ISSN 2229-547X VIDEHA 'विदेह' १२४ म अंक १५ फरबरी २०१३ (वर्ष ६ मास ६२ अंक १२४) ऐ अंकमे अछि:- १. संपादकीय संदेश २. गद्य २.१जगदीश प्रसाद मण्डल-उपन्यास- बड़की बहिन (आगाँ..) २.२.जगदीश प्रसाद मण्डल जीक दूटा लघुकथा- बलजोर/ दोस्ती नै धारैए ३. पद्य ३.१.१.रामविलास साहुक दूटा कविता २.हेम नारायण साहु जीक कविता ३.२.१.आशीष अनचिन्हार-गजल२. डॉ. शिव कुमार प्रसादक दूटा गीत ३.३.१.जगदानन्द झा ‘मनु’ गजल १-४ 2.पंकज चौधरी "नवलश्री" भक्ति गजल/ भगवती गीत १-२/ कविता १-२/ गजल १-७ ३.४.१.कामिनी कामायनी- आस्थाक पूर्ण कलश २.बिनीता झा- चैन ३.ज्योति झा चौधरी-पिया जल्दी सँ आउ ने (वैलेन्टाइन डे पर विशेष) ३.५.१.राजदेव मण्डलक दू गोट कविता २.जगदीश प्रसाद मण्डलक दू टा गीत ३.६.बाल मुकुन्द पाठक- गजल१-२ ३.७.१.बिन्देश्वर ठाकुर "नेपाली"- प्रेम / गजल २.सुमित मिश्र- गजल १-२ मिथिला कला-संगीत १. ज्योति झा चौधरी २.राजनाथ मिश्र (चित्रमय मिथिला) ३. उमेश मण्डल (मिथिलाक वनस्पति/ मिथिलाक जीव-जन्तु/ मिथिलाक जिनगी) बालानां कृते-१.पंकज चौधरी "नवलश्री"- बाल गजल १-३ २.अमित मिश्र- बाल कविता १-३ विदेह मैथिली पोथी डाउनलोड साइट VIDEHA MAITHILI BOOKS FREE DOWNLOAD SITE विदेह ई-पत्रिकाक सभटा पुरान अंक ( ब्रेल, तिरहुता आ देवनागरी मे ) पी.डी.एफ. डाउनलोडक लेल नीचाँक लिंकपर उपलब्ध अछि। All the old issues of Videha e journal ( in Braille, Tirhuta and Devanagari versions ) are available for pdf download at the following link. विदेह ई-पत्रिकाक सभटा पुरान अंक ब्रेल, तिरहुता आ देवनागरी रूपमे Videha e journal's all old issues in Braille Tirhuta and Devanagari versions विदेह ई-पत्रिकाक पहिल ५० अंक
विदेह ई-पत्रिकाक ५०म सँ आगाँक अंक ↑ विदेह आर.एस.एस.फीड एनीमेटरकेँ अपन साइट/ ब्लॉगपर लगाऊ। ब्लॉग "लेआउट" पर "एड गाडजेट" मे "फीड" सेलेक्ट कए "फीड यू.आर.एल." मे http://www.videha.co.in/index.xml टाइप केलासँ सेहो विदेह फीड प्राप्त कए सकैत छी। गूगल रीडरमे पढ़बा लेल http://reader.google.com/ पर जा कऽ Add a Subscription बटन क्लिक करू आ खाली स्थानमे http://www.videha.co.in/index.xml पेस्ट करू आ Add बटन दबाउ। Join official Videha facebook group. 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नन्दी-भृंगी कहैए जे सोझाँक दरबज्जा स्वप्न नै, मात्र बुझबाक दोष छल! अभिनेता विवेक कुमार अपन “सरनेम” पुछल गेलापर कहै छथि जे कतेक मोश्किलसँ तँ जाति हुनकर पाछाँ छोड़लक अछि से उर्फ तँ छोड़िये देल जाए। वामपंथीक कथामे ने स्वर्ग-नर्क होइ छै आ नहिये यमराज-चित्रगुप्त, मुदा एतुक्का परिस्थिति देखि कऽ ओ अविश्वास कोना करथु? मुदा यमराजे हुनका कहै छथिन्ह जे ई दुःस्वप्न हुअए। यमदूत सभ कड़ाह लग अनेरे ठाढ़ छथि कियो भूजैले भेटिते नै छन्हि, चित्रगुप्तक मेकप बला दाढ़ी देखि भिखमंगनीक हँसलापर भृंगी कहै छथि जे भिखमंगनी सेहो हुनके सभ जेकाँ कलाकार छथि। मोनक दरबज्जा मोन छोड़ि एलापर कोना खुजत? फ्रेंच नाटक “वेटिंग फॉर गोडो”, हैरोल्ड पिंटरक अंग्रेजी नाटक “द बर्थडे पार्टी”, बादल सरकारक बांग्ला नाटक “एवम् इन्द्रजीत” आ उदय नारायण सिंह ‘नचिकेता’क मैथिली नाटक “नो एण्ट्री: मा प्रविश” पुरान नाटक जेकाँ परिभाषित आरम्भ आ अन्तक परिधिसँ अलग अछि। ई कतौ सँ शुरू भऽ जाइत अछि, कतौ खतम भऽ जाइत अछि। एवम् इन्द्रजीत मे लेखक पात्र ताकि रहल अछि, आ अनचोक्के ओ दर्शक दीर्घाकेँ सम्बोधित करैत चारिटा देरीसँ आएल दर्शककेँ मंचपर बजा लैए आ ओकरा नाटकक पात्र बना दैए। चारिम पात्र ओकरा प्रिय छै, ओ निर्मल नै “इन्द्रजीत” छी। ओ अलग अछि, इन्द्रकेँ जीतैबला ऐतिहासिक पात्र अछि। ओ अमल विमल, कमल जेकाँ लीखपर नै चलत। मुदा अन्त जाइत जाइत इन्द्रजीत सेहो अमल विमल, कमल एवम् इन्द्रजीत भऽ जाइए। हैरोल्ड पिन्टरक “द बर्थडे पार्टी”क प्रारम्भमे तेहेन समीक्षा भेल जे हुनकर लेखकीय जीवन समाप्त हुअए पर आबि गेल। मुदा एकर पुनर्पाठ एकरा क्लासिक बना देलक। किछु रहस्य, किछु आतंककेँ ओ सम्पूर्ण नाटकमे बनेने रहलाह, हास्य कथ्यकेँ आर मजगूत केलक। स्टैनले की अछि, छल बा बनऽ चहैत अछि? की ओ स्त्रीकेँ दूषित करैए, बा ओ अपन पत्नीक हत्या केलक? मुदा मेग तँ ओकरा पसिन्न करै छै? ओकर पहिल आ दोसर कन्सर्ट, के तकर बाधक बनलै? की ओ झूठ बजैए बा वर्तमान सामाजिक आ राजनैतिक परिभाषासँ अलग व्यवहारक अछि? ओ मेगकेँ मोकऽ चाहैए मुदा तैयो किए मेग ओकरा पसिन्न करै छै आ सामाजिक आ राजनैतिक शक्ति ओकरा किए आ कोना उठा कऽ लऽ गेल जाइ छै, जकर सिपाही गोल्डबर्ग (गोल्डबर्गक लुलुक संग रहस्यमय व्यवहार) स्वयं आदर्श उपस्थित नै कऽ पाबै छथि। सुन्न-मसान सड़कक कातक माटिक ढिमका आ पत्रहीन नग्न गाछ “वेटिंग फॉर गोडो” क स्टेज छिऐ, ताला लागल दरबज्जाक बाहरक स्थल/ मण्डप “नो एण्ट्री: मा प्रविश”क स्टेज छिऐ तँ “एवम् इन्द्रजीत”मे दर्शक दीर्घा, सएह स्टेज बनि जाइए। “द बर्थडे पार्टी”मे घरक कोठली स्टेज छिऐ मुदा पिन्टर एकर पात्र स्टैनले केँ डेरीडाक “विखण्डन” पद्धतिसँ कखनो खण्ड कऽ दैत छथि तँ कखनो फेरसँ जोड़ि दै छथि। लोक बा दर्शक ओकरासँ ईर्ष्या करऽ लगैए, खने सहानुभूति करऽ लगैए खने घृणा करऽ लगैए, मुदा स्टैनली गोल्डबर्ग आ मैक्कानक सोझाँ जखन निर्बल बुझि पड़ैए तँ दर्शक ओकरा संग अपनाकेँ देखैए, जेना ओ “एवम् इन्द्रजीत” मे इन्द्रजीत संग अपनाकेँ देखैए। “वेटिंग फॉर गोडो” मे जखन लोक गुलाम संग अपनाकेँ देखैए तखने सहानुभूति देखेलापर चमेटा पड़लापर ओ हतप्रभ रहि जाइए। “नो एण्ट्री: मा प्रविश” मे भिखमंगनी ईर्ष्यावश रम्भा-मेनकाकेँ मुँहझड़की कहैए! पॉकेटमार इन्द्रक व्रजपर रुपैय्याक बोली लगबैए। नन्दी-भृंगी कहैए जे सभ गोटे सत्य छी मुदा क्यो गोटे पूर्ण सत्य नै बजलौं। “एवम् इन्द्रजीत”मे इन्द्रजीतक हाल सिसीफस सन छै। शापित ग्रीक मिथक सिसीफस, संगमरमरक पाथरपर चढ़बाक लेल अभिशप्त, आ जखने ओ चोटीपर पहुँचैए आकि पाथर फेर गुरकि कऽ ओकरा नीचाँ आनि दै छै। मनुक्खक काज आ जीवन निरर्थकतापर आधारित अछि। मनुक्ख असफल होइले अभिशप्त अछि, इन्द्रजीत जेकाँ? आकि “नो एण्ट्री: मा प्रविश”क स्वर्ग-नरक, यमराज-चित्रगुप्तक अमान्यता देखलाहा गपकेँ देखि बदलत? मुदा तखन यमराजे कहै छथि जे देखलाहा गप दुःस्वप्न भऽ सकैए? “वेटिंग फॉर गोडो” ईश्वरक इन्तजारी नै छिऐ, बेकेट स्वयं कहै छथि जे इन्तजारी “गॉड”क नै “गोडो”क भऽ रहल अछि, ओना क्रिस्टियेनिटी “मिथोलोजी” अछि से ओ तकर प्रयोग करै छथि। अस्तित्ववादी विचारधारा, मनुक्ख आ ब्रह्माण्ड सभ निरर्थक अछि, अबसर्ड अछि। ....................................... "वेटिंग फॉर गोडो” दू अंकीय ट्रेजी-कॉमेडी अछि। सैमुअल बैकेट द्वारा ई 1952 ई. मे फ्रेंच भाषामे लिखल गेल आ एकर पहिल प्रदर्शन पेरिसमे 1953 ई. मे भेल। एकर अंग्रेजी संस्करणक प्रदर्शन लंदनमे 1955 ई. मे भेल आ अंग्रेजी संस्करण 1956 ई. मे प्रकाशित भेल। हैरोल्ड पिंटरक अंग्रेजी नाटक “द बर्थडे पार्टी” कैम्ब्रिजमे 1958 ई. मे मंचित भेल आ 1960 ई. मे प्रकाशित भेल। बादल सरकारक बांग्ला नाटक “एवम् इन्द्रजीत” 1962 ई. मे लिखल गेल आ ई 1965 ई. मे कलकत्तामे मंचित भेल। उदय नारायण सिंह ‘नचिकेता’क “नो एण्ट्री: मा प्रविश” 2008 ई. मे ई-प्रकाशित आ फेर ओही बर्ख प्रकाशित भेल। 19 फरबरी 2011 केँ कुणालक निर्देशनमे कालिदास रंगालय, पटनामे ई डेढ़ घण्टाक नाटक मंचित भेल। गजेन्द्र ठाकुर ggajendra@videha.com अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। २. गद्य २.१जगदीश प्रसाद मण्डल-उपन्यास- बड़की बहिन (आगाँ..) २.२.जगदीश प्रसाद मण्डल जीक दूटा लघुकथा- बलजोर/ दोस्ती नै धारैए जगदीश प्रसाद मण्डल उपन्यास- बड़की बहिन (आगाँ..) बड़की बहिन चारि भाए-बहिनक बीच सुलोचना, पहिल रहने बड़की बहिनक नाओंसँ गाम भरिमे जानल जाइत छथि। बीघा दू-अढ़ाइक जमीनबला परिवार। छियासी बर्खक अवस्थामे जिनगीक ढलानक आखिरी सीढ़ीमे पहुँचल सुलोचना भातीजक संग बिलसपुर-मध्य प्रदेशसँ अपने गाड़ीसँ गाम पहुँचली। गाम पहुँचते हलचल भऽ गेल सुलोचना बहिन एली। ओना पछिला पीढ़ीक अनुकरण करैत अगिलो पीढ़ी, दीदीक जगह बहिने कहै छन्हि। एक्के-दुइये टोलक धिया-पुता आ जनि-जातियो पहुँचए लगली। डेढ़ियापर गाड़ी रोकि रघुनाथ (छोट भाइक जेठ बेटा) उतरि एका-एकी सभकेँ उतारए लगल। दू बर्खक पोताकेँ सुलोचना कोरामे नेने गाड़ीसँ उतरली। रिष्ट-पुष्ट शरीर, चानीक बल्ला दुनू हाथमे, महीन, सादा साड़ी पहिरने। थुल-थुल देह। उतरिते चारू दिस आँखि उठा तकलन्हि तँ बूझि पड़लन्हि जे जेबा कालसँ विपरीत सभ किछु बूझि पड़ैए। जिनगीक आशा तोड़ि घरो-दुआर आ गामोकेँ गोड़ लागि कहने रहियनि जे अंतिम दर्शन केने जाइ छी। कहाँ आशा छल जे गामक मुँह फेर देखब। तइ बीच जेठ भौजाइपर नजरि पड़लन्हि। नजरिसँ नजरि मिलिते दुनूकेँ बघजर लागि गेलन्हि। मुँहक बोल बन्ने रहलन्हि तइ बीच झुनकुट चेहरा, ठेंगा हाथे बसमतिया दीदी सेहो पहुँचली। जहिना सुलोचना गामक बेटी तहिना बसमतिया दीदी सेहो। एक उमेरिये दुनू गोटे, मुदा सुलोचना बहिन तीन मास जेठ छथि। बसमतिया दीदीकेँ देखिते सुलोचना बजली- “साले भरिमे एते लटैक गेलैं?” दुनूक जिनगी बच्चेसँ एकठाम बीतने बजैमे कोनो कमी रहबे ने करए। निधोक भऽ बसमतिया दीदी बजली- “तूँ ने भाए-भातिजक कमेलहा खा कऽ गेंड़ा बनि गेलैं, हमरा के देत?” सुलोचना- “किअए भगवान तोरा थोड़े बेपाट छथुन जे नै देनिहार छौ?” बसमतिया- “हँ से तँ अछिये, मुदा जएह कमाएत तेहीमे ने देत। अच्छा, कह जे टुटलाहा लग कज्जी ने तँ रहलौं। नीक जकाँ हड्डी जूटि गेलौं किने?” “हँ। आब तँ बाल्टीनो उठबै छी, पोतोकेँ कोरो-काँखमे लऽ कऽ खेलबै छिऐ। अपने गाड़ियो छी, आब गामेमे रहब।” “ऐ उमेरमे असकरे रहि हेतौ?” “छोट भाए- मुनेसरो रहत किने? काल्हि ओहो आओत। ताबे कहुना अही टुटलाहा घरमे रहि पजेबाक घर बनाओत। हम सभ कते जीबे करब। मुदा जाबे आँखि तकै छी, ताबे तकक ओरियान तँ करए पड़त किने?” चौदह बर्खक अवस्थामे सुलोचनाक बिआह भेलन्हि। जहिना पिताक साधारण किसान परिवार तेहने परिवारमे बिआहो भेलन्हि। समाजमे अखन धरि धन नै कुले-मूलक महत अधिक रहल मुदा लेनो-देन तँ चलिते छल। नीक-मूलक कन्याक माङो बेसी। ओना अपन-पिताक कुल-मूलसँ दब परिवारमे बिआह भेलन्हि, मुदा कोनो हिनके टा नै, समाजमे कतेको गोटेकेँ भेल छन्हि आ होइतो अछि। कोनो प्रश्ने नै उठल। मिथिलांचलक ओइ गाममे सुलोचनाक जन्म भेल छलन्हि जइ गाम होइत एकटा धारो अछि आ पूबसँ कोसीक पानि आ पछिमसँ कमलाक पानि सेहो बरसातक मौसममे बाढ़ि बनि अबिते अछि। ओना कोसी-कमलाक बान्ह नै रहने अबैत-अबैत बाढ़ि पतरा जाइत मुदा बरखोक तँ कोनो निश्चित ठेकान नहिये छै। जइ साल बरखा बेसी भेल तइ साल बाढ़ियो नमहर-नमहर आएल आ जइ साल कम बरखा भेल बाढ़ियो छोट अबैत। खेतीक लेल बरखा छोड़ि दोसर कोनो साधन नै छल। लकड़ीक करीनसँ किछु खेती होइत छल मुदा ओ तँ पोखरिसँ होइत छल जे बैशाख-जेठमे अपने सुखि जाइत। जे पोखरि गहींर रहैत ओइ पोखरिक पानि ऊपर अनैमे तीन-चारि गाड़ करीन लगि जाइत। गहुमक खेती नहियेँक बराबर होइत छल, कियो-कियो दू-चारि कट्ठा कऽ लैत छलाह। छह गोटेक परिवार चलबैमे सुलोचनाक पिता हरिहरकेँ कठिनाइ तँ रहबे करनि मुदा गाममे मात्र हरिहरे एहेन नै बहुतो एहेन छलाह जे हुनकोसँ भारी जिनगी जीबैत छलाह। एक तँ महिला शिक्षाक चलनि नै, दोसर गाममे साधनोक अभाव। ओना बाहरसँ कम सम्पर्क रहने गाममे शिक्षाक ओते जरूरतो नहियेँ छल। बेवहारिक ज्ञानक जरूरत छल जे सभमे छलैक, अखनो छैक। स्कूलक मुँह सुलोचना नै देखली। बिआहक तीन साल पछाति सुलोचनाक दुरागमन भेल, सासुर गेली। बर्ख-पाँचे-छबेक पछाति सासुरसँ सुलाचनाकेँ भगा देलकन्हि। भगबैक कारण रहैक जे सन्तान नै भेलन्हि। ओना ने कहियो डॉक्टरी जाँच कराओल गेलन्हि आ ने सन्तान नै हेबाक दोष किनकामे छन्हि, से फड़िछाओल गेल। समाजमे एहेन धड़ल्लेसँ होइत जे कोनो महिलाकेँ कुरुप कहि सासुरसँ ठोंठिया कऽ भगाओल जाइत तँ कोनोकेँ सौतिन तर बसा भगाओल जाइत। इत्यादि-इत्यादि। वैदिक पद्धति एक-पुरुष एक नारीक सम्बन्धकेँ पहिल श्रेणीक विचार समाज मानने अछि, तइठाम रंग-रंगक बाधा बना नारीकेँ अगुआइसँ रोकल गेल। रंग-रंगक सगुन-अपसगुन कहि, तँ उढ़री-ढढ़री बना दबाओल गेल। एहेन स्थितिकेँ जँ रोगक जड़ि बिना तकने आ ओइठामसँ वैचारिक बाट बनौने बिना आइ एक्कैसम शताब्दीमे पहुँचल छी। ई बिलकुल सत्य छैक जे कियो शेर होइ आकि सियार सभकेँ अपन कालखण्डक लेखा-जोखा होइ छै। तँए ओ अगिला-पछिला दोखक भागी भेला, बूझब ई ननमति भेल। हँ, जँ कियो अपना हाथे किछु केलन्हि तेकर जबावदेह तँ भेबे कएल। सुलोचनाक पिता हरिहर समाजक ओहन व्यक्ति जे आँखिक सोझामे कियो गाछक आम तोड़ि लैत वा खेतक धान नोचि लैत तँ एतबे चेतावनी दैत बजैत छलाह जे जाइ िछयौ बापकेँ कहए जे ई छौड़ा धान नोचलक कि आम तोड़लक। बुझिअहन्हि जे जखन तोरा कनैठी पड़तौ। समाजमे सहयोगक विचार छल। अपन गारजन अपने बच्चाकेँ सिखबैत छल। मुदा एकटा जबरदस गुण परिवारमे छलन्हि जे महीनाक चारि-पाँच रवि, चारि-पाँच सोमक सोमवारी संग कतेको पावनिक उपाससँ सोलो छोट कऽ नेने छलाह। सरस्वतीक आगमन परिवारमे भऽ गेल छलन्हि। िसर्फ अपने हरिहरेटा नै पढ़ने। कारणो छल समंगर परिवारमे एक समांग गिरहस्थियो करैत छलाह। तँए शुरुहेसँ पढ़ाइ दिस नै लगाओल गेलन्हि। काल-क्रमे ओहन-ओहन भैयारी पछुआएल। ई दीगर भेल। ओना किछु समाज एहनो छल जे एहेन-एहेन अवस्था (सुलोचनाक संग जेहेन भेल तेहेन) केँ बाहुबलसँ रोकलक मुदा समाजोक कटनियाँ तँ बड़का मूस कतिते छै। जाति-जातिकेँ बाँटि सभ रोगसँ रोगाएल छी। कियो कम कियो बेसी। मुदा एहेन-एहेन अपराध समाजक मुद्दा नै बनि बनि, जातिय मुद्दा बनि कमजोर पड़ैत गेल। काल-क्रमे जातियोसँ परिवारमे पहुँच गेल। एक जातिकेँ नीच देखाएब वा जातिक भीतर कोनो परिवारकेँ निच्चाँ मनोरंजनक साधन बनि गेल अछि। सरस्वतीक आगमनसँ हरिहरक परिवारक विचारमे किछु नवीनता तँ आबिये गेल अछि। सासुरसँ भगाओल सुलोचनाकेँ परिवार सहर्ष अपना लेलन्हि। अपनबैक कारण भेल जे परिवारक सभ अपने गल्ती मानि लेलन्हि जे ओहन कुल-मूलमे डेगे नै उठबैक चाही। ओहनसँ मुँहो लगाएब नीक नै हएत। बापक दुलरूआ बेटा दोसर बिआह कऽ लेलन्हि। मुदा सुलोचना अपनाकेँ वैधव्य नै बुझलन्हि। हाथक चुड़ी रखनहि रहली। समए आगू बढ़ल। लक्ष्मी जहिना दरबज्जापर हँसी-खुशीसँ आबि जाइ छथिन तखन केतबो ताड़ी-दारूक खर्चा हराएले रहै छै। तहिना ने सरस्वतियो रगड़ी-झगड़ी छथि। सुलोचना जकाँ नै ने छथि जे मने-मन संकल्पक संग जीबैक बाट पकड़ैत, ओ तँ तेहेन रगड़ी छथि जे एकटा सौितनक कोन गप जे हजारो सौतिनकेँ झोंटिया अपन हिस्सा लैये कऽ छोड़ैत। पुरुखक कहने भऽ जेतै जे जेठकीक जेठुआ जोश कमा देतै। सरस्वतीक रूप परिवारमे बदलल। संस्कृत पद्धतिक जगह नव-नव पद्धति शुरू भेल। संस्कृतोक पद्धति रहबे कएल। मुदा शिक्षाक बुनियादी पद्धतिसँ उछालि देलक। सुलोचनाक पीठ परक जेठ भाए युगेसर मैट्रिक पास तमुरिया स्कूलसँ केलन्हि। गरीबी बेकारीसँ त्रस्त परिवार। नोकरीक तलासमे कलकत्ता गेला। दू साल रहलाह। भाषाक दूरी, शहर-गामक दूरी तँ स्पष्टे रहै। दू साल पछाति युगेसर टीचर्स ट्रेनिंग केलन्हि। लोअर प्राइमरीक शिक्षक बनलाह। युगेसरसँ छोट मुनेसर सेहो मैट्रिक पास तमुरिया स्कूलसँ केलन्हि। साइंस पढ़ैत। जनता काओलेजमे साइंसक पढ़ाइ नै होइत। गर लगबैत खगड़ियाक गर लगौलन्हि। ओही ठामक संस्कृत विद्यालयमे विद्यार्थीकेँ भोजन-डेराक बेवस्था सेहो करैत अछि। कोसी कओलेज सेहो छैहे। साइंसक विद्यार्थी, नीक जकाँ बी.एस.सी केलन्हि तइ बीच बिआहो अफसरक परिवारमे भऽ गेलन्हि। चारि भाँइक भैयारी हरिहरक छलन्हि, तइमे बँटवारा भऽ गेलन्हि। दुनू परानी हरिहरो मरि गेलखिन। दुनू भाँइक परिवार...। (जारी..) ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। जगदीश प्रसाद मण्डल जीक दूटा लघुकथा- बलजोर/ दोस्ती नै धारैए बलजोर राज-दरबारसँ घूमि कऽ अबिते बड़का-भैया हाँइ-हाँइ बैग राखि जुत्ता निकालि बेसुधि जकाँ पलंगपर चारूनाल चीत भऽ ओंघरा गेला। एतेक सुधि नै रहलनि जे तरबा पसीनासँ पसीज पैताबाक संग देहक घामक भीजल गोलगला कुर्ता निकालितथि। आंगनमे बड़की-भौजी चुल्हि लग बैस भानस करैत पुतोहुकेँ कहैत रहथिन- “कनियाँ, भगवान जँ ससुर देलनि तँ अहाँकेँ देलनि, अपनो ऐ बुढ़ाड़ी तक पहुँचैमे कहियो खाइ-पीबै आकि कोनो मन-मनोरथक दुख बेकल नहियेँ भेल अछि।” सासुक (बड़की-भौजी) बात सुनि पुतोहु (रेखा) जे तिलकोरक पात छाँटि-छाँटि तहिया-तहिया सासु-ससुर लेल राखि अपना-ले लोहियामे देल उनटबैले छोलनी दिस आँखि उठबैत बाजलि- “कहै तँ छथिन बड़ सुन्नर बात माए, मुदा गाममे हिया कऽ देखथुन जे हिनका एते उमेरक कते गोटे घरक गारजनी अपना हाथे चुहुटि कऽ पकड़ने छै। खाएल-पीअल पोसल देह छन्हि नोकरनी जकाँ रखने छथि। ई कहाँ कहियो मनमे होइ छन्हि जे पोता-पोती बिआह-दुरागमन करै जोकर भऽ गेल। अपनो उमेर पचास-पचपनक तँ भैये गेल हएत मुदा हाथ-मुट्ठी केना चलै छै से सोचै-विचारैक मौका अखैन तक कहाँ देलनि। जहिना दुरागमन कऽ ऐ घर प्रवेश केलौं तहिना अखनो छी। पाकल आम जकाँ दुनू बेकती भेली, कखन ढन दे आँखि मुनि लेती तेकर कोनो ठीक छन्हि। किछु दिन पछाति बेटा-पुतोहु घर सम्हारत। तखन यएह कहथु जे हिनका जकाँ कहिया हएब?” अपन मलिकियतपर पुतोहुक व्यंग्यवाणक आक्रमण देखि बड़की भौजी तिलकोर उनटबैत पुतोहुक बोल सुनि तिल-मिलाए लगलीह। ढोढ़ साँप जकाँ मन सनकए लगलनि मुदा विचार रोकि मनमे उठलनि, घरवाली घर लेती दाइ जेती छुच्छे, तइले लक्कड़-झक्कर करब नीक नै। चारि पएरक हाथी हूसि जाइए मनुख तँ सहजहि दुइये पएरक होइ छै। आगिक ताउ लग मन तबधि गेल हेतनि, भरिसक तँए एहेन बात बजलीह। मुदा लगले विचार घूमि गेलनि। एहेन बात पुतोहुकेँ बाजक चाहियनि। एतबो नै होश रहलनि जे मुँहपर एहेन बात बजलीह। घर-दुआर केतौ पड़ाएल जाइ छै। एहेन उचित भेल जे पाकल आम जकाँ बुझै छथि। जिनगीक कोनो ठेकान छै, जँ कहीं हमरासँ पहिने अपने चलि जाथि तँ पोत-पुतोहुक गारजनी केहेन हएत। छौड़ा-मारड़िक गारजनी आ पटुआ सागक झोरमे की भेद छै। मुदा किछु बजली नै। नजरि दुनूक तिलकोरक तड़ूआपर, एहेन ने हुअए जे कोनो लहकि जाए आ कोनो असिझू भऽ नरमे रहि जाए। एक हुकुमदारनी दोसर केनिहारि। बड़का-भैयाक असल नाओं सुलोचन आ बड़की भौजीक शान्ती छियनि। परिवारक बाबा समाजक भैयारीमे सुलोचन बड़के भैया आ शान्ती बड़की-भौजियेक रूपमे रहि गेली। ओना दुनू बेकतीक उमेर अस्सीसँ उपरेक छन्हि। मुदा ऊपरका खाड़ीक लाटमे धियो-पुतो बड़के-भैया आ बड़किये भौजी कहै छन्हि। सुलोचनाक पलंगक मचमचीक अबाज आँगन धरि पहुँचि दुनू बेकतीक कानमे ओहिना पहुँचल छल जहिना मलकार िकसान परिवारमे बाधसँ अबैत माल-जालक आवाज अबैत। अकानि-अकानि अनुमान लगौलनि जे भरिसक बुढ़ा पहुँचि गेला। अनुमानो ठीके रहलनि। बड़की भौजी रेखासँ बेसी पनिगर। देहो हल्लुक। तँए जाबे रेखा छोलनी राखि पल्था सम्हारि दुनू हाथ रोपि उठैत-उठैत ताबे बुढ़ी (बड़की भौजी) तीनियेँ डेगमे पति-बड़का-भैया लग पहुँचि गेली। पहुँचिते आँखि मूनि चारूनाल चीत, दुनू हाथ सिरमा दिस बढ़ौने देखि अर्द्धचेत जकाँ हुअए लगलीह। मुदा हाेश सम्हारि दहिना हाथक आँगुर नाक लग भिरौलनि। साँस नीके चलैत रहनि मुदा रस्ताक झमारसँ किछु गरम तँ रहबे करनि। पंखा हौकलासँ भक्क टूटि जेतनि। पाछू उनटि तकलीह तँ डाँड़पर हाथ नेने रेखाक मौकनी हाथी नहाँति लुदुर-लुदुर अबैत देखलनि। लग अबैसँ पहिनहि जोससँ हुकुम फेकलनि- “कनी पंखा नेने आउ।” एक तँ राकश दोसर नतल, दस डेग आगू बढ़बसँ रेखा हुकुमेकेँ नीक बुझलनि। घूमि तँ गेली मुदा मन बिसाइन जकाँ हुअए लगलनि। जत्ते विष-विस्सी बढ़ल जान्हि तत्ते मनक हौंर सेहो तेज होइत जाइत छलनि। ई केहेन भेल जे नैनसँ देखैक बदला पंखा अनैले घुमा देलनि। भलहिं डाॅक्टर नै छी मुदा डाॅक्टरक परिवारक बेटी तँ छीहे। पढ़ल-लिखल छीहे, तखन किअए बुढ़ी अपचंग भेल छथि। एक तँ बुढ़ा खेलाड़ जे एत्ते दूरसँ पएरे एला से भेलनि मुदा बजितथि से नै भेलनि। लोककेँ कोनो बेमारी होइ छै तँ बजैए आ हिनकर पहने बकारे बन्न भऽ गेलनि। तेहने खेलाड़ि बुढ़ी छथिन। जना लूटि लैतियनि तहिना दुरसेसँ हुकुम चला देलनि। हमरासँ बेसी पनिगर तँ अपने छथिये किअए ने दौग कऽ पंखा लऽ गेली। मन ठमकलनि। परबस जीव...। मनमे ठहैकते रेखाक सभ विचार, पानि पड़ल झोलीक आगि जकाँ सिमसि गेलनि। जँ बात कटितियनि तँ पीड़ित-सँ-विपरीत भऽ जइतथि, जँ नै कटलियनि तँ बुढ़ाक जान-परान निकलि रहल छन्हि। अजीब लीला बुढ़ीक छन्हि। हड़पटाहि गाए जकाँ, दूधक काल छड़पि उठती आ डोरी तोड़ि आड़ि-धूर कुदि कऽ टपै बेर खलीफा भऽ जेती। इहए छी परिवार बाबा-दादी, बाबी-दादी, दीदी-पीसा, मौसी-मौसा, काका-काकी, भाय-भौजाइक सम्बन्धक कोनो महत नै, मुदा...। कतए बिला गेल बाबा-दादीक सम्पति गुण, जे पेट-काटि उपार्जित केने रहथि। उचित-अनुचित जिनगीक दिशा बोध करबैत अछि तइठाम मंत्र बनि ढोलक-झालिक संग हवामे रमैत रहै छै। पंखाक आदेश पुतोहुकेँ दैत बड़की-भौजी कान लग मुँह सटा कऽ पुछलखिन- “किछु खेबो-पीबोक मन होइए?” बड़की-भौजीक आवाज कानमे पैसिते ढोढ़ साँप जकाँ बड़का-भैया फुफकार छोड़लनि- “की खाएब की पीब, अह्लादि कऽ पुछै छथि, बड़ हएत तँ यएह ने हएत जे एते दिन छानि-छानि खाइ छलौं आब झाड़ि-झाड़ि खाएब।” तरे-तर जे बड़का-भैया बजैत रहथि से बड़की-भौजी नीक जकाँ नै सुनि पौलनि। अह्लाद-सँ-अह्लादित होइत हाथीक सूढ़ जकाँ मजीराक ध्वनिमे बड़की-भौजीक गछाड़ देखि बड़का-भैयाक मन सुगबुगेलनि। बजलाह- “कनी थम्हू। आँखिक पल उठबे ने करैए।” भक्ति भावसँ बड़की भौजी धड़-फड़ाइत बजली- “अच्छा, पानि आनि आँखि पोछि दइ छी।” कहि बड़की-भौजी जुआनीक जोशमे पलंगसँ कूदि पानि आनए दौगलीह। चौकठिक अढ़मे पुतोहु-रेखा पंखा नेने अबैत रहथि, अकासमे उड़ैत बड़की-भौजीक नजरि रेखापर नै पड़लनि। एक गोटे असथिरसँ अबैत दोसर कुदैत-फुदैत िनकलैत, मोखे लग भिड़ंत भऽ गेलनि। कोनो एक-दोसर परिवारक भिड़ंत नै तँए ने बड़की-भौजी किछु बजलीह आ ने पुतोहु-रेखा। मन दुनूक टाँगल बुढ़ाक कोसलपर। चलचलौ जकाँ छथि, अखने जे पाबि लेब से पाबि लेब। बुढ़ीक (बड़की भौजी) धड़फड़ी देखि रेखाक मनमे उठल, शान्त-चित्त रहैबला बुढ़ा एना विस्मृत जकाँ किअए कऽ रहला अछि। जनिकामे एते दूरसँ अबैक शक्ति छलनि मुदा घरक लोककेँ कहितथिन से होश नै रहलनि। जरूर कोनो राजरोग छियनि। (राजरोग ओहन बेमारी होइत जे जड़ि-मूल नै छुटैत मुदा पथ-परहेजसँ जिनगी देने रहैत अछि।) राजरोग मनमे अबिते विचार फुद-फुदाए लगलनि। जहिना छठी रातिक दूध जिनगीक अंतिम क्षण धरि स्मरण रहैत, जेकर सफर जिनगीमे सभसँ नमहर होइत छै। किछु रोग एहनो होइ छै जे चटपट जिनगीकेँ तोड़ि दइ छै आ किछु एहनो होइ छै जे मुसकारीक मूस जकाँ कुहि-कुहि जिनगी लइ छै। भरिसक बुढ़होकेँ ने सएह पकड़ि लेलकनि। चून जकाँ मन चुनिया गेलनि। ओना जखन दुनू गोटेक (सासु-पुतोहु) कानमे बुढ़ाक पहिल ध्वनि एलनि तखन दुनूक अपन-अपन उत्साह रहनि। बड़की-भौजीक उत्साह रहनि जे राज-दरबारसँ घुमलाहेँ। नीक जकाँ परिवारक विदाइ भेले हेतनि, देखा चाही चाइन केहेन चमकैए। जाबे रेखा कोठरी पहुँचि बुढ़ा लग बैस किछु पुछैक ओरियान करिते रहथि आकि बड़की-भौजी लोटामे पानि नेने पहुँचली। मनमे शंका जगलनि। शंका ई जे बुढ़ासँ किछु कहा ने नेने होथि। मुदा बिनु सुनल बात बाजबो उचित नै। तहूमे एक दिस मालिक (पति) छथि दोसर दिस पुतोहु। जँ कहीं दुनू एक दिशाह भऽ जाथि तखन अपन गति की हएत? गाड़ी उनार भेने चढ़निहारक जान थोड़े बँचै छै। जँ बचबो करै छै तैयो अबाह बनाइये दइ छै। मुदा मनक ताप-संताप बनले रहलनि। पुतोहुकेँ कहलखिन- “कनियाँ, अहाँ उन्टा घुट्ठी ऐँठ दिअनु।” घुट्ठीक भार देला पछाति बड़की-भौजीक मन रमकलनि- ओह, लगले दोहरा कऽ अढ़ाएब नीक नै तहूमे तीन गोटेक बीचमे। नै तँ कड़ू तेलसँ तरबा रगड़ब नीक होइतनि। पानिसँ चानि धुआ जइतनि आ तेलसँ तरबा रगड़ा जइतनि तँ अनेरे होशमे आबि जइतथि। खैर, जे हूसल से हूसल। चानिपर पानिक फुहार पड़िते बड़का-भैया आँखि खोललनि। आँखि-पर-आँखि पड़िते बड़की-भौजीक आँखिमे ललकारीक रेगहा जगलनि। जगिते सहमि गेली। अनेरे बुढ़ाड़ीमे घी-ढारीक बात मन पाड़ै छी। लोककेँ अपनो उमेरक ठेकान करक चाही। दुनियोँ तँ अजीबे छै, दुनियाँक एको प्रतिशत लोक एहेन नै अछि जे अपने माए-बहिन जकाँ दुनियोँक माए-बहिनक चर्च नै करैत अछि मुदा एत्ते अपराध किअए होइ छै। नैतिकताक महत जँ नै होइतै तँ माए-बहिनिक अपराध कहाँ केतौ होइ छै। पतिक थरथराइत मन छाती डोला देलकनि। पँजरा उनटि तकलीह तँ पुतोहुकेँ उन्टा घुट्ठी जोर-जोरसँ ससारैत देखलीह। मुदा शंका भेलनि, शंका ई जे जरूर कोनो बात हेतै। बुद्धियार आदमी काजे देखि आदमी चिन्हैए। जँ कहीं घुट्ठिये पकड़ि घोलटिया लेलकनि तखन अपने तँ बीचेमे रहि जाएब। पुरुखक ठेकाने कोन। साँढ़-परा जकाँ कखन की करत तेकर कोन ठेकान। कखनो भगत सिंह बनि जान फूकत तँ कखनो वेश्यालयमे दिने-देखार लुटत-लुटाएत। मन पड़लनि घी-ढारिक मंत्र। मुदा आब ओ मंत्रक समए कहाँ रहल। गाछपर सँ खसैत लोक जकाँ भौजीक मन झुमलनि मुदा थाकल ठेहिआएल पतिक सेवाकेँ प्रथम प्रश्रय दैत अपन बेथा बिसरि भौजी पति (बड़का भैया) केँ कहलखिन- “लोककेँ सौंसे देह गुड़-घा रहै छै से बरदास कऽ समैपर नहेबे-खेबे करैए आ अहाँ मुरदा जकाँ आरो धड़ खसौने जाइ छी।” भौजीक बात भैयाकेँ कठानि नै लगलनि। पुरुखपाना जगलनि। मरितो धरि पत्नी लग झुकि जाएब तँ केहेन पुरुख हएब। फुड़फुड़ा कऽ चिड़ै जकाँ, उठि बैस भौजीकेँ कहलखिन- “कनी कुरताक बटम खोलि दिअ।” “एहिना उनटा-पुनटा बुझै छिऐ।” झपटैत पतिकेँ भौजी कहि रेखाकेँ आदेश देलखिन- “पहिने पएरक पैताबा कनियाँ निकालि दिअनु।” ओना बड़का-भैया रंगा रूपैयाक मुस्की देलनि मुदा मनमे उठि गेलनि पत्नीक बात ‘उनटा-पुनटा काज।’ मुदा बजलाह किछु ने। सभ बात स्त्रीगण लग बाजब उचित नै। जँ ओकरा नाक नै रहितै तँ कि-कि ने करैत। मुदा छाती राँइ-बाँइ भेल जाइत रहनि। कुरताक बटम खोलिते बड़की-भौजी राँइ-बाँइ भेल हृदए देखलनि। बजली किछु ने। देह खलिआइते बड़का-भैया बजला- “कनी लेटरीनो जैतौं आ नहाइयो लैतौं।” एक राकश दाेसर नोतल भौजी आदेश फेकलनि- “कनियाँ, अहाँ चौका सम्हाररू हम बाथ रूप सम्हारने अबै छी।” दुनू गोटे माने सासुओ आ पुतोहुओ अपना-अपना मने खुशी जे खेबे कालक गप ने रस पाबि मिठाँसपूर्ण होइ छै। दुनूकेँ खुशी देखि बड़को-भैया खुश। परिवार खुशी तँ अपनो खुशी। जँ खुशी नै तँ बजार घुमैकाल ओहिना बाप बेटाकेँ आ माए बेटीकेँ कोरामे लऽ घुमैत रहै छै। कोठरी छोड़ैक विचार तीनू गोटे करिते रहथि आकि शिवशंकर पहुँचि गेलखिन। किनको लजेबाक प्रश्ने नै। बड़का-भैया बड़के-भैया भेला, भौजी भौजिये भेलखिन आ रेखा अंगीतेक बेटियो आ काॅलेजक विद्यार्थियो। कोठरी प्रवेश करिते शिवशंकर पूछि देलखिन- “भाय, केहेन यात्रा रहल?” जहिना मुर्दा ऊपर अस्सी मन जारनि लादि जराओल जाइत तहिना अस्सी मन पानिमे डुमल बड़का-भैया मिरमिराइत कहलखिन- “अशुभे रहल।” भैयाक बात सुनि शिवशंकर बजलाह- “पहिने फ्रेस भऽ जाउ, नहा-खा लिअ तखन निचेनसँ आगूक गप हेतै। ताबे हम बैसै छी।” शिवशंकरक मनमे रहनि जे नव-नव रचना अनने हेता, सेहो देख लेब आ दरबारक कागजो-पत्तर देख लेब। एक्के वस्तुकेँ एक स्तरसँ गिरौलापर अनेक तरहक दबाब पड़ै छै। असथिरसँ गिरौलापर नरमो वस्तुकेँ बँचैक संभावना रहै छै, जखन कि जोरसँ गिरौलापर कड़ो वस्तुकेँ टुटै-फुटैक संभावना भऽ जाइ छै। बड़का-भैयाक स्थिति सएह रहनि। मुदा दबाबो देब उचित नै बूझि शिवशंकर चुपे रहलाह मुदा रेखाकेँ कहलखिन- “पान सए नम्बर जर्दा देल पान खुआ दिअ। एक झपकी ताबे मारि लेब।” जते काज बड़का-भैया अाधा घंटामे करै छलाह ततबे करैमे घंटोसँ ऊपर लागि गेलनि। जहिना पएरमे जात बान्हि वा जहलमे डंडा-वेरी..., मुदा से शिवशंकर नै बूझि सकलाह। कारण भेलनि जे रेखा काॅलेजमे खेल-कुदमे नम्बर एक छल आइ उठबो-बैसबोमे असोकर्ज भऽ रहल छन्हि। मनमे उठलनि अखराहाक खलीफा पहिने डण्ड-बैसक कऽ लपटैए, तखन कुश्ती लड़ैए आ तेकर पछाति छोट-छोट खलीफाकेँ लपटाबैए। पछाति सवारी कसि परीक्षा लइए। जिनगीयोक अवस्था अहिना होइ छै। बड़का-भैया ऐमे चुकलाह। भोगी-विलासीक परिवार बना लेलनि आ आशामे जीबै छथि जे चाननक गाछी लगौने छी। सोचिते-सोचैत आँखि बन्न भऽ गेलनि। भकुआइत ओंघा गेला। बड़का-भैयाकेँ पहुँचिते बड़की-भौजी पनबट्टी नेने पहुँचि गेलखिन। दुनू गोटे पान खेलनि। शिवशंकर पुछलखिन- “अशुभ की कहलिऐ?” शिवशंकरक प्रश्न सुनि बड़का-भैया झमान भऽ जेना हजारो हाथ ऊपरसँ खसला- “मिसियो भरि जेकर आशा नै छल से भेल मुदा...?” खेतक अकटा-मिसियाकेँ कियो अन्न मानबे ने करैत तँ कियो सागो आ रोटियो बना खाइत अछि। खेती भलहिं नै होउ मुदा ओहो (अकटा-मिसिया) मैदानमे डटल अछि। जँ कनियो नजरि नै राखब तँ जजातेक छातीपर चढ़ि धरतीकेँ अन्नमंडल बना दैत अछि। बाट-घाट रोकने तीर्थ यात्रीकेँ किछु नै बिगड़ैत छै, देखै-सुनैक नव-नव स्थान भेटैत छै। मानिऔ वा नै मानिऔ समैक शक्ति सबल होइ छै। बड़का-भैयाक चेहराक क्रिया देखि शिवशंकर सोचथि जे चेहरा कहि रहल छन्हि जे जना धमसुरक चोट लगल होन्हि। जटा-जटीनक बेंगकेँ जहिना कुटनी कूटि पेटसँ पानि निकालि पानिक संग मुइल बेंगकेँ मटकुरमे नेने गीत गबैत केकरो ऐठाम फेक भरि दिन फौतली सुनैक रास्ता बना लैत तहिना गसिया कऽ शिवशंकर पकड़लनि। मुदा मनमे ईहो होन्हि जे धमसुरक चोट कनियो खड़खड़ाएल नै। एकाएक एना किअए भेल। जाबे अकासमे पािन पानिसँ नै टकराएत ताबे बिजली केना बनतै आ बिजली नै बनत तँ ठनका केना बनत। भलहिं अहाँ ओकरा सोनोसँ अमूल्य बुझैत होइऐ मुदा ने राधाकेँ नअ मन घी हेतनि आ ने राधा नचती। केकरा बुते हएत जे ओकरा पकड़ि हाथमे आनत। ओकरा पकड़ै ले गोवरधन जकाँ गोबरक ढेरी बनबए पड़त, तइपर फुलही थारी राखए पड़त तखन जब समए औतै समुद्रसँ करिया हवा उठि अदलि-बदलि बादल बनि दोसर बादलसँ टकराएत, ओही टक्करसँ बिजली बनि ठनका बनै छै। तखन जा कऽ ओही थारीपर ठनका खसत। कतबो ठनका जोर करतै मुदा गोबर की ओकर शक्तिकेँ शक्ति मानतै। रास्ता रोकतै। भलहिं अश्वमेघ युद्ध किअए ने होउ। जहिना छातीपर बैस कंठ पकड़ि बलजोर मुँहसँ बजबा लैत, तहिना बड़का-भैया बजलाह- “आशाक विपरीत अपना हाथे केलौं।” बड़का-भैयाक बात सुनि शिवशंकर विर्ड़ोक मोड़मे पड़ि गेला। पुछलखिन- “एना किअए?” “तीन गोटे कारोबारी छेलौं। दू गोटे शिकारी छेलौं आ एक गोटे अनाड़ी छलाह। हुनका लिए दिन-राति बारहे-बारहे घंटाक होइ छै सहए बुझैत। ओना जहिना आदि ऋृषिका सबहक परिवारकेँ जँ कोनो परिवार कहि देबै तँ ई जल्दवाजी भेल। इंजिन िनर्माताक परिवार जँ इंजिन िनर्मितक शक्ति नै राखत तँ वंशक रक्छा केना हेतै।” “हँ तखन?” “प्रस्ताव देलिऐ। दोसरो प्रस्ताव एलै। मुदा जेकर कल्पना नै छल से भेल!” “से...।” “प्रस्ताव दइते जे दोसर छलाह, जिनकासँ मिसियो आशा नै छल जे ठनका जकाँ बनि जेता। जहिना अकासमे उड़ैत गीध अपन सहयोगी चीलकेँ देखा दैत आ हरड़ी-विदेशरक मकड़क मेलामे अरबा चाउरक चिक्कसमे, इनहोर देल पानिसँ बनल रोटी आ तइपर पँचफोरना देल अल्लूक दमक संग हाथमे रोटी लऽ मेलो देखैत आ खेबो करैत रहैए आ तखने जहिना हाथक रोटी झपटि चील पोखरिक महारक पीपरक गाछपर बैस कुचड़ए लगैए, तहिना भेल। तेना झपटलक जे छाती छॅहो-छित्त भऽ गेल। कतबो अपनाकेँ असथिर करी मुदा नै भऽ सकल। अन्त भेल जे संदेश तँ समाजमे जेबे करत। मुदा-संदेशो तँ सनेसे छी। केम्हर केहेन बिलहाएत से के कहलक।” “आब?” “देखार होइ दुआरे बहुमत नै हुअए देलिऐ। सर्वसम्मति कऽ जान बचा लेलौं।” सुनि दुनू गोटे मर्माहत भऽ गेला। मुदा दुनूक मनमे दू तरहक विचार नाचए लगलनि। बड़का-भैयाक मनमे उठैत रहनि जे ई उमेर सन्यासक छी। हमरा कोन ऐ दुनियाँ-दारीसँ मतलब अछि जे अनेरे...। शिवशंकरक मनमे उठैत रहनि जे जाधरि समए नै पकड़ि चलब ताधरि समए संग नै चलि सकब। विकासोक प्रक्रिया छै। ओहीमे गति-मति संगे चलै छै। से नै भेल। (“बलजोर” कथा डॉ. प्रेम शंकर सिंहकेँ समर्पित...) दोस्ती नै धारैए मतिछिन्नु जकाँ भेल दरबज्जाक खुटाँमे ओंगठि अपने करनीक फल देखबो करैत रही आ अगिला फल दिस तकबो करैत रही। मुदा मन केतौ थहेबे ने करए, केतौ-कतौ डुमियो जाए तँ केतौ-कतौ बूझि पड़ए जे समुद्रक कातमे लहड़िक संग बालुपर ढूसि खेलै छी। गाम दिस ताकी तँ देखिऐ जे गोसाँइ भायकेँ सौसे गामसँ दोस्ती निमहि रहल छन्हि दोसर हम छी जे लऽ दऽ कऽ एकटा दोस खेनाइ-पीनाइसँ लऽ कऽ बर-बरिआती पुरनाइ धरि छल, सेहो चलि गेल। ओह! अनेरे झगड़ा कऽ अपन संकल्प तोड़लौं। एेँह कहू जे ई केहेन भेल जे जइ भोला बेटाक केश कटबए गंगा कात गेल रही आ केश कटौला पछाति छौड़ाकेँ असीरवाद देने रहिऐ जे पान साल पछाति बरिआती पूरि बिआहो कऽ देबौ, से तँ टूटि गेल। भोलबो सप्पत खा लेलक जे तोरा दुआरपर थूक नै फेकबौ तहिना झोंकमे अपनो तँ कहिये देलिऐ। लाभ-हानि तकै छी तँ एकटा दाेस छल सेहो चलि गेल। असकरे जहिना पुरुखक घर तहिना ने मौगियोक होइ छै। ओह, अनेरे एहेन झोंकमे पड़लौं, ओ जँ बजबे कएल तँ पछाति बुझा दैतिऐ जे मनक कोनो ठेकान छै ओहिना मुँहसँ निकलि गेल तइले दोस्ती किअए चलि जाएत। भेल तँ एतबे ने रहए जे ओ माटिक तरक अल्हुआ-सुथनीकेँ फल कहि एकादशीक बात कहै आ हम आम-जामुनकेँ अकास फल कहि एकादशीक बात कहैत रहिऐ। अनेरे बातक रग्गड़-झग्गड़ बनि मग्गह कऽ दऽ आएल। बुकौड़ लगि गेल जे असकरे गाममे केना रहब? जइ गाममे जाति-जातिक रगड़ा, जाति-जातिक बीच कूल-मूलक रगड़ा, कखनो टिक-बिनु टकक रगड़ा, कखनो राम-कृष्णक रगड़ा, तँ कखनो ऐ टोल ओइ टोलक रगड़ा, केना एहेन समाजमे असकरे रहब। जहिना बान्ह टुटने वा छहर टुटने बाढ़िक पानि घरेकेँ डुमा दैत आ घरमे बैसल घरवारी घरकेँ रक्षक बूझि भक्षक भऽ जाइत सएह गति भेल। मुदा गरिबाहा जे धनिकाहाक देखसी-रस्ता पकड़त तँ कते दिन चलि सकत। मनमे उठल जे जाबे अपन दुख दोसरकेँ नै कहब ताबे एहिना हएत। मुदा कहबो केकरा करब। डोंगी नावमे बैसा डगमगा कऽ डुमबैयेबला बेसी अछि। नजरि उठा तकलौं तँ मंगल ग्रह जकाँ गोसाँइ-भाय छोड़ि दोसर कियो ने बुझाएल। गोसाँइ भाय स्कूलक संगी। गोटि-पंगड़ा जे पुरान लोक छथि ओ अपनाकेँ पुरना सीमा बना लेलनि तहिना नवका तूर नवका सीमा। कारणो भेल शिक्षाक बदलाव! मुदा गोसाँइ-भाय तँ एक बतरिया छथि, हुनकेसँ पूछब नीक हएत। विदा भेलौं। गोसाँइ-भाय हमरा गिरगिटिया कहै छथि। जखन बजै छी तखन ‘ठीक-ठीक’ कहि दैत छथि, मुदा रंग बदलैकाल सतरंगा कहि गिरगिटिया कहै छथि। संगी-साथीमे अहिना होइ छै। बान्हपर देखिते गोसाँइ-भाय पुछलनि- “की गिरगिट भाय, सुनै छी अहू बेर इलेक्शन हएत?” कहलियनि- “आब ऐ सभकेँ छोड़ि देलौं। सभ पाटी टहलि-बूलि देखि लेलिऐ। एक उमेरोपर एलौं। छौड़ा-मारड़िक चालि धड़ब से सकब।” चाह पीबिते मन असथिर भेल। पुछलियनि- “भाय, हमरा दोस्ती नै धारैए। तेकर की कारण? अहाँकेँ देखै छी जे सगरो लुधकी लागल अछि आ हमरा एकटा छल सेहो टूटि गेल?” “किअए?” “मुहाँ-ठुट्ठी भऽ गेल।” “की मुहाँ-ठुट्ठी?” “कौआ-ठुट्ठी नै खेलाइ छिऐ तहिना।” “गिरगिट भाय, अहाँ लंगोटिया संगी छी तँए कहै छी। जहिना कोनो-कोनो गाछमे एकेटा सिर होइ छै, आ कोनोमे मुसरासँ लऽ कऽ मोटका सिर, पतरकाक संग जल्लो होइ छै, सबहक अपन-अपन काजो आ जिनगियो छै। तहिना बिनु रोपल मनुक्खोक सिर छै। ओकरामे दोसर केना सटै छै आ हटै छै, यएह खेल छै। अही पाशापर सभ बैस जिनगीक नाव खेिब भव-सागर पहुँचैए।” ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। ३. पद्य ३.१.१.रामविलास साहुक दूटा कविता २.हेम नारायण साहु जीक कविता ३.२.१.आशीष अनचिन्हार-गजल२. डॉ. शिव कुमार प्रसादक दूटा गीत ३.३.१.जगदानन्द झा ‘मनु’ गजल १-४ 2.पंकज चौधरी "नवलश्री" भक्ति गजल/ भगवती गीत १-२/ कविता १-२/ गजल १-७ ३.४.१.कामिनी कामायनी- आस्थाक पूर्ण कलश २.बिनीता झा- चैन ३.ज्योति झा चौधरी-पिया जल्दी सँ आउ ने (वैलेन्टाइन डे पर विशेष) ३.५.१.राजदेव मण्डलक दू गोट कविता २.जगदीश प्रसाद मण्डलक दू टा गीत ३.६.बाल मुकुन्द पाठक- गजल१-२ ३.७.१.बिन्देश्वर ठाकुर "नेपाली"- प्रेम / गजल २.सुमित मिश्र- गजल १-२ १.रामविलास साहुक दूटा कविता २.हेम नारायण साहु जीक कविता १ रामविलास साहुक दूटा कविता रामविलास साहु जीक दूटा कविता- जीयब केना जीयब तँ जीयब केना दुनियाँ बदलि गेल जेना चारूकात अधरमे कुकरमे दिन-दहारे डाका पड़ैए चौबटियापर इज्जति लुटाइए गाम-शहरमे दारू बिकाइए मानव पीब दानव बनैए चोरी-डाका सिनाजोड़ी करैए बीच बजार बलत्कारी होइए कतए चलि गेल धर्मक नीति जेनए देखियौ कुरितिये रीित जीयब तँ जीयब केना दुनियाँ बदलि गेल जेना। चलैत बाट डर लगैए चौर सिपाही खेल करैए सरकारक कानून उन्टा बनलए िनर्दोषी लेल जहल बनलए दोषी घूमि-घूमि मौज करैए सरकार अपराधीक बीच गरीब जनता पीसाइत रहैए सभ हत्यारा कंश बनलए सरकार धृष्टराष्ट बनलए अधिकारी मंत्री माल लुटैए देशक जनता बौक बनलए देखि कवि सोचमे पड़लए जीयब तँ जीयब केना दुनियाँ बदलि गेल जेना।। मोनक आगि पूर्णिमाक चान मलिन भेल देखि तरेगन कनखी मारए। सोलह श्रृंगार काएल भेल मलिन। पिया बिनु भेलौं विरहिन रातिक फूल भोरे भेल मलिन। मृग तृष्णामे मृग बौआइए भटकि-भटकि जहिना परान गमबैए। तहिना मन हमर भरमैए मोन आगि रहि-रहि जड़ैए। नै पिया पियास मुझाइए सोलहकलासँ सजल चानकेँ जहिना अन्हरा नै देखैए तहिना परदेशिया पिया अपनाकेँ विरान बुझैए। िनरदैयाकेँ प्रेम केना जगतै प्रेम बिनु दुनियाँ केना चलतै। की चकबा चकबी जकाँ साँझ पड़ैत बिछुड़ि पड़तै? पूर्णिमाक चन देखि राति बितेतै कहैए कवि राखू मोनमे धीरज एक दिन मेटत अमृतसँ पियास अपन मोनक आगिकेँ राखू दािब। २ हेम नारायण साहु हम छी मैथिल- हम छी मैथिल हमर छी मिथिला मिथिला हमर गाम छी। हमर अप्पन धाम छी। किएक एकरा िबसरि रहल छी ऐ माटि-पानिकेँ छोड़ि पड़ाए रहल छी। ऐ भूमिकेँ समुच्चा जगमे नाम जपैए संसारक लोक जय-जय गान करैए। मिथिलाक सभ्यता-संस्कृतिकेँ किएक बिसरि रहल छी? ऐठामक लोक-गाथा ठोहि पाड़ि कानि रहल छै। कतए गेल जट-जटीन ओ झड़नी गीत...। गामक गल्ली-कुच्ची गबैत छल कहियो कतए गेल अल्हा-रूदल ओ लोरिकक नाच जे ठेहुनिया दऽ मंचपर ललकारैत छल? बिला गेल महराइ केर खिस्सा धर्मराज सन धर्मात्माक भक्त हरिया डोम सन भक्त कहबैत छल? बिनु कोनो भेद-भावक भक्त केर घर भोजन करै छल! बिसरि गेल सभ दिना-भदरीक गाथा बिसरि गेल सभ चुहरमलक गाथा कतेक गिनाबी मिथिलाक संस्कृतिक गाथा मन पड़ैए तँ दुखाइए माथा। ऐ मातृभूमिक संतान भऽ माएकेँ छोड़ि किअए पड़ाइ छी। हम छी मैथिल हमर छी मिथिला किअए एकरा बिसरि रहल छी। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। १.आशीष अनचिन्हार-गजल२. डॉ. शिव कुमार प्रसादक दूटा गीत १ आशीष अनचिन्हार गजल
