ISSN 2229-547X VIDEHA 'विदेह' १२२ म अंक १५ जनवरी २०१३ (वर्ष ६ मास ६१ अंक १२२) ऐ अंकमे अछि:- १. संपादकीय संदेश २. गद्य २.१.शिवकुमार झा ‘टिल्लू’-द्विरागमन २.२.जगदीश प्रसाद मण्डल-लघुकथा-कलंक २.३.बिन्देश्वर ठाकुर- प्रेम-पत्र / सपनाक अबसान २.४.प्रसुन सिंह- नारीक चरित्र सभसँ रंगल कथासंग्रह ‘जिद्दी’ २.५.जगदानन्द झा ‘मनु’- दूटा विहनि कथा- लाशसँ भरल ट्रेन/ सभसँ प्रिय बस्तु ३. पद्य ३.१.जगदीश चन्द्र ठाकुर ‘अनिल’- की भेटल आ की हेरा गेल (आत्म गीत)- (आगाँ) ३.२.बिन्देश्वर ठाकुर "नेपाली"- हमर समाज बौरा गेल/ परदेशी पिया/ जन्मब दुर्लभ ऐ धरतीपर ३.३.जगदानन्द झा ‘मनु’- गजल १-४ ३.४.शिव कुमार यादव- गजल ३.५.मुन्नी कामतक दूगो कविता स्वच्छ समाज / माय एक चुटकी नुन दअ दे... ३.६.१.राजदेव मण्डलक तीन गोट कविता-नेंगरा मजदूर/ मनक दुआर/ छाँहक रूप २.जगदीश प्रसाद मण्डलक पाँचटा गीत-अबिते अगहन./ उपजल खेत./ धूल चरण./ उनटन./ जान विचार......दूटा कविता- (तिलासंक्रातिक अवसरपर) सतबेध/गुरुत्तर ३.७.राजेश कुमार झा-शराबक लेल ३.८.बिनीता झा-देखू आइ एफबी परक खेल ४.गद्य-पद्य भारती:१.मूल तेलुगु कविता:पसुपुलेटि गीता; तेलुगुसँ हिंदी अनुवाद:आर.शांता सुंदरी; हिन्दीसँ मैथिली अनुवाद: विनीत उत्पल (दिल्लीक बलात्कारक घटनापर)- दुमर्जा २. मन्त्रद्रष्टा ऋष्यश्रृङ्ग- हरिशंकर श्रीवास्तव “शलभ"- (हिन्दीसँ मैथिली अनुवाद विनीत उत्पल) विदेह मैथिली पोथी डाउनलोड साइट VIDEHA MAITHILI BOOKS FREE DOWNLOAD SITE विदेह ई-पत्रिकाक सभटा पुरान अंक ( ब्रेल, तिरहुता आ देवनागरी मे ) पी.डी.एफ. डाउनलोडक लेल नीचाँक लिंकपर उपलब्ध अछि। All the old issues of Videha e journal ( in Braille, Tirhuta and Devanagari versions ) are available for pdf download at the following link. विदेह ई-पत्रिकाक सभटा पुरान अंक ब्रेल, तिरहुता आ देवनागरी रूपमे Videha e journal's all old issues in Braille Tirhuta and Devanagari versions विदेह ई-पत्रिकाक पहिल ५० अंक
विदेह ई-पत्रिकाक ५०म सँ आगाँक अंक ↑ विदेह आर.एस.एस.फीड एनीमेटरकेँ अपन साइट/ ब्लॉगपर लगाऊ। ब्लॉग "लेआउट" पर "एड गाडजेट" मे "फीड" सेलेक्ट कए "फीड यू.आर.एल." मे http://www.videha.co.in/index.xml टाइप केलासँ सेहो विदेह फीड प्राप्त कए सकैत छी। गूगल रीडरमे पढ़बा लेल http://reader.google.com/ पर जा कऽ Add a Subscription बटन क्लिक करू आ खाली स्थानमे http://www.videha.co.in/index.xml पेस्ट करू आ Add बटन दबाउ। Join official Videha facebook group. 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(मैथिलीक सभसँ लोकप्रिय जालवृत्त) पर जाउ। 1.संपादकीय मैथिली:२०१२ मोबाइलपर जखन हम मैथिलीमे बात करै छी तँ हमर सहकर्मी गौरी भोला कहै छथि- “बड्ड मीठ भाषा अछि।” गायत्री व्यंकट कहै छथि- “अहाँक भाषा मैथिली अछि आ हम सभ अपन बेटीक नाम मैथिली राखै छी।” ऐ मिठासक भितुरका खटास हम हुनका बुझा नै पबै छियन्हि। २०१२ आ मैथिली भाषा आ साहित्य: २०१२ विभिन्न कारणसँ मैथिली भाषा आ साहित्यक इतिहासमे मोन राखल जाएत। ऐ वर्षक शुरुमे चनौरागंज (झंझारपुर) मे बेचन ठाकुर जीक नेतृत्वमे जातिवादी रंगमंचक विरुद्ध समानान्तर मैथिली रंगमंचक “पहिल विदेह मैथिली नाट्य उत्सव” २०१२ क प्रारम्भमे सम्पन्न भेल। बेचन ठाकुर विगत २५-३० वर्षसँ मैथिली नाटकक निर्देशक रहल छथि, दर्जन भरि नाटक ओ लिखने छथि, जे अनेकानेक बेर मंचित आ प्रशंसित भेल अछि। ऐ बेरुका नाट्य उत्सवक थीम रहए “भरतक नाट्य शास्त्रक परिप्रेक्ष्यमे मैथिली नाटक आ रंगमंच”। दू दिनक ऐ दिन-रातिक महोत्सवमे जगदीश प्रसाद मण्डलक नाटक “वीरांगना”, बेचन ठाकुरक नाटक “विश्वासघात” आ गजेन्द्र ठाकुरक नाटक “उल्कामुख” मंचित भेल। एकर अलाबे नारी सशक्तिकरण/ लोकगाथा आधारित एकाङ्कीक प्रदर्शन सेहो भेल। मैथिली कवि सम्मेलन भेल आ विदेह सम्मान देल गेल जकर विवरण निम्न प्रकारसँ अछि। विदेह समानान्तर साहित्य अकादेमी सम्मान १.विदेह समानान्तर साहित्य अकादेमी फेलो पुरस्कार २०१०-११ २०१० श्री गोविन्द झा (समग्र योगदान लेल) २०११ श्री रमानन्द रेणु (समग्र योगदान लेल) २.विदेह समानान्तर साहित्य अकादेमी पुरस्कार २०११-१२ २०११ मूल पुरस्कार- श्री जगदीश प्रसाद मण्डल (गामक जिनगी, लघुकथा संग्रह) २०११ बाल साहित्य पुरस्कार- ले.क. मायानाथ झा (जकर नारी चतुर होइ, लघुकथा संग्रह) २०११ युवा पुरस्कार- आनन्द कुमार झा (कलह, नाटक) २०१२ अनुवाद पुरस्कार- श्री रामलोचन ठाकुर- (पद्मानदीक माझी, बांग्ला- मानिक बंद्योपाध्याय, उपन्यास, बांग्लासँ मैथिली अनुवाद) नाटक, गीत, संगीत, नृत्य, मूर्तिकला, शिल्प आ चित्रकला क्षेत्रमे विदेह सम्मान २०१२ अभिनय मुख्य अभिनय सुश्री शिल्पी कुमारी, उम्र- १७, पिता श्री लक्ष्मेण झा श्री शोभा कान्ती महतो, उम्र- १५ पिता- श्री रामअवतार महतो, हास्य-अभिनय सुश्री प्रियंका कुमारी, उम्र- १६, पिता- श्री वैद्यनाथ साह श्री दुर्गानंद ठाकुर, उम्र- २३, पिता- स्व्. भरत ठाकुर नृत्य सुश्री सुलेखा कुमारी, उम्र- १६, पिता- श्री हरेराम यादव श्री अमित रंजन, उम्र- १८, पिता- नागेश्वर कामत चित्रकला श्री पनकलाल मण्डल, उमेर- ३५, पिता- स्व. सुन्दर मण्डल, श्री रमेश कुमार भारती, उम्र- २३, पिता- श्री मोती मण्डयल संगीत (हारमोनियम) श्री परमानन्दा ठाकुर, उम्र- ३०, पिता- श्री नथुनी ठाकुर संगीत (ढोलक) श्री बुलन राउत, उम्र- ४५, पिता- स्वे. चिल्टू राउत संगीत (रसनचौकी) श्री बहादुर राम, उम्र-५५, पिता- स्व्. सरजुग राम शिल्पी-वस्तुकला श्री जगदीश मल्लिक, उम्र-५०, गाम- चनौरागंज मूर्ति-मृत्तिका कला श्री यदुनंदन पंडित, उम्र-४५, पिता- अशर्फी पंडित काष्ठ-कला श्री झमेली मुखिया, पिता स्व. मूंगालाल मुखिया, उम्र- ५५ किसानी-आत्मनिर्भर संस्कृति श्री लछमी दास, उमेर- ५०, पिता स्व. श्री फणी दास निम्न सम्मान विदेह नाट्य उत्सव २०१३ क अवसरपर देल जाएत:- विदेह मैथिली पत्रकारिता सम्मान-२०१२ श्री नवेन्दु कुमार झा आ विदेह समानान्तर साहित्य अकादेमी फेलो पुरस्कार २०१२ श्री राजनन्दन लाल दास (समग्र योगदान लेल) 2.विदेह भाषा सम्मान २०१२-१३ (वैकल्पिक साहित्य अकादेमी पुरस्कारक रूपमे प्रसिद्ध) २०१२ बाल साहित्य पुरस्कार - श्री जगदीश प्रसाद मण्डल केँ “तरेगन” बाल प्रेरक विहनि कथा संग्रह २०१२ मूल पुरस्कार - श्री राजदेव मण्डलकेँ "अम्बरा" (कविता संग्रह) लेल। 2012 युवा पुरस्कार- श्रीमती ज्योति सुनीत चौधरीक “अर्चिस” (कविता संग्रह) 2013 अनुवाद पुरस्कार- श्री नरेश कुमार विकल "ययाति" (मराठी उपन्यास श्री विष्णु सखाराम खाण्डेकर) समानान्तर साहित्य अकादेमी पुरस्कारक रूपमे प्रसिद्ध विदेह भाषा सम्मान साहित्य अकादेमीमे एक जाति विशेषक फर्जी साहित्यिक (!) संस्था सभक साहित्य अकादेमी मैथिली विभागपर ४५ वर्षोंक कब्जाक विरुद्ध प्रतिक्रियाक रूपमे सोझाँ आएल। ४४ सालमे मैथिल ब्राह्मण -३६ बेर, कायस्थ-६ बेर, राजपूत-२ बेर आ गएर सवर्ण- ० बेर ऐ पुरस्कारकेँ प्राप्त कऽ सकला। ब्राह्मणमे नीक लेखक जेना ललित, धूमकेतु, धीरेन्द्र ऐ पुरस्कारसँ वंचित रहला आ हरिमोहन झा केँ ई पुरस्कार जिबैत नै देल गेलनि। प्रतिक्रियावादी लेखक सभसँ ऐ पुरस्कारक लिस्ट भरल पड़ल अछि। सुभाष चन्द्र यादव, मेघन प्रसाद, बिन्देश्वर मण्डल, जगदीश प्रसाद मण्डल, नचिकेता आदि गएर ब्राह्मण लेखक जिनका मैथिली साहित्यमे अपार आदर प्राप्त छन्हि, ब्राह्मणवादी साहित्य अकादेमीक कोपक शिकार छथि। मिथिला राज्यक आन्दोलनी लोक सभ द्वारा गुआहाटीमे विद्यापति पर्व (दिसम्बर २०१२) क अवसरपर जगदीश प्रसाद मण्डलकेँ मुख्य अतिथि बनाओल जएबाक विरोध भेल, जकर घोर भर्त्सना कएल गेल। विद्यापति: विद्यापति मैथिलीक महाकवि छथि। परम्पराक अनुसार ओ एकटा हाजाम ठाकुर परिवारक छथि। ज्योतिरीश्वर ठाकुर हुनकर विवरण “वर्ण रत्नाकर” मे केने छथि आ श्रीधर दास हुनकर पदावलीक उल्लेख उदाहरण सहित “सदुक्ति कर्णामृत” मे केने छथि। श्रीधर दास आ ज्योतिरीश्वरक परवर्ती संस्कृत आ अवहट्ठक लेखक विद्यापतिक उल्लेख मैथिल ब्राह्मणक पंजीमे भेल अछि। परन्तु किछु ब्राह्मणवादी संस्था सभ द्वारा ज्योतिरीश्वरपूर्व विद्यापति केँ ब्राह्मण बना देबाक आ हुनका “पाग” पहिरा “यज्ञोपवीत संस्कार” करबाक प्रयास मैथिलीक यज्ञोपवीत संस्कार करबाक षडयंत्रक रूपमे देखल जा रहल अछि। साहित्यिक जगतमे सम्पूर्ण साल ऐपर चर्चा होइत रहल आ ई मामिला सालक अन्तमे भेल “इण्डिया हैबीटेट सेन्टर भारतीय भाषा महोत्सव” मे सेहो उठल। विद्यापति पर्वक माध्यमसँ मैथिल ब्राह्मणक एकटा कट्टरवादी ग्रुप जातिवादी रंगमंचक साथ मिलि कऽ मैथिली पर कब्जाक कोशिशमे लागल रहल आ सामान्य लोक ऐसँ दूर भऽ रहल छथि। टैगोर लिटरेचर अवार्ड: मैथिलीक लेल पहिल टैगोर लिटरेचर अवार्ड श्री जगदीश प्रसाद मण्डलकेँ “गामक जिनगी” लघुकथा संग्रह पर देल गेल। परन्तु एकर चर्चा दरभंगा सहित मिथिलांचलक कोनो हिन्दी अखबार नै केलक, आकाशवाणी दरभंगा सेहो पूर्ण चुप्पी साधने रहल आ अपन जातिवादी चरित्र लोक सभक सोझाँ राखलक। गूगल विदेह बुक्स: विदेह द्वारा गूगलक सहयोगसँ ४०० सँ बेशी मैथिली किताब गूगल बुक्स पर १००% ब्राउज आ डाउनलोडक सुविधाक संग ऑनलाइन कएल गेल। अंग्रेजी-मैथिली शब्दकोषकेँ कॉमन क्रिएटिव शेयर अलाइक लाइसेन्सक अन्तर्गत रिलीज कएल गेल। साहित्य अकादेमीमे मैथिली समन्वयकक मनोनयन आ साहित्य अकादेमीक पुरस्कारक राजनीति: साहित्य अकादेमीमे मैथिली समन्वयकक चयनक लेल ६ टा जातिवादी संगठनकेँ साहित्य अकादेमी मान्यता देने अछि। ई संगठन सभ मैथिलीक ८ म समन्वयकक मनोनयन केलक अछि। ई संयोग अछि बा दुर्योग कि आइ धरि एकर सभ समन्वयक मैथिल ब्राह्मण भेल छथि, ऐ बेर सेहो ई क्रम जारी रहल। युवा पुरस्कार देबामे सभ निअम खतम करैत रेफरी द्वारा नाम देल सभ पुस्तकपर विचार करबासँ मना कऽ देलनि आ एक साधारण पुस्तककेँ ई पुरस्कार देलनि जकर लेखक मूलतः हिन्दीमे लिखै छथि। की मैथिली मात्र मैथिली ब्राह्मणक भाषा छी? यदि साहित्य अकादेमी आ जातिवादी संस्था सभक वश चलितै तँ उत्तर हँ रहितै। परन्तु समानान्तर विचारधारा आ समानान्तर रंगमंच ऐ धारणाकेँ ध्वस्त कऽ देलक। ऐ लिंक https://sites.google.com/a/videha.com/videha-pothi/ पर विदेह मैथिली विहनि कथा, विदेह मैथिली लघुकथा, विदेह मैथिली पद्य, विदेह मैथिली नाट्य उत्सव, विदेह मैथिली शिशु उत्सव, विदेह मैथिली प्रबन्ध-निबन्ध-समालोचना ऑनलाइन उपलब्ध अछि। विनीत उत्पलक आर.टी.