VIDEHA — Issue 116 / अंक ११६

Publication: VIDEHA · Issue: 116
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215 ISSN 2229-547X VIDEHA 'विदेह' ११६ म अंक १५ अक्टूबर २०१२ (वर्ष ५ मास ५८ अंक ११६) ऐ अंकमे अछि:- १. संपादकीय संदेश २. गद्य २.१.१.डॉ अरूणा चौधरी- लघुकथा- छलना २.जगदीश प्रसाद मण्‍डलक आठ गोट वि‍हनि‍ कथा २.२.डॉ. अजीत मिश्र- लघुकथा- व्यथा २.३.कामिनी कामायनी-लघुकथा- कठजीब २.४.मुन्नी कामत- नाटक- जिन्दगीक मोल २.५.खुशबू झा- मैथिली कथा संग्रह जिद्दी पढलापर २.६.पूनम मण्डल-आकाशवाणी दरभंगाक जातिवादी प्रवृत्तिक विरोधमे वि‍देह वि‍चार गोष्‍ठी सह कवि सम्मेलन २.७.दुर्गानन्‍द मण्‍डल- नेना लेल सुन्दर चि‍त्रकथा २.८..अमित मिश्र- विहनि कथा- परिभाषा २.सन्दीप कुमार साफी दूटा विहनि कथा ३.राम वि‍लास साहु दूटा ि‍वहनि‍ कथा ४.वीरेन्‍द्र कुमार यादव-लघुकथा- बाबाक गाछ ३. पद्य ३.१.जगदीश चन्द्र ठाकुर ‘अनिल’- की भेटल आ की हेरा गेल  (आत्म गीत)- (आगाँ) ३.२.१.जगदीश प्रसाद मण्‍डलक लगभग दर्जन भरि‍ गीत २.मिहिर झा- गजल ३.अमित मिश्र-भगवती गीत/ गजल ४.अच्‍छे लाल शास्‍त्री- दूटा कविता ३.३.१.कैलास दास-कम्प्यूटर २.प्रमोद रंगीले- मच्छर राज ३.शंभु सौरभ- गीत ३.४.१.राजदेव मण्‍डल जीक दू गोट कवि‍ता २.डॉ॰ शशिधर कुमर “विदेह” ३.५.१.मुन्नी कामत- किछु कविता २.रूबी झा- दूटा गजल ३.शान्तिलक्ष्मी चौधरी-दुर्गापूजा ४.नंद वि‍लास राय ३.६.१.पवन कुमार साह २.बिपिन कुमार कर्ण- कवि‍ता-देखु केहेन ई भारत ि‍नर्माण ३.रामदेव प्रसाद मण्‍डल ‘झारूदार’- झारू ३.७.१.बाल मुकुन्द पाठक- किछु गजल २.सन्दीप कुमार साफी- दूटा कविता ३.८.१.विनीत उत्पल- गजल २.अनिल मल्लिक- गजल ३.किशन कारीगर- (हास्य कविता) ४. मिथिला कला-संगीत १. ज्योति झा चौधरी २.राजनाथ मिश्र (चित्रमय मिथिला) ३. उमेश मण्डल (मिथिलाक वनस्पति/ मिथिलाक जीव-जन्तु/ मिथिलाक जिनगी) बालानां कृते-१.शि‍वकुमार झा ‘टि‍ल्‍लू’- बिना रदीफक बाल-गजल २.मुन्नी कामत- किछु बाल कविता ३.अमित मिश्र- बाल गजल ४.जगदानन्द झा मनु- माटिक बासन भाषापाक रचना-लेखन -[मानक मैथिली], [विदेहक मैथिली-अंग्रेजी आ अंग्रेजी मैथिली कोष (इंटरनेटपर पहिल बेर सर्च-डिक्शनरी) एम.एस. एस.क्यू.एल. सर्वर आधारित -Based on ms-sql server Maithili-English and English-Maithili Dictionary.] विदेह ई-पत्रिकाक सभटा पुरान अंक ( ब्रेल, तिरहुता आ देवनागरी मे ) पी.डी.एफ. डाउनलोडक लेल नीचाँक लिंकपर उपलब्ध अछि। All the old issues of Videha e journal ( in Braille, Tirhuta and Devanagari versions ) are available for pdf download at the following link. विदेह ई-पत्रिकाक सभटा पुरान अंक ब्रेल, तिरहुता आ देवनागरी रूपमे Videha e journal's all old issues in Braille Tirhuta and Devanagari versions विदेह ई-पत्रिकाक पहिल ५० अंक

विदेह ई-पत्रिकाक ५०म सँ आगाँक अंक ↑ विदेह आर.एस.एस.फीड एनीमेटरकेँ अपन साइट/ ब्लॉगपर लगाऊ। ब्लॉग "लेआउट" पर "एड गाडजेट" मे "फीड" सेलेक्ट कए "फीड यू.आर.एल." मे http://www.videha.co.in/index.xml टाइप केलासँ सेहो विदेह फीड प्राप्त कए सकैत छी। गूगल रीडरमे पढ़बा लेल http://reader.google.com/ पर जा कऽ Add a  Subscription बटन क्लिक करू आ खाली स्थानमे http://www.videha.co.in/index.xml पेस्ट करू आ Add  बटन दबाउ। Join official Videha facebook group. 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Go to the link below for download of old issues of VIDEHA Maithili e magazine in .pdf format and Maithili Audio/ Video/ Book/ paintings/ photo files. विदेहक पुरान अंक आ ऑडियो/ वीडियो/ पोथी/ चित्रकला/ फोटो सभक फाइल सभ (उच्चारण, बड़ सुख सार आ दूर्वाक्षत मंत्र सहित) डाउनलोड करबाक हेतु नीचाँक लिंक पर जाउ। VIDEHA ARCHIVE विदेह आर्काइव ज्योतिरीश्वर पूर्व महाकवि विद्यापति। भारत आ नेपालक माटिमे पसरल मिथिलाक धरती प्राचीन कालहिसँ महान पुरुष ओ महिला लोकनिक कर्मभमि रहल अछि। मिथिलाक महान पुरुष ओ महिला लोकनिक चित्र 'मिथिला रत्न' मे देखू। गौरी-शंकरक पालवंश कालक मूर्त्ति, एहिमे मिथिलाक्षरमे (१२०० वर्ष पूर्वक) अभिलेख अंकित अछि। मिथिलाक भारत आ नेपालक माटिमे पसरल एहि तरहक अन्यान्य प्राचीन आ नव स्थापत्य, चित्र, अभिलेख आ मूर्त्तिकलाक़ हेतु देखू 'मिथिलाक खोज' मिथिला, मैथिल आ मैथिलीसँ सम्बन्धित सूचना, सम्पर्क, अन्वेषण संगहि विदेहक सर्च-इंजन आ न्यूज सर्विस आ मिथिला, मैथिल आ मैथिलीसँ सम्बन्धित वेबसाइट सभक समग्र संकलनक लेल देखू "विदेह सूचना संपर्क अन्वेषण" विदेह जालवृत्तक डिसकसन फोरमपर जाउ। "मैथिल आर मिथिला" (मैथिलीक सभसँ लोकप् ऐ बेर युवा पुरस्कार(२०१२)[साहित्य अकादेमी, दिल्ली]क लेल अहाँक नजरिमे कोन कोन लेखक उपयुक्त छथि ? Thank you for voting! Thank you for voting! श्रीमती ज्योति सुनीत चौधरीक “अर्चिस” (कविता संग्रह)  25.56% श्री विनीत उत्पलक “हम पुछैत छी” (कविता संग्रह)  7.22% श्रीमती कामिनीक “समयसँ सम्वाद करैत”, (कविता संग्रह)  5.56% श्री प्रवीण काश्यपक “विषदन्ती वरमाल कालक रति” (कविता संग्रह)  3.89% श्री आशीष अनचिन्हारक "अनचिन्हार आखर"(गजल संग्रह)  25.56% श्री अरुणाभ सौरभक “एतबे टा नहि” (कविता संग्रह)  6.11% श्री दिलीप कुमार झा "लूटन"क जगले रहबै (कविता संग्रह)  6.67% श्री आदि यायावरक “भोथर पेंसिलसँ लिखल” (कथा संग्रह)  5.56% श्री उमेश मण्डलक “निश्तुकी” (कविता संग्रह)  12.22% Other:  2% ऐ बेर अनुवाद पुरस्कार (२०१३) [साहित्य अकादेमी, दिल्ली]क लेल अहाँक नजरिमे के उपयुक्त छथि? Thank you for voting! Thank you for voting! श्री नरेश कुमार विकल "ययाति" (मराठी उपन्यास श्री विष्णु सखाराम खाण्डेकर)  31.3% श्री महेन्द्र नारायण राम "कार्मेलीन" (कोंकणी उपन्यास श्री दामोदर मावजो)  12.17% श्री देवेन्द्र झा "अनुभव"(बांग्ला उपन्यास श्री दिव्येन्दु पालित)  11.3% श्रीमती मेनका मल्लिक "देश आ अन्य कविता सभ" (नेपालीक अनुवाद मूल- रेमिका थापा)  20.87% श्री कृष्ण कुमार कश्यप आ श्रीमती शशिबाला- मैथिली गीतगोविन्द ( जयदेव संस्कृत)  13.04% श्री रामनारायण सिंह "मलाहिन" (श्री तकषी शिवशंकर पिल्लैक मलयाली उपन्यास)  10.43% Other:  0.87% फेलो पुरस्कार-समग्र योगदान २०१२-१३ : समानान्तर साहित्य अकादेमी, दिल्ली Thank you for voting! Thank you for voting! श्री राजनन्दन लाल दास  46.6% श्री डॉ. अमरेन्द्र  32.04% श्री चन्द्रभानु सिंह  19.42% Other:  1.94% 1.संपादकीय १ समन्वय २-४ नवम्बर २०१२ इण्डिया हैबीटेट सेन्टर भारतीय भाषा महोत्सव SAMANVAY 2-4 November 2012 IHC INDIAN LANGUAGES' FESTIVAL -समन्वय २०१२: भारतीय लेखनक उत्सव:२-४ नवम्बर २०१२: (इण्डिया हैबीटेट सेन्टर भारतीय भाषा महोत्सव) -एकर साइट अछि http://samanvayindianlanguagesfestival.org -समन्वयक छथि सत्यानन्द निरूपम आ गिरिराज कराडू -उत्सवक निदेशक छथि- राज लिबरहान -उत्सवक एडवाइजरी बोर्डमे छथि-आलोक राय, के.सच्चिदानन्दन, लक्ष्मण गायकवाड, ओम थानवी, महमूद फारूकी, ममता सागर, रवि सिंह, सीतांशु यशचन्द्र, तेमशुला आओ। -आयोजन कमेटीमे छथि- १.इण्डिया हैबीटेट सेन्टरक प्रोग्राम टीम, २.पारस नाथ, अनन्त नाथ। -सहयोगी छथि, दिल्ली प्रेस आ प्रतिलिपि बुक्स। -समन्वय २०११ मे मैथिलीक प्रतिनिधित्व केने रहथि- गंगेश गुंजन। http://samanvayindianlanguagesfestival.org/2011/gangesh-gunjan/ समन्वय २-४ नवम्बर २०१२ SAMANVAY 2-4 November 2012 IHC INDIAN LANGUAGES' FESTIVAL Venue: Indian Habitat Centre, Lodhi Road, New Delhi -- 110 003 http://samanvayindianlanguagesfestival.org/2012/schedule/ http://samanvayindianlanguagesfestival.org/2012/arvind-das/ http://samanvayindianlanguagesfestival.org/2012/gajendra-thakur/ http://samanvayindianlanguagesfestival.org/2012/udaya-narayana-singh/ SAMANVAY 2012 Venue: Indian Habitat Centre, Lodhi Road, New Delhi -- 110 003 2 November 2012 Afternoon 4.00- 4.30: Inauguration By Chandrashekhar Kambar, Ratan Thiyam 4.45 – 5.45: Opening Session: Boli is Back Speakers: Ratan Thiyam, Kashinath Singh, Gurvinder Singh, Nilesh Mishra Moderator: Alok Rai 6.00 – 7.00: Opening Reading Nabaneeta Dev Sen, Sitanshu Yashaschandra, Udaya Narayana Singh, Mamang Dai, Arun Kamal, Arjun Deo Charan, Narender Singh Negi 7.15 – 8.15: Evening Performance Ugana re: Vidyapati by Shovana Narayanan ———————————————————————————————————————————————— 3 Nov 2012 10.30-11.30: Manipuri: The Idea of Nation Speakers: Yumlembam Ibomcha, Dr. Dhanabir Laishram, Bijoykumar Tayenjam Moderator: Robin Ngangom 11.45-12.15: Interaction: Mapping Cities Kashinath Singh, Laxman Gaikwad, Om Thanvi 12.30-1.30 Maithili: Love’s Own Language Speakers: Uday Narayan Singh, Dev Shankar Naveen, Gajendra Thakur Moderator: Arvind Das 2.30 -3.30 Kannada: Tales of Modernities: Small Spaces, Big Ideas Speakers:Gopalkrishna Pai, Banu Mushtaq, B.T. Jahnavi Moderator: Mamta Sagar 3.45-4.15 Interaction Munawwar Rana 4.30-5.30 English: Where’s My Reader? Speakers: Palash Krishna Mehrotra, Biman Nath, S.Hussain Zaidi, Madhuri Banerjee Moderator: Jai Arjun Singh 5.45-6.30: Future of Indian Languages Publishing in Digital Era Speakers:Akshay Pathak, Prem Prakash, Shiva Kumar Moderator: Rahul Dixit 7.00-8.30 Evening Performance: Kashmiri Sufiyana Kalam Gulzar Ahmad Ganie and party ———————————————————————————————————————————————————— 4 November 2012 10.00-11.00 Oriya: Reclaiming Language, Space and Body: Women Writing Speakers: Pratibha Ray, Sarojini Sahoo, Yashodhara Mishra, Aparna Mohanty Moderator: Paramita Satpathy 11.15- 12.15: Folk Performance: Pad Dangal Jagan, Dhavale and others Introduction: Prabhat 12.30-1.30 Marathi: The City of No Outsiders Mumbai Speakers: Arun Sadhu, Hemant Divate Moderator: Prakash Bhatambrekar 2.30-3.30 Kashmiri: My Reality, My Language Speakers: Shahnaz Rasheed, Gulshan Badrani, Elyas Azad Moderator: Nisar Azam 14 3.45-4.15: Interaction Girish Kasaravali, Banu Mushtaq, Mamta Sagar 4.30-5.30: Hindi: Culture and Power: A Tale of Seven Cities (Allahabad, Benares, Bhopal, Delhi, Kolkata, Lahore, Patna) Speakers: Kashinath Singh, Ashok Vajpeyi, Arun Kamal, Alka Saraogi Moderator: Neelabh 5.45- 6.30: Mind Your Language Speakers: Sneha Khanwalkar, Varun Grover, Ratan Rajpoot, Simran Kohli Moderator: Vineet Kumar 6.30 – 7.00: Award Ceremnoy and Closing Speakers: K. Satchidanandan, Raj Liberhan, Paresh Nath, Anant Nath, Satyanand Nirupam, Giriraj Kiradoo 7.15 – 8.30: Evening Performance Solo by Rabbi Shergill २ चीनक लेखक "मो यान (लेखकीय नाम मो यान, वास्तविक नाम गुआन मोये) " केँ साहित्य लेल २०१२ क नोबल पुरस्कार देल जेतन्हि, स्वेडिश एकेडमी ११ अक्टूबर २०१२केँ ई घोषणा केलक। प्रेस कॉनफेरेन्समे कहल गेल जे "मो यान" लोकगाथा, इतिहास आ समकालीन घटनाक मिलनसँ जागल अवस्थाक आभासी(जागल अवस्थाक स्वप्न)वास्तविकताकेँ चित्रित करैत छथि। मो यान पहिल चीनक नागरिक छथि जिनका साहित्य लेल नोबल पुरस्कार देल जेतन्हि। पूर्वी चीनक शाण्डोंग प्रान्तमे हिनकर जन्म भेलन्हि, मो यान (१९५५- ) क माता-पिता किसान छलखिन्ह। जखन ओ १२ बर्खक रहथि तखन सांस्कृतिक क्रान्तिक बाद हुनका स्कूल छोड़ि पहिने खेती आ फेर फैक्ट्रीमे काज करऽ पड़लन्हि। फेर ओ “जन स्वतंत्रता सेना”मे चलि गेला, हुनकर पहिल लघुकथा १९८१ ई. मे प्रकाशित भेलन्हि। ओ अपन लेखनमे अपन युवावस्था आ अपन जन्मस्थलीक वर्णन करै छथि, जेना “रेड सोर्घम- लाल ज्वार”मे, ऐपर फिल्म सेहो बनल, डकैती, जापानी कब्जा आ बोनिहारक दुखद स्थितिक ऐमे विवरण अछि। उपन्यासक अतिरिक्त हुनकर लघुकथा सभक संग्रह प्रकाशित छन्हि। मो यानक कहब छन्हि जे एकटा महान उपन्यास लिखल जाएब अखन बाकी अछि। समारोह १० दिसम्बरकेँ हएत। पुरस्कारमे ८० लाख क्रोनर (स्वेडन) देल जाइत अछि जे लगभग दस लाख डॉलर (अमेरिका)क बराबर अछि। ३ ऐ बेर मूल पुरस्कार(२०१२)-विदेह भाषा सम्मान (प्रसिद्ध समानान्तर साहित्य अकादेमी पुरस्कार) श्री राजदेव मण्डल जीकेँ हुनकर कविता संग्रह "अम्बरा" लेल देल जा रहल छन्हि। राजदेव मंडल अम्बरा-कविता-संग्रह आ हमर टोल (उपन्यास) लिखने छथि। अम्बरा https://sites.google.com/a/videha.com/videha-pothi/Home/Ambara_Rajdeo_Mandal.pdf?attredirects=0  सँ आ हमर टोल https://sites.google.com/a/videha.com/videha-pothi/Home/HammarTol_Rajdeo_Mandal.pdf?attredirects=0  सँ डाउनलोड कएल जा सकैत अछि। http://www.videha.co.in/  पर भऽ रहल ऑनलाइन वोटिंगमे ऐ पोथीकेँ सभसँ बेशी वोट भेटलै। वोटिंगक परिणाम ऐ तरहेँ रहल: श्री राजदेव मण्डलक “अम्बरा” (कविता-संग्रह) 12.67% श्री बेचन ठाकुरक “बेटीक अपमान आ छीनरदेवी”(दूटा नाटक) 11.02% श्रीमती आशा मिश्रक “उचाट” (उपन्यास) 6.34% श्रीमती पन्ना झाक “अनुभूति” (कथा संग्रह) 4.68% श्री उदय नारायण सिंह “नचिकेता”क “नो एण्ट्री:मा प्रविश (नाटक) 5.23% श्री सुभाष चन्द्र यादवक “बनैत बिगड़ैत” (कथा-संग्रह) 4.96% श्रीमती वीणा कर्ण- भावनाक अस्थिपंजर (कविता संग्रह) 5.23% श्रीमती शेफालिका वर्माक “किस्त-किस्त जीवन (आत्मकथा) 8.54% श्रीमती विभा रानीक “भाग रौ आ बलचन्दा” (दूटा नाटक) 6.61% श्री महाप्रकाश-संग समय के (कविता संग्रह) 5.51% श्री तारानन्द वियोगी- प्रलय रहस्य (कविता-संग्रह) 4.96% श्री महेन्द्र मलंगियाक “छुतहा घैल” (नाटक) 9.64% श्रीमती नीता झाक “देश-काल” (कथा-संग्रह) 5.51% श्री सियाराम झा "सरस"क थोड़े आगि थोड़े पानि (गजल संग्रह) 7.16% Other: 1.93% श्री राजदेव मण्डल जीकेँ बधाइ। हुनका ई सम्मान विदेह नाट्य उत्सव २०१३ क अवसरपर देल जाएत। ४ मैथिलीकेँ बी.पी.एस.सी.सँ हटाबै लेल लालू प्रसाद जिम्मेवार वा मैथिलीक कट्टरपंथी प्रोफेसर सभ जिम्मेवार- जखन लालू प्रसाद पहिल बेर मुख्यमंत्री बनल रहथि तखन बी.पी.एस.सी. नाम आ टाइटिलक संग बिहार प्रशासनिक/ आर्थिक/ (आ सम्भवतः वन आदि) सेवाक रिजल्ट सभ हिन्दी अखबारमे छापने रहए। मैथिल ब्राह्मण सफल उम्मीदवारसँ ई लिस्ट भरल रहए, झा-झा देखि लोक घबड़ा गेल रहए। की ९०% मार्क्स हिसाब छोड़ि मैथिली लिटेरेचरमे आबि सकैत अछि? बी.पी.एस.सी. मे एल.एस.डब्लू., भूगोल आदिक मार्क्स सेहो कोनो कोनो साल बहुत अबै छलै, मुदा एना नै, आ ओइमे कोनो एक टाइटिलकेँ फाएदा नै होइ छलै। मैथिलीक प्रोफेसर सभक मूल्यांकनमे देखाओल गेल मूर्खतासँ लालू प्रसादपर चारू दिससँ दवाब पड़लन्हि, हुनकर सामाजिक न्यायक हँसी उड़ाओल गेल आ अन्ततः हुनका बी.पी.एस.सी.सँ मैथिलीकेँ हटाबऽ पड़लन्हि। आ तखन हुनका ज्ञात पड़लन्हि जे ई तँ मैथिल ब्राह्मणोक ९०% लोकक हृदएमे कोनो शूल उत्पन्न नै कऽ सकल। जे २-४ सए गोटे प्रशासनिक/ आर्थिक/ (आ सम्भवतः वन आदि) सेवामे मैथिलीक कारणसँ गेलथि, वएह मात्र जँ कोनो मैथिली पत्रिकाक ग्राहक बनि जाथि तँ मैथिली पत्रिका सभक ई स्थिति नै रहत। मुदा ऐमेसँ ९९% केँ आइ मैथिलीसँ कोनो सरोकार नै अछि। मैथिलीक कट्टरपंथी मूर्खाधिराज प्रोफेसर सभ जातिवादिताक कारण मैथिलीक जे नोकसान पहुँचेलन्हि से इतिहास हुनका सभकेँ क्षमा नै करत। ५ “विद्यापतिक मिथिला सांस्कृतिक परिषद द्वारा यज्ञोपवीत संस्कार आ पाग-प्रतिष्ठापन” संस्कृत आ अवहट्ठ बला विद्यापति ठक्कुरः आ कविकोकिल विद्यापतिक बीचक अन्तर "मिथिला सांस्कृतिक परिषद" आ ओइसँ जुड़ल "किशोरीकान्त मिश्र" आदि नै बुझि सकला वा नै बूझऽ चाहलन्हि। ऐतिहासिक लिखित तथ्य अछि जे गोनू झा १०५०-११५० मे भेलाह मुदा उषा किरण खान संस्कृत आ अवहट्ठबला विद्यापतिसँ हुनकर शास्त्रार्थ करबै छथि (हिन्दीक ऐतिहासिक उपन्यास सिरजनहार, भारतीय ज्ञानपीठमे)। वीरेन्द्र झा कहै छथि जे गोनू झा ५०० साल पहिने भेला आ तारानन्द वियोगी गोनू झा केँ ३०० साल पहिने भेल मानै छथि (दुनू गोटेक हिन्दीमे प्रकाशित गोनू झापर पोथी, क्रमसँ राजकमल प्रकाशन आ नेशनल बुक ट्रस्टसँ प्रकाशित) तँ विभा रानीक गोनू झापर हिन्दी पोथी (वाणी प्रकाशन) मे कुणाल गोनू झाकेँ भव सिंहक राज्यमे (१४म शताब्दी) भेल मानैत छथि। जखन पंजीमे उपलब्ध लिखित अभिलेखन गोनू झाकेँ संस्कृत आ अवहट्ठबला विद्यापतिसँ दस पीढ़ी पहिने अभिलेखित करैत अछि, तखन ई हाल अछि। समानान्तर परम्पराक विद्यापति आ पाग- विद्यापतिक संस्कृत ग्रन्थमे ठक्कुर विद्यापति कृता लिखल अछि/ आ ओ विद्यापति ब्राह्मण छथि। हमर उद्देश्य मैथिली पदावली बला विद्यापतिसँ अछि, हुनका किए पाग पहिरा कऽ "हम्मर विद्यापति" बना लेल गेल। ई तखन नै भेल जखन बिदापत नाचक माध्यमसँ आठ सए बर्ख गएर ब्राह्मण समुदाय विद्यापतिकेँ जिएने रखलक, मुदा तखन भेल जखन बंगाल विद्यापति आ गोविन्ददासक पदावलीकेँ अपन बना लेलक मुदा बंगालेक विद्वान राजकृष्ण मुखोपाध्याय सर्वप्रथम १८७५ ई. मे कहलन्हि जे विद्यापति मिथिलाक कवि छथि आ बंगालेक नगेन्द्रनाथ गुप्त सर्वप्रथम कहलन्हि जे गोविन्ददास सेहो मिथिलाक कवि छथि आ जखन ई तथ्य सोझाँ उठल तँ पहिने तँ सगर बंगाल हुनकापर मार-मार कऽ उठल आ बादमे मानि गेल। राजकृष्ण मुखोपाध्याय जइ विद्यापतिकेँ मिथिलाक कहने रहथि ओ पदावलीक विद्यापतिक सन्दर्भमे छल, संस्कृत आ अवहट्ठक विद्यापति ठक्कुरः केँ बंगाल कहियो अपन नै कहने छल। ज्योतिरीश्वरक संस्कृत धूर्तसमागम नाटक आ संस्कृत आ अवहट्ठबला विद्यापतिक गोरक्षविजय नाटक मध्य देल मैथिली गीत सेहो पदावलीक पुरान परम्पराक द्योतक अछि आ ऐ दुनू लेखकपर मैथिली पदावलीक प्रभाव देखबैत अछि। फेर मिथिलाक विद्वानकेँ सोह एलन्हि आ विद्यापतिक संस्कृत-अवहट्ठ ग्रन्थ, गोविन्ददास नाम्ना आ विद्यापति नाम्ना पञ्जीमे उपलब्ध विवरण दऽ विद्यापति ठाकुर आ गोविन्ददास झा (!!!) निकालल गेल, एतऽ रमानाथ झाक पञ्जीक सतही ज्ञान आ सीमित दृष्टिकोण नोकसान पहुँचेलक। फेर अनचोक्के पाग पहिरा कऽ (मिथिला सांस्कृतिक परिषद- ई संस्था भारतक स्वतंत्रताक बाद विद्यापतिकेँ पाग पहिरा कऽ हुनका ब्राह्मण घोषित करबाक कुकृत्य केलक) विद्यापति (मैथिली बला, संस्कृत बला नै) केँ "हम्मर विद्यापति" ब्राह्मण वर्ग द्वारा बना लेल गेल। मुदा कवीश्वर ज्योतिरीश्वर सन बहुत रास कवि पञ्जीमे उपलब्ध छथि। आ जे नामक अन्तर विद्यापतिमे आबि जाइ छन्हि (जखन कि सभ काज प्लानिंगसँ भेलै तैयो एकटा सबूत बचि गेलै) से ज्योतिरीश्वरमे किए नै अबैए। आब आउ गएर ब्राह्मण द्वारा गाओल बिदापत, जे ज्योतिरीश्वरसँ पूर्व (सम्भवतः) नौआ ठाकुर जातिमे भेल रहथि आ तकर प्रमाणमे ज्योतिरीश्वर द्वारा वर्णन रत्नाकरमे ऐ कविक चर्चा अछि। विद्यापतिक कोनो पदावलीक रचनामे अपन संस्कृत/ अवहट्ठ लेखक हेबाक चर्च नै केने छथि। मुदा हुनकर रचना (संस्कृत आ अवहट्ठक विरुद्ध, जे दोसर विद्यापतिक रचना छी, जे ब्राह्मण रहथि) सर्वहाराक लेल जे दर्द अछि से संस्कृत आ अवहट्ठक विद्यापतिमे किए नै अछि? संस्कृत आ अवहट्ठक विद्यापति तँ सर्वहारासँ घृणा करै छथि आ लिखित रूपमे कट्टर ब्राह्मण छथि। मुदा पदावलीक विद्यापति तँ निश्छल छथि, किछु कट्टर पद कट्टर ब्राह्मणवादी सम्पादक लोकनि द्वारा घोसोआओल गेल अछि (हास्यास्पद रूपमे)। पिआ देसान्तर (विद्यापतिक बिदेसिया)क कन्सेप्ट आब सुधीगणक समक्ष अछि आ मैथिल बिदेसिया लोकनिक वर्तमान दुर्दशाक बीच ई महाकवि विद्यापतिक प्रति ससम्मान अर्पित अछि। की ई दर्द अवहट्ठ आ संस्कृतक विद्यापतिमे छन्हि? पदावली एकटा पैरेलल संस्कृतिक द्योतक अछि। एक्के समयमे संस्कृत आ अवहट्ठ एक्के लेखक लिख लेत, ओकरा कष्ट छै जे अवहट्ठमे लिखलापर विद्वान ओकर उपहास करै छथि, मुदा ई दर्द की एकर लेशोमात्र पदावलीक विद्यापतिमे छन्हि? ओतए तँ उल्लास आ दर्द छै, सर्वहाराक उल्लास आ दर्द। ओ विद्यापति जे संस्कृत आ अवहट्ठ मे लिखलन्हि ओ राजपण्डित छला से विद्वान रहथि, हुनका अवहट्ठोमे लिखलापर लोक निन्दा करन्हि। मुदा मैथिलीक विद्यापति जे पैरेलल परम्पराक अंग छथि, ओइसँ दूर छला। ई पैरेलल परम्परा ऋगवेदक समयसँ छै (ओइ समयमे नाराशंसी रहै)। ई पैरेलल परम्पराक विद्यापति नौआ ठाकुर जातिक रहबे करथि, वा ब्राह्मण जातिक रहबे करथि, से इतिहास ओइपर मौन अछि। मुदा लोककथा आ परम्परा, बिदापतक सर्वहारासँ सघन सम्बन्ध, बिस्फीक परम्परा हुनका गएर ब्राह्मण सिद्ध करैए। संस्कृत आ अवहट्ठक कोनो पाँति नहिये ओइ विद्यापतिक पदावलीक चर्चा करैए आ नहिये पदावली पदावलीक विद्यापतिक संस्कृत वा अवहट्ठ केर रचनाक चर्चा करैए। संस्कृत आ अवहट्ठ मुस्लिम आक्रमणक, जनौ आ मन्दिर भ्रष्ट हेबापर दुखी अछि मुदा पदावली तँ सर्वहाराक हर्ष, उल्लास आ संघर्ष अछि; ओइ तरहक हाक्रोस ओतए नै, हुनका समएमे तँ प्रायः मुस्लिम मिथिलामे रहबो नै करथि।आ जखन मैथिलीबला विद्यापति ब्राह्मण रहबो करथि वा नै तहीपर सवाल अछि तखन पाग पहिरा कऽ कोन सोच हम सभ पैदा कऽ रहल छी, "विद्यापति" हम्मर छलाह कि नै? की विद्यापतिक ब्राह्मण नै रहलासँ ओ हमर नै हेताह? की हुनकर "पिआ देशांतर" बला माइग्रेशन बला गीत महत्वहीन भऽ जेतै? की हुनकर शृंगारिक गीतक मात्र चर्चा कोनो षडयंत्र तँ नै? विद्यापति सन कविकेँ पाग पहिरा कऽ जातिगत बन्धनमे बान्हब कतेक सही अछि? "मध्यकालीन मिथिला"मे विजय कुमार ठाकुर लिखै छथि: "मिथिलाक धार्मिक क्षेत्रमे एहि सामन्तवादी युगीन धार्मिक विचारधाराक प्रभाव एहन सर्वव्यापी छल जे एखनहुँ एहि परम्पराक निम्नलिखित अवशेष समाजमे विद्यमान अछि: ...(घ) पाग सेहो तांत्रिक विचारधारासँ सम्बद्ध अछि।" (पृ.२६) तँ ईहो तंत्र मंत्र बियाह उपनयन धरि ने रहए दियौ। किए ओइ पैरेलल परम्पराक विद्यापतिकेँ ओइमे सानै छियन्हि। आ ई कुकृत्य किशोरीकान्त मिश्रक मिथिला सांस्कृतिक परिषद केलक। ऐ तरहक लोक जै मिथिलाक संस्कृतिक रक्षक, ओ संस्कृति आ भाषा जँ आइयो बाँचल छै, तँ ई ओइ संस्कृति आ भाषाक विशेषता छिऐ। आ रामलोचन ठाकुर अही प्रतिक्रियावादी "किशोरीकान्त मिश्र"क मंचसँ मंच सापेक्ष बयान देलन्हि (उपन्यासक संख्याक सम्बन्धमे) जकर कोनो ऐतिहासिक महत्व नै छै। चेतना समितिक पत्रिकामे मानेश्वर मनुज सेहो मंच सापेक्ष बयानमे जगदीश प्रसाद मण्डलक उपन्यासक संख्या मात्र ४ लिखलन्हि!!! जगदीश प्रसाद मण्डलक नाममे जँ मण्डल टाइटिल नै रहैत मात्र जगदीश प्रसाद रहैत तँ रमानाथ झाक अनुयायी हुनका श्रोत्रिय, अमर-रामदेव झाक अनुयायी हुनका ब्राह्मण आ "लालदासक स्मारिका"क लेखक वर्मा जी हुनका कायस्थ घोषित कऽ दैतथि। आ ्जँ जगदीश प्रसाद मण्डलक फोटो उपलब्ध नै रहितै तँ किशोरीकान्त मिश्रक प्रतिक्रियावादी मिथिला सांस्कृतिक परिषद जगदीश प्रसाद मण्डलक यज्ञोपवीत संस्कार कऽ हुनका पाग पहिरा फेर वएह कुकृत्य करितए जे ओ विद्यापतिक संग एक हजार सालक बाद केलक। आ बेरमाक कोनो बुढ़बा माटिक ढिमकाकेँ देखबैत जगदीश प्रसाद "झा/ ठक्कुरः" केर काल्पनिक घराड़ी, यएह छी, घोषित कऽ दितए। मलंगियाक बेटा, रामदेव झाक बेटा आ ढेर रास छद्मनामीक देल गाड़ि सेहो विदेहमे बिना काँट-छाँटक छपने अछि, जे लोक पढ़ि सकए, किछु गाड़ि जे नै छापल जा सकैए, सएह टा नै छपने छी। आ गारिक डरसँ अखन धरिक मैथिली आ मिथिलाक इतिहासकार ऐ विषयपर इशारा तँ केलन्हि मुदा आगाँ नै बढ़ला। तेँ ओ ज्योतिरीश्वर(१२७५-१३५०) पूर्व विद्यापतिये रहथि से फेर सिद्ध होइए। जयदेव (लगभग १२००)क गीत-नृत्य आ किरतनियाँ ज्योतिरीश्वर पूर्व विद्यापतिक पदावली मेल खाइत अछि, संस्कृत आ अवहट्ठबला विद्यापतिक काव्य सौष्ठवसँ मेल नै खाइत अछि। आब पुनः आबी मिथिला सांस्कृतिक परिषदक मंच जतएसँ रामलोचन ठाकुर मंच सापेक्ष बयान देलन्हि। ई परिषद विद्यापतिक यज्ञोपवीत संस्कार नै, मैथिलीक यज्ञोपवीत संस्कार केलक। ओकर विद्यापतिकेँ पहिराओल पाग, कोलकातासँ बिन्ध्येश्वर मण्डल आ श्रीकान्त मण्डलकेँ लुप्त कऽ देलक आ मैथिलीक यज्ञोपवीत संस्कार पूर्ण भऽ गेल। संस्कृत आ अवहट्ठबला विद्यापतिक जातिगत कट्टरताक बानगी देखी:- कीर्तिलता- जाति-अजातिक विवाह अधम कएँ पारक। पुरुष-परीक्षामे विद्यापति कथा कहैत-कहैत लेखकीय वक्तव्य दै छथि कि राजपूतक स्त्री चरित्रहीन होइत अछि, ई ओहिना भेल जेना अथर्ववेदमे शूद्रक पत्नीकेँ बिना स्वीकृतिक कियो हाथ पकड़ि लऽ जा सए बला वक्तव्य। संस्कृत आ अवहट्ठबला विद्यापति जाति-अजातिपर विशेष बल दै छथि, रक्त शुद्धता/ जाति हुनका लेल महत्वपूर्ण छन्हि। संस्कृत आ अवहट्ठबला विद्यापति कहै छथि- अकुलीन कोनो दयाक अधिकारी नै अछि!! आ सौन्दर्य मात्र धनिक आ विशिष्ट वर्गक एकाधिकार अछि!! संस्कृत आ अवहट्ठबला (किशोरीकान्त मिश्रक मिथिला सांस्कृतिक परिषदक जनौ आ पागबला) विद्यापति कहै छथि- जाति सामाजिक जीवनमे अन्तिम निर्धारक तत्व अछि। जे खराप कुलमे जन्म लैए ओ दुष्ट दिमागक साँप मात्र बनि सकैए!! किशोरीकान्त मिश्रक मिथिला सांस्कृतिक परिषदक जनौ आ पागबला संस्कृत आ अवहट्ठबला विद्यापति कहै छथि- ओ देश जतऽ जातिक निअम लागू नै होइए से म्लेच्छ देश थिक( Aspects of Society and Economy of Medieval Mithila)- Upendra Thakur अमीर खुसरोसँ पहिने पागक वर्णन हमरा नै भेटल अछि। मुदा ज्योतिरीश्वर पूर्व विद्यापति (पदावलीक लेखक) कहै छथि:- नृप इथि काहु करथि नहि साति। पुरख महत सब हमर सजाति॥ ताहि द्वारे राजा ककरो दण्ड नहि दैत छथि आ सभटा पैघ लोक एके रंग छथि। गोविन्ददासक पद्यो क्लिष्ट छलन्हि आ एकर समानान्तर परम्परा सेहो नै छल (सम्भवतः सवर्ण मध्य प्रचलनक कारण ई दुनू चीज छल), से बिदापत नाच जकाँ ओ एतुक्का माँटिमे संरक्षित नै भऽ सकल। गंगेश उपाध्यायक तत्त्वचिन्तामणिक चर्चा मुदा वर्धमान जे हुनका सुकविकैरवकाननेन्दुः कहै छथि, ओ कविता सभ कतऽ गेल? पक्षधर लिखैपर प्रतिबन्ध लगेलन्हि मुदा रघुनाथ शिरोमणि आ हुनकर शिष्य “उदयन” आ “गंगेश”क कृतिकेँ रटि कऽ चलि गेलाह आ नवद्वीपमे नव्य-न्याय स्कूलक स्थापनाक संगे बंगालसँ विद्यार्थी एनाइ बन्द भऽ गेल। ज्योतिरीश्वर पूर्व विद्यापति:- कश्मीरक अभिनव गुप्त (दशम शताब्दीक अन्त आ एगारहम शताब्दीक प्रारम्भ)- ग्रन्थ “ईश्वर प्रत्याभिज्ञा- विभर्षिणी” मे विद्यापतिक उल्लेख करै छथि। श्रीधर दासक सदुक्तिकर्णामृत, - श्रीधर दास विद्यापतिक पाँच टा पद उद्धृत केने छथि जे विद्यापतिक पदावलीक भाषा छी। “जाव न मालतो कर परगास तावे न ताहि मधुकर विलास।” आ “मुन्दला मुकुल कतय मकरन्द” (मध्यकालीन मिथिला, उपेन्द्र ठाकुर) ज्योतिरीश्वर (१२७५-१३५०)  षष्ठः कल्लोल- ॥अथ विद्यावन्त वर्णना॥….. विदातञो आस्थान भीतर भउ. तका पछा तेलङ्गी. मरहठी. वि।दओतिनी दुइ चित्रकइ गाङ्ग जउन निहालि अइसनि देषुअह. चउआञ्चरि चीरि एकहोङ्क परिहने …….से कइसन देषु. जइसे प्रयागक्षेत्र सरस्वतीकेँ गङ्गाजमुनाक सम्वाहि। का हो तइसे ता विदाञोतके दुअओ सम्वाहिका हो भउअह . दशञुन्धी राजा अवधान कराउ. विदाञोत आस्थान वइसु. (विदाञोत (पुरुख) भीतर भेल, तकर पाछाँ तेलङ्गी, मरहठी। विदओतनी (स्त्री) दूटा रंगक गङ्गा यमुनामे नहायलि एहन देखाइए। चारि-चारि आँचरबला चीर एकहकटा पहिरने। से केहन देखू. जेना प्रयागक्षेत्र सरस्वतीकेँ गङ्गाजमुनाक संगबे तेहने ओइ विदाञोतकेँ दुनू सम्वाहिका। दशञुन्धी राजाकेँ अवधान करेलक, विदाञोत स्थानपर बैसला। अष्टमः कल्लोलः- ॥अथ राज्य वर्णना॥ …विदाञोत त।न्हिक गीत. नृत्य. वाद्य. ताल. घाघर परिठरइतेँ आह… विदाञोत लोकनिक गीत, नृत्य, वाद्य, ताल, घाघर पहीरि कऽ भेल। उगना महादेव: महादेव (उगनारूपी) विद्यापतिक ऐठाम गीत सुनबा लेल उगना नोकर बनि रहै छलाह। मैथिलीक आदिकवि विद्यापति (ज्योतिरीश्वर पूर्व) आ विद्यापति ठक्कुरः (संस्कृत आ अवहट्ठक लेखक आ राजा शिवसिंहक दरबारी) दुनूसँ सम्बद्ध कऽ उगनाक ई कथा प्रसिद्ध भेल। बोधि कायस्थ: विद्यापति ठक्कुरःक पुरुष परीक्षामे हिनक गंगालाभक कथा वर्णित अछि। महाकवि विद्यापति (ज्योतिरीश्वर पूर्व मैथिली पदावली सभक लेखक) क विषयमे सेहो गंगालाभक ई कथा प्रचलित छल आ बादमे विद्यापति ठक्कुरक (संस्कृत आ अवहट्ठक लेखक) विषयमे सेहो गंगालाभक ई कथा प्रचलित भेल। विद्यापति ठक्कुरःक संस्कृत साहित्य मिथिलाक विद्वान परम्पराक लोपक बाद सोझाँ आएल, आ संस्कृत साहित्यमे विद्यापति ठक्कुरःक कोनो खास चर्च नै भेटैत अछि आ बंगालक विद्यार्थीक एनाइयो कम भऽ गेल छल, जे अबितो रहथि हुनका लेल विद्यापति ठक्कुरःक संस्कृत आ अवहट्ठ साहित्य समकालीनक साहित्य छल जे खतम होइत विद्वता परम्पराक साहित्य छल आ सेहो तखन लिखाइये रहल छल, मुदा ज्योतिरीश्वर-पूर्व पदावली प्रसिद्धि प्राप्त कऽ लेने छल। ओइ कालक गोनू वा विद्यापतिक समय पाग रहबो करए सेहो निश्चित नै, कारण अमीर खुसरो (१२५३-१३२५) मात्र एकर चर्च केने छथि। विजय कुमार ठाकुर एकरा सामन्तवादी प्रतीक आ तंत्र मंत्रसँ सम्बद्ध मानै छथि। मुस्लिम आक्रमणक बाद अधीनस्थ सामन्तकेँ ई पहिराओल गेल हएत आ ई मुस्लिम टोपीसँ मेल खाइतो अछि, आ मात्र ब्राह्मण-कायस्थ मुस्लिम आक्रमणक बाद मिथिलामे सामन्त रहथि (राजपूत नै) आ आइयो अही दू वर्गक बीच ई कहियो काल बियाह आदिमे प्रयुक्त होइए। महाकवि विद्यापति- कवीश्वर ज्योतिरीश्वर(लगभग १२७५-१३५०)सँ पूर्व (कारण ज्योतिरीश्वरक ग्रन्थमे हिनक चर्च अछि), मैथिलीक आदि कवि। संस्कृत आ अवहट्ठक विद्यापति ठक्कुरःसँ भिन्न। सम्भवतः बिस्फी गामक नौआ ठाकुर श्री महेश ठाकुरक पुत्र (परम्परा अनुसार)। समानान्तर परम्पराक बिदापत नाचमे विद्यापति पदावलीक (ज्योतिरीश्वरसँ पूर्वसँ) नृत्य-अभिनय होइत अछि। विद्यापति ठक्कुरः १३५०-१४३५ विषएवार बिस्फी-काश्यप (राजा शिवसिंहक दरबारी) आ संस्कृत आ अवहट्ठ लेखक। कीर्तिलता, कीर्तिपताका, पुरुष परीक्षा, गोरक्षविजय, लिखनावली आदि ग्रंथ समेत विपुल संख्यामे कालजयी रचना। ई मैथिलीक आदिकवि विद्यापति (ज्योतिरीश्वर पूर्व)सँ भिन्न छथि। ६ जगदीश प्रसाद मण्डल- एकटा बायोग्राफी... भुमहुर आगि‍ जकाँ गामक राजनीति तरेतर जोड़ पकड़ए लागल। भगवती‍ स्‍थान अगुआएल। तइ संग एकटा आरो भेल। आरो ई भेल जे खुदरा-खुदरी सभ कि‍यो सभ-स्‍थान (देव स्‍थान) अबै-जाइ छलाह मुदा मने-मन बँटाएल छलाह। खाली डि‍हवारे स्‍थान सार्वजनि‍क बूझल जाइ छल। जेकर स्‍पष्‍ट रूप बि‍‍आह, मूड़न, उपनैन इत्‍यादि‍मे देखल जाइत अछि‍। डि‍हवार स्‍थान एकहरे वंशक स्‍थापि‍त कएल अछि‍। दुर्गापूजा एकहरे दि‍यादकेँ तोड़लक। भेल ई जे एकहरे परि‍वार (दि‍यादी) गामक ब्राह्मणमे सभसँ नमहर दि‍यादी अछि जे दू टोलमे वि‍भाजि‍त छथि‍। उत्तरवारि‍ टोल आ दछि‍नवारि‍ टोल। बड़की पोखरि‍क उत्तरवरि‍यो आ दछि‍नवरि‍यो महारपर दुर्गापूजा होइत अछि‍। पोखरि‍ बीचमे सीमा अछि। गामक सीमा (टोल-टोलक) गजपटे रहि‍ गेल। जना आन-आन गाममे कतौ सड़क सीमा होइए तँ कतौ स्‍कूल, से नै भेल। पानि‍येमे सीमा गड़ा गेल। उत्तरवारि‍ दुर्गा-स्‍थानक अगुआइ बेरमा नि‍वासी मधेपुर ब्‍लौकक प्रमुख आ जगदरक नथुनी सि‍ंह केलनि‍। प्रमुख गामक भगि‍नमान, तँए एकहरे परि‍वारमे गुन-गुनी उठल। मुदा दुनू गोटे माने प्रमुखो आ नथुनि‍यो सि‍ंह एकहरे परि‍वारसँ दुर्गाक माटि‍ लेलनि‍। दछि‍नवारि‍ टोलक एकहरे अपन स्‍थान बूझि‍ दस-आना छ-आना हुअए लगलाह। आबाजाहीमे बढ़ोतरी भेल। भोज-भात सेहो बढ़ल। ओइ समए बचनू मि‍श्र जे राजनीति‍क दृष्‍टि‍सँ माटि‍ धऽ नेने छलाह। आर्थिक वि‍षमता रहबे करनि‍। ओना चारि‍ भाँइक भैयारी छलनि‍। चारू भाँइ गामक सेसर देहबला माने हाड़-काठक। मुदा मुकदमामे ओझरा गेल रहथि‍। दछि‍नवारि‍ टोलक एकहरे परि‍वारमे बचनू मि‍श्रक नीक पइठ रहनि‍। ओ दि‍न-राति‍ एकबट्ट कऽ दछि‍नवरि‍या दुर्गाक माटि‍ सेहो एकहरे परि‍वारसँ लि‍औलनि‍। एकहरे परि‍वार वि‍भाजि‍त भऽ गेल। ब्राह्मण बँटा गेला, जइसँ पूजा-पाठक कोनो अभाव कहि‍यो नै भेल अछि‍। अही बीच कपलेश्वर राउतक बाबा मरलनि‍। पुरोहि‍त अपन ललकारा भरलनि‍। लड़ाइ फँसि‍ गेल। लड़ाइ ई फँसल जे एक दि‍स पुरोहि‍त अपन शक्‍ति‍ देखबए लगलाह तँ दोसर दि‍स कपि‍लेश्वर अड़ि‍ कऽ ठाढ़ भऽ गेल। मुदा पाँचे-सात दि‍नक बीच (सराध-मृत्‍युक बीच) इलाका गनगना गेल। मृत्‍यु दि‍न वि‍वाद तँ नै उठल मुदा नव चेतना जरूर जागल। नव चेतना ई जे पार्टीक भीतर बंधनक रूपमे जि‍नगीकेँ पकड़लक, मृत्‍युक समाचार सुनि‍ते लोकक ढबाहि‍ लागि‍ गेल, जना समस्‍ये हरा गेल। कि‍यो कपड़ा कि‍नए गेल, कि‍यो बाँस काटि‍ चचरी बनबए लागल, कि‍यो अछि‍या खुनए गेल। बजरूआ करखाना जकाँ कारोबार चलल। मुदा जहि‍ना एक कम्‍पनीक इंजनक पार्ट दोसर कम्‍पनीक लगौने अनेरो खड़खड़ाइत-झड़झड़ात रहैत अछि‍ तहि‍ना शुरूहेसँ हुअए लागल। चचरी बनबैसँ पहि‍ने बाँस कटैमे रक्का-टोकी शुरू भेल। रक्का-टोकीक मूल कारण भि‍न्न-भि‍न जाति‍क भि‍न्न-भि‍न्न वि‍धि‍-वि‍धान। मुदा संयोग तँ एहेन भेल जे सभ टोलक लोक एकठाम पहुँच गेलाह। जहि‍ना गजेरी धुआँक गंध लगि‍ते प्रेमी दि‍स आँखि‍ उठा-उठा देखए लगैए तहि‍ना जइ काजक जे प्रेमी ओ अपन-अपन प्रेमी दि‍स ताकए लगलाह। मुदा ऐ बातपर सभ सहमत जे जइ जाति‍क काज छी हुनकर महत बेसी होइ। घरबैया (कपि‍लेश्वर तीनू भाँइ) कुबेरक खजाना खोलने। जइ काजमे जे जरूरति‍ होइ, पुछैक कोनो खगता‍ नै। अपन गाछी-कलम अछि‍, बँसबारि‍ अछि‍। तीनटा बाँस चचरी ले कटल। चचरी बनबै काल केहेन बल्‍ला आ फट्ठा होइ, तइले फेर रक्का-टोकी उठल। मुदा पार्टीक भीतर एहेन-एहेन नेता रहथि‍ जे घरहटि‍यो रहथि‍। तँए हुनके जुति‍सँ चचरी बनल। फेर लकड़ी कटैमे झंझट उठल। एकटा शीशोक (जइमे सारी नै भेल रहै) सूखल गाछ। जइसँ काज चलि‍ सकै छल। मुदा भेल ई जे बि‍ना बुझने-सुझने अपने फुरने दू गोटे फड़ैबला आमेक गाछ काटि‍ कऽ खसा देलक। मुदा कएले कि‍ जा सकैए। सूखल जरनाक सेहो जरूरत अछि‍ये, ओहो शीशो कटाएल। तीन-चारि‍ दि‍न तक डोम लकड़ी उघि‍ते रहि‍ गेल। खैर जे होउ..। मुदा सैकड़ो आदमी एकठाम बैसि‍ असमसान देखलक। पसाही जकाँ कोन लुत्ती कि‍महर उगि‍ कऽ पकड़ि‍ लइत, तेकर ठेकाने ने रहल। एक गोटे असमसानसँ आएल। आन गाम जाइक रहै, दाढ़ी-केश कटा कऽ चलि‍ गेल। दाढ़ी केश तेसर दि‍न कटाइ छै, तहि‍ना सीमा टपैक बात सेहो उठल। जना सौंसे गाम रंग-बि‍‍रंगक पसाही लागि‍ गेल। कोनो एक मुँहरी गप नै, सभ गड़ि‍मुड़ाह। केकरो मुँह कि‍म्हरो तँ केकरो नांगड़ि‍ कि‍म्हरो। मुदा ललकाराक मैदानमे तँ ललकरे जोर पकड़ै छै। तँए कि‍यो अपना तर्ककेँ वि‍तर्क-कुतर्क मानैले तैयारे नै। मुदा जहि‍ना कलकत्ता सड़कपर गाड़ीपर गाड़ी, लगले रहै छै तहि‍ना तते समस्‍या (गप-सपक क्रममे) उठए लागल जे गप्‍पे-गपमे ओझरा जाइ छल। कोनो घटनाक गप कोनो घटनामे मि‍लि‍ जाए। जहि‍ना दू देशक बीच लड़ाइमे सीमा कातक लोककेँ नीन हराम भऽ जाइ छै तहि‍ना गामक लोकक बीच भऽ गेल। पहि‍ल दि‍न बहुतो गोटे नै बूझि‍ पेला, दोसर दि‍न पता चललनि जे कि‍छु गोटे जहि‍ना अपन कुरहड़ि‍‍-टेंगारी लऽ कऽ गेल रहथि‍ ओ संगे नेने चलि‍यो एला, चलनि‍ अछि‍ जे तेराइत तक सभकेँ छुतका लागि‍ जाइ छै, तँए तीन दि‍न ओहो सभ कि‍छु ने करत। जे सभ कुरहड़ि‍‍-टेंगारी लऽ कऽ आएल रहथि‍ हुनका जगदीश प्रसाद मण्डल पुछलखिन‍ जे कि‍अए अनलि‍ऐ? ओ सभ जबाब देलखिन‍ जे झंझारपुरबला पार्टीक (लकड़ी कारोबार केनि‍हार) कुरहड़ि‍‍ छि‍ऐ, आइ समाज दुआरे काज कामै केलौं, जँ कुरहड़ि‍ बरदा जाइत तखन तँ काजे बन्न भऽ जइतए। तही बीच एक गोटा बाजि‍ उठलाह जे आन गामक कुरहड़ि‍ भेल कि‍ने, गामक कुरहड़ि‍केँ ने छुतका लगतै आकि‍ आनो गामक ओजारकेँ छुतका लागत। मुदा कुरहड़ि‍बला गप ओते नै पकड़लक जते केशबला पकड़लक। रंग-रंगक गप चलए लागल। तेरहा सराध होइत तँ दि‍याद-वाद सहि‍त नह-केश दि‍न केश कटौताह, तँए घरवालीकेँ कोनो मतलबे नै। समाजमे एक जाति‍क संग आनो जाति‍ आ एक टोलक संग आनो टोलक लोक रहथि‍ मुदा वैचारि‍क टकराव टोले-टोल, घरे-घर हुअए लागल। वि‍चि‍त्र स्‍थि‍ति‍ बनि‍ गेल। जहि‍ना गाममे झंझट बढ़ल तहि‍ना पंचैति‍यो बढ़ल। अधि‍क पंचैति‍यो बढ़ने झंझट कमबो कएल आ बढ़बो कएल। कि‍यो बजै छल जे जखन मुरदा जरौला बाद पोखरि‍मे नहेलौं, आंगन आबि‍ लोह-पाथर छूलौं, अपना ऐठाम आबि‍ सोहराइ वा मि‍रचाइ खा नहा कऽ कपड़ा बदलि‍ लेलौं तखन छुतका कतेटा अछि‍ जे तैयो लगले रहि‍ गेल। तँ कि‍यो बजै छल जे केश-कट्टा दि‍याद होइ छै कि‍ आनो हेतइ। तँ कि‍यो बजै छल जे काल्हि‍ये दस रूपैया दऽ कऽ केश बनौने छलौं, केना कटा लेब। गाममे गपो चलैत आ पराते भने कि‍छु गोटे केश कटा लेलनि‍। बि‍ना पनचैति‍येक पनचैती भऽ गेल जे केशमे कि‍छु लागल रहै छै जि‍नकर मन मानए कटाबए, नै मन मानए नै कटाबए। दू दि‍न एहि‍ना चलल। तेसर दि‍न छाउर-झप्‍पी हएत। अखन धरि‍ सभ (समाज) कोनो ि‍नर्णए नै केने छल जे की कएल जाए, मुदा परि‍स्‍थि‍ति‍क सामना जरूर कएल जाएत से तय छल, ई सबहक मनमे रहबे करनि‍। जखन जे समस्‍या उठत तेकर समाधान तखने करब। जइ दि‍न छाउर-झप्‍पी छल ओइ दि‍न घरवारी (कपि‍लेश्वर राउत) एकटा समांगकेँ महापात्र ऐठाम पठौलनि। बेरमामे महापात्र नै अछि, कछुबीक पुजबै छथि‍। जेहो सभ नै बाजक चाही सेहो सभ महापात्र कहि‍ ि‍नर्णए सुना देलखि‍न जे नै जाएब, कछुबीसँ आबि‍ ओ समांग बाजल। छाउर-झप्‍पीक समए भेल जाइत रहए। की कएल जाए? बि‍देश्वर ठाकुर (नौआ) बाजल जे छाउर-झप्‍पीक सभ लूरि‍ हमरा अछि‍। हम झँपबा देबै। सएह भेल। राति‍मे सराध कर्ममे पुरोहि‍तक (ब्राह्मण) ओते महत नै होइत अछि जते महापात्रक। ि‍नर्णए कि‍छु नै भेल, भेल एतबे जे जहि‍ना महापात्रकेँ कहलि‍यनि‍ तहि‍ना पुरोहि‍तोकेँ पुछि‍ लि‍अनु। सएह भेल। दोसर दि‍न जखन पुरोहि‍तकेँ पुछल गेलनि‍ तखन ओहो ओहने जबाब देलखि‍न जे नै जाएब। सभ वि‍चारि‍ये नेने रहथि‍। दि‍नेमे बेरूपहर अपनामे बैसार भेल। सर्वसम्‍मति‍ ि‍नर्णए भेल जे पुरोहि‍त-पात्र छोड़ि‍ देल जाए। सराधमे दू काज होइ छै। क्रि‍या-कर्म आ भोज। जे खर्च क्रि‍या-कर्ममे हएत ओ भोजेमे लगा दि‍औ। ओना बरइ सभ गाममे नै छथि‍, कि‍छु गनल-गूथल गाममे छथि, सभ कुटुमैतीमे सघन गूथल छथि‍। जहि‍ना शंख फूकि‍ महाभारत शुरू भेल तहि‍ना शंख फुका गेल। चौबगली गाममे समाचार पसरि गेल। आन-आन गाममे सेहो रंग-बि‍रंगक सवाल उठए लागल। कतौ उठल जे जँ क्रि‍या-कर्म नै हएत, तँ भोज नै खाएब। कतौ उठल जे कि‍यो अपन बाप-दादाक करैए तइसँ कि‍ पंचक (भोज खेनि‍हारक) मुँह छुबा जाएत। कुटुम सभ जि‍ज्ञासा करए अाबए लगलनि‍। जे आबथि‍ हुनकर जबाब होन्‍हि‍ जे सामाजि‍कता टुटने कुटुमैती थोड़े टूटि‍ जाएत। समाज बनि‍ कऽ नै कुटुम बनि‍ कऽ तँ खेबे करब। गामोमे जाति‍क बीच वि‍वाद उठल। मृत्‍युक दसम दि‍न, जइ दि‍न नह-केश कट्टी हएत। भि‍नसुरके पहर करीब आठ बजे बैसार भेल। बैसार अइले भेल जे अखन धरि‍क भोज-भात खाजा-मूंगबापर अँटकल छल। लोकक जीवन स्‍तर एत्ते नि‍च्चाँ छल। ऐठाम खाजा-मूंगबा वा लड्डू तक पहुँचल छल तँए खान-पानमे धक्का मारल जाए। तँए रसगुल्‍ला-लालमोहनक संग पर्याप्‍त दहीक बेवस्‍था हुअए। भोज-भातक ई स्‍थि‍ति‍ अखनो थोड़-थाड़ अछि‍ये मुदा पहि‍ने कि‍छु जाति‍ भोजक मामलामे बदनाम छल। एक बरतन चाह बनल, जि‍नका जते मन फुरलनि‍ से तते पीलनि‍। पान चलल, ओना पान बर्जित अछि तैयो‍। अखन धरि‍ जाति‍क ओझरी छुटि‍ चुकल छल। एगारहो गामक जाति‍ सहमत भऽ गेलाह जे भोज खाएब। वातावरणमे उठल जे कि‍यो अपन माए-बापक कि‍रि‍या-कर्म करत आकि‍ अनकर। तइसँ अनका कि‍ जे अनेरे कुटुम-परि‍वारसँ मुँह फूल्‍ली कऽ लेब। अखन धरि‍क सोझराएल काज देखि‍ सबहक मन हरि‍अर। तइपर चाहक झोंक सेहो रहए। तइमे रसगुल्‍ला-लालमोहन आगूएमे अछि‍, सभकेँ बुझले जे गौआँसँ अनगौआँ धरि‍क हि‍स्‍सा बराबरे अछि‍। गप शुरू होइते तीनू बहि‍न (बेटी) आबि‍ प्रश्न ठाढ़ केलक जे नह-केशक भोज हम करब, प्रश्न जटि‍ल भऽ गेल, तीनू कहै छै हम करब। अच्‍छा कहि‍ तीनू बहि‍नकेँ वि‍दा कएल गेल। मुदा ओझरी लगि‍ते गेल। जखन नमहर भोजक योजना बनि‍ गेल तखन छोटका-छोटकाकेँ तँ रोकए पड़त। कुबेरक भंडार तँ नै छि‍ऐ जे जते निकालब तते बढ़तै। नह-केश भोजमे खाइले केकरा देल जाइ छै ओकरे ने जे कठि‍यारी गेल रहल। भोज कथीक होइ छै, तँ भतभोज। सभ जाति‍क बीच तँ भातक चलनि‍ नै छै। तखन? एक्के काज केनि‍हारमे दू रीति‍ नीक हएत। होइत-हबाइत नह-केश दि‍नक भोजे उठाव भऽ गेल। तीनू बहि‍नकेँ कहल गेल जे भोज नमहर भइये रहल अछि‍ तेहीमे अहूँ सभ जे ि‍दअ चाहै छी से मि‍ला दि‍औ। ओते घरवारीकेँ असान हेतइ। तीनू बहि‍न राजी भऽ गेलीह। दोसर प्रश्न उठल जे पुरोहि‍त-महापात्र नै औताह तेकर की करब। कि‍यो जाति‍क पुरोहि‍त ताकए लगलाह तँ कि‍यो कि‍छु। मुदा कि‍छु आन जाति‍मे शुरू भऽ गेल मुदा से नै भेल। तँए जाति‍मे भेटबे ने कएल। कि‍छु गोटेक वि‍चार जे जखन ओ सभ (पुरोहि‍त-पात्र) एबे नै करताह तखन सोलहो आना छोड़ि‍ दि‍औ। कि‍छु गोटेक वि‍चार जे जखन गामेमे देखै छि‍ऐ राम, सदाय, पासवान इत्‍यादि‍केँ अपन सभ कि‍छु छै तखन हमहूँ सभ कि‍अए ने बना ली। तखन कि‍ हुअए? रामअवतार राउतकेँ पुजबैक भार देल गेलनि‍ आ बि‍देश्वर ठाकुर सहयोगी बनि‍ पुजा देथि‍न। पुजौल केना जाए? कोन जरूरी कोनो चीजक अछि‍, से नै तँ केरे पातपर पुजौताह आ दछि‍नामे दुनू गोरेकेँ एक-एक जोड़ धोती देल जेतनि‍। सएह भेल। सराधे दि‍न (एकादशा) भोज करैक वि‍चार भेल। भोज भलै। काफी जस भोजमे भेल। मुदा जाति‍क बीच जे रि‍एकशन भेल ओ...। अखन धरि‍ दसो दि‍न रंग-रंगक बैसार गामसँ आन गाम धरि‍ होइते रहल। अंतमे रतीश बाबूक (नवानी) ि‍नर्णए भेल, जे जति‍या आगू पति‍या नै लगै छै। सन् सैंतालीस... भारतक स्वतंत्र त्रिवार्णिक झण्डा फहरा रहल छल। मुदा कम्यूनिस्ट पार्टीक माननाइ छल जे भारत स्वतंत्र नै भेल अछि। असली स्वतंत्रता भेटब बाँकी छै... मिथिलाक एकटा गाम… जन्म भेल रहए एकटा बच्चाक.. ओही बर्ख ... ओइ स्वतंत्र वा स्वतंत्र नै भेल भारतमे... पिताक मृत्यु...गरीबी.. केस मोकदमा... वंचितक लेल संघर्षमे भेटलै स्वतंत्र भारतक वा स्वतंत्र नै भेल भारतक जेल.... आइ बेरमामे पाँच-दस बीघासँ पैघ जोत ककरो नै.. ओइ गाममे जीवित अछि आइयो किसानी आत्मनिर्भर संस्कृति... पुरोहितवादपर ब्राह्मणवादक एकछत्र राज्यक जतऽ भेल समाप्ति.. संघर्षक समाप्तिक बाद जिनकर लेखन मैथिली साहित्यमे आनि देलक पुनर्जागरण... जगदीश प्रसाद मण्डल- एकटा बायोग्राफी...गजेन्द्र ठाकुर द्वारा (अनुवर्तते...) अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। २. गद्य २.१.१.डॉ अरूणा चौधरी- लघुकथा- छलना २.जगदीश प्रसाद मण्‍डलक आठ गोट वि‍हनि‍ कथा २.२.डॉ. अजीत मिश्र- लघुकथा- व्यथा २.३.कामिनी कामायनी-लघुकथा- कठजीब २.४.मुन्नी कामत- नाटक- जिन्दगीक मोल २.५.खुशबू झा- मैथिली कथा संग्रह जिद्दी पढलापर २.६.पूनम मण्डल-आकाशवाणी दरभंगाक जातिवादी प्रवृत्तिक विरोधमे वि‍देह वि‍चार गोष्‍ठी सह कवि सम्मेलन २.७.दुर्गानन्‍द मण्‍डल- नेना लेल सुन्दर चि‍त्रकथा २.८..अमित मिश्र- विहनि कथा- परिभाषा २.सन्दीप कुमार साफी दूटा विहनि कथा ३.राम वि‍लास साहु दूटा ि‍वहनि‍ कथा ४.वीरेन्‍द्र कुमार यादव-लघुकथा- बाबाक गाछ १.डॉ अरूणा चौधरी- लघुकथा- छलना २.जगदीश प्रसाद मण्‍डलक आठ गोट वि‍हनि‍ कथा डॉ अरूणा चौधरी, अध्यक्षा, मैथिली विभाग, मगध महिला कॉलेज, पटना विश्वविद्यालय, पटना लघुकथा छलना ओकर नाम छलैक ‘छलना’। हम जखन-जखन ओकर नाम सुनैत छलियैक तँ आश्चर्य होइत छल जे एकर माय-बाप केँ आर कोनो दोसर नाम नहि फुरेलैक ? एक दिन संयोग सँ ओकर माय सँ भेंटि भेल। हमरा रहल नहि गेल। देखिते; पुछिये त लेलियैक- ऐँ यै अहाँकेँ आरो कोनो दोसर नाम बेटी लेल नहि फुराएल ? ओ एकटा दीर्घ निःश्वास छोड़ि हमरा दिस निर्मिमेश दृष्टिएँ तकैत चुपचाप ओतए सँ ससरि गेल। ओकर ताकब हमरा नीक नहि लागल - हम कने अप्रतिभ भए उठलहुँ। किछु दिनक बाद एक दिन छलना, हमरा सँ भेँट करए आएल गोड़ लागि पैर लग बैसि गेल। हम कतबो कहलियैक - उपर सौफा पर बैसि, मुदा कथिलए, ओ ओतहि ओहिना बैसल रहल। बड़ी कालक बाद नहुँ-नहुँ बाजल-अपना ऑफिस मे हमरा नौकरी नहि रखा देब! बरू दाइएक काज करब, खुब मन लगाकए काज करबैक, ककरो शिकाए तक मौका नहि देबैक। हम अहाँ केँ अप्रतिष्ठा नहि होमए देब। एके साँसमे ओ समटा बाजि गेल स्वर कने मध्यम, मुदा उत्साह आ उमंग सँ भरल ओकर हृदयक भावना हमरा वंशी जकाँ खींच रहल छल। ओकर बाजब; ओकर शुद्ध-शुद्ध उच्चारण सुनि आश्चर्यचिकित भेलहुँ- पुछलियैक; किछु, पढ़लो-लिखल छैं ? ओ मुड़ी निहुरौने बाजल हँ, बी.ए. पास छी सुनि जेना हम आकाशसँ खसलहुँ। विश्वासे नहि भए रहल छल ओकर बातक। सोचय लगलहुँ-स्त्रीक घरसँ बहराएब, आजुक स्त्री शिक्षाक बात, सरकारक प्रयत्न, महिलाक उत्थानक प्रति लोकक मानसिकता, जागरूकता, वैश्वीकरणक पराकाष्ठा-भक टुटल-देखैत छी ओहिना पैर लग निहुरल बैसल अछि, छलना। हमरा अनुमान छल-कहुना ‘क’ ‘ट केँ पढ़ि लैत होएत भरिसक। मुदा ई एहन साधारण कद-काठीक छौड़ी एतेक पढ़ल होएत से त’ सपनहुँ मे नहि सोचने छलहुँ। गाम मे पढ़ाई कएने छें ? बाजल-पूना मे बाबू छलथि, ओतहि उच्च विद्यालय सँ मैट्रिक पास कएलहुँ मुदा बाबू चलि बसलाह। बाबूक कमाईसँ कहुना घर चलैत छल। ताहि पर सँ हमर पढ़ाईक खर्च हुनका बड़ शौक छलनि जे बेटी पढ़ि-लिख बडका ऑफिसर बनए। हमहु मने-मन सपना देखैत छलहुँ। मन लगा पढैत छलहुँ जे बाबूक विश्वास नहि टुटैन्ह। मैट्रिक अब्वल नम्बर सँ पास कएलहँु। वजिफा भेटल तँ सपरिवार खूब प्रसन्न भेल। मन मे आन्तरिक सन्तोष भेल जे हमर पढ़ाईक चिन्ता सँ बाबू फारिग भए जएताह ओहिना हुनका पर अपन सात बहिनक दायित्व छलनि। बाबू भाई-बहिन मे सब सँ जेठ। जखन सब छोटे रहथि-हमर दादाक मृत्यु भए गेलनि। ता धरि दसमे मे पढ़ैत छलाह - धरक भार आ बहिन सभक बियाहक समस्या सँ विचलित छलाह। पढुआ कक्का पूनाक एक बैंक मे चपरासीक नौकरी लगवा देलखिन्ह। ताहि सँ सातो बहिन यथासाध्य वर-घर कए निश्चित भए गेलाह। बाबू पारिवारिक दायित्व सँ चैन भए अपन व्यक्तिगत जीवन दिस अग्रसर होइत माय केँ गाम सँ पूना बजा लेलखिन। तीनू गोटा सुख-सुविधा सँ रहए लगलहँु- माय घर सम्हारय, बाबू बैंक आ हम निश्चित सँ कॉलेज...... एक दिन कॉलेज सँ आबि बैग-बस्ता रखिते छलहुँ कि मकान मालकिन स्वर सुनलहुँ - कतए छीयै बैंक सँ फोन आएल अछि- बैंक मे डकैती भए गेल छैक, किछु गोटे घायल अछि, किछुक मृत्यु भए गेल छैक। करेज कांपए लागल मोन सशंकित भेल- की भेलैया ? दौड़लहुँ बैंक दिस। पता लागल बाबूकेँ गोली लागल छन्हि आ ओ अस्पताल मे छथि, खून बहुत बहि गेल छनि, हमर खून देल गेलनि मुदा हमर खून हुनका बचा नहि सकलनि। हमर सबहक दुनियाँ उजड़ि गेल। माए एहि दुःख सँ एखन धरि उबरि नहि सकल अछि। ओकर अन्तर्मन मे कतहुने कतहु बाबूक मृत्युक एकटा कारण हमहुँ छियैक। कारण लगैछ जेना माए सोचैत छल-आब तीन-गोटेक छोट-छीन परिवार, गाम मे रहब-थोड़-बहुत जमीनक उपजा-बाड़ी सँ गुजर-बसर करब। मुदा हमर पढाई आ बाबूक आस, ओकर मोनक बात पूरा नहि भए सकलैक। बाबूक लालसा छलनि, हमर खूब-पढब-लिखब आ खूब नीक वर-घर मे विवाह, करएबाक-लगैत अछि जेना अर्थाभाव मे बहिन सभक विवाहक कमी’ हमर विवाह धनी-गणमान्य परिवार मे कराए पूरा करए चाहैत छलाह। अपन हृदयक टीस केँ हमर उज्जवल भविष्यक निर्माण सँ दूर करए चाहैत छलाह। माएक गाम मे रहबाक इच्छा केँ हमर उज्वल भविष्यक निर्माण सँ दूर करए चाहैत छलाह। माएक गाम मे रहबाक इच्छा केँ मोनमे दाबि बैंक मे नौकरी करिते रहि गेलाह। के जनैत छल जे विधिक विधान एहन होएत ? एहि असामयिक घटना सँ माए जेना माटिक मूरत भए गेल। मृत्युक समाद सँ गम्मी लादि देलक कोनो प्रतिक्रिया नहि, निर्विकार भाव सँ लोकक मूँह तकैत रहैत छल। आस-पड़ोसक लोकक प्रयास सँ ओकरा येन-केन प्रकारेण सामान्य अवस्था मे आनल गेलैक तखन जे ओ क्रन्दन कएलक से कहि नहि, सभ लोक भाव-विहुल भए उठल। कनेक शान्त भेलाक बाद, ओ हमरा गारि-श्राप देमए लागल-ओकर मुँह सँ अन्तिम बहराएल शब्द छलैक-छलना। अपन एहि नवीन नामकरणसँ हमहुँ शत-प्रतिशत सहमत छी कारण नहि हमरा पढ़ैक उत्कंठा रहितए आ नहि बाबूक मोन मे हमर उज्जवल भविष्यक एतेक महत्वाकांक्षा त हम सभ माएक इच्छानुसार गाम चलि गेल रहित हुँ आ हमरा माएक जीवनक संग एतेक टा छल नहि होएत ?

