VIDEHA — Issue 115 / अंक ११५

Publication: VIDEHA · Issue: 115
Open original PDF at Internet Archive

342 343 ISSN 2229-547X VIDEHA 'विदेह' ११५ म अंक ०१ अक्टूबर २०१२ (वर्ष ५ मास ५८ अंक ११५) ऐ अंकमे अछि:- १. संपादकीय संदेश २. गद्य २.१.जितेन्द्र झा-राजेश्वर नेपालीक सातटा कृति विमोचित २.२.कैलास दास-म्याराथन दौड़ आ जनकपुर २.३.कामिनी कामायनी-कलंकित चान २.४.जगदीश प्रसाद मण्डल-किछु विहनि कथा २.५.विजय मस्त-सुजीतक सम्पूर्ण कथा एकटा नया स्वाद देलक २.६.१.ओम प्रकाश-विहनि कथा- प्रोग्रेसिभ २.पंकज चौधरी (नवलश्री)-विहनि कथा - ई नोर छै गरीबीक २.७.डॉ. अरुण कुमार सिंह- स्वातन्त्र्योत्तर मैथिली कथामे सामाजिक समरसता २.८.१.राजदेव मंडल-लघुकथा-एलेक्‍सनक भूत २.प्रो. वीणा ठाकुर-लघुकथा- परि‍णीता ३.मनोज कुमार मण्‍डल- लघुकथा-घासवाली ४.कपि‍लेश्वर राउत- विहनिकथा-सलाह ३. पद्य ३.१.जगदीश चन्द्र ठाकुर ‘अनिल’- की भेटल आ की हेरा गेल  (आत्म गीत)- (आगाँ) ३.२.१.शि‍व कुमार झा ‘टि‍ल्‍लू’-कवि‍ता-दृष्‍टि‍कोण २.मिहिर झा- महँगी ३.शिव कुमार यादव- गीत-कविता ३.३.जगदीश प्रसाद मण्डल-किछु गोट गीत ३.४.१.राजदेव मण्‍डल- कानैत हँसी/ कनहेपर भाेलब २.पवन कुमार साह- गीत एवं कवि‍ता ३.ओम प्रकाश- गजल ४.राजेश कुमार झा- एकटा प्रेम बिरहक कथा ३.५.१.मुन्नी कामत- किछु कविता २.प्रीति‍ प्रि‍या झा- कवि‍ता- ज्ञानक बल ३.रूबी झा- दूटा गजल ४.कुसुम ठाकुर- हाइकू ३.६.१.हेम नारायण साहु- तीन गोट कवि‍ता २.रामदेव प्रसाद मण्‍डल ‘झारूदार’- शासक सुधारक महाझारू ३.७.१.जगदानन्द झा मनु- किछु गजल २.बाल मुकुन्द पाठक- किछु गजल ३.पंकज चौधरी (नवलश्री)- किछु गजल ३.८.१.विनीत उत्पल- गजल २.अनिल मल्लिक- दूटा गजल ३.अविनाश झा अंशु ४.किशन कारीगर- पंडा आ दलाल- (हास्य कविता) ४. मिथिला कला-संगीत १. ज्योति झा चौधरी २.राजनाथ मिश्र (चित्रमय मिथिला) ३. उमेश मण्डल (मिथिलाक वनस्पति/ मिथिलाक जीव-जन्तु/ मिथिलाक जिनगी) ५. गद्य-पद्य भारती:मन्त्रद्रष्टा ऋष्यश्रृङ्ग- हरिशंकर श्रीवास्तव “शलभ"- (हिन्दीसँ मैथिली अनुवाद विनीत उत्पल) ६.बालानां कृते-१.जगदीश प्रसाद मण्डल- बाल वि‍हनि‍ कथा- घटक काका २.शिव कुमार यादव- बाल कविता ३.जगदानन्द झा मनु- करुण हृदयक मालिक महाराज रणजीत सिंह ७. भाषापाक रचना-लेखन -[मानक मैथिली], [विदेहक मैथिली-अंग्रेजी आ अंग्रेजी मैथिली कोष (इंटरनेटपर पहिल बेर सर्च-डिक्शनरी) एम.एस. एस.क्यू.एल. सर्वर आधारित -Based on ms-sql server Maithili-English and English-Maithili Dictionary.] विदेह ई-पत्रिकाक सभटा पुरान अंक ( ब्रेल, तिरहुता आ देवनागरी मे ) पी.डी.एफ. डाउनलोडक लेल नीचाँक लिंकपर उपलब्ध अछि। All the old issues of Videha e journal ( in Braille, Tirhuta and Devanagari versions ) are available for pdf download at the following link. विदेह ई-पत्रिकाक सभटा पुरान अंक ब्रेल, तिरहुता आ देवनागरी रूपमे Videha e journal's all old issues in Braille Tirhuta and Devanagari versions विदेह ई-पत्रिकाक पहिल ५० अंक

विदेह ई-पत्रिकाक ५०म सँ आगाँक अंक ↑ विदेह आर.एस.एस.फीड एनीमेटरकेँ अपन साइट/ ब्लॉगपर लगाऊ। ब्लॉग "लेआउट" पर "एड गाडजेट" मे "फीड" सेलेक्ट कए "फीड यू.आर.एल." मे http://www.videha.co.in/index.xml टाइप केलासँ सेहो विदेह फीड प्राप्त कए सकैत छी। गूगल रीडरमे पढ़बा लेल http://reader.google.com/ पर जा कऽ Add a  Subscription बटन क्लिक करू आ खाली स्थानमे http://www.videha.co.in/index.xml पेस्ट करू आ Add  बटन दबाउ। Join official Videha facebook group. Join Videha googlegroups विदेह रेडियो:मैथिली कथा-कविता आदिक पहिल पोडकास्ट साइट http://videha123radio.wordpress.com/ मैथिली देवनागरी वा मिथिलाक्षरमे नहि देखि/ लिखि पाबि रहल छी, (cannot see/write Maithili in Devanagari/ Mithilakshara follow links below or contact at ggajendra@videha.com) तँ एहि हेतु नीचाँक लिंक सभ पर जाउ। संगहि विदेहक स्तंभ मैथिली भाषापाक/ रचना लेखनक नव-पुरान अंक पढ़ू। http://devanaagarii.net/ http://kaulonline.com/uninagari/  (एतए बॉक्समे ऑनलाइन देवनागरी टाइप करू, बॉक्ससँ कॉपी करू आ वर्ड डॉक्युमेन्टमे पेस्ट कए वर्ड फाइलकेँ सेव करू। विशेष जानकारीक लेल ggajendra@videha.com पर सम्पर्क करू।)(Use Firefox 4.0 (from WWW.MOZILLA.COM )/ Opera/ Safari/ Internet Explorer 8.0/ Flock 2.0/ Google Chrome for best view of 'Videha' Maithili e-journal at http://www.videha.co.in/ .) Go to the link below for download of old issues of VIDEHA Maithili e magazine in .pdf format and Maithili Audio/ Video/ Book/ paintings/ photo files. विदेहक पुरान अंक आ ऑडियो/ वीडियो/ पोथी/ चित्रकला/ फोटो सभक फाइल सभ (उच्चारण, बड़ सुख सार आ दूर्वाक्षत मंत्र सहित) डाउनलोड करबाक हेतु नीचाँक लिंक पर जाउ। VIDEHA ARCHIVE विदेह आर्काइव ज्योतिरीश्वर पूर्व महाकवि विद्यापति। भारत आ नेपालक माटिमे पसरल मिथिलाक धरती प्राचीन कालहिसँ महान पुरुष ओ महिला लोकनिक कर्मभमि रहल अछि। मिथिलाक महान पुरुष ओ महिला लोकनिक चित्र 'मिथिला रत्न' मे देखू। गौरी-शंकरक पालवंश कालक मूर्त्ति, एहिमे मिथिलाक्षरमे (१२०० वर्ष पूर्वक) अभिलेख अंकित अछि। मिथिलाक भारत आ नेपालक माटिमे पसरल एहि तरहक अन्यान्य प्राचीन आ नव स्थापत्य, चित्र, अभिलेख आ मूर्त्तिकलाक़ हेतु देखू 'मिथिलाक खोज' मिथिला, मैथिल आ मैथिलीसँ सम्बन्धित सूचना, सम्पर्क, अन्वेषण संगहि विदेहक सर्च-इंजन आ न्यूज सर्विस आ मिथिला, मैथिल आ मैथिलीसँ सम्बन्धित वेबसाइट सभक समग्र संकलनक लेल देखू "विदेह सूचना संपर्क अन्वेषण" विदेह जालवृत्तक डिसकसन फोरमपर जाउ। "मैथिल आर मिथिला" (मैथिलीक सभसँ लोकप्रिय जालवृत्त) पर जाउ। ऐ बेर मूल पुरस्कार(२०१२) [साहित्य अकादेमी, दिल्ली]क लेल अहाँक नजरिमे कोन मूल मैथिली पोथी उपयुक्त अछि ? Thank you for voting! श्री राजदेव मण्डलक “अम्बरा” (कविता-संग्रह)  12.67% श्री बेचन ठाकुरक “बेटीक अपमान आ छीनरदेवी”(दूटा नाटक)  11.02% श्रीमती आशा मिश्रक “उचाट” (उपन्यास)  6.34% श्रीमती पन्ना झाक “अनुभूति” (कथा संग्रह)  4.68% श्री उदय नारायण सिंह “नचिकेता”क “नो एण्ट्री:मा प्रविश (नाटक)  5.23% श्री सुभाष चन्द्र यादवक “बनैत बिगड़ैत” (कथा-संग्रह)  4.96% श्रीमती वीणा कर्ण- भावनाक अस्थिपंजर (कविता संग्रह)  5.23% श्रीमती शेफालिका वर्माक “किस्त-किस्त जीवन (आत्मकथा)  8.54% श्रीमती विभा रानीक “भाग रौ आ बलचन्दा” (दूटा नाटक)  6.61% श्री महाप्रकाश-संग समय के (कविता संग्रह)  5.51% श्री तारानन्द वियोगी- प्रलय रहस्य (कविता-संग्रह)  4.96% श्री महेन्द्र मलंगियाक “छुतहा घैल” (नाटक)  9.64% श्रीमती नीता झाक “देश-काल” (कथा-संग्रह)  5.51% श्री सियाराम झा "सरस"क थोड़े आगि थोड़े पानि (गजल संग्रह)  7.16% Other:  1.93% ऐ बेर युवा पुरस्कार(२०१२)[साहित्य अकादेमी, दिल्ली]क लेल अहाँक नजरिमे कोन कोन लेखक उपयुक्त छथि ? Thank you for voting! श्रीमती ज्योति सुनीत चौधरीक “अर्चिस” (कविता संग्रह)  26.74% श्री विनीत उत्पलक “हम पुछैत छी” (कविता संग्रह)  7.56% श्रीमती कामिनीक “समयसँ सम्वाद करैत”, (कविता संग्रह)  5.81% श्री प्रवीण काश्यपक “विषदन्ती वरमाल कालक रति” (कविता संग्रह)  4.07% श्री आशीष अनचिन्हारक "अनचिन्हार आखर"(गजल संग्रह)  23.26% श्री अरुणाभ सौरभक “एतबे टा नहि” (कविता संग्रह)  5.81% श्री दिलीप कुमार झा "लूटन"क जगले रहबै (कविता संग्रह)  6.98% श्री आदि यायावरक “भोथर पेंसिलसँ लिखल” (कथा संग्रह)  5.81% श्री उमेश मण्डलक “निश्तुकी” (कविता संग्रह)  12.21% Other:  1.74% ऐ बेर अनुवाद पुरस्कार (२०१३) [साहित्य अकादेमी, दिल्ली]क लेल अहाँक नजरिमे के उपयुक्त छथि? Thank you for voting! श्री नरेश कुमार विकल "ययाति" (मराठी उपन्यास श्री विष्णु सखाराम खाण्डेकर)  32.73% श्री महेन्द्र नारायण राम "कार्मेलीन" (कोंकणी उपन्यास श्री दामोदर मावजो)  11.82% श्री देवेन्द्र झा "अनुभव"(बांग्ला उपन्यास श्री दिव्येन्दु पालित)  11.82% श्रीमती मेनका मल्लिक "देश आ अन्य कविता सभ" (नेपालीक अनुवाद मूल- रेमिका थापा)  18.18% श्री कृष्ण कुमार कश्यप आ श्रीमती शशिबाला- मैथिली गीतगोविन्द ( जयदेव संस्कृत)  13.64% श्री रामनारायण सिंह "मलाहिन" (श्री तकषी शिवशंकर पिल्लैक मलयाली उपन्यास)  10.91% Other:  0.91% फेलो पुरस्कार-समग्र योगदान २०१२-१३ : समानान्तर साहित्य अकादेमी, दिल्ली Thank you for voting! श्री राजनन्दन लाल दास  48.96% श्री डॉ. अमरेन्द्र  30.21% श्री चन्द्रभानु सिंह  18.75% Other:  2.08% 1.संपादकीय १ -समन्वय २०१२: भारतीय लेखनक उत्सव:२-४ नवम्बर २०१२: (इण्डिया हैबीटेट सेन्टर भारतीय भाषा महोत्सव) -एकर साइट अछि http://samanvayindianlanguagesfestival.org -समन्वयक छथि सत्यानन्द निरूपम आ गिरिराज कराडू -उत्सवक निदेशक छथि- राज लिबरहान -उत्सवक एडवाइजरी बोर्डमे छथि-आलोक राय, के.सच्चिदानन्दन, लक्ष्मण गायकवाड, ओम थानवी, महमूद फारूकी, ममता सागर, रवि सिंह, सीतांशु यशचन्द्र, तेमशुला आओ। -आयोजन कमेटीमे छथि- १.इण्डिया हैबीटेट सेन्टरक प्रोग्राम टीम, २.पारस नाथ, अनन्त नाथ। -सहयोगी छथि, दिल्ली प्रेस आ प्रतिलिपि बुक्स। -समन्वय २०११ मे मैथिलीक प्रतिनिधित्व केने रहथि- गंगेश गुंजन। http://samanvayindianlanguagesfestival.org/2011/gangesh-gunjan/ २ जगदीश प्रसाद मण्डल- एकटा बायोग्राफी... दुर्गास्‍थान बनैसँ पूर्व छोट-पैघ अनेको स्‍थान छल, कोनो नै कोनो रूपमे अखनो अछि‍। बलदेव बाबू (सरि‍सब पाही) बेटाक उपलेखनामे एकटा शि‍वालय बड़की पोखरि‍क उत्तरवरि‍या महारपर बनौलनि‍। अखुनका हि‍साबसँ मंदि‍र छोटे मुदा जइ दि‍न बनौल गेल बहुत सुन्‍दर मंदि‍र रहै। ओना अठासीक भुमकममे खसि‍ पड़ल मुदा स्‍थान आरो चमकि‍ गेल। ओही मैदानमे दुर्गोपूजा होइए आ मुसलमानक दाहाक मेला सेहो लगैए। मेलामे अकसरहाँ बेपारि‍यो आ देखि‍नि‍हारो हि‍न्‍दुएक परि‍वार रहैत अछि‍। दोसर स्‍थान राधा-कृष्‍ण, राम-जानकी, हनुमान-महादेव सबहक सम्‍मि‍लि‍त स्‍थान अछि‍। एके स्‍थानपर रामो-जानकी आ राधो-कृष्‍ण छथि‍। स्‍थान बहुत पुरान अछि‍। बौधू दास स्‍थान बनौलनि‍। शुद्ध वैरागी छलाह। परि‍वार नै छलनि‍, मुदा स्‍थानकेँ स्‍थान बनौने रहथि‍। कमसँ-कम एक बेर अपनो सौंसे गाम घुमैत छलाह आ सभसँ हब-गब करै छलाह। लोको उपकैड़-उपकैड़ कहै छलनि‍ जे बाबा औझुका सि‍दहा हमरे दि‍ससँ रहतै। असकरे घुमैत छलाह। ओना ओ ठकुरबाड़ी बनौने छलाह, मुदा बि‍नु मुर्तिएक। लोकक दुख-दर्दकेँ हृदएसँ पकड़ैत छलाह। भखरौली (सुखेत) नील कोठीक सेहबाक (अंग्रेज बेपारी) अन्‍याय नै बरदास कऽ सौंसे बेरमा लोककेँ कहलखि‍न जे एकरा भगबैक अछि‍। तेपटा जमीन लऽ लऽ सभटा खेत मारने जाइए। डेढ़-हथ्‍थी  लऽ कऽ अपनो घुमै छलाह आ वएह नेने आगू भेलाह। भेबे नै केलाह, कऽ कऽ देखा देलखि‍न। ओही स्‍थानपर महावीर दास भेलाह। गरीब परि‍वारक महावीर दास कबीर पंथक सीख, स्‍थानपर आबि‍ गेलाह। बौधूओ दासक उमर नि‍च्‍चा मुँहेँ भेलनि‍। महावीर दासकेँ राखि‍ लेलनि‍। वैष्‍णव रहबे करथि‍। मुदा बौधू दासक प्रभाव रहबे करनि‍, जइसँ बहुत उमेरक पछाति‍ बि‍आह केलनि‍। साधारण परिवारसँ आएल महावीर दासक वि‍चार बहुत उदार छलनि‍। भूमि‍हार रहि‍तो सबहक परि‍वारमे कबीर पंथी परि‍वार बूझि‍ भात-रोटी सभ खाइ छलाह। वैदागि‍रीक ज्ञान भेलनि‍। वैदागि‍री खूब बढ़लनि‍। वएह आमदनी देखि‍ बि‍आहो करौल गेलनि‍ आ केबो केलनि‍। ताधरि‍ स्‍थानमे बीघा पाँचेक, समाजक दान कएल, जमीनो भऽ गेल छलनि‍। हफीम खाइ छलाह। मुदा स्‍वाभवसँ बहुत उदार छलाह। परोपट्टामे नाम कमेने छलाह। भगवानक दरवार (ठकुरवाड़ी) मे पैघसँ पैघ आ छोटसँ छोट जे कि‍यो संगीतज्ञ औताह जहाँ धरि‍ बनि‍ पड़त खुशीसँ वि‍दा करबनि‍। से भेबो कएल। परोपट्टाक दरवारी दास होथि‍ आकि‍ छठू दास, हि‍ताइ दास होथि‍ कि‍ लखन दास, जि‍नके ढोलकि‍या बम्‍बइमे नामी छथि‍, तहि‍ना नाटक-नौटंकी इत्‍यादि‍-इत्‍यादि‍। अपन स्‍वभाव वएह रहनि‍ जे जखन हफीमक नशा सि‍रचढ़ रहनि‍ तखन वि‍दा करथि‍। तेसर स्‍थान छी ब्रह्म स्‍थान। अखनो बीघासँ ऊपर जमीन स्थानमे अछि। पक्का माकन। अांगन बाड़ी केन्‍द्र, धर्मराज स्‍थान सभ सटले-सटल। जाधरि‍ पंडि‍त उपेन्‍द्र मि‍श्र, जे वेद, व्‍याकरण, साहि‍त्‍य आ ज्‍योति‍षक आचार्य छलाह, साले-साल काति‍क मासमे पनरह दि‍न भागवत करै छलाह। ओना ओ तते गंभीर आ संयमी छलाह जे एक शब्‍द फाजि‍ल नै बजैत छलाह जइसँ बनौआ पंडि‍तक बीच उपहासक पात्र बनल छलाह जे हुनका थोि‍थये ने छन्‍हि‍। अपन स्‍थान बूझि‍ गामेपर सँ चौकी नेने अबैत छलाह आ आसनक जे प्रक्रि‍या छै से करैत बैसि‍ जाइ छलाह। पहि‍ने दू-तीन दि‍न परचारे होइमे लागि‍ जाइ छल मुदा जेना-जेना परचार होइत जाइत छलै तेना-तेना सुननि‍हारोक आ भागवतकेँ आगू बढ़बैक ओरि‍यानो करैत जाइत छलाह। एकटा महावीर जी स्‍थान, पोखरि‍क माहरपर अधसुखू कटहरक गाछ लग धूजा गाड़ि‍ स्‍थान स्‍थापि‍त भेल। पूजा शुरू भेल। एकटा अद्भुत भेल। अद्भुत ई भेल जे अधसुखू कटहरक गाछ पानि‍ पीब जोर केलक। गाछ लहलहा उठल। मझोलके गाछ, जेना डारि‍-पात सभमे फड़ैक शक्‍ति‍ आबि‍ गेलै। डेढ़ सएसँ अढ़ाइ सए तक फड़ हुअए लगलै। भलहिं तीन-चौथाइमे कोह नहि‍ये होइ, कमरि‍ये टा होइ। वएह कटहरक गाछ स्‍थानक प्रभावकेँ तेज केलक। इलाकामे समाचार पसरि‍ गेल। अष्‍टयाम कीर्तन (रामनवमी, चैत) शुरू भेल जइमे तीन मनसँ पाँच मनक बीच गहुम-चाउरक परसाद बनैत आ खर्च होइत छल। जे एक-एक मुट्ठी कऽ बाँटल जाइत छल। लकड़ीक मंडप बनल रहैत छल जत्तऽ वि‍सर्जनक पछाति‍ नगर कीर्तन होइत छल। नगर कीर्तनक अर्थ भेल चारि‍ गोटे मंडपकेँ उठा आगू-आगू सौंसे गाम घुमैत छलाह आ पाछू-पाछू कीर्तन-भजन होइत समाजो घुमैत छलाह। जि‍नका जे जुड़ैत छलनि‍ से चढ़ेबा चढ़बै छलाह। जइसँ साज-बाज कीनल जाइत छल। तहि‍ना मुसहर सभ सेहो आसीन मासमे पूजा करैत छलाह आ अखनो करैत छथि, मिरदंग-झालि‍ लऽ दस गोटे सौंसे गाम घूमि‍ चंदा करै छलथि/ छथि‍ जइसँ पूजाक खर्च चलै/ चलैए। तहि‍ना मुसलमानो सभ दाहा बनबै छथि‍ आ सौंसे गाम घुमै छथि‍। एहेन भायचारा चलि‍ आबि‍ रहल अछि‍। तहि‍ना सालमे दू स्‍थानपर दुर्गा पूजा, महावीर जी स्‍थानमे दर्जनो अष्‍टयाम, नवाह, तीन दि‍नक कबीर पंथक संत सम्‍मेलन दर्जनो साहि‍त्‍यि‍क गोष्‍ठी, दुआर-दरबज्‍जापर कीर्तन-भजन इत्‍यादि‍-इत्‍यादि‍ चलि‍ते रहैए। ततबे नै तीन-तीनटा महंथो, तीन सम्‍प्रदायक, आधा दर्जन कीर्तनो मंडली, जे रोजगार बनौने छथि‍, सभ चलि‍ रहल अछि‍। आखि‍र मि‍थि‍लाक समाज छि‍ऐ कि‍ने। एक तँ ओहि‍ना सरसठि‍क चुनाव हवा बहौलक, तइपर बेरमाक भगवती (१९६९ स्‍थापि‍त) सेहो अपन दुआरि‍ खोलि‍ देलनि‍। गामक आयात ि‍नर्यात आन-आन समाजसँ बढ़ल। दुनू हवा चलल, एक दि‍स सभ जाति‍क बीच दुर्गापूजा एली तँ दोसर-दि‍स नव जवानक हृदैमे कि‍छु करैक उत्‍साह सेहो भरल। ओना समाज समुद्रोसँ नमहर अछि‍। तँए समाजक भीतर की सभ होइ छै, कहब कठि‍न अछि‍। मुदा कि‍छु जे देखबामे अबैए ओ छी स्‍त्रीगणक माध्‍यमसँ नैहर-सासुरक बीच पाइ-कौड़ी, गहना-जेबरक बन्‍हकी-छनकी। कोन गामक गहना कोन गाम गेल कहब कठि‍न। दोसर गामोक बीच महाजनी आ आनो-आनो गामक बीच। जमीन्‍दारीक रूआब तँ खनदानी रूआब बनैए, जँ से नै बनैए तँ अंग्रेज सेहबा चलि‍ गेल आ सहाएबक बीआ‍ छि‍टा गेल। मैनजन, महाजन, जमीन्‍दारक संग जाति‍ साम्‍प्रदायि‍क कते सूत्र लागि‍ गेल अछि, बेरमावासीकेँ ऋृण दैमे अगुआएल जाति‍क। खाली एकटा पछुआएल दाता, मुदा कारोबार छोट। बेपारीक शासनो जमीन्‍दारसँ भि‍न्न होइत। खैर जे होउ? श्राद्ध-कर्म आ बि‍आह कर्म रोकब पुरोहि‍त सभ घोषणा कऽ देलनि‍। गामक लोकक बीच समस्‍या ठाढ़ भेल जे आब की हएत? कबीर पंथी महात्‍मा सभकेँ रास्‍ता भेटलनि‍, घोड़-दौड़ शुरू केलनि‍। समाजमे उठैत आगि‍ ठमकल रहल। कबीर पंथी सभ तेहेन जे जएह घर बसबए चाहै छथि‍ तेहीमे आगि‍ लगबै छथि‍। गति‍-मुक्‍ति‍क वि‍चार तँ समाजमे दइ छथि‍न मुदा औझुका बात कहबे ने करै छथि‍न। आइ हम की छी, सबहक प्रश्न छी। कबीरक पाँति‍ छन्‍हि‍ जे “साइ इतना दीजि‍ए....।” मुदा कऽ कतएसँ दैथि‍ तइठाम कने झल भऽ जाइ छै। तहि‍ना मायाक बुनि‍यादसँ ऊपर उठि‍ वि‍चार रखै छथि‍ जइसँ झल अन्‍हार भऽ जाइ छै। अध्‍यात्‍म ओहन पद्धति‍ छि‍ऐ जे मनुष्‍यकेँ मनुष्‍य बनैक लूरि‍ दइ छै। खाली लुरि‍ये नै ओहन बुधि‍यो दइ छै जेकरा सुपर मैन कहै छि‍ऐ। कि‍नका ई अभि‍लाषा नै छन्‍हि‍ जे सुपरमैन बनी। मुदा, से कि‍अए ने भऽ पबैए। जंगलमे लाखो गाछ एक संग जीवन-यापन करैत हवो-वि‍हाड़ि‍क झोंक सहैए। एकैसम शताब्‍दीक मांग अछि‍ जे स्‍वतंत्र मनुख बनि‍ स्‍वतंत्र वि‍चरण कऽ सकी। जइठाम बाट-घाट सभ असुरक्षि‍त अछि‍ तइठाम दि‍ल्‍ली दूर नै तँ लग अछि‍। तखन जाए दि‍औ जेहो खेलक सेहो पचताएल जे नै खेलक सेहो पचताइए। ओना १९६० ई.सँ जगदीश प्रसाद मण्डल खेतीसँ थोड़ बहुत जुड़ि‍ गेल रहथि। मि‍रचाइ, भट्टा, कोबी, अल्‍लू इत्‍यादि‍क लगसँ खेती शुरू केलनि। धान, मरूआ, रब्‍बी-राइक खेती जने हाथे हुअए लगलनि। भायकेँ खेतीसँ कम सरोकार। तहूमे अमानत पढ़ि‍ लेने रहथिन्ह‍। जमीनक खि‍स्‍सा-पि‍हानी ओहन जे महि‍नो भरि‍मे अन्‍त नै लैत रहए। मुदा अपनो जि‍नगीले तँ लोक कि‍छु सोचि‍ते अछि‍। नाच दि‍स झुकि गेलाह। मुदा गरीबक कलाकेँ उभाड़ब धीया-पुताक‍ खेल नै। खैर जे होउ। भोगेन्‍द्र जी सम्‍पर्कमे एला पछाति‍ खेतीक प्रति‍ आरो जि‍ज्ञसा तेज भेलनि। तेज ऐ दुआरे भेलनि जे जर्मनी, जापानक खेतीक बात ओ मनमे बैसा देलखिन्ह‍। हि‍साब जोड़थि तँ दस कट्ठा खेत एक परि‍वारक (पाँच गोटे) लेल बेशि‍ये‍ बूझि पड़नि। तहूमे साइबेरि‍याक ओहन कि‍सान अछि‍ जे सालक छह मास, आठ मास ढकल बर्फ हटि‍ते धड़-फड़मे तेना कऽ खेती कऽ लइए जे बढ़ि‍या उपजा उपजा लइए। आइ भलहि‍ं मि‍थि‍लांचलक अदहासँ बेसी भाग बलुआ गेल अछि‍, माटि‍ ऊपर बालु भरि‍ गेल अछि‍। समस्‍या ओते भारी अछि‍ जे जहि‍ना बालु तरसँ ऊपर आबि‍ भूमि‍केँ मारि‍ देलक तहि‍ना ओकरो अटावेश करैत कि‍सानक हाथमे खेत आबए। बि‍हारक मूल पूँजी‍ खेत छी, जते खेती समृद्ध हएत तते राज्‍यो समृद्ध हएत। एक तँ अपन हाथक पूँजी, खेत, दोसर जखन राजनीति‍सँ जुड़ि‍ गेलथि तखन तँ काजो बढ़ि‍ गेलनि। खेती ि‍दस ढंगसँ बढ़ैक कोशि‍श केलनि। पूसा मेलासँ खेतीक कि‍ताब कीनि‍-कीनि‍ अनए लगला। कि‍सानक जे कार्यक्रम होइ तइमे जाए लगला। राजनीति‍सँ जुड़ने कोट-कचहरी सेहो घुमए लगला। मधेपुर ब्‍लौकमे जुबेर सहाएब पी.ओ. रहथिन्ह‍। बहुत शरीफ लोक‍। अपनापन बहुत अधि‍क रहनि‍। हुनकासँ सम्‍पर्क भेलनि। ओ एग्रीकल्‍चर ग्रेजुएट। स्‍कूल-काओलेज जकाँ घंटो-घंटो खेतीक बात लोककेँ बुझबैत रहथि‍न। हुनका सम्‍पर्कसँ ई भेलनि जे जतए हुनकर कार्यक्रम होन्‍हि‍ जानकारी देथिन‍। एग्रीकल्‍चर महावि‍द्यालय- पूसो-ढोलीमे सालमे एक बेर नमहर आ छोट-मोट कार्यक्रम चलि‍ते रहैत छल। १९६० ई.सँ पूर्व बेरमा गाममे ने एकोटा बोरि‍ंग रहए आ ने दमकल। सभसँ पहि‍ने (१९७१-७२) स्‍व. सत्‍य देव झा, जे पढ़ल-लि‍खल तँ नहि‍ये छलाह मुदा एवरेडी बैट्रीक कम्‍पनी कलकत्तामे नोकरी भऽ गेल रहनि‍, सेवा ि‍नवृत्त‍ भेल रहथि‍। बंगालक खेतीक जानकारी भइये गेल रहनि‍। सोचलनि‍ जे पाँच बीघा खेत कीनि‍ जँ बोरि‍ंग करा लेब तँ परबरि‍स चलि‍ जाएत। से करबो केलनि‍। वएह बोरि‍ंग पहि‍ल छी। खेतीक जानकारी भेने पानि‍क महत लोक बुझए लगै छै। राजनीति‍क पार्टी बनि‍ये गेल रहए। सरसठि‍क रौदीक पछाति‍ बोरि‍ंग-दमकलक योजना सेहो जनमल, मुदा सतमसुआ। बेरमा गाममे बी.डी.सी.क बैसार भेल। डी.एम. सेहो आएल रहथि‍। ब्‍लौकक सभ रहबे करथि‍। तोहफाक रूपमे डी.एम. सहाएब, ति‍हाइ सवसि‍डीक रूपमे बोरि‍ंग-दमकलक चर्चक संग कि‍सानक दशा-दि‍शाक चर्च सेहो केलनि‍। चारि‍ श्रेणीमे कि‍सानक बँटबाराक चर्च करैत सबहक लाभक चर्च केलनि‍। जगदीश प्रसाद मण्डल आ चारि गोटे माने पाँचटा कि‍सान वि‍चार केलनि जे अवसरक उपयोग करता। पूसा-ढोलीसँ लऽ कऽ जि‍ला-ब्‍लौकक बीच जे कि‍सान मेला वा गोष्‍ठी होइ तइ सभमे जाइत-अबैत रहथि, ओना पाँचो गोटे बोरि‍ंग गड़बैक वि‍चार केलनि मुदा दू गोटे नै गड़ौलनि‍। बोरि‍ंग गरौला पछाति‍ नव-नव धान, गहुम इत्‍यादि‍क बीआ सेहो आनए लगला। अखन (२०१२ ई.मे) जते धानक उपज नै भऽ रहल अछि‍ तइसँ बेसी आठम दशकमे हुअए लागल छल। सीता धान, जे मेहि‍यो होइत अछि‍ आ खाइयोमे नीक होइत अछि, सवा क्‍वीन्‍टल कट्ठा उपजए लागल। ि‍सर्फ धाने गहुम नै, आलू-कोबी, टमाटर इत्‍यादि‍क खेती सेहो जोड़ पकड़लक। जे गाम कर्जक तरमे दबल छल ओ अपना पएरपर ठाढ़ हुअए लागल। गामसँ जमीन्‍दारो सभ चलि‍ गेल रहथि‍। एक गोटे मात्र बँचल रहला, जि‍नका भाँजमे एक सय दस बीघा जमीन। जइपर पछाति‍ जबरदस लड़ाइ भेल। बी.डी.सी.क बैसारमे डी.एम. सहाएब सूदखोर महाजनक चर्च वि‍स्‍तारसँ केने रहथि‍। संग-संग ईहो कहि‍ देलखि‍न जे दोबरसँ फाजि‍ल जे महाजन लेताह हुनकापर कानूनी कारवाइ हेतनि‍। कर्जदार सभ नि‍चेन भऽ गेलाह जे जहि‍या हएत‍ तहि‍या ने देबै। नै रहने कतए सँ देबै। मुदा महाजनक आक्रमण भेल। पकड़ा-पकड़ी शुरू भेल। खेतीक संग-संग गाममे आरो-आरो काज सभ हुअए लागल। गामक जते बान्‍ह–सड़क अछि‍ ओकरा नक्‍शासँ अनुमूल बनौल गेल। जइसँ गामक रूपे-रेखा बदलि‍ गेल। ई भेल जन-सहयोगसँ। पछाति‍ सरकारि‍यो योजना सभसँ माटि‍क काज, खरंजा इत्‍यादि‍ होइत रहल। अखन तँ सहजहि‍ गामक ओहन रूप बनि‍ गेल अछि‍ जे एकोटा परि‍वार नै अछि‍, जेकरा घरक आगू चरि‍पहि‍या सवारी नै जा सकैए। तहि‍ना प्रति‍ दू परि‍वारपर पानि‍ पीबैक साधन बनि‍ गेल अछि‍। तहि‍ना प्रति‍ आठ बीघापर बोरि‍ंग (प्राइवेट) अछि‍। ओना पछि‍मी कोसीक नहरि‍क दूटा शाखा सेहो उत्तरे-दछि‍ने, पूबो आ पछि‍मो बनि‍ रहल अछि‍। तइ संग स्‍टेट बोरि‍ंग सेहो गराएल अछि‍। मुदा चालू नै भेल अछि‍। तहि‍ना आबागमनक सुवि‍धा सेहो अछि‍ये। एक दि‍स रेलबे स्‍टेशन तीन कि‍लोमीटरपर अछि‍ तँ दाेसर दि‍स एन.एच. दू कि‍लोमीटरपर अछि‍। जहि‍ना वसंत ऋृतु अबि‍ते मेघमे ठेकल गाछसँ लऽ कऽ माटि‍मे ओंघराएल ध‍रतीमे नव पात, नव कलश, नव कोढ़ीक संग नव फूल दैत तहि‍ना समाजक फुलवाड़ीमे फूलक अंकुर दि‍अए लागल। रंग-बि‍रंगक समस्‍या (पोजीटि‍व-नि‍गेटि‍व दुनू) उठि‍-उठि‍ ठाढ़ हुअए लागल। जगदीश प्रसाद मण्डल सभ सेहो वि‍चार केलनि जे समाजक उत्‍थानमे जाति‍क कट्टरपन बाधा छी। ओना जँ जाति‍क बीच कथा-कुटुमैती होइत अछि‍ तँ ओ दू समाजक बीचक प्रश्न बनि‍ जाइत अछि‍। मुदा समाजक बीच जाति‍क छुआ-छुत बहुत नमहर खाधि‍ बनबैए। तँए महि‍नामे एकबेर बैसार करब आ ओ करब टोले-टोल घूमि‍-घूमि‍, ई सबहक विचार भेलनि। बैसारमे कोनो बेसी जोगारक प्रश्न नै, मुदा टोलबैयाक वि‍चारसँ, जँ ओ सभ खाइ-पीबैक बेवस्‍था करथि‍ तँ सेहो बढ़ि‍याँ, सभ खाएब, ई सबहक विचार भेलनि। अखनो धरि‍ खाइते छथि। सभ जाति‍क बरि‍आति‍यो आ भोजो-काजमे खाइते छथि। हँ ई बात जरूर अछि‍ जे अखनो ति‍तम्‍हा चलि‍ते रहल अछि‍, मुदा सभ जाति‍क सहयोग रहने कम पड़ि‍ जाइए। ई बहुत नीक कदम भेल। परोपट्टामे जेना पसाही लागि‍ गेल। ओना झंझारपुर ब्‍लौकमे कमलासँ पछि‍म नागेन्‍द्रजी (डाॅ. नागेन्‍द्र कुमार झा डाॅ. धीरेन्‍द्रक माि‍झल भाए), पूब फुलपरास ब्‍लौकमे कामेसर जी (श्री कामेश्वर राम) सेहो क्रान्‍ति‍क सूत्रपात केलनि‍। जमि‍ कऽ तीनू ब्‍लौकमे पार्टीक प्रभाव बढ़ल। तइ बीच नागेन्‍द्रजी पार्टी स्‍कूल चलौलनि‍। लग रहने तीनू दि‍न जगदीश प्रसाद मण्डल सभ भाग लेलनि। केन्‍द्रक नेता सबहक संग रहैक मौका भेटलनि। हुनको सबहक इच्‍छा भेलनि‍ जे बेरमोमे एहि‍ना हुअए। से भेबो कएल। टोले-टोलक मीटि‍ंगमे टोलक समस्‍या मुख्‍य मुद्दा बनल रहैत छल जइसँ गामक अध्‍ययन अधि‍कसँ अधि‍क गोटेकेँ हुअए लगलनि‍। चौक-चौराहापर सि‍नेमा-सर्कशक गप-सप नै भऽ गामक समस्‍याक गप शुरू भेल। मुदा चालैन जकाँ रोगाएल समाज। ओना आन गामसँ भि‍न्न बेरमाक बनाबटो अछि‍। तेकर मुख्‍य कारणमे एकटा ईहो कारण अछि‍ जे आइ धरि‍ गमकट्टा (धार)क पल्‍ला नै पड़ल। कहैले बहुत पहि‍नेसँ एकटा सुपैन (प्राचीन नाम सुपर्णा) धार अछि‍ मुदा अजेगर साँप जकाँ ई एकेठाम बैसल रहल। तहूमे तीनि‍ये मास धार रहैए बाकी मास मुर्दघट्टीसँ लऽ कऽ चारागाह बनल रहैए। गाममे अधिक बासभूमि रहने ऊँचगर जमीन पर्याप्‍त अछि‍। मझोलका कि‍सान बेसी रहने जमीनक छोट सीमांकन। मुदा पटबैक बेवस्‍था नै रहने बाड़ि‍ओ-झाड़ीमे मड़ूए-गम्‍हरिक खेती होइत छल। तरकारीक खेतीले ऊँचगर जमीन माने चौमास खाली बरि‍याति‍ऐक लेल होइए, बाकी मध्‍यमो जमीन (चौर छोड़ि‍), दू बेर (दू फसल) उपजैत अछि‍। कि‍छु बोरि‍ंग भइये गेल, चापाकल सेहो लोक लगौलक। तरकारी खेती जोर पकड़लक। कतेक परि‍वार उठि‍ कऽ ठाढ़ भऽ गेल। महाजनी सेहो बन्न भइये गेल रहए। जइसँ समस्‍या सेहो उठल रहए। सन् सैंतालीस... भारतक स्वतंत्र त्रिवार्णिक झण्डा फहरा रहल छल। मुदा कम्यूनिस्ट पार्टीक माननाइ छल जे भारत स्वतंत्र नै भेल अछि। असली स्वतंत्रता भेटब बाँकी छै... मिथिलाक एकटा गाम… जन्म भेल रहए एकटा बच्चाक.. ओही बर्ख ... ओइ स्वतंत्र वा स्वतंत्र नै भेल भारतमे... पिताक मृत्यु...गरीबी.. केस मोकदमा... वंचितक लेल संघर्षमे भेटलै स्वतंत्र भारतक वा स्वतंत्र नै भेल भारतक जेल.... आइ बेरमामे पाँच-दस बीघासँ पैघ जोत ककरो नै.. ओइ गाममे जीवित अछि आइयो किसानी आत्मनिर्भर संस्कृति... पुरोहितवादपर ब्राह्मणवादक एकछत्र राज्यक जतऽ भेल समाप्ति.. संघर्षक समाप्तिक बाद जिनकर लेखन मैथिली साहित्यमे आनि देलक पुनर्जागरण... जगदीश प्रसाद मण्डल- एकटा बायोग्राफी...गजेन्द्र ठाकुर द्वारा (अनुवर्तते...) ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com  पर पठाउ। गजेन्द्र ठाकुर ggajendra@videha.com http://www.maithililekhaksangh.com/2010/07/blog-post_3709.html २.गद्य २.१.जितेन्द्र झा-राजेश्वर नेपालीक सातटा कृति विमोचित २.२.कैलास दास-म्याराथन दौड़ आ जनकपुर २.३.कामिनी कामायनी-कलंकित चान २.४.जगदीश प्रसाद मण्डल-किछु विहनि कथा २.५.विजय मस्त-सुजीतक सम्पूर्ण कथा एकटा नया स्वाद देलक २.६.१.ओम प्रकाश-विहनि कथा- प्रोग्रेसिभ २.पंकज चौधरी (नवलश्री)-विहनि कथा - ई नोर छै गरीबीक २.७.डॉ. अरुण कुमार सिंह- स्वातन्त्र्योत्तर मैथिली कथामे सामाजिक समरसता २.८.१.राजदेव मंडल-लघुकथा-एलेक्‍सनक भूत २.प्रो. वीणा ठाकुर-लघुकथा- परि‍णीता ३.मनोज कुमार मण्‍डल- लघुकथा-घासवाली ४.कपि‍लेश्वर राउत- विहनिकथा-सलाह जितेन्द्र झा राजेश्वर नेपालीक सातटा कृति विमोचित

पत्रकार तथा साहित्यकार राजेश्वर नेपाली लिखित ७ टा कृतिक एक्कहिबेर विमोचन कएल गेल अछि । राष्ट्रपति रामवरण यादव राष्ट्रपति भवन, शीतल निवासमे आसिन १३ गते शनिदिन आयोजित कार्यक्रममे नेपाली लिखित पोथीसभक विमोचन कएलनि ।

पुस्तकसभ नेपाली, मैथिली आ हिन्दी भाषामे अछि । जनकपुरमे रहि पत्रकारितामे सक्रिय नेपाली लिखित लोकतन्त्रको लालिमा आ विचारक्रान्ति नेपाली कविता संग्रह, गरिबको व्यथा नेपाली खण्डकाव्य, नव नेपाल हिन्दी कविता संग्रह, सोहागिन आ विचारक्रान्ति मैथिली कविता संग्रह आ क्रान्तिकारी सरयुग चौधरीको जीवनी विमोचित भेल । राष्ट्रपति रामवरण यादव राजेश्वर नेपालीक पत्रकारिता आ साहित्यिक योगदानके प्रशंसा कएने रहथि । नेपाली काँग्रेसक कृयाशील कार्यकर्ताक रुपमा प्रजातन्त्रक लेल संघर्ष करैत काल नेपालीक सँग बिताओल दिन राष्ट्रपति याद कएने रहथि ।

मिथिलाञ्चल क्षेत्रक विभूति, शहिदके विषयमे पत्रिकामे लिखिकऽ जीवन्त रखबाक काज नेपालीक सराहनीय पक्ष रहल राष्ट्रपतिक कहब छलनि । साहित्य, पत्रकारिता आ राजनीति तीनू क्षेत्रमे नेपालीक दखल रहल कहैत राष्ट्रपति यादव हुनका बहुआयामिक व्यक्तित्वके संज्ञा देलनि । “मिथिलाक पाबनि तिहार, ऐतिहासिक स्थल, आ विभिन्न महत्वपुर्ण राजनीतिक घटनाक विषयमे जानकारी लेबालेल नेपालीसँ सम्पर्क करैत छी” राष्ट्रपति कहलनि ।

