406 ISSN 2229-547X VIDEHA 'विदेह' ११९ म अंक ०१ दिसम्बर २०१२ (वर्ष ५ मास ६० अंक ११९) ऐ अंकमे अछि:- १. संपादकीय संदेश २. गद्य २.१.आशीष अनचिन्हार- लघु-दीर्घ निर्णय भाग-1 २.२.जगदीश प्रसाद मण्डल-किछु विहनि कथा २.३.सत्यनारायण झा- विहनि कथा- “सुटिया” २.४.मुन्नी कामत- विहनि कथा- कैंसर २.५.महेन्द्र मलंगिया- मूर्दाः श्रृंगार संघर्ष आ द्वन्द्व २.६.जगदानन्द झा मनु- लघुकथा- कमलू २.७.नवेंदु कुमार झा-मिथिला आ मैथिली बॅटबाक भऽ रहल साजिश/ ई गवर्नेंस दिस सरकार बढ़ौलक डेग ३. पद्य ३.१.जगदीश चन्द्र ठाकुर ‘अनिल’- की भेटल आ की हेरा गेल (आत्म गीत)- (आगाँ) ३.२.जगदीश प्रसाद मण्डल- किछु गीत ३.३.१.जगदानन्द झा मनु २.राजदेव मण्डल जीक तीन गोट कविता ३.शिव कुमार यादव- कविता- ई की भेल ३.४.शिव कुमार झा "टिल्लू"- सिनेह ३.५.बाल मुकुंद पाठक- पाँचटा गजल ३.६.१.बिनीता झा- भूखल/ प्रकृति २.मुन्नी कामत-किछु कविता३.शेफालिका वर्मा- रे मन ३.७.१.कैलाश दास- नेता जी २. प्रबीण चौधरी प्रतीक३.सत्यनारायण झा-हे भगवान ३.८.बिन्देश्वर ठाकुर- अभागलमे शुभकामना एक/अस्पतालक हाल/ जनकपुरक रेल्वे/ एक एहनो नारी/गजल बालानां कृते-बाल मुकुन्द पाठक- बाल गजल विदेह मैथिली पोथी डाउनलोड साइट VIDEHA MAITHILI BOOKS FREE DOWNLOAD SITE विदेह ई-पत्रिकाक सभटा पुरान अंक ( ब्रेल, तिरहुता आ देवनागरी मे ) पी.डी.एफ. डाउनलोडक लेल नीचाँक लिंकपर उपलब्ध अछि। All the old issues of Videha e journal ( in Braille, Tirhuta and Devanagari versions ) are available for pdf download at the following link. विदेह ई-पत्रिकाक सभटा पुरान अंक ब्रेल, तिरहुता आ देवनागरी रूपमे Videha e journal's all old issues in Braille Tirhuta and Devanagari versions विदेह ई-पत्रिकाक पहिल ५० अंक
विदेह ई-पत्रिकाक ५०म सँ आगाँक अंक ↑ विदेह आर.एस.एस.फीड एनीमेटरकेँ अपन साइट/ ब्लॉगपर लगाऊ। ब्लॉग "लेआउट" पर "एड गाडजेट" मे "फीड" सेलेक्ट कए "फीड यू.आर.एल." मे http://www.videha.co.in/index.xml टाइप केलासँ सेहो विदेह फीड प्राप्त कए सकैत छी। गूगल रीडरमे पढ़बा लेल http://reader.google.com/ पर जा कऽ Add a Subscription बटन क्लिक करू आ खाली स्थानमे http://www.videha.co.in/index.xml पेस्ट करू आ Add बटन दबाउ। Join official Videha facebook group. 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Go to the link below for download of old issues of VIDEHA Maithili e magazine in .pdf format and Maithili Audio/ Video/ Book/ paintings/ photo files. विदेहक पुरान अंक आ ऑडियो/ वीडियो/ पोथी/ चित्रकला/ फोटो सभक फाइल सभ (उच्चारण, बड़ सुख सार आ दूर्वाक्षत मंत्र सहित) डाउनलोड करबाक हेतु नीचाँक लिंक पर जाउ। VIDEHA ARCHIVE विदेह आर्काइव ज्योतिरीश्वर पूर्व महाकवि विद्यापति। भारत आ नेपालक माटिमे पसरल मिथिलाक धरती प्राचीन कालहिसँ महान पुरुष ओ महिला लोकनिक कर्मभमि रहल अछि। मिथिलाक महान पुरुष ओ महिला लोकनिक चित्र 'मिथिला रत्न' मे देखू। गौरी-शंकरक पालवंश कालक मूर्त्ति, एहिमे मिथिलाक्षरमे (१२०० वर्ष पूर्वक) अभिलेख अंकित अछि। मिथिलाक भारत आ नेपालक माटिमे पसरल एहि तरहक अन्यान्य प्राचीन आ नव स्थापत्य, चित्र, अभिलेख आ मूर्त्तिकलाक़ हेतु देखू 'मिथिलाक खोज' मिथिला, मैथिल आ मैथिलीसँ सम्बन्धित सूचना, सम्पर्क, अन्वेषण संगहि विदेहक सर्च-इंजन आ न्यूज सर्विस आ मिथिला, मैथिल आ मैथिलीसँ सम्बन्धित वेबसाइट सभक समग्र संकलनक लेल देखू "विदेह सूचना संपर्क अन्वेषण" विदेह जालवृत्तक डिसकसन फोरमपर जाउ। "मैथिल आर मिथिला" (मैथिलीक सभसँ लोकप्रिय जालवृत्त) पर जाउ। ऐ बेर युवा पुरस्कार(२०१२)[साहित्य अकादेमी, दिल्ली]क लेल अहाँक नजरिमे कोन कोन लेखक उपयुक्त छथि ? Thank you for voting! श्रीमती ज्योति सुनीत चौधरीक “अर्चिस” (कविता संग्रह) 28.52% श्री विनीत उत्पलक “हम पुछैत छी” (कविता संग्रह) 5.08% श्रीमती कामिनीक “समयसँ सम्वाद करैत”, (कविता संग्रह) 3.91% श्री प्रवीण काश्यपक “विषदन्ती वरमाल कालक रति” (कविता संग्रह) 3.13% श्री आशीष अनचिन्हारक "अनचिन्हार आखर"(गजल संग्रह) 22.27% श्री अरुणाभ सौरभक “एतबे टा नहि” (कविता संग्रह) 5.86% श्री दिलीप कुमार झा "लूटन"क जगले रहबै (कविता संग्रह) 5.47% श्री आदि यायावरक “भोथर पेंसिलसँ लिखल” (कथा संग्रह) 3.91% श्री उमेश मण्डलक “निश्तुकी” (कविता संग्रह) 20.31% Other: 2% ऐ बेर अनुवाद पुरस्कार (२०१३) [साहित्य अकादेमी, दिल्ली]क लेल अहाँक नजरिमे के उपयुक्त छथि? Thank you for voting! श्री नरेश कुमार विकल "ययाति" (मराठी उपन्यास श्री विष्णु सखाराम खाण्डेकर) 33.6% श्री महेन्द्र नारायण राम "कार्मेलीन" (कोंकणी उपन्यास श्री दामोदर मावजो) 11.2% श्री देवेन्द्र झा "अनुभव"(बांग्ला उपन्यास श्री दिव्येन्दु पालित) 11.2% श्रीमती मेनका मल्लिक "देश आ अन्य कविता सभ" (नेपालीक अनुवाद मूल- रेमिका थापा) 21.6% श्री कृष्ण कुमार कश्यप आ श्रीमती शशिबाला- मैथिली गीतगोविन्द ( जयदेव संस्कृत) 12% श्री रामनारायण सिंह "मलाहिन" (श्री तकषी शिवशंकर पिल्लैक मलयाली उपन्यास) 9.6% Other: 0.8% फेलो पुरस्कार-समग्र योगदान २०१२-१३ : समानान्तर साहित्य अकादेमी, दिल्ली Thank you for voting! श्री राजनन्दन लाल दास 44.92% श्री डॉ. अमरेन्द्र 36.44% श्री चन्द्रभानु सिंह 16.95% Other: 1.69% 1.संपादकीय जगदीश प्रसाद मण्डल- एकटा बायोग्राफी आगाँ करीब अढ़ाइ बजे काली बाबूक ऐठाम जगदीश प्रसाद मण्डल पहुँचला। नीक फुलवाड़ी, आठ कोठरीक नीक डेरा, होम गार्डक ड्यूटी। पहिने हुनकर पत्नी देखलखिन कारणो छलै जे ओ रोडे दिसक कोठरीमे रहथि, खिड़की खोलि बाहर आबि गेट खोलि आगू बढ़ि काली बाबूकेँ कहलखिन, ओ डेराक सभसँ दछिनवरिया कोठरीमे भुँइयेँपर शतरंजी बिछा पड़ल रहथि। धड़फड़ाएले उठि आबि कऽ एकटा कोठरी देखा कहलखिन, झोड़ा राखि दिऔ। बाथ रूम देखबैत कहलखिन, गाड़ीक झमाड़ल छी पहिने नहा लिअ। जगदीश प्रसाद मण्डलकेँ अपनो सएह मन रहनि। सएह केलनि। नहा कऽ कोठरीमे अबिते कहलखिन, खेला बाद अराम करब। जगदीश प्रसाद मण्डल कहलखिन- “भूख लागल छलए, बसे स्टेण्डमे खा लेलौं।” साँझू पहर चाह-ताह पीब दुनू गोटे दोबरा कऽ लुंगी जकाँ धोती आ बिना गंजियेक कुर्ता पहिरने रहथि। कारणो छलै, मौसम। डेरासँ बगलिते पछवरिया डेराक सम्बन्धमे कहए लगलखिन्ह। ओ डेरा डी.एम.क छल जे मणीपुरी छलाह। १९८४ बैचक आइ.ए.एस। डेराक आगूमे ठाढ़ देखि ओ निकलि कऽ एला। अबिते काली बाबू बंगलामे कहलखिन जे बंधु छथि। तखन ओ हिन्दीमे गप-सप केलखिन। आगू बढ़िते आइ.जी.क डेरा। आइ.जी.क बेटा संग कालीबाबूक बेटाकेँ दोस्ती। डेरा लग पहुँचते दुनू गोटे हूल दऽ डेरासँ निकलल। ओ बंगाली छलाह। अगरतलाक बंगला भाषी। पहिल दिन १९६० ई. धरिक अपन चरिकोसीक विद्यार्थीक ओतऽ चर्च भेल छल। दोसर दिन सबेरे चाहे पीबैत काल ओ कहलखिन जे आइ ऑफिस होइत दछिनमे बूढ़ी काली मंदिर अछि तइठाम तक चलब। सबेरे दस बजे संगे दुनू गोटे ऑफिस गेला। ऑफिस सभ नमहर-नमहर रहै मुदा अपन आॅफिस छोटेटा छलनि। एकटा अलमारी, दूटा कुर्सी, एकटा टेबुल। सोझे अपना कोठरीमे पहुँचलाह। पहुँचते एकटा बंगाली प्यून (बी.ए. पास धुड़झाड़ बजैबला) पहुँचलनि। ऑफिसक सम्बन्धमे पुछलखिन। सभ बात सुनि कहलखिन- चाह पिआउ। चाह पीब दुनू गोटे विदा भेला। बाजारसँ निकलिते चाहक खेती दिस बढ़ला। सड़कक दुनू कात पहाड़ी जमीन छै। जहिना अपना ऐठाम पहिने लोक पतिआनी लगा बेढ़ीक काज करैत छलाह तहिना पानक बड़ैब जकाँ ढलुआ बनाओल छल। भरि-भरि छातीक गाछ। ओइमे अधिक महिला पीठपर बोको लदने चाह-पत्ती तोड़ैत छलीह। चाहक गप-सप चलबैत कहलखिन जे हालेमे ग्रीन टी कऽ कऽ नव िकस्म आएल अछि, ओना खेती बहुत अधिक नै भेल अछि मुदा दुनियाँक बजारमे सभसँ बेसी मांग अछि। कीमतो सभसँ ऊपर छै। कनिये आगू बढ़लापर रबड़क गाछ देखलनि। पतिआनी लगा रोपल। गाछक आकारसँ बूझि पड़लनि जे पनरह-बीस बर्खक हएत। बहुत भारी नै देखलनि। छाती भरि ऊपरमे खोधल, जइमे सँ लस्सा (दूध) निकलैत। सभ दिन भिनसरू पहर ओइ दूधकेँ समेटि-समेटि लऽ कऽ रबड़ बनबैत। करीब बारह बजे बूढ़ी काली स्थान पहुँचला। छोट-छीन जगह। कमे दोकान-दौरी। सए बर्खसँ ऊपरक बूझि पड़लनि। सुर्खीपर जोड़ल मकान फाटि-फुटि, झड़ि-झूड़ि गेल छलै। मूर्ति देखि निकलि गेला। पुरान कलाक मूर्ति। मुदा हुनका बहुत रास मंत्र सभ पढ़बाक छलनि तँए ओ मंदिरमे रहलाह। बाहर निकलि गाछ सभ िहयेलनि तँ कैम्पसेमे एकठाम आम, कटहर, गमहारि, शीशो-जामुनक गाछ देखिलनि। अखन धरि गौहाटीक उपरान्त एहेन पचमेल गाछ कतौ ने देखने छला। तँए किछु बात मनमे उठलनि। अंतमे मन-मानि गेलनि जे मिथिलाक कियो पुजेगरी रहल हेताह। जगदीश प्रसाद मण्डल पुजेगरीसँ किछु काल गप-सप करिते रहथि आकि ताबे ओहो निकललाह। निकलिते कहलखिन जे कहने जे छलौं कमल सागर देखब, से यएह छी। हिया कऽ देखलनि तँ बूझि पड़लनि जे बेरमाक बड़की पोखरिसँ छोटे छै। पंचो ठीके-ठाक बूझि पड़लनि। किएक तँ बेरमा बड़की पोखरिसँ ओहो परिचिते। तहूमे बेरमा बड़की पोखरि आ कछुबी बड़की पोखरिक तुलना तँ दुनू गामक लोक करबे करैत रहैए। तइमे बेरमा बीस, तँ बड़कियो पोखरि बीस। जगदीश प्रसाद मण्डल कहलखिन- “एकर नाओं किअए सागर पड़ल?” भूगोलक विद्यार्थी ठमकि गेलाह। ठमकिते दोहरा देलखिन जे बेरमा बड़की पोखरिमे एक महारक लोक दोसर महारबलाकेँ नै चिन्है छै, से तँ देखै छिऐ दस कट्ठा पेट हेतै। पोखरिक पछबरिया महारपर बंगला देसक सीमा गाड़ल। बाँसक खुट्टा। तखने थोड़े हटि चटगाम बला रेल पास केलकै। जगदीश प्रसाद मण्डल विदा होइसँ पहिने मिठाइ खा पानि पीब चाह पीलनि। ओना ओ चीनिया बेमारीसँ ग्रसित, मुदा तैयो परसाद जकाँ खेलनि। दिनगरे डेरापर पहुँचै गेला। अखन धरि काली बाबूक परिवार वैष्णव बनि गेल छलनि। शुद्ध शकाहारी परिवार। चारि बजे भोरेसँ नाचि-नाचि भजन करए लगैत छलाह जे पड़ोसिया, मणीपुरबला कहबो करैत छलनि। ईटा सिमटीक छहरदेवाली नै रहने झलफले झाझनक टाट। हुनका देखथि जे व्यायाम बहुत करैत छलाह। मांसक प्रिय। अपने ओ मिथिलांचलेक लोक जकाँ (शरीरसँ) रहथि मुदा पत्नी पहाड़नी जकाँ छोटे कदक। दुर्गापूजाक समए रहबे करै, बगले पूवारि कात, करीब दू बीघा पूब पूजा होइत छल। अपन-अपन परिवारक संग अफसर सभ देखैत छलाह। अपना सभ ऐठाम जकाँ दस दिनक पूजा नै। परीबसँ शुरू नै भऽ छठम दिनसँ शुरू होइत अछि। मुदा मिथिलांचलसँ बहुत बेसी होइत अछि। काली बाबू कहलखिन जे ऐठाम त्रिपुरो आ बंगलो देशमे काली पूजा सभ करैत अछि। असामसँ उत्तर-पूब लऽ कऽ दछिन धरि मेघालय, त्रिपुरा, मिजोरम, मणिपुर, अरूणाचल, नागालैंड राज्य अछि। ट्रेनक रास्ता थोड़ेक आगू धरि। मुख्य सवारी बस-ट्रक छी। जंगल-पहाड़सँ भरल। हजारो किसिमक गाछ-िवरीछ। उपजाऊ जमीन कम। ओना जइठाम रंग-रंगक गाछ-विरीछ अछि तइठाम खाइबला फल सेहो हेबे करतै। ढकिया साग बाध-बोनक घास जकाँ उपजल। ओना गेलापर कहि देलखिन जे अपना ऐठामसँ जे भिन्न अछि ओ देखबो करब आ खेबो करब। एक तँ ओहिना ओ (कालीबाबू) तते भँजिआह अपने जे सभ ठेकनौने रहथिन। तुलनात्मक दृष्टिसँ ओइ इलाका (त्रिपुरा आदि) मे अपना सभसँ बेसी बरखा होइ छै जइसँ अपने सबहक चौरी खेत जकाँ अधिकांस धानक कटनी पानियेमे होइत अछि। जइसँ अपना सभ जकाँ कतिका खेती कम लगै छै। अपना ऐठाम कातिक नीक मास ऐ लेल बूझल जाइत अछि जे अन्नक एक मौसम बनैत अछि। तइ संग तीमन-तरकारी, फल-फलहरीक सेहो बनैत अछि। मोटामोटी यएह जते किसिमक खेती कातिकमे होइत अछि, ओते ने आन कोनो मौसममे। बिलंबसँ खेतक पानि सूखने किछु तेलहन, पटुआ आ धानक खेती होइत अछि। त्रिपुराक करीब साठि-सत्तरि प्रतिशत जंगल-झाड़, पहाड़सँ घेरल अछि। तीस-चालिस प्रतिशतक जमीन उपजाउ। धान मुख्य फसिल छी। जइ तरहक सम्पदा इलाकामे छै, िवकास नै भेल अछि। जनमानसँ धोखा अखनो कएल जा रहल अछि। त्रिपुराक आदिवासी समुदायकेँ एते महगाइक सामना करए पड़ि रहल छै, जे बिसवास नै कएल जा सकैए। ओना विदेशी संस्था सभ शिक्षाक एहेन ढर्रा धड़ा देने अछि जे रेलक विकास नै होउ। हँ ई बात जरूर अछि जे अपना सभ जकाँ रेलवे लाइन बैसबैमे असान नै छै, पहाड़ी क्षेत्र रहने महग अछि। अोना अपनो ऐठाम किछु राजनीतिक दल ओहनो छथि जे सड़क-पुल िनर्माण, नहर-छहर िनर्माणमे मशीनक प्रयोग नै होउ। ट्रेक्टर माटि नै उघए। लोके उघत आ बनाओत। हुनका सभकेँ देखए पड़तनि जे गाममे िसर्फ गिरहस्तीकेँ समुचित बनाओल जाए तइ लेल केनिहार (श्रमिक) नै भेटतनि। तइठाम नहर-छहर, बान्ह–सड़क बाधित कएल जाए, ई कते उचित भेल। पशुपालन नहिये जकाँ ओइ इलाकामे छैक, तेकर अर्थ ई नै जे से केनहि अछि आकि पशु छइहे नै। जंगलमे ओहन-ओहन पशुक भरमार अछि जेकरा आगू अपना सबहक गाए-महीसिक मूल्य फीका पड़ि जाएत। तहिना गाछो-विरीछक हाल अछि। सुन्दरवन इलाकामे हजारक कोन बात, लाखक कोन बात जे करोड़-करोड़ रूपैया मूल्यक गाछ सभ अछि। बाँसक तँ चर्चे नै। खिस्सा जे फल्लाँ खलीफा बाँसे उखाड़ि कऽ दतमनि करैत छलाह, से प्रत्यक्ष भेलनि। ओहनो बाँसक बोन सभ अछि जे जेहेन बाँसक कड़ची होइए। एकटाकेँ काटि कऽ दतमनि केलनि। एकर माने ई नै भेल जे एहेने बाँस ओइ इलाकामे होइ छै। बाँसक दर्जनो किस्म। कड़चीसँ लऽ कऽ ओहनो-ओहनो बाँस सभ अछि जे अपना ऐठामक सँ डेढ़िया-दोबर मोट अछि। बिनु माटिक खेती पहाड़पर होइ छै। झूम सिस्टम कहल जाइ छै। छोट-छोट किआरी बना ओइमे उगल घास-फूस, बोन-झाड़ काटि आगि लगा जरा देलक आ खेती केलक। ई तीन साल पछाति छोड़ि दोसर खेत बनौलक। बंगला देशक लोक बहुत गरीब छथि। तेकर कारणो अछि एक तँ अपने सभ जकाँ १९४७ ई.सँ पूर्व छला। आजादीक संग बँटा कऽ पाकिस्तानक हाथ पड़ि गेल। दुनूक बीच अनेको रंगक विषमता अछि; भाषा, बेवहार, खेती इत्यादिक। सत्ता पाकिस्तानक हाथ पड़ल, पूर्वी बंगाल पछुआ गेल। एक तँ अहुना समुद्री इलाकाक देश, समुद्री-तूफानसँ बेसी बर्बादी होइत अछि तइपर शासनक विपरीतता, आरो धकिया देलक। एक तँ त्रिपुरोक आर्थिक-स्थिति ओते सुदृढ़ नहिये अछि, मुदा सरकारी अनुदान भरपूर भेटै छै। ओना सरकारी अनुदानक सही उपयोग नै भऽ बेसी लुटाइते छै। मुदा तैयो किछु उद्योग-धंधा छोट पैमानापर चलिते अछि। जूटक एकटा कारखानाक संग लघु उद्योगक रूपमे बाँसक छत्ताक बेंट (डंटा), बाँसक बनल आरो-आरो वस्तु बनैत अछि। अगरतल्लाक बजारो तते नमहर तँ नहिये अछि। अल्मुनिया बर्तन सेहो बनैत अछि। बंगला देशक हजारो श्रमिक अगरतलामे रिक्शो चलबैत अछि आ मजदूरियो करैत अछि। दुनूक बीच बीजाक (पासपोर्टक) बेवस्था प्रायोगिक स्तरपर नै छै। सभदिन बंगला देशक श्रमिक भिनसरे अगरतलामे प्रवेश करैत अछि आ साँझू पहर घूमि जाइत अछि। सीमापर अबितो काल आ जाइतो काल गिनती कऽ लेल जाइ छै वा नै से नै जानि। जगदीश प्रसाद मण्डल जखन सीमाक चौकी देखए गेला, तखन मध्य प्रदेशक सिपाही ड्यूटीमे छलाह। हिन्दी भाषी, तँए किछु गप-सप भेलनि। पुछलखिन तँ कहलकनि जे सभ दिन भिनसर ६ बजेसँ आठ बजे तक ई सभ (बंगलादेशी) प्रवेश करैए, सभकेँ गनि कऽ लइ छिऐ आ वापसी काल ५ बजेसँ सात बजे सेहो गनि लइ छिऐ! भाषाक दृष्टिसँ त्रिपुरामे अंग्रेजी, ककवार्क, बंगला आ मणिपुरी चलैत अछि। जगदीश प्रसाद मण्डल जइ समए गेल रहथि (१९९८) ओइ समए काली बाबू डी.आइ.जी. (होमगार्ड) रहथि। काजो हल्लुके रहनि। अपनो जहिना झड़-झंझटसँ कात रहए चाहै छला तहिना छलनि। जगदीश प्रसाद मण्डलकेँ चारि दिन जखन पहुँचना भेलनि आकि बदली भऽ गेलनि। डी.आइ.जी. (प्रशासन) बना उत्तरी त्रिपुरा बदली कऽ देलकनि। पाँचम दिन अपनो सभ परिवार आ जगदीश प्रसाद मण्डल कैला शहरक लेल विदा भेला। दस बजे छहटा फोर्सक संग विदा भेला। अगरतला पच्छिमी त्रिपुरामे पड़ैत अछि। बंगलादेशसँ सटले। दछिनी त्रिपुरामे उग्रवादी उपद्रव अधिक छल तँए नै घूमि पेला। ओना जाइ काल बेसी रातियेकेँ पास केने रहथि तँए बेसी नै देखि पेला मुदा अगरतलासँ कैला शहर अबैमे देखैक बेसी समए भेटलनि। दस बजेमे जे विदा भेला अगरतलासँ से साढ़े चारि बजे कैला शहर पहुँचला। बीचमे तीन ठाम, पनरह-बीस मिनट कऽ कऽ रूकबो केला। नव जगहपर सभ नबे रहथि तँए दू दिन घुमै-फिरैक कोनो कार्यक्रम नै बनलनि। तेसर दिनसँ घुमब-फिरब फेर शुरू भेलनि। आसीन मास रहने बाधमे धानोक फसल रहै। ओना ऊँचगर जमीन सेहो तेलहन आ अल्लू लेल तैयारी चलैत रहै। जंगल-पहाड़क क्षेत्र छीहे अपना ऐठामसँ भिन्न गाछ-विरीछ देखथि। ओना आमक गाछ सेहो अछि। मुदा अपना सबहक आमसँ भिन्न अछि। ओइठामक आम अपना सभ जकाँ पकलापर नै खाएल जाइत अछि। जखने आम पकैपर होइत कि ओइमे कीड़ा फड़ि जाइत अछि जे गुद्दाकेँ भुर-भूरा बना दइत, जे खाइ जोकर नै रहि पबैत अछि। त्रिपुराक प्रमुख स्थानमे उनीकुटी सेहो अछि। उनीकुटीक कार्यक्रम बनलनि। उनीकुटीक सम्बन्धमे कहल जाइत अछि जे जखन द्वापर जुगक अन्त हुअए लागल आ कलयुगक आवाहन हुअए लागल तखन देवता सभ सोचलनि जे कलयुग बहुत खराब जुग आबि रहल अछि। मान-मर्यादा, इज्जत-आवरू बँचब कठिन अछि। से नै तँ धरती छोड़ि समुद्रे बास करब नीक हएत। उनक अर्थ एक होइत अछि। जहिना अपना सभ उनचालीस, उन्नैस, उनतीस, उनहतरि इत्यादि कहै छिऐ, जेकर अर्थ होइत चालीसमे एक कम, बीसमे एक कम इत्यादि तहिना उनकुटिक करोड़मे एक कम। स्थानक नाअों सुनि मन खूब खुशी भेलनि। खुशीक कारण ईहो रहै जे काली बाबू तेहन ढंगसँ नाचि-नाचि कथा सुनौलखिन जे आरो जिज्ञासा बढ़ि गेल रहनि। तइपरसँ अखन धरि चौरासिये लाखक नाआें सुनने छला, आइ तँ करोड़ देखैक मौका। लाभ ईहो जे दोसर स्थान नहियो जेता तैयो तँ फल भेटबे करतनि। राता-राती सभ देवता पड़ा कऽ समुद्र दिसक रस्ता धेलनि। पएरे रहथि। जाइत-जाइत त्रिपुरा (उनीकुटि-माताहारी) पहुँचैत-पहुँचैत भोर भऽ जाइ गेलनि। महिंसबार सभ महींस खोलि-खोलि चरबए विदा भेल रहए। सभ देवता सोचलनि जे दिन-देखार पड़ाएब नीक हएत, सभ कियो एकेठाम डेरा खसौलनि। ओहए स्थान उनीकुटी छी। नमहर क्षेत्रमे स्थान पसरल अछि। नमहर-नमहर पहाड़, गाछ-विरीछ, बोन-झाड़सँ भरल। पहाड़पर सँ झरना झहरैत। मनुष्यसँ पूर्वक जे जीव-जन्तु अछि वएह सभ देवी-देवता। पहाड़ी भूमि मुदा रंग-रंगक पाथर सभक अछि। बाल-पाथर काँच पत्थरसँ सक्कत जुआएल पत्थर धरिक स्थान। ओहनो पत्थर जे हाथसँ टूटि जाइत अछि। आ ओहनो पत्थर जे खूब सक्कत अछि। खाइयोबला फलक आ केरोक बोन अछि। बीचमे दोकान-दौड़ी। ओ बाहरे अछि। जइठाम पहाड़पर सँ झरनाक पानि झहरैत अछि तइठाम द्वापर युगक अर्जुन-कृष्णक रथक चित्र बनाओल अछि जे स्थानक मुख्य बिन्दु छी। पूर्वांचल (असाम, मेघालय, मणिपुर, मिजोरम, त्रिपुरा, अरूणाचल, नागालैंड आ सिक्किम) मिला अपने-आपमे एक देश छी। जंगल, पहाड़, झील, नदी घाटीक समूह। भाषाक दृष्टिसँ सेहो बहुभाषी अछि। अपन-अपन क्षेत्रक भाषा सेहो छै। मोटा-मोटी बंगला, अंग्रेजी, हिन्दी, खासी, गारो, ककवार्क, मणिपुरी, मिजो, आओ, कोंयक, अंगामी, सेमा, लोथा, मोंपा, अका मिजू, शर्दुकमेन, निशि, अपतनी, हिलमिदि, तगिन, अदी, इदु, दिगारू, मिजिखम्री, सिंगफू, तंगला, नोक्टे, वांचू, लोपचा, भोटिया, नेपाली लिंबू इत्यादि।अगरतलाक राजा (सामंती युगमे) बर्म्मन-परिवारक छलाह। अखन जे फिल्मीस्तानमे गीतकार-संगीतकार वर्म्मन सभ छथि ओ ओतुके छथि। हुनके देल मकानमे त्रिपुराक सभा भवन (सदन) अछि। आदिवासीक बीच अपना सभसँ भिन्न भोजनक चलनि अछि। खाइ-पीबैक वस्तुमे सेहो अन्तर अछि। हुनका सबहक भोजमे अपना सभ जकाँ नै जे भात-दालि-तरकारीसँ शुरू केलौं आ जना-जना आगू बढ़ैत जाएत तेना-तेना नीक-नीक विन्यास आओत। ओइठाम से नै छै। नीक-नीक वस्तु पहिने बँटाइत अछि आ जेना-जेना आगू बढ़ैत अछि तेना-तेना पछुआइत जाइत अछि। दू हजार ईस्वीक पछाति काली-बाबू रोगाए लगलाह। पहिने आँखि खराब भेलनि। कलकत्तामे ऑपरेशन करौलनि। कब्जियतक शिकाइत शुरूहेसँ भऽ गेल रहनि। मधुमेह सेहो भऽ गेलनि। आइ.जी. बनला उत्तर किछु दिन नीक रहलाह। ओना बीचमे डी.जी.पी. बनि मेघालय (शिलाँग) सेहो एलाह। मुदा ओइठाम मन नै लगलनि। छह मास पछाति पुन: घूमि कऽ अगरतले आइ.जी. बनि चलि गेलाह। रिटायर होइसँ चारि बर्ख पूर्व ओछाइन पकड़ि लेलनि। नोकरीदार रहने गाम नै एलाह। ओतै इलाज करबैत रहलाह। दिल्ली, कलकत्ता सभ ठाम गेला मुदा स्वस्थ नै भऽ सकलाह। देहक कोनो गंजन नै रहलनि। तीन या चारि बेर पेटक ऑपरेशन भेल छलनि। कष्टसँ मनो चिड़चिड़ा गेलनि। दू बर्ख पछाति (सेवा-निवृत्त होइसँ पहिने) गाम आबि गेलाह। दुनू तरहक रोग -शारीरिक-मानसिक- सँ भीतरे-भीतर ग्रसित भऽ गेलाह। मानसिक रोगक कारण भेलनि- जखन आइ.जी. बनलाह, गृह विभाग सँ जबाब-तलब भेलनि। लिखितमे जबाब तँ दऽ देलखिन मुदा बिमारियाह शरीर भेने दौड़-धूप तँ कऽ नै सकलाह। ड्यूटीसँ सेहो अलग भऽ गेल रहथि। एक दिश गृह-विभागक चाप, दोसर दिस ड्यूटीसँ अलग हएब, आर्थिक समस्या उपस्थित भऽ गेलनि। तइपर पथ्य-पानि, दवाइ-दारूक खर्च काफी बढ़ि गेल रहनि। बेवस भऽ गेलाह। काली बाबूकेँ पंडित कहैक कारण अछि जे गीता (श्रीमद्भगवदगीता) पर अपन दृष्टिकोण छलनि। आचार्य रजनीशक आठो खंडक (आठ खंडमे संगृहित, जेकर ओइ समैमे अठारह सए दाम छलै) नीक अध्ययन छलनि, जे दृष्टिकोणकेँ बदलने छलनि। जिनगीक आशा टूटि गेलनि। अंतिम दौड़क भेँटमे विभागीय बहुत बात कहलखिन जे देखैआ कि अछि आ चोरौआ कि अछि। नोकरीक शुरूक जिनगीसँ लऽ कऽ अखन धरिक बहुत बात संगी होइक नाते जगदीश प्रसाद मण्डलकेँ ओ कहलखिन। अगरतला पहुँचते (डी.एस.पी.) अपन पहिचान छबे मासमे बना लेलनि। इमानदार अफसरक रूपमे प्रशासनसँ जनमानसक बीच आबि गेलाह। नगद रूपैआ, गहना-जेबर वा लत्ता-कपड़ा कहियो केकरोसँ नै छुलनि, मुदा खाइ-पीबैक वस्तु नै घुमबैत छलाह। शुरूक पाँच बर्खक जिनगी एक कालखंडक जिनगी बनि गेल छलनि। शराब पिबैत छलाह, सिगरेट पीबैत छलाह, मुर्गी-अंडा खाइत छलाह। ओही दौड़मे (१९७२ ई.) बंगला देशक लड़ाइ-पाकिस्तानक संग भेल रहए। मिथिलांचलक भाय लोकनिकेँ मन हेतनि जे सालो भरि बरखा सेहो भेल रहए। साले बरसातक भऽ गेल। घर छाड़ैले जे कियो खढ़-पात रखलनि सबहक सड़ि गेलनि। एक तँ ओहिना लत्ती-फत्ती माने चार परक सजमनि कदीमा रहने खढ़क घरकेँ कोनो दशा नै रहैत छैक, तँए नै छड़ाएब तँ पटोटनो देबक आवश्यकता भइये जाइत छलै। ओना बोनिहार श्रेणीक अधिकतर धनखेती (धानसँ पहिने जे मड़ूआ होइत छल) ओकर सस्ती छलै। सस्ती ई जे जखन मड़ूआ पाकि जाइ छलै तखन गिरहत खेतमे रहैत छलाह, नार कटनिहार सभ मड़ूआ गिरहतकेँ दऽ दैत छेलखिन आ नार लऽ कऽ अपन घर छाड़ैत छलाह। बंगला देशक (१९७१ ई.) लड़ाइमे बंगला देशकेँ भारत संग देलक। इन्दिराजी प्रधान मंत्री रहथि। रूसक (सोवियत संघक) भरपूर सहयोग भेटलनि। ओही समए सोवियत संघ बहुत शक्तिशाली छल। ओना अखनो अछि मुदा....? बीस बर्खक दोस्तीक समझौता भारत-सोवियत संघक भेल। नीक जबाब पाकिस्तानक संग देनिहार अमेरिकाकेँ भेटल। दुनियाँक इतिहासमे ३१ हजार सेना बंगलेदेशमे हाथ उठौलक। सरेण्डर केलक। बंगला देशक ओइ लड़ाइमे शीर्ष नेता सभ त्रिपुरेक अगरतलामे रहथि। इन्दिराजी सेहो चुप-चाप (बिना किछु जानकारीक) जािथ। त्रिपुरा मलेट्रीक छाबनी बनल रहए। ओइ समए भोलेंट्रीक हाथमे लड़ाइ कमान रहै, सुरक्षाक कमान तँ प्रशासनेपर रहए। ओइ गेस्ट हाउसक जिम्मा हिनके (काली बाबूक) रहनि। जइमे बंगला देशक कर्णधार सभ रहथि। ओइ बीच (बंगला देशक लड़ाइसँ पूर्व) एकटा जिम्मेदार अध्यक्ष केँ गारियो पढ़लखिन आ मारबो केलखिन, भेल ई जे हिनका नाओंपर एकटा माछक बेपारीसँ ओ खूब माछ खाए। बंगाली भाय, तहूमे त्रिपुराक पानि आरो मन्द छै, एक दिन ड्यूटीमे जाइत रहथि कि सलाम ठोकि ओ बेपारी हँसैत कहि देलकनि। ओइ बातकेँ पीठिया ठोक केलनि, वएह (अध्यक्ष) पकड़ा गेला। मुदा लूटमे चरखा नफा। त्रिपुरामे कम्युनिस्ट पार्टी आ कांग्रेस पार्टीक बीच कशमकस राजनीति रहए। तीन गोटेक कमिटी नृपेन बाबूक (नृपेन चक्रवर्ती, जे आजन्म अविवाहित रहलाह, कम्युनिस्ट पार्टीक नेतृत्व करैत रहथि ट्रिपुल एम.ए. रहथि, दू बेर मुख्य मंत्री सेहाे बनलाह) अध्यक्षतामे बनल। जिनगीक संघर्षक अनुभव काली बाबूकेँ विद्यार्थीये जिनगीक रहनि। संगी-साथी प्रशासनिक अफसर सभ कहनि जे मोटरी बान्हि कऽ रखने रहू। तेकर जबाब देथिन- बन्हले अछि। नृपेन बाबू घटनाक जड़ि तक पहुँचलाह। इनक्वाइरी दौड़मे गप-सप करैक बहाने जंगलक एकटा गेस्ट हाउसमे लऽ गेलनि। कोनो जानकारी केकरो नै देलखिन। मुदा देखिनिहारो तँ देखिते रहै। भरि राति ओतै रहलाह। जइसँ आरो प्रतिष्ठा बनि गेल रहनि। मुदा प्रतिष्ठो तँ जनमारा होइ छै। काली बाबू अपने पाँच भाइक भैयारी आ चारि संतान अपने छन्हि। तीन कन्या एक लड़का। तीनू कन्याक बिआह कऽ लेने छलाह। भाए आ पिता जीविते छलखिन। थेहगर दुनू, अपनासँ एक बर्ख पहिने पिता मुइलखिन। भाए छन्हिये। बेटाक बिआह पछुआएल छलनि। ओना गप-सप (बिआहक) सुपौल जिलामे चलैत रहनि। ओहो (कन्यागत) रेलबेक एस.पी., जखन मन मानि गेलनि जे आब नै जीब, तखन हुनका तत्काल बजा मंदिरमे बिआह सम्पन्न केलनि। नोकरी समाप्त भेला पनरहे-बीस दिनक पछाति मरि गेला। मुदा पेंशनक समस्या तँ उठिये गेलनि। जगदीश प्रसाद मण्डल त्रिपुरा जाइसँ पहिने हैदराबाद गेल रहथि। हैदराबादमे राष्ट्रीय स्तरक साहित्यिक, राजनीतिक कार्यक्रम छल। ग्रुपमे मधुबनी जिलासँ गेल छला। रेलक एक मासक पास सभ कियो बनबौने रहथि। मुदा रूटक हिसाबसँ बनल रहनि। ओही समए मधुबनी जिलाक पार्टी अन्तर्गत स्व. अनन्त भगत साहित्यिक मोर्चापर जिम्मामे रहथि। साधारण परिवारसँ आएल अनन्त भगत, जेहने पितमरू रहथि तेहने वफादार। आर्थिक स्थिति नीक नै रहलोपर पार्टीक होलटाइमर नेता रहथि। ओइ समए मधेपुरक भार हुनके भेटल रहनि। चारि दिनक कार्यक्रम हैदराबादमे छल। सािहत्यिक मंचपर प्रेम चन्द साहित्य छल आ राजनीतिक मंचपर देशमे कानून बनैक, ओकर व्याख्या आ िनर्णए लइमे कि समस्या अबैत अछि, तइपर विशद चर्चो आ आगूक लेल कार्यक्रमोक िनर्णए भेल छलै। प्रेमचन्द साहित्यपर विशद व्याख्या रमेश चन्द उद्घाटन भाषणमे देलनि। ओना ओ पंजाबक छलाह मुदा अंग्रेजीमे बाजल रहथि। कारण छल जे एक तँ दछिनी भारतमे कार्यक्रम छल, तहूमे जइठाम हिन्दीसँ अधिक अंग्रेजीक बोलवाला अछि। बहुत पैघ कार्यक्रम छल। एकमतसँ प्रेमचन्द प्रगतिशील विचारक साहित्यकार मानल गेलाह। राजनीतिक मंचपर मुख्य वक्ता छलाह-भूपेश गुप्ता जे राज्य सभामे लगातार एक सएसँ ऊपर बैसारमे सम्मिलित छलाह। कानून बनबैक प्रक्रियामे कि बाधा उपस्थित होइत अछि, तेकर विशद व्याख्या करैत कोन रूपमे काज कएल जाइत अछि, कहलनि। भूपेश गुप्त बंगालक छलाह। आजन्म अविवाहित रहलाह। एक संग स्व. इन्दिराजी (प्रधानमंत्री इन्दिरा गाँधी) स्व. ज्योति बाबू (ज्योति बसु, मुख्यमंत्री बंगाल) आ भूपेश गुप्त इंग्लैडमे कानूनक शिक्षा लेने रहथि। दोसर मुख्य वक्ता रहथि न्यायमूर्ति बी. आर. अय्यर। बी. आर. अय्यर सहाएब सुप्रीम कोर्टसँ सेवा निवृति भेल छथि। समस्याक िनर्णए करब कते कठिन अछि तइपर विशद भाषण देलनि। वएह बी. आर. अय्यर सहाएब जे १९६७ ई. मे बिहारमे महामाया बाबूक सरकारक भ्रष्ट पूर्वमंत्री सभपर जे आयोग बैसौने रहथि। एकटा जानल-मानल न्यायाधीश। तेसर मुख्य वक्ता छलाह, मध्यप्रदेश हाइकोर्टक एकटा सीनियर अधिवक्ता। न्यायालयमे बहस करैमे कि समस्या उपस्थित होइत अछि तइपर विषद चर्च केने रहथि। स्वभावो आ मेहनतोमे ओ सभ दछिन भारतक लोक भिन्न छथि। ओ सभ जी खोलि कऽ काज करैमे विश्वास रखै छथि। जगदीश प्रसाद मण्डलक अपन इच्छा छलनि जे किछु ग्रामीण क्षेत्र देखथि, मुदा से नै भेल। गाड़ीसँ (ट्रेन) जे देखबो केलनि ओ से नै भेल जे देखए चाहै छला। चारिये दिन हैदराबादमे रहबाक छलनि, तहूमे जइ कार्यक्रममे आएल छला ओ छोड़ि केना सकै छला। हैदराबाद शहरो नमहर। तैयो मुख्य-मुख्य जे दर्शनीय अछि से तँ देखबे केलनि। ऊषा कम्पनी, संगमरमरक पहाड़, चारमीनार, निजामक राजशाही मकान, झील इत्यादि देखलनि। काफी व्यस्त शहर हैदराबाद अछि। ओतए गाड़ी-सवारीक पर्याप्त बेवस्था अछि, मुदा तैयो काफी भीड़-भारबला शहर हैदराबाद अछि। खाइ-पीबैक िवन्यास अपना सभसँ किछु भिन्न अछि। मुदा देश स्तरक कार्यक्रम तँए देश भरिक खान-पानक बेवस्था रहबे करै। ओना कटहरक जे विन्यास छलै ओ अपना ऐठाम सँ भिन्ने नै नीको अछि। विदा होइ काल, वापसीमे किछु धड़फड़ी भऽ गेलनि। ओना टिकट आरक्षित रहनि मुदा प्लेटफार्मपर पहुँचैत-पहुँचैत गाड़ी खुजि गेलनि। सभ कियो (मधुबनीक) सभ दिस भऽ गेला। अगिला स्टेशनपर एकठाम हेता, लेडी कम्पार्टमेंट (महिला बोगी) मे चढ़ि गेला। अखन धरि महिला बोगी नै देखने छला। चढ़ि कऽ बइसौक जे विचार तँ सौंसे बोगी महिले बैसल देखलनि। टी.टी सेहो महिला। मुदा अपना ऐठाम जकाँ यात्री झौं-झौं कऽ नै छुटलनि। जगदीश प्रसाद मण्डल ओकरा सभ दिस देखैत जे किछु पूछतनि तखन ने कहथिन। ओहो सभ चुपचाप देखबो करैत आ मुस्कियो दैत। जगदीश प्रसाद मण्डलकेँ कोनो चिन्ते ने रहनि। एक्के देशक रेलगाड़ीमे दू रीति अछि, तखन कि हेतै? किछु काल पछाति टी.टी. लगमे एलखिन। ओ बूझि गेल रहथिन जे ई उत्तर भारतक मेल गाड़ी छी। कहलकनि जे ई लेडी कम्पार्टमेंट छिऐ। ओना ओ हिन्दियेमे कहलकनि मुदा जहिना अपना ऐठामक मिड्ल स्कूलक बच्चा हिन्दी बजैत अछि तहिना। परिचयक जरूरी बूझि पड़लनि। अपना यात्राक चर्च करैत कहलखिन जे धड़फड़ा कऽ चढ़ि गेला तँए ऐ कोठरीमे चलि एला। ने तँ किअए अबितथि। कहलखिन जे आगू बदलि लेब, संगियो सभ छथिन, ओहो सभ भेट जेतनि। जारी...
