VIDEHA — Issue 117 / अंक ११७

Publication: VIDEHA · Issue: 117
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168 ISSN 2229-547X VIDEHA 'विदेह' ११७ म अंक ०१ नवम्बर २०१२ (वर्ष ५ मास ५९ अंक ११७) ऐ अंकमे अछि:- १. संपादकीय संदेश २. गद्य २.१.रामभरोस कापडि भ्रमर-यात्रा प्रसंग- ह्वेन सांगसं चीनमे भेंटघांट २.२.जगदीश प्रसाद मण्‍डल-पाँचटा वि‍हनि‍ कथा २.३.नागेन्द्रकुमार कर्ण-सुजित कुमार झा पर २.४.खुशबू झा-रुपाली २.५.डॉ. कैलाश कुमार मि‍श्र- मेवाड़ आ मालवाक सांझी लोककला : एक परि‍चय २.६.गजेन्द्र ठाकुर- विद्यापति: किछु प्रचलित कुप्रचारक निराकरण (भाग-३) २.७.जगदानन्द झा मनु- प्रेमक बलि ३. पद्य ३.१.जगदीश चन्द्र ठाकुर ‘अनिल’- की भेटल आ की हेरा गेल  (आत्म गीत)- (आगाँ) ३.२.जगदीश प्रसाद मण्‍डलक सातटा गीत ३.३.जगदानन्द झा मनु ३.४.राजदेव मण्‍डल जीक दू गोट कवि‍ता ३.५.जवाहर लाल कश्यप ३.६.१.कपि‍लेश्वर राउत२.ओम प्रकाश ३.७.१.शिवनाथ  यादव आ अर्चना  कुमारी २.हेम नारायण साहु ३.शिव कुमार यादव ३.८.१.अनिल मल्लिक २.अंशु माला पाण्डेय ३.शान्तिलक्ष्मी चौधरी ४.आशुतोष मिश्र गद्य-पद्य भारती:मन्त्रद्रष्टा ऋष्यश्रृङ्ग- हरिशंकर श्रीवास्तव “शलभ"- (हिन्दीसँ मैथिली अनुवाद विनीत उत्पल) भाषापाक रचना-लेखन -[मानक मैथिली], [विदेहक मैथिली-अंग्रेजी आ अंग्रेजी मैथिली कोष (इंटरनेटपर पहिल बेर सर्च-डिक्शनरी) एम.एस. एस.क्यू.एल. सर्वर आधारित -Based on ms-sql server Maithili-English and English-Maithili Dictionary.] विदेह मैथिली पोथी डाउनलोड साइट VIDEHA MAITHILI BOOKS FREE DOWNLOAD SITE विदेह ई-पत्रिकाक सभटा पुरान अंक ( ब्रेल, तिरहुता आ देवनागरी मे ) पी.डी.एफ. डाउनलोडक लेल नीचाँक लिंकपर उपलब्ध अछि। All the old issues of Videha e journal ( in Braille, Tirhuta and Devanagari versions ) are available for pdf download at the following link. विदेह ई-पत्रिकाक सभटा पुरान अंक ब्रेल, तिरहुता आ देवनागरी रूपमे Videha e journal's all old issues in Braille Tirhuta and Devanagari versions विदेह ई-पत्रिकाक पहिल ५० अंक

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Thank you for voting! श्रीमती ज्योति सुनीत चौधरीक “अर्चिस” (कविता संग्रह)  29.88% श्री विनीत उत्पलक “हम पुछैत छी” (कविता संग्रह)  5.39% श्रीमती कामिनीक “समयसँ सम्वाद करैत”, (कविता संग्रह)  4.15% श्री प्रवीण काश्यपक “विषदन्ती वरमाल कालक रति” (कविता संग्रह)  2.9% श्री आशीष अनचिन्हारक "अनचिन्हार आखर"(गजल संग्रह)  20.75% श्री अरुणाभ सौरभक “एतबे टा नहि” (कविता संग्रह)  4.98% श्री दिलीप कुमार झा "लूटन"क जगले रहबै (कविता संग्रह)  5.39% श्री आदि यायावरक “भोथर पेंसिलसँ लिखल” (कथा संग्रह)  4.15% श्री उमेश मण्डलक “निश्तुकी” (कविता संग्रह)  21.16% Other:  1.24% ऐ बेर अनुवाद पुरस्कार (२०१३) [साहित्य अकादेमी, दिल्ली]क लेल अहाँक नजरिमे के उपयुक्त छथि? Thank you for voting! Thank you for voting! श्री नरेश कुमार विकल "ययाति" (मराठी उपन्यास श्री विष्णु सखाराम खाण्डेकर)  33.88% श्री महेन्द्र नारायण राम "कार्मेलीन" (कोंकणी उपन्यास श्री दामोदर मावजो)  11.57% श्री देवेन्द्र झा "अनुभव"(बांग्ला उपन्यास श्री दिव्येन्दु पालित)  10.74% श्रीमती मेनका मल्लिक "देश आ अन्य कविता सभ" (नेपालीक अनुवाद मूल- रेमिका थापा)  20.66% श्री कृष्ण कुमार कश्यप आ श्रीमती शशिबाला- मैथिली गीतगोविन्द ( जयदेव संस्कृत)  12.4% श्री रामनारायण सिंह "मलाहिन" (श्री तकषी शिवशंकर पिल्लैक मलयाली उपन्यास)  9.92% Other:  1% फेलो पुरस्कार-समग्र योगदान २०१२-१३ : समानान्तर साहित्य अकादेमी, दिल्ली Thank you for voting! श्री राजनन्दन लाल दास  46.43% श्री डॉ. अमरेन्द्र  33.93% श्री चन्द्रभानु सिंह  17.86% Other:  2% 1.संपादकीय १ जगदीश प्रसाद मण्डल- एकटा बायोग्राफी...(जारी...) कपि‍लेश्वर राउतक ऐठामक घटना (बाबाक सराध) गामसँ बाहर धरि‍ जना आगि‍क लुत्ती भऽ गेल। ऐ घटनासँ छोट-पैघ अनेको घटना जन्‍म लेलक दूटा घटना ओइमे महत्वपूर्ण रहल, पहि‍ल रामावतार राउतक संग जे भेल आ दोसर बि‍‍देसर ठाकुरक संग जे भेल। दुनू गोटेक योगदानो नीक रहलनि‍। मधेपुर ब्‍लौक थानाक संग-संग वि‍धान सभा क्षेत्र सेहो छल। आब नै अछि‍। ओइ समए अट्ठाइस पंचायतक ब्‍लौको आ थानो छल, तँए राजनीति‍क अड्डा सेहो रहल। कोसी-कमलाक बीच बसल ब्‍लौक अछि‍। तँए दुनूक (पूबमे कोसी, पछि‍ममे कमला) बीच जते छोटका बड़का, मुइलहा-जीतहा धार अछि‍ सभ मधेपुर ब्‍लौक होइत गुजरि‍ते अछि‍। एक दि‍स काेसी कटनि‍या कऽ बालुसँ बलुऔने अछि‍ तँ दोसर दि‍स कमलो। कि‍म्‍हरो बालु अछि‍ तँ कि‍म्‍हरो मोनि‍-मान सेहो अछि‍। देशक आजादीक लड़ाइमे मधेपुर ब्‍लौकक योगदान बि‍हारक कोनो ब्‍लौकसँ कम नै रहल अछि‍। जय प्रकाश बाबू, सुरज बाबू आ लखन जीक (डाॅक्‍टर लक्ष्‍मण झा) आवाजाही बेसी रहलनि‍, जइसँ अधि‍कांश गाममे स्‍थानीय नेतृत्‍व सेहो उभरल, अंचल स्तरपर सेहो उभरल। मधेपुर ब्‍लौकक उत्तरी छोरपर बेरमा पंचायत अछि‍ जे झंझारपुर आ फुलपराससँ लागल अछि‍। जहि‍ना उत्तरी छोरपर बेरमा पंचायत अछि‍ तहि‍ना पूर्बी छोरपर मैटरस पंचायत अछि‍। मैटरस पंचायतक जानल-मानल परि‍वार रामावतार राउतक छलनि‍। सम्‍पति‍शाली रहथि‍ मुदा कोसीमे गामे तहस-नहस भऽ गेल। कोसीक पछबरि‍या बान्‍हक भीतर पंचायत पड़ैत अछि‍। गामे होइत धार सेहो बहै छै। १९४७ ई.क आजादीक पछाति‍ क्षेत्रक जे सम्‍पति‍शाली लोक सभ छलाह वएह सभ गामक मुखि‍यो आ मुँह-पुरुखो छलाह। वर्गीय आधारपर राजनीति‍क पार्टी (कांग्रेस) ठाढ़ छल। तँए जत्ते गुदगर लोक छलाह, सबहक भितरि‍या संबंध सेहो छलनि‍। भितरि‍या संबंधक माने ई जे हुनका सबहक बीच जातीय बंधन कमजोर छलनि‍। ऐठाम एकटा वि‍चारणीय प्रश्न अछि‍ जे हुनका सभकेँ अपनामे माने एक-दोसर परि‍वारक बीच लेन-देन, खान-पीन, मदति‍-सहायता सभ कि‍छु छलनि‍ मुदा जाति‍क बीच राजनीति‍क वि‍भाजन सेहो पनपि‍ गेल छल, जेकर बल राजनीति‍क पार्टी सभकेँ भेटैत छल। लत्ती जकाँ ओ परि‍वार माने सुभ्‍यस्‍त परि‍वार सभ सजल छलाह। बेरमाक रामावतार राउत जे तहि‍या मैट्रीक पास नव युवक छलाह, भारतीय कम्‍युनि‍स्ट पार्टीक वफादार कार्यकर्त्ता रहथि। भा.क.पा.मे एक टर्म (तीन वर्ष) जि‍ला परि‍षद सेहो रहलाह। जहि‍ना कपि‍लेश्वर राउत तीन भाँइ, कपि‍लेश्वर, जागेश्वर आ लखन राउत तहि‍ना रामावतार राउत सेहो तीन भाँइ, सीताराम, रामावतार आ राम प्रसाद राउत‍। दू भाँइ रामावतारक बि‍आह मैटरसे भेल। ओना बरइ जाति‍ सभ गाममे नहि‍ये अछि‍ मुदा कि‍छु गाम सघन आबादीबला तँ अछि‍ये। जेहने सघन आबादीबला गाम मैटरस तेहने बेरमाे अछि‍, सए घरक लगभग अखनो अछि‍। मुदा दुनू गामक बीच एकटा दूरी सेहो अछि‍। जहि‍ना मैटरसमे एक परि‍वारक वर्चस्‍व, जइसँ सामंती सूत्र अधि‍क मजगूत, मुदा बेरमामे से नै अछि‍। कम आँट-पेटक (नि‍म्न-मध्‍यम) परि‍वार सभ, तँए वि‍चारोमे दूरी अछि‍ये। तहूमे कम्‍युनिस्ट पार्टी कोनो-ने-कोनो रूपमे १९६२ ई.सँ रहल। ओना ओइसँ पूर्वेसँ केस-फौदारी गाममे पकड़ि‍ लेने छल। मालि‍क सभ (जमीन्‍दार) सँ लड़ाइ चलि‍ रहल छल। चाहे ओ बलदेव बाबू (बलदेव झा, सरि‍सव पाही) होथि‍ आकि‍ लक्ष्‍मीकान्‍त, रमाकान्‍त साहु, झंझारपुर होथि‍। आन्‍दोलनक रूपमे तँ नै मुदा व्‍यक्‍ति‍गत रूपमे तँ छलैहे, जइसँ कि‍छु बजनि‍हार तँ छलाहे। राजनीति‍क आधारपर १९६२ ई.सँ मुकदमा उठल जे कि‍छुए दि‍नक पछाति‍ मरि‍ गेल। सभकेँ (पार्टीबला) अगि‍लगी केसमे फँसा सजा करबा देलकनि‍। मैटरसक मुखि‍या रामावतार राउत बेरमाक रामावतार राउतपर आक्रमण केलक। आक्रमण ई भेल जे दुनू भाँइ सीताराम राउत आ रामावतार राउतक बि‍आह मैटरसे भेल। सीताराम राउतक ससुर साधारणे परि‍वारक आ रामावतार राउतक ससुर (बेटाक अभावमे) बबाजि‍ये। दुनू गोटेकेँ मैटरसक रामावतार सामंती चाप दऽ कऽ दुनूकेँ बेटी आपस अनैले कहलखि‍न। दुनू मजबूर भऽ गेलाह। रामावतारक ससुर तँ कहि‍ देलखि‍न जे तोरा सबहक गाम छि‍अह, जे मन-फुरह से करह, हम जाइ छि‍अ। घुमन्‍तू बबाजी भऽ गेलाह। अपन दल-बलक संग रामावतार राउत बेरमा एलाह। बेरमाक प्रमुख अपन दल-बलक संग तैयारे रहथि‍न। जाति‍क बीच वि‍भाजनक मजगूत बान्‍ह (खेनाइ-पिनाइ बन्न) पड़ि‍ये गेल रहै। वि‍षम स्‍थि‍ति‍ बनि‍ गेल। वि‍षम ई जे जाति‍-सम्‍प्रदाय एते सक्कत बनल छल जेकरा तोड़ब धि‍या-पुताक खेल नै। जँ रोकल जाए तँ केना? जखने लड़ाइ उठत आकि‍ जाति‍क मुद्दा बनि‍ जाएत। घटनाक समए करीब बारह बजे रामावतार राउत बेरमा पहुँचल। वि‍न्‍घ्‍यनाथ ठाकुर पहि‍नेसँ मुसताइज। टोलबैये (गामक बड़ै टोल) अगि‍ला वाहन, बेरमाक रामावतार राउतक घरक चारूकात मर्द-औरत थहाथही करैत। रामावतारक पि‍ता सुबध राउत दुनू परानीक संग तीनू बेटाक बीच दरबज्‍जापर बैसि‍ नौताएल छागर जकाँ मरैले पुस्‍तैनी घराड़ीपर पीठ अोरि‍ देने रहथि‍। एक-दोसरक सभ मुँह तकैत, मन कहैत माए तूँ कते काल, बाबू तूँ कते काल, बेटा तूँ कते काल, बौआ तँू कते काल। दुनू दि‍यादि‍नी (रामावतारक पत्नीयो आ भौजाइयो) भनसा घरक ओसारक खूटा लगा बैसि‍ कनैत रहथि‍। दुनू दि‍यादि‍नीकेँ कहल गेलनि‍- “अपना गहना-गुरि‍या जे अछि‍ से लऽ लि‍अ।” मुदा दुनू दि‍यादि‍नी कि‍छु नै बजलीह। दुनूक बाँहि‍ पकड़ि‍ टोलक स्‍त्रीगण आंगनसँ नि‍कालि अरि‍याइत कऽ सीमा टपा देलनि‍। ऐ संग दोसर घटना-रामावतारकेँ करीब चारि‍ बीघा जमीन छलनि, जइमे जमीन्‍दारीक घुरछीक चलैत अस्‍सी प्रति‍शत जमीनपर मुकदमा ठाढ़ कएल गेल। कोर्टक सभ बेवस्‍थाक भार आने-आन लऽ लेलखि‍न। मुदा जमीनक सबूतो होइ छै आ दखलो होइ छै। दखलबलाकेँ एते लाभ होइ छै जे उपजबैक मौका भेटै छै। सबूतक वि‍वाद कोर्टमे उठल। मुदा समाजक तागत मजगूत। तँए दखल रामावतारेक रहल। पछाति‍ सबूतो कोर्टसँ भइये गेल। करीब देढ़-दू बर्खक पछाति‍ रामावतार राउत (मैटरसबला) समझौता केलनि। समझौताक मुख्‍य कारक भेल जे सुबध राउत डटि‍ गेलाह जे पहि‍ने ओ अपना बेटीक बि‍आह करए तखन देखा देब‍ै, देखा देबैक अर्थ भेल जे जाति‍ तोड़ि‍ आन जाति‍मे कुटुमैती शुरू कऽ देब। होतसँ होतांग होइत देखि‍ सभ सहमलाह। तेकर एकटा कारण ईहो भेल जे कते दि‍न लाठी उठि‍ चुकल छल। शक्‍ति‍ परीक्षण भऽ चुकल छल। मुदा असल परीक्षण भेल जइ दि‍न इन्‍दि‍रा गाँधी शही‍द भेलीह ऐ घटनाक पछाति‍। समझौताक पछाति‍ दुनू लड़की आपस तँ एलीह मुदा मानसि‍क रोगसँ पीड़ि‍त भऽ गेलीह। एक सन्‍तानक पछाति‍ जेठकी, सीतारामक पत्नी आ दू सन्‍तानक पछाति‍ मझि‍ली (रामावतारक पत्नी), मरि‍ गेलखि‍न। दुनू बहि‍नि‍येँ। पछाति‍ दुनू भाँइक बि‍आह भेल जे परि‍वार अखन चलि‍ रहल अछि‍। दुर्गा पूजासँ होइत कपि‍लेश्वरक घटनामे बि‍‍देसर ठाकुरक नीक योगदान रहल। बोनि‍हार परि‍वार रहि‍तो बि‍‍देसर ठाकुरकेँ बात पकड़ैक ढंग आ दोसरकेँ बुझै-बुझबैक ढंग नीक छलै। परि‍वार बड़ नमहर नै मुदा छोटो नै। संयुक्‍त परि‍वार टुटैक पैघ कारण गरीबी सेहो होइत अछि‍। समाजमे एहेन परि‍वारक कमी नै जे कहता- “ई सएओ घरक टोल फल्‍लेँक वंश छि‍अनि‍।” मुदा अखन तते केसा-केसी भऽ गेल अछि‍ जे सम्‍पति‍ तँ गेबे केलनि‍ जे एक्कोटा-समांगो एहेन नै बँचलाह जे जहल जा खनदानक मर्यादा नै तोड़लनि‍। तीन पीढ़ी ऊपरसँ बि‍‍देसर ठाकुरक एक पुरखि‍याह परि‍वार तँए पुस्‍तैनी खेतो आ जजमनि‍कोमे काट-खोंट नै भेल, पोता धरि‍ सेहो सएह भेल अछि‍। एकटा बेटा आ चारि‍टा बेटी बि‍‍देसर ठाकुरकेँ। अपन आठ कट्ठा खेत, जइमे तीन कट्ठा धनहर, डेढ़-दू कट्ठा घराड़ी-महार बड़की पोखरि‍क ढि‍मका, बाकी गाछी-वि‍रछी। दस कट्ठा बटाइयो धनहर करैत। गामक जजमनि‍कामे करीब चौथाइ गाम। जेकर कमाइलक (साली) तरीका सेहो रंग-रंगक। मुदा ओहन गि‍रहस्‍त (दाढ़ी-केश कटबैबला) बेसी जे समैपर अगहनमे कमाइल दऽ दइ छथि‍न। दाढ़ी-केश मि‍ला कऽ एक पूर्ण आदमीक कमाइल एक धारा माने १२ सेर कच्‍ची, जे करीब सात कि‍लोक लगभग होइए आ आधा कमाइल एकटा केशक होइए‍। अही जि‍नगीमे चारू बेटि‍यो-जमाए, नाइतो-नाति‍न देखलनि, तहि‍ना बेटो-पुतोहु आ पोतो-पोती देखलनि। बि‍‍देसर ठाकुर संग एक बेर जगदीश प्रसाद मण्डल मधुबनीक चकि‍या जहलमे रहथि आरो करीब दस आदमी। बि‍‍देसर ठाकुर कातमे जा कऽ गाँजा पीबैत रहथि। थानाक जमेदार देख लेलक। पकड़ने आबि‍ डंडा-बेड़ी कऽ देलकनि। एहेन परि‍स्‍थि‍ति‍मे की कएल जाए। खएर जे होउ, पछि‍मी मधुबनीक एकटा साथी सेहो रहथिन, मुँहगर-कन्‍हगर। राति‍मे खेला-पीला पछाति‍ सांस्‍कृति‍क कार्यक्रम एक-डेढ़ घंटा करै छला। डंडा-बेड़ी नेने बि‍‍देसर ठाकुर सेहो अपने बनाओल गीत- “हमरा सन के अछि‍ बुरि‍बलेल/ बाले-बच्‍चे महींस पोसलौं/ प्रमुख-नथुनी सि‍ंह दरोगा खुटापर आबि‍ खोलि‍ लेल। हमरा सन...? जखने जेलक अन्‍दर एलौं/ पीपरक गाछ तर गांजा लटेलौं/ जेलर आबि‍ डंडा-बेरी‍ ठोकि‍ देल/ हमरा सन...? घामे-पसि‍ने खेती केलौं/ तुलसी-फूल ओ कनकजीर/ खोहे तरसँ सरुप सि‍ंह डेढ़ि‍यामे तोल लेल/ हमरा सन...?, विद्यापतिकेँ पहिनहिये छीनि लेल/ हमरा सन...?” गाबि‍ अपन वृतान्‍त सुनौलनि‍। पछमी मधुबनीबला साथी काफी प्रभावि‍त भेला। अपना लग बजा अपनो जि‍नगीक बात आ बि‍देश्वरो ठाकुरक बात सुनौलकनि‍/सुनलनि‍। भि‍नसरे जमेदारकेँ कहि‍ डंडा-बेड़ी हटबैत कवि‍ घोषि‍त कऽ देलकनि‍। जेलक स्‍टाफ सभ कवि‍ जी कहए लगलनि‍। मुदा जहलक भीतरेमे, बाहर नै। मनचोभि‍या नाचक नीक कलाकारमे बि‍‍देसर ठाकुर। अपन एहेन गुण जे फि‍ल्‍मो गीत आ सामाजि‍क गीतमे दू-चारि‍-पाँति‍ ओही तर्जपर गाबि‍ लै छलाह। मृत्‍यु दुखद भेलनि‍। आम तोड़ै काल गाछपरसँ खसि‍ पड़लाह जइमे डाँड़क हड्डी थकुचा गेलनि‍। ओना इलाज-बात जरूर भेलनि‍ मुदा कोनो कि‍ गट्टा टुटब आकि‍ घुट्ठी टुटब छी जे बड़बढ़ि‍या-बड़ बेश? मुदा साल भरि‍ ओछाइन धेला पछाति‍ उठि‍ कऽ ठाढ़ भेलाह। चौकपर सैलून शुरू केलनि‍। जइसँ पनरह-बीसक नगदो आ जजमनि‍को काज सम्‍हारए लगलाह। सुति‍ कऽ जगदीश प्रसाद मण्डल उठले रहथि कि‍ सुनलनि, बि‍‍देसर ठाकुर मरि‍ गेला। साँझमे गप-सप भेले रहनि। तँए बि‍सवासे ने होनि, मुदा एहेन गप झूठो तँ नहि‍ये होइत अछि‍। कि‍अए तँ गारि‍‍ओक सीमा जीवि‍ते धरि‍क अछि‍, मृत्‍यु तँ सराप छी।   बि‍‍देसर ठाकुरक घटना देखि‍ जगदीश प्रसाद मण्डलकेँ सजल-धजल सामंत आँखि‍क परदापर नाचए लगै छनि। कि‍छु परि‍वार (जाति‍-वि‍शेष नै सम्‍पदा वि‍शेष) केँ छोड़ि‍ अधि‍कांश परि‍वार अपन जि‍नगीक अनुसार काज-उदेम करि‍ते छनि‍, बि‍‍देसर ठाकुरक पत्नी महींसि‍क पर्ड़ू कीनि‍ बहनतू महींस बनौलनि‍। नीक पोस एकटा बड़द सेहो। थानाक दारोगा सि‍पाही-चौकीदारक संग, नथुनी सि‍ंह अपन लठैतक संग आ वि‍न्‍ध्‍यनाथ ठाकुर अपन दूत-भूतक संग बि‍‍देसर ठाकुर ऐठाम पहुँचल। रस्‍ता कातमे घर, थहाथही लोक करैत। तीनू गोटे नथुनी सि‍ंह, वि‍न्‍ध्‍यनाथ ठाकुर आ दरोगा कनफुसकी कऽ महींस खोलि‍ लेलकनि‍! खोलला पछाति‍ की हुअए। कोनो कि‍ घुमा कऽ देब अछि‍ आकि‍ अपन बनाएब अछि‍। दरोगाजी कि‍ कहि‍ लऽ जेताह? केतबो ढील कानून छै तैयो तँ कोर्टकेँ कागज चाहबे करी।‍ वि‍न्‍घ्‍यनाथ ठाकुरकेँ दमे नै अँटलनि‍। दुत-भूत मुड़ी डोला देलकनि‍। लंठोक शक्‍ति‍मे जाति‍क वि‍भाजन रहल अछि‍। होइत-हबाइत महींस नथुनी सि‍ंह अपना ऐठाम लऽ गेलाह। सभतूर बि‍‍देसर ठाकुर गाममे घूमि‍-घूमि‍ गौआँकेँ कहलकनि‍। मुदा एक लोर कानैक सि‍बा दोसर उपाइये की अछि‍। जखन बि‍‍देसर ठाकुर सबहक (करीब दस-बारह आदमी) बीच पहुँचलाह तखन जान दइले तैयार। लड़ाइयोक उत्‍साह होइ छै, जँ से नै तँ मनोरंजनक लेल लोक कि‍अए जान गमबैए। कि‍छु गोटे एहने, तँए एक रंगक वि‍चार उठल। एक पंचायत‍क समस्‍या दोसर पंचायत पहुँचि गेल तँए एक पंचायत‍क नै दू पंचायतक समस्‍या बनि‍ गेल। मुदा मूल तँ ओतए अछि‍ जे एकटा महींसक खाति‍र मनुष्‍यक जि‍नगी जाए। महींसक तँ बोन लगा सकैए मनुष्‍य, मुदा हजारो महींसि‍क बोन बुते एकटा मनुख ठाढ़ कएल हएत? तत्-काल वातावरणमे नरमी आएल। मुदा जहि‍ना हरदी जड़ि‍मे जहर सेहो फड़ैए, किएक तँ हरदी कहै छै हम बिखकट्टा छि‍औ। तहि‍ना कि‍छु दि‍नक पछाति‍ बि‍‍देसर ठाकुर सभकेँ बैसा बाजल- “जते लोक महींस खोललक ओइमे बेसी हमरे जजमान अछि‍, ओकरा सभकेँ केश-दाढ़ी काटब छोड़ि‍ देबै। हमर कमाइ जाएत, ओकरा बत्तू बना टहलेबै। मुदा कमाइयो केना जाएत? कमेबे ने करबै तँ कमाइ कथीक लेबै।” प्रश्न उठैत अछि‍ जदी कि‍यो अपन समस्‍याक समाधानक लेल ठाढ़ हुअए तँ कि‍ कएल जाए? सबहक बीचेमे बि‍देसर ठाकुर संकल्‍प लऽ लेलनि जे केश नै कटबै। केश नै कटैक बात जना अकासमे उड़ि‍या गेलै; बलजोरी करैक दम कि‍नको नै अँटलनि‍। इलाकाक स्‍थि‍ति‍ भि‍न्न-भि‍न्न तरहक, तँए भि‍न्न-भि‍न्न तरहक लड़ाइयो। जमीनक लड़ाइमे नागेन्‍द्रजी (डॉ. नागेन्द्र झा, पैटघाट) केँ थानामे टांगि‍ सैयो लाठीसँ देह चूरि‍ देने रहनि‍, जइसँ जि‍नगी भरि‍ हाथ-पएर टेढ़े रहलनि‍। कामेसर राम (फुलपरास) पच्‍चीस-तीस गोटेक संग तीन सालसँ जहलमे, जे सभ मडर केसमे फँसल। तहि‍ना राम प्रसाद सहनी (पचही) केँ ट्रकमे उनटा बान्‍हि‍ रोडपर घि‍सि‍औने रहनि‍। अखन धरि‍ जे कोनो मुकदमा भेल छल ओकर कोनो जबाब मुकदमासँ नै देल गेल छल, जे महींसक घटनासँ शुरू भेल। तीनू गोरे दरोगा, नथुनी सि‍ंह आ वि‍न्‍ध्‍यनाथ ठाकुरपर मुकदमा कएल गेल। ओना दर्जनो केश भऽ चुकल छल। थानाक एक पक्षीय बेवहार देखि‍ सभ ि‍नर्णए कऽ लेलनि जे ने थाना केस करए जेता आ ने कोनो केसक संबंधमे कहए जेता। जे हेतै से कोर्टेसँ हेतै। महींसक बरामदगी हाई कोर्टसँ भेल। वीरेन्‍द्र जी (माननीय न्‍यायमूर्ति, उच्‍च न्‍यायालय-पटना) काज केने रहथि‍न। बि‍देसर ठाकुरक केशकट्टी झंझटक पंचैतीमे प्रमुख जीक पंच बौकू ठाकुर (नौए) भेला। बि‍देसर ठाकुर अपन पंच अपने हेताह, दसटा समाज सुनि‍नि‍हार हेताह, प्रमुखोजी अपन सुनि‍नि‍हार रखथि‍, मुदा बजता दुनू पंचेटा, निर्णय भेल। पनचैतीक अजीव आकर्षण, आकर्षणक कारण भेल जे कते-बेर बि‍देसर ठाकुर असगरोमे पटका-पटकी कऽ लै छला। तइमे बि‍देसर बदनाम भऽ गेल छला। पनचैतीक दोसर आकर्षण छल बौकू ठाकुरक भाषा। “जि‍नगीक पहि‍ल दि‍न एहेन भाषासँ भेँट भेल।“, जगदीश प्रसाद मण्डल मोन पाड़ै छथि। एक तँ आलंकारि‍क शैली, तइ बीच एक पाँति‍ प्रमुख जीक पक्ष आ बि‍देसर ठाकुरक वि‍पक्षमे बाजि‍ जाथि‍ तँ दोसर पाँति‍ बि‍देसरक पक्षमे प्रमुख जीक वि‍पक्ष बाजि‍ जाथि‍। सुनि‍नि‍हार सभ भाषेक (शब्‍द-जाल) जालमे ओझरा जाथि। बि‍देसरो ठाकुरक समाज आ प्रमुखो जीक समाज बौकू ठाकुरक भाषेमे ओझरा जाथि। पनचैती कि‍ हएत जे घौंघाउजे भऽ जाए। पक्ष-वि‍पक्षक बीच जाधरि‍ समदर्शी बनि‍ सोलह (सोरह) आनापर कील नै गड़त ताधरि‍ ओकर सोर पताल दि‍स केना जाएत? जाधरि‍ सोरसँ सि‍र बनि‍ धरतीसँ अकास दि‍स नै उठत ताधरि‍ सोर पाबि‍-पाबि‍ सोरहा केना हएत। कते बेर पर-पनचैती बैसल मुदा ने समझौता टुटल आ ने झंझट फड़ि‍आएल। तइ बीच एहेन भेल जे सभ दि‍याद बि‍देसरो ठाकुर अपना समाज (नौआ समाज) मे बैसि‍ फेरसँ गि‍रहस्‍तक बँटबारा कऽ लेलनि। मुदा पनचैती पछुआएले रहल‍। बि‍नु डायरीक जि‍नगीमे तारीक-मड़कुमा घटना होइत अछि‍ दि‍न-महीना नै। तइ बीच लौकहीमे जि‍ला-सम्‍मेलन भेल। लौकही हाइ स्‍कूलपर सम्‍मेलनक आयोजन भेल रहै, लौकहा स्‍टेशनसँ सवारीक अभावमे कि‍छु गोटे छोड़ि‍ जगदीश प्रसाद मण्डल सभ पएरे गेल रहथि। सवारी अभावक कारण सड़क रहनि। एकटा जीप, तइमे के सभ जेताह। ऑफि‍सक कागजातक संग जि‍ला कार्यालय। तइ संग भोगेन्‍द्र जीक चारि‍ दि‍नक सम्‍मेलन भेलनि। नीक जुटान भेल छल। जि‍ला भरि‍क संगी, जि‍ला भरि‍क चालि‍-ढालि‍क संग जुटान। सम्‍मेलनक दोसर दि‍न दुनू गोटे प्रति‍नि‍धि‍, माने जगदीश प्रसाद मण्डल आ रामावतार संगे भोगेन्‍द्रजी सँ भेँट केलनि‍, ओ एकटा छोटे कोठरीमे असगरे सि‍मटि‍येपर बि‍छान बि‍छा चरि‍हत्‍थी गमछा ओढ़ने जगले पड़ल रहथि‍। दुनू गोटेकेँ पहुँचि‍ते उठि‍ कऽ बैसि पुछि‍ देलखि‍न- “की हाल-चाल गामघरक अछि‍?” भोगेन्‍द्रजीमे जबरदस गुण रहनि‍ जे कोनो बातकेँ जड़ि‍सँ पकड़ैत छलखि‍न। कपि‍लेश्वर ऐठामक सराधबला घटना भऽ चुकल छल, एक-हरफीमे रामावतार सुना देलकनि‍। मुदा हालेमे अपनो ओही काजसँ गुजरल रहथि‍, केस कटौले रहनि‍। काेनो तरहेँ समाज छानि‍-बान्‍हि‍ कऽ पार लगाैलकनि‍, तइसँ गुजरले रहथि‍। बि‍टि‍या-बि‍टि‍या सभ सवाल उठौलखि‍न। सवि‍स्‍तार घटनाक चर्च रामावतार कऽ देलखिन‍, गुम भऽ गेलाह। कि‍छु समए पछाति‍ गुम्‍मी तोड़ि‍ अपनो घटनाक चर्च केलनि‍। रामावतार नवका पुरहि‍त भेले रहथि‍, तँए भोगेन्‍द्रजी मानि‍ जाथि‍न। पुन: दोहरबैत रामावतार पुछलखिन‍- “कॉमरेड, हमरा ऐठामक केहेन भेल?” भोगेन्‍द्रजी जबाब देलखि‍न- “जहि‍ना सोझे नाक छुअब होइए आ घुमा कऽ छुअब सेहो होइए, तहि‍ना सूदखोरी, महाजनी सोझे छुअब भेल बाँकी जे भेल से घुमा कऽ छुअब भेल। तँए एकरा सामाजि‍क आर्थिक रूपमे देखि‍यौ। समाजक भीतर आर्थिक ढाँचा एहेन ठाढ़ अछि‍ जेकर समीकरण जरूरी भऽ गेल अछि‍। मुदा से के करत?” कहि‍ चुप भऽ गेलाह। तही बीच पूर्व वि‍धायक लाल बि‍हारी आबि‍ गेलाह। सम्‍मेलनक काज बूझि‍ दुनू गोटे बहरा गेला। जगदीश प्रसाद मण्डल  मधेपुर जि‍ला सम्‍मेलनक पछाति‍ जि‍ला नेतृत्‍वमे एला आ क्षेत्रमे समए देब शुरू केलनि। गामे-गाम ओझराएल, अपन-अपन मुद्दा अपन-अपन लड़ाइ। कतौ माछक कारोबार तँ कतौ मुँह-पुरखीक। जमीनक छुति‍यो ने कतौ, तहि‍ना महाजनि‍योक। जि‍ला सम्‍मेलनक कार्यक्रममे जे मुद्दा छै तइसँ भि‍न्न लड़ाइ छै। लक्ष्‍मीकान्‍त-रमाकान्‍त साहुक जमीनपर बटाइदारी शुरू भेल। अपनो बुझै छथि‍ आ बेरमाक लोक सेहो बुझैत अछि‍ जे अपने खेती करै छलाह आकि‍ बटेदार करैत छल। बटाइदारी शुरू होइते एकटा मुर्दघट्टी परतीपर आठ-दसटा सरधुआ पोखरि‍क घर जकाँ घर ठाढ़ कऽ जखन जगदीश प्रसाद मण्डल सभ खेत दि‍स बढ़ला आकि‍ अपना-अपना घरमे आगि‍ लगा, अट्ठाइस गोटेकेँ अगि‍लग्‍गी केसमे फँसा देलकनि। आठ-दसटा घर बनबैक कारण छलै केसकेँ सीरि‍यस बनबैले, मुद्दै-गबाह हएत। तइ बीच एकटा घटना घटल। कि‍सुन देव मण्‍डल चाहक दोकान करैत छलाह। ओहो पार्टीक जुझारू कार्यकर्त्ता। जगदीश प्रसाद मण्डल सबहक बैसारक अड्डा सेहो छलनि। जगदीश प्रसाद मण्डल सभ चारि‍-पाँच गोटे रहथि। पचाससँ ऊपर सदाए (मुसहर) सभ कोदारि‍-सहत लेने आबि‍ चाहक दोकानक आगूमे यत्र-कुत्र बाजए लगला। ठाढ़ भऽ कऽ जगदीश प्रसाद मण्डल सभ जबाब दि‍अए लगलखिन। सदाय सबहक हाथमे हथि‍यार, तइपर ताड़ी-दारू पीने‍, दोसराक कहलमे। तइ बीच गाम दि‍स हल्‍ला भऽ गेलै जे कि‍सुनदेव ऐठाम हसेरा-हसेरी भऽ गेलै। जे जत्तै रहए से तत्तैसँ लाठी नेने दौगल। टोल आ दोकानक बीचेमे मारि‍ फँसि‍ गेल। जबरदस मारि‍ भेल। कते गोटेकेँ कान-कपार फुटल। केस-फौदारी आ जहलक भय समाप्‍त भऽ गेल छलै। एकतीस दि‍नक भीतर अट्ठाइसो मुदालहक जमानत भऽ गेलै। जमानतक पछाति‍ जमीनक दखल दि‍हानी शुरू भेलै। गड़बड़ भऽ गेल रहै जे, जे असल बटेदार रहै ओ केस नै केलक आ जे बटेदार नै रहै ओ केस केलक। स्‍पष्‍ट रूपमे गाम दू भागमे बँटा गेल रहै। ओना ऊपरसँ दुइये पार्टी बूझि‍ पड़ै मुदा चोरनुकबा माने भीतरे-भीतर तेसरो पार्टी बनि‍ गेल रहै। तेसर ई रहै जे खूलि‍ कऽ सोझामे नै आबै मुदा दि‍न-राति‍ कनफुसकी पाछू लागल रहै। पहि‍लुके धक्कामे जमीनदार बूझि‍ गेल जे जमीन जेबे करत, बनि‍याँ रहबे करए, तरे-तर जमीन बेचब शुरू केलक। ओना जमीनसँ सम्‍बन्‍धि‍त कि‍छु पुरनो कानून छलै, कि‍छु नवको बनल जेना हदबंदी, आ कि‍छु नहि‍यो छलै। तीस-चालीस बर्ख पहि‍ने बकास्‍तक लड़ाइ भऽ चुकल छल। ओना बकास्‍तक लड़ाइ असानीसँ सम्‍पन्न भेल रहै। लोकोक बीच अधि‍कारक महत छल। कि‍छु गोटे व्‍यक्‍ति‍गत रूपमे केस लड़ि‍ बिनु अधि‍कारक सेहो जमीन दखल कऽ लेने छला। जमीनक बीच कानूनी ओझरी नीक जकाँ नै मुदा लागि‍ जरूर गेल छल। १९३५ ई.सँ पूर्व जे अंग्रेज वि‍रोधी आजादीक दि‍शा छल ओइमे धक्का लागल। वामपंथी वि‍चार अपन पहचान बना नेने छल। १९२५ ई.मे कम्‍युनिस्ट पार्टी सेहो बनि‍ गेल छल। सुभाष बाबू सेहो अपन दृष्‍टि‍कोण रखलनि‍। जमीनक ओझरी ई भेल जे बटाइदारी कानून पछुलका सर्वेमे सि‍कमी बटाइ कऽ कऽ खति‍यान बनि‍ चुकल छल। भूदानी आन्‍दोलन सेहो उठि‍ये चुकल छल। बटाइदारीक संग हदबंदी (अर्थात् बीस बीघासँ ऊपर बलाक जमीन लऽ लेल जेतै।) कानून सेहो बनि‍ चुकल छल। तहूमे पछि‍मी मधुबनी जि‍लामे बटाइदारी लड़ाइ धुर-झाड़ चलैत रहए। ओना ि‍सर्फ जमीनदारे नै, बेसि‍यो जमीनबला आ ओकर जे लगुआ-भगुआ रहै ओहो आ कि‍छु राजनीति‍क दल सेहो जाति‍-सम्‍प्रदायक नामपर राजनीति‍क पार्टी ठाढ़ कऽ नेने छल। एक तँ गरीबक बीच सामंती संस्‍कार धकेल कऽ नि‍च्‍चा  खसौने रहै, दोसर कम्‍युनिस्ट पार्टीकेँ समाजक भीतर जाति‍-धर्म वि‍रोधी कहि‍ घृणाक पात्र बनौने रहै, जइसँ दरबज्‍जापर पहुँचलापर वि‍चि‍त्र स्‍थति‍ पैदा होइत छल। मधुबनी-दरभंगा जि‍लाक सौभाग्‍य रहल जे, जे जाति समाजक नि‍यामक रहलाह ओही जाति‍क नेतृत्‍वमे कम्‍युनि‍स्ट पार्टी बनल रहए, कम्‍युनि‍स्ट पार्टीक भीतर ब्राह्मण नेतृत्‍व अधि‍क छल। ओना सभ जाति‍क बीच कम्‍युनि‍स्ट पार्टीक पहुँच रहल। खास कए कऽ खजौली आरक्षि‍त भेने अनि‍वार्यो भऽ गेल रहै। १९५५ ई.क पूर्व बि‍हारक राजनीति‍मे जाति‍क प्रभाव नगण्‍य छल मुदा जोर पकड़ए लागल। जइसँ वर्गीय स्‍वरूप नै पनपि‍ जातीय स्‍वरूप पनपि‍ गेल। जाति‍-जाति‍क वि‍भाजन भऽ गेल। मुदा आजादीक फल एते तँ भइये गेल छल जे सभकेँ भोटक अधि‍कार भेट गेल छलै। सरकारक बीच कुर्सी पटका-पटकी १९६२ ई.सँ शुरू भऽ गेल छल। एम.एल.ए, एम.पी.क बदला-बदली हुअए लागल। आमजन ठकाइत रहलाह। ठकाइत-ठकाइत एते ठका गेलाह जे गामक बीस बीघा जमीनबलाकेँ बेटी बि‍आहमे जमीन बेचए पड़ए लगलनि‍! क्षेत्रक वि‍कास मात्र रूकबे ने कएल अपि‍तु पाछू मुँहेँ ससरए लागल। पछि‍मी कोसी नहर, मैथि‍ली भाषा, जमीनक सवाल कम्‍युनि‍स्ट पार्टीक मुख्‍य मुद्दा सभ दि‍न रहल। एक दि‍स कोसी नहर हुअए तेकर आन्‍दोलन! तँ दोसर दिस नै हुअए तेकर आन्‍दोलन! भूदानी आन्‍दोलन अपन स्‍वरूप बि‍गाड़ि‍ पाइक अड्डा बनि‍ गेल, जइसँ मामिला आरो ओझरा गेल। ओझरा ई गेल जे एक-एक जमीनकेँ तीन-तीन गोटेकेँ पर्चा भेटल। जइसँ जमीनबलाक झगड़ा जमीन लेनि‍हारोक बीच फँसि‍ गेल। प्रशासनक स्‍थि‍ति‍ ओहने छल जे एकछाहा बूझि‍ पड़ै। बेरमाक जे कम्‍युनि‍स्ट वि‍रोधी रहथि‍, नमहर साँस छोड़लनि‍। जहि‍ना अड़ना पाड़ा मुइने नढ़ि‍या सभ साँझू पहरकेँ ढोल बजा-बजा नचैए तहि‍ना साँस छोड़ि‍ नाचए लगलाह। लूटा-लुटी जोर पकड़लक। गाममे खेतक जजातक (तरकारी, अन्न, फल) चोरि‍ बढ़ल। ओना तइसँ पूर्व चोरि‍सँ गाम एते आक्रान्‍त रहैत छल जे जबरदस समस्‍या रहै, मुदा संक्षेपमे एक गोटेकेँ गाछमे टाँगि‍ आ दोसर गोटेकेँ सामूहि‍क मारि‍ जखन पड़ल तहि‍येसँ चोरि‍मे कमी आएल। ओना चोरि‍क रंग-रूप बदलने चोरक कमी नै भेल मुदा रंग-रूप बदलने लोक ठकेबे करत। चाहे पि‍तरि‍या सोना होइ आकि‍ एकक तीन। जमीनक लड़ाइ उठने जे जत्तै रहए से ततैसँ बन्‍सी पाथि‍ देलक। झंझारपुरक लक्ष्‍मीकान्‍त रामाकन्‍त दुनू भाँइ छथि‍। एक भाँइक हि‍स्‍सा कृष्‍ण चन्‍द्र झा (कैलू मास्‍टर) लेलनि‍ दोसर हि‍स्‍सा बैजनाथ मण्‍डल लेलनि। कम्‍युनि‍स्ट पार्टी महादेवसँ बटाइदारी केस करबौने छल। जगदीश प्रसाद मण्डल सभ अट्ठाइसो मुदालहक संग अट्ठाइसटा गबाह लऽ कऽ जमानत करबए एक दि‍न पहि‍ने गेला। कि‍यो-कि‍यो साइकि‍लसँ जाइ छल, सेहो राखि‍ देलक जे जँ भीतर जाए पड़त तँ साइकि‍ल जपाल भऽ जाएत। जँ थाना गेल तँ पेशेवर मनुक्‍खक गति‍ हेबे करतै। पहि‍ले दि‍न, गामसँ नि‍कलला पछाति‍  बैजनाथ मण्‍डल हल्‍ला उठौलक, एकटा लि‍फाफ नेने चि‍ट्ठी गाममे देखौलक जे कैलू मास्‍टरक बेटा हमरा माए-बहि‍नकेँ गाि‍र लि‍ख कऽ पठा देलक हेँ। ओना अखनो धरि‍ चि‍ट्ठी देखैक मौका जगदीश प्रसाद मण्डल केँ नै भेटलनि। ओना दुनू गोटेक भीतरि‍या इच्‍छा जे सोलहो आना हुअए। एक गोटे जबुरि‍या करबैक फि‍राकमे दोसर गोटे बलजोरी कब्‍जा करैक फेरमे। महादेव मण्‍डलक बटाइकेँ जगदीश प्रसाद मण्डल सभ रोकि‍ देलनि। रोकैक कारण बैजनाथ मण्‍डलक जेठ भाय महादेव मण्‍डल। ओही परि‍वारक लेल ने जे कीनि‍ये लेलक। अगि‍लग्‍गी केसक जमानत करा गाम पहुँचि‍ते कि‍छु गोटे बाजल जे कैलू मास्‍टरक बेटाकेँ बैजनाथ मारबो केलक आ पकड़ि‍ कऽ दरबज्‍जापर रखनौं अछि‍। कि‍छुए काल पछाति‍ कैलू मास्‍टर सहाएबक बहि‍न जे जीवि‍ते छथि‍‍, डाँड़क ऑपरेशन भेल छन्‍हि‍, तइसँ जँ ब्रेन प्रभावि‍त भऽ गेल तेकर तँ नै मुदा जँ नीक होन्‍हि‍ तँ मुखौतरी भऽ जाए, आबि‍ कहलनि‍ जे बैजनाथ हमरा भाति‍जकेँ मारबो केलक आ पकड़ि‍ कऽ रखने अछि‍ से कहक छोड़ि‍ दइले। जगदीश प्रसाद मण्डल गेला, कहलनि, ओ छोड़ि‍ देलकै। ओ घटना ३०७ क रूपमे उठल। कैलू मास्‍टर तीनू भाँइ महादेवकेँ आ जगदीश प्रसाद मण्डल, रामावतार राउत आ सत नारायण राउतकेँ मुदालह कऽ देलनि‍, ओइ केसमे सजा भेलनि जे हाइकोटसँ फड़ि‍आएल। वीरेन्‍द्रे जी (माननीय न्‍यायमूर्ति, पटना हाई कोर्टमे छथि‍।) काज केने रहथि‍।  कैलू मास्‍टर सहाएबक घटनाक प्रभाव सभसँ बेसी दुर्गा स्‍थानपर पड़लनि। शुरूक बैचमे कैलूओ मास्‍टर सहाएब, रामावतारो आ जगदीश प्रसाद मण्डल संगे-संगे चंदा करए जाथि; दुर्गा स्‍थानक बेवस्‍था करथि। भलहिं ओ अपना भगवतीकेँ कहथि‍न जे दुश्मनकेँ सांगि‍ करि‍यह आ जगदीश प्रसाद मण्डल अपना भगवतीकेँ वएह बात कहथिन‍। पनरह बर्खक पछाति‍ ओहो (कैलू मास्‍टर सहाएब) आ जगदीश प्रसाद मण्डल आ रामावतार अगि‍ला पीढ़ीकेँ सुमझा देलखिन‍। लक्ष्‍मीकान्‍तबला जमीनक चौथाइसँ अधि‍या दाममे नि‍कलि‍ गेलनि, कि‍छु इम्‍हरो-आम्‍हरो भेल, लूटमे चरखा नफा। एक गोटे रजिस्ट्री आॅफि‍समे मुंशीयागरी करै छला, हदवंदीक नकल लऽ नेने रहथि‍। बि‍क्रीक सुनि‍-गुनि‍ पबि‍ते ि‍वरोध कऽ दैथि आ तरेतर झाड़ि‍ लैथि। गामक जमीन गौआँक हाथ आएल। केस-मुकदमा सोलह कऽ समाप्‍त भेल। लक्ष्‍मीकान्‍त साहुक जमीनक लड़ाइक पश्चात आन्‍दोलनक रूपमे ने जमीन्‍दार छलाह आ ने लड़ाइ उठल। आन-आन जमीन्‍दार जमीन बेचि‍ कऽ पहि‍नहि‍येँ चलि‍ गेल छला, खाली लक्ष्‍मि‍येकान्‍त-रमाकान्‍त बँचल रहि‍ गेल छला। सेहो भइये गेल। भूदानी आन्‍दोलन- बेरमामे भूदानी आन्‍दोलन तेनाहे जकाँ भेल। कारण जे जइ समए भूदानक जमीन देल गेल ओइ समए बेरमामे तेहेन जमीनबला नहि‍ये छला। एकटा परि‍वार छल, ओ छल गठरी झाक परि‍वार। गठरी झाकेँ पण्‍डि‍ताइमे लाखे राज-ब्रह्मोत्तर कऽ कऽ जमीन भेटल रहनि‍ मुदा ओ जमीन बेरमा गाममे नै गामसँ बाहर छलनि‍। मालि‍क-मलि‍कानक गाम बेरमा, जइसँ भूदानमे कम जमीन देल गेल। तहूमे बँटबारा होइसँ पूर्वे ओ सभ बेचि‍-बि‍कीन नेने छलाह। तइ संग ईहो भेल जे तेहेन-तेहेन कार्यकर्त्ताकेँ जमीनक सबूत आ बँटैक भार देल गेलनि‍ जे ओ सभ आरो डुबा देलनि‍। एक-एक जमीनक सबूत तीन-तीन गोटेकेँ जि‍ला कार्यालयमे भेट गेल। एक तँ ओहि‍ना कमजोर आदमीकेँ उठबैक आन्‍दोलन छल, मुदा सबूतक ओझरी तेहेन ओझरी लगा देलक जे कोनो लाभ कि‍नको नै भेलनि‍। जँ थोड़-थाड़ कि‍छु भेबे केलनि‍ तँ ओइसँ समस्‍याक समाधान थोड़े भऽ पबैत, भूदानी आन्‍दोलनसँ तँ तेहेन लाभ नहि‍ये भेल मुदा बसैबला घराड़ीक जमीनक समस्‍या जरूर हल भऽ गेल। तेकर कारण भेल जे एक दि‍स आम जमीन, दोसर लक्ष्‍मीकान्‍त बला, तेसर एक गोटे (गंगाराम/भोला राम मण्‍डल) गंज परक छलाह हुनको छिना गेल। तइ संग अपनो छलनि‍ आ कि‍छु गोटे किनबो केलनि‍।   लक्ष्‍मीकान्‍त, रमाकान्‍तक लड़ाइक बीचेमे एकटा दोसर झंझट ठाढ़ भऽ गेल। छोट-छीन मुद्दा नमहर बनि‍ गेल। ओ एना भेल-सतदेव झा नामक एक गोटे बेरमामे। शुरूमे माने जुआनी अवस्‍थामे अपराधि‍क प्रवृत्ति‍क छलाह, जे चालीस बर्खसँ ऊपरक भेला तखन गाम छोड़ि‍ कलकत्ता गेलाह। शुरूमे मोटि‍या सभ संग मोटि‍यागि‍री केलनि‍। कि‍छु साल पछाति‍ बैट्री (अमेरि‍कन कम्‍पनी, एवरेडी) फैक्‍टरीक चि‍मनीक काज भेलनि‍। वि‍देशी कम्‍पनी रहने नीक दरमाहा भेटलनि‍। वएह जखन रि‍टायर कऽ गाम एलाह तँ कम्‍युनिस्ट पार्टीक संग उलझि‍ नमहर वि‍वाद ठाढ़ कऽ देलनि‍। भेल ई जे सतदेव झाकेँ बेटा नै भेलनि‍। ि‍सर्फ एकटा बेटि‍ये टा भेल छलनि‍। गरीबीक चलैत बेटीक वि‍आह बेसौह लड़काक संग केलनि‍। दू सन्‍तानक पछाति‍ जमाए मरि‍ गेलखि‍न। अपनो परि‍वार छोटे रहनि‍। दुनू नाति‍यो आ बेटि‍योकेँ अपना ऐठाम-बेरमा लऽ अनलनि‍। अपनो सेवा ि‍नवृत्ति‍ भेला पछाति‍ दुनू परानी कलकत्तासँ गाम आबि‍ गेलाह। गाम आबि‍ पाँच बीघा खेत कीनलनि‍। एकटा बोरि‍ंग गरौलनि‍, एकटा दमकल लेलनि‍। बेवस्‍था ऐ ढंगसँ शुरू केलनि‍ जे, जँ समुचि‍त ढंगसँ चलाओल जाइत तँ, नीक कि‍सान परि‍वार ठाढ़ होइत, से नै भेलनि‍। खेतक बेवस्‍थाक संग जोड़ा बरद लेलनि‍, घर बनौलनि‍। बहुत नीक तँ नै मुदा मजगूत घर जरूर बनौलनि‍। गौआँक मतभेदक एकटा कारण ईहो भेल जे अपन घराड़ी छोड़ि‍ दोसर घराड़ी कीन दोसर ठाम घर बनौलनि‍। जे जमीन कीनि‍ घर बनौलनि‍ ओ जमीन बि‍का गेल छल। दोसर गोटे कीनने रहथि‍ मुदा रजिस्ट्री नै भेल रहए। सतदेव झाकेँ रजि‍स्ट्री भेलनि‍, जमीन कब्‍जा भेलनि‍, घर बनौलनि‍। मुदा समाजक मनमे अाबि‍ये गेलनि‍ जे ई अनुचि‍त भेल। पहि‍लुका कीनि‍ि‍नहार पाछू हटि‍ गेलाह। कलकत्ता सन शहरमे जि‍नगी बि‍तौनि‍हार सतदेव झा खेती नै कऽ पाबि‍ सकलाह। दुनू नाति‍यो बचहने रहनि‍। पैछला (कलकत्ताक) कमाइ सठि‍ गेलनि‍। मुदा खाइ-पीबैक चसकीक संग जीवन-शैली सेहो खर्चीला बनि‍ये गेल रहनि‍। खेत बेचब शुरू केलनि‍। जेठका नाति‍क बि‍आह सेहो करा लेलनि‍। आधासँ बेसी खेत जखन बि‍का गेलनि‍, तखन बेटि‍यो आ दुनू नाति‍यो झगड़ा करब शुरू केलकनि‍। सतदेव झाकेँ बेटि‍यो आ नाति‍योसँ झगड़ा ऐ लेल शुरू भेलनि जे जखन अपना ऐठाम (बेटीक सासुर आ नाति‍क गाम) सँ चलि‍ एलौं आ एतुको सभटा बेचि‍नहि‍ये जाइ छथि‍ तखन हमरा सभकेँ की हएत। अपने दुनू परानी बूढ़ छथि‍, दू-चारि‍ सालमे मरि‍ जेताह मुदा हम सभ कतए जाएब? उचि‍त वि‍चार रहि‍तो पारि‍वारि‍क छल तँए दोसर हाथ नै बढ़बए चाहैत। मुदा बेटीक-नाति‍क झगड़ासँ सतदेव झाकेँ दूरी बनलनि‍ आ वि‍रोधी (कम्‍युनिस्ट वि‍रोधी) सँ नजदीकी बनलनि‍। नाति‍ (प्रमोद झा) सासुर गेल। सासुर रहि‍का ब्‍लौकक भोज-परोर। ओइ इलाकामे जमीनक लड़ाइ धुर-झाड़ चलैत। सासुर पहुँच प्रमोद ससुरकेँ सभ बात कहलखि‍न। संगे लागल ससुर बेरमा एलनि‍। प्रमोदक ससुर गांजा पीबै छलथि‍, अखनो छथि‍ये। बेरमा आबि‍ तीनि‍-चारि‍ दि‍न रहलाह। गजेरीक पार्टी बना लेलनि‍। तइमे कि‍छु कम्‍युनिस्टो पार्टीक। खूब नीक जकाँ खा-पीब भोजनो बनौलनि‍ जे आइ सतदेव झा जतए भेटताह ततए पकड़ि‍ औंठा नि‍शान लऽ लेब। जगदीश प्रसाद मण्डल सबहक जानकारीमे नै रहनि। पान-सात गोटेक बीचक योजना रहै, सैह भेल। बाधमे पकड़ि‍ पाँचो गोटे पटकि‍ कऽ स्‍टाम्‍पपर नि‍शान लऽ लेलकनि‍। वि‍रोधी (कम्‍युनिस्ट वि‍राधी) केँ मौका हाथ लगलनि‍। अपन-अपन चालि‍ सभ चालि‍ देलकनि‍। जगदीश प्रसाद मण्डल सभकेँ मुदालह बना केस कऽ देलकनि‍। थानासँ कहि‍यो लाट-घाट नै रहलनि, थाना खुलि‍ कऽ वि‍रोधीक संग छल। जखने केस होइ छल तखने कोर्टमे हाजि‍र भऽ जमानत करा लइ छला। ि‍सर्फ (३०७ दफा) एकटा केसमे एहेन भेल जे जाबे एकटा मुदालह हाजि‍रा करा जमा कराबथि तइ बीच जप्‍ती-कुर्कीक आदेश करा थाना घरमे जब्‍ती-कुर्की कऽ लेलकनि। घरक केबाड़ खोलि‍ लेलकनि, दमकल सीज कऽ लेलकनि। केस भेलनि, जमानत करेलनि। पार्टीक आन्‍दोलनसँ हटि‍ दोसर दि‍स मोड़ा गेला। सतदेव झाक एगारह कट्ठा जमीन जगदरक भीड़मे। नथुनी सि‍ंहक वि‍चारसँ ओ जमीन एकटा जगदरेबला हाथसँ बि‍करी भऽ गेल। खेतमे धान रहै, धान काटैक झंझट उठल। बेरमा-जगदरक भीड़ानी भेल। ओही दि‍न नथुनी सि‍ंह अपन दल-बलक संग पाछू हटलाह। मुदा भीतरे-भीतर गरमाहटि‍ बढ़ल। जगदरक संग दूरीक आनो कारण छल,‍ ओ कारण छल पाँचक दशकमे एक गोटे (जगदरेक) बेरमा एलाह। संगमे पाछू-पाछू कुत्तो रहनि‍। कुत्ता-कुत्तामे पटका-पटकी भऽ गेल। यत्र-कुत्र गारि‍ कुत्ताबलाकेँ पढ़लखि‍न। बाता-बाती बढ़ि‍ गेल। ओइ समए गरीबीक चलैत बेरमाक बोनि‍हार जगदरमे काजो करैत छलाह आ रीनो-पैंइच करैत छलाह। बाता-बाती होइते जगदरक हँसेरी बेरमा पहुँचि‍ गेल। नि‍आरल लड़ाइक योजना होइ छै बि‍नु नि‍आरल लड़ाइ तँ नारेपर होइ छै। बेरमा-जगदरक नारा उठल, जगदरक सभ मारि‍ खा गाम एलाह। मुदा प्रश्न तँ मालि‍क-बोनि‍हारक उठल। जेकरा ऐठाम रूपैओ आ धानो कर्जाक अछि‍ ओ सोहाइ लाठी कपारपर मारलक, केना बरदास कि‍यो करत। खूब जमगर आगि‍ उठए लागल मुदा ठंढाएल। तइ बीच एकटा आरो घटना भेल। घटना भेल जे चनौरा महंथकेँ दरभंगा महंथानामे लड़ाइ उठल। चनौरा महंथक दहि‍न गबैया जगदरक नथुनी सि‍ंह। राय-वि‍चार कऽ दरभंगामे मारि‍ करैक योजना बनौलनि‍। गेबो केलाह। कानूनक दायरामे झंझट रहबे करै; महंथक संग नथुनी सि‍ंह आ नथुनी सि‍ंहक संग जते जगदर-बेरमाक लंठ सभ रहए ओ सभ, भरि‍ पेट मारि‍यो खेलक, जहलो गेल। मुदा से ततबे नै भेल? भेल ईहो जे जहलोक भीतर ओहि‍ना कुटनी भेलनि‍। सन् सैंतालीस... भारतक स्वतंत्र त्रिवार्णिक झण्डा फहरा रहल छल। मुदा कम्यूनिस्ट पार्टीक माननाइ छल जे भारत स्वतंत्र नै भेल अछि। असली स्वतंत्रता भेटब बाँकी छै... मिथिलाक एकटा गाम… जन्म भेल रहए एकटा बच्चाक.. ओही बर्ख ... ओइ स्वतंत्र वा स्वतंत्र नै भेल भारतमे... पिताक मृत्यु...गरीबी.. केस मोकदमा... वंचितक लेल संघर्षमे भेटलै स्वतंत्र भारतक वा स्वतंत्र नै भेल भारतक जेल.... आइ बेरमामे पाँच-दस बीघासँ पैघ जोत ककरो नै.. ओइ गाममे जीवित अछि आइयो किसानी आत्मनिर्भर संस्कृति... पुरोहितवादपर ब्राह्मणवादक एकछत्र राज्यक जतऽ भेल समाप्ति.. संघर्षक समाप्तिक बाद जिनकर लेखन मैथिली साहित्यमे आनि देलक पुनर्जागरण... जगदीश प्रसाद मण्डल- एकटा बायोग्राफी...गजेन्द्र ठाकुर द्वारा (अनुवर्तते...) २ साहित्य अकादेमीमे समन्वयक पद लेल कालाबाजारी (ब्लैक मार्केटिंग)- एकटा रिपोर्ट साहित्य अकादेमी दिल्लीक मैथिली समन्वयक चुनाव लेल जे संस्था सभ निर्धारित अछि ओकर नाम अछि:- विद्यापति सेवा संस्थान, दरभंगा; सचिव वैद्यनाथ चौधरी “बैजू” आ अध्यक्ष- पं. चन्द्रनाथ मिश्र अमर। अखिल भारतीय मैथिली साहित्य परिषद, दरभंगा; सचिव डा. गणपति मिश्र , अध्यक्ष रहथि स्व. जयमन्त मिश्र। चेतना समिति, पटना, सचिव श्री विवेकानन्द ठाकुर, अध्यक्ष श्रीमति प्रमीला झा। राँटी मधुबनीक कोनो संस्था, सम्भवतः वर्तमान अध्यक्ष श्री हेतुकर झा। किशोरीकान्त मिश्रक मिथिला सांस्कृतिक परिषद (जे संस्था विद्यापतिकेँ पाग पहिरा कऽ हुनका ब्राह्मण घोषित करबाक कुकृत्य केलक), वर्तमान अध्यक्ष श्री सुरेन्द्र नारायण झा आ सचिव गंगाधर झा। पंचानन मिश्रक अखिल भारतीय मैथिली साहित्य समिति, इलाहाबाद; आ मैथिली लोक साहित्य परिषद, कोलकाता, सम्भवतः वर्तमान अध्यक्ष- अणिमा सिंह (सम्भवतः मैथिली लोक साहित्य परिषद आब ऐ लिस्टमे नै अछि कारण आधिकारिक मैथिली साहित्यिक संस्था सभक लिस्टमे साहित्य अकादेमी, दिल्ली ऐ संस्थाक नाम नै देने अछि।)। ऐ मे सँ किछु संस्थाक नाम आ वर्तमान अध्यक्ष आदिमे परिवर्तन सम्भव अछि।