नेपालीक कृतिमे स्वच्छन्दतावादी चेतनाक प्रवाह भेल बात प्रा. कुलप्रसाद कोइराला कहलनि । डा.रामदयाल राकेश राजेश्वर नेपालीके पत्रकारक रुपमे मात्र नहि साहित्यकारके रुपमे सेहो सम्मान भेटबाक चाही ताहिपर जोड देने रहथि । प्राध्यापक कुलप्रसाद कोइराला विमोचित पुस्तकसभमे व्यावसायिक दृष्टिसँ किछु कमजोरी रहितो भाव बुझएबामे सफल रहल कहने रहथि । नेपाली लिखित मैथिली कृति अन्य भाषाक हुनके कृतिपर भारी पड़ल हुनक टिप्पणी छलनि । तहिना आशा सिन्हा, पुरुषोत्तम दाहाल कृतिक विषयमे मन्तव्य व्यक्त कएने रहथि । रविन्द्र साह स्मृति प्रतिष्ठान, जनकपुरद्वारा आयोजित कार्यक्रममे वक्तासभ नेपालीक कृति सभमे समग्रमे सामाजिक चेतनाके उद्घाटित करबाक प्रयास भेल कहने रहथि । ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। कैलास दास म्याराथन दौड़ आ जनकपुर जनकपुरक रंगभूमी मैदानमे शनिदिन भेल म्याराथन दौड़ प्रतियोगिता एखन धरिक ऐतिहासिक आ प्रथम रहल अछि । आयोजकक अनुसार एहि प्रतियोगितामे २० देशक सहभागीक आमन्त्रण कएल गेल छल । मुदा १८ देशक खेलाडी सभक भीसा पास नहि भेलाक कारण भारत आ नेपालक ७५ जिल्लाक एहि प्रतियोगितामे मात्र सहभागी भऽ सकल । ओना जनकपुरक लेल बहुत पैघ प्रतियोगिता छल । आयोजकक अनुसार चारि महिना पहिले सँ एकर तैयारी भऽ रहल छल । मुदा शनिदिन प्रतियोगिताक सफलता भेटल । स्थानीयवासीसभ म्याराथनक खेलाडी सभकँे सडक पर दौड़ देखि कऽ ताली बजा स्वागत कएने छलथि । भोरे सँ नगरक सफाई सँगहि पुुलिस, ट्राफिक आ एहिमे खटल स्वयं सेवक सभ व्यवस्थित करएमे जुटल छल । म्याराथन प्रतियोगिता तीन चरणमे बाटल गेल छल । फुल म्यराथन, मिनी म्याराथन आ भेन्ट्रान्स म्याराथन । मिनी म्यराथनमे खास कऽ जनकपुरक स्कुल सभक धियापुता सभक सहभागीता छल । भेन्ट्रान्स प्रतियोगितामे ४० वर्ष उमेरक व्यक्ति सभक सहभागिता छल आ फुल म्याराथनमे नेपाल भारत सँ आएल खेलाडी सभक सहभागिता छल । फुल म्याराथन प्रतियोगिता ४२ किलोमिटरक धरि छल । जनकपुरक रंगभूमि मैदान सँ प्रारम्भ भेल दौड़ ढल्केवर पहुँच कऽ फेर सँ जनकपुर आएल छल । मिनी म्यराथन प्रतियोगिता जनकपुरक रिङ्ग रोड कायम कएने छल । ई दौड देखबाक लेल नगर भितर स्थानीयवासी सभक भीड छल तऽ जनकपुर ढल्केवर सडकखण्डमे पुलिस स्वयं सवेक मात्र नहि एहि क्षेत्रक ग्रामीण जनता सभ उत्साह पूर्वक सडकक कातमे ठाढ़ भऽ खेलाडी सभकेँ ताली बजा कऽ स्वगत कएने छल । बीच बीचमे खेलाडी सभक लेल पानिकँे सेहो व्यवस्था छल । फुल म्याराथनमे प्रथम होबएवलाकँे ५० हजार, दोसर होबएवला २५ हजार आ तेसर होबएवला १० हजार पुरस्कार देल गेल अछि । तहिना मिनी म्याराथनमे प्रथम होबएवलाके १० हजार, दोसर होबएवलाके ५ हजार आ तेसर होबएवलाके ३ हजारक पुरस्कार देल गेल अछि । भेन्ट्रान्स म्याराथन विजेताक लेल प्रमाणपत्र देल गेल अछि । कोनो खेलाडीक लेल पुरस्कार सँ महत्वपूर्ण हुनक प्रतिभा पर देश आ समाज गौरवान्वित होइत अछि । शनिदिन भारत आ नेपाल बीच भेल खेलमे नेपाली खेलाडी मात्र विजयी भऽ सकल अछि । एहि सँ अनुमान लगाओल जा सकैया जे एखनो नेपालक मधेशमे भावी खेलाडी सभ अछि । मुदा हुनका सभक अवसर नहि भेटलाक कारण ओ सभ अपन प्रतिभा देखाबए सँ वञ्चित होइत आएल छथि । स्वास्थ्यए जीवन अछि आ स्वस्थ्य रहबाक लेल खेलकुदक विकास आवश्यक अछि । एकटा कहावत अछि जे जतए कला सँस्कृति आ खेलक विकास होइत अछि ओतए पूर्ण स्वास्थ्य वातावरणक विकास होइत अछि । तएँ कहल जाए तऽ म्याराथन प्रतियोगिता सँ एतुका धियापुताकँे मात्र नहि सम्पूर्ण नगरवासीक लेल गौरवक विषय छल । एहिमे सहयोग करएवला सभक धन्यवाद आवश्य देबहेटा पड़त । म्याराथन प्रतियोगिता जाहि रुप सँ व्यवस्थित होएवाक चाहि ओ तऽ नहि भेल मुदा आयोजकक प्रयासकँे सेहो धन्यवाद देबहे पड़त । शनिदिन ऐतिहासिक धरोहर रंगभूमि मैदानमे खेलाडी सभक उत्साह आ उमंग सँ खचाखच भडल छल । खास कऽ कहल जाए तऽ स्थानीय बालबालिका जखन दौड रहल छल ओकरा पाछू हुनक अभिभावक सेहो देखिकऽ बड खुशी व्यक्त करैत छल कि जीत मात्र सफलता नहि होइत अछि । कम्तिमे एहि प्रतियोगितामे भाग लेबाक लेल अवसर तऽ भेटल । मिनी म्याराथन प्रतियोगिताक सहभागी विद्यार्थी सभक अखन धरि किताब आ टिवीमे मात्र देखि कऽ कल्पना कएने होइतो मुदा शनिदिन जखन स्वयं सहभागी भेल तऽ हुनका सभक एकटा सिख भेटलन्हि जे हमहँु सभ आबएवला दिनमे जीतक सफलताक प्रयास करी । ई प्रतियोगिता सँ जनकपुर धार्मिक पर्यटकीय सँगहि खेलकुदक एकटा भूमि सेहो अछि सन्देश दऽ रहल अछि । ओना एहि प्रतियोगिताक सफलतामे साथ देने सम्पूर्ण युवा क्लव, संघ संस्था सहितक व्यक्ति सभक धन्यवाद नहि एहि सँ पैघ काज करवाक उम्मिद रखवाक अपेक्षा करैत छी । ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। कामिनी कामायनी कलंकित चान ओ टूहटूह इजोरिया . . सम्पूर्ण आकाश पर पूर्ण चंद्रक एकाधिपत्य. .दूर दूर धरि ठहक्का मारैत चॉदनी।नीचाधरती पर शीतल अमृतक धार .. ।ओहि निरमल धार सॅ सींचल गाछ . बिरीछ .खरिहान. दलान . .. बाडी झाडी .. ।पूबरिया बाडी मे पतियानी लागल केरा के गाछ .. मे लटकल घौंद .. .नीचा आलू के फसील .. . ओही इजोरिया राति मे सब किछु एक दम फरिच्छ देखाए पडैत छल । शंभु बाबू के भरि भरि रात नीन्न नै होबैत छलैन्ह. . चारि दिन पहिनहि जेहल सॅ छुटि क’ आयल छलाह .. .अंगरेजक जमाना. . क्रांतिकारी सब के घातक अपराधी मानि लोमहर्षक यातना देल जाए. दुनु टांग बान्धि क’ टेबुल पर राखि ओ मोटका हंटरक मारि .. .. दनादन . .बेहोश सेहो नै रहै दे. . पानि पिया पिया क’ होश मे आने . .पानियो भरि छांक नै पीबै दै .. घोंट भरि दैत गिलास झीक लैक़ . पानि पीयाबए बला .. हंटर बरसाबए बाला सब स्वदेशी .। .मात्र एक गोट. . ललका मूॅह वाला बिलाडि के ऑखि वाला . .अफसर अंगरेज़ ।. .. ओ प्रताडना ओ कष्ट .. सात दिन कोना एकांत वास .. ई सब हुनक दिमाग के भॅभोरि क’ राखि देने छल. .त’ ओहि मे सुखद सुमंगल नीन्न क’ प्रवेश हो त’ कोना हो । ओ पीडादायी .. एकाकी जीवन सॅ बचबा लेल लोक पैलवार आ’ समाजक निर्माण कएने अछि. ।किएक त’ ओ सामाजिक प्राणी अछि ।किछु मे त’ लागल रहैत अछि जा धरि धरती पर रहैत अछि। स्वराज्य क’लेल लडय वला के उद्देश्य सेहो सएह छल नै कि अपन समाज पर अपन बनाओल कानून के मध्य जीवन यापन करब . .ई विदेशिया सब हक गुलामी आ’ अत्याचार किएक सहब ।हॅ .. नीन्न नैं अबैन्ह त’ मोन दुनिया जहानक’ खोंचि खॉचि मे ओझरा जाएन्ह । ई भरिपोख इजोरिया के आनंद .. . .. ।अपन दलान पर ओ एसगरे नै सुतैत छलाह . .चारि टा खटिया आ’ पॉच टा चौकी आओर बिछैल छलै. . सब पटोपट .. .नीन्न क’ जादूगरनी खाली हिनके लग नहिं आबि रहल छल ।मोन भेलैन्ह. . .बिछौन सॅ उठि क’ रस्ता पर टहली. . आलस लगलैन्ह. . . ..मोन अपन खुरलुच्ची पन मे लागल. . नचबैत रहल बडी काल धरि. . ।जखन लग्घी लगलैन्ह. . त’ उठैए पडलैन्ह. . ।दलान क’ ठीक सोझॉ रस्ता छलै आ’ तकरा लगले हुनकर आ माझिल भायक खरिहान. .. . .सात भायक भैयारी मे बखरा बॉट हाले मे भेल रहे. . पहिने त’ साझीए छलैथ सब कियो. . मेल जोल पूर्ववत ..बीच मे रस्ता खरिहान आ’ दुनु कात सबहक पोखरा पाटन घर दुआरि. . .।बडका भायक घराडी . .पूबरीया बाडी के दहिन .. बाम कात भालसरिक . . आम लताम .कागजी नेबो अररनेबा क मध्य मे मुस्कैत कदंबक गाछ ठाढ़ । अहि टूह टूह इजोरिया मे सब किछु ओहिना चमकैत देखाय पडि रहल छल ।मौसम कनि सर्दियाय लागल छलै. . कनि कनि धुऑ धुऑ सन . .सेहो लगैक़ . मुदा ई धुॅआ सेहो पघिलल चानी सन लगैक।खरिहानक दॉया कात गोहाली. .एक कोठरी मे चारू गाय पागुर करैत दोसर मे बरद चारू. . मूॅह तकैत बैसल. . लग पास के चार सब पर सजमनि कदीमा भथुआ . के लत्ती छारल . ..सब टा मिल क’ बड सुन्नर दृश्य उपस्थित करैत छल . .।एकरे सब के निहारैत निहारैत औचक हुनक धियान. . कदंबक गाछ तरि ऊज्जर नूआ मे बुलैत स्त्री पर पडलैन्ह .. एक छन के लेल देह क’ रोईयॉ रोईया ठाढ भ’ गेलन्हि. . . . किंस्यात कोनो चुडैल. . पिशाचिन .. .ओहिना बाट पर ठाढ दम सधने ओ नाशै रोग हरै सब पीडा. . .सुमिरैत ओकरे परनजरि गडौने रहला ।नैं बड लाम नै बड छोट. . मध्यम कद काठी के . . .देखैत देखैत. . कदंबक गाछ तरि जाकए विलिन भ’ गेलए. .।सब टा भूतक सुनलाहा खिस्सा मोन पडए लगलैन्ह।अहि टोल मे . .सैझला भायक पुतौह सोईरीए मे मूईल छलिह. .चिल्का जीबैत रहि गेल छल. . ।लोक कहै .. एहेन स्त्री के आत्मा अपन बच्चा पर लागल रहै छै. . ओ ओकरा पर झपट्टा मारए के फेराक मे राति भरि अहुरिया कटैत रहै छै . .।कियो कियो कदंबक गाछ तर अधरतिया मे कानब के स्वर सेहो सुनैक़. ।कियो . .बाडी मे .. पोखरिक महाड पर केश छिटकौने नचैत सेहो देखै. . मुदा नेने सॅ क्रान्तिकारी आदमी. .हुनका अहि सब पर कहियो विसबास नै भेलन्हि. . तखन ज्ञात जगत सॅ बेसी रहस्यमय अज्ञात लोक अछि. . । मुदा ओ त’ बीसीये.ा बरख पहिनुक्का खिस्सा अछि ।कनिए काल मे एक गोट लमगर पुरूख सेहो दृष्टिगोचर भेल रहे. .ओहो ओहि कदंबक गाछ तरि विलिन. . ओहि गाछक पिछुआति मे बडका गाछी छलै. . ।ओ चौंकला . .एहेन लीला त’ ओ भूत परेतक कहियो नहिं सुनने छलैथि. . अहि गंभीर चिंता मे डूबल छलाह कि कखन नीन्न आबि दबोचलकैन्ह . नहिं पता ।बडका मोटका लोहा के हथकडी . . .हंटर. . आ ..लोम हर्षक चित्कार . कियो हुनक टांग झीक रहल छल. . ड़रौन स्वप्न सॅ घबडाक’ ओ ऑखि खोलला. त’ फरिच्छ भ’ गेल छलै. . खुभिया खबास. .आबि क हुनक पएर जॉति रहल छल .। ओकरा संगे अपन खेत पथार गाछी देखैत . ..ओ रतुका प्रसंग उठौलाह . .मस्तिष्क मे बाध बोन के स्थान परवएह घुमि रहल छल ।खुभिया बड बुधियार. .एक एक आखर सोचि समझि क’ बाजए बला . .आज्ञाकारी सेहो . .हुनके समवयस्क .. .ओकर पूरा खानदान हुनके सबहक रैयत . .।रतुका प्रसंग पर ओहो अपन अकिल लगबैत चुडैल . .राकसक गप के समर्थन कएने छल । दुपहरिया मे ओ अपन दलान सॅ टहलैत बुलैत . . खरिहान. . पूबरिया बाडी के नांघैत. . कदंबक दिस गेला .. ओ त’ बडका कका के घरक पछुऔत छल . .दलान त’ हुनक दलान सॅ सोझे देखान्हि .. मुदा घर खरिहान क ऊत्तर बारी मे बनल गोहाली सॅ झॅपा जाए छलै. कदंबक गाछ दिस एकदम एकांत .. ऊम्हर राहडि सॅ भरल खेत. . इम्हर ओम्हर केरा के ढेर रास गाछ .. . . . नीचा जमीन एकदम साफ़ . .एकदम अ’ड ।दिनों मे कियो नुकैल लोक के देख नहि सकैत छल .. .।आ’ अहि गुनथुन मे सुरूज महाराज अपन सातों घोडा के हॉकैत हाफैत . .अपस्यात भेल . पच्छिम क्षितीज पर अस्त होयबाक ओरियौन करि रहल छला ।.अपन . सुवर्णमयी रश्मि के खिहारि खिहारि क पकडैत अन्ततः अस्तगामी भेला ।ताहि समय मे सूरूज डूबबा सॅ पहिनहीए घरक चार सॅ उठैत धॅू स्वच्छ आकास के मलीन करए लागै. . ई धूॅआ कतै पैघ संकेत छलै समाज मे . .।जांै केकरो घर सॅ एकोदिन धूॅआ नै निकलै. . पडोसिया स हजो पीसी तुरंत टोकि दै.थ . “आय यै . .अहॉ के घर मे काल्हि चूल्हि नै जरल की . .।’ आ ओ गिरहस्थिन डब डब भरल ऑखि सॅ नीचा तकैत नहूॅ नहूॅ बाजि उठे ‘कि कहै छथीन . .बहिन. . . घर मे एक टा दाना नै छै. . धिया पुत्ता सब के बाडी झाडी सॅ लताम तोडि क’ द’ देलियै. . .हिन्कर मोन खराप छन्हि . .केना की करीयै . .किछु नै फुरैत अछि. ।’ “ अ‍ॅ यै हमरा अछैत अहॉ उपास पडब . . .सुइद मूर लगा क’ द’ देब जहिया हैत. आय ई पसेरी भरि अन्न राखू .।’ आ’ तुरंत चूल्हि पजरि जाए । सांझे सकाले खा पीबी क’ पुरूष पात अपन अपन दलान ध’ लैथ छलैथ .।स््रत्रीगण क’ राज त’ घरे अांगन टा मे. . .छहरि देबार क’भीतर ओ सब शेरनी .बीर बंकाडा ..।मुदा जखने घर सॅ बाहरि के कोनो काज पडै. . त’ होश हवास गुम. .तखन पॉच बरखक पुरूष बच्चा से हो हुनका सब पर भारी पडय लागै. . ।पुरूषक एतेक वर्चस्व एहै जे . .स्त्री की गाछ बिरीछ सेहो डरे थरथर कॉपै ।स्त्री आ’ पुरूष के गिरहस्थी रूपी गाडी के दूनू पहिया मानल गेल अछि . तखन दूनू मे एतेक विभेद किएक़ . .शंभू बाबू स्त्री शिक्षा के पक्षधर छलाह .. . . .ओ राजा राम मोहन राय . .केशव चन्द्र सेन. . गॉधी. .नेहरू सॅ विशेष प्रभावित छलाह .हुनके सह पर सम्पूर्ण परोपट्टाके स्त्रीगण तकली :टकुआः आ चरखा पर सूत काटि क’ दैन्ह आ’ ओ मधुबनी जा कए खादी भराड मे जमा क’ दैथ. . ओही ठाम सॅ बांग .. :तूर : आनि क’ सेहो वएह देथ ।घर पैलवार के सबसॅ छोट भाय. .हुनकर गप गॉधी जी सुनने छलथि. . पंचकोशी के क्रान्तिकारी जुवक सब सुनै छल. .बहिन ..भौजाय. . भतीजी सब के चिठ्ठी पतरी लिखए जोगर पढाय वएह करौने छलथि .। राति आयल ।फेर वएह उछन्नर .. नीन्न हुनक लग पास आबि के सब के बेसुध करि दै. . मुदा हिनका छकाबए लागैन्ह. . ।निशा रात्रि . .. चारहु कात. .सुन मसान . बाध बोन सॅ नढिया .गीदडि . .कूकूर क कानब. भौंकब ।वएह टूह टूह इजोरिया .. फेर सॅ आकाश देवी धरती परअपन अमृत घट ऊझीलबा लेल उत्सुक . . .शीतल बयार बहय लगलै. . ।आ’ ई कहबी जे अद्र्व रात्रि मे भूत प्रेत भ्रमण करैत रहै छै. . हुनका बड अनसोहॉत लागैन्ह . .।ई त’ ब्रम्ह सॅ साक्षात्कार करबा क’ मुर्हूत अछि ।मोन अहिना बऊआबैत ढहनाबैत .. . .अ‍ॅखि के अपना संग नेने ओही कदंबक गाछ तरि स्थिर भेल ।रतौंधी बला बुढबा चौकीदरबा के स्वर से हो बन्न भ’ गेल छलै।मुदा आय कोनो परि वा चुडैलएखन धरि नहिं आयल छल । आ’ हुनका भेलन्ह किंस्यात भ्रम भेल होयन्हि । . .एहेन पवित्र जगह मे .. कदंब .केरा .नेबो लग कतो ओहेन ओहेन अतृप्त आत्मा भटकै । आकाश मे पितडिया थारी जकॉ पूर्ण शशि अपन हास परिहास मे लागल छल .दुधिया चांदनी. .बरैक बरैक क’ ओस बिन्दु के रूप धरि थारी सॅ खसैत रहल छल . .।आब हुनक धियान सबहक दलान .चार .. खपडैल . .कोठा खरिहान गाछ बिरीछ सॅ ढनमनाइत. . .लग पास मे सूतल चारि टा खाट आ’ पॉच टा चौकी पर सूतल पैघ भाय आ’ बेटा भातीज सब सॅ निकसि विधु प पडलन्हि कतेक सुन्नर . . जेकर सहोदर बिष हुए. जे खारा पानि सॅ उत्पन्न . .अशांत उद्विघ्न जननी के कोखि सॅ एहेन शीतल सुन्नर संतान के जन्म . .कुदरत वा ईश्वर. . अपरंपार हुनक लीला ।चरखा चलबैत झूकल बुढिया जेना इसारा सॅ हुनका दिस सोमरस फेंकलकैन्ह. . ओ लोकि क’ पीने छलाह. . .।टुन टुन. . छमछम . .अप्सरा . .नाचि रहल अछि. . इन्द्रक दरबार मे. . घूॅघरू आ’ तबला के जुगलबन्दी. . वाह वाह .. अप्सरा जीत रहल अछि .. झन झनन . .झन .. नीन्नटूटि गेलन्हि. . परात भ’ गेल छलै. . .बरदक गरा मे बान्हल छोट छोट घंटी बाजि रहल छल. .कत्तो कियो पराती गाबि रहल छल. .।खुभिया आय हर जोतय लेल बरदक सेवा मे अन्हारे सॅ लागि गेल छल ।नींमक ‘ठारि नमा क’ दतमनि तोडला आ’ ओहो खुभिया संगे भमरा बाला खेत पहुॅचला “एतेक चाकर चौरस खेत अहि चऽऽर मे ककरो नैं छै भायजी ।’खुभिया जहन कहलकै .. त’ ओ गॅहिया क’ चारूकात हेरए लगला. . गौरव सॅ हुनक सीना आओर चौडा भ’ गेल छल ।खेतक कनिए कात सॅ बडका नदी के धार बहै छलै .. ..मुदा ओहि दिस सॅ ओय खेतक लेल .. कोनो विघ्न नैं छलै. . माटि कटबा के कोनो भय फिलहाल त’ नहिए छल ।लहलह करैत धान अगहन्नी. . ।किछु आओर अपन खेत घुमए लेल दूर दराज मे देखाए पडि रहल छल ।पहिनुका जमाना .बॅटेदार सब सेहो ईमान बाला. . मालिकक घरक भले पॉच बरखक बच्चे किएक नै ठाढ होय. .. हुनका परोछ मे.. कटनी नै करै ।एक एक टा खेत सोना उपजै छलै सोना . .सबहक दलान पर पुआरक बडका बडका टाल .. . . किछु के बडका बडका बखारी सब दूरे सॅ झलकै. . अन्न पानि राखए लेल. . माटिक कोठी त’ घरे घर छईए छल ।छोट सॅ छोट जमीन बाला के साल भरि क’ फसल त’ निकलिए जाए । जखन भूतही बलान मे बाडि आबै तै बरख त’ तबाही मचबे करैक ।ओना कृषि प्रधान समाज मे गामक सबलोकक पेट त’ भरिए जाए .. ओय समे के जाए छलै कमाबए लेल परदेस. . ताहू मे तिरहुतिया सब .. बड कम . .. ।हॅ आन आन जगह के लोग त’ ताहू समय मे त्रिनिदाद. . मॉरिशस. . कत्तएकहॉ नै जाए .. आ जौं लोक गेलो हेताह त’ हुनक भत्र्सने भेल हेतन्हि तत्कालिन समाज मे. . ।किछु पंडित सब .. बंगाल चलि गेला. . किछु आगरा. काशी .जयपुर आदि आदि जगह .. मुदा तखन हुनक भॉति भॉतिक कपोल कल्पित खिस्सा जन साधारणक मनोरंजन सेहो करैक । धीरे धीरे अंधेरिया राति होमय लगलै .. आब दृष्टि ओतेक ताकतबर नहिं लगै .. चारहू कात घुप्प अन्हार. . सबहक दलान पर मद्विम करि क’ जरैत लालटेम . ..पन्दरह दिन धरि प्रकृति के लटारम अहिना चल्ौत रहल .. आकास मे चमकैत .. कोटि कोटि तरेगन. . .फेर इजोरिया आबए लेल जोर मारए लागल छलै. ।अध रतिया क’ कनिक टा के चान आबि धरती के छबि निहारए लागै । आय राति मे . . . .जखन ओ गायत्री जप करैत बैसल छलाह .. फेर देखैत छथि. . अहि बेर स्त्री के माथ पर नूआ नै बडका बडका झमटगर केश. . .ओ बडका कका के दलान दिस बढल मुदा फेर ओ कदंबक गाछ दिस मुडि गेल. .।कनिए काल मे .. एक गोट लमगर पुरूष . .बडका कका के दलान सॅ उतरि धड झुकौने ओहि कदंबक गाछ मे विलिन भ’ गेल । अकस्मात हुनक मस्तिष्क मे कौंधलन्हि ई त’ काशी थीक बडका कका के पूत. . . .मुदा ओ स्त्री . . .ओ . .. के .. . ्र.।आ अही प्रश्नक उत्तर प्राप्त केनाय हुनका लेल अंगे्रज के देश सॅ खदेडनाय सॅ बेशी आवश्यक बुझाय पडय लागल छलैन्ह ।एक मोन भेलैन्ह जे पएर दाबि क’ एकर पछोर धैल जाए . .. . मुदा दोसरे छन अपन छुद्र विचार पर हुनका ग्लानि भेलन्हि ।नीक बेजाए . .पाप पुण्यक तत्व मीमांसा मे पौडैत हुनका ओंघी धरि दबोचलकन्हि । कएक दिन धरि बडका बडका केस हुनक मोन के ऊनक बडका गुच्छा जकॉ ओझरेने रहलन्हि . .ककरा सॅ पूछि. . .कोना की सोचतै लोक़ . ।मुदा नहि रहल गेलन्हि त’ भोजन समाप्त केला के बाद आने माने सॅ ज्योतिषक खिस्सा सुनबैत बजलैथ ‘स्त्री के बडका बडका केस. . डाढ सॅ नीचा . .ओकरा राजरानी बनबै छैक़ . ।’ अहि प्रसंग प. भॉति भॉति के मुॅह बिचकबैत. . हुनक . .गृहस्वामिनी बजलीह ‘ऐंऽऽऽऽऽऽऽऽऽह अंगोरा . . .बडका कका जे बूढ मे छौडी बियाहि क’ अनने छलथि. . से त’ बरकेसा रानी अछि. . ड़ाढ सॅ नीचा नागीन जकॉ लहरैत मोटका जुट्टी. . .मुदा राजरानी के कोनो लच्छन त’ नहिं देखाय पडलै ककरो ।सोलहम बरख होईत होई त कका के सेहो सुरधाम पठा देलकन्हि ।एक टा मुसरी धरि के जनम नहिं द’ सकलै बेचारो. ..जीब रहल छथि सतवा पूत आ’ पूतौहक नौडी बनि ।कत्तेक गंजन करै छन्हि .. सनतीया के माए. . ।’ बस . . .हुनका सूत्र वाक्य भेंट गेल छलैन्ह । जड काल नीक जकॉ सुरू भ’ गेल छल. . मोफलर सॅ कान बन्हने. . मोटका चद्दरि ओढने . . बाध मे बूलैत काल खुभीया सॅ बजला. “ ऐं रौ. . . .हमरा टोल मे भूत आ’ चुडैल क’ खेल कोना संभव छै .. . .. ई यज्ञ भूमि. . . हमर बाबा परबाबा कतेक रास यज्ञ .हवन पूजा पाठ केन्ो छलैथ एतय .. ।’ खुभिया गुमसुम . .माथ झुकौने धार क पानि मे उमकैत माछ सबके हेरैत रहल छल ।कनि काल बिलमि क’ बाजल ‘भायजी . . .जौं अहॉ सराप नै दी आ’ खराप . नै मानी त’ एक टा एकान्ति हमरो आहॉ सॅ करबा के लालसा छल ।’ ‘केहेन गप करए छ .. तोरा एहेन लोकके आय धरि कियो गारि वा सराप त’ कात जाओ कियो रे कारो करि क’ बाजल छ. . तू अपने एतेक बुद्वियार. . पैघ छोट के आदर करए वला . .एहेन विचार तोरा मन मे कोना एलो .. तू त’ हमर सबस बिसबासी लोक छ . ।’ बड गहीड सॉस खीचैत बाजल. . “मुदा ई गप जौं तेसरा के कान मे जेतै. . त’ हमर सबहक जीबन परलय भ जेतै ।’ “नै नै. . हे ले. .हम अप्पन जनेऊ के सप्पत खाए छी ..तेसर कान मे त’ हमरा मुॅह सॅ नहिए जयतौ. . ।’ “भायजी. . हमर आंगन बाली बडका कका के घराडी पर काज करै छै .. . एक दिन बडकी काकी ओकरा सप्पत द’ क’ पेट गिराबए के दबाय दोसरा गाम के एक टा बैद सॅ म्ांगबौलखिन्ह .. ।आ’ ई कहलखिन्ह जे जौ कियो जानत त’ हम जहर माहूर खा क’ त’ मरि जाएब . .आ’ ई पाप तोरे माथ पर जेतौ .. तोहर बाल बच्चा परजेतौ. . ।’हम त’ ओहि दिन बुझि गेल रहिए .. .मुदा डरे हम की बजितौं . .कासी बाबू सेहो आबि क’ हमरा दूनू परानी के धमका क’ गेल छलखिन ।’ ओ ठक बक जकॉ कतेक काल धरि खुभिया के देखैत ठाढ रहि गेल छला. . ।सम्पूर्ण शरीर मे अजीब सनक प्रकंपन होमए लागल छल्ौन्ह. . .. ।असक्त भ’ खेतक आरि पर बैस रहल छला। बडका कका के ई चारिम विवाह छलैन्ह. . . दू टा स्त्री त’ तेसर आ’ चारिम प्रसव काल मे वीर गति के प्राप्त कएने छलथि . .तेसर के बाप अपन बेटीके सासुर के मूॅहे नहि देखए देलखिन्ह .. तीनो नाति भगिनमान बनि क’ मातृके मे रहि गे ल छला । . .ई चारिम . .पचास बरखक वय मे. . . ओ एकर पुरकस जोर लगा क’ विरोध कएने छला . .त’ वृद्वजन हुनका दबाडि देने छलथि . . ‘तौं त राति दिन गॉधी .. चर्चिल . .चाऊ करैत करैत अंगरेजी विद्या पढि अंगरेज भ’ चुकल छ।आहि रे बा . .अहि मे हर्ज की. . . घोडा आ’ पुरूष कहियो बूढ होय छै. . जखन समाज मे बहू विवाह प्रचलित छैक . चारू कात तुरूकक राज . .ओही कुकर्मी सबहक हाथ सॅ अपन स्त्री सब के बचेनाय . .अपन जाति बचेनाय हमर सबहक कत्र्तव्य थीक . .त’ अहि मे अहींके किएक दोष बूझि पडैत अछि. . सबसॅ बेसी अक्कीलगर अहीं छी।निरधनक बेटी के एक टा आश्रय भेट जेतै. . ।’ हॅ आश्रय त’ अवश्य भेट गेल रहै. . भरि जीवनक लेल. . भले बारह बरखक कन्या पचास बरखक बर. .।छल . .छदम . .व्यभिचार . .शोषण. . स्त्री के जीवन के जोंक जकॉ ग्रसित कएने अछि ।नारी मुक्ति के लेल ओ किछु नहि कए सकला .। किछु काल क बाद हुनक नजरि ऊपर आकास मे अटकल . .जतए ओए दिन बडका चान छल . .अखन दिवाकर महाराज स्थापित छैथ।मुॅह सॅ निकलि गेलन्हि. “ .कमजोर चान कलंकित अछि कि प्रचंड शक्तिमान भानु .. ।’। इति।। रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। जगदीश प्रसाद मण्डल किछु विहनि कथा फज्झति‍ सोनेलाल आ जीयालालक बीच करीब बीस बर्खसँ चि‍न्‍हा-परि‍चए छन्‍हि‍। ओना दू गामक, मुदा सटल गाम रहने खेतो एकबधू आ हाटो-बजारमे भेँट-घाँट होइते रहै छन्‍हि‍। कहैले दुनूक बीच अपेछो छन्‍हि‍, एकबधू खेत रहने अड़ि‍यो छथि‍ मुदा दुनू गामक वि‍परीत सामाजि‍क चालि‍-ढालि‍ रहने बातो-वि‍चारमे अन्‍तर छन्‍हि‍येँ। कामेकेँ धाम आ कर्मेकेँ धर्मक मजगू वि‍चार रहने जीयालाल कम आँट-पेटक सम्‍पति‍ रहनौं ने कहि‍यो बेकारी महसूस करै छथि‍ आ ने गुजर-बसर करैमे परेशानी होइ छन्‍हि‍। जहि‍ना मौसमी फल बरहमसि‍यो होइत अछि‍ तहि‍ना मौसमी खेतीकेँ बरहमसि‍या दि‍स ससारैमे दि‍न-राि‍त लगल रहै छथि‍। जखन कि‍ सोनेलाल सोलहन्नी मौनसूनी कि‍सान छथि‍। अन्नक खेती संग जीयालाल फलो-फलहरी आ तरकारि‍यो-फड़कारि‍क खेती करै छथि‍। खेतक हि‍सावसँ अपने भरि‍ खेती करै छथि‍ मुदा मेहनति‍ बेशि‍या दैत छन्‍हि‍ जइसँ अधा-छि‍धा वि‍करीयो-बट्टा भइये जाइत छन्‍हि‍। जइसँ आनो-आनो काज चलि‍ते रहै छन्‍हि‍। फलक खेती केने लताम, नेबो, धात्री, अनारसक गाछ नर्सरी जकाँ रहि‍ते रहै छन्‍हि‍। मुदा जहि‍ना धर्मक जड़ि‍ दया छी तहि‍ना खेतीक जड़ि‍ बीज (बीआ) सेहो छी, तँए फलक कोनो गाछ बेचै नै छथि‍। ओहि‍ना (मंगनि‍ये) दोसरकेँ दैत छथि‍। नेबोक एकटा गाछ साेनेलाल जीयालालसँ मंगलनि‍। रस्‍ते-पेरेक गप छल। जीयालाल कहि‍ कहलखि‍न- “जखन आएब भऽ जाएत।” साल बीत गेल। ओना दुनू गोटेक बीच भेँट-घाँट होइते छल मुदा गाछक कोनो चर्च नै। दोसर साल दुनू गोटेकेँ नवानी दुर्गा-पूजा मेलामे भेँट भेलनि‍। चाहे दोकानपर बैस दुनू गोटेक बीच दुनि‍याँ-दारीक संग अपनो खेती-पथारीक गप चललनि‍। जेना हराएल वस्‍तु भेटने देहमे पानि‍ जगै छै तहि‍ना सोनेलालकेँ जगलनि‍। दोकानपर चारि‍-पाँच गामक चारि‍-पाँच गोटे बैसल। सोनेलाल जी‍यालालकेँ कहलखि‍न- “हमर बाकि‍ये अछि‍?” वाकी सुनि‍ जीयालालोकेँ धक् दऽ नेबो गाछ मन पड़लनि‍। सुहकारैत कहलखि‍न- “हँ, हँ, से तँ अछि‍ये। भऽ जाएत।” तेसर साल वि‍जलीपुरक समैध ऐठाम सोनेलाल दरबज्‍जापर बैसल रहथि‍ तखने मधेपुरसँ अबैत जीयालालपर नजरि‍ पड़ि‍ते सोर पाड़लखि‍न। समाजो आ परि‍वारोक पान-सात गोटे बैसल रहथि‍। सोनेलालक अवाज सुनि‍ जीयालाल सड़कसँ पछि‍म मुँहेँ साइकि‍लो घुमौलनि‍ आ वि‍चारि‍यो लेलनि‍ जे फज्‍झति‍ करबनि‍। तइसँ पहि‍ने मनमे उठि‍ गेल रहनि‍ जे जखन दुइये गोटेक बीचक काज छी तखन दुनि‍याँकेँ जनबैक कोना जरूरत। जरूर कि‍छु बात छै, तँए फज्‍झति‍सँ जड़ि‍ पकड़त। दलानक दावामे जीयालाल साइकि‍ल लगबि‍ते रहैथि‍ आकि‍ सोनेलाल महाजनीक स्‍वरमे बाजल- “हमर बाि‍कये अछि‍!” सोनेलालक स्‍वरो आ जगहो देखि‍ जीयालालक देह अगि‍या गेल। एक तँ ओहुना परुखक आदति‍ रहल अछि‍ जे घरोवाली लग आ सासुरो-समधि‍औरोमे अलंकारि‍क भाषाक प्रयोग करैत अछि‍। नजरि‍  तेज करैत जीयालाल, लूरि‍गर सि‍पाही जकाँ जे दुश्मनेक हाथक हथि‍यार छीनि‍ प्रहार करैए तहि‍ना समाजकेँु अगुअबैत बजलाह- “अहूँ सभ अपन समधि‍क हाल सुनू। बेटा-पुतोहु, बेटी-जमाएबला भऽ गेलाह, मुदा अखन धरि‍ एकटा नेवोओ गाछ नै छन्‍हि‍।” ~ काँच सूत साठि‍ बर्खक संगी पैंसठि‍म बर्खमे रहने तँ मोहनकेँ कि‍छु नै बूझि‍ पड़लनि‍ मुदा सोहनकेँ मन कहलकनि‍ जे भरि‍सक दुनू गोटेक बीचक सम्‍बन्‍ध काँच सूतमे बन्हल छल। दुनू गोटे, मोहनो आ सोहनोक घर बीघा दुइयेक हटल। ओना दुनू दू जाति‍क, मुदा दू जाति‍क बीच जते दूरी बनल अछि‍ तते नै छन्‍हि‍। कारण छैक जे एकठाम रहने बहुत बेमारी लगि‍यो जाइ छै आ छुटयो जाइ छै। तहि‍ना दुनू गोटेक बीच रहने छन्‍हि‍। दुनू लंगोटि‍या संगी। ओना कि‍छुए मासक कमी-बेशी दुनूक बीच छन्‍हि‍, मुदा पाँच धरि‍ तँ बच्‍चाकेँ घरे-अंगना चि‍न्‍हेमे लगि‍ जाइ छै। गामक कति‍का माने जाड़क मासक अखड़ाहासँ लऽ कऽ कवड्डी, गुड़ी-गुड़ीक मैदान होइत वि‍द्यालय धरि‍क संगी दुनू गोटे। ओना गामक स्‍कूलक पछाति‍ दुनू गोटे दू वि‍द्यालयमे पढ़लनि‍, मुदा ग्रेजुएशन एके साल दुनू केलनि‍। साइंसक वि‍द्यार्थी रहने मोहन काँलेजमे डि‍माॅसटेटर बनलाह। आ सोहन एम.ए.मे नाअों लि‍खौलनि‍। पछाति‍ एम.ए.सी. केलोपरान्‍त मोहन लेक्‍चरर बनि‍ तीन साल पहि‍ने सेवा-नि‍वृति‍ भेलाह। एक तँ जि‍नगी भरि‍क संगी, दोसर समाजक पढ़ल-लि‍खल तँए बैसार-उसार अधि‍क काल। रौदि‍याह समए भेने पहि‍ल शि‍कार कि‍सानक संग खेतसँ जुड़ल लोक हेताह, तँए अखन चौक-चौराहाक मुख्‍य वि‍षय बनल अछि‍। छह बजे साँझ। टहलि‍-बुलि‍ कऽ अाबि‍ चौकपर बैसलाह। लाटक सएह पान-सात गोटे बैसलाह। धानक जाइत खेती देखि‍ सोहन दालि‍क खेतीक चर्च उठबैत कहलखि‍न- “अस्‍सीक दशकसँ पहि‍ने दलि‍हन सस्‍त छल आ अखन वएह महग भऽ गेल अछि‍। दोसर पानि‍ नै भेने अखन उपायो तँ दोसर नहि‍ये अछि‍। सरकारी जे अछि‍ से कागजेमे अछि‍।” जना सोहनक बात मोहनकेँ लागि‍ गेलनि‍। प्रति‍वाद करैत बजलाह- “हमरा उमेरसँ बेसी तोरो उमेर नहि‍ये हेतह, जहि‍यासँ देखि‍लि‍यै दलि‍हने महग अछि‍।” वि‍चारमे लोच दैत सोहन बजलाह- “अपना ऐठाम कहबी छै जे ‘नीच काज कऽ ली मुदा राहरि‍क बोनि‍ नै ली।’ कोनो कहबी ओहि‍ना नै होइ छै।” जना कते घैल घी सोहन हरा देने होन्‍हि‍ तहि‍ना आगि‍-बबूला भऽ उठि‍ वि‍दा होइत बजलाह- “केकरो कहने कि‍छु भऽ जाइ छै।” सोहन गुमे रहलाह। कि‍छु कालक पछाति‍ सोहनक मनमे उठलनि‍ कि‍ फूि‍स बाजल छलौं तखन लगलनि‍ कि‍अए। नजरि‍ पाछू दि‍स बढ़लनि‍। जहि‍ना पहि‍या कऽ गाड़ीक पहि‍या चलैत अछि‍ तहि‍ना पहि‍या कऽ देखलापर देखलनि‍ जे जहि‍ना छलाॅगसँ जि‍नगी उठै छै तँ ओहना नि‍च्‍चो होइ छै, मुदा धड़ि‍आ कऽ जे जि‍नगी उठै छै ओ धड़ि‍आइते रहै छै, चाहे जेम्हर जाउ। आइ बुझै छी जे दूनू गोटे काँच सूतमे बन्‍हल छलौं जे अबैत-अबैत आइ टूटि‍ गेल। संगी रहने लोक हराइए, भसि‍आइए। मुदा असगर चलनि‍हार कतए हराएत। पत्ता पकड़ि‍ वि‍च्‍ची पकड़ैक लूरि‍ चाही। ~ बुधि‍-बधि‍या रामकि‍सुन आ देवनारायण लंगौटि‍या संगी। एकठाम बैस खेती-पथारीसँ लऽ कऽ कथा-कुटुमैतीक गप-सप दुनू करैत। रामकि‍सुनक बेटा दरभंगासँ धड़फड़ाएल आबि‍ कहलकनि‍- “बाबू, रूपैआक ओरि‍यान कऽ दि‍अ। काल्हि‍ये भरि‍ फार्म भरैक समए छै।” अपना हाथमे रामकि‍सुनकेँ पनरहे सए रूपैआ, पाँच सए ओरि‍यान करब छलनि‍। जइठाम लोक बेसी गप-सप करैए तइठाम घरक नोनो-तेल आ खेतक खरीद-वि‍क्रीक गप सेहो करि‍ते अछि‍। मनमे भेलनि‍ जे पेंइचेक-गप अछि‍ तँ अनका कि‍अए कहबनि‍। पहि‍ने दोसेकेँ कहै छि‍यनि‍ जँ नइ हएत तखन बूझल जेतैक। कोनो कि‍ पेंच-उघारक अकाल पड़ि‍ गेल अछि‍ जे नै भेटत। यएह तँ गुण अछि‍ जे जते खगता दुबराइए महाजन ओते मोटाइए। देवनारायणकेँ रामकि‍सुन कहलखि‍न- “दोस, पान सए रूपैआक बेगरता भऽ गेल अछि‍, सम्‍हारि‍ दि‍अ।” देवनारायणक हाथमे रूपैआ रहबे करनि‍, मुदा दोससँ सूदि‍ केना लि‍तथि‍। महाजनी सूदि‍क गुण तँ बूझल छलनि‍। कनी-मनी झूठ-फूसि‍ धन-सम्‍पति‍क लेन-देनमे चलि‍ते अछि‍। सुहरदे मुँहेँ उत्तर देलखि‍न- “दोस, जखन अपना बूझि‍ एलौं तँ घुमाएब उचि‍न नै हएत। मुदा इमानदारीसँ कहै छी अपना हाथमे एको पाइ नै अछि‍।” रामकि‍सुन- “तब तँ काजमे बाधा हएत?” देवनारायण- “से नै हुअए देब?” रामकि‍सुन- “कहै छी हाथ खालि‍ये अछि‍ तखन वि‍थूत केना नै हएत?” देवनारायण- “अपन ने खाली अछि‍, हुनकर (पत्नीक) हाथमे छन्‍हि‍। मुदा....?” रामकि‍सुन- “मुदा की?” देवनारायण- “आना दर सूदि‍ तँ महाजनीमे चलै छै मुदा स्‍त्रीगणकेँ तँ माइक देलहा कोसलि‍या रहै छै कि‍ने, तँए दू-आना दर सूदि‍ लागत।” सूदि‍ सुनि‍ रामकि‍सुन गुम भऽ गेलाह। मनमे उठलनि‍ जे सोझ हाथे नाक नै छुब, घुमा कऽ छुअब भेल। जते घुमाओन बाट रहै छै तते ने लोको हराइए। मुदा काज खगौने तँ जि‍नगी खसै छै। यएह ने परीक्षाक घड़ी छी। ~ पहाड़क बेथा साओनक फुहार पड़ि‍ते जहि‍ना नरम-गरम बीच गप-सप्‍प शुरू होइत तहि‍ना धारा संग नि‍कलैत पहाड़ समुद्र दि‍स बढ़ल तँ कबई माछ जकाँ समुद्रो ि‍सरा ससरि‍ पहाड़ दि‍स बढ़ल। अकासक बुन पबि‍ते पानि‍ रंग जकाँ छुहुटि‍ धड़ैत तहि‍ना दुनूक बीच भेल। पनचैतीक ओइ पंच जकाँ जे अपन बेथा कहए जाइत आ अनके तते बेथा रहैत जे अपन तर पड़ि‍ जाइत तहि‍ना समुद्रोकेँ भेल। ओना अपन-अपन बेथा दुनूकेँ रहए मुदा सि‍र चढ़ल पहाड़ रहने समुद्र चुपे रहए। मुदा सि‍र चढ़ल पहाड़ रहने समुद्र चुपे रहल। मनमे संतोष भेल जे जि‍नगि‍ये केहेन छन्‍हि‍ जे बेथे कते हेतनि‍। कनी पछुए अपन बेथा राखब। खि‍लैत कली जकाँ, जे फूल बनत कि‍ फल, वि‍हुँसैत समुद्र पुछलक- “भाय, बड़ पीताएल देखै छी, पि‍यास लगल अछि‍ की?” जहि‍ना पि‍यासल बटोहीकेँ कोनो दरबज्‍जापर पानि‍क लोटा सोझ अबि‍ते आत्‍माक तरास लपकि‍ कऽ पकड़ि‍ लैत तहि‍ना पहाड़ व्‍यथि‍त भऽ बाजल- “देखू जे सात बीतक केहेन अछि‍, जे एक तँ अधासँ बेसी चीरले अछि‍ तइपर केहेन ठट्ठा केलक हेन?” बेथामे नड़ाएल पहाड़केँ देखि‍ समुद्र पुचकारि‍ कऽ पुछलक- “भैया, अहूँ जँ बेथा जेबै तँ हमरा सबहक की गति‍ हेतै। अहींक आशामे ने हमहूँ जीबै छी।” रसाएल समुद्र देखि‍ छुब्‍द होइत पहाड़ बाजल- “कहू जे एहनो ठट्ठा हेाइ छै जे टि‍कमे बान्हि‍ देने अछि‍, खुनलौं पहाड़ नि‍कलल चुहि‍या। यएह नि‍साफ होइ जे मेडि‍कलक कि‍ताब पढ़नि‍हारकेँ जँ कि‍यो कहै जे अहाँकेँ सरदि‍यो छोड़बैक लूरि‍ नै अछि‍, ई केहेन हएत।” ~ उमकी भोलन बाबा गंगा नहाइले ि‍नरधनमाक संग गेलाह। गंगामे दुनू गोटे संगे पैसलाह। ऐ आशासँ जे जँ बूढ़ (भोलन बाबा) भँसि‍येता तँ पोता नि‍रधनमा पकड़तनि‍ आ जँ बाल-बोध नि‍रधनमा भँसि‍आएत तँ भोलन बाबा पकड़तनि‍। जाधरि‍ दुनू गोटे पकड़ा-पकड़ी नै करतथि‍ ताधरि‍ एक कालखंड भरि‍ संगे केना रहि‍ पबि‍तथि‍। गंगामे पैसि‍ नि‍रधनमा पुछलकनि‍- “एँ हौ बाबा, सभ चीजक गाछमे देखै छि‍ऐ सभटा एक-रंग रहल आ गोटे-गोटे भुल भऽ जाइए?” नि‍रधनमाक प्रश्नसँ बाबाकेँ दुख नै भेलनि‍ जे हमरे ठीकि‍या कऽ ने तँ पुछलक। मुदा हमरा ठीकि‍या कऽ बाल-बोध कि‍अए पूछत। जहि‍ना जेठुआ पानि‍ पीवि‍ते धरती पुरना खढ़केँ गलेबो करैत अछि‍ आ नवकाकेँ जनमेबो करैत अछि‍। तहि‍ना तँ अखन नि‍रधनमो अछि‍। ताधरि‍ दुनू गोटे छाती भरि‍ पानि‍मे पहुँचि‍ गेलाह। छाती भरि‍ पानि‍मे पहुँचि‍ते जना सर्द माथ धरि‍ पहुँचि‍ गेलनि‍। सर्द पहुँचि‍ते नि‍रधनमा दोहरा कऽ पुछलकनि‍- “बाबा, जखन छाती भरि‍ पानि‍मे आबि‍ये गेलौं तँ अहीले ने लोक एते हरान रहैए, आब घूमि‍ कऽ कथीले जाएब, से नइ तँ.....?” ि‍नरधनमाक प्रश्न सुनि‍ भोलन बाबा हरा गेलाह। पानि‍मे जना डूमि‍ गेलाह। मनमे उठलनि‍ जे अही उमेरमे ने बाल-बोध पानि‍मे नहाइले जाइत तँ उमकए लगैत। कहीं अही उमकीमे ने ि‍नरधनमा बेसी पानि‍मे पहुँच भसि‍ जाए। जँ भसि‍ गेल तँ फेर एहेन लोक भेटत कि‍ नै। मन रोकलकनि‍ पहि‍ने मुँहसँ मनाही कऽ दइ छि‍ऐ। नइ मानत तँ अपने ने गंगा लाभ हएत। मुदा बुढ़ाड़ीक बाट तँ अपनो टूटि‍ जाएत। ओकरा छोड़ि‍ एक लोटा पानि‍यो देनि‍हार भेटत! तेहेन जुग-जमाना भऽ गेल अछि‍ जे...। जइठाम ताड़ी-दारूक लाइसेंस दऽ दऽ बेरोजगारी हटौल जाइए। की ऐ रोजगारसँ मि‍थि‍लाक माटि‍ जे बालुसँ भरि‍ बलुआ गेल अछि‍, ओ उपजाऊ भूमि‍ बनत। जाधरि‍ नै बनत ताधरि‍ हम सभ ओहि‍ना बरहमासकेँ छहमासा बनाएब आ छहमासा चौमासा तीन मासा करैत पराती साँझ-पराती कानि‍-कानि‍ गाएब, ‘माधव, हम परि‍णाम नि‍राशा।’ डुमकी लइसँ पहि‍ने बाबा नि‍रधनमापर नजरि‍ देलनि‍ तँ देखलखि‍न जे ओ हमरे बाट ताकि‍ रहल अछि‍। कहलखि‍न- “एक्के बेर डूम लि‍हेँ। सभ तीरथ बेर-बेर गंगासागर एक बेर।” जहि‍ना जि‍नगी दोस्‍ती करए बेर गंगाक शपथ लैत, तहि‍ना संगे दुनू गोरे गंगामे डूम लैत स्‍नान कऽ घूमि‍ गाम एलाह। ~ बजन्‍ता-वुझन्‍ता पोखरि‍क धड़ि‍पर वि‍शाल सि‍मरक गाछपर दूटा सुग्‍गा बैसि‍, जति‍आरए संबंध बनबैत रहए। मुदा नाम-गामक ठेकान बि‍नु बुझने उड़ैबलाक कोन ठेकान। तँए दुनू सहमत भेल जे पहि‍ने अपन ठौर-ठेकानक संबंध बना लि‍अ तखन कथा-कुटुमैतीक संबंधक चर्च करब। एक डारि‍क सुग्‍गा लग पहुँचि‍ गेल। दुनू बुझैत जे घर-परि‍वारक गप आन कि‍अए सुनत। तँए कानमे कान सटा एकटा दोसरकेँ पुछलक- “बेरादर, तोहर नाम की छि‍अह?” कनी काल गुम रहि‍ दोसर बाजल- “उढ़ड़ाकेँ गामक ठेकान होइ छै। की नाम कहबह। तोहीं अपना वि‍चारे राखि‍ दाए। हमहूँ आइसँ मानि‍ लेब।” पहि‍ल सुग्‍गा- “बड़बढ़ि‍याँ।” बड़बढ़ि‍या सुनि‍ दोसर धाँइ दऽ बाजल- “भाय, तोहर नाओं की छि‍अह?” पहि‍ल- “पोसा।” दोसर- “पोसा केकरा कहै छै?” पोसा बाजल- “जे मनुक्‍खक संग रहैए।” दोसर- “तब तँ पि‍जरामे रखैत हेतह?” पोसा- “हँ, पि‍जरोमे रहै छै। मुदा हम ओहन पोसा छी जे बि‍नु पि‍जरेक मनुक्‍खक संग रहै छी।” ~ चर्मरोग एक तँ काति‍कक पूर्णिमा दोसर गहन सेहो लागत। तहूमे कते साल पछाति‍ पूर्ण-गहन लगि‍ रहल अछि‍। गामक लोकक उजाहि‍ देखि‍ दुनू परानी दोस काका सेहो कमला नहाइक वि‍चार केलनि‍। तीनि‍ये दि‍न जाइ-अबैमे लागत। दोस काका काकीकेँ कहलखि‍न- “जखन तीनि‍ये दि‍नक बात अछि‍ तखन कि‍अए ने घरेसँ बटखरचा लऽ जाइ। अनेरे केहेन कहाँ दोकानक खाएब। एक तँ बेचि‍नि‍हारक हाथ-पएर नीक नै रहै छै तहूमे कोन-कहाँ माछी सेहो ि‍भनकैत रहै छै।” दोस काकाक वि‍चारमे अपन वि‍चार मि‍लबैत काकी उत्तर देलखि‍न- “अपन घर फेर अपन घर छी। कौओ मेना अपन घरक सुख बुझैए। हम सभ तँु सहजहि‍ मनुख छी। एतबो-अचार वि‍चार नै राखब से केहेन हएत। तहूमे तते ने चीज-बौस महग भऽ गेल अछि‍ जे लोक आब भरि‍ पेट खाइए आकि‍ मनकेँ बुझा पानि‍सँ पेट भरैए।” दोस काका- “काल्हि‍ चारि‍ बजे भोरमे गाड़ी अछि‍। घंटा भरि‍ टीशन जाइमे लागत। एक-डेढ़ बजेमे सभ कि‍यो उठि‍ जाएब। जाबे दुनू पुतोहु बटखरचा बनौतीह ताबे दुनू गोटे नहा-सोना लेब।” काकी- “बड़बढ़ि‍याँ।” कमला स्‍नान करबाक वि‍चार, तँए दुनू परानी अबेर तक गपे-सपमे जगि‍ गेलथि‍। अबेर कऽ सुतने नीनो अबेर तक खेहारलकनि‍। एक-डेढ़ बजेक बदला अढ़ाइ बजेमे नीन टुटलनि‍। घड़ी देखि‍ते दोस काका अपन दोख घुसकबैत पत्नीपर गुम्हरलाह- “अढ़ाइ बजैए, आब कखन चुल्हि‍ पजारल जाएत। तहूमे सभ सुतले अछि‍।” दोस काका दि‍स अपन क्रोध नै घुसका काकी जोरसँ गरजैत पुतोहुपर बजलीह- “कोन कुम्‍हकरणक बेटी सभ घर चलि‍ आएल अछि‍, से नै जानि‍। कहू जे एना कऽ सि‍खा कऽ दुनू दि‍यादि‍नीकेँ कहने छेलि‍ऐ जे एक-डेढ़ बजेमे उठि‍ चुल्हि‍ पजारि‍ बटखरचा बना देब, से चलचलउ बेर तक सुतले अछि‍।” मुदा पुतोहुक लेल धैन-सन। सूतलक गारि‍ये की, जे सुनबे ने करत। पुतोहुक चाल-चुल नै सुनि‍ काकी अपने ठंढ़ा गेलीह आगू बढ़ि‍ जेठकी पुतोहुकेँ सोर पाड़ि‍ काकी बजलीह- “एना के कहने छलाैं, से अखन तक सूतले छी।” भलहि‍ं काति‍क मास रोगाह कि‍अए ने हुअए मुदा जेठक राति‍ ओहन सोहनगर थोड़े होइए। जेहन सि‍नेह सुख काति‍कक नि‍नि‍या देवीक होइए ओ जेठ जनीकेँ थोड़े होइ छन्‍हि‍। जहि‍ना धानसँ भरल बसुधा कड़कड़ाइत रहैए तहि‍ना ने देवि‍यो कड़कड़ाइत रहै छथि‍। ओछाइनेपर सँ जेठकी पुतोहु भकुआएले जबाब देलकनि‍- “अखन बड़ राति‍ छै, एते कि‍अए धड़फड़ाइ छथि‍।” एक तँ ओहुना पैंतालीस-पचास बर्खक उमेर दुनू परानी दोस काकाक, तइपर सँ पुतोहुक बात आरो ढील कऽ देलकनि‍। मुदा तैयो रूआव झाड़ैत काकी छोटकी पुतोहुकेँ उठबैत बजलीह- “कनि‍याँ, नै खाइक ओरि‍यान केलौं तँ केलौं, मुदा नि‍कलबो बेर तँ अपन घर-दुआर सुमझि‍ लेब कि‍ सूतले रहब।” पहि‍लुका बात छोटकी सूतलेमे गमौलनि‍। मुदा अंति‍म ‘सूतले रहब’ बेर नीन टूटि‍ गेलनि‍। ओछाइनेपरसँ बजलीह- “दीदी, सूतले छथि‍न।” राति‍क भुखल भोरमे जहि‍ना छह-नंबरा कोदारि‍ कान्हपर लऽ खढ़होरि‍ तामए वि‍दा होइत तहि‍ना खि‍सि‍आएल मने दोस काका तीन दि‍नक धर्मक घाट पहुँचबाक वि‍चार जगौलनि‍। काकीकेँ कहलखि‍न- “पनरहे मि‍नट समए बचल अछि‍, झब दऽ तैयार होउ, नै तँ जहि‍ना बटखरचा छूटल तहि‍ना संगि‍यो आ कमलो स्‍नान छूटत।” एक तँ ओहि‍ना जेठुआ रौदमे सुखाएल केराउ, तइपर खापरि‍मे पड़ि‍ते जहि‍ना भरभरा कऽ उड़ए लगैत तहि‍ना काकी भरभराइत दोस काकाकेँ कहलखि‍न- “आन पुरुखक जे बोल राखब से नि‍महत। कि‍यो अपना घरमे पुतोहुओ अनलक आ दान-दहेज लछमि‍यो अनलक। कि‍यो तेहेन लुरि‍गर पुतोहु अनलक जेकरा देहेमे सभ कि‍छु तेहेन छै जे शि‍खरपर पहुँचबैए। अहाँकेँ आँखि‍मे कोन चर्मरोग भऽ गेल अछि‍ जे चूनि‍-चूनि‍ पुतोहु अनलौं।” पत्नीक बात सुनि‍ दोस काका सहमि‍ गेलाह। मुदा सासुर, समधि‍यौर आ पत्नी लग जँ मुँह बन्न भऽ गेल तँ पुरुखे कथीक। मुदा एको डारि‍क पत्ता धरि‍क बोध तँ पत्नीकेँ हेबे करै छन्‍हि‍ जे करनी-धरनीक सीखमे सीखि‍ते छथि‍। मुदा तैयो दोस काका अगुअबैत बजलाह- “जाएब की नै?” लपकि‍ कऽ काकी बजलीह- “ढौआ जेबीमे लऽ लि‍अ, आ झनझनबैत चलू!” ~ शंका चालीस बर्खसँ संग-संग रहनौं श्‍याम काकाकेँ काकीपर अखनो शंका बनले रहै छन्‍हि‍। ओना सोलहन्नी शंका तँ नै मुदा तैयो शंका तँ शंके छी। सोलहन्नी ऐ लेल नै जे परि‍वारक आन काजमे एको पाइ शंका नै रहै छन्‍हि‍, मुदा पाइ-कौड़ी खर्चक भाँजमे तँ रहि‍ते छन्‍हि‍। जइसँ आइ धरि‍ कहि‍यो नै मुट्ठी खोलि‍ धड़बै छथि‍। जाधरि‍ माए जीबैत छलनि‍ ताधरि‍ पुतोहुक हाथमे कहि‍यो जरूरीसँ बेसी कोनो वस्‍तु नै जाए देलकनि‍। कारण छलनि‍ जे अपनो जकाँ (जकाँ जकाँ) कुशल गृहि‍णी बनबए चहैत छलीह। कुशल ऐ लेल जे कमसँ कम वस्‍तुमे जीवन-यापन करैक लूरि‍ भेलासँ जि‍नगीक गाड़ी समुचि‍त ढंगसँ चलैत अछि‍, से चलैत रहनि‍। आब तँ सहजहि‍ नाति‍-नाि‍तन, पोता-पोतीसँ घर भरि‍ गेल छन्‍हि‍, मुदा तखन कि‍अए शंका छन्‍हि‍? ओना ओ बुझै छथि‍ जे जे घरसँ बाहर धरि‍ जोड़ि‍ चलैक ओ कुशल गारजन भेल, मुदा से काकी रहि‍तो कि‍छु वि‍शेष सिनेह नाति‍-नाति‍न, पोता-पोतीसँ रहने अवगुण तँ छन्‍हि‍ये। ओना श्‍याम काकाकेँ अपन इच्‍छा कहि‍यो दोकान-दौड़ीसँ नोन-तेल करैक नै रहलनि‍, आब तँ सहजहि‍ नहि‍ये छन्‍हि‍। तँए काकि‍ये दोकान-दौड़ीक नोन-तेल करै छथि‍न। दोकान-दौड़ीक करैक पाछू दोसरो कारण छन्‍हि‍। ओ ई छन्‍हि‍ जे कनि‍याँ-पुतराक की मांग हेतनि‍ से हुनका लग तँ बाजि‍ सकै छथि‍, मुदा हमरा लग थोड़े बजतीह। मुदा काकि‍यो कम नै ने छथि‍न, दोकानक (परि‍वारक खर्चक) सभ समान कहि‍ पाइ जोड़ि‍ कऽ लऽ लैत छथि‍न आ तहूपर सँ कि‍छु उधारी केने अबै छथि‍न। उधारीक कारण होइ छन्‍हि‍ जे काजक वस्‍तु कहि‍ पुतोहु चलबाकाल कहि‍ दैत छथि‍न जे चौकलेट, नवका वि‍स्‍कुट दोकानमे बड़ सुन्नर एलैए। पुतोहुक आग्रह केना काकी नै मानथि‍न। जइसँ कि‍छु ने कि‍छु उधारी दोकानक भइये जाइत छन्‍हि‍। तगेदा भेलापर श्‍याम काका बुझबे करै छथि‍ आ देबे करै छथि‍न। मुदा मनमे कुवाथ तँ भइये जाइ छन्‍हि‍ जे एते धीया-पुताकेँ चसकाएब नीक नै। भोरे की फुड़लनि‍ की नै, उपराग दैत काकी श्‍याम काकाकेँ कहलखि‍न- “एते दि‍नसँ एकठाँ रहलौं, मुदा भरि‍ मन वि‍श्वास कहि‍यो ने भेल?” काकीक बातकेँ गौर करैत श्‍याम काका कहलखि‍न- “से केना बुझै छी?” श्‍याम काकाकेँ आगू बजैले रहबे करनि‍ आकि‍ बीचेमे काकी टपकि‍ पड़लीह- “मुट्ठी खोलि‍ मुट्ठा कहि‍यो मुट्ठीमे आबए देलौं।” ~ ओसार बीस बर्ख नोकरीक पछाति‍ वसन्‍त भाय पजेबा, सि‍मटी आ लोहाक दू मंजि‍ला घर बनौलनि‍। दू मंजि‍ला बनबैक कारण छोट घराड़ी। कोठरी मात्र चारि‍येटा। सभ प्राणी मि‍लि‍ वसन्‍त भाय घरबासो लेताह आ परदेशो छोड़ताह। रहैक घर आ जीबैक अपन अनुकूल कारोबारक कमाइ कमा अपने छथि‍। आठ बजे राति‍ घरवासक समए। घरवासक सभ ओरि‍यान जुटा एकठाम सभ जुटि‍ गप-सप्‍प शुरू केलनि‍। आइ दोसर गपे की हएत? वसन्‍त भाय माएकेँ कहलखि‍न- “माए, परि‍वारमे आब पोता-पोती धरि‍ भऽ गेलौ। कौआ-मेना जकाँ कते दि‍न जीवि‍तो सभसँ सि‍रगर परि‍वारमे तोंही छेँ, बाज कोन कोठरी लेमे?” एक तँ ओहि‍ना माएक मन उधि‍याएल जे जते दि‍नका दुख लि‍खल छलए से कटलौं। आब तँ लि‍खलहो कटल। धीया-पुताकेँ जे हेतै अपन कऽ लेत। हमरा जीबैत धरि‍ तँ घरक दुख मेटा गेलै। सौंसे परि‍वारपर आँखि‍ खि‍ड़बैत माए बजलीह- “बौआ, घर तोंही सभ लैह, ओसारक एके भाग बहुत हएत?” अपन जीत देखैत पुतोहु झाड़-झाड़ैत बजलीह- “माएकेँ कहि‍यो घरसँ सि‍नेह भेलनि‍ जे हेतनि‍?” अपन जीत माए सोहो देखैत। सभ दि‍न सहीटमे रहलौं, चललौं-फि‍ड़लौं, आब ऐ बुढ़ाड़ीमे जे सीढ़ीपर ऊपर-नि‍च्‍चा करैत टाँग-हाथ तोड़ि‍ ली, एहेन वुधि‍यार हमहीं छी। पुतोहु दि‍स देखैत बजलीह- “कनि‍याँ, कहुना भेलौं तँ बाले-बोध भेलौं। एकटा उझटो बात बाजब तँ हम नै उरदास करब तँ आन करत। हमरा लि‍ऐ सभसँ नीक ओसारे। सभ दि‍न राति‍-वि‍राति‍ घरक चौबगली घुमै-फि‍ड़ै छी, घर-अंगना टहलै छी, अन्‍हार-धुनहारमे ऊपर-नि‍च्‍चा करब नीक हएत।” ~ छोटका काका दि‍यादि‍क दसो भैयारीमे मुनेसर सभसँ छोट, तँए सभ छोटका काका कहै छन्‍हि‍। जाधरि‍ भैयारीक सभ जीबैत छलनि‍ ताधरि‍ कहि‍यो छोट-पैघि‍क बात मनमे नै उठलनि‍। उठबो उचि‍त नहि‍ये। मुदा जखन उमेर बढ़लनि‍, भैयारीक नवो भाँइ दुनि‍याँ छोड़ि‍ देलनि‍ तखन तँ उठबो उचि‍ते छलनि‍ आ उठबो केलनि‍। उठलनि‍ ई जे जखन सभ भाँइ छलाह तखन जँ छोटका काका कहैत छल तँ कहैत छल मुदा आब कि‍अए कहैए। जँ से कहैत रहल तँ ऑफि‍सक चारि‍म श्रेणीक कर्मचारी जकाँ बड़ाबाबू कहि‍या बनब? साठि‍ बर्खक उमेर टपलौं, माथो कारीसँ उजरा गेल मुदा छोटका काकाक छोटके काका रहि‍ गेलौं। एक तँ ओहुना छोटकासँ सझि‍ला, सझि‍लासँ मझि‍ला, मझि‍लासँ बड़का बनैमे कते टपान अछि‍ तइपर अखन धरि‍ एको टपान नै टपलौं। देहक रंग-रूपसँ बाबा बनैक खाढ़ीमे आएल जाइ छी मुदा पीराड़क गाछ जकाँ बाढ़ि‍ कहाँ अबैए। असमंजसमे पड़ल मुनेसरक मनमे उठल। प्रचार प्रसारक जमाना आबि‍ गेल अछि‍ नकलि‍यो असली बनि‍ बजारमे दौड़ रहल अछि‍ तँए कि‍छु ने करब तँ ओहि‍ना रहि‍ जाएब। भीखमंगो तँ नहि‍ये छी जे जन्‍मेसँ बाबा कहबए लगब। अपन पैरवि‍यो अपने केना करब। अनेरे लोक धड़खनाह कहए लगत। मुदा जे वि‍चार अपने उठि‍ रहल अछि‍ ओ हुनका (पत्नी) केँ कहाँ उठि‍ रहल छन्‍हि‍। ओ तँ छोटकी काकी सुनि‍ आरेा मुस्‍की दैत रहै छथि‍। पत्नीकेँ सोर पाड़ि‍ मुनेसर कहलखि‍न- “देखि‍यो जे घर-परि‍वारसँ लऽ कऽ समाज धरि‍ छोटके कक्का कहैए से उचि‍त भेल?” छोटका काकाक मनमे रहनि‍ जे स्‍त्रीगण जानि‍ दस ठाम ओहुना बजतीह। तइसँ अपन काज ससरत। मुदा छोटकी काकी गबदी मारि‍ देलनि‍। कतौ कि‍अए बजतीह। अपन लाभ के छोड़ैए जे छोड़ि‍तथि‍। काकीकेँ कहि‍ छोटका काका कान पाथि‍ देलनि‍, जे कि‍म्‍हरोसँ तँ हवा चलबे करत। मुदा कतौ चाल-चूल नै। मास दि‍नक पछाति‍ पुन: छोटाक काका काकीकेँ मन पाड़ैत दोहरौलनि‍- “कहने जे रही तेकर सुनि‍-गुनि‍ कहाँ कतौ पबै छी?” एक दि‍स छोटका काकाक उदास मन, दोसर दि‍स अपन ओलड़ैत-मलड़ैत। मुदा दोसरकेँ अनुकूल बना कि‍छु कहबोमे आनन्‍द अबै छै। मुदा जहि‍ना पुरुखकेँ जेठ भेने आनन्‍द अबै छै तहि‍ना तँ स्‍त्रीगणोकेँ छोट भेने अबै छै। जँ नै अबैकत तँ कि‍अए भाँजाइकेँ सभ एक लाड़नि‍ लाड़ि‍ दइए। भलहि‍ं एक लाड़नि‍क बदला सात लाड़नि‍ कि‍अए ने खाए मुदा होइ तँ सएह छै। छोट भेने एते लाभ तँ होइते अछि‍ कि‍ जे जेठ जकाँ अशि‍ष्‍ट बोलीसँ बँचैत अछि‍। मुनेसरक मनकेँ बुझबैत छोटकी काकी बजलीह- “अच्‍छा देखि‍यो ने, समए कतौ भागल जाइए। भदबरि‍या मेघ साँझ-भोर तकैए।” जहि‍ना चाह पीब मन तँ मानि‍ जाइए मुदा पेट थोड़े मानत। टकटकी लगा मुनेसर छोटकी काकी (पत्नी) दि‍सि‍ देखैत रहलाह। ~ सीमा-सड़हद खेते-पथार जकाँ सबहक सीमा-सड़हद होइ छै। मुदा कि‍छु मानबो करैत अछि‍ तँ कि‍छु अति‍क्रमणो करैत अछि‍। कि‍छु बुझि‍नि‍हार बुझि‍तो तोड़ैत अछि‍ तँ कि‍छु बि‍नु बुझनौं तोड़ैत अछि‍। इंजीनि‍यरि‍ंग कओलेजसँ रि‍टायर भेलाक पाँच सालक पछाति‍ सुधीर काका गामेमे रहबाक वि‍चार केलनि‍। वि‍चार अपने नै केलनि‍, काकीक दबाबमे केलनि‍। कारण भेल जे राजधानीक शहरमे अपन मकान कीनै काल मनमे ऐबे ने केलनि‍ जे राजधानीक शहर राजधानीकरण भऽ जाइ छै। सभ तरहक राजधानी बनैक लक्षण आबि‍ जाइ छै। अपराधीक भाँजमे पड़ि‍ सुधीर काकाक जे धन लुटेलनि‍ से तँ सबूर केलनि‍ जे बाढ़ि‍क पानि‍ जकाँ आएल-गेल मुदा दुनू परानी मारि‍ तेहेन खेलनि‍ जे राजधानी छोड़ि‍ गाम दि‍सक बाट धेलनि‍। दुनू परानी गाम तँ आबि‍ गेलाह मुदा इंजीनि‍यर रहने मनमे रहबे करनि‍ जे गामो-समाज तँ सएह मुदा से नै भेलनि‍। बाहरे जकाँ गामोमे बूझि‍ पड़नि‍ भातीजकेँ सोर पाड़ि‍ कहलखि‍न- “मनोज, गाम अही दुआरे एलौं जे अपन दर-दि‍याद, सर-समाजमे हब-गब करैत जि‍नगी ससारि‍ लेब। मुदा.....।” सुधीर काकाक वि‍चार मनोज बूझि‍ गेल। मुदा समुचि‍त उत्तर नै बूझि‍, प्रश्नकेँ बहटाि‍र बाजल- “काका, गामक लोकमे ओते सूझ‍-बूझ छै जे......?‍” मनोजक उत्तरसँ सुधीर काकाकेँ संतोष नै भेलनि‍। दोहरौलनि‍- “नै बौआ, कि‍छु दोसर बात छै?” मनोज कहलकनि‍- “काका, जाधरि‍ गाम-समाजक सीमा सड़हद बूझि‍ अपन सीमा-सड़हद नै बनाएब, ताधरि‍......।” ~ रमैत जोगी बहैत पानि‍ की मनमे एलनि‍ की नै....। राधाकान्‍त बाबा घर-परि‍वारसँ भगैक वि‍चार कऽ लेलनि‍। ओना समाज तँ समाज छी जे खेबा काल बौसैत अछि‍, पड़ाइत काल बौसैत अछि‍, रूसलमे बौसैत अछि‍ नै जानि‍ आरो काल बौसैत अछि‍। मुदा से राधाकान्‍त बाबाकेँ कि‍यो नै वौसए एलनि‍। ओना मनमे रहनि‍ जे कि‍यो औताह तँ अपन मनक बेथा कहबनि‍। केना नै कहि‍यनि‍ उपदेश झाड़लासँ झड़ै छै आकि‍ उपैत केलासँ। मुदा मनक बात मनेमे अंतरी जकाँ घुरि‍आइत बहत्तरि‍ हाथक भऽ गेलनि‍। केकरो नै देखि‍ फेर मनमे उठलनि‍ जे जखन समाजे नै तखन परि‍वारक कते आशा। बड़ करत तँ मुँहमे आगि‍ धराओत, कठि‍आरी के जाएत। तहूमे तेहेन चालि‍-ढालि‍ सभ धेने जाइए जे एको दि‍न रहब कि‍ जहलसँ कम अछि‍। मुदा तैयो आशामे रहथि‍ जे परि‍वारोक कि‍यो जँ बौसए चलि‍ औत तँ बौसा जाएब। अनेरे ऐ बुढ़ाड़ीमे कतए बौआएब। मुदा आशा अशे रहि‍ गेलनि‍। ओना अंत-अंत धरि‍ आशा रहनि‍ जे आन-आबए वा नै, मुदा......? दादी तँ दाि‍दये भऽ गेलीह। सृजनकर्ता कुम्‍हार तँ बर्तन गढ़ि‍ ओकर मुँह-कान नै सोझ करए, तँ केहेन बर्तन बनत। तहि‍ना दादी अपना बोनमे हराएल। कि‍अए बौसए औतनि‍। तहूमे कोनो कि‍ हराएल बात अछि‍ जे मरैबला मरबे करैए। आ चूड़ी फोड़ि‍, सि‍नूर मेटा जीबे करैए। मुदा जीवैक जगह तँ चाही। दरबज्‍जासँ उठि‍ राधाकान्‍त बाबा कमलक मोटरीमे लटकैत कमंडल कान्‍हपर लैत ओसारसँ नि‍च्‍चा उतरलाह कि‍ पोता देखलकनि‍। दौड़ल आबि‍ पाछूसँ मोटरी पकड़ैत कहलकनि‍- “कतए चललह?” बहैत पवि‍त्र धारक स्‍नान जकाँ राधाकान्‍त बाबा हरा गेलाह। मनक बेथा मनेमे गुमसरि‍ प्रेमक पेंपी बनि‍ मुँहसँ नि‍कलए लगलनि‍। मुदा कि‍छु उत्तर नै पाबि‍ पोता कहलकनि‍- “हमहूँ जेबह।” संगी पाबि‍ बाबा उत्तर देलखि‍न- “रमैत‍ जोगी बहैत‍ पानि‍।” ~ गंजन जखने सुनीता-दादी बेटीक हाल-समाचार सुनलनि‍ जे तेहेन रौदीमे पड़ि‍ गेल जे एको कनमा धान नै हेतै, तखनेसँ बाबापर आँखि‍ गड़ौने रहथि‍ जे जखने अवसर भेटत, नीक जकाँ गंजन करबनि‍। ओना बाबाकेँ बेटी कि‍ इलाकेक समाचार बूझल रहनि‍ मुदा सुनीता-दादीक कानमे ऐ लेल नै देलनि‍ जे कएले कि‍ हेतनि‍, तखन तँ मनरोग चढ़ा देबनि‍। तइसँ नीक जे कहबे ने करबनि‍, अनका मुँहे जे सुनबे करतीह तँ ओहुना घोंघाउज कऽ लेब। गर चढ़िते सुनीता-दादी बाबाकेँ कहलखि‍न- “कहाँ दन मृत्‍युन्‍जय-बेटीकेँ एको कनमा धान नै हेतइ, सात तुर दि‍न केना खेपतै? सभटा आगि‍ लगौल अहाँक छी। जेहेन गाम तीनू बेटीक केलौं तेहेन गाम अहाँकेँ मृत्‍युन्‍जयले नै भेटल।” दादीक गंजन गजि‍ते बाबाक मनमे उठलनि‍ जे जि‍नगीमे जँ कि‍छु अरधि‍-संकल्‍पि‍त बनि‍ नै चललौं तँ खाली डि‍ब्‍बामे झुटका दऽ झुनझुना बनौने की हएत। “दस कोस सीमा जे बन्‍हलि‍ऐ” लोरि‍क की फुसि‍ये कहलनि‍ अछि‍। जइठाम राँइ-बाँइ भेल गामक खेत जकाँ अनेको छोटका-बड़का आड़ि‍मे जि‍नगी बन्हि‍ गेल अछि‍, तइठाम कैये की सकै छी। अखनो ओ वि‍चार मनमे मरल कहाँ अछि‍ जे एक बाप-माइक धि‍या-पुता एक रंग जि‍नगी नै जीबए! ~ कचहरि‍या-भाय कचहरि‍या-भायकेँ देखि‍ते नीरस बाजल- “भाय, ओहूँकेँ कचहरि‍या उत्तरी भरि‍सक नहि‍ये उतरत?” कचहरि‍या भाय आ नीरस लंगोटि‍या संगी। भरि‍सक नै साल, तँ महि‍ने, नै महीना तँ दि‍ने, नै दि‍न तँ घंटे-मि‍नट नीरसे पैघ हेतनि‍। जि‍नका जन्‍म–टी‍प्पणि‍ लि‍खाएल हेतनि‍ ति‍नका ने जि‍नका नै लि‍खाएल हेतनि‍ ओ तँ अपने टीपत। कचहरि‍या-भाय बच्‍चेसँ चंगला से नीरसमे कम छलनि‍। जहि‍ना बगुला पोखरि‍क वा पानि‍क कि‍नछरि‍ धड़ैत तहि‍ना एकठाम रैन-बसेरा रहि‍तो कचहरि‍या-भाय कचहरीक लाट पकड़ि‍ लेलक। नीरसक प्रश्न कचहरि‍या भाइक मन हौड़ि‍ देलकनि‍। दुनि‍याँ बड़ीटा छै, झूठ-सच चलि‍ते रहतै। चलबो केना नै करतै? कोनो की अन्‍हार इजोत एक दि‍ना छी जे ओरा जाएत। तखन तँ भेल जतए छी ततए कुहेसकेँ भगा कऽ राखी। तहूमे नीरस लंगोटि‍या भैयारी छी, कोन दि‍नक कोन गप एहेन हएत जे नै बूझल हेतइ। रसे-रसे मनकेँ सोझ करैत बाजल- “बौआ नीरस, रहल तँ रस, नै तँ बेरस। आब अपना सभ अंति‍म घाटक घटवार भेलौं। भगवान तोरा सन बेटा सभकेँ देथुन जे कन्‍हाक भार उतारि‍ अपना कन्‍हापर लऽ लेलक।” आगूक बात बजैले कचहरि‍या भाइक ठोर पटपटाइते रहनि‍ आकि‍ बि‍चहि‍मे नीरस टोकि‍ देलकनि‍- “अहाँक बेटा की दब छथि‍?” जना कचहरि‍या भाइक छाती चहकि‍ गेलनि‍। फुटल कसताराक दही जकाँ मुँहसँ नि‍कललनि‍- “रसगुल्‍ला रसक चहटि‍ शुरूहेसँ लगि‍ गेल जे अपनो बुझै छी जे हलवाइक कुकुड़ जकाँ एक्कोटा रुइयाँ देहमे नै अछि‍ मुदा चहटि‍यो तँ चुहटि‍ कऽ चोहटबे करत।” बाल-बोध जकाँ नीरस मनकेँ फुसलबैत-बहलबैत बाजल- “अच्‍छा भाय, एकटा कहू जे जुआनी आ बुढ़ाड़ीमे की बूझि‍ पड़ैए?” सह पबैत कचहरि‍या भाय भगैतक पलगाँइ जकाँ बाजल- “गेल रे जुआनी फेर कतए पएब।” नहलापर गुलाम फेकैत नीरस भाय बाजल- “कृपा पाबि‍ कि‍यो मूकसँ वाचाल बनैए तँ कि‍यो वाचालसँ मूक!” कहि‍ मुड़ी डोलबैत दुनू गोरे जि‍नगीक कुन्‍ज भवनमे घुमए लगलाह। ~ बि‍सवास पनरह दि‍नसँ परेशान डॉक्‍टर परमेश्वर ओना माझि‍ल भाय-भागेश्वरक पेटक ऑपरेशनसँ परसुए पलखति‍ पौलनि‍ मुदा अपन अस्‍त–व्‍यस्‍त जीवनकेँ पटरीपर अनैमे दू-दि‍न सेहो लगि‍ये गेलनि‍। पटरीपर अनैक मतलब भेल नि‍श्चि‍त समैपर ि‍नर्धारि‍त काज करब। साँझक सात बजैत। चाह पीब सि‍गरेट सुनगा पहि‍लुक दमक धुआँ मुँहसँ फेकि‍ते रहथि‍ आकि‍ मनमे उठलनि‍, ऑपरेशन करैबलामे हमरो लोक जनैए मुदा अपना ऑपरेशनमे भाय-सहाएबक मन कि‍अए ने मानलकनि‍। जखन अपने घरक समांग बि‍सवास नै करत तखन दुनि‍याँक अशे की? मुदा मझि‍लो भैया तँ ओहन नहि‍ये छथि‍ जे आँखि‍ मूनि‍ कि‍छु करताह। जते डाॅ. परमेश्वर इनारक पानि‍ जकाँ डोलसँ ऊपर करथि‍ तइसँ बेसि‍ये पानि‍ तलाव टुटल इनार जकाँ मनमे भरि‍ जान्‍हि‍। हाँइ-हाँइ तीनटा सि‍गरेट पीब गेलाह मुदा पश्नक उत्तरक माटि‍ नै छूबि‍ सकलाह। बि‍सवास करब..., नै करब..., मनमे ओझरी लागि‍ गेलनि‍। जहि‍ना नन्‍हकी काँट बुढ़-पुरानक नजरि‍योपर नै पड़ैत आ धीया-पुता लप दऽ नि‍कालि‍ लैत। तहि‍ना डॉक्‍टर सहाएबकेँ अंति‍म वि‍चार मनमे अँटैक गेलनि‍ जे भागेश्वर भैया आन थोड़े छि‍आ जे लाज-संकोच करब। हुनकेसँ पूछि‍ मन थीर कऽ लेब। ओना भागेश्वरक आदति‍ छन्‍हि‍ जे सोझमे पड़ैत पूछि‍ दैत छथि‍न जे भैया कि‍ काका आकि‍ बौआ, की हाल-चाल अछि‍। तँए जखने पुछताह कि‍ टटके प्रश्न पूछि‍ देबनि‍। आराम करैत भागेश्वर गपे केनि‍हारक प्रति‍क्षा करैत रहथि‍। डाॅ. परमेश्वरकेँ लगमे देखि‍ते पूछि‍ बैसलाह- “बाउ, की हाल-चाल अछि‍?” हाल-चाल सुनि‍ते डॉ. परमेश्वर व्‍याख्‍या करैत बजलाह- “हाल-चाल कि‍ रहत भैया अहाँसँ ि‍नवृत्ति‍ भेलौं आ एकटा बात मनमे उठि‍ कऽ ठाढ़ भऽ गेल अछि‍।” बि‍च्‍चेमे भागेश्वर टोकलकनि‍- “एते भूमि‍का बन्‍हैक कोन प्रयोजन, कोन बात?” डाॅ. परमेश्वर- “पेटक ऑपरेशनक डाॅक्‍टर हमहूँ, कतेको करबो केलौं, कतौ अजस नै भेल। मुदा अहाँसँ जखन पुछलौं तँ दोसरकेँ कि‍अए पसि‍न केलि‍ऐ?” भागेश्वर- “बौआ, अहाँ साधारण श्रेणीक नै छी जे कि‍छु कहि‍ देब। दू रूपमे ज्ञान काज करै छै। गुण आ ि‍नर्गुण। अहाँ छोट भाए छी, जखन पेट कटि‍तौं तखन छाती दहैलि‍यो सकै छलए। मुदा देखैक जे भार देलौं से अही दुआरे जे अपन जेठ भाय बूझि‍ नीकसँ तकति‍यान करि‍तौं।” दान-दछि‍ना तरगरे उठि‍ पंडि‍त काका ि‍नत्‍य–कर्मसँ ि‍नवृत्ति‍ भऽ झुनझुनाबला बत्तीक ठेंगा लेने सड़कपर आबि‍ चि‍कड़ि‍-चि‍कड़ि‍ बजए लगलाह- “ई समाज रहैबला नै अछि‍। आन बि‍सरि‍ जाए तँ बि‍सरि‍ जाए मुदा मरै बेरमे केना मुँह बन्न करब जे पुराण-पोथीक दान सभसँ नीक नै होइ छैक।” आंगनसँ पत्नी सुनि‍ते धड़फड़ाएल दौगल आबि‍ कहलकनि‍- “भोरे-भोर की भऽ गेल जे एना अड़ड़ाइ छी?” पत्नीक पश्नसँ पंडि‍त काकाकेँ दुख नै भेलनि‍। खुशि‍ये भेलनि‍। कमसँ कम पत्नि‍यो तँ लगमे आबि‍ पुछलनि‍। खखास करैत बजलाह- “कहू जे भोज-काजमे लोक लाखक-लाख रूपैया फूकि‍ दइए। धोती-लोटा बाँटि‍ दइए। अहीं कहू जे लोक आब जग-गि‍लास भऽ गेल, फुलपेंटे-कोट भऽ गेल। तइठाम धोती-लोटाकेँ के छूअत। जे छुऐबला अछि‍ ओइले एकोटा पाइ नै लुटबए चहैए, तखन अनेरे की करब रहि‍ कऽ मन हुअए तँ अखने वि‍दा भऽ जाउ।” पंडि‍त काकाकेँ संगीक जरूरत देखि‍ पंडि‍ताइन काकी  बौसैत कहलखि‍न- “अखन धरि‍ अहूँ ते ने कहि‍यो बाजल छेलि‍ऐ। समाज दोखी बनाओत। तामस मि‍झा लि‍अ।” ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। विजय मस्त सुजीतक सम्पूर्ण कथा एकटा नया स्वाद देलक