शोणितसँ छै बनल नोर हम्मर भेलै हँसी तँ अंगोर हम्मर
हम तँ छी आब साँझक भरोसे नीलाम भेल छै भोर हम्मर
हम देखबै किए दोसरक दिस तोंही तँ छहक चितचोर हम्मर
कोनो सुधार नै देशमे छै लोक तँ बड्ड कमजोर हम्मर
बाटक हिसाब नै पूछ मीता टुटि गेल आब संगोर हम्मर दीर्घ-दीर्घ-लघु-दीर्घ+ लघु-दीर्घ-दीर्घ+ लघु-दीर्घ-दीर्घ हरेक पाँतिमे २ डॉ. शिव कुमार प्रसादक दूटा गीत- सम्पर्क-सहायक प्राध्यापक (सेलेक्सन ग्रेड), हिन्दी विभाग, ह. प्र. साह महाविद्यालय, (िनर्मली काॅलेज िनर्मली) िनर्मली- सुपौल। बौआ केर उबटन कजरौटी केर काजर संगे बौआ केर उबटन बिला गेल। सोइरी केर अशौचक संगे भारतीय संस्कार हरा गेल। बौआ केर......। नव युगक नव संस्कारमे जॉनसन बेबीक पाउडर मिलि गेल माइक स्तन छोड़ि कऽ नेना बोतल संगे माए भुला गेल। बौआ केर......। सिनेहक डोरि तोड़ि कऽ ममता सुन्दरता केर मोल बिका गेल दाइ नौरिनक संग पाबि कऽ नेना माइक शोक भुला गेल बौआ केर......। अपन आन सभ पाइपर बिक गेल सम्बन्धक सभ आँच बुता गेल धन लक्ष्मीक चकाचौंधमे तन मन रागक रंग मेटा गेल कजरौटी केर काजर संगे बौआ केर......। सोहर जन्म बधैया संगे मूड़न उपनैनक महत मेटा गेल लकदक गाड़ी वस्त्राभूषणमे बरूआ केर आचार्य भुला गेल कजरौटी केर काजर संगे बौआ केर......। शहर ओ गेल...... शहर ओ गेल मनुक्ख बनै लेल गाममे रहि बन-मानुख छल शहरक पाथर केर जंगलमे सभकेँ सभ आइ पथरा गेल। शहरक पाथर केर जंगलमे सभकेँ सभ आइ पथरा गेल। गाममे सभ छल भाए-बहिन सभ कियो बाबू कियो काका छल भैया-भौजी बेटी-भतीजी नै कियो बिनु नाता छल। शहरमे जाइते रिश्ता-नाता सभटा मटिया-मेट भऽ गेल शहरक पाथर केर जंगलमे सभकेँ सभ आइ पथरा गेल। पथराएल शहरी पाथरमे कन्निको मानवता नै बाँचल चारि बरखसँ चालीस बर्ख केर नेना-युवती बलि चढ़ि गेल शहरक पाथर केर जंगलमे सभकेँ सभ आइ पथरा गेल। बाट-बटोही देखतो आन्हर सनितो रूदन बहिर भऽ गेल पशुतो एहेन कुकर्म सुनि-सुनि चुड़ुक पानिमे डूमि मरि गेल शहरक पाथर केर जंगलमे सभकेँ सभ आइ पथरा गेल। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। १.जगदानन्द झा ‘मनु’ गजल १-४ 2.पंकज चौधरी "नवलश्री" भक्ति गजल/ भगवती गीत १-२/ कविता १-२/ गजल १-७ १ जगदानन्द झा ‘मनु’ ग्राम पोस्ट- हरिपुर डीहटोल, मधुबनी गजल-१ रहब आब नै दास बनि हम अपन नीक इतिहास जनि हम
जखन ठानलहुँ हम अपनपर समुद्रो लएलहुँ तँ सनि हम
उठा मांथ जतएसँ तकलहुँ दएलहुँ तँ नक्षत्र गनि हम
हलाहल दुनीयाँक पीने चलै छी अपन मोन तनि हम
जमल खून मारलक धधरा लएलहुँ विजय विश्व ठनि हम (बहरे मुतकारिब, मात्राक्रम-१२२) ------------------------------------------- गजल-२ हकन नोर माए कनै छै तकर पुत्र मुखिया बनै छै
कते आब बैमान बढ़लै गरीबक टका के गनै छै
पतित बनल नेता तँ देशक दुनू हाथ ओ मल सनै छै
पएलक कियो जतय मोका अपन बनि कs ओहे टनै छै
बनल भोकना जेठरैअति मुदा 'मनु' तँ सभटा जनै छै
(बहरे मुतकारिब, मात्राक्रम-१२२) ---------------------------------------- गजल-३ मनुखक एहि दुनियाँमे कोनो मोल नहि रहल हमरा लेल केकरो लग दूटा बोल नहि रहल बजाएब कतए ककरा सभटा साज टूटिगेल छल एकटा फूटल ओहो आब ढोल नहि रहल सभतरि घुमैत अछि मनुखक भेषमे हुडार नुकाबै लेल ओकरा लग कोनो खोल नहि रहल रातिक भोजन ओरिआनमे माएक मोन अधीर छल हमर बाड़ीमे एकटा से ओल नहि रहल हँसैत आ मुस्काइत रहए जतएकेँ लोकसभ मिथिलाक गाममे 'मनु' आब ओ टोल नहि रहल (सरल वार्णिक बहर, वर्ण-१९) ---------------------------------------- गजल -४ होए मोन हरखीत ढोलो सोहाइ नै बिनु कारने मीठ बोलो सोहाइ प्रियगर भेट नवकी कनियाँ गेलै जँ हाथक हुनकर नोनगर ओलो सोहाइ जेबीमे जखन भरल रुपैया होइ तहने महग सस्ताक मोलो सोहाइ सिम्बर तूरकेँ नीक गदगर मसलंग सुन्नर ओहिपर आब खोलो सोहाइ भरि सन्दूक घर जाहिमे भेटै सोन एहन घरक महकैत झोलो सोहाइ (बहरे हमीद, २२२१-२२१२-२२२१) जगदानन्द झा 'मनु' ग्राम पोस्ट- हरिपुर डीहटोल, मधुबनी २ पंकज चौधरी "नवलश्री" भक्ति गजल/ भगवती गीत १-२/ कविता १-२/ गजल १-७ १ भक्ति गजल श्वेत अछि परिधान माँ हे ठोढ़ पर मुस्कान माँ हे हाथ पुस्तक कमल आसन सजल वीणा तान माँ हे भारती जय माँ भवानी जग करै गुणगान माँ हे बुधि बिना बकलेल सन हम माँगि रहलौं ज्ञान माँ हे क्रोध आलस लोभ भागय दूर हो अभिमान माँ हे "नवल" माँगत आर नै किछु पाबि ई वरदान माँ हे *बहरे रमल / मात्राक्रम-२१२२ २ भगवती गीत १-२ १ ममतामयी माँ ममता दे तू ममतामयी माँ ममता दे तू सभ कष्ट कलेश मिटा दे तू ममतामयी माँ...} २ डोलल नैया बिन खेबैया आश तोरे टा बांचल मैया जुनि कर देरी हाथ बढा दे}२ भवसागर पार लगा दे तू ममतामयी माँ... हम अज्ञानी ज्ञानक भूखल माँ दानी तोर दानक भूखल जीवनमे छै घोर अन्हरिया}२ माँ ज्ञानक दीप जड़ा दे तू ममतामयी माँ... परम पावन होयत तन-मन धन्य होयत माँ ई जीवन सुतकें विनती सुनि ले मैया}२ बस एक दरस त' देखा दे तू ममतामयी माँ....} २ २ हेयै जगजानी मैया विनती त' सुनियौ हेयै जगजानी मैया विनती त' सुनियौ बेटा के दशा देखि } २ नैना ने मुनियौ हेयै जगजानी मैया.. श्रद्धा सुमन ल' ऐलहुं शरणमे तन-मन-धन सभ } २ अहिंक चरणमे मानब कथीसँ मैया } २ आर कथी अनियौ... बेटाकें दशा देखि.. जतय-जतय गेलियै वैह ठुकरेलकै दीन के कियो ने } २ कोर लगेलकै आश अहिं बाँचल } २ पाथर ने बनियौ.. बेटाकें दशा देखि... अहूँ नै सुनबै जँ दुखनामा आन के सुनतै } २ कहू ककरा माँ कहिया हरब दुःख } २ आर कते कनियौ... बेटाकें दशा देखि... हेयै जगजानी मैया विनती त' सुनियौ बेटाकें दशा देखि } २ नैना ने मुनियौ हेयै जगजानी मैया } 3 ३ कविता १-२ १ श्रमक मोल !! चली कर्तव्यक पथ पर अविचल बनी श्रमिक श्रमक सत्कार करी संतोष रहए संग जिज्ञाशा लोभ-आ-द्वेषक प्रतिकार करी। करी कर्म सतत नै किछु बाधक अप्राप्य प्राप्त करी बनि साधक बस श्रमसँ सफल करी जीवन सभ स्वप्न अपन साकार करी। ने त' सुखसँ बेशी नेह रहए ने दुःखसँ दुबकल देह रहए चिंता छोड़ी नित करी चिंतन संघर्ष सहर्ष स्वीकार करी। चलि काल संग बनी कालविजयी संग छूटत पाछू रहि जाएब जँ श्रमसँ देह चोराएब त' एहि कालक धारमे बहि जाएब क्षण भरि नै व्यर्थे नष्ट होए क्षण-क्षण के एहन जोगार करी। सभ लेख विधि केर टलि जाएत श्रमसँ भाग्य बदलि जाएत खींची भाग्यक रेखा पुनि आ श्रमसँ स्वयं श्रृंगार करी। २ हमर देश पर-गत्ती-सील !! जेमहर देखू बीले-बील हमर देश पर-गत्ती-सील ! भ्रष्टाचार उजागर भेल त' पोखरिसँ बढि सागर भेल आतंकक से पंक पड़ल सभ छै बलिक छागर भेल फूसि बजै त' ठेहुन-छाबा जे सच बाजल बागर भेल कतरि रहल छै सभके जेबी खांकी खादी आर वकील। हमर देश पर-गत्ती-सील ! जनता आगाँ छुच्छ सोहारी नेताजीक छनि भरल बखारी सरकारेक भाग जगै छै जँ बनल योजना कोनो सरकारी पाँच बरख धरि कुर्सीक माया मतदानक बेर खोजपुछारी निर्धन लाचारक के पूछत खटैत-खटैत छै ढोढी ढील। हमर देश पर-गत्ती-सील ! धिया कंठ लागल की करतै टाका छापि कत'सँ अनतै सभटा खेत जँ एखने गेलै बांकी धिया बेर की गनतै नोरसँ भीजल माएक आँचरि नुका-नुका कते ओ कनतै धिया बापक डीह बिकेलै ब'रक बापक झोड़ा सील। हमर देश पर-गत्ती-सील ! घूसे पर काटै घुसकुनिया करिया धन सभके चाही दलमलित छै दल-दलित संरक्षण सभके चाही प्रतिभाक प्रतिकार करए आरक्षण सभके चाही व्यथा कथा के कहतै ककरा सगर व्यवस्था सोहरल पील। हमर देश पर-गत्ती-सील ! ४ गजल-१ सगतरि बखान मिथिला कें महिमा महान मिथिलाकें छथि राम सजल बनि दुल्हा छाती उतान मिथिलाकें पाहुनसँ भरल अछि आँगन दलमल दलान मिथिलाकें धूमन गगूल शरबत आ परसबइ पान मिथिलाकें अवधेश देखि गदगद छथि सभ ओरियान मिथिलाकें अरिपन पड़ल सजल डाला देखब चुमान मिथिलाकें आओत "नवल" कोजगरा बाँटब मखान मिथिलाकें वर्ण क्रम: २२१२+१२२२ गजल-२ जग भरिक उपरागसँ अकच्छ भेल छी राति-दिन लागैत दागसँ अकच्छ भेल छी मौध मुँह पर मुदा मोन माहुर भरल ऐ फुसियाहा अनुरागसँ अकच्छ भेल छी हम जँ बजलौं अहाँसँ त' रुसि रहता ओ ऐ संबंधक गुणा-भागसँ अकच्छ भेल छी दंश सहलौं कते मिसिया भरि मौध लेल प्रेमक मधुर परागसँ अकच्छ भेल छी "नवल" टूटितै नै जे निन्न होएतै एहन राति-राति भरिक जागसँ अकच्छ भेल छी *आखर-१६ गजल- ३ सभसँ ऊपर देश भारत जगसँ सुन्नर देश भारत मुकुट पर्वत हिन्द चरणहि छै रमणगर देश भारत माय मानी माटि के सभ तें हिलसगर देश भारत धर्म सभटा जाति सभटा बड़ दिलह्गर देश भारत अपन अन्नक बल भरै छै पेट अनकर देश भारत सहब ककरो यातना नै आब बलगर देश भारत ठाम सभके मान सभके "नवल" नमहर देश भारत >बहरे रमल/मात्रा क्रम :२१२२+२१२२ गजल-४ "गाँधीजी"क धरती पर बहलै शोणित केर धार कोना "भगत सिंह" केर आँगनमे जनमल अत्याचार कोना कतए गेलै "आजाद"क नगरी रूसि "लक्ष्मी" कत' पड़ेली देव आ विद्वानक नगरीसँ बिला रहल संस्कार कोना बिसरल-बिलटल छै अपनैती "मालवीय-मौलाना"कें जाति-पाति आ भेदभावक पसरल एते विकार कोना आब नै जनमै "लाल" किए की देशक माटि भेलै उस्सर लोभी-कपटी-कुकर्मी सभके लागल एते पथार कोना ने नेत ठीक ने नाम नीक टाका बल पर नेता बनलै करै ओसूली जनता सभसँ चतरल भ्रष्टाचार कोना मतकें मान बिना बुझने बेर-बेर मतदान केलहुं मतकें मान नै बूझब जा जागत गुम सरकार कोना छोड़ब नै अधिकार अपन फांड़ बान्हि ली चलू "नवल" बिनु मँगने नै भीख भेटै भेटत फेर अधिकार कोना >आखर-२१ गजल- ५ प्रीत बनि क' हियामे रहबे करब हम बनि नेह शोणितमे बह्बे करब हम वेग मोडू बसातक हमर पएर छोडू बसातक संगे-संग बहबे करब हम किए बिसरैमे लागल छी हमरा अनेरे छाँह बनि अहाँ संग रहबे करब हम नै बुझलहुँ अहीं त' दोख अनकर कथी ई तिरस्कारक तीर सहबे करब हम छै किछु दिन लेल जिनगी तकर मोहे की रेतीक भवन बनि ढहबे करब हम मिठ लागत की क'रू तकर परवाह नै जे सच छै उचित छै कहबे करब हम अहाँ घोंटी गरल बूझि की पीबी सुधा कहि "नवल" नेह-छाल्ही त' मह्बे करब हम *आखर-१६ गजल- ६ हुनका संग लिअ' बढू आगाँ जे छथि अभियानक पक्षमे चलू करै छी नव पहल पुनि नव-क्रांतिक उपलक्षमे नमन करैत छी हुनका जे संग चलथि बनि सहभागी हुनको भ्रम के दूर करब जे सभ छथि ठाढ़ विपक्षमे चलू करी अनुपालन हुनकर जे छथि ज्ञानक अगुआ पछुवाएल छथि जे अज्ञाने तनिको आनब समकक्षमे कर्मठ छै जे कर्मभूमिमे हारत-जीतत हएत सफल ओ की जानै मोल एकर जे बस गप छाँटै सूतल कक्षमे "नवल" नाच नै आबै जकरा तकरा लै सभ अंगने टेढ़ घुरबाक लूरि ने जकरा से त्रुटि तकबे करतै अक्षमें *आखर-२२ गजल- ७ जिनगी भरि बस व्यर्थक चिंता मरितहुँ लागल स्वर्गक चिंता अन्नक खगल छै निर्धन चिंतित करए धनिकहो अर्थक चिंता पहिलुक भेटिते दसकें ललसा दस पुरिते शुरू शतकक चिंता बहुअक छथि बिआहल सभ मारल काँचकुमारकें घटकक चिंता आशा फ'रक लागल छै सभके ककरो "नवल" नै कर्मक चिंता *मात्रा क्रम: २२२+१२२+२२२ ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। १.कामिनी कामायनी- आस्थाक पूर्ण कलश २.बिनीता झा- चैन ३. ज्योति झा चौधरी-पिया जल्दी सँ आउ ने (वैलेन्टाइन डे पर विशेष) पिया जल्दी सऽ आऊ ने १ कामिनी कामायनी आस्थाक पूर्ण कलश पोखरिक माटि सँ पितड़िया फुल्डालि माँजैत/ बाबी ओइ दिन बड़ उदास भऽ गेल छलीह/ जखन घासक छिट्टा ,माथ सँ उतारि/ घुटनक आंगनवाली /आँचर मे बान्हल / गंगा मैयाक परसाद देलकन्हि / हरिद्वार सँ आएल छल/ कुम्भ नहा कऽ / माथ पर बोझ छल ,कतेक रास खिस्साक / सह सह करैत लोक / मुंडे मूँड चारु दिस / तिल रखबाक जग्गह नहि / उपरका स्वास उपरे / निचुलका नीचे / मुदा सहस्त्र बाहु सन बेटा / माय बाबू दुनु केँ पजिया कऽ भीड़केँ धकियाबैत / आबि गेला घाट पर / ओ निर्मल, ओ कन कन जल / डुबकी पर डुबकी / उतरि गेल सभ पाप / वएह तँ स्वर्ग / आँखिसँ देखल / ओ घंटी आ शंख सँ गुंजैत ,/ इन्द्रक दरबार सन सजल / मैयाक आरती । ओइ दिन तँ शुरुआते छलै पोथीक / बाँचैत रहली कतेको दिन / मास / सुध बुध बिसरल / बाबी संग कतेको मइया सभ लइत रहली उसास / देती की माते , हुनको ई पुण्य लाभ / बा अहिना कोन मे पड़ल पड़ल / जिनगी होइत रहत खाक। माल जाल / पशु /पाखी / मृतककेँ उद्धार करए वाली / पतितपाविनी /सुनौथ हमरो सबहक विलाप । आ दलान पर/ आंगन मे/ ओसारा पर/ गोहाली मे / पोखरिक महाड़ पर/ बनैत रहलै बिसबासक पुल/ कुजरनी अपन तरकारी बेच कऽ/ मलाहीन माछ /तेलिन तेल / कुम्हइन अपन माटिक बासन बेचि / पुरहिताइन लोटा /हसूली / बन्हकी राखि करैत रहली बाटक ओरियान नहि जाति / नहि कुल गौरवक गुमान / कतेक दिन सँ एतबे लागल धियान / जे गंगा असननीया जेबै / आ ओहो माघ आबि गेलै /लागि गेलै संगम मे कुम्भ / बिन कोनो पुरुख पातकेँ नेहोरा पाती केने / मोटरी चोटरी बान्हने/ अधरतिए / टीसन पर/ पहुँच गेल रहै/नहा धो कऽ/ नब नब वस्त्र मे / सम्पूर्ण गामक आधा सँ बेसीए स्त्रीगण सभ / स्कूल /कॉलेज मे / पढ़य /पढ़बए वाली बेटी /पुतौह / अस्पताल मे काज करैत सिस्टर / डिग्री धारी नवतुरिया संग / गामक मुखिया सहजों पीसी सेहो / बुझैत अपना केँ महान / बहरायल छल / सबहक संग / करबक लेल अपन कल्याण / साध हेतै पूर्ण आब / करबाक गंगा अस्नान । २ बिनीता झा- चैन चैन जखन गेलौं चैन लग बैसय, ओ मुँह बिचका कऽ पड़ा गेल। पहिने घुमय छल अंगना मे, ने कहि कतऽ आब बिला गेल। जखन गेलौं ओकरा दुनियाँ मे ताकय, बिच्चे मे बाट हमर अपने हेरा गेल। कहियो भरमा कऽ सपना देखौने छल, आइ काज पड़ल तँ आंगन मे बैसल छोड़ि गेल। ओ जे गेल तँ चलिये गेल, दिन-राति बाट सभ ताकैत रहि गेल। ३ ज्योति झा चौधरी पिया जल्दी सँ आउ ने (वैलेन्टाइन डे पर विशेष)
पिया कथीक अछि एहेन गुमान अहॉं किछु तँ बताउ ने छोड़ू- छोड़ू ने डोली कहार अहॉं ओहिना लऽ जाउ ने ऽऽ
ऑंखि हमर अछि द्वारे पर गारल पूरी पकवान बनि राखल सेरायल केने बैसल छी सोलह सिंगार अहॉं जल्दी सऽ आउ ने ऽऽ छोड़ू-छोड़ू ने डोली कहार अहॉं ओहिना लऽ जाउ ने ऽऽ
सॉंझक आघात सँ इजोत पड़ायल दिन भरिक असगरूआ मोन अघायल तुलसी चौड़ा पर दीपक कतार अहॉं घर जगमगाउ ने ऽऽ छोड़ू-छोड़ू ने डोली कहार अहॉं ओहिना लऽ जाउ ने ऽऽ
संगे लऽ जायब अगिला बेर कहलहुँँ विश्वास राखिक हम नहिं किछु बजलहुँ बीतल जाइए उमरक बहार अहॉं काज बिसराउ नेऽऽ छोड़ू-छोड़ू ने डोली कहार अहॉं ओहिना लऽ जाउ ने ऽऽ ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। १.राजदेव मण्डलक दू गोट कविता २.जगदीश प्रसाद मण्डलक दूटा गीत १ राजदेव मण्डलक दूटा कविता- राजदेव मण्डल जीक दूटा कविता दगध सुर कलीकेँ स्वर सुनि पिक भेल पागल अन्तरमे किछु जागल लेलक कान मुनि मनमे गप्पकेँ गुनि कली बजैत अछि अपनहि धुनि- “मधुमासक आगमन भेल अहाँ फँसि गेलौं कोन खेल हृदय केना बिसरि गेल के बनौलक एहेन जेल जतए चलैत अछि फरेबी खेल हमरा बना देलौं बकलेल आकि अहाँ बनि गेलौं सन्त वियोगक दाहसँ दग्ध छी कन्त साँचे अनन्त अछि वसन्त किन्तु हमर नै देखब अन्त।” इजोतक वस्त्र घर-दुआरिकेँ नीप हाथमे लेने जरैत दीप अन्हारसँ लड़बाक इच्छा कऽ रहल समैक प्रतीक्षा हवाक झाेंका कऽ रहल खेल दीया अपनाकेँ बचेबाक लेल आँचर तर ढुकि गेल जेना इजोत वस्त्र बनि गेल आँखिकेँ असंख्य दीप सुझाएल जे छल मुझाएल बाट अछि असीम, अपार अड़ल चारूभर अन्हार एक दीप अछि ज्वलित तँ करत अनेकोकेँ प्रज्वलित नेसि रहल धेने इहए आस ठामहि-ठाम खेलत उजास। २ जगदीश प्रसाद मण्डल जीक दूटा गीत- मरम देखि...... मरम देखि मर्माहत होइ छै मर्म देखि मर्माहत होइ छै। डाह मरम मरण देखि मर्माहत टुक-टुक तकै छै। तारन-मारन देखि-देखि तिलमिला तिल-तिल खसै छै। तिलमिला तिल-तिल खसै छै। मरम देखि......। मर्मक आहत देखि-देखि घात-अवघात हृदए लगै छै। तइर तीर तीड़ि-तीड़ि सगर देह सकबेधल देखै छै। सगहर देह सकबेधल देखै छै। मरम देखि......। मर्म मारि सुमारि छोड़ि कुमारि मारि मारैत रहै छै। अढ़ि-मोड़ि एँठि रस्सी बाट-घाट सकबेधल देखै छै। बाट-घाट सकबेधल देखै छै। मरम देखि......। मर्म एक दुनियाँ बसि जिनगीक पाठ पढ़ैत रहै छै। दोसर मरम मरण बनि भूत-राकश टहलैत रहै छै। भूत-राकश टहलैत रहै छै। मरम देखि......। चालनि-सूप...... चालनि-सूप चालनि एलौं भाय यौ, सूप-चालनि चलनि एलौं। कखनो घाट कखनो अगम बीच पानि चलिआइत एलौं। पकड़ि पाँखि सुगना गीधक चाल चील चिलचिलाइत एलौं भाय यौ, चालनि......। कखनो सिमटी बालु बनि संगे-संग पथराइत एलौं। दोखरा-तेखरा कखनो बनि मुरही संग भुजाइत एलौं भाय यौ, मुरही संग भुजाइत एलौं। चालनि-सूप......। जल्ला सिर गाछ पकड़ि बाँस जाल जलिआइत एलौं। अल्हुआ-सुथनी फल पकड़ि मरिया-अरिया फेकाइत एलौं भाय यौ, मरिया-अरिया फेकाइत एलौं। चालनि-सूप......। करनी-धरनी बढ़नी बनि अंगने घर बहराइत एलौं। गुड़ा-खुद्दी खखरी बनि गुड़चल्ला-चला चलनि एलौं भाय यौ, गुड़चल्ला चला चलनि एलौं। चालनि-सूप......। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। बाल मुकुन्द पाठक- गजल १-२ गजल मिललौँ अपन चानसँ भेल पुलकित मोन बीतल पहर विरहक भेल हर्षित मोन
छल आँखि सागर ताहिसँ सुनामी उठल बहलौँ तकर वेगसँ भेल विचलित मोन
बाजल तँ जेना बुझु फूल झहरल मुखसँ ठोरक मधुर गानसँ भेल शोभित मोन
ओकर बढ़ल डेगसँ दर्द हरिया उठल पायलक सुनिते स्वर भेल जीबित मोन
प्रीतक तराजू पर तौललौँ धन अपन विरहक दिया जड़िते भेल पीड़ित मोन
बहरे सलीम ,मात्राक्रम २२१२ २२२१ २२२१
२.गजल
पिया बिन ऐहि घर रहिये कऽ की करबै विरह सन आगिमे जड़िये कऽ की करबै
अपन कनियाँ जखन कहि नै सकब हमरा पिया करमे अपन धरिये कऽ की करबै
निवाला जखन नै भेटत तँ बुझबै दुख गरीबक दुख अहाँ सुनिये कऽ की करबै
उड़ाबै देखि खिल्ली लोक हमरा यौ समाजक बनि हँसी रहिये कऽ की करबै
जखन दर्दक इलाजेँ नै अहाँ लग यौ तखन बेथा हमर सुनिये कऽ की करबै
बहरे हजज ,मात्रा क्रम १२२२ तीन बेर ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। १.बिन्देश्वर ठाकुर "नेपाली"- प्रेम / गजल २.सुमित मिश्र- गजल १-२ १ बिन्देश्वर ठाकुर "नेपाली" धनुषा नेपाल , हाल:कतार प्रेम / गजल १ प्रेम
नै सोचू नै घबराउ अहाँ एक दिन हम जरुर आएब संगमे दसैं, तिहार तथा भ्यालेनटाइन सेहो मनाएब।।
दुश्मन कतबो दुआरपर होइतो लाख कोसक बीच होइ छै प्रीतम दूर पहाड़पर होइतो घर-आङ्ग्नक बीच होइ छै।।
आजुक दिन प्रेमक प्रतीक प्यार करी से मन करैए अहाँ संगक झगड़ा-प्यार दुनु हमरा याद अबैए।। २ गजल देखब मनमानी कतेक दिन करै छी विधवा संग कहानी कतेक दिन करै छी
समय चक्रमे अहूँ मुरछाएब जीवनक गुलामी कतेक दिन करै छी
मानव भऽ मानवता सीखू दोसरक गुलामी कतेक दिन करै छी
मलिन नै करु मिथिलाक संस्कृति बौआ -बुच्चीक ढुवानी कतेक दिन करै छी
समएमे एखनो निक पथ रोजु मानवताक ग्लानी कतेक दिन करै छी २ सुमित मिश्र करियन ,समस्तीपुर गजल-1
पहाड़ संग टकरेबाक लेल अटल विश्वास चाही नै मिझा सकै एहन ज्वालामुखीके प्रकाश चाही
पिँजराक बंधन में बन्न पंछी कोना कऽ उड़ि सकत कोनो सपना पूरा करबाक लेल मुक्त आकाश चाही
करेज पर चोट करैत भविष्य केर किछु सवाल शीप वा मोती पाबऽ लेल सागर पिबाक पियास चाही
अन्हारेमे आयल दिनकर सँ संसार रोशन छै अज्ञानता सँ जीतबाक लेल निरंतर प्रयास चाही
ई चलायमान दुनिया अनवरत चलैत रहत मुदा अचल नाम लेल पहचान किछु खास चाही
माटि पर गिरल फूल सँ भी घर-आँगन गमकत मुदा ओझरायल बाटमेँ सही राहके तलाश चाही
कृपा करब माँ शारदे आब नाव फँसल मँझधार हरेक खेल जीत सकी "सुमित" के एतबे आश चाही
वर्ण-20
गजल-2
सबटा मोनक बात हुनक आँखि बता गेल बहल एहन बसात हमर होश उड़ा गेल
नदीकेँ धारकेँ विपरीत चलबाक कोशिश भासैत जा रहल स्वप्न सब किछु हेरा गेल
पाथरपर फूल उगायब जुनि छै कठिन डेगहिँ-डेग मिलल निराशा आश जगा गेल
स्वार्थक बदरी मानवतापर मँडरायल भाइ-भाइमे दुश्मनी गामक-गाम जरा गेल
संस्कृतिकेँ झकझोरैत नव जमानाकेँ दौड़ लोक-लाज गुम अपन उपस्थिति देखा गेल
गरीबी केर लत्ती चहुँ ओर लतरल अछि गमकैत फुलबाड़ी "सुमित" पल भरिमे सुखा गेल
वर्ण-17 ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। १. ज्योति झा चौधरी २.राजनाथ मिश्र (चित्रमय मिथिला) ३. उमेश मण्डल (मिथिलाक वनस्पति/ मिथिलाक जीव-जन्तु/ मिथिलाक जिनगी) १. ज्योति झा चौधरी २. राजनाथ मिश्र चित्रमय मिथिला स्लाइड शो चित्रमय मिथिला (https://sites.google.com/a/videha.com/videha-paintings-photos/ ) ३. उमेश मण्डल मिथिलाक वनस्पति स्लाइड शो मिथिलाक जीव-जन्तु स्लाइड शो मिथिलाक जिनगी स्लाइड शो मिथिलाक वनस्पति/ मिथिलाक जीव जन्तु/ मिथिलाक जिनगी (https://sites.google.com/a/videha.com/videha-paintings-photos/ ) ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। बालानां कृते १.पंकज चौधरी "नवलश्री"- बाल गजल १-३ २.अमित मिश्र- बाल कविता १-३ १ पंकज चौधरी "नवलश्री" बाल गजल-१ संगी सभके संगे लै छी चल भैया पिकनिक मनबै छी माँ देतै चिक्कस आ चाउर बांकी बाबू के कहि दै छी चुल्हा जारनि बासन आनै आ सभकिछु मिलिजुलि पकबै छी तीमन करुगर मिठगर तस्मइ पूरी आ हलुआ बनबै छी केरा पातक थारी सुन्नर तूं सभ बैसै हम परसै छी "नवलसँ" कहि दे एतै ओहो झगड़ा-झंझट सभ बिसरै छी *मात्रा क्रम-आठ टा दीर्घ सभ पांतिमे ©पंकज चौधरी "नवलश्री" बाल गजल-२ देख भेलै भोर भैया आब आलस छोड़ भैया दाय-बाबा माय-बाबू लाग सभके गोर भैया गाछ नीमक ऊँच बड़ छै चढ़ि क’ दतमनि तोड़ भैया धो क’ मुँह चल ने नहा ली भूख मारय जोर भैया दालि बेशी भात ले कम खूब खो तिलकोर भैया खा क’ पुनि पोथी ल’ बैसी चल पढ़ै छी थोड़ भैया चल चलै छी खेल खेलब बनि सिपाही-चोर भैया ई सिनेहक ताग कहियो होय नै कमजोर भैया तों “नवल” भैया हमर छें हम बहिनिया तोर भैया *बहरे रमल/मात्रा क्रम-२१२२+२१२२ ©पंकज चौधरी “नवलश्री” बाल गजल-३ चार पर कुचरैत कौआ सभ सनेशा दैत कौआ टाट पर बैसल त' कखनो मेघमे उमकैत कौआ ताकि गोपी लोल मारै गाछ पर फुद्कैत कौआ काग दस टा मूस एगो ताहि लै झगड़ैत कौआ छीन हाथक सभ जिलेबी उड़ल पुनि बहसैत कौआ ऐंठ बासन देखि दौगल अन्न लै तरसैत कौआ भोज आँगन भाग जागै पात पर लुधकैत कौआ सूपमे खुद्दी पसारल दाय छथि उड़बैत कौआ देखि सूतल दाय के पुनि सूप दिस ससरैत कौआ "नवल" कागक अजब लीला लोक के नचबैत कौआ *बहरे रमल/मात्रा क्रम-२१२२+२१२२ ©पंकज चौधरी "नवलश्री" २ अमित मिश्र करियन ,समस्तीपुर, मिथिला ,बिहार अमित मिश्र बाल कविता 1 पतंग बनाबै रे
पन्नी कागत फाड़ै रे सुन्नर पतंग बानबै रे मैदासँ बाटी भरै रे लाल आगिपर बरकाबै रे लस-लस लेइ बनाबै रे झारुक काठी आनै रे सीधा आ गोल राखै रे कागतक चिप्पी साटै रे लम्बा कागत काटै रे कोणपर पुँछरी बनाबै रे बहुते धागा आनै रे दू दिश भूर करै रे चल गुड्डीकेँ नाथै रे कनिये काल सुखाबै रे दैवा पवन बहाबै रे चल पतंग उड़ाबै रे बाधे बाधे दौड़ै रे अम्बरमे पतंग नाचै रे नीच्चा हमहूँ सब गाबै रे सब मिल पतंग बनाबै रे
२ बाबाकेँ
मोटका लाठी बाबाकेँ बड़का बाटी बाबाकेँ घर आँगन गुँजि रहल प्रेम भरल हँसी बाबाकेँ
भरल चुनौटी बाबाकेँ कान कनैठी बाबाकेँ नव नव सबकसँ छै भरल सबटा देल पोथी बाबाकेँ
कुर्ता -धोती बाबाकेँ कण्ठीक मोती बाबाकेँ एखनो सबटा इयाद अछि खिस्सा-पिहानी बाबाकेँ
डाँर झूकल बाबाकेँ दाँत टूटल बाबाकेँ कहिया एथिन भगवान घरसँ कते साल भेल देखल बाबाकेँ
३
उसनल अण्डाक न्याय
एकटा राजा टुनटुन पूरमे राज करै छल बड नीकसँ एक दिन घटलै अजगुत घटना सोनमाकेँ पकड़ने एलै कोनमा कोनमा कहलक सोनमाकेँ देखू सरकार चोरा कऽ खेलक उसनल अण्डा राति अन्हार अण्डासँ मूर्गी बहरैतै ओहिसँ बहुते मुर्गी होइतै बेच बेच खूब पाइ कमैतौं बड़का गाड़ी बंगला किनितौं एकरा दिऔ सजा कड़ाइ हमरा दिआबू सबटा पाइ
राजा बहुते सोचमे पड़ल धियानसँ सबटा गप बूझल बूझि गेल कोनमाकेँ चालि बूधिक काल चलेलक हालि-हालि राजा कहलक सून रै कोनमा दौड़ल चलि जो अपन अंगना बबूरक गाछपर आम छै फरल तोड़ने आबें सबटा पाकल