ओकर तँ जीवने उजड़ि गेलैक ! एहने आशा विहीन अन्धकारमय जीवनक कल्पनासँ ओ पुनः जेना बौक भए गेल। एखन ओ सामान्य लोक जकाँ क्रिया-कलाप करैछ किन्तु दिमाग ओकर सुन्न भए गेल छैक। संग रहैत अछि मुदा अनभुआर चलैत-फिरैत, हिलैत-डोलैत कठपुतली सन। हम, अवाक भेल बडी काल धरि ओकर एकतरफा बार्तालाप आ घटना सुनैत रहलहुँ चुपचाप। मोन दुखी अशान्त अखिन्न भए गेल। तथापि एखनो मोन मे जिज्ञासा बनले रहल ओकर नाम की छियैक? हम पुछिये बैसलियैक गे तोहर असली नाम की छौक? ओ मुड़ी निहुरौने उत्तर देलक ‘आशा’। जगदीश प्रसाद मण्‍डलक आठ गोट वि‍हनि‍ कथा- उड़हड़ि‍ एक तँ ओहि‍ना जूरशीतलक भोर, चारि‍ये बजेसँ चन्‍द्रकूप बनि‍ इनार अकास-पताल एक केने, सि‍रसि‍राइत वसन्‍त सि‍र सजबै पाछू बेहाल, जे जतए से ततैसँ पीह-पाह करैत। तइपर तीन दि‍नसँ एकटा नवका गप गाममे सेहो उपकि‍ गेल छै। ओ ई जे कपरचनमा उड़हड़ि‍ गेल। रंग-बि‍रंगक खेरहा-खेरही गाममे छि‍टाइत। ओना उपरका जहाज जकाँ स्‍त्रीगणक बीच गप हवाइ भेल मुदा पुरुखक बीच कोनो सुनि‍-गुनि‍ नै। तँए कपरचनमाक पि‍ता-रघुनाथक लेल धैन-सन। माए कुड़बुड़ाइत मुदा सासुक डरे मुँह नै खोलैत। ओना परगामी भेने माइयो आ पत्नि‍योक मन ओते घबाह नै होइत। होइत तँ ओतए जतए सीमानक आड़ि‍ धारक बाढ़ि‍मे भसि‍या जाइ छै। कुसमा दादीक माने कपरचनमाक दादीक मनमे मि‍सि‍यो भरि‍ हलचल नै। कोनो कि‍ बेटी जाति‍ छी जे अबलट लागत। बेटा धन छी जतए रहत ओतए खुट्टा गाड़ि‍ कऽ रहल। कि‍यो बजैए तँ अपन मँुह दुइर करैए। जूरशीतल पावनि‍, अपने हाथे कुसमा दादी इनारसँ पानि‍ भरि असीरवाद बॅटबे करतीह। तहूमे तेहेन गप परि‍वारक उड़ल छन्‍हि‍ जे बाँटबो‍ जरूरि‍ये छन्‍हि‍। ओना अन्‍हरगरे मनमे उठल रहनि‍ मुदा पहरक ठेकान नै रहलनि‍। जखन गाममे पीह-पाह शुरू भेल तखन फुड़फुड़ा कऽ उठि‍ लाेटा-डोल लेने इनार दि‍स बढ़ली। मनमे ईहो रहनि‍ जे इनार परक असीरवाद बेसी नीक अंगनाक अपेक्षा होइ छै। तँए सभसँ पहि‍ने इनारपर पहुँचब जरूरी बुझलनि‍। आब कि‍ कुशक जौर आ घट थोड़े रहल मुदा तैयो। इनारसँ डोल ऊपरो ने भेल छलनि‍ आकि‍ नवनगरवाली समजि‍या-पुतोहु अबि‍ते देखलनि‍ जे दादी असगरे छथि‍ तँए अवसरक लाभ उठा ली नै तँ पचताइये कऽ की हएत। उपरागी जकाँ बजली- “उढ़ड़ा एलनि‍ की नै?” नवनगरवालीक बोल कुसमा दादीकेँ मि‍सि‍यो भरि‍ नै कबकबौलकनि‍। मनमे नचैत रहनि‍ जे एके पीढ़ी ऊपरक लोकक ने संकोच करैए, हम तँ दू पीढ़ी छि‍ऐ। बाल-बोधक उकठपनो गपक जबाब उकठपने जकाँ ि‍दऐ से केहेन हएत। नवनगरवालीक आँखि‍मे आँखि‍ चढ़बैत बजलीह- “कनि‍याँ, अहाँ कहुना भेलौं तँ पोते-पोती भेलौं। कि‍छु छी कपरचना तँ बेटा धन छी। जँ ककरो लैयो कऽ चलि‍ गेल हेतै तँ सोचि‍ लेने हेतै जे ठाठसँ जि‍नगी केना बि‍ताएब। जतए रहत जगरनथि‍या खन्‍ती गाड़ि‍ देतै।” भादवक बर्खा जकाँ कुसुमा दादीक मुँह बरैसते रहनि‍ कि‍‍ इनारक कि‍नछड़ि‍मे कनबाहि‍ भेल दुलारपुरवाली ठाढ़ छथि‍। मुदा ओ दादीक सभ बात सुनि‍ नेने रहथि‍। मन भि‍न-भि‍ना गेल रहनि‍‍। तइपर जूरशीतलक उखमज जे टटका-बसि‍याक भि‍रंत छि‍हे। टटका नीक आकि‍ बसि‍या। बसि‍या नीक आकि‍ तेबसि‍या। तेबसि‍या नीक आकि‍ अमवसि‍या। मुदा टटका? नवनगरवालीक पक्ष लैत बजली- “सभटा कएल हि‍नके छि‍यनि‍। दुनि‍याँमे नाओंक अकाल पड़ि‍ गेल छेलै जे कपरचनमा नाओं रखलखि‍न।” सतैहि‍या बर्खाकेँ छुटैक आशामे थोड़े छोड़ल जा सकैए। बीचोमे जोगारक जरूरत अछि‍ये।  जँ से नै तँ बि‍ल-बाल होइत कि‍महर-कि‍महर बहि‍ जाएत से थोड़े बूझि‍ पेबै। कुसमा दादी दुलारपुरवालीकेँ कहए लगलखि‍न- “तों सभ फुलक नाओं के बेसी पसि‍न करै छहक, मुदा तोंही कहअ जे जते अपना गाममे फूल अछि‍ ओकर मूल्‍य कि‍ हेबाक चाही। मुदा देखै कि‍ छहक। पोताक नाओं कोनो अधला रखने छी जेहेन चालि‍-ढालि‍ देखलि‍ऐ तेहेन नाउओं रखि‍ देलि‍ऐ।” दादीक उतारा सुनि‍ नवनगरवाली मुँह चमकबैत बाजलि‍‍- “दादी, अबेर भेल जाइ छै। एक चुरूक असीरवाद देती तँ दोथु नै तँ अपन राखथु।” अगुआएल काजकेँ पछुआइत देखि‍ दादी डोल नेनहि‍ नवनगरवालीकेँ कहलखि‍न- “मन तँ होइए जे सौंसे डोल उझलि‍ दि‍अ मुदा अखैन काजक बेर अछि‍। जा तोहूँ घर-अंगना देखहक।” ~ मत्हानि‍ भोटक तीन मास पछाति‍ श्‍याम आ कमलनाथकेँ भेँट भेल। ओना एक गामक रहि‍तो ऐनाहे-ओनाहे सम्‍बन्‍ध दुनूक बीच भोटसँ पहि‍ने छल, मुदा महि‍ना दि‍नक दौड़ एते लग आनि‍ देलक जे एक्के गाछक फल जकाँ बूझि‍ पड़ए लगलै। एक तँ तीन मासक बाकि‍औता गपो-सप आ अपन पार्टीक हारि‍ आ दोसराक सरकारोक हालि‍-चाि‍ल पार्टी लोकक मुँहे सुनब तँ जरूरि‍ये अछि‍। माटि‍क बान्‍हपर चैत-बैशाखमे धूरा-गर्दा उड़ि‍ते अछि‍, तहूमे तेहेन घोड़दौड़क समए अछि‍ जे आरो उड़ि‍ अकासकेँ अन्‍हरौने अछि‍। भोटक हाि‍रसँ कमलनाथक मन झुकल तइ संग परि‍वारक तीन पुस्‍तक सेवा सेहो हराइत-बि‍ड़हाति‍ देखि‍ आरो झूकि‍ गेल। खसल मन कमलनाथ बाजल- “भाय, की हाल-चाल अछि‍?” कमलनाथकेँ श्‍याम आंकि‍ लेलक। हारल लोकक बीच चढ़ा-उतड़ी होइते छै। खसैत कमलनाथकेँ देखि‍ चढ़ैत श्‍याम बाजल- “पूरबते।” श्‍यामक उत्तर पाबि‍ कमलनाथ भक-चकमे पड़ि‍ गेल। पैछला बात बुझने बि‍ना आगू केना बढ़ल जाएत। मने-मन सोचए लगल जे पूर्वतक की अर्थ भेल। मुदा श्‍यामक पूर्वतक अर्थ रहए अपन राजनीति‍। देशक जे हेतइ से देशक लोक जनतै; तइसँ हमरा की। अपन ठीकेदारी, ऑफि‍समे हेरा-फेरीक संग समाजमे सराध-बि‍आह चलैत रहतै, सभ अबाद रहत। ई की सेवा नै भेल? श्‍यामक उत्तर नै बूझि‍ कमलनाथ पुन: दोहरबैत बाजल- “भाय, नै बूझि‍ पेलौं?” अपन गोटी लाल होइत देखि‍ श्‍याम अगुआएल नेता जकाँ वि‍चारए लगल जे अगुआएब तँ ओहए न भेल जे अपन वि‍चारकेँ रूचि‍गर बना दोसरकेँ बुझाएब। मुदा लगले मन चकभौर लेलकै। मुँहा-मुँही बाजब आ मुँह घुमा कऽ बाजब एके भेल। ओहए ने कला छी। अनुकूल होइत श्‍याम बाजल- “भाय, भोटक पछाति‍ जना हमरो मन उड़ि‍या-बीड़ि‍या गेल। पहि‍ने जना करै छलों से आब कहाँ कएल होइए। तखन तँ ढीलो-उड़ीसक दवाइ खा-लेब, से केहेन हएत?” ~ मेकचो पछुआ पकड़ैत ि‍मथि‍लांचलक कि‍सानकेँ अपनो दोख ओतबे छन्‍हि‍ जते सरकारक। कि‍एक तँ ओहो अपनाकेँ जनतंत्रक कि‍सान नहि‍ बूझि‍ पेलनि‍। पाँच बीघा जोतक कि‍सान चुल्हाइ। अस्‍सीक दसकमे गहुमक खेतीक संग सरकारी खादक अनुदान आएल। बीघा भरि‍ गहुमक खेती चुल्हाइ करत। एक बोरा यूरि‍या आ एक बोरा ग्रोमर खादक पूँजी लगबैक वि‍चार केलक। ओना समुचि‍त खादो आ पौष्‍टि‍क तत्वो खेतमे देब जुड़ब-पड़ब परक फुड़ब भेल। ब्‍लौकक माध्‍यमसँ खाद भेटै छै। पाँच दि‍न बरदा चुल्हाइ भी.एल.डब्‍ल्‍यूसँ फर्म भरौलक। तीन दि‍न पछाति‍ कर्मचारि‍यो लि‍खि‍ देलखि‍न। दू दि‍न पछाति‍ बी.ओ. सहाएब लि‍खला पछाति‍ फर्म ब्‍लौक ऑफि‍स पहुँचत जे आठम दि‍न भेटतै। फार्म जमा केला पछाति‍ घरपर आबि‍ चुल्हाइ चपचपाइत‍ पत्नी रूसनी लग बाजल- “ऐ बेर अपन गहुमक खेती नीक हएत!” पति‍क चपचपीमे चपचपा रूसनी चपि‍-चपि‍, गौंचि‍आइत नजरि‍ दैत बाजलि‍- “फगुआमे नवके पुड़ी खाएत।” तीस दि‍सम्‍बरकेँ चुल्हाइ गहुम बाउग केलक। पच्‍चीस कि‍लो कट्ठा उपज भेल। टुटैत उपजाक टुटैत चुल्हाइक मन पत्नीकेँ कहलक- “ऐ बेरसँ नीक पौरुके भेल। चालीस कि‍लो कट्ठा भेल रहए।” रूसनी- “एना कि‍अए भेल?” चुल्हाइ- “तेहेन चमरछोंछमे पड़ि‍ गेलौं जे मेकचो-पर-मेकचो लगैत गेल। जइसँ बाउग करैमे डेढ़ मास पछुआ गेलौं। तँए उपजा टूटि गेल।‍” पति‍क घाउपर मलहम लगबैत रूसनी बाजलि‍- “खेती जुआ छि‍ऐ। हारि‍-जीत चलि‍ते रहै छै। तइ ले कि‍ हाथ-पएर मारि‍ बैसि‍ जाएब।” बि‍सवास भरल पत्नीक बात सुनि‍ संकल्‍पि‍त होइत चुल्हाइ बाजल- “फेर एहेन फेरि‍मे नै पड़ब।” ~ झुटका वि‍दाइ जहि‍ना हारल नटुआकेँ झुटका वि‍दाइ होइ छै तहि‍ना ने हमरो सहए भेल; मनमे अबि‍ते प्रोफेसर रतनक चि‍न्‍तन धार ठमकि‍ गेलनि‍। पि‍ताक श्राद्ध-कर्म समपन भेलाक तेसरा दि‍न प्रो. रतन दरबज्‍जाक कुर्सीपर ओंगठि‍ कऽ बैस; बीतल काजक समीक्षा करैत छलाह। जहि‍ना नख-सि‍ख वर्णन होइत तहि‍ना ने सि‍ख-नखक सेहो होइए। मुदा काजक समीक्षा तँ मशीन सदृश होइत। जे पार्ट पाछू कऽ लगौल जाइत खोलबा काल पहि‍ने खुजैत अछि‍। प्रो. रतन छगुन्‍तामे पड़ल छथि‍ जे समए कतएसँ कतए ससरि‍ गेल आ....। आब‍ कि‍ थारी-लोटा आ कपड़ा-लत्ताक घटबी ओइ तरहेँ अछि‍ जना पहि‍ने छल। कहू जे ई केहेन भेल जे एते रूपैआ लोटा पाछू गमा देलौं। जँ समाजक बात नै मानि‍तौं दोखी होइतो, मानलौं तँ कि‍ मानलौं। लोटाक चर्च हुनका सभकेँ करक चाहि‍यनि‍। तहूमे तेना लाबा-फरही करए गललाह जे इस्‍टिलि‍या केना देबै, लोहा छी अशुद्ध होइए। नि‍अमत: फूल, पि‍तरि‍ वा ताम हेबाक चाही। चानी-सोना तँ राजा-रजबारक भेल। वि‍चार अनि‍वार्य भऽ गेल। फेर एहेन प्रश्न कि‍अए उठल जे घरही नै दऽ बच्‍चासँ बूढ़ धरि‍ जे पंच औताह सभकेँ होन्‍हि‍। सि‍यानोक पनि‍पीबा ओहए हएत जे धीया-पुताक?‍ तखन तँ लोटासँ लेाटकी धड़ि‍क ओरि‍यान करू। तहूमे तेहेन अनरनेवा गाछ जकाँ भरि‍गर गाछ ठाढ़ कऽ केलनि‍ जे हाइ स्‍कूलक शि‍क्षक गंगाधर लोटाक संग धोति‍यो बँटलनि‍। तइठाम एको अलंग नै करि‍तै; से केहेन होइत। बजारसँ घुमला पछाति जहि‍ना नीक वस्‍तु देखलापर‍ मनमे उमकी उठैत तँ अधला देखलापर डुबकी लि‍अए पड़ैत, सएह ने भेल। प्रो. रतनक मन कोसी-कमलाक एकबट्ट भेल पानि‍ जकाँ घोर-मट्ठा भऽ गेलनि‍। चि‍लहोरि‍ जकाँ झपटैत पत्नीकेँ कहलखि‍न- “मन बि‍साइन-बि‍साइन भेल जाइए आ अहाँकेँ एक कप चाहो ने जुरैए?” पति‍क आदेश सुनि‍ सुजीता चाहक ओरि‍यान केलनि‍। चाह दैत सुजीता, पॅजरामे बैसि‍ जट-जटीन जकाँ पुछलखि‍न- “की भेल जे एना मन वि‍धुआएल अछि‍?” ओना चाहक चुस्‍कीसँ रतनक बि‍सबि‍सी कनी कमलनि‍ मुदा नि‍ड़कटोबलि‍ भऽ कऽ छूटल नै छलनि‍। ओही झोंकमे झोंकि‍ देलखि‍न- “हएत कि‍ झुटका वि‍दाइ भेल।” पति‍क बात सुजीता नै बूझि‍ सकलीह। बुझि‍यो केना सकि‍तथि‍? मुदा रोड़ाएल दालि‍क सुगंध जकाँ अनुमानए लगली। मनमे जे कुवाथ भेल छन्‍हि‍‍ से जाबे खोलता नै ताबे केना बूझब। जँ कोनो तेहेन बात रहि‍तनि‍ तँ एना साँप जकाँ गैंचि‍या-गैंचि‍या कि‍अए चलि‍तथि‍। बजलीह- “कनी काल अराम करू, हमरो हाथ काजेमे बाझल छलए, ओकरा सम्‍हारि‍ लइ छी।” ~ मुँहक खति‍यान ऐ बेर दुर्गापूजाक नव उत्‍साह अछि‍। उत्‍साहो उचि‍ते, हाले-सालमे मलेमासक वि‍दागि‍री भेल अछि‍‍। एक दि‍न माघ बीतने तँ आशा फुड़फुड़ाइत पाँखि‍ झाड़ए लगैत अछि‍, भलहिं पच्‍चीस दि‍नक टप-टप पाला खसैत शीत-लहरी आगू कि‍अए ने हुअए। मुदा से नै, कहि‍यो नावपर गाड़ी चढ़ैए तँ कहि‍यो गाड़ीपर नाव। तहूमे दुनूक बीच, गाड़ी-नावक बीच एहेन रंग-रूपक मि‍लानी रहै छै जे दुनू-दुनूकेँ पीठेपर उठबैए आ पेटोमे रखैए। से ऐ बेर थोड़े हएत, तते ने लोक रौदिआएल अछि‍ जे महारेपरसँ कूदि‍-कूदि‍ उमकत। औझुका दि‍न भगवतीक माटि‍ लेल जाएत। भोजक पाते देखि‍ धीया-पुता चपचपाए लगैत जे खूब खेबनि‍। आखि‍र भोज होइते कि‍अए छै। चारि‍ बजे भोरेसँ पीह-पाह शुरू भऽ गेल। ओना रघुनी भायकेँ बूझल रहनि‍ मुदा तैयो पीह-पाह नीक नै लगैत रहनि‍। कारण रहए जे दि‍नक फल भोजन बूझि‍ क्रमि‍क-काजक क्रि‍या बुझैत। जाबे चौकक हवा पानि‍ पीबए पहुँचैत कि‍ तइसँ पहि‍ने चाहक चुल्हि‍ पजरल देखलनि‍। अपन मनकामना पुरबैत तेतरा दस कप चाहक भोज केलक। भोजन सत्तरि‍मे भोजैत अपन बात बजि‍ते अछि‍ तहि‍ना तेतरा बाजल- “भाय, ट्रेण्‍ड डरेबर भऽ गेलि‍यौ, भगवती दयासँ आब कोनो दुख-तकलीफ परि‍वारकेँ नै हेतै।” दोकानक दोसर बेंचपर बैसल पोखरि‍या असामी रामेश्वर सेहो बैसल। तेतराक बात जना रामेश्वरक छातीमे छेदि‍ केलक तहि‍ना रामेश्वरकेँ भेल। झोंक चढ़ि‍ते बाजल- “बाप जे मड़ूआ लेलकै, से तँ अखैन तक सठाएले ने भेलै हेन...?” रामेश्वरक बात सुनि‍ते तेतरा लोढ़ि‍औलक। मुदा कएल कि‍ जाए? दुनूकेँ थोम-थाम लगबैत कहलखि‍न- “दू घंटा लोककेँ बातो बुझैमे लगतनि‍ तँए दू घंटा दुनू गोरे घरपर जाउ।” घर ि‍दस रामेश्वर बढ़ैत बाजल- “बाढ़ि‍मे घर खसि‍ पड़ल, नै तँ अखने बही आनि‍ कऽ पंचक बीचमे फेकि‍ दैति‍ऐ।” घरमुँहा होइत तेतरा बाजल- “कि‍ बूझि‍ पड़ै छै जे बाबेबला सनकी अछि‍, झाड़ि‍ देबइ। जँ ओकर बाकि‍ये छै तँ मनुख जकाँ फुटमे कहैत।” कोसलि‍या सीकसँ खसल मटकूड़ जकाँ सोमन काकाक मन छहोंछि‍त भऽ फुटए लगलनि‍। बि‍नु भाँग पीनौं अफीमक नशा चढ़ि‍ गेलनि‍। नि‍ताकैत भेल देहकेँ खरौआ जौड़ीसँ घोरल खाटपर चि‍तंग पटकलनि‍। दंगल जकाँ नै जे कि‍छु हारबो करैए, कि‍छु जीतबो करैए आ कि‍छु खि‍चड़ि‍यो बनैए। दोसर कारण छलनि‍। ऊनाइत मन उधि‍या-उधि‍या बजैत जे चारू बेटाक पि‍ता छी, पालन-पोशन करै छी तखन कि‍अए ने बूझि‍ पेलौं जे घरमे कोसलि‍या सेहो बसि‍ रहल अछि‍। मनक सीमा टपि‍ बोल नि‍कललनि‍- “अनेरे परि‍वार-परि‍वार करै छी, सत्तरि‍ बर्खक पसीनाक की मोल रहल। यएह ने जे घरे-परि‍वारेमे एहेन मोइन फोड़ि‍ दुदि‍शि‍या धार बहए लगल। कुट्टी-कट्टा जकाँ जँ दुनू दि‍स धार बनाएब तँ नारक मुट्ठी घुसकबै काल हाथ खड़रेबाक डर रहबे करत।” सोमन काकाकेँ देख घुरनी काकीक मन मि‍सि‍यो भरि‍ नै हलचलेलनि‍। जि‍नगीक अनेको क्रोध देखने छथि‍। अनुभवी छथि‍। कनी फड़ि‍क्केसँ थर्मामीटर लगा काकी काकाक रोग नपए लगलीह। मुदा पुरना थर्मामीटरसँ तँ पुरना रोग परेखमे अबैत नवका केना आऔत। सहए भेलनि‍। ओना सोमन काकाक अपने ठकमुड़ाए गेल रहथि‍ जे एना कि‍अए भेल? मुदा तैयो घुरनी काकी बीख उतारैतक मंत्र चलौलनि‍- “बेसी भीड़ भऽ गेल। मन थीर कऽ कऽ नहा-खा लि‍अ। खा कऽ जखन अराम करब तखन अपने मन चेन भऽ जाएत।” काकीक खट-मधुर गप सोमन काकाकेँ आरो अमता देलकनि‍। झटकीक झटका जकाँ झटहा झटकि‍ देलखि‍न- “जअ-ति‍ल आनि‍ उसरैग दि‍अ। हमहूँ अहाँकेँ उसरैग दइ छी। कोन भाँजमे अनेरे पड़ल छी। जइठाम द्रौपदीसँ लऽ कऽ रघू बाबू धरि‍ कुरसी जमौने छथि‍। तइठाम पार पाएब असान छै।” हूसि‍ गेल भोज खा बाबा अबि‍ते रहथि‍ कि‍ पोता-रमचेलबा मन पड़लनि‍। तखने देखलनि‍ जे तीमन-तरकारीक मोटरी माथपर नेने दछि‍नसँ अबैत अछि‍। मन सहमि‍ गेलनि‍ जे सभ दि‍न पोताकेँ संग नेने जाइ छलौं, आ.....। लगले मनमे एलनि‍ जे जे पूत हरि बाहि‍ करए गेल, देव-पि‍तर सभसँ गेल। तइ बीच हाथमे लोटा देखि‍ रमचेलबा पूछि‍ देलकनि‍- “कतए गेल छेलह बाबा हौ?” बाबा अवाक भऽ गेला। मुदा, आब तँ ओहए सभ ने करत तँए अनुकूल बना राखब जरूरी अछि‍। नि‍धोख कहलखि‍न- “बौआ, तूँ हाटपर गेलह, इमहर वि‍जो भऽ गेलै, तँए कि‍ करि‍तौं?” जहि‍ना नि‍धोख बाबा बजलाह तहि‍ना रमचेलबा बाजल- “बनलह कि‍ने?” बाबाकेँ मन पड़ि‍ गेलनि‍। पूर्वांचलक मणीपुरी भोज भोज, जइमे जे वस्‍तु जते नीक रहै छै ओ ओते पहि‍ने परोसि‍ खुआ दइ छथि‍। मुदा अपना ऐठाम तँ अन्नकेँ अन्न बुझनि‍हार आगूमे आएल पहि‍ल अन्नक पूजा करत। बाबा बजलाह- “बौआ, नीक भेलौ जे तों नै गेलेँ।” अपन बात सुनि‍ रमचेलबा बाजल- “से कि‍ हौ?” अनुकूल होइत रमचेलबाकेँ देखि‍ बाबा कहलखि‍न- “धुर हूसा गेल।” अकचकाइत रमचेलबा बाजल- “से कि‍ हौ?” “कि‍ कहबौ, भात-दालि‍ बड़ पवि‍त्र बनल छलै, तइपर अल्‍लू-परोड़क तरकारी तेहेन बनल छलै जे देखि‍ये कऽ मन हि‍लसि‍ गेल। खूब खेलौं। तेकर बाद जे नीक-नीक वि‍न्‍यास सभ अबै लगल, ओकरा दि‍स के ताकैत।” “तब तँ खूब बनलह?” “अपूछ भऽ गेल।” गति‍-गुद्दा सोलह बर्खक पछाति‍ सुखदेव बम्‍बइसँ गाम आएल। पहि‍लुका सुखदेवा नै जे ठोरनमड़ासँ जानल जाइत छल। ओ सुखदेव जे बम्‍बईक गली-कुचीसँ नोकरी करैत सोलहम जि‍नगी एयर पोर्ट (शि‍वाजी टर्मिनल) पहुँच गेल अछि‍। खाली नोकरि‍ये नै नोकरी तँ ओहनो होइत अछि‍ जे पानि‍ पीऔनि‍हार गलि‍यो-कुचीमे रहैत अछि‍ आ एयरो पाेर्टमे। ओ सुखदेब जे होटलक मसल्‍ला पीसब, टा नै, काजक गति‍ सेहो आ मानसि‍क गति‍ सेहो तेज केलक। ग्रेजुएत सुखदेव, आँफि‍सर सुखदेव, जीप-कार-ट्रकक ड्राइवर सुखदेव। गाम अबि‍ते सुखदेव भजि‍औलक तँ भाँजपर चढ़ल जे खुशीलाले बाबा टा एहेन रहला अछि‍ जि‍नकर समांग नै बहड़ेलखि‍न। पुरना ढर्ड़ाक लोक खुशीलाल बाबा। जि‍नगी ओइठामसँ देखने जइठाम पालकी, महफा, ओसारक ओहार, घरक ओहार चलैत छल। आइ कि‍ देखै छी। मन-चि‍त मारि‍ अपन कुल-खनदानक जड़ि‍मे पानि‍ ढारैत जीव रहला अछि‍। जइठाम गाम हमरा छोड़ि‍ देलक, आ हम गामकेँ छोड़ि‍ देलि‍ऐ, एहेन बहैत धारक त्रि‍वेणी मोरपर खुशीलाले बाबा टा छथि‍। कने जि‍रेलाक पछाति‍ भेँट करबनि‍। तीन बजेक समय। सुखदेव खुशीलाल बाबा ऐठाम पहुँच गोर लागि‍ अपन परि‍चए देलकनि‍। बैसैक इशारो करथि‍ आ सुखदेवक समाचारो सुनथि‍। मने-मन खुशि‍यो होन्‍हि‍ जे अही माटि‍-पानि‍क बम्‍बईक शि‍वाजी टर्मिनलमे ऑफीसर बनल अछि‍। जहि‍ना साँप अपन छन्‍द सुनबैत-सुनबैत पड़ा गेल मुदा गड़ूल देखबे ने केलनि‍। तहि‍ना खुशीलाल बाबा सुखदेवक समाचारमे हरा गेलाह। बजैत-बजैत सुखदेवकेँ बूझि‍ पड़ल जे भरि‍सक हम अपने खि‍स्‍सा सुनबए एलि‍यनि‍। वि‍चार रोकि‍ पुछलखि‍न- “बाबा, अपना दि‍सक कि‍ हाल-चाल अछि‍?” जहि‍ना पुरना संगी पाबि‍ हृदय खोलि‍ सभ गप करैत तहि‍ना खुशीलाल बाबा बजलाह- “बौआ, ऐठामक गि‍रहस्‍तकेँ कोनो गति‍-गुद्दा अछि‍। धार माटि‍ दुइर कऽ देलक। कोसी-नहर ठीकेदार खा गेल। मौनसूनी बर्खाकेँ रौदी खा गेल। की कहबह।” ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ।  डॉ. अजीत मिश्र, मैसूर। लघुकथा व्यथा ‘भाग, भाग एहि ठामसँ, नहि तँ कोनो दशा बाँकी नहि रखबौक, इह मुँह जे लगैत छनि, भागि जो, नहि तँ कान-कपाड़ फोड़ि देबौक’- बंगला भाषामे किछु एहने-एहने वाक्य सुनितो हम अत्यन्त स्थिर भए ओहि रोगीकेँ सान्त्वना दैत कहए लगलहुँ- ‘हे अहाँ घबराउ जुनि, सभ किछु ठीक भए जाएत। मात्र किछु काल स्थिर भए रहू।’ हमर एहन कहला पर ओ आर जोर सँ बपहारि काटए लगलीह, किछु काल लेल तँ हमरो लागल जे कोन कार्यमे फँसि गेलहुँ, मुदा फेर अपनाकेँ मनबैत हुनका शान्त करबाक प्रयास करैत रहलहुँ। मुदा ओहो कोनो एम्हर-ओम्हरकेर माटिसँ नहि बनलि छलीह, लागल जेना भगवान हुनका बनएबामे अपन सभ कलाक प्रयोग कएने छलाह। हमसभ एक दिस आ ओ रोगी दोसर दिस, जे करीब पच्चीससँ तीस वर्षक सुन्दर कायाक एकगोट महिला छलीह, जनिक व्यथा देखि सम्पूर्ण कम्पार्टमेन्टक लोक व्यथित छल, सभ केओ राम-राम, शिव-शिव कए रहल छलाह जे कहुना नीक नहाँति ओ रोगी खड़गपुरधरि पहुँचि जाथि। आइ लागि रहल छलैक जे खड़गपुर हावड़ासँ सए नहि, हजार कीलोमीटर दूर हो। हम एक बेर फेर अपन ज्ञान झाक प्रयोग करबाक निर्णय कए रोगी लग जाए अत्यन्त शान्त स्वरेँ हुनका कहलिएनि– ‘देखू, हमसभ आब मात्र किछुए कालमे खड़गपुर पहुँचि जाएब आ अहाँक उचित प्रतिकार प्रारम्भ होएत। ओतए नामी डॉक्टरसभ आबि अहाँक चिकित्सा करताह, जँ यात्रामे जएबाक योग्य होएब तँ आगाँ चलब, नहि तँ ओतहि उतरि आपस अपन घर चलि जाएब। मुदा एहि एक घंटाक लेल हम किछु दवाइ दैत छी, तकरा मुँहमे राखि जँ अहाँ बीस मिनट धरि किछु नहि बाजब तँ तत्काल अहाँक कष्ट दूर भए जाएत आ हमसभ सेहो गन्तव्य धरि पहुँचि जाएब।’ हमर ई कथन कार्य कएलक, ओ हमर आदेशक पालन प्रारम्भ कए देलनि। हम कहलिएनि- ‘कनी मुँह खोलू तँ, जीहकेँ उपर करु, हँ, हँ, चित्त भए केँ पड़ि रहू।’ हमर सभ आदेशक ओ शतश: पालन कए रहल छलीह। ठीक एहने समयमे मन पड़ि आएल मैथिली साहित्यक प्रसिद्ध एकांकी ‘छींक’, जाहिमे एकटा बंगाली डॉक्टर मैथिलक चिकित्सा कएल करैत छथि, एतए हमरा उनटा अवसर भेटि रहल छल। बंगालीक चिकित्सा एक मैथिलक हाथेँ। हम ओहि एकांकीक किछु डॉयलागकेँ स्मरण कए ओतए प्रयोगमे आनब प्रारम्भ कएल, ‘जुआन’ कहने ‘यौवन’क सन्देहक कोनो डर नहि छल, तेँ निश्चिन्त भावेँ हुनक जाँच प्रारम्भ कएल। हुनक जाँच कएलाक बाद हम एकटा दवाइ हुनकर मुँहमे दए एकबेर फेर बीस मिनट धरि नहि बजबाक आग्रह कएल। किछु काल धरि तँ ओ स्थिर रहलीह, मुदा बीच-बीचमे हुनक आह हमरासभकेँ आहत कए रहल छल। भगवानक रक्ष जे हमसभ खड़गपुर एही स्थितिमे पहुँचि गेलहुँ, ओतए पूर्व सूचना रहबाक कारणेँ रेल विभागक किछु प्रसिद्ध चिकित्सक अपन दल-बलकेर सङ उपस्थित रहथि। गाड़ी रुकतहि ओ सभ ओहि रोगीक लग पहुँचि अपन औजार-पाती सरिआबए लगलाह। ओ सभ अपन कार्यमे लगबे करितथि कि रोगी बहुत जोरसँ चिचिआइत गाड़ीसँ नीचाँ उतरबाक लेल गेट दिस दौड़लीह। सभ हाँ-हाँ करैत हुनका पाछाँ लागल, मुदा ओ तँ एकहि छरपानमे प्लेटफॉर्म पर उतरि चिचिआइत रहलीह। हुनक एहन स्थिति देखि चिकित्सक दलक सङ-सङ परिजन दौड़लाह। मुदा ओ रोगी ककरो अपना लग आबए देबाक हेतु तैआर नहि, ओ जोर-जोरसँ बंगला भाषामे किछु चिचिआ रहल छलीह। एक तँ अस्वस्थता आ दोसर स्टेशनक चहल-पहल, हुनक कोनो वाक्य ककरो बुझबामे नहि आबि रहल छल। एहि उहा-पोहमे विचित्र स्थिति भए गेल, एक दिस गाड़ीकेँ खोलबाक व्यग्रता तँ दोसर दिस रोगीक असहजता, ककरो किछु फुरिए नहि रहल छलैक। रोगीक पति द्वारा बीच-बीचमे सहटबाक प्रयासो कएला पर ओ आरो जोरसँ चीत्कार मारि उठथि। आब हमरहु रहल नहि गेल, नीचाँ उतरि ओहि रोगीक दिस ताकल। हमरा तकला पर लागल जेना ओ रोगी अपन व्यथा हमरासँ बाँटि रहल होथि। किछु आशान्वित भए हुनका दिस बढ़लहुँ, ओ निरपेक्ष रहि हमरा दिस तकैत रहलीह। एतबा कालमे हम हुनका लग पहुँचि गेल छलहुँ, आग्रह-अनुरोध करैत ओहि डॉक्टरक दलकेँ चलि जएबाक हेतु कहि रहलि छलीह। हुनक कहब छलनि जे हम एहि डॉक्टरसभसँ नहि देखाएब, ई सभ हमरा मारि देत। हमर सभक एहि वार्तालापक क्रममे हुनक पति सेहो लगमे आबि गेल छलाह। रोगी एक झटकामे बढ़ि हुनका चेतौनी देब प्रारम्भ कएलनि- “जतबा काल ई डॉक्टरसभ नहि चलि जाएत, हम गाड़ीमे चढ़बे नहि करब, हमरा एहि डॉक्टरसभसँ नहि देखएबाक अछि। हमरा सङ तँ एहेन सुन्दर डॉक्टर छथि, तनिका छोड़ि आब हम ककरोसँ नहि देखाएब।” हुनक एहन कहबाक सङ हमर रोइयाँ ठाढ़ भए गेल, हुनक पति सेहो हमरा दिस किंकर्त्तव्यविमुढ़ भेल देखए लगलाह। हमरा दुहूक स्थिति विचित्र भए गेल छल। हम हुनका बुझबैत कहलिएनि- “देखू, सभ विभागक अलग-अलग डॉक्टर होइत छथि, अहाँ केँ जे बीमारी अछि, तकर हम डॉक्टर नहि। ओकर डॉक्टर तँ ओएह सभ थिकाह, तेँ नीक होएत जे अहाँ हुनकासँ देखबा लिअए।” “नहि, नहि, एहन नहि भए सकैछ। अहाँ डॉक्टर छी ने ? बस हम देखाएब तँ अहीँसँ, नहि तँ ककरोसँ नहि।” एहि बीच गाड़ीक एटेन्डर सेहो आबि हुनका बुझएबाक प्रयास कएलक- ‘एहि डॉक्टरसभसँ देखा लिअए, ई तँ सङमे चलिए रहल छथि, जँ आवश्यकता पड़त तँ ई फेर देखबे करताह।’ मुदा एहि सभक हुनका पर कोनो प्रभावे नहि पड़ि रहल छलनि। ओ अपन जिद्द पर अड़ल रहलीह। अन्तत: रेलवे विभागक ओहि डॉक्टर दलमे सँ एकगोटए हमरा सभक सङ भुवनेश्वर धरि लेल सङ कए देल गेलाह, जाहिसँ बाटमे विषम स्थिति अएला पर उचित प्रतिकार कएल जाए सकए। गप्प एहन छलैक जे हम हावड़ा-मैसूर स्पेशल रेलगाड़ीसँ मैसूर जाए रहल छलहुँ। गाड़ी खुजतहिँ हमर अगिला कम्पार्टमेण्टमे हल्ला-गुल्ला मचि गेल। पछाति पता चलल जे एकटा रोगी ओही गाड़ीसँ भेल्लोर जाए रहल छथि, जनिक स्थिति बड़ गड़बड़ा गेल छनि। हुनका संग चलनिहार व्यक्तिक संग-संग देखनिहार-सुननिहार सभ केओ चिन्तित छलहुँ। ओ विचित्र प्रकारक रोगी छलीह, कष्ट तँ ठीके छलनि, मुदा ओ भगल सेहो खूब कए रहल छलीह, जकर अनुमान प्राय: सभ यात्रीकेँ भए रहल छलनि। सभकेँ आश्चर्य लागि रहल छलनि जे हुनक परिवार एहन रोगीकेँ लए एतबा दूर किएक जाए रहल छथि। ओहि रोगीकेँ एकदम ठीक-ठाक रहैत एकाएक एहन दौड़ा अबैत छलनि, जाहिमे ओ अपन सभ किछु बिसरि घोर कष्टमे पहुँचि जाइत छलीह। हुनक परिवारक कहब छलनि जे करीब तीन महीनासँ हुनक इएह स्थिति छनि, गामसँ शहर धरिक प्राय: सभ नामी-गरामी डॉक्टरसँ जाँच भेल, मुदा बीमारीक पता नहि चलि सकल। अन्तत: हारि-थाकि भेल्लोर जाए जाँच करएबाक योजना बनाओल गेल। एही क्रममे हावड़ासँ गाड़ी खुजलाक दसो मिनट नहि बीतल छलैक कि हुनका ओएह दौरा आबि गेलनि। सभ केओ चिन्तित भए उठलाह, तखने अपन आगाँ राखल यात्रीगणक लिस्टमे हमर नामक आगाँ डॉक्टर लागल देखि ओहि बॉगीक एटेन्डर हमरा समक्ष आबि कहि उठल- ‘सर एक मिनट प्लीज’ एकाएक एटेन्डरक मुँहसँ बंगलामे एहन वाक्य सुनि पहिने तँ चौकलहुँ, मुदा फेर ओकरा अनुसारेँ अपन सीटसँ उठि ओकर लगीच गेलहुँ। ‘ की यौ की गप्प छैक’ - हमहूँ मैथिलीमे पूछि देलियैक। ओ कनी आर लगीच आबि कमे जोरसँ फेर बंगलामे पूछलक- ‘की अपने डॉक्टर छिऐक?’ हम किछु उत्तर दितियैक ताहिसँ पूर्व एकगोट युवक सेहो हमरा सभक बीच आबि अत्यन्त जिज्ञासु भए हमर उत्तर सुनए लगलाह। हम फेर मैथिलीमे कहलिऐक- ‘औजी हम डॉक्टर तँ छी, मुदा दवाइ-बारीक नहि, हम तँ पोथी-पतराबला डॉक्टर छी।’ हमर एहन कहला पर ओहि दुहूक सपना टूटबाक प्रत्यक्ष दर्शन हमरो भेल। दुहू गोटए माथ पकड़ि लगक सीट पर बैसि गेल, आ हम किंकर्त्तव्यविमुढ़ भेल हुनका सभकेँ देखैत रहलहुँ। किछुऐ क्षणक बाद जेना ओहि एटेन्डरकेँ कोनो उपाय सुझलैक, ओ अत्यन्त तीव्रताक संग उठि फेर हमर लगीच आएल आ फुसफुसाइत कहि उठल- ‘सर, अपने तँ पोथी-पतराक डॉक्टर छिऐक, पोथी-पतरातँ सभकेँ मार्ग देखबैत छैक, की अपनहुँ हमरा सभकेँ उचित बाट देखा सकैत छी?’ ओ निरपेक्ष भावेँ सभ किछु बाजि गेल आ एम्हर हम भँवर जालमे फँसैत गेलहुँ। हमरा तँ किछु बुझबामे आबिए नहि रहल छल, हम कोन आ कोना बाट देखेबैक, से फुरिए नहि रहल छल। एहि बीच तेसर व्यक्ति सेहो उठि ठाढ़ भए हमर लगीच आबि एकटक हमरा देखि रहल छलाह। हम तीनूगोटए तीनूक प्रतीक्षामे रही जे आब ओ बजताह तँ ओ। मुदा सभकेओकेँ ठक्कमुड़ी लागि गेल छल। अन्तत: हमहिं चुप्पी तोड़ैत ओहि एटेन्डरसँ पूछि बैसलिऐक- ‘औ की गप्प छैक, कनी फरिछाकेँ तँ कहू, जाहिसँ ओहि समस्याक समाधान ताकल जाए, जाहि हेतु अहाँ सभ अत्यन्त व्यग्र छी।’ हमर एहि वाक्यक ओहि दुहू व्यक्ति पर अत्यन्त प्रभाव पड़ल। फेर हमरा जे कहलनि से सुनि हमरा तँ बुझू साँप सुँघि लेलक, डेग ने आगू बढ़ि रहल छल आ ने पाछू, ने हँ कहैत बनैत छल आ ने नहि कहैत। एही उहापोहमे फँसल हम किछु मिनटक हेतु आँखि मुनि बैसि रहलहुँ। एक दिस छल परहितक मामिला तँ दोसर दिस छल छद्मक आसरा। एकक रक्षा कएने दोसरक अहित भए रहल छलैक, किछु फुरिऐ नहि रहल छल। एकाएक जेना हृदयक कोनो कोनसँ एकटा उहि आएल आ तनि ठाढ़ भए ओहि दुहू व्यक्तिक अनुसारेँ ढोग करबाक निश्चय कए लेल। हुनका सभक कहब छल जे हम तत्काल पोथी-पतड़ा छोड़ि दवाइ-बीरोक डॉक्टर बनि हुनक रोगीक परीक्षण करी आ तत्काल किछु उपाय ताकी। एतबा सूचना तक तँ हम निरपेक्ष बनल रहलहुँ, मुदा हुनका सभसँ अग्रिम जे सूचना भेटल ताहिसँ एहि छद्म रुप धरबाक योजना बना लेल। ओ सभ कहलनि जे एहि रोगीकेँ कष्ट तँ अवश्य छनि, मुदा ताहिसँ बेसी छनि शंकाक बीमारी। जँ हुनका उचित रुपेँ बुझाओल जाए तँ हुनक विषम कष्टकेँ थोड़ेक कालक हेतु रोकल जाए सकैत अछि। ई सूचना हमरा सोचबाक हेतु बाध्य कएलक जे जखन जीवने एकटा नाटक थिक तँ एहि तरहक नाटक कएने कोनो हर्ज नहि। इएह सभ सोचि हम अपन स्वीकृति हुनका सभकेँ दए देल आ बाट भरि डॉक्टर बनि ओहि मानसिक रोगीक उपचार करैत रहलहुँ। एहि क्रममे कखनो हींगोली तँ कखनो पचनोल, कखनो कॉफी बाइट टॉफी तँ कखनो अल्पेनलीभक ‘डोज’ दैत काठपाडी स्टेशन धरि पहुँचि गेल छलहुँ, जतए उतरि ओ रोगी अपनाकेँ पूर्ण ठीक मानि अस्पताल जएबासँ मना कए रहलि छलीह। हमर गाड़ी सीटी देलक आ हम छड़पि अपन गाड़ी धएल। अफरा-तफरीमे ओहि व्यक्तिक फोनो नम्बर नहि लए सकलहुँ, जाहिसँ हुनक बादक स्थितिक पता चलि सकितए। एक दिस तँ अपना माथ पर जीतक मुरेठा बान्हल देखि गद्-गद् भए रहल छलहुँ, मुदा हृदयक कोनो कोनमे एखनहुँ ई व्यथा छल जे की हम ठीक कएलहुँ? ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। कामिनी कामायनी लघुकथा कठजीब नाम त’ हुनक पिता पितामह बड़ दीव ‘अन्नपूर्णा’ धयने छ्लखिंन्ह ,मुदा कपार , कत्त के अन्न आ’ केहेन पूर्ण ? आ’ शने;शने; लोक वेद हुनक नाम के छोट करैत करैत ,अंत मे पुरनी दाय बना क’ भरि टोल कि भरि गाम लेल जेना निश्चित करि देलकइ। हुनक आबक रैन बसेरा वा घर जे कहि दादे कका के गोहाली छल । ओ त’ आब अपने नै छलाह ,काकी छलखिन्ह।त’ हुनके आग्रह प’ ओ जखन अपन पिता के डीह स उपाड़ी फेकल गेली त’ हुनक अनंत धार नॉर के पोछै लेल नबकी काकी अपन आचरि बढ़ोने छलखिन्ह ।अप्पन झोरा झपटा   ,गेरुआ ,सीरक ओछोंन बीछोन टूटलाही फूटलाही कासा ,पितड़िया बासन उसरगलहा लोटा  सब सईत समेट क, रखलन्हि।आ’ ओहि दिन स  ओ हुनक अघोषित अड्डा । भरि टोल मे दु चारि त आँगन एहेन छल जतए हुनक बैसब उठब छल ।मुदा हेम क्षेम त’ सबस ।बड़ कम लोक हुनका अनेरे बइसल वा तमसाइत देखने होयत ।सदिखन कोल्हू के बरद बनल काज मे जुटल ,पाईन बुनि के हुनके चिंता, टहटहौवा रौद के हुनके चिंता , रोपनि  कटनी के हुनके चिंता ,ससुर बाइस बेटी के भार साठे के हुनके चिंता , दुरगमनीया कनिया के अहिब के फड़ बनबए के हुनके चिंता ,भरि गाम के नौतल हकारल अहिबाती  के तेल सिनुर परसब के हुनके चिंता ,पाहून पड़क के आव भगत के हुनके चिंता, एतबा नहि परसौती के दबाए रानहब ,सोइरी मे चिल्का चिलकोड़ लेल चमाइन बजाएब ,किसुनमा दोकान स चीज़ वोस्तआनब   केकरो कोनटा लागि क सीआईडी गिरि करब   , सत पुछू त’  हुनक चिंता अनंत छल ।नई  घर , , नई घराड़ी   आगा नाथ नई पाछा पगहा , , तखन माथ प’ एतेक बोझ  ,, , । तखन जे नहीं करबे पापी पेट , , । ‘दाय    सुने   छथिंह  ,   कनी सोनरबा ओत चली जाथु , , ,एखन धरि नंकिरबा के कानक कुंडल नहीं पठेलकई । , , कखनों  कोनो गाम बाली बाजि उठेक “ये दाय  ,कनी डोमबा के ओत जाकय चारि टा सूप  ,, कोनिया ,डगरा आ’ दुई टा चलनी लेल समाद पठा देथुंह ‘ ,, मुनेशरा के कहने रहिए मार बाढ़ेन्न जरलहबा के अपन ससुरारि मे जाकए बईस  रहलई , , कहथीन कनी परसू भिनसरे पठा देतय’।   आधा घोघ आधा मोड़त काढ़ने कोनो भौज दूरखा स’ झकैत बजा लईत छलिह ‘दीदी , , एखनि धरि संजुआ के बाबू नै एलखींन जोगबन्नी से , ,बड़का गाम बला ,जमाए आबि क’ द्लान प’ बईसल छथिन्ह,घर मे किछू कत्तों नै , , ,एक कप चाह  देबए से नई दूध ,नई चाहक पत्ति , , ,कनी किसुनमा के दोंकान मे ई फुलही थारी बंधकी राखि क’ किछू पाए ल’आबौथ आ’ कनमा भरी घी आ’ मखान सेहो ल’ लिहथि’। आ’ हुनक ई सहयोगात्मक  काज गामे टा  मे नहीं अटकल छल ।दु ई कोश दूर मधबन्नी सहर  “दाय  ,, पर पाहून लेल तुलसी फूल चौर निघटी गेल छईक, , दुइयों सेर ल’ लिहथि , नारिकेरक तेल , कडु तेल ,हींग ,किनको खरपा, टकुआ ,लहठी ,टिकुली ,सिनुर , बांग , फुइस फड़क ,लटखुट ,चरखा,बेलना ,पापड़, पटिया ,, ,जेठक कड़ कड़कडौआ  रौद , , माथ प’   पथिया मे बड़का बोझ रखने  , ,धिपईत कारी स्याह पघिलल पिच रोड , , , पएर मे नै कोनो चट्टी   , , ,घामे पसीने अपस्यात , , सबहक चीज बोस्त किन बैसाही क’ आनि दैत छलिह त’ ओय दिन हुनक बड़ मान, कियो कियो बियेन स’ हौंक सेहो दैन । दिन त’ दिन ,घोर निशा रैतियो मे हुनक निस्वार्थ सेवा लेबा स’ लोक नहि हीचूके ।संकराति के दोसरे राति धीरुवा के पेट मे मोचाड उठलई , , जे ओ छर पट्टी काटय लागल ,, ,घर  मे सुतल अहि खाट प’ कखनो   माए के उठाबै  त’ कखनो ओहि खाट प’ सुतल काकी के , ,।अलसायल ,ओंघाएल दुनु बिछाऊँन प’ पडल पडल बजलथी ‘की होएछो?’ “माए गे बाड़ी जाएब’।  आब त’ दुनु के नींद पड़ेल ।ललटेंमक टेमी उकसबईत माए बजलिह ‘भरी दिन हुरईत रहेत अछि आ’ सुतली राति मे हिनका दिशा फिरबा के ज़ोर मारे  छैन ।अहि जड़ काल मे ,अनहार मे ककरा  उठबिए’ ।काकी के तुरंत फुरेलेंह ‘पुरनी दाय के कहथुन नै’ । “आब के जेतय गोहाली हुनका उठाबै’ । माए कनी ओकताएल सन बजली त’ पितीयानि हाफ़ी लईत सीरक तर स’ बजली “ बिसरी गेलखिन ईएह त’ कहने रह थीन  जे आय कोनो पुरुख पात द्लान प’ नै छै ओसारा प सुति रहबई ,कहथून नै’।  माए सेहो सिरके तर स’सोर  पाड़ली  ‘ दाय , ,यई पुरनी दाय , , ,यई मरि गेलहू की जिबते छी’ ।मुदा हुनक स्वर बाहरि के घोर अंधकार स’ एकाकार होइत शून्य मे बिला गेल छल।इमहर धीरुवा पेट पकड़ने अहि कोन स’ ओहि कोन  मोंगरी माछ जका तड़फैत, , घरे मे भ’जायत गे , , दे ललटेंम , ,हम एसगरे जायब , , मुदा ललटेंमक प्रतीक्षा सेहो नहीं करि सकले आ’ जिन जका दौड़ीक बाड़ी के केवाड़ी खोली चुकल छल ।माय हदबदा  क’ उठली , , ‘भरी दिन अगत्ति धिया पूता के चक्कर मे कनी काल चैन स’ पड़िओ नही सकैत छि राइतो मे सेह’ । आ ओसारा प’ आबि भीम जका फोंफ काटेत दाय के देह हिल्बइत बजली ‘यई भिशिंड़ जका सुतल छी ,, क तेक मोट निन भ’ गेल   , कुंभकरंक कान कटल्हू ,’।दाय हड्बड़ा क’ उठि बैसली ‘की भेले  ,की भेले’ ।त’ माए बजल खिन ‘हे ते की अंगोरा , , धीरुवा अन्हारे मे भागले बाड़ी दिस , डोलमे पानि लक  कनी जाथुन, हैया लीअ ललटेंम’ ।बोरा ओढने खालिए पएर भुतहा बाड़ी मे डोल नेने चलि गेल छलिह। दाय के खेनाय कखनों  अहि आँगन स’ कखनों ओहि आँगन स’ भेटय ।स्त्रीगन सभक कहबी छल जे ओ जीभ के बड़ पातर  ,ओना सब कीछू भकोसी जाए छथी  ,सब किछू मे की , , जेना  चारी दिनका मटकूड़ि मे सड़ल दही ,ट्टायल खाजा  ,बज़्जर भेल ठकुआ  ,, आ’ कटहरक को स’ ल’ क’ ओकर कामड़ी नेरहा धरि । आ’ पचि सेहो जायन्ह ।आकड़ पाथर पचाबए वाला जीब ,गज़ब के पाचन शक्ति ।  दुपहरिया क’ बइसारी मे स्त्रीगन सब हुनक पाचन शक्ति के एक स’ एक उदाहरण दैत हस्सी ठठा करैत अपन मोंन बहटारई छलिह। भरि दिन काज ‘यै दाय ,कनी हमर राहड़ी राखल छै उलैल  , दस सेर लगीच  दरड़ि देथुंह कनी  ,कनी अरबा चौर क चिक्कस सेहो पीस दिहथी कतेक दिन स’  बंभोलिया के बगिया खेबाक मोन करैत छै’.।आ’ दाय टोलक भौजी स’ ल’क’ हुनक पुतहुओ सबहक अड़हैल काज मे दासोदास भेल ।कखन भोर होए आ’ कखन सांझ ,,के जाने । कखनों काल जौ कोनो काज नै त’ जनानी के बइसारी मे कोनो अधलाह काज  वा झगड़ा फसाद के गप्प प’ कोनो पुतहु बाजि उठए ‘ई काज पुरनिए दाय के भ’ सकैत अछि ,’ वा ‘ई लुतरी लाड़ब मे वएह ओस्तद छथीन’।सेहो परोछ मे नै मुहे प’ ।दाय गुमसुम भ’ जायथ, , कखनों “ह ह हम कीएक कहबई , ,सप्पत खुआ लीय’ ।मुदा हुनका त’ पूतौह सभक टोंट आ’ अपमान सहबा के जेना आदति पड़ी गेल छलैन । काज तिहारक घर मे दाय के काज पानक लत्ती जका लतरल चलल जाए ।कखनों सिनेह स’ त’ कखनों आदेश स’ तिरस्कार स’ लोहछल बोल स , “ऐ यै  ,देखियोन्ह त’ हिंकर सौख , , किदन कहबी छै जे  , ,जेकरे दादा  ,, मर बाढ़्नि ,बिसरिओ गेलिये  ,उठु ,ई अदौड़ी खोटय अहाँ की बैसि रहलहु बौवासिन सब जेंका , ,जइयो कनी गुवरबा के कहने आबिओ बीस सेर दूध काल्ही भोर स’ भोर पहुँचा दै आँगन मे  ,” “ ललबा  अखन धरि नै एलई बजार स’ चौक प’ दारू तारु त’ नै पीबए लगलई ,कनी देखथुन त , आ हे  जों भेटईन्ह त’ कहिहथी जे हम ओकरा नानी गामक बाट मोंन पड़ा देबई जखनहमारा स’ पईच लेब आयत” ।  आ’ पुरनी दाय  ,भुट्ट ,कनी मोट गर गेंद जका अहि ठाम स’ ओहि ठाम गुड़कइत ।मौसम चाहे कहनों होय लोक के त’ अपन बेगरता पुर हेबा क चाही।ओय हुईल मालि मे केदन त’ हुनका खाय लेल पुछैन्ह ,आ’ सांझे मे खाइतथि त कोन जुलुम भ’ जेतय । जहिया ककरो  आँगन मे काज तिहार रहए ,ओय दिन हुनक मैल नुआ के जबर्दस्ती हटा क’ साफ सुथरा व नब नुआ अपन आसन जमा लईत छल ,दाय के त’ छवि सेहो बदलि जायन्ह।ओ थुस्स स’ नई कत्तों बईसइथ, अपन पएर प’, पीढ़ा प’ चौखटी प’ ,पटिया प  ,नब नुआ नई मैल भ जाए । अहि नुआ के एवज मे मास मास दिन धरि रातिदिन खटनाइ  ,अहि बीच जों केकरो खड़ सेहो छुबए लगथि त’ घरक मलकाइन चिचिया उठेथ ‘हे लोक सब देखियोन्ह चक्र चालि हिनकर , ,नब नुआ देलीयेन्ह भोजन बेर मे दौगल ओतिह  , आ’ काज क’ बेर दोसरा के आँगन सूईझ रहल छनहि , ,कनिओ धाक छईन आखि मे’। आ’ एकर ओकर काज करि क’ पेट भरब के प्रक्रिया सुखद त’ नहीये रहल हेतइक।हिनका हुनका आँगन स थारी गोहाली मे पहुँच त’जाए आ’ के जाने अहि मे कोनो दिन उपासे सुइत रहैत हेती । लाचार बेसहारा अनिश्चित जिनगी के एक टा बडका ऐब सेहो गहूम मे सूड़ा जका सेनहियाएल छल हुनका मे ,आंखि बचा क’ कोनो बोस्त इमहर स’ ओमहर  करब के , बड़का चीज क त्तय ,मुदा किछों, , ।आ’ ककरो गरुड पुराण सुनबा काल जखन पंडित जी क’ प्रवचन चलै ,कोन पाप के कोन दंड भेटैत छै नरक मे , चोरनी के नाम प, दाय दिस ताकि ताकि क’ स्त्रीगन  सब मुसके ,एक दोंसरा के बीट्ठू कटे ,।एकर आभास भेला के बावजूदों दाय निर्विकार भाव स’ अपन बड़का बडका आंखि ,नाक ,कान सब के एक सीध मे राखि क’ कथा  वाचक् के  चरण कमल मे बकोध्यान लगौने बइसल । टोलक कोन मे अपन सहोदर भाय भाउज , एकटा बहिन ,सेहो बाल विधवा  ,, सासुर स’ देउर  आयल छलेनह लेब’ त’ अपन जनक् क प ए र छानि  कानए लगलिह दहो बहो कि हम आब नहीं जायब ओहि नगर ,। माए बाबू बेटी के दुख देखबा मे अपना के असमर्थ बुझेत कनीए दिन मे धरती स’ अलोप भ’गेलथि ,आ’ भोजाय नामी नट्टीन्न, , भाय घरबाली के मुट्ठी मे ,। पहिने त’ सब कियो संगे रहे छलथि,  कतबों गुहागिज्जी होए ,मुदा ओय दिन नही जानि कोन गप्प प’ झगड़ा झाटी भेलय ,आ’ पटलपुर वाली हुनक सिकी मौनी, अड़जाल खड़जाल नुआ ,झोरा आदि सबटा निकालि दिरघु कका के खरिहान मे फेंक देलखिन ।गोबर स’ घर आँगन नीप क’ गंगाजल छीट डंका के चोट प’ ई उद्घोषित करी देलथी जे पुरनी दाय ह मरा लेल मुइल छथि। तहन बास के दईतन्हि ,नबकी काकी के छोड़िए क’ ।गोहाली मे त’ आब गाय बरद छै ने । योग्य पूत सब  ,किओ कीछू बिगाडिओ नै सकेत छल । मुदा सहोद्र भाय लेल हुनकर अनुराग रहि रहि क’ चुबै न   , ,छोट छोट भातिज भतीजी सब के इमहर उमहर स चोरएल ,नुकेल समान द’ दैत ।राइत बिराति सबहक आंखि बचा के ओकर आँगनो चली जाथि।भौज सेहो आब तेहन डाहीन नहि रहल छली । ‘नुनु (छोट भाय ) कतदन पड़ा क’ चलि गेलय ,नई खाय के ठेकान नई पीबय के, धिया पूता सब बिलटी रहल छै” ।ककरो ओसारा प बइसी जखन ओ विलाप करैत त’ लोकक मों न खिन्न भ जाए “ऊह फुटली आंखि नै देखेत छनही आ’ हिनक व्याकुलता देखियौन्ह”। एक राति पटोर बाली काकी चुप्पे पएर दाबि हिनका पाछा अपन आँगन मे अयली ,त’हींकर करनी देखि हुनका सौसे देह मे खौता फुकि देल कैन “हे ,हे ।हे दाय , , की करैत छी?”  कनी कड़गर सन स्वर मे बजली ,त’ ओ घबड़ा क’ मड़ुआ के ढेर प’ख़सी पडली आ’ हुनक मुंह स निकसि गेलन्ह “मड़ुआ चोरबे छी”। भिनसरे सौसे टोल मे हल्ला भ’ गेले ‘दाय मड़ुआ चोरबे छली राति मे’ ।मुदा हुनका लेल धन सन ,ओ मजगुत प्राणी ,ओमहर इमहर बुलैत टहलेत ,कोनो कोनो काज् क ब्योंत मे अपना के एना खटबईत जेना ई कथा कोनो आन के भ’ रहल होय । पराग कका  बनारस मे रहेत छला ,माए  के देख चारि दिन लेल आयल छ लैथ,नबका धुइस छ्लेन्ह ,, , बड़  गरम ,  , ,जाड़क मास ,घर मे अलगन्नी प रखने छलथी ,कतेक ताकल गेल  ,धरती गिड़ गेलै की अकास खा गेलै,  कत्तों ने भेटलै ।ओ अहुरिया काटि क’ आपस छली गेलाह बनारस । “घर स आखिर लेते के ?’आ’ शक के सुइया सदी खन दाय प’ जा क’ अटकीजाए ,मुदा प्रमाण की ?’ आ’ एकटा धाक सेहो ,फुइस अकंड़ नई उठाबी ककरो ,।कियो इहों बाजी उठेक , ‘जाय  दिओ गरीब ,अबला  छ थिन्ह ,पराग बाबू के एकबाल बनल रहौक ’।  “मुदा ओ केलखिन की ? ओढ़ेत बिछबइत त किओ नहीं देखलख’ । “भौजाई के द’ आएल हेती राताराती’। आ’ सब किओ बईस क’ अपन अपन मगज मारी करी क’ गहीड श्वास छोड़ैत मौन भ जायथ। हुनका खेनाय देबा मे त’ सबके अखरए लगे ।नीत रोगी के पुछै के ,, भाति भाति के फकड़ा पढ़ल जाए ।एक दिन क’ पाहून के तरुवा तीमन ,स चार लगा क’ लोक खुवा देत छै,मुदा नीत दिन ,”  । क हुना करि क’ हुनका सोझा थारी पठा दैल जाए छल।केकरो भुखल ने रखबा चाहि ,धर्म के नाम प, कर्तव्य के नाम प’ हुनका खेनाय भेटन्ह । मुदा ओय दिन जखन दुरगमनिया कनिया के पाजेब कोहबरे स’ हेरा गेले तखन त’ हुनक सौस महेशक माए के तामसे जेना बुट्टी बुट्टी चमकय लगलन्ह  ‘ई जुलुम आब ने सहबा जोगर छैक ,महेशक विवाह में नबका नुआ देने छलियेन्ह” ।ओ अहिना अगिया बेताल छलिह,तुरंत फाड़ बान्ह वाली  ज़नानी । भानस चढ़ल चुल्ही प’तेकरा छोड़ि झटा झट बढ़ ली गोहाली दिस ,अपना पीठ प’ चारि ज़नानी के फौज नेने ।चीज क’ नाम प’ गेरुआ खोल मे डोरी लगा क’ एक टा झोरा ,दुई तीन टा नुआ,एक गोट चादरी,केथरी,आ’ एक टा खूब मोटगर सन गेरुआ ।सब टा मैल चिक्कट ,कखनों काल साफ करैत ,इमहर ताकल,ओमहर ताकल ,अहि दोग देखल ,ओई दोग देखल,। माटि मे त गाड़ि क’नहि रखने छथी,मुदा तेहन कोनो चेन्ह नहि देखाय । एक जन के जे अपना के जासूस क महतारी बुझैत छलिह,के नजरि मोटका गेरुआ प’अटकल छल ,समस्त भीड़ के उक्साबईत बजली ‘गेरुआ के देखू नै’ । नेता के आदेश के पालन तुरंत होब लागले ,आय जेना महान रहस्यक उदघाटन होबए जा रहल छल ,अहि समाजक सब स’ भ्रष्ट आ’ पतित ,चोर क’ चारित्रिक हनन होबि रहल छल ,प्रमाणक संग । गेरुआ के सियों न खोलल गेल, तेकरा निच्चा फेर मुंह बन्न,,आखिर मे सर्व सम्मति स’ गेरुआ के फाड़ी देल गेल ,आब ओत ठाढ़ ज़नानी सबहक  आंखि फाटल रही गेलय ,केकर सरौता,केकर पनबट्टा,केक्कर नुआ, केकर आंगी, साया, केकर कुर्ता,  ,, मुदा पाजेब कत्तों नहि निकललै ।  दाय ककरो काज स’ लोहरबा ओत गेल छलथि । ताबेत में ढनमनाई त ढनमनाइत ओहो आबी  परमान पुर बाली के  दु आरि  प    सुस्ताए लेल बइसी  गेल छलिह । गोहाली मे बिरनी के छत्ता जकां   उमड़ल भीड़ देखि  ओहो ओत स’उठी अकचकायल सन ओत आयल छलिह ।आ’ ई प्रलयंकारी दृश्य देखि ओ जेना बज्र भ गेल छलिह ,एकदम शून्य ,जेना पाथर  , , , ।चुप्प् चा प  लद स ‘ओत बैसि रहली ।साक्षात ताड़का बनल महेष् क माए के मुंह स धधकल  धधकल अंगोरा निकलि रहल छल “पाजेब की केलिये? नब नुकूत कनिया के छले ,एहेन कोन सौख मौज बुढाढ़ी मे पईस गेल ,पाए के बेगरता छल त’ हमारा कहितहु” । “यए काकी ,सोनरबा के ओतय राखी देने हेथिह”   आए काल्ही बड़ एनाय जेनाय  होय छन। सोनरबा ओत मदना के दौडएल गेल ।मुदा ओ  एक्दमे नकारी देलके ,केहनों सप्पत खे बा लेल तैयार ,  ,।कियो मुसकी माँरेत बाजल “ओ किए नाक प’ माछी बैसय देतै, , कहबी छईक चोर चोर मोसियौत”। बाजि ताजि क’,माथ कपार भंगैत   ओ खोजी दल ओहि ठाम स’आपस भ गेल छलिह..त’ लोक के लगलए आब बेचारी मुंह उठा क’ कोना जिबती,कोनो पोखरी ,  धार मे संहिया जेती वा जहर माहुर खा क’ सूती रहती ।किछू दयामंत  सबके हुनक दुर्गति प’ आंखि झहरय लगलेन्ह ,’सब साय पूत बाली सब जेना दुधक धोल हौक ,अब्बल दूब्बल प’सिथूवा चोख”। त’किछू करेजगर ज़नानी के अपन ऐब नुकबए के बहन्ना भेट गैल ।‘ई त’सिन्हा चोर निकलली ,ओय दिन दूध औट क चीन _बारे  प’ छोड़ि देने रहिए ,जे कनी सुसुम हेते तखन पौर क’ सिक प’लटका देबै ।मुदा कनिए काल मे नहा क’ आबे छी त’आधा दूध गायब ,दाय  ओसारा प,सिलौट प, मसल्ला पिसेत छलिह” ।मुदा सत छल जे बीमार दियादनी के गायक दूध पिनाए हुनका नहीं सोहाए आ’कखनों,बिलाड़ी के नाम प,कखनों   उधिया क। खसबा के अड़ में कनी पैइनफेंट के अपने पीबी जायथ।   ओम्हर  साँझ पड़बा स’ पहिने कनिया के भाय नैहर स, दौगल एलै ,पाजेब नैहरे मे छूटि गेल रहै ।महेशक माए अहि खबरि के पीबी गेलिह ,एतेक शक्ति त नहीं छलेन्ह जे जा क’ दाय स माफी मांगि लइतथी । ओए राति केकरो घर क थारी  दाय छूबों नहीं कयल्खींह ।कोना गिड़ल जेते अन्न ,एहेन कलंक्क ॰बाद । भिनसर  भेने सब देखलक “दाय अपन गेरुआ के सीबी रहल छलिह । कनिए कालक़ बाद टोल मे एकरा ओकरा आँगन जा क कतो दालि ,कत्तों चिक्कस ,कुटिया पिसिया मे  एना लागी गेल छली जेना किछू गप्पे नहि भेल होमए । रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। मुन्नी कामत नाटक जिन्दगीक मोल प्रथम-दृश्य राम रतन- बाबू सुतल छिऐ? भिक्खन- कि कहै छहक बउआ? जागले छिऐ, बाजऽ, बहुत परेशान लागि रहल छहक। राम रतन- बाबू, हम बाहर कमाइ लेल जाइ के सोचि रहल छी। तोहर की विचार छऽ। भिक्खन- नै बउआ, हम अतेक दिन तक तोरा नै कतौ जा देलियऽ। आबो नै जा देबऽ। तोरा सिवा हमरा के छै। तोहर माइ तोरा हमरा कोरामे दऽ कऽ दुनिया छोड़ि देलक। तहियासँ हमर सभ कुछ तूँ छहक। हम तोरासँ एक पल खातिर दूर नै रहि सकै छी। राम रतन- बाबू आब हम १८ बरसक भऽ गेलिऐ। हम अपन ख्याल राखैमे सक्षम छी। हमरा बाहरक दुनियाँ देखै कऽ एगो मौका दऽ दिअ, बस एक बेर जा दिअ, फेर अहीं संगे रहब। भिक्खन- नै, अबकी बैशाखमे तोहर बियाह करै कऽ अछि। बियाह करि लऽ, फेर तोरा जतऽ जाय कऽ मन हेतऽ जायहक। राम रतन- बाबू आब माइनो जाउ। किछु दिनक तँ बात छै। फेर अहाँ जेना कहब हम तहिना करब। भिक्खन- ठीक छै, अहाँक हठक आगू हमरा झुकइये पड़तै। ककरा संगे आ कतऽ जेबहक? राम रतन- बाबू, काल्हि फुलचनमा हिमाचल जा रहल छै। हम ओकरे संगे हिमाचल जाएब। भिक्खन- ठीक छइ, काइले जेबहक तब तँ पाइ कौरीक ओरियान करऽ पड़तै। कखुनका गाड़ीसँ जेबहक। राम रतन- रातिक ११ बजे निर्मली सँ गाड़ी पकड़बै। आब हम जाइ छी, अपन कपड़ा-लत्ता साफ करै लऽ। । पटाक्षेप। दोसर दृश्य भिक्खन- बउआ हइए..... फूलचन एलऽ। राम रतन- आबैय छी बाबू। कपड़ा पिनहै छी। भिक्खन- बउआ फूलचन। तूँ तँ ओतै रहै छहक। तोरा तँ ओतौका सभ किछु कऽ पता हेतऽ। फूलचन- हउ कक्का, तूँ चिंता नै करऽ। राम रतन हमरे संगे रहतै। ओतऽ ओकरा कोनो चीजक तकलीफ नै हेतै। भिक्खन- तूँ तँ दवाइबला कम्पनीमे काज करै छहक नऽ! कथीक काज करै छहक? फूलचन- हँ कक्का। दवाइयेबला कम्पनीमे छिऐ। ओइमे तँ बहुत तरहक काज होइ छै। जे काज भेटल सएह करि लेलौं। भिक्खन- अच्छा चलऽ, ठीक छै। राम रतन- चल फूलचन! भिक्खन- बउआ सभ किछु ठीकसँ लऽ लेलहक नऽ? आ सभ िदन हमरा फोन करैत रहिअ। बाहर जाए छहक, गाड़ी-घोड़ा देख कऽ चलइहक। राम रतन- ठीक छै बाबू, अहाँ चिंता बिलकुल नै करू। अपन ख्याल रखब। समय-समयपर खाना खाइत रहब आ बेसी काज नै करब। हम जल्दी घुइम-फिर कऽ आबि रहल छी। सबहक प्रस्थान! ।पटाक्षेप। तेसर दृश्य (हिमाचल पहुँच कऽ) राम रतन- फूलचन, आइ गामसँ एला छऽ दिन भऽ गेलैए। तूँ तँ काम पर चलि जाइ छऽ आ हमरा असगर पहाड़ जकाँ समय लगै यऽ। हमरो कतउ काज लगा दे नऽ। फूलचन- अच्छा ठीक छै। काल्हि हम अपन मालिकसँ तोरा लऽ बात करबउ। दोसर दिन फूलचन- राम रतन, काल्हिसँ तूँहो चलियहन हमरा संगे। ८ हजार मासिक तनखुआ पर हम तोरा लऽ बात केलियौहँ, मंजूर छउ नऽ। मन लगा कऽ काज करबही तँ अओर तनखुआ बढ़ेतउ। राम रतन- ई तँ हमरा लऽ बहुत खुशीक बात अछि। अखने हम बाबूकेँ ई शुभ समाचार दै छी। पटाक्षेप। चारिम दृश्य कम्पनीक कैनटिंगमे बैठ राम रतन आ फूलचन खाना खाइत गप्प करैत अछि। राम रतन- फूलचन अतऽ कोन काज होइ छै। हमरा सँ आइ कोनो काज नै करेनकैए। डॉक्टरबला कोट पहिरने एगो आदमी एलै आ हमरा एगो गोली खिया कऽ चलि गेलै। कुछो समझमे नै आबै छै, उ हमरा कथीक दवाइ देलकैए। ओतऽ चारि-पाँच गरऽ अओर छेलै, सभकेँ वएह दवाइ देलकैए। फूलचन- अतऽ अलग-अलग बिमारीक दवाइ बनै छै, ओकरे जाँच खातिर कम्पनी किछु लोककेँ नौकरी पर रखै छै, जइमे सँ एगो तुहो छी। राम रतन- ओइ दवाइसँ कोनो हानि तँ नै होइ छै? फूलचन- नै! अगर हेबे करतै तँ अतऽ डॉक्टरक आ दवाइयक कोनो कमी छै? जे खर्चा ओकर इलाजमे लगतै सभ कम्पनी देतै। हमहूँ तँ कतेक साल तक यएह काज केलिऐ, कहाँ किछु भेलै। एक आदमी- फूलचन, राम रतनकेँ पठाउ, डॉक्टर साहेब बजेने छै। फूलचन- जी। (रामरतनसँ) जो देखहीं की कहै छउ। राम रतन डॉक्टरक चेम्बरमे जाइत अछि। राम रतन- साहेब अहाँ बजेलौं। डॉक्टर- ई दवाइ खा लिअ आ एतऽ पड़ि रहू, किछु इन्जेक्सन लगेबाक अछि। दवाइ खा कऽ राम रतन सुइ लइ लऽ मेज पर लेट जाइए! २ घंटा बाद डॉक्टर- राम रतन ओ राम रतन उठू। डॉक्टर राम रतनकेँ हिलाबैत अछि आ फेर नब्ज देखऽ लागैत अछि! डॉक्टर- ई की, ई तँ मरि गेल। कियो अछि, डॉक्टर खुरानाकेँ बजाउ। डॉक्टर खुराना- की भेल? डॉक्टर- सर, एकरा देखू, की भऽ गेलै, नब्ज नै चलै छै। डॉक्टर खुराना- ओह नो! ई मरि गेल। कोन दवाई देलौं एकरा? डॉक्टर-सर ई तीनू। डॉक्टर खुराना- की अहाँ पागल छी? एक साथ एतेक दवाइ, सेहो पहिले बेरमे। पहिने अहाँ एकरा नींदक गोली खुएलौं, तकर बाद एतेक पावरक दू-दू इन्जेक्सन दऽ देलौं? डॉक्टर-सर आब की हएत? डॉक्टर खुराना- हमरा सभ ऐठाम तँ ई रोजक बात अछि। एकर परिवारबलाकेँ मुआवजा दऽ कऽ चुप करा दियौ, आ हँ जखन सभ चलि जाए तखन बॉडी बाहर निकालब। ता तक एकर मरबाक खबर ऐ चहरदिवारीसँ बाहर नै एबाक चाही, बुझि गेलौं। रातिक ९ बजे फूलचन- सर, राम रतन कतऽ अछि, ओकर छुट्टी नै भेल? डॉक्टर- आइ एम सॉरी फूलचन, राम रतन आब ऐ दुनियाँमे नै रहल। हमरा एकर अफसोस अछि। ओकर परिवारबलाकेँ कम्पनी एक लाख रूपैया मुआवजाक तौरपर देत। हम ओकरा नै बचा पेलौं। फूलचन मने-मन सोचैत अछि -आब हम की जबाब देब कक्काकेँ। केना कहब कि ओकर जिअइ कऽ सहारा छिन गेल। केना जिथिन ओ, हे भगवान, एना केना भऽ गेल। पटाक्षेप! अंतिम-दृश्य फूलचन- हेल्लो.. कक्का, तूँ जेना छहक तहिना अखने गाड़ी पकड़ि लए। राम रतन बहुत जोर बीमार छऽ। भिक्खन- बउआ, एक बेर हमरा राम रतन सँ बात करा दए। की भेलैए हमर बाबूकेँ। हम तँ देखनइयो नै छिऐ हिमाचल तँ केना एबऽ। फूलचन- कक्का, हमर छोटका भाइ तोरा लऽ कऽ एतऽ। ओ अखने तोरा घर आबि रहल छऽ, तूँ बस जल्दी आबि जा। भिक्खन- हम अबै छिअ बउआ, तूँ हमरा बउआक ख्याल रखियहक। फूलचन- ठीक छै, आब फोन रखै छिअ। कहैत-कहैत फूलचन कानऽ लगैत अछि दोसर दिन हिमाचल पहुँच कऽ भिक्खन-बउआ........बउआ राम रतन कतऽ छहक? फूलचन- कक्का पहिले अहाँ किछो खा लिअ। राम रतन ठीक यऽ। भिक्खन- पहिले हम अपना बेटाकेँ देखब तब किछो मुँहमे लेब। फूलचन भिक्खनक गला पकड़ि कानऽ लगैए आ सभ किछु बता दइए। भिक्खन- फूलचन, हमरा बेटाक जीवनक सौदा तूँ ८ हजार मे केलहक। तूँ सभ किछु जानै छेलहक, तइयो ओइ मौतक मुँहमे हमरा बेटाकेँ धकेल देलहक। तूँ हमर सभ किछु लऽ लेलहक, हमरा निष्प्राण बना देलहक। हमर बेटाक मौतपर हमरा १ लाखक भीख तोहर कम्पनी देतऽ, उ ओकरे मुँह पर फेक दिहक। हमरा नै चाही कोनो भीख। आइ हमर बेटा मरल, काल्हि ककरो अओरक बेटा मरत। आखिर ई मौतक खेल किए खेलल जाइए? जे दवाइक परीक्षण जानवरक ऊपर करबाक चाही ओकरा भोला-भाला गरीब मनुष्यक ऊपर करैत अछि। कि अकरा रोकै लेल कोनो कानून नै अछि? एक घार रूदनक संगे पटाक्षेप ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। खुशबू झा मैथिली कथा संग्रह जिद्दी पढलापर