की भेलै, मम्मी ? कोनो पहाड़ टूटि गेलै, कथिलाए दुखित छेँ । ककरो मृत्यु भऽ गेल छै । हम डाक्टर लग जाइत छी, एक घण्टाक बात अछि, बस्स सभ किछु नरमल । जिद्दी कथाक नायिका गिन्नीद्वारा वाजल गेल ई वाक्य आजुक आधुनिकताक नामपर सिगरेट, दारु आ यौन सम्बन्धके फैशन रुपमे अपना रहल मैथिल समाजक युवा युवतीक कथा व्यथाके कथाकार सुजीत कुमार झा वहुत सरल तरीकासँ प्रस्तुत कएने छथि । २०६९ साउनक अन्तिम सप्ताहमे बिमोचित पत्रकार आ साहित्यकार सुजीत झाजीक तेसर कृति जिद्दी कथा संग्रहक १२ गोट कथा हम बहुत रोचक आ जिज्ञासु भऽ पढलहुँ । ओना हुनक पहिल कृति चिडैं सेहो पढवाक अवसर भेटल छल, वहुत रोमान्चित लागल रहए । एकटा साहित्यके विद्यार्थीक नजरिसँ सुजीत जी मिथिला समाजमे व्याप्त पौराणिक परम्परासँ लऽकऽ आधुनिकताक छोट—छोट विषयसभके अपन कलमक माध्यमसँ सुसज्जित करयमे सफल छथि । यदि सुजीतजी अपन पाठकक विचारके सम्बोधन करैथि तऽ हमर ईच्छा अछि जे ओ अपन तेसर कृतिक लाल डायरी आ जिद्दी कथाके उपन्यासक रुपमे आगामी दिनमे रचना करथि । लाल डायरी आ जिद्दी पढैत काल हम कथामे एनाक डुवलहुँ जे एकर कथाक रुपमे अन्त हमरा दुःखीत कऽ देलक । ताहि कारणे ई प्रतिक्रिया लिखवाक लेल हम विवश भऽ गेलहूँ । ओ दूनु कथाक कथ्य गजब छल आ तहिना शिल्प । जिद्दी कथा संग्रहक पहिल कथा “फूल फुलाइएकऽ रहल” मे जाहि तरिकासँ नायिका अपना आगु आएल समस्याके समाधान कयलक अछि एहि समाजक महिलासभक लेल एकटा उपदेश अछि । दोसर कथा “नव व्यापार”क महिला क्लब आ साधनाके अपना परिवार मे रहिकऽ एतेक वेशी स्वतन्त्रता मैथिल समाजमे जूनि भेटैय । तहिना तेसर कथा “खाली घर” आई काल्हि अपनाके आधुनिक बुझनिहार महिला जिनका अपने निर्णयसँ पाछतावा हुए, ताहिके कथाकार चित्रण करएमे सफल भेल छथि । चारिम कथा “लाल डायरी” । मुदा जतेक सत्य अछि यादवजीकें मृत्यु १७ गते भेल अछि, ओतवे निर्र्विवाद सत्य अछि फागुन १८ गते सांझ हमरा घरपर यादवजीके आएब जेकर प्रमाण लाल डायरी अछि । वाक्य हमरा झकझोरि देलक आ लागल वास्तवमे आदमीके शरीरे मरैत अछि आत्मा नहि । विज्ञान युगमे सेहो एहिबात के एहसास कराओल गेल अछि । एकर प्रस्तुति एहिमे सजिवता आनि देने अछि । तहिना पांचम कथा जिद्दी प्रत्येक परिवारक माता पिताके अपना धियापुताक देलजाएवला स्वतन्त्रताके सँग—सँग हुनका प्रति आओर जिम्मेवारीक उपदेश दैत अछि । सुुजीतक जादूक ओ सामान बेचनिहार युवती वास्तवमे हमरो सम्मोहित कऽ देलक । सातम कथा आदर्श हमरा कोनो खासे प्रभावित नई कऽ सकल । मुदा अर्थहीन यात्रामे नेहा, जिनकर व्यक्तित्व एक चुम्बक जेका छलैन्हि कोनो पुरुष स्वयं खिचाक चलि अबैत छल ताहिके ओ मात्रै नहि समाजक बहुतो नेहा सभ दुरुपयोग करैत छथि । जाहिके कारण हुनक वैवाहिक जीवन अस्वस्थ रहल । ई कथा मात्र नई समाजक ऐना अछि । व्यर्थक उडानक सम्बन्धमे एक्कहिटा बात कहब कि सुजीत जी मानव जातिक ओ उड़ान जे बहुत कम समयमे बहुत बड़का होइत छैक, जे बहुत थोर लोक बुझि सकैया ताहिके अत्याधिक चतुरताक संग प्रस्तुत कएने छथि । नवम कथामे नीमाद्वारा अपना पति सोहनक लेल कएल गेल व्यवहार पर जेना श्रीनाथ चिन्तित छलथि, हमरो मोनमे स्याह प्रश्न आएल कि सोहनक पत्नीक व्यवहार निष्ठा छल कि देखावा ? सङ्गग्रह एगारहम कथा केहन सजायक चमेलीक प्रश्न — कोन अधिकारसं ओ हमरा पोसलन्हि आ फेर हमरा जनसागरमे भंसा देलन्हि, हम जन्मसँ अनाथ छी , ओतही पलितहुँ एहि गन्दा वातावरणक असरि तऽ नहि पडितए । हमर विश्वास किए तोड़ल गेल ? प्रश्न मात्रे चमेलीक नै भऽ समाजक प्रत्येक बच्चाक अछि, जे पोसपुत वा सतवा माता पिताकसंग रहैथ छथि आ दुःख भोगैत छथि । अन्तिम कथा मेनकाके हमर ह्ृदयसं धन्यवाद अछि । की आब तऽ अहँु नीना बनि गेल छीक जवाफ नहि ओ चिचएलहि आ एकटा सुखी परिवार विध्वंश होबए सँं बचि गेल । ई कृतिक रचनाकारक विषयमे कहलजाए त हमरा चिन्हल जानलमे सुजीतजी सन बहुत कम छथि जिनका मुहसँं कहियो अपशब्द नहि सुुनलहुँ आ सदिखनी हँसैंत रहैत छथि । समग्रमे जिद्दी कथा संग्रह एकबेर सभके पढबाक चाही हमर तऽ इहे सल्लाह अछि । किताबक प्रिन्टिङ्ग, डिजाइन सेहो बढिया अछि । प्रकाशकके सेहो धन्यवाद देब जे बढिया किताब पढबाक अवसर देलन्हि । लेखक राजनीतिकर्मीक अतिरिक्त युवा कवि छथि । ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। १.ओम प्रकाश-विहनि कथा- प्रोग्रेसिभ २.पंकज चौधरी (नवलश्री)-विहनि कथा - ई नोर छै गरीबीक १ ओम प्रकाश विहनि कथा- प्रोग्रेसिभ शर्माजी आ हुनकर कनियाँ पूरा समाजमे प्रोग्रेसिभ कहाबैत छलथि। एकर कारण ई छल जे दूटा बेटीक जन्मक उपरान्त शर्माजी बिना बेटाक लालसा केने फैमिली पलानिंगक आपरेशन करा लेने छलाह आ दूनू बेकती बेटी सभक लालन पालनमे कोनो कसरि नै छोडने छलखिन्ह। बेटी सबकेँ पढेबा लिखेबामे पूरा धेआन देने छलखिन्ह आ ओकरा सभकेँ तमाम सुख सुविधा देबामे पाँछा नै रहैत छलखिन्ह। समाजमे शर्माजी दूनू बेकती बहुत आदरणीय आ उदाहरण छलथि। बेटी सभकेँ आ शर्माजीक कनियाँकेँ कोनो दिक्कत नै होई, ऐ लेल शर्माजी किछो करबा लेल तैयार रहैत छलाह। घरक काजमे मदतिक लेल एकटा दाई राखल गेल छल जे चौबीसो घण्टा हुनकर घरे पर रहैत छलैन्हि। ओकर नाँउ छलै मीतू आ ओ बयसमे बारह-तेरह बरखक छल। ऐ हिसाबेँ ओ एखन बच्चे छलै आ पेटक मजबूरीमे हुनकर घरमे काज करबा लेल बाध्य छलै। घरक पूरा साफ सफाई, पोछा, बासन माँजनाई आ कपडा धोनाई ओकरे जिम्मा छलै। दिन भरि खटिकऽ ओ थाकि जाईत छल आ साँझुक बाद झपकी लेबऽ लागैत छल। जखने ओकरा झपकी आबै की मलकिनीक प्रवचन ओकर निन्न तोडि दैत छलै। रातिमे सभक खएलाक उपरान्त ओ सभटा बासन माँजि लैत छलै आ तकर बादे खाई लेल बैसै छलै। खएबामे सबहक बचल खुचल ओकरा नसीब होईत छलै। शर्माजी अपन बेटी सभक सब फरमाईश पूरा करैत छलखिन्ह आ कोनो वस्तुक माँग भेला पर बाजारसँ तुरंत ओ वस्तु आनैत छलथि, चाहे ओ कोनो खेलौनाक फरमाईश होई वा कोनो भोज्य सामग्रीक। जँ कखनो मीतू बाल सुलभ लालसामे ओइ वस्तु सभ दिस ताकियो दैत छलै की शर्माजीक कनियाँ अनघोल उठा दैत छलखिन्ह जे आब हमर बेटी सभकेँ ई वस्तु सब नै पचतै, देखू कोना नजरि लगा देलक ई निराशी। एकर अलावे आरो ढेरी गपक प्रसाद मीतूकेँ भेंट जाईत छलै, तैं बेचारी ऐ सब फरमाईशी वस्तु दिस धेआन नै देबाक प्रयास करैत छल, मुदा बच्चे छलै तैँ कखनो कालकेँ गलती भइये जाईत छलै। एकदिन शर्माजीक बडकी बेटी गुलाबजामुनक फरमाईश केलकै। शर्माजी साँझमे घर आबैत काल बीसटा गुलाबजामुन सबसँ नीक मधुरक दोकानसँ कीनिकऽ नेने अएलाह। पहिने तँ दूनू बेटी आ हुनकर कनियाँ दू-दूटा गुलाबजामुनक भोग लगेलखिन्ह आ तकर बाद बचलाहा मधुरकेँ फ्रिजमे राखि देल गेलै। मीतू कुवाचक डरे ऐ मधुर दिस ताकबो नै केलक आ नै ओकरा खएबा लेल भेंटलै। मुदा मधुरक सुगंध ओकरा बेर-बेर अपना दिस आकर्षित करऽ लागलै। ओ एकटा योजना मोने मोन बनेलक आ चुपचाप घरक काज करऽ लागल। रातिमे भोजन कएलाक उपरान्त शर्माजीक कनियाँ ओकरासँ बासन मँजबेलखिन्ह आ एकर बाद ओकरा खएबा लेल बचलाहा सोहारी आ तरकारी दैत ई ताकीद केलखिन्ह जे हम सुतै लेल जाई छियौ, तूँ खा कऽ अपन छिपली माँजि सुतै लए जइहैं। ओ स्वीकृतिमे अपन मुडी हिलेलक आ खएबा लेल बैसि गेल। शर्माजीक कनियाँ तकर बाद सुतै लए चलि गेलीह। आब मीतू मधुर खएबाक अपन योजना पर काज शुरू केलक। पहिने तँ जल्दीसँ सोहारी तरकारी समाप्त कएलक आ तकर बाद नहुँ नहुँ डेगे फ्रिज दिस बढल। एकदम स्थिरसँ ओ फ्रिजक फाटक खोललक आ फ्रिजसँ मधुरक पैकेट निकालि कऽ एकटा गुलाबजामुन मुँहमे राखलक। फेर ओ सोचऽ लागल जे जखन एकटा खाइये लेलौं तखन एकटा आर खा लेबामे कोनो हर्ज नै छै। तैँ ओ एकटा आर गुलाबजामुन निकालि मुँहमे धरिते छल की पाँछासँ शर्माजीक कनियाँ ओकर केश पकडि घीचि लेलखिन्ह। असलमे खटपटक आवाज सुनि हुनकर निन्न टूटि गेल छलैन्हि। आब तँ मीतूक जे हाल भेलै से जूनि पूछू। मुँहमे गुलाबजामुन ठूँसल छलै तैँ ओ गोंगिया लागल। शर्माजीक कनियाँ ओकरा पर थापड आ लातक बौछार कए देलखिन्ह। संगे अपशब्दक नब महाकाव्यक रचना सेहो करैत पूरा घरकेँ जगा देलखिन्ह। सब मिलिकऽ मीतूक अपशब्द आ थापडक खोराक दए गेलखिन्ह। जखन ओ सब गारिक पूरा शब्दकोश पढि गेलखिन्ह आ मारैत हाथ दुखाबऽ लागलैन्हि तखन ओ सब हँपसैत ठाढ भऽ गेलथि। शर्माजीक कनियाँ मीतूक झोंटा घीचैत कहलखिन्ह जे हम सब प्रोग्रेसिभ छी, तैं छोडि देलियौ नै तँ आन रहितौ ने तँ बलि चढेने बिना नै छोडितौ। ई कहि ओ सब अपन बेडरूम दिस विदा भेलथि आ मीतू कानैत अपन बोरा लेने ओसारा दिस सुतै लेल बढि गेल। २ पंकज चौधरी (नवलश्री) विहनि कथा - ई नोर छै गरीबीक