ऐ मे सँ अधिकतर संस्था कागजी अछि वा साहित्यिक नै राजनैतिक अछि आ जातिवाद, क्षेत्रवाद आ आनुवंशिक आधारपर संचालित अछि। साहित्य अकादेमी, दिल्लीक आधिकारिक मैथिली साहित्यिक संस्था सभक लिस्ट MAITHILI 01. The Secretary All India Maithili Sahitya Samiti Tirbhukti 1/1B, Sir P.C. Banerjee Road Allahabad-211 002 02. The General Secretary Akhil Bharatiya Maithili Sahitya Parishad C/o Dr. Ganapati Mishra Lalbag Darbhanga-846 004 03. The Secretary Chetna Samity Vidyapati Bhawan Vidyapati Marg Patna-800 001 04. The Secretary Mithila Sanskritik Parishad 6 B, Kailash Saha Lane Kolkata-700 007 05. The Secretary Vidyapati Seva Sansthan Mithila Bhavan Parishar Darbhanga-846 004 06. The Secretary Centre for the Study of Indian Traditions Tantrabati Geeta Bhavan Ranti House, Ranti Madhubani-847 211 Ashok Avichal DR. VEENA THAKUR KE BADHAI Ashok Avichal Sahitya Akademi Nayi Delhi ker Maithili paramarshdatri samitik pahil sanyojak banak saubhagya Dr. Veena Thakur kein Bhetlain. nishchiten Maithili kein yogya karmath aa sahitya anuragi vidhusi pratinidhi bhetlaik. Jharkhand Maithili sahitya manch Jamshedpur aa Jharkhand Maithili Bhojpuri Sahitya Sangam dis san Dr. Thakur kein Badhai Top of Form You, Maithili Singer Parivar, Prity Thakur, Poonam Mandal and 7 others like this. Ashish Anchinhar आशा अछि जे वीणा ठाकुर जी अपन एडवाइजरी बोर्डमे कबिलपुरक शंकरदेव झा-विजयदेव झा आदिकेँ दूर रखती आ 9 टा सदस्यमे सँ कमसँ कम 5 टा सदस्य गएर सवर्णकेँ रखती। Sunday at 10:12pm · Unlike · 2 Gajendra Thakur पहिल रमानाथ झा, दोसर जयकान्त मिश्र, तेसर सुरेन्द्र झा सुमन, चारिम सुरेश्वर झा, पाँचम रामदेव झा, छअम रामदेव झाक ससुर चन्द्रनाथ मिश्र अमर, सातम रामदेव झाक समधि विद्यानाथ झा विदित आ आठम वीणा ठाकुर। साहित्य अकादेमीक मैथिली विभागक समन्वयक सूचीक ई आठम लगातार मैथिल ब्राह्मण समन्वयक हेतीह। 9 अ म जँ मैथिले ब्राह्मण बनि जाए तँ लगातार तेसर हैट्रिक बनि जाएत, जइ रेकॉर्डकेँ साहित्यकार कि क्रिकेटरो नै तोड़ि सकत। Sunday at 10:19pm · Like · 2 Ashok Avichal kam sa kam sahityan ke jatiwaad san pharak rakhak prayas hoit rahak chahi.. Veena Thakur matra maithil brahman nai Maithilik Sahityakar aa pahil Mahila chith Sunday at 10:22pm · Like · 1 Gajendra Thakur मुदा ई पहिल महिला छथि से कने-मने आशाक किरण छोड़ैए। तेँ वीणा ठाकुर जीकेँ बधाइ। Sunday at 10:27pm · Like · 4 Gajendra Thakur मुदा आशीष अनचिन्हार जीक गपसँ हम सहमत छी। जेना रामदेव झाक बेटा आदि अजित आजादपर "विदित" केँ ५०-६० लाख देबाक आरोप आ नचिकेता आदिपर जातिगत/ व्यक्तिगत घृणित आरोप लगेने रहए (आज अखबारमे) से की सिद्ध करैए? की वीणा ठाकुर रामदेव झा-शंकरदेव झा- चन्द्र नाथ मिश्र क कैंडीडेट छली? आशीष अनचिन्हार जीक ऐ सलाह सँ सहमत छी जे "वीणा ठाकुर जी अपन एडवाइजरी बोर्डमे कबिलपुरक शंकरदेव झा-विजयदेव झा आदिकेँ दूर रखती आ 9 टा सदस्यमे सँ कमसँ कम 5 टा सदस्य गएर सवर्णकेँ रखती।" Sunday at 10:32pm · Like · 4 Gajendra Thakur आ जे से नै करती तखन पहिल महिला समन्वयकक मैथिलीकेँ की लाभ हएत, आ तकर परिणाम मैथिली लेल भयंकर हएत। Sunday at 10:34pm · Like · 3 Ashok Avichal vishwas aich je veena thakur yogya aa maithili lel samarpit sahityakar sabkein sadasya banebak kaal prathmikta detih Sunday at 10:38pm · Like · 1 Gajendra Thakur जे संस्था सभ हुनका चुनलकन्हि अछि ओइमेसँ अधिकतर फर्जी छै, जकरा साहित्यसँ कोनो मतलब नै छै, ओही सभक सदस्य सभ भूतकालमे एडवाइजरी बोर्डमे चुनाइत आएल अछि। Sunday at 10:43pm · Like · 4 Gajendra Thakur "योग्य" माने मात्र मैथिल ब्राह्मण नै भऽ जाए अशोक अविचलजी। Sunday at 10:44pm · Like · 4 Gajendra Thakur साहित्यकेँ जाति-पातिसँ दूर रखबाक चाही, ई सभ मैथिल ब्राह्मण साहित्यकार सभसँ सुनैत-सुनैत हमर कान पाकि गेल अछि। कोन तरहक हिप्पोक्रेसी अहाँ लोकनि कऽ रहल छी अशोक अविचलजी। दुनियाँ सभ देखि रहल अछि। इतिहास अहाँकेँ माफ नै करत। "शब्दशास्त्रम्" कथा जे हम "उमेश मण्डल"केँ समर्पित केने छलौं, ओ समर्पणक पाँती कोना अहाँ अपन सम्पादकत्वमे प्रकाशित "कथा पारस"सँ हटा देलिऐ। जँ ओ समर्पण "उमेश झा" केँ रहितै तँ अहाँ ओ पाँती हटबितिऐ अशोक अविचलजी? Sunday at 10:52pm · Like · 1 Ashish Anchinhar खाली बातमे जाति पाति हटेलासँ नै होइ छै अशोक अविचल जी बल्कि व्यवहारमे सेहो जाति पातिकेँ हटेबाक चाही Monday at 9:46am via mobile · Edited · Like · 2 Poonam Mandal ''आशा अछि जे वीणा ठाकुर जी अपन एडवाइजरी बोर्डमे कबिलपुरक शंकरदेव झा-विजयदेव झा आदिकेँ दूर रखती आ 9 टा सदस्यमे सँ कमसँ कम 5 टा सदस्य गएर सवर्णकेँ रखती।'' वि‍चारणीय अछि‍। Monday at 3:51pm · Like · 4 Arbind Kumar Yadav जे संस्था सभ हुनका चुनलक ओइमेसँ अधिकतर फर्जी अछि‍, जकरा साहित्यसँ कोनो मतलब नै छै, ओही सभक सदस्य सभ भूतकालमे एडवाइजरी बोर्डमे चुनाइत आएल अछि। ''साहित्य अकादेमीक मैथिली विभागक समन्वयक सूचीक ई आठम लगातार मैथिल ब्राह्मण समन्वयक छथि‍।'' Monday at 4:10pm · Like · 3 Rabindra Kumar Choudhary akan dhair jha wa misar sanyojak hoiat rahlah achhi. pahil ber thakur bhelih achhi.badlab suru bha ghel achhi. Yesterday at 2:07pm · Like · 1 Ashish Anchinhar ई ठाकुर बाभन छथि हजाम नै Yesterday at 2:24pm via mobile · Like · 2 Umesh Mandal Rabindra Kumar Choudhary जी, झा आ मि‍श्रक जगह ठाकुर भेलीह जेकरा अहाँ बदलाव कहै छि‍ऐ; ई कोन बदलाव भेलै? Yesterday at 7:29pm · Like · 2 Poonam Mandal http://esamaad.blogspot.in/2012/10/blog-post_5235.html समदिया: साहित्य अकादेमी, दिल्लीक मैथिलीक आठम महिला समन्वयक डॉ. वीणा ठाकुर हेती esamaad.blogspot.com Since 2004 AD, First Maithili News Portal 'Samadiya'(Poonam Mandal & Priyanka Jh...See More Yesterday at 8:05pm · Like · 3 · Remove Preview Gajendra Thakur Vijay Deo Jha दू गो बात सर  गजेन्द्र बाबु हम अपने आ अपनेक रामचेलवा के कमेन्ट पढ़ल। नीक लागल जे हमरा अपने एडवाजरी बोर्ड में मेंबर हेबाक योग्य बुझल। चलू लागले हाथ हमहूँ अहाँ के महान साहित्यकार कहि देलौ। लेकिन एकटा बात हम कहि रहल छी आ एही बात के हम वीणा जी के सेहो कहबनि जे अपने पर मोनोग्राफ जरुर लिखल जाय। अपने बड़ पैघ आ महान साहित्यकार छी सरकार आ उत्तम किस्म के थेथर सेहो। कोन बुद्धिये पोस्ट में हमर नाम देलियई सरकार। आप भी सर हद्दे करते है सब चीज़ को कस्टम का माल समझ लिए हैं। और ई सब जो ढोंग करते हैं जाति वाला तो पहले अपना टाईटिल हटाईये। अपने बेटा के जनउ में जो लाख टाका बुके थे और बभना सब को खिलाये उसका हिसाब भी दीजिये ना और हम सब तुच्छ प्राणी को ज्ञान दीजिये प्रभु की जब आप सचमुच में जाति के विरोध में हैं तो बेटा के कन्धा पर धागा काहें टाँगे गुरु। मतलब पुरे मिथिलांचल में एक आप ही भगल्पुरिया कबिलाहा है ये सब पैतराफोकासी उमेश जैसे लोगों को दीजिये गुरु। और गजेन्द्र बाबु कुछ दिन पहले तक तो आपही अजीत आज़ाद जी को गरिया रहे थे अब दोस्तियारी कैसे हो गया। आप घिना दिए गुरु। इसको पोस्ट कर दीजियेगा एक दम लाइन बाई लाइन। Yesterday at 8:39pm · Like · 3 Gajendra Thakur ई विजदेव झाक पिताक नाम रामदेव झा आ नानाक नाम चन्द्रनाथ मिश्र अमर छियन्हि। गरिखर मे दुनू नामी- दुनू पक्षसँ ई गुण हिनका आनुवंशिक रूपेँ तँ नै आबि गेल छन्हि!! Yesterday at 8:40pm · Like · 4 Umesh Mandal शंकरदेव झा हमरा कहने छथि जे सभ भाँइ दस सदस्यीय साहित्य अकादेमीक एडवाइजरी कमेटीक सदस्य रूपमे नै एता, आ ईहो कहने रहथि "जे जँ हम सभ मेम्बर बनी तँ रामदेव झाक बेटा नै होइ"। कतेक दिन पुरान गप भऽ गेलै। अजित आजादसँ चर्च भेल तँ ओ कहलनि- "धुर छोड़ू एकर सभक किरिया खायबक कोनो माइन नै छै, गिरल सभ छै..."।- देखा चाही आगाँ की होइए। Yesterday at 8:44pm · Unlike · 4 Ashish Anchinhar मने जे जँ शङ्करदेव आ हुनक भाए आदि साहित्य अकादेमीक कोनो पद लेता तँ ओ रामदेवक बेटा नै हेता सएह ने Yesterday at 9:01pm via mobile · Unlike · 2 Pawan Kumar Sah पहिल रमानाथ झा, दोसर जयकान्त मिश्र, तेसर सुरेन्द्र झा सुमन, चारिम सुरेश्वर झा, पाँचम रामदेव झा, छठम रामदेव झाक ससुर चन्द्रनाथ मिश्र अमर, सातम रामदेव झाक समधि विद्यानाथ झा विदित आ आठम वीणा ठाकुर; एकछाहा झा.. मि‍सर... बाभन ठाकुर...!!!!!! कहि‍या तक चलैत रहत ई खेल?? की हि‍नकासँ कमजोर केण्‍डीडेट छलखि‍न्‍ह प्रोफेसर उदय नारायण सिंह 'नचि‍केता'? की हि‍नकासँ सौ गुणा अधि‍क काज नचि‍केता जी नहि‍ केने छथि‍न्‍ह मैथि‍ली लेल? मुदा तैयो श्री गजेन्‍द्र ठाकुर जीक बातपर ''महिला छथि से कने-मने आशाक किरण छोड़ैए।'' आश अछि‍, मुदा से तँ गड़गड़ेलेपर बूझब। 2 hours ago · Unlike · 1 Bottom of Form LIST OF LITERARY ASSOCIATIONS RECOGNISED BY SAHITYA AKADEMI ASSAMESE 01. The General Secretary Asam Sahitya Sabha Chandrakanta Handique Bhavan Jorhat 785 001 (Assam) BENGALI 01. The Secretary Rabindra Bharati Society 5, Dwarakanath Tagore Lane Kolkata-700 007 02. The Secretary Bangiya Sahitya Parishad 243/1, Acharya Parafullachandra Road Kolkata-700 006 BODO 01. The General Secretary Bodo Sahitya Sabha R.N. Brahma Hall Kokrajhar BAC (Assam) Pin-783 370 DOGRI 01. The General Secretary Dogri Sanstha (Regd.) Karan Nagar Jammu 02. The Secretary Kavi Dattu Sahitya Sansthan Vill. & P.O. Bhadoo Tehsil: Bilawar Dist: Kathua, J & K 03. The General Secretary Dogri Sahitya Sabha Vill. & P.O. : Marh Tehsil & Dist: Jammu 04. The General Secretary Duggar Manch 124, Dogra Hall Jammu-180 001 GUJARATI 01. The Secretary Gujrati Sahitya Parishad Govardhan Bhavan Ashram Road Behind Times of India Bldg. Ahmedabad-380 009 02. The Secretary Gujarat Sahitya Academy Town Hall Complex, Sector-17 Gandhinagar-382 017 03. The Secretary Gujarat Vidya Sabha Premabhai Hall Bhadra Ahmedabad-380 001 04. The Secretary Gujarat Sahitya Sabha Room No. 2 H.K. Arts College Ahmedabad-380 009 05. The Secretary Narmad Sahitya Sabha C/o Sahitya Sangam Bava Sidi, Opp. Pancholi Wadi Gopipura Surat-395 001 06. The Secretary Premanand Sahitya Sabha Premanand Sahitya Bhavan Dandia Bazar Vadodara-390 001 07. The Secretary Forbes Gujarati Sabha 403, Chetna, Off. J.P. Road Near Seven Bunglow Apartments Andheri (West) Mumbai-400 058 HINDI 01. The Secretary Bharatiya Bhasha Parishad 36-A, Shakespeare Sarani Kolkata-700 017 02. The Secretary Bihar Rashtra Bhasha Parishad Shivpujan Sahai Path (Saidpur Vistar) Patna-800 004 03. The Secretary Uttar Pradesh Hindi Sansthan Rajarshi Purushottamdas Tandon Hindi Bhavan 6, Mahatama Gandhi Marg Lucknow-226 001 (U.P.) 04. The Secretary Madhya Pradesh Rashtrabhasha Prachar Samiti Hindi Bhavan Shamla Hills Bhopal – 462 002 (M.P.) 05. The Secretary Rashtrabhasha Hindi Prachar Samiti Sree Dungargarh Rajasthan 331 803 06. The Secretary Maharashtra Rashtrabhasha Sabha 387, Narayan Peth Rashtrabhasha Bhavan Pune-411 030 07. The Secretary Dakshin Bharat Hindi Prachar Sabha Dakshin Bharat Hindi Prachar Sabha Marg T. Nagar Chennai-600 017 KANNADA 01. The Director Rastrakavi Govinda Pai Samshodhana Kendra M.G.M. College Campus Udupi-576 102 0 2. The Secretary Shimoga Karnataka Sangha B.H. Road Shimoga-577 201 03. The Secretary Puttur Karnataka Sangha Vivekananda College Campus Puttur-574 202 D.K. District (Karnataka) 04. The Secretary Kannada Sahitya Parishat Pampamahakavi Road Chammarajpet Bangalore-560 018 05. The Secretary Karnataka Vidyavardak Sangh Chammaraj Mandir Dharwad-580 001 KASHMIRI 01. The Secretary Jammu and Kashmir Academy of Art Culture & Languages Canal Road Jammu Or The Secretary Jammu and Kashmir Academy of Art Culture & Languages Lal Mandi Srinagar 02. The Gneral Secretary Adbee Markaz Kamraj P.O. Box 793 GPO Srinagar-191 001 (Kashmir) 03. The Secretary Kashmiri Bhasha evam Sanskriti Pratishthan (Samprati) 904, Subhash Nagar Jammu 180 005 KONKANI 01. The Secretary Kerala Konkani Academy `Gokul’ Azhakiyakavu West Lane Cochin-682 006 02. The General Secretary Konkani Bhasha Mandal Konkani Bhavan Shankara Bhandari Marg Vidyanagar Margao-403 601 (Goa) 03. The Secretary Konkani Bhasha Prachar Sabha 6/1716, Palace Road Mattancheri Cochin-682 002 04. The Secretary Konkani Bhasha Mandal (R) Karnataka Navaratna Palace K.S. Rao Road Mangalore-575 001 05. The Secretary Konkani Bhasha Mandal 13/Ritz, Convent View CHS Gatla Village Road Chembur Mumbai-400 071 MAITHILI 01. The Secretary All India Maithili Sahitya Samiti Tirbhukti 1/1B, Sir P.C. Banerjee Road Allahabad-211 002 02. The General Secretary Akhil Bharatiya Maithili Sahitya Parishad C/o Dr. Ganapati Mishra Lalbag Darbhanga-846 004 03. The Secretary Chetna Samity Vidyapati Bhawan Vidyapati Marg Patna-800 001 04. The Secretary Mithila Sanskritik Parishad 6 B, Kailash Saha Lane Kolkata-700 007 05. The Secretary Vidyapati Seva Sansthan Mithila Bhavan Parishar Darbhanga-846 004 06. The Secretary Centre for the Study of Indian Traditions Tantrabati Geeta Bhavan Ranti House, Ranti Madhubani-847 211 MALAYALAM 01. The General Secretary Samastha Kerala Sahitya Parishath Hospital Road Kochi-682 011 02. The Secretary Kerala Sahitya Akademi Post Box No. 501 Town Hall Road Trichur-680 020 03. The Secretary Thunchan Smaraka Trust Thunchan Parambu Tirur-676 101 Malappuram Dist 04. The General Secretary C.V. Raman Pillai Foundation Kottakkal Sasthamangalam Thiruvananthapuram-695 010 MANIPURI 01. The General Secretary Manipuri Sahitya Parishad Paona Bazar Imphal-795 001 (Manipur) 02. The General Secretary Naharol Sahitya Premee Samiti Keisampat Modhabhavan Imphal-795 001 03. The General Secretary Manipuri Sahitya Parishad, Assam P.O. Silchar-788 001 Dist: Cachar (Assam) 04. The Secretary Manipur State Kala Akademi Khuman Lampak Imphal-795 001 (Manipur) 05. The General Secretary The Cultural Forum Rupmahal Tank Complex Bir Tikendrajit Road P.O. Imphal-795 001 (Manipur) 06. The Secretary Writers’ Forum, Imphal Rupmahal Tank Complex Bir Tikendrajit Road Imphal-795 001 07. The Secretary Manipuri Literary Society C/o Manipur Hindi Parishad Assembly Road Imphal-795 001 MARATHI 01. The Secretary Maharashtra Sahitya Parishad Tilak Road Pune-411 030 02. The General Secretary Vidharbha Sahitya Sangh Jhansi Rani Chowk Sitaburdi Nagpur-400 012 03. The Secretary Maharashtra Sahitya Sabha 698, Mahatama Gandhi Road Indore-452 007 04. The Chief Secretary Mumbai Marathi Sahitya Sangh Sahitya Sangh Mandir Dr. Bhalerao Marg Mumbai-400 004 05. The Secretary Mumbai Marathi Grantha Sangrahalaya 172, Mumbai Marathi Grantha Sangrahalaya Marg Dadar (West) Mumbai-400 014 06. The Secretary Marathwada Sahitya Parishad Sanmitra Colony Aurangabad-431 001 NEPALI 01. The General Secretary Nepali Sahitya Adhyayan Samiti 10, Mayil, Shahid D.B. Giri Path Kalimpong-734 301 Darjeeling (West Bengal) 02. The General Secretary Nepali Sahitya Sammelan 15, Sonam Wangdi Road Darjeeling (West Bengal) 03. The Secretary Nepali Sahitya Parishad Post Box No. 119 G.P.O. Shillong-793 001 (Meghalaya) 04. The General Secretary Nepali Sahitya Parishad, Assam Maliglaon Nepali Mandir Gaushala Guwahati-781 011 05. The Secretary Gorkha Jana Pustakalaya Kurseong-734 203 Dist Darjeeling (West Bengal) 06. The Secretary Nepali Sahitya Parishad Nepali Sahitya Parishad Bhavan Jeevan Theeng Marg Vikas Kshetra Gangtok-737 101 (Sikkim) 07. The President Nepali Sammelan, Delhi B-13, DDA Flats Behind D-6 Lane Vasant Vihar New Delhi-110 057 ORIYA 01. The Secretary Phakir Mohan Sahitya Parishad Shantikanan Mallikashpur-P.O. Matiganj Balasore (Orissa) Pin-756 003 02. The Secretary Prajatantra Prachar Samity Prajatantra Bhavan Cuttack-753 002 03. The General Secretary Sarala Sahitya Sansad Sarala Bhavan Biju Patnaik Chhak Tulsipur Cuttack-753 008 04. The Secretary Lekhaka Sammukhya 9, Station Square Bhubaneswar-751001 05. The Secretary Orissa Writers’ Co-Operative Society Ltd. Qtrs. No. 29/4, Type IV R, Unit –II Near Old Bus Stand, Ashok Nagar Bhubaneswar-751 009 06. The General Secretary Utkal Sahitya Samaj Sri Ramachandra Bhavan Town Hall Road Cuttack-753009 PUNJABI 01. The General Secretary Panjabi Sahit Akademi Panjabi Bhavan, Jagraon Road Ludhiana-141 001 (Punjab) 02. The General Secretary Kendri Punjabi Lekhak Sabha 6, Ashok Nagar Jalandhar-144 002 (Punjab) 03. The General Secretary Punjabi Sahit Sabha 10, Rouse Avenue Institutional Area New Delhi-110 002 04. The General Secretary Panjabi Bhasha Akademi Desh Bhagat Yadgar Hall G.T. Road Jalandhar-144 001 (Punjab) 05. The Secretary Punjabi Sahitya Akademi Kala Bhavan Rose Garden, Sector 16-B Chandigarh 06. The Secretary Punjabi Academy, Delhi DDA Community Centre Motia Khan Paharganj New Delhi-110 055 RAJASTHANI 01. The Secretary Rammat Sansthan 180-B, Laxmi Nagar Jodhpur (Rajasthan) 02. The Secretary Rajasthan Sahitya Samiti Bisau-331 027 (Rajasthan) 03. The Secretary Bharatiya Vidya Mandir Shodh Pratishthan Shri Ratan Bihari Ji Mandir Bikaner-334 001 (Rajasthan) 04. The General Secretary Yugadhara 1 Ga 34, Sector 5 Hiran Magari Udaipur (Rajasthan) 05. The Secretary Charan Sahitya Shodh Sansthan Makarwali Road Ajmer-305 001 (Rajasthan) 06. The Secretary Rajasthani Bhasa Sahitya Evam Sanskriti Akademi Nagari Bhandar Kot Gate Bikaner-334 001 (Rajasthan) 07. The Founder Rupayan Sansthan Via: Pipar City Borunda-342 604 Jodhpur (Rajasthan) SANSKRIT 01. The Secretary Sanskrit Sahitya Parishat 168/1, Raja Dinendra Street Kolkata-700 004 02. The Secretary Samskrita Sahitya Parishad 27, Chinnakadai Street Tiruchirapally-620 002 03. The Director Sanskrit Sushma Anusandhan Sansthan Varanasi Vishwavidhyalay Varanasi (U.P.) 04. The Secretary Bhandarkar Oriental Research Institute Pune-411 004 SANTALI 01. The General Secretary Adibasi Socio-Educational & Cultural Association At./PO: Rairangpur District: Mayurbhanj (Orissa) 02. General Secretary All India Santali Writers’ Association Hansda Bakhol, Model School Road Jhargram-721 507 Dist.: Paschim Medinipur 03. General Secretary Adibasi Socio-Educational & Cultural Association 14/1, Kundu Lane Bhowanipore Kolkata-700 025 SINDHI 01 The President Akhil Bharat Sindhi Boli Ain Sahit Sabha A-26, Saket Colony Adarsh Nagar Jaipur-302 004 02. The Director Indian Institute of Sindhology 2-B/16, Opp. Rly. Station P.B. No. 10 Adipur (Kuchchh)-370 205 TAMIL 01. The Secretary Ilakkiya Chintanai 5 A, Chittaranjan Road Teynampet Chennai-600 018 02. The Secretary Bharathi Tamil Sangham 93A, Rash Behari Avenue Kolkata-700 026 03. The Secretary Thiruvananthapuram Tamil Sangam Tamil Sangam Road Killippalam Thiruvananthapuram-695 002 04. The Secretary Tamil Ilakkiya Peravai Trust 180, Gandhiji Road Erode-638001 (Tamil Nadu) TELUGU 01. The Secretary Andhra Pradesh Abhyudaya Rachayutala Sangam (Arasam) S.R.T. 23, Mushirabad Hyderabad-500 020 02. The Secretary Viswa Sahiti 1-3-1-18A, Kavadiguda Near Kalpana Theatre Secunderabad-500 080 03. The Secretary Andhra Saraswat Parishath Tilak Road Hyderabad-500 001 04. The Secretary Yuva Bharati Andhra Saraswat Parishath Building Tilak Road Hyderabad-500 001 05. The President Siddhartha Kala Peetham Siddhartha Nagar Vijayawada-520 010 URDU 01. The Secretary Urdu Academy, Delhi C.P.O. Building Near Ritz Cinema Near Metro Station Kashmiri Gate Delhi-110 006 02. The Secretary Maharashtra State Urdu Academy D.D. Building, II Floor Old Customs House Shaheed Bhagat Singh Road Mumabi-400 023 03. The Secretary Anjuman Taraqqi Urdu (Hind) ‘Rashid Manzil’ H.I.G. 2, Bada Makan Layout Mysore-570 007 04. The Secretary Idara-e-Adabiyat-e-Urdu Aiwan-e-Urdu Panjagutta Road Hyderabad-500 482 ३ समन्वय २-४ नवम्बर २०१२ इण्डिया हैबीटेट सेन्टर भारतीय भाषा महोत्सव SAMANVAY 2-4 November 2012 IHC INDIAN LANGUAGES' FESTIVAL -समन्वय २०१२: भारतीय लेखनक उत्सव:२-४ नवम्बर २०१२: (इण्डिया हैबीटेट सेन्टर भारतीय भाषा महोत्सव) -एकर साइट अछि http://samanvayindianlanguagesfestival.org -समन्वयक छथि सत्यानन्द निरूपम आ गिरिराज कराडू -उत्सवक निदेशक छथि- राज लिबरहान -उत्सवक एडवाइजरी बोर्डमे छथि-आलोक राय, के.सच्चिदानन्दन, लक्ष्मण गायकवाड, ओम थानवी, महमूद फारूकी, ममता सागर, रवि सिंह, सीतांशु यशचन्द्र, तेमशुला आओ। -आयोजन कमेटीमे छथि- १.इण्डिया हैबीटेट सेन्टरक प्रोग्राम टीम, २.पारस नाथ, अनन्त नाथ। -सहयोगी छथि, दिल्ली प्रेस आ प्रतिलिपि बुक्स। -समन्वय २०११ मे मैथिलीक प्रतिनिधित्व केने रहथि- गंगेश गुंजन। http://samanvayindianlanguagesfestival.org/2011/gangesh-gunjan/ समन्वय २-४ नवम्बर २०१२ SAMANVAY 2-4 November 2012 IHC INDIAN LANGUAGES' FESTIVAL Venue: Indian Habitat Centre, Lodhi Road, New Delhi -- 110 003 http://samanvayindianlanguagesfestival.org/2012/schedule/ http://samanvayindianlanguagesfestival.org/2012/arvind-das/ http://samanvayindianlanguagesfestival.org/2012/gajendra-thakur/ http://samanvayindianlanguagesfestival.org/2012/udaya-narayana-singh/ SAMANVAY 2012 Venue: Indian Habitat Centre, Lodhi Road, New Delhi -- 110 003 2 November 2012 Afternoon 4.00- 4.30: Inauguration By Chandrashekhar Kambar, Ratan Thiyam 4.45 – 5.45: Opening Session: Boli is Back Speakers: Ratan Thiyam, Kashinath Singh, Gurvinder Singh, Nilesh Mishra Moderator: Alok Rai 6.00 – 7.00: Opening Reading Nabaneeta Dev Sen, Sitanshu Yashaschandra, Udaya Narayana Singh, Mamang Dai, Arun Kamal, Arjun Deo Charan, Narender Singh Negi 7.15 – 8.15: Evening Performance Ugana re: Vidyapati by Shovana Narayanan ———————————————————————————————————————————————— 3 Nov 2012 10.30-11.30: Manipuri: The Idea of Nation Speakers: Yumlembam Ibomcha, Dr. Dhanabir Laishram, Bijoykumar Tayenjam Moderator: Robin Ngangom 11.45-12.15: Interaction: Mapping Cities Kashinath Singh, Laxman Gaikwad, Om Thanvi 12.30-1.30 Maithili: Love’s Own Language Speakers: Uday Narayan Singh, Dev Shankar Naveen, Gajendra Thakur Moderator: Arvind Das 2.30 -3.30 Kannada: Tales of Modernities: Small Spaces, Big Ideas Speakers:Gopalkrishna Pai, Banu Mushtaq, B.T. Jahnavi Moderator: Mamta Sagar 3.45-4.15 Interaction Munawwar Rana 4.30-5.30 English: Where’s My Reader? Speakers: Palash Krishna Mehrotra, Biman Nath, S.Hussain Zaidi, Madhuri Banerjee Moderator: Jai Arjun Singh 5.45-6.30: Future of Indian Languages Publishing in Digital Era Speakers:Akshay Pathak, Prem Prakash, Shiva Kumar Moderator: Rahul Dixit 7.00-8.30 Evening Performance: Kashmiri Sufiyana Kalam Gulzar Ahmad Ganie and party ———————————————————————————————————————————————————— 4 November 2012 10.00-11.00 Oriya: Reclaiming Language, Space and Body: Women Writing Speakers: Pratibha Ray, Sarojini Sahoo, Yashodhara Mishra, Aparna Mohanty Moderator: Paramita Satpathy 11.15- 12.15: Folk Performance: Pad Dangal Jagan, Dhavale and others Introduction: Prabhat 12.30-1.30 Marathi: The City of No Outsiders Mumbai Speakers: Arun Sadhu, Hemant Divate Moderator: Prakash Bhatambrekar 2.30-3.30 Kashmiri: My Reality, My Language Speakers: Shahnaz Rasheed, Gulshan Badrani, Elyas Azad Moderator: Nisar Azam 14 3.45-4.15: Interaction Girish Kasaravali, Banu Mushtaq, Mamta Sagar 4.30-5.30: Hindi: Culture and Power: A Tale of Seven Cities (Allahabad, Benares, Bhopal, Delhi, Kolkata, Lahore, Patna) Speakers: Kashinath Singh, Ashok Vajpeyi, Arun Kamal, Alka Saraogi Moderator: Neelabh 5.45- 6.30: Mind Your Language Speakers: Sneha Khanwalkar, Varun Grover, Ratan Rajpoot, Simran Kohli Moderator: Vineet Kumar 6.30 – 7.00: Award Ceremnoy and Closing Speakers: K. Satchidanandan, Raj Liberhan, Paresh Nath, Anant Nath, Satyanand Nirupam, Giriraj Kiradoo 7.15 – 8.30: Evening Performance Solo by Rabbi Shergill ४ राजकमल चौधरी: मोनोग्राफ (सुभाष चन्द्र यादव) जे साहित्य अकादेमी द्वारा रामदेव झा आ मोहन भारद्वाजक कृपासँ प्रकाशित नै भऽ सकल। https://docs.google.com/a/videha.com/viewer?a=v&pid=sites&srcid=dmlkZWhhLmNvbXx2aWRlaGEtcG90aGl8Z3g6NDNiMmVhYThlOTNiMDA5Zg राजकमल चौधरी: मोनोग्राफ (सुभाष चन्द्र यादव) download link https://sites.google.com/a/videha.com/videha-pothi/Home/Rajkamal_Monograph.pdf?attredirects=0&d=1 https://sites.google.com/a/videha.com/videha-pothi/Home/Rajkamal_Monograph.pdf?attredirects=0&d=1 dbb13891-a-96a2f0ab-s-sites.googlegroups.com September 11 at 11:28pm · Like · 1 · Remove Preview Gangesh Gunjan राजकमल जी (विनिबंध)क प्रकरण कान मे पडल तं छल, से कतोक वर्ख भ गेलै आब| मुदा से एहन कुरूप छैक से अहींक एहि फेस बुकिया समाद मे स्पष्ट भेलय| तें एकर धन्यवाद अहीं कें दैत छी गजेन्द्र जी |... ओना वास्तविक तं ई जे सम्पूर्ण पढबा सं पहिने मोन "विरक्त" भ' गेल | नै पढि भेल आगाँ ! नीक केलौहें नेट पर द' क'| समकालीन आ आगत पीढ़ी सेहो बुझओ ई कारी-कथा! हमरा सन लोकक विडम्बना देखू जे पूरा प्रकरण अपन अनुज- मित्र- अग्रज सं जुडल अछि| से एहन ऐतिहासिक दुर्घटना भ' गेल अछि ! उत्तरदायी व्यक्तिगत हम कतहु सं नै | मुदा साहित्यिक पीढ़ीक नैतिकता सं "अपराध बोध" सहबा लेल अभिशप्त छी| उपाय ? सस्नेह,