कोनमाकेँ माँथा चकरेलै बबूरमे आम कतऽसँ एलै राजाकेँ निज शंका कहलक राज तखन गप बूझेलक जहिना बबूरमे नै आम फड़ै छै तहिना उसनल अण्डासँ नै मुर्गी जनमै छै कोनमा मानलक अपन गलती सोनमासँ भऽ गेलै दोस्ती न्याय देखि बड ताली बाजल नाँगरि दाबि कऽ कोनमा भागल ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। बच्चा लोकनि द्वारा स्मरणीय श्लोक १.प्रातः काल ब्रह्ममुहूर्त्त (सूर्योदयक एक घंटा पहिने) सर्वप्रथम अपन दुनू हाथ देखबाक चाही, आ’ ई श्लोक बजबाक चाही। कराग्रे वसते लक्ष्मीः करमध्ये सरस्वती। करमूले स्थितो ब्रह्मा प्रभाते करदर्शनम्॥ करक आगाँ लक्ष्मी बसैत छथि, करक मध्यमे सरस्वती, करक मूलमे ब्रह्मा स्थित छथि। भोरमे ताहि द्वारे करक दर्शन करबाक थीक। २.संध्या काल दीप लेसबाक काल- दीपमूले स्थितो ब्रह्मा दीपमध्ये जनार्दनः। दीपाग्रे शङ्करः प्रोक्त्तः सन्ध्याज्योतिर्नमोऽस्तुते॥ दीपक मूल भागमे ब्रह्मा, दीपक मध्यभागमे जनार्दन (विष्णु) आऽ दीपक अग्र भागमे शङ्कर स्थित छथि। हे संध्याज्योति! अहाँकेँ नमस्कार। ३.सुतबाक काल- रामं स्कन्दं हनूमन्तं वैनतेयं वृकोदरम्। शयने यः स्मरेन्नित्यं दुःस्वप्नस्तस्य नश्यति॥ जे सभ दिन सुतबासँ पहिने राम, कुमारस्वामी, हनूमान्, गरुड़ आऽ भीमक स्मरण करैत छथि, हुनकर दुःस्वप्न नष्ट भऽ जाइत छन्हि। ४. नहेबाक समय- गङ्गे च यमुने चैव गोदावरि सरस्वति। नर्मदे सिन्धु कावेरि जलेऽस्मिन् सन्निधिं कुरू॥ हे गंगा, यमुना, गोदावरी, सरस्वती, नर्मदा, सिन्धु आऽ कावेरी धार। एहि जलमे अपन सान्निध्य दिअ। ५.उत्तरं यत्समुद्रस्य हिमाद्रेश्चैव दक्षिणम्। वर्षं तत् भारतं नाम भारती यत्र सन्ततिः॥ समुद्रक उत्तरमे आऽ हिमालयक दक्षिणमे भारत अछि आऽ ओतुका सन्तति भारती कहबैत छथि। ६.अहल्या द्रौपदी सीता तारा मण्डोदरी तथा। पञ्चकं ना स्मरेन्नित्यं महापातकनाशकम्॥ जे सभ दिन अहल्या, द्रौपदी, सीता, तारा आऽ मण्दोदरी, एहि पाँच साध्वी-स्त्रीक स्मरण करैत छथि, हुनकर सभ पाप नष्ट भऽ जाइत छन्हि। ७.अश्वत्थामा बलिर्व्यासो हनूमांश्च विभीषणः। कृपः परशुरामश्च सप्तैते चिरञ्जीविनः॥ अश्वत्थामा, बलि, व्यास, हनूमान्, विभीषण, कृपाचार्य आऽ परशुराम- ई सात टा चिरञ्जीवी कहबैत छथि। ८.साते भवतु सुप्रीता देवी शिखर वासिनी उग्रेन तपसा लब्धो यया पशुपतिः पतिः। सिद्धिः साध्ये सतामस्तु प्रसादान्तस्य धूर्जटेः जाह्नवीफेनलेखेव यन्यूधि शशिनः कला॥ ९. बालोऽहं जगदानन्द न मे बाला सरस्वती। अपूर्णे पंचमे वर्षे वर्णयामि जगत्त्रयम् ॥ १०. दूर्वाक्षत मंत्र(शुक्ल यजुर्वेद अध्याय २२, मंत्र २२) आ ब्रह्मन्नित्यस्य प्रजापतिर्ॠषिः। लिंभोक्त्ता देवताः। स्वराडुत्कृतिश्छन्दः। षड्जः स्वरः॥ आ ब्रह्म॑न् ब्राह्म॒णो ब्र॑ह्मवर्च॒सी जा॑यता॒मा रा॒ष्ट्रे रा॑ज॒न्यः शुरे॑ऽइषव्यो॒ऽतिव्या॒धी म॑हार॒थो जा॑यतां॒ दोग्ध्रीं धे॒नुर्वोढा॑न॒ड्वाना॒शुः सप्तिः॒ पुर॑न्धि॒र्योवा॑ जि॒ष्णू र॑थे॒ष्ठाः स॒भेयो॒ युवास्य यज॑मानस्य वी॒रो जा॒यतां निका॒मे-नि॑कामे नः प॒र्जन्यों वर्षतु॒ फल॑वत्यो न॒ऽओष॑धयः पच्यन्तां योगेक्ष॒मो नः॑ कल्पताम्॥२२॥ मन्त्रार्थाः सिद्धयः सन्तु पूर्णाः सन्तु मनोरथाः। शत्रूणां बुद्धिनाशोऽस्तु मित्राणामुदयस्तव। ॐ दीर्घायुर्भव। ॐ सौभाग्यवती भव। हे भगवान्। अपन देशमे सुयोग्य आ’ सर्वज्ञ विद्यार्थी उत्पन्न होथि, आ’ शुत्रुकेँ नाश कएनिहार सैनिक उत्पन्न होथि। अपन देशक गाय खूब दूध दय बाली, बरद भार वहन करएमे सक्षम होथि आ’ घोड़ा त्वरित रूपेँ दौगय बला होए। स्त्रीगण नगरक नेतृत्व करबामे सक्षम होथि आ’ युवक सभामे ओजपूर्ण भाषण देबयबला आ’ नेतृत्व देबामे सक्षम होथि। अपन देशमे जखन आवश्यक होय वर्षा होए आ’ औषधिक-बूटी सर्वदा परिपक्व होइत रहए। एवं क्रमे सभ तरहेँ हमरा सभक कल्याण होए। शत्रुक बुद्धिक नाश होए आ’ मित्रक उदय होए॥ मनुष्यकें कोन वस्तुक इच्छा करबाक चाही तकर वर्णन एहि मंत्रमे कएल गेल अछि। एहिमे वाचकलुप्तोपमालड़्कार अछि। अन्वय- ब्रह्म॑न् - विद्या आदि गुणसँ परिपूर्ण ब्रह्म रा॒ष्ट्रे - देशमे ब्र॑ह्मवर्च॒सी-ब्रह्म विद्याक तेजसँ युक्त्त आ जा॑यतां॒- उत्पन्न होए रा॑ज॒न्यः-राजा शुरे॑ऽ–बिना डर बला इषव्यो॒- बाण चलेबामे निपुण ऽतिव्या॒धी-शत्रुकेँ तारण दय बला म॑हार॒थो-पैघ रथ बला वीर दोग्ध्रीं-कामना(दूध पूर्ण करए बाली) धे॒नुर्वोढा॑न॒ड्वाना॒शुः धे॒नु-गौ वा वाणी र्वोढा॑न॒ड्वा- पैघ बरद ना॒शुः-आशुः-त्वरित सप्तिः॒-घोड़ा पुर॑न्धि॒र्योवा॑- पुर॑न्धि॒- व्यवहारकेँ धारण करए बाली र्योवा॑-स्त्री जि॒ष्णू-शत्रुकेँ जीतए बला र॑थे॒ष्ठाः-रथ पर स्थिर स॒भेयो॒-उत्तम सभामे युवास्य-युवा जेहन यज॑मानस्य-राजाक राज्यमे वी॒रो-शत्रुकेँ पराजित करएबला निका॒मे-नि॑कामे-निश्चययुक्त्त कार्यमे नः-हमर सभक प॒र्जन्यों-मेघ वर्षतु॒-वर्षा होए फल॑वत्यो-उत्तम फल बला ओष॑धयः-औषधिः पच्यन्तां- पाकए योगेक्ष॒मो-अलभ्य लभ्य करेबाक हेतु कएल गेल योगक रक्षा नः॑-हमरा सभक हेतु कल्पताम्-समर्थ होए ग्रिफिथक अनुवाद- हे ब्रह्मण, हमर राज्यमे ब्राह्मण नीक धार्मिक विद्या बला, राजन्य-वीर,तीरंदाज, दूध दए बाली गाय, दौगय बला जन्तु, उद्यमी नारी होथि। पार्जन्य आवश्यकता पड़ला पर वर्षा देथि, फल देय बला गाछ पाकए, हम सभ संपत्ति अर्जित/संरक्षित करी। 8.VIDEHA FOR NON RESIDENTS 8.1 to 8.3 MAITHILI LITERATURE IN ENGLISH 8.1.1.The Comet -GAJENDRA THAKUR translated by Jyoti Jha chaudhary 8.1.2.The_Science_of_Words- GAJENDRA THAKUR translated by the author himself 8.1.3.On_the_dice-board_of_the_millennium- GAJENDRA THAKUR translated by Jyoti Jha chaudhary 8.1.4.NAAGPHANS (IN ENGLISH)- SHEFALIKA VERMA translated by Dr. Rajiv Kumar Verma and Dr. Jaya Verma Send your comments to ggajendra@videha.com विदेह नूतन अंक भाषापाक रचना-लेखन इंग्लिश-मैथिली-कोष / मैथिली-इंग्लिश-कोष प्रोजेक्टकेँ आगू बढ़ाऊ, अपन सुझाव आ योगदान ई-मेल द्वारा ggajendra@videha.com पर पठाऊ। Top of Form १.भारत आ नेपालक मैथिली भाषा-वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक शैली आ २.मैथिलीमे भाषा सम्पादन पाठ्यक्रम १.नेपाल आ भारतक मैथिली भाषा-वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक शैली
१.१. नेपालक मैथिली भाषा वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक उच्चारण आ लेखन शैली (भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक धारणाकेँ पूर्ण रूपसँ सङ्ग लऽ निर्धारित) मैथिलीमे उच्चारण तथा लेखन १.पञ्चमाक्षर आ अनुस्वार: पञ्चमाक्षरान्तर्गत ङ, ञ, ण, न एवं म अबैत अछि। संस्कृत भाषाक अनुसार शब्दक अन्तमे जाहि वर्गक अक्षर रहैत अछि ओही वर्गक पञ्चमाक्षर अबैत अछि। जेना- अङ्क (क वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ङ् आएल अछि।) पञ्च (च वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ञ् आएल अछि।) खण्ड (ट वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ण् आएल अछि।) सन्धि (त वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे न् आएल अछि।) खम्भ (प वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे म् आएल अछि।) उपर्युक्त बात मैथिलीमे कम देखल जाइत अछि। पञ्चमाक्षरक बदलामे अधिकांश जगहपर अनुस्वारक प्रयोग देखल जाइछ। जेना- अंक, पंच, खंड, संधि, खंभ आदि। व्याकरणविद पण्डित गोविन्द झाक कहब छनि जे कवर्ग, चवर्ग आ टवर्गसँ पूर्व अनुस्वार लिखल जाए तथा तवर्ग आ पवर्गसँ पूर्व पञ्चमाक्षरे लिखल जाए। जेना- अंक, चंचल, अंडा, अन्त तथा कम्पन। मुदा हिन्दीक निकट रहल आधुनिक लेखक एहि बातकेँ नहि मानैत छथि। ओ लोकनि अन्त आ कम्पनक जगहपर सेहो अंत आ कंपन लिखैत देखल जाइत छथि। नवीन पद्धति किछु सुविधाजनक अवश्य छैक। किएक तँ एहिमे समय आ स्थानक बचत होइत छैक। मुदा कतोक बेर हस्तलेखन वा मुद्रणमे अनुस्वारक छोट सन बिन्दु स्पष्ट नहि भेलासँ अर्थक अनर्थ होइत सेहो देखल जाइत अछि। अनुस्वारक प्रयोगमे उच्चारण-दोषक सम्भावना सेहो ततबए देखल जाइत अछि। एतदर्थ कसँ लऽ कऽ पवर्ग धरि पञ्चमाक्षरेक प्रयोग करब उचित अछि। यसँ लऽ कऽ ज्ञ धरिक अक्षरक सङ्ग अनुस्वारक प्रयोग करबामे कतहु कोनो विवाद नहि देखल जाइछ। २.ढ आ ढ़ : ढ़क उच्चारण “र् ह”जकाँ होइत अछि। अतः जतऽ “र् ह”क उच्चारण हो ओतऽ मात्र ढ़ लिखल जाए। आन ठाम खाली ढ लिखल जएबाक चाही। जेना- ढ = ढाकी, ढेकी, ढीठ, ढेउआ, ढङ्ग, ढेरी, ढाकनि, ढाठ आदि। ढ़ = पढ़ाइ, बढ़ब, गढ़ब, मढ़ब, बुढ़बा, साँढ़, गाढ़, रीढ़, चाँढ़, सीढ़ी, पीढ़ी आदि। उपर्युक्त शब्द सभकेँ देखलासँ ई स्पष्ट होइत अछि जे साधारणतया शब्दक शुरूमे ढ आ मध्य तथा अन्तमे ढ़ अबैत अछि। इएह नियम ड आ ड़क सन्दर्भ सेहो लागू होइत अछि। ३.व आ ब : मैथिलीमे “व”क उच्चारण ब कएल जाइत अछि, मुदा ओकरा ब रूपमे नहि लिखल जएबाक चाही। जेना- उच्चारण : बैद्यनाथ, बिद्या, नब, देबता, बिष्णु, बंश, बन्दना आदि। एहि सभक स्थानपर क्रमशः वैद्यनाथ, विद्या, नव, देवता, विष्णु, वंश, वन्दना लिखबाक चाही। सामान्यतया व उच्चारणक लेल ओ प्रयोग कएल जाइत अछि। जेना- ओकील, ओजह आदि। ४.य आ ज : कतहु-कतहु “य”क उच्चारण “ज”जकाँ करैत देखल जाइत अछि, मुदा ओकरा ज नहि लिखबाक चाही। उच्चारणमे यज्ञ, जदि, जमुना, जुग, जाबत, जोगी, जदु, जम आदि कहल जाएबला शब्द सभकेँ क्रमशः यज्ञ, यदि, यमुना, युग, यावत, योगी, यदु, यम लिखबाक चाही। ५.ए आ य : मैथिलीक वर्तनीमे ए आ य दुनू लिखल जाइत अछि। प्राचीन वर्तनी- कएल, जाए, होएत, माए, भाए, गाए आदि। नवीन वर्तनी- कयल, जाय, होयत, माय, भाय, गाय आदि। सामान्यतया शब्दक शुरूमे ए मात्र अबैत अछि। जेना एहि, एना, एकर, एहन आदि। एहि शब्द सभक स्थानपर यहि, यना, यकर, यहन आदिक प्रयोग नहि करबाक चाही। यद्यपि मैथिलीभाषी थारू सहित किछु जातिमे शब्दक आरम्भोमे “ए”केँ य कहि उच्चारण कएल जाइत अछि। ए आ “य”क प्रयोगक सन्दर्भमे प्राचीने पद्धतिक अनुसरण करब उपयुक्त मानि एहि पुस्तकमे ओकरे प्रयोग कएल गेल अछि। किएक तँ दुनूक लेखनमे कोनो सहजता आ दुरूहताक बात नहि अछि। आ मैथिलीक सर्वसाधारणक उच्चारण-शैली यक अपेक्षा एसँ बेसी निकट छैक। खास कऽ कएल, हएब आदि कतिपय शब्दकेँ कैल, हैब आदि रूपमे कतहु-कतहु लिखल जाएब सेहो “ए”क प्रयोगकेँ बेसी समीचीन प्रमाणित करैत अछि। ६.हि, हु तथा एकार, ओकार : मैथिलीक प्राचीन लेखन-परम्परामे कोनो बातपर बल दैत काल शब्दक पाछाँ हि, हु लगाओल जाइत छैक। जेना- हुनकहि, अपनहु, ओकरहु, तत्कालहि, चोट्टहि, आनहु आदि। मुदा आधुनिक लेखनमे हिक स्थानपर एकार एवं हुक स्थानपर ओकारक प्रयोग करैत देखल जाइत अछि। जेना- हुनके, अपनो, तत्काले, चोट्टे, आनो आदि। ७.ष तथा ख : मैथिली भाषामे अधिकांशतः षक उच्चारण ख होइत अछि। जेना- षड्यन्त्र (खड़यन्त्र), षोडशी (खोड़शी), षट्कोण (खटकोण), वृषेश (वृखेश), सन्तोष (सन्तोख) आदि। ८.ध्वनि-लोप : निम्नलिखित अवस्थामे शब्दसँ ध्वनि-लोप भऽ जाइत अछि: (क) क्रियान्वयी प्रत्यय अयमे य वा ए लुप्त भऽ जाइत अछि। ओहिमे सँ पहिने अक उच्चारण दीर्घ भऽ जाइत अछि। ओकर आगाँ लोप-सूचक चिह्न वा विकारी (’ / ऽ) लगाओल जाइछ। जेना- पूर्ण रूप : पढ़ए (पढ़य) गेलाह, कए (कय) लेल, उठए (उठय) पड़तौक। अपूर्ण रूप : पढ़’ गेलाह, क’ लेल, उठ’ पड़तौक। पढ़ऽ गेलाह, कऽ लेल, उठऽ पड़तौक। (ख) पूर्वकालिक कृत आय (आए) प्रत्ययमे य (ए) लुप्त भऽ जाइछ, मुदा लोप-सूचक विकारी नहि लगाओल जाइछ। जेना- पूर्ण रूप : खाए (य) गेल, पठाय (ए) देब, नहाए (य) अएलाह। अपूर्ण रूप : खा गेल, पठा देब, नहा अएलाह। (ग) स्त्री प्रत्यय इक उच्चारण क्रियापद, संज्ञा, ओ विशेषण तीनूमे लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना- पूर्ण रूप : दोसरि मालिनि चलि गेलि। अपूर्ण रूप : दोसर मालिन चलि गेल। (घ) वर्तमान कृदन्तक अन्तिम त लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना- पूर्ण रूप : पढ़ैत अछि, बजैत अछि, गबैत अछि। अपूर्ण रूप : पढ़ै अछि, बजै अछि, गबै अछि। (ङ) क्रियापदक अवसान इक, उक, ऐक तथा हीकमे लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना- पूर्ण रूप: छियौक, छियैक, छहीक, छौक, छैक, अबितैक, होइक। अपूर्ण रूप : छियौ, छियै, छही, छौ, छै, अबितै, होइ। (च) क्रियापदीय प्रत्यय न्ह, हु तथा हकारक लोप भऽ जाइछ। जेना- पूर्ण रूप : छन्हि, कहलन्हि, कहलहुँ, गेलह, नहि। अपूर्ण रूप : छनि, कहलनि, कहलौँ, गेलऽ, नइ, नञि, नै। ९.ध्वनि स्थानान्तरण : कोनो-कोनो स्वर-ध्वनि अपना जगहसँ हटि कऽ दोसर ठाम चलि जाइत अछि। खास कऽ ह्रस्व इ आ उक सम्बन्धमे ई बात लागू होइत अछि। मैथिलीकरण भऽ गेल शब्दक मध्य वा अन्तमे जँ ह्रस्व इ वा उ आबए तँ ओकर ध्वनि स्थानान्तरित भऽ एक अक्षर आगाँ आबि जाइत अछि। जेना- शनि (शइन), पानि (पाइन), दालि ( दाइल), माटि (माइट), काछु (काउछ), मासु (माउस) आदि। मुदा तत्सम शब्द सभमे ई निअम लागू नहि होइत अछि। जेना- रश्मिकेँ रइश्म आ सुधांशुकेँ सुधाउंस नहि कहल जा सकैत अछि। १०.हलन्त(्)क प्रयोग : मैथिली भाषामे सामान्यतया हलन्त (्)क आवश्यकता नहि होइत अछि। कारण जे शब्दक अन्तमे अ उच्चारण नहि होइत अछि। मुदा संस्कृत भाषासँ जहिनाक तहिना मैथिलीमे आएल (तत्सम) शब्द सभमे हलन्त प्रयोग कएल जाइत अछि। एहि पोथीमे सामान्यतया सम्पूर्ण शब्दकेँ मैथिली भाषा सम्बन्धी निअम अनुसार हलन्तविहीन राखल गेल अछि। मुदा व्याकरण सम्बन्धी प्रयोजनक लेल अत्यावश्यक स्थानपर कतहु-कतहु हलन्त देल गेल अछि। प्रस्तुत पोथीमे मथिली लेखनक प्राचीन आ नवीन दुनू शैलीक सरल आ समीचीन पक्ष सभकेँ समेटि कऽ वर्ण-विन्यास कएल गेल अछि। स्थान आ समयमे बचतक सङ्गहि हस्त-लेखन तथा तकनीकी दृष्टिसँ सेहो सरल होबऽबला हिसाबसँ वर्ण-विन्यास मिलाओल गेल अछि। वर्तमान समयमे मैथिली मातृभाषी पर्यन्तकेँ आन भाषाक माध्यमसँ मैथिलीक ज्ञान लेबऽ पड़ि रहल परिप्रेक्ष्यमे लेखनमे सहजता तथा एकरूपतापर ध्यान देल गेल अछि। तखन मैथिली भाषाक मूल विशेषता सभ कुण्ठित नहि होइक, ताहू दिस लेखक-मण्डल सचेत अछि। प्रसिद्ध भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक कहब छनि जे सरलताक अनुसन्धानमे एहन अवस्था किन्नहु ने आबऽ देबाक चाही जे भाषाक विशेषता छाँहमे पडि जाए। -(भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक धारणाकेँ पूर्ण रूपसँ सङ्ग लऽ निर्धारित) १.२. मैथिली अकादमी, पटना द्वारा निर्धारित मैथिली लेखन-शैली
