामिनी कामायनी उत्तराक नोर केहेन उदासी के मोटगरि चद्दरि मे लपेटल लटपटायल . ई जगह .. .लागि रहल अछि ।जेना सदाबहार गाछक सबटा पात झरि गेल होय ।सायं सायं बहैत बसात मे कत्तेको रूदनक स्वर मिलि क’ एकटा भयंकर चित्कार करि रहल अछि ।ओ गाछ . ओ बिरीछ. . ओ चिडै. . ओ चुनमुनी .. .. अपन उत्साह बिसरि कहुना करि अपन दिन कटैत हो जेना ।दूर .. पहाड .. . शाश्वत भ्रमक परदाफाश करबा क प्रयास मे प्रकृति के रहस्यवादी दृष्टिकोण सॅ फराक हटि क’ किछु आओर राग अलापि रहल छल ।कत्तेक अपरिचित भ’ गेलै. ई सब जे कहियो ओकर जीवन क ह्दय प्रदेश बनि चुकल छल । कसकि त’ उठल रहै मोन । बड दिन क’ बाद . . आंगुर प’ गिनलक . .पॉच सावनक बाद .. . ओ आयल छल मसूरी फेर सॅ .. ।जगह त’ वएह छलै. . ओहिना आकास. . के छुबैत. . पहाड़ . .पहाड .. प’ झूमैत हरियर कचोर ऊॅच ऊॅच गाछ. . . ओहिना साफ . धोल चमकैत वातावरण. . .ओहिना मकान क छत प’ कार . . .मुदा ओकरा ओकर जादुई आकर्षण बड निघटल लगलै ।ओ गप नै छलै. . जे ओकरा बौरा देने छलैक़ . . कि खिलखिल करैत .. जीन्दगी सॅ लब लब भरल।. . . ओ वसंत. . सन्न सन्नबहैत बयार सडकक कात बेंच प’ बैसैत मातर ओकर धियान दूर पर्वत प ससरति कारी सन कोने बिन्दु जकॉ वस्तु प’ पडलै. . वायनोकूलर सॅ झट देखलक़ . बकरी .. पहाडी बकरी .. ओकरा हॅसी लागि गेलए. . ठठा क’ हॅसि पडल छल. . बकरीयो के की सूझलै. . ओत्ते ऊपर चरय लेल गेल ।ओही दिन पूर्णिमा के चॉद ओही बकरी के झुंड सॅ कनिए उपर विश्राम करैत ओही परम सुन्दरता के निहारि रहल छली ।ओकर नजरि आब चॉद प’अटकि गेलय ।मुॅह सॅ स्वर फुटि पडलै. ‘चलो दिलदार चलो. . .चॉद के पार चलो. . . । . . ‘हम है तैयार चलो. . ।’आ विकल के स्वर मे स्वर मिलाएब ओकरा फेर सॅ जोर सॅ ठहाका लगाबए प’ मजबूर करि देने छल .. जे कनि क्षण के लेल ओही ठाम गूॅजए लागल छल।छुट्टी के दिन ओ दुनु अहिना सांझ पडय सॅ पहिने बौआबैत ढहनाबैत . .ओए पहाडी के चप्पा चप्पा छानि मारै. .गहराई मे उतरै. . चढाई प दौड दौड क’ चढबाक कोससि मे हाफैत हॉफैत ओही ठाम ओंघडा जाए. .. मौसम त’ अपने आप मे निराला. . .भंगतडाह. . .कखनो रूइस रहलौ. . कखनो. . कानए लगलहूॅ. . कखनो मंद मंद मुस्की. कखनो छिडियाएल. .. आब के संभारत. . .मुदा पहाड ओकर सब रूप प’ न्योछावर. . . कनियो रोषराख नै. . ..सनातन प्रेमी जे छलै. . ।साफ सुथरा निप्पल पोतल आकाश मे नहिं जानि कतय सॅ औचक मे कारी स्याह मेघ आबि झमाझम बरसि जाए .. .माल रोड प’ घुडसवारी करैत दुनु एकदम भींग जाए. . .तहन थर थर कॉपैत देह मे गरमी आनबा लेल. . लग पास के कॉफी हाउस मे जाकए चैन पाबए ।कैमल बैक हिल्स. . प’ घुमैत. . कंपनी बाग के झुल्ला प’ झुलैत. . .दिन सोन चिरैया सन फुर्र सॅ उडि जाए .। लोकक नजरि के बेपरवाही सॅ फेकैत. . विकल .. ओकरा एक छण के लेल एसगर नै छोडय चाहै. . ।. उत्तरा के ओकरा सॅ भेंट सीनियर्स के फेयर वेल पार्टी के मंच प’ भेल रहै. . जखन दूनू गोटे एक टा कोरस गेने छल. . .कि जादू छलै. . ओकर आवाज मे. . राजस्थानी सूफी गायक बला . . देखैतो राजपुरूष. . .राजस्थान के बासिन्दो छलै.. . अहि सॅ बेशी ओकरा किछु जानबा के उत्कंठा कहियो भेबो नै कैल रहै । गीत संगीत सॅ दुनु के लगाव एक टा नव रिश्ता कायम करि देने छल. . जे सर गम के सातो स्वर मे ओ दुनु सेहो समाहित ।कैम्टी फॉल मे नहैत. . .धनोल्टी के गेस्ट हाउस के बरामदा प’ राखल बडका कुरसी प’ बैस. . ओ दूनू त संगीतक नदी मे पौडैत गप सॅ बेसी गीते गाबैत रहैत छल । सुरकंडा देवी के यात्र्रा लेल वएह जिद केन्ो रहै. . नै त’ विकल के धरम करम सॅ कोनो मतलब नै. . .मुदा ओतेक ऊॅचाई प’ मेघक अपन घर मे. . . देखलक एकरा की झूंड के झूंड खिहारैत. . पकडि लेलक जेना ओकरे सबहक सुआगत लेल ठाढ़ . भयंकर नाद से विष वमन करैत बरसैत रहल. . ।ऊत्तरा के त’ हिम्मत प’ मनोमन पाथरि लदा गेल रहै ।ओ त’ गाडिए मे बैसल रहल. . मुदा. . विकल पानि के चिरैत. . ऊपरक चढाई प चढैत रहल मात्र ओकरे लेल ।ओतेक पानि मे पिच्छडि के बिन परवाह केने .. अपना के चार्वाक शिष्य घोषित करए वाला. . । बाजै ओ बड कम . .मुदा ओकर ऑखिक छलकैत भाव मे उत्तरा के सब प्रश्न क’ उत्तर भेंट जाय ।ओकरा प्रेम के आध्यात्मिकता पर नजरि पडय लगलै. . .अहि इंस्टीच्यूट मे आबए सॅ पहिने ओकरा होशे हवास कत्त छलै. . इम्हर ओम्हर ताकए झॉकए के. . .पढाई. . पढाई आ’ पढाई. . .सदिखन प्रथम प्रथम पाबैत .. .ओकर मनोबल. . अप्रत्याशित रूपेन ताकतवर भ’ चुकल छल. . . आ जखन अहि ठाम आयल. . .अहूॅ मे प्रथम. . .।ओकरा लागै असफलता की होबैत छै. . .केहेन होय छै आकांक्षा के अपूर्ण रहि जेनाय ।घर सॅ बाहरि धरि ओकरा प’ ईश्वरक असीम अनुकंपा. . ओ त’ धरती सॅ जेना पचास फीट ऊपर .।आ’ विकल सॅ मिलब ओकरा लेल अप्रत्याशित अनुभव छल .. .प्रेमक प्रथम अनुभूति. ... . . .माता पिता के विरोध केनाय स्वभाविक छलै . क़त्तेको सुयोग्य वर छॉटिक क’ रखने रहैथ. .जै पर ओ आंगुर रखै. .।मुदा ओकर प्रचंड जिद्द. . .आब ओहि मे अहंकार से हो संग ध’ नेने रहै. . .जाति पॉति .. आब के मानै. . छै. . ई जिन्दगी फेर नै भेटत. . . ।के गारंटी लै छै जे स्वजातिय मे विवाह केला सॅ स्वर्ग जेबा के रास्ता खुलि जाए छै. .।आब एत्तेक योग्य . . .निर्णय लेबा मे माहिर संतान के सोझा कोन माता पिता टिकतैथ. . .हथियार खसा देलखिन । विकल कहल. . .हमर अहि संसार मे अप्पन कहए बला अछिए के. . पता . .नहि क़त्तय जनम लेलौ. . .केहेन मॉ के प्रेम ..होय छै. . केहेन पिता के दुलार होय छै .. .अनाथालय मे पलल बढल . . ।अहॉ लेल त’ अप्पन जान देबा के मौका आयत पाछॉ हटय बला प्राणी हमरा नहिं बूझब ।अहॉ सॅ हमरा संसार भेंट गेल. . जेना प्रेमक प्रथम पाठक ज्ञान क’ संग संसारक ज्ञान भेल. ।’ओ कुमारक गरिदनि प’ एक हाथ रखने .. गाडी के खिडकी सॅ बाहर . . प्रकृति के अवलोकन मे लागल छल. . क़ि . .किरर. ऽऽऽऽऽ््््. संगे गाडी रूकि गेलै. . । ‘की भेलै. . .ओ अकचकाएल. . “ट्रैफिक जाम. .’ . रहस्यमय मुस्कुराहट संग विकल बाजल । ‘पहाडो प’ ट्रैफिक़ . ।’ ओकरा मुॅह सॅ निकलल आ’ दुनू खूब जोर सॅ एक स्वर मे हॅसि पडल छल ।सोझा मात्र तीन टा गाडी लागल .. .पुलिस कंट्रोल करैत .. । जाडक छोटका दिन जकॉ अति शीघ्र ट्रेनिंगक ओ अल्पावधि बीत गेल छल. . .बिना झंझट. . खर्च वर्च के कोर्ट मे जाकए. . अपन जन्मजन्मांतर के संबंध पर मोहर लगबा लेलक .. ।एतेक लग रहिओ क’एक दोसर के किछु जानबा बूझवा के मौको नञ्ािं भेटलै . . .तखन लागै संगीते जीन्दगी छै. . मुदा बाद मे लगै . . ओ त’ मात्र .. दूनू के कॉमन हॉबी. . आर की.. । अचानक ओकर हाथ मे ज्ोना माइक्रोस्कोप आबि गेलै. . .ओकर. . बैसब. . ओकर उठब .. पहिने कोना बजै छलै. . आब. . .नै कोनो तमीज नैं तहजीब .. . छोट छोट गप प’ चिडचिडायल सन. . .एक दिन जूत्ता पर पॉलिस नै लागल रहै त’ तामसे आन्हार भ’ पियुन प’ जूत्ता फेंक देलकै. . हजारि रंगक अजगुत गारिक संग । पोस्टिंग त’ दूनू के एके शहर मे छलै .. मुदा दू मिनिस्ट्री मे ।आ अही बीच जेना प्रेमक रंगीन चादरि के एके धोआन मे रंग जबरदस्त भखरए लगलै .. ।छोट छोट गप. . सोचलक . .आर सब मैनर्स त’ सीखिए जैतै. . .मुदा एकरा भीतर तामस किएक एत्तेक भरल छै. . ओ कोना कम हेतै. . .कोन दुख छै. . .कोन अपराध भाव सॅ ग्रस्त छै. . बजतै. . तखन नै .. किछु समाधान . .कोनो काउंसिलिंग हेतै । अहि पोस्टिंग मे ओकर प्रथम शिशु के जन्म भेल रहै. . .मैटरनिटी लीव प छल. . .कुदरत के अजगुत ईनाम पाबि क’ ओकर आत्मा परि तृप्त भ’ गेल छल. . आब किछु नै चाही प्रभु. . .अपन कृपा अहिना बरसेने रहब ।ओकर मॉ पापा आबि क’ किछु दिन ओकर सुख मे शामिल भेल छलखिन्ह. .। विकल के सुभाव ओकरा किछु विशेष बदलल लागै. . ।ऑफिस सॅ आबैत मातर बच्चा के कनी मन्ाि कोरा कॉख मे ल क’. . चाह ताह पीबि क’ सीधे अपन स्टडी मे चलि जाए. . ।कोनो खास गप सप्प नै. गीत संगीतक दरिया जेना सुखा गेल छल .. . .राति मे डिनर करैत दोसर कमरा मे जा कए सूति रहै. . बच्चा भरि राति कॉय कूय करैत सूतै जे नै दैक़ . इहो सही. . ओ त दिन मे सूति क’ नीद पूरा करि लैत छै. . मुदा विकल के दिन मे कत्त चैन . . । छुट्टी मे पडल पडल. .आब ओ बड बोर होबए लागल छल. . बच्चा के कामकाज देखभाल करए बाली बंगाली आया के वात्सल्य प्रेम देखि ओकर मन एकदम प्रसन्न .. ओकरे नीन सूतै ओकरे नीन जागै. . नहायब सफाई. . नैपकिन बदलब. . डिटॉल सॅ ओकर कपडा सब के पखारब . .एकदम समय प’ दूध बना क’ बोतल सॅ पियाएब. .सांझ मे प्रैम प’ सूता क अहाते मे कनी मन्ाि घूमा दै. . एक बेर ओकरा कहबा क’ देर छलै. . ओ फट स’ सीख क’ अनुकरण करए लागै. . ।उमहर सॅ धियान हटि क’ विकल प केन्द्रित भ’ गेलै. . .एतेक उदासीनता किएक एकर व्योहार मे. . .कनियो कोनो अपना पन नै. . पी 0आर 0के स्टाफ जेना बस ठोर पटपटा क’ हाल चाल पूछि लै. . ।नै ऑखि मे ओ चमक .. नै. . ठोर प’ मुस्कुराहट. .. . । ओकरा मोन पडलै. . .पहिनो त’ ओ नहिए बाजै. . छल बेसी. . जखन दूनू के भेंट होय. . त’ गीतकार .. संगीतकार क चर्चा सॅ सुरू होय आ’ गीत प’ आबि क’ समाप्त. . .।किंस्यात किछु परेशानी सॅ गुजरि रहल होयत ।घर मे पडल पडल ओकर दिमाग शैतानक अड्डा बनि गेल छल. सोचलक . बड आराम भेल आब ड्युटि ज्वाइन करि लेबा क’ चाही .. दू मास त’ भैए गेलै. . । एक दिन ओकरा जखन रहल नै गेलै. . ओ चुप्पे ओकर स्टडी मे जा कए पाछॉ सॅ ओर गरा मे हाथ धरि क’ अपन कान ओकर गाल मे सटबैत बाजल ‘कि भ’ रहल छै एतेक मुस्तैदीसॅ।’ हास्य मे कहल ई शब्द ओकरा एकदम चौंका देलकै. . चट सॅ अपन डायरी बन्न करि ओ अपना के ओकर बाहुपाश सॅ मुक्त करैत ठाढ भ’ गेल छल .. ‘अरे चलू तैयार भ’ जाए हमसब एक टा नाटक देखय चलैत छी ।’आ’ हाथ पकडने बाहर बरामदा मे चलि आयल छल । ओय दिन जे भेल हो मुदा एक टा संशय के बीजारोपण त’ अवश्य भ’ गेलै . .। ओकर मन औउनाइत रहलै. . ओ लिख की रहल अछि जे ओकरा सॅ दुराव छिपाव करए पडि रहल छै .।परोछ मे ओही कोठरी मे जाए त’ आलमरी मे ताला लटकैत. . .के जानै कुन्जी कत्तय छै. . ।आब जखन ठानिए नेने रहै ..रहस्यक उदघाटन करए लेल तखन कोन गप . .।ओय कोठरी मे बगीचा दिस सॅ सेहो एक टा खिडकी छलै. . जै प’ सदिखन परदा फैलल रहै छल।दिने मे ओ ओही परदा के कनी घिसका देने रहै ।रात के बारह बाजल . .चारों कात अन्हार .. सन्नाटा. . ।सब कियो खा पीबि क’ सूतल .. कुमार अंगेठीमोचाड करैत कुरसी सॅ उठल. .. ड़ायरी के अनबीरा मे बन्न करि कुरसी प’ चढि कुन्जी के रोशनदान मे राखि देलक ।बस . .ओ दिन छलै .. . । चक्र सुदर्शन सॅ ओकर गरा कटि गेल रहै . . .मस्तक . .कुरसी प’ बैसल .. शरीर. . धरती प’ खसल. .शोणित सॅ .. लथपथ. . .पॉच पॉच हाथ तडपैत. . .मुदा कत्तेक तडैपतैक़ . कनिए काल मे शान्त भ’ गेलै. . टेबुल प’ राखल मस्तक आब पूर्ण गंभीर भ’ क’ आगूॅ के रणनीति सोचैत रहल. . .।मामला गहीड छलै . .सोचबा मे समय लगलै । घर के शान्ति सामान्य रहल्ौ. . .भोजन बनै. . खेनाय खायल जाए. .बच्चा के झूला प’ झूलायल जाय. ..दासी मुसीक मुसीक क’ मेमसाहब के रंग बिरंगी किस्सा कहै. . मेम साहब ठहक्का मारै. . . मुदा ज्वाला मुखी धधकैत रहलै. . लावा नै बहरैलै. .तै स की . । अपन टा्रन्सफर नार्थ ईस्ट मे करा क’ बिना खड खडकेने . .निःशब्द महात्मा बुद्व जकॉ निशा रात्रि के फ्लाईट सॅ ओकर ओही घर सॅ .. पलायन भ’ चुकल छल । जीवन सॅ जीवन पथक लंबाई बेसी होइत एलैहैं ।नीचा हेरब . .खाधि. . गुफा. . वन .. पहाड़ . सागर. . .उपर मात्र एक टा नीरभ्र आकाश. .. .रंग बिरंगी उडैत पाखी . असीम शान्ति के खजाना .. .ऊपर सॅ धियान नीचा एलै. . ताकब सूरू कयल.. ..कोन पन्ना . .कोन पोथी. . कोन पंथ. . मंदिर .मस्जिद. .चर्च . .गुरूद्वारा . .गोनपा. . .ध्यान . .योग़ . ।मस्तिष्क फेर सॅ गरिदनि सॅ जुडि गेलै. . आब ह्दय मे जे परिवर्तन भेल होय. . दिमाग एकदम शान्त. . ।जीवन क’ ओही नाटकीय मोड प ‘यवनिका पतति’ कहि कहिया कत्त नै पूर्ण विराम लगा देल गेल छल।कोनो ‘हयु एन्ड क्राय’ नै मचलै । मसूरी मे फेर अयबा के कोनो सरकारिए प्रयोजन छलै ।आय ओकरा संग ओकर कोर्स मेट वान्या छल।समय अपन शाश्वत फेरी लगबैत ओहि ठाम कनि विसेष काल के लेल विलमल छल. .थाकल थेहियाएल. . ओंघाइत. . ओकर विश्राम क’ मूड देखि जडि चेतन सब अपन श्वॉस रोकने. . कियो कोनो उकठ्ठी नै करै. . कनियो सोर नै हुए . .।सडकक कात बनल बेन्च प’ बैसल ओ ओहिना सोझा के पहाड प’ दूर्््ऽऽऽऽऽऽ्चरैत
बकरी के देखय लागल।ओही दिन जेकॉ आय सेहो बकरी चरैत छल. . कारी कारी बिन्दु मात्र ।ऑखि मे चमैक उठलै. . . ‘गडेरिया क’ जीनगी. . पहाड हो वा रेगिस्तान . असुविधा .. कष्ट सॅ भरल. . दीन हीन लाचार बीमार ‘ भीतक छोट छोट घर .. .उजडल उडल छप्पर . . माटीक चूल्ही प’ चढल माटीक बासन .मे . . .खदकैत. . भात. . . .माटिए के परात मे .. सानैत. . बाजरा के आटा . .चुनरी सॅ गंदा हाथ पोछैत. . खीझैत. . धूऑ सन मूॅह वाली स्त्री. . नीमक गाछ तर पडल खटिया .. चीलम पीबैत. . खोंखी करैत जर्जर वृद्व. . .ताड के पटिया प’ चीक्कट केथडी .. .फुल्लल हाथ पयर . .पीडा सॅ कहरैत कृशकाय वृद्वा. . . कनिए हटि क’ पॉच. सात ..नौ .. बरखक नंग धडंग धीयापुत्ता . करिक्का बकरी के बच्चा संग खेलाइत ..गाछ सॅ बान्हल माटिक बासन मे पानि पीबैत बूढ घोडा चारहु कात पसरल लिद्दी. .।’ घबडा क’ ओ ओही दिस सॅ मुॅह फेर नेने छल. ।मुदा कनिए काल मे नै जाने ओकरा की फुरलै ।वान्या के ई प्रसंग सुना ओ ओकर मन्तव्य जानबाक’ कोरसीस कयल. . ‘ई बता जे ओ गडेरिया पैलवार केकर प्रतिक्षा करैत रहै छल .. ओहेन नितांत गरीबियो मे ओकरा केकर आस छल हेतैक ।’ देवदार के सुडौल वृक्ष निहारैत. . वान्या कनि काल मुस्कैत रहल फेर ओकरा दिस ताकैत बाजल. ‘आर केकर . .ओही रोटी ठोकए वाली के जे मैल हाथ अपन चुनरी मे पोछैत छल .. आ .. जेकर तीनों बच्चा बकरी के बच्चा संग दौड लगबैत छल. .ओकरे .घरबला के .. आखिर ओही पैलवार मे ओकरा अलावा और के हेतै कमाए बला . . ।’ “की।” “नै एकदम ठीक ।कोनो पढल लिखल अपन पैर प’ ठाढ जागरूक स्त्री एहेन पैलवार के किएक शत्रु बनतै ।’ “मतलब’ ।वान्या कनि अचरज सॅ . कनि गहन दृष्टि सॅ ओकरा दिस ताकलक। “तौं नै बूझबही।’अनंत मे ताकैत .. अत्यंत विरक्त भाव स क’हि’ ओ वान्या संग ओहीठाम सॅ उठि वापस अपन गेस्ट हाउस मे चुपचाप चलि आयल छल .।। २ सत्यनारायण झा दुटा बात पुत्रक जन्म दिन पर---- आइ हमर जेष्ठ पुत्र चि० श्री सुमनजीक जन्म दिन छनि |हमर आशीष आ शुभ कामना |जिनगी मे पूर्ण सफलता पाबथि आ अपन मेहनतिक किछु अंश गरीब गुरबाक मदति मे लगाबथि |बेटा कतबो पैघ भ’ जाइक,माय बाप क’ बच्चे बुझायत छैक |बाल बच्चाक जन्म दिनक सुअवसर पर घर मे जन्म दिनक गप्पक क्रम मे माय बाप क’ बरबस संतानक बचपन मोन परि जाइत छैक ,से आइ हमरो सुमनजीक बचपन याद भ’ गेल अछि |कोना हुनक जन्म भेलनि ,कोना पैघ भेलाह ,कोना बच्चा मे ठेहुनिया देथि ,कोना चलनाइ सिखलनि,कोना पढलनि आ कोना एखन वर्तमान मे छथि |एकएक पल मोन परैत अछि |किछु पल एहन होयत छैक जे माय बापक मोन उदास क’ दैत छैक आ किछु एहन होयत छैक जे देह मे अनेरे गुदगुदी लगैत छैक आ अनेरे हँसी लागि जाइत छैक |हमरा तीन संतान दु पुत्र आ एक बेटी |तीनूक लालन पालन ,शिक्षा –दीक्षा ,पढ़ाई –लिखाई बहुत अनुशासित ढंग सं कयल आ ओ लोकनि पूर्ण अनुशासित छथि |जाहि ठाम अनुशासन नहि बुझू ओतय क’ मालिक भगबाने | बालबच्चा क’ अनुशासन मे राखी मुदा एकटा मित्र जकाँ बचचा संग खेलाऊ |हमहू सैह करैत छलौ |बहुत आनन्द होयत छल |आब ओ सभ त’ अतीतक एकटा खिस्सा भ’ गेलैक |एखन दु मास सं हमर पौत्र चि० आकर्ष हमरा संग पटना मे छल |ओना ओ लोकनि दुबई मे रहैत छथि |भरि दिन आकर्ष संग खेलाइत छलौ |राति क’ ओ कहैत छल जे दादाजी खिस्सा कहूँ आ हम सुमन जीक बचपन,विभुजीक बचपन आ रजनीक बचपनक खिस्सा सूना दैत छलियैक आ ओ प्रसन्न भ’ जाइत छल |अपनो हम बहुत खुशी रहैत छलौ |खिस्सा सुनबैत काल हम सतत अतीत मे चल जाइत छलौ |खीस्से सुनबैत सुनबैत एकटा विचार मोन मे आयल जे जन्म दिन पर कियैक ने एकटा कविता लिखी जाहि मे बचपन सं एखन तकक झलक होयक |एहि कविता क’ अपने सभ अवश्य पढू |एहि मे कोनों साहित्य नहि छैक ,एहि मे मोनक बात बाते जकाँ लिखल छैक जे सरल आ सहज छैक |आग्रह अपन पुत्र सं जे एहि पाँती क’ अवश्य पढथि | ३ कैलास दास, पत्रकार, जनकपुर खोजय पड़त मातृत्व बालगीत
हमरा अखनो स्मरण अछि बाल्यकालमे हमरा सभक खेलय वाला एकटा समूह छल । ओहिमे लडका–लडकी के अछि कोनो मतलव नहि । एकटा हाफ पैन्ट आ गँजी लगा कऽ कोनो आम गाछ होए वा घरक दलान चाहे कोनो सार्वजनिक स्थल किए नहि होएँ । झुण्ड बना कऽ कबड्डी, आम गाछी, गोटी गोटी सँगहि खपडाके फुटलहवा लऽकऽ जमिनमे चिर पारि ‘रेङ्ग, रेङ्ग ’खेलतहुँ त कखनो विद्यालय के घर या अपने दलाने मे जा कऽ पाच गोटे मिलकऽ ‘झिझिर कोनो झिझिर कोना कोन, कोन कोना जाउँ । साउस मारलक ठुमका पुतौहुँ कोना जाउँ’ स्मरण अबय त मनेमन अखनो मुस्की सेहो होबय लगय । ओहि समय केँ बहुत किछु याद त नहि अछि मुदा एकटा हाँस्य व्यँङ्ग हम सभ एहनो करैत छली । ‘अण्टा रे भण्टा हम दू भाई पटना जाई झुमका लाई सासु के पहिनाई तऽ पुतहुँ झुमकाई ।’ लेकिन आई हम सभ फेर सँ ओहि बाल अवस्था सभक बीच जाएबाक मौका मिलैत अछि तऽ आश्चर्य लगैत अछि । ओना तऽ पहिले जाका बच्चा सभक झुण्डो नहि अछि । आ एछियो तऽ ओकरा सभक बीचमे एहन गीत सुनवाक अवसर मिलैत अछि– ‘परदेशी, परदेशी, जाना नही मुझे छोडके, मुझे छोड्के ।’ ‘चलि आना तू...तू.. पान की दूकान पे साढे तीन साढे तीन बजे ...।’ गाम ओहे छैक मुदा दलान नहि अछि । बच्चा बुच्ची ओहने अछि मुदा वातारण नहि । गाछवृक्ष छैक लेकिन ओ समूह आब नहि । मातृत्व बाल गीत (फकरा) के स्थान मे हिन्दी, अँग्रेजी,भोजपुरी वातावरण सभ ठाममे छा गेल छैक । कखनो काल हमरा सभक बीच झगडो होइत छल मुदा मुडही, लाई, चाउरक रोटी, भूजा खाएक लेल मुदा अखन देखैत छी सिंगरेट, दारु, गुटका पान परागके लेल आई हमर भाज त काल्हि तू नहि खुवाएबे त देखैबो कहि क झगडा करैत अछि । वास्तव मे कखनो काल बडा आश्चर्य होइत अछि कि देखते–देखते ऐहन परिवर्तन कोना भऽ गेलय । एकटा हम सभ रही जे गुरु जी के देखते नुका जाई । मायबाबु आ अपना से बडका से हरदम डर लगाय । आई परिवर्तन सँगहि बच्चामे शिष्टाचार, आदर स्वभाव किछुओ नहि अछि । कोन बुढ, कोन जवान सभलगय एक समान । तखन एकर दोषी के त ? अवसय एहन वातावरण बनाबयमे हमरे सभक दोष अछि । जाधरि हम कमजोर नहि भेली त हिन्दी, अँग्रेजी आ भोजपुरी वातावरण हमरा उपर कोना चढि गेल । एकर खोजी करबाक अखनो आवश्यकता अछि । जाधरि मैथिली मातृत्व बाल साहित्य के अगाडि नहि लाएब तऽ दोसरक कला संस्कृति भेषभूष आ वातावरण एहने हमरा सभक उपर लदाइत रहत । ऐकर परिणाम भेटत भूखमरि, लुटपाट, धोखाधरी एतबे नहि अपन बालबच्चा अपने माय बाबु के भुला कऽ कखन की करत नहि कहि सकैत छी । तँ एकरा सभक दूर करबाक लेल मैथिली मातृत्व बाल साहित्यके अगाडि बढाबही पडत । ओना तऽ गैर सरकारी संस्था आसमान नेपाल बालबालिकाक लिखल ‘बाल शक्ति पत्रिका’ तीन महिना पर प्रकाशित कय रहल अछि । एहि सँ ओकर समाधान नहि अछि । ओहि मे एकदूगो बाल कविता सँ मात्र मैथिली मातृत्व के नहि बचा सकैत छी । ऐकरा लेल एखनो बुढ पुरानक बात विचार आ ओहिक समय वातावरण के ब्यख्या करही टा पडत । रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। डॉ.अरुण कुमार सिंह, भारतीय भाषा का भाषावैज्ञानिक सांख्यिकी संकाय,भारतीय भाषा संस्थान, मैसूर मातृभाषाक माध्यमसँ उच्चशिक्षा किछु समयसँ देशमे उच्चशिक्षाक माध्यम एवं विषयवस्तुकेँ लए कए विमर्श चलि रहल अछि। एक दिस बाबा रामदेव अनशनक समय अपन मांग मे भारतीय भाषाक माध्यमसँ उच्च शिक्षाक मांग रखलन्हि, तँ दोसर दिस मुंबई उच्च न्यायालयक एक गोट फैसलामे कहल गेल अछि जे लोक सेवा आयोगक अंतिम परीक्षा अर्थात् साक्षात्कारमे परीक्षार्थी अपन मातृभाषामे जबाब दए सकैछ। एक तरहेँ ई कार्यपालिका पर दुईतरफा दबाब अछि । एक दिसतँ लोकतांत्रिक दबाब जनसमूहक रूपमे रामलीला मैदानमे जमा भएकेँ, तँ दोसर दिस न्यायपालिका भारतीय भाषाक पक्षमे निर्णय दए केँ। विश्वमातृभाषा दिवसक अवसर पर दिल्लीमे बुद्धिजीवी एवं लेखकक प्रतिनिधिमण्डल सरकारकेँ एक गोट विज्ञापन देने छलाह, जाहिमे कहल गेल छल जे विश्वविद्यालय अनुदान आयोग द्वारा जारी नियमावलीमे पी.एच.डी.क लेल अनिवार्य दुई शोध-पत्रमे सँ एक मातृभाषामे हो। एहि तरहेँ देखल जा रहल अछि जे अंग्रेजीकेँ कात करैत भारतीय भाषाकेँ प्रश्रय देबाक बात शुरु भए चुकल अछि । मातृभाषा ओहन भाषा होइछ, जकर माध्यमसँ कोनो नेता अपन घर, परिवार आओर समाजकेँ बुझि पबैछ। पहिल भाषा होएबाक कारणेँ मातृभाषे कोनो व्यक्तिक चिंतन-प्रक्रियामे कार्य करैछ। एहि लेल प्रतिभाक सभसँ पैघ अभिव्यक्ति पहिल भाषे मे होइछ। जँ कोनो व्यक्ति बहुभाषी अछि तँ ओ पहिल भाषाक पृष्ठभूमि पर कोनो दोसर भाषा सीखैछ आओर एक तरहेँ चिंतन-प्रक्रियाक बीचे मे मातृभाषा आओर दोसर भाषाक बीच अनुवाद करैत रहैछ। एहि स्थितिमे ओ दोसर भाषामे कतबा निपुण अछि ई एहि पर निर्भर करैछ जे ई मानसिक अनुवाद ओ कतबा कम समयमे कए पबैछ। संविधान स्वीकृत 22 भाषामे जतबा उच्च शिक्षण कार्य भए रहल अछि, ओहिसँ बहुत बेसी एक मात्र अंग्रेजी भाषाक माध्यमसँ भए रहल अछि। आब प्रश्न उठैछ जे जाहि शिक्षण-पद्धतिकेँ मैकालेक विरासत एवं आओर अंग्रेजी साम्राज्यक विस्तार कहल जाइछ, ओकर कोनो ठोस विकल्प आइ धरि किएक नहि उभरि पाओल? एकर प्रमुख कारणमे भारतीय भाषाक आपसी संघर्षकेँ नजरअंदाज नहि कएल जाए सकैछ। दोसर ई जे एहि भारतीय भाषाक ज्ञान-परंपरामे कतए धरि पहुँच अछि? की आइ प्रौद्योगिकी, अंतरिक्ष, चिकित्सा, विधि, प्रबंधन आदि विधाक उच्चतम रूपकेँ भारतक कोनो क्षेत्रीय भाषामे सहजतासँ अभिव्यक्त कएल जाए सकैछ? हमरा बुझने कठिन अछि। एहन बात नहि अछि जे भारतीयभाषाक क्षमता संदिग्ध अछि, जखनकि लोकभाषाक शब्द-सामर्थ्य बहुत रास भाषाक तुलनामे समृद्ध अछि। मुदा विषयवस्तुक उपलब्धता एकटा पैघ समस्या अछि। एहि बातकेँ सहर्ष स्वीकार कएल जएबाक चाही। ओनाहूँ कोन भाषामे कीसब सामग्री रहबाक चाही ई भाषा नहि, अपितु समाजक जिम्मेदारी होइछ। जँ भाषा दरिद्र अछि, तखनो आर समृद्ध अछि तखनो। विकासक अपन परिवेश आओर अपन शब्दावली होइछ, जकरा दोसर भाषामे सम्पूर्ण रूपसँ घुलि-मिलि जएबामे सालक-साल लागि जाइछ। उदाहरणस्वरूप ‘हेलो’ शब्दकेँ लेल जाए सकैछ। कहल जाइछ जे अमेरिकी आविष्कारक थॉमसन पहिल बेर टेलीफोनसँ ई जानबाक लेल जे ओकर आबाज पहुँचि रहल अछि कि नहि ताहि लेल ‘हेलो’ शब्द बजने छल। तहियासँ आइ धरि टेलीफोनक कतेक स्वरूप सोझ आएल, मुदा पहिल बेर बाजल शब्द ‘हेलो’ मे कोनो परिवर्त्तन नहि आएल। जँ इएह आविष्कार भारतमे भेल’ रहैततँ ई पहिल शब्द कोनो-ने-कोनो भारतीय भाषाक शब्द रहल होएत। जँ आत्मालोचनक दृष्टिसँ देखल जाए तँ भारतीय भाषाक वैज्ञानिकता पर कोनो संदेह नहि अछि। मुदा ओहिमे अभिव्यक्त विज्ञानकेँ संदिग्धताक घेरासँ बाहर नहि लाबल जाए सकैछ। किएकतँ विज्ञान एहि भाषामे जन्म नहि लैछ, अपितु अनुदित होइछ। आय जँ एक दिस विश्व बजार पर स्थापित होएबाक प्रतिस्पर्धा चलि रहल अछि तँ दोसर दिस अपन क्षेत्रीयताक पहचान समाप्त नहि भए जाए तकर दबाब सेहो देखल जाए रहल अछि। एहन परिस्थितिमे भारतमे उच्च शिक्षामे स्थानीय भाषाक प्रयोगक चहुँदिस मांग एक स्वागतयोग्य डेग भए सकैछ। परंच ओकर स्थायी स्तित्व तखन रहत जखन मूल एहि भाषामे पल्लवित-पुष्पित हो। भाषा अभिव्यक्तिक साधन होइछ; आत्माक अभिव्यक्तिक आओर सत्ता अभिव्यक्तिक सेहो। वर्त्तमान मांगक फलस्वरूप जाहि लोकभाषासँ भूख आओर प्रतिरोध अभिव्यक्त होइछ एवं एकरा माध्यमेँ सत्तामे घूसपैठक चर्चा सेहो भए सकैछ। की ई प्रयास सत्तासीन वर्गकेँ मंजूर भए सकैछ? तेँ ई देखब बेस उत्सुकताक विषय होएत जे कोर्टक फैसलासँ लाभान्वित होइत छात्र मातृभाषामे साक्षात्कार दए केँ चयनित होएबामे कतबा सफल होइछ। भारत एक बहुभाषिक देश अछि, जतए 1652 मातृभाषा अछि। संविधान जाहि 22 भाषाकेँ मान्यताक देलनि अछि ओहो कोनो अंतिम भाषा नहि अछि। संवैधानिक मान्यताक लेल बहुत रास भाषा-भाषीक एक पैघ समूह बरोबरि सक्रिय अछि, आओर कोनो एहन तर्क नहि अछि जकर आधार पर एकर सक्रियताकेँ नजरअंदाज कएल जाए सकैछ। जखन कोनो भाषा रोजगारसँ जुड़ैछतँ एहि तरहक प्रयासकेँ आर बल भेटैछ। ओनातँ मैसूर स्थित भारतीय भाषा संस्थानक अन्तर्गत भारतीय भाषाक भाषा वैज्ञानिक सांख्यिकी संकाय’मे नेचूरल लेंग्वेज प्रोसेसिंगक माध्मयमे मैथिलीकेँ मशीनसँ जोड़बाक काज प्ररांभ भए गेल अछि संगहि राष्ट्रीय अनुवाद मिशन ज्ञानपरक पोथीक भारतक 22 भाषामे अनुवादक योजनापर काज कए रहल अछि। एहि सबसँ माध्यम भाषे मे बदलाव आओत, जखनकि आवश्यकता एहि बातक अछि जे एहि भाषासभमे ज्ञानपरक सामग्री उपलब्ध हुए जाहिसँ समाजक आग्रह स्वतः एहि भाषासभक प्रति बनए आओर उच्च शिक्षामे भारतीय भाषाक संग-संग मैथिली सेहो अपन वृहत्तर दायित्वक सामंजस्यपूर्वक निर्वहन कए सकए। ई सब तखन संभव भए सकत जखन मैथिल (मिथिलामे निवास करए वला सभ जाति, वर्ग, धर्म एवं सम्प्रदायक लोक) अपन मौलिक चिंतन एवं शोधक माध्यमसँ एकर नेतृत्त्व करताह। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। बेचन ठाकुर बाप भेल पित्ती (महान सामाजिक मैथिली नाटक) पहिल अंक दृश्य- एक (स्थान- लखनक घर। दलानपर लखन, लखनक कक्का मोतीलाल, भाए बौहरू बड़का बेटा मनोज आ छोटका बेटा संतोष उपस्थित छथि। लखन चिन्तित मुद्रामे छथि। सभ कियो चौकीपर बैस विचार-विमर्श कए रहल छथि। बारह वर्षीय मनोज आ दस बर्षीय संतोष दलानपर माटि-माटि खेल रहल अछि। मोतीलाल- लखन, चिन्ता-फीकीर छोड़ू। की करबै? भगवानकेँ जे मर्जी होइत अछि, ओकरा के बदलि सकैत अछि? अहाँ कनियाँकेँ एतबे दिनका भोग छेलै। आब अहाँक की विचार भऽ रहल अछि? लखन- कक्का, अपने सभ जे जेना विचार देबै। मोतीलाल- हम सभ की विचार देब? पहिने तँ अहाँक अपन इच्छा। लखन- दूटा छोट-छोट बौआ अछि। ओकर पतिपाल केना हाएत? जँ कुल-कनियाँ नीक भेटत तँ दोसर कऽ लइतौं। मोतीलाल- भातीज, अहाँक नीक विचार अछि। ऐ उमेरमे अहाँक िनर्णए हमरो उचित बुझना जाइत अछि। बौहरू- कक्का, एगो कहबी जे छै ‘सतौत भगवानोकेँ नै भेलै’ से? मोतीलाल- बौआ, तोहर की कहब छह? लखनकेँ बिआह नै करबाक चाही की? बौहररू- हँ, हमर सहए कहब रहए। भैया कनी तियाग कऽ दुनू छौंराकेँ पढ़ा-लिखा कऽ बुधियार बनाबितथि। ओना भैयाकेँ कनियाँ केहेन भेटतनि केहेन नै। मोतीलाल- हमरा विचारसँ लखनक परिस्थिति बिआह करैबला अवस्स अछि। लखन- कक्का, नजरिमे दऽ देलौं। जदी सुर-पता लगए तँ जोगार लगाएब। मोतीलाल- बेस देखबै। पटाक्षेप। दृश्य- 2 (स्थान- मदनक घर। ओ अपन बिआहल बेटीक बिआहक चिन्तामे लीन छथि। कातमे पत्नी-गीता दलान झाड़ि रहल छथि। मोतीलालक समधिक समधि हरिचन मोतीलालकेँ मदनक ऐठाम कुटुमैतीक संबंधमे लऽ जाए रहल छथि। हरिचन मदनक ग्रामीण छथि हिनका दुनूक पहुँचैत मातर गीता घोघ तानि अन्दर चलि जाइत छथि। दलानपर तीन-चारिटा कुर्सी लागल अछि। मोतीलाल आ हरिचनक प्रवेश।) हरिचन- (कर जोड़ि) नमस्कार मदन भाय। मदन- नमस्कार नमस्कार। मोतीलाल- नमस्कार कुटुम। मदन- नमस्कार नमस्कार। बैसै जाइ जाउ। (दुनू जन बैसलाह। संजय, संजय, बेटा संजय, संजय। संजय- (अन्दरसँ) जी पिताजी, हइए ऐलौं। (संजयक प्रवेश।) (हरिचनकेँ मदन पकड़ि कऽ अंदर लऽ जाइत छथि।) मदन- लड़िकाकेँ बेटा दुगो छै आ अस्था-पाती? हरिचन- गोटेक बीघाक अन्दरे छै। अपना भरि कोनो दिक्कत नै छै। मदन- की करी की नै, किछु नै फुराइए। हरिचन- हमरा सभकेँ लट होइए। यदि विचार हुअए तँ हुनका लड़िकी देखाए दियनु। नै तँ कोनो बात नै। मदन- बेस अपने दलानपर चलू। हम बुच्चीकेँ लेने आबै छी। (हरिचन दलानपर आबि गेलाह किछुए काल बाद मदन सेहो आबि गेलाह।) मदन- चलू, देखल जेतै। कऽ लेबै। आगू भगवानक मर्जी। हम लड़िकीक बाप छिऐ। तँ हमरा लड़िका देखबाके चाही। मुदा हम सभ दिन अहाँपर विश्वास करैत रहलौं। आइ कोना नै करब? हरिचन- हम अहाँक संग बिसवासघात केलौं? मदन- से तँ कहियो नै। ओना दुनियाँ बिसवासेपर चलै छै। (वीणाक संग मीनाक प्रवेश। मीना सभकेँ पएर छूबि गोर लगैत अछि।) हरिचन- कुर्सीपर बैसू बुच्ची। (मीना कुर्सीपर बैसैत अछि। वीणा ठाढ़े अछि।) मोतीलाल बाबू, लड़िकीकेँ किछु पूछबो करबनि, तँ पुछियौ। मोतीलाल- की पुछबनि, किछु नै। हरिचन- बुच्ची अहाँ चलि जाउ। (मीना सभकेँ गोर लागि अन्दर गेलीह।) मदन- हरिचन भाय, लड़िकी अपने सभकेँ पसीन भेलीह? मोतीलाल- हँ, लड़िकी हमरा लोकनिकेँ पसीन अछि। मदन- तहन अगिला कार्यक्रम की हेतै? हरिचन- जे जेना करीऔ। ओना हम विचार दैतौं जे बिआह मंदिरमे कऽ लैतौं। चीप एण्ड बेस्ट। मदन- कहिया तक? हरिचन- कहिया तक, चट मंगनी पट बिआह। काल्हिये कऽ लिअ। बढ़िया दिन छै। कुटुमैती लगा कऽ नै रखबाक चाही। मदन- भाय, ओरियान कहाँ किच्छो छै? हरिचन- जे भेलै सेहो बढ़िया, जे नै भेलै सेहो बढ़ियाँ। आदर्शेमे आदर्श। मदन- बेस, काल्हुके रहए दिऔ। हरिचन- जाउ, जे भऽ सकए, ओरियान करू। हम सभ सेहो जाइ छी। जय रामजी की। मदन- जय रामजी की। (हरिचन आ मोतीलालक प्रस्थान।) होनी जे हेबाक हेतै, सएह ने हेतै। आप इच्छा सर्वनाशी, देव इच्छा परमबल:। पटाक्षेप। दृश्य- 3 (दूश्य- लखनक बरिआतीक तैयारी। वर-लखन, मोतीलाल, बौहरू, मनोज आ संतोष मदनक ओइठाम जा रहल छथि। मदन अपन घरक कातमे एकटा शिव मंदिरक प्रांगणमे बिआहक पूर्ण तैयारी केने छथि। सात गोट कुर्सी आ एक गोट टेबूल लगल अछि। पंडीजी गणेश महादेवक पूजा कए रहल छथि। मदन, मीना, गीता हरिचन, संजय आ वीणा मंदिरक प्रांगणमे थहाथही कए रहल छथि तथा बरियातीक प्रतीक्षा कए रहल छथि। मीना कनियाँक रूपमे पूर्ण सजल अछि। बरियाती पहुँचलाह। डोलमे राखल पानिसँ सभ बरियाती हाथ-पएर धोइ कऽ कुर्सीपर बैसलाह आ लखन बरबला कुर्सीपर बैसलाह। बापेक कातमे एक्के कुर्सीपर मनोज आ संतोष बैसलाह। मदन प्रांगणमे आबि जलखैक बेवस्था केलनि। सभ कियो जलखै कऽ रहल छथि।) मनोज- पापा, पापा, नाच कखैन शुरू हेतै? लखन- धूर बूरबक, अखैन किछु नइ बाज। लोक हँसतौ। मनोज- किअए हौ, लो हँसतै तँ हमहूँ हँसबै। कहऽ न नटुआ कखैन औतै? लखन- चुप चुप, नटुआ नै कही। लड़िकी औतै। मनोज- कए गो लड़िकी औतै? कार्केस्ट्रा कखैन शुरू हेतै? लड़िकी संगे हमहूँ नचबै, गेबै आ रूमाल फाड़ि कऽ उड़ेबै। पापा हौ, लड़िकीकेँ कहबै खाली रेकाँडिंगे हांस करैले। अगबे भोजपूरीयेपर। लखन- चूप बड़ खच्चर छेँ रौ। आर्केस्ट्रा नै हेतै। डंस नै हेतै। मनोज- तखन एतए की हेतै हौ पापा? लखन- हमर बिआह हेतै बिआह। संतोष- पापा हौ, तोहर बिआह हेतै आ हमर नै। लखन- हँ हँ, तोरो हेतै। संतोष- कहिया हेतै? लखन- नमहर हेबहीन तहन हेतौ। संतोष- हम नमहर नै छिऐ। एत्तेटा तँ भऽ गेलिऐ। आब बिआह कहिया हेतै? लखन- बीस साल बाद हेतौ। संतोष- बीस साल बाद बुढे भऽ जेबै तँ बिआह कए कऽ की हेतै? हम आइये करब। लखन- आइ तोरा ले लड़िकी कहाँ छै? संतोष- आँइ हौ पापा, तोरा ले लड़िकी छै आ हमरा ले नै छै। केकरोसँ कऽ लेबै। लखन- केकरासँ करबिहीन? संतोष- मौगी सभ औतै न तँ ओइमे जे सभसँ मोटकी मौगी हेतै, ओकरेसँ करबै। दूधो खूब पीबै नम्हरो हेबै आ मोटेबो करबै। पापा हौ, हमरा लोकनियामे तोरे रहए पड़तह। लखन- बेस रहबौ बौआ। (जगमे पानि आ गिलास लऽ कऽ संजयक प्रवेश। सभ कियो पानि पीलनि आ हाथ-मुँह धोइ अपन-अपन जगहपर बैसलाह। पंडीजी पूजा पूर्णाहुतिक पश्चात बर लग बैस जलखै केलाह।) गणेश- अहाँ सभ विलंब किअए करै छी? बिआहक मुहुर्त्त हुसि रहल अछि। हौ, हौ, जल्दी चलै चलू। कोनो चीजक टेम होइ छै किने? (लड़िकीक संग सरयातीक प्रवेश। सभ कियो मंदिरपर गेलाह। सतहपर बिछाएल दरीपर बैसलाह।) गणेश- आउ लड़िका-लड़िकी, हमरा लग बैसू। (लखन आ मीना पंडीजी लग बैसैत छथि। पंडीजी दुनूकेँ अपन रामनामबला चद्दरि ओढ़ा दैत छथिन। दुनूकेँ हाथमे अरबा चाउर आआेर कुश दइ छथिन।) गणेण- लड़िका-लड़िकी पढ़ू- मंगलम् भगवान विष्णु, मंगलम् गरूड़ध्वज: मंगलम् पुण्डरीकाक्ष मंगलाय तनोऽहरि:।। लखन, मीना- मंगलम्.....। (पंडीजी तीन बेर ई मंत्र पढ़ा कऽ अपना बगलमे राखल सेनूरक पुड़ियामे सँ एक चुटकी सेनूर लड़िकाक हाथमे देलनि।) गणेश- बिआहक मुहुर्त्त बीति रहल छल। तँए हम एक्केटा मंत्र बिआह करा दै छी। आब सिन्दुरदान होइए। लड़िका, लड़िकीक मांगमे सेनूर दिअनु। (लखन मीनाक मांगमे सेनूर देलनि।) आब अपने सभ दुर्वाक्षत दिअनु। (पंडीजी पैघ सबहक हाथमे दुर्वाच्छत देलखिन।) मंत्र- ऊँ. अाब्रह्न ब्राह्मणो। मित्राणामुदयस्तव। (मंत्रक बाद सभ कियो लड़िका-लड़िकीकेँ दुर्वाक्षत देलखिन।) लाउ, दुनू समधि दक्षिणा-पाती। सस्तेमे अहाँ सभ निमहि गेलौं। (दुनू समधि एकावन-एकावन टका दक्षिणा देलखि।) इएह यौ, एक्को किलो रहुक दाम नै। खाइर जाउ। मदन- पंडीजी लड़िकी-लड़िकीकेँ असीरवाद दिअनु। (लड़िका-लड़िकी पंडीजीकेँ पएर छूबि प्रणाम करैत छथि। पंडीजी असीरवाद दइ छथिन।) मोतीलाल- पंडीजी मोनसँ असीरवाद देबै। गणेश- हँ यौ, दक्षिणे गुणे ने असीरवाद भेटत। (सभ कियो जा रहल छथि।) पटाक्षेप। दृश्य- चारि (स्थान रामलालक घर। रामलालक दुनू पत्नी लक्ष्मी आ संतोषी घरमे हुनका सेवा कऽ रहल छथि। लक्ष्मी पक्षमे दूगो बेटी-एगो बेटा छन्हि। तथा संतोषी पक्षमे एगो बेटी-दूगो बेटा छन्हि। छओ भाए-बहिन एक्के पब्लिक स्कूलमे पढ़ए गेल छथि।) रामलाल- लड़की सभ धिया-पुता नीक जकाँ घरपर पढ़ै-लिखै अछि न? हम तँ भिनसर जाइ छी से रातियेमे अबै छी। पेटक पूजा तँ बड़ पैघ पूजा छै किने? हम नै पढ़लौं से अखैन पछताइ छी। लक्ष्मी- छौड़ाक लक्ष्ण अखैन बड़ नीक देखै छिछे, अग्रिम जे हुअए। हमरा सभकेँ पढ़ैले कहए नै पढ़ै अछि। रामलाल- छोटकी, अहाँ किछु नै बजै छी। संतोषी- दुनू गोटे एक्के बेर बाजि देब तँ अहाँ की सुनबै आ की बुझबै? रामलाल- कोनो तकलीफ अछि की? संतोषी- जेकरा अहाँ सन घरबला रहतै, तेकरा तकलीफो हेतै आ अहुँसँ होशगर बड़की छथि। स्वामी, एगो गप्प पूछी? रामलाल- एक्के गो किअए, हजार गो पूछिते रहू। संतोषी- अहाँ, एहेन चिक्कन घरवालीकेँ रहैत दोसर बिअाह किअए केलिऐ? रामलाल- बड़कीसँ बेटा होइमे किछु बिलंब देखलिऐ तँए दोसर केलिऐ। संतोषी- नै यौ, दोसर गप्प भऽ सकै छै। रामलाल- हमरा तँ नै बूझल अछि, अहीं बाजू दोसर की भऽ सकै छै? संतोषी- अहाँकेँ अहाँकेँ अहाँकेँ एगोसँ मोन नै भरल। रामलाल- बस करू, बस करू, अहाँ तँ लाल बुझक्करि छी। अहाँ तँ अंतर्यामी छी। ओना मोनकेँ जतए दौगेबै, ओतए दौगतै। मन ही देवता, मन ही ईश्वर, मन से बड़ा न कोइ। मन उजियारा जब जब फैले, जग उजियारा होय।। (इसकूल पोशाकमे सोनीक प्रवेश।) सोनी- पापा, पापा, इसकूलक फीस दियौ। रामलाल- माएकेँ कहियौ बुच्ची। सोनी- माए, इसकूलक फीस दहिन। लक्ष्मी- कत्ते फीस लगतौ? सोनी- तों नै बुझै छीही छअ गो विद्यार्थीक छअ सए टाका। लक्ष्मी- छोटकी, जाउ, दऽ दियौ ग। संतोषी- बेस लेने अबै छी। (संतोषी अन्दर जा कऽ छअ सए टाका आनि सोनीकेँ देलनि आ फेर पति सेवामे भीर गेलीह।) रामलाल- छोड़़ै जाइ जाउ आब। अंगना-घर देखियौ। अहुँ सभकेँ कनी काज होइ छै। (दुनू पत्नी चलि गेलीह।) पटाक्षेप दृश्य- पाँच (स्थान- रामलालक घर। रमाकान्त मुखियाक संग बलदेब वार्ड सदस्यक