साहित्यमे किछु पढबाक मोन भेल तऽ हम कथे पढैत छी । कखनो काल समाचार बनबैत–बनबैत थाकि गेलहुँ तऽ नेटपर कोनो कथा खोजए लगैत छी । युवा पत्रकार सुजीत कुमार झाक कथा संग्रह जिद्दी जखन हमरा भेटल एमएकेँ परीक्षा चलैत समयमे पढि लेलहुँ । सुजीतक पहिल कथा संग्रह चिड़ै आ दोसर कृति रिपोर्टर डायरी हम एहि सँ पहिने पढि लेने छी । कथ्यक हिसाव सँ चिडै आ जिद्दीमे खासे अन्तर नहि लागल । मुदा क्रमशः उचाई धऽ रहल छथि से पढबाक क्रममे हमरा भेटल । कोनो व्यक्तिकेँ एक वर्षमे ३ टा पुस्तक आएब साहित्यकेँ प्रति सुजीत कतेक समर्पित छथि तकर एहि सँ बडका उदाहरण दोसर नहि भऽ सकैत अछि । फेर जाहि रुप सँ हिनकर पुस्तक चर्चामे आबि रहल अछि हिनका लेल मात्र नहि मैथिली साहित्यक लेल सेहो उपलब्धीक बात अछि । जिद्दी एहि पुस्तककेँ नाम एकटा कथाक कारण पड़ल से हमरा नहि लगैत अछि । जिद्दीक वारहो कथामे जिद्द भडल अछि । जँ ओ जिद्दी नाम सँ कथा नहि लिख कितावक नाम मात्र लिख देने रहितथि तैयो फरक नहि पडैत ।