11 सितम्बर 2012 11:26 pm को, Gajendra Thakur < Thursday at 2:13pm via  · Unlike · 4 Gajendra Thakur गंगेश गुंजन जीक हिम्मत प्रशंसनीय अछि। जँ स्टेटस-को केर विरोध शुरूसँ भेल रहितै तँ परिस्थिति भिन्न रहितै, सए अछि उपाए। ५ विदेह भाषा सम्मान २०१२-१३ (वैकल्पिक साहित्य अकादेमी पुरस्कार रूपेँ प्रसिद्ध) ऐ बेर मूल पुरस्कार(२०१२)-विदेह भाषा सम्मान (प्रसिद्ध समानान्तर साहित्य अकादेमी पुरस्कार) श्री राजदेव मण्डल जीकेँ हुनकर कविता संग्रह "अम्बरा" लेल देल जा रहल छन्हि। राजदेव मंडल अम्बरा-कविता-संग्रह आ हमर टोल (उपन्यास) लिखने छथि। अम्बरा https://sites.google.com/a/videha.com/videha-pothi/Home/Ambara_Rajdeo_Mandal.pdf?attredirects=0  सँ आ हमर टोल https://sites.google.com/a/videha.com/videha-pothi/Home/HammarTol_Rajdeo_Mandal.pdf?attredirects=0  सँ डाउनलोड कएल जा सकैत अछि। http://www.videha.co.in/  पर भऽ रहल ऑनलाइन वोटिंगमे ऐ पोथीकेँ सभसँ बेशी वोट भेटलै। बाल साहित्य लेल विदेह सम्मान २०१२- श्री जगदीश प्रसाद मण्डल जी केँ हुनकर बाल-प्रेरक विहनि कथा संग्रह "तरेगन" लेल ई पुरस्कार देल जा रहल अछि। ई पुरस्कार विदेह नाट्य उत्सव २०१३ क समारोहमे देल जाएत। “तरेगन” केँ सभसँ बेशी वोट भेटलै। तीनटा पोथी १.जगदीश प्रसाद मण्डलक तरेगन, २. जीवकान्तक “खिखिरक बीअरि” आ ३.मुरलीधर झा क “पिलपिलहा गाछ” केँ विदेह www.videha.co.in  पर भऽ रहल ऑनलाइन वोटिंगमे राखल गेल छल। विशेषज्ञक मतानुसार “पिलपिलहा गाछ”मे बहुत रास कथा अछि जकरा बाल कथा नै कहल जा सकैए, तइ दुआरे ऐ पोथीकेँ लिस्टसँ हटा देल गेल कारण ई पुरस्कार बाल साहित्य लेल अछि, ओनाहितो ऐ पोथीकेँ सभसँ कम वोट भेटल रहै। ऐ पोथी सभक अतिरिक्त आन पोथी सभपर विचार नै कएल गेल कारण ओ सभ पोथीक आकारक नै वरन् बुकलेटक आकारक छल। ६ साहित्य अकादेमीक टैगोर लिटरेचर अवार्ड २०११ मैथिली लेल श्री जगदीश प्रसाद मण्डल केँ हुनकर लघुकथा संग्रह "गामक जिनगी" लेल देल गेल। कार्यक्रम कोच्चिमे १२ जून २०१२केँ भेल। मैथिली लेल विवादक अन्तक कोनो सम्भावना नै देखबामे आबि रहल अछि। ऐ पुरस्कारक ग्राउण्ड लिस्ट बनेबा लेल एकटा तथाकथित साहित्यकारकेँ चुनल गेल जे प्राप्त सूचनाक अनुसार जातिक आ संकीर्णताक आधारपर पोथीक नाम देलन्हि जाइमे नहिये नचिकेताक पोथी रहए, नहिये सुभाष चन्द्र यादवक आ नहिये जगदीश प्रसाद मण्डलक; संगहि ई ग्राउण्डलिस्ट बनौनिहार तथाकथित साहित्यकार विदेहक सहायक सम्पादक मुन्नाजीकेँ कहलन्हि जे जगदीश प्रसाद मण्डलकेँ ऐ जिनगीमे टैगोर साहित्य पुरस्कार नै देल जेतन्हि!। रेफरी जखन ७ टा पोथीक नाम पठेलन्हि तखन ओइमे चन्द्रनाथ मिश्र "अमर"क अतीत मंथन सेहो रहए जखन कि ओ पोथी निर्धारित अवधि २००७-२००९ मे छपले नै अछि, तँ की बिनु देखने पोथी अनुशंसित कएल गेल? ऐ तरहक ग्राउण्ड लिस्ट बनेनिहार आ बिनु पढ़ने पोथी अनुशंसित केनिहार रेफरीकेँ साहित्य अकादेमी चिन्हित करए, आ नाम सार्वजनिक कऽ स्थायी रूपसँ प्रतिबन्धित करए, से आग्रह; तखने मैथिलीक प्रतिष्ठा बाँचल रहि सकत। एतए ईहो तथ्य अछि जे साहित्य अकादेमीक मैथिली विभागक संयोजक श्री विद्यानाथ झा विदित अखन धरि ने पुरस्कार भेटबाक सूचने आ ने पुरस्कार लेल बधाइये श्री जगदीश प्रसाद मण्डलजी केँ देलन्हि अछि जखनकि मण्डल जी पुरस्कार लऽ कऽ घुरि कऽ आबियो गेल छथि; संगहि टैगोर साहित्य पुरस्कार मैथिली लेल पहिल बेर श्री जगदीश प्रसाद मण्डल जीकेँ देल जएबा सम्बन्धमे दरभंगा आकाशवाणी कोनो प्रकारक सूचना प्रसारित नै केलक आ दरभंगा, मधुबनी आदिक हिन्दी समाचार-पत्र सेहो ऐ सम्बन्धमे कोनो समाचार प्रकाशित नै केलक जखनकि देशक सभ राष्ट्रीय अंग्रेजी पत्र ( http://esamaad.blogspot.in/2012/06/tagore-literature-awards-national-media.html ) एकर सूचना बिनु कोनो अपवादक प्रकाशित केलक। साहित्य अकादेमीक मैथिली विभागक, आकाशवाणी दरभंगाक आ दरभंगा-मधुबनीक हिन्दी समाचार पत्रक पत्रकार लोकनिक संकीर्ण जातिवादी चेहरा नीक जेकाँ सोझाँ आबि गेल। मुदा ई तँ मात्र प्रारम्भ अछि। साहित्य अकादेमीक मैथिली विभागक असली चेहरा तखन सोझाँ आओत जखन ऐ बर्खक मूल साहित्य अकादेमी पुरस्कारक घोषणा हएत। श्री जगदीश प्रसाद मण्डल जीक "गामक जिनगी" मैथिली साहित्यक इतिहासक सर्वश्रेष्ठ लघु कथा संग्रह अछि। जगदीश प्रसाद मण्डल जीकेँ बधाइ। सूचना (स्रोत समदिया): टैगोर साहित्य पुरस्कार दक्षिण कोरियाक एम्बैसी (स्पॉन्सर सैमसंग इण्डिया लिमिटेड) क आग्रहपर साहित्य अकादेमी द्वारा शुरू कएल गेल अछि। टैगोर साहित्य पुरस्कार गुरुदेव रवीन्द्र नाथ ठाकुरक १५०म जयन्तीक उपलक्ष्यमे शुरू भेल छल। सभ साल ८ टा भाषा आ तीन सालमे साहित्य अकादेमी द्वारा मान्यता प्राप्त सभटा २४ भाषाकेँ ऐमे पुरस्कृत कएल जाइत अछि। मैथिली लेल ई पुरस्कार पहिल बेर देल जा रहल अछि। गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुरक १५०म जयन्तीक उपलक्ष्यमे साहित्य अकादेमी आ सैमसंग इडिया (सैमसंग होप प्रोजेक्ट) द्वारा २००९ ई. मे स्थापित कएल गेल छल टैगोर साहित्य पुरस्कार। २४ भाषाक श्रेष्ठ पोथीकेँ तीन सालमे पुरस्कार (सभ साल आठ-आठ भाषाक सर्वश्रेष्ठ पोथीकेँ एक सालमे पुरस्कार) देल जाएत। पुरस्कारमे प्रत्येककेँ ९१ हजार टाका आ प्रशस्ति-पत्र देल जाइत अछि। चारिम साल पहिल सालक आठ भाषाक समूहक फेरसँ बेर आएत। टैगोर जयन्तीक लगाति अवसरपर ई पुरस्कार देल जाइत अछि।

टैगोर साहित्य पुरस्कार २००९ बांग्ला, गुजराती, हिन्दी, कन्नड, काश्मीरी, पंजाबी, तेलुगु आ बोडो भाषामे २००५ सँ २००७ मध्य प्रकाशित पोथीपर देल गेल। -बांग्ला (आलोक सरकार, अपापभूमि, कविता) -गुजराती ( भगवान दास पटेल, मारी लोकयात्रा) -हिन्दी (राजी सेठ, गमे हयात ने मारा, कथा संग्रह) -कन्नड (चन्द्रशेखर कांबर, शिकारा सूर्य, उपन्यास) -काश्मीरी (नसीम सफाइ, ना थसे ना आकास, कविता) -पंजाबी (जसवन्त सिंह कँवल, पुण्य दा चानन, आत्मकथा) -तेलुगु (कोवेला सुप्रसन्नाचार्य, अंतरंगम, निबन्ध) -बोडो (ब्रजेन्द्र कुमार ब्रह्मा, रैथाइ हाला, निबन्ध)

टैगोर साहित्य पुरस्कार २०१० असमी, डोगरी, मराठी, ओड़िया, राजस्थानी, संथाली, तमिल आ उर्दू भाषामे २००६ सँ २००८ मध्य प्रकाशित पोथीपर देल गेल।

-असमी (देवव्रत दास, निर्वाचित गल्प) -डोगरी (संतोष खजूरिया, बडलोनदियन बहारां) -मराठी (आर. जी. जाधव, निवादक समीक्षा) -ओड़िया (ब्रजनाथ रथ, सामान्य असामान्य) -राजस्थानी (विजय दान देथा, बातां री फुलवारी) -संथाली (सोमाइ किस्कू, नमालिया) -तमिल (एस. रामकृष्णन, यामम) -उर्दू (चन्दर भान खयाल, सुबह-ए-मश्रिक-की अजान)

टैगोर साहित्य पुरस्कार २०११ मैथिली, अंग्रेजी, कोंकणी, मलयालम, मणीपुरी, नेपाली आ सिंधी लेल २००७ सँ २००९ मध्य प्रकाशित पोथीपर देल गेल। संस्कृत लेल पुरस्कार नै देल जा सकल। -मैथिली (जगदीश प्रसाद मण्डल, "गामक जिनगी") -अंग्रेजी (अमिताव घोष, "सी ऑफ पॉपीज") -कोंकणी (शीला कोलाम्बकर, "गीरा") -मलयालम (अकितम अचुतम नम्बूदरी, "अंतिमहक्कलम") -मणीपुरी (एन. कुंजामोहन सिंह, "एना केंगे केनबा नट्टे") -नेपाली (इन्द्रमणि दरनाल, "कृष्णा-कृष्णा") -संस्कृत- -सिंधी (अर्जुन हसीद, "ना इएन ना") जगदीश प्रसाद मंडल, जन्म ५ जुलाइ १९४७। गाम-बेरमा, तमुरिया, जिला-मधुबनी। एम.ए.। कथाकार (दीर्घकथा संग्रह- शंभुदास; लघुकथा संग्रह १.गामक जिनगी, २. अर्द्धांगि‍नी..सरोजनी.. सुभद्रा.. भाइक सिनेह इत्‍यादि; आ तरेगन -बाल-प्रेरक विहनि कथा संग्रह); नाटककार (१.मिथिलाक बेटी, २.कम्प्रोमाइज, ३.झमेलिया वियाह आ ४.एकांकी-संचयन); उपन्यासकार(मौलाइल गाछक फूल, जीवन संघर्ष, जीवन मरण, उत्थान-पतन, जिनगीक जीत- उपन्यास) आ कवि (१.इन्द्रधनुषी अकास, २.गीतांजलि आ ३.राति-दिन। मार्क्सवादक गहन अध्ययन। हिनकर कथामे गामक लोकक जिजीविषाक वर्णन आ नव दृष्टिकोण दृष्टिगोचर होइत अछि। गामक जिनगी, लघुकथा संग्रह लेल विदेह समानान्तर साहित्य अकादेमी पुरस्कार २०११ मूल पुरस्कार, आ टैगोर साहित्य सम्मान २०११; आ बाल-प्रेरक विहनि कथा संग्रह "तरेगन" लेल बाल साहित्यक विदेह सम्मान २०१२ (वैकल्पिक साहित्य अकादेमी पुरस्कार रूपेँ प्रसिद्ध) प्राप्त। अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। २. गद्य २.१.रामभरोस कापडि भ्रमर-यात्रा प्रसंग- ह्वेन सांगसं चीनमे भेंटघांट २.२.जगदीश प्रसाद मण्‍डल-पाँचटा वि‍हनि‍ कथा २.३.नागेन्द्रकुमार कर्ण-सुजित कुमार झा पर २.४.खुशबू झा-रुपाली २.५.डॉ. कैलाश कुमार मि‍श्र- मेवाड़ आ मालवाक सांझी लोककला : एक परि‍चय २.६.गजेन्द्र ठाकुर- विद्यापति: किछु प्रचलित कुप्रचारक निराकरण (भाग-३) २.७.जगदानन्द झा मनु- प्रेमक बलि रामभरोस कापडि भ्रमर यात्रा प्रसंग