आइ. क जे उत्तर साहित्य अकादेमी देलक अछि ओ साहित्य जगतकेँ लज्जित करैत अछि। समन्वयक आ ओकर एडवाइजरी बोर्डक सदस्य सभ जइ तरहेँ सभटा असाइनमेन्ट स्वयं आ सर-सम्बन्धीकेँ दऽ देलनि ओ ऐ संस्था सभक ब्राह्मणवादी प्रवृत्तिकेँ सोझाँ अनैत अछि। राजदेव मंडल, रामविलास साहु, उमेश पासवान, रामदेव प्रसाद मण्डल झारूदार, जगदीश प्रसाद मंडल, उमेश मंडल, सुभाष चन्द्र यादव, प्रेमशंकर सिंह, डॉ. उदय नारायण सिंह "नचिकेता", मेघन प्रसाद आदि लेखक निःस्वार्थ भावसँ मैथिलीकेँ प्राणवायु दऽ रहल छथि। पागक राजनीति: ब्राह्मणवादी पागक राजनीतिकेँ तखन बड्ड पैघ धक्का लागल जखन खरौआमे महाकवि लालदास जयन्तीक अवसरपर पहिल बेर आयोजक लोकनि ई मानलनि जे ई जाति विशेषक परिधान मिथिला मैथिलीक मंचपर प्रयोग नै कएल जएबाक चाही आ ओ सएह केलनि। एकरा समानान्तर विचारधाराक बड़ पैघ विजयक रूपमे देखल जा रहल अछि। प्राथमिक आ मध्य विद्यालयमे शिक्षाक माध्यम मैथिली माध्यमसँ: सुप्रीम कोर्टक निर्णयक बादो अखनो मिथिलामे शिक्षाक माध्यम मैथिली नै अछि। ऐ सम्बन्धमे एकटा बैठक निर्मलीमे भेल जइमे जगदीश प्रसाद मण्डल, राम विलास साहु, राजदेव मण्डल, वीरेन्द्र यादव आदिक उपस्थितिमे राहुल कुमार जीक संयोजकत्वमे विदेह विचार गोष्ठी सम्पन्न भेल आ हस्ताक्षर अभियान भेल। परन्तु ई चिन्ता सेहो प्रकट कएल गेल जे मैथिली साहित्यक वर्तमान जातिवादी आ प्रतिक्रियावादी सिलेबसकेँ बदलल जाए, आततायी जातिवादी जमीन्दारक जीवनी कोन गुलाम मानसिकताक अन्तर्गत सिलेबसमे राखल गेल अछि? कोसी पुलक उद्घाटनक अवसर पर मुख्यमंत्री नीतीश कुमारकेँ ऐ सम्बन्धमे स्मार पत्र देल गेल। एकर अलाबे विदेह गोष्ठी (परिचर्चा/ प्रैक्टिकल लैबोरेटरी प्रदर्शन) साहित्यक विभिन्न आयामपर सम्पन्न भेल। नेपाल मे मैथिली: डेनमार्क एम्बैसीक सहयोगसँ "बुधियार छौड़ा आ राक्षस" (रमेश रञ्जन लिखित नाटक) कई दर्जन स्थानपर मंचित भेल। विद्यापति पुरस्कारक घोषणा भेल, दू लाखक पुरस्कार रामभरोस कापड़ि भ्रमरकेँ भेटलनि। रंगमञ्च आयोजनामे जनकपुरमे मैथिली नाटक तथा सांस्कृतिक कार्यक्रम सम्पन्न भेल। सांस्कृतिक कार्यक्रममे गीत एवं नृृत्य प्रस्तुत भेल। जानकी नवमी पर जनकपुरमे बम विस्फोट भेल, झगड़ू मण्डल सहित कई संस्कृतिकर्मीक हत्या भेलनि। परमेश्वर कापड़ि घाइल भेला। स्वस्थ्य महिला स्वस्थ्य परिवार- स्वस्थ्य समाज मूल नाराक संग यदुकोहा आ माची झिटकहियामे सड़क नाटक प्रदर्शन भेल। परिवार नियोजनपर आधारित जंगलमे मंगल नामक मैथिली भाषाक सड़क नाटक पिसिआइ नेपालक सहयोगसँ प्रतिविम्ब रंगमञ्च जनकपुर प्रदर्शित केलक। युवा नाट्यकला परिषद परवाहा देउरी द्वारा बिक्रमी शम्वत २०६९ क पूर्व सन्ध्यामे अन्तरराष्ट्रिय मैथिली नाटक महोत्सव आयोजित भेल, उदघाटन गणतन्त्र नेपालक पहिल राष्ट्रपति डा.रामवरण यादव केलनि। महोत्सवमे नेपाल आ भारतक आठ नाट्य समूह भाग लेलक। नचिकेता क "एक छल राजा"क मंचन सरस्वती पूजनोत्सव तथा वसन्त पंचमी मेला २०६८ क अवसर पर तिलाठी मे भेल। हम जखन बच्चा रही तँ गाममे “देशी कौआ” आ “कार कौआ” दुनू देखाइ पड़ैत छल, “कार कौआ” चकमक आ कर्कश, “देशी कौआ” हल्लुक रंगक आ मधुर आवाजबला। लोक ककरो कर्कश बोलीकेँ सुनि बजै छला- “केना कार कौआ सन बजै छेँ।” एम्हर किछु बर्खसँ “देशी कौआ” विलुप्त भऽ गेल अछि, लोक सभकेँ एकर दुख छै। चारू दिस कार कौआक साम्राज्य व्याप्त अछि। गजेन्द्र ठाकुर ggajendra@videha.com अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। २. गद्य २.१.शिवकुमार झा ‘टिल्लू’-द्विरागमन २.२.जगदीश प्रसाद मण्डल-लघुकथा-कलंक २.३.बिन्देश्वर ठाकुर- प्रेम-पत्र / सपनाक अबसान २.४.प्रसुन सिंह- नारीक चरित्र सभसँ रंगल कथासंग्रह ‘जिद्दी’ २.५.जगदानन्द झा ‘मनु’- दूटा विहनि कथा- लाशसँ भरल ट्रेन/ सभसँ प्रिय बस्तु शिवकुमार झा ‘टिल्लू’ द्विरागमन आत्मासँ जीबाक प्रवृति रखेबला लोककेँ जखन परिस्थितिवश अविरल स्नात जीवन शैलीकेँ जीवाक अनर्गल प्रयत्न करए पड़ैत छैक तँ जीवनक शैलीमे परिवर्त्तन अवश्यंभावी भऽ जाइत छैक। इहए दशा मौलिक रसास्वादन करैत अपन साहित्य साधनासँ समाजकेँ अनुशासित स्वस्थ मनोरंजन देबाक प्रयत्न करैबला आशुकथाकारकेँ सेहो होइत अछि। हरिमोहन बाबू हास्य सम्राट छथि। मैथिली कथाकेँ जनप्रिय बनेबाक दृष्टिऍं हिनक प्रयास अतुलनीय मानल जाइत अछि। गंभीर चिन्तन हेतु अनुशीलन करबाक लेल सामाजिक अर्न्तद्वन्द्व ओ विडम्बनाकेँ अपन सरल शैलीमे आरोहन कऽ मैथिली साहित्यकेँ मनोरम रसास्वादन प्रदान केलनि। किछु व्यतिक्रमक क्रममे हास्य सम्राट ई बिसरि गेलथि जे गंभीर विषय हास्यक छाल्हीक तरमे पानि-पानि भऽ गेल छल। जकर प्रत्यक्ष प्रमाण हिनक चर्चित उपन्यास “कन्यादान” मानल गेल। सगरो आलोचनाक बाढ़ि आबि गेल छलनि। “बुच्ची दाइ”केँ एहेन अवस्थामे आनि कऽ किएक छोड़ि देलनि? ओना ई कोनो असहज नै। मिथिलाक तथाकथिक भलमानुषक परिवारमे अखनो बहुत ठाम “बुच्ची दाइ” कानि रहल छथि। अपस्याँत छथि कतौ अपन सासुरक पीड़ासँ तँ कतौ अपन नैहरक देल लावण्य दुखमयी अश्रुसरितासँ। जौं विधवा भऽ जेतीह तँ समाजकेँ स्वीकार्य भऽ जाएत किएक तँ उज्जर साड़ीमे वाला सवल समाजकेँ मान्य छैक। मुदा शिक्षा विहीन बुच्ची दाइकेँ छोड़ि पाश्चात्य जरदगब सी.सी. मिश्रा केना भागि सकैत छथि...? बेटी दोसरक लाज होइछ। ओकरा इस्कूल नै पठा कऽ लालकाकी केना गलती नै केलखिन...। हरिमोहन जीक ऐ उद्देश्यहीन उपन्यासक आलोचना हिनका समस्याक तत्काल समाधान करबाक लेल प्रेरणा देलक। आशु कथाकार समाजक देल उपहासकेँ बर्दाश्त नै कऽ सकल आ तत्क्षण एकर समाधान लिखबाक लेल उद्यत भऽ गेल। शीर्षक देल गेल “द्विरागमन”। स्वाभाविक छैक बेटी कोनो ढोलनाक ताग तँ नै जे सड़ि गेला बाद निकालि कऽ दोसर तागमे गाँथल जाए। तँए द्विरागमन दोसर केना करत। सी.सी. मिश्र पाश्चात्य जोकर बुच्ची दाइकेँ मॉडर्न वाला बना कऽ द्विरागमन करत। कोनो न्यायाधीशसँ साक्ष्यक अभावमे नै चाहैत िनर्दोषकेँ सजा दैत छैक तँ ओकर शब्द-शब्दक तादात्म्य अनर्गल लगैत। तहिना हरिमोहन जीक द्विरागमनमे जइ-जइ समाधानक विन्दुक उत्कर्ष भेल ओ वएह प्रमाण नै दऽ सकल जकर हरिमोहन अधिकारी छथि। द्विरागमन अपन मोनकेँ जवरदस्ती मनौअल करा कऽ हरिमोहन लिखलनि। एतेक तँ िनश्चित अछि नैसर्गिक प्रतिभाक धनी उपन्यासकार कतौ ऐ कचोटकेँ प्रत्यक्ष नै कएलनि। संग-संग कोनो पारखी ई दु:साहस नै कऽ सकैत अछि जे ऐ उपन्यासक मान्यतापर प्रश्नचिन्ह लगाओत। द्विरागमन सेहो कन्यादाने जकाँ अध्यायमे विभक्त अछि। प्रयोगवादिताक एहेन प्रमाण मैथिली साहित्यक महाकाव्य विधामे मनबोध आ प्रवासी तथा काव्य विधामे नचिकेताकेँ छोड़ि संभवत: आनठाम नै भेटत। मिस विजली विश्व-विद्यालय अज्ञात यौवना आ मुग्धा छथि। सी.सी. मिश्रा हुनक फैन भऽ गेल छथि। सम्पूर्ण भाषणमे आर्यक मूल भाषक श्लोकक तार्किक विवेचन विश्व विद्यालयक संग-संग चण्डीचरणकेँ झकझोकरि देलक। विद्योत्तमा “कालीदास” केँ कुमारसंभवमक नायक बना देने छलीह तँ ऐठाम चण्डीकेँ अपन “बुच्ची दाइ”मे सुयोग्य पाश्चात्य वालाक आश जागव उपन्यासक यथार्थवादी क्रांति मानल जाए। जे मैथिली साहित्यक लेल तत्क्षण तँ बेछप्प अवश्य छल। मिस विजलीक भाषणमे जे आधुनिकताक लेब उपन्यासकार देखेबाक प्रयास केलनि ओ पुरुष प्रधान संकुचित मानसिकतासँ भरल कथाकथित मिथिलाक सवल अर्थात सवर्ण समाज विशेष कऽ कऽ ब्राह्मणमे अखनो स्वीकार्य नै ओहि काल तँ सर्वथा असंभव छल। अखनो हमरा सबहक समाजमे स्त्रीकेँ सहचरी नै अनुचरी मानल जाइत अछि। अपन वेवाक हास्यसँ हरिमोहन तत्कालीन सार्मथ्यवान सबल मैथिलक अर्न्तदशापर तीक्ष्ण प्रहार केलनि, मुदा हास्य समागम मिश्रित रहबाक कारणे ओ समाज एकर मर्मकेँ बूझि नै सकल। जौं सभटा गप्प शुष्क दार्शनिक अंदाजमे लिखल जाइतए तँ हरिमोहन जीक द्विरागमन ओहिना अक्षोप भऽ जइतए जेना साम्यवादी जगदीश प्रसाद मण्डल जीक “मौलाइल गाछक फूल” आ सुभाष चन्द्र यादव केर “घरदेखिया” आ “बनैत विगड़ैत”क अछि। एकटा ब्रह्मण साहित्यकार द्वारा मनुवादी प्रवृतिपर प्रहार समाज द्वारा मान्य तँ भेल मुदा मात्र हास्य आ रोचकताक कारणे। जौं हास्य नै रहितए तँ चतुरानन िमश्रक “कला” जकाँ दुतियाक चान मानल जेबाक संभावनाक विशेष छल। “अकाण्डताण्डव”मे लालकाकी, आवेश रानी, तारादाइ आ दुलारमनिक संवाद रूचिगर लगैत अछि। ऐठाम मिथिलाक परम्परावादी दृष्टिकोणकेँ उत्तम देखेबाक मूल कारण उपन्यासकार नारी शिक्षा ओ चेतनाक संग-संग अनुशीलनक अभाव मनैत छथि। एतेक तँ स्पष्ट अछि जे रेवती रमण सन शिक्षित भाइक कारणे सकल ग्राम्य नारी पात्रा बुच्ची दाइकेँ आधुनिक बनेबाक लेल तैयार भऽ जाइत छथि। पति परमेश्वर होइत अछि। ओकर इच्छाकेँ केना नै पूर्ण कएल जाएत। ब्राह्मण परिवारक स्त्री केना दोसर बिआह करतीह? ऐ प्रकारक कल्पना हरिमोहन करबाक साहस नै कऽ सकलाह। ओ स्वयं परम्परावादी समाजक अंग छथि। तँए परम्परा आ आधुनिकतामे सामंजस्य स्थापित कराबाक इच्छाशक्तिकेँ नवल रूपेँ सजा कऽ बुच्ची दाइकेँ आधुनिक बना देलनि। कन्यादानमे उद्देश्यहीन अंतिम यात्राक परिणति इहए भेल जे एकटा मूर्ख वालिकाकेँ जबरदस्ती ततेक आधुनिक बना देल गेल जे वर्तमान परिस्थितिमे सेहो ग्राह्य नै भऽ सकैत अछि। ओइ कालक लेल तँ सर्वथा अनुपयुक्त भेल हएत। जे बुच्ची दाइ पहिल राति सी.सी. मिश्राक “नार्सिग” शब्दकेँ नरसिंह लगा कऽ गारि बूझि गेली ओ आब डलसीक स्थानपर “क्रोटन”क गमला मंगवाक प्रेरणा अपन माएकेँ दैत छथि- ई तँ सर्वथा अपच्च मानल जाए। ओना “देशी मुर्गी विलायती बोल” परिस्थिति वश संभव छैक मुदा प्रकृति ओहूमे गाममे रहि कऽ वयस भेल मुरुख वालाकेँ शिक्षित बना कऽ एहेन परिवर्तन करबाक चेष्टा उपन्यासकारक अदूरदर्शिता मानल जाए। अशिक्षित पुरुष वा नारी जखन परिस्थितिवश पाश्चात्य संस्कृति आरोहण करैत अछि तँ चालिमे परिवर्तन संभव छैक। मुदा ऐठाम बुच्ची दाइमे शिक्षाक क्रमिक विकास देखाओल गेल। पतिक आलिंगन आ सिनेहसँ विमुख नारीकेँ परीक्षास्वरूप आधुनिक बनए पड़ल ऐ प्रसंगमे तँ बुच्ची दाइकेँ आर गंभीर बना देबाक आवश्यकता छल। मात्र लोकप्रियता आ छद्म साहित्य लोलपताक कारणे एतेक अलौकिक परिवर्तनकेँ समाजक लेल कोनो रूपेँ दिशा िनर्देशित नै मानल जा सकैछ। हरिमोहन सन पारखी रचनाकारक लेखनीक कमाल मानल जाए जे शैली ओ प्रवाहक संग-संग रोचकताक कारणे “द्विरागमन” लोकप्रिय भऽ गेल अन्यथा जौं सामान्य साहित्यकारक ई प्रयास रहितए तँ कोनो रूपे साहित्यक लेल उपयुक्त नै मानल जइतए। भाषा शैली ओ प्रवाहमे द्विरागमन अभूतपूर्व कृति थिक ऐमे कोनो संदेह नै। सरल ग्राम्य समाजक शब्द “धी-डाही”सँ लऽ कऽ पाश्चात्य उपक्रम धरि कतौ ई नै बुझना जाइत अछि जे हरिमोहन ओइ समाजक अंग नै छथि जइ समाजक लेल संवाद लिखल गेल। अर्थात अज्ञसँ लऽ कऽ विज्ञ धरि गामक “जरलाही” सन शब्द बाजैवाली महिलासँ लऽ कऽ मिस विजलीक भाषण धरि एकरूपता देखा कऽ ई प्रमाणित तँ अवश्य कएलनि जे हुनकासँ पैघ रोम-रोममे पुलकित “मैथिली पुत्र” ताधरि तँ अवश्य नै भेल छल। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। जगदीश प्रसाद मण्डल-लघुकथा-कलंक कलंक दिशा-दिशान्तर दिस दृष्टि उठा विश्वामित्र देखलनि तँ समुद्रमे जोर-जोरसँ उठैत लहड़ि नजरि पड़लनि। लहड़िक गति देखि बूझि पड़लनि जे कहीं भूचाल तँ ने भऽ रहल अछि। एहेन भूचाल पूर्वोमे भेल छल आकि पहिल-पहिल भऽ रहल अछि। मुदा ई भाँज केना लागत? ने एकोटा पोथी बँचल, सभटाकेँ दिवार खा गेल आ ने एकोटा पुरान लोककेँ देखै छी जिनकासँ पूछि लेबनि। तखन? आँखि बन्न केने विश्वामित्र बन्द पिपनी तरसँ तकलनि तँ त्रेता युगक मन्थरा देखलनि। मन्थरापर नजरि पहुँचिते कालिल प्रभातक सूर्यकेँ अर्ध दैत देखलनि। मन विहुँसि गेलनि। अनेरे खापड़िक तिसी जकाँ जनचना-चनचना उड़ए लगलनि। एह, ओहो नौड़ी-छौड़ी कमाल कऽ गेल। अयोधिया राजकेँ ढनमना देलक। मुदा लगले मन ठमकि गेलनि। पैछला बात इतिहास-पुरान भेल, अनेरे ओकरा धुनने बड़ हएत तँ मोटका तोसक-सीरक बनत आब ओ युग रहल जे अनेरे पाँच किलो ऊपरो आ पाँच किलो तरोमे तड़तड़ाएत! आब तँ ठंढ़ा हवाक दवाइ बिजलीक हीटर भऽ गेल। जिनगी असान भऽ गेल, मुदा आचारक कि विचार अछि से कतए हरा गेल अछि जे एना बेर-बेर समुद्रमे लहड़ि उठैत रहैए। विश्वामित्रक मन फेर ठमकलनि। ओह अनेरे कोन फेरिमे पड़ै छी। घरवाली घर लेती, दाय जेती छुच्छे। कते दिन जीबे करब जे अनेरे माथमे मोटरी बान्हि रखने रहब। मुदा जाबे आँखि तके छी ताबे केना मुनल रहत। जेकर रक्छा ओटोमेटिक पीपनी करैत रहैत अछि। मन नचिते रहनि आकि डेग उठि पूबरिया रस्ता पकड़ि लेलकनि। जाधरि भकुआएल रहलाह ताधरि तँ दिशाँस लगलाहा जकाँ पूब-पछिमक बोध नै रहलनि मुदा आगूक कटारि देखिते विश्वामित्र चौंकलाह। जहिना गाड़ी-सवाड़ीक यात्री जीवन-मरणक बीच चलैत तहिना विश्वामित्रक सवाड़ी मरल-जीअल बाट पकड़लक। आँखि उठा देखलनि तँ मन्थराक घर सोझमे पड़लनि। जीह हलसि गेलनि। कहुना छी तँ राज-दरवारक छी किने। बैसैले सोनाक पीढ़ी देबे करत। सभ दिन तँ सागेक विन्यास ने गनै छी मुदा आइ तँ छेनेक विन्यास गनब। मुदा लगले जीहक पानि धरतीपर खसिते मन बदललनि। की मन्थरा जीबैत जीबैए आकि मुइल जीबैए। जहिना कोनो गाममे जँ सभ चोरे भऽ जाए तखन चोर के भेल। कियो नै, मुदा सधुआ गाम नै चौरूआ गाम तँ कहाऔत। दरबज्जापर पहुँचिते विश्वामित्रपर आंगन बहारैत मन्थराक नजरि पड़ल। पहिलुके नजरिमे अखड़ाहाक खलीफा जकाँ माटिक सलामी भेटलनि। हाथमे बाढ़नि नेनहि आंगनसँ मन्थरा बेसोह दौगल आबि डेढ़ियापर बाढ़नि पटकि दुनू हाथे दुनू बाँहि पकड़ि मन्थरा आंगन लऽ जा गोड़ लगलकनि। असीरवाद दैत विश्वामित्र पुछलखिन- “मन्थरा, अहीं तँ राम-रावणक बखेरा ठाढ़ केलौं, अखुनका कि हाल अछि?” विश्वामित्रक प्रश्नपर धियान नै दऽ ऋृषिक सेवामे चुपचाप लगि गेल। आतिथ्य-सत्कार पछाति मन्थरा मुँह खोललक- “बाबा महाराज, इतिहास-पुरान हमरा कलंकिनी बना ठाढ़ केने अछि। असगरमे कहियो भेँट हेबाक समए नै भेटल तँए अखन धरि अहाँ कान धरि नै पहुँचा सकल छेलौं, मुदा आइ....।” बिच्चेमे विश्वामित्र पाकल आम जकाँ टपकि खसलाह- “ई तँ हमर दुरभाग्य जे अहाँ सन करामातीसँ तीन युगक पछाति भेँट भेल।” विश्वामित्रक आमक रस पाबि मधुआएल मन्थरा बाजलि- “दरवारमे हम नौड़ी छेलौं। नौड़ी-छौड़ीक मोजर कते होइ छै से अहाँसँ छिपल अछि। तखन हमरे दोख लगा किअए कलंकिनी बनौने अछि?” मन्थराक प्रश्न विश्वामित्रकेँ ठमका देलकनि। तत्काल बातकेँ टारैत बजलाह- “अखन हम हाल-चाल देखैए चलल छी। अहाँक पुरान बात अछि। ओ बिना तात्विक चिन्तनसँ नै हएत।” मन्थरा- “तखन?” “यएह जे सात दिनक समए दिअ। आठम दिन आठ बजे अपने आबि कहि देब, नै जँ कोनो काजक ओझरीमे पड़ि गेलौं तखन अहाँ सबा आठ बजे जरूर पहुँच जाएब।” ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। बिन्देश्वर ठाकुर, धनुषा, नेपाल। हाल-कतार। प्रेम-पत्र / सपनाक अबसान प्रेम-पत्र