१ सय १४ पृष्ठक एहि कथा संग्रहमे १२ टा कथा अछि । पहिल कथा ‘फूल फुलाइएकऽ रहल’ संग्रहक नाम सँग पुरा वष्तुनिष्ट बुझाइत अछि । अहुँमे जिद्द अछि । कथामे पिंकी अपन अधुरा सपनाके टुटैत नहि छोडि एकटा दृढ विश्वासक सँग पुरा कऽ एकटा सच्चा आ कर्तव्यनिष्ट पत्निक रुपमे ठाढ़ भेल छथि । तहिना ‘नव व्यपारमे’ साधना उपर आधुनिकताक प्रभाव देखाओल गेल अछि जे अपन पति आ घर दुआरक जिम्मेवारीकँे बिसरि क्लब आ राजनीतिक हिस्सा बनल छथि । ‘खाली घर’, ‘लाल डायरी’, ‘जिद्दी’, ‘जादु’, ‘आदर्श’, ‘अर्थहिन यात्रा’ आ ‘व्यर्थक उडान’ ई सभ कथामे महिलाक मनोविज्ञानके चित्रण बहुत सुन्दर ढंग सँ कएल गेल अछि । तहिना ‘निष्ठा कि देखावा’ मे अपन कर्तव्यके समाजक लेल मात्र निर्वाह करय बला औपचारिकता बुझि पतिक सेवा करय बाली नकारात्मक विचारधाराक महिलाक चित्रण कएल गेल अछि । ‘केहन सजाय ?’ नामक कथामे कामनी मैडम जेहन जुझारु महिला जे अवलाके सवला बनैत देखि खुश होइत छली । ओहन सकारात्मक विचारधाराक महिलाक प्रस्तुत कएल गेल अछि तऽ ओ कथामे पुत्र भेलापर गोद लेल वच्चाकेँ छोड़ि देबएबला घटना पढि रोइया ठाढ कऽ दैत अछि । ‘मेनका’मे एकटा एहन महिलाक चित्रण अछि जे एकटा बेरंगक जीवन बिता रहल छली मुदा जखन रंग भड़य बला भेटल तऽ ओ अपन रंग उजारय बाली जेहन नहि बनबाक प्रण कएलन्हि आ अपन बेरंग जिनगीक दोसर यात्रा तय कएलन्हि । अर्थात महिलाद्वारा पीडित महिला दोसरकँे पीडा नहि देबए चाहलथि । अर्थात पुरा कथा संग्रह महिला आ महिलाक आचरण पर केन्द्रीत अछि जे एहि समाजक सत्यताक उजागर करैत अछि । एहिमे प्रस्तुत सभ महिलाक मोनमे एकटा अलग द्वन्द्व प्रस्तुत कएल गेल जे एहि पुरुषबादी समाजक देन अछि । आ ई काल्पनिक कथा होइतो एकटा कटु सत्य बातक पोल खोलि दैत अछि । एहि संग्रहक मोलिकते इएह अछि । हम चाहब सुजीतक नयाँ पुस्तक जल्दि आबए । खास कऽ महिला सँ जुड़ल समस्यासभकेँ आओर गम्भीरता संग उठैक एकर अपेक्षा हमरा तऽ अछिए । मैथिलीके पुस्तक प्रकाशन काज दुरुह भेलाक बादो आफन्त नेपाल जिद्दी पुस्तक छापयके प्रयत्न कएलक अछि । एहिके लेल आफन्तोके धन्यबाद देबहे पडत । ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। पूनम मण्डल वि‍देह वि‍चार गोष्‍ठी एक झलक- आकाशवाणी दरभंगाक जातिवादी प्रवृत्तिक विरोधमे आ दसटा घोर जातिवादी परिवारक मैथिलीकेँ मारैक षडयन्त्रमे आकाशवाणी दरभंगा द्वारा देल जा रहल सहयोगक विरोधमे "विदेह गोष्ठी- सह कवि सम्मेलन" ७ अक्टूबर २०१२, स्थान, अशर्फी दास साहु-समाज महि‍ला इण्टर महावि‍द्यालय, निर्मली, सुपौल मे सम्पन्न भेल। लोकमे अपार उत्साह देखल गेल। ई तथ्य सोझाँ मे आएल जे मैथिलीक पहिल जनकवि आ मैथिलीक भिखारी ठाकुरकेँ सेहो डेढ़ साल पहिने फॉर्म भरबाओल गेलन्हि मुदा आकाशवाणी दरभंगा द्वारा कोनो सूचना तकर बाद नै देल गेलन्हि। ओ कहलन्हि जे  आकाशवाणी दरभंगा बाहर देबालपर "झारू" साटि देबाक मोन होइए। आकाशवाणी दरभंगा मैथिलीक जातिवादी रंगमंच आ साहित्यक प्रसारक आ प्रचारक बनि कऽ रहि गेल अछि। ि‍नर्मली/सुपौल- स्‍थानीय अशर्फी दास, साहु-समाज र्इ. महि‍ला महावि‍द्यालय परि‍सरमे दि‍नांक 7 अक्‍टूबरकेँ दुपहर 2 बजेसँ संध्‍या 6:30 बजे धरि‍ कवि‍, कथाकार, गीतकार, अल्हा गौनि‍हार, रसनचौकी बजेनि‍हार इत्‍यादि‍क संग-संग अनेक श्रोता सबहक जमघट कसबामे दलमलि‍त केलक। आकाशवाणी दरभंगाक जाति‍वादी प्रवृत्ति‍क वि‍रोधमे आ दसटा जाति‍वादी परि‍वारक मैथि‍लीकेँ मारैक षडयंत्रमे आकाशवाणी दरभंगा द्वारा देल जा रहल सहयोगक वि‍राधमे वि‍देह वि‍चार गोष्‍ठी सह कवि‍ सम्मेलन सुसम्‍पन्न भेल। कवि‍ राजदेव मण्‍डलक अध्‍यक्षतामे आ पवन कुमार साह एवं दुर्गानन्‍द मण्‍डल जीक मंचसंचालनमे पहि‍ल आ दोसर दुनू सत्रक अर्थात् वि‍चार गोष्‍ठी आ काव्‍य गोष्‍ठीक समापन भेल जेकर संयोजक रहथि‍ उमेश मण्‍डल। एहेन पहि‍ल बेर देखल गेल जे मि‍थि‍लाक कला-संस्‍कृतिक‍ हराएल प्रेमी अपन-अपन वि‍चार खुलि‍ कऽ रहखलनि‍। जेकर दू-टुक वि‍वरण ऐ तरहेँ अछि‍- शंभू सौरभजी- “हक-अधि‍कार आ कर्तव्‍यक संग लड़ाइ लड़ू तखन जे खोजि‍ रहल छि‍ऐ ओकर प्राप्‍ति‍ अवस्‍स हएत।” वीरेन्‍द्र कुमार यादव- “अपनामे एकता हेबाक चाही। तखने अधि‍कारक प्राप्‍ति‍ भऽ सकत। ओइ वर्गक लोक अपना सभकेँ सदि‍योसँ ठकि‍ रहल अछि‍।” रामदेव प्रसाद मण्‍डल ‘झारूदार’- “अपना संग भेल दरभंगा रेडि‍यो स्‍टेशनक फुसलाओल कथा वि‍स्‍तारसँ सुनेलन्‍हि‍।” राहुल कुमार साहु- “अपने सभ एकता करू आ हम सभटा-युवा क्रांति‍कारी अहाँ सबहक संग छी। अधि‍कार प्राप्‍ति‍ करबाक लेल जे करए पड़तै हम सभ संग रहब।” राम वि‍लास साहु- “मात्र सात प्रति‍शत लोक मैथि‍ली वि‍कासक हेतु अर्थात मि‍थि‍लाक साहि‍त्‍यि‍क वि‍कासमे जे कोनो सरकारी वा गैर सरकारी संस्था सभ अछि‍ तइपर कब्‍जा केने अछि‍। जे बि‍लकुल अनुचि‍त अछि‍, अनुचि‍त ई जे तखन तँ समुचि‍त वि‍कास तँ नै हएत। जखन कि‍ सामुहि‍क वि‍कास आवश्‍यक अछि‍।” मनोज कुमार साहु कहलनि‍- “अपने सभ अपन लेखनीक तागति‍केँ आओर बढ़ाउ आ तखन अधि‍कार प्राप्‍ति‍क लेल संघर्ष करू सफलता अवस्‍स भेटत, ई हमर शुभकामना।” कपि‍लेश्वर राउत कहलनि‍- “दरभंगा रेडि‍यो स्‍टेशनक जाति‍वादी बेवस्‍था अवि‍लम्‍ब हटबाक चाही। वास्‍तवमे तखने  मि‍थि‍लाक वि‍कास हएत। जगदीश प्रसाद मण्‍डलकेँ जे टैगोर लि‍टरेचर अवार्ड भेटलनि‍, जे मैथि‍ली लेल पहि‍ल अछि‍; से समाचार नहि‍येँ कोनो दैनिक अखबार (दरभंगा-मधुबनीक)मे छपल आ ने आकाशवाणीयेमे समाचार-प्रसारि‍त भेल। जे बहुत कि‍छु कहि‍ रहल अछि‍।” नंद वि‍लास राय- “मैथि‍लीक नामपर जे कोनो फंड सरकार द्वारा देल जाइए ओ मात्र मुट्ठी भरि‍ लोकक बीच रहि‍ जाइए। माने तेकर फैदा खाली दस प्रति‍शत ब्राह्मणेटा उठबैए। आेतबे नै, चौक-चौराहापर मि‍थि‍लाक मान-प्रति‍ष्‍ठा मात्र भोजनेकेँ कहैत रहैए।” कृष्‍ण राम कहलनि‍- “समाजकेँ खण्‍ड-खण्‍ड कऽ वर्णवादी बेवस्‍थाक तहत बाभन सभ बाँटि‍ कऽ बेवसाय कऽ रहल अछि‍।” हेम नारायण साहु‍- “मात्र मुट्ठी भरि‍ लोक अपन आधि‍पत्‍य कायम केने अछि‍ आ एमहुरका लोक सभकेँ गप-गप दऽ दऽ आ पूजा-पाठ करा कऽ आर्थिक आ मानसि‍क लूट करैत रहल अछि‍। ओ सभ रूपैयाक लेल जे-नै-सेहो कऽ सकैए आ कऽ रहल अछि‍।” राम प्रवेश मण्‍डल- “हम सभ जगबाक प्रयास कऽ रहल छी आ बूझू जे जागि‍ गेल छी। आब नि‍श्चि‍त अपन अधि‍कारकेँ पाबि‍ लेब।” वीपीन कुमार कर्ण- “जहि‍ना माताकेँ सम्‍मान हेबाक चाही तहि‍ना मैथि‍लीकेँ सेहो। एते दि‍न अपना सभ बूझू जे भाषाकेँ भरना लगा देने रहि‍ऐ आब ओ छोड़बैक समए आबि‍ गेल अछि‍। कथनी आ करनीमे अंतर खाली नै हेबाक चाही।” उमेश पासवान- “बाभन सभ मैथि‍लीकेँ कद्दै जकाँ धेने अछि‍। लेकि‍न आब हमरा सभ छोड़बै नै ढावक जकाँ दौग कऽ जेबै आ छोड़ा लेबै। खाली अपना सभमे एकता हेबाक चाही।” श्री जगदीश प्रसाद मण्‍डल- “कि‍छुये लोकक ई कि‍रदानी अछि‍ जे मात्र बोलि‍येपर काज चला रहल अछि‍। देखबै जे मक्कै खेतमे ऊचका मचान बना कऽ नेंगराे-लुल्‍हाकेँ ओइपर बैसा‍ बजबबैत रहैए जे “हैआ आबए दे,  के छि‍अँ रौ, अखने देखा दइ छि‍औ, रूक....।” अर्थात् टि‍टकारी दैत रहल छथि‍। मात्र एक धक्का देबाक जरूरति‍ अछि‍। परि‍णाम सामने आबि‍ जाएत आ समाजक वि‍कासक असली आ बुनि‍यादी रास्‍ता सबहक सोझामे आबि‍ जाएत मि‍थि‍लाक चि‍न्‍तन पंचदोवोपासनाक रहल अछि‍। कोनो साधारण चि‍ंतन नै।” नाटककार बेचन ठाकुर- “कि‍छुए लोक मैथि‍लीकेँ बपौती सम्‍पति‍ बूझि‍ शब्‍दजालमे फसा कऽ लूट कऽ रहल अछि‍। जे हर बहए से खढ़ खाए आ बकरी खाए अचार।” उमेश मण्‍डल- “ब्राह्मणोमे सभ ब्राह्मण ऐ खेलमे शामील नै छथि‍ मात्र पाँचसँ दस प्रति‍शत लोक ई कारनामा मैथि‍लीक संग कऽ रहल छथि‍। अोहुँमे माने ब्राह्मणोमे वंचि‍त साहि‍त्‍य-प्रेमी सभ्‍ा छथि‍। खाली ऐ पेंचकेँ बुझबाक अछि‍ आ तइपर धक्का लगेबाक अछि‍। मणि‍पद्मम आ हरि‍मोहन झाक साहि‍त्‍यक अखन तक जे मूयांकण भेल से संबंधि‍त वि‍चारधाक पहि‍चान छी...‍।” अच्‍छेलाल शास्‍त्री कहलनि‍- “संगठन हेबाक चाही तखने अधि‍कारक प्राप्‍ति‍ भऽ सकत; ऐ जगमे के नै जनैए बाभनक कारनामा।” कवि‍ उपेन्‍द्र नारायण अनुपम- “लक्ष्‍यपर पहुँचि‍ रहल छी आ पहुँचबे करब।” संचालक द्वय श्री पवन कुमार साह आ दुर्गानंद मण्‍डल- “मंच संचालनक क्रममे अपन उद्गार व्‍यक्‍त करैत कहलनि‍, एहेन-एहेन वि‍चार गोष्‍ठी मासे-मास हेबाक चाही। मि‍थि‍लाक वि‍कासक बाधापर बहुत रास जाति‍वादी मुद्दा अछि‍ जेकरा जँ साहि‍त्‍यकार-वि‍द्वान नै बुझताह तँ के....?” अध्‍यक्ष राजदेव मण्‍डल- “सम्‍बन्धि‍त वि‍षयपर अर्थात् ‘आकाशवाणी दरभंगाक जातिवादी प्रवृत्तिक विरोधमे आ दसटा घोर जातिवादी परिवारक मैथिलीकेँ मारैक षड्यन्त्रमे आकाशवाणी दरभंगा द्वारा देल जा रहल सहयोगक विरोधमे’ सभ वक्‍ताक वक्‍तव्‍य सुनलौं। ऐपर सामुहि‍क वि‍चार करैत वैधानि‍क तरि‍कासँ डेग उठाएब आवश्‍यक अछि‍। वि‍कासक क्रम तखने सोझराएत। नै तँ....!!!!! कवि‍ सम्‍मेलनक एक झलक- प्रेम आदि‍त्‍य कुमार- उपेदसात्‍मक कवि‍तक पाठ केलनि‍। वीपीन कुमार कर्ण- भारत ि‍नर्माण केना भऽ रहल अछि‍ आ केना हेबाक चाही तकरा उजागर करैत कवि‍ताक पाठ केलनि‍। शंभू सौरभ- लोक गीत सुना दर्शक दीर्घाक लोट-पोटक स्‍थि‍ति‍ बनौलनि‍। गुरु जीक चि‍त्र हुनक कवि‍तामे देखल गेल। रामदेव प्र. झारूदार- प्रदूषणसँ मुक्‍ति‍ लेल वृक्षा-रोपन कार्यक्रमपर बल दैत कवि‍ताक पाठ केलनि‍। दुगानंद ठाकुर- वर्षा कतए चलि‍ गेल...। तइ कारण फसि‍लक केहेन दुर्गति‍ भऽ गेल...। अपना कवि‍ताक माध्‍यमसँ रखलनि‍। कवि‍ उमेश पासवान- कतए हरा गेल छी यौ भाय सभ; कतए हरा गेल छी।’ कहैत भाव-वि‍ह्वल भऽ गेलाह। कवि‍ नंद वि‍लास राय- बेटी वि‍आहमे कतेक समस्‍या उत्पन्न होइए तेकर नीक चि‍त्र अपना कवि‍ताक माध्‍यमे रखलनि‍। पलल्‍वी कुमारी- जगदीश प्रसाद मण्‍डल लि‍खि‍त गीतांजलिक साभार करैत जुग-जुग आस लगेने मैइये शीत रौद चटैत एलौं... गीत गौलनि‍। अच्‍छेलाल शास्‍त्री- घर-घरमे दुख अछि पसरल‍, ऐ दुखमे केना लुटनाहार लूटि‍ रहल अछि‍ तेकर चि‍त्रण केलनि‍। बेचन ठाकुर- अखुनका समैक वि‍चि‍त्रताक वर्णक अपना कवि‍ताक माध्‍यमे केलथि‍। हेम नारायण साहु- हि‍नक कवि‍तामे केहेन-केहेन जुलुम भऽ रहल अछि‍ तकर साफ-नि‍च्‍छल चि‍त्र आएल। राम वि‍लास साहु- रौदीक वर्णक करैत सामाजक आडम्‍बरी सबहक चि‍त्रांकण केलनि‍। कवि‍ कपि‍लेश्‍वर राउत, राजदेव मण्‍डल, जगदीश प्रसाद मण्‍डल, पवन कुमार साह, दुर्गानन्‍द मण्‍डल इत्‍यादि‍ अनेको कवि‍ अपन-अपन नूतन कवि‍ताक पाठ केलनि‍। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। दुर्गानन्‍द मण्‍डल नेना लेल सुन्दर चि‍त्रकथा