ह्वेन सांगसं चीनमे भेंटघांट हमसभ हाइस्कूलक पाठ्यक्रममे ह्वेनसांगकेँ सम्बन्धमे पढैत छलहुँ । चिनी यात्रीसभ भारतधरि पहुँचि बौद्धधर्मक ग्रन्थसभकेँ संकलन कऽ चीन लऽ गेल छल । विकट वाट–अथक यात्री । महिनोक सफर । हमसभ चीनक सांस्कृतिक राजधानी सियानमे आबि गेल छी । विजिंगसं दूघंटाक उडानक बाद काल्हिए एत्त आएल रही । आसीन ७ गतेसं नेपाल प्रज्ञा प्रतिष्ठानक नौ सदस्यीय प्रतिनिधि मण्डल सात दिनक चीन भ्रमणमे अछि । सात गते काठमाडौसं चायना ईस्टर्न एयरलायन्ससं हमसभ कुनमिंग आयल रहीआ ओत्तसं ओही दिन विजिंग पहुंचल रही राति ११ बजे करिब । विजिंगमे तीन दिन रहि क काल्हि चीनक सांस्कृतिक राजधानी सियान आयल रही । आ आई सियानक बासी रहल ह्वेन सांगक विशिष्ट कृतित्वक अध्ययनमे लागल छी । सरिपहुं आइ एकटा विशिष्ट व्यत्तित्वक कृतित्वसँ साक्षात्कारक समय छल । हमर चुलबुले गाइड मोनिका (पश्चिमी नाम) हमरासभकेँ डा.सीन टेम्पलमे लऽ जा रहल छली । एतय ओकरे शब्दमे सियान जौैंग अर्थात हमसभ जकरा ह्वेन सांग कहैत छिएै,क बासस्थान, कृतिसभसँ परिचय कराबय लेल ओ बेसब्र छलीह, मन्दिर बनौल गेल जत्त ओ बौद्ध कृतिसभक चिनी अनुवाद कएलन्हि । हुनक अनुवाद कएल किछु कृति ओतहि राखल अछि । भारतसँ घुरलाक बाद तत्काले सम्राटद्वारा कएल गेल स्वागत आ अन्य क्रियाकलापसभ देवालपर लिखल भव्य चित्रसभ बताबि रहल छल । प्रकोष्ट भितर ह्वेन सांगकेँ भव्य प्रतिमा सेहो स्थापित अछि । तहिना बाहर कम्पाउण्डमे सेहो हुनक विशाल प्रतिमा राखल गेल अछि । ओ सियानके बासी छलाह । तएँ सियानवासी हुनका बहुत बेसी सम्मान करैत अछि आ हुनका स्मृतिकेँ सम्बद्र्धन करएमे दत्तचित्त भऽ लागल अछि । ११९ ई सन पूर्व सियानमे बेस्टर्न हान डाइनेस्टी समय दिस सिल्क कारोबार ओतय होइत छल । पाछु इएह सिल्क व्यापार सियान होइत समुद्रतट धरि पसरल । ई व्यापारिक बाट पाछु सिल्करोडक नामसँ प्रसिद्ध भऽ गेल । जखन चीनमे सन २५ दिस इस्टर्न हान पिरियडक समयमे भारतीय बुद्धिज्म चीनमे प्रवेश पौलक , सम्भवतः ओकर बाट सेहो इएह सिल्करोडे छल । तांग राजवंशक प्रारम्भिक समय ६२९ सन दिस ह्वेन सांग ओएह सिल्करोड होइत भारतधरिक यात्रा कएने छलाह —बुद्ध साहित्य,दर्शन प्राप्त करबा लेल ।ओ सन ६४५ मे सियान घुरलाह आ बडका ध्ष्मि नययकभ एबनयमब या म्ब ऋष्भल त्झउभि कँ निर्माण भेल । ह्वेनसांग सन ६०० मे जन्मल छलथि , ६१३मे बौद्ध भिक्षु बनलान्ह, ६२९ सँ ६४५ धरि भारत भ्रमण कएलन्हि, ६४५ सँ ६६४ धरि बौद्ध साहित्यक अनुवाद कएलन्हि , सन ६६४ मे हुनक देहाबसान भ गेलन्हि । हमरासभकेँ विस्तारपूर्वक ओहि पैगोडाकेँ जानकारी प्राप्त भेल । मनमे उठल अनेको जिज्ञाशाकेँ सेहो शान्त करबाक अवसर पौलहुँ । चीनमे देखय लायक बहुत चीज अछि । आठ हजार ई.पूर्वधरिक अवशेषसभ संग्रहालयमे देखलहुँ तऽ ३००० सँ ५००० हजारधरि ई पूर्वक साबूत आ विकसित सामग्रीसभ देखलाक बाद सभ्यता आ संस्कृतिक विकासमे चिनियां भूमि अन्य क्षेत्रसँ आगां आ बेसी सम्पन्न किए अछि से आभास होइत अछि । आव विश्वास होइत अछि जे लिपिक विकास किया चीनेमे भेल छल । चीन भ्रमणक एहि प्रसंगमे अनेकौं ऐतिहासिक तथ्यसभसं साक्षात्कार करबाक अवसर भेटल । तखन लागल चीन मात्र सातम् आश्चर्यक लेल मात्र नहि, अपना भितर अनेकौ आश्चर्यसं भरल सामग्रीसभ संरक्षित क रखने अछि, जकरा देखा क एखन आर्थिक उपार्जन मात्रे नहि अपन परम्परा आ सांस्कृतिक सम्पदाकें विश्वकें अगाडी समधानि क प्रस्तुत करबाक पैघ काजसेहो क रहल अछि । चीनक विकासक गति ठीके प्रशंशायोग्य मानल जएबाक चाही । ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ।  जगदीश प्रसाद मण्‍डल पाँचटा वि‍हनि‍ कथा- पुरनी भौजी बीस दि‍न बरि‍साइत भेनौं धुर-झाड़ आम पाकब शुरू नै भेल अछि‍। बि‍नु बरखाक गरै जकाँ मेघक रूखि‍ पकड़लक। दसो पोता-पोतीकेँ नेने पुरनी भौजी रोहनि‍या आमक झमटगरहा गाछ लग बैस दसोकेँ कहलखि‍न- “जे पहि‍ने पाओत से मीरा, जे दोसर पाओत से दोहल, जे तेसर पाओत से तेहल आ जे चारि‍म पाओत से चौहल।” पुरनी भौजीकेँ तीनटा बेटा छन्‍हि‍। बि‍नु गहबर गेनौं पोती-पोतीक ढवाहि‍ लागल छन्‍हि‍। बच्‍चा देखि‍ माएक ममता तँ स्‍वाभावि‍क अछि‍। बाप तँ भरि‍ दि‍न बोनाएले रहै छथि‍। दस बर्खक पोता जे मि‍ड्ल स्‍कूलमे पढ़ैए; टेटि‍याह सुग्‍गा जकाँ टाहि‍ मारलक- “मीरा माने कि‍ भेल?” बि‍हाड़ि‍ तँ बि‍ड़हा गेल मुदा हवाक सि‍हकी उठल। ढेनुआर जकाँ धऽ कऽ भरभड़ा गेल। के पहि‍ने पौलक तेकर ठेकाने ने रहल। ~ पोखला कटहर पान सए रूपैआ खर्च भेला पछाति‍ झबरी काकीकेँ आधा छूटपर एक हजार रूपैआ बैंकसँ लोन भेटलनि‍। अखन धरि‍क जि‍नगी बोनि‍-बुत्ताक रहलनि‍ तँए ओहन रोजगार चाहैत रहथि‍ जे कए सकथि‍। ओना घरे लग रोजगरि‍नी सभ छन्‍हि‍ मुदा जाति‍क वि‍भाजन काजेाकेँ कम सक्कत वि‍भाजि‍न नै केने अछि‍। तँए लगमे रहि‍तो अनाड़ीक-अनाड़ि‍ये झबड़ी काकी। मुदा पुछबो केकरा करथि‍न। एक हजार रूपैआक बात अछि‍। के केना झपटि‍ लेतनि‍ तेकर ठीक नै। काकीक घरक आगू रस्‍तापर देने श्‍याम जाइत रहथि‍ हुनका देखि‍ते काकी टोकि‍ देलखि‍न- “बौआ सि‍याम, तोहीं सभ ने बेटा-भातीज भेलह। रोजगार करैले एक हजार रूपैआ लोन देलक हेन।” झबड़ी काकीक बात सुनि‍ श्‍याम नजरि‍ खि‍रौलनि‍। बगलेमे देखि‍ कहलखि‍न- “पचहीवालीकेँ सोर पाड़ि‍यौ।” पचहीवालीकेँ अबि‍ते श्‍याम कहलखि‍न- “भौजी, अहाँ अपना संगे तरकारी बेचैक लूरि‍ सि‍खा दि‍औ। अपनो कि‍छु पूँजी भइये गेलनि‍। एेबेर तत्ते आम फड़ल अछि‍ जे कटहरकेँ के पूछत। ओना बेसी फड़ने पौखुलाहे कटहर बेसी अछि‍ मुदा चौथाइ कमाइ लऽ कऽ बेचि‍ लि‍अ।” ~ सरही सौबजा दि‍न भरि‍ सात गोटेक संग झंझरपुरि‍या-बेपारी आम तोड़ि‍, काँच-पाकल, फुटल बेरा टोकड़ी बना, ट्रकक प्रति‍क्षामे टहलैत गामक चाहक दोकानपर आबि‍ अनेरे बजैत- “एहेन ठकान जि‍नगीमे नै  ठकाएल छलौं, जेहेन आइ ठकेलौं?” चाहे दोकानक छर्ड़ा बूझि‍ आनो-आन छर्ड़ा छोड़ैत- “झंझरपुरि‍या तँ इलाकाकेँ ठकैए, ओकरा ठकि‍ लेत हमर गौआँ?” बेपारि‍योकेँ मनमे कि‍छु रहै तँए पाछू हटैले तैयार नै। बत-कटौवलि‍ एहेन चलि‍ गेल जे ने एकोटा ऐ गामक नीक अछि‍ आ ने झंझरपुरि‍या। बोलीक मारि‍ तँ धुड़-झाड़ होइत, मुदा आगू बढ़ैक साहस कि‍यो ने करए। एकटा गामक प्रति‍ष्‍ठा बूझि‍ दोसर घोड़न-कटान बूि‍झ। ओना चौकक रोहानी ठीक रहै कि‍एक तँ सूर्यास्‍तक समए रहए। जटा भाय चौकक रोहानी देखि‍ते चाहे दोकानपर बैसलाह। सामाजि‍क प्रश्न तँए हस्‍तक्षेप कएल जा सकै छै। बजलाह- “कथीक घोंघाउज छी?” झंझारपुरबला-बेपारी- “अहीं गाममे लखनजी सँ पाँच हजारमे सौबजा आमक एकटा गाछ लेने छलौं तइमे ठकि‍ लेलनि‍।” अपन चर्च सुनि‍ लखनजी सेहो मोबाइलि‍क दोकानपर सँ चाहक दोकानक आगूमे आबि‍ ठाढ़ भेला। बेपारीक प्रश्न उठि‍ते लखनजी पुछलखि‍न- “कि‍ ठकि‍ लेलौं, बाजू।” बेपारी- “कलमी बूझि‍ लेने छलौं, सरही दऽ ठकि‍ लेलौं? लखनजी- “कत्तेमे नेने छलौं कत्ते के आम भेल?” “से तँ नफगर अछि‍, पाँच हजारमे लेने छलौं। खर्च-बर्च काटि‍ कहुना पाँच हजार बचबे करत?” जटा भाय- “तखन जे एना बजै छी से उचि‍त भेल?” बेपारी- “हमर बात दोसर अछि‍। सौबजा कलमी होइ छै। हि‍नकर अॅठि‍आहा छि‍यनि‍, माने सरही छि‍यनि‍। ओना साइजोमे ठीक छन्‍हि‍।” जटा भाय- “अहाँ केना बुझै छी जे मुँह-नाक एक रहि‍तो सरही छी?” बेपारी- “जटा काका, अहूँ भासि‍ जाइ छी। कहुना भेलौं तँ बेपारी भेलौं कि‍ ने। कुमारि‍-बि‍औहि‍तीक भाँज जँ नै बुझबै तँ घटकैती कएल हएत।” ~ तेरहो करम अबेर कऽ भाँज लगने कनटीर काका खेत देखए नै गेला। ओना मनमे उठलनि‍ मुदा भदवारि‍ जानि‍ नै गेला। वि‍चारि‍ लेलनि‍ जे इजोरि‍या छीहे भोरगरे देखि‍ लेब। छगाएल मन साढ़े तीनि‍ये बजे नीन टूटि‍ गेलनि‍। नीन टुटि‍ते नजरि‍ दौड़ कऽ काज पकड़ि‍ लेलकनि‍। तीन-हत्‍थी ठेंगा लऽ बाध दि‍स वि‍दा भेलाह। श्रीवि‍धि‍ खेती लेल जे धानक बीआ भेटल छलनि‍ वएह धान। रौदीक कि‍रतबे वि‍धि‍ तँ भंग भऽ गेलनि‍ मुदा सए रूपैये घंटा पटा बीघा भरि‍ खेती केलनि‍। संयोगो नीक बैसलनि‍। कोसी नहरि‍क पहि‍ल पानि‍ हाथ लगने सुतरलनि‍। नबे दि‍नक पाकल धानमे भरि‍ जाँघ पानि‍, चुट्टी-पीपड़ीसँ लदल सीस देखि‍ कनटीर काकाक मन चोटसँ चोटाए लगलनि‍। असहाज होइते बमछैत घर दि‍स घूमि‍ गेलाह। मोहनलालक घर लग अबि‍ते आरो बमकि‍-बमकि‍ बमछी छोड़ए लगलाह। आँखि‍ मीड़ि‍ते मोहनलाल अंागनसँ नि‍कलि‍ लगमे आबि‍ पुछलक‍नि‍- “काका, एना कि‍अए भोरे-भोर बमकै छि‍ऐ?” ओना कनटीर काका आ मोहनलालक उमेरक दूरी बीस बर्खसँ बेसी हटल मुदा वि‍चारक दूरी लगीच बनौने तँए दुनूक बात दुनू सुनबो करै छथि‍, कहबो करै छथि‍न आ मानवो तँ करि‍ते छथि‍। बमकी सुनि‍ कनटीर काका ठमकि‍ गेला। ठमकैत बजला- “की कहि‍यऽ बौआ, परसू धान काटि‍ तोड़ बागु करैक वि‍चार केने छलौं। तोहूँ तँ खेती करि‍ते छह, तोहीं कहह जे धानक-नारक कि‍ गति‍ हएत, छनुआमे कते भीड़ होइ छै से कि‍ कोनो नै बुझै छहक। तइपर कहि‍या खेतक पानि‍ सूखत आ कि‍ फेर दोहरा कऽ पानि‍ औत तेकर कोन ठेकान छै?” कनटीर काकाक दहलाइत छातीकेँ खढ़ फेक असथि‍र करैक वि‍चार मनमे उठि‍ते मोहनलाल बाजल- “डुमैक कोन अाशा करै छी उगैक आस करू।” मोहनलालक तोष जते संतोष देलकनि‍ तइसँ बेसी असंतोष बनौलकनि‍। मनमे एलनि‍ जे एक तँ ठेकानि‍ कऽ नहरक पानि‍ नै अबैए तइपर जे छहरक बान्‍ह-छेक नि‍यमि‍त नै अछि‍। सरकार कहत जे कानून अपना हाथमे नै लि‍अ। बजलाह- “एको कर्म बाकी नै रहत। तेरहो कर्म भइये जाएत। सबहक नजरि‍ दैछने खाइपर लटकल छै से केना उतरतै?” मोहनलाल- “काका, कूदै-फानै तोड़ै तान, से राखए दुनि‍याँक मान’ बि‍सरि‍ गेलऐ?”‍ कि‍छु मन पाड़ैत कनटीर काका बजलाह- “हौ छोड़ि‍यो केना देब, अकाल मृत्‍यु केना हुअए देब।” ~ डुमैत ि‍जनगी डुमैत कारोबार देखि‍ झड़ीलाल डुमैत जि‍नगी, जहि‍ना ओछाइनपर पड़ल चारक कोरो-बत्ती लोक देखैत तहि‍ना देखि‍ रहल छथि‍। तड़पैत मन बेथि‍त भऽ दुनि‍याँ नि‍हारि‍ते बुदबुदेलनि‍- “एतेटा दुनि‍याँमे अपन कि‍छु ने रहल।” मुदा लगले मन ठमकि‍ गेलनि‍। जि‍नगी तँ परती खेत जकाँ नै अछि‍ जे जेमहरसँ तेमहर जेबाक हुअए ति‍म्‍हरे-सँ-ति‍म्‍हर कोना-कोनाी रस्‍ता बना लि‍अ। जि‍नगीक तँ नाप अछि‍। ओना पचास बर्खक झड़ीलाल अखन धरि‍ हारि‍ मानैले तैयार नै छलाह मुदा एकाएक मृत्‍युक समीप देखि‍ थर-थरा गेलाह। हारि‍ नै मानैक कारण छलनि‍ जे जे गौरव गाममे केकरो नै देखैत छलाह ओ अपनामे देखैत छलाह। ओ छि‍यनि‍ समैया फसि‍ल जकाँ भि‍न्न-भि‍न्न नाओं। अनेको नाओंसँ अपन प्रति‍ष्‍ठा बनौने छथि‍। कि‍यो बेपारी भाय, तँ कि‍यो डाक्‍टर भाय, कि‍यो दि‍लीप भाय कहैत छन्‍हि‍। मुदा स्‍त्रीगणक बीच झड़-झड़हा नाओं चलैत। यएह छलनि‍ झड़ीलालक जि‍नगीक मान-प्रति‍ष्‍ठा। मुदा जे होउ झड़ीलाल अपनाकेँ मेहनती बेपारी जरूर बुझै छथि‍। सालमे तीन-चारि‍ जोड़ मुइल-टुटल बड़द (गाड़ीक टुटल, घास-पानि‍क टुटल, रोगाएल इत्‍यादि‍) सस्‍तामे आनि‍, दुनू परानी जमि‍ कऽ सेवा करै छथि‍ आ डेढ़ि‍या-दोबरमे बेचि‍ अपना जीवि‍काक आधार बनौने छथि‍। घूमै-फि‍ड़ैबला छथि‍ये तँए तीनू बेटीक बि‍आह एहेन नजरि‍ये कऽ लेने रहथि‍, जे कहि‍यो भार नै बुझलनि‍। अंति‍म खेप माने ऐ खेपमे ठका गेलाह। आठे दि‍न खूँटापर बड़द अनला भेलनि‍ कि‍ पाँचे दि‍नक बीच जोड़ो भरि बड़द‍ मरि‍ गेलनि‍। खूँटापर पड़ल मरल बड़द लग बैसल दुनू परानी झड़ीलाल। अक-वक बन्न। तरसैत मन कलपैत देवसुनरि‍क, जहि‍ना रौद, पानि‍ वा शीतमे सि‍ताएल चि‍ड़ै पाँखि‍ फड़फड़बैत; तहि‍ना मन फुड़फुड़ेलनि‍- “भगवान हाथक काज छीन लेलनि‍?” पत्नीक बातक उत्तर झड़ीलालकेँ नै फुड़लनि‍। फुड़बो केना करि‍तनि‍, जि‍नगीमे कहि‍यो पहरनि‍याँ देवीक पूजा पहाड़पर चढ़ि‍ नै केने छलाह। मुदा तैयो घिंघि‍याइत स्‍पष्‍ट उत्तर देलखि‍न- “दुनि‍याँ बड़ीटा छै, एकटा काज छि‍नाएल दोसर-तेसर-चारि‍म ताकि‍ लेब।” पति‍क उत्तरसँ देवसुनरि‍केँ झॅपन-तोपन बरसाती सूर्य जकाँ अाशाक कि‍रण फुटलनि‍, मुदा लगले फेर तोपा गेलनि‍। बजली- “काज ले तँ लूरि‍ चाही, से....?” ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। नागेन्द्रकुमार कर्ण सुजित कुमार झा पर कहल जाइत अछि, इख नहि भेल मनुष्य आ विष नहि भेल साँप कोन काजकेँ । तहिना साहित्यमे सेहो होइत अछि । कवि, लेखक अथवा साहित्यकार कहए चाहने बात पाठक अथवा श्रोता नहि वुझिसकल तऽ ओकर कोन अर्थ ? एकटा लेखक कहए चाहने अथवा देबए चाहने सन्देश श्रोता वा पाठक अनुसार फरक फरक हएत मुदा विनु सन्देशक ओ साहित्य विनु काजक होइत अछि । ओहन साहित्य चिरस्थायी सेहो नहि होइत अछि । मनोरञ्जनक लेल मात्र सिमित रहैत अछि । नहि तऽ ओहिकेँ लेल कवि, लेखक अथवा साहित्यकारकँे भरमग्दुर प्रयत्न करए पड़ैत अछि । अपन रचनाकँे चिरस्मरणीय बनाबए तथा ओहिकँे सान्दर्भिकताक लेल साहित्यकारकँे बहुत प्रयत्न करए पड़ैत अछि । तएँ आबए बला पुस्तासभक समयमे सेहो ओ रचनाक सान्दर्भिकता रहौक । हालहि मैथिली साहित्यक नवउदयीमान कथाकार एवं पत्रकारसुजीतकुमार झाक कथा संग्रह जिद्दीक सम्बन्धमे किछु लिखबाक प्रयत्न कएने छी । इएह भादव २३ गते महोत्तरी जिल्लाक जलेश्वर स्थित नेपाल पत्रकार महासंघ महोत्तरी शाखाक सभाहलमे आयोजित समीक्षा तथा परिचयात्मक कार्यक्रममे उठल सवालसभकेँ सेहो मनन कएलहुँ आ ई कथा संग्रह पढि कऽ अपन मोन भितर उठल बातसभकँे एतह रखवाक प्रयास कएलहुँ अछि । साहित्यकँे विविध विधासभमे सँ कथा विधा सेहो एक अछि । गद्य विधाकेँ एक सशक्त आ छोट समयमे पढि कऽ सम्पन्न करय बला आ प्रशस्त सन्देश देवाक सामथ्र्य कथामे होइत अछि । कविशेखर ज्योतिरीश्वर ठाकुर सँ शुरु भेल मैथिली साहित्यकँे गद्य अखन धरि अनवरत रुपमे आगु बढि रहल अछि आ गद्यकँे एक सशक्त विधा कथा रहल अछि । कथामे कोनो एक पक्षक बातकेँ उठाओल गेल अछि जे ई विधा पुरान मानल जाइत अछि । । पहिने–पहिने उपदेशात्मक कथासभ, नैतिक कथासभ, परिक कथासभ , भगवान आ दैत्यक कथासभ सुनाओल जाइत छल । धीरे धीरे सामाजिक घरातलक यर्थाथताकेँ समेटि कऽ यर्थातवादी कथासभ लिखाए लागल । मैथिली कथा साहित्यकेँ बात कएल जाए तऽ बहुत लम्बा परम्परा नहि रहलाक बादो एहिकँे गुणात्मक रुपमे नीक स्थिती रहल अछि । संस्कृतक कथासभकँे अनुवाद सँ शुरु भेल मैथिली कथा साहित्यकँे शुरुवात पत्रपत्रिका सँ भेल तथ्य रहल अछि । मैथिली पत्रपत्रिकाक प्रकाशन संगहि मैथिली कथा साहित्यकँे शुरुवात भेल मैथिली साहित्यिक इतिहास पुस्तकमे उल्लेख अछि । बासुदेव ठाकुरक सप्तध्याधा सँ शुरुवात भेल मैथिली कथा साहित्यकँे इतिहास अखन धरि रातो नदिमे बहि रहल पानि जेकाँ अछि । कोनो नदिमे जहिना बाढि अबैत अछि आ चलि जाइत अछि । ओहिना साहित्यमे सेहो प्रकाशनक बाढि आएल आ सुखाएल । संख्यात्मक रुपमे ओतके कथा संग्रहक प्रकाशनसभ नहि रहलाक बादो गुणात्मक रुपमे कोनो भाषा सँ मैथिली कथाक स्तरीयता कम नहि अछि । कथाक विभिन्न वादसभमे मैथिली साहित्यकारसभ कलम चलौने देखल गेल अछि । बासुदेव ठाकुरक सप्तध्याधा सँ शुरु भेल मैथिली कथा साहित्य लेखनीक इतिहासमेृ पं. सुन्दर झा शास्त्रीक अखनु बखारी नै फुजलै, डा.धीरेन्द्रक हिचुकैत बहैत सेती, डा.राजेन्द्र बिमलक इ कथा हमरे थिक, राम भरोस कापड़ी भ्रमरक कथा संग्रह तोरा संगे जयबौ रे कुजवा, डा.रेवती रमण लालक माधव नहि अएला मधुपुर सँ, डा.सुरेन्द्र लाभक कथायात्रा, अयोध्यानाथ चौधरीक एकटा हेरायल सम्बोधन, राजेश्वर नेपालीक सोमली, वृशेष चन्द्र लालक माल्हो आ सुजीतकुमार झाक चिडैं पश्चात आएल जिद्दी कथा संग्रह मुख्य अछि । एहिकेँ बाहेक बहुत कथा संग्रह आ कथासभ मैथिली साहित्यमे प्रकाशन भेल अछि जे उत्कृष्ट सेहो अछि । डा. धीरेन्द्रक अभिभावकीय परम्परामे बढल मैथिली कथा साहित्यमे विषयवस्तुक व्यापकता, राजनीतिक वदलावक प्रभाव, नेपालीय माटिपानिक गंध, पारिवारीक, सामाजिक, साँस्कृतिक आ राजनैतिक जीवन आ ओतए सँ पड़ल उतार चढाव देखल जाइत अछि । कथाशिल्पक दृष्टि सँ नव–नव प्रयोग सेहो देखल गेल अछि । तहिना उतारचढावक बीच वितल समयमे नेपालीय माटिमे मैथिली कथा संग्रह जिद्दीक प्रकाशन भेल अछि । कथाकार सुजित कुमार झाक पहिल कथा संग्रह चिडै आ तकरबाद आएल रिपोर्टर डायरी आ तेसर कृतिक रुपमे आएल कथा संग्रह जिद्दी वास्तवमे मैथिली साहित्य भण्डारमे बृद्धि भेल अछि । हुनकर दुनू पुस्तक सँ परिमार्जित आ सशक्तरुपमे जिद्दी कथा संग्रह आएल कहबामे कोनो भांगठ नहि अछि । कथा संग्रह जिद्दीमे नेपालीय मैथिली नारीसभक विषयवस्तुसभ उठाओल गेल अछि । एहि संग्रहक मुख्य पात्रसभ नारी अछि तऽ कथा सेहो नारीक आसपास घुमैत रहल कथा संग्रह जिद्दी नारीवादी कथासंग्रहकेँ रुपमे आगा आएल अछि । कथाकार सुजित कुमार झाकेँ नारीवादी कथाकारक रुपमे देखल गेल अछि । कथा संग्रह जिद्दीमे कथाकार नारीक सामाजिक, साँस्कृतिक, राजनीतिक स्तर पड़ल प्रभाव, एहि सँ सामाजिक जनजीवनमे पड़ल असर, अगामी दिनमे एहि सँ पड़ल जाएबला सामाजिक विखण्डनक खतराकेँ सुक्ष्मरुपमे देखल गेल अछि । कथा संग्रह यर्थातक धरातलमे ठाढ़ अछि । यद्यपि ई कथा संग्रह बेसी आदर्शोन्मुख यर्थातवाद दिस गेल अछि । एक दर्जन कथा समाविष्ट रहल कथासंग्रह जिद्दीमे हरेक कथा एक अलग छाप छोड़ए सफल भेल अछि । कथाक अन्त नहि पढए धरि कथावस्तुक शिर्षक अपुर्ण लगैत अछि । मुदा कथा पढलाक बाद एक निमेषमे मिथिलाञ्चलक धरातलीय यर्थात मानस पटलपर आबि जाइत अछि । पारस्परिक स्नेह, विश्वास, बलिदान, सेवा, करुणा, अनुशासनक धरातलमे रहि कऽ अपन मोन, सम्मान बचौने मिथिलाञ्चलमे ओ बातसभ समयानुक्रममे घटल घटनाक प्रेरणा सँ कथा जन्मल अछि । आ कथाकार कथासभक मार्फत ओ बातसभकेँ पुनःस्थापना होएबाक बात पर जोड़ देने छथि । सरसरती रुपमे माला बनाएल शैलीमे आगा बढैत जाएब आ अन्तमे पाठककेँ सोचमग्न बनाबैत कथाक इतिश्री करब कथाक महत्वपूर्ण बाट अछि । कथा संग्रहमे रहल १२ टा कथासभ मे सँ सभ उत्कृष्ट रहल अछि । पहिल कथा पूmल फुलाइए कऽ रहलमे महिलाक अथक प्रयास आ दृढ इच्छाक नमुना प्रस्तुत कएल गेल अछि तऽ महिलाकेँ एक्को् बेर नहि पुछि अभिभावक लडकीक विवाह करब, विवाहक समयमे लड़का पक्षद्वारा झुठ बाजब, दहेज आ रंगक कारण विवाहमे समस्या आएब सहितक समस्याकेँ सेहो देखाओल गेल अछि । जे समस्या मिथिलाञ्चलक घरघरमे रहल अछि । जेना उच्च विचार आ अथक प्रयास पश्चात इलेनोर रुजबेल्ट सँ अपन अपांग पतिकेँ राष्ट्रपति सन गरिमामय पदमे पहुँचाओल गेल छल । पूmल फुलाइएकऽ रहलमे जगदीशकेँ पिंकी अपन दृढ इच्छा शक्ति आ प्रयत्न सँ सहायक स्टेशन मास्टर बनाए कऽ छोडलन्हि । तहिना दोसर कथा नव व्यपारमे आधुनिक होइत गेल महिलाक जीवनशैली आ एहि सँ पड़ल जाएबला पारिवारिक कलहकेँ एकटा विम्वक आधारमे उजागर कएल गेल अछि । खाली घर सँ साउस, पुतहुँ आ पति बीचक अन्तरद्धन्द्ध, साउस पुतहुँक कलह, दाइकेँ पोतापोती प्रतिकँे मोहक संग संग दोसर भावनाकेँ कदर नहि कएला पर परिणामकेँ उजागर कएल गेल अछि । दू विचार, दू समयक प्रतिनिधित्व सेहो कएने अछि । तहिना लाल डायरी कथा हिन्दु आ मैथिली समाजमे रहल अन्धविश्वासकेँ देखाओल गेल अछि । जिद्दी कथा सँ अभिभावक जेना बेटा बेटीकेँ अनुशासनमे रखैत अछि । तहिना बेटा बेटी बनबाक यर्थातताकेँ स्वीकार कएने अछि । तहिना समयमे नहि चेतल गेल तऽ जिद्दीक परिणाम की होइत अछि से प्रष्ट अछि । बिना छलकपट, निर्देष आ व्यवहारिक भऽ मेहनत कएलापर सफलता अवश्य भेटैत अछि सन्देश जादु कथा छोडने अछि । ओतबे मात्र नहि आदर्श, अर्थहीन यात्रा, व्यर्थ उडान आ निष्ठा की देखावा कथामे नारी चरित्रक मनोविष्लेषण कएल गेल अछि । समाज की कहत ? दिखावाकँे लेल समाजमे भऽरहल कृकृत्य आ हदकँे वयान ओ कथासभमे कएल गेल अछि । तहिना केहन सजायमे धर्मपुत्रीक रुपमे घरमे आएल चमेलीकेँ हुनक घरपरिवार आ सतबा माएकेँ अपन बेटा भेलाक बाद कएल गेल व्यवहार आ ओकरबाद चमेली भोगने पीडाकेँ देखाओल गेल अछि । अन्तिम कथा मेनकामे राजिव सरकँे व्यवहार आ स्नेह सँ मेनकाक मोन भितर उब्जल उतार चढावकेँ देखाओल गेल अछि । समग्रमे कहल जाए तऽ कथा संग्रह जिद्दी बेसी आदर्शबादक नमुना प्रस्तुत कएने अछि तऽ महिलाकेँ मुख्यपात्रक रुपमे ठाढ़ अछि । समाजक विकृति, विसंगती, नीक बेजाए सभक हकदार प्रत्यक्ष वा अप्रत्यक्ष रुपमे महिला भेल वयान कएने अछि । तहिना मिथिलाक नारीसभकेँ आगा आ स्वछन्द भऽ आगा बढबाक प्रेरणा सेहो ई कथासंग्रह देने अछि । महिलासभक पक्षमे वकालत सेहो करैत अछि । मुदा की अपनासभक समाजमे आबि रहल पश्चिमी संस्कृति आ ओकर विकृति, विसंगतीक जिम्मेवार महिला अछि । की महिला आब जननीक बदला संहारकर्ता बनि रहल अछि । की मिथिलाक नारी आब सीता जेकाँ प्रतिव्रता आ सीता जेकाँ बनए सँ चुकल छथि ? यावत गम्भीर प्रश्नसभ सेहो ई कथासंग्रह उठौने अछि । पुरुषवादी सोच आ मानसिकताक कारण ई प्रश्नसभ जायज हएत ? मुदा महिलाक कारण समाज बदलल, समाज नीक आ सुशिक्षित बनैत गेल यर्थात कथाकार देखए नहि सकल अछि । साहित्यकार समाजक यर्थातताकेँ लाबि कऽ अपन रचना मार्फत सभक समक्ष पहुँचेबाक काज कएने छथि । कहल जा रहल अछि कोनो समाजक अध्ययन करवाक चाही तऽ ओ समाजक साहित्य पढलापर पहुँच जाएत । एहि सँ साहित्यकारकेँ गम्भीर आ चेतनशील भऽ रचना करय लेल प्रेरित करैत अछि । कथाकार पुरुषकेँ दोष नहि देखौने छथि । की मैथिली समाजमे सभ दोष महिलेके होइत अछि पुरुष मात्र रबर स्टाम्प अछि । ई सभ बात नहि आएब कथासंग्रहक कमजोर पक्ष सेहो देखल गेल अछि । कतिपय कथा दुखान्त सँ सुखान्त दिस आगा बढल अछि । कतेको स्थानमे दुःखान्त सँ शुरु भऽ दुःखान्तमे जा समाप्त होइत अछि । कथाकार सुजित कुमार झाक रचनासभ आओर उत्कृष्ट रचनासभ आबैक तकर अपेक्षा अछि । एक प्रकारक शैली सँ कथासंग्रहकेँ कनी ओझराहटिमे रखलाक बादो यर्थातताकेँ दृष्टिकोण सँ अब्बल अछि । भाषाशैली, मैथिली कहवी, प्रकृति तथा व्यक्ति वर्ण सेहो बढिया आ मिठासपूर्ण रहल अछि । पुस्तकक नामाकरण युगानुकुल कथासभ आएल अछि से सुखद बात अछि । मैथिली कथा साहित्यमे रौदी पड़ल समयमे एकहि वर्षमे दू दू टा कथा संग्रह आएब वास्तवमे कठिन काम अछि । मुदा ओ चुनौतीकेँ सेहो स्वीकार करैत सुजितक संग्रह प्रशंसनीय अछि । तहिना आफन्त नेपाल सेहो कथा संग्रहकेँ प्रकाशन कऽ बजार धरि लौने प्रति धन्यवादक पात्र रहल अछि । मैथिली साहित्य क्षेत्रकेँ एकटा आशाक केन्द्र आ भरोसाक साहित्यकारकेँ आगा बढाएब प्रात्ेसाहन कएने काजक लेल आफन्त नेपालकेँ साधुवाद देबहे पड़त ।

रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। खुशबू झा रुपाली ‘बउवा,बउवा .........। कत गेल बउवा ?’ माए बजली ‘कतौ खेलाइत हैत ।’ अतेक कहैत माए अपन काजमे लागि गेली । इम्हर बाबुजीके अपन छोटकी बेटी सँग बतिएब आ बेटीके लाड करब पसिन छलन्हि । ताएँ जाऽ धरि बेटीके नहि देखब हुनकर नयनके चयन नहि भेटतन्हि । ताबतेमे जेठकी बेटी बजली, ‘पापा बउवा गार्डेनमे असगरे गाछ बृक्ष सँग बतियाति छली ।’ ‘अएँ कि भेल ? असगरे एना किए ? कियो किछु कहि देलक ?’ एकै स्वाँसमे पुछल गेल पापाक प्रश्नक जबाब देब बउवाक बसके बात नहि छल । बस शुरु भऽ गेल लाड । तखने बेटा आएल बैसि गेल पापाक पजरामे आ ओ पोल खोलैत बाजल, ‘पापा अहाँ बउवाके अतेक लाड किया करैत छी ? बुझल अइ बउवाके पढैमे नहि मौन लगैत अछि । तएँ हम डँटने छलहुँ ।’ बस बेटाक बात सुनिते बाबु खिसिया गेला आ बजलथि, ‘तु बौवाके डटबएँ तँ निक नहि हएतौ । तोरा कि बुझाइत छौ बउवा नहि पढतै ? देखिहे एक दिन हम्मर सपना इहे पुरा करत ।’ इ सुनिते बउवा तऽ खुसि सँ फुलि गेल मुदा सभ किछु सुनि रहल माएँ बेटाक पक्ष लऽ बजली, ‘हमर बेटा ठिके तऽ कहैय, .........’ताबतेमे सभक बातके रोकैत बडकी बेटी बैसाली बजली,‘ बुझल अछि पापा अपन गाममे सेहो आब बोर्डिङ स्कुल खुजल अछि । ताएँ बउवा रुपालीके अहिमे एडमिशन करा दिऔ ।’ बैशाली छली बड टैलेन्ट , सभ क्षेत्रमे हुनकर हात पकरय बला किओ नहि । पढाई खेलकुद आ घर घरुवारी सभमे आगा । अपना सँ बडका व्यक्ति सँग बात चति करब हुनका पसिन छलन्हि । तँए जानकारी सेहो बड बेसी, आ नम्र सेहो ओतबए । तखन तऽ घरमे माँए पापाक बाद दुनु भाए बहिन दिदिक बात कहियो नहि नकारथि आ जे कहब उएह करब । तँए अपन दिदीक गप्प सुनैत भाए सेहो समर्थन कएलन्हि । ओ तऽ स्कुलक पुरा डिटेल कहि देलक । ओना सोनुक कम्पिटशन सेहो अपना सँ सिनीयर व्यक्ति सँग रहनि । अर्थात बैशाली सँ चारि बर्षक छोट भाए सोनु सेहो अपन दिदी सनक सभ क्षेत्रमे आगू । इएह कारण छल जाहि सँ बाबू जखन नोकरी पर सँ अबैथ तऽ दुनु भाए बहिनक पढाईके सम्बनधमे बुझय एक बेर अबश्य पहुँचैथ हाई स्कुल । ओतय पहुँचैत गर्भ सँ माथ उँच भऽ जाइन कारण सभ शिक्षक दिस सँ बेटी बैशाली आ बेटाक बडाई सुनयके भेटनि हुनका । दुनु अपना–अपना कक्षाक लिडर । आब एहन होनहार बच्चाक बात नहि मानब एहन कोन पिता हएता ? तँए ओ सेहो कहलथि ‘ठिक छई हम आइए बोर्डिङ स्कुलक प्रिन्सीपल सँग भेट करब ।’ अतेक बात भेल मुदा एकान्त प्रिय, परीक दुनियामे भुतलाए बाली रुपाली किछु नहि बजली । हुनका तऽ जेना किछु लेल सोचहे नहि पडैन । अतेक ध्यान राखय बला माए बाबु जी आ भाए बहिन जे भेटल रहैक । बस रुपालीके सोचबाक छल तऽ एक्कहिटा बात की परीक दुनियाँ हुएय जतय अपने पाँचु गोटे सधि खन सँगे रही । बेसी बाजब, सँगी बनाएब अहि सभ सँ दुर रहल रुपालीक दिनचर्या सभ सँ अलग । खाएब आ गार्डेनमे खेलाएब बस इतबए रुपालीक दिनचर्या । अबोध रुपालीके बुझल नहि छल की ओहो कहियो जीवनक यात्रा पर असगरे निकलत । दोसर दिन पापा गेलथि स्कुलक प्रिन्सीपल सँग भेट करबा लेल । बातचीत भेल, ओहिके दोसर दिन सँ तय भऽ गेल बउवाके स्कुलक यात्रा । घरमे सभकेउ खुशी रहैक रुपालीक एहन यात्राक लेल । सँगहि अबोध रुपाली सेहो बिन बुझले खुशीके हिसा बनि रहल छल । भोरे–भोरे सभ किओ रुपालीक चिंतामे जुटि गेलथि । इम्हर बउवा अपने चकीत छल किए सभकेउ ओकरा एना कऽ तैयार कऽ रहल अछि । खाना बनल बउवाके खुवाओल गेल, एकटा अलग पोशाक पहिराओल गेल । रुपालीके दहि चिनी खुवा माए बिदा कएली आ पापा हाथ पकरि स्कुल दिस गेला । ओतय पहुँच रुपाली बच्चाक जमात, शिक्षकसभक भिड देखि कानय लागल मुदा रुपालीक कानब पापा ओहि दिन बेवास्ता कऽ ओहिठाम सँ आगू बढि गेलथि । बस ! इएह पहिल दिनक यात्रा रुपालीक जीवनक अनन्त यात्रा बनि गेल । कहिया बउवा रुपाली समझदार आ बुझनिक घरक सदस्य बनि गेल एहि बातक किनको अनुभवो नहि भेल । सभ किछु बदलि गेल । रुपालीक उमेर, पारीवारीक सदस्य, सभ किछु । दिदी बैशालकि आब अपन अलग छोट सुन्दर परिवार भऽ गेल, भइया सोनु अपन लक्ष्य प्राप्तीक बाटमे व्यस्त, पापा नोकरीक अन्तिम समयक लुफ्त उठा रहल आ माँए एखनो रुपालीक चिन्तामे व्यस्त । मुदा जँ किछु परिवर्तन नहि भेल ओ छल रुपालीक स्वभाव । परीक दुनियाँ एखनो रुपालीक लेल महत्वपुर्ण अछि । सभक सँग रहब रुपालीक सपना एखनो मरल नहि अछि । मुदा ई अधुरा सपना कहियो पुरा नहि भेल कियक तऽ रुपाली सनक सफा हृदयक व्यक्तिके एहि ठाम भेटल तऽ मात्र निराशा । अपन पढाईक क्रममे जखन रुपाली नौ, दश कक्षा पार कएलक तखन ओकरा किछु सँगी भेटल जे रुपालीक अपन बिबाहीत दिदीक बिछोडक बादके कमी पुरा कऽ रहल छल । मुदा दिदीक कमी पुरा करब कठिन छल किएक तऽ ओ रुपालीक लेल मात्र दिदी नहि सहेली छलथि । अचानक दिदीक बिबाह रुपालीक मनके नहि निक जँेका प्रभावीत कएलक । किछु दिन तऽ किनको सँग बातो नहि करैक ओ । जेना कोनो सिख भेटल हुएय रुपालीके । दिदीके गेलाक बाद रुपाली बुझि गेल ककरो पर आश्रित नहि होयबाक चाहि । दिन बितैत गेल मुदा असगर रहि रहल रुपालीके पापा, भईया आ दिदीक दुरी एकटा प्रश्न ठाढ कऽ दैक । जेना ई दुरी रुपालीक लेल स्लो प्वाइजन हुएय ? जे समय–समयमे अपन बिसके असर देखा दैक । स्कुल जिबनमे पारीवारीक व्यक्ति सँग बनय लागल दुरी कलेजक यात्राक बादो एकटा प्रशनक जवाफक खोजिमे लागल रहल रुपाली । सभ किछु बुझलक मुदा सम्बन्धके लऽ कऽ मनमे प्रश्न घुमैत रहैक । रुपालीके तिन–चारि महिना पापाक लेल इंतजार करय पडला सँ अबोध मनमे नोकरीक प्रतिक दृष्टि नकारात्मक बनि गेल । ‘एहन काज किए करी जे परिवार सँ दुर कऽ दिए ?’ रुपालीक ई प्रश्नक उत्तर देब सम्भव नहि छल । तँए अहिके केउ पागलपन कहि बातके टारि दैक । सम्बन्धके लऽ कऽ बहुत पोजेसिव रहल रुपाली । जतय ओ किछु सोँचैथ होइक ओहि सँ बहुत अलग । ई दुनियाँ अपनेमे व्यस्त । इएह व्यस्त दुनियाक हिस्सा बनल रुपाली सम्बन्ध तऽ बनौलक जाहिमे किओ रहैक ओकर सँगी तऽ किओ पे्रमी । मुदा एहि सम्बन्धमे सेहो भेटल तऽ एकटा प्रश्न । एकान्त प्रिय रुपालीक आगू फेर सँ एकटा प्रश्न सामने आएल । ‘कि अपन स्वार्थ पुर्तिक लेल मात्र सम्बन्ध बनाएल जाइत छैक ?’ रुपालीक मनक एहन प्रश्न दुनियाँक आगू प्रस्तुत भेल । रुपाली अपन सँगी ओ अपने बनौने रहैक । मुदा सभ मतलबी, अपन आबश्यक्ताक समयमे रुपालीके याद सभ किओ करैक मुदा जखन रुपालीके उपर किछु समस्या हुएय तऽ सभकिओ साइड लागि जाइक । बस समय–समयमे कखनो सँगीक स्वार्थीपना तऽ कखनो पे्रममे धोखा एहि सभ सँ रुपालीक मनमे गहिर घाउ बना देलक । मुदा तखनो रुपालीक यात्रा समाप्त नहि भेल ओ आगा बढल । आब आरम्भ भेल रुपालीक अफिसीयल यात्रा । ओ अपन पढाई समाप्त कऽ काज शुरु कएलक । बहुत खुशी छल ओ अपन माँए बाबुक लेल किछु करबाक मौका भेटला पर । एकटा नयाँ रुपालीक जेना जन्म भेल हुए । एकटा नयाँ जोश जाँगर देखबाक भेट रहल छल रुपालीमे । मुदा एखनो ओकर मनक अबोधपना समाप्त नहि भेल छल । बस फरक छल तऽ एकैटा आब ओ एहि संसार आ परीक दुनिया बिचक फरक बुझि गेल छल । मुदा एखनो ओ अपन अस्तीत्व खोजि रहल छल परीक दुनियामे । उमेर सँ परीपक्व मुदा हृदय पुरा पुर बच्चा जेहन अबोध । मुदा ई रुपालीक मजबुरी कहि वा आबश्यक्ता एहि सजिव दुनियाँके घृणा करय बाली रुपाली अपना लेल एकटा जगह स्थापीत कएलक । शायद ई पे्ररणा ओकरा अपन पारीवारीक सदस्य सँ भेटल हुएय । तँए छल कपट, धोखा आ दानवीय विचार सँ भडल एहि समाजमे ओ आगु बढैत गेल आ बस बढैत गेल.......। मुदा एकटा अलग संसारक परीकल्पना ओकरा एखनो पाछु नहि छोडलक । एखनो पे्रम, स्नेह, मित्रता आ भातृत्व सँ भडल अलग संसारक कल्पना रुपालीक हृदयक एकटा हिस्सा बनल अछि मुदा ई ओकर हृदय धरि सिमीत रहि गेल......। किओ आगू नहि अएल रुपालीक एहि काल्पनीक संसारक हिस्सा बनबाक लेल । आ बस अधुरा आ एकल बच्चा आई परीपक्व रुपाली भेलाक बादो अधुरा अछि । ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। डॉ. कैलाश कुमार मि‍श्र मेवाड़ आ मालवाक सांझी लोककला : एक परि‍चय महि‍ला संस्कृति रक्षण केर संवाहि‍का छथि‍। ई परम्परा सनातनसँ शाश्वत अछि‍। संस्कृति ‍ अगर लोक संस्कृति‍ हो तँ महि‍ला लोकनि‍केँ लगभग एकाधि‍कार भऽ जाइत छन्हि‍। जइ कार्य, संस्कार, रीति‍ इत्यादि‍केँ शास्त्रीय परम्परा द्वारा महि‍ला लोकनि‍ नै कऽ पबैत छथि‍ तकरा लोकपरम्परा आ लोक वि‍धान द्वारा विस्तारसँ करैत छथि‍। मि‍थि‍ला संस्कृति ‍मे तुसारी, मधुश्रावणी, आम-महु बि‍आह, जटा-जटि‍न, बि‍आहक पश्चात् कोहबर घरमे सम्पादित अनेक दि‍नक वि‍धि‍-बेवहार एकर उदाहरण अछि‍। लोक परम्परा समन्वित परम्परा होइत अछि‍। एक वि‍धि‍क संग अनेक क्रि‍या-कलाप आ रचनात्मकता संलग्न रहैत अछि‍- पूजा पाठ, तंत्र-मंत्र, पि‍तृ आराधना, गीत-संगीत, जादू-टोना, वस्‍त्र वि‍न्‍यास, वि‍भि‍न्न कलाक प्रदर्शन इत्‍यादि‍। सभ आपसमे ताना बाना जकाँ जुटल। एक-दोसरक प्रति‍ समर्पित। एककेँ बि‍ना दोसरक सम्‍पादन असंभव। 15 दि‍नक पि‍तृपक्ष एखने अर्थात् 15 अक्‍टुबर 2012क समाप्‍त भेल अछि‍। ऐ पन्‍द्रह दि‍नमे हमरा लोकनि‍ अपन समस्‍त स्‍वर्गवासी पि‍तृ एवं मातृकेँ स्‍मरण करैत हुनका लोकनि‍केँ तील-जलसँ तृप्‍त करैत छी। आवाह्न तर्पन आ पुन: जयबाक ि‍नवेदन : “ऊँ आगच्‍छन्‍तुमे पि‍त्र इमम्  ग्रहनन्‍तु जलाजलि‍म्।।” "हे पि‍त्र (मातृ) आऊ आ जलकेँ स्‍वीकार करू। आब अहाँ देवलोकमे छी। तँए हमरा लोकनि‍क कल्‍याण करू।" ) पि‍तृ पक्षमे लगातार पन्‍द्रह दि‍न धरि‍ राजस्‍थानक मेवाड़ (अर्थात् उदयपुर, महासमद) आ मध्यप्रदेशक मालवा (उज्‍जैन, इन्‍दौर ग्‍वालि‍यर आदि‍))))) ) मे कुमारि‍ कन्‍या सभ सांझी पूजैत छथि‍। सांझीमे अनेक तरहक चि‍त्रकलाक आ वि‍म्‍बक ि‍नर्माण करैत छथि‍, गीत गबैत छथि‍ आ अन्‍तत: सांझीकेँ जलकरमे भसा दैत छथि‍। सांझीक पूजा स्‍वर्गीया मातृ लोकनि‍क, आवाह्न आ कृतज्ञताक अर्पन मानल जा सकैत अछि‍। सांझीक पूजा आ प्रचलन ओना तँ राजस्‍थान, मध्‍यप्रदेश, पश्चि‍मी  उत्तर प्रदेश, उतराखण्‍ड , उड़ीसा आ अपन मि‍थि‍लोमे कुनो ने कुनो रूपमे व्‍याप्‍त अछि‍। हरि‍याणामे ई सेहो बहुत उत्‍कृष्‍ठतासँ मनाएल जाइत अछि‍। सांझी केर अनेक नाम  यथा- सांझी, सांजी, संझ्या, संध्‍या, संधा, हांजी, हज्‍जा इत्‍यादिसँ जानल जाइत अछि‍। पि‍तृपक्षमे पन्‍द्रह दि‍न धरि‍ मेवाड़ आ मालवाक कुमारि‍ कन्‍या लोकनि‍ घरक बाहरी देबालपर गाएक गोबरसँ  आ माटि स   मोटगर लेप बना एक तरहक वर्गाकार आकृति‍ कऽ ओइपर वि‍भि‍न्न तरहक चि‍त्रांकनक ि‍नर्माण करैत छथि‍। संगे अनुष्‍ठान, गीत-नाद, पूजा-पाठ सेहो चलैत रहैत छैक। ओइ समैमे अगर उज्जैन शहरक सि‍ंहपुरा आदि‍ क्षेत्रमे जएब तँ लागत जेना कुनो कला ि‍दर्घाक  वीथिका मे आबि‍ गेल छी। कलाकृति‍केँ देखि‍ भाव-वि‍भोर भेने बि‍ना नै रहब। तेरहम दि‍न कि‍ला-कोटक ि‍नर्माण होइत छैक। कि‍ला कोटक अर्थ भेल कलाकेँ चारुदिस सँ राजमहलक कि‍ला जकाँ गढ़ बना देनाइ। अन्‍तत: पन्‍द्रहम दि‍न सांझीक पूरा रूप प्रसस्‍त भऽ जाइत छैक। पन्‍द्रहमे दि‍नक सांझमे तमाम चि‍त्रकेँ खुरेचि‍ कुमारि‍ कन्‍या, नव ब्‍याहल लड़की (जे बि‍आहक प्रथम वर्षमे सांझी देवीक उद्यापन करैत छथि‍।) समस्‍त खुरचल सामग्रीकेँ लऽ पोखरि‍ धार, नदी आदि‍मे वि‍सर्जन कऽ दैत छथि‍। वि‍सर्जनक दृश्‍य बड्ड भावमय होइत छैक। लड़की सभ गबैत, नचैत नव वस्‍त्रसँ सजल माधुर्यक वातावरण बनेने रहैत छथि‍। सांझीमे प्रयुक्त वि‍म्‍ब आ रूप सांझी लोककथाक आधारपर होइत छैक। गोबरसँ नीप बेस बना ओइपर फुलक पंखुरी, चमकम कागत आदि‍सँ चि‍त्र बनाएल जाइत छैक। सांक्षी देवीक गीत गएल जाइत छैक। कि‍छु चि‍त्र एहनो होइत छैक जे नव ब्‍याहताकेँ पारि‍वारि‍क जीवनक आवश्‍यकताकेँ सूचि‍त अथबा प्रदर्शित करैत छैक। ओइ श्रेणीमे टी.वी., फ्रीज, मोटर बाईक, गैसक चुल्हा आ सि‍लि‍ण्‍डर इत्‍यादि‍ सेहो मनोहारी ढंगसँ चि‍त्रि‍त कएल भेट जाएत। सांझी के छलीह? ऐ सम्‍बन्‍धमे अनेक तरहक दंत कथा छैक। जेना कि‍ सांझी दुर्गाक एक रूप छथि‍; ब्रह्माक पुत्री छथि‍; सांझी पार्वती अर्थात शि‍वक अर्धांगि‍नी छथि‍; सांझी वैदि‍क देवी छथि‍ जि‍नकर उपासना संध्‍या  अर्थात् सांझमे कएल जाइत अछि‍; सांझी लक्ष्‍मी नारायणक प्रति‍रूप छथि‍; सांझी नवदुर्गाक प्रति‍मूर्ति छथि‍; सांझी बृन्दावन धामक देवी छथि‍; सांझी राजस्‍थानक संगानेरक कन्‍याक छथि‍ जि‍नकर बि‍आह अजमेर छलन्‍हि‍; सांझी कुमारि‍ कन्‍या–सबहक अराध्‍य आ प्रीय देवी छथि‍, सांझी राजस्‍थानक बगड़ावत क्षेत्रमे लोक आख्‍यायनमे प्रशंसि‍त देवी थीकीह आ अन्‍तत: सांझी सूर्य देवक  अर्धांगि‍नीक रूपमे सेहो जानल जाइत छथि‍। चि‍त्रि‍त चि‍त्रांकन आ मनुक्‍खक आकृति‍सँ एना ज्ञात होइत अछि‍ जे सांझी एक ब्‍याहल कन्‍या छलीह। जिनकर वैवाहक जीवन सफल नै रहलनि‍। अनमेल बि‍आह छलन्‍हि‍। पति‍, सासु, समाज सभ शोषण केलकन्‍हि‍। कुमारि  कन्‍या सभ भोरे उठि‍ ताजा गोबर चूनि‍ फूल, पत्तीक बेवस्‍था कऽ सांझी कलाक  निर्माण  मे लागि‍ जाइत छथि‍। देबाल एक क्षेत्रकेँ वर्गाकार आकृति‍केँ गोबरक आ  माटिक  लेपसँ भरल जाइत अछि‍। परम्‍परा आ व रूचि‍केँ मि‍श्रण कऽ मोटीफ केर निर्माण होइत अछि‍। हरेक कन्‍याक कल्‍पनाशीलता भि‍न्न होइत छन्‍हि‍। माय, पि‍ति‍याइन सभ सेहो मदति‍ करैत छन्‍हि‍ जइसँ सांझी रमणगर आ सौन्‍दर्यसँ परि‍पूर्ण भऽ जाइक। बनेबाक सामग्रीक रूपमे गोबर, फूल, पात, धास, मक्कैक बालि‍, रंगारंग कागज, टीन फ्वाइल, कौड़ी, बांसक -बत्ती, सि‍न्‍दुर कुमकुम इत्‍यादि‍क प्रयोग सबतरि‍ भेटत। मालवा अर्थात उज्‍जैन दि‍स गुल-तेवारी, गेन्‍दा लाल, चमेली, बरमासा फूल जेकरा सदा सुहागन सेहो कहल जाइत छैक केर प्रयोग होइत छैक। गुलाबी, उज्‍जर, पीकीस ब्राउन, आदि‍ रंगक वि‍शेष स्‍थान होइत छैक। सर्वप्रथम आंगुरसँ प्रथम परतक निर्माण   कैल जाइत छैक। जकरा गोहाली कहल जाइत छैक। ऐमे वर्गाकार क्षेत्र अथवा अष्‍टकारक निर्माण गोबर आ माटि‍क मोट लेपसँ देबालपर कएल जाइत छैक। प्रथम तीन आंगुरक सहायतासँ फीगरक निर्माण केलाक बाद फुल, पात, घास, आदि‍सँ साटि‍ फीगरकेँ सजाएल जाइत छैक। प्रथम दिनक  डि‍जाइनकेँ दोसर दि‍न उखाड़ि‍ देल जाइत छैक। प्रत्‍येक ति‍थि‍क अनुसारे मोटीफक  निर्माण कएल जाइत छैक। राजस्‍थानक एक  गाममे प्रयुक्त तेरह दि‍नक सांझी चि‍त्रण हमरा एना भेटल- एकम (पहि‍ल)- वन्‍दरावल बीज (दोसर)- बीजना (पंखा) तीज (तेसर दि‍न)- तीन, ति‍वाड़ी (तीन खि‍ड़की) चौठ (चारि‍म दि‍न)- चौपड़ पंचम (पॉचम दि‍न)- पांच कुवारे (पाँच कुमार बालक) छठम (छठम दि‍न)- फूल छड़ी (फूलक डंडा) सातम (सातम दि‍न)- साति‍या (स्‍वास्‍ति‍क) आठम (आठम दि‍न)- अष्‍टकोणी बाजोट (बैसैबला टूल) नम (नवम दि‍न)- डोकरा-डोकरी (बुढ़आ बुढ़ी) दशम (दसम दि‍न)- दस पकवान (दस तरहक ब्‍यंजन) ग्‍यारस (ग्‍यारहम दि‍न)- जनेऊ बारस (बारहम दि‍न)- सीड़ी (सीढ़ी) तेरस (तेरहम दि‍न)- कोंट (ऐ दि‍नक सांझीमे सभ दि‍नमे युक्‍त चि‍त्रक ि‍नर्माण कएल जाइत छैक। एकरा अलाबे आरो बहुत रास बि‍म्‍वक  निर्माण  होइत छैक।) सांझी कलाक रूप आ ओकर अर्थ लोक कलामे आश्चर्यजनक ज्ञान आ परम्‍पराक समावेश होइत छैक। कुनो चीज निरर्थक  नै भेटत। जेना कि‍ कतौ-कतौ सातम दि‍न हत्‍यारी-हतम केर रूपक वि‍न्‍यास करबाक परम्‍परा छैक। तइ दि‍न ओइ आत्माक स्‍मरणमे रूपकेँ गढ़ल जाइत छैक जि‍नकर या तँ हत्‍या भऽ गेलन्‍हि‍ या ओ स्‍वयं आत्‍महत्‍या कऽ लेलन्‍हि‍। नवम दि‍नमे डाकरि‍या नम बनैत छैक। ओइ दि‍न बुढ़ आ बुढीक चि‍त्रण होइत छैक जे नवमी तिथि में अई जीवनकेँ ति‍याग केलन्‍हि‍। बीजना या बीजनी खजुर पंखाकेँ कहल जाइत छैक। तेसर दि‍न ति‍वाड़ी अर्थात तीनटा खि‍ड़कीक निर्माण  कएल जाइत छैक। चौपड़ खेलक चि‍त्रण चारि‍म दि‍न कएल जाइत छैक। कतौ-कतौ छठम ति‍थमे फूल छाबरी अर्थात् फुलडालीक निर्माण  करबाक परम्‍परा भेटत। सति‍या अथवा हति‍या स्‍वास्‍ति‍ककेँ कहल जाइत छैक। एकर निर्माण  सामान्‍यतया सातम दि‍न कएल जाइत दैक। अठकली फूलक निर्माण आठम दि‍न कएल जाइत छैक। कतौ-कतौ नवम ति‍थि‍मे नंगटा-नंगटी (वाद्य यंत्र) रचना सेहो कएल जाइत छैक। लोक परम्‍परा शास्‍त्रीय परम्‍परामे सेहो प्रयुक्‍त कएल जाइत छैक। राजस्‍थानक श्रीनाथ जीक मंदि‍रमे मुर्तिक पाछाँ पि‍छवाइ कला आ केराक पातपर सांझी बनैत छैक। एकर दोसर ठाम जलमे सांझी बनैत ैछक। वृन्‍दावनमे फर्शपर रंगोलीक रूपमे अनेक तरहक रंग आ चाउरक आंटाक प्रयोगसँ कलात्‍मक सांझी राधा आ कृष्‍णक प्रेमकथा आ भक्‍ति‍केँ स्‍मरण करबाक अप्रतीम कलाक रूपमे बनाएल जाइत छैक। बहुत तँ जानकारी नै अछि‍ परन्‍तु बुझना एना जाइत अछि‍ जे मि‍थि‍लामे सांझ पूजक परम्‍परा आ कुमारि‍ कन्‍या सभ द्वारे तुसारी  पूजन सांझीक परम्‍पराक एक रूप अछि‍। नेपाल आ उत्तराखण्‍डमे सेहो कि‍छु एहन परम्‍पराक वि‍धान छैक। एक दि‍न राजस्‍थानक उदयपुरसँ हल्‍दी धाटी घूमए लेल गेल रही। ओतए केर सांझी स्‍थानीय फूलक सहायतासँ बनाएल जाइत छैक। आ ओइमे राधा-कृष्‍णक प्रेमक प्रबलता दृष्‍टि‍गोचर भक्‍ति‍-भावसँ कलात्‍मक रूपे होइत छैक। फूलक एहेन वि‍न्‍यास अन्‍यत्र असंभव। ओना लोककलामे कून नीक आ कोन खराप ई कहब असंभव मुदा मालवा  अबि‍ते मातर सांझीक कलासँ कुनो बटोही मंत्र मुग्‍ध भऽ जाइत अछि‍। ओतए केर नायि‍का केर आँखि‍ अतेक कतरगर  जे मोन करत दखि‍ते रही। जेहने कि‍शोरी तहने चि‍त्रकला। मोन करत केकर प्रशंसा करी चि‍त्रक अथवा चि‍त्र बनेनि‍हारि‍केँ? राजस्‍थानमे एक कथा पता लागल। संझा छलीह सांवरि‍ आ सामान्‍य गरीब घरक कन्‍या। हुनकर बि‍आह कि‍छु खाश परि‍स्‍थि‍ति‍मे एकटा नांगर ब्रह्मण जेकर नाम खोड़या ब्राह्मण रहैक- करा देल गेलन्‍हि‍। बेचारी संझाकेँ सासुरमे बड्ड कष्‍ट भेलन्‍हि‍। पति‍ कहि‍यो हुनकर भावनाकेँ सम्‍मान नै देलकन्‍हि‍। नैहरमे जनम हेबाक तुरंत बाद माय मरि‍ गेलथि‍न्‍ह। कष्‍टेमे जनम भेलनि‍, वि‍कट स्‍थि‍ति‍मे बि‍आह भेलन्‍हि‍ आ कष्‍टेमे मरि‍ गेलीह सांझा। हुनका मरला उत्तर दैव लोकमे स्‍थान भेटलनि‍। आ जे कुमारि‍ कन्‍या श्राद्ध पक्षमे हुनकर तेरहसँ पन्‍द्रह दि‍न अराधना करतीह ति‍नकर वैवाहि‍क जीवन सफल रहतैक। अही तरहक लोक मान्‍यता ओइ क्षेत्रमे छैक। मि‍थि‍लाक सामा-चकेबा पाबनि‍ जकाँ मालवामे सांझीक भाइ-बहि‍नक सम्‍बन्‍धकेँ मधुर बनेबैबला लोक-उत्‍सव मानल जाइत छैक। लड़की सभ अपन बीराजी (भैय्या)क लेल मंगल कामना करैत छथि‍। जे चीज नै भेटैत छन्‍हि‍ तइ लेल भायसँ नि‍वेदन कऽ ओइ चीजकेँ मंगा संझाक नीक जकाँ  निर्माण , पूजा-पाठ करैत छथि‍। अन्‍तत: यएह कहल जा सकैत अछि‍ जे सांझी लोक परम्‍पराक एक अनुपम उदाहरण अछि‍. अहेन उदाहरण  जइमे चि‍त्रकला, नृत्‍यकला, संगीतकला, वस्‍तुकला आदि‍क सम्‍न्‍वि‍त समावेश भेटत। ऐ तरहक अनुपम लोक कलाक रक्षण भेनाइ अनि‍वार्य। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। गजेन्द्र ठाकुर विद्यापति: किछु प्रचलित कुप्रचारक निराकरण (भाग-३)