२ विद्यापति पुरस्कारक घोषणा दू लाखक पुरस्कार रामभरोस कापड़ि भ्रमरकेँ विद्यापति स्मृति दिवसक अवसरपर नेपाल सरकार द्वारा गठित विद्यापति पुरस्कार कोष सोम दिन पुरस्कार सभक घोषणा कएलक अछि । घोषित उक्त पुरस्कार सभमे सभसँ महत्वपूर्ण पुरस्कार दू लाख टाकाक एकटा आ एक एक लाखक चारिटा पुरस्कार रहल अछि । दू लाख टाकाक नेपाल विद्यापति मैथिली भाषा साहित्य पुरस्कार नेपाल प्रज्ञा प्रतिष्ठानक प्राज्ञ एवं संस्कृति विभाग प्रमुख प्राज्ञ राम भरोस कापड़ि भ्रमरकेँ देबाक निर्णय कएल गेल अछि । तहिना मैथिली कला संस्कृति पुरस्कार मैथिलीक नाटककार महेन्द्र मलंगियाकेँ, मैथिली अनुसंधान पुरस्कार डा. योगेन्द्र प्रसाद यादवकेँ, मैथिली अनुवाद पुरस्कार पंडित सूर्यकान्त झा आ मैथिली पाण्डुलिपि पुरस्कार विराटनगरक राम नारायण सुधाकरकेँ देबाक निर्णय कएल गेल अछि । रामभरोस कापडि ‘भ्रमर-जन्मः २००८ साल, साओन, बधचौडा, जि. धनुषा, शिक्षाःएम.ए. (त्रि.वि.वि.) पी. एच. डी. (मानद) सम्प्रतिः सदस्य, प्राज्ञ परिषद्, नेपाल प्रज्ञा–प्रतिष्ठान, कमलादी।प्रकाशित कृति- काव्यः बन्न कोठरी औनाइत धुंवा (कवितासंग्रह): २०२९ साल, नहि, आब नहि (दीर्घकविता) २०३६ साल, मोमक पघलैत अधर (गीत, गजल), अप्पन अनचिन्हार (कवितासंग्रह): १९९० ई., भयो अब भयो (अनुवाद) बस अब नही (हिन्दी अनुवाद) । कथासंग्रहः तोरासंगे जएबौ रे कुजवा (कथासङ्ग्रह) १९८४ ई., हुगली ऊपर बहैत गंगा (कथासङ्ग्रह) २०६५ । उपन्यासः घरमुहाँ २०६९ । नाटकः रानी चन्द्रवतीः २०४५ साल, एकटा आओर वसन्तः २०५२ साल, महिषासुर मुर्दावाद एवं अन्य नाटकः २०५४ साल, भ्रमरका उत्कृष्ट नाटकहरू (नेपाली अनुवाद) २०६४ भैया अएलै अपन सोराज (नाटक) २०६७ । शोधः जनकपुरधाम र यस क्षेत्रका सांस्कृतिक सम्पदाहरूः २०५६ साल, राजकमलक कथासाहित्यमे नारीः २०६४ साल, लोकनाट्यः जट–जटिनः २०६४। मैथिली लोकसंस्कृति (आलेख संग्रह) २०६६ । तराईको फांट देखि हिमालको कांख सम्म (आलेख संग्रह), प्रकाशकः साझा प्रकाशन, २०६७ । विविध:आजको धनुषाः २०३९ साल, जनकपुर लोकचित्रः २०४६ साल । समयको अन्तराल पछ्याउदै(आलेख संग्रह, २०६६ साल) ठेकान पर (विचार संग्रह), समय–सन्दर्भ (निबन्ध संग्रह) २०६८ । सम्पादनः मैथिली पद्यसङ्ग्रहः (नेपाल राजकीय प्रज्ञाप्रतिष्ठान): २०५१ साल, लाबाक धान (कवितासङ्ग्रह) २०५१ साल, त्रिशूली (स्व. माथुरद्वारा लिखित खण्डकाव्य) २०४९ साल, नेपालक मैथिली पत्रकारिताः २०४४ साल, मैथिली लोकनृत्यः भावभंगिमा एवं स्वरूप (नेपाल राजकीय प्रज्ञा प्रतिष्ठान) २०६१, अन्तराष्ट्रिय मैथिली सम्मेलन आ नेपालः २०६५ साल, हम और तुम (हिन्दी कवितासंग्रह): २०६६ साल । मैथिली नाटक–संग्रह (नाटक संग्रह) २०६७, महाकवि विद्यापति आ नेपाल(निबन्ध संग्रह) २०६८, मैथिली लोक संस्कृति संगोष्ठी प्रतिवेदन,२०६९,लोकनायक सलहेस (निबन्ध संग्रह) २०६९ । सम्मान: नेपाल राजकीय पज्ञा–प्रतिष्ठान द्वारा प्रदत्त प्रथम ‘मायादेवी प्रज्ञापुरस्कार’ द्वारा सम्मानितः २०५२ साल, विद्यापति सेवा संस्थान, दरभङ्गाद्वारा ‘मिथिला विभूति’ सम्मान, शेखर प्रकाशन, पटना द्वारा ‘शेखर सम्मान’, ने. मैथिली साहित्य परिषद्, जनकपुर द्वारा ‘वैदेही प्रतिभा पुरस्कार, अन्तर्राष्ट्रिय मैथिली सम्मेलन मुम्बई द्वारा ‘मिथिलारत्न’ सम्मान, मधुरिमा नेपाल द्वारा ‘मधुरिमा सम्मान’, चेतना समिति, पटना द्वारा यात्री चेतना पुरस्कार, साझा प्रकाशन द्वारा साझा लोक संस्कृति पुरस्कार (२०६८) आदि दर्जनो सम्मान, पुरस्कार प्राप्त। विशेषः पूर्व अध्यक्षः साझा प्रकाशन ,ललितपुर। विशेष उल्लेखनीय- नेपालक पहिल आधुनिक कथा संग्रह “तोरा संगे जयबौ रे कुजबा “(१९८४ ई.) क प्रणेता”। नेपालक पहिल आ आइधरि एक मात्र साहित्यकार जकर कथा संग्रह “तोरा संगै जयबौरे कुजवा” क प्रकाशन बिहार (भारत) क सरकारी संस्था मैथिली अकादमी कएलक। सम्पूर्ण मैथिली साहित्यमे पहिल प्रेमपरक दीर्घकविता “नहि, आब नहिं” क कवि । नेपाल राजकीय प्रज्ञा–प्रतिष्ठानसं पहिल बेर प्रदान कएल गेल “मायादेवी प्रज्ञा–पुरस्कार”(२०५२) क प्राप्तकर्ता जकर प्रशस्तिमे लिखल गेल छल–मैथिली भाषा साहित्य एवं मैथिली पत्रकारिताक क्षेत्रमे विशिष्ट योगदानक लेल । नेपालसं प्रकाशित पहिल मैथिली समाचारपत्र “गामघर साप्ताहिक”क सम्पादन–प्रकाशन, जे अनवरत रूपें विगत तीस वर्षसं प्रकाशित भऽ रहल अछि । नेपालसं प्रकाशित पहिल आधुनिक कविता संग्रह “बन्न कोठरीः औनाइत धुआँ”क कवि । नेपालक पहिल मैथिली कवि जकर कविता बंगला भाषामे अनुवाद भऽ साहित्य अकादमी, दिल्लीक संग्रहमे छपल। पहिल साहित्यकार जकरा साझा प्रकाशन, ललितपुर द्वारा सर्वप्रथम “साझा लोक संस्कृति”पुरस्कार प्रदान कएल गेल। नेपालक पहिल मधेशी एवं मैथिली साहित्यकार जे साझा प्रकाशनक गरिमामय अध्यक्ष पद पर नियुक्त भेल आ प्रज्ञा–प्रतिष्ठानमे सदस्य नियुक्ति (२०६७, माघ २१ गते) धरि बनल रहल। नेपालक पहिल मैथिली साहित्यकार जे सर्वप्रथम नेपाल प्रज्ञा–प्रतिष्ठानक प्राज्ञ सभा सदस्य बनल आ बादमे प्राज्ञ परिषद् सदस्य सेहो वर्तमानमे अछि । साझा प्रकाशनक अध्यक्षक रूपमे पहिल बेर नेपाली बाहेक मैथिली समेतक भाषाक प्रकाशनक शुभारम्भ कएल, जाहिमे पहिल मैथिली बालकथा संग्रह “बगियाक गाछ” प्रकाशित भेल। नेपालमे पहिल बेर काठमांडूमे अन्तर्राष्ट्रिय मैथिली सम्मेलन (२०६७) क सफलतापूर्वक आयोजन कएल, जकर उद्घाटन नेपालक राष्ट्रपति आ विसर्जन नेपालक उपराष्ट्रपति कएलनि । काठमाण्डूमे आयोजित सार्कस्तरीय कवि गोष्ठीमे सर्वप्रथम नेपालक मैथिली कविक रूपमे प्रतिनिधित्व कएल । नेपालक पहिल साहित्यकार जकर रचना नेपालक पाठ्यक्रममे मात्र नहि बिहारक मैथिली पाठ्यक्रममे सेहो पढाई भऽ रहल अछि । नेपालक सर्वाधिक मौलिक रचनाक लेखक । एखन धरि तीन दर्जन धरि सभ पुस्तक प्रकाशित । तत्कालीन नेपाल राजकीय प्रज्ञा–प्रतिष्ठानक प्राज्ञ सभाक सदस्य होइते सर्वप्रथम प्रज्ञा–प्रतिष्ठानद्वारा मैथिलीमे “आँगन” पत्रिकाक प्रकाशन प्रारम्भ कएल । अन्य गतिविधि अन्तर्राष्ट्रिय मैथिली सम्मेलन, दिल्लीक आयोजनमे होबऽ बला अन्तर्राष्ट्रिय सम्मेलनमे भारतक मुम्बई, कलकत्ता, चेन्नई, तिरुपति आ गुआहाटीमे नेपालक प्रतिनिधि मंडलकें नेतृत्व करैत भाग लेल । “एकटा आओर वसन्त” फिल्मक निर्माण-कथा-पटकथा-सम्वाद-गीत लेखन । नेपाल टेलिभिजन लेल जनकपुरधाम पर डकुमेन्ट्री लेखन-प्रदर्शन। “सीता” लगायतक किछु नेपाली फिल्ममे गीत लेखन। नेपाल सरकार संस्कृति मंत्रालयद्वारा गठित विद्यापति पुरस्कार कोषक विधान, मापदण्ड निर्धारण कार्यदलक सदस्य आ अन्तर्राष्ट्रिय स्तरक अवधारणा पत्र प्रस्तुत (बादमे एहिमे व्यापक परिवर्तन कऽ) विवादित बनादेल गेल) । नेपाल पत्रकार महासंघक का.वा. अध्यक्ष (धनुषा) आ नेपाल प्रेस युनियन, (धनुषा)क अध्यक्षक रूपमे काज कऽ चुकल । नेपाल प्रज्ञा–प्रतिष्ठानक प्राज्ञ सदस्यक हैसियतसं मैथिली लोक नाट्य जट–जटिनक गीत संकलन कऽ तकरा रेकर्डिङ कराओल आ जटजटिनक कथानककें नाट्य रुपान्तर कऽ मंचपर प्रदर्शित कएल जे अद्यावधिक जारी अछि । नेपाल प्रज्ञा–प्रतिष्ठान द्वारा राजा सलहेसपर नेपाल–भारतक विद्वान् सभक गोष्ठी कएल आ कार्यपत्र सहित एकटा पुस्तक प्रज्ञा–प्रतिष्ठानसं “लोकनायक सलहेस” प्रकाशित कएल । जनकपुरधाममे सर्वप्रथम “अखिल नेपाल मैथिली साहित्य परिषद्”क गठन २०३० सालमे कएल आ लगभग डेढ दशक धरि विद्यापति पर्व लगायत अन्य मैथिली गतिविधि संचालन कएल । मैथिली पत्रिका “अर्चना” “आंजुर” आ “गामघर” क माध्यमसं आइ काल्हिक बहुतो मैथिली साहित्यकारकें साहित्य क्षेत्रमे पदार्पणक अवसर प्रदान कएल। राष्ट्रिय, अन्तर्राष्ट्रिय स्तरक गोष्ठी, सेमिनार सभमे कार्यपत्र प्रस्तोता एवं सहभागिताक रूपमे आमंत्रित भऽ भाग लेल। नेपाल प्रज्ञा–प्रतिष्ठानमे सर्वप्रथम विद्यापति स्मृति पर्व मनएबाक शुभारंभ कएल। आजुक तिथिमे नेपालमे मैथिली साहित्यक कोनो विधामे सर्वाधिक रचना लिखबाक श्रेय प्राप्त। नेपाल सरकार, संस्कृति मन्त्रालय द्वारा राष्ट्रगानकेँ मैथिली अनुवाद करएबाक क्रममे मैथिली अनुवादक हेतु विज्ञ मनोनित कएलापर राष्ट्रगानकें मैथिलीमे अनुवाद कऽ मूल गीतक संगीतकार अम्बर गुरुङसँ प्रमाणित करा मन्त्रालयमे बुझाओल। (विदेह ई पत्रिकाकेँ ५ जुलाइ २००४ सँ अखन धरि ११९ देशक १,६२६ ठामसँ ८५,६२२ गोटे द्वारा ४३,६३१ विभिन्न आइ.एस.पी. सँ ३,७४,६०६ बेर देखल गेल अछि; धन्यवाद पाठकगण। - गूगल एनेलेटिक्स डेटा।) अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। २. गद्य २.१.आशीष अनचिन्हार- लघु-दीर्घ निर्णय भाग-1 २.२.जगदीश प्रसाद मण्डल-किछु विहनि कथा २.३.सत्यनारायण झा- विहनि कथा- “सुटिया” २.४.मुन्नी कामत- विहनि कथा- कैंसर २.५.महेन्द्र मलंगिया- मूर्दाः श्रृंगार संघर्ष आ द्वन्द्व २.६.जगदानन्द झा मनु- लघुकथा- कमलू २.७.नवेंदु कुमार झा-मिथिला आ मैथिली बॅटबाक भऽ रहल साजिश/ ई गवर्नेंस दिस सरकार बढ़ौलक डेग आशीष अनचिन्हार लघु-दीर्घ निर्णय भाग-1 हमर ऐ लेखमे मात्र पं. गोविन्द झा जीक चर्च अछि तकरा अन्यथा नै लेल जाए से हमर आग्रह। पं. गोविन्द झा जीकेँ हम मैथिली व्याकरणक धूरी मानैत ई लिखल अछि। निश्चित रुपें पं. जी अपन अग्रजसँ नियम ग्रहण केने छथि आ अपन अनुज सभकेँ बेसी प्रभावित केने छथि तँए हम मात्र पं. जीक उपर ई लेख केन्द्रित केलहुँ जाहिसँ हुनक अग्रज आ हुनक अनुज सभ ऐ लेखक माँझमे आबि सकथि। तँ आउ कने चली मात्रा केना गानल जाइत छै ताहिपर। मात्रा गनबाक लेल मोन राखू जाहि अक्षरमे "अ", "इ", "उ", "ऋ" एवं "लृ" नुकाएल हो तकरा लघु मानू आ तकरा बाद सभकेँ दीर्घ। संगहि संग अनुस्वार तँ दीर्घ अछि मुदा चन्द्रबिन्दु लघु। चन्द्रबिन्दु जँ लघु अक्षरपर रहतै तँ लघु मानल जेतै आ जँ दीर्घ अक्षरपर रहतै तँ दीर्घ मानल जाएत। संगहि-संग जँ कोनो शब्दमे संयुक्ताक्षर हुअए तँ ताहिसँ पहिलेक अक्षर दीर्घ भए जाइत छैक चाहे ओ लघु किएक ने हुअए। उदाहरण लेल--प्रत्यक्ष शब्दमे दूटा संयुक्ताक्षर अछि पहिल त्य एवं क्ष। आब एहिमे देखू "त्य" सँ पहिने "प्र" अछि तँए ई दीर्घ भेल आ "क्ष" सँ पहिने "त्य" अछि तँए इहो दीर्घ भेल। ई नियम जँ दू टा अलग-अलग शब्द हो तैयो लागू हएत जेना उदाहरण लेल--- हमर प्रेम छी अहाँ... ऐमे "प्रे" संयुक्ताक्षर भेल आ ताहिसँ पहिने बला शब्द " र" दीर्घ भए जाएत। मतलब जे "हमर" शब्दक अंतिम अक्षर "र" दीर्घ भए जाएत । सङ्गे-सङ्ग मोन राखू "न्ह" आ "म्ह" संयुक्ताक्षरसँ पहिने बला शब्दमे लघु दीर्घ सेहो हएत। जेना की "कुम्हार" मे "म्ह" सँ पहिने "कु" दीर्घ भेल तेनाहिते "कन्हाइ" शब्दमे सेहो "न्ह"सँ पहिने "क" वर्ण दीर्घ भेल। क्ष, त्र आ ज्ञ संयुक्ताक्षर अछि। तेनाहिते.... प्र, र्व, आदि सेहो संयुक्ताक्षर अछि। मुदा "मृत" शब्दमे "मृ" संयुक्ताक्षर नै अछि। गजलमे दूटा लघुकेँ एकटा दीर्घ सेहो मानल जाइत छै। बहुत गोटेंकेँ समस्या होइत छन्हि जे इ लघु-दीर्घ कोना होइत छै। प्रस्तुत अछि किछु उदाहरण--- बिगड़ि-----------एहि शब्दकेँ ह्रस्व-दीर्घ मानू वा दीर्घ-ह्रस्व मानू। बहरक जेहन जरूरति हो। अरबी बहरमे तीन टा लघु सँ कोनो बहर नै छै तँए लघु-लघु-लघु मानबाक कोनो जरूरति नै। हुनकर---------- एहि शब्दकेँ दीर्घ-दीर्घ मानू वा दीर्घ-लघु-लघु मानू वा लघु-लघु-दीर्घ दीर्घ मानू जेहन जरूरति हो। अरबी बहरमे चारिटा लघु सँ कोनो बहर नै छै तँए लघु-लघु-लघु-लघु मानबाक कोनो जरूरति नै। घर------- एहि शब्दकेँ दीर्घ मानू वा लघु-लघु बहरक जेहन जरूरति हो। चोर------ इ साफे तौर पर दीर्घ-लघु अछि। जँ कोनो शेरमे एना पाँति छै--- बिगड़ि चलै । आब एहि दू शब्दकेँ बान्हू। या तँ अहाँ " बिग" मने एकटा दीर्घ मानू आ "ड़ि" मने एकटा लघु फेर "च" एकटा लघू भेल आ "लै" एकटा दीर्घ। एकर मतलब जे " बिगड़ि चलै" केर संभावित बहर भेल--दीर्घ-ह्रस्व-ह्रस्व-दीर्घ। एहि शब्दकेँ एकटा आर रूप दए सकैत छी जेना की---- "बि" के लघु मानू "गड़ि"केँ दीर्घ मानू आ फेर "च" एकटा लघू भेल आ "लै" एकटा दीर्घ। एकर मतलब जे " बिगड़ि चलै" केर संभावित बहर भेल--- लघु-दीर्घ-लघु-दीर्घ। आब एहि दू रूपकेँ अहाँ बहरक हिसाबें प्रयोग करू। कतेको आदमी " बिग" केँ दीर्घ मानताह फेर "ड़ि" "च" केँ मिला दीर्घ मानताह आ "लै" भेल दीर्घ मने दीर्घ-दीर्घ -दीर्घ मुदा इ रूप गलत भेल। मुदा ऐठाम एकटा गप्प मोन राखू जे किछु शब्दमे धेआन सेहो राखए पड़त जेना एकटा शब्द " कमल " लिअ। आब जँ अहाँ एकर उच्चारण क-मल ( मने लघु-दीर्घ) करबै ताहिसँ एकटा फूलक अर्थ निकलत मुदा जखन अहाँ एही शब्दकेँ कम-ल ( मने दीर्घ-लघु) करबै तखन एकर अर्थ घटनाइमे हेतै जेना - पानि कम'ल की नै इत्यादि। तँए हमर आग्रह जे पहिने कोनो शब्दकेँ उच्चारणक हिसाबेँ अर्थ देखू जाहिसँ उच्चारण अनर्थ नै हुअए। मैथिलीमे वर्तनीकेँ हिसाबेँ ई उदाहरण देखू---- लए---- ह्रस्व-दीर्घ लs------ह्रस्व ल'------ह्रस्व लय--- ह्रस्व-ह्रस्व वा दीर्घ इएह निअम कए, कs वा स', भए भs वा भ' लेल छै आन प्रारूप लेल एहने बात बूझल जाए। ऐठाम ईहो कही जे लघु लेल ह्रस्व शब्दक प्रयोग सेहो कएल जाइत छै तेनाहिते दीर्घ लेल गुरू शब्द छै। ई तँ छल सूत्र रूपमे। कने एकरा फरिछा कए देखी------ 1) 1) पं. गोविन्द झा अपन पोथी " मैथिली छंद शास्त्र" ( मिथिला पुस्तक केन्द्र दरभंगासँ प्रकाशित, द्वितीय संस्करण १९८७)मे पृष्ठ १३ मे लिखैत छथि जे " सँ, जँ, तँ, हँ आदि गुरू अछि" मने चंद्रबिंदुकेँ पं. गोविन्द झा जी दीर्घ मनने छथि। मुदा फेर पं. गोविन्द झा जी शेखर प्रकाशनसँ २००६मे प्रकाशित अपन पोथी " मैथिली परिचायिका" केर पृष्ठ २०पर लिखै छथि जे " अनुस्वार भारी होइत अछि आ चंद्रबिंदु भारहीन" मने ऐ पोथीमे पं. जी चंद्रबिंदुकेँ लघु मनने छथि आ एहने सन विचार ओ मैथिली अकादेमीसँ २००७मे प्रकाशित अपन पोथी "मैथिली परिशीलन"क पृष्ट ३५पर देने छथि। आब हमरा एहन पाठक लेल ई बड़का प्रश्न अछि जे चंद्रबिंदुकेँ लघु मानल जाए की दीर्घ, कारण एकै पं. गोविन्द झा जी अपन भिन्न-भिन्न पोथीमे भिन्न विचार देने छथि आ ई प्रचारित करबाक उपक्रम करै छथि जे जाहि पोथीमे हम जे लीखि देलहुँ से सही अछि। जँ पं. गोविन्द झा जी बाद बला पोथीमे लीखि देने रहितथिन्ह जे " मैथिली छंद शास्त्रमे चंद्रबिंदु केर सम्बन्धमे हम जे लिखने छी से गलत थिक आब आब हम ऐ पोथीमे एकरा सुधारि रहल छी" तखन हमरा जनैत भ्रम नै पसरितै आ ऐसँ हुनक महानता सेहो सिद्ध होइत। मुदा से नै भेल। कोनो भाषाक वैयाकरणक उपर ओहि भाषाक हरेक लोककेँ विश्वास होइत छै। मैथिल सेहो पं. जीपर विश्वास करैत छथि ( हमरा सहित) आ तँए बहुत मैथिल लोकनि चंद्रबिंदुकेँ दीर्घ मानि बैसल छथि। एकर सभसँ बड़का उदाहरण श्री रमण झा सन अलंकार शास्त्री अपन पोथी " भिन्न-अभिन्न"क पृष्ठ ६७-७३ मे देने छथि जतए श्री रमण जी पं. गोविन्द झा जीक संदर्भ दैत चंद्रबिंदुकेँ दीर्घ मानि लेने छथि। अस्तु ई गप्प फरिछाएल अछि जे चंद्रबिंदु लघु होइत अछि आ अनुस्वार दीर्घ। एही क्रममे एकटा आर गप्प भए सकैए जे पं. गोविन्द झा जी कविवर सीताराम झा जीक कविताकेँ देखि चंद्रबिंदुकेँ दीर्घ मानि लेने होथि तँ से गप्प फराक, कारण कविवर सीताराम जी अपन अधिकांश कवितामे चंद्रबिंदु युक्त लघु शब्दकेँ दीर्घ जकाँ प्रयोग केने छथि। मुदा ऐठाम ई मोन राखए पड़त जे छंदमे जरूरति पड़लापर ( मात्र आवश्यक स्थितिमे) लघुकेँ दीर्घक बराबर वा तेनाहिते दीर्घकेँ लघु बराबर उच्चारण कएल जाइत रहलै। तँए जँ कविवर सीता राम जी जँ आवश्यकता पड़लापर जँ चंद्रबिंदु युक्त लघुकेँ दीर्घ जकाँ प्रयोग केने छथि ताहिसँ ओ नियम नै बनि जेतै वस्तुतः नियम तँ इएह छै जे चंद्रबिंदु लघु अछि। एकटा गप्प आर संस्कृतमे लघुकेँ दीर्घक बराबर वा तेनाहिते दीर्घकेँ लघु बराबर उच्चारण मान्य नै छै। मैथिलीमे लघुकेँ दीर्घक बराबर वा तेनाहिते दीर्घकेँ लघु बराबर उच्चारण प्राकृत एवं अप्रभंश भाषासँ भेल अछि। 2) 2) मैथिली छन्द शास्त्रक पृष्ठ १४पर पं. गोविन्द झा जी लिखै छथि जे ----" न्ह आ म्ह संयुक्ताक्षरसँ पूर्व लघु वर्ण गुरू नै होइत अछि, कन्हाइ, कुम्हार, एहिठाम क ओ कु गुरू नहि थिक।" मुदा जँ अहाँ मैथिली उच्चारणकेँ अकानब तँ साफ-साफ सुनबामे कन् + हाइ ध्वनि आएत तेनाहिते कुम् + हार ध्वनि सुनबामे आएत। मैथिलीमे क + न्हाइ वा कु + म्हार ध्वनि कदाचिते भेटत आ जेना की गजल उच्चारणपर आधारित अछि तँए गजलमे कन्हाइ लेल दीर्घ + दीर्घ + लघु हएत आ कुम्हार सेहो दीर्घ + दीर्घ + लघु हएत। ओना गजलेमे किएक हरेक छन्द, हरेक पद्य उच्चारणपर अछि तँए हरेक छंदमे कुम्हार दीर्घ + दीर्घ + लघु हएत। आब कने आर विस्तारसँ चली। उर्दू भाषामे न्ह, म्ह आ ल्ह सँ पहिनुक अक्षर दीर्घ नै होइत छै मने जे जाहि सङ्गे ल्ह, म्ह वा न्ह रहैत अछि तकरे उपर ओ प्रभाव दै छै जेना " तुम्हारा " ऐ शब्दक उच्चारण उर्दूमे "तु + म्हारा" होइत छै तँए उर्दूमे " तुम्हारा लेल लघु + दीर्घ + दीर्घ प्रयोग होइत छै। ओना ऐठाम ई कहब बेजाए नै जे उर्दूमे न्ह, म्ह, ल्ह केर ध्वनि संस्कृतसँ आएल मुदा उर्दूक सचेष्ट विद्वान सभ उच्चारण अपने हिसाबसँ रखलथि। उर्दूक ई उच्चारण हिन्दीमे आएल ( बजबा कालमे उर्दू आ हिन्दी एक समान होइत अछि)। मुदा जँ मैथिली उच्चारणकेँ देखबै तँ साफे-साफ अंतर बुझना जाएत। आ एही अन्तरक कारणें मैथिल हरेक आन राज्यमे जल्दिये पहिचानमे आबि जाइत छथि। मैथिलीमे आने संयुक्ताक्षर जकाँ म्ह,न्ह आ ल्ह केर प्रभाव होइत छै तँए कुम्हार आ कन्हाइ लेल दीर्घ + दीर्घ + लघु हएत। संस्कृतमे सेहो “ म्ह, ल्ह आ न्ह “सँ पहिने केर लघु दीर्घ मानल जाइत छै। आब देखू तुलसी दास जी द्वारा लिखल ई स्त्रोत------------- नमामी शमीशान निर्वाण रूपं विभू व्यापकम् ब्रम्ह वेदः स्वरूपं पहिल पाँतिकेँ मात्रा क्रम अछि---- ह्रस्व-दीर्घ-दीर्घ-ह्रस्व-दीर्घ-दीर्घ-ह्रस्व-दीर्घ-दीर्घ-ह्रस्व-दीर्घ-दीर्घदोसरो पाँतिकेँ मात्रा क्रम अछि-----ह्रस्व-दीर्घ-दीर्घ-ह्रस्व-दीर्घ-दीर्घ-ह्रस्व-दीर्घ-दीर्घ-ह्रस्व-दीर्घ-दीर्घ | आब ऐ श्लोकक दोसर पाँतिक ब्रम्ह शब्दपर धेआन देबै सभ बुझबामे आबि जाएत। 3) 3) पं. गोविन्द झा जी मैथिली छंद शास्त्रक पृष्ठ १३मे संयुक्ताक्षरसँ पहिने बला अक्षर दीर्घ हएत की लघु तकर व्यवस्था देखेने छथि। हुनका मतें जँ एकैटा शब्दमे संयुक्ताक्षर हो तखने टा संयुक्ताक्षरसँ पहिनुक अक्षर दीर्घ हएत। सङ्गे-सङ्ग ईहो कहने छथि जे प्रचलित समासमे जँ अलगो-अलग अक्षर छै तखन संयुक्ताक्षरसँ पहिनुक अक्षर दीर्घ हएत। सङ्गे-सङ्ग ओ एकर सभहँक अपवाद सेहो देने छथि। लगभग इएह नियम मैथिलीक सभ लेखक अपनेने छथि। सङ्गे हम ईहो कहि दी जे हिन्दीयोमे एहने सन नियम छै ( आन आधुनिक भारतीय भाषामे की छै से हमरा नै पता) मुदा ई नियम संस्कृतमे नै छै। संस्कृतमे चाहे एकै शब्दमे संयुक्ताक्षर हो की अलग-अलग शब्दमे दूनू स्थितिमे संयुक्ताक्षरसँ पहिनुक अक्षर दीर्घ हएत। संस्कृत पद्यक किछु उदाहरण देखू------पहिने आदि शंकराचार्यक ई निर्वाण षट्कम देखू----------- मनो बुद्ध्यहंकारचित्तानि नाहम् न च श्रोत्र जिह्वे न च घ्राण नेत्रे न च व्योम भूमिर् न तेजॊ न वायु: चिदानन्द रूप: शिवोऽहम् शिवॊऽहम् न च प्राण संज्ञो न वै पञ्चवायु: न वा सप्तधातुर् न वा पञ्चकोश: न वाक्पाणिपादौ न चोपस्थपायू चिदानन्द रूप: शिवोऽहम् शिवॊऽहम् न मे द्वेष रागौ न मे लोभ मोहौ मदो नैव मे नैव मात्सर्य भाव: न धर्मो न चार्थो न कामो ना मोक्ष: चिदानन्द रूप: शिवोऽहम् शिवॊऽहम् न पुण्यं न पापं न सौख्यं न दु:खम् न मन्त्रो न तीर्थं न वेदा: न यज्ञा: अहं भोजनं नैव भोज्यं न भोक्ता चिदानन्द रूप: शिवोऽहम् शिवॊऽहम् न मृत्युर् न शंका न मे जातिभेद: पिता नैव मे नैव माता न जन्म न बन्धुर् न मित्रं गुरुर्नैव शिष्य: चिदानन्द रूप: शिवोऽहम् शिवॊऽहम् अहं निर्विकल्पॊ निराकार रूपॊ विभुत्वाच्च सर्वत्र सर्वेन्द्रियाणाम् न चासंगतं नैव मुक्तिर् न मेय: चिदानन्द रूप: शिवोऽहम् शिवॊऽहम् पहिल पाँतिकेँ मात्रा क्रम अछि---- ह्रस्व-दीर्घ-दीर्घ-ह्रस्व-दीर्घ-दीर्घ-ह्रस्व-दीर्घ-दीर्घ-ह्रस्व-दीर्घ-दीर्घ --------| दोसरो पाँतिकेँ मात्रा क्रम अछि-----ह्रस्व-दीर्घ-दीर्घ-ह्रस्व-दीर्घ-दीर्घ-ह्रस्व-दीर्घ-दीर्घ-ह्रस्व-दीर्घ-दीर्घ--------- । जँ अहाँ नीकसँ पढ़बै तँ पता लागत जे संयुक्ताक्षरसँ पहिने बला अक्षर जे अलग शब्दमे छै ओहो दीर्घ भए रहल छै। आब शंकराचार्योसँ पहिनुक रचना देखी। तँ पढ़ू रावण रचित ई शिवतांडव स्त्रोतम्। एहूमे संयुक्ताक्षरसँ पहिनुक अक्षर दीर्घ भेल अछि चाहे ओ एक शब्दमे अछि वा अलग शब्दमे। लघु-दीर्घक-लघु-दीर्घ-----ऐ रूपकेँ पालन 14 श्लोक धरि पालन कएल गेल अछि। जटाटवीगलज्जलप्रवाहपावितस्थले गलेवलम्ब्य लम्बितां भुजङ्गतुङ्गमालिकाम् । डमड्डमड्डमड्डमन्निनादवड्डमर्वयं चकार चण्डताण्डवं तनोतु नः शिवः शिवम् ॥ 1 ॥ जटाकटाहसम्भ्रमभ्रमन्निलिम्पनिर्झरी- -विलोलवीचिवल्लरीविराजमानमूर्धनि । धगद्धगद्धगज्ज्वलल्ललाटपट्टपावके किशोरचन्द्रशेखरे रतिः प्रतिक्षणं मम ॥ 2 ॥ धराधरेन्द्रनन्दिनीविलासबन्धुबन्धुर स्फुरद्दिगन्तसन्ततिप्रमोदमानमानसे । कृपाकटाक्षधोरणीनिरुद्धदुर्धरापदि क्वचिद्दिगम्बरे मनो विनोदमेतु वस्तुनि ॥ 3 ॥ जटाभुजङ्गपिङ्गलस्फुरत्फणामणिप्रभा कदम्बकुङ्कुमद्रवप्रलिप्तदिग्वधूमुखे । मदान्धसिन्धुरस्फुरत्त्वगुत्तरीयमेदुरे मनो विनोदमद्भुतं बिभर्तु भूतभर्तरि ॥ 4 ॥ सहस्रलोचनप्रभृत्यशेषलेखशेखर प्रसूनधूलिधोरणी विधूसराङ्घ्रिपीठभूः । भुजङ्गराजमालया निबद्धजाटजूटक श्रियै चिराय जायतां चकोरबन्धुशेखरः ॥ 5 ॥ ललाटचत्वरज्वलद्धनञ्जयस्फुलिङ्गभा- -निपीतपञ्चसायकं नमन्निलिम्पनायकम् । सुधामयूखलेखया विराजमानशेखरं महाकपालिसम्पदेशिरोजटालमस्तु नः ॥ 6 ॥ करालफालपट्टिकाधगद्धगद्धगज्ज्वल- द्धनञ्जयाधरीकृतप्रचण्डपञ्चसायके । धराधरेन्द्रनन्दिनीकुचाग्रचित्रपत्रक- -प्रकल्पनैकशिल्पिनि त्रिलोचने मतिर्मम ॥ 7 ॥ नवीनमेघमण्डली निरुद्धदुर्धरस्फुरत्- कुहूनिशीथिनीतमः प्रबन्धबन्धुकन्धरः । निलिम्पनिर्झरीधरस्तनोतु कृत्तिसिन्धुरः कलानिधानबन्धुरः श्रियं जगद्धुरन्धरः ॥ 8 ॥ प्रफुल्लनीलपङ्कजप्रपञ्चकालिमप्रभा- -विलम्बिकण्ठकन्दलीरुचिप्रबद्धकन्धरम् । स्मरच्छिदं पुरच्छिदं भवच्छिदं मखच्छिदं गजच्छिदान्धकच्छिदं तमन्तकच्छिदं भजे ॥ 9 ॥ अगर्वसर्वमङ्गलाकलाकदम्बमञ्जरी रसप्रवाहमाधुरी विजृम्भणामधुव्रतम् । स्मरान्तकं पुरान्तकं भवान्तकं मखान्तकं गजान्तकान्धकान्तकं तमन्तकान्तकं भजे ॥ 10 ॥ जयत्वदभ्रविभ्रमभ्रमद्भुजङ्गमश्वस- -द्विनिर्गमत्क्रमस्फुरत्करालफालहव्यवाट् । धिमिद्धिमिद्धिमिध्वनन्मृदङ्गतुङ्गमङ्गल ध्वनिक्रमप्रवर्तित प्रचण्डताण्डवः शिवः ॥ 11 ॥ दृषद्विचित्रतल्पयोर्भुजङ्गमौक्तिकस्रजोर्- -गरिष्ठरत्नलोष्ठयोः सुहृद्विपक्षपक्षयोः । तृष्णारविन्दचक्षुषोः प्रजामहीमहेन्द्रयोः समं प्रवर्तयन्मनः कदा सदाशिवं भजे ॥ 12 ॥ कदा निलिम्पनिर्झरीनिकुञ्जकोटरे वसन् विमुक्तदुर्मतिः सदा शिरःस्थमञ्जलिं वहन् । विमुक्तलोललोचनो ललाटफाललग्नकः शिवेति मन्त्रमुच्चरन् सदा सुखी भवाम्यहम् ॥ 13 ॥ इमं हि नित्यमेवमुक्तमुत्तमोत्तमं स्तवं पठन्स्मरन्ब्रुवन्नरो विशुद्धिमेतिसन्ततम् । हरे गुरौ सुभक्तिमाशु याति नान्यथा गतिं विमोहनं हि देहिनां सुशङ्करस्य चिन्तनम् ॥ 14 ॥ पूजावसानसमये दशवक्त्रगीतं यः शम्भुपूजनपरं पठति प्रदोषे । तस्य स्थिरां रथगजेन्द्रतुरङ्गयुक्तां लक्ष्मीं सदैव सुमुखिं प्रददाति शम्भुः ॥ 15 ॥ ऐ के अलावे पूरा संस्कृत पद्ये एकर उदाहरण अछि। मुदा से देब ने हमरा अभीष्ट अछि आ ने उचित। मैथिलीमे ई नियम नै छै तकर कारण प्राकृत-अप्रभंश भाषाक प्रभाव छै। मैथिली सहित आन-आन आधुनिक उत्तर भारतीय भाषामे ई सेहो ई नियम नै मानल जाइत छै प्राकृत-अपभ्रंशक प्रभावें। आब ई देखू जे ई प्राकृत-अपभ्रंश कोन भाषा थिक। प्राकृतक सम्बन्धमे नाट्य शास्त्रक प्रणेता भरत मुनि कहै छथि जे------ एतदेव विपर्यस्तं संस्कार गुण वर्जितम् विज्ञेयं प्राकृतं पाठ्यं नाना वस्थान्तरात्मकम्। मने जे मूल शब्दक अक्षरकेँ आगू-पाछू कए वा सरलीकृत कए बाजब प्राकृत पाठ कहाइए। ऐठाम मूल शब्द मने संस्कृतक शब्द भेल, मुदा मूल शब्द कोनो भाषाक भए सकैए। तेनाहिते आचार्य भर्तृहरि जी प्राकृतक सम्बन्धमे कहै छथि जे -------- दैवीवाक् व्यवकीर्णेयम शकतैरभि धातृभिः मने जे दैवीवाक् ( संस्कृत ) अशक्त लोकक मूँहमे आबि भिन्न-भिन्न रूपमे आबि जाइ छै। मुदा महाभाष्यकार पतञ्जलि प्राकृतकेँ अपशब्दक रूपमे देखैत छथि आ हुनका मतें ऐ तरहक अपशब्दक प्रयोग चाहे ओ बाजल जाइ की सूनल जाइ दूनू रूपमे अधर्म थिक। प्रायः-प्रायः हरेक भाषाविज्ञानी प्राकृतक बाद बला रूपकेँ अपभ्रंशक नाम देने छथिन्ह। लगभग नवम आ दशम शताब्दी धरि प्राकृतक प्रयोग खत्म भए गेल छल आ अपभ्रंशक प्रयोग शुरू भए गेल छल। मुदा ऐ ठाम मोन राखू जे अधिकांश भाषाविज्ञानी अप्रभंशकेँ प्राकृतसँ अलग मनने छथि मुदा दूनूक प्रकृति एक समान हेबाक कारणें " प्राकृत-अपभ्रंश " नाम बेसी चलै छै। प्राकृतमे शब्दक निर्माण मुख्यतः लोक रूचिपर निर्धारित छै ने की व्याकरणपर। एकटा उदाहरण देखू-----चन्द्र शब्दसँ चन्दा प्राकृत शब्द भेल मुदा इन्द्र शब्दसँ इन्दा शब्द नै बनल ब्लकि इन्दर शब्द बनल। तेनाहिते वधू शब्दसँ बहु बनि तँ गेल मुदा साधु शब्दसँ साहु नै बनल। साहु अलग शब्द अछि। आ लगभग एहने हालति अपभ्रंशक अछि। ई बात जननाइ महत्वपूर्ण अछि जे जेनाहित प्राकृत लेल मूल शब्द संस्कृत छै तेनाहिते अपभ्रंश लेल मूल शब्द प्राकृत छै। आ बादमे एही अपभ्रंशसँ मैथिली आ आन आधुनिक भारतीय भाषा सभहँक जन्म भेल। ओना प्राकृतक बहुत रूप छै। तेनाहिते अपभ्रंशक सेहो अनेको रूप छै। मैथिलीमे अपभ्रंशकेँ अपभ्रष्ट वा अवहट्ट सेहो कहल जाइत छै। मुदा ई प्राकृत रूप हरेक समयमे होइत रहलैए। वेदक नाराशंसी एकर उदाहरण अछि | आ ऋगवेदमे ओहि समयक सामानान्तर भाषाक बहुत रास शब्द भेटत। तेनाहिते अशोक वाटिकामे हनुमान जीक ई चिन्ता जे हम सीता जीसँ देवभाषामे गप्प करी की मानुषी भाषामे सेहो ऐ गप्पक प्रमाण अछि जे ओहू समयमे संस्कृतक समानान्तर भाषा छलै आब ओकर नाम मानुषी होइ की वा अन्य कोनो। महत्वपूर्ण तँ ई छै जे वेदसँ लए कए एखन धरि संस्कृतक समानान्तर धारा बहैत रहल आब भले ही ओकर नाम जे रहल होइ। संस्कृत शब्द जखन प्राकृत रूपमे आबए लगलै तखन संयुक्ताक्षर शब्दपर बहुत बेसी प्रभाव पड़लै। जँ गौरसँ देखबै तँ पता लागत जे प्राकृत बाजए बला सभ संयुक्ताक्षर शब्दकेँ अपन लक्ष्य बनेने छल ताहूमे एहन संयुक्ताक्षर बला शब्द जे शब्दक शुरूआतमे छल। एकर कारण छलै जे संयुक्ताक्षर बला शब्दकेँ बजबामे बहुत सावधानी आ शिक्षा चाही छल। संस्कृतक संयुक्ताक्षर बला शब्द प्राकृतमे दू रूपमे तोड़ल गेल--- १) जै संस्कृतक शब्दक शुरुआत संयुक्ताक्षरसँ भेल छै तकरा प्राकृतमे पूरा-पूरी लोप कए देल गेलै। केखनो-केखनो शुरूआतक संयुक्ताक्षरकेँ बादमे आनि देल गेलै जेना----- “ग्रह” संस्कृत छै मुदा एकर प्राकृत “गिरहो” छै। तेनाहिते स्कन्द लेल खन्दो, क्षमा लेल खमा वा छमा, स्तम्भ लेल खम्भ, स्खलितं लेल खलिअं, क्लेश लेल किलेसो इत्यादि। २) जँ शब्दक शुरुआत छोड़ि कतौ संयुक्ताक्षर छै तँ केखनो ओकर लोप भए गेल छै वा नव रूपमे संयुक्ताक्षर छै जेना ---- चतुर्थी लेल चउत्थी, चैत्र लेल चइत्ता, चन्द्रिमा लेल चन्दिमा, क्षेत्रम् लेल छेतम् आदि-आदि। कुल मिला कए प्राकृत-अपभ्रंशमे एहन स्थिति बनल जे दूनू भाषामे सँ कोनो भाषामे एहन शब्द नै छलै जकर शुरूआत संयुक्ताक्षर शब्दसँ होइत हो। एतेक विवेचनाक बाद हम अपन मूल उद्येश्य दिस चली। हमर मूल उद्येश्य छल जे मैथिलीमे संस्कृते जकाँ अलग-अलग शब्द रहितों संयुक्ताक्षरसँ पहिने बला अक्षर दीर्घ किएक नै होइए। आब जँ गौरसँ उपरका विवरण पढ़ने हएब आ जँ आर प्राकृत-अपभ्रंशक पोथी सभ पढ़ब तँ पता लागत जे प्राकृत-अप्रभंशमे तँ संयुक्ताक्षरसँ शुरूआत शब्द छैके नै। आ मैथिलीयो अपभ्रंशसँ निकलल अछि आ प्रारंभिक मैथिलीमे संयुक्ताक्षरसँ शुरूआत होइत कोनो शब्द नै अछि। आ तँए मैथिलीमे संस्कृतक ई नियम नै आएल। आ अहाँ अपने सोचियौ ने जे जै भाषामे संयुक्ताक्षरसँ शुरू होइत शब्द छैके नै से एहन तरहँक नियम किएक राखत। मुदा जँ नवीन मैथिली भाषाक किछु प्रतिष्ठित लेखकक रचनाकेँ देखी तँ ओ मात्र क्रियापदकेँ छोड़ि सभ संस्कृतक शब्द ( तत्सम शब्द )केँ प्रयोग केने छथि। आन-आन कम प्रतिष्ठित लेखक अपन रचनामे तत्सम शब्दकेँ फिल्मी मसल्ला मानि जोरगर प्रयोग करै छथि। एतबा नै पं. गोविन्द झा जी अपन पोथी "मैथिली परिशीलन"क पृष्ठ २९-३० पर गौरव पूर्वक नवीन भारतीय भाषा ( जै मे मैथिली सेहो अछि )केँ तत्सम निष्ठ हेबाक बहुत रास फायदा गनौने छथि। आब हमरा सन जिज्ञासु लग ई प्रश्न अपने-आप आबि जाइए जे जँ संस्कृतक शब्द लेलासँ बहुत रास फायदा भेलै ( वा भए सकैत छै ) तखन तँ संस्कृतक सम्बन्धित नियम लेलासँ सेहो फायदा भेल रहितै ( वा भए सकैत छै )। ओनाहुतो मैथिलीमे वा अन्य कोनो आधुनिक भारतीय भाषाक पद्यमे संस्कृत शब्दक प्रयोग होइ छै तखन ओ नियम स्वतः पालन भए जाइत छै। अहाँ अपने मैथिली महँक एहन कोनो पद्य गाउ जाहिमे संयुक्ताक्षरसँ शुरू होइत कोनो संस्कृत शब्द हो स्वतः अहाँकेँ बुझा जाएत जे अलग शब्द रहितों संयुक्ताक्षरसँ पहिने बला अक्षर दीर्घ होमए लगैत छै। ऐठाँ फेर मोन राखू जे प्राकृत-अपभ्रंश भाषामे एहन शब्द छलैहे नै जकर शुरूआत संयुक्ताक्षरसँ होइ तँए ओहि भाषामे ई नियम नै पालित भेल। आब एतेक विवेचनक बाद अहाँ सभकेँ मामिला बुझबामे आएल हएत। तँए हमर आग्रह जे जँ ऐ नियमसँ बचबाक हो तँ संयुक्ताक्षरसँ शुरू होइत शब्दक तद्भव रूप प्रयोग करू जेना " प्रकाश " लेल परकाश, " प्रयोग " लेल परियोग इत्यादि। हमर कहबाक मतलब जे जेना पुरना कालमे प्राकृत संयुक्ताक्षरकेँ हटा देलकै वा आधुनिक कालमे बंगला भाषामे संयुक्ताक्षर हटि गेलै तेनाहिते मैथिलीमेसँ संयुक्ताक्षर सेहो हटा दिऔ। आ जँ अहाँ संस्कृते शब्द लेब तखन पूरा नियम सहित लिअ। आब अहाँ जँ सकांक्ष पाठक हएब तँ हमरासँ पूछब जे जँ केओ संस्कृत छोड़ि आन भाषाक शब्द लेत तखन की ओहि भाषाक नियमक पालन करत ? ऐ लेल हमर उत्तर रहत जे नै। कारण संस्कृत हमर मूल भाषा थिक तँए ओकरा दिस ताकब हमर मजबूरी नै बल्कि कर्तव्य सेहो अछि। मुदा ओकरा छोड़ि जँ आन भाषाक शब्द लै छै तखन ओकरा मैथिलीक नियम हिसाबें प्रयोग करू। जेना की अरबी-फारसी-उर्दू भाषामे " ग़ज़ल " लिखल जाइत छै मने ग आ ज केर निच्चा नुक्ता लगाएल जाइत छै मुदा मैथिलीमे नुक्ता नै छै तँए मैथिलीमे " गजल " लीखू। नुक्ता लगा कए लिखब बेकार । कोनो संस्कृतक शब्दकेँ वा अन्यदेशीय शब्दकेँ मैथिलीकरण कोना करी आ कोना नव शब्द बनाबी तकर विवेचना आगू हएत। ई छल हमर पहिल तर्क। आब कने दोसर तर्क दिस चली--- संस्कृत पद्यमे एकटा पाँतिकेँ इकाइ मानल जाइत छै। आ जँ हम शब्दकेँ भिन्न-भिन्न करै छिऐ मने अलग-अलग शब्दक संयुक्ताक्षरसँ भेल दीर्घ नै मानै छिऐ तँ एकर मतलब जे हम पाँतिकेँ नै बल्कि शब्दकेँ इकाइ मानि रहल छिऐ आ हमरा जनैत पद्यमे शब्दकेँ इकाइ मानब उचित नै। पद्यमे इकाइ सदिखन पाँति होइ छै। एकटा विडंबना देखू जे मैथिलीक सभ व्याकरण शास्त्री आ कवि लोकनि शब्दकेँ इकाइ तँ मानै छथि मुदा जखन जगण-मगण केर गिनती करै छथि तखन पाँतिकेँ इकाइ मानि लै छथि। एकटा उदाहरण लिअ जे की वसन्त तिलका छन्दक अछि। ऐ छन्दक व्यवस्था एना अछि---- तगण+ मगण+जगण +जगण + गा + गा मने की ----दीर्घ-दर्घ-लघु +दीर्घ-लघु-लघु +लघु-दीर्घ-लघु +लघु-दीर्घ-लघु +दीर्घ+ दीर्घ आब एकर पद्य उदाहरण देखू---- " ई ने अहाँक सन वीरक काज थीकs" ( कविवर सीताराम झा, मैथिली छन्द शास्त्र, पृष्ठ-४५)। ऐ एकटा पाँतिमे देखू जे " ई " आ "ने " दूटा अलग-अलग शब्द अछि सङ्गे-सङ्ग तेसर शब्द " अहाँक" केर पहिल अक्षर " अ " लए कए मात्र एकटा " तगण "बनल अछि। आब हमर कहब अछि जे जँ अहाँ पद्यमे शब्देकेँ इकाइ मानै छिऐ तखन दू-तीनटा अलग-अलग शब्दकेँ सानि एकटा जगण-मगण किएक बनबै छी। जँ केओ शब्देकेँ इकाइ मानै छथि तकर मतलब ई भेल जे ओ अपन पद्यमे एहन शब्दकेँ प्रयोग करथि जे हरेक जगण-मगण मने कोनो दशाक्षरी खण्ड लेल समान रूपसँ रहए। तँए हमर मानब जे संस्कृतक पद्ये जकाँ जँ अलग-अलग शब्द होइ तैयो संयुक्ताक्षरसँ पहिनुक बला अक्षर दीर्घ हएत। ऐठाँ ई मोन राखू जे एकटा पाँति खत्म भेलै तँ ओ इकाइ खत्म भेलै। आब जँ दोसर पाँतिक शुरूआत संयुक्ताक्षरसँ भए रहल छै तकर प्रभाव पहिल पाँतिक अन्तिम शब्दक अन्तिम अक्षरपर नै पड़त। ………………… क्रमशः जारी.............. ( लघु-दीर्घ लेल शेष निघात सम्बन्धी अवधारणक खण्डन विदेहक अगिला अङ्कमे …) ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। जगदीश प्रसाद मण्डल जन्म- ५ जुलाइ १९४७ पिताक नाओं : स्व. दल्लू मण्डल, माताक नाओं : स्व. मकोबती देवी, पत्नी- श्रीमती रामसखी देवी, पुत्र- सुरेश मण्डल, उमेश मण्डल, मिथिलेश मण्डल। मातृक- मनसारा, घनश्यामपुर, जिला- दरभंगा। मूलगाम- बेरमा, भाया- तमुरिया, जिला-मधुबनी, (बिहार) पिन- ८४७४१० मोबाइल- ०९९३१६५४७४२ शिक्षा- एम.ए. (हिन्दी आ राजनीति शास्त्र) मार्क्सवादक गहन अध्ययन। हिनकर कथामे गामक लोकक जिजीविषाक वर्णन आ नव दृष्टिकोण दृष्टिगोचर होइत अछि। गामक जिनगी लघुकथा संग्रह लेल विदेह समानान्तर साहित्य अकादेमी पुरस्कार २०११क मूल पुरस्कार आ टैगाेर साहित्य सम्मान २०११; एवं बाल-प्रेरक विहनि कथा संग्रह ‘‘तरेगन’’ लेल बाल साहित्य विदेह सम्मान २०१२ (वैकल्पिक साहित्य अकादेमी पुरस्कार रूपेँ प्रसिद्ध) प्राप्त। साहित्यिक कृति- उपन्यास- (१) मौलाइल गाछक फूल (२००९), (२) उत्थान-पतन (२००९), (३) जिनगीक जीत (२००९), (४) जीवन-मरण (२०१०), (५) जीवन संघर्ष (२०१०) नाटक- (१) मिथिलाक बेटी (२००९), (२) कम्प्रोमाइज (२०१०), (३) झमेलिया बिआह (२०१२) लघुकथा संग्रह- (१) गामक जिनगी (२००९), (२) अर्द्धागिनी... सरोजनी... सुभद्र... भाइक सिनेह इत्यादि (२०१२), (३) सतभैंया पोखरि (२०१२) बाल-प्रेरक विहनि कथा संग्रह- (१) तरेगन (२०१०) विहनि कथा संग्रह- बजन्ता-बुझन्ता (२०१२) एकांकी संग्रह- (१) पंचवटी (२०१२) दीर्घकथा संग्रह- (1) शंभुदास (२०१२) कविता संग्रह- (१) इंद्रधनुषी अकास (२०१२), (२) राति-दिन (२०१२) गीत संग्रह- (१) गीतांजलि (२०१२), (२) तीन जेठ एगारहम माघ (२०१२) किछु विहनि कथा १. बुधनी दादी २. अकास दीप ३. कनमन ४. खिलतोड़ ५. मुँह-कान ६. अनदिना ७. अपन काज ८. दूरी ९. पुरनी भौजी १०. छूटि गेल ११. काल्हि दिन १२. अप्पन हारि १३. कनफुसकी १४. मुँहक बात मुँहेमे १५. कनीटा बात १६. गति-गुद्दा १७. बिसवास १८. कचहरिया-भाय १९. गुहारि २०. शिवजीक डाक-बाक् २१. सोग २२. पनचैती २३. कचोट २४. अजाति २५. पटोर २६. फुसियाह २७. गति-मुक्ति २८. चौकीदारी २९. झगड़ाउ-झोटैला ३०. घबाह ट्यूशन ३१. दादी-माँ ३२. पटोटन ३३. मुसाइ पंडित ३४. भरमे-सरम ३५. देखल दिन ३६. फज्झति ३७. काँच सूत ३८. बुधि-बधिया ३९. पहाड़क बेथा ४०. उमकी ४१. बजन्ता-बुझन्ता ४२. चर्मरोग ४३. शंका ४४. ओसार ४५. छोटका काका ४६. सीमा-सड़हद ४७. रमैत जोगी बहैत पानि ४८. गंजन ४९. सजाए ५०. घटक बाबा ५१. आने जकाँ ५२. दान-दछिना ५३. उड़हड़ि ५४. मत्हानि ५५. मेकचो ५६. झुटका विदाइ ५७. मुँहक खतियान ५८. कोसलिया ५९. हूसि गेल ६०. पोखला कटहर ६१. सरही सौबजा ६२. तेरहो करम ६३. डुमैत िजनगी ६४. चोर-सिपाही ६५. दूधबला ६६. टाइपिस्ट ६७. समदाही ६८. बुढ़िया दादी बुधनी दादी जहिना कुमहारकेँ भादवक रौद बादलमे झपा गेने दुर्दिन आगूमे नाचए लगैत तहिना बुधनी दादीकेँ साल भरिसँ भऽ रहल छन्हि। साल भरि पहिने तक, जाबे पति जीबैत छलनि ताबे दिल्लीक कमाइसँ जे सुख केलनि, रहितो आब नै भऽ पाबि रहल छन्हि। सोलह कोठरीक हथिसार जकाँ मकानमे असकरे रहैत डर होइ छन्हि जे कहीं सुतली रातिमे भूमकम भेल आ घर खसल तँ महीनो दिनमे ऊपर हएब िक नै। तरेमे सड़ि कऽ महकि जाएब। जहियासँ बुधनी दादी नैहरसँ सासुर एली तहियेसँ कहू आकि नैहरोमे तइसँ पहिनेसँ कहू, नहेला पछाति हनुमान चलीसा पढ़िते छथि। किताब देखि कऽ नै मुँह जुआनिये। गामक तीन टोलक आबा-जाही बुधनी दादीक छन्हि। कोन-पावनि कहिया हएत आ कोन उपास कहिया पड़त से हिसाव जोड़ए अबै छन्हि। तइ संग ईहो छन्हि जे सामाक गीत टोलक कोन बात जे गामेमे सभसँ बेसी अबै छन्हि। छठिक भिनसुरका अर्ध पड़ि गेल आइसँ सामाक गीत हएत। दसमी श्रेणीक राधा बुधनी दादी लग पहुँचल। पहुँचिते राधा बुधनी दादीकेँ गोड़ लागि बाजल- “दादी, अपन मोबाइल नंबर दऽ दिअ। जखन अबैक छुट्टी हएत एबो करब नै तँ मोबाइलेपर लिखि देब।” मोबाइलिक नाओं सुनिते बुधनी दादीक मन गाछसँ खसल कटहर जकाँ आँठी उड़ि कतौ, कमरी उड़ि कतौ, नेरहा उड़ि कतौ, छहोछित भऽ गेलनि। बजलीह- “बुच्ची, आब तोरा सबहक जुग-जमाना एलह। बेटा मोबाइल पठा देलक जइसँ कहियो काल धियो-पुतो आ बेटो-पुतेाहुसँ गप-सप होइ छलए। सेहो केदैन चोरा लेलक। भरि दिन अंगनेमे बैसल रहब से पार लागत। मूस तते भऽ गेल अछि जे ने नुआ-विस्तरक सेखी रहए दइए आ ने खाइ-पीबैक।” राधा- “दादी, अहिना जिनगी चलै छै।” बुधनी दादी- “बुच्ची, जीबैक मन होइए मुदा तेहेन-तेहेन आपैत-विपैत सभ अछि जे हाेइए तइसँ नीक भरमे-सरमे मरि जाइ।” ~ अकास दीप दिवालीक एक दिन पहिने गाममे रंग-बिरंगक अकासदीपक खूँटा गड़ल देखि मनोहरोक मनमे उठल जे अपनो ऐठाम जराबी मुदा लगले मन घेड़ा गेलै जे पावनि-तिहार तँ परम्पराक हिसाबे चलैत अछि, जँ से नै तँ एके समाज माने एक जातिक समाजमे एकेटा पावनि किछु गोटेकेँ होइत छन्हि, किछु गोटेकेँ नहियो होइत छन्हि। कारणो स्पष्ट अछि जे जाति दियादमे बँटल अछि। जँ िदयादीक भीतर पावनिक दिन अशौच भऽ जाइए तखन टूटि जाइए। किछु गोटे खंडित बूझि जोड़ि लैत छथि, किछु गोटे छोड़ि दैत छथि। तइ संग ईहो होइत रहै छै जे बहरवैया आमदनीपर जिनका नहियो होइत छलनि ओहो नव शिरासँ शुरूहो करैत छथि। ओझराइत मनोहर बाबासँ पुछैक विचार केलक। मनोहर हाइ स्कूलमे पढ़ैत अछि। घरक कोनो काज करैसँ पहिने बाबासँ पूछब जरूरी बुझलक। सात बजे साँझ। चाह पीब पान खाइते श्यामलाल गप करैक मूडमे एला। केकरो नै देखि चौक दिस जाइक विचार करिते रहथि आकि मनोहर आबि बाजल- “बाबा, एकटा विचार मनमे भेल?” श्यामलाल- “की?” “ऐबेर अपना गाममे सइयोसँ बेशी अकास दीप दिवाली दिन बड़त!” “ई तँ नीक बात भेल।” श्यामलालकेँ अनुकूल होइत देखि मनोहर बाजल- “बाबा, अपनो दरबज्जापर...?” श्यामलाल मुड़ी डोलबैत सोचए लगलाह मनोहर बच्चा अछि हलहोड़िमे मन उड़ि गेलै। काँच कड़ची वा पघिलल काचकेँ जेहेन साँचामे देल जाइ छै तेहने ने वस्तुओ बनैत अछि। सोचि श्यामलाल कहलखिन- “बौआ, जइ गाममे मटिया तेल, जेकर उपयोग गाममे खाली डिबिये टामे होइ छै, तहूक हाहाकार मचल रहै छै। तइठाम तू भरि राति मासो दिन डिबिया बाड़बह से केहेन हएत?” ~ कनमन साढ़े चारि बजैत। हाइ स्कूलसँ अबिते सुधीरक नजरि दरबज्जापर बैसल बाबा श्याम सुन्दरपर पड़लनि। दरबज्जा-अंगनाक बीच मोड़पर सुधीर तेकठी जकाँ ठाढ़ भेल। केम्हर डेग बढ़ौत से फड़िछेबे ने करैत। बाबाकेँ पुछियनि जे किअए मन खसल अछि, आकि किताब रखि कपड़ा बदलि आबी। रस्तेसँ भूखो-पियास लगले अछि। नबे बजेक खेलहा छी। तेकठीक तीनू खूँटाक बीच अपनाकेँ सुधीर पौलक जे दूटाक कनोति तेकठी नाओं धड़बैत अछि जखन कि तेसरक नाआें गोरी भऽ जाइ छै, जेकरा ऊपर लाद लादि लदाना दइ छै। बाबाक बात बूझब सभसँ जरूरी अछि, मुदा बरदाएल हाथे कइये कि सकबनि। कपड़ा बदलब ओते महत नै रखैत अछि तँए एना करी जे बाबाकेँ कहियनि जे हमहूँ आबि गेलौं जइसँ जाबे ओ अपन बात बजता ताबे किताव राखि आएब। कनी डेगमे झाड़ अानए पड़त। सहए केलक। बाजल- “बाबा, किअए मन खसल अछि?” कहि किताव राखए आंगन गेल। किताव राखि श्याम सुन्दर लग आबि सुधीर बाजल- “बाबा, मन खसैत कारण की अछि?” आस-निआसक बीच श्याम सुन्दर ओझड़ाएल रहथि, तँए नजरि खसल छलनि। पोताक जबाब भारी पबैत छलाह। चालीस बर्खक संगी हेरा-फेरीमे जहल चलि गेल छलनि, तेकरे सोग। मुदा बाल-बोध लग बाजी वा नै बाजी। छिपाएब झूठ हएत नै छिपाएब सेहो तँ नीक नहिये हएत। नीकक चर्च हेबाक चाही, अधलाक तँ फलो अधले हएत। एहनो तँ भऽ सकैए जे छिपबैत-छिपबैत छिनारक छिनरपनिये छीप जाए। मुदा एहनो तँ भऽ सकैए जे एक-दोसराक अधला छिपबैत-छिपबैत छिपारकेक समाज बनि जाए। तत्-मत् करैत श्याम सुन्दर बाजल- “बौआ, अखने सुनलौं जे रूपलाल जहल चलि गेल। मिरचाइक झाँझ जकाँ ओहए मनकेँ मलीन केने अछि।” श्याम सुन्दर जे कहि अपनाकेँ हटबए चाहथि से लगले नै हटलनि। कारण भेलनि जे जहलक नाओं सुनि सुधीर दोहरा देलकनि- “किअए रूपलाल बाबा जहल गेला?” सुधीरक प्रश्न श्याम सुन्दरकेँ ज्वर आनि देलकनि मुदा ज्वार नै बनि तुड़छैत ज्वारि तँ आबिये गेल रहनि। बुझबैत बजलाह- “एते पुरान रहितो रूपलाल समैकेँ ठेकानबे ने केलक। पुरना चालिसँ आब काज चलैबला छै! बुझथुन जे केहेन दादासँ पल्ला पड़ल।” ~ खिलतोड़ आकाशवाणी केन्द्रक कार्यक्रमक कृषि विभागसँ दयाकान्त तीस बर्ख पछाति सेवा-निवृति भेला। खेती-पथारीक कार्यक्रमक चिन्हार चेहरा बनौने रहला। नोकरी पाबि जिनगीमे बहुत किछु केलनि। तीनू बेटो आ दुनू बेटियोकेँ पढ़ा-िलखा, नोकरी धड़ा नेने छथि। अपनो रहैक बेवस्था शहरेमे कऽ लेलनि। सेवा-निवृत्तिक चारि बर्ख पछाति मन उबियेलनि जे शहरमे नै रहब, बाप-दादाक बनाओल गामेमे रहब। मन उबियाइक कारण भेलनि जे पुरना संगी सभमे किछु गोटे आन शहर, तँ किछु गोटे गाम आ किछु गोटे मरियो गेलाह। पछाति जे संगी भेटलनि, हुनका सभसँ तेहेन सम्बन्ध नै बनि सकलनि जेहेन पहिलुका सबहक संग छलनि। दूर रहने परिवारोक (बेटा-बेटीक) सम्बन्ध पतराये गेल रहनि। पत्नियो संगी नै बनि सभ दिन भनसिये रहि गेलनि। खंडहर जकाँ घर-घराड़ी। गाम अबिते पहिने घर-अंगना, बीस बर्खसँ परता पड़ल चापाकल उड़ाहलनि। दरबज्जापर अबैत-अबैत मास दिन लगि गेलनि। दरबज्जापर अबिते देखलनि जे अगिला बाड़ी परती पड़ल अछि। जँ एकरा चौमास बना लेब तँ सालो भरि परिवारक तीमन-तरकारी तँ चलबे करत जे किछु बाँटियो-खोंटि लेब। सहए केलनि। कहिया कतए सँ परता पड़ल खेतकेँ गहींरसँ ताम करबा दयाकान्त चौमास बनौलनि। अल्लूक खेती केलनि। अखन धरि जे अल्लूक खेतीक सम्बन्धमे बुझै छलाह तही हिसाबसँ तैयारो केलनि आ खाद-कीटनाश दऽ रोपबो केलनि। बीस दिन रोपला पछाति खेतमे चारि आना गाछ देखलनि। मुदा घबड़ेला नै, सबूर केलनि जे अखन जनमइयोक समए छैहे। तीस दिन पछाति जखन ओहो चौअन्नी गाछमे सँ आधासँ बेसी जरिये गेलनि तखन माथ ठमकलनि। मुदा पुछबो किनकासँ कएल जाए। तहूमे जिनगी भरि अपने दोसरकेँ बुझेलौं। ओना ओझरी मनमे लगए लगलनि मुदा चेत गेलाह। जे खेतीक मर्म बुझैत होथि तिनकासँ बूझब नीके छी। बूझब, गहराइसँ बूझब आ मर्म बूझब भिन्न होइत अछि। ठेहिआएल दयाकान्त दीनानाथ ओइठाम पहुँचलाह। दयाकान्तकेँ देखिते दीनानाथ बजला- “आऊ-आऊ, लाल भाय।” रेडियो स्टेशनमे लाल भाइक नाओंसँ दयाकान्त छला तँए लाले भाइक नाओंसँ जनैत छन्हि। चाह पीब दयाकान्त बजला- “दीना भाय, अल्लू रोपलौं से गाछे ने भेल?” जहिना सौरखीक पात देखि डाँट पकड़ि सौरखी उखाड़ल जाइत तहिना दीनानाथ पकड़ि पुछलखिन- “अल्लू खुनि कऽ देखलिऐ जे सड़ि गेल आकि जीविते अछि?” “हँ, सभ सड़ि गेल।” “खेतमे हाल केहेन अछि?” “से तँ बढ़िया अछि। ओते नै अछि जे अल्लू सड़ि जाएत।” “तखन?” “सएह नै बुझै छी।” “बीआ काटि कऽ रोपने छलौं कि सौंसे?” “गोटगरहा सौंस रोपने छलौं। तइ संग खादो आ कीटनाशको भरपूर देने छलौं।” खादक मात्रा सुनि दीनानाथ बजला- “देखियौ कहिया कतए सँ जमीन पड़ता छल खिलतोड़ भेल। ओकरा अपनेमे ओते शक्ति छै जे सुभर उपजा दऽ सकैए। तइमे तते खाद दऽ देलिऐ जे बीए जरि गेल।” ~ मुँह-कान काल्हिये बैंकक मैनेजर आबि सुनरलालक गाएकेँ सेहो देखि गेल छलाह। एक्कैस हजारक गाए। गामक किसानक बीच एकछाहा चर्च। कियो सिलेब रंगक चर्च करैत तँ कियो सिंह-सिंगहौटीक। कियो थुथुनक चर्च करैत तँ कियो गरदनिक अगिलाक। जइठाम मनुखोकेँ उचित अन्न नै भेट रहल अछि तइठाम मवेशी पालन धिया-पुताक खेल छिऐ। कते दूधक जरूरत अछि, तइले कते मवेशीक जरूरत पड़त मूल प्रश्न भेल। एक तँ एक्कैसक हजारक गाए गाममे आएल अछि। अखन धरि जे नै आएल छल। बैंकक लाभ जरूर भेल। मनधनो काका गाए देखए सुनरलालक ऐठाम एला। गाइक रंग-रूप देखि मनधन काका चैन होइत तमाकू खाइले बैसलाह। खुशीसँ खुशिआएल सुनरलाल बाजल- “काका, बहूदिनसँ हीक गड़ल छल जे एकटा नीक गाए खुँटापर बान्हब, से भगवान पूर केलनि।” भवधारमे बहैत सुनरलालकेँ देखि मनधन काका कहलखिन- “बड़ सुनर गाए छह। मलकार की सभ कहलकह?” काजक जड़ि दिस बढ़ैत सुनरलाल बाजल- “चारि मास पछाति एक संझू भऽ जाएत आ छह मास लागत।” “कते दूध होइ छह?” “दू किलो भिनसर आ डेढ़ किलो साँझमे।” दूधक नाओं सुनि मनधन काका चौंक गेला जे बाप रे कतए सँ बैंकक कर्ज चुकाओत, कतए सँ गाइक खर्च जुटाओत आ कतए सँ अपने गुजर करत। बात आगू नै बढ़ा मनधन काका सुनरलालकेँ चरिअबैत कहलखिन- “छब दे तमाकुल खुआबह। एकटा काज मन पड़ि गेल।” “एना अगुताइ किअए छह?” मुदा मनधन काकाकेँ कोनो जबाब नै फुड़लनि। मनमे नचैत रहनि युग तँ आर्थिक मोड़ लऽ रहल अछि। मुदा घिड़नीक चालि किमहर छै वस्तुक गुण दिस आकि सुआद दिस? ~ अनदिना शिक्षक अमरनाथकेँ देखिते रामकिसुन बाजल- “मास्सैव, अनदिना गाममे देखै छी?” रामकिसुनक प्रश्नसँ अमरनाथ अचंभित भऽ गेला जे एहेन बात किअए पुछलनि। मुदा बाजबो तँ उचित नहिये हएत। रंग-बिरंगक जहिना शिक्षक छथि तहिना विद्यार्थियो अछि। जेहने चलबैबला अछि तेहने चलौनिहारो अछि। कि हमरा कहने झूठ भऽ जेतै जे शिक्षक सभ दरमहे टा उठबए विद्यालय जाइ छथि, तँए कि ईहो झूठ भऽ जाएत जे सरकारो दहिन गबैया जकाँ महिने-महिने दरमाहा देब छोड़ि सालक-सालेक पाहि लगबै छै। अमरनाथक मन ठमकलनि। अनदिना गाममे देखै छी, अहाँ गामसँ हटि नोकरी करै छी, बिनु छुट्टीक दिन गाममे छी, कि समाजक एतबे दायित्व बनै छै जे फल्लाँ भाइक सातो बेटा गुरुजी बनि गेलखिन। अधभर मुस्की दैत अमरनाथ कहलखिन- “भाय, की कहै छी, जुगेमे भूर भऽ गेलै। अमैया छुट्टीमे गाम एलौं हेन आ ऐठाम देखै छी जे फैजली सभ कोशेबो ने कएल हेन।” दिन ठेकनबैत रामकिसुन बाजल- “कते दिनक छुट्टी अछि जे एना हदिया गेलौं?” “आब कि ओ जुग-जमाना रहल जे रोहनियासँ फैजली तक खाइक छुट्टी होइ छै। आधासँ बेसी छुट्टी कटियो गेल अछि। जब हमर स्कूल खुजल तेकर पछाति आन-आन स्कूलमे छुट्टी हेतै।” रामकिसुन- “ई तँ अजगुते भेल?” दहिना हाथसँ चानि ठोकि अमरनाथ बाजल- “अहाँ अजगुत कहै छिऐ। एतबे अछि। पहिने सरकारियो ऑफिसमे आ आनो-आनो ठाम किरानी होइ छलै अखनो अछि। तहिना स्कूलमे शिक्षक होइ छला अखनो छथि। मुदा आबक शिक्षक सालो भरिक नै छह मसिया बनि गेलाह। छह मास धिया-पुताकेँ पढ़ाउ आ छह मास ऑफिसक काज करू। जहिना नाचमे लेबरा सभ नै लेबराइ करैए तहिना ने हमहूँ सभ कखनो माल्थस रॉविनसन करै छी तँ कखनो आबि घरे-घर बकरी-छागरक गिनती करै छी।” अमरनाथक बात सुनि रामकिसुन ओल जकाँ कबकवेला नै, मुस्की दैत बजलाह- “होउ, अहीं सबहक जुग-जमाना छी, जे काटब से काटि लिअ।” रामकिसुनक काटब सुनि अमरनाथ अह्लादित होइत बजलाह- “ठीके ने अहाँ कहै छी। अपना सभकेँ जे सभसँ छोटका दिन होइए, ओइमे कथीक छुट्टी होइए से बूझल अछि?” “नै।” “बड़ा दिनक!” ~ अपन काज तेजीसँ समए अगुएने, विकास भेने महगियोक वृद्धि धकधका गेल। तहूमे तीमन-तरकारीक तेजी भेने, बाड़ी-झाड़ीसँ टपि खेत-पथार दिस बढ़ल। जइ चौमासमे अंडी-बगहंडीसँ लऽ कऽ भाँग-धथुरक बिरदावन रहैत आएल छल ओ कटि-खोंटि चौमासो दिस घुसकुनियाँ कटलक। अखन धरि कपलेसर परिवार धरिक तरकारी उपजबैत छल सेहो कोनचरमे सजमनिक गाछ, आ गौसारपर अल्लू-कोवी, मिरचाइ, भट्टा उपजबैत छल ओ चारि कट्ठा कोवी खेती करत। ओना पाँच बीघा जोतक किसान कपलेसर, मुदा खेतमे खादक हिसाब धाने-गहुमक बुझैत अछि। मिरचाइ बाड़ीकेँ कड़चीसँ भोला बतिअबैत रहथि आकि कपलेसर अबिते पुछलकनि- “भैया, चारि कट्ठा कोवी खेती करब, तइमे कते खाद लगतै?” कपलेसरक प्रश्न सुनि भोला तारतममे पड़ि गेला। रंग-बिरंगक प्रश्न मनमे उठलनि। जइ खेतमे पहिल बेर खेती हएत आ जइ खेतमे साले-साल होइ छै, उपजैक दृष्टिसँ दुनू एक केना भेल। कोवीक पछिला फसिल कि छलै, सिरो तँ रंग-रंगक होइ छै। कोनो छह आंगुर ऊपरे धरिक तँ कोनो बीत भरिक, कोनो तोहूसँ गहींरक। जँ खेत खसले अछि तँ कते दिनसँ खसल अछि तही हिसाबसँ ने रसेबो करत। तहूमे पृथ्वीक रस तँ आरो एकभग्गु छै। भोलाक मनमे लगले उठलनि जे जखन बेचारा पूछए आएल सेहो ओहिना नै देखबो करैए। तखन किछु नै कहिऐ से केहेन हएत। किछु कहैले ठोर चटपटेलनि मुदा मनमे उठि गेलनि जे कोन खादक नाओं कहबै। ओहोमे तँ करामतिये अछि। एक्के खादमे कथूक मात्रा बेसी रहै छै तँ कथूक कम। मन अकछए लगलनि जे अनेरे अपनो काज बरदा मगजमारी कऽ रहल छी। मुदा धाँइ दऽ किछु कहियो देब केहेन हएत। मन घुमलनि अपन जबाब अपने उठलनि जे काज बरदाइए आ कि दोसर काज ठाढ़ करैए। असथिर मन होइते पोखरिक पानिमे जहिना हवा पाबि हिलकोर लगैए तहिना हिलकोर उठलनि। प्रकृतिक हिसावसँ मौसम बनै-बदलैत अछि। फसिलक अपन गति छै। तइठाम क्षेत्र-क्षेत्रक मिलान नै हएत तँ उपजाक कते भरोस कएल जाएत। दुनियाँ घर अंगना बनि गेल अछि दुरसक बात बेसी बूझै छी आ घरक बात बुझिते ने छी। गहुमेक बाउगक समए इलाका-इलाकामे अलग-अलग तिथिसँ होइत अछि, तेकरा केना बूझब। अपन बात सहजे शीतगृहमे रखि देने छी नइ तँ जयंती बाबड़ीमे थोड़े बन्हाएत। मन थीर होइते भोला बाजल- “कपले, पढ़ल-लिखल जेहेन छी से तहूँ जनिते छह, आब तोरो उमेर कम नहिये भेलह। खेती करै छी पुछलह तँ कहै छिअह। चारि किलो डी.