दक्षिण-पूब भरसँ अटूट मेघ घेरैत देखि बुधनी पूवैर बाधक एकपेरिया बाट पर नमहर-नमहर डेग झटकारने घर दिश विदा भेल. माथ पर घासक छिट्टा, कांख तऽर थोड़ सुखैल राहटक जारैन आ खोइंछ में नुका धेने छल सात-आठ टा रस्फट्टू आम जे अबैत काल बाट में बिछने छल अल्हुआ वला खेत लगका कलकतिया आमक गाछ तर सँ.. गाम परहक चिंता जान खेने जा रहल छलै. सात वरखक बेटा बंटी के घरे पर छोड़ि आयल छल. ओना ओ तऽ छाल छोड़ेने छल बाध अबै लेल मुदा रौद तेहन ने चंडाल उगल छलैक जे बुधनी के मोन नहि मानलकै आ ओकरा सुगिया काकी अंगना छोडि आयल छल. बुधनी के सभ सँ बेशी चिंता अहि गप्पक छलै जे जों ओकरा घर पर पहुंचै सँ पहिने वरखा शुरू भ गेलै तऽ जुलुम भऽ जेतै. चिपरी सभ बाहरे में सुखाइत छलै आ अंगना में खुद्दी सेहो पसारल छलै...आ हाँ चार पर बिरियो तऽ देने छलै बना कऽ सुखाई लेल, सभटा चौपट भऽ जेतै.. विचारक अहि उथल-पुथल में अगुताइल भागल जैत छल घर दिश. घर पहुँचते देरी छिट्टा अंगना में पटकि पहिने बंटी के सोर पारलक. ता धरि तऽ एकदम गुप्प अन्हार भऽ गेल छलैक आ जोड़-जोड़ सँ बिजलोका लोकय लागल छलै. संगहिं मेघ सेहो ढन-ढन गरज लागल छलै. बुधनी हडबडा कऽ सभटा काज करय लागल. आ बंटी... ओहो पाछू कियैक रहत..! ओहो छोटकी पथिया में चिपरी समेट कऽ उठाब लागल. कने कालक बाद खूब जोड़ सँ वरखा शुरू भऽ गेलै. बुधनी बंटी के लऽ कऽ दौड़ कऽ घर दिश भागल...मुदा ताहि सँ की..? घर की कोनो अंगना सँ नीक छलै..! सड़ल खऽर... मोनो नहि जेऽ कैऽ वरख भऽ गेल छलै छड़वेला. कोरो-बाती सेहो सड़ल-गलल. ओहिना टुक-टुक मेघ देखाइत...! राति कऽ बंटी घरे में बैसले-बैसल चंदा मामा सँ बतिया लैत छल आ तरेगन सँ खूब लुका-छिपी खेलैत छल. सौंसे घर में गर-गर पाइन चुबैत. कनिए काल में घर पाइन सँ भरि कऽ डबरा भऽ गेल. बुधनी छिपिया लऽ पाइन उपछ लागल. ओ पाइन उपछैत-उपछैत अप्सियांत भेल छल. आ बंटी.... ओकरा लेखे केहनो सन नहि....आ रहबे कियैक करतैक...? ओ तऽ कागतक नाह बना घर में अई कोन सँ ओई कोन धरि बहा कऽ आनंद सँ विभोर भऽ रहल छल. कने कालक पश्चात जहन खेलाइत-खेलाइत बंटी थाकि गेल तऽ नाह के ओहिना पाइने में हेलैत छोडि बुधनी के कोरा में जा बैसल आ बाजल माय गे भूख लागल अछि, किछु खाई लेल दे ने...! बुधनी एक दू बेर तऽ अन्ठेलक मुदा जहन बंटी छाल छोड़बय लागल तऽ बुधनी चिनवार पर बासन सभ के उनटा-पुन्टा कऽ देख लागल. किछु नहि भेटलैक...किछु रहतैक तहन ने भेटतै. मुदा बंटी कियैक मानत..आ फेर जे माइन गेल से नन्ने की..? बुधनी अकबकैल ओकर मूंह तकैत छल तखने कोठिक गोड़ा पर राखल मरुआ रोटिक एकटा टुकड़ी पर ओकर नजरि गेलै. बुधनी मोन पारय लागल जे कहिया के छियैक.... हाँ मोन पड़ल परसुए भोर में तऽ बनने छलियैक.. बुधनी ओ मरुआ रोटी पर थोड नून आ सुखायल अचार धऽ बंटी के दऽ देलकै. बंटी मगन भऽ खाय लागल. नेनाक चंचल मोन तऽ देखू…खाइत-खाइत बंटी बाजल माय गेऽ दू टुकड़ी पियाउज दे ने..! बुधनी सौंसे घर ढुरलक तऽ आधा टा पियाउज भेटलै.. ओ पियाउज सोहि बंटी के देबय लागल....! बुधनिक आंखि में नोर भरि गेलै. बंटी माय के मुंह दिश तकलक तऽ बाजल…की भेलऊ माय कियैक कने छिही. नहि तऽ कहाँ कनैत छी हम. नहि-नहि फेर नोर कियैक बहि रहल छौ. मोन खराब छौ की.. माथ दुखाई छौ, हम जाइंत दियौ...? नहि बउआ किछु नहि भेलै हमरा. हमरा कियैक माथ दुखैत…? ई सुनि बंटी चहकि कऽ बाजल... ओहो आब बुझलियौ तों पियाउज कटलहिन्ह हैं तैं तोरा आंखि सँ नोर बहैत छौ - छैऽ नेऽ..? बुधनी मोने-मोन सोचे लागल जे बउया तोड़ा कोना कहियौ जेऽ ई नोर माथ दुखेबाक कारणे आ की पियाउज कटबाक कारणे नहि बहि रहल अछि.... इ नोर...इ नोर तऽ गरीबी केर छैक. मुदा बुधनी सभटा दर्द अपना मोन में समेटने विरोगे लोल कोंचियाबैत आ जबरदस्तिये कनी मुस्कियैत बाजल "हाँ बउया पियाउज कटलियै तहि दुआरे नोर बहय लागल...! बंटी मायक ई गप्प सुनि ठिठिया कऽ हंसल आ मरुआ-रोटी-नून-अचार पियाउजक टुकड़ी संगे खाय में मगन भऽ गेल. गाल पर नोरक सुखायल धार नेने बुधनी के ओकर नेनपनक सत्य आ सुन्दर छवि देखि अजीब सन संतोषक अनूभूति भऽ रहल छलय..!!! ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। डॉ. अरुण कुमार सिंह, एल.डी.सी.आई.एल., भारतीय भाषा संस्थान, मैसूर कर्नाटक स्वातन्त्र्योत्तर मैथिली कथामे सामाजिक समरसता ‘सर्वेभवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद् दुख भाक्-भवेत्।’ उपनिषदक ई सूत्र वाक्य समरसतेक उन्नायक व परिचायक अछि। मानवमात्रक हितक कामना, सुख, समृद्धि एवं कल्याणक भावने सामाजिक समरसता अछि जे विभिन्न जाति, वर्ण, धर्म, सम्प्रदाय, भाषाई लोकक मन वाणी आओर कर्मसँ समरूप भए अपन प्रस्थिति एवं भूमिकाक निर्वाह करैत लक्ष्य प्राप्ति दिस प्रेरित करैछ। सामाजिक समरसता भारतीय संस्कृतिक आत्मा अछि। धर्म सापेक्षीकरण धर्म निरपेक्षीकरण, सर्वधर्म समभाव, मानवतावाद, बहुजनहिताय-बहुजनसुखाय आदि अवधारणा सामाजिक समरसताक पोषक व परिणाम रहल अछि। विविधतामे एकरूपताक भावना समरसतेकेँ प्रतिनिधित्व करैत अछि। संत, साहित्यकार, समाजवैज्ञानिक आदि सब सामाजिक व्यवस्था एवं प्रगति लेल - सामाजिक संगठनक स्थिरता लेल सामाजिक समरसताक अपेक्षा करैत रहल अछि। सामाजिक समरूपताक प्रचार-प्रसारक प्रति साहित्यकार सदैव सजग रहलाह अछि। सामाजिक प्राणीक रूपमे ओ समाजक शिल्पीए टा नहि अपितु शिक्षक, पथ-प्रदर्शक, विश्लेषक व सर्जक सेहो अछि एतदर्थ हुनक सृजनमे सामाजिक समरसताक सन्देश रहब स्वाभाविके अछि। मिथिलेत्तर प्रान्त मध्य विद्यापतिक सम्मान आओर आधुनिक युगक प्रथम मैथिली गद्यकार चन्दाझाक यश देखिकेँ मिथिलाक विद्वानमे सेहो अपन निज भाषाक सेवाक उत्सुकता जागल जकर फलस्वरूप मैथिली कथासाहित्यक निर्माण प्रारम्भ भेल। मैथिली साहित्यक समालोचक डॉ. रामदेव झाक कहब छन्हि जे आरम्भमे मैथिली कथा लेखकक लेल रचनाक दुई आदर्श छल पहिल संस्कृत परम्पराक आख्यायिका-उपाख्यायन, नीति कथा आदि तथा दोसर पाश्चात्य परिपाटीक सामाजिक परिवेश पर रचित कथा उपन्यास। ओहि समय धरि अंग्रेजी वा अन्य पाश्चात्य साहित्यसँ मैथिली साहित्यकारक साक्षात् परिचय नहि भए सकल छल, परंच बंगला साहित्य मे पाश्चात्य कथा - उपन्यासक अनुवाद आओर ओहिसँ प्रेरित-प्रभावित अभिनव कथा-उपन्यास विशेष समृद्ध भए बंगाल आओर बंगालसँ बाहर लोकप्रिय भए चुकल छल। मिथिला आओर मैथिलीक पूर्वोत्तर राज्य-आसाम एवं बंगालसँ प्राचीन कालहिसँ घनिष्ट सम्बन्ध रहल अछि, जाहिक कारणेँ मैथिली कथा साहित्यक आरम्भिक कथामे बंगला साहित्यक प्रभाव दृष्टिगोचर होइत अछि। हम कहि सकैत छी जे एकरे फलस्वरूप मैथिली कथा साहित्य मे नव युगक संग-संग नव दृष्टिकोणक सूत्रपात भेल एवं पाश्चात्य साहित्य एवं भारतीय साहित्यसँ प्रभावित भए मैथिली कथासाहित्य क्रियाशील भेल अछि। मैथिली साहित्य मध्य 1922-23 ई. क आसपास जखन मौलिक कथा लिखल जाए लागल ताहि मध्य कुमार गंगानन्द सिंह, कालीकुमार दास, लक्ष्मीपति सिंह, कांची नाथ झा ‘किरण’ आदिक कथा मध्य मिथिलाक वर्त्तमान समाजक स्थितिकेँ देखैत मैथिली कथासाहित्यकेँ सामाजिक जीवनसँ जोड़बाक भरपुर प्रयास कएलन्हि। एहि मे कुमार गंगानन्द सिंहक ‘पंचपरमेश्वर’ एवं ‘बिहाड़ि’ मे सामाजिक समरसताक वातावरणक अक्षरशः पालन होइत देखल गेल छल। स्वातन्त्र्योत्तर युगमे मैथिली साहित्यकार लोकनि अपन साहित्य मध्य पात्र चयन करबामे क्रमशः आभिजात्य मोहक तिरस्कार करैत सामाजिक समरसताक नियोजन (समावेश) करैत गामघरक ओहि पात्रसभकेँ साहित्यमे प्रतिष्ठित कएलनि जे परम्परासँ शोषित ओ प्रताड़ित रहल छलाह। स्वातन्त्र्योत्तर कालक कथाकारमे ललित, राजकमल, सोमदेव, मायानन्द मिश्र, धीरेन्द्र, रामदेव झा, हंसराज एवं लिली रे आदि प्रमुख अछि। मैथिली कथा साहित्य मध्य सामाजिक समरसताक दिशामे वस्तुतः ललितेक ‘रमजानी’ ओहि समयक श्रेष्ठ कथा सिद्ध भेल जे अखन धरि टटका बनल अछि। हिनक ओवरलोड, कंचनियाँ, मुक्ति एवं जानवर आदि कथा मे समकालीन स्थितिकेँ चिन्हैत जीवनक यथार्थक चित्रणक क्रममे समाजक सामन्ती विकारकेँ जगजियार करैत सामाजिक समरसताक बोध तँ देलनि मुदा मुक्तिक रास्ता नहि बना सकलाह। धीरेन्द्रक अधिकांश कथाक जन्म समाजक ओहि क्षेत्रक व्यथासँ होइत अछि जे सामाजिक स्तर पर तिरस्कृत अछि। शारीरिक स्तर पर बात-बात पर दण्डित कएल जाइत अछि। आर्थिक स्तर पर औंठा बोरबा लेल अभिशप्त अछि। हिनक कथा घंटी, सवाइ, हिचुकैत बहैत सेती, गामक ठठरी, मादा काँकोड़, बन्हकी आदि कथामे सामाजिक समरसता देखार दैत अछि। रामदेव झाक मनुक संतान, एक खीरातीन फाँक आदि कथामे स्वतन्त्र भारतक आर्थिक संघर्षक सामाजिक भावनासँ जाति विभेदकेँ समाप्त करैत वर्ग-संघर्षसँ मुक्त भए जाइत अछि। सामाजिक एवं प्रशासकीय व्यवस्थाक विद्रूपताकेँ देखार करैत दलित वर्गक विद्रोहक स्वरकेँ संगठन मे परिवर्त्तन करैत तत्कालीन समकालीन जीवनक यथार्थक चित्रण करैत अछि। सोमदेव विशिष्ट कथाकार छथि। हिनक प्रमुख कथा भात, अंगाचोर आदि मे निम्न वर्गक जीवनक यथार्थक अत्यन्त आत्मीयतासँ चित्रण भेल अछि। प्रभाष कुमार चौधरीक ‘मलाहक टोल’ कथा शोषित वर्गकेँ अपन अस्तित्वक रक्षा लेल प्रेरित करैत अछि। रामानन्द रेणु आर्थिक विसंगति जन्य निम्न वर्गक दंश एवं कुण्ठाकेँ अपन कथा मध्य विश्लेषित कएने छथि। जीवकान्तक ‘इनकिलाव’ तत्कालीन राजनीतिक सामाजिक जीवनक यथार्थसँ अछि। 1970 ई. क दशकमे बैंकक राष्ट्रीयकरण, प्रिवीपर्सक समाप्ति, भूमि सुधार सम्बन्धी आन्दोलन, आदि किछु एहन घटना थिक, जाहिसँ सामाजिक जागरण भेल तँ दोसर दिस साम्यवादी आन्दोलनसँ पूँजीपति एवं श्रमिक मध्य संघर्षमे वृद्धि भेल। दलित वर्गमे सह-अस्मिताक भावमे वृद्धि भेल। एहि यथार्थक प्रवक्ता कथाकारक रूपमे सुभाषचन्द्र यादवक नाम महत्त्वपूर्ण अछि। हिनक महत्वपूर्ण कथा छन्हि- घरदेखिया, काठक बनल लोक, फँसरी एवं ‘बनैत बिगड़ैैत’ कथा संग्रहक कथा आदि। कथाकार दलित अस्मिताक स्वर दैत समकालीन यथार्थक चित्रणसँ पूर्ण सफल भेल छथि। कथाकार महाप्रकाश, सुकान्त सोम, मनमोहन झा, उपेन्द्र दोषी, उदयचन्द्र झा ‘विनोद’, रामनरेश सिंह, राजाराम प्रसाद, महेन्द्र, विभूति आनन्द, अशोक, रमेश, तारानन्द वियोगी, देवशंकर नवीन, प्रदीप बिहारी, रामभरोस कापड़ि ‘भ्रमर’, रमेश रंजन, शैलेन्द्र आनन्द, केदार कानन, जगदीश प्रसाद मंडल, उमेश पासवान, डॉ. धीरेन्द्र, उमाकान्त, सुशील, रघुनाथ मुखिया, कामिनी कामायनी, ऋषि वशिष्ट, उमेश मंडल, वीरेन्द्र कुमार यादव, रामदेव प्रसाद मंडल झारूदार, मनोज कुमार मंडल, दुर्गानन्द मंडल आदि अपन कथा मध्य तथाकथित रूपेँ शोषित-दलित निम्नवर्गक छोटसँ छोट घटनाक्रमकेँ अपन कथानक बनबैत समाजक वास्तविक चित्रक चित्रण कए रहल छथि। एवं प्रकारेँ मैथिली कथा अपन स्वरकेँ परिवर्त्तित करैत, नव डेग दैत सामाजिक समरसता कायम करबा दिस विकासोन्मुख अछि। सहायक ग्रंथसूची 1 झा, बासुकीनाथ (डॉ.) (सम्पादक), समकालीन कथा साहित्यःसामाजिक परिप्रेक्ष्य, चेतना समिति, पटना,1976 2 झा, दिनेश कुमार(डॉ.), मैथिली साहित्यक आलोचनात्मक इतिहास,मैथिली अकादमी, पटना, 1989 3 झा, श्री दुर्गानाथ ‘श्रीश’ (डॉ.), मैथिली साहित्यक इतिहास, भारती पुस्तक केन्द्र, दरभंगा, 1991 4  भारद्वाज, मोहन (सम्पादक), मैथिली आलोचना,पत्रिका, मित्र गोष्ठी द्वारा डॉ. भीमनाथ झा, लक्ष्मीसागर, दरभंगा, फरबरी 1992 5 झा, रामानन्द ‘रमण’(डॉ.), अखियासल, अखियासल प्रकाशन, लालगंज, मधुबनी,1995 6 नबीन,देवशंकर, आधुनिक साहित्यक परिदृश्य, अंतिका प्रकाशन, दिल्ली 2000 7 ठाकुर, प्रो. वीणा, वाणिनी, मिथिला रिसर्च सोसाइटी, कबिलपुर, लहेरियासराय, दरभंगा, 2010 8 झा, रामानन्द ‘रमण’(डॉ.), हिआओल, अखियासल प्रकाशन, लालगंज, मधुबनी,2012 9 झा बाल गोविन्द “व्यथित” (डॉ.) मैथिली साहित्यक इतिहास, पटना भारती भवन, 1981 10 झा, बासुकीनाथ (डॉ.) (सम्पादक) मैथिली साहित्यक रूपरेखा, पटना चेतना समिति, 1976 11. http://www.videha.co.in ************* ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। ‍ १.राजदेव मंडल-लघुकथा-एलेक्‍सनक भूत २.प्रो. वीणा ठाकुर-लघुकथा- परि‍णीता ३.मनोज कुमार मण्‍डल- लघुकथा-घासवाली ४.कपि‍लेश्वर राउत- विहनिकथा-सलाह १ राजदेव मंडल लघुकथा- एलेक्‍सनक भूत नि‍न्नक नि‍शामे मातल सूतल छी आ सपना देखि‍ रहल छी। जुलूस जा रहल अछि‍। इनक्‍लाब जि‍न्‍दाबाद.....। राजनीति‍क पार्टी आ पाटीक तरफसँ ठाढ़ नेताक लेल वोट माँगएबला जुलूस। आगूमे नेताक बदला प्‍लाईवुडक आदमकद फोटो। दुनू जाँघक बीच मोटका लाठी धोंसि‍या कऽ फोटोकेँ ऊपर उठौने। गर्दमि‍सान करैत भीड़ नि‍कट आबि‍ रहल अछि‍। “जितबे करता- जितबे करता, हमर नेता जितबे करता। नेताजीकेँ मारि कऽ गोली, बन्न नै कऽ सकत हमर बोली।‍” भीड़मे एक दोसरासँ पूछैत अछि‍- “नेता जीकेँ गोली लगि‍ गेलै की?‍” “हँ भाय, साँझमे। गोली तँ अजमा कऽ छातीमे मारलकै। लेकि‍न हुसि‍ गेलै। टाँगमे गोली लगलै। होसपि‍टलमे पड़ल छथि‍। इलाज चलि‍ रहल छै। तइ दुआरे नेता जीक फोटो लऽ कऽ प्रचार कऽ रहल छि‍ऐ।‍” “सभटा एण्‍टी पाटीक कि‍रदानी हेतै।‍” हमर धि‍यान आदमकद फोटोपर अछि‍। आरे तोरीकेँ, ई फोटो तँ हमरे छी। हू बहू। लगल जेना हम उछलि‍ कऽ फोटोमे ढुकि‍ गेलौं। फोटोक बदलामे हमहीं ठाढ़ छी। आ ऊ अगत्ती छौड़ा लाठीपर टंगने हमरा ऊपर नीचाँ कऽ रहल अछि‍। दरदक अनुभव होइत अछि‍। बेसुमार दरद। हम ि‍चचि‍या रहल छी- “हे रौ, हमरा नीचाँ राख। एना कि‍ए नाहकमे जान लैत छँ।‍” भीड़केँ कोनो आँखि‍-कान होइत छै। के सुनत हमर कानब? मुड़ी उठेलौं। आगूमे देखै छी जे एण्‍टी पाटीक कि‍छु लफंगा सभ घुरि‍या रहल अछि‍। कि‍छु लोकक हाथमे झण्‍डा आ डण्‍टा अछि‍। आ रे तोरीकेँ, ई सभ तँ डाँड़सँ पेस्‍तौल नि‍कालि‍ रहल अछि‍। कि‍यो बम पटकि‍ पड़ाएल। “धुम... धुम... धड़ाम।‍” सभ भागल जहि‍ंपटार। हमरा लाठी सहि‍त गन्‍हकैत नालीमे फेंकि‍ देलक। ओइ भभकैत नालीमे हम लसकल छी, नाक मुनने। हल्‍ला कऽ कहि‍ रहल छि‍ऐ- “हओ, ठाढ़ हुअ। हमरो संग नेने चलह।‍” कि‍न्‍तु के सुनत? संकटकालमे तँ लोक केहनो प्रि‍य बेकतीक संग छोड़ि‍ दै छै। आ हम तँ नेता छी....। तँए हम तँ सबहक प्रि‍य। कि‍न्‍तु कि‍यो नै अबैत अछि‍। महकैत नालीमे धँसल जा रहल छी। ‘हे देव, डूबै छी। तँ हाथ पएर मारह।’ नालीसँ नि‍कलबाक लेल हाथ-पएर जोर-जोर चलेलौं। स्‍त्रीकेँ झकझोरबसँ नि‍न्न टूटि‍ गेल। तामससँ थरथराइत पत्नी बाजि‍ रहल अछि‍- “दि‍न कऽ गारि‍ आ राति‍मे मारि। हमरा ई जि‍अ नै दैत। हम आब रहि‍ नै सकैत छी।‍” “देखू एना नै बाजू। पड़ोसि‍या सुनत तँ की कहत। हमरा तँ मोने नै रहल जे घरमे अहाँ लग सूतल छी। हम तँ सपनामे कतएसँ कतए बौआ रहल छलौं। आब अहाँ जे कही।‍” “अच्‍छा, अच्‍छा बुझलौं। भोर भऽ गेल छै। दुआरपर सँ कि‍यो सोर पाड़ि‍ रहल अछि‍। उठू, देखि‍यौ।‍” “की देखबै। वएह सभ हेताह।‍” “के सभ?‍” “आइ तँ नमनेशन देबाक लेल जाइक छै ने।‍ संगे-संग जाइबला संगी-साथी सभ…।” “ठीके तँ अछि‍। अहूँ नहा-सोना कऽ तैयार भऽ जाउ। चलि‍ जाउ सवेरे।‍” “धुर, हमरा राजनेति‍ करनाइ ठीक नै लगैत अछि‍। ई कोनो नीक करम नै अछि‍।” “हेओ, अहाँ सपनामे धसना खसैत तँ नै देखलि‍ऐ। आकि‍ एलेक्‍सनक भूत चाँपि‍ देलक। काल्हि‍ तक जइ‍ राजनेति‍क गुण-गान करैत छलि‍ऐ आइ ओकरा अधलाह कहै छि‍ऐ?‍” स्‍वरकेँ अकानैत फेर बजली- “अच्‍छा जाइयौ, दुआरि‍पर सँ सोर पाड़ैत अछि‍।‍” हाथ-मुँह धो कऽ हम दुआरि‍पर पहुँचलौं। देखैत छी- गौआँ-घरूआ, संगी-साथी, कि‍छु नव सि‍खुआ नेता सभ एका-एकी दुआरि‍पर जमा भऽ रहल अछि‍। एकटा छोटका भीड़ सन। भीड़सँ स्‍वर नि‍कलि‍ रहल अछि‍- “अँए यौ, अखनी तक अहाँ तैयार नै भेलौं। कागज-पत्तर लि‍अ। आ जल्‍दी चलू। सभसँ पहि‍ले।‍” “हाँ-हाँ सभसँ पहि‍लुक नमनेशन अपने सभक दाखि‍ल हेबाक चाही।‍” “जल्‍दी नमगरहा कुरता लगाउ। अरे, मुँह की तकै छेँ। छि‍पगरहा लग्‍गामे झण्‍डा बान्‍ह।” हमरा ठाढ़े भेल देखि‍ एक गोटे बजल- “रौ तोरीकेँ, नेताजी अहाँ ठाढ़े छी। जल्‍दी करू। साम-दामक संग चलैक छै।” तैयो हम असमंजसमे ठाढ़ छी। पछि‍म भर सँ चटपटि‍या काका अपस्‍यि‍ाँत हइत पहुुँचल। भीड़केँ देखि‍ ओकर पएर ठमकल। ओ जोरसँ बजल- “हौ, एकटा गप्‍प बुझलहक। पछबरि‍या सड़कक कातमे एकटा नेताजीकेँ टांग-हाथ तोड़ि‍ कऽ राखि‍ देने छै। ओ नुए बसतरे सभ करम केने पड़ल अछि‍।” “धुर सभटा फूि‍स। खाली झूठे बजै छी- अहाँ।” “नै हौ, देखि‍ आबहक, अपनेसँ। कि‍रि‍या खा कऽ कहै छि‍अह। कुहरै छै। अखने पानि‍ पि‍आ कऽ एलि‍ऐ।” “छोड़ ऐ गप्‍पकेँ। सभ एलेक्‍सनमे तँ अहि‍ना होइ छै। कतेक नेता मरतै-हारतै। अन्‍तमे जे बचत आ जीतत तेकरे राजति‍लक लगतै।” “चलू बहादूर, डर नै राखू।” “यौ ठकमुड़ी कि‍अए लगल अछि‍।” हमरा लगैत अछि‍- ई सभ आब नै मानत। हमरा जबरदस्‍ती ने लऽ जाए। हम कोनो शर्तपर नै जाएब। हमरा नस-नसमे डर ढुकल जा रहल अछि‍। मि‍टि‍ंगमे नेताजी कहने रहथि‍- “पहि‍ले शि‍क्षा प्राप्‍त करू। संघर्ष करू आ तब बढ़ू सत्ता दि‍स।” तँ कि‍ हम शि‍क्षि‍त नै छी। एकता करबाक लेल प्रयास करैत रहलौं। आब जे समए आएल तँ सत्ता प्राप्‍त करैक लेल कोशि‍शमे लगलौं। फेर ई डर कतएसँ आबि‍ गेल। लगैत अछि‍ तरे-तर कण्‍ठ मोकने जा रहल अछि‍। बेकार एलेक्‍सनमे ठाढ़ हेबाक हवा फैला देलि‍ऐ। सात दि‍नसँ सुनि‍ रहल छी- वि‍पक्षी सबहक गपशप। शाइत ऐ एलेक्‍सनमे हमर मौत लि‍खल अछि‍। गामक सम्‍पन्न आ दबंग मालि‍क सि‍ंहजी सेहो कहैत रहए- जे हमरा बेटाक एण्‍टीमे ठाढ़ हएत ओकरा साफ कऽ देबै। चारि‍म दि‍न सि‍ंह जीक भाय हमरा समझाबैत कहने रहए- “हौ धि‍या-पुताकेँ पढ़ाबह-लि‍खाबह आ घर दुआरि‍ नीकसँ बनाबह। कि‍ए राजनेति‍क फेरमे पड़ल छह। राजनेती छि‍ऐ आन्‍हर बि‍हाड़ि‍। तोहर घर-परि‍वार तगतगर नै छह। ऐ बि‍हाड़ि‍मे अपनो उड़ि‍ जेबहक आ परि‍वारो नाश भऽ जेतह। तोरा पासमे राजनेति‍ करैबला सामरथ कहाँ छह। छोट जाति‍मे जनमल, छोट परि‍वारक लोक छह। तोरा बुत्ते ई नै हेतह।” लगैत अछि‍ हमरा धीया-पुता अनाथ भऽ जाएत आ पत्नी वि‍धवा। संगी-साथीक की हेतै। फाँटि‍पर तँ हम चढ़बै। धुर नै ठाढ़ हएब हम। कहि‍ दैत छि‍अह साफे-साफ। जोरसँ बजै छी- “हे यौ हम एलेक्‍सनमे नै ठाढ़ हएब। दोसरे गोटेकेँ ठाढ़ करू। हम समर्थन करबै।” सभ अवाक। भीड़ बजैत अछि- “गाछ चढ़ा कऽ छह मारै छेँ। कतौ मुँह देखेबाक जोग रहब हम सभ। नै, आब से नै हेतह। ठाढ़ हुअए पड़तह।” सोचै छी- हमरा पासमे बड़का माथ नै अछि‍। कनि‍यो हुसि‍ जाएब तँ जेल जाएब। आब हमरा भागए पड़त, दोसर कोनो उपाइ नै। देह जेना थर-थराए लगल। जोरसँ बजलौं- “हमरा बोखार लगि‍ गेल। अहाँ सभ चलि‍ जाउ। हमरा बुत्ते एलेक्‍सन लड़ल नै हएत।” ओतएसँ पड़ेलौं, ऑंगन आबि‍ बि‍छौनपर धाँइ दऽ खसि‍ पड़लौं। खि‍सि‍आएल लोक कि‍छुसँ कि‍छु बजैत एका-एकी जा रहल अछि‍। सभ चलि‍ गेल तँ निचेन भऽ नि‍साँस छोड़लौं। पत्नी लगमे आबि‍ हमरा नि‍हारि‍ रहल अछि‍। पुछलि‍ऐ- “एना कि‍अए तकै छी?” बजलीह- “देखै छी जे अहाँ मौगी छी की मरद। अहाँ एतेक मौगि‍याह छी, हमरा पता नै छल। आब तँ हमरा लाज होइए जे एहेन मौगाक संग केना कऽ जि‍नगी काटबै। अहाँ घरेमे रहू, एलेक्‍सनमे ठाढ़ हेबाक लेल हमहीं जाइ छी।” कहैत ओ फुरतीसँ नि‍कलि‍ गेली। हमरा भीतरीमे जेना तूफान सन उठए लगल। मोनमे आबए लगल कि‍छु शब्‍द सभ- डेरबुक..... साफ कऽ देब...... बि‍हाड़ि‍..... परि‍वारक नाश..... सत्ता......... राजनेति............. मौगि‍याहा...........। कि‍छु काल तक मोन औनाइत रहल। फेर जेना भीतरमे कि‍छु उगल। मेघकेँ फाड़ि‍ जेना सूरूज उगि‍ गेल हो। धड़फड़ा कऽ उठलौं। कुरता पहि‍रि‍लौं। झोरा कान्‍हमे लटकेलौं। आ ऑफि‍स दि‍स दौगैत जा रहल छी। मुँहसँ जोरगर स्‍वर स्‍वत: नि‍कलि‍ रहल अछि‍- “चलू जल्‍दी चलू। हम एलेक्‍सनमे ठाढ़ हेबाक लेल जा रहल छी।” फेर दौड़ए लगलौं। एतेक पछुआएल छी तँ दौड़हि‍ ने पड़त। २ प्रो. वीणा ठाकुर १९५४- लघुकथा परि‍णीता आइ डोमेस्‍टि‍क एयर पोर्ट दि‍ल्‍लीमे श्‍यामाक भेँट नीलसँ भेल छलनि‍। श्‍यामा थोड़ेक काल धरि‍ हतप्रभ रहि‍ गेल छलीह। नील-नील कहि‍ मोनक कोनो कोनमे हहाकारक लहरि‍ उठि‍ गेल छल। एतेक वर्ष बीत गेल। नील अखनो ओहने छथि‍, कोनो परि‍वर्त्तन नै भेल छन्‍हि‍। आकर्षक नील, हँसमुख नील, पुर्ण पुरुष नील, उच्‍च पदस्‍थ नील, नील-नील। श्‍यामा कहि‍यो नीलकेँ बि‍सरि‍ नै सकल छलीह। सभटा प्रयासश्‍यामाक वि‍फल भऽ गेल छल। नील सदि‍खन छाया सदृश श्‍यामाक संग लागले रहलथि‍। नील कतेक दूर भऽ गेल छथि‍, श्‍यामा आब चाहि‍यो कऽ नीलकेँ स्‍पर्श नै कऽ सकैत छथि‍, ओहि‍ना जेना छाया संग रहि‍तौं स्‍पर्श नै कएल जा सकैत अछि‍, मनुष्‍यक संग छायाक अस्‍ति‍त्‍व तँ सदि‍खन रहैत छैक, मुदा ओकर आकार तँ सदि‍खन नै रहैत छैक। श्‍यामाक जि‍नगी नील, श्‍यामाक सोच नील, श्‍यामाक सभ ि‍कछु नील। श्‍यामाक तन्‍द्रा भंग भऽ गेल छल, नीलक चि‍र परि‍चि‍त हँसि‍ सुनि‍, नील आश्चर्यचकि‍त होइत प्रसन्न भऽ कहने छलाह- “श्‍यामा, माइ डि‍यर फ्रेंड हमरा बि‍सवास होइत अछि‍, अहाँ फेर भेँट हएत। श्‍यामा अहाँ अखनो ओहि‍ना सुन्‍दर छी, यु आर टु मच ब्‍युटि‍फूल यार, आइ कैन नॉट वि‍लि‍भ।‍” और पुन: ठहाका माइर‍ हँसने छलाह। नील संगक युवतीसँ श्‍यामाक परि‍चए करबैत कहने छलाह- “श्‍यामा, मीट माइ वाइफ नीलि‍मा, ओना हमर नीलू- नीलू माइ वेस्‍ट फ्रेंड श्‍यामा।” नीलू बहुत शालीनतासँ श्‍यामाक अभि‍वादन करैत कहने छलीह- “गुड मॉनि‍ंग मैम।‍” और नील हँसेत बाजि‍ गेल छलाह- “देखू हम आइयो अहाँक पसन्‍दक ब्‍लू पैंट शर्ट पहि‍रने छी।‍” कि‍छु आॅपचारि‍क गप्‍प भेल छल। एयरपोर्टपर एनाउन्‍समेंट भऽ रहल छल, संभवत: नीलक फ्लाइटक समए भऽ गेल छल। श्‍यामा पाछाँसँ नील और श्‍यामाक जोड़ी नि‍हारैत रहि‍ गेल छलीह। कतेक सुन्‍दर जोड़ी अछि‍- राधा-कृष्‍ण सदृश। नीलि‍मा कतेक सुन्‍दर छथि‍, एकदमसँ नील जोगड़क। लगैत अछि‍ जेना ब्रह्मा फुर्सतमे नीलि‍माकेँ गढ़ने होएथि‍न। सुन्‍दर, सुडॉल शरीर, श्‍वेत वर्ण, सुन्‍दर लम्‍बाइ, उमंग और उत्‍साहसँ पूर्ण नीलि‍मा। नीलि‍माक प्रत्‍येक हाव-भाव सुसंस्‍कृत होएवाक परि‍चायक अछि‍। श्‍यामा अपलक देखैत रहि‍ गेल छलीह। ताबत धरि‍ जाबत दुनू श्‍यामाक आँखि‍सँ ओझल नै भऽ गेल छलथि‍। घर अएलाक पश्‍चात् बि‍नु कि‍छु सोचने आएना लग आबि‍ अपनाकेँ देखए लागल छलीह। केशक एकटा लटमे कि‍छु श्‍वेत केश देखि‍ श्‍यामाकेँ आश्चर्य भेल छलनि‍ जे अखन धरि‍ हुनक नजरि‍ ऐ ‍पर नै‍ पड़ल छल। फेर जेना श्‍यामाकेँ संकोच भेल छलनि‍ जे अबैत देरी आखि‍र अएनामे की देखि‍ रहल छथि‍। भरि‍सक नीलक प्रशंसा अखनो श्‍यामाकेँ ओहि‍ना आह्लादि‍त कऽ गेल छल। ई तँ कि‍छु वर्ष पहि‍ने होइत छल। आब तँ प्राय: श्‍यामा नीलकेँ, नीलक संग बि‍ताएल क्षणकेँ बि‍सरवाक प्रयास कऽ रहल छथि‍। आखि‍र नील अखन धरि‍ श्‍यामाक मस्‍ति‍ष्‍कपर ओहि‍ना आच्‍छादि‍त छथि‍। समैक अन्‍तराल कि‍छु मि‍टा नै सकल। मि‍टा देलक तँ श्‍यामाक जि‍नगी, श्‍यामाक खुशी। श्‍यामाक जि‍नगी भग्‍न खण्‍डहर बनि‍ कऽ रहि‍ गेल, जइ‍मे नील आइ हुलकी दऽ गेल छलाह। की नील अखन धरि‍ श्‍यामाकेँ बि‍सरने नै छथि‍? श्‍यामाक पसन्‍द अखनो मोन छन्‍हि‍? श्‍यामाक महत्‍व अखनो बाँचल अछि‍? नै तँ नील एना नै बजि‍तथि‍। चारू-कात देखलनि‍, ओछाओनसँ लऽ कऽ टेबुल धरि‍ कि‍ताब छि‍ड़ि‍याएल छल। मोन थोड़ेक खौंझा गेल छलनि‍, एहेन अस्‍त-व्‍यस्‍त घरक हालत देखि‍। तथापि‍ कि‍ताब एक कात कऽ श्‍यामा अशोथकि‍त भऽ ओछाओनपर पड़ि‍ रहल छलीह। मोन एकदम थाकि‍ गेल छल, मुदा दि‍माग सोचनाइ नै छोड़ि‍ रहल छल। श्‍यामा अपन आदति‍ अनुसार डायरी लि‍खैले बैस गेल छलीह। आजुक पन्ना-नीलक नाओं- नील, आजुक पन्ना अहाँक नाओं अछि‍। हमरा बूझल अछि‍, आब नै तँ हमर डायरी कहि‍यो जबरदस्‍ती पढ़ब, नै हमरा पढ़ब। नील पाँच वर्ष अहाँक संग बि‍ताएल अवधि‍ हमर जीवनक संचि‍त पूँजी थि‍क, ऐ पूँजीकेँ बड़ नुका कऽ मोनक कोनमे राखने छलौं। कतौ ऐ अमूल्‍य नि‍धि‍केँ बॉटबाक इच्‍छा नै छल, कागजक पन्नोपर नै‍। मुदा आइ एतेक पैघ अन्‍तरालक पश्‍चात, अहाँकेँ देखि‍ मोन अपना वशमे नै रहल। मोन की हमरा वशमे अछि‍। अहाँक संग रहि‍ हम तँ दि‍न-दुनि‍याँ बि‍सरि‍ गेल छलौं, कहि‍यो कि‍छु कहबाक इच्‍छा होएबो कएल तँ अहाँ सुनए लेल तैयार नै भेलौं। अहाँ सतत् कहैत रहलौं- “हमरा अहाँक मध्‍य नै कहि‍यो तेसर मनुष आएत और नै कोनो व्‍यर्थक गप्‍प, बस मात्र हम और अहाँ, और कि‍छु नै‍।‍” हम मन्‍त्र मुग्‍ध भऽ अहाँक गप्‍प सुनैत सभ कि‍छु बि‍सरि‍ गेल छलौं। मुदा आइ सभ कि‍छु बदलि‍ गेल। आइ जँ सभ कि‍छु लि‍ख अहाँकेँ समर्पित नै कऽ देब तँ मोन और बेचैन भऽ जाएत। अहाँ हमरासँ दूर भऽ गेल छी, तथापि‍ आइ सभ कि‍छु, जे नै कहि‍ सकल छलौं, हम डायरीमे लि‍ख रहल छी। जखन हम अपनाकेँ अहाँकेँ समर्पित कऽ देलौं, तखन कि‍छु बचा कऽ राखब उचि‍त नै‍। हमर पि‍ता उच्‍च वि‍द्यालयमे शि‍क्षक छलाह, नाओं छलनि‍ पं. दि‍वाकर झा। हम दु बहि‍न एक भाए छी, हम सभसँ पैघ, बहि‍न श्‍वेता और भाए वि‍कास। हमर वर्ण कि‍छु कम छल, तइ‍ कारणे बाबूजी आवेशमे हमर नाओं रखलनि‍‍ श्‍यामा। बाबूजी हरदम कहैत छलाह- “ई हमर बेटी नै बेटा छथि‍, हमर जीवनक गौरव छथि‍ श्‍यामा।” छोट बहि‍नक नाओं श्‍वेता अछि‍, श्‍वेता गौर वर्णक छथि‍, तँए माए श्‍वेता नाओं राखने छलथि‍न। मैट्रि‍कमे हमरा फर्स्‍ट डि‍वि‍जन भेल तँ बाबूजी कतेक प्रसन्न भेल छलाह। महावीर जीकेँ लड्डु चढ़ौने छलाह। सौंसे महल्‍ला अपनहि‍सँ प्रसादक लड्डु‍ बाँटने छलाह। हमरा जि‍द्दसँ कॉलेजमे हमर नाओं लि‍खओल गेल छल। माए तँ वि‍रोध कएने छलीह। जखन हम बी.ए. पास कऽ गेलौं, तँ हमर बि‍आहक चि‍न्‍ता बाबू जीकेँ होमए लागल छलनि‍। एकठाम बि‍आह ठीक भेल तँ बड़क माए-बहि‍न हमरा देखए लेल आएल छलथि‍, मुदा श्‍वेताकेँ पसि‍न्न करैत अपन नि‍र्णए सुना देने छलथि‍न जे अपन बेटाक बि‍आह श्‍वेतासँ करब। बाबूजी कतेक दुवि‍धामे पड़ि‍ गेल छलाह। पैघ बहि‍नसँ पहि‍ने छोटक बि‍आह केना संभव अछि‍। मुदा माए-बाबूजी केँ बुझाबैत कहने छलथि‍न-“जे काज भऽ जाइत छैक से भऽ जाइत छैक। बि‍आह तँ लि‍खलाहा होइत छैक।” नील शास्‍त्रक कथन अछि‍-माए बापक असि‍रवाद फलि‍त होइत छैक। जँ असि‍रवाद‍ फलि‍त होइत छैक तँ माए बापक नि‍र्णए सन्‍तानक भाग्‍यक नि‍र्धारण सेहो करैत हेतैक। भरि‍सक माएक नि‍र्णए हमर भवि‍ष्‍य भऽ गेल। श्‍वेताक बि‍आह ओइ वरसँ भऽ गेलनि‍। आइ डोमेस्‍टि‍क एयर पोर्ट दि‍ल्‍लीमे श्‍यामाक भेँट नीलसँ भेल छलनि‍। श्‍यामा थोड़ेक काल धरि‍ हतप्रभ रहि‍ गेल छलीह। नील-नील कहि‍ मोनक कोनो कोनमे हहाकारक लहरि‍ उठि‍ गेल छल। एतेक वर्ष बीत गेल। नील अखनो ओहने छथि‍, कोनो परि‍वर्त्तन नै भेल छन्‍हि‍। आकर्षक नील, हँसमुख नील, पुर्ण पुरुष नील, उच्‍च पदस्‍थ नील, नील-नील। श्‍यामा कहि‍यो नीलकेँ बि‍सरि‍ नै सकल छलीह। सभटा प्रयासश्‍यामाक वि‍फल भऽ गेल छल। नील सदि‍खन छाया सदृश श्‍यामाक संग लागले रहलथि‍। नील कतेक दूर भऽ गेल रुष, श्‍यामा आब चाहि‍यो कऽ नीलकेँ स्‍पर्श नै कऽ सकैत छथि‍, ओहि‍ना जेना छाया संग रहि‍तौं स्‍पर्श नै कएल जा सकैत अछि‍, मनुष्‍यक संग छायाक अस्‍ति‍त्‍व तँ सदि‍खन रहैत छैक, मुदा ओकर आकार तँ सदि‍खन नै रहैत छैक। श्‍यामाक जि‍नगी नील, श्‍यामाक सोच नील, श्‍यामाक सभ ि‍कछु नील। श्‍यामाक तन्‍द्रा भंग भऽ गेल छल, नीलक चि‍र परि‍चि‍त हँसि‍ सुनि‍, नील आश्चर्यचकि‍त होइत प्रसन्न भऽ कहने छलाह- “श्‍यामा, माइ डि‍यर फ्रेंड हमरा बि‍सवास होइत अछि‍, अहाँ फेर भेँट हएत। श्‍यामा अहाँ अखनो ओहि‍ना सुन्‍दर छी, यु आर टु मच ब्‍युटि‍फूल यार, आइ कैन नॉट वि‍लि‍भ।‍” और पुन: ठहाका माइर‍ हँसने छलाह। नील संगक युवतीसँ श्‍यामाक परि‍चए करबैत कहने छलाह- “श्‍यामा, मीट माइ वाइफ नीलि‍मा, ओना हमर नीलू- नीलू माइ वेस्‍ट फ्रेंड श्‍यामा।” नीलू बहुत शालीनतासँ श्‍यामाक अभि‍वादन करैत कहने छलीह- “गुड मॉनि‍ंग मैम।‍” और नील हँसेत बाजि‍ गेल छलाह- “देखू हम आइयो अहाँक पसन्‍दक ब्‍लू पैंट शर्ट पहि‍रने छी।‍” कि‍छु आॅपचारि‍क गप्‍प भेल छल। एयरपोर्टपर एनाउन्‍समेंट भऽ रहल छल, संभवत: नीलक फ्लाइटक समए भऽ गेल छल। श्‍यामा पाछाँसँ नील और श्‍यामाक जोड़ी नि‍हारैत रहि‍ गेल छलीह। कतेक सुन्‍दर जोड़ी अछि‍- राधा-कृष्‍ण सदृश। नीलि‍मा कतेक सुन्‍दर छथि‍, एकदमसँ नील जोगड़क। लगैत अछि‍ जेना ब्रह्मा फुर्सतमे नीलि‍माकेँ गढ़ने होएथि‍न। सुन्‍दर, सुडॉल शरीर, श्‍वेत वर्ण, सुन्‍दर लम्‍बाइ, उमंग और उत्‍साहसँ पूर्ण नीलि‍मा। नीलि‍माक प्रत्‍येक हाव-भाव सुसंस्‍कृत होएवाक परि‍चायक अछि‍। श्‍यामा अपलक देखैत रहि‍ गेल छलीह। ताबत धरि‍ जाबत दुनू श्‍यामाक आँखि‍सँ ओझल नै भऽ गेल छलथि‍। घर अएलाक पश्‍चात् बि‍नु कि‍छु सोचने आएना लग आबि‍ अपनाकेँ देखए लागल छलीह। केशक एकटा लटमे कि‍छु श्‍वेत केश देखि‍ श्‍यामाकेँ आश्चर्य भेल छलनि‍ जे अखन धरि‍ हुनक नजरि‍ ऐ ‍पर नै पड़ल छल। फेर जेना श्‍यामाकेँ संकोच भेल छलनि‍ जे अबैत देरी आखि‍र अएनामे की देखि‍ रहल छथि‍। भरि‍सक नीलक प्रशंसा अखनो श्‍यामाकेँ ओहि‍ना आह्लादि‍त कऽ गेल छल। ई तँ कि‍छु वर्ष पहि‍ने होइत छल। आब तँ प्राय: श्‍यामा नीलकेँ, नीलक संग बि‍ताएल क्षणकेँ बि‍सरवाक प्रयास कऽ रहल छथि‍। आखि‍र नील अखन धरि‍ श्‍यामाक मस्‍ति‍ष्‍कपर ओहि‍ना आच्‍छादि‍त छथि‍। समैक अन्‍तराल कि‍छु मि‍टा नै सकल। मि‍टा देलक तँ श्‍यामाक जि‍नगी, श्‍यामाक खुशी। श्‍यामाक जि‍नगी भग्‍न खण्‍डहर बनि‍ कऽ रहि‍ गेल, जइ‍मे नील आइ हुलकी दऽ गेल छलाह। की नील अखन धरि‍ श्‍यामाकेँ बि‍सरने नै छथि‍? श्‍यामाक पसन्‍द अखनो मोन छन्‍हि‍? श्‍यामाक महत्‍व अखनो बाँचल अछि‍? नै तँ नील एना नै बजि‍तथि‍। चारू-कात देखलनि‍, ओछाओनसँ लऽ कऽ टेबुल धरि‍ कि‍ताब छि‍ड़ि‍याएल छल। मोन थोड़ेक खौंझा गेल छलनि‍, एहेन अस्‍त-व्‍यस्‍त घरक हालत देखि‍। तथापि‍ कि‍ताब एक कात कऽ श्‍यामा अशोथकि‍त भऽ ओछाओनपर पड़ि‍ रहल छलीह। मोन एकदम थाकि‍ गेल छल, मुदा दि‍माग सोचनाइ नै छोड़ि‍ रहल छल। श्‍यामा अपन आदति‍ अनुसार डायरी लि‍खैले बैस गेल छलीह। आजुक पन्ना-नीलक नाओं- नील, आजुक पन्ना अहाँक नाओं अछि‍। हमरा बूझल अछि‍, आब नै तँ हमर डायरी कहि‍यो जबरदस्‍ती पढ़ब, नै हमरा पढ़ब। नील पाँच वर्ष अहाँक संग बि‍ताएल अवधि‍ हमर जीवनक संचि‍त पूँजी थि‍क, ऐ पूँजीकेँ बड़ नुका कऽ मोनक कोनमे राखने छलौं। कतौ ऐ अमूल्‍य नि‍धि‍केँ बॉटबाक इच्‍छा नै छल, कागजक पन्नोपर नै‍। मुदा आइ एतेक पैघ अन्‍तरालक पश्‍चात, अहाँकेँ देखि‍ मोन अपना वशमे नै रहल। मोन की हमरा वशमे अछि‍। अहाँक संग रहि‍ हम तँ दि‍न-दुनि‍याँ बि‍सरि‍ गेल छलौं, कहि‍यो कि‍छु कहबाक इच्‍छा होएबो कएल तँ अहाँ सुनए लेल तैयार नै भेलौं। अहाँ सतत् कहैत रहलौं- “हमरा अहाँक मध्‍य नै कहि‍यो तेसर मनुष आएत और नै कोनो व्‍यर्थक गप्‍प, बस मात्र हम और अहाँ, और कि‍छु नै‍।‍” हम मन्‍त्र मुग्‍ध भऽ अहाँक गप्‍प सुनैत सभ कि‍छु बि‍सरि‍ गेल छलौं। मुदा आइ सभ कि‍छु बदलि‍ गेल। आइ जँ सभ कि‍छु लि‍ख अहाँकेँ समर्पित नै कऽ देब तँ मोन और बेचैन भऽ जाएत। अहाँ हमरासँ दूर भऽ गेल छी, तथापि‍ आइ सभ कि‍छु, जे नै कहि‍ सकल छलौं, हम डायरीमे लि‍ख रहल छी। जखन हम अपनाकेँ अहाँकेँ समर्पित कऽ देलौं, तखन कि‍छु बचा कऽ राखब उचि‍त नै‍। हमर पि‍ता उच्‍च वि‍द्यालयमे शि‍क्षक छलाह, नाओं छलनि‍ पं. दि‍वाकर झा। हम दु बहि‍न एक भाए छी, हम सभसँ पैघ, बहि‍न श्‍वेता और भाए वि‍कास। हमर वर्ण कि‍छु कम छल, तइ‍ कारणे बाबूजी आवेशमे हमर नाओं रखलनि‍‍‍ श्‍यामा। बाबूजी हरदम कहैत छलाह- “ई हमर बेटी नै बेटा छथि‍, हमर जीवनक गौरव छथि‍ श्‍यामा।” छोट बहि‍नक नाओं श्‍वेता अछि‍, श्‍वेता गौर वर्णक छथि‍, तँए माए श्‍वेता नाओं राखने छलथि‍न। मैट्रि‍कमे हमरा फर्स्‍ट डि‍वि‍जन भेल तँ बाबूजी कतेक प्रसन्न भेल छलाह। महावीर जीकेँ लड्डु चढ़ौने छलाह। सौंसे महल्‍ला अपनहि‍सँ प्रसादक लड्डु‍ बाँटने छलाह। हमरा जि‍द्दसँ कॉलेजमे हमर नाओं लि‍खओल गेल छल। माए तँ वि‍रोध कएने छलीह। जखन हम बी.ए. पास कऽ गेलौं, तँ हमर बि‍आहक चि‍न्‍ता बाबू जीकेँ होमए लागल छलनि‍। एकठाम बि‍आह ठीक भेल तँ बड़क माए-बहि‍न हमरा देखए लेल आएल छलथि‍, मुदा श्‍वेताकेँ पसि‍न्न करैत अपन नि‍र्णए सुना देने छलथि‍न जे अपन बेटाक बि‍आह श्‍वेतासँ करब। बाबूजी कतेक दुवि‍धामे पड़ि‍ गेल छलाह। पैघ बहि‍नसँ पहि‍ने छोटक बि‍आह केना संभव अछि‍। मुदा माए-बाबूजीकेँ बुझाबैत कहने छलथि‍न-“जे काज भऽ जाइत छैक से भऽ जाइत छैक। बि‍आह तँ लि‍खलाहा होइत छैक।” नील शास्‍त्रक कथन अछि‍-माए बापक असि‍रवाद फलि‍त होइत छैक। जँ असि‍रवाद‍ फलि‍त होइत छैक तँ माए बापक नि‍र्णए सन्‍तानक भाग्‍यक नि‍र्धारण सेहो करैत हेतैक। भरि‍सक माएक नि‍र्णए हमर भवि‍ष्‍य भऽ गेल। श्‍वेताक बि‍आह ओइ वरसँ भऽ गेलनि‍। अर्थशास्‍त्रक एम.ए. कएलाक पश्‍चात वि‍श्ववि‍द्यालयक पी.जी. डि‍पार्टमेन्‍टमे हमरा लेक्‍चररक नौकरी भऽ गेल। तइ‍ दि‍न हमरा बुझाएल छल, जेना जीवनक सभटा उद्देश्‍य पूरा भऽ गेल अछि‍। बुझबे नै कएलौं, जे एकरा आगाँ सेहो जिनगी छैक। जाबत बुझलौं ताबत सभ समाप्‍त भऽ गेल छल। जखन पढ़ैत छलौं, महि‍ला शि‍क्षि‍काक पहि‍रब ओढ़ब, वेश-भूषा हमरा वड़ आकषिर्‍त करैत छल। हमरा आदर्शमे इहो समाहि‍त भऽ गेल छल। हल्‍लुक रंग साड़ी पहि‍रब हमर शौख भऽ गेल छल, भरि‍सक तँए हमर जि‍नगी रंग वि‍हि‍न भऽ गेल। खैर, बाबुजीक प्रसन्नताक कोनो सीमा नै छलैन्‍हि‍। कि‍छु मासक बाद बाबुजी रि‍टायर भऽ गेल छलाह। स्‍कूलक शि‍क्षकक दरमाहा कम छल, बाबूजीक पेंशनसँ घरक खर्च, वि‍कासक इन्‍जि‍नि‍यरि‍ंगक पढ़ाइ संभव नै छल। हमरा पहि‍ल बेर जहि‍ना दरमाहा भेटल, माएक हाथमे राखि‍ देने छलौं, तकरा बाद ई एकटा निअम बनि‍ गेल छल। मुदा बाबुजीक मोनमे सतत् एकटा अपराध बोध होइत छलैन्‍ह। बाबुजी मुँहसँ तँ कि‍छु नै बजैत छलाह, मुदा हुनक आँखि‍ सभ कि‍छु कहि‍ दैत छल। कि‍छु दि‍नक बाद बाबुजी एकदमसँ चुप रहए लागल छलाह। माएक व्‍यवहारमे सेहो परि‍वर्त्तन भऽ गेल छलैन्‍ह। हमरा प्रति‍ बाबुजी माएक सि‍नेह क्रमश: आदरमे परि‍वर्तित होअए लागल छल। शुरू-शुरूमे ऐ आदरसँ हम कतेक असहज भऽ जाइत छलौं, पहि‍ने छोट-छोट चीज लेल जि‍द्दक अधि‍कार छल, मुदा ई आदर तँ हमरा बहुत रास अधि‍कारसँ वंचि‍त कऽ देलक। हमरा सतत् लगैत छल जे आहि‍स्‍ता-आहि‍स्‍ता कर्त्तव्‍य मजबूत पाशमे हम बान्‍हल जा रहल छी। हमर स्‍वतन्‍त्रता छोट होइत गेल और हम असमए पैघ होइत गेलौं। ताबत धरि‍ हम बुझवे नै कएलौं जे प्रत्‍येक मनुष्‍यक व्‍यक्‍ति‍गत जि‍नगी होइत अछि‍, भवि‍ष्‍यक कल्‍पना होइत अछि‍ और होइत अछि‍ उमंग, उत्‍साह। बाबुजीक मृत्‍यु हार्ट अटैक सँ भऽ गेलनि‍। मृत्‍युकाल बाबुजीक मुँहपर आच्‍छादि‍त नि‍रीह भाव, आँखि‍मे पश्‍चाताप, ओहि‍ना मोन अछि‍। बाबुजीक मुँहसँ कि‍छु नै कहलैथ, मुदा हुनका आँखि‍क कातरता सभ कि‍छु कहि‍ गेल। आब हम घरक मात्र बेटी नै रहि‍ गेल छलौं। हम घरक कमौआ बेटी, पालन केनि‍हारि‍ गार्जियन भऽ गेल छलौं। वि‍कास पढ़ैत छलाह, हुनक पढ़ाइ, बि‍आह सभटा हमर उत्तरदायि‍त्‍व भऽ गेल। ई छोट-छीन गृहस्‍थी समैक अनुसार चलैत रहल। वि‍कासक पढ़ाइ समाप्‍त भऽ गेल छलनि, बि‍आह लेल कन्‍यागत आबए लागल छलाह। वि‍काससँ हम बि‍आह लेल पुछलौं, पहि‍ने तँ ओ तैयार नै भेलाह, बेर-बेर कहैत रहलाह- “दीदी, जाबत अहाँक बि‍आह अएत, हम बि‍आह नै करब।” कतेक बुझौने छलौं, अन्‍तमे हमरा कहए पड़ल जे अहाँक बि‍आह, सेट्लमेन्‍ट, अहाँक घर बसाएब हमर दायि‍त्‍व अछि‍, तखन वि‍कास स्‍वीकृति‍ देने छलाह। कतेक उत्‍साहसँ वि‍कासक बि‍आह कएने छलौं। पी.एफ.सँ अधि‍कतम लोन लऽ कऽ सभटा खर्च कएलौं। एक-एक वस्‍तु कपड़ा, गहना माए अपना इच्‍छासँ कीनने छलीह। वि‍कासक बि‍आह सम्‍भ्रान्‍त परि‍वारमे भेल, कनि‍या पढ़ल-लि‍खल सुन्‍दर सुशील छथि‍। मुदा एकटा बात अछि‍, सुशीलो व्‍यक्‍ति‍ मुँहसँ कहि‍यो एहेन कटुसत्‍य बहरा जाइत अछि‍, जकर प्रहारसँ दोसरक आत्‍मा छि‍न्न-भि‍न्न भऽ जाइत छैक। एकबेरक घटना हमरा अखन धरि‍ बि‍सरल नै भेल अछि‍, होएबो नै करत। वि‍कासक बेटा मोनु स्‍कूल गेल छल, स्‍कूलसँ अएबामे थोड़ेक देरी भऽ रहल छलैक। वि‍कासक कनि‍याँ पूजाक बेचैनी देखि‍ हमरा रहल नै गेल। हम पूजाकेँ भरोस दैत कहने छलौं- “परेशान नै होउ, मोनु अबैत हएत, कि‍छु कारण भऽ गेल हेतैक।‍” पूजा नि‍छोह भेल बाजि‍ गेल छलीह- “अहाँ की बुझबैक सन्‍तानक दर्द। एतेक सुनैत।” हम अवाक रहि‍ गेल छलौं। पूजा कहलैथ तँ सत्‍य। मुदा ई सत्‍य एतेक कटु छल जे हमर आत्‍मा क्षत-वि‍क्षत भऽ गेल। की हमरा मोनमे मोनु, पूजा आ वि‍कास लेल सि‍नेह नै छल। की मात्र कोखि‍सँ जन्‍म देलासँ मातृत्‍वक भाव अबैत छैक? की हम वि‍कासक भवि‍ष्‍यक चि‍न्‍तामे अपन जीवन उत्‍सर्ग नै कऽ देलौं? हमर एतवे महत्‍व। खैर पूजा नै बुझैत छथि‍ तइ‍सँ की। वि‍कास तँ हमरा बुझैत छथि‍। यएह सोचि‍ मोनकेँ सांत्‍वना दैत रहलहु। मुदा मोन की सांत्‍वनाक भाषा बुझैत छैक। मुँहसँ तँ कि‍छु नै बाजि‍ सकलौं। मुदा तकरा पश्‍चात् एकटा हीन-भाव क्रमश: हमरा मोनमे बढ़ैत गेल। आब बेधड़क मोनुकेँ दुलारो करवामे हमरा संकोच होअए लागल छल। पहिने हम जइ‍ अधि‍कारसँ पूजा मोनुक संग रहैत छलौं, आब संकोच होअए लागल छल। नै जानि‍ कोन बात पूजाकेँ अप्रि‍य लागि‍ जएतनि‍, कि‍छु कहैसँ पहि‍ने अनायास सर्तक भऽ जाइत छलौं। कि‍छु दि‍नक बाद वि‍कासकेँ इग्‍लैण्‍डमे बढ़ि‍या नौकरी भऽ गेल छलैन्‍ह। ि‍वकास हमर सहमति‍क बाद वि‍देशक नौकरी स्‍वीकार कएने छलाह। आइओ मोन अछि‍, जइ‍ दि‍न वि‍कास सपरि‍वार वि‍देश गेल छलाह, ओइ राति‍ हमरे बि‍छाैनपर सूतल छला। वि‍कास कतेक कानल छलाह, हमहूँ अपनाकेँ रोकि‍ नै सकल छलौं। वि‍कास जाइतो काल एकेटा बात कहने छलाह- “दीदी, बाब अहाँ केना रहब, अपन ख्‍याल राखब।‍” ओना वि‍कास छथि‍ तँ हमरासँ छह वर्ष छोट, मुदा परि‍वारक परि‍स्‍थि‍ति‍ हुनकहुँ बुजुर्ग बना देने छल। वि‍कास छोट छथि‍, तइ‍सँ की। यएह उत्तरदायि‍त्‍व बोध तँ पुरुषक पुरुषत्‍वक छि‍ऐक, जइ‍सँ ओ परि‍वारक गार्जियन भऽ जाइत अछि‍। बाबुजीक मृत्‍युक पश्‍चात वि‍कास टुटलथि‍ नै‍, कि‍एक तँ सहारा हम भऽ गेल छलौं। मुदा जाबत वि‍कास सभ तरहसँ व्‍यवस्‍थि‍त भऽ गेलथि‍। हमरो उत्तरदायि‍त्‍व लेबए चाहैत छलाह। खैर वि‍कास वि‍देश चलि‍ गेलथि‍। हमहूँ नि‍श्‍चि‍न्‍त भऽ गेल छलौं। आब घरमे मात्र हम और माए बचि‍ गेल छलौं। कोनो उत्‍साह नै‍, समए अपनहि‍ बि‍तैत जाइत अछि‍, जि‍नगीओ बि‍त रहल छल। ओइ समएमे नील वसंतक झोंक बनि‍ अहाँ हमर जि‍नगीमे आएल छलौं। हमरा अखनो ओहि‍ना मोन अछि‍, हम कॉलेज जएबा लेल तैयार भऽ कऽ घरसँ नि‍कलल छलौं। रि‍क्‍शा थोड़ेक दूर चौराहापर भेटैत छल। अहाँ हमरा बगलमे गाड़ी रोकि‍ कतेक बि‍सवाससँ बाजल छलौं- “हम नील, एयर इण्‍डि‍यामे पाएलट छी, अहाँक पड़ोसी, अहाँ कतए जाएब, चलू छोड़ि‍ दैत छी।‍” हम नि‍र्विकार स्‍वरे अहाँक अस्‍वीकार कऽ देने छलौं। अहाँ फेर बाजल छलौं- “हम अपना परि‍चए तँ दऽ देलौं, अहुँ तँ कि‍छु बाजु।‍” हम अहाँकेँ टारवाक उद्देश्‍यसँ कहने छलौं- “हमर नाओं श्‍यामा छी, और हम वि‍श्ववि‍द्यालयक पोस्‍ट ग्रेजुएट वि‍भागमे अर्थशास्‍त्र पढ़बैत छी।‍” अहाँ कनेक मुस्‍कुराइत, हमरा दि‍सि‍ तकैत गाड़ीमे बैस गेल छलौं। नील अहाँक मुहँक स्‍मि‍त भाव, आत्‍म-बि‍सवाससँ भरल स्‍वर, हमरा मस्‍ति‍ष्‍कमे एहेन कऽ अंकि‍त भऽ गेल जे एतेक वर्ष बि‍तलाक पश्‍चातो ओहि‍ना सभटा मोन अछि‍। लगैत अछि‍ जेना ई आजुक घटना थि‍क। तकरा बाद आठ दि‍न धरि‍ अहाँसँ भेँट नै भेल छल। नै जानि‍ कि‍एक कोनमे नुकाएल अहाँसँ भेँटक इच्‍छा बलवति‍ होअए लागल छल। तकरा बाद एक दि‍न जखन हम ि‍डर्पाटमेन्‍टमे बैसल छलौं, चपरासी समाद कहने छल जे वि‍जि‍टि‍ंग रूपमे एक गोटे भेँट करवा लेल बैसल छथि‍, और अहाँक कार्ड हमरा देने छल। नाओं पढ़ि‍ हम कतेक उद्वि‍ग्‍न भऽ गेल छलौं और अहाँ कतेक अह्लादि‍त होइत, मुस्‍कुराइत हमर स्‍वागत कएने छलौं। हमरा लागल छल जेना ऐ मुस्‍कुराहटसँ हम कतेक परि‍चि‍त छी। बि‍ना कि‍छु पुछने अहाँ जल्‍दी-जल्‍दी बाजल छलौं जे फ्लाइट लऽ कऽ अहाँ अमेरि‍का गेल छलौं, तइ‍ कारणे एतेक देरी भऽ गेल। कि‍ंचि‍त अहाँक हड़बड़ी बजवाक शैली सुनि‍ हमरा हँसि‍ लागि‍ गेल छल। और अहाँ आर्श्‍चचकि‍त होइत बाजल छलौं जे- भगवानक शुक्र अिछ, अहाँ हँसलौं तँ।” और कॉफि‍ हाउसक अहाँक नि‍मन्‍त्रण हम अस्‍वीकार नै कऽ सकल छलौं। ओइ दि‍न अहाँसँ दाेसर बेर भेँट कॉफी आउसमे भेल छल। बि‍ना कि‍छु पुछने अहाँ अपन वि‍षएमे कहने छलौं जे अहाँक माँ, बाबुजी दुनू डॉक्‍टर छथि‍, अहाँ बैचलर छी और माँ-बाबुजीक एक मात्र सन्‍तान छी, उम्र पचीस वर्ष अछि‍, एयर इण्‍डि‍यामे पायलट छी। हम तइ‍पर कहने छलौं जे हमर उम्र तीस वर्ष अछि‍। हमर बात सुनि‍ अहाँ हँसैत कहने छलौं जे- “दोस्‍तीमे उम्र कतएसँ आबि‍ गेल।” तकरा बाद अहाँ कहलौं जे पता लगा लेने छी जे आहाँ हॉस्‍टल सुपरि‍टेन्‍डेन्‍ट भऽ गेल छी और सुपरि‍टेन्‍डेन्‍ट क्‍वाटरमे शि‍फ्ट कऽ गेल छी। नील, हम केना कऽ कहि‍तौं जे हम अपन घर छोड़ि‍ क्‍वाटरमे कि‍एक शि‍फ्ट कऽ गेलौं। भला लाजक बात की बाजल जाइत छैक। असलमे ई भेल छल जे श्‍वेता हमर छोट बहि‍नक पति‍क ट्रान्‍स्‍फर ऐ शहरमे भऽ गेल छल, माएक घरपर तँ श्‍वेताक अधि‍कार सेहो छल, श्‍वेता अपन पति‍ और बच्‍चाक संग माएक घरमे रहय लेल आबि‍ गेल छलीह। माएकेँ बड्ड प्रसन्नता भेल छलैन्‍ह और माएक प्रसन्नता देखि‍ हम चुप रहि‍ गेल छलौं। नै जानि‍ कि‍एक हमरा नीक नै लागल छल, यद्यपि‍ घरक वातावरण बदलि‍ गेल छल मुदा हमरा श्‍वेताक पति‍क सभ कि‍छुमे दखल अन्‍दाजी नीक नै लगैत छल। हम बेचैन रहय लागल छलौं। माए सेहो हमर भावनासँ अनभि‍ज्ञ छलीह। संयोगसँ हाेस्‍टल सुपरि‍टेन्‍डेन्‍ट बनवाक हमरा अवसर भेटल और हम ऐ अवसरकेँ वरदान बूझि स्‍वीकार कऽ लेलौं। ऐ पद लेल हमरासँ वेशी उपयुक्‍त और कोनो महि‍ला शि‍क्षि‍का नै छलीह। कि‍एक तँ सभ शादी-सुदा छथि‍, सभकेँ परि‍वार छन्‍हि‍, गृहस्‍थी छन्‍हि‍ और हमरा तँ नै आगू नाथ नै पाछू पगहा। यद्यपि‍ संजोगि‍ कऽ बसाएल घरसँ हमर ई पड़ाइन छल मुदा छल उपयुक्‍त अवसर, हम होस्‍टल शि‍फ्ट कऽ गेलौं। तकरा बाद नील, अहाँ प्रति‍दि‍न आबए लागल छलाैं पहि‍ने तँ मात्र साँझमे अबैत छलौं मुदा क्रमश: अहाँक आएब बढ़ैत गेल और हमरापर अहाँकेँ अधि‍कारो बढ़ैत गेल। अहाँ मात्र दोस्‍त नै रहि‍ गेल छलौं हमर मानस देवता बनि‍ गेल छलौं, हमर तँ जि‍नगीये बदलि‍ गेल छल। जि‍नगी एतेक सुन्‍दर होइत छैक, हम अहाँसँ सि‍खलौं। पहि‍ल बेर हमरा एहसास भेल जे हमहुँ सुन्‍दर छी, हमरो महत्व अछि‍। जीवनक एकटा नव पन्ना खुजि‍ गेल। बस सदि‍खन एकेटा काज रहि‍ गेल। अहाँक प्रतीक्षा करब, अहाँक वि‍षयमे सोचब। पहि‍ल बेर हमरा अपनापर गर्व भेल छल। नील अहाँक व्‍यक्‍ति‍व, सौम्‍य मुद्रा अहाँक न्‍योछावर भऽ जाएब, अहाँक आँखि‍ प्‍यास कतेक आत्‍मवि‍श्वास हमरामे भरि‍ देने छल। हमरा बूझल अछि‍ जे हम कतेक साधारण छी, मुदा अहाँक बाँहक गर्मकसाव, कानमे अाहि‍स्‍तासँ कहल गेल झूठ-सच बात, हमरा कतेक भरि‍ दैत छल। हम कतेक बहुमूल्‍य, कतेक गौरवमयी भऽ जाइत छलौं। लगैत छल, हमरा लग कि‍छु अछि‍ अथवा नै मुदा एकटा चीज अछि‍ अहाँक देवता लेल, एकट तृप्‍ति‍, एकटा उल्‍लास, एकटा भराव जे हम मात्र अपनाकेँ अर्पित करवाक पश्चाते दऽ सकैत छलौं। नील, ई चारि‍ वर्ष कोना बीत गेल, हम बुझबे नै केलौं। कहि‍यो कल्‍पनो नै कने छलौं जे ऐ संबंधकेँ भवि‍ष्‍य की अछि‍। एक दि‍न अहाँ ड्युटीपर गेल छलौं, अहाँक माँ-बाबूजी आएल छलाह। अहाँक माँ मढल-लि‍खल छथि‍, हमरा कोनो अपशब्‍द नै कहलन्‍हि‍, मुदा जतेक कहने छलीह, से तँ हमर जि‍नगीये बदलि‍ देलक। हमर सभ कल्‍पना, जि‍नगी चूर-चूर भऽ गेल। तइ दि‍न जि‍नगीक ठोस धरातलक एहसास हमरा फेर भेल। अहाँक माँ, अहाँ जि‍नगीक भीख हमरासँ मांगने छलीह। हमरा तँ बुझाइत छल जे हमहीं अहाँक जि‍नगी छी। मुदा तखन हमरा बुझाएल जे हम अहाँक जि‍नगीमे राहु छी, जेकर छाया अहाँक जि‍नगीमे ग्रहण बनि‍ गेल अछि‍। कि‍ऐक तँ हमर उमर अहाँसँ पाँच वर्ष बेसी छल, हमर अवस्‍था आब वि‍वाह करबा जेागर नै छल। हमर प्रेम नै व्‍यापार छल। नील हम तँ ऐ दृष्‍टि‍कोणसँ अपन मूल्‍यांकन नै केने छलौं। और फेर हम एक बेर पलायन केलौं, अपना जि‍नगीसँ अहाँक जि‍नगीसँ। फेर वएह कर्त्तव्‍यक मजबूत पाश, जे पहि‍ने तँ अपन परि‍वार लेल हमरा बान्‍हि‍ देने छल आब अहाँक परि‍वार लेल। नील, भरि‍सक अहुँकेँ मोन हएत। कि‍एक तँ जखन हमर पसन्‍दक ब्‍लू पेन्‍ट-शर्ट अखन धरि‍ मोन अछि‍ तँ ओ अन्‍ति‍म राति‍ जरूर मोन हएत। अहाँ साँझमे आएल छलौं, अहाँक पाछाँ हमर जीवनमे कोन बवंडर उठि‍ गेल अहाँ बि‍ना कहने कोना बुझि‍तौं। आखि‍र अपन स्‍त्रीत्‍वक एतेक पैघ अपमान केना बाजल जा सकैत अछि‍। आन दि‍न जकाँ हम सोफापर बैसल छलौं और अहाँ नील कालि‍नपर बैसि‍ हमरा कोरामे एकटा नि‍श्‍छल बच्‍चा जकाँ माथ राखि‍ सुति‍ गेलौं। ड्यूटीपरी सँ एलाक बाद अहाँ थाकि‍ जे गेल छलौं। मुदा हमरा तँ नै आँखि‍मे नि‍न्न छल, नै मोनमे चैन। सूतलमे अहाँक ि‍नर्दोष मुँह देखि‍, भरि‍ राति सोचलाक बाद कठोर ि‍नर्णए लऽ लेने छलौं, जे आब अहाँसँ कोनो सम्‍बन्‍ध नै राखब। सुखक एतबे दि‍न हमरा भाग्‍यमे अछि‍। अहाँकेँ हमरा छोड़ेयै पड़त। नील, तकरा बाद हमर मोन थेड़ेक आश्वस्‍त भऽ गेल छल, कनी आँखि‍ लागि‍ गेल छल। नीन्न टुटल तँ भोरक चारि‍ बाजि‍ रहल छल, मुदा चारू दि‍स पवि‍त्र, शान्‍त और प्रकाशमय लागि‍ रहल छल। हमरा ओ भोर अखनौं ओहि‍ना मोन अछि‍ कि‍एक तँ फेर हमरा ओहन शान्‍ति‍, ओहन पवि‍त्र प्रकाश, ओहन ताजगी, ओहन मोनक पसरल उदार हरि‍त-वर्ण वापस नै भेटल। नील, हम अहाँकेँ अपन सप्‍पत दैत हमरासँ कोनो प्रकारक सम्‍पर्क नै राखबाक प्रार्थना केने छलौं। नील अहुँ तँ हमर सप्‍पतक मान रखैत अपन वचनक ि‍नर्वाह करैत रहलौं। आन दि‍न तँ अहाँ हमर कोनो बात नै सुनैत छलौं, जे इच्‍छा होइत छल, अपन जि‍द्दसँ अधि‍कार बूझि‍ सएह करैत छलौं। मुदा जीवनक एतेक महत्वपूर्ण ि‍नर्णएमे अहाँ हमर संग कि‍एक देलौं। सम्‍पूर्ण जीवन संग बि‍तेबाक अहाँक प्रति‍ज्ञा हमरा अागाँ कि‍एक छोट भऽ गेल। और सभ दि‍न तँ जि‍द्दी बच्‍चा जकाँ अपन बात मनवा लैत छलौं मुदा तइ दि‍न भरि‍सक हमर दृढ़ नि‍श्चय देखि‍ चुप-चाप अहाँ रहि‍ गेल छलौं। खैर नील, अहाँ चलि‍ गेलौं। नील अहाँकेँ मोन अछि‍, एक बेर लाल रंगक साड़ी अहाँ हमरा लेल अनने छलौं, पहि‍ल बेर गाढ़ लाल रंगक साड़ी देखि‍ हमरा सुखद आश्चर्य भेल छल। अहाँक जि‍द्दसँ साड़ी पहि‍र ऐनामे अपनाकेँ देखि‍ हमरा कतेक संकोच भेल छल। अहाँ कतेक प्रसन्न भेल छलौं। अहाँ कहने छलौं- “फ्रेन्‍ड, यू आर टु मच ब्‍युटि‍फुल यार।” हमहुँ अहाँकेँ बूझल नै हएत, कॉलेज जीवनमे हल्‍लुक रंगक साड़ी पहि‍रने, शांत सौम्‍य अपन शि‍क्षि‍का लोकनि‍केँ देखि‍, हमर सएह आदर्श भऽ गेल छल। मुदा ई आदर्श तँ हमर जि‍नगीकेँ रंगहीन बना देलक। एतेक धरि‍ जे हमर माए सेहो नै बुझलन्‍हि‍, जे रंगक बि‍ना जीवन कहेन उदास भऽ जाइत छैक। आन दि‍नक तँ गप्‍प छोड़ु वि‍कासक वि‍वाहोमे माए हमरा लेल हल्‍लुक रंग साधारण सुती साड़ी कीन कऽ आनने छलीह। नील माए-बाप तँ सन्‍तानक जीवनमे रंग भरैत छैक, माएकेँ हमरा लेल ई बुझबाक कहि‍यो पलखति‍ नै भेटलन्‍हि‍, यएह रंगहीन हमर जि‍नगी बनि‍ गेल। अहाँ हमरा जि‍नगीमे देवदूत बनि‍ एलौं हमर काया बदलि‍ गेल, सभ कि‍छु बदलि‍ गेल मुदा कतेक दि‍न लेल? ‍ ३ मनोज कुमार मण्‍डल लघुकथा- घासवाली गामक चौबटि‍यापर कि‍छु दर-दोकान रहने सभ दि‍न साँझ-भोर बड़ भीड़ रहैत छल। गाम नम्हर रहने पंचायत छल। अड़ोस-पड़ोसक गाममे ऐ ढंगक दर-दोकान नै रहलाक कारण ओहो गामक लोक सभ अही चौबटि‍यापर अबैत। लोक सभ चौबटि‍यापर आबि‍ साँझ-भाेर चाह-पान सेहो करैत आ अपन जरूरति‍क साैदा सेहो कीनि‍-बेसाहि कऽ घर लऽ जाइत। चौबटि‍या गामक बीच रहबाक कारण कि‍छु बेसि‍ये भीड़-भार रहैत छल। छोट-पैघ गि‍रहस्थ आ ठर-ठि‍केदार आबि‍ जन-मजदूर अढ़बैत छल। भीड़ भेने लोक सभ चाह-पानक दोकानपर चाहो-पान करैत आ रंग-बि‍रंगक गप-सप सेहो। गप-सपसँ बुझाइत जेना ई चौबटि‍या गामक राजनीति‍क अड्डा रहए।‍ दुपहरि‍याकेँ चौबटि‍या खाली रहैत छल। लोक अपन-अपन काम-काजमे रहैत छलाह। दोकानदारो सभ अपन-अपन दोकान बन्न कऽ घर खाइले चलि‍ जाइत छल। गामक कि‍छु निठल्लो सभ दुपहरि‍यामे ताश भँजैत रहैत छल। एक दि‍न साँझू पहर चौबटि‍यापर बैसल रही‍। हमरा बगलमे कि‍छु लोक सेहो बैसल छलाह। चौबटि‍यापर तरकारी बेचैवाली सभ आबि‍ अपन-अपन दोकानक बोरा बि‍छा-बि‍छा लगा रहल छलीह। चौबटि‍यापर एकटा दुचारी घर रहए जे सदि‍खन खालि‍ये रहैत छल। कि‍छु गाजा पि‍याक सभ बैस गाजा पी रहल छलै। तखने गामक पुबरि‍या टोलसँ झुण्डक-झुण्डा बकरी नि‍कलि‍ रहल, चरैले जा रहल छल। बकरीक झुण्ड खूब नमहर छल। हमरा लागल तीसो-चालीसक ई झुण्ड अछि‍। हमरा बगलमे ओइ टोलक एक गोटे बैसल छलाह। हम हुनका पुछलि‍यनि‍- “ई सभटा बकरी अहीं टोलक छी?” ओ कहला- “ई सभ बकरी तँ एक्के गोटाक छी।” सुनि‍ हमरा बड़ आश्चर्य भेल। हमर जि‍ज्ञासा कने आर बढ़ल। हम फेर पुछलि‍यनि‍- “कि‍नक ई सभ बकरी छी?” कहलनि‍- “दीपवालीक।” हम छगुन्तामे पड़ि‍ गेल रही। संगे खुश सेहो भेल रही। सभसँ पहि‍ने तँ हमरा भेल जे एतेक बकरी एक गोटा सम्हारैत केना अछि‍। आ फेर भेल जे जखनि‍ ओ चरबए लेल जाइ अछि‍ तँ केना बुझैत अछि‍ जे कोन हमर छी आ कोन दोसराक। दीपवालीक घर हमरा घरसँ कनि‍ये दूर हटि‍ कऽ छल। दू जाति हेबाक कारणे दू टोल छल। गाममे बहुतो जाति‍ रहए परंतु सभ जाति‍क घर कने अलग-अलग रहए। जाति‍क नाओंपर टोलक नाओं पड़ल अछि‍। हम दीपवालीसँ परि‍चि‍त रही। दीपवाली बुधनाक कनि‍याँ छथि‍। बुधना देखबामे रोगाहे जकाँ छथि‍। समए-समैपर दरभंगा गि‍लास फैक्ट्रीमे मास-दू मास कमा कऽ कि‍छु उपार्जन कऽ लैत छथि‍। जाधरि‍ बुधना गामे रहैत साइकि‍लपर झंझारपुरसँ तरकारी अनैत, बाँकी समए सदि‍खन ताश भँजैत। चाह-पान, भाँग-गाँजा सभ कि‍छु बुधनाक अमल। दीपवाली बड़ नमगर-छड़गर छथि‍। देखबामे एकदम गोर। बड़ कमासुत। नाउएँटा लऽ दीपवाली मौगी छलीह परन्तु मर्दे जकाँ हरि‍दम खटैत छलीह। दूटा बेटा आर एकटा बेटी छन्हि। बेटीक बि‍आह भऽ गेल छन्हि। बेटी वि‍धवा भऽ गेल छन्हि जइसँ एकटा नाति‍क जि‍म्मेवारी दीपेवालीपर छन्हि। बड़का बेटा थोड़-बहुत पढ़ि‍ माइक सहयोग करए लागल। छोटका बेटा पढ़ैत छल। एतेकटा बकरीक झुण्ड दीपवालीक मेहनति‍क फल छल। भरि‍ दुपहरि‍या अंगने-अंगने घूमि‍ तरकारी बेचैत छलीह, साँझू पहरकेँ चौबटि‍यापर बैस तरकारी बेचैत छलीह। दीपवाली बड़ मधुभाषी आ मि‍लनसार छथि‍ से सभ जनैत। एक दि‍न बुधना तरकारी लऽ कऽ अबैत छलाह। बाटपर एकटा मोटरगाड़ीबला पाछूसँ ठोकर मारि‍ देलकनि‍। जइसँ बुधना मरि‍ गेल। हटि‍याक दि‍न रहने हमरो गामक बहुतो लोक झंझारपुर गेल छलाह। ई कथा सौंसे गाम मटि‍या तेल जकाँ पसरि‍ गेल। सुनैत देरी भरि‍ गामक लोक चौबटि‍यापर जमा भऽ गेल। दीपवालीक घर चौबटि‍यासँ सटले पुबरि‍या टोलमे छल। के बच्चा, के बूढ़, सभ साइकि‍ल मोटर साइकि‍लसँ झंझारपुर दि‍स दौड़ पड़ल जेतए बुधनाक लाश छल। हम गुड़ घावक पीड़ासँ व्यायकुल रही, ई बात सुनि‍ कहुना कऽ चौबटि‍यापर गेल रही। कि‍छुए कालक बाद हमर धि‍यान दीपवाली आ हुनकर दुनू बेटापर पड़ल। हमरा आइ धरि‍ मोन अछि,‍ दीपवालीक खूलल-खूलल केश, लत्ता-कपड़ाक कोनो ठेकान नै। बताहि‍ जकाँ जोर-जोरसँ कनैत छलीह- “डकूबा हौ, डकूबा! आब हमर जि‍नगी केना कटतै हौ डकूबा! आब ई दुनू बेटा केकरा बाबू कहते हौ डकूबा!” हुनकर दुनू बेटा सेहो भोकासि‍ पाड़ि‍-पाड़ि‍ कनैत छल। ई दृश्य देखि‍ हमरा आँखि‍मे नोर आबि‍ गेल। गामक दाइ-माइ दीपवालीकेँ सम्हारैत आ कनबो करैत। कि‍छुए कालक बाद बुधनाक लाश लग पुलि‍स आएल। लाश उठा पोस्टमार्टमक लेल लऽ गेल। गामक लोक सभ रंग-बि‍रंगक बात करए लगल। सबहक बात बुधनासँ शुरू होइत छल। मुन्हाइर साँझकेँ एम्बु्लेंसपर बुधनाक लाश गाम आएल रहए। एक बेर फेर भरि‍ गाममे हल-चल भऽ गेल। दीपवाली आर दुनू बेटा लाशपर गि‍र जोर-जोरसँ कनैत छलीह। गामक बूढ़-बुढ़ानुस सभ कहलनि‍- “ऐ लाशकेँ जल्दी़ संस्कार कऽ देल जाए। ई कोनो खुशनामा नै छी। ई हाक-डाकबला लाश छी।” कोनो तरहेँ संस्कार भऽ गेल। आब दीपवाली बेसाहारा भऽ गेलीह। दूटा बेटा आ एकटा नाति‍क जि‍म्मेवारी हुनका ऊपर। दीपवाली आब तरकारी बेचनाइ बन्न कऽ देलनि‍। केना नै बन्न करैत। झंझारपुरसँ तरकारी के आनत? बक‍रीये टा आब हुनक जीवि‍काक साधन रहि‍ गेल रहनि‍। कहाबी अछि‍ जे दुख जखनि‍ अबैत अछि‍ तँ चारू दि‍ससँ अबैत अछि‍। बुधनाक मरब सालो नै लागल रहै, बरसातक समए रहए, एकटा बेमारी आएल। हुनकर सभ बकरी एका-एकी सभटा मरि‍ गेल। दीपवाली फेरसँ दुखमे डूमि‍ गेलीह। आब हुनका कोनो सहारा नै बचल। पन्द्रह दि‍न धरि‍ दीपवाली कि‍छु नै बाजए। फेर दीपवाली हि‍म्मत नै हारलनि‍। एक दि‍न हम सांत्वनाक खि‍यालसँ कहलि‍यनि‍- “की हाल अछि‍?” ओ कहलनि‍- “बौआ, वि‍धनाक एहने मोन छन्हि्‍ तँ हम की केओ की करत? आब हम सभ माटि‍मे मि‍लि‍ गेलौं कि‍ंतु अहाँ सबहक माए-बापक असीरवादसँ हम हारि‍ मानएवाली नै छी। जाबे जि‍अब मेहनत कऽ बाल-बच्चाकेँ देखब। मरला ऊपर जानथि‍ वि‍धना।” दीपवालीकेँ आब मेहनति‍ छोड़ि‍ कोनो सहारा नै बँचल। ओ छथि‍ बड़ मेहनती। ओना बुधना दीपवालीक साेहाग छल कि‍ंतु दीपवालीक कमाइपर घरक सबहक ठेसी छलनि‍। दस धूर जमीनसँ पाँच कट्ठा भेल रहै जे दीपवालीक खून-पसेनाक फल छी। दीपवाली एक गोटासँ गाए, तेहाइपर, पोसि‍या लेलनि‍। नाति‍ अपन गाम चलि‍ गेल। दीपवाली आब भरि‍ दि‍न गाएमे लागल रहैत छलीह। समए बीतल। छोटका बेटाकेँ कोनो तरहेँ दरभंगा पढ़ैले पठौलनि‍। दीपवालीक उमर सेहो नीचाँ मुहेँ भेल जा रहल छल। गाए पोसबामे एना लगल रहैत छलीह जे घासक पथि‍या सदि‍खन हुनका माथेपर रहैत छल। बड़का बेटा आब नम्हर भेल, घर-गि‍रहस्तीक कार्य करए लगल। गाए पोसलासँ एकटा बड़द भऽ गेल। जइसँ बड़का बेटा खेती करए लागल। दुख तँ दीपवालीकेँ बड़ भेलै कि‍ंतु दीपवालीक मेहनति‍क कारण एकबेर फेर हुनकर घर-परि‍वार चलए लगल। भरि‍ गामक लोक हुनका घासवाली कहए लगलनि‍। आइ हुनका दस थान गाए छन्हि‍। ओ घास आनैमे एना लगल रहैत छलीह जे भरि‍ दि‍न बाधेमे रहैत छलीह। बाधसँ एलापर खेनाइ बनाबथि‍ आ माल-जालक नि‍मेरा सेहो करथि‍। एक दि‍न बड़का बेटाकेँ कहलीह- “बौआ, हमरा खेतसँ एबामे देरी भऽ जाइए, तोरा भूख लागि‍ जाइत हेतह ने?” बेटा कहलकनि‍- “माए, भूख तँ अवश्ये लागि‍ जाइए परन्तु तूहीं की करबीही, से नै तँ हमरा खेनाइ बनेनाइ सि‍खा दे।” माए बाजलि‍- “जरूर बौआ, लूरि कोनो खराप नै होइ छै। हम बाप-जनम कहि‍यो घास नै छि‍लने रही मुदा आइ दस थान गाए घासेपर रखने छी।” ऐ तरहेँ समए बितैत गेल। दीपवाली संघर्ष करैत रहलीह। एक दि‍न हम भोरे-भोर चौबटि‍यापर गेल रही। चाहक दोकानपर ि‍कयो बजलाह जे दीपवालीक बेटा प्रोफेसर भऽ गेलै। पेपरमे आएल छै। हमरा बड़ खुशी भेल। हम हुनकर पूरा जि‍नगीकेँ मोन पाड़ए लगल रही। दीपवालीपर घनेरो दुख आएल परन्तु कखनो हुनक मनोबल मलीन नै भेल। ओ दुखसँ संघर्ष कऽ समाजकेँ एकटा प्रोफेसर देलखि‍न, ऐसँ खुशी अओर की? छोटका बेटा काओलेज ज्वाैइन कऽ लेलन्हि। पहि‍ल तनखाह उठा माएसँ मि‍लबा लेल गाम एलाह। माए कहलखि‍न- “बेटा, हमरा बड़ खुशी अछि‍ कि‍ंतु ई दि‍न आनबामे तोहर भैयाक योगदान छह। तूँ छोटेटा छेलह तखन बाप मरि‍ गेलह। तोरा पढ़ेबा-लि‍खेबामे तोहर भैया हरि‍दम मदति‍ केलकह। ई धि‍यान रखि‍यह।” कहैत दीपवालीक आँखि‍सँ खुशीक नोर टपकल आ तखनि‍ दोसर दि‍स टगि‍ गेल। ४ कपि‍लेश्वर राउत विहनिकथा- सलाह फागुन बीत रहल छल आ चैतक आगमन भऽ रहल छल। समए तेहन ने बिकट जे बातरस बलाक लेल बर उकड़ू छल। फागुन चैतमे जेहने गर्मी तेहने हार तक डोलबैबला जाड़। तँए ने एकटा कहावत छै जे एकटा ब्रह्मण गाए बेच कऽ चैतमे कम्‍बल खरीदने रहथि‍। तेहने समए अहू बेर‍ छल। बातरसोक जन्‍म एहने समएमे होइत छै। ि‍कसुनकेँ बातरस जागि‍ गेल छलै जइ‍सँ बेचारा अफसि‍याँत छल। गाम घरक डाक्‍टरसँ लऽ कऽ दरभंगा तकक डाक्‍टरसँ देखौलक मुदा बेमारी ठीक नै भेलै। बातरस आब गठि‍याक रूप धऽ लेलकै। उठबैसँ लऽ कऽ खेनाइ-पि‍नाइ तकमे असोकर्य होमए लगलै। एक दि‍न पड़ोसी-बालगोवि‍न्‍द कहलकै- “हौ ि‍कसुन, तोरा देखि‍ कऽ हमरा बड़ दया अबैत अछि‍ जे एहेन धुआ-कायामे ई की भऽ गेलै। हमर वि‍चार अछि‍ जे बेटा दि‍ल्‍लीमे छहे, ओतइ जा कऽ एक बेर‍‍ देखा आबह।” ि‍कसुन बजला- “ठीके कहै छह भाय, दू-चारि‍ दि‍नमे चलि‍ जाएब।” दि‍ल्‍ली जा कऽ एम्‍स असपतालमे जाँच करा कऽ एक महीना दवाइ खेलक। ि‍कछु असान भेल, गाम चल आएल। गाम आबि‍‍‍ कऽ जखन दवाइ खाए तँ दवाइ जखन तक असर रहै ताबे तक ठीक रहै आ जखन दवाइक असर खतम भऽ जाइ तँ बेमारी बढ़ि‍ जाइ। बेचारा असोथकि‍त भऽ असमंजसमे दलानपर बैसल छल ि‍क सुमन जी जे गामे स्‍कूलमे मास्‍टरी करैत छला, ओही टोल दऽ कऽ अबैत छला अाकि‍ नजरि‍ कि‍सुन दि‍स गेलनि‍। कुशल पुछलखि‍न, बेचारा झमानसँ खसल। धूर, हम ि‍क अपन कुशल कहब। हम तँ वातरससँ हरान छी। सुमन जी बोल भरोस दैत कहलखि‍न- “अहाँक बेमारी ठीक भऽ जाएत। हम जेना कहैत छी तना-तना करू आ आयुर्वेदि‍क दवाइ बता दैत छी से करैत रहू, बेमारी ठीक भऽ जाएत।” बेचारेकेँ कतौसँ प्राण एलै। बाजला- “एतेक केलौं तँ एकबेर इहो अजमाएब।” सुमनजी बजला- “हम जेना-जेना कहै छी तेना-तेना करू। सीधा भऽ कऽ बैसू। एक नम्‍बर, पएर पसारू आ अंगुरीकेँ मोड़ू आ सोझ करू। दोसर, पएरक पंजाक अंगुरीकेँ मोड़ू आ सोझ करू। तेसर, पंजाकेँ आगाँ झुकाउ आ सोझ करू। आब दुनू पएरकेँ सटा कऽ गोल कऽ कऽ घुमा, पाँच बेर‍ एक मुँहेँ तँ पाँच बेर दोसर मुँहेँ। चारिम, जाँघमे हाथसँ गहुआ लगा कऽ छावाकेँ जेना साइि‍कल चलबैत छी तेना चलाउ, उपरसँ नीचाँ मुँहेँ आ नीचाँसँ उपर मुँहेँ, इहो पाँच बेर‍। आ हे याद राखब रीढ़क हड्डी सीधा रहक चाही। पाँचम, पलथा मारि‍ कऽ बैस जाउ आ दुनू हाथकेँ पसारू आ दुनू हाथक अोंगरीकेँ सोझ करू, कसि कऽ मुट्ठी बान्हू, दस बेर करू। छअम, हाथक पंजाकेँ आगू झुकाउ आ सोझ करू १० बेर। सातम, दुनू कलाइक मुट्ठी बान्‍हि‍ कऽ गोल कऽ कऽ घुमाउ, ऊपरसँ नीचाँ आ नीचाँसँ ऊपर मुँहेँ। आठम, हाथकेँ सीधा कऽ कऽ पंजाकेँ पाँखुरपर भि‍राउ आ सोझ करू। नवम, पंजाकेँ पाँखुरपर भिड़ा कऽ कोहुनीकेँ सटाउ आ गोल कऽ कऽ ऊपरसँ नीचाँ आ नीचाँसँ ऊपर मुँहेँ १० बेर करू। दसम, गरदनि‍केँ आगू झुकाउ आ फेर पाछू झुकाउ, पाँच बेर फेर दुनू पाँखुरमे पाँच बेर कानकेँ सटाउ आब गोल कऽ कऽ चारूभर घुमाउ आगूसँ पाछू आ पाछूसँ आगू पाँच बेर। एगारहम, पएर पसारू आ ठेहुनकेँ मोड़ि‍ कऽ पएरपर बैस जाउ आ दुनू हाथ ऊपर उठा कऽ आगू मुँहेँ झुकू आ नाककेँ जमीनपर सटाउ आ हाथकेँ सीधा जमीनपर पसारि‍ दि‍यौ। पेटसँ हवा निकालि‍ दि‍यौ। जखन साँस लेबाक हुअए तखन सोझ भऽ जाउ आ साँस लि‍अ। ई पाँच बेर करू। बारहम, ठेहुन भरे डाँड़केँ सोझ करू आ दुनू हाथसँ पएरक तरबाकेँ पकड़ू, ईहो पाँच बेर करू।” बि‍च्‍चेमे कि‍सुन बजला- “ई तँ बड्ड भिरगर अछि‍।” सुमनजी- “सभ दि‍न साँझ-भि‍नसर करैत रहब ने तँ कोनो भि‍रगर नै बुझाएत। हँ तँ अगि‍ला आसन सभ सुनू। ततेक ने आसन छै जे करैत रहब तँ भि‍नसरसँ साँझ पड़ि‍ जाएत। अहाँ लेल जे जरूरत अछि‍ ओतबे देखबै छी। तँ सुनू चि‍त भऽ कऽ सुति रहू, दुनू टांगकेँ सटा कऽ ऊपरसँ नीचाँ मुँहेँ आ नीचाँसँ ऊपर मुँहे चलाउ। फेर दुनू टाँगकेँ सटा कऽ ओहि‍ना चलाउ।” ि‍कसुन बजला- “ई तँ आरो भि‍रगर अछि‍।” सुमनजी कहलखि‍न- “नै, जहन लगातार करए लगब ने तँ सभ हल्‍लुक भऽ जाएत। जहि‍ना जनमौटी बच्‍चाकेँ माए आ दादी सभ टांग, हाथ, देह सभकेँ ममोरि‍-समोरि‍ दैत छै जइसँ सभ अंग सक्कत भऽ जाइ छै, तहि‍ना अहूँकेँ हएत। अहाँक खून जाम भऽ गेल अछि‍। ओकरा चलेबाक अछि‍। अहाँक तँ कमाएल-खटाएल देह छलए, बेटाकेँ नोकरी भेने काज छोड़ि‍ देलि‍ऐ, तँए एना भेल। जँ सभ अंग चलबैत रहब, योग-प्राणायाम करैत रहब, तँ सभ रोग-व्‍याधि‍ स्‍वत: भागि‍ जाएत। हँ तँ आब अगि‍ला करू। आब पीठ भरे सुतू पहि‍ने एक टांगकेँ डाँड़ भरे उठाउ फेर दोसरो टाँगकेँ उठाउ तकर बाद दुनू टाँगकेँ उठाउ आ राखू। एकर बाद दुनू हाथकेँ पाछू लऽ जा कऽ घुट्ठीकेँ पकड़ि‍ कऽ छातीकेँ उठाउ। ऐसँ डाँड़क रोग समाप्‍त। सुबह-शाम खाली पेटे अगर नि‍यमि‍त रूपे करैत रहब तँ नि‍श्चि‍त ठीक भऽ जाएब। आब कि‍छु प्राणायाम सेहो सि‍ख लि‍अ। पद्मासनमे बैस जाउ आ कपाल भाती, उड़ि‍यान बन्‍ध, अनुलोम-वि‍लोम, भ्रामरी आ नाड़ी सोधन प्राणायाम करैत रहू। कपाल भातीमे केवल साँस छोड़ैक छै ई पच्‍चास बेर करू। उड़ि‍यान बंधमे पेटकेँ सटकेबाक छै पूरा हवा पेटसँ नि‍कालि‍ कऽ। अनुलोम-वि‍लोममे वामा नाकसँ साँस लि‍अ आ दहि‍नासँ छोड़ू। तहि‍ना दहि‍नासँ लि‍अ आ वामासँ छोड़ू। ई क्रम दस बेर। भ्रामरीमे, आँखि‍ आ कानकेँ हाथक ओंगरीसँ मोड़ि‍ कऽ औंठा कानमे, दोसर ओंगरी कपारपर आ तीन ओंगरी आँखि‍पर राखू आ कंठसँ ओम शब्‍दक उच्‍चारक करू, दस बेर। नारी सोधन, वामा नाकसँ साँस लि‍अ आ रोकू, जहन छोड़ैक वि‍चार हुअए तहन दाया नाकसँ पूरा छोड़ि‍ आ बाहरे साँसकेँ रोकने रहू। जहन साँस लइक वि‍चार हुअए तँ दायासँ लि‍अ। फेर रोकि‍ दियौ आ ओहि‍ना वि‍परीतसँ छोड़ू। ईहो दस बेर करू। आ हे सुबह-शाम टहलैक सेहो आदति लगा लि‍अ। एकटा दवाइ बता दइ छी। पहि‍ने दवाइ बनाएब केना से सुनू, आधा कि‍लो करू तेल, एक पौआ लहसुन, पाँचटा धथुरक फड़, दू सए ग्राम लाल मि‍रचाइ, दू सए ग्राम तमाकुलक पात, थोड़ेक आकक पत्ता, सए ग्राम लौंग, सभटाकेँ कुटि‍ कऽ तेलमे डाहि‍ दि‍औ। एक मास तक जरलेहेसँ माि‍लश करू तखन गरलाहासँ करब आ मोन राखब जे मालि‍श केला बाद हाथ साबुनसँ धाेइ लेब।” कि‍सुन लाल बजला- “कि‍छु परहेजो-तरहेज छै?” “योग केला बाद बीस मि‍नट तक कि‍छु नै खाएब। एक घंटाक बाद जलपान करब। जलपानक चारि‍ घंटा बाद भोजन करब। खाइत काल पानि‍ नै पीअब। खेलाक एक घंटा बाद पानि‍ पि‍अब। हरि‍अर साग-सब्‍जीक खेनाइमे बेसी बेवहार करब। सूतैकाल एक गि‍लास सुशुम दूध पीि‍ब लेब। जौं नि‍अम आ संयमसँ जेना बता देलौं तेना जँ करैत रहब तँ बातरस तँ ठीके भऽ जाएत जे आनो बेमारी सभ नै हएत। जेना कफ, दम्मा, टीवी, रक्तचाप, मोटापा, गैस, कब्‍ज, हृदए रोग, अवसाद इत्‍यादि‍। देहसँ मेहनति‍ करैबलाक देह केहेन सोंटल-साँटल रहै छै तहि‍ना अहुँक भऽ जाएत।” ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com  पर पठाउ। ३. पद्य ३.१.जगदीश चन्द्र ठाकुर ‘अनिल’- की भेटल आ की हेरा गेल  (आत्म गीत)- (आगाँ) ३.२.१.शि‍व कुमार झा ‘टि‍ल्‍लू’-कवि‍ता-दृष्‍टि‍कोण २.मिहिर झा- महँगी ३.शिव कुमार यादव- गीत-कविता ३.३.जगदीश प्रसाद मण्डल-किछु गोट गीत ३.४.१.राजदेव मण्‍डल- कानैत हँसी/ कनहेपर भाेलब २.पवन कुमार साह- गीत एवं कवि‍ता ३.ओम प्रकाश- गजल ४.राजेश कुमार झा- एकटा प्रेम बिरहक कथा ३.५.१.मुन्नी कामत- किछु कविता २.प्रीति‍ प्रि‍या झा- कवि‍ता- ज्ञानक बल ३.रूबी झा- दूटा गजल ४.कुसुम ठाकुर- हाइकू ३.६.१.हेम नारायण साहु- तीन गोट कवि‍ता २.रामदेव प्रसाद मण्‍डल ‘झारूदार’- शासक सुधारक महाझारू ३.७.१.जगदानन्द झा मनु- किछु गजल २.बाल मुकुन्द पाठक- किछु गजल ३.पंकज चौधरी (नवलश्री)- किछु गजल ३.८.१.विनीत उत्पल- गजल २.अनिल मल्लिक- दूटा गजल ३.अविनाश झा अंशु ४.किशन कारीगर- पंडा आ दलाल- (हास्य कविता) जगदीश चन्द्र ठाकुर ‘अनिल’ की भेटल आ की हेरा गेल  (आत्म गीत)- (आगाँ) की भेटल आ की हेरा गेल ; आत्म गीत                                                आगाँ आतंकक छाया छल पसरल चहुँदिस अन्हारटा छल लतरल उत्पात मचौने छल दानव पीड़ा केर पर्वत छल अकड़ल सरस्वती कुहरैत छली हाथक वीणा छल छिना गेल, हम सोचि रहल छी जीवनमे की भेटल आ की हेरा गेल। अपहरण जतय उद्योग बनल चंदाक वसूली रोग बनल मारि-पीट, दंगा-फसाद, छल लोकक खातिर भोग बनल छल जहाँ-जतऽ जे चिड़ै कतहु आकाश छोड़ि कऽ पड़ा गेल, हम सोचि रहल छी जीवनमे की भेटल आ की हेरा गेल। एक बिपटा, कते मदारी छल सबहक सभसँ भैयारी छल गाड़ी छल उपरमे चितंग नीचाँ कुहरैत सवारी छल हम थहाथही देखइत रहलहुँ छल कंठ कतेको मोका गेल हम सोचि रहल छी जीवनमे की भेटल आ की हेरा गेल। हे मित्र! बंधु ! परिवार हमर! हे  आंगन आ चिनुआर हमर ! जीवाकेर, बजबाकेर देखू क्यो छीन लेलक अधिकार हमर हमरहि सोझाँ माइक छाती पर पाथर छल क्यो खसा गेल हम सोचि रहल छी जीवनमे की भेटल आ की हेरा गेल । मा मिथिले ! क्षमा करू हमरा संकल्प अपन हम बिसरि गेलहुँ हमरहु मुट्ठीमे छल अकाश नहि जानि कतऽ हम पिछड़ि गेलहुँ हमरहि चुप्पी केर कारण क्यो अछि आँखि अहाँकेँ देखा गेल हम सोचि रहल छी जीवनमे की भेटल आ की हेरा गेल। की होयत ई जीवन लऽ कऽ? की होयत तन-मन-धन लऽ कऽ? की हएत जोगा कऽ आँखि अपन? आ की अरण्य क्रन्दन लऽ कऽ? कहइत अछि हमरा पंचवटी मैथिलीक काया सुखा गेल हम सोचि रहल छी जीवनमे की भेटल आ की हेरा गेल। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। १.शि‍व कुमार झा ‘टि‍ल्‍लू’-कवि‍ता-दृष्‍टि‍कोण २.मिहिर झा- महँगी ३. शिव कुमार यादव- गीत-कविता १ शि‍व कुमार झा ‘टि‍ल्‍लू’ कवि‍ता- दृष्‍टि‍कोण हि‍आक दू गोट रूप अवलोकन आ वाचन पहि‍लुक मात्र अपनहि‍ लेल दोसर समाजकेँ जनयबाक लेल पहि‍लुक जौं सद्गमनीय स्‍व-संतोष आ कल्‍याणकारी जीवन ओहेन व्‍यक्‍ति‍मे दोसरक कोनो आवश्‍यकता नै हमर जीवन “पोथीक फूजल पन्ना” सभ वाचन दइत पोथीक आखरक संग-संग जौं पटल अर्थात् पृष्‍ठ कारी केना आखर देखाएत? एहेन फूजल अर्न्‍तमनक कोनो प्रयोजन नै मनसा-वाचा कर्मना तीनू त्रि‍वेणीक धार जकाँ वि‍लग... छि‍ड़ि‍आएल... ई बेवस्‍थाक फेर नै आ ने जाति‍-वंशक प्रभाव जौं रहि‍तए तँ बैरमखाँक आंगनमे रहीम फुदकैत केना? जखन गुरुजीक मुखसँ पहि‍ल बेर सुनलौं आश्चर्य लगल छल डार्विन जौं ई सुनि‍तए तँ वंश-सि‍द्धान्‍त नै लि‍खतए कि‍एक अछि‍ दृष्‍टि‍कोणक फेरि‍? ई मात्र अर्थयुगक वि‍जय सभ आगू जेबाक लेल बपहारि‍ काटि‍ रहल नीक गुण-धर्मसँ नीक बाटपर नै कुकरम करब मुदा सभसँ आगू नाचब पथ्‍य स्‍वादहीन होइछ बाबाकेँ ब्रह्मपहरमे दुग्‍ध पानक अभ्‍यास छलनि‍ हमहूँ प्रयाग कएलौं दूध तँ ि‍नरंतर नै रहि‍ सकल मुदा! सुरापान धरि‍ अवश्‍य करए लगलौं अपने टा नै समाजक जाति‍क भारसँ दाबल भरि‍आक बीच कुहरैत संस्‍कारी दि‍लीप कोनो राज पुत्र नै रैदासक वंशज दि‍लीप खूब पढ़ैत छल हम घुमैत छलौं आब ओकरो सि‍खा देलि‍ऐ दुनू पि‍बैत छी वाह रे मनुक्‍खक मोन ऐ सँ नीक चाली नोन देखि‍ते बाट बदलि‍ लइत हम मनुक्‍ख छी आर्यावर्त्तक वैदि‍क सनातन पालक पुरुष सूक्‍तसँ देल उपाधि‍ ब्रह्मकुलक पूत हमहीं भँसै छी कोनो ने मानवताक भीत ससरए नानक-रैदास ईसा बुद्ध परशुराम बुद्ध कृष्‍ण राम सुरगण कुहरि‍ रहल रहीमक अस्‍ति‍त्‍व वाम अंतमे कनै छी देखि‍ अवोध चि‍लका बि‍लखइए अपन संग दोसरोक कल्‍याण नै सोचलौं की भेटल मनु-वंशकेँ नाश कऽ देलौं तँए जे देखू वएह सोचू वएह अर्न्‍तमन सएह वाचन नीक केलक नीक भेटल अधलाह परि‍णाम स्‍वत: भोगैए ईश्वर छैक की नै वि‍षय गौण बुझू मुदा! प्रकृति‍ तँ अवश्‍य जकर डांगमे कोनो ध्‍वनि‍ नै अधलाह परि‍णाम भोगबे करत अधरकेँ हि‍आसँ जोड़ि‍ हमर दृष्‍टकोण नीक चि‍चि‍आउ नै सोचू..... अान्‍हर रहू मुदा सबहक कल्‍याण करू जौं एतेक शक्‍ति‍ नै तँ अपने कल्‍याण करू जहानमे दृष्‍टि‍कोणक वि‍हान अवश्‍य हएत। २ मिहिर झा महँगी बुन्न बुन्न रिसैत महँगी बना लेलक दरारि कमला क बाढ़ि सन हू हू बहैत संपोला से अजगर बनैत चट करैत गामक गाम एकहि संग कोनो स्थान सुरक्षित नहि त्राण पबै लेल तथाकथित सरकार फाटक खोलैत बान्ह के रहि रहि के आ कहैत सांत्वना शब्द ई जरूरी छैक देशक भविष्य लेल जतय वर्तमाने अन्हार छैक ३ शिव कुमार यादव गीत-कविता १ बरखाक मौसम ऐलए, साउनक मास चलल बरखा ऐलए-बुन्नी ऐलए, बूनेँ-बून पानि बरसल।