फणीश्वरनाथ रेणु बिदापत नाचपर रिपोर्ताज लिखलनि जे १ अगस्त १९४५ ई. केँ साप्ताहिक “विश्वमित्र”मे प्रकाशित भेल। ऐ रिपोर्ताजक महत्व अछि, कारण ई ऐ विषयपर ज्योतिरीश्वर द्वारा लिखित विवरणक ७०० बर्ख बाद लिखल गेल आ ऐ ७०० बर्खमे जे विद्यापतिकेँ समानान्तर परम्परा जिआ कऽ रखलक। आ जे एकरा जिआ कऽ रखलक ओकरासँ अनचोक्के विद्यापति छीनि लेल गेलन्हि। बिदेश्वर ठाकुर विद्यापति गीत गबैत आ हाक्रोश करैत मृत्युकेँ प्राप्त केलन्हि जे विद्यापतिकेँ पाग पहिरा कऽ ब्राह्मण सभ छीनि लेलक। ब्रह्मपुराक कानूनगो बद्री प्रसाद ठाकुर, पोखरिभीड़ाक बिनोद ठाकुर, रुद्रपुरक सरयुग ठाकुर आ मेंहथक जयराम ठाकुर आ बिस्फीक सौँसे गाम आइयो ई रटि रहल छथि। शालिग्राम यादव, अवधिया ठाकुर बिस्फी गामक परम्पराक गवाह छथि। विद्यापति कर्मकाण्डीय अपहरण मे हुनकर जन्म आदिक प्रति सभ तरहक अनर्गल तर्क उपस्थित होइत रहल मुदा हुनकर समानान्तर परम्पराक मादे कोनो शोध-पत्रमे चर्चो धरि नै भेल। ई आलेख बिदेश्वर ठाकुर सन हजारक हजार समानान्तर परम्पराक लोकक प्रति समर्पित अछि जे बिदापतक ज्योतिरीश्वर आ फणीश्वरनाथ रेणुक दुनू आलेखक बीच विद्यापतिकेँ जिआ कऽ रखलन्हि।

मिथिलाक शतपथ ब्राह्मणक परम्परा आ मिथिलाक समानान्तर परम्परा: वैदिक संस्कृतक प्राचीनतम ग्रन्थ ऋगवेदसँ पहिनेसँ भाषा अस्तित्वमे रहल हएत। कतेक मौखिक साहित्य जेना गाथा, नाराशंसी, दैवत कथा आ आख्यान सभ ओहिमे रचल गेल हएत। एहने गाथा सभक गायकक लेल “गाथिन”, “गातुविद्” आ “गाथपति” ऋगवेदमे प्रयुक्त भेल। वैदिक कालेसँ गाथा आ नाराशंसी समानान्तर रूपमे रहल। प्राकृतसँ वैदिक संस्कृत बहार भेल आकि वैदिक संस्कृतसँ प्राकृत? वेदमे नाराशंसी नाम्ना जन आख्यान यएह सिद्ध करैत अछि जे दुनू समानान्तर रूपेँ बहुत दिन धरि चलल। ई समानान्तर परम्परा दुनूकेँ प्रभावित केलक। आब ऋगवेद देखू- ओतए दुर्लभ लेल- दूलभ, (ऋगवेद ४.९.८) प्रयोग की सिद्ध करैत अछि? अथर्ववेदमे पश्चात् लेल पश्चा (अथर्ववेद १०.४.१०) की सिद्ध करैत अछि? गोपथ ब्राह्मणमे प्रतिसन्धाय लेल प्रतिसंहाय की सिद्द करैत अछि? (गोपथ ब्राह्मण २.४)। जे आर्य छथि से भारतक पच्छिम भागसँ मिथिलामे एलाह, आ हुनका सभक एबासँ पूर्व वेदक किछु अंश विद्यमान छल, तेँ ने बहुत रास शब्द जे मैथिलीमे अछि, बहुत रास उच्चारण जे मैथिलीमे अछि ओ वैदिक संस्कृतमे अछि, मुदा लौकिक संस्कृतमे नै अछि। अविद्या, कर्मसिद्धान्त, जन्म आ पुनर्जन्मक आवाजाही आ मोक्ष ई सभ अनार्यसँ आर्यकेँ भेटलै। तेँ ने उपनिषदमे मोक्ष प्राप्तिक मार्ग छै, स्वर्ग प्राप्तिक नै। मोक्ष भेटत कोना? यज्ञ केलासँ? नै, ई भेटत ज्ञानसँ आ मनन-चिन्तन आ समाधिसँ। राजा जनकक संरक्षणमे याज्ञवल्क्य बृहदारण्यक उपनिषदक तिरहुतक अनार्य क्षेत्रमे रचना केलन्हि। वाचस्पति मिश्र सांख्यकारिकाक सन्तावनम सूत्रक व्याख्या करैत कहै छथि जे की ई कहि सकै छी जे अचेतन दूध केर पोषणसँ परु पोसाइए आ अचेतन प्रकृतिक संचालनसँ जीवकेँ मुक्तिक ज्ञान भेटैए? ईश्वर तँ स्वयंमे पूर्ण छथि तँ ओ कोन उद्देश्ये विश्वक सृष्टि करताह आ जीव लेल जँ ओ सृष्टि करताह तँ सृष्टिक बादे तँ जीव बन्हाइए आ सृष्टिसँ पूर्व तँ बन्हेबाक प्रश्ने नै अछि, तखन जीवक प्रति कथीक दया? से प्रकृति द्वारा सृष्टि होइए आ जीव अपन प्रयाससँ अपवर्गक प्राप्ति करै छथि। आ विवेकसँ होइए प्रलय। से ईश्वरवाद नै निरीश्वरवाद अछि वाचस्पतिक व्याख्या। प्रकृति संचालनमे जँ ईश्वर भाग लै छथि तँ ओ चेतन प्रक्रिया हएत जे कोनो उद्देश्येसँ हएत आ तकर कोनो खगता ईश्वरकेँ छन्हिये नै। न्यायसूत्रक रचना केनिहार मिथिलाक गौतम सोलह पदार्थक ज्ञानसँ जीवक निःश्रेयस प्राप्त करबाक चर्च करै छथि, मुदा ऐ सभमे ईश्वरक कतौ चर्च नै अछि जे हुनको द्वारा मुक्ति सम्भव अछि। वैशेषिक सूत्र कहैए जे वेद विद्वान लोकनि द्वारा रचल गेल अछि नै कि ईश्वर द्वारा। कुमारिल भट्ट कहै छथि जे सृष्टिक पूर्व ईश्वरक विषयमे कोनो विश्वसनीय चर्चा असम्भव अछि। 

शतपथ ब्राह्मणक तथाकथित मुख्य धारा, आ तकर समानान्तर मुख्यधारा: ब्राह्मण आ गएर ब्राह्मणवाद मिथिलामे शुरुएसँ रहल अछि। ज्योतिरीश्वर लिखै छथि- बौध पक्ष अइसन- आपात भीषण। अगतिशील शतपथ ब्राह्मणक परम्परा नामक साम्यताक कारण संस्कृत आ अवहट्ठबला विद्यापतिकेँ पूज्य बनबैपर बिर्त अछि। ऋक् आ नाराशंसी, महाकवि विद्यापति आ पागबला विद्यापति, मोक्ष आ स्वर्ग-नर्क ई दुनू परस्पर विरोधी विचारधारा मिथिलामे रहल।  शतपथ ब्राह्मणक विदेघमाथव आ पुराणक निमि दुनू गोटेक पुरोहित गौतम छथि से दुनू एके छथि आ एतएसँ विदेह राज्यक प्रारम्भ। माथवक पुरहित गौतम मित्रविन्द यज्ञक/ बलिक प्रारम्भ कएलन्हि आ पुनः एकर पुनःस्थापना भेल महाजनक-२ क समयमे याज्ञवल्क्य द्वारा। मैत्रेयी, याज्ञवल्क्य, सीता, जनककेँ रटैत-रटैत ई परम्परा विद्यापतिक यज्ञोपवीत संस्कार आ पाग प्रतिष्ठापन जइ तीव्र गतिये केलक से ओकर शतपथ ब्राह्मणक तथाकथित मुख्य धाराक अनुकूल छल। 

१७६० ई.क माधव सिंहक शाखा पञ्जीक आदेशक बाद मिथिलामे ब्राह्मण आ कायस्थ मध्य नव-कुलीनवादक प्रसार भेल आ भलमानुस (बत्तेसगमिया) उपजातिक कर्ण कायस्थमे आ स्रोत्रिय उपजातिक मैथिल ब्राह्मणमे उत्पत्ति भेल, ओइसँ शारीरिक आ मानसिक बीमारी ऐ दुनू उपजाति मध्य भयंकर रूपसँ बढ़ल, संगे बहुविवाह, बाल-विवाहक आ विधवाक संख्यामे अत्यधिक वृद्धि भेल। आ ईहो जइ शान्तिपूर्ण रूपसँ आ तीव्रगतिसँ भेल से शतपथ ब्राह्मणक तथाकथित मुख्य धाराक अनुकूल छल। 

विद्यापतिपर दिनेश्वर लाल आनन्द आ रामवृक्ष बेनीपुरीक विचार!! दिनेश्वर लाल आनन्दकेँ भ्रम रहन्हि, ओइ कालमे पञ्जी गुप्त चीज रहै, जे संस्कृत आ अवहट्ठ बला विद्यापतिक विषएवार बिस्फीकेँ पञ्जीमे जयवार (निम्न कोटिक) कऽ देल गेल रहै। शाखा पञ्जी १७६० ई.सँ पहिने रहबे नै करै आ तकर प्रमाण अछि जे अयाची मिश्रक मूलक निचुलका पीढ़ी स्रोत्रिय उपजातिमे अछि आ ब्राह्मण उपजातिमे सेहो। ई ओहिना अछि जे सिन्धु घाटी सभ्यतामे बड़द रहै मुदा गाय नै (सीलपर), मुदा बिनु गाय बड़दक उत्पत्ति कोना हएत। दिनेश्वर लाल आनन्दकेँ पञ्जीक सभ तथ्य उपलब्ध नै रहन्हि, प्रायः पदावली बला विद्यापति आ संस्कृत आ अवहट्ठबला विद्यापतिक एक्के हेबाक दुष्प्रचारमे हुनका लागल हेतन्हि जे अवहट्ठमे लिखबाक कारण जँ विषएवार बिस्फीकेँ पञ्जीमे जयवार करबाक सम्बन्धसँ जोड़ल जाए तँ विद्यापति ठक्कुरः किए क्रान्तिकारी भेलाह से व्याख्या कएल जा सकत। मुदा दिनेश्वर लाल आनन्द सेहो मानै छथि जे पदावलीक हुनकर (विद्यापतिक) हाथक तँ छोड़ू, हुनकर कालोमे संगृहीत पदक कोनो विवरण नै अछि। मुदा से कोना सम्भव जखन संस्कृत आ अवहट्ठबला विद्यापति अपन संस्कृत आ अवहट्ठ ग्रन्थ सभ टहंकारसँ आरम्भ आ समापन करै छथि, के राजा-रानी हुनका प्रेरित केलखिन्ह, ककर आश्रित छलाह, सभ वर्णन दैत। पूर्ण लेखकीय अन्दाज, सरस्वती आ लक्ष्मी दुनुक बल; तखन पदावलीमे से किए नै? दिनेश्वर लाल आनन्द गुम्म छथि। संस्कृत आ अवहट्ठ बला विद्यापति अपन आश्रयदाताक विषयमे लिखने छथि मुदा कोनो संस्कृत आ अवहट्ठ ग्रन्थमे अपना विषयमे किछुओ नै लिखने छथि। ओ अवह्ट्ठ लिखबोमे दवाबक अनुभव करै छथि, जे तखुनका मुख्य परम्पराक साहित्यिक भाषा छल। मुदा ज्योतिरीश्वरपूर्व विद्यापतिक प्रभाव एतेक छलन्हि जे हुनका संस्कृत नाटक गोरक्षविजयमे मैथिली गीत लिखऽ पड़लन्हि (जेना विदाञोतक पहिल रिपोर्ताज लिखनिहार ज्योतिरीश्वरकेँ संस्कृत नाटक धूर्तसमागममे मैथिली गीत लिखऽ पड़लन्हि)। गोविन्द झा ज्योतिरीश्वरक विदाञोतमे विद्यापतिक परम्परा देखि लै छथि, चर्च करै छथि मुदा ज्योतिरीश्वर पूर्व विद्यापतिकेँ आगाँ किए नै बढ़ा पबैत छथि जखन बिदेश्वर ठाकुर गाबि-गाबि कऽ प्राण त्यागि रहल छथि? विद्यापति नाटकमे विद्यापतिकेँ प्यास जतऽ लगलन्हि ओ नाटक लेखकक गाम कोना भऽ जाइए? सभ अपना-अपना हिसाबसँ “हम्मर विद्यापति”पर नाटक लिखि रहल छथि।

रामबृक्ष बेनीपुरी लग सेहो पञ्जीक तथ्य नै छन्हि। एकटा उपजातिक बनोतरी आ किंवदन्तीक आधारपर ओ केशव मिश्रक विद्यापतिपर हँसब लिखै छथि; द्वैत परिशिष्टक ई केशव मिश्र वाचस्पति-२ (१४००-१४९०) क पौत्र छथि। एकटा आर केशव मिश्र (११५० लगभग) छथि जे तर्कभाष लिखै छथि आ जकर समीक्षा तत्वचिन्तामणिकारक गंगेशक पुत्र वर्धमान “तर्कप्रकाश”मे करै छथि। आनन्द कुमारस्वामे जतेक शोध १९१५ ई. मे केने रहथि ओइसँ एक्को डेग आगाँ नहिये बेनीपुरी जा सकलथि नहिये आनन्दस्वामीक सए बर्ख बाद कियो दोसर मुख्यधाराक शोधकर्ता जा सकल छथि। वएग उगनाक कथा बेनीपुरी कहै छथि, मुदा महादेव संस्कृत आ अवहट्ठक कट्टर विद्यापतिक “शैवसर्वस्वसार”पर कैलाशमे नचता आकि ज्योतिरीश्वरपूर्व विद्यापतिक नचारीपर, ओइपर गुम छथि। आनन्द कुमारस्वामी जकाँ बेनीपुरीकेँ बुझल छन्हि जे संस्कृत आ अवहट्ठक विद्यापतिक हाथक लिखल भागवत उपलब्ध अछि आ इहो जे विद्यापतिकेँ गंगालाभ कोना भेलन्हि, गंगा हुनका अपनामे लीलि लेलखिन्ह। आनन्द कुमारस्वामी जकाँ बेनीपुरीकेँ संस्कृत आ अवहट्ठक विद्यापतिक लिखल पुरुषपरीक्षाक विषयमे सुनल छन्हि मुदा पढ़ल नै छन्हि, आ से नै तँ हुनका बुझल रहितन्हि जे संस्कृत आ अवहट्ठक विद्यापति गंगालाभक कथा बोधि कायस्थक विषयमे लिखने छथि। ज्योतिरीश्वर पूर्व विद्यापतिक विषयमे ई कथा उगनाक कथा सन प्रचलित छल जे बादमे संस्कृत आ अवहट्ठक विद्यापतिसँ कर्मकाण्डीय रूपमे जोड़ल गेल आ पुरुषपरीक्षाक कथा बोधि कायस्थ एकर प्रमाण अछि। कीर्तिपताकाकेँ बेनीपुरी मैथिली गीतक संग्रह कहै छथिइ!! पूछि-पाछि कऽ शोध कएल जाइ छै? जे आधार कुमारस्वामी सए बर्ख पहिने रखलन्हि, ओइपर सुखाएल मुख्यधारा किए नै आगाँ बढ़ल कारण ई शतपथ ब्राह्मणवादी मुख्यधारा ओकरा एकर अनुमति नै दै छै। मुदा बिना कोनो प्रमाणक शिवसिंहक मित्र पुरादित्यकेँ भूमिहार ब्राह्मण सिद्ध कऽ दै छथि, ओहिना जेना गोविन्ददास (झा) केँ रमानाथ झा स्रोत्रिय बतेलन्हि (सुकुमार सेन तकरा हास्यास्पद मानै छथि), आ रामदेव झा ब्राह्मण सिद्ध करै छथि आ कालिदासकेँ वर्माजी (लालदास स्मारिकामे) कायस्थ सिद्ध करै छथि। संस्कृत आ अवहट्ठबला विद्यापति पूर्ण कर्मकाण्डक संग पुस्तकक प्रारम्भ आ अन्त करै छथि, राजा-रानी-आश्रयदाताकेँ मोन पाड़ै छथि मुदा अपन चर्च नै करै छथि। मुदा पदावली लोककण्ठमे किए रहि गेल, पुस्तकक तामझाम ओ तकरा किए नै देलन्हि, कारण ओ हुनकासँ कए सए पूर्वक रचना छल, जखन पागक उत्पत्ति मिथिलामे नै भेल छल। पदावलीमे रूपनारायण, शिवसिंह, लखिमा, देव सिंह, हर सिंह, पद्म सिंह, विश्वास देवे, अर्जुन-अमर, राघव सिंह, रुद्र सिंह, धीर सिंह, भैरव सिंह, चन्द्र सिंह आदि बादमे घोसिआएल गेल, जे गीतक लयकेँ प्रभावित करैत स्पष्ट रूपसँ दृष्टिगोचर होइत अछि। संस्कृत-अवहट्ठबला विद्यापति भू-परिक्रमा (देव सिंह), कीर्तिलता (कीर्ति सिंह आ वीर सिंह), कीर्तिपताका, गोरक्षविजय (शिव सिंह), लिखनावली (पुरादित्य), दान वाक्यावली (रानी धीरमति) आदि स्पष्ट रूपसँ राज्याश्रित रचना छल। गोरक्षविजय नाटक भैरव पूजाक अवसरपर लिखल गेल आ ऐ मे धूर्त समागम सन मैथिली गीत छल जे ज्योतिरीश्वर पूर्व विद्यापतिक भयंकर प्रभाव स्वरूप छल। नामक असमानता नै रहैत तँ ज्योतिरीश्वकेँ ज्योतिरीश्वर पूर्व विद्यापति बना देल जाइत।  तत्वचिन्तामणिकारक गंगेश १२००० ग्रन्थक बराबर एकटा ग्रन्थ लिखलन्हि। प्रोफेसर दिनेशचन्द्र भट्टाचार्य “हिस्ट्री ऑफ नव्य-न्याय इन मिथिला” मे लिखै छथि- “The family which was inferior in social status is now extinct in Mithila…Gangesha’s family is completely ignored and we are not expected to know even his father’s name.” आ ई सभ सूचना, ओ लिखै छथि, हुनका प्रो. आर.झा (रमानाथ झा) देलखिन्ह! आब आउ पञ्जीमे वर्णित तथ्यपर- ओइमे स्पष्ट रूपसँ लिखल अछि जे तत्वचिन्तामणिकारक गंगेशक जन्म पिताक मृत्युक पाँच वर्ष बाद भेलन्हि आ ओ चर्मकारिणीसँ विवाह केलन्हि, तँ ई गप रमानाथ झा दिनेशचन्द्र भट्टाचार्यसँ किए नुकेलन्हि? एकटा उपजाति द्वारा हिनकर मूर्खसँ विद्वान बनबाक गपपसारल गेलन्हि आ हिनका खतम करबाक साजिश भेल। गंगेशक पुत्र वर्द्धमान गंगेशकेँ सुकविकैरवकाननेन्दुः कहै छथि। मुदा गंगेश सन प्रसिद्ध विद्वानक कविता कोन साजिशक अन्तर्गत आइ उपलब्ध नै अछि से ऊपर देल उदाहरणसँ स्पष्ट अछि। बंगालक वासुदेव पक्षधर मिश्रक सहपाठी रहथि, मिथिला पढ़ैले एला, शलाका परीक्षा उत्तीर्ण केलन्हि आ सर्वभौम उपाधि भेटलन्ह्। वासुदेव गंगेशक तत्वचिन्तामणि आ उदयनक न्यायकुसुमांजलिक कारिकाकेँ कंठस्थ कऽ लेलन्हि। पक्षधर आ आन मिथिलाक शिक्षक तत्वचिन्तामणि लिखबाक (प्रतिलिपि करबाक) अनुमति नै दै छला! वासुदेवक शिष्य रघुनाथ शिरोमणि अपन गुरु पक्षधर मिश्रकेँ शास्त्रार्थमे हरा प्रमाणित करबाक अधिकार लेलन्हि। नव्यन्याय स्कूलक नवद्वीपमे वासुदेव-रघुनाथ द्वारा स्थापना भेल। पक्षधर मिश्र संस्कृत आ अवहट्ठबला विद्यापतिक समकालीन छला। आ रघुनाथक संग बंगालसँ मिथिला विद्यार्थीक आगमन बन्द भऽ गेल।

शिवसिंह द्वारा संस्कृत आ अवहट्ठबला विद्यापतिकेँ जे बिस्फी ताम्रपत्र देल गेल तकरा ग्रियर्सन फर्जी कहलन्हि कारण ओ विद्यापतिक पदावलीसँ परिचित रहथि आ बूझि गेल रहथि जे ओइ विद्यापतिकेँ ई ताम्रपत्र भेटब असम्भव छल। मुदा ई ताम्रपत्र तँ संस्कृत आ अवहट्ठबला विद्यापतिकेँ भेटल छलन्हि आ दुनूक बीचक अन्तर ग्रियर्सन नै सोचि सकला। मुदा से म.म. हरप्रसाद शास्त्री सोचलन्हि आ ऐ ताम्रपत्रकेँ असली बतेलन्हि।

श्रीधरदासक सदुक्तिकर्णामृतमे कैवर्त पपीहाक गंगापर स्तुति गीत अछि। राधाकृष्णक गीत अछि। लक्ष्मणसेनक राज कवि धोयी (जोलहा) रहथि। लखिमा ठकुराइन पदावली नै लिखलन्हि संस्कृतमे पद्य लिखलन्हि (ग्रियर्सन)। श्रीधरदासक अभिलेख अंधरा ठाढ़ीमे अछि आ ओ नान्यदेव आ गंगदेवक मंत्री रहथि। हुनकर वंशज अमिअकर संस्कृत आ अवहट्ठबला विद्यापतिक समकालीन रहथि। गंगदेवकेँ उपेन्द्र ठाकुर कलचुरी मानै छथि। विजय कुमार ठाकुर कलचुरि कर्णक स्तुतिमे सदुक्तिकर्णामृत (श्रीधरदास)क विद्यापतिक गीतकेँ मानै छथि। राधाकृष्ण चौधरीक मत ऐ सँ भिन्न छन्हि। कोनो परिस्थितिमे ई विद्यापति ज्योतिरीश्वर पूर्व रहथि। “रामचरित”- विग्रहपाल-३ कर्णकेँ हरेलन्हि, ऐ सम्बन्धमे बेगूसरायसँ उत्तर १६ किमी. नौलागढ़सँ दूटा पाल अभिलेख राधाकृष्ण चौधरीकेँ भेटलन्हि। ओहो कर्ण ११म शताब्दीक छथि। धूर्त समागम सेहो दक्षिण भारतमे प्रसिद्ध अछि। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। ‍ जगदानन्द झा मनु प्रेमक बलि प्रवल आ सुमन एक दोसरसँ बहुत प्रेम करैत छल | दुनू संगे- संग बितल पाँच बरखसँ पढि रहल छल आ ओहि समयसँ दुनूक बिचक चिन्हा परिचय कखन अगाध प्रेममे बदैल गेलै से दुनूमे सँ केकरो सुधि नहि रहलै | आब दुनूक प्रेम अपन चरम सीमा पर पहुँच चुकल छैक आ एक दोसरकेँ बिना जीवनक कल्पनो दुनूक लेल असहनीय छैक | दुनूक प्रेम आब दुनूक एकान्तीसँ निकैल कालेज कम्पलेक्समे गमकए लगलै आ तरे-तरे गाम तक  सेहो | मुदा  रुढ़िवादी ताना-बानामे बुनल समाजक व्यवस्थामे दुनूक मिलन आ  विवाहक कल्पनो असंभव छलैक | किएक तँ  प्रवल ब्राह्मण आ सुमन तेली जातिकेँ छल आ प्रवलक मए बाबू आ समाजकेँ लोग एहि बिजातीय विवाहकेँ पक्षमे कोनो हालतमे तैयार नहि | एहि सभ गप्पक अनुभब प्रवल आ सुमनकेँ सेहो भेलैक मुदा ओहो दुनू अप्पन प्रेमसँ बन्हल वेबस | करए   तँ करए की ? समाजक व्यबस्थाक कारणे विवाहक कल्पने मात्रसँ देह सिहैर जाई | दुनूक प्रेम आब ओई   सिखर पर पहुँच गेलैक जतएसँ वापसीक कोनो गुंजाइस नहि | मए बाबू  सभटा जनितो समाजक डरे  गप्प मानैक तैयार नहि | एक दिन दुनू गोटा एहि विषय पर गप्प करैत रहे, प्रवल बाजल -" चलू दुनू गोते दिल्ली,मुम्बई भागि ओहि ठाम विवाह कए लेब नहि कोनो समाज नहि गाम आ नहि मए बाबूक डर |" सुमन - "से   तँ ठीक छैक मुदा हम अपन जीवन जीबैक लेल हुनक जीवनसँ कोना खेलव जीनक जीवैक आसा अपना दुनू गोते छी | सोचू हमरा भगला बाद हमर मए बाबूकेँ आ अहाँक भगला बाद अहाँक मए बाबूकेँ समाजमे की प्रतिस्ठा रहि जेतैंह आ ओकर बाद हुनक जीवन केहन हेतैंह आ एहेन कए कs की हम दुनू अपन जीवनकेँ खुश राखि पाएब | प्रेम  तँ तियागक नाम छैक | ऐना एकटा अनुचीत डेग उठा कए हम अपन प्रेम कए बदनाम कोना कए सकै छी | रहल मिलन आ वियोगक गप्प तँ  मिलनकेँ लेल एकैटा जन्म नहि छैक, एहि जन्ममे नहि अगिला जन्ममे अपन मिलन अबस्य होएत |" सुमनकेँ ई गप्प सुनि प्रवल किछु नहि बाजि पएल ओकरा अपन करेजासँ सटा जेना सभ किछु बिसरि जएबाक प्रयास कए रहल अछि | अगिला भोरे-भोरे गामक पोखरि मोहार पर पीपड़  गाछक निच्चा भिड़क करमान लागल | सामने पीपड़ गाछसँ प्रवल आ सुमनकेँ मुइल देह फसड़ी लागल लटकल | दुनूकेँ आँखि बाहर निकलल जेना  समाजसँ एखनो किछु प्रश्न कए रहल अछि - ऐना कहिया तक, प्रेमक बलि लेब ? ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com  पर पठाउ। ३. पद्य ३.१.जगदीश चन्द्र ठाकुर ‘अनिल’- की भेटल आ की हेरा गेल  (आत्म गीत)- (आगाँ) ३.२.जगदीश प्रसाद मण्‍डलक सातटा गीत ३.३.जगदानन्द झा मनु ३.४.राजदेव मण्‍डल जीक दू गोट कवि‍ता ३.५.जवाहर लाल कश्यप ३.६.१.कपि‍लेश्वर राउत२.ओम प्रकाश ३.७.१.शिवनाथ  यादव आ अर्चना  कुमारी २.हेम नारायण साहु ३.शिव कुमार यादव ३.८.१.अनिल मल्लिक २.अंशु माला पाण्डेय ३.शान्तिलक्ष्मी चौधरी ४.आशुतोष मिश्र जगदीश चन्द्र ठाकुर ‘अनिल’ की भेटल आ की हेरा गेल  (आत्म गीत)- (आगाँ) हम गाम, शहर घुमइत रहलहुं भारतक भूमि चुमइत रहलहुं सभ जलकें गंगाजल समान देखइत रहलहुं छुबइत रहलहुं छत्तीसगढक ओइ धरती पर मिथिलाकेर धूआ देखा गेल, हम सोचि रहल छी जीवनमे की भेटल आ की हेरा गेल । बस नाव-नदी    संयोग कहू पूर्वक किछु कर्मक भोग कहू पाप-पुण्यकेर योग कहू अथवा नुकाइले दोग कहू सतपुराक ओ हरियर जंगल हमरहु अदिष्टमे लिखा गेल, हम सोचि रहल छी जीवनमे की भेटल  आ की हेरा गेल । रामक  वन-गमन जरूरी छल राजाकेर ओ मजबूरी छल सीताक हरणकेर पाछां  तं रावणकेर दसटा मूड़ी छल कैकेइक माथ पर ई कलंक मन्थराक हाथें लिखा गेल, हम सोचि रहल छी जीवनमे की भेटल आ की हेरा गेल । छल धोन्हि बहुत लागल ओत्तहु छल लोक बहुत बांटल ओत्तहु देखलहुं सभठां  जंगलमे छल लोक बहुत जागल ओत्तहु नवकलश बहुत देखलहुं लेकिन छल  गाछ कतेको सुखा गेल, हम सोचि रहल छी जीवनमे की भेटल आ की हेरा गेल । माएसं भेटल जे शीतलता ओ निर्मलता आ भावुकता पाथेय बनल से हमराले ओ लोचकता आ व्यापकता कएटा पिच्छड़ छल बाट जतय खसबासं हमरा बचा गेल, हम सोचि रहल छी जीवनमे की भेटल आ की हेरा गेल । संततिक बिछोहक दारूण दुख भरिसक जननी नहि सहि सकली चिंतासं जर्जर कायामे नहि सालो भरि ओ रहि सकली नहि जानि कोन नव दुनियामे प्राणक पंछी उड़ि पड़ा गेल, हम सोचि रहल छी जीवनमे की भेटल आ की हेरा गेल। (क्रमशः) ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। जगदीश प्रसाद मण्‍डल सातटा गीत खेल-खेलाड़ी...... खेल खेलाड़ी खेल ठानि‍ कबडी दौड़ दौड़ैत एलैए। सीमा बान्‍हि‍ भौक भौकि‍या छुबि‍-छुबि‍ छुतबैत एलैए। छुबि‍-छुबि‍ छुतबैत एलैए। खेल-खेलाड़ी......। नमगर-चौड़गर परती पराँत नमहर डेग डेगैत एलैए। आम छी, जाम छी, करि‍या लताम छी साँस छोड़ि‍ रेड़ैत एलैए। साँस छोड़ि‍ रेड़ैत एलैए। खेल-खेलाड़ी......। एक साँस चेत कबड्डी चीका-दरबर करैत एलैए। भौक बनि‍ भोकि‍या-भोकि‍या छुबि‍-छुबि‍ छुतबैत एलैए। छुबि‍-छुबि‍ छुतबैत एलैए। खेल-खेलाड़ी......। धरती खुनि‍-खुनि‍ मुदा एहनो अखड़ाहा बनबैत एलैए। माटि‍ संग हाथ मि‍ल-मि‍ला वीर भूमि‍ सि‍रजैत एलैए। वीर भूमि‍ सि‍रजैत एलैए। खेल-खेलाड़ी......। ककोड़बा...... ककोड़बा बि‍आन ककोड़बे खाइ छै। मीत यौ, ककोड़बा बि‍आन ककोड़बे खाइ छै। बि‍नु सि‍र-पएर सजि‍-सजि‍ चुट्टा-चांगुर चुहुटए लगै छै। अपने सि‍रजल-जल्‍ला-झल्‍ला खद-खुद डि‍रि‍आए लगै छै। ककोड़बा......। खखैर-खखोड़ि‍ खखरी बनि‍ दन-दनाइत कहैत रहै छै। माटि‍-पानि‍ सभ हमरे-हमरे कुम्‍हरा ढेर बनबैत रहै छै। मीत यौ, कुम्‍हरा ढेर बनबैत रहै छै। ककोड़बा.......। जेर नि‍कलि‍ जड़ि‍या-जेड़ि‍या पाछू पेट छि‍छि‍याए लगै छै। कतए जाएब कतए जाइ छी ठेकाने नै रहि‍ पबै छै। मीत यौ, ठेकान नै रहि‍ पबै छै। ककोड़बा......। सोर बनि‍...... सोर बनि‍ सन्‍हि‍या सान्‍हि‍ सि‍र चालि‍ चलए लगै छै। सि‍र-ि‍सरा सि‍रसि‍रा चुहटि‍ बत-बता बतबए लगै छै। बत-बता बतबए लगै छै। सोर बनि‍......। फुलहरि‍ फूल फड़ फलहरि‍ बड़गद वि‍रीछ बनए लगै छै। कट्ठा-कहि‍ नट्ठा बनि‍-बना सघन-घन धड़ए लगै छै। घन सघन धड़ए लगै छै। सोर बनि‍......। पकड़ि मूस मुँह मुसका शील-सि‍नेह सि‍रजए लगै छै। पकड़ि‍ पूछ पुछड़ी पकड़ि‍ घाट-घट घटबए लगै छै। घाट-घट घटबए लगै छै। सोर बनि‍......। कूट चि‍त्र घट-घट घटा पौरुष-पुरुष गढ़ै लगै छै। कूट कुटि‍ कूटि‍-पीस सि‍‍रखणि‍ सि‍र गढ़ए लगै छै। सि‍रखणि‍ सि‍र गढ़ए लगै छै। सोर बनि‍......। सेज-सिंगार...... सेज सिंगार सजि‍ साजि‍-साजि‍ साध सत् धड़ए लगै छै। दूर-दूर दुरगम दृग दृश्‍य‍ सोरहा सोर करए लगै छै। सेज-सिंगार......। बनि‍ते दहाइ एकाइ बदलि‍ सि‍ज फूल सि‍ंगार धड़ै छै। बाल-भाल लीख-लीख ललाट धार जि‍नगी कुदए लगै छै। जि‍नगी धार बहए लगै छै। सेज-सिंगार......। सोर पकड़ि‍ शोर सोर शोर सोड़ह सोरहा करए लगै छै। जि‍नगीक टपान टपि‍ते टपैत दोहरी सेज सजए लगै छै। दोहरी सेज सजए लगै छै। सेज-सिंगार......। बदला-बदली करए धन-धेनु धाम-काम कहबए लगै छै। मि‍थि‍ मालि‍न मन मलि‍‍-मलि मि‍थि‍लांगना कहबए लगै छै। ‍मि‍थि‍लांगना कहबए लगै छै। सेज-सिंगार......। जएह लूरि‍...... जएह लूरि‍-बुधि‍ मन पकड़ए तेहने टा जि‍नगी भाय यौ। नगर नजरि‍ नि‍हारि‍-नि‍हारि‍ अराधि‍ राखि‍ जि‍नगी ठनि‍यौ। अराधि‍ राखि‍ जि‍नगी ठनि‍यौ। जएह लूरि‍......। लूरि‍-बुधि‍ गरजोड़ बनि‍-बनि‍ गरदनि‍-खूटा मि‍लैत रहै छै। एक रक्षक एक भक्षक बनि‍ अमृत रस भरैत रहै छै। अमृत रस भरैत रहै छै। रंग-रंग फूल माला मालि‍न मुसुकि‍ मुँह कली कलि‍आइ छै। मालि‍न माला गढ़ि‍-मढ़ि‍ छत माली छति‍या सजै छै। छत माली छति‍या सजै छै। जएह लूरि‍......। जोति‍ हर...... जोति‍ हर हरबाह कहै छै मीत यौ, हर जोति‍ हरबाह कहै छै। नीचा-ऊपर खेत बनि‍ वन चोटी-ढाल बनल छै। बून पपीह सु-आती पकड़ि‍ मृत-अमृत रसपान करै छै। मृत-अमृत......। कीर्त-वीर्त परकृत तारा-ऊपरी सि‍र सजै छै। पसरि‍ लतड़ि‍-लतड़ि‍ लत्ती लत-मरदन करैत रहै छै। मीत यौ, लत......। चोटी पानि‍ टघड़ि‍-टघड़ि‍ झील-सरोवर सजैत रहै छै। बाल-भल कुशक कलेप स्‍थल-मरू बनबैत रहै छै। मीत यौ, स्‍थल......। हर हलक...... हर हलक हलन्‍तमे मीर-दोल तेहल बनै छै। पुर-पुष्‍कर पुरस्‍कर घाट-बाट घटैत रहै छै। हल-हलक......। एक-दू तीन चारि‍ चालि‍ गति‍ इंजीन गाड़ी धड़ै छै। अन्‍हा-गाहिंस छड़ छूटि फरकेसँ फीफीआइत रहै छै। फरकेसँ‍......। लंक मारि‍ लपकि‍-लपकि‍ संगे-संग चलैत रहै छै। करनी, मरनी भरनी बीच धार अगम बहैत रहै छै। धार अगम......। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। जगदानन्द झा मनु १.गजल जकर मोनक रावण नै मरलै राम आजुक कोना ओ बनलै डशल साँपक पइनो मंगै छै डशल मनुखक कनिको नै कनलै गेल आँगन घर सभ पलटै छै मोन भेटत कोना जे जड़लै हाथ रखने सभतरि भस्मासुर निकलितो साउध बाहर डड़लै छोड़ि ढेपापर चुगला 'मनु'केँ शहर दिस नेन्ना भुटका भगलै (मात्राक्रम-२१२२-२२-२२२) ****************************** २.गजल सुरशाक मुँह बेएने महगाइ मारलक  बरख-बरख पर पाबि  बधाइ मारलक 