प्रवेश।) बलदेव- (दलान परसँ) रामलाल रामलाल भाय। रामलाल- (अन्दरेसँ) हइए एलौं भाय। दलानपर ताबे बैसु। जलखै कएल भऽ गेल। बलदेव- मुखियोजी एलाह, कने जल्दिये एबै। रामलाल- तहन तुरन्त एलौं। (हाथ-मुँह पोछिते प्रवेश। प्रणाम-पाती कऽ अन्दरसँ दूटा कुर्सी अनलनि। रमाकान्त आ बलदेब कुर्सीपर बैसलाह मुदा रामलाल ठाढ़े छथि।) रामलाल- मुखियाजी, आइ केम्हर सूरूज उगलै? आइ रामलाल तरि गेल सरकार। कहियौ सरकार हम केना मन पड़लौं। इनरा आवासबला कोनो गप्प छै की? बलदेव- गप्प तँ इएह छै। मुदा पहिने कुशल-छेम, तहन ने अगिला गप-सप्प। कहु अपन हाल-समाचार। रामलाल- अपने सबहक किरपासँ हमर हाल-समाचार बड्ड बढ़ियाँ अछि। भाय, अपन हाल-चाल कहु। बलदेव- भाय, एकदम दनदनाइ छै। रामलाल- आ मुखियाजी दिशिका। रमाकान्त- हमरो हाल-चाल बड़ बढ़िया अछि। वएह एलेक्शन नजदीक छै तँए पंचायतमे घुमनाइ अावश्यक बुझलौं। संगे संग अहुँक काज रहए। रामलाल- तहन अपने किअए एलिऐ, हमहीं चलि अबितौं। रमाकान्त- देखियौ, जनता जानार्दन होइ छै। पहिने जनता तहन हम। जनता मुखियाकेँ बड़ आशासँ चुनै छै। ओइ आशाक पूर्ति केनाइ हमर परम कर्त्तव्य छै। रामलाल- अपने महान छिऐ। अपनेक आगू हम की बजबै? बलदेव- मुखियाजी, कने ओकरो ऐठाम जाइक छै। हिनकर काज जल्दी कऽ दियनु। रमाकान्त- तहन दऽ दियनु। (बलदेव बेगसँ बीस हजार टाका निकालि रामलालकेँ देलखिन।) रामलाल- (पाँच सए टाका निकालि) मुखियाजी, ई अपने राखि लिऔ। रमाकान्त- नै, ई नै भऽ सकैए। ई अपने रखियौ। हमरा पेट ले बहुते फंड छै। कहबी छै- ओतबे खाइ जइसँ मोंछमे नै ठेकए। रामलाल- भगवान, एहेन मुखिया सगतर होइ छै। बलदेव- रामलाल भाय, जतए-ततए सुनै छी अहाँक परिवारक संबंधमे। तँ मन हर्षित भऽ जाइए। एहेन सुन्दर ढंगसँ परिवार चलेनाइ आइ-काल्हि असंभव अछि। रामलाल- सभ भगवानक किरपा छनहि आ अपन करतब तँ चाहबे करी। रमाकान्त- हमरा लोकनि जाइ छी। जाउ, अहुँ अपन काम-काज देखियौ। (रमाकान्त आ बलदेवक प्रस्थान) रामलाल- धन्यवाद बलदेव भाय, धन्यवाद मुखियाजी एहिना सभ जनतापर खिआल रखबै। पटाक्षेप। दृश्य- छह (स्थान- लखनक घर। मीना अपन बेटी रामपरी आ बेटा कृष्णाक संग बैडमिंटन खेल रहल अछि। रामपरी- मम्मी, कसि कऽ मारहीन ने। काँर्क नै उड़ै छौ। मीना- बेसी कसि कऽ नै लगै छै। कम-सँ-कम बौओ जकाँ बमकाही ने? (मनोजक प्रवेश) मीना- ओएह, एलौ सरधुआ भांड़ैले। रामपरी- आबए दहीन ने मम्मी। भायजी छथिन। मीना- भायजी छथिन। कप्पार छथिन। काँर्क फूटि जेतौ तँ आनि कऽ देतौ? रामपरी- मम्मी, भायजी कतए सँ आनि कऽ देतै, तोंही कह तँ। आकि पापा आनि देथिन। मीना- पापाकेँ हम जे कहबै, से करथुन। तोहर कहल नै करथुन। रामपरी- मम्मी, ई गप्प तोहर नीक नै भेलौ आ पापोकेँ नीक नै भेलनि। मीना- तों पंचैती करैले एलँह की बैडमिंटन खेलैले? खेलबाक छौ तँ खेल नै तँ जो एत्तएसँ। रामपरी- तोंही सभ खेल, हम जाइ छी। (खीसिया कऽ रामपरीक प्रस्थान। रामपरीबला बैटसँ मनोज बैडमिंटन खेलए लगैत अछि। मीना बएटेसँ ओकरा मारैले छुटैत अछि। फेर दुनू माय-पुत बैडमिंटन खेलए लगैत अछि।) कृष्णा- मम्मी, तोरा दीदी जकाँ खेलल नै होइ छौ। कने पापाकेँ कहबीन सीखा दइले से नै। मीना- बौआ, पापा हमरा की सिखेलखुन, हमहीं सीखा दइ छिऐ। कृष्णा- तेकर माने तों पापासँ जेठ छीही? मीना- उमरमे भलहिं छोट हएब मुदा अकलमे निश्चिते जेठ। (संतोषक प्रवेश) संतोष- हमहूँ खेलबै कृष्णा। (बैट लऽ कऽ खेलए लगैत अछि। झटसँ मीना संतोषक हाथसँ हाथ मोचारि कऽ बैट लऽ लैत अछि। टुनकीबला आ मुड़ीमचरूआ कहि बैटसँ मारैले दौगैत अदि। संतोष भागि जाइत अछि। ओइपर खीसिया कऽ कृष्णा एक बैट मम्मीकेँ बैसा दैत अछि।) कृष्णा- तों बड़ खच्चर छेँ मम्मी। खेलल-तेलल होइ छौ नहियेँ आ जमबै छेँ। अखैन संतोष भायजी रहिते तँ खूम बैडमिंटन खेलतौं की नै। मीना- संतोशबा तोहर भायजी नै छिऔ। जेकर छिऐ से बुझतै। तोरा ओकरासँ कोनो मतलब नै। कृष्णा- किअए मम्मी? उहो तँ हमरे पापाक बेटा छिऐ ने? मीना- मुदा तोहर मम्मीक बेटा नै ने छिऐ। कृष्णा- बुझबीहीन तँ किअए नै हेतै? नै बुझबीहीन तँ हमहूँ-हमहूँ तोहर दुश्मन छिऔ। मीना- बकबास नै कर। काल्हि जनमलेँ आ बुढ़बा जकाँ गप्प करै छेँ। सभ बात तों अखैन नै बुझबीहीन। आब काल्हि खेलिहेँ चल। (बैट-काँर्क लऽ कऽ मीना-कृष्णाक प्रस्थान।) पटाक्षेप। अंक दोसर दृश्य- एक (स्थान- रामलालक घर। संतोषी बिस्तरपर पड़ल अछि। पाँच भाय-बहिन इसकूल गेल अछि। मुदा सोनी घरेपर अछि सोनीक तबीयत ठीक नै अछि।) संतोषी- सोनी बुच्ची, कनी देह दबा दिअ तँ? सोनी- हमरा अपने माथ दुखाइए। तँए इसकूलो नै गेलौं। अखन धरि बासिये मुँहेँ छी। खैर अहाँ तँ छोटकी माए छी। अहाँक अज्ञाक पालन केनाइ हमर परम कर्त्तव्य छी। संतोषी बुच्ची अहाँ बुधियार छी ने। (सोनी संतोषीक देह दबाए रहल अछि।) साेची- छोटकी माए, बड़ भुख लागल-ए, कनी खाइले दिअ। संतोषी- हमरा नै हएत। जाउ अपनेसँ लऽ लिअ गऽ। सोनी- एक दिन अहीं कहने छेलिऐ, अपनेसँ खाइले कहियो नै लइले। धिया-पुताकेँ घटि जाइ छै। तँए हम अपनेसँ नै लेब। संतोषी- लिअ वा नै लिअ। हमरा बुते नै हएत देल। अपना देहमे करौआ लागल अछि। सोनी- जाइ छिऐ बड़की माएकेँ कहैले। (सोनी, लक्ष्मीकेँ कहैले अन्दर गेलीह एम्हर संतोषी और गबदिआ कऽ पड़ि रहलीह। सोनी आ लक्ष्मीक प्रवेश।) लक्ष्मी- छोटकी, छोटकी, छोटकी। सोनी- अखने जगले छेलै। तुरन्ते देखही। गै माए सूतल लोक ने जगैए, जागल की जगतै। लक्ष्मी- (जोरसँ) छोटकी, छोटकी, छोटकीऽ ऽ ऽ ऽ। (संतोषी फुरफुरा कऽ उठै छथि।) संतोषी- की कहलिऐ दीदी? लक्ष्मी- सोनीकेँ अहाँ किअए कहलिऐ, देहमे करौआ लागल अछि? संतोषी- हम से कहाँ कहलिऐ। हम अपना दऽ कहलिऐ जे हमरा देहमे करौआ लागल अछि की। एतबेपर बुच्ची भागि गेलीह। सोनी- अपन बेटाक माथपर हाथ रखि कऽ कहबै? संतोषी- हम बजबे नै केलिऐ। एतेक आगि किअए उठबै छी सोनी। साेनी- आगि तँ अहाँ उठबै छी आ लगबै छी। हमरे माथपर हाथ रखि कऽ बाजू तँ। संतोषी- हँ यै साँच बात किएक ने बाजब। आउ, लग आउ। लक्ष्मी- बूझि गेलौं अहाँ कत्ते साँच बजै छी। अनकर बेटा-बेटी उपरेमे अबै छै आ अपन बड़ कसेब कऽ छै। िनर्लज्जी नहितन। झूठ बजैत कोनो गत्तरमे लाजो नै होइ छन्हि। संतोषी- िनर्लज्जी तँ अहाँ छी जे बेटीक पक्ष लऽ कऽ फेफिया कऽ उठै छी। लक्ष्मी- िनर्लज्जी िनर्लज्जी करब तँ अखैन झोंटा पकड़ि कऽ पोटा िनकालि देब। संतोषी- कनी देखियौ तँ झोंटा पकड़ि कऽ। (रामलालक प्रवेश) रामलाल- अहाँ सभ कतीले हल्ला-फसाद करै छी? चुपै जाउ। छोटकी, की बात छै? संतोषी- दुनू माइ-धीन हमरा कहैए, झोंटा पकड़ि कऽ पोटा निकालि देब। रामलाल- बड़की, अहाँ से किअए कहलिऐ? लक्ष्मी- हँ हँ, हमरा सींग बढ़ि गेलै तँए दुआरे। ओकरे पुछिऐ तँ। रामलाल- की बात छै छोटकी? संतोषी- ओकरे सभकेँ पुछियौ। रामलाल- की भेलै बुच्ची? सोनी- हमरा माथा दुखाइ छेलए। इसकूलो नै गेलौं। बासिये मुँहेँ रही। छोटकी माएकेँ कहलियनि खाइले दिअ। तँ ओ कहलनि, अपनेसँ लऽ लिअ। देहमे करौआ लगल अछि। ई बात बड़की माएकेँ कहलियनि तँ ओ माएसँ लड़ैले तैयार छथि। रामलाल- हमरा तोरापर विश्वास अछि बुच्ची। तों फूसि नै बाजि सकै छेँ। हम बात बूझि गेलौं। छोटकी, सोलहन्नी अहाँक गलती अछि। बड़कीसँ अहाँ लगती मानू। नै तँ एहेन घारवाली हमरा नै चाही। अपन जोगार देखू। जेहने हमर परिवारक सुबेवस्थाक चर्चा सौंसे गाम होइ छेलए तेहने परिवारक प्रतिष्ठाकेँ माटिमे मिलबए चाहैत अछि। तुरन्त सोचि कऽ बाजू, की चाहै छी? संतोषी- (किछु सोचि कऽ, बड़कीक पएर पकड़ि) हमरेसँ गलती भेलै। आब गलती कहियो नै हेतै। रामलाल- बड़की, आइ माफ कऽ दियनु। आइ दिनसँ गलती नै करतै। सदिखन मीलि कऽ रहै जाइ जाउ। “जहाँ सुमति वहाँ सम्पत्ति नाना। जहाँ कुमति वहाँ विपत्ति निधाना।” पटाक्षेप। दृश्य- दू (स्थान- लखनक घर। लखन दलानपर बैसल छथि आ पारिवारिक स्थितिक संबंधमे सोचि रहल छथि।) लखन- की करी नै करी, किछु ने फुराइत अछि। बेटी रामपरी सेहो ताड़ जकाँ बढ़ि रहल अछि। आमदनी कम छै आ परिवारमे खर्चा बड़ छै। (मनोज आ संतोषक प्रवेश।) मनोज- पापा, बहुते छौंड़ा सभ इसकूल जाइ छै पढ़ैले। हमहूँ सभ जाएब। हमरो सभकेँ नाम लिखा दिअ ने सरकारी इसकूलमे। लखन- नाम लिखबैमे पाइ लगतै, किताब-कोंपीमे पाइ लगतै, टीशन पढ़ैमे पाइ लगतै। हमरा ओतेक सकरता नै अछि। हमरा बुते नै हेतौ। पहिने पेटक चिन्ता कर। संतोषी- पापा, रामपरी आ कृष्णा जे पब्लिक इसकूल जाइ छै से? ओकरा सभकेँ पाइ नै लगै छै? लखन- से मम्मीसँ पुछही गऽ। पाइ कोनो हम दइ छिऐ। संतोषी- मम्मीकेँ बजा कऽ एत्तऽ आनू। कनी अपनेसँ कहबनि। लखन- जो बजा आन। (संतोष शीघ्र मीनाकेँ बजा कऽ अनैत अछि।) मीना- की कहै छी? लखन- की कहब। मनोज-संतोष कहैए हमहूँ पढ़ब, से की करबै। मीना- कप्पार करबै, अंङोरा करबै, धधकलहा करबै। लखन- एना कअए बजै छी? बोलीमे कनियो लसि नै अछि। हरदम निशाँमे चूर रहै छी। मीना- बड़ फटर-फटर बजै छी। मुँह बन्न करू नै तँ बूझि लिअ। जाउ अहाँ एत्तएसँ। एकरा सभकेँ हम जबाब दइ छिऐ। (लखनक प्रस्थान) की कहलेँ मनोज? मनोज- मम्मी, हमरो सभकेँ इसकूलमे नाम लिखा दिअ बहुते छौड़ा सभ इसकूल जाइ छै। मीना- बड़ पढ़ुआ भऽ गेलेँ तो सभ? गाँड़िमे गूँह नै माए गै हग्गब। बिना ढौए के पढ़ाइ छै की खेनाइ होइ छै? पेट भरै छौ तँए फुराइ छौ। एत्तऽ सँ अक्खैन भाग। नै तँ बढ़नी देखै छीहीन। कमा कऽ लाऽ तँ खो वा पढ़। नै तँ घर नै टपि सकै छेँ तों सभ। मनोज- मम्मी, हमरा सभकेँ कमाएल हेतै। जन मे के रखतै? मीना- नै कमाएल हेतौ तँ भीखे मँगिहेँ आ ओम्हरे खँहिहेँ। संतोष- अपना बेटा-बेटीकेँ पढ़ाबै ले होइए आ हमरा बेरमे की होइए? मीना- भगलेँ सरधुए सभ की? (बढ़नी लऽ कऽ मारैले दौगल। संतोष भागि गेल। मनोज पकड़ा गेल। “पढ़ुआकेँ सार अछि भगलेँ एत्तए से” कहि कहि मनोजकेँ मीना बढ़नीसँ झँटलक। अन्तमे हाथसँ छूटि कऽ कनैत-कनैत भागि गेल।) पढ़ैए। फोकटेमे पढ़ाइ होइ छै। (हकमैत-हकमैत) ऊपरेमे अल्हुआ फड़ै छै। पटाक्षेप। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। १.जगदीश प्रसाद मण्डल- पाँचटा विहनि कथा २.राम विलास साहु-दूटा विहनि कथा ३. चन्दन कुमार झा-विहनि कथा- टटका रचना १ जगदीश प्रसाद मण्डल पाँचटा विहनि कथा 1. गति-मुक्ति सज्जासनसँ उठि आँखि मीड़िते बाबा रमचेबलाकेँ उठबैत कहलखिन- “रे रमचेलबा, दिन-रातिकेँ लोक एकबट्ट करैक भाँजमे अछि आ तूँ ढेंग जकाँ पड़ले रहमे?” आँखिक काँच-सूखल काँची पोछैत रमचेलबा ओछाइनेपर सँ बाजल- “जे कहै छह से तँ कइये दइ छिअ। तखन ढेंग किअए कहै छह?” जाधरि बाबा नहलापर गुलाम फेंकितथि ताधरि ओछाइनपरसँ उठि रमचेलबा लगमे पहुँच गेलनि। बाबा कहलखिन- “रे तों ते हमर ने कऽ दइ छेँ, तइसँ थोड़े हेतौ।” मुँह बाँबि जहिना चूजा अहार मंगैत तहिना रमचेलबा पुछलकनि- “तब?” रमचेलबाक जिज्ञासा देखि बाबा कहलखिन- “अपना ले कर।” बाबाक पक्का चेला रमचेलबा। एक पाइ बाम-बुच नै। मुड़ी डोलबैत बाजल- “अच्छा, गिरह बान्हि लेलियह। मुदा ढेंग किअए कहलह?” रमचेलबाकेँ मानै जोकर भाषामे बाबा कहलखिन- “देख, जाबे गाछक शील काटि कऽ राखल रहै छै ताबे ढंेग कहबै छै। ओकरे जखन आड़ा-मशीनपर लऽ जा तख्ता चीड़ा नाव बना पानिमे दौड़बै छै तखन ओहो अपन भरि पेट आदमीकेँ धारमे झिलहोरि खेलैत पार करै छै। मुदा एकटा बात कहि दइ छियौ, जे जे पुछबाक होउ से पूछि ले, किअए तँ एको मिशिया जीवैक मन नै होइए।” पाछू उनटि रमचेलबा तकलक तँ बूझि पड़लै जे जाबे जीवैक लूरि नइए ताबे जीवै केना छी। तहूमे बाबाक संगे। मुदा बूढ़-पुरानक बिसवासे कत्ते जँ कहीं टटके आँखि मूनि देलनि तखन तँ अपनो मनमे आ हुनको मन लगले रहि जेतनि। पुछलकनि- “बाबा हौ, गति-मुक्ति केकरा कहै छै?” रमचेलबाक प्रश्न सुनि बाबा विह्वल भऽ गेलाह। भावावेषमे कहए लगलखिन- “चौबीसो घंटा जँ समए संग मनोनुकूल जिनगी जीबए लगी, यहए भेल गति-मुक्ति।” 2. चौकीदारी तीन दिन झंझारपुर-मधुबनी दौड़-बरहा केला पछाति चौकीदार रामटहल दास पछिला आठ मासक दरमहो आ आनो-आन भत्ता उठा सात बजे गामपर माने घर पहुँचल। रस्तेसँ निआरि लेलक जे आरो जे हेतइ से पछाति हेतइ पहिने भरि पोख सूतब। तीन दिनक दौड़-बरहा कोनो लज्जति देहक रहए देलक। ने नहाइक ठेकान आ ने खाइक। ठाकुरो जीकेँ एक लोटा जल नै चढ़ा सकलौं। खैर जे हौ, जे पुत हरबाही गेल देव-पितर सभसँ गेल। मुदा ओछाइनपर पहुँचैसँ पहिने जे काज अछि से तँ करए पड़त। अबिते मुँहक रोहानीसँ पत्नी परेखि नेने रहथि तँए पाँचटा तरूआ-भुजुआक ओरियानमे जुटि गेली। स्नान-धियान, तिलक-चानन, पूजा-पाठ कऽ रामटहल दास भोजन करए आँगन पहुँचल। अँगनाक चुहचुही देखि मनमे खुशी भेलै। मुदा चुहचुहीक कारण नजरिपर पड़बे ने कएल। पत्नीपर आँखि पड़िते आंकि लेल जे चुह-चुही आंगनक किरतबे नै आंगनवालीक किरतबे भेल अछि। चिक्कनि माटिक ठाँओं, नमगर-चौड़गर आसनपर बैसिते पाँचटा तरूआ, पाँचटा भुजुआक संग अचार-चटनी सजल थारी आगूमे देखलक। देखिते पत्नीसं किछु पूछैक विचार रामटहल दासकेँ भेल मुदा थारी राखि राम पिआरी सुतैक ओछाइन सरिऔनाइकेँ काजक एक नम्बर सूचीमे रखने, तँए अखन गप केना करितथि। सरकारीकरण नै भेला पूब चौकीदारी समाजक दायित्व बूझल जाइत छल। चौकीदारी टैक्सक रूपमे छोट-पैघ किसानसँ लेल जाइत छल आ पनरह रूपैआ मािसक वेतनक रूपमे देल जाइत छल। अन्हरिया सप्तमीसँ लऽ कऽ इजोरिया षष्टी धरि -पनरह दिन- गामक पहरा चौकीदार करैत छल। गाममे दूटा चौकीदार तँए एककेँ हाथमे फरसा आ दोसरकेँ हाथमे भाला रहैत छल। घरसँ निकलिते चौकीदार जोरसँ टाँहि दैत छल जइसँ गामोक लोक बूझि जाइत छल जे पहरूदार पहरा दइले निकलि रहल अछि। निन्न टुटिते बीड़ी-तमाकुलक संग कतौ माल-जालक तकतान तँ कतौ लघी-विरती शुरू भऽ जाइत छल। टोले-टोले घूमि-घूमि चौकीदार ठहकवो करैत आ जगेबो करैत। जँ कतौ चोर अभड़ैत तँ संग मिलि आगू-आगू दौगवो करैत। विल्कुल पारदर्शी कारोवार छल। ओछाइनपर पति-रामटहल दासकेँ देखिते रामपियारीक मन सिहरल। मन मन सिहरिते विचारक भाव बदलल। एक तँ कमासुत पति तोहूमे आठ मासक बकिऔताक गरमी। बदलल मनमे उठलनि जानक जंजाल परिवार होइए। जानकेँ अकछ-अकछ केने रहैए। एक बोल दुनू परानी गपो करब सेहो ने होइए। मन घुमलनि। तँए कि लोक मनो-मनोरथ छोड़ि देत। सहटि कऽ पति लग आबि बजली- “दरमाहा उठबैमे पाइयो-कौड़ी खरचा भेल?” पत्नीक जिज्ञासा भरल शब्द सुनि रामटहल बजलाह- “जाबे बबाजी नै भेल छलौं ताबे आ अखनमे बड़ अन्तर भऽ गेल अछि। सौंसे थानाक सेक्रेटरी छी। आन-आनकेँ तँ कटबे करै छै, मुदा हमर नै कटैए।” “कते भेटल?” कते भेटल सुनि रामटहल दासकेँ, जहिना सीक परक मटकूर खसिते टुकड़ी-टुकड़ी भऽ छिड़िया जाइत तहिना भेलनि। सुखक नीनकेँ छोड़ए नै चाहलनि। मुदा तैयो बजाइये गेलनि-भेटत कि अल्हुआ, धैन समाज अछि जे मुँहक लाली अछि नै तँ अठ-अठ महीना पेट बान्हि कऽ खटत। जेकरा ऊपर झपटी छै, तेकरा ने हमरा कोन अछि। 3. झगड़ो झोटैला भोरे अर्द्धांगिनिक गग्गड़सँ ठमकि लाल काका दरबज्जाक बीचला खूँटामे ओंगठि कुही होइत मने-मन विचारैत जे औझुका िदन भंगठले अछि। जहिना यात्रा काल भंगठल इंजनक कोनो भरोस नै तहिना पत्नीक खट-पटसँ लाल काकाक मनमे सेहो होइत। औझुका दिन केहेन हएत केहेन नै तेकर कोनो ठेकान नै। अपनो किछु हुसलौं। हुसलौं की! पावर चढ़ल छलए। ओह: भोरे लोक राम-नाम लैत उठैए आ कोन दुरमतिया चढ़ि गेल से नै जानि। कोन एहेन पहाड़ टूटि खसल जाइ छलै जे भोरे अढ़ौती-अढ़ा देलियनि। निअमानुसार अपन-अपन पुरौला पछातिये ने कियो दोसर दिस देखत। तइ बीच हाथमे चाहक गिलास नेने मुसिकिआति पत्नी दू हाथ आगू अबैत देखलनि। जना कोनो कोकनल खूँटाबला घर हड़हड़ा कऽ खसैत अछि तहिना लाल काका अकाससँ खसलाह। मुदा भिनसुरका तामस सोलहो आना नै मेटाएल छलनि, तँए चाह लेल हाथ नै बढ़ौलनि। ससुराएल लोक जकाँ लाल काकाकेँ देखि लाल काकीक मनमे उठलनि जे पुरुख छिया कि पुरुखक झड़। हाथ पकड़ि कहबनि जे चाह लिअ। आगूमे ताड़क गाछ जकाँ ठाढ़ रहली। जहिना नमहर गाछक ऊपरका डारि टूटि रूकि-रूकि कऽ निच्चा खसैत तहिना लाल कक्काक मन फेर खसलनि। थोड़े सबूर मनमे सेहो भेलनि जे दुपहरिया खेनाइ नै गड़बड़ाइत। पाछू उनटि तकलनि मन पड़लनि जे एहेन-एहेन झगड़ा तँ बेसी काल होइए। मुदा खेनाइ-पीनाइमे कहाँ कहियो बाधा भेल। ओह तामसमे बिसरि गेल छलौं। पत्नीक चौअनियाँ मुस्कीक जबाबमे लाल काका अठनियाँ ठाह दैत, हाथक गिलास पकड़ैत बजलाह- “मीठगर चाह अछि कि ने?” लालल काकाकेँ मुँहमे गिलास लगबैसँ पहिने लालकाकी ठमकल रहली, मुदा मुँहसँ गिलास हटबिते, पुछलखिन- “ठाेरमे ठोर सटैए किने?” चाहक गरमी लाल काकाकेँ चढ़िते रहनि। अवसर केँ बिनु गमौने बजलाह- “घी सँ नै चीनीसँ।” 4. घबाह टयूशन घिड़नीक तिनकमिया बंशीक घबाएल माछ जकाँ, बुधियार काका बीस बर्खक नोकरीक पछाति घबाएल मने अपना दिस तकलनि। घबाएल मन ऐ लेल जे प्रतियोगिता परीक्षामे बैइसै जोकर बेटा भऽ गेलनि। उचित तँ यएह ने बनैत जे वयस देखि-देखि अपन विषयक बात बेटोसँ पूछि लेब। एकर मतलब ई नै जे छौड़ाकेँ बापक पएरक जूतो आ अंगो अँटि जाइ छै। जइ दिन नोकरी शुरू केलौं, तीन मन धान गौआँ मिलि दैत छलाह। राजा-रजवारक गाम नै, जे स्कूल-अस्पताल खुजत। परिवारो तहिना छल, गौआँ मुँह देखि कोनो धड़ानी गुजर करैत छलौं आ गामेक बच्चाकेँ पढ़ेबो करै छलौं। अपनो बूझि पड़ै छल आ समाजो शिक्षक बुझैत छलाह। अपने ऊपर दुरिमतिया चढ़ल कि समाजक ऊपर चढ़ल आकि सरकारक ऊपर चढ़ल से बुझबे ने करै छी। जे विद्यालय या तँ व्यक्ति-विशेषक वा सामाजिक स्तरपर चलैत छल ओकरा आगू केना बढ़ौल जाए। मूल प्रश्न छल। मुदा भेल की? खाली संस्कृते विद्यालयकेँ कहबै आकि मेडिकल, इंजीनियरिंग आदि जेनरल विद्यालयकेँ, सभटा एक्के सिरहाने पेटकुनिया लधने अछि। प्रकाशकेँ सोर पाड़ि बुधियार काका कहलखिन- “बौआ, आब तोरा ले दुनियाँक बहुत बाट खुजैक समए आबि गेलह मुदा समए एहेन बनि गेल अछि जे जते सहयोगक जरूरत तोरा पड़तह, ओते नै दऽ सकबह। अपनो जुआन भेल जाइ छह, अपनो तँ किछु सोचिते हेबह?” पिताक विचार सुनि प्रकाश बाजल- “बाबूजी, टयूशनक नव क्षेत्र तँ बनिते जा रहल अछि, बूझल जेतै।” प्रकाशक विचार सुनि, कनी काल गुम रहि बुधियार काका बजलाह- “बौआ, तीनटा विद्यार्थीकेँ टयूशन पढ़ा अपनो शिक्षक बनलौं, मुदा आब लड़कीक शिक्षा बढ़लासँ ओहो घबाह भेल जा रहल छै।” 5.दादी-माँ सत्तरि बर्खक दादी-माँकेँ अखनो वहए चुहचुही गाममे बूझि पड़ै छन्हि जे चुहचुही सासुरमे सभकेँ बूझि पड़ैत। जइ दिन रंगल वस्त्र, भरल पेट काजर लगौल आँखिसँ गाम देखलानि ओ जीते-जी केना बिसरि जेती। ओना दादी-माँ केँ दू पीढ़ीसँ मुखतियारी चलि अबैत मुदा पलखतिक दुआरे ऐ बातपर नजरिये ने कहियो गेलनि। कारणो अछि जे दू तरहक जिनगी लोककेँ भेटै छै, एककेँ बनल-बनाएल दोसर टुटल-फुटल। टुटल-फुटल घरकेँ दादी-माँ सभ दिन चिकने करैमे लागल रहली तँए सासुरक सुख दिस धियाने ने गेलनि। एक तँ ओहुना जे कुरसीपर बैसि जाइए ओ थोड़े बुझै छै जे कुरसीक पुवरियो पार छै आ पछवरियो पार। तँए जिनगीकेँ तीनू पार देखैक लूरि हेबाक चाही। मुदा से दादी-माँ केँ नै छलनि परिवारक सभक धौजनि सुनैक अभ्यस्त छथि तँए आश्वासन तँ सभकेँ दइते छथिन, मुदा जे पहिने बिसरै। सत्तरि बर्खक अपनाकेँ नै बूझि दादी-माँकेँ छोड़ल केचुआ जकाँ लहलही छन्हिये। तहूमे कोरा-काँखकेँ सभ दिन बच्चा सभकेँ लैत रहली तँए किअए नै रहतनि। छह बर्ख पहिने परिवारमे एकटा गाए एलनि। जहिना मनुष्यसँ लऽ कऽ बाध-बोन धरि लक्ष्मी छिड़िआएल छथि तहिना दादी-माँ गाएकेँ बूझि सेवा करए लगलीह। थैर-गोबर अपन काजक सूचीमे लऽ लेलनि। छबे बर्खक दौड़मे आइ दासटा गाए खुट्टापर छन्हि। पहिने एकटाकेँ थैर-गोबर करैक अभ्यास छलनि अखन दस टाक भऽ गेल छन्हि, किअए मनक चुहचुही कमतनि। अोना अखन धरि सभ तूर परिवारक काजमे सटि चलै छन्हि मुदा दुनू पुतोहुओ आ बेटोक दियादिनियो आ भाइयोमे खट-पट हुअए लगलनि से भनक छन्हि मुदा जेकरा जे मनमे हेतै से तेहेन पाऔत, तँए धनि-सन। दुनू बेटो आ पुतोहुक बीच उठैत विवादक कारण पिता-शिवशंकर नीक जकाँ बुझैत। जइठाम लाखक विधायक, सांसद, बेपारी, ठीकेदार करोड़ कूदि अरबमे टहलि रहल अछि तइठाम मनक उछाल स्वाभाविके छै। तँए गुम्म। जहिना दृष्टिकूट विश्राम बेर होएत तहिना दादी-माँकेँ बूझि पड़लनि। पति-शिवशंकर सोझसँ गुजरिते रहथि कि दुनू बेटा, ताल ठौकैत पहुँचल। अधरस्तेपर दादी-माँ अँटकि गेलीह। शिवशंकर पुछलखिन- “तोरा दुनू भाँइक बीच एना किअए होइ छह?” पिताक प्रश्नसँ दुनू भाँइ प्रकाशो आ जोगियो एक दोसरपर दोख मढ़ए लगल। तही बीच आंगनमे सेहो दुनू पुतोहु डंका पीटए लगली। शिवशंकर बूझि गेलाह। जे अंगने आगि असमसान तक जाइ छै। भार हटबैत शिवशंकर दुनू भाँइकेँ कहलखिन- “माएसँ पूछि लहक?” अपना-अपनीकेँ प्रकाशो आ जोगियो दुनू भाँइ बाँहि पसारैत दादी-माँकेँ पुछलक- “माए, तूँ केनए?” गरमाएल साँस छोड़ैत दादी-माँ बाजल- “केम्हरो ने। अपने दिस।” दुनू बेकती शिवशंकरो आ दादियो-माँ विचारए लगलथि जे समए एहेन दुरकाल बनि रहल अछि जे रातिक कोन बात जे दिनोकेँ सुरक्षित रहब कठिन भऽ गेल अछि, तइठाम घरेमे कुकुड़-कटौज करत तँ जानत अपने। आब कि जीबैक कोनो सख अछि, कमाइ छी खाइ छी। २ राम विलास साहु दूटा विहनि कथा :: स्कूलक खिचड़ी एकटा अभिभावक तमसा कऽ स्कूल पहुँचलाह। हेड मास्टरकेँ उपराग दैत बजलाह- “पढ़ाइ-लिखाइ तँ जएह-सएह होइए। खाली खिचड़ीयेमे बेहाल रहै छी। जखन धिया-पुता पढ़बे नै करतै तखन तँ हाकिम-हुकुमक तँ बाते छोड़ू चपरासियो नै बनतै। एसँ नीक तँ प्राइवेटे स्कूल ने जइमे दूटा पाइये ने लगै छै, पढ़ाइ तँ नीक होइ छै। आइ तक ऐ स्कूलक बच्चा पढ़ि कऽ कोन नाम कमेलकै।” मास्टर सहाएब शान्त भावसँ अभिभावककेँ समझबैत बजलाह- “देखू, तमसाउ नै कोनो हम खिबै छी खिचरी। ई तँ सरकारक योजना छी। ऐ योजनासँ लाभो बहुत छै। निच्चासँ ऊपर धरि सभ माले-माल होइ छै।” अभिभावक बजलाह- “से केना?” मास्टर सहाएब कहलखिन- “सहीमे प्राइवेट स्कूलक बच्चा सभ पढ़ि-लिखि हाकिम-हुकुम बनै छै। आ ईहो देखैत हेबै जे ओ सभ माए-बाप, गाम-समाजकेँ छोड़ि एवं मातृभूमिकेँ बिसरि जाइए, बूझू बौर जाइए। से तँ ऐ स्कूलक बच्चामे नै हाेइए।” चोर-सिपाही माघ मास अन्हरिया राति। ओस-कुहेससँ हाथो-हाथ ने सुझैत। एकटा चोर चारि कऽ भागल जाइ छल। तखने एकटा सिपाही गस्तीमे आबि रहल छल। चोर सिपाहीकेँ देखिते भागल। चोर बूढ़ छल मुदा सिपाही बलंठ छलै। भागैत चोरकेँ रपटि कऽ पकड़लक सिपाही। पकड़ि हाजति लेने जाइ छल। चोरकेँ डंढ़ासँ देह थरथराइ छल। मने-मन ईहो सोचै छल जे केना ऐ यमराजक हाथसँ बचब। थोड़े आगू चलि कऽ देखल जे सड़कसँ हटि एकटा घूर रहै। आगि देखिते चोर बाजल- “सर, अहाँ एत्तै रहू आ हम ओइ धूरासँ कनी बिड़ी नेसने अबै छी?” सिपाही कने सोचि कऽ बाजल- “अरे, तूँ हमरा मूर्ख बुझै छेँ रे! आ जे तूँ भागि जेमे तँ हम तोरा पतालमे खोजबौ? चूपचाप एतए बैस हम अपनेसँ बीड़ी सुनगेने अबै छी।” ३. चन्दन कुमार झा टटका रचना
लीलाधर बाबू एकटा कॉलेज मे प्रोफेसरी करैत छथि.प्रोफेसरी कि करताह, बुझू तऽ भरिदिन विभाग मे बैसल गप्प हँकैत छथि.मैथिली पढ़ैले कएक टा विद्यार्थी आब कॉलेज मे नाम लिखबैत अछि ? से सभ मैथिली प्रोफेसर सभकेँ बैसारी मे रहि-रहि कऽ जहिना किछु लिखबाक झोंक चढैत छैक तहिना पछिला करीब सात-आठ बरख सँ कलाधर बाबू के सेहो कखनो-काल चढैत छन्हि.प्रायः सब विधा मे कलम अजमा चुकल छथि मुदा मोशकिल जे एखनधरि स्थापित साहित्यकार नहि भऽ सकलाह.अछैतो रचना आ' किताब छपेबा हेतु पुँजीके किताब नहि छपा रहल छथि.सोचैत छथि जे पहिने किताब पढैबला तऽ ताकि ली.विभिन्न पत्रिका के नियमित पाठकक सदस्यता ग्रहण कयने छथि, बस अही लोभे जे एहि पत्रिका सभ मे हुनको रचना छपन्हि.मुदा संपादक, आ' तहू मे मैथिली के विद्वान तऽ अपने कम्म टेड़ियाह नहि होइछ से हिनकर पठाओल रचना सभकेँ कोनो पत्रिका मे उचित स्थान नहि भेटैत छन्हि.एहि समस्या सँ त्राणक खातिर विचार भेलन्हि जे किएक ने संपादक जी सँ मुखोत्तरी अनुरोध कएल जाए आ' से एकटा संपादक ल'ग पहुचलाह.नमस्कार-पाती आ' परिचय-पातक बाद लीलाधर बाबू अपन दूटा टटका रचना संपादक दिश बढ़बैत बजलाह- " कने एकरा देखल जाओ.ई हमर एकदम्म टटका रचना अछि.अपन पत्रिकाक अगिला अंक मे शामिल करी से अनुरोध." फेर भेलन्हि जे ई विनय-वचन हुनक प्रोफेसरक कद के देखैत संपादक महोदय के कही हल्लुक नहि लागल होन्हि तइँ कनेक आर पालिश करैत बजलाह -" एहि प्रतिष्ठित पत्रिका मे यदि हमर रचना के अपने जगह देब तऽ ई हमरा लेल गौरवक गप्प होयत". संगहि जोड़ति गेलाह जे-"हम एहि पत्रिकाक नियमित पाठक सेहो छी". संपादक महोदय रचना पर अपन कैंचिआयल दृष्टि देलाक बाद कहलखिन्ह - " ओना तऽ ठिक्के अछि मुदा हम अपन पत्रिका मे जे स्तर के रचना छपैत छियैक ताहि अनुरूपेँ कनेक हल्लुक बुझना जाइत अछि". फेर भेलन्हि जे कहीँ एकटा नियमित पाठक ने हाथ से छिटकि जान्हि से बात के सम्हारैत बजलाह- "ठीक छैक, एखन ई रचना राखि दियौक,हम छपबाक कोशिश करब". लीलाधर बाबू केँ अपन रचनाक संग होइ बला लीला के भान भऽ गेल रहन्हि.ओ चोट्टहि संपादक महोदय सँ विदा लेलाह.जखन दू मास बीत गेलैक तऽ एकबेर फेर लीलाधर बाबू ओहि संपादक महोदय के कार्यालय मे जुमि गेलाह. संपादक महोदय के पुरना गाहकि मोन पड़लनि आ लीलाधर बाबू के संबोधित करैत बजलाह-" ओ..की कहू...पछिला दू मास मे ततेक ने रचना सभ आबि गेलैक जे अपनेक के रचना के हम जगह नहि दऽ पौलहु.लेकिन अगिला अंक मे...." लीलाधर बाबू हुनकर बात के बिच्चहि मे कटैत बाजि उठलाह-" कोनो बात नहि...हम ओहि रचनाक मादेँ अपने सँ पुछारी करय लेल नहि आयल छी". आ फेर एकटा विजीटिंग कार्ड संपादक महोदय दिश बढ़बैत बजलाह जे - " ई हमर संपादन मे नव पत्रिका बहार होमय जा' रहल अछि. हम जनैत छी जे संपादक के अपने पत्रिका मे अपन रचना छापब उचित नहि बुझाइत छन्हि.तइँ अहाँ ल'ग यदि कोनो टटका आ' प्रकाशन योग्य रचना हो तऽ अवश्य प्रेषित करी". संपादक महोदय झट दऽ टेबुलक दराज मे अपन टटका रचना ताकय लगलाह....अगिला अंक सँ लीलाधर बाबूक रचना सभ सेहो पत्रिका सभ मे छपय लागल. ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। १.दुर्गानन्द मण्डल-बेटीक अपमान/ जीवन-मरण २.शिवकुमार झा ‘टिल्लू’-पृथ्वीपुत्र/ राजकमल ३.डा.राजेन्द्र विमल- नव–नव क्षितिजक सन्धान करैत सुजीतक जिद्दी १ दुर्गानन्द मण्डल १ नाटक बेटीक अपमानपर एक नजरि मैथिली साहित्यक एकटा विधा नाटक अछि, जे विधा सभ दिन रौदियाहे सन रहल। गिनल-चुनल नाटककारक किछु नाटक जे आंगुरपर गनल जा सकैत अछि, दोगा-दोगी कोनो पुस्तकालयक शोभा मात्र बढ़ौलक। एकटा समए छल जइमे नाटककार जे नाटक लिखलनि तइमे वाक्-पटुता नै रहबाक कारणे वा शुद्ध-अशुद्ध उच्चारण नै भेने वा समुचित वाद-संवादक संग समदियाक अभाव सभ दिन देखल गेल। चूँकि ओना हम जत्ते-जे ढकि ली मुदा एकटा सत्यकेँ स्वीकार करए पड़त जे हम मैथिल छी। हमरा लोकनिक मातृभाषा मैथिली भेल। मुदा माएकेँ माँ कहैत कनेको लाज विचार नै होइए। जेना कि आँखिसँ लाजक पानि खसि पड़ल। तात्पर्य, मैथिल होइतो दोसर भाषाक दासताक शिकार भेल छी आ ओकर भोग भोगि रहल छी, बुझाइत अछि जेना मैथिलीक लेल एेठामक माइटिये उसाह भऽ गेल अछि, जइपर गदपुरनि मात्र उपजि सकैए। मुदा ओहेन उसाह माटिपर “बेटीक अपमान आ छीनरदेवी” लिखि नाटकार बेचन ठाकुर, चनौरागंज, मधुबनी, मैथिली नाट्य जगतमे एकर सफल मंचन कऽ महावीरी झंडा गाड़ि समस्त मैथिली, मैथिल आ मिथिलाक मान-सानकेँ मात्र बढ़ेबे टा नै कलनि अपितु चारि-चाँद लगा देलनि। ऐ लेल ठाकुर जीकेँ समस्त मैथिल भाषी आ नाट्य प्रेमीक तरफसँ हम कोटिश: धन्यैवाद दैत अपार हर्ष महसूस कऽ रहल छी। हमरा विश्वास अछि जे अपने ई दुनू रचना जेकर मंचन अपने अपनहि कोचिंग संस्थानक छात्र-छात्रा लोकनिसँ करा, ई साबित कऽ देलौं जे मिथिलाक माटिमे अखनो ओतेक शक्ति बचल अछि जइपर केसरो उपजि सकैत अछि। नाटककारक नाटकक विषय अति उत्तम छन्हि। वर्त्तमान शताब्दीक सभ मनुख ऐ बातसँ भिज्ञ अछि, सरकारी सर्वेक्षणसँ सेहो स्पष्टत अछि जे दिनानुदिन लिंगानुपात बढ़ि रहल अछि। सभ राज्यक अनुपात थोड़े ऊपर-नीचाँ भऽ सकैए मुदा कियो ऐ बातसँ मुँह नै मोड़ि सकै छथि जे प्रति हजार लड़िका-लड़िकीक बीच एकटा बड़का खाधि बढ़ैत जा रहल अछि, जइ खाधिमे लड़िकीक अनुपात निरंतर नीचाँ मुँहेँ गिड़ैत जा रहल अछि आ हमरा लोकनि कानमे तूर-तेल दऽ निचेनसँ सूतल छी। जौं ई क्रम जारी रहल तँ आगू की हएत से तँ सोचू!! ई एकटा प्रश्नवाचक चिन्ह छोड़बामे नाटककार एकदम सफल रहला अछि। एतबे नै, आजुक वैज्ञानिक युगमे यंत्रादिक सहायतासँ ई जानि जे माइक गर्भमे पलैत बच्चाक, बेटा नै बेटी छी.... िनर्मम हत्या करबामे कनिक्को कलेजा नै कँपैए!! जेकर कोनो कसूर नै ओकरा कुट्टी-कुट्टी काटि खुने-खुनामे कऽ माइक गर्भसँ बहार कऽ दै छिऐ। जइ बेथे ओइ बच्चाक माए पनरह दिन धरि बिछौन धेने रहैत अछि। ऐठाम एकटा गप हम फरिछा कऽ कहि दिअ चाहै छी, ओ बेथा हुनकर ओइ बेटीक प्रतिये नै जेकर ओ हत्या करौलनि अछि, अपितु शारीरिक बेथा छन्हि जइ लेल एत्ते आ एहेन कुकर्म करै छथि। ओइ िनर्दोष बच्चाक माए-बाप दुनू ततबाए दोषी छथि। ओ ई नै बूझि रहल छथि जे जइ बेटीक ओ हत्याए करौलनि जौं ओ बेटी आइ नै रहैत तँ की अपने रहितौं? जौं बेटी नै हएत तँ सृष्टिक रचना संभव अछि? जौं हँ तँ केना वा नै तँ एहेन अपराध कऽ स्वयं किएक एतेक पैघ हत्यारा साबित भऽ रहल छी। रानी झांसी, लक्ष्मीबाई, सावित्री, अहिल्या, सती अनुसुइया, इन्दिरा गांधी, मैडम क्यूरी, मदर टेरेसा..., ईहो सभ तँ बेटीये छलीह। जौं हिनको हत्या पूर्वहिमे कऽ देल गेल रहैत तँ आइ.....। तखन आँखि रहैत एना हम सभ आन्हर किएक? बुइध रहैत मुर्खाहा जकाँ काज किए करै छी? मनुक्ख तँ मनुक्ख छी ने, छागर-पाठी आकि गाए-महिंस तँ नै जे कतौ कोनो.....। तहूमे साढ़े-पारा अधिक भऽ जाए, गाए-महिंस कम, तखन की हएत? जौं हम-अहाँ ई नै सोचबै तँ के सोचताह? ऐ हत्याक पाछाँ एकटा अओर कारण अछि जेकर नाओं थिक दहेज। मुदा उहो तँ हमहीं अहाँ लेबाल आ देबालो छिऐ। अखनो समाजमे आ प्राय: गाम पाछाँ एक-आध गोटे जरूर छथि जे अपन बालकक बिआह एकटा नीक कुल-कनियाँ ताकि आदर्श बिअाह कऽ उदाहरण बनै छथि। ऐ काजक दोषीकेँ सजा नै दऽ िनर्दोषकेँ जानेसँ मारि दुनू परानी ऐ पापक भागीदारी छी। छीह.......।