हमर प्राणप्यारी नम्रता मनभरिके माया आ स्नेह मात्र अहाँकेँ। हम ऐठाम कुशल रहि अहाँक कुशलताक कामना करैत छी। अहाँक वियोगमे बिना पानिक माछ आ बिना नेहु कऽ माँस बनल हम एतऽ परिवारक भरण-पोषण लेल श्रमजीवीक टोपी लगा दिन काटि रहल छी। काल्हिक फोनसँ साच्चे हमर मन बड दुखित अछि। अहाँक उपराग छल जे हमरा बिसरि गेलौं, बराबर फोन नै करैत छी। अहाँकेँ हमर ख्याले नै अछि। मुदा सत्य ई नै छै। किएक तँ हम तँ बस शरीर छी जहिकऽ आत्मा अहाँ छी। जौँ श्वास लेबऽबला फोक्सो हम छी तखन ऑक्सीजन तँ अहाँ छी। आब अहीं कहू जकरा बिना हम एक पल बाँचि नै सकब, ओकरासँ अलग रहबाक कल्पना कोना करब? मुदा तैयो परिस्थिति लोककेँ दोसर कऽ सामने विवश कऽ दै छै। आन लग काम करब, ओहो प्रचण्ड गर्मीमे, बड पैघ बात छै। घरमे बसिया-कुबसिया किछु नै खाइ छलौं। मुदा एतऽ सुखल खबुस चिबाएब लत भऽ गेल अछि। नेपालमे रहैत काल विदेश माने स्वर्ग हएत से कल्पना करैत छलौं। ओतुक्का लोक सभ आनन्दसँ, खुशी साथ जीवन व्यतीत करैत हेताह, से भ्रम छल। पैसा जेना गाछसँ हिला कऽ लाख- दू लाख पठबैत अछि, तहिना बुझाइत छल। शायद एखन अहूँ ओहे सोचैत हएब। मुदा देखू ह्रिदेश्वरी, सत्य ई नै छै। स्वर्ग कहल ई जगह वियोगाभासमे तड़पि-तड़पि मरऽबला स्थान छै। एतऽ पैसाक महत्व संगे मनुष्यक खरीद-बिक्री होइ छै। दोसर दिस रातिमे अहाँ संग बिताएल ओ पल सभ,स्नेहक तीत-मीठ गप-सप बिढ़नीक खोता जकाँ हमरा मानस पटलमे आबिकऽ निन्द तोड़ि दैए। कखनो-कखनो विदेश छोड़ि कऽ अहीं संग ओइठाम साग-पात खा दिवस गमएबाक इच्छा होइए। मुदा विगतक दु:ख-दर्दसँ मन तरसि जाइए। सच्चे, नीक खाना, नीक कपड़ा आ नीक गहना लेल कतेक तरसि गेल छलौं। नीक खाएब आ नीक लगाएब सपना भऽ गेल छल। एतऽ आबि परिवार टेबब एकटा किनर मिलल अछि। दायित्व पूरा करबाक एकटा सहारा अछि। हम एतबेमे खुशी छी। मुदा तैयो फोन करबाक पर्याप्त पैसा आ समय नै हएब, दोसरक वशमे बड़द जकाँ जोताएब, घर- परिवारसँ दूर रहब चिन्ताक विषय थिक। एहन विषम परिस्थितिमे हमर साथ देब, आत्मविश्वास बढ़ाएब, अपनामे धैर्यताक बान्ध मजगूत राखब अहाँक कर्तव्य अछि। कारण अहाँक धैर्यता आ आत्मविश्वासे प्रवासमे हमरा हौसला प्रदान करत। अन्तमे समय-समयमे फोन करैत रहब से वाचाक संग एखन विराम। बाँकी दोसर पत्रमे।
अहाँक स्नेही एकान्त राम मरुभूमि टोल,कतार २ सपनाक अबसान एक दिन रमलोचना आंगनमे सँ महेश महेश... किलोल करै छथि। तखन चौकिये परसँ काकी कहै छथिन, बौआ एम्हरे आउ- काकीक मन बड पिड़ाएल आ मन खिन्न रहए। रमलोचना गामक बेटा आ महेसक संगी छल। बुढ़िया रमलोचनाकेँ बजा कऽ महेशकेँ वृतान्त सुनबैत छथिन। महेश जे तीन साल पहिने गेल छलाह कतार, अपन सपना पूरा करबाक लेल। जयबाक बेर अत्यन्त हर्षित- माएला घर बनाएब, पत्नीक लेल नीक कपड़ा, बच्चा-बुच्चीकेँ नीक स्कूलमे पढ़ाएब आ जबान बहिनक शादी करब। हतपतमे पास्पोर्ट बनौलक। अपन कियो नै रहै विदेशमे। तैयो घरक पड़ोसी मदनक सहयोगमे हुनकर मामासँ वीजा मङौलक। पहिने कनिए पैसामे भऽ जाएत कहितो प्लेनपर चढ़ऽसँ पहिने १ लाख नगद लेबाक जिद करऽ लागल। पैसा नै भेलाक कारणे दोबर कऽ कागज बनबा लेलक। आब दूध-माछ दुनू बातर भऽ गेलै महेशकेँ। की करत घरमे, सभ सदस्यक आँखिक नोर पोछैत ओ गेलाह कतार। मुदा हुनका सभकेँ नै चाही एना, काम नाथुरकेँ कैहक दिन-राति धूपमे तबुक उठाएब आ देह धुनि बिल्डिङ कन्सट्रक्शनमे काम करब। नै खएबाक नीक व्यवस्था, नै सुतबाक। कम्पनी सेहो सप्लाइ। घरक याद बड सतबैक महेशकेँ। मुदा प्रतिज्ञाक अटल रहथिन महेश। कतबो दु:ख पीड़ा होइतो काम नै छोड़थिन। ओइठाम ब्याज बढ़ि कऽ घर गिरवी रखबाक स्थिति आबि गेलै। एतऽ पगार जहिनाक तहिना। दिन-दिन सोचि-सोचि कमजोर भऽ गेल बेचारा महेश। एक दिन काम करैत काल करेन्ट लागि गेल हुनका। साथी-संगीक सहयोगमे अस्पताल लऽ जा बचलथि। मुदा हाथ बिना काम कऽ भऽ गेल। ऊपरसँ कम्पनी तोरा गल्तीसँ करेन्ट लागल आ कम्पनीक समान सभ नोकसान भेल कहैत माँस सेहो काटि लेलक। शरीर बिना कामकेँ भेलासँ उपचार करएबाक बदला महेशकेँ घर पठा देलक। महेशक आँखिसँ नोर बर्-बर् टपकैत रहल। घर पहुँचलाक बाद ओ माएक स्थिति देखि बौक भऽ गेलाह। जेना मुँहसँ किछु अबाज नै निकलल। माय सेहो अन्तिम साँस रोकने बस महेशक लेल। बौआ-बुच्ची बाबुक सनेसक प्रतीक्षामे। पत्नीक लेल सेहो किछु नै। हाथ खाली। बड ग्लानि भेलनि महेशकेँ। किछु दिन बाद उपराग सभसँ महेशक धैर्यताक बान्ध टुटि गेलै। ई बान्ध बड मजगूत होइ छै आ टुटलापर सर्वनाश होइ छै। यएह भेल महेशक साथ। अपन जबान बहिनक विवाह दहेजक कारण नै भऽ सकल आ गामक लोकक ताना सुनि-सुनि ओ पागल भऽ गेलाह। महेश बनि कऽ सृष्टिक रक्षा करब उद्देश्य रखने हमर बेटा ऐ गरीबीक चपेटामे जिनगी नरक बना लेलक। आ हम सभ दर-दर भटकि रहल छी। अते कहैत बुढ़ियाक आँखिमे नोर भरल आ जोर-जोरसँ चिचिया उठल आ धिया-पुता जकाँ हुचकि-हुचकि कानऽ लगलीह। रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। प्रसुन सिंह, महोत्तरी नारीक चरित्र सभसँ रंगल कथासंग्रह ‘जिद्दी’ जिद्दी कथासंग्रहक बारेमे हम पहिलबेर सामाजिक सञ्जाल फेसबुकके माध्यमसँ जानकारी पएलहुँ । अप्पन गृह जिल्ला महोत्तरीक सदरमुकाम जलेश्वरमें एहि पोथीक विमोचन भेल खबर सुनिकऽ हमरा मनमे स्वभाविक एहि पोथीके बारेमे आओर जानकारी लेबाक इच्छा भेल । अप्पन बाल्यावस्थामें मैथिली भाषा सँ परिचित नहि होएबाक कारणसँ हमरा अप्पन मातृभाषा प्रति आओर वेस रुचि आ स्नेह अछि । एहि भाषाक बारेमे जतेक भऽ सकैय ओतेक जानकारी आ एहि सऽ सामिप्यता बढएबाक इच्छा हमरामे स्वभाविक अछि । संगैह साहित्यके विद्यार्थी आ प्रेमी होएबाक कारण सँ हमरा एहि पोथीक प्रति विशेष जिज्ञासा छल । कात्र्तिक मासमे हम विजयादशमीसँ छठि पावनिधरि जलेश्वरमें रहलहुँ । हमर भित्र नागेन्द्रकुमार कर्ण सँ भेटक क्रममें संयोगवश एहि कथा संग्रहक बारेमे हम हुनका सँ पुछलहुँ । भाइटीकाक दिन हुनकर गाम सुगामें चित्रगुप्त पुजाक अवसर पर गेल छलहुँ त ओ हमरा जिद्दी उपहारस्वरुप देलाह । पोथी भेटैत मन खुस भगेल । हमर पहिल मैथिली कृति पढबाक अनुभव केहन हायत से सोचिकऽ हम आओर प्रफुल्लित भऽ गेलहुँ । अगिला दिन भोरे उठैत हम जिद्दीके हातमे लेलहुँ । सुरुवातमे रहल टिप्पणी सभ पढिकऽ किछ पूर्वजानकारी लेलाक बाद हम एहि पोथीके पहिल कथा ‘पूmल पूmलाइएकऽ रहल’ पढलँहु । कथा समापन होइते हमर भितरके पाठक प्रसन्न भगेल । हमरा लागल जे एहि कृत्ति पढबाक लेल हम एतेक बिलम्ब किया कएलहुँ । हमरा कथाकार सुजित कुमार झा आ एहि कृति प्रति और विश्वास बढल जखन पहिला कथा पढलाक बाद हमरा आरो कथा पढबाकलेल पन्ना उल्टएबाक इच्छा स्वतस्पूर्mत भेल । एकटा लेखकके विजयक लक्षण इहे छैक जे हुनकर कृत्तिके पाठकगण सुरु स लऽकऽ अन्तधरि पढबाक इच्छा होय । ‘पूmल पूmलाइएकऽ रहल’ के पिंकीके अपन संगै भेल धोखाके अवसरिमे परिवर्तन करैत देखलहुँ त ओकर विवेकके मन सलाम कयलक । तहिना ‘नव व्यापारक’ साधनाक असन्तुष्टि आ नारी अधिकारक अपव्याख्यासँ अप्पन घरसंसार प्रतिके जिम्मेवारी सँ दुर भेल देखलहुँ त लागल अपने अडोसपडोसके ककरो चित्रण छैक । ‘खाली घर’ आ ‘व्यर्थक उडानमे’ मुख्य पात्र सभक मनोवैज्ञानिकपक्षक सूक्ष्म दर्शन भेटल । तहिना ‘लाल डायरी’ मे एक उत्तम ‘सस्पेन्स थ्रिलर’क स्वाद भेटल त ‘जिद्दी’क गिन्नी अपने समाजक दीशाहीन नवपुस्ताक यथार्थपरक चित्रण अछि । जिद्दीक आओर कथामे से हो उठाएल गेल विषय वहुत यर्थार्थपरक अछि । एहि संग्रहक कथा पढलाक बाद हमरा लागल जे इ त अपने अडोसपडोसक काका, काकी, भाइ, वहिन, दाइ, आ बाबाक जीवनक चित्रण अछि । मनमे स्वाभाविक रुपसँ एकटा आवाज अवैत छल, ‘ एहन फलानाकसंग से हो भेल छल, फलानाके स्वभाव त ठिके एहिना छैक’ । जिद्दीक विशेषतासभक बात कएल जाए त एहिके प्रत्येक कथामे नारी मुख्य पात्र (एचयतबनयलष्कत) अछि । नारीक चरित्रक विभिन्न रंगक एहिमे प्रस्तुति कएलगेल अछि । पिंकी आदर्श जीवनसाथीक उदाहरण छथि त साधना एक लापरवाह गृहिणीके । गिन्नी अप्पन लक्ष्यसँ भटकल युवतीक प्रतिनिधि छथि त ममता कल्पनाक पङ्ख लगाबिकऽ उडान करनिहार स्वप्नप्रेमी महिलाक । निमाक पत्नीव्रताक ढोंग आ लालचि चरित्र पाठकक मन सिहोरि दैत अछि त कामनी मैडमक ममत्व करुणाक भाव जगबैत अछि । एहिसँ इ अनुभव होएत अछि जे अप्पन समाजमे बहुतरास महिला छथि जे अप्पन घरसंसार सम्हारिकऽ रहल छथि आ तेहनो महिला छथि जे कोनो नै कोनो कारणसँ अप्पन जीवनक माला समेटिकऽ नहि राखऽ सकल छथि । कथाकार झा एक ख्भचकबतष्भि (बहुमुखी) सर्जक छथि एहि बातक प्रमाण से हो एहिसँ भेट जाइत अछि । एक पाठकक नजरसँ देखि त जिद्दी कथा संग्रह पढलाक बाद हमरा एक रोमान्चकारी साहित्यिक यात्राक स्वाद भेटल जाहिमे अप्पन मिथिलाञ्चलक घरघरके कहानी वहुत कुशलतापूर्वक कथाकार झा प्रस्तुत कयने छथि । हुनकर आगामी कृतिक प्रतिक्षा करैत हुनका जिद्दीक लेल बधाइ दैत छी, संगैह हुनकर आगामी रचना सभकलेल शुभकामना दैत छी । ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। ३. पद्य ३.१.जगदीश चन्द्र ठाकुर ‘अनिल’- की भेटल आ की हेरा गेल (आत्म गीत)- (आगाँ) ३.२.बिन्देश्वर ठाकुर "नेपाली"- हमर समाज बौरा गेल/ परदेशी पिया/ जन्मब दुर्लभ ऐ धरतीपर ३.३.जगदानन्द झा ‘मनु’- गजल १-४ ३.४.शिव कुमार यादव- गजल ३.५.मुन्नी कामतक दूगो कविता स्वच्छ समाज / माय एक चुटकी नुन दअ दे... ३.६.१.राजदेव मण्डलक तीन गोट कविता-नेंगरा मजदूर/ मनक दुआर/ छाँहक रूप २.जगदीश प्रसाद मण्डलक पाँचटा गीत-अबिते अगहन./ उपजल खेत./ धूल चरण./ उनटन./ जान विचार......दूटा कविता- (तिलासंक्रातिक अवसरपर) सतबेध/गुरुत्तर ३.७.राजेश कुमार झा-शराबक लेल ३.८.बिनीता झा-देखू आइ एफबी परक खेल जगदीश चन्द्र ठाकुर ‘अनिल’ की भेटल आ की हेरा गेल (आत्म गीत)- (आगाँ) भोरे उठि स्मरण करै छी परिजन, प्रियजन, गुरूजनकें आसन-प्राणायामक आदति शुद्ध करैए तन-मनकें साहित्यक आनन्द हमर दिनचर्यामे अछि समा गेल, हम सोचि रहल छी जीवनमे की भेटल आ की हेरा गेल । के जानय काल्हि रही ने रही मोनक सभ बात कही ने कही यात्री, हरिमोहनसं एखनहुं खाली नहि छथि मिथिलाक मही से सोचि सूप सन अछि करेज आ देखि नैन अछि जुड़ा गेल, हम सोचि रहल छी जीवनमे की भेटल आ की हेरा गेल । सौंसे दुनियाले एक सूर्य सौंसे दुनियाले एक चान लाख तरेगन केर संग सौंेसे दुनियाले आसमान ओ कलाकार, ओ वैज्ञानिक सभ बना कतऽ छथि नुका गेल, हम सोचि रहल छी जीवनमे की भेटल आ की हेरा गेल। भगवानक दर्शन होइए शुभ चिन्तनमे, शुभ कीर्तनमे हरियर धरती, सुन्दर अकास शुभ दर्पणमे, शुभ अर्पणमे देखै छी चारूकात हमर अछि फूल कते नव फुला गेल, हम सोचि रहल छी जीवनमे की भेटल आ की हेरा गेल। हम छी कृतज्ञ एहि अस्तित्वक जे जीबा केर आधार देलनि मंगनीमे भेटल रौद, हवा आ देखबाले संसार देलनि दुविधासँ मुक्तिक मंत्र प्रबल पथ महाजनक अछि सिखा गेल, हम सोचि रहल छी जीवनमे की भेटल आ की हेरा गेल। हम छी ऊर्जा, जीवन-ऊर्जा हम उत्सव छी ऐ तन-मन केर शान्ति, प्रेम, आनन्द मात्र अछि लक्ष्य हमर एहि जीवन केर उत्साह भरल, उल्लास भरल उत्कर्षक पथ अछि देखा गेल, हम सोचि रहल छी जीवनमे की भेटल आ की हेरा गेल । (क्रमशः) ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। बिन्देश्वर ठाकुर "नेपाली", धनुषा- नेपाल, हाल- कतार हमर समाज बौरा गेल/ परदेशी पिया/ जन्मब दुर्लभ ऐ धरतीपर १ हमर समाज बौरा गेल एखनुक सभसँ पैघ सबाल अछि सगरो बलत्कारे बलत्कार गाँउमे बलत्कार, शहरमे बलत्कार देशमे बलत्कार, विदेशमे बलत्कार बुझू जे घोर कलयुग छा गेल माने हमर समाज बौरा गेल ।।