ए.पी. तीन किलो पोटाश, कीटनाशक संग खेतमे मिला दिहक। नवका किश्मक बीआ छेबे करह सवा-हाथ, डेढ़-हाथपर रोपिहह।” ~ दूरी जहिना समैपर काज भेने, भोजन आ अराम भेने, मनमे हलचल कम उठैत तहिना नै भेने बेसी उठैत अछि। लोहोक मशीन नियमित चलने अपन जिनगीक गारंटी करैत अछि तहिना मनुष्योकेँ गारंटीक सीमा भरिसक हेबे करतै। नियमित जिनगीमे चलैत चिन्तू चाहक प्रतीक्षामे बैसल रहथि। ओना चाहक संयोग नीक छलनि जे पुतोहुक बदला पत्नी हाथक चाह कएक दिनुका पछाति भेटतनि मुदा मन ओझड़ाइत रहिन जे पत्नी बिनु पुछनहि तीन दिनपर चारि बजे भोरे आबि गेलखिन। मनक ओझरीक दूटा कारण छलनि। पहिल-बिनु पछुने भाय-भौजाइ ऐठाम गेल रहथिन, जहिना गेल रहथिन तहिना बिनु बजौने चलिये आएल रहथिन। दोसर कारण रहनि जे जखन ने हम हुनका (पत्नी) भरोसे जीबै छी आ ने ओ हमरा भरोसे, तखन जँ नहिये पुछलनि तँ कि हेतै। समैसँ बहुत पहिने तँ नहिये, अपने दोसरे दिस रहथि, मुदा सइयक अन्त नै शुरूहे दिसक रहनि तँए चिन्तूक मन बेसी आगू नै बढ़ि ठमकि गेलनि। मुदा ठमकल नै रहलनि जना पछिलुके गप मोनकेँ तेना हौड़ि-हाँड़ि देलकनि जे चाहक एके चुस्की लैत दोसर ठाढ़ भऽ गेलनि। ओ ई भेलनि जे पुरुष-औरत मिलि एक जिनगी ठाढ़ करैत अछि, मुदा दुनू (माए-बाप)क बीच दूरी तँ अछिये। तखन किअए कहै छै जे एक बाप-माएक दुनू परानीक बीच जे दूरी अछि ओकरो झुठलौल जा सकैए। दू इलाका (लग-दूर) दू बोली, दू संस्कृति जिनगीक क्रिया। तइ बीच अपसियाँत होइत पोता इन्तू आबि आगूमे ठाढ़ भऽ गेलनि। इन्तूक ड्यूटी छलै भिनसुरका चाह बाबाकेँ पहुँचाएब। चाह पहुँचा पत्नी अटकली नै तइ बीच इन्तू आबि गेल। बाबा चिन्तूकेँ अनुकूल बनबैत इन्तू बाजल- “बाबा हौ, मन बड़ खुशी देखै छिअह?” लत्तिये जकाँ बातो लतड़ै छै। साङह लगबैत चिन्तू पुछलखिन- “से तूँ केना बुझै छीही?” इन्तू टपकि खसल- “दादीयोकेँ हँसैत जाइत देखने छेलियह।” ~ पुरनी भौजी बीस दिन बरिसाइत भेनौं धुर-झाड़ आम पाकब शुरू नै भेल अछि। बिनु बरखाक गरै जकाँ मेघक रूखि पकड़लक। दसो पोता-पोतीकेँ नेने पुरनी भौजी रोहनिया आमक झमटगरहा गाछ लग बैस दसोकेँ कहलखिन- “जे पहिने पाओत से मीरा, जे दोसर पाओत से दोहल, जे तेसर पाओत से तेहल आ जे चारिम पाओत से चौहल।” पुरनी भौजीकेँ तीनटा बेटा छन्हि। बिनु गहबर गेनौं पोती-पोतीक ढवाहि लागल छन्हि। बच्चा देखि माएक ममता तँ स्वाभाविक अछि। बाप तँ भरि दिन बोनाएले रहै छथि। दस बर्खक पोता जे मिड्ल स्कूलमे पढ़ैए; टेटियाह सुग्गा जकाँ टाहि मारलक- “मीरा माने कि भेल?” बिहाड़ि तँ बिड़हा गेल मुदा हवाक सिहकी उठल। ढेनुआर जकाँ धऽ कऽ भरभड़ा गेल। के पहिने पौलक तेकर ठेकाने ने रहल। ~ छूटि गेल तृतीयाक साँझ भगवती स्थानमे दऽ सावित्री बाबा लग आबि फुदकैत बाजल- “बाबा, एकटा बात बुझलौं हेँ?” मद भरल पोतीक बात सुनि आगू सुनैक आशामे आस काशीनाथ ओइ संगीत प्रेमी जकाँ जे एकक पछाति दोसरो सुनए चाहैत, मुँह बाबि पोती दिस देखए लगलाह। मुँह रोकि सावित्री महराइक पलगाँ जकाँ प्रतिक्षा करए लगली। काशीनाथक मन फड़फड़ेलनि जे भरिसक चुप्पा-चुप, धुप्पा-धुप खेल ने भऽ गेल। हमरा उठलेसँ काज तँ हमरा बैसलेसँ काज। सावित्रीकेँ काशीनाथ पुछलखिन- “की सुनलौं?” “अबै छलौं ते अहाँ दे लोक सभ बजै छलाह जे ओ आब ककरो नै गरिअबै छथिन!” गाइरिक नाओं सुनि सावित्रीकेँ अनुकूल बनबैत काशीनाथ बजलाह- “बुच्ची, कतेकेँ गरिआएब। अपने मुँह दुखा जाइए। छोड़ि देलिऐ तँए छूटि गेल।” ~ काल्हि दिन हमरा गामक पजरे पाभरि हटल कटहरबा गाम छै। हमरा गाम जकाँ बरहवर्णा तँ नै मुदा तैयो दू सय घरसँ उपरेक छै। तीनिये-चारि जातिक बस्ती। समांगक पातर रहने परदेश नै जाइ छी। अधपुरान साइकिलपर मसल्लाक (मिरचाइ, हरदी, धनिया, लहसुन इत्यादि) कारवार करै छी। हमर मेन मारकेट कटहरबे छी। पनरह-बीस घरक पाहि लगौने छी, सभ दिन हरियरिये रहैए। बनियाँ जाति वाकी दुनियाँसँ कोनो मतलब नै। पैछला सालक भोट दिन कि भेलै से अखनो ने बुझै छी। एतबे देखै छी जे दुनू गामक बीच खूब मारि भेल। दुनू गामक लोक झोरा लऽ लऽ कोट-कचहरी करैए। चाहे जेकर गोटी लाल होय आकि कारी, हमरा कोन मतलब। छगुन्तामे पड़ल छी जे मारि केलक कोय रोजी-रोटी हमर केना छीना गेल। एकठाम रहितो दुनू गामक आबा-जाही किअए बन्न भऽ गेल? अपना खेत-पथार अछि जे अपने आगिये-पानिये निमहब! तइ बीच पत्नी आबि बजलीह- “एना सोग-पीड़ामे परिवार चलत?” “काल्हि दिन केना चलत सएह तँ अपनो िवचारै छी!” ~ अप्पन हारि मनकेँ कतबो अपना दिससँ बहटारए चाहै छी तैयो कुकुड़ जकाँ दुआर-दरबज्जा छोड़बे ने करैए। छोड़बो केना करत? कोनो कि आइयेक संगी छी आकि जहिये पशु-पक्षी दिस तकलौं तहियेसँ ने ओहो संग लगि परिवारमे सटि गेल। अपन दुरागमन भेल। आने सभ जकाँ अपनो बूझि पड़ए लगल जे सौंसे दुनियाँ दुलहनियेसँ भरल अछि। तहिना पत्नियोक आँखि हमरा छोड़ि किछु देखबे ने करनि। थोपड़ी की कोनो एक्के हाथे बजैए। ओइले तँ दुनू हाथ चाही। से भेबो कएल। बूझि पड़ए जे सौंसे दुनियाँ फूसि आ दुइये प्राणी सत् छी। एहन स्थितिमे मेल-मिलानक कथे की। कान्हीसँ विचार धड़िक। जहिना दुनू कसमकस पार्टीक बीच फैसला उचित होइत तहिना भगवान निसाफो केलनि। तइसँ फलो नीक भेटल। जौआँ बेटा भेल। जँ दुनू दू रहैत तँ बेइमानियो होइतै से एक्के रहए। खुशी तँ दुनू प्राणीकेँ भेल मुदा दू दिशामे। अपना मनमे हुअए जे हे भगवान दसो साल जँ एहेन उपजा देलह तँ गाममे बीस भऽ जाएब। तरे-तर माघक खेसारी जकाँ मन गदगदाएल। मुदा पार्टनरक विचार दोसरे रहनि। एकहरी बच्चाक होन्हहारी-दर्द दोहराएल रहनि तँए पाण्डु रोग जकाँ पीड़ी पकड़ने। चारि-पाँच मासक पछाति फेर दुनियाँ िदस दुनू पार्टनर तकलौं। मुदा विचारमे खट-पट हुअए लगल। खट-पट एते बढ़ि गेल जे एक-एक बेटा बाँटि दुनू दू दिस भऽ गेलौं। तीन बर्ख भऽ रहल अछि। पत्निक हिस्साक बच्चा फूल सन लहलह करैए। वएह अपन दहिना हाथक चटकन दिन-राति खाइए। कोन दुरमतिया कपारपर चढ़ि गेल जे औझका थापर एहेन लागि गेलै जे मुँहेँ भरे माटिपर खसल। अपन कोखिक कनैत बच्चाकेँ देखि पत्नी गड़ियबैत बजलीह- “पुरुख नै पुरुखक झड़ छी।” सुनि क्रोध नै उठल। जना मनक सभ ताप-संताप मेटा गेल हुअए। लजाएल आँखि, आँखिपर देलियनि तँ बूझि पड़ल जे झपटि लेतीह। मुदा जहिना रौद पानिमे आ पानि रौदमे सटि नव जीवन धड़ैत तहिना आब अपनो विचारै छी। ~ कनफुसकी गामेक स्कूलमे सोहनक संग दोस्ती भेल। ओना एक्के गाममे कनिये हटि कऽ दुनू गोरेक घरो अछि मुदा आने गाम जकाँ। तीस साल पूर्व जखन एक्के विद्यालयमे नोकरी भेटल तखन नजदीकी आएल। पाँच बर्ख पछाति अबर-जात नौत-पिहानमे बदलि गेल। दू जाति रहितो छान-बान कमल। तीस बर्ख बाद, आइ एहेन भऽ गेल जे नजरि दिससँ नजरि मिलए नै चाहैत अछि। सभ गुण मिलतो एकटा अवगुन सोहनमे शुरूहेसँ रहल जे अनका कानमे फुसफुसा विचार कऽ घुसका-फुसका दैत। जे ऐबेर बुझलौं। सेहो केना बुझलौं तँ जेकरा लग बजलाह ओ आबि जड़ि-सँ-अंत धरि कहलनि। मन तुरुछि गेल। संग केने जखन सोहन लग पहुँच पुछलियनि- “भाय, की सभ भोला भायकेँ कहलियनि हेँ?” प्रश्न सुनि जना सोहनक बीख ओइ साँप सदृश बूझि पड़ल जे हबक मारैले ककरो खेहारए लगैत, तइ बीच दोसरकेँ पाबि काटि लैत, तहिना! ने ओ किछु बजलाह आ ने दोहरा कऽ किछु पुछलियनि। ~ मुँहक बात मुँहेमे पछबारि गामबलाकेँ एहेन दशा कहियो ने भेल हेतनि जेहेन आइ बहिरा माए केलकनि? पछबारि गामक घटक बहिरापर अबैत छलाह। गाम, घर-बरक चर्च सुनि नेने छेलखिन। मन मानि गेल छलनि जे अपना जोगर कुटुमैती नीक अछि। गामक सीमानपर अबिते एक गोटेकेँ पूछि देलखिन। सभ गुणक चर्च नीके बूझि पड़लनि मुदा बहिरा नाओं सुनि मन भनभना गेलनि। मन भनभनाइते, बैलून जकाँ देहक शक्ति निकलए लगलनि। आमक गाछ देखि, निच्चामे बैस सोचए लगलाह जे आब की करब? घटकक भाँज बुझिते बहिरा माए विदा भेली। घटक लग पहुँच बाजली- “कोन गाॅ रहै छी, कतए जाएब?” घटक- “एतै एकटा लड़का उदेसे आएल छलौं मुदा लड़िकाक नउए बहिरा छिऐ। मन भटकि गेल। आब घुरि जाएब।” बहिरा माए- “जँ बेटा-बेटी खेलाइ पाछू बेहाल रहए आ माए-बापक आदेश नै सुनए, ते की बाप-माए ओकरा मारतै आकि बहिरा कहि छोड़तै?” ~ कनीटा बात कनीटा बात कत्ते नमहर भऽ जाइए ओ आब बुझै छी। पढुआ काका बेटे जकाँ बूझै छलाह। जे कहै छेलियनि आँखि मुनि विश्वास कऽ लैत छलाह। खास कऽ पाइ-कौड़ीबला काजमे कहियो दोहरा कऽ नै पुछलनि। ओइ दिन कोन दुर्मतिया चढ़ि गेल जे मुँहसँ झूठ निकलि गेल। आरो ई भेल जे पुन: ओइ बातकेँ झूठ नै कहि देलियनि। मुदा हुनका लग कोन झूठपकड़ा मशीन छन्हि जे ओ बूझि गेलाह, कहलनि- “बौआ, तहूँ तहिना?” कहि आगूमे थूक फेक देलनि। सकपकाइत कहलियनि- “की, कक्का?” मुदा पढ़ुआ काका दोहरा कऽ किछु नै बजलाह जे आब बूझि रहल छी। ~ गति-गुद्दा सोलह बर्खक पछाति सुखदेव बम्बईसँ गाम आएल। पहिलुका सुखदेवा नै जे ठोरनमड़ासँ जानल जाइत छल। ओ सुखदेव जे बम्बईक गली-कुचीसँ नोकरी करैत सोलहम जिनगी एयर पोर्ट (शिवाजी टर्मिनल) पहुँच गेल अछि। खाली नोकरिये नै नोकरी तँ ओहनो होइत अछि जे पानि पीऔनिहार गलियो-कुचीमे रहैत अछि आ एयरो पाेर्टमे। ओ सुखदेव जे होटलक मसल्ला पीसब टा नै, काजक गति सेहो आ मानसिक गति सेहो तेज केलक। ग्रेजुएत सुखदेव, आँफिसर सुखदेव, जीप-कार-ट्रकक ड्राइवर सुखदेव। गाम अबिते सुखदेव भजिऔलक तँ भाँजपर चढ़ल जे खुशीलाले बाबा टा एहेन रहला अछि जिनकर समांग नै बहड़ेलखिन। पुरना ढर्ड़ाक लोक खुशीलाल बाबा। जिनगी ओइठामसँ देखने जइठाम पालकी, महफा, ओसारक ओहार, घरक ओहार चलैत छल। आइ कि देखै छी। मन-चित मारि अपन कुल-खनदानक जड़िमे पानि ढारैत जीब रहला अछि। जइठाम गाम हमरा छोड़ि देलक, आ हम गामकेँ छोड़ि देलिऐ, एहेन बहैत धारक त्रिवेणी मोरपर खुशीलाले बाबा टा छथि। कने जिरेलाक पछाति भेँट करबनि। तीन बजेक समय। सुखदेव खुशीलाल बाबा ऐठाम पहुँचि गोर लागि अपन परिचए देलकनि। बैसैक इशारो करथि आ सुखदेवक समाचारो सुनथि। मने-मन खुशियो होन्हि जे अही माटि-पानिक बम्बईक शिवाजी टर्मिनलमे ऑफीसर बनल अछि। जहिना साँप अपन छन्द सुनबैत-सुनबैत पड़ा गेल मुदा गड़ूल देखबे ने केलनि। तहिना खुशीलाल बाबा सुखदेवक समाचारमे हरा गेलाह। बजैत-बजैत सुखदेवकेँ बूझि पड़ल जे भरिसक हम अपने खिस्सा सुनबए एलियनि। विचार रोकि पुछलखिन- “बाबा, अपना दिसक कि हाल-चाल अछि?” जहिना पुरना संगी पाबि हृदय खोलि सभ गप करैत तहिना खुशीलाल बाबा बजलाह- “बौआ, ऐठामक गिरहस्तकेँ कोनो गति-गुद्दा अछि। धार माटि दुइर कऽ देलक। कोसी-नहर ठीकेदार खा गेल। मौनसूनी बर्खाकेँ रौदी खा गेल। की कहबह।” ~ बिसवास पनरह दिनसँ परेशान डॉक्टर परमेश्वर ओना माझिल भाय-भागेश्वरक पेटक ऑपरेशनसँ परसुए पलखति पौलनि मुदा अपन अस्त–व्यस्त जीवनकेँ पटरीपर अनैमे दू-दिन सेहो लगिये गेलनि। पटरीपर अनैक मतलब भेल निश्चित समैपर िनर्धारित काज करब। साँझक सात बजैत। चाह पीब सिगरेट सुनगा पहिलुक दमक धुआँ मुँहसँ फेकिते रहथि कि मनमे उठलनि, ऑपरेशन करैबलामे हमरो लोक जनैए मुदा अपना ऑपरेशनमे भाय-सहाएबक मन किअए ने मानलकनि। जखन अपने घरक समांग बिसवास नै करत तखन दुनियाँक अशे की? मुदा मझिलो भैया तँ ओहन नहिये छथि जे आँखि मूनि किछु करताह। जते डाॅ. परमेश्वर इनारक पानि जकाँ डोलसँ ऊपर करथि तइसँ बेसिये पानि तलाव टुटल मोकर जकाँ मनमे भरि जान्हि। हाँइ-हाँइ तीनटा सिगरेट पीब गेलाह मुदा पश्नक उत्तरक माटि नै छूबि सकलाह। बिसवास करब..., नै करब..., मनमे ओझरी लागि गेलनि। जहिना नन्हकी काँट बुढ़-पुरानक नजरियोपर नै पड़ैत आ धिया-पुता लप दऽ निकालि लैत। तहिना डॉक्टर सहाएबकेँ अंतिम विचार मनमे अँटैक गेलनि जे भागेश्वर भैया आन थोड़े छिआ जे लाज-संकोच करब। हुनकेसँ पूछि मन थीर कऽ लेब। ओना भागेश्वरक आदति छन्हि जे सोझमे पड़ैत पूछि दैत छथिन जे भैया कि काका आकि बौआ, की हाल-चाल अछि। तँए जखने पुछताह कि टटके प्रश्न पूछि देबनि। आराम करैत भागेश्वर गपे केनिहारक प्रतिक्षा करैत रहथि। डाॅ. परमेश्वरकेँ लगमे देखिते पूछि बैसलाह- “बाउ, की हाल-चाल अछि?” हाल-चाल सुनिते डॉ. परमेश्वर व्याख्या करैत बजलाह- “हाल-चाल कि रहत भैया अहाँसँ िनवृत्ति भेलौं आ एकटा बात मनमे उठि कऽ ठाढ़ भऽ गेल अछि।” बिच्चेमे भागेश्वर टोकलकनि- “एते भूमिका बन्हैक कोन प्रयोजन, कोन बात?” डाॅ. परमेश्वर- “पेटक ऑपरेशनक डाॅक्टर हमहूँ, कतेको करबो केलौं, कतौ अजस नै भेल। मुदा अहाँसँ जखन पुछलौं तँ दोसरकेँ किअए पसिन केलिऐ?” भागेश्वर- “बौआ, अहाँ साधारण श्रेणीक नै छी जे किछु कहि देब। दू रूपमे ज्ञान काज करै छै। गुण आ िनर्गुण। अहाँ छोट भाए छी, जखन पेट कटितौं तखन छाती दहैलियो सकै छलए। मुदा देखैक जे भार देलौं से अही दुआरे जे अपन जेठ भाय बूझि नीकसँ तकतियान करितौं।” ~ कचहरिया-भाय कचहरिया-भायकेँ देखिते नीरस बाजल- “भाय, ओहूँकेँ कचहरिया उत्तरी भरिसक नहिये उतरत?” कचहरिया भाय आ नीरस लंगोटिया संगी। भरिसक नै साल, तँ महिने, नै महीना तँ दिने, नै दिन तँ घंटे-मिनट नीरसे पैघ हेतनि। जिनका जन्म–टिप्पणि लिखाएल हेतनि तिनका ने जिनका नै लिखाएल हेतनि ओ तँ अपने टीपत। कचहरिया-भाय बच्चेसँ चंगला से नीरसमे कम छल। जहिना बगुला पोखरिक वा पानिक किनछरि धड़ैत तहिना एकठाम रैन-बसेरा रहितो कचहरिया-भाय कचहरीक लाट पकड़ि लेलक। नीरसक प्रश्न कचहरिया भाइक मन हौड़ि देलक। दुनियाँ बड़ीटा छै, झूठ-सच चलिते रहतै। चलबो केना नै करतै? कोनो की अन्हार इजोत एक दिना छी जे ओरा जाएत। तखन तँ भेल जतए छी ततए कुहेसकेँ भगा कऽ राखी। तहूमे नीरस लंगोटिया भैयारी छी, कोन दिनक कोन गप एहेन हएत जे नै बूझल हेतइ। रसे-रसे मनकेँ सोझ करैत बाजल- “बौआ नीरस, रहल तँ रस, नै तँ बेरस। आब अपना सभ अंतिम घाटक घटवार भेलौं। भगवान तोरा सन बेटा सभकेँ देथुन जे कन्हाक भार उतारि अपना कन्हापर लऽ लेलक।” आगूक बात बजैले कचहरिया भाइक ठोर पटपटाइते रहै आकि बीचेमे नीरस टोकि देलक- “अहाँक बेटा की दब छथि?” जना कचहरिया भाइक छाती चहकि गेलनि। फुटल कसताराक दही जकाँ मुँहसँ निकललनि- “रसगुल्ला रसक चहटि शुरूहेसँ लगि गेल जे अपनो बुझै छी। हलवाइक कुकुड़ जकाँ एक्कोटा रुइयाँ देहमे नै अछि मुदा चहटियो तँ चुहटि कऽ चोहटबे करत।” बाल-बोध जकाँ नीरस मनकेँ फुसलबैत-बहलबैत बाजल- “अच्छा भाय, एकटा कहू जे जुआनी आ बुढ़ाड़ीमे की बूझि पड़ैए?” सह पबैत कचहरिया भाय भगैतक पलगाँइ जकाँ बाजल- “गेल रे जुआनी फेर कतए पएब।” नहलापर गुलाम फेकैत नीरस भाय बाजल- “कृपा पाबि कियो मूकसँ वाचाल बनैए तँ कियो वाचालसँ मूक!” कहि मुड़ी डोलबैत दुनू गोरे जिनगीक कुन्ज भवनमे घुमए लगलाह। ~ गुहारि कमला कातक नवटोलीक गहबर बड़ जगताजोर। सएह सुनि अपनो गुहारि करबैक विचार भेल। भाँज लगेलौं तँ पता चलल जे तीनू वेरागन-सोम, बुध आ शुक्र- भगता भाउ खेलाइ छथि मुदा शुक्र दिनकेँ तँ साक्षात् कालियेक आवाहन रहै छन्हि। मन थिर भेल। डाली लगबए पड़ै छै तँए ओरियौनक विचार भेल। मन भेल जे पत्नीकेँ डाली ओरयौनक भार दियनि। मुदा बोलकेँ रोकि विचार कहलक- “देवालयक काज छी, एकोरत्ती कुभाँज भेने गुहारियो उनटे हएत। डालीक बौस बाजरसँ कीनए पड़त। मुदा सस्त दुआरे जनिजाति उनटा-पुनटा बौस कीन लेतीह।” मन उनटि गेल। अपने हाथे किनैक िनर्णए केलौं। बाजार पहुँच फूल काढ़ल सीकीक रँगर डालीक संग बेसिये दाम दऽ दऽ नीक-नीक बौस कीनलौं। मन पड़ल जे भरि दिन उपास करए पड़त। चाहो तक नै पीब सकै छी। जँ पीबैओक मन हएत तँ गोसाँइ उगैसँ पहिने भलहिं पीब लेब। तनावसँ भरि दिन मन उदीग्न रहैए। ने काज करैक मन होइए आ ने कियो सोहाइए। एहेन तनाव दुिनयाँमे ककरो भरिसके हेतै। कोन जालमे पड़ि गेल छी। तहूमे एकटा रहए तब ने। जालक-जाल लागल अछि। जमीन-जत्थाक जाल, जन-जाल, मन-जाल, तन-जाल, शब्द-जाल, अर्थ-जाल, विचार-जाल, वाक्-जाल नै जानि कते जाल बनौनिहार कते जाल बना कऽ पसारि देने अछि। एक तँ ओहिना इचना माछ जकाँ लटपटाएल छी तइपरसँ जालक-जाल। गैंचीक नजरि तँ नै जे ससरि-फसरि छछारी कटैत जान बचा सोलहन्नी जिनगी पाबि लेब। तँए नवटोलीक गहबरमे डाली लगेलौं। गुहरियाक कमी नै। अकलबेरेसँ गुहरिया पहुँच पतियानी लगा बैस गेल। गहबरक भीतर भगत बैस धियान मग्न भऽ गेलाह। गहबरसँ उदेलित भाव भगतक हृदैकेँ कम्पित करैत। गुहारि करए बाहर निकललाह। हाथमे जगरनथिया बेंतक छड़ी नेने। भगत गुहारि शुरू करैत कहलखिन- “भगत-अश्रमसँ श्रमक बाट पकड़ि चलि जाउ। आगू किछु ने हएत।” भगतक पछाति डलिवाह कहथिन- “पाछु घुिर नै ताकब। कतबो जोगिन सभ कानि-कानि किअए ने बजए मुदा घुरि नै ताकब।” हमरो नम्बर लगिचाएल। मुदा एक्के वाक् सुनि उत्सुकता ओते नहिये रहए जते नव वाक् सुनैक होइत। अनेरे मनमे तुलसीक विचार उठि गेल। कहने छथि जे जेकरा जंजाल रहै छै तेकरा ने चिन्ता होइ छै। जेकरा नै छै? तही बीच भगत सोझमे आबि गेलाह। पैछले बातकेँ दोहरबैत एकटा नव बात पुछलनि- “छुटि गेल किने?” बिनु तारतमे बजा गेल- “हँ।” विदा भेलौं। बाटमे विचारए लगलौं जे अश्रमक अर्थ कि होइ छै। मुदा कोनो अर्थे ने लागल। हारि कऽ ऐ निष्कर्षपर एलौं जे एक सोगे आएल छलौं दोसर नेने जाइ छी। गाम अबिते टोल-पड़ोसक लोक भेँट करए आबए लगलाह। सभ एक्के बात पुछथि- “की भेल?” किछु गोटेकेँ प्रश्ने बना कहलियनि- अश्रमक अर्थे ने बुझलौं। अहीं कहू। मुदा जते मुँह तते रँगक उत्तर भेटए लगल। सुनैत-सनैत मन घोर-मट्ठा भऽ गेल। पछाति जे कियो पूछथि तँ कहए लगलियनि- “जहिना छलौं तहिना छी। जहिना छलौं तहिना छी।” ~ शिवजीक डाक-बाक् चौदहो भुवन भ्रमणमे काग-भुशुंडी बौराएल रहथि कि तइ बीच शिवजीक संग गुरूओजी पहुँचलथि। सज्जा सजल शव जकाँ काग-भुशुंडी, ने गुरूएजी आ ने शिवजीए दिस तकलनि। मणिक जोहमे अपने समुद्रमे डूबकी लगबैत। दलदल पानि सदृश गुरूजी, तॅँए कोनो आनि-पीड़ा नै भेलनि। मुदा पाछु पिछड़ैत काग-भुशंुडीकेँ देखि शिवजीक क्रोध सीमा तोड़ि बहरा गेलनि। जहिना हुकड़ैत ढेनुआर गाए चुकड़ैत बच्चाकेँ देखि मलकार (पोसिनिहार) जँ नै दुहै तँ कि गाए कोकणि नै जाएत। के दोखी? शिवजीक बाक-डाक नै। काग-भुशुंडीक लेल धैन-सन। चाँकि नै देखि काग-भुशुंडीकेँ शिवजी कहलखिन- “जा रे अभगला, अजेगरोक कान कटलह।” ~ सोग आने दिन जकाँ तड़गरे प्रोफेसर लीलाधरक नीन टुटलनि। जना आन दिन नीन टूटिते ओछाइन छोड़ि टहलए विदा भऽ जाइ छलाह से आइ नै भेलनि। ओछाइन छोड़ैसँ पहिने मनमे उठि गेलनि एक्कैस मार्च। पचास बर्ख पूरि एकावनममे प्रवेश कऽ रहल छी। मनमे उठलनि जिनगीक पचास बर्ख। जँ सइये बर्खक अधार बनबै छी तैयो अधा टपि गेलौं। मुदा से केना हएत? जिनगी तँ विभाजित अछि। तँए एकक बाद दोसरमे प्रवेश आ पैछलाक नीक-अधलाक समीक्षा। मुदा हिसाबे उकड़ूमे पड़ि गेल अछि। सए बर्ख जीबे करब तेकर कोनो गारंटी अछि..। तखन अधा केना मानब। लगले नजरि नोकरी दिस बढ़लनि। जइ दिन नोकरी शुरू केने रही तइ दिन बतीस बर्खक जोड़ने रही। गुन भेल जे तीन बर्ख बढ़ि गेल। पेइतीस बर्खक नोकरी भऽ गेल जइमे पच्चीस बर्ख पूरि गेल अछि। दसे बर्ख बचल अछि। अहू पच्चीस बर्खमे आठ बर्ख ओझे-गुनी खेलक। सत्तरह बर्खक नोकरीकेँ नोकरी बुझलौं, जखन कओलेज सरकारी भेल। एकाएक बीस गुना जिनगीमे उछाल आएल। साठि हजारक नोकरी कोनो मामूली छी, जइठाम अखनो कते पेटेपर खटैए। मुदा जहिना तीआरि जालक ओझरी जे छोड़बै दुआरे लोक पूँजिओ गमा फेकिये दैत अछि। मुदा से तँ लीलाधरकेँ नै भऽ पाइब रहलनि हेँ। ओझरी जत्ते छोड़बए चाहथि तते अमती काँट जकाँ ओझराइते जाइत छलनि। तखने पत्नी ओछाइन छोड़ि, कपड़ासँ पौछैत मुँह, एेनामे देख, कटोरिया धोंधि नेने फुदकैत विजयक खुशीसँ मुस्की दैत लीलाधरक ओछाइन लग पहुँच मुँह दिस तकलनि। टक-टक आँखि तकैत लीलाधर पत्नीकेँ नै देखलनि। मनुष्य कि चिड़ै आकि कौछ छी जे अंडा दऽ पड़ा जाए। पड़ाएल कि पड़ाओल गेल एे प्रश्नमे लीलाधर ओझराएल। टकटकी देखि पत्नी डरि गेलीह। मुदा तैयो अपन अर्ज निमाहैत बजली- “कथीक सोग...?” प्रो. लीलाधर- “किछु ने?” जिनगीक सोग। मरैइयो बेर तक पत्नी सिरे चढ़ि खेती, काल्हि धरि केलौं? यएह ने जे तते हित-अपेछित बना लेलौं जे सालक दस प्रतिशत कमाइ भोज-भातमे चलि जाइए। तइपर अपनो सभ दिन अनके खेबै, से केहेन हएत। मुदा सभ दिन जँ भोजे खेबै तँ विद्यापतिक हिसाब (अधा जनम हम नीन गमाओल) केँ की करब। ने किछुओ पाइ जमा कऽ राखि सकलौं आ जेहो केलौं ओ दस बर्ख बादे भेटत। की तीनू बच्चाकेँ आगूक शिक्षा दऽ पाएब। ~ पनचैती परसूसँ सौंसे गाम यएह चरचा जे ई पनचैती केना हएत। एक दिस सोनेलाल बाबा आ दाेसर दिस विधायक जीक प्रतिनिधि। तहूमे खासे मसियौत सेहो छियनि। विधायकजी भिन्ने गजुआइत जे एक जातिक वोट प्रभावित हएत। मुदा अपनो आदमी तँ किछु नै कहत सेहो बात तँ नै। नीक हएत अस्पताल धऽ ली। भेँट करए सभ एबे करत, ओतइ सँ फरिया देब। सोनेलाल बाबाक दियाद-वाद, जाति-समाज इन्दिरा अावासक भाँजमे। तँए या तँ गबदी मािर देत या तँ सोझा एबे ने करत। पुतोहूक दुआरे बेटोसँ मिलान नहिये जकाँ। मुदा बिना फड़िओने तँ टुटल गाड़ीक पहिया जकाँ गेबे करत। ‘काँकोड़-रोटी।’ चेहरासँ सोनेलाल बाबा अस्सी बर्खक बूझि पड़ै छथि मुदा छथि छियासठिये बर्खक। जरल मनमे आगि उठलनि। तीन साल पहिने इन्दिरा आवास वएह प्रतिनिधि विधायक जीक सोझमे गछलखिन। सोनेलाल बाबा तही दिनसँ बौआइ छथि। मुदा अखन धरि नै भेटलनि। बेचाराक मनक धधड़ा ओइ दिन भभकि उठल जइ दिन सोनेलाल बाबा पुछलखिन- “नेताजी, दौगैत-दौगैत टाँग टूटि गेल। आबो कहू?” प्रतिनिधि- “आइक युगमे बिना खुऔने-पीऔने काज चलै छै?” सोनेलाल बाबा- “ई बात ओइ दिन किअए ने कहलौं जइ दिन हमरो हाथमे भोट छल।” “अखन एते छुट्टी नइए, दोसर दिन बात करब।” पगलाएल सोनेलाल बाबा कि केलनि से अपनो नै बुझलखिन। ~ कचोट आजादीक चौसठिम वर्षगाँठ मनबए खुशीक समुद्रमे आबाल-वृद्ध डुमल। चौदह अगस्तक निसभेर राति। अचानक पत्नीक छातीमे टनक उठलनि। दू बजैत। बारहे बजे रातिसँ जहाँ-तहाँ रबासि-फटाका फुटैत। अधिक धिया-पुता भेने बेसीकाल घरवाली खन-खनाएले रहै छथि। अपनो अभ्यस्त भऽ गेल छी। जइसँ ने डाॅक्टर ओइठाम जाइमे अबूह लगैए आ ने लसुन-तेला बना मािलस करैमे। घरक अनिवार्य खर्चमे दवाइयो-दारू आबि गेल अछि। तँए कखनो मनमे चिन्ता-फिकिर नहिये जकाँ रहैए। एक तँ सौन-भादबक अन्हार, तइपर मेघडम्बर जकाँ मेघौन। एत्ती रातिमे की करब? ने गाममे डाक्टर छथि जे लालटेनो हाथे बजा अनबनि, थाल-खिचारक रस्ता, चारि किलोमीटरपर डाॅक्टरक घर। जहिना कोनो फनिगा मकड़जालमे फँसि छटपटाइत तहिना मन छटपटाए लगल। मन पड़ल दुनू प्राणीक जिनगी। समाजमे अपना सन कते जोड़ा अछि जे दोहरा कऽ सिनूर भरने हएत। जीता-जिनगी विश्वासघाती नै बनब। जे बनि पड़त तइमे पाछू नै हटब। उत्साह जगल। घरक जते टँगर रही सेवामे जुटि गेलौं। कियो तेलक मालिस तँ कियो सुखले ऐँठुआ ससार करए लगलनि। अपने रिक्सा भजियबए विदा भेलौं। मझिली बेटी माएक आंगुर फोड़ि-फोड़ि रोग जाँचए लगलि। जहिना थर्मामीटर लगा डाॅक्टर बोखारक जाँच करैत तहिना ने मलकारो मालक पाउज गनि रोगक जाँच करैए। तीन बजे भोरमे रिक्सा नेने पहुँचलौं। माएकेँ उठा बेटा-बेटी रिक्सापर चढ़ौलक। जेठका बेटाकेँ संग केने डॉक्टर ओइठाम विदा होइत तेसर बेटाकेँ कहलिऐ- “बौआ दिनेश, माल-जालक तकतान करब।” गामेक मिड्ल स्कूलक पाँचमा क्लाशमे पढ़ैत दिनेश। फस्ट करैए। शिक्षककेँ जहिना गुरूक आदर करैए तहिना अपनो दुनू बेकतीक लेल श्रवणे-कुमार छी। साढ़े एगारह बजे घुमि कऽ एलौं। एक तँ रौद तइपर कठगुमारी। पियासे मन तबधल। दरबज्जापर रिक्सा देखिते दिनेश लोटामे पानि नेने पहुँचल। लोटाक पानि देखि हृदए उमड़ि गेल। अनायास मुँहसँ निकलल- “बौआ, इस्कूल...।” अखन धरि दिनेश बिसरि गेल छल पनरह अगस्त, स्वतंत्रता दिवस। बिसरि गेल छल झंडाक संग मिल चलब, बिसरि गेल छल नव वर्षक उपहार। दिनेश बाजल- नै, केना जेतौं।” मनमे असहनीय कचोट भेल। मुदा बात बहलबैत बजलौं- “बौआ, एहेन फेड़ा जिनगीमे कहियो ने भेल छल। मुदा सभ शुभ-शुभ सम्पन्न भेल।” ~ अजाति गुरु काका, बड़का काका, पढ़ुआ काका, लाल काका, भैया काका, दोस काका, संगी काका सभ एकठाम बैस रघुनाथक गप चलौलनि। गुरु काका बजलाह- “शेतानक चरखी अछि रघुनत्था।” सह मारैत बड़का काका कहलखिन- “एहेन छुतहर एकोटा ने कुल-खनदानमे भेल।” एकमुहरी गप देखि दोस काका बजलाह- “एना गौं-गौं केने नै हएत? किछु स्पष्ट विचार करए पड़त।” अपन भार हटबैत पढ़ुआ काका टपकि गेलाह- “भने दोसक विचार छै। लाल भाय अहीं अपन िनर्णए सुना दिऔ।” गंभीर होइत लाल काका फैसला देलखिन- “रघुनाथ अजाति भऽ गेल।” ~ पटोर किशोरी ऐठाम बिआहक काज तेतरी सोहो देखलक। पक्का पति-भक्त तेतरी। राति-दिन पतिक विचारक सेवा हृदैसँ करैत। रंग-रंगक पटोर साड़ी पहिरल देखि लाड़-झाड़ करैत पति-गुलेतीकेँ तेतरी कहलक- “हमरो पटोर साड़ी कीन दिअ?” अनुकूल रखै दुआरे गुलेती अनुकूल शब्दक सहारा लैत सोचए लगल जे जहिना अन्हार घर साँपे-साँप होइ छै तहिना ने दुनू बेकती छी। रंगक चमकी देखि ओ (तेतरी) लटुआएल अछि आ अनुकूलक अपने लटुआएल छी। मुदा छी तँ दुनू एक्के रंग। जखन एक्के रंग छी तखन बीचमे बाधा कथीक। जेहने अपने पटोर साड़ीक सम्बन्धमे जननिहार, किनिनिहार छी तेहने ने ओहो अछि। तखन तँ भेल जे, की परसै छी, तँ फूसि। तहन कनी लगा कऽ देबइ। ओना अपन आँट-पेट देखि गुलेती सहमल नै। बुझलक जे जहिना गुलेतीक शिकार तहिना ने मुँहक शिकार होइए। दुनूक सोल्हैनी गारंटी थोड़े अछि। तहूमे चोबिसो घंटा संग रहनिहारि नारीक नश-नश नै बुझी तँ ई केकर दोख। जहिना कलीसँ गुलाब छिटैक छिटकए लगैत तहिना चौवन्निया मुस्की छिटकबैत गुलेती बाजल- “केहेन पटोर लेब?” जहिना स्वर्गक आशामे लोक, सभ किछु दान करैले तैयार रहैत अछि तहिना पटोरक आशामे तेतरी भेल। हजारोक भीड़मे जहिना प्रेमी प्रेमीकेँ पकड़ि सटि जाइत, तहिना गुलेतीक हृदैमे तेतरी सटि गेल। गोदीक बच्चाक सुतैक भार जहिना गोद लैत तहिना एेलिसाएल तेतरी बाजल- “जेहने किशोरीक अंगनामे देखलिऐ।” “एक्के रंगक देखलिऐ?” “नै, सभ रंगक रहै।” एकटा संगी रहने ने लोक हराइए जौं तइसँ बेसी होइ तँ केना हराएत? जेतै हराए लगत ततै संगी भेट जेतै। पत्नीकेँ हराइत देखि गुलेती बाजल- “अहाँक विचार नै मानब तँ दुनियाँमे केकर विचार मानै बला अछि। अहाँकेँ हाथ पकड़ि अनने छी तहन विचार केना नै मानब। अहाँक मांग मानि लेलौं। कागजमे लिख लेलौं। जइ दिन बजार जाएब तइ दिन किनने आएब। खाली बजार जाइ घड़ी पुरजी मोन पाड़ि देब अहाँ। अच्छा एकटा बात बूझल अछि, ओ साड़ी (पटोरबला) एक्के बेर पहिरला बाद खिंचल जाइ छै से। से सभ दिन कतए खिंचबै?” साड़ी खिंचब सूनि तेतरीक विचार ठमकि गेल। बाजलि- “तखन ऐबेर छोड़ि दिऔ। आगू साल अगते कीन देब।” भार घुसकैत गुलेती दुनू जाँघपर हाथक शान पिजबैत बाजल- “कहू तँ भला, अच्छा अहीं माेन पाड़ि दिअ जे एतेक उमेरमे अहाँक कोन गप कहिया कटलौं?” केकरो गप अपने टूटि जाइ छै तँ ऐमे केकर दोख। हँ तखन ई बात जरूर भेल अछि जे गामक चालि बदलल! पहिने गाममे चोरकेँ अबिते जएह देखलक सएह चोर-चोर हल्ला करए लगैत छल मुदा अर्थक चक्का तेहेन दिशा पकड़ि लेलक जे सामाजिकता तहस-नहस भऽ गेल अछि। जहिना राम-रावणक बीचक जे तीर चलए आ दस-दस बीस-बीस गर्दनि कटि हवामे उधियाइत एकठाम भऽ सटि जाइत तेहने ने भऽ रहल अछि। (ई कथा, “पटोर” मनोज कुमार कर्ण उर्फ मुन्नाजी लेल...) ~ फुसियाह सुभितगर समए भेने अनुकूल काजक वृद्धि जिनगीकेँ आगू मुँहेँ ओहिना ससारैत अछि जहिना प्रतिकूल भेने विपरीत दिशामे पाछू मुँहेँ ससारैत अछि। मुदा किछु भेद तँ भइये जाइत अछि। ओ छी कम-बेशीक गणित। साँझक आठ बजैत। ओना माघक आठ राति कहबैत अछि मुदा से नै साओन-भादोक आठ साँझे कहबैए। आठ घंटा दमकल चला घरपर आबि कमलदेव गद्गदाएल मने पत्नी-सुचित्राकेँ कहलनि- “पहिने चाह पिआउ, पछाति एकटा गप कहब?” जहिना कर्मकेँ वचन सदति दबैत रहैत अछि तहिना सुचित्रा चाह बनबैसँ पहिने हठ करैत बजलीह- “सुनल रहत तँ चाहो बनबै बेर विचारब, ओना खट-खुट मन केने कहीं चाहो ने दुइर भऽ जाए।” पत्नीक बात सुनि कमलदेव सोचमे पड़ि गेलाह। शुभ काजमे अशुभ बात ओहन करामात कऽ दैत जहिना एकटा छिक्का हाइ-कोर्टक फैसला उनटा-पुनटा दैत अछि। हो ने हो कहीं अही गपक धूनिमे चाहक धूनि बिसरि जाथि। तखन तँ दिन-भरिक मेहनति तँ मेहनते रहि जाएत, बजला- “अनेरे कोन झूठ-फुसिक फेरिमे पड़ै छी पहिने चाह पिआउ, तखन दुनियाँ-दारीक गप-सप हेतइ।” मुस्की दैत सुचित्रा उत्तर देलनि- “तँए ने पहिने घर-परिवारक काज निबटा लिअ चाहै छी। अहीं सन पुरुख हम थोड़े छी जे भरि दिन छाती भरे खटै छी आ गामक लोक फुसियाहा कहैए।” पत्नीक बात सुनि कमलदेवक मनमे झोंक एलनि। जहिना गुम हवामे सूर्यक ताप अपन करामात करैत तहिना एक तँ कमलदेवक मनमे चाहक झोंक चढ़ल तइपरसँ पत्नीक मुँहेँ फुसियाह सुनि झोंक तेज भऽ गेलनि, बजलाह- “ने अहाँ कहने कटहर हएत आ ने गौआँ कहने बरहर हएत। कटहर कटहरे रहतै, बरहर बरहरे रहतै। एक रंग आँठी-कमड़ी भेनहि की हएत?” पतिक विचारकेँ अांकैत सुचित्रा बजलीह- “अहाँ तमसा गेलौं। तमसाउ नै। लोक जे अहाँकेँ फुसियाह कहैए तेकर कारण अछि जे काजक हिसाबसँ समए नै दइ छिऐ, घड़ीक हिसावसँ समए दऽ दइ छिऐ।” पत्नीक विचारकेँ आंकैत कमलदेव दोहड़बैत बाजला- “कनी फरिछा कऽ कहियौ?” सुचित्रा- “केकरो खेत पटबैक जे समए दइ छिऐ ओ खेतक हिसाबसँ समए दिऔ। काजक समए दोसर होइ छै आ घड़ीक समए दोसर।” ~ गति-मुक्ति सज्जासनसँ उठि आँखि मीड़िते बाबा रमचेबलाकेँ उठबैत कहलखिन- “रे रमचेलबा, दिन-रातिकेँ लोक एकबट्ट करैक भाँजमे अछि आ तूँ ढेंग जकाँ पड़ले रहमे?” आँखिक काँच-सूखल काँची पोछैत रमचेलबा ओछाइनेपर सँ बाजल- “जे कहै छह से तँ कइये दइ छिअ। तखन ढेंग किअए कहै छह?” जाधरि बाबा नहलापर गुलाम फेंकितथि ताधरि ओछाइनपरसँ उठि रमचेलबा लगमे पहुँच गेलनि। बाबा कहलखिन- “रे तों ते हमर ने कऽ दइ छेँ, तइसँ थोड़े हेतौ।” मुँह बाँबि जहिना चूजा अहार मंगैत तहिना रमचेलबा पुछलकनि- “तब?” रमचेलबाक जिज्ञासा देखि बाबा कहलखिन- “अपना ले कर।” बाबाक पक्का चेला रमचेलबा। एक पाइ बाम-बुच नै। मुड़ी डोलबैत बाजल- “अच्छा, गिरह बान्हि लेलियह। मुदा ढेंग किअए कहलह?” रमचेलबाकेँ मानै जोकर भाषामे बाबा कहलखिन- “देख, जाबे गाछक शील काटि कऽ राखल रहै छै ताबे ढंेग कहबै छै। ओकरे जखन आड़ा-मशीनपर लऽ जा तख्ता चीड़ा नाव बना पानिमे दौड़बै छै तखन ओहो अपन भरि पेट आदमीकेँ धारमे झिलहोरि खेलैत पार करै छै। मुदा एकटा बात कहि दइ छियौ, जे जे पुछबाक होउ से पूछि ले, किअए तँ एको मिशिया जीवैक मन नै होइए।” पाछू उनटि रमचेलबा तकलक तँ बूझि पड़लै जे जाबे जीवैक लूरि नइए ताबे जीवै केना छी। तहूमे बाबाक संगे। मुदा बूढ़-पुरानक बिसवासे कत्ते जँ कहीं टटके आँखि मूनि देलनि तखन तँ अपनो मनमे आ हुनको मन लगले रहि जेतनि। पुछलकनि- “बाबा हौ, गति-मुक्ति केकरा कहै छै?” रमचेलबाक प्रश्न सुनि बाबा विह्वल भऽ गेलाह। भावावेषमे कहए लगलखिन- “चौबीसो घंटा जँ समए संग मनोनुकूल जिनगी जीबए लगी, यहए भेल गति-मुक्ति।” ~ चौकीदारी तीन दिन झंझारपुर-मधुबनी दौड़-बरहा केला पछाति चौकीदार रामटहल दास पछिला आठ मासक दरमहो आ आनो-आन भत्ता उठा सात बजे गामपर माने घर पहुँचल। रस्तेसँ निआरि लेलक जे आरो जे हेतइ से पछाति हेतइ पहिने भरि पोख सूतब। तीन दिनक दौड़-बरहा कोनो लज्जति देहक रहए देलक। ने नहाइक ठेकान आ ने खाइक। ठाकुरो जीकेँ एक लोटा जल नै चढ़ा सकलौं। खैर जे हौ, जे पुत हरबाही गेल देव-पितर सभसँ गेल। मुदा ओछाइनपर पहुँचैसँ पहिने जे काज अछि से तँ करए पड़त। मुँहक रोहानीसँ पत्नी परेखि नेने रहथि तँए पाँचटा तरूआ-भुजुआक ओरियानमे जुटि गेली। स्नान-धियान, तिलक-चानन, पूजा-पाठ कऽ रामटहल दास भोजन करए आँगन पहुँचल। अँगनाक चुहचुही देखि मनमे खुशी भेलै। मुदा चुहचुहीक कारण नजरिपर पड़बे ने कएल। पत्नीपर आँखि पड़िते आंकि लेल जे चुह-चुही आंगनक किरतबे नै आंगनवालीक किरतबे भेल अछि। चिक्कनि माटिक ठाँओं, नमगर-चौड़गर आसनपर बैसिते पाँचटा तरूआ, पाँचटा भुजुआक संग अचार-चटनी सजल थारी आगूमे देखलक। देखिते पत्नीसं किछु पूछैक विचार रामटहल दासकेँ भेल मुदा थारी राखि राम पिआरी सुतैक ओछाइन सरिऔनाइकेँ काजक एक नम्बर सूचीमे रखने, तँए अखन गप केना करितथि। सरकारीकरण नै भेला पूब चौकीदारी समाजक दायित्व बूझल जाइत छल। टैक्सक रूपमे चौकीदारी छोट-पैघ किसानसँ लेल जाइत छल आ पनरह रूपैआ मािसक वेतनक रूपमे देल जाइत छल। अन्हरिया सप्तमीसँ लऽ कऽ इजोरिया षष्टी धरि -पनरह दिन- गामक पहरा चौकीदार करैत छल। गाममे दूटा चौकीदार तँए एककेँ हाथमे फरसा आ दोसरकेँ हाथमे भाला रहैत छल। घरसँ निकलिते चौकीदार जोरसँ टाँहि दैत छल जइसँ गामोक लोक बूझि जाइत छल जे पहरूदार पहरा दइले निकलि रहल अछि। निन्न टुटिते बीड़ी-तमाकुलक संग कतौ माल-जालक तकतान तँ कतौ लघी-विरती शुरू भऽ जाइत छल। टोले-टोले घूमि-घूमि चौकीदार ठहकवो करैत आ जगेबो करैत। जँ कतौ चोर अभड़ैत तँ संग मिलि आगू-आगू दौगवो करैत। विल्कुल पारदर्शी कारोवार छल। ओछाइनपर पति-रामटहल दासकेँ देखिते रामपियारीक मन सिहरल। मन सिहरिते विचारक भाव बदलल। एक तँ कमासुत पति तोहूमे आठ मासक बकिऔताक गरमी। बदलल मनमे उठलनि जानक जंजाल परिवार होइए। जानकेँ अकछ-अकछ केने रहैए। एक बोल दुनू परानी गपो करब सेहो ने होइए। मन घुमलनि। तँए कि लोक मनो-मनोरथ छोड़ि देत। सहटि कऽ पति लग आबि बजली- “दरमाहा उठबैमे पाइयो-कौड़ी खरचा भेल?” पत्नीक जिज्ञासा भरल शब्द सुनि रामटहल बाजल- “जाबे बबाजी नै भेल छलौं ताबे आ अखनमे बड़ अन्तर भऽ गेल अछि। सौंसे थानाक सेक्रेटरी छी। आन-आनकेँ तँ खरचा हेबे करै छै मुदा हमरा नै होइए।” “कते भेटल?” कते भेटल सुनि रामटहल दासकेँ, जहिना सीक परक मटकूर खसिते टुकड़ी-टुकड़ी भऽ छिड़िया जाइत तहिना भेल। सुखक नीनकेँ छोड़ए नै चाहलनि। मुदा तैयो बजाइये गेलनि- “भेटत कि अल्हुआ, धैन समाज अछि जे मुँहक लाली अछि नै तँ अठ-अठ महीना पेट बान्हि के खटत। जेकरा ऊपर-झपटी छै, तेकरा ने हमरा कोन अछि।” ~ झगड़ाउ-झोटैला भोरे अर्द्धांगिनिक रग्गड़सँ ठमकि लाल काका दरबज्जाक बीचला खूँटामे ओंगठि कुही होइत मने-मन विचारैत जे औझुका िदन भंगठले अछि। जहिना यात्रा काल भंगठल इंजनक कोनो भरोस नै तहिना पत्नीक खट-पटसँ लाल काकाक मनमे सेहो होइत। औझुका दिन केहेन हएत केहेन नै तेकर कोनो ठेकान नै। अपनो किछु हुसलौं। हुसलौं की! पावर चढ़ल छलए। ओह: भोरे लोक राम-नाम लैत उठैए आ कोन दुरमतिया चढ़ि गेल से नै जानि। कोन एहेन पहाड़ टूटि खसल जाइ छलै जे भोरे अढ़ौती-अढ़ा देलियनि। निअमानुसार अपन-अपन पुरौला पछातिये ने कियो दोसर दिस देखत। तइ बीच हाथमे चाहक गिलास नेने मुसिकिआति पत्नीकेँ दू हाथ आगू अबैत देखलनि। जना कोनो कोकनल खूँटाबला घर हड़हड़ा कऽ खसैत अछि तहिना लाल काका अकाससँ खसलाह। मुदा भिनसुरका तामस सोलहो आना नै मेटाएल छलनि, तँए चाह लेल हाथ नै बढ़ौलनि। ससुराएल लोक जकाँ लाल काकाकेँ देखि लाल काकीक मनमे उठलनि जे पुरुख छिया कि पुरुखक झड़। हाथ पकड़ि कहबनि जे चाह लिअ। आगूमे ताड़क गाछ जकाँ ठाढ़ रहली। जहिना नमहर गाछक ऊपरका डारि टूटि डारि-डारिपर रूकि-रूकि कऽ निच्चा खसैत तहिना लाल कक्काक मन फेर खसलनि। थोड़े सबूर मनमे सेहो भेलनि जे दुपहरिया खेनाइ नै गड़बड़ाइत। पाछू उनटि तकलनि तँ मन पड़लनि जे एहेन-एहेन झगड़ा तँ बेसी काल होइए। मुदा खेनाइ-पीनाइमे कहाँ कहियो बाधा भेल। ओह तामसमे बिसरि गेल छलौं। पत्नीक चौअनियाँ मुस्कीक जबाबमे लाल काका अठनियाँ ठाह दैत, हाथक गिलास पकड़ैत बजलाह- “मीठगर चाह अछि कि ने?” लाल काकाकेँ मुँहमे गिलास लगबैसँ पहिने लालकाकी ठमकल रहली, मुदा मुँहसँ गिलास हटबिते, पुछलखिन- “ठाेरमे ठोर सटैए किने?” चाहक गरमी लाल काकाकेँ चढ़िते रहनि। अवसर केँ बिनु गमौने बजलाह- “दूधसँ नै चीनीसँ।” ~ घबाह ट्यूशन घिड़नीक तिनकमिया बंशीक घबाएल माछ जकाँ, बुधियार काका बीस बर्खक नोकरीक पछाति घबाएल मने अपना दिस तकलनि। घबाएल मन ऐ लेल जे प्रतियोगिता परीक्षामे बैइसै जोकर बेटा भऽ गेलनि। उचित तँ यएह ने बनैत जे वयस देखि-देखि अपन विषयक बात बेटोसँ पूछि लेब। एकर मतलब ई नै जे छौड़ाकेँ बापक पएरक जूतो आ अंगो अँटि जाइ छै। जइ दिन नोकरी शुरू केलौं, तीन मन धान महीना गौआँ मिलि दैत छलाह। राजा-रजवारक गाम नै, जे स्कूल-अस्पताल खुजत। परिवारो तहिना छल, गौआँ मुँह देखि कोनो धड़ानी गुजर करैत छलौं आ गामेक बच्चाकेँ पढ़ेबो करै छलौं। अपनो बूझि पड़ै छल आ समाजो शिक्षक बुझैत छलाह। अपने ऊपर दुरिमतिया चढ़ल कि समाजक ऊपर चढ़ल आकि सरकारक ऊपर चढ़ल से बुझबे ने करै छी। जे विद्यालय या तँ व्यक्ति-विशेषक वा सामाजिक स्तरपर चलैत छल ओकरा आगू केना बढ़ौल जाए। मूल प्रश्न छल। मुदा भेल की? खाली संस्कृते विद्यालयकेँ कहबै आकि मेडिकल, इंजीनियरिंग आदि जेनरल विद्यालयकेँ, सभटा एक्के सिरहाने पेटकुनिया लधने अछि। प्रकाशकेँ सोर पाड़ि बुधियार काका कहलखिन- “बौआ, आब तोरा ले दुनियाँक बहुत बाट खुजैक समए आबि गेलह मुदा समए एहेन बनि गेल अछि जे जते सहयोगक जरूरत तोरा पड़तह, ओते नै दऽ सकबह। अपनो जुआन भेल जाइ छह, अपनो तँ किछु सोचिते हेबह?” पिताक विचार सुनि प्रकाश बाजल- “बाबूजी, ट्यूशनक नव क्षेत्र तँ बनिते जा रहल अछि, बूझल जेतै।” प्रकाशक विचार सुनि, कनी काल गुम रहि बुधियार काका बजलाह- “बौआ, तीनटा विद्यार्थीकेँ ट्यूशन पढ़ा अपनो शिक्षक बनलौं, मुदा आब लड़कीक शिक्षा बढ़लासँ ओहो घबाह भेल जा रहल छै।” ~ दादी-माँ सत्तरि बर्खक दादी-माँकेँ अखनो वहए चुहचुही गाममे बूझि पड़ै छन्हि जे चुहचुही सासुरमे सभकेँ बूझि पड़ैत। जइ दिन रंगल वस्त्र, भरल पेट, काजर लगौल आँखिसँ गाम देखलनि ओ जीते-जी केना बिसरि जेती। ओना दादी-माँकेँ परिवारमे दू पीढ़ीसँ मुखतियारी चलि अबैत मुदा पलखतिक दुआरे ऐ बातपर नजरिये ने कहियो गेलनि। कारणो अछि जे दू तरहक जिनगी लोककेँ भेटै छै, एककेँ बनल-बनाएल दोसर टुटल-फुटल। टुटल-फुटल घरकेँ दादी-माँ सभ दिन चिकने करैमे लागल रहली तँए सासुरक सुख दिस धियाने ने गेलनि। एक तँ ओहुना जे कुरसीपर बैस जाइए ओ थोड़े बुझै छै जे कुरसीक पुवरियो पार छै आ पछवरियो पार। तँए जिनगीकेँ तीनू पार देखैक लूरि हेबाक चाही। मुदा से दादी-माँ केँ नै छन्हि परिवारक सभक धौजनि सुनैक अभ्यस्त छथि तँए आश्वासन तँ सभकेँ दइते छथिन, मुदा जे पहिने बिसरै। सत्तरि बर्खक अपनाकेँ नै बूझि दादी-माँकेँ छोड़ल केचुआ जकाँ लहलही छन्हिये। तहूमे कोरा-काँखकेँ सभ दिन बच्चा सभकेँ लैत रहली तँए किअए नै रहतनि। छह बर्ख पहिने परिवारमे एकटा गाए एलनि। जहिना मनुष्यसँ लऽ कऽ बाध-बोन धरि लक्ष्मी छिड़िआएल छथि तहिना दादी-माँ गाएकेँ बूझि सेवा करए लगलीह। थैर-गोबर अपन काजक सूचीमे लऽ लेलनि। छबे बर्खक दौड़मे आइ दसटा गाए खुट्टापर छन्हि। पहिने एकटाकेँ थैर-गोबर करैक अभ्यास छलनि अखन दस टाक भऽ गेल छन्हि, किअए मनक चुहचुही कमतनि। अोना अखन धरि सभ तूर परिवारक काजमे सटि चलै छन्हि मुदा दुनू पुतोहुओ आ भाइयोमे खट-पट हुअए लगलनि से भनक छन्हि मुदा जेकरा जे मनमे हेतै से तेहेन पाऔत, तँए धनि-सन। दुनू बेटो आ पुतोहुक बीच उठैत विवादक कारण पिता-शिवशंकर नीक जकाँ बुझैत। जइठाम लाखक विधायक, सांसद, बेपारी, ठीकेदार करोड़ कूदि अरबमे टहलि रहल अछि तइठाम मनक उछाल स्वाभाविके छै। तँए गुम्म। जहिना दृष्टिकूट विश्राम बेर होएत तहिना दादी-माँकेँ बूझि पड़लनि। पति-शिवशंकर सोझसँ गुजरिते रहथि कि दुनू बेटा, ताल ठौकैत पहुँचल। अधरस्तेपर दादी-माँ अँटकि गेलीह। शिवशंकर पुछलखिन- “तोरा दुनू भाँइक बीच एना किअए होइ छह?” पिताक प्रश्नसँ दुनू भाँइ प्रकाशो आ जोगियो एक दोसरपर दोख मढ़ए लगल। तही बीच आंगनमे सेहो दुनू पुतोहु डंका पीटए लगली। शिवशंकर बूझि गेलाह। जे अंगने आगि असमसान तक जाइ छै। भार हटबैत शिवशंकर दुनू भाँइकेँ कहलखिन- “माएसँ पूछि लहक?” अपना-अपनीकेँ प्रकाशो आ जोगियो दुनू भाँइ बाँहि पसारैत दादी-माँकेँ पुछलक- “माए, तूँ केनए?” गरमाएल साँस छोड़ैत दादी-माँ बाजल- “केम्हरो ने। अपने दिस।” शिवशंकरो आ दादियो-माँ, दुनू बेकती विचारए लगलथि जे समए एहेन दुरकाल बनि रहल अछि जे रातिक कोन बात जे दिनोकेँ सुरक्षित रहब कठिन भऽ गेल अछि, तइठाम घरेमे कुकुड़-कटौज करत तँ जानत अपने। आब कि जीबैक कोनो लीलसा अछि, कमाइ छी खाइ छी। ~ पटोटन अद्राक पहिल बरखा। मास्टर सहाएब आ बड़ाबाबू, दुनू गोटे एक्के मोटर साइकिलसँ गामसँ झंझारपुर जाइत रहथि। साते किलोमीटर झंझारपुर तँए दुनू गोटे गामेसँ जाइ अबै छथि। थानाक बड़ाबाबू नै कोर्टक बड़ाबाबू देवनन्दन आ हाइस्कूलक शिक्षक प्रेमनन्दन। ओना दुनू गोटे शहरूआसँ बेसी गमैइये छथि मुदा तैयो कलप कएल कपड़ा पहीरि कऽ ऐबे-जेबे करै छथि। पँचकोशीमे सिंहेश्वरक नाओं एकटा नीक घरहटियाक रूपमे लोक जनैत। ओना नाउऍं तँ नाआें छी, तइमे तँ कमी नै भेलनि अछि मुदा परदेशियाक कमाइ आ इन्दिरा आवासक चलैत काजमे कमी तँ भइये गेलनि अछि। उमेर बेसी भेने मनमे खुशिये होइत रहै छन्हि जे भने काज कमि रहल अछि। एक तँ परदेश भगने नव घरहटिया नै बनि रहल अछि, दोसर हमहीं सभ जे पुरना पाँच गोटे छी सएह कते सम्हारब। ब्रह्मपुर गाममे प्रवेश करिते बुन्दाबुन्दी पानि शुरू भेल। बड़ाबाबू ड्राइवरी करैत आ मास्टर सहाएब पाछूमे बैसल। बुन तँ गोटगर पड़ैत रहै मुदा कम-सम। बीत-डेढ़ बीतक दूरीपर बुन खसै तँए कपड़ा सोखनहि चलि जाइत मुदा जते आगू बढ़ैत छलाह तते पानियो बेशिआएल जाइत। बढ़ैत-बढ़ैत सिंहेश्वर घर लग अबिते अँटकि जाएब नीक बुझलनि। सड़केपर गाड़ी लगा दुनू गाेटे सिहेश्वरक दरबज्जा दिस बढ़लाह। दरबज्जा कि मालक घर। अाधा घरमे माल बन्हैत आधामे दरबज्जा बनौने। दरबज्जा कि एकटा चौकी मात्र। सिंहेश्वर अपने दरबज्जेपर। चारसँ चुबैत बुन्नकेँ निहारि-निहारि देखैत जे रौदमे फाटि गेल अछि आ कि कौआ खोदने अछि। मुदा लगले मन पड़ि गेलनि आद्रा आबि गेल, घर कहाँ छाड़लौं। तखने दुनू गोटे पहुँचलाह। चौकीपर सँ उठि सिंहेश्वर दुनू गोटेकेँ बाँहि पकड़ि चौकीपर बैसबैत अपनो बैसला। तड़तड़ौआ बरखा शुरू भेल। कलप कएल शर्टपर खढ़क चुबाटसँ दाग जकाँ हुअए लगलनि। एक तँ बेचारेकेँ अपने मनमे दुख होइत हेतनि जे केना साल खेपब तइपरसँ हमहूँ भारी बना दियनि ओ उचित नै। दागे लगत तँ कि हेतै, कोनो कि केरा-दारीमक दाग छी जे नै छूटत। मुदा बड़ाबाबूकेँ मुँहसँ बजा गेलनि- “अहाँक नाओं पँचकोसीमे अछि सिंहेश्वर भाय, मुदा अपना घरक हालत एहेन बनौने छी?” बड़ाबाबूक विचारसँ सहमत होइत सिंहेश्वर बाजल- “बड़ाबाबू, गामसँ लोककेँ भगने गाममे काज बढ़ि गेल अछि, मुदा काजक धुनि तेहेन पकड़ि लेलक जे ठेकाने ने रहल जे बरखा मास आबि गेल। आब पानि छुटैए तँ नै छाड़ल हएत तँ पटोटनो तँ दइये देबइ।” ~ मुसाइ पंडित गाममे विख्यात मुसाइ पंडित छथि। ओहन पंडित जिनकर बात मुसाइये पंडितक नाओंसँ विख्यात अछि। मध्यम् जातिक मुसाइ पंडित, माएक कोरपच्छु बेटा भेने, दौजी फड़ जकाँ तीन सालमे माए आ सात सालमे पिताक श्राद्ध केलनि। मुदा बाल-विवाहक शुभ फल भेटि गेल रहनि। पिताक श्राद्धसँ तीन मास पहिने बिआह भऽ गेलनि। जँ कहीं तीन मास पछुऐतथि तँ सिमरिया गाड़ी जकाँ मास नै कऽ पबितथि, मुदा भाग्य तँ भाग्य छी, से मुसाइ पंडितकेँ सुतरलनि। जेकरा माए-बाप रहै छै तेकरा तँ पोथी-पतरा काज दइते छैक जे बिनु-माइयो-बापबलाकेँ सुतरल। मुसाइ पंडित पिताक श्राद्धक तीन दिन पछाति ससुरकेँ अरिआतए काल पुछलनि- “बाबू, आब तँ यएह सभ ने माता-पिता भेला, हमरा कि हएत? भाय-भौजाइक हालत अपनो गाममे देखिते हेथिन।” जमाइक प्रश्न सुनि कमलाकान्त गुम्म भऽ गेलाह। मने-मन विचारए लगलाह जे बेटी-जमाइक भार उठाएब भारी होइ छै। फेर मन घुमलनि जे भगिनमान तँ कुलश्रेष्ठ होइए। मुदा लगले मन बदलि गेेलनि घी-जमाए भगिना। जहिना घरमे सिदहा नै रहने भूखक लहरि जोर मारैत छै तहिना आगूक जिनगी मुसाइकेँ जोर मारलक। दोहरबैत बाजल- “बाबू, किछु बजलखिन नै?” कमलाकान्तक मन फेर बहटलनि। पत्नीसँ पूछि लेब जरूरी अछि, मुदा से खोलि कऽ केना समधियौरमे जमाए लग बाजब। बेटोकेँ तँ पूछि लेब अछि। मुदा पुतोहु बेरमे पुछबे ने केलौं आ बेटी-जमाए बेरमे किअए पुछबै। मन बनिते बजलाह- “दुनू भाय-भौजाइकेँ बजबिऔ। आखिर माता-पिताक परोछ भेने तँ वएह सब ने माता-पिता भेलाह।” मुसाइ दुनू भाँइकेँ पुछलनि। एक तँ ओहुना लोकक घराड़ी घटल जाइ छै तइपर जँ बढ़ि जाए, ई के नै चाहत। दुनू भाँइयो आ भौजाइओ मुसाइकेँ सासुर जाइक आदेश दऽ देलक। गाए-नेरूक मिलान तँ ठेहुने-पानि दुहान। कमलाकान्त संगे चलए कहि पुछलखिन- “कपड़ो-लत्ता लेब।” मुसाइ- “हँ, हँ, जते सरधुआ कपड़ा अछि ओ जँ नै लऽ लेब तँ ऐठाम मूसे-दिवार खा जाएत।” एक तँ ओहिना मुसाइ सहलोल, तइपर सासुरक विद्यालय पहुँचि गेल। सासुमे जँ सारि-सरहोजिसँ गलथोथरिमे हािर जाएब तँ कोन डोराडोरिबला भेलौं। जहिना विषुवत रेखाक समान दूरीपर दुनूमे दिशा समान मौसम होइत तहिना अन्हार-इजोतक बीच सेहो होइत अछि। पच्चीस बर्खक अवस्थामे मुसाइ सासुरसँ मुसाइ पंडित भऽ दूटा धिया-पुता नेने गाम आबि गेलाह। जहिना फुटलो खपटाक जरूरति समए पाबि होइ छै तहिना मुसाइ पंडितक जरूरति गाममे आइ भेल। मौसमी बेमारीक जानकारी दिअ गाममे बहरबैया सभ औताह। जखने सँ मुसाइ पंडित सुनलनि तखनेसँ मटिया तेल देलहा कुत्ता जकाँ मनमे उड़ी-बीड़ी लगि गेलनि। जहिना समए िनर्धारित छल तहिना कार्यक्रम शुरू भेल। अभ्यागती सुआगत सभकेँ भेलनि। बारहो मासक मौसमी बेमारी आ ओइसँ पथ-परहेजक नीक जानकारी देलखिन। गाममे नव फल भेटल। बीचमे बैसल मुसाइ पंडित सुनैपर कम धियान देने रहथि। संगसोरमे जहिना लोक हरेलहो जगहपर गपे-गपमे पहुँचि जाइत अछि तहिना मुसाइ पंडित सेहो पहुँचि गेलाह। हड़लनि ने फुड़लनि उठि कऽ बीचमे ठाढ़ भऽ गेला। ठाढ़ होइते बैसिनिहारक आँखि पड़ै लगलनि। दुनू हाथसँ शान्ति बना रखैक इशारा दैत बजलाह- “अभ्यागत लोकनिक विचार उत्तम अछि, सभकेँ अनुकरण करैक चाहियनि।” अपन समर्थन पाबि बाहरी लोकनि आरो अगिला बात सुनैले जिज्ञासा जगौलनि। मुदा जे पहिने बाजत ओ चोर गाम-घरक खेलक मंत्र छै। तँए आँखि, कान तँ मुसाइ पंडित दिस सभ देलनि मुदा मुँह घुमौनहि रहला। मुसाइ पंडित लेल धनि सन। कहिया लोक हमर बात सुनलक आ देखलक। सुनह नै सुनह, मनक उदगार छी, बजबे करब। मुदा सइयो आँखि भीष्म–पितामह जकाँ गड़ल देखि सम्हरैत मुसाइ पंडित बजलाह- “आम-जामुन इलाकाक हाड़-पाँजर टुटब, किसानी काजमे साँप-कीड़ा काटब, हाड़मे पैसल जाड़केँ सेहो तँ देखए पड़त, ईहो तँ मौसमिये बेमारी भेल किने?” गौंआँ वक्ता बूझि जोरसँ सभ थोपड़ी बजौलक मुदा थोपड़ी सुनि मुसाइ पंडित अकवकमे पड़ि गेलाह जे लोकक थोपड़ीक अवाज की छै। हास हँसी आकि हँसी हास। ~ भरमे-सरम