श्रीमती प्रीति‍ ठाकुरक दू गोट चि‍त्रकथा (पहि‍ल गोनू झा आ आन मैथि‍ली चि‍त्रकथा, दोसर मैथि‍ली चि‍त्रकथा) मैथि‍ली साहि‍त्‍यमे पहि‍ल बेर श्रुति‍ प्रकाशन नई दि‍ल्‍लीसँ प्रकाशि‍त भेल। दुनू चि‍त्रकथा एक संग श्री उमेश मण्‍डल जीक माध्‍यमे भेटल। एक-आधटा पन्ना उनटैबि‍ते मन गद्-गद भऽ गेल। लागल जे आब हम मैथि‍ल दरि‍द्र नै सभ कथुसँ सम्‍पन्न भऽ रहल छी। साहि‍त्‍यक तँ अनेको वि‍धा होइ अछि‍ जइमे कथा एक वि‍धा थि‍क तहूमे चि‍त्रकथा तँ बाल साहि‍त्‍य लेल प्रमुख। चि‍त्रकथाक माध्‍यमसँ अपन भूलल-बि‍सरल संस्‍कृति‍क झलक सेहो भेटैत अछि‍। नि‍श्चि‍त रूपे मैथि‍ली साहि‍त्‍यमे एकर अभाव बहुत दि‍नसँ खटैक रहल छल। जेकरा श्रीमती प्रीति‍ ठाकुर अपन चि‍त्र कथा मैथि‍ल समाजक बीच राखि‍ एकटा असीम प्रति‍भाक परि‍चय देलनि‍ अछि‍। बुझना जाइ छल जेना हम अपनेकेँ स्‍वयं वि‍सरि‍ गेल छी। वि‍सरि‍ गेल रही ओइ समैकेँ जइ समैमे मैयाँ अपन पोता-पोती लऽ जा कऽ घूड़ लग बैसि‍ गोनू झाक खि‍स्‍सा सुनबैत छलीह जे अति‍ मनोरंजक आ गोनूक तीव्र बुधि‍क परि‍चायक छल। तहि‍ना आनो आनो कथा जेकरा प्रीति‍ जी चि‍त्रवत् कऽ हमरा लोकनि‍क साेझामे रखलीह। जइमे रेशमा-चूहरमल, नैका बनि‍जारा, ज्‍योति‍ पंजि‍यार, महुआ घटवारि‍न, राजा सलहेस, छेछण महराज आ कालि‍दास छथि‍। जे कहि‍यो आम छल, आब लुप्‍त प्राय: भेल जा रहल छल, ओकरा एकबेर पुन: परि‍चि‍त करौलनि‍। जइमे लोक जनलक जे रेशमा के आ चूहड़मल के? एतबे नै, प्रेमक पराकाष्‍ठाक परि‍चयक रूपमे जे लोकक ठोरपर हीर-रांझा वा लैला-मजनू रहैत छल, की ओकरासँ कम निस्‍वार्थ प्रेम रेशमा आ चूहड़मलक छल ई देखेबाकमे साकांक्ष रहलीह। जतए चुहड़मल दुधवंशी दुसाध जाति‍क तँ दोसर तरफ रेशमा भुमि‍हार ब्राह्मण जाति‍क बेटी। जखन जुहड़मलकेँ दंगल जीत कऽ अबैत देखलक तँ दुनूक भेँट गंगाक तटपर, ओतहि‍ प्रेमकथाक प्रारम्‍भ भेल। अर्थात् प्रेममे जाति‍-पाति‍सँ कोनो लेन-देन नै अपि‍तु प्रेम तँ प्रेम थि‍क। प्रेम कएल नै जाइ छै अपने भऽ जाइ छै। तहि‍ना नैका बनि‍जारा सेहो प्रेमेक पराकाष्‍ठाक परि‍चायक छी। भगता ज्‍योति‍ पंजि‍यार अपन वीरता आ पराक्रमक कारणे पूजि‍त भेल। आइ जँ धर्मराजक पूजा तँ ज्‍योति‍ पंजि‍यार सेहो पूजि‍त छथि‍। धर्मराजक भक्‍त ज्‍योति‍ पंजि‍यार बारह बर्खक तपस्‍याक बाद कंचन काया लऽ कऽ घूमि‍ घर एलाह। माइक कोखि‍ पवि‍त्र भेल। जे एहेन पैघ भगता ओकरा कोखि‍सँ जनमल। तहि‍ना महुआ घटवारि‍न सेहो अपन इज्‍जत बचाबए खाति‍र कौशि‍की धारमे जान गमा अपन सतीत्‍वकेँ अकिंचन बना कऽ रखलीह। राज सलहेसक कथा तँ नाचो रूपमे प्रसि‍द्ध अछि‍। जेकरा प्रीति‍जी चि‍त्रवत् कऽ इति‍हास बना देलनि‍। एकटा धरोहरक रूप दऽ देलथि‍। अनचि‍न्‍हार जकाँ छेछन महराज कथाक संग कालि‍दासक चि‍त्र कथा आ हुनक यादव कुलमे जन्‍म हएब, हुनक यर्थाथ परि‍चए भेल। बहुतोकेँ ई बूझल हेतनि‍ जे कालि‍दास तँ कर्ण-कायस्‍थ छलाह। ऐ लेल सेहो प्रीति‍ जीकेँ धन्‍यवाद। प्रीति‍ जीक दोसर रचना मैथि‍ली चि‍त्रकथामे कुल दस गोट कथा वर्णित अछि‍। जइमे राजा सलहेस, बोधि‍ कायस्‍थ, दीना-भदरी, नैका-बनि‍जारा, वि‍द्यापति‍क आयु अवसान प्रमुख अछि‍। ऐ प्रकारे दुनू चि‍त्रकथा पढ़लापर एहेन लागल जे ई कथा सभ ऐति‍हासि‍क महत पाओत। ऐ प्रकारक रचनाक सर्वथा अभाव सन छल। जेकरा प्रीति‍जी हमरा सबहक समक्ष राखि‍ एकरा धरोहरि‍ स्‍वरूप महत देलनि‍। ऐ पोथीकेँ नैना-भुटुकाक पहि‍ल पसि‍न कहल जा सकैत अछि‍। खास कऽ जे बच्‍चा नंदन, वालहंश, वा अन्‍य पोथी पढ़बाक हि‍स्‍सक लगौने छल आब ओ लेखि‍का द्वारा रचि‍त रचनासँ लाभ उठाओत। पोथीक प्रत्‍येक चि‍त्र तथ्‍यात्‍मक आ उद्देश्‍यपरक अछि‍। चि‍त्रकथाक माध्‍यमसँ प्रीति‍जी मि‍थि‍लाक वि‍लुप्‍त प्राय भेल वि‍षय-वस्‍तुकेँ कथाक रूप दऽ जीवंत कऽ देलनि‍। मैथि‍ली प्रेमी ऐ तरहक रचनाकेँ नजरअंदाज नै कऽ सकैत छथि‍। आबैबला पीढ़ीक लेल ऐ प्रकारक रचना नै मात्र मनोरंजक अपि‍तु प्रेरणादायक सेहो सि‍द्ध हएत। पोथीक सभसँ पैघ बात ई अछि‍ जे प्रत्‍येक चि‍त्र एकटा वि‍शेष अंदाज आ दशाकेँ प्रस्‍तुत करबामे सफल भेल अछि‍ जे लि‍खल गेल पाँति‍क भाव स्‍पष्‍ट कऽ रहल अछि‍। प्राय: सभ जाति‍क लोकक चि‍त्रण ऐ चि‍त्रकथामे समाएल अछि‍। जे प्रीति‍ जीक समन्‍वयवादी सोचक परि‍चायक अछि‍। प्रगति‍शील वि‍चार तँ सहजहि‍। मि‍थि‍ला सभ दि‍नसँ उदारक परि‍चायक रहल मुदा कि‍छु लोक बेवसायि‍क एवं जाति‍वादी सोचक लाड़नि‍ बीचमे चलौलनि‍ आ चलाइयो रहल छथि‍। हमरा हर्ख भऽ रहल अछि‍ ऐ चि‍त्रकथाक लेखि‍कापर जे एतेक सुन्‍दर, सुगम, आ प्रगति‍शील डेग बढ़ा मैथि‍ली साहि‍त्‍यक वि‍कासमे एकटा बेछप स्‍थान बनौलनि‍ अछि‍। हमर शुभकामना सतत रहत जे प्रीति‍जी ऐ प्रकारक रचना करैत रहती आ श्रुति‍ प्रकाशन प्रकाशि‍त करैत रहत तँ नि‍श्चि‍त रूपेँ मि‍थि‍ला, मैथि‍ली आ मैथि‍लामे रहनि‍हार सभ पूर्णत: समृद्ध भऽ जेताह। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। १.अमित मिश्र- विहनि कथा- परिभाषा २.सन्दीप कुमार साफी दूटा विहनि कथा ३.राम वि‍लास साहु दूटा ि‍वहनि‍ कथा ४.वीरेन्‍द्र कुमार यादव-लघुकथा- बाबाक गाछी १ अमित मिश्र विहनि कथा परिभाषा माएक मोन एकाएक बड खराप भऽ गेल ।गाममे एहि रोगक डाँक्टर नै छथि तँए एकटा मित्रक संग शहर एलौँ ।रवि दिन ,क्लिनिक बंद ।डाक्टर साहेबक डेरापर जाएबाक योजना बनल ।मुदा . . . । पिछला दू घंटासँ गली-गली भटकि रहल छी ।जालमे फँसल माछ जकाँ मोहल्ला भरिमे अहुरिया काटि रहल छी ।लोक सबसँ पूछि रहल छी ,मुदा . . .। डाँक्टर साहेबक डेरा नै भेटल । मोन खौंझा गेल । मित्र बजलनि ,"जानबरसँ पूछि रहल छी तँए जबाब नै भेटैत अछि ।" ई सुनि एकटा लड़का रूकि गेल आ कहल ,"भाइजी एकरे नाम तँ शहर छै ।गामक लोक अगल-बगलकेँ दस गामक लोककेँ चिन्हैत अछि मुदा शहरमे बायाँ हाथ, दायाँ हाथकेँ नै चिन्है छै। एक फ्लैटमे जन्मदिन होइ छै आ दोसरमे श्राद्ध, ककरोसँ कोनो मतलब नै। शहर तँ शमसान थिक जतऽ तांत्रिक बनि लोक अपन स्वार्थपूर्तिक लेल तपस्या कऽ रहल छथि । किओ ककरो खोज-खबरि नै लै छथि, नै तँ तपस्या भंग भऽ जेतै। ईएह तँ थिक शहरक परिभाषा।" इम्हर सह-सह करैत मनुखक बीच डेरा खोजबामे असमर्थ भेलहुँ आ उम्हर माएक साँसक डोर टूटल । २. सन्दीप कुमार साफी दूटा विहनि कथा १ साउस पुतोहु -कनियाँ, घरमे छी यै? -की भेलनि माए? -आँइ यै छौँकावाली, एतेक निचेनसँ सितै किए छी यै? दुपहरक काज-राज अहिना पड़ल छै। कनी म्हिसोकेँ पानि देखा ने दियौ, पियासल महीस खुट्टा तोड़ि रहल छै। एतेक कहूँ मनुख सुतए। कतेक नीन आबैए अहाँकेँ यै। -तँ की करू, सुतबो नै करू। भरि दिन खटैत-खटैत हाथ-पएर कारी-झामर भऽ गेल। ओम्हर चिलका तंग करए, इम्हर भानससँ तंग। हिनका होइ छै, हम भरि दिन खटैते रही, हमरासँ नै हएत महीसकेँ पानि पिआए। हमर माथ बड़ जोर दुखाइए, डाँर-पिट्ठी सेहो तोड़ने जाइए। एखन हमरासँ किछु नै हएत कएल। -आँइ यै, एतेक कहूँ पुतोहु बानसब्बर हुबए। सुनियौ यै ढुकरीक माए। अहाँ सभ कहबै जे साउसक दोख। हम की बैसल छी। भरि दिन गोरहा पाथैत-पाथैत दुपहर भऽ गेल, एक टाएर गोबर छल हन। एखन तक पूजो नै केलौं। कखैन खाएब कोनो ठीक नै। ऐ महरानीकेँ देखियौ जे हमरेपर हाथ-पएर चमकाबैए। बड़का छोटका कऽ आइयक कनियाँ कोनो माने-मतलबे नै राखैए। अपन जएह मोन भेल वएह केलक। के खेनहारकेँ देखैए, जे ससुर भैंसुर खेलक की नै, अपन पेट भरि गेल, दोसर आब जेना रहए। अपन भूख तँ चुल्हा फूक, दोसरक भूख तँ माथा दुख।भगवान हमरे बेटाक कपाड़मे ई नसिनियाँ बथाए छल। जाइ छी नहाइ लए, एकरासँ मुँह लगाएब तँ अपने मुँह खराब हएत। मुदा एकरा जाबे तक बेटासँ पिटबाएब नै ताबे तक हमहूँ सुख-चैनसँ नै रहब। हमहूँ ऐ कनसिनियाँकेँ देखा कऽ रहब, जँ बेटा वशमे रहत तँ ऐ जनानीकेँ केहन होइ छै। साउससँ जबाब-सवाल केनाइ सभ हम देखा देबै। महीस जेना नाथि देबै। पुतोहु- देखियौ यै मकरा काकी। हम सभ सुनि रहल छी। साउस कहूँ पुतोहुपर एतेक आगि-बाउल ढारै अइ यै। खिखरी माए, हमर साउस पहिने पुतोहु नै छलै की, जे पुतोहुकेँ एना सताबै छै। जँ ई बुढिया बेटासँ हमरा मारि खिया देलकै तँ घरमे यएह रहत की हमहीं रहब। झोँटा-केस हम नै उखाड़ि लेलिऐ तँ फेर की। साउस- यै, सुनियौ यै टोल-पड़ोसक लोक सभ। ऐ भत खोखरीकेँ हम कोन आगि-बाउल ढारि देलिऐ जे ई हमर झोटा-केस उखारत। कोनो हमरा कियो देखनाहर नै अए। आइ आबऽ दही बुढ़बाकेँ, नै किछु कहलकौ तँ फेर की। पुतोहु-हाँ-हाँ, देखब ने अहाँ हमर की बिगाड़ि लेब। जँ बेसी ओम्हर-आम्हर करब तँ हम छोटका भाएकेँ फोन कऽ के नैहरे चलि जाएब। तखन अहाँ अहिना असगरे चुल्हा फुकैत रहब। कहिया मरतै ई बुढ़िया, हमरा जानपर अछि। २ सगुन ठकोकाका-हर्षित बाबू। एना माथपर हाथ धेलासँ काज-राज चलैबला नै अछि। किएक तँ अपन मिथिलामे भऽ एलैए जे परम्परा, तेकरा तँ निभाबैए पड़त। किएक तँ अखुनका जइ मनसूबे चलि रहल अछि, तेकरा संग हमरा लोकनिकेँ चलऽ पड़त ने। अच्छए, खएर बात अपन समाजमे गरीब होइए वा धनिक, मुदा बेटी विवाह कोनो धरानीए भइए जाइत अछि। तइ लेल घबड़ेबाक कोनो बात नै। सभ बाबा उगना ठीक कऽ देथिन। ठीक छै तँ जाइ छी हर्षित बाबू, ठीक छै। हर्षित बाबू-आ ठको काका। हाँ कहू, की कहै छी। देखियौ जे चढ़ैत शुद्धमे बेटीक कन्यादान कऽ के हम सभ दिल्ली जल्दी जाए चहै छी। तइ दुआरे काका हम अहाँकेँ सलाह लिअ लए आएल छी। जल्दीसँ कतौ भाँज लगेबै। ठकोकाका-हर्षित बाबू। ओना हम सखबारमे एगो लड़का देखने छलिऐ, हमरा बड पसन्द आएल। लड़का बंगलोरमे इन्जीनियरिंगक तैयारी करैत अछि। बुझबामे आएल, लड़का नीक गोत्रसँ संलग्न अछि। भाव-विचार बड मधुर आ स्वभाविक सेहो छै। मुदा हर्षित बाबू, लड़का कऽ माय-बाप नै अछि, ओकरा मामा-मामी आ नाना-नानी पालने अछि। हर्षित बाबू-ठकोकाका, जँ अहाँ ओ भाँज लगबितौँ तखन तँ बुझु जे सभ ठीके-ठाक रहितै। ठकोकाका-ओ लड़का बुझु जे अहाँकेँ सेट भऽ गेल। सगुन ठीक अछि अहाँक यौ हर्षित बाबू। हर्षित बाबू-शुभ लगनमे देरी की। जे नगद लेता अओर लड़का जे लेतहिन। हम सभ देबनि दै लेल। चैनकेँ गलामे देबनि, मोटर साइकिल देबनि। मुदा ओ लड़का हमरा बड पसन्द आएल। ठकोकका, अहाँ जल्दीसँ ई चक्कर चलाउ। हमर कन्यादान भऽ जाए। जल्दीसँ सगुन लऽ कऽ जाउ, गोर लगै छी। ३ राम वि‍लास साहु दूटा ि‍वहनि‍ कथा इमानदारीक पाठ ननुआँ पुछलक कनुआँसँ- “भैया आइ-काल्हि‍ तँ गामोक स्‍कूलमे बड़ सुवि‍धा पढ़ाइ होइ छै तैयो वि‍द्याथी सभ शहरक स्‍कलमे कि‍अए पढ़ै छै?” कनुआँ जबाब देलक- “गामक इस्‍कूलमे इमनदारीक पाठ आ शहरक इस्‍कूलमे रोजगारक पाठ पढ़बै छै।” “से केना?” -ननुआँ पुन: पुछलक। कनुआँ उत्तर देलक- “गामक इस्‍कूलमे एहेन पाठ पढ़बै छै जे कहुना साक्षर भऽ जाए, गाए-भौंस चराबए आ नमहर भेलापर हर-फार जोतए, खेती करए। अन्न उपजा कऽ अपनो खाए आ आनोकेँ खि‍याबए। ई छि‍ऐ ने इमानदारीक पाठ मुदा शहरक इस्‍कूलमे वि‍द्यार्थी सभकेँ रोजगारक पाठ पढ़बै छै। ओ सभ पढ़ि‍-ि‍लखि‍ रोजगार लेल आन-आन शहर चलि‍ जाइ छै। अपन घर-परि‍वार आ समाज सेहो छुटि‍ जाइ छै। समाजसँ बेमुख भऽ जाइ छै। आब तोहीं कह जे इमानदारीक पाठ के पढ़तै?” बौआ बाजल पढ़ल-लि‍खल बेरोजगार छी मुदा दि‍न केना कटै छल तकर कोनो सुधि‍-बुधि‍ नै छल। ऊपरसँ परि‍वारक बोझ, आगू पढ़बाक इच्‍छा रहि‍तो कि‍छु नै कऽ सकलौं। एक दि‍न मनमे फुराएल जे कि‍छु नेना-भुटकाकेँ पढ़ाएल जाए। अहुना तँ हम बुड़ि‍आएले छी औरो बुड़ि‍या जाएब। एक दि‍न भोरमे बौआ-बुच्‍चीकेँ ओसारपर पढ़बै छलौं। दुनू बेरा-बेरी प्रश्न पुछए आ हम उत्तर दइ छेलि‍ऐ। अहि‍ना स्‍थि‍ति‍मे बौआ पुछलक- “लोक एत्ते मेहनतसँ कि‍अए पढ़ैए, जे पढ़ैए सेहो आ जे नै पढ़ैए ओहो तँ एक ने एक दि‍न मरि‍ऐ जाइए?” बौआकेँ हम समझबैत कहलि‍ऐ- “जीवन-मरण तँ प्रकृति‍क नि‍अम छी। ओ नि‍रंतर होइत रहैत अछि‍।” बौआ फेर पुछलक- “तखनो लोक कि‍अए पढ़ैए?” “मनुख पढ़ि‍-लि‍ख ज्ञान अर्जित करैए आ ओइ ज्ञानसँ अपन जि‍नगीकेँ सुलभ बना असली जि‍नगी जीबैए। लोक पढ़ि‍-लि‍खि डाक्‍टर-इंजि‍नि‍यर, औफि‍सर, कवि‍ लेखक आ उपदेशक इत्‍यादि‍ बनैए। अच्‍छा ई कहह जे तूँ की बनबऽ?‍” बौआ बाजल- “हम पढ़ि‍-लि‍ख कोनो काज कऽ सकै छी मुदा कवि‍-लेखक नै बनब। सभ कमा कऽ सुख-मौजसँ जि‍नगी बि‍तबै छथि‍ मुदा कवि‍-लेखककेँ कोनो कमाइ नै होइत छन्‍हि‍।” ४ वीरेन्‍द्र कुमार यादव लघुकथा बाबाक गाछी आमसँ लदल गाछ। बि‍नु ओगरबाहक गाछी तुलसि‍या चाँपक कछेरमे। तुलसि‍या गाममे अभि‍जात वर्गक लोक सबहक संगे एक घर अक्षोप सेहो छल। राजू मल्लि‍क ओइ अछोप परि‍वारक पढ़ल-लि‍खल युवक छल। सरकार आरक्षणक पक्षमे ओही गाम-पंचायतकेँ सुरक्षि‍त कए लेलक। गामक प्रमुख लोक सभ वि‍चार कए कऽ राजूकेँ मुखि‍या आ मोहि‍नीकेँ प्रति‍नि‍धि‍ चुनलक। मोहि‍नी ओही गामक पैघ शशि‍बाबूक पुत्र वधु छलीह। मोहि‍नीक पति‍ भरि‍-दि‍न गाँजा-भांग पीबैत, बि‍नु धि‍या-पुताक जवानि‍येमे स्‍वर्ग चलि‍ गेल। नव ि‍नर्वाचि‍त प्रति‍नि‍धि‍ सबहक सम्‍मेलन भेल, जइमे पहि‍ल बेर मोहि‍नी आ राजूक भेँट भेल। आ ई भेँट दुनू गोटेक छातीमे मीलक पथ्थर जकाँ गड़ि‍ गेल। दुनूक मोनमे एक-दोसरकेँ अपनेबाक आग सुनगए लगल। पि‍रि‍तक आतुरतामे मोहि‍नी चैत-बैसाखक रौदमे बाबा गाछी दि‍स‍ वि‍दा भेल। बाबा गाछीक बगलमे चाँपमे राजू मल्लि‍क अपन सुगर टहलाबए गेल छल। राजूपर मोहि‍नीक नजरि‍ पड़ि‍ते मोहनीक प्रीति‍ उमड़ि‍ पड़ल। मोहि‍नी जोरसँ बाजि‍ उठल- “राजू, एम्‍हर गाछक छाँहमे आउ, ओतए रौदमे कि‍एक खून सुखबै छी?” एतेक सुनि‍ते राजू दौग कऽ मोहि‍नी लग आबि‍ गेल। मोहि‍नी राजूक हाथ पकड़ि‍ कऽ लगमे आनए चालहक, मुदा राजू अपनाकेँ अछूत बूझि‍ अलग भऽ गेल। मोहि‍नी एकटा फकड़ा सुनबैत राजूकेँ अपना लगमे खींच लेलक- “प्‍यास ने मानए धोबी घाट, नीन ने बुझए टुटल खाट आ प्रीति ने मानए ओछी जात।‍” राजूक देहपर मोहि‍नीक हाथक स्‍पर्शसँ राजूक हृदए शीतल भऽ गेल आ मोनमे भेलै जे ई चमत्‍कार केना भऽ गेलै जे एतेक पैघ घरक पुत्र-वधुक लगमे हम बैस गेलौं। मोहि‍नी बाजल- “ऐ राजू अहाँ हमरा हृदैमे छी। हम अहाँकेँ ईश्वरसँ आगू मानै छी। हमर जीवनक संगी बनबाक लेल स्‍वीकार करू।” एतेक बात सुनि‍ते राजू बाजल- “ई केना होएत? अहाँ पैघ लोक छी आ हम अछूत। ओना तँ अहाँक नजरि‍ पड़ि‍ते हमहूँ ई सूधि‍ बि‍सरि‍ जाइ छी जे हम अक्षोप छी। मोहि‍नी बाजल इंसान अछोप नै होइत अछि‍। कर्मसँ लोक ऊँच आ नीच होइत अछि‍। बाबा साहेब अम्‍बेदकर जाति‍सँ अछोप छलाह मुदा ओ अपन शि‍क्षा आ कर्मसँ ऐ समाजकेँ देखौलक जे समाजक आगूक पाँति‍मे हुनक स्‍थान छन्‍हि‍।” मोहनी आ राजूक प्रेम-प्रसंग बीचेमे कलुबा जे शशि‍ बाबूक मुँह लगुआ आ चालि‍सँ चुगला छल, कि‍छु दूरसँ ई खेला देखैत पोखरि दि‍स जाइत छल। कलुआ अपन नजरि‍ पड़ि‍ते राजू डरसँ सहमि‍ गेल आ इशारासँ मोहि‍नीकेँ देखौलक। मोहि‍नी राजूकेँ हि‍म्‍मत बन्‍हैत अलग भऽ गेलीह। आ फेर भेटबाक समए नि‍श्चि‍त केलक। ऐ प्रेम-प्रसंगक चर्चा सौंसे गाममे होमए लागल। हिम्मत बान्‍हि‍ कलुआ शशि‍बाबूसँ ई बात कहैत रहनि‍ ओही समैमे गामक औरो पैघ लोक सभ आबि‍ गेल आ शशि‍बाबूकेँ उतार-चढ़ाउक बात कहए लागल। शशि‍बाबू बाजलाह- “रजुआक बाप रामा डोमकें बोलाबा भेजू।” बोलाबाक लेल गेल धीरू रामा डोमकेँ सभटा बात बतौलक। रामा डोम दारू पीब कऽ मस्‍त छल। मालि‍कक बोलाबापर रामा दौगल आएल आ दुनू हाथ जोड़ि‍ बाजल- “मालि‍कक जे हुकुम हेतै हम मानब।” कलुआ बाजल- “रे राम तूँ चारि‍ दि‍नमे ऐ गामसँ आन गाम चलि‍ जो, फेर घुरि‍ कऽ ऐ गाम नै अबि‍हेँ।” रामा डोम मालि‍कक हुकुम मानैत बाजल- “मालि‍क अहाँक हुकुमक पालन अवस्‍स करब।” ई कहि‍ रामा डोम ओइठामसँ वि‍दा भऽ गेल। घर पहुँचि‍ रामा, पुत्र राजूकेँ थप्‍पड़ मारैत कहलक- “तोरा होश-हवाश नै, एतेक जुलुम कि‍एक केलेँ।” राजू कनैत बाजल- “बाबूजी, हमर कोनो दोख नै, हम ि‍नर्दोष छी। रामाक गुस्‍सा शान्‍त भेल।” भोरबाक चारि‍ बजि‍ते बगलक गामसँ अजान सुनि‍ते मोहि‍नी घरसँ भऽ बाबा गाछी आएल। ओही गाछीमे राजू छल। दुनू गोटे गाम छोड़ि‍ चलि‍ गेल। भोर होइते ई खबरि‍ सौंसे गाम आगि‍ जकाँ पसरि‍ गेल। शशि‍बाबू गामक लोकसँ वि‍चार केलक आ थानामे अपहरणक रपट लि‍खैलक जइसँ राजू आ रामाक नाम देलक। ओम्‍हर राजू मोहि‍नीक संगे कोर्ट मैरेज केलक आ कि‍छु दि‍न अनतए रहबाक नि‍श्चय केलक। तइ बीच गामक लोक सभ रामा डोमकेँ पुलि‍ससँ पकड़बा देलक। पुलि‍स मारि‍-पीट कऽ रामाकेँ जहल पठा देलक। ई खबरि‍ सुनि‍ते राजू मोहि‍नीक संग कोर्टमे हाजि‍र भेल। रामाक जमानत करौलक आ गाम दि‍स वि‍दा भेल। राति‍मे रामा, राजू आ मोहि‍नी गाम आएल। भोर होइते सौंसे गामक लोक शशि‍बाबूक दुआरि‍पर जमघट लगा देलक। कि‍यो बाजैत- “ई डोमरा छातीपर मुँग दररि‍ रहल अछि‍।” तँ कि‍यो बाजए- “एहेन हुलुम कहि‍यो नै भेल रहए।” ऐ तरहेँ चुपचाप शशि‍बाबू सुनैत रहला। कि‍छु कालक बाद बजलाह- “हे यौ समाजक लोक सभ परि‍वर्त्तन दुनि‍याँक नि‍अम छी। काल्हि‍क ऊँच आइ गहींर, काल्हि‍क पैघ आइ बरोबरि‍। बदलैत कालक चक्रसँ कि‍छु सि‍खबाक चाही। आब अपना सभकेँ कोनो चारा नै अछि‍। मोहि‍नी ि‍वधवा पुत्रवधु छी, जन-प्रति‍नि‍धि‍ सेहो बना देलि‍यनि‍। समाजकेँ सही आ नव दि‍शा देबाक लेल प्रति‍नि‍धि‍ होइत अछि‍। अपना सभ रूढ़ि‍वादी वि‍चारक ति‍याग करू। वि‍धवा वि‍वाह होबाक चाही। संगहि‍ ऊँच-नीचक भेद-भाव छोड़ू। सभ लोक ईश्वरक संतान छी। कि‍यो ऊँच-वा-नीच नै होइत अछि‍। सभकेँ समान बुझबाक चाही। अंतरजातीय वि‍आहकेँ सरकार प्रश्रय दऽ रहल अछि‍। ऐ अवसरपर समाजक लोककेँ हम आइ साँझक ि‍नमंत्रण दइ छी। साँझमे सामाजि‍क रि‍ति-रेबाजक अनुसार मोहि‍नी आ राजूक बि‍आह होएत।” ई सभ गप्‍प कहैत शशि‍बाबू उठि‍ गेलाह आ कलुआ केर संग रामा डोमक घर दि‍स वि‍दा भेल। साँझमे राजू दुल्‍हा बनि‍ बरि‍आतीक संग शशि‍बाबूक दुआरि‍पर पहुँचल मोहि‍नी आ राजूक बि‍आह भेल। शशि‍बाबू अपन दोसर टोलक कामत परहक घर-दुआरि‍ आ जमीन मोहि‍नी आ राजूकेँ देबाक घोषणा केलनि‍। ऐ तरहेँ आधुनि‍क समता-मूलक लोक जकाँ राजू आ मोहि‍नी जीवन-बसर करैत ग्राम-पंचायतक प्रति‍नि‍धि‍त्‍व करए लगलाह। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com  पर पठाउ। ३. पद्य ३.१.जगदीश चन्द्र ठाकुर ‘अनिल’- की भेटल आ की हेरा गेल  (आत्म गीत)- (आगाँ) ३.२.१.जगदीश प्रसाद मण्‍डलक लगभग दर्जन भरि‍ गीत २.मिहिर झा- गजल ३.अमित मिश्र-भगवती गीत/ गजल ४.अच्‍छे लाल शास्‍त्री- दूटा कविता ३.३.१.कैलास दास-कम्प्यूटर २.प्रमोद रंगीले- मच्छर राज ३.शंभु सौरभ- गीत ३.४.१.राजदेव मण्‍डल जीक दू गोट कवि‍ता २.डॉ॰ शशिधर कुमर “विदेह” ३.५.१.मुन्नी कामत- किछु कविता २.रूबी झा- दूटा गजल ३.शान्तिलक्ष्मी चौधरी-दुर्गापूजा ४.नंद वि‍लास राय ३.६.१.पवन कुमार साह २.बिपिन कुमार कर्ण- कवि‍ता-देखु केहेन ई भारत ि‍नर्माण ३.रामदेव प्रसाद मण्‍डल ‘झारूदार’- झारू ३.७.१.बाल मुकुन्द पाठक- किछु गजल २.सन्दीप कुमार साफी- दूटा कविता ३.८.१.विनीत उत्पल- गजल २.अनिल मल्लिक- गजल ३.किशन कारीगर- (हास्य कविता) जगदीश चन्द्र ठाकुर ‘अनिल’ की भेटल आ की हेरा गेल  (आत्म गीत)- (आगाँ) बिजली कौखन कऽ अबै छली किछु हँसै छली, किछु कनै छली सभ बाट अहिल्या सन शापित नित बाट रामकेर तकै छली

निशिचरक उपद्रवसँ सभठाँ छल यज्ञस्थल सभ घिना गेल, हम सोचि रहल छी जीवनमे की भेटल आ की हेरा गेल। हम थहाथही करइत रहलहुँ अन्हड-बिहाड़ि भोगइत रहलहुँ कूकुर, हाथी आ गहुमनसँ डरइत रहलहुँ, भगइत रहलहुँ

बतहा हाथी केर तरबा तर चुट्टी अनगिनती पिचा गेल, हम सोचि रहल छी जीवनमे की भेटल आ की हेरा गेल। हम देखलहुँ सबहक सोझाँमे बकरीमे खुट्टा बान्हल अछि सौंसे आकाशक बदलामे कागत एक टुकड़ी तानल अछि

निर्वासित रहबा केर दुख छल मैथिलीक भाग्यमे लिखा गेल, हम सोचि रहल छी जीवनमे की भेटल आ की हेरा गेल।

देखलहुँ हम नवगछुलीकेँ देखलहुँ हम पुरना गाछीकेँ देखलहुँ हम गाछक धोधरिकेँ देखलहुँ हम गाछक बाँझीकेँ

छल हहरि गेल सभ गाछ, मुदा लत्ती-फत्ती सभ मोटा गेल, हम सोचि रहल छी जीवनमे की भेटल आ की हेरा गेल।

मनकें जे आलोकित केलक से छल इजोत ‘मिथिला मिहिर’क ‘मिथिला दर्शन’ आ ‘माटि पानि’ ‘भारती’ आ विद्यापति पर्वक

‘जय जय भैरवि’ केर शंंखनाद चेतना-भूमिमे समा गेल, हम सोचि रहल छी जीवनमे की भेटल आ की हेरा गेल।

यात्री, हरिमोहन जगा गेला नित नऽव पराती सुना गेला आंगन-आंगन आ घर-घरमे मैथिलीक पूजा सिखा गेला

‘जय मैथिली’ कहइत-कहइत छल आँखि हुनक डबडबा गेल, हम सोचि रहल छी जीवनमे की भेटल आ की हेरा गेल । ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। १.जगदीश प्रसाद मण्‍डलक लगभग दर्जन भरि‍ गीत २.मिहिर झा गजल ३.अमित मिश्र-भगवती गीत/ गजल ४.अच्‍छे लाल शास्‍त्री- दूटा कविता १ जगदीश प्रसाद मण्‍डलक लगभग दर्जन भरि‍ गीत भीख मांगि‍...... भीख मांगि‍ दुनि‍याँ भि‍खारी दानी शि‍व कहबै छी यौ। हे यौ भोलानाथ दानी शि‍व कहबै छी यौ। राि‍त-दि‍न समैट‍-समटै छी भीखमंगा कहबै छी यौ धड़ि‍ भीख धारा बनै छी धार भीख बहबै छी यौ धार भीख......। खि‍खर सि‍र अकुर-सकुर चोटी सि‍र पकड़ै छी यौ धार बनि‍ धड़ा-धड़ा पहुँच समुद्र धड़ै छी यौ। पहुँच समुद्र......। हे यौ भोला बाबा पहुँच समुद्र धड़ै छी यौ। बकरी खुट्टी...... बकरी खुट्टी खुटेस-खुटेस जि‍नगी पाठ पढ़ै छै। कुन्‍ज भवन, लाल बि‍हारी लीला रचि‍ रास करै छै। लीला रचि‍......। रंग-बि‍रंगक पात खुआ रस अमरीत चुसै छै। मन मक्‍खन चोरि‍ छोड़ि‍ गरदनि‍ बान्‍ह पड़ै छै। मीत यौ, गरदनि‍......। बीर्त रहि‍तो बकरी जेना साँढ़-धाकर कहै छै। मनहाएल-मनहाएल रहि‍तो उरीति‍ रीति‍ गबै छै। मीत यौ, उरीति‍......। अमरा अँचार...... अमरा अँचार चटै छै मीत यौ, अमरा अँचार चटै छै। अमौर-मौर बनि‍ बना अबि‍ते रस बदलै छै। पानि‍ जीह पाबि‍ पनि‍या चहटि‍ चुहुटि‍ धड़ै छै। मीत यौ......। जेहने फड़क रंग-रूप तेहने ते पातो धेने छै। नमहर-नमहर गीरह-गाँठ बि‍नु गि‍रहेक डारि‍ पकड़ै छै। मीत यौ......। चटि‍ते अचार अम अमड़ि‍ अमरजोत देखै छै। जीवन जन छोड़ि‍-मोड़ि‍ मरण वाणि‍ पकड़ै छै। मीत यौ......। घरे-घरे...... घरे-घरे ज्‍योति‍ दीप गाम अन्‍हार पड़ल छै। घरे-घर समाज कहि‍-कहि‍ अध-मरल गाम पड़ल छै। अध-मरल......। इति‍हास मि‍थि‍ला कहि‍ पुर जनक धाम बनल छै। वक्र आठ गीत गाबि‍ ज्‍योति‍रमान जगै छै। ज्‍योति‍रमान......। बनि‍ कनि‍याँ-पुतरा कठपुतरी मूक नाच नचैत रहै छै। राति‍-दि‍न एकबट्ट बरहबट बनि‍ नाचि‍ नाच नचैत रहै छै। नाचि‍ नाच......। बेटी कि‍अए...... बेटी कि‍अए बनेलौं, शि‍व यौ बेटी कि‍अए बनेलौं। भूख पेट दुख बनि‍ बना हमरे कि‍अए सजेलौं हमरे कि‍अए......। सजि‍ साजि‍ सि‍र सजा सजायाक्‍ता कि‍अए बनेलौं कि‍छु ने कामना मनमे ठनने एहेन कि‍अए बनेलौं। बेटी कि‍अए......। मन-मन माली बैसल छै मालि‍न कि‍अए बनेलौं मन-मलि‍न मुँह कानि‍-कानि‍ बेटी कि‍अए बनेलौं। हे शि‍वदान हे बमभोला बेटी कि‍अए बनेलौं। मनक भाव...... मनक भाव समेटि‍-समेटि‍ मनोभाव पनपए लगै छै। सुभाव अभाव कुभाव भव रूप रंग सजबए लगै छै। रूप रंग......। महकि‍ महि‍ परखि‍ नि‍खारि‍ भवन भव सि‍रजए लगै छै। उक-भाव लपकि‍ लपाक बि‍न भावुक सजबए लगै छै। बनि‍ भावुक......। भाव-भावुक रमकी-चमकी भाव लोक सि‍रजए लगै छै। आनन कानन मानन मानि‍ भवानन कहबए लगै छै। भवानन......। ि‍सरजन सि‍र...... सि‍रजन सि‍र पकड़ि‍-पकड़ि‍ जड़ि‍ धरती धड़बै छै। पति‍-पन पाँति‍ पति‍या उपवन-वन सजबै छै। भाय यौ, उपवन......। सजि‍ते वन उफनि‍ उपनि‍ धरती धार बहबए लगै छै। सुध-असुध कहि‍ सुनि‍-सुनि‍ घटि‍-बढ़ि‍ घाट बनबए लगै छै। भाय यौ, घटि‍-बढ़ि‍......। कोने-कानी कुटि‍-कुटि‍ धोबि‍ घाट सेहो बनबै छै। नि‍रजन, नि‍रमल बसि‍-बसु हारि‍-जीत दुनि‍याँ कहै छै। भाय यौ, हारि‍-जीत......। ‍ दूधक भूखल...... कनि‍-कनि‍ कानि‍ कहै छै। कमी-कमी कान पकड़ि‍ पेकड़ि‍ जड़ि‍ कनु अंग धड़ै छै। भाय यौ, जड़ि‍ कनु अंग धड़ै छै। कनि‍-कनि‍......। रंग-रंग कनजरि‍ बनि‍ वन रंग-रंग मुँह धड़ै छै। रंग-रंग सुनि‍ गुण-गुनि‍ फलाफल मुँह छि‍टकै छै। कनि‍-कनि‍......। जड़ि‍ कोनो फल फलागम कोनो फुलहरि‍ झड़ै छै। जड़ि‍-जड़ि‍ कनकि‍-कनकि‍ कान कलशल डारि‍ कहबै छै। अपेछि‍त, कलशल डारि‍ कहबै छै। कनि‍-कनि‍......। संगे-संग...... संगे-संग न्‍यों घरक खुना गेल मीत यौ, एके संग न्‍यों खुना गेल। मीत यौ, ई गड़बड़ भेल उ गड़बड़ भेल? नै यौ, हँ यौ, हँ यौ, नै यौ, हँ....। संगे-संग......। अदलि‍ नीक बदलि‍ अधला अदलि‍-बदलि‍ बदला गेल। गारा गर पकड़ि‍-पकड़ि‍, मीत गारा घेघ बनबैत गेल, मीत यौ.....। संगे-संग......। बाम दहि‍न बनु बुझने-सुझने छटि‍ बाम बूच छटि‍या गेल। डाली कसतारा सजि‍ सजबए ई अधला भेल, मीत यौ ई अधला भेल। संगे-संग......। चोटी छुबै...... चोटी छुबै चट-चटि‍या चटि‍या चाट सि‍खै छै। जीनगानि‍क रंग रभस जि‍न्‍दादि‍ली गाबै छै। चोटी छुबै......। बून-बून अकास बनि‍-बनि‍ धड़-धरती छुबैत रहै छै। चूह चुहुट साटि‍ सटि‍ छती दूध-फूल बनबै लगै छै। चोटी छुबै......। करम-धरम खेल सि‍र सि‍रजि‍ नचनी नाच नचैत रहै छै। बाट-बटोही पकड़ि‍-पकड़ि‍ मूंगबा मुँह वि‍लहि‍ चलै छै चोटी छुबै......। २ मिहिर झा गजल सारंगीक तार पर जेना फिरैत उँगरी जूता पर टकुआ संग छै चलैत उँगरी

देश बनल कूडा डिब्बा फैलल सौंसे गंध कौखन एम्पायर जेकाँ छै उठैत उँगरी अंग अंग कानि उपर आनि सेहो भरल लंकाक छोट रहितो छैक तनैत उँगरी

छौड लपेट माछ के निकबैत आ तरैत पिठाड सों सामा चकेबा के ढोरैत उँगरी 

छैक गाम अलग कुल परिवारो अलग  हृदय मिलबै छै सिंदूर करैत उँगरी ३ अमित मिश्र १ भगवती गीत राति सुनहरी,उगल इजोरीया ,चक-मक चमकत चान यौ भऽ कऽ शेर सबार एथिन मैया हमरो गाम यौ कार्तिक एनिन  गणपति एथिन ,संगमे सब बहिनियाँ एथिन ललका चुनरी शोभैत हेतै ,रूपसँ मनमोहिनी हेथिन-2 सब मिल करबै हमहू-2बारम्बार प्रणाम यौ भऽ कऽ शेर सबार . . . . . . . निमियाँकेँ छाँवमे अम्बे ,बनौथिन अपन डेरा यौ गीतो हेतै झालियो बाजतै ,और बाजतै नगाड़ा यौ-2 झूमऽ लागथिन मैया भवानी-2 संग-संग सगरो गाम यौ भऽ कऽ शेर सबार . . . . . . कष्ट सबहक दूर करथिन ,करथिन नैया पार यौ अरहुल फूलक माला बनाबू ,चलू अम्बे द्वार यौ-2 अन्तमे जयकारा लगाबू-2 लऽ दुर्गाकेँ नाम यौ भऽ कऽ शेर सबार एथिन मैया हमरो गाम यौ-6 २ गजल

उठि कऽ बैसल मरदबा एखनी कुच्छो होतै की  छै समय ई भोरका एखनी कुच्छो होतै की साँप दू मूँहाँ भरल छै सगर घरमे की करबै बीनपर कठफोड़बा एखनी कुच्छो होतै की

नोट हमरे लोककेँ संग हमरे थानेदारो देश हमरे चोरबा एखनी कुच्छो होतै की

बाण चललै कोन देखू करेजा छलनी भेलै घावमे छल नेहिया एखनी कुच्छो होतै की

चान धरि पहुचल मनुख आब तारापर चलि जेतै  काल्हि घर ओतै मुदा एखनी कुच्छो होतै की

पाँति किनको छै गजल हमर भेलै ई कर्मक फल बादमे लिखबै कता एखनी कुच्छो होतै की

2122-2122-1222-222 ४ अच्‍छे लाल शास्‍त्री पि‍ताक नाओं स्‍व. बि‍लट यादव गाम- सोनवर्षा कवि‍ता- कि‍सानक भेल पि‍सान देखू सभ जन महग भेल समान जखन सभसँ सस्‍ता बि‍कैत धान। कि‍यो अछि‍ चलैत चि‍बबैत पान जखन अखन कि‍सान भेल पि‍सान। खेल करैत अछि‍, बीचक दलाल तेजगर चक्कूसँ करैत हलाल। अछि‍ भड़ैत दूनू जेबीमे माल हाल देखि‍ रहल छी सालक साल। ठोकि‍ रहल अछि‍ सभ समस्‍या ताल सभ दि‍न कि‍सानकेँ बजरल ताल। नै कहैत कि‍यो कि‍नको हाल कहि‍यो दाही अछि‍ कहि‍यो अकाल। नै एकता जाधरि‍ कि‍सानक भेल चलैत रहत ताधरि‍ एहने खेल। कृषि‍ लागतपर हुअए उचि‍त दाम खुशी हुअए सभ लोक गामक गाम। जखन कि‍सानपर अछि‍ देशक ताज सभसँ कमजोर कि‍एक हुनक अबाज। सरकारकेँ चाही वि‍शेष धि‍यान सभ बात जानि‍ रहला भगवान। २ आबो चेत चलू जहन हम मनुख बनि‍ एलौं ऋृषि‍-मुनि‍क देशमे ति‍याग तपस्‍या दान परोपकार उद्देश्‍यमे। अखनो नै बाजू सूनू देखू कोनो झूठ असत्‍य अत्‍याचार तोड़ि‍ रहल सत्‍यक घूठ। देखलौं न्‍यालय-कचहरीमे झूठक बेवहार राखि‍ मि‍लान केहेन करैत एहेन वि‍चार। स्‍वदेशीसँ स्‍वदेशी टाका कमा रहल अछि‍ देशक जन-धन प्रगति‍क क्षण सभ गमा रहल अछि‍। कानून देशक नै मालि‍क जानि‍ रहल अछि‍ गलती करैत चलती धरैत फानि‍ रहल अछि‍। अंग्रेज भागि‍ गेल मुदा रहि‍ गेल बनल डगर पूर्खाक कृति‍ धूमि‍ल भेल सगर गाम-नगर। स्‍वदेश प्रेम नै जि‍नका ओ बनलाह दलाल नमक हराम देशक देशकेँ करैत हलाल। कानून जानि‍ मानि‍ प्रगति‍ करैत चलू देसमे जहन हम मनुख बनि‍ ेएलौं ऋृषि‍-मुनि‍क देशमे। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। १.कैलास दास-कम्प्यूटर २.प्रमोद रंगीले- मच्छर राज ३.शंभु सौरभ- गीत १ कैलास दास

कम्प्यूटर हमर काम अनेक अछि करैत नहि छी करबैै छी सभ क्षेत्र मे हम अबै छी । हम कम्प्यूटर छी

हम नहि झुठ बजैत छी बजबै तऽ पुछैत छी । करबै तऽ करैत छी । सभ क्षेत्र मे हम अबै छी ।

निरक्षर हम दोस्त नहि नहि जनने हमरा लोक बुझैत नहि अछि कामक हमर अन्त्य नहि अछि हम कम्प्यूटर छी

हम हँसबए आ खेलबय छी गेम फिल्म सभ देखबै छी । सभहक प्रोबल्म सोल्भ करैत छी हम कम्प्यूटर छी

तेल, मोविल हमर आहार नहि भाई वहिन आ साथीसँ सरोकार नहि परिश्रम हमर बाट अछि हमर नाम कम्प्युटर अछि

बिजुली पर हम चलैत छी ओकरा बिना हम मरल छी हम सभ क्षेत्रमे अबै छी हम कम्प्यूटर छी

हमर जे स्नेह करैत अछि ओकरा हम सभचिज दैत छी जे हमरा सँ दूरी रखैत अछि ओकरा हमहँु दूरे रखैत छी २ प्रमोद रंगीले मच्छर राज जनकपुर शहर पर करू सभ गाेटे नाज गुलाम बनू मच्छरक यएह अछि काज खुन पिपासु केँ देखू केहन छै अन्दाज सलाम ठोकू सभ गाेटे आबि गेल मच्छर राज पर्यटन दिवस नै , मनाउ मच्छर दिवस मच्छरसँ कटबैबला हाेउ विवश सुनु मच्छर संगीत बन्द करू अावाज सलाम ठोकू सभ गाेटे आबि गेल मच्छर राज

महलमे रहू या बनाउ झाेपडी सहनशीलता नै अछि तँ फोड़ू खाेपड़ी दिन भरिक टेन्सनकेँ अाउर बढाउ, जखन पड़ैए साँझ सलाम ठाेकू सभ गाेटे आबि गेल मच्छर राज

