VIDEHA — Issue 120 / अंक १२०

Publication: VIDEHA · Issue: 120
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127 ISSN 2229-547X VIDEHA 'विदेह' १२० म अंक १५ दिसम्बर २०१२ (वर्ष ५ मास ६० अंक १२०) ऐ अंकमे अछि:- १. संपादकीय संदेश २. गद्य २.१.आशीष अनचिन्हार-माहिया २.२.जगदीश प्रसाद मण्‍डल-लघुकथा-इमानदार घूसखोर २.३.प्रमोद रंगिले- प्रचण्ड प्रयोग कएलथि नया हथियार- मधेसी मोर्चा बेवकुफ बनए लेल भऽ गेल तैयार २.४.१.रामवि‍लास साहु -एकटा वि‍हनि‍ कथा- घुसहा घर २.कैलास दास-लघुकथा-लाँज २.५.संजीव कुमार शमा- महाकवि‍ पं. लालदासक १५६म जयंती समारोह २.६.सन्दीप कुमार साफी- आत्मकथा २.७.उमेश मण्डल- दोसर चरणक पहिल सगर राति दीप जरय दरभंगामे सम्पन्न- डिजिटल फॉर्ममे ३७ टा पोथीक लोकार्पण ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com  पर पठाउ। ३. पद्य ३.१.जगदीश चन्द्र ठाकुर ‘अनिल’- की भेटल आ की हेरा गेल  (आत्म गीत)- (आगाँ) ३.२.सन्दीप कुमार साफी-कविता-कातिकक पूर्णिमा/ गामक इनार ३.३.जगदानन्द झा मनु ३.४.हेमनारायण साहु- हम छी नीमक गाछ ३.५.मुन्नी कामत केर दुइ गोट कविता-सिया तोरे कारण/ ठिठुराबैत जाड़ ३.६.१.राजदेव मण्‍डलक तीन गोट कवि‍ता-चि‍र प्रतीक्षा/ हाथ/ ठक२.मिहिर झा- विदागरी ३.७.पंकज चौधरी (नवलश्री)- चारिटा गजल ३.८.बिन्देश्वर ठाकुर- गीत-गजल-कविता विदेह मैथिली पोथी डाउनलोड साइट VIDEHA MAITHILI BOOKS FREE DOWNLOAD SITE विदेह ई-पत्रिकाक सभटा पुरान अंक ( ब्रेल, तिरहुता आ देवनागरी मे ) पी.डी.एफ. डाउनलोडक लेल नीचाँक लिंकपर उपलब्ध अछि। All the old issues of Videha e journal ( in Braille, Tirhuta and Devanagari versions ) are available for pdf download at the following link. विदेह ई-पत्रिकाक सभटा पुरान अंक ब्रेल, तिरहुता आ देवनागरी रूपमे Videha e journal's all old issues in Braille Tirhuta and Devanagari versions विदेह ई-पत्रिकाक पहिल ५० अंक

विदेह ई-पत्रिकाक ५०म सँ आगाँक अंक ↑ विदेह आर.एस.एस.फीड एनीमेटरकेँ अपन साइट/ ब्लॉगपर लगाऊ। ब्लॉग "लेआउट" पर "एड गाडजेट" मे "फीड" सेलेक्ट कए "फीड यू.आर.एल." मे http://www.videha.co.in/index.xml टाइप केलासँ सेहो विदेह फीड प्राप्त कए सकैत छी। गूगल रीडरमे पढ़बा लेल http://reader.google.com/ पर जा कऽ Add a  Subscription बटन क्लिक करू आ खाली स्थानमे http://www.videha.co.in/index.xml पेस्ट करू आ Add  बटन दबाउ। Join official Videha facebook group. Join Videha googlegroups विदेह रेडियो:मैथिली कथा-कविता आदिक पहिल पोडकास्ट साइट http://videha123radio.wordpress.com/ मैथिली देवनागरी वा मिथिलाक्षरमे नहि देखि/ लिखि पाबि रहल छी, (cannot see/write Maithili in Devanagari/ Mithilakshara follow links below or contact at ggajendra@videha.com) तँ एहि हेतु नीचाँक लिंक सभ पर जाउ। संगहि विदेहक स्तंभ मैथिली भाषापाक/ रचना लेखनक नव-पुरान अंक पढ़ू। http://devanaagarii.net/ http://kaulonline.com/uninagari/  (एतए बॉक्समे ऑनलाइन देवनागरी टाइप करू, बॉक्ससँ कॉपी करू आ वर्ड डॉक्युमेन्टमे पेस्ट कए वर्ड फाइलकेँ सेव करू। विशेष जानकारीक लेल ggajendra@videha.com पर सम्पर्क करू।)(Use Firefox 4.0 (from WWW.MOZILLA.COM )/ Opera/ Safari/ Internet Explorer 8.0/ Flock 2.0/ Google Chrome for best view of 'Videha' Maithili e-journal at http://www.videha.co.in/ .) Go to the link below for download of old issues of VIDEHA Maithili e magazine in .pdf format and Maithili Audio/ Video/ Book/ paintings/ photo files. विदेहक पुरान अंक आ ऑडियो/ वीडियो/ पोथी/ चित्रकला/ फोटो सभक फाइल सभ (उच्चारण, बड़ सुख सार आ दूर्वाक्षत मंत्र सहित) डाउनलोड करबाक हेतु नीचाँक लिंक पर जाउ। VIDEHA ARCHIVE विदेह आर्काइव ज्योतिरीश्वर पूर्व महाकवि विद्यापति। भारत आ नेपालक माटिमे पसरल मिथिलाक धरती प्राचीन कालहिसँ महान पुरुष ओ महिला लोकनिक कर्मभमि रहल अछि। मिथिलाक महान पुरुष ओ महिला लोकनिक चित्र 'मिथिला रत्न' मे देखू। गौरी-शंकरक पालवंश कालक मूर्त्ति, एहिमे मिथिलाक्षरमे (१२०० वर्ष पूर्वक) अभिलेख अंकित अछि। मिथिलाक भारत आ नेपालक माटिमे पसरल एहि तरहक अन्यान्य प्राचीन आ नव स्थापत्य, चित्र, अभिलेख आ मूर्त्तिकलाक़ हेतु देखू 'मिथिलाक खोज' मिथिला, मैथिल आ मैथिलीसँ सम्बन्धित सूचना, सम्पर्क, अन्वेषण संगहि विदेहक सर्च-इंजन आ न्यूज सर्विस आ मिथिला, मैथिल आ मैथिलीसँ सम्बन्धित वेबसाइट सभक समग्र संकलनक लेल देखू "विदेह सूचना संपर्क अन्वेषण" विदेह जालवृत्तक डिसकसन फोरमपर जाउ। "मैथिल आर मिथिला" (मैथिलीक सभसँ लोकप्रिय जालवृत्त) पर जाउ। 1.संपादकीय १ विदेह भाषा सम्मान 2012-13  अनुवाद पुरस्कार 2013, युवा पुरस्कार 2012 आ 2013 फेलो (समग्र योगदान) क लेल विदेह सम्मानक घोषणा 2013 फेलो (समग्र योगदान)क विदेह सम्मान- श्री राजनन्दन लालदास केँ। युवा पुरस्कार 2012- श्रीमति ज्योति सुनीत चौधरीकेँ “अर्चिस” कविता-हाइकू संग्रह लेल। अनुवाद पुरस्कार 2013- श्री नरेश कुमार विकलकेँ मराठी उपन्यास “ययाति”क मैथिली अनुवाद लेल। मूल पुरस्कार 2012 आ बाल साहित्य पुरस्कार 2 012 लेल विदेह सम्मानक घोषणा पहिनहिये भ’ गेल अछि।

विदेह भाषा सम्मान २०१२-१३ (वैकल्पिक साहित्य अकादेमी पुरस्कारक रूपमे प्रसिद्ध)