शास्त्रो एकटा बात बतबैत अछि जे “यत्र नार्यस्तु पूज्यंते रमन्ते तत्र देवता।” मुदा ओकर पूजा की करबै, ओइ देवीक संसारमे एबाक अधिकारे छीनि होइए, जे बड़का काज केलौं। जतए समस्त विश्व ऐ समस्यासँ जरि रहल अछि ओतए नाटककार अपना नाटकक माध्यमे एकटा साधारणो लेखक सदृश अपन लेखनीक माध्यमे समाजमे ई संदेश देबामे पूर्णत: सफल छथि जे समए रहैत जौं नै चेतब तँ नाटकक मुख्य पात्र दीपक सदृश हाल हएत। जे अंतमे कनियाँक मुइला पछाति अपनेसँ भात पसाबथि, किएक तँ हुनक कनियाँ बरोबरि गर्भपात करेबाक कारणे शोनितक कमीसँ उड़ीस भऽ मुइलीह। एतबे नै, बेटीक अभावमे नगद गीनि आ तखन पुतोहु घर अनलाह। तखन हुनका कबीर साहैबक ई पाँति मोन पड़ैत छन्हि, “सन्तोक सभ दिन होत एक समाना।” आबो जौं नै चेतब तँ अहिना टाका दऽ बेटी बेसाहऽ पड़त। निरंतर चीज-बौस जकाँ बेटियोक दाम बढ़ैत जाएत, जेकरा किनैत-किनैत अहाँक प्राण निकलि जाएत। किएक तँ अपना समाजमे एकटा नै कएक टा मरूकियाबला अखनो जीविेते अछि, जे चारि लाख एकावन हजार टाका नगद आ सभ सरंजाम संगहि बरिआती ऊपरसँ। चेतु हे मैथिल आबो चेतु। नै तँ आब ओ दिन दूर नै जे गाड़ीपर नाव रहत। आब बेटी अपन अपमान बरदास नै कऽ सकैए। ऐ प्रकारे नाटककार समाजक लेल एकटा पैघ संदेश दऽ रहल छथि जे गर्भपातसँ पैघ कोनो पाप नै होइत अछि। तँए ऐ पापसँ बची आ बेटीक बाप बनी। अहुना बेटा आ बेटी दुनू कोइखिक श्रृंगार होइए। ऐ तरहेँ श्री बेचन ठाकुर जी हमरा लोकनिक नीन तोड़ैमे सफल रहला। जे श्री जगदीश प्रसाद मण्डल जीक प्रेरणापूर्ण आदर्शवादी व्यक्तिक हाथ हुनका माथपर छन्हि, हम सेहो बिनु मंगने शुभकामना दैत छियनि, रहबनि, जे अहिना नाटक लिखैत रहथु, मंचन करबैत रहथु। धन्यवादक पात्र श्रुति प्रकाशनक श्रीमती नीतू कुमारी आ नागेन्द्र झाजी केँ जे प्रकाशनक समस्त भार उठा कृतज्ञ हेबाक मौका देलखिन। जौं विदेह प्रथम पाक्षिक ई-पत्रिकाक सह सम्पादक उमेश मण्डल एवं सम्पादक गजेन्द्र बाबूकेँ, जिनक अथक सहयोगक प्रसादे प्रकाशनक रास्ता सुगम आ प्रकाशन सफल भेल, तँए नै लिखब-कहब तँ अनुचित। २ जीवन-मरण :: दुर्गानन्द मण्डल जीवन-मरण उपन्यास, एकटा लब्ध प्रतिष्ठित उपन्यासकार श्री जगदीश प्रसाद मण्डल जीक अनुपम कृति अइ। हुनक लिखल अनेको उपन्यास, जे एक-सँ-बढ़ि-कऽ–एक अछि। जइमे उपन्यासकार द्वारा उठाओल गेल विभिन्न प्रकारक सामाजिक रूढ़िवादिताक ज्वलंत उदाहरण प्रस्तुत कएल गेल अछि। मात्र प्रस्तुतिकरण धरि कथा नै अपितु ओकर सामाधान तकबामे सेहो उपन्यासकार सतत् सफल रहला अछि। प्रस्तुत उपन्यासमे मनुखक जे अपन जिनगी छै, ओकर जे अपन समाज छै, समाजक प्रति व्यक्ति विशेषक उत्तरदायित्व होइत अछि से, आ नवका पीढ़ी जे पश्चिमी सभ्यताक असभ्यतासँ ग्रसित भऽ असभ्य बनि गेला अछि तइपर उपन्यासक आरंम्भमे एकटा कसगर चोट देलनि अछि। देवनन्दन जे बेवसायसँ डाॅक्टर छथि, पत्नी शीला द्वारा जनलनि जे पिताक मृत्यु भऽ गेल तैयो घबरेला नै सोचलनि पिताक अपन समाज छन्हि जइ बीच ओ अपन जिनगी बितौलनि। तँए उचित हएत जे हुनका अपना समाजमे पहुँचा दियनि आ मृत्युक सभ कर्म सामाजेक अनुकूल बढ़ियासँ करी िनर्णए लेलनि। मोबाइलसँ नम्बर निकालि, टिपि अपन जेठ बेटा दयानन्दकेँ जनौलनि- “बच्चा, बाबू मरि गेलाह, तँए दुनू भाँइ गाम आऊ।” मुदा वाह रे पश्चिमी सभ्यता! देखू हमरा लोकनिकेँ केना ग्रसित केने अछि, दयानन्द बाजि उठलाह- “बाबू, ऐ लेल गाम किअए जाएब? आब तँ बिजलीबला शबदाहमे आसानीसँ काज सम्पन्न भऽ जाइत अछि” दयानन्दक विचार सुनि देवनन्दन कहलकनि- “बच्चा, सभ जीव-जन्तुकेँ अपन-अपन जिनगी होइत अछि। आ जे जेहने जिनगीमे जीबैत अछि ओकरा लेल वएह जिनगी आनन्ददायक होइत अछि। जेना, चीनी, मिरचाइ आ करैला तीनूक तीन तरहक स्वाद, मीठ, कड़ू आ तीत होइए। मुदा की मरिचाइक कीड़ा आबि करैलाक कीड़ा चीनीमे जीब सकत? कथमपि नै। जखन की ओ तँ अधलाहसँ नीकमे गेल।” पिताक बात सुनि दयानन्दकेँ आश्चर्य भेलनि, मुदा देवनन्दनक अनुसारे ऐमे आश्चर्य कोन। किएक तँ गामक दोसर नाम समाज सेहो छिऐ। जे शहर-बाजारमे नै अछि। ऐठाम उपन्यासकार समाजकेँ मानव नै मानवक जे मूल सभ्यता छै ओकरा एकैसम सदीक नव पीढ़ी लेल एकटा मिशाल देखौलनि अछि। जे वर्त्तमानमे आजुक पीढ़ी समाजकेँ नै बूझि किदैन बुझै छथिन, ओ बिसरि गेलाह जे समाज की थिक, ओकर मान-मर्यादा कि होइ छै, सामाजिक बन्धन की छी, ओकर कानून-कायदा की छै। आजूक वर्त्तमान आधुनिक समाज जइमे सभ अपने पाछू बेहाल रहैए। ओ केकर सुख-दुख, जीवन-मरणकेँ सुनत। ओ तँ भरिपेट नीक अन्न-तीमन खाएब मात्र जनैए। मुदा तइसँ कि मन थोड़े अस्थिर भऽ सकैए। जाधरि आत्माक संतुष्टि नै हेतैक। बुझेबामे केत्तौ कोनो प्रकारक किन्तु-परन्तु नै राखि, मनुक्ख एकटा सामाजिक प्राणी होइत अछि, ओकर अपन एकटा समाज छै, जइमे सभ एक-दोसराक सुखसँ सुखी आ दुखसँ दुखी होइ छथि, देखेबामे सफल भेलाह। वर्त्तमानमे जन्म जरूर जाति-समाजमे होइ छै, मुदा लगले आँखि-पाँखि भेने हमरालोकनि अपन मूल समाजकेँ भूलि-बिसरि आन समाजमे मिलि हूलि-मािल उठेने रहै छी। केतेक दुखक बात भेल। कला आ संस्कृितसँ दूर तँ स्वभाविक रूपे तँ छिहे ओना हम सभ कतेको नोर मंचपर किएक ने बहा ली। दोसर दिस उपन्यासकार मिथिलानिक एकटा गजब चित्र प्रस्तुत केलनि अछि। मैथिल नारि अपन पतिकेँ परमेश्वर मानै छथि। जिनकेपर हुनका भरि मांग सेनुर आ भरि हाथ चुड़ी रहैत छन्हि। अपना पतिक प्रति कतेक निष्ठा रखै छथि स्पष्ट अछि- “अदौसँ सावित्री, अनुसुर्इया आदि ऐ विषयमे जगविदित छथि। देवनंदनक माए सुभद्रा जिनका चेहरापर सोग नै अपितु सिनेह उमरि रहल छन्हि। मोने-मन आनंदित जे, जहिना हाथ पकड़लनि तहिना पार-घाट लगा देलनि। भड़ल-पुड़ल फुलवाड़ी अछि कतौ हेराएल रहब।” मिथिलानिक महान विचार आ तियागक स्तरकेँ कतेक सुक्ष्म रूपेँ उपन्यासकार रखलनि अछि। तियागक मूर्तिक रूपमे ऐ तरहेँ स्पष्ट अछि जे पतिकेँ मुइला बादो हर्ष छन्हि जे हमरा अछेत मरलाह से नीके भेलनि। अन्यथा मोनमे लागल रहैत जे हुनक शेष दिन केहेन...। सभ पौस-प्राणी गुनधुनमे पड़ल गाम चलल जा रहल छथि। देवनंदन सोचथि, से नै तँ आइ समाजक काज पड़त। समाजक की महत छै। मनुक्ख कोन तरहेँ सामाजिक प्राणी होइए, समाजक बीच बाबूजी केना जीबथि, कतेक परिवारसँ दोस्ती छलनि आ कतेकसँ दुश्मनी, गुनधुनमे पड़ल माएसँ पुछलखिन- “माए, कते परिवारसँ बाबूजी केँ दोस्ती छेलनि।” तखन माएकेँ मोन पड़लनि ओ समाज, जतए सभ मिलि कुमरम, बिआह, सामा, घरक गोसाँइसँ लऽ कऽ दुर्गा स्थानक गीत मोन पड़ए लगलनि। देवनंदनक बात सुनि माए-सुभद्रा बजलीह- “छिया, छिया। मिथिलाक समाज छी। ऐ समाजमे मुर्दा जरबैले, केकरो घरक आँगि मिझबैले, केकरो-साँप-ताप कटने रहल आकि गाछ-ताछपर सँ खसलापर केकरो कियो कहै नै छै। ई सामाजिक काज छी। तँए, अपन काज बूझि सभ अपने तैयार भऽ जाइत अछि।” ऐठाम उपन्यासकार मिथिला आ मैथिल समाजक एकटा विलक्षण उदाहरण द’ अपन सभ्यता आ संस्कृतिक परिचए द’ समाजक समुद्री रूपकेँ दर्शन करौलनि अछि। पूर्वोमे बाढ़ि एलापर करियाकाका आ देवनंदन द्वारा उठाओल गेल कदम आबैबला समाजक लेल एकटा आदर्श उपस्थित केलनि अछि। आखिर दिन बिसेक बाद सभ घूमि अपन-अपन घर आएल रहथि। ओही समाजक एकटा अभिन्न अंग देवनंदनक पिता जे समाजक प्रतिष्ठित व्यक्ति रघुनंदनक लहाश गाम पहुँचते आगू-आगू गाड़ी आ पाछू करमान लागल लोक दियादीमे सबहक चुल्हि मिझाएल। दोसर दिस उपन्यासकार जे मर्द-पुरुखक क्रिया-कलाप, स्त्रीगण सबहक गप-सप तँ एक दिस 111 बर्खक रधिया दादी गाइक गर्दनि जकाँ लटकल चमरी, बाइस गाहीक बर्ख भेल, पूर्वमे रधुनंदनकेँ कतेको दिन दूध पिऔने रहथिन, उपस्थित क’ सामाजिक आ मातृत्व प्रेमक ज्वलंत उदाहरण प्रस्तुत केलनि। जिनका दादी जूरशीतलमे अछिंजलसँ असिरवाद द’ फगुूआमे रँगो खेलाइत छलीह। से सप्तरंगी समाजक इंद्रधनुषी संबंधक एकटा विलक्षण उदाहरण अछि। श्राद्ध-बिआह समाजेक काज होइते अछि। समाज तँ समाजे होइए तहूमे ओहेन समाज जइठाम रघुनंदनकेँ उत्तरे-दछिने सुता उज्जर दप-दप वत्रसँ छाँपि सिरहानामे धूप-गुगुल जरैत अछि। तइ बीच बचनू, चंचन, झोली, बौकू, बतहू देहपर तौनी आ डाँरमे धोती पहिरने कान्हपर कुरहरि नेने संग-मिलि कानी-गाबी आ हँसी ऐ सँ पैघ सुख केकरा कहबै? जइ सुखक लेल लोक नीच-सँ-नीच काज करैए मुदा पाबि नै पबैए। ऐठाम उपन्यासकार भौतिक सुखकेँ सुख नै मानि आत्मिक सुख, अतिइन्द्रिय सुख जइसँ आत्मिक शान्ति भेटैत छै, ओ वास्तविक सुख थिक। तँए मात्र दैहिक सुखकेँ क्षणिक आ आत्मिक सुखकेँ वास्तविक बता अपनाकेँ आध्यात्मिक हेबाक सेहो परिचय द’ समाजोकेँ आध्यात्मिक बातपर चिन्तन-मनन अनुकरणक प्रेरणा देलनि अछि। समाजक समस्त काजक जिम्मा करियाकाकापर छन्हि। समाजक ऊँच-नीच, छोट-पैघ सभ जातिक लोक, जाति-परजाति सभ मिलि रघुकाकाक काजमे पूर्ण सहयोग देबए चाहै छथि चाहे ओ िकर्तनिया हुअए आकि भजनिया, लेलहा हुअए आकि बौका, सुन्दर काका होथि वा छीतन भाय दुनू परानी जे जातिक डोम छथि। जे पूर्वमे गुनापर रघुकाकाकेँ पाँचटा गीत सुनौने छलाह। जीविते छथि छीतन भाय। छितनो भायकेँ बरियातीमे हकार देब नै बिसरब, समाजक जाति-पातिक कुप्रर्थासँ निकालि मनुक्खक जे एकटा अपन समाज होइछ, मनुक्खक जे एकटा जाति होइए जइमे सभ वर्ग आ वर्णक लोक रहैए, वास्तवमे ओ ने समाज छी। ओइ जातिगत भावनासँ ग्रसित समाजकेँ ऊपर मुँहेँ उठा स्वच्छ वातावरणमे शुद्ध साँस लेबाक बाट देखौलनि हेन। जहिना हवा अनेक गैसक मिश्रन छी तहिना तँ समाजो अनेक वर्ग आ वर्णक मिश्रण छी। जौं से नै तँ कियो एक-दोसरक बिना जीब सकत? संभव नै, मुदा से बुझैत लोक अपने स्वार्थमे आन्हर भेल रहैए। आ फल्लंमा डोम तँ फल्लांमा दुसाध ई संस्कार नैन्हियेटा सँ माए-बाप देबामे पाछू नै रहै छथि। आखिर एकटा प्रश्न हमरा तरफसँ, अहाँ प्रबुध समाजक लेल अछि, जौं समाजमे सभ जाति नै रहत तँ की समाजिक जीवन चलि सकत यदि हँ तँ केना? जौं नै तँ फेर एहेन भावना किएक? डोमसँ हम छूबल जाएब, मुदा ओकर बनाओल चीज-बौस गौसाँइ-पितरपर चढ़त तँ की इष्ट-देव नै छुऔत। जौं छुआएत तँ सनातनिये सँ किएक ने..... ? आ जौं देव-पितर नै छुआएत तँ हमरा-अहाँकेँ छुएबाक कोन आधार बनल अछि?? झाँपले परदामे उपन्यासकार जाति-प्रथाकेँ तोड़ि एकटा आदर्शवादी समाज स्थापनापर जोर देलनि। जहिना फुलवाड़ीमे जुही, चमेली फूल रहैत अछि तहिना गेना गुलाब सेहो। अधला नै तँ नीकक महत्ते की? तीत नै तँ मीठक स्वादे की? कारी नै तँ गोरे की? तहिना तँ समाजो एकटा फुलवाड़ी होइ छै। जइमे सभ तरहक लोकक अपन-अपन भूमिका होइ छैक। विचार करबाक थिक जे वैदिक पद्धतिपर चलए बला समाजक चित्र जे जहजहि उपन्यासमे आएल अछि से तँ सहज अछि। मुदा आजुक ओहन समाज जइमे अलगाव अछि। मनुक्ख-मनुक्खमे एतेक अन्तर किएक अछि? प्रश्नक संग इशारामे उत्तर सेहो बतेबामे उपन्यासकार पाछू नै हटलथि। जेकर स्पष्ट उदाहरण रघुकाकाक बरियातीमे छीतन भाय सदृश लोककेँ अपन बाजाक संग भजन करैले चलैक लेल कहि एकटा आदर्श समाजक परिपक्व छाप छोड़लनि अछि। ओतबे नै, एकटा कहावत अछि ‘भेल-गेलपर शिव जगरनाथ’ एहने एकटा व्यक्ति छथि फोंचभाय, पाही जमीनदारक टहलू धड़फराएल आबि छौंकए चाहै छथि ई बाजि- ‘सभ कथुक आरिऔन तँ देखै छी मुदा ससर आ घी कहाँ अछि?’ माने काज भँगठा एवं भरिया देबए चाहलनि। मुदा लेलहा फोंचभायकेँ चौहटैत ई सावित क’ देलकनि जे रघुकाका आ देवभाय सँ हमरो केकरोसँ कम अपेक्षा नै। फोंचभाय कएल काजमे केवल गलतियेटा तकैबला लोक छथि। मुदा हाय रे उपन्यासकार, समस्त उपन्यासमे जीवन थिक तँ मरण असंभावी.., ई खेल चलिते रहैए। अही समाजक बीच लोक जनमो लइए आ मरबो करैए। पैघत्व तँ ऐ बातमे अछि जे जइ समाजमे रघुबाबू सन दाता छलाह आइ ओकरे ऋृण चुकबए खातिर अर्थी उठबैले बुझू जे मािर भ’ रहल अछि। तही बीच लेलहाक मुँहसँ अनायास निकलल जे सुनै जाउ, कान्ही लगा उठबियनु नै तँ दरद हेतनि।’ सभ मानि गेल। एक दिस आंगनसँ लहास उठल आ दोसर दिस सहनाइपर विदाइक धून। आहहा... यएह तँ सुख आ दुखक दुिनयाँ छी। जीवन-मरणक सार्थकता छी। मुदा हमरालोकनि जीवनक एक्के भाग देखै आ जनै छी। जीवन आ मरण सृष्टिक चक्र छी। ऐसँ कियो बाँचल कहाँ। एक िदस करियाकाका आ दोसर दिस सुन्नरकाका रघुभायकेँ अंतिम प्रणाम कऽ डेग आगू बढ़ौलनि। पाछू-पाछू देवनंदनक हाथमे आगि अा कोहा दऽ पाछू-पाछू बरिआती सजि विदा भेल। तइ पाछू करियाकाका रेलगाड़ीक गार्ड जकाँ पाछू-पाछू। गाछी पहुँचि सभ कियो सभ कथुक जोगर अपना-अपना विवेकसँ लगा सिरहौना-पथौना रूपी औछाओनपर सुता एक-एक चेरा चढ़बैत छाती भरि ऊँच कऽ सुन्दरकाका देवक बाँहि पकड़ि धधकैत उक मुँहमे लगा देलकनि। बाँकी सभ काज समाजक निअमानुसार तेरहसँ सत्तर दिन धरि चलैत रहल। समाज तँ समाजक निअम। तही बीच हुलन दुनू परानी, जेकर आधा देह झाँपल आ आधा उघार छल, ओसरक नीच्चेसँ अपन कर्मकेँ धर्म बूझि प्रणाम केलकनि आ मने-मन सोचबो करए जे रघुबाबूक काजमे कत्ते वर्तन लागत। ईम्हर देवबाबू जिनका गाड़ामे उतरी छन्हि हुनकोसँ बेसी चिन्ता करियाकाकाकेँ छन्हि मुदा करियाकाकासँ कम कुसुमलाल पण्डितकेँ कहाँ छै? ओकरा तँ ऐ बातक चिन्ता छै जे श्रधुआ वर्तनक काज तँ दसम-एगारहम दिन हएत, मुदा दहीक लेल? ओतबे नै, रघुनन्दन बाबूक काजक मादे ततबेक चिन्ता राजेसर नौआकेँ सेहो। जेकर काज एक दिस पुजबैक प्रकिया तँ दोसर दििस कर्म सम्पन्न करेबाक। मुदा एतेक सभ किछु होइतौ अपना समाजमे जे पण्डितक किरदानी छन्हि तेकरो बखिया उघारैमे कतौ कमी नै रखला अछि। जे नायकक रूपमे शिवशंकर छथि जे अदौसँ अद्यतन आन-आन श्राध-कर्मक उदाहरण दऽ जजमानक खून उड़िस जकाँ पीबैत रहलाह जेकर साक्षात् उदाहरण सिट्ठी भेल समाज सबहक सोझामे अछि। मनुक्ख विचारसँ पैघ होइत अछि। विचार बदलल। नव पीढ़ीक प्रसादे सुन्दर आ दुधिगर गाए सभ सेहो गाममे आएल। तइ बीच चाहक संग सभ सभ अपन-अपन विचार रखलनि। जइमे सर्वसम्मतिसँ विचार यएह भेल जे पाँच गोटे विचार कऽ डेग उठाउ, (1) श्राद्ध घरवारी आ कर्ताक अनुकूल हुअए। दानस्वरूप मात्र झरखंडी बाछा नै दागल जाए। (1)(2) आन गामक पंच माने भोज खेनिहारसँ परहेज कऽ गामक सभ जातिकेँ खुऔल जाए आन गामक दोस्त–कुटुम-दिआद तँ रहबे करता। (1)ऐ प्रकारे उपन्यासक मादे उपन्यासकार हमरालोकनिक बीच व्याप्त विभिन्न प्रकारक नीक आ अधला प्रथा-रीति-चलनि-मान्यताक बीच विभिन्न प्रकारक लोक सबहक अमुल्य विचार आ ओही समाजक दालि-भातमे मुसलचन्दक उदाहरण दऽ ओकरासँ सावधान केलनि। सृष्टिक जे चक्र छी जीवन-मरण जइसँ कियो बँचि नै सकै छी जेकरा समाज आ कर्त्तकेँ मनोनुकूल कऽ समाजमे रचनात्मक काज करी ऐ लेल एकटा दिशा-िनर्देश देलनि। जेकरा देवनन्दन जी अपने शब्दे स्वीकार कऽ पिताक निम्मिते साले-साल भोजे नै वल्कि यथासाध्य कल्याणकारी काजक प्रेरणा देलनि। २ शिवकुमार झा ‘टिल्लू’ पृथ्वीपुत्र अतिक्रमण सबल व्यक्ति वा समूहक अमानुषिक प्रवृति रहल अछि। वैज्ञानिक मान्यताक अनुसारे सेहो अस्तित्वक लेल संघर्ष आ ओइ संघर्षमे योग्यतमक उत्तरजीविता कालक्रममे होइ रहल अछि। जखन सम्पूर्ण सृष्टिमे बौद्धिक चेतनासँ युक्त मानव अस्तित्वक लेल बेवस्थाक विरूद्ध संघर्ष केवल तखन मिथिलाक माटि-पानि कोना अछोप रहए। समाजक ऊँच-नीच आ जय-पराजयक वृत्ति-चित्रक रूपेँ ललितेश मिश्र ललित जीक उपन्यास पृथ्वी-पुत्र पुस्तकाकार सन् 1965 ई.मे प्रकाशित भेल। जेना की आमुखमे स्वयं उपन्यासकार लिखने छथि जे ई उपन्यास हंसराज जीक तगेदामे लिखल गेल, तँए ऐमे रचनाकारक सम्पूर्ण आत्मीयता देखब भ्रामक सिद्ध हएत। हमरा सबहक संग ई दुर्भाग्य रहल जे आत्मिक भाषामे रचनाकार अपन आशुत्वसँ बेशी तगेदाक कारणेँ रचना करैत रहलाहेँ। रचनाक कारण जे हुअनि मुदा एतबा तँ अवश्य प्रासांगिक आ मैथिली साहित्यक लेल वरदान मानल जाए जे पृथ्वीपुत्र उपन्यासक माध्यमसँ उपन्यसकार मिथिलाक माटि-पानिमे समाहित सभसँ अंतिम वर्गक समाज धरि पहुँचि गेल छथि जे सोझ मानसिक प्रवृत्तिक द्योतक अछि। ओना ललितक कथा “रमजानी” सेहो समाजक दलित वा पछड़ल लोकक वृत्तिचित्र थिक। स्वाभाविके छैक रचनाकार प्रशासनिक सेवामे रहल छथि,, समाजक ऊँच-नीच कृत्य-कुकृत्य आ वर्गक विषमताक दर्शन बरोबरि होइत हेतनि तँए अपन दैनन्दिनीक अनुभवकेँ कल्पनाक सरोवरिमे बोरि यथार्थवादी रूप देबाक प्रयास कएलनि जइमे अंशत: सफल सेहो भेलाह। उपन्यासक गाथा व्यावसायिक चलचित्र जकाँ मध्यसँ प्रारंभ होइत अछि। घटनाक गर्त्तमे गेलासँ ई उपन्यास दलित समाजमे सामन्तवादी शोषणक विरूद्ध वर्ग संघर्षक चलचित्र थिक। जंगी पासवानक पुत्र विसेखी पासवान कर्मसँ वैड-कैरेक्टरक चोर अछि। जकरा अपन दुनू पुत्र गेनालाल आ सरूपसँ बेशी अपन शिष्य छतरपर विश्वास छैक। गेनालाल जेकरा गेनमा कहल जाइछ ओकर चरित्र भकलोल-मनुख मुदा कर्मशील मजूरक छैक। सरूप ऐ उपन्यासक नायक थिक। जकरा कतौ उपन्यासकार दलित समाजक क्रांति-वीर वनएबाक प्रयास करैत छथि तँ कतौ अपन बहिन बिजलीक कल्पनाथ मिश्र उर्फ कलपू मिश्रक संग अनैतिक सिनेहक प्रोत्साहक वा साक्षी। सरूपक चित्रक ई अर्न्तद्वन्द्व दलित समाजक जीवन शैलीमे विराधाभास मानल जाए। गेना लालक अर्द्धागिनी बेनी अपन पतिक मृत्युक पश्चात् पारिवारिक सहमति आ उत्तरदायित्वक कारणे अपन देओर सरूपसँ बिआह कऽ लैत अछि। उपन्यास गाथाक विचित्र पात्र छथि बिजुली वा बिजो बिजुरी आ बिजुरिया सन छद्म नामसँ विभूषित बिसेखी पासवानक कन्या “बिजली”। कौमार्यक आंगनमे प्रवेश करिते बिजलीकेँ गामक पंडित कुलमे जनमल कल्पनाथ मिश्रसँ प्रेम भऽ जाइत अछि। कलपू मिसर विवाहित छथि मुदा पहिल प्रसव पीड़ाक क्रममे हिनक कनियाँक देहान्त भऽ गेलनि। ऐ अनर्गल आ िनष्कर्ष रहित प्रेमक आभास दलित समाजकेँ लागि जाइत अछि। फलत: रेलवेमे पेटमेन हीरालालसँ बिजलीक बिआह कऽ देल गेल। रीति-प्रीति आरंभे कालसँ साहित्यक महत्वपूर्ण बिन्दु रहल छैक। ओइ मार्गदर्शनपर आगाँ बढ़ैत ललित जी उपन्यासमे आकर्षणक सोमरस घोरबाक प्रयास करैत ऐ विचित्र पात्राकेँ ऐमे समाहित कएलनि। दू-तीन बेरि पेटमेन हीरा लालक सानिध्यसँ बिजली पड़ा कऽ गाम आबि गेलीह। मान-मनोबलक बाद फेर पतिक क्वाटरमे गयलाक बाद कोयला सन धुरधुर घऽर आ बऽर नीक नै लगलनि। हीरा लालकेँ बिजलीक चरित्रक वास्तविकताक भान भऽ जाइत अछि। पुरुष सभ किछु बर्दास्त कऽ सकैत अछि मुदा अपन दाराकेँ दोसर पुरुषक सन आत्मिक वा दैहिक वरण पुरुषक लेल घोंटव असंभव। बिजलीक प्रति हीरा लालक व्यवहार कर्कश भऽ जाइत अछि। अंतिम परिणति भेल जे बिजली सभ दिनक लेल नैहर आबि गेली। हीरा लाल पुनि आएल मुदा ओकरा चरित्रपर खलनायिका बिजली लांछना लगेबाक लेल सरुपकेँ उत्साहित केलक। गामक मानिजन अर्थात् जतिया राजा काी दासक अंतिम िनर्णय भेल जे बिजली आब हीरा लाल संगे नै जेतीह। ओना समाजक सभ पंच एकमत छलाह जे बिजलीक पुर्नविवाह कराओल जाए, मुदा जखन रचनाकार मात्र उपन्यासक आकर्षक लेल ऐ चरित्रक िनर्माण कएने छथि तँ क्रांतिक आश असंभव। कल्पनाथ मिश्र आ बिजलीक सिनेह पत्रहीन नग्न गाछ जकाँ मानल जाए जकर अस्तित्व नै। एक दिस जखन सरूप पुछैत अछि बिजलीसँ- “पाहुन मोन पड़लौ की....?” तँ बिजलीक उत्तर दार्शनिक जकाँ भेटल तँ दोसर दिस बिजली कलपू मिसर द्वारा दोहरि मोड़ि कऽ देबए काल बलजोरी शब्द सुनि बजैत अछि- तोरा संग कुश्तम पटकममे डाँड़ तँ नै हएत हमरा....। ई सिनेह कोन तरहक मानल जाए ई िनर्णए करब सर्वथा असंभव। उपन्यासगाथामे कथाक्रमानुसारे विकराल वर्ग संघर्ष देखार होइत अछि। सर्वे एलाक बाद गरीबक जमीन कागतपर तँ आपिस होइत अछि मुदा जंग बहादुर सिंह सन जमीन्दार दुसाध आ मुसहर समाजकेँ जमीन देबाक लेल तैयार नै अछि। वर्ग संघर्ष करबाक लेल सरूप उद्यत भेल। सरूपक दलमे जजाति कटबाक लेल गेनालाल सन माटिक पूत मात्र छल। जंग बहादुरक हँसेरीदल लोहा सिंहक नेतृत्वमे सरूपपर हमला कऽ देलक। अनुजकेँ वचेबाक क्रममे गेनमा मारल गेल। ऐ वर्ग संघर्षक अंत औचित्वहीन लगैत अछि। सन् 1965 ई.मे भारत आजाद भऽ गेल छल। तखन दलित समाजक एकटा माटिक लाल सामन्तवादी तत्वक आगाँ लुप्त भऽ गेल आ जंगबहादुर सन सामन्तीक ओइठाम पुलिस पहुँचल नै हएत...। ई अत्यन्त हास्यास्पद लगैत अछि। जौं ऐ तरहक घटना भेलो हएत तैयो उपन्यासकारकेँ ऐमे क्रांति अनबाक प्रयास करबाक छलनि। साम्यवादी लेखनीसँ िनकसल उपन्यासक अंश अत्यन्त िनर्बल मानल जाए। ऐ घटनासँ पूर्व बिजलीक चरित्रपर आधात दुर्योधन सिंह सन सिपाही करैत अछि। ओकरा सरूप काटि दैत अछि। पुत्रकेँ जेहलसँ बचएबाक लेल बिसेखी सभ दोख अपना ऊपर लऽ जहल चलि जाइत अछि जइठाम संग्रहणी सन बेमारीसँ ओकर मृत्यु भऽ गेल। बिसेखीक चरित्रक काल-क्रमानुसार परिवर्त्तन उपन्यासक सबल पक्ष मानल जाए। पहिने जखन चोर छल तँ ओकरा किछु नै भेल आ जखन किछु नै केलक तँ पुत्रमोह आ पारिवारिक मर्यादाक कारणेँ सजा भेटल। बी.सी. कैरेक्टरक चोरसँ मुक्ति पाबए लेल कलक्टरक आगाँ सप्पत खेने छल। ओइ सप्पत खेबामे घुरन दुसाध, मंडर पाण्डे, खख्खन जट्ट, रौदी खलीफा आ बुच्ची झा सन चोर सेहो छल। उपन्यासकार द्वारा चोरक नाम चयन करबामे ई स्पष्ट भऽ गेल चोरक कोनो जाति नै होइत छैक, समाजक अग्र आसन बैसैबला लोककेँ सेहो कुकर्मी समाजमे स्थान छन्हि। ई उपन्यासकारक समन्वयवादी सोच मानल जाए। आब बिसेखीक परिवारमे पुरुष पात्रक रूपमे बचैत अछि- सरूप। सरूपकेँ ललित पृथ्वीपुत्र बनेबाक कोनो अबसरि नै छोड़ैत छथि। ऐ उपन्यासक ओ वास्तविक नायक अछि। अपन पिताकेँ चोरि नै करबाक सप्पत खाइत काल लड़खड़ाइत देखि ओ क्रोधित भऽ जाइत अछि। ओकरा चोरि करब कथमपि पसिन्न नै। जंगबहादुरकेँ ललकारि जजाति काटि लेबाक उपक्रममे शोषित समाजक ओ “क्रांतिवीर” बनि जेबाक लेल उद्यत अछि। बहिनक आँचरपर दुर्योधन सिंह सन सिपाहीक हाथ देखि ओकर हत्या कऽ केलक। सरूप कर्मवादी सत्पुरुष अछि। जाधरि बेनीकेँ सरूपक माय एकर अंक नै लगलन्हि ताधरि ओइ भाउजमे सरूप मात्र श्रद्धापूर्वक मातृत्व रूप देखलक। ऐ दलित समाजक आदरणीय पात्रकेँ ललित एकठाम कलंकी चरित्र बना देलनि। कल्पनाथ मिसरक अनर्गल सिनेहसँ बँधलि बिजलीकेँ सरूप आत्मसात केना केलक। एकठाम भाउजिक विषक्त हँसी आ व्यंग्यवाणसँ आकुल भऽ सरूप बिजलीपर क्रोध तँ करैत अछि मुदा सम्पूर्ण उपन्यासमे कलपू मिसरक प्रसंगमे पृथ्वीपुत्र चुप्प रहि गेल। सिनेह कोनो अपराध नै, कियो केकरोसँ कऽ सकैत अछि, मुदा ऐ सिनेहक कोनो निष्कर्ष नै। सरूप सन सोझ मानसिकताक पुरुष ऐ अनर्गल सिनेहकेँ केना समर्थन देलक। बिजली ठाम-ठाम औचित्यहीन सिनेही जकाँ बेनीसँ अपन प्रेमकेँ सबलता प्रदान करबाक लेल निरर्थक संवाद करैत अछि। ऐसँ इहए प्रमाणित होइछ जे ऐ नारीकेँ अपन माता-पिता आ भाइक मर्यादाक कोनो बोध नै। तखन एकठाम महान दार्शनिक जकाँ बिजलीकेँ दृष्टि पटलपर राखब उपन्यासकारक अदूरदर्शिता छन्हि। जखन कलपू मिसर अपन माइक राखल अभरन बिजलीकेँ पहिरबाक अनुरोध करैत अछि तँ ओ बजैत अछि जे- “ओ गहना पहिरब तँ हम जरि जाएब। जखन बिजली एतेक बुद्धिमती महिला अछि तँ अपन मान-मर्यादा अपन बाप-पुरूखाक द्वारा बनाओल बेवस्था अर्थात् पाणिग्रहण संस्कार द्वारा वरणेय हीरालालकेँ किअए छोड़ि देलक। ई निश्चित रूपे जातीय संकीर्णतासँ बान्हल उपन्यासकारक व्यक्तिगत अनर्गल सोच छन्हि।” जौं ऐ उपन्यासमे वर्ग-संघर्ष देखाएब यथार्थबोध मानल जाए तैयो ऐमे कमजोरी अछि। वर्ग संघर्षमे हत्या आ ओइ हत्याक बाद केनिहारकेँ कोनो सजा नै, अत्यन्त िनर्बल पक्ष थिक। कलपू मिसर आ बिजलीक िसनेहमे बिसेखीक परिवारक कोनो तीक्ष्ण अवरोध नै देखाएब दलित समाजक चेतनापर आधात मानल जाए। समाजक कात लागल वर्ग सवर्ण आ सामन्तवादी लग अपन घरक गणिकाकेँ परसि सकैत अछि... सर्वथा असंभव। दलित समाजक नारीसँ सवर्ण समाजक पुरुष बेबाक गप्प तखने कऽ सकैत छथि जखन हुनक विचार आ चरित्र विश्वसनीय हुअए। भऽ सकैत अछि बिजली सन कोनो विशेष नारी एहेन मानसिकता रखैत छथि वा होथि मुदा परिवारक आन लोक ऐ तरहक िसनेहकेँ कथमपि नै स्वीकार करत। जौं एकर अंत दुनूक बिआह देखा कऽ कएल जइतए तँ ई उपन्यास अवश्य दूरगामी होइतए। अंर्तद्वन्द्वसँ भरल समाजसँ ललित कोनो अलग नै छथि तँए सभ सकारात्मकताक आश राखब उचित नै। एतेक तँ निश्चित जे पृथ्वीपुत्र शिल्पमे बड़ नीक स्थान रखैत अछि। विम्ब कोनो विशेष नै मुदा समाजक अंतिम वर्ग धरि पहुँचल तँए व्यापक मानल जाए। जितपुर मौजाक टोल बबुरबन्नाक गाथा, मुदा टोलमे खएरक बोन बबूरसँ बेसी मुदा नाओं बबुरबन्ना। वास्तविकता अछि सामर्थ्यवान लोक कम रहितौ पूजनीय होइत छथि, उपन्यासकारक दृष्टिकोण सम्यक् आ समन्वयवादी ऐठाम तँ अवश्य लगैत अछि। भाषा ओ शैली गतिमान आ खाँटी ग्रामीण आंचलिक मैथिलीमे लिखल गेल जे ललितक योग्यताक प्रत्यक्ष प्रमाण थिक। आाचार्य रमानाथ झाक ऐ मतसँ हम सहमति नै रखैत छी जे हास्य रसक अभावमे पृथ्वीपुत्र झुझुआन लगैत अछि। जखन स्थिति कनबाक हुअए तँ हास्य समागम संमव नै ऐ उपन्यासमे हास्य रसक समागम करब िनरर्थक होइतए। ऐ पोथीक सभसँ सकारात्मक पक्ष थिक समाजक यथार्थवादी बेवस्थाक मौलिक चित्रण। जाति-पातिमे टुटल समाजक सत्यकेँ स्पष्ट देखबैत उपन्यासकार एकठाम एहेन साहस कऽ देलनि जे संभवत: सबल समाजमे जनमल दोसर साहित्यकारसँ अवश्य असंभव होइतए। पृथ्वीपुत्र पलायनवादक विरोध करैत अछि। जमीन्दार कृषिकार्य स्वयं नै करताह, मुदा जमीनक सकल उत्पाद आ स्वामित्व हिनके भेटनि, ऐ कटु सत्यसँ ललित विलग छथि। हिनक लेखनीसँ क्रांतिक सुगंध पसरल जे जमीन ओकरे हएत जे एकरा जोतए। वास्तविकता सेहो छैक साम्यवादी बेवस्थामे कर्म पुरुषकेँ कर्मक फल अवश्य भेटबाक चाही। जे संतान माए-बापक प्रति अपन कर्त्तव्य पालन नै करए ओकरा मातृ-पितृ सिनेह मंगबाक कोनो अधिकार नै। अपन पसेनासँ माटि कोरि जे मजूर धरतीकेँ बाँझ होएबासँ बचाबथि हुनके ऐ माटिक स्वामित्व भेटबाक चाही। जौं ऐ प्रकारक सोचकेँ सबलता प्रदान कएल जाए तँ कृषि प्रधान देशमे अपन मौलिक कर्मसँ लोक विमुख भऽ पड़ाइन नै करताह। प्राकृतिक संतुलनकेँ जीवन्त राखब सभक मौलिक कर्त्तव्य थिक। ऐ तरहक साम्यवादी दृष्टिकोण मैथिली साहित्यकेँ अवश्य नव दिशा देलक। िनष्कर्षत: पृथ्वीपुत्र किछु अर्न्तद्वन्द्वसँ भरल रहलाक बादो मैथिली साहित्यमे नव चेतना भरबाक लेल अनुगामी उपन्यास मानल जाए। २ मैथिली कथा साहित्यक विकासमे राजकमलक योगदान :: शिवकुमार झा ‘टिल्लू’ सन् 1954 मे “अपराजिता” कथाक संग राजकमल जीक मैथिली कथा साहित्य जगतमे प्रवेश भेल। हिनक मूल नाओं मनीन्द्र नारायण चौधरी छन्हि। 1929मे जनमल ऐ साहित्यकारक लेखनीसँ मैथिली साहित्यकेँ लगभग 36 गोट कथा भेटल। मात्र 38 बरखक अपन जीवनकालमे राजकमल मैैथिली गद्य साहित्यकेँ किछु एहेन कृति दऽ देलनि जइसँ प्रयोगकेँ बादक धरातलपर प्रतिष्ठित करबाक श्रेय साहित्यक समालोचक लोकनि ऐ साहित्यकारकेँ िनर्विवाद रूपेँ दऽ रहल छथि। हिनक तीन गोट कथा संग्रह ललका पाग, एक आन्हर एक रोगाह आ “िनमोही बालम हम्मर” पुस्तकाकार प्रकाशित छन्हि। एकर अतिरिक्त हिनक एक गोट पोथी “कृति राजकमलक” मैथिली अकादेमीसँ प्रकाशित भेल अछि जइमे 13 गोट कथा आ एकटा उपन्यास आन्दोलन संकलित अछि। ओना कृतिराजकमलक छओ गोट कथा “ललका पाग”मे सेहो छपल अछि। रमानाथ झाक मतेँ राजकमलक कथा मूल उद्देश्य मनोविश्लेषणात्मक प्रणालीसँ आरोपित मर्यादा ओ आदर्शक पाछाँ नुकाएल आन्हरकेँ नाङट करब अछि। डॉ. डी.एन. झा सेहो ऐ मतसँ सहमत छथि। “ललका पाग” कथा हिनक लिखल कथा सभमे अपन विशिष्ट स्थान रखैत छन्हि। ऐ कथाकेँ मैथिली साहित्यक किछु श्रेष्ठ कथामे स्थान देब सर्वथा न्यायोचित अछि। कथाक आरंभमे मैथिली स्त्रीक चिन्हबाक विश्लेषणमे कोनो अचरज नै। त्रिपुराक तुलना जइ वर्गक मैथिल कन्याँसँ कएल गेल कथाक भूमिकामे ओइ वर्गक स्पष्ट उल्लेख तँ नै कएल गेल मुदा ओ ब्राह्मण परिवारक कन्या छथि। अल्पायुमे पण्डित पिताक मृत्युक पश्चात् तिरू अपन माइक संग गाममे रहैत छलीह। अग्रज झिंगुरनाथ बाहर धन उपार्जन लेल चलि गेलाह। किछुए वर्षमे तिरू युवती वयसमे प्रवेश कऽ गेलीह। दस-एगारह वर्षक बाद जखन झिंगुरनाथ अपन गाम घुरि अएलनि तँ मातृसिनेहक संग-संग तिरूक हाथ पीअर करबाक जिम्मेदारीक आभास भेलनि। वास्तविकतो छैक जे जखन ई कथा 1955मे विदेह विशेषांकमे देल गेल ओइ कालकेँ के कहए वर्तमान समैमे सेहो अपना सबहक समाजमे कन्याक जन्म कालहिसँ बियाहक चिन्ता अभिभावककेँ सतबए लगैत छन्हि। तिरू तँ माघमे 14मे वर्षमे प्रवेश कऽ जेतीह। उद्देश्य जौं सार्थक हुअए तँ सफलता निश्चित भेटबे करैत अछि। चण्डीपुरक राम सागर चौधरीक सुपुत्र राधाकान्तसँ स्व. पण्डित टेकनाथ झाक पुत्री त्रिपुराक बियाह सम्पन्न भेल। सासुर आबि तिरू कनेको स्तब्ध नै छथि किएक तँ जीवन शैलीक कोनो ज्ञाने नै छन्हि। अज्ञानतामे बाड़ीक पछुआरमे पोखरि देखि अपन बेमात्र सासुसँ हेलबाक कलाक जिज्ञासा कएलनि। यएह जिज्ञासा हुनक जीवनक लेल काल भऽ गेलनि। चननपुरवाली सासु भोरे-भोर समस्त गाममे अफवाह पसारि देलखिन जे रातिमे नवकी कनियाँ पोखरिमे चुभकि रहल छलीह। राधाकान्त ऐ घटनासँ मर्माहित भऽ गेलाह। आब प्रश्न उठैत अछि जे चननपुरवाली एना किअए कएलीह? ओ अपन पितिऔत भाय डाॅ. शंभूनाथ मिसरक सुपत्रीसँ राधाकान्तक बियाह करबए चाहैत छलीह। ऐठाम कथाकार कनेक चुकि गेल छथि। ऐ उद्देश्यकेँ कतौ स्पष्ट नै कएल गेल। माए जौं अपन बेटाक बियाह आनठाम करबए चाहैत छलीह तँ त्रिपुरासँ कोना भऽ गेलनि। जखन की चननपुरवाली परिवारक अभिभाविका छलखिन। हुनक पतिक हुनकापर कोनो विशेष अनुशासन सेहो नै छलनि आ ने राधाकान्त त्रिपुरासँ प्रेम बियाह केलखिन तँ कथानकमे एहेन परिवर्त्तनकेँ सोझे-सोझ आत्मसात् करब कनेक कठिन लागि रहल अछि। गाममे तँ कूटनीति चलिते अछि किएक तँ छद्म रोजी रोजगारपर बेरोजगारी भारी। तँए भोलामास्टर आ बंगट चौधरी सन परिवार विध्वंसक केँ राधाकान्त सन संवेदनशील लोककेँ दोसर बियाह करबाक प्रेरणा देबएमे यथार्थ बोध होइत अछि। ई सभ घटना चक्रसँ कथा रोचक होइत अछि। मुदा कथाकेँ आकर्षक बनेबाक क्रममे राजकमल बिसरि गेलाह जे त्रिपुरा मात्र 13-14 वर्षक बालिका छथि। जखन पोखरिमे चुभकबाक जिज्ञासा सासुरोमे छन्हि तखन सौतिन अएबाक संभावनाक मध्य अपन सकल गृहस्थ कार्यमे कोना लागल रहलीह? एक दिस चंचल रूपक उद्बोधन आ दोसरा रूपमे परिपक्व नारी, एकरा प्रयोगवाद तँ कहल जा सकैत अछि मुदा प्रयोगात्मक रूप वास्तविकतासँ बहुत दूर अछि। राधाकान्त सेहो शिक्षित छथि, मात्र अपन स्त्रीकेँ पोखरिमे स्नान करबाक सजाक रूपेँ दोसर बियाह। ओना मिथिलामे पहिने गप्पे-गप्पमे बियाह करबाक इतिहास रहल अछि परंच ऐ प्रकारक बियाहक कारण समीचीन नै लागल। अंतमे अपन बियाह कालक राखल ललका पाग जखन त्रिपुरा राधाकान्तकेँ दोसर बियाहक लेल प्रस्थानकालमे दैत छथिन तँ राधाकान्तक हृदए परिवर्तन भऽ जाइत अछि आ पहिलुक ललका पागक मर्यादा रखबाक लेल ओ चुप्प भऽ आंगनमे आबि कुर्सीपर बैस जाइत छथि। एहू घटनकाक्रममे कथा वास्तविकतासँ बेसी कल्पवृक्षक पुष्प प्रतीत होइत अछि। जे राधाकान्त मात्र पोखरि स्नानक दंडमे त्रिपुरासँ नारीक अधिकार छीनि लेबाक िनर्णए केलनि ओ अंगुलिमाल जकाँ क्षणहिमे कोना बदलि गेलाह। ई ध्रुव सत्य अछि जे मैथिल ब्राह्मण परिवारमे ललका पागक स्थान विशेष छैक आ ओइ पागकेँ सहेजि कऽ त्रिपुरा धएने छलीह। भगवत परीक्षा जकाँ सौतिन अनबाक लेल पतिक हाथमे पाग देबाक िनर्णएमे अंगुलिमाल रूपी राधाकान्तकेँ बुद्धसँ दर्शन भेलनि। जौं एकरा संभवो मानल जाए तैयो कनेक कमी ई जे राधाकान्त त्रिपुराक तुलनामे कामाख्या दाइक संस्कारकेँ सोचि-विचारि विशिष्ट मानि दोसर बियाह करबाक िनर्णए कएलनि। कोनो क्षणहिमे नै। ऐ बियाहक सूत्रधार हुनक बेमात्र माए छलथिन। चननपुरवालीकेँ अछैत राधाकान्त माथपर बिनु पाग धएने कोना विदा भऽ रहल छलाह, ई तँ सद्य: कथाक बहुत कमजोर पक्ष अछि। भाषा विज्ञानक आधारपर जौं मूल्यांकन कएल जाए तँ कथाकार परम्परावादी मैथिल साहित्यकार जकाँ गद्यकेँ अधोषित श्रृंगारक रूप देबाक प्रयास कएलनि। तिरूक तुलना वाण भट्टक श्यामांगी नायिकासँ करए काल ई उद्देश्य स्पष्ट भऽ जाइत अछि। मुदा जखन लिखैत छथि जे “मिथिलाक छौड़ी सभ अहिना कनैत अछि।” तँ स्पष्ट भऽ जाइत छन्हि आत्मिक रूपसँ किछु आर कहए चाहैत छथि। ऐठाम छौड़ीक स्थानपर ‘कन्या‘ शब्दक प्रयोग सेहो कएल जा सकैत छल जे बेसी नीक लगितए। कामाख्या दाइक विषयमे राधाकान्तक मौन सिनेहमे पिआ आ आ जाऽ....... लिखबाक उद्देश्य स्पष्ट नै भऽ सकल। ई सत्य अछि जे राजकमल मैथिलीक संग-संग हिन्दीमे सेहो लिखैत छलाह, मुदा हिन्दीक प्रति झॉपल सिनेह मैथिली कथामे परिलक्षित भऽ गेल। ई मैथिली साहित्यक लेल दुर्भाग्यक गप्प जे ऐ भाषाकेँ दुभाषी रचनाकार मात्र अपन नाओं-गाओंक लेल हथियार बनेलनि मातृभाषा सिनेहसँ साहित्यिक रचनाक कोनो संबंध नै। ओना ऐ प्रकारक कथ्य यात्री आ आरसीक रचनामे नै भेटैत अछि। कथोपकथनमे विरोधाभास देखलाक बादो एकरा नीक रचना मानल जा सकैछ किएक तँ कथा बड्ड आकर्षक छन्हि। जौं बिम्बक विश्लेषणकेँ शिल्पक रूपमे देखल जाए तँ राजकमलजी स्थापित शिल्पी छथि ई ललका पाग प्रकट भऽ गेल। दमयन्ती हरण- ‘दमयन्ती हरण’ भरल सभामे कोनो विवश नारीक चिर-हरणक वृत्ति चित्र नै। ई तँ समाजक पाग-चानन- ठोपधारी किछु कथाकथिक भलमानुषक वास्तविक झाॅपल चरित्रकेँ नाङट करबाक कथा थिक। कथा नायिका छथि तेइस-चौबीस बरखक- दमयन्ती दुलरैतिन दम्मो अथवा समाजक कोप भाजन बनलि दमिआँ। ऐ नायिकाकेँ गामक रक्षक लोकनि खलनायिका बना देलनि, जे दोसरक शोषण तँ नै करैत अछि मुदा अपन चरित्र हनन कऽ ग्राम्य समाजकेँ विगलित कऽ रहलीह जे कोनो अर्थमे उचित नै। ऐ लेल दोष ककरा देल जाए? सामर्थ्यहीन मायकेँ वा ओहि समाजकेँ जकर छाहरिमे नेनपनसँ सोझे अग्राह्य नारीक अवस्थामे प्रवेश कऽ गेली- दमियाँ। मिथिला समाजक वर्णन कोनो कवितामे जतेक घृतगन्धा हुअए मुदा ई अक्षरश: सत्य अछि जे जइ समैमे ई कथा लिखल गेल ओइ समैमे परीक्षा समाप्ति आ नव कक्षामे प्रवेशक मध्यक समय छात्रक लेल मस्ताएल साँढ़सँ बेशी किछु नै छल। जौं रहितए तँ फूलबाबू रामपुरमे किअए बौआइत रहितथि। “फूल भैया ओइपार जएबह?” वेदव्यासक मत्स्यगंधा इत्यादि संवादसँ नारी विमर्शक विह्वल रूप प्रदर्शित होइत छैक। कथाकार तँ कथाक प्रारंभेमे अवश्ये ई निश्चय केने हेताह की कथा नायिकाकेँ वैश्याक रूपमे प्रदर्शित कऽ कथाक इतिश्री कएल जाए। मुदा आदर्शवादी विचारधारासँ एकटा वैश्याक भूमिका वॉधव बड़ कठिन कार्य भेल हएत। शनै:-शनै: ‘गाड़ीमे भीख मांगैत छौड़ी’ सदृश दमयन्तीक रूपक विश्लेषणमे नारी जातिक अपमानसँ बेशी समाजक कटु सत्य इजोतमे आबि गेल। स्वेच्छासँ अमर्यादित आचरणक आवरणमे दमियाँ नै गेलीह। ‘हे महादेव, चारिदिनसँ हमरा ऑगनमे चूल्हा नहि जरल अछि’ सन संवादसँ ई परिलक्षित होइत छैक। गूढ़ मंथन कएलासँ कथामे किछु विशेष नै। अपन बेटीक भरण-पोषणक लेल देह व्यापारकेँ केन्द्र विन्दु बना कऽ लिखल गेल कथामे कोनो सम्यक समाज विमर्श नै। कोनो आदर्श पथ नै मात्र पथभ्रष्ट समाजकेँ पाठक धरि परसल गेल। यायावरी जीवन चक्रमे घुमैत जयद्रथ आ कथाकारक संवाद कोनो समाजक लेल आदर्श प्रस्तुत नै कएलाक। देलक तँ समाजकेँ ई संदेश जे जौं कोनो अवला मिथिलाक गाममे रामबाबू सन दु:खिता पतिताक कथाकथिक रक्षक लग अपन आत्मरक्षाक ऑचर पसारतीह तँ ओ ऑचर खींच लेबामे कोनो संकोच नै करतथि। ’मायसँ कोन काज अछि’- नायिका कथाकारकेँ देखि हुनको ग्राहके बुझली। ई कोनो भ्रम नै। अस्तित्व विहीन नारी लग देहलोलुपे मनुक्ख पहुँचैत छथि। ‘हम स्त्री नै छी, फूल भैया। हम तँ माटिक फूटलि हाँड़ी छी। हमरापर दया करबाक कोनो प्रयोजन नहि’- मर्माहित करबाक लेल चेतनाशील मनुक्खकेँ ई वाक्य भारी पड़त। छप्पन बरख पूर्व ई कथा लिखल गेल। ओइ समैमे समाजक ई दशा छल? तखन तँ वर्त्तमानकालक जीवन शैलीकेँ दोष देब उचित नै। जखन जड़िए पथभ्रष्ट तँ छीपक विषयमे नीक कल्पना करब सेहो भ्रामक अछि। सम्पूर्ण कथामे झाजी आ चौधरीजी, मात्र पंचैती कालमे स्कूलक प्रधानाध्यापक यादवजी आ एकठाम खबास कुंजा धानुक अन्य वर्गक पात्र छथि। तखन ‘ब्रह्मो जानति ब्राहण:’ कोना कलियुगमे प्रासंगिक मानल जाए। समाजमे नीति शिक्षाक आचार्य जौं कुनीतिक प्रधानाचार्य भऽ जाथि तँ व्यवस्थे चौपट्ट किएक नै हएत। बेर-बेर जखन-जखन नारी वा शूद्रक चर्च होइत अछि तँ तुलसीदासक ‘ढोल गॅवार शूद्र पशु नारीक’ उद्धरण देल जाइत अछि। महाकाव्यक रचनामे कोनो विशेष पात्रक मुखसँ निकसल ऐ वाणी द्वारा मानस पुरुषक चरित्र हनन कएल जाइत अछि। चौधरीजी बजलाह ‘घोर कलियुग आबि गेल अछि तुलसीदास ठीके लिखने छथि...’ ई उचित नै लागल। तुलसीदास तँ एकठाम लिखने छथि जे ‘धीरज धर्म मित्र अरू नारी, आफत काल परेखहुँ चारी’ एकर उल्लेख किएक नै कएल जाइत छैक? ओना ऐ कथामे नारी आ धर्ममे सहचरी बनेबाक कोनो गुंजाइश नै छल। मुदा तुलसीक विषयमे लिखबाक काल ई धियान रखबाक चाही जे रामचरित मानस जनभाषाक कृति अछि जइसँ सम्पूर्ण हिन्दू संस्कृति प्रभावित भऽ रहल, कोनो विशेष जातिक आधिकारिक भाषा संस्कृतिमे लिखल नै गेल। तँए बाल्मिकि रामायणसँ बेशी पाठक धरि एकर पहुँच रहल। कथाक बिम्ब विश्लेषण रूचिगर लागल, जे राजकमलक विशेष कथा लिखबाक कलाक परिणाम मानल जाए। हिनक कथामे कोनो हास्य समागम नै रहितहुँ जनप्रिय रहल। तकर मौलिक कारण थिक गद्य काव्यात्मक विश्लेषण। वाणिज्यक छात्र रहितहुँ राजकमल अंकगणितीय वा सांख्यिक लेखा जोखामे नै पड़लाह किएक तँ ‘आशुकथाकार’ छथि। कथाक अंतमे वएह पंचैतीक िनर्णए जे हमरा सबहक समाजक व्याधि छल। कानूनकेँ चुनौती देबाक लेल पंच परमेश्वर बनि किछु लोक पान चिबा कऽ इतिश्री कऽ रहल छलाह। वर्त्तमान समैमे ई संभव नै छैक किएक तँ मनुख सेहो ‘चेतनाशील भऽ रहल आ प्रजातंत्र दीर्घ सूत्री समाजक पागधारीसँ भरिगर भऽ गेल। मुदा अंतमे कथाकार बिसरि जाइत छथि आ मत्स्यगंधाक हँसी प्रश्ने रहि गेल। राजकमलक प्रश्नसँ कथाक इतिश्री करब पाठककेँ भ्रमित कऽ दैत अछि, मुदा रूचिपूर्ण। िनर्णए तँ हमरा सबहक समाजमे ओझराएले रहि गेल छल तँए संभवत: प्रश्नेसँ कथाक इतिश्री कएल गेल भऽ सकैत अछि कथाकार कथाकेँ रोचक बनेबाक लेल पाठक धरि प्रश्न छोड़ि कथाक इतिश्री करब उचित बुझैत होथि। जौं ई सत्य तँ एकरा मैथिली साहित्यक लेल दुर्भाग्यशाली मानल जाए, किएक तँ न्यायाधिशकेँ िनर्णए ओझरा क’ न्यायक कुर्सीपर सँ उतरलाक बाद बेवस्था चौपट हएब स्वभाविक छैक। अाकाश गंगा- मैथिली साहित्यक संग सदिखन ई भ्रांति रहल जे जौं कोनो साहित्यकारक एक गोट कृति साहित्यकेँ आर सुवासित कऽ देने अछि तँ आगाँक रचनामे कथ्य ओ शिल्पसँ बेशी कथाकारक नाओं मूल्यांकनक केन्द्र बिन्दु भऽ जाइछ। ऐ अर्न्तद्वन्द्वसँ राजकमल सेहो नै अछोप रहलाहेँ। ‘आकाश गंगा’ श्रैगांरिक बिन्दुकेँ स्पर्श करैत समाजक अर्न्तव्यथाक चित्रण करबामे सफल कथा थिक, ऐमे कोनो संदेह नै। मुदा जौं अंत:करणसँ अवलोकन कएल जाए तँ ‘बऽर दुआरिपर उतरल नहि की छींकक ध्वनि’ जकाँ कथाक प्रारंभे छायावादी शैलीमे कएल गेल। ‘विवेकानन्द चौधरी नहि मिथ्या कहलहुँ, आब जमीन्दार नहि साधारण नागरिक। नागरिको नहि साधारण ग्रामीण’ सन शब्दकोशसँ वाक्य बनाएब अप्रासंगिक मानल जाए। कथाकार स्वयं दृग्भ्रमित तँ नै छथि किएक तँ हिनक प्रतिभापर संदेह नै। तखन पाठककेँ दृग्भ्रमित करबाक उद्देश्य स्पष्ट नै। कथाकारकेँ एकबेर स्पष्ट कऽ देबाक चाही जे विवेकानंद की छथि? जौं ई काव्य रहितए तँ क्षम्य छल, मुदा कथाक ऐ रूपकेँ की मानल जाए? सचार तखने नीक लगैत छैक जखन मूल खाद्य पदार्थ अक्षत हुए। मड़ुआक संग गाही साग तरकारी परसबाक बादो भोजनमे विशेष स्वाद नै भेटत। कथोपकथनपर शिल्पक भार एक निश्चित सीमाने तक शोभायमान लगैछ। विवेकानंद चौधरीक अपन अर्द्धांगिनी मदालसासँ संबंध समाप्त भऽ गेलनि। विवेकानन्द अपन बेटी अन्नपूर्णा संग रहए लगलाह। एकटा जमीन्दारक बेटी अन्नपूर्णा पितृ आशाक विपरीत गरीब बालक राधाकान्तक संग विआह कऽ लैत छथि। बाप-बेटीक संबंध समाप्त भऽ गेलनि। कालान्तरमे बेटी अन्नपूर्णा एक बालक अशोकक माए भऽ गेलीह। पतिक देहावसानक बाद दरिद्रासँ लड़ैत माय अन्नपूर्णाक चरित्र चित्रणमे कथाकारक सबल दृष्टिकोण झलकैत अछि। नारी-विमर्शक दृष्टिसँ कथा रोचक मुदा नारीक जीवन दशा समाजमे उदासी छैक, ई प्रमाणित करब उचित मुदा अगिला पीढ़ीक लेल उदासीन तँए रचनाकारकेँ ऐमे परिवर्त्तन करबाक चाही छल। अंतमे विवेकानन्दक हृदए पझिजैत अछि आ ओ बेटीक विदागरीक लेल उद्यत भऽ जाइत छथि। ललका पाग जकाँ अहू कथामे परिणाम स्पष्ट नै भऽ सकल। श्रैंगारिक जीवनक परिधिमे घुमैत कथा परिणाम विहीन, एेसँ एकरा कथाकारक पलायनवादी वैरागी प्रवृत्तिक द्योतक मानल जा सकैत अछि। कादम्बरी उपकथा- वैधव्य जीवनक अविरल चित्रणसँ भरल ऐ कथामे नायिका ‘कादम्बरी’ विधवा छथि। पति विश्वनाथक मरलाक बाद नैहर चलि जाइत छथि। किछु दिनक बाद देओर दुखित भऽ गेलखिन तखन सासुर आबि गेलीह। सासुरक लोकक कल्पना छल जे कादम्बरी ब्राह्मण संस्कृतिक अनुकूल श्वेत वस्त्र धारिणी अवला बनि अएलीह। मुदा सौन्दर्य सुन्नरि कादम्बरी अंग-वस्त्रसँ विपदा-मारलि नै अएलीह। फेर धमगिज्जरि। अपन केओ नै किएक तँ जीवनक एक पहिया धसि गेल छलनि। तँए ने दोसरक नेनामे शिक्षाक दिव्य संस्कार जगएबाक क्रममे परिहासक पात्र भऽ गेलीह। गायत्री देवी छोट दिआदिनी छलीह। शिक्षित नारी कादम्बरीक महत नेना-सभक मध्य बेसी छल। किएक तँ हुनकामे संतानहीन रहितो मातृत्व छलनि। नेना आ मूक पालतू पशु सिनेहक भुक्खल होइत अछि। ई सभ गायत्रीकेँ सोहाइत नै छलनि। अपना तँ ऊक देबाक लेल एकटा अल्लुओ पेटसँ नै उखड़लनि’ गायत्रीक ऐ प्रतिघातसँ कादम्बरी पाषाण भऽ गेलीह। आङनक पाठशाला बन्न कऽ देलखिन किएक तँ गायत्रीक छोटकी बेटी निरमलाक मृत्यु भेलापर ‘डाइन’ शब्दसँ सेहो विभूषित कएल गेलीह। जखन की निरमला सर्प दंशसँ जहान छोड़ि विदा भेलीह। कथाक अंतिम चक्र बड़ नीक अछि। लुब्धा खबासक स्त्री प्रसव पीड़ासँ व्यथित कादम्बरीक आङनमे छटपटाइत छथि। एकटा गरीब समाजक कात लागल वर्गक नारीक व्यथा कादम्बरीकेँ कर्त्तव्य परायणताक भावुक प्रवाहमे लऽ गेलनि। हास-परिहास आ परितापक भयसँ मुक्त भऽ ओइ नारीक संग-संग संसारमे आबए बला नेनाक लेल भगवतीसँ छागर कबुला केलखिन। जखन ई गप्प बादमे गायत्री कादम्बरीक मुखसँ सुनलनि तँ प्रायश्चितमे अश्रुकण बाहर भऽ गेलनि। ग्लानि भरल समाजक वैधव्य जीवनक वृति चित्र अंतमे सिनेहसँ समाप्त भेल। आकर्षणमे कथा चुम्बकीय प्रभाव जकाँ पाठककेँ झपटि लैत अछि, मुदा की समाजक ऐ अनिश्चयवादी बेवस्थाकेँ ‘नारी-विमर्शक’ दृष्टिसँ उचित मानल जाए। जइ कालमे ई कथा लिखल गेल, भारतवर्षमे सेहो धर्म सुधार आन्दोलन भऽ रहल छल, मुदा मैथिल ब्राह्मण समाज ओहिकालकेँ के कहए एखन धरि ‘वैधव्य जीवन’सँ मुक्तिक आन्दोलनकेँ जाति-संस्कार विरोधी मानैत अछि। ऐ मतेँ ई कथा लिखब कोनो अनुचित नै। मुदा प्रयोगधर्मिताक रूपेँ जौं धियान देल जाए तँ राजकमल क्रांतिदूत भऽ सकैत छलाह। परिणाम मिश्रित देखा सकैत छलथि परंच ‘कादम्बरी’केँ रूढ़िवादितासँ मुक्ति करबाक प्रयास कथाकारकेँ ओइ शिखरपर स्थापित कऽ सकैत छल जतए धरि मैथिली साहित्य एखन तक नै पहुँचल अछि। निष्कर्षत: व्यवस्था फेर नाङट भेल से उचित किएक तँ संकीर्ण मानसिकताक समाजक मध्य ई कथा घुमैत अछि। घड़ी- कथा साहित्यमे रचनाकारक संग-संग समीक्षक लोकनि सेहो बिम्ब ओ शिल्पकेँ कथाक सचार मानैत छथिन। हमर मत ऐ रूपेँ कनेक विलग अछि। कोनो रचनाकेँ पढ़लाक बाद ओकर मूल्यांकन हेतु जे मौलिक तत्व होइछ ओ थिक रचनाकारक दृष्टिकोण। जेना स्वस्थ व्यक्तिक सम्मिलनसँ स्वस्थ परिवार आ समाजक िनर्माण होइत अछि ठीक ओहिना जौं रचनाकारक दृष्टिकोण समाजपयोगी हुअनि तँ रचनाक सार्थकता सत्य प्रमाणित भऽ जाइछ। ’घड़ी’ शीर्षक कथाक बिम्ब चलन्त जेकरा सामान्य शब्दमे चालू कहल जाइत अछि। शिल्प आवृतिसँ भरल अर्थात् परिवर्त्तनशील आ दृष्टिकोण आश्चर्यजनक रूपसँ समाजक लेल कलुष अछि। नाओंसँ प्रथम दृष्टिए बुझना जाइछ जे ‘घड़ी’ अर्थात् समाजमे कालक प्रहरी मुदा अन्तरावलोकनक बाद काल प्रहरी घड़ी समाजमे अकालक सार्थकता सिद्ध कऽ रहलैक। अकाल माने जे ने उचित मानल जाए तकर व्याख्या, ओहूमे अनैतिक संबंधक केन्द्र बिन्दु बना कऽ लिखल गेल कथामे कथाकार सेहो अनैतिक नायककेँ संग दैत छथिन। रजनीकान्त प्राध्यापक बनि पटनामे रहैत छथिन। पत्नी चन्द्रमुखी आ पाँच सन्तानक संग-संग एकटा विधवा शिक्षिका मौसी उर्मिला हिनक परिवारक सदस्या थिकीह। टकाक ओ ओछौनपर सूतनिहार रजनीकान्तकेँ ‘घड़ी’सँ कोनो प्रेम नै। ‘घड़ी’ नामक यंत्रसँ रजनीकान्त घृणा करैत छथि। ई बात पटना नगरमे मैथिल समाजक सभ लेाककेँ बुझल छैक। ई लिखबाक प्रयोजन आ प्रमाणिकतापर संदेह होइत अछि जौं शिल्पक आधारपर उचित मानलो जाए तँ एकर प्राथमिकता पूर्णत: असत्य हएत। काल्पनिक कथामे सेहो ऐ तरहक शब्द वा वाक्य नै लिखबाक चाही। “मैथिल समाजक सभ लोक”मे पटनामे रहनिहार सम्पूर्ण मैथिलकेँ केन्द्रित कऽ कऽ 1965 मे ई कथा लिखल गेल। रजनीकांत कोनो भारतीय सिनेमा जगतक प्रसिद्ध कलाकार नै छथि आ ने महात्मा गाँधी सन राष्ट्रक सेवक एकटा प्रोफेसरकेँ सभ लोक कोना जानि सकैत अछि? मैथिल समाजमे अमीरक संग-संग गरीब लोक सेहो छथि। तत्कालीन पटनामे समाजक किछु लोक मोटिया, रिक्शा चालक जूता पॉलिश केनिहार सेहो हेताह हुनका रजनीकान्तसँ केना परिचय? खैर प्रयोगवादी राजकमलक ऐ कृत्यकेँ मैथिली भाषामे क्षम्य कऽ देल गेल जे साहित्यक अदूरदर्शिताक परिचायक थिक। कथा कोनो विशेष बिम्ब नै रखने अछि। कथाकार स्वयं ऐमे सहनायक छथि। मैथिल समाजक मुसलमान जातिक पात्र अमजद मियाँ अपन नवयुवती पत्नी जहूरनक इलाजक लेल पटना अबैत छथि। चूड़ीक व्यापारी अमजद कथाकारपर विश्वसनीयता रखैत हिनकेसँ सहयोग लैत छथिन। “एक रिक्शापर हम आ जहूरनी आ दोसर रिक्शापर अमजद अली आ रत्नेश झा कम्पाउन्डर आ दुसधा खबास अस्पतालसँ घुरैत छलहुँ।” ऐ प्रकारक संवादमे कथाकारक दृष्टिकोण पूर्णत: स्पष्ट भऽ गेल अछि। कोनो पुरुष ओहिकालमे कथमपि नै स्वीकार कऽ सकैत छल जे अोकर कनियाँ पर-परुषक संग वैसए जौं एना कएलो गेल तँ एकर परिणाम अनर्गल साबित भेल। कालान्तरमे वएह जहूरन प्रो. रजनीकान्तक संग अबैत-अबैत हुनक प्रेमालाप मे ओझरा गेलीह। ओइ प्रेमालापकेँ कथाकार समर्थन तँ नै कएलनि मुदा गबाह अवश्य भऽ गेलखिन। अनर्गल प्रेमकेँ प्रकाशित कएलनि मुदा प्रो. साहेवक कनियाँसँ एकरा नुका कऽ रखलनि। मित्रक ई कर्त्तव्य होइत अछि जे अपन मित्रकेँ कुमार्गसँ रोकथि। जौं नै रोकि सकलाह तँ स्वयं संग छोड़ि देबाक चाहियनि छल। राजा बलि वचनक रक्षाक लेल जखन गुरुक संग छोड़ि देने छलथि तँ राजकमल एक कुकर्मी मित्रक कुकर्मक भागी कोना बनबाक लेल तैयार छथि? ई घटना मात्र कथाक, मुदा कथोमे ऐ प्रकारक भ्रांति उत्पन्न करब सर्वथा अनुचित मानल जाए। ‘दुसधा खबास’ लिखब उचित नै जौं हम दोसरकेँ इज्जति नै देब तँ ‘बाभन’ शब्द सुनबामे किएक क्षोभ होइत अछि? अंतमे रजनीकान्त अपन सत्य पथपर पुन: आबि जाइत छथि। ‘घड़ी’ तँ कीनि लेलथि मुदा ई घड़ी जहूरनीक चरित्र आ चन्द्रमुखीक विश्वासकेँ केना घुराएत? ब्रह्माण्डशास्त्री, दार्शनिकसँ लऽ कऽ भौतिकीय गणकक दृष्टिकोणमे चुम्बकीय आकर्षण विपरीत ध्रुवक मध्य होइत छैक। जीवन धर्ममे नर-नारी संग रहितो विपरीत किएक तँ शारीरिक संरचनासँ सृजनक माध्यममे अन्तर होइछ। स्वाभाविक छैक जे साहित्यकार ऐ गृहस्थ आश्रममे प्रवेश करैत रचनाक बिम्ब तैयार करैत अछि। तँए कोनो साहित्यक आदि कालमे मौलिक विमर्श भक्ति आ श्रृंगार रहल। राजकमल जीक पदार्पण मैथिली साहित्यक आधुनिक कालमे भेलनि मुदा ताधरिक कथा जगतमे अपन भाषाकेँ कृषकाय मानल जाए। अपेक्षाकृत राजकमल युवा सेहो रहथि तँए सौन्दर्य आकर्षण पनकब कोनो असहज नै। अपराजिता कथा हिनक पहिलुक रचना छन्हि जे वैदेहीक अक्टूवर 1954 अंकमे प्रकाशित भेल रहए। जेना नाओंसँ स्पष्ट अछि “अपराजिता” जे स्त्री पराजित नै भेल हुअए मुदा ऐठाम कोनो मण्डन मिश्रक भारतीक उल्लेख नै। कथाकारक मित्र नागदत्तक कनियाँ छथि- अपराजिता। एकर अर्थ कथमपि नै जे ओ नागदत्तपर विशेषाधिकार रखैत छलीह। सिनेहसँ राखल नाओं आ अधिकारक दृष्टकोणमे व्यापक अंतर होइत छैक। तँए कथाकारकेँ ई नाओं अनसोहाँत लगैत छन्हि। मिथिला क्षेत्र एखन धरि प्राकृतिक विपदा बाढ़िक कोपभाजिता बनैत रहलीह। सन् 1954मे स्थिति तँ आर फराक छल। “सरिपहुँ... बागमती, कमला, बलान, गण्डक आ खास कऽ कोसी तँ अपराजिता अछि ने। ककरो सामर्थ्य नै जे एकरा पराजित कऽ सकए” ....ऐ कथांशक द्वारा कथाकार कोनो बातसँ मुक्तिक आश नै रखने छथि, हिआसँ भऽ सकैछ जे रखने होिथ मुदा कथाक दृष्टिकोण बेछप्प मानल जाए। कथाकारकेँ कथामे तँ अवश्य पीड़ा भऽ रहलनि जे जे वेदमे नदीकेँ मनुक्खक सेविका कहलकैक अछि। मनुक्खक पत्नी कहलकैक अछि... मुदा, बहुओ भऽ कऽ कोसी आ वागमती अपराजिता छथि। एक दिस बाढ़िक उजैहियासँ पसरल अधोगतिकेँ देखि कथाकार व्यथित छथि तँ दोसर दिस मििथलाक परम सत्यकेँ उधार कऽ रहलाह। सम्पूर्ण भारत-वर्षक अधिकांश भूभागमे नारी-जीवन सोझ विचार रखनिहार लोकक लेल चिन्ताक विषय रहल। राजकमलक कथा सभमे सम्पूर्ण भारत वर्षक उल्लेख नै आ ने मिािलाक सम्पूर्ण समाजक िहनक कथा प्रतिनिधित्व करैत छन्हि। मूलत: मैथिल ब्राह्मण परिवारकेँ केन्द्र बिन्दु बना कऽ लिखल गेल हिनक “अपराजिता” शिक्षित मैथिल परिवारक नारी जकरा पति रहितौं अवला कहल जा सकैछ केर स्थितिक वास्तविक विवेचक थिक। ओना ऐ कथामे कतौ नारी शोषित अथवा दोहनक प्रत्यक्षत: उल्लेख नै। सम्पूर्ण कथा “द वनिर्ग ट्रेन” जकाँ रेलगाड़ीसँ प्रारंभ भऽ समस्तीपुर आ दड़िभंगाक बीच पटरीक मध्य झुलैत अछि। समस्तीपुरसँ मुक्तापुर होइत हायाधाट धरि बाढ़िक प्रकोपक मध्य प्रारंभ भेल कथामे रेल पटरीपर पानि आबि जयबाक कारण यात्री सबहक परेशानी कथा मूल बिम्ब थिक। बिम्ब कोनो विशेष अर्थक नै मुदा शिल्प जोरगर तँए कथा किछु हद धरि रोचक भऽ गेल। प्राय: मैथिली कथाकारक संग समस्या रहल जे कथा लिखबाक उद्देश्य बहुत ठाम स्पष्ट नै होइत अछि। राजकमलक अपराजिता सेहो इएह प्रकारक कथा मानल जाए। हमरा सबहक समाजक नकारात्मक स्वरूपकेँ ऐ कथामे नांगट तँ खूब नीक जकाँ कएल गेल मुदा की मात्र नांगट कएने समस्याक निदान संभव छैक? ऐ कथामे तँ ई प्रमाणित होइत छैक जे साहित्य समाजक दर्पण मुदा भांगल दर्पणमे कांति देखलासँ कांति सेहो स्पष्टत: नै देखाएत आ आँखिपर असर पड़ब सेहो अवश्यांभावी तँ कथाकार पाठककेँ ऐ कथासँ पूर्णत: प्रभावित कएलनि ई कहब सर्वथा अनुचित। “फुलपरास वाली” कथा नारी प्रधान कथा थिक जकर नायिका छथि। विलट भाय पटनामे रहि रिक्शा चलबैत छथिन्ह। एकटा पंडितक पुत्र भऽ रिक्शा हाँकब कथाकारक अर्द्धांगिनी शशिकेँ नीक नै लगैत छन्हि। शारीरिक श्रमक अभ्यास नै रहलासँ जीवन दुष्कर भ’ जाइछ छै। शशिकेँ ऐसँ बेसी खटकैत छन्हि जे विलट भाय हुनक भैंसुर छथि। पंडित चन्द्रकांत झा वेदान्तक पुत्र विलट झा रिक्शा चएलबाक कर्मकेँ अनुचित नै मानैत छथि। मनुक्ख कर्मशील भऽ अपन पेट पोसए तँ कोनो हर्ज नै। पैतृक ठाठ-बाठक घंटी डोलेलासँ पेट तँ नै भरि सकैत अछि। श्रमजीवी श्रमसँ पेट भरि सकैत अछि मुदा जौं शरीर अस्वस्थ भऽ जाए तँ जीवन चलाएब नितांत असहज भऽ जाइत छैक। विलट भाइ बेमार पड़ि जाइत छथि जिनका देखबाक लेल कनियाँ अर्थात् फुलपरास वाली पटना अबैत छथि। विलट भाइक ज्वर तँ शांत भऽ जाइत छन्हि मुदा एकटा ज्वार बढ़ि गेलनि ओ थिक सुरा पान। कहियो पीबि कऽ नाली खसैत छथि तँ कहियो घर आबि गुड़कैत छथि। कथाकार अर्थात मणि बाबू आ हुनक कनियाँ शशिकेँ ई सभ बड़ अनसोहाँत लगलनि। बिलट कर्मोपदेश दैत छलाह जे कोनो काज कऽ कऽ जीवन यापान करब अनुचित नै। मुदा आब ताड़ी-दारूपर उतरि गेल छथि। एतबे नै एक दिन अपन संग फुलपरास वालीकेँ सिनेमा देखबए लऽ जाइत छथि जइठाम मीनाक्षी अर्थात् फुलपरासवालीक हाथ विलट भाइक एकटा लुच्चा मिऋ पकड़ि लैत अछि। बादमे बिलट अपन अधलाह कर्मपर प्रयश्चित सेहो करैत छथि। ऐ बीच कथाकार कथानककेँ थोड़े मोरि दैत छथि। फुलपरास वाली जे मणि बाबूक भौजी थिकीह तिनकासँ प्रेम करबाक नाटक। अश्चर्य मानल जाए जे नारी विमर्शमे राजकमलक लेखनी कतए धरि भसिया जाइत छन्हि। ओना देओर अर्थात् मणिबाबू मीनाक्षीकेँ अपन पियासक शिकार नै बना सकलनि। किएक तँ पतिक देल पीड़ासँ मैथिल नारी आत्मासँ कानि तँ सकैत अछि मुदा अपन पतिकेँ छोड़ि अान पुरुषकेँ अपन सर्वस्व न्योछावर करबाक कल्पनो नै करत। एेठाम कथाकारक दृष्टिकोण साफ आ समाजक लेल आदर्श मानल जाए। जौं दोसर अर्थमे सोचल जाए तँ विजय कुकर्मी पुरुषेकेँ भेल। अपने कोनो कर्म करब, पथभ्रष्ट भऽ जाएब मुदा जीवन संगिनी सदिखन संग देत, संभवत: यएह कारण थिक जे पुरुष कोनो हद धरि खसि जएबामे संकोच नै करैत अछि आ तथापि ओकरा विश्वास रहैत छैक जे गृहिणी कदापि नै विमुख हएत। विहनि कथाक विकासमे राजकमलक सेहो किछु योगदान छन्हि। “किरतनियाँ” सर्वकालिक विहनि कथामे अपन विशेष महत रखैत अछि। एकर कारण जे राजकमल ऐ कथाक माध्यमसँ पहिलुक बेर मिथिलांक ब्राह्मण समाजसँ इतर भऽ कथा लिखैत छथि। किरतनियाँ कोनो भजन संकीर्तण मण्डलीक सदस्य नै एकटा भिखमंगनी बालिका अछि। जौं सवल परिवारमे जनमलि रहैत तँ उमेर पढ़ब लिखब आ नेनपनक भभटपन करबाक छल। मुदा गरीबक कोन शेखी। माए-बाप कहिया जहान छोड़ि देलक पता नै। 80-90 वर्षक बुढ़िया मइयाँक संग भीख मंगैत अछि। पूस मासक जाड़मे बुढ़िया लटुआ कऽ खसि पड़ल। ऐ घटनाक तीन दर्शक नांगड़ा, झपसुआ आ भिखमंगाक मेट चन्नरदास छल। नेंगरा कोनो नामकरण संस्कारसँ देल नाओं नै। नांगड़ तँए नगड़ा ओना भिखमंगाक नामे की...? कथाकारक दर्शन नीक लगैत अछि। झपसुआ नामधारी जीव आ चन्नरदास दिनमे निपट्ट अन्हारक भूमिकामे भीख मंगैत अछि आ रातिमे अपन वास्तविक रूपमे। कथाकार ऐ प्रसंगसँ प्रमाणित करबामे सफल होइत छथि जे जीवनक मंच आ रंगमंचमे भिन्नता छैक। बुढ़िया मरि गेल ओकर लहास लग बैसि किरतनिआँ चन्नरदास संग भीख मांगि लहास जरेबाक लेल नाटकीय क्रीड़ा करैत अछि। भीखक कैंचा गनि-गनि सवा तीन टका पूरा कएल गेल, मुदा लहास नै जराओल जाएत। किरतनिआँ बाजलि- “एह! तीन टकामे हम दुनू आठ दिन ताड़ी पी लेब।” चन्नरदास अपन उद्देश्यमे सफल होइत अछि। ओकर उद्देश्य छल बाल जीवनसँ युवती बनलि किरतनियाँक शारीरिक दोहन। आब किरतनिआँ सेहो निडर भऽ गेली। स्वाभाविक छैक जखन नारी कलंकिता बनि जाइत अछि तँ िनर्लज्ज होएब निश्चित भऽ जाइछ। कथाक गतिमे गेलासँ ई प्रमाणित होइत छैक जे ऐ तरहक स्थितिक लेल दोषी ई पुरुष प्रधान समाज रहल। बिम्ब आ शिल्प दुनूमे ई कथा राजकमलक सर्वश्रेष्ठ कथामे सँ एकटा मानल जाए। सबल पक्ष ई जे कथा समाजक सभसँ अंतिम वर्गक जीवन शैलीक कथा थिक। एकटा आन विहनि कथा पनिडुब्वी सेहो राजकमलक श्रेष्ठ कथामे स्थान रखैत अछि। हिनक अधिकांश कथा ब्राह्मण-परिवार विषयमूलक अछि मुदा एकटा कथा “मलाहक टोल : एक चित्र” समाजमे पिछड़ल वर्गक नारीकेँ केन्द्रित कऽ कऽ लिखल गेल तीन नायिका पिरितिआ कमली आ केतकीक कथा िथक। एे कथामे राजकमल मूलत: नारी विमर्शकेँ बिम्बित कएलनि मुदा ऐठाम ई अवश्य प्रमाणित भऽ गेल जे समाजक कात लागल वर्गक नारीमे साहस, चेतना आ दृढ़ निश्चय समाजक अधिष्ठाता वर्गक नारीसँ बेशी अछि। तँए ऐ वर्गक नारी अपन इच्छानुसार अधोगतिकेँ प्राप्त तँ कऽ सकैत अछि मुदा ओकरा संग कियो जबरदस्ती नै कऽ सकैछ। जौं कियो करबाक प्रयास करत तँ “कैतकी” जकाँ समाजक कात लागल र्वगक नारी रूद्रा बनि तिरपित मिसर सन चरित्र हीन व्यक्तिक हत्या तक कऽ सकैत अछि। ऐ प्रकारक घटना समाजमे होइत रहल तँए राजकमल जीक प्रयास ऐठाम उचित मानल जाए। प्रयोगकेँ बादक धरातलपर आनैबला राजकमल मैथिली साहित्यमे कथाकेँ विशेष स्थान दिऔलन्हि। हरिमोहन आ ललित जकाँ हिनक कथा पाठकमे प्रिय अछि। जौं अल्पायु (मात्र 39 बर्ख) मे कालकलवित नै भेल होइत अछि तँ भऽ सकैत छल जे आगाँ आर परिपक्व भऽ कथा जगतमे प्रवेश करितथि। मुदा हिनक कथाक सभसँ पैघ कमी रहल नारी सौन्दर्य आ अनैतिक संबंधकेँ मूल बना कऽ किछु कथा लिखि साहित्यमे अनैतिक संबंधकेँ बलशाली बनेबाक प्रयास कएलनि। ओना ऐ तरहक घटना समाजमे होइत रहल अछि मुदा सत्यकेँ नांगट कऽ कऽ छोड़ि देलासँ साहित्य सबल नै भऽ सकैछ। दोसर किछु कथाकेँ जौं छोड़ि देल जाए तँ कथाकार स्वयं फूलबाबू बनि कथा नायक बनल छथि मुदा सोचमे पारदर्शी नै। राजकमलकेँ सम्पूर्ण कथाकार तँ नै मानल जा सकैछ मुदा “शिल्पी”क रूपमे मैथिली कथा जगतक विशिष्ट कथाकार तँ अवश्य छथि। ३. डा.राजेन्द्र विमल नव–नव क्षितिजक सन्धान करैत सुजीतक जिद्दी
साहचर्य–सम्भूत रसोद्भावनाक चतुर, युवा कथाकार सुजीत कुमार झाक कथा मिथिलाञ्चलक महानगरोन्मुख शहरक विविधतापूर्ण परिवेश आ पात्रक स्थिति–मनस्थितिक सूक्ष्म चित्राङ्कन प्रस्तुत करैत अछि । प्रत्येक कथा कोनो एक गोट एहने शहरी पात्रक जीवनमे झटका नेने आएल कोनो निर्णायक मोड़क नाटकीय रुपमे जखन प्रत्यक्षीकरण करबैछ तऽ पाठक चिहँुकि उठैत अछि । सामान्य घटनासभक श्रृङ्खलासँ आरम्भ भेल कथा मध्यधरि अबैत–अबैत सूच्याग्र भऽ जाइत अछि आ अन्तमे एकटा ‘करेण्ट’ जेकाँ लगबैत अछि । – जेना सामान्य यात्रामे चलैत–चलैत केओ आगाँमे फँेच कढ़ने, नाङरिपर ठाढ़ गहुमन देखि नेने हो ! शिल्पक ई वैशिष्ठ्य हिनका मैथिलीक अन्य कथाकारसँ अलगहे फराक कए दैत अछि । महानगरोन्मुख समाजक चित्राङ्कनक संगहि कथा एक गोट मनोवैज्ञानिक सत्यक उद्घाटन करैत अछि । कथामे एक गोट एहन स्थल अबैत अछि जखन आश्चर्यचकित भेल पाठक सोचैत अछि, ‘ अरे ! ई की भऽ गेलै ?’ – आ तखने कथाक अन्त भऽ जाइ छै । अमेरिकी कथाकार ओ. हेनरीक स्मरण भऽ अबैछ । अवग्रहमे पड़ल पात्रक प्राण जेना अकस्मात् मुक्ति–पथ पाबि लैछ ! कथाकार सुजीत कुमार झाक कथाकारिताक दोसर उल्लेखनीय निजत्व थिक – अनतिदीर्घता अर्थात् संक्षिप्तता । हिनक कथाक घटना–परिघटना ज्यामितीय चित्र जेकाँ एक–दोसरकेँ कटैत, ओझराइत–सोझराइत आगाँ नहि बढ़ैछ । कथाक तीर सनसनाइत जाइत अछि आ अर्जूनक लक्ष्य–भेद जेकाँ चिड़ैक आँखिटा देखैत ओकर भेदन करैत अछि आ कुशल धनुर्धरक धनुर्विद्याक सफलताक प्रमाणसँ धन्य भऽ जाइत अछि । तँए कथासभमे एकटा प्रभावान्वितियुक्त त्वरा छैक । हिनक सभ पात्र खाँटी मैथिल थिकाह – विभिन्न जाति, वर्गक मध्यवित्तीय मैथिल । सुजीत कुमार मध्यवित्तीय मैथिल जीवनक सफल कथाकार छथि । परम्परागत मूल्यक सिमेण्टसँ ठोस बनल संयुक्त परिवारमे देखल जाइत पारस्परिक स्नेह, विश्वास, वलिदान, सेवा, करुणा, अनुशासन आदि श्रेष्ठ मानवीय गुणमे लागल पश्चिमी सोचक नोनीसँ उत्पन्न दरार देखि कथाकारक हृदय दरकि जाइत छैन्हि आ हुनक लगभग प्रत्येक कथा खण्डित होइत एहि मूल्यकेँ पुनस्र्थापित करबाक कलात्मक चेष्टा बनि जाइत अछि । सहज–स्वभाविक कथोपकथनक मुक्तावलीसँ बनल–बूनल ई कथा सभक कथाकारक अपन परिवेशक भोगल यथार्थ सभक चित्रावलीसँ सजाओल सुन्दर ‘अलबम’ थिक । कथाकार सुजीत कुमारक कथाक सेहो एक गोट प्रमुख तत्व थिक सहज मानवीय राग–बन्ध । सुप्रसिद्ध आलोचक ई.एम.एलब्राइड लिखने छथि जे कथा–साहित्यक समस्त भावात्मक तत्वमे एकटा प्रेमे एहन थिक जकर सर्वाधिक प्रयोग भेल अछि, कारण प्रेम मानव–स्वभावक सर्वव्यापक तत्व थिक । ‘पूmल फुलाइएकऽ रहल’ कथाक उच्च कुलशीला, सुशिक्षिता नायिका पिंकी अन्तद्र्वन्द्वक भंवरमे फँसि उबडुब करैत मुक्तिक हेतु तखन हाथ पएर भाँजऽ लगैत छथि । जखन हुनका पता लगैत छैन्हि जे जाहि पुरुषकेँ सहायक स्टेशन मास्टर कहि हुनक विवाह रचाओल गेल छल आ जकरा अपन सम्पूर्ण संचेतना समर्पण दऽ ओ इन्द्रधनुषी कल्पनाक इन्द्रजालमे ओझराएलि अपन सुधिबुधि हेरा चुकलि छलीह से सहायक स्टेशन मास्टर नहि एकटा साधारण पैटमैन अछि जे वस्तुतः अपन मालिक स्टेशन मास्टर आ सहायक स्टेशन मास्टरक घरलए बजारसँ झोड़ाक भोड़ा तरकारी कीनिकऽ अनैत अछि तऽ ओ सातम आसमानसँ खसैत छथि । मुदा, ई स्वयंसिद्ध नायिका अग्निकेँ साक्षी राखि लेल गेल पतिब्रत्य संकल्पकेँ स्मरण कए एकटा नव अवतार लैत छथि – अपन चिताक छाउरसँ पुनः उड़ि आसमानकेँ छुबैत मिथकीय पन्छी ‘स्फिङ्स’ जेकाँ ! नायककेँ एम.ए.धरि पढ़बैत छथि । अन्ततः नायक सहायक स्टेशन मास्टरक पदपर प्रतिष्ठित होइत छथि । ‘नयाँ व्यपार’–क रोगग्रस्त नायक जितेन्द्र प्रसादक हँसैत–खेलैत गार्हस्थ जीवन महत्वकांक्षाक बबण्डरमे उधियाकऽ तहस–नहस भऽ गेल अछि । स्वयं रोगशैय्यापर पड़ल छथि, बच्चासभ अपन–अपन व्यवसाय–संसारमे हेराएल अछि आ पत्नी साधना सड़कपर चलैत लोकक आँखिमे गरदा झोंकैत, मिश्राजीक स्कूटरपर बैसि, अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवसमे सहभागी होएबाक लेल उड़ि जाइत छथि । कथा वर्तमान पारिवारिक जीवनक विद्रूपता आ विसङ्गतिकेँ रेखाङ्कित करैत अछि । ‘खाली घर’–क नायक जयचन्द्र आ नायिका जानकी रेलक पटरी जेकाँ जीवन पर्यन्त समानान्तर चलैत छथि, मुदा कहियो, कखनो मीलि ने पबैत छथि । तकर कारण छैक पतिकेँ आदेश–अनुवर्तिनी ‘रोवोट’ नारीक चाहिऐन्हि, सासु–ससुरकेँ पुतहुक पटमासि कएल बहिकिरनीक बेगरता छैन्हि । मुदा पति अपन ‘स्व’–क संग जीवाक आकांक्षिणी छथि । एकटा शीतयुद्धमे जीवन बीति जाइत अछि, रीति जाइत अछि । ‘लाल किताब’ परामनोविज्ञानपर आधारित रहस्य–रोमाञ्चसँ भड़ल कथा थिक । सेवक प्रसाद यादवजी १८ गतेकेँ अपन कक्षमे एकसरि बैसलि कथा नायिका मित्रपत्नीकेँ अत्यन्त अनुराग पूर्वक एक गोट लाल डायरी भेंट कऽ गेल रहै छथि । मित्रपत्नीकेँ जबर्दस्ती हाथ पकड़ि ओ अपना लग बैसबै छथि–हाथ अकल्पित रुपें सर्द–हेमाल किए लगै छल से ओ बूझि नहि पबैत छथि । मुदा जखन मित्रक मृत्युपर शोकविह्वल भेल नायिका पति बाहरसँ आबिकऽ सेवक प्रसादक मृत्यु सत्रहे गते भऽ गेल होएबाक सूचना दै छथिन्ह तऽ ओ काँपि उठैत छथि । मायक सह पाबि गिन्नी पढ़ाइ छोड़ि नृत्यमे प्रशिक्षित भऽ आय दिन नव–नव ‘पब्लिक शो’ करऽ लगलीह । बाप अपन बेटीकेँ ग्लैमर दिशि आकृष्ट देखि चिन्तामग्न रहै छथि, मुदा जिदाहि पत्नीक आगाँ विवश रहै छथि । परिणामतः जखन पता चलल जे गिन्नी व्यसनी, व्यभिचारिणी आ गर्भिणी भऽ गेलि छथि तऽ वातावरण हाक्रोशकऽ उठैत अछि । ताबत बहुत बिलम्ब भऽ गेल रहैत छैक । ‘जादू’ कथाक नायिका सिम्मी घरपर जा कम्पनीक उत्पाद बेचऽबाली सेल्सगर्ल छलीह, मुदा हुनक मधुरवाणी आ शिष्ट व्यवहारक जादू रेणु आ हुनकर पतिक दिमागपर एना ने चढ़ल जे रेणुक पति हुनका अपन कम्पनीक नीक पदक हेतु अफर दऽ देलथिन्ह । परम्परावादी मूल्यक खण्डहरपर ठाढ़ होइत बलुआही पारिवारिक संरचनापर कठोर प्रहार अछि कथा– ‘ आदर्श’ परम्परावादी पति आ सासुकेँ लात मारि घर छोड़ि चलि तऽ अबै छथि अद्र्धआधुनिका शिक्षिका नायिका, मुदा पन्द्रह वर्षक पश्चात् जखन अपन कक्षामे एक गोट भविष्णु युवकक नाम ‘ आदर्श’ सूनि ओ चिहुँकि उठै छथि जेना ककोड़विच्छा अनचोकेमे डंक मारि देने होइक । आदर्शक पिताक नाम छै – अरुण, जिला न्यायाधीश, अर्थात् ओकर पूर्वपति । स्टाफ रुममे आबिकऽ धम्म दऽ बैसि जाइत छथि, मस्तिष्कमे अन्हड़–विहाड़ि नेने । एहि स्थलपर आबि विखण्डनवादी मूल्य हारि जाइत अछि आ संयुक्त परिवारक परम्परावादी मूल्य विजय घोष करैत अछि । ‘अर्थहीन यात्रा’क नायिका नेहा अपन पति माधवसँ एहि दुआरे असन्तुष्ट रहैत छथि जे ओ महत्वकांक्षाक उन्मादसँ ग्रस्त नहि छथि, पार्टी–क्लवक सौखीन नहि छथि, भौतिक चमक दमकमे विश्वास नहि करैत छथि, नेहाक लेल ‘ गिप्mट’ नहि अनैत छथि आदि । तलकालए ओ जानकीरामसँ विवाह करैत छथि, बेटी तेजिकऽ । फेर ओ जानकी रामकेँ छोड़ि अन्य पुरुष संगे रहए लगैत छथि – पति पत्नीवत्, मुदा अविवाहित । पश्चिमसँ आएल ‘लिविङ्ग टूगेदर’–क चपेटिमे पड़लि नेहा अन्ततः अपनहि लेल निर्णायक कारण पश्चातापक आगिमे धू–धूकऽ जरऽ लगैत छथि । प्रस्तुत कथा सेहो पछबा हवाक विरोध आ पुरवाक समर्थनमे देवाल जेकाँ ठाढ़ अछि । नारी मनोविज्ञानक सुन्दर आ यर्थाथवादी विश्लेषण प्रस्तुत करैत कथा ‘व्यर्थक उड़ान’–क नायक कार्यालयक काजसँ जे विराटनगर गेलाह तऽ दू–चारि दिन विलम्ब की भेलैन्हि नायिका ऊनी स्वेटर जेकाँ मोनमे लहराइत भावक रंग–विरंगी लच्छाकेँ ओझरबैत–सोझरबैत जँ दुर्भाग्यसँ वैधव्यक पहाड़ टूटि पड़ल होइन्हि तऽ शेष यात्रा कमलसंग बितएबाक, ओकरा संग हनीमून मनएबाधरिक कल्पनामे डूबि जाइ छथि कि धम्म दऽ पति जूमि जाइत छथिन्ह । ओ पतिकेँ भरि पाँज पजियाकऽ हबोढ़कार भऽ कानऽ लगै छथि । ‘निष्ठा कि देखाबा’ एक गोट घोर यथार्थवादी मार्मिक कथा अछि । नीमाक पति सोहनक दुनू किडनी सड़ि गेल छैक जकर प्रत्यारोपण डाक्टरक सलाह अनुसार भेल्लोरमे जा करएबाक बदला ओ पतिकेँ जल्दीसँ जल्दी गाम एहि दुआरे लऽ जाइत छथि जे सम्पति सम्बन्धी कागजात सभपर हुनकर हस्ताक्षर लेल जा सकए । पतिकेँ मरबाक चिन्ता नहि, सम्पति डुबबाक चिन्ता बेसी घेरने छैन्हि । मुदा भाग्यक व्यंग्य ई थिक जे अन्तिम साँसधरि पति हुनका पतिपरायणा मानैत छथि । ‘केहन सजाय’ एक गोट टुग्गरि बालिका चमेलीक कथा अछि । जकरा कोनो सन्तानहीन सम्भ्रान्त दम्पती गोद नेने छल, मुदा जखन ओहि दम्पतीकेँ अपन औरसँ सन्तान जनमि जाइत छैक, चमेली ओहि घरमे नहि, ‘महिला सदन’मे पठा देल जाइत छथि । ओ तऽ धन्य कही संस्थाक नव अध्यक्षा आ पूर्व प्रधानाध्यापिका कामिनी मैडमकेँ जनिक करुणापूर्ण प्रयाससँ ओ रितेशक संग परिणय सूत्रमे बन्हा जीवनक भसिआइत नाओक लेल किनार पाबि लैत छथि । मेनकाक कोमल नारी हृदयकेँ हँथोड़ैथि ‘मेनका’ जीवन झँझावातक आघात–प्रतिघातसँ नारी हृदय समुद्रमे उठैत उत्ताल तरङ्गक विक्षोभकारी कथा थिक । मेनका परित्यक्ता थिकीह । हुनक पति चन्द्रभूषण सुन्दरी युवती नीनाक मोहपाशमे ओझरा हुनकर परित्यागकऽ देने छलथिन । नारी–अहंपर चोट लगैत अछि । मेनका प्राध्यापन सेवामे संलग्न छथि, जतऽ हिनक सम्पर्क विवाहित सहकर्मी राजीव सरसँ होइत छैन्हि । राजीव सरक व्यक्तित्वक चुम्बकीय प्रभावमे मेनकाक व्यक्तित्व लौहकण जेकाँ आकृष्ट होइत अछि, मुदा जखन ओ सोचै छथि जे राजीवपत्नी आरतीक हेतु हुनक प्रणय–लीला नीना–कर्मसँ कम हिंसक किंवा घृणित नहि होएत तऽ ओ अपनामे सिमटिकऽ कठोर लौहपिण्ड बनि जाइत छथि, जे चुम्बककेँ घीचि सकैत अछि, मुदा चुम्बकसँ घिचा नहि सकैत अछि । कथाकार सुजीत कुमार झाक कथाक विषय– चयन, बनाबट आ बुनाबट, भाषा शैली आ कलात्मक उच्चतामे उत्तरोत्तर प्रौढ़ता अबैत जाएत आ ओ मैथिली कथाक हेतु एहिना विषय आ शिल्पक नव–नव क्षितिजक सन्धान करैत नव प्रतिमानक स्थापनामे सफल होएताह, हमर विश्वास अछि । ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। १.विदेह बाल साहित्य सम्मान २०११ सँ सम्मानित ले.क. मायानाथ झासँ उमेश मण्डलक साक्षात्कार २.हम पुछैत छी: विदेह मैथिली समानान्तर रंगमंचक संस्थापक मैथिली नाटक आ रंगमंचक आइ धरिक सभसँ पैघ नाम बेचन ठाकुरसँ मुन्नाजीक गपशप १. विदेह बाल साहित्य सम्मान २०११ सँ सम्मानित ले.क. मायानाथ झासँ उमेश मण्डलक साक्षात्कार उमेश मण्डल- सभसँ पहिने विदेह बाल साहित्य सम्मान २०११ लेल अपनेकेँ बहुत-बहुत बधाइ...। अहाँक नजरिमे साहित्यक उद्देश्य की अछि? मायानाथ झा- साहित्य समाजक दर्पण थीक। सामाजिक गतिविधि, एवम् क्रिया-कलाप साहित्येसँ प्रतिविम्बित होइत अछि। मनुष्य तँ नश्वर होइत अदि, किन्तु ओकरहिंसँ िनर्मित साहित्य अक्षुण्ण होइत अछि। कोनो देश एवम् कालखण्ड साहित्यक बलेँ चिरकाल धरि जीबैत अछि। से िनर्भर करैत अछि जे भावी पीढ़ी कोन रूपेँ ओकरा सहेज-समटि कऽ रखने रहैत अछि। उमेश मण्डल- अहाँक साहित्यमे इतिहास/संस्कृति (खास कऽ मिथिलाक) केना वर्णित होइत अछि? मायानाथ झा- हमर साहित्यक मुख्य विधा अछि- कथा। कथा एवं कविताक माध्यमसँ हम पुरान एवं प्रचलित बात, वा घटना सबहक वर्णन केलौं अछि जइमे इतिहास-संस्कृतिक पुट अछि। कथोकेँ खिस्सा-पिहानी जकाँ वर्णित केलौं अछि। चारित्रिक एवं सांस्कृतिक झलक ओइमे मूलत: छैके। उमेश मण्डल- दिनानुदिनक अनुभवक अहाँक साहित्यमे कोन तरहेँ विवेचन होइत अछि? मायानाथ झा- आक्रोश एवं आन्तरिक वेदनाक रूपमे। आधुनिक बदलैत परिवेशमे जखन अपन उत्तम आचार-विचार, उत्कृष्ट परम्परा एवं समृद्ध संहिताकेँ विलाइत देखैत छी तँ घोर दु:ख होइत अछि आ तखन सहए ने वाणी वा लेखनीसँ निकलतैक, जेना- “नहि कनिञों संकोच छै, माय बापक बोझ नहि उठेवामे। लाज तऽ छैक नहि, धाखोसँ कटि जयबामे। उतकिरना बुझाइत छैक, प्रदूषण फैलाबएमे। हेठी बुझाइत छैक, मातृभाषा बजबामे। की अटपट गप्प अछि, केहन भारी विडम्बना अछि!” उमेश मण्डल- साहित्यक शक्तिक विषएमे अपनेक की कहब अछि? मायानाथ झा- साहित्यक शक्तिक प्रसंग पुछलौं तँ हमरा मोन पड़ि आएल अछि रामधारी सिंह दिनकरक कविता- “दो में से क्या तुम्हें चाहिए कलम या कि तलवार? तन में अजय शक्ति, या मन में जागे उच्च विचार।” साहित्यक शक्ति अजेय, अपरिमेय होइत अछि। अपन समाज कि देश साहित्ये शक्तिक बदौलति विश्वमे एतेक चर्चित-अर्चित अछि। तहूमे हमरा लोकनि विशेष रूपेँ। मिथिलावासी आन्दोलनकारी नहिऍंटा होइत अछि। आइ धरि साहित्यक शक्तिक बलेँ अपनाकेँ अधिकृत वा प्रतिष्ठित रखैत एलाह अछि। x` उमेश मण्डल- अहाँक साहित्यमे पाप-पुण्यक विश्लेषण केना होइत अछि? मायानाथ झा- “परोपकाराय पुण्याय, पापाय परपीड़नम्” रूपमे। सत्कर्म धर्म थीक आ दुष्कर्म पाप। साहित्य सेवनसँ जँ चरित्रक िनर्माण भेल तँ पुण्य कमेलौं नै तखन पापोन्गामी हएब सुनिश्चित। दु:खक गप्प जे वर्तमान परिप्रेक्ष्यमे चारित्रिक गठनपर कम जोर देल जाइत अछि। धनोपार्जन संबंधित शिक्षा तइपर बेशी हाबी भेल जा रहल अछि। उमेश मण्डल- कल्पना आ यथार्थक समन्वय अहाँ अपन साहित्यमे केना करैत छी? मायानाथ झा- कल्पनाक हवा-महलपर हमरा उड़ए नै अबैत अछि। तँए हमर रचनामे कल्पनाक आधार भीत्ति-प्रायेः कतौ दृष्टगोचर होएत। परम्परागत विम्बकेँ अभिनव विम्बक संग हम समन्वय करैत छी जे हमर भोगल एवम् अनुभवक आधारशिलापर ठाढ़ रहैत अछि। विविध भावक संग जुड़ल विविध विषय आत्मीयताक डोरी पकड़ि निस्सरित होइत अछि। उमेश मण्डल- अहाँक साहित्यमे पात्र जीवन्त भऽ उठैत अछि, तेकर की रहस्य? मायानाथ झा- पात्र यथार्थताक संग जुड़ल रहैत छथि, लाग-लपेट वा आडम्बरक तामझामक बीच ओझराएल नै रहैत छथि आ तँए बुझाइत अछि जे शब्द विन्यास, वाक्-पटुताक आलम्बन नहियो रहैत ओ मुखर भऽ उठैत होथि। पाठकक दृष्टकोण एवम् अभिरूचि सेहो ऐ प्रसंग अपन महत रखैत अछि। उमेश मण्डल- साहित्य लेखन, विशेष कऽ मैथिली साहित्य लेखन अहाँ लेल कोन तरहेँ विशिष्ट अछि आ एकर प्राथमिकताकेँ अहाँ कोन तरहेँ देखै छी? मायानाथ झा- हिन्दी कविताक दू पाँति मोन पड़ैत अछि- “जिनको न निज देश का, निज भाषा का अभिमान है। वह नर नहीं वह पशु िनरा और मृतक समान है।” अपन भाषाक प्रति हमरा अगाध सिनेह अछि। सेनामे प्रवासक संग ई प्रेम आओर प्रगाढ़ भऽ गेल बंगला एवं दक्षिणक निवासीकेँ देखि कऽ। भाषाक प्रति ओ लोकनि खूब कट्टरवादी होइत छथि। दोसर, किछु अपवाद छोड़ि हम इएह देखैत अएलौं अछि जे लोक जतेक अपन भाषामे मुखरित होइत अछि ततेक आन भाषामे नै। हमर शिक्षा गामहि-घरमे भेल अछि तँं हिन्दी-अंग्रेजी नीक जकाँ लिखबाक-पढ़बाक लूरि रहितो हम अपन भाषामे बेशी सहज रहैत छी। अवकाश प्राप्तिक बाद हम अपन डोरि सेहो आबि गेलौं, तँ हम मैथिली साहित्यकेँ प्राथमिकतासँ लेल अछि। अपन तँ अपनहि ने होइत छैक, जँ अनकर वस्तु बड्ड प्रिय आ अपन बड्ड अधलाहक मनोवृत्तिक संक्रमणसँ ग्रसित नै होइ। उमेश मण्डल- की अहाँ कोनो तथ्यक झँपलाहा भाग उघारैत छिऐक? अगर हँ तँ केना आ नै तँ किएक? मायानाथ झा- तथ्यक झँपलाहा भाग की भेल? कोनो पात्रक वा कोनो रीतिक अशोभनीय अंश ओकर विद्रुपता, कुरूपता, अश्लीलता। जखन अहाँ विवेचना करबैक तँ नींक-अधलाह दुनू देखबहि पड़त। विद्रूपताक विश्लेषणात्मक वर्णन तँ बड्ड नीक मुदा ओकर बखिया उघाड़ब वा चीरहरण करब हमरा अवांछनीय लगैत अछि। सुधी पाठकक लेल इंगित कऽ देब मात्र वेश भऽ जाइत छैक। सकारात्मक पक्षकेँ विशेष रूपेँ दर्शाएब प्राय: सभ रचनाकारक उद्देश्य रहिते छन्हि कारण नीक साहित्य आखिर कोन भेल वएह ने जे नीक तथ्यकेँ अमूल्य नीधि साबित कऽ सकए। तथ्यक उत्तमता, उत्कृष्टता पाठककेँ बिनु झकझोरिने नै छोड़ए। उमेश मण्डल- अहाँ कहिया-सँ-कहिया धरि प्रवास केलौं? प्रवासमे एतेक दिन बितेलाक बादो अहाँक रचनामे मिथिला आ ओकर संस्कृति मुख्य रूपसँ भेटैत अछि, की ई नोसटेलजिया छी? की प्रवास रहि ओतुक्का अनुभवक लेखनक अहाँ प्रथमिकता अहाँ नै बुझै छिऐक? मायानाथ झा- भारतीय थल सेनाक डाक शाखामे हम अपन जीवनक छत्तीस वर्ष आठ मास सत्रह दिन (13. 09. 1969 सँ 31. 05. 2006) बिताओल। इहए हमर प्रवास काल-खण्ड थीक। लगभग चारि दशकक बेदाग दीर्घ सेवापर हमरा गर्व अछि। सैन्य विषयपर हम किछु विशेष नै लिखलौं अछि से सही, किन्तु तकरा हम अपन नैटटेलजिया नै मानैत छी। हमर पोथी सभमे लिखल भूमिका सैन्य जीवनक अनुभव आ परिपाटीक आधारेपर वर्णित अछि। एकटा कवितामे छोटछीन बातक जिक्र सेहो अछि, नवीन रचना ‘हास्य ऊर्जा’ मे अनेक चुटकुलाक समावेश अछि। मोनमे जे एकटा विशेष रचना (आत्म कथाक रूपमे) अकार नेने अछि तकरा साकार नै कए सकलौं अछि। जाधरि भगवतीक कृपा नै हएत ताधरि नै भए सकत कारण हमर विश्वास ओहीपर आधारित अछि। जे भवतव्य हो सएह। उमेश मण्डल- अहाँ कहियासँ लेखन प्रारम्भ केलौं, केकरा लेल लिखलौं, आइ-काल्हि केकरा लेल लिख रहल छी? मायानाथ झा- हम बाल्यावस्थेसँ लेखन प्रारम्भ केलौं। स्वजन गुरुजनकेँ किछु फकरा-पिहानी जकाँ बना कऽ सुना दैत छलियनि। मोन अछि बहिनक सासुरमे बकरी मीयाँ दर्जीपर किछु कड़ी जोड़ि कऽ सुना देने रहिऐ 1956-57क बीच। चवन्नी पारितोषिक भेटल रहय। तकर बाद सांस्कृतिक कार्यक्रम सभमे हम अपन भाषा सेनामे हिन्दी वा भोजपुरीमे पौरोडी बराबरि बनबैत रहलौं अछि। पैरोडी गीत आकर्षणक विशेष माध्यम बनि जाइत छल। बराबरि सराहना भेटैत रहल। सेनाक अपन शाखाक पत्रिका (मेल-मिलाप) मे हमर कविता आ आलेख बराबरि छपैत रहल। पहिल बेर प्राय: 1977-78 मे। कर्णामृत मैथिली पत्रिकामे हमर क्रमश: दू गोट कविता छपल अछि, 2004 क सन्धि कालमे। हमरा जनैत कियो लिखैत अछि पहिने अपना लेल। अपन लेखन हमरा भरपूर स्वान्त: सुख दैत अछि। तखन तँ लेखक अपन विचार, भाव, मनोव्यथा, मोनक खुशी सभटाकेँ लेखनीक माध्यमसँ दोसरा तक पहुँचाबए चाहिते अछि। भनसीयाक कएल भानसकेँ आन जखन खाइत छैक तखने ने ओकरा नीक भेलैक कि बेजाए से कहैत छैक। सएह बात लेखकोक प्रति होइत छनहि। पाठके ने हुनक कृतिक अवलोकन कए गुण-दोषक विवेचना करैत छथि। ओना हम विशेषतया लिखैत छी, बच्चा, किशोर, एवं युवा वर्गकेँ धियानमे रखैत। हुनका लोकनिमे आजुक िशक्षासँ सशक्त चारित्रिक गठन होइत नै देखाइत अछि जे अत्यन्त दयनीय एवं चिन्तनीय बात बुझाइत अछि। अर्थोपार्जनजनित शिक्षा नैतिकताक आधारशिला कथमपि नै गढ़ि सकैत अछि | दोसर समस्या अछि नवका पीढ़ीक अपन भाषासँ विमुख होएब। ओहू पाछू ओएह अर्थ-पिशाच आबि गेल छैक। विद्वान भएक पूजित हएब आजुक पीढ़ीक सेहन्ता नै प्रत्युत-अरबपति बनि नाम कमाएब नियति छैक। उमेश मण्डल- की अहाँकेँ ई लगैत रहल अछि जे मुख्य धारासँ अहाँ कतियाएल गेल छी? अहाँक रचनामे समाजकेँ बाहरसँ देखबाक प्रवृतिक की कारण? मायानाथ झा- प्रश्न पूर्णतया बोधगम्य नै प्रतीत होइत अछि। हमर कोन रचना मुख्य धारासँ कतिआएल लागि रहल अछि? मुख्य धारासँ अपनेक की तात्पर्य अछि? हमरा नै बूझि पड़ैत अछि जे हमर कोनो रचना ई लक्षित करैत अछि जे हमर प्रवृत्ति समाजकेँ बाहरसँ देखबाक अछि। व्यक्तिक समष्टि समाज होइत छैक। समाजसँ बाहर व्यक्तिक अस्तित्व तँ अर्थहीन भऽ जाइत अछि। हँ, बुद्धिजीवी समाजक आलोचक,विवेचक एवं चिन्तक तँ होइते अछि। हम तँ अपनाकेँ अपन रचनाक माध्यमसँ कोनो रूपमे तइ सीमाक पार जाइत नै बूझि रहल छी। िवदेह- अपन साहित्य आ रचनामे की स्वयंकेँ पूर्णरूपसँ इमानदार राखब आवश्यक छै? मायानाथ झा- रचनामे कोनो लेखकक ई अभिलाषा रहैत छैक जे ओ तथ्यके चरम बिन्दु तक लऽ जा सकए आ ई िनर्भर करैत छैक ओकर लेखनीक शक्ति आ चातुर्यपर। लेखकक ईमानदारीक निर्णायक होइत छथि पाठक। पाठक होइत छथि विभिन्न रूचि एवं विचारक। तँए एक्के रचनाक प्रति विभिन्न पाठकक प्रतिक्रिया विभिन्न होइत अछि। रचनाकार अपन हिसाबेँ अपने जगहपर रहि जाइत अछि। उमेश मण्डल- मैथिली साहित्य आइक दिनमे की ई सभ (साहित्यकार)क सामुहिक दोष स्वीकृतिक रूप नै बुझना जाइत अछि?