ऐ शहरमे रहै कऽ अछि तँ ई सत्य जानि लिअ ऐ दुखक निवारणा केउ नै करत, बात हमर मानि लिअ हारि मानि कऽ, देवता जानि कऽ पहिराउ ताज सलाम ठोकू सभ गाेटे अाबि गेल मच्छर राज ३ शंभु सौरभ, पता-गाम- भरवाड़ा, जि‍ला- दरभंगा। गीत चलैत चल चलैत चल पएरसँ पलैत चल तृण, तुषार तृप्‍त कण मृत्‍यु केर अदि‍प्‍त पल। जलैत चल......। मुद्रा अघाएल रहू प्रकृति‍ तत्व धैल रहू भावनाक लोलकीपर चेतना डम्हाएल रहू चलैत चल......। सि‍नेह भरल दृष्‍टि‍ हो स्‍वर्णमयी सृष्‍टि‍ हो कर्ममयी कामना फुलाएल सदा शि‍‍ष्‍ट हो स्‍वाँसमे हो स्‍वर-समर एक गीत, एक स्‍वर घेंटसँ मि‍ला कऽ घेंट वायुसँ मि‍लैत चल। चलैत चल......। बाट अनचि‍न्‍हार छौ सन्‍मुख अन्‍हार छौ बक्र धार चक्र बनि‍ कालचक्र ठाढ़ छौ छोट हृदए खोह छौ वयसो अजोह छौ वि‍षम बाट-घट छैक दौड़ैक बेछोह छौ चि‍न्‍तइ जे जीवनकेँ जीबैले योवनकेँ कर्मक आलोकमे मर्मकेँ छीलैत चल चलैत चल......। मानवता कानि‍-कानि‍ ठोहि‍ पारि‍ रहल मांगि‍ जि‍नगीक मोल रे खोल हृदए द्वारि‍ फानि‍ कान्‍ह परल भार छल मृत्‍युक हँकार छौ हि‍म्‍मतसँ काज ले ले-ऊँच पहाड़ छौ क्षि‍ति‍ज दृष्‍टि‍ हीन छैक कल्‍पना नवीन छैक तोँ प्रवीण यात्री बनि‍ सि‍न्‍धुमे पि‍लैत चल चलैत चल......। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। १.राजदेव मण्‍डल जीक दू गोट कवि‍ता २.डॉ॰ शशिधर कुमर “विदेह” १ राजदेव मण्‍डल जीक दू गोट कवि‍ता- कुहेस कतौ नै कि‍छु बचल अछि‍ शेष चारूभर पसरल कुहेस कठुआ गेल देह भीजल अछि‍ केश अधभि‍ज्‍जू सन भेल सभटा भेष घुरि‍या रहल छी ठामहि‍-ठाम कि‍यो नै देत अछि‍ समैपर काम टुटल जा रहल सभ आस ऊपरसँ लगि‍ गेल दि‍शाँस कुहेस और भऽ गेल सघन इजोत लगैत अछि‍ टीका सन। खेत-खरि‍हान, घर, जंगल-झार सभटाकेँ गि‍ंर गेल अन्‍हार उनटि‍ गेल अछि‍ जेना माथ छूटि‍ गेल सभ संग-साथ। नै भेटैत अछि‍ बाट नै अपन घाट लगे-लग औनाइत मन भेल उचाट सभ गोटे धऽ लेने छी खाट देखा दि‍अ जाएब कोन बाट। कहि‍या फटत ई कुहेस भेटत अपन घर परि‍वेश हे सुरूज कि‍रि‍णकेँ जगाउ आबो तँ ऐ कुहेसकेँ भगाउ। जानवरक बोली सुनहट बाट अन्‍हार भरल अछि‍ कि‍छो गोंगि‍या रहल देह थरथराइत मन डरल भूत जकाँ के अछि‍ अड़ल सुनमसान अछि‍ चारूभर ने लोग आ ने अछि‍ घर जानवर ठाढ़ अछि‍ आरि‍ ऊपर बाजि‍ रहल अछि‍ भऽ चरफर- “हे यौ, जल्‍दी लग आउ बोली सूनि‍ नै घबराउ कहब आब रहस्‍यक गप बोलीक लेल बड्ड केलौं तप अहाँ देलौं अपन बोली हमर पूरा भेल आसा नै घबराउ हम देब आब अपन भेस-भाषा।” जानवरक मुँहसँ मनुक्‍खक बोली सूनि‍ रहल छी अचरजमे डुमल अपने माथ घूनि‍ रहल छी। नै सुनब तँए कान मुनि‍ रहल छी वि‍कासक क्रमकेँ गुनि‍ रहल छी। २ डॉ॰ शशिधर कुमर “विदेह” एम॰डी॰(आयु॰) – कायचिकित्सा कॉलेज ऑफ आयुर्वेद एण्ड रिसर्च सेण्टर, निगडी – प्राधिकरण, पूणा (महाराष्ट्र) – ४११०४४, मृगतृष्णा  मे  पानि  तकै  छी मृगतृष्णा  मे  पानि  तकै  छी, कोना  भेटत  से  अँहीं  कहू ? छाँह पकड़बा केर  इच्छा  अछि, कोना भेटत  से  अँहीं  कहू ?? अग्निराशि   पर  खाली  पएरेँ, निःसंशय  भऽ   कोना  चलू ? काँट  भरल  सभ  बाट-घाट मे, बिनु आहत भऽ  कोना चलू ?? रोपल बाँस आ आम आश अछि, फड़त  कोना  से  अँहीं  कहू ? सौंसे  विष  केर  धार   बहइए, अमिय कहाँ  से  अँहीं  कहू ?? राति अन्हरिया,  पुनमि बाद पख, चान भेटत  कोना - कतए कहू ? धारक गति अतिप्रबल  पूब दिशि, जायब  पच्छिम  कोना  कहू ?? आइ  अहाँ  बड़  नीक  लगै  छी जानि   किए   नञि,   आइ  अहाँ  बड़  नीक  लगै  छी । जानि   किए   नञि,   आइ  अहाँ  बड़  दीव  लगै  छी ।। जकर  राग  युग – युग सञो राजित, जकर  बोल  दिक् - दिक् मे भाषित, सरस   सिंगारहि   रस   अनुसिञ्चित,  गीत   लगै   छी । जानि   किए   नञि,   आइ  अहाँ  बड़  नीक  लगै  छी ।। जकर  परस  मरु,  उपवन  साजित, विद्युत - हास - चपल  तव  याचित, जकर   हृदय    प्रीतक   मोती,   से   सीप   लगै   छी । जानि   किए   नञि,   आइ  अहाँ  बड़  नीक  लगै  छी ।। माँझ   जलधि  लघु  द्वीप   समाने, हीरक - द्युति   जनु  कोयला  खाने, जार मास निशिभाग अन्हरिया,  राति प्रकाशित दीप लगै छी । जानि   किए   नञि,   आइ  अहाँ  बड़  नीक  लगै  छी ।। जकर  प्रतिक्षा  युग – युग  कयलहुँ, जनम-मरण कत’  छाड़ि कऽ अयलहुँ, कालक    गति    निर्बाधेँ,    पर   मनमीत   लगै   छी । जानि   किए   नञि,   आइ  अहाँ  बड़  नीक  लगै  छी ।। आइ याद हुनिक बहुते आयल आइ   याद   हुनिक,  बहुते  आयल । कऽ  गेल   मोन,  अतिशय  घायल ।। नञि जानि    कतऽ सँ     कोन  वेग, उड़ितहि – उड़ितहि  एहि ठाँ   आयल । संगहि   अपना,    हुनिकर    मोनक, सन्दर्भ   केहेन,   की – की,  आनल । अछि   अनुनादित    मस्तिष्क – मोन, किछु चंचल सनि, किछु किछु पागल ।। स्मृति   पटल   पर   द्योतित   सनि, छवि  हुनिकहि  सद्यः  अछि  आयल । पवनक  ओ  परस   अनुराग   भरल, जनु प्रीति हुनिक भरि - भरि लाओल । श्रवणहि  ओ  हास  श्रुतिगोचर  थिक, अछि  जकर  मोन अतिशय कायल ।। छी  बैसल  एहि   ठाँ   क्लासहि  मे, पर  मोन तँ  कोसहु  चलि  आयल । लेक्चर   श्रवणहि    श्रुतिगोचर   छी, मन   सन्निकर्ष    हुनिक   पायल । लगइत अछि  जेना  ओ  आइ  एतए, संगहि  तँ  सम्मुख  छथि  आयल ।। क्रम संख्या लिखित शब्द अभिप्रेत उच्चारण १ पानि पाइन, पइन, पैन २ अछि अइछ ३ अग्निराशि अग्निराशि ४ राति राइत ५ अन्हरिया अन्हरिया, अन्हैरया ६ पुनमि पुनैम ७ गति गइत ८ अतिप्रबल अतिप्रबल, अइतप्रबल ९ दिशि दिशि, दिश १० जानि जाइन ११ कत’ कते १२ छाड़ि छोइड़ १३ सनि सइन, सन १४ अतिशय अतिशय, अइतशय ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। १.मुन्नी कामत- किछु कविता २.रूबी झा- दूटा गजल ३.शान्तिलक्ष्मी चौधरी-दुर्गापूजा ४.नंद वि‍लास राय १ मुन्नी कामत १ भेल पुरा आस उमरल ऐल देखी कारी मेघ चलि गेल धान पुबरिया खेत। बंजर भूमि आब पनिया जेतै मिटतै आब अपनो दुख सगरे अन्न उझला जेतै। बुच्ची लऽ लब आंगी अनबै तोरा लऽ लव साड़ी अबकी जतरामे निर्मली बजारक खेबै पकौरी। आइ पुबाइर बाध रोपबै काल्हि पछबाड़ि परसू उत्तरबाड़ि आ दक्षिणबाड़ि चारू दिस लहलहेतै खुशहाली सुख-सम्पन्न हम सब भऽ जएब। २ भाइयक स्नेह जब छोट छेलौं तँ कतेक स्नेह करै छल हमरा भइया हमर एगो लोर पर कतेक रूप बदलै छल भइया हाथी घोड़ा भालू बनि कऽ मनबै छल हमरा भइया। पहिलुक कर हमरा खिया कऽ फेर सुगा मैना कऽ हिस्सा सेहो खियाबै छल भइया। पर आब एगो अलगे रूप बदललखिन भइया भिन-भिनौजक खेल खेला रहल छथिन भइया। कतनो कनै छी तइयो नै देखै लऽ अबैए भइया। आब हम नै खेलबै ई खेल रहि नै सकबै भइया करि कऽ बैर भगवान हमरा फेरसँ बच्चा बना दइए हमरा भइया सँ ओ स्नेह मंगा दइए। ३ अलहर मेघ बजबैए मेघ तबला ढोल बरसाबैए पानि टिपिर-टिपिर झनर-झनर राग अनमोल। सन-सन-सन हवा सनसनाय तन-मन केँ ओ थिरकाबैत उड़ि जाए। झमकि कऽ आबैए कारी बादल चुमै लऽ धरतीक चरनकेँ तृप्त भऽ ई अल्हर बादल हँसैत खिलखिलाइत यएह आसमानमे पुनः विलुप्त भऽ जाए। २ रूबी झा गजल १

आंखि सँ दहs बहs नोर बहै छल ओ कहलेन धुर पानि रहल  आंखि हमर दुहु रंजित भेल केहन कठोर ओ नै जानि रहल श्वांस केर प्रवाहधारा थोड़ भs गेल प्राण नहि बांचल शेष जनु हुनका लेल छल सभ खेल तमाशा हम तरेगन गानि रहल 

गुदरी सिबि सिबि दिवस हम काटी अजीर्ण नुआ देह में छारल  साग पात तोरिकs जे आनलौ नोरे सँ हम ओकरा छानि रहल 

बारह बरख पर ओ एला एक घड़ी छाहों नहि भेटल हमरा  हरिबासर आ तीज सबटा केलौ कठिन ब्रत हम ठानि रहल 

विदीर्ण भs गेल मोन कल्पित भेल काया नोर सँ पोखरि बनि गेल  निर्दयी छलीतs ओ ओरे सँ छथि कथी लेल रूबी अहाँ कानि रहल 

सरल वार्णिक बहर वर्ण -२५ २ आश टूटल भाग फूटल 

आंखि इनहोरे सँ शीतल लेख भाग्यक जनु इहे छल 

ठोढ़ कम्पित मोन तीतल 

मलिन भेलै चान उज्जर 

राहु गरसिकs सौंस बैसल 

छन पलक के खिलल फूलो 

मौलि गेलै पुष्प कोमल 

पेट रूबी नूर बान्हल 

पहर चारू कानि काटल 

२१२२ -२१२२ सभ पांति में 

३ आइ हम बड़ उदास छी नै बुझी किए हतास छी छांह रौद आएत जाएत  लागै किए चैती बतास छी

आंखिसँ निन्न गेल कतए मुहं लगे सुखेल घास छी 

घर में नै नै बाहर चैन  नै निकले उहे भरास छी 

लागि अछि जगसँ विछुब्ध रूबी नेने अहाँ सन्यास छी 

सरल वार्णिक बहर वर्ण -१० ३ शान्तिलक्ष्मी चौधरी दुर्गापूजा

सिमसिम जाड़क हुलकी ओ भोरे केँ सितायब अधिराइते सँ भनभन भिनसरबे केँ जागब

हिंग रसूनक बदही सतसुइया केँ बान्हब नजरि-गुजरिकेँ जन्तर डायन-जोगिनके दागब

फुल चोरीके हो-हो बुढ़ियाक फौती सरापब भगजोगनीक रोसनी आँखिफाड़ि अधकोढ़ी निहारब

लालटेनक भकचोन्ह मिलिजुलि पार्थिब बनायब नेनतुर के भुसभुस ओ दादीक फटकारब

चिकैनि-गोबरौरके धवधव घुरघुराक चालब डेरहीक पिछड़ौन नेनाक जहिंतहिं नहायब

दोहारा तीराक लाली सिंगरहारक गमकब थलकम्मल फुलडाली कनेल-तरक हबगब

बेलपत्र काँटक सिबसिब दुइभक मुरी खोटब बेजन्त्री पत्ता केर गिनती मुरिपत्ता केराक काटब

मायक फिसफिस गौरीमंत्र बहिनदायक आरती गायब बाबा केर सप्तसती श्लोक हनुमानचलिसा एककंठेँ खेहारब

पानक बिचकी खिल्ली कतरा सुपारीकेँ खोंसब पिचकल मखाना पर किर्री ओंकरल मुँगकेँ प्रसादब

कुमारिक नववस्त्रम मुट्ठीमुट्ठी पान चिबायब पायल के झुनमुन नाक धरि सिनुर टघारब

ब्राह्मणक पीड़ही क्षीर-भोजन खायब दहुँदिश खीरक पत्ता निलका-माँछी नाचब

बान्हल बरदक हुरब कुकुर केँ दबारब बिज्जीकेँ कनकटुआ छागरकेँ नाँगरि मोचारब

खेसारिक छिम्मरि घासबोझ पर घोलटब लदहाक झुल्ला पालो पर झुलब

नीलकंठकेँ ढ़ेंपा  बिढ़निकेँ मारब रसचोभीक फुदफुद टिकुलीकेँ शिकारब

लिय आबि गेलीहेँ मैया धीयापुताकेँ खेलाअब आउ आबैजाउ गाम दुर्गापुजा मनायब ४ नंद वि‍लास राय कवि‍ता वोट पंचायत चुनावक पकड़ने छल प्रचार-प्रसारक बड्ड जोर सभ चौक-चौराहा पर छल रेडीक अावाजक शोर। बैसल रही हम अपन दलानपर चुनावक सरगर्मी रहए उफानपर ताबति‍मे हमर हरबाहा जकर नाम अछि‍ मंगला देखबा-सुनवामे तँ ओ बुरि‍बक लगैत अछि‍ मुदा अछि‍ बड्ड चंगला। आएल ओ कहलक- “गि‍रहत कनी खैनी दि‍अ।” हम खैनीक डि‍ब्‍बी दैत कहलि‍ऐ- “चुनाबह अपनो खा आ हमराे खुआबह।” ओ खैनी चुनौलक हमरो दि‍स बढ़ौलक हम एक जूम खैनी ढोर तरमे लेलौं। आ पुछलौं- “कहऽ मंगल की छअ समाचार वोट केकरा-केकरा दइले करैत छहक वि‍चार?” ओ बाजल- “की कहू गि‍रहत कि‍नडीडेट सभ ने दि‍न बुझैए ने राति‍ बुझैए आ जखनि‍-तखनि‍ भोट मंगैले चलि‍ अबैए।” हम कहलि‍ऐ- “आन पदक कण्‍डीडेट सभमे तँ करए पड़तह वि‍चार मुदा सरपंचमे मांगनि‍ दि‍आदे छह ठाढ़ आदमि‍यो नीक अछि‍ अनकासँ ठीक अछि‍।” ओ बाजल- “की कहलि‍ऐ गि‍रहत दि‍आद? परसाल हमर बकरी उखरि‍ कऽ ओकर चारि‍टा गाछ खाए लेने रहए कोबी तइले बि‍खनि‍-बि‍खनि‍ कऽ गारि‍ देने रहए हमरा ओकर मौगी ओकर गारि‍क लागल अछि‍ हमरा बड़ चोट हम ओकरा कि‍न्नौं नै देब अपन भोट।” ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। १.पवन कुमार साह २.बिपिन कुमार कर्ण- कवि‍ता-देखु केहेन ई भारत ि‍नर्माण ३.रामदेव प्रसाद मण्‍डल ‘झारूदार’- झारू १ पवन कुमार साह कवि‍ता मि‍थि‍ला वासी कहबै छी हम मि‍थि‍ला वासी जेकर नै दुनि‍याँमे जोड़। माथ उठा कऽ, घुमरि‍-घुमरि‍ कऽ कहबै छी हम बड़ बेजोर। पलटि‍ कऽ देखू अपन इति‍हास ने बुझाएत कोनो उपहास। ई ओ माि‍ट अछि‍ जतए भेल पहि‍ले लोकतंत्रक वास। हम बुझै छी, लोकतंत्रमे सभ समान फेर बताउ कि‍एक बनल छी बइमान? जाि‍त-पाति‍क भेद छै, अपनेमे वि‍भेद छै। जाति‍क नाओंपर लेने छी कमान की यहए अछि‍ अपन इमान? एक वाक् एके गाम एक पोसाक एके नाम दरि‍द्र-सम्पन्नक कि‍ काम ऊँच-नीक सभ एक-समान। खाउ सप्‍पत एक बति‍या नै बात हुअए कहि‍यो बसि‍या। एक छी हम छी बेजोड़ नै टुटत कहि‍यो ई जोड़। २ बिपिन कुमार कर्ण कवि‍ता देखु केहेन ई भारत ि‍नर्माण देशक आर्य भेलाह अनार्य नास्‍ति‍क राज आस्‍ति‍क गमार। प्रेम वि‍हीन भेल हि‍न्‍दुस्‍तान देखु केहेन ई भारत ि‍नर्माण। जनता जागरूक भेल होशि‍यार नोनि‍याँ रानी, गेनहारि‍क हार। गोपालकांडाक हवाइ अभि‍यान देखु केहेन ई, भारत ि‍नर्माण। अमेरि‍का करता रि‍टेलक बेपार देशक आन मनमोहन, पवार। गोल अठन्नी रूपैया महान देखु केहेन ई, भारत ि‍नर्माण। देशक हार पंजा सरकार ड्रोन ठाकरे भेल सरदार। देशद्रोहकेँ एहेन सम्‍मान देखु केहेन ई, भारत ि‍नर्माण। देश हीरो खुर्शिद सलमान राज भैया केलनि‍ टु जीक दान। भेल घोटाला खानक खान देखु केहेन ई, भारत ि‍नर्माण। ऐ युगक नायक अजमल कसाब कॉग्रेसक लेल ई भ्रमक जाल। करू नाथ क्षमा हे, प्रणव ि‍नधान देखु केहेन ई, भारत ि‍नर्माण। अन्ना, बाबा घोल मचौलक गेल लोकपाल सि‍मरि‍या धाम। आजुक भारतक आत्‍म सम्‍मान देखु केहेन ई, भारत ि‍नर्माण। ३ रामदेव प्रसाद मण्‍डल ‘झारूदार’ एकटा अनुपम गीत झारू- गरीब भूखल कम रहै छै, भूखल बेसी रहै धनवान। गरीब भूख बस सुखल रोटी, अमीर भूखल हीराक खान। गीत- तूमलोग केना कऽ जीवि‍ते ओतए आपलोग जतए बेमार छै। असंतोषमे माथ दुखाइ छै स्‍वार्थक चढ़ल बोखार छै। अहाँ बाबू बनू बरूआर हम छी सेवाले तैयार। मान-सम्‍मानमे सभकेँ बरोबरि‍ जीबैक अधि‍कार छै। असंतोषमे......। आप उरू मोटर गाड़ी साइकि‍ल हमरो रहए तैयारी। एक दोसरक घाट उतारनाइ दुनि‍याँक बेवहार छै। असंतोषमे......। अहाँ पाबू पुआ-खीर चुल्हा बुझै ने हमरो भीड़ इज्जतसँ दू वक्‍तक रोटी हमरो तँ दरकार छै। असंतोषमे......। अहाँ पहि‍रू सूट-सफारी फाटए हमरो ने पढ़ि‍या साड़ी तन झाँपि‍ हमहूँ जीबी हमरो तँ सरोकार छै। असंतोषमे......। अहाँ शोभा महल अटारी झोपड़ी हमरो रहै तैयारी। सीर छुपबैले छत होइ ऊपर हमरो तँ दरकार छै। असंतोषमे......। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। १.बाल मुकुन्द पाठक- किछु गजल २.सन्दीप कुमार साफी दूटा कविता १ बाल मुकुन्द पाठक गजल १ गजल

आइ हमर मोन बड्ड खनहन अछि ककरोसँ हमरा तँ नै अनबन अछि तरुआ तरकारी आ पापड बनि गेल देखूँ चूल्हा पर भातो ले अदहन अछि

आसिन एलै बजरखसुआँ गर्मी गेलै ठंढा ठंढा पुरबा बहै सनसन अछि

फेर दुर्गा मेला हेतै नाच आ लीला हेतै देखूँ खुल्ला पैसा बाजैत झनझन अछि

घर परिवार मे तिहार के दिन एलै अंगना मे चलैत नेना ढ़नमन अछि

कनिये दिनके तँ छै ई पावैनक मजा कातिकक बाद फेर ऊहे अगहन छै

सरल वर्णिक बहर , वर्ण 15 २ फेर आइ आँखिसँ नोर बहाबै छी 

रहि रहि अहीकँ बात घुराबै छी कतै छै सिनेह ई कोना हम कहूँ

चलि आउ एखनो कियै सताबै छी ।

गेलौँ चलि कतौ हमरा बिसरिकँ

साँझेसँ अँहीँ लेल नोर खसाबै छी ।

देखूँ कानि कानि साँझसँ भोर भेलै 

भोरे भोर हम मदिरा चढाबै छी ।

मदिरोसँ बढिकँ अँहीँ मे नशा ये

ओहि नशा लेल फेरसँ बजाबै छी ।

नीन्नोँ नै आबै जौँ सपनो मेँ देखतौँ

सुतबा ले कतै मोनकेँ मनाबै छी ।

हाथ जोडिकँ ई कहौँ हे भगवान

कियै नै अहाँ मुकुन्दसँ मिलाबै छी ।।

सरल वर्णिक बहर ,वर्ण 13 ३ आस टूटल भाग भूटल आँखि इनहोरे सँ शीतल घुरिकँ आबूँ ई जिनगी मेँ यै छी अहाँ कियैक रुसल सिनेह केलौँ तेँऽ दुख पेलौँ कानियोँ के नै चैन भेटल लहर उठल करेजासँ लागै कि जेना साँस छूटल कि करबै जीके ई जिनगी अहाँक जौँ ना संग भेटल आस टूटल भाग भूटल आँखि इनहोरे सँ शीतल ४ गजल

आइ हम बड़ उदास छी ,कोना कहौँ ककरासँ

ओहि दिनसँ कानैत छी यौ,अहाँ गेलौँ जहियासँ हे यौ हमर प्रीतम ,अहाँ एखनो तऽ घर आबूँ

दिन राति हम एतबे , प्रार्थना करै छी दैबासँ

चारिये दिन तँ बुझियौ ,चारि साल सन बीतल

अहाँसँ बतियाइ लेल फोनो माँगलौँ अनकासँ

पछबा के बहलासँ ,बात एगो इयाद आएल

चलि गेलौँ नैहर हम तँ ,रुसल छलौँ अहाँसँ

चाही नै कपडा लत्ता ,और चाही नै धन दौलत

एतबे कहौँ मुकुन्द चलि आबु,जल्दी पटनासँ

सरल वार्णिक बहर वर्ण-18 ५ गजल

कि लिखूँ हम गजल उमर नादान अछि हुनकर दीवाना ई दुनिया जहान अछि रुपकँ जलवा देखूँ लागै छथि चान सन गोल गोल गोर गाल पूर्णिमा समान अछि

केश अहाँक रेशम सन आँखि मृग जेना धायल भेलौँ देखिकँ होश नै ठेकान अछि

गुलाबी गाल पर नीक लागै ठोरक लाली अहीँमे अटिकल छौड़ासभँकँ जान अछि

कमर जे लचकैये देखि मोन बहकैये 'मुकुन्द' के लागे जेना हुस्नके दोकान अछि

सरल वर्णिक बहर ,वर्ण 16

२ सन्दीप कुमार साफी दूटा कविता १ माघ क शीतलहरी बाप रे बाप होइए प्राण चलि जाएत मन नै होइए ओछैनसँ उठी जवान क ई हाल तँ बूढ़क की भरि माघ पिअब सभ की पाइनो बरफ भऽ गेल दिन भरि धुइनसँ आँखि नै सुजहाए ओछाइ-बिछाइ सभ गेल तीति सन-सन-सन-सन पछवा बहैए केरा पातसँ बुन्नी खसैए हाथ पएर सभ सुन्न भऽ गेल लोचना करए बाँझीक धधरा सुटकल रहैए दलानमे बगरा एक महिनासँ रौद नै भेल आलू गाछ सभ गलि गेल बाप रे बाप, होइए प्राण चलि जाएत २ रसगुल्लाक जबार नोत दै छी यौ नोत दै छी रसगुल्ला जबारक नोत दै छी हम आएल छी महरैल गामसँ समुच्चा गामकेँ नोत दै छी मुखिया जी यौ लखन काका आइ सौँझुका हम नोत दै छी पियोर छेनासँ बनल रसगुल्ला काशी भाइ यौ नोत दै छी पहिल तोरमे पहुँचब सभ गोटए सबेरे सकाल कऽ नोत दै छी पूरी तरकारी अओर देब तखन तइपर सँ देब रसगुल्ला तोपि नोत दै छी यौ नोत दै छी रसगुल्ला जबारक नोत दै छी ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। १.विनीत उत्पल- गजल २.अनिल मल्लिक- गजल ३.किशन कारीगर- (हास्य कविता) १ विनीत उत्पल गजल नेनामे जखन कानैत रही, तूँ चुप हमरा कराबैत रहीँ हम नहि मानैत रही तँ तूँ प्रेमसँ हमरा खुआबैत रहीं तोहर आंचर छल ई दुनिया नहि हम किछु जानैत रही मन दब रहला पर हमरा लोरि गाबि कऽ सुताबैत रहीं पहर धरि काज केलाक बाद तूँ दम साधि कऽ सुतैत रही हमर टुहैक कानबसँ भरि-भरि राति माय जागैत रहीं लोकक उलाहना सुनैकऽ बादो नै कखनो तमसाबैत रही अपना नहि पीबि कऽ ओ दूध हमरा जरूर पियाबैत रहीं जन्मैत संगे देखै छी मायकेँ पहिने ठाढ़ कियो ओतय रही आँखिमे भरल नोरक संग उत्पलकेँ देखि मुस्काबैत रहीं सरल वार्णिक बहर वर्ण -23 २ अनिल मल्लिक गजल बहीनक चोटी पकडि क’ खीचीएै गुल्लक कहियो फोडि दियै  पुजा करैक लेल फेरो हम ओकरा फूलो कहियो लोढि दियै कतेक उछन्नर करीएै ओकरा आओर फेरो मेल कतेक  खौंझाबय लेल बाउलक घरके कहियो कहियो तोडि दियै 

बरख बितैत अछि आब त’ राखी की आ भरदूतिआ केहन  पहिले ओकर कोनो पाबनि मे कहाँ एना कहियो छोडि दियै 

तेरह सँ तीन बननाई रीति छै खून कहूँ पातर होइछै  एखन रहि जाइ छै तार टूटले एकरा कहियो जोडि दियै 

माम अबै छलाह पैदले भिजैत कोशो कोश ओहि बरखा मे  सोचिते रहलौं हम जा क' सीनेहक खेत कहियो कोडि लियै 

गँगा नओतल जमुना कहिते आँखि केहन ओकर चमकै  अहि भरदूतीया मे त’ छी ठनने खुशी मे ओकरा बोडि दियै ३ किशन कारीगर लोक करे लूटमार जेंका                          (हास्य कविता)

लोभी बैसल अछि लोभ मे जोंक जेंका ओक्कर चालि चलब झपटमार जेंका सरकारी खरांत लेल बेहाल भेल लोक करे लूटमार जेंका.

लोभी लोकक भीड़ मे केकरा समझाएब "कारीगर" बैसल अछि चुपचाप बौक जेंका बेईमान लोक नहि ईमानदारी सीखत? लोक करे लूटमार जेंका.

डेग-डेग पर भ्रष्टाचारी भेटत  ओ जाल बिछौने  बैसल अछि चालि चलब प्रोपर्टी दलाल जेंका लोक करे लूटमार जेंका.

सरकारी व्यबस्थाक हाल बेहाल भ्रष्टाचारक बढ़ी गेल अछि मकड़जाल एही ओझरी मे ओझराएल कतेक लोक मुदा नेता नाचै अपने ताल.

जनताक नाम पर फुसियाहिंक जनसेवा नेतागिरी के धंधा चमकि गेल सभ खाए रहल सरकारी मेवा जहिना बाढ़ी मे अपटल माछ कतेक रेवा.

बेमतलब के करै विदेश यात्रा विकसित योजनाक नाम पर बेहिंसाब खर्च करै जेना सरकारी धन छैक ओक्कर बपौती जेंका.

बाढ़ी-सुखार सँ लोक तबाह भेल मुदा कोनो स्थाई समाधान नहि कराउत हवाई सर्वेक्षण मे नेता जी फुसियांहिक बिधि टा पुराउत.

राहत आ बचाव के नाम पर रहत पैकेजक बंदरबांट भ रहल उज्जर कुरतावला सभ सँ आगू ओक्कर चालि चलब झपटमार जेंका. ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। बालानां कृते १.शि‍वकुमार झा ‘टि‍ल्‍लू’- बिना रदीफक बाल-गजल २.मुन्नी कामत- किछु बाल कविता ३.अमित मिश्र- बाल गजल ४.जगदानन्द झा मनु- माटिक बासन १ शि‍वकुमार झा ‘टि‍ल्‍लू’ बिना रदीफक बाल-गजल उगल सुरुज उठू बौआ भऽ गेलै भोर माॅझ आङहमे कौआ कौआ बनल मुँह जोर आँखि‍ काँची भरल सभ पि‍पनी सटल मुँह लाले लागय जेना पाकल परोर झट उठू फट करू अहाँ शौच स्‍नान बासि‍ भात संग रखने छी गौंचीक झोर घंटी बाजल गुरुदेव आबि‍ गेलखि‍न पहि‍ल कक्षाक नेना करय धनधोर नै मोनसँ पढ़ब तँ कि‍यो मानत केना जौं मुरुखे बौड़ाएब सभ बूझत चोर वागीश मात्र एक दीन-दुखि‍याक नाथ वर्ण आले तँ की ज्ञान दीप हएत गोर ईश जेठकेँ करु सि‍नेह छोटसँ राखू नि‍त राखब धि‍यान मान माइक कोर (वर्ण- 15) २ मुन्नी कामत किछु बाल कविता जतरा बाबू आबि रहल अछि जतरा लेब अहाँ सँ लब कपड़ा घुरै लऽ जएब अहाँ संगे मेला देखब ओतऽ कठपुतलीक खेला कीनब हम एगो उड़न जहाज तइ पर बैइठ घुमब सगरे संसार। २ अंकक मेल चलू खेलब आइ हम एगो खेल जइमे एक संगे करब कतेक अंकक मेल। 1.2.3.4.5.6.7.8.9.दस अइ सँ आगू चलत एगो बस। छुक-छुक नै ई तेज दौड़ै यऽ एक पर एक एग्यारह भऽ जाइए। एक पर दू बैठ 12 एक पर तीन बैठ 13 एक पर चारि बैठ 14 एक पर पाँच बैठ 15 एक पर छअ बैठ 16 एक पर सात बैठ 17 एक पर आठ बैठ 18 एक पर नअ बैठ 19 दू पर बैठ जिरो बीस भऽ गेल पहिले एक असगर छल आब उन्नीस टा भऽ गेल अहिना एकता अपन जीवन मे अहूँ लाउ मिल कऽ अपन शक्ति बढ़ाउ। ३ माय हमरा एगो बहिन आनि दे। चल बजार उ बजैबला गुड़िया कीन दे। जे हमरा भइया कहत हर साल हमरा हाथ पर राखी बान्हत उ चुलबुलिया मुनिया आनि दे। किए तूँ हमरा असगर रखने छऽ हमरासँ बहिनक स्नेह छिनने छऽ तू अपन कान्हाकेँ द्रोपदी आनि दे माय हमरा एगो बहिन आनि दे। ककर भैया तोरा सतबै छउ कोन बात छै जे तोहर आँखि भरै छउ तूँहो तँ ककरो बहिन छी तँ फेर किए हमरा बहिन लऽ कंश बनल छी हमरा तूँ एगो मैका दऽ दे माय हमरा बहिनक जिनगी बाझि दे ई सोन चिरैया चिड़िया आनि दे माय हमरा एगो बहिन आनि दे। ३ अमित मिश्र बाल गजल

माँटिकेँ कर जोड़ि करियौ नमन बौआ देख रहलौँ आइ सुन्नर सपन बौआ भाग देशक ताग नेहक छी अहाँ यौ छी अहाँ गमकैत मैथिल सुमन बौआ

पानिमे डूबि जीबै छी मगर यौ देख लै ई विश्व ताकत अपन बौआ

मारि झगड़ा नै फँसै से मोनमे यौ शीत शोणित अपन नै छै जलन बौआ

चान सन सब गुण अहाँ एखन गढ़ू यौ समय छै एखन बनू नव रतन बौआ

फाइलातुन 2122 तीन बेर बहरे-रमल ४ जगदानन्द झा 'मनु' ग्राम पोस्ट - हरिपुर डीहटोल, मधुबनी माटिक बासन केदार प्रसाद गामक एकटा कुशल कुम्हार । माटिक बासन जेना  घैल, ढाकन, मटकुरी बना अपन जीवन यापन करै छलाह । माटिक बासन बनेनाइ मात्र हुनक आजीवकाक साधन नहि भs कs हुनका लेल  एकटा सुन्नर कारीगरी छल । अपन काज करैकाल ओ ऐना तनमय भs जाइ छलाह जेना एकटा भक्त अपन अराध्य देवताक ध्यानमे अपन तन-मनक सुधि बिसैर जाइत छैक । ओ अपन स्वं साधनासँ धिरे-धिरे छठि मैयाक सुन्नर व आकर्षित हाथी सेहो बनबए लगला । हुनकर बनाएल माटिक बासन आ छठिक हाथीक बड्ड प्रशंसा होइत छल । धिरे-धिरे गामक परिवेश बदलए लागल । माटिक बासनक जगह स्टील आ आन-आन धातु लेबए लागल । केदार प्रसादजीक आमदनी कम होबए लगलन्हि मुदा ओ अपन काजक प्रति  निष्ठा आ समर्पणकेँ दुवारे कुम्हारक काज नहि छोरि पएला । हुनक सुन्नर सुशिल बेटा बिभू नेन्नेसँ अपन पुस्तैनी काजमे माँजल । ई कहैमे कोनो संकोच नहि जे ओ अपन बाबूओ सँ बीसे । केदार प्रसादजी एहि गपकेँ नीकसँ  बुझैत अपन होनहार पुतकेँ गुणसँ मोने-मोन खुस छलाह आ चिंतीत सेहो । चिंतीत एहि दुवारे की कुम्हारक काजक कि बर्तमान छैक आ कि भबिष्य हेतै से हुनका बुझल मुदा बिभूक हस्तकौशल देखि ओकरा एहि काजसँ बाहर केनाइ उचित नहि बुझलाह । बिभू सेहो इस्कूल पढ़ाइक संगे-संग अपन बाबूक सभटा गुणकेँ  अंगीकार केने गेल ।  अपन  बाबूक छठिक हाथीसँ आगू बढ़ि ओ मूर्तिकलामे अपन हस्तकौशलक उपयोग करै लागल । ओकर बनाएल मूर्तिक चर्चा गाम  भरिमे होबए लगलै । जतए ओकर बाबूक बनाएल छठिक हाथीकेँ एगारह टाका भेटन्हि ओतए ओकर बनाएल छोट-छोट कनियाँ- पुतड़ा सभकेँ सय-सबासय टाका भेटअ लगलै । बिभू अपन बाबूक देख-रेखमे मूर्तिकलामे दिनो- दिन आगू बढ़ए लागल । आब ओकर बनाएल माए सरोस्वती, कृष्णास्टमी, विश्वकर्मा पूजाक मूर्तिक माँग चारूकातक बीस गाम तक होबए लगलै मुदा बिभूक बाबू तैयो ओकर बनाएल मूर्तिमे कोनो ने कोनो दोख निकालि आ ओकरा अओर बेसी नीक मूर्ति बनाबैक प्रेरणा देथिन । बिभू सेहो हुनक गपकेँ मन्त्र मानि आगू आरो नीक मूर्ति बनाबएमे लागि जे । बिभू दसम वर्गकेँ बाद इस्कूली पढ़ाइ छोड़ि पूर्णतः मूर्तिकलामे अपनाकेँ समर्पित कए लेलक । अठारहम बरखक पूर्ण बुझनूक भs गेल आब ओकरा नीक बेजएकेँ ज्ञान भs गेलै । ओकर मूर्तिक प्रशंषा आब गाम नहि, जिला नहि राज स्तरपर होबै लगलै । आब  तँ ओकर बनाएल एक-एकटा मूर्तिकेँ दू-दू तिन-तिन हजार टाका भेटए लगलै । मुदा ओकर बाबू एखनो ओकर मूर्तिमे कोनो ने कोनो दोख निकाइल ओकरा आर सुन्नर मूर्ति बनाबैक निर्देश देथिन । पहिले बिभू हुनक गपकेँ मन्त्र मानि कमी दूर करैक चेष्टामे लागि  जाइ छल मुदा आब हुनक गपसँ ओकर मोन कतौ-ने कतौ आहत होइत छलै । मुदा बिरोध करैक सहाश नहि तेँ मोनकेँ मारि हुनक बताएल निर्देशमे लागि जाइ छल  । जेना-तेना काज आगू बढ़ैत रहल आ ओकर बनाएल गेल मूर्तिक चर्चा आब राजक सीमासँ निकैल बाहर दस्तक देबए लगलै । राजसरकारकेँ गृहमंत्रालयसँ बिभूकेँ पत्र एलै जाहिमे ओकर बनाएल गेल मुर्तिकेँ अखिल भारतीय मूर्ति प्रदर्शनीमे राखक व्यवस्था कएल गेल रहैक । सभटा खर्चा राजसरकारक आ विजेताकेँ देशक सर्वश्रेष्ट मूर्तिकारक सम्मानकेँ संगे-संग एक लाख टाकाक नगद इनाम सेहो ।   ई पत्र पाबि बिभूकेँ बड्ड प्रसंता भेलै । सभसँ पहिले दौरल-दौरल अपन बाबूकेँ एहि गपक सुचना देलक । केदार प्रसादजी सेहो बड्ड प्रसन्य भेलाह हुनकर जीवन भरिकेँ मेहनत रंग लाइब रहल छल । बिभू राति-राति भरि जागि-जागि कए अपन मार्गदर्शक गुरु बाबू संगे लागि गेल । एकसँ एक नीक-नीक मूर्ति बनेलक मुदा केदार प्रसादजी सभ मूर्तिमे कोनो ने कोनो कमी निकाइले देथिन । केदार प्रसादजीक बताएल कमीकेँ दूर करैकेँ बदला बिभूक मोनमे आब नकारात्मक प्रवृति घर करए लगले । हुनक बताएल कमीपर आब ओ सबाल-जबाब करए लागल । काइल्ह प्रतियोगता लेल मूर्ति भेजैक अंतिम दिन आ आइ बिभू अपन बनाएल मूर्ति सभमे सँ एकटा सभसँ नीक मूर्तिकेँ अंतिम रूप देबएमे लागि गेल । केदार प्रसादजी बारीकीसँ ओहि मूर्तिकेँ निरीक्षण करैत, बिभूक दिमागमे हलचल चलि रहल छल - "हाँ आब तँ ई कोनो ने कोनो गल्ती बतेबे करता ।" ततबामे केदार प्रसादजी अपन चुप्पीकेँ तोरैत बजलाह -"सुन्नर ! आइ तक बनाएल गेल मूर्ति सभमे सर्बश्रेस्थ ।" कनीक काल चुप रहला बाद फेर -"  मुदा ।" मुदा की आब  तँ  बिभूक मोन बिफैर गेलै - "अबस्य कोनो ने कोनो कमी गनेता ।" केदार प्रसादजी अपन गपकेँ आगू बढ़ाबैत -" ई जँ एना रहितेए तँ  आरो बेसी नीक, आ ई रंग जँ फलाँ फलाँ रहथि तँ  जबरदस्त होइते ।" नैन्हेटासँ जिनक गपकेँ मन्त्र मानि पूरा करैमे जि-जानसँ लागि जाइ छल आइ हुनक गपकेँ नहि पचा पएलक । बिफैर कए बाजि उठल -"रहै दियौ ! अहाँकेँ  तँ एनाहिते दोख निकालए अबैए, अपन बनेएल ढाकन बसनी  तँ कियो एको टाकामे नहि किनैए आ हम केतबो नीक मूर्ति बना लि कोनो ने कोनो दोख अबश्य निकाइल देब ।" बिभूक गप सूनिते मातर केदार प्रसादजीक शांत मुद्रा भंग भए सोचनीए भs गेलनि । एकटा नमहर साँस लैत बिभूक पीठ ठोकैत बजलाह -"बस बेटा बस ! जहिया व्यक्तिकेँ अपन पूर्णताकेँ आभाष भs जाइ छैक ओकर बाद ओकर जीवनक विकास ओतहिए रुकि जाइ छैक । पूर्णताकेँ आभास दिमागक आगू बढ़ैक चेतनामे लकबा लगादै छैक ।" किछु छन चुप्प,दुनू गोटे शांत । बिभूक आँखिसँ नोर टघरैत जे आइ ई की कए लेलहुँ, ओकरा अपन गल्तीक ज्ञान भs गेलै । केदार प्रसादजी आगू - "हमर सपना छल जे हमर बेटा राजक आ देशक नहि वरण दुनियाँक सर्वश्रेष्ट मूर्तिकार  बनत.....मुदा नहि । कोनो गप नहि हमराकेँ जनै छल ? कियो नहि । हमर बेटाकेँ पूरा राज जनैत अछि एकटा नीक मूर्तिकारकेँ रूपमे । हमरा लेल बड्ड पैघ गप अछि । मुदा हमर सपना ------- आब नहि पूरा होएत । ई कहि ओ ओहि कक्षसँ बाहर भs गेला । ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। बच्चा लोकनि द्वारा स्मरणीय श्लोक १.प्रातः काल ब्रह्ममुहूर्त्त (सूर्योदयक एक घंटा पहिने) सर्वप्रथम अपन दुनू हाथ देखबाक चाही, आ’ ई श्लोक बजबाक चाही। कराग्रे वसते लक्ष्मीः करमध्ये सरस्वती। करमूले स्थितो ब्रह्मा प्रभाते करदर्शनम्॥ करक आगाँ लक्ष्मी बसैत छथि, करक मध्यमे सरस्वती, करक मूलमे ब्रह्मा स्थित छथि। भोरमे ताहि द्वारे करक दर्शन करबाक थीक। २.संध्या काल दीप लेसबाक काल- दीपमूले स्थितो ब्रह्मा दीपमध्ये जनार्दनः। दीपाग्रे शङ्करः प्रोक्त्तः सन्ध्याज्योतिर्नमोऽस्तुते॥ दीपक मूल भागमे ब्रह्मा, दीपक मध्यभागमे जनार्दन (विष्णु) आऽ दीपक अग्र भागमे शङ्कर स्थित छथि। हे संध्याज्योति! अहाँकेँ नमस्कार। ३.सुतबाक काल- रामं स्कन्दं हनूमन्तं वैनतेयं वृकोदरम्। शयने यः स्मरेन्नित्यं दुःस्वप्नस्तस्य नश्यति॥ जे सभ दिन सुतबासँ पहिने राम, कुमारस्वामी, हनूमान्, गरुड़ आऽ भीमक स्मरण करैत छथि, हुनकर दुःस्वप्न नष्ट भऽ जाइत छन्हि। ४. नहेबाक समय- गङ्गे च यमुने चैव गोदावरि सरस्वति। नर्मदे सिन्धु कावेरि जलेऽस्मिन् सन्निधिं कुरू॥ हे गंगा, यमुना, गोदावरी, सरस्वती, नर्मदा, सिन्धु आऽ कावेरी  धार। एहि जलमे अपन सान्निध्य दिअ। ५.उत्तरं यत्समुद्रस्य हिमाद्रेश्चैव दक्षिणम्। वर्षं तत् भारतं नाम भारती यत्र सन्ततिः॥ समुद्रक उत्तरमे आऽ हिमालयक दक्षिणमे भारत अछि आऽ ओतुका सन्तति भारती कहबैत छथि। ६.अहल्या द्रौपदी सीता तारा मण्डोदरी तथा। पञ्चकं ना स्मरेन्नित्यं महापातकनाशकम्॥ जे सभ दिन अहल्या, द्रौपदी, सीता, तारा आऽ मण्दोदरी, एहि पाँच साध्वी-स्त्रीक स्मरण करैत छथि, हुनकर सभ पाप नष्ट भऽ जाइत छन्हि। ७.अश्वत्थामा बलिर्व्यासो हनूमांश्च विभीषणः। कृपः परशुरामश्च सप्तैते चिरञ्जीविनः॥ अश्वत्थामा, बलि, व्यास, हनूमान्, विभीषण, कृपाचार्य आऽ परशुराम- ई सात टा चिरञ्जीवी कहबैत छथि। ८.साते भवतु सुप्रीता देवी शिखर वासिनी उग्रेन तपसा लब्धो यया पशुपतिः पतिः। सिद्धिः साध्ये सतामस्तु प्रसादान्तस्य धूर्जटेः जाह्नवीफेनलेखेव यन्यूधि शशिनः कला॥ ९. बालोऽहं जगदानन्द न मे बाला सरस्वती। अपूर्णे पंचमे वर्षे वर्णयामि जगत्त्रयम् ॥ १०. दूर्वाक्षत मंत्र(शुक्ल यजुर्वेद अध्याय २२, मंत्र २२) आ ब्रह्मन्नित्यस्य प्रजापतिर्ॠषिः। लिंभोक्त्ता देवताः। स्वराडुत्कृतिश्छन्दः। षड्जः स्वरः॥ आ ब्रह्म॑न् ब्राह्म॒णो ब्र॑ह्मवर्च॒सी जा॑यता॒मा रा॒ष्ट्रे रा॑ज॒न्यः शुरे॑ऽइषव्यो॒ऽतिव्या॒धी म॑हार॒थो जा॑यतां॒ दोग्ध्रीं धे॒नुर्वोढा॑न॒ड्वाना॒शुः सप्तिः॒ पुर॑न्धि॒र्योवा॑ जि॒ष्णू र॑थे॒ष्ठाः स॒भेयो॒ युवास्य यज॑मानस्य वी॒रो जा॒यतां निका॒मे-नि॑कामे नः प॒र्जन्यों वर्षतु॒ फल॑वत्यो न॒ऽओष॑धयः पच्यन्तां योगेक्ष॒मो नः॑ कल्पताम्॥२२॥ मन्त्रार्थाः सिद्धयः सन्तु पूर्णाः सन्तु मनोरथाः। शत्रूणां बुद्धिनाशोऽस्तु मित्राणामुदयस्तव। ॐ दीर्घायुर्भव। ॐ सौभाग्यवती भव। हे भगवान्। अपन देशमे सुयोग्य आ’ सर्वज्ञ विद्यार्थी उत्पन्न होथि, आ’ शुत्रुकेँ नाश कएनिहार सैनिक उत्पन्न होथि। अपन देशक गाय खूब दूध दय बाली, बरद भार वहन करएमे सक्षम होथि आ’ घोड़ा त्वरित रूपेँ दौगय बला होए। स्त्रीगण नगरक नेतृत्व करबामे सक्षम होथि आ’ युवक सभामे ओजपूर्ण भाषण देबयबला आ’ नेतृत्व देबामे सक्षम होथि। अपन देशमे जखन आवश्यक होय वर्षा होए आ’ औषधिक-बूटी सर्वदा परिपक्व होइत रहए। एवं क्रमे सभ तरहेँ हमरा सभक कल्याण होए। शत्रुक बुद्धिक नाश होए आ’ मित्रक उदय होए॥ मनुष्यकें कोन वस्तुक इच्छा करबाक चाही तकर वर्णन एहि मंत्रमे कएल गेल अछि। एहिमे वाचकलुप्तोपमालड़्कार अछि। अन्वय- ब्रह्म॑न् - विद्या आदि गुणसँ परिपूर्ण ब्रह्म रा॒ष्ट्रे - देशमे ब्र॑ह्मवर्च॒सी-ब्रह्म विद्याक तेजसँ युक्त्त आ जा॑यतां॒- उत्पन्न होए रा॑ज॒न्यः-राजा शुरे॑ऽ–बिना डर बला इषव्यो॒- बाण चलेबामे निपुण ऽतिव्या॒धी-शत्रुकेँ तारण दय बला म॑हार॒थो-पैघ रथ बला वीर दोग्ध्रीं-कामना(दूध पूर्ण करए बाली) धे॒नुर्वोढा॑न॒ड्वाना॒शुः धे॒नु-गौ वा वाणी र्वोढा॑न॒ड्वा- पैघ बरद ना॒शुः-आशुः-त्वरित सप्तिः॒-घोड़ा पुर॑न्धि॒र्योवा॑- पुर॑न्धि॒- व्यवहारकेँ धारण करए बाली र्योवा॑-स्त्री जि॒ष्णू-शत्रुकेँ जीतए बला र॑थे॒ष्ठाः-रथ पर स्थिर स॒भेयो॒-उत्तम सभामे युवास्य-युवा जेहन यज॑मानस्य-राजाक राज्यमे वी॒रो-शत्रुकेँ पराजित करएबला निका॒मे-नि॑कामे-निश्चययुक्त्त कार्यमे नः-हमर सभक प॒र्जन्यों-मेघ वर्षतु॒-वर्षा होए फल॑वत्यो-उत्तम फल बला ओष॑धयः-औषधिः पच्यन्तां- पाकए योगेक्ष॒मो-अलभ्य लभ्य करेबाक हेतु कएल गेल योगक रक्षा नः॑-हमरा सभक हेतु कल्पताम्-समर्थ होए ग्रिफिथक अनुवाद- हे ब्रह्मण, हमर राज्यमे ब्राह्मण नीक धार्मिक विद्या बला, राजन्य-वीर,तीरंदाज, दूध दए बाली गाय, दौगय बला जन्तु, उद्यमी नारी होथि। पार्जन्य आवश्यकता पड़ला पर वर्षा देथि, फल देय बला गाछ पाकए, हम सभ संपत्ति अर्जित/संरक्षित करी। 8.VIDEHA FOR NON RESIDENTS 8.1 to 8.3 MAITHILI LITERATURE IN ENGLISH 8.1.1.The Comet   -GAJENDRA THAKUR translated by Jyoti Jha chaudhary 8.1.2.The_Science_of_Words- GAJENDRA THAKUR translated by the author himself 8.1.3.On_the_dice-board_of_the_millennium- GAJENDRA THAKUR translated by Jyoti Jha chaudhary 8.1.4.NAAGPHANS (IN ENGLISH)- SHEFALIKA VERMA translated by Dr. Rajiv Kumar Verma and Dr. Jaya Verma Send your comments to ggajendra@videha.com विदेह नूतन अंक भाषापाक रचना-लेखन इंग्लिश-मैथिली-कोष / मैथिली-इंग्लिश-कोष  प्रोजेक्टकेँ आगू बढ़ाऊ, अपन सुझाव आ योगदान ई-मेल द्वारा ggajendra@videha.com पर पठाऊ। Top of Form विदेहक मैथिली-अंग्रेजी आ अंग्रेजी मैथिली कोष (इंटरनेटपर पहिल बेर सर्च-डिक्शनरी) एम.एस. एस.क्यू.एल. सर्वर आधारित -Based on ms-sql server Maithili-English and English-Maithili Dictionary. १.भारत आ नेपालक मैथिली भाषा-वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक शैली आ २.मैथिलीमे भाषा सम्पादन पाठ्यक्रम १.नेपाल आ भारतक मैथिली भाषा-वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक शैली

