VIDEHA — Issue 118 / अंक ११८

Publication: VIDEHA · Issue: 118
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183 ISSN 2229-547X VIDEHA 'विदेह' ११८ म अंक १५ नवम्बर २०१२ (वर्ष ५ मास ५९ अंक ११८) ऐ अंकमे अछि:- १. संपादकीय संदेश २. गद्य २.१.गजेन्द्र ठाकुर- जगदीश प्रसाद मण्डल: एकटा बायोग्राफी (आगाँ) २.२.जगदीश प्रसाद मण्‍डल-आठटा वि‍हनि‍ कथा २.३.गोविन्द झा-(नाटक) गाम जएबै गाम जएबै गाम जएबै ना २.४.मुन्नी कामत- एकांकी -हत्यारा समाज २.५.गजेन्द्र ठाकुर- नाटक- गंगा ब्रिज २.६.पूनम मण्डल-१.दाग (उपन्‍यास) : गौरीनाथ- लोकार्पण २."सगर राति दीप जरय"क दोसर फेज (चरण)क पहिल सगर राति दीप जरय ०१ दिसम्बर २०१२ शनि दिन सन्ध्याकेँ केँ दरभंगामे ३.समन्वय २-४ नवम्बर २०१२ इण्डिया हैबीटेट सेन्टर भारतीय भाषा महोत्सव SAMANVAY 2-4 November 2012 IHC INDIAN LANGUAGES' FESTIVAL/ ३ नवम्बरकेँ मैथिलीमे ब्राह्मणवाद, ज्योतिरीश्वरपूर्व विद्यापति आ मैथिलीमे प्रेमक गीतपर भेल बहस २.७.डा.रमानन्द झा ‘रमण’-कलकत्ता विश्वविद्यालयमे मैथिली- राजा टंकनाथ चौधरी २.८.नवेंदु कुमार झा- आर्थिक संकट मे चेतना, दू दिनक हएत समारोह ३. पद्य ३.१.जगदीश चन्द्र ठाकुर ‘अनिल’- की भेटल आ की हेरा गेल  (आत्म गीत)- (आगाँ) ३.२.जगदीश प्रसाद मण्‍डल गोटेक दर्जन गीत ३.३.१.मुन्नी कामत-पाँच टा बाल कविता २.जगदानन्द झा मनु-बाल गजल ३.४.राजदेव मण्‍डल जीक दू गोट कवि‍ता ३.५. जगदीश चन्द्र ठाकुर ‘अनिल’-बाल गीत ३.६.ओम प्रकाश-गजल ३.७.रामवि‍लास साहु- बाल कविता ३.८.१.किशन कारीगर- घोटालाबला पाइ २.अजीत मिश्र-दीआबाती ३.श्याम दरिहरे- ओबामा ओबामा ओबामा बालानां कृते-१.जगदीश चन्द्र ठाकुर ‘अनिल’-बाल गजल २.राजदेव मण्‍डल- बाल कवि‍ता विदेह मैथिली पोथी डाउनलोड साइट VIDEHA MAITHILI BOOKS FREE DOWNLOAD SITE विदेह ई-पत्रिकाक सभटा पुरान अंक ( ब्रेल, तिरहुता आ देवनागरी मे ) पी.डी.एफ. डाउनलोडक लेल नीचाँक लिंकपर उपलब्ध अछि। All the old issues of Videha e journal ( in Braille, Tirhuta and Devanagari versions ) are available for pdf download at the following link. विदेह ई-पत्रिकाक सभटा पुरान अंक ब्रेल, तिरहुता आ देवनागरी रूपमे Videha e journal's all old issues in Braille Tirhuta and Devanagari versions विदेह ई-पत्रिकाक पहिल ५० अंक