1.विदेह समानान्तर साहित्य अकादेमी फेलो पुरस्कार 2012 2012 श्री राजनन्दन लाल दास (समग्र योगदान लेल) 2.विदेह भाषा सम्मान २०१२-१३ (वैकल्पिक साहित्य अकादेमी पुरस्कारक रूपमे प्रसिद्ध) २०१२ बाल साहित्य पुरस्कार - श्री जगदीश प्रसाद मण्डल केँ “तरेगन” बाल प्रेरक विहनि कथा संग्रह २०१२ मूल पुरस्कार - श्री राजदेव मण्डलकेँ "अम्बरा" (कविता संग्रह) लेल। 2012 युवा पुरस्कार- श्रीमती ज्योति सुनीत चौधरीक “अर्चिस” (कविता संग्रह) 2013 अनुवाद पुरस्कार- श्री नरेश कुमार विकल "ययाति" (मराठी उपन्यास श्री विष्णु सखाराम खाण्डेकर) २ फणीश्वर नाथ रेणु एकटा लोकगीतक विद्यापति भूमिका महाकवि विद्यापतिपर “खोज”करैत काल हमरा लागल जे एक अध्यायक शीर्षक राख’ पड़त- “खेतिहर-बोनिहार आ बहलमानक कवि विद्यापति”। कारण पूर्णियाँ-सहरसाक इलाकामे आइयो विद्यापतिक पदावली गाबि-गाबि क’ भाव देखाक’ नाचैबलाक मण्डली सभ अछि। ऐ मण्डली सभक नायक महिसवार, चरबाह आ गाड़ीक बहलमाने होइ छथि प्रायः। मैथिल पण्डित लोकनिसँ पुछलौं , ई कोना भेल? बजला, अहाँ कोन फेरामे पड़ल छी? अही सभ मूर्खक कारण आइ विद्यापतिक दुर्दशा भ’ रहल अछि। ऐ मामूली लोक सभक मोनमे जखन एलै विद्यापतिक नामपर “चारिटा पदावली” जोड़ि देलक। ..अहाँ दिग्भ्रमित भ’ रहल छी।.. मिथिलाक पण्डितक वर्जना-वाणीपर कान-बात नै दैत हम सहर्ष सहरसा (बा सहर्षा?) यात्राक तैयारी शुरू क’ देलौं। ..कनचीरा गाम एकटा एहन गाम अछि जइपर दू-दू जिलाक जिला अधिकारीक शासन चलैत अछि। अदहा गाम सहरसामे, अदहा गाम पूर्णियाँमे।  ... कनचीराक विद्यापति-मण्डलीक नाम दुनू जिलाक लोक लै छथि। ... जइ दिन कनचीरा गाम पहुँचलौं, गाममे एकटा अघट घटना घटित भ’ गेल रहै। दस सालसँ इलाकाक प्रतिनिधित्व करैबला नेताजी चुनावमे चितंग भ’ गेल रहथि। तइ द्वारे ओइ राति नाच-गानक दोसरे मतलब निकालल जा सकै छल, ऐ डरे “विद्यापति-मण्डली”क नायक जनकदास नाच करबाक अनुमति नै देलनि।  दोसर राति ओ बड्ड खुशामद करेलाक बाद अनुमति देलनि। नायक जनकदास बड्ड तर्क-वितर्क केलाक बाद घुमा-फिरा क’ दोहरा-तेहरा क’ कहलनि, “विद्यापति- नाच” क जन्म हुनके परिवारमे पहिले-पहिल भेल। विस्तारसँ ओ कहियो किछु नै कहलनि। आ हुनका जखन ई विश्वास भ’ गेलनि जे “विद्यापति नाच मण्डली”क नामपर खर्च करबा लेल हजार- दू हजार टाका सरकारक खजानासँ ल’ क’ हम नै बहराएल छी, तखन ओ मृदंगपर थाप देलनि। राति भरि नाच देखैत रहलौं। गाए चरबैबला छौड़ा, साड़ी पहीर विरहिनी राधा बनि गेलि आ कानि-कानि गाबए लागलि- “कतेक दिवस हरि खेपब हो, तुम एसकरि नारी!” दोसर दिन, जनकदाससँ ऐ नाचक उत्पत्तिक इतिहास पुछलौं तँ ओ बाजल- नै जानि कहियासँ ऐ नाचक मूलगैनी हमरा परिवारमे चलैत आबि रहल अछि। जनकदासक ऐ उदासीक कारण छल- हमर टेपरेकार्डर।.. चुप्पे-चुप्पे सभ गीत फीतामे अहाँ भरि लेलौं, चलाकीसँ। मंगनीमे अपन काज सुतारि लेलौं अहाँ? आ, अंतिममे पचास टाका नगदी देलाक बादो ओ हमर ऐ प्रश्नक कोनो उत्तर नै देलनि कि खेतिहर-बोनिहार, चरवाह आ बहलमान सभ कहिया आ केना विद्यापतिक पदावलीकेँ गाबि-गाबि नाचब प्रारम्भ केलनि। जनकदासक पलानीमे पुआरपर पड़ल रही दिन भरि, ओकरा दया नै लगलै। ओकर मसोमात जवान बेटी हमरा दिससँ पैरवी केलक, तखनो ओ नै पसिझल, अपन खानदानीक “हँसी” करबैबला गप के “गजट” मे “छापी” कराब’ चाहत? बुरहा जनकदास बड़द खोलि चरबै लेल चलि गेला। हम ओकर पलानीमे पड़ल रहलौं आ तकर बादे एकटा खिस्सा सुनलौं बा सपना देखलौं बा “भ्रम”मे पड़ि गेलौं- ई नै कहि सकै छी। ३ की मैथिली मात्र मैथिल ब्राह्मणक भाषा छी? सेन्टर फॉर स्टडी ऑफ  इण्डियन ट्रेडिशन्स- मैथिली साहित्यसँ ऐ संस्थाक की सरोकार छै? विद्यापति सेवा संस्थान आ चेतना समिति राजनैतिक संस्था अछि- पागबला संस्कृत आ अवहट्ठक विद्यापतिक सालाना विद्यापति पर्व करबाक अतिरिक्त एकर सभक की काज छै? ऑल इण्डिया मैथिली साहित्य समितिक पड़ोसीयोकेँ पता नै छै जे ई संस्था छैहो बा नै, जयकान्त मिश्रक मृत्युक बाद ऐ संस्थाक मान्यता बरकरार किए छै, की जयकान्त मिश्रक मैथिली लेल कएल अहसानक पारिश्रमिक हुनकर बेटी-जमाए लऽ रहल छथि। अखिल भारतीय मैथिली साहित्य परिषद की अछि आ एम.बी.बी.एस. डॉक्टर, जिनका साहित्यसँ कोनो सरोकार नै छन्हि, किए वोटक अधिकार लेल ऐ मुइल संस्थाक पता अपन नामसँ दै लेल तैयार भेल छथि। मिथिला सांस्कृतिक परिषद तँ विद्यापतिकेँ पागबला फोटो पहिरा कऽ विद्यापतिक नै मैथिलीक यज्ञोपवीत संस्कार करबाक दोषी अछिये। तँ की ई मैथिल ब्राह्मणक खाँटी संस्था सभ मैथिलीकेँ मैथिल ब्राह्मणक भाषा बनबै लेल (साहित्य अकादेमी दिल्लीमे) मात्र वोट आ कब्जाक राजनीतिक अन्तर्गत साहित्य अकादेमीक मैथिली कन्वीनर चुनबाक लेल संस्थाक रूपमे काज कऽ रहल अछि, आ तेँ अस्तित्वमे अछि? की मैथिली मात्र मैथिल ब्राह्मणक भाषा अछि? साहित्य अकादेमी, दिल्लीक पुरस्कारक बँटवारा (!!!) देखी तँ उत्तर की अछि? (कुल बँटवारा ४३ बेर- २०११ धरि) मैथिल ब्राह्मण -३६ बेर!! कायस्थ-५  बेर राजपूत-२  बेर गएर सवर्ण- 0000 बेर!!!! १९६६- यशोधर झा (मिथिला वैभव, दर्शन) मैथिल ब्राह्मण १९६८- यात्री (पत्रहीन नग्न गाछ, पद्य) मैथिल ब्राह्मण १९६९- उपेन्द्रनाथ झा “व्यास” (दू पत्र, उपन्यास) मैथिल ब्राह्मण १९७०- काशीकान्त मिश्र “मधुप” (राधा विरह, महाकाव्य) मैथिल ब्राह्मण १९७१- सुरेन्द्र झा “सुमन” (पयस्विनी, पद्य) मैथिल ब्राह्मण १९७३- ब्रजकिशोर वर्मा “मणिपद्म” (नैका बनिजारा, उपन्यास) कर्ण कायस्थ १९७५- गिरीन्द्र मोहन मिश्र (किछु देखल किछु सुनल, संस्मरण) मैथिल ब्राह्मण १९७६- वैद्यनाथ मल्लिक “विधु” (सीतायन, महाकाव्य) कर्ण कायस्थ १९७७- राजेश्वर झा (अवहट्ठ: उद्भव ओ विकास, समालोचना) मैथिल ब्राह्मण १९७८- उपेन्द्र ठाकुर “मोहन” (बाजि उठल मुरली, पद्य) मैथिल ब्राह्मण १९७९- तन्त्रनाथ झा (कृष्ण चरित, महाकाव्य) मैथिल ब्राह्मण १९८०- सुधांशु शेखर चौधरी (ई बतहा संसार, उपन्यास) मैथिल ब्राह्मण १९८१- मार्कण्डेय प्रवासी (अगस्त्यायिनी, महाकाव्य) मैथिल ब्राह्मण १९८२- लिली रे (मरीचिका, उपन्यास) मैथिल ब्राह्मण १९८३- चन्द्रनाथ मिश्र “अमर” (मैथिली पत्रकारिताक इतिहास) मैथिल ब्राह्मण १९८४- आरसी प्रसाद सिंह (सूर्यमुखी, पद्य) गएर ब्राह्मण- राजपूत १९८५- हरिमोहन झा (जीवन यात्रा, आत्मकथा) मैथिल ब्राह्मण १९८६- सुभद्र झा (नातिक पत्रक उत्तर, निबन्ध) मैथिल ब्राह्मण १९८७- उमानाथ झा (अतीत, कथा) मैथिल ब्राह्मण १९८८- मायानन्द मिश्र (मंत्रपुत्र, उपन्यास) मैथिल ब्राह्मण १९८९- काञ्चीनाथ झा “किरण” (पराशर, महाकाव्य) मैथिल ब्राह्मण १९९०- प्रभास कुमार चौधरी (प्रभासक कथा, कथा) मैथिल ब्राह्मण १९९१- रामदेव झा (पसिझैत पाथर, एकांकी) मैथिल ब्राह्मण १९९२- भीमनाथ झा (विविधा, निबन्ध) मैथिल ब्राह्मण १९९३- गोविन्द झा (सामाक पौती, कथा) मैथिल ब्राह्मण १९९४- गंगेश गुंजन (उचितवक्ता, कथा) मैथिल ब्राह्मण १९९५- जयमन्त मिश्र (कविता कुसुमांजलि, पद्य) मैथिल ब्राह्मण १९९६- राजमोहन झा (आइ काल्हि परसू, कथा संग्रह) मैथिल ब्राह्मण १९९७- कीर्ति नारायण मिश्र (ध्वस्त होइत शान्तिस्तूप, पद्य) मैथिल ब्राह्मण १९९८- जीवकान्त (तकै अछि चिड़ै, पद्य) मैथिल ब्राह्मण १९९९- साकेतानन्द (गणनायक, कथा) मैथिल ब्राह्मण २०००- रमानन्द रेणु (कतेक रास बात, पद्य)कर्ण कायस्थ २००१- बबुआजी झा “अज्ञात” (प्रतिज्ञा पाण्डव, महाकाव्य) मैथिल ब्राह्मण २००२- सोमदेव (सहस्रमुखी चौक पर, पद्य) कायस्थ २००३- नीरजा रेणु (ऋतम्भरा, कथा) मैथिल ब्राह्मण २००४- चन्द्रभानु सिंह (शकुन्तला, महाकाव्य) गएर ब्राह्मण- राजपूत २००५- विवेकानन्द ठाकुर (चानन घन गछिया, पद्य) मैथिल ब्राह्मण २००६- विभूति आनन्द (काठ, कथा) मैथिल ब्राह्मण २००७- प्रदीप बिहारी (सरोकार, कथा)कर्ण कायस्थ २००८- मत्रेश्वर झा (कतेक डारि पर, आत्मकथा) मैथिल ब्राह्मण २००९- स्व.मनमोहन झा (गंगापुत्र, कथासंग्रह) मैथिल ब्राह्मण २०१०-श्रीमति उषाकिरण खान (भामती, उपन्यास) मैथिल ब्राह्मण २०११- श्री उदयचन्द्र झा "विनोद" (अपक्ष, कविता संग्रह) मैथिल ब्राह्मण गजेन्द्र ठाकुर ggajendra@videha.com अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। २. गद्य २.१.आशीष अनचिन्हार-माहिया २.२.जगदीश प्रसाद मण्‍डल-लघुकथा-इमानदार घूसखोर २.३.प्रमोद रंगिले- प्रचण्ड प्रयोग कएलथि नया हथियार- मधेसी मोर्चा बेवकुफ बनए लेल भऽ गेल तैयार २.४.१.रामवि‍लास साहु -एकटा वि‍हनि‍ कथा- घुसहा घर २.कैलास दास-लघुकथा-लाँज २.५.संजीव कुमार शमा- महाकवि‍ पं. लालदासक १५६म जयंती समारोह २.६.सन्दीप कुमार साफी- आत्मकथा २.७.उमेश मण्डल- दोसर चरणक पहिल सगर राति दीप जरय दरभंगामे सम्पन्न- डिजिटल फॉर्ममे ३७ टा पोथीक लोकार्पण आशीष अनचिन्हार- माहिया हम प्रयासरत छलहुँ जे लघु-दीर्घ निर्णय भाग-२ एही अंकमे आबए मुदा कनेक नमहर चर्चा हेबाक कारणें बेसी समय लागि रहल छै..... तँए ऐ खेप एकटा नव विधापर गप्प करी। ऐ विधाक नाम थिक " माहिया " । ई विधा मूलतः पंजाबी साहित्य केर थिक आ पंजाबीसँ उर्दूमे आएल आ तकरा बाद सभ भाषामे पसरल। ई विधा मात्र तीन पाँति केर होइत छै जाहिमे पहिल पाँतिमे 12 मात्रा दोसरमे 10 मात्रा आ फेर तेसरमे 12 मात्रा होइत छै आ सङ्गे-सङ्ग पहिल पाँति आ तेसर पाँतिमे काफिया ( तुकान्त ) होइत छै... तँ देखी एकर संरचनाकेँ------ पंजाबीमे माहियाक पहिल पाँतिक संरचना अधिकांशतः 2211222 अछि मने दीर्घ-दीर्घ-लघु-लघु-दीर्घ-दीर्घ-दीर्घ। तेनाहिते दोसर पाँतिक संरचना अछि 211222 दीर्घ-लघु-लघु-दीर्घ-दीर्घ-दीर्घ आ फेर तेसर पाँतिक संरचना पहिल पाँतिक बराबर अछि मने 2211222 मने दीर्घ-दीर्घ-लघु-लघु-दीर्घ-दीर्घ-दीर्घ। ओना ई अधिकांश संरचना अछि। ऐकेँ अलावे किछु हेड़-फेड़क संग आन-आन संरचना सेहो भेटैत अछि। मुदा ई निश्चित छै जे हरेक पाँतिमे दीर्घक बेसी संख्या रहने लयमे ई खूब आबि जाइत छै माहिया छन्दमे अर्थक चारि तरहें विस्तार होइत छै... १) या तँ पहिल आ दोसर पाँति मीलि कए एकटा अर्थकेँ ध्वनित करै आ तेसर पाँति अलग रहै, २) या तँ दोसर पाँति आ तेसर पाँति मीलि कए कएटा अर्थकेँ द्वनित करै आ पहिल पाँति अलग रहै, ३) या तीनू पाँति मीलि कए एकटा अर्थकेँ ध्वनित करै ४) या दोसर पाँति एहन होइ जे पहिलो पाँति सङ्ग मीलि अलग अर्थ दै वा तेसर पाँति सङ्ग मीलि अलग अर्थ दै। माहिया छन्दक स्थायी अधार श्रृगांर रस थिक मुदा आधुनिक समयमे ई हरेक विषयमे लिखल जाइत अछि। उदाहरण स्वरूप देखू हमर दूटा माहिया--- १) तीरसँ ने तरुआरिसँ हम डरै छी आब हुनक नजरिकेँ मारिसँ २) डोलैए मोन हमर उठल आँखिसँ भाइ करेज मथैए हमर मैथिलीमे ई माहिया छन्द अज्ञात अछि.. आउ एकरो आगू बढ़ाएल जाए..... खास कए जे कवि श्रृगांर रसमे भीजल रहै छथि। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। जगदीश प्रसाद मण्‍डल लघुकथा- इमानदार घूसखोर चुनमुन बाबूकेँ सभ जनैत, चाहे ओ आम आदमी होथि‍ वा कचहरीक वकील, मुंशी, कि‍रानी, चाहे इनटेलि‍जेन्‍स  वि‍भागक अफसर होथि‍ वा प्रशासनि‍क, जे ओहन घूसखोर जि‍ला भरि‍मे कि‍यो नै छथि‍ मुदा ईहो सभ जनैत छथि‍ जे जि‍नगीमे कहि‍यो अपन इमान नै डि‍गौलनि‍। जि‍ला सत्र न्‍यायालयक प्रथम श्रेणीक जज चुनमुन बाबू छथि‍। अोना हुनकर असल नाओं सुरेन्‍द्र  प्रसाद छि‍यनि‍ मुदा दादीक पहि‍ल पोता रहने उपहार देल नाओं चुनमुन छि‍यनि‍ जे पछाति‍ बाबू जोड़ा गेलनि‍। उर्फ कए कऽ अपनो चुनमुन बाबू लि‍खते छथि‍ जे नेमप्‍लेटमे सेहो छन्‍हि‍। ओना बहुतो, प्रेमचंद आ दि‍नकरजी सन भेलाह जि‍नकर असली नाओंसँ बेसी लोक उपनामेकेँ जनैत छन्‍हि‍। बच्‍चेसँ चुनमुन बाबू इमानदारीक ि‍नर्वहन करैत आएल छथि‍ जेकर फलाफल सेहो जीवि‍तेमे भेट रहल छन्‍हि‍। पढ़ै-लि‍खैमे एते इमानदार रहलाह जे कहि‍यो मौलि‍क रचना छोड़ि‍ नोट-फोटक सहारा नै लेलनि‍। जइसँ सभ दि‍न नीक रि‍जल्‍ट होइत रहलनि‍। ओना सुभ्‍यस्‍त परि‍वार रहने कहि‍यो अर्थक अभाव सेहो नहि‍ये भेलनि‍। मुदा अपनो पढ़ैमे एते इमानदारी रखैत छलाह जे शि‍क्षकसँ परि‍वार धरि‍ नजरि‍मे रहलाह। एम.ए; एल.एल.बी. कए प्रथम श्रेणी जि‍ला सत्र न्‍यायाधीश बनलाह। चारि‍ भाँइक बीच सए बीघासँ ऊपरे जमीन छन्‍हि‍ जइमे तीन भाँइ नोकरी करै छथि‍ आ एक भाँइ देवेन्‍द्र प्रसाद गि‍रहस्‍थी करै छथि‍। गि‍रहस्‍थीक अर्थ खाली खेति‍ये करब नै, बल्‍कि‍ परि‍वारकेँ संचालि‍त करब सेहो होइत, जे छलनि‍। नोकरिहरो भाँइ सभकेँ नै बूझि‍ पड़नि‍ जे खानदानी परि‍वारमे कनि‍यो कतौ घून-घान आकि‍ दि‍वार-गराड़ लागल अछि‍। परि‍वारक ऐ काजमे चुनमुन बाबूक वि‍चार काज केलकनि‍। ओहए कहलखि‍न जे जखन हम सभ तीनू भाँइ नोकरी करै छी तखन खेत आ परि‍वार देवेन्‍द्रक भेलनि‍, जइ दि‍न हमसभ रि‍टायर भेलापर‍ आएब तइ दि‍न अगि‍ला वि‍चार करब। मनमे ईहो रहनि‍ जे जखने हम सभ खेत बाँटि‍ लेब तखने ढेर तरहक बि‍‍हंगरा उठत। एक तँ ओहि‍ना जमीन जाल छी तइपर भैयारीक तँ आरो महाजाल। जे सम्‍पति‍ आइ धरि‍ मान-प्रति‍ष्‍ठा बनल रहल अछि‍ वहए गाड़ा-घेघ बनि‍ सभटाकेँ धोइ-पोछि‍ एकबट्ट कऽ देत। जखन जि‍नगीमे माने-प्रति‍ष्‍ठा नै तखन जि‍नगि‍यो तँ एक्‍सपायर डेटक दबाइसँ बेसी कि‍छु नै। एक तँ अोहुना समए ि‍नर्धारि‍त अछि‍ जे कते उमेरमे बेटाक बि‍आह आ कते उमेरमे बेटीक बि‍अाह करक चाही, तहूमे देहक लक्षण आगूमे ढाढ़ भऽ जाइ छै। से सुरेन्‍द्रक पि‍ता गौड़ीनाथ सेहो केलनि‍। जखन सुरेन्‍द्र प्रसाद बी.ए.मे पढ़ैत छलाह तखने बि‍आह कऽ देलखि‍न। कहैले तँ ईहो अछि‍ जे जखन पढ़ि‍-िलखि‍ अपना पएरपर ठाढ़ भऽ जाइ तखन बि‍आह करैक चाही, मुदा जइठाम पएरपर ठाढ़ होइक बेवस्‍थे नै रहत तइठाम कि‍ सभ अवि‍वाहि‍त बनि‍ बबाजि‍ये भऽ जाए। कओलेजक अवस्‍थामे सुरेन्‍द्र प्रसाद रहथि‍ मुदा मि‍सि‍यो भरि‍ मनमे नै उठलनि‍ जे अखन बि‍आह अनुचि‍त हएत। साहि‍त्‍यसँ दि‍लचस्‍पी रहबे करनि‍ तहूमे मध्‍ययुगीन साहि‍त्‍यसँ बेसी रहलनि‍ तँए मनमे चप-चपि‍ये रहनि‍। पि‍तोक मनमे कहि‍यो दहेजक लोभ नै उठलनि‍ जे नीक शि‍क्षा पाबि‍ नीक नोकरी भेटलापर नीक दहेजो भेटै छै। सामान्‍य गि‍रहस्‍त परि‍वार जकाँ अपन दायि‍त्‍व बूझि‍ समैपर काज समेटि‍ लेलनि‍ कि‍अए मनमे उठि‍तनि‍ जे बेटाकेँ पढ़ैमे बाधा उपस्‍थि‍त हेतनि‍। तँए मन खुशीसँ खुशि‍आइते रहनि‍। एम.ए.क पहि‍ल सत्रमे जखन सुरेन्‍द्र पढ़ैत छल तखन जौंआ बेटी भेल। नैहरेमे पत्नी रहथि‍न। ओना साले भरि‍पर दुरागमन भऽ गेल रहनि‍। जौंआ बेटी देखि‍ माएक मनमे तँ कनी सोगो पैसलनि‍ मुदा नानीक मनमे तते खुशी रहनि‍ जे सोल्हो आना नाति‍ने पाछू बेहाल रहए लगली। खुशीक कारण रहनि‍ जे तेहेन जुग-जमाना भऽ गेल अछि‍ जे अनेरे लोक बेटाक आशा करैए, तइसँ नीक बेटि‍ये। जँ बेटीकेँ नाति‍ नहि‍ये देखत तैयो जँ दुनू बेटीक जि‍नगी-जान रहलै तँ कहि‍यो माएकेँ थोड़े दावाइ-दारू आकि‍ कपड़ा-लत्ताक दुख हुअए देत। अपनो पहि‍रन जँ दैत रहतै तैयो सभ दि‍न हराएले रहत। तहूमे तेहेन कपड़ा सभ बनि‍ रहल अछि‍ जे तीन साल तक नबे रहैए, आ चलत कते दि‍न तेकर कोनो ठीक छै। सुइटर बि‍नैक लूरि‍ सि‍खा देबै, भरि‍ बाँहि‍सँ लऽ कऽ अाधावाहिंक तते दैत रहतै जे दस-दसटा साटि‍ कऽ पहि‍रत। कि‍ करतै माघक जाड़। ओना सुरेन्‍द्रक माइक मनमे सेहो खुशि‍ये रहनि‍ जे भगवान अपना कोखि‍मे बेटी नै देलनि‍ तँ कि‍ हेतै पोतीक कन्‍यादानक बाट तँ खुजि‍ये गेल। जे नारी एकोटा कन्‍यादान नै केलक ओ चाहे जे हुअए मुदा माइक एक सूत्रमे कम जरूर रहत। जि‍ला सत्र न्‍यायालयक न्‍यायाधीश बनि‍ जुआइन करए सुरेन्‍द्र प्रसाद आइ जेताह। असीरवाद दैत माइयो आ पि‍तो कहलखि‍न- “बौआ, नमहर काजक भार उठबए जेबह तँए नमहर बनि‍ काज करि‍हह।” माता पि‍ताक असीरवाद सुनि‍ सुरेन्‍द्र कि‍छु नै बाजल मुदा मनमे एकटा प्रश्न घुरि‍आए लगलनि‍, जे माए बूझि‍ गेलखि‍न। तोसैत कहलखि‍न- “बौआ, सभ दि‍न एकार बनि‍ पढ़लह-लि‍खलह मुदा अपन परि‍वार अपने आगू नीक होइ छै तँए पत्नि‍यो आ चारू कनटि‍रबि‍‍योकेँ संगे नेने जाह।” सोझामे गौड़ीनाथकेँ देखैत तँए सुरेन्‍द्र कि‍छु बाजए नै चाहैत मुदा मन गुनगुनाइत जे माए बूझि‍ गेलखि‍न। बजलीह- “बौआ, अपन बच्‍चाकेँ अपने देख-रेखमे पढ़ाएब बेसी नीक होइ छै, सेहो हेतह, आइ-काल्हि‍ देखै छि‍ऐ दूधे लगसँ बच्‍चा हटि‍ जाइ छै। दोसर हमरा सबहक आशा कते दि‍न करै छह, सेहो सीखल नै रहतह तँ अगि‍लाकेँ कि‍ सि‍खेबहक। मनमे होइत हेतह जे पि‍ता कि‍ कहताह मुदा नोकरीक अर्थ तँ ई नै ने होइ छै जे गामे छोड़ि‍ देब, परि‍वारे छोड़ि‍ देब। मौका-मुनासि‍ब अबैत-जाइत रहि‍हह। बेटा धन छि‍अह, तोरा माल-जाल जकाँ थोड़े डोरी बान्‍हि‍ राखल जाएत। ई होइत हेतह जे परि‍वार टूटि‍ जाएत, से भ्रम हेतह। भदवारि‍ मासमे हि‍मालयक पानि‍क मि‍लान समुद्रसँ भऽ जाइत अछि‍ जे अनदि‍ना माने आन मौसममे धार कमजोर वा सुखने  छूटि जाइत अछि‍ मुदा फेर भदवारि‍मे कि‍ देखै छहक। परि‍वार एक धार छी जेकर प्रवाह स्‍वच्‍छ पवि‍त्र बनि‍ अनवरत सामाजि‍क दि‍शामे बहैत रहए यएह ने भेल। छाती सक्कत कए कऽ घरसँ जाह।” अखन धरि‍ सुरेन्‍द्र प्रसाद छाती सक्कत करबक अर्थ खाली कहावते धरि‍ बुझैत छल मुदा माइक असीरवादक शब्‍द मनमे हौंड़ मारलकनि‍। छाती सक्कत करब बाता-बातीमे सक्कत करब आकि‍ काजमे सक्कत करब, वि‍चार सक्कत करब आकि‍ पवि‍त्र वि‍चार सक्कत करब, पवि‍त्र वि‍चार संग पवि‍त्र जि‍नगी सक्कत बना चलब आकि‍ सक्कत मनुष्‍य बनब। समुद्रक पानि‍ जकाँ जते डुबकुनि‍याँ मारैत तते अथाह दि‍स डुमल जाइत। अनायास मनमे उठलनि‍, आएल शुभक लगनमा शुभे हे शुभे...। माइक शुभ बात सुनि‍ शुभेक्‍क्षु नजरि‍सँ दलदलाइत सुरेन्‍द्र बाजल- “माए, तोहर असीरवाद शि‍रोधार्य अछि‍। मुदा समस्‍यो तँ जि‍नगीक बाधक बनि‍ दानव जकाँ अबैत रहै छै।” आेना सुरेन्‍द्र खुशीमे दहलि‍ गेल छल जइसँ ऐ वि‍चारपर नजरि‍ नै गेलनि‍ जे बड़का जंगलक कातमे पहि‍ने झाड़े-झूड़ रहै छै जइमे छोट-छोट जानवर बास करैत अछि‍। तहि‍ना ने मनुक्‍खोक बोन छै जइमे पहि‍ने छोटका जीव-जन्‍तु रहैत छै। चुपचाप भेल पि‍ताक मनमे नचैत जे जूरशीतलक अछींजल जकाँ, घरसँ नि‍कलि‍ दोसराक सेवामे जा रहल अछि‍ कि‍ ओकरा बसाओत आकि‍ उजाड़त। मुदा बि‍नु गहन लगने अनुमानि‍ते ने हएब। जहि‍ना कओलेजक पहि‍ल दि‍न, सासुरक पहि‍ल भेँट, दोस्‍तीक पहि‍ल मि‍लन भेने स्‍वत: हृदए डगमगाए लगैत, जे सुरेन्‍द्रो प्रसादकेँ कार्यालय पहुँचते हुअए लगलनि‍। नव-नव संगी सभ आबि‍-आबि‍ भेँट करए लगलनि‍। संगि‍यो बेसी ओहन नै, जे समतूल हुअए। मुदा सुरेन्‍द्र अवाक। सोझे नमस्‍कारक उत्तर नमस्‍कारमे दैत रहलाह। मात्र हाजरी बनाएब छलनि‍ तँए काजक भारो बेसी नहि‍ये। संगी सभ कमि‍ते असकरे रहि‍ गेलाह। मनमे परि‍वार आ दरमाहा संगे सोझा-सोझी उठलनि‍। दरमाहा तँ सीमि‍त परि‍वारक स्‍तरक हि‍साबसँ बनैत छै, तहूमे जे देश जेहेन रहल ओकर ओइ तरहक बनै छै। पाँच गोटेक परि‍वारमे छह गोटे अखने छी। तहूमे चारि‍टा बेटि‍ये अछि‍। समाजो तेहेन अछि‍ जे दहेजक सवारी कसबे करत। घर भाड़ा, बि‍जली-पानि‍, इन्‍कम टेक्‍स इत्‍यादि‍ कटि‍ये जाएत तखन हाथमे कते आओत? महगी अपना चालि‍ये चलबे करै छै। तहूमे तेहेन लफड़ल डेग पकड़ि‍ लेने अछि‍ जे मध्‍यवर्गीय जीवन धारक मोनि‍ जकाँ चकभौंर लऽ रहल अछि‍। मन वि‍षसँ बि‍साइन हुअए लगलनि‍। ओना काज नै रहने कार्यालय समैसँ पहि‍ने छोड़ब पहि‍ल दि‍न उचि‍त नै हएत। कुरसीक मुरेड़ापर मुड़ी अॅटकौने अकास दि‍स देखैक कोशि‍श करैत रहथि‍ मुदा कार्यालयक छतमे रोकाएल रहनि‍। चारि‍ बजे कार्यालयसँ नि‍कलि‍ सुरेन्‍द्र प्रसाद सोझे डेरा दि‍स वि‍दा भेलाह। रंग-बि‍रंगक टीका-टि‍प्‍पणी रस्‍तामे होइत। कि‍छु नीको कि‍छु अधलो। परदेशमे पति‍ कमेताह, से खुशी पत्नी सुनैनाकेँ रहबे करनि‍। चारू बेटीक बीच सुनैना यक्षि‍णी जकाँ पति‍क आगमनक प्रति‍क्षा बेर-बेर नजरि‍ उठा-उठा करैत। ओसारपर पति‍केँ पहुँचते सुनैना मुस्‍की भरल नजरि‍क तीर छोड़लनि‍। पगलाएल मन सुरेन्‍द्र प्रसादक। जि‍नगीक समस्‍यासँ पगलाएल। ओना कि‍यो खुशि‍योसँ पगलाइत अछि‍ तँ कि‍यो दुखोसँ। मुदा सुरेन्‍द्र पगलाएल रहथि‍ अपन आगूक जि‍नगीक समस्‍यासँ। अपनाकेँ संयमि‍त करैत बेटीक हाथ पकड़ने कोठरी पहुँचला। पत्नी चाह अनलनि‍। दुनू गोटे चाह पीबैत गप-सप शुरू केलनि‍। अपन आमदनी देखबैत सुरेन्‍द्र बजलाह- “अपन परि‍वार भेल जेकर आमदनी सत्तरि‍ हजार महि‍ना भेल, तइमे घर भाड़ा, इन्‍कम टैक्‍सक संग कतेको जमा करैक सूत्र लागल अछि‍। घर केना चलत से तँ अपने दुनू गोरे ने वि‍चारब।” जेना सुरेन्‍द्र प्रसाद अपन मोटा पत्नीपर पटकए चाहलनि‍ तहि‍ना पत्नी भोली-बौलक गेन जकाँ उनटबैत बजलीह- “देखू हमर कुल-खनदान एहेन नै रहल जे केकरो अधि‍कार छीनत। जे काज अहाँक छी ओ अहाँक भेल आ जे हमर छी ओ हमर भेल। छह मास पछाति‍ पेटक बच्‍चाक दुख माइये बुझैत अछि‍ बाप थोड़े बूझत। आकि‍ कहि‍यो कि‍छु कहबो केलौं।” दू-हत्‍थी बौल फेकैत सुरेन्‍द्र बजलाह- “कहलौं तँ बेस बात मुदा पढ़लौं-लि‍खलौं दुनू गोटे फुट-फुट इसकूलमे, सभ दि‍न रहलौं फुट-फुट मुदा धीया-पुता तँ सझि‍या भेल कि‍ने, तखन देह छि‍पौने काज चलत?” सुनैना अपनाकेँ कमजोर पबैत बजलीह- “अहाँक जे वि‍चार अछि‍ से बाजू जे अनुकूल हएत मानि‍ लेब जे नै हएत अोकरा तत्‍काल रखि‍ लेब।” एक गंभीर चि‍ंतक जकाँ सुरेन्‍द्र बजलाह- “जते हमरा दरमाहा भेटत ओ अहाँ हाथमे दऽ देब। अपना वि‍चारे परि‍वार चलाएब।” नोकरीकेँ जि‍नगीक धार बूझि‍ परि‍वारक सवारी नावपर चढ़ा भवि‍ष्‍य दि‍स बढ़लाह। मनमे उठलनि‍ जे एक बेर पत्नीकेँ पूछि‍ लि‍यनि‍ जे केना घर चलाएब मुदा मनकेँ मने रोकि‍ कहलकनि‍ जखन कुल-खनदानक रक्षक छथि‍ तखन कि‍छु बाजब उचि‍त नै हएत। अपना लेल सोचब नीक हएत। चलैत धारमे नावकेँ हवा-बि‍हाड़ि‍, पानि‍-पाथरसँ सामना करए पड़ै छै। जखने वेतनक भीतर परि‍वार चलत, तखने एक वान्‍हल परि‍वार जकाँ आगू बढ़ब। जहि‍ना समाज अपन रोग अपने अराधि‍ लेलक जइसँ  सभ रोगा गेल तखन अपन रोग के देखत। मुदा एहनो तँ रोग होइते अछि‍ जाधरि‍ दोसर नै बुझैत ताधरि‍ दोसरकेँ नै कहल जाइत। कमा कऽ परि‍वारमे आनब पत्नी देखबे करतीह, आमदपर आमद देखि‍ चसकबे करतीह, जते चसकती तते लोक देखबे करत। कोनो कि‍ केकरो आँखि‍ सीयल छै जे नै देखत। मुदा बेटा-बेटीक बि‍आह-दान -पढ़ा-लि‍खा सक्षम बना जि‍नगीमे उतारैक अवस्‍था धरि-‍ जँ नै कऽ लेब तखन कोन मुँहे समाजमे जीब। नीक हएत जे जहि‍ना होशि‍यार रोगी दवाइये दोकानपर दवाइ खा लइए आ घरपर अनबे नै करैए, तेहने जँ उपाए होइ तँ नीक हएत। नजरि‍ काज दि‍स बढ़लनि‍। कोन एहेन कोर्ट-न्‍यायालय अछि‍ जइमे काजक बोझ नै पड़ल अछि‍। आनसँ भि‍न्न अपन पहचान बनबैक प्रश्न अछि‍। मनक उत्साह जगलनि‍। कार्यालय संग डेरामे काज करब। काज बढ़ौने जँ कि‍छु हथि‍आइयो लेब तँ ओते अनुचि‍त नै हएत। जँ से नै करब तँ परि‍वार साधारण नै असाधारण रूपमे ठाढ़ भेल अछि‍। खेनाइ-पीनाइसँ लऽ कऽ पढ़ौनाइ-लि‍खौनाइ धरि‍ तँ बेटे-जकाँ हएत। पढ़ाइ समाप्‍त होइते वा होइपर रहि‍ते बि‍आहक भूत कपारपर चढ़ि‍ जाएत। ई काज केकर हेतै? तखन? जाधरि‍ प्रति‍कूलकेँ अनुकूल बना नै चलल जाएत ताधरि‍ सड़क परक गाड़ी जकाँ दुर्घटनाकेँ के रोकत। जहि‍ना ओकाइतसँ भारी ढेंगकेँ बाँसक जोगार लगा उनटा-पुनटा घुसकाओल जाइत अछि‍ तहि‍ना उनटबै-पुनटबैक जोगार करए पड़त। मुदा अनुचि‍त रूपमे? नहि‍! कदापि‍ नै!! तखन? हँ तखन अछि‍ जे अपन काज की अछि‍? यएह ने जे लोकक झगड़ाक मुकदमाक ि‍नर्णए करब। जेकर नोकरी करै छि‍ऐ ओकर काज अनकासँ बेसी करब। यएह जि‍नगीक पहि‍चान हएत कि‍ने। अनेरे कि‍अए एते मुकदमा कोर्टमे पड़ल अछि‍। महि‍नामे बीसटा मुकदमाक फैसला करब। जहि‍ना सभकेँ सभ ओझरबैक पाछू लगल रहैत अछि‍ तहि‍ना ने कोटो-कचहरी भऽ गेल अछि‍। ओना काज करैक दि‍शा सभकेँ र्नि‍धारि‍त अछि‍ तखन कि‍अए ने अपन बाट पकड़ि‍ तेज गति‍‍ये चलब। संकल्‍पि‍त होइत मन ठमकलनि‍। केकर फैसला करैक अछि‍ ओकरे ने जे अपन बात अपने नै बूझि‍ अनेरे ओझराइत आबि‍ गेल अछि‍। एकक ओझरीसँ दोसर ओझराएल अछि‍। जहि‍ना रग्‍गड़ करैत आबि‍ गेल अछि‍ तहि‍ना हमहूँ दू-चारि‍ रन्‍दा चला आरो चि‍क्कन कऽ देब। बीसटा केसक फैसला मासक काजक संग डेढ़ लाखक ऊपरी आमदनी सेहो करब अछि‍। दुनू पार्टीसँ पाइ लेबै। जेकरा पक्षमे हेतै ओ अपने भेल आ जेकरा वि‍पक्षमे हेतै ओकर घुमा देबै। केकरो संग अनुचि‍त नै करब। मुदा लोको तँ शेतानक चरखि‍ये अछि‍, जे वि‍चारलौं से चलए देत कि‍ नै। कि‍अए ने चलए देत? चरखीकेँ चरखा बना घुमाएब तखन अनेरे ने सभ सुधरि‍ जाएत। मुदा चरखीकेँ चरखा बनत केना? हँ कि‍अए ने बनत? जखने काजमे तेजी आनब तखने ने काज मुँहथरि‍ लग पहुँचत। हँ मास-दू मास फोंक जाएत मुदा तेसर मास अबैत-अबैत तँ गर पकड़ि‍ये लेत। जखने केसक बहस करा फैसला करैक स्‍थि‍ति‍मे आओत, तखने ने ससारैक गर भेटत। तीन-तीन दि‍नपर तारीख देबै अनेरे ने मासे ि‍दनमे ठहि‍या कऽ लि‍खाइ-फीस जमा करत। चुनमुन बाबूक दस बर्ख नोकरी पुरि‍ गेलनि‍। अनढड़न फुलवाड़ीक फूल जकाँ चारू बेटी खि‍लए लगलनि‍। तइपर अनढड़न भगवान तीनटा बेटी आ दूटा बेटा आरो देलकनि‍। मुदा पति‍-पत्नीक बीच सि‍नेहमे कमीक पेंपी पोनगए लगलनि‍। सुनैनाक मन कनैत जे भगवान तते धीया-पुता दऽ देलनि‍ जे के कतए बौआएत तेकर ठीक नै। तेहन जुग-जमाना भऽ गेल जे नि‍हत्‍था बाप-माए बेटीक पार-घाट केना लगाओत। अपने (पति‍) कहि‍यो एक पाइ अनुचि‍त नै कमाइ छथि‍ कि‍ समाज हमरा छोड़ि‍ देत। बि‍नु दहेजक बि‍आह बेटी सबहक हएत? कतए सँ आओत। ओना पत्नि‍क मलि‍न चेहरा देख चुनमुन बाबू परखैक परि‍यास करैत छलाह मुदा लाख समस्‍याक बीच सुनैना पति‍ लग पत्नि‍ये जकाँ रहैत छलीह। काजक भार पति‍पर छेलन्‍हि‍‍हेँ। बेसी समेओ ने भेटैत छलनि‍ जे बेसी बातो करि‍तथि‍। दोसर साँझ, चाह नेने सुनैना पति‍क हाथमे दैत आगूमे ठाढ़ भऽ गेलीह। जहि‍ना देवालयमे भक्‍त कि‍छु याचना करए ठाढ़ होइत तहि‍ना सुनैना भऽ गेलीह। सुरेन्‍द्रक मनमे मि‍सि‍यो भरि‍ जि‍नगीमे प्रति‍कुलता नै। एक घोंट चाह पीब सुरेन्‍द्र बजलाह- “मन मन्‍हुआएल देखै छी?” ढलान पाबि‍ जहि‍ना पानि‍ ढलकि‍ जाइत तहि‍ना ढलकैत सुनैना बजलीह- “एक तँ भगवान बेइमान भेला जे केकरो रोटि‍योपर ने नून केकरो बोरे-बोरे नून दइ छथि‍न। नअ-नअटा बाल-बच्‍चाक परि‍मार्जन करब नान्‍हि‍टा खेल छी।” सुनैनाक वि‍चार मुँहसँ नि‍कलबो नै कएल छलनि‍ तइ बीचेमे सुरेन्‍द्र बजलाह- “खेल-खेल‍ खेलौं।” कहि‍ चुप भऽ गेलाह। आँखि‍ उठा पत्नीक आँखि‍पर अँटकबए चाहैत छलाह मुदा रोगाएल-सोगाएल-पीड़ाएल सुनैनाक आँखि‍मे सुखाइत जि‍नगीक बालुक टीला छोड़ि‍ आर कि‍छु ने देख पड़ैत छलनि‍। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। प्रमोद रंगिले प्रचण्ड प्रयोग कएलथि नया हथियार- मधेसी मोर्चा बेवकुफ बनए लेल भऽ गेल तैयार जनकपुरधाम: एकीकृत नेकपा माओवादीक अध्यक्ष प्रचण्ड प्रधानमन्त्रीक लेल मधेसी मोर्चा नीक रहत, बतौलन्हि अछि। राष्ट्रपति डा. रामवरण यादव प्रधानमन्त्रीक लेल सहमति करए देने  दोसरका अल्टीमेटम सेहो अहिना समाप्त भेलाक बाद तथा कांग्रेस  दिस सँ प्रधानमन्त्रीक लेल अपन उम्मेदवार श’सील कोइरालाकेँ खड़ा करौलाक बाद प्रचण्डक एहन अभिव्यक्ति आएल अछि। ओना तँ माओवादी सँ हरेक काम पुछिकऽ करएबला मधेसी मोर्चा दिससँ प्रधानमन्त्रीक प्रस्ताव माओवादी अहिसँ पहिनहु आएल छल मुदा प्रधानमन्त्रीक लेल प्रस्तावित भेल गच्छदारक भूमिका मधेसी मोर्चामे नीक नै रहलासँ हुनकर नाम बादमे बिसराओल गेल छलै।  माओवादीकेँ नाया हथियारक रुपमे प्रयोग होबएबला मोर्चा दिससँ नाया प्रस्ताव तमलोपाक अध्यक्ष महन्थ ठाकुरक नाम आएल अछि। ओना तँ चुनावेमे हार पौने ठाकुर एखन धरि नै मधेसक लेल किछु कएने छथि नै तँ किछु बजने छथि। एहन अवस्थामे प्रधानमन्त्रीक लड्डू पौनाइ कोनो छोट बात नइ अछि। यदि गप्प कएल जाए राष्ट्रपतिकेँ अल्टिमटमकेँ तँ ओहन अल्टीमेटम कतेक बितल, अइके गणना नइ कएल जा सकैए। बेर-बेर संविधान बनाबएकेँ समए बढ़ैत-बढ़ैत संविधान सभे विघटन भऽ गेल मुदा एखनो धरि नइ दल सभमे कोनो किसीमके कनीको लाज लागल नै बुझि पड़ैत अछि। एम्हर प्रधानमन्त्रीक लेल राष्ट्रपति समक्ष निवेदन देने किसोरी महतो मौकामे चौका मारए लेल एकदम तैयार बैसल छथि। राष्ट्रपतिक दोसरो देल गेल सहमतिक समए बितलाक बाद अदालत निवेदक महतोकेँ प्रधानमन्त्री किए नइ बनाओल गेल, ओही केँ लेल स्पष्टीकरण मंगलक अछि। एक दिससँ देखल जाए तँ राष्ट्रपति रामवरण यादव सेहो कम मजबूर  नइ छथि। संविधान सभाक देहावसान भेलाक बाद संसदीय पद्धति द्वारा बनाओल गेल राष्ट्रपतिकेँ सेहो कोनो अधिकार नै रहत, से धमकी प्रमुख दलक प्रमुख नेता सभसँ अएलाक बाद चुलबुल पाण्डे जी चुलबुल करनाइए बन्द कए देने छथि। आब जेना लगैए, देशक एहन अवस्थामे निकास निकालयके लेल किनको दबंग बनहिटा पड़त। नइ तँ नेपाल विश्वक भ्रष्ट मुलुकमे ३७ अम स्थान मात्रे नइ, नम्बर एक बनैत देर नइ लागत। बिना संविधानक चलि रहल देशकेँ अफगानिस्तान बनैत देर नइ लागत। मधेसक मुक्तिक लेल सशस्त्र भूमिगत रुपमे युद्ध कऽ रहल मोर्चा सभकेँ नेपाल सरकार किछे महिना पहिले वार्तामे आबए, आवहन कएने छलथि। मुदा जखन ई मोर्चा सभ वार्तामे अएलथि तखन सरकारकेँ कोनो मतलब नइ देखल जा रहल अछि। मधेसीक नेता सभ ई सभ देखिओ कऽ चुप्पी किए सधने छै? कहीं फेरसँ देश द्वन्द्वमे नइ फँसि जाइक। यदि एहन भेल तँ अहिके जिम्मेवार यएह दल सभ रहत। दोसर दिस प्रचण्ड सँ अलग भेल माओवादी दल वैध पक्षधर नेकपा– माओवादी देशकेँ जल्दीए निकास नइ निकालत तँ हम सभ फेर सशस्त्र युद्ध करए जंगल ढुकब, जेहन चेतावनी बेर-बेर दऽ चुकल अछि। एहन अवस्थामे नेता सभकेँ इमानदार बननाइ जरुरी रहल अछि। पड़ोसी देश भारतक राज्य बिहारक उदाहरण देखाबएबला नेपाली नेता सभ एखन बिहारक तरक्कीक उदाहरण सेहो देखौक आ सिखाबौक। किएक तँ नेता सभक नौटंकी करए स्थल नेपालकेँ बनाओत तँ जनता किन्नहु नै स्वीकार करत। ध्यान दिअ। रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। १.रामवि‍लास साहु -एकटा वि‍हनि‍ कथा- घुसहा घर २.कैलास दास लघुकथा-लाँज १ रामवि‍लास साहु केर एकटा वि‍हनि‍ कथा- घुसहा घर- मुखि‍याजी पंचायतक गामे-गाम आम सभाक बैसार लेल डोल्हो दि‍यौलनि‍। गामक लोक सभ एकजुट भऽ आम सभामे पहुँचलाह। सभाकेँ संवोधि‍त करैत मुखि‍याजी बजलाह- “ऐ बैसारमे सभ कि‍यो मि‍ल ि‍नर्णए लि‍अए जे पंचायतक गरीब आ मसोमात, जि‍नकर घर टुटल-फाटल होइ वा रहबा योग नै होइ छै। ओइ व्‍यक्‍ति‍क सूची बनाएल जाउ। हुनका सभकेँ सरकार तरफसँ घर बनबैले इन्‍दि‍रा-आवास योजनासँ रूपैया भेटतनि‍।” वार्ड सदस्‍यक सहयोगसँ मुखि‍याजी लग इन्‍दि‍रा आवासबला सूची पहुँचल। बि‍हानेसँ मुखि‍या जीक दलाल सभ सूचीमे नामांकि‍त व्‍यक्‍ति‍सँ भेँट कऽ एक-एकटा फार्म दऽ कहि‍ देलक जे फार्म भरि‍ कऽ मुखि‍याजी लग जमा करै जाउ आ बैंकमे खाता सेहो खोलबा लइ जाउ। संगे संग पाँच हजार रूपैआ सेहो दि‍अए पड़त। तखन इन्‍दि‍रा आवास भेटै जाएत। बहुत गोटे तँ अपन गाए-महि‍ंस-बकरी-छकरी-गहना-जेबर जेकरा जे गर लगलै बेचि‍ कऽ रूपैआ दऽ रूपैआ उठेलक। कि‍छु आदमी एहनो छल जेकरा सकर्ता नै भेलै ओ वंचि‍त रहि‍ गेल। बदलामे पाइबला लोक अपना नामे उठा लेलक। कि‍छु दि‍नक बाद रघि‍या मसौमात इन्‍दि‍रा-आवास ले फार्म भरि‍ मुखि‍या जी लग पहुँचलीह। मुखि‍याजी फार्म पढ़ि‍ बजलाह- “पहि‍ले इन्‍दि‍रा आवासमे पचीस हजार भेटै छलै आब चालि‍स हजार भेटै छै मुदा आगू भेटैबला साइठ हजार भेटतै। जइमे पच्‍चीसमे पाँच हजार आ अखन चालि‍समे दस हजार खर्चा लगै छै मुदा आगू साइठमे पनरह हजार लगतै।” रधि‍या सुनिते कानि‍-कलपि‍ कऽ अपन मजबूरी सुनौलकनि‍। मुखि‍याजी मुड़ी डोलबैत बजलाह- “यइ काकी, हमरे केनेे नै ने होइ छै, डेगे-डेग हाकि‍म-हुकुम बैसल छै। ओहो तँ कटि‍या सोन्‍हा कऽ रखने रहै छै तेकरा की हेतै। आ हमरो कोनो दरमाहा भेटै छै हमहूँ तँ ओहीमे नि‍महै छि‍ऐ। तँ ई हेतौ जे हम अपनबला नै लेबो।” सुनि‍ रधि‍या सभ बात सुनि‍ परि‍स्‍थि‍ति‍ बूझि‍ आपस आबि‍ गेलीह। बुधनी बुढ़ि‍या गाममे सभसँ उमेरगर। जुआनि‍येमे घरबला बाढ़ि‍मे डुमि‍ मरि‍ गेलखि‍न। दूटा बेटाक संग बुधनी कहि‍यो हि‍म्‍मत नै हारलि। संघर्ष करैत आत्‍म-ि‍नर्भरतापर धि‍यो-पुतोकेँ सक्कत बनौने छथि‍। हलाँकि‍ आर्थिक रूपे कमजोरे छथि‍। एक दि‍न मुखि‍या जीक नजरि‍ बुधनी बुढ़ि‍यापर पड़लनि‍ आ देखि‍ते पुछलखि‍न- “गामक बहुतो लोक सभ लाभ लेलक मुदा तूँ कोनो फारमो नै भरलीही? तोरा तँ दूटा लाभ भेटतौं। एकटा वृद्धा-पेंसन ओ दोसर इन्‍दि‍रा आवासक।” बधनी बजलीह- “ऐमे कोनो खर्चो-वर्चो लगैए?” मुखि‍याजी- “हँ, वृद्धा-पेंसनमे पाँच सए आ इन्‍दि‍रा-आवासमे पनरह हजार।” बुधनी- “हम ई लाभ नै लेब।” मुखि‍याजी- “कि‍अए नै लेब?” बुधनी- “घूस दऽ कऽ घर बनाएब तँ ओइ घूसहा घरमे रहैबला केहेन हेतै?” मुखि‍याजी आ बुधनी बुढ़ि‍याक गप अपना घरक कोनचर लगसँ रधि‍या मसोमात सुनैत छलीह अपना मनकेँ बुझबैत बजलीह- “इन्‍दि‍रा आवास कि‍अए घूसहा घर कहि‍यो ने।” २ कैलास दास जनकपुर लघुकथा लाँज सावित्री लाँज देखिकऽ छक्क पड़ि गेल। ओ जे सोचने छल ओहि सँ उल्टा नजरि अबए लागल। सावित्री लँजक ओछाओन पर बैसल छल की पवन ओकर देह पर हाथ राखि सहलाबए लगल। पवनक हाथ सावित्रीक देह पर पड़ैैत सावित्री पवनक मोनक भाव बुझि गेल आ ओ बाजल ‘पवन हम सोचने छली कि लाँज मतलब विदेश मे कामकाज करएवाला सभक फोटो रहैत होतैक आ कोना कोना विदेश मे जा कऽ लोक रहैत अछि । काम करैत अछि ओ सभ देखबैत छैक । मुदा अहाँ तऽ......’ पवन सावित्रीकेँ आओर नजदीक बैसिकऽ अपन हाथ आगाँ बढ़बैत अछि कि अनायासे देह पर हाथ पड़ला सँ सावित्री चिहुकि उठल आ पवन सँ फेर सँ कहैत अछि, ‘अहाँ की कऽ रहल छी ।’ सावित्री देह पर सँ पवनक हाथ हटबैत कहैत अछि ‘चलू लाँज देखि लेलहुँ । ’ सावित्रीके वियाह रंजनसँ भेल छल । दुनू गोटेमे बड प्रेम छल । ओकर प्रेमक चर्चा भरि गाम छल । दुनू गोटेक सुमधुर प्रेममे दू वर्ष कोना बीत गेल पतो नहि चलल । दू वर्षक क्रममे एकटा लडका भेल । बड स्नेह सँ ओकर नाम राजा रखलक । मुदा हुनकर स्वस्थ्य कहियो नीक नहि रहए । ओ चाहैत छल राजा पढिके बडका लोक बनैक । मुदा एहिके लेल बहुत पैसाके आवश्यकता अछि । रंजन गरीब तऽ अवश्य छल मुदा सावित्रीक प्रेम आ सहयोग पाबि कऽ कहियो अपने आपकेँ अभाव महसुस नहि कऽ रहल छल। एक कट्ठा घरारी आ पाँच कट्टा खेत अछि रंजनकेँ। माय—बाबु आ तीन व्यक्ति अपने लगा कऽ पाँच गोटेक परिवार अछि। दिन बितैत गेल आ परिवारिक भार सेहो बढैत गेल। एगो कमाइबला आ पाँच गोटे खाएबला। पैसाक अभाव स्वभाविक अछि। राजाक पढाइ सेहो। जेकरा सँ कर्जा लेने रहैक ओ सभ किछु दिनक बाद सेहो तङ्ग करए लागल। एक दिन तङ्ग भऽ कऽ सावित्री बाजल, ‘इहा रहला सँ कर्जा नहि सधत। बौआक पढाइक कर्जा आ पछिला किछु कर्जा सेहो अछि। बुझाइए घर पर रहला सँ कर्जा सभ नहि सधत। एक बेर अहुँ विदेश जा कऽ देखतहुँ।’ सावित्री उदास भऽ बाजल ‘कर्जा सेहो सधि जाएत आ राजुक पढाइ लिखाइ कऽ लेल....।’ ‘माय—बाबु आ अहाँकेँ छोडि कऽ हमरा कनिको विदेश जएबाक मोन नहि होइए। सुनैत छिऐ विदेशमे सेहो अब बड ठगी होइत अछि । फेर राजा सेहो छोट अछि । ताहुमे उ सभ दिन बिमारे रहैत अछि। तेएँ....।’ ‘जाइ देबक मन ककरो थोरही होइत अछि। मुदा हारने करब की? अपन सभ सम्पति बेचिओ देब तऽ कर्जा नहि सधत आ एता रहला सँ दिन-प्रतिदिन कर्जा बढिते जाएत। दू—तीन सालके तऽ बात अछि । फेर सुखे—सुख रहत। देखियो ने भण्डारीकेँ सेहो अपने जेकाँ हाल रहैक। मुदा विदेश जाइते ओकर सभ दुःख दूर भऽ गेलैए। पक्काक कोठा सेहो बना लेलक आ अपन बच्चा सभकेँ बोर्डिङ्ग स्कूल मे पढबैत अछि’ सावित्री बाजल। ‘लेकिन अहाँ बिना एक दू वर्ष की, एको दिन मुस्किल अछि.।’ ‘सुखे कोइ थोरही नहि जाइत अछि । भगवाने हमरा सभक एहन कऽ देलक तँ की करबै....।’ सावित्री रंजनकेँ समझाबके प्रयास कऽ रहल छल । ‘सएह तँ अहुँकेँ बात साँचे अछि । मुदा जाएबाक लेल तऽ कम्तिमे एक लाख रुपैया चाही ।’ ‘ओकर चिन्ता नहि करु अहाँ । विदेश जाएवालाके नाम पर जतेक रुपैया चाही ओतेक गाम मे भेट जाइत अछि ।’ किछु दिनक बाद रंजन पासपोर्ट बना विदेश चलि गेल । रंजनकेँ विदेशमे काम बढिए भेट गेल। महिनाक बीस पच्चीस हजार खाए पी कऽ बचा लैत अछि। दू वर्ष बितलो नहि छल कि ओ सभ कर्जा सधा लेलक। कर्जा सधिते रंजनकेँ बडका होबएके सपना बढैत गेल। राजा केँ सेहो जनकपुरक एकटा बोर्डिङ्ग स्कूलमे नाम लिखबा देबक लेल कहि देलक। राजा आब जनकपुरक हॉस्टलमे रहि कऽ पढय लागल। रंजन आब घर बनएबाक लेल सोचए लागल। जहिना अपन पत्नी सावित्रीसँ प्रेम छल आब रंजनके कतारमे रुपैया सँ प्रेम भऽ गेल। दू वर्ष बीतल की ओ फेरसँ दू वर्षक लेल पासपोर्टमे समए बढा लेलक। सावित्री आब असगरे भऽ गेल। राजा छलैक तऽ ओकरो संग समय कटि जाइत छल। बुढ साउस—सासुर बेसी समय खेतक कामकाज मे लागल रहैत अछि । ओना तऽ सावित्री समय काटय लेल घरमे टिवी, भिसीडी सेहो लगा लेलक। एक दिन सावित्री माछ लाबए धनौजी बजार गेल। ओतहि बजारमे सावित्रीक नैहरकेँ सहेली गीतासँ भेट भऽ गेल। दुनू गोटे घरक बातचित बतिआए लागल। बातचित करैत—करैत कोना साँझ भऽ गेल पतो नहि चलल। किछुए देर बाद पश्चिम दिससँ अन्हर तुफान जेकाँ बादल गरजए लागल। देखिते—देखिते टिपटिप कऽ पानी पडए लागल। एकाएक सावित्रीकेँ घरक याद आएल आ ओ बाजल ‘गे देखही पानिओ पड़ए लगलै? कतेक दिनक बाद भेटलेहे सेहो बतियाइ के समयो नहि छै। जो दोसर दिन बतिआएब। ’ कहि कऽ दुनू गोटे दू दिस चलि गेल। सावित्री जोर सँ झटकारैत घर दिस जाए लागल। जखने ओ बजार सँ निकलि कऽ चोउरीक गाछ लग पहुँचल की अन्हर—तुफान संगहि पानी जोर—जोरसँ पडैय शुरु कऽ देलक । एक तऽ अन्हार रहैक दोसर मे पानिके संगहि अन्हर बिहारि। एहन मे सावित्रीकेँ आगाँ बढएके हिम्मत नहि भऽ रहल छल आ ओ एगो गाछ लग जा कऽ ठाढ भऽ गेल। सावित्री असगरे गाछ लग डराएल जेकाँ ठाढ छल। अन्हर बिहारि गाछकेँ उखारि फेक देत जेना लागि रहल। गाछ छोडिके जाएके विचार होइक तऽ बुझाए हावा उड़ाके लऽ जाएत। गाछक जड़िमे सावित्री चुपचाप बैसि गेल । किछुए देरक बाद जखन अन्हर तुफान रुकल तऽ सावित्री ठाढ़ भऽ जाएके सोचि रहल छल कि बाजार दिससँ एगो साइकिलबला आबि सावित्रीकेँ मुँहपर टर्च बारलक। टर्चक छर्ररा देखिकऽ सावित्री डर सँ थरथर कपए लागल । सावित्री केँ जेना लागि रहल छल आइ हम बाँचि कऽ घर नहि जा सकब। ओ अपन चेहरा केँ छुपाबए के कोशिशमे लागि गेल। ‘अहाँ के छी। अकेले इहा की कऽ रहल छी ।’ साइकिलबला बाजल। सावित्री मर्दक आवाज सुनिकऽ आओर भयभीत भऽ गेल आ थरथराइत बाजल ‘हम एतही.., लखौरी ....जाएब । बजार आएल छलहुँ । पानी घेर लेलक तँ....’ साइकिलबला सावित्रीक नजदीक पहुँचकऽ—‘चलु हम अहाँकऽ घर धरि छोड़ि दैत छी। अहाँक गामसँ आगाँ हमरे गाम अछि औरही।’ ‘नहि ई जाथुन, हम चलि जाएब।’ सावित्री हिम्मत कऽ कऽ बाजल। ‘डराउ नहि, हम अहींके पड़ोसी छी। किछु नहि हएत।’ साइकिलबला आग्रह स्वरमे बाजल। दुनू गोटेक गाम जाएबला एकेटा रास्ता भेलाक कारण सावित्री संगहि जएबाक लेल तैयार भऽ गेल। साइकिलबला आगाँ आगाँ टर्च बारि रहल छल आ सावित्री साइकल केँ पकड़ने पाछु पाछु जाए लागल। बाटमे अबैत काल दुनू गोटेकेँ परिचय सेहो भेल । दुनू गोटे धराशयी बातसभ बतियात—बतियात गाम पहुँच गेल । ‘एतेक बतिया लेलहँु आ नामो नहि जनलहुँ, की नाम अछि’ साइकिलबला पुछलक- ‘सावित्री’ ‘अहाँक’ सावित्री हँसैत बाजल ‘पवन’ ‘जखन पड़ोसी छी तऽ चलु ने घरो दुआर तँ देखि लेब ।’ सावित्री डराइते बाजल । ‘आइ नहि फेर दोसर दिन । ओना हमर गामक चउरी आ अहाँक गामक चउरी एके छैक। काल्हि खेत पर अएबाक सेहो छैक। हमहुँ विदेशे छलहुँ। दू महिना भेल एतए आएला,’ पवन बाजल । ‘एखन जाइ दिअ, बड अन्हार लगैत छैक,’ पवन मुस्कैत चलि गेल। सावित्री किछु क्षण पवनकेँ ओहिना देखैत रहि गेल। जखन पवन ओकरा सँ परोछ भऽ गेल तखन ओकर ध्यान टुटल आ घरक कामकाजमे लागि गेल। खाना बनबैत कालमे सावित्रीकेँ अपने आप हँस्सी सेहो अबैत रहए । जखन ओ सुतल छल तऽ सोचाए लागल ‘पवन नीक व्यक्ति अछि। अगर ओ नीक नहि रहितैक तऽ बाटमे हमरा किछुओ कऽ सकैत छल। बातो बड नीक—नीक करैत अछि। लोक सभ कहैत अछि मर्द महिलाकेँ देखिकऽ हैवान भऽ जाइत अछि, मुदा सएह तँ पवन मे नहि देखलहुँ।’ सावित्री फेर सँ अपन कपाड़ झटैत ‘हुँ... ओकरा सँ हमरा कि लिअ दिअ के। जतह के छलैक ओतह चलि गेलैक।’ कपारकेँ ठोकैत ‘हमर दिमागे जे अछि नहि बिना कामकेँ सोचए लगैत अछि ।’ किछु देर बाद फेरसँ रंजन दिस ध्यान लगबैत सुति रहल । सावित्री भोर होइते खेत पर पहुँच गेल छल । ओ चारु दिस चकुआए लागल । कतौ केकरो नहि देखि रहल छल । जेना लागि रहल छल ओ केकरो खोजि रहल हुअए आ ओ व्यक्ति नहि भेटला पर उदास भऽ गेल हुअए । किछु देरक बाद सावित्री उदास भऽ घर दिस जऽ रहल छल कि पवन केँ अपन जनकेँ हल्ला करैत अवाज सुनिकऽ सावित्री रुकि गेल। जखन पवन नजदीक आएल तऽ सावित्री बाजल ‘अहुँकेँ खेत एम्हरे छैक नहि ।’ ‘हँ....इहे खेत अछि’ इशारा करैत पवन बाजल । सावित्री किछु देर रुकल आ फेरसँ घर चलि गेल । सावित्रीकेँ गेलाक बाद पवनक हृदय जोर-जोरसँ धडकए लागल। ओ सोचए लागल किछु देर आओर रुकतैक तँ की भऽ जएतै। कतेक मीठ बजैत अछि सावित्री। बुझाइए बात करिते रहती। ठाढ भऽ सोचए लागल कोनो बहन्ने सावित्रीसँ भेटबाक लेल उपाय सोचए पडत । एकदिन फेरसँ पवन बाजर दिस जा रहल छल कि ओ घर दिस रुकिकऽ इम्हर ओम्हर ताकए लागल कि देखलक सावित्री कल सँ पानी भरि रहल अछि । पवनकेँ देखिकऽ सावित्री घर दिस जाए लागल कि पवन बाजल, ‘बौआक समाचार सभ केहन अछि। बढिया सँ तऽ पढैत अछि की नहि?’ ‘छुटीमे घर लऽ अएबै । अखन जनकपुरे अछि ।’ सावित्री बजैत घरमे घुसि गेल । एक दिन सावित्री अपन खेत लग घुमि रहल छल की धराक दऽ पवन पहुँचल आ सावित्री सँ बाजल —‘अहूँ कतेक व्यस्त रहैत छी सावित्री’ कामधाम रहितैक तब ने व्यस्त। दिनभरि तँ ओहिना घरेमे रहैत छी। सोचली कनिक खेतेमे घुमि फिर ली ।’ सावित्री बाजल । किछु देर धरि सावित्री आ पवन बीच बातचित भेल । एहि क्रममे दुनू एक दोसरसँ खोलिकऽ बाजए लागल । किछुए दिनक भेटघाट सँ पवन मनहि मन सावित्री प्रति भावुक बनि गेल । एक दिन सावित्री पुछलक —‘पवन विदेश मे केहन घर दुआर सभ होइत छैक। बडका....बडका... घर दुआर सभ होइत होतैक ने।’ ‘अपना इहा केँ जे लँज सभ होइत छैक नहि ओहने —ओहने मकान सभ विदेश मे रहैत छैक ।’ पवन बाजल । ‘आइए लँज केकरा कहैत छैक.....लँज केहन होइत छैक । अपनो सभके यहाँ लँज छैक ।’ सावित्री उत्सुकता पूर्वक बाजल । ‘जनकपुरेमे तऽ लँज छैक ..। नहि देखने छियए ..। कहियो जनकपुर जाएब तऽ देखा देब ।’ पवन कनिका स्थिरसँ बाजल । सावित्रीके लँज देखबाक इच्छा जागि गेल । ओनी पवन केँ सेहो सावित्री प्रति उत्तेजना बढैत गेल । भेटक क्रम बढैत गेल । एक दिन सावित्री केँ श्रीमान् रंजन विदेश सँ रुपैया पठोलक । जखन ई बात सावित्री पवन केँ कहलक तऽ ओ मनेमन गदगद भऽ गेल आ कहलक —‘चलु जनकपुरमे रुपैया छोडा देब आ लाँज सेहो देखा देब ।’ सात्रिवी आ पवन जनकपुर आएल । सभसँ पहिने ओ प्रभु मनि ट्रान्सफरसँ रुपैया छोडौलक आ दुनू गोटे होटल मे जाऽकऽ खाना सेहो खएलक । एकरबाद पवन बाजल —‘देखियौ एहि कोठाके भितर लँज छैक । एकरा देखएके लेल किछु रुपैया लगैत छैक । चलु आइ अहाँकेँ लँजो देखाइए दैत छी ।’ पवन सावित्री के पकडएके प्रयास कएलक । ओ अपन बातक जालमे फसाबए चाहलक। कनिक देरक लेल सावित्रीकेँ रुकि जायके मोन कएलक मुदा ओकर आगुमे रंजन आ राजाक आकृति आबि गेल ओ पवनकेँ लँजमे ठेलैत सडक पर चलि आएल । ओकरा बुझाएमे चलि आएल छल एहि ठाम रुकि गेलहुँ तऽ अनर्थ भऽ जाएत सोचैत ओ सिधे गाम चलि गेल । ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। संजीव कुमार शमा महाकवि‍ पं. लालदासक १५६म जयंती समारोह दि‍नांक २० नभम्‍वर २०१२केँ महाकवि‍ पं. लालदासक १५६म जयंती स्‍थानीय लालदास जमा दू उच्‍च वि‍द्यालयक प्रांगणमे महाकवि‍ पं. लालदास जयंती समारोह समि‍ति‍ खड़ौआ द्वारा समारोहपूर्वक मनाओल गेल। समारोहक मुख्‍य अति‍थि‍ जि‍ला उपवि‍कास आयुक्‍त श्री ओम प्रकाश राय आ समारोह समि‍ति‍क अध्‍यक्ष झारखण्‍ड वद्युत बोर्डक पूर्व चेयरमैन डाॅ. हरि‍वंश लाल संयुक्‍त रूपे वि‍द्यालय प्रांगणमे स्‍थापि‍त महाकवि‍क प्रति‍मा आ मंचपर स्‍थि‍त महाकवि‍क तैल चि‍त्रपर माल्‍यार्पण आ संगहि‍ दीप प्रजज्‍वलन कऽ समारोहक वि‍धिवत उद्घाटन केलन्‍हि‍। गामवासी कन्‍हैया कृष्‍ण कायस्‍थ स्‍वागत भाषण दैत सभ आगत अति‍थि‍गणक स्‍वागत आ सबहक प्रति‍ अपन आभार व्‍यक्‍त केलन्‍हि‍। वरि‍ष्‍ठ समाजसेवी वयोवृद्ध स्‍वतंत्रा सेनानी भरत नारायण कर्ण वि‍शि‍ष्‍ट अति‍थि‍य भाषण दैत बजलाह जे महाकवि‍ महाराज रामेश्वर सि‍ंहक दरबारमे दरबारी पंडि‍तक रूपे वि‍द्यमान छलाह। महाराज हुनक विद्वतासँ आहुत भऽ हुनका पंडि‍तक उपाधि‍सँ वि‍भूषि‍त कएने छलखि‍न्‍ह। अध्‍यक्षीय वक्‍तव्‍यमे डॉ. एच.बी.लाल मात्र दू पाँति‍ कहलन्‍हि‍ जे महाकवि‍क जयंती समारोहक जगह स्‍मृति‍ समारोह हम सभ मनाबी से नीक। आ दोसर महत्वपूर्ण इशारा केलन्‍हि‍‍ जे वास्‍तवमे हम सभ मि‍थि‍लांचलक साहि‍त्‍यि‍क मंचक गरि‍माकेँ पागक चलनि‍सँ कमजोर करै छी। पाग सम्‍पूर्ण मि‍थि‍लाक नै छी। जखने जागी तखने प्रात कहि‍ अध्‍यक्षीय भाषणमे बि‍नु पूर्ण वि‍राम लगौनहि‍ हाथ इशारासँ हि‍न्‍दीक वि‍द्वान, प्रखर वक्ता कुमार रामेश्वर लाल दासकेँ करबाक आग्रह कएल जेकरा कुमार साहेब सहर्षतापूर्वक स्‍वीकार केलन्‍हि‍। जखन कि‍ स्‍वस्‍थि‍ वाचन पं. शि‍व कुमार मि‍श्र द्वारा प्रस्‍तुत कएल गेल। मुख्‍य अति‍थि‍ डीडीसी श्री ओ.पी.राय अपन वक्तव्‍य दैत कहलन्‍हि‍ जे महाकवि‍ लालदास द्वारा मैथि‍ली भाषामे रचि‍त रचना रमेश्वर चरि‍त मि‍थि‍ला रामायणक प्रासंगि‍कता अखनो बनल अछि‍। ओ आवश्‍यकता जतौलन्‍हि‍ जे मैथि‍ली साहि‍त्‍यक धरोहरक रूपमे महाकवि‍क रचनाकेँ यथाशीघ्र प्रकाशि‍त करा पाठकगणक बीच पहुँचक चाही। अपन उद्गार व्‍यक्‍त करैत ओ ईहो कहलन्‍हि‍ जे कलाक उपयोग आत्‍मचि‍ंतनक लेल हेबाक चाही, छलबाक लेल नै। ओ वसुधैव कुटुम्‍बकमक उक्‍ति‍केँ चरि‍तार्थ करबा लेल सुधि‍ श्रोतागणसँ आग्रह केलन्‍हि‍। महाकवि‍क व्‍यक्‍ति‍व एवं कृति‍त्‍व वि‍षयपर आयोजि‍त परि‍चर्चामे साहि‍त्‍य अकादेमीक अनुवाद पुरस्‍कारसँ सम्‍मानि‍त प्रो. खुशीलाल झा जतौलनि‍ जे महाकवि‍ द्वारा रचि‍त रमेश्वर चरि‍त मि‍थि‍ला रामायणपर वाल्‍मीकि‍ रामायणक प्रभाव अछि‍। संगोष्‍ठीमे साहि‍त्‍य अकादेमी द्वारा टैगोर साहि‍त्‍य पुरस्‍कारसँ सम्‍मानि‍त मैथि‍लीक समन्‍वयवादी साहि‍त्‍यकार श्री जगदीश प्रसाद मण्‍डल अपन उद्गार व्‍यक्‍त करैत कहलन्‍हि‍ जे पं. लालदास बहुमुखी प्रति‍भाक धनी छलाह। जि‍नकर लेखनी मैथि‍ली भाषा साहि‍त्‍यकेँ अमरत्‍व प्रदान केलक अछि‍, जे आइयो डेढ़ सए बर्ख बि‍तलाक बादो एना बुझा रहल अछि‍ जे ओ अपन लेखनीक माध्‍यमे अखनो माँ-मैथि‍लीक सेवा कऽ रहला अछि‍। मण्‍डलजी ईहो इच्‍छा जतौलन्‍हि‍ जे “महाकविक साहि‍त्‍यमे आध्‍यात्‍मि‍क चि‍ंतन” वि‍षयक संगोष्‍ठी आवश्‍यक अछि‍। संग-संग धर्म, सप्रदाय एवं आध्‍यात्‍म ऐ तीनूकेँ अपना ऐठाम सानि‍-बाटि‍ कऽ देखबापर चि‍ंता व्‍यक्‍त केलनि‍। आजुक समैमे नवतुरि‍या आ बूढ़ साहि‍त्‍य प्रेमी लोकनि‍ अपन मातृभाषामे रचना कऽ अपना साहि‍त्‍यकेँ संपन्नता प्रदान कऽ रहल छथि‍। जे मैथि‍ली साहि‍त्‍य आन्‍दोलनमे मीलक पत्‍थर साबि‍त भऽ रहल अछि‍। परि‍चर्चाक क्रममे मैथि‍ली पत्रि‍का “झारखण्‍डक सनेस”क सम्‍पादक डाॅ. अशोक अवि‍चल महाकवि‍क व्‍यक्‍ति‍त्‍वपर प्रकाश दैत कहलन्‍हि‍ जे पं. लालदास दर्शनक साक्षात् प्रति‍मूर्त्ति छलाह। हि‍न्‍दी, संस्‍कृत, ऊर्दू आ फारसीक उद्भट वि‍द्वान रहि‍तो महाकवि‍ मातृभाषा मैथि‍लीमे उच्‍चकोटि‍क ग्रंथक रचना कऽ जननीक हद तक अपन करजा उतारबामे सफल भेलाह। डॉ. अवि‍चल वि‍द्यानुरागी लोकनि‍सँ आग्रह केलन्‍हि‍ जे गाम खड़ौआमे महाकवि‍क नामे एकटा प्रकोष्‍ठ बनाओल जाए जइमे यथासंभव हुनक पाण्‍डुलि‍पि‍क संग्रह होइ आ संगे हुनक प्रकाशि‍त अप्रकाशि‍त रचनाक संग्रह कएल जाए। जइसँ अबैबला पीढ़ी आ गवेषक लोकनि‍केँ ऐसँ हुनका वि‍षयमे वि‍स्‍तृत जानकारी भेट सकतन्‍हि‍। शि‍क्षावि‍द अवकाश प्राप्‍त शि‍क्षक हरि‍नारयण झा वि‍द्वातपूर्ण शैलीमे अपन वि‍चार प्रस्‍तुत करैत कहलन्‍हि‍ जे महाकवि‍ द्वारा रचि‍त रामायणमे माँ सीताक वर्णन पुष्‍कर काण्‍डमे वि‍लक्षणतापूर्वक कएल गेल अछि‍। माँ सीता शक्‍ति‍क अधि‍ष्‍ठात्री छथि‍, एकरा ओ अपना पद्यमे वर्णित कए मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीरामोकेँ मानबा लेल मजबूर कएल। श्री झा एे अवसरपर सभ गोटेसँ आग्रह केलन्‍हि‍ जे जइ धरणीपर माँ सीता अवतरि‍त भेलीह ओइ धरापर महाकवि‍क अवतरण भेल हम सभ कि‍यो बि‍ना कोनो भेदभावक माँ मैथि‍लीक धरणी धराकेँ पुष्‍पि‍त-पल्‍लवि‍त करी। यएह हमरा सबहक महाकवि‍क प्रति‍ श्रद्धांजलि‍ होएत। वि‍द्यालय समि‍ति‍क अध्‍यक्ष अनूप कश्‍यप माननीय डीडीसी साहेबकेँ वि‍द्यालयक उत्‍थान व वि‍कासक दि‍स धि‍यान आकृष्‍ट करबैत बजलाह जे वि‍द्यालयक सर्वांगीण वि‍कास भेला उत्तर ऐ क्षेत्रक धि‍या-पुतामे शि‍क्षाक संपूर्ण वि‍कास भऽ सकत जे सही अर्थमे महाकवि‍क प्रति‍ श्रद्धांजलि‍ हएत। समारोहक दोसर सत्रमे काव्‍य गोष्‍ठीक आयोजन भेल जकर अध्‍यक्षता शब्‍द-साधक श्री जगदीश प्रसाद मण्‍डल आ संचालन चर्चित उद्घोषक श्री संजीव कुमार शमा द्वारा कएल गेल। काव्‍य-गोष्‍ठीक आरम्‍भ वि‍द्यापति‍ सम्‍मानसँ सम्‍मानि‍त कवि‍ शंभु सौरभक काव्‍यसँ भेल।‍ तहि‍ना दोसर काव्‍यक पाठ मैथि‍ली प्रखर समालोचक श्री दुर्गानंद मण्‍डल केलन्‍हि‍। तकरा पछाति कवि‍गणमे श्री बेचन ठाकुर, श्री राम वि‍लास साहु, श्री लक्ष्‍मी दास, श्री उमेश नारायण कर्ण, श्री नन्‍द वि‍लास राय, श्री रामसेवक ठाकुर, श्री शशि‍कान्‍त झा, श्री हेमनारायण साहु, श्री कपि‍लेश्वर राउत, श्री शि‍वकुमार मि‍श्र अपन-अपन काव्‍य पाठसँ श्रोतावृंदकेँ काव्‍य रसमे सराबोर करैत रहलाह। जखन कि‍ डॉ. अवि‍चल अपन कवि‍ता ‘संस्‍कृति‍क साड़ापर’ सुना सामाजि‍क अपसंस्‍कृति‍सँ सजग हेबाक दि‍स इशारा केलन्‍हि‍। दोसर दि‍स युवा कवि‍ लोकनि‍मे श्री उमेश पासवान, श्री नारायण झा, श्री अखि‍लेश कुमार मण्‍डल, संतोष कुमार महतो, वि‍कास कुमार झा, ओमजी अपन-अपन नूतन काव्‍यसँ दस्‍तक देलन्‍हि‍। युवा संघर्षशील कवि‍ उमेश मण्‍डल अपन गजल सुना श्रोतागणसँ वाहवाही लुटलन्‍हि‍। काव्‍य गोष्‍ठीक समापन अध्‍यक्ष श्री जगदीश प्रसाद मण्‍डलक काव्‍यसँ भेल। काव्‍यक शीर्षक छल ‘चल रे जीवन चलि‍ते चल’ काव्‍यक माध्‍यमसँ श्री मण्‍डल श्रोतावृंदकेँ काव्‍यमे दर्शनक दरसन करा काव्‍यक गंभीरतासँ परि‍चय करौलन्‍हि‍। संपूर्ण काव्‍य गोष्‍ठीमे काव्‍य-समीक्षकक नाते मैथि‍ली साहि‍त्‍यक स्‍तंभकार डाॅ. अशोक अवि‍चल अपन प्रखर वुद्धि‍मताक प्रतापें कवि‍ लोकनि‍क काव्‍यक समीक्षा कऽ कवि‍ आ श्रोतागणकेँ काव्‍यक मर्मसँ परि‍चए करोओल आ शुभकामनाक संग जोश बढ़बैत रहला। कवि‍ गोष्‍ठीमे काव्‍य-समीक्षा एकटा नव प्रयोग भेल। जकर श्रेय श्री संजीव कुमार शमाकेँ जाइ छन्‍हि‍। संपूर्ण कार्यक्रमकेँ उद्घोषक संजीव शमा द्वारा सजाओल गेल छल। अपन वि‍द्वतापूर्ण शैली आ वाक्-चातुर्यसँ उपस्‍थि‍त श्रोतावृंदकेँ आह-एवं-वाहक लेल मजबूर कएल। माधुर्य ग्राह्य भाषा शैलीक कारणें सुधि‍ श्रोताक मानस पटलपर छाएल रहला। मंचस्‍थ अति‍थि‍, कवि‍, समीक्षक, वक्‍ता इत्‍यादि‍ जेतेक साहि‍त्‍यानुरागी छलाह सभकेँ समारोह समि‍ति‍ पूष्‍पमाल एवं चादरि अर्पित कए सम्‍मानि‍त कऽ अपनाकेँ गौरव महशूस केलक। मि‍थि‍ला मैथि‍ली मंचक स्‍थापि‍त कलाकार रामसेवक ठाकुर पंकज झा आ चंदन द्वारा सांस्‍कृति‍क कार्यक्रमक प्रस्‍तुति‍ सराहनीय छल। समारोहकेँ सफल बनेबामे आयोजन समि‍ति‍क सदस्‍य सुनील कुमार दास, डॉ. अरवि‍न्‍द लाल, ि‍नर्मल कुमार दास, वि‍नय कुमार दास, योगानंद लाल दास, प्रभात कुमार दास, राजेन्‍द्र कुमार दास, आ अजय कुमार दासक भूमि‍का महत्तपूर्ण छल। अंतमे जयंती समारोह समि‍ति‍क सचि‍व श्री भागीरथ लाल दास धन्‍यवाद ज्ञापन करैत जंतव्‍य देलन्‍हि‍ जे आगू साल वि‍द्यालयक स्‍वर्ण जयंतीक अवसरपर कार्यक्रम दू-दि‍ना हएत, जकर हकार उपस्‍थि‍त सभ सुधि‍ श्रोतागणकेँ मंचसँ देल गेल। ऐ अवसर पर पछि‍ले बर्ख जकाँ अहू साल वि‍देह मैथि‍ली पोथी प्रदर्शनीक भव्‍य प्रदर्शन सेहो छल। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। सन्दीप कुमार साफी, जन्म ७ जून १९८४ पिता श्री सीताराम साफी, माता- श्रीमती सीता देवी, गाम- मेंहथ, भाया- झंझारपुर, जिला- मधुबनी। शिक्षा- बी.ए. (प्रतिष्ठा), मैथिली। (मैथिलीमे दलित आत्मकथाक सर्वथा अभाव रहल अछि। सन्दीप कुमार साफीक आत्मकथा मैथिली आ मिथिलाक साहित्य, समाज आ संस्कृतिकेँ हिलोरैत ओइ अभावक पूर्ति करैत अछि।– सम्पादक, विदेह) आत्मकथा जीवन एगो संघर्ष होइत अछि, संघर्षमय होइत अछि। ऐ संघर्षमे कियो-कियो आगू निकलि जाइत अछि तँ कियो अप्पन जीवनमे बहुत पाछू छूटि जाइत अछि। ओही संघर्षमय दुनियाँमे एगो हम छी, जिनकर नाम अछि संदीप साफी माने किरण। स्कूलमे सन्दीप नामसँ चिन्हल जाइबला अओर गाममे सभ किरण नामसँ पहचानैए। ग्राम+पोस्ट मेंहथ, भाया- झंहझारपुर, जिला- मधुबनीक रहनिहार हमर जन्म निर्धन गरीब परिवारमे भेल। हम जातिक धोबी छी, हरिजन (दलित) छी। गाममे सभ क’ कपड़ा धो क’ माँ-बाबू हमरा सभक पालन-पोषण केने अछि। हम चारि भाइ-बहीन छी, जइमे हम सभसँ बड़का छी, तइसँ छोट हमर भाइ-बहीन सभ अछि। हमर जन्म 07.06.1984 ई. मे भेल। ओइ जमानामे सस्ता सभ किछु, तैयो हमरा सबहक भरन-पोषण झूर-झूरइतो चलए। अ-आ सँ कबीर कान तक हम सभ दुखीरामसँ पढ्लौं। किछु दिन बाद बाबूजी सरकारी स्कूलमे नाम लिखा देलक। सरकारी स्कूलमे पढ़ाइ चलै तँ ठीके-ठाक मुदा हम सभ ओतेक किछु बुझि नै पबिऐ। ओहेन गारजनो होसगर नै जे देखबितए जे की लिखलएँ, की सिखलएँ। मुदा धीरे-धीरे आगू बढ़लौं। छोटमे माए एकटा बकरी किनलक जे ओकरोसँ किछु रुपैया आमदनी हएत तँ कहुना गुजर-बसर हएत। थोड़ेक दिन बकरी सेहो चरेलौं अओर बकरी बेचि हमर माँ ओहीसँ एकटा बाछी लेलक जे ओइसँ दूधक आमदनी हएत आ ओइ पाइसँ अपन परिवार सुखीसँ गुजर करब। ई सभ काज करैत बाबूजी संगे लोकक ऐठाम कपड़ा पहुँचेनाइक सेहो काज करैत छलौं। पिछला पाँच दस सालमे जमाना बहुत आगू बढ़ि गेल। पहिले एते बोइन नै भेटैत छलै जेतेक अखुनका समएमे भेटैत अछि। पहिने एक मोटा कपड़ा धोइ छल हमर माँ-बाबू तँ गिरहस्त सभ पाँच सेर धान नै तँ दू किलो आँटा दैत छलै। कियो कपड़ा दुआइ तरे पाइयक आमदनी नै रहलासँ मजूरीमे दू-तीन किलो अल्लूए द’ देलक। पहिने पाइ महग छलै आ अन्न-पाइन सस्ता छलै। गाममे सबहक माय-बाबू इस्कूल भेजै मुदा हम जाइ लोकक कपड़ा पहुँचाब’, तइयो सौँझका टेममे अंगनामे बोरा बिछा क’ पढ़ैले बैसए हमर पिसियौत भाय राजू भैया, तखन हमहूँ पढ़ैले आबी तँ दू-कानसँ बीस कान तक सिखलौं। ओकरा बाद अप्पन गामक इस्कूलमे नाम लिखा देलक, हेडमास्टर छल पहिने कोइलखक यादवजी, हुनका कहि बाबू, जे एकरा कनी देखबै। किछु दिन अहिना समए कटल, चौथा-पचमामे बढ़ला बाद किताब पढ़ला किछु आबि गेल तँ गारजीयन कहलक जे चलि जा बौआ पीसा संगे, ओतै नेपालमे रहिह’। गामपर खर्चाक दिक्कत तँ हेबे करइए, से नै तँ ओतै काज-राज करिह’ अओर ओतै रहिह’। पढ़ाइ-लिखाइ आब छोड़’। पढ़ि-लिखि क’ की हेतै। 1994 ई.क समएमे हम चलि गेलौं नेपाल। ओतै दीदी संगे रही, सभ दिन कपड़ा धोइ अओर संगे पहुँचाबैले जाइ। अओर आबी तँ लकड़ी चुल्हापर भानस करी। भोरे तीन बजे उठी कपड़ा धोइले। ओइ समए हमर उमेर बुझू जे 11-12 क’ छलए। किछु दिन ओहू ठाम गुजारलौं। तकरा बाद हम फेर गाम एलौं। हमर बाबू कहलनि जे आब नै जा, किछु दिन पढ़’। कमसँ कम मैट्रिको तक पढ़ि लेब’ तँ कतौ ने कतौ सरकारी नोकरी भइये जेत’। हमरा जेतबे जुड़त ओतबेमे हम गुजर करब मुदा तूँ पढ़’। तकरा बाद हम कोठिया इस्कूलमे नाम लिखेलौं। ओइ ठाम छठासँ किलास चलै छलै। फेर थोड़ेक दिन गामेमे रहि क’ माल-जाल चरा क’ हाइस्कूल तक गेलौं। मुदा समए एहेन आएल जे फेर हम पढ़ाइ छोड़ि पंजाब चलि गेलौं। ओइ समएमे हम छलौं नौमामे। गेलौं ओइ बास्ते जे हमरासँ छोट बहीन छल, घरक गारजन कहलक जे बौआ गाममे रहलासँ आब किछु नै हेतौ, से नै तँ चलि जा लोक सभ संगे बड़का कक्का लग चण्डीगढ़। कतौ नोकरी धरा देत’, कइहक हमर नाम जे बाबू कहलक य’। हमर कक्का बित्तन साफी जे बी.ए.क डिग्री प्राप्त केने छलए, वएह सोचि हमर बाबू हुनका लगमे पठौलनि जे ओकरा कनीक बुइध चै, कतौ नीक नीक नोकरी पकड़ा देतै। मुदा हमरा लगमे कोनो सर्टिफिकेट नै रहए, से हमरा कतौ छोटो-मोटो काजपर नै राखए। कोनो औफिसोमे नै राखए जे ई तँ पढ़ल लिखल नै अछि, सभ दफतरमे से कहए। आखिरीमे काका एगो प्रेस आइरनक दोकान क’ कहलक, एतै आइरन कर। नया आइरनक दोकान, कोइ ग्राहक आबै, कियो नै आबै। एक-दू महिनाक बाद काका हमरापर शक करए लागल जे ई पाइ कमाइ अइ मुदा हमरा नै दइए। हमरा मनमे बहुत दुख हुअए जे हम कत’ आबि गेलौँ, खेनाइ खाइ ल’ जाइ तँ कहए जे दोकानक भाड़ा आब तोरे भर’ पड़त’ चाहे दोकान चल’ या नै चल’। ई सभ सुनि मन व्याकुल भेल जे आब ऐठाम हमरा रहलासँ कोनो फाएदा नै हएत। आब एत’सँ जाइए पड़त। ओही ठाम गामक कतेक लोक रहै छल, तेकरा कहि-सुनि हम कोठीमे काज करए लगलौं। एक महिना भेल तँ गाम जाइ क’ भाड़ा भ’ गेल। एलौं काका लगमे जे हम गाम जा रहल छी। तँ काका कहलक, रुकि जा, हम टिकट बना दै छिअ। एक दू दिन रुकि जा। गामक लोक जाइत छै, तेकरा संगे हम गाम पठा देब’। तइ बिच हमरा संग एहो घटना भ’ गेल जे हमरा पएरमे आइग लागि गेल। हमरा पूरा पएरमे पएरसँ एड़ीसँ जांघ तक झड़कि गेल। आब हम बड़का समस्यामे फँसि गेलौं। उ घाव हमरा तीन महिना तक घिघरी कटेलक। असगरे साइकिलसँ एक पएरे पाइडिल मारि क’ ऊँच-नीच रस्तापर सँ जाइ छलौं दवाइ कराबैले चण्डीगढ़ शहरसँ दूर छै गाम धनास, ओइठाम। कम पाइमे डाक्टर दवाइ दै छलै। सप्तामे तीन बेर जाइ छलौं दवाइ कराबैले। जेहो रुपैया कोठीसँ कमा क’ अनने छलौं सभ पाइ कक्काकेँ द’ देलौं। एकर समाचार जखन हमर माँ आ बाबूकेँ पहुँचल तँ बहुत कानल जे कोहुना बौआ केकरोसँ पाइ ल’ क’ तूँ गाम आबि जो। ओही ठाम छै बुधन अओर कोरैला, तेकरासँ पाइ ल’ क’ गाम चल्इ आ। हम गामेपर ओकरा पाइ द’ देबै। ओही समएमे हमर बोर्ड परीक्षाक फॉर्म भराइ छलए, यएह कातिक अगहन महिनामे हमरा केकरो द्वारा चिट्ठी समाद आएल जे जल्दी गाम आब’ जे किछु दिन पइढ़ो लेब’ अओर घाव से छुटि जेत’। हमर फॉर्म हमर संगी मनोज पासवान सभ भरि देल। किछु बुझल ने सुझल, ने गणितक ज्ञान ने संस्कृतक ज्ञान। तैयो परीक्षा मधुबनीमे वाटसन स्कूलमे भेल सन 2000 ई. मे जखन दू महिना बाद रिजल्ट निकलल तखन मनमे जएह धुकधुकी छल सएह भेल। हम परीक्षा पास नै क’ पेलौं। आब तँ अओर मोन दुखी भ’ गेल जे आब की कएल जाए। तकरा बाद कोइ ने कोइ कहलक जे संस्कृत बोर्ड सँ परीक्षा दहक। एक बेर बाबू तँ हमर मानलक मुदा माँ कहलक जे आब सभ पढ़ाइ-लिखाइ चलि जा ममियौत भाए संगे बंगलोर। हम फेर बंगलोर चलि एलौं। ऐठाम काज भेटल खानाक केटरिंगमे, कुक सबहक कपड़ा धोइ क’ काज भेटल। किछु दिन बाद गामपर सँ हमर विवाहक बातचीतक समाचार आएल जे तूँ गाम आब’। फरबरी-मार्चमे हम गाम गेलौं। बाबूजीकेँ कहलियनि जे विवाहमे जे दहेज देत’ ओइ दहेजसँ अओर एक सालमे किछु रुपैया अओर लगा क’ बहिनक कन्यादान सेहो क’ लेब। किछु भाड़ा-बर्तन अओर ओइमे लगा देबै। ई सभ मजबूरी देख हमर विवाह 2002 मे भेल, पण्डौल गाममे, जइ गामक पड़ोसमे कनी हटि क’ अछि भवानीपुर गाम, जइ ठाम महादेव उगना रूप धारण क’ विद्यापतिकेँ दर्शन देने छलनि जे अखन मिथिलामे सुप्रसिद्ध अछि, कवि विद्यापति अओर उगना महादेव। हमर विवाहक पश्चात एक बेर फेर हम संस्कृत बोर्डसँ परीक्षा देलौं, अओर ओइमे हम द्वितीय श्रेणीसँ उत्तीर्ण भेलौं। हम ई परीक्षा केथाही-रामपट्टी स्कूलसँ देने छलौं 2005 मे। तेकरा बाद पुनः हम अपने गाम लगमे कॉलेज छल शिवनन्दन-नन्दकिशोर महाविद्यालय, भैरवस्थान ओइमे एडमिशन करा क’ आइ.ए. मे हम फेर आबि गेलौं बेंगलोर। तकरा बाद ओइ केटरिंगमे आदमी बढ़ि गेलासँ हमरा ओइठाम काज नै भेटल तँ हम फेर एतौ एकटा कोठीमे काज पकड़लौं अओर गाम आबि क’ इण्टरमीडिएट परीक्षामे फेर शामिल भ’ गेलौं आ अहूमे सेकेण्ड डिवीजनसँ पास भेलौं, कोठीएमे समए बचए तँ पढ़बो करी, किताब गामसँ ल’ क’ जाइ छलौं। संग-संग बहिनक कन्यादान सेहो भ’ गेल भगवतीक दयासँ। ओही विवाहमे किछु खर्चा आ कर्जा भ’ गेल बेसी। कोठीमे दू हजार रुपैया दिअए महिना, ओइमे घरक खर्चा अओर ओम्हर अपन पढ़ाइक परीक्षा फीस, पलसमे परिवारक सेहो खर्चा। फेर बी.ए. मे नाम लिखेलौं अओर फेर चलि गेलौं बंगलौर। हमर विषय छल आर्ट जे कोनो ट्यूशन बिना पढ़ि सकै छलौं। हमरा इण्टरमीडिएटमे हिन्दी विषयमे ज्यादा अंक आएल छल मुदा अपने नै रही गाममे तँ हमर संगी छल राकेश कुमार ठाकुर, लगैमे हजाम, वएह छल हमर फॉर्म भरनिहार, परीक्षा शुल्क जमा केनिहार, हुनका मैथिलीमे ज्यादा अंक एलै, ओइ वास्ते हमरो उ यएह ऑनर्स विषय रखबा देलक। गाम एलौं तँ मन किछु पछताइतो छल जे आबक जमानामे आर्ट क’ पढ़ाइ कियो पढ़ै छै, मुदा  मैथिलीक जखन नाम सुनलिऐ तखन मन गदगद भ’ गेल। हँ, मुदा किताब भेटल बहुत मेहनति क’ कए। हर साल पाँच सएमे किताब खरीद’ पड़ए, ओहूमे जेरोक्स पन्ना। तेकरा पढ़ि क’ हम बी.ए. फर्स्ट क्लाससँ 2011 ई. मे पास केलौं ललित नारायण मिथिला यूनिवर्सिटा, कामेश्वर नगर दरभंगासँ। ता’त हमरा बालो बच्चा भेल। पढ़ाइ संग-संग एकरो सबहक देख-रेख केनाइ माय-बापक दायित्व होइ छै। तखन हम फेर गामसँ बेंगलोर आबि गेलौं। कतेक बेर पैराशुट रेजीमेंटमे बेंगलोरमे भर्तीमे बहालीमे गेलौं मुदा असफल रहलौं। ऐबेर गाममे एस.टी.ई.टी.बला परीक्षामे सेहो शामिल भेलौं मुदा उहो असफल रहल। आबि गेलौं बेंगलोर जे आब ओतेक कोनो नीक एजुकेशनो नै अछि जे कतौ नोकरी हएत, तैयो कोनो काजमे लागल छी। भगवतीक दया, आगू हुनका हाथमे छनि। हमरा दूटा बेटा अछि अओर एकटा बेटी, बड्क्ष अछि राजकुमार साफी, छोट बेटा सागर कुमार साफी। तइसँ छोट अछि राज नन्दनी कुमारी। अखन ई सभ आंगनवाड़ी स्कूलमे पढ़ि रहल अछि। ओतेक पाइ अछि नै जे प्राइवेट स्कूलमे धीया-पुताकेँ पढ़ाएब, दिनोदिन महगाइ बढ़ले जाइत अछि। हम सभ बी.पी.एल. कोटिमे शामिल छी। धीरे-धीरे एतबो शिक्षा भेलाक बादो कोनो नोकरी नै भेटैए। लोक कहै छलए जे एतेक पढ़निहार बड़का अफसर होइत अछि मुदा हम सभ किछु नै क’ पाबि रहल छी। हमरा संगीतसँ बेसी मिलान रहैत अछि। गीत गेनाइ हमरा बहुत नीक लगैत अछि। मैथिली होइ बा नेपाली बा हिन्दी, हम ओहू गीतकेँ गाबि सकै छी। कीर्तन-भजन केलौं अपने गामघरपर संगी-साथी संग। जीवन एगो घड़ीक सुइया होइत अछि, दिन भरि, राति भरि चलिते रहैए, कखनी बन्द भ’ जाएत किनको नै थाह अछि। हम अप्पन ऐ मैथिलीक माटि-पानिसँ जुड़ल हरएक बातक सम्मान करब। अप्पन भाषाकेँ ऊँच शिखरपर पहुँचेबाक प्रयास करब। हम मैथिल छी, मिथिलेमे रहब अओर पोरो साग तोड़ि क’ गुजर करब। सादा छी सादा रहब। जय मिथिला, जय मिथिला धाम, प्रणाम। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। उमेश मण्डल दोसर चरणक पहिल सगर राति दीप जरय दरभंगामे सम्पन्न- डिजिटल फॉर्ममे ३७ टा पोथीक लोकार्पण पूर्वपीठिका: -"सगर राति दीप जरय"क दोसर फेज (चरण)क पहिल सगर राति दीप जरय ०१ दिसम्बर २०१२ शनि दिन सन्ध्याकेँ केँ दरभंगामे -आयोजक छथि श्री अरविन्द ठाकुर --"सगर राति दीप जरय"क पहिल चरणमे बहुत रास घुसपैठिया घुसि गेल रहथि आ ई अपन मूल उद्देश्यसँ दूर भऽ गेल छल। -लोक भरि राति सुतैत रहथि, जातिवादिताक स्वर सोझाँ आबि गेल छल, लॉबी बना कऽ होइत समीक्षा आ ब्राह्मणवादी-आमंत्रण धरि गप पहुँचि गेल छल। साहित्य अकादेमीक हस्तक्षेपसँ मामला आर गरबड़ा गेल। ७५म सगर राति दीप जरयमे पटनामे किछु गोटे द्वारा शराब पीलापर धनाकर ठाकुर विरोध सेहो प्रकट केलन्हि। तकर बाद ओहीमेसँ किछु गोटे ऐ गोष्ठीकेँ दिल्ली लऽ गेला, मुदा विभिन्न कारणसँ आ साहित्य अकादेमीक दवाबपर मैथिली पोथी प्रदर्शनी नै लगाओल जा सकल, कारण आयोजक तकर अनुमति नै देलन्हि, ऐ साहित्य अकादेमीक कथा गोष्ठीकेँ ७६म -"सगर राति दीप जरय"क मान्यता नै देल जा सकल (ओना किछु ब्राह्मणवादी कथाकार आ घुसपैठिया लोकनि एकरा ७६म सगर राति दीप जरय कहि रहल छथि!!) । ७६म -"सगर राति दीप जरय"क आयोजन विभा रानी द्वारा चेन्नैमे भेल जतए मात्र एकटा कथाकार पहुँचला। कियो माला नै उठेलनि आ सगर राति दीप जरयक पहिल चरणक दुखद अन्त भऽ गेल। --"सगर राति दीप जरय"केँ फेरसँ जियेबाक प्रयत्नक स्वागत कएल जा रहल अछि। "सगर राति दीप जरय"क दोसर फेज (चरण)क पहिल सगर राति दीप जरय ०१ दिसम्बर २०१२ केँ "किरण जयन्ती"क अवसरपर आयोजित भऽ रहल अछि। आशा अछि जे ई नव "सगर राति दीप जरय"क दोसर फेज (चरण)क पहिल सगर राति दीप जरय पुनः अपन ओइ पथपर आगाँ बढ़त, जे प्रभास कु. चौधरी ऐ लेल सोचने छला। सगर राति‍ दीप जरय- कि‍रण जयन्‍ती केर अवसरपर दि‍नांक १ दि‍सम्‍बरक साँझ ६ बजेसँ भि‍नसर ६ बजे धरि‍ दरभंगाक कटहलवाड़ी स्‍थि‍त एम.एम.टी.एम महावि‍द्यालयक प्रेक्षागारमे सगर राति‍ दीप जरय-कथा गोष्‍ठीक आयोजन अरवि‍न्‍द ठाकुर जीक संयोजकत्‍वमे भेल। ऐ गोष्‍ठीक उद्घाटन डी.आइ.जी. राकेश कुमार मि‍श्र दीप प्रज्‍वलि‍त कऽ केलनि‍। डॉ. भीम नाथ झाक अध्‍यक्षता एवं अजीत आजाद जीक संचालनमे ऐ भरि‍ राति‍क कार्यक्रमकेँ तीन सत्रमे बाँटि‍ आगू बढ़ाओल गेल। पहि‍ल सत्र छलै उद्घाटनक दोसर  लोकार्पण आ तेसर कथा वाचन सह समीक्षाक। मध्‍यांतर सेहो भेल जइमे नीक भोजनक आ लगभग दससँ बीस मि‍नट धरि‍क आरामाक बेवस्‍था छल। अहाँकि‍ ई बेवस्‍था गोष्‍ठीमे आनायास भेलै, भेलै ई जे भोजनक प्रवन्‍ध साकट लेल अलग। जइसँ दू तोजीमे भोजन कराओल गेलै। जइमे समए लागल। आ एकटा आर महत्‍वपूर्ण बात ई जे मंच संचालक अजीत आजादजी स्‍वयं दुनू सत्रक भोजनमे टहलि‍-टहलि‍ भोजन करबेलखि‍न। अर्थात् पहि‍ल तोजीमे भोजन केनि‍हार कथाकारकेँ लगभग बीस मि‍नट सुतैक अवसर भेट गेलैक। सत्रक आरम्‍भ श्री जगदीश प्रसाद मण्‍डल लि‍खि‍त एगारह गोट पोथीक लोकार्पण जे पी.डी.एफ फाइलमे सी.डी.क रूपमे भेल जेकर वि‍वरण एना अछि‍- गीतांजलि‍ (गीत संग्रह), इन्‍द्रधनुषी अकास (कवि‍ता संग्रह), तीन जेठ एगारहम माघ (गीत संग्रह), राति‍-दि‍न (कवि‍ता संग्रह), अर्द्धांगि‍नी.. सरोजनी.. सुभद्रा.. भाइक सि‍नेह इत्‍यादि‍ (लघुकथा संग्रह), शंभुदास (दीर्घकथा संग्रह), बजन्‍ता-बुझन्‍ता (वि‍हनि‍ कथा संग्रह), कम्‍प्रोमाइज (नाटक), झमेलि‍या बि‍आह (नाटक), पंचवटी (एकांकी संचयन) आ सतभैंया पोखरि‍ (लघुकथा संग्रह)। तकर बाद श्री गजेन्‍द्र ठाकुर लि‍खि‍ल ९ गोट पोथी लोकार्पण (सी.डी.) मे भेल। तकर सबहक वि‍वरण एना अछि‍- प्रबन्ध-निबन्ध-समालोचना भाग-१, सहस्रबाढ़नि (उपन्यास), सहस्राब्दीक चौपड़ि‍पर (पद्य संग्रह), गल्प-गुच्छ (विहनि आ लघु कथा संग्रह), संकर्षण (नाटक), त्वञ्चाहञ्च आ असञ्जाति मन (दूटा गीत प्रबन्ध), बाल मण्डली/ किशोर जगत (बाल नाटक, कथा, कविता आदि), उल्कामुख (नाटक) आ सहस्रबाढ़नि उपन्‍यासक अंग्रेजी अनुवाद The Comet नामक पोथी जेकर अनुवादक थि‍कीह श्रीमती ज्‍योि‍त सुनीत चौधरी। एही कड़ीमे ऐ  दुनू रचनाकारक अलादा वि‍देह-सदेह भाग-५सँ१० धरि‍क संकलन जे वि‍देह मैथि‍ली लघुकथा, वि‍देह मैथि‍ली नाट्य उत्‍सव, वि‍देह मैथि‍ली पद्य, वि‍देह मैथि‍ली प्रवन्‍ध-नि‍वन्‍ध, वि‍देह शि‍शु उत्‍सव आ वि‍देह मैथि‍ली वि‍हनि‍ कथाक छल। ततबे नै एगारहटा आर रचनाकारक पोथी सी.डी. रूपमे सबहक बीच आएल जइमे १. वर्णित रस- (कवि‍ता संग्रह) उमेश पासवान (औरहा, मधुबनी), २. नव अंशु- (गजल, रूवाइ आ कता संग्रह) अमीत मि‍श्र (करि‍यन, समस्‍तीपुर), ३. रथक चक्का उलटि‍ चलै बाट- (कवि‍ता संग्रह) राम ि‍वलास साहु (लक्ष्‍मि‍नि‍या, मधुबनी), ४. कि‍यो बूझि‍ ने सकल हमरा- (गजल, रूवाइ आ कता संग्रह) ओम प्रकाश झा (भागलपुर), ५. बाप भेल पि‍त्ती आ अधि‍कार- (नाटक) बेचन ठाकुर (चनौरागंज, मधुबनी), ६. हम पुछैत छी- (साक्षात्‍कार) मनोज कुमार कर्ण, मुन्नाजी (रूपौली, मधुबनी), ७. हमरा बि‍नु जगत सुन्ना छै- (गीत-झारू संग्रह) रामदेव प्रसाद मण्‍डल ‘झारूदार’ (ररूआर, सुपौल), ८. क्षणप्रभा- (कवि‍ता संग्रह) शि‍व कुमार झा ‘टि‍ल्‍लू’ (करि‍यन, समस्‍तीपुर), ९. हमर टोल- (उपन्‍यास) राजदेव मण्‍डल (मुसहरनि‍याँ, मधुबनी), १०. मोनक बात- (गजल, रूवाइ आ कता संग्रह) चंदन झाक आ ११म नीतू कुमारीक मैथि‍ली चि‍त्र कथा, ऐ तरहेँ ऐ गोष्‍ठीमे, कुल्‍लम 37टा पोथी लोकार्पित भेल। कथा पाठ आ तइपर समीक्षकक टीप्‍पणी ऐ गोष्‍ठीक वैशि‍ष्‍टय अछि‍। पहि‍ल पालीमे श्रीमती वीणा ठाकुर, आशा मि‍श्र, ज्‍योत्‍सना चन्‍द्रम, श्‍याम भाष्‍करक लघुकथा आ उमेश मण्‍डलक वि‍हनि‍ कथाक पाठ भेल। समीक्षीय टीप्‍पणी भेल। अहि‍ना आगूक पालीमे कथाकार अपन नूतन कथाक पाठ केलनि‍- बेचन ठाकुर- वेस्‍ट मैडम लक्ष्‍मी दास- टाइपि‍स्‍ट चन्‍देश्वर खाँ- नाओल्‍द अनमोल झा- फाइल, सेयर मुरलीधर झा- मनुक्‍ख अभि‍षेक- महापुरुष रामाकान्‍त राय ‘रमा’- वकवास रामवि‍लास साहु- घूसहाघर नारायणजी- छत्ता शैलेन्‍द्र आनन्‍द- फोरलेन पवन कुमार साह- अपन रीति‍ सुभाषचन्‍द्र सनेही- बूढ़ी नन्‍द वि‍लास राय- बाबाघाम उमेश पासवान- अजाति‍ अशोक कुमार झा- माछक मोटरी परमानन्‍द प्रभावकर- परि‍वर्त्तन फूल चन्‍द्र मि‍श्र प्रवीण- परि‍वर्त्तन दुखमोचन झा- समरथको नहि‍ दोष गोसाई दुर्गानंद मण्‍डल- कुकर्मा जगदीश प्रसाद मण्‍डल- अनदि‍ना, बुधनी दादी शि‍व कुमार मि‍श्र- नापता शशि‍कान्‍त झा- दूरी अच्‍छेलाल शास्‍त्री- गामक लोक शीर्षकक कथा पढ़लनि‍। हलाँकि‍ शास्‍त्री जीक कथाक वाचन मात्र एक पृष्‍ठ  सुनला पछाति‍ रोकि‍ देल गेल ई कहि‍ जे ई कथा नै आलेख थि‍क। अच्‍छेलाल शास्‍त्रीक ई पहि‍ल मंच रहनि‍ जइपर ओ कथा पढ़ि‍ रहल छलाह, ओना कवि‍ता आइ तीस बर्ख पहि‍नेसँ लि‍खैत छथि‍। ई मंचक अध्‍यक्ष संग संचालक एवं ऐ दुआरे केलनि जे पृष्‍ठ भरि‍क वाचनमे कथोप-कथन कि‍एक नै आएल। शास्‍त्री जीक कहब छलनि‍ जे कथोप-कथन कोनो कथाक एक तत्‍व थि‍क से हमरो बूझल अछि‍ आ तकर समावेश अवश्‍य केने छी मुदा से आगू अछि‍ माने अगि‍ला पृष्‍ठमे। तथापि‍ कथाक वाचन रोकि‍ देल गेलनि‍। आ अच्‍छेलाल यादव शास्‍त्री अपन कथाक अपूर्ण पाठसँ नि‍रास रहि‍ गेलाह। अमीत मि‍श्र, मुकुन्‍द मयंक, अमलेन्‍दु  शेखर पाठक, रौशन झा इत्‍यादि‍ व्‍यक्‍ति‍क कथाक पाठ सेहो भेल आ तइपर टीप्‍पणी गुनजाइश हि‍साबे। टी‍प्‍पणीकार सभ छलाह- फूलचन्‍द्र मि‍श्र रमण, रमानंद झा रमण, भीमनाथ झा, अशोक मेहता, दुर्गानन्‍द मण्‍डल, कमल मोहन चुन्नु, नारायणजी, कुमार शैलेन्‍द्र, जगदीश प्रसाद मण्‍डल, कमलाकान्‍त झा (जयनगर), योगानंद झा इत्‍यादि‍। आगि‍ला ‘सगर राति‍ दीप जरए’ कमलेश झाक संयोजकत्वमे घनश्‍यामपुरमे हेबाक घोषणा सेहो भेल। दीप आ उपस्‍थि‍ति‍ पुस्‍ति‍का स्‍थानीय संयोजक अरवि‍न्‍द्र ठाकुर कमलेश झाकेँ हस्‍तगत करा गोष्‍ठीक समापनक घोषण केलनि‍। ३. पद्य ३.१.जगदीश चन्द्र ठाकुर ‘अनिल’- की भेटल आ की हेरा गेल  (आत्म गीत)- (आगाँ) ३.२.सन्दीप कुमार साफी-कविता-कातिकक पूर्णिमा/ गामक इनार ३.३.जगदानन्द झा मनु ३.४.हेमनारायण साहु- हम छी नीमक गाछ ३.५.मुन्नी कामत केर दुइ गोट कविता-सिया तोरे कारण/ ठिठुराबैत जाड़ ३.६.१.राजदेव मण्‍डलक तीन गोट कवि‍ता-चि‍र प्रतीक्षा/ हाथ/ ठक२.मिहिर झा- विदागरी ३.७.पंकज चौधरी (नवलश्री)- चारिटा गजल ३.८.बिन्देश्वर ठाकुर- गीत-गजल-कविता जगदीश चन्द्र ठाकुर ‘अनिल’ की भेटल आ की हेरा गेल  (आत्म गीत)- (आगाँ) जे सुख भेटल, जे शांति भेटल अघ्ययन, मनन आ चिन्तनमे दुख-सुखकेर परिभाषा जानल की सफल, सुफल की जीवनमे एक दृष्टि नव, एक सृष्टि नव अपनहु अन्तरमे   समा गेल हम सोचि रहल छी जीवनमे की भेटल आ की हेरा गेल। सपना छल जे छी देखि चुकल सपना अछि जे छी देखि रहल सपने संगी अछि बनल हमर सपनेसँ हम छी सीखि रहल सपनेमे अहिना पड़ल-पड़ल हँसिते-हँसिते अछि कना गेल, हम सोचि रहल छी जीवनमे की भेटल आ की हेरा गेल। जीवनक अर्थ तँ हर्ष भेल दोसर मतलब संघर्ष भेल हम ताकि रहल छी अपनामे की बाँचल आ की व्यर्थ गेल अछि वैह सुफल दुनियामे जे अपनाकें  कहुना बचा गेल, हम सोचि रहल छी जीवनमे की भेटल आ की हेरा गेल । हम के छी, कतऽसँ आयल छी अछि अएबा केर  प्रयोजन की सुख-दुखक चक्रमे घूमि रहल अनवरत हमर ई जीवन की हमरा अन्तरमे बैसल क्यो अछि प्रश्न कैकटा उठा गेल, हम सोचि रहल छी जीवनमे की भेटल आ की हेरा गेल । ई देह अतिथि, ई प्राण अतिथि सम्मान अतिथि, अपमान अतिथि अछि लोभ, मोह आ मायाकेर अज्ञान अतिथि, विज्ञान अतिथि हम अहिना रहब स्थिर तहियो जहिया देखब सब बिला गेल, हम सोचि रहल छी जीवनमे की भेटल आ की हेरा गेल । ई हाथ हमर, ई पएर हमर ई आँखि हमर, ई कान हमर ई देह हमर, ई मोन हमर ई प्राण हमर आ ध्यान हमर हम छी स्वामी एहि कायाकेर अछि ई रहस्य क्यो बुझा गेल, हम सोचि रहल छी जीवनमे की भेटल  आ की हेरा गेल। (क्रमशः) ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। सन्दीप कुमार साफी- कविता-कातिकक पूर्णिमा/ गामक इनार 1 कातिकक पूर्णिमा जेबै देखैले मेला कमला क’ सभ सालमे मेला लागए जोर नहैले जाएब भोरे भोर हेतै ओही बाउलपर कुस्ती खाएब तोड़ि क’ कुसियार माए बहीन सभ खेलए सामा चकेवा भसब’ जाए ओइ किनार चुगलाकेँ चूड़ा दही खुआ क’ लेवान दिन चूड़ा कुटाए उक्खड़िमे। जोतलाहा खेतमे भसाबए सामा चकेवाकेँ पूर्णिमा नहाइले जाइ कमलामे मेला लागैए दुनू पारमे नाच तमाशा हुअए अल्हा रूदल बिकाए झिल्ली मुरही मिथिलामे माए बहीनक’ भाइयक मानल जाए ई पाबनि सालमे एक बेर नाम लिअए भाइक सभ बहीन हमर भइया रहए जुड़ाएल। 2 गामक इनार चलए मिलान सभ लोककेँ भरै छलौं एक ठाम पानि अपनामे रहै चलए बाजा भूकी रहै चलौं सभ मिलि-जुलि क’ घर-घरमे आब भेल कल लोको सभ भेल अल कल खीचि ने पाबए इनारक रस्सी ने रहल टोलमे एकता के राखए पोखरि इनारक सेखता साविकक देन क’ होइए अभास कोनाकेँ बुझाएब पियास विलुप्त भ’ रहल अछि इनार कत’ गेल घैलाक पानि ओही ठाम करै छलौं स्नान रहै छल गामक शान देवी-देवता रहै छल प्रसन्न मन रहै छल शुद्ध रखै छलौं शुद्ध-अशुद्धक मान। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। जगदानन्द झा मनु, ग्राम पोस्ट- हरिपुर डीहटोल, मधुबनी 1.कविता - उगैत सूरज पएर पसारि उगैत सूरज पएर पसारि धरतीक आँगनमे एलै लाल रंगक ओढ़नी एकर हरीयर खेतमे छिरएलै कोंढ़ी सभ मूरी हिला कए पंखुड़ीकेँ फैलेलक नचि-नचि कए नैन्हेंटा भोंडा खुशीकेँ नाच दखेलक लए संग अपन साजि बरयाति खुशी ओ संग अनने अछि संग एकरे उठल चिड़ै सभ आर मनुख सभ जगैत अछि माए सभ आँचरमे भरि कए नेनापर अमृत बरसेलै उगैत सूरज पएर पसारि धरतीक आँगनमे एलै बरदकेँ संग लए हरबाहा कन्हापर लादि हर आएल गाए महीषकेँ रोमि चरबाहा धरतीक आँगनमे बहि आएल छोट छोट हाथसँ नेना डोड़ी पकैर बकरीकेँ अनलक माथ पर ल' क' ढाकी खुरपी घसबाहीन झुमति निकलल एहन सुन्नर मनभाबक दृश्य भोरका कएलक उगैत सूरजकेँ तँ देखू केहएन सुन्नर दुनियाँ बनेलक । उगैत सूरज पएर पसारि धरतीक आँगनमे एलै । ****************************** 2.गजल जीवन कखन तक छैक नै बुझलक कियो कखनो करेजक गप्प   नै जनलक कियो भेटल तँ जीवनमे सुखक संगी बहुत देखैत दुखमे आँखि नै तकलक कियो दुखकेँ अपन बेसी बुझै किछु लोक सभ भेलै जँ दोसरकेँ तँ नै सुनलक कियो सदिखन रहल भागैत सभ काजे अपन आनक नोर घुइरो कs नै बिछ्लक कियो जीवन तँ अछि जीवैत 'मनु' सभ एतए मइरो कs जे जीवैत नै बनलक कियो (बहरे- रजज, 2212 तीन-तीन बेर सभ पांतिमे) *********************************************** 3.गजल जखन खगता सभसँ बेसी तखन ओ मुँह मोड़ि लेलनि जानि आफत छोरि हमरा सुखसँ नाता जोड़ि लेलनि देखि चकमक रंग सभतरि ओहिमे बहि ओ तँ गेली जानि खखड़ी ओ हमर हँसिते करेजा कोड़ि लेलनि बन्द केने हम मनोरथ अप्पन सदिखन चूप रहलहुँ पाञ्च बरखे आबि देख फेर सपना तोड़ि लेलनि दुखसँ अप्पन अधिक दोसरकेँ सुखक चिन्ता कएने आँखि जे फूटै दुनू तैँ एक अप्पन फोड़ि लेलनि चलक सप्पत संग लेलहुँ जीवनक जतराक पथपर मेघ दुखकेँ देखते ओ संग 'मनु'केँ छोड़ि लेलनि (बहरे - रमल, मात्रा क्रम- 2122 चारि-चारि बेर सभ पांतिमे) ******************************************************** 4.गजल किए तीर नजरिसँ अहाँकेँ चलैए  हँसी ई तँ घाएल हमरा करैए 