छलहुँ भने बड़ नीक  बिन बन्हले कतेक  गोर-नार कनियाँ संगक सगाइ मारलक 

झूठक रंगमे डूबि जीबितहुँ कतेक दिन  रंग ह्टैत देरी झूठक बड़ाइ मारलक 

सुधि बिसरि कए सभटा निसामे बहेलहुँ  दिन राति पीया कए गाम गमाइ मारलक 

भौतिक सुखमे डूबल 'मनु' सगरो दुनियाँ जतए ततए फरजीकेँ उघाइ मारलक     

(सरल वार्णिक बहर, वर्ण-१७) ************************************** ३.गजल जे हँसी हमर सुनलहुँ अहाँ दर्दकेँ नै तँ बुझलहुँ अहाँ   दाँतकेँ बीचमे जीभ सन मोनमे अपन मुनलहुँ अहाँ

प्रेमकेँ नै किए चिन्हलहुँ देख मुह हमर घुमलहुँ अहाँ   

स्नेह आ प्रेम सभटा बिसरि मोनकेँ तोरि झुमलहुँ अहाँ

हाथ संगे खुशीकेँ पकरि हृदय मनुकेँ तँ खुनलहुँ अहाँ (बहरे मुतदारिक, २१२-२१२-२१२) ********************************** ४.गजल अनकोसँ सम्बन्ध जोड़ाबै छै पाइ छोटकाकेँ बड्डका बनाबै छै पाइ फूसियो बिकाइ छै मोलेमे आइ तँ सतकेँ सभतरि नुकाबै छै पाइ ज्ञानक कनिको मोले नहि रहल प्रवचन सभटा सुनाबै छै पाइ नहि माए बाबू नहि भाइ बहिन दुनियाँमे सभकेँ कनाबै छै पाइ चिन्हार नै अनचिन्हार एहिठाम 'मनु' आइ सभकेँ हँसाबै छै पाइ (सरल वार्णिक बहर, वर्ण-१३) *********************************** ५.गजल सभकियो दुनियाँमे किएक आँखि चोराबै छैक माँगि नहि लिए कियो तेँ सभकिछु नुकाबै छैक गरीबी भेलैक बहुते केहन ई व्यबस्था छैक गरीबी नहि सरकार गरीबेकेँ मेटाबै छैक साउस भेली सरदार गलती नहि हुनकर जतए ततए किएक पुतोहुकेँ जड़ाबै छैक जतेक दर्द बेटामे  बेटीयोमे ओतबे सभकेँ बेटा बिकाइ किएक बेटीकेँ सभ हटाबै छैक दुनियाँक रीत  एहन 'मनु'केँ नै सोहाइ छैक रहए जे खोपड़ीमे सभक घर बनाबै  छैक (सरल वार्णिक बहर, वर्ण-१८) ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। राजदेव मण्‍डल दू गोट कवि‍ता- राजदेव मण्‍डल जी दूटा कवि‍ता- उपयोग हे यौ श्रीमान्, अहाँ छी अदभुत लोग अहीं सँगे पौलौं हमहूँ सुख-भोग भरल-पूरल रहल हमरो घोघ भागल रहल दुखि‍या सोग देखलौं एहेन-एहेन दोग जे हमहूँ भऽ गेलौं बड़का लोग जतए तक पहुँचलौं ठीके नै छलौं ओइ जोग कि‍न्तु आइयो हम वएह छी कहाँ भेलौं नि‍रोग जे छल अपन तेकरो लग बनि‍ गेलौं आब कुलोग। काज पड़ल तँ ला ताकि‍ कऽ नुकाएल छौ कोन दोग भऽ गेल काज तँ हटा तुरत इहए छि‍औ संक्रामक रोग। आइ जनलौं कारण की छलै असली रोग अहाँ करैत रहलौं हरपल हमर उपयोग। (ई कवि‍ता “उपयाेग” श्री गजेन्‍द्र ठाकुरकेँ समर्पित, राजदेव मण्‍डल...) द्वन्‍द अधरति‍या भऽ गेल छै साइत अखने पहुँचलौं बौआइत सुनहट बाड़ीमे कोयलीक तान श्वेत शि‍लापर बैसल अछि‍ चान आधा मुखपर केश-पाश आधापर अछि‍ नोर, नि‍राश तैयो आस-पास छि‍टकि‍ रहल प्रकाश बि‍आहक बन्‍धन तोड़ि‍-ताड़ि‍ घर-पलि‍वारकेँ छोड़ि‍-छाड़ि‍ आएल अपने इच्‍छा कऽ रहल हमर प्रतीक्षा चि‍र प्रति‍क्षि‍त पि‍यासल मन कछ-मछा रहल तन छन-छन केना कऽ राखब मनकेँ सम्‍हारि‍ अन्‍तरमे उठल आन्‍ही-बि‍हाड़ि‍। बढ़ाएब हाथ अहाँ दि‍स लोककेँ उठतै रि‍श खुशीसँ भरत हमर मन दुसमन सभ करत सन-सन आपस घींच लेब हाथ तँ समाज रहत साथ अपने मनसँ हएत लड़ाइ लोक करैत रहत बड़ाइ। बाँहि‍ पसारि‍ बढ़ेलौं हाथ तरेतर घुमि‍ रहल अछि‍ माथ वि‍मूढ भऽ अड़ल छी द्वन्‍दमे पड़ल छी। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। जवाहर लाल कश्यप ऑंखि सँ जे झहरल नोर तकरा सब देखलक, आह मे जे जरि गेल तकरा के देखतै/ मन्जिल जे छुलक, वाह वाह सब केलक/ राह मे जे रहि गेल तकरा के देखतै/ पंख छल छोट मुदा, छुबय आकाश छल/ हिम्मत नहिं हारब, अतेक विश्वाश छल/ जे छुलक आकाश तखरा सब देखलख/ बिच मे जे रहि गेल तकरा के देखतै/ नाव छल छोट मुदा जायब सागर के पार छल छोट पतवार मुदा, साहस अपार छल/ जे पार केलक तखरा सब देखलक/ बिच मे जे डुबि गेल तकरा के देखतै/ ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। १.कपि‍लेश्वर राउत२.ओम प्रकाश १ कपि‍लेश्वर राउत रौदी रौदीक मारल सभ रि‍रि‍आइए चि‍रै-चुनमुनी चुन-चुना माल-जाल सेहो रि‍रि‍आइए माथ पकड़ि‍ मनुषी चि‍चि‍आइए रौदीक मारल सभ रि‍रि‍आइए। नहरक बनाबटो अजीबे नहरक पानि‍ अछैत बहैए ऊपरका खेत पानि‍क बि‍ना नि‍चला खेत दहा रहलए रौदीक मारल सभ रि‍रि‍आइए। कि‍सानक हालत कि‍यो ने पूछू सभटा धन उपजामे दइए कहि‍यो दाही कहि‍यो रौदी मेहनती कि‍सान तैयो हँसैए रौदीक मारल सभ रि‍रि‍आइए। जेकरा हाथमे पानि‍ छै ओकर खेत लह-लहा रहल-ए दाही-रौदीमे जि‍नाइ जे जीलक ओ हरदम चैनसँ जि‍बैए रौदीक मारल सभ रि‍रि‍आइए। कर्मयोगी जे बनल ि‍कसान ओ कर्मेकेँ प्रधानता दइए नसाखोरी आ गप-सपसँ रहबला तकर दि‍न अदि‍न होइए रौदीक मारल सभ रि‍रि‍आइए। सांख्‍य योगी सुदामा बनली दरि‍द्र जीवन जि‍बैए कर्मयोगी कृष्‍ण बनि‍ कऽ स्‍वाबलम्‍बीकेँ सभ पूजैए रौदीक मारल सभ रि‍रि‍आइए। पोथी-पतराक भवि‍ष्‍यवाणी वैज्ञानि‍को तर्क हेरैले रहैए। समए देखि‍ जे सुधरल तकरे सभ गुणगाण गबैए रौदी-दाहीमे वएह जि‍बैए रौदीक मारल सभ रि‍रि‍आइए। २ ओम प्रकाश गजल आँखिसँ नोर खसाबै छी किया एना मोती अपन लुटाबै छी किया एना खाली बातसँ भेंटत नै किछो एतय तखनो बात बनाबै छी किया एना सुनि बेथा तँ मजा लेबे करत दुनिया बेथा अपन सुनाबै छी किया एना अपने सीबऽ पडत फाटल करेजा ई अनकर आस लगाबै छी किया एना अमृतक घाट तकै छी बिखक पोखरिमे अचरज "ओम" कराबै छी किया एना (दीर्घ-दीर्घ-दीर्घ-ह्रस्व) + (ह्रस्व-दीर्घ-दीर्घ-दीर्घ) + (ह्रस्व-दीर्घ-दीर्घ-दीर्घ) (मफऊलातु-मफाईलुन-मफाईलुन)- १ बेर प्रत्येक पाँतिमे ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। १.शिवनाथ  यादव आ अर्चना  कुमारी २.हेम नारायण साहु ३.शिव कुमार यादव १ शिवनाथ  यादव आ अर्चना  कुमारी इन्दिरा आवासक रुपया सभटा खा गेलै मुखिया, हकन कनै छै गामक दुखिया, सबटा खा गेलै मुखिया। इन्दिरा आवासक रुपया सभटा खा गेलै मुखिया॥ गरीब सभकेँ बुझै छै कुमहरक बतिया, सुनिते सिखाय दै छै जनताकेँ लतिया, घरसँ बेऽघर भेलै दुखिया, सभटा खा गेलै मुखिया। इन्दिरा आवासक रुपया सभटा खा गेलय मुखिया॥ हयौ जनता कतऽ जा करत अपन फरियाद यौ, किरानी चपरासी अफसर एके दियाद यौ, सबहक जालमे ओझरा गेलै दुखिया सभटा खा गेलै मुखिया। इन्दिरा आवासक रुपया सभटा खा गेलै मुखिया॥

बी.डी.ओ. विधायक डी.एम., सी.एम. लऽ गेलै, मुखियाकेँ मोछ कनिको नै टेढ़ भेलै, दौड़धुपमे बिलटि गेलै दुखिया, सभटा खा गेलै मुखिया, इन्दिरा आवासक रुपया सभटा खा गेलै मुखिया॥

२ हेम नारायण साहु कवि‍ता जोन-बोनि‍हार हमर कमाइपर सभ राज करैए हमरे मि‍लि‍ सभ शोषण करैए। अपनामे सभ एक बनल-ए‍ दबलाहा सभकेँ बैरजना बनबैए। जोन-हरबाह बना खटबैए खटबैत-खटबैत पसि‍ना चुबाबैए। उचि‍त बोनि‍ जँ मांगए जाइ छी बि‍नु पौने आपस होइ छी। भऽ जाइ छै अनभुआर जकाँ दौगैए पगलाएल कुकुड़ जकाँ। की दबल छी, दबाएले रहब कतेक दि‍न एना सहैत रहब? धोबि‍या पाट जकाँ पि‍टाइत रहब चक्कीक गहुम जकाँ पि‍साइत रहब? ऐ सबहक कि‍एक ने मोन बदलैए दलि‍त-गरीब दि‍स ने कि‍यो तकैए। हवाक रुखि‍ आब बदलि‍ रहल अछि‍ दलि‍त-पि‍ड़ि‍त सभ जागि‍ रहल अछि‍। सबहक बेटा-बेटी पढ़ि‍ रहल अछि‍ ज्ञानक दि‍या जराए रहल अछि‍। पलटी भऽ जाएत शोषणक चक्का मारत मि‍लि‍ सभ चौका-छक्का। ३ शिव कुमार यादव मिथिला गीत

एक माटिमे जनमल हमसब एक पानिसँ पलल-बढ़ल अखनो धरि अछि पसरल यौ माँ मिथिलेक सर-समाज यौ भलमानुष सुनु-सुनु -2 तै मिथिलाकेँ बिसरि कोना जेबए छै 'मैथिल'क ई निहोरा यौ भलमानुष सुनु-सुनु- 2

अंतरा:- 1. एहि मिथिलामेऽऽऽ  एहि मिथिला मे जनम लेलनि मंडन, अयाची, विद्यापति एहि मिथिलामे रहैत छलथि लोरिक, सलहेस, वाचस्पति सभ केओ संदेस दऽ गेलथि, सभ केओ कत्तर्व्य निबाहि गेलथि ताहि कत्तर्व्यकेँ निबाहि, ताहि संदेस पर चलु-चलु यौ भलमानुष सुनु-सुन----2

2. एहि मिथिला मे ऽऽऽ एहि मिथिला मे गीत सुनाबै कोशी-कमला आ बलान एहि मिथिला मे धार बहैए गंगा-जमुना आ गंडक नित-दिन धारक पानि चलैछ, नवरंगक नव बिचार लबैछ ककरो सँ नहि पानि डरैए, अप्पन बाट बनाबी-बनाबी  यौ भलमानुष सुनु-सुनु---2

माँ मिथिले-------4

3. एहि मिथिला मेऽऽऽ एहि मिथिला मे नै कोनो कमी अछि परब-तीहार आ सनेसक एहि मिथिला मे अछि पसरल कुटुम-सम्बंधी-अपनैती लोक समाज मे रहैत अछि हिलि-मिलि सभ केओ काज करैछ माँ मिथिले केँ आजाद करू, अनकर बाट कि जोहैत-जोहैत यौ भलमानुष सुनु-सुनु---2

शिकुया "मैथिल" ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। १.अनिल मल्लिक २.अंशु माला पाण्डेय ३.शान्तिलक्ष्मी चौधरी ४.आशुतोष मिश्र १ अनिल मल्लिक गजल 

अहाँ मुसुकीसँ चान’क ईजोर भ’गेलै  राति छलैहे लगलै जेना भोर भ’गेलै हम अयलौं जखन अहाँ भन्सामे छलौं  मोनक इक्षा त’ तपैत इन्होर भ’गेलै 

राति निसबद छलै हमहुँ चुप्पे छलौं  अहाँक हँसी त’ पानिमे हिलोर ल’एलै 

घोघ कमाल केलकै हम सोचिते छलौं  श्याम रँग छलै कोना आब गोर भ’गेलै 

हम बजलौं कहाँ लोक बुझलक कोना  बौआ एतै चर्चा कोना बड्ड जोर भ’गेलै 

हमर हाल अहाँसँ कहि सकलौं कहाँ  कोमल ह्रदय ई कोना कठोर भ’गेलै 

दू मासक ई छुट्टी बितलै कत्तेक जल्दी  फेरो बिरहा आँखिमे देखू नोर ल’एलै ll (सरल वर्ण१५) 2 अंशु माला पाण्डेय मिथिला महान

तरुआ तिलकोर तरल, खीर छल मखान, शीतल जल, मन भरल मुख सोहे पान। चनमो गगनमा, करै गुणगान मैथिल छी, मान अछि मिथिला महान।।

३ शान्तिलक्ष्मी चौधरी जर-जाजन

भरिघर हुलिमालि-हुलास छै ईह, की पिहकारी, हास छै जमाय सुहासिनक जुमरट सारि-सरहोजिक रास छै

आँखिक चलै सतखेल दायकेँ फुटै परास छै जुमटल कुमार-वारक हिनके अखिहास छै

ककरो मचै प्रणय-उधम ककरो प्रेमक उपास छै परदेसी पी केँ प्राण कटै प्रीतक टाटट निसास छै

कुटुम-अतिथी सत्कारमे सभकियो दासम-दास छै अँगनाक तँ छोरू पिहानी दूआरो तेहने उलास छै

किओ चितंग अखरे चौकी कतौ मसलंगक विलास छै किओ टाँग उठौने टिटही अगरल अँगनीक घास छै

किओ धरै बहिनियारैक छौरीकेँ समधिकेँ समधीनक पिआस छै जीवह पपूकका सनक रसिक की गप्प, गप्पठंग, गपास छै

छोटका चौकी दs पानि भरल सेवामे तत्पर खबास छै जनौसँ पीठ कुरियावैत कुटुमक बस जल्दीसँ आबैक आस छै

नहायकेँ समधि मंत्र जापय माथ मे पड़ल तेल-फुलास छै लागल छप्पन-भोग आसन परसल समधिक परिहास छै

हौ लियौ, और लियौ ...मर्र एतै टा लहास छै छल्हिघर-दहि, गुदगर-रसगुल्ला आह, की खुआक सुवास छै

अन्नक छै निसाँ चढ़ल बहैत लेरोक की हवास छै माँछी नै दै कsल लेबै तैयौ नाक बाजेत खरास छै

किनको तलक पान-सुपारिक किनको खैनिक तलास छै किनको खुब चलैल कलक ठंढ पानिक तरास छै

मनोरंजनक समा बान्हल तीन ठाम पसरल तास छै रंग-डबल, गुलाम-पीयर पटक पर उठैत होहास छै

टोले टोल बिजहो भेलय भरिगाँ भोजक हुलास छै कहुना मैया पार लगेथिन मनमे इयह अभिलास छै

बाबा छथिन पतियाल धेनय मन कनै आँहुर-उदास छै जँ भेलय कनियो चौपट सभ खरचक सत्यानास छै

ब्राह्मण-रैजपुत-सोल्हकन खेलकै आब स्त्रीगणक झौंकास छै तखन बचतै करवारीक-घरवै चलु जल्दीये भेटल उगरास छै

किओ कहै जगकेँ थै-थै कतहुँ चुटकी-उपहास छै सर-समाजक काजे कून तैमे मिथिला किछ खास छै ४ आशुतोष मिश्र अहाँ किए अखन एना छी  अखन अहाँ बहुत नेन्ना छी 

माए बापकेँ अहाँ सपना नीक रहब अहाँसँ परिकल्प्ना मोती सँ हम शब्द लिखी  अहाँ ओ हमर पन्ना छी 

अहाँ किए अखन एना छी अखन अहाँ बहुत नेन्ना छी ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। विदेह नूतन अंक मिथिला कला संगीत राजनाथ मिश्र चित्रमय मिथिला स्लाइड शो चित्रमय मिथिला (https://sites.google.com/a/videha.com/videha-paintings-photos/ ) उमेश मण्डल मिथिलाक वनस्पति स्लाइड शो मिथिलाक जीव-जन्तु स्लाइड शो मिथिलाक जिनगी स्लाइड शो मिथिलाक वनस्पति/ मिथिलाक जीव जन्तु/ मिथिलाक जिनगी  (https://sites.google.com/a/videha.com/videha-paintings-photos/ ) विदेह नूतन अंक गद्य-पद्य भारती १. मोहनदास (दीर्घकथा):लेखक: उदय प्रकाश (मूल हिन्दीसँ मैथिलीमे अनुवाद विनीत उत्पल) मोहनदास (मैथिली-देवनागरी) मोहनदास (मैथिली-मिथिलाक्षर) मोहनदास (मैथिली-ब्रेल) २.छिन्नमस्ता- प्रभा खेतानक हिन्दी उपन्यासक सुशीला झा द्वारा मैथिली अनुवाद छिन्नमस्ता ३.कनकमणि दीक्षित (मूल नेपालीसँ मैथिली अनुवाद श्रीमती रूपा धीरू आ श्री धीरेन्द्र प्रेमर्षि) भगता बेङक देश-भ्रमण मन्त्रद्रष्टा ऋष्यश्रृङ्ग- हरिशंकर श्रीवास्तव “शलभ"- (हिन्दीसँ मैथिली अनुवाद विनीत उत्पल) मन्त्रद्रष्टा ऋष्यश्रृङ्ग दोसर परिच्छेद ऋष्यश्रृङ्क जन्मक वृतान्त महाकाव्य, पुराण आ दोसर पुरना ग्रंथक निर्मल जलमे प्रक्षेपक शैवाल जाल कम नै अछि। प्रक्षेपमे संकलित पुराकथाक तात्विक नीर क्षीर विवेचन निष्पक्ष प्रबुद्ध वर्ग कऽ सकैत अछि। महाभारतक वनपर्वक 110 केर ई वृतांत विश्वसनीय भऽ सकैत अछि जे महर्षि विभाण्डक मृगिसँ संभोग केने छल। कतेक परवर्ती ऋषिकेँ लऽ कऽ एहेन चर्चा अछि। ऋषि दम सेहो मृगिक संग संभोग केने छल। मृगवेशमे अप्पन कनियाक संग रतिक्रीड़ा करैत एकटा ऋषि पांडुक द्वारा वध कऽ देल गेल छल, आदि। (आदि पर्व 118) मुदा, नहि तँ ई विश्वसनीय अछि आ नहिये कोनो चिकित्साशास्त्रक आधार पर तथ्यपरक अछि जे कोनो मृगिक पेटसँ मनुखक शिशु जन्म लेने अछि। ऋष्यश्रृंङ्ग केँ लऽ कऽ कतेक आधारहीन लोकोक्ति प्रचलित अछि।  कतेक कथामे हुनका मृगिक पेटसँ जन्मल मनुखक नेनाक रूपमे देखाएल गेल अछि, जे पूरा तरहे भ्रामक अछि। महाभारत (शांतिपर्व 296) सँ ज्ञात होइत अछि जे वशिष्ठ, ऋष्यश्रृङ्ग, कश्यप, वेद, तांड, कृपाचार्य, कक्षिवत, कमठ, यवक्रीत, द्रोणाचार्य, आयु, मतंग, दत्त, द्रुमद, मात्स्य आदि ऋषि अशुद्ध योनीमे जन्म लऽ कऽ तपस्या कऽ मूल पिताक वर्णमे पहँुचल। ऐसँ ई स्पष्ट अछि जे ऐ सभ ऋषिक माय आर्येतर आ ब्रााह्णेतर  स्त्री छली। तइसँ हुनका अशुद्ध योनि कहल गेल। मुदा कर्मक सिद्धांतक अनुसार, ओ ऋषि अप्पन कठोर तपस्या आ साधनाक बल पर अप्पन पिताक कोटिमे पहुँचल। ई स्मरण रहबाक चाही जे स्त्री योनीक बिना मनुखक संततिक उत्पति असंभव अछि। पुरना भारतक संस्कृतिमे आत्मसात आ समन्वयक प्रवृत्ति एत्ते प्रबल छल जे तहियौका दूटा आदिम समूह आर्य आ अनार्यक परवर्ती जुग मे ऐ तरहेँ परस्पर समन्वय भऽ गेल जे ओ अप्पन गुणक कर्मक अनुसार चारि वर्णमे बँटि गेल। पूर्व वैदिक कालमे आठ तरहक विवाह नै छल। ई उत्तरकालक देन अछि, जे सूत्रकाल धरि आबैत-आबैत पूरा तरहे संगठित भऽ गेल छल। तहियौका समाज विवाहक सभ रूप केर मान्यता देने छल। स्थापना उत्तर वैदिक कालमे बड़ प्रचलित छल आ ऐ समन्व्यवादी प्रवृत्तिक प्रवर्तक दूरदर्शी ऋषिगण छल। ई भारतीय समाजक उत्कर्षक द्योतक छल। महर्षि विभाण्डक उत्तर वैदिककालक ऋषि छल। कोनो संदेड नै जे हुनकर स्त्री आर्येत्तर नारी छल। हुनका गर्भसँ एकटा प्रखर शिशुक जन्म भेल जे ऋष्यश्रृङ्गक नामसँ विख्यात भेल अछि। “भागवत दर्शन"क मुताबिक, विभाण्डक  त्यागी, तपस्वी, संयमी आ स्वाध्याय-परायण छल। एक दिन पोखरिमे ठाढ़ भऽ कऽ मुनि तप कऽ रहल छल। ओइ काल स्वर्गसँ उतरि कऽ उर्वशी ओतए नहाबै लेल आएल। हुनकर अनुपम रूप लावण्य देखि कऽ मुनिक मन विचलित भऽ गेल। ओ अपलक ओइ अप्सराक सौंदर्य देखैत रहल। अनजानमे हुनकर वीर्य स्खलित भऽ गेल। ओइ काल आश्रममे पलय बला एकटा हिरणी जल पीबय लेल आएल छल। ओ जलक संग ओइ अमोघ वीर्यकेँ सेहो पीब लेलक। ओ गर्भवती भऽ गेल। ओकर उदरसँ महामुनि ऋष्यश्रृङ्क जन्म भेल।1 कहल जाइत अछि जे ओ साधारण हिरणी नै छल। पूर्व कालमे ओ एकटा देवकन्या छल। कोनो पुण्यात्मा राजाकेँ देखि कऽ ओ हिरणी जकाँ अप्पन पैघ-पैघ आँखिसँ राजाक अनुराग पाबैक लेल हुनक विलोक कऽ रहल छल। ब्राह्माजी कन्याक ऐ अविनय व्यवहारकेँ देखि कऽ तमसा कऽ शाप दऽ कऽ मृत्य लोकक हिरणी बना देलक। शापमे आगू ई व्यवस्था देल गेल जे ओकर उदरसँ यशस्वी ऋषिक जन्म हएत, तखन ओ शापसँ मुक्त भऽ जाएत। वएह देवकन्या एतए हिरणी बनि कऽ रहए लागल। ओ अप्पन शापक खत्म हेबाक प्रतीक्षा करैत रहल। एक दिन उर्वशी ओम्हरसँ निकलल। जखन ओ अप्पन सखीकेँ हिरणीक रूपमे देखलक तँ ओइपर ओकरा बड़ रास दया आबि गेलै। ओ सोचए लागल जे कोन तरहेँ ओकर उदरमे ऋषिक शुक्राणु पहुँचए। ओइ काल पोखरिमे तपस्यारत विभाण्डक ऋषिपर उर्वशीक दृष्टि पड़ल। ओ लज्जा भरल भावकेँ देखाबैत पोखरिमे उतरल आ नहाबैक बहानासँ अप्पन समूचा अंगकेँ अनावृत करए लागल।2 विधिक विधान, मुनिक दृष्टि हुनकापर पड़ल। ओ कामातुर भऽ उठल आ हुनकर वीर्य स्खलित भऽ गेल। मृगी ओकरा पीब गेल आ एकटा पुत्रकेँ जन्म दऽ कऽ स्वर्ग सिधारि गेलि। मुनि विभाण्डक ओइ नेनाकेँ गो दूध पिया कऽ पालन-पोषण करए लागल। महाभारत आ श्रीमद्भागवतमे, विभाण्डक आश्रममे शापित देवकन्या मृगीक उदरसँ ऋष्यश्रृङ्गक जन्मक उल्लेख अछि।3 आजुक काल मे आदिवासी लोकमे पशुक नाम पर ओकर गोत्र जानल जाइत अछि, जेना डुंगडुंग (माछ), कच्छप (कछुआ), हांसदा (हंस) आदि। ओइ तरहेँ ऋष्यश्रृङ्गक मां मृग गोत्रीय आर्येतर कन्या छल। ओ एकटा रूपवती छल उर्वशी तरहे। तइसँ पुराणकार हुनका उर्वशीक सखिक तरहे उल्लेख केने छल। ऋष्यश्रृंगक मां केँ एकटा हिरण हेबाक एकटा मिथक अछि। ओ अयोनिज संस्कृतिमे जन्म लऽ कऽ ओकर नैसर्गिक गुण व रूप सौष्ठवक परिचायक छल। ओकर नाम मृगम्बदा छल। ओ रूपवती कन्या आषाढ़ पूर्णिमाक दिन एकटा महान शिशु केँ जन्म देलक जे संपूर्ण आर्यावर्तक तत्कालीन इतिहासकेँ एकटा नब धारा प्रदान कऽ गरिमा युक्त कऽ देलक।4 वाल्मीकि रामायणमे महर्षि कश्यपक पुत्र विभाण्डक आ महर्षि विभाण्डक पुत्र सुप्रसिद्ध मुनि ऋष्यश्रृङ्ग भेला।5 शास्त्रक गहन अनुशीलनसँ एहन लागैत अछि जे ऋष्यश्रृङ्ग अप्पन पिताक संग वनमे रहैत छल आ वनमे हुनकर लालन-पालन भेल छल। कोनो पुरनका महाकाव्य, काव्य वा पौराणिक ग्रंथमे हुनकर माँक उल्लेख नै भेटैत अछि। प्राचीन आख्यानमे योनिज आ अयोनिज, ऐ दू तरहक जातक उल्लेख भेटैत अछि। योनि शब्दक अर्थ मूलत: “घर" होइत अछि आ पुरान ग्रंथमे ऐ अर्थमे एकर प्रयोग भेटैत अछि।6 जिनकर जन्म घरमे नै भेल अछि, ओ अयोनिज संतान अछि। सीता, शकुंतला, द्रौपदी आदि अप्पन माता-पिताक अयोनिज संतान अछि। यज्ञभूमि मे 'वामदेव्यव्रत" केर उत्पन्न नेना सेहो ओइ कोटिमे आबैत अछि। जइ नेनाक जन्म अप्पन घरमे भेल ओ योनिज कहाबैत अछि। हम्मर विचारसँ ऋष्यश्रृंङ्ग अप्पन पिताक योनिज आैरस संतान छल। जन्मक पश्चात ऋषि अप्पन नेनाकेँ आर्येतर माँ सँ अलग कऽ विद्याध्ययन केर अप्पन तपोस्थलीमे राखलक। एकटा दोसर वृतान्तक मुताबिक, शिशुकेँ जन्म दऽ कऽ माँ स्वर्ग सिधार गेलि। तइसँ पिता विभाण्डक अपना लग राखि कऽ शिशुक लालन-पालन आ सभटा संस्कार देलक। महर्षि विभाण्डक ब्राह्माक मानस पुत्र मरीचिक वंश परंपरामे परम तेजस्वी आ वेद केर प्रकांड पंडित छल। महर्षि व्यास एकर वर्णन एना केने अछि, मरीचिॅ मानसस्य जज्ञे तस्यापि कश्यप:। मश्यपात्काश्यप: जात: तस्य सुतो विभाण्डक: ऋष्यश्रृङ्ग  तस्य पुत्रास्ति।।7 महर्षि विभाण्डक पुत्र ऋष्यश्रृङ्गक छह बरखक आयुमे उपनयन संस्कार करा कऽ यज्ञोपवीत धारण करौलक आ वेद विधिसँ वेदारंभ संस्कार कऽ गायत्री मंत्र प्रदान केलक। ब्राह्मचर्य धारण करा कऽ ब्राह्मचारी कठिन व्रत, तप, स्वाध्याय, प्रात: सायं गायत्री जप आदि कराबैत वेदक अध्ययन करौलक।8 (जारी...) ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। बालानां कृते बच्चा लोकनि द्वारा स्मरणीय श्लोक १.प्रातः काल ब्रह्ममुहूर्त्त (सूर्योदयक एक घंटा पहिने) सर्वप्रथम अपन दुनू हाथ देखबाक चाही, आ’ ई श्लोक बजबाक चाही। कराग्रे वसते लक्ष्मीः करमध्ये सरस्वती। करमूले स्थितो ब्रह्मा प्रभाते करदर्शनम्॥ करक आगाँ लक्ष्मी बसैत छथि, करक मध्यमे सरस्वती, करक मूलमे ब्रह्मा स्थित छथि। भोरमे ताहि द्वारे करक दर्शन करबाक थीक। २.संध्या काल दीप लेसबाक काल- दीपमूले स्थितो ब्रह्मा दीपमध्ये जनार्दनः। दीपाग्रे शङ्करः प्रोक्त्तः सन्ध्याज्योतिर्नमोऽस्तुते॥ दीपक मूल भागमे ब्रह्मा, दीपक मध्यभागमे जनार्दन (विष्णु) आऽ दीपक अग्र भागमे शङ्कर स्थित छथि। हे संध्याज्योति! अहाँकेँ नमस्कार। ३.सुतबाक काल- रामं स्कन्दं हनूमन्तं वैनतेयं वृकोदरम्। शयने यः स्मरेन्नित्यं दुःस्वप्नस्तस्य नश्यति॥ जे सभ दिन सुतबासँ पहिने राम, कुमारस्वामी, हनूमान्, गरुड़ आऽ भीमक स्मरण करैत छथि, हुनकर दुःस्वप्न नष्ट भऽ जाइत छन्हि। ४. नहेबाक समय- गङ्गे च यमुने चैव गोदावरि सरस्वति। नर्मदे सिन्धु कावेरि जलेऽस्मिन् सन्निधिं कुरू॥ हे गंगा, यमुना, गोदावरी, सरस्वती, नर्मदा, सिन्धु आऽ कावेरी  धार। एहि जलमे अपन सान्निध्य दिअ। ५.उत्तरं यत्समुद्रस्य हिमाद्रेश्चैव दक्षिणम्। वर्षं तत् भारतं नाम भारती यत्र सन्ततिः॥ समुद्रक उत्तरमे आऽ हिमालयक दक्षिणमे भारत अछि आऽ ओतुका सन्तति भारती कहबैत छथि। ६.अहल्या द्रौपदी सीता तारा मण्डोदरी तथा। पञ्चकं ना स्मरेन्नित्यं महापातकनाशकम्॥ जे सभ दिन अहल्या, द्रौपदी, सीता, तारा आऽ मण्दोदरी, एहि पाँच साध्वी-स्त्रीक स्मरण करैत छथि, हुनकर सभ पाप नष्ट भऽ जाइत छन्हि। ७.अश्वत्थामा बलिर्व्यासो हनूमांश्च विभीषणः। कृपः परशुरामश्च सप्तैते चिरञ्जीविनः॥ अश्वत्थामा, बलि, व्यास, हनूमान्, विभीषण, कृपाचार्य आऽ परशुराम- ई सात टा चिरञ्जीवी कहबैत छथि। ८.साते भवतु सुप्रीता देवी शिखर वासिनी उग्रेन तपसा लब्धो यया पशुपतिः पतिः। सिद्धिः साध्ये सतामस्तु प्रसादान्तस्य धूर्जटेः जाह्नवीफेनलेखेव यन्यूधि शशिनः कला॥ ९. बालोऽहं जगदानन्द न मे बाला सरस्वती। अपूर्णे पंचमे वर्षे वर्णयामि जगत्त्रयम् ॥ १०. दूर्वाक्षत मंत्र(शुक्ल यजुर्वेद अध्याय २२, मंत्र २२) आ ब्रह्मन्नित्यस्य प्रजापतिर्ॠषिः। लिंभोक्त्ता देवताः। स्वराडुत्कृतिश्छन्दः। षड्जः स्वरः॥ आ ब्रह्म॑न् ब्राह्म॒णो ब्र॑ह्मवर्च॒सी जा॑यता॒मा रा॒ष्ट्रे रा॑ज॒न्यः शुरे॑ऽइषव्यो॒ऽतिव्या॒धी म॑हार॒थो जा॑यतां॒ दोग्ध्रीं धे॒नुर्वोढा॑न॒ड्वाना॒शुः सप्तिः॒ पुर॑न्धि॒र्योवा॑ जि॒ष्णू र॑थे॒ष्ठाः स॒भेयो॒ युवास्य यज॑मानस्य वी॒रो जा॒यतां निका॒मे-नि॑कामे नः प॒र्जन्यों वर्षतु॒ फल॑वत्यो न॒ऽओष॑धयः पच्यन्तां योगेक्ष॒मो नः॑ कल्पताम्॥२२॥ मन्त्रार्थाः सिद्धयः सन्तु पूर्णाः सन्तु मनोरथाः। शत्रूणां बुद्धिनाशोऽस्तु मित्राणामुदयस्तव। ॐ दीर्घायुर्भव। ॐ सौभाग्यवती भव। हे भगवान्। अपन देशमे सुयोग्य आ’ सर्वज्ञ विद्यार्थी उत्पन्न होथि, आ’ शुत्रुकेँ नाश कएनिहार सैनिक उत्पन्न होथि। अपन देशक गाय खूब दूध दय बाली, बरद भार वहन करएमे सक्षम होथि आ’ घोड़ा त्वरित रूपेँ दौगय बला होए। स्त्रीगण नगरक नेतृत्व करबामे सक्षम होथि आ’ युवक सभामे ओजपूर्ण भाषण देबयबला आ’ नेतृत्व देबामे सक्षम होथि। अपन देशमे जखन आवश्यक होय वर्षा होए आ’ औषधिक-बूटी सर्वदा परिपक्व होइत रहए। एवं क्रमे सभ तरहेँ हमरा सभक कल्याण होए। शत्रुक बुद्धिक नाश होए आ’ मित्रक उदय होए॥ मनुष्यकें कोन वस्तुक इच्छा करबाक चाही तकर वर्णन एहि मंत्रमे कएल गेल अछि। एहिमे वाचकलुप्तोपमालड़्कार अछि। अन्वय- ब्रह्म॑न् - विद्या आदि गुणसँ परिपूर्ण ब्रह्म रा॒ष्ट्रे - देशमे ब्र॑ह्मवर्च॒सी-ब्रह्म विद्याक तेजसँ युक्त्त आ जा॑यतां॒- उत्पन्न होए रा॑ज॒न्यः-राजा शुरे॑ऽ–बिना डर बला इषव्यो॒- बाण चलेबामे निपुण ऽतिव्या॒धी-शत्रुकेँ तारण दय बला म॑हार॒थो-पैघ रथ बला वीर दोग्ध्रीं-कामना(दूध पूर्ण करए बाली) धे॒नुर्वोढा॑न॒ड्वाना॒शुः धे॒नु-गौ वा वाणी र्वोढा॑न॒ड्वा- पैघ बरद ना॒शुः-आशुः-त्वरित सप्तिः॒-घोड़ा पुर॑न्धि॒र्योवा॑- पुर॑न्धि॒- व्यवहारकेँ धारण करए बाली र्योवा॑-स्त्री जि॒ष्णू-शत्रुकेँ जीतए बला र॑थे॒ष्ठाः-रथ पर स्थिर स॒भेयो॒-उत्तम सभामे युवास्य-युवा जेहन यज॑मानस्य-राजाक राज्यमे वी॒रो-शत्रुकेँ पराजित करएबला निका॒मे-नि॑कामे-निश्चययुक्त्त कार्यमे नः-हमर सभक प॒र्जन्यों-मेघ वर्षतु॒-वर्षा होए फल॑वत्यो-उत्तम फल बला ओष॑धयः-औषधिः पच्यन्तां- पाकए योगेक्ष॒मो-अलभ्य लभ्य करेबाक हेतु कएल गेल योगक रक्षा नः॑-हमरा सभक हेतु कल्पताम्-समर्थ होए ग्रिफिथक अनुवाद- हे ब्रह्मण, हमर राज्यमे ब्राह्मण नीक धार्मिक विद्या बला, राजन्य-वीर,तीरंदाज, दूध दए बाली गाय, दौगय बला जन्तु, उद्यमी नारी होथि। पार्जन्य आवश्यकता पड़ला पर वर्षा देथि, फल देय बला गाछ पाकए, हम सभ संपत्ति अर्जित/संरक्षित करी। विदेह नूतन अंक भाषापाक रचना-लेखन इंग्लिश-मैथिली-कोष / मैथिली-इंग्लिश-कोष  प्रोजेक्टकेँ आगू बढ़ाऊ, अपन सुझाव आ योगदान ई-मेल द्वारा ggajendra@videha.com पर पठाऊ। Top of Form विदेहक मैथिली-अंग्रेजी आ अंग्रेजी मैथिली कोष (इंटरनेटपर पहिल बेर सर्च-डिक्शनरी) एम.एस. एस.क्यू.एल. सर्वर आधारित -Based on ms-sql server Maithili-English and English-Maithili Dictionary. १.भारत आ नेपालक मैथिली भाषा-वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक शैली आ २.मैथिलीमे भाषा सम्पादन पाठ्यक्रम १.नेपाल आ भारतक मैथिली भाषा-वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक शैली