१. जे शब्द मैथिली-साहित्यक प्राचीन कालसँ आइ धरि जाहि वर्त्तनीमे प्रचलित अछि, से सामान्यतः ताहि वर्त्तनीमे लिखल जाय- उदाहरणार्थ-
ग्राह्य
एखन ठाम जकर, तकर तनिकर अछि
अग्राह्य अखन, अखनि, एखेन, अखनी ठिमा, ठिना, ठमा जेकर, तेकर तिनकर। (वैकल्पिक रूपेँ ग्राह्य) ऐछ, अहि, ए।
२. निम्नलिखित तीन प्रकारक रूप वैकल्पिकतया अपनाओल जाय: भऽ गेल, भय गेल वा भए गेल। जा रहल अछि, जाय रहल अछि, जाए रहल अछि। कर’ गेलाह, वा करय गेलाह वा करए गेलाह।
३. प्राचीन मैथिलीक ‘न्ह’ ध्वनिक स्थानमे ‘न’ लिखल जाय सकैत अछि यथा कहलनि वा कहलन्हि।
४. ‘ऐ’ तथा ‘औ’ ततय लिखल जाय जत’ स्पष्टतः ‘अइ’ तथा ‘अउ’ सदृश उच्चारण इष्ट हो। यथा- देखैत, छलैक, बौआ, छौक इत्यादि।
५. मैथिलीक निम्नलिखित शब्द एहि रूपे प्रयुक्त होयत: जैह, सैह, इएह, ओऐह, लैह तथा दैह।
६. ह्र्स्व इकारांत शब्दमे ‘इ’ के लुप्त करब सामान्यतः अग्राह्य थिक। यथा- ग्राह्य देखि आबह, मालिनि गेलि (मनुष्य मात्रमे)।
७. स्वतंत्र ह्रस्व ‘ए’ वा ‘य’ प्राचीन मैथिलीक उद्धरण आदिमे तँ यथावत राखल जाय, किंतु आधुनिक प्रयोगमे वैकल्पिक रूपेँ ‘ए’ वा ‘य’ लिखल जाय। यथा:- कयल वा कएल, अयलाह वा अएलाह, जाय वा जाए इत्यादि।
८. उच्चारणमे दू स्वरक बीच जे ‘य’ ध्वनि स्वतः आबि जाइत अछि तकरा लेखमे स्थान वैकल्पिक रूपेँ देल जाय। यथा- धीआ, अढ़ैआ, विआह, वा धीया, अढ़ैया, बियाह।
९. सानुनासिक स्वतंत्र स्वरक स्थान यथासंभव ‘ञ’ लिखल जाय वा सानुनासिक स्वर। यथा:- मैञा, कनिञा, किरतनिञा वा मैआँ, कनिआँ, किरतनिआँ।
१०. कारकक विभक्त्तिक निम्नलिखित रूप ग्राह्य:- हाथकेँ, हाथसँ, हाथेँ, हाथक, हाथमे। ’मे’ मे अनुस्वार सर्वथा त्याज्य थिक। ‘क’ क वैकल्पिक रूप ‘केर’ राखल जा सकैत अछि।
११. पूर्वकालिक क्रियापदक बाद ‘कय’ वा ‘कए’ अव्यय वैकल्पिक रूपेँ लगाओल जा सकैत अछि। यथा:- देखि कय वा देखि कए।
१२. माँग, भाँग आदिक स्थानमे माङ, भाङ इत्यादि लिखल जाय।
१३. अर्द्ध ‘न’ ओ अर्द्ध ‘म’ क बदला अनुसार नहि लिखल जाय, किंतु छापाक सुविधार्थ अर्द्ध ‘ङ’ , ‘ञ’, तथा ‘ण’ क बदला अनुस्वारो लिखल जा सकैत अछि। यथा:- अङ्क, वा अंक, अञ्चल वा अंचल, कण्ठ वा कंठ।
१४. हलंत चिह्न निअमतः लगाओल जाय, किंतु विभक्तिक संग अकारांत प्रयोग कएल जाय। यथा:- श्रीमान्, किंतु श्रीमानक।
१५. सभ एकल कारक चिह्न शब्दमे सटा क’ लिखल जाय, हटा क’ नहि, संयुक्त विभक्तिक हेतु फराक लिखल जाय, यथा घर परक।
१६. अनुनासिककेँ चन्द्रबिन्दु द्वारा व्यक्त कयल जाय। परंतु मुद्रणक सुविधार्थ हि समान जटिल मात्रापर अनुस्वारक प्रयोग चन्द्रबिन्दुक बदला कयल जा सकैत अछि। यथा- हिँ केर बदला हिं।
१७. पूर्ण विराम पासीसँ ( । ) सूचित कयल जाय।
१८. समस्त पद सटा क’ लिखल जाय, वा हाइफेनसँ जोड़ि क’ , हटा क’ नहि।
१९. लिअ तथा दिअ शब्दमे बिकारी (ऽ) नहि लगाओल जाय।
२०. अंक देवनागरी रूपमे राखल जाय।
२१.किछु ध्वनिक लेल नवीन चिन्ह बनबाओल जाय। जा' ई नहि बनल अछि ताबत एहि दुनू ध्वनिक बदला पूर्ववत् अय/ आय/ अए/ आए/ आओ/ अओ लिखल जाय। आकि ऎ वा ऒ सँ व्यक्त कएल जाय।
ह./- गोविन्द झा ११/८/७६ श्रीकान्त ठाकुर ११/८/७६ सुरेन्द्र झा "सुमन" ११/०८/७६
२. मैथिलीमे भाषा सम्पादन पाठ्यक्रम २.१. उच्चारण निर्देश: (बोल्ड कएल रूप ग्राह्य):- दन्त न क उच्चारणमे दाँतमे जीह सटत- जेना बाजू नाम , मुदा ण क उच्चारणमे जीह मूर्धामे सटत (नै सटैए तँ उच्चारण दोष अछि)- जेना बाजू गणेश। तालव्य शमे जीह तालुसँ , षमे मूर्धासँ आ दन्त समे दाँतसँ सटत। निशाँ, सभ आ शोषण बाजि कऽ देखू। मैथिलीमे ष केँ वैदिक संस्कृत जकाँ ख सेहो उच्चरित कएल जाइत अछि, जेना वर्षा, दोष। य अनेको स्थानपर ज जकाँ उच्चरित होइत अछि आ ण ड़ जकाँ (यथा संयोग आ गणेश संजोग आ गड़ेस उच्चरित होइत अछि)। मैथिलीमे व क उच्चारण ब, श क उच्चारण स आ य क उच्चारण ज सेहो होइत अछि। ओहिना ह्रस्व इ बेशीकाल मैथिलीमे पहिने बाजल जाइत अछि कारण देवनागरीमे आ मिथिलाक्षरमे ह्रस्व इ अक्षरक पहिने लिखलो जाइत आ बाजलो जएबाक चाही। कारण जे हिन्दीमे एकर दोषपूर्ण उच्चारण होइत अछि (लिखल तँ पहिने जाइत अछि मुदा बाजल बादमे जाइत अछि), से शिक्षा पद्धतिक दोषक कारण हम सभ ओकर उच्चारण दोषपूर्ण ढंगसँ कऽ रहल छी। अछि- अ इ छ ऐछ (उच्चारण) छथि- छ इ थ – छैथ (उच्चारण) पहुँचि- प हुँ इ च (उच्चारण) आब अ आ इ ई ए ऐ ओ औ अं अः ऋ ऐ सभ लेल मात्रा सेहो अछि, मुदा ऐमे ई ऐ ओ औ अं अः ऋ केँ संयुक्ताक्षर रूपमे गलत रूपमे प्रयुक्त आ उच्चरित कएल जाइत अछि। जेना ऋ केँ री रूपमे उच्चरित करब। आ देखियौ- ऐ लेल देखिऔ क प्रयोग अनुचित। मुदा देखिऐ लेल देखियै अनुचित। क् सँ ह् धरि अ सम्मिलित भेलासँ क सँ ह बनैत अछि, मुदा उच्चारण काल हलन्त युक्त शब्दक अन्तक उच्चारणक प्रवृत्ति बढ़ल अछि, मुदा हम जखन मनोजमे ज् अन्तमे बजैत छी, तखनो पुरनका लोककेँ बजैत सुनबन्हि- मनोजऽ, वास्तवमे ओ अ युक्त ज् = ज बजै छथि। फेर ज्ञ अछि ज् आ ञ क संयुक्त मुदा गलत उच्चारण होइत अछि- ग्य। ओहिना क्ष अछि क् आ ष क संयुक्त मुदा उच्चारण होइत अछि छ। फेर श् आ र क संयुक्त अछि श्र ( जेना श्रमिक) आ स् आ र क संयुक्त अछि स्र (जेना मिस्र)। त्र भेल त+र । उच्चारणक ऑडियो फाइल विदेह आर्काइव http://www.videha.co.in/ पर उपलब्ध अछि। फेर केँ / सँ / पर पूर्व अक्षरसँ सटा कऽ लिखू मुदा तँ / कऽ हटा कऽ। ऐमे सँ मे पहिल सटा कऽ लिखू आ बादबला हटा कऽ। अंकक बाद टा लिखू सटा कऽ मुदा अन्य ठाम टा लिखू हटा कऽ– जेना छहटा मुदा सभ टा। फेर ६अ म सातम लिखू- छठम सातम नै। घरबलामे बला मुदा घरवालीमे वाली प्रयुक्त करू। रहए- रहै मुदा सकैए (उच्चारण सकै-ए)। मुदा कखनो काल रहए आ रहै मे अर्थ भिन्नता सेहो, जेना से कम्मो जगहमे पार्किंग करबाक अभ्यास रहै ओकरा। पुछलापर पता लागल जे ढुनढुन नाम्ना ई ड्राइवर कनाट प्लेसक पार्किंगमे काज करैत रहए। छलै, छलए मे सेहो ऐ तरहक भेल। छलए क उच्चारण छल-ए सेहो। संयोगने- (उच्चारण संजोगने) केँ/ कऽ केर- क ( केर क प्रयोग गद्यमे नै करू , पद्यमे कऽ सकै छी। ) क (जेना रामक) –रामक आ संगे (उच्चारण राम के / राम कऽ सेहो) सँ- सऽ (उच्चारण) चन्द्रबिन्दु आ अनुस्वार- अनुस्वारमे कंठ धरिक प्रयोग होइत अछि मुदा चन्द्रबिन्दुमे नै। चन्द्रबिन्दुमे कनेक एकारक सेहो उच्चारण होइत अछि- जेना रामसँ- (उच्चारण राम सऽ) रामकेँ- (उच्चारण राम कऽ/ राम के सेहो)। केँ जेना रामकेँ भेल हिन्दीक को (राम को)- राम को= रामकेँ क जेना रामक भेल हिन्दीक का ( राम का) राम का= रामक कऽ जेना जा कऽ भेल हिन्दीक कर ( जा कर) जा कर= जा कऽ सँ भेल हिन्दीक से (राम से) राम से= रामसँ सऽ , तऽ , त , केर (गद्यमे) एे चारू शब्द सबहक प्रयोग अवांछित। के दोसर अर्थेँ प्रयुक्त भऽ सकैए- जेना, के कहलक? विभक्ति “क”क बदला एकर प्रयोग अवांछित। नञि, नहि, नै, नइ, नँइ, नइँ, नइं ऐ सभक उच्चारण आ लेखन - नै त्त्व क बदलामे त्व जेना महत्वपूर्ण (महत्त्वपूर्ण नै) जतए अर्थ बदलि जाए ओतहि मात्र तीन अक्षरक संयुक्ताक्षरक प्रयोग उचित। सम्पति- उच्चारण स म्प इ त (सम्पत्ति नै- कारण सही उच्चारण आसानीसँ सम्भव नै)। मुदा सर्वोत्तम (सर्वोतम नै)। राष्ट्रिय (राष्ट्रीय नै) सकैए/ सकै (अर्थ परिवर्तन) पोछैले/ पोछै लेल/ पोछए लेल पोछैए/ पोछए/ (अर्थ परिवर्तन) पोछए/ पोछै ओ लोकनि ( हटा कऽ, ओ मे बिकारी नै) ओइ/ ओहि ओहिले/ ओहि लेल/ ओही लऽ जएबेँ/ बैसबेँ पँचभइयाँ देखियौक/ (देखिऔक नै- तहिना अ मे ह्रस्व आ दीर्घक मात्राक प्रयोग अनुचित) जकाँ / जेकाँ तँइ/ तैँ/ होएत / हएत नञि/ नहि/ नँइ/ नइँ/ नै सौँसे/ सौंसे बड़ / बड़ी (झोराओल) गाए (गाइ नहि), मुदा गाइक दूध (गाएक दूध नै।) रहलेँ/ पहिरतैँ हमहीं/ अहीं सब - सभ सबहक - सभहक धरि - तक गप- बात बूझब - समझब बुझलौं/ समझलौं/ बुझलहुँ - समझलहुँ हमरा आर - हम सभ आकि- आ कि सकैछ/ करैछ (गद्यमे प्रयोगक आवश्यकता नै) होइन/ होनि जाइन (जानि नै, जेना देल जाइन) मुदा जानि-बूझि (अर्थ परिव्र्तन) पइठ/ जाइठ आउ/ जाउ/ आऊ/ जाऊ मे, केँ, सँ, पर (शब्दसँ सटा कऽ) तँ कऽ धऽ दऽ (शब्दसँ हटा कऽ) मुदा दूटा वा बेसी विभक्ति संग रहलापर पहिल विभक्ति टाकेँ सटाऊ। जेना ऐमे सँ । एकटा , दूटा (मुदा कए टा) बिकारीक प्रयोग शब्दक अन्तमे, बीचमे अनावश्यक रूपेँ नै। आकारान्त आ अन्तमे अ क बाद बिकारीक प्रयोग नै (जेना दिअ , आ/ दिय’ , आ’, आ नै ) अपोस्ट्रोफीक प्रयोग बिकारीक बदलामे करब अनुचित आ मात्र फॉन्टक तकनीकी न्यूनताक परिचायक)- ओना बिकारीक संस्कृत रूप ऽ अवग्रह कहल जाइत अछि आ वर्तनी आ उच्चारण दुनू ठाम एकर लोप रहैत अछि/ रहि सकैत अछि (उच्चारणमे लोप रहिते अछि)। मुदा अपोस्ट्रोफी सेहो अंग्रेजीमे पसेसिव केसमे होइत अछि आ फ्रेंचमे शब्दमे जतए एकर प्रयोग होइत अछि जेना raison d’etre एतए सेहो एकर उच्चारण रैजौन डेटर होइत अछि, माने अपोस्ट्रॉफी अवकाश नै दैत अछि वरन जोड़ैत अछि, से एकर प्रयोग बिकारीक बदला देनाइ तकनीकी रूपेँ सेहो अनुचित)। अइमे, एहिमे/ ऐमे जइमे, जाहिमे एखन/ अखन/ अइखन केँ (के नहि) मे (अनुस्वार रहित) भऽ मे दऽ तँ (तऽ, त नै) सँ ( सऽ स नै) गाछ तर गाछ लग साँझ खन जो (जो go, करै जो do) तै/तइ जेना- तै दुआरे/ तइमे/ तइले जै/जइ जेना- जै कारण/ जइसँ/ जइले ऐ/अइ जेना- ऐ कारण/ ऐसँ/ अइले/ मुदा एकर एकटा खास प्रयोग- लालति कतेक दिनसँ कहैत रहैत अइ लै/लइ जेना लैसँ/ लइले/ लै दुआरे लहँ/ लौं गेलौं/ लेलौं/ लेलँह/ गेलहुँ/ लेलहुँ/ लेलँ जइ/ जाहि/ जै जहिठाम/ जाहिठाम/ जइठाम/ जैठाम एहि/ अहि/ अइ (वाक्यक अंतमे ग्राह्य) / ऐ अइछ/ अछि/ ऐछ तइ/ तहि/ तै/ ताहि ओहि/ ओइ सीखि/ सीख जीवि/ जीवी/ जीब भलेहीं/ भलहिं तैं/ तँइ/ तँए जाएब/ जएब लइ/ लै छइ/ छै नहि/ नै/ नइ गइ/ गै छनि/ छन्हि ... समए शब्दक संग जखन कोनो विभक्ति जुटै छै तखन समै जना समैपर इत्यादि। असगरमे हृदए आ विभक्ति जुटने हृदे जना हृदेसँ, हृदेमे इत्यादि। जइ/ जाहि/ जै जहिठाम/ जाहिठाम/ जइठाम/ जैठाम एहि/ अहि/ अइ/ ऐ अइछ/ अछि/ ऐछ तइ/ तहि/ तै/ ताहि ओहि/ ओइ सीखि/ सीख जीवि/ जीवी/ जीब भले/ भलेहीं/ भलहिं तैं/ तँइ/ तँए जाएब/ जएब लइ/ लै छइ/ छै नहि/ नै/ नइ गइ/ गै छनि/ छन्हि चुकल अछि/ गेल गछि २.२. मैथिलीमे भाषा सम्पादन पाठ्यक्रम नीचाँक सूचीमे देल विकल्पमेसँ लैंगुएज एडीटर द्वारा कोन रूप चुनल जेबाक चाही: बोल्ड कएल रूप ग्राह्य: १.