बच्चामे बाबू कतबो पढ़बैक परयास केलनि मुदा हम नहिये पढ़लयनि। अपनेसँ जे कनैठी दऽ नाम-गाम सिखा देलनि ओ अखनो कानेपर रखने छी। पचासम बर्ख चलि रहल अछि। परुसाल शिक्षामित्रक उजैहिया उठलै। चौक-चौराहा, हाट-बजार, गल्ली-कुच्ची सगतरि एक्के हवा बहए लगलै। जहिना हवा पीब अधमरुओ साँप फनफना उठैत तहिना मनमे उठल। उठिते गर अँटबए लगलौं। एहेन बहैत गंगामे स्नान नै कऽ लेब तँ सभ दिन पापिये रहि जाएब। दरबज्जापर बैसल विचारिते रही आकि सुन्दर भायकेँ धड़फड़ाएल अबैत देखलियनि। हुनका देखिते अपन चिंता पड़ा गेल। दया उमड़ि गेल। बेचारे एक्को कौड़ीक आदमी नै रहलाह। आचार्यक उपाधि लैयो कऽ गोबर-माटि भेल पड़ल छथि। नोकरी नै भेलनि। लग अबिते पुछलयनि- “भाय, केम्हर-केम्हर?” चौवनिया मुस्की दैत बजलाह- “बेतरनी पार होइक लग्न आबि रहल अछि। डारि चुकल बानरक जे गति होइ छै वएह गति अवसर चुकल मनुखोकेँ होइ छै। तँए गंगामे हाथ धोइ लिअ।” धारक मोइन जकाँ विचार चकभौर लेलक। पुछलियनि- “से की?” कहलनि- “अगिला साल तत्ते शिक्षा मित्रक बहाली हएत जे एक्कोटा पढ़ल-लिखल नै बॅचत।” असमंजसमे कहलियनि- “भाय, हमरा तँ नामे-गामटा लिखल होइए।” ठाहाका मारि कहलनि- “डेर-दू हजार खर्च करू तेहेन सर्टिफिकेट आनि कऽ देब जे पहिलुके बहालीमे भऽ जाएत।” रूपैआ दऽ देलियनि साटिफिकेट सेहो देलनि। भैकेन्सी भेल। बेटो बी.ए.पास केने अछि। दुनू बापुत गामेक स्कूलमे दरखास दइक विचार केलौं। कागजक जखन मिलानी केलौं तँ बेटाक उमेरसँ दू बरख कम अपन उमेर! मुदा एहेन अजोध बात बजबो कतए करब। भरमे-सरम चुप्पे रहि गेलौं। ~ देखल दिन मृत्युसँ छह मास पूर्व मुनेसर काकाकेँ बेटा लग मन उबिएलनि तँ असगरे दिल्लीसँ गाम विदा भेलाह। परिवारसँ समाज धरि सभकेँ अचरज लगलनि जे मनमे कि चढ़ि गेलनि जे असगरे एते साहस केलनि। असगरे विदा होइक कारण भेलनि जे बेटाकेँ पाँच दिन समए नै, एक तँ ओहुना बैंकमे कम छुट्टी होइ छै तइपर अपनो कारोवार ठाढ़ केने छथि। पुतोहु सहजे पुतोहुए छन्हि, भरि दिन एयर-कंडीशनमे बैस देश-विदेशक खेल देखब आ साज-श्रृंगार छोड़ि दुनियाँमे किछु देखबे ने करै छथि। मुदा मुनेसर काकाक सहासक कारण ईहो भेलनि जे एकेटा गाड़ी िदल्लीसँ सकरी पहुँचा देतनि। सकरी तँ ओहुना घरे-अंगना भेलनि। गाम अबिते मुनेसर काका देखलनि जे घर-अंगना तँ खंडहर भऽ गेल, कतए रहब। अंडी-बगहंडी, भाँग-धथुरसँ भरल अछि। जखने बोनाह भेल तखने साँप-छुछुनरिक संग बिढ़नी-पचैहिया हेबे करत। बाप-पुरुखाक डीहक दशा देखि दुख भेलनि जे जखन घरे नै तखन मनुख केना रहत। जखन मनुक्खे नै रहत तँ बाप-पुरुखाकेँ के चिन्हत। मने-मन विचार ऊपर-निच्चा होइते रहनि कि एक गोटेकेँ रस्ता धेने जाइत देखलनि। ओना दस साल पहिने देखनहि रहथि मुदा मनुष्योक बुनाबटि तँ अजीव अछि। जहिना बीस बर्खक अवस्था धरि बाढ़िक आगमन रहैत अछि तहिना साठि बर्खक पछाति रौदियाहक। दुनू सएह तँए पुछैक जरूरत दुनूकेँ भेलनि। कमलेशकेँ ऐ लेल पुछैक जरूरत भेलै जे आन-गामक जँ रहितथि तँ रस्ते-रस्ते एला, चलि जइतथि। ठाढ़ भऽ निहारि किअए रहला अछि। जखन कि मुनेसर काकाकेँ जरूरी भेलनि जे जखन पुस्तैनी गाम एलौं, परिवार चलि गेल तँ चलि गेल, समाजो अछि कि ओहो मेटा गेल। मोवाइल जकाँ नै भेल जे अगुआ कऽ किअए फोन करब। पाइ खरचा होइ छै कि नै। ओइ सम्प्रदाय सदृश अछि कि ने जे अगुआ कऽ जेकर नजरि पड़त ओ पहिने अभिवादन करत। मुदा भेल दोसरे, जहिना पनचैतीमे एक संग अनेको बजनिहार बाजए लगैत वा मोवाइलेपर दुनू दिससँ दुनू परानी बाजए लगैत, तहिना मुनेसरो काका आ कमलेशो एके बेर दुनू दिससँ बाजल। आग्रह करैत कमलेश अपना ऐठाम तीन दिनक अभ्यागतीमे लऽ गेलनि। गाम-समाजक कुशल-समाचारक संग मुनेसर काकाक मनक जड़िमे अपन परिवार नचए लगलनि। कोन धरानी बाबू, एकटा साधारण पोस्ट मास्टर रहि तीस बीघा खेत बनौलनि। दस गाम बीच एकटा पोस्ट आफिस मनिआडरक रूपैआ अगुआ-पछुआ, संग-संग जिनकर रूपैआ दिअ जाथि दू-चारि आना ओहो देबे करनि। आमदनी बढ़ने मुनेसरोकेँ पढ़ा-लिखा हाकिम बनौलनि। तेसर पीढ़ी चलि रहल छन्हि। डंडी तराजू जकाँ परिवारकेँ तौल रहला अछि जे एक पीढ़ी (पिता) समाजमे की सभ केलनि। बीचक की भेल आ आइ उजड़ि-उपटि गेल। जहिना चढ़ैत जुआनी जिनगी बौरा जाइ छै तहिना ने अबैत मृत्युकेँ रोग-सोग सेहो भेटए लगै छै। कमलेशक घर देखि मुनेसर काका चीन्ह गेलखिन जे ई तँ संगीऐक घर छी। पुछलखिन- “बाउ, परिवारमे के सभ छथि?” कमलेश बाजल- “तीन पीढ़ीक सभ छथि।” मुनेसर काकाकेँ आगू बकार नै फुटलनि। जहिना तकितो आँखिमे ज्योति नै रहै छै तहिना भेलनि। ~ फज्झति सोनेलाल आ जीयालालक बीच करीब बीस बर्खसँ चिन्हा-परिचए छन्हि। ओना दू गामक, मुदा सटल गाम रहने खेतो एकबधू आ हाटो-बजारमे भेँट-घाँट होइते रहै छन्हि। कहैले दुनूक बीच अपेछो छन्हि, एकबधू खेत रहने अड़ियो छथि मुदा दुनू गामक विपरीत सामाजिक चालि-ढालि रहने बात-विचारमे अन्तरो छन्हियेँ। कामेकेँ धाम आ कर्मेकेँ धर्मक विचार रहने जीयालाल कम आँट-पेटक सम्पति रहनौं ने कहियो बेकारी महसूस करै छथि आ ने गुजर-बसर करैमे परेशानी होइ छन्हि। जहिना मौसमी फल बरहमसियो होइत अछि तहिना मौसमी खेतीकेँ बरहमसिया दिस ससारैमे दिन-राित लगल रहै छथि। जखन कि सोनेलाल सोलहन्नी मौसमी किसान छथि। अन्नक खेती संग जीयालाल फलो-फलहरी आ तरकारियो-फड़कारिक खेती करै छथि। खेतक हिसावसँ अपने भरि खेती करै छथि मुदा मेहनति बेशिया दैत छन्हि जइसँ अधा-छिधा विकरीयो-बट्टा भइये जाइत छन्हि। जइसँ आनो-आनो काज चलिते रहै छन्हि। फलक खेती केने लताम, नेबो, धात्री, अनारसक गाछ नर्सरी जकाँ रहिते रहै छन्हि। मुदा जहिना धर्मक जड़ि दया छी तहिना खेतीक जड़ि बीज (बीआ) सेहो छी, तँए फलक कोनो गाछ बेचै नै छथि। ओहिना (मंगनिये) दोसरकेँ दैत छथि। नेबोक एकटा गाछ साेनेलाल जीयालालसँ मंगलनि। रस्ते-पेरेक गप छल। जीयालाल कहि कहलखिन- “जखन आएब भऽ जाएत।” साल बीत गेल। ओना दुनू गोटेक बीच भेँट-घाँट होइते छन्हि मुदा गाछक कोनो चर्च नै। दोसर साल दुनू गोटेकेँ नवानी दुर्गा-पूजा मेलामे भेँट भेलनि। चाहे दोकानपर बैस दुनू गोटेक बीच दुनियाँ-दारीक संग अपनो खेती-पथारीक गप चललनि। जेना हराएल वस्तु भेटने देहमे पानि जगै छै तहिना सोनेलालकेँ जगलनि। दोकानपर चारि-पाँच गामक चारि-पाँच गोटे बैसल। सोनेलाल जीयालालकेँ कहलखिन- “हमर बाकिये अछि?” बाकी सुनि जीयालालोकेँ धक् दऽ नेबो गाछ मन पड़लनि। सुहकारैत कहलखिन- “हँ, हँ, से तँ अछिये। भऽ जाएत।” तेसर साल विजलीपुरक समैध ऐठाम सोनेलाल दरबज्जापर बैसल रहथि तखने मधेपुरसँ अबैत जीयालालपर नजरि पड़िते सोर पाड़लखिन। समाजो आ परिवारोक पान-सात गोटे बैसल रहथि। सोनेलालक अवाज सुनि जीयालाल सड़कसँ पछिम मुँहेँ साइकिलो घुमौलनि आ विचारियो लेलनि जे फज्झति करबनि। तइसँ पहिने मनमे उठि गेल रहनि जे जखन दुइये गोटेक बीचक काज छी तखन दुनियाँकेँ जनबैक कोना जरूरत। जरूर किछु बात छै, तँए फज्झतिसँ जड़ि पकड़त। दलानक दावामे जीयालाल साइकिल लगबिते रहथि आकि सोनेलाल महाजनीक स्वरमे बजलाह- “हमर बािकये अछि!” सोनेलालक स्वरो आ जगहो देखि जीयालालक देह अगिया गेलनि। एक तँ ओहुना पुरुखक आदति रहल अछि जे घरोवाली लग आ सासुरो-समधिऔरोमे अलंकारिक भाषाक प्रयोग करैत अछि। नजरि तेज करैत जीयालाल, लूरिगर सिपाही जकाँ जे दुश्मनेक हाथक हथियार छीनि प्रहार करैए तहिना समाजकेँु अगुअबैत बजलाह- “अहूँ सभ अपन समधिक हाल सुनू। बेटा-पुतोहु, बेटी-जमाएबला भऽ गेलाह, मुदा अखन धरि एकटा नेबोओक गाछ नै छन्हि।” ~ काँच सूत साठि बर्खक संगी पैंसठिम बर्खमे रहने तँ मोहनकेँ किछु नै बूझि पड़लनि मुदा सोहनकेँ मन कहलकनि जे भरिसक दुनू गोटेक बीचक सम्बन्ध काँच सूतमे बन्हल छल। दुनू गोटेक, मोहनो आ सोहनोक-घर बीघा दुइयेक हटल। ओना दुनू दू जातिक, मुदा दू जातिक बीच जते दूरी बनल अछि तते नै छन्हि। कारण जे एकठाम रहने बहुत बेमारी लगियो जाइ छै आ छुटयो जाइ छै। तहिना दुनू गोटेक बीच रहने छन्हि। दुनू लंगोटिया संगी। ओना किछुए मासक कमी-बेशी दुनूक बीच छन्हि, मुदा पाँच बर्ख धरि तँ बच्चाकेँ घरे-अंगना चिन्हेमे लगि जाइ छै। गामक कतिका माने जाड़क मासक अखड़ाहासँ लऽ कऽ कवड्डी, गुड़ी-गुड़ीक मैदान होइत विद्यालय धरिक संगी दुनू गोटे। ओना गामक विद्यालयक पछाति दुनू गोटे दू विद्यालयमे पढ़लनि, मुदा ग्रेजुएशन एके साल दुनू केलनि। साइंसक विद्यार्थी रहने मोहन काँलेजमे डिमाॅसटेटर बनलाह। आ सोहन एम.ए.मे नाअों लिखौलनि। पछाति एम.ए.सी. केलोपरान्त मोहन लेक्चरर बनि तीन साल पहिने सेवा-निवृति भेलाह। एक तँ जिनगी भरिक संगी, दोसर समाजक पढ़ल-लिखल तँए बैसार-उसार एकठाम अधिक काल होइत। रौदियाह समए भेने पहिल शिकार खेतसँ जुड़ल लोक हेताह, तँए अखन चौक-चौराहाक मुख्य विषय रौदी बनल अछि। छह बजे साँझ। टहलि-बुलि कऽ दुनू गोटे अाबि चौकपर बैसलाह। लाटमे पान-सात गोटे सेहो बैसलाह। धानक जरैत खेती देखि सोहन दालिक खेतीक चर्च उठबैत कहलखिन- “अस्सीक दशकसँ पहिने दालि सस्त छल आ अखन वएह महग भऽ गेल अछि। पानि नै भेने अखन उपायो तँ दोसर नहिये अछि। सरकारी जे अछि से कागजेमे अछि।” जना सोहनक बात मोहनकेँ लागि गेलनि। प्रतिवाद करैत बजलाह- “हमरा उमेरसँ बेसी तोरो उमेर नहिये हेतह, जहियासँ देखै छिऐ दालिये महग अछि।” विचारमे लोच दैत सोहन बजलाह- “अपना ऐठाम कहबी छै जे ‘नीच काज कऽ ली मुदा राहरिक बोनि नै ली।’ कोनो कहबी ओहिना नै होइ छै।” जना कते घैल घी मोहनक सोहन हरा देने होन्हि तहिना आगि-बबूला भऽ उठि विदा होइत बजलाह- “केकरो कहने किछु भऽ जाइ छै।” सोहन गुमे रहलाह। किछु कालक पछाति सोहनक मनमे उठलनि कि फूिस बाजल छलौं तखन लगलनि किअए। नजरि पाछू दिस बढ़लनि। जहिना पहिया कऽ गाड़ीक पहिया चलैत अछि तहिना पहिया कऽ देखलापर देखलनि जे जे जिनगी छलाॅगसँ उठै छै ओ ओहिना निच्चो होइ छै, मुदा धड़िआ कऽ जे जिनगी उठै छै ओ धड़िआइते रहै छै, चाहे जेम्हर जाउ। आइ बुझै छी जे दूनू गोटे काँच सूतमे बन्हल छलौं जे अबैत-अबैत आइ टूटि गेल। संगी रहने लोक हराइए, भसिआइए। मुदा असगर चलनिहार कतए हराएत। पत्ता पकड़ि विच्ची पकड़ैक लूरि चाही। ~ बुधि-बधिया रामकिसुन आ देवनारायण लंगौटिया संगी। एकठाम बैस खेती-पथारीसँ लऽ कऽ कुटुम-परिवार सहितक गप-सप दुनू करैत। रामकिसुनक बेटा दरभंगासँ धड़फड़ाएल आबि कहलकनि- “बाबू, रूपैआक ओरियान कऽ दिअ। काल्हिये भरि फार्म भरैक समए छै।” अपना हाथमे रामकिसुनकेँ पनरहे सए रूपैआ, पाँच सए ओरियान करब छलनि। जइठाम लोक बेसी गप-सप करैए तइठाम घरक नोनो-तेल आ खेतक खरीदो-विक्रीक गप सेहो करिते अछि। मनमे भेलनि जे पेंइचेक-गप अछि तँ अनका किअए कहबनि। पहिने दोसेकेँ कहै छियनि जँ नइ हएत तखन बूझल जेतैक। कोनो कि पेंच-उघारक अकाल पड़ि गेल अछि जे नै भेटत। यएह तँ गुण अछि जे जते खगल दुबराइए, महाजन ओते मोटाइए। देवनारायणकेँ रामकिसुन कहलखिन- “दोस, पान सए रूपैआक बेगरता भऽ गेल अछि, सम्हारि दिअ।” देवनारायणक हाथमे रूपैआ रहबे करनि, मुदा दोससँ सूदि केना लितथि। महाजनी सूदिक गुण तँ बूझल छलनि। कनी-मनी झूठ-फूसि धन-सम्पतिक लेन-देनमे चलिते अछि। सुहरदे मुँहेँ उत्तर देलखिन- “दोस, जखन अपना बूझि एलौं तँ घुमाएब उचिन नै हएत। मुदा इमानदारीसँ कहै छी अपना हाथमे एको पाइ नै अछि।” रामकिसुन- “तब तँ काजमे बाधा हएत?” देवनारायण- “से नै हुअए देब?” रामकिसुन- “कहै छी हाथ खालिये अछि तखन विथूत केना नै हएत?” देवनारायण- “अपन ने खाली अछि, हुनकर (पत्नीक) हाथमे छन्हि। मुदा....?” रामकिसुन- “मुदा की?” देवनारायण- “आना दर सूदि तँ महाजनीमे चलै छै मुदा स्त्रीगणकेँ तँ माइक देलहा कोसलिया रहै छै किने, तँए दू-आना दर सूदि लागत।” सूदि सुनि रामकिसुन गुम भऽ गेलाह। मनमे उठलनि जे सोझ हाथे नाक नै छुब, घुमा कऽ छुअब भेल। जते घुमाओन बाट रहै छै तते ने लोको हराइए। मुदा काज खगौने तँ जिनगी खसै छै। यएह ने परीक्षाक घड़ी छी। ~ पहाड़क बेथा साओनक फुहार पड़िते जहिना नरम-गरम बीच गप-सप्प शुरू होइत तहिना धारा संग निकलैत पहाड़ समुद्र दिस बढ़ल तँ कबई माछ जकाँ समुद्रो िसरा ससरि पहाड़ दिस बढ़ल। अकासक बुन पबिते पानि रंग जकाँ छुहुटि धड़ैत तहिना दुनूक बीच भेल। पनचैतीक ओइ पंच जकाँ जे अपन बेथा कहए जाइत आ अनके तते बेथा रहैत जे अपन तर पड़ि जाइत तहिना समुद्रोकेँ भेल। ओना अपन-अपन बेथा दुनूकेँ रहए मुदा सिर चढ़ल पहाड़ रहने समुद्र चुपे रहल। मनमे संतोष भेलै जे जिनगिये केहेन छन्हि तँए बेथे कते हेतनि। कनी पछुए अपन बेथा राखब। खिलैत कोढ़ी जकाँ, जे फूल बनत कि फल, विहुँसैत समुद्र पुछलक- “भाय, बड़ तबधल देखै छी, पियास लगल अछि की?” जहिना पियासल बटोहीकेँ कोनो दरबज्जापर पानिक लोटा सोझ अबिते आत्माक तरास लपकि कऽ पकड़ि लैत तहिना पहाड़ व्यथित भऽ बाजल- “देखू जे सात बीतक केहेन अछि, जे एक तँ अधासँ बेसी फटले छै तइपर केहेन ठट्ठा केलक हेन?” बेथामे नहाएल पहाड़केँ देखि समुद्र पुचकारि कऽ पुछलक- “भैया, अहूँ जँ बेथा जेबै तँ हमरा सबहक की गति हेतै। अहींक आशामे ने हमहूँ जीबै छी।” रसाएल समुद्र देखि छुब्द होइत पहाड़ बाजल- “कहू जे एहनो ठट्ठा हेाइ छै जे टिकमे बान्हि देने अछि, खुनलौं पहाड़ निकलल चुहिया। यएह निसाफ होइ जे मेडिकलक किताब पढ़निहारकेँ जँ कियो कहै जे अहाँकेँ सरदियो छोड़बैक लूरि नै अछि, ई केहेन हएत।” ~ उमकी भोलन बाबा गंगा नहाइले िनरधनमाक संग गेलाह। गंगामे दुनू गोटे संगे पैसलाह। ऐ आशासँ जे जँ बूढ़ (भोलन बाबा) भँसियेता तँ पोता निरधनमा पकड़तनि आ जँ बाल-बोध निरधनमा भँसिआएत तँ भोलन बाबा पकड़तनि। जाधरि दुनू गोटे पकड़ा-पकड़ी नै करतथि ताधरि एक कालखंड भरि संगे केना रहि पबितथि। गंगामे पैसि निरधनमा पुछलकनि- “एँ हौ बाबा, सभ चीजक गाछमे देखै छिऐ सभटा एक-रंग रहल आ गोटे-गोटे भुलकि जाइए?” निरधनमाक प्रश्नसँ बाबाकेँ दुख नै भेलनि जे हमरे ठीकिया कऽ ने तँ पुछलक। मुदा हमरा ठीकिया कऽ बाल-बोध किअए पूछत। जहिना जेठुआ पानि पीविते धरती पुरना खढ़केँ गलेबो करैत अछि आ नवकाकेँ जनमेबो करैत अछि। तहिना तँ अखन निरधनमो अछि। ताधरि दुनू गोटे छाती भरि पानिमे पहुँचि गेलाह। छाती भरि पानिमे पहुँचिते जना सर्द माथ धरि पहुँचि गेलनि। सर्द पहुँचिते निरधनमा दोहरा कऽ पुछलकनि- “बाबा, जखन छाती भरि पानिमे आबिये गेलौं तँ अहीले ने लोक एते हरान रहैए, आब घूमि कऽ कथीले जाएब, से नइ तँ.....?” िनरधनमाक प्रश्न सुनि भोलन बाबा हरा गेलाह। पानिमे जना डूमि गेलाह। मनमे उठलनि जे अही उमेरमे ने बाल-बोध पानिमे नहाइले जाइत तँ उमकए लगैत। कहीं अही उमकीमे ने िनरधनमा बेसी पानिमे पहुँच भसि जाए। जँ भसि गेल तँ फेर एहेन लोक भेटत कि नै। मन रोकलकनि पहिने मुँहसँ मनाही कऽ दइ छिऐ। नइ मानत तँ अपने ने गंगा लाभ हएत। मुदा बुढ़ाड़ीक बाट तँ अपनो टूटि जाएत। ओकरा छोड़ि एक लोटा पानियो देनिहार भेटत! तेहेन जुग-जमाना भऽ गेल अछि जे...। जइठाम ताड़ी-दारूक लाइसेंस दऽ दऽ बेरोजगारी हटौल जाइए। की ऐ रोजगारसँ मिथिलाक माटि जे बालुसँ भरि बलुआ गेल अछि, ओ उपजाऊ भूमि बनत। जाधरि नै बनत ताधरि हम सभ ओहिना बरहमासकेँ छहमासा बनाएब आ छहमासा चौमासा तीन मासा करैत पराती-साँझ कानि-कानि गाएब, ‘माधव, हम परिणाम निराशा।’ डुमकी लइसँ पहिने बाबा निरधनमापर नजरि देलनि तँ देखलखिन जे ओ हमरे बाट ताकि रहल अछि। कहलखिन- “एक्के बेर डूम लिहेँ। सभ तीरथ बेर-बेर गंगासागर एक बेर।” जहिना कियो दोस्ती करए बेर गंगाक शपथ लैत, तहिना संगे दुनू गोरे गंगामे डूम लैत स्नान कऽ घूमि गाम एलाह। ~ बजन्ता-बुझन्ता पोखरिक धड़िक विशाल सिमरक गाछपर दूटा सुग्गा बैसि, जतिआरए सम्बन्ध बनबैत रहए। मुदा नाम-गामक ठेकान बिनु बुझने उड़ैबलाक कोन ठेकान। तँए दुनू सहमत भेल जे पहिने अपन ठौर-ठेकानक सम्बन्ध बना लिअ तखन कथा-कुटुमैतीक सम्बन्धक चर्च करब। दोसर डारिक सुगा लग पहुँचि गेल। दुनू बुझैत जे घर-परिवारक गप आन किअए सुनत। तँए कानमे कान सटा एक दोसरकेँ पुछलक- “बेरादर, तोहर नाम की छिअह?” कनी काल गुम रहि दोसर बाजल- “उढ़ड़ाकेँ गामक ठेकान होइ छै। की नाम कहबह। तोहीं अपना विचारे राखि दाए। हमहूँ आइसँ मानि लेब।” पहिल सुग्गा- “बड़बढ़ियाँ।” बड़बढ़िया सुनि दोसर धाँइ दऽ बाजल- “भाय, तोहर नाओं की छिअह?” पहिल- “पोसा।” दोसर- “पोसा केकरा कहै छै?” पोसा बाजल- “जे मनुक्खक संग रहैए।” दोसर- “तब तँ पिजरामे रखैत हेतह?” पोसा- “हँ, पिजरोमे रहै छै। मुदा हम ओहन पोसा छी जे बिनु पिजरेक मनुक्खक संग रहै छी।” ~ चर्मरोग एक तँ कातिकक पूर्णिमा दोसर गहन सेहो लागत। तहूमे कते साल पछाति पूर्ण-गहन लगि रहल अछि। गामक लोकक उजाहि देखि दुनू परानी दोस काका सेहो कमला नहाइक विचार केलनि। तीनिये दिन जाइ-अबैमे लागत। दोस काका काकीकेँ कहलखिन- “जखन तीनिये दिनक बात अछि तखन किअए ने घरेसँ बटखरचा लऽ जाइ। अनेरे केहेन कहाँ दोकानक खाएब। एक तँ बेचिनिहारक हाथ-पएर नीक नै रहै छै तहूमे कोन-कहाँ माछी सेहो िभनकैत रहै छै।” दोस काकाक विचारमे अपन विचार मिलबैत काकी उत्तर देलखिन- “अपन घर फेर अपन घर छी। कौओ मेना अपन घरक सुख बुझैए। हम सभ तँ सहजहि मनुख छी। एतबो-अचार विचार नै राखब से केहेन हएत। तहूमे तते ने चीज-बौस महग भऽ गेल अछि जे लोक आब भरि पेट खाइए आकि मनकेँ बुझा पानिसँ पेट भरैए।” दोस काका- “काल्हि चारि बजे भोरमे गाड़ी अछि। घंटा भरि टीशन जाइमे लागत। एक-डेढ़ बजेमे सभ कियो उठि जाएब। जाबे दुनू पुतोहु बटखरचा बनौतीह ताबे दुनू गोटे नहा-सोना लेब।” काकी- “बड़बढ़ियाँ।” कमला स्नान करबाक विचार, तँए दुनू परानी अबेर तक गपे-सपमे जगि गेलथि। अबेर कऽ सुतने नीनो अबेर तक खेहारलकनि। एक-डेढ़ बजेक बदला अढ़ाइ बजेमे नीन टुटलनि। घड़ी देखिते दोस काका अपन दोख घुसकबैत पत्नीपर गुम्हरलाह- “अढ़ाइ बजैए, आब कखन चुल्हि पजारल जाएत। तहूमे सभ सुतले अछि।” दोस काका दिस अपन क्रोध नै घुसका काकी पुतोहुपर जोरसँ गरजैत बजलीह- “कोन कुम्हकरणक बेटी सभ घर चलि आएल अछि, से नै जानि। कहू जे एना कऽ सिखा कऽ दुनू दियादिनीकेँ कहने छेलिऐ जे एक-डेढ़ बजेमे उठि चुल्हि पजारि बटखरचा बना देब, से चलचलउ बेर तक सुतले अछि।” मुदा पुतोहुक लेल धैन-सन। सूतलमे गारिये की, जे सुनबे ने करत। पुतोहुक चाल-चुल नै सुनि काकी अपने ठंढ़ा गेलीह आगू बढ़ि जेठकी पुतोहुकेँ सोर पाड़ि बजलीह- “एना के कहने छलाैं, से अखन तक सूतले छी।” भलहिं कातिक मास रोगाह किअए ने हुअए मुदा जेठक राति ओहन सोहनगर थोड़े होइए। जेहन सिनेह सुख कातिकक निनिया देवीक होइए ओ जेठ जनीकेँ थोड़े होइ छन्हि। धानसँ भरल बसुधा जहिना कड़कड़ाइत रहैए तहिना ने देवियो कड़कड़ाइत रहै छथि। ओछाइनेपर सँ जेठकी पुतोहु भकुआएले जबाब देलखिन- “अखन बड़ राति छै, एते किअए धड़फड़ाइ छथि।” एक तँ ओहुना पैंतालीस-पचास बर्खक उमेर दुनू परानी दोस काकाक, तइपर सँ पुतोहुक बात आरो ढील कऽ देलकनि। मुदा तैयो गारजनी रूआव झाड़ैत काकी छोटकी पुतोहुकेँ उठबैत बजलीह- “कनियाँ, नै खाइक ओरियान केलौं तँ केलौं, मुदा निकलबो बेर तँ अपन घर-दुआर सुमझा लेब कि सूतले रहब।” पहिलुका बात छोटकी सूतलेमे गमौलनि। मुदा अंतिम ‘सूतले रहब’ बेर नीन टूटि गेलनि। ओछाइनेपरसँ बजलीह- “दीदी, सूतले छथिन।” रातिक भुखल भोरमे जहिना छह-नंबरा कोदारि कान्हपर लऽ खढ़होरि तामए विदा होइत तहिना खिसिआएल मने दोस काका तीन दिनक धर्मक घाट पहुँचबाक विचार जगौलनि। काकीकेँ कहलखिन- “पनरहे मिनट समए बचल अछि, झब दऽ तैयार होउ, नै तँ जहिना बटखरचा छूटल तहिना संगियो आ कमलो स्नान छूटत।” एक तँ ओहिना जेठुआ रौदमे सुखाएल केराउ, तइपर खापरिमे पड़िते जहिना भरभरा कऽ उड़ए लगैत तहिना काकी भरभराइत दोस काकाकेँ कहलखिन- “आन पुरुखक जे बोल राखब से निमहत। कियो अपना घरमे पुतोहुओ अनलक आ दान-दहेज लछमियो अनलक। कियो तेहेन लुरिगर पुतोहु अनलक जेकरा देहेमे सभ किछु तेहेन छै जे परिवारकेँ शिखरपर पहुँचबैए। अहाँकेँ आँखिमे कोन चर्मरोग भऽ गेल अछि जे चूनि-चूनि पुतोहु अनलौं।” पत्नीक बात सुनि दोस काका सहमि गेलाह। मुदा सासुर, समधियौर आ पत्नी लग जँ मुँह बन्न भऽ गेल तँ पुरुखे कथीक। मुदा एको डारिक पत्ता धरिक बोध तँ पत्नीकेँ हेबे करै छन्हि जे करनी-धरनीक सीखमे सीखिते छथि। मुदा तैयो दोस काका अगुअबैत बजलाह- “जाएब की नै?” लपकि कऽ काकी बजलीह- “ढौआ जेबीमे लऽ लिअ, आ झनझनबैत चलू!” ~ शंका चालीस बर्खसँ संग-संग रहनौं श्याम काकाकेँ काकीपर अखनो शंका बनले रहै छन्हि। ओना सोलहन्नी शंका तँ नै मुदा तैयो शंका तँ शंके छी। सोलहन्नी ऐ लेल नै जे परिवारक आन काजमे एको पाइ शंका नै रहै छन्हि, मुदा पाइ-कौड़ी खर्चक भाँजमे तँ रहिते छन्हि। जइसँ आइ धरि कहियो मुट्ठी खोलि नै धड़बै छन्हि। जाधरि माए जीबैत छलनि ताधरि पुतोहुक हाथमे कहियो जरूरीसँ बेसी कोनो वस्तु नै जाए देलकनि। कारण छलनि जे अपनो जकाँ कुशल गृहिणी बनबए चहैत छलीह। कुशल ऐ लेल जे कमसँ कम वस्तुमे जीवन-यापन करैक लूरि भेलासँ जिनगीक गाड़ी समुचित ढंगसँ चलैत अछि, से चलैत रहनि। आब तँ सहजहि नाति-नाितन, पोता-पोतीसँ घर भरि गेल छन्हि, मुदा तखन किअए शंका छन्हि? ओना ओ बुझै छथि जे घरसँ बाहर धरि जोड़ि चलैक लूरि जेकरा होइ ओ कुशल गारजन भेल, मुदा से काकीकेँ रहितो किछु विशेष सिनेह नाति-नातिन, पोता-पोतीसँ रहने अवगुण तँ छन्हिये। ओना श्याम काकाकेँ अपन इच्छा कहियो दोकान-दौड़ीसँ नोन-तेल करैक नै रहलनि, आब तँ सहजहि नहिये छन्हि। तँए काकिये दोकान-दौड़ीक नोन-तेल करै छथिन। दोकान-दौड़ीक करैक पाछू दोसरो कारण छन्हि। ओ ई छन्हि जे कनियाँ-पुतराक की मांग हेतनि से हुनका लग तँ बाजि सकै छथि, मुदा हमरा लग थोड़े बजतीह। काकियो कम नै ने छथिन, दोकानक (परिवारक खर्चक) सभ समान कहि पाइ जोड़ि कऽ लऽ लैत छथिन आ तहूपर सँ किछु उधारी केने अबै छथिन। उधारीक कारण होइ छन्हि जे काजक वस्तु कहि पुतोहु चलबाकाल कहि दैत छथिन जे चौकलेट, नवका विस्कुट दोकानमे बड़ सुन्नर एलैए। पुतोहुक आग्रह केना काकी नै मानथिन। जइसँ किछु ने किछु उधारी दोकानक भइये जाइत छन्हि। तगेदा भेलापर श्याम काका बुझबे करै छथि आ देबे करै छथिन। मुदा मनमे कुवाथ तँ भइये जाइ छन्हि जे एते धिया-पुताकेँ चसकाएब नीक नै। भोरे की फुड़लनि की नै, उपराग दैत काकी श्याम काकाकेँ कहलखिन- “एते दिनसँ एकठाँ रहलौं, मुदा भरि मन विश्वास कहियो ने भेल?” काकीक बातकेँ गौर करैत श्याम काका कहलखिन- “से केना बुझै छी?” श्याम काकाकेँ आगू बजैले रहबे करनि आकि बीचेमे काकी टपकि पड़लीह- “मुट्ठी खोलि मुट्ठा कहियो मुट्ठीमे आबए देलौं।” ~ ओसार बीस बर्ख नोकरीक पछाति वसन्त भाय दू मंजिला घर बनौलनि। दू मंजिला बनबैक कारण छोट घराड़ी। कोठरी मात्र चारियेटा। सभ प्राणी मिलि वसन्त भाय घरबासो लेताह आ परदेशो छोड़ताह। रहैक घर आ जीबैक अपन अनुकूल कारोबारक कमाइ कमा अनने छथि। आठ बजे राति घरवासक समए छै। घरवासक सभ ओरियान जुटा एकठाम सभ जुटि गप-सप्प शुरू केलनि। आइ दोसर गपे की हएत? वसन्त भाय माएकेँ कहलखिन- “माए, परिवारमे आब पोता-पोती धरि भऽ गेलौ। कौआ-मेना जकाँ कते दिन जीवितो। सभसँ सिरगर परिवारमे तोंही छेँ, बाज कोन कोठरी लेमे?” एक तँ ओहिना माएक मन उधियाएल जे जते दिनका दुख लिखल छलए से कटलौं। आब तँ लिखलहो कटल। धिया-पुताकेँ जे हेतै अपन कऽ लेत। हमरा जीबैत धरि तँ घरक दुख मेटा गेलै। सौंसे परिवारपर आँखि खिड़बैत माए बजलीह- “बौआ, कोठरी तोंही सभ लैह, ओसारक एके भाग बहुत हएत?” अपन जीत देखैत पुतोहु झाड़-झाड़ैत बजलीह- “माएकेँ कहियो घरसँ सिनेह भेलनि जे हेतनि?” अपन जीत माए सोहो देखैत। सभ दिन सहीटमे रहलौं, चललौं-फिड़लौं, आब ऐ बुढ़ाड़ीमे जे सीढ़ीपर ऊपर-निच्चा करैत टाँग-हाथ तोड़ि ली, एहेन वुधियार हमहीं छी। पुतोहु दिस देखैत बजलीह- “कनियाँ, कहुना भेलौं तँ बाले-बोध भेलौं। एकटा उझटो बात बाजब तँ हम नै बरदास करब तँ आन करत। हमरा लिऐ सभसँ नीक ओसारे। सभ दिन राति-विराति घरक चौबगली घुमै-फिड़ै छी, घर-अंगना टहलै छी, अन्हार-धुनहारमे ऊपर-निच्चा करब नीक हएत।” ~ छोटका काका दियादिक दसो भैयारीमे मुनेसर सभसँ छोट, तँए सभ छोटका काका कहै छन्हि। जाधरि भैयारीक सभ जीबैत छलनि ताधरि कहियो छोट-पैघिक बात मनमे नै उठलनि। उठबो उचित नहिये। मुदा जखन उमेर बढ़लनि, भैयारीक नवो भाँइ दुनियाँ छोड़ि देलनि तखन तँ उठबो उचिते छलनि आ उठबो केलनि। उठलनि ई जे जखन सभ भाँइ छलाह तखन जँ छोटका काका कहैत छल तँ कहैत छल मुदा आब किअए कहैए। जँ से कहैत रहल तँ ऑफिसक चारिम श्रेणीक कर्मचारी जकाँ बड़ाबाबू कहिया बनब? साठि बर्खक उमेर टपलौं, माथो कारीसँ उजरा गेल मुदा छोटका काकाक छोटके काका रहि गेलौं। एक तँ ओहुना छोटकासँ सझिला, सझिलासँ मझिला, मझिलासँ बड़का बनैमे कते टपान अछि तइपर अखन धरि एको टपान नै टपलौं। देहक रंग-रूपसँ बाबा बनैक खाढ़ीमे आएल जाइ छी मुदा पीराड़क गाछ जकाँ बाढ़ि कहाँ अबैए। असमंजसमे पड़ल मुनेसरक मनमे उठल। प्रचार प्रसारक जमाना आबि गेल अछि नकलियो असली बनि बजारमे दौड़ रहल अछि तँए किछु ने करब तँ ओहिना रहि जाएब। भीखमंगो तँ नहिये छी जे जन्मेसँ बाबा कहबए लगब। अपन पैरवियो अपने केना करब। अनेरे लोक धड़खनाह कहए लगत। मुदा जे विचार अपने उठि रहल अछि ओ हुनका -पत्नी- कहाँ उठि रहल छन्हि। ओ तँ छोटकी काकी सुनि आरेा मुस्की दैत रहै छथि। पत्नीकेँ सोर पाड़ि मुनेसर कहलखिन- “देखियो जे घर-परिवारसँ लऽ कऽ समाज धरि छोटके कक्का कहैए से उचित भेल?” छोटका काकाक मनमे रहनि जे स्त्रीगण जानि दस ठाम ओहुना बजतीह। तइसँ अपन काज ससरत। मुदा छोटकी काकी गबदी मारि देलनि। कतौ किअए बजतीह। अपन लाभ के छोड़ैए जे छोड़ितथि। काकीकेँ कहि छोटका काका कान पाथि देलनि, जे किम्हरोसँ तँ हवा चलबे करत। मुदा कतौ चाल-चूल नै। मास दिनक पछाति पुन: छोटाक काका काकीकेँ मन पाड़ैत दोहरौलनि- “कहने जे रही तेकर सुनि-गुनि कहाँ कतौ पबै छी?” एक दिस छोटका काकाक उदास मन, दोसर दिस काकीक ओलड़ैत-मलड़ैत। दोसरकेँ अनुकूल बना किछु कहबोमे आनन्द अबै छै। मुदा जहिना पुरुखकेँ जेठ भेने आनन्द अबै छै तहिना तँ स्त्रीगणोकेँ छोट भेने अबै छै। जँ नै अबितै तँ किअए भाैजाइकेँ सभ एक लाड़नि लाड़ि दइए। भलहिं एक लाड़निक बदला सात लाड़नि किअए ने खाए मुदा होइ तँ सएह छै। छोट भेने एते लाभ तँ होइते अछि जे जेठ जकाँ अशिष्ट बोलीसँ बँचैत अछि। मुनेसरक मनकेँ बुझबैत काकी बजलीह- “अच्छा देखियो ने, समए कतौ भागल जाइए। भदबरिया मेघ कि कोनो साँझ-भोर तकैए।” जहिना चाह पीब मन तँ मानि जाइए मुदा पेट थोड़े मानत। टकटकी लगा मुनेसर छोटकी काकी (पत्नी) दिसि देखैत रहलाह। ~ सीमा-सड़हद खेते-पथार जकाँ आनोक सीमा-सड़हद होइ छै। मुदा किछु मानबो करैत अछि तँ किछु अतिक्रमणो करैत अछि। किछु बुझिनिहार बुझितो तोड़ैत अछि तँ किछु बिनु बुझनौं तोड़ैत अछि। इंजीनियरिंग कओलेजसँ रिटायर भेलाक पाँच सालक पछाति सुधीर काका गामेमे रहबाक विचार केलनि। विचार अपने नै केलनि, काकीक दबाबमे केलनि। कारण भेल जे राजधानीक शहरमे अपन मकान कीनै काल मनमे ऐबे ने केलनि जे राजधानीक शहर राजधानीकरण भऽ जाइ छै। सभ तरहक राजधानी बनैक लक्षण आबि जाइ छै। अपराधीक भाँजमे पड़ि सुधीर काकाक जे धन लुटेलनि से तँ सबूर केलनि जे बाढ़िक पानि जकाँ आएल-गेल मुदा दुनू परानी मारि तेहेन खेलनि जे राजधानी छोड़ि गाम दिसक बाट धेलनि। दुनू परानी गाम तँ आबि गेलाह मुदा इंजीनियर रहने मनमे रहबे करनि जे गामो-समाज तँ सएह मुदा से नै भेलनि। बाहरे जकाँ गामोमे बूझि पड़नि। भातीजकेँ सोर पाड़ि कहलखिन- “मनोज, गाम अही दुआरे एलौं जे अपन दर-दियाद, सर-समाजमे हब-गब करैत जिनगी ससारि लेब। मुदा.....।” सुधीर काकाक विचार मनोज बूझि गेल। मुदा समुचित उत्तर नै देब उचित बूझि, प्रश्नकेँ बहटािर बाजल- “काका, गामक लोकमे ओते सूझ-बूझ छै जे......?” मनोजक उत्तरसँ सुधीर काकाकेँ संतोष नै भेलनि। दोहरौलनि- “नै बौआ, किछु दोसर बात छै?” मनोज कहलकनि- “काका, जाधरि गाम-समाजक सीमा सड़हद बूझि अपन सीमा-सड़हद नै बनाएब, ताधरि......।” ~ रमैत जोगी बहैत पानि की मनमे एलनि की नै....। राधाकान्त बाबा घर-परिवारसँ भगैक विचार कऽ लेलनि। ओना समाज तँ समाज छी जे खेबा काल बौसैत अछि, पड़ाइत काल बौसैत अछि, रूसलमे बौसैत अछि नै जानि आरो कोन-कोन काल बौसैत अछि। मुदा से राधाकान्त बाबाकेँ कियो नै बौसए एलनि। ओना मनमे रहनि जे कियो औताह तँ अपन मनक बेथा कहबनि। केना नै कहियनि उपदेश झाड़लासँ झड़ै छै आकि उपैत केलासँ। मुदा मनक बात मनेमे अंतरी जकाँ घुरिआइत बहत्तरि हाथक भऽ गेलनि। केकरो नै देखि फेर मनमे उठलनि जे जखन समाजे नै तखन परिवारक कते आशा। बड़ करत तँ मुँहमे आगि धराओत, कठिआरी के जाएत। तहूमे तेहेन चालि-ढालि सभ धेने जाइए जे एको दिन रहब कि जहलसँ कम अछि। मुदा तैयो आशामे रहथि जे परिवारोक कियो जँ बौसए चलि औत तँ बौसा जाएब। अनेरे ऐ बुढ़ाड़ीमे कतए बौआएब। मुदा आशा अशे रहि गेलनि। ओना अंत-अंत धरि आशा रहनि जे आन-आबए वा नै, मुदा......? दादी तँ दािदये भऽ गेलीह। सृजनकर्ता कुम्हार तँ बर्तन गढ़ि ओकर मुँह-कान नै सोझ करए, तँ केहेन बर्तन बनत। तहिना दादी अपना बोनमे हराएल। किअए बौसए औतनि। तहूमे कोनो कि हराएल बात अछि जे मरैबला मरबे करैए। आ चूड़ी फोड़ि, सिनूर मेटा जीबे करैए। मुदा जीवैक जगह तँ चाही। दरबज्जासँ उठि राधाकान्त बाबा कमलक मोटरीमे लटकैत कमंडल कान्हपर लैत ओसारसँ निच्चा उतरलाह कि पोता देखलकनि। दौड़ल आबि पाछूसँ मोटरी पकड़ैत कहलकनि- “कतए चललह?” बहैत पवित्र धारक स्नान जकाँ राधाकान्त बाबा हरा गेलाह। मनक बेथा मनेमे गुमसरि प्रेमक पेंपी बनि मुँहसँ निकलए लगलनि। मुदा किछु उत्तर नै पाबि पोता कहलकनि- “हमहूँ जेबह।” संगी पाबि बाबा उत्तर देलखिन- “रमैत जोगी बहैत पानि।” ~ गंजन जखने सुनीता-दादी बेटीक हाल-समाचार सुनलनि जे तेहेन रौदीमे पड़ि गेल जे एको कनमा धान नै हेतै, तखनेसँ बाबापर आँखि गड़ौने रहथि जे जखने अवसर भेटत, नीक जकाँ गंजन करबनि। ओना बाबाकेँ बेटी कि इलाकेक समाचार बूझल रहनि मुदा सुनीता-दादीक कानमे ऐ लेल नै देलनि जे कएले कि हेतनि, तखन तँ मनरोग चढ़ा देबनि। तइसँ नीक जे कहबे ने करबनि, अनका मुँहे जे सुनबे करतीह तँ ओहुना घोंघाउज कऽ लेब। गर चढ़िते सुनीता-दादी बाबाकेँ कहलखिन- “कहाँ दन मृत्युन्जय-बेटीकेँ एको कनमा धान नै हेतइ, सात तुर दिन केना खेपतै? सभटा आगि लगौल अहाँक छी। जेहेन गाम तीनू बेटीक केलौं तेहेन गाम अहाँकेँ मृत्युन्जयले नै भेटल।” दादीक गंजन गजिते बाबाक मनमे उठलनि जे जिनगीमे जँ किछु अरधि-संकल्पित बनि नै चललौं तँ खाली डिब्बामे झुटका दऽ झुनझुना बनौने की हएत। “दस कोस सीमा जे बन्हलिऐ” लोरिक की फुसिये कहलनि अछि। जइठाम राँइ-बाँइ भेल गामक खेत जकाँ अनेको छोटका-बड़का आड़िमे जिनगी बन्हि गेल अछि, तइठाम कैये की सकै छी। अखनो ओ विचार मनमे मरल कहाँ अछि जे एक बाप-माइक धिया-पुता एक रंग जिनगी नै जीबए! ~ सजाए बजैत लाज होइए मुदा नहियो बाजब तँ पुरुख कथीक। जहिना सभकेँ होइ छै तहिना जूति-भाँति लए पत्नीसँ मुँहाँठुट्ठी भऽ गेल। दुनू दू दिशाक बुझनूक! खिसिया कऽ अपने काज करए खेत चलि गेलौं। जलखै नै पहुँचल। सबूर केलौं। मुदा खीस आरो तबैध गेल। अबेर धरि खेतेमे खटैत रहलौं। गामपर आबि नहा-सोना खाइले गेलौं। ओढ़ना ओढ़ि पत्नी घरमे सूतल। तामसे नै टोकलियनि। मुदा तैयो अनठा कऽ बच्चाकेँ पुछलिऐ- “बुच्ची, माए कतए छथुन?” कहलक- “मन खराप छै सूतल अछि।” “तोरा बुत्ते खाएक परसल हेतह?” कहलक- “भानसो कहाँ भेलहेँ।” ~ घटक बाबा एहेन अगिआएल क्रोध घटक बाबाकेँ जिनगीमे पहिल दिन छलनि, जेहेन आइ भोरे उठलनि। एक तँ ओहुना देह घटने थोड़-थाड़ क्रोध सदिखन रहबे करै छन्हि मुदा घटबी जिनगीमे घटती काज भेने जहिना होइ छै तहिना भेलनि। ओना देहक घटबी अनका जकाँ नै छलनि, किएक तँ सभ दिन रहने केकरो फेहम बनल रहै छै, सभ किछु दुरुस्त रहै छै, मुदा तइसँ भिन्न घटक बाबाकेँ भेलनि। जेना केरा गाछक वा अनरनेबा गाछक पानि सुखने खलपैट जाइए तहिना भेने घरक पहिलुका सभ कपड़ो-लत्ता आ जुतो-चप्पल भऽ गेलनि। दहेजुआ देल कुरतो-गंजी आ जुत्तो-पप्पल ढील-ढीलाह बनि गेलनि। एकर माने ई नै जे कुरतो-गंजी आ जुतो-चप्पल बढ़ि कऽ ताड़ भऽ गेलनि तँए ढील-ढीलाह भऽ गेलनि। अपने सुखि कऽ पलास भऽ गेल छथि। ओना घरमे तते-रास कपड़ो-जुत्तो-चप्पल छन्हि जे अपन जीता-जिनगीकेँ के कहए जे मुइलोपर दान-पुन करैत उगड़िये जेतनि। मुदा कुछप भेने ओहो सभ कुछपिये जेतनि जइसँ कोनो सोगात नै लगतनि। जँ अपनो पहीरता तँ लेबरे जकाँ लगता आ दानो-पुन करता तैयो सएह हेतनि। खैर जे होउ, मुदा औझुका अगिआएल क्रोध बिनु हवोक ने पजरि जाए तेहने लहलही छन्हि। कनभेंटक सातम श्रेणीक पोती सरस्वती जिज्ञासु बनि पुछलकनि- “बाबा, पढ़ल-लिखल लड़काक संग बिनु पढ़ल-लिखल लड़कीक बिआह कते करौलिऐ आ बिनु पढ़ल-लिखल लड़काकेँ पढ़ल-लिखल लड़कीक संग कते करौने हेबइ?” पोतीक पुछल प्रश्नक उत्तर बाबा नकारि केना सकै छथि। कविताक तुकवन्दी जकाँ कुछप किअए ने होउ, मुदा लय तँ भरबे करताह। छ-अनियाँ मुस्की दैत घटक बाबा कहलखिन- “कोनो की डायरी लिखि कऽ रखने छी, अनगिनती बूझह।” बाल मन सरस्वतीक अनगिनतीमे ओझरा गेल। मुदा जहिना भूखक तृष्णाकेँ पानियोसँ किछु समए विलमाओल जा सकैए, मुदा तृष्णो तँ तृष्णा छिऐ। ठोस जहिना पानिमे नै भसिआइत, पानि हवामे नै उड़ैत तहिना सरस्वतीक तृष्णा नै उड़ल। पुन: दोहरा कऽ बाजल- “बाबा, बिआह किअए होइ छै?” पाँच किलो मोटरीकेँ तँ टारि देलिऐ, मनहीकेँ केना टारबै। जहिना पएर पड़िते साँप फन-फना उठैए तहिना घटक बाबाकेँ फनफनी उठलनि। एक तँ ओहुना घटबी देह थरथराइते रहै छन्हि तइपर आरो धऽ लेलकनि। मुदा जहिना गनगुआरि देखि नागक फनकी टूटि जाइत तहिना दस बर्खक पोतीकेँ सोझमे ठाढ़ भेने घटक बाबाकेँ भेलनि। ~ आने जकाँ हलसल-फूलसल पत्नी बजलीह- “आइ धरि अहाँ कहियो मोनसँ नै चाहलौं। सभ दिन बिगड़ले रहै छी?” पत्नीक बात सुनि छूब्ध भऽ गेलौं जे एहेन बात किअए कहलनि! िनच्चाँ-ऊपर देखि कहलियनि- “अहाँ कत्ते चाहै छी?” कहलनि- “जहिना सभकेँ देखै छिऐ।” कहलियनि- “आने जकाँ हमहूँ भऽ जाइ तखन ने?” ~ दान-दछिना तरगरे उठि पंडित काका िनत्य–कर्मसँ िनवृत्ति भऽ झुनझुनाबला बत्तीक ठेंगा नेने सड़कपर आबि चिकड़ि-चिकड़ि बजए लगलाह- “ई समाज रहैबला नै अछि। आन बिसरि जाए तँ बिसरि जाए मुदा मरै बेरमे केना मुँह बन्न करब जे पुराण-पोथीक दान सभसँ नीक नै होइ छैक।” आंगनसँ पत्नी सुनिते धड़फड़ाएल दौगल आबि कहलकनि- “भोरे-भोर की भऽ गेल जे एना अड़ड़ाइ छी?” पत्नीक पश्नसँ पंडित काकाकेँ दुख नै भेलनि। खुशिये भेलनि। कमसँ कम पत्नियो तँ लगमे आबि पुछलनि। खखास करैत बजलाह- “कहू जे भोज-काजमे लोक लाखक-लाख रूपैआ फूकि दइए। धोती-लोटा बाँटि दइए। अहीं कहू जे लोक आब जग-गिलास भऽ गेल, फुलपेंटे-कोट भऽ गेल। की नै? तइठाम धोती-लोटाकेँ के छूअत। जे छुऐबला अछि ओइले एकोटा पाइ नै लुटबए चहैए, तखन अनेरे रहि कऽ की करब। मन हुअए तँ अखने विदा भऽ जाउ।” पंडित काकाकेँ संगीक जरूरत देखि पंडिताइन काकी बौसैत कहलखिन- “अखन धरि अहूँ ने ते कहियो बाजल छलौं। समाज दोखी बनाओत। तामस घोंटि लिअ।” ~ उड़हड़ि एक तँ ओहिना जूरशीतलक भोर, चारिये बजेसँ चन्द्रकूप बनि इनार अकास-पताल एक केने, सिरसिराइत वसन्त सिर सजबै पाछू बेहाल, जे जतए से ततैसँ पीह-पाह करैत। तइपर तीन दिनसँ एकटा नवका गप गाममे सेहो उपकि गेल छै। ओ ई जे कपरचनमा उड़हड़ि गेल। रंग-बिरंगक खेरहा-खेरही गाममे छिटाइत। ओना उपरका जहाज जकाँ स्त्रीगणक बीच गप हवाइ भेल मुदा पुरुखक बीच कोनो सुनि-गुनि नै। तँए कपरचनमाक पिता-रघुनाथक लेल धैन-सन। माए कुड़बुड़ाइत मुदा सासुक डरे मुँह नै खोलैत। ओना परगामी भेने माइयो आ पत्नियोक मन ओते घबाह नै होइत। होइत तँ ओतए जतए सीमानक आड़ि धारक बाढ़िमे भसिया जाइ छै। कुसमा दादीक माने कपरचनमाक दादीक मनमे मिसियो भरि हलचल नै। कोनो कि बेटी जाति छी जे अबलट लागत। बेटा धन छी जतए रहत ओतए खुट्टा गाड़ि कऽ रहत। कियो बजैए तँ अपन मँुह दुइर करैए। जूरशीतल पावनि, अपने हाथे कुसमा दादी इनारसँ पानि भरि असीरवाद बॅटबे करतीह। तहूमे तेहेन गप परिवारक उड़ल छन्हि जे बाँटबो जरूरिये छन्हि। ओना अन्हरगरे मनमे उठल रहनि मुदा पहरक ठेकान नै रहलनि। जखन गाममे पीह-पाह शुरू भेल तखन फुड़फुड़ा कऽ उठि लाेटा-डोल नेने इनार दिस बढ़ली। मनमे ईहो रहनि जे इनार परक असीरवाद बेसी नीक अंगनाक अपेक्षा होइ छै। तँए सभसँ पहिने इनारपर पहुँचब जरूरी बुझलनि। आब कि कुशक जौर आ घट थोड़े रहल मुदा तैयो। इनारसँ डोल ऊपरो ने भेल छलनि आकि नवनगरवाली समजिया-पुतोहु अबिते देखलनि जे दादी असगरे छथि तँए अवसरक लाभ उठा ली नै तँ पचताइये कऽ की हएत। उपरागी जकाँ बजली- “उढ़ड़ा एलनि की नै?” नवनगरवालीक बोल कुसमा दादीकेँ मिसियो भरि नै कबकबौलकनि। मनमे नचैत रहनि जे एके पीढ़ी ऊपरक लोकक ने संकोच करैए, हम तँ दू पीढ़ी छिऐ। बाल-बोधक उकठपनो गपक जबाब उकठपने जकाँ िदऐ से केहेन हएत। नवनगरवालीक आँखिमे आँखि चढ़बैत बजलीह- “कनियाँ, अहाँ कहुना भेलौं तँ पोते-पोती भेलौं। किछु छी कपरचना तँ बेटा धन छी। जँ ककरो लैयो कऽ चलि गेल हेतै तँ सोचि नेने हेतै जे ठाठसँ जिनगी केना बिताएब। जतए रहत जगरनथिया खन्ती गाड़ि देतै।” भादवक बर्खा जकाँ कुसुमा दादीक मुँह बरैसते रहनि कि इनारक किनछड़िमे कनबाहि भेल दुलारपुरवाली ठाढ़ छथि। मुदा ओ दादीक सभ बात सुनि नेने रहथि। मन भिन-भिना गेल रहनि। तइपर जूरशीतलक उखमजक जे टटका-बसियाक भिरंत छिहे। टटका नीक आकि बसिया। बसिया नीक आकि तेबसिया। तेबसिया नीक आकि अमवसिया। मुदा टटका? नवनगरवालीक पक्ष लैत बजली- “सभटा कएल हिनके छियनि। दुनियाँमे नाओंक अकाल पड़ि गेल छेलै जे कपरचनमा नाओं रखलखिन।” सतैहिया बर्खाकेँ की छुटैक आशामे थोड़े छोड़ल जा सकैए। बीचोमे जोगारक जरूरत अछिये। जँ से नै तँ बिल-बाल होइत किमहर-किमहर बहि जाएत से थोड़े बूझि पेबै। कुसमा दादी दुलारपुरवालीकेँ कहए लगलखिन- “तों सभ फुलक नाओं के बेसी पसिन करै छहक, मुदा तोंही कहअ जे जते अपना गाममे फूल अछि ओकर मूल्य कि हेबाक चाही। मुदा देखै कि छहक। पोताक नाओं कोनो अधला रखने छी जेहेन चालि-ढालि देखलिऐ तेहेन नाउओं रखि देलिऐ।” दादीक उतारा सुनि नवनगरवाली मुँह चमकबैत बाजलि- “दादी, अबेर भेल जाइ छै। एक चुरूक असीरवाद देती तँ दोथु नै तँ अपन राखथु।” अगुआएल काजकेँ पछुआइत देखि दादी डोल नेनहि नवनगरवालीकेँ कहलखिन- “मन तँ होइए जे सौंसे डोल उझलि दिअ मुदा अखैन काजक बेर अछि। जा तोहूँ घर-अंगना देखहक।” ~ मत्हानि भोटक तीन मास पछाति श्याम आ कमलनाथकेँ भेँट भेल। ओना एक गामक रहितो ऐनाहे-ओनाहे सम्बन्ध दुनूक बीच भोटसँ पहिने छल, मुदा महिना दिनक दौड़ एते लग आनि देलक जे एक्के गाछक फल जकाँ बूझि पड़ए लगलै। एक तँ तीन मासक बकिऔता गपो-सप आ अपन पार्टीक हारि आ दोसराक सरकारोक हालि-चािल पार्टी लोकक मुँहे सुनब तँ जरूरिये अछि। माटिक बान्हपर चैत-बैशाखमे धूरा-गर्दा उड़िते अछि, तहूमे तेहेन घोड़दौड़क समए अछि जे आरो उड़ि अकासकेँ अन्हरौने अछि। भोटक हािरसँ कमलनाथक मन झुकल तइ संग परिवारक तीन पुस्तक सेवा सेहो हराइत-बिड़हाति देखि आरो झूकि गेल। खसल मन कमलनाथ बाजल- “भाय, की हाल-चाल अछि?” कमलनाथकेँ श्याम आंकि लेलक। हारल लोकक बीच चढ़ा-उतड़ी होइते छै। खसैत कमलनाथकेँ देखि चढ़ैत श्याम बाजल- “पूरबते।” श्यामक उत्तर पाबि कमलनाथ भक-चकमे पड़ि गेल। पैछला बात बुझने बिना आगू केना बढ़ल जाएत। मने-मन सोचए लगल जे पूर्वतक की अर्थ भेल। मुदा श्यामक पूर्वतक अर्थ रहए अपन राजनीति। देशक जे हेतइ से देशक लोक जनतै; तइसँ हमरा की। अपन ठीकेदारी, ऑफिसमे हेरा-फेरीक संग समाजमे सराध-बिआह चलैत रहतै, सभ अबाद रहत। ई की सेवा नै भेल? श्यामक उत्तर नै बूझि कमलनाथ पुन: दोहरबैत बाजल- “भाय, नै बूझि पेलौं?” अपन गोटी लाल होइत देखि श्याम अगुआएल नेता जकाँ विचारए लगल जे अगुआएब तँ ओहए ने भेल जे अपन विचारकेँ रूचिगर बना दोसरकेँ बुझाएब। मुदा लगले मन चकभौर लेलकै। मुँहा-मुँही बाजब आ मुँह घुमा कऽ बाजब एके भेल। ओहए ने कला छी। अनुकूल होइत श्याम बाजल- “भाय, भोटक पछाति जना हमरो मन उड़िया-बीड़िया गेल। पहिने जना करै छलों से आब कहाँ कएल होइए। तखन तँ ढीलो-उड़ीसक दवाइ खा-लेब, से केहेन हएत?” ~ मेकचो पछुआ पकड़ैत िमथिलांचलक किसानकेँ अपनो दोख ओतबे छन्हि जते सरकारक। किएक तँ ओहो अपनाकेँ जनतंत्रक किसान नहि बूझि पेलनि। पाँच बीघा जोतक किसान चुल्हाइ। अस्सीक दसकमे गहुमक खेतीक संग सरकारी खादक अनुदान आएल। बीघा भरि गहुमक खेती चुल्हाइ करत। एक बोरा यूरिया आ एक बोरा ग्रोमर खादक पूँजी लगबैक विचार केलक। ओना समुचित खादो आ पौष्टिक तत्वो खेतमे देब जुड़ब परक फुड़ब भेल। ब्लौकक माध्यमसँ खाद भेटै छै। पाँच दिन बरदा चुल्हाइ भी.एल.डब्ल्यूसँ फर्म भरौलक। तीन दिन पछाति कर्मचारियो लिखि देलखिन। दू दिन पछाति बी.