१.१. नेपालक मैथिली भाषा वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक  उच्चारण आ लेखन शैली (भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक धारणाकेँ पूर्ण रूपसँ सङ्ग लऽ निर्धारित) मैथिलीमे उच्चारण तथा लेखन १.पञ्चमाक्षर आ अनुस्वार: पञ्चमाक्षरान्तर्गत ङ, ञ, ण, न एवं म अबैत अछि। संस्कृत भाषाक अनुसार शब्दक अन्तमे जाहि वर्गक अक्षर रहैत अछि ओही वर्गक पञ्चमाक्षर अबैत अछि। जेना- अङ्क (क वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ङ् आएल अछि।) पञ्च (च वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ञ् आएल अछि।) खण्ड (ट वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ण् आएल अछि।) सन्धि (त वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे न् आएल अछि।) खम्भ (प वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे म् आएल अछि।) उपर्युक्त बात मैथिलीमे कम देखल जाइत अछि। पञ्चमाक्षरक बदलामे अधिकांश जगहपर अनुस्वारक प्रयोग देखल जाइछ। जेना- अंक, पंच, खंड, संधि, खंभ आदि। व्याकरणविद पण्डित गोविन्द झाक कहब छनि जे कवर्ग, चवर्ग आ टवर्गसँ पूर्व अनुस्वार लिखल जाए तथा तवर्ग आ पवर्गसँ पूर्व पञ्चमाक्षरे लिखल जाए। जेना- अंक, चंचल, अंडा, अन्त तथा कम्पन। मुदा हिन्दीक निकट रहल आधुनिक लेखक एहि बातकेँ नहि मानैत छथि। ओ लोकनि अन्त आ कम्पनक जगहपर सेहो अंत आ कंपन लिखैत देखल जाइत छथि। नवीन पद्धति किछु सुविधाजनक अवश्य छैक। किएक तँ एहिमे समय आ स्थानक बचत होइत छैक। मुदा कतोक बेर हस्तलेखन वा मुद्रणमे अनुस्वारक छोट सन बिन्दु स्पष्ट नहि भेलासँ अर्थक अनर्थ होइत सेहो देखल जाइत अछि। अनुस्वारक प्रयोगमे उच्चारण-दोषक सम्भावना सेहो ततबए देखल जाइत अछि। एतदर्थ कसँ लऽ कऽ पवर्ग धरि पञ्चमाक्षरेक प्रयोग करब उचित अछि। यसँ लऽ कऽ ज्ञ धरिक अक्षरक सङ्ग अनुस्वारक प्रयोग करबामे कतहु कोनो विवाद नहि देखल जाइछ। २.ढ आ ढ़ : ढ़क उच्चारण “र् ह”जकाँ होइत अछि। अतः जतऽ “र् ह”क उच्चारण हो ओतऽ मात्र ढ़ लिखल जाए। आन ठाम खाली ढ लिखल जएबाक चाही। जेना- ढ = ढाकी, ढेकी, ढीठ, ढेउआ, ढङ्ग, ढेरी, ढाकनि, ढाठ आदि। ढ़ = पढ़ाइ, बढ़ब, गढ़ब, मढ़ब, बुढ़बा, साँढ़, गाढ़, रीढ़, चाँढ़, सीढ़ी, पीढ़ी आदि। उपर्युक्त शब्द सभकेँ देखलासँ ई स्पष्ट होइत अछि जे साधारणतया शब्दक शुरूमे ढ आ मध्य तथा अन्तमे ढ़ अबैत अछि। इएह नियम ड आ ड़क सन्दर्भ सेहो लागू होइत अछि। ३.व आ ब : मैथिलीमे “व”क उच्चारण ब कएल जाइत अछि, मुदा ओकरा ब रूपमे नहि लिखल जएबाक चाही। जेना- उच्चारण : बैद्यनाथ, बिद्या, नब, देबता, बिष्णु, बंश, बन्दना आदि। एहि सभक स्थानपर क्रमशः वैद्यनाथ, विद्या, नव, देवता, विष्णु, वंश, वन्दना लिखबाक चाही। सामान्यतया व उच्चारणक लेल ओ प्रयोग कएल जाइत अछि। जेना- ओकील, ओजह आदि। ४.य आ ज : कतहु-कतहु “य”क उच्चारण “ज”जकाँ करैत देखल जाइत अछि, मुदा ओकरा ज नहि लिखबाक चाही। उच्चारणमे यज्ञ, जदि, जमुना, जुग, जाबत, जोगी, जदु, जम आदि कहल जाएबला शब्द सभकेँ क्रमशः यज्ञ, यदि, यमुना, युग, यावत, योगी, यदु, यम लिखबाक चाही। ५.ए आ य : मैथिलीक वर्तनीमे ए आ य दुनू लिखल जाइत अछि। प्राचीन वर्तनी- कएल, जाए, होएत, माए, भाए, गाए आदि। नवीन वर्तनी- कयल, जाय, होयत, माय, भाय, गाय आदि। सामान्यतया शब्दक शुरूमे ए मात्र अबैत अछि। जेना एहि, एना, एकर, एहन आदि। एहि शब्द सभक स्थानपर यहि, यना, यकर, यहन आदिक प्रयोग नहि करबाक चाही। यद्यपि मैथिलीभाषी थारू सहित किछु जातिमे शब्दक आरम्भोमे “ए”केँ य कहि उच्चारण कएल जाइत अछि। ए आ “य”क प्रयोगक सन्दर्भमे प्राचीने पद्धतिक अनुसरण करब उपयुक्त मानि एहि पुस्तकमे ओकरे प्रयोग कएल गेल अछि। किएक तँ दुनूक लेखनमे कोनो सहजता आ दुरूहताक बात नहि अछि। आ मैथिलीक सर्वसाधारणक उच्चारण-शैली यक अपेक्षा एसँ बेसी निकट छैक। खास कऽ कएल, हएब आदि कतिपय शब्दकेँ कैल, हैब आदि रूपमे कतहु-कतहु लिखल जाएब सेहो “ए”क प्रयोगकेँ बेसी समीचीन प्रमाणित करैत अछि। ६.हि, हु तथा एकार, ओकार : मैथिलीक प्राचीन लेखन-परम्परामे कोनो बातपर बल दैत काल शब्दक पाछाँ हि, हु लगाओल जाइत छैक। जेना- हुनकहि, अपनहु, ओकरहु, तत्कालहि, चोट्टहि, आनहु आदि। मुदा आधुनिक लेखनमे हिक स्थानपर एकार एवं हुक स्थानपर ओकारक प्रयोग करैत देखल जाइत अछि। जेना- हुनके, अपनो, तत्काले, चोट्टे, आनो आदि। ७.ष तथा ख : मैथिली भाषामे अधिकांशतः षक उच्चारण ख होइत अछि। जेना- षड्यन्त्र (खड़यन्त्र), षोडशी (खोड़शी), षट्कोण (खटकोण), वृषेश (वृखेश), सन्तोष (सन्तोख) आदि। ८.ध्वनि-लोप : निम्नलिखित अवस्थामे शब्दसँ ध्वनि-लोप भऽ जाइत अछि: (क) क्रियान्वयी प्रत्यय अयमे य वा ए लुप्त भऽ जाइत अछि। ओहिमे सँ पहिने अक उच्चारण दीर्घ भऽ जाइत अछि। ओकर आगाँ लोप-सूचक चिह्न वा विकारी (’ / ऽ) लगाओल जाइछ। जेना- पूर्ण रूप : पढ़ए (पढ़य) गेलाह, कए (कय) लेल, उठए (उठय) पड़तौक। अपूर्ण रूप : पढ़’ गेलाह, क’ लेल, उठ’ पड़तौक। पढ़ऽ गेलाह, कऽ लेल, उठऽ पड़तौक। (ख) पूर्वकालिक कृत आय (आए) प्रत्ययमे य (ए) लुप्त भऽ जाइछ, मुदा लोप-सूचक विकारी नहि लगाओल जाइछ। जेना- पूर्ण रूप : खाए (य) गेल, पठाय (ए) देब, नहाए (य) अएलाह। अपूर्ण रूप : खा गेल, पठा देब, नहा अएलाह। (ग) स्त्री प्रत्यय इक उच्चारण क्रियापद, संज्ञा, ओ विशेषण तीनूमे लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना- पूर्ण रूप : दोसरि मालिनि चलि गेलि। अपूर्ण रूप : दोसर मालिन चलि गेल। (घ) वर्तमान कृदन्तक अन्तिम त लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना- पूर्ण रूप : पढ़ैत अछि, बजैत अछि, गबैत अछि। अपूर्ण रूप : पढ़ै अछि, बजै अछि, गबै अछि। (ङ) क्रियापदक अवसान इक, उक, ऐक तथा हीकमे लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना- पूर्ण रूप: छियौक, छियैक, छहीक, छौक, छैक, अबितैक, होइक। अपूर्ण रूप : छियौ, छियै, छही, छौ, छै, अबितै, होइ। (च) क्रियापदीय प्रत्यय न्ह, हु तथा हकारक लोप भऽ जाइछ। जेना- पूर्ण रूप : छन्हि, कहलन्हि, कहलहुँ, गेलह, नहि। अपूर्ण रूप : छनि, कहलनि, कहलौँ, गेलऽ, नइ, नञि, नै। ९.ध्वनि स्थानान्तरण : कोनो-कोनो स्वर-ध्वनि अपना जगहसँ हटि कऽ दोसर ठाम चलि जाइत अछि। खास कऽ ह्रस्व इ आ उक सम्बन्धमे ई बात लागू होइत अछि। मैथिलीकरण भऽ गेल शब्दक मध्य वा अन्तमे जँ ह्रस्व इ वा उ आबए तँ ओकर ध्वनि स्थानान्तरित भऽ एक अक्षर आगाँ आबि जाइत अछि। जेना- शनि (शइन), पानि (पाइन), दालि ( दाइल), माटि (माइट), काछु (काउछ), मासु (माउस) आदि। मुदा तत्सम शब्द सभमे ई निअम लागू नहि होइत अछि। जेना- रश्मिकेँ रइश्म आ सुधांशुकेँ सुधाउंस नहि कहल जा सकैत अछि। १०.हलन्त(्)क प्रयोग : मैथिली भाषामे सामान्यतया हलन्त (्)क आवश्यकता नहि होइत अछि। कारण जे शब्दक अन्तमे अ उच्चारण नहि होइत अछि। मुदा संस्कृत भाषासँ जहिनाक तहिना मैथिलीमे आएल (तत्सम) शब्द सभमे हलन्त प्रयोग कएल जाइत अछि। एहि पोथीमे सामान्यतया सम्पूर्ण शब्दकेँ मैथिली भाषा सम्बन्धी निअम अनुसार हलन्तविहीन राखल गेल अछि। मुदा व्याकरण सम्बन्धी प्रयोजनक लेल अत्यावश्यक स्थानपर कतहु-कतहु हलन्त देल गेल अछि। प्रस्तुत पोथीमे मथिली लेखनक प्राचीन आ नवीन दुनू शैलीक सरल आ समीचीन पक्ष सभकेँ समेटि कऽ वर्ण-विन्यास कएल गेल अछि। स्थान आ समयमे बचतक सङ्गहि हस्त-लेखन तथा तकनीकी दृष्टिसँ सेहो सरल होबऽबला हिसाबसँ वर्ण-विन्यास मिलाओल गेल अछि। वर्तमान समयमे मैथिली मातृभाषी पर्यन्तकेँ आन भाषाक माध्यमसँ मैथिलीक ज्ञान लेबऽ पड़ि रहल परिप्रेक्ष्यमे लेखनमे सहजता तथा एकरूपतापर ध्यान देल गेल अछि। तखन मैथिली भाषाक मूल विशेषता सभ कुण्ठित नहि होइक, ताहू दिस लेखक-मण्डल सचेत अछि। प्रसिद्ध भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक कहब छनि जे सरलताक अनुसन्धानमे एहन अवस्था किन्नहु ने आबऽ देबाक चाही जे भाषाक विशेषता छाँहमे पडि जाए। -(भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक धारणाकेँ पूर्ण रूपसँ सङ्ग लऽ निर्धारित) १.२. मैथिली अकादमी, पटना द्वारा निर्धारित मैथिली लेखन-शैली

१. जे शब्द मैथिली-साहित्यक प्राचीन कालसँ आइ धरि जाहि वर्त्तनीमे प्रचलित अछि, से सामान्यतः ताहि वर्त्तनीमे लिखल जाय- उदाहरणार्थ-

ग्राह्य

एखन ठाम जकर, तकर तनिकर अछि

अग्राह्य अखन, अखनि, एखेन, अखनी ठिमा, ठिना, ठमा जेकर, तेकर तिनकर। (वैकल्पिक रूपेँ ग्राह्य) ऐछ, अहि, ए।

२. निम्नलिखित तीन प्रकारक रूप वैकल्पिकतया अपनाओल जाय: भऽ गेल, भय गेल वा भए गेल। जा रहल अछि, जाय रहल अछि, जाए रहल अछि। कर’ गेलाह, वा करय गेलाह वा करए गेलाह।

३. प्राचीन मैथिलीक ‘न्ह’ ध्वनिक स्थानमे ‘न’ लिखल जाय सकैत अछि यथा कहलनि वा कहलन्हि।

४. ‘ऐ’ तथा ‘औ’ ततय लिखल जाय जत’ स्पष्टतः ‘अइ’ तथा ‘अउ’ सदृश उच्चारण इष्ट हो। यथा- देखैत, छलैक, बौआ, छौक इत्यादि।

५. मैथिलीक निम्नलिखित शब्द एहि रूपे प्रयुक्त होयत: जैह, सैह, इएह, ओऐह, लैह तथा दैह।

६. ह्र्स्व इकारांत शब्दमे ‘इ’ के लुप्त करब सामान्यतः अग्राह्य थिक। यथा- ग्राह्य देखि आबह, मालिनि गेलि (मनुष्य मात्रमे)।

७. स्वतंत्र ह्रस्व ‘ए’ वा ‘य’ प्राचीन मैथिलीक उद्धरण आदिमे तँ यथावत राखल जाय, किंतु आधुनिक प्रयोगमे वैकल्पिक रूपेँ ‘ए’ वा ‘य’ लिखल जाय। यथा:- कयल वा कएल, अयलाह वा अएलाह, जाय वा जाए इत्यादि।

८. उच्चारणमे दू स्वरक बीच जे ‘य’ ध्वनि स्वतः आबि जाइत अछि तकरा लेखमे स्थान वैकल्पिक रूपेँ देल जाय। यथा- धीआ, अढ़ैआ, विआह, वा धीया, अढ़ैया, बियाह।

९. सानुनासिक स्वतंत्र स्वरक स्थान यथासंभव ‘ञ’ लिखल जाय वा सानुनासिक स्वर। यथा:- मैञा, कनिञा, किरतनिञा वा मैआँ, कनिआँ, किरतनिआँ।

१०. कारकक विभक्त्तिक निम्नलिखित रूप ग्राह्य:- हाथकेँ, हाथसँ, हाथेँ, हाथक, हाथमे। ’मे’ मे अनुस्वार सर्वथा त्याज्य थिक। ‘क’ क वैकल्पिक रूप ‘केर’ राखल जा सकैत अछि।

११. पूर्वकालिक क्रियापदक बाद ‘कय’ वा ‘कए’ अव्यय वैकल्पिक रूपेँ लगाओल जा सकैत अछि। यथा:- देखि कय वा देखि कए।

१२. माँग, भाँग आदिक स्थानमे माङ, भाङ इत्यादि लिखल जाय।

१३. अर्द्ध ‘न’ ओ अर्द्ध ‘म’ क बदला अनुसार नहि लिखल जाय, किंतु छापाक सुविधार्थ अर्द्ध ‘ङ’ , ‘ञ’, तथा ‘ण’ क बदला अनुस्वारो लिखल जा सकैत अछि। यथा:- अङ्क, वा अंक, अञ्चल वा अंचल, कण्ठ वा कंठ।

१४. हलंत चिह्न निअमतः लगाओल जाय, किंतु विभक्तिक संग अकारांत प्रयोग कएल जाय। यथा:- श्रीमान्, किंतु श्रीमानक।

१५. सभ एकल कारक चिह्न शब्दमे सटा क’ लिखल जाय, हटा क’ नहि, संयुक्त विभक्तिक हेतु फराक लिखल जाय, यथा घर परक।

१६. अनुनासिककेँ चन्द्रबिन्दु द्वारा व्यक्त कयल जाय। परंतु मुद्रणक सुविधार्थ हि समान जटिल मात्रापर अनुस्वारक प्रयोग चन्द्रबिन्दुक बदला कयल जा सकैत अछि। यथा- हिँ केर बदला हिं।

१७. पूर्ण विराम पासीसँ ( । ) सूचित कयल जाय।

१८. समस्त पद सटा क’ लिखल जाय, वा हाइफेनसँ जोड़ि क’ ,  हटा क’ नहि।

१९. लिअ तथा दिअ शब्दमे बिकारी (ऽ) नहि लगाओल जाय।

२०. अंक देवनागरी रूपमे राखल जाय।

२१.किछु ध्वनिक लेल नवीन चिन्ह बनबाओल जाय। जा' ई नहि बनल अछि ताबत एहि दुनू ध्वनिक बदला पूर्ववत् अय/ आय/ अए/ आए/ आओ/ अओ लिखल जाय। आकि ऎ वा ऒ सँ व्यक्त कएल जाय।

ह./- गोविन्द झा ११/८/७६ श्रीकान्त ठाकुर ११/८/७६ सुरेन्द्र झा "सुमन" ११/०८/७६

  २. मैथिलीमे भाषा सम्पादन पाठ्यक्रम २.१. उच्चारण निर्देश: (बोल्ड कएल रूप ग्राह्य):- दन्त न क उच्चारणमे दाँतमे जीह सटत- जेना बाजू नाम , मुदा ण क उच्चारणमे जीह मूर्धामे सटत (नै सटैए तँ उच्चारण दोष अछि)- जेना बाजू गणेश। तालव्य शमे जीह तालुसँ , षमे मूर्धासँ आ दन्त समे दाँतसँ सटत। निशाँ, सभ आ शोषण बाजि कऽ देखू। मैथिलीमे ष केँ वैदिक संस्कृत जकाँ ख सेहो उच्चरित कएल जाइत अछि, जेना वर्षा, दोष। य अनेको स्थानपर ज जकाँ उच्चरित होइत अछि आ ण ड़ जकाँ (यथा संयोग आ गणेश संजोग आ गड़ेस उच्चरित होइत अछि)। मैथिलीमे व क उच्चारण ब, श क उच्चारण स आ य क उच्चारण ज सेहो होइत अछि। ओहिना ह्रस्व इ बेशीकाल मैथिलीमे पहिने बाजल जाइत अछि कारण देवनागरीमे आ मिथिलाक्षरमे ह्रस्व इ अक्षरक पहिने लिखलो जाइत आ बाजलो जएबाक चाही। कारण जे हिन्दीमे एकर दोषपूर्ण उच्चारण होइत अछि (लिखल तँ पहिने जाइत अछि मुदा बाजल बादमे जाइत अछि), से शिक्षा पद्धतिक दोषक कारण हम सभ ओकर उच्चारण दोषपूर्ण ढंगसँ कऽ रहल छी। अछि- अ इ छ  ऐछ (उच्चारण) छथि- छ इ थ  – छैथ (उच्चारण) पहुँचि- प हुँ इ च (उच्चारण) आब अ आ इ ई ए ऐ ओ औ अं अः ऋ ऐ सभ लेल मात्रा सेहो अछि, मुदा ऐमे ई ऐ ओ औ अं अः ऋ केँ संयुक्ताक्षर रूपमे गलत रूपमे प्रयुक्त आ उच्चरित कएल जाइत अछि। जेना ऋ केँ री  रूपमे उच्चरित करब। आ देखियौ- ऐ लेल देखिऔ क प्रयोग अनुचित। मुदा देखिऐ लेल देखियै अनुचित। क् सँ ह् धरि अ सम्मिलित भेलासँ क सँ ह बनैत अछि, मुदा उच्चारण काल हलन्त युक्त शब्दक अन्तक उच्चारणक प्रवृत्ति बढ़ल अछि, मुदा हम जखन मनोजमे ज् अन्तमे बजैत छी, तखनो पुरनका लोककेँ बजैत सुनबन्हि- मनोजऽ, वास्तवमे ओ अ युक्त ज् = ज बजै छथि। फेर ज्ञ अछि ज् आ ञ क संयुक्त मुदा गलत उच्चारण होइत अछि- ग्य। ओहिना क्ष अछि क् आ ष क संयुक्त मुदा उच्चारण होइत अछि छ। फेर श् आ र क संयुक्त अछि श्र ( जेना श्रमिक) आ स् आ र क संयुक्त अछि स्र (जेना मिस्र)। त्र भेल त+र । उच्चारणक ऑडियो फाइल विदेह आर्काइव  http://www.videha.co.in/ पर उपलब्ध अछि। फेर केँ / सँ / पर पूर्व अक्षरसँ सटा कऽ लिखू मुदा तँ / कऽ हटा कऽ। ऐमे सँ मे पहिल सटा कऽ लिखू आ बादबला हटा कऽ। अंकक बाद टा लिखू सटा कऽ मुदा अन्य ठाम टा लिखू हटा कऽ– जेना छहटा मुदा सभ टा। फेर ६अ म सातम लिखू- छठम सातम नै। घरबलामे बला मुदा घरवालीमे वाली प्रयुक्त करू। रहए- रहै मुदा सकैए (उच्चारण सकै-ए)। मुदा कखनो काल रहए आ रहै मे अर्थ भिन्नता सेहो, जेना से कम्मो जगहमे पार्किंग करबाक अभ्यास रहै ओकरा। पुछलापर पता लागल जे ढुनढुन नाम्ना ई ड्राइवर कनाट प्लेसक पार्किंगमे काज करैत रहए। छलै, छलए मे सेहो ऐ तरहक भेल। छलए क उच्चारण छल-ए सेहो। संयोगने- (उच्चारण संजोगने) केँ/  कऽ केर- क ( केर क प्रयोग गद्यमे नै करू , पद्यमे कऽ सकै छी। ) क (जेना रामक) –रामक आ संगे (उच्चारण राम के /  राम कऽ सेहो) सँ- सऽ (उच्चारण) चन्द्रबिन्दु आ अनुस्वार- अनुस्वारमे कंठ धरिक प्रयोग होइत अछि मुदा चन्द्रबिन्दुमे नै। चन्द्रबिन्दुमे कनेक एकारक सेहो उच्चारण होइत अछि- जेना रामसँ- (उच्चारण राम सऽ)  रामकेँ- (उच्चारण राम कऽ/ राम के सेहो)। केँ जेना रामकेँ भेल हिन्दीक को (राम को)- राम को= रामकेँ क जेना रामक भेल हिन्दीक का ( राम का) राम का= रामक कऽ जेना जा कऽ भेल हिन्दीक कर ( जा कर) जा कर= जा कऽ सँ भेल हिन्दीक से (राम से) राम से= रामसँ सऽ , तऽ , त , केर (गद्यमे) एे चारू शब्द सबहक प्रयोग अवांछित। के दोसर अर्थेँ प्रयुक्त भऽ सकैए- जेना, के कहलक? विभक्ति “क”क बदला एकर प्रयोग अवांछित। नञि, नहि, नै, नइ, नँइ, नइँ, नइं ऐ सभक उच्चारण आ लेखन - नै त्त्व क बदलामे त्व जेना महत्वपूर्ण (महत्त्वपूर्ण नै) जतए अर्थ बदलि जाए ओतहि मात्र तीन अक्षरक संयुक्ताक्षरक प्रयोग उचित। सम्पति- उच्चारण स म्प इ त (सम्पत्ति नै- कारण सही उच्चारण आसानीसँ सम्भव नै)। मुदा सर्वोत्तम (सर्वोतम नै)। राष्ट्रिय (राष्ट्रीय नै) सकैए/ सकै (अर्थ परिवर्तन) पोछैले/ पोछै लेल/ पोछए लेल पोछैए/ पोछए/ (अर्थ परिवर्तन) पोछए/ पोछै ओ लोकनि ( हटा कऽ, ओ मे बिकारी नै) ओइ/ ओहि ओहिले/ ओहि लेल/ ओही लऽ जएबेँ/ बैसबेँ पँचभइयाँ देखियौक/ (देखिऔक नै- तहिना अ मे ह्रस्व आ दीर्घक मात्राक प्रयोग अनुचित) जकाँ / जेकाँ तँइ/ तैँ/ होएत / हएत नञि/ नहि/ नँइ/ नइँ/ नै सौँसे/ सौंसे बड़ / बड़ी (झोराओल) गाए (गाइ नहि), मुदा गाइक दूध (गाएक दूध नै।) रहलेँ/ पहिरतैँ हमहीं/ अहीं सब - सभ सबहक - सभहक धरि - तक गप- बात बूझब - समझब बुझलौं/ समझलौं/ बुझलहुँ - समझलहुँ हमरा आर - हम सभ आकि- आ कि सकैछ/ करैछ (गद्यमे प्रयोगक आवश्यकता नै) होइन/ होनि जाइन (जानि नै, जेना देल जाइन) मुदा जानि-बूझि (अर्थ परिव्र्तन) पइठ/ जाइठ आउ/ जाउ/ आऊ/ जाऊ मे, केँ, सँ, पर (शब्दसँ सटा कऽ) तँ कऽ धऽ दऽ (शब्दसँ हटा कऽ) मुदा दूटा वा बेसी विभक्ति संग रहलापर पहिल विभक्ति टाकेँ सटाऊ। जेना ऐमे सँ । एकटा , दूटा (मुदा कए टा) बिकारीक प्रयोग शब्दक अन्तमे, बीचमे अनावश्यक रूपेँ नै। आकारान्त आ अन्तमे अ क बाद बिकारीक प्रयोग नै (जेना दिअ , आ/ दिय’ , आ’, आ नै ) अपोस्ट्रोफीक प्रयोग बिकारीक बदलामे करब अनुचित आ मात्र फॉन्टक तकनीकी न्यूनताक परिचायक)- ओना बिकारीक संस्कृत रूप ऽ अवग्रह कहल जाइत अछि आ वर्तनी आ उच्चारण दुनू ठाम एकर लोप रहैत अछि/ रहि सकैत अछि (उच्चारणमे लोप रहिते अछि)। मुदा अपोस्ट्रोफी सेहो अंग्रेजीमे पसेसिव केसमे होइत अछि आ फ्रेंचमे शब्दमे जतए एकर प्रयोग होइत अछि जेना raison d’etre एतए सेहो एकर उच्चारण रैजौन डेटर होइत अछि, माने अपोस्ट्रॉफी अवकाश नै दैत अछि वरन जोड़ैत अछि, से एकर प्रयोग बिकारीक बदला देनाइ तकनीकी रूपेँ सेहो अनुचित)। अइमे, एहिमे/ ऐमे जइमे, जाहिमे एखन/ अखन/ अइखन केँ (के नहि) मे (अनुस्वार रहित) भऽ मे दऽ तँ (तऽ, त नै) सँ ( सऽ स नै) गाछ तर गाछ लग साँझ खन जो (जो go, करै जो do) तै/तइ जेना- तै दुआरे/ तइमे/ तइले जै/जइ जेना- जै कारण/ जइसँ/ जइले ऐ/अइ जेना- ऐ कारण/ ऐसँ/ अइले/ मुदा एकर एकटा खास प्रयोग- लालति‍ कतेक दि‍नसँ कहैत रहैत अइ लै/लइ जेना लैसँ/ लइले/ लै दुआरे लहँ/ लौं गेलौं/ लेलौं/ लेलँह/ गेलहुँ/ लेलहुँ/ लेलँ जइ/ जाहि‍/ जै जहि‍ठाम/ जाहि‍ठाम/ जइठाम/ जैठाम एहि‍/ अहि‍/ अइ (वाक्यक अंतमे ग्राह्य) / ऐ अइछ/ अछि‍/ ऐछ तइ/ तहि‍/ तै/ ताहि‍ ओहि‍/ ओइ सीखि‍/ सीख जीवि‍/ जीवी/ जीब भलेहीं/ भलहि‍ं तैं/ तँइ/ तँए जाएब/ जएब लइ/ लै छइ/ छै नहि‍/ नै/ नइ गइ/ गै छनि‍/ छन्‍हि‍  ... समए शब्‍दक संग जखन कोनो वि‍भक्‍ति‍ जुटै छै तखन समै जना समैपर इत्‍यादि‍। असगरमे हृदए आ वि‍भक्‍ति‍ जुटने हृदे जना हृदेसँ, हृदेमे इत्‍यादि‍। जइ/ जाहि‍/ जै जहि‍ठाम/ जाहि‍ठाम/ जइठाम/ जैठाम एहि‍/ अहि‍/ अइ/ ऐ अइछ/ अछि‍/ ऐछ तइ/ तहि‍/ तै/ ताहि‍ ओहि‍/ ओइ सीखि‍/ सीख जीवि‍/ जीवी/ जीब भले/ भलेहीं/ भलहि‍ं तैं/ तँइ/ तँए जाएब/ जएब लइ/ लै छइ/ छै नहि‍/ नै/ नइ गइ/ गै छनि‍/ छन्‍हि‍ चुकल अछि/ गेल गछि २.२. मैथिलीमे भाषा सम्पादन पाठ्यक्रम नीचाँक सूचीमे देल विकल्पमेसँ लैंगुएज एडीटर द्वारा कोन रूप चुनल जेबाक चाही: बोल्ड कएल रूप ग्राह्य: १.होयबला/ होबयबला/ होमयबला/ हेब’बला, हेम’बला/ होयबाक/होबएबला /होएबाक २. आ’/आऽ आ ३. क’ लेने/कऽ लेने/कए लेने/कय लेने/ल’/लऽ/लय/लए ४. भ’ गेल/भऽ गेल/भय गेल/भए गेल ५. कर’ गेलाह/करऽ गेलह/करए गेलाह/करय गेलाह ६. लिअ/दिअ लिय’,दिय’,लिअ’,दिय’/ ७. कर’ बला/करऽ बला/ करय बला करैबला/क’र’ बला / करैवाली ८. बला वला (पुरूष), वाली (स्‍त्री) ९ . आङ्ल आंग्ल १०. प्रायः प्रायह ११. दुःख दुख १ २. चलि गेल चल गेल/चैल गेल १३. देलखिन्ह देलकिन्ह, देलखिन १४. देखलन्हि देखलनि/ देखलैन्ह १५. छथिन्ह/ छलन्हि छथिन/ छलैन/ छलनि १६. चलैत/दैत चलति/दैति १७. एखनो अखनो १८. बढ़नि‍ बढ़इन बढ़न्हि १९. ओ’/ओऽ(सर्वनाम) ओ २० . ओ (संयोजक) ओ’/ओऽ २१. फाँगि/फाङ्गि फाइंग/फाइङ २२. जे जे’/जेऽ २३. ना-नुकुर ना-नुकर २४. केलन्हि/केलनि‍/कयलन्हि २५. तखनतँ/ तखन तँ २६. जा रहल/जाय रहल/जाए रहल २७. निकलय/निकलए लागल/ लगल बहराय/ बहराए लागल/ लगल निकल’/बहरै लागल २८. ओतय/ जतय जत’/ ओत’/ जतए/ ओतए २९. की फूरल जे कि फूरल जे ३०. जे जे’/जेऽ ३१. कूदि / यादि(मोन पारब) कूइद/याइद/कूद/याद/ यादि (मोन) ३२. इहो/ ओहो ३३. हँसए/ हँसय हँसऽ ३४. नौ आकि दस/नौ किंवा दस/ नौ वा दस ३५. सासु-ससुर सास-ससुर ३६. छह/ सात छ/छः/सात ३७. की  की’/ कीऽ (दीर्घीकारान्तमे ऽ वर्जित) ३८. जबाब जवाब ३९. करएताह/ करेताह करयताह ४०. दलान दिशि दलान दिश/दलान दिस ४१ . गेलाह गएलाह/गयलाह ४२. किछु आर/ किछु और/ किछ आर ४३. जाइ छल/ जाइत छल जाति छल/जैत छल ४४. पहुँचि/ भेट जाइत छल/ भेट जाइ छलए पहुँच/ भेटि‍ जाइत छल ४५. जबान (युवा)/ जवान(फौजी) ४६. लय/ लए क’/ कऽ/ लए कए / लऽ कऽ/ लऽ कए ४७. ल’/लऽ कय/ कए ४८. एखन / एखने / अखन / अखने ४९. अहींकेँ अहीँकेँ ५०. गहींर गहीँर ५१. धार पार केनाइ धार पार केनाय/केनाए ५२. जेकाँ जेँकाँ/ जकाँ ५३. तहिना तेहिना ५४. एकर अकर ५५. बहिनउ बहनोइ ५६. बहिन बहिनि ५७. बहिन-बहिनोइ बहिन-बहनउ ५८. नहि/ नै ५९. करबा / करबाय/ करबाए ६०. तँ/ त ऽ तय/तए ६१. भैयारी मे छोट-भाए/भै/, जेठ-भाय/भाइ, ६२. गि‍नतीमे दू भाइ/भाए/भाँइ ६३. ई पोथी दू भाइक/ भाँइ/ भाए/ लेल। यावत जावत ६४. माय मै / माए मुदा माइक ममता ६५. देन्हि/ दइन दनि‍/ दएन्हि/ दयन्हि दन्हि/ दैन्हि ६६. द’/ दऽ/ दए ६७. ओ (संयोजक) ओऽ (सर्वनाम) ६८. तका कए तकाय तकाए ६९. पैरे (on foot) पएरे  कएक/ कैक ७०. ताहुमे/ ताहूमे ७१. पुत्रीक ७२. बजा कय/ कए / कऽ ७३. बननाय/बननाइ ७४. कोला ७५. दिनुका दिनका ७६. ततहिसँ ७७. गरबओलन्हि/ गरबौलनि‍/ गरबेलन्हि/ गरबेलनि‍ ७८. बालु बालू ७९. चेन्ह चिन्ह(अशुद्ध) ८०. जे जे’ ८१ . से/ के से’/के’ ८२. एखुनका अखनुका ८३. भुमिहार भूमिहार ८४. सुग्गर / सुगरक/ सूगर ८५. झठहाक झटहाक ८६. छूबि ८७. करइयो/ओ करैयो ने देलक /करियौ-करइयौ ८८. पुबारि पुबाइ ८९. झगड़ा-झाँटी झगड़ा-झाँटि ९०. पएरे-पएरे पैरे-पैरे ९१. खेलएबाक ९२. खेलेबाक ९३. लगा ९४. होए- हो – होअए ९५. बुझल बूझल ९६. बूझल (संबोधन अर्थमे) ९७. यैह यएह / इएह/ सैह/ सएह ९८. तातिल ९९. अयनाय- अयनाइ/ अएनाइ/ एनाइ १००. निन्न- निन्द १०१. बिनु बिन १०२. जाए जाइ १०३. जाइ (in different sense)-last word of sentence १०४. छत पर आबि जाइ १०५. ने १०६. खेलाए (play) –खेलाइ १०७. शिकाइत- शिकायत १०८. ढप- ढ़प १०९ . पढ़- पढ ११०. कनिए/ कनिये कनिञे १११. राकस- राकश ११२. होए/ होय होइ ११३. अउरदा- औरदा ११४. बुझेलन्हि (different meaning- got understand) ११५. बुझएलन्हि/बुझेलनि‍/ बुझयलन्हि (understood himself) ११६. चलि- चल/ चलि‍ गेल ११७. खधाइ- खधाय ११८. मोन पाड़लखिन्ह/ मोन पाड़लखि‍न/ मोन पारलखिन्ह ११९. कैक- कएक- कइएक १२०. लग ल’ग १२१. जरेनाइ १२२. जरौनाइ जरओनाइ- जरएनाइ/ जरेनाइ १२३. होइत १२४. गरबेलन्हि/ गरबेलनि‍ गरबौलन्हि/ गरबौलनि‍ १२५. चिखैत- (to test)चिखइत १२६. करइयो (willing to do) करैयो १२७. जेकरा- जकरा १२८. तकरा- तेकरा १२९. बिदेसर स्थानेमे/ बिदेसरे स्थानमे १३०. करबयलहुँ/ करबएलहुँ/ करबेलहुँ करबेलौं १३१. हारिक (उच्चारण हाइरक) १३२. ओजन वजन आफसोच/ अफसोस कागत/ कागच/ कागज १३३. आधे भाग/ आध-भागे १३४. पिचा / पिचाय/पिचाए १३५. नञ/ ने १३६. बच्चा नञ (ने) पिचा जाय १३७. तखन ने (नञ) कहैत अछि। कहै/ सुनै/ देखै छल मुदा कहैत-कहैत/ सुनैत-सुनैत/ देखैत-देखैत १३८. कतेक गोटे/ कताक गोटे १३९. कमाइ-धमाइ/ कमाई- धमाई १४० . लग ल’ग १४१. खेलाइ (for playing) १४२. छथिन्ह/ छथिन १४३. होइत होइ १४४. क्यो कियो / केओ १४५. केश (hair) १४६. केस (court-case) १४७ . बननाइ/ बननाय/ बननाए १४८. जरेनाइ १४९. कुरसी कुर्सी १५०. चरचा चर्चा १५१. कर्म करम १५२. डुबाबए/ डुबाबै/ डुमाबै डुमाबय/ डुमाबए १५३. एखुनका/ अखुनका १५४. लए/ लिअए (वाक्यक अंतिम शब्द)- लऽ १५५. कएलक/ केलक १५६. गरमी गर्मी १५७ . वरदी वर्दी १५८. सुना गेलाह सुना’/सुनाऽ १५९. एनाइ-गेनाइ १६०. तेना ने घेरलन्हि/ तेना ने घेरलनि‍ १६१. नञि / नै १६२. डरो ड’रो १६३. कतहु/ कतौ कहीं १६४. उमरिगर-उमेरगर उमरगर १६५. भरिगर १६६. धोल/धोअल धोएल १६७. गप/गप्प १६८. के के’ १६९. दरबज्जा/ दरबजा १७०. ठाम १७१. धरि तक १७२. घूरि लौटि १७३. थोरबेक १७४. बड्ड १७५. तोँ/ तूँ १७६. तोँहि( पद्यमे ग्राह्य) १७७. तोँही / तोँहि १७८. करबाइए करबाइये १७९. एकेटा १८०. करितथि /करतथि १८१. पहुँचि/ पहुँच १८२. राखलन्हि रखलन्हि/ रखलनि‍ १८३. लगलन्हि/ लगलनि‍ लागलन्हि १८४. सुनि (उच्चारण सुइन) १८५. अछि (उच्चारण अइछ) १८६. एलथि गेलथि १८७. बितओने/ बि‍तौने/ बितेने १८८. करबओलन्हि/ करबौलनि‍/ करेलखिन्ह/ करेलखि‍न १८९. करएलन्हि/ करेलनि‍ १९०. आकि/ कि १९१. पहुँचि/ पहुँच १९२. बत्ती जराय/ जराए जरा (आगि लगा) १९३. से से’ १९४. हाँ मे हाँ (हाँमे हाँ विभक्त्तिमे हटा कए) १९५. फेल फैल १९६. फइल(spacious) फैल १९७. होयतन्हि/ होएतन्हि/ होएतनि‍/हेतनि‍/ हेतन्हि १९८. हाथ मटिआएब/ हाथ मटियाबय/हाथ मटियाएब १९९. फेका फेंका २००. देखाए देखा २०१. देखाबए २०२. सत्तरि सत्तर २०३. साहेब साहब २०४.गेलैन्ह/ गेलन्हि/ गेलनि‍ २०५. हेबाक/ होएबाक २०६.केलो/ कएलहुँ/केलौं/ केलुँ २०७. किछु न किछु/ किछु ने किछु २०८.घुमेलहुँ/ घुमओलहुँ/ घुमेलौं २०९. एलाक/ अएलाक २१०. अः/ अह २११.लय/ लए (अर्थ-परिवर्त्तन) २१२.कनीक/ कनेक २१३.सबहक/ सभक २१४.मिलाऽ/ मिला २१५.कऽ/ क २१६.जाऽ/ जा २१७.आऽ/ आ २१८.भऽ /भ’ (’ फॉन्टक कमीक द्योतक) २१९.निअम/ नियम २२० .हेक्टेअर/ हेक्टेयर २२१.पहिल अक्षर ढ/ बादक/ बीचक ढ़ २२२.तहिं/तहिँ/ तञि/ तैं २२३.कहिं/ कहीं २२४.तँइ/ तैं / तइँ २२५.नँइ/ नइँ/  नञि/ नहि/नै २२६.है/ हए / एलीहेँ/ २२७.छञि/ छै/ छैक /छइ २२८.दृष्टिएँ/ दृष्टियेँ २२९.आ (come)/ आऽ(conjunction) २३०. आ (conjunction)/ आऽ(come) २३१.कुनो/ कोनो, कोना/केना २३२.गेलैन्ह-गेलन्हि-गेलनि‍ २३३.हेबाक- होएबाक २३४.केलौँ- कएलौँ-कएलहुँ/केलौं २३५.किछु न किछ- किछु ने किछु २३६.केहेन- केहन २३७.आऽ (come)-आ (conjunction-and)/आ। आब'-आब' /आबह-आबह २३८. हएत-हैत २३९.घुमेलहुँ-घुमएलहुँ- घुमेलाें २४०.एलाक- अएलाक २४१.होनि- होइन/ होन्हि/ २४२.ओ-राम ओ श्यामक बीच(conjunction), ओऽ कहलक (he said)/ओ २४३.की हए/ कोसी अएली हए/ की है। की हइ २४४.दृष्टिएँ/ दृष्टियेँ २४५ .शामिल/ सामेल २४६.तैँ / तँए/ तञि/ तहिं २४७.जौं / ज्योँ/ जँ/ २४८.सभ/ सब २४९.सभक/ सबहक २५०.कहिं/ कहीं २५१.कुनो/ कोनो/ कोनहुँ/ २५२.फारकती भऽ गेल/ भए गेल/ भय गेल २५३.कोना/ केना/ कन्‍ना/कना २५४.अः/ अह २५५.जनै/ जनञ २५६.गेलनि‍/ गेलाह (अर्थ परिवर्तन) २५७.केलन्हि/ कएलन्हि/ केलनि‍/ २५८.लय/ लए/ लएह (अर्थ परिवर्तन) २५९.कनीक/ कनेक/कनी-मनी २६०.पठेलन्हि‍ पठेलनि‍/ पठेलइन/ पपठओलन्हि/ पठबौलनि‍/ २६१.निअम/ नियम २६२.हेक्टेअर/ हेक्टेयर २६३.पहिल अक्षर रहने ढ/ बीचमे रहने ढ़ २६४.आकारान्तमे बिकारीक प्रयोग उचित नै/ अपोस्ट्रोफीक प्रयोग फान्टक तकनीकी न्यूनताक परिचायक ओकर बदला अवग्रह (बिकारी) क प्रयोग उचित २६५.केर (पद्यमे ग्राह्य) / -क/ कऽ/ के २६६.छैन्हि- छन्हि २६७.लगैए/ लगैये २६८.होएत/ हएत २६९.जाएत/ जएत/ २७०.आएत/ अएत/ आओत २७१ .खाएत/ खएत/ खैत २७२.पिअएबाक/ पिएबाक/पि‍येबाक २७३.शुरु/ शुरुह २७४.शुरुहे/ शुरुए २७५.अएताह/अओताह/ एताह/ औताह २७६.जाहि/ जाइ/ जइ/ जै/ २७७.जाइत/ जैतए/ जइतए २७८.आएल/ अएल २७९.कैक/ कएक २८०.आयल/ अएल/ आएल २८१. जाए/ जअए/ जए (लालति‍ जाए लगलीह।) २८२. नुकएल/ नुकाएल २८३. कठुआएल/ कठुअएल २८४. ताहि/ तै/ तइ २८५. गायब/ गाएब/ गएब २८६. सकै/ सकए/ सकय २८७.सेरा/सरा/ सराए (भात सरा गेल) २८८.कहैत रही/देखैत रही/ कहैत छलौं/ कहै छलौं- अहिना चलैत/ पढ़ैत (पढ़ै-पढ़ैत अर्थ कखनो काल परिवर्तित) - आर बुझै/ बुझैत (बुझै/ बुझै छी, मुदा बुझैत-बुझैत)/ सकैत/ सकै। करैत/ करै। दै/ दैत। छैक/ छै। बचलै/ बचलैक। रखबा/ रखबाक । बिनु/ बिन। रातिक/ रातुक बुझै आ बुझैत केर अपन-अपन जगहपर प्रयोग समीचीन अछि‍। बुझैत-बुझैत आब बुझलि‍ऐ। हमहूँ बुझै छी। २८९. दुआरे/ द्वारे २९०.भेटि/ भेट/ भेँट २९१. खन/ खीन/  खुना (भोर खन/ भोर खीन) २९२.तक/ धरि २९३.गऽ/ गै (meaning different-जनबै गऽ) २९४.सऽ/ सँ (मुदा दऽ, लऽ) २९५.त्त्व,(तीन अक्षरक मेल बदला पुनरुक्तिक एक आ एकटा दोसरक उपयोग) आदिक बदला त्व आदि। महत्त्व/ महत्व/ कर्ता/ कर्त्ता आदिमे त्त संयुक्तक कोनो आवश्यकता मैथिलीमे नै अछि। वक्तव्य २९६.बेसी/ बेशी २९७.बाला/वाला बला/ वला (रहैबला) २९८ .वाली/ (बदलैवाली) २९९.वार्त्ता/ वार्ता ३००. अन्तर्राष्ट्रिय/ अन्तर्राष्ट्रीय ३०१. लेमए/ लेबए ३०२.लमछुरका, नमछुरका ३०२.लागै/ लगै ( भेटैत/ भेटै) ३०३.लागल/ लगल ३०४.हबा/ हवा ३०५.राखलक/ रखलक ३०६.आ (come)/ आ (and) ३०७. पश्चाताप/ पश्चात्ताप ३०८. ऽ केर व्यवहार शब्दक अन्तमे मात्र, यथासंभव बीचमे नै। ३०९.कहैत/ कहै ३१०. रहए (छल)/ रहै (छलै) (meaning different) ३११.तागति/ ताकति ३१२.खराप/ खराब ३१३.बोइन/ बोनि/ बोइनि ३१४.जाठि/ जाइठ ३१५.कागज/ कागच/ कागत ३१६.गिरै (meaning different- swallow)/ गिरए (खसए) ३१७.राष्ट्रिय/ राष्ट्रीय VIDEHA FOR NON RESIDENTS MAITHILI LITERATURE IN ENGLISH 8.1.1.The Comet   -GAJENDRA THAKUR translated by Jyoti Jha chaudhary 8.1.2.The_Science_of_Words- GAJENDRA THAKUR translated by the author himself 8.1.3.On_the_dice-board_of_the_millennium- GAJENDRA THAKUR translated by Jyoti Jha chaudhary 8.1.4.NAAGPHANS (IN ENGLISH)- SHEFALIKA VERMA translated by Dr. Rajiv Kumar Verma and Dr. Jaya Verma DATE-LIST (year- 2012-13) (१४२० फसली साल) Marriage Days: Nov.2012- 25, 26, 28, 29, 30 Dec.2012- 5,9, 10, 13, 14 January 2013- 16, 17, 18, 23, 24, 31 Feb.2013- 1, 3, 4, 6, 8, 10, 14, 15, 18, 20, 24, 25 April 2013- 21, 22, 24, 26, 29 May 2013- 1,2,3,5,6,9,12,13,17,19,20,22,23,24,26,27,29,30,31 June 2013- 2,3 July 2013- 11, 14, 15 Upanayana Days: January 2013- 16 February 2013- 14, 15, 20, 21 April 2013- 22 May 2013- 20, 21 Dviragaman Din: November 2012- 25, 26, 28, 29 December 2012- 2, 3, 14 February 2013- 14, 15, 18, 20, 21, 22, 27, 28 March 2013- 1 April 2013- 18, 22, 24, 26, 28, 29 May 2013- 12, 13 Mundan Din: November 2012- 26, 30 December 2012- 3 January 2013- 18, 24 February 2013- 1, 14, 15, 20, 28 April 2013- 17 May 2013- 13, 23, 29 June 2013- 13, 19, 26, 27, 28 July 2013- 10, 15 FESTIVALS OF MITHILA (2012-13) Mauna Panchami-08 July Madhushravani- 22 July Nag Panchami- 24 July Raksha Bandhan- 02 Aug Krishnastami- 10 August Kushi Amavasya / Somvari Vrat- 17 August Vishwakarma Pooja- 17 September Hartalika Teej- 18 September ChauthChandra-19 September Karma Dharma Ekadashi-26 September Indra Pooja Aarambh- 27 September Anant Caturdashi- 29 Sep Agastyarghadaan- 30 Sep Pitri Paksha begins- 30 Sep Jimootavahan Vrata/ Jitia-08 October Matri Navami- 09 October SomvatiAmavasya Vrat- 15 October Kalashsthapan- 16 October Belnauti- 20 October Patrika Pravesh- 21 October Mahastami- 22 October Maha Navami - 23 October Vijaya Dashami- 24 October Kojagara- 29 Oct Dhanteras- 11 November Diyabati, shyama pooja-13 November Annakoota/ Govardhana Pooja-14 November Bhratridwitiya/ Chitragupta Pooja- 15 November Chhathi -19 November Devotthan Ekadashi- 24 November ravivratarambh- 25 November Navanna parvan- 25 November KartikPoornima- Sama Visarjan- 28 November Vivaha Panchmi- 17 December Makara/ Teela Sankranti-14 Jan Naraknivaran chaturdashi- 08 February Basant Panchami/ Saraswati Pooja- 15 February Achla Saptmi- 17 February Mahashivaratri-10 March Holikadahan-Fagua-26 March Holi- 28 March Varuni Trayodashi-07 April Chaiti  navaratrarambh- 11 April Jurishital-15 April Chaiti Chhathi vrata-16 April Ram Navami- 19 April Ravi Brat Ant- 12 May Akshaya Tritiya-13 May Janaki Navami- 19 May Vat Savitri-barasait- 08 June Ganga Dashhara-18 June Somavati Amavasya Vrata- 08 July Jagannath Rath Yatra- 10 July Hari Sayan Ekadashi- 19 July Aashadhi Guru Poornima-22 Jul VIDEHA ARCHIVE १.विदेह ई-पत्रिकाक सभटा पुरान अंक ब्रेल, तिरहुता आ देवनागरी रूपमे Videha e journal's all old issues in Braille Tirhuta and Devanagari versions विदेह ई-पत्रिकाक पहिल ५० अंक