मधुर बाजि खन-खन पएरक पजनियाँ  हमर मोन रहि रहि कए डोलबैए   

छ्लकए हबामे अहाँकेँ खुजल लट  कतेको तँ  दाँतेसँ   आङुर कटैए ससरि जे जए जखन आँचर अहाँकेँ जिला भरि  करेजाक धड़कन रुकैए अहीँकेँ तँ मुँह देखि जीबैत 'मनु' अछि बिना संग नै साँस मिसियो चलैए (बहरे - मुतकारिब, मात्रा क्रम -122-122-122-122) *************************************************** 5.गजल रहब आब नै दास बनि हम अपन नीक इतिहास जनि हम

जखन ठानलहुँ हम अपनपर समुद्रो लएलहुँ तँ सनि हम

उठा मांथ जतएसँ तकलहुँ दएलहुँ  तँ नक्षत्र गनि हम

हलाहल दुनीयाँक पीने चलै छी अपन मोन तनि हम

जमल खून मारलक धधरा लएलहुँ विजय विश्व ठनि  हम

(बहरे मुतकारिब, मात्रा क्रम-१२२) ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। हेमनारायण साहु हम छी नीमक गाछ जंगल झार बूझि‍ हमरा छोड़ने छी छी कतेक रोगक-नि‍दान से नै बुझै छी। बड़ गुनगर छी से बूझि‍ लि‍अ नै अछि‍ बि‍सवास तँ अजमाए लि‍अ। हम वातावरणकेँ शुद्ध करै छी अशुद्ध पवनकेँ शुद्ध करै छी। पात पीस कंकलि‍पर लगाउ डारि‍क दत्‍मनि‍सँ पैरि‍या भगाउ। टूसा तोड़ि‍-तोड़ि‍ मुँहमे खाउ पेटक कीड़ाकेँ जड़ि‍सँ भगाउ। फड़ तोड़ि‍ अर्क बनाउ अल्‍लू गाछकेँ पालासँ बचाउ। फड़क आँठीसँ तेल बनाउ बनाए औषधि‍ अनेक रोग भगाउ। बचल सि‍ट्ठीसँ जैवि‍क खाद बनाउ। खेतमे मि‍लाए सोना उपजाउ हम छी नीमक गाछ। डगर-बाटपर लगाउ गाम समाजसँ लऽ कऽ पर्यावरणकेँ नि‍रोग बनाउ। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। मुन्नी कामत केर दुइ गोट कविता-सिया तोरे कारण/ ठिठुराबैत जाड़ सिया तोरे कारण जनक दुलारी सिया सहैत एलौं सभ दरद अहाँ किअए? रानी भऽ वनमे रहलौं पतिक खातिर सभ सुख ति‍यागलाैं पग-पगपर संघर्ष केलौं हर परीक्षामे खड़ा उतरलौं तँ फेर ई समाज नै अहाँकेँ अपनेलक किअए? जइ पति ले सभ किछु अहाँ ति‍यागलौं वएह अहाँकेँ ति‍यागलक किअए? किअए ने विद्रोह अहाँ केलौं नारीक हित ले अवाज उठेलौं। सदखिन सुनै छी हम एक्के बात। जहन सति सीता नै बचलै तँ केना बचतौ तोहर लाज? जौं एगो सीता जे अवाज उठैइतै, तँ फेर कोनो सीता नै परितारित होइतै। चुप रहैक ई सजा मिलैए, कतेक सीता नित वनवास भोगैए। ठिठुराबैत जाड़ एलैए जाड़ लऽ कऽ दुखक पहाड़। केना कटत दिन-राति‍ केना बीतत ई जाड़क कड़ारि‍। उजरल छौइन टुटल अछि टाट नै अछि कोनो ओहार घरक चारू कात अछि बाटे-बाट। पुआरक ओर्हना पुआरेक बिछौना केकरा कहै छै लोग कम्‍मल केना कहै छै होइ छै जाड़ सुहाना। कहियो घरसँ निकलि‍ कऽ देखियो एक राि‍त अतए बिता कऽ देखियो ठिठुइर कऽ मरैए लोग नित कतेक जना। गरिबेकेँ तँ भगवानो मारै छै अगर नै! तँ फेर पत्थरक देह बना किअए नै भेजै छैक। जे ढाहि‍ दइ सरकारक भीखकेँ अनुदानक नाओंपर भेटैत मजाकक इन्‍दि‍रा-अवास आ सरकारी राहत कोषकेँ। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। १.राजदेव मण्‍डलक तीन गोट कवि‍ता-चि‍र प्रतीक्षा/ हाथ/ ठक२.मिहिर झा- विदागरी १ राजदेव मण्‍डलक तीन गोट कवि‍ता-चि‍र प्रतीक्षा/ हाथ/ ठक चि‍र प्रतीक्षा नीपलौं-पोतलौं घर-दुआर कतेक बेर केलौं झार-बहार अपनो केलौं सोलहो ि‍संगार कऽ रहल छी इंतजार उताहुल भेल मन पि‍आसल अछि‍ तन बि‍तल जाइत क्षण कखन हएत मि‍लन मनमे फुलाइत सुमन नमरले जाइत प्रतीक्षाक क्षण असोथकि‍त भऽ गेल नयन शंि‍कत छी बि‍फल हएत जतन नि‍न्नसँ बन्न भेल आँखि‍क कोर दुखाइत देहक पोरे-पोर मन घेराएल सपनाक शोर अहाँक झलक बुझाएल थोड़बे-थोड़ चौंकि‍ उठलौं नि‍न्न छल घोर नै भेल छल भि‍नसर-भोर पएरक चेन्‍हसँ हम मानि‍ रहल छी अहाँ अाएल छलौं से जानि‍ रहल छी पुन: एकबेर देहकेँ तानि‍ रहल छी बाधाक नि‍न्नकेँ तोड़ि‍-ताड़ि‍ बौआइत सपनाकेँ डाहि‍-जारि‍ खोलि‍ अपन सभ घर-दुआरि‍ चि‍र-प्रतीक्षा तन-मन सम्‍हारि‍। हाथ- हाथ ि‍सर्फ नै अछि‍ हाथ अन्‍हारमे जनमि‍ गेल एेमे नाक, कान, आँखि‍, दाँत इजोतेटा मे नै अन्‍हारोमे रहैत अछि‍ साथ सूँघैत अछि‍ सभ कात जानैत टेब-टेब‍ सभ बात हाथकेँ नै देखैत हाथ देखैत अछि‍ हाथक करामात कतए सँ कते धरि‍ पहुँचल हाथ हाथसँ मि‍लैत हाथ सि‍रजनक साथ भऽ जाइत अछि‍ वि‍ध्‍वंसक बात हाथ तँ अछि‍ हमरे साथ फेर कि‍एक हेतै अधला बात। ठक हम छी ठक नै कोनो शक झूठ गप भख साँचक नै परख शुरूमे ठकलौं घर-परि‍वार आगाँ ठकैत दुनि‍याँ-संसार टका-पैसा हजारक-हजार लगा देलौं सम्‍पति‍क अमार ठकैक आदति‍सँ नचार कतेको कनैत जार-बेजार आइ छूटल पूरा भक जखनि‍ हमर लगल ठक एहेन जीत पार भऽ गेल जि‍नगी बूझू बेमार भऽ गेल सभकेँ एहि‍ना उठैत हेतै दरद आइ हमहूँ करैत छी गरद साँच कतए सँ आब हम पाएब ठकबे करब वा ठका जाएब सोचब कोनो एहेन उपाए ऐ जालसँ २ मिहिर झा विदागरी विदागरी समेटल इयादक चित्र चलचित्र मिज्झर होइत भावनाक ओस अटकल गाल पर थरथराइत  शब्द स्पर्श सँ पूर्ण अंदेशा अनंत सूनपन केँ शांत हएत समुद्रक आवाज श्याम अरुण रुकल ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। पंकज चौधरी (नवलश्री)- चारिटा गजल गजल १ सभ मात-पिता केर शौख-सेहन्ता बौआ करता नाम मगन  जुआनिक  माया  नगरी  बौआ मनसुख राम बाबू-पित्ती घरक धरणि थम्हने छथि बनिकऽ खाम संतति  कर्मसँ  देह  नुकौने  करम केने अछि बाम बाबुक  अरजल  पर  में  फूटानी  माटि लगै नै चाम जँ अपना कन्हा हऽर पड़ल तऽ जय-जय सीता-राम अनतह  शोणित  सुखा  रहल  आ  घर  बहै  नै घाम बबुआनी  केर  अजबहिं  सनकी  बैरी भऽ गेल गाम ईरखे  नान्गैर  कटबै  लै जे  तेजलक मिथिला धाम परदेसक   माया  ओझरायल  घूमि  रहल  छै  झाम अपना  आँगन  सोन  छोड़ि सभ अनकर बीछी ताम घर छोड़ि घुर - मुड़िया खेलक  कहिया लागत थाम मोल  बुझै  नहि  भावक  भाषा भाव पूछए नहि दाम चलु  रहब  माँ   मैथिल  आँगन  नेह  बहै जहि ठाम "नवल"  निवेदन मैथिल जनसँ छोडू नै मिथिलाम छै  पागक शोभा  माथे पर  आ  चरणहि नीक खराम *आखर-२० २ बौआ केर छटिहारक राति मिथिला-विधिए नियारल काजर शुभग - सिनेहक ठोप करिकबा  मौसी हाथक पाड़ल काजर नवरातिक अहि शुभ - बेलामे अबै अष्टमिक राति डेराओन माय अपन संतति सभके  तैं आंखि दुनु चोपकारल काजर अन्हरिया  राति  अमावस  केर ई दीप - पुंज मुंह दूशि रहल राति दिवालिक लेसलहुं  टेमी तंत्र - मन्त्र उपचारल काजर कते  सुहन्गर  स्वप्न सजोने कजरायल आँखिक पेपनी पर बरसाति - पंचमी - मधुश्रावनि नवकनिया के धारल काजर नव - यौवन के नव - तरंग इ  "नवल" मोन भसियेबे करतै गोर - गोर चन्ना सन मुंह पर  सजनी कियै लेभारल काजर *आखर-२४ ३ सजनी रहि - रहि टेमी बारी भरि  कजरौटा  काजर पारी थोपि रहल छी  काजर सौंसे ओहिना  मादक नयना भारी आंखिसँ आँखिक फेरम-फेरी जेना  होय  मऊहक़ के थारी देह  रहल आ  प्राण  बिलेलै नयन - वाण सँ जिबते मारी करिया आँखिक पोखरि कात स्वपन  सेहन्ता  केर बैसारी कहू छोडि इ  आँखिक अमृत पीब कियैक  हम दारु - तारी मोन के जीतैऽ जे  तकरा पर "नवल" कियै ने जीवन हारी *आखर-११ ४ ई प्रश्न जे उठल  आब  बाबुक बाद के भऽ गेल कान ठाढ़ सभ दऽर-दियाद के उपजा के बेरमे तऽ हांसू पिजा रहल अहि खेतमे मुदा देत पाइन-खाद के ममरी तऽ खागेलै सभ लुझि-लपटि कऽ जे पेईनमे बंचल छै  से पीत गाद  के बाँटि-चुटि सभकिछु बखरा लगा लिय सहतैक  ई  अनेरे  बरदिक  लाद  के गीजल जे पाईके ओ भीजत की नोरसँ वानर की जानऽ गेल आदक सुआद के भतबऽरी के प्रथा ई चलल गामे-गाम कहतै समाद के  आ सुनतै समाद के करेजसँ  नञि ओ "नवल" पेटसँ छलै संबंध  केर  गंध  उड़ल  संग पाद  के *आखर-१५ ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। बिन्देश्वर ठाकुर, धनुषा नेपाल, हाल; कतार बिन्देश्वर ठाकुर, धनुषा, नेपाल। हाल- कतार। गजल 

एखन धरि पैसा कमेलौं कि नै यै? खातामे पैसा पठेलौं कि नै यै? घरक स्थिति भाड़मे जाए मुदा  हमरा लेल हसुली बनेलौं कि नै यै?

फुसक घर हमरा काटऽ छुटैए  शहरमे बिल्डिङ बनेलौं कि नै यै?

फाटल पहिरु अहाँ ताहिसँ गम नै  हमरा लेल चुनरी लएलौं कि नै यै?

बहुते कमाइ छी बुधनाकेँ कहब हमरा लेल हिस्सा लगेलौं कि नै यै? गीत १ अनारसन छिटकल अहाँक जवानी  मदहोस देहियापर लाखो परेसानी  रस टपटप जेना पाकल अरनेबा  एकटा अदापर अछि दुनियाँ दिवाना। पायल बजा दिल घायल कएलौं  बिन बादल बर्षा करै छी  आबि आगू कोरामे बैसू   गाल दिअ कनी दाँत कटै छी। 

दिल तोड़ब अपराध छिऐक  दिल जोड़ब नै अछि कोनो पाप  बदनमे चोली आ कमरमे लहङा  चाही तँ अहाँ दिअ नाप। 

बड नीक लगै छी साड़ी अथबा  सुटो जखन लगबै छी  चाल चली अहाँ हिरनी जैसन  दिल हमर धड़कबै छी। 

२ बाल अहाँक रेशम रेशम  टमाटर जेहन गाल अछि  ओठ जेना स्वीट ललीपप  आ रुपो कतेक बबाल अछि। देख अहाँकेँ जिस्म सराबी  बढैत अछि हमर बेताबी  एकबेर बस प्रेम करऽ दी  नै हएत अहाँकेँ कोइ खराबी। 

दिल अहाँक निठुर सोना  चान्दी सन चमकैत मन  उपरसँ पिताएब बेसी  मुदा भीतरसँ नम्बर वन। 

जरुरी चीज जीवनमे चाही  अहाँ ओ बजार छी  सेब, सन्तोला,अंगूर आ  अहीं हमर अनार छी। 

हीरा, मोती, धन-दौलत  अहीं डोली कहार छी  बिन जीवन अन्हार अहाँकेँ  अहीं खुशीक बहार छी। चेतना 

स्वार्थ-स्वार्थसँ भरल संसार  छिनए सबके सब अधिकार  अपन स्वाभिमान बचएबाक हेतु करे लाखो अत्याचार।।१।। 

की कहु दुनियाँक रीत  किछु नै समझमे आबैए  अपन झूठ शान सौगात ला  मिथ्या दोस लगबैए।।२।। 

मानव भऽ मानवता भुलब  ई केहन अनैतिक बात कहू  नैतिक पतन,अस्तित्वमे दाग लऽ  आब कथीक पश्चताप कहू।।३।। 