- मायानाथ झा- पुन: प्रश्न स्पष्ट नै अछि। तँए हमर कोनो प्रतिक्रिया नै। उमेश मण्डल- की अहाँकेँ लगैत अछि जे अहाँक पोथीकेँ हिन्दी, बंग्ला, नेपाली, अंग्रजी आदि भाषामे अनुवाद कएल जाएत? तइ स्थितिमे ओतए एकर कोन रूपेँ स्वागत हेतैक? की अहाँक साहित्य ओइ भाषा आ संस्कृति सभ लेल ओतबे महत्वपूर्ण रहतै जते ओ मैथिली भाषा आ संस्कृति लेल छै? अहाँक लेखन भाषा-संस्कृति निर्पेक्ष किअए नै भऽ सकल? मायानाथ झा- हमर पोथी जँ अन्य कोनो भाषामे अनुवाद हुअए तँ ओ ओतबे स्वागत योग्य हएत जतबा ओ अपन भाषामे अछि। ओकरामे कोनो एहन बात नै छैक जे दोसर भाषामे अनुवाद भेने ओकर महत्ता न्यून भऽ जाइक। हमर पोथीक कोनो कथा भाषा-संस्कृतिसँ तेना भऽ कऽ आबद्ध नै अछि जे दोसराक लेल अग्राह्य बनि जाएत। उमेश मण्डल- अहाँक भाषा तँ मैथिली अछि मुदा अहाँक लेखनपर बाहरी भाषा, संस्कृति, विचारधाराक प्रभाव पड़ल अछि, कतौ-कतौ ई स्पष्ट अछि मुदा बेसी ठाम नै, एकर की कारण? मायानाथ झा- सैन्य जीवनक क्रममे हम भारतक विभिन्न क्षेत्रमे रहलौं खास कए कऽ पूर्वी एवं उत्तर-पूर्वी क्षेत्रमे। विभिन्न भाषासँ पाला पड़ल। मुदा हाबी रहल मुख्यतया अपने भाषा। छिटपुट रूपेँ आनो भाषाक शब्द विशेष रूपमे ऊर्दूक प्रयोगमे आबि गेल हएत। ओना कौखनक कथानकपर विशेष जोर देबाक गैर-भाषीय शब्दक प्रयोगकेँ हम अनुचित नै बुझैत छी। सेनामे भाषाक शुद्धतापर ओतेक जोर नै देल जाइत छैक जतेक कथनक स्पष्टतापर, भलहिं भाषा खिचड़ी किएक नै भऽ जाए। उमेश मण्डल- अहाँक रचनाक प्रचार ऐ पुरस्कारक बाद भयंकर रूपसँ भेल अछि, अहाँकेँ ऐसँ केहेन अनुभव भऽ रहल अछि? मायानाथ झा- प्रसन्नता होइत अछि, उत्साह बढ़ल अछि। किन्तु, प्रचार जे भेल हो, मुदा पोथीक मांग आइ धरि कतौसँ नै आएल अछि, तँए प्रचारकेँ प्रस्तर बुझी तँ से आखिर केना? विदेह साहित्य सम्मानक प्रति सादर आभार। २ हम पुछैत छी: विदेह मैथिली समानान्तर रंगमंचक संस्थापक मैथिली नाटक आ रंगमंचक आइ धरिक सभसँ पैघ नाम बेचन ठाकुरसँ मुन्नाजीक गपशप गमैया नाटकक परिवेशजन्य आधुनिक मैथिली समानान्तर नाटक आ रंगमंचक सृजनकर्त्ता एवं निस्वार्थ भावनासँ रचनारत श्री बेचन ठाकुर जीसँ हुनक रचनात्मक प्रक्रिया मादे युवा विहनि कथाकार मुन्नाजी द्वारा कएल गेल विभिन्न प्रश्नक उतारा अहाँ सबहक समक्ष देल जा रहल अछि। मुन्नाजी- प्रणाम ठाकुरजी! बेचन ठाकुर- प्रणाम मुन्ना भाय! मुन्नाजी- साहित्यक मुख्य: दू गोट विधाक एतेक रास प्रकारमे सँ अपने नाटकक सर्जनकेँ प्राथमिकता देलौं किए? एकर कोनो विशेष कारण तँ नै अछि? अहाँक समानान्तर रंगमंच जे आन्दोलन शुरू कएने अछि ओकर मादेँ किछु कहए चाहब। बेचन ठाकुर- मुन्नाजी, अहाँकेँ तँ बुझले हएत जे मैथिलीमे जातिवादी रंगमंच, खास कऽ महेन्द्र मलंगिया (ओकर आंगनक बारहमासासँ लऽ कऽ छुतहा घैल धरिमे ई जातिवादी शब्दावली भरल अछि) आ हुनकर विचारधाराक लोक, कोन तरहेँ पत्र-पत्रिकाक माध्यमसँ आ सरकारी आ गएर सरकारी फण्ड आ सहयोगक माध्यमसँ गएर सवर्णक प्रति गारि आदिक प्रयोग कऽ रहल छथि, ओकर संस्कृतिकेँ तोड़ि कऽ प्रस्तुत कऽ रहल छथि, ओकरा लेल एहेन मैथिलीक प्रयोग कऽ रहल छथि जकरासँ ई सिद्ध हुअए जे ओ सभ मैथिली भाषी छथिए नै, कतौ बाहरसँ आएल छथि। आब मलंगियाक संस्था ई काज हिन्दीसँ मैथिलीमे अनूदित नाटकमे सेहो केलक, रामेश्वर प्रेमक नाटकक मैथिलीमे “जल डमरू बाजे” रूपमे घृणित अनुवाद आ मंचन भेल, गएर सवर्ण लेल तथाकथित छोटहा मैथिलीक प्रयोग कएल गेल, हिन्दीमे रामेश्वर प्रेम ऐ तरहक प्रयोग नै केने छथि, रामेश्वर प्रेम सेहो ई हेबऽ देबा लेल दोषी छथि। हिन्दी सन कोनो भाषा आ मैथिलीकेँ मिश्रित कऽ ओ लोकनि ई सिद्ध करबामे लागल छथि जे ईएह मिश्रित भाषा मिथिलाक भाषा छी, आ ऐ तरहेँ मैथिलीकेँ मारबा लेल बिर्त छथि; किछु थोपड़ीक लोभेँ सेहो ओ ई कऽ रहल छथि। ओना तँ जइ पत्रिका आ सरकारी-गएर सरकारी माध्यममे एकर चर्च होइए ओकर पढ़निहारक संख्या तँ शून्ये अछि मुदा ओ सभ जँ अहाँ पढ़ू तँ लागत जे जे अछि से जातिवादी रंगमंचे अछि, ओना ओ वास्तविकतामे मैथिली रंगमंचक दसो प्रतिशत नै अछि। आ यएह सभ कारण शुरूसँ विद्यमान छल जइ कारणसँ हम समानान्तर रंगमंच पछिला २५ सालसँ चलबैत रहलौं। मुदा एकर कोनो विवरण मैथिलीक जातिवादी पत्रिकामे नै आएल। मुदा जखन पहिल विदेह मैथिली नाट्य उत्सव २०१२ भेल तँ ९०% लोकक समानान्तर रंगमंचक धाह ओइ जातिवादी रंगमंचकेँ/ मानसिकताकेँ बुझा पड़ऽ लगलै। रामदेव झा अपन दूटा पुत्र विजयदेव झा आ शंकरदेव झाक संग मैदानमे आबि गेलाह आ अपशब्दक प्रयोगक शुरुआत केलन्हि। मलंगिया जी अपन दुनू पुत्र ललित कुमार झा आ ऋषि कुमार झाक संग मैदानमे आबि गेलाह आ अपशब्दक प्रयोगक शुरुआत केलन्हि। तँ दुनू गोटेमे (रामदेव झा आ महेन्द्र झा मलंगियामे) समानता फेर सोझाँ आबि गेल। जातिवादी रंगमंच साहित्य अकादेमी पुरस्कारक लेल मलंगियाक नाम उठेलक, कमल मोहन चुन्नू नाटककारकेँ नाटक लेल पुरस्कार देबाक गप केलन्हि आ महेन्द्र मलंगिया लेल ऐ पुरस्कारक अनुशंसा केलन्हि, ओ कहलन्हि जे आइ धरि ई नै भेल अछि जे मैथिलीमे नाटककारकेँ नाटक लेल पुरस्कार भेटल अछि, ओ रामदेव झाकेँ भेटल पुरस्कारकेँ खारिज करैत कहलन्हि जे रामदेव झाकेँ जइ नाटक- एकांकी लेल पुरस्कार भेटलन्हि से कथाकेँ कथोपकथनमे लिखल मेहनति मात्र अछि (मिथिला दर्शनमे हुनकर लेख)। आ जखन महेन्द्र मलंगियाकेँ जातिवादी रंगमंचक “मैथिली एकांकी संग्रह”क ठेका साहित्य अकादेमीसँ चन्द्रनाथ मिश्र “अमर”-रामदेव झा (ससुर-जमाएक जोड़ी)क अनुकम्पासँ भेटलन्हि तँ ओ मैथिलीक (जातिवादी रंगमंचक) १९ टा सर्वश्रेषठ एकांकीमे रामदेव झाक “पिपासा” लेने रहथि, आब लिअ, रामदेव झा सर्वश्रेष्ठ नाटककार भऽ गेलाह!! आ ओइ पोथीक भूमिकामे ओ चन्द्रनाथ मिश्र “अमर”-रामदेव झा केँ खुश रखबा लेल गोविन्द झा आ सुधांशु शेखर चौधरीक मजाक तँ उड़ेनहिये छथि संगमे राधाकृष्ण चौधरी आ मणिपद्मकेँ किए ओ ऐ संग्रहमे शामिल नै केलन्हि, ओइ लेल हास्यास्पद तर्क सेहो देने छथि। गुणनाथ झाकेँ ओ शामिल किए नै केलन्हि!! सर्वहाराक रंगमंचकेँ ओ शामिल किए करितथि, ई संकलन तँ जातिवादी रंगमंचक छल किने!! आ जँ अहाँ जातिवादी रंगमंचक विरोध करब तँ मलंगिया जीक दुनू बेटा ललित कुमार झा, ऋषि कुमार झा फोन नम्बर +२३४८०३९४७२४५३ सँ अहाँकेँ धमकी देत जेना ललित कुमार झा उमेश मण्डल जी केँ देलन्हि वा विजयदेव झा +९१९४७०३६९१९५ नम्बरसँ धमकी देत जेना ओ उमेश मण्डल जी केँ २६ अगस्त २०१२ केँ धमकी देलन्हि। आ आब अहाँ सोचमे पड़ि जाएब जे ई लोकनि कखन एक दोसराक पक्षमे आबि जाइ छथि आ कखन विरोधमे, कखन रामदेव झा नाटककार बनि जाइ छथि आ कखन खारिज भऽ जाइ छथि। जातिवादी रंगमंच आपसमे खण्ड-पखण्ड अछि, मुदा विदेह मैथिली साहित्य आन्दोलन आ विदेह मैथिली समानान्तर रंगमंचक विरोधमे ई सभ एक भऽ जाइत अछि। कमल मोहन चुन्नूकेँ नाटककार जगदीश प्रसाद मण्डलकेँ लघुकथा संग्रह “गामक जिनगी” लेल टैगोर साहित्य सम्मान भेटलासँ एतेक कष्ट भेलन्हि जे ओ एक बेर फेर “घर-बाहर”मे मलंगिया जीकेँ साहित्य अकादेमी पुरस्कार भेटए, से फतवा जारी कऽ देलन्हि ई कहि कऽ जे मलंगिया जी मैथिलीक (जातिवादी रंगमंचक दृष्टिकोणसँ) सर्वश्रेष्ठ नाटककार छथि, मुदा ऐबेर ओ ई सतर्की केलन्हि जे सर्वश्रेष्ठ समालोचक, लघुकथाकार आ कविक नाम सेहो जोड़लन्हि, आ हुनको सभकेँ साहित्य अकादेमी भेटए से चर्च कऽ देलन्हि, जे आरोप नै लागए। कहबाक आवश्यकता नै जे ऐ लिस्टक सभ समालोचक, लघुकथाकार आ कवि चुन्नू जीक ब्राह्मण जातिक छथि आ दोसरक हुनका पढ़ल नै छन्हि। सर्वहारा वर्ग नीक जेकाँ बुझि गेल जे ई साहित्य आ ई रंगमंच ओकरा लेल नै अछि, से ओ अपनाकेँ ऐसँ कात कऽ लेलक, आ जँ विदेह मैथिली साहित्य आन्दोलन आ विदेह मैथिली समानान्तर रंगमंच नै अबितए तँ मामिला खतमे छल। हम आगाँ २५ साल धरि ई समानान्तर रंगमंच चलबैत रहब। पछिला २५ सालमे जतेक सफलता भेटल अछि ओइसँ हम उत्साहित छी, अगिला पचीस सालमे जँ हम जातिवादी रंगमंचक किरदानीक कारण मैथिलीसँ भागल सर्वहारा वर्गक किछु आर गोटेकेँ मैथिलीसँ जोड़ि सकब आ जे काज हमरासँ छूटि जाएत से अगिला पीढ़ी करत। जातिवादी रंगमंच आब सरकारी आ गएर सरकारी संस्थाक हथियार बनि कऽ रहि गेल अछि, ई ढहब शुरू भऽ गेल अछि, किछु ऊपरी सुधार, नामे लेल सही, ई कऽ रहल अछि। हमर लक्ष्य अछि जे अगिला पचीस सालमे ई जड़िसँ खतम भऽ जाए। मुन्नाजी- अहाँक नाटकक कथानकमे केहेन स्थिति वा परिवेशक समावेश रहैए। बेचन ठाकुर- जखन हम परिवारक संग वा पड़ोसीक संग गमैया नाच वा नाटक देखैले जाइत रही तँ हुनके सभसँ प्रेरित भऽ नाटकक प्रति अभिरूचि जागल आ दिनोदिन बढ़ैत रहल आ तँइ हमर नाटकक कथानकमे समाजक स्थिति-परिस्थिति आ ओकर यथासंभव समाधानक परिवेश रहैए। मुन्नाजी- अहाँ जहिया नाटक लेखन प्रारम्भ केलौं, कहू जे तहिया आ आजुक सामाजिक, सांस्कृितिक उपस्थापन वा बदलावक प्रति अहाँक नजरिये केहेन स्थि़ति देखना जाइछ? बेचन ठाकुर- कओलेज जीवनसँ किछु-किछु लिखैक प्रयास करैत रहलौं जैमे नाटक मुख्य रहल। नाटकक दृष्टिएँ प्रारंभिक सामाजिक आ सांस्कृतिक स्थिति तथा आजुक स्थितिमे बड्ड अंतर देखना जाइए। गमैया नाटक जस-के-तस पड़ल अछि, कनी-मनी आगू घुसकल अछि। मुदा शहरी नाटक अपेक्षाकृत आगू अछि, मुदा ओतए सोचक अभाव अछि। मुन्नाजी- आइ नाटक कथानक, शिल्प एवं तकनीकी दृष्टिकोणे उम्दा स्तरक प्राप्तिक संग थियेटरमे आबि जुमल अछि, अहाँ थियेटरमे प्रदर्शित आ गमैया नाटकक बीच कतेक फाँट देखै छी। आ किए? बेचन ठाकुर- कथानक, शिल्प एवं तकनीकी दृष्टिएँ थियेटर आ गमैया नाटकमे बड्ड फाँट देखै छी। दर्शकक आ कलाकारक साक्षरता, स्त्री-पुरूषक भूमिका, साज-बाजक ओरियान, इजोतक जोगार इत्यादिमे बड्ड फाँट अछि। फलस्वरूप गमैया नाटक अपेक्षाकृत पछुआएल रहि गेल अछि मुदा विषय वस्तुमे ई आगाँ अछि। मुन्नाजी- गाममे आइयो बाँस-बत्ती आ परदाक जोगारे नाट्य प्रदर्शन होइछ आ दर्शक सेहो जुटैछ तँ अपने गमैया नाटक अतीतक दशा आ भविष्यक दिशा मादे की कहब? बेचन ठाकुर- गमैया नाटकक प्रदर्शनमे दर्शकक भीड़ रहैए। कारण गाम-घरमे मनोरंजनक साधनक सामूहिक स्तरपर अभाव छै। शहरक देखादेखी आब गामो-घरक स्थितिमे सुधार भऽ रहलैए। तैं गमैया नाटकक दशा भविष्यमे अवश्य सुधरत, विश्वास अछि। मुन्नाजी- अहाँ एतेक रास विभिन्न तरहक नाटक लिख मंचन कैयौ कऽ हेराएल वा बेराएल रहलौं, किए? मलंगिया जीक रंगमंचक एकटा निर्देशक प्रकाश झा हमरा कहलन्हि जे अहाँ भरि दिन केश कटैत रहैत छी, रंगमंच अहाँ किए ने गेलिऐ! बेचन ठाकुर- हम एकटा निजी शिक्षकक दृष्टिएँ अपन विद्यार्थीक बौद्धिक विकास हेतु अपन कोचिंगक प्रांगणमे कोनो विशेष अवसरपर, तैमे खास कऽ सरस्वती पूजामे, रंगमंचीय सांस्कृतिक कार्यक्रमक बेबस्था करै छी जैमे अपन निर्देशनमे विद्यार्थी द्वारा कार्यक्रम संपादित होइए। ओइ तरहेँ दर्जनो नाटकक मंचन सराहनीय ढंगसँ भऽ चुकल अछि। मलंगियाजीक जातिवादी रंगमंचक विरोधमे समानान्तर रंगमंच अछि तँ अहाँ हुनका लोकनिसँ की आशा करै छी! (हँसैत) ओना हमर ठाकुर टाइटिल सँ हुनका लोकनिकेँ भेल हेतन्हि जे हम नौआ ठाकुर छी, तेँ ओ ई बाजल छथि। मुदा जँ किओ ई काज कऽ रहल छथि आ अपन संस्कृतिक रक्षा कऽ रहल छथि, जेना नौआ ठाकुर लोकनि, तँ की हर्ज। विद्यापति ठाकुर, जे बिस्फीक नौआ ठाकुर रहथि, केँ बिदापत नाचक माध्यमसँ जिआ कऽ राखलन्हि नौआ ठाकुर लोकनि, विद्यापति आ मैथिलीकेँ हजार साल धरि जिआ कऽ राखलन्हि, तँ ऐमे ककरो किए कष्ट छै? आब तँ ओ लोकनि विद्यापतिकेँ ब्राह्मण बनेबामे लागल छथि। ओना हम बरही जातिक छी, से महेन्द्र झा मलंगिया जी आ प्रकाश झा जीकेँ अहाँ भेँट भेलापर कहि देबन्हि। सूत्रक अभावमे हम हेराएल रही। मुदा आब प्राप्त सूत्र आ बेबस्थाक कृतज्ञ छी। मुन्नाजी- अहाँ नाटकक अतिरिक्त अओर की सभ लिखै छी, सभसँ मनलग्गू कोनो विधाक कोन प्रकारक अहाँ प्रेमी छी आ किए? बेचन ठाकुर- हम नाटकक अतिरिक्त विहनि कथा, लघुकथा, राष्ट्रीय गीत, भक्तिगीत, कविता, टटका घटनापर आधृत गीत इत्यादि लिखबाक प्रयास करैत रहै छी। गोष्ठीमे उपस्थित भऽ कऽ कथा पाठो केलौंहेँ। सभसँ मनलग्गू विधा हमर संगीत अछि। ओना हमर प्रतिष्ठाक विषय गणित अछि। मुन्नाजी- जाति-वर्ग विभेद अहाँक रचनाकेँ कतेक प्रभावित कऽ पौलक अछि, अपने ऐ जातीय विषमताक टापर-टोइयामे अपनाकेँ कतऽ पबै छी? बेचन ठाकुर- जाति-वर्ग विभेद हमर रचनाकेँ अंशत: प्रभावित केलक। ऐमे हम अपनाकेँ अपन जगहपर अड़ल पबै छी। मुन्नाजी- नाटक वा अन्यान्य रचनात्मक सक्रियताक मादे अपनेक अगिला रूखि की वा केहेन रहत? बेचन ठाकुर- नाटक वा अन्यान्य रचनात्मक सक्रियताक मादे अपन अगिला रूखक संबंधमे किछु निश्चित नै कहल जा सकैए, समानान्तर रंगमंच तँ चलिते रहत। इच्छा प्रबल अछि। जतए धरि संभव भऽ सकत करब। मुन्नाजी- अपनेक अमूल्य उतारा हेतु बहुमूल्य समए देबाक लेल हार्दिक धन्यवाद! बेचन ठाकुर- अपनेक प्रश्नक यथासंभव जबाबसँ अपनाकेँ गौरवान्वित बुझि अपनेकेँ हार्दिक धन्यवाद ज्ञापित करैत हमरो अपार हर्ष होइए। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। ३. पद्य ३.१.१.अनामिका राज- नवका बाट २.नगीना कुमारी झा३.इरा मल्लिक- गीत ३.२.१.पंकज चौधरी “नवलश्री” - गजल २.राम विलास साहुक कविता-रौदी३.प्रमोद रंगीले ३.३.जगदीश प्रसाद मण्डल-११ गोट गीत ३.४.१. राजदेव मण्डल २.ओमप्रकाश झा ३.५.१.लालबाबू मण्डल २.किशन कारीगर ३.६.चंदन कुमार झा ३.७.१.जगदानन्द झा 'मनु' २.राजेश कुमार झा (कन्हैया) ३.शशिधर कुमर- पूणा प्रवास ३.८.१.जगदीश चन्द्र ठाकुर ‘अनिल’- की भेटल आ की हेरा गेल (आत्म गीत)- (आगाँ)२.सत्यनारायण झा- ओहिना मोन अछि ओ दिन १.अनामिका राज- नवका बाट २.नगीना कुमारी झा३.इरा मल्लिक- गीत १ अनामिका राज जन्म तिथि ०७.०५.१९८६, शिक्षा एम.एस.सी. वनस्पति विज्ञान, गाम- विषनपुर (खगड़िया), पिता- दामोदर राम (प्रोफेसर भौतिकी विभाग), पति- अशोक राज (परीवीक्षण अधिकारी, पंजाब नेशनल्ल बैंक, खगड़िया)। विशेष: मैथिली नाटकमे अभिनय। नवका बाट आशा आ विश्वासक बीचमे फाँसल, गर्त होइत जिनगी भोगनिहार दुइये लोक होइछ बोनिहार आकि नारी! दुनू सामन्त कि पूँजीवादी द्वारा भोगबाक चीज बनि रहि जाइछ आ भोगनिहार एकर मर्दन करैत अपन पुरुषारथ देखेबाक माउग प्रयास करैए। आब उलटबासी काज करए लागल अछि। फूटए लगलैए बोल बोनिहारक आ कमा कऽ घर चलबै जोगरक भऽ गेल अछि नारी अगिला बाट एकरे हाथमे आबि कऽ अटकि गेल अछि। २ नगीना कुमारी झा १ साहसक डोरी
बहुत भऽ गेल सभक अत्याचार नै सहि सकब आब आइ अपराध कतेक सहि कऽ नोर झाइर हम बैसू आँखिक गहना कतेक हम सुखाउ
सभक बात रहलै एहने सभ दिन कहियो नैने भेल गेल परिवर्तन जीवनक धारक बाट भेल दू तीर काटो सँ बेसी बिझल बोलीक तीर
नै चाहितो भरियाक भेल छी भार नै सोची तँ फसल छी जीवनक जाल ऋण पहाड़ बनि रहल कर्तव्यक उपहास उठि रहल लिखल भवितव्यक
डरक मारल भऽ नै जीबि सकब सिमरक रुइ जकाँ नै उड़ि सकब बहुत सभाक उपहास सहलौं आब नै बहुत सँ मोनक चोट खेलौं आब नै
रीतिक बन्धन सीमा देखु नंघाओल मोनक बोझक भारी तैयो रहि गेल देखियौ साहसक डोरी तँ आब टुटि गेल सभक कर्जा सेहो उधारे अपने रहि गेल २ मोन पड़ैए मोन पड़ैए ओ गोरहा आ ओ चेरा सब जरि रहल खूब, धाह दऽ रहल ओ चिन्बारक चुलहाक धधकैत आगि मोन पड़ैए ओ विवश एक नारी ढहल गोरहा सन रहथि ओ बेचारी फाड़ल चेरा सन जीवनक हुनक साड़ी सन्दुकक पौआ संग बन्हल ओ अबोध शाइद ओकर चिचियाहटिमे छल प्रतिशोध शाइद ओ छल दूर मायक दसधार दूध मोन पड़ैए ओ चकला आ बेलना गोलमटोल सुप भरिक गेटल सोहारी अपना लेल ओ ठोकती मरुआक रोटी मोन पड़ैए फेर ओ सन्दुकक पौआ तड़सैए ओ जीवन अन्तिम क्षण, जेना शाइद ओ सोछए अइमे हमर दोष कोना? ३ दहेज प्रथा
नओ महिना दुख झेल माय गर्भ्वती भेली आश करैत पुत्र केर जन्मा लेल बेटी सपना टुटल देखि बाबु माथ पर हाथ धेला कर्म जरल सोचि अपन भाग्यकेँ सरापता धीयाक जन्म घरमे बढय लगल चिन्ता बढ़ैत बेटीक उमेर धेल्कन्हि बिआहक चिन्ता धीयाक स्वरुप अछि कम नै अप्सरा लेकिन मारैए बेटी बलाकेँ दहेज प्रथा केकर दोष देब आह कहू मैथिल समाज पढ़ि लिखि धीया बनल अछि सर्व गुणी काका घुमता गाम गाम ताकबाक लेल जमाय बाबू झमारि खसता सुनि बड़द सँ वरक महगी वाह मिथिलाबासी अहाँकेँ कोना करी बखान उपहार स्वरुप अहाँ देलौं दहेज प्रथाक नाम शाबाश अहाँकेँ, बनबैत छी बेटी बलाकेँ बदनाम वाह कि गौरव बेटाक मोलमोलाइ करी तँ लाज शर्म मर्यादा मनवाताकेँ भूली कि करै छी मानव भऽ मानवक तनिको दुखक आभाष नै करै छी स्वार्थमे डुबी अबला बना नारीकेँ शूलीपर चढाबै छी हर समय दृश्यमे नारीकेँ किए कुदृष्टिसँ देखै छी निर्मल सीतापर किए शंका करै छी दुःशासन दुर्योधन सँ द्रोपदी केँ किए नै बचबै छी शंका आ बदनामी हुनकर बड़का अपमान सभ दर्द सहथिन मुदा नै कलंकित अपवाह सुनु ध्यानसँ अहूँ सभ छी एकटा बेटीबला अए केहन प्रथा बोझ बनेलक बेटीक समान धिया बेटा बला सँ अनुरोध दहेजक करी विरोध नै लेब नै देब कहि कऽ आबो करी अस्वीकार ३ इरा मल्लिक गीत ----- अहाँ कहै छी , बैसू लगमे, नीक लगैए। नेह नयन निहारब सजना, बड नीक लगैए। हाथ केँ हाथ सँ साथ मिलल, जखन पयलौँ नेह अहाँके, जीवन डोर मे बान्हि पिया, सोहागिन बनलौँ अहाँके, अहाँ हँसै छी सौँसे घर आब , झिलमिल चाँद लगैए, नेह नयन निहारब सजना, बड नीक लगैए। सुध बुधि नै अछि अपन आब तेँ, मुखड़ा देखि अहाँके, सिंगार अहीं छी, साज अहीं, पिया! प्यार बसल अँगनामे, अकछ करै छी पिया हमरा, तहियो बड नीक लगै छी, घर मे होली, दशमी, दिवाली, निशदिन आब लगैए। अहाँ कहै छी, बैसू लगमे, बड नीक लगैए। नेह नयन निहारब सजना, बड नीक लगैए। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। १.पंकज चौधरी “नवलश्री” - गजल २.राम विलास साहुक कविता-रौदी३.प्रमोद रंगीले १ पंकज चौधरी “नवलश्री” स्थायी पता : (s/o-श्री भागेश्वर चौधरी), गाम-सुगौना, भाया-राजनगर, जिला-मधुबनी, (मिथिला), बिहार-८४७२३५ पत्राचारक पता : (c/o-श्री मोहन चौधरी ), एच-१९४ (प्रथम तल), प्रताप विहार, सेक्टर-१२, जनपद-गाजियाबाद, उत्तर प्रदेश-२०१००९ गजल
किछु फुरा नञि रहल की करी नञि करी अनचिन्हार के कोनाकऽ मनाएल जाय ओ हमर के हेती हम हुनकर के छी ई सरोकार कहुना तऽ फरिछाएल जाय
हुनक आंखि लाजे धंसल जा रहल शब्द ठोढ़क थरथरी में फँसल जा रहल ओ बजती ने किछु हमरा टोकने बिना ई गप्प कोन ब्योंते फेर अगुवाएल जाय
आंखि हुनका सँ जखने मिला हम लेलौं कारी पोखरि में लागल बिला सन गेलंहु ने रातुक पहर ने तरेगन उगल ई भ्रमित मोन जगले में सप्नाएल जाय भने छलियै बान्हल नयन मेहसँ नञि तऽ उधिया कऽ खसितउं हुनक नेहसँ कते काल हेललहुं मगन आंइख में आब करेजा में सेहो तऽ सन्हियाएल जाय
नहि जानि कोना ई कखन भऽ गेलय छलय अनचिन्हार जे से अपन भऽ गेलय दू क्षण में कए जीवन के ललसा पुड़ल ई सच में भेलै कोना पतियाएल जाय
अपन मोन पर अपने अधिकार नञि आब हुनका बिना हमहूँ चिन्हार नञि हुनके सँ छइ अथ-श्री इति-श्री "नवल" प्रेम में ई मगन मोन भसियाएल जाय
*आखर-३१ २ राम विलास साहुक कविता- रौदी माथपर हाथ धेने खेतिहरक आँखिसँ गिरलै नोर धरती सुखलै धान जरलै खेतमे फटलै दरारि सुखले साउन-भादौ बितलै खेतिहरक नसीब फुटलै खेतसँ उड़ै छै धूल जरैत खेत देखि दिल जरैत जरि गेलै सबहक तकदीर की खेबै अपना की खेतै धिया-पुता सोगसँ घटलै शरीर पूर्वा-पच्छिया फोंक गेलै सभ नक्षत्र बनलै ठक ऋृतु बदललै मौसम बदललै धतरीक दरारि फटले रहलै पानि बिनु सभ जीब तेजै छै नित्य परान रौदी-दाही बहुते देखलौं एहेन जुलुम कहियो नै देखलौं अछैतै ओरूदे गेलै परान ई मुसिबत के हरि लेतै जखन भगवान, सरकार दुनू बेमुख बनल छै खेतिहारक दुख के पतिएतै मांगै छै पानि तँ डीजलक अनुदान भैटै छै। ३ प्रमोद रंगीले नेताजी जिन्दावाद नेताजी मंचप भाषण दऽ रहलए सभ दिनक काज ओ कऽ रहलए। भाषण सुनैत सुनैत एकटा अभागल, उठल गडगडाकऽ जेना भऽ गेल पागल । कनिक देर मनकेँ शान्त कऽ कऽ सहलक । तहन जाकऽ मनक बकार फोड़लक। रौ तोरा सँ वढ़ियाँ कुत्ता........। सुनबिही कखन जखन लगतौ जुत्ता। दोसरक माल खा खा कऽ बढालेलेँ पेट। यएह कारण सँ घटल छौ तोहर रेट। नेताजी पहिने घबड़ाएल, कनिक धड़फड़ाएल, तहन जाकऽ मेकमे गड़गड़ाएल। देखियौ देशमे शान्ति लाइब देली। पैसा केँ लुटएला भलेही मुँह बाइब देली। देश एखन राहतक साँस लऽ रहल छै। भलेही कर्सी आन्दोलन भऽ रहल छै। देखियौ शिक्षा कतेक आगू भागि गेल। भले शैक्षिक संस्थामे ताला लागि गेल। देखियौ विदेशमे बहुतकेँ रोजगारी लगा देली। भलेहि अपन देशकेँ रोजगारीक पैसा खा गेली। देखियौ सभतैर बिजलीबती मिल गेल छै। भलही बिजली बिलमे जनता सभ हिल गेल छै। देखियौ अपन देशक गरीबी मिट गेल। भलेहि धनीकहा सभ दस महला पिट गेल। हमरा जीता देब तँ हम आउर विकास लाएब ओइमे सँ पचहतर परसेन्ट मात्रेेे खाएब। अहाँ सभकेँ खुश राखक हमर वादा अइ। बुझि गेली हमर कि इरादा अइ। वेवकुफ जनता आउर वेवकुुुफ भऽ गेल। गलती ओ कऽ कऽ सभ क्रेडिट लऽ गेल। भाग्य यएह रहत कतनौ होउ बरबाद प्रेम सँ कहू नेताजी जिन्दावाद । ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। जगदीश प्रसाद मण्डल ११ गोट गीत 1. आश प्रेम संग...... 1. आश प्रेम संग झूिम रहल छै लाल टमाटर बाजि रहल छै। आश प्रेम......। वन बीच सन्यासी जहिना झींक दऽ दऽ जात नचबै छै। निआस कहाँ छोड़ि संग चिक्कस बनि-बनि भूमि भरै छै। आश प्रेम......। लाल टमाटर बनि सन्यासी खटमीठ रूप धड़ैत रहै छै। नै मीठ तँ खट्टो नहियेँ अपन नाओं सुनबैत कहै छै। आश प्रेम......। गीत गीता गाबि सन्यासी भगवत भजन करैत रहै छै। सबूर पाबि सबर सबरी मरितो राम एबे करै छै। आश प्रेम संग......। 2. विषय दस...... 2. विषय दस िसलेबस प्रवेश दसो दिशा देखैत रहै छै। त्रिभूज-ज्यमिति तहिना गीत व्यास गबैत रहै छै। विषय दस......। सून अप्पन हिस्सा कहि-कहि ठेहुन रोपि अड़ल रहै छै। अंकसँ हिसाबो तहिना रथ जिनगी धिचैत चलै छै। रथ जिनगी......। आगू भलहिं काटि-छाँटि घटबी घाट बढ़ैत चलै छै। होइत-हबाइत धकिया-धुकिया हिस्सा अपन कहबैत चलै छै। हिस्सा अपन.....। 3. धर्मक फूल...... 3. धर्मक फूल फुलेबे करतै बनि फुलबाड़ी सजबे करतै धर्मक फूल......। सान धार बनबे करतै काम-धाम बनबे करतै। भीड़-कुभीड़ धाम बीच असंख्य-शंख उठबे करतै। धर्मक फूल......। धड़ घनेरो धार घनेरो रूप कृष्ण कहबे करतै बान पकड़ि वाणी बदलि िनसाँस-साँस भरबे करतै। बनि फुलबाड़ी सजबे करतै। धर्मक फूल......। सहस्र नाओं बनि-बनि माला जप होइते रहतै। कुरू-पाण्डु बीच सदएसँ नाद-शंख कहबे करते। नाद-शंख कहबे करतै। हे यौ मीत, धर्मक फूल फुलेबे करतै फुलबाड़ी बनि सजबे करतै। 4. किछु ने करै छी...... किछु ने करै छी, मीत यौ किछु ने करै छी। गेड़ू-चौक मारि गनगुआरि बनि दिन-राति रमल रहै छी। मीत यौ किछु ने करै छी। जरि-मरि गेल मन-कामना समए संगम संग रमल छी मीत यौ किछु ने करै छी। बोनक बाट आगू छै उत्तरे-दछिने धार बहल छै घटि-घटि घटिया घाट बनि घोंटे-घोट पीबैत रहै छी मीत यौ किछु ने करै छी ससरि-ससरि ससरति रहै छी गाछ उतरि धरती पकड़ि लछमी-नाग कहबैत रहै छी मीत यौ किछु ने करै छी। 5. अपने पाछू...... अपने पाछू बौआइत रहै छी मीत यौ, अपने पाछू बौआइत रहै छी। दिन-राति ढहनाइत रहै छी राति-दिन गनहाइत रहै छी अपने पाछू बौआइत रहै छी मीत यौ......। पछुआ बनि पछुआर पहुँचिते पेट-पीठ, पाँजर देखै छी हड्डी छाती छिटैक-सिसैक पखुड़ा बनि सूर-तान भरै छी पखुड़ा बनि सूर-तान भरै छी मीत यौ, अपने पाछू बौआइत रहै छी। जुआ-जुआ, जुआ-जुआ नांगड़ि ऐँठि चलैत रहै छी लाद ऊपर लादि-लादि टूटि-टूटि गीरह बनैत रहै छी मीत यौ, अपने पाछू बौआइत रहै छी अपना के अप्पन बूझि-बूझि अपने पाछू ओझराएल रहै छी अपनापन भाव बिनु बुझितो अगुआर-पछुआर नाचि रहल छी। मीत यौ, अपने पाछू......। 6. उठी-बैसी...... 6. हमर तेही मे नाम, हमर तेही मे नाम। हमरा उठलेसँ काम, हमर बैसलेसँ काम हमर तेहीमे नाम......। उठी लेब कि बैठी, बाजू-बाजू धड़-धड़ाम उठी लऽ जँ बैसब, आ कि बैठी लऽ जँ उठब छुबिते भरब पद पराम हमर तेहीमे नाम, हमर तेहीमे काम। खेल खेलाड़ी खेलि खेल बाल-बोध लिखबै छै नाम खेल जिनगीक खेला-खेला मृत-अमृत पाबि सूरधाम। हमर तेहीमे नाम हमर तेहीमे काम हमरा उठले से काम, हमरा बैसले सँ काम। 7. गर-मुड़...... 7. गर-मुड़ बोझ बनल छै मीत यौ, गर-मुड़ बोझ बनल छै। पाबि धार साबे जेना बाणिक बानि धड़ैत रहै छै कोमल-किसलय किछु ने बूझि पछुआ रूप धड़ैत रहै छै। पछुआ रूप......। गर-मुड़.......। तहक-तह तहिया-तहियासँ छल-छल छल्ली बनैत रहै छै समटनिहार संगी जेहेन-जहिया तेहने तेहेन बोझ बनै छै। मीत यौ, तेहने-तेहेन बोझ बनै छै। गर-मुड़ाह बोझ बनल छै। गर-मुड़ाह ठनि-बनि-बनि गर-मुड़ाह चालि चलैत रहै छै। गर-मुड़ाह गीत गाबि-गाबि चालि कोइली चलैत रहै छै। चालि कोइली.......। मीत यौ.........। 8. मनक बेथा...... मनक बेथा कहब केकरा, हे बहिना सभ दिनसँ होइते एलै। बनि-बनि बेथा कथा बनि-बनि मरण-करण बनैत एलै। मृत-अमृत रगड़ि-रगड़ि दीन राति कहैत एलै। मनक बेथा......। खेरहा बनि-बनि कथा-पिहानी राति-दिन भूकैत एलै। पेट वायु जहिना भूकै छै खरही खेरहा कहैत एलै। मनक बेथा......। मोटा तर देह थकुचा-थकुचा पाड़ि ठोह कनैत एलै। कुहरि-कुहरि कानि-कानि आदियेसँ कहैत एलै। मनक बेथा......। 9. रहल नै...... रहल नै तकनिहार मीत यौ नै रहल तकनाहार। तकतियान अपने सिर चढ़ि-मढ़ि रहल नै देखिनिहार, मीत यौ रहल सभ दिन ताक तकैमे धाक अपन पकड़ैपर। जमिते धाक धकेल-धकेल ठेल खसाओल धरतीपर। मीत यौ ठेल खसाओल धरतीपर हेरि-हेर, हरणि हरण अबैत रहल बनि-बनि अन्हार घेरा-घेरि मछार बान्हि-बान्हि पटकि बैस छातीपर। मी यौ पटकि बैस छातीपर। 10. पकड़ि समए...... पकड़ि समए संकल्प नै ठानब गति कर्म पेबै केना? बिनु बूझल बिनु बूलि बटोही घन-सघन बुझैत जेना। पकड़ि समए......। ओर-छोड़ पकड़ि-पकड़ि काम-कर्म पहुँचै जेना छै संग श्रम-समए मिलि तहिना सुफल-फल पाबै तेना छै। पकड़ि समए......। बीच संगम श्रम ओ समए खुशी-खुश खुशिआइ जेना छै पाबि संग संकल्प तहिना धर्म-कर्म सिरजैत चलै छै। पकड़ि समए......। गनगनाइत कर्म गमगमाइत तहिना सागर-झील टपबे करै छै। झील-झिलहोरि सरोवर तहिना जिनगीक सान चढ़बे करै छै। पकड़ि समए......। 11. सतरंग ऐ...... सतरंग ऐ संसारमे समरस रंग धड़ैत रहै छै। धार-कोन अन्हार-बिहाड़ि राति-दिन पेबैत रहै छै। सतरंग ऐ......। कहि सुलक्षण बनि कुलक्षण घटिया घाट घटैत रहै छै। जुआ जोति पछुआ पकड़ि दब-उनार करैत रहै छै। सतरंग ऐ......। सिनेह सिनेहिल सहरि-बहटि गारा-जोड़ करैत रहै छै। िसर्जमान होइए जतए काँट-गुलाब हँसैत रहै छै। सतरंग ऐ......। संग मिलि मधुर डंक जेना सूर-तान भरैत रहै छै। रानी-बीच मधुरानी तहिना पान मधु करबैत रहै छै। सतरंग ऐ......। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। १. राजदेव मण्डल २.ओमप्रकाश झा १ राजदेव मण्डल कविता- घरक आँखि- रहै छलौं केतबो व्यस्त देखबाक अभ्यस्त ठमकि जाइत छल पएर ठीक ओही स्थलपर सम्हारि एकबेर झाँकि घरक आँखि मध्य ओ मोहक रूप ठाढ़ भेल गुप-चुप चित्र आँखिमे चमकि उठैत छल मनक कण-कण गमकि उठैत छल किछु दिनसँ भेल िनपत्ता बिनु देने अता-पत्ता तैयो आदतिसँ लचार भऽ ठाढ़ भऽ गेलौं शून्यमे ओहिना जहिना पहिने छल तहिना ओ नै अछि ई छी मनक खेल ठमकि ठाढ़ भेल तकै छी ई हमरा की भेल की हमरा आँखिमे हुनक बास भऽ गेल आकि हमर आँखि ओ रूप मिलि एकेटा अकास भऽ गेल। अभ्यास नै ऐपार नै ओइपार खसल छी मँझधार पानि अछि अगम-अथाह मनमे निकलबाक चाह डुमैत भसिआइत सम्हारि रहल छी उनटा धाराकेँ झमारि रहल छी छूटि जाएत घर-पलिबार टूटि रहल अछि मोह केर तार जरूरी छलै धीरजसँ सीखब बूझि समझि मनमे लिखब कछेरमे केने रहितौं हेलबाक अभ्यास एना नै टुटैत हमर आस पछताबासँ नीक सेाचब आगू की हएत ठीक। २ ओमप्रकाश झा गजल मदीनाक मालिक अहाँ ई करा दिअ करेजा हमर बस मदीना बना दिअ हमर मोन निश्छल भऽ गमकै धरा पर कृपा एतबा अपन हमरा पठा दिअ बनै सगर दुनिया खुशी केर सागर सभक ठोर एतेक मुस्की बसा दिअ दया केर बरखा करू ऐ पतित पर मनुक्खक कते मोल हमरा बता दिअ दहा जाइ दुनिया सिनेहक नदीमे अहाँ "ओम" केँ प्रेम-कलमा पढा दिअ बहरे-मुतकारिब फऊलुन (ह्रस्व-दीर्घ-दीर्घ) - ४ बेर प्रत्येक पाँति मे ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। १.लालबाबू मण्डल २.किशन कारीगर १ लालबाबू मण्डल, सिरहा जुलुश जनताकेँ खाइला नै नून रोटी नेता पीबए ह्विस्की-जूस बुढ़ोमे नेता जुआन बनैए जनताकेँ खा कऽ खुश तइपर निकालै जनता जुलुश जनता नुकैल डरे जेना नुकैल बिलमे मुस। अपने नेता फर्देबाल घुमैए जापान, इण्डिया, रूस तइपर निकालै जनता जुलुश … नेताकेँ कोठा सोफा जनताकेँ टुटली मड़ैआ फुस जनता सुतैए भुइयाँपर काटि रहल अछि मच्छड़ भुस तइपर निकालै जनता जुलुश चिजबिज रहलासँ होइए ठंढियोमे गरमी महसूस कपड़ा नै भेलासँ जनता मरैए माघ पूस तइपर निकालै जनता जुलुश २ किशन कारीगर फोंफ काटि रहल सरकार (हास्य कविता) रंग विरंगक डिग्री डिप्लोमा लेने रोड पर घूमि रहल युवक बेकार देशक कर्ता-धर्ता चुप्पी लधने छथि आ फोंफ काटि रहल सरकार। बुनियादी शिक्षाक दरस एक्को मिसिया ने खाली किताबी ज्ञान देल गेल छैक आ परीक्षा पास कए डिग्री लेने घूमि रहल अछि युवक बेरोजगार। ओकरा नहि कोनो लुड़ि-भास तोतारंटत आ परीक्षा पास बेबहारिक जिनगी मे फेल भ गेल कियो भूखले मरै अहाँ के कोन काज। परीक्षा प्रणाली आ पाठ्यक्रम एहेन किएक अहिं फरिछा के कहू औ सरकार फुसियाँहिक डिग्री डिप्लोपा कोन काजक कतेक लोक एखनो अछि बेकार। कुर्सी पर बैसल छी त कोना बुझहब कि होइत छैक लाचारी आ बेकारी रोजगारक अवसर बंद केलियै कतेक बढ़ि गेल अछि बेरोजगारी। अहिंक पैरवी पैगाम सँ अलूइड़ लोक सभ के नोकरी भेट गेल मुदा मेहनत क पढ़निहार सभ पक्षपात नीति दुआरे बेकार भ गेल। दू टा पद दू लाख आवेदन कर्ता एकटा पद मंत्री कोटा सँ विज्ञापन पूर्व फिक्स भेल अछि बिधपुरौआ परीक्षा टा करौताह। मेहनत क ईमानदारी सँ लिखित परीक्षा पास क लेब मुदा इंटरव्यू मे अहाँ के तेरह डिबिया तेल जरतौह। ईमानदारी पर अड़ल रहब कारीगर त इंटरव्यू मे कैंची चलत योग्यता रहैतो अहाँ भ जाएब बेकार मुदा फोंफ काटि रहल सरकार।। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। चंदन कुमार झा गजल १ जीवन छै बड़ सुखकर जँ दूर सँ देखबै भेटत अगनित विर्रो जँ लगीच सँ जँचबै सदिखन समयक संग चलै छै सुख-दुख कहू अहीँ एहि फेरी सँ फेर कोना के बचबै बैसारी के सुख सदति क्षणभंगुर होइ छै भऽ जायब अस्तित्वहीन जँ श्रम नहि करबै किएक तकै छी बाट अहाँ अप्पन मरण के चलबै जँ कर्म-मार्ग त' अमर बनि रहबै "चंदन" जिनगी सतरंगी भरले प्रकाश सँ नजरि कोना के आओत मुनि नयन जँ रहबै २ बितलै धुरिया साओन सुखले भदबरिया आब कोना के कटतै ई जिनगीके अन्हरिया खेतकेर दड़ारि देखि फटलैक करेजिया गुजरक आस बचलै एक्कहिटा बहरिया सुखले सगरो बाट-घाट इनारो-पोखरिया ई के बड़का धूर पर मारै छैक ओंघरिया परले परती खेत आ' उपटल विरार छै उपजल छै मंहगी आ' हरियेलै बेपरिया झलकै हड्डी देहक आर ऐंठलै अंतरिया भुक्खे-प्यासल ओगरै महाजनक दुअरिया नै बरिसलै पछबा ने बरिसलै पुबरिया "चंदन" आब टाँगले हथिए पर नजरिया ---------------वर्ण-१७--------------- ३ राँड़ी बेटखौकी करय ने आबय हमरा तैँलोक कहैत छै हम रचैत छी फकरा हमरा सन मूढके कोना देतै से इज्जति भए गेलैए ज्ञान दूइ आखर के जकरा हम बकरी बनले छी मैँ-मैँ मेमियाइते ओ' खुरछारी काटि रहलैए जेना झबरा हम तकैत छी पंच फरिछौटक खातिर ओ खरखरिया बजबै जे बझतै झगड़ा बेशी बुधियारी ब्याधिक कारण छै "चंदन" हकरी लागल कहि-कहि कहबै ककरा ----------------वर्ण-१६------------- ४ नौ महिना धरि कोखि मे रखलौ क'त पीड़ा सहि हमरा जनलौ अपना छाती केर दुध पियाकऽ आँचर तर मे हमरा पोसलौ हमरा कनियो कष्ट हुए नहि राति-राति भरि ताहिले जगलौं कखनो जँ मारल मुँह ठुनका ठुनकि-ठुनकि कऽ संगे कनलौं जँ हम रूसि-फुलि कोनटा बैसी सुग्गा-नेन्ना कहि-कहिकऽ बौंसलौं नीक कहै केयो केयो अधलाहे अहाँक नजरि मे नीके रहलौं अहाँ तऽ ममता बुझि के बाँटल हम बुझलौं जे अहाँ के ठकलौं अहीँक देल संसार पाबि केर अहीँक लेल हम कूड़ी फँटलौं "चंदन" हमछी कते अभागल मायक महिमा बुझि नै सकलौं ------------वर्ण-१२----------- ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। १.जगदानन्द झा 'मनु' २.राजेश कुमार झा (कन्हैया) ३.शशिधर कुमर- पूणा प्रवास १ जगदानन्द झा 'मनु' ग्राम पोस्ट- हरिपुर डीह्टोंल, मधुबनी १.गजल रंग देखू भरल अछि सभतरि तँ खूनसँ देश गेलै गैल बैमानीक घूनसँ
साग तरकारी कते भेलै महग यौ आब छी पोसैत नेना भात नूनसँ
नामकेँ लत्ता गरीबक देहपर अछि लदल कबिलाहा कते छै गरम ऊनसँ
छैक भिसकी रम बहै भरपूर सबतरि एखनो हम गुजर केलौं पान चूनसँ
मारि गर्मी लेल 'मनु' बेबस कते छी ओ तँ अछि पेरीसमे पोसाति जूनसँ