जान भेटल सुखल दुभिमे, छोट-नमहर लत्ती लतरल गाछ-बिरिछ, घास-पात हरिआएल, माल-जालक मनमा जुड़ाएल। कतौ-कतौ तँ रौदिए अछि, गाछ-बिरिछ मुरझाएल मुदा कि करबै? मनुषक करनी जे गाछ-बिरिछ काटल।

कोशी-कमला उछललि, उछलल नहरि-गंडकक  कतहु-कतहु तँ बान्हो टुटल, तँ कतेको गामो दहाएल।

कतौ अछि जलामए बाड़ी-झाड़ी आ खेत-पथार, तँ, कतहु अछि दरार पड़ल सुखाएल चौरी-चाँचड़।

बौआ बुचकुन छुपर-छापरि खुब कऽ रहल, तँ धीया-पुता आ मुनसा अछि माँछक जोगाड़िमे लागल।

मधुश्रावणी सेहो भेल, आ हएत भोला बाबाक पूजा आ व्रत सभ सोम  तँ व्रत रखती कतेको कन्या, अछि ई साउनक मास। 

घंटीक टुन-टुनक मिठास सगरो, चलल हर-बड़द खेत दिस, कादो भेल, बीआक आँटी लऽ चलल जन रोपनी लेल।

मेहनत कऽ रहल अछि कृषक मंडली खूब जतन सँ "शिकुया", तखने तँ फसलि लहलहाइत अछि आ अन्न भेटैए।

२ कविता

हमर एतबहि अपराध छल

हमर एतबहि अपराध छल हम नीच जातिक छौड़ा, हमर एतबहि अपराध छल।

गरसा नेने ठाढ़ अछि तमसाएल बीचे बान्ह पर, गरदनि आइ काटि देबै,  जँ टपलै फेरो सँ आब  फलनाक छौड़ा हम्मर दूरा।

छै एहनो लोक मुचंट  जे आगाँ पिछाँ किछु नै सोचए,  पढ़ल-लिखल आ ऊँचक नाँच नचए, अप्पन कपाड़ि छोड़ि कऽ  अनकर धीया पुता केँ दुसए।

सोझा हमहीं पड़ल छलिऐ हमरे पर ओ दौड़ल छल, हम तँ अनभिज्ञ अबोध नेना, खनए मेँ तीतल बिलाड़ि जकाँ हम ओतऽ सँ पड़ाएल छलौं।

हमर एतबहि अपराध छल, गामक लोक मने हमर माय डाइन। सात दिन सँ ओकर छौड़ा, बोखारि मे बिछौना पर पड़ल छल।

कि! एखनो धरि लोक मानैए, डाइन जोगन सँ डरइए? हम तँ अबोध नेना छी, बापक मुइने बटुबर छी।

बापक मुइने माय भसिआएल छल, सदिखन किछु नै किछु निहारैत छलि,  अपने मेँ किछु बिचारैत छलि,  अप्पन घर-आँगन केँ सरिआबैत छलि, तैँ, लोक डाइन बिचारि बजाबैत छल।

जइ गिरहत काजे बाप मुइल,  ओ उलटे गरिआबैत अछि गए मौगी, अप्पन मरदकेँ खएबे केलाँ, आब हमरा पर डेनियाँ लागल छैँ,  कि-कि नै कहि लोककेँ ओ बताबइए।

हमर एतबे अपराध अछि,  लोकक मोने हमर माय नै चलल तैँ, लोक सदिखन दुत्कारैत अछि, चुड़ैल डाइन कहि बजाबैत अछि।

एतेक खीझैत होइतौँ समाजक लोक सँ, माय माहुर आनि नै खएलक, हमरे लेल ओ जीबैए, अनकर आस छोड़ि कऽ एसगरे ऐ निःदर्द दुनियाकेँ पछाड़ैए।