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Thank you for voting! श्रीमती ज्योति सुनीत चौधरीक “अर्चिस” (कविता संग्रह)  29.55% श्री विनीत उत्पलक “हम पुछैत छी” (कविता संग्रह)  5.26% श्रीमती कामिनीक “समयसँ सम्वाद करैत”, (कविता संग्रह)  4.05% श्री प्रवीण काश्यपक “विषदन्ती वरमाल कालक रति” (कविता संग्रह)  2.83% श्री आशीष अनचिन्हारक "अनचिन्हार आखर"(गजल संग्रह)  21.46% श्री अरुणाभ सौरभक “एतबे टा नहि” (कविता संग्रह)  4.86% श्री दिलीप कुमार झा "लूटन"क जगले रहबै (कविता संग्रह)  5.26% श्री आदि यायावरक “भोथर पेंसिलसँ लिखल” (कथा संग्रह)  4.05% श्री उमेश मण्डलक “निश्तुकी” (कविता संग्रह)  21.05% Other:  1.62% ऐ बेर अनुवाद पुरस्कार (२०१३) [साहित्य अकादेमी, दिल्ली]क लेल अहाँक नजरिमे के उपयुक्त छथि? Thank you for voting! श्री नरेश कुमार विकल "ययाति" (मराठी उपन्यास श्री विष्णु सखाराम खाण्डेकर)  34.43% श्री महेन्द्र नारायण राम "कार्मेलीन" (कोंकणी उपन्यास श्री दामोदर मावजो)  11.48% श्री देवेन्द्र झा "अनुभव"(बांग्ला उपन्यास श्री दिव्येन्दु पालित)  10.66% श्रीमती मेनका मल्लिक "देश आ अन्य कविता सभ" (नेपालीक अनुवाद मूल- रेमिका थापा)  20.49% श्री कृष्ण कुमार कश्यप आ श्रीमती शशिबाला- मैथिली गीतगोविन्द ( जयदेव संस्कृत)  12.3% श्री रामनारायण सिंह "मलाहिन" (श्री तकषी शिवशंकर पिल्लैक मलयाली उपन्यास)  9.84% Other:  1% फेलो पुरस्कार-समग्र योगदान २०१२-१३ : समानान्तर साहित्य अकादेमी, दिल्ली Thank you for voting! श्री राजनन्दन लाल दास  45.69% श्री डॉ. अमरेन्द्र  35.34% श्री चन्द्रभानु सिंह  17.24% Other:  1.72% 1.संपादकीय (समन्वय २०१२ इण्डिया हैबीटेट सेन्टर भारतीय भाषा महोत्सव, दिल्लीक बहसक आधारपर) की मैथिली साहित्य अपन मूल स्वरमे ब्राह्मणवादी अछि? हमर उत्तर दुनू अछि- हँ आ नै। जँ अहाँ मिथिला दर्शन, अंतिका, पागबला विद्यापति पर्व समारोह केनिहार चेतना समितिक घर-बाहर, झारखण्डक सनेस वा जखन-तखनक लेखकक जातिक प्रोफाइल देखि कऽ कहि रहल छी, जातिवादी रंगमंचक मात्र दू जातिक कट्टर दर्शकक अहंकेँ संतुष्ट करबा लेल प्रयुक्त कएल जा रहल आपत्तिजनक शब्दावलीक निर्लज्जतापूर्ण प्रयोगक आधारपर कहि रहल छी, साहित्य अकादेमीमे आइ धरि सभटा आठो समन्वयक जातिक प्रोफाइलक आधारपर कहि रहल छी, सी.आइ.आइ.एल, एन.बी.टी., बा साहित्य अकादेमीक दुब्बर-पीअर कपीश संकलन आ कार्यक आधारपर कहि रहल छी, आकाशवाणी दरभंगा वा हिन्दी अखबारक दरभंगा संस्करणक आधारपर कहि रहल छी तँ उत्तर हँ अछि। मुदा जँ ज्योतिरीश्वर पूर्व/ श्रीधर दास पूर्व बिन पागबला गएर ब्राह्मण विद्यापति, बा पिताक मृत्युक पाँच बर्ख बाद जन्म आ चर्मकारिणीसँ विवाह केनिहार तत्वचिन्तामणिकारक गंगेश जिनकर प्रेमकविता विलुप्त कऽ देल गेल, भोरुकवा एफ.एम. चैनल, फुलप्रास लगक पकड़िया गाम (पोस्ट रतनसारा) क रामलखन साहुजी पुत्र स्व. खुशीलाल साहुजी जे २५ सालसँ नाच पार्टी कम्पनी खोलने छथि आ दसो बिगहा बोहा देलनि, बा ऐ बेर दुर्गापूजामे नै किछु तँ सए नाच पार्टी नाच केलक; ई सभ देखी तँ उत्तर नै अछि। आ जँ आकाशवाणी दरभंगा, दरभंगाक हिन्दी अखबार, आ मैथिलीक ऊपरवर्णित पत्रिका ओकरा समाचार नै बुझैए आ कोनो साधारण नाटककारक/ लेखकक सालाना उर्सक न्यूजक आधारपर मैथिली नाटककेँ मृत घोषित करैत साक्षात्कार छपैए तँ ई ओकर समस्या छै। विद्यापतिक पदावलीक आधारपर भऽ रहल बिदापत, आ ओही पदावलीक पिआ-देशांतर (माइग्रेशन)क आधारपर भऽ रहल पिआ देशान्तरक पार्टी सभमे सेहो कमी आएल अछि, मुदा जँ अनुपात देखल जाए तँ मुख्य आ समानान्तरक बीच अखनो एक आ निनानबे केर छै तखन तँ ई गएर ब्राह्मणवादी ने भेल। पर्वत ऊपर भमरा सूतल मालिन बेटी सूतल फुलवारि हे उठू-उठू मालिन बेटी गाँथू गिरमल हार हे। जँ शब्द शास्त्रम केर ऐ गीतमे धीरेन्द्र प्रेमर्षिकेँ सर्वहाराक गीत नै शास्त्रीय गीत देखबामे अबै छन्हि तँ ई गीत विदेह ऑडियोमे अपलोड छै, आ ओ ओही पात्रक टोल (चर्मकार टोल) सँ रेकॉर्ड कएल गेल छै जकर ई कथा छिऐ, आ यएह गएर-ब्राह्मणवादी परम्पराक जीत अछि। विद्यापतिक कोन परंपरा- जतऽ ओ वर्णाश्रम व्यवस्थाक समर्थन करै छथि बा स्त्रीक दर्दकेँ भोगैत: कौन तप चकलहूँ भेलहूँ जननी गे बा गरीबक व्यथा -सुख सपनेहूँ नहिं भेल, गबै छथि एतौ उत्तर वएह अछि। समानान्तर परम्परा मुख्यधारा लेल सर्वदा फैशनक रूपमे छै। ज्योतिरीश्वर आ संस्कृत आ अवहट्ठबला विद्यापति सेहो धूर्तसमागम आ गोरक्षविजय नाटकमे क्रमशः एकरा फैशनक रूपमे लेलन्हि। अवहट्ठ सेहो साहित्यिक भाषा रहै, आ समानान्तर परम्पराकेँ मुख्य धाराक प्रगतिशील लोक द्वारा फैशनक रूपमे प्रयोग कएल गेलै। जन कवि वा एक्टीविस्ट २-४-१०-२५-५० धरि पद्य लिखि कऽ संतुष्ट नै होइ छै, मुदा जँ ई फैशनक रूपमे प्रयुक्त हुअए तँ से ज्योतिरीश्वर आ संस्कृत आ अवहट्ठबला विद्यापतिक संग यात्री-नागार्जुनक फैशनपरस्त प्रगतिशील मैथिली कवितामे अबै छै। मुदा ज्योतिरीश्वर पूर्वक बिनु पागबला गएर ब्राह्मण विद्यापतिक परम्परा तँ बिदापत, पिआ देशान्तर आ रामदेव प्रसाद मण्डल झारुदारक झारू/ महाझारूमे देखा पड़त, हजारक हजार झारू लिखि कऽ बोहा देलनि, हमरा सन लोक जँ ओइमेसँ किछुओ लिखि कऽ टाइप कऽ लै छी तँ तकरो संख्या सए-दू सए ओहिना भऽ जाइ छै। जँ तरौनीक लोकनाथ झाक घरपर बैसि वर्णाश्रम धर्म बला कविता पदावलीमे घोसिया दियौ, शिव सिंह, लखिमाक नाम घोसिया दियौ तँ ज्योतिरीश्वर पूर्व पदावलीक लय टूटि जाइए, आ बिदापत आ पिआ देशान्तर पार्टी ओकर मंचन गायन नै कऽ पबैए आ ई षडयंत्र बिनु परिश्रमेक खतम भऽ जाइए। ‘डायसपोरा कम्यूनिटी’ धरि पहुँचबाक उद्देश्यमे कनेक असहमति अछि, जे काज अखन हेबाक चाही से अछि नेटिव स्पीकर जतए रहि रहल छथि ओतुक्का दुष्प्रचारक लेल ई सूचना समाज आगाँ आबए। वंचित, महिला आ समानान्तर परम्पराक स्पोक्सपर्सनक रूपमे। जहाँ धरि मैथिली प्रिन्ट मीडियाक गप अछि, ओतौ समानान्तर लेखन क्वालिटी आ क्वान्टिटी दुनूमे ९०% स्थानपर अछि। इन्टरनेट तँ बोनस छिऐ, ४-५ सए मैथिली पोथी, दस हजार मैथिली ताल-पत्र पीडी.एफ. कैमरा रेडी कॉपीक रूपमे विदेह आर्काइवमे मुफ्त डाउनलोड लेल उपलब्ध अछि। ओइमे देवनागरीक अतिरिक्त तिरहुता आ ब्रेलमे सेहो मैथिली अछि। गूगल आ विदेहक सौजन्यसँ चारि सएसँ ऊपर पोथी गूगल बुक्समे १००% ब्राउज आ डाउनलोड लेल उपलब्ध छै; ऐमे सँ मैथिली-अंग्रेजी आ अंग्रेजी-मैथिली डिक्शनरीक सात टा पोथी/ फाइल क्रिएटिव कॉमन्स (एट्रीब्यूशन-शेयर अलाइक)लाइसेन्सक अन्तर्गत १००% ब्राउज आ डाउनलोड लेल उपलब्ध अछि, माने कियो एकर उपयोग क्रेडिट दऽ कऽ (माने साभार लिखि कऽ) आ अही तरहेँ आगाँ लाइसेन्स वितरित करबाक शर्त स्वीकार कऽ कए कऽ सकै छथि, एकरामे वृद्धि कऽ एकर संवर्धन आ व्यावसायिक उपयोग कऽ सकै छथि। ‘डायसपोरा कम्यूनिटी’ नेटिव कम्यूनिटीक प्रति अपन कर्ज उतारि रहल अछि। नेटिव स्पीकर बड्ड आगाँ बढ़ि गेल अछि, ओकर सोच आगाँ छै, ओ समानान्तर परम्पराक लेखनसँ अपनाकेँ आइडेन्टिफाइ कऽ रहल अछि, मुदा सुखाएल मुख्यधारा समाजसँ सकारात्मक दिशा आ समए क्षेत्रमे पाछाँ अछि। (विदेह ई पत्रिकाकेँ ५ जुलाइ २००४ सँ अखन धरि ११९ देशक १,६२६ ठामसँ ८५,६२२ गोटे द्वारा ४३,६३१ विभिन्न आइ.एस.पी. सँ ३,७४,६०६ बेर देखल गेल अछि; धन्यवाद पाठकगण। - गूगल एनेलेटिक्स डेटा।) अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। २. गद्य २.१.गजेन्द्र ठाकुर- जगदीश प्रसाद मण्डल: एकटा बायोग्राफी (आगाँ) २.२.जगदीश प्रसाद मण्‍डल-आठटा वि‍हनि‍ कथा २.३.गोविन्द झा-(नाटक) गाम जएबै गाम जएबै गाम जएबै ना २.४.मुन्नी कामत- एकांकी -हत्यारा समाज २.५.गजेन्द्र ठाकुर- नाटक- गंगा ब्रिज २.६.पूनम मण्डल-१.दाग (उपन्‍यास) : गौरीनाथ- लोकार्पण २."सगर राति दीप जरय"क दोसर फेज (चरण)क पहिल सगर राति दीप जरय ०१ दिसम्बर २०१२ शनि दिन सन्ध्याकेँ केँ दरभंगामे ३.समन्वय २-४ नवम्बर २०१२ इण्डिया हैबीटेट सेन्टर भारतीय भाषा महोत्सव SAMANVAY 2-4 November 2012 IHC INDIAN LANGUAGES' FESTIVAL/ ३ नवम्बरकेँ मैथिलीमे ब्राह्मणवाद, ज्योतिरीश्वरपूर्व विद्यापति आ मैथिलीमे प्रेमक गीतपर भेल बहस २.७.डा.रमानन्द झा ‘रमण’-कलकत्ता विश्वविद्यालयमे मैथिली- राजा टंकनाथ चौधरी २.८.नवेंदु कुमार झा- आर्थिक संकट मे चेतना, दू दिनक हएत समारोह गजेन्द्र ठाकुर जगदीश प्रसाद मण्डल: एकटा बायोग्राफी (आगाँ) 1978 ई.मे पंचायत चुनाव भेल। सीधा मुकाबला (दुइये उम्‍मीदवारक) भेल। बहुमत-अल्‍पमतक परि‍चय गामक सभ बुझैत छल। एकटा कनीटा उदाहरण- जखन वि‍रोधी नीक जकाँ ओझरा गेला, तइ बीच भोगेन्‍द्र जीक मध्‍यस्थतामे पनचैति‍यो मानि‍ लेल गेल। मुदा पंचेक बीच वि‍वाद फँसि‍ जाए। अंतमे ई भेल जे ने कम्‍युनि‍स्ट पार्टीक बहरबैया पंच औता आ ने प्रमुखजी (वि‍न्‍ध्‍यनाथ ठाकुर) क बहरबैया पंच अबैले तैयार रहलखि‍न। मुदा पनचैती तँ पछुआएले अछि‍। जखन सभ छोड़ि‍ देलनि‍ तखन गामेक पंच बनथि‍। जइमे एकटा शर्त्त लागल जे दुनू पक्षक बीच जे नै सम्‍बन्‍धि‍त होथि‍ ओ पंच हेता। तकति‍यान भेल तँ एको गोटे शेष नै बँचलाह। ओहने शेष बँचला जे भीम जकाँ अभि‍मन्‍युक संग रहथि‍न। पंचायत चुनावसँ पूर्व 1977 ई.मे दि‍ल्‍लीयो सरकार आ पटनो सरकार बदलि‍ गेल। एक नव परि‍स्‍थि‍ति‍ पैदा लेलक। गामोक पार्टी (कम्‍युनिस्ट पार्टी) अनेको लड़ाइ लड़ि‍ चुकल छल। जइसँ गुण-अवगुण बूझि‍ चुकल छल। तँए चौगुणा उत्‍साह रहबे करै। टुटैत सामंती बेवस्‍थाक एकोटा घृणि‍त काज पंचायत चुनावमे शेष नै रहल। एकटा उदाहरण- बहुमत अल्‍पमतमे नामो बदलि‍ देल जाइत छल। जहि‍ना कतौ राक्षसक अर्थ रक्षा केनि‍हार छल, सुरक अर्थ सुरापान करैबला। काज करैमे फल्‍लाँ राक्षसे छी। असगरे लहासकेँ पीठपर लादि‍ असमसान लऽ गेल। चुनाव घोषणाक वि‍रोधमे मुखि‍यो आ सरपंचोक मामला कोर्ट पहुँचल। सरपंचक मामला निचले कोर्टसँ फड़ि‍या गेल। मुखि‍या चुनावक मामला हाइ-कोर्ट पहुँचल। चुनाव अवैध भेल। जहि‍ना ठाकुरक बरि‍आती ठाकुरे-ठाकुर तहि‍ना बि‍नु पंचायती‍क मुखि‍या बि‍ना सभ मुखि‍ये मुखि‍या। मुखि‍या-सरपंचक काजो तहि‍ना। मात्र गामक पनचैती। सरपंच भेने सेहो बदलि‍ गेल। ओना पार्टीक भीतर कि‍छु दरारि‍ बनि‍ गेल। दरारि‍ ई जे जि‍नका सरपंचक उम्‍मीदवार बनौल गेलनि‍ ओ‍करे खि‍लाफ दोसर नोमीनेशन कऽ देलनि‍। पार्टी अपन ि‍नर्णए आपस करैत चुनाव लड़ल। गामक वातावरणमे गुमराहट रहए। नीक-नीक अपराधीक गाओं बेरमा। एक ग्रुप छह-छह बर्ख जेल काटि‍ चुकल छलाह। ओहो सभ जीवि‍ते। जे चुनाव (पंचायत चुनाव) मे बूथपर लाठी हाथे कि‍छु गोटे बैसलो आ कि‍छु गामोमे घुमैत। कसमकस रहने चुनाव शान्तिसँ भेल। मुदा गि‍नती काल एक गोटे (प्रमुखक गि‍नती एजेंट) दस-बारहटा मोहर देल बाइलेट हाँइ-हाँइ कऽ खा गेल। तही बीच पार्टीक एजेंट देखलक कि‍ हाँइ-हाँइ कऽ पान-सात थापर मुँहमे लगा देलकनि‍। थापर लगि‍ते मुँहसँ उगललक। छह बर्ख जहल कटलाहा एक गोटे एकटा खस्‍सीक चोरि‍मे पकड़ा गेल। खस्‍सी शि‍वलाल महतोक। चोर-मोट पकड़ाएल। मारि‍-पीट शुरू भऽ गेल। आदति‍ छोड़बै जोकर मारि‍ लगलनि। संग-संग ईहो भेल जे पकड़ि‍ कऽ थाना पहुँचा देल गेल। तहि‍ना दोसराक संग (दोसर अपराधीक) सेहो भेल। ओना खुदरा-खुदरी झंझट होइते रहैत छल, मुदा से सभ कमल। पंचायतक वि‍धि‍-वि‍धानक जे कि‍ताब छल सेहो तेहने छल। लोक-सभामे भोगेन्‍द्र जीक प्रस्‍तावकेँ स्‍वीकृति‍ भेटल। गाँधी जीक कल्‍पना आ मगध जनतंत्र वैचारि‍के दुनि‍याँमे छल बेवहारि‍क जमीनपर नै छल। अही बीच (1977 ई.मे) एकटा मि‍त्र जगदीश प्रसाद मण्डलकेँ भेटलन्हि। ओ रहथि‍ स्‍व. काली कान्‍त झा, आइ.पी.एस। बेरमाक बगले पूब कछुबी गाम छै। काली बाबू कछुबीयेक। 1969 ई.क बैचक आइ.पी.एस। ओ गाम आएल रहथि‍। झंझारपुर बजारक कोनो काज रहनि‍। बेरमा कछुबीक बीच बाधक ‍अड़ि‍पेरि‍यासँ लऽ कऽ पक्की सड़क धरि‍ कतेको रास्‍ता अछि‍। अपना घरसँ सीधा पूब हुनकर घर छन्‍हि‍। असकरे पएरे झंझारपुर जाइत रहथि‍ तँए सोझ-साझ रस्‍ता हि‍या-हि‍या बढ़ैत रहथि‍। जखन बेरमा मुसहरी लग एला तँ रस्‍ता दू दि‍शि‍या बूझि‍ पड़लनि‍। दुनू घूमि‍ कऽ आगू मि‍लैत अछि‍ जइठाम सँ झंझारपुरक रास्‍ता सोझ भऽ जाइ छै। मुसहरी बगले गामक डि‍हवारक स्‍थान। स्‍थान रहने चारू दि‍ससँ लोकक आवाजाही तँए चारू कात रास्‍ता अछि‍। ओइठाम आबि‍ जखन आगू हि‍यौलनि‍ तँ सोझका पछि‍म मुँहेँ बूझि‍ पड़लनि‍। डि‍हवार स्‍थान घरक बगलेमे पूबारि‍ भाग अछि‍। ओही रस्‍तासँ आगू बढ़लाह। तँ दरबज्‍जेपर चलि‍ एला। ओना चेहरासँ जगदीश प्रसाद मण्डल ि‍चन्‍हैत रहथिन‍। मुदा एक स्‍कूलमे पढ़ैक कहि‍यो अवसर नै भेटलनि। तेकर कारण छल, शुरूमे ओ गाममे कि‍छु दि‍न पढ़ि‍ नवानी वि‍द्यालयमे नाओं लि‍खाैलनि‍ आ जगदीश प्रसाद मण्डल गामक स्‍कूलसँ टपि‍ कछुवि‍ये अपन प्राइमरीमे नाओं लि‍खेलनि। अखन तँ मि‍ड्ल स्‍कूल धरि‍ मि‍लि‍ गेल अछि‍ मुदा ओइ समए मि‍ड्ल स्‍कूल अलग छल। सभ बेवस्‍था अलग छलै। मध्‍यमा पास कऽ जखन धुड़झाड़ संस्‍कृत पढ़ए-लि‍खए आबि‍ गेलनि‍, पि‍ताकेँ संतोष भऽ गेलनि‍। तखन ओ (काली बाबू) तमुरि‍या हाइ स्‍कूलमे दसमामे नाओं लि‍खौलनि‍। ओइ समए बि‍नु सर्टि‍यो फि‍केटक दसमा धरि‍ एडमीशन होइ छल। दसमा-एगरहमाक मि‍श्रि‍त सि‍लेवस छल। साल भरि‍क पछाति‍ दसमाक परीक्षा होइत छल जे स्‍कूलेमे होइत छल। नहि‍ये जकाँ वि‍द्यार्थी फेल करैत छलाह। जेना आन-आन बहुत देशमे अखनो अछि‍। दसमा-एगरहमाक बीच एसेसमेंट प्रथा सेहो छल। दू सए नम्‍बरक होइत छल। जइसँ मैट्रि‍कक बोर्ड परीक्षामे अस्‍सि‍ये-अस्‍सि‍ये नम्‍बरक वि‍षय होइत छल। असि‍समेंटक नम्‍बर वि‍द्यालये (स्‍कूले) सँ पठाओल जाइ छलै जे बोर्डक (मैट्रि‍कक) रि‍जल्‍टमे जोड़ि‍ होइ छल। मुदा एकटा बात बीचमे जरूर छलै जे बाइस-बाइस नम्‍बर एलापर पास होइत छल। मुदा तहू भीतर एकटा आरो छलै जे समाज अध्‍ययन दसे नम्‍बरमे पास होइत छल। एकर माने ई नै जे दस नम्‍बर असान भेल। अधि‍कांश वि‍द्यार्थी बीस नम्‍बरक भीतरे रहैत छलाह, गोटि‍-पङरा आगू बढ़ैत छलाह। आर्ट वि‍षय (फैक्‍लटी) लऽ कऽ नाओं लि‍खौलनि‍। मुदा साले भरि‍क पछाति‍ (दसमाक परीक्षा) स्‍कूले नै आनो-आन स्‍कूलमे चर्चाक पात्र कालीबाबू बनि‍ गेला। कारण भेल जे अखन धरि‍ हाइ स्‍कूलमे अठमासँ लऽ कऽ बोर्ड धरि‍क परीक्षामे साइंसक वि‍द्याथीक रि‍जल्‍ट अगुआएल रहैत छल। दसमामे फस्‍ट (पहि‍ल स्‍थान) भेलनि‍। आर्ट वि‍षयमे एकटा धक्का लागल। धक्का ई लागल जे अखन धरि‍ परीक्षाक नम्‍बर दइक बेवहार छल ओ दोसर रंगक छल। घुसुकुनि‍याँ कटैत आर्टक नम्‍बर घुसुकैत छल, जखन कि‍ साइंसक वि‍षयमे सए-मे-सए छल। कनीटा उदारहण- जखन हाइ स्‍कूलक सम्‍बन्‍धमे चर्च भेल तखन ओ कहलनि‍- “खा कऽ स्‍कूल वि‍दा होइ काल हाथक तरहत्‍थीपर पाँचटा अंग्रेजी शब्‍द वा एकटा प्रश्नक उत्तर लि‍खि‍ लइ छलौं आ स्‍कूल पहुँचैत-पहुँचैत रटि‍ लइ छलौं। जाइयो काल आ अबैयो काल करै छलौं। स्‍कूल पहुँचते पहि‍ने कलपर जा बढ़ि‍या जकाँ हाथ धोइ लइ छलौं, तखन बैसै छलौं। ओना शि‍क्षा पद्धति‍मे सेहो कि‍छु अन्‍तर अछि‍। रटैक चलनि‍ सभ रंग अछि‍।” प्रथम श्रेणीसँ मैट्रीक पास केलनि‍। मुदा घरक स्‍थि‍ति‍ ओते नीक नै तँ खराबो नै। कारण जे ओ महापात्र परि‍वारक छलाह। से जमीनदारि‍ये जकाँ पसरल अछि‍। तहूमे महापात्रक कम जन-संख्‍या रहने अखनो धरि‍ अबादे छन्‍हि‍। ओइ समए सी.एम कओलेज बहुत नीक कओलेज बूझल जाइत छल। नीक वि‍द्यानीक एडमि‍शनो होइत छल। 1959 ई.मे चारि‍टा कओलेज खुजल जइमे जनता कओलेज झंझारपुरो आ सरि‍सो कओलेज सेहो खुजल। मैट्रीक केला पछाति‍ सी.एम. कओलेज नै जा, ओना आर.के. कओलेज सेहो नीक छल, मुदा दुनूक बेवहारि‍क पद्धति‍मे कि‍छु अन्‍तर छल। जइठाम आर. के. कओलेजमे सबहक गुनजाइश छल तइठाम सी.एम. कओलेजमे नै छल। दोसरो कारण छल सी.एम. कओलेज सरकारी बनि‍ चुकल छल। छात्र प्रवेशक सीमा ि‍नर्धारि‍त छल। सी.एम. कओलेजक इच्‍छा रहि‍तो काली बाबू सरि‍सो कओलेजमे नाओं लि‍खौलनि‍। कारण भेलनि‍ जे एकठाम दूटा वि‍द्यार्थी पढ़बैक बदलामे रहै-खाइक जोगार लगि‍ गेलनि‍। परि‍वारक आमदनी ओते खराब नै जइसँ सी.एम.कओलेज नै जा सकै छलाह मुदा सहयोगक अभाव रहलनि‍। लि‍टरेचर इंग्‍लीशक संग प्रथम श्रेणीमे आइ.ए. पास केलनि‍। दरभंगामे रहैक गर लागि‍ गेलनि‍। अंग्रेजी आनर्सक संग सी.एम. कओलेजमे नाओं लि‍खौलनि‍। आनर्स ग्रेजुएट भऽ नि‍कललाह। एकटा कनीटा बात- जगदीश प्रसाद मण्डल जइ समएमे जनता कओलेजमे पढ़ैत रहथि तइ समए आनर्सक पढ़ाइ नै होइत रहै। खाली मैथि‍लीमे तीन शि‍क्षक रहथि‍, जइसँ मैथि‍लीमे होइत रहै। जगदीश प्रसाद मण्डल हि‍न्‍दी, राजनीति‍ शास्‍त्रक वि‍द्यार्थी रहथि। प्राइवेटे सँ हि‍न्‍दी आनर्सक तैयारी केलनि। ओना दू गोटे (दूटा शि‍क्षक) कओलेजमे रहथि‍ मुदा पढ़ाइ नै होइत रहै। बी.ए.क फार्म धरि जनते कओलेजसँ भरलनि, परीक्षा सी.एम. कओलेजमे भेल। जगदीश प्रसाद मण्डल डि‍हवार स्‍थानक पछवरि‍या रस्‍ता पकड़ने दरवज्‍जापर आबि‍ गेला। आइ.पी.एस. अफसरक आएब अपनाकेँ सौभाग्‍यशाली बुझलनि। पकड़ि‍ कऽ दरवज्‍जापर बैसौलनि‍। पुछलनि‍ तँ कहलनि‍ जे झंझारपुर जाइ छी, काज अछि‍। कहलखिन‍ जे अहाँ असकरे छी, तहूमे पाएरे छी दि‍क्कत हएत। कहलनि‍ जे कोनो दि‍क्कत नै हएत। फेर कहलनि‍ जे हमहूँ संग भऽ जाइ छी। कि‍छु गप-सप करैक मौका सेहो भेटत। मुदा ओ पुलि‍स नजरि‍बला। कहलनि‍ जे साइकि‍ल दि‍अ घुमैकालमे दऽ देब। साइकि‍लसँ झंझारपुर गेला। जि‍नगीक तेना कऽ पहि‍ल भेँट दुनू गोटेक बीच भेल छल। ओइ दि‍न ई अंदाजमे नै आएल छलनि जे सम्‍बन्‍ध एते गाढ़ आ जि‍नगी भरि‍ नि‍महतनि। अंदाजमे नै अबैक कारण छलनि जे कतेको पुरान हि‍त-अपेछि‍त टूटि‍ गेल छलनि। ओना नवको बढ़बो कएलनि। एकटा उदाहरण- एकटा गामेक संगी छलखिन, कओलेजमे संगे पढ़ने रहथि। मुदा जाइतक सीमा घेरने छलनि। स्‍टेट बैंकमे हुनका नोकरी भेलनि‍। नीक दरमाहा। अनधुन आमदनी। वि‍चार एते बदलि‍ गेलनि‍ जे गाम एलापर भेँट-घाँट नै होइ छलनि। कुसंयोग एहेन भेलनि जे दसे-बारह बर्ख पछाति‍ स्‍कूटर एक्‍सीडेंटमे जखमी भेला आ गाम आबि‍ कि‍छु दि‍नक पछाति‍ मरि‍ गेला। अखनो दुख होइ छनि जे मुइला पछाति‍ देखए (जि‍ज्ञासा) नै गेलखिन‍। मुदा वि‍चार एहेन बनि‍ गेल छलनि, जि‍नगीक अनुभवसँ, जे दोस्‍त-दुश्‍मनक बीचक दूरीक फलाफल कि‍ होइ छै से बूझि‍ गेल छला। कनीटा उदाहरण- एक गोटे नजदीकी रहथिन‍। हुनका ऐठाम बि‍आह रहनि। दि‍न-राति‍ रहला। मुदा हुनका (जि‍नकर काज रहनि) दोस्‍त-दुश्‍मनक बुझैक नै रहनि‍। सभ रंगक लोक काजमे लागल छल। एक गोटे जि‍नका बदनाम करैक वि‍चार मनमे रहनि‍, चाहे जे पछि‍ला कोनो कारण होउ, दालि‍मे दोहरा कऽ नून दऽ देलखि‍न। पछाति‍ जखन दालि‍ नुनगर भऽ गेलै तखन जगदीश प्रसाद मण्डलक नाओं लगा देलखिन‍। एहि‍ना दोसरठाम भेल। बि‍नु अदहन देने बरतनमे सुखले दाि‍ल दऽ नाओं लगा देलकनि‍। तहूसँ एकबेर भेल जे गामक दुर्गापूजामे कार्यकर्ता छला, नाचक भार भेटलनि जे नीक नाच हुअए। तइ समए गाम-घरमे नाटक-नौटंकी कम छल आ नाच बेसी अनेको तरहक छल। एक गोटे नाच अनैक भार लऽ लेलनि‍। बढ़ियाँ नाचक खूब प्रचार भेल। जखन नाच आएल तँ जेहने नीकक प्रचार भेल रहए तेहने हहासो भेल। मुदा जखने कि‍यो परि‍वारसँ नि‍कलि‍ समाजमे डेग उठबैए तँ ओ ई मानि‍ चलैए जे नमहर काजमे बेशि‍यो आ भारि‍यो, दुनू काज होइ छै अपना भरि‍ लोक परि‍यासे करैए, मुदा कि‍छु त्रुटि‍ रहि‍ जाइ छै, तखन कि‍ कएल जाएत। हँ एते जरूर जे अधि‍क-सँ-अधि‍क काजक सभ पहलूपर नजरि‍ राखक चाही। एहि‍ना कोनो घटनोक होइ छै। कि‍यो बेमार छथि‍ वा कोनो दोसरे कारण छन्‍हि‍, रंग-बि‍रंगक सुझाव लोक दैत अछि‍। नीको रहै छै अधलो रहै छै, तइठाम एहने समस्‍या उठबाक संभावना रहै छै। स्‍वर्गीय काली बाबूक पहि‍ल बहाली डी.एस.पी.क रूपमे अगरतला (त्रि‍पुरा)मे भेल रहनि‍। चारि‍ सए रूपैया महीना दरमाहा। समैयो सस्‍त रहए। अन्‍त तक ई बात बजैत रहलाह जे सि‍गरेट आ दारू पीबैत छलौं। करीब पाँच बर्ख पीलौं। परि‍वारमे मतभेदक उभरि‍ गेल रहनि‍। उभरैक कारण स्‍पष्‍टे छल। एक साधारण थाना सि‍पाही दस बीघाक प्‍लॉट कीनि‍, तीनि‍ मंजि‍ला मकान बना, पाँच लाखक बेटि‍यो बि‍आह कऽ लइए तइ संग समांगो सभकेँ नोकरी लगा लइए तइठाम ई (काली बाबू) छुच्‍छे हाकि‍म छथि‍। मुदा ओ परि‍वारकेँ बुनि‍यादी ढंगसँ बदलए चाहै छला। अपन खनदानी वृत्ति‍केँ अधला वृत्ति‍ कहै छलाह। परि‍वार कर्जमे डुमल छल। दि‍यादीक झगड़ा कोर्टमे चलैत छलनि‍। ओइ वि‍वादकेँ जेना-तेना काली बाबू ि‍नपटौलनि‍। कर्जसँ परि‍वारकेँ मुक्‍त केलनि‍। पछाति‍ घर बनबैक वि‍चार केलनि‍। भट्ठा लगा बनौलनि‍। अपनासँ छोट भाए माझि‍ल भाएकेँ अगरतलेक हाइ-स्‍कूलमे काज धड़ौलनि‍। सालमे एक बेर नि‍श्चि‍त रूपे अबि‍ते छलाह। मास दि‍न गाममे रहैत छलाह। तइ-बीच तीन-चारि‍ भेँट जगदीश प्रसाद मण्डलसँ भऽ जाइ छलनि। मुदा मात्र तीन-चारि‍ भेँटमे साल भरि‍क कि‍रि‍या-कलापक कि‍ हएत। हुनक अपन रूटि‍ंग छलनि‍। काजो-उदेम ठेकना कऽ अबैत छलाह। आठ दि‍न होइत-होइत काज नि‍बटबै छलाह। पछाति‍ कुटुमारे (सासुर-मात्रि‍क-बहि‍न इत्‍यादि‍) करै छलाह। मास दि‍न पुरैत-पुरैत काजो नि‍बटि‍ जाइ छलनि‍। आ छुट्टि‍यो बीत जाइ छलनि‍। काजक दौड़मे काजे गप-सप करैक मौको दैत छै। एकटा काजक भार अपनो ऊपर रखै छलाह आ समांगो सभकेँ लगबैत छलाह। सम्‍बन्‍ध बढ़लनि। एनाइ-गेनाइक संग खेनाइ-पीनाइ सेहो बढ़ि‍ गेलनि। हाइ स्‍कूलमे फस्‍ट करैमे भूगोलक योगदान बेसी छलनि‍। एक दू नम्‍बर कम होइ छलनि‍। पूर्वाचलक ि‍त्रपुरा, मणीपुर, मि‍जोरम, अरूणाचल, नागोलैंड इत्‍यादि‍क नीक अध्‍ययन छलनि‍। ओना धार्मिक प्रवृत्ति‍ दि‍स बढ़लाह। पूजा-पाठ दि‍स बढ़ि‍ गेला। डी.एस.पी. सँ एस.पी. भेला पछाति‍ अपन बदली ट्रेंनि‍ग कओजेलमे करा लेलनि‍। ता एस.पी. ओहीमे रहलाह। तीन-चारि‍ साल पछाति‍ (अपेछा भेलापर) जगदीश प्रसाद मण्डलकेँ त्रि‍पुरा अबैले कहए लगलाह। मुदा जगदीश प्रसाद मण्डलकेँ दोहरी ओझरी लागल रहनि। परि‍वारसँ लऽ कऽ मुकदमाक खर्च धरि‍क। ने कोट-कचहरी अबै-जाइसँ छुट्टी आ ने दोसर दि‍स जाइ-अबैक छुट्टी। जगदीश प्रसाद मण्डलकेँ १९९८ ई. धरि‍ अबैत-अबैत पूर्वांचल देखैक एते जि‍ज्ञासा बढ़ि‍ गेलन्हि जे अपनाकेँ ओ नै सम्‍हारि‍ पेलन्हि। ओना समैक पलखति‍ भेट गेलनि आ से भेटलनि दुर्गापूजाक जि‍म्‍मासँ अलग भेलापर। दोसर कारण ईहो भेलनि जे पचासो सँ ऊपर मुकदमा नि‍वटि‍ गेल छलनि जइसँ काेट-कचहरीक आवाजाही सेहो कमि‍ गेलनि। दूटा सेशन केश (३०७ आ ४३६ अर्थात् मृत्‍युक प्रयास आ अगि‍लग्‍गी।) मात्र बचि‍ गेल छलनि। तहूमे ४३६ (अगि‍लग्‍गी) केश हराइये गेलै। हरा ई गेलै जे झंझारपुर-मधुबनीक बीच जे कोर्टक बदला-बदली भेलै ओइमे ई केस हरा गेलै। ओना कते गोटे मुँहेँ सुनने रहथि जे कोटसँ केशक फाइलो गाइब होइ छै। आ ईहो सुनने रहथि जे केशो हरा जाइ छै। ओना दुवि‍धा रहबे करन्हि। जइसँ खुशि‍यो होइन्हि आ चि‍न्‍तो। दोसर ३०७ (एटेम्‍प टू मर्डर) रहन्हि ओइमे तँ सजा भऽ गेल रहनि मुदा खुशी ई रहन्हि जे जते सजाए कानूनी दौड़मे हेबाक चाही रहै से नै भेल रहै, तँए मजगूतो डोरी भत्ता तोड़ि‍-तोड़ि टूटि‍ जाइ छै, लाभ-हानि‍ मुकदमासँ (३०७सँ) जे भेल होइन्हि मुदा एकटा अनुभव जरूर भेलन्हि जे भ्रष्‍ट न्‍यायालयक कुरसी केना डोलैत रहै छै। ओना कोट-कचहरीसँ नि‍सचि‍नती जकाँ जरूर भेला। मुदा चि‍न्‍ता तँ रहबे करन्हि। हजार देवी-देवतासँ जहि‍ना एक जगदम्‍बा तगतगर, तहि‍ना दुनू केश रहन्हि। एक दि‍न जखन सभ केशकेँ मन पाड़ि‍ आइ.पी.सी.सँ मि‍लेलन्हि तँ बूझि‍ पड़लन्हि जे जँ शुरूहे सँ सजाए होइत अबैत रहितन्हि तँ भरि‍सक सभ दि‍न जहलेमे अगि‍ला केशक फैसला सुनि‍तथि। मुदा केहेनो फड़ल आमक गाछ कि‍अए ने हुअए मुदा पकलापर बा बि‍हाड़ि‍मे हहरि‍ एक्की-दुक्की गि‍नतीमे चलि‍ अबैए तहि‍ना भेल रहन्हि। भीम जखन अभि‍मन्‍युकेँ सातक फाटक तोड़ैक भार लऽ लेलनि‍ तेहने मनमे उठलनि। फेर ठमकल सभ केशक सजाए जोड़लन्हि तँ १०७ बर्ख पुरैत रहन्हि। जि‍नगी दि‍स तकलनि तँ बूझि‍ पड़लन्हि जे सए बर्खक काज तँ पुरि‍ये गेलन्हि। जँ नै केने रहि‍तथि तँ दोखी केना भेला? साउनक साँप जकाँ केचुआ छोड़ैक मौसम देखि‍ जि‍नगी बदलैक वि‍चार केलनि। पैछला जि‍नगी तँ अगि‍ला जि‍नगीक सोंगर बनि‍ गेल छलनि। साहि‍त्‍य-दि‍शामे बढ़ैक वि‍चार उठलनि। मुदा साहि‍त्‍यक वि‍द्यार्थी तँ रहि‍ चुकल छला, सूर-पता तँ बूि‍झ चुकल छला। टेबि‍या-टेबि‍या कि‍छु साहि‍त्‍यकारक साहि‍त्‍य पढ़ए लगला, मुदा मन फेर ठमकि‍ गेलनि। मन ठमकि‍ गेलनि ई जे कि‍ताब बात जँ आँखि‍क देखल हुअए ओ बेसी नीक होइए। कि‍ताब कि‍नैक खर्चक कटौती कऽ घूमैक वि‍चार केलनि। देशक केरल, कर्नाटक, कश्‍मीर छोड़ि‍ सभ राज्‍य देखलनि।  मुदा जून २०१२ ई.मे केरलक धरतीपर कोच्चिमे जखन “गामक जिनकी” लघुकथा संग्रह लेल टैगोर साहि‍त्‍य पुरस्‍कार प्राप्‍त भेलनि तँ केरल सेहो घुमि लेलनि। १९५७ ई.मे केरलमे वामपंथी सरकार बनल छल। देशक ओ राज्‍य जइठाम शत-प्रति‍शत पढ़ल-लि‍खल छथि‍। खुशी भेलनि। अखन धरि‍ भूगोल एतबे बुझै छला जे देशक पूर्वी भाग असाम छी। आन-आन राज्‍य जे बनल ओ पछाति‍यो बनल आ चर्चो संक्षेपे छल। हायर सेकेण्‍ड्री धरि‍ भूगोल पढ़ने छला। पछाति‍ नहि‍ये पढ़लनि। तहूमे कि‍छु घटबि‍ये भऽ गेलनि, घटवि‍यो स्‍वाभावि‍के भेलनि। स्‍वाभावि‍क ई जे जहि‍ना एम.ए. पास, हाइ स्‍कूलक शि‍क्षक बनि‍, हाइ स्‍कूल पास मि‍ड्ल स्‍कूल भेलोपर बरदास कइये लइ छथि‍ तहि‍ना ईहो केलनि। आसीन मास, दुर्गापूजाक समए। जगदीश प्रसाद मण्डल एटलस नि‍कालि‍ अजमबए लगला। घरसँ बि‍राटनगर पहुँचि जेता, बि‍राट नगरसँ सि‍लीगुड़ी। ओतौ रहैक ठौर छन्हि, ओतए सँ असाम आ गौहाटीसँ त्रि‍पुरा। मुदा दुनूमे बहुत अंतर भेल। गौहाटीसँ अगरतलाक बस चारि‍ बजे अपराहनमे जे खुजलनि ओ दोसर दि‍न डेढ़ बजे अगरतला पहुँचल। जहि‍ना भेड़ी जेरमे हूड़ार चलि‍ अबैए तहि‍ना बससँ उतरलापर बूझि‍ पड़लनि। भाषाक दूरी, जहि‍ना हि‍न्‍दी जननि‍हार तहि‍ना अंग्रेजी। बस धरि‍ तँ हि‍न्‍दीसँ काज चलि‍ चुकल छलनि, बससँ उतरि‍ते, भुखाएल रहबे करथि, पहि‍ने हाेटलमे जा खेलनि। मुदा एकटा स्‍पष्‍ट अंतर ई बूझि‍ पड़लनि जे जे सस्‍त खेनाइ सि‍लीगुड़ीमे भेटलनि ओ आगू कतौ ने भेटलनि। कनीटा उदाहरण- बरपेटा असाम राति‍क एक बजे बस एकटा होटलक आगूमे लागि‍ गेल, अकड़ल यात्री सभ उतरि‍ होटल पहुँचल। हॉल जकाँ होटल जइमे तीन बसक यात्रीक बेवस्‍था। चारि‍ रोटी-तरकारीक दाम बीस रूपैया लेलकनि। मुदा देखलनि जे एक प्‍लेट माछ वा मांसबला रहै तँ ओकरा सभसँ एक-एक सए रूपैया लेलकै जे सि‍लीगुड़ीमे दू रूपैया पचास पाइमे खुअबैत रहै। होटलसँ नि‍कलि‍ थानापर गेला। कि‍यो हि‍न्‍दी बुझनि‍हार नै। काली बाबूक नाआें कहि‍ते एकटा सि‍पाही डेरापर पहुँचा देलकनि। जारी... ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। जगदीश प्रसाद मण्‍डल वि‍हनि‍ कथा- १ छूटि‍ गेल तृतीयाक साँझ भगवती स्‍थान दऽ सावि‍त्री बाबा लग आबि‍ फुदकैत बाजल- “बाबा, एकटा बात बुझलौं हेँ?” मद भरल पोतीक बात सुनि‍ आगू सुनैक आशामे आस काशीनाथ ओइ संगीत प्रेमी जकाँ जे एकक पछाति‍ दोसरो सुनए चाहैत, मुँह बाबि‍ पोती दि‍स देखए लगलाह। मुँह रोकि‍ सावि‍त्री महराइक ओइ पलगाँ जकाँ प्रति‍क्षा करए लगली। काशीनाथक मन फड़फड़ेलनि‍ जे भरि‍सक चुप्‍पा-चुप, धुप्‍पा-धुप खेल ने भऽ गेल। हमरा उठलेसँ काज तँ हमरा बैसलेसँ काज। सावि‍त्रीकेँ काशीनाथ पुछलखि‍न- “की सुनलौं?” “अबै छलौं ते अहाँ दे लोक सभ बजै छलाह जे ओ आब ककरो नै गरि‍अबै छथि‍न!” गाइरि‍क नाओं सुनि‍ सावि‍त्रीकेँ अनुकूल बनबैत काशीनाथ बजलाह- “बुच्‍ची, कते के गरि‍आएब। अपने मुँह दुखा जाइए। छोड़ि‍ देलि‍ऐ तँए छूटि‍ गेल।” २ अकास दीप दि‍वालीक एक दि‍न पहि‍ने गाममे रंग-बि‍रंगक अकासदीपक खूँटा गड़ल देखि‍ मनोहरोक मनमे उठल जे अपनो ऐठाम जराबी मुदा लगले मन घेड़ा गेलै जे पावनि‍-ति‍हार तँ परम्‍पराक हि‍साबे चलैत अछि‍, जँ से नै तँ एके समाज माने (एक जाति‍क) एकेटा पावनि‍ कि‍छु गोटेकेँ होइत छन्‍हि‍, कि‍छु गोटेकेँ नहि‍यो होइत छन्‍हि‍। कारणो स्‍पष्‍ट अछि‍ जे जाति‍ दि‍यादमे बँटल अछि‍। जँ ि‍दयादीक भीतर पावनि‍क दि‍न अशौच भऽ जाइत तखन टूटि‍ जाइत। कि‍छु गोटे खंडि‍त बूझि‍ जोड़ि‍ लैत छथि‍, कि‍छु गोटे छोड़ि‍ दैत छथि‍। तइ संग ईहो होइत रहै छै जे बहरवैया आमदनीपर जि‍नका नहि‍यो होइत छलनि‍ ओहो नव शि‍रासँ शुरूहो करैत छथि‍। ओझराइत मनोहर बाबासँ पुछैक वि‍चार केलक। मनोहर हाइ स्‍कूलमे पढ़ैत अछि‍। घरक कोनो काज करैसँ पहि‍ने बाबासँ पूछब जरूरी बुझलक। सात बजे साँझ। चाह पीब पान खाइते श्‍यामलाल गप करैक मूडमे एला। केकरो नै देखि‍ चौक दि‍स जाइक वि‍चार करि‍ते रहथि‍ आकि‍ मनोहर आबि‍ बाजल- “बाबा, एकटा वि‍चार मनमे भेल?” श्‍यामलाल- “की?” “ऐबेर अपना गाममे सइयोसँ बेशी अकास दीप दि‍वाली दि‍न बड़त!” “ई तँ नीक बात भेल।” श्‍यामलालकेँ अनुकूल होइत देखि‍ मनोहर बाजल- “बाबा, अपनो दरबज्‍जापर...?” काँच कड़ची वा पघि‍लल काचकेँ जेहेन साँचामे देल जाइत तेहने ने वस्‍तुओ बनैत अछि‍। मनोहर बच्‍चा अछि‍ हलहोड़ि‍मे मन उड़ि‍ गेलै। श्‍यामलाल कहलखि‍न- “बौआ, जइ गाममे मटि‍या तेल, जेकर उपयोग गाममे खाली डि‍बि‍ये टामे होइ छै, तहूक हाहाकार मचल रहै छै। तइठाम तू भरि‍ राति‍ मासो दि‍न डि‍बि‍या बाड़वह से केहेन हएत?” ३ कनमन साढ़े चारि‍ बजैत। हाइ स्‍कूलसँ अबि‍ते सुधीरक नजरि‍ दरबज्‍जापर बैसल बाबा श्‍याम सुन्‍दरपर पड़लनि‍। दरबज्‍जा-अंगनाक बीच मोड़पर सुधीर तेकठी जकाँ ठाढ़ भेल। केम्‍हर डेग बढ़ौत से फड़ि‍छेबे ने करैत। बाबाकेँ पुछि‍यनि‍ जे कि‍अए मन खसल अछि‍, आकि‍ कि‍ताब रखि‍ कपड़ा बदलि‍ आबी। रस्‍तेसँ भूखो-पि‍यास लगले अछि‍। नबे बजेक खेलहा छी। तेकठीक तीनू खूँटाक बीच अपनाकेँ सुधीर पौलक जे दूटाक कनोत तेकठी नाओं धड़बैत अछि‍ जखन कि‍ तेसरक नाआें गोरी भऽ जाइ छै, जेकरा ऊपर लाद लादि‍ लदाना दइ दइ छै। बाबाक बात बूझब सभसँ जरूरी अछि‍, मुदा बरदाएल हाथे कइये कि‍ सकबनि‍। कपड़ा बदलब ओते महत नै रखैत अछि‍ तँए एना करी जे बाबाकेँ कहि‍यनि‍ जे हमहूँ आबि‍ गेलौं जइसँ जाबे ओ अपन बात बजता ताबे कि‍ताव राखि‍ आएब। कनी डेगमे झाड़ अानए पड़त। सहए केलक। बाजल- “बाबा, कि‍अए मन खसल अछि‍?” कहि‍ कि‍ताव राखए आंगन गेल। कि‍ताव राखि‍ श्‍याम सुन्‍दर लग आबि‍ सुधीर बाजल- “बाबा, मन खसैत कारण कि‍ अछि‍?” आस-नि‍आसक बीच श्‍याम सुन्‍दर ओझड़ाएल रहथि‍, तँए नजरि‍ खसल छलनि‍। पोताक जबाव भारी पबैत छलाह। चालीस बर्खक संगी हेरा-फेरीमे जहल चलि‍ गेल छलनि‍, तेकरे सोग। मुदा बाल-बोध लग बाजी वा नै बाजी। छि‍पाएब झूठ हएत नै छि‍पाएब सेाहे तँ नीक नहि‍ये हएत। नीकक चर्च हेबाक चाही, अधलाक तँ फलो अधले हएत। एहनो तँ भऽ सकैए जे छि‍पबैत-छि‍पबैत छि‍नारक छि‍नरपनि‍ये छीप जाए। मुदा एहनो तँ भऽ सकैए जे एक-दोसराक अधला छि‍पबैत-छि‍पबैत छि‍पारकेक समाज बनि‍ जाए। तत्-मत् करैत श्‍याम सुन्‍दर बाजल- “बौआ, अखने सुनलौं जे रूपलाल जहल चलि‍ गेल। मि‍रचाइक झाँझ जकाँ ओहए मनकेँ मलीन केने अछि‍।” श्‍याम सुन्‍दर जे कहि‍ अपनाकेँ हटबए चाहै से लगले नै हटलनि‍। कारण भेलनि‍ जे जहलक नाओं सुनि‍ सुधीर दोहरा देलकनि‍- “कि‍अए रूपलाल बाबा जहल गेला?” सुधीरक प्रश्न श्‍याम सुन्‍दरकेँ ज्‍वर आनि‍ देलकनि‍ मुदा ज्‍वार नै बनि‍ तुड़छैत ज्‍वारि‍ तँ आबि‍ये गेल रहनि‍। बुझबैत बजलाह- “एते पुरान रहि‍तो रूपाला समैकेँ ठेकानबे ने केलक। पुरना चालि‍सँ आब काज चलैबला छै! बुझथुन जे केहेन दादासँ पल्‍ला पड़ल।” ४ खि‍लतोड़ आकाशवाणी केन्‍द्रक कार्यक्रमक कृषि‍ वि‍भागसँ दयाकान्‍त तीस बर्ख पछाति‍ सेवा-नि‍वृति‍ भेला। खेली-पथारीक कार्यक्रमक चि‍न्‍हार चेहरा बनौने रहला। नोकरी पाबि‍ जि‍नगीमे बहुत कि‍छु केलनि‍। तीनू बेटो आ दुनू बेटि‍योकेँ पढ़ा-ि‍लखा, नोकरी धड़ा नेने छथि‍। अपनो रहैक बेवस्‍था शहरेमे कऽ लेलनि‍। सेवा-नि‍वृत्ति‍क चारि‍ बर्ख पछाति‍ मन उवि‍एलनि‍ जे शहरमे नै रहब, बाप-दादाक बनाओल बामेमे रहब। मन उवि‍आइक कारण भेलनि‍ जे पुरना संगी सभमे कि‍छु गोटे आन शहर, तँ कि‍छु गोटे गाम आ कि‍छु गोटे मरि‍यो गेलाह। पछाति‍ जे संगी भेटलनि‍, हुनका सभसँ तेहेन सम्‍बन्‍ध नै बनि‍ सकलनि‍ जेहेन पहि‍लुका सबहक संग छलनि‍। दूर रहने परि‍वारोक (बेटा-बेटीक) सम्‍बन्‍ध पतराये गेल रहनि‍। पत्नि‍यो संगी नै बनि‍ सभ दि‍न भनसि‍ये रहि‍ गेलनि‍। खंडहर जकाँ घर-घराड़ी। गाम अबि‍ते पहि‍ने घर-अंगना, बीस बर्खसँ परता पड़ल चापाकल उड़ाहलनि‍। दरबज्‍जापर अबैत-अबैत मास दि‍न लगि‍ गेलनि‍। दरबज्‍जापर अबि‍ते देखलनि‍ जे अगि‍ला बाड़ी परती पड़ल अछि‍। जँ एकरा चौमास बना लेब तँ सालो भरि‍ परि‍वारक तीमन-तरकारी तँ चलबे करत जे कि‍छु बाँटि‍यो-खोंटि‍ लेब। सहए केलनि‍। कहि‍या कतए सँ परता पड़ल खेतकेँ गहींरसँ ताम करबा दयाकान्‍त चौमास बनौलनि‍। अल्‍लूक खेतीक केलनि‍। अखन धरि‍ जे अल्‍लूक खेतीक सम्‍बन्‍धमे बुझै छलाह तही हि‍साबसँ तैयारो केलनि‍ आ खाद-कीटनाशक दऽ रोपबो केलनि‍। बीस दि‍न रोपला पछाति‍ खेतमे चारि‍ आना गाछ देखलनि‍। मुदा घबड़ला नै, सबूर केलनि‍ जे अखन जनमइयोक समए छै। तीस दि‍न पछाति‍ जखन ओहो चौअन्नी गाछमे सँ आधासँ बेसी जरि‍ये गेलनि‍ तखन माथ ठमकलनि‍। मुदा पुछबो कि‍नकासँ कएल जाए। तहूमे जि‍नगी भरि‍ अपने दोसरकेँ बुझेलौं। ओना ओझरी मनमे लगए लगलनि‍ मुदा चेत गेलाह। जे खेतीक मर्म बुझैत होथि‍ ति‍नकासँ बूझब नीके छी। बूझब, गहराइसँ बूझब आ मर्म बूझब भि‍न्न होइत अछि‍। ठेहि‍आएल दयाकान्‍त दीनानाथ ओइठाम पहुँचलाह। दयाकान्‍तकेँ देखि‍ते दीनानाथ बजला- “आऊ-आऊ, लाल भाय।” रेडि‍यो स्‍टेशनमे लाल भाइक नाओंसँ दयाकान्‍त छला तँए लाले भाइक नाओंसँ जनैत छन्‍हि‍। चाह पीब दयाकान्‍त बजला- “दीना भाय, अल्‍लू रोपलौं से गाछे ने भेल?” जहि‍ना सौरखीक पात देखि‍ डाँट पकड़ि‍ सौरखी उखाड़ल जाइत तहि‍ना दीनानाथ पकड़ि‍ पुछलखि‍न- “अल्‍लू खुनि‍ कऽ देखलि‍ऐ जे सड़ि‍ गेल आकि‍ जीवि‍ते अछि‍?” “हँ, सभ सड़ि‍ गेल।” “खेतमे हाल केहेन अछि‍?” “से तँ बढ़ि‍या अछि‍। ओते नै अछि‍ जे अल्‍लू सड़ि‍ जाएत।” “तखन?” “सएह नै बुझै छी।” “बीआ काटि‍ कऽ रोपने छलौं कि‍ सौंसे?” “गोटगरहा सौंस रोपने छलौं। तइ संग खादो आ कीटनाशको भरपूर देने छलौं।” खादक मात्रा सुनि‍ दीनानाथ बजला- “देखि‍यौ कहि‍या कतए सँ जमीन पड़ता छल खि‍लतोड़ भेल। ओकरा अपनेमे ओते शक्‍ति‍ छै जे सुभर उपजा दऽ सकैए। तइमे