(बहरे रमल, मात्राक्रम-२१२२) ------------------------------------------- २.गजल घर घरमे चक्कू पिजाबैत देखलौं नेनाकेँ तमाकुल चूनाबैत देखलौं बेगरता निकालि कs आजुक घड़ीमे नीक नीककेँ ठेंगा देखाबैत देखलौं मोनक दोष मोनेमे नूका कs सबटा कपटसँ करेज लगाबैत देखलौं दियादक फसादमे अपने मोलमे घरमे धिया पुता नुकाबैत देखलौं पाईकेँ जमाना छै पाईकेँ हिसाबमे पानिमे मनुखता डुबाबैत देखलौं नहि रहिगेल मोल प्रेम आ स्नेहकेँ प्रेमकेँ डबरामे बहाबैत देखलौं "मनु" मन कोमल सहि नहि सकलौं किए माएकेँ नोर खसाबैत देखलौं (सरल वार्णिक बहर, वर्ण-१४) --------------------------------------------------- ३.गजल गीत आ गजलमे अहाँ ओझराति किएक छी हुए मैथिलीक विकास अंसोहाति किएक छी परती पराँत जतए कोनो उपजा नहि है तीन फसल ओतएसँ फरमाति किएक छी जतए सह सह बिच्छू आ साँप भरल होई ओतए बिना नोतने अहाँ देखाति किएक छी अप्पन चटीएसँ नै फुरसैत भेटे अहाँकेँ सिलौटपर माथ फोरि कs औनाति किएक छी आँखि पथने बरखसँ अहीँक रस्ता तकै छी प्राणसँ बेसी 'मनु' मनकेँ सोहाति किएक छी (सरल वार्णिक बहर, वर्ण- १७) ------------------------------------------------------------------ ४.गजल हम चान लेबैलए बढ़लौं अहाँ रोकब तैयो तारा लेबै मैथिलकेँ बढ़ल डेग नहि रुकत आब जयकारा लेबै मिथिलाराज मँगै छी हम भीखमे नहि अधिकार बूझि चम्पारणसँ दुमका नहि देब किशनगंज तँ आरा लेबै छोरलौं दिल्ली मुंबई अमृतसर सूरतकेँ बिसरै छी अपन धरतीपर आबि नहि केकरो सहारा लेबै गौरब हम जगाएब फेरसँ प्राचीन मिथिलाक शानकेँ विश्व मंचपर एकबेर फेर पूर्ण मिथिलाक नारा लेबै उठू 'मनु' जयकार करू अपन भीतर सिंघनाद करू फेरसँ निश्चय कए सह सह अवतार बिषहारा लेबै (सरल वार्णिक बहर, वर्ण-२२) ---------------------------------------------- १.हजल लाल धोती केश राँगि समधि चुगला बनला ना बेटा बेचि आनि बरयाती ई पगला बनला ना सभ बिसरि आँखि मुनि ध्यानसँ ताकथि रुपैया भीतर कारी बाहर उज्जर बोगला बनला ना खेत खड़ीहान बेच बेच पीबथि बभना तारी आब लंगोटा खोलि खालि ई तँ हगला बनला ना तमाकुल चूनबैत पसारने दिनभरि तास घर आँगनक चिंता नहि ई खगला बनला ना जेल छोरि बाहर आबि हाथ जोरि माँगथि भोट जितैत देरी 'मनु'केँ बिसरि दोगला बनला ना (सरल वार्णिक बहर, वर्ण-१८) २ राजेश कुमार झा (कन्हैया), पिताक नाम :- श्री विजय कुमार झा, गाम :- घोघरडीहा (पुबाई टोल), पोस्ट ऑफिस + थाना : -घोघरडीहा , जिला :- मधुबनी, (बिहार ) -847402 माँ भगवन जते सृष्टि रचने छथिन, सभ सृष्टिमे सभसँ नीक छथि माँ. महाभारतमे युधिष्ठिर कहलखिन, ऐ धरतीयो सँ पैघ छथि माँ माँक बारेमे की लिखू, ऐ सोचसँ परे छथि माँ. नौ महिना ओ कोख मे राखै छथि, प्रसवक पीड़ा सहै छथि माँ बच्चाकेँ छाती लगा कऽ सुतबै छथि, अपने राति-राति भरि जागल रहै छथि माँ. बच्चाकेँ निक- निकूत खुआबै छथि, अपने कए साँझ भूखल रहै छथि माँ. बच्चाकेँ आँचरमे छुपबै छथि, अपने हर दुख झेलै छथि माँ. बच्चाकेँ जौँ कुनू कष्ट होइ छै, ओकर दर्द महसूस करै छथि माँ. बच्चा चाहे हुनका कइटा रहैए, सूर्य प्रकाश जकाँ एकरंग प्यार करै छथि माँ. बच्चा चाहे बूढ़े भऽ जाए, तैयो हुनका बच्चे समझै छथि माँ, बच्चा चाहे केतबो गलती करए, बिना माफी माफ करै छथि माँ. बच्चा चाहे जेहेन सोचैए, बच्चा निकक लेल जीवन बितबै छथि माँ. बच्चा जे मइ टूअर हैछथि, हुनकासँ पूछियौ केहेन होइ छथि माँ, बच्चाक सोचसँ चैन तखने होइ छथि, जहन ई दुनियासँ जाइ छथि माँ बच्चा सँ हुनका एते मोह छनि, मरला बादो लगैए दुआर पर बाट ताकै छथि माँ, माँकेँ नै बिसरियौ नै दुःख पहुँचाबियौ, थालमे खिलल सरोज छथि माँ ३ शशिधर कुमर पूणा प्रवास – (३)१ बरष दू हजार एक ।२ मिथिला सञो पूनाक, प्रवास शुरू भेल ।। दरिभंगा नञि, पटना सँ, पकड़ल जे रेल । पूना – कल्याण नञि, कुर्ला धरि गेल । कुर्ला सञो भी॰टी॰ वा, दादर, कल्याण जा, बऽस - ट्रेन भेटल, से पूना धरि गेल ।। बरष दू हजार एक,३ सुन्नर समाद भेटल । दरिभंगा सञो पूना, सप्ताहिक ट्रेन चलल । टिकट कटओलहुँ झट, पूजा आ छठि छल । चढ़लहुँ जे पूना मे, दरिभंगे डेग उठल ।। तकर बाद कहियो ने, ओहि ट्रेनक संग भेल । आर॰ए॰सी॰ – वेटिंग की, नो – रूमक ढंग भेल । कुर्ला – कल्याण भाया, फेरो प्रवास रहल । ट्रेनक आवृत्ति बढ़ओ, मोन मे से आश छल ।।४ बरष दू हजार तीन,५ फेरो एक बजट – रेल । पटना सञो पूना लए, एक नऽव ट्रेन देल । चमचमाइत डिब्बा सभ, बड़ नीक लगैत छल । नवकनिञा सनि सजलि, मोन केँ हरैत छल ।। आइ दू हजार बारह, देखल कतोक खेल । पटना सप्ताहिक सँ, दैनिक भए गेल । एक्सप्रेस रहए तहिया, सुपर - फास्ट भेल । “तीन” सञो प्रवास केर, साधन इएह भेल ।। नीक बात पटना, बनल अति – तेज६ । मुदा किए दरिभंगा, रहल बकलेल ? भरि दिनक जतरा कऽ, पटना पहुँचलहुँ हम । पटना सञो पूना केर, बाट आब धएलहुँ हम ।। पटनाक ट्रेन केँ, ई की भए गेल छल ? नवकनिञा असमय मे, बुढ़िया बनि गेल छल । सेकेण्ड नञि, थर्ड हैण्ड, रिपेयर सेट बॉगी छल । पुछबा पर बूझल, कलकत्ताक लॉबी छल ।। बीझ लागल लोहाक, चिप्पी सभ साटल छल । किछु तँ अपर – बर्थ, ढेकी सनि लागल छल । खएबा लए डेस्क होइछ, सेहो बिलायल छल । बाहर सञो डिब्बा धरि, राँगल - पोतयल छल ।। रतुका समय बेस, निन्न बड्ड लागल छल । अपरबर्थ - बत्ती तेँ, माथहि पर टाँगल छल । स्वीचक गुलामी सँ, ओहो स्वतन्त्र छल ।७ राति भरि आँखि पर, दिनकर प्रचण्ड छल ।। मोन पड़ल एहने सनि, पहिनहु किछु भेल छल । गंगासागर गाड़ीक, डिब्बा बदलाएल छल । इण्टरसिटीक सेहो, एहने किछु बात छल । कहिया धरि मिथिला – बिहारक ई हाल रहत ?? अर्थोपलब्धि संकेत :- १ = “पूना प्रवास (१) आ (२)” नामक हमर कविता सभ विदेहक पुर्व अंक ( वर्ष – ४, मास – ४७, अंक – ९४, दिनांक - १५ नवम्बर २०११, स्तम्भ ३॰७ मे ) मे छपि चुकल अछि । २ = २००१ ई॰, जकर मई – जून मे (BAMS हेतु नाँव लिखएबाक लेल) हम पहिल बेर पूना गेल रही । तहि समय मे बिहार सँ पूनाक लेल रेलगाड़ीक कोनो सीधा सम्पर्क नञि छल । “पटना कुर्ला एक्सप्रेस” आ “पटना कुर्ला सुपर फास्ट एक्सप्रेस” छल जाहि मे सँ पहिल कल्याण जं॰ पर रुकैत छल आ दोसर नञि । कुर्ला टर्मिनस सँ पूनाक लेल कोनो रेलगाड़ी नञि छल । पूनाक लेल रेलगाड़ी भी॰टी॰/वी॰टी॰ (वर्तमान सी॰एस॰टी॰), दादर, थाना वा कल्याण सँ भेटैत छल। ३ = २००१ ई॰क शीतकालीन विशेष उद्घोषणा मे “दरभंगा पूणा एक्सप्रेस” ओही सालक अक्टूबर – नवम्बर सँ देल गेल । ४ = कोनहु रेलगाड़ीक लेल “नो-रूम” (No Room / Regret) भेटबाक मतलब छै कि ओहि मे प्रतिक्षा श्रेणी (Waiting Class) धरिक टिकट उपलब्ध नञि थिक । माने कि ओहि ट्रेनक माँग वा यात्रीक संख्या बहुत बेशी थिक अर्थात् ओहि रेलगाड़ीक आवृत्ति (Frequency) बढ़ाओल जयबाक चाही । पे दुर्भाग्य सँ आइयो स्थिति सएह अछि पर एहि रेलगाड़ी आवृत्ति नहु बढ़ाओल जा रहल अछि । सम्सत मिथिलांचलक लोक दिन भरिक समय व्यर्थ गमाए, पटना आबि ट्रेन पकड़बाक लेल विवश कएल गेल छथि । ५ = २००३ ई॰ , जहिया “पटना पूणा एक्सप्रेस” ट्रेन देल गेल । पहिने ई गाड़ी “एक्सप्रेस” जे कि बाद मे “सुपर फास्ट एक्सप्रेस” कएल गेल । पहिने ई “सप्ताहिक” छल जे कि बाद मे क्रमशः “दू-दिना”, “तीन-दिना”, “चारि-दिना” आ अन्ततः “दैनिक” कऽ देल गेल । ६ = “अति-तेज” माने “सुपर-फास्ट” । एहि ठाम सन्दर्भतः सांकेतिक रूपेँ “दैनिक” होयबाक परिचायक सेहो । ७ = माथ पर लागल “ट्युब-लाइट” जरिते रहैत छल । “स्वीच” केँ दबला सँ मिझाइत नञि छल । ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। १.जगदीश चन्द्र ठाकुर ‘अनिल’- की भेटल आ की हेरा गेल (आत्म गीत)- (आगाँ)२.सत्यनारायण झा- ओहिना मोन अछि ओ दिन १ जगदीश चन्द्र ठाकुर ‘अनिल’ की भेटल आ की हेरा गेल (आत्म गीत)- (आगाँ) चहुंदिस धधरा धधकैत छलै सभहक छाती धडकैत छलै सभ चिडै खेतमे छल कनइत सभहक खोंता उजडैत छलै
भ’ जाउ तृप्त हे अग्निदेव कनितो-कनितो छल बजा गेल हम सोचि रहल छी जीवनमे की भेटल आ की हेरा गेल ।
बच्चीकेर अएबासं पहिनहि जडि गेल घ’र जे फूसक छल छल हमर चाकरी केर चिन्ता तैपर कर्जा भरि टोलक छल
परिवर्तन केर सुख छलनि बुझू भेटबासं पहिनहि छिना गेल हम सोचि रहल छी जीवनमे की भेटल आ की हेरा गेल । छल अति संघर्षक दिन घरमे ओ खटै छली, चुप रहै छली कहबा केर जे किछु रहै छलनि नोरेसं सभटा कहै छली
खगताक बाढिमे छलनि अपन गहनो-गुडिया सभ दहा गेल हम सोचि रहल छी जीवनमे की भेटल आ की हेरा गेल ।
घूमि गाम-गाम आ शहर-शहर किछु मांगि-चांगि क’ जे अनलहुं फाटल अंगा, फाटल जेबी की कत’खसल से नहि बुझलहुं
आगां तकलहुं, पाछां तकलहुं छल जांत पयरमे बन्हा गेल हम सोचि रहल छी जीवनमे की भेटल आ की हेरा गेल ।
अपनहि हाथें हम पत्र लीखि अपनहिकें कएलहुं सम्बोधन अपनहि अर्जुन,अपनहि केशव अपनहि बनि गेलहुं दुर्योधन
अपनहि अन्तरमे महाभारत अपनहि लोभें छल ठना गेल हम सोचि रहल छी जीवनमे की भेटल आ की हेरा गेल ।
संघर्ष सत्य, थिक क्रान्ति सत्य सत्ये होइ छथि शिव आ सुन्दर जे भेटि गेल से अछि सुन्दर जे नहि भेटल से अति सुन्दर
सुन्दरतम तं थिक ओ घृत जे अछि हवन-अग्निमे ढरा गेल हम सोचि रहल छी जीवनमे की भेटल आ की हेरा गेल । २ सत्यनारायण झा- ओहिना मोन अछि ओ दिन ओहिना मोन अछि ओ दिन , जखन आहाँ नान्हिटा रही ,अंगना मे खेलाइत रही , डेगा डेगी दैत रही ,खसैत रही ,परैत रही , कुदैत रही फनैत रही आ माँटि मे ओंघराति रही , निश्च्छल पवित्र मादक मुस्कान देने , सदिखन चंचल ,किछु ने किछु खेल करैत अपन अधबोलिया भाषा मे सभक’हँसबैत कतेक सुखद आनन्द लगैत छल ओ नेनपन करेज मे सटा लैत छलौ अपन पुत्र सुमन | जखन आहाँ डेगा डेगी सं दौड़य लगलौ , हर बिरडो उठौने ,पटका पटकी करैत , अपन नेनपन सं सभ क’ खिचैत आँगन मे नचैत ,दलान पर खसैत माईक आँचर तर नुकाइत ,पिताक कोरा मे हँसैत खींच लैत छलौ अपना आगोश मे संतोष भ’ जाइत छल’ अहाँक भरोस मे तृप्त भ’ जाइत छल आत्मा आनन्दित होयत हेताह परमात्मा सोचय लगैत छलौ अहाँक नेनपन सुखक अनुभूति होयत छल सदिखन तेजस्वी ,चंचल ,मनोयोगी आ प्रतिभा विलक्षण अदम्य साहस ,अदम्य उत्साह आ कठिन परिश्रम गुरु भ’ पढ़बय लगलौ आ शिष्य भ’ पढ़य लगलौ परिबाक चान जकाँ धीरे धीरे बढ़य लगलौ लोक चकित छल ,हम चकित छलौ ओजस्विता ,स्पस्टवाणी आ धवल प्रखरता दुपहरियाक सूर्य जकाँ प्रचंड ताप , लह लह ,दह दह करैत असीम मनस्ताप योगी जकाँ सतत तपस्या मे लीन लागे जेना अहाँक श्रृष्ट सभ सं भिन्न देखि करेज पहाड़ जकाँ भ’ जाइत छल एकाग्रता देखि मोन तृप्त भ; जाइत छल होमय लागल समाज मे शोर , बढ़य लगलौ आहाँ चतुर्दिक विकासक ओर प्रतिभाशाली छात्रक सभ गुण छल मेहनतिक फल आबय लागल पल पल कओलेज मे पढ़ैत छलौ ,आगा बढैत गेलौ विद्या अर्जन मे क्षुधा बढैत गेल ,अजगर जकाँ पसरैत गेल उच्च आकांक्षा ,प्रयास तीब्रतर ,प्रतिभाक संग विशाल लक्ष्य दर मुदा कठिन तपस्या सफलता दुर ,तोरय लागल अहूँक सूर सफलता असफलताक खेल ,अहूंक संग किछु दिन भेल | कुंठित मोन रहैत छल ,भीतर सं हृदय कनैत छल निश्छल पवित्र संयत भेल ,भीतर सं अशांत मुदा अहाँक साहस लेल जीवनक डोर घीचैत ,आशाक संचार लैत चकित भ’ जाइत छलौ अदम्य साहस देखैत भाग्य पलटल समय करबट लेलक सफलता पर सफलता धरौहि लागल पुनः शोर भेल चारुकात ,उपद्रवी सभ मचाबय लागल उत्पात कतेक कटल कतेक मरल कतेक भेल बताह हमर बात कतेक क’ लगैत छलैक कटाह मुदा गंगाजल जकाँ कल कल छल छल निर्मल स्वच्छ ,धवल शुद्ध प्रवाह ने कियो रोकि सकल ने कियो बान्हि सकल गंगाक धार सतत बहैत गेल कतेक ठाम अटकल कतेक ठाम भटकल पुनः अपना वेग सं वहैत रहल कतेक लोक स्नान केलक ,कतेक लोकक प्यास शांत केलक उपद्रवियो सभ शांत भ’ गेल ,हमरो बहुत आराम भ’ गेल अस्तित्व बिसरि गेलौ हम अपन ,संसार मे बस एकटा सुमन अपन आभा समेट लेलौ ,अहाँक अस्तित्व मे अपना क’ समा लेलौ ओही मे आनन्द छलौ ,ओही मे खुशी छलौ जीवनक लक्ष्य आब पुरा भेल ,तृष्णा राखब हम कथी लेल हमरा जिनगीक जे छल अरमान ,सबटा पुरा क’ देलनि भगबान | ओहो बहुत खुशी रहत छली ,अपना दूधक बलिहारी दैत छली दूधक इज्जत रखने छलनि पूत ,सभ क’ कोखि में होयक एहने सपूत | केखनो क’ ओ दैत छली उलहन ,बेटाक शक्ति सं ओ छली विह्वल देखि हमरा लगैत छल हँसी ,बेटाक प्यार क’ देखत हमरा सं बेशी | आहाँ बढैत गेलौ दिन बदलैत गेल ,गंगाक धार बरी दुर चलि गेल धारक प्रवाह कम होमय लागल कतेक लोक खुशी सं भेल पागल गंगा पहुँच गेल एक ठाम ,ओ सोचय लागल एक शाम आगू दीवार पाछू दूरी ,देखाइत नहि अछि सफलताक धुरी अदम्य उत्साह आ उमंग ,सबटा संगे मुदा समय बड कम मुदा एकबेर पुनः पहाड़ तोरलौ ,जीबनक समग्र लक्ष्य पेलौ गंगा कहबी या पद्मा ,हुगली कहबी या भागिरथी सफलताक बाट ताकय परत ,आब आहाँ नहि छी पथी | कठिन नहि छैक किताबक परीक्षा पास करब कठिन छैक जीबनक परीक्षा पास करब जीबनक हर मोर पर ,हर खुशी हर लम्हा मे संग रहब हम सभ ,संग रहब हम सभ माय बाप क’ की चाही ,पुत्रक खुशी पुत्रक चाह हर समय भेटत ,हर समय पायब,हमर आशीष हमर उत्साह | हमर अंतिम इच्छा ,हमर पैघ आकांक्षा अहाँक पितृ –मात् प्रेम ,अहाँक बंधुत्व –प्रिया प्रेम समाजक प्रति बनू प्रकर्ष ,देत अहाँक आनन्द आकर्ष | सुललित पुत्रक शुभकांक्षी पिता, सत्य नारायण ,२८ .०८ २०१२ ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। विदेह नूतन अंक मिथिला कला संगीत १.राजनाथ मिश्र (चित्रमय मिथिला) २. उमेश मण्डल (मिथिलाक वनस्पति/ मिथिलाक जीव-जन्तु/ मिथिलाक जिनगी) १. राजनाथ मिश्र चित्रमय मिथिला स्लाइड शो चित्रमय मिथिला (https://sites.google.com/a/videha.com/videha-paintings-photos/ ) २. उमेश मण्डल मिथिलाक वनस्पति स्लाइड शो मिथिलाक जीव-जन्तु स्लाइड शो मिथिलाक जिनगी स्लाइड शो मिथिलाक वनस्पति/ मिथिलाक जीव जन्तु/ मिथिलाक जिनगी (https://sites.google.com/a/videha.com/videha-paintings-photos/ ) ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। विदेह नूतन अंक गद्य-पद्य भारती १. मोहनदास (दीर्घकथा):लेखक: उदय प्रकाश (मूल हिन्दीसँ मैथिलीमे अनुवाद विनीत उत्पल) मोहनदास (मैथिली-देवनागरी) मोहनदास (मैथिली-मिथिलाक्षर) मोहनदास (मैथिली-ब्रेल) २.छिन्नमस्ता- प्रभा खेतानक हिन्दी उपन्यासक सुशीला झा द्वारा मैथिली अनुवाद छिन्नमस्ता ३.कनकमणि दीक्षित (मूल नेपालीसँ मैथिली अनुवाद श्रीमती रूपा धीरू आ श्री धीरेन्द्र प्रेमर्षि) भगता बेङक देश-भ्रमण ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। बालानां कृते १.इरा मल्लिक -बालगीत२.जगदानन्द झा मनु- संंकल्पक धनी विल्मा रुडोंल्फ १ इरा मल्लिक बालगीत -------- मेघ बरसलै, धरती बिहुँसलै, भीजय गहे गह, धरती बनल छै रानी, राजा बनलै मेघ, ढमढम बाजै ढोल नगाड़ा! बिजली चमकलै, ह्रदए हहरलै. सखी बसै दूर देश, नाचि रहल छै , छमछम छमछम, वन मे मोरनी मोर, ढमढम बाजै ढोल नगाड़ा! घिर घिर आओल, कारी बदरिया, बरसै रस मेघ फुहार, देखि रहल छै इन्दर राजा, धरती अछि रसे विभोर, ढमढम बाजै ढोल नगाड़ा! २ जगदानन्द झा मनु बाल प्रेरक विहनि कथा संकल्पक धनी विल्मा रुडोंल्फ बिल्मा रुडोंल्फक जन्म तेनेसेस शहरकेँ एक गोट गरीब परिवारमे भएलैंह | चारि बरखक अबस्थामे डबल निमोनियाँ आओर कालाजारक प्रकोपक संगे-संगे ओ पोलियोसँ ग्रस्त भs गेलिह | ओ अपन दुनू पएरकेँ सहारा देबैक लेल ब्रैस पहिरैत छलिह | डाक्टर तँ एते तक कहि देलकैन्ह जे ओ जीवन भरि अपन पएर सँ चलि फिर नहि सकतिह, मुदा हुनकर माए हुनका हिम्मत बढ़ेलखिन्ह आ कहलखिन्ह -"दृढ़ शंकल्प, लगन, आ कठिन मेहनत सँ जे कोनो काज कएल जाए भगवान ओकरा अवश्य पूरा करैत छथिन्ह |'' इ गप्प सुनि विल्मा निश्चय कएलैन्ह जे ओ दुनियाँकेँ सभसँ तेज धाविका बनतिह | नअ बरखक अबस्थामे डाक्टरक मना कएला बादो ओ अपन पएरक ब्रैस उतारि कs अपन पहील डेग जमीनपर बढ़ेलीह | १३ बरखक अबस्थामे अपन पहील दौड़ प्रतियोगतामे भाग लेलैन्ह आ सभसँ पाछू रहलीह | ओकर बाद दोसर, तेसर, चारिम, पाँचम प्रतियोगता सभमे भाग लैत रहलीह आओर सभसँ अन्तिम स्थानपर आबैत रहलीह | आ इ प्रयास ताबत तक रहलैन्ह जाबत कि ओ दिन नहि आबि गएल जहिया ओ प्रथम एलीह | १५ बरखक अबस्थामे विल्मा टेनिसी स्टेट यूनिवर्सिटी गएलीह, जाहि ठाम हुनक भेट एडटेम्पल नामक एकटा कोचसँ भेलैन्ह | हुनका ओ अपन मोनक इच्छा बतेलीह, जे ओ दुनियाँकेँ सभसँ तेज धाबिका बनऐ चाहैत छथि | हुनक दृढ़ इच्छा शक्तिकेँ देखैत टेम्पल हुनक कोच बनब स्वीकार कएलैन्ह | अंतमे ओ शुभ दिन आएल जहिया विल्मा ओलम्पिकमे भाग लs रहल छलीह | ओलम्पिकमे दुनियाँकेँ सभसँ तेज दौड़ए बला सभसँ मुकाबला रहैत छैक | विल्माक मुकाबला जुताहैनसँ छलैन्ह जिनका कियो नहि हरा पएने छल | पहील दौड़ १०० मीटरकेँ छल जाहिमे बिल्मा जुताहैन केँ हरा कs पहील स्वर्णपदक जितलीह | दोसर दौड़ २०० मीटरकेँ एहुमे विल्मा, जूताकेँ दोसर बेर हराकए अपन दोसर स्वर्णपदक जितलीह | तेसर आ अन्तिम दौड़ ४०० मीटर रिले रेस छल आ विल्माक सामना एकबेर फेरसँ जुतासँ छलैन्ह | एहि अन्तिम आ निर्णायक दौड़मे टीमक सभसँ तेज धाबिकाकेँ बिच सामना छल | दुनू टीमसँ चारि चारिटा सर्बश्रेष्ठ धाविका, करू अथवा मरुक मुकाबला | विल्माक टीमकेँ तीनटा धाविका रिले रेसकेँ शुरूआती तिन हिस्सामे दौड़लीह अ आसानीसँ बेटन बदललीह | जखन विल्माकेँ दौड़क बेर एलैन्ह तँ हुनकासँ बेटन छूटि गएलैन्ह मुदा ओ अपनाकेँ सम्हारैत, खसल बेटन शिर्घतासँ उठाबैत मशीन जकाँ तेजीसँ दौडैत जुताकेँ तेसरो बेर हरा कs तेसर गोल्ड मेडलक संगे-संगे दुनियाँकेँ नम्बरएक धाविका बनि अपन सपना पूरा करैत इतिहासक पन्नामे अपन नाम स्वर्ण अक्षरसँ लिखेलथि | ई अमीट इतिहास १९६० कए ओलम्पिककेँ अछि जाहिमे एकटा लकबाग्रस्त महिला दुनियाकेँ सर्वश्रेष्ठ धाविका बनल छली | एहेन सफल व्यक्तिक खिस्सासँ अपनों सभकेँ मोनमे सफलता प्राप्तिक लालसा अबस्य जगल होएत | कठिनाई सफलताक पहील सीढ़ी छैक, दृढ़ शंकल्प आ विश्वासक संग डेग आगु तँ बढ़ाऊ सफलता अहाँक चरण चूमत | ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। बच्चा लोकनि द्वारा स्मरणीय श्लोक १.प्रातः काल ब्रह्ममुहूर्त्त (सूर्योदयक एक घंटा पहिने) सर्वप्रथम अपन दुनू हाथ देखबाक चाही, आ’ ई श्लोक बजबाक चाही। कराग्रे वसते लक्ष्मीः करमध्ये सरस्वती। करमूले स्थितो ब्रह्मा प्रभाते करदर्शनम्॥ करक आगाँ लक्ष्मी बसैत छथि, करक मध्यमे सरस्वती, करक मूलमे ब्रह्मा स्थित छथि। भोरमे ताहि द्वारे करक दर्शन करबाक थीक। २.संध्या काल दीप लेसबाक काल- दीपमूले स्थितो ब्रह्मा दीपमध्ये जनार्दनः। दीपाग्रे शङ्करः प्रोक्त्तः सन्ध्याज्योतिर्नमोऽस्तुते॥ दीपक मूल भागमे ब्रह्मा, दीपक मध्यभागमे जनार्दन (विष्णु) आऽ दीपक अग्र भागमे शङ्कर स्थित छथि। हे संध्याज्योति! अहाँकेँ नमस्कार। ३.सुतबाक काल- रामं स्कन्दं हनूमन्तं वैनतेयं वृकोदरम्। शयने यः स्मरेन्नित्यं दुःस्वप्नस्तस्य नश्यति॥ जे सभ दिन सुतबासँ पहिने राम, कुमारस्वामी, हनूमान्, गरुड़ आऽ भीमक स्मरण करैत छथि, हुनकर दुःस्वप्न नष्ट भऽ जाइत छन्हि। ४. नहेबाक समय- गङ्गे च यमुने चैव गोदावरि सरस्वति। नर्मदे सिन्धु कावेरि जलेऽस्मिन् सन्निधिं कुरू॥ हे गंगा, यमुना, गोदावरी, सरस्वती, नर्मदा, सिन्धु आऽ कावेरी धार। एहि जलमे अपन सान्निध्य दिअ। ५.उत्तरं यत्समुद्रस्य हिमाद्रेश्चैव दक्षिणम्। वर्षं तत् भारतं नाम भारती यत्र सन्ततिः॥ समुद्रक उत्तरमे आऽ हिमालयक दक्षिणमे भारत अछि आऽ ओतुका सन्तति भारती कहबैत छथि। ६.अहल्या द्रौपदी सीता तारा मण्डोदरी तथा। पञ्चकं ना स्मरेन्नित्यं महापातकनाशकम्॥ जे सभ दिन अहल्या, द्रौपदी, सीता, तारा आऽ मण्दोदरी, एहि पाँच साध्वी-स्त्रीक स्मरण करैत छथि, हुनकर सभ पाप नष्ट भऽ जाइत छन्हि। ७.अश्वत्थामा बलिर्व्यासो हनूमांश्च विभीषणः। कृपः परशुरामश्च सप्तैते चिरञ्जीविनः॥ अश्वत्थामा, बलि, व्यास, हनूमान्, विभीषण, कृपाचार्य आऽ परशुराम- ई सात टा चिरञ्जीवी कहबैत छथि। ८.साते भवतु सुप्रीता देवी शिखर वासिनी उग्रेन तपसा लब्धो यया पशुपतिः पतिः। सिद्धिः साध्ये सतामस्तु प्रसादान्तस्य धूर्जटेः जाह्नवीफेनलेखेव यन्यूधि शशिनः कला॥ ९. बालोऽहं जगदानन्द न मे बाला सरस्वती। अपूर्णे पंचमे वर्षे वर्णयामि जगत्त्रयम् ॥ १०. दूर्वाक्षत मंत्र(शुक्ल यजुर्वेद अध्याय २२, मंत्र २२) आ ब्रह्मन्नित्यस्य प्रजापतिर्ॠषिः। लिंभोक्त्ता देवताः। स्वराडुत्कृतिश्छन्दः। षड्जः स्वरः॥ आ ब्रह्म॑न् ब्राह्म॒णो ब्र॑ह्मवर्च॒सी जा॑यता॒मा रा॒ष्ट्रे रा॑ज॒न्यः शुरे॑ऽइषव्यो॒ऽतिव्या॒धी म॑हार॒थो जा॑यतां॒ दोग्ध्रीं धे॒नुर्वोढा॑न॒ड्वाना॒शुः सप्तिः॒ पुर॑न्धि॒र्योवा॑ जि॒ष्णू र॑थे॒ष्ठाः स॒भेयो॒ युवास्य यज॑मानस्य वी॒रो जा॒यतां निका॒मे-नि॑कामे नः प॒र्जन्यों वर्षतु॒ फल॑वत्यो न॒ऽओष॑धयः पच्यन्तां योगेक्ष॒मो नः॑ कल्पताम्॥२२॥ मन्त्रार्थाः सिद्धयः सन्तु पूर्णाः सन्तु मनोरथाः। शत्रूणां बुद्धिनाशोऽस्तु मित्राणामुदयस्तव। ॐ दीर्घायुर्भव। ॐ सौभाग्यवती भव। हे भगवान्। अपन देशमे सुयोग्य आ’ सर्वज्ञ विद्यार्थी उत्पन्न होथि, आ’ शुत्रुकेँ नाश कएनिहार सैनिक उत्पन्न होथि। अपन देशक गाय खूब दूध दय बाली, बरद भार वहन करएमे सक्षम होथि आ’ घोड़ा त्वरित रूपेँ दौगय बला होए। स्त्रीगण नगरक नेतृत्व करबामे सक्षम होथि आ’ युवक सभामे ओजपूर्ण भाषण देबयबला आ’ नेतृत्व देबामे सक्षम होथि। अपन देशमे जखन आवश्यक होय वर्षा होए आ’ औषधिक-बूटी सर्वदा परिपक्व होइत रहए। एवं क्रमे सभ तरहेँ हमरा सभक कल्याण होए। शत्रुक बुद्धिक नाश होए आ’ मित्रक उदय होए॥ मनुष्यकें कोन वस्तुक इच्छा करबाक चाही तकर वर्णन एहि मंत्रमे कएल गेल अछि। एहिमे वाचकलुप्तोपमालड़्कार अछि। अन्वय- ब्रह्म॑न् - विद्या आदि गुणसँ परिपूर्ण ब्रह्म रा॒ष्ट्रे - देशमे ब्र॑ह्मवर्च॒सी-ब्रह्म विद्याक तेजसँ युक्त्त आ जा॑यतां॒- उत्पन्न होए रा॑ज॒न्यः-राजा शुरे॑ऽ–बिना डर बला इषव्यो॒- बाण चलेबामे निपुण ऽतिव्या॒धी-शत्रुकेँ तारण दय बला म॑हार॒थो-पैघ रथ बला वीर दोग्ध्रीं-कामना(दूध पूर्ण करए बाली) धे॒नुर्वोढा॑न॒ड्वाना॒शुः धे॒नु-गौ वा वाणी र्वोढा॑न॒ड्वा- पैघ बरद ना॒शुः-आशुः-त्वरित सप्तिः॒-घोड़ा पुर॑न्धि॒र्योवा॑- पुर॑न्धि॒- व्यवहारकेँ धारण करए बाली र्योवा॑-स्त्री जि॒ष्णू-शत्रुकेँ जीतए बला र॑थे॒ष्ठाः-रथ पर स्थिर स॒भेयो॒-उत्तम सभामे युवास्य-युवा जेहन यज॑मानस्य-राजाक राज्यमे वी॒रो-शत्रुकेँ पराजित करएबला निका॒मे-नि॑कामे-निश्चययुक्त्त कार्यमे नः-हमर सभक प॒र्जन्यों-मेघ वर्षतु॒-वर्षा होए फल॑वत्यो-उत्तम फल बला ओष॑धयः-औषधिः पच्यन्तां- पाकए योगेक्ष॒मो-अलभ्य लभ्य करेबाक हेतु कएल गेल योगक रक्षा नः॑-हमरा सभक हेतु कल्पताम्-समर्थ होए ग्रिफिथक अनुवाद- हे ब्रह्मण, हमर राज्यमे ब्राह्मण नीक धार्मिक विद्या बला, राजन्य-वीर,तीरंदाज, दूध दए बाली गाय, दौगय बला जन्तु, उद्यमी नारी होथि। पार्जन्य आवश्यकता पड़ला पर वर्षा देथि, फल देय बला गाछ पाकए, हम सभ संपत्ति अर्जित/संरक्षित करी। 8.VIDEHA FOR NON RESIDENTS 8.1 to 8.3 MAITHILI LITERATURE IN ENGLISH 8.1.1.The Comet -GAJENDRA THAKUR translated by Jyoti Jha chaudhary 8.1.2.The_Science_of_Words- GAJENDRA THAKUR translated by the author himself 8.1.3.On_the_dice-board_of_the_millennium- GAJENDRA THAKUR translated by Jyoti Jha chaudhary 8.1.4.NAAGPHANS (IN ENGLISH)- SHEFALIKA VERMA translated by Dr. Rajiv Kumar Verma and Dr. Jaya Verma Send your comments to ggajendra@videha.com विदेह नूतन अंक भाषापाक रचना-लेखन Input: (कोष्ठकमे देवनागरी, मिथिलाक्षर किंवा फोनेटिक-रोमनमे टाइप करू। Input in Devanagari, Mithilakshara or Phonetic-Roman.) Output: (परिणाम देवनागरी, मिथिलाक्षर आ फोनेटिक-रोमन/ रोमनमे। Result in Devanagari, Mithilakshara and Phonetic-Roman/ Roman.) English to Maithili Maithili to English इंग्लिश-मैथिली-कोष / मैथिली-इंग्लिश-कोष प्रोजेक्टकेँ आगू बढ़ाऊ, अपन सुझाव आ योगदान ई-मेल द्वारा ggajendra@videha.com पर पठाऊ। Top of Form विदेहक मैथिली-अंग्रेजी आ अंग्रेजी मैथिली कोष (इंटरनेटपर पहिल बेर सर्च-डिक्शनरी) एम.एस. एस.क्यू.एल. सर्वर आधारित -Based on ms-sql server Maithili-English and English-Maithili Dictionary. १.भारत आ नेपालक मैथिली भाषा-वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक शैली आ २.मैथिलीमे भाषा सम्पादन पाठ्यक्रम १.नेपाल आ भारतक मैथिली भाषा-वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक शैली
१.१. नेपालक मैथिली भाषा वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक उच्चारण आ लेखन शैली (भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक धारणाकेँ पूर्ण रूपसँ सङ्ग लऽ निर्धारित) मैथिलीमे उच्चारण तथा लेखन १.पञ्चमाक्षर आ अनुस्वार: पञ्चमाक्षरान्तर्गत ङ, ञ, ण, न एवं म अबैत अछि। संस्कृत भाषाक अनुसार शब्दक अन्तमे जाहि वर्गक अक्षर रहैत अछि ओही वर्गक पञ्चमाक्षर अबैत अछि। जेना- अङ्क (क वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ङ् आएल अछि।) पञ्च (च वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ञ् आएल अछि।) खण्ड (ट वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ण् आएल अछि।) सन्धि (त वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे न् आएल अछि।) खम्भ (प वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे म् आएल अछि।) उपर्युक्त बात मैथिलीमे कम देखल जाइत अछि। पञ्चमाक्षरक बदलामे अधिकांश जगहपर अनुस्वारक प्रयोग देखल जाइछ। जेना- अंक, पंच, खंड, संधि, खंभ आदि। व्याकरणविद पण्डित गोविन्द झाक कहब छनि जे कवर्ग, चवर्ग आ टवर्गसँ पूर्व अनुस्वार लिखल जाए तथा तवर्ग आ पवर्गसँ पूर्व पञ्चमाक्षरे लिखल जाए। जेना- अंक, चंचल, अंडा, अन्त तथा कम्पन। मुदा हिन्दीक निकट रहल आधुनिक लेखक एहि बातकेँ नहि मानैत छथि। ओ लोकनि अन्त आ कम्पनक जगहपर सेहो अंत आ कंपन लिखैत देखल जाइत छथि। नवीन पद्धति किछु सुविधाजनक अवश्य छैक। किएक तँ एहिमे समय आ स्थानक बचत होइत छैक। मुदा कतोक बेर हस्तलेखन वा मुद्रणमे अनुस्वारक छोट सन बिन्दु स्पष्ट नहि भेलासँ अर्थक अनर्थ होइत सेहो देखल जाइत अछि। अनुस्वारक प्रयोगमे उच्चारण-दोषक सम्भावना सेहो ततबए देखल जाइत अछि। एतदर्थ कसँ लऽ कऽ पवर्ग धरि पञ्चमाक्षरेक प्रयोग करब उचित अछि। यसँ लऽ कऽ ज्ञ धरिक अक्षरक सङ्ग अनुस्वारक प्रयोग करबामे कतहु कोनो विवाद नहि देखल जाइछ। २.ढ आ ढ़ : ढ़क उच्चारण “र् ह”जकाँ होइत अछि। अतः जतऽ “र् ह”क उच्चारण हो ओतऽ मात्र ढ़ लिखल जाए। आन ठाम खाली ढ लिखल जएबाक चाही। जेना- ढ = ढाकी, ढेकी, ढीठ, ढेउआ, ढङ्ग, ढेरी, ढाकनि, ढाठ आदि। ढ़ = पढ़ाइ, बढ़ब, गढ़ब, मढ़ब, बुढ़बा, साँढ़, गाढ़, रीढ़, चाँढ़, सीढ़ी, पीढ़ी आदि। उपर्युक्त शब्द सभकेँ देखलासँ ई स्पष्ट होइत अछि जे साधारणतया शब्दक शुरूमे ढ आ मध्य तथा अन्तमे ढ़ अबैत अछि। इएह नियम ड आ ड़क सन्दर्भ सेहो लागू होइत अछि। ३.व आ ब : मैथिलीमे “व”क उच्चारण ब कएल जाइत अछि, मुदा ओकरा ब रूपमे नहि लिखल जएबाक चाही। जेना- उच्चारण : बैद्यनाथ, बिद्या, नब, देबता, बिष्णु, बंश, बन्दना आदि। एहि सभक स्थानपर क्रमशः वैद्यनाथ, विद्या, नव, देवता, विष्णु, वंश, वन्दना लिखबाक चाही। सामान्यतया व उच्चारणक लेल ओ प्रयोग कएल जाइत अछि। जेना- ओकील, ओजह आदि। ४.य आ ज : कतहु-कतहु “य”क उच्चारण “ज”जकाँ करैत देखल जाइत अछि, मुदा ओकरा ज नहि लिखबाक चाही। उच्चारणमे यज्ञ, जदि, जमुना, जुग, जाबत, जोगी, जदु, जम आदि कहल जाएबला शब्द सभकेँ क्रमशः यज्ञ, यदि, यमुना, युग, यावत, योगी, यदु, यम लिखबाक चाही। ५.ए आ य : मैथिलीक वर्तनीमे ए आ य दुनू लिखल जाइत अछि। प्राचीन वर्तनी- कएल, जाए, होएत, माए, भाए, गाए आदि। नवीन वर्तनी- कयल, जाय, होयत, माय, भाय, गाय आदि। सामान्यतया शब्दक शुरूमे ए मात्र अबैत अछि। जेना एहि, एना, एकर, एहन आदि। एहि शब्द सभक स्थानपर यहि, यना, यकर, यहन आदिक प्रयोग नहि करबाक चाही। यद्यपि मैथिलीभाषी थारू सहित किछु जातिमे शब्दक आरम्भोमे “ए”केँ य कहि उच्चारण कएल जाइत अछि। ए आ “य”क प्रयोगक सन्दर्भमे प्राचीने पद्धतिक अनुसरण करब उपयुक्त मानि एहि पुस्तकमे ओकरे प्रयोग कएल गेल अछि। किएक तँ दुनूक लेखनमे कोनो सहजता आ दुरूहताक बात नहि अछि। आ मैथिलीक सर्वसाधारणक उच्चारण-शैली यक अपेक्षा एसँ बेसी निकट छैक। खास कऽ कएल, हएब आदि कतिपय शब्दकेँ कैल, हैब आदि रूपमे कतहु-कतहु लिखल जाएब सेहो “ए”क प्रयोगकेँ बेसी समीचीन प्रमाणित करैत अछि। ६.हि, हु तथा एकार, ओकार : मैथिलीक प्राचीन लेखन-परम्परामे कोनो बातपर बल दैत काल शब्दक पाछाँ हि, हु लगाओल जाइत छैक। जेना- हुनकहि, अपनहु, ओकरहु, तत्कालहि, चोट्टहि, आनहु आदि। मुदा आधुनिक लेखनमे हिक स्थानपर एकार एवं हुक स्थानपर ओकारक प्रयोग करैत देखल जाइत अछि। जेना- हुनके, अपनो, तत्काले, चोट्टे, आनो आदि। ७.ष तथा ख : मैथिली भाषामे अधिकांशतः षक उच्चारण ख होइत अछि। जेना- षड्यन्त्र (खड़यन्त्र), षोडशी (खोड़शी), षट्कोण (खटकोण), वृषेश (वृखेश), सन्तोष (सन्तोख) आदि। ८.ध्वनि-लोप : निम्नलिखित अवस्थामे शब्दसँ ध्वनि-लोप भऽ जाइत अछि: (क) क्रियान्वयी प्रत्यय अयमे य वा ए लुप्त भऽ जाइत अछि। ओहिमे सँ पहिने अक उच्चारण दीर्घ भऽ जाइत अछि। ओकर आगाँ लोप-सूचक चिह्न वा विकारी (’ / ऽ) लगाओल जाइछ। जेना- पूर्ण रूप : पढ़ए (पढ़य) गेलाह, कए (कय) लेल, उठए (उठय) पड़तौक। अपूर्ण रूप : पढ़’ गेलाह, क’ लेल, उठ’ पड़तौक। पढ़ऽ गेलाह, कऽ लेल, उठऽ पड़तौक। (ख) पूर्वकालिक कृत आय (आए) प्रत्ययमे य (ए) लुप्त भऽ जाइछ, मुदा लोप-सूचक विकारी नहि लगाओल जाइछ। जेना- पूर्ण रूप : खाए (य) गेल, पठाय (ए) देब, नहाए (य) अएलाह। अपूर्ण रूप : खा गेल, पठा देब, नहा अएलाह। (ग) स्त्री प्रत्यय इक उच्चारण क्रियापद, संज्ञा, ओ विशेषण तीनूमे लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना- पूर्ण रूप : दोसरि मालिनि चलि गेलि। अपूर्ण रूप : दोसर मालिन चलि गेल। (घ) वर्तमान कृदन्तक अन्तिम त लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना- पूर्ण रूप : पढ़ैत अछि, बजैत अछि, गबैत अछि। अपूर्ण रूप : पढ़ै अछि, बजै अछि, गबै अछि। (ङ) क्रियापदक अवसान इक, उक, ऐक तथा हीकमे लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना- पूर्ण रूप: छियौक, छियैक, छहीक, छौक, छैक, अबितैक, होइक। अपूर्ण रूप : छियौ, छियै, छही, छौ, छै, अबितै, होइ। (च) क्रियापदीय प्रत्यय न्ह, हु तथा हकारक लोप भऽ जाइछ। जेना- पूर्ण रूप : छन्हि, कहलन्हि, कहलहुँ, गेलह, नहि। अपूर्ण रूप : छनि, कहलनि, कहलौँ, गेलऽ, नइ, नञि, नै। ९.ध्वनि स्थानान्तरण : कोनो-कोनो स्वर-ध्वनि अपना जगहसँ हटि कऽ दोसर ठाम चलि जाइत अछि। खास कऽ ह्रस्व इ आ उक सम्बन्धमे ई बात लागू होइत अछि। मैथिलीकरण भऽ गेल शब्दक मध्य वा अन्तमे जँ ह्रस्व इ वा उ आबए तँ ओकर ध्वनि स्थानान्तरित भऽ एक अक्षर आगाँ आबि जाइत अछि। जेना- शनि (शइन), पानि (पाइन), दालि ( दाइल), माटि (माइट), काछु (काउछ), मासु (माउस) आदि। मुदा तत्सम शब्द सभमे ई निअम लागू नहि होइत अछि। जेना- रश्मिकेँ रइश्म आ सुधांशुकेँ सुधाउंस नहि कहल जा सकैत अछि। १०.हलन्त(्)क प्रयोग : मैथिली भाषामे सामान्यतया हलन्त (्)क आवश्यकता नहि होइत अछि। कारण जे शब्दक अन्तमे अ उच्चारण नहि होइत अछि। मुदा संस्कृत भाषासँ जहिनाक तहिना मैथिलीमे आएल (तत्सम) शब्द सभमे हलन्त प्रयोग कएल जाइत अछि। एहि पोथीमे सामान्यतया सम्पूर्ण शब्दकेँ मैथिली भाषा सम्बन्धी निअम अनुसार हलन्तविहीन राखल गेल अछि। मुदा व्याकरण सम्बन्धी प्रयोजनक लेल अत्यावश्यक स्थानपर कतहु-कतहु हलन्त देल गेल अछि। प्रस्तुत पोथीमे मथिली लेखनक प्राचीन आ नवीन दुनू शैलीक सरल आ समीचीन पक्ष सभकेँ समेटि कऽ वर्ण-विन्यास कएल गेल अछि। स्थान आ समयमे बचतक सङ्गहि हस्त-लेखन तथा तकनीकी दृष्टिसँ सेहो सरल होबऽबला हिसाबसँ वर्ण-विन्यास मिलाओल गेल अछि। वर्तमान समयमे मैथिली मातृभाषी पर्यन्तकेँ आन भाषाक माध्यमसँ मैथिलीक ज्ञान लेबऽ पड़ि रहल परिप्रेक्ष्यमे लेखनमे सहजता तथा एकरूपतापर ध्यान देल गेल अछि। तखन मैथिली भाषाक मूल विशेषता सभ कुण्ठित नहि होइक, ताहू दिस लेखक-मण्डल सचेत अछि। प्रसिद्ध भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक कहब छनि जे सरलताक अनुसन्धानमे एहन अवस्था किन्नहु ने आबऽ देबाक चाही जे भाषाक विशेषता छाँहमे पडि जाए। -(भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक धारणाकेँ पूर्ण रूपसँ सङ्ग लऽ निर्धारित) १.२. मैथिली अकादमी, पटना द्वारा निर्धारित मैथिली लेखन-शैली
१. जे शब्द मैथिली-साहित्यक प्राचीन कालसँ आइ धरि जाहि वर्त्तनीमे प्रचलित अछि, से सामान्यतः ताहि वर्त्तनीमे लिखल जाय- उदाहरणार्थ-
ग्राह्य
एखन ठाम जकर, तकर तनिकर अछि
अग्राह्य अखन, अखनि, एखेन, अखनी ठिमा, ठिना, ठमा जेकर, तेकर तिनकर। (वैकल्पिक रूपेँ ग्राह्य) ऐछ, अहि, ए।
२. निम्नलिखित तीन प्रकारक रूप वैकल्पिकतया अपनाओल जाय: भऽ गेल, भय गेल वा भए गेल। जा रहल अछि, जाय रहल अछि, जाए रहल अछि। कर’ गेलाह, वा करय गेलाह वा करए गेलाह।
३. प्राचीन मैथिलीक ‘न्ह’ ध्वनिक स्थानमे ‘न’ लिखल जाय सकैत अछि यथा कहलनि वा कहलन्हि।
४. ‘ऐ’ तथा ‘औ’ ततय लिखल जाय जत’ स्पष्टतः ‘अइ’ तथा ‘अउ’ सदृश उच्चारण इष्ट हो। यथा- देखैत, छलैक, बौआ, छौक इत्यादि।
५. मैथिलीक निम्नलिखित शब्द एहि रूपे प्रयुक्त होयत: जैह, सैह, इएह, ओऐह, लैह तथा दैह।
६. ह्र्स्व इकारांत शब्दमे ‘इ’ के लुप्त करब सामान्यतः अग्राह्य थिक। यथा- ग्राह्य देखि आबह, मालिनि गेलि (मनुष्य मात्रमे)।
७. स्वतंत्र ह्रस्व ‘ए’ वा ‘य’ प्राचीन मैथिलीक उद्धरण आदिमे तँ यथावत राखल जाय, किंतु आधुनिक प्रयोगमे वैकल्पिक रूपेँ ‘ए’ वा ‘य’ लिखल जाय। यथा:- कयल वा कएल, अयलाह वा अएलाह, जाय वा जाए इत्यादि।
८. उच्चारणमे दू स्वरक बीच जे ‘य’ ध्वनि स्वतः आबि जाइत अछि तकरा लेखमे स्थान वैकल्पिक रूपेँ देल जाय। यथा- धीआ, अढ़ैआ, विआह, वा धीया, अढ़ैया, बियाह।
९. सानुनासिक स्वतंत्र स्वरक स्थान यथासंभव ‘ञ’ लिखल जाय वा सानुनासिक स्वर। यथा:- मैञा, कनिञा, किरतनिञा वा मैआँ, कनिआँ, किरतनिआँ।
१०. कारकक विभक्त्तिक निम्नलिखित रूप ग्राह्य:- हाथकेँ, हाथसँ, हाथेँ, हाथक, हाथमे। ’मे’ मे अनुस्वार सर्वथा त्याज्य थिक। ‘क’ क वैकल्पिक रूप ‘केर’ राखल जा सकैत अछि।
११. पूर्वकालिक क्रियापदक बाद ‘कय’ वा ‘कए’ अव्यय वैकल्पिक रूपेँ लगाओल जा सकैत अछि। यथा:- देखि कय वा देखि कए।
१२. माँग, भाँग आदिक स्थानमे माङ, भाङ इत्यादि लिखल जाय।
१३. अर्द्ध ‘न’ ओ अर्द्ध ‘म’ क बदला अनुसार नहि लिखल जाय, किंतु छापाक सुविधार्थ अर्द्ध ‘ङ’ , ‘ञ’, तथा ‘ण’ क बदला अनुस्वारो लिखल जा सकैत अछि। यथा:- अङ्क, वा अंक, अञ्चल वा अंचल, कण्ठ वा कंठ।
१४. हलंत चिह्न निअमतः लगाओल जाय, किंतु विभक्तिक संग अकारांत प्रयोग कएल जाय। यथा:- श्रीमान्, किंतु श्रीमानक।
१५. सभ एकल कारक चिह्न शब्दमे सटा क’ लिखल जाय, हटा क’ नहि, संयुक्त विभक्तिक हेतु फराक लिखल जाय, यथा घर परक।
१६. अनुनासिककेँ चन्द्रबिन्दु द्वारा व्यक्त कयल जाय। परंतु मुद्रणक सुविधार्थ हि समान जटिल मात्रापर अनुस्वारक प्रयोग चन्द्रबिन्दुक बदला कयल जा सकैत अछि। यथा- हिँ केर बदला हिं।
१७. पूर्ण विराम पासीसँ ( । ) सूचित कयल जाय।
१८. समस्त पद सटा क’ लिखल जाय, वा हाइफेनसँ जोड़ि क’ , हटा क’ नहि।
१९. लिअ तथा दिअ शब्दमे बिकारी (ऽ) नहि लगाओल जाय।
२०. अंक देवनागरी रूपमे राखल जाय।
२१.किछु ध्वनिक लेल नवीन चिन्ह बनबाओल जाय। जा' ई नहि बनल अछि ताबत एहि दुनू ध्वनिक बदला पूर्ववत् अय/ आय/ अए/ आए/ आओ/ अओ लिखल जाय। आकि ऎ वा ऒ सँ व्यक्त कएल जाय।
ह./- गोविन्द झा ११/८/७६ श्रीकान्त ठाकुर ११/८/७६ सुरेन्द्र झा "सुमन" ११/०८/७६