विदेह ई-पत्रिकाक ५०म सँ आगाँक अंक २.मैथिली पोथी डाउनलोड Maithili Books Download ३.मैथिली ऑडियो संकलन Maithili Audio Downloads ४.मैथिली वीडियोक संकलन Maithili Videos ५.मिथिला चित्रकला/ आधुनिक चित्रकला आ चित्र Mithila Painting/ Modern Art and Photos "विदेह"क एहि सभ सहयोगी लिंकपर सेहो एक बेर जाउ। ६.विदेह मैथिली क्विज  :  http://videhaquiz.blogspot.com/ ७.विदेह मैथिली जालवृत्त एग्रीगेटर : http://videha-aggregator.blogspot.com/ ८.विदेह मैथिली साहित्य अंग्रेजीमे अनूदित http://madhubani-art.blogspot.com/ ९.विदेहक पूर्व-रूप "भालसरिक गाछ"  : http://gajendrathakur.blogspot.com/ १०.विदेह इंडेक्स  : http://videha123.blogspot.com/ ११.विदेह फाइल : http://videha123.wordpress.com/ १२. विदेह: सदेह : पहिल तिरहुता (मिथिला़क्षर) जालवृत्त (ब्लॉग) http://videha-sadeha.blogspot.com/ १३. विदेह:ब्रेल: मैथिली ब्रेलमे: पहिल बेर विदेह द्वारा http://videha-braille.blogspot.com/ १४.VIDEHA IST MAITHILI  FORTNIGHTLY EJOURNAL ARCHIVE http://videha-archive.blogspot.com/ १५. विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका मैथिली पोथीक आर्काइव http://videha-pothi.blogspot.com/ १६. विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका ऑडियो आर्काइव http://videha-audio.blogspot.com/ १७. विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका वीडियो आर्काइव http://videha-video.blogspot.com/ १८. विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका मिथिला चित्रकला, आधुनिक कला आ चित्रकला http://videha-paintings-photos.blogspot.com/ १९. मैथिल आर मिथिला (मैथिलीक सभसँ लोकप्रिय जालवृत्त) http://maithilaurmithila.blogspot.com/ २०.श्रुति प्रकाशन http://www.shruti-publication.com/ २१.http://groups.google.com/group/videha २२.http://groups.yahoo.com/group/VIDEHA/ २३.गजेन्द्र ठाकुर इ‍डेक्स http://gajendrathakur123.blogspot.com २४. नेना भुटका http://mangan-khabas.blogspot.com/ २५.विदेह रेडियो:मैथिली कथा-कविता आदिक पहिल पोडकास्ट साइट http://videha123radio.wordpress.com/ २६.Videha Radio २७. Join official Videha facebook group. २८. विदेह मैथिली नाट्य उत्सव http://maithili-drama.blogspot.com/ २९.समदिया http://esamaad.blogspot.com/ ३०. मैथिली फिल्म्स http://maithilifilms.blogspot.com/ ३१.अनचिन्हार आखर http://anchinharakharkolkata.blogspot.com/ ३२. मैथिली हाइकू http://maithili-haiku.blogspot.com/ ३३. मानक मैथिली http://manak-maithili.blogspot.com/ ३४. विहनि कथा http://vihanikatha.blogspot.in/ ३५. मैथिली कविता http://maithili-kavita.blogspot.in/ ३६. मैथिली कथा http://maithili-katha.blogspot.in/ ३७.मैथिली समालोचना http://maithili-samalochna.blogspot.in/ महत्त्वपूर्ण सूचना:(१) 'विदेह' द्वारा धारावाहिक रूपे ई-प्रकाशित कएल गेल गजेन्द्र ठाकुरक  निबन्ध-प्रबन्ध-समीक्षा, उपन्यास (सहस्रबाढ़नि) , पद्य-संग्रह (सहस्राब्दीक चौपड़पर), कथा-गल्प (गल्प-गुच्छ), नाटक(संकर्षण), महाकाव्य (त्वञ्चाहञ्च आ असञ्जाति मन) आ बाल-किशोर साहित्य विदेहमे संपूर्ण ई-प्रकाशनक बाद प्रिंट फॉर्ममे। कुरुक्षेत्रम्–अन्तर्मनक खण्ड-१ सँ ७ Combined ISBN No.978-81-907729-7-6 विवरण एहि पृष्ठपर नीचाँमे आ प्रकाशकक साइट http://www.shruti-publication.com/ पर । महत्त्वपूर्ण सूचना (२):सूचना: विदेहक मैथिली-अंग्रेजी आ अंग्रेजी मैथिली कोष (इंटरनेटपर पहिल बेर सर्च-डिक्शनरी) एम.एस. एस.क्यू.एल. सर्वर आधारित -Based on ms-sql server Maithili-English and English-Maithili Dictionary. विदेहक भाषापाक- रचनालेखन स्तंभमे। कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक- गजेन्द्र ठाकुर गजेन्द्र ठाकुरक निबन्ध-प्रबन्ध-समीक्षा, उपन्यास (सहस्रबाढ़नि) , पद्य-संग्रह (सहस्राब्दीक चौपड़पर), कथा-गल्प (गल्प गुच्छ), नाटक(संकर्षण), महाकाव्य (त्वञ्चाहञ्च आ असञ्जाति मन) आ बालमंडली-किशोरजगत विदेहमे संपूर्ण ई-प्रकाशनक बाद प्रिंट फॉर्ममे। कुरुक्षेत्रम्–अन्तर्मनक, खण्ड-१ सँ ७ Ist edition 2009 of Gajendra Thakur’s KuruKshetram-Antarmanak (Vol. I to VII)- essay-paper-criticism, novel, poems, story, play, epics and Children-grown-ups literature in single binding: Language:Maithili ६९२ पृष्ठ : मूल्य भा. रु. 100/-(for individual buyers inside india) (add courier charges Rs.50/-per copy for Delhi/NCR and Rs.100/- per copy for outside Delhi)

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Details for purchase available at print-version publishers's site website: http://www.shruti-publication.com/ or you may write to e-mail:shruti.publication@shruti-publication.com विदेह: सदेह : १: २: ३: ४ तिरहुता : देवनागरी "विदेह" क, प्रिंट संस्करण :विदेह-ई-पत्रिका (http://www.videha.co.in/) क चुनल रचना सम्मिलित। विदेह:सदेह:१: २: ३: ४ सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। Details for purchase available at print-version publishers's site http://www.shruti-publication.com  or you may write to shruti.publication@shruti-publication.com २. संदेश- [ विदेह ई-पत्रिका, विदेह:सदेह मिथिलाक्षर आ देवनागरी आ गजेन्द्र ठाकुरक सात खण्डक- निबन्ध-प्रबन्ध-समीक्षा,उपन्यास (सहस्रबाढ़नि) , पद्य-संग्रह (सहस्राब्दीक चौपड़पर), कथा-गल्प (गल्प गुच्छ), नाटक (संकर्षण), महाकाव्य (त्वञ्चाहञ्च आ असञ्जाति मन) आ बाल-मंडली-किशोर जगत- संग्रह कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक मादेँ। ] १.श्री गोविन्द झा- विदेहकेँ तरंगजालपर उतारि विश्वभरिमे मातृभाषा मैथिलीक लहरि जगाओल, खेद जे अपनेक एहि महाभियानमे हम एखन धरि संग नहि दए सकलहुँ। सुनैत छी अपनेकेँ सुझाओ आ रचनात्मक आलोचना प्रिय लगैत अछि तेँ किछु लिखक मोन भेल। हमर सहायता आ सहयोग अपनेकेँ सदा उपलब्ध रहत। २.श्री रमानन्द रेणु- मैथिलीमे ई-पत्रिका पाक्षिक रूपेँ चला कऽ जे अपन मातृभाषाक प्रचार कऽ रहल छी, से धन्यवाद । आगाँ अपनेक समस्त मैथिलीक कार्यक हेतु हम हृदयसँ शुभकामना दऽ रहल छी। ३.श्री विद्यानाथ झा "विदित"- संचार आ प्रौद्योगिकीक एहि प्रतिस्पर्धी ग्लोबल युगमे अपन महिमामय "विदेह"केँ अपना देहमे प्रकट देखि जतबा प्रसन्नता आ संतोष भेल, तकरा कोनो उपलब्ध "मीटर"सँ नहि नापल जा सकैछ? ..एकर ऐतिहासिक मूल्यांकन आ सांस्कृतिक प्रतिफलन एहि शताब्दीक अंत धरि लोकक नजरिमे आश्चर्यजनक रूपसँ प्रकट हैत। ४. प्रो. उदय नारायण सिंह "नचिकेता"- जे काज अहाँ कए रहल छी तकर चरचा एक दिन मैथिली भाषाक इतिहासमे होएत। आनन्द भए रहल अछि, ई जानि कए जे एतेक गोट मैथिल "विदेह" ई जर्नलकेँ पढ़ि रहल छथि।...विदेहक चालीसम अंक पुरबाक लेल अभिनन्दन। ५. डॉ. गंगेश गुंजन- एहि विदेह-कर्ममे लागि रहल अहाँक सम्वेदनशील मन, मैथिलीक प्रति समर्पित मेहनतिक अमृत रंग, इतिहास मे एक टा विशिष्ट फराक अध्याय आरंभ करत, हमरा विश्वास अछि। अशेष शुभकामना आ बधाइक सङ्ग, सस्नेह...अहाँक पोथी कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक प्रथम दृष्टया बहुत भव्य तथा उपयोगी बुझाइछ। मैथिलीमे तँ अपना स्वरूपक प्रायः ई पहिले एहन  भव्य अवतारक पोथी थिक। हर्षपूर्ण हमर हार्दिक बधाई स्वीकार करी। ६. श्री रामाश्रय झा "रामरंग"(आब स्वर्गीय)- "अपना" मिथिलासँ संबंधित...विषय वस्तुसँ अवगत भेलहुँ।...शेष सभ कुशल अछि। ७. श्री ब्रजेन्द्र त्रिपाठी- साहित्य अकादमी- इंटरनेट पर प्रथम मैथिली पाक्षिक पत्रिका "विदेह" केर लेल बधाई आ शुभकामना स्वीकार करू। ८. श्री प्रफुल्लकुमार सिंह "मौन"- प्रथम मैथिली पाक्षिक पत्रिका "विदेह" क प्रकाशनक समाचार जानि कनेक चकित मुदा बेसी आह्लादित भेलहुँ। कालचक्रकेँ पकड़ि जाहि दूरदृष्टिक परिचय देलहुँ, ओहि लेल हमर मंगलकामना। ९.डॉ. शिवप्रसाद यादव- ई जानि अपार हर्ष भए रहल अछि, जे नव सूचना-क्रान्तिक क्षेत्रमे मैथिली पत्रकारिताकेँ प्रवेश दिअएबाक साहसिक कदम उठाओल अछि। पत्रकारितामे एहि प्रकारक नव प्रयोगक हम स्वागत करैत छी, संगहि "विदेह"क सफलताक शुभकामना। १०. श्री आद्याचरण झा- कोनो पत्र-पत्रिकाक प्रकाशन- ताहूमे मैथिली पत्रिकाक प्रकाशनमे के कतेक सहयोग करताह- ई तऽ भविष्य कहत। ई हमर ८८ वर्षमे ७५ वर्षक अनुभव रहल। एतेक पैघ महान यज्ञमे हमर श्रद्धापूर्ण आहुति प्राप्त होयत- यावत ठीक-ठाक छी/ रहब। ११. श्री विजय ठाकुर- मिशिगन विश्वविद्यालय- "विदेह" पत्रिकाक अंक देखलहुँ, सम्पूर्ण टीम बधाईक पात्र अछि। पत्रिकाक मंगल भविष्य हेतु हमर शुभकामना स्वीकार कएल जाओ। १२. श्री सुभाषचन्द्र यादव- ई-पत्रिका "विदेह" क बारेमे जानि प्रसन्नता भेल। ’विदेह’ निरन्तर पल्लवित-पुष्पित हो आ चतुर्दिक अपन सुगंध पसारय से कामना अछि। १३. श्री मैथिलीपुत्र प्रदीप- ई-पत्रिका "विदेह" केर सफलताक भगवतीसँ कामना। हमर पूर्ण सहयोग रहत। १४. डॉ. श्री भीमनाथ झा- "विदेह" इन्टरनेट पर अछि तेँ "विदेह" नाम उचित आर कतेक रूपेँ एकर विवरण भए सकैत अछि। आइ-काल्हि मोनमे उद्वेग रहैत अछि, मुदा शीघ्र पूर्ण सहयोग देब।कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक देखि अति प्रसन्नता भेल। मैथिलीक लेल ई घटना छी। १५. श्री रामभरोस कापड़ि "भ्रमर"- जनकपुरधाम- "विदेह" ऑनलाइन देखि रहल छी। मैथिलीकेँ अन्तर्राष्ट्रीय जगतमे पहुँचेलहुँ तकरा लेल हार्दिक बधाई। मिथिला रत्न सभक संकलन अपूर्व। नेपालोक सहयोग भेटत, से विश्वास करी। १६. श्री राजनन्दन लालदास- "विदेह" ई-पत्रिकाक माध्यमसँ बड़ नीक काज कए रहल छी, नातिक अहिठाम देखलहुँ। एकर वार्षिक अ‍ंक जखन प्रिं‍ट निकालब तँ हमरा पठायब। कलकत्तामे बहुत गोटेकेँ हम साइटक पता लिखाए देने छियन्हि। मोन तँ होइत अछि जे दिल्ली आबि कए आशीर्वाद दैतहुँ, मुदा उमर आब बेशी भए गेल। शुभकामना देश-विदेशक मैथिलकेँ जोड़बाक लेल।.. उत्कृष्ट प्रकाशन कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक लेल बधाइ। अद्भुत काज कएल अछि, नीक प्रस्तुति अछि सात खण्डमे।  मुदा अहाँक सेवा आ से निःस्वार्थ तखन बूझल जाइत जँ अहाँ द्वारा प्रकाशित पोथी सभपर दाम लिखल नहि रहितैक। ओहिना सभकेँ विलहि देल जइतैक। (स्पष्टीकरण-  श्रीमान्, अहाँक सूचनार्थ विदेह द्वारा ई-प्रकाशित कएल सभटा सामग्री आर्काइवमे https://sites.google.com/a/videha.com/videha-pothi/ पर बिना मूल्यक डाउनलोड लेल उपलब्ध छै आ भविष्यमे सेहो रहतैक। एहि आर्काइवकेँ जे कियो प्रकाशक अनुमति लऽ कऽ प्रिंट रूपमे प्रकाशित कएने छथि आ तकर ओ दाम रखने छथि ताहिपर हमर कोनो नियंत्रण नहि अछि।- गजेन्द्र ठाकुर)...   अहाँक प्रति अशेष शुभकामनाक संग। १७. डॉ. प्रेमशंकर सिंह- अहाँ मैथिलीमे इंटरनेटपर पहिल पत्रिका "विदेह" प्रकाशित कए अपन अद्भुत मातृभाषानुरागक परिचय देल अछि, अहाँक निःस्वार्थ मातृभाषानुरागसँ प्रेरित छी, एकर निमित्त जे हमर सेवाक प्रयोजन हो, तँ सूचित करी। इंटरनेटपर आद्योपांत पत्रिका देखल, मन प्रफुल्लित भऽ गेल। १८.श्रीमती शेफालिका वर्मा- विदेह ई-पत्रिका देखि मोन उल्लाससँ भरि गेल। विज्ञान कतेक प्रगति कऽ रहल अछि...अहाँ सभ अनन्त आकाशकेँ भेदि दियौ, समस्त विस्तारक रहस्यकेँ तार-तार कऽ दियौक...। अपनेक अद्भुत पुस्तक कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक विषयवस्तुक दृष्टिसँ गागरमे सागर अछि। बधाई। १९.श्री हेतुकर झा, पटना-जाहि समर्पण भावसँ अपने मिथिला-मैथिलीक सेवामे तत्पर छी से स्तुत्य अछि। देशक राजधानीसँ भय रहल मैथिलीक शंखनाद मिथिलाक गाम-गाममे मैथिली चेतनाक विकास अवश्य करत। २०. श्री योगानन्द झा, कबिलपुर, लहेरियासराय- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पोथीकेँ निकटसँ देखबाक अवसर भेटल अछि आ मैथिली जगतक एकटा उद्भट ओ समसामयिक दृष्टिसम्पन्न हस्ताक्षरक कलमबन्द परिचयसँ आह्लादित छी। "विदेह"क देवनागरी सँस्करण पटनामे रु. 80/- मे उपलब्ध भऽ सकल जे विभिन्न लेखक लोकनिक छायाचित्र, परिचय पत्रक ओ रचनावलीक सम्यक प्रकाशनसँ ऐतिहासिक कहल जा सकैछ। २१. श्री किशोरीकान्त मिश्र- कोलकाता- जय मैथिली, विदेहमे बहुत रास कविता, कथा, रिपोर्ट आदिक सचित्र संग्रह देखि आ आर अधिक प्रसन्नता मिथिलाक्षर देखि- बधाई स्वीकार कएल जाओ। २२.श्री जीवकान्त- विदेहक मुद्रित अंक पढ़ल- अद्भुत मेहनति। चाबस-चाबस। किछु समालोचना मरखाह..मुदा सत्य। २३. श्री भालचन्द्र झा- अपनेक कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक देखि बुझाएल जेना हम अपने छपलहुँ अछि। एकर विशालकाय आकृति अपनेक सर्वसमावेशताक परिचायक अछि। अपनेक रचना सामर्थ्यमे उत्तरोत्तर वृद्धि हो, एहि शुभकामनाक संग हार्दिक बधाई। २४.श्रीमती डॉ नीता झा- अहाँक कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़लहुँ। ज्योतिरीश्वर शब्दावली, कृषि मत्स्य शब्दावली आ सीत बसन्त आ सभ कथा, कविता, उपन्यास, बाल-किशोर साहित्य सभ उत्तम छल। मैथिलीक उत्तरोत्तर विकासक लक्ष्य दृष्टिगोचर होइत अछि। २५.श्री मायानन्द मिश्र- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक मे हमर उपन्यास स्त्रीधनक जे विरोध कएल गेल अछि तकर हम विरोध करैत छी।... कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पोथीक लेल शुभकामना।(श्रीमान् समालोचनाकेँ विरोधक रूपमे नहि लेल जाए।-गजेन्द्र ठाकुर) २६.श्री महेन्द्र हजारी- सम्पादक श्रीमिथिला- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़ि मोन हर्षित भऽ गेल..एखन पूरा पढ़यमे बहुत समय लागत, मुदा जतेक पढ़लहुँ से आह्लादित कएलक। २७.श्री केदारनाथ चौधरी- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक अद्भुत लागल, मैथिली साहित्य लेल ई पोथी एकटा प्रतिमान बनत। २८.श्री सत्यानन्द पाठक- विदेहक हम नियमित पाठक छी। ओकर स्वरूपक प्रशंसक छलहुँ। एम्हर अहाँक लिखल - कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक देखलहुँ। मोन आह्लादित भऽ उठल। कोनो रचना तरा-उपरी। २९.श्रीमती रमा झा-सम्पादक मिथिला दर्पण। कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक प्रिंट फॉर्म पढ़ि आ एकर गुणवत्ता देखि मोन प्रसन्न भऽ गेल, अद्भुत शब्द एकरा लेल प्रयुक्त कऽ रहल छी। विदेहक उत्तरोत्तर प्रगतिक शुभकामना। ३०.श्री नरेन्द्र झा, पटना- विदेह नियमित देखैत रहैत छी। मैथिली लेल अद्भुत काज कऽ रहल छी। ३१.श्री रामलोचन ठाकुर- कोलकाता- मिथिलाक्षर विदेह देखि मोन प्रसन्नतासँ भरि उठल, अंकक विशाल परिदृश्य आस्वस्तकारी अछि। ३२.श्री तारानन्द वियोगी- विदेह आ कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक देखि चकबिदोर लागि गेल। आश्चर्य। शुभकामना आ बधाई। ३३.श्रीमती प्रेमलता मिश्र “प्रेम”- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़लहुँ। सभ रचना उच्चकोटिक लागल। बधाई। ३४.श्री कीर्तिनारायण मिश्र- बेगूसराय- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक बड्ड नीक लागल, आगांक सभ काज लेल बधाई। ३५.श्री महाप्रकाश-सहरसा- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक नीक लागल, विशालकाय संगहि उत्तमकोटिक। ३६.श्री अग्निपुष्प- मिथिलाक्षर आ देवाक्षर विदेह पढ़ल..ई प्रथम तँ अछि एकरा प्रशंसामे मुदा हम एकरा दुस्साहसिक कहब। मिथिला चित्रकलाक स्तम्भकेँ मुदा अगिला अंकमे आर विस्तृत बनाऊ। ३७.श्री मंजर सुलेमान-दरभंगा- विदेहक जतेक प्रशंसा कएल जाए कम होएत। सभ चीज उत्तम। ३८.श्रीमती प्रोफेसर वीणा ठाकुर- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक उत्तम, पठनीय, विचारनीय। जे क्यो देखैत छथि पोथी प्राप्त करबाक उपाय पुछैत छथि। शुभकामना। ३९.श्री छत्रानन्द सिंह झा- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़लहुँ, बड्ड नीक सभ तरहेँ। ४०.श्री ताराकान्त झा- सम्पादक मैथिली दैनिक मिथिला समाद- विदेह तँ कन्टेन्ट प्रोवाइडरक काज कऽ रहल अछि। कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक अद्भुत लागल। ४१.डॉ रवीन्द्र कुमार चौधरी- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक बहुत नीक, बहुत मेहनतिक परिणाम। बधाई। ४२.श्री अमरनाथ- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक आ विदेह दुनू स्मरणीय घटना अछि, मैथिली साहित्य मध्य। ४३.श्री पंचानन मिश्र- विदेहक वैविध्य आ निरन्तरता प्रभावित करैत अछि, शुभकामना। ४४.श्री केदार कानन- कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक लेल अनेक धन्यवाद, शुभकामना आ बधाइ स्वीकार करी। आ नचिकेताक भूमिका पढ़लहुँ। शुरूमे तँ लागल जेना कोनो उपन्यास अहाँ द्वारा सृजित भेल अछि मुदा पोथी उनटौला पर ज्ञात भेल जे एहिमे तँ सभ विधा समाहित अछि। ४५.श्री धनाकर ठाकुर- अहाँ नीक काज कऽ रहल छी। फोटो गैलरीमे चित्र एहि शताब्दीक जन्मतिथिक अनुसार रहैत तऽ नीक। ४६.श्री आशीष झा- अहाँक पुस्तकक संबंधमे एतबा लिखबा सँ अपना कए नहि रोकि सकलहुँ जे ई किताब मात्र किताब नहि थीक, ई एकटा उम्मीद छी जे मैथिली अहाँ सन पुत्रक सेवा सँ निरंतर समृद्ध होइत चिरजीवन कए प्राप्त करत। ४७.श्री शम्भु कुमार सिंह- विदेहक तत्परता आ क्रियाशीलता देखि आह्लादित भऽ रहल छी। निश्चितरूपेण कहल जा सकैछ जे समकालीन मैथिली पत्रिकाक इतिहासमे विदेहक नाम स्वर्णाक्षरमे लिखल जाएत। ओहि कुरुक्षेत्रक घटना सभ तँ अठारहे दिनमे खतम भऽ गेल रहए मुदा अहाँक कुरुक्षेत्रम् तँ अशेष अछि। ४८.डॉ. अजीत मिश्र- अपनेक प्रयासक कतबो प्रश‍ंसा कएल जाए कमे होएतैक। मैथिली साहित्यमे अहाँ द्वारा कएल गेल काज युग-युगान्तर धरि पूजनीय रहत। ४९.श्री बीरेन्द्र मल्लिक- अहाँक कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक आ विदेह:सदेह पढ़ि अति प्रसन्नता भेल। अहाँक स्वास्थ्य ठीक रहए आ उत्साह बनल रहए से कामना। ५०.श्री कुमार राधारमण- अहाँक दिशा-निर्देशमे विदेह पहिल मैथिली ई-जर्नल देखि अति प्रसन्नता भेल। हमर शुभकामना। ५१.श्री फूलचन्द्र झा प्रवीण-विदेह:सदेह पढ़ने रही मुदा कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक देखि बढ़ाई देबा लेल बाध्य भऽ गेलहुँ। आब विश्वास भऽ गेल जे मैथिली नहि मरत। अशेष शुभकामना। ५२.श्री विभूति आनन्द- विदेह:सदेह देखि, ओकर विस्तार देखि अति प्रसन्नता भेल। ५३.श्री मानेश्वर मनुज-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक एकर भव्यता देखि अति प्रसन्नता भेल, एतेक विशाल ग्रन्थ मैथिलीमे आइ धरि नहि देखने रही। एहिना भविष्यमे काज करैत रही, शुभकामना। ५४.श्री विद्यानन्द झा- आइ.आइ.एम.कोलकाता- कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक विस्तार, छपाईक संग गुणवत्ता देखि अति प्रसन्नता भेल। अहाँक अनेक धन्यवाद; कतेक बरखसँ हम नेयारैत छलहुँ जे सभ पैघ शहरमे मैथिली लाइब्रेरीक स्थापना होअए, अहाँ ओकरा वेबपर कऽ रहल छी, अनेक धन्यवाद। ५५.श्री अरविन्द ठाकुर-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक मैथिली साहित्यमे कएल गेल एहि तरहक पहिल प्रयोग अछि, शुभकामना। ५६.श्री कुमार पवन-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक पढ़ि रहल छी। किछु लघुकथा पढ़ल अछि, बहुत मार्मिक छल। ५७. श्री प्रदीप बिहारी-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक देखल, बधाई। ५८.डॉ मणिकान्त ठाकुर-कैलिफोर्निया- अपन विलक्षण नियमित सेवासँ हमरा लोकनिक हृदयमे विदेह सदेह भऽ गेल अछि। ५९.श्री धीरेन्द्र प्रेमर्षि- अहाँक समस्त प्रयास सराहनीय। दुख होइत अछि जखन अहाँक प्रयासमे अपेक्षित सहयोग नहि कऽ पबैत छी। ६०.श्री देवशंकर नवीन- विदेहक निरन्तरता आ विशाल स्वरूप- विशाल पाठक वर्ग, एकरा ऐतिहासिक बनबैत अछि। ६१.श्री मोहन भारद्वाज- अहाँक समस्त कार्य देखल, बहुत नीक। एखन किछु परेशानीमे छी, मुदा शीघ्र सहयोग देब। ६२.श्री फजलुर रहमान हाशमी-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक मे एतेक मेहनतक लेल अहाँ साधुवादक अधिकारी छी। ६३.श्री लक्ष्मण झा "सागर"- मैथिलीमे चमत्कारिक रूपेँ अहाँक प्रवेश आह्लादकारी अछि।..अहाँकेँ एखन आर..दूर..बहुत दूरधरि जेबाक अछि। स्वस्थ आ प्रसन्न रही। ६४.श्री जगदीश प्रसाद मंडल-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक पढ़लहुँ । कथा सभ आ उपन्यास सहस्रबाढ़नि पूर्णरूपेँ पढ़ि गेल छी। गाम-घरक भौगोलिक विवरणक जे सूक्ष्म वर्णन सहस्रबाढ़निमे अछि, से चकित कएलक, एहि संग्रहक कथा-उपन्यास मैथिली लेखनमे विविधता अनलक अछि। समालोचना शास्त्रमे अहाँक दृष्टि वैयक्तिक नहि वरन् सामाजिक आ कल्याणकारी अछि, से प्रशंसनीय। ६५.श्री अशोक झा-अध्यक्ष मिथिला विकास परिषद- कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक लेल बधाई आ आगाँ लेल शुभकामना। ६६.श्री ठाकुर प्रसाद मुर्मु- अद्भुत प्रयास। धन्यवादक संग प्रार्थना जे अपन माटि-पानिकेँ ध्यानमे राखि अंकक समायोजन कएल जाए। नव अंक धरि प्रयास सराहनीय। विदेहकेँ बहुत-बहुत धन्यवाद जे एहेन सुन्दर-सुन्दर सचार (आलेख) लगा रहल छथि। सभटा ग्रहणीय- पठनीय। ६७.बुद्धिनाथ मिश्र- प्रिय गजेन्द्र जी,अहाँक सम्पादन मे प्रकाशित ‘विदेह’आ ‘कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक’ विलक्षण पत्रिका आ विलक्षण पोथी! की नहि अछि अहाँक सम्पादनमे? एहि प्रयत्न सँ मैथिली क विकास होयत,निस्संदेह। ६८.श्री बृखेश चन्द्र लाल- गजेन्द्रजी, अपनेक पुस्तक कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक पढ़ि मोन गदगद भय गेल , हृदयसँ अनुगृहित छी । हार्दिक शुभकामना । ६९.श्री परमेश्वर कापड़ि - श्री गजेन्द्र जी । कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक पढ़ि गदगद आ नेहाल भेलहुँ। ७०.श्री रवीन्द्रनाथ ठाकुर- विदेह पढ़ैत रहैत छी। धीरेन्द्र प्रेमर्षिक मैथिली गजलपर आलेख पढ़लहुँ। मैथिली गजल कत्तऽ सँ कत्तऽ चलि गेलैक आ ओ अपन आलेखमे मात्र अपन जानल-पहिचानल लोकक चर्च कएने छथि। जेना मैथिलीमे मठक परम्परा रहल अछि। (स्पष्टीकरण- श्रीमान्, प्रेमर्षि जी ओहि आलेखमे ई स्पष्ट लिखने छथि जे किनको नाम जे छुटि गेल छन्हि तँ से मात्र आलेखक लेखकक जानकारी नहि रहबाक द्वारे, एहिमे आन कोनो कारण नहि देखल जाय। अहाँसँ एहि विषयपर विस्तृत आलेख सादर आमंत्रित अछि।-सम्पादक) ७१.श्री मंत्रेश्वर झा- विदेह पढ़ल आ संगहि अहाँक मैगनम ओपस कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक सेहो, अति उत्तम। मैथिलीक लेल कएल जा रहल अहाँक समस्त कार्य अतुलनीय अछि। ७२. श्री हरेकृष्ण झा- कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक मैथिलीमे अपन तरहक एकमात्र ग्रन्थ अछि, एहिमे लेखकक समग्र दृष्टि आ रचना कौशल देखबामे आएल जे लेखकक फील्डवर्कसँ जुड़ल रहबाक कारणसँ अछि। ७३.श्री सुकान्त सोम- कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक मे  समाजक इतिहास आ वर्तमानसँ अहाँक जुड़ाव बड्ड नीक लागल, अहाँ एहि क्षेत्रमे आर आगाँ काज करब से आशा अछि। ७४.प्रोफेसर मदन मिश्र- कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक सन किताब मैथिलीमे पहिले अछि आ एतेक विशाल संग्रहपर शोध कएल जा सकैत अछि। भविष्यक लेल शुभकामना। ७५.प्रोफेसर कमला चौधरी- मैथिलीमे कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक सन पोथी आबए जे गुण आ रूप दुनूमे निस्सन होअए, से बहुत दिनसँ आकांक्षा छल, ओ आब जा कऽ पूर्ण भेल। पोथी एक हाथसँ दोसर हाथ घुमि रहल अछि, एहिना आगाँ सेहो अहाँसँ आशा अछि। ७६.श्री उदय चन्द्र झा "विनोद": गजेन्द्रजी, अहाँ जतेक काज कएलहुँ अछि से मैथिलीमे आइ धरि कियो नहि कएने छल। शुभकामना। अहाँकेँ एखन बहुत काज आर करबाक अछि। ७७.श्री कृष्ण कुमार कश्यप: गजेन्द्र ठाकुरजी, अहाँसँ भेँट एकटा स्मरणीय क्षण बनि गेल। अहाँ जतेक काज एहि बएसमे कऽ गेल छी ताहिसँ हजार गुणा आर बेशीक आशा अछि। ७८.श्री मणिकान्त दास: अहाँक मैथिलीक कार्यक प्रशंसा लेल शब्द नहि भेटैत अछि। अहाँक कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक सम्पूर्ण रूपेँ पढ़ि गेलहुँ। त्वञ्चाहञ्च बड्ड नीक लागल। ७९. श्री हीरेन्द्र कुमार झा- विदेह ई-पत्रिकाक सभ अंक ई-पत्रसँ भेटैत रहैत अछि। मैथिलीक ई-पत्रिका छैक एहि बातक गर्व होइत अछि। अहाँ आ अहाँक सभ सहयोगीकेँ हार्दिक शुभकामना। विदेह मैथिली साहित्य आन्दोलन (c)२००४-१२. सर्वाधिकार लेखकाधीन आ जतए लेखकक नाम नहि अछि ततए संपादकाधीन। विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। सह-सम्पादक: उमेश मंडल। सहायक सम्पादक: शिव कुमार झा आ मुन्नाजी (मनोज कुमार कर्ण)। भाषा-सम्पादन: नागेन्द्र कुमार झा आ पञ्जीकार विद्यानन्द झा। कला-सम्पादन: ज्योति झा चौधरी आ रश्मि रेखा सिन्हा। सम्पादक-शोध-अन्वेषण: डॉ. जया वर्मा आ डॉ. राजीव कुमार वर्मा। सम्पादक- नाटक-रंगमंच-चलचित्र- बेचन ठाकुर। सम्पादक- सूचना-सम्पर्क-समाद- पूनम मंडल आ प्रियंका झा। सम्पादक- अनुवाद विभाग- विनीत उत्पल। रचनाकार अपन मौलिक आ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि) ggajendra@videha.com केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx, .rtf वा .txt फॉर्मेटमे पठा सकैत छथि। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेताह, से आशा करैत छी। रचनाक अंतमे टाइप रहय, जे ई रचना मौलिक अछि, आ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। मेल प्राप्त होयबाक बाद यथासंभव शीघ्र ( सात दिनक भीतर) एकर प्रकाशनक अंकक सूचना देल जायत। ’विदेह' प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका अछि आ एहिमे मैथिली, संस्कृत आ अंग्रेजीमे मिथिला आ मैथिलीसँ संबंधित रचना प्रकाशित कएल जाइत अछि। एहि ई पत्रिकाकेँ श्रीमति लक्ष्मी ठाकुर द्वारा मासक ०१ आ १५ तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि। (c) 2004-12 सर्वाधिकार सुरक्षित। विदेहमे प्रकाशित सभटा रचना आ आर्काइवक सर्वाधिकार रचनाकार आ संग्रहकर्त्ताक लगमे छन्हि। रचनाक अनुवाद आ पुनः प्रकाशन किंवा आर्काइवक उपयोगक अधिकार किनबाक हेतु ggajendra@videha.com पर संपर्क करू। एहि साइटकेँ प्रीति झा ठाकुर, मधूलिका चौधरी आ रश्मि प्रिया द्वारा डिजाइन कएल गेल। सिद्धिरस्तु वि दे ह विदेह Videha বিদেহ  www.videha.co.in and www.videha.com विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका Videha Ist Maithili Fortnightly ejournal  विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका 'विदेह' ११७ म अंक ०१ नवम्बर २०१२ (वर्ष ५ मास ५९ अंक ११७) मानुषीमिह संस्कृताम् ISSN 2229-547X VIDEHA

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