तते खाद दऽ देलि‍ऐ जे बीये जरि‍ गेल।” ५ मुँह-कान काल्हि‍ये बैंकक मैनेजर आबि‍ सुनरलालक गाएकेँ सेहो देखि‍ गेल छलाह। एक्कैस हजारक गाए। गामक कि‍सानक बीच एकछाहा चर्च। कि‍यो सि‍लेब रंगक चर्च करैत तँ कियो सि‍ंह-सि‍ंगहौटीक। कि‍यो थुथुनक चर्च करैत तँ कि‍यो गरदनि‍क अगि‍लाक। जइठाम मनुष्‍योकेँ उचि‍त अन्न नै भेट रहल अछि‍ तइठाम मवेशी पालन धीया-पुताक खेल छि‍ऐ। कते दूधक जरूरत अछि‍, तइले कते मवेशीक जरूरत पड़त मूल प्रश्न भेल। एक तँ एक्कैसक हजारक गाममे आएल अछि‍। अखन धरि‍ जे नै आएल छल। बैंकक लाभ जरूर भेल। मनधनो काका गाए देखए सुनरलालक ओइठाम एला। गाइक रंग-रूप देखि‍ मनधन काका चैन होइत तमाकू खाइले बैसलाह। खुशीसँ खुशि‍आएल भेल सुनरलाल बाजल- “काका, बहूदि‍नसँ हीक गड़ल छल जे एकटा नीक गाए खुँटापर बान्‍हब, से भगवान पूर केलनि‍।” भवधारमे बहैत सुनरलालकेँ देखि‍ मनधन काका कहलखि‍न- “बड़ सुनर गाय छह। मलकार की सभ कहलकह?” काजक जड़ि‍ दि‍स बढ़ैत सुनरलाल बाजल- “चारि‍ मास पछाति‍ एक संझू भऽ जाएत आ छह मास लागत।” “कते दूध होइ छह?” “दू कि‍लो भि‍नसर आ डेढ़ कि‍लो साँझमे।” दूधक नाओं सुनि‍ मनधन काका चौंक गेला जे बाप रे कतए सँ बैंकक कर्ज चुकाओत, कतए सँ गाइक खर्च जुटाओत आ कतए सँ अपने गुजल करत। बात आगू नै बढ़ा मनधन काका सुनरलालकेँ चरि‍अबैत कहलखि‍न- “छब दे तमाकुल खुआबह। एकटा काज मन पड़ि‍ गेल।” “एना अगुताइ कि‍अए छह?” मुदा मनधन काकाकेँ कोनो जबाब नै फुड़लनि‍। मनमे नचैत रहनि‍ युग तँ आर्थिक मोड़ लऽ रहल अछि‍। मुदा घि‍ड़नीक चालि‍ कि‍महर छै वस्‍तुक गुण दि‍स आकि‍ सुआद दि‍स? ६ बुधनी दादी जहि‍ना कुमहारकेँ भादवक रौद बादलमे झपा गेने दुर्दिन आगूमे नाचए लगैत तहि‍ना बुधनी दादीकेँ साल भरि‍सँ भऽ रहल छन्‍हि‍। साल भरि‍ पहि‍ने तक, जाबे पति‍ जीवैत छलनि‍ ताबे दि‍ल्‍लीक कमाइसँ जे सुख केलनि‍, रहि‍तो आब नै भऽ पाबि‍ रहल छन्‍हि‍। सोलह कोठरीक हथि‍सार जकाँ मकानमे असकरे रहैत डर होइ छन्‍हि‍ जे कहीं सुतली राति‍मे भूमकम भेल आ घर खसल तँ महीनो दि‍नमे ऊपर हएब ि‍क नै। तरेमे सड़ि‍ कऽ महकि‍ जाएब। जहि‍यासँ बुधनी दादी नैहरसँ सासुर एली तहि‍येसँ कहू आकि‍ नैहरोमे तइसँ पहि‍नेसँ कहू, नहेला पछाति‍ हनुमान चलीसा पढ़ि‍ते छथि‍। कि‍ताब देखि‍ कऽ नै मुँह जुआनि‍ये। गामक तीन टोलक आबा-जाही बुधनी दादीक छन्‍हि‍। कोन-पावनि‍ कहि‍या हएत आ कोन उपास कहि‍या पड़त से हिसाव जोड़ए अबै छन्‍हि‍। तइ संग ईहो छन्‍हि‍ जे सामाक गीत टोलक कोन बात जे गामेमे सभसँ बेसी अबै छन्‍हि‍। छठि‍क भि‍नसुरका अर्ध पड़ि‍ गेल आइसँ सामाक गीत हएत। दसमी श्रेणीक राधा बुधनी दादी लग पहुँचल। पहुँचि‍ते राधा बुधनी दादीकेँ गोड़ लागि‍ बाजल‍- “दादी, अपन मोबाइल नंबर दऽ दि‍अ। जखन अबैक छुट्टी हएत एबो करब नै तँ मोबाइलेपर लि‍खि‍ देब।” मोबाइलि‍क नाओं सुनि‍ते बुधनी दादीक मन गाछसँ खसल कटहर जकाँ आँठी उड़ि‍ कतौ, नेरहा उड़ि‍ कतौ, छहोछि‍त भऽ गेलनि‍। बजलीह- “बुच्‍ची, आब तोरा सबहक जुग-जमाना एलह। बेटा मोबाइल पठा देलक जइसँ कहि‍यो काल धीयो-पुतो आ बेटो-पुतेाहुसँ गप-सप होइ छलए। सेहो केदैन चोरा लेलक। मरि‍ दि‍न अंगनेमे बैसल रहब से पार लागत। मूस तते भऽ गेल अछि‍ जे ने नुआ-वि‍स्‍तक सेखी रहए दइए आ ने खाइ-पीबैक।” राधा- “दादी, एहि‍ना जि‍नगी चलै छै।” बुधनी दादी- “बुच्‍ची, जीवैक मन होइए मुदा तेहेन-तेहेन आपैत-वि‍पैत सभ अछि‍ जे हाेइए तइसँ नीक भरमे-सरमे मरि‍ जाइ।” ७ अनदि‍ना शि‍क्षक अमरनाथकेँ देखि‍ते रामकि‍सुन बाजल- “मास्‍सैव, अनदि‍ना गाममे देखै छी?” रामकि‍सुनक प्रश्नसँ अमरनाथ अचंभि‍त भऽ गेला जे एहेन बात कि‍अए पुछलनि‍। मुदा बाजबो तँ उचि‍त नहि‍ये हएत। रंग-बि‍रंगक जहि‍ना शि‍क्षक छथि‍ तहि‍ना वि‍द्यार्थियो‍ अछि‍। जेहने चलबैबला अछि‍ तेहने चलौनि‍हारो अछि‍। कि‍ हमरा कहने झूठ भऽ जेतै जे शि‍क्षक सभ दरमहे टा उठबए वि‍द्यालय जाइ छथि‍, तँए कि‍ ईहो झूठ भऽ जाएत जे सरकारी दहि‍न गबैया जकाँ महि‍ने-महि‍ने दरमाहा देब छोड़ि‍ सालक-सालेक पाहि‍ लगबै छै। अमरनाथक मन ठमकलनि‍। अनदि‍ना गाममे देखै छी, अहाँ गामसँ हटि‍ नोकरी करै छी, बि‍नु छुट्टीक दि‍न गाममे छी कि‍ समाजक एतबे दायि‍त्‍व बनै छै जे फल्‍लाँ भाइक सातो बेटा गुरुजी बनि‍ गेलखि‍न। अधभर मुस्‍की दैत अमरनाथ कहलखि‍न- “भाय, की कहै छी, जुगेमे भूर भऽ गेलै। अमैया छुट्टीमे गाम एलौं हेन आ ऐठाम देखै छी जे फैजली सभ कोशेबो ने कएल हेन।” दि‍न ठेकनबैत रामकि‍सुन बाजल- “कते दि‍नक छुट्टी अछि‍ जे एना हदि‍या गेलौं।” “आब कि‍ ओ जुग-जमाना रहल जे रोहनि‍यासँ फैजली तक खाइक छुट्टी होइ छै। आधासँ बेसी छुट्टी कटि‍यो गेल अछि‍। जब हमर स्‍कूल खुजल तेकर पछाति‍ आन-आन स्‍कूलमे छुट्टी हेतै।” रामकि‍सुन- “ई तँ अजगुते भेल?” दहि‍ना हाथसँ चानि‍ ठोकि‍ अमरनाथ बाजल- “अहाँ अजगुत कहै छि‍ऐ। एतबे अछि‍। पहि‍ने सरकारि‍यो ऑफि‍समे आ आनो-आनो ठाम कि‍रानी होइ छलै अखनो अछि‍। तहि‍ना स्‍कूलमे शि‍क्षक होइ छला अखनो छथि‍। मुदा आबक शि‍क्षक सालो भरि‍क नै छह मसि‍या बनि‍ गेलाह। छह मास धि‍या-पुताकेँ पढ़ाउ आ छह मास ऑफि‍सक काज कररू। जहि‍ना नाचमे लेबरा सभ नै लेबराइ करैए तहि‍ना ने हमहूँ सभ कखनो माल्‍थस रॉवि‍नसन करै छी तँ कखनो आबि‍ घरे-घर बकरी-छागरक गि‍नती करै छी।” अमरनाथक बात सुनि‍ रामकि‍सुन ओल जकाँ कबकवेला नै, मुस्‍की दैत बजलाह- “होउ, अहीं सबहक जुग-जमाना छी, जे काटब से काटि‍ लि‍अ।” रामकि‍सुनक काटब सुनि‍ अमरनाथ अह्लादि‍त होइत बजलाह- “ठीके ने अहाँ कहै छी। अपना सभकेँ जे सभसँ छोटका दि‍न होइए, ओइमे कथीक छुट्टी होइए से बूझल अछि‍?” “नै।” “बड़ा दि‍नक!” ८ अपन काज तेजीसँ समए अगुएने, वि‍कास भेन महगि‍योक वृद्धि‍ धकधका गेल। तहूमे तीमन-तरकारीक तेजी भेने, बाड़ी-झाड़ीसँ टपि‍ खेत-पथार दि‍स बढ़ल। जइ चौमासमे अंडी-बगहंडीसँ लऽ कऽ भाँग-धथुरक बि‍रदावन रहैत आएल छल ओ कटि‍-खोंटि‍ चौमासो दि‍स घुसकुनि‍याँ कटलक। अखन धरि‍ कपलेसर परि‍वार धरि‍क तरकारी उपजबैत छल सेहो कोनचरमे सजमनि‍क गाछ, आ गौसारपर अल्‍लू-कोवी, मि‍रचाइ, भट्टा उपजबैत छल ओ चारि‍ कट्ठा कोवी खेती करत। ओना पाँच बीघा जोतक कि‍सान कपलेसर, मुदा खेतमे खादक हि‍साब धाने-गहुमक बुझैत अछि‍। मि‍रचाइ बाड़ीकेँ कड़चीसँ भोला बति‍अबैत रहथि‍ आकि‍ कपलेसर अबि‍ते पुछलकनि‍- “भैया, चारि‍ कट्ठा कोवी खेती करब, तइमे कते खाद लगतै?” कपलेसरक प्रश्न सुनि‍ भोला तारतममे पड़ि‍ गेला। रंग-बि‍रंगक प्रश्न मनमे उठलनि‍। जइ खेतमे पहि‍ल बेर खेती हएत आ जइ खेतमे साले-साल होइ दै, उपजैक दृष्‍टि‍सँ दुनू एक केना भेल। कोवीक पछि‍ला फसि‍ल कि‍ छलै, सि‍रो तँ रंग-रंगक होइ छै। कोनो छह आंगुर ऊपरे धरि‍क तँ कोनो बीत भरि‍क, कोनो तोहूसँ गहींरक। जँ खेत खसले अछि‍ तँ कते दि‍नसँ खसल अछि‍ तही हि‍साबसँ ने रसेबो करत। तहूमे पृथ्‍वीक रस तँ आरो एकभग्गु छै। भोलाक मनमे लगले उठलनि‍ जे जखन बेचारा पूछए आएल सेहो ओहि‍ना नै देखबो करैए। तखन कि‍छु नै कहि‍ऐ से केहेन हएत। कि‍छु कहैले ठोर चटपटेलनि‍ मुदा मनमे उठि‍ गेलनि‍ जे कोन खादक नाओं कहबै। ओहोमे तँ करामति‍ये अछि‍। एक्के खादमे कथूक मात्रा बेसी रहै छै तँ कथूक कम। मन अकछए लगलनि‍। जे अनेरे अपनो काज बरदा मगजमारी कऽ रहल छी। मुदा धाँइ दऽ कि‍छु कहि‍यो देब केहेन हएत। मन घुमलनि‍ अपन जबाब अपने उठलनि‍ जे काज बरदाइए आ कि‍ दोसर काज ठाढ़ करैए। असथि‍र मन होइते पोखरि‍क पानि‍मे जहि‍ना हवा पाबि‍ हि‍लकोर लगैए तहि‍ना हि‍लकोर उठलनि‍। प्रकृति‍क हि‍सावसँ मौसम बनै-बदलैत अछि‍। फसि‍लक अपन गति‍ छै। तइठाम क्षेत्र-क्षेत्रक मि‍लान नै हएत तँ उपजाक कते भरोस कएल जाएत। दुनि‍याँ घर अंगना बनि‍ गेल अछि‍ दुरसक बात बेसी बूझै छी आ घरक बात बुझि‍ते ने छी। गहुमेक बाउगक समए इलाका-इलाकामे अलग-अलग ति‍थि‍सँ होइत अछि‍, तेकरा केना बूझब। अपन बात सहजे शीतगृहमे रखि‍ देने छी नइ तँ जयंती बाबड़ीमे थोड़े वनहाएत। मन थीर होइते भोला बाजल- “कपले, पढ़ल-लि‍खल जेहेन छी से तहूँ जनि‍ते छह, आब तोरो उमेर कम नहि‍ये भेलह। खेती करै छी पुछलह तँ कहै छि‍अह। चारि‍ कि‍लो डी.ए.पी. तीन कि‍लो पोटाश, कीटनाशक संग खेतमे मि‍ला दि‍हक। नवका किश्‍मक बीआ छेबे करह सवा-हाथ, डेढ़-हाथपर रोपि‍हह।” ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। गोविन्द झा (नाटक) गाम जएबै गाम जएबै गाम जएबै ना (आरम्भ 23.09.2012 ---- समाप्ति 17.10.2012) पहिल दृश्य [बूढ़ा खाट पर बैसल छथि। दूर सँ हल्ला सुनि पड़ैत अछि ---पकड़-   पकड़।  दौड़-जैड़। कोम्हर रौ। हे ओम्हर गाछी दिस। बूढ़ी दौड़ि कें अबैत छथि।] बूढ़ी – अएँ, ई कथीक हल्ला भए रहल छै ? बूढ़ा – के कहत कथी।. तान्त्रिक – (बाहरहि सँ) इएह हम कहब जे कथीक हल्ला थिकैक। बूढ़ी – आउ-आउ। हमरा तँ बड़ डर भए गेल। [ तान्त्रिक प्रवेश कए कुरसी पर बैसैत छथि ] तान्त्रिक – कोनो डरक बात नहि। एहि गाम मे तँ कोनो-ने-कोनो हल्ला-फसाद होइतहि रहै छै। बूढी – एखन कथीक हल्ला भेलै।? तान्त्रिक – फटफटिआ पर सबार चारि-पाँच टा छौंड़ी सब हुड़हुड़ करैत अएलै आ ओ रंगदार छौंड़ा रघुबिरबा अछि ने तकरा पकड़ि कें लए गेलै। बूढा – अपहरण ? तान्त्रिक – नहि, अपहरण नहि। बूढ़ा – तखन की? तान्त्रिक – एकटा छौंड़ी औकरा सँ बिआह करतै। बूढी – बलजोरी ? तान्त्रिक – हँ, सएह बूझू। बूढ़ा – विचित्र बात। तान्त्रिक – आजुक युग मे कोनो बा त विचित्र नहि। सुनू, बुझा दैछी। आजुक पढुआ छओंड़ा सभ हठे बिआह नहि करत। माए-बापक कथा के सुनैए। बाप एक सँ एक उत्तम कन्या तकैत रहथु, बेटा कें कोनो मतलब नहि। जखन जबानी जोर मारतै तँ बाट-घाट मे लुचपनी करैत फिरत। बूढ़ा – ठीके कहैछी अहाँ। तान्त्रिक – छौंड़ा कें एहि मे कोनो खतरा नहि। खतरा छै खाली छौंड़ी कें। तें छौंड़ी सभ एकटा दल बना कए अभियान चलओलक अछि जे एहन-एहन छुट्टा कुकुर सब कें एक-एक लड़ाकू छौंड़ी लगा नाथि देल जाए जे जीवन भरि टीक पकड़ने रहैक। बूढ़ा – ओ, आब बूझल। एही अभियान मे एखन ई रघुबिरबा पकड़ाएल। उचित सजाए भेटलैक। बूढ़ी – की करतै ओकरा? बूढ़ा – नहि बुझलिऐ? आर की, मन्दिर मे लए जा कए बिआह करा देतै। तान्त्रिक – अस्तु, छोड़ू अनकर गप। एखन हम एकटा शुभ संवाद लए आएल छी। बूढ़ा – केहन संवाद ? तान्त्रिक – हमरा हाथ मे एकटा एहन वस्तु आएल अछि जे पाबि कें अहाँ धन्य-धन्य भए जाएब। बूढ़ा – एहन कोन वस्तु से तँ कहू। तान्त्रिक – एक टा कन्यारत्न। परिचय सुनब? बूढ़ा – ( गम्भीर साँस लए ) कन्यारत्न. (गुम)। तान्त्रिक – (प्रतीक्षा कए) एना गम्भीर किएक भेलहुँ ? बूढ़ा – हमर सब हाल अहाँ कें बुझले अछि, तखन कहू की। तान्त्रिक – तैओ एक बात बूझि लिअ। गाम मे एखन जे घटना भेल अछि से गामहु सँ बेसी विदेश मे भए रहल अछि, तरीका भनहि किछु भिन्न हो। बूढा – जनै छी। बूढ़ी -  जनै छी ताहि सँ की। किछु सोचहु पड़त। तान्त्रिक – सोचल जाए। एखन आज्ञा हो। फेर भेट होएत। [ तान्त्रिकक प्रस्थान।] बूढ़ा – सुनलहुँ? बूढ़ी – सुनब की कपार। हम कहैत-कहैत हारि गेलहुँ जे बिमारिऔक लाथें बौआ कें बजा लिऔ, नहि तँ पछताएब।. बूढ़ा – की हैत बजा कए। अएले तँ छल परुकाँ कि तेसरुकाँ। की कहलक से मन पारू। बूढ़ी – मने अछि। बिसरत कोना। मुदा एक बेर जे हारए से कि फेर....? बूढ़ा – चुप रहू। हमर टूटल मन कें आओर नहि तोड़ू। जेहन हमर-अहाँक मन तेहन आजुक जनमल ओकर मन कोना हेतै। हम-अहाँ चुप्पे रही सएह उचित। बूढ़ी – अहाँ तँ कोनो बात मे तेना जिद पकड़ि लै छी जे हमरा किछु नहि फुरैए। जँ एक बेर बजाइए लेबै तँ कोन अनर्थ ...। बूढ़ा – हँ, भए जएतै अनर्थ। अहाँ नहि जनै छी जे आइ-काल्हि नीक नोकरीक की हाल छै। केहनो जरूरी काज रहए, जँ छुट्टी लेलहुँ तँ बूझू नोकरी गेल। हम अपन मोह-ममता देखू कि बेटाक कल्याण। अपना भरोसें जिबैत रहलहुँ, अपना भरोसें जिबैत रहब। अहाँ घबराउ नहि। बूढ़ी – जहिना अहाँ कें बेटाक नोकरीक चिन्ता अछि तहिना तँ हमरा अहाँक बिमारीक चिन्ता। बूढ़ा – हम ठीक भए रहल छी। कोनो चिन्ता नहि। [ अचानक डाक्टरक प्रवेश ] बूढ़ा – आउ-आउ, बैसू। बुझबिऔन हिनका। डाक्टर – (बूढ़ीक प्रति) ठीके कहलनि जनार्दन बाबू,  कोनो चिन्ता नहि। क्रमशः निकें भए रहल छथि। (आला लगाए देखि कें) ठीक छी। चित्त प्रसन्न राखू। एखन आज्ञा दिअ। मरीज सब बाट तकैत हैत। (बूढ़ा उठए लगैत छथि) अहाँ उठू नहि, बैसले रहू। फेर आएब दबाइ लेने।  (जाइत छथि)। बूढी – (ठाढि भए अरिआतैत) एक कप चाहो नहि देलहुँ। डाक्टर – (बूढ़िक कान लग) हृदय किछु कमजोर भए गेल छनि। हिनका हरदम प्रसन्न रखबाक प्रयास करू। हम तकर उचित उपाय कए रहल छी। बूढ़ी - कोन उपाए ? डाक्टर – से एखन नहि कहब। पछाति अपनहि बूझि जएबैक। [ डाक्टर जाइत छथि। बूढ़ी घुरि कें बूढ़ा लग आबि कें बैसैत छथि।] बूढ़ी – (बूढा कें माथ पर हाथ देने देखि) एना माथ पर हाथ किएक देने छी ? बूढ़ा – नहि पूछी सएह नीक। जँ मनक बात कहब तँ अहूँ हमरहि जकाँ माथ पर हाथ देब। बूढ़ी – ई कोना हैत जे अहाँ कनैत रही आ हम हँसैत रही ? बूढ़ा – अहूँ कनबा मे संग देबहि चाही तँ सुनू छाती कें मजगूत कए कें। (कनेक रुकि कें) एखन जे ओ घटना सुनल तकर की अर्थ से अहाँ नहि बुझलिऐ। सुनू हम बुझा दै छी हुनक पेटक बात। पहिल बात ई जे ओ हमरा चेतओलनि, जँ हम बेटा कें बजाए चटपट ओहि कन्यारत्न सँ विवाह नहि कराए देबैन तँ गामक वा विदेशक छौंड़ी सभ ओएह हाल करतनि जे रघुबिरबाक कएलक। बूढ़ी – ओ कोन बेजाए कहलनि। बूढ़ा – बात तँ बड़ सुन्दर, मुदा एना धमकी दए डर देखाए कुटुमैती होअए ? आ असल बात ई जे की बेटा अहाँक बात मानि कें दौड़ल आओत आ अहाँक बात मानि केँ ओहि कन्यारत्न केँ अपन अर्धांगिनी बनाए लेत ? बूढ़ी – तँ साफ-साफ जबाब दए दिऔन। एहि लेल मथा हाथ किएक ? बूढ़ा – हमरा मन कें अहाँ जतेक खोधब ततेक नव-नव राक्षस बहराइत जाएत। हमरा तँ लगैए जे अहाँक बेटा ओतहि विवाह कए चुकल अछि। तहिं दू-तीन बरख सँ आबि नहि रहल अछि। तेसराँ आएल रहए तँ अहाँ बड़ आग्रह कएने रहिऐक, मुदा टस सँ मस नहि भेल। किएक ? बूढ़ी – अहीं कहू किएक। बूढ़ा – हमरा तँ लगैए जे ता ओ विवाह कए चुकल छल। बूढ़ी – अहाँ तँ अनेरे किदन-कहाँदन सोचैत रहै छी। छोडू ई सभ चिन्ता।. चलू  भोजन करए। [ दूनूक प्रस्थान ] दोसर दृश्य [ ड्रॉइङ रूम मे एक उच्च अधिकारी आदित्य सिंह, हिनक यूरोपिअन पत्नी जेन क्रिस्टल उर्फ प्रभाक संग सोफा पर बैसल आ पाँच वर्षक बालक वरुण फर्श पर खेलाइत।] आदित्य – (मोबाइल कान मे लगबैत) आदित्य स्पीकिङ। मोबाइल – हम अपनेक गाम सँ बाजि रहल छी। आदित्य – की बात ? मोबाइल – अपनेक पिता बाबू जनार्दन सिंह....। आदित्य – कुशल छथि ने ? मोबाइल – हँ, जिबैत छथि। मुदा स्थिति नीक नहि छनि। अपनेक माता बेर-बेर कहैत रहलथिन जे बौआकें बजाए लिऔक। मुदा ओ नहि बजओताह। अपने यथासंभव शीघ्र आएल जाए। आदित्य – पिताजी अपने किएक नहि सूचित कएलनि ? मोबाइल – पुछै छिअनि तँ कहै छथि, अपना भरोसें जीलहुँ, अपनहि भरोसें जिअए दिअ। एक चिकित्सकक रूप मे हम अपन कर्तव्य बूझल जे अपने कें सूचित कए दी। आदित्य – ( मोबाइल कात कए पत्नीक प्रति) सुनलहुँ ? कनिआँक आँखि मे नोरे ने, पड़ोसिनि भोकारि पारथि। (प्रतिक्रिया जनबाक हेतु प्रभाक मुँह निहारै छथि)। प्रभा – हमर मुँह की निहारै छी। चलबाक इन्तिजाम करू। हमर फादर इन लॉ बड़ स्वाभिमानी आ स्वावलम्बी छथि। अन्तिमो अवस्था धरि ओ नहि बजओताह। क्षमा करी तँ तकर कारणो कहि दी। आदित्य – कहबाक प्रयोजन नहि। हम अपन अपराध स्वयं जनै छी। बेर-बेर बजबैत रहलाह, मुदा.....। प्रभा – मुदा अहाँ कें फुरसति नहि। लगैए जे अहाँ बाप केँ आगिओ नहि दए सकब। अहाँकें कोन ? अहाँ खूब भोगि चुकल छी माए-बापक दुलार। हम तँ ने माइक मुँह देखल ने बापक। सुनैत रही जे अहाँक देश मे सासु अपन पुतोहुक आबेस बेटिअहु सँ बेसी करैत अछि। इएह सोचि कें अहाँक संग धएलहुँ। मुदा अहाँ तीन वर्ष सँ ठकैत-फुसिअबैत रहलहुँ। अहाँक दोख नहि. हमर कपारक दोख। आदित्य – ( तेज अबाज मे ) अहीं सुनबैत रहब कि हमरो बात सुनब ? प्रभा – ( आओर तेज अबाज मे ) नहि सुनब अहाँक बात। सुनैत-सुनैत कान पाथर भए गेल। ( कनै छथि)। प्रवीण – (बाहरहि सँ) ई कोन नाटक भए रहल छै. मैडम ? आदित्य – प्रवीण , आबह-आबह। प्रवीण – (प्रवेश कए सविस्मय) अएँ. श्रीमतीजीक आँखि मे नोर ? आदित्य – ई एकटा विकट समस्या ठाढ़ कए देलनि अछि। प्रवीण – कोनो समस्या नहि। मैडम, एना नोर ढारने ई पाथर नहि पसिजत। पहिने नोर पोछू आ मन प्रसन्न करू। तखन देखू जे कोना ई मिस्टर सोल्यूशन छन भरि मे अहाँक सभ समस्याक समाधान कए दै छथि।   (आदित्य दिस आङुर देखाए) एकरा कानि-खीजि कें अहाँ नहि सोझ कए सकै छी। ( आदित्य सँ ) हओ, हमर कहल मानह आ तुरन्त गाम जएबाक तैआरी करह। एकसर नहि, तीनू एक संग। आदित्य – मुदा छुट्टी ? प्रवीण – मूर्ख छह तों। हौ, आइ-काल्हि नोकरी मे छुट्टी देल नहि जाइ छै, छुट्टी लेल जाइ छै। केवल सूचना दए निकलि पड़ह। हम छी ने, कोनो खतरा नहि। छुट्टीक मंजूरीक प्रतीक्षा करबह तँ बापक सराधो नहि कए सकबह। आदित्य – एकटा आओर विकट समस्या अछि तोहर मेम साहेब कें लए। कट्टर पुरना विचारक लोक हमर माता-पिता हिनका घरो नहि टपए देथिन। प्रवीण – हओ, एतेक दिन संग रहलह तैओ तों चीन्हि नहि सकलह हमर मेम साहेब कें। जे तोरा सन बेकूफ कें नाथि देलनि से अबस्से छन भरि मे सासु-ससुर कें रिझाए लेतीह। की से आत्मबल अछि ने, मेम साहेब ? प्रभा -  पुछलहुँ तँ जड़ि सँ सुनू। हमरा सन अभागलि दोसर नारी नहि भेटत। हम ने माए कें देखलहुँ ने बाप कें। एकटा अशरण वृद्ध शरण देलनि। जखन हिनका सँ विवाह भेल, मनहि मन प्रसन्न भेलहुँ जे आब सासु-ससुर सँ ओ दुलार भेटत जे माए-बाप सँ भेटैछै। एही लेल भारतीय पड़ोसी सँ साड़ी पहिरब सिखलहुँ। एही लेल बड़ जतन सं मैथिली सिखलहुँ। प्रवीण – बाह. अहाँ तँ मैथिली बजबा मे प्रवीणहु सँ प्रवीँण भए गेलहुँ। प्रभा – अहाँक मित्र कें अङरेजी सँ बड़ अनुराग। प्रवीण – तखन सिखलहुँ कोना ? प्रभा – ओ अङररेजी बाजथि तँ हम कान मूनि ली। एखनहु से जिद ठनने छी। मुदा....। प्रवीण – आब मुदा की ? आदित्य – हम एकसर तँ जएबा लेल तैआर छी, मुदा हिनका लए जएबा मे एकटा बाधा अछि। प्रवीण – केहन बाधा ? आदित्य – हम विवाह कएलहुँ से बात माए-बाप सँ आइ धरि छिपओने रहलहुँ। तखन कोना हिनका लेने....? प्रवीण – हम तोहर मनक सभ बात जनैछिअहु। तों बापक तीन–तीन टा बड़का अपराध कएने छह। पहिल – तीन बरख सँ माए-बाप कें मुह नहि देखओलह। दोसर – चुपेचाप विवाह कए लेलह। तेसर – इसाइ कन्या सँ विवाह कएलह। प्रभा – ठीक कहैछी अहाँ। एही लाजें...। प्रवीण – तों पढ़ि-लिखि कें लोढ़ा भए गेलह। हओ, जनै नहि छह, सभक बाप धृतराष्ट्र होइछै, पक्का धृतराष्ट्र। लाख अपराध माफ। तखन डर कोन ? बड़ क्रोध हेतनि त कहथुन, कान पकड़ि कें दस बेर उठह-बैसह। बस, सभ क्रोध निपत्ता। वरुण – ( खेलाएब छोड़ि कान पकड़ि कें उठब-बैसब सुनि कें स्वयं करैत ) डैडी, अहूँ एहिना करू ने। (हाथ पकड़ि घिचैत अछि। आदित्य संग दैछथिन।) प्रवीण – बाह रे बौआ, बाह ! एक्सेलेन्ट ! देखह, हओ.  बापक हृदय केहन हइछै। एहिना तों बापक आगाँ कान पर हाथ देने ठाढ़ भए जएबह कि बस, आनन्दे आनन्द। (प्रवीण सँ) बाउ. तों सब गाम जएबह। वरुण – सत्ते गाम जएबै ? आदित्य आ प्रभा – हँ, सत्ते गाम जएबै। [ वरुण नाचि-नाचि गबैत अछि। ताहि मे माए, बाप आ प्रवीण तीनू संग दैत छथिन ] गाम जएबै गाम जएबै जाम जएबै ना दही खएबै चूरा खएबै आम खएबै ना गाम जएबै गाम जएबै जाम जएबै ना दादा के देखबै दादी के देखबै भैया के दखबै ना गाम जएबै गाम जएबै जाम जएबै ना प्रभा – बस, नाच खतम। आब चलैचलू डिनर मे। [ सभक प्रस्थान ] तेसर दृश्य [ पुरान-सन पक्का मकान। नमहर बरंडा। बामा कात एक कोठली। बरंडा पर खाट, ताहि पर रोगग्रस्त बूढ़ा जनार्दन ठाकुर पड़ल। बूढ़ी पाएर जँतैत। खाटक एक कात किछु कुरसी ] बूढ़ा – अहाँ किछु कहए लागल रही ? बूढ़ी – हँ, ठीके। बूढ़ा – कहलहुँ नहि . बूढ़ी – हँ, मुह सम्हारि लेलहुँ। मनक बात मनहि राखल। बूढ़ा – से किएक ? बूढ़ी – कहैत-कहैत थेथर भए गेलहुँ। सभ बेकार। तखन फेर कहि कें कोन फल ? जेहने बाप चंठ तेहने बेटा। बूढ़ा – (उठि कें बैसैत क्रोध सँ) हे, हमरा जे कहब से कहू, हमर बेटा चंठ नहि अछि। कोना बुझाउ अहाँ कें जे नीक नोकरी केहन वस्तु थिकैक। की हमर मुह आ अहाँक मुह देखैत रहने ओकर मुह भरतै ? बूढ़ी – हमहूँ कोना बुझाउ अहाऎ कें। जेना अहाँ कें बौआक नोकरीक चिन्ता अछि तहिना तँ हमरहु अहांक प्राणक चिन्ता। बूढ़ा – देखू, पाँच-पाँच टा डाक्टर-वैद्य तत्परतापूर्वक इलाज कए रहल छथि। हम स्वस्थ भेल जा रहल छी। तखन कोन चिन्ता ? [ वाम दिस सँ आदित्य, प्रभा आ वरुणक प्रवेश। तीनू अलक्षित रूपें कात मे ठाढ़ छथि। ] आदेत्य – (कातहि सँ) इएह, इएह थिक हमर घर। बूढ़ी – (अबाज सुनि कें झटकारने आगाँ बढ़ैत कचकाए) अएँ, के ?  बौआ ? आबि गेल, आबि गेल हमर बौआ ! बूढा – (हड़बड़ाए उठि कें दौड़ैत) अएँ, अचानक आबि गेल ! आदित्य – बाबूजी, बाबूजी, एना नहि दौड़ू। खसि पड़ब। (बाँहि पकड़ि कें खाट पर बैसाए पिता आ माता कें प्रणाम करैत छथि) । बूढ़ा – (माथ पर हाथ दए पँजिअबैत) जहाँ रहह, निकें रहह। बूढ़ी – जुगजुग जीबह, निकें रहह। प्रभा आ वरुण – (दूरहि सँ कर जोड़ि कें) प्रणाम बाबूजी, प्रणाम माताजी। बूढ़ा – (दूनूक मुह निहारि सविस्मय) अएँ, ई के ? आदित्य – ( अचानक बूढ़ाक आगाँ ठाढ़ भए) बाबूजी, बाबूजी, हमरा ओहिना कान ऐंठू जेना नेना मे ऐंठै छलहुँ। ऐंठू, ऐंठू ने। (आँखि मे नोर )। बूढ़ा – (अकचकाए) अरे, तोरा ई की मोन पड़लहु। (मुह निहारि) अएँ, हँसीक जगह नोर किएक ? आदित्य – अहाँ नहि ऐंठब तँ हम अपनहि ऐंठैछी। [  आदित्य कान ऐंठैत उठैत -बैसैत छथि। वरुण नकल करैत अछि। प्रभा पकड़ि कें कोर लए लैछथिन। ] बूढ़ा – ( आदित्य कें पकड़ि खाट पर अपना लग बैसाए) एना नहि करह, बाउ। बात की थिकै से कहह। आदित्य – आइ, बाबूजी, अहाँक आगाँ आ माए, तोरो आगाँ हम लाज-बीज कात कए अपन अपराध कबूल करैछी आ तकर जे दण्ड हो से ......। बूढा – पहिने ई तँ कहह जे तों कोन अपराध कएलह। आदित्य – एक नहि, तीन-तीन टा अपराध। नम्बर एक – तीन वर्ष सँ गाम नहि अएलहुँ। नम्बर दू – अहाँ कें बिनु पुछनहि चुपेचाप विवाह कए लेलहुँ। नम्बर तीन – अहाँक प्रस्तावित कन्यारत्नक उपेक्षा कए एहि क्रिश्चन कन्या सँ विवाह कए लेल। आइ अहाँ एहि सभ अपराधक दण्ड दिअअ. हम सहर्ष भोगि लेब। [ आदित्य, प्रभा आ वरुण तीनू कर जोड़ने एक पाँत मे ठाढ़ होइछथि। एक मिनट सभ स्तब्ध भेल एक दोसराक मुह अपलक तकैत छथि। ] प्रभा – हम हिनकर पुतोहु दूरहि सँ गोड़ लगैछिऐन। ( आँजुर माटि धरि झुकाए प्रणाम करैत छथिन)। बूढी – (सहसा आगाँ बढ़ि कें कोर करैत) अहोभाग, अहोभाग हमर। केहन सुन्नर पोता आ केहन सुन्नरि पुतोहु। दूधे नहाउ पूते बिआउ। (बूढ़ा सँ) लछमी घर अइलीह। लग आबि कें आसिख दिऔन। ( प्रभा कें आशीर्वाद देबाक लेल हुनक माथ दिस हाथ बढ़बैत लग जाइत छथि।) प्रभा – (पाछु हटैत) हाँ-हाँ। हमरा छूबथु नहि। बूढ़ी – ( अकचकाए ठमकि के) अएँ, से किएक ? प्रभा – हम अङरेजक बेटी, अछोप। बूढ़ी – (मर्माहत भए दू डेग पाछु हटैत) अएँ, मे......म ! [ बूढ़ा अचानक बेहोस भए ठामहि पडि रहैछथि। ] बूढ़ी – ( छाती पिटैत) दैबा गे दैबा ! प्रभा – माइ गॉड ! हमरा सभक अबितहिं ई की भए गेलनि। आदित्य – दीज ओल्ड फोक कुड नॉट टोलरेट आवर प्रेजेन्स। लेट अस फ्लाइ बैक ऐज सून ऐज पॉसिबुल। प्रभा – प्लीज हैभ पैशेन्स ए मोमेन्ट। ( बूढ़ी सँ ) माजी, लग मे कोनो डाक्टर छथि ? बूढ़ी – हँ, लगहि मे छथि। चारिए-पाँच घर बामा दिस। प्रभा – हम डाक्टर कें बजा अनैछिऐन। ई पंखा हौंकैत रहथुन। किछु टोकथुन नहि। [ कनेक काल सभ स्तब्ध। प्रभाक संग डाक्टर अबैछथि। ] बूढ़ी – डाकदरबाबू. देखिऔन. की भए गेलनि हिनका। डाक्टर – घबराउ नहि। लगले ठीक भए जएतनि। (जाँच कए छाती पकड़ि कें डोलबैत) जनार्दन बाबू, मन केहन अछि ? बूढ़ा – ( अस्पष्ट ध्वनि मे ) म.....म,  मम...ता....। डाक्टर – की कहलहुँ ? बूढ़ा – ध....धर...धर। डाक्टर – डेलिमा. क्लिअर केस ऑफ डेलिमा। एक दिस ममता आ दोसर दिस धर्म – दूनूक प्रबल आघात सहि नहि सकलाह। आदित्य – एकर प्रतिकार ? डॉक्टर – पहिने ई कहल जाए जे अपने के ? आदित्य – ई हमर पिता, ई माता आ ई...। [ तीनूक बीच नमस्कार ] डाक्टर – तखन तँ एकर प्रतिकार अपनहि दूनूक हाथ मे अछि। खास कए अपनेक श्रीमतीजीक हाथ मे। प्रभा – से कोना ? डाक्टर – ममता कें ततेक जगाउ जे ओ धर्म पर विजय पाबए। अपने कें फोन हमही कएने रही। नीक कएल जे आबि गेलहुँ। आब कोनो चिन्ता नहि। होस आबि रहल छनि। कनेक काल मे नॉर्मल भए जएताह। एखन आज्ञा हो। [  डाक्टर जाइत छथि। आदित्य, प्रभा आ वरुण फेर ओआआहिना पाँती लगाए ठाढ़ भए जाइछथि। बूढ़ी भारी दुबिधा मे पड़लि बकर-बकर पुतोहुक मुह तकैछथि। ] आदित्य – बाबूजी होस मे आबि गेलाह । आब की कएल जाए। प्रभा – लेट मी प्ले ए ट्रिक नाउ। ( बूढाक लग जाए कें ) बाबूजी, आब  हिनक मन केहन छनि ? बूढ़ा – ठीक अछि। प्रभा – कहथु तँ, ई के थिकाह ? बूढ़ा – बेटा। प्रभा – हम के छी ? बूढ़ा – हमर पुतोहु। प्रभा – आ ई  ? बूढ़ा – ई हमर पोता। प्रभा – हम एतेक दूर सँ किएक अएलहुँ। बूढ़ा – अपन सासु, अपन ससुर आ अपन घर-आङन देखए। प्रभा – से तीनू देखि लेल। आब आज्ञा हो, जाइछी। बूढी – ( अकचकाए) अएँ, से किएक। प्रभा – हम अछोप मेम छी। हमरा रहने हिनकर घर छूति जएतनि। (कनैत) हाए रे हमर कपार। बड़ मनोरथ छल, नहि माए-बाप तँ सासु-ससुर सँ माए-बापक दुलार भेटत। ......तेहन पुरुखक हाथ धएलहुँ जे सासुओ-ससुर देखि कें दूर पड़ाइत छथि।.......हिनका लोकनिक भाखा सिखलहुँ, साड़ी पहिरब सिखलहुँ। सब बेकार, सब बेकार। बूढ़ी – ( दौड़ि कें जाए प्रभा कें पँजिआए आँचर सँ नोर पोछैत ) नहि बाजह, एहन कथा नहि बाजह हमर बेटी ( मुह चूमैछथि)। बूढ़ा – (उठि कें प्रभा कें डेन धए घिचैत) बेटी, पहिने बाप कें गोड़ लागह, तखन माए कें। प्रभा – ( ठेहुनिआँ दए बूढ़ाक पाएर पर माथ दए) प्रणाम,बाबूजी। बूढ़ा – (दूनू डेन पकड़ि कें उठबैत) कल्याणवती भव, सौभाद्यवती भव। प्रभा – बाबूजी, आब ई पड़ि रहथु ( बाँहि पकड़ि कें खाट पर बैसाए ओहिना बूढ़ी कें प्रणाम करैत छथि। छन भरि बूढ़ीक मुह निहारि कें ) मा, तों सत्ते हमरा अपन बेटी बुझैछें ? बूढी – सत्ते नहि तँ फूसि। प्रभा – हमरा तखन विश्वास हैत जखन तों हमर हाथक छूअल खएबें। बूढ़ी – खोआ दे जे खोअएबाक होउ। प्रभा – (बैग सँ टिफिन बॉक्स निकालि ओहि सँ एक-एक चमचा लए सभक हाथ मे दैत छथि, वरुण कें भरि प्लेट ) खो दही-चूरा-आम भरि पेट। वरुण – (खाइत आ नाचि-नाचि गबैत अछि) गाम जेबै गाम जेबै गाम जबै ना                                 दही खेबै चूरा खेबै आम खेबै ना गाम जेबै गाम जबै गाम जेबै ना ( माए-बाप कें हाथ पकड़ि कें घिचैत) प्लीज ऐकम्पनी मी । आदित्य – नहि मानत.। बड़ जिद्दी अचि ई छओंड़ा। ( तीनू नचैत-गबैत छथि।) [ तान्त्रिक, जोतखी, वैद्य आ होमिओपैथक प्रवेश। नाच समाप्त कए तीनू यथास्थान बैसैत छथि।] तान्त्रिक – सुनल जे अपने अचेत भए गेल रही, तें हमरा तोकनि पहुँचि गेलहुँ। एतए तँ आनन्दे-आनन्द देखैछी। बूढ़ा – ठीके छन भरि अचेत भए गेल रही। डाक्टर साहेब कहलनि, अधिक आनन्द भेला पर एना होइछै। आब ठीक छी। आनन्द कोना नहि हो। एतेक दिन पर ई पुत्ररत्न अएताह अछि। आदित्य – नमस्कार। बूढ़ा – आ तनिका संग ई पुत्रवधूरत्न प्रभा – नमस्कार। बूढ़ा – आ तनिका कोर मे ई पौत्ररत्न। तान्त्रिक – एना अचेत होएब नीक नहि थिक। फेर नहि हो तकर उपाए हम कए दैछी। ( बूड़ाक माथ पर हाथ दए फुसुर-फुसर मन्त्र पढि ) बस. मा दुर्गाक प्रसादें फेर कहिओ नहि हैत। जोतखी – औजी, ग्रह विपरीत रहतै तँ अहाँक मा दुर्गा की करतीह ? ग्रहक महिमा आब बड़का-बड़का वैज्ञानिको सब मानैत छथि। मूर्छा थिक मनक रोग। मनक मालिक थिकाह चन्द्रमा। सतत चानीक औंठी पहिरने रहू, फेर कहिओ एना नहि हैत। होमिओपैथ – कनेक मुह बाओल जाए ( बूड़ा मुह बबैछथि, डाक्टर चारि-पाँच गोली खसा दैछथि।) आदित्य – अपने किछु बजलहुँ नहि? होमि. - हमर बोलीक काज हमर गोली करैत अछि। वैद्य – मन तँ आनन्द-आनन्द भए गेल मुदा बल ? बूढ़ा – बल एखनहु नहि आएल अछि। वैद्य – ( एक पुड़िआ दैत) हमर ई भीमपराक्रम रस बकरीक दूध मे घोरि तीन दिन खाए लेल जाए। अपने भीमहि कें पछाड़ि देबनि ओहिना जेना जबानी मे पछाड़ैत रहिऐन। आदित्य – अपने लोकनिक फीस ? वैद्य – राम-राम! हमरा लोकनि कारनीक ओतए कहिओ एक टुक सुपारिओ नहि लेल! तान्त्रिक – हँ, तैओ जँ सत्कार करबाक हो तँ मा दुर्गाक प्रसादक संग एक साँझ....। वैद्य – धुरजी! एना घिनाउ नहि। आब चलैत चलू एतए सँ। हिनका बेटा-पुतहु सँ गप करए दिऔन। ( सभ चिकित्सक जाइत छथि।) आदित्य – बाबूजी, सुनल तान्त्रिक महोदयक प्रस्ताव? बूढ़ा – वैद्यजी भनहि धुरजी कहि देथुन, हमरा तँ बड़ आनन्द भेल। आदित्य – से किएक? बूढ़ा – सुनह। हमरा आशंका छल जे समाज बारि ने दिअए। समय बहुत बदलि गेलै। परन्तु समस्या अछि जे सम्हरत कोना.? हम सब अथबल आ तों सब परदेसी। बूढ़ी – ब्राह्मन मुह खोलि कें भात मङलनि तँ कोना नहि देबनि? जेना हैत तेना हम सम्हारि लेब। प्रभा – गुड आइडिआ! सुनैछी मिथिला मे खूब भोज होइए आ ताहि मे खूब व्यंग्य-विनोद. हास-परिहास होइए। आदित्य – ठहाका पर ठहाका चलैए। जे सुनैत रही से देखिए लिअअ। ( बूढ़ीक प्रति) माए, तों कोनो चिन्ता नहि कर। देखैत रह, आइए साँझ खन भोजक सभ सामग्री हबा गाड़ी पर आबि जाएत। बूढ़ा – भोजक ओरिआओन पछाति, पहिने भोजनक ओरिआओन होअओ। आदित्य - आइ पाँचो गोटए एक संग भोजन करब। माए, तोरहु हमरा सभक संग खाए पड़तौ। बूढ़ी – ( विस्मय सँ दाढ़ी पर हाथ दए ) गे मैया ! एहनो कतहु भेलैये। प्रभा – ओना नहि मानबें त हम पकड़ि कें अपना संग बैसा लेबौ। बूढ़ा – ( बूढ़ीक प्रति ) अहाँ जाउ पूआ-पकमान छानए । बूढ़ी – बेटी, चल हमरा संग. तोरा अपन घर-आङन, बाड़ी-झाड़ी देखा दैछिऔ। आदित्य – ( विनोदक मुद्रा मे ) तोहर घर छुततौ नहि ? बूढ़ी – छूतत किएक? लछमीक पाएर पड़त तँ अन-धन सँ भरल-पूरल रहत। [ बूढ़ी, प्रभा आ वरुणक प्रस्थान ] बूढ़ा – तोंहू ओहि कोठली मे विश्राम करह गए। बाट-घाटक थाकल-ठेहिआएल छह। हमरहु आब विश्राम करक चाही। [ दूनूक प्रस्थान। ] चारिम दृश्य [ दूनू कात चारि-चारि कुरसी। बीच मे चौकी। एक कातक कुरसी पर तान्त्रिक आ जोतखी। शेष खाली।] तान्त्रिक – मा दुर्गे, मा दुर्गे। देखू तँ अशिष्टता ! अतिथि आबि गेलाह आ घरबैआ घरहि मे सुटकल छथि। वैद्य – औजी, ई भोज नहि थिकैक, ई थिकैक पार्टी। पार्टी मामूली लोक नहि दए सकैए। आदित्य बाबू सुट-बूट, स्नो-पाउडर लगओने ने एक सेकेंड पहिने, ने एक सेकेंड लेट ठीक घड़ीक सुइ पर उपस्थित भए जएताह। तान्त्रिक – आ भानस-भात तकरो कतहु धुआँ-धुकुर नहि देखैछिऐ। वैद्य – बड़ भूख लागल अछि? जमाइन फाँकि कें आएल छी की? धैर्य धरू। समय पर सभ सामग्री पहुँचि जएतै। [ डाक्टर आ होमिओपैथ अबैछथि आ दोसर कातक कुरसी पर बैसैछथि।] होमिओ. – देखू तँ तमासा, एतेक दिन बापक कोनो खोजे नहि। बाप-पुरुखाक बनाओल मकान ढहल-ढनमनाएल जा नहल छनि तकर सुधिए नहि, आ पहुँचि गेलाह पार्टी कए कें अपन बड़प्पन देखबए। डाक्टर – पहुँचलाह कोना आ किएक से लग आउ, कानमे कहैछी। हम फोन कएलिऐन जे बाप मरै पर छथि तखन अएलाह। ने बाप कें बेटा सँ मतलब, ने बेटा कें बाप सँ। उँच्चा चढि-चढि देखा घर-घर एके लेखा। बूढ भेला पर हमरो-अहाँक इएह दशा हैत। वैद्य – आ पार्टी किएक भए रहल छै से बुझलिऐ ? तान्त्रिक – हम मुह खोलि कें बजलहुँ तें। वैद्य – मा दुर्गा अहाँ कें जीह तँ बड़ सुन्दर देलनि, मुदा बुद्धि देबा मे कने कंजूसी कएलैन। एकरा पार्टी नहि, बूढ़ाक श्राद्ध बूझू। तान्त्रिक – धुरजी ! बापक जिबितहि कतहु श्राद्ध भेलैए? वैद्य – जीबी तँ की-की ने देखी। आब इहो चललैए। बाप कें सन्देह जे मुइला पर बेटा श्राद्ध करत कि नहि। बेटा सेहो सोचलथिन श्राद्ध करए फेर आबए नहि पड़त। तान्त्रिक – ( घड़ी देखि ) आब गप बन्द। पार्टीक समय भए गेल। जे घड़ी ने साहेब पहुँचलाह। [ आदित्य, प्रभा, बूढ़ा, बूढ़ी आ तनिक कोर मे वरुणक प्रवेश। आदित्य ठाढ़ रहैत छथि, आओर सभ सोफा पर बैसैत छथि।] आदित्य – हम अपना दिस सँ आ पूज्य पिताजीक दिस सँ अपने लोकनिक अभिवादन आ स्वागत करैत छी। अपने लोकनि हमर पूज्य पिताजीक प्राणरक्षा कएल तदर्थ हम अपने सभक सदा आभारी रहब। हमरा ई जानि कें बड़ प्रसन्नता भेल जे चिकित्सा मे अपने लोकनिक प्रवीणता आ सेवापरायणताक प्रसादें हमर ई गाम आदर्श स्वस्थ ग्राम घोषित भेल। आइ हमरा अपने लोकनिक श्रीमुख सँ ई सुनबाक लालसा भए रहल अछि जे कोना-कोना अपने लोकनि हमर गाम कें ई सौभाग्य प्राप्त कराओल आओर कोना-कोना हमर पिता कें रोगमुक्त करैत गेलहुँ। धन्यवाद। ( प्रभाक लग बैसैछथि।) तान्त्रिक – ( ठाढ़ भए ) ओं नमो दुर्गायै। आदरणीय जनार्दन बाबू, आ आदित्य बाबू, एहि गाम कें ई सौभाग्य आन ककरो कएने नहि, मा दुर्गाक कृपा सँ प्राप्त भेलैक। हम घर-घर, गाम-गाम चन्दा माङि-माङि.... वैद्य – ( बीचहि मे ) अपन मकान बनओलहुँ। तान्त्रिक – ( तमसाए कें ) चुप ! पहिने हमरा बाजए दिअअ, पछाति जतेक बकबाक हो बकब। की कहैत रही ? हँ, मन पड़ल, चन्दा कए-कए ग्रामवासीक कल्याणक संकल्प कए तीन बेर सहस्रचण्डी महायज्ञ कएल। तहिआ सँ एहि गाम मे हमर चण्डीपाठे सभ रोगक रामबाण भए गेल। तैओ केओ-केओ आतुरतावश चण्डीपाठक संग-संग डाक्टर-बैदक औखधो भकसि लैत अछि, भनहि ओहि मे जहर-माहुर रहओ। डाक्टर – (ठाढ भए) की बजलहुँ, की बजलहुँ ? वैद्य – मुह सम्हारि कें बाजू  ! डाक्टर – कृपया सुनल जाए एहि दूनू धन्वन्तरिक एक प्रसिद्ध कथा। एक दिन ई तान्त्रिकजी आ बैदजी अपना मे की गप करैत रहथि से सुनल जाए। तान्त्रिकजी पुछलथिन बैदजी सँ, अओ, ने अहाँ चण्डीपाठ कएलहुँ. आ ने हम ककरहु कोनो दबाइ देलिऐक; तखन चिता किएक जरैत अछि ? वैद्य – चुप रहू। अहींक, अहींक इंजेक्शन तँ ओकर जान लेलकै। तान्त्रिक – एहन मुह रहत तँ बाट-घाठ मे मारि खाएब। होमिओ. – गरहत्ता दए गाम सँ बैलाउ एहि डाकू डकडरबा कें। डाक्टर – माफ कएल जाए। हम स्वयं पड़ा  जाए चाहैछी । अपने सभ शतमारी वैद्य आ सहस्रमारी वैद्यराज थिकहुँ। भुजैत आ भजबैत रहू एहि स्वस्थ ग्राम कें। तान्त्रिक – जनार्दन बाबू, कान खोलि कें सुनि लिअअ। गरहत्था दए कें एतए सँ निकालू किडनीक सौदागर एहि डकदरबा कें। नहि तँ खाउ अपम पार्टी अपनहि। चलैत चलू सभ केओ एतए सँ। प्रभा – हाए रे हमर कपार ! की करैत की भए गेल। जलदी पड़ाउ एहन गाम सँ। हमरा बड़ डर होइए। आदित्य – अहाँ घबराउ नहि। कने काल धैर्य धरू। प्रभा – माइ गॉड ! ( ठाढ़ि भए लग जाए कान मे ) एहि भयंकर आगि कें अहाँक चुरू भरि पानि किन्नहु मिझाए नहि सकत। जलदी पड़ाउ। आदित्य – कोनो डर नहि। छन भरि धैर्य धए देखू तमाशा। हम जनैछी, एहन सिचुएशन कें कोना कन्ट्रोल कएल जाइत अछि। प्रभा – बेस, लड़ैत रहू अहाँ एहि सिचुएशन सँ। हम आँखि मूनि लैछी। ( आबि कें बैसैछथि।) आदित्य – आदरणीय अतिथि गण, कृपया हमर दू शब्द सुनि लेल जाए, तखन जनिका जे करबाक हो से करैत जाएब। अपने लोकनिक एहि अनुपम प्रतिस्पर्धा कें देखि कें हमरा अपार आनन्द भेल। किएक तँ एकर मूल लक्ष्य रहल गामक लोक कें स्वस्थ राखब। तें हम सभ अतिथिक हृदय सँ प्रशंसा करैत छी। अपने सभ एक सँ एक आगाँ बढ़ि कें हमर पूज्य पिताक प्राणरक्षा कएल ताहि हेतु  हम अपने सभक प्रति आजीवन कृतज्ञ रहब। अपने सभक पाएर पकड़ि प्रार्थना करैत छी जे जेना हमर पिताक प्राण बचाओल तहिना हमर प्रतिष्ठा बचाओल जाए। वैद्य – बाह ! अपने बड़ कौशल सँ एहि विषम परिस्थिति कें सम्हारि लेल। तान्त्रिक – वैद्य जी भनहि सन्तुष्ट भए जाथु, हमर समाधान नहि भेल। हम अपनेक पूज्य पिताजीक मुह सँ ई सुनए चाहैछी जे ओ ककर  चिकित्सा सँ स्वस्थ भेलाह। [ किछु काल सभ बूढ़ाक मुह तकैत अछि। ] बूढ़ा – ( किछु काल सोचि कें ) हमरा पुछैछी तँ हम एतबे कहब जे हम ककरो चिकित्सा सँ नहि, बेटा सपरिवार आबि गेलाह तकर ततेक, ततेक आनन्द भेल जे सभ रोग-बलाए बिलाए गेल। [ सभ चकित भए एक दोसराक मुह तकैत छथि। ] डाक्टर – आब मुह की तकैछी। भेटि गेल उचित बिदाइ। चलैत चलू अपन-अपन घर। खाथु आदित्य बाबू अपन बापक श्राद्धक पिण्ड अपनहि। आदित्य – ( घबराए कें दूनू हाथ जोड़ि ) हम सभक पाएर धरैछी। एहन कठोर दंड देबा सँ पहिने एहि अपराधीक मुह सँ दू शब्द सुनि लेल जाए। बूढ़ा – ( आयासपूर्वक ठाढ़ भए कें ) एक बूढ़ आ ताहि पर चिर रोगी। हमरा होस नहि रहल जे की बाजी की नहि। माफ.....मा..(बोल लटपटाइत छनि आ खसैत जकाँ बैसि जाइत छथि।) आदित्य – पिताजीक एहन स्थिति कें देखैत कृपया अपने लोकनि छन भरि बैसि गेल जाए। ( सभ बैसैत छथि। ) सुनल जाए जे पिताजीक मुह सँ एहन कथा किएक बहरएलनि। ( प्रभा सँ ) कने पानि। (दू घोंट पानि पीबि कें ) सुनल जाए। हम आजुक दुनिआँक चकाचौन्ह मे पड़ि कें आ ( प्रभा दिस संकेत कए ) हिनक मायाजाल मे फँसि कें.... प्रभा – आ हमरा अपन मायाजाल फँसा कें। आदित्य – चुप रहू। एखन मजाक नहि। हमरा कनेको होस नहि रहल जे पिताक हृदय आ माताक ममता केहन होइछै। हम माए-बाप कें सालक साल कलपबैत-कनबैत रहलहुँ। धन्यवाद डाक्टर साहेब कें जे हमर ओ मोह निद्रा तोड़लनि। धन्यवाद एहि ( प्रभा दिस संकेत) ममतामयी नारीरत्न  कें जे हमरा मानू कान पकड़ि कें एतए घीचि अनलनि। बहुत-बहुत वर्ष पर एक संग बेटा, पुतोहु आ पोताक मुह देखितहि आनन्दक लहरी मे सभ रोगव्याधि दहा गेलनि । तहिं ओहन कथी मुह सँ बहराए गेलनि। एहि सभ दुखद घटनाक अपराधी हम छी। क्षमा करू अपने तोकनि। क्षमा करू बाबूजी। क्षमा कर माए। ( माए-बापक पाएर पकड़ि कें कनैत छथि। माए आँचर सँ नोर पोछैत छथिन। ) बूढ़ा – ( डेन धए उठबैत ) बाउ, ई अहाँक दोख नहि। ई एहि घोर कलिकालक दोख थिक। उठू आ सभ कें आदरपूर्वक भोजन करबिऔन गए। तान्त्रिक – आब वितम्ब किएक ? मा दुर्गाक प्रसादें बीझो होअओ। ( आगाँ आदित्य आ प्रभा, तनिक पाछाँ सभ चिकित्सक जाइत छथि.। ) बूढ़ी – बाउ, आँखि खोलह। आब भोज हेतै। चलह देखैले। वरुण – ( झट उठि कें हर्ष सँ हँसैत नचैत ) भोज हेतै  भोज हेतै  भोज हेतै ना भोज खेबै  भोज खेबै  भोज खेबै ना गाम जेबै  गाम जेबै  गाम जेबै ना भोज खेबै  भोज खेबै  भोज खेबै ना भोज खेबै  भोज खेबै  भोज खेबै ना [ बूढ़ी आ वरुणक प्रस्थान।  ] बूढ़ा – ( शून्य दृष्टि सँ चारू दिस ताकि ) चारू दिस सुन। सभ चल गेल, सभ। एहि सुन मे कतेक काल, कतेक काल एना बैसल रहब ? कतेक काल ? हमरहु आब जएबाक चाही।  कोम्हर ? कतए ? नेपथ्य सँ – जतए सँ फेर केओ घुरैत नहि अछि। यद् गत्वा न निवर्तते। यद् गत्वा  न निवर्तते - रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। मुन्नी कामत एकांकी -हत्यारा समाज प्रथम-दृश्य सूर्यकला-     काकी...... हयइ लवकी काकी, कतऽ छेतहिन? लवकी काकी-  की कहै छिऐ कनियाँ! अतऽ पुबरिया घरमे छी आउ। सूर्यकला-     काकी, रमकलिया मै कऽ सुनै छिऐ फेर किछु छै, आइ भोरका गरी सँ रमकलिया बाबू लऽ कऽ गेलैए अल्ट्रासाउण्ड करबै लऽ दरभंगा। लवकी काकी- धैउररर उंउंउंउं पापी नरकी कऽ की बात करै छी... छौरा तँ जान सँ मारि देतै मौगीकेँ। देखियौ, देहमे कोनो जान छै जेे फेर गेलै खुुुुनमा-खून होइ लऽ। सूर्यकला-     की करतै काकी बेटी जनमा कऽ जे मै-बाप सब दिन मरतै, से बलू एक्के बेर मरि जा, वएह ठीक ने। आब तँ ई पाप घरही होइ छै। अकरा कोनो पाप नै समझदारी कहल जाइ छै। देखतुुहुन, अतेक दिन छेलै जे बेटीकेँ नै पढ़बै छी तैं उ बोझ अछि। आब तँ पढ़बैयोमे खर्चा आ बियाहोमे खर्चा होइत अछि। केना कऽ हम गरीब बेटी जनमैब। बेटा जनमा कऽ चौराहा पर राखि देब तँ दू साँझ हमर चुल्हा जरत, मगर बेटी तँ हर पग-पग पर कलंक बोटरने घर आनत। ओकर उजर चुनरीमे कारिख लगैत देर नै हएत। आब कहू काकी ओइ शर्मसँ मरी आकि अहिना मरी। लवकी काकी-  तोेहर बात सही छऽ कनियाँ पर अही सोचकेँ तँ बदलै कऽ छै। जे लोग निअम बनेने छै आ कहै छै बेटा बैटी एक समान, वएह बेटीक इज्जतक दुश्मन बनि जाइ छै। घोर कलयुग छै। सभ मजबूर छै।                  पटाक्षेप। दोसर-दृश्य रामेश्वर- रमकाली माय, की करबै, डॉक्टर साहेब कहै छै जे फेर बेटी  अइ। महग युगमे चारि टा बेटी पहिले सँ अछि। बेटाक खातिर छः बेर अहाँकेँ सफैया करा चुकलौं, आब तँ अहाँक शरीर देख डॉक्टर सफैया करैसँ सेहो मना करैत अछि। कहै छै जे अहाँक देहमे खूूून नै यऽ। चलू गाम चलू, ओतऽ निचेेेेनसँ विचारि कऽ कोनोे काज करब। कमला- हयौ रमकाली बाबू, हम अहाँसँ सभ बेर निहौरा करै छी कि अहाँ हमरासँ एतेक बड़का पाप नै कराउ। अकर बध हम दूनू परानिये टा कऽ नै पुरे परिवारकेँ लागत। आइ बेटी बेटासँ कम छै जे अहाँ बेटा लऽ आनहर भेल छी आ हमर जानक दुश्मन बनि रहल छी। रामेश्वर- अपन मुॅंह तूँ बंदे राख। नै तँ अतैसँ लतियाबैत गाम लऽ जेबौ। जेना अतेक साल तक मुँह सिने छँ तहिना आगुओ सिने रह। तूँ मर या जी, हमरा तकर परवाह नै अछि। जाबऽ तक तोरा देहमे जान छउ ताबऽ तक जेना जेना कहबौ करैत रह। कमला- तँ लऽ लिअ ने हमर जान, मुक्ति मिल जैत हमरा। अहाँक मारि-गारि सँ आ अइ पाप करैसँ............. रामेश्वर- की कहली पाप..... पाप नै करिऐ तँ की करिऐ। साले-साल बेटी जनमाबैत रहिऐ। जब हम घरसँ निकलैत छी तँ लरेग हमरा देख मुँह फेर लइए। भोरे-भोर कोइ हमरा देखै यऽ तँ कहै यऽ कि अही निपु़तराहाक दरसन करि हमर अजुका दिन खराब भऽ गेल। तूँ की बुजबिही कि अइ बदनामीकेँ लऽ कऽ हम केना तिल-तिल मरि रहल छी। चल घर चल, हम सफैया करैबला दवाइ लऽ कऽ अबै छी। पटाक्षेप। तेसर-दृश्य (कमला गाड़ीसँ उतड़ि किछु दूर चलैत बेहोश भऽ गिर पड़ैत अछि।) रामेश्वर- रमकाली माय..... रमकाली माय..... की भेल? कोइ कनी पानि दिअ। (एक व्यक्ति एक गिलास पाइन रामेश्वरकेँ पकड़ाबैत छथि। रामेश्वर पाइन कमलाक मुँह पर छिटैत अछि। कमला भक सँ आँखि खोलैत अछि।) कमला- कनी पियै लऽ पाइन दिअ। (रामेश्वर पाइनक गिलास कमलाकेँ दै छथि।) रामेश्वर- रमकाली माय, की भेल? ठीक छिऐ ने, टाइर गाड़ी मंगाबी घर पर सँ आकि रसे-रसे जएल भऽ जएत। कमला- हम ठीक छी। उ गाड़ीमे छेलिऐ ने, तइ सँ मन घूर गेल। अहाँ चलू, हम धीरे-धीरे अबै छी। (कमला मने-मन भगवानक स्मरण करैत कहैत छथि- हे भगवान, हमरा देहमे ई की भऽ रहल अछि जेना लगैए पुरा देह कोइ गोधना गोधै यऽ। कखनो कऽ तँ जेना पताए लगै छी। भगवान अगर हम मरि जाइऐ तँ हमर बाल-बच्चाक रक्षा करिहक।) पटाक्षेप। चौथा-दृश्य रामेेश्वर- कतऽ गेलिऐ..... लिअ, ई गोली खा लिअ। कमला- हमर बात मानू आ अइ बच्चाकेँ नै गिराउ। चारिम महिना चलि रहल छै। आबऽ दियौ जे आबैए, अपने भागे एतै। हमरा भागमे बेटा नै लिखल छै तैँ तँ नै होइ छै। हम ई दवाइ नै खएब। रामेश्वर- (एक थप्पर कमलाक गालपर दैत कहैत अछि) से किए एहन करम छउ तोहर जे तोरा कोइखमे बेटा पनपबे नै करै छउ। कोन गै घरमे आगि लगेने छेलही से एहन वंशहीन कोइख दऽ कऽ भगवान पठेलकौ। कुलक्छिनी.... कलंकनी, कहाँ कऽ हमरे कपारमे सटल छेल। चुपचाप ई दवाइ खा ले नै तँ जबरदस्तीयो खुऐल होइ छै हमरा, बुझलिही कि नै। कमला- ठीक छै, अहाँक मर्जीक खिलाफ आइ तक एको गो काज नै केलौं आ आइयो नै करब, अहाँ जे चाहै छी हम वएह करब। हम दवाइ खाइ छी, आगू राम राखए। (कमला दवाइ खाइ यऽ आ रामेश्वर पएर झमाड़ैत ओतऽ सँ चलि जाइ यऽ।) पटाक्षेप। अंतिम-दृश्य (गामक सरकारी अस्पतालमे अधमरा अवस्थामे कमला खुन सँ लतपत पड़ल अछि।) नर्स-   डॉक्टर साहेब, की करिऐ? कारनी कऽ हालत बहुत सिरियस भेल जाइ यऽ। खून बन्दे नै भऽ रहल अछि। देहक आधासँ बेसी खून निकलि गैलै, की करबै? डॉक्टर- हम अहाँ की करि सकै छिऐ। हम तँ बस प्रयास करबै जे कि राइतेसँ कऽ रहल छिऐ। इंसान जे जेना करै छै, तहिना पबै छै। (10 सालक रमकाली कनैत डॉक्टर लग अबै अछि। डॉक्टर साहेब देखियौ ने, माय कऽ की भेलैए। साँसो नै लै छै।) (डॉक्टर साहेब दौड़ कऽ कमला लग जाइ छथि जतऽ रामेश्वर कमलाक माथा अपना कोरामे लऽ कऽ विलाप करै छथि।) डॉक्टर- चुप रहू, अतऽ एना कननाइ बंद करू, सबहक जड़ि अहाँ छी। आब अइ लोरसँ हमदर्दी देखबै छी। (डॉक्टर कमलाक नारी देखैए आ आलासँ सेहो जाँच करैए।) रामेश्वर- की भेलै डॉक्टर साहेब, किए ई एना लारू-बातू भऽ गेलैए। डॉक्टर- अकरा मुक्ति मिल गेलैए। अहाँक अत्याचारसँ। आब ई अइ पापक नगरीकेँ छोड़ि चलि देलखिन। लऽ जाउ अकरा आ पुछबै कि अहाँक बेटा देने बिना ई किए दुनियाँ छोड़ि देलक। अहाँक मर्जी बिना किए आँखि बंद कऽ लेलक। जाउ आ पुछियौ। अकरा देहसँ निकलल अइ खुनक रेतसँ। अहाँ हत्यारा छी। बेटाक लालचमे घरवालीकेँ मारि देलौं। अहाँकेँ तँ मौतो नसीब नै हएत। रामेश्वर- हँ डॉक्टर, हम कातिल छी। अपन खुशीकेँ...अपन जीवन संगनीकेँ...अइ बच्चा सबहक ममताकेँ। डॉक्टर- आखिर कहिया तक अहाँ सब अनहार घरमे बैठल रहब। अइ अनहार घरसँ निकलू, देखियौ बाहर कतेक प्रकाश छै। हमरो बेटा नै छै, दू टा बेटी छै जे हमरा लऽ बेटा समान छै। फेर अहाँ किए बेटा खातिर अतेक भुखौइल छी। रामेश्वर- डॉक्टर साहेब, ई समाजक लोग हमरा निपुत्र कहि-कहि कऽ हमर जिनैइ दुर्लभ करि देलक आ बेटा पाबै कऽ  भूख अओर बढ़ा देलक। हम नै बुझलौं जे अकर अंत ई हएत। डॉक्टर- बेटा आ बेटी कोनो स्त्रीक भाग पर नै बल्कि पुरूष पर निर्भर करै छै। अइमे स्त्रीकेँ कोनो दोष नै छै। आइ देखियौ, एहन कोनो क्षेत्र नै छै जतऽ बेटी बेटाक बराबरीमे खरा नै छै, फेर ई भेद भाव किए? बेटी होय या बेटा, आखिर दुनू तँ अहींक अंश अहींक संतान छी। रामेश्वर- डॉक्टर साहेब, हमर तँ दुनियाँ उजड़ि गेल मुदा हम अन्हार सँ आब इजोतमे आबि गेलौं। हम अपन चारू बेटीकेँ खूब पढ़ैब-लिखैब आ बेटा सँ उच्च दर्जा देब। आब यएह हमर चौस कंधा छी। पटाक्षेप। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। गजेन्द्र ठाकुर नाटक- गंगा ब्रिज कल्लोल एक दृश्य १ स्टेजक एक कात किछु मजदूर सभ खट-खुट कऽ गिट्टी पजेबा तोड़ि रहल छथि लगैए जे गंगापुलक मरोम्मति भऽ रहल अछि, कारण किछु मजदूर जय माँ गंगे कहि मंचक नीचाँ प्रणाम सेहो कऽ रहल छथि। स्टेजक दोसर कात दूटा लोक नीचाँ राखल नगाड़ा-ढोलपर चोट दऽ रहल अछि। तखने एकटा ढोलहो देनहारक प्रवेश। ढोलहो देनहार : गंगा ब्रिज। पवित्र गंगापर बनल ऐ पुलक मरोम्मति लेल मजदूर चाही। स्त्री-पुरुष, बाल-वृद्ध सभ कियो आवेदन दऽ सकै छथि। (ढोलहो दैत) सुनै जाउ, सुनै जाउ।… गंगा ब्रिज। पवित्र गंगापर बनल ऐ पुलक मरोम्मति लेल मजदूर चाही। स्त्री-पुरुष, बाल-वृद्ध सभ कियो आवेदन दऽ सकै छथि। एकटा लोक (डंका बजेनाइ छोड़ि मजदूर सभकेँ अकानैत ढोलहो देनहार लग अबैए , मुदा दोसर लोक आस्ते आस्ते डंका बजबिते रहैत अछि): देखै छिऐ जे काज तँ चलिये रहल छै, तखन फेर? ढोलहो देनहार: एतबे मजदूरसँ काज नै चलतै। पूरा पुल हिल रहल छै। (ढोलहो दैत) सुनै जाउ, सुनै जाउ।… गंगा ब्रिज। पवित्र गंगापर बनल ऐ पुलक मरोम्मति लेल मजदूर चाही। स्त्री-पुरुष, बाल-वृद्ध सभ कियो आवेदन दऽ सकै छथि। दोसर लोक (डंका बजेनाइ छोड़ि कऽ ढोलहो देनहार लग अबैए): एतबे दिनमे कोना ई हाल भऽ गेलै। सुनै छिऐ जतेक पाया ऐ पुलमे छै ततेक कए करोड़ टाका एकरा बनबैमे खर्च भेल रहै। ढोलहो देनहार:काज ढंगसँ नै भेल रहै। सुनै जाउ, सुनै जाउ...। गंगापर बनल ऐ पुलक मरोम्मति लेल मजदूर चाही। स्त्री-पुरुष, बाल-वृद्ध सभ कियो आवेदन दऽ सकै छथि। सुनै जाउ, सुनै जाउ। एकटा लोक: देखै छिऐ, जहिया बनिये रहल छलै, बनि कऽ तैयारो नै भेल रहै, तहियेसँ ऐ पुलक मरोम्मति शुरू छै। दोसर लोक: चिप्पीपर चिप्पी पड़ि रहल छै। उद्घाटनसँ पहिनहिये सँ चिप्पी पड़नाइ शुरू भऽ गेल रहै। ढोलहो देनहार: सरकारी पुल छिऐ, चिप्पी नै पड़तै तँ इन्जीनियर आ ठिकेदारक घरपर छज्जा कोना एतै। सुनै जाउ, सुनै जाउ...। एकटा लोक: हौ ढोलहोबला, से तँ बुझलिऐ, मुदा से ने कहऽ जे दुनियाँ मे आनो ठाम पुल बनै छै, से ओतुक्का इन्जीनियर आ ठिकेदारक घरपर छज्जा पड़ै छै आकि नै हौ। ढोलहो देनहार: किजा ने गेलिऐ, मुदा सुनै छिऐ अंग्रेजबला पुल मजगूत होइ छलै। सुनै जाउ, सुनै जाउ...। दोसर लोक: हौ, अनेरक पाइ आबै छलै लूटिक तँ जे एकाध टा पुल अंग्रेज बनेलकै से मजगूते ने हेतै हौ। एकटा लोक:ई इन्जीनियर आ ठिकेदार सभ लूटिमे अंग्रेजसँ कम नै छै, मुदा पुल मजगूत किए नै बनबै छै हौ। ओइ बनबैमे अंग्रेज सन किए नै छै हौ। दोसर लोक: मजगूत बना देतै तँ फेर मरोम्मतिक ठेका कोना भेटतै हौ। की हौ ढोलहोबला.. ढोलहो देनहार: किजा ने गेलिऐ। सुनै जाउ, सुनै जाउ...। गंगापर बनल ऐ पुलक मरोम्मति लेल मजदूर चाही। स्त्री-पुरुष, बाल-वृद्ध सभ कियो आवेदन दऽ सकै छथि। सुनै जाउ, सुनै जाउ। (ढोलहो बला चलि जाइए। पाछाँसँ दू-दूटा तिरंगा झण्डा लेने बच्चा सभ अबैए। संगमे दूटा शिक्षक छै। एकटा शिक्षक (वा शिक्षिका) आगाँ-आगाँ आ एकटा शिक्षक (वा शिक्षिका) पाछाँ-पाछाँ चलि रहल छथि। सभ मजदूरकेँ एक-एकटा झण्डा दऽ देल जाइ छै। “ओइ दुनू टा लोककेँ सेहो एक-एकटा झण्डा देल जाए”- ई गप शिक्षक इशारामे कहै छथि, मुदा झण्डा घटि गेलै, से ओ दुनू खाली हाथ रहि जाइ छथि आ सभक मुँह ताकऽ लगै छथि। मजदूरक सोझाँ ओ दुनू लोक ठाढ़ भऽ जाइए आ फेर डंके लग आबि ठाढ़ भऽ जाइए आ आश्चर्यसँ देखऽ लगैए। त्रिवार्णिक झण्डा लऽ कऽ बाकी सभ गोटे मंचपर छितरा जाइ छथि आ स्टेजपर ठाढ़ भऽ जाइ छथि। उल्लासक वातावरण सगरे पसरल अछि, दुनू लोककेँ छोड़ि सभक मुँहपर (मजदूर सभक सेहो) हँसी-प्रसन्नता आबि जाइ छै। जखन सभ ठाढ़ भऽ जाइ छथि तखन दुनू शिक्षक (वा शिक्षिका) बच्चा सभक आगाँ आ दर्शक सभक सोझाँ ठाढ़ भऽ जाइ छथि। “१५ अगस्त” ई नारा दुनू शिक्षक बाजै छथि आ “स्वतंत्रता दिवस” ई सभ मिलि कऽ (दुनू लोक केँ छोड़ि कऽ) बाजै छथि। शिक्षक (वा शिक्षिका) १: बौआ-बुच्ची। आइ ई त्रिवार्णिक झण्डा हमरा सभक हाथमे फहरा रहल अछि। पहिने हम सभ दोसराक अधीन छलौं, पराधीन छलौं, ई झण्डा झुकल छल, फहरा नै सकै छलौं। झण्डा फहराइत रहए ओइ लेल हमरा सभकेँ जोर लगाबैत रहऽ पड़त। (चारू दिस हाथ पसारैत) ऐ इलाकामे आब खुशी पसरत। जमीन्दारक राज खतम भऽ गेल। सभ कियो पढ़ि सकै छथि। झगड़ा-झाँटी, युद्ध, आब सभ खतम भऽ गेल। हमरा सभक जीवनमे एकटा नवका भोर आएल अछि। नवका शिक्षा, नवका खेतीक चलनि हएत। शिक्षक (वा शिक्षिका) २: बड़का चिमनीक धुँआ आ बड़का-बड़का बान्ह। बिलैंतसँ आबैबला सभ समान चिमनीबला फैक्ट्रीमे तैयार हएत। बड़का-बड़का बान्ह ओइ धारकेँ बान्हि-छेक कऽ सञ्जत कऽ देत। खूब उपजत खेत, बर्खा बरखत इन्द्रक नै हमरा सभक प्रतापसँ। खेते-खेत बहत धार, हएत पटौनी। छोट-पैघक भेद मेटा जाएत। शिक्षक (वा शिक्षिका) १: छोट-पैघक भेद मेटा जाएत? बड़का चिमनीक धुँआ आ बड़का-बड़का बान्ह छोट-पैघक भेद मेटाएत? शिक्षक (वा शिक्षिका) २: हँ। पटौनी हएत खेते-खेत। बिलैंतसँ आबैबला सभ समान आब एतै चिमनीबला फैक्ट्रीमे तैयार हएत। शिक्षक (वा शिक्षिका) १: बड़का बान्ह आ बड़का फैक्ट्रीसँ ढेर रास समस्या सेहो आबै छै। ओकर निदान जरूरी छै। विकास एकभग्गो भऽ जाएत। शिक्षक (वा शिक्षिका) २: विकास एकभग्गू कोना हएत? शिक्षक (वा शिक्षिका) १: बड़का फैक्ट्री सभ ठाम नै लागि सकत, कतौ-कतौ लागत, ओतऽ बोनिहारक पड़ैन हएत। बड़का बान्ह बनलासँ ओकर भीतरक गामसँ सेहो लोकक पड़ैन हएत। बड़का बान्ह जँ मजगूत नै हएत तँ ओ टूटत आ प्रलय आएत। बड़का फैक्ट्री आ बड़का बान्ह लोकक जिनगीकेँ छहोछित कऽ देत। शिक्षक (वा शिक्षिका) २:एक पीढ़ीकेँ तँ बलिदान देबैए पड़त। बच्चा सभ, बाजै जाउ। अहाँ सभ देश लेल अपनाकेँ समर्पण करब आकि नै। शिक्षक (वा शिक्षिका) १: बच्चा सभ, बाजै जाउ, अहाँ सभ की बनऽ चाहै छी। समाजकेँ की देबऽ चाहै छी। बच्चा १: हम इन्जीनियर बनब आ सड़क, पुल, नहर बनाएब। जइसँ लोकक दुःख दूर हेतै। बच्चा २: हमहूँ इन्जीनियर बनब। बड़का-बड़का बान्ह, बड़का-बड़का चिमनीक धुँआ। धुँआ सुंघैमे हमरा बड्ड नीक लागैए। कतेक नीक दिन आएत, बड़का-बड़का बान्ह, बड़का-बड़का चिमनी देश भरिमे पसरि जाएत। बच्चा १: मुदा धुँआसँ खोँखी होइ छै। हमर माए खोँखी करैत रहैए। हमरा धुँआसँ परहेज अछि। बच्चा २:मुदा हमर माए तँ भनसाघर जाइतो नै अछि। मुदा हम जाइ छी, चोरा-नुका कऽ, आ धुँआक गंध, बड़का देवार, ई सभ हमरा बड्ड नीक लगैए। शिक्षिका २: नीकगप। मुदा विकास केहन हुअए, ई सभ हमरा सभक हाथमे नै अछि। पटना आ दिल्लीमे ई निर्णय हएत जे हमरा सभ लेल केहन विकास हेबाक चाही। शिक्षिका १: नीकगप, नीक गप जे हमरा सभक विकास लेल पटना आ दिल्लीमे सोचल जा रहल अछि। मुदा ओतऽ बैसि कऽ वा एकाध दिनक हलतलबीमे कएल दौड़ासँ ओ सभ उचित निर्णय लऽ सकता? जे से, मुदा हम सभ समाज लेल काज करी, से सतत ध्यान रहए। पूरा इमानदारीसँ, जान जी लगा कऽ ऐ देशक इतिहास हमरा सभकेँ बनेबाक अछि, से ध्यान रहए। आइ १५ अगस्त १९४७ केँ हम ई प्रण ली, वचन दी। सभ बच्चा: हम सभ वचन दै छी, हम सभ पूरा इमानदारीसँ जान जी लगा कऽ ऐ देशक नव इतिहास लिखब। (“१५ अगस्त” ई नारा दुनू शिक्षक बाजै छथि आ “स्वतंत्रता दिवस” ई सभ मिलि कऽ (दुनू लोक केँ छोड़ि कऽ) बाजै छथि। बच्चा आ शिक्षक सभ मजदूर सभसँ झण्डा आपस लऽ लै छथि। मजदूर सभ फेर बैसि कऽ ठक-ठुक करऽ लगैए। दुनू लोक ओतै हतप्रभ ठाढ़ रहैए। फेर पर्दाक पाछाँ कोनमे देखऽ लगैए जेना ककरो एबाक प्रतीक्षा कऽ रहल हुअए। तखने दुनू हरबड़ा कऽ जाइए आ एकटा कुर्सी आनि कऽ राखैए। एकटा ४०-४५ बर्खक अभियन्ता मंचपर अबैए। अभियन्ता कनेक हाँफि रहल अछि, कुर्सी देखिते ओ धबसँ ओइ कुर्सीपर बैसि जाइए। फेर साँस स्थिर कऽ ठाढ़ होइए। ठक-ठुक बन्द भऽ जाइ छै आ मजदूर सभ फ्रीज भऽ जाइए, ओ दुनू लोक कोन दिस दंका लग चलि जाइए आ फ्रीज भऽ जाइए। अभियन्ता बाजऽ लगैए।) अभियन्ता: (कुर्सीकेँ झमाड़ैत) एना। एना हिलि रहल अछि ई, ई गंगा ब्रिज। सीमेन्ट, बालु, गिट्टीक कंक्रीटसँ बनल ई पुल कठपुलासँ बेशी हिलैए। जहिया आबै छी, मरोम्मतियेक काज चलैत रहै छै। वन-वे, एक दिस; एक्के दिसुका मात्र भऽ कऽ रहि गेल अछि ई। एक्के दिस पुल खुजल छै, दोसर दिस कोना चलत, अदहा पुलपर मरोम्मतिक काज भऽ रहल अछि। (तखने ओ आभासी रूपमे हिलऽ लगैए आ ओकर बाजब थरथरा उठै छै।) ई पुल तँ एत्ते हिलि रहल अछि जत्ते गामक कठपुलो नै हिलैए। (तखने एकटा ठिकेदार अबैए।) ठिकेदार (अभियन्तासँ): हइ इन्जीनियर। तोहूँ वएह कऽ वएह रहि गेलेँ। बालुकेँ एना कऽ चालनिसँ चालू, ओना कऽ चालू, जेना ओ चाउर दालि हुअए मुदा हम सेहो चाललौं। ठीक छै ठीक छै। तूँ कहै छलेँ जे रोटी बनेबा लेल जेना चालै छी तहिना पुल बनेबा लेल चालू, तखने नीक रोटी सन नीक पुल बनत। ठीक छै ठीक छै। फेर एतेक सीमेन्ट, एतेक बालु, एतेक.. हम कहने रही जे हम तोहर सभ गप मानब, मुदा तखन नेता, दोसर इन्जीनियर, गुण्डा, एकरा सभकेँ कमीशन कतऽ सँ देबै? तोरा कहलासँ बालु चालऽ लगलौं आ कमीशन बन्द कऽ देलिऐ। हमर तँ किछु नै भेल मुदा तोहर बदली भऽ गेलौ, तोहर दरमाहा बन्न भऽ गेलौ। बच्चा सभक नाम स्कूलसँ कटाबऽ पड़लौ, गाम पठाबऽ पड़लौ बच्चा सभकेँ। हम कहने रहियौ तोरा, जे बालु चालब, एतेक सीमेन्ट, एतेक बालु, सभ निअमसँ देबै। हमरा की? इलाकाक पुल, सड़क… जतेक मजगूत रहतै ततेक ने नीक। हमरो लेल नीके। मुदा हमरा बूझल छल जे तोहर बदली भऽ जेतौ। चीफ इन्जीनियर, नेताक दहिना हाथ.. पहिने हमरे कहने रहए तोरा रोलरक नीचाँमे पिचड़ा कऽ दैले.. बइमान चीफ इन्जीनियर। देख, पहिने हमरो होइ छल जे तोहूँ ओकरे सभ जेकाँ छेँ, अपन रेट बढ़ाबैले ई सभ कऽ रहल छेँ। मुदा बादमे हम देखलौं जे नै, तूँ अलग छेँ। मुदा हम की करू? हम अपन बच्चाक नाम स्कूलसँ नै कटबा सकै छी। मुदा जौँ तोरा सन चीफ इन्जीनियर आबि जाए.... कहियो से दिन आबए... तखन हम फेरसँ बालु चालब शुरू करब आ वएह चालल बालु, एत्ते बालु एत्ते सीमेन्टमे मिलाएब। एत्ते बालु, एत्ते सीमेन्ट, सभटा ओहिना जेना अहाँ तूँ कहै छलेँ। मुदा जखन तोरा सन कियो आबए तखने किने। ताधरि तँ... (अभियन्ता आ ठिकेदारक प्रस्थान। लागल जेना फ्रीज लोककेँ अभियन्ता आ ठिकेदारक गपक विषयमे बुझल नै भेलै जेना ई सभ आभाषी छल। दुनूटा लोक फ्रीज स्थितिसँ घुरि असथिरसँ डंका बजबऽ लगैए आ तखन मजदूर सभ सेहो फ्रीज स्थितिसँ आपस आबि जाइए आ फेरसँ ठकठुक करऽ लगैए। दुनू लोक डंकाक अबाज आस्ते-आस्ते तेज करऽ लगैए आ फेर ठक-ठुकक अबाज मद्धिम पड़ि जाइए आ डंकाक अबाजक संग पर्दा खसैए।) कल्लोल २ दृश्य १ (इन्जीनियरिंग कॉलेजक दीक्षान्त समारोह, विद्यार्थी सभ ठाढ़ अछि आ शिक्षक (बा शिक्षिका) भाषण दऽ रहल छथि। अभियन्ता सेहो विद्यार्थी सभ मध्य ठाढ़ अछि।) शिक्षक/ शिक्षिका १: अहाँ सभक आइ ऐ इन्जीनियरिंग कॉलेजमे अंतिम दिन अछि। एतुक्का जीवन आ असल जीवनमे बड्ड अन्तर छै। आब अहाँ सभकेँ धूरा-गर्दामे जेबाक अछि। काज करबाक अछि। मोन लगा कऽ काज करबाक अछि। एतेक काज करबाक अछि जे ई खेत सोना उपजाबऽ लागए। लोकक जीवनमे समृद्धि आबि जाए। दिन-राति नै देखबाक अछि। यएह हमर गुरुदक्षिणा हएत। ऐ दीक्षान्त समारोहमे अहाँ सभसँ हम यएह आग्रह करै छी। हमर देश, हमर लोक बड्ड मुश्किलसँ स्वतंत्र भेल अछि। मुदा ई स्वतंत्रता मानसिक रूपसँ आबि जाए तखन ने। आर्थिक रूपसँ हम दोसरासँ स्वतंत्र भऽ जाइ, ककरो आगाँ हाथ नै पसारऽ पड़ए, बजबाक स्वतंत्रता तखने आबि सकत। अभियन्ता माने बनेनहार, सर्जक। सड़क बनेनहार, नहर बनेनहार, पुला बनेनहार। अभियन्ता माने जोड़ैबला। ई पुल लोककेँ लोकसँ जोड़त। सड़क सभ बनत। लोकक जीवनमे गति आएत, दौगत जिनगी। नहरि, पोखरिसँ भरल इलाकामे सोना उपजत। (विद्यार्थी सभक करतल ध्वनि।) शिक्षक/ शिक्षिका २:अहाँ सभकेँ बड़का-बड़का काज करबाक अछि। बड़का-बड़का बान्ह बनेबाक अछि। ओहीसँ विकास हेतै, ओहीसँ तेजीसँ विकास हेतै। सगरे विश्वमे अही तरहेँ विकास भेल छै। भारतकेँ स्वतंत्रता भेटल छै, आ ई स्वतंत्रता तखने काएम रहि सकत जखन तेजीसँ विकास हएत। आ तेजीसँ विकास हएत बड़का-बड़का फैक्ट्री आ बड़का-बड़का बान्हसँ। शिक्षक/ शिक्षिका १: ओना तँ हमरा विकासक ओइ बड़का पथसँ मतभिन्नता अछि, कारण बड़का फैक्ट्रीमे हमर लोक मजदूरे बनि कऽ ने रहि जाए, बड़का मजगूत पक्का बान्ह बनबैमे जतेक पाइ चाही तत्ते ऐ देश लग छैहो नै, तखन बड़का कच्ची बान्ह कतेक गामकेँ अपन पेटमे लेतै, ओतेक मजगूत नै रहतै, टुटैत भंगैत रहतै, सदिखन ओकर मरोम्मतिये होइत रहतै। शिक्षक/ शिक्षिका २: मुदा मुजफ्फरपुरक ऐ दीक्षान्त समारोहमे विकासक पथक दिशा नै तय कएल जा सकैए। ओ तँ दिल्ली आ पटनेमे तय हएत। आब…(जोरसँ बजैत) ऐ दीक्षान्त समारोहमे सभसँ बेशी नम्बर लऽ कऽ पास केनिहार छात्रकेँ हम बजबऽ चाहै छियन्हि। (अभियन्ताकेँ हाथक इशारासँ बजबैए आ मेडल पहिराबैए)। (विद्यार्थी सभक करतल ध्वनि। शिक्षक/ शिक्षिकाक प्रस्थान।) अभियन्ताक मित्र: दोस। अभियंत्रणक पढ़ाइमे तँ तूँ बाजी मारि गेल छेँ। आब असल जिनगी शुरू हएत। देखी ओतऽ के बाजी मारैए। अभियन्ता: कोनो अभियन्ताक जीत छै जे ओकर बनाएल पुल कतेक मजगूत छै, ओकर बनाएल नहरि आ बान्ह पानिक निकासीमे बाधा तँ नै दै छै। ओ लोकक जिनगी सुखी बना पाबैए आकि नै। काज समयसँ पूर्ण होइ छै आकि नै। अभियन्ताक मित्र: बड़का काजमे कने-मने गलती तँ होइते रहै छै। जे कहीं भाइ, हमरा तँ बड़का छहर, बड़का फैक्ट्री, बड़का चिमनी बड्ड नीक लगैए। धुँआक सुगन्ध तँ हमरा बच्चेसँ नीक लगैए, तोरा तँ बुझले छौ। अभियन्ता:आ हमर माएकेँ धुँआसँ खोँखी होइ छै, हमरा धुँआ नीक नै लगैए। तोरा तँ बुझले छौ। अभियन्ताक मित्र:देख भाइ, हमरा आ तोरामे की अन्तर अछि। हम तँ ओइ पथपर आगाँ बढ़ि जाएब जे दिल्ली बा पटना हमरा लेल निर्धारित करत। मजगूत बड़का पक्का बान्ह बनाबैले कहत तँ से बनेबै, कमजोर बड़का कच्चा बान्ह बनाबैले कहत तँ से बनेबै। जे उपरका हाकिम कहत से करबै। अभियन्ता: चाहे ओ नीक हुअए बा खराप। अभियन्ताक मित्र: ऊपरमे बैसल छै तँ कोनो गुण छै तेँ नै बैसल छै। आ गुणी लोक अधला गप किए कहतै? अभियन्ता:तखन एतऽ पढ़ि कऽ, ज्ञान अर्जित कऽ कऽ की फाएदा? अभियन्ताक मित्र:छोड़ भाइ।आइ खुशीक मौका छै, आइ तूँ जीतल छेँ तेँ आइ तोरे गप सही, मुदा आइये धरि। जारी... ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। पूनम मण्डल-१.दाग (उपन्‍यास) : गौरीनाथ- लोकार्पण २."सगर राति दीप जरय"क दोसर फेज (चरण)क पहिल सगर राति दीप जरय ०१ दिसम्बर २०१२ शनि दिन सन्ध्याकेँ केँ दरभंगामे ३.समन्वय २-४ नवम्बर २०१२ इण्डिया हैबीटेट सेन्टर भारतीय भाषा महोत्सव SAMANVAY 2-4 November 2012 IHC INDIAN LANGUAGES' FESTIVAL/ ३ नवम्बरकेँ मैथिलीमे ब्राह्मणवाद, ज्योतिरीश्वरपूर्व विद्यापति आ मैथिलीमे प्रेमक गीतपर भेल बहस १ दाग (उपन्‍यास) : गौरीनाथ- लोकार्पण बहुत दिन भेल, एक्कैस वर्ष, मातृभाषाक प्रति अनुरागक एक टा विशेष क्षण मे मैथिली मे लिखबाक लेल उन्मुख भेल रही—1991 मे— एहि एक्कैस वर्ष मे लगभग दू गोट कथा-संग्रह जोगर कथा आ दू गोट वैचारिक (आलोचनात्मक, संस्मरणात्मक आ विवरणात्मक) पुस्तक जोगर लेख यत्र-तत्र प्रकाशित आ छिडि़आयल रहितो ओकरा सभ केँ पुस्तकाकार संग्रहित करबाक साहस एखन धरि नइँ भेल। ई प्राय: अनके कारणेँ, जकर चर्चा बहुत आवश्यक नइँ। मुदा, ई उपन्यास एहि लेल पुस्तकाकार अपने सभक समक्ष प्रस्तुत क’ रहल छी जे एकरा पत्र-पत्रिका द्वारा प्रस्तुत करबाक सुविधा हमरा लेल नइँ छल। मुदा हमरा लग ई विश्वास छल जे मैथिलीक ओ पाठक वर्ग पढ़’ चाहताह जे प्राय: तेरह वर्ष सँ 'अंतिका’ पढ़ैत आयल छथि। मैथिली पत्रकारिताक दीर्घकालीन ओहि इतिहास—जे मैथिली पत्रिका पाठकविहीन आ घाटा मे बहराइत अछि—केँ फूसि साबित करैत जे पाठक वर्ग 'अंतिका’ केँ निरंतर 'घाटारहित’ बनौने रहलाह हुनक स्नेह पर हमरा आइयो विश्वास अछि। निश्चये ओ पाठक वर्ग हमर उपन्यास सेहो कीनिक’ पढ़ताह आ हमर पुरना विश्वास केँ आरो दृढ़ करताह। —लेखक Price : 150.00 INR स्त्री आ शूद्र दुनू केँ हीन आ मर्दनीय मान’वला कुसंस्कृतिक अवसानक कथा जे अपन तथाकथित 'ब्रह्मïशक्ति’क छद्ïम अहंकार मे परिवर्तनक ईजोत देखिए ने पबै यए...जखन देख’ पड़ै छै तँ पाखंडक कील-कवच ओढि़ लै यए, अहुछिया कटै यए, घिनाइ यए आ अंतत: एक टा 'दाग’ मे बदलै यए जे कुसंस्कृतिक स्मृति शेषक संग परिवर्तनक संवाहक, स्त्री आ शूद्रक, संघर्ष-प्रतीक सेहो अछि। उपन्यास पठनीय अछि, विचारोत्तेजक अछि आ मैथिली मे बेछप। —कुणाल गौरीनाथ मैथिलीक चर्चित आ मानल कथाकार छथि। पठनीयता आ रोचकता हिनकर गद्य मे बेस देखाइत अछि। माँजल हाथेँ ओ ई उपन्यास लिखलनि अछि। गौरीनाथ मैथिली साहित्यक आँगुर पर गनाइ वला लेखक मे छथि जे जाति-विमर्श केँ अपन विषय वस्तु बनौलनि। आन भारतीय भाषा मे साहित्यक जे लोकतांत्रिकीकरण भेल, तकर सरि भ’क’ हेबाक मैथिली एखनो प्रतीक्षे क’ रहल अछि। ई उपन्यास मैथिली साहित्यक लोकतांत्रिकीकरण लेल कयल एक टा सार्थक आ सशक्त प्रयास अछि। 'दाग’ अनेक अंतद्वंद्व सबहक बीच सँ टपैत अछि विश्वसनीयता, रोचकता आ लेखकीय ईमानदारीक तीन टा तानल तार पर एक टा समधानल नट जकाँ। एत’ सामंतवाद आ ब्राह्मणवादक मिझेबा सँ पहिनेक दीप सनहक तेज भ’ जायब देखाइत अछि। धुरखुर नोचैत नपुंसक तामस आ वायवीय जाति दंभ अछि। नवतुरियाक आर्थिक कारणेँ जाति कट्टरताक तेजब सेहो। दलित विमर्श अछि, ओकर पड़ताल सेहो। दलितक ब्राह्मणीकरण नहि भ’ जाय, तकरो चिंता अछि। दलित विमर्शक मनुष्यतावाद आ स्त्रीवादक नजरिञे पड़ताल सेहो। आकार मे बेसी पैघ नहियो रहैत एहि मे क्लासिक सब सनहक विस्तार अछि अनेक रोचक पात्रक गाथाक बखान संग। आजुक मैथिल गाम जेना जीवंतता सँ एहि उपन्यासक पात्र बनि केँ सोझाँ अबैत अछि, से अनायासे फणीश्वरनाथ रेणु केँ मन पाडि़ दैत अछि। गामक नवजुबक सबहक दल यात्रीक नवतुरियाक योग्य वंशज अछि। जँ आजुक मिथिला, ओकर दशा-दिशा आ संगहि ओत’ होइत सामाजिक परिवर्तन रूपी अमृत मंथनक खाँटी बखान चाही, तँ 'दाग’ केँ पढ़ू। एहि रोचक आ अत्यंत पठनीय उपन्यासक व्यापक पाठक समाज द्वारा समुचित स्वागत हैत आ गाम-देहात सँ ल’क’ नगर परोपट्टा मे एहि पर चर्चा हैत, एहेन हमरा पूर्ण विश्वास अछि। —विद्यानन्द झा स्त्री आ दलित एहि दुनू विमर्श केँ एक संग समेट’वला उपन्यास हमरा जनतब मे मैथिली मे नहि लिखल गेल अछि। ई उपन्यास एहि रिक्ति केँ भरैत भविष्यक लेखन लेल प्रस्थान-विन्दु सेहो तैयार करैत अछि। 'दाग’ अपन कैनवास मे यात्रीक 'नवतुरिया’ आ ललितक 'पृथ्वीपुत्र’क संवेदना केँ सेहो विस्तार प्रदान करैत अछि। ताहि अर्थ मे ई मैथिली उपन्यास परंपराक एक टा महत्त्वपूर्ण कड़ी साबित हैत। 'नवतुरिया’क 'बम-पार्टी’क विकास-यात्रा केँ 'गतिशील युवा मंच’ मे देखल जा सकैत अछि। जाति, धर्म, लिंग आदि सीमाक अतिक्रमण करैत मनुष्य ओ मनुष्यताक पक्ष मे लेखकीय प्रतिबद्धताक प्रमाण थिक सुभद्रा सनक पात्रक निर्माण जे अपन दृष्टि सँ जातीय-विमर्श सँ आगाँक बाट खोजैत अछि, 'पहिने मनुष्य बचतै तखन ने प्रेम!’ अभिनव कथ्य आ शिल्पक संग मिथिलाक नव बयार केँ थाह’वला उपन्यास थिक 'दाग’। —श्रीधरम उसार-पुसार ई उपन्यास हम लगभग दस वर्ष पहिने लिखब शुरू कयने रही। 2003 मे। एक्कैसम शताब्दीक नव गाम मे तखन धरि जे किछु थोड़ेक सामाजिकता बचल छल, एहि बीच सेहो खत्म जकाँ भ’ गेल। खगल केँ के देखै यए, हारी-बीमारी धरि मे तकैवला नइँ! अहाँक नीक जरूर दोसर केँ अनसोहाँत लगै छै। लोभ-लिप्साक पहाड़ समस्त सम्बन्ध आ हार्दिकता केँ धंधा आ नफा-नुकसान सँ जोडि़ देलक अछि।...गाम सँ बाहर रह’वला भाइ-भातिज केँ बेदखल करबाक यत्न बढ़ल अछि। खेती-किसानीक जगह व्यापार आ बाहरी पाइ पर जोर। सुखितगर होइते लोक शहर जकाँ आत्मकेन्द्रित भ’ रहल अछि आकि नव तरहक दबंग बनि रहल अछि, नंगटै पर उतरि रहल अछि। संगहि की ई कम दुखद जे जाति-धर्म, पाँजि-प्रतिष्ठा सनक मामिला मे एखनो; थोड़े कम सही; उग्र कोटिक सामाजिक एकता, आडम्बर आ शुद्धता देखाइते अछि?... सवर्ण समाज दलित-अछूतक कन्या पर अदौ सँ मोहित होइत रहल आ एम्हर आबि विवाह आदिक सेहो अनेक घटना सोझाँ आयल। मुदा दलित युवकक संग गामक सिरमौर पंडितजीक कन्याक भागि जायब, घर बसायब आ ओकर स्वावलंबी हैब पागधारी लोकनि केँ नइँ अरघैत छनि तँ एकरा की कहबै? खेतिहर समाज लेल खेती-किसानी सँ बढि़ ताग आ पाग कहिया धरि रहत से नइँ कहि सकब!... ओना मिथिला-मैथिल-मैथिलीक मामिला मे 'पूबा-डूबा’क हस्तक्षेप पश्चिमक श्रेष्ठता-ग्रंथि केँ कहियो स्वीकार्य नइँ रहल—खासक’ शुद्धतावादी लोकनि आ पोंगा पंडित लोकनि केँ!... निश्चये ओहेन व्यक्ति केँ मैथिल समाजक ई पाठ बेजाय लगतनि जे मनुक्ख आ मनुक्ख मे भेद करै छथि, एक केँ श्रेष्ठ आ दोसर केँ हीन बुझैत छथि!... सिमराही-प्रतापगंज-ललितग्राम-फारबिसगंज बीचक आ कात-करोटक 'पूबा-डूबा’ गाम-घरक किछु शब्द (ककनी, कुरकुटिया, ढौहरी, दोदब आदि), किछु ध्वनि, भिन्न-भिन्न तरहक उच्चारण आ वर्तनीक विविधता कोसी-पश्चिमक किछु पाठक केँ अपरिचित भनहि लगनि, आँकड़ जकाँ प्राय: नइँ लगबाक चाहियनि किएक तँ कोसी पर नव बनल पुल चालू भ’ गेल अछि...जाति मे भागनि आकि अजाति मे, बेटी-बहिन घर-घर सँ भागबे करतनि...ताग आ पाग धयले रहि जयतनि!...नव-नव बाट आ पुल आकर्षक होइत छै! से जनै अछि छान-पगहा तोड़बा लेल आकुल-व्याकुल नव तुरक मैथिल कन्या! हँ, पंडिजी बुझैतो तकरा स्वीकार’ नइँ चाहैत छथि। उपन्यासक अन्तिम पाँति पूरा क’ हम विश्रामक मुद्रा मे रही...कि पंडीजी, माने पंडित भवनाथ मिश्र, आबि गेलाह। पुछलियनि—पंडित कका, अंकुरक प्रश्नक उत्तर के देत? कहू, ओकर कोन अपराध?... पंडित कका किछु ने बजलाह, बौक बनि गेलाह!...मुदा हुनका आँखि मे अनेक तरहक मिश्रित क्रोध छलनि! ओ पहिने जकाँ दुर्वासा नइँ भ’ पाबि रहल छलाह, मुदा भाव छलनि—खचड़ै करै छह! हमरा नाँगट क’क’ राखि देलह आ आबो पुछै छह...