अत्याचार, आतंक, महिला हिंसा निस्तब्ध भऽ सभ केऊ देखैत अछि जनता तँ आपसमे फुटले देखब लुटेराक त्राससँ सरकारो डगमगा गेल माने हमर समाज बौरा गेल।।
सुरक्षाकर्मी पथभ्रष्ट भऽ जुआ खेलै शान्तिसेना हिनताबोधमे दारु पेलै अशान्तिक भूमरिमे धरती खौझा गेल माने हमर समाज बौरा गेल।।
कतौ फेसबुकसँ बलत्कार ककरो स्काइपमे बलत्कार कखनो निम्बुजसँ बलत्कार तँ कतौ ट्वीटरमे बलत्कार एहन अपराध सर्वत्र छा गेल माने हमर समाज बौरा गेल।।
सहनशीलताक प्रतिमूर्ति नारी मर्यादाक पराकाष्ठा होइ छै माया-प्रेमसँ जगत फुलाबै स्वप्न दर्शनक द्रष्टा होइ छै मुदा दुर्भाग्य दानवक उदय भेल सकुनी मामा संग कंसक आगमन भेल द्रौपदीक चीरहरण, सीताक रुपहरण निन्दनीय घटना आइ फेर दोहरा गेल माने हमर समाज बौरा गेल।।
की कहु देखलौं घोर अनैतिक बात जइठाम देखू बलत्कारे बलत्कार बेटीक बलत्कार, दीदीक बलत्कार मौसीक बलत्कार,पिउसीक बलत्कार बुझु जे घोर कलयुग छा गेल माने हमर समाज बौरा गेल।।
२ परदेशी पिया कोना बिसरलौं मुँहो हमर भेलौं अहाँ कोना विरान जन्म-जन्मक व्रत-बन्धनसँ पलभरिमे भऽ गेलौं आन।
देख सपनामे छाती फटैए बिपदामे देख कऽ दिल धड़कैए लोकक पिया घर आबै छथि हमर आँखिसँ नोर खसैए।
जन्मेसँ हम भेलौं अभगली बचपन छिनल सासुर पौली बाली उमरमे भेलौं परदेसी बिनु पियाक जीवन बितौली।
केश फल्कौवामे तेल गम्कौआ लऽ जाइत छलौं पान-मखान टोकलक बिच्चे बाट मुझौसा अहाँ गामक बुढ़बा हजाम।
नीक नै लागए बिन अहाँके लौटब कहिया अपन गाम असगर आङ्गन दाँत कटैए बिन अहाँकेँ ठाम-ठाम । ३ जन्मब दुर्लभ ऐ धरतीपर जन्मब दुर्लभ ऐ धरतीपर। माटि-पानि अछि जकर महान।। सदियोसँ परिचर्चा पौने। अछि आर्यसमाज बिधमान।। पूर्वज जिनकर नाना क्षेत्रमे। कुशल, ज्ञानी, गुणवान छै।। इतिहासक हर पन्नापर। एकसँ एक नीक नाम छै।। एखनुक मैथिल पथभ्रष्ट भऽ। कुकर्मी-कुसंस्कारी भऽ रहल।। आधुनिकताक दुर्गन्धित हवासँ। धाराशाही मिथिलाकेँ कऽ रहल।। एहन विषम परिस्थितिमे। अपन कर्तव्यक बोध करब।। छिड़िआएल, भुलल, भटकल जनकेँ। लऽ सत्मार्गक ओर चलब।। ई पुनीत कर्मयोगी सभमे। अछि हमर चरण बन्दना।। सम्पूर्ण स्रष्टा एवम् समाजमे। ऐ नवबर्षक शुभकामना।। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। जगदानन्द झा ‘मनु’ ग्राम पोस्ट- हरिपुर डीहटोल, मधुबनी गजल - १ भूतलेलहुँ किए एना मित बना लिअ छोड़ि सगरो बहानाकेँ प्रित लगा लिअ वचन नै देब हम नै किछु मोल एकर आउ चलि संगमे हमरो अप्पना लिअ काँट पसरल बिछ्ब कहु एतेक कोना फूलकेँ लय कs मोनक संसय हटा लिअ जुनि बुझू आन जगमे सपनोसँ कखनो बूझि अप्पन कनी छू ठोरसँ सटा लिअ रूप सुन्नर अहाँकेँ ई ओहिपर बदरा जीब कोना करेजामे "मनु" बसा लिअ (बहरे - असम, मात्रा क्रम - २१२२-१२२२-२१२२ ) गजल-२ जीवन कखन तक छैक नै बुझलक कियो कखनो करेजक गप्प नै जनलक कियो भेटल तँ जीवनमे सुखक संगी बहुत देखैत दुखमे आँखि नै तकलक कियो दुखकेँ अपन बेसी बुझै किछु लोक सभ भेलै जँ दोसरकेँ तँ नै सुनलक कियो सदिखन रहल भागैत सभ काजे अपन आनक नोर घुइरो कs नै बिछ्लक कियो जीवन तँ अछि जीवैत 'मनु' सभ एतए मइरो कs जे जीवैत नै बनलक कियो (बहरे- रजज, २२१२ तीन-तीन बेर सभ पांतिमे) गजल-३ जखन खगता सभसँ बेसी तखन ओ मुँह मोड़ि लेलनि जानि आफत छोरि हमरा सुखसँ नाता जोड़ि लेलनि देखि चकमक रंग सभतरि ओहिमे बहि ओ तँ गेली जानि खखड़ी ओ हमर हँसिते करेजा कोड़ि लेलनि बन्द केने हम मनोरथ अप्पन सदिखन चूप रहलहुँ पाञ्च बरखे आबि देख फेर सपना तोड़ि लेलनि दुखसँ अप्पन अधिक दोसरकेँ सुखक चिन्ता कएने आँखि जे फूटै दुनू तैँ एक अप्पन फोड़ि लेलनि चलक सप्पत संग लेलहुँ जीवनक जतराक पथपर मेघ दुखकेँ देखते ओ संग 'मनु'केँ छोड़ि लेलनि (बहरे - रमल, मात्राक्रम- २१२२ चारि-चारि बेर सभ पांतिमे) गजल -४ किए तीर नजरिसँ अहाँकेँ चलैए हँसी ई तँ घाएल हमरा करैए
मधुर बाजि खन-खन पएरक पजनियाँ हमर मोन रहि रहि कए डोलबैए
छ्लकए हबामे अहाँकेँ खुजल लट कतेको तँ दाँतेसँ आङुर कटैए ससरि जे जए जखन आँचर अहाँकेँ जिला भरि करेजाक धड़कन रुकैए अहीँकेँ तँ मुँह देखि जीबैत 'मनु' अछि बिना संग नै साँस मिसियो चलैए (बहरे - मुतकारिब, मात्राक्रम -१२२-१२२-१२२-१२२) ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। शिव कुमार यादव गजल
कतऽ नुकेलहीं गे दिलतोड़िया कतऽ भसेलहीं गे मनतोड़िया
तोहीं तँ हमर मनमीत गे कतऽ हरेलहीं गे संगतोड़िया
चान सन तोँ हमर सजनी गे कतऽ बिलेलहीं गे नैनतोड़िया
तोँ तँ हमर भगजोगिनी गे कतऽ पड़ेलहीं गे पगतोड़िया
"शिकुया" हेरान तोड़ा लेल गे कतऽ भसेलहीं गे मनतोड़िया
(आशीष अनचिन्हार जीक पाँति "कहाँ नुकेलही गे दिलतोड़िया गे मनतोड़िया" के देखि कऽ तुरत्तेमे कहल गेल ई गजल।)
शिकुया "मैथिल" ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। मुन्नी कामतक दूगो कविता स्वच्छ समाज / माय एक चुटकी नुन दअ दे... १ स्वच्छ समाज छोड़ि जाइ छी एगो चेन्ह हम। हम निस्प्राण भऽ गेलौं मुदा हमर दरद सदि जीबैत रहत, हम चुपचाप जा रहल छी मुदा हमर चिख अहाँकेँ हरिदम झकझोरैत रहत। दोष हमर नै, अहाँक मानसिकताक छल बुराइ हमरामे नै अहाँकेँ संस्कारम छल। बेजुबान हम नै अहाँकेँ बना कऽ गेलौं जा रहल छी, हम खामोश भऽ कऽ अपन अवाज बुलंद केने जा रहल छी । अगर अछि अहाँमे जिंदा कनियो मानवता तँ बचाउ दोसर ‘दामिनी‘क लाज, यएह हमर इच्छा अछि निस्पाप हुअए अपन समाज, करू नै समर्पित हमरापर फूल आ मोमबत्ती गाड़ि देब हमरा सहि श्रर्द्धाजलि तँ करू संकल्प बनाएब अहाँ नारीकेँ जीऐ लेल एगो स्वच्छ समाज। २ माय एक चुटकी नुन दअ दे... आइ हम जनलिऐ बेटी आ बेटामे कि भेद होइ छै, गर्भमे बेटी किअए गरै छै। नारीक दुःख नारिये जनै छै, तँए तँ हर माए बेटी जनमबैसँ डरै छै। जइ बेटीकेँ माए जीवन दइ छै, वएह बेटीकेँ समाजक अत्याचार मारै लेल मजबूर करै छै। बेआबरू भऽ कऽ मरैसँ तँ नीक माए इज्जत कऽ तँू मौत दऽ दे ई पुरूष सत्तात्मक समाज छीऐ माए जनमिते तूँ हमरा एक चुटकि नुन दऽ दे। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। १.राजदेव मण्डलक तीन गोट कविता-नेंगरा मजदूर/ मनक दुआर/ छाँहक रूप २.जगदीश प्रसाद मण्डलक पाँचटा गीत-अबिते अगहन./ उपजल खेत./ धूल चरण./ उनटन./ जान विचार......दूटा कविता- (तिलासंक्रातिक अवसरपर) सतबेध/गुरुत्तर १ राजदेव मण्डलक तीनटा कविता- नेंगरा मजदूर/ मनक दुआर/ छाँहक रूप १ नेंगरा मजदूर किएक फटकारै छी यौ दरबान हम नै छी कियो आन नै करू एना परेशान नै छी भिखमंगा, चाेर, बेइमान बरख भरि पहिले हमरो रहै अहीं सन शान हमहीं बनौने रही ई सतमहला मकान कतेक लगा कऽ लगन काज केने रही भऽ कऽ मगन अपन दुख किछु कहल ने जाइ ऊपरसँ खसल रही दुनू भाँइ टाँग कटा कऽ हमर बचल जान सहोदराकेँ उड़ि गेल प्राण नै छी दुखित केलौं िनरमान एहेन काजमे होइतै छै बलिदान हमर तँ कर्तव्य अछि काजसँ लड़ब किछु भऽ जेतै काज तैयो करब देखबाक लीलसा छल एकबेर आँखि जुरा जाएत रहब कनेक देर। “भागि जो ऐठामसँ रे बकलेल ई जगह अछि विशिष्ट लोकक लेल मालिक एतौ तँ देख लेबही खेल तुरन्तेमे चलि जेबही जेल।” आँखि लगै छै केहेन क्रूर जेना देहमे कऽ देतै भूर चोटहिं घूमि गेल नेंगरा मजदूर अछि चुप्पे आवाज निकलै दूर-दूर। २ मनक दुआर अन्हार घरमे बैसल लोग कऽ रहल अछि जेना कोनो नै देखि रहल एक देासराक मुख कतए सँ भेटत दरशनक सुख औना रहल सभ ठामहिं-ठाम बिनु मकसद जिनगी बेकाम अन्हार करै अन्हारसँ बात अन्हारेसँ झँपने रहू सबहक गात अनठेकानी हथोड़िया मारैत हाथ नै जानि के करतै केकरापर आघात शंकामे डूमल सभ काते-कात डर नाचि रहल अछि माथे-माथ कतबो करब छूच्छे जाप अन्हार घरमे साँपे-साँप खोलए पड़त िखड़की-दुआर अन्तर मनक सभ केबाड़ अन्हार भऽ जाएत तार-तार पहुँचत प्रकाश आर-पार एक देासरसँ जान-पहचान बढ़त आपसी मान-सम्माण। ३ छाँहक रूप हम छी अभागल जा रहल छी भागल निन्नमे डूमल या जागल हरपल पाछाँ लागल केहेन ई छाँह बिनु परबाह लगैत अछि अथाह अशोथकित भऽ गेलौं भगैत-भागैत घूमि-घूमि पाछू तकैत-तकैत मुँहसँ निकलैत अछि आह केहेन अछि जिदियाह जखैन तक अछि ई काया सँगे लगल रहत ई छाया बेसी भागब तँ थकित हएत तन ओझराएल रहत हरक्षण मन अड़ि कऽ परखब हम ओकर रूप चाहे चढ़ि ऊपर चाहे खसि कूप रूप हो कुरूप वा हो अनूप ओकरे सँगे देखब हम अपन सरूप। २ जगदीश प्रसाद मण्डलक पाँचटा गीत-अबिते अगहन./ उपजल खेत./ धूल चरण./ उनटन./ जान विचार......दूटा कविता- (तिलासंक्रातिक अवसरपर) सतबेध/गुरुत्तर १ अबिते अगहन...... अबिते अगहन ओस ओसा धड़-धरती धड़ए लगै छै। चर-चाँचर आँचर पकड़ि उजाहि सिल्ली चरए लगै छै। उजाहि सिल्ली......। आँचर धन चाँचर पकड़ि गरि गारा गाबए लगै छै। अकुल-सकुल रभसि राग दिन-राति बीच गबै छै। दिन-राति......। जेकर छलै तेकर गेलै अपन कहि हहकारि कहै छै। धनबल मनबल सिर चढ़ि राग-विराग अलपि कहै छै। राग-विराग......। २ उपजल खेत...... उपजल खेत जजात जेनाही मुड़हन, दोहन तेहन कहै छै। कोणे-काणी हिहिया-हिहिया राखी सिर सौंति सजबै छै। राखी सिर......। बोन-बाध बिनु रखा राखी िनर्जन िनरबल कहए लगै छै। आलतू-पालतू फालतू बनि परती-पराँत कहए लगै छै। परती-पराँत......। मरल धार चहि चहटि पेट मूर्द-घाट सिरजए लगै छै। बजारि बज्र परतियो तहिना मूड़-धन धाम बनबए लगै छै। भाय यौ, मुड़......। ३ धूल चरण...... धूल चरण चन्द्रामृत कहि काका कबीर कुकुआइत एला रज सर सिर सहजि सजि गोप गोस्वामी कहाइत एला। गोप गोस्वामी......। हर क्षण पल पलकि जीअन-मरन चलैत एलै चीत चेता चकोर चितवन नकर-सकर बिलहैत एला नकर-सकर......। जीता जी गुहा-भत्ता मरन रूप सजबैत एला चरण पकड़ि चन्द्र अमृत बनि जल-थल नभ घुमैत एला जल-थल......। चरण-शरण कहि शरणागत रूप रोबोट धड़ैत एला जीवन मुक्त मुक्ति जिनगी नाम-राम सिरजैत एला नाम-राम......। ४ उनटन...... उनटन उबटन सदि-सदि बनि बोध बाल सिस चढ़ैत एलै। अदलि-बदलि रीति-नीति सून-शून्य सुनबैत एलै। मीत यौ, सून......। दस-बीस, तीस तेबर जेबर बनि-बनि सजैत एलै। नब्बे-अस्सी खस्सी खसि खड़-खड़ाइत खसैत एलै। मीत यौ, खड़......। पछिया पछ पकड़ि पछुआ आगू-पाछू ठेलैत गेलै। वाम-दहिना बाँहि पकड़ि पाट धोबि पटकैत एलै। मीत यौ, पाट......। ५ जान विचार...... जान विचार अबिते आंगना जनदार बास कहबए लगै छै। कर्म-शब्द रचि-रचि बसि रूप कर्म सजबए लगै छै। भाय यौ, रूप......। भाव कहै छै अभाव शब्द कर्म गवाही दइत कहै छै। करता-धरता जे जन जानए साधि-साधि मंगल गबै छै। भाय यौ, साधि......। कर्म-धर्म कि शब्द-धर्म आँखि मिचौनी खेल खेलै छै। तिरछा-तिरछा तीन-तीनबटिया विरीछ-तिरिछ रोपए लगै छै। भाय यौ, विरीछ......। दूटा कविता- १ (तिलासंक्रातिक अवसरपर) सतबेध सत् केर शक्ति जगैछ भूमि रण उठि-मरि, मरि उठि, उठि कहै छै। कुंज-निकंुज पुरुष परीछा असत्-सत् सुसत् बनै छै। इत्यादि, आदिसँ दादी-नानी सतबेध खिस्सा कहैत एली वेद-पुराण सिर-सजि मणि दिन-राति सुनबैत एली भरल-पुरल पोथी-पुराण सत्-बेध जिनगी भरल-पुरल छै। कखनो जोगीक जोग बेधि तीन सत् वाण रटै छै। काल कुचक्र चक्र सुचक्र वाण बेधि मारैत रहै छै। वाण वाणि नारी-पुरुष संग साड़ी शक्ति सजबैत रहै छै। मिथिला मर्म माथ तखन मथि-मथि माथ मिलबै छै। दान सतंजा बाँटि-बिलहि जिनगी सफल करैत कहै छै। चक्री-कुचक्री वाण बनि वन चालि कुकुड़ धड़ैत एलैए। जिनगी जुआ पकड़ि-पकड़ि पछुआ पाट बिलहैत एलैए। पाटि-पाटि पटिया-पटिया पटिया धरती बिछबैत एलैए। नरि गोनरि गमार कुहू कहि तर-उपरा रंग चढ़बैत एलैए। चिक्कन-चुनमुन चुनचुनाइत देखि लोल-बोल बतिआइत एलैए। मन-मानूख फुसला-पनिया मनु-मानव कहैत एलैए। बाणि मोड़ि पकड़ि पग जंगल नाच देखैत एलैए। भ्रमर रूप सजि-धजि-धजि भौं-आँखि चढ़बैत एलैए। फूल कमल बसोबारा कहि कमल दहल दहलाइत एलैए। दोबर-तेबर दस-बीस कहि सत् शून्य भरैत एलैए। सैयाँ-निनानबे मंत्र रचि बसि अस्सी-खस्सी बनबैत एलैए। बर्जित तन कहि-कहि मानव-मन रचैत एलैए। खस्सी-बकरी रूप देखि-देखि मासु खून पीबैत एलैए। लंका दर्शन पूर्व राम वाण समुद्र पकड़ै छै। सत्-बेध पाथर पकड़ि-पकड़ि सेतु बान्ह बनबै छै। २ गुरुत्तर गुरुत्तर भार भरैसँ पहिने गुरुत्तर पाठ पठैत पढ़ै छी। सड़ि-सड़ि सरिया-सरिया सिर साटि सजबए लगै छै। बून-बून बुन्नी पकड़ि-पकड़ि धड़ि-धड़ि धारण करै छै। धड़कि-धड़कि धड़-धड़धड़ा गति गीत मीत गबै छै। शिवगंगा पकड़ैसँ पहिने पथर-माटि बनए लगै छै। परिहास रचि-बसि कैलाश राति शिव रचबए लगै छै। एक-एक जोड़ि-जाड़ि पजेबा महल ताज सजबए लगै छै। पकड़ि बाँहि अक्षर ब्रह्म वन-उपवन सजबए लगै छै। अक्षर-ब्रह्म मिलि बैसि शक्ति शब्द सजबए लगै छै। हित-सहित पकड़ि-पकड़ि मुँह साहित्य सिरजए लगै छै। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। राजेश कुमार झा शराबक लेल सुनबै छी एकटा शराबीक कथा, शराबक लेल ओ की की करैए पहिने शराबकेँ बुझै छै ओ फैशन, शराबक रंगमे रंगैए फैशन बुझतै-बुझतै, ओ शराबक लत पकड़ैए पहिने पिआबै छै संगी-साथी, बादमे ओ अपने पिबैए पिअ वास्ते हम देखलौं, ओ परिवारक सम्पति लुटैए जौं परिवार ओकरा रोकै छथिन, हुनका कुलटा-चरित्रहीन कहैए जहन परिवारक सम्पति लुटि जाइ छनि, परिवार हुनकर भूखे मरैए तहन ओ करैए पैंच-उधार, अपन सगा-संबंधीकेँ ठकैए पैंच तँ आपिस नै करैए, ऊपरसँ झगरा-झाँटी करैए तहन ओ करैए छीना-झपटी, अइ तरहेँ ओ समाजोकेँ लुटैए शिकाइतपर जहन पुलिस पकड़ै छै, ओ जेलोमे गलत संगी बढ़बैए जहन जेलसँ बाहर अबैए, तहन लुटेरा-गिरोह बनबैए शराबीकेँ चाही बस शराब, जहन की शराबे शराबी केँ पिबैए शराब छी अन्यायक बीज, अकरा बढ़ैसँ रोकैए बंद कराउ ई शराबक ठेका, ई मानवकेँ हैवान बनेने यऽ उठू गुजरात जकाँ हर राज्य, शराब बेचैपर पाबन्दी केने यऽ ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। बिनीता झा देखू आइ एफबी परक खेल
देखू आइ एफबी परक खेल भेष बदलि लोक अपन भेल देखू खेलैत छथि कतेक खेल बढबैत छथि अंजानसँ मेल नाना तरहक छायाचित्र नुकबैत अपन कायाचित्र फँसला जे क्यो ऐ जालमे नाश हुनक छन्हि ऐ कालमे सतर्क भए आजुक पीढ़ीकेँ बुझबाक चाही सभ चालिकेँ राखैत डेग सम्हारि कए निश्चित कल्याण हुनक तखनहिं टा अपेक्षित l ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। बालानां कृते बच्चा लोकनि द्वारा स्मरणीय श्लोक १.प्रातः काल ब्रह्ममुहूर्त्त (सूर्योदयक एक घंटा पहिने) सर्वप्रथम अपन दुनू हाथ देखबाक चाही, आ’ ई श्लोक बजबाक चाही। कराग्रे वसते लक्ष्मीः करमध्ये सरस्वती। करमूले स्थितो ब्रह्मा प्रभाते करदर्शनम्॥ करक आगाँ लक्ष्मी बसैत छथि, करक मध्यमे सरस्वती, करक मूलमे ब्रह्मा स्थित छथि। भोरमे ताहि द्वारे करक दर्शन करबाक थीक। २.संध्या काल दीप लेसबाक काल- दीपमूले स्थितो ब्रह्मा दीपमध्ये जनार्दनः। दीपाग्रे शङ्करः प्रोक्त्तः सन्ध्याज्योतिर्नमोऽस्तुते॥ दीपक मूल भागमे ब्रह्मा, दीपक मध्यभागमे जनार्दन (विष्णु) आऽ दीपक अग्र भागमे शङ्कर स्थित छथि। हे संध्याज्योति! अहाँकेँ नमस्कार। ३.सुतबाक काल- रामं स्कन्दं हनूमन्तं वैनतेयं वृकोदरम्। शयने यः स्मरेन्नित्यं दुःस्वप्नस्तस्य नश्यति॥ जे सभ दिन सुतबासँ पहिने राम, कुमारस्वामी, हनूमान्, गरुड़ आऽ भीमक स्मरण करैत छथि, हुनकर दुःस्वप्न नष्ट भऽ जाइत छन्हि। ४. नहेबाक समय- गङ्गे च यमुने चैव गोदावरि सरस्वति। नर्मदे सिन्धु कावेरि जलेऽस्मिन् सन्निधिं कुरू॥ हे गंगा, यमुना, गोदावरी, सरस्वती, नर्मदा, सिन्धु आऽ कावेरी धार। एहि जलमे अपन सान्निध्य दिअ। ५.उत्तरं यत्समुद्रस्य हिमाद्रेश्चैव दक्षिणम्। वर्षं तत् भारतं नाम भारती यत्र सन्ततिः॥ समुद्रक उत्तरमे आऽ हिमालयक दक्षिणमे भारत अछि आऽ ओतुका सन्तति भारती कहबैत छथि। ६.अहल्या द्रौपदी सीता तारा मण्डोदरी तथा। पञ्चकं ना स्मरेन्नित्यं महापातकनाशकम्॥ जे सभ दिन अहल्या, द्रौपदी, सीता, तारा आऽ मण्दोदरी, एहि पाँच साध्वी-स्त्रीक स्मरण करैत छथि, हुनकर सभ पाप नष्ट भऽ जाइत छन्हि। ७.अश्वत्थामा बलिर्व्यासो हनूमांश्च विभीषणः। कृपः परशुरामश्च सप्तैते चिरञ्जीविनः॥ अश्वत्थामा, बलि, व्यास, हनूमान्, विभीषण, कृपाचार्य आऽ परशुराम- ई सात टा चिरञ्जीवी कहबैत छथि। ८.साते भवतु सुप्रीता देवी शिखर वासिनी उग्रेन तपसा लब्धो यया पशुपतिः पतिः। सिद्धिः साध्ये सतामस्तु प्रसादान्तस्य धूर्जटेः जाह्नवीफेनलेखेव यन्यूधि शशिनः कला॥ ९. बालोऽहं जगदानन्द न मे बाला सरस्वती। अपूर्णे पंचमे वर्षे वर्णयामि जगत्त्रयम् ॥ १०. दूर्वाक्षत मंत्र(शुक्ल यजुर्वेद अध्याय २२, मंत्र २२) आ ब्रह्मन्नित्यस्य प्रजापतिर्ॠषिः। लिंभोक्त्ता देवताः। स्वराडुत्कृतिश्छन्दः। षड्जः स्वरः॥ आ ब्रह्म॑न् ब्राह्म॒णो ब्र॑ह्मवर्च॒सी जा॑यता॒मा रा॒ष्ट्रे रा॑ज॒न्यः शुरे॑ऽइषव्यो॒ऽतिव्या॒धी म॑हार॒थो जा॑यतां॒ दोग्ध्रीं धे॒नुर्वोढा॑न॒ड्वाना॒शुः सप्तिः॒ पुर॑न्धि॒र्योवा॑ जि॒ष्णू र॑थे॒ष्ठाः स॒भेयो॒ युवास्य यज॑मानस्य वी॒रो जा॒यतां निका॒मे-नि॑कामे नः प॒र्जन्यों वर्षतु॒ फल॑वत्यो न॒ऽओष॑धयः पच्यन्तां योगेक्ष॒मो नः॑ कल्पताम्॥२२॥ मन्त्रार्थाः सिद्धयः सन्तु पूर्णाः सन्तु मनोरथाः। शत्रूणां बुद्धिनाशोऽस्तु मित्राणामुदयस्तव। ॐ दीर्घायुर्भव। ॐ सौभाग्यवती भव। हे भगवान्। अपन देशमे सुयोग्य आ’ सर्वज्ञ विद्यार्थी उत्पन्न होथि, आ’ शुत्रुकेँ नाश कएनिहार सैनिक उत्पन्न होथि। अपन देशक गाय खूब दूध दय बाली, बरद भार वहन करएमे सक्षम होथि आ’ घोड़ा त्वरित रूपेँ दौगय बला होए। स्त्रीगण नगरक नेतृत्व करबामे सक्षम होथि आ’ युवक सभामे ओजपूर्ण भाषण देबयबला आ’ नेतृत्व देबामे सक्षम होथि। अपन देशमे जखन आवश्यक होय वर्षा होए आ’ औषधिक-बूटी सर्वदा परिपक्व होइत रहए। एवं क्रमे सभ तरहेँ हमरा सभक कल्याण होए। शत्रुक बुद्धिक नाश होए आ’ मित्रक उदय होए॥ मनुष्यकें कोन वस्तुक इच्छा करबाक चाही तकर वर्णन एहि मंत्रमे कएल गेल अछि। एहिमे वाचकलुप्तोपमालड़्कार अछि। अन्वय- ब्रह्म॑न् - विद्या आदि गुणसँ परिपूर्ण ब्रह्म रा॒ष्ट्रे - देशमे ब्र॑ह्मवर्च॒सी-ब्रह्म विद्याक तेजसँ युक्त्त आ जा॑यतां॒- उत्पन्न होए रा॑ज॒न्यः-राजा शुरे॑ऽ–बिना डर बला इषव्यो॒- बाण चलेबामे निपुण ऽतिव्या॒धी-शत्रुकेँ तारण दय बला म॑हार॒थो-पैघ रथ बला वीर दोग्ध्रीं-कामना(दूध पूर्ण करए बाली) धे॒नुर्वोढा॑न॒ड्वाना॒शुः धे॒नु-गौ वा वाणी र्वोढा॑न॒ड्वा- पैघ बरद ना॒शुः-आशुः-त्वरित सप्तिः॒-घोड़ा पुर॑न्धि॒र्योवा॑- पुर॑न्धि॒- व्यवहारकेँ धारण करए बाली र्योवा॑-स्त्री जि॒ष्णू-शत्रुकेँ जीतए बला र॑थे॒ष्ठाः-रथ पर स्थिर स॒भेयो॒-उत्तम सभामे युवास्य-युवा जेहन यज॑मानस्य-राजाक राज्यमे वी॒रो-शत्रुकेँ पराजित करएबला निका॒मे-नि॑कामे-निश्चययुक्त्त कार्यमे नः-हमर सभक प॒र्जन्यों-मेघ वर्षतु॒-वर्षा होए फल॑वत्यो-उत्तम फल बला ओष॑धयः-औषधिः पच्यन्तां- पाकए योगेक्ष॒मो-अलभ्य लभ्य करेबाक हेतु कएल गेल योगक रक्षा नः॑-हमरा सभक हेतु कल्पताम्-समर्थ होए ग्रिफिथक अनुवाद- हे ब्रह्मण, हमर राज्यमे ब्राह्मण नीक धार्मिक विद्या बला, राजन्य-वीर,तीरंदाज, दूध दए बाली गाय, दौगय बला जन्तु, उद्यमी नारी होथि। पार्जन्य आवश्यकता पड़ला पर वर्षा देथि, फल देय बला गाछ पाकए, हम सभ संपत्ति अर्जित/संरक्षित करी। 8.VIDEHA FOR NON RESIDENTS 8.1 to 8.3 MAITHILI LITERATURE IN ENGLISH 8.1.1.The Comet -GAJENDRA THAKUR translated by Jyoti Jha chaudhary 8.1.2.The_Science_of_Words- GAJENDRA THAKUR translated by the author himself 8.1.3.On_the_dice-board_of_the_millennium- GAJENDRA THAKUR translated by Jyoti Jha chaudhary 8.1.4.NAAGPHANS (IN ENGLISH)- SHEFALIKA VERMA translated by Dr. Rajiv Kumar Verma and Dr. Jaya Verma Send your comments to ggajendra@videha.com विदेह नूतन अंक भाषापाक रचना-लेखन इंग्लिश-मैथिली-कोष / मैथिली-इंग्लिश-कोष प्रोजेक्टकेँ आगू बढ़ाऊ, अपन सुझाव आ योगदान ई-मेल द्वारा ggajendra@videha.com पर पठाऊ। Top of Form १.भारत आ नेपालक मैथिली भाषा-वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक शैली आ २.मैथिलीमे भाषा सम्पादन पाठ्यक्रम १.नेपाल आ भारतक मैथिली भाषा-वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक शैली
१.१. नेपालक मैथिली भाषा वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक उच्चारण आ लेखन शैली (भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक धारणाकेँ पूर्ण रूपसँ सङ्ग लऽ निर्धारित) मैथिलीमे उच्चारण तथा लेखन १.पञ्चमाक्षर आ अनुस्वार: पञ्चमाक्षरान्तर्गत ङ, ञ, ण, न एवं म अबैत अछि। संस्कृत भाषाक अनुसार शब्दक अन्तमे जाहि वर्गक अक्षर रहैत अछि ओही वर्गक पञ्चमाक्षर अबैत अछि। जेना- अङ्क (क वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ङ् आएल अछि।) पञ्च (च वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ञ् आएल अछि।) खण्ड (ट वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ण् आएल अछि।) सन्धि (त वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे न् आएल अछि।) खम्भ (प वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे म् आएल अछि।) उपर्युक्त बात मैथिलीमे कम देखल जाइत अछि। पञ्चमाक्षरक बदलामे अधिकांश जगहपर अनुस्वारक प्रयोग देखल जाइछ। जेना- अंक, पंच, खंड, संधि, खंभ आदि। व्याकरणविद पण्डित गोविन्द झाक कहब छनि जे कवर्ग, चवर्ग आ टवर्गसँ पूर्व अनुस्वार लिखल जाए तथा तवर्ग आ पवर्गसँ पूर्व पञ्चमाक्षरे लिखल जाए। जेना- अंक, चंचल, अंडा, अन्त तथा कम्पन। मुदा हिन्दीक निकट रहल आधुनिक लेखक एहि बातकेँ नहि मानैत छथि। ओ लोकनि अन्त आ कम्पनक जगहपर सेहो अंत आ कंपन लिखैत देखल जाइत छथि। नवीन पद्धति किछु सुविधाजनक अवश्य छैक। किएक तँ एहिमे समय आ स्थानक बचत होइत छैक। मुदा कतोक बेर हस्तलेखन वा मुद्रणमे अनुस्वारक छोट सन बिन्दु स्पष्ट नहि भेलासँ अर्थक अनर्थ होइत सेहो देखल जाइत अछि। अनुस्वारक प्रयोगमे उच्चारण-दोषक सम्भावना सेहो ततबए देखल जाइत अछि। एतदर्थ कसँ लऽ कऽ पवर्ग धरि पञ्चमाक्षरेक प्रयोग करब उचित अछि। यसँ लऽ कऽ ज्ञ धरिक अक्षरक सङ्ग अनुस्वारक प्रयोग करबामे कतहु कोनो विवाद नहि देखल जाइछ। २.ढ आ ढ़ : ढ़क उच्चारण “र् ह”जकाँ होइत अछि। अतः जतऽ “र् ह”क उच्चारण हो ओतऽ मात्र ढ़ लिखल जाए। आन ठाम खाली ढ लिखल जएबाक चाही। जेना- ढ = ढाकी, ढेकी, ढीठ, ढेउआ, ढङ्ग, ढेरी, ढाकनि, ढाठ आदि। ढ़ = पढ़ाइ, बढ़ब, गढ़ब, मढ़ब, बुढ़बा, साँढ़, गाढ़, रीढ़, चाँढ़, सीढ़ी, पीढ़ी आदि। उपर्युक्त शब्द सभकेँ देखलासँ ई स्पष्ट होइत अछि जे साधारणतया शब्दक शुरूमे ढ आ मध्य तथा अन्तमे ढ़ अबैत अछि। इएह नियम ड आ ड़क सन्दर्भ सेहो लागू होइत अछि। ३.