१.१. नेपालक मैथिली भाषा वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक  उच्चारण आ लेखन शैली (भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक धारणाकेँ पूर्ण रूपसँ सङ्ग लऽ निर्धारित) मैथिलीमे उच्चारण तथा लेखन १.पञ्चमाक्षर आ अनुस्वार: पञ्चमाक्षरान्तर्गत ङ, ञ, ण, न एवं म अबैत अछि। संस्कृत भाषाक अनुसार शब्दक अन्तमे जाहि वर्गक अक्षर रहैत अछि ओही वर्गक पञ्चमाक्षर अबैत अछि। जेना- अङ्क (क वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ङ् आएल अछि।) पञ्च (च वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ञ् आएल अछि।) खण्ड (ट वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ण् आएल अछि।) सन्धि (त वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे न् आएल अछि।) खम्भ (प वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे म् आएल अछि।) उपर्युक्त बात मैथिलीमे कम देखल जाइत अछि। पञ्चमाक्षरक बदलामे अधिकांश जगहपर अनुस्वारक प्रयोग देखल जाइछ। जेना- अंक, पंच, खंड, संधि, खंभ आदि। व्याकरणविद पण्डित गोविन्द झाक कहब छनि जे कवर्ग, चवर्ग आ टवर्गसँ पूर्व अनुस्वार लिखल जाए तथा तवर्ग आ पवर्गसँ पूर्व पञ्चमाक्षरे लिखल जाए। जेना- अंक, चंचल, अंडा, अन्त तथा कम्पन। मुदा हिन्दीक निकट रहल आधुनिक लेखक एहि बातकेँ नहि मानैत छथि। ओ लोकनि अन्त आ कम्पनक जगहपर सेहो अंत आ कंपन लिखैत देखल जाइत छथि। नवीन पद्धति किछु सुविधाजनक अवश्य छैक। किएक तँ एहिमे समय आ स्थानक बचत होइत छैक। मुदा कतोक बेर हस्तलेखन वा मुद्रणमे अनुस्वारक छोट सन बिन्दु स्पष्ट नहि भेलासँ अर्थक अनर्थ होइत सेहो देखल जाइत अछि। अनुस्वारक प्रयोगमे उच्चारण-दोषक सम्भावना सेहो ततबए देखल जाइत अछि। एतदर्थ कसँ लऽ कऽ पवर्ग धरि पञ्चमाक्षरेक प्रयोग करब उचित अछि। यसँ लऽ कऽ ज्ञ धरिक अक्षरक सङ्ग अनुस्वारक प्रयोग करबामे कतहु कोनो विवाद नहि देखल जाइछ। २.ढ आ ढ़ : ढ़क उच्चारण “र् ह”जकाँ होइत अछि। अतः जतऽ “र् ह”क उच्चारण हो ओतऽ मात्र ढ़ लिखल जाए। आन ठाम खाली ढ लिखल जएबाक चाही। जेना- ढ = ढाकी, ढेकी, ढीठ, ढेउआ, ढङ्ग, ढेरी, ढाकनि, ढाठ आदि। ढ़ = पढ़ाइ, बढ़ब, गढ़ब, मढ़ब, बुढ़बा, साँढ़, गाढ़, रीढ़, चाँढ़, सीढ़ी, पीढ़ी आदि। उपर्युक्त शब्द सभकेँ देखलासँ ई स्पष्ट होइत अछि जे साधारणतया शब्दक शुरूमे ढ आ मध्य तथा अन्तमे ढ़ अबैत अछि। इएह नियम ड आ ड़क सन्दर्भ सेहो लागू होइत अछि। ३.व आ ब : मैथिलीमे “व”क उच्चारण ब कएल जाइत अछि, मुदा ओकरा ब रूपमे नहि लिखल जएबाक चाही। जेना- उच्चारण : बैद्यनाथ, बिद्या, नब, देबता, बिष्णु, बंश, बन्दना आदि। एहि सभक स्थानपर क्रमशः वैद्यनाथ, विद्या, नव, देवता, विष्णु, वंश, वन्दना लिखबाक चाही। सामान्यतया व उच्चारणक लेल ओ प्रयोग कएल जाइत अछि। जेना- ओकील, ओजह आदि। ४.य आ ज : कतहु-कतहु “य”क उच्चारण “ज”जकाँ करैत देखल जाइत अछि, मुदा ओकरा ज नहि लिखबाक चाही। उच्चारणमे यज्ञ, जदि, जमुना, जुग, जाबत, जोगी, जदु, जम आदि कहल जाएबला शब्द सभकेँ क्रमशः यज्ञ, यदि, यमुना, युग, यावत, योगी, यदु, यम लिखबाक चाही। ५.ए आ य : मैथिलीक वर्तनीमे ए आ य दुनू लिखल जाइत अछि। प्राचीन वर्तनी- कएल, जाए, होएत, माए, भाए, गाए आदि। नवीन वर्तनी- कयल, जाय, होयत, माय, भाय, गाय आदि। सामान्यतया शब्दक शुरूमे ए मात्र अबैत अछि। जेना एहि, एना, एकर, एहन आदि। एहि शब्द सभक स्थानपर यहि, यना, यकर, यहन आदिक प्रयोग नहि करबाक चाही। यद्यपि मैथिलीभाषी थारू सहित किछु जातिमे शब्दक आरम्भोमे “ए”केँ य कहि उच्चारण कएल जाइत अछि। ए आ “य”क प्रयोगक सन्दर्भमे प्राचीने पद्धतिक अनुसरण करब उपयुक्त मानि एहि पुस्तकमे ओकरे प्रयोग कएल गेल अछि। किएक तँ दुनूक लेखनमे कोनो सहजता आ दुरूहताक बात नहि अछि। आ मैथिलीक सर्वसाधारणक उच्चारण-शैली यक अपेक्षा एसँ बेसी निकट छैक। खास कऽ कएल, हएब आदि कतिपय शब्दकेँ कैल, हैब आदि रूपमे कतहु-कतहु लिखल जाएब सेहो “ए”क प्रयोगकेँ बेसी समीचीन प्रमाणित करैत अछि। ६.हि, हु तथा एकार, ओकार : मैथिलीक प्राचीन लेखन-परम्परामे कोनो बातपर बल दैत काल शब्दक पाछाँ हि, हु लगाओल जाइत छैक। जेना- हुनकहि, अपनहु, ओकरहु, तत्कालहि, चोट्टहि, आनहु आदि। मुदा आधुनिक लेखनमे हिक स्थानपर एकार एवं हुक स्थानपर ओकारक प्रयोग करैत देखल जाइत अछि। जेना- हुनके, अपनो, तत्काले, चोट्टे, आनो आदि। ७.ष तथा ख : मैथिली भाषामे अधिकांशतः षक उच्चारण ख होइत अछि। जेना- षड्यन्त्र (खड़यन्त्र), षोडशी (खोड़शी), षट्कोण (खटकोण), वृषेश (वृखेश), सन्तोष (सन्तोख) आदि। ८.ध्वनि-लोप : निम्नलिखित अवस्थामे शब्दसँ ध्वनि-लोप भऽ जाइत अछि: (क) क्रियान्वयी प्रत्यय अयमे य वा ए लुप्त भऽ जाइत अछि। ओहिमे सँ पहिने अक उच्चारण दीर्घ भऽ जाइत अछि। ओकर आगाँ लोप-सूचक चिह्न वा विकारी (’ / ऽ) लगाओल जाइछ। जेना- पूर्ण रूप : पढ़ए (पढ़य) गेलाह, कए (कय) लेल, उठए (उठय) पड़तौक। अपूर्ण रूप : पढ़’ गेलाह, क’ लेल, उठ’ पड़तौक। पढ़ऽ गेलाह, कऽ लेल, उठऽ पड़तौक। (ख) पूर्वकालिक कृत आय (आए) प्रत्ययमे य (ए) लुप्त भऽ जाइछ, मुदा लोप-सूचक विकारी नहि लगाओल जाइछ। जेना- पूर्ण रूप : खाए (य) गेल, पठाय (ए) देब, नहाए (य) अएलाह। अपूर्ण रूप : खा गेल, पठा देब, नहा अएलाह। (ग) स्त्री प्रत्यय इक उच्चारण क्रियापद, संज्ञा, ओ विशेषण तीनूमे लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना- पूर्ण रूप : दोसरि मालिनि चलि गेलि। अपूर्ण रूप : दोसर मालिन चलि गेल। (घ) वर्तमान कृदन्तक अन्तिम त लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना- पूर्ण रूप : पढ़ैत अछि, बजैत अछि, गबैत अछि। अपूर्ण रूप : पढ़ै अछि, बजै अछि, गबै अछि। (ङ) क्रियापदक अवसान इक, उक, ऐक तथा हीकमे लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना- पूर्ण रूप: छियौक, छियैक, छहीक, छौक, छैक, अबितैक, होइक। अपूर्ण रूप : छियौ, छियै, छही, छौ, छै, अबितै, होइ। (च) क्रियापदीय प्रत्यय न्ह, हु तथा हकारक लोप भऽ जाइछ। जेना- पूर्ण रूप : छन्हि, कहलन्हि, कहलहुँ, गेलह, नहि। अपूर्ण रूप : छनि, कहलनि, कहलौँ, गेलऽ, नइ, नञि, नै। ९.ध्वनि स्थानान्तरण : कोनो-कोनो स्वर-ध्वनि अपना जगहसँ हटि कऽ दोसर ठाम चलि जाइत अछि। खास कऽ ह्रस्व इ आ उक सम्बन्धमे ई बात लागू होइत अछि। मैथिलीकरण भऽ गेल शब्दक मध्य वा अन्तमे जँ ह्रस्व इ वा उ आबए तँ ओकर ध्वनि स्थानान्तरित भऽ एक अक्षर आगाँ आबि जाइत अछि। जेना- शनि (शइन), पानि (पाइन), दालि ( दाइल), माटि (माइट), काछु (काउछ), मासु (माउस) आदि। मुदा तत्सम शब्द सभमे ई निअम लागू नहि होइत अछि। जेना- रश्मिकेँ रइश्म आ सुधांशुकेँ सुधाउंस नहि कहल जा सकैत अछि। १०.हलन्त(्)क प्रयोग : मैथिली भाषामे सामान्यतया हलन्त (्)क आवश्यकता नहि होइत अछि। कारण जे शब्दक अन्तमे अ उच्चारण नहि होइत अछि। मुदा संस्कृत भाषासँ जहिनाक तहिना मैथिलीमे आएल (तत्सम) शब्द सभमे हलन्त प्रयोग कएल जाइत अछि। एहि पोथीमे सामान्यतया सम्पूर्ण शब्दकेँ मैथिली भाषा सम्बन्धी निअम अनुसार हलन्तविहीन राखल गेल अछि। मुदा व्याकरण सम्बन्धी प्रयोजनक लेल अत्यावश्यक स्थानपर कतहु-कतहु हलन्त देल गेल अछि। प्रस्तुत पोथीमे मथिली लेखनक प्राचीन आ नवीन दुनू शैलीक सरल आ समीचीन पक्ष सभकेँ समेटि कऽ वर्ण-विन्यास कएल गेल अछि। स्थान आ समयमे बचतक सङ्गहि हस्त-लेखन तथा तकनीकी दृष्टिसँ सेहो सरल होबऽबला हिसाबसँ वर्ण-विन्यास मिलाओल गेल अछि। वर्तमान समयमे मैथिली मातृभाषी पर्यन्तकेँ आन भाषाक माध्यमसँ मैथिलीक ज्ञान लेबऽ पड़ि रहल परिप्रेक्ष्यमे लेखनमे सहजता तथा एकरूपतापर ध्यान देल गेल अछि। तखन मैथिली भाषाक मूल विशेषता सभ कुण्ठित नहि होइक, ताहू दिस लेखक-मण्डल सचेत अछि। प्रसिद्ध भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक कहब छनि जे सरलताक अनुसन्धानमे एहन अवस्था किन्नहु ने आबऽ देबाक चाही जे भाषाक विशेषता छाँहमे पडि जाए। -(भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक धारणाकेँ पूर्ण रूपसँ सङ्ग लऽ निर्धारित) १.२. मैथिली अकादमी, पटना द्वारा निर्धारित मैथिली लेखन-शैली

१. जे शब्द मैथिली-साहित्यक प्राचीन कालसँ आइ धरि जाहि वर्त्तनीमे प्रचलित अछि, से सामान्यतः ताहि वर्त्तनीमे लिखल जाय- उदाहरणार्थ-

ग्राह्य

एखन ठाम जकर, तकर तनिकर अछि

अग्राह्य अखन, अखनि, एखेन, अखनी ठिमा, ठिना, ठमा जेकर, तेकर तिनकर। (वैकल्पिक रूपेँ ग्राह्य) ऐछ, अहि, ए।

२. निम्नलिखित तीन प्रकारक रूप वैकल्पिकतया अपनाओल जाय: भऽ गेल, भय गेल वा भए गेल। जा रहल अछि, जाय रहल अछि, जाए रहल अछि। कर’ गेलाह, वा करय गेलाह वा करए गेलाह।

३. प्राचीन मैथिलीक ‘न्ह’ ध्वनिक स्थानमे ‘न’ लिखल जाय सकैत अछि यथा कहलनि वा कहलन्हि।

४. ‘ऐ’ तथा ‘औ’ ततय लिखल जाय जत’ स्पष्टतः ‘अइ’ तथा ‘अउ’ सदृश उच्चारण इष्ट हो। यथा- देखैत, छलैक, बौआ, छौक इत्यादि।

५. मैथिलीक निम्नलिखित शब्द एहि रूपे प्रयुक्त होयत: जैह, सैह, इएह, ओऐह, लैह तथा दैह।

६. ह्र्स्व इकारांत शब्दमे ‘इ’ के लुप्त करब सामान्यतः अग्राह्य थिक। यथा- ग्राह्य देखि आबह, मालिनि गेलि (मनुष्य मात्रमे)।

७. स्वतंत्र ह्रस्व ‘ए’ वा ‘य’ प्राचीन मैथिलीक उद्धरण आदिमे तँ यथावत राखल जाय, किंतु आधुनिक प्रयोगमे वैकल्पिक रूपेँ ‘ए’ वा ‘य’ लिखल जाय। यथा:- कयल वा कएल, अयलाह वा अएलाह, जाय वा जाए इत्यादि।

८. उच्चारणमे दू स्वरक बीच जे ‘य’ ध्वनि स्वतः आबि जाइत अछि तकरा लेखमे स्थान वैकल्पिक रूपेँ देल जाय। यथा- धीआ, अढ़ैआ, विआह, वा धीया, अढ़ैया, बियाह।

९. सानुनासिक स्वतंत्र स्वरक स्थान यथासंभव ‘ञ’ लिखल जाय वा सानुनासिक स्वर। यथा:- मैञा, कनिञा, किरतनिञा वा मैआँ, कनिआँ, किरतनिआँ।

१०. कारकक विभक्त्तिक निम्नलिखित रूप ग्राह्य:- हाथकेँ, हाथसँ, हाथेँ, हाथक, हाथमे। ’मे’ मे अनुस्वार सर्वथा त्याज्य थिक। ‘क’ क वैकल्पिक रूप ‘केर’ राखल जा सकैत अछि।

११. पूर्वकालिक क्रियापदक बाद ‘कय’ वा ‘कए’ अव्यय वैकल्पिक रूपेँ लगाओल जा सकैत अछि। यथा:- देखि कय वा देखि कए।

१२. माँग, भाँग आदिक स्थानमे माङ, भाङ इत्यादि लिखल जाय।

१३. अर्द्ध ‘न’ ओ अर्द्ध ‘म’ क बदला अनुसार नहि लिखल जाय, किंतु छापाक सुविधार्थ अर्द्ध ‘ङ’ , ‘ञ’, तथा ‘ण’ क बदला अनुस्वारो लिखल जा सकैत अछि। यथा:- अङ्क, वा अंक, अञ्चल वा अंचल, कण्ठ वा कंठ।

१४. हलंत चिह्न निअमतः लगाओल जाय, किंतु विभक्तिक संग अकारांत प्रयोग कएल जाय। यथा:- श्रीमान्, किंतु श्रीमानक।

१५. सभ एकल कारक चिह्न शब्दमे सटा क’ लिखल जाय, हटा क’ नहि, संयुक्त विभक्तिक हेतु फराक लिखल जाय, यथा घर परक।

१६. अनुनासिककेँ चन्द्रबिन्दु द्वारा व्यक्त कयल जाय। परंतु मुद्रणक सुविधार्थ हि समान जटिल मात्रापर अनुस्वारक प्रयोग चन्द्रबिन्दुक बदला कयल जा सकैत अछि। यथा- हिँ केर बदला हिं।

१७. पूर्ण विराम पासीसँ ( । ) सूचित कयल जाय।

१८. समस्त पद सटा क’ लिखल जाय, वा हाइफेनसँ जोड़ि क’ ,  हटा क’ नहि।

१९. लिअ तथा दिअ शब्दमे बिकारी (ऽ) नहि लगाओल जाय।

२०. अंक देवनागरी रूपमे राखल जाय।

२१.किछु ध्वनिक लेल नवीन चिन्ह बनबाओल जाय। जा' ई नहि बनल अछि ताबत एहि दुनू ध्वनिक बदला पूर्ववत् अय/ आय/ अए/ आए/ आओ/ अओ लिखल जाय। आकि ऎ वा ऒ सँ व्यक्त कएल जाय।

ह./- गोविन्द झा ११/८/७६ श्रीकान्त ठाकुर ११/८/७६ सुरेन्द्र झा "सुमन" ११/०८/७६

  २. मैथिलीमे भाषा सम्पादन पाठ्यक्रम २.१. उच्चारण निर्देश: (बोल्ड कएल रूप ग्राह्य):- दन्त न क उच्चारणमे दाँतमे जीह सटत- जेना बाजू नाम , मुदा ण क उच्चारणमे जीह मूर्धामे सटत (नै सटैए तँ उच्चारण दोष अछि)- जेना बाजू गणेश। तालव्य शमे जीह तालुसँ , षमे मूर्धासँ आ दन्त समे दाँतसँ सटत। निशाँ, सभ आ शोषण बाजि कऽ देखू। मैथिलीमे ष केँ वैदिक संस्कृत जकाँ ख सेहो उच्चरित कएल जाइत अछि, जेना वर्षा, दोष। य अनेको स्थानपर ज जकाँ उच्चरित होइत अछि आ ण ड़ जकाँ (यथा संयोग आ गणेश संजोग आ गड़ेस उच्चरित होइत अछि)। मैथिलीमे व क उच्चारण ब, श क उच्चारण स आ य क उच्चारण ज सेहो होइत अछि। ओहिना ह्रस्व इ बेशीकाल मैथिलीमे पहिने बाजल जाइत अछि कारण देवनागरीमे आ मिथिलाक्षरमे ह्रस्व इ अक्षरक पहिने लिखलो जाइत आ बाजलो जएबाक चाही। कारण जे हिन्दीमे एकर दोषपूर्ण उच्चारण होइत अछि (लिखल तँ पहिने जाइत अछि मुदा बाजल बादमे जाइत अछि), से शिक्षा पद्धतिक दोषक कारण हम सभ ओकर उच्चारण दोषपूर्ण ढंगसँ कऽ रहल छी। अछि- अ इ छ  ऐछ (उच्चारण) छथि- छ इ थ  – छैथ (उच्चारण) पहुँचि- प हुँ इ च (उच्चारण) आब अ आ इ ई ए ऐ ओ औ अं अः ऋ ऐ सभ लेल मात्रा सेहो अछि, मुदा ऐमे ई ऐ ओ औ अं अः ऋ केँ संयुक्ताक्षर रूपमे गलत रूपमे प्रयुक्त आ उच्चरित कएल जाइत अछि। जेना ऋ केँ री  रूपमे उच्चरित करब। आ देखियौ- ऐ लेल देखिऔ क प्रयोग अनुचित। मुदा देखिऐ लेल देखियै अनुचित। क् सँ ह् धरि अ सम्मिलित भेलासँ क सँ ह बनैत अछि, मुदा उच्चारण काल हलन्त युक्त शब्दक अन्तक उच्चारणक प्रवृत्ति बढ़ल अछि, मुदा हम जखन मनोजमे ज् अन्तमे बजैत छी, तखनो पुरनका लोककेँ बजैत सुनबन्हि- मनोजऽ, वास्तवमे ओ अ युक्त ज् = ज बजै छथि। फेर ज्ञ अछि ज् आ ञ क संयुक्त मुदा गलत उच्चारण होइत अछि- ग्य। ओहिना क्ष अछि क् आ ष क संयुक्त मुदा उच्चारण होइत अछि छ। फेर श् आ र क संयुक्त अछि श्र ( जेना श्रमिक) आ स् आ र क संयुक्त अछि स्र (जेना मिस्र)। त्र भेल त+र । उच्चारणक ऑडियो फाइल विदेह आर्काइव  http://www.videha.co.in/ पर उपलब्ध अछि। फेर केँ / सँ / पर पूर्व अक्षरसँ सटा कऽ लिखू मुदा तँ / कऽ हटा कऽ। ऐमे सँ मे पहिल सटा कऽ लिखू आ बादबला हटा कऽ। अंकक बाद टा लिखू सटा कऽ मुदा अन्य ठाम टा लिखू हटा कऽ– जेना छहटा मुदा सभ टा। फेर ६अ म सातम लिखू- छठम सातम नै। घरबलामे बला मुदा घरवालीमे वाली प्रयुक्त करू। रहए- रहै मुदा सकैए (उच्चारण सकै-ए)। मुदा कखनो काल रहए आ रहै मे अर्थ भिन्नता सेहो, जेना से कम्मो जगहमे पार्किंग करबाक अभ्यास रहै ओकरा। पुछलापर पता लागल जे ढुनढुन नाम्ना ई ड्राइवर कनाट प्लेसक पार्किंगमे काज करैत रहए। छलै, छलए मे सेहो ऐ तरहक भेल। छलए क उच्चारण छल-ए सेहो। संयोगने- (उच्चारण संजोगने) केँ/  कऽ केर- क ( केर क प्रयोग गद्यमे नै करू , पद्यमे कऽ सकै छी। ) क (जेना रामक) –रामक आ संगे (उच्चारण राम के /  राम कऽ सेहो) सँ- सऽ (उच्चारण) चन्द्रबिन्दु आ अनुस्वार- अनुस्वारमे कंठ धरिक प्रयोग होइत अछि मुदा चन्द्रबिन्दुमे नै। चन्द्रबिन्दुमे कनेक एकारक सेहो उच्चारण होइत अछि- जेना रामसँ- (उच्चारण राम सऽ)  रामकेँ- (उच्चारण राम कऽ/ राम के सेहो)। केँ जेना रामकेँ भेल हिन्दीक को (राम को)- राम को= रामकेँ क जेना रामक भेल हिन्दीक का ( राम का) राम का= रामक कऽ जेना जा कऽ भेल हिन्दीक कर ( जा कर) जा कर= जा कऽ सँ भेल हिन्दीक से (राम से) राम से= रामसँ सऽ , तऽ , त , केर (गद्यमे) एे चारू शब्द सबहक प्रयोग अवांछित। के दोसर अर्थेँ प्रयुक्त भऽ सकैए- जेना, के कहलक? विभक्ति “क”क बदला एकर प्रयोग अवांछित। नञि, नहि, नै, नइ, नँइ, नइँ, नइं ऐ सभक उच्चारण आ लेखन - नै त्त्व क बदलामे त्व जेना महत्वपूर्ण (महत्त्वपूर्ण नै) जतए अर्थ बदलि जाए ओतहि मात्र तीन अक्षरक संयुक्ताक्षरक प्रयोग उचित। सम्पति- उच्चारण स म्प इ त (सम्पत्ति नै- कारण सही उच्चारण आसानीसँ सम्भव नै)। मुदा सर्वोत्तम (सर्वोतम नै)। राष्ट्रिय (राष्ट्रीय नै) सकैए/ सकै (अर्थ परिवर्तन) पोछैले/ पोछै लेल/ पोछए लेल पोछैए/ पोछए/ (अर्थ परिवर्तन) पोछए/ पोछै ओ लोकनि ( हटा कऽ, ओ मे बिकारी नै) ओइ/ ओहि ओहिले/ ओहि लेल/ ओही लऽ जएबेँ/ बैसबेँ पँचभइयाँ देखियौक/ (देखिऔक नै- तहिना अ मे ह्रस्व आ दीर्घक मात्राक प्रयोग अनुचित) जकाँ / जेकाँ तँइ/ तैँ/ होएत / हएत नञि/ नहि/ नँइ/ नइँ/ नै सौँसे/ सौंसे बड़ / बड़ी (झोराओल) गाए (गाइ नहि), मुदा गाइक दूध (गाएक दूध नै।) रहलेँ/ पहिरतैँ हमहीं/ अहीं सब - सभ सबहक - सभहक धरि - तक गप- बात बूझब - समझब बुझलौं/ समझलौं/ बुझलहुँ - समझलहुँ हमरा आर - हम सभ आकि- आ कि सकैछ/ करैछ (गद्यमे प्रयोगक आवश्यकता नै) होइन/ होनि जाइन (जानि नै, जेना देल जाइन) मुदा जानि-बूझि (अर्थ परिव्र्तन) पइठ/ जाइठ आउ/ जाउ/ आऊ/ जाऊ मे, केँ, सँ, पर (शब्दसँ सटा कऽ) तँ कऽ धऽ दऽ (शब्दसँ हटा कऽ) मुदा दूटा वा बेसी विभक्ति संग रहलापर पहिल विभक्ति टाकेँ सटाऊ। जेना ऐमे सँ । एकटा , दूटा (मुदा कए टा) बिकारीक प्रयोग शब्दक अन्तमे, बीचमे अनावश्यक रूपेँ नै। आकारान्त आ अन्तमे अ क बाद बिकारीक प्रयोग नै (जेना दिअ , आ/ दिय’ , आ’, आ नै ) अपोस्ट्रोफीक प्रयोग बिकारीक बदलामे करब अनुचित आ मात्र फॉन्टक तकनीकी न्यूनताक परिचायक)- ओना बिकारीक संस्कृत रूप ऽ अवग्रह कहल जाइत अछि आ वर्तनी आ उच्चारण दुनू ठाम एकर लोप रहैत अछि/ रहि सकैत अछि (उच्चारणमे लोप रहिते अछि)। मुदा अपोस्ट्रोफी सेहो अंग्रेजीमे पसेसिव केसमे होइत अछि आ फ्रेंचमे शब्दमे जतए एकर प्रयोग होइत अछि जेना raison d’etre एतए सेहो एकर उच्चारण रैजौन डेटर होइत अछि, माने अपोस्ट्रॉफी अवकाश नै दैत अछि वरन जोड़ैत अछि, से एकर प्रयोग बिकारीक बदला देनाइ तकनीकी रूपेँ सेहो अनुचित)। अइमे, एहिमे/ ऐमे जइमे, जाहिमे एखन/ अखन/ अइखन केँ (के नहि) मे (अनुस्वार रहित) भऽ मे दऽ तँ (तऽ, त नै) सँ ( सऽ स नै) गाछ तर गाछ लग साँझ खन जो (जो go, करै जो do) तै/तइ जेना- तै दुआरे/ तइमे/ तइले जै/जइ जेना- जै कारण/ जइसँ/ जइले ऐ/अइ जेना- ऐ कारण/ ऐसँ/ अइले/ मुदा एकर एकटा खास प्रयोग- लालति‍ कतेक दि‍नसँ कहैत रहैत अइ लै/लइ जेना लैसँ/ लइले/ लै दुआरे लहँ/ लौं गेलौं/ लेलौं/ लेलँह/ गेलहुँ/ लेलहुँ/ लेलँ जइ/ जाहि‍/ जै जहि‍ठाम/ जाहि‍ठाम/ जइठाम/ जैठाम एहि‍/ अहि‍/ अइ (वाक्यक अंतमे ग्राह्य) / ऐ अइछ/ अछि‍/ ऐछ तइ/ तहि‍/ तै/ ताहि‍ ओहि‍/ ओइ सीखि‍/ सीख जीवि‍/ जीवी/ जीब भलेहीं/ भलहि‍ं तैं/ तँइ/ तँए जाएब/ जएब लइ/ लै छइ/ छै नहि‍/ नै/ नइ गइ/ गै छनि‍/ छन्‍हि‍  ... समए शब्‍दक संग जखन कोनो वि‍भक्‍ति‍ जुटै छै तखन समै जना समैपर इत्‍यादि‍। असगरमे हृदए आ वि‍भक्‍ति‍ जुटने हृदे जना हृदेसँ, हृदेमे इत्‍यादि‍। जइ/ जाहि‍/ जै जहि‍ठाम/ जाहि‍ठाम/ जइठाम/ जैठाम एहि‍/ अहि‍/ अइ/ ऐ अइछ/ अछि‍/ ऐछ तइ/ तहि‍/ तै/ ताहि‍ ओहि‍/ ओइ सीखि‍/ सीख जीवि‍/ जीवी/ जीब भले/ भलेहीं/ भलहि‍ं तैं/ तँइ/ तँए जाएब/ जएब लइ/ लै छइ/ छै नहि‍/ नै/ नइ गइ/ गै छनि‍/ छन्‍हि‍ चुकल अछि/ गेल गछि २.२. मैथिलीमे भाषा सम्पादन पाठ्यक्रम नीचाँक सूचीमे देल विकल्पमेसँ लैंगुएज एडीटर द्वारा कोन रूप चुनल जेबाक चाही: बोल्ड कएल रूप ग्राह्य: १.होयबला/ होबयबला/ होमयबला/ हेब’बला, हेम’बला/ होयबाक/होबएबला /होएबाक २. आ’/आऽ आ ३. क’ लेने/कऽ लेने/कए लेने/कय लेने/ल’/लऽ/लय/लए ४. भ’ गेल/भऽ गेल/भय गेल/भए गेल ५. कर’ गेलाह/करऽ गेलह/करए गेलाह/करय गेलाह ६. लिअ/दिअ लिय’,दिय’,लिअ’,दिय’/ ७. कर’ बला/करऽ बला/ करय बला करैबला/क’र’ बला / करैवाली ८. बला वला (पुरूष), वाली (स्‍त्री) ९ . आङ्ल आंग्ल १०. प्रायः प्रायह ११. दुःख दुख १ २. चलि गेल चल गेल/चैल गेल १३. देलखिन्ह देलकिन्ह, देलखिन १४. देखलन्हि देखलनि/ देखलैन्ह १५. छथिन्ह/ छलन्हि छथिन/ छलैन/ छलनि १६. चलैत/दैत चलति/दैति १७. एखनो अखनो १८. बढ़नि‍ बढ़इन बढ़न्हि १९. ओ’/ओऽ(सर्वनाम) ओ २० . ओ (संयोजक) ओ’/ओऽ २१. फाँगि/फाङ्गि फाइंग/फाइङ २२. जे जे’/जेऽ २३. ना-नुकुर ना-नुकर २४. केलन्हि/केलनि‍/कयलन्हि २५. तखनतँ/ तखन तँ २६. जा रहल/जाय रहल/जाए रहल २७. निकलय/निकलए लागल/ लगल बहराय/ बहराए लागल/ लगल निकल’/बहरै लागल २८. ओतय/ जतय जत’/ ओत’/ जतए/ ओतए २९. की फूरल जे कि फूरल जे ३०. जे जे’/जेऽ ३१. कूदि / यादि(मोन पारब) कूइद/याइद/कूद/याद/ यादि (मोन) ३२. इहो/ ओहो ३३. हँसए/ हँसय हँसऽ ३४. नौ आकि दस/नौ किंवा दस/ नौ वा दस ३५. सासु-ससुर सास-ससुर ३६. छह/ सात छ/छः/सात ३७. की  की’/ कीऽ (दीर्घीकारान्तमे ऽ वर्जित) ३८. जबाब जवाब ३९. करएताह/ करेताह करयताह ४०. दलान दिशि दलान दिश/दलान दिस ४१ . गेलाह गएलाह/गयलाह ४२. किछु आर/ किछु और/ किछ आर ४३. जाइ छल/ जाइत छल जाति छल/जैत छल ४४. पहुँचि/ भेट जाइत छल/ भेट जाइ छलए पहुँच/ भेटि‍ जाइत छल ४५. जबान (युवा)/ जवान(फौजी) ४६. लय/ लए क’/ कऽ/ लए कए / लऽ कऽ/ लऽ कए ४७. ल’/लऽ कय/ कए ४८. एखन / एखने / अखन / अखने ४९. अहींकेँ अहीँकेँ ५०. गहींर गहीँर ५१. धार पार केनाइ धार पार केनाय/केनाए ५२. जेकाँ जेँकाँ/ जकाँ ५३. तहिना तेहिना ५४. एकर अकर ५५. बहिनउ बहनोइ ५६. बहिन बहिनि ५७. बहिन-बहिनोइ बहिन-बहनउ ५८. नहि/ नै ५९. करबा / करबाय/ करबाए ६०. तँ/ त ऽ तय/तए ६१. भैयारी मे छोट-भाए/भै/, जेठ-भाय/भाइ, ६२. गि‍नतीमे दू भाइ/भाए/भाँइ ६३. ई पोथी दू भाइक/ भाँइ/ भाए/ लेल। यावत जावत ६४. माय मै / माए मुदा माइक ममता ६५. देन्हि/ दइन दनि‍/ दएन्हि/ दयन्हि दन्हि/ दैन्हि ६६. द’/ दऽ/ दए ६७. ओ (संयोजक) ओऽ (सर्वनाम) ६८. तका कए तकाय तकाए ६९. पैरे (on foot) पएरे  कएक/ कैक ७०. ताहुमे/ ताहूमे ७१. पुत्रीक ७२. बजा कय/ कए / कऽ ७३. बननाय/बननाइ ७४. कोला ७५. दिनुका दिनका ७६. ततहिसँ ७७. गरबओलन्हि/ गरबौलनि‍/ गरबेलन्हि/ गरबेलनि‍ ७८. बालु बालू ७९. चेन्ह चिन्ह(अशुद्ध) ८०. जे जे’ ८१ . से/ के से’/के’ ८२. एखुनका अखनुका ८३. भुमिहार भूमिहार ८४. सुग्गर / सुगरक/ सूगर ८५. झठहाक झटहाक ८६. छूबि ८७. करइयो/ओ करैयो ने देलक /करियौ-करइयौ ८८. पुबारि पुबाइ ८९. झगड़ा-झाँटी झगड़ा-झाँटि ९०. पएरे-पएरे पैरे-पैरे ९१. खेलएबाक ९२. खेलेबाक ९३. लगा ९४. होए- हो – होअए ९५. बुझल बूझल ९६. बूझल (संबोधन अर्थमे) ९७. यैह यएह / इएह/ सैह/ सएह ९८. तातिल ९९. अयनाय- अयनाइ/ अएनाइ/ एनाइ १००. निन्न- निन्द १०१. बिनु बिन १०२. जाए जाइ १०३. जाइ (in different sense)-last word of sentence १०४. छत पर आबि जाइ १०५. ने १०६. खेलाए (play) –खेलाइ १०७. शिकाइत- शिकायत १०८. ढप- ढ़प १०९ . पढ़- पढ ११०. कनिए/ कनिये कनिञे १११. राकस- राकश ११२. होए/ होय होइ ११३. अउरदा- औरदा ११४. बुझेलन्हि (different meaning- got understand) ११५. बुझएलन्हि/बुझेलनि‍/ बुझयलन्हि (understood himself) ११६. चलि- चल/ चलि‍ गेल ११७. खधाइ- खधाय ११८. मोन पाड़लखिन्ह/ मोन पाड़लखि‍न/ मोन पारलखिन्ह ११९. कैक- कएक- कइएक १२०. लग ल’ग १२१. जरेनाइ १२२. जरौनाइ जरओनाइ- जरएनाइ/ जरेनाइ १२३. होइत १२४. गरबेलन्हि/ गरबेलनि‍ गरबौलन्हि/ गरबौलनि‍ १२५. चिखैत- (to test)चिखइत १२६. करइयो (willing to do) करैयो १२७. जेकरा- जकरा १२८. तकरा- तेकरा १२९. बिदेसर स्थानेमे/ बिदेसरे स्थानमे १३०. करबयलहुँ/ करबएलहुँ/ करबेलहुँ करबेलौं १३१. हारिक (उच्चारण हाइरक) १३२. ओजन वजन आफसोच/ अफसोस कागत/ कागच/ कागज १३३. आधे भाग/ आध-भागे १३४. पिचा / पिचाय/पिचाए १३५. नञ/ ने १३६. बच्चा नञ (ने) पिचा जाय १३७. तखन ने (नञ) कहैत अछि। कहै/ सुनै/ देखै छल मुदा कहैत-कहैत/ सुनैत-सुनैत/ देखैत-देखैत १३८. कतेक गोटे/ कताक गोटे १३९. कमाइ-धमाइ/ कमाई- धमाई १४० . लग ल’ग १४१. खेलाइ (for playing) १४२. छथिन्ह/ छथिन १४३. होइत होइ १४४. क्यो कियो / केओ १४५. केश (hair) १४६. केस (court-case) १४७ . बननाइ/ बननाय/ बननाए १४८. जरेनाइ १४९. कुरसी कुर्सी १५०. चरचा चर्चा १५१. कर्म करम १५२. डुबाबए/ डुबाबै/ डुमाबै डुमाबय/ डुमाबए १५३. एखुनका/ अखुनका १५४. लए/ लिअए (वाक्यक अंतिम शब्द)- लऽ १५५. कएलक/ केलक १५६. गरमी गर्मी १५७ . वरदी वर्दी १५८. सुना गेलाह सुना’/सुनाऽ १५९. एनाइ-गेनाइ १६०. तेना ने घेरलन्हि/ तेना ने घेरलनि‍ १६१. नञि / नै १६२. डरो ड’रो १६३. कतहु/ कतौ कहीं १६४. उमरिगर-उमेरगर उमरगर १६५. भरिगर १६६. धोल/धोअल धोएल १६७. गप/गप्प १६८. के के’ १६९. दरबज्जा/ दरबजा १७०. ठाम १७१. धरि तक १७२. घूरि लौटि १७३. थोरबेक १७४. बड्ड १७५. तोँ/ तूँ १७६. तोँहि( पद्यमे ग्राह्य) १७७. तोँही / तोँहि १७८. करबाइए करबाइये १७९. एकेटा १८०. करितथि /करतथि १८१. पहुँचि/ पहुँच १८२. राखलन्हि रखलन्हि/ रखलनि‍ १८३. लगलन्हि/ लगलनि‍ लागलन्हि १८४. सुनि (उच्चारण सुइन) १८५. अछि (उच्चारण अइछ) १८६. एलथि गेलथि १८७. बितओने/ बि‍तौने/ बितेने १८८. करबओलन्हि/ करबौलनि‍/ करेलखिन्ह/ करेलखि‍न १८९. करएलन्हि/ करेलनि‍ १९०. आकि/ कि १९१. पहुँचि/ पहुँच १९२. बत्ती जराय/ जराए जरा (आगि लगा) १९३. से से’ १९४. हाँ मे हाँ (हाँमे हाँ विभक्त्तिमे हटा कए) १९५. फेल फैल १९६. फइल(spacious) फैल १९७. होयतन्हि/ होएतन्हि/ होएतनि‍/हेतनि‍/ हेतन्हि १९८. हाथ मटिआएब/ हाथ मटियाबय/हाथ मटियाएब १९९. फेका फेंका २००. देखाए देखा २०१. देखाबए २०२. सत्तरि सत्तर २०३. साहेब साहब २०४.गेलैन्ह/ गेलन्हि/ गेलनि‍ २०५. हेबाक/ होएबाक २०६.केलो/ कएलहुँ/केलौं/ केलुँ २०७. किछु न किछु/ किछु ने किछु २०८.घुमेलहुँ/ घुमओलहुँ/ घुमेलौं २०९. एलाक/ अएलाक २१०. अः/ अह २११.लय/ लए (अर्थ-परिवर्त्तन) २१२.कनीक/ कनेक २१३.सबहक/ सभक २१४.मिलाऽ/ मिला २१५.कऽ/ क २१६.जाऽ/ जा २१७.आऽ/ आ २१८.भऽ /भ’ (’ फॉन्टक कमीक द्योतक) २१९.निअम/ नियम २२० .हेक्टेअर/ हेक्टेयर २२१.पहिल अक्षर ढ/ बादक/ बीचक ढ़ २२२.तहिं/तहिँ/ तञि/ तैं २२३.कहिं/ कहीं २२४.तँइ/ तैं / तइँ २२५.नँइ/ नइँ/  नञि/ नहि/नै २२६.है/ हए / एलीहेँ/ २२७.छञि/ छै/ छैक /छइ २२८.दृष्टिएँ/ दृष्टियेँ २२९.आ (come)/ आऽ(conjunction) २३०. आ (conjunction)/ आऽ(come) २३१.कुनो/ कोनो, कोना/केना २३२.गेलैन्ह-गेलन्हि-गेलनि‍ २३३.हेबाक- होएबाक २३४.केलौँ- कएलौँ-कएलहुँ/केलौं २३५.किछु न किछ- किछु ने किछु २३६.केहेन- केहन २३७.आऽ (come)-आ (conjunction-and)/आ। आब'-आब' /आबह-आबह २३८. हएत-हैत २३९.घुमेलहुँ-घुमएलहुँ- घुमेलाें २४०.एलाक- अएलाक २४१.होनि- होइन/ होन्हि/ २४२.ओ-राम ओ श्यामक बीच(conjunction), ओऽ कहलक (he said)/ओ २४३.की हए/ कोसी अएली हए/ की है। की हइ २४४.दृष्टिएँ/ दृष्टियेँ २४५ .शामिल/ सामेल २४६.तैँ / तँए/ तञि/ तहिं २४७.जौं / ज्योँ/ जँ/ २४८.सभ/ सब २४९.सभक/ सबहक २५०.कहिं/ कहीं २५१.कुनो/ कोनो/ कोनहुँ/ २५२.फारकती भऽ गेल/ भए गेल/ भय गेल २५३.कोना/ केना/ कन्‍ना/कना २५४.अः/ अह २५५.जनै/ जनञ २५६.गेलनि‍/ गेलाह (अर्थ परिवर्तन) २५७.केलन्हि/ कएलन्हि/ केलनि‍/ २५८.लय/ लए/ लएह (अर्थ परिवर्तन) २५९.कनीक/ कनेक/कनी-मनी २६०.पठेलन्हि‍ पठेलनि‍/ पठेलइन/ पपठओलन्हि/ पठबौलनि‍/ २६१.निअम/ नियम २६२.हेक्टेअर/ हेक्टेयर २६३.पहिल अक्षर रहने ढ/ बीचमे रहने ढ़ २६४.आकारान्तमे बिकारीक प्रयोग उचित नै/ अपोस्ट्रोफीक प्रयोग फान्टक तकनीकी न्यूनताक परिचायक ओकर बदला अवग्रह (बिकारी) क प्रयोग उचित २६५.केर (पद्यमे ग्राह्य) / -क/ कऽ/ के २६६.छैन्हि- छन्हि २६७.लगैए/ लगैये २६८.होएत/ हएत २६९.जाएत/ जएत/ २७०.आएत/ अएत/ आओत २७१ .खाएत/ खएत/ खैत २७२.पिअएबाक/ पिएबाक/पि‍येबाक २७३.शुरु/ शुरुह २७४.शुरुहे/ शुरुए २७५.अएताह/अओताह/ एताह/ औताह २७६.जाहि/ जाइ/ जइ/ जै/ २७७.जाइत/ जैतए/ जइतए २७८.आएल/ अएल २७९.कैक/ कएक २८०.आयल/ अएल/ आएल २८१. जाए/ जअए/ जए (लालति‍ जाए लगलीह।) २८२. नुकएल/ नुकाएल २८३. कठुआएल/ कठुअएल २८४. ताहि/ तै/ तइ २८५. गायब/ गाएब/ गएब २८६. सकै/ सकए/ सकय २८७.सेरा/सरा/ सराए (भात सरा गेल) २८८.कहैत रही/देखैत रही/ कहैत छलौं/ कहै छलौं- अहिना चलैत/ पढ़ैत (पढ़ै-पढ़ैत अर्थ कखनो काल परिवर्तित) - आर बुझै/ बुझैत (बुझै/ बुझै छी, मुदा बुझैत-बुझैत)/ सकैत/ सकै। करैत/ करै। दै/ दैत। छैक/ छै। बचलै/ बचलैक। रखबा/ रखबाक । बिनु/ बिन। रातिक/ रातुक बुझै आ बुझैत केर अपन-अपन जगहपर प्रयोग समीचीन अछि‍। बुझैत-बुझैत आब बुझलि‍ऐ। हमहूँ बुझै छी। २८९. दुआरे/ द्वारे २९०.भेटि/ भेट/ भेँट २९१. खन/ खीन/  खुना (भोर खन/ भोर खीन) २९२.तक/ धरि २९३.गऽ/ गै (meaning different-जनबै गऽ) २९४.सऽ/ सँ (मुदा दऽ, लऽ) २९५.त्त्व,(तीन अक्षरक मेल बदला पुनरुक्तिक एक आ एकटा दोसरक उपयोग) आदिक बदला त्व आदि। महत्त्व/ महत्व/ कर्ता/ कर्त्ता आदिमे त्त संयुक्तक कोनो आवश्यकता मैथिलीमे नै अछि। वक्तव्य २९६.बेसी/ बेशी २९७.बाला/वाला बला/ वला (रहैबला) २९८ .वाली/ (बदलैवाली) २९९.वार्त्ता/ वार्ता ३००. अन्तर्राष्ट्रिय/ अन्तर्राष्ट्रीय ३०१. लेमए/ लेबए ३०२.लमछुरका, नमछुरका ३०२.लागै/ लगै ( भेटैत/ भेटै) ३०३.लागल/ लगल ३०४.हबा/ हवा ३०५.राखलक/ रखलक ३०६.आ (come)/ आ (and) ३०७. पश्चाताप/ पश्चात्ताप ३०८. ऽ केर व्यवहार शब्दक अन्तमे मात्र, यथासंभव बीचमे नै। ३०९.कहैत/ कहै ३१०. रहए (छल)/ रहै (छलै) (meaning different) ३११.तागति/ ताकति ३१२.खराप/ खराब ३१३.बोइन/ बोनि/ बोइनि ३१४.जाठि/ जाइठ ३१५.कागज/ कागच/ कागत ३१६.गिरै (meaning different- swallow)/ गिरए (खसए) ३१७.राष्ट्रिय/ राष्ट्रीय DATE-LIST (year- 2012-13) (१४२० फसली साल) Marriage Days: Nov.2012- 25, 26, 28, 29, 30 Dec.2012- 5,9, 10, 13, 14 January 2013- 16, 17, 18, 23, 24, 31 Feb.2013- 1, 3, 4, 6, 8, 10, 14, 15, 18, 20, 24, 25 April 2013- 21, 22, 24, 26, 29 May 2013- 1,2,3,5,6,9,12,13,17,19,20,22,23,24,26,27,29,30,31 June 2013- 2,3 July 2013- 11, 14, 15 Upanayana Days: January 2013- 16 February 2013- 14, 15, 20, 21 April 2013- 22 May 2013- 20, 21 Dviragaman Din: November 2012- 25, 26, 28, 29 December 2012- 2, 3, 14 February 2013- 14, 15, 18, 20, 21, 22, 27, 28 March 2013- 1 April 2013- 18, 22, 24, 26, 28, 29 May 2013- 12, 13 Mundan Din: November 2012- 26, 30 December 2012- 3 January 2013- 18, 24 February 2013- 1, 14, 15, 20, 28 April 2013- 17 May 2013- 13, 23, 29 June 2013- 13, 19, 26, 27, 28 July 2013- 10, 15 FESTIVALS OF MITHILA (2012-13) Mauna Panchami-08 July Madhushravani- 22 July Nag Panchami- 24 July Raksha Bandhan- 02 Aug Krishnastami- 10 August Kushi Amavasya / Somvari Vrat- 17 August Vishwakarma Pooja- 17 September Hartalika Teej- 18 September ChauthChandra-19 September Karma Dharma Ekadashi-26 September Indra Pooja Aarambh- 27 September Anant Caturdashi- 29 Sep Agastyarghadaan- 30 Sep Pitri Paksha begins- 30 Sep Jimootavahan Vrata/ Jitia-08 October Matri Navami- 09 October SomvatiAmavasya Vrat- 15 October Kalashsthapan- 16 October Belnauti- 20 October Patrika Pravesh- 21 October Mahastami- 22 October Maha Navami - 23 October Vijaya Dashami- 24 October Kojagara- 29 Oct Dhanteras- 11 November Diyabati, shyama pooja-13 November Annakoota/ Govardhana Pooja-14 November Bhratridwitiya/ Chitragupta Pooja- 15 November Chhathi -19 November Devotthan Ekadashi- 24 November ravivratarambh- 25 November Navanna parvan- 25 November KartikPoornima- Sama Visarjan- 28 November Vivaha Panchmi- 17 December Makara/ Teela Sankranti-14 Jan Naraknivaran chaturdashi- 08 February Basant Panchami/ Saraswati Pooja- 15 February Achla Saptmi- 17 February Mahashivaratri-10 March Holikadahan-Fagua-26 March Holi- 28 March Varuni Trayodashi-07 April Chaiti  navaratrarambh- 11 April Jurishital-15 April Chaiti Chhathi vrata-16 April Ram Navami- 19 April Ravi Brat Ant- 12 May Akshaya Tritiya-13 May Janaki Navami- 19 May Vat Savitri-barasait- 08 June Ganga Dashhara-18 June Somavati Amavasya Vrata- 08 July Jagannath Rath Yatra- 10 July Hari Sayan Ekadashi- 19 July Aashadhi Guru Poornima-22 Jul VIDEHA ARCHIVE १.विदेह ई-पत्रिकाक सभटा पुरान अंक ब्रेल, तिरहुता आ देवनागरी रूपमे Videha e journal's all old issues in Braille Tirhuta and Devanagari versions विदेह ई-पत्रिकाक पहिल ५० अंक