ओ. सहाएब लिखला पछाति फर्म ब्लौक ऑफिस पहुँचत जे आठम दिन भेटतै। फार्म जमा केला पछाति घरपर आबि चुल्हाइ चपचपाइत पत्नी रूसनी लग बाजल- “ऐ बेर अपन गहुमक खेती नीक हएत!” पतिक चपचपीमे चपचपा रूसनी चपि-चपि, गौंचियाइत नजरि दैत बाजलि- “फगुआमे नवके पुड़ी खाएत।” तीस दिसम्बरकेँ चुल्हाइ गहुम बाउग केलक। पच्चीस किलो कट्ठा उपज भेल। टुटैत उपजाक टुटैत चुल्हाइक मन पत्नीकेँ कहलक- “ऐ बेरसँ नीक पौरुके भेल। चालीस किलो कट्ठा भेल रहए।” रूसनी- “एना किअए भेल?” चुल्हाइ- “तेहेन चमरछोंछमे पड़ि गेलौं जे मेकचो-पर-मेकचो लगैत गेल। जइसँ बाउग करैमे डेढ़ मास पछुआ गेलौं। तँए उपजा टूटि गेल।” पतिक घाउपर मलहम लगबैत रूसनी बाजलि- “खेती जुआ छिऐ। हारि-जीत चलिते रहै छै। तइ ले कि हाथ-पएर मारि बैस जाएब।” बिसवास भरल पत्नीक बात सुनि संकल्पित होइत चुल्हाइ बाजल- “फेर एहेन फेरिमे नै पड़ब।” ~ झुटका विदाइ जहिना हारल नटुआकेँ झुटका विदाइ होइ छै तहिना ने हमरो सहए भेल; मनमे अबिते प्रोफेसर रतनक चिन्तन धार ठमकि गेलनि। पिताक श्राद्ध-कर्म समपन भेलाक तेसरा दिन प्रो. रतन दरबज्जाक कुर्सीपर ओंगठि कऽ बैस; बीतल काजक समीक्षा करैत छलाह। जहिना नख-सिख वर्णन होइत तहिना ने सिख-नखक सेहो होइए। मुदा काजक समीक्षा तँ मशीन सदृश होइत। जे पार्ट पाछू कऽ लगौल जाइत खोलबा काल पहिने खुजैत अछि। प्रो. रतन छगुन्तामे पड़ल छथि जे समए कतएसँ कतए ससरि गेल आ....। आब कि थारी-लोटा आ कपड़ा-लत्ताक घटबी ओइ तरहेँ अछि जना पहिने छल। कहू जे ई केहेन भेल जे एते रूपैआ लोटा पाछू गमा देलौं। जँ समाजक बात नै मानितौं दोखी होइतो, मानलौं तँ कि मानलौं। लोटाक चर्च हुनका सभकेँ नै करक चाहियनि? तहूमे तेना लाबा-फरही करए लगलाह जे इस्टिलिया केना देबइ, लोहा छी अशुद्ध होइए। निअमत: फूल, पितरि वा ताम हेबाक चाही!! चानी-सोना तँ राजा-रजबारक भेल। विचार अनिवार्य भऽ गेल। फेर एहेन प्रश्न किअए उठल जे घरही नै दऽ बच्चासँ बूढ़ धरि जे पंच औताह सभकेँ होन्हि। सियानोक पनिपीबा ओहए हएत जे धिया-पुताक? तखन तँ लोटासँ लोटकी धड़िक ओरियान करू। तहूमे तेहेन अनरनेवा गाछ जकाँ भरिगर गाछ ठाढ़ कऽ देलनि जे हाइ स्कूलक शिक्षक गंगाधर लोटाक संग धोतियो बँटलनि। तइठाम एको अलंग नै करितै; से केहेन होइत। बजारसँ घुमला पछाति जहिना नीक वस्तु देखलापर मनमे उमकी उठैत तँ अधला देखलापर डुबकी लिअए पड़ैत, सएह ने भेल। प्रो. रतनक मन कोसी-कमलाक एकबट्ट भेल पानि जकाँ घोर-मट्ठा भऽ गेलनि। चिलहोरि जकाँ झपटैत पत्नीकेँ कहलखिन- “मन बिसाइन-बिसाइन भेल जाइए आ अहाँकेँ एक कप चाहो ने जुरैए?” पतिक आदेश सुनि सुजीता चाहक ओरियान केलनि। चाह दैत सुजीता, पजरामे बैस जट-जटीन जकाँ पुछलखिन- “की भेल जे एना मन विधुआएल अछि?” ओना चाहक चुस्कीसँ रतनक बिसबिसी कनी कमलनि मुदा निड़कटोबलि भऽ कऽ छूटल नै छलनि। ओही झोंकमे झोंकि देलखिन- “हएत कि झुटका विदाइ भेल।” पतिक बात सुजीता नै बूझि सकलीह। बुझियो केना सकितथि? मुदा रोड़ाएल दालिक सुगंध जकाँ अनुमानए लगली। मनमे जे कुवाथ भेल छन्हि से जाबे खोलता नै ताबे केना बूझब। जँ कोनो तेहेन बात रहितनि तँ एना साँप जकाँ गैंचिया-गैंचिया किअए चलितथि। बजलीह- “कनी काल अराम करू, हमरो हाथ काजेमे बाझल छलए, ओकरा सम्हारि लइ छी।” ~ मुँहक खतियान ऐ बेर दुर्गापूजाक नव उत्साह अछि। उत्साहो उचिते, हाले-सालमे मलेमासक विदाइ भेल अछि। एक दिन माघ बीतने तँ आशा फुड़फुड़ाइत पाँखि झाड़ए लगैत अछि, भलहिं पच्चीस दिनक टप-टप पाला खसैत शीत-लहरी आगू किअए ने हुअए। मुदा से नै, कहियो नावपर गाड़ी चढ़ैए तँ कहियो गाड़ीपर नाव। तहूमे दुनूक बीच, गाड़ी-नावक बीच एहेन रंग-रूपक मिलानी रहै छै जे दुनू-दुनूकेँ पीठेपर उठबैए आ पेटेमे रखैए। से ऐ बेर थोड़े हएत, तते ने लोक रौदिआएल अछि जे महारेपरसँ कूदि-कूदि उमकत। औझुका दिन भगवतीक माटि लेल जाएत। भोजक पाते देखि धिया-पुता चपचपाए लगैत जे खूब खेबनि। आखिर भोज होइते किअए छै। चारि बजे भोरेसँ पीह-पाह शुरू भऽ गेल। ओना रघुनी भायकेँ बूझल रहनि मुदा तैयो पीह-पाह नीक नै लगैत रहनि। कारण रहए जे दिनक फल भोजन बूझि क्रमिक-काजक क्रिया बुझैत। जाबे चौकक हवा पानि पीबए पहुँचैत कि तइसँ पहिने चाहक चुल्हि पजरल देखलनि। अपन मनकामना पुरबैत तेतरा दस कप चाहक भोज केलक। भोजन सत्तरिमे भोजैत अपन बात बजिते अछि तहिना तेतरा बाजल- “भाय, ट्रेण्ड डरेबर भऽ गेलियौ, भगवती दयासँ आब कोनो दुख-तकलीफ परिवारकेँ नै हेतै।” दोकानक दोसर बेंचपर बैसल पोखरिया असामी रामेसर सेहो बैसल। तेतराक बात जना रामेसरक छातीमे छेदि केलक तहिना रामेसरकेँ भेल। झोंक चढ़िते बाजल- “बाप जे मड़ूआ लेलकै, से तँ अखैन तक सठाएले ने भेलै हेन...?” रामेसरक बात सुनिते तेतरा लोढ़िऔलक। मुदा कएल कि जाए? दुनूकेँ थोम-थाम लगबैत रघुनी भाय कहलखिन- “दू घंटा लोककेँ बातो बुझैमे लगतनि तँए दू घंटा दुनू गोरे घरपर जाउ।” घर िदस रामेसर बढ़ैत बाजल- “बाढ़िमे घर खसि पड़ल, नै तँ अखने बही आनि कऽ पंचक बीचमे फेक दैतिऐ।” घरमुँहा होइत तेतरा बाजल- “कि बूझि पड़ै छै जे बबेबला सनकी अछि, झाड़ि देबइ। जँ ओकर बाकिये छै तँ मनुख जकाँ फुटमे कहैत।” ~ कोसलिया सीकसँ खसल मटकूड़ जकाँ सोमन काकाक मन छहोंछित भऽ फुटए लगलनि। बिनु भाँग पीनौं अफीमक नशा चढ़ि गेलनि। निताकैत भेल देहकेँ खरौआ जौड़ीसँ घोरल खाटपर चितंग पटकलनि। दंगल जकाँ नै जे किछु हारबो करैए, किछु जीतबो करैए आ किछु खिचड़ियो बनैए। दोसर कारण छलनि। ओनाइत मन उधिया-उधिया बजैत जे चारू बेटाक पिता छी, पालन-पोशन करै छी तखन किअए ने बूझि पेलौं जे घरमे कोसलिया सेहो बसि रहल अछि। मनक सीमा टपि बोल निकललनि- “अनेरे परिवार-परिवार करै छी, सत्तरि बर्खक पसीनाक की मोल रहल। यएह ने जे घरे-परिवारेमे एहेन मोइन फोड़ि दुदिशिया धार बहए लगल। कुट्टी-कट्टा जकाँ जँ दुनू दिस धार बनाएब तँ नारक मुट्ठी घुसकबै काल हाथ खड़रेबाक डर रहबे करत।” सोमन काकाकेँ देखि घुरनी काकीक मन मिसियो भरि नै हलचलेलनि। जिनगीक अनेको क्रोध देखने छथि। अनुभवी छथि। कनी फड़िक्केसँ थर्मामीटर लगा काकी काकाक रोग नपए लगलीह। मुदा पुरना थर्मामीटरसँ तँ पुरना रोग परेखमे अबैत नवका केना आऔत। सहए भेलनि। ओना सोमन काका अपने ठकमुड़ाए गेल रहथि जे एना किअए भेल? मुदा तैयो घुरनी काकी बीख उतारैतक मंत्र चलौलनि- “बेसी भीड़ भऽ गेल। मन थीर कऽ कऽ नहा-खा लिअ। खा कऽ जखन अराम करब तखन अपने मन चेन भऽ जाएत।” काकीक खट-मधुर गप सोमन काकाकेँ आरो अमता देलकनि। झटकीक झटका जकाँ झटहा झटकि देलखिन- “जअ-तिल आनि उसरैग दिअ। हमहूँ अहाँकेँ उसरैग दइ छी। कोन भाँजमे अनेरे पड़ल छी। जइठाम द्रौपदीसँ लऽ कऽ रघू बाबू धरि कुरसी जमौने छथि। तइठाम पार पाएब असान छै।” ~ हूसि गेल भोज खा बाबा अबिते रहथि कि पोता-रमचेलबा मन पड़लनि। तखने देखलनि जे तीमन-तरकारीक मोटरी माथपर नेने दछिनसँ अबैत अछि। मन सहमि गेलनि जे सभ दिन पोताकेँ संग नेने जाइ छलौं, आ.....। लगले मनमे एलनि जे जे पूत हरि बाहि करए गेल, देव-पितर सभसँ गेल। तइ बीच हाथमे लोटा देखि रमचेलबा पूछि देलकनि- “कतए गेल छेलह बाबा हौ?” बाबा अवाक भऽ गेला। मुदा, आब तँ ओहए सभ ने करत तँए अनुकूल बना राखब जरूरी अछि। निधोख कहलखिन- “बौआ, तूँ हाटपर गेलह, इमहर विजो भऽ गेलै, तँए कि करितौं?” जहिना निधोख बाबा बजलाह तहिना रमचेलबा बाजल- “बनलह किने?” बाबाकेँ मन पड़ि गेलनि। पूर्वांचलक मणीपुरी भोज; जइमे जे वस्तु जते नीक रहै छै ओ ओते पहिने परोसि खुआ दइ छथि। मुदा अपना ऐठाम तँ अन्नकेँ अन्न बुझनिहार आगूमे आएल पहिल अन्नक पूजा करत। बाबा बजलाह- “बौआ, नीक भेलौ जे तों नै गेलेँ।” अपन बात सुनि रमचेलबा बाजल- “से कि हौ?” अनुकूल होइत रमचेलबाकेँ देखि बाबा कहलखिन- “धुर हूसा गेल।” अकचकाइत रमचेलबा बाजल- “से कि हौ?” “कि कहबौ, भात-दालि बड़ पवित्र बनल छलै, तइपर अल्लू-परोरक तरकारी तेहेन बनल छलै जे देखिये कऽ मन हिलसि गेल। खूब खेलौं। तेकर बाद जे नीक-नीक विन्यास सभ अबै लगल, ओकरा दिस के ताकैत।” “तब तँ खूब बनलह?” “अपूछ भऽ गेल।” ~ पोखला कटहर पान सए रूपैआ खर्च भेला पछाति झबरी काकीकेँ आधा छूटपर एक हजार रूपैआ बैंकसँ लोन भेटलनि। अखन धरिक जिनगी बोनि-बुत्ताक रहलनि तँए ओहन रोजगार चाहैत रहथि जे कए सकथि। ओना घरे लग रोजगरिनी सभ छन्हि मुदा जातिक विभाजन काजेाकेँ कम सक्कत विभाजिन नै केने अछि। तँए लगमे रहितो अनाड़ीक-अनाड़िये झबड़ी काकी। मुदा पुछबो केकरा करथिन। एक हजार रूपैआक बात अछि। के केना झपटि लेतनि तेकर ठीक नै। काकीक घरक आगू रस्तापर देने श्याम जाइत रहथि हुनका देखिते काकी टोकि देलखिन- “बौआ सियाम, तोहीं सभ ने बेटा-भातीज भेलह। रोजगार करैले एक हजार रूपैआ लोन देलक हेन।” झबड़ी काकीक बात सुनि श्याम नजरि खिरौलनि। बगलेमे देखि कहलखिन- “पचहीवालीकेँ सोर पाड़ियौ।” पचहीवालीकेँ अबिते श्याम कहलखिन- “भौजी, अहाँ अपना संगे तरकारी बेचैक लूरि सिखा दिऔ। अपनो किछु पूँजी भइये गेलनि। एेबेर तत्ते आम फड़ल अछि जे कटहरकेँ के पूछत। ओना बेसी फड़ने पौखुलाहे कटहर बेसी अछि मुदा चौथाइ कमाइ लऽ कऽ बेचि लिअ।” ~ सरही सौबजा दिन भरि सात गोटेक संग झंझरपुरिया-बेपारी आम तोड़ि, काँच-पाकल, फुटल बेरा टोकड़ी बना, ट्रकक प्रतिक्षामे टहलैत गामक चाहक दोकानपर आबि अनेरे बजैत- “एहेन ठकान जिनगीमे नै ठकाएल छलौं, जेहेन आइ ठकेलौं?” चाहे दोकानक छर्ड़ा बूझि आनो-आन छर्ड़ा छोड़ैत- “झंझरपुरिया तँ इलाकाकेँ ठकैए, ओकरा ठकि लेत हमर गौआँ?” बेपारियोकेँ मनमे किछु रहै तँए पाछू हटैले तैयार नै। बत-कटौवलि एहेन चलि गेल जे ने एकोटा ऐ गामक नीक अछि आ ने झंझरपुरिया। बोलीक मारि तँ धुड़-झाड़ होइत, मुदा आगू बढ़ैक साहस कियो ने करए। एकटा गामक प्रतिष्ठा बूझि दोसर घोड़न-कटान बूिझ। ओना चौकक रोहानी ठीक रहै किएक तँ सूर्यास्तक समए रहए। जटा भाय चौकक रोहानी देखिते चाहे दोकानपर बैसलाह। सामाजिक प्रश्न तँए हस्तक्षेप कएल जा सकै छै। बजलाह- “कथीक घोंघाउज छी?” झंझारपुरबला-बेपारी- “अहीं गाममे लखनजी सँ पाँच हजारमे सौबजा आमक एकटा गाछ नेने छलौं तइमे ठकि लेलनि।” अपन चर्च सुनि लखनजी सेहो मोबाइलिक दोकानपर सँ चाहक दोकानक आगूमे आबि ठाढ़ भेला। बेपारीक प्रश्न उठिते लखनजी पुछलखिन- “कि ठकि लेलौं, बाजू।” बेपारी- “कलमी बूझि नेने छलौं, सरही दऽ ठकि लेलौं? लखनजी- “कत्तेमे नेने छलौं कत्ते के आम भेल?” “से तँ नफगर अछि, पाँच हजारमे नेने छलौं। खर्च-बर्च काटि कहुना पाँच हजार बचबे करत?” जटा भाय- “तखन जे एना बजै छी से उचित भेल?” बेपारी- “हमर बात दोसर अछि। सौबजा कलमी होइ छै। हिनकर अॅठिआहा छियनि, माने सरही छियनि। ओना साइजोमे ठीक छन्हि।” जटा भाय- “अहाँ केना बुझै छी जे मुँह-नाक एक रहितो सरही छी?” बेपारी- “जटा काका, अहूँ भासि जाइ छी। कहुना भेलौं तँ बेपारी भेलौं कि ने। कुमारि-बिऔहितीक भाँज जँ नै बुझबै तँ घटकैती कएल हएत।” ~ तेरहो करम अबेर कऽ भाँज लगने कनटीर काका खेत देखए नै गेला। ओना मनमे उठलनि मुदा भदवारि जानि नै गेला। विचारि लेलनि जे इजोरिया छीहे भोरगरे देखि लेब। छगाएल मन साढ़े तीनिये बजे नीन टूटि गेलनि। नीन टुटिते नजरि दौड़ कऽ काज पकड़ि लेलकनि। तीन-हत्थी ठेंगा लऽ बाध दिस विदा भेलाह। श्रीविधि खेती लेल जे धानक बीआ भेटल छलनि वएह धान। रौदीक किरतबे विधि तँ भंग भऽ गेलनि मुदा सए रूपैये घंटा पटा बीघा भरि खेती केलनि। संयोगो नीक बैसलनि। कोसी नहरिक पहिल पानि हाथ लगने सुतरलनि। नबे दिनक पाकल धानमे भरि जाँघ पानि, चुट्टी-पीपड़ीसँ लदल सीस देखि कनटीर काकाक मन चोटसँ चोटाए लगलनि। असहाज होइते बमछैत घर दिस घूमि गेलाह। मोहनलालक घर लग अबिते आरो बमकि-बमकि बमछी छोड़ए लगलाह। आँखि मीड़िते मोहनलाल अंागनसँ निकलि लगमे आबि पुछलकनि- “काका, एना किअए भोरे-भोर बमकै छिऐ?” ओना कनटीर काका आ मोहनलालक उमेरक दूरी बीस बर्खसँ बेसी हटल मुदा विचारक दूरी लगीच बनौने तँए दुनूक बात दुनू सुनबो करै छथि, कहबो करै छथिन आ मानवो तँ करिते छथि। बमकी सुनि कनटीर काका ठमकि गेला। ठमकैत बजला- “की कहियऽ बौआ, परसू धान काटि तोड़ बागु करैक विचार केने छलौं। तोहूँ तँ खेती करिते छह, तोहीं कहह जे धानक-नारक कि गति हएत, छनुआमे कते भीड़ होइ छै से कि कोनो नै बुझै छहक। तइपर कहिया खेतक पानि सूखत आ कि फेर दोहरा कऽ पानि औत तेकर कोन ठेकान छै?” कनटीर काकाक दहलाइत छातीकेँ खढ़ फेक असथिर करैक विचार मनमे उठिते मोहनलाल बाजल- “डुमैक कोन अाशा करै छी उगैक आस करू।” मोहनलालक तोष जते संतोष देलकनि तइसँ बेसी असंतोष बनौलकनि। मनमे एलनि जे एक तँ ठेकानि कऽ नहरक पानि नै अबैए तइपर जे छहरक बान्ह-छेक नियमित नै अछि। सरकार कहत जे कानून अपना हाथमे नै लिअ। बजलाह- “एको कर्म बाकी नै रहत। तेरहो कर्म भइये जाएत। सबहक नजरि दैछने खाइपर लटकल छै से केना उतरतै?” मोहनलाल- “काका, कूदै-फानै तोड़ै तान, से राखए दुनियाँक मान’ बिसरि गेलऐ?” किछु मन पाड़ैत कनटीर काका बजलाह- “हौ छोड़ियो केना देब, अकाल मृत्यु केना हुअए देब।” ~ डुमैत िजनगी डुमैत कारोबार देखि झड़ीलाल डुमैत जिनगी, जहिना ओछाइनपर पड़ल चारक कोरो-बत्ती लोक देखैत तहिना देखि रहल छथि। तड़पैत मन बेथित भऽ दुनियाँ निहारिते बुदबुदेलनि- “एतेटा दुनियाँमे अपन किछु ने रहल।” मुदा लगले मन ठमकि गेलनि। जिनगी तँ परती खेत जकाँ नै अछि जे जेमहरसँ तेमहर जेबाक हुअए तिम्हरे-सँ-तिम्हर कोना-कोनाी रस्ता बना लिअ। जिनगीक तँ नाप अछि। ओना पचास बर्खक झड़ीलाल अखन धरि हारि मानैले तैयार नै छलाह मुदा एकाएक मृत्युक समीप देखि थर-थरा गेलाह। हारि नै मानैक कारण छलनि जे जे गौरव गाममे केकरो नै देखैत छलाह ओ अपनामे देखैत छलाह। ओ छियनि समैया फसिल जकाँ भिन्न-भिन्न नाओं। अनेको नाओंसँ अपन प्रतिष्ठा बनौने छथि। कियो बेपारी भाय, तँ कियो डाक्टर भाय, कियो दिलीप भाय कहैत छन्हि। मुदा स्त्रीगणक बीच झड़-झड़हा नाओं चलैत। यएह छलनि झड़ीलालक जिनगीक मान-प्रतिष्ठा। मुदा जे होउ झड़ीलाल अपनाकेँ मेहनती बेपारी जरूर बुझै छथि। सालमे तीन-चारि जोड़ मुइल-टुटल बड़द (गाड़ीक टुटल, घास-पानिक टुटल, रोगाएल इत्यादि) सस्तामे आनि, दुनू परानी जमि कऽ सेवा करै छथि आ डेढ़िया-दोबरमे बेचि अपना जीविकाक आधार बनौने छथि। घूमै-फिड़ैबला छथिये तँए तीनू बेटीक बिआह एहेन नजरिये कऽ नेने रहथि, जे कहियो भार नै बुझलनि। अंतिम खेप माने ऐ खेपमे ठका गेलाह। आठे दिन खूँटापर बड़द अनला भेलनि कि पाँचे दिनक बीच जोड़ो भरि बड़द मरि गेलनि। खूँटापर पड़ल मरल बड़द लग बैसल दुनू परानी झड़ीलाल। अक-वक बन्न। तरसैत मन कलपैत देवसुनरिक, जहिना रौद, पानि वा शीतमे सिताएल चिड़ै पाँखि फड़फड़बैत; तहिना मन फुड़फुड़ेलनि- “भगवान हाथक काज छीन लेलनि?” पत्नीक बातक उत्तर झड़ीलालकेँ नै फुड़लनि। फुड़बो केना करितनि, जिनगीमे कहियो पहरनियाँ देवीक पूजा पहाड़पर चढ़ि नै केने छलाह। मुदा तैयो घिंघियाइत स्पष्ट उत्तर देलखिन- “दुनियाँ बड़ीटा छै, एकटा काज छिनाएल दोसर-तेसर-चारिम ताकि लेब।” पतिक उत्तरसँ देवसुनरिकेँ झॅपन-तोपन बरसाती सूर्य जकाँ अाशाक किरण फुटलनि, मुदा लगले फेर तोपा गेलनि। बजली- “काज ले तँ लूरि चाही, से....?” ~ चोर-सिपाही चोरिक बाढ़ि एने गामे-गाम चोरक सोहरी लगि गेल। जहिना घोरन लुधैक जाइत तहिना चोरो लुधकए लगल। सेहो एकरंगा नै, सतरंगा! पाँखिसँ बिनु पॉखिबला घोरने जकाँ घुड़छा-घुड़छे! जेकर बहुमत तेकर राज-पाट! शासक-सँ-सिपाही धरि। अगहन मास। गामक अधासँ ऊपर उपजल धानक खेतमे १४४ लगि गेल। कोनो बटेदारीक चलैत तँ कोनो फटेदारीक। सरकारियो काज तँ सरकारिये छी। एक घंटाक काज मासो दिनमे हएत तेकर कोनो गारंटी नै। तखैन १४४ मे जप्त भेल खेत ४४ दिनक बदला ४४ मासो रहि सकैए। ओस पला गेल। दिन खिआ कऽ पानि भऽ गेल। दिन-राति शीतलहरिमे डूमि गेल। दर्जनो भरि सिपाही धानक ओगरबाहि करैत। अपना जिनगी दिस तकलक तँ बूझि पड़लै जे जान बँचब कठिन अछि। एक बाजल- “खस्सी मासु खेबा जोगर समए अछि।” दोसर बाजल- “जँ बनबैले तैयार होय तँ खस्सी आनि देब।” सएह भेल। दूटा सिपाही विदा भेल। हाथमे हथियारो आ देहमे बर्दियो रहबे करै। दिनके देखल खस्सियो आ घरो छेलैहे। अपने जकाँ एक गोटे मुँह दबलक दोसर उठा कऽ लऽ अनलक। बना-शोना सभ भरि मन खेलक। मुदा दोसरे दिनसँ दुनू गोटेकेँ आन-आन सिपाही चोरबा कहए लगल। सालो नै लगल ग्लानिसँ गड़ि दुनू नोकरी छोड़ि अपन पुरना वृतिमे लगि गेल। एक समाज चोर-सिपाही तँ दोसर समाज सिपाही-चोर कहए लगलै। ~ दूधबला फगुआक समए। पीह-पाहसँ मौसमक रंग चढ़ि रहल छै। दिनुका काज उसारि नित्यानन्द काका दरबज्जापर बैस सालक फगुआक ऊपर-निच्चा विचारि रहला अछि। जाड़सँ गरमीक प्रवेश भऽ रहल अछि। ठाढ़ पानिकेँ इनहोराइले ठंढ मारि तँ सिरसिसाइये पड़तै। जँ से नै तँ इनहोराएत केना। मुदा तेहेन दोखाह दोरस हवा बहि गेल जे सोझ बाट (नीक रस्ता) बालु-गरदासँ अन्हरा कऽ तेहेन बहबाड़ि बनि रहल अछि जे भरि मुँह बाजब कठिन बनल जा रहल अछि। सूर्यास्त तँ भऽ गेल मुदा अन्हराएल नै छलैक। मोटर साइकिलसँ उतरि मनोहर नित्यानन्द काकाकेँ प्रणाम करैत आगूक चौकीपर बैसल। किछु दिन पूर्व धरि नित्यानन्द काका मनोहरकेँ दूधबेचा बुझैत छलाह। मुदा पनरह-बीस दिन पहिने शंका जगलनि से जगले रहि गेलनि। जइसँ विचार बदलए लगल छलनि। मुदा कोनो विचारकेँ बदलैसँ पहिने ऊपर-निच्चा देख लेब जरूरी बूझि पुछलखिन- “कारोबारक की हाल छह?” नित्यानन्द काकाक उत्तर दइसँ पहिने मनोहरक मनमे आएल जे जखन फगुआक सनेस अनने छियनि तखन आगूमे रखैमे काेन लाज। अनेरे साँइक नाओं सभ जानए आ हए-हए करए। जुगोक तँ धर्म होइ छै। के भंगखौका शराब नै पीबैत अछि। ओ सभ तँ नशोकेँ पानि उतारि देने अछि। भाय जखन एकटा प्रेमी अछि तखन तँ जिनगी भरि प्रेम करू नै तँ पुरुखक आँखिसँ गीरब ओते महत नै रखै छै जते मौगीक आँखिसँ। मुदा अपनाकेँ सम्हारि विचार लेब जरूरी बूझि बाजल- “काका, आइक जुगमे दूध बेचने गुजर चलत, तखन तँ...?” नित्यानन्द काकाकेँ ठहकि गेलनि। मुदा तेयौ मन नै मानलकनि बजलाह- “कते गोटे गाममे दूधबेचा छह?” गर पाबि मनोहर बाजल- “काका, आब कि काेनो गाइये-महिसिक दूध बिकाइए। गाछसँ लऽ कऽ लोहा धरिक दूध बिकाइए। कतेक नाओं कहब। जेम्हरे देखै छी तेम्हरे सएह।” सएह केर सह पाबि नित्यानन्द काका हूँहकारी दैत बजलाह- “से सएह।” ~ टाइपिस्ट पच्चीस बर्ख पूर्व मैट्रिक सेकेण्ड डिवीजनसँ पास केलौं। ने नोकरी भेल आ ने लोकक पीहकारी दुआरे खेती केलौं। शत-प्रतिशत अपनाकेँ भारत सरकारक बेरोजगारक बहीमे नाअाें लिखा लेलौं। भरि दिन गप-लड़ौनाइसँ लऽ कऽ ताश जोतै धरिक रूटिंग बना लेलौं। किछु दिन पछाति बूझि पड़ल जे भरिसक हमरा सबहक फाइल लाल-फीताक तरमे पड़ि गेल। अोना पाँच बर्ख रेगुलर बेरोजगार रहलौं, मुदा एक दिन तामस उठल नवीकरण करौनाइ छोड़ि देलौं। तेकर बाद कोन बेरोजगार भेलौं तेकर अर्थ नहिये तहिया लागल आ ने अखनो बुझै छी। जेकर खर्च लाख रूपैआ, उपजे सबा सेर! देबएबला भगवान छथि, लगौता कोनो फेर। सबूर तँ भेल मुदा मन नै मानलक। तखन भेल जे किछु करक चाही। ओना मन तँ छह-पाँच केलक मुदा टाइप-राइटिंग मशीन कीनैक विचार भेल। कीनलौं। टाइपिस्ट बनि अपनाकेँ ठाढ़ देखलौं। ओना बजारक भावे ठीके छी। आब कहू जे एहनो होइ जे जते कागज-पत्तर टाइप करब से गणेशजी जकाँ बूझबो अनिवार्य अछि। आकि टाइप करैक पाइ लइ छिऐ, टाइप कऽ देबइ। जँ केतौ छुटो-छाट हेतै आकि शब्दो गलती हेतै, से दोख मशीनक हेतै आकि हमर हएत? कहू जे केहेन बूड़िपना सोहनक भेल जे पुछलनि- “कागजमे कि सभ छलै?” सोहन इंजीनियरिंग पढ़ि बंगलोरमे काजरत छथि। बिआही पत्नी शिक्षिका छथिन। कनिये तरपट ई छन्हि जे एक गोटे बंगलोरमे छथि दोसर गाममे। ओना सोहनोक सोचब गलती नै भेलनि। कमेता बंगलोरमे रहता बंगलोरमे आ घरवाली रहथिन गामक घरमे से केहेन हएत। जिनगीक तँ स्तर होइ छै। शिक्षिका पत्नी थूक फेक अनठबैत एली जे अपने कि कोनो नै कमाइ छी जे एहेन छुतहरक कमाएल खाएब। मुदा संगी-तुरिया पीठपोहू भेलनि। दुनू बेकतीक भेद न्यायालय पहुँचि गेल। ओही कागजक कच्चा नकलक बात सोहन पुछने छलाह। ~ समदाही अनुप काकाकेँ दूटा पत्नी छन्हि। गृहस्ती जीविका रहने तीनू परानी अपन-काजमे दिन-राति मगन रहै छथि। दुपहरिये रातिसँ मालक तकतियान अनुप काका करए लगै छथि। सभ दिन संग रहितो जहिना दिन-राति बारहो मास घुसुकि-घुसुकि अपन काज करैत रहैए तहिना तीनू परानीक बीच सेहो होइते छन्हि। मुदा जहिना लोकक धियान दिन-रातिपर नै पड़ैत छैक तहिना अनुपो काकाक धियान नै पड़ैत छन्हि। हमरा खेलासँ काज तँ हमरा पीलासँ काज, बस एतबे। समए केकरा संग छोड़ै छै जे अनुप काकाकेँ छोड़तनि। जखने अधरतियामे उठताह आकि मुँह-हाथ धोइते पहिने चाह पीता। जहिना कतौ चलैसँ पहिने माए अपन बच्चाकेँ खुअबैत अछि तहिना अनुपो काकाकेँ दुनू सौतिन करिते छन्हि। ओना नियमित काज बाँटल दुनू सौतिनमे नहिये छन्हि, नजरियेसँ बाँटि-बाँटि काज करै छथि तँए ने कहियो उपराँउज होइ छन्हि आ ने बैसारी बूझि पड़ै छन्हि। दू बजे रातिमे चाह पियाएब, तोहूमे जाड़क मासमे से अबूह तँ दुनू सौतिनकेँ लगबे करनि। केतबो पति सुख लोककेँ भेटौ मुदा जाड़ोक तँ अपन सुख छै। मुदा थर्मसमे चाह बना पति सेवा दुनू कऽ लैत छथि। काजो असान भऽ जाइ छन्हि। एतबे ने जे थर्मससँ गिलासमे ढारि दिअ पड़ै छन्हि। काजक बँटबारा नै रहने कहियो बिआही तँ कहियो समदाही पिअबैत रहै छन्हि। काज करैक ढंग दुनूकेँ अपन-अपन छन्हि। बिआही गिलास धो उनटा कऽ रखै छथि, जखन कि धोइ दुआरे समदाही गिलासेमे पानि रखि दइ छथिन। चाहक सुआद पबिते अनुप काका बूझि जाइ छथि जे केकर िकरदानी छी मुदा कहबो केकरा करथिन। कोनो आंगुर कटने अपने घाव। तहूमे सौतिनियाँ डाह, घरेसँ सड़ेरा उठत। तहूमे खेती-पथारीले नै, खाइ-पीबैले! भरि दिन अनेरे मगजमारीमे ओझरा जाएब। तइसँ नीक चुपे रहब। करसीक लहलहाइत घूर लग बैसिते बिआही चाह नेने एलखिन। चुस्की लइते अनुप काकाकेँ बजा गेलनि- “हँ, औझका चाह चाह जकाँ लगैए किने!” बजलाह तँ अनुप काका फुसफुसाइये कऽ मुदा समदाही सुनि गेलखिन। फरिक्कैसँ जुमा कऽ फेकलनि- “बड़ काग भाषा सुनिनिहारि भेल छथि।” ~ बुढ़िया दादी नै जानि दादीकेँ एहेन क्रोध किअए भऽ गेलनि। एक तँ ओहुना बैशाख-जेठक सुखाएल जारनि चरचराइत रहैए, खढ़क छाड़ल-छार पटपटाइत रहैए, तइ हिसाबे दादीयोक खटखटाएब अनुकूले भेल। दादी माने तीन पीढ़ी ऊपर नै कि गामक बनौआ दादी। नवो-नौताड़ि बनौआ दादी होइते छथि, उचितो छैक। आठ-दस बर्खक पोता अपन कुत्ताकेँ अनठियासँ लड़ा देलक जइसँ कोनचरक सजमनिक गाछ टूटि गेलनि, तेकरे तामस दादीकेँ पोतापर रहनि। जखन टुटलनि तखन बाधमे रहथि तँए नै देखलखिन। तखन ततबे, कुत्तेक झगड़ा भरि। बारह बजे बाधसँ अबिते, जहिना हजारो चेहराक बीच प्रेमीक नजरि प्रेमिकापर जा अँटकैत, तहिना दादीक नजरि सजमनिक गाछपर पहुँचि गेलनि। लटुआएल-पटुआएल पड़ल देखलखिन। नरसिंह तेज भेलनि, मुदा परिवारक सभ गबदी मारि देलक। तँए अधडरेड़ेपर तामस अँटकि गेलनि। जँ अकासक पानिकेँ धरती नै रोकए तँ पताल जाइमे देरी लगतै? दोसरि साँझ जखन बाधसँ घूमि कऽ दादी एलीह तँ नीक जकाँ भाँज लगि गेलनि जे पोताक किरदानीसँ गाछ नोकसान भेल। तामस लहड़ए लगलनि। छौड़ाकेँ सोर पाड़लखिन- “अगतिया छेँ रौ, रौ अगतिया?” नाओं बदलल बूझि गोविन्दोकेँ अवसर भेटलै। अन्हारे गरे चौकी-दोगमे नुका रहल। अपने फुड़ने दादी भट-भटाए लगली- “भरि दिन छौड़ा एम्हर-सँ-ओम्हर ढहनाइत रहैए आ कुत्ता-विलाइ तकने घुड़ैए।” मुदा लगले मन ठमकि गेलनि। भरिसक अंगनामे नै अछि, खाइ-बेर भेल जाइ छै, कतए छिछिआइ ले गेल अखन धरि अंगनामे नै अछि। पुतोहुकेँ पुछलखनि- “कनियाँ, बौआ कहाँ अछि।” बेटाकेँ अपन जान सुरक्षित बूझि पुतोहु बजली- “बड़ी कालसँ नै देखलिऐ।” पोताकेँ तकैले बुढ़िया दादी विदा भेली। सुतै बेर गोविन्दा अलिसाएल आबि दादीकेँ कहलक- “दादी बिछान बीछा दे।” गोविन्दक बात सुनि दादी पिघलि गेली। ओछाइन ओछा कऽ सुता देलखिन। सेन्धपर पकड़ल चोर जकाँ, तामस फेर कड़ुआ गेलनि। मुदा निनियाँ देवीक कोरामे देखि क्रोध घोंटए लगली। अखन छोड़ि दइ छिऐ, भोरहरबामे पेशाब करैले उठेबे ने करत। बुझतै केहेन होइ छै सजमनिक गाछ तोड़नाइ। जाबे सभ करम नै कराएब ताबे चालि नै छुटतै। भाेरहरबामे गोविन्द दादीकेँ उठबैत बाजल- “दादी-दादी।” दादी गबदी मारैक विचार केलनि। मुदा तीन बेरक बाद तँ गरियेबे करत, तइसँ नीक जे तेसर हाकमे अपने बाजि देबइ। की हेतै, एकटा सजमनियेँक गाछ ने टुटल। फेर रोपि लेब। ~ ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। सत्यनारायण झा विहनि कथा:-- सुटिया अन्हार गुफ्फ ।हाथ हाथ नहि सुझैत । आकाश साफ़ रहैक ।पूरा आकाश तारा सं आच्छादित ।निरवता तँ तेहन रहैक जे हृदय मे अनेरे सनसनाहट बुझाय ।भगजोगनिक यत्र तत्र प्रकाश रात्रिक निरवता कऽ आओर प्रखर केने रहैक ।पक्षी सभ अपना खोता मे तेना ने सुतल रहैक जे कतौ सं कोनो आवाज नहि अबैत रहैक ।एकदम शांत ।वायुक वेग मे केखनो कऽ बाँसक झुरमुट ऊपर नीचा भऽ जायक लगैक जेना कोनो अदृश्य शक्ति ओकरा हिला रहल छैक । एहन अन्हरिया राति नहि देखने छलियेक ।हम ओही दिन कतेको अंतराल कऽ बाद इलाहाबाद सं गाम आयल रही ।हम ओहि समय इलाहाबाद मे पढ़ैत रही ।भोजनोपरांत हम अपन दलान पर सुतल रही ।नींद नहि होयत रहय ।दोसर पहर राति बित गेल रहैक ।कनेके काल पहिने बाँध बोन में गिदरक हुआ हुआ सुनने रहियैक ।कतबो प्रयास करी नींद हेबे नहि करय ।छटपट करैत परल रही ।तखने दलानक कात कनैलक गाछ लग कुकुर कानय लगलैक ।कुकुरक रुदन हमरा देह मे कपकपी भरि देलक ।कनेक मोन कऽ स्थिर केलौ ।आब बुझायल निद्रा देवीक आगमन भऽ रहल छनि । अर्द्धावस्था मे रही ।तखने बुझायल पुबारी कात सं दुर दुर सं केकरो विलाप करबाक आवाज आबि रहल अछि ।निद्रा देबी पुनः लंक लेलनि ।एतेक राति मे के कानि सकैत छैक ?अनुमान सं बुझायल जे मलहटोली सं कनबाक अवाज आबि रहल छैक ।विलाप तँ एहन करैक जेना अंतरात्मा सं चित्कार करैत होयक ।ओह ,कियो भारी बिपति मे कानि रहल छैक ?ओहिना ओछेन पर परल रही ,ताबे आँगन दिस सं माय अयलीह आ उठा कहय लगलीह जे लगैत अछि जेना सुटिया कनैत छैक ।ओकर बेटा बच्चेलाल बर जोर दुखित छैक ।मियादी ज्वर लगैत छैक ।सुटियाक नाम सुनिते मोन दुःख सं भरि गेल ।ओ हमरा घरक खबासनी छल ।एकेटा बच्चा भेल रहैक तँ ओकर पति भोकरहा मरि गेलैक ।बेटाक कारण सगाइ नहि केलक ।ओकर निर्बाह हमरे घर सं होयत छलैक ।हमरा सात्विक सिनेह सुटिया सं छल ।हम ओकरा बेटा सं चारि पाँच सालक पैघ रहियैक ।बच्चे रही तँ सुटिया हमरा मायसन सिनेह देने छल ।बर माने ।हम बच्चे सं ओकर पाछू पछु दौड़ैत रहैत छलौ ।आत्मीय सिनेह छल ।गाम आबी तँ सुनिते ओ दौड़ जायत छल ।अपना हाथे पानि पियाबति छल ।हमरा माय कऽ पूरा सम्हारैत छलैक ।आइ नहि आयल तँ मोन में एकबेर ठह्कल मुदा भेल नहि बुझल हेतैक ?आब तँ ओकरो बच्चेलाल सोलह –सत्रह बरखक भऽ गेलैक ।मुदा ----।मायक मुँह सं जहिना सुनालियैक ,तुरत ओकरा घर दिस भागलौ ।वास्तव मे बच्चेलाल कऽ तुलसी पीड़ा लग सुता देने रहैक आ ओकरा देह पर सुटिया अपन देह बजारि चिचिया रहल छलैक ।हमरा देखिते सुटिया पैर पर अपन कपार पीटय लागल ।ओ बेहोश भऽ गेलैक ।ओकर दांती छोरेलियैक मुदा होश मे अबिते ओ ओहिना कपार पिटय लगैक ।बच्चेलाल निष्प्राण भऽ गेल रहैक ।ओ एहि दुनिया कऽ छोरि चुकल छल । कनेकालक बाद लोक सभ एकटा ठठरी बना कऽ अनलकै \ ओहिपर बच्चेलाल कऽ धय देलकै आ राम नाम सत्य छै ,कहैत ,सभ श्मशान दिस बिदा भऽ गेलैक । ओकरा अंगना सं सभ चलि गेल रहैक ।सुटिया असगरे कनैत रहैक ।बगल मे हमहू ठाढ़ रहियैक ।एक बेर ओकर आँखि हमरा आँखि सं मिललय ।ओकर दर्द जेना हमरा पूरा शरीर मे समा गेल ।नहि रोकि सकलौ अपना कऽ आ ओकरा भरि पाँज पकरि अपना करेज मे सटा लेलौ आ जोर जोर सं कानय लगलौ जेना माय कऽ पकरि बेटा कनैत छैक । रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। मुन्नी कामत विहनि कथा- कैंसर रोगी- बाप रे बाप ........आब नै जिबै....... माय गे माय..............हो...........दौड़ऽ होउ लोक सब डॉक्टर- चुपु, ई अस्पताल छिऐ, अहाँ कऽ दलान नै जे एना ढ़करै छिऐ। की भेल, देखै सँ तँ भला चंगा छी, कोन तकलीफ यऽ। रोगी- डॉक्टर साहेब, हम एगो आम आदमी छी। हमरा कैंसर भेल अछि जे हमर प्राण लऽ कऽ हमर पीछा छोड़त। हमरा मरै कऽ गम नै अछि पर हमर पुरे परिवार कऽ सेहो ई कैंसर अपना गिरफत मे लऽ रहल अछि। की हमरा आ हमरा परिवार कऽ मुक्ति मिलत? डॉक्टर- हअ-हइ, किएक नै। दुनियामे एहन कोनो बीमारी नै अछि जकर आइक युगमे इलाज नै होइत अछि। पर अहाँ कऽ आ अहाँक पुरे परिवार कऽ कैंसर अछि ई अहाँ केना जनै छी? एना भइए नै सकैत अछि। देखै सँ तँ अहाँ पागल नै लगैत छी, फेर पागल जेकाँ बात किए करैत छी। पहिले जॉंच कराउ, फेर इलाज शुरू करब। रोगी- डॉक्टर साहेब, की जाँचब अहाँ, कि हमरा घरमे आइ सात दिन सँ सब उपास यऽ कि नै? सरकार घर मे गोदामक-गोदाम अन्न सड़ैत अछि पर हम गरीब एक मुटठी अन्न लऽ तरसि रहल छी। आकि ई जाँचब जे हम कतेक दिन सँ प्यासल छी। ने देह मे आगि लगबै लऽ मटिया तेल अछि ने जहर खाइ लेल जेब मे पाइ। डॉक्टर- अहाँ की कहि रहल छी? हमरा समझमे किछु नै आबि रहल अछि। रोगी- कहियो गरीबी कऽ जिंनगी जिलिऐ हऽ डॉक्टर साहेब। हमरा मंॅंहगाइ, गरीबी, लाचारी आ बेरोजगारी अइ तरहक अनेक बिमारी गरसने अछि जे आब कैंसरक रूप लऽ लेलक। कहुँ अहि लाइलाज बिमारी कऽ इलाज अछि अहाँक डॉक्टरी दुनियामे? डॉक्टर- ऐ बिमारी सँ तँ कोइ नै बचल अछि। ई तँ दिन-प्रतिदिन भयंकर रूप लेने जाइ यऽ। अकरा सँ मुक्ति तँ मौते दिया सकै यऽ। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। महेन्द्र मलंगिया मूर्दाः श्रृंगार संघर्ष आ द्वन्द्व ई सर्वविदित अछि — काव्येषु नाटकं रम्यम् । अर्थात काव्यमे नाटक सभसँ आनन्दप्रद अछि । एहिसँ दू टा बात अभरिकऽ हमरा लोकनिक सोझामे अबैत अछि — पहिल तँ ई जे नाटक एक प्रकारक काव्य अछि आ दोसर, ओहि काव्यमे सभसँ बेसी आनन्दप्रद । एहि दुनूमेसँ दोसर बातपर कोनो आंगुर नइ उठल अछि । एकरा ध्वनि मतसँ सभ स्वीकार कएलक अछि , मुदा पहिल बातपर आंगुर उठव शुरू भऽ गेल । सभसँ पहिने पंडित जगन्नाथ एहिपर आपत्ति उठौलन्हि । ओ कहलन्हि जँ रसव्यंजककेँ काव्य मानल जाए तँ नाटकीय अंग अभिनय आदिकेँ रसव्यंजक भेलासँ निश्चिित रूपेण एकरा काव्य कहबामे आपत्ति होयत । एहिना अलंकार चिन्तामणिक पंचम परिच्छेदमे जिनसेनाचार्य द्वारा – काव्यादौ नाटकादौ कहिकऽ अलग– अलग सत्ता स्वीकारल गेल अछि । ओेहूना जँ देखल जाए तँ काव्य काविक कर्म छियै आ नाट्य नटक । संगहि नाट्य खेल अछि जकरा देखल आ सुनल जा सकैछ । एहिमे आँखि आ कान दुनू व्यस्त रहैछ, मुदा काव्यमे काने टा । आचार्य भरत नाटक सम्बन्धमे सेहो कहने छथि व्रक्रीडनीयकममिच्छामो दृश्यं श्रव्यं च यद्भवेत । अर्थात नाटक खेल अछि, देखबाक चीज अछि आ ओ श्रव्य सेहो अछि । एतदर्थ एकरा मंचक विभिन्न प्रक्रियासँ गुजरऽ पड़ैत छैक । एहना स्थितिमे कोनो कवि वा उपन्यासकार वा कथाकार जखन एहि साहित्यिक विधासँ टपिकऽ नाट्य साहित्यक क्षेत्रमे अबैत छथि आ एकर मूल्यांकन करऽ लगैत छथि तँ ओतेक सटीक नइ भऽ पबैत छथि । लेखन आ सम्पादनसँ ल’ क’ समीक्षा धरि कतेको एहन स्थल हमरा भेटल अछि जतऽ ओ चुकल बुझना जाइत छथि । एहिसभक जँ उदाहरण देबऽ लागब तँ एकटा पोथा तैयार भऽ जाएत तथापि हम एक–आध टा उदाहरण अवश्य देबऽ चाहब । यथा—जीवन झाक नाटक ‘सुन्दर संयोग’ मे चतुर्थ अंकक पर्दा खसैत अछि । मंचपर कोनो पात्र प्रवेश नहि करैत अछि, मुदा सात–सात टा गीत नेपथ्यसँ चलैत रहैत अछि । एकर बाद रथोद्धतामे दू पाँती गबैछ, मुदा कादम्बरीक प्रवेश नहि देखाओल गेल अछि । पुनः जे नवम गीत अछि ओ नेपथ्यसँ अछि कि मंचसँ तकर उल्लेख सेहो नहि अछि । एकर मतलब जे नाट्यकारकेँ रंगमंचक जानकारीक अभाव छन्हि । एहिना मिथिला मिहिर, १३–०५–१९६२ ई. मे प्रकाशित राधाकृष्ण चौधरीक नाटक ‘राज्याभिषेक’ मे राजधर कहैत अछि – चलू, आइ संध्याकाल कोनो गाछी दिस घूमि आबी । पुनः कोष्ठमे देल गेल अछि — साँझुक पहर, तीनू गोटए गाछीमे पहुँचलाह आ देखलनि ओतऽ हाँजक— हाँज छौड़ीसभ विद्यापतिक गीत गाबि रहल अछि । ई लोकनि कातमे बैसि मजा लैत रहलाह ।’ आब साँझुक पहर, गाछीमे पहुँचब आ हाँजक–हाँज छौड़ीसभके विद्यापति गीत गबैतक जानकारी प्रेक्षककेँ कोना भेटतैक ? ने दृश्य परिवर्तन, ने चलबाक माइम, ने कोनो संवाद आ ने दृश्य निर्माण । जखन कि नाट्यकार आ संपादक जानल–मानल विद्वान छलाह । आब जँ समीक्षाक बात करी तँ ओकरा हास्यास्पद छोड़िकऽ आओर नहि किछु कहल जा सकैए । एहि बातक पुष्टिक दू–तीन वर्षक भीतर प्रकाशित किछु समीक्षासँ कएल जा सकैछ । हमरा नइ लगैए जे नाट्यकर्मक एकोरत्ती छूति हुनका लोकनिमे छन्हि । उपर्युक्त बात सभकेँ देखैत आब हम नाट्यकार रमेश रञ्जनपर अबैत छी । ई एकटा सफल अभिनेता रहलाह अछि । तें रंगमंचक जे तकनिक छैक ओकरा हिनका पूर्ण ज्ञान छन्हि । अतः एकर उपयोग अपना नाटकमे सफल ढंगसँ कएलनि अछि । एकर प्रमाण एहि नाटकक संवाद अछि जे अपना लयमे चलैत अछि । संगहि प्रत्येक संवादकेँ बजबामे ओष्ठकेँ सुलभताक अनुभव होइत छैक । किएक तँ संवाद छोट–छोट अछि । एकर जड़िमे हिनक अभिनेताबला गुण काज कएलक अछि । आखिर मंचपर संवाद अभिनेते बजैत छैक । तें ओ एहन संवादकेँ किन्नहुँ समावेश नहि करत जाहिमे ओष्ठ सुलभता नहि होइक । एतबए नहि, एकटा सफल निर्देशक सेहो रहबाक कारणेँ पात्रसभ सेहो मंचपर सक्रिय रहैछ । मंच निर्देश सेहो उचित ढंगसँ कएल गेल अछि । एमहर आबिकऽ किछु गोटे ‘पुरुष एक– पुरुष दू’ अथवा ‘युवक एक एक–युवती’ एक कहिकऽ जे नाटकमे पात्र रखैत छथि ताहिपर आपत्ति उठौलनि अछि । मुदा हम कहब जे एहन आपत्तिमे कोनो जान नहि अछि । आओर ई आपत्ति परोक्ष रूपसँ पाठ्य नाटकक ओकालत करैत अछि, मंचीय नाटकक नहि । किएक तँ नाटक पाठक वस्तु नहि, ओ तँ प्रेक्षकक वस्तु छियैक । आओर प्रेक्षकक हेतु नाटकमे युवक, पुरुष, स्त्री तथा युवतीक हेतु नाम दऽ देल गेल रहैत छैक । संवादमे पुरुष, स्त्री, युवक, युवती आदि कहिकऽ नहि अबैत छैक । मंचक आगाँ बैसल प्रेक्षककेँ केओ नहि कहैत छैक जे ई पुरुष एक वा दू छियैक । एहना स्थितिमे पुरुष एक वा दू पर आपत्ति उठाएब बिल्कुल असंगत लगैत अछि । एहि नाटकपर दुरुहताक चार्ज लगाओल गेल अछि । मुदा एहि मादे अपन विचार व्यक्त करबासँ पहिने हम प्रेक्षकक सम्बन्धमे किछु विचारणीय तथ्य दिस जाए चाहब – प्रेक्षक विभिन्न प्रकारक होइत अछि । आओर ई विभिन्नता वयस, शिक्षा, पेशा आदि पर निर्भर करैत छैक । बच्चा सभक वास्ते ओहन नाटक चाही जाहिसँ ओकर बालसुलभ जिज्ञासाक पूर्ति होइक । मुखौटा लागल पात्र आ अवस्थाक अनुकूल संवाद ओ सभ बेसी पसिन करत । तहिना निरक्षर आ अखरकट्टू प्रेक्षक ग्रामीण कलाकारद्वारा प्रस्तुत लोकनाट्यकेँ बेसी पसिन करत । किएक तँ एकरा बुझबाक लेल ओकरा बेसी मानसिक श्रम नहि करऽ पड़ैत छैक । इएह कारण अछि जे कोनो लोकनाट्यक पाछाँ निरक्षर आ अखरकट्टू जनसमुदाय ढंगरि जाइत अछि । ओहीठाम पढ़ल—लीखल लोक एहिमे नगण्येक बराबर रहैत अछि । एकरा लोकनिक हेतु ओहिसँ इतर नाटक चाही । एकटा बात आओर—देश, काल आ परिस्थिति नाटकक मीटर होइत छैक जाहिपर नाटक अपने आप बाजऽ लगैत अछि । तें जँ हमरा रेडियो नेपाल सुनबाक अछि तँ मीटरकेँ ओहिपर घुसकाकऽ आनऽ पड़त । हमरा नीक जकाँ मोन अछि जे एकटा मित्रकेँ सैमुअल बैकेटक नाटक ‘इण्ड गेम’ पढ़ऽ लेल देने रहियनि । एक मासक बाद हुनका कहलियनि जे नाटक पढ़ल भऽ गेल तँ दऽ दिय । एहिपर ओ जवाब देलनि जे ‘पढ़ल तँ नइ भेल अछि , मुदा लेब तँ लऽ लिय । कारण, हम बुझबे नइ करै छियै ।’ बैकेटक ओ नीक नाटक अछि जे द्वितीय विश्व युद्धक बाद लिखल गेल छल । एकरा हिटलरक पराजय आ वर्लिन पतनसँ जोड़ल जाए तँ सभ मिलि जएतै । एहिना ई नाटक ‘मुर्दा’ अछि । ओहि कालखण्डमे नेपालक शासन राजाक अधीन छलैक । यमराज एहिठाम राजाक प्रतीक अछि । चित्रगुप्त प्रधान दरबारी अछि जे राजाक छत्रछायामे विभिन्न कुकृत्य करैत अछि । देखल ने जाए—चित्रगुप्तः हँ सरकार, असलमे मृत्युभुवनकेँ स्वच्छ रखबाक दायित्व तँ हमर अछि । अपने तँ निमित्त पात्र मात्र छी । एहि संवादसँ ई बात साफ भऽ जाइत अछि जे मृत्युभुवन अर्थात नेपालकेँ केहन साफ करैत होएतैक । संगहि ई सफाइ ककरा नामपर होइत छैक तकरा लेल तँ निमित्त पात्र अछिए । एहि नाटकक केन्द्र विन्दु मुर्दा अछि जे सत्ताद्वारा बनाओल जाइत अछि । किएक तँ ओ मुर्दा मात्र पर शासन कऽ सकैत अछि, जागरुक लोकपर नहि । तें सत्ता चाहैत रहैत अछि जे सभकेँ मुर्दा बना दी । एहिव्रmममे सत्ता दू टा हथियार अपनबैत अछि – पहिल तँ ई जे ओ सुख–सुविधाक जाल फेकैत अछि । आइ — काल्हुक पूजीपतिसभ पूर्वक पूजीपतिकेँ गारि पढ़ैत छैक जे जखन बुझलकै जे मार्क्स एतेक प्रखर बुद्धिक अछि तँ ओकरा सभ सुख–सुविधा जुटाकऽ बेकार किएक ने कऽ देलक । एहि बातक चरितार्थ ई नाटक करैत अछि । देखल ने जाए— बूढ़ा ः ओ दूर होइत गेल हमरा सभसँ आ शासनक नजदिक होइत गेल । शासन ओकरा गुड़क ढेप बुझाइक । ओ बुझऽ लागल रहय जे एहिमे सटल रहलासँ हमरा स्वर्गी आनन्द भेटत । शासनक आनन्द अर्थात स्वर्गक आनन्द लेल जीवनकेँ छोड़ि देलक । आब तेसर मार्ग छैक दमन । एकर आगाँ लोक मुह नहि खोलि पबैत अछि । एहि बातक पुष्टि निम्नांकित संवाद करैत अछि — बूढ़ा ः एहि सभक बलपर अपना भीतरमे अद्भुत क्षमताक विकास कएनाइ एखन दुलर्भ छै । हवाक गतिक विरुद्ध के ठाढ़ हैत ? उफनैैत नदीक विपरीत दिशामे आगू बढ़बाक के दुस्साहस करत ? शासनक विरुद्ध स्वर निकालबाक इच्छा–शक्ति के देखाओत ? एहि तरहें नाट्यकार दमन आ पोषण सत्ताक दूू टा आँखि मानैत छथि जे अक्षरशः सत्य अछि । देखल जाए ई संवाद — युवक २ ः शासनक आँखिसँ दू टा रोशनी निकलै छै । एकटा जरबऽबला आ एकटा बढ़बऽबला । जे जिन्दा रहल तकरा जरौलक आ जे मुर्दा भऽ गेल ओकरा बढ़ौलक । एहिठाम जिन्दाक तात्पर्य ओहि व्यक्तिसँ अछि जे सत्ताक विरुद्ध किछु बजबालए तैयार होइत अछि । एहन व्यक्तिकेँ जराओल जाइत छैक अर्थात नाना प्रकारक कष्ट देल जाइत छैक । एकर विपरीत जे मौन भऽ गेल अर्थात मुर्दा भऽ गेल ओ विभिन्न तरहक सुख भोगैत अछि । उपर्युक्त हथकण्डा अपनौलाक बादो विद्रोहक ज्वाला फुटबे करैत छैक । आओर ओहि ज्वालामे केहनो तानाशाह भस्म भऽ जाइत अछि । एहन उदाहरणसँ इतिहास भरल पड़ल अछि । तें नाट्यकार हतोत्साह नहि होइत छथि । ओ एकटा बूढ़ पात्र गढ़ैत छथि जे समयकेँ घीचिकऽ अपना संग लऽ अनैत अछि । एहने वयक्तिपर तँ लोक विश्वास करैत अछि । एही विश्वासक प्रतिफल छैक जे पुरुष एक, दू, तीन आ चारि बूढ़ाक इर्द–गिर्द जमा भऽ जाइत अछि । ओ सभ चित्रगुप्त आ ओकर सहयोगीकेँ अपना घेरामे लऽ लैत अछि । एहना स्थितिमे यमराज सत्तासँ कोना अलग–थलग भऽ जाइत अछि तकर अनुमान सहजहिं लगाओल जा सकैछ । नाटकक महत्वपूर्ण श्रृंगार संघर्ष तथा द्वन्द्व अछि । ई संघर्ष तथा द्वन्द्व स्वीकृत यथार्थ आ अस्वीकृत यथार्थक बीच उत्पन्न होइत अछि । एहि स्वीकृत तथा अस्वीकृत यथार्थक संवाहक क्रमशः खलनायक तथा नायक होइत छैक । एहि दुनूक बीच घात–प्रतिघात चलैत रहैत अछि । नायक चाहैत अछि जे स्वीवृmत यथार्थक स्थानपर अस्वीकृत यथार्थकेँ स्थापित करी । अतः नायक आ खलनायकक बीच संघर्ष होइत छैक । एहन संघर्ष एहि नाटकमे भरपूर देखल जाइछ । यमराज अ चित्रगुप्त सभकेँ मुर्दा बनबऽ चाहैत अछि जकर प्रतिकार बूढ़ा करैत अछि । आ, जतऽ प्रतिकार होएतैक ओतऽ संघर्ष नहि होएबाक कोनो प्रश्ने नहि उठैत छैक । तहिना प्रस्तुत नाटकमे द्वन्द्व सेहो प्रचुर देखल जाइछ । नाट्यकार देखबैत छथि जे सत्ता लोककेँ मुर्दा बनबैत छैक आ से गुड़क ढेप देखाकऽ अथवा डंटा देखाकऽ । मुदा किछु लोक सोचैत अछि जे एहि दुनूक विरुद्ध ठाढ़ भेल जाए । एहना स्थितिमे युवक आ पुरुष लोकनिमे भयंकर द्वन्द्व उत्पन्न होइत छैक जे नाट्यकारक सफलताक द्योतक अछि । कोनो रचनाक वास्ते शीर्षक एकटा महत्वपूर्ण स्थान रखैत अछि । किएक तँ शीर्षक कोनो रचनाक विषयमे बहुत किछु कहैत छैक एहि दृष्टिएँ प्रस्तुत नाटकक शीर्षक ‘मुर्दा’ बहुत उपयुक्त अछि । किएक तँ मुर्दाक चर्चा प्रस्तुत नाटकमे बेर–बेर आएल अछि । अन्तमे हम इएह कहब जे प्रबुद्ध प्रेक्षकक बीच एहि नाटकक आदर हेतै से हमरा पूर्ण विश्वास अछि । नाट्य क्षेत्रमे नाट्यकारक भविष्य उजज्वल छन्हि से हम मानैत छी । ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। जगदानन्द झा मनु, ग्राम पोस्ट- हरिपुर डीहटोल, मधुबनी लघुकथा- कमलू पूष मास, जाड़ अपन चरम सीमापर । लगातार पन्द्रह दिनसँ शितलहरी । गामक एकटा टूटल- फूटल खोपड़ीक असोरा । जाड़सँ बचैक हेतु असोराकेँ बाँकी दुनूकात बोड़ाक ओहाड़ । एकटा पुरान टूटल-फूटल चौकीपर पुआरक ओछैन, ओहिपर करीब सत्तैर बरखक बेमार असहाय कमलु । माए-बाबू बड्ड सिनेहसँ ओकर नाम कमल रखने रहथि, मुदा अभाब आ गरीबीसँ संघर्ष करैत -करैत कमलसँ कमलुमे बदैल गेल । गरीबी आ बुढ़ापा ओहिपर बीमारीसँ सताएल जीर्ण-शीर्ण शरीर, अभाबक कारण अप्पन बएससँ दस बरखक बेसीएक लगैत । उपरसँ जाड़क एहन हाल । जाड़सँ कपैत लगातार खोंखी करैत । खाँसैत-खाँसैत कखनो बिचमे राहत भेटै छै तँ मुहसँ, कहु तँ करेजासँ दर्दक थकान संगे दुख मिलल आह ओकर मुहसँ निकलैत । ओहि आहसँ किन्चीत एक बेर पाथरो पिघैल जाए, मुदा कमलुक आह सुनै बला ओकर दर्दकेँ बुझै बला ओहिठाम कियोक नहि । नै कियो देखभाल करै बला आ नै कियो पुछै बला । मुदा कमलुक आह आ खोंखीकेँ शाइद एहि बातक ज्ञान नहि, तैँ तँ ओ रुकैक नाम नहि लए रहल छलै । खोंखी आओर बेसी असहनीय आ विभत्स्यए भेलजा रहल छलै ।। खोंखीक वेककेँ सम्हालेमे असमर्थ, कमलु एकाएक अपन सम्पूर्ण बलकेँ एकठ्ठा करैत अपन दुनू हाथसँ छातीकेँ कैस कए दबाबैत बैस रहल, कि तहने ओकरा पानिक तलब महसुश भेलै । आ ओकर मुहसँ अनायास निकैल परलै -"पानि -पानि " मुदा ! अभागा कमलु ! असहाय कमलु ! ओहिठाम ओकर बास्ते एक घूँट पानि दै बला कियोक नहि । इ बिचार कमलुकेँ मोनमे अबैत देरी ओकर मुहपर दर्द भरल व्यंगक एकटा मुस्की चमैक गेलै । जेना ओ अपन वाक्यपर पचता रहल हुए । अपन दर्दकेँ ठोरपर अनि दाँतसँ कटैत, लाठीक सहारा लैत चौकीक निच्चा राखाल पानिक लोटा लेबक लेल झुकल । बहुत संघर्सकेँ बाद लोटा उठाबैत जल्दी-जल्दी दू घोंट पानि अपन हलकमे उतारि लेलक । परञ्च पानि पीबैक बाद ओकरा लग एतेक बल नहि रहलै जे ओ लोटाकेँ फेरसँ नीँचा राखि सकै । लोटा ओकर हाथसँ छूति कए गुरैक गेलैक । लोटाक बचल पानि चारू कात नीच्चाँ बहि कए मानु कमलुक तकदीर आ एकाकीपर ठहाका लगाकए हँसैत होए । कमलु सेहो अपने खाली लोटा जकाँ चौकीपर पसैर जाइत अछि । परला बाद ओकर दहिना हाथ ओकर दुनू आँखिकेँ झैंप दै छैक । मानु अपन आँखिकेँ झाँपिक नोर नुकाबैक प्रयास कए रहल हुए । मुदा निर्लज्य नोर छैक की रुकैक केँ नामे नहि लए रहल छैक । आ ई नोर छैक, ओकर बुढ़ाड़ीकेँ ? ओकर बीमारीकेँ ? ओकर भूख-प्यासकेँ ? नहि नहि नहि । तँ ई नोर किएक ? केकरा लेल ? ई नोर छैक ओकर मनोरथक हत्याकेँ । ई नोर छैक ओकर छिरयाइत सपनाकेँ, जेकरा की ओ अपन सोनीतसँ पटेने रहए । ओकर नोर छैक की रुकैक नाम नहि लए रहल छैक । मुदा मोन स्वप्नील दुनियाँक इन्द्रधनुषी अतीतमे हिलकोर मारै लगलै । जखन ओ उनैस बीस बरखक जबान सुन्नर युबक रहए । माए बड्ड मनोरथसँ ओकर ब्याह रचेने रहथिन । बाबू तँ कखन एहि दुनियाँसँ गेलखिन ओकरा मोनो नहि । बाबूक सभटा भार माए उठेलखिन । केखनो ओकरा बाबूक कमी नहि होबए देलखिन । ब्याह भेलै । घरमे एकता सुधड़ कनियाँ एलखिन । समय खुशी-खुशी बीतै लगलै । मुदा ब्याहक पाँच बर्ख बादो ओकर घर नेनाक जन्म नहि भेलै । कमलु दुनू व्यक्तिक तँ जे हाल, ओकर माएकेँ तँ नेनाक अभाबमे दिन काटब मुश्किल भए गेलनि । फेर शुरू भेल कोबला-पातिरक दौड़ । माँ भगवतीक मंदिरमे पातैर राखल गेल । भगवान सत्यनारायणक कथाक कोबला राखल गेल । भगवतीक इच्छासँ ओहो दिन आएल । कमलुक कनियाँ गर्भवती भेली आ नियत समयपर एकटा सुन्नर बालकक जन्म भेलै । सून घरमे बसन्तक आगमन भए गेलै । कमलु माएक तँ खुशीक मारे धरतीपर पएर नहि टिकैत छलनि । छ्ठीहार दिन समूचा गाम माछ भात खूएल गेल । सत्यनारायण भगवानक कथा कराएल गेल । माँ भगवती घरमे पातैर देल गेल । बच्चाक नाम राखल गेल, राज ! राज कमल । सम्पूर्ण वातावरण खुशीसँ गमकए लागल । जे आबए कमलुकेँ बधाइ दइत । आखिर दे किएक नहि ? सात बर्खक बाद जे बाप बनल रहए । माँ भगवतीक माया जखन नहि देबक रहनि नहि देलखिन । देबए लगलखिन तँ एककेँ बाद एकटा, कमलु चारिटा पुत्रक पिता बनल । घर गृहस्थी खुशी-खुशी चलए लगलै । एहि बीच कमलुक नोकरी सेहो लागि गेलै । आर्थिक चिन्ताक समाधान सेहो भए गेलै । चारू बेटाकेँ यथासामर्थ नीकसँ शिक्षा दिएलक । समयकेँ काल चक्रमे, कमलुक माए अपन जीवनक सम्पूर्ण सुख भोगि स्वर्ग चलि गेली । देखतए-देखतए कमलुक चारू पुत्र युवा भेल । ओकरो सभहक घर बसबक समय आबि गेल । नीक लोक-बेद देख कए चारू बेटाक ब्याह केलक । कमलुक घर पोता-पोतीसँ भरि गेल । भरल-पुरल घर देखब शाइद नीयतिकेँ मंजूर नहि । अथबा कमलुक भागमे एहिसँ आगाँक सुख भोगब नहि लिखल रहै । आथिक युग आ परिबारक बोझसँ लदल, कमलुक चारू बेटा एक एक कए रोजी रोजगारक खोजमे ओकरा लगसँ दूर होति गेलै । चारू बेटा अपन-अपन परिबारक संगे शहरमे बसि गेल । रहि गेल कमलु आ ओकर संग देबैक लेल ओकर अर्धांगिनी, पत्नी ओकर चारू पुत्रक माए । जेना-तेना दुनू प्राणीक जीवन चलैत रहए । परञ्च केखन तक ? जेना भोरक बाद साँझ होइत छैक, प्रतेक शुरुआतक अन्त होइत छैक, ओनाहिते प्रतेक जीवनक मृत्यु । कमलुक कनियाँ सेहो जीवनसँ लडैत लडैत कमलुक संग नै दए पेली आ एक दिन कमलुकेँ छोरि स्वर्ग लोक चलि गेली । आब कमलु निदान्त असगर रहि गेल । आधा तँ कमलु ओहि दिन मरि गेल । बाँकी जीवन जे शेष रहै ओहिसँ निकैल कए अपन अतीतमे हरा गेल छल । मुदा नै जनि कखन ओ अपन अतीतक दुनियाँसँ नीकैल गेल रहए । अथबा कखन निकालि देल गेल रहए, बिधाताक हाथसँ । नोर सुखा कए ओकर गालपर पपड़ी जैम गेल रहै । दुनू आँखि खुजल । ओहे खुजल आँखिसँ अपन अतीतकेँ निहाईर रहल छल, कमलु । आओर ओहे खुजल आँखि आब शाइद केकरो बाट देख रहल छैक । शाइद अपन बेटा सभक । अगिला भोरे, गामक किछु लोक एकटा अर्थीकेँ उठेने जा रहल छलै । "राम नाम सत्य छै, सभक इहे गत छै ।" "राम नाम सत्य छै, सभक इहे गत छै ।" रस्तामे एककात ठार एकटा शहरी युबक, जेकी अर्थी देख कए रुकि गेल रहए । लग एला बाद ओहिमे सँ केकरोसँ पूछैत छै - "के छथि भाई " ओकर उत्तरमे गामक एकटा लोक बजैत छथि, जे की ओहि शहरी युबककेँ नहि चिन्हैत छथि - "छथि कतए, कहियौंह छलथि । छलथि हमरे गामक एकता अभागल, चारि-चारिटा बेटाक बाप रहितो, असगर । बेचारा ! अभाब एवं बेमारीसँ असगरे लडैत-लडैत मरि गेला । आब मुखाग्नीयो देबैक हेतु अप्पन कियोक नहि, सभ अपने-अपनेमे व्यस्त । कमलु नाम छलनि हिनकर ।" "कमलु" कमलु नाम सुनैत देरी ओ शहरी युबक जोर-जोरसँ दहाड़ि मारि-मारि कए कनए लागल । ओकर कनैक कोनो पार नहि । ओकर करून रुदनमे एतेक दर्द रहै कि ओकरासँ सभकेँ सहानुभूति भए गेलै । "किए भाई अपने किएक एतेक कानै लगलौं ।" "अरे ! हम अभागल नहि कानब तँ आओर के कानत ।" ई कहैत ओ अपन जेबीसँ एकटा टेलीग्राम निकाइल कए देखेलकै जे कोनो ग्रामीण द्वारा कमलुक बेटा राजकमलकेँ कमलुक बीमारीक खबर लेल लिखल गेल रहै । ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। नवेंदु कुमार झा- मिथिला आ मैथिली बॅटबाक भऽ रहल साजिश/ ई गवर्नेंस दिस सरकार बढ़ौलक डेंग मिथिला आ मैथिली बॅटबाक भऽ रहल साजिश मिथिलांचलक मातृभाषा मैथिलीक प्रति मैथिलीभाषी सभक उदास रवैयाक कारण आब ऐ भाषा पर संकटक मेघ उभरि रहल अछि। संविधानक अष्टम् अनुसूची मे सम्मिलित प्रदेशक एकमात्र ऐ भाषा केँ कमजोर करबाक साजिश राजनेता आ किछु साहित्यिक विद्वान कऽ रहल छथि। एक दिस बज्जिका तऽ दोसर दिस अंगिकाक नाम पर ऐ भाषा भाषी केँ तोड़बाक साजिश भऽ रहल अछि तँ दोसर दिस सीमांचल आ सुरजापुरी आदिक नारा दऽ मिथिलांचल केँ तोड़बाक प्रयास भऽ रहल अछि। बज्जिका आ अंगिका केँ मैथिलीभाषी स्वीकार कएने छथि मुदा किछु लोक अपन राजनीति आ विद्यता केँ स्थापित करबाक लेल अपन मातृभाषा मैथिलीक विरोध मे ठाढ़ भऽ मिथिला आ मैथिली विरोधक काज आसान कऽ रहल छथि। किछु दिन पहिने मुजफ्फरपुर आ वैशालीक क्षेत्र मे बज्जिकांचल आ बज्जिका भाषाक लऽ कऽ आंदोलन चलल छल जे एखन शांत पड़ल अछि तऽ एखन भागलपुरक क्षेत्रमे अंगिकाक नाम पर आंदोलन चलि रहल अछि। अंगिकाकँे संवैधानिक मान्यताक लऽ कऽ पटनामे सेहो आंदोलनक योजना अछि। दरअसल जहिना भारत केँ अपन देशक लोकसॅ खतरा अछि तहिना मिथिला आ मैथिलीकेँ अपन लोकसॅ खतरा अछि। वर्तमानमे अंगिकाक नाम पर चलि रहल आंदोलनकेँ सेहो मैथिली समर्थक होयबाक दाबा करएबला राज्य सरकारक एक मंत्रीक परोक्ष समर्थन भेटि रहल अछि। मैथिली आ अंगिकाक नामपर मैथिलीभाषीकेँ लड़ा अपन राजनीतिक रोटी सेकऽमे मंत्री लागल छथि। ताज्जूब तऽ ई अछि जे मंत्री जीक ऐ साजिशक बादो हुनकर मिथिला आ मैथिली विरोधी बात केँ लोक ग्रहण करैत छथि। कहल जाइत अछि जे दू कोस पर भाषा बदलि जाइत अछि। ई भाषाक बदली नै होइत अछि अपितु स्थानीय बोलीक रूप भाषाक परिवर्तन होइत अछि। मधुबनीसॅ किशनगंज धरि शिवहरसॅ वैशाली धरि आ बरौनी सॅ मधेपुरा धरि सभ ठामक लोक मैथिली भाषी छथि। अंतर मात्र एतबा अछि जे ऐ भाषाक बोली मे अंतर होइत अछि। ई अंतर तऽ दरभंगा जिलाक समस्तीपुर आ मुजफ्फरपुर जिलाक सटल सीमाक गाम मे सेहो अछि। एकर मतलब ई नै अछि जे ई मैथिली भाषासॅ फराक भाषा अछि। कहल जाइत अछि जे कमजोरहाक कतेको मालिक होइत अछि आ सभ अपना-अपना हिसाब सॅ मलिकौत करैत अछि। ई मिथिला आ मैथिली पर लागू भऽ रहल अछि। अपन विद्वता मे फूलल मैथिलीक विद्वानकेँ भाषाक विखंडनक भऽ रहल साजिशसँ बचैबाक फुर्सत नै छनि। मात्र साहित्य अकादमी आ आन पुरस्कारक लेल वर्ष भरि चिरौरी मे लागल रहल ई विद्वान सभ अपन हित मे मातृभाषाक हित बिसरि रहल छथि। जइ कारण क्षुद्र राजनेता आ तथाकथित विद्वान मिथिला आ मैथिली केँ कमजोर करबाक गहींर साजिश कऽ रहल छथि आ हमरा सभ कानमे तुर धऽ सूतल छी। एक दिस मातृभाषापर हमला तऽ दोसर मातृभाषाक अस्तित्व मिटैबाक साजिश भऽ रहल अछि। मिथिलांचलक कोसी क्षेत्र मे सीमांचल आ सुरजापुरी कऽ नाम वोटक राजनीतिक लेल मिथ्लिांचलक सामाजिक, सांस्कृतिक पहचान केँ मेटैबाक साजिश भऽ रहल अछि। आब समय सचेत होयबाक अछि। मातृभाषा आ मातृभूमिक पीठ मे छुरा घोपऽ बला असली चेहरा सोझा आनऽ पड़त नै तऽ मिथिलाक माछ जकां मातृभूमि आ मातृभाषाक अस्तित्व मेटा देल जाएत। अंगिका, बज्जिका, सीमांचल सूरजापुरी आदिक नामपर मिथिलांचल आ मैथिलीक विरूद्ध साजिश हएत तँ रहत ऐतिहासिक मिथिला आ मृदुभाषा मैथिली? ई गवर्नेंस दिस सरकार बढ़ौलक डेग बिहार ई-गर्वनेंस केँ मजगूत करबामे लागल अछि। सरकार प्रदेश मे कम्प्युटरीकरण केँ बढ़ावा दऽ रहल अछि। सरकारक मानौत अछि जे कम्प्युटरीकरणसॅ काजक गति बढ़त आ भ्रष्टाचार पर लगाम लगबऽ मे सेहो मदति भेटत। ऐ दिशा मे पहिल डेग उठबैत बिहार सरकार सभ पैघ निविदा इलेक्ट्रानिक माध्यमसॅ आमंत्रित करबाक निर्णय लेलक अछि। संगहि सरकार सरकारी कार्यालय केँ पूरा तरहें कम्प्युटरीकृत करबाक निर्णय लेलक अछि। एखन 25 लाख सॅ बेसीक निविदा ई टेनडरिंगक माध्यमसॅ कयल जा रहल अछि। अगिला किछु वर्षमे एकर सीमा घटा कऽ तीन लाख धरि करबाक योजना अछि। ऐसॅ भ्रष्टाचारपर लगाम लगैबा मे तऽ मदति भेटबे करत। ठीकेदार सभ केँ सेहो ई-पेमेन्टक माध्यमसॅ भोगतान करबाक निर्णय लेल गेल अछि। राज्य सरकार आब अपन कार्यालयक सेहो पूरा तरहे कम्प्युटरीकरण करबाक निर्णय लैत ऐ दिस तेजी सॅ डेंग उठौलक अछि। एकर अंतर्गत राज्य सरकार अपन कर्मचारी सभ केँ कम्प्युटरक प्रशिक्षण कार्यक्रम चला रहल अछि। सरकारक योजना एकरा प्रशासनक निचला स्तर धरि लऽ जयबाक अछि। पंचायत सभ केँ सेहो कम्प्युटरसॅ जोड़बाक योजना बनाओल गेल अछि। एकर अंतर्गत आब सभ पंचायतकेँ इलेक्ट्रानिक माध्यमसॅ भुगतान करबाक निर्णय लेल गेल अछि। केन्द्र सरकारसॅ टाका भेटलाक बाद सात दिनक भीतर ई टाका सीधा पंचायतक खातामे पठा देल जाएत। संगहि सरकार सभ कर्मचारी आ पेंशनधारीक खाता मे पठा देल जाएत। संगहि सरकार सभ कर्मचारी आ पेंशनधारीक नव डाटाबेस बनैबाक निर्णय लेलक अछि जे अगिला छओ मास मे तैयार भऽ जाएत। एकर बाद हुनक भुगतान खाताक माध्यमसॅ भऽ जाएत। उप मुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी जनौलनि अछि जे काजक गति बढ़ाएब आ भ्रष्टाचार पर लगाम लगैबाक लेल सरकार कम्प्युटरीकरणकेँ बढ़ा रहल अछि। ऐ दिस पहिल डेग ई-टेंडरिंगक उठाओल गेल अछि। जल्दीए सभ सरकारी कार्यालयक कम्प्युटरीकरण करबाक निर्णय लेल गेल अछि आ पंचायत सभ केँ सेहो कम्प्युटरीकरणक माध्यम सॅ जोड़बाक निर्णय लेल गेल अछि। ऐ लेल कर्मचारी सभक लेल प्रशिक्षण कार्यक्रम चलाओल जा रहल अछि। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। ३. पद्य ३.१.जगदीश चन्द्र ठाकुर ‘अनिल’- की भेटल आ की हेरा गेल (आत्म गीत)- (आगाँ) ३.२.जगदीश प्रसाद मण्डल- किछु गीत ३.३.१.जगदानन्द झा मनु २.राजदेव मण्डल जीक तीन गोट कविता ३.शिव कुमार यादव- कविता- ई की भेल ३.४.शिव कुमार झा "टिल्लू"- सिनेह ३.५.बाल मुकुंद पाठक- पाँचटा गजल ३.६.१.बिनीता झा- भूखल/ प्रकृति २.मुन्नी कामत-किछु कविता३.शेफालिका वर्मा- रे मन ३.७.१.कैलाश दास- नेता जी २. प्रबीण चौधरी प्रतीक३.सत्यनारायण झा-हे भगवान ३.८.बिन्देश्वर ठाकुर- अभागलमे शुभकामना एक/अस्पतालक हाल/ जनकपुरक रेल्वे/ एक एहनो नारी/गजल जगदीश चन्द्र ठाकुर ‘अनिल’ की भेटल आ की हेरा गेल (आत्म गीत)- (आगाँ) हमरहु जीवनकेर उत्सवमे छल श्रीरामक अवतरण भेल हमरहु अन्तरकेर सीताकेर जंगलमे छल अपहरण भेल