जाह, तोरा कहियो चैन सँ नइँ रहि हेतह!... अंकुरक छाती पर जे दाग अछि, तेहन-तेहन अनेक दाग सँ एहि लेखकक गत्र-गत्र दागबाक आकांक्षी पंडित समाज आ विज्ञ आलोचक लोकनि लग निश्चये अंकुरक सवालक कोनो उत्तर नइँ हेतनि। सुभद्राक तामस आ ओकर नजरिक दापक दाग सेहो हुनका लोकनिक आत्मा पर साइत नहिए बुझाइत हेतनि!... मुदा सुधी पाठक, दलित समाज सँ आगाँ आबि रहल नवयुवक लोकनि आ स्त्रीगण लोकनिक नव पीढ़ी जरूर एकर उत्तर तकबाक प्रयास करत, से हमरा विश्वास अछि। —गौरीनाथ 01 सितम्बर, 2012 २ "सगर राति दीप जरय"क दोसर फेज (चरण)क पहिल सगर राति दीप जरय ०१ दिसम्बर २०१२ शनि दिन सन्ध्याकेँ केँ दरभंगामे -"सगर राति दीप जरय"क दोसर फेज (चरण)क पहिल सगर राति दीप जरय ०१ दिसम्बर २०१२ शनि दिन सन्ध्याकेँ केँ दरभंगामे -आयोजक छथि श्री अरविन्द ठाकुर --"सगर राति दीप जरय"क पहिल चरणमे बहुत रास घुसपैठिया घुसि गेल रहथि आ ई अपन मूल उद्देश्यसँ दूर भऽ गेल छल। -लोक भरि राति सुतैत रहथि, जातिवादिताक स्वर सोझाँ आबि गेल छल, लॉबी बना कऽ होइत समीक्षा आ ब्राह्मणवादी-आमंत्रण धरि गप पहुँचि गेल छल। साहित्य अकादेमीक हस्तक्षेपसँ मामला आर गरबड़ा गेल। ७५म सगर राति दीप जरयमे पटनामे किछु गोटे द्वारा शराब पीलापर धनाकर ठाकुर विरोध सेहो प्रकट केलन्हि। तकर बाद ओहीमेसँ किछु गोटे ऐ गोष्ठीकेँ दिल्ली लऽ गेला, मुदा विभिन्न कारणसँ आ साहित्य अकादेमीक दवाबपर मैथिली पोथी प्रदर्शनी नै लगाओल जा सकल, कारण आयोजक तकर अनुमति नै देलन्हि, ऐ साहित्य अकादेमीक कथा गोष्ठीकेँ ७६म -"सगर राति दीप जरय"क मान्यता नै देल जा सकल (ओना किछु ब्राह्मणवादी कथाकार आ घुसपैठिया लोकनि एकरा ७६म सगर राति दीप जरय कहि रहल छथि!!) । ७६म -"सगर राति दीप जरय"क आयोजन विभा रानी द्वारा चेन्नैमे भेल जतए मात्र एकटा कथाकार पहुँचला। कियो माला नै उठेलनि आ सगर राति दीप जरयक पहिल चरणक दुखद अन्त भऽ गेल। --"सगर राति दीप जरय"केँ फेरसँ जियेबाक प्रयत्नक स्वागत कएल जा रहल अछि। "सगर राति दीप जरय"क दोसर फेज (चरण)क पहिल सगर राति दीप जरय ०१ दिसम्बर २०१२ केँ "किरण जयन्ती"क अवसरपर आयोजित भऽ रहल अछि। आशा अछि जे ई नव "सगर राति दीप जरय"क दोसर फेज (चरण)क पहिल सगर राति दीप जरय पुनः अपन ओइ पथपर आगाँ बढ़त, जे प्रभास कु. चौधरी ऐ लेल सोचने छला। ३ समन्वय २-४ नवम्बर २०१२ इण्डिया हैबीटेट सेन्टर भारतीय भाषा महोत्सव SAMANVAY 2-4 November 2012 IHC INDIAN LANGUAGES' FESTIVAL/ ३ नवम्बरकेँ मैथिलीमे ब्राह्मणवाद, ज्योतिरीश्वरपूर्व विद्यापति आ मैथिलीमे प्रेमक गीतपर भेल बहस -भारतीय भाषा महोत्सव  २ नवम्बरकेँ प्रारम्भ भेल- -ज्योतिरीश्वर पूर्व विद्यापतिक जीवनपर आधारित "उगना रे" पर कथक नृत्यांगना शोभना नारायणक नृत्य लोककेँ मंत्रमुग्ध केलक -समन्वय २-४ नवम्बर २०१२ इण्डिया हैबीटेट सेन्टर भारतीय भाषा महोत्सव SAMANVAY 2-4 November 2012 IHC INDIAN LANGUAGES' FESTIVAL/ - ३ नवम्बरकेँ मैथिलीमे ब्राह्मणवाद, ज्योतिरीश्वरपूर्व विद्यापति आ मैथिलीमे प्रेमक गीतपर भेल बहस -बहसमे भाग लेलनि उदय नारायण सिंह नचिकेता, देवशंकर नवीन, विभा रानी आ गजेन्द्र ठाकुर; आ मोडेरेटर रहथि अरविन्द दास -आकाशवाणी दरभंगा, हिन्दी अखबार सभक दरभंगा संस्करण, सी.आइ.आइ.एल. , साहित्य अकादेमी, नेशनल बुक ट्रस्ट आ अंतिका- मिथिला दर्शन, जखन-तखन केर लेखकक प्रोफाइल, विद्यापतिकेँ पाग पहिरा कऽ विद्यापति पर्व केनिहार चेतना समितिक पत्रिका घर बाहर, झारखण्ड सनेस आ जातिवादी रंगमंचक नाटकक शब्दावली आदि, ऐ सभ द्वारा मैथिली साहित्यकेँ ब्राह्मणवादी बनेबाक प्रयासक विरुद्ध गएर-ब्राह्मणवादी समानान्तर धाराक चर्च गजेन्द्र ठाकुर द्वारा भेल -ज्योतिरीश्वर पूर्व गएर ब्राह्मण विद्यापति आ ज्योतिरीश्वरक पश्चात बला कट्टर संस्कृत-अवहट्ठ बला विद्यापतिक बीच अन्तर गजेन्द्र ठाकुर रेखांकित केलन्हि ऐ सँ पहिने हिन्दी आ मणिपुरीक कार्यक्रम सेहो भेल। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। डा.रमानन्द झा ‘रमण’ कलकत्ता विश्वविद्यालयमे मैथिली- राजा टंकनाथ चौधरी कलकत्ता विश्वविद्यालयमे मैथिलीक अध्यापनक प्रारम्भक होएबाक सदर्न्भमे डा. जयकान्त मिश्र (मैथिली साहित्यक इतिहास, साहित्य अकादेमी ) लिखने छथि - स्वर्गीय सर आशुतोष मुखर्जी कलकत्तामे मैथिलीक महान सम्पोषक कहल जाए सकैत छथि। कुमार गंगाानन्द सिंह, बाबू गङ्गापति सिंह, ब्रजमोहन ठाकुर, विद्यानन्द ठाकुर आदि महानुभाव लोकनिक प्रयाससँ तथा दुर्गागंज पुरनियाँक राजा टंकनाथ चौधरीक उदार वित्तीय सहायतासँ 1917 ई. मे कलकत्ता विश्वविद्यालयमे मैथिली चेयर स्थापित भेल। डा. सुभद्र झा (मैथिली: वृत्त ओ परिधि, चेतना समिति) तात्कालिक स्थिति आ सहयोगकेँ स्पष्ट करैत लिखल अछि जे मैथिलीक अध्यापनक हेतु दू टा प्राध्यापक नियुक्त भेल छलाह। एहिमे एक गोटेक वेतन रजौरक राजा स्व. टंकनाथ चौधरी द्वारा देल द्रव्य राशिसँ तथा दोसर गोटेक वेतनक राशि बनैलीक स्व. राजा कीर्त्यानन्द सिंह प्रभृति द्वारा देल द्रव्यसँ देल जाइत छल तथा ई लोकनि क्रमशः रजौर तथा बनैली व्याख्याता कहल जाथि। एहि प्रसंग ब्रजमोहन ठाकुर (विश्वविद्यालयमे मैथिलीक प्रवेश, चेतना समिति) लिखल अछि- जखन हम पूर्णियाँसँ घूरि के ँकलकत्ता पहुँचलहुँ तखन ज्ञात भेल जे राजा श्रीटंकनाथ चौधरी सेहो उदारदातापूर्वक साढ़े तीन हजार टाका देबाक सूचना सर मुखर्जीके ँ देलथिन्ह अछि। ओ ‘टंकनाथ चौधरी चेयर’ स्थापित करबाक अनुरोध कएलन्हि अछि। एहि तरहे ँ दूनू (राजाबहादुर कीर्त्यानन्द सिंह) मिलाके ँ एगारह हजार टाका तात्कालिक कार्य चलएबाक हेतु संगृहीत भए गेल। अर्थात् विश्वविद्यालयमे मैथिलीक अध्यापन कार्य प्रारम्भ होएबाक निमित्त आवश्यक निधि उपलब्ध करेबाक हेतु जे दू उदारमना मातृभाषा अनुरागी आर्थिक सहयोग कएल आ कलकत्ता विश्वविद्यालयमे सर्वप्रथम मैथिलीक अध्यापन कार्य प्रारम्भ भए सकल एवं जाहिसँ मैथिली शिक्षणक बाट खूजल, ओहिमे एक छथि राजा टंकनानाथ चौधरी। राजा टंकनाथ चौधरी राजा बुद्धिनाथ चौधरीक पुत्र छलाह। हिनक जन्म 11 नवम्बर 1884 ई. के ँदुर्गागंज, कटिहारमे भेलनि। ओ अपन बेमात्रोय भाए कुमार छत्रानाथ चौधरीसँ मात्रा छओ मास छोट छलाह। हिनक पिता राजा बुद्धिनाथ चौधरीक देहान्त जेष्ठ 1885 ई. मे भए गेलनि। ओहि समयमे दूनू भाए नावालिग छलाह। जेना महाराज महेश्वर सिंहक देहावसानक उपरान्त हुनक दूनू पुत्रा महाराज लक्ष्मीश्वर सिंह एवं महाराज रमेश्वर सिंहक अल्पवयस्कताक कारणे ँ दरभंगा राज ‘कोर्ट ऑफ वार्ड्सक अन्तर्गत चल गेल छल, ओहिना राजा बुद्धिनाथ चौधरीक जमीनदारी कोरट लागि गेलनि। राजा टंकनाथ चौधरीक प्रारम्भिक शिक्षा नवद्विप जिलाक कृष्णनगरमे भेलनि। 15 वर्षक अवस्थामे ओ कलकत्ता विश्वविद्यालयसँ प्रथम श्रेणीमे इंटर पास कएल। प्रेसिडेंसी कालेजसँ अङरेजी तथा दर्शन विषयक संग स्नातक भेलाह। अग्रिम शिक्षाक हेतु दर्शनशास्त्रा लए एम. ए. मे नाम लिखाओल। किन्तु 1904 ई.मे जखन जमीनदारी कोरट मुक्त भेलनि तँ औपचारिक शिक्षा समाप्त कए जमीनदारीक प्रबन्धक दायित्व सम्हारि लेल। राजा बुद्धिनाथ चौधरीक जमीनदारी बिहार आ बंगााल- दूनू राज्यमे छलनि। ओकर सुप्रबन्धक हेतु बिहार क्षेत्रक प्रबन्ध कुमार छत्रनाथ चौधरी तथा बंगााल क्षेत्रक प्रबन्ध राजा टंकनाथ चौधरी सम्हारल। राजा टंकनाथ चौधरीक विवाह कोइलख, मधुबनी ग्राम निवासी पण्डित जानकीनाथ झाक कन्यामे छलनि। राजा साहबके ँ तीन पुत्र एवं तीन कन्या भेलथिन। हिनक परिवारमे कतेको खाढ़ीसँ पिताके ँ कन्यादानक सौभाग्य नहि होइत छलनि। राजा साहबके ँ ई सौभाग्य भेटलनि। राजा टंकनाथ चौधरी यद्यपि स्वयं उच्चशिक्षा प्राप्त नहि कए सकल छलाह मुदा, समाजमे शिक्षाक व्यापक प्रचार हो, तदर्थ आजीवन प्रयत्नशील छलाह। एहि हेतु 1915 ई. मे अपन पिताक नाम पर रामनगरमे स्कूल स्थापित कएल। शिक्षाक क्षेत्रामे हिनक अवदानक उल्लेख करैत मिथिला मिहिर (16 जून, सन 1928 ई.) लिखैत अछि- ‘शिक्षा प्रचार में आप सदा आगे रहते थे। अपनी राजधानी रामगञ्ज में अपने स्वर्गीय पिता के स्मारक में बुद्धिनाथ इन्सटिच्यूशन नाम से एक हाईस्कूल स्थापित कर उसमें अनेको विद्यार्थियों को अपनी ओर से सब खर्च देते थे।’ ओहि स्कूलमे मैथिल छात्रक निःशुल्क शिक्षाक व्यवस्था छलैक। खगल आ मेधावी छात्रक आवास आदिक प्रबन्ध राजक दिशिसँ होइत छल। बंगालमे रहितो हुनक समस्त पारिवारिक सम्बन्ध आ सरोकार मिथिलासँ छल। ते ँ ओतय मैथिल छात्रक संख्या पर्याप्त रहैत छल। ओ मैथिल छात्र संघक स्थापना कएल जकर नियमित बैसार होइत छलैक। ओहि बैसारमे मैथिली निबन्ध तथा कविता पाठ होइत छल। मिथिलासँ गेल ओहने एक छात्रमे छलाह काशीनाथ झा जे पछाति मैथिलीक कवि कथाकारक रूपमे ख्यात भेलाह। पं. काशीनाथ झा जखन मैट्रिक पास कए लेलनि तँ ओही स्कूलमे हुनक नियुक्ति एक शिक्षक रूपमे भए गेलनि। तदुपरान्त, ओ अपन अनुज काञ्चीनाथ झा (डा. काञ्चीनाथ झा ‘किरण’) के ँ गामसँ आनि लेलनि। किरणजी ओतहिसँ मएट्रिक एवं राजा टंकनाथ चौधरीक आर्थिक सहयोग पाबि कलकत्ता विश्वविद्यालयसँ इण्ट्रेंस पास कएलनि। एहि तथ्यके ँ स्पष्ट करैत राजा टंकनाथ चौधरीक पुत्र रुद्रनाथ चौधरी (देहावसान, 2004 ई.) लिखैत छथि- At Ramganj, he established a High School in 1915, in the memory of their father. The Maithil Students from Mithila area were taught free of tuition fee, they were allowed free food and seats in the Maithil Hostel of the school. Poor students of the area were also allowed teaching free of fees. A Maithil Chhatra Sangha was established in which essays and verses were read. Late Pandit Kashinath Jha, who passed Matriculation from there was appointed as a teacher of the school. Pt. Kashinath Jha was the elder brother of Mithila's eminent writer and thinker, Dr. Kanchinath Jha "Kiran", took great interest in Maithili literature. The students were encouraged to write more and more and read them in the weekly gathering. Movements for Mithilakshar type was done. (चेतना समिति स्मारिका, 1988)। राजा टंकनाथ चौधरीक व्यक्तित्व सहज छल। ओ मिलनसार छलाह। पैघ-छोटक भेदभाव मनमे बिना अनने लोकसँ भेंट करैत छलाह। हिनक व्यक्तित्वक एहि विशेषताक प्रसंग ‘मिथिला मिहिर’ लिखने अछि - ‘हमारे राजा साहब बी.ए. होने के अतिरिक्त सुवक्ता, कार्यकुशल, अथक परिश्रमी, निरभिमानी, शिक्षाप्रेमी, तथा मिलनसार थे। आप बड़े से बड़े और छोटे से छोटे तक में दिल खोलकर बातें करते थे।’ हुनक पुत्र रुद्रनाथ चौधरीक निम्नलिखित कथनसँ सेहो एहि बातक पुष्टि होइत अछि। ओ लिखैत छथि - When at Ramnagar, he used to sit in the maidan in front of the palace for about one and half hour with some officials and relations. where the general public and tenants were free to talk to him about their grievances, if any, which were noted down and redressed as far as possible. (चेतना समिति स्मारिका, 1988 ई.)। राजा टंकनाथ चौधरी उदार प्रवृतिक लोक छलाह। मिथिला मिहिरसँ स्पष्ट होइछ हिनक एहि उदारताक प्रतिकूल प्रभाव पड़ैत छलैक तथा ओ कर्जमे भए गेल छलाह। तथापि सामाजिक कार्यसँ किंचितो विमुख नहि भेलाह। राजा साहबक उदारताक एक ज्वलन्त उदाहरण अछि जे 1926 ईमे सितावगञ्ज आ ठाकुरगाँव बाटे दिनाजपुरसँ रूहिया धरि जखन रेललाइन बनय लागल, जे हुनक जमीन बाटे जाइत छल, तँ राजा टंकनाथ चौधरी रेलवेके ँनिःशुल्क जमीन दए देलथिन। राजा टंकनाथ चौधरी दिनाजपुर जिला वोर्डक गैर-पदाधिकारी अध्यक्ष तथा दिनाजपुर म्युनिसिपल बोर्डक 15 वर्ष धरि अध्यक्ष रहलाह। बंगाल लेजिस्लेटिव काउंसिलक गठन भेला पर ओकर सदस्य निर्वाचित भेलाह। हिनक अवदानक प्रसंग मिथिला मिहिर लिखैत अछि - ‘बहुत दिनों तक आप दिनाजपुर डिस्ट्रिक्ट बोर्ड के चेयरमैन रहे और इस अवधि में आपने अच्छे-अच्छे काम किये जिनके लिये दिनाजपुर जिला बोर्ड में आज भी आप का नाम आदर के साथ लिये जाते हैं। आजकल आप कदमा थाना की ओर से पूर्णिया जिला बोर्ड में मेम्बर थे। और बंगाल कौंसिल का भी मेम्बर थे। बंगाल के भूतपूर्व गवर्नर ने आपकी उदारता और शिक्षा-प्रेम की कई वार प्रशंसा की थी। और ‘राजा साहब’ की उपाधि से सम्मानित किया। रुद्रनाथ चौधरी लिखल अछि - Being pleased at his devotion for public welfare the British Government honoured him with the title of Raja on Nov. 25, 1925 in a Durbar held by the Governor of Bengal. राजा टंकनाथ चौधरी नित्यपूजा आ देवीभागवत पाठ कएल करथि। किन्तु दोसर धर्मक प्रति असहिष्णु नहि छलाह। 1926 ई.मे कलकत्ताक संगहि आनोठाम जखन साम्प्रदायिक दंगा पसरि गेलैक एवं ओकर पसार दिनाजपुर धरि होअए लागल तँ राजा साहेब तत्काल पण्डित एवं मौलवीकेँ आमन्त्रित कएल। दूनू गोटाके ँ एकठाम बैसाय धर्मशास्त्र पर प्रवचन दिआओल। ई कायक्रम एक मास धरि चलल छल। राजा साहबक एहि प्रयाससँ धार्मिक साहिष्णुता बढ़ल एवं शान्ति व्यवस्था भंग नहि भेलैक। ओतय कटिहार हाट लगाओल, जे अद्यावधि लागि रहल अछि। रामगञ्जमे ओ भगवतीक एक मन्दिरक निर्माण कएल। भारत विभाजनक उपरान्त 1951 ई. मे राजा टंकनाथ चौधरीक पुत्र आदि पूर्वी पाकिस्तानसँ जान बचाए पडे़लाह, ताधरि ओतय दुर्गापूजा खूब धूमधामसँ होइत छल। राजा टंकनाथ चौधरी दुर्लभ पुस्तक तथा पाण्डुलिपिक संग्रह कए विशाल पुस्तकालयक स्थापना कएने छलाह। जखन हुनक एक प्राध्यापक सेवानिवृतिक उपरान्त बिलेंत जाए लगलथिन तँ हुनक समस्त संग्रह राजा साहेब कीनि लेल। रुद्रनाथ चौधरी लिखल अछि - Huge collections of manuscripts on Talpatra, Bhojapatra and thick papers on different subjects, collected by his ancestors were being transcribed by eminent pandits for years. He spent hours in reading books in night. राजा साहब संगीतक बड़ प्रेमी छलाह। बेतिआक संगीतकार मल्लिक लोकनि हुनक दरवारमे अबैत रहैत छलथिन। शतरंज एवं फोटोग्राफी हुनक हॉबी छल। छात्र जीवनमे फुटबाल, हेलब एवं घोड़सबारी प्रिय छलनि। ओ एक कुशल शिकारी सेहो छलाह। जखन कोनो सरकारी अमला अथवा बंगालक गर्वनर अबैत छलथिन तँ हुनक सम्मानमे विशेष शिकार अभियान होइत छलैक। एहि लेल हुनका अपन जमीनदारीसँ बाहर नहि जाए पड़ैत छलनि। मिथिला मिहिर एवं मिथिलामोदक ‘मैथिल महासभा’ विषयक रिपोर्ट एवं समाचारमे राजा टंकनाथ चौधरीक उल्लेख निश्चित रूपसँ भेटैत अछि। एहिसँ स्पष्ट होइछ जे ओ मैथिल महासभाक अधिवेशनमे नियमित रूपसँ सम्मिलित होइत छलाह। ईहो स्पष्ट होइछ जे ओ समाजोपकारी, सुधारात्मक प्रयास एवं प्रस्तावक समर्थक छलाह। ओ एक नीक वक्ता छलाह जे मिथिला मोद (उद्गार, 61 1911 ई.) मे मैथिल महासभाक तेसर अधिवेशनक (3-5 नवम्वर 1911 ई. दरभंगा)क प्रकाशित निम्नविवरणसँ स्पष्ट होइत। ओ लिखैत अछि - द्वितीय दिन (4 नवम्बर 1911 ई.) 2 बजे श्रीमान कनिष्ठ रजौराधीश टंकनाथ चौधरी (B.A.) महोदयक सुन्दर वक्तृता भेल। सर्वज्ञात अछि जे राजा टंकनाथ चौधरी कलकत्ता विश्वविद्यालयमे मैथिलीक प्रवेशक लेल उदारतापूर्वक दान देल। किन्तु मैथिली भाषा-साहित्य एवं संस्कृतिक विकास एवं संरक्षणक क्षेत्रमे हुनक इएह टा अवदान नहि अछि। जखन ओ अपन पिताक नामपर स्कूल स्थापित कएल तँ ओहिमे मैथिल छात्रक लेल विशेष व्यवस्था छल। मैथिल छात्र संघक तत्त्वावधानमे रचनाक पाठ कराए ओ सर्जनात्मक प्रतिभाकेँ प्रोत्साहित करैत छलाह। मिथिलाक्षरक संरक्षणक लेल प्रशिक्षण अभियान चलौने छलाह। ओहिना जखन मैथिल महासभामे वा ओकर बाहर समुद्र यात्रा पर घर्मथन होइत छल तँ एहि विषयक निबन्ध लेखन प्रतियोगिता आयोजित कराओल। एहि सम्बन्धमे पण्डित जानकीनाथ झा, व्याकरणतीर्थक नामसँ एक निवेदन मिथिलामोद, उद्गार - 61, शाके 1833, सन 1319 सालमे प्रकाशित अछि। निवेदन अछि - 50 टाका पुरस्कार श्रीमान रजौराधीशसँ - आधुनिक कालमे मैथिल ब्राह्मणके ँ उन्नत्यर्थ विलायत जाएब अनुचित - एतद्विषयमे मिथिला भाषा मध्य जे मैथिल ब्राह्मण विद्वज्जन प्रमाण सहित सर्वोत्तम लेख लिखताह, तनिका 50 टाका मूल्यक पदक (मेडल) देल जैतन्हि।’ लेख 15 दिसम्बर 1911 ई. सँ पूर्व निवेदकके ँपठा देबाक अनुरोध अछि। समुद्र यात्राक पक्ष-विपक्षमे मिथिलामोद(1911ई.) मे अनेक लेख प्रकाशित भेटैत अछि। सम्भव थिक जे ओही प्रतियोगिता हेतु लिखल गेल हो। समाज सुधारक संग मातृभाषा मैथिलीक विकासक प्रति राजा साहब कतेक साकांक्ष छलाह, से एहि निबन्ध प्रतियोगिताक आयोजनसँ स्पष्ट होइत अछि। समस्यापूर्ति प्रतियोगिता तँ होइत छल, मुदा मैथिलीमे निबन्ध लेखन प्रतियोगिताक आयोजन प्रायः सर्वप्रथम राजा टंकनाथ चौधरी, सएह आरम्भ कराओल। राजा टंकनाथ चौधरी महाराज रमेश्वर सिंहक प्रियपात्र छलाह। ओ समय-समय पर मिथिला, मैथिल एवं जमीनदारीक समस्यापर विचार करैत रहैत छलाह। ओ जखन कोनो गम्भीर समस्याक समाधानक लेल गवर्नर वा वायसरायसँ भेंट करबाक हेतु जाइत छलाह, तँ राजा टंकनाथ चौधरी हुनक संगमे रहैत छलथिन। आर जखन हुनक देहावसान भेलनि तँ महाराज रमेश्वर सिंह राजा टंकनाथ चौधरीके ँ Mouthpicee of North Bengal कहि अपन शोक संवेदना व्यक्त कएल। एहन मातृभाषा अनुरागी राजा टंकनाथ चौधरीक, मात्रा 44 वर्षक अवस्थामे जेठ पूर्णिमा रवि, प्रातः काल 3 जून 1928 केँ देहान्त भए गेलनि। राजा साहबक रोग आ देहावसानक प्रसंग मिथिला मिहिर, लिखैत अछि - ‘बहुमूत्र रोग से ग्रस्त रहने पर भी स्वास्थ्य, सबल और प्रभावशाली जान पड़ते थे। मृत्यु से कई दिन पहले उसी के उपसर्ग से कुछ अस्वस्थ्य हो गये, जिसके निवारणार्थ दिनाजपुर में ‘इन्जकशन’ कराये! काल बली था, बुरा होने वाला था; इन्जकशन से फायदा नहीं पहुँचा, उलटे बाँह फूल गया, चित्त विकल हुआ, दिनाजपुर से कलकत्ते आये, बड़े-बड़े डाक्टरों ने देखा, दबा की; परन्तु निष्ठुर काल के आगे किसका चलता है, उसका दबा कौन कर सकता है? गत रविवार ता. 3 जून, 1928 ई. के भोर में दुखी परिवारों को रोते हुये छोड़ कर इस संसार से सदा के लिये चल बसे!’ राजा साहब पुत्रा नवालिग छलथिन। परिणामतः फेर हुनक जमीनदारी कोर्टस आफ वार्डक अन्तर्गत चल गेल। मैथिलक एक केन्द्र समाप्त भए गेलैक। एहि प्रसंग रुद्रनाथ चौधरी लिखने छथि - With his passing away hundreds of relations, employees and dependents became unsettled, and the Estate being taken over by the court of wards, they all went away to other places or their home. The family shifted to Calcutta for the education of the children. बंगलादेश निर्माणक बाद बनल सौहार्दपूर्ण वातावरणमे रजौरक एक विश्वासपात्र दुर्गागंज आबि राजा साहेबक पुत्र (देहावसान 2004 ई.)सँ घूमि चलबाक अनुरोध कएने छलनि जे बंगबन्धु मुजिवुर रहमानक हत्याक उपरान्त भारत विरोधी वातावरणमे विलीन भए गेल। राजा साहेबक पुत्रबधु जे हुनक नवजात पौत्र (प्रो. जी.एन. चौधरी, पूर्व अध्यक्ष, स्नातकोत्तर समाजशास्त्रा विभाग, ल.ना.मि.वि.वि. दरभंगा) के ँ अपन आंचरमे नुकाके ँ पड़ाएल छलीह, अपन आँखिमे मैथिली भाषा-साहित्य एवं संस्कृतिक प्रभावशाली केन्द्रक उत्कर्ष आ त्रासदीक चित्रके ँ आँखिमे जीवन भरि (देहावसान 2009 ई.) जोगौने रहलीह। एहि संग राजा साहेबक परिवारक भावात्मक सूत्रा रामगञ्जसँ भङ्ग भए गेलैक। जेना रुद्रनाथ चौधरी लिखल अछि जे राजा साहबक देहावसानक बाद कतेको मैथिल परिवार आश्रय विहीन भए गाम वा अन्यत्र चल गेलाह, ओहिमे काशीनाथ झा वा कांचीनाथ झा ‘किरणे’ टा नहि छलाह, कोइलख ग्रामवासी पण्डित गोवर्द्धन झा, प्रसिद्ध गोनू बाबू सेहो छलाह। गोनू बाबू पुत्र श्री सुधीर कुमार झा, आइ.पी.एस. (सेवानिवृत्त) जखन 2006 ई. मे अपन पिताक आश्रय स्थलक अन्वेषणमे रामगञ्ज बंग्लादेश अपन पुत्रक संग पहुँचलाह तँ ओतय मन्दिर देखल। हुनक कलमबाग देखल। खेत-पथार देखल, जाहि पर हुनक मैनेजरक सन्तानक गौर-कानूनी अधिकार छैक। आ बिना केबार-खिड़कीक ठाढ़ लूटाएल एवं खण्डहर बनल राजा साहबक महल देखल। राजा साहबक लुटाएल एवं खण्डहर भेल महल प्रत्येक अनुरागीके ँ मैथिली भाषा साहित्यक विकास-गाथा ठोहि पारि कहैत रहैत अछि। राजा साहबक देहवसान पर शोक व्यक्त करैत मिथिला मिहिर लिखैत अछि - ‘आँखें भर आती है, कलेजा फटा जाता है, लेखनी थर्रा रही है। न रोये बिना कलेजा हल्का नहीं होता, इसलिये मेरा लिखना रोना समझिये। काल! तूँ सचमुच काल ही नहीं, क्रूर और निष्ठुर भी हो। अभी पण्डित राधाकृष्ण झा की मृत्यु शोक जरा भी मलिन होने नहीं पाया था कि हमारे समाज गगन के ज्वलन्त नक्षत्रा राजा टंकनाथ चौधरी बी.ए. को उठा ले गया।’ किन्तु जाधरि मैथिली भाषा साहित्य रहत एवं विश्वविद्यालयमे मैथिलीक प्रवेशक सन्दर्भ जखन-जखन आओत, राजा टंकनाथ चौधरीक नाम पहिल श्रेणीक मातृभाषा अनुरागीक रूपमे आदरक संग स्मरण कएल जाइत रहत। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। नवेंदु कुमार झा आर्थिक संकट मे चेतना, दू दिनक हएत समारोह मिथिलांचलक प्रतिनिधि सांस्कृतिक संस्था चेतना समिति द्वारा प्रति वर्ष आयोजित त्रिदिवसीय विद्यापति स्मृति  पर्व समरोह ऐ वर्ष दू दिवसीय हएत। 26 आ 27 नवम्बर केँ आयोजित ऐ समारोहक दरमियान कवि गोष्ठी विचार गोष्ठी, सांस्कृतिक कार्यक्रम आ नाटकक मंचन कएल जाएत। सूत्रसॅ भेटल जनतबक अनुसार चेतना समिति, आर्थिक संकटक दौरमे अछि तैॅ ऐ वर्ष मात्र दू दिनक समारोह हएत। समितिक मठ विद्यापति भवनक गोटेक एक वर्षसॅ पुननिर्माणक काज चलि रहल अछि तेॅ समितिक आमदनी घटि गेल अछि। आमदनी घटलाक संग महगीक ऐ दौरमे खर्च कम नै भेल आ समितिपर आर्थिक संकट आबि गेल अछि तेॅ अपन सीमित संसाधनक कारण आर्थिक संतुलन बनाएल रखबाक लेल बहु प्रतीक्षित वार्षिक आयोजनक समय अवधिमे कटौती कएलक अछि। समारोहक आयोजन लेल भेल बैसारक दरमियान विद्वान सचिव, कर्मठ अध्यक्ष आ जीनियस मार्गदर्शक समितिक आर्थिक संकटक जनतब दैत समारोह मात्र दू दिन आयोजित करबाक निर्णय सुनौलनि तँ समितिक मठाधीश सभक स्वाभिमान एकाएक जागि उठल आ ओ ऐपर अपन विरोध जनौलनि मुदा तीन सदस्यीय ई प्रतिभा सम्पन्न कोर कमिटी ऐपर कान नै देलक आ अपन निर्णयपर मोहर लगैबामे सफल रहल। ओना तॅ देशमे विदेशी निवेशक कारण आर्थिक संकटक बदरि लगबाक आशंका विरोधी दल केँ भऽ रहल अछि मुदा ऐ आर्थिक संकट सभसॅ पहिल शिकार जेना चेतना समिति भऽ गेल अछि। समितिक ऐ निर्णयसॅ राजधानी पटनाक सक्रिय सामाजिक-सांस्कृतिक मैथिलजन आक्रोषमे छथि। ओ समितिकेँ आर्थिक संकटसॅ उबारबाक लेल अपन योगदान देबऽ चाहैत छथि मुदा चेतनाक मठाधीश कर्ताधर्ता जेना अचेत भऽ गेल छथि। हुनका समाजसॅ सहयोग लेबऽ मे कोनो रूचि नै छनि। ओ अपन असफलताकेँ उजागर नै होमए देबऽ चाहैत छथि तँ बाबा विद्यापतिक मठ बनल चेतना समितिक मठाधीशक गर्दनिमे घंटी बन्हबाक लेल सेहो ओ अपन समयक बर्बादी बुझि रहल अछि। पटनामे एक समय समितिक सक्रियताक कारण तीन दिन विद्यापति स्मृति पर्व समारोह प्रदेश भरिमे चर्चाक विषय बनैत छल। समय दर समय आम मैथिलक प्रति समितिक उदासीनता सॅ ऐ समारोहक दायरा घटैत जा रहल अछि आ कहियो हार्डिंग पार्क सन पैघ मैदान ऐ समारोहक लेल छोट पड़ि जाइत छल तँ आब उद्घाटन समारोह आ कवि सम्मेलनक लेल जगह पैघ भऽ जाइत अछि। मैथिल जनक ऐ समारोहक प्रति घटैत रूचिक कारण समारोह पर अस्तित्वक संकट आबि गेल अछि। तीन दिनक वार्षिक आयोजन आब दू दिवसीय भऽ रहल अछि। दू दिनक कार्यक्रम आयोजित करबाक निर्णयक बचावक लेल समिति सेहो जोड़गर तर्क रखने अछि। समिति सूत्र ऐ संबंध मे तर्क दऽ रहल अछि जे विद्यापति भवनक पुनर्निर्माण आ कार्यक्रम स्थल नै भेटलाक कारण अवधि घटाओल गेल अछि। कार्यक्रम प्रति वर्ष निश्चित समयपर निर्धारित अछि तँ समिति कार्यक्रम स्थल आरक्षित करबामे विलम्ब किए केलक, ऐपर मौन अछि। दरअसल समितिपर व्यक्तिवादी एकाधिकार हावी अछि। ऐ एकाधिकारक चुनौती देबाक साहस केओ नै करऽ चाहैए। एक दिस समिति ऐ वार्षिक आयोजनकेँ औपचारिकता बुझि रहल अछि तँ राजधानीक मैथिल जन सेहो एकर जयबारी आयोजन बुझि अपन उपस्थिति दर्ज करैबाक प्रयास करैत छथि। (मुख्यमंत्री पाक यात्राक बिहार सरकारक आन समाद www.prdbihar.gov.in or www.prdbihar.gov.org पर उपलब्ध अछि। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com  पर पठाउ। ३. पद्य ३.१.जगदीश चन्द्र ठाकुर ‘अनिल’- की भेटल आ की हेरा गेल  (आत्म गीत)- (आगाँ) ३.२.जगदीश प्रसाद मण्‍डल गोटेक दर्जन गीत ३.३.१.मुन्नी कामत-पाँच टा बाल कविता २.जगदानन्द झा मनु-बाल गजल ३.४.राजदेव मण्‍डल जीक दू गोट कवि‍ता ३.५. जगदीश चन्द्र ठाकुर ‘अनिल’-बाल गीत ३.६.ओम प्रकाश-गजल ३.७.रामवि‍लास साहु- बाल कविता ३.८.१.किशन कारीगर- घोटालाबला पाइ २.अजीत मिश्र-दीआबाती ३.श्याम दरिहरे- ओबामा ओबामा ओबामा जगदीश चन्द्र ठाकुर ‘अनिल’ की भेटल आ की हेरा गेल  (आत्म गीत)- (आगाँ) बाबूकें रहै छलनि हमरा बुधियार बनएबाकेर चिंता ओ देखथि लौकिक क्रिया-कर्म आ काज पड़ल सोझां सभटा पोथीसं हम्मर प्रेम देखि ओ छला बहुत किछु डेरा गेल, हम सोचि रहल छी जीवनमे की भेटल आ की हेरा गेल। से पिता पुत्रसं हारि गेला आ जीत गेल पोथी-पतरा की गाम-घर, की क्रिया-कर्म ओ बिसरि गेला चिंता सभटा, की जन्मभूमि, की सर-कुटुंब सभ दुनियादारी बिला गेल, हम सोचि रहल छी जीवनमे की भेटल आ की हेरा गेल। हमरहि सोझांमे एक राति बाबूजी अंतिम सांस लेलनि तजि जीर्ण-शीर्ण एहि कायाकें नव कायाले’ प्रस्थान केलनि चलितो-चलितो एहि दुनियासं ओ छला बहुत किछु सिखा गेल, हम सोचि रहल छी जीवनमे की भेटल आ की हेरा गेल। घुरलहुं कए वरखक बाद गाम उजड़ल उपटल बिलटल देखलहुं जै घरकें बाबू बना गेला ओइ घरकें खसल-पड़ल देखलहुं सभटा लताम, सभटा नेबो सभटा गुलाब छल सुखा गेल, हम सोचि रहल छी जीवनमे की भेटल आ की हेरा गेल। छल पथरायल संबंध शेष किछु वैचारिक अनुबंध शेष मनकें आनन्दित करबाले’ एखनहुं धरि छल किछु गंध शेष माइक हाथक पारल कोठी माइक सभटा दुख सुना गेल, हम सोचि रहल छी जीवनमे की भेटल आ की हेरा गेल। हम देखलहुं उल्कापात कते हम सहलहुं झंझाबात कते परिजन-प्रियजनसं बिछुड़न केर संताप कते, आघात कते सुख-दुख केर नश्वरताक पाठ अस्तित्व गुरू बनि पढ़ा गेल, हम सोचि रहल छी जीवनमे की भेटल आ की हेरा गेल। (क्रमशः) ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। जगदीश प्रसाद मण्‍डल गोटेक दर्जन गीत जोति‍ हर...... जोति‍ हर हरबाह हकड़ि‍ जि‍नगी गीत गबै छै। ले-ऊँच, ऊँच ले बनि‍ बन चोटी-ढाल बनल छै। गे भौजी, चोटी......। बून पपीह स्‍वाती पकड़ि‍ रस अमृत भरैत चलै छै। कृत्ति‍-वृत्त परकृति‍ पकड़ि‍ तरे-ऊपरे सि‍र सजै छै। गे भौजी......। लत्ती बनि‍ लतड़ि‍-पसरि‍ लतमरदन करैत रहै छै। चोटी जल टघड़ि‍-टघड़ि‍ खून पसीना एक करै छै। गे भौजी......। ओहए पानि‍ टघड़ि‍-टघड़ि‍ झील-सरोवर सेहो सजै छै। बाल-भाल कुशक कलेप मरू स्‍थल गढ़ैत रहै छै। गे भौजी......। शब्‍दार्थ- हकड़ि‍- अबाज लत- आदत लतमरदन- आदतक फल कुशक- कौशल कला। हर हलक...... हर हलक हलन्‍तमे मीर-दोल तेहल बनै छै। पुर-पुष्‍कर पुरस्‍सर बाट-घाट घटबी चलै छै। हल-हलक हलन्‍तमे... एक-दू-तीन चारि‍ रहि‍तो गति‍ इंजीन गाड़ी धड़ै छै। बेहि‍साब-हि‍साब बनि‍ बन धड़ि‍ धड़कि‍ धड़ैत रहै छै। धड़ि‍ धड़कि‍......। लंक-अयोधि‍या सटि‍-हटि‍ संगी-संग चलैत रहै छै। नि‍रशि‍ परखि‍ बाट-बटोही फल करनी भोगैत रहै छै। फल करनी......। शब्‍दार्थ- हलन्‍त- घटबी धड़ि‍- भीत्ता, धड़कन नि‍रखि‍- शुद्धि‍, पवि‍त्र। हि‍म-गि‍रि...... हि‍म-गि‍रि‍ उत् उतूंग उमड़ि‍ नि‍रमल अमृत धार बहै छै। सि‍ख-शि‍खर सि‍हैर-सहैर गंग अकास बहैत रहै छै। गंग अकास......। उतरे-दछि‍ने धड़ैन धार शि‍खर-सगर देखबै छै। रंग-रंग फूल माल सजि‍ मन गंग साजि‍ सजै छै। मन गंग......। हटि‍-सटि‍, सटि‍-हटि‍ बैस-बेस सागर-शि‍खर धड़ैत रहै छै। गंग-अकास उतड़ि‍-उतड़ि‍ गंग-अकास......। शब्‍दार्थ- सि‍हैर सहैर- द्रवि‍त भऽ टघड़ब, धड़ैन- धरती (धरणी) बैस-वेस- भेष बना बैसब। भुवन भूचलि...... भुवन भूचलि‍ अकास रंग-रंग तारा सजै छै। तीन मि‍लि‍ डंड तराजू सभक तौल-मपैत रहै छै। सभक......। कखनो दायाँ वायाँ कखनो कीर-कि‍रदानी करैत रहै छै। तेकठीक आस बि‍नु पौने उदय-अस्‍त करैत रहै छै। उदय......। सातो सगर देखि‍ सतभैंया कचबच बचकच करैत रहै छै। भोर होइत भहड़ि‍-भड़ड़ि‍ थकतका थकथका सेज सजै छै। थकतका......। शब्‍दार्थ- डंड-तरजू- मेघमे तीन तारा मि‍लि‍ सोझा-सोझी रहैत। सतभैंया- मेघमे सात तरेगन, जेकरा कचबचि‍या सेहो कहल जाइ छै। खुजि‍ते आँखि...... खुजि‍ते आँखि‍ तड़पि‍ तड़पि‍ पृथि‍वी पग पएर पड़ै छै। धरती-अकास बीचो-बीच खम्‍भ भेल देखै छै। खम्‍भ......। अकास अमरीत बरसि‍ खोंइछ धरती भरैत रहै छै। आसा-आस मि‍लि‍ बैसि‍ बरहमासा गबैत रहै छै। भाय यौ, बरहमासा......। पर-वत बत-पर संग-संग हेल समुद्र हेलैत रहै छै। बालु ऊपर ढेर-बनि वन ढुइस हेल हेलैत रहै छै। मीत यौ, अहींकेँ कहै छै ढुइस......। मुड़जन मनुहर...... मुड़जन मनुहर पकड़ि‍-पकड़ि‍ तान वि‍रूदावली तनै छै। दोहन-दौजी कुदि‍-चमकि‍ रचि‍-रचि‍ रास रचै छै। संगी, रचि‍-रचि‍......। मुसुक मुसकी मसकि‍-मसकि‍ कन-आनन अनैत रहै छै। नेंगरा-लुलहा, जरल-मरल बेणु-वन वीणा तनै छै। संगी, वेणु-वन......। शूर-सूर, मूड़ मुड़ि‍-मूड़ि‍ पग-प्रेम पबैत रहै छै। लट्ट-चूड़ा, खट्टा दही भोज ब्रह्म गाबि‍ कहै छै। संगी, ब्रह्म......। शब्‍दार्थ- मुड़जन- अगुआएल, एक नम्‍बर मुनहर- बड़का बखारी दोहन- दौजी (अन्नमे दोहन, फलमे दौजी, अर्थात् दू नम्‍बर।) हँसी, खुशी, मुश्‍की, मुसुक इत्‍यादि‍क लि‍ंक छै। शूर- योद्धा सूर- कवि‍ सूरदास। गोधूलि‍-बेल...... गोधूलि‍-बेल डगर डगरि‍ थन-माइक थुथुन थुथबै छै। आस सूर्ज असतन पाबि‍ तर-ऊपर चमकए लगै छै। तर-ऊपर......। अबैत करूआएल काल देखि‍ पग-पगहा पाछू घीचै छै। पाँचम पहर पहल पहीर रग-रग रंग रगड़ए लगै छै। दीब साँझक दि‍व्‍य पाबि‍ सगुनि‍याँ कहबए लगै छै। सगुनि‍याँ......। राति‍ दबा दबदबाइत प्रभा भाेर-भुरुकबा जगबै छै। दुर-दुरा, दुर-दुरा दूर प्रात सूर्ज घीचने अबै छै। प्रात सूर्ज......। दौड़ि‍-दौड़...... दौड़ि‍-दौड़ दाउर घोर-घन बाट नहि‍ भेटै छै। कारी-भारी भारी करि‍-करि‍ अन्‍ह घाट बनबै छै। अन्‍ह घाट......। अन्‍हार घर साँपे-साँप वि‍सवि‍साह बनबै छै। इजोतो अनरोख भऽ भऽ घोर-घनघोर करै छै। घोर-घनघोर......। लीला बड़ लीलाधर बड़-बड़ राशि‍ रास रचै छै। मत् मन मत मत-मत मस्‍ती चालि‍ धड़ै छै। मस्‍ती चालि‍......। शब्‍दार्थ- दौड़- ठेकान करि‍-करि‍- करब अनरोध- झलहन्‍हार मत- वि‍चार मत- नि‍शाएल। चोट-चाट...... चोट-चाट चोटि‍या देलकै मुँह-नाक भसका देलकै। चोट-चाट......। कान कनक छीनि‍-वीनि‍ बहीर बौक बना देलकै। नाक-मुँह-कान ताकि‍ चोट-चाट चोटि‍या देलकै चोट-चाट......। बहीर-बौक मि‍लि‍-मि‍लि मलि‍ आँखि‍ मसका देलकै। गन्‍ह महक महक गन्‍ह दि‍न-राति‍ गनहा देलकै। दि‍न-राति‍......। साँझ बेला वेली फूलि‍ भोर-भुरुकवा कहै छै। रातु पार खेपि‍-खेप पाट सन धड़बैत चल छै। पाट सन......। शब्‍दार्थ- छीनि‍-वीि‍न- छीन कऽ बि‍ड़हाएब। चाइन चेन...... चाइन चेन थर-थीर थि‍ति‍ते चान-मुँह मुस्‍की भरै छै। हास-परि‍हास अट्टाहास लोक सूर्ज पहुँचए लगै छै। लोक सूर्ज......। तन-तना तक ताकि‍ तरेगन हि‍या-हि‍या देखैत रहै छै। रंग एक रोशनाइ आनि‍ लालटेन राति‍ गढ़ैत रहै छै। मीत यौ, लालटेन......। असि‍ते-अस्‍त सुधा पाबि‍ साँझ पहि‍ल अनघोल करै छै। बनि‍ सगुनि‍या तार-तारा आगूक अम्‍भ भरैत रहै छै। आगूक दम्‍भ......। दीनक दोख...... दीनक दोख कहै छी हे बहि‍ना दीनक दोख कहै छी। बात-बात बति‍या कति‍या हटि‍-हटि‍ हाट हटै छै। बत-रग्‍गर रगड़ि‍-रगड़ि‍ पीसि‍ पीस पीबै छै। हे बहि‍ना, पीसि‍-पीस......। घरे-अंगने बीज कोढ़ीक छीटि‍-गाड़ि‍ रोपैत रहै छै। फूल कोढ़ि‍क फलक तेहने जि‍नगी पाठ पढ़ैत रहै छै। हे बहि‍ना, जि‍नगी......। नि‍शाँ पीब नस-नस नि‍सया नि‍शाएल घाट तकैत रहै छै। राति‍क हारल दि‍नक मारल ि‍जनगी गीत गबैत रहै छै। हे बहि‍ना, जि‍नगी......। सगर समनदर...... सगर समनदर सड़ि‍ सरि‍त तन-मन आस सि‍रजै छै। दुर्गा देवी हे माँ काली असतन आस धड़बै छै। मीत यौ, असतन आस......। थन तन मन पशु धन परबत सीस सजबै छै। ढेर धार ढेरि‍आएल घाट मन मनु माँ कहबै छै। मीत यौ, मन मनु......। पाश बैसि‍ बसि‍या बुलकि‍ जि‍नगी तानि‍ नचै छै। हे माँ, नगर बीच रीति‍-रीत सती-सावि‍त्री पुछै छै। मीत यौ, सती......। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। १.मुन्नी कामत-पाँच टा बाल कविता २.जगदानन्द झा मनु बाल गजल १ मुन्नी कामत पाँच टा बाल कविता १ बेटी छोड़ऽ कक्का बेटा-बेटी कऽ अंतरक खेल। सोचऽ तूँ एक बेर बेटा-बेटी मे की फरक भेल। बेटा कनेतऽ पर बेटी पोछतऽ लोर बेटा पर एक कुल मुदा बेटी पर दू कुल करतऽ इजोत। थाकि-हारि कऽ जब तूँ कतौ सँ एबहक कक्का स्नेह बरसाबै लऽ आगु जेतऽ बेटी। कुछ दिन कऽ मेजमान बनि ई तोरा घर आइल छऽ तोहर दुलार आ आशीष लऽ कऽ चुप-चाप चलि जेतऽ बेटी। तब फाटतऽ तोहर कोढ़ आ अंतरमन सँ एतऽ एगो आवाज कि अगला जनम तूँ फेर अइ आंगन मे अहियहन बेटी। २ कारी-बजार कारी-धन कारी-बजारी कारी चादरसँ लिपटल हमर देश अछि। केना बेदाग करब अकरा सगदर कारी-स्याह अछि। निचाँ-निचाँ की देखब जब उपरे अंधकार अछि कोनो दोसर नै रंग अतऽ सगदर कारी-बजार अछि। राष्ट्रपति होए या प्रधानमंत्री सब कऽ सब दरिद्र अछि कि कहब बेशर्मी कतेक हद तक अकरा देहमे समैल अछि। भगाबू अइ दिम्मक कऽ अपन घर सँ नै तँ ई हड्डी तक खाइ लऽ तैयार अछि सोचु -बिचारू अपनामे अहीं कऽ हाथमे कैलक सरकार अछि। ३ शब्दक खेल चुन्नु- अ सँ अनार आ सँ आम रटैत जी थोथरा गेल आब नै खेलब हम ई शब्दक खेल। मांॅ-    तँ चलू उराबऽ चलि पतंग हरियर अपन लाल ओकर पिअर भइया कऽ आब कहू सब मिलाकऽ कतेक उड़ि रहल अछि पतंग। चुन्नु- अतौ तँ अछि सवालक जाल मांॅ हमरा पहिले ई बता दिअ एक सँ आगाँ कतेक होइ छै से सिखा दिअ मांॅ-    तँ कहू आब कहियो नै उबबै अइ खेल सँ नै उलझबै अंकक अइ जाल सँ तब हम अहाँ कऽ सब सिखैब। सब सबालक जबाब अहाँ कऽ बनैब। ४ मांॅ बता तूँ एगो बात मांॅ बता तूँ एगो बात खोल तूँ ई मेघक राज के सब रहै छै ओतऽ कि छै ओकरा सबहक काज। भोरक सुन्दर सुरज दुपहर कऽ किए जरबै छै साँझ पड़ैत फेर कतऽ हरा जाइ छै। राइत कऽ अबै छै मामा सजा कऽ मोतियक थार कि ओतौ छै बहुत बड़का संसार। कहियो देखै छी कनिये कहियो बेसी कहियो तँ साफे नै देखाइ यऽ तूँ बता मांॅ मामा एना किए नुका-छुप्पी कऽ खेल खेलै यऽ। सुनु बउआ हमर बात बिना पढ़ने नै खुलत ई राज जेना-जेना अहांॅ पढ़ैत जएब सब भेद कऽ भेदैत जएब। ५ अनहार घरमे हत्या हम बेटी छी तँ हमर कोन दोष हमहुँ तँ एगो जान छी हमरो आँखि यऽ कान यऽ मुँह यऽ हम नै निष्प्राण छी। नै चलाबू एना कैंची हमर मन डराइ यऽ देखियौ हमर कटल हाथ सँ लाले खुन बहै यऽ। अनहार घर सँ तँ निकलऽ दिअ एक बेर तँ हमरो अइ निष्ठुर संसारकेँ देखऽ दिअ। केना लेलक अतऽ जन्म सिता ओइ रहस्यकेँ जानऽ दिअ हमरा नै मारू जकरा लोग पुजै छै ओइ मायक मँुह देखऽ दिअ। २ जगदानन्द झा मनु बाल गजल  चलै चुनमुन चलै गुनगुन तमासा घुमि कए आबी  जिलेबी ओतए छानैत तोहर भेटतौ बाबी 