२. मैथिलीमे भाषा सम्पादन पाठ्यक्रम २.१. उच्चारण निर्देश: (बोल्ड कएल रूप ग्राह्य):- दन्त न क उच्चारणमे दाँतमे जीह सटत- जेना बाजू नाम , मुदा ण क उच्चारणमे जीह मूर्धामे सटत (नै सटैए तँ उच्चारण दोष अछि)- जेना बाजू गणेश। तालव्य शमे जीह तालुसँ , षमे मूर्धासँ आ दन्त समे दाँतसँ सटत। निशाँ, सभ आ शोषण बाजि कऽ देखू। मैथिलीमे ष केँ वैदिक संस्कृत जकाँ ख सेहो उच्चरित कएल जाइत अछि, जेना वर्षा, दोष। य अनेको स्थानपर ज जकाँ उच्चरित होइत अछि आ ण ड़ जकाँ (यथा संयोग आ गणेश संजोग आ गड़ेस उच्चरित होइत अछि)। मैथिलीमे व क उच्चारण ब, श क उच्चारण स आ य क उच्चारण ज सेहो होइत अछि। ओहिना ह्रस्व इ बेशीकाल मैथिलीमे पहिने बाजल जाइत अछि कारण देवनागरीमे आ मिथिलाक्षरमे ह्रस्व इ अक्षरक पहिने लिखलो जाइत आ बाजलो जएबाक चाही। कारण जे हिन्दीमे एकर दोषपूर्ण उच्चारण होइत अछि (लिखल तँ पहिने जाइत अछि मुदा बाजल बादमे जाइत अछि), से शिक्षा पद्धतिक दोषक कारण हम सभ ओकर उच्चारण दोषपूर्ण ढंगसँ कऽ रहल छी। अछि- अ इ छ ऐछ (उच्चारण) छथि- छ इ थ – छैथ (उच्चारण) पहुँचि- प हुँ इ च (उच्चारण) आब अ आ इ ई ए ऐ ओ औ अं अः ऋ ऐ सभ लेल मात्रा सेहो अछि, मुदा ऐमे ई ऐ ओ औ अं अः ऋ केँ संयुक्ताक्षर रूपमे गलत रूपमे प्रयुक्त आ उच्चरित कएल जाइत अछि। जेना ऋ केँ री रूपमे उच्चरित करब। आ देखियौ- ऐ लेल देखिऔ क प्रयोग अनुचित। मुदा देखिऐ लेल देखियै अनुचित। क् सँ ह् धरि अ सम्मिलित भेलासँ क सँ ह बनैत अछि, मुदा उच्चारण काल हलन्त युक्त शब्दक अन्तक उच्चारणक प्रवृत्ति बढ़ल अछि, मुदा हम जखन मनोजमे ज् अन्तमे बजैत छी, तखनो पुरनका लोककेँ बजैत सुनबन्हि- मनोजऽ, वास्तवमे ओ अ युक्त ज् = ज बजै छथि। फेर ज्ञ अछि ज् आ ञ क संयुक्त मुदा गलत उच्चारण होइत अछि- ग्य। ओहिना क्ष अछि क् आ ष क संयुक्त मुदा उच्चारण होइत अछि छ। फेर श् आ र क संयुक्त अछि श्र ( जेना श्रमिक) आ स् आ र क संयुक्त अछि स्र (जेना मिस्र)। त्र भेल त+र । उच्चारणक ऑडियो फाइल विदेह आर्काइव http://www.videha.co.in/ पर उपलब्ध अछि। फेर केँ / सँ / पर पूर्व अक्षरसँ सटा कऽ लिखू मुदा तँ / कऽ हटा कऽ। ऐमे सँ मे पहिल सटा कऽ लिखू आ बादबला हटा कऽ। अंकक बाद टा लिखू सटा कऽ मुदा अन्य ठाम टा लिखू हटा कऽ– जेना छहटा मुदा सभ टा। फेर ६अ म सातम लिखू- छठम सातम नै। घरबलामे बला मुदा घरवालीमे वाली प्रयुक्त करू। रहए- रहै मुदा सकैए (उच्चारण सकै-ए)। मुदा कखनो काल रहए आ रहै मे अर्थ भिन्नता सेहो, जेना से कम्मो जगहमे पार्किंग करबाक अभ्यास रहै ओकरा। पुछलापर पता लागल जे ढुनढुन नाम्ना ई ड्राइवर कनाट प्लेसक पार्किंगमे काज करैत रहए। छलै, छलए मे सेहो ऐ तरहक भेल। छलए क उच्चारण छल-ए सेहो। संयोगने- (उच्चारण संजोगने) केँ/ कऽ केर- क ( केर क प्रयोग गद्यमे नै करू , पद्यमे कऽ सकै छी। ) क (जेना रामक) –रामक आ संगे (उच्चारण राम के / राम कऽ सेहो) सँ- सऽ (उच्चारण) चन्द्रबिन्दु आ अनुस्वार- अनुस्वारमे कंठ धरिक प्रयोग होइत अछि मुदा चन्द्रबिन्दुमे नै। चन्द्रबिन्दुमे कनेक एकारक सेहो उच्चारण होइत अछि- जेना रामसँ- (उच्चारण राम सऽ) रामकेँ- (उच्चारण राम कऽ/ राम के सेहो)। केँ जेना रामकेँ भेल हिन्दीक को (राम को)- राम को= रामकेँ क जेना रामक भेल हिन्दीक का ( राम का) राम का= रामक कऽ जेना जा कऽ भेल हिन्दीक कर ( जा कर) जा कर= जा कऽ सँ भेल हिन्दीक से (राम से) राम से= रामसँ सऽ , तऽ , त , केर (गद्यमे) एे चारू शब्द सबहक प्रयोग अवांछित। के दोसर अर्थेँ प्रयुक्त भऽ सकैए- जेना, के कहलक? विभक्ति “क”क बदला एकर प्रयोग अवांछित। नञि, नहि, नै, नइ, नँइ, नइँ, नइं ऐ सभक उच्चारण आ लेखन - नै त्त्व क बदलामे त्व जेना महत्वपूर्ण (महत्त्वपूर्ण नै) जतए अर्थ बदलि जाए ओतहि मात्र तीन अक्षरक संयुक्ताक्षरक प्रयोग उचित। सम्पति- उच्चारण स म्प इ त (सम्पत्ति नै- कारण सही उच्चारण आसानीसँ सम्भव नै)। मुदा सर्वोत्तम (सर्वोतम नै)। राष्ट्रिय (राष्ट्रीय नै) सकैए/ सकै (अर्थ परिवर्तन) पोछैले/ पोछै लेल/ पोछए लेल पोछैए/ पोछए/ (अर्थ परिवर्तन) पोछए/ पोछै ओ लोकनि ( हटा कऽ, ओ मे बिकारी नै) ओइ/ ओहि ओहिले/ ओहि लेल/ ओही लऽ जएबेँ/ बैसबेँ पँचभइयाँ देखियौक/ (देखिऔक नै- तहिना अ मे ह्रस्व आ दीर्घक मात्राक प्रयोग अनुचित) जकाँ / जेकाँ तँइ/ तैँ/ होएत / हएत नञि/ नहि/ नँइ/ नइँ/ नै सौँसे/ सौंसे बड़ / बड़ी (झोराओल) गाए (गाइ नहि), मुदा गाइक दूध (गाएक दूध नै।) रहलेँ/ पहिरतैँ हमहीं/ अहीं सब - सभ सबहक - सभहक धरि - तक गप- बात बूझब - समझब बुझलौं/ समझलौं/ बुझलहुँ - समझलहुँ हमरा आर - हम सभ आकि- आ कि सकैछ/ करैछ (गद्यमे प्रयोगक आवश्यकता नै) होइन/ होनि जाइन (जानि नै, जेना देल जाइन) मुदा जानि-बूझि (अर्थ परिव्र्तन) पइठ/ जाइठ आउ/ जाउ/ आऊ/ जाऊ मे, केँ, सँ, पर (शब्दसँ सटा कऽ) तँ कऽ धऽ दऽ (शब्दसँ हटा कऽ) मुदा दूटा वा बेसी विभक्ति संग रहलापर पहिल विभक्ति टाकेँ सटाऊ। जेना ऐमे सँ । एकटा , दूटा (मुदा कए टा) बिकारीक प्रयोग शब्दक अन्तमे, बीचमे अनावश्यक रूपेँ नै। आकारान्त आ अन्तमे अ क बाद बिकारीक प्रयोग नै (जेना दिअ , आ/ दिय’ , आ’, आ नै ) अपोस्ट्रोफीक प्रयोग बिकारीक बदलामे करब अनुचित आ मात्र फॉन्टक तकनीकी न्यूनताक परिचायक)- ओना बिकारीक संस्कृत रूप ऽ अवग्रह कहल जाइत अछि आ वर्तनी आ उच्चारण दुनू ठाम एकर लोप रहैत अछि/ रहि सकैत अछि (उच्चारणमे लोप रहिते अछि)। मुदा अपोस्ट्रोफी सेहो अंग्रेजीमे पसेसिव केसमे होइत अछि आ फ्रेंचमे शब्दमे जतए एकर प्रयोग होइत अछि जेना raison d’etre एतए सेहो एकर उच्चारण रैजौन डेटर होइत अछि, माने अपोस्ट्रॉफी अवकाश नै दैत अछि वरन जोड़ैत अछि, से एकर प्रयोग बिकारीक बदला देनाइ तकनीकी रूपेँ सेहो अनुचित)। अइमे, एहिमे/ ऐमे जइमे, जाहिमे एखन/ अखन/ अइखन केँ (के नहि) मे (अनुस्वार रहित) भऽ मे दऽ तँ (तऽ, त नै) सँ ( सऽ स नै) गाछ तर गाछ लग साँझ खन जो (जो go, करै जो do) तै/तइ जेना- तै दुआरे/ तइमे/ तइले जै/जइ जेना- जै कारण/ जइसँ/ जइले ऐ/अइ जेना- ऐ कारण/ ऐसँ/ अइले/ मुदा एकर एकटा खास प्रयोग- लालति कतेक दिनसँ कहैत रहैत अइ लै/लइ जेना लैसँ/ लइले/ लै दुआरे लहँ/ लौं गेलौं/ लेलौं/ लेलँह/ गेलहुँ/ लेलहुँ/ लेलँ जइ/ जाहि/ जै जहिठाम/ जाहिठाम/ जइठाम/ जैठाम एहि/ अहि/ अइ (वाक्यक अंतमे ग्राह्य) / ऐ अइछ/ अछि/ ऐछ तइ/ तहि/ तै/ ताहि ओहि/ ओइ सीखि/ सीख जीवि/ जीवी/ जीब भलेहीं/ भलहिं तैं/ तँइ/ तँए जाएब/ जएब लइ/ लै छइ/ छै नहि/ नै/ नइ गइ/ गै छनि/ छन्हि ... समए शब्दक संग जखन कोनो विभक्ति जुटै छै तखन समै जना समैपर इत्यादि। असगरमे हृदए आ विभक्ति जुटने हृदे जना हृदेसँ, हृदेमे इत्यादि। जइ/ जाहि/ जै जहिठाम/ जाहिठाम/ जइठाम/ जैठाम एहि/ अहि/ अइ/ ऐ अइछ/ अछि/ ऐछ तइ/ तहि/ तै/ ताहि ओहि/ ओइ सीखि/ सीख जीवि/ जीवी/ जीब भले/ भलेहीं/ भलहिं तैं/ तँइ/ तँए जाएब/ जएब लइ/ लै छइ/ छै नहि/ नै/ नइ गइ/ गै छनि/ छन्हि चुकल अछि/ गेल गछि २.२. मैथिलीमे भाषा सम्पादन पाठ्यक्रम नीचाँक सूचीमे देल विकल्पमेसँ लैंगुएज एडीटर द्वारा कोन रूप चुनल जेबाक चाही: बोल्ड कएल रूप ग्राह्य: १.होयबला/ होबयबला/ होमयबला/ हेब’बला, हेम’बला/ होयबाक/होबएबला /होएबाक २. आ’/आऽ आ ३. क’ लेने/कऽ लेने/कए लेने/कय लेने/ल’/लऽ/लय/लए ४. भ’ गेल/भऽ गेल/भय गेल/भए गेल ५. कर’ गेलाह/करऽ गेलह/करए गेलाह/करय गेलाह ६. लिअ/दिअ लिय’,दिय’,लिअ’,दिय’/ ७. कर’ बला/करऽ बला/ करय बला करैबला/क’र’ बला / करैवाली ८. बला वला (पुरूष), वाली (स्त्री) ९ . आङ्ल आंग्ल १०. प्रायः प्रायह ११. दुःख दुख १ २. चलि गेल चल गेल/चैल गेल १३. देलखिन्ह देलकिन्ह, देलखिन १४. देखलन्हि देखलनि/ देखलैन्ह १५. छथिन्ह/ छलन्हि छथिन/ छलैन/ छलनि १६. चलैत/दैत चलति/दैति १७. एखनो अखनो १८. बढ़नि बढ़इन बढ़न्हि १९. ओ’/ओऽ(सर्वनाम) ओ २० . ओ (संयोजक) ओ’/ओऽ २१. फाँगि/फाङ्गि फाइंग/फाइङ २२. जे जे’/जेऽ २३. ना-नुकुर ना-नुकर २४. केलन्हि/केलनि/कयलन्हि २५. तखनतँ/ तखन तँ २६. जा रहल/जाय रहल/जाए रहल २७. निकलय/निकलए लागल/ लगल बहराय/ बहराए लागल/ लगल निकल’/बहरै लागल २८. ओतय/ जतय जत’/ ओत’/ जतए/ ओतए २९. की फूरल जे कि फूरल जे ३०. जे जे’/जेऽ ३१. कूदि / यादि(मोन पारब) कूइद/याइद/कूद/याद/ यादि (मोन) ३२. इहो/ ओहो ३३. हँसए/ हँसय हँसऽ ३४. नौ आकि दस/नौ किंवा दस/ नौ वा दस ३५. सासु-ससुर सास-ससुर ३६. छह/ सात छ/छः/सात ३७. की की’/ कीऽ (दीर्घीकारान्तमे ऽ वर्जित) ३८. जबाब जवाब ३९. करएताह/ करेताह करयताह ४०. दलान दिशि दलान दिश/दलान दिस ४१ . गेलाह गएलाह/गयलाह ४२. किछु आर/ किछु और/ किछ आर ४३. जाइ छल/ जाइत छल जाति छल/जैत छल ४४. पहुँचि/ भेट जाइत छल/ भेट जाइ छलए पहुँच/ भेटि जाइत छल ४५. जबान (युवा)/ जवान(फौजी) ४६. लय/ लए क’/ कऽ/ लए कए / लऽ कऽ/ लऽ कए ४७. ल’/लऽ कय/ कए ४८. एखन / एखने / अखन / अखने ४९. अहींकेँ अहीँकेँ ५०. गहींर गहीँर ५१. धार पार केनाइ धार पार केनाय/केनाए ५२. जेकाँ जेँकाँ/ जकाँ ५३. तहिना तेहिना ५४. एकर अकर ५५. बहिनउ बहनोइ ५६. बहिन बहिनि ५७. बहिन-बहिनोइ बहिन-बहनउ ५८. नहि/ नै ५९. करबा / करबाय/ करबाए ६०. तँ/ त ऽ तय/तए ६१. भैयारी मे छोट-भाए/भै/, जेठ-भाय/भाइ, ६२. गिनतीमे दू भाइ/भाए/भाँइ ६३. ई पोथी दू भाइक/ भाँइ/ भाए/ लेल। यावत जावत ६४. माय मै / माए मुदा माइक ममता ६५. देन्हि/ दइन दनि/ दएन्हि/ दयन्हि दन्हि/ दैन्हि ६६. द’/ दऽ/ दए ६७. ओ (संयोजक) ओऽ (सर्वनाम) ६८. तका कए तकाय तकाए ६९. पैरे (on foot) पएरे कएक/ कैक ७०. ताहुमे/ ताहूमे ७१. पुत्रीक ७२. बजा कय/ कए / कऽ ७३. बननाय/बननाइ ७४. कोला ७५. दिनुका दिनका ७६. ततहिसँ ७७. गरबओलन्हि/ गरबौलनि/ गरबेलन्हि/ गरबेलनि ७८. बालु बालू ७९. चेन्ह चिन्ह(अशुद्ध) ८०. जे जे’ ८१ . से/ के से’/के’ ८२. एखुनका अखनुका ८३. भुमिहार भूमिहार ८४. सुग्गर / सुगरक/ सूगर ८५. झठहाक झटहाक ८६. छूबि ८७. करइयो/ओ करैयो ने देलक /करियौ-करइयौ ८८. पुबारि पुबाइ ८९. झगड़ा-झाँटी झगड़ा-झाँटि ९०. पएरे-पएरे पैरे-पैरे ९१. खेलएबाक ९२. खेलेबाक ९३. लगा ९४. होए- हो – होअए ९५. बुझल बूझल ९६. बूझल (संबोधन अर्थमे) ९७. यैह यएह / इएह/ सैह/ सएह ९८. तातिल ९९. अयनाय- अयनाइ/ अएनाइ/ एनाइ १००. निन्न- निन्द १०१. बिनु बिन १०२. जाए जाइ १०३. जाइ (in different sense)-last word of sentence १०४. छत पर आबि जाइ १०५. ने १०६. खेलाए (play) –खेलाइ १०७. शिकाइत- शिकायत १०८. ढप- ढ़प १०९ . पढ़- पढ ११०. कनिए/ कनिये कनिञे १११. राकस- राकश ११२. होए/ होय होइ ११३. अउरदा- औरदा ११४. बुझेलन्हि (different meaning- got understand) ११५. बुझएलन्हि/बुझेलनि/ बुझयलन्हि (understood himself) ११६. चलि- चल/ चलि गेल ११७. खधाइ- खधाय ११८. मोन पाड़लखिन्ह/ मोन पाड़लखिन/ मोन पारलखिन्ह ११९. कैक- कएक- कइएक १२०. लग ल’ग १२१. जरेनाइ १२२. जरौनाइ जरओनाइ- जरएनाइ/ जरेनाइ १२३. होइत १२४. गरबेलन्हि/ गरबेलनि गरबौलन्हि/ गरबौलनि १२५. चिखैत- (to test)चिखइत १२६. करइयो (willing to do) करैयो १२७. जेकरा- जकरा १२८. तकरा- तेकरा १२९. बिदेसर स्थानेमे/ बिदेसरे स्थानमे १३०. करबयलहुँ/ करबएलहुँ/ करबेलहुँ करबेलौं १३१. हारिक (उच्चारण हाइरक) १३२. ओजन वजन आफसोच/ अफसोस कागत/ कागच/ कागज १३३. आधे भाग/ आध-भागे १३४. पिचा / पिचाय/पिचाए १३५. नञ/ ने १३६. बच्चा नञ (ने) पिचा जाय १३७. तखन ने (नञ) कहैत अछि। कहै/ सुनै/ देखै छल मुदा कहैत-कहैत/ सुनैत-सुनैत/ देखैत-देखैत १३८. कतेक गोटे/ कताक गोटे १३९. कमाइ-धमाइ/ कमाई- धमाई १४० . लग ल’ग १४१. खेलाइ (for playing) १४२. छथिन्ह/ छथिन १४३. होइत होइ १४४. क्यो कियो / केओ १४५. केश (hair) १४६. केस (court-case) १४७ . बननाइ/ बननाय/ बननाए १४८. जरेनाइ १४९. कुरसी कुर्सी १५०. चरचा चर्चा १५१. कर्म करम १५२. डुबाबए/ डुबाबै/ डुमाबै डुमाबय/ डुमाबए १५३. एखुनका/ अखुनका १५४. लए/ लिअए (वाक्यक अंतिम शब्द)- लऽ १५५. कएलक/ केलक १५६. गरमी गर्मी १५७ . वरदी वर्दी १५८. सुना गेलाह सुना’/सुनाऽ १५९. एनाइ-गेनाइ १६०. तेना ने घेरलन्हि/ तेना ने घेरलनि १६१. नञि / नै १६२. डरो ड’रो १६३. कतहु/ कतौ कहीं १६४. उमरिगर-उमेरगर उमरगर १६५. भरिगर १६६. धोल/धोअल धोएल १६७. गप/गप्प १६८. के के’ १६९. दरबज्जा/ दरबजा १७०. ठाम १७१. धरि तक १७२. घूरि लौटि १७३. थोरबेक १७४. बड्ड १७५. तोँ/ तूँ १७६. तोँहि( पद्यमे ग्राह्य) १७७. तोँही / तोँहि १७८. करबाइए करबाइये १७९. एकेटा १८०. करितथि /करतथि १८१. पहुँचि/ पहुँच १८२. राखलन्हि रखलन्हि/ रखलनि १८३. लगलन्हि/ लगलनि लागलन्हि १८४. सुनि (उच्चारण सुइन) १८५. अछि (उच्चारण अइछ) १८६. एलथि गेलथि १८७. बितओने/ बितौने/ बितेने १८८. करबओलन्हि/ करबौलनि/ करेलखिन्ह/ करेलखिन १८९. करएलन्हि/ करेलनि १९०. आकि/ कि १९१. पहुँचि/ पहुँच १९२. बत्ती जराय/ जराए जरा (आगि लगा) १९३. से से’ १९४. हाँ मे हाँ (हाँमे हाँ विभक्त्तिमे हटा कए) १९५. फेल फैल १९६. फइल(spacious) फैल १९७. होयतन्हि/ होएतन्हि/ होएतनि/हेतनि/ हेतन्हि १९८. हाथ मटिआएब/ हाथ मटियाबय/हाथ मटियाएब १९९. फेका फेंका २००. देखाए देखा २०१. देखाबए २०२. सत्तरि सत्तर २०३. साहेब साहब २०४.गेलैन्ह/ गेलन्हि/ गेलनि २०५. हेबाक/ होएबाक २०६.केलो/ कएलहुँ/केलौं/ केलुँ २०७. किछु न किछु/ किछु ने किछु २०८.घुमेलहुँ/ घुमओलहुँ/ घुमेलौं २०९. एलाक/ अएलाक २१०. अः/ अह २११.लय/ लए (अर्थ-परिवर्त्तन) २१२.कनीक/ कनेक २१३.सबहक/ सभक २१४.मिलाऽ/ मिला २१५.कऽ/ क २१६.जाऽ/ जा २१७.आऽ/ आ २१८.भऽ /भ’ (’ फॉन्टक कमीक द्योतक) २१९.निअम/ नियम २२० .हेक्टेअर/ हेक्टेयर २२१.पहिल अक्षर ढ/ बादक/ बीचक ढ़ २२२.तहिं/तहिँ/ तञि/ तैं २२३.कहिं/ कहीं २२४.तँइ/ तैं / तइँ २२५.नँइ/ नइँ/ नञि/ नहि/नै २२६.है/ हए / एलीहेँ/ २२७.छञि/ छै/ छैक /छइ २२८.दृष्टिएँ/ दृष्टियेँ २२९.आ (come)/ आऽ(conjunction) २३०. आ (conjunction)/ आऽ(come) २३१.कुनो/ कोनो, कोना/केना २३२.गेलैन्ह-गेलन्हि-गेलनि २३३.हेबाक- होएबाक २३४.केलौँ- कएलौँ-कएलहुँ/केलौं २३५.किछु न किछ- किछु ने किछु २३६.केहेन- केहन २३७.आऽ (come)-आ (conjunction-and)/आ। आब'-आब' /आबह-आबह २३८. हएत-हैत २३९.घुमेलहुँ-घुमएलहुँ- घुमेलाें २४०.एलाक- अएलाक २४१.होनि- होइन/ होन्हि/ २४२.ओ-राम ओ श्यामक बीच(conjunction), ओऽ कहलक (he said)/ओ २४३.की हए/ कोसी अएली हए/ की है। की हइ २४४.दृष्टिएँ/ दृष्टियेँ २४५ .शामिल/ सामेल २४६.तैँ / तँए/ तञि/ तहिं २४७.जौं / ज्योँ/ जँ/ २४८.सभ/ सब २४९.सभक/ सबहक २५०.कहिं/ कहीं २५१.कुनो/ कोनो/ कोनहुँ/ २५२.फारकती भऽ गेल/ भए गेल/ भय गेल २५३.कोना/ केना/ कन्ना/कना २५४.अः/ अह २५५.जनै/ जनञ २५६.गेलनि/ गेलाह (अर्थ परिवर्तन) २५७.केलन्हि/ कएलन्हि/ केलनि/ २५८.लय/ लए/ लएह (अर्थ परिवर्तन) २५९.कनीक/ कनेक/कनी-मनी २६०.पठेलन्हि पठेलनि/ पठेलइन/ पपठओलन्हि/ पठबौलनि/ २६१.निअम/ नियम २६२.हेक्टेअर/ हेक्टेयर २६३.पहिल अक्षर रहने ढ/ बीचमे रहने ढ़ २६४.आकारान्तमे बिकारीक प्रयोग उचित नै/ अपोस्ट्रोफीक प्रयोग फान्टक तकनीकी न्यूनताक परिचायक ओकर बदला अवग्रह (बिकारी) क प्रयोग उचित २६५.केर (पद्यमे ग्राह्य) / -क/ कऽ/ के २६६.छैन्हि- छन्हि २६७.लगैए/ लगैये २६८.होएत/ हएत २६९.जाएत/ जएत/ २७०.आएत/ अएत/ आओत २७१ .खाएत/ खएत/ खैत २७२.पिअएबाक/ पिएबाक/पियेबाक २७३.शुरु/ शुरुह २७४.शुरुहे/ शुरुए २७५.अएताह/अओताह/ एताह/ औताह २७६.जाहि/ जाइ/ जइ/ जै/ २७७.जाइत/ जैतए/ जइतए २७८.आएल/ अएल २७९.कैक/ कएक २८०.आयल/ अएल/ आएल २८१. जाए/ जअए/ जए (लालति जाए लगलीह।) २८२. नुकएल/ नुकाएल २८३. कठुआएल/ कठुअएल २८४. ताहि/ तै/ तइ २८५. गायब/ गाएब/ गएब २८६. सकै/ सकए/ सकय २८७.सेरा/सरा/ सराए (भात सरा गेल) २८८.कहैत रही/देखैत रही/ कहैत छलौं/ कहै छलौं- अहिना चलैत/ पढ़ैत (पढ़ै-पढ़ैत अर्थ कखनो काल परिवर्तित) - आर बुझै/ बुझैत (बुझै/ बुझै छी, मुदा बुझैत-बुझैत)/ सकैत/ सकै। करैत/ करै। दै/ दैत। छैक/ छै। बचलै/ बचलैक। रखबा/ रखबाक । बिनु/ बिन। रातिक/ रातुक बुझै आ बुझैत केर अपन-अपन जगहपर प्रयोग समीचीन अछि। बुझैत-बुझैत आब बुझलिऐ। हमहूँ बुझै छी। २८९. दुआरे/ द्वारे २९०.भेटि/ भेट/ भेँट २९१. खन/ खीन/ खुना (भोर खन/ भोर खीन) २९२.तक/ धरि २९३.गऽ/ गै (meaning different-जनबै गऽ) २९४.सऽ/ सँ (मुदा दऽ, लऽ) २९५.त्त्व,(तीन अक्षरक मेल बदला पुनरुक्तिक एक आ एकटा दोसरक उपयोग) आदिक बदला त्व आदि। महत्त्व/ महत्व/ कर्ता/ कर्त्ता आदिमे त्त संयुक्तक कोनो आवश्यकता मैथिलीमे नै अछि। वक्तव्य २९६.बेसी/ बेशी २९७.बाला/वाला बला/ वला (रहैबला) २९८ .वाली/ (बदलैवाली) २९९.वार्त्ता/ वार्ता ३००. अन्तर्राष्ट्रिय/ अन्तर्राष्ट्रीय ३०१. लेमए/ लेबए ३०२.लमछुरका, नमछुरका ३०२.लागै/ लगै ( भेटैत/ भेटै) ३०३.लागल/ लगल ३०४.हबा/ हवा ३०५.राखलक/ रखलक ३०६.आ (come)/ आ (and) ३०७. पश्चाताप/ पश्चात्ताप ३०८. ऽ केर व्यवहार शब्दक अन्तमे मात्र, यथासंभव बीचमे नै। ३०९.कहैत/ कहै ३१०. रहए (छल)/ रहै (छलै) (meaning different) ३११.तागति/ ताकति ३१२.खराप/ खराब ३१३.बोइन/ बोनि/ बोइनि ३१४.जाठि/ जाइठ ३१५.कागज/ कागच/ कागत ३१६.गिरै (meaning different- swallow)/ गिरए (खसए) ३१७.राष्ट्रिय/ राष्ट्रीय DATE-LIST (year- 2012-13) (१४२० फसली साल) Marriage Days: Nov.2012- 25, 26, 28, 29, 30 Dec.2012- 5,9, 10, 13, 14 January 2013- 16, 17, 18, 23, 24, 31 Feb.2013- 1, 3, 4, 6, 8, 10, 14, 15, 18, 20, 24, 25 April 2013- 21, 22, 24, 26, 29 May 2013- 1,2,3,5,6,9,12,13,17,19,20,22,23,24,26,27,29,30,31 June 2013- 2,3 July 2013- 11, 14, 15 Upanayana Days: January 2013- 16 February 2013- 14, 15, 20, 21 April 2013- 22 May 2013- 20, 21 Dviragaman Din: November 2012- 25, 26, 28, 29 December 2012- 2, 3, 14 February 2013- 14, 15, 18, 20, 21, 22, 27, 28 March 2013- 1 April 2013- 18, 22, 24, 26, 28, 29 May 2013- 12, 13 Mundan Din: November 2012- 26, 30 December 2012- 3 January 2013- 18, 24 February 2013- 1, 14, 15, 20, 28 April 2013- 17 May 2013- 13, 23, 29 June 2013- 13, 19, 26, 27, 28 July 2013- 10, 15 FESTIVALS OF MITHILA (2012-13) Mauna Panchami-08 July Madhushravani- 22 July Nag Panchami- 24 July Raksha Bandhan- 02 Aug Krishnastami- 10 August Kushi Amavasya / Somvari Vrat- 17 August Vishwakarma Pooja- 17 September Hartalika Teej- 18 September ChauthChandra-19 September Karma Dharma Ekadashi-26 September Indra Pooja Aarambh- 27 September Anant Caturdashi- 29 Sep Agastyarghadaan- 30 Sep Pitri Paksha begins- 30 Sep Jimootavahan Vrata/ Jitia-08 October Matri Navami- 09 October SomvatiAmavasya Vrat- 15 October Kalashsthapan- 16 October Belnauti- 20 October Patrika Pravesh- 21 October Mahastami- 22 October Maha Navami - 23 October Vijaya Dashami- 24 October Kojagara- 29 Oct Dhanteras- 11 November Diyabati, shyama pooja-13 November Annakoota/ Govardhana Pooja-14 November Bhratridwitiya/ Chitragupta Pooja- 15 November Chhathi -19 November Devotthan Ekadashi- 24 November ravivratarambh- 25 November Navanna parvan- 25 November KartikPoornima- Sama Visarjan- 28 November Vivaha Panchmi- 17 December Makara/ Teela Sankranti-14 Jan Naraknivaran chaturdashi- 08 February Basant Panchami/ Saraswati Pooja- 15 February Achla Saptmi- 17 February Mahashivaratri-10 March Holikadahan-Fagua-26 March Holi- 28 March Varuni Trayodashi-07 April Chaiti navaratrarambh- 11 April Jurishital-15 April Chaiti Chhathi vrata-16 April Ram Navami- 19 April Ravi Brat Ant- 12 May Akshaya Tritiya-13 May Janaki Navami- 19 May Vat Savitri-barasait- 08 June Ganga Dashhara-18 June Somavati Amavasya Vrata- 08 July Jagannath Rath Yatra- 10 July Hari Sayan Ekadashi- 19 July Aashadhi Guru Poornima-22 Jul VIDEHA ARCHIVE १.विदेह ई-पत्रिकाक सभटा पुरान अंक ब्रेल, तिरहुता आ देवनागरी रूपमे Videha e journal's all old issues in Braille Tirhuta and Devanagari versions विदेह ई-पत्रिकाक पहिल ५० अंक
विदेह ई-पत्रिकाक ५०म सँ आगाँक अंक २.मैथिली पोथी डाउनलोड Maithili Books Download ३.मैथिली ऑडियो संकलन Maithili Audio Downloads ४.मैथिली वीडियोक संकलन Maithili Videos ५.मिथिला चित्रकला/ आधुनिक चित्रकला आ चित्र Mithila Painting/ Modern Art and Photos "विदेह"क एहि सभ सहयोगी लिंकपर सेहो एक बेर जाउ। ६.विदेह मैथिली क्विज : http://videhaquiz.blogspot.com/ ७.विदेह मैथिली जालवृत्त एग्रीगेटर : http://videha-aggregator.blogspot.com/ ८.विदेह मैथिली साहित्य अंग्रेजीमे अनूदित http://madhubani-art.blogspot.com/ ९.विदेहक पूर्व-रूप "भालसरिक गाछ" : http://gajendrathakur.blogspot.com/ १०.विदेह इंडेक्स : http://videha123.blogspot.com/ ११.विदेह फाइल : http://videha123.wordpress.com/ १२. विदेह: सदेह : पहिल तिरहुता (मिथिला़क्षर) जालवृत्त (ब्लॉग) http://videha-sadeha.blogspot.com/ १३. विदेह:ब्रेल: मैथिली ब्रेलमे: पहिल बेर विदेह द्वारा http://videha-braille.blogspot.com/ १४.VIDEHA IST MAITHILI FORTNIGHTLY EJOURNAL ARCHIVE http://videha-archive.blogspot.com/ १५. विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका मैथिली पोथीक आर्काइव http://videha-pothi.blogspot.com/ १६. विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका ऑडियो आर्काइव http://videha-audio.blogspot.com/ १७. विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका वीडियो आर्काइव http://videha-video.blogspot.com/ १८. विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका मिथिला चित्रकला, आधुनिक कला आ चित्रकला http://videha-paintings-photos.blogspot.com/ १९. मैथिल आर मिथिला (मैथिलीक सभसँ लोकप्रिय जालवृत्त) http://maithilaurmithila.blogspot.com/ २०.श्रुति प्रकाशन http://www.shruti-publication.com/ २१.http://groups.google.com/group/videha VIDEHA केर सदस्यता लिअ Top of Form Bottom of Form ईमेल : एहि समूहपर जाउ २२.http://groups.yahoo.com/group/VIDEHA/ Top of Form Subscribe to VIDEHA Powered by us.groups.yahoo.com Bottom of Form २३.गजेन्द्र ठाकुर इडेक्स http://gajendrathakur123.blogspot.com २४. नेना भुटका http://mangan-khabas.blogspot.com/ २५.विदेह रेडियो:मैथिली कथा-कविता आदिक पहिल पोडकास्ट साइट http://videha123radio.wordpress.com/ २६.Videha Radio २७. Join official Videha facebook group. २८. विदेह मैथिली नाट्य उत्सव http://maithili-drama.blogspot.com/ २९.समदिया http://esamaad.blogspot.com/ ३०. मैथिली फिल्म्स http://maithilifilms.blogspot.com/ ३१.अनचिन्हार आखर http://anchinharakharkolkata.blogspot.com/ ३२. मैथिली हाइकू http://maithili-haiku.blogspot.com/ ३३. मानक मैथिली http://manak-maithili.blogspot.com/ ३४. विहनि कथा http://vihanikatha.blogspot.in/ ३५. मैथिली कविता http://maithili-kavita.blogspot.in/ ३६. मैथिली कथा http://maithili-katha.blogspot.in/ ३७.मैथिली समालोचना http://maithili-samalochna.blogspot.in/ महत्त्वपूर्ण सूचना:(१) 'विदेह' द्वारा धारावाहिक रूपे ई-प्रकाशित कएल गेल गजेन्द्र ठाकुरक निबन्ध-प्रबन्ध-समीक्षा, उपन्यास (सहस्रबाढ़नि) , पद्य-संग्रह (सहस्राब्दीक चौपड़पर), कथा-गल्प (गल्प-गुच्छ), नाटक(संकर्षण), महाकाव्य (त्वञ्चाहञ्च आ असञ्जाति मन) आ बाल-किशोर साहित्य विदेहमे संपूर्ण ई-प्रकाशनक बाद प्रिंट फॉर्ममे। कुरुक्षेत्रम्–अन्तर्मनक खण्ड-१ सँ ७ Combined ISBN No.978-81-907729-7-6 विवरण एहि पृष्ठपर नीचाँमे आ प्रकाशकक साइट http://www.shruti-publication.com/ पर । महत्त्वपूर्ण सूचना (२):सूचना: विदेहक मैथिली-अंग्रेजी आ अंग्रेजी मैथिली कोष (इंटरनेटपर पहिल बेर सर्च-डिक्शनरी) एम.एस. एस.क्यू.एल. सर्वर आधारित -Based on ms-sql server Maithili-English and English-Maithili Dictionary. विदेहक भाषापाक- रचनालेखन स्तंभमे। कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक- गजेन्द्र ठाकुर गजेन्द्र ठाकुरक निबन्ध-प्रबन्ध-समीक्षा, उपन्यास (सहस्रबाढ़नि) , पद्य-संग्रह (सहस्राब्दीक चौपड़पर), कथा-गल्प (गल्प गुच्छ), नाटक(संकर्षण), महाकाव्य (त्वञ्चाहञ्च आ असञ्जाति मन) आ बालमंडली-किशोरजगत विदेहमे संपूर्ण ई-प्रकाशनक बाद प्रिंट फॉर्ममे। कुरुक्षेत्रम्–अन्तर्मनक, खण्ड-१ सँ ७ Ist edition 2009 of Gajendra Thakur’s KuruKshetram-Antarmanak (Vol. I to VII)- essay-paper-criticism, novel, poems, story, play, epics and Children-grown-ups literature in single binding: Language:Maithili ६९२ पृष्ठ : मूल्य भा. रु. 100/-(for individual buyers inside india) (add courier charges Rs.50/-per copy for Delhi/NCR and Rs.100/- per copy for outside Delhi)
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Details for purchase available at print-version publishers's site website: http://www.shruti-publication.com/ or you may write to e-mail:shruti.publication@shruti-publication.com विदेह: सदेह : १: २: ३: ४ तिरहुता : देवनागरी "विदेह" क, प्रिंट संस्करण :विदेह-ई-पत्रिका (http://www.videha.co.in/) क चुनल रचना सम्मिलित। विदेह:सदेह:१: २: ३: ४ सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। Details for purchase available at print-version publishers's site http://www.shruti-publication.com or you may write to shruti.publication@shruti-publication.com २. संदेश- [ विदेह ई-पत्रिका, विदेह:सदेह मिथिलाक्षर आ देवनागरी आ गजेन्द्र ठाकुरक सात खण्डक- निबन्ध-प्रबन्ध-समीक्षा,उपन्यास (सहस्रबाढ़नि) , पद्य-संग्रह (सहस्राब्दीक चौपड़पर), कथा-गल्प (गल्प गुच्छ), नाटक (संकर्षण), महाकाव्य (त्वञ्चाहञ्च आ असञ्जाति मन) आ बाल-मंडली-किशोर जगत- संग्रह कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक मादेँ। ] १.श्री गोविन्द झा- विदेहकेँ तरंगजालपर उतारि विश्वभरिमे मातृभाषा मैथिलीक लहरि जगाओल, खेद जे अपनेक एहि महाभियानमे हम एखन धरि संग नहि दए सकलहुँ। सुनैत छी अपनेकेँ सुझाओ आ रचनात्मक आलोचना प्रिय लगैत अछि तेँ किछु लिखक मोन भेल। हमर सहायता आ सहयोग अपनेकेँ सदा उपलब्ध रहत। २.श्री रमानन्द रेणु- मैथिलीमे ई-पत्रिका पाक्षिक रूपेँ चला कऽ जे अपन मातृभाषाक प्रचार कऽ रहल छी, से धन्यवाद । आगाँ अपनेक समस्त मैथिलीक कार्यक हेतु हम हृदयसँ शुभकामना दऽ रहल छी। ३.श्री विद्यानाथ झा "विदित"- संचार आ प्रौद्योगिकीक एहि प्रतिस्पर्धी ग्लोबल युगमे अपन महिमामय "विदेह"केँ अपना देहमे प्रकट देखि जतबा प्रसन्नता आ संतोष भेल, तकरा कोनो उपलब्ध "मीटर"सँ नहि नापल जा सकैछ? ..एकर ऐतिहासिक मूल्यांकन आ सांस्कृतिक प्रतिफलन एहि शताब्दीक अंत धरि लोकक नजरिमे आश्चर्यजनक रूपसँ प्रकट हैत। ४. प्रो. उदय नारायण सिंह "नचिकेता"- जे काज अहाँ कए रहल छी तकर चरचा एक दिन मैथिली भाषाक इतिहासमे होएत। आनन्द भए रहल अछि, ई जानि कए जे एतेक गोट मैथिल "विदेह" ई जर्नलकेँ पढ़ि रहल छथि।...विदेहक चालीसम अंक पुरबाक लेल अभिनन्दन। ५. डॉ. गंगेश गुंजन- एहि विदेह-कर्ममे लागि रहल अहाँक सम्वेदनशील मन, मैथिलीक प्रति समर्पित मेहनतिक अमृत रंग, इतिहास मे एक टा विशिष्ट फराक अध्याय आरंभ करत, हमरा विश्वास अछि। अशेष शुभकामना आ बधाइक सङ्ग, सस्नेह...अहाँक पोथी कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक प्रथम दृष्टया बहुत भव्य तथा उपयोगी बुझाइछ। मैथिलीमे तँ अपना स्वरूपक प्रायः ई पहिले एहन भव्य अवतारक पोथी थिक। हर्षपूर्ण हमर हार्दिक बधाई स्वीकार करी। ६. श्री रामाश्रय झा "रामरंग"(आब स्वर्गीय)- "अपना" मिथिलासँ संबंधित...विषय वस्तुसँ अवगत भेलहुँ।...शेष सभ कुशल अछि। ७. श्री ब्रजेन्द्र त्रिपाठी- साहित्य अकादमी- इंटरनेट पर प्रथम मैथिली पाक्षिक पत्रिका "विदेह" केर लेल बधाई आ शुभकामना स्वीकार करू। ८. श्री प्रफुल्लकुमार सिंह "मौन"- प्रथम मैथिली पाक्षिक पत्रिका "विदेह" क प्रकाशनक समाचार जानि कनेक चकित मुदा बेसी आह्लादित भेलहुँ। कालचक्रकेँ पकड़ि जाहि दूरदृष्टिक परिचय देलहुँ, ओहि लेल हमर मंगलकामना। ९.डॉ. शिवप्रसाद यादव- ई जानि अपार हर्ष भए रहल अछि, जे नव सूचना-क्रान्तिक क्षेत्रमे मैथिली पत्रकारिताकेँ प्रवेश दिअएबाक साहसिक कदम उठाओल अछि। पत्रकारितामे एहि प्रकारक नव प्रयोगक हम स्वागत करैत छी, संगहि "विदेह"क सफलताक शुभकामना। १०. श्री आद्याचरण झा- कोनो पत्र-पत्रिकाक प्रकाशन- ताहूमे मैथिली पत्रिकाक प्रकाशनमे के कतेक सहयोग करताह- ई तऽ भविष्य कहत। ई हमर ८८ वर्षमे ७५ वर्षक अनुभव रहल। एतेक पैघ महान यज्ञमे हमर श्रद्धापूर्ण आहुति प्राप्त होयत- यावत ठीक-ठाक छी/ रहब। ११. श्री विजय ठाकुर- मिशिगन विश्वविद्यालय- "विदेह" पत्रिकाक अंक देखलहुँ, सम्पूर्ण टीम बधाईक पात्र अछि। पत्रिकाक मंगल भविष्य हेतु हमर शुभकामना स्वीकार कएल जाओ। १२. श्री सुभाषचन्द्र यादव- ई-पत्रिका "विदेह" क बारेमे जानि प्रसन्नता भेल। ’विदेह’ निरन्तर पल्लवित-पुष्पित हो आ चतुर्दिक अपन सुगंध पसारय से कामना अछि। १३. श्री मैथिलीपुत्र प्रदीप- ई-पत्रिका "विदेह" केर सफलताक भगवतीसँ कामना। हमर पूर्ण सहयोग रहत। १४. डॉ. श्री भीमनाथ झा- "विदेह" इन्टरनेट पर अछि तेँ "विदेह" नाम उचित आर कतेक रूपेँ एकर विवरण भए सकैत अछि। आइ-काल्हि मोनमे उद्वेग रहैत अछि, मुदा शीघ्र पूर्ण सहयोग देब।कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक देखि अति प्रसन्नता भेल। मैथिलीक लेल ई घटना छी। १५. श्री रामभरोस कापड़ि "भ्रमर"- जनकपुरधाम- "विदेह" ऑनलाइन देखि रहल छी। मैथिलीकेँ अन्तर्राष्ट्रीय जगतमे पहुँचेलहुँ तकरा लेल हार्दिक बधाई। मिथिला रत्न सभक संकलन अपूर्व। नेपालोक सहयोग भेटत, से विश्वास करी। १६. श्री राजनन्दन लालदास- "विदेह" ई-पत्रिकाक माध्यमसँ बड़ नीक काज कए रहल छी, नातिक अहिठाम देखलहुँ। एकर वार्षिक अंक जखन प्रिंट निकालब तँ हमरा पठायब। कलकत्तामे बहुत गोटेकेँ हम साइटक पता लिखाए देने छियन्हि। मोन तँ होइत अछि जे दिल्ली आबि कए आशीर्वाद दैतहुँ, मुदा उमर आब बेशी भए गेल। शुभकामना देश-विदेशक मैथिलकेँ जोड़बाक लेल।.. उत्कृष्ट प्रकाशन कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक लेल बधाइ। अद्भुत काज कएल अछि, नीक प्रस्तुति अछि सात खण्डमे। मुदा अहाँक सेवा आ से निःस्वार्थ तखन बूझल जाइत जँ अहाँ द्वारा प्रकाशित पोथी सभपर दाम लिखल नहि रहितैक। ओहिना सभकेँ विलहि देल जइतैक। (स्पष्टीकरण- श्रीमान्, अहाँक सूचनार्थ विदेह द्वारा ई-प्रकाशित कएल सभटा सामग्री आर्काइवमे https://sites.google.com/a/videha.com/videha-pothi/ पर बिना मूल्यक डाउनलोड लेल उपलब्ध छै आ भविष्यमे सेहो रहतैक। एहि आर्काइवकेँ जे कियो प्रकाशक अनुमति लऽ कऽ प्रिंट रूपमे प्रकाशित कएने छथि आ तकर ओ दाम रखने छथि ताहिपर हमर कोनो नियंत्रण नहि अछि।- गजेन्द्र ठाकुर)... अहाँक प्रति अशेष शुभकामनाक संग। १७. डॉ. प्रेमशंकर सिंह- अहाँ मैथिलीमे इंटरनेटपर पहिल पत्रिका "विदेह" प्रकाशित कए अपन अद्भुत मातृभाषानुरागक परिचय देल अछि, अहाँक निःस्वार्थ मातृभाषानुरागसँ प्रेरित छी, एकर निमित्त जे हमर सेवाक प्रयोजन हो, तँ सूचित करी। इंटरनेटपर आद्योपांत पत्रिका देखल, मन प्रफुल्लित भऽ गेल। १८.श्रीमती शेफालिका वर्मा- विदेह ई-पत्रिका देखि मोन उल्लाससँ भरि गेल। विज्ञान कतेक प्रगति कऽ रहल अछि...अहाँ सभ अनन्त आकाशकेँ भेदि दियौ, समस्त विस्तारक रहस्यकेँ तार-तार कऽ दियौक...। अपनेक अद्भुत पुस्तक कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक विषयवस्तुक दृष्टिसँ गागरमे सागर अछि। बधाई। १९.श्री हेतुकर झा, पटना-जाहि समर्पण भावसँ अपने मिथिला-मैथिलीक सेवामे तत्पर छी से स्तुत्य अछि। देशक राजधानीसँ भय रहल मैथिलीक शंखनाद मिथिलाक गाम-गाममे मैथिली चेतनाक विकास अवश्य करत। २०. श्री योगानन्द झा, कबिलपुर, लहेरियासराय- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पोथीकेँ निकटसँ देखबाक अवसर भेटल अछि आ मैथिली जगतक एकटा उद्भट ओ समसामयिक दृष्टिसम्पन्न हस्ताक्षरक कलमबन्द परिचयसँ आह्लादित छी। "विदेह"क देवनागरी सँस्करण पटनामे रु. 80/- मे उपलब्ध भऽ सकल जे विभिन्न लेखक लोकनिक छायाचित्र, परिचय पत्रक ओ रचनावलीक सम्यक प्रकाशनसँ ऐतिहासिक कहल जा सकैछ। २१. श्री किशोरीकान्त मिश्र- कोलकाता- जय मैथिली, विदेहमे बहुत रास कविता, कथा, रिपोर्ट आदिक सचित्र संग्रह देखि आ आर अधिक प्रसन्नता मिथिलाक्षर देखि- बधाई स्वीकार कएल जाओ। २२.श्री जीवकान्त- विदेहक मुद्रित अंक पढ़ल- अद्भुत मेहनति। चाबस-चाबस। किछु समालोचना मरखाह..मुदा सत्य। २३. श्री भालचन्द्र झा- अपनेक कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक देखि बुझाएल जेना हम अपने छपलहुँ अछि। एकर विशालकाय आकृति अपनेक सर्वसमावेशताक परिचायक अछि। अपनेक रचना सामर्थ्यमे उत्तरोत्तर वृद्धि हो, एहि शुभकामनाक संग हार्दिक बधाई। २४.श्रीमती डॉ नीता झा- अहाँक कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़लहुँ। ज्योतिरीश्वर शब्दावली, कृषि मत्स्य शब्दावली आ सीत बसन्त आ सभ कथा, कविता, उपन्यास, बाल-किशोर साहित्य सभ उत्तम छल। मैथिलीक उत्तरोत्तर विकासक लक्ष्य दृष्टिगोचर होइत अछि। २५.श्री मायानन्द मिश्र- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक मे हमर उपन्यास स्त्रीधनक जे विरोध कएल गेल अछि तकर हम विरोध करैत छी।... कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पोथीक लेल शुभकामना।(श्रीमान् समालोचनाकेँ विरोधक रूपमे नहि लेल जाए।-गजेन्द्र ठाकुर) २६.श्री महेन्द्र हजारी- सम्पादक श्रीमिथिला- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़ि मोन हर्षित भऽ गेल..एखन पूरा पढ़यमे बहुत समय लागत, मुदा जतेक पढ़लहुँ से आह्लादित कएलक। २७.श्री केदारनाथ चौधरी- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक अद्भुत लागल, मैथिली साहित्य लेल ई पोथी एकटा प्रतिमान बनत। २८.श्री सत्यानन्द पाठक- विदेहक हम नियमित पाठक छी। ओकर स्वरूपक प्रशंसक छलहुँ। एम्हर अहाँक लिखल - कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक देखलहुँ। मोन आह्लादित भऽ उठल। कोनो रचना तरा-उपरी। २९.श्रीमती रमा झा-सम्पादक मिथिला दर्पण। कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक प्रिंट फॉर्म पढ़ि आ एकर गुणवत्ता देखि मोन प्रसन्न भऽ गेल, अद्भुत शब्द एकरा लेल प्रयुक्त कऽ रहल छी। विदेहक उत्तरोत्तर प्रगतिक शुभकामना। ३०.श्री नरेन्द्र झा, पटना- विदेह नियमित देखैत रहैत छी। मैथिली लेल अद्भुत काज कऽ रहल छी। ३१.श्री रामलोचन ठाकुर- कोलकाता- मिथिलाक्षर विदेह देखि मोन प्रसन्नतासँ भरि उठल, अंकक विशाल परिदृश्य आस्वस्तकारी अछि। ३२.श्री तारानन्द वियोगी- विदेह आ कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक देखि चकबिदोर लागि गेल। आश्चर्य। शुभकामना आ बधाई। ३३.श्रीमती प्रेमलता मिश्र “प्रेम”- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़लहुँ। सभ रचना उच्चकोटिक लागल। बधाई। ३४.श्री कीर्तिनारायण मिश्र- बेगूसराय- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक बड्ड नीक लागल, आगांक सभ काज लेल बधाई। ३५.श्री महाप्रकाश-सहरसा- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक नीक लागल, विशालकाय संगहि उत्तमकोटिक। ३६.श्री अग्निपुष्प- मिथिलाक्षर आ देवाक्षर विदेह पढ़ल..