अपील सुनु धधकैत इनसान  अपनही जैसन सबके मान  स्वार्थ बिना जौँ जिन्दगी टेबब  निश्चित बनत देश महान।।४।। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। बालानां कृते बच्चा लोकनि द्वारा स्मरणीय श्लोक १.प्रातः काल ब्रह्ममुहूर्त्त (सूर्योदयक एक घंटा पहिने) सर्वप्रथम अपन दुनू हाथ देखबाक चाही, आ’ ई श्लोक बजबाक चाही। कराग्रे वसते लक्ष्मीः करमध्ये सरस्वती। करमूले स्थितो ब्रह्मा प्रभाते करदर्शनम्॥ करक आगाँ लक्ष्मी बसैत छथि, करक मध्यमे सरस्वती, करक मूलमे ब्रह्मा स्थित छथि। भोरमे ताहि द्वारे करक दर्शन करबाक थीक। २.संध्या काल दीप लेसबाक काल- दीपमूले स्थितो ब्रह्मा दीपमध्ये जनार्दनः। दीपाग्रे शङ्करः प्रोक्त्तः सन्ध्याज्योतिर्नमोऽस्तुते॥ दीपक मूल भागमे ब्रह्मा, दीपक मध्यभागमे जनार्दन (विष्णु) आऽ दीपक अग्र भागमे शङ्कर स्थित छथि। हे संध्याज्योति! अहाँकेँ नमस्कार। ३.सुतबाक काल- रामं स्कन्दं हनूमन्तं वैनतेयं वृकोदरम्। शयने यः स्मरेन्नित्यं दुःस्वप्नस्तस्य नश्यति॥ जे सभ दिन सुतबासँ पहिने राम, कुमारस्वामी, हनूमान्, गरुड़ आऽ भीमक स्मरण करैत छथि, हुनकर दुःस्वप्न नष्ट भऽ जाइत छन्हि। ४. नहेबाक समय- गङ्गे च यमुने चैव गोदावरि सरस्वति। नर्मदे सिन्धु कावेरि जलेऽस्मिन् सन्निधिं कुरू॥ हे गंगा, यमुना, गोदावरी, सरस्वती, नर्मदा, सिन्धु आऽ कावेरी  धार। एहि जलमे अपन सान्निध्य दिअ। ५.उत्तरं यत्समुद्रस्य हिमाद्रेश्चैव दक्षिणम्। वर्षं तत् भारतं नाम भारती यत्र सन्ततिः॥ समुद्रक उत्तरमे आऽ हिमालयक दक्षिणमे भारत अछि आऽ ओतुका सन्तति भारती कहबैत छथि। ६.अहल्या द्रौपदी सीता तारा मण्डोदरी तथा। पञ्चकं ना स्मरेन्नित्यं महापातकनाशकम्॥ जे सभ दिन अहल्या, द्रौपदी, सीता, तारा आऽ मण्दोदरी, एहि पाँच साध्वी-स्त्रीक स्मरण करैत छथि, हुनकर सभ पाप नष्ट भऽ जाइत छन्हि। ७.अश्वत्थामा बलिर्व्यासो हनूमांश्च विभीषणः। कृपः परशुरामश्च सप्तैते चिरञ्जीविनः॥ अश्वत्थामा, बलि, व्यास, हनूमान्, विभीषण, कृपाचार्य आऽ परशुराम- ई सात टा चिरञ्जीवी कहबैत छथि। ८.साते भवतु सुप्रीता देवी शिखर वासिनी उग्रेन तपसा लब्धो यया पशुपतिः पतिः। सिद्धिः साध्ये सतामस्तु प्रसादान्तस्य धूर्जटेः जाह्नवीफेनलेखेव यन्यूधि शशिनः कला॥ ९. बालोऽहं जगदानन्द न मे बाला सरस्वती। अपूर्णे पंचमे वर्षे वर्णयामि जगत्त्रयम् ॥ १०. दूर्वाक्षत मंत्र(शुक्ल यजुर्वेद अध्याय २२, मंत्र २२) आ ब्रह्मन्नित्यस्य प्रजापतिर्ॠषिः। लिंभोक्त्ता देवताः। स्वराडुत्कृतिश्छन्दः। षड्जः स्वरः॥ आ ब्रह्म॑न् ब्राह्म॒णो ब्र॑ह्मवर्च॒सी जा॑यता॒मा रा॒ष्ट्रे रा॑ज॒न्यः शुरे॑ऽइषव्यो॒ऽतिव्या॒धी म॑हार॒थो जा॑यतां॒ दोग्ध्रीं धे॒नुर्वोढा॑न॒ड्वाना॒शुः सप्तिः॒ पुर॑न्धि॒र्योवा॑ जि॒ष्णू र॑थे॒ष्ठाः स॒भेयो॒ युवास्य यज॑मानस्य वी॒रो जा॒यतां निका॒मे-नि॑कामे नः प॒र्जन्यों वर्षतु॒ फल॑वत्यो न॒ऽओष॑धयः पच्यन्तां योगेक्ष॒मो नः॑ कल्पताम्॥२२॥ मन्त्रार्थाः सिद्धयः सन्तु पूर्णाः सन्तु मनोरथाः। शत्रूणां बुद्धिनाशोऽस्तु मित्राणामुदयस्तव। ॐ दीर्घायुर्भव। ॐ सौभाग्यवती भव। हे भगवान्। अपन देशमे सुयोग्य आ’ सर्वज्ञ विद्यार्थी उत्पन्न होथि, आ’ शुत्रुकेँ नाश कएनिहार सैनिक उत्पन्न होथि। अपन देशक गाय खूब दूध दय बाली, बरद भार वहन करएमे सक्षम होथि आ’ घोड़ा त्वरित रूपेँ दौगय बला होए। स्त्रीगण नगरक नेतृत्व करबामे सक्षम होथि आ’ युवक सभामे ओजपूर्ण भाषण देबयबला आ’ नेतृत्व देबामे सक्षम होथि। अपन देशमे जखन आवश्यक होय वर्षा होए आ’ औषधिक-बूटी सर्वदा परिपक्व होइत रहए। एवं क्रमे सभ तरहेँ हमरा सभक कल्याण होए। शत्रुक बुद्धिक नाश होए आ’ मित्रक उदय होए॥ मनुष्यकें कोन वस्तुक इच्छा करबाक चाही तकर वर्णन एहि मंत्रमे कएल गेल अछि। एहिमे वाचकलुप्तोपमालड़्कार अछि। अन्वय- ब्रह्म॑न् - विद्या आदि गुणसँ परिपूर्ण ब्रह्म रा॒ष्ट्रे - देशमे ब्र॑ह्मवर्च॒सी-ब्रह्म विद्याक तेजसँ युक्त्त आ जा॑यतां॒- उत्पन्न होए रा॑ज॒न्यः-राजा शुरे॑ऽ–बिना डर बला इषव्यो॒- बाण चलेबामे निपुण ऽतिव्या॒धी-शत्रुकेँ तारण दय बला म॑हार॒थो-पैघ रथ बला वीर दोग्ध्रीं-कामना(दूध पूर्ण करए बाली) धे॒नुर्वोढा॑न॒ड्वाना॒शुः धे॒नु-गौ वा वाणी र्वोढा॑न॒ड्वा- पैघ बरद ना॒शुः-आशुः-त्वरित सप्तिः॒-घोड़ा पुर॑न्धि॒र्योवा॑- पुर॑न्धि॒- व्यवहारकेँ धारण करए बाली र्योवा॑-स्त्री जि॒ष्णू-शत्रुकेँ जीतए बला र॑थे॒ष्ठाः-रथ पर स्थिर स॒भेयो॒-उत्तम सभामे युवास्य-युवा जेहन यज॑मानस्य-राजाक राज्यमे वी॒रो-शत्रुकेँ पराजित करएबला निका॒मे-नि॑कामे-निश्चययुक्त्त कार्यमे नः-हमर सभक प॒र्जन्यों-मेघ वर्षतु॒-वर्षा होए फल॑वत्यो-उत्तम फल बला ओष॑धयः-औषधिः पच्यन्तां- पाकए योगेक्ष॒मो-अलभ्य लभ्य करेबाक हेतु कएल गेल योगक रक्षा नः॑-हमरा सभक हेतु कल्पताम्-समर्थ होए ग्रिफिथक अनुवाद- हे ब्रह्मण, हमर राज्यमे ब्राह्मण नीक धार्मिक विद्या बला, राजन्य-वीर,तीरंदाज, दूध दए बाली गाय, दौगय बला जन्तु, उद्यमी नारी होथि। पार्जन्य आवश्यकता पड़ला पर वर्षा देथि, फल देय बला गाछ पाकए, हम सभ संपत्ति अर्जित/संरक्षित करी। 8.VIDEHA FOR NON RESIDENTS 8.1 to 8.3 MAITHILI LITERATURE IN ENGLISH 8.1.1.The Comet   -GAJENDRA THAKUR translated by Jyoti Jha chaudhary 8.1.2.The_Science_of_Words- GAJENDRA THAKUR translated by the author himself 8.1.3.On_the_dice-board_of_the_millennium- GAJENDRA THAKUR translated by Jyoti Jha chaudhary 8.1.4.NAAGPHANS (IN ENGLISH)- SHEFALIKA VERMA translated by Dr. Rajiv Kumar Verma and Dr. Jaya Verma Send your comments to ggajendra@videha.com विदेह नूतन अंक भाषापाक रचना-लेखन इंग्लिश-मैथिली-कोष / मैथिली-इंग्लिश-कोष  प्रोजेक्टकेँ आगू बढ़ाऊ, अपन सुझाव आ योगदान ई-मेल द्वारा ggajendra@videha.com पर पठाऊ। Top of Form विदेहक मैथिली-अंग्रेजी आ अंग्रेजी मैथिली कोष (इंटरनेटपर पहिल बेर सर्च-डिक्शनरी) एम.एस. एस.क्यू.एल. सर्वर आधारित -Based on ms-sql server Maithili-English and English-Maithili Dictionary. १.भारत आ नेपालक मैथिली भाषा-वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक शैली आ २.मैथिलीमे भाषा सम्पादन पाठ्यक्रम १.नेपाल आ भारतक मैथिली भाषा-वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक शैली

१.१. नेपालक मैथिली भाषा वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक  उच्चारण आ लेखन शैली (भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक धारणाकेँ पूर्ण रूपसँ सङ्ग लऽ निर्धारित) मैथिलीमे उच्चारण तथा लेखन १.पञ्चमाक्षर आ अनुस्वार: पञ्चमाक्षरान्तर्गत ङ, ञ, ण, न एवं म अबैत अछि। संस्कृत भाषाक अनुसार शब्दक अन्तमे जाहि वर्गक अक्षर रहैत अछि ओही वर्गक पञ्चमाक्षर अबैत अछि। जेना- अङ्क (क वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ङ् आएल अछि।) पञ्च (च वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ञ् आएल अछि।) खण्ड (ट वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ण् आएल अछि।) सन्धि (त वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे न् आएल अछि।) खम्भ (प वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे म् आएल अछि।) उपर्युक्त बात मैथिलीमे कम देखल जाइत अछि। पञ्चमाक्षरक बदलामे अधिकांश जगहपर अनुस्वारक प्रयोग देखल जाइछ। जेना- अंक, पंच, खंड, संधि, खंभ आदि। व्याकरणविद पण्डित गोविन्द झाक कहब छनि जे कवर्ग, चवर्ग आ टवर्गसँ पूर्व अनुस्वार लिखल जाए तथा तवर्ग आ पवर्गसँ पूर्व पञ्चमाक्षरे लिखल जाए। जेना- अंक, चंचल, अंडा, अन्त तथा कम्पन। मुदा हिन्दीक निकट रहल आधुनिक लेखक एहि बातकेँ नहि मानैत छथि। ओ लोकनि अन्त आ कम्पनक जगहपर सेहो अंत आ कंपन लिखैत देखल जाइत छथि। नवीन पद्धति किछु सुविधाजनक अवश्य छैक। किएक तँ एहिमे समय आ स्थानक बचत होइत छैक। मुदा कतोक बेर हस्तलेखन वा मुद्रणमे अनुस्वारक छोट सन बिन्दु स्पष्ट नहि भेलासँ अर्थक अनर्थ होइत सेहो देखल जाइत अछि। अनुस्वारक प्रयोगमे उच्चारण-दोषक सम्भावना सेहो ततबए देखल जाइत अछि। एतदर्थ कसँ लऽ कऽ पवर्ग धरि पञ्चमाक्षरेक प्रयोग करब उचित अछि। यसँ लऽ कऽ ज्ञ धरिक अक्षरक सङ्ग अनुस्वारक प्रयोग करबामे कतहु कोनो विवाद नहि देखल जाइछ। २.ढ आ ढ़ : ढ़क उच्चारण “र् ह”जकाँ होइत अछि। अतः जतऽ “र् ह”क उच्चारण हो ओतऽ मात्र ढ़ लिखल जाए। आन ठाम खाली ढ लिखल जएबाक चाही। जेना- ढ = ढाकी, ढेकी, ढीठ, ढेउआ, ढङ्ग, ढेरी, ढाकनि, ढाठ आदि। ढ़ = पढ़ाइ, बढ़ब, गढ़ब, मढ़ब, बुढ़बा, साँढ़, गाढ़, रीढ़, चाँढ़, सीढ़ी, पीढ़ी आदि। उपर्युक्त शब्द सभकेँ देखलासँ ई स्पष्ट होइत अछि जे साधारणतया शब्दक शुरूमे ढ आ मध्य तथा अन्तमे ढ़ अबैत अछि। इएह नियम ड आ ड़क सन्दर्भ सेहो लागू होइत अछि। ३.व आ ब : मैथिलीमे “व”क उच्चारण ब कएल जाइत अछि, मुदा ओकरा ब रूपमे नहि लिखल जएबाक चाही। जेना- उच्चारण : बैद्यनाथ, बिद्या, नब, देबता, बिष्णु, बंश, बन्दना आदि। एहि सभक स्थानपर क्रमशः वैद्यनाथ, विद्या, नव, देवता, विष्णु, वंश, वन्दना लिखबाक चाही। सामान्यतया व उच्चारणक लेल ओ प्रयोग कएल जाइत अछि। जेना- ओकील, ओजह आदि। ४.य आ ज : कतहु-कतहु “य”क उच्चारण “ज”जकाँ करैत देखल जाइत अछि, मुदा ओकरा ज नहि लिखबाक चाही। उच्चारणमे यज्ञ, जदि, जमुना, जुग, जाबत, जोगी, जदु, जम आदि कहल जाएबला शब्द सभकेँ क्रमशः यज्ञ, यदि, यमुना, युग, यावत, योगी, यदु, यम लिखबाक चाही। ५.ए आ य : मैथिलीक वर्तनीमे ए आ य दुनू लिखल जाइत अछि। प्राचीन वर्तनी- कएल, जाए, होएत, माए, भाए, गाए आदि। नवीन वर्तनी- कयल, जाय, होयत, माय, भाय, गाय आदि। सामान्यतया शब्दक शुरूमे ए मात्र अबैत अछि। जेना एहि, एना, एकर, एहन आदि। एहि शब्द सभक स्थानपर यहि, यना, यकर, यहन आदिक प्रयोग नहि करबाक चाही। यद्यपि मैथिलीभाषी थारू सहित किछु जातिमे शब्दक आरम्भोमे “ए”केँ य कहि उच्चारण कएल जाइत अछि। ए आ “य”क प्रयोगक सन्दर्भमे प्राचीने पद्धतिक अनुसरण करब उपयुक्त मानि एहि पुस्तकमे ओकरे प्रयोग कएल गेल अछि। किएक तँ दुनूक लेखनमे कोनो सहजता आ दुरूहताक बात नहि अछि। आ मैथिलीक सर्वसाधारणक उच्चारण-शैली यक अपेक्षा एसँ बेसी निकट छैक। खास कऽ कएल, हएब आदि कतिपय शब्दकेँ कैल, हैब आदि रूपमे कतहु-कतहु लिखल जाएब सेहो “ए”क प्रयोगकेँ बेसी समीचीन प्रमाणित करैत अछि। ६.हि, हु तथा एकार, ओकार : मैथिलीक प्राचीन लेखन-परम्परामे कोनो बातपर बल दैत काल शब्दक पाछाँ हि, हु लगाओल जाइत छैक। जेना- हुनकहि, अपनहु, ओकरहु, तत्कालहि, चोट्टहि, आनहु आदि। मुदा आधुनिक लेखनमे हिक स्थानपर एकार एवं हुक स्थानपर ओकारक प्रयोग करैत देखल जाइत अछि। जेना- हुनके, अपनो, तत्काले, चोट्टे, आनो आदि। ७.ष तथा ख : मैथिली भाषामे अधिकांशतः षक उच्चारण ख होइत अछि। जेना- षड्यन्त्र (खड़यन्त्र), षोडशी (खोड़शी), षट्कोण (खटकोण), वृषेश (वृखेश), सन्तोष (सन्तोख) आदि। ८.ध्वनि-लोप : निम्नलिखित अवस्थामे शब्दसँ ध्वनि-लोप भऽ जाइत अछि: (क) क्रियान्वयी प्रत्यय अयमे य वा ए लुप्त भऽ जाइत अछि। ओहिमे सँ पहिने अक उच्चारण दीर्घ भऽ जाइत अछि। ओकर आगाँ लोप-सूचक चिह्न वा विकारी (’ / ऽ) लगाओल जाइछ। जेना- पूर्ण रूप : पढ़ए (पढ़य) गेलाह, कए (कय) लेल, उठए (उठय) पड़तौक। अपूर्ण रूप : पढ़’ गेलाह, क’ लेल, उठ’ पड़तौक। पढ़ऽ गेलाह, कऽ लेल, उठऽ पड़तौक। (ख) पूर्वकालिक कृत आय (आए) प्रत्ययमे य (ए) लुप्त भऽ जाइछ, मुदा लोप-सूचक विकारी नहि लगाओल जाइछ। जेना- पूर्ण रूप : खाए (य) गेल, पठाय (ए) देब, नहाए (य) अएलाह। अपूर्ण रूप : खा गेल, पठा देब, नहा अएलाह। (ग) स्त्री प्रत्यय इक उच्चारण क्रियापद, संज्ञा, ओ विशेषण तीनूमे लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना- पूर्ण रूप : दोसरि मालिनि चलि गेलि। अपूर्ण रूप : दोसर मालिन चलि गेल। (घ) वर्तमान कृदन्तक अन्तिम त लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना- पूर्ण रूप : पढ़ैत अछि, बजैत अछि, गबैत अछि। अपूर्ण रूप : पढ़ै अछि, बजै अछि, गबै अछि। (ङ) क्रियापदक अवसान इक, उक, ऐक तथा हीकमे लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना- पूर्ण रूप: छियौक, छियैक, छहीक, छौक, छैक, अबितैक, होइक। अपूर्ण रूप : छियौ, छियै, छही, छौ, छै, अबितै, होइ। (च) क्रियापदीय प्रत्यय न्ह, हु तथा हकारक लोप भऽ जाइछ। जेना- पूर्ण रूप : छन्हि, कहलन्हि, कहलहुँ, गेलह, नहि। अपूर्ण रूप : छनि, कहलनि, कहलौँ, गेलऽ, नइ, नञि, नै। ९.ध्वनि स्थानान्तरण : कोनो-कोनो स्वर-ध्वनि अपना जगहसँ हटि कऽ दोसर ठाम चलि जाइत अछि। खास कऽ ह्रस्व इ आ उक सम्बन्धमे ई बात लागू होइत अछि। मैथिलीकरण भऽ गेल शब्दक मध्य वा अन्तमे जँ ह्रस्व इ वा उ आबए तँ ओकर ध्वनि स्थानान्तरित भऽ एक अक्षर आगाँ आबि जाइत अछि। जेना- शनि (शइन), पानि (पाइन), दालि ( दाइल), माटि (माइट), काछु (काउछ), मासु (माउस) आदि। मुदा तत्सम शब्द सभमे ई निअम लागू नहि होइत अछि। जेना- रश्मिकेँ रइश्म आ सुधांशुकेँ सुधाउंस नहि कहल जा सकैत अछि। १०.हलन्त(्)क प्रयोग : मैथिली भाषामे सामान्यतया हलन्त (्)क आवश्यकता नहि होइत अछि। कारण जे शब्दक अन्तमे अ उच्चारण नहि होइत अछि। मुदा संस्कृत भाषासँ जहिनाक तहिना मैथिलीमे आएल (तत्सम) शब्द सभमे हलन्त प्रयोग कएल जाइत अछि। एहि पोथीमे सामान्यतया सम्पूर्ण शब्दकेँ मैथिली भाषा सम्बन्धी निअम अनुसार हलन्तविहीन राखल गेल अछि। मुदा व्याकरण सम्बन्धी प्रयोजनक लेल अत्यावश्यक स्थानपर कतहु-कतहु हलन्त देल गेल अछि। प्रस्तुत पोथीमे मथिली लेखनक प्राचीन आ नवीन दुनू शैलीक सरल आ समीचीन पक्ष सभकेँ समेटि कऽ वर्ण-विन्यास कएल गेल अछि। स्थान आ समयमे बचतक सङ्गहि हस्त-लेखन तथा तकनीकी दृष्टिसँ सेहो सरल होबऽबला हिसाबसँ वर्ण-विन्यास मिलाओल गेल अछि। वर्तमान समयमे मैथिली मातृभाषी पर्यन्तकेँ आन भाषाक माध्यमसँ मैथिलीक ज्ञान लेबऽ पड़ि रहल परिप्रेक्ष्यमे लेखनमे सहजता तथा एकरूपतापर ध्यान देल गेल अछि। तखन मैथिली भाषाक मूल विशेषता सभ कुण्ठित नहि होइक, ताहू दिस लेखक-मण्डल सचेत अछि। प्रसिद्ध भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक कहब छनि जे सरलताक अनुसन्धानमे एहन अवस्था किन्नहु ने आबऽ देबाक चाही जे भाषाक विशेषता छाँहमे पडि जाए। -(भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक धारणाकेँ पूर्ण रूपसँ सङ्ग लऽ निर्धारित) १.२. मैथिली अकादमी, पटना द्वारा निर्धारित मैथिली लेखन-शैली

१. जे शब्द मैथिली-साहित्यक प्राचीन कालसँ आइ धरि जाहि वर्त्तनीमे प्रचलित अछि, से सामान्यतः ताहि वर्त्तनीमे लिखल जाय- उदाहरणार्थ-

ग्राह्य

एखन ठाम जकर, तकर तनिकर अछि

अग्राह्य अखन, अखनि, एखेन, अखनी ठिमा, ठिना, ठमा जेकर, तेकर तिनकर। (वैकल्पिक रूपेँ ग्राह्य) ऐछ, अहि, ए।

२. निम्नलिखित तीन प्रकारक रूप वैकल्पिकतया अपनाओल जाय: भऽ गेल, भय गेल वा भए गेल। जा रहल अछि, जाय रहल अछि, जाए रहल अछि। कर’ गेलाह, वा करय गेलाह वा करए गेलाह।

३. प्राचीन मैथिलीक ‘न्ह’ ध्वनिक स्थानमे ‘न’ लिखल जाय सकैत अछि यथा कहलनि वा कहलन्हि।

४. ‘ऐ’ तथा ‘औ’ ततय लिखल जाय जत’ स्पष्टतः ‘अइ’ तथा ‘अउ’ सदृश उच्चारण इष्ट हो। यथा- देखैत, छलैक, बौआ, छौक इत्यादि।

५. मैथिलीक निम्नलिखित शब्द एहि रूपे प्रयुक्त होयत: जैह, सैह, इएह, ओऐह, लैह तथा दैह।

६. ह्र्स्व इकारांत शब्दमे ‘इ’ के लुप्त करब सामान्यतः अग्राह्य थिक। यथा- ग्राह्य देखि आबह, मालिनि गेलि (मनुष्य मात्रमे)।

७. स्वतंत्र ह्रस्व ‘ए’ वा ‘य’ प्राचीन मैथिलीक उद्धरण आदिमे तँ यथावत राखल जाय, किंतु आधुनिक प्रयोगमे वैकल्पिक रूपेँ ‘ए’ वा ‘य’ लिखल जाय। यथा:- कयल वा कएल, अयलाह वा अएलाह, जाय वा जाए इत्यादि।

८. उच्चारणमे दू स्वरक बीच जे ‘य’ ध्वनि स्वतः आबि जाइत अछि तकरा लेखमे स्थान वैकल्पिक रूपेँ देल जाय। यथा- धीआ, अढ़ैआ, विआह, वा धीया, अढ़ैया, बियाह।

९. सानुनासिक स्वतंत्र स्वरक स्थान यथासंभव ‘ञ’ लिखल जाय वा सानुनासिक स्वर। यथा:- मैञा, कनिञा, किरतनिञा वा मैआँ, कनिआँ, किरतनिआँ।

१०. कारकक विभक्त्तिक निम्नलिखित रूप ग्राह्य:- हाथकेँ, हाथसँ, हाथेँ, हाथक, हाथमे। ’मे’ मे अनुस्वार सर्वथा त्याज्य थिक। ‘क’ क वैकल्पिक रूप ‘केर’ राखल जा सकैत अछि।

११. पूर्वकालिक क्रियापदक बाद ‘कय’ वा ‘कए’ अव्यय वैकल्पिक रूपेँ लगाओल जा सकैत अछि। यथा:- देखि कय वा देखि कए।

१२. माँग, भाँग आदिक स्थानमे माङ, भाङ इत्यादि लिखल जाय।

१३. अर्द्ध ‘न’ ओ अर्द्ध ‘म’ क बदला अनुसार नहि लिखल जाय, किंतु छापाक सुविधार्थ अर्द्ध ‘ङ’ , ‘ञ’, तथा ‘ण’ क बदला अनुस्वारो लिखल जा सकैत अछि। यथा:- अङ्क, वा अंक, अञ्चल वा अंचल, कण्ठ वा कंठ।

१४. हलंत चिह्न निअमतः लगाओल जाय, किंतु विभक्तिक संग अकारांत प्रयोग कएल जाय। यथा:- श्रीमान्, किंतु श्रीमानक।

१५. सभ एकल कारक चिह्न शब्दमे सटा क’ लिखल जाय, हटा क’ नहि, संयुक्त विभक्तिक हेतु फराक लिखल जाय, यथा घर परक।

१६. अनुनासिककेँ चन्द्रबिन्दु द्वारा व्यक्त कयल जाय। परंतु मुद्रणक सुविधार्थ हि समान जटिल मात्रापर अनुस्वारक प्रयोग चन्द्रबिन्दुक बदला कयल जा सकैत अछि। यथा- हिँ केर बदला हिं।

१७. पूर्ण विराम पासीसँ ( । ) सूचित कयल जाय।

१८. समस्त पद सटा क’ लिखल जाय, वा हाइफेनसँ जोड़ि क’ ,  हटा क’ नहि।

१९. लिअ तथा दिअ शब्दमे बिकारी (ऽ) नहि लगाओल जाय।

२०. अंक देवनागरी रूपमे राखल जाय।

२१.किछु ध्वनिक लेल नवीन चिन्ह बनबाओल जाय। जा' ई नहि बनल अछि ताबत एहि दुनू ध्वनिक बदला पूर्ववत् अय/ आय/ अए/ आए/ आओ/ अओ लिखल जाय। आकि ऎ वा ऒ सँ व्यक्त कएल जाय।