पढ़ैकेँ छुटल झंझट भेल इसकूलक शुरू छुट्टी  दसो दिन राति मेला घुमि कए नव वस्तु सभ पाबी 

करीया बनरिया कुदि कुदि कए नाचै बजाबै बिन  चलै चल ओकरा संगे हमहुँ नेन्ना कनी गाबी 

बनल मेनजन अछि बकड़ी पबति बैसल अचारे छै  बरद सन बौक दिनभरि चूप्प रहए पहिरने जाबी    

बुझलकौ आब तोरो होसयारी 'मनु' तँ बुढ़िया गै  लगोने ध्यान वक कतएसँ सम्पति नीकगर दाबी    

(बहरे हजज) ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। राजदेव मण्‍डल दूटा कवि‍ता इमानदारी इमानदारी बि‍कैत छै बेनाम लाख, करोड़ आ टका-छेदाम सभ रंग दाम सभ रंग नाम जेहने इमानदारी तेहने दाम देहाती दाम शहरी नाम जेहने टका तेहने काम इमान कहै सुनू हमर बोल हमर के लगा सकैत अछि‍ मोल टूटि‍ रहल अछि‍ पुरना खोल सहजहि‍ं फूटत नवका बोल। बेइमानी कठहँसी हँसैत अछि‍ ऊँच आसनपर वएह बसैत अछि‍ ओकरे भेटै आदर सम्‍मान इमानदारी पाबैत अपमान हमहँू नै बचल छी पूरा लगल अछि‍ बेमानीक धूरा खोजलौं ऐ पार-सँ-ओइ पार नै भेटल पूरा इमानदार बजलौं अहाँ बारम्‍बार कहू के अछि‍ इमानदार? बीआ बीआ नै अछि‍ खाली बीआ माटि, पानि‍, हवा प्रकाश सँ मि‍लतै आस छूबि‍ देत अकास आँखि‍ देख रहल अछि‍ साँच बीआ मध्‍य आँकुरक नाच कालकेँ कऽ रहल जाँच अन्‍तरमे बैसल गाछ एक-सँ-अनेक पसरल छेकने जाइत आगाँ ससरल दैत अछि‍ प्राण वायु बढ़ैत अछि‍ सबहक आयु। कि‍छु अछि बेसी कि‍छु अछि‍ कम अहीमे मि‍लल अछि‍ सत-रज-तम। एकरा अन्‍तरमे शक्‍ति‍ अपार जाएत एक दि‍न धरतीक पार बीजक प्रस्‍फोटन अछि‍ सार हरक्षण बनैत नव अाकार। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। जगदीश चन्द्र ठाकुर ‘अनिल’ बाल गीत सत्य अहिंसाकेर पुजारी  छला महात्मा गांधी ज्ञानक बड़की पैघ बखारी छला महात्मा गांधी। ओ कहलनि, एके छथि अल्ला-ईश्वर एके अछि मंदिर-मस्जिद एके थिक काबा-काशी, भारतवासीकेर  मूल एक थिक जाति एक थिक सभ छथि भारतवासी बूझि पड़ैए पड़ैए भव-भय हारी छला महात्मा गांधी ज्ञानक बड़की पैघ बखारी छला महात्मा गांधी। सत्याग्रहकेर केलनि तेहेन प्रचार, भागल भुल्ला लत्ते-पत्ते सात समुंदर पार ब्रह्मा, विष्णु और त्रिपुरारी छला महात्मा गांधी ज्ञानक बड़की पैघ बखारी छला महात्मा गांधी। ओ कहलनि सौंसे दुनियाकेँ बनय एकटा गाम, सभकें भेटै रोजी-रोटी स’भ चुआबए घाम दुनियामे सभसँ उपकारी छला महात्मा गांधी ज्ञानक बड़की पैघ बखारी छला महात्मा गांधी । ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। ओम प्रकाश गजल करेजक बात नै कहियो बनल एतय कियो सुनलक कहाँ मोनक कहल एतय सुखायल गाछकेँ पटबैसँ की हेतै फरत कोना जखन गाछे जरल एतय हँसी कीनैत रहलौं सदिखने ऐठाँ लए छी हम नुका आत्मा मरल एतय लिखलकै भाग्य बिधि सबहक अलग कलमसँ कपारक गप कियो नै पढि सकल एतय गडै पर शूल "ओम"क आह नै निकलै भऽ गेलौं सुन्न काँटे टा गडल एतय बहरे-हजज मफाईलुन (ह्रस्व-दीर्घ-दीर्घ-दीर्घ) - ३ बेर प्रत्येक पाँतिमे ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। रामवि‍लास साहु बाल कवि‍ता मेघक बरि‍आती- तारबतोर पूरबा बहै दि‍न-राित बहै नै थके गति‍ मन्‍द पड़ि‍ते गर्मी चढ़ल असमान उसनि‍याँ करनाइ शुरू भेल एहेन अचरज कहि‍यो नै भेल गर्मी भगबै ले मेघक बरि‍आती शुरू भेल भंडार कोणसँ गरजैत ढनकैत सेना संगे मेघ धमकि‍ गेल आगू-आगू अन्‍हर बि‍हारि‍ पाछू संगे शीतल वयार ढन-ढन ढमकैत बि‍जुरी चमकैत मेघक बरि‍आती आबए लगल देखते मेघक बरि‍आती गर्मी जान बचा भागए लगल मेघक बरि‍आती पछारैत गेल झम-झम बर्खा बरसि‍ गेल गर्मीक परकोपसँ छुट्टी भेल मेघक बरि‍आती घूमि‍ घर गेल। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। १.किशन कारीगर- घोटालाबला पाइ २.अजीत मिश्र-दीआबाती ३.श्याम दरिहरे- ओबामा ओबामा ओबामा १ किशन कारीगर घोटालाबला पाइ (हास्य कविता) ई पोटरी त हमरा सँ उठने नहि उठि रहल अछि कनेक अहूँ जोड़ लगा दिय भाई ई छी घोटालावला पाई। हम पूछलियन ई की छी ओ हमरा कान में कहलनि कोयला बेचलाहा सभटा रुपैया हम एही पुत्री में रखने छि . हमरा सात पुस्त लोकक गुजर एही रुप्पैया स चली जायत हम धरती में पैर नहीं रोपाब आई इ छि घोटालावला पाई। चुपेचाप थोड़ेक अहूँ लिय मुदा केकरो सँ कहबई नहि भाई सरकारी संपित हम केलियई राई-छाई इ छि घोटालावला पाई। कोयला भूखंडक बाँट-बखरा दुआरे मंत्रिमंडल के सर्जरी भेल लोक हो-हल्ला केलक मुदा कोयला दलाली के नफ्फा हमरे ता भेल। फेर मंत्री पद भेटैत की नहि? ताहि दुआरे चुपेचाप पोटरी बनेलौहं सभटा अपने नाम केने छि भाई ई छी घोटालावला पाई। देखावटी दुआरे सरकारी खजाना  पर बड़का-बड़का ताला लटकने छि मुदा राति होएते देरी हमीह भेष बदली खजाना लूटि लैत छी। मंत्रीजी के कहल के नहि मानत? सरकारी मामला में कियक किछु बाजत? चुपेचाप सभटा काज होयत छैक औ भाई ई छी घोटालावला पाई। २ अजीत मिश्र दी न-हीन हो वा धनवान आ शा भरल सभे जहान बा ट-घाटमे  गर्दमिशान ती रभुक्तिमे भरल महान। प कबान सङ हाथ मखान र ङ्ग-रङ्गकेर पाबि समान ब लिहारी एहि परब जुगाइन। म ङ्गल चहु, मिथिला महान हा थ माथ पर सभे जहान न त-मति हमसभ, हे भगवान। ३ श्याम दरिहरे ओबामा ओबामा ओबामा ओबामा ओबामा ओबामा हंगामा हंगामा हंगामा जीतल ओबामा हारल अछि मेकन हारि गेल पालिन आ जीति गेल बैदन अमेरिका तऽ सहजे सुकराती नचैए दुनियाक लोक सेहो फगुआ गबैेए गोरकीक उपर करीक्कीक भाव बढ़ल व्हाइट हाउसक कुर्सी पर बलैकमैनक दाव लहल उजरत इराक नइ फनकत इरान नइ डूबत ने बैंक कोनो एआइजी की लेहमैन दुनियामे समताक डंका पिटायत लादेनके मानवसऽ इरखा मिटायत फूटत ने बम कतउ मरत ने लोक कतउ सस्तेमे तेल आ सस्तेमे गैस भेटत मड़रके बेटा आब नैनो चलायत सुकनीक देहमे एन्जलीना फुलायत चिबायब ने रोटी चाभब आब कूकी गंगाक बदला पेप्सीएमे नहायब गेनमाक बेटीके चान पर पठाएब बुधना आब घोंघाक माला ने पहिरत गीधना ने कहिओ भैंसी चरायत चन्डेभाइ किनि लेता जीन्स आ टी शर्ट भौजी के परसुए हालीउड घुमायब।

थीर रहू धीर धरू मोन भरमाउ नइ पानिएमे माछ अछि कुट्टी लुटाउ नइ कइओबेर अब्दुल्ला अछि नाचल अनठीया बिआहमे हरबड़मे खेयाली पुलाव बरकाउ नइ देखल छथि काटर आ देखले छथि क्लिंटन देखि लेलहुँ बुश देखलहुँ हुनकर फुस्स ओबामाक दीआमे तेल कते राखल अछि ओकरे ता अटकर लगाबऽ तऽ दीअऽ नवे अछि घोड़ा परेखऽ तऽ दीअऽ खाइए कते आ बहैए कते दुलकी चलैए की सरपट भगैए सम्हारत इरान की सुतारत पाकिस्तान कोरिया खेहारत की चीन परतारत काबुल बचायत की पछारत गऽ रूस की लेने देने पड़ि जायत हरो पालो थुस्स। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। विदेह नूतन अंक मिथिला कला संगीत राजनाथ मिश्र चित्रमय मिथिला स्लाइड शो चित्रमय मिथिला (https://sites.google.com/a/videha.com/videha-paintings-photos/ ) उमेश मण्डल मिथिलाक वनस्पति स्लाइड शो मिथिलाक जीव-जन्तु स्लाइड शो मिथिलाक जिनगी स्लाइड शो मिथिलाक वनस्पति/ मिथिलाक जीव जन्तु/ मिथिलाक जिनगी  (https://sites.google.com/a/videha.com/videha-paintings-photos/ ) विदेह नूतन अंक गद्य-पद्य भारती १. मोहनदास (दीर्घकथा):लेखक: उदय प्रकाश (मूल हिन्दीसँ मैथिलीमे अनुवाद विनीत उत्पल) मोहनदास (मैथिली-देवनागरी) मोहनदास (मैथिली-मिथिलाक्षर) मोहनदास (मैथिली-ब्रेल) २.छिन्नमस्ता- प्रभा खेतानक हिन्दी उपन्यासक सुशीला झा द्वारा मैथिली अनुवाद छिन्नमस्ता ३.कनकमणि दीक्षित (मूल नेपालीसँ मैथिली अनुवाद श्रीमती रूपा धीरू आ श्री धीरेन्द्र प्रेमर्षि) भगता बेङक देश-भ्रमण बालानां कृते १.जगदीश चन्द्र ठाकुर ‘अनिल’-बाल गजल २.राजदेव मण्‍डल- बाल कवि‍ता १ जगदीश चन्द्र ठाकुर ‘अनिल’ बाल गजल १ भोरहि सभकें आबि जगा कोइली हमरा आंगन आ। घ’रहुमे भऽ गेल दुगोला सभकें प्रेेमक पाठ पढ़ा। बात-बातमे खापड़ि फूटै सभकें सुंदर बोल सिखा। स’भ घ’र लागय अपने एहेन स्नेहक दीप जड़ा। लक्ष्मी आबथु स’भ घ’रमे दरिद्रताकें दूर भगा। मच्छर भरि गांमे पैसल सभ जनकें डेंगूसं बचा। २ कत’ खसलियै  यौ पापा कोना क’एलियै यौ पापा । पान तमाकुल गुटका खेलौं दांत गमेलियै यौ पापा । लीभर काज करत कहिया धरि शराब  पिलियै यौ पापा । खोलि देलक इसकूल घ’रमे कोना कमेलियै यौ पापा । महल छोड़िक’ जहलमे एलौं कते लुटलियै यौ पापा । लोकतंत्रकें जर्जर केलियै मूस बनलियै यौ पापा। २ राजदेव मण्‍डल बाल कवि‍ता छीपपर दीप नमगर बाँसक छीप पर नाचैत दीप अपने देहकेँ जारि‍-जारि‍ तैयो टेमीकेँ सम्‍हारि‍ अन्‍हारकेँ ललकारि‍ हवासँ करैत मारि‍ एक्के धूनमे चलि‍ रहल समताक लेल गलि‍ रहल जेतबे क्षमता छै तेतबे दोग-दागमे फैलि‍ रहल बटोहीकेँ देखबैत बाट हरा ने जाइ कहीं कुबाट। देत प्रकाश सभकेँ लड़ैत अन्‍हारसँ भरि‍ राति‍ कि‍न्नौं नै देखतै केकरो रंग, रूप आ जाति‍। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। बच्चा लोकनि द्वारा स्मरणीय श्लोक १.प्रातः काल ब्रह्ममुहूर्त्त (सूर्योदयक एक घंटा पहिने) सर्वप्रथम अपन दुनू हाथ देखबाक चाही, आ’ ई श्लोक बजबाक चाही। कराग्रे वसते लक्ष्मीः करमध्ये सरस्वती। करमूले स्थितो ब्रह्मा प्रभाते करदर्शनम्॥ करक आगाँ लक्ष्मी बसैत छथि, करक मध्यमे सरस्वती, करक मूलमे ब्रह्मा स्थित छथि। भोरमे ताहि द्वारे करक दर्शन करबाक थीक। २.संध्या काल दीप लेसबाक काल- दीपमूले स्थितो ब्रह्मा दीपमध्ये जनार्दनः। दीपाग्रे शङ्करः प्रोक्त्तः सन्ध्याज्योतिर्नमोऽस्तुते॥ दीपक मूल भागमे ब्रह्मा, दीपक मध्यभागमे जनार्दन (विष्णु) आऽ दीपक अग्र भागमे शङ्कर स्थित छथि। हे संध्याज्योति! अहाँकेँ नमस्कार। ३.सुतबाक काल- रामं स्कन्दं हनूमन्तं वैनतेयं वृकोदरम्। शयने यः स्मरेन्नित्यं दुःस्वप्नस्तस्य नश्यति॥ जे सभ दिन सुतबासँ पहिने राम, कुमारस्वामी, हनूमान्, गरुड़ आऽ भीमक स्मरण करैत छथि, हुनकर दुःस्वप्न नष्ट भऽ जाइत छन्हि। ४. नहेबाक समय- गङ्गे च यमुने चैव गोदावरि सरस्वति। नर्मदे सिन्धु कावेरि जलेऽस्मिन् सन्निधिं कुरू॥ हे गंगा, यमुना, गोदावरी, सरस्वती, नर्मदा, सिन्धु आऽ कावेरी  धार। एहि जलमे अपन सान्निध्य दिअ। ५.उत्तरं यत्समुद्रस्य हिमाद्रेश्चैव दक्षिणम्। वर्षं तत् भारतं नाम भारती यत्र सन्ततिः॥ समुद्रक उत्तरमे आऽ हिमालयक दक्षिणमे भारत अछि आऽ ओतुका सन्तति भारती कहबैत छथि। ६.अहल्या द्रौपदी सीता तारा मण्डोदरी तथा। पञ्चकं ना स्मरेन्नित्यं महापातकनाशकम्॥ जे सभ दिन अहल्या, द्रौपदी, सीता, तारा आऽ मण्दोदरी, एहि पाँच साध्वी-स्त्रीक स्मरण करैत छथि, हुनकर सभ पाप नष्ट भऽ जाइत छन्हि। ७.अश्वत्थामा बलिर्व्यासो हनूमांश्च विभीषणः। कृपः परशुरामश्च सप्तैते चिरञ्जीविनः॥ अश्वत्थामा, बलि, व्यास, हनूमान्, विभीषण, कृपाचार्य आऽ परशुराम- ई सात टा चिरञ्जीवी कहबैत छथि। ८.साते भवतु सुप्रीता देवी शिखर वासिनी उग्रेन तपसा लब्धो यया पशुपतिः पतिः। सिद्धिः साध्ये सतामस्तु प्रसादान्तस्य धूर्जटेः जाह्नवीफेनलेखेव यन्यूधि शशिनः कला॥ ९. बालोऽहं जगदानन्द न मे बाला सरस्वती। अपूर्णे पंचमे वर्षे वर्णयामि जगत्त्रयम् ॥ १०. दूर्वाक्षत मंत्र(शुक्ल यजुर्वेद अध्याय २२, मंत्र २२) आ ब्रह्मन्नित्यस्य प्रजापतिर्ॠषिः। लिंभोक्त्ता देवताः। स्वराडुत्कृतिश्छन्दः। षड्जः स्वरः॥ आ ब्रह्म॑न् ब्राह्म॒णो ब्र॑ह्मवर्च॒सी जा॑यता॒मा रा॒ष्ट्रे रा॑ज॒न्यः शुरे॑ऽइषव्यो॒ऽतिव्या॒धी म॑हार॒थो जा॑यतां॒ दोग्ध्रीं धे॒नुर्वोढा॑न॒ड्वाना॒शुः सप्तिः॒ पुर॑न्धि॒र्योवा॑ जि॒ष्णू र॑थे॒ष्ठाः स॒भेयो॒ युवास्य यज॑मानस्य वी॒रो जा॒यतां निका॒मे-नि॑कामे नः प॒र्जन्यों वर्षतु॒ फल॑वत्यो न॒ऽओष॑धयः पच्यन्तां योगेक्ष॒मो नः॑ कल्पताम्॥२२॥ मन्त्रार्थाः सिद्धयः सन्तु पूर्णाः सन्तु मनोरथाः। शत्रूणां बुद्धिनाशोऽस्तु मित्राणामुदयस्तव। ॐ दीर्घायुर्भव। ॐ सौभाग्यवती भव। हे भगवान्। अपन देशमे सुयोग्य आ’ सर्वज्ञ विद्यार्थी उत्पन्न होथि, आ’ शुत्रुकेँ नाश कएनिहार सैनिक उत्पन्न होथि। अपन देशक गाय खूब दूध दय बाली, बरद भार वहन करएमे सक्षम होथि आ’ घोड़ा त्वरित रूपेँ दौगय बला होए। स्त्रीगण नगरक नेतृत्व करबामे सक्षम होथि आ’ युवक सभामे ओजपूर्ण भाषण देबयबला आ’ नेतृत्व देबामे सक्षम होथि। अपन देशमे जखन आवश्यक होय वर्षा होए आ’ औषधिक-बूटी सर्वदा परिपक्व होइत रहए। एवं क्रमे सभ तरहेँ हमरा सभक कल्याण होए। शत्रुक बुद्धिक नाश होए आ’ मित्रक उदय होए॥ मनुष्यकें कोन वस्तुक इच्छा करबाक चाही तकर वर्णन एहि मंत्रमे कएल गेल अछि। एहिमे वाचकलुप्तोपमालड़्कार अछि। अन्वय- ब्रह्म॑न् - विद्या आदि गुणसँ परिपूर्ण ब्रह्म रा॒ष्ट्रे - देशमे ब्र॑ह्मवर्च॒सी-ब्रह्म विद्याक तेजसँ युक्त्त आ जा॑यतां॒- उत्पन्न होए रा॑ज॒न्यः-राजा शुरे॑ऽ–बिना डर बला इषव्यो॒- बाण चलेबामे निपुण ऽतिव्या॒धी-शत्रुकेँ तारण दय बला म॑हार॒थो-पैघ रथ बला वीर दोग्ध्रीं-कामना(दूध पूर्ण करए बाली) धे॒नुर्वोढा॑न॒ड्वाना॒शुः धे॒नु-गौ वा वाणी र्वोढा॑न॒ड्वा- पैघ बरद ना॒शुः-आशुः-त्वरित सप्तिः॒-घोड़ा पुर॑न्धि॒र्योवा॑- पुर॑न्धि॒- व्यवहारकेँ धारण करए बाली र्योवा॑-स्त्री जि॒ष्णू-शत्रुकेँ जीतए बला र॑थे॒ष्ठाः-रथ पर स्थिर स॒भेयो॒-उत्तम सभामे युवास्य-युवा जेहन यज॑मानस्य-राजाक राज्यमे वी॒रो-शत्रुकेँ पराजित करएबला निका॒मे-नि॑कामे-निश्चययुक्त्त कार्यमे नः-हमर सभक प॒र्जन्यों-मेघ वर्षतु॒-वर्षा होए फल॑वत्यो-उत्तम फल बला ओष॑धयः-औषधिः पच्यन्तां- पाकए योगेक्ष॒मो-अलभ्य लभ्य करेबाक हेतु कएल गेल योगक रक्षा नः॑-हमरा सभक हेतु कल्पताम्-समर्थ होए ग्रिफिथक अनुवाद- हे ब्रह्मण, हमर राज्यमे ब्राह्मण नीक धार्मिक विद्या बला, राजन्य-वीर,तीरंदाज, दूध दए बाली गाय, दौगय बला जन्तु, उद्यमी नारी होथि। पार्जन्य आवश्यकता पड़ला पर वर्षा देथि, फल देय बला गाछ पाकए, हम सभ संपत्ति अर्जित/संरक्षित करी। विदेह नूतन अंक भाषापाक रचना-लेखन इंग्लिश-मैथिली-कोष / मैथिली-इंग्लिश-कोष  प्रोजेक्टकेँ आगू बढ़ाऊ, अपन सुझाव आ योगदान ई-मेल द्वारा ggajendra@videha.com पर पठाऊ। Top of Form विदेहक मैथिली-अंग्रेजी आ अंग्रेजी मैथिली कोष (इंटरनेटपर पहिल बेर सर्च-डिक्शनरी) एम.एस. एस.क्यू.एल. सर्वर आधारित -Based on ms-sql server Maithili-English and English-Maithili Dictionary. १.भारत आ नेपालक मैथिली भाषा-वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक शैली आ २.मैथिलीमे भाषा सम्पादन पाठ्यक्रम १.नेपाल आ भारतक मैथिली भाषा-वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक शैली