आ हमरहु हाथें रावणकेर दसटा मूडी छल कटा गेल, हम सोचि रहल छी जीवनमे की भेटल आ की हेरा गेल ।
सोचै छी पिता, पितामह सब हमरा संग एखनहु छथि जिबइत हम देखि रहल छी अपनामे सभकें चलइत, हंसइत-गबइत आइ,काल्हि,परसू सभटा अपनहि अन्तरमे समा गेल, हम सोचि रहल छी जीवनमे की भेटल आ की हेरा गेल ।
जीवनकें पढलहुं बेर-बेर जीवनकें गुणलहुं बेर-बेर जीवनकें देखलहुं बेर-बेर जीवनकें भोगलहुं बेर-बेर
स्वर्ग, नर्क जिबितहिं सभटा अपनहि जीवनमे देखा गेल, हम सोचि रहल छी जीवनमे की भेटल आ की हेरा गेल ।
नहि बूझी जीवन केर मतलब ओहिना जीने चल जाइत छी नहि जानि पियास हटत कहिया ओहिना पीने चल जाइत छी
सभ विष शिवशंकर के समान जे जखन जतए अछि देखा गेल, हम सोचि रहल छी जीवनमे की भेटल आ की हेरा गेल ।
हम जाहि सुखक कामना करी से दुखमे होइछ परिवर्तित मुश्किल अछि झंझाबातहुमे राखब अपनाकें आनन्दित
अपनहि अन्तरमे बैसल क्यो गीताक पाठ अछि पढा गेल, हम सोचि रहल छी जीवनमे की भेटल आ की हेरा गेल ।
अपनहि हाथें हम छी लिखइत सौभाग्य अपन,दुर्भाग्य अपन अपनहि हस्ताक्षर देखै छी पाछां तकइत छी जखन-जखन हं, किछु हस्ताक्षर एहनो अछि जे अछि लेभरल वा मेटा गेल, हम सोचि रहल छी जीवनमे की भेटल आ की हेरा गेल । (क्रमशः) ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। जगदीश प्रसाद मण्डल किछु गीत १. गाछक रंग बदलि ..................... २. मुँहक हँसी केहेन ..................... ३. झोंक जुआनी झोंकए ..................... ४. बैसले-बैसल नाचि ..................... ५. गुमकीमे बौआए ..................... ६. भूत बनि भुतिआएल ..................... ७. सुखले मे सभ ..................... ८. दीनक दिन केना ..................... ९. कोढ़ पकड़ि ..................... १०. जाल समाज ..................... ११. मीत यौ, देहक पानि ..................... १२. आश प्रेम संग ..................... १३. विषय दस ..................... १४. धर्मक फूल ..................... १५. किछु ने करै छी ..................... १६. अपने पाछू ..................... १७. उठी-बैसी ..................... १८. गर-मुड़ ..................... १९. मनक बेथा ..................... २०. रहल नै ..................... २१. पकड़ि समए ..................... २२. सतरंग ऐ ..................... २३. दुनियाँक जेहने ..................... २४. चढ़ि अन्हार ..................... २५. एक िवष...... ..................... २६. पेटक ताप ..................... २७. जेहन मुँह ..................... २८. धार संग नाह ..................... २९. मन मशीन ..................... ३०. खट-मीठ ..................... ३१. झोंकमे ..................... ३२. पबिते पैग ..................... ३३. हेल-मेल जाधरि ..................... ३४. कौशल जखन ..................... ३५. उमकीमे उमकि ..................... ३६. जिनगीक कुन्ज ..................... ३७. सत-चित ..................... ३८. पड़िते पएर ..................... ३९. अहाँ किअए ..................... ४०. घट-घट घोंट ..................... ४१. जहिना बारह ..................... ४२. दुनियाँ घोड़ाएल ..................... ४३. बहलि बहील ..................... ४४. हलचल जिनगी ..................... ४५. टकटक ताक ..................... ४६. भीख मांगि ..................... ४७. बकरी खुट्टी ..................... ४८. अमरा अँचार ..................... ४९. घरे-घरे ..................... ५०. बेटी किअए ..................... ५१. मनक भाव ..................... ५२. िसरजन सिर ..................... ५३. दूधक भूखल ..................... ५४. संगे-संग ..................... ५५. चोटी छुबै ..................... ५६. खेल-खेलाड़ी ..................... ५७. ककोड़बा ..................... ५८. सोर बनि ..................... ५९. सेज-सिंगार ..................... ६०. जएह लूरि ..................... ६१. जोति हर ..................... ६२. हर हलक ..................... ६३. हिम-गिरि ..................... ६४. भुवन भूचलि ..................... ६५. खुजिते आँखि ..................... ६६. मुड़जन मनुहर ..................... ६७. गोधूलि-बेल ..................... ६८. दौड़ि-दौड़ ..................... ६९. चोट-चाट ..................... ७०. चाइन चेन ..................... ७१. दीनक दोख ..................... ७२. सगर समनदर ..................... ७३. चप-चप ..................... ७४. मारी-बेमारी ..................... गाछक रंग बदलि...... गाछक रंग बदलि रहल छै मौसम संग सुधरि रहल छै। थल-कमल जकाँ कहियो गाढ़-लाल-उज्जर बनै छै। तहिना फूल-फल कोढ़ि जकाँ झरि-झरि कोनो फलो बनै छै। गाछक रंग बदलि रहल छै मौसम संग.......। आशा आश लगा-लगा जीत अपराजित बनैत रहै छै। सुधरि रूप बदलि चालि कारी काजर चमकि उठै छै। गाछक रंग बदलि रहल छै मौसम संग.......। लत्ती पानि रूप बदलि थल-कमल बनैत रहै छै तहिना लत्ती अपराजित गाछ बनि गछाड़ि धड़ै छै। गाछक रंग बदलि रहल छै मौसम संग.......। मुँहक हँसी केहेन...... मुँहक हँसी केहेन अबै छै ठोरक रूप देखैत चलू। छाती केना दलकि रहल छै सूर-तान भजैत चलू। मुँहक हँसी केहेन अबै छै ठोरक रूप.......। जिनगी जेकर जेहेन रहै छै छाती तेहने तेकर बनै छै। हलसि-कलशि कहैत रहै छै एेना पारदर्शी बनैत रहै छै। मुँहक हँसी केहेन अबै छै ठोरक रूप.......। जखने पालिस शीशा लगतै झल अन्हार बनिते रहतै। झल अन्हार अन्हार बदलि एक्कभग्गु बनि शीशा रहतै। मुँहक हँसी केहेन अबै छै ठोरक रूप.......। देखि-देखि ओ सुनि-सुनि कऽ हँसैत डेग उठबैत चलू। मुँहक हँसी केहेन अबै छै ठोरक रूप.......। झोंक जुआनी झोंकए...... झोंक जुआनी झोंकए लगै छै उष्मा पाबि उमसए लगै छै। झोंक जुआनी.......। जाधरि सिर सृजै शिशिर छै हार-मासु सिहरैत रहै छै। सुनिते कोइली कुहुकि वसंती भनभनाइत मन तनतनाए लगै छै। झोंक जुआनी.........। रंग-विरंगक वन-उपवनमे रंग-रंगक फूल फॅुलए लगै छै पाबि रस मधुमाछी सिरजए कोनो बिख चुभकैत रहै छै। झोंक जुआनी.......। बैसले-बैसल नाचि...... बैसले-बैसल नाचि रहल छै गुड़-चाउर मन फाँकि रहल छै। सिसकैत-सिहरैत कतौ देखि संग मिलि कऽ कानि रहल छै बैसले-बैसल.......। उफनैत-उधियाइत धार देखि संग मिलि कऽ दाबि रहल छै। घट-घट घाट बना-बना धार-विचार बहा रहल छै। बैसले-बैसल.........। गुमकीमे बौआए...... गुमकीमे बौआए रहल छी औल-बौल टौआए रहल छी। गुमकीमे..........। घाम-पसिना बहि रहल छै आश-िनराश चलि रहल छै। धक्कम-धुक्कम चलि रहल छै औलाइत-बौलाइत मन कहै छै। गुमकीमे..........। कखनो अन्हर-बिहारि देखै छी झाँट-पानि बिच पड़ए लगै छी। गुमकीमे............। भूत बनि भुतिआएल...... भूत बनि भुतिआएल छी मित यौ बनि भूत भुतिआएल छी। संगे-संग जगलौं संगे-संग उठलौं संगे-संग चालि चलि संगे रहि हराएल छी। संगिया मरि गेल हम भुतिआएल छी। केकरा कहबै भूत भविष्य वर्त्तमान छिड़िआएल छै। रग्गर बिच फक्कर बनि लाजे-पड़ाएल छै भूत बनि भुतिआएल छै बनि भूत भुतिअाएल छै। सुखले मे सभ...... सुखले मे सभ पिछड़ि रहल छै मुँह-कान सभ तोड़ि रहल छै। सूखल जानि जतए पएर रोपै छै काह-कूह सभ ततए जमल छै। सुखले मे सभ.....। सूखल धरती जतए पड़ल छै झल-फल नजरि ततए जाइ छै। सुखले मे सभ......। अन्हर-जाल फरिच्छ मानि कऽ भोर-भुरुकबा सूर्य बुझै छै। सुखले मे सभ......। दीनक दिन केना...... दीनक दिन केना कऽ चढ़तै मन कहाँ कहियो मानै छै। रतुके काजे दिनो गमा कऽ बढ़ती कहाँ तानि पबै छै। दीनक दिन केना.....। बिनु तनने घोकचि-मोकचि जौं जाड़ माघ अबैत रहै छै। चैतक चेत चेतौनी ओहिना सिर जेठ धड़ैत रहै छै। दीनक दिन केना.....। तीन जेठ एगारहम माघ तीनू लोक देखैत सुनै छै। देह-पसेना सुरकि चाटि कऽ माघे ने माघो कहबै छै। दीनक िदन केना.....। कोढ़ पकड़ि...... कोढ़ पकड़ि कोढ़ी कहै छै कोंढ़िया कोढ़ पकड़ने छै। केना कऽ फड़बै-फुलेबै रेहे-देह पकड़ने छै। कोढ़ पकड़ि.....। देखलोसँ नहि देखि पड़ै छै सुनलोसँ नहि सुनि पबै छै। टीश-पीड़ा टीशा पीड़ा मन घोर-घोर बनौने छै। कोढ़ पकड़ि.....। नहि कहियो फड़बै-फुलेबै झखि-झखि आशा तोड़ने छै। सकारथ भऽ अकारथ बनि-बनि दिन-राति अन्याय करै छै। कोढ़ पकड़ि.....। जाल समाज...... जाल समाज महजाल बनल छै हाना बनि परिवार सजल छै। जाल समाज महजाल बनल छै। बिनु नाप हाना बनल छै हाना मध्य खाना सजल छै। हाना बूझि खाना लपकि खानामे जा-जा फँसै छै। मीत यौ, जाल समाज.....। जान गमाएब खेल खेलि बचैक नहि उपाए करै छै ऊपर कूदि-कूदि फानि चाहि गोरिया-गोरिया गुहारि करै छै। मीत यौ, जाल समाज.....। मीत यौ, देहक पानि....... मीत यौ, देहक पानि तखन फुलाइ छै कोढ़ी बनि काज रूप लगै छै। देहक पानि तखन फुलाइ छै। कोढ़िये ने फुलो-फड़ो संग बाँहि पकड़ि संकल्प कुदै छै। देहक पानि.....। जाधरि मन संकल्पित नहि ताबे केना उद्देश्य कहबै छै संकल्पे ने तन-मन बीच सीमा दइत डेग बढ़बै छै। मीत यौ, देहक पानि.....। काम-धाम जहिना बनै छै तहिना ने कर्मो-धर्म कहबै छै धर्मे ने धारण करैत पथ-पानि चढ़बैत चलै छै। मीत यौ, देहक पानि.....। आश प्रेम संग...... आश प्रेम संग झूिम रहल छै लाल टमाटर बाजि रहल छै। आश प्रेम......। वन बीच सन्यासी जहिना झींक दऽ दऽ जात नचबै छै। निआस कहाँ छोड़ि संग चिक्कस बनि-बनि भूमि भरै छै। आश प्रेम......। लाल टमाटर बनि सन्यासी खटमीठ रूप धड़ैत रहै छै। नै मीठ तँ खट्टो नहियेँ अपन नाओं सुनबैत कहै छै। आश प्रेम......। गीत गीता गाबि सन्यासी भगवत भजन करैत रहै छै। सबूर पाबि सबर सबरी मरितो राम एबे करै छै। आश प्रेम संग......। विषय दस...... विषय दस िसलेबस प्रवेश दसो दिशा देखैत रहै छै। त्रिभूज-ज्यमिति तहिना गीत व्यास गबैत रहै छै। विषय दस......। सून अप्पन हिस्सा कहि-कहि ठेहुन रोपि अड़ल रहै छै। अंकसँ हिसाबो तहिना रथ जिनगी घिचैत चलै छै। रथ जिनगी......। आगू भलहिं काटि-छाँटि घटबी घाट बढ़ैत चलै छै। होइत-हबाइत धकिया-धुकिया हिस्सा अपन कहबैत चलै छै। हिस्सा अपन.....। धर्मक फूल...... धर्मक फूल फुलेबे करतै बनि फुलबाड़ी सजबे करतै धर्मक फूल......। सान धार बनबे करतै काम-धाम बनबे करतै। भीड़-कुभीड़ धाम बीच असंख्य-शंख उठबे करतै। धर्मक फूल......। धड़ घनेरो धार घनेरो रूप कृष्ण कहबे करतै बान पकड़ि वाणी बदलि िनसाँस-साँस भरबे करतै। बनि फुलबाड़ी सजबे करतै। धर्मक फूल......। सहस्र नाओं बनि-बनि माला जप होइते रहतै। कुरू-पाण्डु बीच सदएसँ नाद-शंख बजबे करते। नाद-शंख बजबे करतै। हे यौ मीत, धर्मक फूल......। किछु ने करै छी...... किछु ने करै छी, मीत यौ किछु ने करै छी। मीत यौ किछु ने करै छी। गेड़ू-चौक मारि गनगुआरि बनि दिन-राति रमल रहै छी। मीत यौ......। जरि-मरि गेल मन-कामना समए संगम संग रमल छी मीत यौ......। बोनक बाट आगू छै उत्तरे-दछिने धार बहल छै घटि-घटि घटिया घाट बनि घोंटे-घोट पीबैत रहै छी मीत यौ......। ससरि-ससरि ससरति रहै छी गाछ उतरि धरती पकड़ि लछमी-नाग कहबैत रहै छी मीत यौ......। अपने पाछू...... अपने पाछू बौआइत रहै छी मीत यौ, अपने पाछू बौआइत रहै छी। दिन-राति ढहनाइत रहै छी राति-दिन गनहाइत रहै छी मीत यौ, अपने पाछू......। पछुआ बनि पछुआर पहुँचिते पेट-पीठ, पाँजर देखै छी हड्डी छाती छिटैक-सिसैक पौंखड़ा बनि सूर-तान भरै छी पौंखड़ा बनि सूर-तान भरै छी मीत यौ, अपने पाछू......। जूआ-जुआ, जूआ-जुआ नांगड़ि ऐँठि चलैत रहै छी लादक ऊपर लादि-लादि टूटि-टूटि गीरह बनैत रहै छी मीत यौ, अपने पाछू......। अपना के अप्पन बूझि-बूझि अपने पाछू ओझराएल रहै छी अपनापन भाव बिनु बुझितो अगुआर-पछुआर नाचि रहल छी। मीत यौ, अपने पाछू......। उठी-बैसी...... हमर तेही मे नाम, हमर तेही मे नाम। हमरा उठलेसँ काम, हमर बैसलेसँ काम हमर तेहीमे नाम......। उठी लेब कि बैठी, बाजू-बाजू धड़-धड़ाम उठी लऽ जँ बैसब, आ कि बैठी लऽ जँ उठब छुबिते भरब पद पराम हमर तेहीमे नाम, हमर तेहीमे काम। खेल खेलाड़ी खेलि खेल बाल-बोध लिखबै छै नाम खेल जिनगीक खेला-खेला मृत-अमृत पाबि सूरधाम। हमर तेहीमे नाम हमर तेहीमे काम हमरा उठले से काम, हमरा बैसले सँ काम। गर-मुड़...... गर-मुड़ बोझ बनल छै मीत यौ, गर-मुड़ बोझ बनल छै। पाबि धार साबे जेना बाणिक बानि धड़ैत रहै छै कोमल-किसलय किछु ने बूझि पछुआ रूप धड़ैत रहै छै। गर-मुड़.......। तहक-तह तहिया-तहियासँ छल-छल छल्ली बनैत रहै छै समटनिहार संगी जेहेन-जहिया तेहने तेहेन बोझ बनै छै। गर-मुड़.......। गर-मुड़ाह ठनि-बनि-बनि गर-मुड़ाह चालि चलै छै। गर-मुड़ाह गीत गाबि-गाबि चालि कोइली चलै छै। चालि कोइली चलै छै। गर-मुड़.......। मनक बेथा...... मनक बेथा कहब केकरा, हे बहिना सभ दिनसँ होइते एलै। बनि-बनि बेथा कथा बनि-बनि मरण-करण बनैत एलै। मृत-अमृत रगड़ि-रगड़ि दीन राति कहैत एलै। मनक बेथा......। खेरहा बनि-बनि कथा-पिहानी राति-दिन भूकैत एलै। पेट वायु जहिना भूकै छै खरही खेरहा कहैत एलै। मनक बेथा......। मोटा तर देह थकुचा-थकुचा पाड़ि ठोह कनैत एलै। कुहरि-कुहरि कानि-कानि आदियेसँ कहैत एलै। मनक बेथा......। रहल नै...... रहल नै तकनिहार मीत यौ नै रहल तकनाहार। तकतियान अपने सिर चढ़ि-मढ़ि रहल नै देखिनिहार, मीत यौ रहल नै......। रहल सभ दिन ताक तकैमे धाक अपन पकड़ैपर। जमिते धाक धकेल-धकेल ठेल खसाओल धरतीपर। मीत यौ, ठेल खसाओल धरतीपर रहल नै......। हेरि-हेर, हरणि हरण अबैत रहल बनि-बनि अन्हार घेरा-घेरि मछार बान्हि-बान्हि पटकि बैस छातीपर। मीत यौ, पटकि बैस छातीपर। रहल नै......। पकड़ि समए...... पकड़ि समए संकल्प नै ठानब गति कर्म पेबै केना? बिनु बूझल बिनु बूलि बटोही घन-सघन बुझैत जेना। पकड़ि समए......। ओर-छोड़ पकड़ि-पकड़ि काम-कर्म पहुँचै जेना छै संग श्रम-समए मिलि तहिना सुफल-फल पाबै तेना छै। पकड़ि समए......। बीच संगम श्रम ओ समए खुशी-खुश खुशिआइ जेना छै पाबि संग संकल्प तहिना धर्म-कर्म सिरजैत चलै छै। पकड़ि समए......। गनगनाइत कर्म गमगमाइत तहिना सागर-झील टपबे करै छै। झील-झिलहोरि सरोवर तहिना जिनगीक सान चढ़बे करै छै। पकड़ि समए......। सतरंग ऐ...... सतरंग ऐ संसारमे समरस रंग धड़ैत रहै छै। धार-कोन अन्हार-बिहाड़ि राति-दिन पेबैत रहै छै। सतरंग ऐ......। कहि सुलक्षण बनि कुलक्षण घटिया घाट घटैत रहै छै। जुआ जोति पछुआ पकड़ि दब-उनार करैत रहै छै। सतरंग ऐ......। सिनेह सिनेहिल सहरि-बहटि गारा-जोड़ करैत रहै छै। िसरजमान होइए जतए काँट-गुलाब हँसैत रहै छै। सतरंग ऐ......। संग मिलि मधुर डंक जेना सूर-तान भरैत रहै छै। रानी-बीच मधुरानी तहिना पान मधु करबैत रहै छै। सतरंग ऐ......। दुनियाँक जेहने...... दुनियाँक जेहने मंच मंचबै, तेहने ने रंगमंचो बनै छै। पात्र बनि जेहेन पाट खेलबै देखिनिहारो तेहने देखै छै। दुनियाँक जेहने......। चाहै सभ छै चैन चीत दुख-भुख दुनियाँ सेहो कहै छै। सुख सुखाएल सूतल-पड़ल सिर संजीवनी भेटै कहाँ छै। सिर संजीवनी......। दुनियाँक जेहने......। हरि अनंत हरि कथा अनंता हँसि गीत भागवत गबै छै। हेरि शक्ति शक्ति हरीक बाघ चढ़ि भगवती कहै छै। बाघ चढ़ि......। दुनियाँक जेहने......। चढ़ि अन्हार...... चढ़ि अन्हार पख भरि-भरि अमवसिया कहबैत अबै छै। तहिना ने इजोरो बढ़ि-बढ़ि मास पूब कहबैत चलै छै। चढ़ि अन्हार......। काटि इजोर कपचि-सपचि पून प्रकाश पाबैत कहै छै। खेल जिनगीक खेलाड़ी चढ़ि-चढ़ि रंगमंच कहै छै। चढ़ि-चढ़ि......। जस-जसोदा भेद बिनु बुझने लीला धड़धड़बैत करै छै। तीत-मीठ फल फलाफल सिर चढ़ि सिरताज कहै छै। सिर चढ़ि......। एक िवष...... एक विष जहान जहर जौहरी दोसर जोहि अनै छै। अजोह सोहि जग-जागि बीस ज्ञान कहबए लगै छै। विश्व ज्ञान कहबए लगै छै। एक िवष......। सुख-दुख संगे संग चलि पटका-पटकी करैत रहै छै। अपन-अपन रस्ता पकड़ि दिन-राति सन्हि मारि करै छै। दिन-राति सन्हि मारि करै छै। एक िवष......। िनसां विष खिस्सा विष कथा विष बतकथा विष बिसाइत विष बिसबिसा देह बिखाह बनबै छै। भाय यौ, देह बिखाह बनबै छै। एक िवष......। पेटक ताप...... पेटक ताप जहिना तपै छै तपै छै तहिना मनक ताप। वेद-पुरण मिलित मीलि एक वरदान एक अभिशाप। भाइ यौ......। तपैक तप तपस्या जहिना सभकेँ तपैक अछि दरकार। बिनु तापे तप केना तड़तै पेते केना उचित-उपकार। भाइ यौ......। विलपि-विलपि भगवत मंगै छै बीच व्यास भागवत देखै छै। शक्ति पाबि शालीनी जहिना सिंह सवार शंख फूकै छै। भाय यौ......। जेहन मुँह...... जेहन मुँह तेहन हँसी सभ दिन हँसैत एलैए। मुँहक जेहन गढ़नि-मढ़नि तेहने तान भरैत एलैए। तेहने......। जाधरि डोर नै बनि-बनि घास साबे कहबैत एलैए। बनिते डोरी समेटि-बटोरि गृह-वास कहबैत एलैए। गिरह-वास कहबैत एलैए। गिरह-वास......। जीह-दाँत सभ संग पूरै छै आँखि-कान सभ संग एलैए। लहरि बीच लहरि-लहरि हास-हँसी हँसैत एलैए। हास-हँसी......। धार संग नाह...... धार संग नाव तखने चलै छै धार जलदार बनल रहै छै। जल-जलदार......। देख मानसून लपकि-झपकि धरा-धार बनबैत रहै छै। ओद्र आद्रा पाबि पबिते मजि मजरि मोजर धड़ै छै। मजि मजरि......। जेना-जेना मनसून पबै छै तेना-तेना नाव धार चलै छै। पूरबा-पछबा झोंक पाबि-पाबि मन-तेज गतिआइत चलै छै। मन्द–तेज......। गति धार जलधार जहिना मतियो तहिना मनसून चलै छै। गति-मति कखनो संग-साथ तँ कखनो झहरैत रहै छै। तँ कखनो......। मन मशीन...... मन मशीन मंत्रणा करै छै युग-परिवर्तित हेबे करतै। सभ दिनसँ होइते एलैए सभ दिन हेबे करतै। मन मशीन......। मथि-मथि मन मशीन बनि गति तेज हेबे करतै साधन युक्त परिवार जहिना धरा-धार बहबै करतै। धरा-धार.....। एक अलंग मशीन जिनगीक दाेसर नीति कहबे करतै नीति-अनीति कुनीति बनिते एक-सँ-एक लड़बे करतै। एक-सँ-एक......। खट-मीठ...... खट-मीठ बनि-बनि चटलौं सुआद आम केना पेबै यौ खट-मट खरकैट-खरकैट चिक्कन केना बनेबै यौ। चिक्कन केना......। तेतरि रोपि तेहेन लगेलौं गुड़-आम संग पेलौं यौ रंग बदलि सुआदो बदलि कृत्रिम प्रकृति कहेलौं यौ कृत्रिम......। जेहने फल पेलौं तेतरिक तेहने गढ़ि हवा बनेलौं यौ चर्क-कुष्ट निमंत्रित कऽ कऽ रोग-मराएल बनेलौं यौ रोग-मराएल......। झोंकमे...... झोंकमे झोंका गेलौं, मीत यौ छोड़ि जिनगी उड़िया गेलौं। झोंकमे......। पार नै पाबि गुन-गुना धन-धरम किछुओ ने पेलौं। मान-दान घाट घटि-घटि अपसोचमे नहा गेलौं झोंकमे......। नै जानि दुनियाँ-दिवाना भरल दिवाना दुनियाँ पेलौं। प्रेमी-प्रेम पकड़ि-पकड़ि अपने तँ किछुओ ने पेलौं। मीत यौ, झोंमे......। बिनु प्रेम खाली नै दुनियाँ राधि-अराधि किछुओ ने पेलौं मूंडे-मूंडे मति-विमति बीच सुमति-कुमति सगतरि पेलौं। मीत यौ, झोंकमे.......। पबिते पैग...... पबिते पैग पिआलिक घोड़चालि चालि धड़ए लगै छै। छान-पगहा बीच घोड़ाएल घोड़छान चालि चलै छै। घोड़छान......। उठिते दोसर पैग-पग सिंह-सिंहासन सजबए लगै छै। कुदैक-कुदैक फानि-फना फन-फना डुमबए लगै छै। फन-फना......। चढ़ि-चढ़ि डंक डकडका गद-गधैया पकड़ए लगै छै ता-थइ, ता-थइ नाच-नाचि गाम गदह करए लगै छै। गाम गदह......। हेल-मेल जाधरि...... हेल-मेल जाधरि नै पकड़ब जिनगीक कोनो भरोस नै। रंग-बिरंग सरोवर सगर छै पार जेबाक संतोष नै। हेल-मेल......। कोनो थीर, जलजलाइत कोनो जुआरि भरल छै सजल-धजल। पबिते पेट उनटि-सुनटि देखए रूप जीअल-मरल। हेल-मेल......। दूर-दूर, हटि-हटि सजल छै दुर्गम दुर्ग सिरजैत रहै छै। अन्हर-विहाड़िक झोंक पाबि उनटा-पुनटा नाव चलबै छै। हेल-मेल......। कौशल जखन...... कौशल जखन कोसल बनै छै कोसलिया एबे करतै। लाख परयास केलो पछाति ढंस घर हेबे करतै। कौशल......। कोसल असगर नै पनपै छै पनपै छै दाेसर-तेसर। चालि कुचालि धड़ि पकड़ि भूमि बनैत रहै छै उसर। कौशल......। उसर पाबि उसरि-उपटि घर परिवार समाज उसरै छै ऊपरे-ऊपर छीटि अछीनजल फूकि शंख काल भगबै छै। कौशल......। उमकीमे उमकि...... उमकीमे उमकि गेलै भाव भँवर भसिया गेलै। अबिते उमकी चित-वृत्ति रमकीमे रमकए लगै छै। अतल-गहन गहन-अतल पाबि-पाबि बौराए लगै छै। पाबि-पाबि......। तीले-तील तिलकि-तिलकि। कौओ बेरागी बनै छै कल्प-कल्प रमकि झुमकि। अनजनुआ कहबए लगै छै अनजनुआ......। उमकि-उमकि लपकि झपकि लोल-बोल धड़ए लगै छै। बिनु रंग-रूप बदलनौं कोकिल स्वर भरै छै। कोकिल स्वर......। जिनगीक कुन्ज...... जिनगीक कुन्ज भवनमे बिहार कुन्ज करए लगै छै। दुनियाँक भवसार बीच भव आनन बनबए लगै छै। भव आनन......। आनन-फानन बीच-बीच हजार आँखि देखैत रहै छै। सरमे-भरमे चुनि-चानि सागर भव भरैत रहै छै सागर भव......। आँखि बीच अँखिया-अँखिया डिम्ह डिम्हा भाँगैत रहै छै। क्षीर-नीर निखड़ि-निखड़ि घाटे-घाट चुनैत रहै छै। घाटे-घाट......। सत-चित...... सत-चित आनन-फाननमे भव आनन बिलटि गेलै। शील बनि शीला चढ़ा लोढ़ि-बीछि रगड़ए लगलै। लोढ़ि-बीछि......। वाण-वाणि चेत-अचेत चाल-चालि चलबए लगलै बीचमान बनि बिचमानि नीर-छीर मिलबए लगलै। दूधे-पानि मिलबए लगलै। लोढ़ि-बीछि......। मुख-बिमुख पथ पथरा गुआरि गर लगबए लगलै। आनन चित सरि-सरिया ढुलकि ढोल बजबए लगलै। ढुलकि ढोल बजबए लगलै। लोढ़ि-बीछि......। पड़िते पएर...... पड़िते पएर हवा पोखरि डेगे-डेग डगरए लगै छै। झील-मिलि, हिल-मिलि बानि पकड़ि बाँहि संगरए लगै छै। पड़िते पएर......। धक्कम-धुक्का मुक्कामे जहिना धक्का-धुक्की चलए लगै छै। सिहकिते नाद चिहकि छाती धरा धार धड़धड़बए लगै छै। पड़िते पएर......। हिला-डोला हिलोरि-हिलोरि किनछड़ि कोण पकड़ए लगै छै। तड़पि-तड़पि तड़पन करैत ठौर अपन धड़ए लगै छै। पड़िते पएर......। अहाँ किअए...... अहाँ किअए रूसल छी हे बहिना अहाँ किअए रूसल छी हे। हल-चल, हल-चल सभ दिन करै छी चल-हल चल-हल कहाँ पाबि पबै छी तैयो अहीं मगन कानि-हँसि कुचड़ै छी कानि हँसि......। अहाँ किअए......। राति दिन एकबट्ट बनौने सभकेँ सभ लागल रहै छी। लागि भीड़ कियो, भीड़ लागि रमझौआ करैत छी हे रमझौआ......। अहाँ किअए......। घट-घट घोंट...... घट-घट घोंट घोटै छै मीत यौ, घट-घट घोंट घोटै छै। तरसैत-तरपैत तनतनाइ छै तन-फन मन भनभनाइ छै हक-हका, हकहका कहै छै अपनमे दरकार धड़ै छै। घट-घट......। अपन माइन एकबट्ट मानि हँसमुँह मन मुस्की भरै छै। मन-सम्मान, समान मान तानि छाती समवाण तनै छै। तानि छाती......। जे चिन्हत तेकरे ने चिन्हबै बीच-बीच बिचमानि बजै छै। धर्म सनातन ठुमकि-ठुमकि राति-दिन परिछान करै छै। राति-दिन......। मीत यौ, घट-घट घोंट घोटै छै। जहिना बारह...... जहिना बारह दिन बजैत तहिना ने रातियो कहै छै। बीच-बिचौबलि बीछि-बेड़ा दुनूमे समतूल भरै छै। दुनूमे......। जहिना बारह......। जेठक बारह नम-नमड़ि बारह राति पटिअबै छै। मघजल्ला पसारि-पसारि हार जाड़ बढ़िअबै छै। हार जाड़......। जहिना बारह......। कखनो बाम दहिन घुसुकि दुनू दिस कपचैत रहै छै। निखरि-निहारि नहि देखि झपकी-लपकी सहैत रहै छै। झपकी-लपकी......। जहिना बारह......। दुनियाँ घोड़ाएल...... दुनियाँ घोड़ाएल छै निशाँमे घट-घोट घोटैत कहै छै। सुखचन-दुखचन कुहि-कुहि भटैक-भटका मारैत रहै छै। भटैक-भटका......। दुनियाँ घोड़ाएल......। सुख-चैन सोचि-असोचि सुखल धार बहबैत रहै छै। काँट-कुश बना बना धार-धड़ि धड़बैत रहै छै। धार-धड़ि......। दुनियाँ घोड़ाएल......। सुखल-टटाएल रसाएल जिनगी रसाएल जीव कहबए लगै छै। भुख-पियास पचि-पचा सार-वेद गाबए लगै छै। सार-वेद......। दुनियाँ घोड़ाएल......। बहलि बहील...... बहलि बहील बहिला कहै छै आश हमर कहियो नै करिहह फुलकि-फलकि ढेनु-ढेनुआरक तोड़ि आश तेकरो रहिहह। बहलि बहील......। बहलि मन दहलि-दहलि बाँझ गाछ धड़ैत रहै छै। पकड़ि डारि डोला-डरा लस्सा–लोल छोड़बए लगै छै। लस्सा लोल......। बहलि बहील......। लटपट-सटपट बझ-बझीन गीत वधैया गाबि कहै छै। ता धीन ताधीन धीन ता धीन सूर-तान टहिआए लगै छै। शूर-तान......। बहलि बहील......। हलचल जिनगी...... हलचल जिनगी हलसि-खिलचि हर-हरि चालि चलै छै। बीर्तमान भविष्य कहि-सुनि भूत-बंगला सजबै छै। मीत यौ, भूत-बंगला सजबै छै। हलचल......। जहिना आनक पोखरि डरान अपनो गाछी कहबै छै। अधसर-अधमर पोखरि सृजए जम-जजमान फफनै छै। मीत यौ, जम-जजमान फफनै छै। हलचल......। भाग बैसि एक वीणा-धारणी बहिना बाँहि पकड़ै छै। वाम-दहिन चालि चलि-चलि धाम-काम धड़बै छै। मीत यौ, धाम-काम धड़बै छै। हलचल......। टकटक ताक...... टकटक ताक तकै छी हे मइये आहाँ किअए आँखि मुनने छी। गड़-गड़ गाल गबै छी मइये तखन किअए कान खोलने छी। तखन......। टकटक......। जन-मन-धन धियानए मइये छी छूटि, केना जाइ छी। डारि-पात अमृत भरि-भरि विष-रस केना बनै छी। विष-रस......। टकटक......। कन-कन मणि मन-मन मइये अन्हार किअए छोड़ै छी। रचि अन्हार इजोत-जोत तखन एना किअए विषविषबै छी। एना किअए......। टकटक......। भीख मांगि...... भीख मांगि दुनियाँ भिखारी दानी शिव कहबै छी यौ। हे यौ भोलानाथ दानी शिव कहबै छी यौ। राित-दिन समैट-समटै छी भीखमंगा कहबै छी यौ धड़ि भीख धारा बनै छी धार भीख बहबै छी यौ धार भीख......। शिखर सिर अकुर-सकुर चोटी सिर पकड़ै छी यौ धार बनि धड़ा-धड़ा पहुँचि समुद्र धड़ै छी यौ। पहुँचि समुद्र......। हे यौ भोला बाबा पहुँचि समुद्र धड़ै छी यौ। बकरी खुट्टी...... बकरी खुट्टी खुटेस-खुटेस जिनगीक जिनगी पाठ पढ़ै छै। कुन्ज भवनमे लाल बिहारी लीला रचि-रचि रास करै छै। लीला रचि......। रंग-बिरंगक पात खुआ रस अमरीत चुसबैत रहै छै। मनक मक्खन चोरि-छोड़ि गरदनि बान्ह पड़ैत रहै छै। मीत यौ, गरदनि......। बीर्त रहितो बकरी जेना साँढ़-धाकर कहैत रहै छै। मनहाएल-मनहाएल रहितो कुरीति-रीति गबै छै। मीत यौ, उरीति......। अमरा अँचार...... अमरा अँचार चटै छै मीत यौ, अमरा अँचार चटै छै। अमौर-मौर बनि बना अबिते रस बदलै छै। पानि जीह पाबि पनिया चहटि चुहुटि धड़ै छै। मीत यौ......। जेहने फड़क रंग-रूप तेहने ते पातो धेने छै। नमहर-नमहर गीरह-गाँठ बिनु गिरहेक डारि पकड़ै छै। मीत यौ......। चटिते अचार अम अमड़ि अमरजोत देखै छै। जीवन जन छोड़ि-मोड़ि मरण वाणि पकड़ै छै। मीत यौ......। घरे-घरे...... घरे-घरे ज्योति दीप गाम अन्हार पड़ल छै। घरे-घर समाज कहि-कहि अध-मरल गाम पड़ल छै। अध-मरल......। इतिहास मिथिला कहि पुर जनक धाम बनल छै। वक्र आठ गीत गाबि ज्योतिरमान जगै छै। ज्योतिरमान......। बनि कनियाँ-पुतरा कठपुतरी मूक नाच नचैत रहै छै। राति-दिन एकबट्ट बरहबट बनि नाचि नाच नचैत रहै छै। नाचि नाच......। बेटी किअए...... बेटी किअए बनेलौं, शिव यौ बेटी किअए बनेलौं। भूख पेट दुख बनि बना हमरे किअए सजेलौं हमरे किअए......। सजि साजि सिर सजा दोखाह जिनगी किअए बनेलौं किछु ने कामना मनमे ठनने एहेन किअए बनेलौं। बेटी किअए......। मन-मन माली बैसल छै मालिन किअए बनेलौं मन-मलिन मुँह कानि-कानि बेटी किअए बनेलौं। हे शिवदानी हे बमभोला बेटी किअए बनेलौं। मनक भाव...... मनक भाव समेटि-समेटि मनोभाव पनपए लगै छै। सुभाव अभाव कुभाव भव रूप रंग सजबए लगै छै। रूप रंग......। महकि महि परखि निखारि भवन भव सिरजए लगै छै। उक-भाव लपकि लपाक बिन भावुक सजबए लगै छै। बनि भावुक......। भाव-भावुक रमैक-चमैक भाव लोक सिरजए लगै छै। आनन कानन मानन मानि भवानन कहबए लगै छै। भवानन......। िसरजन सिर...... सिरजन सिर पकड़ि-पकड़ि जड़ि धरती धड़बै छै। पति-पन पाँति पतिया उपवन-वन सजबै छै। भाय यौ, उपवन......। सजिते वन उफनि उपनि धरती धार बहबए लगै छै। सुध-असुध कहि सुनि-सुनि घटि-बढ़ि घाट बनबए लगै छै। भाय यौ, घटि-बढ़ि......। कोने-कानी खूटि-खूटि धोबि घाट सेहो बनबै छै। निरजन, निरमल बसि-बसु हारि-जीत दुनियाँ कहै छै। भाय यौ, हारि-जीत......। दूधक भूखल...... कनि-कनि कानि कहै छै। कनी-कनी कान पकड़ि-पकड़ि कर्ण-अंग धड़ैत रहै छै। िनरलोभ, निसकपट बनि-बनि अखंड बनि बसैत रहै छै। रंग-रंग कनजरि बनि वन रंग-रंग मुँह धड़ैत रहै छै। रंग-रंग गुनि गुन सुनि फलाफल छिटकैत रहै छै। कनि-कनि......। जड़ि कोनो फल फलागम फुलहरि कोनो झड़ैत रहै छै। जड़ि-जड़ि कनकि-कनकि कलश-पल्लव भरैत रहै छै। अपेछित, पल्लव कलश भरैत रहै छै। संगे-संग...... घरक नाआें संगे गड़ा गेल मीत यौ, ई गड़बड़ भेल उ गड़बड़ भेल? नै यौ, हँ यौ, हँ यौ, नै यौ, हँ....। ई गड़बड़ भेल, उ गड़बड़ भेल। घरक नाअों......। अदलि नीक बदलि अधला अदलि-बदलि बदला गेल। गारा गर पकड़ि-पकड़ि, मीत गारा घेघ बनबैत गेल, मीत यौ.....। घरक नाअों......। बाम दहिन बिनु बुझने-सुझने छटि बाम बूच छटिया गेल। डाली कसतारा सजि सजबए ई अधला भेल, मीत यौ ई अधला भेल। घरक नाअों......। चोटी छुबै...... चोटी छुबै जखन चट-चटिया चटिया चाट चटैत रहै छै। जीनगानिक रंग रभससँ सुर जिन्दादिली भरैत रहै छै। चोटी छुबै......। बून-बून अकास बनि-बनि धड़-धरती छुबैत रहै छै। चूह चुहुटि साटि सटि छाती दूध-फूल बनबए लगै छै। चोटी छुबै......। करम-धरम खेल सिर सिरजै नचनी नाच नचैत रहै छै। बाट-बटोही पकड़ि-पकड़ि मूंगबा मुँह बिलहैत रहै छै। चोटी छुबै......। खेल-खेलाड़ी...... खेल खेलाड़ी खेल ठानि कबडी दौड़ दौड़ैत एलैए। सीमा बान्हि भौक भौकिया छुबि-छुबि छुतबैत एलैए। छुबि-छुबि छुतबैत एलैए। खेल-खेलाड़ी......। नमगर-चौड़गर परती पराँत नमहर डेग डेगैत एलैए। आम छी, जाम छी, करिया लताम छी साँस छोड़ि रेड़ैत एलैए। साँस छोड़ि रेड़ैत एलैए। खेल-खेलाड़ी......। एक साँस चेत कबड्डी चीका-दरबर करैत एलैए। भौक बनि भोकिया-भोकिया छुबि-छुबि छुतबैत एलैए। छुबि-छुबि छुतबैत एलैए। खेल-खेलाड़ी......। धरती खुनि-खुनि मुदा एहनो अखड़ाहा बनबैत एलैए। माटि संग हाथ मिल-मिला वीर भूमि सिरजैत एलैए। वीर भूमि सिरजैत एलैए। खेल-खेलाड़ी......। ककोड़बा...... ककोड़बा बिआन ककोड़बे खाइ छै। मीत यौ, ककोड़बा बिआन ककोड़बे खाइ छै। बिनु सिर-पएर सजि-सजि चुट्टा-चांगुर चुहुटए लगै छै। अपने सिरजल-जल्ला-झल्ला खद-खुद डिरिआए लगै छै। ककोड़बा......। खखैर-खखोड़ि खखरी बनि दन-दनाइत कहैत रहै छै। माटि-पानि सभ हमरे-हमरे कुम्हरा ढेर बनबैत रहै छै। मीत यौ, कुम्हरा ढेर बनबैत रहै छै। ककोड़बा.......। जेर निकलि जड़िया-जेड़िया पाछू पेट छिछियाए लगै छै। कतए जाएब कतए जाइ छी ठेकाने नै रहि पबै छै। मीत यौ, ठेकान नै रहि पबै छै। ककोड़बा......। सोर बनि...... सोर बनि सन्हिया सान्हि सिर चालि चलए लगै छै। सिर-िसरा सिरसिरा चुहटि बत-बता बतबए लगै छै। बत-बता बतबए लगै छै। सोर बनि......। फुलहरि फूल फड़ फलहरि बड़गद विरीछ बनए लगै छै। कट्ठा-कहि नट्ठा बनि-बना सघन-घन धड़ए लगै छै। घन सघन धड़ए लगै छै। सोर बनि......। पकड़ि मूस मुँह मुसका शील-सिनेह सिरजए लगै छै। पकड़ि पूछ पुछड़ी पकड़ि घाट-घट घटबए लगै छै। घाट-घट घटबए लगै छै। सोर बनि......। कूट चित्र घट-घट घटा पौरुष-पुरुष गढ़ै लगै छै। कूट कुटि कूटि-पीस सिरखणि सिर गढ़ए लगै छै। सिरखणि सिर गढ़ए लगै छै। सोर बनि......। सेज-सिंगार...... सेज सिंगार सजि साजि-साजि साध सत् धड़ए लगै छै। दूर-दूर दुरगम दृग दृश्य सोरहा सोर करए लगै छै। सेज-सिंगार......। बनिते दहाइ एकाइ बदलि सिज फूल सिंगार धड़ै छै। बाल-भाल लीख-लीख ललाट धार जिनगी कुदए लगै छै। जिनगी धार बहए लगै छै। सेज-सिंगार......। सोर पकड़ि शोर सोर शोर सोड़ह सोरहा करए लगै छै। जिनगीक टपान टपिते टपैत दोहरी सेज सजए लगै छै। दोहरी सेज सजए लगै छै। सेज-सिंगार......। बदला-बदली करए धन-धेनु धाम-काम कहबए लगै छै। मिथि मालिन मन मलि-मलि मिथिलांगना कहबए लगै छै। मिथिलांगना कहबए लगै छै। सेज-सिंगार......। जएह लूरि...... जएह लूरि-बुधि मन पकड़ए तेहने टा जिनगी भाय यौ। नगर नजरि निहारि-निहारि अराधि राखि जिनगी ठनियौ। अराधि राखि जिनगी ठनियौ। जएह लूरि......। लूरि-बुधि गरजोड़ बनि-बनि गरदनि-खूटा मिलैत रहै छै। एक रक्षक एक भक्षक बनि अमृत रस भरैत रहै छै। अमृत रस भरैत रहै छै। रंग-रंग फूल माला मालिन मुसुकि मुँह कली कलिआइ छै। मालिन माला गढ़ि-मढ़ि छत माली छतिया सजै छै। छत माली छतिया सजै छै। जएह लूरि......। जोति हर...... जोति हर हरबाह हकड़ि जिनगीक गीत गबै छै। ले-ऊँच, ऊँच ले बनि वन चोटी-ढाल बनल छै। गे भौजी, चोटी......। बून पपीह स्वाती पकड़ि रस अमृत भरैत चलै छै। कृत्ति-वृत्त परकृति पकड़ि तरे-ऊपरे सिर सजै छै। गे भौजी......। लत्ती बनि लतड़ि-पसरि लतमरदन करैत रहै छै। चोटी जल टघड़ि-टघड़ि खून पसीना एक करै छै। गे भौजी......। ओहए पानि टघड़ि-टघड़ि झील-सरोवर सेहो सजै छै। बाल-भाल कुशक कलेप मरू स्थल गढ़ैत रहै छै। गे भौजी......। हर हलक...... हर हलक हलन्तमे मीर-दोल तेहल बनै छै। पुर-पुष्कर पुरस्सर बाट-घाट घटबी चलै छै। हल-हलक हलन्तमे... एक-दू-तीन चारि रहितो गति इंजीन गाड़ी धड़ै छै। बेहिसाब-हिसाब बनि बन धड़ि धड़कि धड़ैत रहै छै। धड़ि धड़कि......। लंक-अयोधिया सटि-हटि संगी-संग चलैत रहै छै। निरशि परखि बाट-बटोही फल करनी भोगैत रहै छै। फल करनी......। हिम-गिरि...... हिम-गिरि उत् उतूंग उमड़ि निरमल अमृत धार बहै छै। सिख-शिखर सिहैर-सहैर गंग अकास बहैत रहै छै। गंग अकास......। उतरे-दछिने धड़ैन धार शिखर-सगर देखबै छै। रंग-रंग फूल माल सजि मन गंग साजि सजै छै। मन गंग......। हटि-सटि, सटि-हटि बैस-वेस सागर-शिखर धड़ैत रहै छै। गंग-अकास उतरि-उतरि गंग-अकास......। भुवन भूचलि...... भुवन भूचलि अकास रंग-रंग तारा सजै छै। तीन मिलि डंड तराजू सभक तौल-मपैत रहै छै। सभक......। कखनो दायाँ वायाँ कखनो कीर-किरदानी करैत रहै छै। तेकठीक आस बिनु पौने उदय-अस्त करैत रहै छै। उदय......। सातो सगर देखि सतभैंया कचबच बचकच करैत रहै छै। भोर होइत भहड़ि-भड़ड़ि थकथका थकथका सेज सजै छै। थकतका......। खुजिते आँखि...... खुजिते आँखि तड़पि तड़पि पृथिवी पग पएर पड़ै छै। धरती-अकास बीचो-बीच खम्भ भेल देखै छै। खम्भ......। अकास अमरीत बरसि खोंइछ धरती भरैत रहै छै। आसा-आस मिलि बैसि बरहमासा गबैत कहै छै। भाय यौ, बरहमासा......। पर-वत बत-पर संग-संग हेल समुद्र हेलैत रहै छै। बालु ऊपर ढेर-बनि वन ढुइस हेल हेलैत रहै छै। मीत यौ, अहींकेँ कहै छै ढुइस......। मुड़जन मनुहर...... मुड़जन मनुहर पकड़ि-पकड़ि तान विरूदावली तनै छै। दोहन-दौजी कुदि-चमकि रचि-रचि रास रचै छै। संगी, रचि-रचि......। मुसुक मुसकी मसकि-मसकि कन-आनन अनैत रहै छै। नेंगरा-लुलहा, जरल-मरल बेणु-वन वीणा तनै छै। संगी, वेणु-वन......। शूर-सूर, मूड़ मुड़ि-मूड़ि पग-प्रेम पबैत रहै छै। लट्टा-चूड़ा, खट्टा दही भोज ब्रह्म गाबि कहै छै। संगी, ब्रह्म......। गोधूलि-बेल...... गोधूलि-बेल डगर डगरि थन-माइक थुथुन थुथबै छै। आस सूर्ज असतन पाबि तर-ऊपर चमकए लगै छै। तर-ऊपर......। अबैत करूआएल काल देखि पग-पगहा पाछू घीचै छै। पाँचम पहर पहल पहीर रग-रग रंग रगड़ए लगै छै। दीब साँझक दिव्य पाबि सगुनियाँ कहबए लगै छै। सगुनियाँ......। राति दबा दबदबाइत प्रभा भाेर-भुरुकबा जगबै छै। दुर-दुरा, दुर-दुरा दूर प्रात सूर्ज घीचने अबै छै। प्रात सूर्ज......। दौड़ि-दौड़...... दौड़ि-दौड़ दाउर घोर-घन बाट नहि भेटै छै। कारी-भारी भारी करि-करि अन्ह घाट बनबै छै। अन्ह घाट......। अन्हार घर साँपे-साँप विसविसाह बनबै छै। इजोतो अनरोख भऽ भऽ घोर-घनघोर करै छै। घोर-घनघोर......। लीला बड़ लीलाधर बड़-बड़ राशि रास रचै छै। मत् मन मत मत-मत मस्ती चालि धड़ै छै। मस्ती चालि......। चोट-चाट...... चोट-चाट चोटिया देलकै मुँह-नाक भसका देलकै। चोट-चाट......। कान कनक छीनि-वीनि बहीर बौक बना देलकै। नाक-मुँह-कान ताकि चोट-चाट चोटिया देलकै चोट-चाट......। बहीर-बौक मिलि-मिलि मलि आँखि मसका देलकै। गन्ह महक महक गन्ह दिन-राति गनहा देलकै। दिन-राति......। साँझ बेला वेली फूलि भोर-भुरुकवा कहै छै। रातु पार खेपि-खेप पाट सन धड़बैत चल छै। पाट सन......। चाइन चेन...... चाइन चेन थर-थीर थितिते चान-मुँह मुस्की भरै छै। हास-परिहास अट्टाहास लोक सूर्ज पहुँचए लगै छै। लोक सूर्ज......। तन-तना तक ताकि तरेगन हिया-हिया देखैत रहै छै। रंग एक रोशनाइ आनि लालटेन राति गढ़ैत रहै छै। मीत यौ, लालटेन......। असिते-अस्त सुधा ज्योति साँझ पहिल अनघोल करै छै। बनि सगुनियाँ तार-तारा आगूक दम्भ भरैत रहै छै। आगूक दम्भ......। दीनक दोख...... दीनक दोख कहै छी हे बहिना दीनक दोख कहै छी। बात-बात बतिया कतिया हटि-हटि हाट हटै छै। बत-रग्गर रगड़ि-रगड़ि पीसि पीस पीबै छै। हे बहिना, पीसि-पीस......। घरे-अंगने बीज कोढ़ीक छीटि-गाड़ि रोपैत रहै छै। फूल कोढ़िक फलक तेहने जिनगी पाठ पढ़ैत रहै छै। हे बहिना, जिनगी......। निशाँ पीब नस-नस नसिया निशाएल घाट तकैत रहै छै। रातिक हारल दिनक मारल िजनगी गीत गबैत रहै छै। हे बहिना, जिनगी......। सगर समनदर...... सगर समनदर सड़ि सरित तन-मन आस सिरजै छै। दुर्गा देवी हे माँ काली असतन आस धड़बै छै। मीत यौ, असतन आस......। थन तन मन पशु धन परबत सीस सजबै छै। ढेर धार ढेरिआएल घाट मन मनु माँ कहबै छै। मीत यौ, मन मनु......। पाश बैसि बसिया बुलकि जिनगी तानि नचै छै। हे माँ, नगर बीच रीति-रीत सती-सावित्री पुछै छै। मीत यौ, सगर......। चप-चप...... चप-चप चपचपा चपा चपचपाइत चाप चपा गेलिऐ। धार पेट चप-चपीमे तकिते ताकि तरिया गेलिऐ। मीत यौ, तकिते......। चपचपाइत मन धकधकाइत तन काप कपैत कतिया गेलिऐ। ओलनि-छोलनि घर जहिना भीत्ता धार भितिया गेलिऐ। मीत यौ, भीत्ता......। उठिते पूरबा पच्छिम चलि पछिया पूब चलिया गेलिऐ। चप-चप चपचपा चपा खस्सिया खर्ग टंगा गेलिऐ। मीत यौ, खस्सिया......। मारी-बेमारी...... मारी-बेमारी के कहए महामारी बीच पड़ल छै। के केकरा कहतै-सुनतै आने-आन धड़ाएल छै। भाय यौ, आने......। पानि जरि अगिया आगि रस रसराज पबै छै। केकरा कहबै, कहि के सुनतै खट-रस रस भरल छै। भाय यौ, खट......। खट्टर कका केर खटरास खिया-खिया कटकटाएल छै। मजनी रगड़ि-रगड़ि खरकिट्टी सेनुर-सोहाग बुलबलाएल छै। भाय यौ, सेनुर......। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। १.जगदानन्द झा मनु २.राजदेव मण्डल जीक तीन गोट कविता ३.शिव कुमार यादव- कविता- ई की भेल १. जगदानन्द झा मनु, ग्राम पोस्ट- हरिपुर डीहटोल, मधुबनी गजल १ जेना जेना राति बीतल जाइए तेना तेना देह धीपल जाइए जुल्मी संगे संग रहितो हे सखी नहिए हुनकर मोन जीतल जाइए योवनमे पुरबा बसातक जोड़ छै साबरिया बिनु नै त' जीबल जाइए डूबल निनमे सगर दुनिया छै जखन बीया प्रेमक एत' छीटल जाइए भोरे उठिते प्रेम बोरल 'मनु' छलौं लाजे मरि मुह आब तीतल जाइए (मात्राक्रम -222-2212-2212) २ तेल बिनु जेना निशठ टेमी धएने बिनु पिया जीवन बितत कोना अएने
बरख बरखसँ हम तुसारी पूजने छी बुझब की सुख साँझ पाबनि बिनु कएने
छै धिया सुख की बुझब कोना धिया बिनु भ्रूण हत्यारा बुझत की बिनु पएने
मोल जीवनमे हमर बाबूक की अछि मोन बुझलक छन्नमे हुनका गएने
रंग बदलति देखलौं सभकेँ हँसीमे देखि 'मनु' दुनियाँक रहलौं मुँह बएने
(बहरे रमल, २१२२-२१२२-२१२२) २ राजदेव मण्डल जीक तीन गोट कविता बलात् घटना भेलै राति अखने हेतै साइत चौबटियापर पंचायत दोषीपर खसतै जूता-लाति ऊपसँ हेतै जुरमाना लोक मारबे करतै ताना बात बढ़तै तँ जेतै थाना केहेन भऽ गेलै जमाना असगर केना कऽ निकलत लोक राक्षस बैसल दोगे-दोग जेकरा संगे भेलै बलात् कानि रहल अछि भऽ कऽ कात- “एकबेर असगरमे नोचलक गात-गात सबहक सोझा कहए पड़तै वएह बात केना की सभ भेलै हमरा साथ लाज भरल बात केहेन अघात फेर वएह पीड़ा सहए पड़तै खोलि-खोलि कहए पड़तै आँखि ने देखै भरल नोर यौ आब कहिया हेतै भोर?” झूठक गियान हमहीं देने रही झूठक गियान बालपनमे धऽ लेलक कान हमरे देल अछि ई सीख कखनो झूठ होइ छै ठीक झूठ बाजि बचा लिअ जान बढ़ा लिअ मान-सम्मान घटि गेलै सत्यक मान झूठकेँ धऽ लेलक कान करए लगलै झूठक बेपार बदलि गेलै काज बेवहार धऽ लेलकै ओही दिन लीख आब केना कहबे ई नै नीक झूठक गबैत यशोगान भऽ गेलै आब ओ जुआन हाथमे लेने तीर कमान खींच लेत आब हमरे जान ओ नै छी कियो आन सोझा ठाढ़ अपने संतान। जेहने अहाँ तेहने हम संगे-संग घुमलौं देश-कोस कतेक विचारि लगेलौं दोस दुनू गोटेमे भरल परेमक जोश खुशी रहत पल छल पूरा भरोस सभ किछु छल एक्के समान दूटा देह एकेटा जान दोस बनबैत कात एतेक विचार दुसमन बनबैत बखत भेलौं लचार नै सोचने छलौं अपना मन जे बनए पड़त आब दुसमन सन विचार कऽ बनाबितौं दुसमन नै जरैत आइ तन-मन दुसमनसँ कहाँ रहलौं कम जेहने ओ तेहने हम केकरोसँ कहाँ कियो कम। ३ शिव कुमार यादव कविता- ई की भेल
कन्नारोहट भऽरहल छल, भोरे-भोर हमर पड़ोसियाक आगन मे। हूलिमालि मचल छल गाम मे, अपस्याँत लोक, कानैत जनानी सब, सब आबि रहल छल ऐ आंगन मे।
हमहुँ बिछाउन सँ उठि पड़ैलौँ, जा पहुँचलौँ हूलिमालि मचल पड़ोसियाक आंगन। भारी लोक जुटल छल, मौगी-मूनसा आ धीया-पूता। खुसुर-फुसुर गप्प एक-दोसर मरद आ जनानी मे। हमरा किछु नै बुझना जाइत छल!