ह./- गोविन्द झा ११/८/७६ श्रीकान्त ठाकुर ११/८/७६ सुरेन्द्र झा "सुमन" ११/०८/७६

  २. मैथिलीमे भाषा सम्पादन पाठ्यक्रम २.१. उच्चारण निर्देश: (बोल्ड कएल रूप ग्राह्य):- दन्त न क उच्चारणमे दाँतमे जीह सटत- जेना बाजू नाम , मुदा ण क उच्चारणमे जीह मूर्धामे सटत (नै सटैए तँ उच्चारण दोष अछि)- जेना बाजू गणेश। तालव्य शमे जीह तालुसँ , षमे मूर्धासँ आ दन्त समे दाँतसँ सटत। निशाँ, सभ आ शोषण बाजि कऽ देखू। मैथिलीमे ष केँ वैदिक संस्कृत जकाँ ख सेहो उच्चरित कएल जाइत अछि, जेना वर्षा, दोष। य अनेको स्थानपर ज जकाँ उच्चरित होइत अछि आ ण ड़ जकाँ (यथा संयोग आ गणेश संजोग आ गड़ेस उच्चरित होइत अछि)। मैथिलीमे व क उच्चारण ब, श क उच्चारण स आ य क उच्चारण ज सेहो होइत अछि। ओहिना ह्रस्व इ बेशीकाल मैथिलीमे पहिने बाजल जाइत अछि कारण देवनागरीमे आ मिथिलाक्षरमे ह्रस्व इ अक्षरक पहिने लिखलो जाइत आ बाजलो जएबाक चाही। कारण जे हिन्दीमे एकर दोषपूर्ण उच्चारण होइत अछि (लिखल तँ पहिने जाइत अछि मुदा बाजल बादमे जाइत अछि), से शिक्षा पद्धतिक दोषक कारण हम सभ ओकर उच्चारण दोषपूर्ण ढंगसँ कऽ रहल छी। अछि- अ इ छ  ऐछ (उच्चारण) छथि- छ इ थ  – छैथ (उच्चारण) पहुँचि- प हुँ इ च (उच्चारण) आब अ आ इ ई ए ऐ ओ औ अं अः ऋ ऐ सभ लेल मात्रा सेहो अछि, मुदा ऐमे ई ऐ ओ औ अं अः ऋ केँ संयुक्ताक्षर रूपमे गलत रूपमे प्रयुक्त आ उच्चरित कएल जाइत अछि। जेना ऋ केँ री  रूपमे उच्चरित करब। आ देखियौ- ऐ लेल देखिऔ क प्रयोग अनुचित। मुदा देखिऐ लेल देखियै अनुचित। क् सँ ह् धरि अ सम्मिलित भेलासँ क सँ ह बनैत अछि, मुदा उच्चारण काल हलन्त युक्त शब्दक अन्तक उच्चारणक प्रवृत्ति बढ़ल अछि, मुदा हम जखन मनोजमे ज् अन्तमे बजैत छी, तखनो पुरनका लोककेँ बजैत सुनबन्हि- मनोजऽ, वास्तवमे ओ अ युक्त ज् = ज बजै छथि। फेर ज्ञ अछि ज् आ ञ क संयुक्त मुदा गलत उच्चारण होइत अछि- ग्य। ओहिना क्ष अछि क् आ ष क संयुक्त मुदा उच्चारण होइत अछि छ। फेर श् आ र क संयुक्त अछि श्र ( जेना श्रमिक) आ स् आ र क संयुक्त अछि स्र (जेना मिस्र)। त्र भेल त+र । उच्चारणक ऑडियो फाइल विदेह आर्काइव  http://www.videha.co.in/ पर उपलब्ध अछि। फेर केँ / सँ / पर पूर्व अक्षरसँ सटा कऽ लिखू मुदा तँ / कऽ हटा कऽ। ऐमे सँ मे पहिल सटा कऽ लिखू आ बादबला हटा कऽ। अंकक बाद टा लिखू सटा कऽ मुदा अन्य ठाम टा लिखू हटा कऽ– जेना छहटा मुदा सभ टा। फेर ६अ म सातम लिखू- छठम सातम नै। घरबलामे बला मुदा घरवालीमे वाली प्रयुक्त करू। रहए- रहै मुदा सकैए (उच्चारण सकै-ए)। मुदा कखनो काल रहए आ रहै मे अर्थ भिन्नता सेहो, जेना से कम्मो जगहमे पार्किंग करबाक अभ्यास रहै ओकरा। पुछलापर पता लागल जे ढुनढुन नाम्ना ई ड्राइवर कनाट प्लेसक पार्किंगमे काज करैत रहए। छलै, छलए मे सेहो ऐ तरहक भेल। छलए क उच्चारण छल-ए सेहो। संयोगने- (उच्चारण संजोगने) केँ/  कऽ केर- क ( केर क प्रयोग गद्यमे नै करू , पद्यमे कऽ सकै छी। ) क (जेना रामक) –रामक आ संगे (उच्चारण राम के /  राम कऽ सेहो) सँ- सऽ (उच्चारण) चन्द्रबिन्दु आ अनुस्वार- अनुस्वारमे कंठ धरिक प्रयोग होइत अछि मुदा चन्द्रबिन्दुमे नै। चन्द्रबिन्दुमे कनेक एकारक सेहो उच्चारण होइत अछि- जेना रामसँ- (उच्चारण राम सऽ)  रामकेँ- (उच्चारण राम कऽ/ राम के सेहो)। केँ जेना रामकेँ भेल हिन्दीक को (राम को)- राम को= रामकेँ क जेना रामक भेल हिन्दीक का ( राम का) राम का= रामक कऽ जेना जा कऽ भेल हिन्दीक कर ( जा कर) जा कर= जा कऽ सँ भेल हिन्दीक से (राम से) राम से= रामसँ सऽ , तऽ , त , केर (गद्यमे) एे चारू शब्द सबहक प्रयोग अवांछित। के दोसर अर्थेँ प्रयुक्त भऽ सकैए- जेना, के कहलक? विभक्ति “क”क बदला एकर प्रयोग अवांछित। नञि, नहि, नै, नइ, नँइ, नइँ, नइं ऐ सभक उच्चारण आ लेखन - नै त्त्व क बदलामे त्व जेना महत्वपूर्ण (महत्त्वपूर्ण नै) जतए अर्थ बदलि जाए ओतहि मात्र तीन अक्षरक संयुक्ताक्षरक प्रयोग उचित। सम्पति- उच्चारण स म्प इ त (सम्पत्ति नै- कारण सही उच्चारण आसानीसँ सम्भव नै)। मुदा सर्वोत्तम (सर्वोतम नै)। राष्ट्रिय (राष्ट्रीय नै) सकैए/ सकै (अर्थ परिवर्तन) पोछैले/ पोछै लेल/ पोछए लेल पोछैए/ पोछए/ (अर्थ परिवर्तन) पोछए/ पोछै ओ लोकनि ( हटा कऽ, ओ मे बिकारी नै) ओइ/ ओहि ओहिले/ ओहि लेल/ ओही लऽ जएबेँ/ बैसबेँ पँचभइयाँ देखियौक/ (देखिऔक नै- तहिना अ मे ह्रस्व आ दीर्घक मात्राक प्रयोग अनुचित) जकाँ / जेकाँ तँइ/ तैँ/ होएत / हएत नञि/ नहि/ नँइ/ नइँ/ नै सौँसे/ सौंसे बड़ / बड़ी (झोराओल) गाए (गाइ नहि), मुदा गाइक दूध (गाएक दूध नै।) रहलेँ/ पहिरतैँ हमहीं/ अहीं सब - सभ सबहक - सभहक धरि - तक गप- बात बूझब - समझब बुझलौं/ समझलौं/ बुझलहुँ - समझलहुँ हमरा आर - हम सभ आकि- आ कि सकैछ/ करैछ (गद्यमे प्रयोगक आवश्यकता नै) होइन/ होनि जाइन (जानि नै, जेना देल जाइन) मुदा जानि-बूझि (अर्थ परिव्र्तन) पइठ/ जाइठ आउ/ जाउ/ आऊ/ जाऊ मे, केँ, सँ, पर (शब्दसँ सटा कऽ) तँ कऽ धऽ दऽ (शब्दसँ हटा कऽ) मुदा दूटा वा बेसी विभक्ति संग रहलापर पहिल विभक्ति टाकेँ सटाऊ। जेना ऐमे सँ । एकटा , दूटा (मुदा कए टा) बिकारीक प्रयोग शब्दक अन्तमे, बीचमे अनावश्यक रूपेँ नै। आकारान्त आ अन्तमे अ क बाद बिकारीक प्रयोग नै (जेना दिअ , आ/ दिय’ , आ’, आ नै ) अपोस्ट्रोफीक प्रयोग बिकारीक बदलामे करब अनुचित आ मात्र फॉन्टक तकनीकी न्यूनताक परिचायक)- ओना बिकारीक संस्कृत रूप ऽ अवग्रह कहल जाइत अछि आ वर्तनी आ उच्चारण दुनू ठाम एकर लोप रहैत अछि/ रहि सकैत अछि (उच्चारणमे लोप रहिते अछि)। मुदा अपोस्ट्रोफी सेहो अंग्रेजीमे पसेसिव केसमे होइत अछि आ फ्रेंचमे शब्दमे जतए एकर प्रयोग होइत अछि जेना raison d’etre एतए सेहो एकर उच्चारण रैजौन डेटर होइत अछि, माने अपोस्ट्रॉफी अवकाश नै दैत अछि वरन जोड़ैत अछि, से एकर प्रयोग बिकारीक बदला देनाइ तकनीकी रूपेँ सेहो अनुचित)। अइमे, एहिमे/ ऐमे जइमे, जाहिमे एखन/ अखन/ अइखन केँ (के नहि) मे (अनुस्वार रहित) भऽ मे दऽ तँ (तऽ, त नै) सँ ( सऽ स नै) गाछ तर गाछ लग साँझ खन जो (जो go, करै जो do) तै/तइ जेना- तै दुआरे/ तइमे/ तइले जै/जइ जेना- जै कारण/ जइसँ/ जइले ऐ/अइ जेना- ऐ कारण/ ऐसँ/ अइले/ मुदा एकर एकटा खास प्रयोग- लालति‍ कतेक दि‍नसँ कहैत रहैत अइ लै/लइ जेना लैसँ/ लइले/ लै दुआरे लहँ/ लौं गेलौं/ लेलौं/ लेलँह/ गेलहुँ/ लेलहुँ/ लेलँ जइ/ जाहि‍/ जै जहि‍ठाम/ जाहि‍ठाम/ जइठाम/ जैठाम एहि‍/ अहि‍/ अइ (वाक्यक अंतमे ग्राह्य) / ऐ अइछ/ अछि‍/ ऐछ तइ/ तहि‍/ तै/ ताहि‍ ओहि‍/ ओइ सीखि‍/ सीख जीवि‍/ जीवी/ जीब भलेहीं/ भलहि‍ं तैं/ तँइ/ तँए जाएब/ जएब लइ/ लै छइ/ छै नहि‍/ नै/ नइ गइ/ गै छनि‍/ छन्‍हि‍  ... समए शब्‍दक संग जखन कोनो वि‍भक्‍ति‍ जुटै छै तखन समै जना समैपर इत्‍यादि‍। असगरमे हृदए आ वि‍भक्‍ति‍ जुटने हृदे जना हृदेसँ, हृदेमे इत्‍यादि‍। जइ/ जाहि‍/ जै जहि‍ठाम/ जाहि‍ठाम/ जइठाम/ जैठाम एहि‍/ अहि‍/ अइ/ ऐ अइछ/ अछि‍/ ऐछ तइ/ तहि‍/ तै/ ताहि‍ ओहि‍/ ओइ सीखि‍/ सीख जीवि‍/ जीवी/ जीब भले/ भलेहीं/ भलहि‍ं तैं/ तँइ/ तँए जाएब/ जएब लइ/ लै छइ/ छै नहि‍/ नै/ नइ गइ/ गै छनि‍/ छन्‍हि‍ चुकल अछि/ गेल गछि २.२. मैथिलीमे भाषा सम्पादन पाठ्यक्रम नीचाँक सूचीमे देल विकल्पमेसँ लैंगुएज एडीटर द्वारा कोन रूप चुनल जेबाक चाही: बोल्ड कएल रूप ग्राह्य: १.होयबला/ होबयबला/ होमयबला/ हेब’बला, हेम’बला/ होयबाक/होबएबला /होएबाक २. आ’/आऽ आ ३. क’ लेने/कऽ लेने/कए लेने/कय लेने/ल’/लऽ/लय/लए ४. भ’ गेल/भऽ गेल/भय गेल/भए गेल ५. कर’ गेलाह/करऽ गेलह/करए गेलाह/करय गेलाह ६. लिअ/दिअ लिय’,दिय’,लिअ’,दिय’/ ७. कर’ बला/करऽ बला/ करय बला करैबला/क’र’ बला / करैवाली ८. बला वला (पुरूष), वाली (स्‍त्री) ९ . आङ्ल आंग्ल १०. प्रायः प्रायह ११. दुःख दुख १ २. चलि गेल चल गेल/चैल गेल १३. देलखिन्ह देलकिन्ह, देलखिन १४. देखलन्हि देखलनि/ देखलैन्ह १५. छथिन्ह/ छलन्हि छथिन/ छलैन/ छलनि १६. चलैत/दैत चलति/दैति १७. एखनो अखनो १८. बढ़नि‍ बढ़इन बढ़न्हि १९. ओ’/ओऽ(सर्वनाम) ओ २० . ओ (संयोजक) ओ’/ओऽ २१. फाँगि/फाङ्गि फाइंग/फाइङ २२. जे जे’/जेऽ २३. ना-नुकुर ना-नुकर २४. केलन्हि/केलनि‍/कयलन्हि २५. तखनतँ/ तखन तँ २६. जा रहल/जाय रहल/जाए रहल २७. निकलय/निकलए लागल/ लगल बहराय/ बहराए लागल/ लगल निकल’/बहरै लागल २८. ओतय/ जतय जत’/ ओत’/ जतए/ ओतए २९. की फूरल जे कि फूरल जे ३०. जे जे’/जेऽ ३१. कूदि / यादि(मोन पारब) कूइद/याइद/कूद/याद/ यादि (मोन) ३२. इहो/ ओहो ३३. हँसए/ हँसय हँसऽ ३४. नौ आकि दस/नौ किंवा दस/ नौ वा दस ३५. सासु-ससुर सास-ससुर ३६. छह/ सात छ/छः/सात ३७. की  की’/ कीऽ (दीर्घीकारान्तमे ऽ वर्जित) ३८. जबाब जवाब ३९. करएताह/ करेताह करयताह ४०. दलान दिशि दलान दिश/दलान दिस ४१ . गेलाह गएलाह/गयलाह ४२. किछु आर/ किछु और/ किछ आर ४३. जाइ छल/ जाइत छल जाति छल/जैत छल ४४. पहुँचि/ भेट जाइत छल/ भेट जाइ छलए पहुँच/ भेटि‍ जाइत छल ४५. जबान (युवा)/ जवान(फौजी) ४६. लय/ लए क’/ कऽ/ लए कए / लऽ कऽ/ लऽ कए ४७. ल’/लऽ कय/ कए ४८. एखन / एखने / अखन / अखने ४९. अहींकेँ अहीँकेँ ५०. गहींर गहीँर ५१. धार पार केनाइ धार पार केनाय/केनाए ५२. जेकाँ जेँकाँ/ जकाँ ५३. तहिना तेहिना ५४. एकर अकर ५५. बहिनउ बहनोइ ५६. बहिन बहिनि ५७. बहिन-बहिनोइ बहिन-बहनउ ५८. नहि/ नै ५९. करबा / करबाय/ करबाए ६०. तँ/ त ऽ तय/तए ६१. भैयारी मे छोट-भाए/भै/, जेठ-भाय/भाइ, ६२. गि‍नतीमे दू भाइ/भाए/भाँइ ६३. ई पोथी दू भाइक/ भाँइ/ भाए/ लेल। यावत जावत ६४. माय मै / माए मुदा माइक ममता ६५. देन्हि/ दइन दनि‍/ दएन्हि/ दयन्हि दन्हि/ दैन्हि ६६. द’/ दऽ/ दए ६७. ओ (संयोजक) ओऽ (सर्वनाम) ६८. तका कए तकाय तकाए ६९. पैरे (on foot) पएरे  कएक/ कैक ७०. ताहुमे/ ताहूमे ७१. पुत्रीक ७२. बजा कय/ कए / कऽ ७३. बननाय/बननाइ ७४. कोला ७५. दिनुका दिनका ७६. ततहिसँ ७७. गरबओलन्हि/ गरबौलनि‍/ गरबेलन्हि/ गरबेलनि‍ ७८. बालु बालू ७९. चेन्ह चिन्ह(अशुद्ध) ८०. जे जे’ ८१ . से/ के से’/के’ ८२. एखुनका अखनुका ८३. भुमिहार भूमिहार ८४. सुग्गर / सुगरक/ सूगर ८५. झठहाक झटहाक ८६. छूबि ८७. करइयो/ओ करैयो ने देलक /करियौ-करइयौ ८८. पुबारि पुबाइ ८९. झगड़ा-झाँटी झगड़ा-झाँटि ९०. पएरे-पएरे पैरे-पैरे ९१. खेलएबाक ९२. खेलेबाक ९३. लगा ९४. होए- हो – होअए ९५. बुझल बूझल ९६. बूझल (संबोधन अर्थमे) ९७. यैह यएह / इएह/ सैह/ सएह ९८. तातिल ९९. अयनाय- अयनाइ/ अएनाइ/ एनाइ १००. निन्न- निन्द १०१. बिनु बिन १०२. जाए जाइ १०३. जाइ (in different sense)-last word of sentence १०४. छत पर आबि जाइ १०५. ने १०६. खेलाए (play) –खेलाइ १०७. शिकाइत- शिकायत १०८. ढप- ढ़प १०९ . पढ़- पढ ११०. कनिए/ कनिये कनिञे १११. राकस- राकश ११२. होए/ होय होइ ११३. अउरदा- औरदा ११४. बुझेलन्हि (different meaning- got understand) ११५. बुझएलन्हि/बुझेलनि‍/ बुझयलन्हि (understood himself) ११६. चलि- चल/ चलि‍ गेल ११७. खधाइ- खधाय ११८. मोन पाड़लखिन्ह/ मोन पाड़लखि‍न/ मोन पारलखिन्ह ११९. कैक- कएक- कइएक १२०. लग ल’ग १२१. जरेनाइ १२२. जरौनाइ जरओनाइ- जरएनाइ/ जरेनाइ १२३. होइत १२४. गरबेलन्हि/ गरबेलनि‍ गरबौलन्हि/ गरबौलनि‍ १२५. चिखैत- (to test)चिखइत १२६. करइयो (willing to do) करैयो १२७. जेकरा- जकरा १२८. तकरा- तेकरा १२९. बिदेसर स्थानेमे/ बिदेसरे स्थानमे १३०. करबयलहुँ/ करबएलहुँ/ करबेलहुँ करबेलौं १३१. हारिक (उच्चारण हाइरक) १३२. ओजन वजन आफसोच/ अफसोस कागत/ कागच/ कागज १३३. आधे भाग/ आध-भागे १३४. पिचा / पिचाय/पिचाए १३५. नञ/ ने १३६. बच्चा नञ (ने) पिचा जाय १३७. तखन ने (नञ) कहैत अछि। कहै/ सुनै/ देखै छल मुदा कहैत-कहैत/ सुनैत-सुनैत/ देखैत-देखैत १३८. कतेक गोटे/ कताक गोटे १३९. कमाइ-धमाइ/ कमाई- धमाई १४० . लग ल’ग १४१. खेलाइ (for playing) १४२. छथिन्ह/ छथिन १४३. होइत होइ १४४. क्यो कियो / केओ १४५. केश (hair) १४६. केस (court-case) १४७ . बननाइ/ बननाय/ बननाए १४८. जरेनाइ १४९. कुरसी कुर्सी १५०. चरचा चर्चा १५१. कर्म करम १५२. डुबाबए/ डुबाबै/ डुमाबै डुमाबय/ डुमाबए १५३. एखुनका/ अखुनका १५४. लए/ लिअए (वाक्यक अंतिम शब्द)- लऽ १५५. कएलक/ केलक १५६. गरमी गर्मी १५७ . वरदी वर्दी १५८. सुना गेलाह सुना’/सुनाऽ १५९. एनाइ-गेनाइ १६०. तेना ने घेरलन्हि/ तेना ने घेरलनि‍ १६१. नञि / नै १६२. डरो ड’रो १६३. कतहु/ कतौ कहीं १६४. उमरिगर-उमेरगर उमरगर १६५. भरिगर १६६. धोल/धोअल धोएल १६७. गप/गप्प १६८. के के’ १६९. दरबज्जा/ दरबजा १७०. ठाम १७१. धरि तक १७२. घूरि लौटि १७३. थोरबेक १७४. बड्ड १७५. तोँ/ तूँ १७६. तोँहि( पद्यमे ग्राह्य) १७७. तोँही / तोँहि १७८. करबाइए करबाइये १७९. एकेटा १८०. करितथि /करतथि १८१. पहुँचि/ पहुँच १८२. राखलन्हि रखलन्हि/ रखलनि‍ १८३. लगलन्हि/ लगलनि‍ लागलन्हि १८४. सुनि (उच्चारण सुइन) १८५. अछि (उच्चारण अइछ) १८६. एलथि गेलथि १८७. बितओने/ बि‍तौने/ बितेने १८८. करबओलन्हि/ करबौलनि‍/ करेलखिन्ह/ करेलखि‍न १८९. करएलन्हि/ करेलनि‍ १९०. आकि/ कि १९१. पहुँचि/ पहुँच १९२. बत्ती जराय/ जराए जरा (आगि लगा) १९३. से से’ १९४. हाँ मे हाँ (हाँमे हाँ विभक्त्तिमे हटा कए) १९५. फेल फैल १९६. फइल(spacious) फैल १९७. होयतन्हि/ होएतन्हि/ होएतनि‍/हेतनि‍/ हेतन्हि १९८. हाथ मटिआएब/ हाथ मटियाबय/हाथ मटियाएब १९९. फेका फेंका २००. देखाए देखा २०१. देखाबए २०२. सत्तरि सत्तर २०३. साहेब साहब २०४.गेलैन्ह/ गेलन्हि/ गेलनि‍ २०५. हेबाक/ होएबाक २०६.केलो/ कएलहुँ/केलौं/ केलुँ २०७. किछु न किछु/ किछु ने किछु २०८.घुमेलहुँ/ घुमओलहुँ/ घुमेलौं २०९. एलाक/ अएलाक २१०. अः/ अह २११.लय/ लए (अर्थ-परिवर्त्तन) २१२.कनीक/ कनेक २१३.सबहक/ सभक २१४.मिलाऽ/ मिला २१५.कऽ/ क २१६.जाऽ/ जा २१७.आऽ/ आ २१८.भऽ /भ’ (’ फॉन्टक कमीक द्योतक) २१९.निअम/ नियम २२० .हेक्टेअर/ हेक्टेयर २२१.पहिल अक्षर ढ/ बादक/ बीचक ढ़ २२२.तहिं/तहिँ/ तञि/ तैं २२३.कहिं/ कहीं २२४.तँइ/ तैं / तइँ २२५.नँइ/ नइँ/  नञि/ नहि/नै २२६.है/ हए / एलीहेँ/ २२७.छञि/ छै/ छैक /छइ २२८.दृष्टिएँ/ दृष्टियेँ २२९.आ (come)/ आऽ(conjunction) २३०. आ (conjunction)/ आऽ(come) २३१.कुनो/ कोनो, कोना/केना २३२.गेलैन्ह-गेलन्हि-गेलनि‍ २३३.हेबाक- होएबाक २३४.केलौँ- कएलौँ-कएलहुँ/केलौं २३५.किछु न किछ- किछु ने किछु २३६.केहेन- केहन २३७.आऽ (come)-आ (conjunction-and)/आ। आब'-आब' /आबह-आबह २३८. हएत-हैत २३९.घुमेलहुँ-घुमएलहुँ- घुमेलाें २४०.एलाक- अएलाक २४१.होनि- होइन/ होन्हि/ २४२.ओ-राम ओ श्यामक बीच(conjunction), ओऽ कहलक (he said)/ओ २४३.की हए/ कोसी अएली हए/ की है। की हइ २४४.दृष्टिएँ/ दृष्टियेँ २४५ .शामिल/ सामेल २४६.तैँ / तँए/ तञि/ तहिं २४७.जौं / ज्योँ/ जँ/ २४८.सभ/ सब २४९.सभक/ सबहक २५०.कहिं/ कहीं २५१.कुनो/ कोनो/ कोनहुँ/ २५२.फारकती भऽ गेल/ भए गेल/ भय गेल २५३.कोना/ केना/ कन्‍ना/कना २५४.अः/ अह २५५.जनै/ जनञ २५६.गेलनि‍/ गेलाह (अर्थ परिवर्तन) २५७.केलन्हि/ कएलन्हि/ केलनि‍/ २५८.लय/ लए/ लएह (अर्थ परिवर्तन) २५९.कनीक/ कनेक/कनी-मनी २६०.पठेलन्हि‍ पठेलनि‍/ पठेलइन/ पपठओलन्हि/ पठबौलनि‍/ २६१.निअम/ नियम २६२.हेक्टेअर/ हेक्टेयर २६३.पहिल अक्षर रहने ढ/ बीचमे रहने ढ़ २६४.आकारान्तमे बिकारीक प्रयोग उचित नै/ अपोस्ट्रोफीक प्रयोग फान्टक तकनीकी न्यूनताक परिचायक ओकर बदला अवग्रह (बिकारी) क प्रयोग उचित २६५.केर (पद्यमे ग्राह्य) / -क/ कऽ/ के २६६.छैन्हि- छन्हि २६७.लगैए/ लगैये २६८.होएत/ हएत २६९.जाएत/ जएत/ २७०.आएत/ अएत/ आओत २७१ .खाएत/ खएत/ खैत २७२.पिअएबाक/ पिएबाक/पि‍येबाक २७३.शुरु/ शुरुह २७४.शुरुहे/ शुरुए २७५.अएताह/अओताह/ एताह/ औताह २७६.जाहि/ जाइ/ जइ/ जै/ २७७.जाइत/ जैतए/ जइतए २७८.आएल/ अएल २७९.कैक/ कएक २८०.आयल/ अएल/ आएल २८१. जाए/ जअए/ जए (लालति‍ जाए लगलीह।) २८२. नुकएल/ नुकाएल २८३. कठुआएल/ कठुअएल २८४. ताहि/ तै/ तइ २८५. गायब/ गाएब/ गएब २८६. सकै/ सकए/ सकय २८७.सेरा/सरा/ सराए (भात सरा गेल) २८८.कहैत रही/देखैत रही/ कहैत छलौं/ कहै छलौं- अहिना चलैत/ पढ़ैत (पढ़ै-पढ़ैत अर्थ कखनो काल परिवर्तित) - आर बुझै/ बुझैत (बुझै/ बुझै छी, मुदा बुझैत-बुझैत)/ सकैत/ सकै। करैत/ करै। दै/ दैत। छैक/ छै। बचलै/ बचलैक। रखबा/ रखबाक । बिनु/ बिन। रातिक/ रातुक बुझै आ बुझैत केर अपन-अपन जगहपर प्रयोग समीचीन अछि‍। बुझैत-बुझैत आब बुझलि‍ऐ। हमहूँ बुझै छी। २८९. दुआरे/ द्वारे २९०.भेटि/ भेट/ भेँट २९१. खन/ खीन/  खुना (भोर खन/ भोर खीन) २९२.तक/ धरि २९३.गऽ/ गै (meaning different-जनबै गऽ) २९४.सऽ/ सँ (मुदा दऽ, लऽ) २९५.त्त्व,(तीन अक्षरक मेल बदला पुनरुक्तिक एक आ एकटा दोसरक उपयोग) आदिक बदला त्व आदि। महत्त्व/ महत्व/ कर्ता/ कर्त्ता आदिमे त्त संयुक्तक कोनो आवश्यकता मैथिलीमे नै अछि। वक्तव्य २९६.बेसी/ बेशी २९७.बाला/वाला बला/ वला (रहैबला) २९८ .वाली/ (बदलैवाली) २९९.वार्त्ता/ वार्ता ३००. अन्तर्राष्ट्रिय/ अन्तर्राष्ट्रीय ३०१. लेमए/ लेबए ३०२.लमछुरका, नमछुरका ३०२.लागै/ लगै ( भेटैत/ भेटै) ३०३.लागल/ लगल ३०४.हबा/ हवा ३०५.राखलक/ रखलक ३०६.आ (come)/ आ (and) ३०७. पश्चाताप/ पश्चात्ताप ३०८. ऽ केर व्यवहार शब्दक अन्तमे मात्र, यथासंभव बीचमे नै। ३०९.कहैत/ कहै ३१०. रहए (छल)/ रहै (छलै) (meaning different) ३११.तागति/ ताकति ३१२.खराप/ खराब ३१३.बोइन/ बोनि/ बोइनि ३१४.जाठि/ जाइठ ३१५.कागज/ कागच/ कागत ३१६.गिरै (meaning different- swallow)/ गिरए (खसए) ३१७.राष्ट्रिय/ राष्ट्रीय DATE-LIST (year- 2012-13) (१४२० फसली साल) Marriage Days: Nov.2012- 25, 26, 28, 29, 30 Dec.2012- 5,9, 10, 13, 14 January 2013- 16, 17, 18, 23, 24, 31 Feb.2013- 1, 3, 4, 6, 8, 10, 14, 15, 18, 20, 24, 25 April 2013- 21, 22, 24, 26, 29 May 2013- 1,2,3,5,6,9,12,13,17,19,20,22,23,24,26,27,29,30,31 June 2013- 2,3 July 2013- 11, 14, 15 Upanayana Days: January 2013- 16 February 2013- 14, 15, 20, 21 April 2013- 22 May 2013- 20, 21 Dviragaman Din: November 2012- 25, 26, 28, 29 December 2012- 2, 3, 14 February 2013- 14, 15, 18, 20, 21, 22, 27, 28 March 2013- 1 April 2013- 18, 22, 24, 26, 28, 29 May 2013- 12, 13 Mundan Din: November 2012- 26, 30 December 2012- 3 January 2013- 18, 24 February 2013- 1, 14, 15, 20, 28 April 2013- 17 May 2013- 13, 23, 29 June 2013- 13, 19, 26, 27, 28 July 2013- 10, 15 FESTIVALS OF MITHILA (2012-13) Mauna Panchami-08 July Madhushravani- 22 July Nag Panchami- 24 July Raksha Bandhan- 02 Aug Krishnastami- 10 August Kushi Amavasya / Somvari Vrat- 17 August Vishwakarma Pooja- 17 September Hartalika Teej- 18 September ChauthChandra-19 September Karma Dharma Ekadashi-26 September Indra Pooja Aarambh- 27 September Anant Caturdashi- 29 Sep Agastyarghadaan- 30 Sep Pitri Paksha begins- 30 Sep Jimootavahan Vrata/ Jitia-08 October Matri Navami- 09 October SomvatiAmavasya Vrat- 15 October Kalashsthapan- 16 October Belnauti- 20 October Patrika Pravesh- 21 October Mahastami- 22 October Maha Navami - 23 October Vijaya Dashami- 24 October Kojagara- 29 Oct Dhanteras- 11 November Diyabati, shyama pooja-13 November Annakoota/ Govardhana Pooja-14 November Bhratridwitiya/ Chitragupta Pooja- 15 November Chhathi -19 November Devotthan Ekadashi- 24 November ravivratarambh- 25 November Navanna parvan- 25 November KartikPoornima- Sama Visarjan- 28 November Vivaha Panchmi- 17 December Makara/ Teela Sankranti-14 Jan Naraknivaran chaturdashi- 08 February Basant Panchami/ Saraswati Pooja- 15 February Achla Saptmi- 17 February Mahashivaratri-10 March Holikadahan-Fagua-26 March Holi- 28 March Varuni Trayodashi-07 April Chaiti  navaratrarambh- 11 April Jurishital-15 April Chaiti Chhathi vrata-16 April Ram Navami- 19 April Ravi Brat Ant- 12 May Akshaya Tritiya-13 May Janaki Navami- 19 May Vat Savitri-barasait- 08 June Ganga Dashhara-18 June Somavati Amavasya Vrata- 08 July Jagannath Rath Yatra- 10 July Hari Sayan Ekadashi- 19 July Aashadhi Guru Poornima-22 Jul VIDEHA ARCHIVE १.विदेह ई-पत्रिकाक सभटा पुरान अंक ब्रेल, तिरहुता आ देवनागरी रूपमे Videha e journal's all old issues in Braille Tirhuta and Devanagari versions विदेह ई-पत्रिकाक पहिल ५० अंक

विदेह ई-पत्रिकाक ५०म सँ आगाँक अंक २.मैथिली पोथी डाउनलोड Maithili Books Download ३.मैथिली ऑडियो संकलन Maithili Audio Downloads ४.मैथिली वीडियोक संकलन Maithili Videos ५.मिथिला चित्रकला/ आधुनिक चित्रकला आ चित्र Mithila Painting/ Modern Art and Photos "विदेह"क एहि सभ सहयोगी लिंकपर सेहो एक बेर जाउ। ६.विदेह मैथिली क्विज  :  http://videhaquiz.blogspot.com/ ७.विदेह मैथिली जालवृत्त एग्रीगेटर : http://videha-aggregator.blogspot.com/ ८.विदेह मैथिली साहित्य अंग्रेजीमे अनूदित http://madhubani-art.blogspot.com/ ९.विदेहक पूर्व-रूप "भालसरिक गाछ"  : http://gajendrathakur.blogspot.com/ १०.विदेह इंडेक्स  : http://videha123.blogspot.com/ ११.विदेह फाइल : http://videha123.wordpress.com/ १२. विदेह: सदेह : पहिल तिरहुता (मिथिला़क्षर) जालवृत्त (ब्लॉग) http://videha-sadeha.blogspot.com/ १३. विदेह:ब्रेल: मैथिली ब्रेलमे: पहिल बेर विदेह द्वारा http://videha-braille.blogspot.com/ १४.VIDEHA IST MAITHILI  FORTNIGHTLY EJOURNAL ARCHIVE http://videha-archive.blogspot.com/ १५. विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका मैथिली पोथीक आर्काइव http://videha-pothi.blogspot.com/ १६. विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका ऑडियो आर्काइव http://videha-audio.blogspot.com/ १७. विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका वीडियो आर्काइव http://videha-video.blogspot.com/ १८. विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका मिथिला चित्रकला, आधुनिक कला आ चित्रकला http://videha-paintings-photos.blogspot.com/ १९. मैथिल आर मिथिला (मैथिलीक सभसँ लोकप्रिय जालवृत्त) http://maithilaurmithila.blogspot.com/ २०.श्रुति प्रकाशन http://www.shruti-publication.com/ २१.http://groups.google.com/group/videha २२.http://groups.yahoo.com/group/VIDEHA/ २३.गजेन्द्र ठाकुर इ‍डेक्स http://gajendrathakur123.blogspot.com २४. नेना भुटका http://mangan-khabas.blogspot.com/ २५.विदेह रेडियो:मैथिली कथा-कविता आदिक पहिल पोडकास्ट साइट http://videha123radio.wordpress.com/ २६.Videha Radio २७. Join official Videha facebook group. २८. विदेह मैथिली नाट्य उत्सव http://maithili-drama.blogspot.com/ २९.समदिया http://esamaad.blogspot.com/ ३०. मैथिली फिल्म्स http://maithilifilms.blogspot.com/ ३१.अनचिन्हार आखर http://anchinharakharkolkata.blogspot.com/ ३२. मैथिली हाइकू http://maithili-haiku.blogspot.com/ ३३. मानक मैथिली http://manak-maithili.blogspot.com/ ३४. विहनि कथा http://vihanikatha.blogspot.in/ ३५. मैथिली कविता http://maithili-kavita.blogspot.in/ ३६. मैथिली कथा http://maithili-katha.blogspot.in/ ३७.मैथिली समालोचना http://maithili-samalochna.blogspot.in/ महत्त्वपूर्ण सूचना:(१) 'विदेह' द्वारा धारावाहिक रूपे ई-प्रकाशित कएल गेल गजेन्द्र ठाकुरक  निबन्ध-प्रबन्ध-समीक्षा, उपन्यास (सहस्रबाढ़नि) , पद्य-संग्रह (सहस्राब्दीक चौपड़पर), कथा-गल्प (गल्प-गुच्छ), नाटक(संकर्षण), महाकाव्य (त्वञ्चाहञ्च आ असञ्जाति मन) आ बाल-किशोर साहित्य विदेहमे संपूर्ण ई-प्रकाशनक बाद प्रिंट फॉर्ममे। कुरुक्षेत्रम्–अन्तर्मनक खण्ड-१ सँ ७ Combined ISBN No.978-81-907729-7-6 विवरण एहि पृष्ठपर नीचाँमे आ प्रकाशकक साइट http://www.shruti-publication.com/ पर । महत्त्वपूर्ण सूचना (२):सूचना: विदेहक मैथिली-अंग्रेजी आ अंग्रेजी मैथिली कोष (इंटरनेटपर पहिल बेर सर्च-डिक्शनरी) एम.एस. एस.क्यू.एल. सर्वर आधारित -Based on ms-sql server Maithili-English and English-Maithili Dictionary. विदेहक भाषापाक- रचनालेखन स्तंभमे। कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक- गजेन्द्र ठाकुर गजेन्द्र ठाकुरक निबन्ध-प्रबन्ध-समीक्षा, उपन्यास (सहस्रबाढ़नि) , पद्य-संग्रह (सहस्राब्दीक चौपड़पर), कथा-गल्प (गल्प गुच्छ), नाटक(संकर्षण), महाकाव्य (त्वञ्चाहञ्च आ असञ्जाति मन) आ बालमंडली-किशोरजगत विदेहमे संपूर्ण ई-प्रकाशनक बाद प्रिंट फॉर्ममे। कुरुक्षेत्रम्–अन्तर्मनक, खण्ड-१ सँ ७ Ist edition 2009 of Gajendra Thakur’s KuruKshetram-Antarmanak (Vol. I to VII)- essay-paper-criticism, novel, poems, story, play, epics and Children-grown-ups literature in single binding: Language:Maithili ६९२ पृष्ठ : मूल्य भा. रु. 100/-(for individual buyers inside india) (add courier charges Rs.50/-per copy for Delhi/NCR and Rs.100/- per copy for outside Delhi)