"शिकुया" हमर एतबे अपराध छल, हम नीच जातिक छौड़ा  हमर एतबे अपराध छल। शिकुया "मैथिल" ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। जगदीश प्रसाद मण्डल जगदीश प्रसाद मण्‍डलक तेरह गोट गीत- हेल-मेल जाधरि‍...... हेल-मेल जाधरि‍ नै पकड़ब जि‍नगीक कोनो भरोस नै। रंग-बि‍रंग सरोवर सगर छै पार जेबाक संतोष नै। हेल-मेल जाधरि‍......। कोनो थीर, जलजलाइत कोनो जुआरि‍ भरल छै सजल-धजल। पबि‍ते पेट उनटि‍-सुनटि‍ देखए रूप जीअल-मरल। देखए रूप.......। दूर-दूर, हटि‍-हटि‍ सजल छै दुर्गम दुर्ग सि‍रजैत रहै छै। अन्‍हर-वि‍हाड़ि‍क झोंक पाबि‍ उनटा-पुनटा नाव चलबै छै। उनटा-पुनटा......। कौशल जखन...... कौशल जखन कोसल बनै छै कोसलि‍या एबे करतै। लाख परयास केलो पछाति‍ ढंस घर हेबे करतै। कौशल......। कोसल असगर नै पनपै छै पनपै छै दाेसर-तेसर। चालि‍ कुचालि‍ धड़ि‍ पकड़ि‍ भूमि‍ बनैत रहै छै उसर। कौशल......। उसर पाबि‍ उसरि‍-उपटि‍ घर परि‍वार समाज उसरै छै ऊपरे-ऊपर छीटि‍ अछीनजल फूकि‍ शंख काल भगबै छै। कौशल......। जि‍नगीक कुन्‍ज...... जि‍नगीक कुन्‍ज भवनमे बि‍हार कुन्‍ज करए लगै छै। दुनि‍याँक भवसार बीच भव आनन बनबए लगै छै। भव आनन......। आनन-फानन बीच-बीच हजार आँखि‍ देखैत रहै छै। सरमे-भरमे चुनि‍-चानि‍ सागर भव भरैत रहै छै सागर भव......। आँखि‍ बीच अँखि‍या-अँखि‍या डि‍म्ह डि‍म्हा भाँगैत रहै छै। नीख-नीर नि‍खड़ि‍-नि‍खड़ि‍ घाटे-घाट चुनैत रहै छै। घाटे-घाट......। सत-चि‍त...... सत-चि‍त आनन-फाननमे भव आनन बि‍लटि‍ गेलै। शील बनि‍ शीला चढ़ा लोढ़ि‍-बीछि‍ रगड़ए लगलै। लोढ़ि‍-बीछि‍......। वाण-वाणि‍ चेत-अचेत चाल-चालि‍ चलबए लगलै बीचमान बनि‍ बि‍‍चमानि‍ नीर-छीर मि‍लबए लगलै। दूधे-पानि‍ मि‍लबए लगलै। मुख-बि‍मुख पथ पथरा गुआरि‍ गर लगबए लगलै। आनन चि‍त सरि‍-सरि‍या ढुलकि‍ ढोल बजबए लगलै। ढुलकि‍ ढोल......। पड़ि‍ते पएर...... पड़ि‍ते पएर हवा पोखरि‍ डेगे-डेग डगरए लगै छै। झील-मि‍लि‍, हि‍ल-मि‍लि‍ बानि‍ पकड़ि‍ बाँहि‍ संगरए लगै छै। बाँहि‍ पकड़ि......। धक्कम-धुक्का मुक्कामे जहि‍ना धक्का-धुक्की चलए लगै छै। सि‍हकि‍ते नाद चि‍हकि‍ छाती धरा धार धड़धड़बए लगै छै। धरा धार......। हि‍ला-डोला हि‍लोरि‍-हि‍लोरि‍ कि‍नछड़ि‍ कोण पकड़ए लगै छै। तड़पि‍-तड़पि‍ तड़पन करैत ठौर अपन धड़ए लगै छै। ठौर अपन......। पड़ि‍ते पएर......। अहाँ कि‍अए...... अहाँ कि‍अए रूसल छी हे बहि‍ना अहाँ कि‍अए रूसल छी हे। हल-चल, हल-चल सभ दि‍न करै छी चल-हल चल-हल कहाँ पाबि‍ पबै छी तैयो अहीं मगन कानि‍-हँसि‍ कुचड़ै छी कानि‍ हँसि‍......। अहाँ कि‍अए......। राति‍ दि‍न एकबट्ट करए सभ लागल रहै छी। लागि‍ भीड़ कि‍यो, भीड़ लागि‍ रमझौआ करैत छी हे रमझौआ......। अहाँ कि‍अए......। उमकीमे उमकि‍...... उमकीमे उमकि‍ गेलै भाव भँवर भसि‍या गेलै। अबि‍ते उमकी चि‍त-वृत्ति‍ रमकीमे रमकए लगै छै। अतल-गहन गहन-अतल पाबि‍-पाबि‍ बौरए लगै छै। उमकीमे उमकए लगै छै। तीले-तील ति‍लकि‍-ति‍लकि।‍ कौओ बेरागी बनै छै कल्‍प-कल्‍प रमकि‍ झुमकि।‍ अनजनुआ कहबए लगै छै अनजनुआ कहबए लगै छै। उमकि‍-उमकि‍ लपकि‍ झपकि‍ लोल-बोल धड़ए लगै छै। उमकीमे उमकए लगै छै। घट-घट घोंट...... घट-घट घोंट घोटै छै मीत यौ, घट-घट घोंट घोटै छै। तरसि‍-तरपि‍ तन-तना, तना फन-फन मन फनकए लगै छै। मीत यौ, घट-घट......। घट-घट घोंट घटि‍-घटि‍ तबधल तमसल मन-मनाइ छै हक-हक हकहका-हका अपनमे दरकार धड़ै छै। अपनमे......। अपन मान-समान मानि‍ बैसि‍ बीच बीचमानि‍ करै छै। जे जेकर से तेकरे रहतै नाद-शंख फूकैत कहै छै। नाद-शंख......। जहि‍ना बारह...... जहि‍ना बारह दि‍न बजैत तहि‍ना ने राति‍यो कहै छै। बीच-बि‍चौबलि‍ बीछि‍-बेड़ा दुनूमे समतूल भरै छै। दुनूमे......। जेठक बारह नम-नमड़ि‍ बारह राति‍ पटि‍अबै छै। मघजल्‍ला पसारि‍-पसारि‍ हार जाड़ बढ़ि‍अबै छै। हार जाड़......। कखनो बाम दहि‍न घुसुकि‍ दुनू दि‍स कपचैत रहै छै। नि‍खरि‍‍-नि‍हारि‍ नहि‍ देखि‍ झपकी-लपकी सहैत रहै छै। झपकी-लपकी......। जहि‍ना......। दुनि‍याँ घोड़ाएल...... दुनि‍याँ घोड़ाएल छै नि‍शाँमे घट-घोट घोटैत कहै छै। सुखचन-दुखचन कुहि‍-कुहि‍ भटैक-भटका मारैत रहै छै। भटैक-भटका......। शुक-चेन सोचि‍-असोचि‍ सुखल धार बहबैत रहै छै। काँट-कुश बना बना धार-धड़ि‍ धड़बैत रहै छै। धार-धड़ि‍......। सुखल-टटाएल रसाएल जि‍नगी रसाएल जीव कहबए लगै छै। भुख-पि‍यास पचि‍-पचा सार-वेद गाबए लगै छै। सार-वेद......। बहलि‍ बहील...... बहलि‍ बहील बहि‍ला कहै छै आश हमर कहि‍यो नै करि‍हह फुलकि‍-फलकि‍ ढेनु-ढेनुआरक तोड़ि‍ आश तेकरो रहि‍हह। बहलि‍ बहील......। बहलि‍ मन दहलि‍-दहलि‍ बाँझ गाछ धड़ैत रहै छै। पकड़ि‍ डारि‍ डोला-डरा लस्‍सा–लोल छोड़बए लगै छै। लस्‍सा लोल......। लटपट-सटपट बझ-बझीन गीत वधैया गाबि‍ कहै छै। ता धीन ताधीन धीन ता धीन सूर-तान टहि‍आए लगै छै। शूर-तान......। हलचल जि‍नगी...... हलचल जि‍नगी हलसि‍-खि‍लचि‍ हर-हरि चालि‍ चलै छै। बीर्तमान भवि‍ष्‍य कहि‍-सुनि‍ भूत-बंगला सजबै छै। मीत यौ, भूत-बंगला सजबै छै। जहि‍ना आनक पोखरि‍ डरान अपनो गाछी कहबै छै। अधसर-अधमर पोखरि‍ सृजए जम-जजमान फफनै छै। मीत यौ, जम-जजमान फफनै छै। भाग बैसि‍ एक वीणा-धारणी बहि‍ना बाँहि‍ पकड़ै छै। वाम-दहि‍न चालि‍ चलि‍-चलि‍ धाम-काम धड़बै छै। मीत यौ, धाम-काम धड़बै छै। टकटक ताक...... टकटक ताक तकै छी हे मइये आहाँ कि‍अए आँखि‍ मुनने छी। गड़-गड़ गाल गबै छी मइये तखन कि‍अए कान खोलने छी। तखन......। जन-मन-धन धि‍यानए मइये छी छूटि‍, केना जाइ छी। डारि‍-पात अमृत भरि‍-भरि‍ वि‍ष-रस केना बनै छी। वि‍ष-रस......। कन-कन मणि‍ मन-मन मइये अन्‍हार कि‍अए छोड़ै छी। रचि‍ अन्‍हार इजोत-जोत तखन एना कि‍अए वि‍षवि‍षबै छी। एना कि‍अए......। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। १.राजदेव मण्‍डल- कानैत हँसी/ कनहेपर भाेलब २.पवन कुमार साह- गीत एवं कवि‍ता ३.ओम प्रकाश- गजल ४.राजेश कुमार झा- एकटा प्रेम बिरहक कथा १ राजदेव मण्‍डल दूटा कवि‍ता कानैत हँसी घटि‍ गेल बीचक दूरी गप्‍पसँ बेसी डोलैत मुड़ी कि‍छु नै जानै छी तैयो अपन मानै छी एककेँ सुख दोसराक सुख दूनू मि‍लि‍ भऽ जाइत अछि‍ दुख एक गोटेक आँखि‍क नोर दोसरकेँ दुखक नै ओर भीज रहल अछि‍ अन्‍तरक पोरे-पोर ई नै रूकत कतबो लगाएब जोर संचय कएल एक-एकटा कण कतेक भरि‍गर भेल छल तन नि‍कलि‍ गेलासँ आब केहेन हल्‍लुक लगैत अछि‍ मन माए एकदि‍न कहने रहए साइत सभटा सहने रहए बाटसँ भऽ कऽ कात वएह भोगल बात कहैत नीक अधलाह फाटि‍ कलेजा नि‍कलै दाह दू बून सूखल हँसी नोर जल अथाह कहलौं-सुनलौं भऽ गेल गप्‍प एहेनठाम की करि‍ते रहब तप हे, रहै छी कतए कहाँ गप्‍प कतौ नै बजबै अहाँ बि‍सरि‍ थाल-कादोमे धँसल कानैत-कानैत खि‍खि‍या कऽ हँसल लवका शक्‍ति‍ जागि‍ गेल हँसलासँ दुख भागि‍ गेल। कनहेपर भाेलबा हड़बि‍र्ड़ो मचल अछि‍ मेलामे धि‍या-पुता हरा गेल ठेमल-ठेलामे दूनू पच्‍छ अछि‍ पूरा तगड़ा शुरू भऽ गेलै मेलेपर झगड़ा कोइ एँठ-कुठपर खसल चि‍चि‍याइत कोइ भीड़मे फँसल मँुहपर डर नाचि‍ रहल अछि‍ सभ अपने दुख बाँचि‍ रहल अछि‍ के कोनए भऽ गेल नि‍पत्ता केकरो नै चलि‍ रहल पत्ता “हे रौ सुन-ढोलबा हरा गेल भोलबा गाँजा पीबैत छन छलै सँगे की कहबो, छौड़ा छै अधनंगे तकैत-तकैत करए लगल दरद कानि‍-कानि‍ ओ करैत हेतै गरद।” गाँजाक चि‍लम जेबीमे रखलक आँखि‍ उनटबैत ढोलबा कहलक- “छौड़ा छह पाछू कान्‍हपर चढ़ल तूँ जाइ छह आगू बढ़ल नि‍शाँमे अहि‍ना हरेबह काका चि‍नाय कन्हेपर भोलबा आ भोलबे नै।” “बुधि‍ हरा गेल हमर साइत कन्‍हेपर भोलबा ओकरे ले औनाइत कन्‍हेपर छौड़ा बैसल बि‍सरि‍ गेलौं डर छल पैसल।” बजल बुढ़बा- छौड़ाकेँ दैत चमेटा- “तूँ बेटा छेँ की टेटा हमर मन भऽ गेल अधीर कान्‍हपर बैसल छेँ भऽ कऽ बहीर।” थप्‍पर लगि‍ते उपजल आनि‍ छौड़ा बजल कानि‍-कानि‍- “आँखि‍ रहि‍तो कि‍छु नै सुझै छह अपनाकेँ बड़ काबि‍ल बुझै छह।” २ पवन कुमार साह गीत एवं कवि‍ता भाय-यौ भाय-यौ...... चलू चलू चलू चलू चलू चलू मि‍थि‍ला गाम लागल छै ऐ ठाम सुन्‍दर धाम भाय-यौ भाय-यौ......। सुन्‍दर गाम, सुन्‍दर नाम सुन्‍दर खान, सुन्‍दर पहचान एहेन अछि‍ अपन मि‍थि‍ला गाम भाय-यौ भाय-यौ......। मि‍ठगर बोली मि‍ठगर बात दुस्‍मनो समैपर होइए साथ सभ मि‍लि‍-जुलि‍ रहए नै देखबै गुमान एहेन अछि‍ अपन मि‍थि‍ला गाम भाय-यौ भाय-यौ......। गाछ-बि‍रि‍छ कत्ते सुहाबै कोइलीक कू मनकेँ भावै स्‍वच्‍छ हवा ऐ जगहक रग-रग देहकेँ तृप्‍ति‍ कराबै नै भेटत कतौ एते आराम एहेन अछि‍ अपन मि‍थि‍ला गाम भाय-यौ भाय-यौ......। मोनक बात मोनक बात मोने रहि‍ गेल असरा फेर बर्षक पूरा नै भेल दि‍लक बात दि‍ले रहि‍ गेल मनक बात मोने रहि‍ गेल। वि‍चारि‍-वि‍चारि‍ हम चलैत गेलौं पास जा कऽ सभ कि‍छु वि‍सरलौं नजरि‍ हमर पराइते-पराइते एक्केठाम एहेन बसि‍ गेल मनक बात मोने रहि‍ गेल। सोचलौं आब ओ तकबे करत आँखि‍क इशारा देबे करत आगू-पाछू हम करैत छलौं मुदा हमर सोच व्‍यर्थ भऽ गेल मनक बात मोने रहि‍ गेल। ३ ओम प्रकाश गजल अपन छाहरिक डरसँ सदिखन पडाईत रहलौं पता नै किया खूब हम छटपटाईत रहलौं कियो नै सुनै गप करेजक हमर आब एतय करेजक कहै लेल गप हडबडाईत रहलौं अपस्याँत छी जे चिन्हा जाइ नै भीडमे हम मनुक्खक डरे दोगमे हम नुकाईत रहलौं अपन पीठ अपने थपथपा मजा लैत छी हम बजा अपन थपडी सगर ओंघराईत रहलौं कतौ भेंटलै नै सुखक बाट "ओम"क नगरमे सुखक खोजमे बाटमे ढनमनाईत रहलौं ओम प्रकाश फऊलुन (ह्रस्व-दीर्घ-दीर्घ)- ५ बेर प्रत्येक पाँतिमे बहरे-मुतकारिब ४ राजेश कुमार झा एकटा प्रेम बिरहक कथा सुनबै छी एकटा प्रेम बिरहक कथा जे आगि लगा दए गेल हमरा ओ व्यथा छोड़ि कऽ हमरा एना चलि गेली ओ जेना कायाक कमान लए गेली ओ सुखो हमरासँ एना रुसि गेल जेना दुखक मझधारमे छोड़ि गेलीह ओ आब नै भूख लगैए नै प्यास जेना मरुभूमिमे असगर छोड़ि गेली ओ आब तँ विक्षिप्त प्रेमी सन हाल अछि सभटा सुधि-बुधि बिसरा गेली ओ हुनकासँ भेटो नै कए सकैत छी किएक तँ नै मिलैक सप्पत दए गेलीह ओ सबहक चेहरामे हुनके चेहरा ढुँढइ छी ह्रदयमे एहन फोटो बसा  गेली ओ नीने टा आब बस नीक लगैए सुन्नरी सपनाक खजाना दऽ गेली ओ कखनो कोनो जे आहट सुनै छी, बुझैए एक बेर सतहीँ मे फेर आबि गेली ओ एकांतमे बैस चिट्ठी लिखै छी फाड़ै छी नै फुड़ाइए सभटा शब्द चोरा गेली ओ प्रतीक्षा खत्म कए जरुर फूलो फुलायब जे मिलनक कोरही छोड़ि गेली ओ ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। १.मुन्नी कामत- किछु कविता २.प्रीति‍ प्रि‍या झा- कवि‍ता- ज्ञानक बल ३.रूबी झा- दूटा गजल ४.कुसुम ठाकुर- हाइकू १ मुन्नी कामत १ बूँदक मोल फाटल धरती जरल घास एक बूँद पानि बिनु अछि सभक सभ उदास। नै बुझलौं हम प्रकृतिक निअम तँइ कानै पड़त आब कतेक जनम। आइ बुझितौं मोल जे पाइनकेँ तँ एना पियासल नै मरैतौं जाइन कऽ। बहुत नाच नचेलौं छन्नी-छन्नी धरतीकेँ केलौं अपन सुविधा खातिर धरतीकेँ सिमेंट बालु सँ झाँपि देलौं वएह अपमानक बदला छी ई लागए नै पएरमे माटि तकर सजा छी ई आब तँ लोरोमे नै पानि अबैए जकरा पीब हम पियास बुझाबी बुझा रहल यऽ आइ ओइ एक बूँदक मोल छल हमराले ओ कतेक अनमोल। २ करी मिथिलासँ पहचान चलू मिथिला, सुनियौ मैथिली कतेक मीठ ई बोल यौ मिसरी घुलल अछि हर शब्दमे करिरौ एकर मोल यौ। सीताक नैहर एतए उगनाक ई प्रिय स्थान यौ ऋषि-मुनिक भूमि ई अछि एतऽ विद्वानक खान यौ। होइत भिनसर सुगा सीता-राम पढ़ैत अछि बउआ नुनु कहि सभ बात बजैत अछि करियौ अइ भूमिक पहचान यौ। एतए कऽ माछ-पानक दुनिया करैए बखान यौ धोती-कुरता आ पाग अछि पुरूषक पोषाक यौ। अइ धरती पर हम जनमलौं अछि ओइ जनमक कोनो नीक काज यौ फेर-फेर हम एतै जनमी अछि अतनी प्रार्थना भगवान यौ। ३ कारिझुमरी कोसी दू-चाइर दिन नै आइ सात दिनसँ ऊपर भेल कोसी कारिझुमरी सभ लेने चलि गेल। नै खाइ लऽ अन्न अछि नै पिबै लेल पानि ऊ डसिनिया सभ ढेकारैत लऽ गेल। बाउ हरैल अछि भाइ ढिस भऽ पड़ल अछि राइते-राइत आएल एहन निरलज्जिया जे कुहरा कऽ चलि गेल। नै बचल एक कनमो किछो नै भाइ-बाप नै रिश्तेदार कोइ असगर ठार छी कछारिमे ई कोसी कारिझुमरी असहाय छोड़ि हमरा हँसैत चलि गेल। ४ नै लेब आब हम दहेज दहेजक खातिर गिर गेलौं हम मानवताक समाजमे। कि कहब आब अपन दुखरा कि लिखल छल कपारमे। धोती-कुरता पहिर कऽ बाबू ठाठसँ चिबबैत पान अछि हमरा बना कऽ पापी आब ओ कात अछि। पढ़ि-लिख हम बानर बनलौं बाबूक बातमे एलौं दहेज लऽ कऽ केहन काज केलौं नै बुझलौं नारीक शक्ति नै ओकर सम्मान केलौं। कि कहब आब हम कि कतेक घिनौन कुकर्म केलौं। ५ मिथिलाक दादा खेत बेच मन कारी झाम मुदा खाइए माछ सुबह-शाम। जमीनक मोल नै जानैए ई पुरखा अरजलहा बेचैमे लागैए कि। बैठल-बैठल ताल करैए पटुआ धोती पहिर गाम घुरैए। चुप रहि कऽ सभ नाच नचाबैए हुक्का गुरगुड़बैत अपन काज सलटियाबैए। फाटल जेब मुदा ऊँच शान देखियौ मिथलाक एगो ईहो पहचान। तइयो खुआबैए ई बुढ़बा सभकेँ नित पान आ मखान। ६ पाहुनक माछ एलखिन पाहुन लऽ कऽ माछ भदवरियामे नै अछि सुखल कोनो गाछ। माँ हम करबै आब कोन काज कोना रखबै मान कोना सजेबै साज। सुनु कनिया हमर बात छानि उजारू करू ई काज। नै केना बना कऽ देबै रामकेँ केना उपासल रखबै। छानि उजरतै तँ फेर बनेबै मुदा रूसल पाहुन केना मनेबै। पजारू चुल्हा पड़लैए साँझ लगाउ आसन परसू तिमन संगे तरल माछ। ७ हमरा पागल कहैत अछि लोग लरखड़ाइत कदम थरथड़ाइत होठ नसाबाज हम नै, अछि जालिम सभ लोक। चोरी केलौं नै मुदा चोर कहेलौं पर डकैती करि बाइज्जत घूमि रहल अछि लोग। एक मु़ट्ठी अन्न लऽ तरसि रहल छी देखियौ गोदामक-गोदाम अन्न सरा रहल अछि लोग। हम मेहनतो करि नै अपन पेट भरि पाबै छी पर हमर सरकार भरल पेट अरबोक घोटाला करैत अछि आब सोचियौ सभ लोक। ८ सगरे अनहार अछि भ्रष्ट आ भ्रष्टाचारसँ भरल पूरा संसार अछि कोइ नै बॉंचल अतऽ सौंसे ओकरे राज अछि। कोइ देखा कऽ लुटैए कोइ चोरा कऽ लुटैए तँ कोइ शरमा कऽ लुटैए लुइटिक अतऽ बजार अछि। के कहत ककरा अतऽ सभ एक प्रकार अछि गर्भमे सिखैए भ्रष्टाचार यएह नव युगक संस्कार अछि। कदम-कदम पर घूस दैत मानव अइ दुनियामे अबैए आगुओ घुसे दैत घुसकैल जाइए हर मोर पर देखबैत यएह नाच अछि घुस दैबला सभसँ बड़का बइमान अछि। ९ मायक रूदन सोचलौं बेटा बेटी भेल रोपलौं आम बबुल उगि गेल। छापि रहल अछि समाजक अत्याचार केना बचैब हम १८ बरख अकर लाज। ई हमर बोझ नै हमर अंश छी जकरा हम नैनामे बसैब मुदा केना कऽ सियाही भरल घरमे अपन चुनरी बचैब। कलंक बेटी नै ई समाज अछि जे युग-युगसँ उज्जर चुनरीमे लगबैत दाग अछि। चारू दिस छल लक्ष्मण रेखा तइयो हरण भेल सीता सुलेखा। कऽ रहल अछि मजबूर हमरा बेटीसँ दूर हमरा। शूल बनि मनमे गड़ैए बेटी तैँ गर्भमे चुभैए बंद करू आब अत्याचार बसाबऽ दिअ हमरा बेटीक संसार। अपना दिस निहारू। बड़ केलौं उक्टा पेंच अक्कर खिद्यांस ओकर धेंस कहियो तँ आंगुर अनेरो उठाउ अपन मनकेँ बुझाउ। उठैए जे एगो आंगुर ककरो दिस तीन आंगुर देखबैए यऽ अपने दिस। मारू अइ साँपकेँ निकालू मनक अइ काँटकेँ जतेक साफ नजर रखबै दुनिया ओतेक सुन्दर देखबै। बहुत भटकलै खोजैले भूत दुबकि कऽ बैठल छल हमरे करेजामे बनि कऽ सूत। १० मजबूर किसान बाबू केना हेतै आब पाबनि त्योहार। बीसे-बीस दिन पर हेतै खर्चाक भरमार नै अगहनक करारी पर देतै कोइ पैंच उधार बाबू केना हेतै आब पाबनि- त्योहार। छुछे छाछी रहि जेतै अबकी चौरचनमे मरूआ भेल अलोपित आब मिथिलामे केना कि उपाय करिऐ कतऽ सँ करिऐ हम जोगार बाबू केना हेतै आब पाबनि-त्योहार। जतरामे धिया-पुता लव कपड़ा मंगै छै दिवालीमे फटक्काले कनै छै छट्ठी मइयाक की अरग देबै अइ बार बाबू केना हेतै आब पाबनि-त्योहार। २ प्रीति‍ प्रि‍या झा कवि‍ता- ज्ञानक बल भोर भऽ गेल सुरुजदेव आबि‍ गेलखि‍न फेरसँ नव दि‍नक आरंभ.... नव आशाक संग गामक लोक अपन काज आरंभ कएलनि‍ एक्के गाम मुदा वएहमे कि‍छु धनि‍क शेष ि‍नर्धन धनि‍कहा लोक नि‍कलला धनि‍क काजक संग गरीब गरि‍वहे रहि‍ गेल हऽर जोति‍ माल-जाल चराबऽ लेल जमीन्‍दार की जानथि‍ गरीवक हाल ओ तँ मात्र आदेश देबए जानथि‍ गरीबक व्‍यथासँ रस नि‍कालथि‍ बड्ड अनर्थ भऽ रहल आब बदलऽ परत समाज मुदा ई केना कएल जाय? एक्केटा उपाए अछि‍... ज्ञान ज्ञानक मंचपर केओ पैघ नै केओ छोट नै नै केओ राजा केओ रंक नै आबि‍ रहल ओ दि‍न जखन ाानक बलपर सभ एहत समान जे हकसँ अछि‍ वंचि‍त ओकरो आसन भेटत तँए धनक हुलि‍-मालि‍ छोड़ि‍ ज्ञानक स्‍त्रोत बढ़ाउ सभ पूर्ण भऽ जाएत। ३ रूबी झा दूटा गजल १

लेलहुँ सुख भरि पाँज पकड़ि हम  गेलौं माँ के कोर पसरि हम ऐना नहि बाजू वयस बितल एखन छी बालकक उमरि हम 

अनुपम माँ के छाँह आँचरक प्रेमसँ गेलौं तैं तs लभरि हम 

पैघो भेलहुँ जगत टहललौँ माँ सन नहि पाओल नजरि हम 

आशीषसँ माँ के विजय सगर रहबै रूबी अमर अजरि हम 

२२ -२२२१ -२१२ सभ पांति मे २ गजल 

भs गेल लजौनी केर पात सन मौलाएल जिनगी अछार परहक भात सन कठुआएल जिनगी अधखिलल पुष्प जेना फूलवारी में खसल कत्तो  कहै लेल पुष्प सुन्नर नहि तs सुखाएल जिनगी 

समय संग जौं एखन धरि हम नै बदलि पेलौ तैं बनल इनारक बेंग सन औनाएल जिनगी 

ताकि रहल छी एतs ओतs जे अपन भाग्यकरेख हाथसँ जनु रेख मेटल आ की हेराएल जिनगी 

निरर्थक बीतल जीबन रूबी बिनु परोजनके  आब नहि शेष किछ पानि में भसिआएल जिनगी 

सरल वार्णिक बहर वर्ण -१९ ५ कुसुम ठाकुर हाइकू समृद्ध भाषा मैथिली मिथिलाक जायत हेरा लाज होइछ बाजब कोना भाषा पढ़ल हम दोषारोपण नेता अभिभावक नहि कर्त्तव्य देशक नेता नहि जनता केर स्वार्थे डूबल करू ज्यों स्नेह माँ आ मात्रि भाषा सँ संकल्प लिय आबो तs जागू मिथिला केर लाल प्रयास करू अबेर भेल तैयो विचार करू अछि सन्देश ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। १.हेम नारायण साहु- तीन गोट कवि‍ता २.रामदेव प्रसाद मण्‍डल ‘झारूदार’- शासक सुधारक महाझारू १ हेम नारायण साहु गाम- नगर पंचायत ि‍नर्मली, वार्ड नं. ०७, पोस्‍ट-–ि‍नर्मली, जि‍ला- सुपौल, मि‍थि‍ला-बि‍हार तीन गोट कवि‍ता जुलुम भऽ रहल अछि‍... कोनो काज नै बि‍नु घूसक होइए ई देखि‍ कऽ मन बौड़ाइए। समए एहेन बि‍त रहल छै केकरो कोइ नै चि‍न्‍है छै हाकि‍मक कोन गप कहै छी चपरासि‍यो नै ओना टेरै छै। कर्मचारीक तँ जूनि‍ पूछू रखने एकटा पीठू छै। जखने पहुँचब झट दऽ कहि‍ देत एकटामे पाँच सए लगै छै। पंचायतक तँ बाते छोड़ू मुखि‍या आँखि‍ मुनि‍ सुरकै छै बि‍ना टाकाक आवास नै दइ छैक। एतेक महग एकर साइन छैक ओ सभ जइठाम बैसल छै बि‍ना लेने नै बक्‍सै छै। जेकरा नै छै बोल ऐ युगमे ओकरा कोइ नै देखै छै। ओना चलत नै काज आब सभ कोइ मि‍लि‍ फूकब बि‍गुल आब। ढाहि‍ देबै घूसक पहाड़केँ नै छोड़ब ऐ दुष्‍ट समाजकेँ। नव ढंगसँ नव समाजकेँ गढ़ि‍ देव ई नव इति‍हासकेँ। भष्‍टाचार सभठाम होइए धक्कम-धुक्का जइठाम जाइ छी खाइ छी मुक्का। सबहक बन्न अछि‍ चीलम-हुक्का बैस कऽ जरदगव मारैए मुक्का। गामसँ लऽ पंचायत धरि‍ ब्‍लॉकसँ लऽ जि‍ला धरि‍। धुमौआ चेअर बैसल धुरफन्‍दा एँठ रहल धैर्य सभसँ चन्‍द। आगू जतेक बढ़ैए जनता ओतबे पैघ बैसलए हन्‍ता। कि‍एक ने एकर सोच बदलैए औंघाएल मनुक्‍ख मुँहभरे खसैए। कतेक दि‍न एना होइत रहत ि‍दन-दुखि‍या एना पि‍साइत रहत। समता मोन पड़ैए मधुमाछी छत्ता अनगि‍नि‍त मधुमाछी मि‍लि‍ बना रहल अछि‍ अपन छत्ता। नै केकरोमे भेद-भाव सबहक मनमे एके भाव। दि‍न राति‍ सभ जूटल रहैए अमृत रस चूसि‍ भरैए रहैए। बाग-वगि‍यामे धुमैत रहैए मधुर गीत गबैत नचैए फूल-पातपर गाबि‍-गाबि‍ लाबि‍-लाबि‍ मधु सृजैए हृदए सबहक जुड़बैत रहैए। २ रामदेव प्रसाद मण्‍डल ‘झारूदार’ शासक सुधारक महाझारू जय हि‍न्‍द हे देशक धरती, जय हि‍न्‍द हे देशक जनता। जय हि‍न्‍द हे ताज देशक, जय हि‍न्‍द सम्‍प्रभुता।। आस्‍ति‍क-नास्‍ति‍क दुइ भावसँ, बनल प्रकृति‍ द्वन्‍द्व वि‍धान। आस्‍ति‍क जग ि‍नर्माण करए, नास्‍ति‍क करए जगनाशी काम।। जब हेतै आस्‍ति‍क गुण राजा देशक हेतै नव-ि‍नर्माण। जनता पहि‍रए प्रेमक माला, एकता धनसँ भऽ धनवान।। जब हेतै नास्‍ति‍क गुण राजा जनद्रोही हेतै सभ काम। बि‍खरए जनता टुटल माला, देश बनि‍ जाएत दुक्‍खक धाम।। राज वि‍द्याक खेल नै जानू, ई जगमे भारी वि‍ज्ञान। जे गुनलनि‍ अछि‍ पाठ मानवताक हुनके छन्‍हि‍ एकर पहि‍चान।। राज वि‍द्याकेँ ओ की जानत जेकड़ा हाथ लाठी भैंसबार। लाठीसँ कहीं राज चलै छै, राज चलाबए कलम तलवार।। राज हुनकेसँ चलि‍ सकै छै, जि‍नका रँगमे दानी खून। स्‍वामी भाव अंग-अंगमे भरल होइ, और भरल होइ सेवा गुण। जेकर हाथ हमेशा नि‍चाँ, उ बाबू नै कुर्सी जोग। ऐ बुन्नकेँ शासनकर्मी, ताकए घोटालाक संजोग।। प्रजावत्‍सल्‍यकेँ जाने भाषा, जनहि‍तमे बस टि‍कल होइ मन। रोम-रोम जनताकेँ समर्पित, और होइ अर्पित जीवन धन।। जानै नै जे सेवा भाषा, धन-धारण बस आखि‍री धून। हाथ हमेशा जेकर नीचाँ, उ की जनतै दानक गुण।। मन रंगल होइ सत्‍य भावमे तन चढ़ल नि‍ष्‍ठा केर वस्‍त्र, एक हाथमे पालन डोर होइ। दुजेमे रक्षा केर शस्‍त्र।। चोरबा-चुति‍या हाथमे परतै, जब-जब देशक शासन डोर। लूट-मार चोरी डाका संग, बलात बढ़तै लगा कऽ होर।। सच्‍चा शासक हुनके जानू, मानवतासँ रंगल होइ देह। नीत-इमानक ताज चढ़ल होइ, दि‍लमे होइ जन-जनसँ नेह।। नि‍ष्‍ठाहीन जब शासक हेतै, समझू देशक वि‍धाता बाम। पहि‍या वि‍कासी पन्‍चार रहतै, न्‍यायक रहतै चक्का जाम।। लाज रहत तब राज ताजकेँ ब्‍यापै नै एकरा त्रि‍वि‍ध ताप। पाबै नै एकरा पुत्र प्‍यारा, सतबै नै एकरा माए-बाप।। आँखि‍ छोड़ि‍ कऽ कानपर देतै, जब-जब देशक राजा जोड़। भुख गरि‍बी सि‍र चढ़ि‍ बैसतै, उफड़ा जकाँ उपलेतै चोर।। शत्रु मि‍त्र नै ताजकेँ धरै, छुबै नै एकरा सुन्‍दर नारी। ताज नै पकड़ै जाति‍-धरमकेँ, और नै टोकै पत्नी प्‍यारी।। तन-मन मैला राजा हेतै, समझू उ राजा अज्ञान। रहै ि‍नरक्षि‍त राजक जनता, देशसँ मेटेतै नीति‍ ज्ञान। ताल जलै नै क्रोध आगि‍मे, डुबै नै ई लोभक घोल। काम मोह नै अहं सताबै, वर्णा की रहतै एकर मोल।। पद गौरवकेँ अंधा राजा, और हेतै मनक वि‍कलांग। सोना उपजै वाला खेतमे, तब उपजतै गाजा-भाँग।। तन अहाँक एक यंत्र मात्र छी, कुछ कराबू एहेन काम। धरतीपर जे अमर कराबे, ऊँचा कराबै जगमे नाम।। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। १.जगदानन्द झा मनु- किछु गजल २.बाल मुकुन्द पाठक- किछु गजल ३.पंकज चौधरी (नवलश्री)- किछु गजल १. जगदानन्द झा मनु ग्राम पोस्ट- हरिपुर डीह्टोंल, मधुबनी १.गजल    हम चान लेबैलए बढ़लौं अहाँ रोकब तैयो तारा लेबै  मैथिलकेँ बढ़ल डेग नहि रुकत आब जयकारा लेबै 

मिथिलाराज मँगै छी हम भीखमे नहि अधिकार बूझि चम्पारणसँ दुमका नहि देब किशनगंज  तँ आरा लेबै 

छोरलौं दिल्ली मुंबई अमृतसर सूरतकेँ बिसरै छी  अपन धरतीपर आबि नहि केकरो सहारा लेबै 

गौरब हम जगाएब फेरसँ प्राचीन मिथिलाक शानकेँ  विश्व मंचपर एकबेर  फेर पूर्ण मिथिलाक नारा लेबै 

उठू 'मनु' जयकार करू अपन भीतर सिंघनाद करू  फेरसँ निश्चय कए सह सह अवतार बिषहारा लेबै      

(सरल वार्णिक बहर, वर्ण-२२)     

---------------------------------------------- २.गजल

हमर कमाई कोन कोनामे परल अछि  मंत्री घरमे बैमानीक सोना गरल अछि 

गरीब बनि गेल आई जब्बहकेँ बकरी  चिकबा धनिकाहा गामे गाम फरल अछि 

डाका परै परोसमे जँ सुतलौं निचैनसँ  ई निश्चय बुझू आत्मा हमर मरल अछि 

ढोंगी भक्तकेँ नहि निकलै रुपैया दानमे  भरि थारी लेने खंड माछक तरल अछि 

शहर नहि 'मनु' गाम गामकेँ चौकपर  मनुखसँ सजि शराबखाना भरल अछि 

(सरल वार्णिक बहर, वर्ण-१६)

------------------------------------------- ३.गजल

बाबा पोखरिकेँ रौहक की कही यादि अबैए बाबी हाथक दही

अशोक ठाढ़िसँ कूदि पोखरिमे जाईठ छुबि कोना पानिमे बही

बनसी बनाबी कोना नूका कए पूल्ली बनाबै लेल काटी खरही

छीन कs नानी हाथक मटकूरी छोट-छोट हाथसँ छाल्ही मही

जखन अबैत गामक इआद कनि-कनि कs हम नोरेमे बही

सभ सुख रहितो परदेशमे माटिक बिछोह कते हम सही

मैरतो 'मनु' सभ सुख छोरि कs मिथिलाक माटिपर हम रही

(सरल वार्णिक वर्ण, वर्ण-१२)

-------------------------------- ४.गजल

घर-घर रावन आई बसल अछि  सौभाग्यक सीता कतए भसल अछि 

करेजाक स्नेहकेँ मोल ने रहि गेल  सभहक प्रेम पाईमे फसल अछि 

कर्तव्य बोध बिसरा गेल सभतरि   भ्रष्टाचारमे सभ कियो धसल अछि 

बैमान बैसल अछि राजगद्दीपर इमानक मीटर कते खसल अछि 

देश समाज 'मनु' नहि कुशल आब  जमाए बनल आतंकी असल अछि 

जगदानन्द झा 'मनु' (सरल वार्णिक बहर, वर्ण-१४) 

---------------------------------------- ५.गजल

किछु एहन काज करब हमहुँ नै फोटोमे टाँगल रहब हमहुँ 

एलहुँ जन्म लए कए दुनियाँमे एक नै एक दिन मरब हमहुँ 

कुकूर बिलाई जकाँ पेट पोसैट आब जुनि ओहेन बनब हमहुँ 

आगु बढ़ि नबका समाज बनाबि नै पाछु आब आगू चलब हमहुँ 

खाख छनि 'मनु' बहुत बौएलहुँ   आब अपने घर रहब हमहुँ 

(सरल वार्णिक बहर, वर्ण -१३) २ बाल मुकुन्द पाठक गजल १ लोक कहैत छथि जे हम छी शराबी शराब पीबै छी कियो बात मानै नै छी छै की खराबी शराब पीबै छी हम तँ दिन राइत घुरिआइ छी मोन पाड़ि रहि रहि हुनकर याद आएल बात घुराबी शराब पीबैत छी एक दिन उ हमरा नजरमे बसेला प्यार जगेला हम दिलकेँ हुनक प्यारमे दौड़ाबी शराब पीबै छी कहियो गाछीमे बैस नयन मिलेला मोबाइलसँ बतियेला दिन राति हुनक यादसँ अपनाकेँ सताबी शराब पीबै छी उ अपन दुनिया बसेलाऽ हमरा पागल बनेला हुनकर चक्करमे मुकुन्द भेलै शराबी शराब पीबै छी ३ हे भगवान अपन ताकत देखा दिअ हुनका क्षण मे हमरा लग बजा दिअ बहुत दिनसँ तरसैत छी प्रेम लेल सोलहो श्रृंगार मे एहि ठाम पठा दिअ दिन- राति आँखि सँ कोसी गंडक बहबौँ बान्ह टूटल ई गामक गाम बहा दिअ कानैत कानैत हमरा अहाँ हँसा दिअ हुनको हमरे सन हालत बना दिअ असगर बैसल नै नीन्न नै चैन आबै मुकुन्द हमरासँ तँ गले लगबा दिअ ३ अहाँक बिना कोना कऽ रहबै हम चाँन जकाँ मुँह नै बिसरबै हम बड़ दिनसँ प्यासल छी मिलनले सिन्धुक गहराइ मे डुबबै हम अहाँ रुप केर भरल खजाना छी तँए रुपक दीवाना बनबै हम अछि मोरनी सन के चालि अहाँ के अहाँक संगे नाँचि कऽ देखबै हम ई मोन कहै छै एक ना एक दिन अहाँ सँ कतौ नै कतौ भेटबै हम मुकुन्द पुछैत अछि हे मृगनैनी कहि दिन कनियाँ बनबै हम ४ अहाँक गेलासँ आब जिनगी एकारि लागै हमरा तऽ एको दिन साल जकाँ भारि लागै देह हाथ सुखल हमर केशोँ नै माथामे अएनामे देखलासँ बड़का बेमारि लागै खाइ पीयैमे हमरा किछो नीको नै लागैए भात दालि कि खाएब निको नै सोहारि लागै कि कहब हम बाबूकेँ केना देखेबै मुँह पटनामे पढ़ल अनेरे मोन भारि लागै देखै छी फोटो जौँ उ आर याद आबैत छथि मुकुन्दकेँ अहाँ बिना रहल लचारि लागै सरल वर्णिक बहार वर्ण-१६ ३ पंकज चौधरी (नवलश्री) गजल १ एक नजरि हुनकर  पड़लै जे हमरा  पाँजसँ ससरल मोन दूक्षण लेल भसियेलय जे से एखनो धरि नञि सम्हरल मोन कात -करोटे ताकैत बस हुनके चारु दिस छइ पसरल मोन सखी -बहिनपा संग ओझरायल देखिकऽ हुनका पजरल मोन हुनके आँचरिके अऽढ भेलहुँ जिनका कनखीसँ कचरल मोन सभ कतरा में प्रेमक -पोखरि सरस एना भेल कतरल मोन मधुरिम आंइखसँ नेह पीबिकऽ नेह - धरा पर चतरल मोन हुनकर नेहक अचल मेहसँ स्नेह - लता बनि लतरल मोन सगर  बाट स्वागत  के सेहन्ते अलकतरा बनि पलरल मोन स्पर्श  पाबिकऽ पैरक हुनकर मधुर छुअनसँ  सिहरल मोन हुनका अबिते कोयली कुह्कल बनिकऽ फगुआ मजरल मोन छोइड़ गेली ओ विरहक रउदी जड़ल-पाकल झखड़ल मोन प्रेमक पोखरि लए छपकुनिया धिया -पुता सन उमरल मोन स्वपनलोकमें भुतियाअल सन भूख-प्यास तक बिसरल मोन गोह्न्छल -लोह्छल भेल मलीन कखनहु पित्ते अकरल मोन सिनेह - दुलारक तइयो भूखल नञि दुलारसँ अभरल मोन मुदा आब तऽ गप्पहिं दोसर धन -वैभव आँगन नमरल मोन अइ कलयुगिया करिया- युग में भावहीन भेल भखरल मोन सुख -सुविधासँ नेहक परितर दुःख -दुविधासँ हहरल मोन "नवल" सिनेह केर करुण दशा ई देखि कष्टसँ कहरल मोन *आखर-२५ (तिथि-०४.०४.२०१२) २ काजरसँ शोभा आँखिक की आंखिसँ शोभित काजर करिया  जादूसँ  केलक  सभके  सम्मोहित काजर नजरि नञि ककरो लागय जादू - टोना छू- मंतर डायनो -जोगिन के केलक मोन के मोहित काजर लागै नजरि नें अपना की लेती प्राण अनकर ओ फँसल मोन दुविधा में ई देख अघोषित  काजर सम्हारल जेतै कोना कऽ ई भाव करेजक भीतर परसैऽ प्रणय  - निवेदन  नैन  नवोदि  काजर ई मेघो देखि लाजयल जे कारी खट-खट काजर "नवल" कलंकक सोझा भऽ गेल अलोपित काजर *आखर-१९ ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। १.विनीत उत्पल- गजल २.अनिल मल्लिक- दूटा गजल ३.अविनाश झा अंशु ४.किशन कारीगर- पंडा आ दलाल- (हास्य कविता) १ विनीत उत्पल गजल बाट जोगैत तँ आँखि पथराएल नै कहियो प्रेम बिना जे जिनगी सरियाएल नै कहियो अहाँक सुनि कऽ नाम किछु फुरैत नै हमरा  लिखै-पढ़ौक लेल किछु फुराएल नै कहियो 

अहाँक आवाज सुनि थरथराबैत छी हम  एहन मीठ बोल कियो सुनाएल नै कहियो 

देखि कऽ अहाँक ओ मुखड़ा आ ओ सुनर नूर  चोन्हराबैत छै आँखि बिसुराएल नै कहियो 

कहैत अछि उत्पल भाव लऽ कऽ ओ प्रेम संग  प्रेम करू वा नै करू, ई नुकाएल नै कहियो सरल वार्णिक बहर वर्ण -१७ २ अनिल मल्लिक गजल १ हे राम पुछैत छी अहाँ सँ कहू किए दोष हमरा पर लादल गेल जमीन मे समयलौं हम अपने की जीवीतेमे हमरा गाडल गेल अहील्या सुखी छलौं पाथर बनी कS ने बेदना ने कोनो संबेदना छल उद्धार केलौं किए की अपमान सही कहाँ ओहि दुष्ट के मारल भेल 

हे श्याम सुन्दर हे मुरलीधर कहू प्रीत मे हमर कोन खोट छलै बिरह अग्नी मे जरैत रहलौं हम किए प्रीत चिता मे जारल गेल

हे कृष्ण कहैत छलौं सखी हमरा बहीनक हमरा सम्मान भेटल नोर बनी बहल दर्द हमर जखन पाँच पती सँ बिआहल गेल

हे बालकृष्ण अहि यशोदा के मातृत्वक बदला अहाँ किए अश्रु देलौं  गोकुल छोडि मथुरा गेलौं कहियो हाल पुछब से कहाँ आयल भेल

नारी पर अत्याचारक क्रम सुरुआत तहिए सँ भेल स्वीकार करु नाक जे काटल सु्र्पणखा के कहू कोन न्याय सीद्धान्तक पालन भेल

इतिहास के अपन ईक्षा सँ सभ अपने तरह सँ लिखैत रहल निधोक घुमैत अछि अन्यायी कहाँ समाज मे एहन के बारल गेल २ गजल चार पर सँ खसैत पानि ओरिआनी मे सँ बहैत रहै  ओहि मे जे बच्चा सभहक कागजक नाओ चलैत रहै 

माँ खिसिआए कनि जलखै खा ले केओ कहाँ सुनैत छलै गडै गैंची आ कबै माछ लेल पैनी मे बँसी पथैत रहै 

समय नेनपन के एक्को बेर ओह घुमि फेरो अबितै सँगी बिनु ने दिन कटै बिन बातो केखनो लडैत रहै 

आम तोडै सभ नजरि बचा कखनो मकै के बालि तोडै पकडि लै त' कान पकडि क' बाबु के आगाँ लबैत रहै

जिनगी के खाता बही मे यादि के हिसाब लिखैत सभ छै  तहिआ ने छलै कोनो चिन्ता निफिकिर सभ घुमैत रहै 

बितल बरख दशमी मे गेल छलौं हम गाम अपन  पोखरि पर ई बात चलल सपना सन लगैत रहै

(सरल वर्ण २१) ३ अविनाश झा अंशु गजल मूँह जाबि देलक आब हरियरी देतै ई तानाशाही हमरासँ नै सहल जेतै बेसी तंग केलक आब करब विरोध,  हमर धक्कामे पत्ता जेना उड़िया जेतै  

बदला लेब एहन जे राखत ओ मोन दोबारा निकट एबाक हिम्मत नै हेतै

बेर-बेर पश्चाताप करत नोर बहा-बहा आब तहियो ओकरा पर दया नै हेतै  

घुमत नव जोगाड़ मे इम्हर –उम्हर आब कोनो मूँह जाबि लगाबऽ नै देतै

(बिना रदीफक गजल वर्ण -१५) ४ किशन कारीगर पंडा आ दलाल               (हास्य कविता)

एकटा गप साफे बुझहू त ई दुनू ममिऔते पिसिऔते छि एकटा अछि जं पंडा त दोसर अछि दलाल.

साहित्यों आब एकरा दुनू सँ अछूत नहि रहि गेल पंडा बैसल अछि पटना में त दिल्ली में बैसल अछि दलाल.

सभटा साहितिय्क आयोजन में रहबे करत एककर सझिया-साझ हँ ओ में छि नहियों में छि सभटा लकरपेंच लगाबै तिकडमबाज.

की दरभंगा आ की कलकत्ता? सभ ठाम बैसल अछि तिकडमबाज अपना-अपना ओझरी में ओझरौत आ सुढ़िये नहि देत कोनो काज.

पहिने ई काज हमही शुरू केलौहं बड़-बड़ बाजै भाषाई पंडा धू जी एककर श्रेय त हमरा ताहि दुआरे अपस्यांत भेल दलाल.

खेमेबाजी आ गुटबाजी केलक सत्य बजनिहार के धमकी देलक अपना स्वार्थ दुआरे ई सभ भाषा साहित्यक सर्वनाश करेलक.

अपने मने बड्ड नीक लगइए मुदा आई "कारीगर" किछु बाजत कहू औ पंडा आ दलाल एहेन साहित्य समाज लेल कोन काजक?

साहित्य समाज जाए भांड में एकटा दुनू के कोन काज साहित्यक ठेकेदारी शुरू केलक ई दुनूटा भ गेल मालामाल. ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। विदेह नूतन अंक मिथिला कला संगीत १. ज्योति झा चौधरी १. राजनाथ मिश्र चित्रमय मिथिला स्लाइड शो चित्रमय मिथिला (https://sites.google.com/a/videha.com/videha-paintings-photos/ ) २. उमेश मण्डल मिथिलाक वनस्पति स्लाइड शो मिथिलाक जीव-जन्तु स्लाइड शो मिथिलाक जिनगी स्लाइड शो मिथिलाक वनस्पति/ मिथिलाक जीव जन्तु/ मिथिलाक जिनगी  (https://sites.google.com/a/videha.com/videha-paintings-photos/ ) ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। विदेह नूतन अंक गद्य-पद्य भारती १. मोहनदास (दीर्घकथा):लेखक: उदय प्रकाश (मूल हिन्दीसँ मैथिलीमे अनुवाद विनीत उत्पल) मोहनदास (मैथिली-देवनागरी) मोहनदास (मैथिली-मिथिलाक्षर) मोहनदास (मैथिली-ब्रेल) २.छिन्नमस्ता- प्रभा खेतानक हिन्दी उपन्यासक सुशीला झा द्वारा मैथिली अनुवाद छिन्नमस्ता ३.कनकमणि दीक्षित (मूल नेपालीसँ मैथिली अनुवाद श्रीमती रूपा धीरू आ श्री धीरेन्द्र प्रेमर्षि) भगता बेङक देश-भ्रमण मन्त्रद्रष्टा ऋष्यश्रृङ्ग- हरिशंकर श्रीवास्तव “शलभ"- (हिन्दीसँ मैथिली अनुवाद विनीत उत्पल) मन्त्रद्रष्टा ऋष्यश्रृङ्ग पहिलुक परिच्छेद अंग महिमा प्राचीन अंगक निर्माणकेँ लऽ कऽ कतेक रास कथा प्रचलित अछि। वाल्मीकि रामायणक मुताबिक, जतए शोभाशाली कामदेव अप्पन अंग छोड़ने छल, ओ अंग देशक नामसँ विख्यात भेल। अयोध्यासँ सिद्धाश्रम जाए कऽ बाटमे राम-लक्ष्मणक संग विश्वामित्र एक राति गंगा आ सरयूक कातमे बितौने छल। ओतए शुद्ध अंत:करणबला महर्षि सबहक पवित्र आश्रमक परिचय दैत विश्वामित्र बाजल छल जे कहियो एतए भगवान शिव चित्तकेँ एकाग्र कऽ तपस्या करैत छल। ओइ काल कामदेव मूर्तिमान छल। ओ अप्पन देह धारण कऽ विचरण करैत छल। एक दिन भगवान शिव समाधिसँ उठि कऽ मरुद्गणक संग कत्तौ जा रहल छल। ओइ काल ओ दुर्बुद्धि हुनकापर आक्रमण कऽ देलक। भगवान शिव हुंकार कऽ हुनका रोकलक आ अवहेलनापूर्वक ओकरा दिस ताकलक। फेर तँ कामदेवक सभटा अंग हुनकर देहसँ जीर्ण-शीर्ण हुअए लागल। कठिन तापसँ दग्ध भेल कामदेव ओतएसँ भागि गेल। जइ ठाम पर कन्दर्पक देह पूरा तरहे नष्ट भेल, वएह प्रदेश अंग देशक नामसँ विख्यात भेल। 1 अंग देशक नामकरण ओतुक्का एकटा राजा अंगक नामपर भेल छल। आनव राज्य, जकर धूरी अंग छल, पाँच टा राज्यमे विभक्त छल, जकर नामकरण राजा बलिक पाँचटा पुत्रक नामपर भेल छल। आनवक अधिकारमे संपूर्ण पूर्वी बिहार, बंगाल आ उड़ीसा छल, जइमे अंग, बंग, पुण्ड्र, सुहा आ कलिंङ्क राज्य छल। अइ मे अंग एकटा बड़ शक्तिशाली जनपद छल। वाल्मीकि रामायणक मुताबिक सुग्रीव सीताकेँ ताकै लेल अप्पन वानर सैनिककेँ पूरबक देशमे भेजने छल, जइमे अंग सेहो एकटा छल।2 तइ कालमे अंगक विस्तार असीम छल। किएकि बलि पुत्र अंगक बाकी चारि भायक राज्यक सत्ताक केंद्र अंग राज्य छल। ई तथ्य सेहो विचारणीय अछि जे महाभारतक (शांतिपर्व, 296) मुताबिक, आदिकालमे चारि टा गोत्र छल, भृगु, अंगिरा, वशिष्ट आ कश्यप। ऋग्वेदक दोसर, तेसर, चारिम, छअम आ आठम मंडलमे जइ ऋषि सभकेँ मंत्र प्राप्त होइत अछि ओ अछि, गृत्समद, गौतम, भारद्वाज आ कण्व। आचार्य अश्वलायन अष्टम मंडलक वंशकेँ गोत्र द्योतक मानैत अछि, संग-संग अइ मंडलक ऋषिक प्रगाथा सेहो कहल जाइत अछि। हुनका अनुसार, अइ मंडलक पहिलुक सूक्तक ऋषि प्रगाथ छल जे स्वयं कण्व वंशी छल। अइ मंडलक एगारह वालखिल्य मिल कऽ कुल १०३ सूक्त कण्वक अछि। गौतम आ भारद्वाज अंगिरा वंशक मानल जाइत अछि आ कण्व सेहो अंगिरसेक अछि। अइ तरहेँ अइ पाँच मंडलमे अंगिरसक प्रधानता स्वयं सिद्ध अछि। अइ मंडलक ऋषि कुल अंगिरस, अंग द्वीपक ऋषि छल। स्वयं इंद्रक ऐरावत हाथी पदमर्दन कऽ देने छल, अइसँ तमसाएल दुर्वासा इंद्रकेँ शाप दऽ कऽ हुनका सत्ताच्युत कऽ देलखिन। इंद्र राजा बलिसँ सहायता मांगलक। राजा बलि इंद्रक संकेतपर देवलोकेपर अधिकार कऽ लेलक। बलि अंगद्वीपक राजा छल।4 ओ अप्पन पाँच शक्तिशाली पुत्रमे अंगक जनपद बाँटि हुनका सभकेँ ओइ ठामक राजा बना देलक। एकर बादो अंग असुर-सुर संस्कृतिक मुख्य केंद्र छल। ऋग्वेदसँ स्पष्ट ज्ञात होइत अछि जे अंगिरस आ हुनकरे वंशज यज्ञ कर्मक जनक छल। ओ अइ रहस्यक पहिलुक ज्ञाता छल जे यज्ञाग्नि काष्ठमे निहित छल। अइ तरहेँ अंगिरिस सभ अग्निक प्रयोगसँ सभसँ पहिलुक यज्ञोत्सवक नींव देने छल। प्राचीन भारतमे जे सोलह महाजनपदक चर्चा अछि, ओइमे अंग प्रमुख छल। शेष महाजनपद छल, मगध, काशी, कौशल, बज्जि, मल्ल, वत्स, चेदि, पांचाल, कुरु, मत्स्य, शूरसेन, अश्मक, अवन्ति, गान्धार आ कम्बोज। अंग आ मगधमे निरंतर संघर्ष चलैत रहैत छल। बुद्ध कालमे मगधक राजा बिम्बसार अंगकेँ जीत कऽ मगधमे मिला लेने छल। अंग वा अइ पूर्वी प्रदेशक लोग आ राजतंत्र ब्रााह्मण ग्रंथमे व्रात्य नामसँ जानल जाइत अछि। व्रात्यक शाब्दिक अर्थ अछि व्रतकऽ धारण करैबला मुदा एतए एकर प्रयोग बड़ गर्हित अर्थमे भेल अछि। एकर तात्पर्य अछि अनार्य, वैदिक कर्मकांड विरोधी आ वर्णसंकर। सावित्री आ उपनयनसँ भ्रष्ट द्विजातिकेँ मनुस्मृतिमे ब्राात्य कहल गेल अछि। द्विजात्य: सवर्णास्त जनयन्तवुतास्तयान। तान सावित्री परिभ्रष्टान व्रात्यानिति विनिर्दिशेत।। मनुस्मृति 10/20 महाभारतमे व्रात्यकेँ पातकी कहल गेल अछि। एकरा मुताबिक, व्रात्यकेँ आग लगाबैबला, विष दैबला, मदिरा बेचैबला, कुसीद भक्षण करैबला, मित्र द्रोही, भ्रूण हत्यारा, व्यभिचारी आ ब्रह्मघाती कहल गेल अछि।5 अइ तरहेँ व्रात्यकेँ ब्रााह्मण ग्रंथमे पतित कहल गेल अछि। वेदमे सेहो अइ ठामकेँ बड़ हेय दृष्टिसँ देखल गेल अछि। ऋग्वेदक प्रमगन्द शब्द अंग भंग आ मागध लेल प्रयुक्त भेल अछि। मागधकेँ वेदमे कीकट कहल गेल अछि। एहन लागैत छै जे संपूर्ण पूर्वी प्रदेश कोनो सांस्कृतिक अभिशापक आगिमे झुलसि रहल अछि आ वैदिक राजनीतिक शिकार बनि गेल अछि। अइ ठामक लोकक लेल चुनल-चुनल खराब शब्दक प्रयोग करैमे नै तँ वेद मंत्रकार पाछाँ रहल आ नहिये महामुनि व्यासे। ऋग्वेदमे एकटा ऋषि इंद्रसँ प्रार्थना करैत अछि, मगधक गाय कोन काजक अछि जकर दूध यज्ञमे अहाँक काज नै आबैत अछि। (यानि कीकटक गायक दूध सेहो अपवित्र अछि आ ओकरासँ यज्ञ कर्म करैक लेल वर्जना अछि) सोमरसक संग मिल कए ओ दूध यज्ञपात्रकेँ गर्म नै करैत छै। तइसँ हे इंद्र! ओइ नैचाशाख प्रमगन्दक (निचला शाखाक अंग बंग आ मागध) ओ धन हमरा दिअ।6 अथर्ववेद तँ एक डेग अओर आगू अछि। अथर्ववेदक एकटा ऋषि कहैत अछि, जेना मनुख आ उपभोगक अन्य सामान एक ठामसँ दोसर ठाम भेजल जाइत अछि, ओइ तरहेँ ज्वरकेँ गन्धार भूजवान, अंग, मगध प्रदेशमे भेजि देल जाइत अछि।7 आखिर वेद ब्रााह्मण ग्रंथकेँ अइ प्रदेशपर एतेक कोप किए अछि? आउ, विचार करी। ब्रााह्मण द्वारा विनिर्मित जइ यज्ञ-योगादि क्रियाक उदय सप्त सिंधुक घाटीमे भेल, बड़ जोर मारलाक बादो ई विधि-क्रिया भारतक अइ पूब क्षेत्रमे अप्पन जड़ नै जमा सकल आ ने ब्रााह्मणवाद आ ब्राह्मण विचारधारा अइ भागमे अप्पन सत्ता काएम कऽ सकल। किएकि व्रात्य आर्य भेलाक बादो वैदिक कर्मकाण्ड, पशु हिंसाबला यज्ञ आ बड़ खर्चबला विधि कर्मक विरोधी छल। ब्रााह्मण अपनो अइ धरतीपर बसै लेल नै चाहैत छल। एतुक्का निवासी स्वतंत्र विचारक, ज्ञानी आ तपस्वी छल। ओ अपन आचरण, व्यवसाय आ संस्कृतिपर ब्रााह्मणक छाया धरि सहन करै लेल तैयार नै छल। जे कोनो ब्रााह्मण तपस्वी तपस्याक लेल अइ क्षेत्रमे छल, सेहो कमलक तरहेँ जलसँ ऊपर छल। हुनका एतुक्का व्रात्यसँ कोनो संपर्क नै छल। स्वयं ऋष्यश्रृंङ्ग लऽ कऽ रामायणकार वाल्मीकि कहैत अछि- सदिखन पिताक संग रहैसँ विप्रवर ऋष्यश्रृंङ कोनो दोसराकेँ नै जानैत छल।"8 अइसँ स्पष्ट अछि जे ब्राह्मण ऋषि जन-सामान्यक संपर्कसँ अपनाकेँ अलग राखैत अछि। कौशिकी महिमा, पुण्याश्रम विश्वामित्र सेहो तपस्याक लेल अइ पूर्वी इलाकाकेँ चुनने छल। कोशीक कातपर ओ बड़ कठिन तपस्या केने छल जइसँ सृष्टिक मूलचक्रे हिल गेल छल। एहन भूभागमे कतेक तत्वज्ञानी क्षत्रिय-ब्रााह्मण केर चलाएल गेल विधि क्रियाकेँ त्यागब प्रतिष्ठित करैपर जोर देलक। अइ भागक पिछड़ल आ गरीब जनताक लेल ई नब आ क्रांतिकारी मार्ग-पद्धति अनुकूल सिद्ध भेल।9 चारू दिस नदीसँ आच्छादित अंगक ई उत्तरबरिया हिस्सा, घना जंगलसँ परिपूर्ण छल। एकर रमणीयता सेहो अद्वितीय छल। तइसँ महर्षि कश्यपक पुत्र विभाण्डक नामक ऋषि अप्पन तपश्चर्याक लेल अइ भूभागकेँ नीक बुझने छल। ब्रााह्मण ग्रंथक मुताबिक, राजा बलि अंगक शासक छल। हुनका कोनो संतान नै छल। हुनकर स्त्री सुदेक्षणा दीर्घतमा नामक ऋषिसँ पाँचटा पुत्रकेँ जन्म देलक। ई ऋषि आन्हर छल। 10 महाभारतक मुताबिक, ई ऋषि सभ लोकक सोझाँमे स्त्री संभोग करैत छल। 11 हुनकर पिता छल उत्तथ, जिनकर स्त्रीकेँ वरुण भगा कऽ लऽ गेल आ हुनका संग संभोग करलक। बादमे वरुणकेँ दंडित कऽ उत्तथ अप्पन स्त्रीकेँ वापस आनि सुखपूर्वक रहए लागल।12 गर्हित पौराणिक मिथकीय कथा जाल आ ओकर टीकाकार, भाष्यकार, रचनाकारसँ बचैत ई कहएमे कोनो संकोच नै अछि जे पूरा अंगक वासी आ राजतंत्र आर्य आ अनार्य संस्कृतिक संगमपर फल-फूलि रहल छल। विभिन्न जाति, विचार आ संस्कृतिसँ समन्वित ई इलाका प्राचीन षोडश महाजनपदमे प्रमुख छल।13 वैदिक ग्रंथमे जलाशय, जल आ धारक प्रशस्ति अछि। ऋग्वेदमे तँ कतेको ऋचामे ई अछि। जलक पवित्रता प्राकवैदिक अछि यानी आर्यकेँ आबएसँ पहिनेसँ अछि। एकर जीवात्मा आ उर्वरतासँ गहींर संबंध अछि। तइसँ महर्षि कश्यपक तेजस्वी पुत्र विभाण्डक ऋषि अप्पन तपश्चर्याक लेल अइ कोशिकाच्छादित भूभागकेँ सभसँ उपयुक्त बुझलक। तीर्थ तपस्याक लेल नै होइत अछि। तीर्थक प्रथा तँ अनार्य स्रोतसँ ग्रहीत भेल अछि। हिन्दूक सभटा तीर्थ आर्यक मूल स्थानसँ बाहरक अछि। आर्यक आगमनसँ पहिने एतुक्का धर्ममे तीर्थ छल। आर्यक सम्मिलन स्थल यज्ञ छल आ अनार्यक तीर्थ। ई तीर्थ शब्द सेहो वेदवाह्य अछि किएकि वेद विरोधी मतकेँ तैर्थिक मत कहल जाइत अछि। तइसँ तपस्याक लेल तीर्थ नै, अरण्य आ पवित्र धारक कात सभसँ उपयुक्त अछि। तइसँ व्रात्यक भूमि भेलाक बादो महर्षि विभाण्डक उत्तरबरिया अंगक सघन अरण्य क्षेत्रमे कौशिकीक धारक कातमे अप्पन आश्रम बनेने छल। कोशी एकटा पौराणिक धार अछि। एकर कातमे साक्षात भगवान शंकर बसै छै। इंद्र, विष्णु आ ब्रह्मा केँ भगवान शिवसँ भेंट करहि कऽ पूर्व, निर्दिष्ट आ निर्धारित ठाम ई कोशीक मनोरम तीर अछि।14 अप्पन बहिन कौशिकीक संबंधमे स्वयं विश्वामित्र कहैत अछि, दिव्य पुण्योदकारम्या हिमवन्तमुपाश्रिता। लोकस्य हित कार्यार्थो प्रवृत्ता भगिनी मम।।15 अप्पन बहिनक प्रति स्नेहक कारण अइ काजमे विश्वामित्र निअमसँ बड़ सुखसँ निवास करैत छल। ओ यज्ञसँ जुड़ल अप्पन निअमक सिद्धिक लेल अप्पन बहिन कौशिकीक सानिध्यकेँ छोड़ि सिद्धाश्रम आएल छल। अइ कौशिकीक कात विश्वामित्र सहस्र बरख धरि घनघोर आ अतिशय कठोर तपस्या केने छल जइसँ सभटा सृष्टि चक्र हिल गेल छल। कौशिकी तीर मसाध तपस्तेपे सुदारुणम तस्य वर्ष सहस्त्रणि घोरं तप उपासते। रामायण 1-34-25 वाल्मीकि रामायणमे कतेको बेर कौशिकी सरितां वरा (सभ धारमे श्रेष्ठ कौशिकी) बालकाण्ड श्लोक 11, कौशिकी सरितां श्रेष्ठा कुलो द्योतकारी इव (धारमे श्रेष्ठ कौशिकी सेहो अप्पन कुलक कीर्ति केँ प्रकाशित करैवाली छथिन। श्लोक 21) जेहन उक्ति आएल अछि, जइसँ पुण्य सलिला कोशीक महिमा रेखांकित होइत अछि। तइसँ कश्यप पुत्र महर्षि विभाण्डकक तपस्या लेल कोशीक कात सभसँ उपयुक्त छल, जतए विश्वामित्र कठोर तपस्या कऽ कतेक रास सिद्धि प्राप्त केने छल। धारक कात सुदूर धरि फैलल पैघ पाथरक अद्भुत श्रृंखला सेहो विद्यमान छल, जे कोशीक तीव्र धारकेँ नियंत्रित करैत छल। लगभग साढ़े सात हजार बरखक भौगोलिक परिवर्तनक परिणामस्वरूप ओ पाथरक (चट्टान) श्रृंखला जमीनक भीतर गहींरमे चलि गेल आ ओकर ऊपर माटिक मोटका परत जमैत गेल।16 वेगवती नदी, विशाल चट्टान, रमणीय प्रकृति, समिधा बाहुल्य, आैषधियुक्त वनस्पतिसँ आच्छादित अरण्य आ कुलांच भरैत मृगादि वन्य पशु, एहन शांत स्थानमे छल विभाण्डक ऋषिक आश्रम, कोशीक धारक कज्जल वनमे। कोशी आ ओकर छाड़न धारक कातपर अप्पन सघनताक लेल प्रसिद्ध कज्जल वन स्थित पुण्याश्रम पूरे आर्यावर्तमे प्रसिद्ध छल। ई क्षेत्र असुरक प्रभावसँ सेहो मुक्त छल। तइसँ एतए कऽ ऋषि आश्रम निरापद छल। एतए निर्विध्न वेद पाठ चलैत छल आ आश्रमवासीक समए समिधा संचय, अग्निहोत्र आ कृषि काजमे व्यतीत होइत छल। ई आश्रम ऋषि आ  कृषि परंपराक अद्भुत संगम स्थल छल। भूमि बड़ उर्वरा छल। महर्षि विश्वामित्र अप्पन कालक महान कृषि वैज्ञानिक सेहो छल। हुनकर तपस्या आ प्रयोग स्थल कोशीक मनोहर तट सेहो छल। पूरा इलाका वन्य पशुक अभ्यारण्य छल। विश्वामित्र केर अप्पन कठोर तपस्यासँ ऊर्जावान बनाएल इलाका मुनि विभाण्डक लेल सर्वथा उपयुक्त छल। अप्पन वंश परंपराक अनुरूप ओ सेहो विपुल प्रतिभाक पुंज छल। महर्षि व्यास हुनकर वंश परिचय एना देने अछि:- मरीचि: मनसस्य जज्ञे तस्यापि कश्यप:। मश्यपात्कारश्यप: जात: तस्यसुतो विभाण्डक: ऋष्यश्रृङ तस्य पुत्रोस्ति।।17 ब्रह्माक मानस पुत्र मरीचक पौत्र विभाण्डक छल। उच्च वंशोद्भव ई ऋषि वेद विहित संस्कारसँ संपन्न छल। कोशीक कातक ई कज्जल वन हुनकर साधना तपस्याक लेल पूर्ण उपयुक्त आ निरापद छल। अति प्राचीन कालमे (महाभारत, पुराण, वराहमिहिर आ भास्काराचार्यक मतानुसार) भारत नौ खंडमे विभक्त छल। ई खण्ड छल, इंद्र, कसेरुमत, ताम्रवर्ण, गभस्तिमत, कुमारिक, नाग, सौम्य, वरुण आ गान्धर्व। पौराणित साक्ष्य आ एकर पहचानक जे संकेत भेटल अछि, ओकर मुताबिक पूर्वी भारतक ई क्षेत्र इंद्रखण्ड छल। अइ क्षेत्रपर इंद्रक विशेष कृपा छल। तइसँ ई सदिखन हरिअर फल-फूल आ धान्यसँ संपन्न क्षेत्र छल। धार सदानीरा छल। ऋग्वेदमे अंगक उल्लेख नै अछि। तइसँ एहन लागैत अछि जे उत्तर वैदिक कालमे अंग जनपदक उदय भेल अछि। ऋग्वेदमे कीकट शब्दक प्रयोग भेल अछि जेकरा मगध आ अंग क्षेत्रक लोक लेल प्रयोगमे आनल गेल हएत। मुदा कतेक रास आचार्य एकरा सप्त सिन्धुक पर्वतीय भाग लेल सेहो प्रयुक्त करैत अछि।18 जे भी भेल हुअए, रामायण युगक आर्य सभ्यता केर अइ क्षेत्रमे उदय भऽ चुकल छल। मुदा राक्षसी सभ्यता अओर आर्येतर वानरी सभ्यता एतए अप्पन जमीन नै बना सकल छल। अइ क्षेत्रमे स्थापित ऋषि आश्रम अध्ययन, अनुसंधान आ यज्ञादि क्रियाक संपादन लेल उपयुक्त छल। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। बालानां कृते १.जगदीश प्रसाद मण्डल- बाल वि‍हनि‍ कथा- घटक काका २.शिव कुमार यादव- बाल कविता ३.जगदानन्द झा मनु- करुण हृदयक मालिक महाराज रणजीत सिंह १ जगदीश प्रसाद मण्डल बाल वि‍हनि‍ कथा- घटक काका एहेन अगि‍आएल क्रोध घटक बाबाकेँ जि‍नगीमे पहि‍ल दि‍न छलनि‍, जेहेन आइ भोरे उठलनि‍। एक तँ ओहुना देह घटने थोड़-थाड़ क्रोध सदि‍खन रहबे करै छन्‍हि‍ मुदा घटबी जि‍नगीमे घटती काज भेने जहि‍ना होइ छै तहि‍ना भेलनि‍। ओना देहक घटबी अनका जकाँ नै छलनि‍, कि‍एक तँ सभ दि‍न रहने केकरो फेहम बनल रहै छै, सभ कि‍छु दुरुस्‍त रहै छै, मुदा तइसँ भि‍न्न घटक बाबाकेँ भेलनि‍। जेना केरा गाछक वा अनरनेबा गाछक पानि‍ सुखने खलपैट जाइए तहि‍ना भेने घरक पहि‍लुका सभ कपड़ो-लत्ता आ जुतो-चप्‍पल भऽ गेलनि‍। दहेजुआ देल कुरतो-गंजी आ जुत्तो-पप्‍पल ढील-ढीलाह बनि‍ गेलनि‍। एकर माने ई नै जे कुरतो-गंजी आ जुतो-चप्‍पल बढ़ि‍ कऽ ताड़ भऽ गेलनि‍ तँए ढील-ढीलाह भऽ गेलनि‍। अपने सुखि‍ कऽ पलास भऽ गेल छथि‍। ओना घरमे तते-रास कपड़ो-जुत्तो-चप्‍पल छन्‍हि‍ जे अपन जीता-जि‍नगीकेँ के कहए जे मुइलोपर दान-पुन करैत उगड़ि‍ये जेतनि‍। मुदा कुछप भेने ओहो सभ कुछपि‍ये जेतनि‍ जइसँ कोनो सोगात नै लगतनि‍। जँ अपनो पहीरता तँ लेबरे जकाँ लगता आ दानो-पुन करता तैयो सएह हेतन। खैर जे होउ, मुदा औझुका अगि‍आएल क्रोध बि‍नु हवोक ने पजरि‍ जाए तेहने लहलही छन्‍हि‍‍। कनभेंटक सातम श्रेणीक पोती सरस्‍वती जि‍ज्ञासु बनि‍ पुछलकनि‍- “बाबा, पढ़ल-लि‍खल लड़काक संग बि‍नु पढ़ल-लि‍खल लड़कीक बि‍आह कते करौलि‍ऐ आ बि‍नु पढ़ल-लि‍खल लड़काकेँ पढ़ल-लि‍खल लड़कीक संग कते करौने हेबइ?” पोतीक पुछल प्रश्नक उत्तर बाबा नकारि‍ केना सकै छथि‍। कवि‍ताक तुकवन्‍दी जकाँ कुछप कि‍अए ने होउ, मुदा लय तँ भरबे करत। छ-अनि‍याँ मुस्‍की दैत घटक बाबा कहलखि‍न- “कोनो की डायरी लि‍खि‍ कऽ रखने छी, अनगि‍नती बूझह।” बाल मन सरस्‍वतीक अनगि‍नतीमे ओझरा गेल। मुदा जहि‍ना भूखक तृष्‍णाकेँ पानि‍योसँ कि‍छु समए वि‍लमाओल जा सकैए, मुदा तृष्‍णो तँ तृष्‍णा छि‍ऐ। ठोस जहि‍ना पानि‍मे नै भसि‍आइत, पानि‍ हवामे नै उड़ैत तहि‍ना सरस्‍वतीक तृष्‍णा नै उड़ल। पुन: दोहरा कऽ बाजल- “बाबा, बि‍आह कि‍अए होइ छै?” पाँच कि‍लो मोटरीकेँ तँ टारि‍ देलि‍ऐ, मनहीकेँ केना टारबै। जहि‍ना पएर पड़ि‍ते साँप फन-फना उठैए तहि‍ना घटक बाबाकेँ फनफनी उठलनि‍। एक तँ ओहुना घटबी देह थरथराइते रहै छन्‍हि‍ तइपर आरो धऽ लेलकनि‍। मुदा जहि‍ना गनगुआरि‍ देख नागक फनकी टूटि‍ जाइत तहि‍ना दस बर्खक पोतीकेँ सोझमे ठाढ़ भेने घटक काकाकेँ भेलनि‍। २ शिव कुमार यादव बाल कविता बौआ हमरा आब जुनि तंग कर तोरा सँ आब हम हारि मानै छी भोरे सँ तोँ खूब अपस्याँत कऽ देलैँ इस्कुल जो आब हम एतबा जानै छी