विदेह ई-पत्रिकाक ५०म सँ आगाँक अंक २.मैथिली पोथी डाउनलोड Maithili Books Download ३.मैथिली ऑडियो संकलन Maithili Audio Downloads ४.मैथिली वीडियोक संकलन Maithili Videos ५.मिथिला चित्रकला/ आधुनिक चित्रकला आ चित्र Mithila Painting/ Modern Art and Photos "विदेह"क एहि सभ सहयोगी लिंकपर सेहो एक बेर जाउ। ६.विदेह मैथिली क्विज  :  http://videhaquiz.blogspot.com/ ७.विदेह मैथिली जालवृत्त एग्रीगेटर : http://videha-aggregator.blogspot.com/ ८.विदेह मैथिली साहित्य अंग्रेजीमे अनूदित http://madhubani-art.blogspot.com/ ९.विदेहक पूर्व-रूप "भालसरिक गाछ"  : http://gajendrathakur.blogspot.com/ १०.विदेह इंडेक्स  : http://videha123.blogspot.com/ ११.विदेह फाइल : http://videha123.wordpress.com/ १२. विदेह: सदेह : पहिल तिरहुता (मिथिला़क्षर) जालवृत्त (ब्लॉग) http://videha-sadeha.blogspot.com/ १३. विदेह:ब्रेल: मैथिली ब्रेलमे: पहिल बेर विदेह द्वारा http://videha-braille.blogspot.com/ १४.VIDEHA IST MAITHILI  FORTNIGHTLY EJOURNAL ARCHIVE http://videha-archive.blogspot.com/ १५. विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका मैथिली पोथीक आर्काइव http://videha-pothi.blogspot.com/ १६. विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका ऑडियो आर्काइव http://videha-audio.blogspot.com/ १७. विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका वीडियो आर्काइव http://videha-video.blogspot.com/ १८. विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका मिथिला चित्रकला, आधुनिक कला आ चित्रकला http://videha-paintings-photos.blogspot.com/ १९. मैथिल आर मिथिला (मैथिलीक सभसँ लोकप्रिय जालवृत्त) http://maithilaurmithila.blogspot.com/ २०.श्रुति प्रकाशन http://www.shruti-publication.com/ २१.http://groups.google.com/group/videha २२.http://groups.yahoo.com/group/VIDEHA/ २३.गजेन्द्र ठाकुर इ‍डेक्स http://gajendrathakur123.blogspot.com २४. नेना भुटका http://mangan-khabas.blogspot.com/ २५.विदेह रेडियो:मैथिली कथा-कविता आदिक पहिल पोडकास्ट साइट http://videha123radio.wordpress.com/ २६.Videha Radio २७. Join official Videha facebook group. २८. विदेह मैथिली नाट्य उत्सव http://maithili-drama.blogspot.com/ २९.समदिया http://esamaad.blogspot.com/ ३०. मैथिली फिल्म्स http://maithilifilms.blogspot.com/ ३१.अनचिन्हार आखर http://anchinharakharkolkata.blogspot.com/ ३२. मैथिली हाइकू http://maithili-haiku.blogspot.com/ ३३. मानक मैथिली http://manak-maithili.blogspot.com/ ३४. विहनि कथा http://vihanikatha.blogspot.in/ ३५. मैथिली कविता http://maithili-kavita.blogspot.in/ ३६. मैथिली कथा http://maithili-katha.blogspot.in/ ३७.मैथिली समालोचना http://maithili-samalochna.blogspot.in/ महत्त्वपूर्ण सूचना:(१) 'विदेह' द्वारा धारावाहिक रूपे ई-प्रकाशित कएल गेल गजेन्द्र ठाकुरक  निबन्ध-प्रबन्ध-समीक्षा, उपन्यास (सहस्रबाढ़नि) , पद्य-संग्रह (सहस्राब्दीक चौपड़पर), कथा-गल्प (गल्प-गुच्छ), नाटक(संकर्षण), महाकाव्य (त्वञ्चाहञ्च आ असञ्जाति मन) आ बाल-किशोर साहित्य विदेहमे संपूर्ण ई-प्रकाशनक बाद प्रिंट फॉर्ममे। कुरुक्षेत्रम्–अन्तर्मनक खण्ड-१ सँ ७ Combined ISBN No.978-81-907729-7-6 विवरण एहि पृष्ठपर नीचाँमे आ प्रकाशकक साइट http://www.shruti-publication.com/ पर । महत्त्वपूर्ण सूचना (२):सूचना: विदेहक मैथिली-अंग्रेजी आ अंग्रेजी मैथिली कोष (इंटरनेटपर पहिल बेर सर्च-डिक्शनरी) एम.एस. एस.क्यू.एल. सर्वर आधारित -Based on ms-sql server Maithili-English and English-Maithili Dictionary. विदेहक भाषापाक- रचनालेखन स्तंभमे। कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक- गजेन्द्र ठाकुर गजेन्द्र ठाकुरक निबन्ध-प्रबन्ध-समीक्षा, उपन्यास (सहस्रबाढ़नि) , पद्य-संग्रह (सहस्राब्दीक चौपड़पर), कथा-गल्प (गल्प गुच्छ), नाटक(संकर्षण), महाकाव्य (त्वञ्चाहञ्च आ असञ्जाति मन) आ बालमंडली-किशोरजगत विदेहमे संपूर्ण ई-प्रकाशनक बाद प्रिंट फॉर्ममे। कुरुक्षेत्रम्–अन्तर्मनक, खण्ड-१ सँ ७ Ist edition 2009 of Gajendra Thakur’s KuruKshetram-Antarmanak (Vol. I to VII)- essay-paper-criticism, novel, poems, story, play, epics and Children-grown-ups literature in single binding: Language:Maithili ६९२ पृष्ठ : मूल्य भा. रु. 100/-(for individual buyers inside india) (add courier charges Rs.50/-per copy for Delhi/NCR and Rs.100/- per copy for outside Delhi)

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Details for purchase available at print-version publishers's site website: http://www.shruti-publication.com/ or you may write to e-mail:shruti.publication@shruti-publication.com विदेह: सदेह : १: २: ३: ४ तिरहुता : देवनागरी "विदेह" क, प्रिंट संस्करण :विदेह-ई-पत्रिका (http://www.videha.co.in/) क चुनल रचना सम्मिलित। विदेह:सदेह:१: २: ३: ४ सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। Details for purchase available at print-version publishers's site http://www.shruti-publication.com  or you may write to shruti.publication@shruti-publication.com २. संदेश- [ विदेह ई-पत्रिका, विदेह:सदेह मिथिलाक्षर आ देवनागरी आ गजेन्द्र ठाकुरक सात खण्डक- निबन्ध-प्रबन्ध-समीक्षा,उपन्यास (सहस्रबाढ़नि) , पद्य-संग्रह (सहस्राब्दीक चौपड़पर), कथा-गल्प (गल्प गुच्छ), नाटक (संकर्षण), महाकाव्य (त्वञ्चाहञ्च आ असञ्जाति मन) आ बाल-मंडली-किशोर जगत- संग्रह कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक मादेँ। ] १.श्री गोविन्द झा- विदेहकेँ तरंगजालपर उतारि विश्वभरिमे मातृभाषा मैथिलीक लहरि जगाओल, खेद जे अपनेक एहि महाभियानमे हम एखन धरि संग नहि दए सकलहुँ। सुनैत छी अपनेकेँ सुझाओ आ रचनात्मक आलोचना प्रिय लगैत अछि तेँ किछु लिखक मोन भेल। हमर सहायता आ सहयोग अपनेकेँ सदा उपलब्ध रहत। २.श्री रमानन्द रेणु- मैथिलीमे ई-पत्रिका पाक्षिक रूपेँ चला कऽ जे अपन मातृभाषाक प्रचार कऽ रहल छी, से धन्यवाद । आगाँ अपनेक समस्त मैथिलीक कार्यक हेतु हम हृदयसँ शुभकामना दऽ रहल छी। ३.श्री विद्यानाथ झा "विदित"- संचार आ प्रौद्योगिकीक एहि प्रतिस्पर्धी ग्लोबल युगमे अपन महिमामय "विदेह"केँ अपना देहमे प्रकट देखि जतबा प्रसन्नता आ संतोष भेल, तकरा कोनो उपलब्ध "मीटर"सँ नहि नापल जा सकैछ? ..एकर ऐतिहासिक मूल्यांकन आ सांस्कृतिक प्रतिफलन एहि शताब्दीक अंत धरि लोकक नजरिमे आश्चर्यजनक रूपसँ प्रकट हैत। ४. प्रो. उदय नारायण सिंह "नचिकेता"- जे काज अहाँ कए रहल छी तकर चरचा एक दिन मैथिली भाषाक इतिहासमे होएत। आनन्द भए रहल अछि, ई जानि कए जे एतेक गोट मैथिल "विदेह" ई जर्नलकेँ पढ़ि रहल छथि।...विदेहक चालीसम अंक पुरबाक लेल अभिनन्दन। ५. डॉ. गंगेश गुंजन- एहि विदेह-कर्ममे लागि रहल अहाँक सम्वेदनशील मन, मैथिलीक प्रति समर्पित मेहनतिक अमृत रंग, इतिहास मे एक टा विशिष्ट फराक अध्याय आरंभ करत, हमरा विश्वास अछि। अशेष शुभकामना आ बधाइक सङ्ग, सस्नेह...अहाँक पोथी कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक प्रथम दृष्टया बहुत भव्य तथा उपयोगी बुझाइछ। मैथिलीमे तँ अपना स्वरूपक प्रायः ई पहिले एहन  भव्य अवतारक पोथी थिक। हर्षपूर्ण हमर हार्दिक बधाई स्वीकार करी। ६. श्री रामाश्रय झा "रामरंग"(आब स्वर्गीय)- "अपना" मिथिलासँ संबंधित...विषय वस्तुसँ अवगत भेलहुँ।...शेष सभ कुशल अछि। ७. श्री ब्रजेन्द्र त्रिपाठी- साहित्य अकादमी- इंटरनेट पर प्रथम मैथिली पाक्षिक पत्रिका "विदेह" केर लेल बधाई आ शुभकामना स्वीकार करू। ८. श्री प्रफुल्लकुमार सिंह "मौन"- प्रथम मैथिली पाक्षिक पत्रिका "विदेह" क प्रकाशनक समाचार जानि कनेक चकित मुदा बेसी आह्लादित भेलहुँ। कालचक्रकेँ पकड़ि जाहि दूरदृष्टिक परिचय देलहुँ, ओहि लेल हमर मंगलकामना। ९.डॉ. शिवप्रसाद यादव- ई जानि अपार हर्ष भए रहल अछि, जे नव सूचना-क्रान्तिक क्षेत्रमे मैथिली पत्रकारिताकेँ प्रवेश दिअएबाक साहसिक कदम उठाओल अछि। पत्रकारितामे एहि प्रकारक नव प्रयोगक हम स्वागत करैत छी, संगहि "विदेह"क सफलताक शुभकामना। १०. श्री आद्याचरण झा- कोनो पत्र-पत्रिकाक प्रकाशन- ताहूमे मैथिली पत्रिकाक प्रकाशनमे के कतेक सहयोग करताह- ई तऽ भविष्य कहत। ई हमर ८८ वर्षमे ७५ वर्षक अनुभव रहल। एतेक पैघ महान यज्ञमे हमर श्रद्धापूर्ण आहुति प्राप्त होयत- यावत ठीक-ठाक छी/ रहब। ११. श्री विजय ठाकुर- मिशिगन विश्वविद्यालय- "विदेह" पत्रिकाक अंक देखलहुँ, सम्पूर्ण टीम बधाईक पात्र अछि। पत्रिकाक मंगल भविष्य हेतु हमर शुभकामना स्वीकार कएल जाओ। १२. श्री सुभाषचन्द्र यादव- ई-पत्रिका "विदेह" क बारेमे जानि प्रसन्नता भेल। ’विदेह’ निरन्तर पल्लवित-पुष्पित हो आ चतुर्दिक अपन सुगंध पसारय से कामना अछि। १३. श्री मैथिलीपुत्र प्रदीप- ई-पत्रिका "विदेह" केर सफलताक भगवतीसँ कामना। हमर पूर्ण सहयोग रहत। १४. डॉ. श्री भीमनाथ झा- "विदेह" इन्टरनेट पर अछि तेँ "विदेह" नाम उचित आर कतेक रूपेँ एकर विवरण भए सकैत अछि। आइ-काल्हि मोनमे उद्वेग रहैत अछि, मुदा शीघ्र पूर्ण सहयोग देब।कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक देखि अति प्रसन्नता भेल। मैथिलीक लेल ई घटना छी। १५. श्री रामभरोस कापड़ि "भ्रमर"- जनकपुरधाम- "विदेह" ऑनलाइन देखि रहल छी। मैथिलीकेँ अन्तर्राष्ट्रीय जगतमे पहुँचेलहुँ तकरा लेल हार्दिक बधाई। मिथिला रत्न सभक संकलन अपूर्व। नेपालोक सहयोग भेटत, से विश्वास करी। १६. श्री राजनन्दन लालदास- "विदेह" ई-पत्रिकाक माध्यमसँ बड़ नीक काज कए रहल छी, नातिक अहिठाम देखलहुँ। एकर वार्षिक अ‍ंक जखन प्रिं‍ट निकालब तँ हमरा पठायब। कलकत्तामे बहुत गोटेकेँ हम साइटक पता लिखाए देने छियन्हि। मोन तँ होइत अछि जे दिल्ली आबि कए आशीर्वाद दैतहुँ, मुदा उमर आब बेशी भए गेल। शुभकामना देश-विदेशक मैथिलकेँ जोड़बाक लेल।.. उत्कृष्ट प्रकाशन कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक लेल बधाइ। अद्भुत काज कएल अछि, नीक प्रस्तुति अछि सात खण्डमे।  मुदा अहाँक सेवा आ से निःस्वार्थ तखन बूझल जाइत जँ अहाँ द्वारा प्रकाशित पोथी सभपर दाम लिखल नहि रहितैक। ओहिना सभकेँ विलहि देल जइतैक। (स्पष्टीकरण-  श्रीमान्, अहाँक सूचनार्थ विदेह द्वारा ई-प्रकाशित कएल सभटा सामग्री आर्काइवमे https://sites.google.com/a/videha.com/videha-pothi/ पर बिना मूल्यक डाउनलोड लेल उपलब्ध छै आ भविष्यमे सेहो रहतैक। एहि आर्काइवकेँ जे कियो प्रकाशक अनुमति लऽ कऽ प्रिंट रूपमे प्रकाशित कएने छथि आ तकर ओ दाम रखने छथि ताहिपर हमर कोनो नियंत्रण नहि अछि।- गजेन्द्र ठाकुर)...   अहाँक प्रति अशेष शुभकामनाक संग। १७. डॉ. प्रेमशंकर सिंह- अहाँ मैथिलीमे इंटरनेटपर पहिल पत्रिका "विदेह" प्रकाशित कए अपन अद्भुत मातृभाषानुरागक परिचय देल अछि, अहाँक निःस्वार्थ मातृभाषानुरागसँ प्रेरित छी, एकर निमित्त जे हमर सेवाक प्रयोजन हो, तँ सूचित करी। इंटरनेटपर आद्योपांत पत्रिका देखल, मन प्रफुल्लित भऽ गेल। १८.श्रीमती शेफालिका वर्मा- विदेह ई-पत्रिका देखि मोन उल्लाससँ भरि गेल। विज्ञान कतेक प्रगति कऽ रहल अछि...अहाँ सभ अनन्त आकाशकेँ भेदि दियौ, समस्त विस्तारक रहस्यकेँ तार-तार कऽ दियौक...। अपनेक अद्भुत पुस्तक कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक विषयवस्तुक दृष्टिसँ गागरमे सागर अछि। बधाई। १९.श्री हेतुकर झा, पटना-जाहि समर्पण भावसँ अपने मिथिला-मैथिलीक सेवामे तत्पर छी से स्तुत्य अछि। देशक राजधानीसँ भय रहल मैथिलीक शंखनाद मिथिलाक गाम-गाममे मैथिली चेतनाक विकास अवश्य करत। २०. श्री योगानन्द झा, कबिलपुर, लहेरियासराय- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पोथीकेँ निकटसँ देखबाक अवसर भेटल अछि आ मैथिली जगतक एकटा उद्भट ओ समसामयिक दृष्टिसम्पन्न हस्ताक्षरक कलमबन्द परिचयसँ आह्लादित छी। "विदेह"क देवनागरी सँस्करण पटनामे रु. 80/- मे उपलब्ध भऽ सकल जे विभिन्न लेखक लोकनिक छायाचित्र, परिचय पत्रक ओ रचनावलीक सम्यक प्रकाशनसँ ऐतिहासिक कहल जा सकैछ। २१. श्री किशोरीकान्त मिश्र- कोलकाता- जय मैथिली, विदेहमे बहुत रास कविता, कथा, रिपोर्ट आदिक सचित्र संग्रह देखि आ आर अधिक प्रसन्नता मिथिलाक्षर देखि- बधाई स्वीकार कएल जाओ। २२.श्री जीवकान्त- विदेहक मुद्रित अंक पढ़ल- अद्भुत मेहनति। चाबस-चाबस। किछु समालोचना मरखाह..मुदा सत्य। २३. श्री भालचन्द्र झा- अपनेक कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक देखि बुझाएल जेना हम अपने छपलहुँ अछि। एकर विशालकाय आकृति अपनेक सर्वसमावेशताक परिचायक अछि। अपनेक रचना सामर्थ्यमे उत्तरोत्तर वृद्धि हो, एहि शुभकामनाक संग हार्दिक बधाई। २४.श्रीमती डॉ नीता झा- अहाँक कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़लहुँ। ज्योतिरीश्वर शब्दावली, कृषि मत्स्य शब्दावली आ सीत बसन्त आ सभ कथा, कविता, उपन्यास, बाल-किशोर साहित्य सभ उत्तम छल। मैथिलीक उत्तरोत्तर विकासक लक्ष्य दृष्टिगोचर होइत अछि। २५.श्री मायानन्द मिश्र- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक मे हमर उपन्यास स्त्रीधनक जे विरोध कएल गेल अछि तकर हम विरोध करैत छी।... कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पोथीक लेल शुभकामना।(श्रीमान् समालोचनाकेँ विरोधक रूपमे नहि लेल जाए।-गजेन्द्र ठाकुर) २६.श्री महेन्द्र हजारी- सम्पादक श्रीमिथिला- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़ि मोन हर्षित भऽ गेल..एखन पूरा पढ़यमे बहुत समय लागत, मुदा जतेक पढ़लहुँ से आह्लादित कएलक। २७.श्री केदारनाथ चौधरी- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक अद्भुत लागल, मैथिली साहित्य लेल ई पोथी एकटा प्रतिमान बनत। २८.श्री सत्यानन्द पाठक- विदेहक हम नियमित पाठक छी। ओकर स्वरूपक प्रशंसक छलहुँ। एम्हर अहाँक लिखल - कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक देखलहुँ। मोन आह्लादित भऽ उठल। कोनो रचना तरा-उपरी। २९.श्रीमती रमा झा-सम्पादक मिथिला दर्पण। कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक प्रिंट फॉर्म पढ़ि आ एकर गुणवत्ता देखि मोन प्रसन्न भऽ गेल, अद्भुत शब्द एकरा लेल प्रयुक्त कऽ रहल छी। विदेहक उत्तरोत्तर प्रगतिक शुभकामना। ३०.श्री नरेन्द्र झा, पटना- विदेह नियमित देखैत रहैत छी। मैथिली लेल अद्भुत काज कऽ रहल छी। ३१.श्री रामलोचन ठाकुर- कोलकाता- मिथिलाक्षर विदेह देखि मोन प्रसन्नतासँ भरि उठल, अंकक विशाल परिदृश्य आस्वस्तकारी अछि। ३२.श्री तारानन्द वियोगी- विदेह आ कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक देखि चकबिदोर लागि गेल। आश्चर्य। शुभकामना आ बधाई। ३३.श्रीमती प्रेमलता मिश्र “प्रेम”- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़लहुँ। सभ रचना उच्चकोटिक लागल। बधाई। ३४.श्री कीर्तिनारायण मिश्र- बेगूसराय- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक बड्ड नीक लागल, आगांक सभ काज लेल बधाई। ३५.श्री महाप्रकाश-सहरसा- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक नीक लागल, विशालकाय संगहि उत्तमकोटिक। ३६.श्री अग्निपुष्प- मिथिलाक्षर आ देवाक्षर विदेह पढ़ल..ई प्रथम तँ अछि एकरा प्रशंसामे मुदा हम एकरा दुस्साहसिक कहब। मिथिला चित्रकलाक स्तम्भकेँ मुदा अगिला अंकमे आर विस्तृत बनाऊ। ३७.श्री मंजर सुलेमान-दरभंगा- विदेहक जतेक प्रशंसा कएल जाए कम होएत। सभ चीज उत्तम। ३८.श्रीमती प्रोफेसर वीणा ठाकुर- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक उत्तम, पठनीय, विचारनीय। जे क्यो देखैत छथि पोथी प्राप्त करबाक उपाय पुछैत छथि। शुभकामना। ३९.श्री छत्रानन्द सिंह झा- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़लहुँ, बड्ड नीक सभ तरहेँ। ४०.श्री ताराकान्त झा- सम्पादक मैथिली दैनिक मिथिला समाद- विदेह तँ कन्टेन्ट प्रोवाइडरक काज कऽ रहल अछि। कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक अद्भुत लागल। ४१.डॉ रवीन्द्र कुमार चौधरी- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक बहुत नीक, बहुत मेहनतिक परिणाम। बधाई। ४२.श्री अमरनाथ- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक आ विदेह दुनू स्मरणीय घटना अछि, मैथिली साहित्य मध्य। ४३.श्री पंचानन मिश्र- विदेहक वैविध्य आ निरन्तरता प्रभावित करैत अछि, शुभकामना। ४४.श्री केदार कानन- कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक लेल अनेक धन्यवाद, शुभकामना आ बधाइ स्वीकार करी। आ नचिकेताक भूमिका पढ़लहुँ। शुरूमे तँ लागल जेना कोनो उपन्यास अहाँ द्वारा सृजित भेल अछि मुदा पोथी उनटौला पर ज्ञात भेल जे एहिमे तँ सभ विधा समाहित अछि। ४५.श्री धनाकर ठाकुर- अहाँ नीक काज कऽ रहल छी। फोटो गैलरीमे चित्र एहि शताब्दीक जन्मतिथिक अनुसार रहैत तऽ नीक। ४६.श्री आशीष झा- अहाँक पुस्तकक संबंधमे एतबा लिखबा सँ अपना कए नहि रोकि सकलहुँ जे ई किताब मात्र किताब नहि थीक, ई एकटा उम्मीद छी जे मैथिली अहाँ सन पुत्रक सेवा सँ निरंतर समृद्ध होइत चिरजीवन कए प्राप्त करत। ४७.श्री शम्भु कुमार सिंह- विदेहक तत्परता आ क्रियाशीलता देखि आह्लादित भऽ रहल छी। निश्चितरूपेण कहल जा सकैछ जे समकालीन मैथिली पत्रिकाक इतिहासमे विदेहक नाम स्वर्णाक्षरमे लिखल जाएत। ओहि कुरुक्षेत्रक घटना सभ तँ अठारहे दिनमे खतम भऽ गेल रहए मुदा अहाँक कुरुक्षेत्रम् तँ अशेष अछि। ४८.डॉ. अजीत मिश्र- अपनेक प्रयासक कतबो प्रश‍ंसा कएल जाए कमे होएतैक। मैथिली साहित्यमे अहाँ द्वारा कएल गेल काज युग-युगान्तर धरि पूजनीय रहत। ४९.श्री बीरेन्द्र मल्लिक- अहाँक कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक आ विदेह:सदेह पढ़ि अति प्रसन्नता भेल। अहाँक स्वास्थ्य ठीक रहए आ उत्साह बनल रहए से कामना। ५०.श्री कुमार राधारमण- अहाँक दिशा-निर्देशमे विदेह पहिल मैथिली ई-जर्नल देखि अति प्रसन्नता भेल। हमर शुभकामना। ५१.श्री फूलचन्द्र झा प्रवीण-विदेह:सदेह पढ़ने रही मुदा कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक देखि बढ़ाई देबा लेल बाध्य भऽ गेलहुँ। आब विश्वास भऽ गेल जे मैथिली नहि मरत। अशेष शुभकामना। ५२.श्री विभूति आनन्द- विदेह:सदेह देखि, ओकर विस्तार देखि अति प्रसन्नता भेल। ५३.श्री मानेश्वर मनुज-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक एकर भव्यता देखि अति प्रसन्नता भेल, एतेक विशाल ग्रन्थ मैथिलीमे आइ धरि नहि देखने रही। एहिना भविष्यमे काज करैत रही, शुभकामना। ५४.श्री विद्यानन्द झा- आइ.आइ.एम.कोलकाता- कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक विस्तार, छपाईक संग गुणवत्ता देखि अति प्रसन्नता भेल। अहाँक अनेक धन्यवाद; कतेक बरखसँ हम नेयारैत छलहुँ जे सभ पैघ शहरमे मैथिली लाइब्रेरीक स्थापना होअए, अहाँ ओकरा वेबपर कऽ रहल छी, अनेक धन्यवाद। ५५.श्री अरविन्द ठाकुर-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक मैथिली साहित्यमे कएल गेल एहि तरहक पहिल प्रयोग अछि, शुभकामना। ५६.श्री कुमार पवन-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक पढ़ि रहल छी। किछु लघुकथा पढ़ल अछि, बहुत मार्मिक छल। ५७. श्री प्रदीप बिहारी-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक देखल, बधाई। ५८.डॉ मणिकान्त ठाकुर-कैलिफोर्निया- अपन विलक्षण नियमित सेवासँ हमरा लोकनिक हृदयमे विदेह सदेह भऽ गेल अछि। ५९.श्री धीरेन्द्र प्रेमर्षि- अहाँक समस्त प्रयास सराहनीय। दुख होइत अछि जखन अहाँक प्रयासमे अपेक्षित सहयोग नहि कऽ पबैत छी। ६०.श्री देवशंकर नवीन- विदेहक निरन्तरता आ विशाल स्वरूप- विशाल पाठक वर्ग, एकरा ऐतिहासिक बनबैत अछि। ६१.श्री मोहन भारद्वाज- अहाँक समस्त कार्य देखल, बहुत नीक। एखन किछु परेशानीमे छी, मुदा शीघ्र सहयोग देब। ६२.श्री फजलुर रहमान हाशमी-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक मे एतेक मेहनतक लेल अहाँ साधुवादक अधिकारी छी। ६३.श्री लक्ष्मण झा "सागर"- मैथिलीमे चमत्कारिक रूपेँ अहाँक प्रवेश आह्लादकारी अछि।..अहाँकेँ एखन आर..दूर..बहुत दूरधरि जेबाक अछि। स्वस्थ आ प्रसन्न रही। ६४.श्री जगदीश प्रसाद मंडल-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक पढ़लहुँ । कथा सभ आ उपन्यास सहस्रबाढ़नि पूर्णरूपेँ पढ़ि गेल छी। गाम-घरक भौगोलिक विवरणक जे सूक्ष्म वर्णन सहस्रबाढ़निमे अछि, से चकित कएलक, एहि संग्रहक कथा-उपन्यास मैथिली लेखनमे विविधता अनलक अछि। समालोचना शास्त्रमे अहाँक दृष्टि वैयक्तिक नहि वरन् सामाजिक आ कल्याणकारी अछि, से प्रशंसनीय। ६५.श्री अशोक झा-अध्यक्ष मिथिला विकास परिषद- कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक लेल बधाई आ आगाँ लेल शुभकामना। ६६.श्री ठाकुर प्रसाद मुर्मु- अद्भुत प्रयास। धन्यवादक संग प्रार्थना जे अपन माटि-पानिकेँ ध्यानमे राखि अंकक समायोजन कएल जाए। नव अंक धरि प्रयास सराहनीय। विदेहकेँ बहुत-बहुत धन्यवाद जे एहेन सुन्दर-सुन्दर सचार (आलेख) लगा रहल छथि। सभटा ग्रहणीय- पठनीय। ६७.बुद्धिनाथ मिश्र- प्रिय गजेन्द्र जी,अहाँक सम्पादन मे प्रकाशित ‘विदेह’आ ‘कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक’ विलक्षण पत्रिका आ विलक्षण पोथी! की नहि अछि अहाँक सम्पादनमे? एहि प्रयत्न सँ मैथिली क विकास होयत,निस्संदेह। ६८.श्री बृखेश चन्द्र लाल- गजेन्द्रजी, अपनेक पुस्तक कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक पढ़ि मोन गदगद भय गेल , हृदयसँ अनुगृहित छी । हार्दिक शुभकामना । ६९.श्री परमेश्वर कापड़ि - श्री गजेन्द्र जी । कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक पढ़ि गदगद आ नेहाल भेलहुँ। ७०.श्री रवीन्द्रनाथ ठाकुर- विदेह पढ़ैत रहैत छी। धीरेन्द्र प्रेमर्षिक मैथिली गजलपर आलेख पढ़लहुँ। मैथिली गजल कत्तऽ सँ कत्तऽ चलि गेलैक आ ओ अपन आलेखमे मात्र अपन जानल-पहिचानल लोकक चर्च कएने छथि। जेना मैथिलीमे मठक परम्परा रहल अछि। (स्पष्टीकरण- श्रीमान्, प्रेमर्षि जी ओहि आलेखमे ई स्पष्ट लिखने छथि जे किनको नाम जे छुटि गेल छन्हि तँ से मात्र आलेखक लेखकक जानकारी नहि रहबाक द्वारे, एहिमे आन कोनो कारण नहि देखल जाय। अहाँसँ एहि विषयपर विस्तृत आलेख सादर आमंत्रित अछि।-सम्पादक) ७१.श्री मंत्रेश्वर झा- विदेह पढ़ल आ संगहि अहाँक मैगनम ओपस कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक सेहो, अति उत्तम। मैथिलीक लेल कएल जा रहल अहाँक समस्त कार्य अतुलनीय अछि। ७२. श्री हरेकृष्ण झा- कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक मैथिलीमे अपन तरहक एकमात्र ग्रन्थ अछि, एहिमे लेखकक समग्र दृष्टि आ रचना कौशल देखबामे आएल जे लेखकक फील्डवर्कसँ जुड़ल रहबाक कारणसँ अछि। ७३.श्री सुकान्त सोम- कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक मे  समाजक इतिहास आ वर्तमानसँ अहाँक जुड़ाव बड्ड नीक लागल, अहाँ एहि क्षेत्रमे आर आगाँ काज करब से आशा अछि। ७४.प्रोफेसर मदन मिश्र- कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक सन किताब मैथिलीमे पहिले अछि आ एतेक विशाल संग्रहपर शोध कएल जा सकैत अछि। भविष्यक लेल शुभकामना। ७५.प्रोफेसर कमला चौधरी- मैथिलीमे कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक सन पोथी आबए जे गुण आ रूप दुनूमे निस्सन होअए, से बहुत दिनसँ आकांक्षा छल, ओ आब जा कऽ पूर्ण भेल। पोथी एक हाथसँ दोसर हाथ घुमि रहल अछि, एहिना आगाँ सेहो अहाँसँ आशा अछि। ७६.श्री उदय चन्द्र झा "विनोद": गजेन्द्रजी, अहाँ जतेक काज कएलहुँ अछि से मैथिलीमे आइ धरि कियो नहि कएने छल। शुभकामना। अहाँकेँ एखन बहुत काज आर करबाक अछि। ७७.श्री कृष्ण कुमार कश्यप: गजेन्द्र ठाकुरजी, अहाँसँ भेँट एकटा स्मरणीय क्षण बनि गेल। अहाँ जतेक काज एहि बएसमे कऽ गेल छी ताहिसँ हजार गुणा आर बेशीक आशा अछि। ७८.श्री मणिकान्त दास: अहाँक मैथिलीक कार्यक प्रशंसा लेल शब्द नहि भेटैत अछि। अहाँक कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक सम्पूर्ण रूपेँ पढ़ि गेलहुँ। त्वञ्चाहञ्च बड्ड नीक लागल। ७९. श्री हीरेन्द्र कुमार झा- विदेह ई-पत्रिकाक सभ अंक ई-पत्रसँ भेटैत रहैत अछि। मैथिलीक ई-पत्रिका छैक एहि बातक गर्व होइत अछि। अहाँ आ अहाँक सभ सहयोगीकेँ हार्दिक शुभकामना। विदेह मैथिली साहित्य आन्दोलन (c)२००४-१२. सर्वाधिकार लेखकाधीन आ जतए लेखकक नाम नहि अछि ततए संपादकाधीन। विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। सह-सम्पादक: उमेश मंडल। सहायक सम्पादक: शिव कुमार झा आ मुन्नाजी (मनोज कुमार कर्ण)। भाषा-सम्पादन: नागेन्द्र कुमार झा आ पञ्जीकार विद्यानन्द झा। कला-सम्पादन: ज्योति झा चौधरी आ रश्मि रेखा सिन्हा। सम्पादक-शोध-अन्वेषण: डॉ. जया वर्मा आ डॉ. राजीव कुमार वर्मा। सम्पादक- नाटक-रंगमंच-चलचित्र- बेचन ठाकुर। सम्पादक- सूचना-सम्पर्क-समाद- पूनम मंडल आ प्रियंका झा। सम्पादक- अनुवाद विभाग- विनीत उत्पल। रचनाकार अपन मौलिक आ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि) ggajendra@videha.com केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx, .rtf वा .txt फॉर्मेटमे पठा सकैत छथि। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेताह, से आशा करैत छी। रचनाक अंतमे टाइप रहय, जे ई रचना मौलिक अछि, आ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। मेल प्राप्त होयबाक बाद यथासंभव शीघ्र ( सात दिनक भीतर) एकर प्रकाशनक अंकक सूचना देल जायत। ’विदेह' प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका अछि आ एहिमे मैथिली, संस्कृत आ अंग्रेजीमे मिथिला आ मैथिलीसँ संबंधित रचना प्रकाशित कएल जाइत अछि। एहि ई पत्रिकाकेँ श्रीमति लक्ष्मी ठाकुर द्वारा मासक ०१ आ १५ तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि। (c) 2004-12 सर्वाधिकार सुरक्षित। विदेहमे प्रकाशित सभटा रचना आ आर्काइवक सर्वाधिकार रचनाकार आ संग्रहकर्त्ताक लगमे छन्हि। रचनाक अनुवाद आ पुनः प्रकाशन किंवा आर्काइवक उपयोगक अधिकार किनबाक हेतु ggajendra@videha.com पर संपर्क करू। एहि साइटकेँ प्रीति झा ठाकुर, मधूलिका चौधरी आ रश्मि प्रिया द्वारा डिजाइन कएल गेल। सिद्धिरस्तु वि दे ह विदेह Videha বিদেহ  www.videha.co.in www.videha.com विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका Videha Ist Maithili Fortnightly ejournal  विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई 'विदेह' ११६ म अंक १५ अक्टूबर २०१२ (वर्ष ५ मास ५८ अंक ११६) मानुषीमिह संस्कृताम् ISSN 2229-547X VIDEHA

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