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Details for purchase available at print-version publishers's site website: http://www.shruti-publication.com/ or you may write to e-mail:shruti.publication@shruti-publication.com विदेह: सदेह : १: २: ३: ४ तिरहुता : देवनागरी "विदेह" क, प्रिंट संस्करण :विदेह-ई-पत्रिका (http://www.videha.co.in/) क चुनल रचना सम्मिलित। विदेह:सदेह:१: २: ३: ४ सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। Details for purchase available at print-version publishers's site http://www.shruti-publication.com  or you may write to shruti.publication@shruti-publication.com २. संदेश- [ विदेह ई-पत्रिका, विदेह:सदेह मिथिलाक्षर आ देवनागरी आ गजेन्द्र ठाकुरक सात खण्डक- निबन्ध-प्रबन्ध-समीक्षा,उपन्यास (सहस्रबाढ़नि) , पद्य-संग्रह (सहस्राब्दीक चौपड़पर), कथा-गल्प (गल्प गुच्छ), नाटक (संकर्षण), महाकाव्य (त्वञ्चाहञ्च आ असञ्जाति मन) आ बाल-मंडली-किशोर जगत- संग्रह कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक मादेँ। ] १.श्री गोविन्द झा- विदेहकेँ तरंगजालपर उतारि विश्वभरिमे मातृभाषा मैथिलीक लहरि जगाओल, खेद जे अपनेक एहि महाभियानमे हम एखन धरि संग नहि दए सकलहुँ। सुनैत छी अपनेकेँ सुझाओ आ रचनात्मक आलोचना प्रिय लगैत अछि तेँ किछु लिखक मोन भेल। हमर सहायता आ सहयोग अपनेकेँ सदा उपलब्ध रहत। २.श्री रमानन्द रेणु- मैथिलीमे ई-पत्रिका पाक्षिक रूपेँ चला कऽ जे अपन मातृभाषाक प्रचार कऽ रहल छी, से धन्यवाद । आगाँ अपनेक समस्त मैथिलीक कार्यक हेतु हम हृदयसँ शुभकामना दऽ रहल छी। ३.श्री विद्यानाथ झा "विदित"- संचार आ प्रौद्योगिकीक एहि प्रतिस्पर्धी ग्लोबल युगमे अपन महिमामय "विदेह"केँ अपना देहमे प्रकट देखि जतबा प्रसन्नता आ संतोष भेल, तकरा कोनो उपलब्ध "मीटर"सँ नहि नापल जा सकैछ? ..एकर ऐतिहासिक मूल्यांकन आ सांस्कृतिक प्रतिफलन एहि शताब्दीक अंत धरि लोकक नजरिमे आश्चर्यजनक रूपसँ प्रकट हैत। ४. प्रो. उदय नारायण सिंह "नचिकेता"- जे काज अहाँ कए रहल छी तकर चरचा एक दिन मैथिली भाषाक इतिहासमे होएत। आनन्द भए रहल अछि, ई जानि कए जे एतेक गोट मैथिल "विदेह" ई जर्नलकेँ पढ़ि रहल छथि।...विदेहक चालीसम अंक पुरबाक लेल अभिनन्दन। ५. डॉ. गंगेश गुंजन- एहि विदेह-कर्ममे लागि रहल अहाँक सम्वेदनशील मन, मैथिलीक प्रति समर्पित मेहनतिक अमृत रंग, इतिहास मे एक टा विशिष्ट फराक अध्याय आरंभ करत, हमरा विश्वास अछि। अशेष शुभकामना आ बधाइक सङ्ग, सस्नेह...अहाँक पोथी कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक प्रथम दृष्टया बहुत भव्य तथा उपयोगी बुझाइछ। मैथिलीमे तँ अपना स्वरूपक प्रायः ई पहिले एहन  भव्य अवतारक पोथी थिक। हर्षपूर्ण हमर हार्दिक बधाई स्वीकार करी। ६. श्री रामाश्रय झा "रामरंग"(आब स्वर्गीय)- "अपना" मिथिलासँ संबंधित...विषय वस्तुसँ अवगत भेलहुँ।...शेष सभ कुशल अछि। ७. श्री ब्रजेन्द्र त्रिपाठी- साहित्य अकादमी- इंटरनेट पर प्रथम मैथिली पाक्षिक पत्रिका "विदेह" केर लेल बधाई आ शुभकामना स्वीकार करू। ८. श्री प्रफुल्लकुमार सिंह "मौन"- प्रथम मैथिली पाक्षिक पत्रिका "विदेह" क प्रकाशनक समाचार जानि कनेक चकित मुदा बेसी आह्लादित भेलहुँ। कालचक्रकेँ पकड़ि जाहि दूरदृष्टिक परिचय देलहुँ, ओहि लेल हमर मंगलकामना। ९.डॉ. शिवप्रसाद यादव- ई जानि अपार हर्ष भए रहल अछि, जे नव सूचना-क्रान्तिक क्षेत्रमे मैथिली पत्रकारिताकेँ प्रवेश दिअएबाक साहसिक कदम उठाओल अछि। पत्रकारितामे एहि प्रकारक नव प्रयोगक हम स्वागत करैत छी, संगहि "विदेह"क सफलताक शुभकामना। १०. श्री आद्याचरण झा- कोनो पत्र-पत्रिकाक प्रकाशन- ताहूमे मैथिली पत्रिकाक प्रकाशनमे के कतेक सहयोग करताह- ई तऽ भविष्य कहत। ई हमर ८८ वर्षमे ७५ वर्षक अनुभव रहल। एतेक पैघ महान यज्ञमे हमर श्रद्धापूर्ण आहुति प्राप्त होयत- यावत ठीक-ठाक छी/ रहब। ११. श्री विजय ठाकुर- मिशिगन विश्वविद्यालय- "विदेह" पत्रिकाक अंक देखलहुँ, सम्पूर्ण टीम बधाईक पात्र अछि। पत्रिकाक मंगल भविष्य हेतु हमर शुभकामना स्वीकार कएल जाओ। १२. श्री सुभाषचन्द्र यादव- ई-पत्रिका "विदेह" क बारेमे जानि प्रसन्नता भेल। ’विदेह’ निरन्तर पल्लवित-पुष्पित हो आ चतुर्दिक अपन सुगंध पसारय से कामना अछि। १३. श्री मैथिलीपुत्र प्रदीप- ई-पत्रिका "विदेह" केर सफलताक भगवतीसँ कामना। हमर पूर्ण सहयोग रहत। १४. डॉ. श्री भीमनाथ झा- "विदेह" इन्टरनेट पर अछि तेँ "विदेह" नाम उचित आर कतेक रूपेँ एकर विवरण भए सकैत अछि। आइ-काल्हि मोनमे उद्वेग रहैत अछि, मुदा शीघ्र पूर्ण सहयोग देब।कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक देखि अति प्रसन्नता भेल। मैथिलीक लेल ई घटना छी। १५. श्री रामभरोस कापड़ि "भ्रमर"- जनकपुरधाम- "विदेह" ऑनलाइन देखि रहल छी। मैथिलीकेँ अन्तर्राष्ट्रीय जगतमे पहुँचेलहुँ तकरा लेल हार्दिक बधाई। मिथिला रत्न सभक संकलन अपूर्व। नेपालोक सहयोग भेटत, से विश्वास करी। १६. श्री राजनन्दन लालदास- "विदेह" ई-पत्रिकाक माध्यमसँ बड़ नीक काज कए रहल छी, नातिक अहिठाम देखलहुँ। एकर वार्षिक अ‍ंक जखन प्रिं‍ट निकालब तँ हमरा पठायब। कलकत्तामे बहुत गोटेकेँ हम साइटक पता लिखाए देने छियन्हि। मोन तँ होइत अछि जे दिल्ली आबि कए आशीर्वाद दैतहुँ, मुदा उमर आब बेशी भए गेल। शुभकामना देश-विदेशक मैथिलकेँ जोड़बाक लेल।.. उत्कृष्ट प्रकाशन कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक लेल बधाइ। अद्भुत काज कएल अछि, नीक प्रस्तुति अछि सात खण्डमे।  मुदा अहाँक सेवा आ से निःस्वार्थ तखन बूझल जाइत जँ अहाँ द्वारा प्रकाशित पोथी सभपर दाम लिखल नहि रहितैक। ओहिना सभकेँ विलहि देल जइतैक। (स्पष्टीकरण-  श्रीमान्, अहाँक सूचनार्थ विदेह द्वारा ई-प्रकाशित कएल सभटा सामग्री आर्काइवमे https://sites.google.com/a/videha.com/videha-pothi/ पर बिना मूल्यक डाउनलोड लेल उपलब्ध छै आ भविष्यमे सेहो रहतैक। एहि आर्काइवकेँ जे कियो प्रकाशक अनुमति लऽ कऽ प्रिंट रूपमे प्रकाशित कएने छथि आ तकर ओ दाम रखने छथि ताहिपर हमर कोनो नियंत्रण नहि अछि।- गजेन्द्र ठाकुर)...   अहाँक प्रति अशेष शुभकामनाक संग। १७. डॉ. प्रेमशंकर सिंह- अहाँ मैथिलीमे इंटरनेटपर पहिल पत्रिका "विदेह" प्रकाशित कए अपन अद्भुत मातृभाषानुरागक परिचय देल अछि, अहाँक निःस्वार्थ मातृभाषानुरागसँ प्रेरित छी, एकर निमित्त जे हमर सेवाक प्रयोजन हो, तँ सूचित करी। इंटरनेटपर आद्योपांत पत्रिका देखल, मन प्रफुल्लित भऽ गेल। १८.श्रीमती शेफालिका वर्मा- विदेह ई-पत्रिका देखि मोन उल्लाससँ भरि गेल। विज्ञान कतेक प्रगति कऽ रहल अछि...अहाँ सभ अनन्त आकाशकेँ भेदि दियौ, समस्त विस्तारक रहस्यकेँ तार-तार कऽ दियौक...। अपनेक अद्भुत पुस्तक कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक विषयवस्तुक दृष्टिसँ गागरमे सागर अछि। बधाई। १९.श्री हेतुकर झा, पटना-जाहि समर्पण भावसँ अपने मिथिला-मैथिलीक सेवामे तत्पर छी से स्तुत्य अछि। देशक राजधानीसँ भय रहल मैथिलीक शंखनाद मिथिलाक गाम-गाममे मैथिली चेतनाक विकास अवश्य करत। २०. श्री योगानन्द झा, कबिलपुर, लहेरियासराय- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पोथीकेँ निकटसँ देखबाक अवसर भेटल अछि आ मैथिली जगतक एकटा उद्भट ओ समसामयिक दृष्टिसम्पन्न हस्ताक्षरक कलमबन्द परिचयसँ आह्लादित छी। "विदेह"क देवनागरी सँस्करण पटनामे रु. 80/- मे उपलब्ध भऽ सकल जे विभिन्न लेखक लोकनिक छायाचित्र, परिचय पत्रक ओ रचनावलीक सम्यक प्रकाशनसँ ऐतिहासिक कहल जा सकैछ। २१. श्री किशोरीकान्त मिश्र- कोलकाता- जय मैथिली, विदेहमे बहुत रास कविता, कथा, रिपोर्ट आदिक सचित्र संग्रह देखि आ आर अधिक प्रसन्नता मिथिलाक्षर देखि- बधाई स्वीकार कएल जाओ। २२.श्री जीवकान्त- विदेहक मुद्रित अंक पढ़ल- अद्भुत मेहनति। चाबस-चाबस। किछु समालोचना मरखाह..मुदा सत्य। २३. श्री भालचन्द्र झा- अपनेक कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक देखि बुझाएल जेना हम अपने छपलहुँ अछि। एकर विशालकाय आकृति अपनेक सर्वसमावेशताक परिचायक अछि। अपनेक रचना सामर्थ्यमे उत्तरोत्तर वृद्धि हो, एहि शुभकामनाक संग हार्दिक बधाई। २४.श्रीमती डॉ नीता झा- अहाँक कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़लहुँ। ज्योतिरीश्वर शब्दावली, कृषि मत्स्य शब्दावली आ सीत बसन्त आ सभ कथा, कविता, उपन्यास, बाल-किशोर साहित्य सभ उत्तम छल। मैथिलीक उत्तरोत्तर विकासक लक्ष्य दृष्टिगोचर होइत अछि। २५.श्री मायानन्द मिश्र- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक मे हमर उपन्यास स्त्रीधनक जे विरोध कएल गेल अछि तकर हम विरोध करैत छी।... कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पोथीक लेल शुभकामना।(श्रीमान् समालोचनाकेँ विरोधक रूपमे नहि लेल जाए।-गजेन्द्र ठाकुर) २६.श्री महेन्द्र हजारी- सम्पादक श्रीमिथिला- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़ि मोन हर्षित भऽ गेल..एखन पूरा पढ़यमे बहुत समय लागत, मुदा जतेक पढ़लहुँ से आह्लादित कएलक। २७.श्री केदारनाथ चौधरी- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक अद्भुत लागल, मैथिली साहित्य लेल ई पोथी एकटा प्रतिमान बनत। २८.श्री सत्यानन्द पाठक- विदेहक हम नियमित पाठक छी। ओकर स्वरूपक प्रशंसक छलहुँ। एम्हर अहाँक लिखल - कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक देखलहुँ। मोन आह्लादित भऽ उठल। कोनो रचना तरा-उपरी। २९.श्रीमती रमा झा-सम्पादक मिथिला दर्पण। कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक प्रिंट फॉर्म पढ़ि आ एकर गुणवत्ता देखि मोन प्रसन्न भऽ गेल, अद्भुत शब्द एकरा लेल प्रयुक्त कऽ रहल छी। विदेहक उत्तरोत्तर प्रगतिक शुभकामना। ३०.श्री नरेन्द्र झा, पटना- विदेह नियमित देखैत रहैत छी। मैथिली लेल अद्भुत काज कऽ रहल छी। ३१.श्री रामलोचन ठाकुर- कोलकाता- मिथिलाक्षर विदेह देखि मोन प्रसन्नतासँ भरि उठल, अंकक विशाल परिदृश्य आस्वस्तकारी अछि। ३२.श्री तारानन्द वियोगी- विदेह आ कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक देखि चकबिदोर लागि गेल। आश्चर्य। शुभकामना आ बधाई। ३३.श्रीमती प्रेमलता मिश्र “प्रेम”- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़लहुँ। सभ रचना उच्चकोटिक लागल। बधाई। ३४.श्री कीर्तिनारायण मिश्र- बेगूसराय- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक बड्ड नीक लागल, आगांक सभ काज लेल बधाई। ३५.श्री महाप्रकाश-सहरसा- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक नीक लागल, विशालकाय संगहि उत्तमकोटिक। ३६.श्री अग्निपुष्प- मिथिलाक्षर आ देवाक्षर विदेह पढ़ल..ई प्रथम तँ अछि एकरा प्रशंसामे मुदा हम एकरा दुस्साहसिक कहब। मिथिला चित्रकलाक स्तम्भकेँ मुदा अगिला अंकमे आर विस्तृत बनाऊ। ३७.श्री मंजर सुलेमान-दरभंगा- विदेहक जतेक प्रशंसा कएल जाए कम होएत। सभ चीज उत्तम। ३८.श्रीमती प्रोफेसर वीणा ठाकुर- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक उत्तम, पठनीय, विचारनीय। जे क्यो देखैत छथि पोथी प्राप्त करबाक उपाय पुछैत छथि। शुभकामना। ३९.श्री छत्रानन्द सिंह झा- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़लहुँ, बड्ड नीक सभ तरहेँ। ४०.श्री ताराकान्त झा- सम्पादक मैथिली दैनिक मिथिला समाद- विदेह तँ कन्टेन्ट प्रोवाइडरक काज कऽ रहल अछि। कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक अद्भुत लागल। ४१.डॉ रवीन्द्र कुमार चौधरी- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक बहुत नीक, बहुत मेहनतिक परिणाम। बधाई। ४२.श्री अमरनाथ- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक आ विदेह दुनू स्मरणीय घटना अछि, मैथिली साहित्य मध्य। ४३.श्री पंचानन मिश्र- विदेहक वैविध्य आ निरन्तरता प्रभावित करैत अछि, शुभकामना। ४४.श्री केदार कानन- कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक लेल अनेक धन्यवाद, शुभकामना आ बधाइ स्वीकार करी। आ नचिकेताक भूमिका पढ़लहुँ। शुरूमे तँ लागल जेना कोनो उपन्यास अहाँ द्वारा सृजित भेल अछि मुदा पोथी उनटौला पर ज्ञात भेल जे एहिमे तँ सभ विधा समाहित अछि। ४५.श्री धनाकर ठाकुर- अहाँ नीक काज कऽ रहल छी। फोटो गैलरीमे चित्र एहि शताब्दीक जन्मतिथिक अनुसार रहैत तऽ नीक। ४६.श्री आशीष झा- अहाँक पुस्तकक संबंधमे एतबा लिखबा सँ अपना कए नहि रोकि सकलहुँ जे ई किताब मात्र किताब नहि थीक, ई एकटा उम्मीद छी जे मैथिली अहाँ सन पुत्रक सेवा सँ निरंतर समृद्ध होइत चिरजीवन कए प्राप्त करत। ४७.श्री शम्भु कुमार सिंह- विदेहक तत्परता आ क्रियाशीलता देखि आह्लादित भऽ रहल छी। निश्चितरूपेण कहल जा सकैछ जे समकालीन मैथिली पत्रिकाक इतिहासमे विदेहक नाम स्वर्णाक्षरमे लिखल जाएत। ओहि कुरुक्षेत्रक घटना सभ तँ अठारहे दिनमे खतम भऽ गेल रहए मुदा अहाँक कुरुक्षेत्रम् तँ अशेष अछि। ४८.डॉ. अजीत मिश्र- अपनेक प्रयासक कतबो प्रश‍ंसा कएल जाए कमे होएतैक। मैथिली साहित्यमे अहाँ द्वारा कएल गेल काज युग-युगान्तर धरि पूजनीय रहत। ४९.श्री बीरेन्द्र मल्लिक- अहाँक कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक आ विदेह:सदेह पढ़ि अति प्रसन्नता भेल। अहाँक स्वास्थ्य ठीक रहए आ उत्साह बनल रहए से कामना। ५०.श्री कुमार राधारमण- अहाँक दिशा-निर्देशमे विदेह पहिल मैथिली ई-जर्नल देखि अति प्रसन्नता भेल। हमर शुभकामना। ५१.श्री फूलचन्द्र झा प्रवीण-विदेह:सदेह पढ़ने रही मुदा कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक देखि बढ़ाई देबा लेल बाध्य भऽ गेलहुँ। आब विश्वास भऽ गेल जे मैथिली नहि मरत। अशेष शुभकामना। ५२.श्री विभूति आनन्द- विदेह:सदेह देखि, ओकर विस्तार देखि अति प्रसन्नता भेल। ५३.श्री मानेश्वर मनुज-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक एकर भव्यता देखि अति प्रसन्नता भेल, एतेक विशाल ग्रन्थ मैथिलीमे आइ धरि नहि देखने रही। एहिना भविष्यमे काज करैत रही, शुभकामना। ५४.श्री विद्यानन्द झा- आइ.आइ.एम.कोलकाता- कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक विस्तार, छपाईक संग गुणवत्ता देखि अति प्रसन्नता भेल। अहाँक अनेक धन्यवाद; कतेक बरखसँ हम नेयारैत छलहुँ जे सभ पैघ शहरमे मैथिली लाइब्रेरीक स्थापना होअए, अहाँ ओकरा वेबपर कऽ रहल छी, अनेक धन्यवाद। ५५.श्री अरविन्द ठाकुर-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक मैथिली साहित्यमे कएल गेल एहि तरहक पहिल प्रयोग अछि, शुभकामना। ५६.श्री कुमार पवन-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक पढ़ि रहल छी। किछु लघुकथा पढ़ल अछि, बहुत मार्मिक छल। ५७. श्री प्रदीप बिहारी-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक देखल, बधाई। ५८.डॉ मणिकान्त ठाकुर-कैलिफोर्निया- अपन विलक्षण नियमित सेवासँ हमरा लोकनिक हृदयमे विदेह सदेह भऽ गेल अछि। ५९.श्री धीरेन्द्र प्रेमर्षि- अहाँक समस्त प्रयास सराहनीय। दुख होइत अछि जखन अहाँक प्रयासमे अपेक्षित सहयोग नहि कऽ पबैत छी। ६०.श्री देवशंकर नवीन- विदेहक निरन्तरता आ विशाल स्वरूप- विशाल पाठक वर्ग, एकरा ऐतिहासिक बनबैत अछि। ६१.श्री मोहन भारद्वाज- अहाँक समस्त कार्य देखल, बहुत नीक। एखन किछु परेशानीमे छी, मुदा शीघ्र सहयोग देब। ६२.श्री फजलुर रहमान हाशमी-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक मे एतेक मेहनतक लेल अहाँ साधुवादक अधिकारी छी। ६३.श्री लक्ष्मण झा "सागर"- मैथिलीमे चमत्कारिक रूपेँ अहाँक प्रवेश आह्लादकारी अछि।..अहाँकेँ एखन आर..दूर..बहुत दूरधरि जेबाक अछि। स्वस्थ आ प्रसन्न रही। ६४.श्री जगदीश प्रसाद मंडल-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक पढ़लहुँ । कथा सभ आ उपन्यास सहस्रबाढ़नि पूर्णरूपेँ पढ़ि गेल छी। गाम-घरक भौगोलिक विवरणक जे सूक्ष्म वर्णन सहस्रबाढ़निमे अछि, से चकित कएलक, एहि संग्रहक कथा-उपन्यास मैथिली लेखनमे विविधता अनलक अछि। समालोचना शास्त्रमे अहाँक दृष्टि वैयक्तिक नहि वरन् सामाजिक आ कल्याणकारी अछि, से प्रशंसनीय। ६५.श्री अशोक झा-अध्यक्ष मिथिला विकास परिषद- कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक लेल बधाई आ आगाँ लेल शुभकामना। ६६.श्री ठाकुर प्रसाद मुर्मु- अद्भुत प्रयास। धन्यवादक संग प्रार्थना जे अपन माटि-पानिकेँ ध्यानमे राखि अंकक समायोजन कएल जाए। नव अंक धरि प्रयास सराहनीय। विदेहकेँ बहुत-बहुत धन्यवाद जे एहेन सुन्दर-सुन्दर सचार (आलेख) लगा रहल छथि। सभटा ग्रहणीय- पठनीय। ६७.बुद्धिनाथ मिश्र- प्रिय गजेन्द्र जी,अहाँक सम्पादन मे प्रकाशित ‘विदेह’आ ‘कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक’ विलक्षण पत्रिका आ विलक्षण पोथी! की नहि अछि अहाँक सम्पादनमे? एहि प्रयत्न सँ मैथिली क विकास होयत,निस्संदेह। ६८.श्री बृखेश चन्द्र लाल- गजेन्द्रजी, अपनेक पुस्तक कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक पढ़ि मोन गदगद भय गेल , हृदयसँ अनुगृहित छी । हार्दिक शुभकामना । ६९.श्री परमेश्वर कापड़ि - श्री गजेन्द्र जी । कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक पढ़ि गदगद आ नेहाल भेलहुँ। ७०.श्री रवीन्द्रनाथ ठाकुर- विदेह पढ़ैत रहैत छी। धीरेन्द्र प्रेमर्षिक मैथिली गजलपर आलेख पढ़लहुँ। मैथिली गजल कत्तऽ सँ कत्तऽ चलि गेलैक आ ओ अपन आलेखमे मात्र अपन जानल-पहिचानल लोकक चर्च कएने छथि। जेना मैथिलीमे मठक परम्परा रहल अछि। (स्पष्टीकरण- श्रीमान्, प्रेमर्षि जी ओहि आलेखमे ई स्पष्ट लिखने छथि जे किनको नाम जे छुटि गेल छन्हि तँ से मात्र आलेखक लेखकक जानकारी नहि रहबाक द्वारे, एहिमे आन कोनो कारण नहि देखल जाय। अहाँसँ एहि विषयपर विस्तृत आलेख सादर आमंत्रित अछि।-सम्पादक) ७१.श्री मंत्रेश्वर झा- विदेह पढ़ल आ संगहि अहाँक मैगनम ओपस कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक सेहो, अति उत्तम। मैथिलीक लेल कएल जा रहल अहाँक समस्त कार्य अतुलनीय अछि। ७२. श्री हरेकृष्ण झा- कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक मैथिलीमे अपन तरहक एकमात्र ग्रन्थ अछि, एहिमे लेखकक समग्र दृष्टि आ रचना कौशल देखबामे आएल जे लेखकक फील्डवर्कसँ जुड़ल रहबाक कारणसँ अछि। ७३.श्री सुकान्त सोम- कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक मे  समाजक इतिहास आ वर्तमानसँ अहाँक जुड़ाव बड्ड नीक लागल, अहाँ एहि क्षेत्रमे आर आगाँ काज करब से आशा अछि। ७४.प्रोफेसर मदन मिश्र- कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक सन किताब मैथिलीमे पहिले अछि आ एतेक विशाल संग्रहपर शोध कएल जा सकैत अछि। भविष्यक लेल शुभकामना। ७५.प्रोफेसर कमला चौधरी- मैथिलीमे कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक सन पोथी आबए जे गुण आ रूप दुनूमे निस्सन होअए, से बहुत दिनसँ आकांक्षा छल, ओ आब जा कऽ पूर्ण भेल। पोथी एक हाथसँ दोसर हाथ घुमि रहल अछि, एहिना आगाँ सेहो अहाँसँ आशा अछि। ७६.श्री उदय चन्द्र झा "विनोद": गजेन्द्रजी, अहाँ जतेक काज कएलहुँ अछि से मैथिलीमे आइ धरि कियो नहि कएने छल। शुभकामना। अहाँकेँ एखन बहुत काज आर करबाक अछि। ७७.श्री कृष्ण कुमार कश्यप: गजेन्द्र ठाकुरजी, अहाँसँ भेँट एकटा स्मरणीय क्षण बनि गेल। अहाँ जतेक काज एहि बएसमे कऽ गेल छी ताहिसँ हजार गुणा आर बेशीक आशा अछि। ७८.श्री मणिकान्त दास: अहाँक मैथिलीक कार्यक प्रशंसा लेल शब्द नहि भेटैत अछि। अहाँक कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक सम्पूर्ण रूपेँ पढ़ि गेलहुँ। त्वञ्चाहञ्च बड्ड नीक लागल। ७९. श्री हीरेन्द्र कुमार झा- विदेह ई-पत्रिकाक सभ अंक ई-पत्रसँ भेटैत रहैत अछि। मैथिलीक ई-पत्रिका छैक एहि बातक गर्व होइत अछि। अहाँ आ अहाँक सभ सहयोगीकेँ हार्दिक शुभकामना। विदेह मैथिली साहित्य आन्दोलन (c)२००४-१२. सर्वाधिकार लेखकाधीन आ जतए लेखकक नाम नहि अछि ततए संपादकाधीन। विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। सह-सम्पादक: उमेश मंडल। सहायक सम्पादक: शिव कुमार झा आ मुन्नाजी (मनोज कुमार कर्ण)। भाषा-सम्पादन: नागेन्द्र कुमार झा आ पञ्जीकार विद्यानन्द झा। कला-सम्पादन: ज्योति झा चौधरी आ रश्मि रेखा सिन्हा। सम्पादक-शोध-अन्वेषण: डॉ. जया वर्मा आ डॉ. राजीव कुमार वर्मा। सम्पादक- नाटक-रंगमंच-चलचित्र- बेचन ठाकुर। सम्पादक- सूचना-सम्पर्क-समाद- पूनम मंडल आ प्रियंका झा। सम्पादक- अनुवाद विभाग- विनीत उत्पल। रचनाकार अपन मौलिक आ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि) ggajendra@videha.com केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx, .rtf वा .txt फॉर्मेटमे पठा सकैत छथि। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेताह, से आशा करैत छी। रचनाक अंतमे टाइप रहय, जे ई रचना मौलिक अछि, आ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। मेल प्राप्त होयबाक बाद यथासंभव शीघ्र ( सात दिनक भीतर) एकर प्रकाशनक अंकक सूचना देल जायत। ’विदेह' प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका अछि आ एहिमे मैथिली, संस्कृत आ अंग्रेजीमे मिथिला आ मैथिलीसँ संबंधित रचना प्रकाशित कएल जाइत अछि। एहि ई पत्रिकाकेँ श्रीमति लक्ष्मी ठाकुर द्वारा मासक ०१ आ १५ तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि। (c) 2004-12 सर्वाधिकार सुरक्षित। विदेहमे प्रकाशित सभटा रचना आ आर्काइवक सर्वाधिकार रचनाकार आ संग्रहकर्त्ताक लगमे छन्हि। रचनाक अनुवाद आ पुनः प्रकाशन किंवा आर्काइवक उपयोगक अधिकार किनबाक हेतु ggajendra@videha.com पर संपर्क करू। एहि साइटकेँ प्रीति झा ठाकुर, मधूलिका चौधरी आ रश्मि प्रिया द्वारा डिजाइन कएल गेल। सिद्धिरस्तु वि दे ह विदेह Videha বিদেহ  www.videha.co.in विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका www.videha.com Videha Ist Maithili Fortnightly ejournal  विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका 'विदेह' १२० म अंक १५ दिसम्बर २०१२ (वर्ष ५ मास ६० अंक १२०) मानुषीमिह संस्कृताम् ISSN 2229-547X VIDEHA