१.१. नेपालक मैथिली भाषा वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक  उच्चारण आ लेखन शैली (भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक धारणाकेँ पूर्ण रूपसँ सङ्ग लऽ निर्धारित) मैथिलीमे उच्चारण तथा लेखन १.पञ्चमाक्षर आ अनुस्वार: पञ्चमाक्षरान्तर्गत ङ, ञ, ण, न एवं म अबैत अछि। संस्कृत भाषाक अनुसार शब्दक अन्तमे जाहि वर्गक अक्षर रहैत अछि ओही वर्गक पञ्चमाक्षर अबैत अछि। जेना- अङ्क (क वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ङ् आएल अछि।) पञ्च (च वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ञ् आएल अछि।) खण्ड (ट वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ण् आएल अछि।) सन्धि (त वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे न् आएल अछि।) खम्भ (प वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे म् आएल अछि।) उपर्युक्त बात मैथिलीमे कम देखल जाइत अछि। पञ्चमाक्षरक बदलामे अधिकांश जगहपर अनुस्वारक प्रयोग देखल जाइछ। जेना- अंक, पंच, खंड, संधि, खंभ आदि। व्याकरणविद पण्डित गोविन्द झाक कहब छनि जे कवर्ग, चवर्ग आ टवर्गसँ पूर्व अनुस्वार लिखल जाए तथा तवर्ग आ पवर्गसँ पूर्व पञ्चमाक्षरे लिखल जाए। जेना- अंक, चंचल, अंडा, अन्त तथा कम्पन। मुदा हिन्दीक निकट रहल आधुनिक लेखक एहि बातकेँ नहि मानैत छथि। ओ लोकनि अन्त आ कम्पनक जगहपर सेहो अंत आ कंपन लिखैत देखल जाइत छथि। नवीन पद्धति किछु सुविधाजनक अवश्य छैक। किएक तँ एहिमे समय आ स्थानक बचत होइत छैक। मुदा कतोक बेर हस्तलेखन वा मुद्रणमे अनुस्वारक छोट सन बिन्दु स्पष्ट नहि भेलासँ अर्थक अनर्थ होइत सेहो देखल जाइत अछि। अनुस्वारक प्रयोगमे उच्चारण-दोषक सम्भावना सेहो ततबए देखल जाइत अछि। एतदर्थ कसँ लऽ कऽ पवर्ग धरि पञ्चमाक्षरेक प्रयोग करब उचित अछि। यसँ लऽ कऽ ज्ञ धरिक अक्षरक सङ्ग अनुस्वारक प्रयोग करबामे कतहु कोनो विवाद नहि देखल जाइछ। २.ढ आ ढ़ : ढ़क उच्चारण “र् ह”जकाँ होइत अछि। अतः जतऽ “र् ह”क उच्चारण हो ओतऽ मात्र ढ़ लिखल जाए। आन ठाम खाली ढ लिखल जएबाक चाही। जेना- ढ = ढाकी, ढेकी, ढीठ, ढेउआ, ढङ्ग, ढेरी, ढाकनि, ढाठ आदि। ढ़ = पढ़ाइ, बढ़ब, गढ़ब, मढ़ब, बुढ़बा, साँढ़, गाढ़, रीढ़, चाँढ़, सीढ़ी, पीढ़ी आदि। उपर्युक्त शब्द सभकेँ देखलासँ ई स्पष्ट होइत अछि जे साधारणतया शब्दक शुरूमे ढ आ मध्य तथा अन्तमे ढ़ अबैत अछि। इएह नियम ड आ ड़क सन्दर्भ सेहो लागू होइत अछि। ३.व आ ब : मैथिलीमे “व”क उच्चारण ब कएल जाइत अछि, मुदा ओकरा ब रूपमे नहि लिखल जएबाक चाही। जेना- उच्चारण : बैद्यनाथ, बिद्या, नब, देबता, बिष्णु, बंश, बन्दना आदि। एहि सभक स्थानपर क्रमशः वैद्यनाथ, विद्या, नव, देवता, विष्णु, वंश, वन्दना लिखबाक चाही। सामान्यतया व उच्चारणक लेल ओ प्रयोग कएल जाइत अछि। जेना- ओकील, ओजह आदि। ४.य आ ज : कतहु-कतहु “य”क उच्चारण “ज”जकाँ करैत देखल जाइत अछि, मुदा ओकरा ज नहि लिखबाक चाही। उच्चारणमे यज्ञ, जदि, जमुना, जुग, जाबत, जोगी, जदु, जम आदि कहल जाएबला शब्द सभकेँ क्रमशः यज्ञ, यदि, यमुना, युग, यावत, योगी, यदु, यम लिखबाक चाही। ५.ए आ य : मैथिलीक वर्तनीमे ए आ य दुनू लिखल जाइत अछि। प्राचीन वर्तनी- कएल, जाए, होएत, माए, भाए, गाए आदि। नवीन वर्तनी- कयल, जाय, होयत, माय, भाय, गाय आदि। सामान्यतया शब्दक शुरूमे ए मात्र अबैत अछि। जेना एहि, एना, एकर, एहन आदि। एहि शब्द सभक स्थानपर यहि, यना, यकर, यहन आदिक प्रयोग नहि करबाक चाही। यद्यपि मैथिलीभाषी थारू सहित किछु जातिमे शब्दक आरम्भोमे “ए”केँ य कहि उच्चारण कएल जाइत अछि। ए आ “य”क प्रयोगक सन्दर्भमे प्राचीने पद्धतिक अनुसरण करब उपयुक्त मानि एहि पुस्तकमे ओकरे प्रयोग कएल गेल अछि। किएक तँ दुनूक लेखनमे कोनो सहजता आ दुरूहताक बात नहि अछि। आ मैथिलीक सर्वसाधारणक उच्चारण-शैली यक अपेक्षा एसँ बेसी निकट छैक। खास कऽ कएल, हएब आदि कतिपय शब्दकेँ कैल, हैब आदि रूपमे कतहु-कतहु लिखल जाएब सेहो “ए”क प्रयोगकेँ बेसी समीचीन प्रमाणित करैत अछि। ६.हि, हु तथा एकार, ओकार : मैथिलीक प्राचीन लेखन-परम्परामे कोनो बातपर बल दैत काल शब्दक पाछाँ हि, हु लगाओल जाइत छैक। जेना- हुनकहि, अपनहु, ओकरहु, तत्कालहि, चोट्टहि, आनहु आदि। मुदा आधुनिक लेखनमे हिक स्थानपर एकार एवं हुक स्थानपर ओकारक प्रयोग करैत देखल जाइत अछि। जेना- हुनके, अपनो, तत्काले, चोट्टे, आनो आदि। ७.ष तथा ख : मैथिली भाषामे अधिकांशतः षक उच्चारण ख होइत अछि। जेना- षड्यन्त्र (खड़यन्त्र), षोडशी (खोड़शी), षट्कोण (खटकोण), वृषेश (वृखेश), सन्तोष (सन्तोख) आदि। ८.ध्वनि-लोप : निम्नलिखित अवस्थामे शब्दसँ ध्वनि-लोप भऽ जाइत अछि: (क) क्रियान्वयी प्रत्यय अयमे य वा ए लुप्त भऽ जाइत अछि। ओहिमे सँ पहिने अक उच्चारण दीर्घ भऽ जाइत अछि। ओकर आगाँ लोप-सूचक चिह्न वा विकारी (’ / ऽ) लगाओल जाइछ। जेना- पूर्ण रूप : पढ़ए (पढ़य) गेलाह, कए (कय) लेल, उठए (उठय) पड़तौक। अपूर्ण रूप : पढ़’ गेलाह, क’ लेल, उठ’ पड़तौक। पढ़ऽ गेलाह, कऽ लेल, उठऽ पड़तौक। (ख) पूर्वकालिक कृत आय (आए) प्रत्ययमे य (ए) लुप्त भऽ जाइछ, मुदा लोप-सूचक विकारी नहि लगाओल जाइछ। जेना- पूर्ण रूप : खाए (य) गेल, पठाय (ए) देब, नहाए (य) अएलाह। अपूर्ण रूप : खा गेल, पठा देब, नहा अएलाह। (ग) स्त्री प्रत्यय इक उच्चारण क्रियापद, संज्ञा, ओ विशेषण तीनूमे लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना- पूर्ण रूप : दोसरि मालिनि चलि गेलि। अपूर्ण रूप : दोसर मालिन चलि गेल। (घ) वर्तमान कृदन्तक अन्तिम त लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना- पूर्ण रूप : पढ़ैत अछि, बजैत अछि, गबैत अछि। अपूर्ण रूप : पढ़ै अछि, बजै अछि, गबै अछि। (ङ) क्रियापदक अवसान इक, उक, ऐक तथा हीकमे लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना- पूर्ण रूप: छियौक, छियैक, छहीक, छौक, छैक, अबितैक, होइक। अपूर्ण रूप : छियौ, छियै, छही, छौ, छै, अबितै, होइ। (च) क्रियापदीय प्रत्यय न्ह, हु तथा हकारक लोप भऽ जाइछ। जेना- पूर्ण रूप : छन्हि, कहलन्हि, कहलहुँ, गेलह, नहि। अपूर्ण रूप : छनि, कहलनि, कहलौँ, गेलऽ, नइ, नञि, नै। ९.ध्वनि स्थानान्तरण : कोनो-कोनो स्वर-ध्वनि अपना जगहसँ हटि कऽ दोसर ठाम चलि जाइत अछि। खास कऽ ह्रस्व इ आ उक सम्बन्धमे ई बात लागू होइत अछि। मैथिलीकरण भऽ गेल शब्दक मध्य वा अन्तमे जँ ह्रस्व इ वा उ आबए तँ ओकर ध्वनि स्थानान्तरित भऽ एक अक्षर आगाँ आबि जाइत अछि। जेना- शनि (शइन), पानि (पाइन), दालि ( दाइल), माटि (माइट), काछु (काउछ), मासु (माउस) आदि। मुदा तत्सम शब्द सभमे ई निअम लागू नहि होइत अछि। जेना- रश्मिकेँ रइश्म आ सुधांशुकेँ सुधाउंस नहि कहल जा सकैत अछि। १०.हलन्त(्)क प्रयोग : मैथिली भाषामे सामान्यतया हलन्त (्)क आवश्यकता नहि होइत अछि। कारण जे शब्दक अन्तमे अ उच्चारण नहि होइत अछि। मुदा संस्कृत भाषासँ जहिनाक तहिना मैथिलीमे आएल (तत्सम) शब्द सभमे हलन्त प्रयोग कएल जाइत अछि। एहि पोथीमे सामान्यतया सम्पूर्ण शब्दकेँ मैथिली भाषा सम्बन्धी निअम अनुसार हलन्तविहीन राखल गेल अछि। मुदा व्याकरण सम्बन्धी प्रयोजनक लेल अत्यावश्यक स्थानपर कतहु-कतहु हलन्त देल गेल अछि। प्रस्तुत पोथीमे मथिली लेखनक प्राचीन आ नवीन दुनू शैलीक सरल आ समीचीन पक्ष सभकेँ समेटि कऽ वर्ण-विन्यास कएल गेल अछि। स्थान आ समयमे बचतक सङ्गहि हस्त-लेखन तथा तकनीकी दृष्टिसँ सेहो सरल होबऽबला हिसाबसँ वर्ण-विन्यास मिलाओल गेल अछि। वर्तमान समयमे मैथिली मातृभाषी पर्यन्तकेँ आन भाषाक माध्यमसँ मैथिलीक ज्ञान लेबऽ पड़ि रहल परिप्रेक्ष्यमे लेखनमे सहजता तथा एकरूपतापर ध्यान देल गेल अछि। तखन मैथिली भाषाक मूल विशेषता सभ कुण्ठित नहि होइक, ताहू दिस लेखक-मण्डल सचेत अछि। प्रसिद्ध भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक कहब छनि जे सरलताक अनुसन्धानमे एहन अवस्था किन्नहु ने आबऽ देबाक चाही जे भाषाक विशेषता छाँहमे पडि जाए। -(भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक धारणाकेँ पूर्ण रूपसँ सङ्ग लऽ निर्धारित) १.२. मैथिली अकादमी, पटना द्वारा निर्धारित मैथिली लेखन-शैली

१. जे शब्द मैथिली-साहित्यक प्राचीन कालसँ आइ धरि जाहि वर्त्तनीमे प्रचलित अछि, से सामान्यतः ताहि वर्त्तनीमे लिखल जाय- उदाहरणार्थ-

ग्राह्य

एखन ठाम जकर, तकर तनिकर अछि

अग्राह्य अखन, अखनि, एखेन, अखनी ठिमा, ठिना, ठमा जेकर, तेकर तिनकर। (वैकल्पिक रूपेँ ग्राह्य) ऐछ, अहि, ए।

२. निम्नलिखित तीन प्रकारक रूप वैकल्पिकतया अपनाओल जाय: भऽ गेल, भय गेल वा भए गेल। जा रहल अछि, जाय रहल अछि, जाए रहल अछि। कर’ गेलाह, वा करय गेलाह वा करए गेलाह।

३. प्राचीन मैथिलीक ‘न्ह’ ध्वनिक स्थानमे ‘न’ लिखल जाय सकैत अछि यथा कहलनि वा कहलन्हि।

४. ‘ऐ’ तथा ‘औ’ ततय लिखल जाय जत’ स्पष्टतः ‘अइ’ तथा ‘अउ’ सदृश उच्चारण इष्ट हो। यथा- देखैत, छलैक, बौआ, छौक इत्यादि।

५. मैथिलीक निम्नलिखित शब्द एहि रूपे प्रयुक्त होयत: जैह, सैह, इएह, ओऐह, लैह तथा दैह।

६. ह्र्स्व इकारांत शब्दमे ‘इ’ के लुप्त करब सामान्यतः अग्राह्य थिक। यथा- ग्राह्य देखि आबह, मालिनि गेलि (मनुष्य मात्रमे)।

७. स्वतंत्र ह्रस्व ‘ए’ वा ‘य’ प्राचीन मैथिलीक उद्धरण आदिमे तँ यथावत राखल जाय, किंतु आधुनिक प्रयोगमे वैकल्पिक रूपेँ ‘ए’ वा ‘य’ लिखल जाय। यथा:- कयल वा कएल, अयलाह वा अएलाह, जाय वा जाए इत्यादि।

८. उच्चारणमे दू स्वरक बीच जे ‘य’ ध्वनि स्वतः आबि जाइत अछि तकरा लेखमे स्थान वैकल्पिक रूपेँ देल जाय। यथा- धीआ, अढ़ैआ, विआह, वा धीया, अढ़ैया, बियाह।

९. सानुनासिक स्वतंत्र स्वरक स्थान यथासंभव ‘ञ’ लिखल जाय वा सानुनासिक स्वर। यथा:- मैञा, कनिञा, किरतनिञा वा मैआँ, कनिआँ, किरतनिआँ।

१०. कारकक विभक्त्तिक निम्नलिखित रूप ग्राह्य:- हाथकेँ, हाथसँ, हाथेँ, हाथक, हाथमे। ’मे’ मे अनुस्वार सर्वथा त्याज्य थिक। ‘क’ क वैकल्पिक रूप ‘केर’ राखल जा सकैत अछि।

११. पूर्वकालिक क्रियापदक बाद ‘कय’ वा ‘कए’ अव्यय वैकल्पिक रूपेँ लगाओल जा सकैत अछि। यथा:- देखि कय वा देखि कए।

१२. माँग, भाँग आदिक स्थानमे माङ, भाङ इत्यादि लिखल जाय।

१३. अर्द्ध ‘न’ ओ अर्द्ध ‘म’ क बदला अनुसार नहि लिखल जाय, किंतु छापाक सुविधार्थ अर्द्ध ‘ङ’ , ‘ञ’, तथा ‘ण’ क बदला अनुस्वारो लिखल जा सकैत अछि। यथा:- अङ्क, वा अंक, अञ्चल वा अंचल, कण्ठ वा कंठ।

१४. हलंत चिह्न निअमतः लगाओल जाय, किंतु विभक्तिक संग अकारांत प्रयोग कएल जाय। यथा:- श्रीमान्, किंतु श्रीमानक।

१५. सभ एकल कारक चिह्न शब्दमे सटा क’ लिखल जाय, हटा क’ नहि, संयुक्त विभक्तिक हेतु फराक लिखल जाय, यथा घर परक।

१६. अनुनासिककेँ चन्द्रबिन्दु द्वारा व्यक्त कयल जाय। परंतु मुद्रणक सुविधार्थ हि समान जटिल मात्रापर अनुस्वारक प्रयोग चन्द्रबिन्दुक बदला कयल जा सकैत अछि। यथा- हिँ केर बदला हिं।

१७. पूर्ण विराम पासीसँ ( । ) सूचित कयल जाय।

१८. समस्त पद सटा क’ लिखल जाय, वा हाइफेनसँ जोड़ि क’ ,  हटा क’ नहि।

१९. लिअ तथा दिअ शब्दमे बिकारी (ऽ) नहि लगाओल जाय।

२०. अंक देवनागरी रूपमे राखल जाय।

२१.किछु ध्वनिक लेल नवीन चिन्ह बनबाओल जाय। जा' ई नहि बनल अछि ताबत एहि दुनू ध्वनिक बदला पूर्ववत् अय/ आय/ अए/ आए/ आओ/ अओ लिखल जाय। आकि ऎ वा ऒ सँ व्यक्त कएल जाय।

ह./- गोविन्द झा ११/८/७६ श्रीकान्त ठाकुर ११/८/७६ सुरेन्द्र झा "सुमन" ११/०८/७६

  २. मैथिलीमे भाषा सम्पादन पाठ्यक्रम २.१. उच्चारण निर्देश: (बोल्ड कएल रूप ग्राह्य):- दन्त न क उच्चारणमे दाँतमे जीह सटत- जेना बाजू नाम , मुदा ण क उच्चारणमे जीह मूर्धामे सटत (नै सटैए तँ उच्चारण दोष अछि)- जेना बाजू गणेश। तालव्य शमे जीह तालुसँ , षमे मूर्धासँ आ दन्त समे दाँतसँ सटत। निशाँ, सभ आ शोषण बाजि कऽ देखू। मैथिलीमे ष केँ वैदिक संस्कृत जकाँ ख सेहो उच्चरित कएल जाइत अछि, जेना वर्षा, दोष। य अनेको स्थानपर ज जकाँ उच्चरित होइत अछि आ ण ड़ जकाँ (यथा संयोग आ गणेश संजोग आ गड़ेस उच्चरित होइत अछि)। मैथिलीमे व क उच्चारण ब, श क उच्चारण स आ य क उच्चारण ज सेहो होइत अछि। ओहिना ह्रस्व इ बेशीकाल मैथिलीमे पहिने बाजल जाइत अछि कारण देवनागरीमे आ मिथिलाक्षरमे ह्रस्व इ अक्षरक पहिने लिखलो जाइत आ बाजलो जएबाक चाही। कारण जे हिन्दीमे एकर दोषपूर्ण उच्चारण होइत अछि (लिखल तँ पहिने जाइत अछि मुदा बाजल बादमे जाइत अछि), से शिक्षा पद्धतिक दोषक कारण हम सभ ओकर उच्चारण दोषपूर्ण ढंगसँ कऽ रहल छी। अछि- अ इ छ  ऐछ (उच्चारण) छथि- छ इ थ  – छैथ (उच्चारण) पहुँचि- प हुँ इ च (उच्चारण) आब अ आ इ ई ए ऐ ओ औ अं अः ऋ ऐ सभ लेल मात्रा सेहो अछि, मुदा ऐमे ई ऐ ओ औ अं अः ऋ केँ संयुक्ताक्षर रूपमे गलत रूपमे प्रयुक्त आ उच्चरित कएल जाइत अछि। जेना ऋ केँ री  रूपमे उच्चरित करब। आ देखियौ- ऐ लेल देखिऔ क प्रयोग अनुचित। मुदा देखिऐ लेल देखियै अनुचित। क् सँ ह् धरि अ सम्मिलित भेलासँ क सँ ह बनैत अछि, मुदा उच्चारण काल हलन्त युक्त शब्दक अन्तक उच्चारणक प्रवृत्ति बढ़ल अछि, मुदा हम जखन मनोजमे ज् अन्तमे बजैत छी, तखनो पुरनका लोककेँ बजैत सुनबन्हि- मनोजऽ, वास्तवमे ओ अ युक्त ज् = ज बजै छथि। फेर ज्ञ अछि ज् आ ञ क संयुक्त मुदा गलत उच्चारण होइत अछि- ग्य। ओहिना क्ष अछि क् आ ष क संयुक्त मुदा उच्चारण होइत अछि छ। फेर श् आ र क संयुक्त अछि श्र ( जेना श्रमिक) आ स् आ र क संयुक्त अछि स्र (जेना मिस्र)। त्र भेल त+र । उच्चारणक ऑडियो फाइल विदेह आर्काइव  http://www.videha.co.in/ पर उपलब्ध अछि। फेर केँ / सँ / पर पूर्व अक्षरसँ सटा कऽ लिखू मुदा तँ / कऽ हटा कऽ। ऐमे सँ मे पहिल सटा कऽ लिखू आ बादबला हटा कऽ। अंकक बाद टा लिखू सटा कऽ मुदा अन्य ठाम टा लिखू हटा कऽ– जेना छहटा मुदा सभ टा। फेर ६अ म सातम लिखू- छठम सातम नै। घरबलामे बला मुदा घरवालीमे वाली प्रयुक्त करू। रहए- रहै मुदा सकैए (उच्चारण सकै-ए)। मुदा कखनो काल रहए आ रहै मे अर्थ भिन्नता सेहो, जेना से कम्मो जगहमे पार्किंग करबाक अभ्यास रहै ओकरा। पुछलापर पता लागल जे ढुनढुन नाम्ना ई ड्राइवर कनाट प्लेसक पार्किंगमे काज करैत रहए। छलै, छलए मे सेहो ऐ तरहक भेल। छलए क उच्चारण छल-ए सेहो। संयोगने- (उच्चारण संजोगने) केँ/  कऽ केर- क ( केर क प्रयोग गद्यमे नै करू , पद्यमे कऽ सकै छी। ) क (जेना रामक) –रामक आ संगे (उच्चारण राम के /  राम कऽ सेहो) सँ- सऽ (उच्चारण) चन्द्रबिन्दु आ अनुस्वार- अनुस्वारमे कंठ धरिक प्रयोग होइत अछि मुदा चन्द्रबिन्दुमे नै। चन्द्रबिन्दुमे कनेक एकारक सेहो उच्चारण होइत अछि- जेना रामसँ- (उच्चारण राम सऽ)  रामकेँ- (उच्चारण राम कऽ/ राम के सेहो)। केँ जेना रामकेँ भेल हिन्दीक को (राम को)- राम को= रामकेँ क जेना रामक भेल हिन्दीक का ( राम का) राम का= रामक कऽ जेना जा कऽ भेल हिन्दीक कर ( जा कर) जा कर= जा कऽ सँ भेल हिन्दीक से (राम से) राम से= रामसँ सऽ , तऽ , त , केर (गद्यमे) एे चारू शब्द सबहक प्रयोग अवांछित। के दोसर अर्थेँ प्रयुक्त भऽ सकैए- जेना, के कहलक? विभक्ति “क”क बदला एकर प्रयोग अवांछित। नञि, नहि, नै, नइ, नँइ, नइँ, नइं ऐ सभक उच्चारण आ लेखन - नै त्त्व क बदलामे त्व जेना महत्वपूर्ण (महत्त्वपूर्ण नै) जतए अर्थ बदलि जाए ओतहि मात्र तीन अक्षरक संयुक्ताक्षरक प्रयोग उचित। सम्पति- उच्चारण स म्प इ त (सम्पत्ति नै- कारण सही उच्चारण आसानीसँ सम्भव नै)। मुदा सर्वोत्तम (सर्वोतम नै)। राष्ट्रिय (राष्ट्रीय नै) सकैए/ सकै (अर्थ परिवर्तन) पोछैले/ पोछै लेल/ पोछए लेल पोछैए/ पोछए/ (अर्थ परिवर्तन) पोछए/ पोछै ओ लोकनि ( हटा कऽ, ओ मे बिकारी नै) ओइ/ ओहि ओहिले/ ओहि लेल/ ओही लऽ जएबेँ/ बैसबेँ पँचभइयाँ देखियौक/ (देखिऔक नै- तहिना अ मे ह्रस्व आ दीर्घक मात्राक प्रयोग अनुचित) जकाँ / जेकाँ तँइ/ तैँ/ होएत / हएत नञि/ नहि/ नँइ/ नइँ/ नै सौँसे/ सौंसे बड़ / बड़ी (झोराओल) गाए (गाइ नहि), मुदा गाइक दूध (गाएक दूध नै।) रहलेँ/ पहिरतैँ हमहीं/ अहीं सब - सभ सबहक - सभहक धरि - तक गप- बात बूझब - समझब बुझलौं/ समझलौं/ बुझलहुँ - समझलहुँ हमरा आर - हम सभ आकि- आ कि सकैछ/ करैछ (गद्यमे प्रयोगक आवश्यकता नै) होइन/ होनि जाइन (जानि नै, जेना देल जाइन) मुदा जानि-बूझि (अर्थ परिव्र्तन) पइठ/ जाइठ आउ/ जाउ/ आऊ/ जाऊ मे, केँ, सँ, पर (शब्दसँ सटा कऽ) तँ कऽ धऽ दऽ (शब्दसँ हटा कऽ) मुदा दूटा वा बेसी विभक्ति संग रहलापर पहिल विभक्ति टाकेँ सटाऊ। जेना ऐमे सँ । एकटा , दूटा (मुदा कए टा) बिकारीक प्रयोग शब्दक अन्तमे, बीचमे अनावश्यक रूपेँ नै। आकारान्त आ अन्तमे अ क बाद बिकारीक प्रयोग नै (जेना दिअ , आ/ दिय’ , आ’, आ नै ) अपोस्ट्रोफीक प्रयोग बिकारीक बदलामे करब अनुचित आ मात्र फॉन्टक तकनीकी न्यूनताक परिचायक)- ओना बिकारीक संस्कृत रूप ऽ अवग्रह कहल जाइत अछि आ वर्तनी आ उच्चारण दुनू ठाम एकर लोप रहैत अछि/ रहि सकैत अछि (उच्चारणमे लोप रहिते अछि)। मुदा अपोस्ट्रोफी सेहो अंग्रेजीमे पसेसिव केसमे होइत अछि आ फ्रेंचमे शब्दमे जतए एकर प्रयोग होइत अछि जेना raison d’etre एतए सेहो एकर उच्चारण रैजौन डेटर होइत अछि, माने अपोस्ट्रॉफी अवकाश नै दैत अछि वरन जोड़ैत अछि, से एकर प्रयोग बिकारीक बदला देनाइ तकनीकी रूपेँ सेहो अनुचित)। अइमे, एहिमे/ ऐमे जइमे, जाहिमे एखन/ अखन/ अइखन केँ (के नहि) मे (अनुस्वार रहित) भऽ मे दऽ तँ (तऽ, त नै) सँ ( सऽ स नै) गाछ तर गाछ लग साँझ खन जो (जो go, करै जो do) तै/तइ जेना- तै दुआरे/ तइमे/ तइले जै/जइ जेना- जै कारण/ जइसँ/ जइले ऐ/अइ जेना- ऐ कारण/ ऐसँ/ अइले/ मुदा एकर एकटा खास प्रयोग- लालति‍ कतेक दि‍नसँ कहैत रहैत अइ लै/लइ जेना लैसँ/ लइले/ लै दुआरे लहँ/ लौं गेलौं/ लेलौं/ लेलँह/ गेलहुँ/ लेलहुँ/ लेलँ जइ/ जाहि‍/ जै जहि‍ठाम/ जाहि‍ठाम/ जइठाम/ जैठाम एहि‍/ अहि‍/ अइ (वाक्यक अंतमे ग्राह्य) / ऐ अइछ/ अछि‍/ ऐछ तइ/ तहि‍/ तै/ ताहि‍ ओहि‍/ ओइ सीखि‍/ सीख जीवि‍/ जीवी/ जीब भलेहीं/ भलहि‍ं तैं/ तँइ/ तँए जाएब/ जएब लइ/ लै छइ/ छै नहि‍/ नै/ नइ गइ/ गै छनि‍/ छन्‍हि‍  ... समए शब्‍दक संग जखन कोनो वि‍भक्‍ति‍ जुटै छै तखन समै जना समैपर इत्‍यादि‍। असगरमे हृदए आ वि‍भक्‍ति‍ जुटने हृदे जना हृदेसँ, हृदेमे इत्‍यादि‍। जइ/ जाहि‍/ जै जहि‍ठाम/ जाहि‍ठाम/ जइठाम/ जैठाम एहि‍/ अहि‍/ अइ/ ऐ अइछ/ अछि‍/ ऐछ तइ/ तहि‍/ तै/ ताहि‍ ओहि‍/ ओइ सीखि‍/ सीख जीवि‍/ जीवी/ जीब भले/ भलेहीं/ भलहि‍ं तैं/ तँइ/ तँए जाएब/ जएब लइ/ लै छइ/ छै नहि‍/ नै/ नइ गइ/ गै छनि‍/ छन्‍हि‍ चुकल अछि/ गेल गछि २.२. मैथिलीमे भाषा सम्पादन पाठ्यक्रम नीचाँक सूचीमे देल विकल्पमेसँ लैंगुएज एडीटर द्वारा कोन रूप चुनल जेबाक चाही: बोल्ड कएल रूप ग्राह्य: १.होयबला/ होबयबला/ होमयबला/ हेब’बला, हेम’बला/ होयबाक/होबएबला /होएबाक २. आ’/आऽ आ ३. क’ लेने/कऽ लेने/कए लेने/कय लेने/ल’/लऽ/लय/लए ४. भ’ गेल/भऽ गेल/भय गेल/भए गेल ५. कर’ गेलाह/करऽ गेलह/करए गेलाह/करय गेलाह ६. लिअ/दिअ लिय’,दिय’,लिअ’,दिय’/ ७. कर’ बला/करऽ बला/ करय बला करैबला/क’र’ बला / करैवाली ८. बला वला (पुरूष), वाली (स्‍त्री) ९ . आङ्ल आंग्ल १०. प्रायः प्रायह ११. दुःख दुख १ २. चलि गेल चल गेल/चैल गेल १३. देलखिन्ह देलकिन्ह, देलखिन १४. देखलन्हि देखलनि/ देखलैन्ह १५. छथिन्ह/ छलन्हि छथिन/ छलैन/ छलनि १६. चलैत/दैत चलति/दैति १७. एखनो अखनो १८. बढ़नि‍ बढ़इन बढ़न्हि १९. ओ’/ओऽ(सर्वनाम) ओ २० . ओ (संयोजक) ओ’/ओऽ २१. फाँगि/फाङ्गि फाइंग/फाइङ २२. जे जे’/जेऽ २३. ना-नुकुर ना-नुकर २४. केलन्हि/केलनि‍/कयलन्हि २५. तखनतँ/ तखन तँ २६. जा रहल/जाय रहल/जाए रहल २७. निकलय/निकलए लागल/ लगल बहराय/ बहराए लागल/ लगल निकल’/बहरै लागल २८. ओतय/ जतय जत’/ ओत’/ जतए/ ओतए २९. की फूरल जे कि फूरल जे ३०. जे जे’/जेऽ ३१. कूदि / यादि(मोन पारब) कूइद/याइद/कूद/याद/ यादि (मोन) ३२. इहो/ ओहो ३३. हँसए/ हँसय हँसऽ ३४. नौ आकि दस/नौ किंवा दस/ नौ वा दस ३५. सासु-ससुर सास-ससुर ३६. छह/ सात छ/छः/सात ३७. की  की’/ कीऽ (दीर्घीकारान्तमे ऽ वर्जित) ३८. जबाब जवाब ३९. करएताह/ करेताह करयताह ४०. दलान दिशि दलान दिश/दलान दिस ४१ . गेलाह गएलाह/गयलाह ४२. किछु आर/ किछु और/ किछ आर ४३. जाइ छल/ जाइत छल जाति छल/जैत छल ४४. पहुँचि/ भेट जाइत छल/ भेट जाइ छलए पहुँच/ भेटि‍ जाइत छल ४५. जबान (युवा)/ जवान(फौजी) ४६. लय/ लए क’/ कऽ/ लए कए / लऽ कऽ/ लऽ कए ४७. ल’/लऽ कय/ कए ४८. एखन / एखने / अखन / अखने ४९. अहींकेँ अहीँकेँ ५०. गहींर गहीँर ५१. धार पार केनाइ धार पार केनाय/केनाए ५२. जेकाँ जेँकाँ/ जकाँ ५३. तहिना तेहिना ५४. एकर अकर ५५. बहिनउ बहनोइ ५६. बहिन बहिनि ५७. बहिन-बहिनोइ बहिन-बहनउ ५८. नहि/ नै ५९. करबा / करबाय/ करबाए ६०. तँ/ त ऽ तय/तए ६१. भैयारी मे छोट-भाए/भै/, जेठ-भाय/भाइ, ६२. गि‍नतीमे दू भाइ/भाए/भाँइ ६३. ई पोथी दू भाइक/ भाँइ/ भाए/ लेल। यावत जावत ६४. माय मै / माए मुदा माइक ममता ६५. देन्हि/ दइन दनि‍/ दएन्हि/ दयन्हि दन्हि/ दैन्हि ६६. द’/ दऽ/ दए ६७. ओ (संयोजक) ओऽ (सर्वनाम) ६८. तका कए तकाय तकाए ६९. पैरे (on foot) पएरे  कएक/ कैक ७०. ताहुमे/ ताहूमे ७१. पुत्रीक ७२. बजा कय/ कए / कऽ ७३. बननाय/बननाइ ७४. कोला ७५. दिनुका दिनका ७६. ततहिसँ ७७. गरबओलन्हि/ गरबौलनि‍/ गरबेलन्हि/ गरबेलनि‍ ७८. बालु बालू ७९. चेन्ह चिन्ह(अशुद्ध) ८०. जे जे’ ८१ . से/ के से’/के’ ८२. एखुनका अखनुका ८३. भुमिहार भूमिहार ८४. सुग्गर / सुगरक/ सूगर ८५. झठहाक झटहाक ८६. छूबि ८७. करइयो/ओ करैयो ने देलक /करियौ-करइयौ ८८. पुबारि पुबाइ ८९. झगड़ा-झाँटी झगड़ा-झाँटि ९०. पएरे-पएरे पैरे-पैरे ९१. खेलएबाक ९२. खेलेबाक ९३. लगा ९४. होए- हो – होअए ९५. बुझल बूझल ९६. बूझल (संबोधन अर्थमे) ९७. यैह यएह / इएह/ सैह/ सएह ९८. तातिल ९९. अयनाय- अयनाइ/ अएनाइ/ एनाइ १००. निन्न- निन्द १०१. बिनु बिन १०२. जाए जाइ १०३. जाइ (in different sense)-last word of sentence १०४. छत पर आबि जाइ १०५. ने १०६. खेलाए (play) –खेलाइ १०७. शिकाइत- शिकायत १०८. ढप- ढ़प १०९ . पढ़- पढ ११०. कनिए/ कनिये कनिञे १११. राकस- राकश ११२. होए/ होय होइ ११३. अउरदा- औरदा ११४. बुझेलन्हि (different meaning- got understand) ११५. बुझएलन्हि/बुझेलनि‍/ बुझयलन्हि (understood himself) ११६. चलि- चल/ चलि‍ गेल ११७. खधाइ- खधाय ११८. मोन पाड़लखिन्ह/ मोन पाड़लखि‍न/ मोन पारलखिन्ह ११९. कैक- कएक- कइएक १२०. लग ल’ग १२१. जरेनाइ १२२. जरौनाइ जरओनाइ- जरएनाइ/ जरेनाइ १२३. होइत १२४. गरबेलन्हि/ गरबेलनि‍ गरबौलन्हि/ गरबौलनि‍ १२५. चिखैत- (to test)चिखइत १२६. करइयो (willing to do) करैयो १२७. जेकरा- जकरा १२८. तकरा- तेकरा १२९. बिदेसर स्थानेमे/ बिदेसरे स्थानमे १३०. करबयलहुँ/ करबएलहुँ/ करबेलहुँ करबेलौं १३१. हारिक (उच्चारण हाइरक) १३२. ओजन वजन आफसोच/ अफसोस कागत/ कागच/ कागज १३३. आधे भाग/ आध-भागे १३४. पिचा / पिचाय/पिचाए १३५. नञ/ ने १३६. बच्चा नञ (ने) पिचा जाय १३७. तखन ने (नञ) कहैत अछि। कहै/ सुनै/ देखै छल मुदा कहैत-कहैत/ सुनैत-सुनैत/ देखैत-देखैत १३८. कतेक गोटे/ कताक गोटे १३९. कमाइ-धमाइ/ कमाई- धमाई १४० . लग ल’ग १४१. खेलाइ (for playing) १४२. छथिन्ह/ छथिन १४३. होइत होइ १४४. क्यो कियो / केओ १४५. केश (hair) १४६. केस (court-case) १४७ . बननाइ/ बननाय/ बननाए १४८. जरेनाइ १४९. कुरसी कुर्सी १५०. चरचा चर्चा १५१. कर्म करम १५२. डुबाबए/ डुबाबै/ डुमाबै डुमाबय/ डुमाबए १५३. एखुनका/ अखुनका १५४. लए/ लिअए (वाक्यक अंतिम शब्द)- लऽ १५५. कएलक/ केलक १५६. गरमी गर्मी १५७ . वरदी वर्दी १५८. सुना गेलाह सुना’/सुनाऽ १५९. एनाइ-गेनाइ १६०. तेना ने घेरलन्हि/ तेना ने घेरलनि‍ १६१. नञि / नै १६२. डरो ड’रो १६३. कतहु/ कतौ कहीं १६४. उमरिगर-उमेरगर उमरगर १६५. भरिगर १६६. धोल/धोअल धोएल १६७. गप/गप्प १६८. के के’ १६९. दरबज्जा/ दरबजा १७०. ठाम १७१. धरि तक १७२. घूरि लौटि १७३. थोरबेक १७४. बड्ड १७५. तोँ/ तूँ १७६. तोँहि( पद्यमे ग्राह्य) १७७. तोँही / तोँहि १७८. करबाइए करबाइये १७९. एकेटा १८०. करितथि /करतथि १८१. पहुँचि/ पहुँच १८२. राखलन्हि रखलन्हि/ रखलनि‍ १८३. लगलन्हि/ लगलनि‍ लागलन्हि १८४. सुनि (उच्चारण सुइन) १८५. अछि (उच्चारण अइछ) १८६. एलथि गेलथि १८७. बितओने/ बि‍तौने/ बितेने १८८. करबओलन्हि/ करबौलनि‍/ करेलखिन्ह/ करेलखि‍न १८९. करएलन्हि/ करेलनि‍ १९०. आकि/ कि १९१. पहुँचि/ पहुँच १९२. बत्ती जराय/ जराए जरा (आगि लगा) १९३. से से’ १९४. हाँ मे हाँ (हाँमे हाँ विभक्त्तिमे हटा कए) १९५. फेल फैल १९६. फइल(spacious) फैल १९७. होयतन्हि/ होएतन्हि/ होएतनि‍/हेतनि‍/ हेतन्हि १९८. हाथ मटिआएब/ हाथ मटियाबय/हाथ मटियाएब १९९. फेका फेंका २००. देखाए देखा २०१. देखाबए २०२. सत्तरि सत्तर २०३. साहेब साहब २०४.गेलैन्ह/ गेलन्हि/ गेलनि‍ २०५. हेबाक/ होएबाक २०६.केलो/ कएलहुँ/केलौं/ केलुँ २०७. किछु न किछु/ किछु ने किछु २०८.घुमेलहुँ/ घुमओलहुँ/ घुमेलौं २०९. एलाक/ अएलाक २१०. अः/ अह २११.लय/ लए (अर्थ-परिवर्त्तन) २१२.कनीक/ कनेक २१३.सबहक/ सभक २१४.मिलाऽ/ मिला २१५.कऽ/ क २१६.जाऽ/ जा २१७.आऽ/ आ २१८.भऽ /भ’ (’ फॉन्टक कमीक द्योतक) २१९.निअम/ नियम २२० .हेक्टेअर/ हेक्टेयर २२१.पहिल अक्षर ढ/ बादक/ बीचक ढ़ २२२.तहिं/तहिँ/ तञि/ तैं २२३.कहिं/ कहीं २२४.तँइ/ तैं / तइँ २२५.नँइ/ नइँ/  नञि/ नहि/नै २२६.है/ हए / एलीहेँ/ २२७.छञि/ छै/ छैक /छइ २२८.दृष्टिएँ/ दृष्टियेँ २२९.आ (come)/ आऽ(conjunction) २३०. आ (conjunction)/ आऽ(come) २३१.कुनो/ कोनो, कोना/केना २३२.गेलैन्ह-गेलन्हि-गेलनि‍ २३३.हेबाक- होएबाक २३४.केलौँ- कएलौँ-कएलहुँ/केलौं २३५.किछु न किछ- किछु ने किछु २३६.केहेन- केहन २३७.आऽ (come)-आ (conjunction-and)/आ। आब'-आब' /आबह-आबह २३८. हएत-हैत २३९.घुमेलहुँ-घुमएलहुँ- घुमेलाें २४०.एलाक- अएलाक २४१.होनि- होइन/ होन्हि/ २४२.ओ-राम ओ श्यामक बीच(conjunction), ओऽ कहलक (he said)/ओ २४३.की हए/ कोसी अएली हए/ की है। की हइ २४४.दृष्टिएँ/ दृष्टियेँ २४५ .शामिल/ सामेल २४६.तैँ / तँए/ तञि/ तहिं २४७.जौं / ज्योँ/ जँ/ २४८.सभ/ सब २४९.सभक/ सबहक २५०.कहिं/ कहीं २५१.कुनो/ कोनो/ कोनहुँ/ २५२.फारकती भऽ गेल/ भए गेल/ भय गेल २५३.कोना/ केना/ कन्‍ना/कना २५४.अः/ अह २५५.जनै/ जनञ २५६.गेलनि‍/ गेलाह (अर्थ परिवर्तन) २५७.केलन्हि/ कएलन्हि/ केलनि‍/ २५८.लय/ लए/ लएह (अर्थ परिवर्तन) २५९.कनीक/ कनेक/कनी-मनी २६०.पठेलन्हि‍ पठेलनि‍/ पठेलइन/ पपठओलन्हि/ पठबौलनि‍/ २६१.निअम/ नियम २६२.हेक्टेअर/ हेक्टेयर २६३.पहिल अक्षर रहने ढ/ बीचमे रहने ढ़ २६४.आकारान्तमे बिकारीक प्रयोग उचित नै/ अपोस्ट्रोफीक प्रयोग फान्टक तकनीकी न्यूनताक परिचायक ओकर बदला अवग्रह (बिकारी) क प्रयोग उचित २६५.केर (पद्यमे ग्राह्य) / -क/ कऽ/ के २६६.छैन्हि- छन्हि २६७.लगैए/ लगैये २६८.होएत/ हएत २६९.जाएत/ जएत/ २७०.आएत/ अएत/ आओत २७१ .खाएत/ खएत/ खैत २७२.पिअएबाक/ पिएबाक/पि‍येबाक २७३.शुरु/ शुरुह २७४.शुरुहे/ शुरुए २७५.अएताह/अओताह/ एताह/ औताह २७६.जाहि/ जाइ/ जइ/ जै/ २७७.जाइत/ जैतए/ जइतए २७८.आएल/ अएल २७९.कैक/ कएक २८०.आयल/ अएल/ आएल २८१. जाए/ जअए/ जए (लालति‍ जाए लगलीह।) २८२. नुकएल/ नुकाएल २८३. कठुआएल/ कठुअएल २८४. ताहि/ तै/ तइ २८५. गायब/ गाएब/ गएब २८६. सकै/ सकए/ सकय २८७.सेरा/सरा/ सराए (भात सरा गेल) २८८.कहैत रही/देखैत रही/ कहैत छलौं/ कहै छलौं- अहिना चलैत/ पढ़ैत (पढ़ै-पढ़ैत अर्थ कखनो काल परिवर्तित) - आर बुझै/ बुझैत (बुझै/ बुझै छी, मुदा बुझैत-बुझैत)/ सकैत/ सकै। करैत/ करै। दै/ दैत। छैक/ छै। बचलै/ बचलैक। रखबा/ रखबाक । बिनु/ बिन। रातिक/ रातुक बुझै आ बुझैत केर अपन-अपन जगहपर प्रयोग समीचीन अछि‍। बुझैत-बुझैत आब बुझलि‍ऐ। हमहूँ बुझै छी। २८९. दुआरे/ द्वारे २९०.भेटि/ भेट/ भेँट २९१. खन/ खीन/  खुना (भोर खन/ भोर खीन) २९२.तक/ धरि २९३.गऽ/ गै (meaning different-जनबै गऽ) २९४.सऽ/ सँ (मुदा दऽ, लऽ) २९५.त्त्व,(तीन अक्षरक मेल बदला पुनरुक्तिक एक आ एकटा दोसरक उपयोग) आदिक बदला त्व आदि। महत्त्व/ महत्व/ कर्ता/ कर्त्ता आदिमे त्त संयुक्तक कोनो आवश्यकता मैथिलीमे नै अछि। वक्तव्य २९६.बेसी/ बेशी २९७.बाला/वाला बला/ वला (रहैबला) २९८ .वाली/ (बदलैवाली) २९९.वार्त्ता/ वार्ता ३००. अन्तर्राष्ट्रिय/ अन्तर्राष्ट्रीय ३०१. लेमए/ लेबए ३०२.लमछुरका, नमछुरका ३०२.लागै/ लगै ( भेटैत/ भेटै) ३०३.लागल/ लगल ३०४.हबा/ हवा ३०५.राखलक/ रखलक ३०६.आ (come)/ आ (and) ३०७. पश्चाताप/ पश्चात्ताप ३०८. ऽ केर व्यवहार शब्दक अन्तमे मात्र, यथासंभव बीचमे नै। ३०९.कहैत/ कहै ३१०. रहए (छल)/ रहै (छलै) (meaning different) ३११.तागति/ ताकति ३१२.खराप/ खराब ३१३.बोइन/ बोनि/ बोइनि ३१४.जाठि/ जाइठ ३१५.कागज/ कागच/ कागत ३१६.गिरै (meaning different- swallow)/ गिरए (खसए) ३१७.राष्ट्रिय/ राष्ट्रीय VIDEHA FOR NON RESIDENTS MAITHILI LITERATURE IN ENGLISH 8.1.1.The Comet   -GAJENDRA THAKUR translated by Jyoti Jha chaudhary 8.1.2.The_Science_of_Words- GAJENDRA THAKUR translated by the author himself 8.1.3.On_the_dice-board_of_the_millennium- GAJENDRA THAKUR translated by Jyoti Jha chaudhary 8.1.4.NAAGPHANS (IN ENGLISH)- SHEFALIKA VERMA translated by Dr. Rajiv Kumar Verma and Dr. Jaya Verma DATE-LIST (year- 2012-13) (१४२० फसली साल) Marriage Days: Nov.2012- 25, 26, 28, 29, 30 Dec.2012- 5,9, 10, 13, 14 January 2013- 16, 17, 18, 23, 24, 31 Feb.2013- 1, 3, 4, 6, 8, 10, 14, 15, 18, 20, 24, 25 April 2013- 21, 22, 24, 26, 29 May 2013- 1,2,3,5,6,9,12,13,17,19,20,22,23,24,26,27,29,30,31 June 2013- 2,3 July 2013- 11, 14, 15 Upanayana Days: January 2013- 16 February 2013- 14, 15, 20, 21 April 2013- 22 May 2013- 20, 21 Dviragaman Din: November 2012- 25, 26, 28, 29 December 2012- 2, 3, 14 February 2013- 14, 15, 18, 20, 21, 22, 27, 28 March 2013- 1 April 2013- 18, 22, 24, 26, 28, 29 May 2013- 12, 13 Mundan Din: November 2012- 26, 30 December 2012- 3 January 2013- 18, 24 February 2013- 1, 14, 15, 20, 28 April 2013- 17 May 2013- 13, 23, 29 June 2013- 13, 19, 26, 27, 28 July 2013- 10, 15 FESTIVALS OF MITHILA (2012-13) Mauna Panchami-08 July Madhushravani- 22 July Nag Panchami- 24 July Raksha Bandhan- 02 Aug Krishnastami- 10 August Kushi Amavasya / Somvari Vrat- 17 August Vishwakarma Pooja- 17 September Hartalika Teej- 18 September ChauthChandra-19 September Karma Dharma Ekadashi-26 September Indra Pooja Aarambh- 27 September Anant Caturdashi- 29 Sep Agastyarghadaan- 30 Sep Pitri Paksha begins- 30 Sep Jimootavahan Vrata/ Jitia-08 October Matri Navami- 09 October SomvatiAmavasya Vrat- 15 October Kalashsthapan- 16 October Belnauti- 20 October Patrika Pravesh- 21 October Mahastami- 22 October Maha Navami - 23 October Vijaya Dashami- 24 October Kojagara- 29 Oct Dhanteras- 11 November Diyabati, shyama pooja-13 November Annakoota/ Govardhana Pooja-14 November Bhratridwitiya/ Chitragupta Pooja- 15 November Chhathi -19 November Devotthan Ekadashi- 24 November ravivratarambh- 25 November Navanna parvan- 25 November KartikPoornima- Sama Visarjan- 28 November Vivaha Panchmi- 17 December Makara/ Teela Sankranti-14 Jan Naraknivaran chaturdashi- 08 February Basant Panchami/ Saraswati Pooja- 15 February Achla Saptmi- 17 February Mahashivaratri-10 March Holikadahan-Fagua-26 March Holi- 28 March Varuni Trayodashi-07 April Chaiti  navaratrarambh- 11 April Jurishital-15 April Chaiti Chhathi vrata-16 April Ram Navami- 19 April Ravi Brat Ant- 12 May Akshaya Tritiya-13 May Janaki Navami- 19 May Vat Savitri-barasait- 08 June Ganga Dashhara-18 June Somavati Amavasya Vrata- 08 July Jagannath Rath Yatra- 10 July Hari Sayan Ekadashi- 19 July Aashadhi Guru Poornima-22 Jul VIDEHA ARCHIVE १.विदेह ई-पत्रिकाक सभटा पुरान अंक ब्रेल, तिरहुता आ देवनागरी रूपमे Videha e journal's all old issues in Braille Tirhuta and Devanagari versions विदेह ई-पत्रिकाक पहिल ५० अंक