हम पुछलौँ, फन्ना काका कि भेलए यौ ? कहलक, फन्नाक ननकिरबी आगि सँ झड़कल मरल अछि। हम पुछलौँ, कोना यौ काका? कहलक, ननकिरबीक लहास ओकर सासुर सँ नैहर ऐलएयऽ। हम पुछलौँ, आगि मे कोना झड़कि मरल? कहलक, यएह तँ अखन नै बुझलौँ होउ बौआ।
हम जुटलौँ खोज-खबरि मे, ई कोना भेल? बात पता चलल, सब दहेजक अछि ई खेल।
भरल आंगनक भीड़ केँ चीड़ैत जखन पहूँचलौँ हम, लहास देखि ठाढ़ होमए कऽ हिम्मत नै रहल। खनए मे भीड़ सँ बहरइलौँ नोर टपकाबैत हम।
आंगनक हाल की छल ऐ क्षण, सोचि सकैत छी अहाँ? हमहुँ सोचि मे पड़ि गेलौँ, जे ई की भेल? कि! एखनो ऐ तरहक भऽ सकैए। लोक पढ़ैत-लिखैत छथि आ अपना केँ बुधियारो बूझैत छथि। मुदा? तैयो ऐ तरहक दृश्य देखऽ पड़ैत अछि! देह सिहरि उठल हम्मर, हमरो भगवान बहिन देने छथि।
मरद तँ मरद, जनानियो ऐ तरहक कुकर्म करैत छथि। अपने जनानी भऽ कऽ, एकटा दोसर जनानी केँ जड़ाबैत मारैत छथि। ई गामे टा नै, शहर मे सेहो खूब होइत अछि। अपना केँ सभ्य कहैबला लोक, एना खसि जाइत छथि।
टोल-पड़ोस आ समूचा गाम कानि रहल छल। ई की भेल, ई की कऽ देलक मुचंट दहेजक राक्षस ! जे कहियो ऐ गामक माटि आ आंगन मे, जनम् लेलक, हँसि-बोलि-खेलि नमहर भेल छलि। नवातुरे मे आइ "शिकुया", बीच आंगन मे झड़कल, जड़ल बौक बनि पड़ल अछि।
शिकुया "मैथिल" ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। शिव कुमार झा "टिल्लू"- सिनेह ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। बाल मुकुंद पाठक पाँचटा गजल १
हाएत दिवाली जड़तै दीप आँगने आँगन बड़तै दीप घर दुआरि आँगन सँभमेँ डेगे डेऽग पर जड़तै दीप
अन्हार रातिमेँ इजोत दैले मोमबत्ती संगे लड़तै दीप
चुक्का डिबिया सबसँ मिलके गाम प्रकाशसँ भरतै दीप
करै लेल घरकँ द्वारपाली अन्हार रातिसँ लड़तै दीप
सरल वर्णिक बहर ,वर्ण 11 २
आँखिसँ खसैत नोर रुकत की नै नोरक सरस आबो सुखत की नै सुखिकऽ ठोर आब गेल अछि फाटि फाटल ठोर फेरोसँ जुटत की नै
बेकल जिनगी भरि गेल दर्दसँ करेजक बेकलता मेटत की नै
आँखिक पलक फूलि गेल कानि कऽ बंद भेल आँखि फेरो खुजत की नै
जीबाक चाह तँ हटि गेल मोनसँ मरलोऽ पर दुख ई छुटत की नै
सरल वर्णिक बहर ,वर्ण 13 ३
अहाँ बैसला पर कि पाएब एतौ रहब काजके बिन कि खाएब एतौ कतोऽ दुख कतोऽ सुख लिखल अछि तँ सबटा कियै हाथ कर्मसँ हटाएब एतौ
हयौ दोष आ गुणतँ हाएत सभँमेँ बिना गलत हम नै पराएब एतौ
अहाँ बिसरि अप्पन पुरनका बबंडर चलूँ नव विचारसँ नहाएब एतौ
कहल केकरो मानबै बात नै जौँ तँ भूखल अहाँ मरि कनाएब एतौ
बहरे-मुतकारिब ।फऊलुन(मने122)चारि बेर। ४
प्रेम नै भाइ ई जहर छै पोखिरसँ उठल बुझु लहर छै प्रेम मेँ जान जाएत चलि तड़पि के मरब ई जहर छै
नै परु प्रेमके जाल मेँ एखनो एकरे पहर छै
नै करु प्रेमके ई नशा ई तँ मिसरी धुलल जहर छै
प्रेमिका प्रेमिका नै रटू ई पसारैत बड़ कहर छै
ई मुकुन्दोँ फसिकँ ऐहिमेँ कहलक प्रेम नै जहर छै
*बहरे- मुतदारिक । फाइलुन मने दीर्ध-ह्रस्व-दीर्ध चारि बेर । 5 अहाँ हमरा बिसरि रहलौँ वियोगे हम तँ मरि रहलौँ घुसिकँ कोनाकँ देहेमेँ अहाँ हमरा पसरि रहलौँ
बिसरऽ ई लाख चाही हम बनिकऽ लस्सा लसरि रहलौँ
कियै केलौँ अहाँ ऐना करेजसँ नै ससरि रहलौँ
छुटल घर आ अहूँ छुटलौँ दुखेँ हम आब मरि रहलौँ
बहरे -हजज । 'मफाईलुन' (मने 1222) दू बेर ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। १.बिनीता झा- भूखल/ प्रकृति २.मुन्नी कामत-किछु कविता३.शेफालिका वर्मा- रे मन १. बिनीता झा भूखल झरना अछि भूखैल नदी से भेटक लेल नदी भूखैल समुद्रक लेल भूक ओकर तइयो नै मेटेलय उरि बैसल आकाश बनि गेल ओ मेघ बरसि परल फेर आइ धरती पर करय लेल झरना स भेंट ई भूख छी प्रकृतिक देन अहि भूख स ने बचि सकल क्यौ कि झरना कि मनुख चारू दिस लागल अछि सब क्यौ भूखल मोन के शांत करय मे । प्रकृति आखरक नs भरोसे प्रकृति बिन आखरे सबटा बजैत प्रकृति
पात मे रूप सजौने प्रकृति फूलक सुगंधसँ गमकैत प्रकृति
सूर्य आर चान सन चमकैत प्रकृति कल-कल बहैत झरना सन चहकैत प्रकृति
रास करैत चिड़ै चुनमुनीक संग अछि प्रकृति प्रेमीक प्रेममे निःशब्द आँखि लड़बैत प्रकृति
बिन कहने सबटा कहैत प्रकृति आखरक कहाँ भेल मोहताज प्रकृति ? २ मुन्नी कामत किछु कविता १. बंदिश हाथ-पएर दुनू अछि पर नै चलि पबै छी नै किछु करि पबै छी जुबान अछि पर बउक बनल छी बस आँखि सँ देख रहल छी कान सँ सुनि रहल छी अत्यन्त वेदनाक भट्ठीमे अपन देह झुलसा रहल छी जिंदा लहास बनि जी रहल छी ककरा सँ कही ककरा बुझाबी कि हमहुँ एगो जान छी कही ओइ व्यवस्था सँ कि व्यवस्था बनबैबला लोक सँ कि स्वयंसँ। सहज ई मानि ली कि हम चुप रहै लऽ बाध्य छी किएकि हम लड़की छी। २. पैसा सँ बियाह कक्का घरमे बाजै बधइया होइ छै बुचिया कऽ बियाह यौ चारि बहिन हमहुँ छी चारू कऽ चारू कुमार यौ। दिन-राति मेहननि करि रोटिये टा कऽ करि पबै छी जोगार यौ छी हम महगाइ आ गरीबी कऽ मारल अछि बाबू हमर किसान यौ। दिदियो कऽ देखै लेल ऐल गाम-गाम सँ कतेक ने बरतुहार यौ पसिन करि खाइयो कऽ गेल सबटा तरूआ आ पान यौ। तइयो अछि हमर दीदी २५ साल सँ कुमार यौ। कहलक सब बरतुहार बिना दहेजक केेना चलत काम यौ हम छी बेटा बाला अपन पैसा खर्चा करि नै करब बियाह यौ। अइ युगमे लड़की सँ नै पैसा सँ होइत अछि बियाह यौ। ३. काँच बाँस जकाँ लचपच उमरिया काँच बाँस जकाँ लचपच उमरिया डगमगैत अछि डेग यौ केना भरब हम गगरी केना चलब डगर यौ। किया जनमलउ अहि धरती पर की छल हमर गुनाह यौ माय-बाबू नीक सँ बाइजो नै पाबलउँ बनलौं अपने हम माय यौ। ज्ञान,पोथियक दुनिया सँ रहलौं जे अनचिनहार यौ की कहब हम की केहन अछि हमर जिनगी भेल पुरे संसार अनहार यौ। ४. मनक वेदना रहि-रहि एगो हुक उठै यऽ सउँसे देह दगद भेल जाइए आब नै बचत मान भऽ रहल छी हम निष्प्राण। जिनगी बनि गेल धुँआ हवा कऽ मलारो सँ कॉंपि उठै यऽ सब रूआ। अछि सब रस्ता अंजान करिया गेेल मनक अरमान कतऽ ठार छी कतऽ जा रहल छी नै अछि हमरा किछो ज्ञान पर बुझैत छी हम अतेक कि जिन्दगीक आखरी सफर लऽ जाइत अछि समसान। ५. शरहद ई शरहद, ई सीमा कथी लऽ? जमीन बॉंटै लऽ! पर जमीनक संगे मन बँटाइत अछि इंसानकेँ इंसानसँ जुदा करैत अछि। हम एक जाति छी मानव जाति! फेर किए नै कोइ ई बुझैत छी जाति-पाति लऽ किए लड़ै छी? शरहद कऽ नाम पर भाइ-भाइ कऽ बाँटै छी धिक्कार अछि हमरा अपन मानवता पर जे अहि शरहदक सीमा मे बैंध गेल छी हमरा सँ नीक तँ ई हवा, पानि आ पक्षी अछि जे स्वतंत्र भऽ अइ छोर सँ ओइ छोर तक अपन दोस्त बनबैत अछि पर हम अइ दिवारक बिच कैद छी जब लगैत अछि जे आब दुरी मिटा जाएत भाइ-भाइ सँ गला मिलत तब ई दिवार आर मजबूत भऽ गगन केँ छुबऽ लगैत अछि आखिर कहिया ई शरहद हटत? कहिया ई मनक दिवार गिरत? हमर अबैबला पीढ़ी यएह दीवार मे कैद रहत? ३ शेफालिका वर्मा- रे मन आइ जीवनक इच्छा बनि बहरायल निसांस रे मन दिग दिगंत भेल सुरभित हमर आरती रहल अकम्पित आश उमंग नाचि थाकल नूतन नर्तन मधुर अकल्पित सौरभमय सुमन मौलायल मुरझायल विश्वास रे मन अग जग शोभा निरखै आली मधु मधु मह मह हँसैत लाली जग पागल कि हमहीं पागल सोची थाकलों काल कराली आइ मानसक ऐ हलचलमे उर हतास रे मन........... ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। १.कैलाश दास- नेता जी २. प्रबीण चौधरी प्रतीक३.सत्यनारायण झा-हे भगवान १. कैलाश दास नेता जी हम देशक रक्षक छी हमरा सँ किछु सीखू देश रक्षा कोना करबै हमरा सँ ई पुछू।।
देश द्रोहीसँ सावधान रहू देशक रक्षाक लेल कुर्वान रहू लोभ लालच सँ सावधान रहू अपन विधान पर अड़ल रहू
भ्रष्टाचारसँ दूर रहू देशक झण्डाक शान राखू। मातृ भूमिक ऊँच्चा नाम करु देश रक्षाक लागि कुर्वान रहू।
अपन देशसँ प्रेम करु विदेशीसँ न्यारा रहू हरदम एक आवाज उठाउ देश रक्षाक लागि कुर्वान रहू
नेता जीक ई भाषण सुनालक बाद जनता लोकनि
जनता सभ लालच मे आएल मतदान दऽकऽ सेहो जितौलक खुशी खुशी खुशी आ हँसिते हँसिते मारि झगड़ा सेहो मचौलक।
नेता जीतक पद पर आएल अपन रुप रावण सन धएलक मने मने विचार करए के हमरा सँ दुशमनी कएलक।
अब जनताक विनती हे हमर भाग्य विधाता हमर अहाँ शान छी। देशक अहाँ जान छी। हमर अधिकार मिलत तखन अपन आशीर्वाद भेटत जखन
नेता जी कहैत छथि
ओ उपदेश हमर ढंोग छलै भ्रष्टाचारी करबाक समय अएलै नै हम करबै भ्रष्टाचारी कोना बढबए हम अगारी
२ प्रबीण चौधरी प्रतीक देखही रौ मिता एकटा छौड़ी चैन चोराकs चलि गेलै........ ओकर गाल छै गुलाबी ताहि पर तिल एकटा कारी नयन ओकर छै नशीली कए कs हमरा घाइल चलि गेलै देखही रौ मिता एकटा छौडी चैन चोराकs चलि गेलै........ ३ सत्यनारायण झा हे भगवान - हुनका गामक पछिम ,एकटा छैक पोखरि, नाम छैक धोबिया पोखरि | कियो कहै छै, ओकरा धोबिया नामक लोक खुनेलकै , आ कियो कहै छैक ओकरा धोबिया जिन्न खुनेलकै | पोखरि मगर छैक बर गहीर,पातल कोर , कियो थाह नहि पाबि सकलै आइतक | भीड़ बर ऊंच छै , उपर सं देखय मे बर डेरौन लगै छै | चारु महार जंगल छै | ओहि महार पर हुरार रहै छै , ओहि पोखरि मे कियो नहाइत नहि छैक , दिनो मे डर लगै छै, राति मे त’ ओहि मे चुड़ैल नहाइत छैक एक दिन हमहू चुड़ैल क’ देखने रहियैक , मारैत रहैक चुभकी ओहि मे नग्न भ’ क’ , हमहू डरे भागल रही, ओ पोखरि खुनिया छैक | दिन मे गामक लम्पट लुच्चा ओहि मे वसर करैत छैक, राति मे वैह सभ चोरि ,डकैती करै छै ,राहजनी करै छै, लोक क’ लुटै छै | देसक शासन धोबिया पोखरि छै , लम्पट ,लुच्चा एहि मे नहाइत छै , भ्रष्टाचार चुड़ैल छै ,ओ नंगटे चुभकी मारै छै | भ्रष्टाचारक जरि पातल तक छै , ई शासन अत्याचारी छै , एकरे डरे लोक भगैत छै , एहि मे कतेको हुरार छै , ई लोकक इज्जत लुटैत छै | हमरा गामक पछिम मे आमक गाछी छैक | सकरचुनिया,सिनुरिया ,सीपिया ,जर्दा, रंग विरंगक आम छलै| गाछ सभ छलै बर झमटगर , देखय मे लगै छलै बर सुन्दर | मुदा एकबेर कमला मैयाक मरकी अयलै , गाछ सभ सुखा गेलैक | बचलै मात्र पाँचटा गाछ, मुदा पाँचो उपर सं ठुठ, जेना कियो मुरी काइट नेने होयक | ओकर नाम परि गेलैक पचगछिया , पचगछिया भुताहि भ’ गेलै , भूत जोगिन नाच कर’ लगलै, सद्यः लोक देखै , लोक ओ वाट छोडि देलकै , राति क’ पहलमानो क’ ओमहर पसीना दै | हमर देस फूलक फुलबारी छल , एहि फुलबारी में नाना तरहक फूल छलै , राजेंद्र ,जवाहर ,सरदार फूल फुलायल छलै, तिलक ,गोखले ,मालवीय गाछ लतरल चतरल छलै , मुदा कोन रोग धेलकै,सभ मरि गेलै , जे बचलै से कटहा फूल छैक , ओ चुभ सं गरि जाइत छैक | गोलाबक फूल तकने नहि भेटैत छैक , कमल फुलायत कोना ,सरोवर सुखायल छै, आब त’ गाछो कोकनले भेटैत छै | देस चलतै कोना,लोक जीतै कोना मोसकिलक अम्बार छैक ,बतहाक राज छै हे भगवान आबह तू ,जियाबह हमरा देस क’ , चारुकात कन्नारोहट भ’ रहल छै , चित्कार होइ छै ,वलात्कार होइ छै , सभ हक्कान कनैत छैक , मरै नहि छै मुदा मुर्दा भ’ गेल छै | हे खेवनहार कत’ नुकायल छह , अपन चक्र सुदर्शन उठाबह ,त्रिसूल सं माथ काटह पापी क’ , तोहर संतान ठोहि पारि कानि रहल छह ,चिचिया रहल छह , कहि रहल छह “ हे भगवान “ | ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। बिन्देश्वर ठाकुर, धनुषा नेपाल, हाल; कतार अभागलमे शुभकामना एक/अस्पतालक हाल/ जनकपुरक रेल्वे/ एक एहनो नारी/ गजल १ अभागलमे शुभकामना एक
अपने क्याम्पक एकान्त कुनामे आकाशमे चमकैत तारासन अबैए सपनाक ज्वारभाटा सभ हमरा मन मस्तिस्कमे आ गिजबैए हमर जवानी आ भावना सभकेँ।।१।।
बिगत साल जकाँ एहिबेर सेहो चाहनाक डालापर हिम पहिर चलि गेल समा चकेबाक गीत सुनऽ लेल ई कान बहिर भेल? बहिनक समा फोड़ब सेहो अधूरा रहि गेल।।२।।
याद अबैए एखनो चूड़ा, दही, अचार बहिन संग बिताएल समा-चकेबाक साँझ मुदा बिछड़लकऽ पीड़ासँ मन दुखि रहल अछि तन पाइक रहल अछि ।।३।। हमरे सन बहुत लोकनि बंचित छी चास प्रवासमे ओ सम्पूर्ण अभागलमे से हमर शुभकामना । ।।४।। २ अस्पतालक हाल जनकपुरक अञ्चल अस्पताल बनल अछि एक पैघ सबाल समयमे जौँ नै ध्यान देबै तँ रुप इहो लऽ लेत बिकराल ।।१।।
अव्यवस्थापन देखल ऐ संस्थाक दोसर खराबी नै भविष्यक प्रवाह अछि ककरो करए सब अपन मनमानी ।।२।।
स्वार्थक विष पीने सभ सेवक नै लागए मन उपकारमे रोगी ऐठाम खूनसँ लतपत मुदा ओ ब्यस्त क्लिनिक संसारमे ।।३।।
देशक सर्वोच्च जनशक्ति छी तँ ऐ बातपर ध्यान धरी रोगीक लेल भगवान बनब तँ अपन कर्तब्यक बोध करी ।।४।।
आबो दु:ख, पीड़ा जनताकेँ बुझब इहे मनमे आस अछि समय समयमे अस्पतालो टेबब अटूट जनविश्वास अछि ।।५।। ३ जनकपुरक रेल्वे जनकपुरक रेल्वे स्टेसन बनल अछि एक बज्र बिशेषण जीर्ण अवस्थाक मर्म तँ जरुरी सेहो टालल दोसर सेसन।
नेपालक एक मात्र रेल यातायात सेहो बनल विश्वासघात जनकपुरसँ निकलल गाड़ी पटरी छोड़लक बिचे बाट।
बौआ पुछलनि माए कहू ई ट्रेन कहिया धरि चलत माए बजलनि सुनु बौआ कुर्सीक खेल जखन धरि चलत।
घिचाघिच-मिचामिच छोड़िते स्वर्ग भऽ जाएत अपन देश समान विकास सभ ठाम हएत नै रहत कोनो उलझन विशेष।
रेल्बे आ ई रेलक चाट बड पैघ समस्या छैक निवेदन हमर सम्बन्धित सँ जल्दी ऐपर ध्यान देबैक। ४ एक एहनो नारी
चाही उनका स्ट्यान्डर्ड खाना तित नै कि मिठ-मिठ खाना खर्च करऽ मे कनियो कम नै बस देखब सर्कस सिनेमा ।
भोरे उठि अबै छी जखने आर्थिक श्रोतक आधारपर पिछुवारेसँ चुपे निकलल सोपिङ करऽ बजारपर ।
नयाँ डिजाइनक सड़ी चाही अभिनेत्री सन गहना यौ बात हिनकर छनि छुछे करु कि करियै हम बहिना यै।
नव युक्तिसँ नव प्रेमी संग प्रेमक नाटक थिक हिनकर काम फँसलनि जे यिनका फेरामे भागलाह ऐठाम बदनाम ।
पहिनेक नारी एही मिथिलाके सहनशील कतेक सुशील छलीह आजुक नारी भौतिकवादमे मैथिलानीक गुण बिसरि गेलीह।
की हएत हमरा मिथिलाकेँ नारी जौँ पथ छोड़ि देतीह जीवनकेँ दू रथ होइ छै बिन नारी कोना चलतीह। ५ गजल
मध्य राइत सपनामे हम नेपाल गेल छलौं छठिमे परिवार सङे बड खुशी भेल छलौं । ठकुवा भुसबा आरो सब किछु लऽ गेल छलौं फठकाकेँ झोरा मुदा घरही बिसरि गेल छलौं।
माए, बाबु, बहिन, भाइ कन्या छलीह साथमे छोट छोट बातपर तैयो रुइठ गेल छलौं ।
प्रसाद खाइत काल निन्द खुलल जखने अपने बिस्तरपर कतारमे सुतल छलौं ।
बिपदामे हएत साचे मजा करती साथी धत् हम तँ बेकारमे सपनामे गेल छलौं । ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। बालानां कृते बाल मुकुन्द पाठक बाल गजल
मेला चलब हमहुँ कक्का यौ पहिरब आइ सूट पक्का यौ खेबै जिलेबी आ झूलब झूला संगे संग किनब फटक्का यौ
बैट किनब क्रिकेट खेलै ले आबि कऽ खूब मारब छक्का यौ
साझेसँ अखारामे कुश्ती हेतै पहलवानोँ तँ छै लडक्का यौ
अन्तिम बेर छी एतौ हम तँ जाएब बाबू लऽग फरक्का यौ
कोरा मे कने लिअ ने हमरा ई भीड़ मेँ मारि देत धक्का यौ
चलू ने जल्दी किनै ले जिलेबी नै तँ उड़ि जाएत छोहक्का यौ
बाबूओसँ बेसी अहीँ मानै छी छी बड्ड नीक हमर कक्का यौ सरल वर्णिक बहर ,वर्ण 11 ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। बच्चा लोकनि द्वारा स्मरणीय श्लोक १.प्रातः काल ब्रह्ममुहूर्त्त (सूर्योदयक एक घंटा पहिने) सर्वप्रथम अपन दुनू हाथ देखबाक चाही, आ’ ई श्लोक बजबाक चाही। कराग्रे वसते लक्ष्मीः करमध्ये सरस्वती। करमूले स्थितो ब्रह्मा प्रभाते करदर्शनम्॥ करक आगाँ लक्ष्मी बसैत छथि, करक मध्यमे सरस्वती, करक मूलमे ब्रह्मा स्थित छथि। भोरमे ताहि द्वारे करक दर्शन करबाक थीक। २.संध्या काल दीप लेसबाक काल- दीपमूले स्थितो ब्रह्मा दीपमध्ये जनार्दनः। दीपाग्रे शङ्करः प्रोक्त्तः सन्ध्याज्योतिर्नमोऽस्तुते॥ दीपक मूल भागमे ब्रह्मा, दीपक मध्यभागमे जनार्दन (विष्णु) आऽ दीपक अग्र भागमे शङ्कर स्थित छथि। हे संध्याज्योति! अहाँकेँ नमस्कार। ३.सुतबाक काल- रामं स्कन्दं हनूमन्तं वैनतेयं वृकोदरम्। शयने यः स्मरेन्नित्यं दुःस्वप्नस्तस्य नश्यति॥ जे सभ दिन सुतबासँ पहिने राम, कुमारस्वामी, हनूमान्, गरुड़ आऽ भीमक स्मरण करैत छथि, हुनकर दुःस्वप्न नष्ट भऽ जाइत छन्हि। ४. नहेबाक समय- गङ्गे च यमुने चैव गोदावरि सरस्वति। नर्मदे सिन्धु कावेरि जलेऽस्मिन् सन्निधिं कुरू॥ हे गंगा, यमुना, गोदावरी, सरस्वती, नर्मदा, सिन्धु आऽ कावेरी धार। एहि जलमे अपन सान्निध्य दिअ। ५.उत्तरं यत्समुद्रस्य हिमाद्रेश्चैव दक्षिणम्। वर्षं तत् भारतं नाम भारती यत्र सन्ततिः॥ समुद्रक उत्तरमे आऽ हिमालयक दक्षिणमे भारत अछि आऽ ओतुका सन्तति भारती कहबैत छथि। ६.अहल्या द्रौपदी सीता तारा मण्डोदरी तथा। पञ्चकं ना स्मरेन्नित्यं महापातकनाशकम्॥ जे सभ दिन अहल्या, द्रौपदी, सीता, तारा आऽ मण्दोदरी, एहि पाँच साध्वी-स्त्रीक स्मरण करैत छथि, हुनकर सभ पाप नष्ट भऽ जाइत छन्हि। ७.अश्वत्थामा बलिर्व्यासो हनूमांश्च विभीषणः। कृपः परशुरामश्च सप्तैते चिरञ्जीविनः॥ अश्वत्थामा, बलि, व्यास, हनूमान्, विभीषण, कृपाचार्य आऽ परशुराम- ई सात टा चिरञ्जीवी कहबैत छथि। ८.साते भवतु सुप्रीता देवी शिखर वासिनी उग्रेन तपसा लब्धो यया पशुपतिः पतिः। सिद्धिः साध्ये सतामस्तु प्रसादान्तस्य धूर्जटेः जाह्नवीफेनलेखेव यन्यूधि शशिनः कला॥ ९. बालोऽहं जगदानन्द न मे बाला सरस्वती। अपूर्णे पंचमे वर्षे वर्णयामि जगत्त्रयम् ॥ १०. दूर्वाक्षत मंत्र(शुक्ल यजुर्वेद अध्याय २२, मंत्र २२) आ ब्रह्मन्नित्यस्य प्रजापतिर्ॠषिः। लिंभोक्त्ता देवताः। स्वराडुत्कृतिश्छन्दः। षड्जः स्वरः॥ आ ब्रह्म॑न् ब्राह्म॒णो ब्र॑ह्मवर्च॒सी जा॑यता॒मा रा॒ष्ट्रे रा॑ज॒न्यः शुरे॑ऽइषव्यो॒ऽतिव्या॒धी म॑हार॒थो जा॑यतां॒ दोग्ध्रीं धे॒नुर्वोढा॑न॒ड्वाना॒शुः सप्तिः॒ पुर॑न्धि॒र्योवा॑ जि॒ष्णू र॑थे॒ष्ठाः स॒भेयो॒ युवास्य यज॑मानस्य वी॒रो जा॒यतां निका॒मे-नि॑कामे नः प॒र्जन्यों वर्षतु॒ फल॑वत्यो न॒ऽओष॑धयः पच्यन्तां योगेक्ष॒मो नः॑ कल्पताम्॥२२॥ मन्त्रार्थाः सिद्धयः सन्तु पूर्णाः सन्तु मनोरथाः। शत्रूणां बुद्धिनाशोऽस्तु मित्राणामुदयस्तव। ॐ दीर्घायुर्भव। ॐ सौभाग्यवती भव। हे भगवान्। अपन देशमे सुयोग्य आ’ सर्वज्ञ विद्यार्थी उत्पन्न होथि, आ’ शुत्रुकेँ नाश कएनिहार सैनिक उत्पन्न होथि। अपन देशक गाय खूब दूध दय बाली, बरद भार वहन करएमे सक्षम होथि आ’ घोड़ा त्वरित रूपेँ दौगय बला होए। स्त्रीगण नगरक नेतृत्व करबामे सक्षम होथि आ’ युवक सभामे ओजपूर्ण भाषण देबयबला आ’ नेतृत्व देबामे सक्षम होथि। अपन देशमे जखन आवश्यक होय वर्षा होए आ’ औषधिक-बूटी सर्वदा परिपक्व होइत रहए। एवं क्रमे सभ तरहेँ हमरा सभक कल्याण होए। शत्रुक बुद्धिक नाश होए आ’ मित्रक उदय होए॥ मनुष्यकें कोन वस्तुक इच्छा करबाक चाही तकर वर्णन एहि मंत्रमे कएल गेल अछि। एहिमे वाचकलुप्तोपमालड़्कार अछि। अन्वय- ब्रह्म॑न् - विद्या आदि गुणसँ परिपूर्ण ब्रह्म रा॒ष्ट्रे - देशमे ब्र॑ह्मवर्च॒सी-ब्रह्म विद्याक तेजसँ युक्त्त आ जा॑यतां॒- उत्पन्न होए रा॑ज॒न्यः-राजा शुरे॑ऽ–बिना डर बला इषव्यो॒- बाण चलेबामे निपुण ऽतिव्या॒धी-शत्रुकेँ तारण दय बला म॑हार॒थो-पैघ रथ बला वीर दोग्ध्रीं-कामना(दूध पूर्ण करए बाली) धे॒नुर्वोढा॑न॒ड्वाना॒शुः धे॒नु-गौ वा वाणी र्वोढा॑न॒ड्वा- पैघ बरद ना॒शुः-आशुः-त्वरित सप्तिः॒-घोड़ा पुर॑न्धि॒र्योवा॑- पुर॑न्धि॒- व्यवहारकेँ धारण करए बाली र्योवा॑-स्त्री जि॒ष्णू-शत्रुकेँ जीतए बला र॑थे॒ष्ठाः-रथ पर स्थिर स॒भेयो॒-उत्तम सभामे युवास्य-युवा जेहन यज॑मानस्य-राजाक राज्यमे वी॒रो-शत्रुकेँ पराजित करएबला निका॒मे-नि॑कामे-निश्चययुक्त्त कार्यमे नः-हमर सभक प॒र्जन्यों-मेघ वर्षतु॒-वर्षा होए फल॑वत्यो-उत्तम फल बला ओष॑धयः-औषधिः पच्यन्तां- पाकए योगेक्ष॒मो-अलभ्य लभ्य करेबाक हेतु कएल गेल योगक रक्षा नः॑-हमरा सभक हेतु कल्पताम्-समर्थ होए ग्रिफिथक अनुवाद- हे ब्रह्मण, हमर राज्यमे ब्राह्मण नीक धार्मिक विद्या बला, राजन्य-वीर,तीरंदाज, दूध दए बाली गाय, दौगय बला जन्तु, उद्यमी नारी होथि। पार्जन्य आवश्यकता पड़ला पर वर्षा देथि, फल देय बला गाछ पाकए, हम सभ संपत्ति अर्जित/संरक्षित करी। 8.VIDEHA FOR NON RESIDENTS 8.1 to 8.3 MAITHILI LITERATURE IN ENGLISH 8.1.1.The Comet -GAJENDRA THAKUR translated by Jyoti Jha chaudhary 8.1.2.The_Science_of_Words- GAJENDRA THAKUR translated by the author himself 8.1.3.On_the_dice-board_of_the_millennium- GAJENDRA THAKUR translated by Jyoti Jha chaudhary 8.1.4.NAAGPHANS (IN ENGLISH)- SHEFALIKA VERMA translated by Dr. Rajiv Kumar Verma and Dr. Jaya Verma Send your comments to ggajendra@videha.com विदेह नूतन अंक भाषापाक रचना-लेखन इंग्लिश-मैथिली-कोष / मैथिली-इंग्लिश-कोष प्रोजेक्टकेँ आगू बढ़ाऊ, अपन सुझाव आ योगदान ई-मेल द्वारा ggajendra@videha.com पर पठाऊ। Top of Form विदेहक मैथिली-अंग्रेजी आ अंग्रेजी मैथिली कोष (इंटरनेटपर पहिल बेर सर्च-डिक्शनरी) एम.एस. एस.क्यू.एल. सर्वर आधारित -Based on ms-sql server Maithili-English and English-Maithili Dictionary. १.भारत आ नेपालक मैथिली भाषा-वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक शैली आ २.मैथिलीमे भाषा सम्पादन पाठ्यक्रम १.नेपाल आ भारतक मैथिली भाषा-वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक शैली
१.१. नेपालक मैथिली भाषा वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक उच्चारण आ लेखन शैली (भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक धारणाकेँ पूर्ण रूपसँ सङ्ग लऽ निर्धारित) मैथिलीमे उच्चारण तथा लेखन १.पञ्चमाक्षर आ अनुस्वार: पञ्चमाक्षरान्तर्गत ङ, ञ, ण, न एवं म अबैत अछि। संस्कृत भाषाक अनुसार शब्दक अन्तमे जाहि वर्गक अक्षर रहैत अछि ओही वर्गक पञ्चमाक्षर अबैत अछि। जेना- अङ्क (क वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ङ् आएल अछि।) पञ्च (च वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ञ् आएल अछि।) खण्ड (ट वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ण् आएल अछि।) सन्धि (त वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे न् आएल अछि।) खम्भ (प वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे म् आएल अछि।) उपर्युक्त बात मैथिलीमे कम देखल जाइत अछि। पञ्चमाक्षरक बदलामे अधिकांश जगहपर अनुस्वारक प्रयोग देखल जाइछ। जेना- अंक, पंच, खंड, संधि, खंभ आदि। व्याकरणविद पण्डित गोविन्द झाक कहब छनि जे कवर्ग, चवर्ग आ टवर्गसँ पूर्व अनुस्वार लिखल जाए तथा तवर्ग आ पवर्गसँ पूर्व पञ्चमाक्षरे लिखल जाए। जेना- अंक, चंचल, अंडा, अन्त तथा कम्पन। मुदा हिन्दीक निकट रहल आधुनिक लेखक एहि बातकेँ नहि मानैत छथि। ओ लोकनि अन्त आ कम्पनक जगहपर सेहो अंत आ कंपन लिखैत देखल जाइत छथि। नवीन पद्धति किछु सुविधाजनक अवश्य छैक। किएक तँ एहिमे समय आ स्थानक बचत होइत छैक। मुदा कतोक बेर हस्तलेखन वा मुद्रणमे अनुस्वारक छोट सन बिन्दु स्पष्ट नहि भेलासँ अर्थक अनर्थ होइत सेहो देखल जाइत अछि। अनुस्वारक प्रयोगमे उच्चारण-दोषक सम्भावना सेहो ततबए देखल जाइत अछि। एतदर्थ कसँ लऽ कऽ पवर्ग धरि पञ्चमाक्षरेक प्रयोग करब उचित अछि। यसँ लऽ कऽ ज्ञ धरिक अक्षरक सङ्ग अनुस्वारक प्रयोग करबामे कतहु कोनो विवाद नहि देखल जाइछ। २.ढ आ ढ़ : ढ़क उच्चारण “र् ह”जकाँ होइत अछि। अतः जतऽ “र् ह”क उच्चारण हो ओतऽ मात्र ढ़ लिखल जाए। आन ठाम खाली ढ लिखल जएबाक चाही। जेना- ढ = ढाकी, ढेकी, ढीठ, ढेउआ, ढङ्ग, ढेरी, ढाकनि, ढाठ आदि। ढ़ = पढ़ाइ, बढ़ब, गढ़ब, मढ़ब, बुढ़बा, साँढ़, गाढ़, रीढ़, चाँढ़, सीढ़ी, पीढ़ी आदि। उपर्युक्त शब्द सभकेँ देखलासँ ई स्पष्ट होइत अछि जे साधारणतया शब्दक शुरूमे ढ आ मध्य तथा अन्तमे ढ़ अबैत अछि। इएह नियम ड आ ड़क सन्दर्भ सेहो लागू होइत अछि। ३.व आ ब : मैथिलीमे “व”क उच्चारण ब कएल जाइत अछि, मुदा ओकरा ब रूपमे नहि लिखल जएबाक चाही। जेना- उच्चारण : बैद्यनाथ, बिद्या, नब, देबता, बिष्णु, बंश, बन्दना आदि। एहि सभक स्थानपर क्रमशः वैद्यनाथ, विद्या, नव, देवता, विष्णु, वंश, वन्दना लिखबाक चाही। सामान्यतया व उच्चारणक लेल ओ प्रयोग कएल जाइत अछि। जेना- ओकील, ओजह आदि। ४.य आ ज : कतहु-कतहु “य”क उच्चारण “ज”जकाँ करैत देखल जाइत अछि, मुदा ओकरा ज नहि लिखबाक चाही। उच्चारणमे यज्ञ, जदि, जमुना, जुग, जाबत, जोगी, जदु, जम आदि कहल जाएबला शब्द सभकेँ क्रमशः यज्ञ, यदि, यमुना, युग, यावत, योगी, यदु, यम लिखबाक चाही। ५.ए आ य : मैथिलीक वर्तनीमे ए आ य दुनू लिखल जाइत अछि। प्राचीन वर्तनी- कएल, जाए, होएत, माए, भाए, गाए आदि। नवीन वर्तनी- कयल, जाय, होयत, माय, भाय, गाय आदि। सामान्यतया शब्दक शुरूमे ए मात्र अबैत अछि। जेना एहि, एना, एकर, एहन आदि। एहि शब्द सभक स्थानपर यहि, यना, यकर, यहन आदिक प्रयोग नहि करबाक चाही। यद्यपि मैथिलीभाषी थारू सहित किछु जातिमे शब्दक आरम्भोमे “ए”केँ य कहि उच्चारण कएल जाइत अछि। ए आ “य”क प्रयोगक सन्दर्भमे प्राचीने पद्धतिक अनुसरण करब उपयुक्त मानि एहि पुस्तकमे ओकरे प्रयोग कएल गेल अछि। किएक तँ दुनूक लेखनमे कोनो सहजता आ दुरूहताक बात नहि अछि। आ मैथिलीक सर्वसाधारणक उच्चारण-शैली यक अपेक्षा एसँ बेसी निकट छैक। खास कऽ कएल, हएब आदि कतिपय शब्दकेँ कैल, हैब आदि रूपमे कतहु-कतहु लिखल जाएब सेहो “ए”क प्रयोगकेँ बेसी समीचीन प्रमाणित करैत अछि। ६.हि, हु तथा एकार, ओकार : मैथिलीक प्राचीन लेखन-परम्परामे कोनो बातपर बल दैत काल शब्दक पाछाँ हि, हु लगाओल जाइत छैक। जेना- हुनकहि, अपनहु, ओकरहु, तत्कालहि, चोट्टहि, आनहु आदि। मुदा आधुनिक लेखनमे हिक स्थानपर एकार एवं हुक स्थानपर ओकारक प्रयोग करैत देखल जाइत अछि। जेना- हुनके, अपनो, तत्काले, चोट्टे, आनो आदि। ७.ष तथा ख : मैथिली भाषामे अधिकांशतः षक उच्चारण ख होइत अछि। जेना- षड्यन्त्र (खड़यन्त्र), षोडशी (खोड़शी), षट्कोण (खटकोण), वृषेश (वृखेश), सन्तोष (सन्तोख) आदि। ८.ध्वनि-लोप : निम्नलिखित अवस्थामे शब्दसँ ध्वनि-लोप भऽ जाइत अछि: (क) क्रियान्वयी प्रत्यय अयमे य वा ए लुप्त भऽ जाइत अछि। ओहिमे सँ पहिने अक उच्चारण दीर्घ भऽ जाइत अछि। ओकर आगाँ लोप-सूचक चिह्न वा विकारी (’ / ऽ) लगाओल जाइछ। जेना- पूर्ण रूप : पढ़ए (पढ़य) गेलाह, कए (कय) लेल, उठए (उठय) पड़तौक। अपूर्ण रूप : पढ़’ गेलाह, क’ लेल, उठ’ पड़तौक। पढ़ऽ गेलाह, कऽ लेल, उठऽ पड़तौक। (ख) पूर्वकालिक कृत आय (आए) प्रत्ययमे य (ए) लुप्त भऽ जाइछ, मुदा लोप-सूचक विकारी नहि लगाओल जाइछ। जेना- पूर्ण रूप : खाए (य) गेल, पठाय (ए) देब, नहाए (य) अएलाह। अपूर्ण रूप : खा गेल, पठा देब, नहा अएलाह। (ग) स्त्री प्रत्यय इक उच्चारण क्रियापद, संज्ञा, ओ विशेषण तीनूमे लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना- पूर्ण रूप : दोसरि मालिनि चलि गेलि। अपूर्ण रूप : दोसर मालिन चलि गेल। (घ) वर्तमान कृदन्तक अन्तिम त लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना- पूर्ण रूप : पढ़ैत अछि, बजैत अछि, गबैत अछि। अपूर्ण रूप : पढ़ै अछि, बजै अछि, गबै अछि। (ङ) क्रियापदक अवसान इक, उक, ऐक तथा हीकमे लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना- पूर्ण रूप: छियौक, छियैक, छहीक, छौक, छैक, अबितैक, होइक। अपूर्ण रूप : छियौ, छियै, छही, छौ, छै, अबितै, होइ। (च) क्रियापदीय प्रत्यय न्ह, हु तथा हकारक लोप भऽ जाइछ। जेना- पूर्ण रूप : छन्हि, कहलन्हि, कहलहुँ, गेलह, नहि। अपूर्ण रूप : छनि, कहलनि, कहलौँ, गेलऽ, नइ, नञि, नै। ९.ध्वनि स्थानान्तरण : कोनो-कोनो स्वर-ध्वनि अपना जगहसँ हटि कऽ दोसर ठाम चलि जाइत अछि। खास कऽ ह्रस्व इ आ उक सम्बन्धमे ई बात लागू होइत अछि। मैथिलीकरण भऽ गेल शब्दक मध्य वा अन्तमे जँ ह्रस्व इ वा उ आबए तँ ओकर ध्वनि स्थानान्तरित भऽ एक अक्षर आगाँ आबि जाइत अछि। जेना- शनि (शइन), पानि (पाइन), दालि ( दाइल), माटि (माइट), काछु (काउछ), मासु (माउस) आदि। मुदा तत्सम शब्द सभमे ई निअम लागू नहि होइत अछि। जेना- रश्मिकेँ रइश्म आ सुधांशुकेँ सुधाउंस नहि कहल जा सकैत अछि। १०.हलन्त(्)क प्रयोग : मैथिली भाषामे सामान्यतया हलन्त (्)क आवश्यकता नहि होइत अछि। कारण जे शब्दक अन्तमे अ उच्चारण नहि होइत अछि। मुदा संस्कृत भाषासँ जहिनाक तहिना मैथिलीमे आएल (तत्सम) शब्द सभमे हलन्त प्रयोग कएल जाइत अछि। एहि पोथीमे सामान्यतया सम्पूर्ण शब्दकेँ मैथिली भाषा सम्बन्धी निअम अनुसार हलन्तविहीन राखल गेल अछि। मुदा व्याकरण सम्बन्धी प्रयोजनक लेल अत्यावश्यक स्थानपर कतहु-कतहु हलन्त देल गेल अछि। प्रस्तुत पोथीमे मथिली लेखनक प्राचीन आ नवीन दुनू शैलीक सरल आ समीचीन पक्ष सभकेँ समेटि कऽ वर्ण-विन्यास कएल गेल अछि। स्थान आ समयमे बचतक सङ्गहि हस्त-लेखन तथा तकनीकी दृष्टिसँ सेहो सरल होबऽबला हिसाबसँ वर्ण-विन्यास मिलाओल गेल अछि। वर्तमान समयमे मैथिली मातृभाषी पर्यन्तकेँ आन भाषाक माध्यमसँ मैथिलीक ज्ञान लेबऽ पड़ि रहल परिप्रेक्ष्यमे लेखनमे सहजता तथा एकरूपतापर ध्यान देल गेल अछि। तखन मैथिली भाषाक मूल विशेषता सभ कुण्ठित नहि होइक, ताहू दिस लेखक-मण्डल सचेत अछि। प्रसिद्ध भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक कहब छनि जे सरलताक अनुसन्धानमे एहन अवस्था किन्नहु ने आबऽ देबाक चाही जे भाषाक विशेषता छाँहमे पडि जाए। -(भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक धारणाकेँ पूर्ण रूपसँ सङ्ग लऽ निर्धारित) १.२. मैथिली अकादमी, पटना द्वारा निर्धारित मैथिली लेखन-शैली
१. जे शब्द मैथिली-साहित्यक प्राचीन कालसँ आइ धरि जाहि वर्त्तनीमे प्रचलित अछि, से सामान्यतः ताहि वर्त्तनीमे लिखल जाय- उदाहरणार्थ-
ग्राह्य
एखन ठाम जकर, तकर तनिकर अछि
अग्राह्य अखन, अखनि, एखेन, अखनी ठिमा, ठिना, ठमा जेकर, तेकर तिनकर। (वैकल्पिक रूपेँ ग्राह्य) ऐछ, अहि, ए।
२. निम्नलिखित तीन प्रकारक रूप वैकल्पिकतया अपनाओल जाय: भऽ गेल, भय गेल वा भए गेल। जा रहल अछि, जाय रहल अछि, जाए रहल अछि। कर’ गेलाह, वा करय गेलाह वा करए गेलाह।
३. प्राचीन मैथिलीक ‘न्ह’ ध्वनिक स्थानमे ‘न’ लिखल जाय सकैत अछि यथा कहलनि वा कहलन्हि।
४. ‘ऐ’ तथा ‘औ’ ततय लिखल जाय जत’ स्पष्टतः ‘अइ’ तथा ‘अउ’ सदृश उच्चारण इष्ट हो। यथा- देखैत, छलैक, बौआ, छौक इत्यादि।
५. मैथिलीक निम्नलिखित शब्द एहि रूपे प्रयुक्त होयत: जैह, सैह, इएह, ओऐह, लैह तथा दैह।
६. ह्र्स्व इकारांत शब्दमे ‘इ’ के लुप्त करब सामान्यतः अग्राह्य थिक। यथा- ग्राह्य देखि आबह, मालिनि गेलि (मनुष्य मात्रमे)।
७. स्वतंत्र ह्रस्व ‘ए’ वा ‘य’ प्राचीन मैथिलीक उद्धरण आदिमे तँ यथावत राखल जाय, किंतु आधुनिक प्रयोगमे वैकल्पिक रूपेँ ‘ए’ वा ‘य’ लिखल जाय। यथा:- कयल वा कएल, अयलाह वा अएलाह, जाय वा जाए इत्यादि।
८. उच्चारणमे दू स्वरक बीच जे ‘य’ ध्वनि स्वतः आबि जाइत अछि तकरा लेखमे स्थान वैकल्पिक रूपेँ देल जाय। यथा- धीआ, अढ़ैआ, विआह, वा धीया, अढ़ैया, बियाह।
९. सानुनासिक स्वतंत्र स्वरक स्थान यथासंभव ‘ञ’ लिखल जाय वा सानुनासिक स्वर। यथा:- मैञा, कनिञा, किरतनिञा वा मैआँ, कनिआँ, किरतनिआँ।
१०. कारकक विभक्त्तिक निम्नलिखित रूप ग्राह्य:- हाथकेँ, हाथसँ, हाथेँ, हाथक, हाथमे। ’मे’ मे अनुस्वार सर्वथा त्याज्य थिक। ‘क’ क वैकल्पिक रूप ‘केर’ राखल जा सकैत अछि।
११. पूर्वकालिक क्रियापदक बाद ‘कय’ वा ‘कए’ अव्यय वैकल्पिक रूपेँ लगाओल जा सकैत अछि। यथा:- देखि कय वा देखि कए।
१२. माँग, भाँग आदिक स्थानमे माङ, भाङ इत्यादि लिखल जाय।
१३. अर्द्ध ‘न’ ओ अर्द्ध ‘म’ क बदला अनुसार नहि लिखल जाय, किंतु छापाक सुविधार्थ अर्द्ध ‘ङ’ , ‘ञ’, तथा ‘ण’ क बदला अनुस्वारो लिखल जा सकैत अछि। यथा:- अङ्क, वा अंक, अञ्चल वा अंचल, कण्ठ वा कंठ।
१४. हलंत चिह्न निअमतः लगाओल जाय, किंतु विभक्तिक संग अकारांत प्रयोग कएल जाय। यथा:- श्रीमान्, किंतु श्रीमानक।
१५. सभ एकल कारक चिह्न शब्दमे सटा क’ लिखल जाय, हटा क’ नहि, संयुक्त विभक्तिक हेतु फराक लिखल जाय, यथा घर परक।
१६. अनुनासिककेँ चन्द्रबिन्दु द्वारा व्यक्त कयल जाय। परंतु मुद्रणक सुविधार्थ हि समान जटिल मात्रापर अनुस्वारक प्रयोग चन्द्रबिन्दुक बदला कयल जा सकैत अछि। यथा- हिँ केर बदला हिं।
१७. पूर्ण विराम पासीसँ ( । ) सूचित कयल जाय।
१८. समस्त पद सटा क’ लिखल जाय, वा हाइफेनसँ जोड़ि क’ , हटा क’ नहि।
१९. लिअ तथा दिअ शब्दमे बिकारी (ऽ) नहि लगाओल जाय।
२०. अंक देवनागरी रूपमे राखल जाय।
२१.किछु ध्वनिक लेल नवीन चिन्ह बनबाओल जाय। जा' ई नहि बनल अछि ताबत एहि दुनू ध्वनिक बदला पूर्ववत् अय/ आय/ अए/ आए/ आओ/ अओ लिखल जाय। आकि ऎ वा ऒ सँ व्यक्त कएल जाय।
ह./- गोविन्द झा ११/८/७६ श्रीकान्त ठाकुर ११/८/७६ सुरेन्द्र झा "सुमन" ११/०८/७६
२. मैथिलीमे भाषा सम्पादन पाठ्यक्रम २.१. उच्चारण निर्देश: (बोल्ड कएल रूप ग्राह्य):- दन्त न क उच्चारणमे दाँतमे जीह सटत- जेना बाजू नाम , मुदा ण क उच्चारणमे जीह मूर्धामे सटत (नै सटैए तँ उच्चारण दोष अछि)- जेना बाजू गणेश। तालव्य शमे जीह तालुसँ , षमे मूर्धासँ आ दन्त समे दाँतसँ सटत। निशाँ, सभ आ शोषण बाजि कऽ देखू। मैथिलीमे ष केँ वैदिक संस्कृत जकाँ ख सेहो उच्चरित कएल जाइत अछि, जेना वर्षा, दोष। य अनेको स्थानपर ज जकाँ उच्चरित होइत अछि आ ण ड़ जकाँ (यथा संयोग आ गणेश संजोग आ गड़ेस उच्चरित होइत अछि)। मैथिलीमे व क उच्चारण ब, श क उच्चारण स आ य क उच्चारण ज सेहो होइत अछि। ओहिना ह्रस्व इ बेशीकाल मैथिलीमे पहिने बाजल जाइत अछि कारण देवनागरीमे आ मिथिलाक्षरमे ह्रस्व इ अक्षरक पहिने लिखलो जाइत आ बाजलो जएबाक चाही। कारण जे हिन्दीमे एकर दोषपूर्ण उच्चारण होइत अछि (लिखल तँ पहिने जाइत अछि मुदा बाजल बादमे जाइत अछि), से शिक्षा पद्धतिक दोषक कारण हम सभ ओकर उच्चारण दोषपूर्ण ढंगसँ कऽ रहल छी। अछि- अ इ छ ऐछ (उच्चारण) छथि- छ इ थ – छैथ (उच्चारण) पहुँचि- प हुँ इ च (उच्चारण) आब अ आ इ ई ए ऐ ओ औ अं अः ऋ ऐ सभ लेल मात्रा सेहो अछि, मुदा ऐमे ई ऐ ओ औ अं अः ऋ केँ संयुक्ताक्षर रूपमे गलत रूपमे प्रयुक्त आ उच्चरित कएल जाइत अछि। जेना ऋ केँ री रूपमे उच्चरित करब। आ देखियौ- ऐ लेल देखिऔ क प्रयोग अनुचित। मुदा देखिऐ लेल देखियै अनुचित। क् सँ ह् धरि अ सम्मिलित भेलासँ क सँ ह बनैत अछि, मुदा उच्चारण काल हलन्त युक्त शब्दक अन्तक उच्चारणक प्रवृत्ति बढ़ल अछि, मुदा हम जखन मनोजमे ज् अन्तमे बजैत छी, तखनो पुरनका लोककेँ बजैत सुनबन्हि- मनोजऽ, वास्तवमे ओ अ युक्त ज् = ज बजै छथि। फेर ज्ञ अछि ज् आ ञ क संयुक्त मुदा गलत उच्चारण होइत अछि- ग्य। ओहिना क्ष अछि क् आ ष क संयुक्त मुदा उच्चारण होइत अछि छ। फेर श् आ र क संयुक्त अछि श्र ( जेना श्रमिक) आ स् आ र क संयुक्त अछि स्र (जेना मिस्र)। त्र भेल त+र । उच्चारणक ऑडियो फाइल विदेह आर्काइव http://www.videha.co.in/ पर उपलब्ध अछि। फेर केँ / सँ / पर पूर्व अक्षरसँ सटा कऽ लिखू मुदा तँ / कऽ हटा कऽ। ऐमे सँ मे पहिल सटा कऽ लिखू आ बादबला हटा कऽ। अंकक बाद टा लिखू सटा कऽ मुदा अन्य ठाम टा लिखू हटा कऽ– जेना छहटा मुदा सभ टा। फेर ६अ म सातम लिखू- छठम सातम नै। घरबलामे बला मुदा घरवालीमे वाली प्रयुक्त करू। रहए- रहै मुदा सकैए (उच्चारण सकै-ए)। मुदा कखनो काल रहए आ रहै मे अर्थ भिन्नता सेहो, जेना से कम्मो जगहमे पार्किंग करबाक अभ्यास रहै ओकरा। पुछलापर पता लागल जे ढुनढुन नाम्ना ई ड्राइवर कनाट प्लेसक पार्किंगमे काज करैत रहए। छलै, छलए मे सेहो ऐ तरहक भेल। छलए क उच्चारण छल-ए सेहो। संयोगने- (उच्चारण संजोगने) केँ/ कऽ केर- क ( केर क प्रयोग गद्यमे नै करू , पद्यमे कऽ सकै छी। ) क (जेना रामक) –रामक आ संगे (उच्चारण राम के / राम कऽ सेहो) सँ- सऽ (उच्चारण) चन्द्रबिन्दु आ अनुस्वार- अनुस्वारमे कंठ धरिक प्रयोग होइत अछि मुदा चन्द्रबिन्दुमे नै। चन्द्रबिन्दुमे कनेक एकारक सेहो उच्चारण होइत अछि- जेना रामसँ- (उच्चारण राम सऽ) रामकेँ- (उच्चारण राम कऽ/ राम के सेहो)। केँ जेना रामकेँ भेल हिन्दीक को (राम को)- राम को= रामकेँ क जेना रामक भेल हिन्दीक का ( राम का) राम का= रामक कऽ जेना जा कऽ भेल हिन्दीक कर ( जा कर) जा कर= जा कऽ सँ भेल हिन्दीक से (राम से) राम से= रामसँ सऽ , तऽ , त , केर (गद्यमे) एे चारू शब्द सबहक प्रयोग अवांछित। के दोसर अर्थेँ प्रयुक्त भऽ सकैए- जेना, के कहलक? विभक्ति “क”क बदला एकर प्रयोग अवांछित। नञि, नहि, नै, नइ, नँइ, नइँ, नइं ऐ सभक उच्चारण आ लेखन - नै त्त्व क बदलामे त्व जेना महत्वपूर्ण (महत्त्वपूर्ण नै) जतए अर्थ बदलि जाए ओतहि मात्र तीन अक्षरक संयुक्ताक्षरक प्रयोग उचित। सम्पति- उच्चारण स म्प इ त (सम्पत्ति नै- कारण सही उच्चारण आसानीसँ सम्भव नै)। मुदा सर्वोत्तम (सर्वोतम नै)। राष्ट्रिय (राष्ट्रीय नै) सकैए/ सकै (अर्थ परिवर्तन) पोछैले/ पोछै लेल/ पोछए लेल पोछैए/ पोछए/ (अर्थ परिवर्तन) पोछए/ पोछै ओ लोकनि ( हटा कऽ, ओ मे बिकारी नै) ओइ/ ओहि ओहिले/ ओहि लेल/ ओही लऽ जएबेँ/ बैसबेँ पँचभइयाँ देखियौक/ (देखिऔक नै- तहिना अ मे ह्रस्व आ दीर्घक मात्राक प्रयोग अनुचित) जकाँ / जेकाँ तँइ/ तैँ/ होएत / हएत नञि/ नहि/ नँइ/ नइँ/ नै सौँसे/ सौंसे बड़ / बड़ी (झोराओल) गाए (गाइ नहि), मुदा गाइक दूध (गाएक दूध नै।) रहलेँ/ पहिरतैँ हमहीं/ अहीं सब - सभ सबहक - सभहक धरि - तक गप- बात बूझब - समझब बुझलौं/ समझलौं/ बुझलहुँ - समझलहुँ हमरा आर - हम सभ आकि- आ कि सकैछ/ करैछ (गद्यमे प्रयोगक आवश्यकता नै) होइन/ होनि जाइन (जानि नै, जेना देल जाइन) मुदा जानि-बूझि (अर्थ परिव्र्तन) पइठ/ जाइठ आउ/ जाउ/ आऊ/ जाऊ मे, केँ, सँ, पर (शब्दसँ सटा कऽ) तँ कऽ धऽ दऽ (शब्दसँ हटा कऽ) मुदा दूटा वा बेसी विभक्ति संग रहलापर पहिल विभक्ति टाकेँ सटाऊ। जेना ऐमे सँ । एकटा , दूटा (मुदा कए टा) बिकारीक प्रयोग शब्दक अन्तमे, बीचमे अनावश्यक रूपेँ नै। आकारान्त आ अन्तमे अ क बाद बिकारीक प्रयोग नै (जेना दिअ , आ/ दिय’ , आ’, आ नै ) अपोस्ट्रोफीक प्रयोग बिकारीक बदलामे करब अनुचित आ मात्र फॉन्टक तकनीकी न्यूनताक परिचायक)- ओना बिकारीक संस्कृत रूप ऽ अवग्रह कहल जाइत अछि आ वर्तनी आ उच्चारण दुनू ठाम एकर लोप रहैत अछि/ रहि सकैत अछि (उच्चारणमे लोप रहिते अछि)। मुदा अपोस्ट्रोफी सेहो अंग्रेजीमे पसेसिव केसमे होइत अछि आ फ्रेंचमे शब्दमे जतए एकर प्रयोग होइत अछि जेना raison d’etre एतए सेहो एकर उच्चारण रैजौन डेटर होइत अछि, माने अपोस्ट्रॉफी अवकाश नै दैत अछि वरन जोड़ैत अछि, से एकर प्रयोग बिकारीक बदला देनाइ तकनीकी रूपेँ सेहो अनुचित)। अइमे, एहिमे/ ऐमे जइमे, जाहिमे एखन/ अखन/ अइखन केँ (के नहि) मे (अनुस्वार रहित) भऽ मे दऽ तँ (तऽ, त नै) सँ ( सऽ स नै) गाछ तर गाछ लग साँझ खन जो (जो go, करै जो do) तै/तइ जेना- तै दुआरे/ तइमे/ तइले जै/जइ जेना- जै कारण/ जइसँ/ जइले ऐ/अइ जेना- ऐ कारण/ ऐसँ/ अइले/ मुदा एकर एकटा खास प्रयोग- लालति कतेक दिनसँ कहैत रहैत अइ लै/लइ जेना लैसँ/ लइले/ लै दुआरे लहँ/ लौं गेलौं/ लेलौं/ लेलँह/ गेलहुँ/ लेलहुँ/ लेलँ जइ/ जाहि/ जै जहिठाम/ जाहिठाम/ जइठाम/ जैठाम एहि/ अहि/ अइ (वाक्यक अंतमे ग्राह्य) / ऐ अइछ/ अछि/ ऐछ तइ/ तहि/ तै/ ताहि ओहि/ ओइ सीखि/ सीख जीवि/ जीवी/ जीब भलेहीं/ भलहिं तैं/ तँइ/ तँए जाएब/ जएब लइ/ लै छइ/ छै नहि/ नै/ नइ गइ/ गै छनि/ छन्हि ... समए शब्दक संग जखन कोनो विभक्ति जुटै छै तखन समै जना समैपर इत्यादि। असगरमे हृदए आ विभक्ति जुटने हृदे जना हृदेसँ, हृदेमे इत्यादि। जइ/ जाहि/ जै जहिठाम/ जाहिठाम/ जइठाम/ जैठाम एहि/ अहि/ अइ/ ऐ अइछ/ अछि/ ऐछ तइ/ तहि/ तै/ ताहि ओहि/ ओइ सीखि/ सीख जीवि/ जीवी/ जीब भले/ भलेहीं/ भलहिं तैं/ तँइ/ तँए जाएब/ जएब लइ/ लै छइ/ छै नहि/ नै/ नइ गइ/ गै छनि/ छन्हि चुकल अछि/ गेल गछि २.२. मैथिलीमे भाषा सम्पादन पाठ्यक्रम नीचाँक सूचीमे देल विकल्पमेसँ लैंगुएज एडीटर द्वारा कोन रूप चुनल जेबाक चाही: बोल्ड कएल रूप ग्राह्य: १.