कानए जुनि देखहीं बौआ बुच्ची इस्कुल छै भोरे सँ तोरा हम फुसलाबै छी

नीक सँ जो, केकरो सँ नै लड़िहैँ  रुक तोहर अंगा आ पेंट सरिआबै छी

खूब जतन सँ पढ़िहैँ अप्पन दैया संग तोरे सभसँ हम सपना सजाबै छी

गाम-समाज आ देशक नाम ऊँच करिहैँ "शिकुया" तोरे सँ हम आस लगाबै छी ३ जगदानन्द झा 'मनु' ग्राम पोस्ट - हरिपुर डीहटोल, मधुबनी करुण हृदयक मालिक महाराज रणजीत सिंह पंजाब प्रान्तक राजा महाराजामे सँ महाराज रणजीत सिंहक नाम हुनक न्यायप्रियता एवं सुशासनक लेल पसिद्ध छनि| एक समयक गप अछि, महाराज रणजीत सिंहजी अपन प्रजाक सुख दुख देखै लेल घोड़ापर सबार अपन सिपाही संगे राज भ्रमणपर निकलल रहथि | महाराज सेना सहित रस्तापर आगू  बढ़ैत रहथि की कतौसँ एकटा पाथर उड़ि कs आबि महाराजकेँ बिच्चे माथपर लगलनि| पाथर लगिते हुनकर माथसँ सोनितक टघार बहए लगलनि| महाराज अपन एक हाथसँ घोड़ाक लगाम पकड़ने, दोसर हाथे चट कपारकेँ दाबि लेलनि | सिपाही सभ पाथरक दिसामे  दौड़ल| किछु घड़ी बाद ओ सभ एकटा नअ-दस बरखक फाटल चेथड़ी पहिरने, गरीब नेनाकेँ लेने आएल| महाराजकेँ पुछला उत्तर एकटा सिपाही बाजल जे ई नेना पाथर मारि-मारि कए आम तोड़ै छल, ओहे पाथर आबि कs महाराजक माथपर लागल | महाराज रणजीत सिंह ओइ डरैत नेनाकेँ अपना लग बजा, स्नेहसँ ओकर माथपर हाथ फेरैत एगो सिपाहीकेँ आज्ञा देलनि - "पाँच पथिया आम, दू जोड़ी नव कपड़ा आ सएटा असरफी लए कs ऐ नेनाकेँ आदर सहित एकर घर छोड़ि आएल जाए| महाराजक आज्ञाक तुरंत पालन भेल | मुदा महाराजक निर्णयकेँ नै बुझि सेनापति, सहास कए कs ऐ तरहक फैसलाक कारण पुछिए लेलक| सेनापतिक प्रश्नक उत्तर दैत महाराज बजलाह -"जखन एक गोट निरीह गाछ पाथर मारला उत्तर फल दs रहल छै तखन हम तँ ऐ प्रान्तक राजा छी| हमर प्रजा हमर पुत्र तुल्य अछि, एहन ठाम हम कोना फल देबऽसँ वंचित रहि जाइ | गाछ अपन सामर्थे फल दै छै, हम अपन सामर्थे, ऐमे अजगुतक कोन गप| एहन उदार, न्यायप्रिय, वात्सल्य आ करुण ह्रदयक मालिक छलाह महाराज रणजीत सिंह | ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। बच्चा लोकनि द्वारा स्मरणीय श्लोक १.प्रातः काल ब्रह्ममुहूर्त्त (सूर्योदयक एक घंटा पहिने) सर्वप्रथम अपन दुनू हाथ देखबाक चाही, आ’ ई श्लोक बजबाक चाही। कराग्रे वसते लक्ष्मीः करमध्ये सरस्वती। करमूले स्थितो ब्रह्मा प्रभाते करदर्शनम्॥ करक आगाँ लक्ष्मी बसैत छथि, करक मध्यमे सरस्वती, करक मूलमे ब्रह्मा स्थित छथि। भोरमे ताहि द्वारे करक दर्शन करबाक थीक। २.संध्या काल दीप लेसबाक काल- दीपमूले स्थितो ब्रह्मा दीपमध्ये जनार्दनः। दीपाग्रे शङ्करः प्रोक्त्तः सन्ध्याज्योतिर्नमोऽस्तुते॥ दीपक मूल भागमे ब्रह्मा, दीपक मध्यभागमे जनार्दन (विष्णु) आऽ दीपक अग्र भागमे शङ्कर स्थित छथि। हे संध्याज्योति! अहाँकेँ नमस्कार। ३.सुतबाक काल- रामं स्कन्दं हनूमन्तं वैनतेयं वृकोदरम्। शयने यः स्मरेन्नित्यं दुःस्वप्नस्तस्य नश्यति॥ जे सभ दिन सुतबासँ पहिने राम, कुमारस्वामी, हनूमान्, गरुड़ आऽ भीमक स्मरण करैत छथि, हुनकर दुःस्वप्न नष्ट भऽ जाइत छन्हि। ४. नहेबाक समय- गङ्गे च यमुने चैव गोदावरि सरस्वति। नर्मदे सिन्धु कावेरि जलेऽस्मिन् सन्निधिं कुरू॥ हे गंगा, यमुना, गोदावरी, सरस्वती, नर्मदा, सिन्धु आऽ कावेरी  धार। एहि जलमे अपन सान्निध्य दिअ। ५.उत्तरं यत्समुद्रस्य हिमाद्रेश्चैव दक्षिणम्। वर्षं तत् भारतं नाम भारती यत्र सन्ततिः॥ समुद्रक उत्तरमे आऽ हिमालयक दक्षिणमे भारत अछि आऽ ओतुका सन्तति भारती कहबैत छथि। ६.अहल्या द्रौपदी सीता तारा मण्डोदरी तथा। पञ्चकं ना स्मरेन्नित्यं महापातकनाशकम्॥ जे सभ दिन अहल्या, द्रौपदी, सीता, तारा आऽ मण्दोदरी, एहि पाँच साध्वी-स्त्रीक स्मरण करैत छथि, हुनकर सभ पाप नष्ट भऽ जाइत छन्हि। ७.अश्वत्थामा बलिर्व्यासो हनूमांश्च विभीषणः। कृपः परशुरामश्च सप्तैते चिरञ्जीविनः॥ अश्वत्थामा, बलि, व्यास, हनूमान्, विभीषण, कृपाचार्य आऽ परशुराम- ई सात टा चिरञ्जीवी कहबैत छथि। ८.साते भवतु सुप्रीता देवी शिखर वासिनी उग्रेन तपसा लब्धो यया पशुपतिः पतिः। सिद्धिः साध्ये सतामस्तु प्रसादान्तस्य धूर्जटेः जाह्नवीफेनलेखेव यन्यूधि शशिनः कला॥ ९. बालोऽहं जगदानन्द न मे बाला सरस्वती। अपूर्णे पंचमे वर्षे वर्णयामि जगत्त्रयम् ॥ १०. दूर्वाक्षत मंत्र(शुक्ल यजुर्वेद अध्याय २२, मंत्र २२) आ ब्रह्मन्नित्यस्य प्रजापतिर्ॠषिः। लिंभोक्त्ता देवताः। स्वराडुत्कृतिश्छन्दः। षड्जः स्वरः॥ आ ब्रह्म॑न् ब्राह्म॒णो ब्र॑ह्मवर्च॒सी जा॑यता॒मा रा॒ष्ट्रे रा॑ज॒न्यः शुरे॑ऽइषव्यो॒ऽतिव्या॒धी म॑हार॒थो जा॑यतां॒ दोग्ध्रीं धे॒नुर्वोढा॑न॒ड्वाना॒शुः सप्तिः॒ पुर॑न्धि॒र्योवा॑ जि॒ष्णू र॑थे॒ष्ठाः स॒भेयो॒ युवास्य यज॑मानस्य वी॒रो जा॒यतां निका॒मे-नि॑कामे नः प॒र्जन्यों वर्षतु॒ फल॑वत्यो न॒ऽओष॑धयः पच्यन्तां योगेक्ष॒मो नः॑ कल्पताम्॥२२॥ मन्त्रार्थाः सिद्धयः सन्तु पूर्णाः सन्तु मनोरथाः। शत्रूणां बुद्धिनाशोऽस्तु मित्राणामुदयस्तव। ॐ दीर्घायुर्भव। ॐ सौभाग्यवती भव। हे भगवान्। अपन देशमे सुयोग्य आ’ सर्वज्ञ विद्यार्थी उत्पन्न होथि, आ’ शुत्रुकेँ नाश कएनिहार सैनिक उत्पन्न होथि। अपन देशक गाय खूब दूध दय बाली, बरद भार वहन करएमे सक्षम होथि आ’ घोड़ा त्वरित रूपेँ दौगय बला होए। स्त्रीगण नगरक नेतृत्व करबामे सक्षम होथि आ’ युवक सभामे ओजपूर्ण भाषण देबयबला आ’ नेतृत्व देबामे सक्षम होथि। अपन देशमे जखन आवश्यक होय वर्षा होए आ’ औषधिक-बूटी सर्वदा परिपक्व होइत रहए। एवं क्रमे सभ तरहेँ हमरा सभक कल्याण होए। शत्रुक बुद्धिक नाश होए आ’ मित्रक उदय होए॥ मनुष्यकें कोन वस्तुक इच्छा करबाक चाही तकर वर्णन एहि मंत्रमे कएल गेल अछि। एहिमे वाचकलुप्तोपमालड़्कार अछि। अन्वय- ब्रह्म॑न् - विद्या आदि गुणसँ परिपूर्ण ब्रह्म रा॒ष्ट्रे - देशमे ब्र॑ह्मवर्च॒सी-ब्रह्म विद्याक तेजसँ युक्त्त आ जा॑यतां॒- उत्पन्न होए रा॑ज॒न्यः-राजा शुरे॑ऽ–बिना डर बला इषव्यो॒- बाण चलेबामे निपुण ऽतिव्या॒धी-शत्रुकेँ तारण दय बला म॑हार॒थो-पैघ रथ बला वीर दोग्ध्रीं-कामना(दूध पूर्ण करए बाली) धे॒नुर्वोढा॑न॒ड्वाना॒शुः धे॒नु-गौ वा वाणी र्वोढा॑न॒ड्वा- पैघ बरद ना॒शुः-आशुः-त्वरित सप्तिः॒-घोड़ा पुर॑न्धि॒र्योवा॑- पुर॑न्धि॒- व्यवहारकेँ धारण करए बाली र्योवा॑-स्त्री जि॒ष्णू-शत्रुकेँ जीतए बला र॑थे॒ष्ठाः-रथ पर स्थिर स॒भेयो॒-उत्तम सभामे युवास्य-युवा जेहन यज॑मानस्य-राजाक राज्यमे वी॒रो-शत्रुकेँ पराजित करएबला निका॒मे-नि॑कामे-निश्चययुक्त्त कार्यमे नः-हमर सभक प॒र्जन्यों-मेघ वर्षतु॒-वर्षा होए फल॑वत्यो-उत्तम फल बला ओष॑धयः-औषधिः पच्यन्तां- पाकए योगेक्ष॒मो-अलभ्य लभ्य करेबाक हेतु कएल गेल योगक रक्षा नः॑-हमरा सभक हेतु कल्पताम्-समर्थ होए ग्रिफिथक अनुवाद- हे ब्रह्मण, हमर राज्यमे ब्राह्मण नीक धार्मिक विद्या बला, राजन्य-वीर,तीरंदाज, दूध दए बाली गाय, दौगय बला जन्तु, उद्यमी नारी होथि। पार्जन्य आवश्यकता पड़ला पर वर्षा देथि, फल देय बला गाछ पाकए, हम सभ संपत्ति अर्जित/संरक्षित करी। 8.VIDEHA FOR NON RESIDENTS 8.1 to 8.3 MAITHILI LITERATURE IN ENGLISH 8.1.1.The Comet   -GAJENDRA THAKUR translated by Jyoti Jha chaudhary 8.1.2.The_Science_of_Words- GAJENDRA THAKUR translated by the author himself 8.1.3.On_the_dice-board_of_the_millennium- GAJENDRA THAKUR translated by Jyoti Jha chaudhary 8.1.4.NAAGPHANS (IN ENGLISH)- SHEFALIKA VERMA translated by Dr. Rajiv Kumar Verma and Dr. Jaya Verma Send your comments to ggajendra@videha.com विदेह नूतन अंक भाषापाक रचना-लेखन Input: (कोष्ठकमे देवनागरी, मिथिलाक्षर किंवा फोनेटिक-रोमनमे टाइप करू। Input in Devanagari, Mithilakshara or Phonetic-Roman.) Output: (परिणाम देवनागरी, मिथिलाक्षर आ फोनेटिक-रोमन/ रोमनमे। Result in Devanagari, Mithilakshara and Phonetic-Roman/ Roman.) English to Maithili Maithili to English इंग्लिश-मैथिली-कोष / मैथिली-इंग्लिश-कोष  प्रोजेक्टकेँ आगू बढ़ाऊ, अपन सुझाव आ योगदान ई-मेल द्वारा ggajendra@videha.com पर पठाऊ। Top of Form विदेहक मैथिली-अंग्रेजी आ अंग्रेजी मैथिली कोष (इंटरनेटपर पहिल बेर सर्च-डिक्शनरी) एम.एस. एस.क्यू.एल. सर्वर आधारित -Based on ms-sql server Maithili-English and English-Maithili Dictionary. १.भारत आ नेपालक मैथिली भाषा-वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक शैली आ २.मैथिलीमे भाषा सम्पादन पाठ्यक्रम १.नेपाल आ भारतक मैथिली भाषा-वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक शैली

१.१. नेपालक मैथिली भाषा वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक  उच्चारण आ लेखन शैली (भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक धारणाकेँ पूर्ण रूपसँ सङ्ग लऽ निर्धारित) मैथिलीमे उच्चारण तथा लेखन १.पञ्चमाक्षर आ अनुस्वार: पञ्चमाक्षरान्तर्गत ङ, ञ, ण, न एवं म अबैत अछि। संस्कृत भाषाक अनुसार शब्दक अन्तमे जाहि वर्गक अक्षर रहैत अछि ओही वर्गक पञ्चमाक्षर अबैत अछि। जेना- अङ्क (क वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ङ् आएल अछि।) पञ्च (च वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ञ् आएल अछि।) खण्ड (ट वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ण् आएल अछि।) सन्धि (त वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे न् आएल अछि।) खम्भ (प वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे म् आएल अछि।) उपर्युक्त बात मैथिलीमे कम देखल जाइत अछि। पञ्चमाक्षरक बदलामे अधिकांश जगहपर अनुस्वारक प्रयोग देखल जाइछ। जेना- अंक, पंच, खंड, संधि, खंभ आदि। व्याकरणविद पण्डित गोविन्द झाक कहब छनि जे कवर्ग, चवर्ग आ टवर्गसँ पूर्व अनुस्वार लिखल जाए तथा तवर्ग आ पवर्गसँ पूर्व पञ्चमाक्षरे लिखल जाए। जेना- अंक, चंचल, अंडा, अन्त तथा कम्पन। मुदा हिन्दीक निकट रहल आधुनिक लेखक एहि बातकेँ नहि मानैत छथि। ओ लोकनि अन्त आ कम्पनक जगहपर सेहो अंत आ कंपन लिखैत देखल जाइत छथि। नवीन पद्धति किछु सुविधाजनक अवश्य छैक। किएक तँ एहिमे समय आ स्थानक बचत होइत छैक। मुदा कतोक बेर हस्तलेखन वा मुद्रणमे अनुस्वारक छोट सन बिन्दु स्पष्ट नहि भेलासँ अर्थक अनर्थ होइत सेहो देखल जाइत अछि। अनुस्वारक प्रयोगमे उच्चारण-दोषक सम्भावना सेहो ततबए देखल जाइत अछि। एतदर्थ कसँ लऽ कऽ पवर्ग धरि पञ्चमाक्षरेक प्रयोग करब उचित अछि। यसँ लऽ कऽ ज्ञ धरिक अक्षरक सङ्ग अनुस्वारक प्रयोग करबामे कतहु कोनो विवाद नहि देखल जाइछ। २.ढ आ ढ़ : ढ़क उच्चारण “र् ह”जकाँ होइत अछि। अतः जतऽ “र् ह”क उच्चारण हो ओतऽ मात्र ढ़ लिखल जाए। आन ठाम खाली ढ लिखल जएबाक चाही। जेना- ढ = ढाकी, ढेकी, ढीठ, ढेउआ, ढङ्ग, ढेरी, ढाकनि, ढाठ आदि। ढ़ = पढ़ाइ, बढ़ब, गढ़ब, मढ़ब, बुढ़बा, साँढ़, गाढ़, रीढ़, चाँढ़, सीढ़ी, पीढ़ी आदि। उपर्युक्त शब्द सभकेँ देखलासँ ई स्पष्ट होइत अछि जे साधारणतया शब्दक शुरूमे ढ आ मध्य तथा अन्तमे ढ़ अबैत अछि। इएह नियम ड आ ड़क सन्दर्भ सेहो लागू होइत अछि। ३.व आ ब : मैथिलीमे “व”क उच्चारण ब कएल जाइत अछि, मुदा ओकरा ब रूपमे नहि लिखल जएबाक चाही। जेना- उच्चारण : बैद्यनाथ, बिद्या, नब, देबता, बिष्णु, बंश, बन्दना आदि। एहि सभक स्थानपर क्रमशः वैद्यनाथ, विद्या, नव, देवता, विष्णु, वंश, वन्दना लिखबाक चाही। सामान्यतया व उच्चारणक लेल ओ प्रयोग कएल जाइत अछि। जेना- ओकील, ओजह आदि। ४.य आ ज : कतहु-कतहु “य”क उच्चारण “ज”जकाँ करैत देखल जाइत अछि, मुदा ओकरा ज नहि लिखबाक चाही। उच्चारणमे यज्ञ, जदि, जमुना, जुग, जाबत, जोगी, जदु, जम आदि कहल जाएबला शब्द सभकेँ क्रमशः यज्ञ, यदि, यमुना, युग, यावत, योगी, यदु, यम लिखबाक चाही। ५.ए आ य : मैथिलीक वर्तनीमे ए आ य दुनू लिखल जाइत अछि। प्राचीन वर्तनी- कएल, जाए, होएत, माए, भाए, गाए आदि। नवीन वर्तनी- कयल, जाय, होयत, माय, भाय, गाय आदि। सामान्यतया शब्दक शुरूमे ए मात्र अबैत अछि। जेना एहि, एना, एकर, एहन आदि। एहि शब्द सभक स्थानपर यहि, यना, यकर, यहन आदिक प्रयोग नहि करबाक चाही। यद्यपि मैथिलीभाषी थारू सहित किछु जातिमे शब्दक आरम्भोमे “ए”केँ य कहि उच्चारण कएल जाइत अछि। ए आ “य”क प्रयोगक सन्दर्भमे प्राचीने पद्धतिक अनुसरण करब उपयुक्त मानि एहि पुस्तकमे ओकरे प्रयोग कएल गेल अछि। किएक तँ दुनूक लेखनमे कोनो सहजता आ दुरूहताक बात नहि अछि। आ मैथिलीक सर्वसाधारणक उच्चारण-शैली यक अपेक्षा एसँ बेसी निकट छैक। खास कऽ कएल, हएब आदि कतिपय शब्दकेँ कैल, हैब आदि रूपमे कतहु-कतहु लिखल जाएब सेहो “ए”क प्रयोगकेँ बेसी समीचीन प्रमाणित करैत अछि। ६.हि, हु तथा एकार, ओकार : मैथिलीक प्राचीन लेखन-परम्परामे कोनो बातपर बल दैत काल शब्दक पाछाँ हि, हु लगाओल जाइत छैक। जेना- हुनकहि, अपनहु, ओकरहु, तत्कालहि, चोट्टहि, आनहु आदि। मुदा आधुनिक लेखनमे हिक स्थानपर एकार एवं हुक स्थानपर ओकारक प्रयोग करैत देखल जाइत अछि। जेना- हुनके, अपनो, तत्काले, चोट्टे, आनो आदि। ७.ष तथा ख : मैथिली भाषामे अधिकांशतः षक उच्चारण ख होइत अछि। जेना- षड्यन्त्र (खड़यन्त्र), षोडशी (खोड़शी), षट्कोण (खटकोण), वृषेश (वृखेश), सन्तोष (सन्तोख) आदि। ८.ध्वनि-लोप : निम्नलिखित अवस्थामे शब्दसँ ध्वनि-लोप भऽ जाइत अछि: (क) क्रियान्वयी प्रत्यय अयमे य वा ए लुप्त भऽ जाइत अछि। ओहिमे सँ पहिने अक उच्चारण दीर्घ भऽ जाइत अछि। ओकर आगाँ लोप-सूचक चिह्न वा विकारी (’ / ऽ) लगाओल जाइछ। जेना- पूर्ण रूप : पढ़ए (पढ़य) गेलाह, कए (कय) लेल, उठए (उठय) पड़तौक। अपूर्ण रूप : पढ़’ गेलाह, क’ लेल, उठ’ पड़तौक। पढ़ऽ गेलाह, कऽ लेल, उठऽ पड़तौक। (ख) पूर्वकालिक कृत आय (आए) प्रत्ययमे य (ए) लुप्त भऽ जाइछ, मुदा लोप-सूचक विकारी नहि लगाओल जाइछ। जेना- पूर्ण रूप : खाए (य) गेल, पठाय (ए) देब, नहाए (य) अएलाह। अपूर्ण रूप : खा गेल, पठा देब, नहा अएलाह। (ग) स्त्री प्रत्यय इक उच्चारण क्रियापद, संज्ञा, ओ विशेषण तीनूमे लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना- पूर्ण रूप : दोसरि मालिनि चलि गेलि। अपूर्ण रूप : दोसर मालिन चलि गेल। (घ) वर्तमान कृदन्तक अन्तिम त लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना- पूर्ण रूप : पढ़ैत अछि, बजैत अछि, गबैत अछि। अपूर्ण रूप : पढ़ै अछि, बजै अछि, गबै अछि। (ङ) क्रियापदक अवसान इक, उक, ऐक तथा हीकमे लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना- पूर्ण रूप: छियौक, छियैक, छहीक, छौक, छैक, अबितैक, होइक। अपूर्ण रूप : छियौ, छियै, छही, छौ, छै, अबितै, होइ। (च) क्रियापदीय प्रत्यय न्ह, हु तथा हकारक लोप भऽ जाइछ। जेना- पूर्ण रूप : छन्हि, कहलन्हि, कहलहुँ, गेलह, नहि। अपूर्ण रूप : छनि, कहलनि, कहलौँ, गेलऽ, नइ, नञि, नै। ९.ध्वनि स्थानान्तरण : कोनो-कोनो स्वर-ध्वनि अपना जगहसँ हटि कऽ दोसर ठाम चलि जाइत अछि। खास कऽ ह्रस्व इ आ उक सम्बन्धमे ई बात लागू होइत अछि। मैथिलीकरण भऽ गेल शब्दक मध्य वा अन्तमे जँ ह्रस्व इ वा उ आबए तँ ओकर ध्वनि स्थानान्तरित भऽ एक अक्षर आगाँ आबि जाइत अछि। जेना- शनि (शइन), पानि (पाइन), दालि ( दाइल), माटि (माइट), काछु (काउछ), मासु (माउस) आदि। मुदा तत्सम शब्द सभमे ई निअम लागू नहि होइत अछि। जेना- रश्मिकेँ रइश्म आ सुधांशुकेँ सुधाउंस नहि कहल जा सकैत अछि। १०.हलन्त(्)क प्रयोग : मैथिली भाषामे सामान्यतया हलन्त (्)क आवश्यकता नहि होइत अछि। कारण जे शब्दक अन्तमे अ उच्चारण नहि होइत अछि। मुदा संस्कृत भाषासँ जहिनाक तहिना मैथिलीमे आएल (तत्सम) शब्द सभमे हलन्त प्रयोग कएल जाइत अछि। एहि पोथीमे सामान्यतया सम्पूर्ण शब्दकेँ मैथिली भाषा सम्बन्धी निअम अनुसार हलन्तविहीन राखल गेल अछि। मुदा व्याकरण सम्बन्धी प्रयोजनक लेल अत्यावश्यक स्थानपर कतहु-कतहु हलन्त देल गेल अछि। प्रस्तुत पोथीमे मथिली लेखनक प्राचीन आ नवीन दुनू शैलीक सरल आ समीचीन पक्ष सभकेँ समेटि कऽ वर्ण-विन्यास कएल गेल अछि। स्थान आ समयमे बचतक सङ्गहि हस्त-लेखन तथा तकनीकी दृष्टिसँ सेहो सरल होबऽबला हिसाबसँ वर्ण-विन्यास मिलाओल गेल अछि। वर्तमान समयमे मैथिली मातृभाषी पर्यन्तकेँ आन भाषाक माध्यमसँ मैथिलीक ज्ञान लेबऽ पड़ि रहल परिप्रेक्ष्यमे लेखनमे सहजता तथा एकरूपतापर ध्यान देल गेल अछि। तखन मैथिली भाषाक मूल विशेषता सभ कुण्ठित नहि होइक, ताहू दिस लेखक-मण्डल सचेत अछि। प्रसिद्ध भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक कहब छनि जे सरलताक अनुसन्धानमे एहन अवस्था किन्नहु ने आबऽ देबाक चाही जे भाषाक विशेषता छाँहमे पडि जाए। -(भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक धारणाकेँ पूर्ण रूपसँ सङ्ग लऽ निर्धारित) १.२. मैथिली अकादमी, पटना द्वारा निर्धारित मैथिली लेखन-शैली

१. जे शब्द मैथिली-साहित्यक प्राचीन कालसँ आइ धरि जाहि वर्त्तनीमे प्रचलित अछि, से सामान्यतः ताहि वर्त्तनीमे लिखल जाय- उदाहरणार्थ-

ग्राह्य

एखन ठाम जकर, तकर तनिकर अछि

अग्राह्य अखन, अखनि, एखेन, अखनी ठिमा, ठिना, ठमा जेकर, तेकर तिनकर। (वैकल्पिक रूपेँ ग्राह्य) ऐछ, अहि, ए।

२. निम्नलिखित तीन प्रकारक रूप वैकल्पिकतया अपनाओल जाय: भऽ गेल, भय गेल वा भए गेल। जा रहल अछि, जाय रहल अछि, जाए रहल अछि। कर’ गेलाह, वा करय गेलाह वा करए गेलाह।

३. प्राचीन मैथिलीक ‘न्ह’ ध्वनिक स्थानमे ‘न’ लिखल जाय सकैत अछि यथा कहलनि वा कहलन्हि।

४. ‘ऐ’ तथा ‘औ’ ततय लिखल जाय जत’ स्पष्टतः ‘अइ’ तथा ‘अउ’ सदृश उच्चारण इष्ट हो। यथा- देखैत, छलैक, बौआ, छौक इत्यादि।

५. मैथिलीक निम्नलिखित शब्द एहि रूपे प्रयुक्त होयत: जैह, सैह, इएह, ओऐह, लैह तथा दैह।

६. ह्र्स्व इकारांत शब्दमे ‘इ’ के लुप्त करब सामान्यतः अग्राह्य थिक। यथा- ग्राह्य देखि आबह, मालिनि गेलि (मनुष्य मात्रमे)।

७. स्वतंत्र ह्रस्व ‘ए’ वा ‘य’ प्राचीन मैथिलीक उद्धरण आदिमे तँ यथावत राखल जाय, किंतु आधुनिक प्रयोगमे वैकल्पिक रूपेँ ‘ए’ वा ‘य’ लिखल जाय। यथा:- कयल वा कएल, अयलाह वा अएलाह, जाय वा जाए इत्यादि।

८. उच्चारणमे दू स्वरक बीच जे ‘य’ ध्वनि स्वतः आबि जाइत अछि तकरा लेखमे स्थान वैकल्पिक रूपेँ देल जाय। यथा- धीआ, अढ़ैआ, विआह, वा धीया, अढ़ैया, बियाह।

९. सानुनासिक स्वतंत्र स्वरक स्थान यथासंभव ‘ञ’ लिखल जाय वा सानुनासिक स्वर। यथा:- मैञा, कनिञा, किरतनिञा वा मैआँ, कनिआँ, किरतनिआँ।

१०. कारकक विभक्त्तिक निम्नलिखित रूप ग्राह्य:- हाथकेँ, हाथसँ, हाथेँ, हाथक, हाथमे। ’मे’ मे अनुस्वार सर्वथा त्याज्य थिक। ‘क’ क वैकल्पिक रूप ‘केर’ राखल जा सकैत अछि।

११. पूर्वकालिक क्रियापदक बाद ‘कय’ वा ‘कए’ अव्यय वैकल्पिक रूपेँ लगाओल जा सकैत अछि। यथा:- देखि कय वा देखि कए।

१२. माँग, भाँग आदिक स्थानमे माङ, भाङ इत्यादि लिखल जाय।

१३. अर्द्ध ‘न’ ओ अर्द्ध ‘म’ क बदला अनुसार नहि लिखल जाय, किंतु छापाक सुविधार्थ अर्द्ध ‘ङ’ , ‘ञ’, तथा ‘ण’ क बदला अनुस्वारो लिखल जा सकैत अछि। यथा:- अङ्क, वा अंक, अञ्चल वा अंचल, कण्ठ वा कंठ।

१४. हलंत चिह्न निअमतः लगाओल जाय, किंतु विभक्तिक संग अकारांत प्रयोग कएल जाय। यथा:- श्रीमान्, किंतु श्रीमानक।

१५. सभ एकल कारक चिह्न शब्दमे सटा क’ लिखल जाय, हटा क’ नहि, संयुक्त विभक्तिक हेतु फराक लिखल जाय, यथा घर परक।

१६. अनुनासिककेँ चन्द्रबिन्दु द्वारा व्यक्त कयल जाय। परंतु मुद्रणक सुविधार्थ हि समान जटिल मात्रापर अनुस्वारक प्रयोग चन्द्रबिन्दुक बदला कयल जा सकैत अछि। यथा- हिँ केर बदला हिं।

१७. पूर्ण विराम पासीसँ ( । ) सूचित कयल जाय।

१८. समस्त पद सटा क’ लिखल जाय, वा हाइफेनसँ जोड़ि क’ ,  हटा क’ नहि।

१९. लिअ तथा दिअ शब्दमे बिकारी (ऽ) नहि लगाओल जाय।

२०. अंक देवनागरी रूपमे राखल जाय।

२१.किछु ध्वनिक लेल नवीन चिन्ह बनबाओल जाय। जा' ई नहि बनल अछि ताबत एहि दुनू ध्वनिक बदला पूर्ववत् अय/ आय/ अए/ आए/ आओ/ अओ लिखल जाय। आकि ऎ वा ऒ सँ व्यक्त कएल जाय।