विदेह ई-पत्रिकाक ५०म सँ आगाँक अंक २.मैथिली पोथी डाउनलोड Maithili Books Download ३.मैथिली ऑडियो संकलन Maithili Audio Downloads ४.मैथिली वीडियोक संकलन Maithili Videos ५.मिथिला चित्रकला/ आधुनिक चित्रकला आ चित्र Mithila Painting/ Modern Art and Photos "विदेह"क एहि सभ सहयोगी लिंकपर सेहो एक बेर जाउ। ६.विदेह मैथिली क्विज  :  http://videhaquiz.blogspot.com/ ७.विदेह मैथिली जालवृत्त एग्रीगेटर : http://videha-aggregator.blogspot.com/ ८.विदेह मैथिली साहित्य अंग्रेजीमे अनूदित http://madhubani-art.blogspot.com/ ९.विदेहक पूर्व-रूप "भालसरिक गाछ"  : http://gajendrathakur.blogspot.com/ १०.विदेह इंडेक्स  : http://videha123.blogspot.com/ ११.विदेह फाइल : http://videha123.wordpress.com/ १२. विदेह: सदेह : पहिल तिरहुता (मिथिला़क्षर) जालवृत्त (ब्लॉग) http://videha-sadeha.blogspot.com/ १३. विदेह:ब्रेल: मैथिली ब्रेलमे: पहिल बेर विदेह द्वारा http://videha-braille.blogspot.com/ १४.VIDEHA IST MAITHILI  FORTNIGHTLY EJOURNAL ARCHIVE http://videha-archive.blogspot.com/ १५. विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका मैथिली पोथीक आर्काइव http://videha-pothi.blogspot.com/ १६. विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका ऑडियो आर्काइव http://videha-audio.blogspot.com/ १७. विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका वीडियो आर्काइव http://videha-video.blogspot.com/ १८. विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका मिथिला चित्रकला, आधुनिक कला आ चित्रकला http://videha-paintings-photos.blogspot.com/ १९. मैथिल आर मिथिला (मैथिलीक सभसँ लोकप्रिय जालवृत्त) http://maithilaurmithila.blogspot.com/ २०.श्रुति प्रकाशन http://www.shruti-publication.com/ २१.http://groups.google.com/group/videha २२.http://groups.yahoo.com/group/VIDEHA/ २३.गजेन्द्र ठाकुर इ‍डेक्स http://gajendrathakur123.blogspot.com २४. नेना भुटका http://mangan-khabas.blogspot.com/ २५.विदेह रेडियो:मैथिली कथा-कविता आदिक पहिल पोडकास्ट साइट http://videha123radio.wordpress.com/ २६.Videha Radio २७. Join official Videha facebook group. २८. विदेह मैथिली नाट्य उत्सव http://maithili-drama.blogspot.com/ २९.समदिया http://esamaad.blogspot.com/ ३०. मैथिली फिल्म्स http://maithilifilms.blogspot.com/ ३१.अनचिन्हार आखर http://anchinharakharkolkata.blogspot.com/ ३२. मैथिली हाइकू http://maithili-haiku.blogspot.com/ ३३. मानक मैथिली http://manak-maithili.blogspot.com/ ३४. विहनि कथा http://vihanikatha.blogspot.in/ ३५. मैथिली कविता http://maithili-kavita.blogspot.in/ ३६. मैथिली कथा http://maithili-katha.blogspot.in/ ३७.मैथिली समालोचना http://maithili-samalochna.blogspot.in/ महत्त्वपूर्ण सूचना:(१) 'विदेह' द्वारा धारावाहिक रूपे ई-प्रकाशित कएल गेल गजेन्द्र ठाकुरक  निबन्ध-प्रबन्ध-समीक्षा, उपन्यास (सहस्रबाढ़नि) , पद्य-संग्रह (सहस्राब्दीक चौपड़पर), कथा-गल्प (गल्प-गुच्छ), नाटक(संकर्षण), महाकाव्य (त्वञ्चाहञ्च आ असञ्जाति मन) आ बाल-किशोर साहित्य विदेहमे संपूर्ण ई-प्रकाशनक बाद प्रिंट फॉर्ममे। कुरुक्षेत्रम्–अन्तर्मनक खण्ड-१ सँ ७ Combined ISBN No.978-81-907729-7-6 विवरण एहि पृष्ठपर नीचाँमे आ प्रकाशकक साइट http://www.shruti-publication.com/ पर । महत्त्वपूर्ण सूचना (२):सूचना: विदेहक मैथिली-अंग्रेजी आ अंग्रेजी मैथिली कोष (इंटरनेटपर पहिल बेर सर्च-डिक्शनरी) एम.एस. एस.क्यू.एल. सर्वर आधारित -Based on ms-sql server Maithili-English and English-Maithili Dictionary. विदेहक भाषापाक- रचनालेखन स्तंभमे। कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक- गजेन्द्र ठाकुर गजेन्द्र ठाकुरक निबन्ध-प्रबन्ध-समीक्षा, उपन्यास (सहस्रबाढ़नि) , पद्य-संग्रह (सहस्राब्दीक चौपड़पर), कथा-गल्प (गल्प गुच्छ), नाटक(संकर्षण), महाकाव्य (त्वञ्चाहञ्च आ असञ्जाति मन) आ बालमंडली-किशोरजगत विदेहमे संपूर्ण ई-प्रकाशनक बाद प्रिंट फॉर्ममे। कुरुक्षेत्रम्–अन्तर्मनक, खण्ड-१ सँ ७ Ist edition 2009 of Gajendra Thakur’s KuruKshetram-Antarmanak (Vol. I to VII)- essay-paper-criticism, novel, poems, story, play, epics and Children-grown-ups literature in single binding: Language:Maithili ६९२ पृष्ठ : मूल्य भा. रु. 100/-(for individual buyers inside india) (add courier charges Rs.50/-per copy for Delhi/NCR and Rs.100/- per copy for outside Delhi)

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Details for purchase available at print-version publishers's site website: http://www.shruti-publication.com/ or you may write to e-mail:shruti.publication@shruti-publication.com विदेह: सदेह : १: २: ३: ४ तिरहुता : देवनागरी "विदेह" क, प्रिंट संस्करण :विदेह-ई-पत्रिका (http://www.videha.co.in/) क चुनल रचना सम्मिलित। विदेह:सदेह:१: २: ३: ४ सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। Details for purchase available at print-version publishers's site http://www.shruti-publication.com  or you may write to shruti.publication@shruti-publication.com २. संदेश- [ विदेह ई-पत्रिका, विदेह:सदेह मिथिलाक्षर आ देवनागरी आ गजेन्द्र ठाकुरक सात खण्डक- निबन्ध-प्रबन्ध-समीक्षा,उपन्यास (सहस्रबाढ़नि) , पद्य-संग्रह (सहस्राब्दीक चौपड़पर), कथा-गल्प (गल्प गुच्छ), नाटक (संकर्षण), महाकाव्य (त्वञ्चाहञ्च आ असञ्जाति मन) आ बाल-मंडली-किशोर जगत- संग्रह कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक मादेँ। ] १.श्री गोविन्द झा- विदेहकेँ तरंगजालपर उतारि विश्वभरिमे मातृभाषा मैथिलीक लहरि जगाओल, खेद जे अपनेक एहि महाभियानमे हम एखन धरि संग नहि दए सकलहुँ। सुनैत छी अपनेकेँ सुझाओ आ रचनात्मक आलोचना प्रिय लगैत अछि तेँ किछु लिखक मोन भेल। हमर सहायता आ सहयोग अपनेकेँ सदा उपलब्ध रहत। २.श्री रमानन्द रेणु- मैथिलीमे ई-पत्रिका पाक्षिक रूपेँ चला कऽ जे अपन मातृभाषाक प्रचार कऽ रहल छी, से धन्यवाद । आगाँ अपनेक समस्त मैथिलीक कार्यक हेतु हम हृदयसँ शुभकामना दऽ रहल छी। ३.श्री विद्यानाथ झा "विदित"- संचार आ प्रौद्योगिकीक एहि प्रतिस्पर्धी ग्लोबल युगमे अपन महिमामय "विदेह"केँ अपना देहमे प्रकट देखि जतबा प्रसन्नता आ संतोष भेल, तकरा कोनो उपलब्ध "मीटर"सँ नहि नापल जा सकैछ? ..एकर ऐतिहासिक मूल्यांकन आ सांस्कृतिक प्रतिफलन एहि शताब्दीक अंत धरि लोकक नजरिमे आश्चर्यजनक रूपसँ प्रकट हैत। ४. प्रो. उदय नारायण सिंह "नचिकेता"- जे काज अहाँ कए रहल छी तकर चरचा एक दिन मैथिली भाषाक इतिहासमे होएत। आनन्द भए रहल अछि, ई जानि कए जे एतेक गोट मैथिल "विदेह" ई जर्नलकेँ पढ़ि रहल छथि।...विदेहक चालीसम अंक पुरबाक लेल अभिनन्दन। ५. डॉ. गंगेश गुंजन- एहि विदेह-कर्ममे लागि रहल अहाँक सम्वेदनशील मन, मैथिलीक प्रति समर्पित मेहनतिक अमृत रंग, इतिहास मे एक टा विशिष्ट फराक अध्याय आरंभ करत, हमरा विश्वास अछि। अशेष शुभकामना आ बधाइक सङ्ग, सस्नेह...अहाँक पोथी कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक प्रथम दृष्टया बहुत भव्य तथा उपयोगी बुझाइछ। मैथिलीमे तँ अपना स्वरूपक प्रायः ई पहिले एहन  भव्य अवतारक पोथी थिक। हर्षपूर्ण हमर हार्दिक बधाई स्वीकार करी। ६. श्री रामाश्रय झा "रामरंग"(आब स्वर्गीय)- "अपना" मिथिलासँ संबंधित...विषय वस्तुसँ अवगत भेलहुँ।...शेष सभ कुशल अछि। ७. श्री ब्रजेन्द्र त्रिपाठी- साहित्य अकादमी- इंटरनेट पर प्रथम मैथिली पाक्षिक पत्रिका "विदेह" केर लेल बधाई आ शुभकामना स्वीकार करू। ८. श्री प्रफुल्लकुमार सिंह "मौन"- प्रथम मैथिली पाक्षिक पत्रिका "विदेह" क प्रकाशनक समाचार जानि कनेक चकित मुदा बेसी आह्लादित भेलहुँ। कालचक्रकेँ पकड़ि जाहि दूरदृष्टिक परिचय देलहुँ, ओहि लेल हमर मंगलकामना। ९.डॉ. शिवप्रसाद यादव- ई जानि अपार हर्ष भए रहल अछि, जे नव सूचना-क्रान्तिक क्षेत्रमे मैथिली पत्रकारिताकेँ प्रवेश दिअएबाक साहसिक कदम उठाओल अछि। पत्रकारितामे एहि प्रकारक नव प्रयोगक हम स्वागत करैत छी, संगहि "विदेह"क सफलताक शुभकामना। १०. श्री आद्याचरण झा- कोनो पत्र-पत्रिकाक प्रकाशन- ताहूमे मैथिली पत्रिकाक प्रकाशनमे के कतेक सहयोग करताह- ई तऽ भविष्य कहत। ई हमर ८८ वर्षमे ७५ वर्षक अनुभव रहल। एतेक पैघ महान यज्ञमे हमर श्रद्धापूर्ण आहुति प्राप्त होयत- यावत ठीक-ठाक छी/ रहब। ११. श्री विजय ठाकुर- मिशिगन विश्वविद्यालय- "विदेह" पत्रिकाक अंक देखलहुँ, सम्पूर्ण टीम बधाईक पात्र अछि। पत्रिकाक मंगल भविष्य हेतु हमर शुभकामना स्वीकार कएल जाओ। १२. श्री सुभाषचन्द्र यादव- ई-पत्रिका "विदेह" क बारेमे जानि प्रसन्नता भेल। ’विदेह’ निरन्तर पल्लवित-पुष्पित हो आ चतुर्दिक अपन सुगंध पसारय से कामना अछि। १३. श्री मैथिलीपुत्र प्रदीप- ई-पत्रिका "विदेह" केर सफलताक भगवतीसँ कामना। हमर पूर्ण सहयोग रहत। १४. डॉ. श्री भीमनाथ झा- "विदेह" इन्टरनेट पर अछि तेँ "विदेह" नाम उचित आर कतेक रूपेँ एकर विवरण भए सकैत अछि। आइ-काल्हि मोनमे उद्वेग रहैत अछि, मुदा शीघ्र पूर्ण सहयोग देब।कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक देखि अति प्रसन्नता भेल। मैथिलीक लेल ई घटना छी। १५. श्री रामभरोस कापड़ि "भ्रमर"- जनकपुरधाम- "विदेह" ऑनलाइन देखि रहल छी। मैथिलीकेँ अन्तर्राष्ट्रीय जगतमे पहुँचेलहुँ तकरा लेल हार्दिक बधाई। मिथिला रत्न सभक संकलन अपूर्व। नेपालोक सहयोग भेटत, से विश्वास करी। १६. श्री राजनन्दन लालदास- "विदेह" ई-पत्रिकाक माध्यमसँ बड़ नीक काज कए रहल छी, नातिक अहिठाम देखलहुँ। एकर वार्षिक अ‍ंक जखन प्रिं‍ट निकालब तँ हमरा पठायब। कलकत्तामे बहुत गोटेकेँ हम साइटक पता लिखाए देने छियन्हि। मोन तँ होइत अछि जे दिल्ली आबि कए आशीर्वाद दैतहुँ, मुदा उमर आब बेशी भए गेल। शुभकामना देश-विदेशक मैथिलकेँ जोड़बाक लेल।.. उत्कृष्ट प्रकाशन कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक लेल बधाइ। अद्भुत काज कएल अछि, नीक प्रस्तुति अछि सात खण्डमे।  मुदा अहाँक सेवा आ से निःस्वार्थ तखन बूझल जाइत जँ अहाँ द्वारा प्रकाशित पोथी सभपर दाम लिखल नहि रहितैक। ओहिना सभकेँ विलहि देल जइतैक। (स्पष्टीकरण-  श्रीमान्, अहाँक सूचनार्थ विदेह द्वारा ई-प्रकाशित कएल सभटा सामग्री आर्काइवमे https://sites.google.com/a/videha.com/videha-pothi/ पर बिना मूल्यक डाउनलोड लेल उपलब्ध छै आ भविष्यमे सेहो रहतैक। एहि आर्काइवकेँ जे कियो प्रकाशक अनुमति लऽ कऽ प्रिंट रूपमे प्रकाशित कएने छथि आ तकर ओ दाम रखने छथि ताहिपर हमर कोनो नियंत्रण नहि अछि।- गजेन्द्र ठाकुर)...   अहाँक प्रति अशेष शुभकामनाक संग। १७. डॉ. प्रेमशंकर सिंह- अहाँ मैथिलीमे इंटरनेटपर पहिल पत्रिका "विदेह" प्रकाशित कए अपन अद्भुत मातृभाषानुरागक परिचय देल अछि, अहाँक निःस्वार्थ मातृभाषानुरागसँ प्रेरित छी, एकर निमित्त जे हमर सेवाक प्रयोजन हो, तँ सूचित करी। इंटरनेटपर आद्योपांत पत्रिका देखल, मन प्रफुल्लित भऽ गेल। १८.श्रीमती शेफालिका वर्मा- विदेह ई-पत्रिका देखि मोन उल्लाससँ भरि गेल। विज्ञान कतेक प्रगति कऽ रहल अछि...अहाँ सभ अनन्त आकाशकेँ भेदि दियौ, समस्त विस्तारक रहस्यकेँ तार-तार कऽ दियौक...। अपनेक अद्भुत पुस्तक कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक विषयवस्तुक दृष्टिसँ गागरमे सागर अछि। बधाई। १९.श्री हेतुकर झा, पटना-जाहि समर्पण भावसँ अपने मिथिला-मैथिलीक सेवामे तत्पर छी से स्तुत्य अछि। देशक राजधानीसँ भय रहल मैथिलीक शंखनाद मिथिलाक गाम-गाममे मैथिली चेतनाक विकास अवश्य करत। २०. श्री योगानन्द झा, कबिलपुर, लहेरियासराय- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पोथीकेँ निकटसँ देखबाक अवसर भेटल अछि आ मैथिली जगतक एकटा उद्भट ओ समसामयिक दृष्टिसम्पन्न हस्ताक्षरक कलमबन्द परिचयसँ आह्लादित छी। "विदेह"क देवनागरी सँस्करण पटनामे रु. 80/- मे उपलब्ध भऽ सकल जे विभिन्न लेखक लोकनिक छायाचित्र, परिचय पत्रक ओ रचनावलीक सम्यक प्रकाशनसँ ऐतिहासिक कहल जा सकैछ। २१. श्री किशोरीकान्त मिश्र- कोलकाता- जय मैथिली, विदेहमे बहुत रास कविता, कथा, रिपोर्ट आदिक सचित्र संग्रह देखि आ आर अधिक प्रसन्नता मिथिलाक्षर देखि- बधाई स्वीकार कएल जाओ। २२.श्री जीवकान्त- विदेहक मुद्रित अंक पढ़ल- अद्भुत मेहनति। चाबस-चाबस। किछु समालोचना मरखाह..मुदा सत्य। २३. श्री भालचन्द्र झा- अपनेक कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक देखि बुझाएल जेना हम अपने छपलहुँ अछि। एकर विशालकाय आकृति अपनेक सर्वसमावेशताक परिचायक अछि। अपनेक रचना सामर्थ्यमे उत्तरोत्तर वृद्धि हो, एहि शुभकामनाक संग हार्दिक बधाई। २४.श्रीमती डॉ नीता झा- अहाँक कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़लहुँ। ज्योतिरीश्वर शब्दावली, कृषि मत्स्य शब्दावली आ सीत बसन्त आ सभ कथा, कविता, उपन्यास, बाल-किशोर साहित्य सभ उत्तम छल। मैथिलीक उत्तरोत्तर विकासक लक्ष्य दृष्टिगोचर होइत अछि। २५.श्री मायानन्द मिश्र- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक मे हमर उपन्यास स्त्रीधनक जे विरोध कएल गेल अछि तकर हम विरोध करैत छी।... कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पोथीक लेल शुभकामना।(श्रीमान् समालोचनाकेँ विरोधक रूपमे नहि लेल जाए।-गजेन्द्र ठाकुर) २६.श्री महेन्द्र हजारी- सम्पादक श्रीमिथिला- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़ि मोन हर्षित भऽ गेल..एखन पूरा पढ़यमे बहुत समय लागत, मुदा जतेक पढ़लहुँ से आह्लादित कएलक। २७.श्री केदारनाथ चौधरी- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक अद्भुत लागल, मैथिली साहित्य लेल ई पोथी एकटा प्रतिमान बनत। २८.श्री सत्यानन्द पाठक- विदेहक हम नियमित पाठक छी। ओकर स्वरूपक प्रशंसक छलहुँ। एम्हर अहाँक लिखल - कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक देखलहुँ। मोन आह्लादित भऽ उठल। कोनो रचना तरा-उपरी। २९.श्रीमती रमा झा-सम्पादक मिथिला दर्पण। कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक प्रिंट फॉर्म पढ़ि आ एकर गुणवत्ता देखि मोन प्रसन्न भऽ गेल, अद्भुत शब्द एकरा लेल प्रयुक्त कऽ रहल छी। विदेहक उत्तरोत्तर प्रगतिक शुभकामना। ३०.श्री नरेन्द्र झा, पटना- विदेह नियमित देखैत रहैत छी। मैथिली लेल अद्भुत काज कऽ रहल छी। ३१.श्री रामलोचन ठाकुर- कोलकाता- मिथिलाक्षर विदेह देखि मोन प्रसन्नतासँ भरि उठल, अंकक विशाल परिदृश्य आस्वस्तकारी अछि। ३२.श्री तारानन्द वियोगी- विदेह आ कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक देखि चकबिदोर लागि गेल। आश्चर्य। शुभकामना आ बधाई। ३३.श्रीमती प्रेमलता मिश्र “प्रेम”- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़लहुँ। सभ रचना उच्चकोटिक लागल। बधाई। ३४.श्री कीर्तिनारायण मिश्र- बेगूसराय- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक बड्ड नीक लागल, आगांक सभ काज लेल बधाई। ३५.श्री महाप्रकाश-सहरसा- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक नीक लागल, विशालकाय संगहि उत्तमकोटिक। ३६.श्री अग्निपुष्प- मिथिलाक्षर आ देवाक्षर विदेह पढ़ल..ई प्रथम तँ अछि एकरा प्रशंसामे मुदा हम एकरा दुस्साहसिक कहब। मिथिला चित्रकलाक स्तम्भकेँ मुदा अगिला अंकमे आर विस्तृत बनाऊ। ३७.श्री मंजर सुलेमान-दरभंगा- विदेहक जतेक प्रशंसा कएल जाए कम होएत। सभ चीज उत्तम। ३८.श्रीमती प्रोफेसर वीणा ठाकुर- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक उत्तम, पठनीय, विचारनीय। जे क्यो देखैत छथि पोथी प्राप्त करबाक उपाय पुछैत छथि। शुभकामना। ३९.श्री छत्रानन्द सिंह झा- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़लहुँ, बड्ड नीक सभ तरहेँ। ४०.श्री ताराकान्त झा- सम्पादक मैथिली दैनिक मिथिला समाद- विदेह तँ कन्टेन्ट प्रोवाइडरक काज कऽ रहल अछि। कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक अद्भुत लागल। ४१.डॉ रवीन्द्र कुमार चौधरी- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक बहुत नीक, बहुत मेहनतिक परिणाम। बधाई। ४२.श्री अमरनाथ- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक आ विदेह दुनू स्मरणीय घटना अछि, मैथिली साहित्य मध्य। ४३.श्री पंचानन मिश्र- विदेहक वैविध्य आ निरन्तरता प्रभावित करैत अछि, शुभकामना। ४४.श्री केदार कानन- कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक लेल अनेक धन्यवाद, शुभकामना आ बधाइ स्वीकार करी। आ नचिकेताक भूमिका पढ़लहुँ। शुरूमे तँ लागल जेना कोनो उपन्यास अहाँ द्वारा सृजित भेल अछि मुदा पोथी उनटौला पर ज्ञात भेल जे एहिमे तँ सभ विधा समाहित अछि। ४५.श्री धनाकर ठाकुर- अहाँ नीक काज कऽ रहल छी। फोटो गैलरीमे चित्र एहि शताब्दीक जन्मतिथिक अनुसार रहैत तऽ नीक। ४६.श्री आशीष झा- अहाँक पुस्तकक संबंधमे एतबा लिखबा सँ अपना कए नहि रोकि सकलहुँ जे ई किताब मात्र किताब नहि थीक, ई एकटा उम्मीद छी जे मैथिली अहाँ सन पुत्रक सेवा सँ निरंतर समृद्ध होइत चिरजीवन कए प्राप्त करत। ४७.श्री शम्भु कुमार सिंह- विदेहक तत्परता आ क्रियाशीलता देखि आह्लादित भऽ रहल छी। निश्चितरूपेण कहल जा सकैछ जे समकालीन मैथिली पत्रिकाक इतिहासमे विदेहक नाम स्वर्णाक्षरमे लिखल जाएत। ओहि कुरुक्षेत्रक घटना सभ तँ अठारहे दिनमे खतम भऽ गेल रहए मुदा अहाँक कुरुक्षेत्रम् तँ अशेष अछि। ४८.डॉ. अजीत मिश्र- अपनेक प्रयासक कतबो प्रश‍ंसा कएल जाए कमे होएतैक। मैथिली साहित्यमे अहाँ द्वारा कएल गेल काज युग-युगान्तर धरि पूजनीय रहत। ४९.श्री बीरेन्द्र मल्लिक- अहाँक कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक आ विदेह:सदेह पढ़ि अति प्रसन्नता भेल। अहाँक स्वास्थ्य ठीक रहए आ उत्साह बनल रहए से कामना। ५०.श्री कुमार राधारमण- अहाँक दिशा-निर्देशमे विदेह पहिल मैथिली ई-जर्नल देखि अति प्रसन्नता भेल। हमर शुभकामना। ५१.श्री फूलचन्द्र झा प्रवीण-विदेह:सदेह पढ़ने रही मुदा कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक देखि बढ़ाई देबा लेल बाध्य भऽ गेलहुँ। आब विश्वास भऽ गेल जे मैथिली नहि मरत। अशेष शुभकामना। ५२.श्री विभूति आनन्द- विदेह:सदेह देखि, ओकर विस्तार देखि अति प्रसन्नता भेल। ५३.श्री मानेश्वर मनुज-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक एकर भव्यता देखि अति प्रसन्नता भेल, एतेक विशाल ग्रन्थ मैथिलीमे आइ धरि नहि देखने रही। एहिना भविष्यमे काज करैत रही, शुभकामना। ५४.श्री विद्यानन्द झा- आइ.आइ.एम.कोलकाता- कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक विस्तार, छपाईक संग गुणवत्ता देखि अति प्रसन्नता भेल। अहाँक अनेक धन्यवाद; कतेक बरखसँ हम नेयारैत छलहुँ जे सभ पैघ शहरमे मैथिली लाइब्रेरीक स्थापना होअए, अहाँ ओकरा वेबपर कऽ रहल छी, अनेक धन्यवाद। ५५.श्री अरविन्द ठाकुर-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक मैथिली साहित्यमे कएल गेल एहि तरहक पहिल प्रयोग अछि, शुभकामना। ५६.श्री कुमार पवन-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक पढ़ि रहल छी। किछु लघुकथा पढ़ल अछि, बहुत मार्मिक छल। ५७. श्री प्रदीप बिहारी-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक देखल, बधाई। ५८.डॉ मणिकान्त ठाकुर-कैलिफोर्निया- अपन विलक्षण नियमित सेवासँ हमरा लोकनिक हृदयमे विदेह सदेह भऽ गेल अछि। ५९.श्री धीरेन्द्र प्रेमर्षि- अहाँक समस्त प्रयास सराहनीय। दुख होइत अछि जखन अहाँक प्रयासमे अपेक्षित सहयोग नहि कऽ पबैत छी। ६०.श्री देवशंकर नवीन- विदेहक निरन्तरता आ विशाल स्वरूप- विशाल पाठक वर्ग, एकरा ऐतिहासिक बनबैत अछि। ६१.श्री मोहन भारद्वाज- अहाँक समस्त कार्य देखल, बहुत नीक। एखन किछु परेशानीमे छी, मुदा शीघ्र सहयोग देब। ६२.श्री फजलुर रहमान हाशमी-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक मे एतेक मेहनतक लेल अहाँ साधुवादक अधिकारी छी। ६३.श्री लक्ष्मण झा "सागर"- मैथिलीमे चमत्कारिक रूपेँ अहाँक प्रवेश आह्लादकारी अछि।..अहाँकेँ एखन आर..दूर..बहुत दूरधरि जेबाक अछि। स्वस्थ आ प्रसन्न रही। ६४.श्री जगदीश प्रसाद मंडल-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक पढ़लहुँ । कथा सभ आ उपन्यास सहस्रबाढ़नि पूर्णरूपेँ पढ़ि गेल छी। गाम-घरक भौगोलिक विवरणक जे सूक्ष्म वर्णन सहस्रबाढ़निमे अछि, से चकित कएलक, एहि संग्रहक कथा-उपन्यास मैथिली लेखनमे विविधता अनलक अछि। समालोचना शास्त्रमे अहाँक दृष्टि वैयक्तिक नहि वरन् सामाजिक आ कल्याणकारी अछि, से प्रशंसनीय। ६५.श्री अशोक झा-अध्यक्ष मिथिला विकास परिषद- कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक लेल बधाई आ आगाँ लेल शुभकामना। ६६.श्री ठाकुर प्रसाद मुर्मु- अद्भुत प्रयास। धन्यवादक संग प्रार्थना जे अपन माटि-पानिकेँ ध्यानमे राखि अंकक समायोजन कएल जाए। नव अंक धरि प्रयास सराहनीय। विदेहकेँ बहुत-बहुत धन्यवाद जे एहेन सुन्दर-सुन्दर सचार (आलेख) लगा रहल छथि। सभटा ग्रहणीय- पठनीय। ६७.बुद्धिनाथ मिश्र- प्रिय गजेन्द्र जी,अहाँक सम्पादन मे प्रकाशित ‘विदेह’आ ‘कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक’ विलक्षण पत्रिका आ विलक्षण पोथी! की नहि अछि अहाँक सम्पादनमे? एहि प्रयत्न सँ मैथिली क विकास होयत,निस्संदेह। ६८.श्री बृखेश चन्द्र लाल- गजेन्द्रजी, अपनेक पुस्तक कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक पढ़ि मोन गदगद भय गेल , हृदयसँ अनुगृहित छी । हार्दिक शुभकामना । ६९.श्री परमेश्वर कापड़ि - श्री गजेन्द्र जी । कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक पढ़ि गदगद आ नेहाल भेलहुँ। ७०.श्री रवीन्द्रनाथ ठाकुर- विदेह पढ़ैत रहैत छी। धीरेन्द्र प्रेमर्षिक मैथिली गजलपर आलेख पढ़लहुँ। मैथिली गजल कत्तऽ सँ कत्तऽ चलि गेलैक आ ओ अपन आलेखमे मात्र अपन जानल-पहिचानल लोकक चर्च कएने छथि। जेना मैथिलीमे मठक परम्परा रहल अछि। (स्पष्टीकरण- श्रीमान्, प्रेमर्षि जी ओहि आलेखमे ई स्पष्ट लिखने छथि जे किनको नाम जे छुटि गेल छन्हि तँ से मात्र आलेखक लेखकक जानकारी नहि रहबाक द्वारे, एहिमे आन कोनो कारण नहि देखल जाय। अहाँसँ एहि विषयपर विस्तृत आलेख सादर आमंत्रित अछि।-सम्पादक) ७१.श्री मंत्रेश्वर झा- विदेह पढ़ल आ संगहि अहाँक मैगनम ओपस कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक सेहो, अति उत्तम। मैथिलीक लेल कएल जा रहल अहाँक समस्त कार्य अतुलनीय अछि। ७२. श्री हरेकृष्ण झा- कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक मैथिलीमे अपन तरहक एकमात्र ग्रन्थ अछि, एहिमे लेखकक समग्र दृष्टि आ रचना कौशल देखबामे आएल जे लेखकक फील्डवर्कसँ जुड़ल रहबाक कारणसँ अछि। ७३.श्री सुकान्त सोम- कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक मे  समाजक इतिहास आ वर्तमानसँ अहाँक जुड़ाव बड्ड नीक लागल, अहाँ एहि क्षेत्रमे आर आगाँ काज करब से आशा अछि। ७४.प्रोफेसर मदन मिश्र- कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक सन किताब मैथिलीमे पहिले अछि आ एतेक विशाल संग्रहपर शोध कएल जा सकैत अछि। भविष्यक लेल शुभकामना। ७५.प्रोफेसर कमला चौधरी- मैथिलीमे कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक सन पोथी आबए जे गुण आ रूप दुनूमे निस्सन होअए, से बहुत दिनसँ आकांक्षा छल, ओ आब जा कऽ पूर्ण भेल। पोथी एक हाथसँ दोसर हाथ घुमि रहल अछि, एहिना आगाँ सेहो अहाँसँ आशा अछि। ७६.श्री उदय चन्द्र झा "विनोद": गजेन्द्रजी, अहाँ जतेक काज कएलहुँ अछि से मैथिलीमे आइ धरि कियो नहि कएने छल। शुभकामना। अहाँकेँ एखन बहुत काज आर करबाक अछि। ७७.श्री कृष्ण कुमार कश्यप: गजेन्द्र ठाकुरजी, अहाँसँ भेँट एकटा स्मरणीय क्षण बनि गेल। अहाँ जतेक काज एहि बएसमे कऽ गेल छी ताहिसँ हजार गुणा आर बेशीक आशा अछि। ७८.श्री मणिकान्त दास: अहाँक मैथिलीक कार्यक प्रशंसा लेल शब्द नहि भेटैत अछि। अहाँक कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक सम्पूर्ण रूपेँ पढ़ि गेलहुँ। त्वञ्चाहञ्च बड्ड नीक लागल। ७९. श्री हीरेन्द्र कुमार झा- विदेह ई-पत्रिकाक सभ अंक ई-पत्रसँ भेटैत रहैत अछि। मैथिलीक ई-पत्रिका छैक एहि बातक गर्व होइत अछि। अहाँ आ अहाँक सभ सहयोगीकेँ हार्दिक शुभकामना। विदेह मैथिली साहित्य आन्दोलन (c)२००४-१२. सर्वाधिकार लेखकाधीन आ जतए लेखकक नाम नहि अछि ततए संपादकाधीन। विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। सह-सम्पादक: उमेश मंडल। सहायक सम्पादक: शिव कुमार झा आ मुन्नाजी (मनोज कुमार कर्ण)। भाषा-सम्पादन: नागेन्द्र कुमार झा आ पञ्जीकार विद्यानन्द झा। कला-सम्पादन: ज्योति झा चौधरी आ रश्मि रेखा सिन्हा। सम्पादक-शोध-अन्वेषण: डॉ. जया वर्मा आ डॉ. राजीव कुमार वर्मा। सम्पादक- नाटक-रंगमंच-चलचित्र- बेचन ठाकुर। सम्पादक- सूचना-सम्पर्क-समाद- पूनम मंडल आ प्रियंका झा। सम्पादक- अनुवाद विभाग- विनीत उत्पल। रचनाकार अपन मौलिक आ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि) ggajendra@videha.com केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx, .rtf वा .txt फॉर्मेटमे पठा सकैत छथि। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेताह, से आशा करैत छी। रचनाक अंतमे टाइप रहय, जे ई रचना मौलिक अछि, आ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। मेल प्राप्त होयबाक बाद यथासंभव शीघ्र ( सात दिनक भीतर) एकर प्रकाशनक अंकक सूचना देल जायत। ’विदेह' प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका अछि आ एहिमे मैथिली, संस्कृत आ अंग्रेजीमे मिथिला आ मैथिलीसँ संबंधित रचना प्रकाशित कएल जाइत अछि। एहि ई पत्रिकाकेँ श्रीमति लक्ष्मी ठाकुर द्वारा मासक ०१ आ १५ तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि। (c) 2004-12 सर्वाधिकार सुरक्षित। विदेहमे प्रकाशित सभटा रचना आ आर्काइवक सर्वाधिकार रचनाकार आ संग्रहकर्त्ताक लगमे छन्हि। रचनाक अनुवाद आ पुनः प्रकाशन किंवा आर्काइवक उपयोगक अधिकार किनबाक हेतु ggajendra@videha.com पर संपर्क करू। एहि साइटकेँ प्रीति झा ठाकुर, मधूलिका चौधरी आ रश्मि प्रिया द्वारा डिजाइन कएल गेल। सिद्धिरस्तु वि दे ह विदेह Videha বিদেহ  www.videha.co.in and www.videha.com विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका Videha Ist Maithili Fortnightly ejournal  विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका'विदेह' ११८ म अंक १५ नवम्बर २०१२ (वर्ष ५ मास ५९ अंक ११८) मानुषीमिह संस्कृताम् ISSN 2229-547X VIDEHA

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fee tte =nt cus 'लोकार्पण, चर्चा आ नाट्य-प्रस्तुति 4 = am (उपन्यास) : गौरीनाथ प्रमुख वक्ता: सुकान्त सोम, सुरेन्द्र स्निग्ध, हृषीकेश सुलभ, प्रेम कुमार मणि 'तारानन्द वियोगी, मोना झा, डॉ. विनय कुमार “दाग 'क पहिल अध्याय ' ब्रहम-शक्ति 'क नाट्य-प्रस्तुति ye आन रूपांतरण आ निर्देशन : कुणाल Ss SPs स्थान: आई एम ए हॉल, दक्षिण गांधी मैदान, पटना ¥ तिथि आ समय : 25 नवम्बर, 2072, संध्या 04:30 बजे F 7:00 बजे आराम दि विशेष: अंतिका प्रकाशनक पुस्तक आ पत्रिका प्रदर्शनी mer 7 'एहिं अवसर पर मित्र सहित अपने सादर आमंत्रित छी। g निवेदक om wage मिश्र, सचिव आ समस्त भंगिमा परिवार, भंगिमा पटना, दूरभाष संपर्क : 9334339348

सूचना मैथिलीमे So ferco उपाधि प्राप्त: so नरेन्द्र नाथ झा ग्राम+पत्रालय- मेघौल,भाया- सकरी, जिला मधुबनी, बिहारक निवासी छथि, जे सम्प्रति अध्यक्ष मैथिली विभाग do यमुना कार्यी जयन्ती कॉलेज बगाही (ढ़ोली) मुजफ्फरपुर, बी0आर0ए0 बिहार विश्वविद्यालय मुजफ्फरपुरमे कार्यरत छथि। जनिक पी-एच0डी0 उपाधि जून 2006 ई0मे “मिथिला-भाषा रामायणमे शक्ति तत्त्व” विषय पर डा0 रमण झा लएनाएमि0वि0 दरभंगाक शोध निर्देशनमे भेलनि | हिनका Slofeco उपाधि “मैथिली साहित्यमे सीतातत्त्व-निरूपण” डॉ0 नीता झा, विश्वविद्यालय प्रोफेसर एवं पूर्व विभागाध्यक्ष मैथिली विभाग, ल0नाएमि0वि0 दरभंगा शोध- निर्देशनमे 03.09.2042 (Viva-Voce) सुसम्पनन भेलनि। जकर वाह्यपरीक्षक रूपमे so वासुकीनाथ झा पटना एवं <io भगवानजी चौधरी, साहिबगंज (झारखंड), विषय-विशेषज्ञ उपस्थित छलाह | हिनक Sloferco परीक्षाफल i009.20:2 सोमदिन प्रकाशित भेल तथा डी0लीट0 . मूल उपाधि प्रमाण पत्र ल0नाएमि0वि0 दरभंगा चतुर्थ dent समारोह दिनांक 03 अक्टूबर 20(2 20h भारतक राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जीक अध्यक्षतामे प्रमुख रूपमे प्राप्त भेलनि | ः प्रेषक i श्री राम नरेश राय ; रे | NET/J.R.F (U.G.C) t विश्वविद्यालय .. विभाग a i B.R.A.B. University मुजफ्फरपुर नह ९० मो0- 9709728 हि Teg Te का