व आ ब : मैथिलीमे “व”क उच्चारण ब कएल जाइत अछि, मुदा ओकरा ब रूपमे नहि लिखल जएबाक चाही। जेना- उच्चारण : बैद्यनाथ, बिद्या, नब, देबता, बिष्णु, बंश, बन्दना आदि। एहि सभक स्थानपर क्रमशः वैद्यनाथ, विद्या, नव, देवता, विष्णु, वंश, वन्दना लिखबाक चाही। सामान्यतया व उच्चारणक लेल ओ प्रयोग कएल जाइत अछि। जेना- ओकील, ओजह आदि। ४.य आ ज : कतहु-कतहु “य”क उच्चारण “ज”जकाँ करैत देखल जाइत अछि, मुदा ओकरा ज नहि लिखबाक चाही। उच्चारणमे यज्ञ, जदि, जमुना, जुग, जाबत, जोगी, जदु, जम आदि कहल जाएबला शब्द सभकेँ क्रमशः यज्ञ, यदि, यमुना, युग, यावत, योगी, यदु, यम लिखबाक चाही। ५.ए आ य : मैथिलीक वर्तनीमे ए आ य दुनू लिखल जाइत अछि। प्राचीन वर्तनी- कएल, जाए, होएत, माए, भाए, गाए आदि। नवीन वर्तनी- कयल, जाय, होयत, माय, भाय, गाय आदि। सामान्यतया शब्दक शुरूमे ए मात्र अबैत अछि। जेना एहि, एना, एकर, एहन आदि। एहि शब्द सभक स्थानपर यहि, यना, यकर, यहन आदिक प्रयोग नहि करबाक चाही। यद्यपि मैथिलीभाषी थारू सहित किछु जातिमे शब्दक आरम्भोमे “ए”केँ य कहि उच्चारण कएल जाइत अछि। ए आ “य”क प्रयोगक सन्दर्भमे प्राचीने पद्धतिक अनुसरण करब उपयुक्त मानि एहि पुस्तकमे ओकरे प्रयोग कएल गेल अछि। किएक तँ दुनूक लेखनमे कोनो सहजता आ दुरूहताक बात नहि अछि। आ मैथिलीक सर्वसाधारणक उच्चारण-शैली यक अपेक्षा एसँ बेसी निकट छैक। खास कऽ कएल, हएब आदि कतिपय शब्दकेँ कैल, हैब आदि रूपमे कतहु-कतहु लिखल जाएब सेहो “ए”क प्रयोगकेँ बेसी समीचीन प्रमाणित करैत अछि। ६.हि, हु तथा एकार, ओकार : मैथिलीक प्राचीन लेखन-परम्परामे कोनो बातपर बल दैत काल शब्दक पाछाँ हि, हु लगाओल जाइत छैक। जेना- हुनकहि, अपनहु, ओकरहु, तत्कालहि, चोट्टहि, आनहु आदि। मुदा आधुनिक लेखनमे हिक स्थानपर एकार एवं हुक स्थानपर ओकारक प्रयोग करैत देखल जाइत अछि। जेना- हुनके, अपनो, तत्काले, चोट्टे, आनो आदि। ७.ष तथा ख : मैथिली भाषामे अधिकांशतः षक उच्चारण ख होइत अछि। जेना- षड्यन्त्र (खड़यन्त्र), षोडशी (खोड़शी), षट्कोण (खटकोण), वृषेश (वृखेश), सन्तोष (सन्तोख) आदि। ८.ध्वनि-लोप : निम्नलिखित अवस्थामे शब्दसँ ध्वनि-लोप भऽ जाइत अछि: (क) क्रियान्वयी प्रत्यय अयमे य वा ए लुप्त भऽ जाइत अछि। ओहिमे सँ पहिने अक उच्चारण दीर्घ भऽ जाइत अछि। ओकर आगाँ लोप-सूचक चिह्न वा विकारी (’ / ऽ) लगाओल जाइछ। जेना- पूर्ण रूप : पढ़ए (पढ़य) गेलाह, कए (कय) लेल, उठए (उठय) पड़तौक। अपूर्ण रूप : पढ़’ गेलाह, क’ लेल, उठ’ पड़तौक। पढ़ऽ गेलाह, कऽ लेल, उठऽ पड़तौक। (ख) पूर्वकालिक कृत आय (आए) प्रत्ययमे य (ए) लुप्त भऽ जाइछ, मुदा लोप-सूचक विकारी नहि लगाओल जाइछ। जेना- पूर्ण रूप : खाए (य) गेल, पठाय (ए) देब, नहाए (य) अएलाह। अपूर्ण रूप : खा गेल, पठा देब, नहा अएलाह। (ग) स्त्री प्रत्यय इक उच्चारण क्रियापद, संज्ञा, ओ विशेषण तीनूमे लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना- पूर्ण रूप : दोसरि मालिनि चलि गेलि। अपूर्ण रूप : दोसर मालिन चलि गेल। (घ) वर्तमान कृदन्तक अन्तिम त लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना- पूर्ण रूप : पढ़ैत अछि, बजैत अछि, गबैत अछि। अपूर्ण रूप : पढ़ै अछि, बजै अछि, गबै अछि। (ङ) क्रियापदक अवसान इक, उक, ऐक तथा हीकमे लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना- पूर्ण रूप: छियौक, छियैक, छहीक, छौक, छैक, अबितैक, होइक। अपूर्ण रूप : छियौ, छियै, छही, छौ, छै, अबितै, होइ। (च) क्रियापदीय प्रत्यय न्ह, हु तथा हकारक लोप भऽ जाइछ। जेना- पूर्ण रूप : छन्हि, कहलन्हि, कहलहुँ, गेलह, नहि। अपूर्ण रूप : छनि, कहलनि, कहलौँ, गेलऽ, नइ, नञि, नै। ९.ध्वनि स्थानान्तरण : कोनो-कोनो स्वर-ध्वनि अपना जगहसँ हटि कऽ दोसर ठाम चलि जाइत अछि। खास कऽ ह्रस्व इ आ उक सम्बन्धमे ई बात लागू होइत अछि। मैथिलीकरण भऽ गेल शब्दक मध्य वा अन्तमे जँ ह्रस्व इ वा उ आबए तँ ओकर ध्वनि स्थानान्तरित भऽ एक अक्षर आगाँ आबि जाइत अछि। जेना- शनि (शइन), पानि (पाइन), दालि ( दाइल), माटि (माइट), काछु (काउछ), मासु (माउस) आदि। मुदा तत्सम शब्द सभमे ई निअम लागू नहि होइत अछि। जेना- रश्मिकेँ रइश्म आ सुधांशुकेँ सुधाउंस नहि कहल जा सकैत अछि। १०.हलन्त(्)क प्रयोग : मैथिली भाषामे सामान्यतया हलन्त (्)क आवश्यकता नहि होइत अछि। कारण जे शब्दक अन्तमे अ उच्चारण नहि होइत अछि। मुदा संस्कृत भाषासँ जहिनाक तहिना मैथिलीमे आएल (तत्सम) शब्द सभमे हलन्त प्रयोग कएल जाइत अछि। एहि पोथीमे सामान्यतया सम्पूर्ण शब्दकेँ मैथिली भाषा सम्बन्धी निअम अनुसार हलन्तविहीन राखल गेल अछि। मुदा व्याकरण सम्बन्धी प्रयोजनक लेल अत्यावश्यक स्थानपर कतहु-कतहु हलन्त देल गेल अछि। प्रस्तुत पोथीमे मथिली लेखनक प्राचीन आ नवीन दुनू शैलीक सरल आ समीचीन पक्ष सभकेँ समेटि कऽ वर्ण-विन्यास कएल गेल अछि। स्थान आ समयमे बचतक सङ्गहि हस्त-लेखन तथा तकनीकी दृष्टिसँ सेहो सरल होबऽबला हिसाबसँ वर्ण-विन्यास मिलाओल गेल अछि। वर्तमान समयमे मैथिली मातृभाषी पर्यन्तकेँ आन भाषाक माध्यमसँ मैथिलीक ज्ञान लेबऽ पड़ि रहल परिप्रेक्ष्यमे लेखनमे सहजता तथा एकरूपतापर ध्यान देल गेल अछि। तखन मैथिली भाषाक मूल विशेषता सभ कुण्ठित नहि होइक, ताहू दिस लेखक-मण्डल सचेत अछि। प्रसिद्ध भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक कहब छनि जे सरलताक अनुसन्धानमे एहन अवस्था किन्नहु ने आबऽ देबाक चाही जे भाषाक विशेषता छाँहमे पडि जाए। -(भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक धारणाकेँ पूर्ण रूपसँ सङ्ग लऽ निर्धारित) १.२. मैथिली अकादमी, पटना द्वारा निर्धारित मैथिली लेखन-शैली
१. जे शब्द मैथिली-साहित्यक प्राचीन कालसँ आइ धरि जाहि वर्त्तनीमे प्रचलित अछि, से सामान्यतः ताहि वर्त्तनीमे लिखल जाय- उदाहरणार्थ-
ग्राह्य
एखन ठाम जकर, तकर तनिकर अछि
अग्राह्य अखन, अखनि, एखेन, अखनी ठिमा, ठिना, ठमा जेकर, तेकर तिनकर। (वैकल्पिक रूपेँ ग्राह्य) ऐछ, अहि, ए।
२. निम्नलिखित तीन प्रकारक रूप वैकल्पिकतया अपनाओल जाय: भऽ गेल, भय गेल वा भए गेल। जा रहल अछि, जाय रहल अछि, जाए रहल अछि। कर’ गेलाह, वा करय गेलाह वा करए गेलाह।
३. प्राचीन मैथिलीक ‘न्ह’ ध्वनिक स्थानमे ‘न’ लिखल जाय सकैत अछि यथा कहलनि वा कहलन्हि।
४. ‘ऐ’ तथा ‘औ’ ततय लिखल जाय जत’ स्पष्टतः ‘अइ’ तथा ‘अउ’ सदृश उच्चारण इष्ट हो। यथा- देखैत, छलैक, बौआ, छौक इत्यादि।
५. मैथिलीक निम्नलिखित शब्द एहि रूपे प्रयुक्त होयत: जैह, सैह, इएह, ओऐह, लैह तथा दैह।
६. ह्र्स्व इकारांत शब्दमे ‘इ’ के लुप्त करब सामान्यतः अग्राह्य थिक। यथा- ग्राह्य देखि आबह, मालिनि गेलि (मनुष्य मात्रमे)।
७. स्वतंत्र ह्रस्व ‘ए’ वा ‘य’ प्राचीन मैथिलीक उद्धरण आदिमे तँ यथावत राखल जाय, किंतु आधुनिक प्रयोगमे वैकल्पिक रूपेँ ‘ए’ वा ‘य’ लिखल जाय। यथा:- कयल वा कएल, अयलाह वा अएलाह, जाय वा जाए इत्यादि।
८. उच्चारणमे दू स्वरक बीच जे ‘य’ ध्वनि स्वतः आबि जाइत अछि तकरा लेखमे स्थान वैकल्पिक रूपेँ देल जाय। यथा- धीआ, अढ़ैआ, विआह, वा धीया, अढ़ैया, बियाह।
९. सानुनासिक स्वतंत्र स्वरक स्थान यथासंभव ‘ञ’ लिखल जाय वा सानुनासिक स्वर। यथा:- मैञा, कनिञा, किरतनिञा वा मैआँ, कनिआँ, किरतनिआँ।
१०. कारकक विभक्त्तिक निम्नलिखित रूप ग्राह्य:- हाथकेँ, हाथसँ, हाथेँ, हाथक, हाथमे। ’मे’ मे अनुस्वार सर्वथा त्याज्य थिक। ‘क’ क वैकल्पिक रूप ‘केर’ राखल जा सकैत अछि।
११. पूर्वकालिक क्रियापदक बाद ‘कय’ वा ‘कए’ अव्यय वैकल्पिक रूपेँ लगाओल जा सकैत अछि। यथा:- देखि कय वा देखि कए।
१२. माँग, भाँग आदिक स्थानमे माङ, भाङ इत्यादि लिखल जाय।
१३. अर्द्ध ‘न’ ओ अर्द्ध ‘म’ क बदला अनुसार नहि लिखल जाय, किंतु छापाक सुविधार्थ अर्द्ध ‘ङ’ , ‘ञ’, तथा ‘ण’ क बदला अनुस्वारो लिखल जा सकैत अछि। यथा:- अङ्क, वा अंक, अञ्चल वा अंचल, कण्ठ वा कंठ।
१४. हलंत चिह्न निअमतः लगाओल जाय, किंतु विभक्तिक संग अकारांत प्रयोग कएल जाय। यथा:- श्रीमान्, किंतु श्रीमानक।
१५. सभ एकल कारक चिह्न शब्दमे सटा क’ लिखल जाय, हटा क’ नहि, संयुक्त विभक्तिक हेतु फराक लिखल जाय, यथा घर परक।
१६. अनुनासिककेँ चन्द्रबिन्दु द्वारा व्यक्त कयल जाय। परंतु मुद्रणक सुविधार्थ हि समान जटिल मात्रापर अनुस्वारक प्रयोग चन्द्रबिन्दुक बदला कयल जा सकैत अछि। यथा- हिँ केर बदला हिं।
१७. पूर्ण विराम पासीसँ ( । ) सूचित कयल जाय।
१८. समस्त पद सटा क’ लिखल जाय, वा हाइफेनसँ जोड़ि क’ , हटा क’ नहि।
१९. लिअ तथा दिअ शब्दमे बिकारी (ऽ) नहि लगाओल जाय।
२०. अंक देवनागरी रूपमे राखल जाय।
२१.किछु ध्वनिक लेल नवीन चिन्ह बनबाओल जाय। जा' ई नहि बनल अछि ताबत एहि दुनू ध्वनिक बदला पूर्ववत् अय/ आय/ अए/ आए/ आओ/ अओ लिखल जाय। आकि ऎ वा ऒ सँ व्यक्त कएल जाय।
ह./- गोविन्द झा ११/८/७६ श्रीकान्त ठाकुर ११/८/७६ सुरेन्द्र झा "सुमन" ११/०८/७६
२. मैथिलीमे भाषा सम्पादन पाठ्यक्रम २.१. उच्चारण निर्देश: (बोल्ड कएल रूप ग्राह्य):- दन्त न क उच्चारणमे दाँतमे जीह सटत- जेना बाजू नाम , मुदा ण क उच्चारणमे जीह मूर्धामे सटत (नै सटैए तँ उच्चारण दोष अछि)- जेना बाजू गणेश। तालव्य शमे जीह तालुसँ , षमे मूर्धासँ आ दन्त समे दाँतसँ सटत। निशाँ, सभ आ शोषण बाजि कऽ देखू। मैथिलीमे ष केँ वैदिक संस्कृत जकाँ ख सेहो उच्चरित कएल जाइत अछि, जेना वर्षा, दोष। य अनेको स्थानपर ज जकाँ उच्चरित होइत अछि आ ण ड़ जकाँ (यथा संयोग आ गणेश संजोग आ गड़ेस उच्चरित होइत अछि)। मैथिलीमे व क उच्चारण ब, श क उच्चारण स आ य क उच्चारण ज सेहो होइत अछि। ओहिना ह्रस्व इ बेशीकाल मैथिलीमे पहिने बाजल जाइत अछि कारण देवनागरीमे आ मिथिलाक्षरमे ह्रस्व इ अक्षरक पहिने लिखलो जाइत आ बाजलो जएबाक चाही। कारण जे हिन्दीमे एकर दोषपूर्ण उच्चारण होइत अछि (लिखल तँ पहिने जाइत अछि मुदा बाजल बादमे जाइत अछि), से शिक्षा पद्धतिक दोषक कारण हम सभ ओकर उच्चारण दोषपूर्ण ढंगसँ कऽ रहल छी। अछि- अ इ छ ऐछ (उच्चारण) छथि- छ इ थ – छैथ (उच्चारण) पहुँचि- प हुँ इ च (उच्चारण) आब अ आ इ ई ए ऐ ओ औ अं अः ऋ ऐ सभ लेल मात्रा सेहो अछि, मुदा ऐमे ई ऐ ओ औ अं अः ऋ केँ संयुक्ताक्षर रूपमे गलत रूपमे प्रयुक्त आ उच्चरित कएल जाइत अछि। जेना ऋ केँ री रूपमे उच्चरित करब। आ देखियौ- ऐ लेल देखिऔ क प्रयोग अनुचित। मुदा देखिऐ लेल देखियै अनुचित। क् सँ ह् धरि अ सम्मिलित भेलासँ क सँ ह बनैत अछि, मुदा उच्चारण काल हलन्त युक्त शब्दक अन्तक उच्चारणक प्रवृत्ति बढ़ल अछि, मुदा हम जखन मनोजमे ज् अन्तमे बजैत छी, तखनो पुरनका लोककेँ बजैत सुनबन्हि- मनोजऽ, वास्तवमे ओ अ युक्त ज् = ज बजै छथि। फेर ज्ञ अछि ज् आ ञ क संयुक्त मुदा गलत उच्चारण होइत अछि- ग्य। ओहिना क्ष अछि क् आ ष क संयुक्त मुदा उच्चारण होइत अछि छ। फेर श् आ र क संयुक्त अछि श्र ( जेना श्रमिक) आ स् आ र क संयुक्त अछि स्र (जेना मिस्र)। त्र भेल त+र । उच्चारणक ऑडियो फाइल विदेह आर्काइव http://www.videha.co.in/ पर उपलब्ध अछि। फेर केँ / सँ / पर पूर्व अक्षरसँ सटा कऽ लिखू मुदा तँ / कऽ हटा कऽ। ऐमे सँ मे पहिल सटा कऽ लिखू आ बादबला हटा कऽ। अंकक बाद टा लिखू सटा कऽ मुदा अन्य ठाम टा लिखू हटा कऽ– जेना छहटा मुदा सभ टा। फेर ६अ म सातम लिखू- छठम सातम नै। घरबलामे बला मुदा घरवालीमे वाली प्रयुक्त करू। रहए- रहै मुदा सकैए (उच्चारण सकै-ए)। मुदा कखनो काल रहए आ रहै मे अर्थ भिन्नता सेहो, जेना से कम्मो जगहमे पार्किंग करबाक अभ्यास रहै ओकरा। पुछलापर पता लागल जे ढुनढुन नाम्ना ई ड्राइवर कनाट प्लेसक पार्किंगमे काज करैत रहए। छलै, छलए मे सेहो ऐ तरहक भेल। छलए क उच्चारण छल-ए सेहो। संयोगने- (उच्चारण संजोगने) केँ/ कऽ केर- क ( केर क प्रयोग गद्यमे नै करू , पद्यमे कऽ सकै छी। ) क (जेना रामक) –रामक आ संगे (उच्चारण राम के / राम कऽ सेहो) सँ- सऽ (उच्चारण) चन्द्रबिन्दु आ अनुस्वार- अनुस्वारमे कंठ धरिक प्रयोग होइत अछि मुदा चन्द्रबिन्दुमे नै। चन्द्रबिन्दुमे कनेक एकारक सेहो उच्चारण होइत अछि- जेना रामसँ- (उच्चारण राम सऽ) रामकेँ- (उच्चारण राम कऽ/ राम के सेहो)। केँ जेना रामकेँ भेल हिन्दीक को (राम को)- राम को= रामकेँ क जेना रामक भेल हिन्दीक का ( राम का) राम का= रामक कऽ जेना जा कऽ भेल हिन्दीक कर ( जा कर) जा कर= जा कऽ सँ भेल हिन्दीक से (राम से) राम से= रामसँ सऽ , तऽ , त , केर (गद्यमे) एे चारू शब्द सबहक प्रयोग अवांछित। के दोसर अर्थेँ प्रयुक्त भऽ सकैए- जेना, के कहलक? विभक्ति “क”क बदला एकर प्रयोग अवांछित। नञि, नहि, नै, नइ, नँइ, नइँ, नइं ऐ सभक उच्चारण आ लेखन - नै त्त्व क बदलामे त्व जेना महत्वपूर्ण (महत्त्वपूर्ण नै) जतए अर्थ बदलि जाए ओतहि मात्र तीन अक्षरक संयुक्ताक्षरक प्रयोग उचित। सम्पति- उच्चारण स म्प इ त (सम्पत्ति नै- कारण सही उच्चारण आसानीसँ सम्भव नै)। मुदा सर्वोत्तम (सर्वोतम नै)। राष्ट्रिय (राष्ट्रीय नै) सकैए/ सकै (अर्थ परिवर्तन) पोछैले/ पोछै लेल/ पोछए लेल पोछैए/ पोछए/ (अर्थ परिवर्तन) पोछए/ पोछै ओ लोकनि ( हटा कऽ, ओ मे बिकारी नै) ओइ/ ओहि ओहिले/ ओहि लेल/ ओही लऽ जएबेँ/ बैसबेँ पँचभइयाँ देखियौक/ (देखिऔक नै- तहिना अ मे ह्रस्व आ दीर्घक मात्राक प्रयोग अनुचित) जकाँ / जेकाँ तँइ/ तैँ/ होएत / हएत नञि/ नहि/ नँइ/ नइँ/ नै सौँसे/ सौंसे बड़ / बड़ी (झोराओल) गाए (गाइ नहि), मुदा गाइक दूध (गाएक दूध नै।) रहलेँ/ पहिरतैँ हमहीं/ अहीं सब - सभ सबहक - सभहक धरि - तक गप- बात बूझब - समझब बुझलौं/ समझलौं/ बुझलहुँ - समझलहुँ हमरा आर - हम सभ आकि- आ कि सकैछ/ करैछ (गद्यमे प्रयोगक आवश्यकता नै) होइन/ होनि जाइन (जानि नै, जेना देल जाइन) मुदा जानि-बूझि (अर्थ परिव्र्तन) पइठ/ जाइठ आउ/ जाउ/ आऊ/ जाऊ मे, केँ, सँ, पर (शब्दसँ सटा कऽ) तँ कऽ धऽ दऽ (शब्दसँ हटा कऽ) मुदा दूटा वा बेसी विभक्ति संग रहलापर पहिल विभक्ति टाकेँ सटाऊ। जेना ऐमे सँ । एकटा , दूटा (मुदा कए टा) बिकारीक प्रयोग शब्दक अन्तमे, बीचमे अनावश्यक रूपेँ नै। आकारान्त आ अन्तमे अ क बाद बिकारीक प्रयोग नै (जेना दिअ , आ/ दिय’ , आ’, आ नै ) अपोस्ट्रोफीक प्रयोग बिकारीक बदलामे करब अनुचित आ मात्र फॉन्टक तकनीकी न्यूनताक परिचायक)- ओना बिकारीक संस्कृत रूप ऽ अवग्रह कहल जाइत अछि आ वर्तनी आ उच्चारण दुनू ठाम एकर लोप रहैत अछि/ रहि सकैत अछि (उच्चारणमे लोप रहिते अछि)। मुदा अपोस्ट्रोफी सेहो अंग्रेजीमे पसेसिव केसमे होइत अछि आ फ्रेंचमे शब्दमे जतए एकर प्रयोग होइत अछि जेना raison d’etre एतए सेहो एकर उच्चारण रैजौन डेटर होइत अछि, माने अपोस्ट्रॉफी अवकाश नै दैत अछि वरन जोड़ैत अछि, से एकर प्रयोग बिकारीक बदला देनाइ तकनीकी रूपेँ सेहो अनुचित)। अइमे, एहिमे/ ऐमे जइमे, जाहिमे एखन/ अखन/ अइखन केँ (के नहि) मे (अनुस्वार रहित) भऽ मे दऽ तँ (तऽ, त नै) सँ ( सऽ स नै) गाछ तर गाछ लग साँझ खन जो (जो go, करै जो do) तै/तइ जेना- तै दुआरे/ तइमे/ तइले जै/जइ जेना- जै कारण/ जइसँ/ जइले ऐ/अइ जेना- ऐ कारण/ ऐसँ/ अइले/ मुदा एकर एकटा खास प्रयोग- लालति कतेक दिनसँ कहैत रहैत अइ लै/लइ जेना लैसँ/ लइले/ लै दुआरे लहँ/ लौं गेलौं/ लेलौं/ लेलँह/ गेलहुँ/ लेलहुँ/ लेलँ जइ/ जाहि/ जै जहिठाम/ जाहिठाम/ जइठाम/ जैठाम एहि/ अहि/ अइ (वाक्यक अंतमे ग्राह्य) / ऐ अइछ/ अछि/ ऐछ तइ/ तहि/ तै/ ताहि ओहि/ ओइ सीखि/ सीख जीवि/ जीवी/ जीब भलेहीं/ भलहिं तैं/ तँइ/ तँए जाएब/ जएब लइ/ लै छइ/ छै नहि/ नै/ नइ गइ/ गै छनि/ छन्हि ... समए शब्दक संग जखन कोनो विभक्ति जुटै छै तखन समै जना समैपर इत्यादि। असगरमे हृदए आ विभक्ति जुटने हृदे जना हृदेसँ, हृदेमे इत्यादि। जइ/ जाहि/ जै जहिठाम/ जाहिठाम/ जइठाम/ जैठाम एहि/ अहि/ अइ/ ऐ अइछ/ अछि/ ऐछ तइ/ तहि/ तै/ ताहि ओहि/ ओइ सीखि/ सीख जीवि/ जीवी/ जीब भले/ भलेहीं/ भलहिं तैं/ तँइ/ तँए जाएब/ जएब लइ/ लै छइ/ छै नहि/ नै/ नइ गइ/ गै छनि/ छन्हि चुकल अछि/ गेल गछि २.२. मैथिलीमे भाषा सम्पादन पाठ्यक्रम नीचाँक सूचीमे देल विकल्पमेसँ लैंगुएज एडीटर द्वारा कोन रूप चुनल जेबाक चाही: बोल्ड कएल रूप ग्राह्य: १.होयबला/ होबयबला/ होमयबला/ हेब’बला, हेम’बला/ होयबाक/होबएबला /होएबाक २. आ’/आऽ आ ३. क’ लेने/कऽ लेने/कए लेने/कय लेने/ल’/लऽ/लय/लए ४. भ’ गेल/भऽ गेल/भय गेल/भए गेल ५. कर’ गेलाह/करऽ गेलह/करए गेलाह/करय गेलाह ६. लिअ/दिअ लिय’,दिय’,लिअ’,दिय’/ ७. कर’ बला/करऽ बला/ करय बला करैबला/क’र’ बला / करैवाली ८. बला वला (पुरूष), वाली (स्त्री) ९ . आङ्ल आंग्ल १०. प्रायः प्रायह ११. दुःख दुख १ २. चलि गेल चल गेल/चैल गेल १३. देलखिन्ह देलकिन्ह, देलखिन १४. देखलन्हि देखलनि/ देखलैन्ह १५. छथिन्ह/ छलन्हि छथिन/ छलैन/ छलनि १६. चलैत/दैत चलति/दैति १७. एखनो अखनो १८. बढ़नि बढ़इन बढ़न्हि १९. ओ’/ओऽ(सर्वनाम) ओ २० . ओ (संयोजक) ओ’/ओऽ २१. फाँगि/फाङ्गि फाइंग/फाइङ २२. जे जे’/जेऽ २३. ना-नुकुर ना-नुकर २४. केलन्हि/केलनि/कयलन्हि २५. तखनतँ/ तखन तँ २६. जा रहल/जाय रहल/जाए रहल २७. निकलय/निकलए लागल/ लगल बहराय/ बहराए लागल/ लगल निकल’/बहरै लागल २८. ओतय/ जतय जत’/ ओत’/ जतए/ ओतए २९. की फूरल जे कि फूरल जे ३०. जे जे’/जेऽ ३१. कूदि / यादि(मोन पारब) कूइद/याइद/कूद/याद/ यादि (मोन) ३२. इहो/ ओहो ३३. हँसए/ हँसय हँसऽ ३४. नौ आकि दस/नौ किंवा दस/ नौ वा दस ३५. सासु-ससुर सास-ससुर ३६. छह/ सात छ/छः/सात ३७. की की’/ कीऽ (दीर्घीकारान्तमे ऽ वर्जित) ३८. जबाब जवाब ३९. करएताह/ करेताह करयताह ४०. दलान दिशि दलान दिश/दलान दिस ४१ . गेलाह गएलाह/गयलाह ४२. किछु आर/ किछु और/ किछ आर ४३. जाइ छल/ जाइत छल जाति छल/जैत छल ४४. पहुँचि/ भेट जाइत छल/ भेट जाइ छलए पहुँच/ भेटि जाइत छल ४५. जबान (युवा)/ जवान(फौजी) ४६. लय/ लए क’/ कऽ/ लए कए / लऽ कऽ/ लऽ कए ४७. ल’/लऽ कय/ कए ४८. एखन / एखने / अखन / अखने ४९. अहींकेँ अहीँकेँ ५०. गहींर गहीँर ५१. धार पार केनाइ धार पार केनाय/केनाए ५२. जेकाँ जेँकाँ/ जकाँ ५३. तहिना तेहिना ५४. एकर अकर ५५. बहिनउ बहनोइ ५६. बहिन बहिनि ५७. बहिन-बहिनोइ बहिन-बहनउ ५८. नहि/ नै ५९. करबा / करबाय/ करबाए ६०. तँ/ त ऽ तय/तए ६१. भैयारी मे छोट-भाए/भै/, जेठ-भाय/भाइ, ६२. गिनतीमे दू भाइ/भाए/भाँइ ६३. ई पोथी दू भाइक/ भाँइ/ भाए/ लेल। यावत जावत ६४. माय मै / माए मुदा माइक ममता ६५. देन्हि/ दइन दनि/ दएन्हि/ दयन्हि दन्हि/ दैन्हि ६६. द’/ दऽ/ दए ६७. ओ (संयोजक) ओऽ (सर्वनाम) ६८. तका कए तकाय तकाए ६९. पैरे (on foot) पएरे कएक/ कैक ७०. ताहुमे/ ताहूमे ७१. पुत्रीक ७२. बजा कय/ कए / कऽ ७३. बननाय/बननाइ ७४. कोला ७५. दिनुका दिनका ७६. ततहिसँ ७७. गरबओलन्हि/ गरबौलनि/ गरबेलन्हि/ गरबेलनि ७८. बालु बालू ७९. चेन्ह चिन्ह(अशुद्ध) ८०. जे जे’ ८१ . से/ के से’/के’ ८२. एखुनका अखनुका ८३. भुमिहार भूमिहार ८४. सुग्गर / सुगरक/ सूगर ८५. झठहाक झटहाक ८६. छूबि ८७. करइयो/ओ करैयो ने देलक /करियौ-करइयौ ८८. पुबारि पुबाइ ८९. झगड़ा-झाँटी झगड़ा-झाँटि ९०. पएरे-पएरे पैरे-पैरे ९१. खेलएबाक ९२. खेलेबाक ९३. लगा ९४. होए- हो – होअए ९५. बुझल बूझल ९६. बूझल (संबोधन अर्थमे) ९७. यैह यएह / इएह/ सैह/ सएह ९८. तातिल ९९. अयनाय- अयनाइ/ अएनाइ/ एनाइ १००. निन्न- निन्द १०१. बिनु बिन १०२. जाए जाइ १०३. जाइ (in different sense)-last word of sentence १०४. छत पर आबि जाइ १०५. ने १०६. खेलाए (play) –खेलाइ १०७. शिकाइत- शिकायत १०८. ढप- ढ़प १०९ . पढ़- पढ ११०. कनिए/ कनिये कनिञे १११. राकस- राकश ११२. होए/ होय होइ ११३. अउरदा- औरदा ११४. बुझेलन्हि (different meaning- got understand) ११५. बुझएलन्हि/बुझेलनि/ बुझयलन्हि (understood himself) ११६. चलि- चल/ चलि गेल ११७. खधाइ- खधाय ११८. मोन पाड़लखिन्ह/ मोन पाड़लखिन/ मोन पारलखिन्ह ११९. कैक- कएक- कइएक १२०. लग ल’ग १२१. जरेनाइ १२२. जरौनाइ जरओनाइ- जरएनाइ/ जरेनाइ १२३. होइत १२४. गरबेलन्हि/ गरबेलनि गरबौलन्हि/ गरबौलनि १२५. चिखैत- (to test)चिखइत १२६. करइयो (willing to do) करैयो १२७. जेकरा- जकरा १२८. तकरा- तेकरा १२९. बिदेसर स्थानेमे/ बिदेसरे स्थानमे १३०. करबयलहुँ/ करबएलहुँ/ करबेलहुँ करबेलौं १३१. हारिक (उच्चारण हाइरक) १३२. ओजन वजन आफसोच/ अफसोस कागत/ कागच/ कागज १३३. आधे भाग/ आध-भागे १३४. पिचा / पिचाय/पिचाए १३५. नञ/ ने १३६. बच्चा नञ (ने) पिचा जाय १३७. तखन ने (नञ) कहैत अछि। कहै/ सुनै/ देखै छल मुदा कहैत-कहैत/ सुनैत-सुनैत/ देखैत-देखैत १३८. कतेक गोटे/ कताक गोटे १३९. कमाइ-धमाइ/ कमाई- धमाई १४० . लग ल’ग १४१. खेलाइ (for playing) १४२. छथिन्ह/ छथिन १४३. होइत होइ १४४. क्यो कियो / केओ १४५. केश (hair) १४६. केस (court-case) १४७ . बननाइ/ बननाय/ बननाए १४८. जरेनाइ १४९. कुरसी कुर्सी १५०. चरचा चर्चा १५१. कर्म करम १५२. डुबाबए/ डुबाबै/ डुमाबै डुमाबय/ डुमाबए १५३. एखुनका/ अखुनका १५४. लए/ लिअए (वाक्यक अंतिम शब्द)- लऽ १५५. कएलक/ केलक १५६. गरमी गर्मी १५७ . वरदी वर्दी १५८. सुना गेलाह सुना’/सुनाऽ १५९. एनाइ-गेनाइ १६०. तेना ने घेरलन्हि/ तेना ने घेरलनि १६१. नञि / नै १६२. डरो ड’रो १६३. कतहु/ कतौ कहीं १६४. उमरिगर-उमेरगर उमरगर १६५. भरिगर १६६. धोल/धोअल धोएल १६७. गप/गप्प १६८. के के’ १६९. दरबज्जा/ दरबजा १७०. ठाम १७१. धरि तक १७२. घूरि लौटि १७३. थोरबेक १७४. बड्ड १७५. तोँ/ तूँ १७६. तोँहि( पद्यमे ग्राह्य) १७७. तोँही / तोँहि १७८. करबाइए करबाइये १७९. एकेटा १८०. करितथि /करतथि १८१. पहुँचि/ पहुँच १८२. राखलन्हि रखलन्हि/ रखलनि १८३. लगलन्हि/ लगलनि लागलन्हि १८४. सुनि (उच्चारण सुइन) १८५. अछि (उच्चारण अइछ) १८६. एलथि गेलथि १८७. बितओने/ बितौने/ बितेने १८८. करबओलन्हि/ करबौलनि/ करेलखिन्ह/ करेलखिन १८९. करएलन्हि/ करेलनि १९०. आकि/ कि १९१. पहुँचि/ पहुँच १९२. बत्ती जराय/ जराए जरा (आगि लगा) १९३. से से’ १९४. हाँ मे हाँ (हाँमे हाँ विभक्त्तिमे हटा कए) १९५. फेल फैल १९६. फइल(spacious) फैल १९७. होयतन्हि/ होएतन्हि/ होएतनि/हेतनि/ हेतन्हि १९८. हाथ मटिआएब/ हाथ मटियाबय/हाथ मटियाएब १९९. फेका फेंका २००. देखाए देखा २०१. देखाबए २०२. सत्तरि सत्तर २०३. साहेब साहब २०४.गेलैन्ह/ गेलन्हि/ गेलनि २०५. हेबाक/ होएबाक २०६.केलो/ कएलहुँ/केलौं/ केलुँ २०७. किछु न किछु/ किछु ने किछु २०८.घुमेलहुँ/ घुमओलहुँ/ घुमेलौं २०९. एलाक/ अएलाक २१०. अः/ अह २११.लय/ लए (अर्थ-परिवर्त्तन) २१२.कनीक/ कनेक २१३.सबहक/ सभक २१४.मिलाऽ/ मिला २१५.कऽ/ क २१६.जाऽ/ जा २१७.आऽ/ आ २१८.भऽ /भ’ (’ फॉन्टक कमीक द्योतक) २१९.निअम/ नियम २२० .हेक्टेअर/ हेक्टेयर २२१.पहिल अक्षर ढ/ बादक/ बीचक ढ़ २२२.तहिं/तहिँ/ तञि/ तैं २२३.कहिं/ कहीं २२४.तँइ/ तैं / तइँ २२५.नँइ/ नइँ/ नञि/ नहि/नै २२६.है/ हए / एलीहेँ/ २२७.छञि/ छै/ छैक /छइ २२८.दृष्टिएँ/ दृष्टियेँ २२९.आ (come)/ आऽ(conjunction) २३०. आ (conjunction)/ आऽ(come) २३१.कुनो/ कोनो, कोना/केना २३२.गेलैन्ह-गेलन्हि-गेलनि २३३.हेबाक- होएबाक २३४.केलौँ- कएलौँ-कएलहुँ/केलौं २३५.किछु न किछ- किछु ने किछु २३६.केहेन- केहन २३७.आऽ (come)-आ (conjunction-and)/आ। आब'-आब' /आबह-आबह २३८. हएत-हैत २३९.घुमेलहुँ-घुमएलहुँ- घुमेलाें २४०.एलाक- अएलाक २४१.होनि- होइन/ होन्हि/ २४२.ओ-राम ओ श्यामक बीच(conjunction), ओऽ कहलक (he said)/ओ २४३.की हए/ कोसी अएली हए/ की है। की हइ २४४.दृष्टिएँ/ दृष्टियेँ २४५ .शामिल/ सामेल २४६.तैँ / तँए/ तञि/ तहिं २४७.जौं / ज्योँ/ जँ/ २४८.सभ/ सब २४९.सभक/ सबहक २५०.कहिं/ कहीं २५१.कुनो/ कोनो/ कोनहुँ/ २५२.फारकती भऽ गेल/ भए गेल/ भय गेल २५३.कोना/ केना/ कन्ना/कना २५४.अः/ अह २५५.जनै/ जनञ २५६.गेलनि/ गेलाह (अर्थ परिवर्तन) २५७.केलन्हि/ कएलन्हि/ केलनि/ २५८.लय/ लए/ लएह (अर्थ परिवर्तन) २५९.कनीक/ कनेक/कनी-मनी २६०.पठेलन्हि पठेलनि/ पठेलइन/ पपठओलन्हि/ पठबौलनि/ २६१.निअम/ नियम २६२.हेक्टेअर/ हेक्टेयर २६३.