ह./- गोविन्द झा ११/८/७६ श्रीकान्त ठाकुर ११/८/७६ सुरेन्द्र झा "सुमन" ११/०८/७६

  २. मैथिलीमे भाषा सम्पादन पाठ्यक्रम २.१. उच्चारण निर्देश: (बोल्ड कएल रूप ग्राह्य):- दन्त न क उच्चारणमे दाँतमे जीह सटत- जेना बाजू नाम , मुदा ण क उच्चारणमे जीह मूर्धामे सटत (नै सटैए तँ उच्चारण दोष अछि)- जेना बाजू गणेश। तालव्य शमे जीह तालुसँ , षमे मूर्धासँ आ दन्त समे दाँतसँ सटत। निशाँ, सभ आ शोषण बाजि कऽ देखू। मैथिलीमे ष केँ वैदिक संस्कृत जकाँ ख सेहो उच्चरित कएल जाइत अछि, जेना वर्षा, दोष। य अनेको स्थानपर ज जकाँ उच्चरित होइत अछि आ ण ड़ जकाँ (यथा संयोग आ गणेश संजोग आ गड़ेस उच्चरित होइत अछि)। मैथिलीमे व क उच्चारण ब, श क उच्चारण स आ य क उच्चारण ज सेहो होइत अछि। ओहिना ह्रस्व इ बेशीकाल मैथिलीमे पहिने बाजल जाइत अछि कारण देवनागरीमे आ मिथिलाक्षरमे ह्रस्व इ अक्षरक पहिने लिखलो जाइत आ बाजलो जएबाक चाही। कारण जे हिन्दीमे एकर दोषपूर्ण उच्चारण होइत अछि (लिखल तँ पहिने जाइत अछि मुदा बाजल बादमे जाइत अछि), से शिक्षा पद्धतिक दोषक कारण हम सभ ओकर उच्चारण दोषपूर्ण ढंगसँ कऽ रहल छी। अछि- अ इ छ  ऐछ (उच्चारण) छथि- छ इ थ  – छैथ (उच्चारण) पहुँचि- प हुँ इ च (उच्चारण) आब अ आ इ ई ए ऐ ओ औ अं अः ऋ ऐ सभ लेल मात्रा सेहो अछि, मुदा ऐमे ई ऐ ओ औ अं अः ऋ केँ संयुक्ताक्षर रूपमे गलत रूपमे प्रयुक्त आ उच्चरित कएल जाइत अछि। जेना ऋ केँ री  रूपमे उच्चरित करब। आ देखियौ- ऐ लेल देखिऔ क प्रयोग अनुचित। मुदा देखिऐ लेल देखियै अनुचित। क् सँ ह् धरि अ सम्मिलित भेलासँ क सँ ह बनैत अछि, मुदा उच्चारण काल हलन्त युक्त शब्दक अन्तक उच्चारणक प्रवृत्ति बढ़ल अछि, मुदा हम जखन मनोजमे ज् अन्तमे बजैत छी, तखनो पुरनका लोककेँ बजैत सुनबन्हि- मनोजऽ, वास्तवमे ओ अ युक्त ज् = ज बजै छथि। फेर ज्ञ अछि ज् आ ञ क संयुक्त मुदा गलत उच्चारण होइत अछि- ग्य। ओहिना क्ष अछि क् आ ष क संयुक्त मुदा उच्चारण होइत अछि छ। फेर श् आ र क संयुक्त अछि श्र ( जेना श्रमिक) आ स् आ र क संयुक्त अछि स्र (जेना मिस्र)। त्र भेल त+र । उच्चारणक ऑडियो फाइल विदेह आर्काइव  http://www.videha.co.in/ पर उपलब्ध अछि। फेर केँ / सँ / पर पूर्व अक्षरसँ सटा कऽ लिखू मुदा तँ / कऽ हटा कऽ। ऐमे सँ मे पहिल सटा कऽ लिखू आ बादबला हटा कऽ। अंकक बाद टा लिखू सटा कऽ मुदा अन्य ठाम टा लिखू हटा कऽ– जेना छहटा मुदा सभ टा। फेर ६अ म सातम लिखू- छठम सातम नै। घरबलामे बला मुदा घरवालीमे वाली प्रयुक्त करू। रहए- रहै मुदा सकैए (उच्चारण सकै-ए)। मुदा कखनो काल रहए आ रहै मे अर्थ भिन्नता सेहो, जेना से कम्मो जगहमे पार्किंग करबाक अभ्यास रहै ओकरा। पुछलापर पता लागल जे ढुनढुन नाम्ना ई ड्राइवर कनाट प्लेसक पार्किंगमे काज करैत रहए। छलै, छलए मे सेहो ऐ तरहक भेल। छलए क उच्चारण छल-ए सेहो। संयोगने- (उच्चारण संजोगने) केँ/  कऽ केर- क ( केर क प्रयोग गद्यमे नै करू , पद्यमे कऽ सकै छी। ) क (जेना रामक) –रामक आ संगे (उच्चारण राम के /  राम कऽ सेहो) सँ- सऽ (उच्चारण) चन्द्रबिन्दु आ अनुस्वार- अनुस्वारमे कंठ धरिक प्रयोग होइत अछि मुदा चन्द्रबिन्दुमे नै। चन्द्रबिन्दुमे कनेक एकारक सेहो उच्चारण होइत अछि- जेना रामसँ- (उच्चारण राम सऽ)  रामकेँ- (उच्चारण राम कऽ/ राम के सेहो)। केँ जेना रामकेँ भेल हिन्दीक को (राम को)- राम को= रामकेँ क जेना रामक भेल हिन्दीक का ( राम का) राम का= रामक कऽ जेना जा कऽ भेल हिन्दीक कर ( जा कर) जा कर= जा कऽ सँ भेल हिन्दीक से (राम से) राम से= रामसँ सऽ , तऽ , त , केर (गद्यमे) एे चारू शब्द सबहक प्रयोग अवांछित। के दोसर अर्थेँ प्रयुक्त भऽ सकैए- जेना, के कहलक? विभक्ति “क”क बदला एकर प्रयोग अवांछित। नञि, नहि, नै, नइ, नँइ, नइँ, नइं ऐ सभक उच्चारण आ लेखन - नै त्त्व क बदलामे त्व जेना महत्वपूर्ण (महत्त्वपूर्ण नै) जतए अर्थ बदलि जाए ओतहि मात्र तीन अक्षरक संयुक्ताक्षरक प्रयोग उचित। सम्पति- उच्चारण स म्प इ त (सम्पत्ति नै- कारण सही उच्चारण आसानीसँ सम्भव नै)। मुदा सर्वोत्तम (सर्वोतम नै)। राष्ट्रिय (राष्ट्रीय नै) सकैए/ सकै (अर्थ परिवर्तन) पोछैले/ पोछै लेल/ पोछए लेल पोछैए/ पोछए/ (अर्थ परिवर्तन) पोछए/ पोछै ओ लोकनि ( हटा कऽ, ओ मे बिकारी नै) ओइ/ ओहि ओहिले/ ओहि लेल/ ओही लऽ जएबेँ/ बैसबेँ पँचभइयाँ देखियौक/ (देखिऔक नै- तहिना अ मे ह्रस्व आ दीर्घक मात्राक प्रयोग अनुचित) जकाँ / जेकाँ तँइ/ तैँ/ होएत / हएत नञि/ नहि/ नँइ/ नइँ/ नै सौँसे/ सौंसे बड़ / बड़ी (झोराओल) गाए (गाइ नहि), मुदा गाइक दूध (गाएक दूध नै।) रहलेँ/ पहिरतैँ हमहीं/ अहीं सब - सभ सबहक - सभहक धरि - तक गप- बात बूझब - समझब बुझलौं/ समझलौं/ बुझलहुँ - समझलहुँ हमरा आर - हम सभ आकि- आ कि सकैछ/ करैछ (गद्यमे प्रयोगक आवश्यकता नै) होइन/ होनि जाइन (जानि नै, जेना देल जाइन) मुदा जानि-बूझि (अर्थ परिव्र्तन) पइठ/ जाइठ आउ/ जाउ/ आऊ/ जाऊ मे, केँ, सँ, पर (शब्दसँ सटा कऽ) तँ कऽ धऽ दऽ (शब्दसँ हटा कऽ) मुदा दूटा वा बेसी विभक्ति संग रहलापर पहिल विभक्ति टाकेँ सटाऊ। जेना ऐमे सँ । एकटा , दूटा (मुदा कए टा) बिकारीक प्रयोग शब्दक अन्तमे, बीचमे अनावश्यक रूपेँ नै। आकारान्त आ अन्तमे अ क बाद बिकारीक प्रयोग नै (जेना दिअ , आ/ दिय’ , आ’, आ नै ) अपोस्ट्रोफीक प्रयोग बिकारीक बदलामे करब अनुचित आ मात्र फॉन्टक तकनीकी न्यूनताक परिचायक)- ओना बिकारीक संस्कृत रूप ऽ अवग्रह कहल जाइत अछि आ वर्तनी आ उच्चारण दुनू ठाम एकर लोप रहैत अछि/ रहि सकैत अछि (उच्चारणमे लोप रहिते अछि)। मुदा अपोस्ट्रोफी सेहो अंग्रेजीमे पसेसिव केसमे होइत अछि आ फ्रेंचमे शब्दमे जतए एकर प्रयोग होइत अछि जेना raison d’etre एतए सेहो एकर उच्चारण रैजौन डेटर होइत अछि, माने अपोस्ट्रॉफी अवकाश नै दैत अछि वरन जोड़ैत अछि, से एकर प्रयोग बिकारीक बदला देनाइ तकनीकी रूपेँ सेहो अनुचित)। अइमे, एहिमे/ ऐमे जइमे, जाहिमे एखन/ अखन/ अइखन केँ (के नहि) मे (अनुस्वार रहित) भऽ मे दऽ तँ (तऽ, त नै) सँ ( सऽ स नै) गाछ तर गाछ लग साँझ खन जो (जो go, करै जो do) तै/तइ जेना- तै दुआरे/ तइमे/ तइले जै/जइ जेना- जै कारण/ जइसँ/ जइले ऐ/अइ जेना- ऐ कारण/ ऐसँ/ अइले/ मुदा एकर एकटा खास प्रयोग- लालति‍ कतेक दि‍नसँ कहैत रहैत अइ लै/लइ जेना लैसँ/ लइले/ लै दुआरे लहँ/ लौं गेलौं/ लेलौं/ लेलँह/ गेलहुँ/ लेलहुँ/ लेलँ जइ/ जाहि‍/ जै जहि‍ठाम/ जाहि‍ठाम/ जइठाम/ जैठाम एहि‍/ अहि‍/ अइ (वाक्यक अंतमे ग्राह्य) / ऐ अइछ/ अछि‍/ ऐछ तइ/ तहि‍/ तै/ ताहि‍ ओहि‍/ ओइ सीखि‍/ सीख जीवि‍/ जीवी/ जीब भलेहीं/ भलहि‍ं तैं/ तँइ/ तँए जाएब/ जएब लइ/ लै छइ/ छै नहि‍/ नै/ नइ गइ/ गै छनि‍/ छन्‍हि‍  ... समए शब्‍दक संग जखन कोनो वि‍भक्‍ति‍ जुटै छै तखन समै जना समैपर इत्‍यादि‍। असगरमे हृदए आ वि‍भक्‍ति‍ जुटने हृदे जना हृदेसँ, हृदेमे इत्‍यादि‍। जइ/ जाहि‍/ जै जहि‍ठाम/ जाहि‍ठाम/ जइठाम/ जैठाम एहि‍/ अहि‍/ अइ/ ऐ अइछ/ अछि‍/ ऐछ तइ/ तहि‍/ तै/ ताहि‍ ओहि‍/ ओइ सीखि‍/ सीख जीवि‍/ जीवी/ जीब भले/ भलेहीं/ भलहि‍ं तैं/ तँइ/ तँए जाएब/ जएब लइ/ लै छइ/ छै नहि‍/ नै/ नइ गइ/ गै छनि‍/ छन्‍हि‍ चुकल अछि/ गेल गछि २.२. मैथिलीमे भाषा सम्पादन पाठ्यक्रम नीचाँक सूचीमे देल विकल्पमेसँ लैंगुएज एडीटर द्वारा कोन रूप चुनल जेबाक चाही: बोल्ड कएल रूप ग्राह्य: १.होयबला/ होबयबला/ होमयबला/ हेब’बला, हेम’बला/ होयबाक/होबएबला /होएबाक २. आ’/आऽ आ ३. क’ लेने/कऽ लेने/कए लेने/कय लेने/ल’/लऽ/लय/लए ४. भ’ गेल/भऽ गेल/भय गेल/भए गेल ५. कर’ गेलाह/करऽ गेलह/करए गेलाह/करय गेलाह ६. लिअ/दिअ लिय’,दिय’,लिअ’,दिय’/ ७. कर’ बला/करऽ बला/ करय बला करैबला/क’र’ बला / करैवाली ८. बला वला (पुरूष), वाली (स्‍त्री) ९ . आङ्ल आंग्ल १०. प्रायः प्रायह ११. दुःख दुख १ २. चलि गेल चल गेल/चैल गेल १३. देलखिन्ह देलकिन्ह, देलखिन १४. देखलन्हि देखलनि/ देखलैन्ह १५. छथिन्ह/ छलन्हि छथिन/ छलैन/ छलनि १६. चलैत/दैत चलति/दैति १७. एखनो अखनो १८. बढ़नि‍ बढ़इन बढ़न्हि १९. ओ’/ओऽ(सर्वनाम) ओ २० . ओ (संयोजक) ओ’/ओऽ २१. फाँगि/फाङ्गि फाइंग/फाइङ २२. जे जे’/जेऽ २३. ना-नुकुर ना-नुकर २४. केलन्हि/केलनि‍/कयलन्हि २५. तखनतँ/ तखन तँ २६. जा रहल/जाय रहल/जाए रहल २७. निकलय/निकलए लागल/ लगल बहराय/ बहराए लागल/ लगल निकल’/बहरै लागल २८. ओतय/ जतय जत’/ ओत’/ जतए/ ओतए २९. की फूरल जे कि फूरल जे ३०. जे जे’/जेऽ ३१. कूदि / यादि(मोन पारब) कूइद/याइद/कूद/याद/ यादि (मोन) ३२. इहो/ ओहो ३३. हँसए/ हँसय हँसऽ ३४. नौ आकि दस/नौ किंवा दस/ नौ वा दस ३५. सासु-ससुर सास-ससुर ३६. छह/ सात छ/छः/सात ३७. की  की’/ कीऽ (दीर्घीकारान्तमे ऽ वर्जित) ३८. जबाब जवाब ३९. करएताह/ करेताह करयताह ४०. दलान दिशि दलान दिश/दलान दिस ४१ . गेलाह गएलाह/गयलाह ४२. किछु आर/ किछु और/ किछ आर ४३. जाइ छल/ जाइत छल जाति छल/जैत छल ४४. पहुँचि/ भेट जाइत छल/ भेट जाइ छलए पहुँच/ भेटि‍ जाइत छल ४५. जबान (युवा)/ जवान(फौजी) ४६. लय/ लए क’/ कऽ/ लए कए / लऽ कऽ/ लऽ कए ४७. ल’/लऽ कय/ कए ४८. एखन / एखने / अखन / अखने ४९. अहींकेँ अहीँकेँ ५०. गहींर गहीँर ५१. धार पार केनाइ धार पार केनाय/केनाए ५२. जेकाँ जेँकाँ/ जकाँ ५३. तहिना तेहिना ५४. एकर अकर ५५. बहिनउ बहनोइ ५६. बहिन बहिनि ५७. बहिन-बहिनोइ बहिन-बहनउ ५८. नहि/ नै ५९. करबा / करबाय/ करबाए ६०. तँ/ त ऽ तय/तए ६१. भैयारी मे छोट-भाए/भै/, जेठ-भाय/भाइ, ६२. गि‍नतीमे दू भाइ/भाए/भाँइ ६३. ई पोथी दू भाइक/ भाँइ/ भाए/ लेल। यावत जावत ६४. माय मै / माए मुदा माइक ममता ६५. देन्हि/ दइन दनि‍/ दएन्हि/ दयन्हि दन्हि/ दैन्हि ६६. द’/ दऽ/ दए ६७. ओ (संयोजक) ओऽ (सर्वनाम) ६८. तका कए तकाय तकाए ६९. पैरे (on foot) पएरे  कएक/ कैक ७०. ताहुमे/ ताहूमे ७१. पुत्रीक ७२. बजा कय/ कए / कऽ ७३. बननाय/बननाइ ७४. कोला ७५. दिनुका दिनका ७६. ततहिसँ ७७. गरबओलन्हि/ गरबौलनि‍/ गरबेलन्हि/ गरबेलनि‍ ७८. बालु बालू ७९. चेन्ह चिन्ह(अशुद्ध) ८०. जे जे’ ८१ . से/ के से’/के’ ८२. एखुनका अखनुका ८३. भुमिहार भूमिहार ८४. सुग्गर / सुगरक/ सूगर ८५. झठहाक झटहाक ८६. छूबि ८७. करइयो/ओ करैयो ने देलक /करियौ-करइयौ ८८. पुबारि पुबाइ ८९. झगड़ा-झाँटी झगड़ा-झाँटि ९०. पएरे-पएरे पैरे-पैरे ९१. खेलएबाक ९२. खेलेबाक ९३. लगा ९४. होए- हो – होअए ९५. बुझल बूझल ९६. बूझल (संबोधन अर्थमे) ९७. यैह यएह / इएह/ सैह/ सएह ९८. तातिल ९९. अयनाय- अयनाइ/ अएनाइ/ एनाइ १००. निन्न- निन्द १०१. बिनु बिन १०२. जाए जाइ १०३. जाइ (in different sense)-last word of sentence १०४. छत पर आबि जाइ १०५. ने १०६. खेलाए (play) –खेलाइ १०७. शिकाइत- शिकायत १०८. ढप- ढ़प १०९ . पढ़- पढ ११०. कनिए/ कनिये कनिञे १११. राकस- राकश ११२. होए/ होय होइ ११३. अउरदा- औरदा ११४. बुझेलन्हि (different meaning- got understand) ११५. बुझएलन्हि/बुझेलनि‍/ बुझयलन्हि (understood himself) ११६. चलि- चल/ चलि‍ गेल ११७. खधाइ- खधाय ११८. मोन पाड़लखिन्ह/ मोन पाड़लखि‍न/ मोन पारलखिन्ह ११९. कैक- कएक- कइएक १२०. लग ल’ग १२१. जरेनाइ १२२. जरौनाइ जरओनाइ- जरएनाइ/ जरेनाइ १२३. होइत १२४. गरबेलन्हि/ गरबेलनि‍ गरबौलन्हि/ गरबौलनि‍ १२५. चिखैत- (to test)चिखइत १२६. करइयो (willing to do) करैयो १२७. जेकरा- जकरा १२८. तकरा- तेकरा १२९. बिदेसर स्थानेमे/ बिदेसरे स्थानमे १३०. करबयलहुँ/ करबएलहुँ/ करबेलहुँ करबेलौं १३१. हारिक (उच्चारण हाइरक) १३२. ओजन वजन आफसोच/ अफसोस कागत/ कागच/ कागज १३३. आधे भाग/ आध-भागे १३४. पिचा / पिचाय/पिचाए १३५. नञ/ ने १३६. बच्चा नञ (ने) पिचा जाय १३७. तखन ने (नञ) कहैत अछि। कहै/ सुनै/ देखै छल मुदा कहैत-कहैत/ सुनैत-सुनैत/ देखैत-देखैत १३८. कतेक गोटे/ कताक गोटे १३९. कमाइ-धमाइ/ कमाई- धमाई १४० . लग ल’ग १४१. खेलाइ (for playing) १४२. छथिन्ह/ छथिन १४३. होइत होइ १४४. क्यो कियो / केओ १४५. केश (hair) १४६. केस (court-case) १४७ . बननाइ/ बननाय/ बननाए १४८. जरेनाइ १४९. कुरसी कुर्सी १५०. चरचा चर्चा १५१. कर्म करम १५२. डुबाबए/ डुबाबै/ डुमाबै डुमाबय/ डुमाबए १५३. एखुनका/ अखुनका १५४. लए/ लिअए (वाक्यक अंतिम शब्द)- लऽ १५५. कएलक/ केलक १५६. गरमी गर्मी १५७ . वरदी वर्दी १५८. सुना गेलाह सुना’/सुनाऽ १५९. एनाइ-गेनाइ १६०. तेना ने घेरलन्हि/ तेना ने घेरलनि‍ १६१. नञि / नै १६२. डरो ड’रो १६३. कतहु/ कतौ कहीं १६४. उमरिगर-उमेरगर उमरगर १६५. भरिगर १६६. धोल/धोअल धोएल १६७. गप/गप्प १६८. के के’ १६९. दरबज्जा/ दरबजा १७०. ठाम १७१. धरि तक १७२. घूरि लौटि १७३. थोरबेक १७४. बड्ड १७५. तोँ/ तूँ १७६. तोँहि( पद्यमे ग्राह्य) १७७. तोँही / तोँहि १७८. करबाइए करबाइये १७९. एकेटा १८०. करितथि /करतथि १८१. पहुँचि/ पहुँच १८२. राखलन्हि रखलन्हि/ रखलनि‍ १८३. लगलन्हि/ लगलनि‍ लागलन्हि १८४. सुनि (उच्चारण सुइन) १८५. अछि (उच्चारण अइछ) १८६. एलथि गेलथि १८७. बितओने/ बि‍तौने/ बितेने १८८. करबओलन्हि/ करबौलनि‍/ करेलखिन्ह/ करेलखि‍न १८९. करएलन्हि/ करेलनि‍ १९०. आकि/ कि १९१. पहुँचि/ पहुँच १९२. बत्ती जराय/ जराए जरा (आगि लगा) १९३. से से’ १९४. हाँ मे हाँ (हाँमे हाँ विभक्त्तिमे हटा कए) १९५. फेल फैल १९६. फइल(spacious) फैल १९७. होयतन्हि/ होएतन्हि/ होएतनि‍/हेतनि‍/ हेतन्हि १९८. हाथ मटिआएब/ हाथ मटियाबय/हाथ मटियाएब १९९. फेका फेंका २००. देखाए देखा २०१. देखाबए २०२. सत्तरि सत्तर २०३. साहेब साहब २०४.गेलैन्ह/ गेलन्हि/ गेलनि‍ २०५. हेबाक/ होएबाक २०६.केलो/ कएलहुँ/केलौं/ केलुँ २०७. किछु न किछु/ किछु ने किछु २०८.घुमेलहुँ/ घुमओलहुँ/ घुमेलौं २०९. एलाक/ अएलाक २१०. अः/ अह २११.लय/ लए (अर्थ-परिवर्त्तन) २१२.कनीक/ कनेक २१३.सबहक/ सभक २१४.मिलाऽ/ मिला २१५.कऽ/ क २१६.जाऽ/ जा २१७.आऽ/ आ २१८.भऽ /भ’ (’ फॉन्टक कमीक द्योतक) २१९.निअम/ नियम २२० .हेक्टेअर/ हेक्टेयर २२१.पहिल अक्षर ढ/ बादक/ बीचक ढ़ २२२.तहिं/तहिँ/ तञि/ तैं २२३.कहिं/ कहीं २२४.तँइ/ तैं / तइँ २२५.नँइ/ नइँ/  नञि/ नहि/नै २२६.है/ हए / एलीहेँ/ २२७.छञि/ छै/ छैक /छइ २२८.दृष्टिएँ/ दृष्टियेँ २२९.आ (come)/ आऽ(conjunction) २३०. आ (conjunction)/ आऽ(come) २३१.कुनो/ कोनो, कोना/केना २३२.गेलैन्ह-गेलन्हि-गेलनि‍ २३३.हेबाक- होएबाक २३४.केलौँ- कएलौँ-कएलहुँ/केलौं २३५.किछु न किछ- किछु ने किछु २३६.केहेन- केहन २३७.आऽ (come)-आ (conjunction-and)/आ। आब'-आब' /आबह-आबह २३८. हएत-हैत २३९.घुमेलहुँ-घुमएलहुँ- घुमेलाें २४०.एलाक- अएलाक २४१.होनि- होइन/ होन्हि/ २४२.ओ-राम ओ श्यामक बीच(conjunction), ओऽ कहलक (he said)/ओ २४३.की हए/ कोसी अएली हए/ की है। की हइ २४४.दृष्टिएँ/ दृष्टियेँ २४५ .शामिल/ सामेल २४६.तैँ / तँए/ तञि/ तहिं २४७.जौं / ज्योँ/ जँ/ २४८.सभ/ सब २४९.सभक/ सबहक २५०.कहिं/ कहीं २५१.कुनो/ कोनो/ कोनहुँ/ २५२.फारकती भऽ गेल/ भए गेल/ भय गेल २५३.कोना/ केना/ कन्‍ना/कना २५४.अः/ अह २५५.जनै/ जनञ २५६.गेलनि‍/ गेलाह (अर्थ परिवर्तन) २५७.केलन्हि/ कएलन्हि/ केलनि‍/ २५८.लय/ लए/ लएह (अर्थ परिवर्तन) २५९.कनीक/ कनेक/कनी-मनी २६०.पठेलन्हि‍ पठेलनि‍/ पठेलइन/ पपठओलन्हि/ पठबौलनि‍/ २६१.निअम/ नियम २६२.हेक्टेअर/ हेक्टेयर २६३.पहिल अक्षर रहने ढ/ बीचमे रहने ढ़ २६४.आकारान्तमे बिकारीक प्रयोग उचित नै/ अपोस्ट्रोफीक प्रयोग फान्टक तकनीकी न्यूनताक परिचायक ओकर बदला अवग्रह (बिकारी) क प्रयोग उचित २६५.केर (पद्यमे ग्राह्य) / -क/ कऽ/ के २६६.छैन्हि- छन्हि २६७.लगैए/ लगैये २६८.होएत/ हएत २६९.जाएत/ जएत/ २७०.आएत/ अएत/ आओत २७१ .खाएत/ खएत/ खैत २७२.पिअएबाक/ पिएबाक/पि‍येबाक २७३.शुरु/ शुरुह २७४.शुरुहे/ शुरुए २७५.अएताह/अओताह/ एताह/ औताह २७६.जाहि/ जाइ/ जइ/ जै/ २७७.जाइत/ जैतए/ जइतए २७८.आएल/ अएल २७९.कैक/ कएक २८०.आयल/ अएल/ आएल २८१. जाए/ जअए/ जए (लालति‍ जाए लगलीह।) २८२. नुकएल/ नुकाएल २८३. कठुआएल/ कठुअएल २८४. ताहि/ तै/ तइ २८५. गायब/ गाएब/ गएब २८६. सकै/ सकए/ सकय २८७.सेरा/सरा/ सराए (भात सरा गेल) २८८.कहैत रही/देखैत रही/ कहैत छलौं/ कहै छलौं- अहिना चलैत/ पढ़ैत (पढ़ै-पढ़ैत अर्थ कखनो काल परिवर्तित) - आर बुझै/ बुझैत (बुझै/ बुझै छी, मुदा बुझैत-बुझैत)/ सकैत/ सकै। करैत/ करै। दै/ दैत। छैक/ छै। बचलै/ बचलैक। रखबा/ रखबाक । बिनु/ बिन। रातिक/ रातुक बुझै आ बुझैत केर अपन-अपन जगहपर प्रयोग समीचीन अछि‍। बुझैत-बुझैत आब बुझलि‍ऐ। हमहूँ बुझै छी। २८९. दुआरे/ द्वारे २९०.भेटि/ भेट/ भेँट २९१. खन/ खीन/  खुना (भोर खन/ भोर खीन) २९२.तक/ धरि २९३.गऽ/ गै (meaning different-जनबै गऽ) २९४.सऽ/ सँ (मुदा दऽ, लऽ) २९५.त्त्व,(तीन अक्षरक मेल बदला पुनरुक्तिक एक आ एकटा दोसरक उपयोग) आदिक बदला त्व आदि। महत्त्व/ महत्व/ कर्ता/ कर्त्ता आदिमे त्त संयुक्तक कोनो आवश्यकता मैथिलीमे नै अछि। वक्तव्य २९६.बेसी/ बेशी २९७.बाला/वाला बला/ वला (रहैबला) २९८ .वाली/ (बदलैवाली) २९९.वार्त्ता/ वार्ता ३००. अन्तर्राष्ट्रिय/ अन्तर्राष्ट्रीय ३०१. लेमए/ लेबए ३०२.लमछुरका, नमछुरका ३०२.लागै/ लगै ( भेटैत/ भेटै) ३०३.लागल/ लगल ३०४.हबा/ हवा ३०५.राखलक/ रखलक ३०६.आ (come)/ आ (and) ३०७. पश्चाताप/ पश्चात्ताप ३०८. ऽ केर व्यवहार शब्दक अन्तमे मात्र, यथासंभव बीचमे नै। ३०९.कहैत/ कहै ३१०. रहए (छल)/ रहै (छलै) (meaning different) ३११.तागति/ ताकति ३१२.खराप/ खराब ३१३.बोइन/ बोनि/ बोइनि ३१४.जाठि/ जाइठ ३१५.कागज/ कागच/ कागत ३१६.गिरै (meaning different- swallow)/ गिरए (खसए) ३१७.राष्ट्रिय/ राष्ट्रीय DATE-LIST (year- 2012-13) (१४२० फसली साल) Marriage Days: Nov.2012- 25, 26, 28, 29, 30 Dec.2012- 5,9, 10, 13, 14 January 2013- 16, 17, 18, 23, 24, 31 Feb.2013- 1, 3, 4, 6, 8, 10, 14, 15, 18, 20, 24, 25 April 2013- 21, 22, 24, 26, 29 May 2013- 1,2,3,5,6,9,12,13,17,19,20,22,23,24,26,27,29,30,31 June 2013- 2,3 July 2013- 11, 14, 15 Upanayana Days: January 2013- 16 February 2013- 14, 15, 20, 21 April 2013- 22 May 2013- 20, 21 Dviragaman Din: November 2012- 25, 26, 28, 29 December 2012- 2, 3, 14 February 2013- 14, 15, 18, 20, 21, 22, 27, 28 March 2013- 1 April 2013- 18, 22, 24, 26, 28, 29 May 2013- 12, 13 Mundan Din: November 2012- 26, 30 December 2012- 3 January 2013- 18, 24 February 2013- 1, 14, 15, 20, 28 April 2013- 17 May 2013- 13, 23, 29 June 2013- 13, 19, 26, 27, 28 July 2013- 10, 15 FESTIVALS OF MITHILA (2012-13) Mauna Panchami-08 July Madhushravani- 22 July Nag Panchami- 24 July Raksha Bandhan- 02 Aug Krishnastami- 10 August Kushi Amavasya / Somvari Vrat- 17 August Vishwakarma Pooja- 17 September Hartalika Teej- 18 September ChauthChandra-19 September Karma Dharma Ekadashi-26 September Indra Pooja Aarambh- 27 September Anant Caturdashi- 29 Sep Agastyarghadaan- 30 Sep Pitri Paksha begins- 30 Sep Jimootavahan Vrata/ Jitia-08 October Matri Navami- 09 October SomvatiAmavasya Vrat- 15 October Kalashsthapan- 16 October Belnauti- 20 October Patrika Pravesh- 21 October Mahastami- 22 October Maha Navami - 23 October Vijaya Dashami- 24 October Kojagara- 29 Oct Dhanteras- 11 November Diyabati, shyama pooja-13 November Annakoota/ Govardhana Pooja-14 November Bhratridwitiya/ Chitragupta Pooja- 15 November Chhathi -19 November Devotthan Ekadashi- 24 November ravivratarambh- 25 November Navanna parvan- 25 November KartikPoornima- Sama Visarjan- 28 November Vivaha Panchmi- 17 December Makara/ Teela Sankranti-14 Jan Naraknivaran chaturdashi- 08 February Basant Panchami/ Saraswati Pooja- 15 February Achla Saptmi- 17 February Mahashivaratri-10 March Holikadahan-Fagua-26 March Holi- 28 March Varuni Trayodashi-07 April Chaiti  navaratrarambh- 11 April Jurishital-15 April Chaiti Chhathi vrata-16 April Ram Navami- 19 April Ravi Brat Ant- 12 May Akshaya Tritiya-13 May Janaki Navami- 19 May Vat Savitri-barasait- 08 June Ganga Dashhara-18 June Somavati Amavasya Vrata- 08 July Jagannath Rath Yatra- 10 July Hari Sayan Ekadashi- 19 July Aashadhi Guru Poornima-22 Jul VIDEHA ARCHIVE १.विदेह ई-पत्रिकाक सभटा पुरान अंक ब्रेल, तिरहुता आ देवनागरी रूपमे Videha e journal's all old issues in Braille Tirhuta and Devanagari versions विदेह ई-पत्रिकाक पहिल ५० अंक

विदेह ई-पत्रिकाक ५०म सँ आगाँक अंक २.मैथिली पोथी डाउनलोड Maithili Books Download ३.मैथिली ऑडियो संकलन Maithili Audio Downloads ४.मैथिली वीडियोक संकलन Maithili Videos ५.मिथिला चित्रकला/ आधुनिक चित्रकला आ चित्र Mithila Painting/ Modern Art and Photos "विदेह"क एहि सभ सहयोगी लिंकपर सेहो एक बेर जाउ। ६.विदेह मैथिली क्विज  :  http://videhaquiz.blogspot.com/ ७.विदेह मैथिली जालवृत्त एग्रीगेटर : http://videha-aggregator.blogspot.com/ ८.विदेह मैथिली साहित्य अंग्रेजीमे अनूदित http://madhubani-art.blogspot.com/ ९.विदेहक पूर्व-रूप "भालसरिक गाछ"  : http://gajendrathakur.blogspot.com/ १०.विदेह इंडेक्स  : http://videha123.blogspot.com/ ११.विदेह फाइल : http://videha123.wordpress.com/ १२. विदेह: सदेह : पहिल तिरहुता (मिथिला़क्षर) जालवृत्त (ब्लॉग) http://videha-sadeha.blogspot.com/ १३. विदेह:ब्रेल: मैथिली ब्रेलमे: पहिल बेर विदेह द्वारा http://videha-braille.blogspot.com/ १४.VIDEHA IST MAITHILI  FORTNIGHTLY EJOURNAL ARCHIVE http://videha-archive.blogspot.com/ १५. विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका मैथिली पोथीक आर्काइव http://videha-pothi.blogspot.com/ १६. विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका ऑडियो आर्काइव http://videha-audio.blogspot.com/ १७. विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका वीडियो आर्काइव http://videha-video.blogspot.com/ १८. विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका मिथिला चित्रकला, आधुनिक कला आ चित्रकला http://videha-paintings-photos.blogspot.com/ १९. मैथिल आर मिथिला (मैथिलीक सभसँ लोकप्रिय जालवृत्त) http://maithilaurmithila.blogspot.com/ २०.श्रुति प्रकाशन http://www.shruti-publication.com/ २१.http://groups.google.com/group/videha VIDEHA केर सदस्यता लिअ Top of Form Bottom of Form ईमेल : एहि समूहपर जाउ २२.http://groups.yahoo.com/group/VIDEHA/ Top of Form Subscribe to VIDEHA Powered by us.groups.yahoo.com Bottom of Form २३.गजेन्द्र ठाकुर इ‍डेक्स http://gajendrathakur123.blogspot.com २४. नेना भुटका http://mangan-khabas.blogspot.com/ २५.विदेह रेडियो:मैथिली कथा-कविता आदिक पहिल पोडकास्ट साइट http://videha123radio.wordpress.com/ २६.Videha Radio २७. Join official Videha facebook group. २८. विदेह मैथिली नाट्य उत्सव http://maithili-drama.blogspot.com/ २९.समदिया http://esamaad.blogspot.com/ ३०. मैथिली फिल्म्स http://maithilifilms.blogspot.com/ ३१.अनचिन्हार आखर http://anchinharakharkolkata.blogspot.com/ ३२. मैथिली हाइकू http://maithili-haiku.blogspot.com/ ३३. मानक मैथिली http://manak-maithili.blogspot.com/ ३४. विहनि कथा http://vihanikatha.blogspot.in/ ३५. मैथिली कविता http://maithili-kavita.blogspot.in/ ३६. मैथिली कथा http://maithili-katha.blogspot.in/ ३७.मैथिली समालोचना http://maithili-samalochna.blogspot.in/ महत्त्वपूर्ण सूचना:(१) 'विदेह' द्वारा धारावाहिक रूपे ई-प्रकाशित कएल गेल गजेन्द्र ठाकुरक  निबन्ध-प्रबन्ध-समीक्षा, उपन्यास (सहस्रबाढ़नि) , पद्य-संग्रह (सहस्राब्दीक चौपड़पर), कथा-गल्प (गल्प-गुच्छ), नाटक(संकर्षण), महाकाव्य (त्वञ्चाहञ्च आ असञ्जाति मन) आ बाल-किशोर साहित्य विदेहमे संपूर्ण ई-प्रकाशनक बाद प्रिंट फॉर्ममे। कुरुक्षेत्रम्–अन्तर्मनक खण्ड-१ सँ ७ Combined ISBN No.978-81-907729-7-6 विवरण एहि पृष्ठपर नीचाँमे आ प्रकाशकक साइट http://www.shruti-publication.com/ पर । महत्त्वपूर्ण सूचना (२):सूचना: विदेहक मैथिली-अंग्रेजी आ अंग्रेजी मैथिली कोष (इंटरनेटपर पहिल बेर सर्च-डिक्शनरी) एम.एस. एस.क्यू.एल. सर्वर आधारित -Based on ms-sql server Maithili-English and English-Maithili Dictionary. विदेहक भाषापाक- रचनालेखन स्तंभमे। कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक- गजेन्द्र ठाकुर गजेन्द्र ठाकुरक निबन्ध-प्रबन्ध-समीक्षा, उपन्यास (सहस्रबाढ़नि) , पद्य-संग्रह (सहस्राब्दीक चौपड़पर), कथा-गल्प (गल्प गुच्छ), नाटक(संकर्षण), महाकाव्य (त्वञ्चाहञ्च आ असञ्जाति मन) आ बालमंडली-किशोरजगत विदेहमे संपूर्ण ई-प्रकाशनक बाद प्रिंट फॉर्ममे। कुरुक्षेत्रम्–अन्तर्मनक, खण्ड-१ सँ ७ Ist edition 2009 of Gajendra Thakur’s KuruKshetram-Antarmanak (Vol. I to VII)- essay-paper-criticism, novel, poems, story, play, epics and Children-grown-ups literature in single binding: Language:Maithili ६९२ पृष्ठ : मूल्य भा. रु. 100/-(for individual buyers inside india) (add courier charges Rs.50/-per copy for Delhi/NCR and Rs.100/- per copy for outside Delhi)

For Libraries and overseas buyers $40 US (including postage)

The book is AVAILABLE FOR PDF DOWNLOAD AT

https://sites.google.com/a/videha.com/videha/

http://videha123.wordpress.com/  

Details for purchase available at print-version publishers's site website: http://www.shruti-publication.com/ or you may write to e-mail:shruti.publication@shruti-publication.com विदेह: सदेह : १: २: ३: ४ तिरहुता : देवनागरी "विदेह" क, प्रिंट संस्करण :विदेह-ई-पत्रिका (http://www.videha.co.in/) क चुनल रचना सम्मिलित। विदेह:सदेह:१: २: ३: ४ सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। Details for purchase available at print-version publishers's site http://www.shruti-publication.com  or you may write to shruti.publication@shruti-publication.com २. संदेश- [ विदेह ई-पत्रिका, विदेह:सदेह मिथिलाक्षर आ देवनागरी आ गजेन्द्र ठाकुरक सात खण्डक- निबन्ध-प्रबन्ध-समीक्षा,उपन्यास (सहस्रबाढ़नि) , पद्य-संग्रह (सहस्राब्दीक चौपड़पर), कथा-गल्प (गल्प गुच्छ), नाटक (संकर्षण), महाकाव्य (त्वञ्चाहञ्च आ असञ्जाति मन) आ बाल-मंडली-किशोर जगत- संग्रह कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक मादेँ। ] १.श्री गोविन्द झा- विदेहकेँ तरंगजालपर उतारि विश्वभरिमे मातृभाषा मैथिलीक लहरि जगाओल, खेद जे अपनेक एहि महाभियानमे हम एखन धरि संग नहि दए सकलहुँ। सुनैत छी अपनेकेँ सुझाओ आ रचनात्मक आलोचना प्रिय लगैत अछि तेँ किछु लिखक मोन भेल। हमर सहायता आ सहयोग अपनेकेँ सदा उपलब्ध रहत। २.श्री रमानन्द रेणु- मैथिलीमे ई-पत्रिका पाक्षिक रूपेँ चला कऽ जे अपन मातृभाषाक प्रचार कऽ रहल छी, से धन्यवाद । आगाँ अपनेक समस्त मैथिलीक कार्यक हेतु हम हृदयसँ शुभकामना दऽ रहल छी। ३.श्री विद्यानाथ झा "विदित"- संचार आ प्रौद्योगिकीक एहि प्रतिस्पर्धी ग्लोबल युगमे अपन महिमामय "विदेह"केँ अपना देहमे प्रकट देखि जतबा प्रसन्नता आ संतोष भेल, तकरा कोनो उपलब्ध "मीटर"सँ नहि नापल जा सकैछ? ..एकर ऐतिहासिक मूल्यांकन आ सांस्कृतिक प्रतिफलन एहि शताब्दीक अंत धरि लोकक नजरिमे आश्चर्यजनक रूपसँ प्रकट हैत। ४. प्रो. उदय नारायण सिंह "नचिकेता"- जे काज अहाँ कए रहल छी तकर चरचा एक दिन मैथिली भाषाक इतिहासमे होएत। आनन्द भए रहल अछि, ई जानि कए जे एतेक गोट मैथिल "विदेह" ई जर्नलकेँ पढ़ि रहल छथि।...विदेहक चालीसम अंक पुरबाक लेल अभिनन्दन। ५. डॉ. गंगेश गुंजन- एहि विदेह-कर्ममे लागि रहल अहाँक सम्वेदनशील मन, मैथिलीक प्रति समर्पित मेहनतिक अमृत रंग, इतिहास मे एक टा विशिष्ट फराक अध्याय आरंभ करत, हमरा विश्वास अछि। अशेष शुभकामना आ बधाइक सङ्ग, सस्नेह...अहाँक पोथी कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक प्रथम दृष्टया बहुत भव्य तथा उपयोगी बुझाइछ। मैथिलीमे तँ अपना स्वरूपक प्रायः ई पहिले एहन  भव्य अवतारक पोथी थिक। हर्षपूर्ण हमर हार्दिक बधाई स्वीकार करी। ६. श्री रामाश्रय झा "रामरंग"(आब स्वर्गीय)- "अपना" मिथिलासँ संबंधित...विषय वस्तुसँ अवगत भेलहुँ।...शेष सभ कुशल अछि। ७. श्री ब्रजेन्द्र त्रिपाठी- साहित्य अकादमी- इंटरनेट पर प्रथम मैथिली पाक्षिक पत्रिका "विदेह" केर लेल बधाई आ शुभकामना स्वीकार करू। ८. श्री प्रफुल्लकुमार सिंह "मौन"- प्रथम मैथिली पाक्षिक पत्रिका "विदेह" क प्रकाशनक समाचार जानि कनेक चकित मुदा बेसी आह्लादित भेलहुँ। कालचक्रकेँ पकड़ि जाहि दूरदृष्टिक परिचय देलहुँ, ओहि लेल हमर मंगलकामना। ९.डॉ. शिवप्रसाद यादव- ई जानि अपार हर्ष भए रहल अछि, जे नव सूचना-क्रान्तिक क्षेत्रमे मैथिली पत्रकारिताकेँ प्रवेश दिअएबाक साहसिक कदम उठाओल अछि। पत्रकारितामे एहि प्रकारक नव प्रयोगक हम स्वागत करैत छी, संगहि "विदेह"क सफलताक शुभकामना। १०. श्री आद्याचरण झा- कोनो पत्र-पत्रिकाक प्रकाशन- ताहूमे मैथिली पत्रिकाक प्रकाशनमे के कतेक सहयोग करताह- ई तऽ भविष्य कहत। ई हमर ८८ वर्षमे ७५ वर्षक अनुभव रहल। एतेक पैघ महान यज्ञमे हमर श्रद्धापूर्ण आहुति प्राप्त होयत- यावत ठीक-ठाक छी/ रहब। ११. श्री विजय ठाकुर- मिशिगन विश्वविद्यालय- "विदेह" पत्रिकाक अंक देखलहुँ, सम्पूर्ण टीम बधाईक पात्र अछि। पत्रिकाक मंगल भविष्य हेतु हमर शुभकामना स्वीकार कएल जाओ। १२. श्री सुभाषचन्द्र यादव- ई-पत्रिका "विदेह" क बारेमे जानि प्रसन्नता भेल। ’विदेह’ निरन्तर पल्लवित-पुष्पित हो आ चतुर्दिक अपन सुगंध पसारय से कामना अछि। १३. श्री मैथिलीपुत्र प्रदीप- ई-पत्रिका "विदेह" केर सफलताक भगवतीसँ कामना। हमर पूर्ण सहयोग रहत। १४. डॉ. श्री भीमनाथ झा- "विदेह" इन्टरनेट पर अछि तेँ "विदेह" नाम उचित आर कतेक रूपेँ एकर विवरण भए सकैत अछि। आइ-काल्हि मोनमे उद्वेग रहैत अछि, मुदा शीघ्र पूर्ण सहयोग देब।कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक देखि अति प्रसन्नता भेल। मैथिलीक लेल ई घटना छी। १५. श्री रामभरोस कापड़ि "भ्रमर"- जनकपुरधाम- "विदेह" ऑनलाइन देखि रहल छी। मैथिलीकेँ अन्तर्राष्ट्रीय जगतमे पहुँचेलहुँ तकरा लेल हार्दिक बधाई। मिथिला रत्न सभक संकलन अपूर्व। नेपालोक सहयोग भेटत, से विश्वास करी। १६. श्री राजनन्दन लालदास- "विदेह" ई-पत्रिकाक माध्यमसँ बड़ नीक काज कए रहल छी, नातिक अहिठाम देखलहुँ। एकर वार्षिक अ‍ंक जखन प्रिं‍ट निकालब तँ हमरा पठायब। कलकत्तामे बहुत गोटेकेँ हम साइटक पता लिखाए देने छियन्हि। मोन तँ होइत अछि जे दिल्ली आबि कए आशीर्वाद दैतहुँ, मुदा उमर आब बेशी भए गेल। शुभकामना देश-विदेशक मैथिलकेँ जोड़बाक लेल।.. उत्कृष्ट प्रकाशन कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक लेल बधाइ। अद्भुत काज कएल अछि, नीक प्रस्तुति अछि सात खण्डमे।  मुदा अहाँक सेवा आ से निःस्वार्थ तखन बूझल जाइत जँ अहाँ द्वारा प्रकाशित पोथी सभपर दाम लिखल नहि रहितैक। ओहिना सभकेँ विलहि देल जइतैक। (स्पष्टीकरण-  श्रीमान्, अहाँक सूचनार्थ विदेह द्वारा ई-प्रकाशित कएल सभटा सामग्री आर्काइवमे https://sites.google.com/a/videha.com/videha-pothi/ पर बिना मूल्यक डाउनलोड लेल उपलब्ध छै आ भविष्यमे सेहो रहतैक। एहि आर्काइवकेँ जे कियो प्रकाशक अनुमति लऽ कऽ प्रिंट रूपमे प्रकाशित कएने छथि आ तकर ओ दाम रखने छथि ताहिपर हमर कोनो नियंत्रण नहि अछि।- गजेन्द्र ठाकुर)...   अहाँक प्रति अशेष शुभकामनाक संग। १७. डॉ. प्रेमशंकर सिंह- अहाँ मैथिलीमे इंटरनेटपर पहिल पत्रिका "विदेह" प्रकाशित कए अपन अद्भुत मातृभाषानुरागक परिचय देल अछि, अहाँक निःस्वार्थ मातृभाषानुरागसँ प्रेरित छी, एकर निमित्त जे हमर सेवाक प्रयोजन हो, तँ सूचित करी। इंटरनेटपर आद्योपांत पत्रिका देखल, मन प्रफुल्लित भऽ गेल। १८.श्रीमती शेफालिका वर्मा- विदेह ई-पत्रिका देखि मोन उल्लाससँ भरि गेल। विज्ञान कतेक प्रगति कऽ रहल अछि...अहाँ सभ अनन्त आकाशकेँ भेदि दियौ, समस्त विस्तारक रहस्यकेँ तार-तार कऽ दियौक...। अपनेक अद्भुत पुस्तक कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक विषयवस्तुक दृष्टिसँ गागरमे सागर अछि। बधाई। १९.श्री हेतुकर झा, पटना-जाहि समर्पण भावसँ अपने मिथिला-मैथिलीक सेवामे तत्पर छी से स्तुत्य अछि। देशक राजधानीसँ भय रहल मैथिलीक शंखनाद मिथिलाक गाम-गाममे मैथिली चेतनाक विकास अवश्य करत। २०. श्री योगानन्द झा, कबिलपुर, लहेरियासराय- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पोथीकेँ निकटसँ देखबाक अवसर भेटल अछि आ मैथिली जगतक एकटा उद्भट ओ समसामयिक दृष्टिसम्पन्न हस्ताक्षरक कलमबन्द परिचयसँ आह्लादित छी। "विदेह"क देवनागरी सँस्करण पटनामे रु. 80/- मे उपलब्ध भऽ सकल जे विभिन्न लेखक लोकनिक छायाचित्र, परिचय पत्रक ओ रचनावलीक सम्यक प्रकाशनसँ ऐतिहासिक कहल जा सकैछ। २१. श्री किशोरीकान्त मिश्र- कोलकाता- जय मैथिली, विदेहमे बहुत रास कविता, कथा, रिपोर्ट आदिक सचित्र संग्रह देखि आ आर अधिक प्रसन्नता मिथिलाक्षर देखि- बधाई स्वीकार कएल जाओ। २२.श्री जीवकान्त- विदेहक मुद्रित अंक पढ़ल- अद्भुत मेहनति। चाबस-चाबस। किछु समालोचना मरखाह..मुदा सत्य। २३. श्री भालचन्द्र झा- अपनेक कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक देखि बुझाएल जेना हम अपने छपलहुँ अछि। एकर विशालकाय आकृति अपनेक सर्वसमावेशताक परिचायक अछि। अपनेक रचना सामर्थ्यमे उत्तरोत्तर वृद्धि हो, एहि शुभकामनाक संग हार्दिक बधाई। २४.श्रीमती डॉ नीता झा- अहाँक कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़लहुँ। ज्योतिरीश्वर शब्दावली, कृषि मत्स्य शब्दावली आ सीत बसन्त आ सभ कथा, कविता, उपन्यास, बाल-किशोर साहित्य सभ उत्तम छल। मैथिलीक उत्तरोत्तर विकासक लक्ष्य दृष्टिगोचर होइत अछि। २५.श्री मायानन्द मिश्र- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक मे हमर उपन्यास स्त्रीधनक जे विरोध कएल गेल अछि तकर हम विरोध करैत छी।... कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पोथीक लेल शुभकामना।(श्रीमान् समालोचनाकेँ विरोधक रूपमे नहि लेल जाए।-गजेन्द्र ठाकुर) २६.श्री महेन्द्र हजारी- सम्पादक श्रीमिथिला- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़ि मोन हर्षित भऽ गेल..एखन पूरा पढ़यमे बहुत समय लागत, मुदा जतेक पढ़लहुँ से आह्लादित कएलक। २७.श्री केदारनाथ चौधरी- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक अद्भुत लागल, मैथिली साहित्य लेल ई पोथी एकटा प्रतिमान बनत। २८.श्री सत्यानन्द पाठक- विदेहक हम नियमित पाठक छी। ओकर स्वरूपक प्रशंसक छलहुँ। एम्हर अहाँक लिखल - कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक देखलहुँ। मोन आह्लादित भऽ उठल। कोनो रचना तरा-उपरी। २९.श्रीमती रमा झा-सम्पादक मिथिला दर्पण। कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक प्रिंट फॉर्म पढ़ि आ एकर गुणवत्ता देखि मोन प्रसन्न भऽ गेल, अद्भुत शब्द एकरा लेल प्रयुक्त कऽ रहल छी। विदेहक उत्तरोत्तर प्रगतिक शुभकामना। ३०.श्री नरेन्द्र झा, पटना- विदेह नियमित देखैत रहैत छी। मैथिली लेल अद्भुत काज कऽ रहल छी। ३१.श्री रामलोचन ठाकुर- कोलकाता- मिथिलाक्षर विदेह देखि मोन प्रसन्नतासँ भरि उठल, अंकक विशाल परिदृश्य आस्वस्तकारी अछि। ३२.श्री तारानन्द वियोगी- विदेह आ कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक देखि चकबिदोर लागि गेल। आश्चर्य। शुभकामना आ बधाई। ३३.श्रीमती प्रेमलता मिश्र “प्रेम”- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़लहुँ। सभ रचना उच्चकोटिक लागल। बधाई। ३४.श्री कीर्तिनारायण मिश्र- बेगूसराय- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक बड्ड नीक लागल, आगांक सभ काज लेल बधाई। ३५.श्री महाप्रकाश-सहरसा- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक नीक लागल, विशालकाय संगहि उत्तमकोटिक। ३६.श्री अग्निपुष्प- मिथिलाक्षर आ देवाक्षर विदेह पढ़ल..ई प्रथम तँ अछि एकरा प्रशंसामे मुदा हम एकरा दुस्साहसिक कहब। मिथिला चित्रकलाक स्तम्भकेँ मुदा अगिला अंकमे आर विस्तृत बनाऊ। ३७.श्री मंजर सुलेमान-दरभंगा- विदेहक जतेक प्रशंसा कएल जाए कम होएत। सभ चीज उत्तम। ३८.श्रीमती प्रोफेसर वीणा ठाकुर- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक उत्तम, पठनीय, विचारनीय। जे क्यो देखैत छथि पोथी प्राप्त करबाक उपाय पुछैत छथि। शुभकामना। ३९.श्री छत्रानन्द सिंह झा- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़लहुँ, बड्ड नीक सभ तरहेँ। ४०.श्री ताराकान्त झा- सम्पादक मैथिली दैनिक मिथिला समाद- विदेह तँ कन्टेन्ट प्रोवाइडरक काज कऽ रहल अछि। कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक अद्भुत लागल। ४१.डॉ रवीन्द्र कुमार चौधरी- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक बहुत नीक, बहुत मेहनतिक परिणाम। बधाई। ४२.श्री अमरनाथ- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक आ विदेह दुनू स्मरणीय घटना अछि, मैथिली साहित्य मध्य। ४३.श्री पंचानन मिश्र- विदेहक वैविध्य आ निरन्तरता प्रभावित करैत अछि, शुभकामना। ४४.श्री केदार कानन- कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक लेल अनेक धन्यवाद, शुभकामना आ बधाइ स्वीकार करी। आ नचिकेताक भूमिका पढ़लहुँ। शुरूमे तँ लागल जेना कोनो उपन्यास अहाँ द्वारा सृजित भेल अछि मुदा पोथी उनटौला पर ज्ञात भेल जे एहिमे तँ सभ विधा समाहित अछि। ४५.श्री धनाकर ठाकुर- अहाँ नीक काज कऽ रहल छी। फोटो गैलरीमे चित्र एहि शताब्दीक जन्मतिथिक अनुसार रहैत तऽ नीक। ४६.श्री आशीष झा- अहाँक पुस्तकक संबंधमे एतबा लिखबा सँ अपना कए नहि रोकि सकलहुँ जे ई किताब मात्र किताब नहि थीक, ई एकटा उम्मीद छी जे मैथिली अहाँ सन पुत्रक सेवा सँ निरंतर समृद्ध होइत चिरजीवन कए प्राप्त करत। ४७.श्री शम्भु कुमार सिंह- विदेहक तत्परता आ क्रियाशीलता देखि आह्लादित भऽ रहल छी। निश्चितरूपेण कहल जा सकैछ जे समकालीन मैथिली पत्रिकाक इतिहासमे विदेहक नाम स्वर्णाक्षरमे लिखल जाएत। ओहि कुरुक्षेत्रक घटना सभ तँ अठारहे दिनमे खतम भऽ गेल रहए मुदा अहाँक कुरुक्षेत्रम् तँ अशेष अछि। ४८.डॉ. अजीत मिश्र- अपनेक प्रयासक कतबो प्रश‍ंसा कएल जाए कमे होएतैक। मैथिली साहित्यमे अहाँ द्वारा कएल गेल काज युग-युगान्तर धरि पूजनीय रहत। ४९.श्री बीरेन्द्र मल्लिक- अहाँक कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक आ विदेह:सदेह पढ़ि अति प्रसन्नता भेल। अहाँक स्वास्थ्य ठीक रहए आ उत्साह बनल रहए से कामना। ५०.श्री कुमार राधारमण- अहाँक दिशा-निर्देशमे विदेह पहिल मैथिली ई-जर्नल देखि अति प्रसन्नता भेल। हमर शुभकामना। ५१.श्री फूलचन्द्र झा प्रवीण-विदेह:सदेह पढ़ने रही मुदा कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक देखि बढ़ाई देबा लेल बाध्य भऽ गेलहुँ। आब विश्वास भऽ गेल जे मैथिली नहि मरत। अशेष शुभकामना। ५२.श्री विभूति आनन्द- विदेह:सदेह देखि, ओकर विस्तार देखि अति प्रसन्नता भेल। ५३.श्री मानेश्वर मनुज-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक एकर भव्यता देखि अति प्रसन्नता भेल, एतेक विशाल ग्रन्थ मैथिलीमे आइ धरि नहि देखने रही। एहिना भविष्यमे काज करैत रही, शुभकामना। ५४.श्री विद्यानन्द झा- आइ.आइ.एम.कोलकाता- कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक विस्तार, छपाईक संग गुणवत्ता देखि अति प्रसन्नता भेल। अहाँक अनेक धन्यवाद; कतेक बरखसँ हम नेयारैत छलहुँ जे सभ पैघ शहरमे मैथिली लाइब्रेरीक स्थापना होअए, अहाँ ओकरा वेबपर कऽ रहल छी, अनेक धन्यवाद। ५५.श्री अरविन्द ठाकुर-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक मैथिली साहित्यमे कएल गेल एहि तरहक पहिल प्रयोग अछि, शुभकामना। ५६.श्री कुमार पवन-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक पढ़ि रहल छी। किछु लघुकथा पढ़ल अछि, बहुत मार्मिक छल। ५७. श्री प्रदीप बिहारी-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक देखल, बधाई। ५८.डॉ मणिकान्त ठाकुर-कैलिफोर्निया- अपन विलक्षण नियमित सेवासँ हमरा लोकनिक हृदयमे विदेह सदेह भऽ गेल अछि। ५९.श्री धीरेन्द्र प्रेमर्षि- अहाँक समस्त प्रयास सराहनीय। दुख होइत अछि जखन अहाँक प्रयासमे अपेक्षित सहयोग नहि कऽ पबैत छी। ६०.श्री देवशंकर नवीन- विदेहक निरन्तरता आ विशाल स्वरूप- विशाल पाठक वर्ग, एकरा ऐतिहासिक बनबैत अछि। ६१.श्री मोहन भारद्वाज- अहाँक समस्त कार्य देखल, बहुत नीक। एखन किछु परेशानीमे छी, मुदा शीघ्र सहयोग देब। ६२.श्री फजलुर रहमान हाशमी-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक मे एतेक मेहनतक लेल अहाँ साधुवादक अधिकारी छी। ६३.श्री लक्ष्मण झा "सागर"- मैथिलीमे चमत्कारिक रूपेँ अहाँक प्रवेश आह्लादकारी अछि।..अहाँकेँ एखन आर..दूर..बहुत दूरधरि जेबाक अछि। स्वस्थ आ प्रसन्न रही। ६४.श्री जगदीश प्रसाद मंडल-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक पढ़लहुँ । कथा सभ आ उपन्यास सहस्रबाढ़नि पूर्णरूपेँ पढ़ि गेल छी। गाम-घरक भौगोलिक विवरणक जे सूक्ष्म वर्णन सहस्रबाढ़निमे अछि, से चकित कएलक, एहि संग्रहक कथा-उपन्यास मैथिली लेखनमे विविधता अनलक अछि। समालोचना शास्त्रमे अहाँक दृष्टि वैयक्तिक नहि वरन् सामाजिक आ कल्याणकारी अछि, से प्रशंसनीय। ६५.श्री अशोक झा-अध्यक्ष मिथिला विकास परिषद- कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक लेल बधाई आ आगाँ लेल शुभकामना। ६६.श्री ठाकुर प्रसाद मुर्मु- अद्भुत प्रयास। धन्यवादक संग प्रार्थना जे अपन माटि-पानिकेँ ध्यानमे राखि अंकक समायोजन कएल जाए। नव अंक धरि प्रयास सराहनीय। विदेहकेँ बहुत-बहुत धन्यवाद जे एहेन सुन्दर-सुन्दर सचार (आलेख) लगा रहल छथि। सभटा ग्रहणीय- पठनीय। ६७.बुद्धिनाथ मिश्र- प्रिय गजेन्द्र जी,अहाँक सम्पादन मे प्रकाशित ‘विदेह’आ ‘कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक’ विलक्षण पत्रिका आ विलक्षण पोथी! की नहि अछि अहाँक सम्पादनमे? एहि प्रयत्न सँ मैथिली क विकास होयत,निस्संदेह। ६८.श्री बृखेश चन्द्र लाल- गजेन्द्रजी, अपनेक पुस्तक कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक पढ़ि मोन गदगद भय गेल , हृदयसँ अनुगृहित छी । हार्दिक शुभकामना । ६९.श्री परमेश्वर कापड़ि - श्री गजेन्द्र जी । कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक पढ़ि गदगद आ नेहाल भेलहुँ। ७०.श्री रवीन्द्रनाथ ठाकुर- विदेह पढ़ैत रहैत छी। धीरेन्द्र प्रेमर्षिक मैथिली गजलपर आलेख पढ़लहुँ। मैथिली गजल कत्तऽ सँ कत्तऽ चलि गेलैक आ ओ अपन आलेखमे मात्र अपन जानल-पहिचानल लोकक चर्च कएने छथि। जेना मैथिलीमे मठक परम्परा रहल अछि। (स्पष्टीकरण- श्रीमान्, प्रेमर्षि जी ओहि आलेखमे ई स्पष्ट लिखने छथि जे किनको नाम जे छुटि गेल छन्हि तँ से मात्र आलेखक लेखकक जानकारी नहि रहबाक द्वारे, एहिमे आन कोनो कारण नहि देखल जाय। अहाँसँ एहि विषयपर विस्तृत आलेख सादर आमंत्रित अछि।-सम्पादक) ७१.श्री मंत्रेश्वर झा- विदेह पढ़ल आ संगहि अहाँक मैगनम ओपस कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक सेहो, अति उत्तम। मैथिलीक लेल कएल जा रहल अहाँक समस्त कार्य अतुलनीय अछि। ७२. श्री हरेकृष्ण झा- कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक मैथिलीमे अपन तरहक एकमात्र ग्रन्थ अछि, एहिमे लेखकक समग्र दृष्टि आ रचना कौशल देखबामे आएल जे लेखकक फील्डवर्कसँ जुड़ल रहबाक कारणसँ अछि। ७३.श्री सुकान्त सोम- कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक मे  समाजक इतिहास आ वर्तमानसँ अहाँक जुड़ाव बड्ड नीक लागल, अहाँ एहि क्षेत्रमे आर आगाँ काज करब से आशा अछि। ७४.प्रोफेसर मदन मिश्र- कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक सन किताब मैथिलीमे पहिले अछि आ एतेक विशाल संग्रहपर शोध कएल जा सकैत अछि। भविष्यक लेल शुभकामना। ७५.प्रोफेसर कमला चौधरी- मैथिलीमे कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक सन पोथी आबए जे गुण आ रूप दुनूमे निस्सन होअए, से बहुत दिनसँ आकांक्षा छल, ओ आब जा कऽ पूर्ण भेल। पोथी एक हाथसँ दोसर हाथ घुमि रहल अछि, एहिना आगाँ सेहो अहाँसँ आशा अछि। ७६.श्री उदय चन्द्र झा "विनोद": गजेन्द्रजी, अहाँ जतेक काज कएलहुँ अछि से मैथिलीमे आइ धरि कियो नहि कएने छल। शुभकामना। अहाँकेँ एखन बहुत काज आर करबाक अछि। ७७.श्री कृष्ण कुमार कश्यप: गजेन्द्र ठाकुरजी, अहाँसँ भेँट एकटा स्मरणीय क्षण बनि गेल। अहाँ जतेक काज एहि बएसमे कऽ गेल छी ताहिसँ हजार गुणा आर बेशीक आशा अछि। ७८.श्री मणिकान्त दास: अहाँक मैथिलीक कार्यक प्रशंसा लेल शब्द नहि भेटैत अछि। अहाँक कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक सम्पूर्ण रूपेँ पढ़ि गेलहुँ। त्वञ्चाहञ्च बड्ड नीक लागल। ७९. श्री हीरेन्द्र कुमार झा- विदेह ई-पत्रिकाक सभ अंक ई-पत्रसँ भेटैत रहैत अछि। मैथिलीक ई-पत्रिका छैक एहि बातक गर्व होइत अछि। अहाँ आ अहाँक सभ सहयोगीकेँ हार्दिक शुभकामना। विदेह मैथिली साहित्य आन्दोलन (c)२००४-१२. सर्वाधिकार लेखकाधीन आ जतए लेखकक नाम नहि अछि ततए संपादकाधीन। विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। सह-सम्पादक: उमेश मंडल। सहायक सम्पादक: शिव कुमार झा आ मुन्नाजी (मनोज कुमार कर्ण)। भाषा-सम्पादन: नागेन्द्र कुमार झा आ पञ्जीकार विद्यानन्द झा। कला-सम्पादन: ज्योति झा चौधरी आ रश्मि रेखा सिन्हा। सम्पादक-शोध-अन्वेषण: डॉ. जया वर्मा आ डॉ. राजीव कुमार वर्मा। सम्पादक- नाटक-रंगमंच-चलचित्र- बेचन ठाकुर। सम्पादक- सूचना-सम्पर्क-समाद- पूनम मंडल आ प्रियंका झा। सम्पादक- अनुवाद विभाग- विनीत उत्पल। रचनाकार अपन मौलिक आ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि) ggajendra@videha.com केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx, .rtf वा .txt फॉर्मेटमे पठा सकैत छथि। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेताह, से आशा करैत छी। रचनाक अंतमे टाइप रहय, जे ई रचना मौलिक अछि, आ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। मेल प्राप्त होयबाक बाद यथासंभव शीघ्र ( सात दिनक भीतर) एकर प्रकाशनक अंकक सूचना देल जायत। ’विदेह' प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका अछि आ एहिमे मैथिली, संस्कृत आ अंग्रेजीमे मिथिला आ मैथिलीसँ संबंधित रचना प्रकाशित कएल जाइत अछि। एहि ई पत्रिकाकेँ श्रीमति लक्ष्मी ठाकुर द्वारा मासक ०१ आ १५ तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि। (c) 2004-12 सर्वाधिकार सुरक्षित। विदेहमे प्रकाशित सभटा रचना आ आर्काइवक सर्वाधिकार रचनाकार आ संग्रहकर्त्ताक लगमे छन्हि। रचनाक अनुवाद आ पुनः प्रकाशन किंवा आर्काइवक उपयोगक अधिकार किनबाक हेतु ggajendra@videha.co.in पर संपर्क करू। एहि साइटकेँ प्रीति झा ठाकुर, मधूलिका चौधरी आ रश्मि प्रिया द्वारा डिजाइन कएल गेल। सिद्धिरस्तु वि दे ह विदेह Videha বিদেহ  www.videha.co.in www.videha.com विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका Videha Ist Maithili Fortnightly ejournal  विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका'विदेह' ११५ म अंक ०१ अक्टूबर २०१२ (वर्ष ५ मास ५८ अंक ११५) मानुषीमिह संस्कृताम् ISSN 2229-547X VIDEHA वि दे ह विदेह Videha বিদেহ  www.videha.co.in www.videha.com विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका Videha Ist Maithili Fortnightly ejournal  विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका'विदेह' ११५ म अंक ०१ अक्टूबर २०१२ (वर्ष ५ मास ५८ अंक ११५) मानुषीमिह संस्कृताम् ISSN 2229-547X VIDEHA

ay Sie ,) cutee Se =f Bp XN as be = & ! ae (७ | pr ! y 447: कि के

| & ANANTH