ई प्रथम तँ अछि एकरा प्रशंसामे मुदा हम एकरा दुस्साहसिक कहब। मिथिला चित्रकलाक स्तम्भकेँ मुदा अगिला अंकमे आर विस्तृत बनाऊ। ३७.श्री मंजर सुलेमान-दरभंगा- विदेहक जतेक प्रशंसा कएल जाए कम होएत। सभ चीज उत्तम। ३८.श्रीमती प्रोफेसर वीणा ठाकुर- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक उत्तम, पठनीय, विचारनीय। जे क्यो देखैत छथि पोथी प्राप्त करबाक उपाय पुछैत छथि। शुभकामना। ३९.श्री छत्रानन्द सिंह झा- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़लहुँ, बड्ड नीक सभ तरहेँ। ४०.श्री ताराकान्त झा- सम्पादक मैथिली दैनिक मिथिला समाद- विदेह तँ कन्टेन्ट प्रोवाइडरक काज कऽ रहल अछि। कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक अद्भुत लागल। ४१.डॉ रवीन्द्र कुमार चौधरी- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक बहुत नीक, बहुत मेहनतिक परिणाम। बधाई। ४२.श्री अमरनाथ- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक आ विदेह दुनू स्मरणीय घटना अछि, मैथिली साहित्य मध्य। ४३.श्री पंचानन मिश्र- विदेहक वैविध्य आ निरन्तरता प्रभावित करैत अछि, शुभकामना। ४४.श्री केदार कानन- कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक लेल अनेक धन्यवाद, शुभकामना आ बधाइ स्वीकार करी। आ नचिकेताक भूमिका पढ़लहुँ। शुरूमे तँ लागल जेना कोनो उपन्यास अहाँ द्वारा सृजित भेल अछि मुदा पोथी उनटौला पर ज्ञात भेल जे एहिमे तँ सभ विधा समाहित अछि। ४५.श्री धनाकर ठाकुर- अहाँ नीक काज कऽ रहल छी। फोटो गैलरीमे चित्र एहि शताब्दीक जन्मतिथिक अनुसार रहैत तऽ नीक। ४६.श्री आशीष झा- अहाँक पुस्तकक संबंधमे एतबा लिखबा सँ अपना कए नहि रोकि सकलहुँ जे ई किताब मात्र किताब नहि थीक, ई एकटा उम्मीद छी जे मैथिली अहाँ सन पुत्रक सेवा सँ निरंतर समृद्ध होइत चिरजीवन कए प्राप्त करत। ४७.श्री शम्भु कुमार सिंह- विदेहक तत्परता आ क्रियाशीलता देखि आह्लादित भऽ रहल छी। निश्चितरूपेण कहल जा सकैछ जे समकालीन मैथिली पत्रिकाक इतिहासमे विदेहक नाम स्वर्णाक्षरमे लिखल जाएत। ओहि कुरुक्षेत्रक घटना सभ तँ अठारहे दिनमे खतम भऽ गेल रहए मुदा अहाँक कुरुक्षेत्रम् तँ अशेष अछि। ४८.डॉ. अजीत मिश्र- अपनेक प्रयासक कतबो प्रशंसा कएल जाए कमे होएतैक। मैथिली साहित्यमे अहाँ द्वारा कएल गेल काज युग-युगान्तर धरि पूजनीय रहत। ४९.श्री बीरेन्द्र मल्लिक- अहाँक कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक आ विदेह:सदेह पढ़ि अति प्रसन्नता भेल। अहाँक स्वास्थ्य ठीक रहए आ उत्साह बनल रहए से कामना। ५०.श्री कुमार राधारमण- अहाँक दिशा-निर्देशमे विदेह पहिल मैथिली ई-जर्नल देखि अति प्रसन्नता भेल। हमर शुभकामना। ५१.श्री फूलचन्द्र झा प्रवीण-विदेह:सदेह पढ़ने रही मुदा कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक देखि बढ़ाई देबा लेल बाध्य भऽ गेलहुँ। आब विश्वास भऽ गेल जे मैथिली नहि मरत। अशेष शुभकामना। ५२.श्री विभूति आनन्द- विदेह:सदेह देखि, ओकर विस्तार देखि अति प्रसन्नता भेल। ५३.श्री मानेश्वर मनुज-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक एकर भव्यता देखि अति प्रसन्नता भेल, एतेक विशाल ग्रन्थ मैथिलीमे आइ धरि नहि देखने रही। एहिना भविष्यमे काज करैत रही, शुभकामना। ५४.श्री विद्यानन्द झा- आइ.आइ.एम.कोलकाता- कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक विस्तार, छपाईक संग गुणवत्ता देखि अति प्रसन्नता भेल। अहाँक अनेक धन्यवाद; कतेक बरखसँ हम नेयारैत छलहुँ जे सभ पैघ शहरमे मैथिली लाइब्रेरीक स्थापना होअए, अहाँ ओकरा वेबपर कऽ रहल छी, अनेक धन्यवाद। ५५.श्री अरविन्द ठाकुर-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक मैथिली साहित्यमे कएल गेल एहि तरहक पहिल प्रयोग अछि, शुभकामना। ५६.श्री कुमार पवन-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक पढ़ि रहल छी। किछु लघुकथा पढ़ल अछि, बहुत मार्मिक छल। ५७. श्री प्रदीप बिहारी-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक देखल, बधाई। ५८.डॉ मणिकान्त ठाकुर-कैलिफोर्निया- अपन विलक्षण नियमित सेवासँ हमरा लोकनिक हृदयमे विदेह सदेह भऽ गेल अछि। ५९.श्री धीरेन्द्र प्रेमर्षि- अहाँक समस्त प्रयास सराहनीय। दुख होइत अछि जखन अहाँक प्रयासमे अपेक्षित सहयोग नहि कऽ पबैत छी। ६०.श्री देवशंकर नवीन- विदेहक निरन्तरता आ विशाल स्वरूप- विशाल पाठक वर्ग, एकरा ऐतिहासिक बनबैत अछि। ६१.श्री मोहन भारद्वाज- अहाँक समस्त कार्य देखल, बहुत नीक। एखन किछु परेशानीमे छी, मुदा शीघ्र सहयोग देब। ६२.श्री फजलुर रहमान हाशमी-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक मे एतेक मेहनतक लेल अहाँ साधुवादक अधिकारी छी। ६३.श्री लक्ष्मण झा "सागर"- मैथिलीमे चमत्कारिक रूपेँ अहाँक प्रवेश आह्लादकारी अछि।..अहाँकेँ एखन आर..दूर..बहुत दूरधरि जेबाक अछि। स्वस्थ आ प्रसन्न रही। ६४.श्री जगदीश प्रसाद मंडल-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक पढ़लहुँ । कथा सभ आ उपन्यास सहस्रबाढ़नि पूर्णरूपेँ पढ़ि गेल छी। गाम-घरक भौगोलिक विवरणक जे सूक्ष्म वर्णन सहस्रबाढ़निमे अछि, से चकित कएलक, एहि संग्रहक कथा-उपन्यास मैथिली लेखनमे विविधता अनलक अछि। समालोचना शास्त्रमे अहाँक दृष्टि वैयक्तिक नहि वरन् सामाजिक आ कल्याणकारी अछि, से प्रशंसनीय। ६५.श्री अशोक झा-अध्यक्ष मिथिला विकास परिषद- कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक लेल बधाई आ आगाँ लेल शुभकामना। ६६.श्री ठाकुर प्रसाद मुर्मु- अद्भुत प्रयास। धन्यवादक संग प्रार्थना जे अपन माटि-पानिकेँ ध्यानमे राखि अंकक समायोजन कएल जाए। नव अंक धरि प्रयास सराहनीय। विदेहकेँ बहुत-बहुत धन्यवाद जे एहेन सुन्दर-सुन्दर सचार (आलेख) लगा रहल छथि। सभटा ग्रहणीय- पठनीय। ६७.बुद्धिनाथ मिश्र- प्रिय गजेन्द्र जी,अहाँक सम्पादन मे प्रकाशित ‘विदेह’आ ‘कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक’ विलक्षण पत्रिका आ विलक्षण पोथी! की नहि अछि अहाँक सम्पादनमे? एहि प्रयत्न सँ मैथिली क विकास होयत,निस्संदेह। ६८.श्री बृखेश चन्द्र लाल- गजेन्द्रजी, अपनेक पुस्तक कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़ि मोन गदगद भय गेल , हृदयसँ अनुगृहित छी । हार्दिक शुभकामना । ६९.श्री परमेश्वर कापड़ि - श्री गजेन्द्र जी । कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़ि गदगद आ नेहाल भेलहुँ। ७०.श्री रवीन्द्रनाथ ठाकुर- विदेह पढ़ैत रहैत छी। धीरेन्द्र प्रेमर्षिक मैथिली गजलपर आलेख पढ़लहुँ। मैथिली गजल कत्तऽ सँ कत्तऽ चलि गेलैक आ ओ अपन आलेखमे मात्र अपन जानल-पहिचानल लोकक चर्च कएने छथि। जेना मैथिलीमे मठक परम्परा रहल अछि। (स्पष्टीकरण- श्रीमान्, प्रेमर्षि जी ओहि आलेखमे ई स्पष्ट लिखने छथि जे किनको नाम जे छुटि गेल छन्हि तँ से मात्र आलेखक लेखकक जानकारी नहि रहबाक द्वारे, एहिमे आन कोनो कारण नहि देखल जाय। अहाँसँ एहि विषयपर विस्तृत आलेख सादर आमंत्रित अछि।-सम्पादक) ७१.श्री मंत्रेश्वर झा- विदेह पढ़ल आ संगहि अहाँक मैगनम ओपस कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक सेहो, अति उत्तम। मैथिलीक लेल कएल जा रहल अहाँक समस्त कार्य अतुलनीय अछि। ७२. श्री हरेकृष्ण झा- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक मैथिलीमे अपन तरहक एकमात्र ग्रन्थ अछि, एहिमे लेखकक समग्र दृष्टि आ रचना कौशल देखबामे आएल जे लेखकक फील्डवर्कसँ जुड़ल रहबाक कारणसँ अछि। ७३.श्री सुकान्त सोम- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक मे समाजक इतिहास आ वर्तमानसँ अहाँक जुड़ाव बड्ड नीक लागल, अहाँ एहि क्षेत्रमे आर आगाँ काज करब से आशा अछि। ७४.प्रोफेसर मदन मिश्र- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक सन किताब मैथिलीमे पहिले अछि आ एतेक विशाल संग्रहपर शोध कएल जा सकैत अछि। भविष्यक लेल शुभकामना। ७५.प्रोफेसर कमला चौधरी- मैथिलीमे कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक सन पोथी आबए जे गुण आ रूप दुनूमे निस्सन होअए, से बहुत दिनसँ आकांक्षा छल, ओ आब जा कऽ पूर्ण भेल। पोथी एक हाथसँ दोसर हाथ घुमि रहल अछि, एहिना आगाँ सेहो अहाँसँ आशा अछि। ७६.श्री उदय चन्द्र झा "विनोद": गजेन्द्रजी, अहाँ जतेक काज कएलहुँ अछि से मैथिलीमे आइ धरि कियो नहि कएने छल। शुभकामना। अहाँकेँ एखन बहुत काज आर करबाक अछि। ७७.श्री कृष्ण कुमार कश्यप: गजेन्द्र ठाकुरजी, अहाँसँ भेँट एकटा स्मरणीय क्षण बनि गेल। अहाँ जतेक काज एहि बएसमे कऽ गेल छी ताहिसँ हजार गुणा आर बेशीक आशा अछि। ७८.श्री मणिकान्त दास: अहाँक मैथिलीक कार्यक प्रशंसा लेल शब्द नहि भेटैत अछि। अहाँक कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक सम्पूर्ण रूपेँ पढ़ि गेलहुँ। त्वञ्चाहञ्च बड्ड नीक लागल। ७९. श्री हीरेन्द्र कुमार झा- विदेह ई-पत्रिकाक सभ अंक ई-पत्रसँ भेटैत रहैत अछि। मैथिलीक ई-पत्रिका छैक एहि बातक गर्व होइत अछि। अहाँ आ अहाँक सभ सहयोगीकेँ हार्दिक शुभकामना। विदेह मैथिली साहित्य आन्दोलन (c)२००४-१२. सर्वाधिकार लेखकाधीन आ जतए लेखकक नाम नहि अछि ततए संपादकाधीन। विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। सह-सम्पादक: उमेश मंडल। सहायक सम्पादक: शिव कुमार झा आ मुन्नाजी (मनोज कुमार कर्ण)। भाषा-सम्पादन: नागेन्द्र कुमार झा आ पञ्जीकार विद्यानन्द झा। कला-सम्पादन: ज्योति झा चौधरी आ रश्मि रेखा सिन्हा। सम्पादक-शोध-अन्वेषण: डॉ. जया वर्मा आ डॉ. राजीव कुमार वर्मा। सम्पादक- नाटक-रंगमंच-चलचित्र- बेचन ठाकुर। सम्पादक- सूचना-सम्पर्क-समाद- पूनम मंडल आ प्रियंका झा। सम्पादक- अनुवाद विभाग- विनीत उत्पल। रचनाकार अपन मौलिक आ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि) ggajendra@videha.com केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx, .rtf वा .txt फॉर्मेटमे पठा सकैत छथि। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेताह, से आशा करैत छी। रचनाक अंतमे टाइप रहय, जे ई रचना मौलिक अछि, आ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। मेल प्राप्त होयबाक बाद यथासंभव शीघ्र ( सात दिनक भीतर) एकर प्रकाशनक अंकक सूचना देल जायत। ’विदेह' प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका अछि आ एहिमे मैथिली, संस्कृत आ अंग्रेजीमे मिथिला आ मैथिलीसँ संबंधित रचना प्रकाशित कएल जाइत अछि। एहि ई पत्रिकाकेँ श्रीमति लक्ष्मी ठाकुर द्वारा मासक ०१ आ १५ तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि। (c) 2004-12 सर्वाधिकार सुरक्षित। विदेहमे प्रकाशित सभटा रचना आ आर्काइवक सर्वाधिकार रचनाकार आ संग्रहकर्त्ताक लगमे छन्हि। रचनाक अनुवाद आ पुनः प्रकाशन किंवा आर्काइवक उपयोगक अधिकार किनबाक हेतु ggajendra@videha.co.in पर संपर्क करू। एहि साइटकेँ प्रीति झा ठाकुर, मधूलिका चौधरी आ रश्मि प्रिया द्वारा डिजाइन कएल गेल। सिद्धिरस्तु वि दे ह विदेह Videha বিদেহ www.videha.co.in www.videha.com विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका Videha Ist Maithili Fortnightly ejournal विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका 'विदेह' ११३ म अंक ०१ सितम्बर २०१२ (वर्ष ५ मास ५७ अंक ११३) मानुषीमिह संस्कृताम् ISSN 2229-547X VIDEHA वि दे ह विदेह Videha বিদেহ www.videha.co.in www.videha.com विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका Videha Ist Maithili Fortnightly ejournal विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका 'विदेह' ११३ म अंक ०१ सितम्बर २०१२ (वर्ष ५ मास ५७ अंक ११३) मानुषीमिह संस्कृताम् ISSN 2229-547X VIDEHA
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FJ : आनन्द Chaily झा ON युवा TOI | 'एहिए वर्ष सँ प्रारंभ साहित्य अकादमी युवा पुरस्कार युवा नाटककार आनन्द कुमार झा के देल गेल अछि। मेहथ (झंझारपुर) निवासी आनन्दजी जखन उच्चस्तरीय अध्ययन हेतु कोलकाता गेलाहं त' ओतय ओ | रंगमंच सँ जुड़ गेलाह आ कोकिल मंचक श्रीगंगा झाक निर्देशन मे हिनकर लिखल नाटक सब मंचित होमय arma किछुए दिन पछाति पुनः हिनका अपना गाममे tea पड़ि गेलनि। आनंदजी झंझारपुर में एकटा पुस्तक | केन्द्र स्थापित कए अपना व्यवंसायक संग AMIS मे लागल रहलाह। एमहर किछु दिन ओ फारबिसगंज में | सेहों अपन सेवावधि बिताओल मुदा किछुए दिन पछाति ओ पुन: गाम ध' dere) सम्प्रति आनंदजी दिल्ली | में निवास क' रहल छथि। हिनक पुस्तक ‘sar परिवर्तन (नाटक ) कँ साहित्य अकादमी पुरस्कृत कएलक अछि। यद्यपि पुरस्कृत करबाक प्रक्रिया पर मारिते रास प्रश्न चिहन लंगाओल गेल अछि तकरा रहितो नाटक | को पुरस्कार fear युवा रंगकर्मी के पुरस्कार अवश्ये उत्साहजनक कहल जाय। हिनक लिखल किछु प्रमुख | > नाटक अछि - राकाक मोल, कलह, बदलैत समाज, धधाइत नबकी कनियाँक लहास, हठात परिवर्तन आदि। हिनक किछु अप्रकाशित नाटक मंचनक oe जोहि रहल अछि। पारिवारिक परिस्थितिक चोरानुकी आ तकर वैषम्यक संग निरन्तर संघर्ष करैत आनंदजी आइयो नाट्यलेखन में सक्रिय छथि। एहिं युवा नाटककार कँ aE अशेष बधाइ। न -सम्पादक FC, जुलाई-सितम्बर, 20I2 —
[ we मनुवादी, आ आब पाश्चात्यमार्गी, बनयबाक क्रम में. से पुरना जमानाक बात दोसर Bell अपना सभक पुरखा आदिवासीक धर्म-कर्म तथा जीवनशैली क' हेय दृष्टि सँ लोकनि बीछि-बीछि क' तेहने om बसलाह जे ठाम 4 देखेत छथि। stows तथ्य क' बिंसरबाक प्रयास ata रतीक तडर मे खान छल आ ऊपर मे जंगल। पुरना जमाना : छथि जे हमरा सभक मूलग्राम एक अछि, हमसभ समाजी मे जे हालत रहल हो से हम ने जनै छी, लेकिन एखनुका ot, ओ हमर ae छथि। जमाना मे खान आ जंगल दुनूक मालिक स्वयं सरकार भ' डॉ0 विद्यानाथ झा 'विदित' एही विषक ow ‘fact गेल अछि en हमसभ ओहि कीमती सम्पत्तिक बिना बेसरा' में उजागर . कयलनि अछि। ई उपन्यास waa खेबा-खर्चक मंगनीक ओगरबाह बनल छी।' जेना होइत . नामक आदिम समुदाय पर केन्द्रित अछि। संताल मे बारहटा. SH, माय-बापक ममता पछुआ गेलैक। धौनाक fae कुल tha छैक। ताही मे एकटा गोत्र अछि बेसरा। प्रस्तुत. आगाँ बढ़ि गेलैक। घौना आसाम पहुँच गेल। मुदा, पचगछिया उपन्यास बेसरा गोत्रक लोकक शील-स्वभाव, राग-विराग. eR पहुँचबाक रास्ता मे, बस में, बाँसुरी सनक an रीति-नीति सँ परिचित करबैत अछि। ada सहयात्रीक जे मनगर निकटताक अनुभव भेल रहैक से समय-सालक संग ओकर आचार-विचार मे आयल परिंवर्चन बेर-बेर मोन SH संयोगवश गौरी सँ पहिले दिन भेंट पर सेहो ध्यान राखल गेल अछि। सभ सँ पैघ बात date भ' गेलैक on बाँसुरीक प्रति जागल उत्कण्ठा गौरीक जे दुतकारल-कतिआयल एहि पारिवारिक सदस्य क.. खिस्सा सुनबाक. इच्छा क' आतुर क' देलकैक। ः जगयबाक, जागल क' संघर्ष चेतनाक पाटि पकड़्यबाक ae fae शुरू ta अछि पाँचम अध्याय जे am we में कयल गेल अछि से मैथिली साहित्यक | सँ-गौरीक माय-बापक प्रसंग a बीच-बीच मे आदिवासी नव आयाम अछि। मैथिली मे आदिवासी जनजीवन पर. जीवनक अनेक उपकथा अबेत अछि। जेना, लालबाबाक कथा अछि, कवितो मे प्रसंगवश उल्लेख अछि, yer इमानदारी आ नैतिकताक कथा। पाथरपाड़ाक सरदार आ औपन्यासिक विस्तारक संग ई पहिल कृति थिक। कुली पाड़ाक मजदूरक कथा। चायबगानक मालिक-मैनेजर ue कृति क' रचनाकार उपन्यास कहलनि ats! आ.ओहिठामक कर्मचारीक sedan कथा। ई संभ क्षेपक किन्तु, कथा-संयोजनक दृष्टिएँ एकर ठाठ किछु दोसर . कथा आदिवासी जीवनक कटु-मधु दृश्य क ' प्रस्तुत करैत प्रकारक अछि। गुजराती मे उपन्यास क' नवलकथा कहल otf एहि सँ पूँजीपति मालिकक राजनीति आ बामपंथी जाइत छैक। 'विप्लबी बेसरा' sea: नवल कथा थिक। मजदूर नेता मोहरी लालक हत्याक रहस्य बुझबा में अबैत दादी-नानीक खिस्साक शैली मे, अनेक खण्ड में, wre अछि। मोहरीलाल on ओकर पत्नी रमियाक मृत्युक are ad कथा कहल गेल अछि। de ढंग, ae बान्ह॑-काट, . गौरीक कथा शुरू होइत अछि। ated रोचकता। पंचगछिया गाम। सोहराय पावनि। सुफलक ताधरि उपन्यासक उत्तरार्ध आबि जाइत अछि एगारहम पत्नी फूलमनि घर-आँगन कँ सजा रहल STS! बेटा धौना _ अध्याय। आदिवासी जीवन प्रणालीक अनुरूप उपन्यासक बहिनक विदागरी ara’ गेल Se आसामक चायबगान मे. नायिका प्रधान बनायब आवश्यक छल, त. एकैसम अध्याय काज करयवला संगी टेकलाल सँ भेंट होइत छैक। tear «sata अन्त धरि मोहरी लालक बेटी, विपलवी बेसरा हर daw अपना संग आसाम a’ जाय चाहैत ote. बनल साफाहोड़क नतिनी, गौरीक खिस्सा विस्तार 4 : माय-बापक स्नेह नाकर-नुकुर करैत छैक। धौना आदिवासी कहल जाइत अछि। धौना अपने & पढ़िए लैत अछि, गौरी जीवनक गतिमति क' फरिछबैत अछि-' अहाँ जे कहैत छी . क' सेहो पढ़ा दैत अछि a पास धौना aw facie में
ea समीक्षा विप्लवी बेसरा : विषय आ विचार - श्री मोहन भारद्वाज मेथिल मनीषी याज्ञवल्क्य आ हुनक कृति शतपथ मिथिला की झारखण्ड की बिहारक आर्यीकरण संभव ब्राह्मण wf प्रमाण मानी ¢ मिथिलाक आदिवासी अनार्य. भेल। आर्यीकरणक एहि प्रक्रिया मे जे छूटि गेलाह से <.. रहथि। मिथिला जंगली क्षेत्र छल। वैश्वानर सरस्वती सँ.. आइयो आदिवासी कहबैत छथि। अन्य अपना SAAT पूब दिस बढ़ेत गेलाह आ सदानीरा धरिक भूभाग au do फराक, cea सभ्य, cared श्रेष्ठ gad छथि। क' आर्यक प्रवेश क' सुगम बनौलनि। तकरा are आजुक एतबे नहि, एहि प्रकारक सभ्य लोकनि अपन आचार-विचार ः aD 4
| = ro ee a | re * सुभाषचन्द्र Wet | - Se Ca we मोनोग्राफक बारे में ee ip re राजकमल चौधरी at जायत' । मीटिंगक बाद सुरेश्वर झा आ रामदेव झा इलाहाबाद : qi 7 i So) मोनोग्राफ लिखबाक काज | जयकांत flor भेंट aes चल गेलाह- साहित्य अकादेमीक अगिला =e a «Bae 993 ई:क अंतमे मैथिली संयोजक बनबाक पैरवीमे । डी Same tea छल | सुनलहूँ जे. मोहन भारद्वाज पॉडुलिपि पढ़िक५ रामदेवे झाक लाइन पकड़ि लेलनि । | |... dts यादव | wige अकादेमीक एहि idl wes लगलाह जे मैथिली साहित्यवला खंड कने और पैघ ws | frofad एहन wdat feel; राजकमलक यौन जीवनक ईं अंश हटा 'दिऔ, ओ अंश हटा | व्यक्ति खिसिया गेलाह, जिनका art ने कोनो कारणे .ई विश्वास feat आदि । राजमोहन झा आ aad’ ओ अपना ढंगे बुझा-सुझा | छलनि जे राजकमल पर मोनोग्राफ लिखबाक लेल Se सर्वाधिक उपयुक्त . कड तेना तैयार HS लेलनि जे आब हुनका बदलामे Be sy हमर } an योग्य छथि । मैथिलीमे निस्संदेह अनेक योग्य व्यक्ति छथि on go पांडुलिपिकें अयोग्य घोषित ars लगलाह महाप्रकाश एहि बात काज किनको देल जा सकैत छल । लेकिन मैथिली परामर्श मंडलक sas सुकांतक फज्झैतो कयलथि । पांडुलिपिक प्रकाशनक चिंताक wife बैसारमे ई निर्णय भेल ताहिमे कोनो दोसर नाम नहि छल । देवकान्त .. कारण हम ओहिमे few जोड़बाक आ ओकरा संपादित करबाक झा प्रस्ताव देलनि आ att स्वीकृत भड गेल । ae तैयार भड Teg | लेकिन ई जोड़-घटाव बहुत मामूली छल । मोनोग्राफ लिखबामे हमरा बहुत विलम्ब भेल । ओकर पांडुलिपि हम. पांडुलिपि मोहन भारद्वाज के घुरा देलियनि । fee दिनक बाद ओ 996 ई.क अप्रैलमे कलकत्तामे भेल बोर्डक मीटिंगमे जमा कयलहूँ | wes लगलाह आहाँ जे fae कहलिऐक अछि से निष्कर्ष रूपमे Wet मे पांडुलिपि रामदेव झाके समीक्षा हेतु द५ देल गेलनि । ई बात. अलगसँ लिखि ws es दिऔ । मोनोग्राफके पी-एच.डी. थीसिस बना ठीक नहि भेल, से मीटिंगक ae तखन बुझायल जखन मोहन. tare हमर कोना इच्छा नहि छल | निष्कर्ष Act हम. एकदम तैयार भारद्वाज एहिं दिस ध्यान दिऔलनि i मीटिंगमे हम रामदेव झाक . नहि भेलहूँ । ताथरि ई तय as गेल छलैक जे साहित्य अकादेमीक *पसीझैत पाथर 'क प्रस्तावित अंगरेजी अनुवादक विरोध कयने छलिऐक। अगिला मैथिली संयोजक रामदेव झा dae | मोहन भारद्वाजक पाँच-छह मास गुजरि गेलाक बादो जखन रामदेव झा अपन समीक्षात्मक . परामर्श मंडलक सदस्य बनबाक रहनि आ से हुनका रामदेवे झा बना रिपोर्ट नहि पठौलथिन as विश्वास भड गेल जे ओ हमरा विरोध सकैत छलनि; बनाइयो देलथिन । पता चलल हमर मोनोग्राफके' ओ करबाक मजा चखा रहल छथि I रिजेक्ट as देलनि । कारण ई जे विनिबंध लेखक पांडुलिपिमे | Wed: साहित्य अकादेमीकें हम पत्र लिखलिऐक जे समीक्षक्सँ रिपोर्ट _ अपेक्षित संशोधन आ परिवर्तन लेल तैयार नहि भेलाह । अविलम्ब मंगाओल जाय | अंततः आठ महीनाक बाद जनवरी 9978 _ हमरा लेल ई बड़ पैघ आघात आ चुनौती छल | हम ओकर हिन्दी रामदेव झा रिपोर्ट जमा sacs । पांडुलिपिके” ओ अस्वीकृत कड देने amare करब आरंभ कयलहूँ । we प्रसंगमे हमरा केदार काननक pore । हुनक रिपोर्ट ‘ars का प्रतिवेदन ' प्रकाशित कयल जा रहल.. अविस्मरणीय सहयोग भेटल । मोनोग्राफक प्रतिलिपि तैयार करबाक आ अछि । ओहि रिपोर्टक जवाब, जे हम साहित्य अकादेमीके पठौने छलिऐक, .. ज्ञानरंजनसँ ओकर प्रकाशन संबंधी गप्प करबाक श्रेय Harts छनि gs सेहो *वाचक का प्रतिवेदन 'क तुरंत बाद छापल जा रहल अछि। मोनोग्राफ़ पहिने i998 ई.मे पहल पुस्तिका रूपमे छपल आ 20077 रामदेव झा द्वारा रिपोर्ट जमा करबा सँ पहिने मोहन भारद्वाज दिल्ली गेल... सारांश प्रकृॉशिनसँ किताब रूपमे । आब ओ मैथिलीमे छपि रहल अछि । छलाह तँँ हमरे कहला पर ओ साहित्य अकादेमीक उपसचिव रमेश एहि मैथिली रूपमे किछु एहनो चीज अछि जे हिन्दीमे,नहिं अछि । । भसीन सँ गप्प कयने छलथि । तकर सूचना दैत ओ लिखने छलाह- ue मोनोग्राफक fede बहुत प्रशंसा Ae । प्रकाश मनु आ लीलाधर ‘onda d अहाँक पत्रक प्रसंग गप्प भेल । ओ कहलनि जे अन्यथा रिपोर्ट. मांडलॉईक प्रशंसात्मक समीक्षा हिन्दीक पैघ आ प्रतिष्ठित पत्रिकामे अयला पर पुन: दोसर ted रिभ्यू कराओल जयतैक । पोथी wade, छपल | हमरा लग प्रशंसाक अनेक पत्र आयल | बहुत Tice चिट्ठी कने-मने संशोधन Sts पड़य से संभव । अहाँ निशिचंत रहू ।' fafams ओकर खोज करैत रहल | बहुत Ties राज्कमलक बारेमे पांडुलिपि अस्वीकुत हेबाक आशंका तैँ रहबे करय । रच्छ ई छल जे. अपन संस्मरण लिखि ws पठौलक | मैथिली जगतमे एकरा रिजेक्ट परामर्श मंडलक एकटठा और मीटिंग, जे ओकर आखिरी मीटिंग होड़त, 9 करबाक बहुत विरोध आ आलोचना भेल । पत्रिकामे उतरा-चौरी, अप्रैलमे निर्धारित छल, जाहिमे सदस्यक रूपमे उपस्थित रहि हम अपन _ उकटा-पैंची आ विवाद चलल । एहिमे सर्वाधिक मुखर रमेश छलाह । पांडुलिपिके बचेबाक प्रयास HS सकैत छलहूँ । दिल्लीमे मीटिंगसँ _ मैथिली-हिन्दीक रचनाकार डॉ० 'सुवास कुमार, जे हैदराबाद पहिने भसीन कहलनि जाहि नाम पर आपत्ति हो, तकर विरोध अहाँ विश्वविद्यालयमे हिन्दीक प्रोफेसर आ अध्यक्ष आ वेस्ट इंडीजमे कैक मीटिंगेमे. करब । मीटिंगमे निर्णय भेल जे पांडुलिपिक समीक्षा wre साल भिजिटिंग प्रोफेसर were, एहि मोनोग्राफक ata लिखने रहथि कराओल जाय | ककरा देल॑ जाय ? सभ चुप छल । सुझाव रामदेवे .. : उलटाने लगा तो खत्म किये बिना चैन न पड़ा । पूरा पढ़ गया- जिसे झा feed आयल- मोहन भारद्वाज । हमरा भसीनक सलाह HA कहते हैं, एक ही साँसमे | बड़ा मनोयोग पूर्वक लिखा है आपने, और पड़ल, लेकिन ई नहिं खटकल जे रामदेव झा किएक मोहन भारद्वाजक बड़ा ही संयत होकर । राजकमल पर इससे बेहतर कोई रचना मैंने नहीं | é नाम सुझा रहल छथि । हमरा मोहन भारद्वाज पर अविश्वास नहि रहय देखी है । जानकारी और विश्लेषण दोनों ही दृष्टियों से अत्यंत उत्कृष्ट आ हम चुप रहि Fee | बादमे मोहन. भारद्वाज कहलथि- ate) और समृद्ध है यह पुस्तिका । खुशी की बात है कि सारांश प्रकाशन से अहाँक मोनोग्राफ बचि गेल । हमरो लागल जे ठीके. आब ओ oft | seer Golan होने वाला है । oS ————— re का FR 05-0650 5 नाना न ८ = % लि
अछि | आवश्यकता अछि अपन परम्परा के जनवाक, ओहि & परिचित होयबाक | दरभंगा जिला गजेटियर (2964) क A! श्री रमानाथ झा AST मे | ( एहि दृष्टिकोण सँ रमानाथ झा मिथिलाक सांस्कृतिक उत्कर्ष तथा सारस्वत साधनाक + विद्यानाथ झा लिखित श्री रमानाथ झाक साहित्यिक कृतिक विवरण में लिखल " विभिन्न पक्ष पर प्रकाश देलनि अछि ule मे प्रमुख अछि स्थान-गौरव । मिथिला अछि जे दरभंगा जिला गजेटियर मे मेन ऐण्ड aad हिनके रचना थिक | गजेटियरक | 4 जनपदक अनेक परिसर अपन विशिष्टताक कारणे महत्वपूर्ण अछि | ओकर गुणवत्ता भूमिका में पी. सी. रायचौधुरी सेहो सहयोगक लेल रमानाथ झा के धन्यवाद देने | 4 आ महत्ता B तखने जानल जा सकैत अछि जखन ओकर भूगोल आ इतिहास छथिन | Fer, गजेटियर मे मेन ऐन्ड मैनर्स नामक ST शीर्षक वा उप-शीर्षक ae * a अवगत भेल जाय। मधुवनी, सरिसब, बहेड़ा आदि किछु स्थानक भौगोलिक आ dea) उन्ततः डॉ. प्रभाकर झा सँँ सम्पर्क mame | ओ गजेटियरक तेसर Se | ऐतिहासिक विवरण ta रमानाथ झा ओहि क्षेत्रक सांस्कृतिक महिमा, साहित्यिक यायक चारिटा उप-शीर्षकक लेखन के" रमानाथ झाक रचनाक रूप मे चिन्हित गरिमाक विवेचन कयलनि अछि । ई उदाहरण मात्र Pen मिधिलाक एहन सभ कयलनि। तदनुसार रचनावली मे ओ चारू अंश उप-शीर्षकक संग समाविष्ट स्थानक, परिसर-विशेषक अध्ययन अपेक्षित अछि। अछि | ला मिथिला & परिचितिक दोसर आयाम अछि एहिठामक विदत-परम्परा कँ -मोहन “भारदाज जानब। मिथिला मे धीमानक अभाव कहियो नहि भेल। बौद्धिक चिन्तन-मनन मे शिवपुरी; पटना । मिथिला सर्वदा अग्रणी रहल अछि | एहिठामक सारस्वत साधना केँ सर्वत्र आदरक 2 ais, शाप दृष्टि & tea गेल अछि। किन्तु आजुक मैथिल अपन ओहि इतिहास केँ नहि | P जानि रहल अछि। जिज्ञासु लोक & सेहो जनबाक आधार नहि भेटैत छैक। | रमानाथ झा fe मैथिल अक्षर-पुरुषक परिचय-पत्र प्रस्तुत a wie दिशा मे i श्लाघनीय काज कयलनि अछि | परमगुरु गंगेश्वर आ वाचस्पति मिश्र सैँ पदूमविभूषण | [प्र डा. अमरनाथ झा, ज्योतिरीश्वर आ परमहंस विष्णुपुरी सँ कुमार गंगानन्द सिंह एवं सरसकवि ईशनाथ झा afte व्यक्तित्व-प्रकाशन a मिथिलाक सारस्वत प्रतिभा के . , जनबाक आधार आ दृष्टि Fea अछि। एहि प्रसंग पंजी-व्यवस्थाक सेहो उपयोग ' मी मेल अछि। dot सँ मिथिलाक इतिहास संकलित करबाक पहिल सार्थक प्रयास | रमानाथ झा द्वारा कयल गेल अछि। परिचेताक रूप मे कार्य करबाक इच्छुक अन्वेषक-समीक्षक के पंजी व्यवस्थाक स्वरूप ot महत्वक ज्ञान, ओकर उपयोग- है | प्रणात्लीक जनतब रमानाथ झाक एतदूसम्बन्धी Perr सँ होइत अछि। ry रमानाथ झा एकठाम लिखने छथि जे साहित्यक शरीर थिक भाषा | मैथिली ri भाषाक छवि-छटा, ओकर मधुरता मिथिलाक साहित्य केँ उत्कृष्ट बनौलक अछि। | area व्यापकता देलक अछि। किन्तु, आइ मैथिली भाषा संकटापनन अछि। ः मैथिलीक. प्रश्न पर आन्दोलन करबाक प्रयोजन भड wea अछि। रमानाथ झा i { मैथिलीक वर्तमान समस्या पर गम्भीरता &, विस्तार a विचार कयलनि अछि | ae j प्रसंग लिखित Farr सभ हुनक सुविचारित मान्यता Sf अवगत होयबाक अवसर ai de जछि। मैथिलीक वाचिक आ लिखित, साहित्यिक आ साहित्येतर स्वरूप एवं i; i feat) पर ऐतिहासिक oer मे कयल गेल हुनक विचार-विमर्श तथ्यक उपस्थापन है, He हि teen, aera पर चलबाक तर्जनी-संकेत सेहो थिक | id jie of creer अन्तिम Pare अछि-द पीपुल ऑफ मिथिला | है भ YP Wien one शारि उप-शीर्षक मे विभाजित अछि पी.सी.राय चौधुरीक (0. आता erent का ससतावती os प्राक्कथन : I5 ७ | दर ही é
j दमा काम! » - spree ytne जूक बम मे pe = ca Stee Seka eee RL gt ste autem seen, eannee Sere सदर साया परमार मर Sires Leelee ici e es See 725 “कर 2::2255555:25:5255: मम परम epee पर सर सिम 25-28: 5:555:52525 25252: seston, नि का 30225 ध्यउ2ननन- TTT, aoe RET greene EES Meneses Seer Ree Rerieg Ieee ans oeneNeTees meena Ranier) “Soni eae Sine Se Ranitin meals case tere pane naneets मय 22255552555555 अर सर सागर eS गम Ee neers net Seems Meese जे eee अप mmcaaeaeenah Res आप पापा Soa 25222 Sopenn rere teres Hapeel ame ee Rt seen Grew agree weet ot 22222: 5 ee ae यश >::2522228225अ न सुपर Sierra sermee समय Siigletyet 25552 Sone neat gaa पर एयर seme net coger सपा कम wera ciate eae Semester nae जी नही पिलक १. सर Teen
जी . एकटा “आरो कारण wa झारखण्ड मे परदेसीक विभाजनक समय मे झारखण्डक प्रतिव्यक्ति आय जतेक आगमनक। एहिठामक राजाकेँ जनता सँ अनाज आ जंगली छल ताहि मे हास भेल अछि। आइ सम्पूर्ण भारत में खाद्य-पदार्थ भेंट-स्वरूप जखन-तखन प्राप्त होइन। ule साक्षरताक न्यूनतम दर बिहार मे अछि, आ तकरा बाद रेवाज मे गड़बड़ी भेलाक बाद राजा स्वैच्छिक सोगाइत we झारखण्डेक स्थान छैक। कानूनी लगान बना देलनि। आदिवासी जनता एकर विरोध आवश्यकता अछि स्थिति क' ओकर पूर्ण व्याप्त मे कयलक। छोटानागपुरक राजा स्थिति क' अपन अनुकुल देखबाक , समस्या aw गंभीरताँ सँ लेबाक। बहरिया लोकक बनयबाक लेल बाहरी लोक क' मुख्यत: उत्तर बिहार तथा. प्रति आक्रोश क' आन्दोलन मे बदलबाक प्रयास पहिनहु ः उत्तर प्रदेशक बासी a बजौलनि। हुनका सभ क' लगान मेल छल। उनैसम शताब्दीक अन्त मे, टाना भगतक वसूलबाक लेल गामक सम्पदाक ठीकेदारी आ पट्टोदारी द' . प्रादुर्भाव सँ पहिंने, झारखण्डक महान जननेता बिरसा देलथिन। आदिवासीक सम्पर्क हिन्दू सँ बढलनि। परिणाम. मुंडाक आन्दोलन भेल रहय। यद्यपि ओ आन्दोलन धार्मिक मेल जे एहिठामक आदिवासी राजा सिंहभूमिक राजपूत छल, मुदा ओहि, सँ दिकूक विरोध मे एकटा वातावरण परिवार मे बिआह aw’ लेलनि। आदिवासी सँ हिन्दू ara तैयार भेल weal ओकर प्रभाव स्थायी नहि भ' सकल। परिवारक अपेक्षितारय परदेसी सभ सँ बढ़' ame आइ सँ . आब जे स्थिति अछि ताहि मे झारखण्ड, ओहि ठामक लगभग चारि wa वर्ष पहिने छोटानागपुरक राजा छप्पन at आदिवासीक शोषण लेल दिक्कू बनब जरूरी afe छेक। राजपूत परिवार aw मध्य प्रदेश सँ आनि अपन सेना मे. भू-दखलीकरण आ बाजारवादक अस्त्र art भाला-बर्छी शामिल कयलनि। एहिना बाहर सँ आयल HTH आदर सँ बेसी असरदार अछि। a भ्रष्टाचारी आ अत्याचारी a मे राजा सँ उपाधि भेटलनि। एहने उपाधि थिक नारायण, dea पहिल काज थिक। ओ ferry आ आदिवासी-कोनों ax आ राम। राँचीक बॉरैया आ रातू थाना क्षेत्र मे नारायण. देह धारण कयने fe सकैत अछि। आँखि साफ रहय, आ राम तथा माण्डर मेन्द ओहिठामक लोकक नाम मे. ठीक सँ देखेत रही तँ ae सँ भरल रस्ता क' सेहो आइयो yea अछि। झारखण्डक अधिकांश भाग मे जे. आसानी सै पार कयल जा सकैत of. कुम्हार, बरही, सोनार, तेली , जोलहा आदि छथि से wet किन्तु, प्रस्तुत उपन्यासक अन्त ue ate होइत | आगमनक देन थिक। कारीगर आ मजदूरे नहि, aq oan अछि। विविधता भारतक गौरव थिक। एहिठाम विभिन्न पुजारी Bel बाहरेक छथि। रामगढ़क घटवार लोकनि समुदायक बास अछि। तखन जे fra में एकसूत्रता छैक लगभग तीन wa वर्ष पहिने बंगाल सँ तीन wa घोषाल . सैह थिक भारतीय संस्कृति। भारतक एहिं सामाजिक प्रकृति ब्राह्मण क' रजरप्पाक fee देवीक पूजा aH क' बुझेत। amit बढ़बाक अछि। .विदितजी अपन प्रसिद्ध aa अनलनि आ हुनका पण्डा बना क' ओहिठामक . पुस्तक - संताली मैथिली ओ मे कहेत छथि जे हम जागिरदारी द' देलनि। ः संभगोटे भारतक मूलवासी छी। आदिवासी आ गैर आदिवासी, एहिं प्रकार' आजुक झारखण्ड मे आदिवासी क'. आनार्य on आर्यक भेद अवसरक असमानताक देन अछि। फुटकायब कठिन अछि। तखन एतेक अवश्य जे of विकासक सुविधा-असुविधाक परिणाम अछि। विप्लबी अहलादि क' आनल लोक क' काल बेसाहब बूझल जाइत . बेसरा एहि मान्यताक भौतिक सत्यापन थिक। विसंगति ch” | अछि। बिहार सँ woe भेलाक बादक झारखण्ड मे. संगति देबाक मुखर आह्वान थिक। आदिवासीक संख्या मात्र 28 प्रतिशत अछि। बिहार-झारखण्ड शांति निकेतन, पी. पी. ठाकुर पथ शिवपूरी पर्व, पटना-23 न
नौकरी भ जाइत de a मोहरीलालक आत्मीय कम्पाउन्डरक ANT गूँजि. उठल। उपन्यासक समाप्ति जाहि पड़ाओ पर मदति सँ गौरी सेहो नर्स बनि जाइत अछि। गौरी कम्पाउन्डरेक tied अछि de एकरा. वैचारिकता. प्रदान करैत अछि। ओहिठाम FHSS मे ted अछि। कम्पाउन्ठरक बहिन विचारबाक बात ई अछि जे की झारखण्डक गौरीक एहिना ः बाँसुरी आ गौरी मे घुद़ी-सोहार हेम-छेम अछि। ई de हत्या होइत रहत? ई. हत्या गौरीक ate, एकटा सपना, बाँसुरी अछि जे धौना क' आसाम अबैत काल ट्रेन मे. एकटा मनोरथक हत्या. थिक। आदिवासी जन-जीवनक मेटल रहैक। से जखन धौना गौरी dee we कोकडाझाड़ सुख-समृद्धिक हत्या थिक। एहिं अत्याचार & अविलम्ब अबैत अछि तखन ओकरा बाँसुरी सँ सेहो भेंट होइत Sal रोकल जाय से आवश्यक AT, प्रश्न अछि जे कोना प्रेमलीलाक त्रिकोण aia अछि। प्रेमाख्यान आ ओहि मे रोकल जाय, के रोकत? उपन्यास मे एकर एक्केटा उत्तर त्रिकोणक समावेश सँ उपन्यास मे रोचकता add छेक। . देल गेल अछि। साधु dard 'बनला सँ काज नहि चलत, एकरा बाद कथा बड़ तेजी सँ बढ़ैत अछि। स्थान, तीर-धनुष आ हथियार ल क' लड़ाई कर' पड़त। समय, घटना-सभटा बदलि जाइत अछि। गौरी आसाम सँ उपन्यासक कथा एही समस्या तथा समाधान पर झारखण्ड sad अछि। बिहार सँ फराक da wre समाप्त eed अछि। किन्तु, उपन्यासक विषय एतहि खतम राज्य-झारखण्ड। आदिवासीक झारखण्ड। अपन झारखण्ड। * नहि होइत अछि। st amit seq अछि। बहुत-किछु मुदा, प्रश्न अछि- कोना अपन? कतेक अपन? de tga on सोचबाक da कहेत अछि। झारखण्ड राज्य विचार-बिन्दु अछि जत' उपन्यासकार पाठक क' पहुँचाबय a 2000 go में बनल हो, आदिवासी क्षेत्रक रूप में चाहैत छथि गौरी अपन। नानाक संग भुईटिकडी otf एकर-इतिहास बड़ पुरान अछि। एन्थ्रोपोलिजिकल सर्वे ह जाइत fs झारखण्ड बनिए गेल अछि, आब wat ऑफ इन्डियाक पीपुल site shear नामक पोथी (खण्ड आसाम, बंगाल वां मुंबई जेबाक कोन काज'-नाना मनेमन . सोलह) मे कहल गेल अछि जे झारखण्ड क्षेत्र मे बसनिहार aida छथि। गौरी भुईंटिकरी आयल ds नानाक अपेक्षित . पहिल समुदाय मुण्डारी भाषाभाषी छल जे तीस हजार वर्ष सरमाजीक सक्रिय सहयोग सँ राँचीक अस्पताल मे नौकरियों. पहिने एतय आयल Teal तकरा बाद विभिन्न समय मे af गेलैक। सरमाजी भुईटिकरीक कोयला ware लीज विभिन्न भाषा आ संस्कृतिक लोक एतय अबैत रहलाह। ई लेबयवला मालिकक मैनेजर छलाह। गौरी हुनका wT स्थिति आजुक झारखण्ड आ बिहारेक नहि सम्पूर्ण पूर्वी L मोटर साइकिल पर आबाजाही कर' लागल। राँचीक SP भारतक अछि। एक समय Wd जखन झारखण्डक क्षेत्रीय ; रीसोर्टक टेबुल पर डोसा खयलक। Tele स्थान पर परिंचिति पूर्वी मध्यप्रदेश सँ राजमहलक पहाड़ी आ गंगा ‘ सरमाजीक कीनल जीन्स सर्ट on सलवार-सूट view af व्याप्त od ई क्षेत्र बनिया-व्यवसांयी Wows कॉँ लागल। आ, एक राति जखन सरमाजीक पुरूषार्थक प्रत्यक्ष खनिजक व्यापारी तथा तीर्थाटन करयवला धर्मत्माक अनुभव कयलक तखन बाँसुरी क' fata देलकैक जे आकर्षणक केन्द्र रहल अछि। उपन्यास में मैनेजर सरमाजी घौना सन gist पैरूषवला सँ ओ बिआह नहि करत। मुद्दा, अपन परिचय wa देलनि अछि- ' हमर माय मिथिलाक aa सोचैत छलीह से भेलनि नहिं। कोयला खदानक Sel ओकर नैहर रहैक बीना। हम तँँ कहियो मातृकक _.... मालिकक वासनापूर्ति ओ नहि कयलथिन? तैँ ओकरे qa नहि देखलहूँ। सुनै छी जे एखनुका सुपौल जिला मे गोली सँ ae गेलीह। नाना साधु-संन्यासीक जीवन Bo चकला निर्मली अछि, तकरे लग में ओ गाम अछि। हमर त्यागि फेर विप्लवी बेसरा बनि गेलाह। जय झारखण्डक माय मैथिली ada छलि। हमर बाप संताली भाषी रहथि