होयबला/ होबयबला/ होमयबला/ हेब’बला, हेम’बला/ होयबाक/होबएबला /होएबाक २. आ’/आऽ आ ३. क’ लेने/कऽ लेने/कए लेने/कय लेने/ल’/लऽ/लय/लए ४. भ’ गेल/भऽ गेल/भय गेल/भए गेल ५. कर’ गेलाह/करऽ गेलह/करए गेलाह/करय गेलाह ६. लिअ/दिअ लिय’,दिय’,लिअ’,दिय’/ ७. कर’ बला/करऽ बला/ करय बला करैबला/क’र’ बला / करैवाली ८. बला वला (पुरूष), वाली (स्त्री) ९ . आङ्ल आंग्ल १०. प्रायः प्रायह ११. दुःख दुख १ २. चलि गेल चल गेल/चैल गेल १३. देलखिन्ह देलकिन्ह, देलखिन १४. देखलन्हि देखलनि/ देखलैन्ह १५. छथिन्ह/ छलन्हि छथिन/ छलैन/ छलनि १६. चलैत/दैत चलति/दैति १७. एखनो अखनो १८. बढ़नि बढ़इन बढ़न्हि १९. ओ’/ओऽ(सर्वनाम) ओ २० . ओ (संयोजक) ओ’/ओऽ २१. फाँगि/फाङ्गि फाइंग/फाइङ २२. जे जे’/जेऽ २३. ना-नुकुर ना-नुकर २४. केलन्हि/केलनि/कयलन्हि २५. तखनतँ/ तखन तँ २६. जा रहल/जाय रहल/जाए रहल २७. निकलय/निकलए लागल/ लगल बहराय/ बहराए लागल/ लगल निकल’/बहरै लागल २८. ओतय/ जतय जत’/ ओत’/ जतए/ ओतए २९. की फूरल जे कि फूरल जे ३०. जे जे’/जेऽ ३१. कूदि / यादि(मोन पारब) कूइद/याइद/कूद/याद/ यादि (मोन) ३२. इहो/ ओहो ३३. हँसए/ हँसय हँसऽ ३४. नौ आकि दस/नौ किंवा दस/ नौ वा दस ३५. सासु-ससुर सास-ससुर ३६. छह/ सात छ/छः/सात ३७. की की’/ कीऽ (दीर्घीकारान्तमे ऽ वर्जित) ३८. जबाब जवाब ३९. करएताह/ करेताह करयताह ४०. दलान दिशि दलान दिश/दलान दिस ४१ . गेलाह गएलाह/गयलाह ४२. किछु आर/ किछु और/ किछ आर ४३. जाइ छल/ जाइत छल जाति छल/जैत छल ४४. पहुँचि/ भेट जाइत छल/ भेट जाइ छलए पहुँच/ भेटि जाइत छल ४५. जबान (युवा)/ जवान(फौजी) ४६. लय/ लए क’/ कऽ/ लए कए / लऽ कऽ/ लऽ कए ४७. ल’/लऽ कय/ कए ४८. एखन / एखने / अखन / अखने ४९. अहींकेँ अहीँकेँ ५०. गहींर गहीँर ५१. धार पार केनाइ धार पार केनाय/केनाए ५२. जेकाँ जेँकाँ/ जकाँ ५३. तहिना तेहिना ५४. एकर अकर ५५. बहिनउ बहनोइ ५६. बहिन बहिनि ५७. बहिन-बहिनोइ बहिन-बहनउ ५८. नहि/ नै ५९. करबा / करबाय/ करबाए ६०. तँ/ त ऽ तय/तए ६१. भैयारी मे छोट-भाए/भै/, जेठ-भाय/भाइ, ६२. गिनतीमे दू भाइ/भाए/भाँइ ६३. ई पोथी दू भाइक/ भाँइ/ भाए/ लेल। यावत जावत ६४. माय मै / माए मुदा माइक ममता ६५. देन्हि/ दइन दनि/ दएन्हि/ दयन्हि दन्हि/ दैन्हि ६६. द’/ दऽ/ दए ६७. ओ (संयोजक) ओऽ (सर्वनाम) ६८. तका कए तकाय तकाए ६९. पैरे (on foot) पएरे कएक/ कैक ७०. ताहुमे/ ताहूमे ७१. पुत्रीक ७२. बजा कय/ कए / कऽ ७३. बननाय/बननाइ ७४. कोला ७५. दिनुका दिनका ७६. ततहिसँ ७७. गरबओलन्हि/ गरबौलनि/ गरबेलन्हि/ गरबेलनि ७८. बालु बालू ७९. चेन्ह चिन्ह(अशुद्ध) ८०. जे जे’ ८१ . से/ के से’/के’ ८२. एखुनका अखनुका ८३. भुमिहार भूमिहार ८४. सुग्गर / सुगरक/ सूगर ८५. झठहाक झटहाक ८६. छूबि ८७. करइयो/ओ करैयो ने देलक /करियौ-करइयौ ८८. पुबारि पुबाइ ८९. झगड़ा-झाँटी झगड़ा-झाँटि ९०. पएरे-पएरे पैरे-पैरे ९१. खेलएबाक ९२. खेलेबाक ९३. लगा ९४. होए- हो – होअए ९५. बुझल बूझल ९६. बूझल (संबोधन अर्थमे) ९७. यैह यएह / इएह/ सैह/ सएह ९८. तातिल ९९. अयनाय- अयनाइ/ अएनाइ/ एनाइ १००. निन्न- निन्द १०१. बिनु बिन १०२. जाए जाइ १०३. जाइ (in different sense)-last word of sentence १०४. छत पर आबि जाइ १०५. ने १०६. खेलाए (play) –खेलाइ १०७. शिकाइत- शिकायत १०८. ढप- ढ़प १०९ . पढ़- पढ ११०. कनिए/ कनिये कनिञे १११. राकस- राकश ११२. होए/ होय होइ ११३. अउरदा- औरदा ११४. बुझेलन्हि (different meaning- got understand) ११५. बुझएलन्हि/बुझेलनि/ बुझयलन्हि (understood himself) ११६. चलि- चल/ चलि गेल ११७. खधाइ- खधाय ११८. मोन पाड़लखिन्ह/ मोन पाड़लखिन/ मोन पारलखिन्ह ११९. कैक- कएक- कइएक १२०. लग ल’ग १२१. जरेनाइ १२२. जरौनाइ जरओनाइ- जरएनाइ/ जरेनाइ १२३. होइत १२४. गरबेलन्हि/ गरबेलनि गरबौलन्हि/ गरबौलनि १२५. चिखैत- (to test)चिखइत १२६. करइयो (willing to do) करैयो १२७. जेकरा- जकरा १२८. तकरा- तेकरा १२९. बिदेसर स्थानेमे/ बिदेसरे स्थानमे १३०. करबयलहुँ/ करबएलहुँ/ करबेलहुँ करबेलौं १३१. हारिक (उच्चारण हाइरक) १३२. ओजन वजन आफसोच/ अफसोस कागत/ कागच/ कागज १३३. आधे भाग/ आध-भागे १३४. पिचा / पिचाय/पिचाए १३५. नञ/ ने १३६. बच्चा नञ (ने) पिचा जाय १३७. तखन ने (नञ) कहैत अछि। कहै/ सुनै/ देखै छल मुदा कहैत-कहैत/ सुनैत-सुनैत/ देखैत-देखैत १३८. कतेक गोटे/ कताक गोटे १३९. कमाइ-धमाइ/ कमाई- धमाई १४० . लग ल’ग १४१. खेलाइ (for playing) १४२. छथिन्ह/ छथिन १४३. होइत होइ १४४. क्यो कियो / केओ १४५. केश (hair) १४६. केस (court-case) १४७ . बननाइ/ बननाय/ बननाए १४८. जरेनाइ १४९. कुरसी कुर्सी १५०. चरचा चर्चा १५१. कर्म करम १५२. डुबाबए/ डुबाबै/ डुमाबै डुमाबय/ डुमाबए १५३. एखुनका/ अखुनका १५४. लए/ लिअए (वाक्यक अंतिम शब्द)- लऽ १५५. कएलक/ केलक १५६. गरमी गर्मी १५७ . वरदी वर्दी १५८. सुना गेलाह सुना’/सुनाऽ १५९. एनाइ-गेनाइ १६०. तेना ने घेरलन्हि/ तेना ने घेरलनि १६१. नञि / नै १६२. डरो ड’रो १६३. कतहु/ कतौ कहीं १६४. उमरिगर-उमेरगर उमरगर १६५. भरिगर १६६. धोल/धोअल धोएल १६७. गप/गप्प १६८. के के’ १६९. दरबज्जा/ दरबजा १७०. ठाम १७१. धरि तक १७२. घूरि लौटि १७३. थोरबेक १७४. बड्ड १७५. तोँ/ तूँ १७६. तोँहि( पद्यमे ग्राह्य) १७७. तोँही / तोँहि १७८. करबाइए करबाइये १७९. एकेटा १८०. करितथि /करतथि १८१. पहुँचि/ पहुँच १८२. राखलन्हि रखलन्हि/ रखलनि १८३. लगलन्हि/ लगलनि लागलन्हि १८४. सुनि (उच्चारण सुइन) १८५. अछि (उच्चारण अइछ) १८६. एलथि गेलथि १८७. बितओने/ बितौने/ बितेने १८८. करबओलन्हि/ करबौलनि/ करेलखिन्ह/ करेलखिन १८९. करएलन्हि/ करेलनि १९०. आकि/ कि १९१. पहुँचि/ पहुँच १९२. बत्ती जराय/ जराए जरा (आगि लगा) १९३. से से’ १९४. हाँ मे हाँ (हाँमे हाँ विभक्त्तिमे हटा कए) १९५. फेल फैल १९६. फइल(spacious) फैल १९७. होयतन्हि/ होएतन्हि/ होएतनि/हेतनि/ हेतन्हि १९८. हाथ मटिआएब/ हाथ मटियाबय/हाथ मटियाएब १९९. फेका फेंका २००. देखाए देखा २०१. देखाबए २०२. सत्तरि सत्तर २०३. साहेब साहब २०४.गेलैन्ह/ गेलन्हि/ गेलनि २०५. हेबाक/ होएबाक २०६.केलो/ कएलहुँ/केलौं/ केलुँ २०७. किछु न किछु/ किछु ने किछु २०८.घुमेलहुँ/ घुमओलहुँ/ घुमेलौं २०९. एलाक/ अएलाक २१०. अः/ अह २११.लय/ लए (अर्थ-परिवर्त्तन) २१२.कनीक/ कनेक २१३.सबहक/ सभक २१४.मिलाऽ/ मिला २१५.कऽ/ क २१६.जाऽ/ जा २१७.आऽ/ आ २१८.भऽ /भ’ (’ फॉन्टक कमीक द्योतक) २१९.निअम/ नियम २२० .हेक्टेअर/ हेक्टेयर २२१.पहिल अक्षर ढ/ बादक/ बीचक ढ़ २२२.तहिं/तहिँ/ तञि/ तैं २२३.कहिं/ कहीं २२४.तँइ/ तैं / तइँ २२५.नँइ/ नइँ/ नञि/ नहि/नै २२६.है/ हए / एलीहेँ/ २२७.छञि/ छै/ छैक /छइ २२८.दृष्टिएँ/ दृष्टियेँ २२९.आ (come)/ आऽ(conjunction) २३०. आ (conjunction)/ आऽ(come) २३१.कुनो/ कोनो, कोना/केना २३२.गेलैन्ह-गेलन्हि-गेलनि २३३.हेबाक- होएबाक २३४.केलौँ- कएलौँ-कएलहुँ/केलौं २३५.किछु न किछ- किछु ने किछु २३६.केहेन- केहन २३७.आऽ (come)-आ (conjunction-and)/आ। आब'-आब' /आबह-आबह २३८. हएत-हैत २३९.घुमेलहुँ-घुमएलहुँ- घुमेलाें २४०.एलाक- अएलाक २४१.होनि- होइन/ होन्हि/ २४२.ओ-राम ओ श्यामक बीच(conjunction), ओऽ कहलक (he said)/ओ २४३.की हए/ कोसी अएली हए/ की है। की हइ २४४.दृष्टिएँ/ दृष्टियेँ २४५ .शामिल/ सामेल २४६.तैँ / तँए/ तञि/ तहिं २४७.जौं / ज्योँ/ जँ/ २४८.सभ/ सब २४९.सभक/ सबहक २५०.कहिं/ कहीं २५१.कुनो/ कोनो/ कोनहुँ/ २५२.फारकती भऽ गेल/ भए गेल/ भय गेल २५३.कोना/ केना/ कन्ना/कना २५४.अः/ अह २५५.जनै/ जनञ २५६.गेलनि/ गेलाह (अर्थ परिवर्तन) २५७.केलन्हि/ कएलन्हि/ केलनि/ २५८.लय/ लए/ लएह (अर्थ परिवर्तन) २५९.कनीक/ कनेक/कनी-मनी २६०.पठेलन्हि पठेलनि/ पठेलइन/ पपठओलन्हि/ पठबौलनि/ २६१.निअम/ नियम २६२.हेक्टेअर/ हेक्टेयर २६३.पहिल अक्षर रहने ढ/ बीचमे रहने ढ़ २६४.आकारान्तमे बिकारीक प्रयोग उचित नै/ अपोस्ट्रोफीक प्रयोग फान्टक तकनीकी न्यूनताक परिचायक ओकर बदला अवग्रह (बिकारी) क प्रयोग उचित २६५.केर (पद्यमे ग्राह्य) / -क/ कऽ/ के २६६.छैन्हि- छन्हि २६७.लगैए/ लगैये २६८.होएत/ हएत २६९.जाएत/ जएत/ २७०.आएत/ अएत/ आओत २७१ .खाएत/ खएत/ खैत २७२.पिअएबाक/ पिएबाक/पियेबाक २७३.शुरु/ शुरुह २७४.शुरुहे/ शुरुए २७५.अएताह/अओताह/ एताह/ औताह २७६.जाहि/ जाइ/ जइ/ जै/ २७७.जाइत/ जैतए/ जइतए २७८.आएल/ अएल २७९.कैक/ कएक २८०.आयल/ अएल/ आएल २८१. जाए/ जअए/ जए (लालति जाए लगलीह।) २८२. नुकएल/ नुकाएल २८३. कठुआएल/ कठुअएल २८४. ताहि/ तै/ तइ २८५. गायब/ गाएब/ गएब २८६. सकै/ सकए/ सकय २८७.सेरा/सरा/ सराए (भात सरा गेल) २८८.कहैत रही/देखैत रही/ कहैत छलौं/ कहै छलौं- अहिना चलैत/ पढ़ैत (पढ़ै-पढ़ैत अर्थ कखनो काल परिवर्तित) - आर बुझै/ बुझैत (बुझै/ बुझै छी, मुदा बुझैत-बुझैत)/ सकैत/ सकै। करैत/ करै। दै/ दैत। छैक/ छै। बचलै/ बचलैक। रखबा/ रखबाक । बिनु/ बिन। रातिक/ रातुक बुझै आ बुझैत केर अपन-अपन जगहपर प्रयोग समीचीन अछि। बुझैत-बुझैत आब बुझलिऐ। हमहूँ बुझै छी। २८९. दुआरे/ द्वारे २९०.भेटि/ भेट/ भेँट २९१. खन/ खीन/ खुना (भोर खन/ भोर खीन) २९२.तक/ धरि २९३.गऽ/ गै (meaning different-जनबै गऽ) २९४.सऽ/ सँ (मुदा दऽ, लऽ) २९५.त्त्व,(तीन अक्षरक मेल बदला पुनरुक्तिक एक आ एकटा दोसरक उपयोग) आदिक बदला त्व आदि। महत्त्व/ महत्व/ कर्ता/ कर्त्ता आदिमे त्त संयुक्तक कोनो आवश्यकता मैथिलीमे नै अछि। वक्तव्य २९६.बेसी/ बेशी २९७.बाला/वाला बला/ वला (रहैबला) २९८ .वाली/ (बदलैवाली) २९९.वार्त्ता/ वार्ता ३००. अन्तर्राष्ट्रिय/ अन्तर्राष्ट्रीय ३०१. लेमए/ लेबए ३०२.लमछुरका, नमछुरका ३०२.लागै/ लगै ( भेटैत/ भेटै) ३०३.लागल/ लगल ३०४.हबा/ हवा ३०५.राखलक/ रखलक ३०६.आ (come)/ आ (and) ३०७. पश्चाताप/ पश्चात्ताप ३०८. ऽ केर व्यवहार शब्दक अन्तमे मात्र, यथासंभव बीचमे नै। ३०९.कहैत/ कहै ३१०. रहए (छल)/ रहै (छलै) (meaning different) ३११.तागति/ ताकति ३१२.खराप/ खराब ३१३.बोइन/ बोनि/ बोइनि ३१४.जाठि/ जाइठ ३१५.कागज/ कागच/ कागत ३१६.गिरै (meaning different- swallow)/ गिरए (खसए) ३१७.राष्ट्रिय/ राष्ट्रीय DATE-LIST (year- 2012-13) (१४२० फसली साल) Marriage Days: Nov.2012- 25, 26, 28, 29, 30 Dec.2012- 5,9, 10, 13, 14 January 2013- 16, 17, 18, 23, 24, 31 Feb.2013- 1, 3, 4, 6, 8, 10, 14, 15, 18, 20, 24, 25 April 2013- 21, 22, 24, 26, 29 May 2013- 1,2,3,5,6,9,12,13,17,19,20,22,23,24,26,27,29,30,31 June 2013- 2,3 July 2013- 11, 14, 15 Upanayana Days: January 2013- 16 February 2013- 14, 15, 20, 21 April 2013- 22 May 2013- 20, 21 Dviragaman Din: November 2012- 25, 26, 28, 29 December 2012- 2, 3, 14 February 2013- 14, 15, 18, 20, 21, 22, 27, 28 March 2013- 1 April 2013- 18, 22, 24, 26, 28, 29 May 2013- 12, 13 Mundan Din: November 2012- 26, 30 December 2012- 3 January 2013- 18, 24 February 2013- 1, 14, 15, 20, 28 April 2013- 17 May 2013- 13, 23, 29 June 2013- 13, 19, 26, 27, 28 July 2013- 10, 15 FESTIVALS OF MITHILA (2012-13) Mauna Panchami-08 July Madhushravani- 22 July Nag Panchami- 24 July Raksha Bandhan- 02 Aug Krishnastami- 10 August Kushi Amavasya / Somvari Vrat- 17 August Vishwakarma Pooja- 17 September Hartalika Teej- 18 September ChauthChandra-19 September Karma Dharma Ekadashi-26 September Indra Pooja Aarambh- 27 September Anant Caturdashi- 29 Sep Agastyarghadaan- 30 Sep Pitri Paksha begins- 30 Sep Jimootavahan Vrata/ Jitia-08 October Matri Navami- 09 October SomvatiAmavasya Vrat- 15 October Kalashsthapan- 16 October Belnauti- 20 October Patrika Pravesh- 21 October Mahastami- 22 October Maha Navami - 23 October Vijaya Dashami- 24 October Kojagara- 29 Oct Dhanteras- 11 November Diyabati, shyama pooja-13 November Annakoota/ Govardhana Pooja-14 November Bhratridwitiya/ Chitragupta Pooja- 15 November Chhathi -19 November Devotthan Ekadashi- 24 November ravivratarambh- 25 November Navanna parvan- 25 November KartikPoornima- Sama Visarjan- 28 November Vivaha Panchmi- 17 December Makara/ Teela Sankranti-14 Jan Naraknivaran chaturdashi- 08 February Basant Panchami/ Saraswati Pooja- 15 February Achla Saptmi- 17 February Mahashivaratri-10 March Holikadahan-Fagua-26 March Holi- 28 March Varuni Trayodashi-07 April Chaiti navaratrarambh- 11 April Jurishital-15 April Chaiti Chhathi vrata-16 April Ram Navami- 19 April Ravi Brat Ant- 12 May Akshaya Tritiya-13 May Janaki Navami- 19 May Vat Savitri-barasait- 08 June Ganga Dashhara-18 June Somavati Amavasya Vrata- 08 July Jagannath Rath Yatra- 10 July Hari Sayan Ekadashi- 19 July Aashadhi Guru Poornima-22 Jul VIDEHA ARCHIVE १.विदेह ई-पत्रिकाक सभटा पुरान अंक ब्रेल, तिरहुता आ देवनागरी रूपमे Videha e journal's all old issues in Braille Tirhuta and Devanagari versions विदेह ई-पत्रिकाक पहिल ५० अंक
विदेह ई-पत्रिकाक ५०म सँ आगाँक अंक २.मैथिली पोथी डाउनलोड Maithili Books Download ३.मैथिली ऑडियो संकलन Maithili Audio Downloads ४.मैथिली वीडियोक संकलन Maithili Videos ५.मिथिला चित्रकला/ आधुनिक चित्रकला आ चित्र Mithila Painting/ Modern Art and Photos "विदेह"क एहि सभ सहयोगी लिंकपर सेहो एक बेर जाउ। ६.विदेह मैथिली क्विज : http://videhaquiz.blogspot.com/ ७.विदेह मैथिली जालवृत्त एग्रीगेटर : http://videha-aggregator.blogspot.com/ ८.विदेह मैथिली साहित्य अंग्रेजीमे अनूदित http://madhubani-art.blogspot.com/ ९.विदेहक पूर्व-रूप "भालसरिक गाछ" : http://gajendrathakur.blogspot.com/ १०.विदेह इंडेक्स : http://videha123.blogspot.com/ ११.विदेह फाइल : http://videha123.wordpress.com/ १२. विदेह: सदेह : पहिल तिरहुता (मिथिला़क्षर) जालवृत्त (ब्लॉग) http://videha-sadeha.blogspot.com/ १३. विदेह:ब्रेल: मैथिली ब्रेलमे: पहिल बेर विदेह द्वारा http://videha-braille.blogspot.com/ १४.VIDEHA IST MAITHILI FORTNIGHTLY EJOURNAL ARCHIVE http://videha-archive.blogspot.com/ १५. विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका मैथिली पोथीक आर्काइव http://videha-pothi.blogspot.com/ १६. विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका ऑडियो आर्काइव http://videha-audio.blogspot.com/ १७. विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका वीडियो आर्काइव http://videha-video.blogspot.com/ १८. विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका मिथिला चित्रकला, आधुनिक कला आ चित्रकला http://videha-paintings-photos.blogspot.com/ १९. मैथिल आर मिथिला (मैथिलीक सभसँ लोकप्रिय जालवृत्त) http://maithilaurmithila.blogspot.com/ २०.श्रुति प्रकाशन http://www.shruti-publication.com/ २१.http://groups.google.com/group/videha २२.http://groups.yahoo.com/group/VIDEHA/ २३.गजेन्द्र ठाकुर इडेक्स http://gajendrathakur123.blogspot.com २४. नेना भुटका http://mangan-khabas.blogspot.com/ २५.विदेह रेडियो:मैथिली कथा-कविता आदिक पहिल पोडकास्ट साइट http://videha123radio.wordpress.com/ २६.Videha Radio २७. Join official Videha facebook group. २८. विदेह मैथिली नाट्य उत्सव http://maithili-drama.blogspot.com/ २९.समदिया http://esamaad.blogspot.com/ ३०. मैथिली फिल्म्स http://maithilifilms.blogspot.com/ ३१.अनचिन्हार आखर http://anchinharakharkolkata.blogspot.com/ ३२. मैथिली हाइकू http://maithili-haiku.blogspot.com/ ३३. मानक मैथिली http://manak-maithili.blogspot.com/ ३४. विहनि कथा http://vihanikatha.blogspot.in/ ३५. मैथिली कविता http://maithili-kavita.blogspot.in/ ३६. मैथिली कथा http://maithili-katha.blogspot.in/ ३७.मैथिली समालोचना http://maithili-samalochna.blogspot.in/ महत्त्वपूर्ण सूचना:(१) 'विदेह' द्वारा धारावाहिक रूपे ई-प्रकाशित कएल गेल गजेन्द्र ठाकुरक निबन्ध-प्रबन्ध-समीक्षा, उपन्यास (सहस्रबाढ़नि) , पद्य-संग्रह (सहस्राब्दीक चौपड़पर), कथा-गल्प (गल्प-गुच्छ), नाटक(संकर्षण), महाकाव्य (त्वञ्चाहञ्च आ असञ्जाति मन) आ बाल-किशोर साहित्य विदेहमे संपूर्ण ई-प्रकाशनक बाद प्रिंट फॉर्ममे। कुरुक्षेत्रम्–अन्तर्मनक खण्ड-१ सँ ७ Combined ISBN No.978-81-907729-7-6 विवरण एहि पृष्ठपर नीचाँमे आ प्रकाशकक साइट http://www.shruti-publication.com/ पर । महत्त्वपूर्ण सूचना (२):सूचना: विदेहक मैथिली-अंग्रेजी आ अंग्रेजी मैथिली कोष (इंटरनेटपर पहिल बेर सर्च-डिक्शनरी) एम.एस. एस.क्यू.एल. सर्वर आधारित -Based on ms-sql server Maithili-English and English-Maithili Dictionary. विदेहक भाषापाक- रचनालेखन स्तंभमे। कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक- गजेन्द्र ठाकुर गजेन्द्र ठाकुरक निबन्ध-प्रबन्ध-समीक्षा, उपन्यास (सहस्रबाढ़नि) , पद्य-संग्रह (सहस्राब्दीक चौपड़पर), कथा-गल्प (गल्प गुच्छ), नाटक(संकर्षण), महाकाव्य (त्वञ्चाहञ्च आ असञ्जाति मन) आ बालमंडली-किशोरजगत विदेहमे संपूर्ण ई-प्रकाशनक बाद प्रिंट फॉर्ममे। कुरुक्षेत्रम्–अन्तर्मनक, खण्ड-१ सँ ७ Ist edition 2009 of Gajendra Thakur’s KuruKshetram-Antarmanak (Vol. I to VII)- essay-paper-criticism, novel, poems, story, play, epics and Children-grown-ups literature in single binding: Language:Maithili ६९२ पृष्ठ : मूल्य भा. रु. 100/-(for individual buyers inside india) (add courier charges Rs.50/-per copy for Delhi/NCR and Rs.100/- per copy for outside Delhi)
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Details for purchase available at print-version publishers's site website: http://www.shruti-publication.com/ or you may write to e-mail:shruti.publication@shruti-publication.com विदेह: सदेह : १: २: ३: ४ तिरहुता : देवनागरी "विदेह" क, प्रिंट संस्करण :विदेह-ई-पत्रिका (http://www.videha.co.in/) क चुनल रचना सम्मिलित। विदेह:सदेह:१: २: ३: ४ सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। Details for purchase available at print-version publishers's site http://www.shruti-publication.com or you may write to shruti.publication@shruti-publication.com २. संदेश- [ विदेह ई-पत्रिका, विदेह:सदेह मिथिलाक्षर आ देवनागरी आ गजेन्द्र ठाकुरक सात खण्डक- निबन्ध-प्रबन्ध-समीक्षा,उपन्यास (सहस्रबाढ़नि) , पद्य-संग्रह (सहस्राब्दीक चौपड़पर), कथा-गल्प (गल्प गुच्छ), नाटक (संकर्षण), महाकाव्य (त्वञ्चाहञ्च आ असञ्जाति मन) आ बाल-मंडली-किशोर जगत- संग्रह कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक मादेँ। ] १.श्री गोविन्द झा- विदेहकेँ तरंगजालपर उतारि विश्वभरिमे मातृभाषा मैथिलीक लहरि जगाओल, खेद जे अपनेक एहि महाभियानमे हम एखन धरि संग नहि दए सकलहुँ। सुनैत छी अपनेकेँ सुझाओ आ रचनात्मक आलोचना प्रिय लगैत अछि तेँ किछु लिखक मोन भेल। हमर सहायता आ सहयोग अपनेकेँ सदा उपलब्ध रहत। २.श्री रमानन्द रेणु- मैथिलीमे ई-पत्रिका पाक्षिक रूपेँ चला कऽ जे अपन मातृभाषाक प्रचार कऽ रहल छी, से धन्यवाद । आगाँ अपनेक समस्त मैथिलीक कार्यक हेतु हम हृदयसँ शुभकामना दऽ रहल छी। ३.श्री विद्यानाथ झा "विदित"- संचार आ प्रौद्योगिकीक एहि प्रतिस्पर्धी ग्लोबल युगमे अपन महिमामय "विदेह"केँ अपना देहमे प्रकट देखि जतबा प्रसन्नता आ संतोष भेल, तकरा कोनो उपलब्ध "मीटर"सँ नहि नापल जा सकैछ? ..एकर ऐतिहासिक मूल्यांकन आ सांस्कृतिक प्रतिफलन एहि शताब्दीक अंत धरि लोकक नजरिमे आश्चर्यजनक रूपसँ प्रकट हैत। ४. प्रो. उदय नारायण सिंह "नचिकेता"- जे काज अहाँ कए रहल छी तकर चरचा एक दिन मैथिली भाषाक इतिहासमे होएत। आनन्द भए रहल अछि, ई जानि कए जे एतेक गोट मैथिल "विदेह" ई जर्नलकेँ पढ़ि रहल छथि।...विदेहक चालीसम अंक पुरबाक लेल अभिनन्दन। ५. डॉ. गंगेश गुंजन- एहि विदेह-कर्ममे लागि रहल अहाँक सम्वेदनशील मन, मैथिलीक प्रति समर्पित मेहनतिक अमृत रंग, इतिहास मे एक टा विशिष्ट फराक अध्याय आरंभ करत, हमरा विश्वास अछि। अशेष शुभकामना आ बधाइक सङ्ग, सस्नेह...अहाँक पोथी कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक प्रथम दृष्टया बहुत भव्य तथा उपयोगी बुझाइछ। मैथिलीमे तँ अपना स्वरूपक प्रायः ई पहिले एहन भव्य अवतारक पोथी थिक। हर्षपूर्ण हमर हार्दिक बधाई स्वीकार करी। ६. श्री रामाश्रय झा "रामरंग"(आब स्वर्गीय)- "अपना" मिथिलासँ संबंधित...विषय वस्तुसँ अवगत भेलहुँ।...शेष सभ कुशल अछि। ७. श्री ब्रजेन्द्र त्रिपाठी- साहित्य अकादमी- इंटरनेट पर प्रथम मैथिली पाक्षिक पत्रिका "विदेह" केर लेल बधाई आ शुभकामना स्वीकार करू। ८. श्री प्रफुल्लकुमार सिंह "मौन"- प्रथम मैथिली पाक्षिक पत्रिका "विदेह" क प्रकाशनक समाचार जानि कनेक चकित मुदा बेसी आह्लादित भेलहुँ। कालचक्रकेँ पकड़ि जाहि दूरदृष्टिक परिचय देलहुँ, ओहि लेल हमर मंगलकामना। ९.डॉ. शिवप्रसाद यादव- ई जानि अपार हर्ष भए रहल अछि, जे नव सूचना-क्रान्तिक क्षेत्रमे मैथिली पत्रकारिताकेँ प्रवेश दिअएबाक साहसिक कदम उठाओल अछि। पत्रकारितामे एहि प्रकारक नव प्रयोगक हम स्वागत करैत छी, संगहि "विदेह"क सफलताक शुभकामना। १०. श्री आद्याचरण झा- कोनो पत्र-पत्रिकाक प्रकाशन- ताहूमे मैथिली पत्रिकाक प्रकाशनमे के कतेक सहयोग करताह- ई तऽ भविष्य कहत। ई हमर ८८ वर्षमे ७५ वर्षक अनुभव रहल। एतेक पैघ महान यज्ञमे हमर श्रद्धापूर्ण आहुति प्राप्त होयत- यावत ठीक-ठाक छी/ रहब। ११. श्री विजय ठाकुर- मिशिगन विश्वविद्यालय- "विदेह" पत्रिकाक अंक देखलहुँ, सम्पूर्ण टीम बधाईक पात्र अछि। पत्रिकाक मंगल भविष्य हेतु हमर शुभकामना स्वीकार कएल जाओ। १२. श्री सुभाषचन्द्र यादव- ई-पत्रिका "विदेह" क बारेमे जानि प्रसन्नता भेल। ’विदेह’ निरन्तर पल्लवित-पुष्पित हो आ चतुर्दिक अपन सुगंध पसारय से कामना अछि। १३. श्री मैथिलीपुत्र प्रदीप- ई-पत्रिका "विदेह" केर सफलताक भगवतीसँ कामना। हमर पूर्ण सहयोग रहत। १४. डॉ. श्री भीमनाथ झा- "विदेह" इन्टरनेट पर अछि तेँ "विदेह" नाम उचित आर कतेक रूपेँ एकर विवरण भए सकैत अछि। आइ-काल्हि मोनमे उद्वेग रहैत अछि, मुदा शीघ्र पूर्ण सहयोग देब।कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक देखि अति प्रसन्नता भेल। मैथिलीक लेल ई घटना छी। १५. श्री रामभरोस कापड़ि "भ्रमर"- जनकपुरधाम- "विदेह" ऑनलाइन देखि रहल छी। मैथिलीकेँ अन्तर्राष्ट्रीय जगतमे पहुँचेलहुँ तकरा लेल हार्दिक बधाई। मिथिला रत्न सभक संकलन अपूर्व। नेपालोक सहयोग भेटत, से विश्वास करी। १६. श्री राजनन्दन लालदास- "विदेह" ई-पत्रिकाक माध्यमसँ बड़ नीक काज कए रहल छी, नातिक अहिठाम देखलहुँ। एकर वार्षिक अंक जखन प्रिंट निकालब तँ हमरा पठायब। कलकत्तामे बहुत गोटेकेँ हम साइटक पता लिखाए देने छियन्हि। मोन तँ होइत अछि जे दिल्ली आबि कए आशीर्वाद दैतहुँ, मुदा उमर आब बेशी भए गेल। शुभकामना देश-विदेशक मैथिलकेँ जोड़बाक लेल।.. उत्कृष्ट प्रकाशन कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक लेल बधाइ। अद्भुत काज कएल अछि, नीक प्रस्तुति अछि सात खण्डमे। मुदा अहाँक सेवा आ से निःस्वार्थ तखन बूझल जाइत जँ अहाँ द्वारा प्रकाशित पोथी सभपर दाम लिखल नहि रहितैक। ओहिना सभकेँ विलहि देल जइतैक। (स्पष्टीकरण- श्रीमान्, अहाँक सूचनार्थ विदेह द्वारा ई-प्रकाशित कएल सभटा सामग्री आर्काइवमे https://sites.google.com/a/videha.com/videha-pothi/ पर बिना मूल्यक डाउनलोड लेल उपलब्ध छै आ भविष्यमे सेहो रहतैक। एहि आर्काइवकेँ जे कियो प्रकाशक अनुमति लऽ कऽ प्रिंट रूपमे प्रकाशित कएने छथि आ तकर ओ दाम रखने छथि ताहिपर हमर कोनो नियंत्रण नहि अछि।- गजेन्द्र ठाकुर)... अहाँक प्रति अशेष शुभकामनाक संग। १७. डॉ. प्रेमशंकर सिंह- अहाँ मैथिलीमे इंटरनेटपर पहिल पत्रिका "विदेह" प्रकाशित कए अपन अद्भुत मातृभाषानुरागक परिचय देल अछि, अहाँक निःस्वार्थ मातृभाषानुरागसँ प्रेरित छी, एकर निमित्त जे हमर सेवाक प्रयोजन हो, तँ सूचित करी। इंटरनेटपर आद्योपांत पत्रिका देखल, मन प्रफुल्लित भऽ गेल। १८.श्रीमती शेफालिका वर्मा- विदेह ई-पत्रिका देखि मोन उल्लाससँ भरि गेल। विज्ञान कतेक प्रगति कऽ रहल अछि...अहाँ सभ अनन्त आकाशकेँ भेदि दियौ, समस्त विस्तारक रहस्यकेँ तार-तार कऽ दियौक...। अपनेक अद्भुत पुस्तक कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक विषयवस्तुक दृष्टिसँ गागरमे सागर अछि। बधाई। १९.श्री हेतुकर झा, पटना-जाहि समर्पण भावसँ अपने मिथिला-मैथिलीक सेवामे तत्पर छी से स्तुत्य अछि। देशक राजधानीसँ भय रहल मैथिलीक शंखनाद मिथिलाक गाम-गाममे मैथिली चेतनाक विकास अवश्य करत। २०. श्री योगानन्द झा, कबिलपुर, लहेरियासराय- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पोथीकेँ निकटसँ देखबाक अवसर भेटल अछि आ मैथिली जगतक एकटा उद्भट ओ समसामयिक दृष्टिसम्पन्न हस्ताक्षरक कलमबन्द परिचयसँ आह्लादित छी। "विदेह"क देवनागरी सँस्करण पटनामे रु. 80/- मे उपलब्ध भऽ सकल जे विभिन्न लेखक लोकनिक छायाचित्र, परिचय पत्रक ओ रचनावलीक सम्यक प्रकाशनसँ ऐतिहासिक कहल जा सकैछ। २१. श्री किशोरीकान्त मिश्र- कोलकाता- जय मैथिली, विदेहमे बहुत रास कविता, कथा, रिपोर्ट आदिक सचित्र संग्रह देखि आ आर अधिक प्रसन्नता मिथिलाक्षर देखि- बधाई स्वीकार कएल जाओ। २२.श्री जीवकान्त- विदेहक मुद्रित अंक पढ़ल- अद्भुत मेहनति। चाबस-चाबस। किछु समालोचना मरखाह..मुदा सत्य। २३. श्री भालचन्द्र झा- अपनेक कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक देखि बुझाएल जेना हम अपने छपलहुँ अछि। एकर विशालकाय आकृति अपनेक सर्वसमावेशताक परिचायक अछि। अपनेक रचना सामर्थ्यमे उत्तरोत्तर वृद्धि हो, एहि शुभकामनाक संग हार्दिक बधाई। २४.श्रीमती डॉ नीता झा- अहाँक कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़लहुँ। ज्योतिरीश्वर शब्दावली, कृषि मत्स्य शब्दावली आ सीत बसन्त आ सभ कथा, कविता, उपन्यास, बाल-किशोर साहित्य सभ उत्तम छल। मैथिलीक उत्तरोत्तर विकासक लक्ष्य दृष्टिगोचर होइत अछि। २५.श्री मायानन्द मिश्र- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक मे हमर उपन्यास स्त्रीधनक जे विरोध कएल गेल अछि तकर हम विरोध करैत छी।... कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पोथीक लेल शुभकामना।(श्रीमान् समालोचनाकेँ विरोधक रूपमे नहि लेल जाए।-गजेन्द्र ठाकुर) २६.श्री महेन्द्र हजारी- सम्पादक श्रीमिथिला- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़ि मोन हर्षित भऽ गेल..एखन पूरा पढ़यमे बहुत समय लागत, मुदा जतेक पढ़लहुँ से आह्लादित कएलक। २७.श्री केदारनाथ चौधरी- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक अद्भुत लागल, मैथिली साहित्य लेल ई पोथी एकटा प्रतिमान बनत। २८.श्री सत्यानन्द पाठक- विदेहक हम नियमित पाठक छी। ओकर स्वरूपक प्रशंसक छलहुँ। एम्हर अहाँक लिखल - कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक देखलहुँ। मोन आह्लादित भऽ उठल। कोनो रचना तरा-उपरी। २९.श्रीमती रमा झा-सम्पादक मिथिला दर्पण। कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक प्रिंट फॉर्म पढ़ि आ एकर गुणवत्ता देखि मोन प्रसन्न भऽ गेल, अद्भुत शब्द एकरा लेल प्रयुक्त कऽ रहल छी। विदेहक उत्तरोत्तर प्रगतिक शुभकामना। ३०.श्री नरेन्द्र झा, पटना- विदेह नियमित देखैत रहैत छी। मैथिली लेल अद्भुत काज कऽ रहल छी। ३१.श्री रामलोचन ठाकुर- कोलकाता- मिथिलाक्षर विदेह देखि मोन प्रसन्नतासँ भरि उठल, अंकक विशाल परिदृश्य आस्वस्तकारी अछि। ३२.श्री तारानन्द वियोगी- विदेह आ कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक देखि चकबिदोर लागि गेल। आश्चर्य। शुभकामना आ बधाई। ३३.श्रीमती प्रेमलता मिश्र “प्रेम”- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़लहुँ। सभ रचना उच्चकोटिक लागल। बधाई। ३४.श्री कीर्तिनारायण मिश्र- बेगूसराय- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक बड्ड नीक लागल, आगांक सभ काज लेल बधाई। ३५.श्री महाप्रकाश-सहरसा- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक नीक लागल, विशालकाय संगहि उत्तमकोटिक। ३६.श्री अग्निपुष्प- मिथिलाक्षर आ देवाक्षर विदेह पढ़ल..ई प्रथम तँ अछि एकरा प्रशंसामे मुदा हम एकरा दुस्साहसिक कहब। मिथिला चित्रकलाक स्तम्भकेँ मुदा अगिला अंकमे आर विस्तृत बनाऊ। ३७.श्री मंजर सुलेमान-दरभंगा- विदेहक जतेक प्रशंसा कएल जाए कम होएत। सभ चीज उत्तम। ३८.श्रीमती प्रोफेसर वीणा ठाकुर- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक उत्तम, पठनीय, विचारनीय। जे क्यो देखैत छथि पोथी प्राप्त करबाक उपाय पुछैत छथि। शुभकामना। ३९.श्री छत्रानन्द सिंह झा- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़लहुँ, बड्ड नीक सभ तरहेँ। ४०.श्री ताराकान्त झा- सम्पादक मैथिली दैनिक मिथिला समाद- विदेह तँ कन्टेन्ट प्रोवाइडरक काज कऽ रहल अछि। कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक अद्भुत लागल। ४१.डॉ रवीन्द्र कुमार चौधरी- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक बहुत नीक, बहुत मेहनतिक परिणाम। बधाई। ४२.श्री अमरनाथ- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक आ विदेह दुनू स्मरणीय घटना अछि, मैथिली साहित्य मध्य। ४३.श्री पंचानन मिश्र- विदेहक वैविध्य आ निरन्तरता प्रभावित करैत अछि, शुभकामना। ४४.श्री केदार कानन- कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक लेल अनेक धन्यवाद, शुभकामना आ बधाइ स्वीकार करी। आ नचिकेताक भूमिका पढ़लहुँ। शुरूमे तँ लागल जेना कोनो उपन्यास अहाँ द्वारा सृजित भेल अछि मुदा पोथी उनटौला पर ज्ञात भेल जे एहिमे तँ सभ विधा समाहित अछि। ४५.श्री धनाकर ठाकुर- अहाँ नीक काज कऽ रहल छी। फोटो गैलरीमे चित्र एहि शताब्दीक जन्मतिथिक अनुसार रहैत तऽ नीक। ४६.श्री आशीष झा- अहाँक पुस्तकक संबंधमे एतबा लिखबा सँ अपना कए नहि रोकि सकलहुँ जे ई किताब मात्र किताब नहि थीक, ई एकटा उम्मीद छी जे मैथिली अहाँ सन पुत्रक सेवा सँ निरंतर समृद्ध होइत चिरजीवन कए प्राप्त करत। ४७.श्री शम्भु कुमार सिंह- विदेहक तत्परता आ क्रियाशीलता देखि आह्लादित भऽ रहल छी। निश्चितरूपेण कहल जा सकैछ जे समकालीन मैथिली पत्रिकाक इतिहासमे विदेहक नाम स्वर्णाक्षरमे लिखल जाएत। ओहि कुरुक्षेत्रक घटना सभ तँ अठारहे दिनमे खतम भऽ गेल रहए मुदा अहाँक कुरुक्षेत्रम् तँ अशेष अछि। ४८.डॉ. अजीत मिश्र- अपनेक प्रयासक कतबो प्रशंसा कएल जाए कमे होएतैक। मैथिली साहित्यमे अहाँ द्वारा कएल गेल काज युग-युगान्तर धरि पूजनीय रहत। ४९.श्री बीरेन्द्र मल्लिक- अहाँक कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक आ विदेह:सदेह पढ़ि अति प्रसन्नता भेल। अहाँक स्वास्थ्य ठीक रहए आ उत्साह बनल रहए से कामना। ५०.श्री कुमार राधारमण- अहाँक दिशा-निर्देशमे विदेह पहिल मैथिली ई-जर्नल देखि अति प्रसन्नता भेल। हमर शुभकामना। ५१.श्री फूलचन्द्र झा प्रवीण-विदेह:सदेह पढ़ने रही मुदा कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक देखि बढ़ाई देबा लेल बाध्य भऽ गेलहुँ। आब विश्वास भऽ गेल जे मैथिली नहि मरत। अशेष शुभकामना। ५२.श्री विभूति आनन्द- विदेह:सदेह देखि, ओकर विस्तार देखि अति प्रसन्नता भेल। ५३.श्री मानेश्वर मनुज-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक एकर भव्यता देखि अति प्रसन्नता भेल, एतेक विशाल ग्रन्थ मैथिलीमे आइ धरि नहि देखने रही। एहिना भविष्यमे काज करैत रही, शुभकामना। ५४.श्री विद्यानन्द झा- आइ.आइ.एम.कोलकाता- कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक विस्तार, छपाईक संग गुणवत्ता देखि अति प्रसन्नता भेल। अहाँक अनेक धन्यवाद; कतेक बरखसँ हम नेयारैत छलहुँ जे सभ पैघ शहरमे मैथिली लाइब्रेरीक स्थापना होअए, अहाँ ओकरा वेबपर कऽ रहल छी, अनेक धन्यवाद। ५५.श्री अरविन्द ठाकुर-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक मैथिली साहित्यमे कएल गेल एहि तरहक पहिल प्रयोग अछि, शुभकामना। ५६.श्री कुमार पवन-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक पढ़ि रहल छी। किछु लघुकथा पढ़ल अछि, बहुत मार्मिक छल। ५७. श्री प्रदीप बिहारी-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक देखल, बधाई। ५८.डॉ मणिकान्त ठाकुर-कैलिफोर्निया- अपन विलक्षण नियमित सेवासँ हमरा लोकनिक हृदयमे विदेह सदेह भऽ गेल अछि। ५९.श्री धीरेन्द्र प्रेमर्षि- अहाँक समस्त प्रयास सराहनीय। दुख होइत अछि जखन अहाँक प्रयासमे अपेक्षित सहयोग नहि कऽ पबैत छी। ६०.श्री देवशंकर नवीन- विदेहक निरन्तरता आ विशाल स्वरूप- विशाल पाठक वर्ग, एकरा ऐतिहासिक बनबैत अछि। ६१.श्री मोहन भारद्वाज- अहाँक समस्त कार्य देखल, बहुत नीक। एखन किछु परेशानीमे छी, मुदा शीघ्र सहयोग देब। ६२.श्री फजलुर रहमान हाशमी-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक मे एतेक मेहनतक लेल अहाँ साधुवादक अधिकारी छी। ६३.श्री लक्ष्मण झा "सागर"- मैथिलीमे चमत्कारिक रूपेँ अहाँक प्रवेश आह्लादकारी अछि।..अहाँकेँ एखन आर..दूर..बहुत दूरधरि जेबाक अछि। स्वस्थ आ प्रसन्न रही। ६४.श्री जगदीश प्रसाद मंडल-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक पढ़लहुँ । कथा सभ आ उपन्यास सहस्रबाढ़नि पूर्णरूपेँ पढ़ि गेल छी। गाम-घरक भौगोलिक विवरणक जे सूक्ष्म वर्णन सहस्रबाढ़निमे अछि, से चकित कएलक, एहि संग्रहक कथा-उपन्यास मैथिली लेखनमे विविधता अनलक अछि। समालोचना शास्त्रमे अहाँक दृष्टि वैयक्तिक नहि वरन् सामाजिक आ कल्याणकारी अछि, से प्रशंसनीय। ६५.श्री अशोक झा-अध्यक्ष मिथिला विकास परिषद- कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक लेल बधाई आ आगाँ लेल शुभकामना। ६६.श्री ठाकुर प्रसाद मुर्मु- अद्भुत प्रयास। धन्यवादक संग प्रार्थना जे अपन माटि-पानिकेँ ध्यानमे राखि अंकक समायोजन कएल जाए। नव अंक धरि प्रयास सराहनीय। विदेहकेँ बहुत-बहुत धन्यवाद जे एहेन सुन्दर-सुन्दर सचार (आलेख) लगा रहल छथि। सभटा ग्रहणीय- पठनीय। ६७.बुद्धिनाथ मिश्र- प्रिय गजेन्द्र जी,अहाँक सम्पादन मे प्रकाशित ‘विदेह’आ ‘कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक’ विलक्षण पत्रिका आ विलक्षण पोथी! की नहि अछि अहाँक सम्पादनमे? एहि प्रयत्न सँ मैथिली क विकास होयत,निस्संदेह। ६८.श्री बृखेश चन्द्र लाल- गजेन्द्रजी, अपनेक पुस्तक कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़ि मोन गदगद भय गेल , हृदयसँ अनुगृहित छी । हार्दिक शुभकामना । ६९.श्री परमेश्वर कापड़ि - श्री गजेन्द्र जी । कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़ि गदगद आ नेहाल भेलहुँ। ७०.श्री रवीन्द्रनाथ ठाकुर- विदेह पढ़ैत रहैत छी। धीरेन्द्र प्रेमर्षिक मैथिली गजलपर आलेख पढ़लहुँ। मैथिली गजल कत्तऽ सँ कत्तऽ चलि गेलैक आ ओ अपन आलेखमे मात्र अपन जानल-पहिचानल लोकक चर्च कएने छथि। जेना मैथिलीमे मठक परम्परा रहल अछि। (स्पष्टीकरण- श्रीमान्, प्रेमर्षि जी ओहि आलेखमे ई स्पष्ट लिखने छथि जे किनको नाम जे छुटि गेल छन्हि तँ से मात्र आलेखक लेखकक जानकारी नहि रहबाक द्वारे, एहिमे आन कोनो कारण नहि देखल जाय। अहाँसँ एहि विषयपर विस्तृत आलेख सादर आमंत्रित अछि।-सम्पादक) ७१.श्री मंत्रेश्वर झा- विदेह पढ़ल आ संगहि अहाँक मैगनम ओपस कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक सेहो, अति उत्तम। मैथिलीक लेल कएल जा रहल अहाँक समस्त कार्य अतुलनीय अछि। ७२. श्री हरेकृष्ण झा- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक मैथिलीमे अपन तरहक एकमात्र ग्रन्थ अछि, एहिमे लेखकक समग्र दृष्टि आ रचना कौशल देखबामे आएल जे लेखकक फील्डवर्कसँ जुड़ल रहबाक कारणसँ अछि। ७३.श्री सुकान्त सोम- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक मे समाजक इतिहास आ वर्तमानसँ अहाँक जुड़ाव बड्ड नीक लागल, अहाँ एहि क्षेत्रमे आर आगाँ काज करब से आशा अछि। ७४.प्रोफेसर मदन मिश्र- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक सन किताब मैथिलीमे पहिले अछि आ एतेक विशाल संग्रहपर शोध कएल जा सकैत अछि। भविष्यक लेल शुभकामना। ७५.प्रोफेसर कमला चौधरी- मैथिलीमे कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक सन पोथी आबए जे गुण आ रूप दुनूमे निस्सन होअए, से बहुत दिनसँ आकांक्षा छल, ओ आब जा कऽ पूर्ण भेल। पोथी एक हाथसँ दोसर हाथ घुमि रहल अछि, एहिना आगाँ सेहो अहाँसँ आशा अछि। ७६.श्री उदय चन्द्र झा "विनोद": गजेन्द्रजी, अहाँ जतेक काज कएलहुँ अछि से मैथिलीमे आइ धरि कियो नहि कएने छल। शुभकामना। अहाँकेँ एखन बहुत काज आर करबाक अछि। ७७.श्री कृष्ण कुमार कश्यप: गजेन्द्र ठाकुरजी, अहाँसँ भेँट एकटा स्मरणीय क्षण बनि गेल। अहाँ जतेक काज एहि बएसमे कऽ गेल छी ताहिसँ हजार गुणा आर बेशीक आशा अछि। ७८.श्री मणिकान्त दास: अहाँक मैथिलीक कार्यक प्रशंसा लेल शब्द नहि भेटैत अछि। अहाँक कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक सम्पूर्ण रूपेँ पढ़ि गेलहुँ। त्वञ्चाहञ्च बड्ड नीक लागल। ७९. श्री हीरेन्द्र कुमार झा- विदेह ई-पत्रिकाक सभ अंक ई-पत्रसँ भेटैत रहैत अछि। मैथिलीक ई-पत्रिका छैक एहि बातक गर्व होइत अछि। अहाँ आ अहाँक सभ सहयोगीकेँ हार्दिक शुभकामना। विदेह मैथिली साहित्य आन्दोलन (c)२००४-१२. सर्वाधिकार लेखकाधीन आ जतए लेखकक नाम नहि अछि ततए संपादकाधीन। विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। सह-सम्पादक: उमेश मंडल। सहायक सम्पादक: शिव कुमार झा आ मुन्नाजी (मनोज कुमार कर्ण)। भाषा-सम्पादन: नागेन्द्र कुमार झा आ पञ्जीकार विद्यानन्द झा। कला-सम्पादन: ज्योति झा चौधरी आ रश्मि रेखा सिन्हा। सम्पादक-शोध-अन्वेषण: डॉ. जया वर्मा आ डॉ. राजीव कुमार वर्मा। सम्पादक- नाटक-रंगमंच-चलचित्र- बेचन ठाकुर। सम्पादक- सूचना-सम्पर्क-समाद- पूनम मंडल आ प्रियंका झा। सम्पादक- अनुवाद विभाग- विनीत उत्पल। रचनाकार अपन मौलिक आ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि) ggajendra@videha.com केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx, .rtf वा .txt फॉर्मेटमे पठा सकैत छथि। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेताह, से आशा करैत छी। रचनाक अंतमे टाइप रहय, जे ई रचना मौलिक अछि, आ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। मेल प्राप्त होयबाक बाद यथासंभव शीघ्र ( सात दिनक भीतर) एकर प्रकाशनक अंकक सूचना देल जायत। ’विदेह' प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका अछि आ एहिमे मैथिली, संस्कृत आ अंग्रेजीमे मिथिला आ मैथिलीसँ संबंधित रचना प्रकाशित कएल जाइत अछि। एहि ई पत्रिकाकेँ श्रीमति लक्ष्मी ठाकुर द्वारा मासक ०१ आ १५ तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि। (c) 2004-12 सर्वाधिकार सुरक्षित। विदेहमे प्रकाशित सभटा रचना आ आर्काइवक सर्वाधिकार रचनाकार आ संग्रहकर्त्ताक लगमे छन्हि। रचनाक अनुवाद आ पुनः प्रकाशन किंवा आर्काइवक उपयोगक अधिकार किनबाक हेतु ggajendra@videha.com पर संपर्क करू। एहि साइटकेँ प्रीति झा ठाकुर, मधूलिका चौधरी आ रश्मि प्रिया द्वारा डिजाइन कएल गेल। सिद्धिरस्तु वि दे ह विदेह Videha বিদেহ www.videha.co.in विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका www.videha.com Videha Ist Maithili Fortnightly ejournal विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका 'विदेह' ११९ म अंक ०१ दिसम्बर २०१२ (वर्ष ५ मास ६० अंक ११९) मानुषीमिह संस्कृताम् ISSN 2229-547X VIDEHA
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