पहिल अक्षर रहने ढ/ बीचमे रहने ढ़ २६४.आकारान्तमे बिकारीक प्रयोग उचित नै/ अपोस्ट्रोफीक प्रयोग फान्टक तकनीकी न्यूनताक परिचायक ओकर बदला अवग्रह (बिकारी) क प्रयोग उचित २६५.केर (पद्यमे ग्राह्य) / -क/ कऽ/ के २६६.छैन्हि- छन्हि २६७.लगैए/ लगैये २६८.होएत/ हएत २६९.जाएत/ जएत/ २७०.आएत/ अएत/ आओत २७१ .खाएत/ खएत/ खैत २७२.पिअएबाक/ पिएबाक/पियेबाक २७३.शुरु/ शुरुह २७४.शुरुहे/ शुरुए २७५.अएताह/अओताह/ एताह/ औताह २७६.जाहि/ जाइ/ जइ/ जै/ २७७.जाइत/ जैतए/ जइतए २७८.आएल/ अएल २७९.कैक/ कएक २८०.आयल/ अएल/ आएल २८१. जाए/ जअए/ जए (लालति जाए लगलीह।) २८२. नुकएल/ नुकाएल २८३. कठुआएल/ कठुअएल २८४. ताहि/ तै/ तइ २८५. गायब/ गाएब/ गएब २८६. सकै/ सकए/ सकय २८७.सेरा/सरा/ सराए (भात सरा गेल) २८८.कहैत रही/देखैत रही/ कहैत छलौं/ कहै छलौं- अहिना चलैत/ पढ़ैत (पढ़ै-पढ़ैत अर्थ कखनो काल परिवर्तित) - आर बुझै/ बुझैत (बुझै/ बुझै छी, मुदा बुझैत-बुझैत)/ सकैत/ सकै। करैत/ करै। दै/ दैत। छैक/ छै। बचलै/ बचलैक। रखबा/ रखबाक । बिनु/ बिन। रातिक/ रातुक बुझै आ बुझैत केर अपन-अपन जगहपर प्रयोग समीचीन अछि। बुझैत-बुझैत आब बुझलिऐ। हमहूँ बुझै छी। २८९. दुआरे/ द्वारे २९०.भेटि/ भेट/ भेँट २९१. खन/ खीन/ खुना (भोर खन/ भोर खीन) २९२.तक/ धरि २९३.गऽ/ गै (meaning different-जनबै गऽ) २९४.सऽ/ सँ (मुदा दऽ, लऽ) २९५.त्त्व,(तीन अक्षरक मेल बदला पुनरुक्तिक एक आ एकटा दोसरक उपयोग) आदिक बदला त्व आदि। महत्त्व/ महत्व/ कर्ता/ कर्त्ता आदिमे त्त संयुक्तक कोनो आवश्यकता मैथिलीमे नै अछि। वक्तव्य २९६.बेसी/ बेशी २९७.बाला/वाला बला/ वला (रहैबला) २९८ .वाली/ (बदलैवाली) २९९.वार्त्ता/ वार्ता ३००. अन्तर्राष्ट्रिय/ अन्तर्राष्ट्रीय ३०१. लेमए/ लेबए ३०२.लमछुरका, नमछुरका ३०२.लागै/ लगै ( भेटैत/ भेटै) ३०३.लागल/ लगल ३०४.हबा/ हवा ३०५.राखलक/ रखलक ३०६.आ (come)/ आ (and) ३०७. पश्चाताप/ पश्चात्ताप ३०८. ऽ केर व्यवहार शब्दक अन्तमे मात्र, यथासंभव बीचमे नै। ३०९.कहैत/ कहै ३१०. रहए (छल)/ रहै (छलै) (meaning different) ३११.तागति/ ताकति ३१२.खराप/ खराब ३१३.बोइन/ बोनि/ बोइनि ३१४.जाठि/ जाइठ ३१५.कागज/ कागच/ कागत ३१६.गिरै (meaning different- swallow)/ गिरए (खसए) ३१७.राष्ट्रिय/ राष्ट्रीय DATE-LIST (year- 2012-13) (१४२० फसली साल) Marriage Days: Nov.2012- 25, 26, 28, 29, 30 Dec.2012- 5,9, 10, 13, 14 January 2013- 16, 17, 18, 23, 24, 31 Feb.2013- 1, 3, 4, 6, 8, 10, 14, 15, 18, 20, 24, 25 April 2013- 21, 22, 24, 26, 29 May 2013- 1,2,3,5,6,9,12,13,17,19,20,22,23,24,26,27,29,30,31 June 2013- 2,3 July 2013- 11, 14, 15 Upanayana Days: January 2013- 16 February 2013- 14, 15, 20, 21 April 2013- 22 May 2013- 20, 21 Dviragaman Din: November 2012- 25, 26, 28, 29 December 2012- 2, 3, 14 February 2013- 14, 15, 18, 20, 21, 22, 27, 28 March 2013- 1 April 2013- 18, 22, 24, 26, 28, 29 May 2013- 12, 13 Mundan Din: November 2012- 26, 30 December 2012- 3 January 2013- 18, 24 February 2013- 1, 14, 15, 20, 28 April 2013- 17 May 2013- 13, 23, 29 June 2013- 13, 19, 26, 27, 28 July 2013- 10, 15 FESTIVALS OF MITHILA (2012-13) Mauna Panchami-08 July Madhushravani- 22 July Nag Panchami- 24 July Raksha Bandhan- 02 Aug Krishnastami- 10 August Kushi Amavasya / Somvari Vrat- 17 August Vishwakarma Pooja- 17 September Hartalika Teej- 18 September ChauthChandra-19 September Karma Dharma Ekadashi-26 September Indra Pooja Aarambh- 27 September Anant Caturdashi- 29 Sep Agastyarghadaan- 30 Sep Pitri Paksha begins- 30 Sep Jimootavahan Vrata/ Jitia-08 October Matri Navami- 09 October SomvatiAmavasya Vrat- 15 October Kalashsthapan- 16 October Belnauti- 20 October Patrika Pravesh- 21 October Mahastami- 22 October Maha Navami - 23 October Vijaya Dashami- 24 October Kojagara- 29 Oct Dhanteras- 11 November Diyabati, shyama pooja-13 November Annakoota/ Govardhana Pooja-14 November Bhratridwitiya/ Chitragupta Pooja- 15 November Chhathi -19 November Devotthan Ekadashi- 24 November ravivratarambh- 25 November Navanna parvan- 25 November KartikPoornima- Sama Visarjan- 28 November Vivaha Panchmi- 17 December Makara/ Teela Sankranti-14 Jan Naraknivaran chaturdashi- 08 February Basant Panchami/ Saraswati Pooja- 15 February Achla Saptmi- 17 February Mahashivaratri-10 March Holikadahan-Fagua-26 March Holi- 28 March Varuni Trayodashi-07 April Chaiti navaratrarambh- 11 April Jurishital-15 April Chaiti Chhathi vrata-16 April Ram Navami- 19 April Ravi Brat Ant- 12 May Akshaya Tritiya-13 May Janaki Navami- 19 May Vat Savitri-barasait- 08 June Ganga Dashhara-18 June Somavati Amavasya Vrata- 08 July Jagannath Rath Yatra- 10 July Hari Sayan Ekadashi- 19 July Aashadhi Guru Poornima-22 Jul VIDEHA ARCHIVE १.विदेह ई-पत्रिकाक सभटा पुरान अंक ब्रेल, तिरहुता आ देवनागरी रूपमे Videha e journal's all old issues in Braille Tirhuta and Devanagari versions विदेह ई-पत्रिकाक पहिल ५० अंक
विदेह ई-पत्रिकाक ५०म सँ आगाँक अंक http://sites.google.com/a/videha.com/videha/ https://sites.google.com/a/videha.com/videha-archive-part-i/ https://sites.google.com/a/videha.com/videha-archive-part-ii/ २.मैथिली पोथी डाउनलोड Maithili Books Download http://sites.google.com/a/videha.com/videha-pothi ३.मैथिली ऑडियो संकलन Maithili Audio Downloads http://sites.google.com/a/videha.com/videha-audio ४.मैथिली वीडियोक संकलन Maithili Videos http://sites.google.com/a/videha.com/videha-video ५.मिथिला चित्रकला/ आधुनिक चित्रकला आ चित्र Mithila Painting/ Modern Art and Photos http://sites.google.com/a/videha.com/videha-paintings-photos/ "विदेह"क एहि सभ सहयोगी लिंकपर सेहो एक बेर जाउ। ६.विदेह मैथिली क्विज : http://videhaquiz.blogspot.com/ ७.विदेह मैथिली जालवृत्त एग्रीगेटर : http://videha-aggregator.blogspot.com/ ८.विदेह मैथिली साहित्य अंग्रेजीमे अनूदित http://madhubani-art.blogspot.com/ ९.विदेहक पूर्व-रूप "भालसरिक गाछ" : http://gajendrathakur.blogspot.com/ १०.विदेह इंडेक्स : http://videha123.blogspot.com/ ११.विदेह फाइल : http://videha123.wordpress.com/ १२. विदेह: सदेह : पहिल तिरहुता (मिथिला़क्षर) जालवृत्त (ब्लॉग) http://videha-sadeha.blogspot.com/ १३. विदेह:ब्रेल: मैथिली ब्रेलमे: पहिल बेर विदेह द्वारा http://videha-braille.blogspot.com/ १४.VIDEHA IST MAITHILI FORTNIGHTLY EJOURNAL ARCHIVE http://videha-archive.blogspot.com/ १५. विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका मैथिली पोथीक आर्काइव http://videha-pothi.blogspot.com/ १६. विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका ऑडियो आर्काइव http://videha-audio.blogspot.com/ १७. विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका वीडियो आर्काइव http://videha-video.blogspot.com/ १८. विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका मिथिला चित्रकला, आधुनिक कला आ चित्रकला http://videha-paintings-photos.blogspot.com/ १९. मैथिल आर मिथिला (मैथिलीक सभसँ लोकप्रिय जालवृत्त) http://maithilaurmithila.blogspot.com/ २०.श्रुति प्रकाशन http://www.shruti-publication.com/ २१.http://groups.google.com/group/videha २२.http://groups.yahoo.com/group/VIDEHA/ २३.गजेन्द्र ठाकुर इडेक्स http://gajendrathakur123.blogspot.com २४. नेना भुटका http://mangan-khabas.blogspot.com/ २५.विदेह रेडियो:मैथिली कथा-कविता आदिक पहिल पोडकास्ट साइट http://videha123radio.wordpress.com/ २६.Videha Radio २७. Join official Videha facebook group. २८. विदेह मैथिली नाट्य उत्सव http://maithili-drama.blogspot.com/ २९.समदिया http://esamaad.blogspot.com/ ३०. मैथिली फिल्म्स http://maithilifilms.blogspot.com/ ३१.अनचिन्हार आखर http://anchinharakharkolkata.blogspot.com/ ३२. मैथिली हाइकू http://maithili-haiku.blogspot.com/ ३३. मानक मैथिली http://manak-maithili.blogspot.com/ ३४. विहनि कथा http://vihanikatha.blogspot.in/ ३५. मैथिली कविता http://maithili-kavita.blogspot.in/ ३६. मैथिली कथा http://maithili-katha.blogspot.in/ ३७.मैथिली समालोचना http://maithili-samalochna.blogspot.in/ महत्त्वपूर्ण सूचना: The Maithili pdf books are AVAILABLE FOR free PDF DOWNLOAD AT
https://sites.google.com/a/videha.com/videha/ http://videha123.wordpress.com/ http://videha123.wordpress.com/about/ विदेह:सदेह:१: २: ३: ४:५:६:७:८:९:१० "विदेह"क प्रिंट संस्करण: विदेह-ई-पत्रिका (http://www.videha.co.in/) क चुनल रचना सम्मिलित। सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। Details for purchase available at publishers's (print-version) site http://www.shruti-publication.com or you may write to shruti.publication@shruti-publication.com विदेह मैथिली साहित्य आन्दोलन (c)२००४-१३. सर्वाधिकार लेखकाधीन आ जतए लेखकक नाम नहि अछि ततए संपादकाधीन। विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। सह-सम्पादक: उमेश मंडल। सहायक सम्पादक: शिव कुमार झा आ मुन्नाजी (मनोज कुमार कर्ण)। भाषा-सम्पादन: नागेन्द्र कुमार झा आ पञ्जीकार विद्यानन्द झा। कला-सम्पादन: ज्योति झा चौधरी आ रश्मि रेखा सिन्हा। सम्पादक-शोध-अन्वेषण: डॉ. जया वर्मा आ डॉ. राजीव कुमार वर्मा। सम्पादक- नाटक-रंगमंच-चलचित्र- बेचन ठाकुर। सम्पादक- सूचना-सम्पर्क-समाद- पूनम मंडल आ प्रियंका झा। सम्पादक- अनुवाद विभाग- विनीत उत्पल। रचनाकार अपन मौलिक आ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि) ggajendra@videha.com केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx, .rtf वा .txt फॉर्मेटमे पठा सकैत छथि। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेताह, से आशा करैत छी। रचनाक अंतमे टाइप रहय, जे ई रचना मौलिक अछि, आ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। मेल प्राप्त होयबाक बाद यथासंभव शीघ्र ( सात दिनक भीतर) एकर प्रकाशनक अंकक सूचना देल जायत। ’विदेह' प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका अछि आ ऐमे मैथिली, संस्कृत आ अंग्रेजीमे मिथिला आ मैथिलीसँ संबंधित रचना प्रकाशित कएल जाइत अछि। एहि ई पत्रिकाकेँ श्रीमति लक्ष्मी ठाकुर द्वारा मासक ०१ आ १५ तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि। (c) 2004-13 सर्वाधिकार सुरक्षित। विदेहमे प्रकाशित सभटा रचना आ आर्काइवक सर्वाधिकार रचनाकार आ संग्रहकर्त्ताक लगमे छन्हि। रचनाक अनुवाद आ पुनः प्रकाशन किंवा आर्काइवक उपयोगक अधिकार किनबाक हेतु ggajendra@videha.com पर संपर्क करू। एहि साइटकेँ प्रीति झा ठाकुर, मधूलिका चौधरी आ रश्मि प्रिया द्वारा डिजाइन कएल गेल। सिद्धिरस्तु 101 वि दे ह विदेह Videha বিদেহ www.videha.co.in विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका www.videha.com Videha Ist Maithili Fortnightly ejournal विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका''विदेह' १२२ म अंक १५ जनवरी २०१३ (वर्ष ६ मास ६१ अंक १२२) मानुषीमिह संस्कृताम् ISSN 2229-547X VIDEHA