होयबला/ होबयबला/ होमयबला/ हेब’बला, हेम’बला/ होयबाक/होबएबला /होएबाक २. आ’/आऽ आ ३. क’ लेने/कऽ लेने/कए लेने/कय लेने/ल’/लऽ/लय/लए ४. भ’ गेल/भऽ गेल/भय गेल/भए गेल ५. कर’ गेलाह/करऽ गेलह/करए गेलाह/करय गेलाह ६. लिअ/दिअ लिय’,दिय’,लिअ’,दिय’/ ७. कर’ बला/करऽ बला/ करय बला करैबला/क’र’ बला / करैवाली ८. बला वला (पुरूष), वाली (स्त्री) ९ . आङ्ल आंग्ल १०. प्रायः प्रायह ११. दुःख दुख १ २. चलि गेल चल गेल/चैल गेल १३. देलखिन्ह देलकिन्ह, देलखिन १४. देखलन्हि देखलनि/ देखलैन्ह १५. छथिन्ह/ छलन्हि छथिन/ छलैन/ छलनि १६. चलैत/दैत चलति/दैति १७. एखनो अखनो १८. बढ़नि बढ़इन बढ़न्हि १९. ओ’/ओऽ(सर्वनाम) ओ २० . ओ (संयोजक) ओ’/ओऽ २१. फाँगि/फाङ्गि फाइंग/फाइङ २२. जे जे’/जेऽ २३. ना-नुकुर ना-नुकर २४. केलन्हि/केलनि/कयलन्हि २५. तखनतँ/ तखन तँ २६. जा रहल/जाय रहल/जाए रहल २७. निकलय/निकलए लागल/ लगल बहराय/ बहराए लागल/ लगल निकल’/बहरै लागल २८. ओतय/ जतय जत’/ ओत’/ जतए/ ओतए २९. की फूरल जे कि फूरल जे ३०. जे जे’/जेऽ ३१. कूदि / यादि(मोन पारब) कूइद/याइद/कूद/याद/ यादि (मोन) ३२. इहो/ ओहो ३३. हँसए/ हँसय हँसऽ ३४. नौ आकि दस/नौ किंवा दस/ नौ वा दस ३५. सासु-ससुर सास-ससुर ३६. छह/ सात छ/छः/सात ३७. की की’/ कीऽ (दीर्घीकारान्तमे ऽ वर्जित) ३८. जबाब जवाब ३९. करएताह/ करेताह करयताह ४०. दलान दिशि दलान दिश/दलान दिस ४१ . गेलाह गएलाह/गयलाह ४२. किछु आर/ किछु और/ किछ आर ४३. जाइ छल/ जाइत छल जाति छल/जैत छल ४४. पहुँचि/ भेट जाइत छल/ भेट जाइ छलए पहुँच/ भेटि जाइत छल ४५. जबान (युवा)/ जवान(फौजी) ४६. लय/ लए क’/ कऽ/ लए कए / लऽ कऽ/ लऽ कए ४७. ल’/लऽ कय/ कए ४८. एखन / एखने / अखन / अखने ४९. अहींकेँ अहीँकेँ ५०. गहींर गहीँर ५१. धार पार केनाइ धार पार केनाय/केनाए ५२. जेकाँ जेँकाँ/ जकाँ ५३. तहिना तेहिना ५४. एकर अकर ५५. बहिनउ बहनोइ ५६. बहिन बहिनि ५७. बहिन-बहिनोइ बहिन-बहनउ ५८. नहि/ नै ५९. करबा / करबाय/ करबाए ६०. तँ/ त ऽ तय/तए ६१. भैयारी मे छोट-भाए/भै/, जेठ-भाय/भाइ, ६२. गिनतीमे दू भाइ/भाए/भाँइ ६३. ई पोथी दू भाइक/ भाँइ/ भाए/ लेल। यावत जावत ६४. माय मै / माए मुदा माइक ममता ६५. देन्हि/ दइन दनि/ दएन्हि/ दयन्हि दन्हि/ दैन्हि ६६. द’/ दऽ/ दए ६७. ओ (संयोजक) ओऽ (सर्वनाम) ६८. तका कए तकाय तकाए ६९. पैरे (on foot) पएरे कएक/ कैक ७०. ताहुमे/ ताहूमे ७१. पुत्रीक ७२. बजा कय/ कए / कऽ ७३. बननाय/बननाइ ७४. कोला ७५. दिनुका दिनका ७६. ततहिसँ ७७. गरबओलन्हि/ गरबौलनि/ गरबेलन्हि/ गरबेलनि ७८. बालु बालू ७९. चेन्ह चिन्ह(अशुद्ध) ८०. जे जे’ ८१ . से/ के से’/के’ ८२. एखुनका अखनुका ८३. भुमिहार भूमिहार ८४. सुग्गर / सुगरक/ सूगर ८५. झठहाक झटहाक ८६. छूबि ८७. करइयो/ओ करैयो ने देलक /करियौ-करइयौ ८८. पुबारि पुबाइ ८९. झगड़ा-झाँटी झगड़ा-झाँटि ९०. पएरे-पएरे पैरे-पैरे ९१. खेलएबाक ९२. खेलेबाक ९३. लगा ९४. होए- हो – होअए ९५. बुझल बूझल ९६. बूझल (संबोधन अर्थमे) ९७. यैह यएह / इएह/ सैह/ सएह ९८. तातिल ९९. अयनाय- अयनाइ/ अएनाइ/ एनाइ १००. निन्न- निन्द १०१. बिनु बिन १०२. जाए जाइ १०३. जाइ (in different sense)-last word of sentence १०४. छत पर आबि जाइ १०५. ने १०६. खेलाए (play) –खेलाइ १०७. शिकाइत- शिकायत १०८. ढप- ढ़प १०९ . पढ़- पढ ११०. कनिए/ कनिये कनिञे १११. राकस- राकश ११२. होए/ होय होइ ११३. अउरदा- औरदा ११४. बुझेलन्हि (different meaning- got understand) ११५. बुझएलन्हि/बुझेलनि/ बुझयलन्हि (understood himself) ११६. चलि- चल/ चलि गेल ११७. खधाइ- खधाय ११८. मोन पाड़लखिन्ह/ मोन पाड़लखिन/ मोन पारलखिन्ह ११९. कैक- कएक- कइएक १२०. लग ल’ग १२१. जरेनाइ १२२. जरौनाइ जरओनाइ- जरएनाइ/ जरेनाइ १२३. होइत १२४. गरबेलन्हि/ गरबेलनि गरबौलन्हि/ गरबौलनि १२५. चिखैत- (to test)चिखइत १२६. करइयो (willing to do) करैयो १२७. जेकरा- जकरा १२८. तकरा- तेकरा १२९. बिदेसर स्थानेमे/ बिदेसरे स्थानमे १३०. करबयलहुँ/ करबएलहुँ/ करबेलहुँ करबेलौं १३१. हारिक (उच्चारण हाइरक) १३२. ओजन वजन आफसोच/ अफसोस कागत/ कागच/ कागज १३३. आधे भाग/ आध-भागे १३४. पिचा / पिचाय/पिचाए १३५. नञ/ ने १३६. बच्चा नञ (ने) पिचा जाय १३७. तखन ने (नञ) कहैत अछि। कहै/ सुनै/ देखै छल मुदा कहैत-कहैत/ सुनैत-सुनैत/ देखैत-देखैत १३८. कतेक गोटे/ कताक गोटे १३९. कमाइ-धमाइ/ कमाई- धमाई १४० . लग ल’ग १४१. खेलाइ (for playing) १४२. छथिन्ह/ छथिन १४३. होइत होइ १४४. क्यो कियो / केओ १४५. केश (hair) १४६. केस (court-case) १४७ . बननाइ/ बननाय/ बननाए १४८. जरेनाइ १४९. कुरसी कुर्सी १५०. चरचा चर्चा १५१. कर्म करम १५२. डुबाबए/ डुबाबै/ डुमाबै डुमाबय/ डुमाबए १५३. एखुनका/ अखुनका १५४. लए/ लिअए (वाक्यक अंतिम शब्द)- लऽ १५५. कएलक/ केलक १५६. गरमी गर्मी १५७ . वरदी वर्दी १५८. सुना गेलाह सुना’/सुनाऽ १५९. एनाइ-गेनाइ १६०. तेना ने घेरलन्हि/ तेना ने घेरलनि १६१. नञि / नै १६२. डरो ड’रो १६३. कतहु/ कतौ कहीं १६४. उमरिगर-उमेरगर उमरगर १६५. भरिगर १६६. धोल/धोअल धोएल १६७. गप/गप्प १६८. के के’ १६९. दरबज्जा/ दरबजा १७०. ठाम १७१. धरि तक १७२. घूरि लौटि १७३. थोरबेक १७४. बड्ड १७५. तोँ/ तूँ १७६. तोँहि( पद्यमे ग्राह्य) १७७. तोँही / तोँहि १७८. करबाइए करबाइये १७९. एकेटा १८०. करितथि /करतथि १८१. पहुँचि/ पहुँच १८२. राखलन्हि रखलन्हि/ रखलनि १८३. लगलन्हि/ लगलनि लागलन्हि १८४. सुनि (उच्चारण सुइन) १८५. अछि (उच्चारण अइछ) १८६. एलथि गेलथि १८७. बितओने/ बितौने/ बितेने १८८. करबओलन्हि/ करबौलनि/ करेलखिन्ह/ करेलखिन १८९. करएलन्हि/ करेलनि १९०. आकि/ कि १९१. पहुँचि/ पहुँच १९२. बत्ती जराय/ जराए जरा (आगि लगा) १९३. से से’ १९४. हाँ मे हाँ (हाँमे हाँ विभक्त्तिमे हटा कए) १९५. फेल फैल १९६. फइल(spacious) फैल १९७. होयतन्हि/ होएतन्हि/ होएतनि/हेतनि/ हेतन्हि १९८. हाथ मटिआएब/ हाथ मटियाबय/हाथ मटियाएब १९९. फेका फेंका २००. देखाए देखा २०१. देखाबए २०२. सत्तरि सत्तर २०३. साहेब साहब २०४.गेलैन्ह/ गेलन्हि/ गेलनि २०५. हेबाक/ होएबाक २०६.केलो/ कएलहुँ/केलौं/ केलुँ २०७. किछु न किछु/ किछु ने किछु २०८.घुमेलहुँ/ घुमओलहुँ/ घुमेलौं २०९. एलाक/ अएलाक २१०. अः/ अह २११.लय/ लए (अर्थ-परिवर्त्तन) २१२.कनीक/ कनेक २१३.सबहक/ सभक २१४.मिलाऽ/ मिला २१५.कऽ/ क २१६.जाऽ/ जा २१७.आऽ/ आ २१८.भऽ /भ’ (’ फॉन्टक कमीक द्योतक) २१९.निअम/ नियम २२० .हेक्टेअर/ हेक्टेयर २२१.पहिल अक्षर ढ/ बादक/ बीचक ढ़ २२२.तहिं/तहिँ/ तञि/ तैं २२३.कहिं/ कहीं २२४.तँइ/ तैं / तइँ २२५.नँइ/ नइँ/ नञि/ नहि/नै २२६.है/ हए / एलीहेँ/ २२७.छञि/ छै/ छैक /छइ २२८.दृष्टिएँ/ दृष्टियेँ २२९.आ (come)/ आऽ(conjunction) २३०. आ (conjunction)/ आऽ(come) २३१.कुनो/ कोनो, कोना/केना २३२.गेलैन्ह-गेलन्हि-गेलनि २३३.हेबाक- होएबाक २३४.केलौँ- कएलौँ-कएलहुँ/केलौं २३५.किछु न किछ- किछु ने किछु २३६.केहेन- केहन २३७.आऽ (come)-आ (conjunction-and)/आ। आब'-आब' /आबह-आबह २३८. हएत-हैत २३९.घुमेलहुँ-घुमएलहुँ- घुमेलाें २४०.एलाक- अएलाक २४१.होनि- होइन/ होन्हि/ २४२.ओ-राम ओ श्यामक बीच(conjunction), ओऽ कहलक (he said)/ओ २४३.की हए/ कोसी अएली हए/ की है। की हइ २४४.दृष्टिएँ/ दृष्टियेँ २४५ .शामिल/ सामेल २४६.तैँ / तँए/ तञि/ तहिं २४७.जौं / ज्योँ/ जँ/ २४८.सभ/ सब २४९.सभक/ सबहक २५०.कहिं/ कहीं २५१.कुनो/ कोनो/ कोनहुँ/ २५२.फारकती भऽ गेल/ भए गेल/ भय गेल २५३.कोना/ केना/ कन्ना/कना २५४.अः/ अह २५५.जनै/ जनञ २५६.गेलनि/ गेलाह (अर्थ परिवर्तन) २५७.केलन्हि/ कएलन्हि/ केलनि/ २५८.लय/ लए/ लएह (अर्थ परिवर्तन) २५९.कनीक/ कनेक/कनी-मनी २६०.पठेलन्हि पठेलनि/ पठेलइन/ पपठओलन्हि/ पठबौलनि/ २६१.निअम/ नियम २६२.हेक्टेअर/ हेक्टेयर २६३.पहिल अक्षर रहने ढ/ बीचमे रहने ढ़ २६४.आकारान्तमे बिकारीक प्रयोग उचित नै/ अपोस्ट्रोफीक प्रयोग फान्टक तकनीकी न्यूनताक परिचायक ओकर बदला अवग्रह (बिकारी) क प्रयोग उचित २६५.केर (पद्यमे ग्राह्य) / -क/ कऽ/ के २६६.छैन्हि- छन्हि २६७.लगैए/ लगैये २६८.होएत/ हएत २६९.जाएत/ जएत/ २७०.आएत/ अएत/ आओत २७१ .खाएत/ खएत/ खैत २७२.पिअएबाक/ पिएबाक/पियेबाक २७३.शुरु/ शुरुह २७४.शुरुहे/ शुरुए २७५.अएताह/अओताह/ एताह/ औताह २७६.जाहि/ जाइ/ जइ/ जै/ २७७.जाइत/ जैतए/ जइतए २७८.आएल/ अएल २७९.कैक/ कएक २८०.आयल/ अएल/ आएल २८१. जाए/ जअए/ जए (लालति जाए लगलीह।) २८२. नुकएल/ नुकाएल २८३. कठुआएल/ कठुअएल २८४. ताहि/ तै/ तइ २८५. गायब/ गाएब/ गएब २८६. सकै/ सकए/ सकय २८७.सेरा/सरा/ सराए (भात सरा गेल) २८८.कहैत रही/देखैत रही/ कहैत छलौं/ कहै छलौं- अहिना चलैत/ पढ़ैत (पढ़ै-पढ़ैत अर्थ कखनो काल परिवर्तित) - आर बुझै/ बुझैत (बुझै/ बुझै छी, मुदा बुझैत-बुझैत)/ सकैत/ सकै। करैत/ करै। दै/ दैत। छैक/ छै। बचलै/ बचलैक। रखबा/ रखबाक । बिनु/ बिन। रातिक/ रातुक बुझै आ बुझैत केर अपन-अपन जगहपर प्रयोग समीचीन अछि। बुझैत-बुझैत आब बुझलिऐ। हमहूँ बुझै छी। २८९. दुआरे/ द्वारे २९०.भेटि/ भेट/ भेँट २९१. खन/ खीन/ खुना (भोर खन/ भोर खीन) २९२.तक/ धरि २९३.गऽ/ गै (meaning different-जनबै गऽ) २९४.सऽ/ सँ (मुदा दऽ, लऽ) २९५.त्त्व,(तीन अक्षरक मेल बदला पुनरुक्तिक एक आ एकटा दोसरक उपयोग) आदिक बदला त्व आदि। महत्त्व/ महत्व/ कर्ता/ कर्त्ता आदिमे त्त संयुक्तक कोनो आवश्यकता मैथिलीमे नै अछि। वक्तव्य २९६.बेसी/ बेशी २९७.बाला/वाला बला/ वला (रहैबला) २९८ .वाली/ (बदलैवाली) २९९.वार्त्ता/ वार्ता ३००. अन्तर्राष्ट्रिय/ अन्तर्राष्ट्रीय ३०१. लेमए/ लेबए ३०२.लमछुरका, नमछुरका ३०२.लागै/ लगै ( भेटैत/ भेटै) ३०३.लागल/ लगल ३०४.हबा/ हवा ३०५.राखलक/ रखलक ३०६.आ (come)/ आ (and) ३०७. पश्चाताप/ पश्चात्ताप ३०८. ऽ केर व्यवहार शब्दक अन्तमे मात्र, यथासंभव बीचमे नै। ३०९.कहैत/ कहै ३१०. रहए (छल)/ रहै (छलै) (meaning different) ३११.तागति/ ताकति ३१२.खराप/ खराब ३१३.बोइन/ बोनि/ बोइनि ३१४.जाठि/ जाइठ ३१५.कागज/ कागच/ कागत ३१६.गिरै (meaning different- swallow)/ गिरए (खसए) ३१७.राष्ट्रिय/ राष्ट्रीय DATE-LIST (year- 2012-13) (१४२० फसली साल) Marriage Days: Nov.2012- 25, 26, 28, 29, 30 Dec.2012- 5,9, 10, 13, 14 January 2013- 16, 17, 18, 23, 24, 31 Feb.2013- 1, 3, 4, 6, 8, 10, 14, 15, 18, 20, 24, 25 April 2013- 21, 22, 24, 26, 29 May 2013- 1,2,3,5,6,9,12,13,17,19,20,22,23,24,26,27,29,30,31 June 2013- 2,3 July 2013- 11, 14, 15 Upanayana Days: January 2013- 16 February 2013- 14, 15, 20, 21 April 2013- 22 May 2013- 20, 21 Dviragaman Din: November 2012- 25, 26, 28, 29 December 2012- 2, 3, 14 February 2013- 14, 15, 18, 20, 21, 22, 27, 28 March 2013- 1 April 2013- 18, 22, 24, 26, 28, 29 May 2013- 12, 13 Mundan Din: November 2012- 26, 30 December 2012- 3 January 2013- 18, 24 February 2013- 1, 14, 15, 20, 28 April 2013- 17 May 2013- 13, 23, 29 June 2013- 13, 19, 26, 27, 28 July 2013- 10, 15 FESTIVALS OF MITHILA (2012-13) Mauna Panchami-08 July Madhushravani- 22 July Nag Panchami- 24 July Raksha Bandhan- 02 Aug Krishnastami- 10 August Kushi Amavasya / Somvari Vrat- 17 August Vishwakarma Pooja- 17 September Hartalika Teej- 18 September ChauthChandra-19 September Karma Dharma Ekadashi-26 September Indra Pooja Aarambh- 27 September Anant Caturdashi- 29 Sep Agastyarghadaan- 30 Sep Pitri Paksha begins- 30 Sep Jimootavahan Vrata/ Jitia-08 October Matri Navami- 09 October SomvatiAmavasya Vrat- 15 October Kalashsthapan- 16 October Belnauti- 20 October Patrika Pravesh- 21 October Mahastami- 22 October Maha Navami - 23 October Vijaya Dashami- 24 October Kojagara- 29 Oct Dhanteras- 11 November Diyabati, shyama pooja-13 November Annakoota/ Govardhana Pooja-14 November Bhratridwitiya/ Chitragupta Pooja- 15 November Chhathi -19 November Devotthan Ekadashi- 24 November ravivratarambh- 25 November Navanna parvan- 25 November KartikPoornima- Sama Visarjan- 28 November Vivaha Panchmi- 17 December Makara/ Teela Sankranti-14 Jan Naraknivaran chaturdashi- 08 February Basant Panchami/ Saraswati Pooja- 15 February Achla Saptmi- 17 February Mahashivaratri-10 March Holikadahan-Fagua-26 March Holi- 28 March Varuni Trayodashi-07 April Chaiti navaratrarambh- 11 April Jurishital-15 April Chaiti Chhathi vrata-16 April Ram Navami- 19 April Ravi Brat Ant- 12 May Akshaya Tritiya-13 May Janaki Navami- 19 May Vat Savitri-barasait- 08 June Ganga Dashhara-18 June Somavati Amavasya Vrata- 08 July Jagannath Rath Yatra- 10 July Hari Sayan Ekadashi- 19 July Aashadhi Guru Poornima-22 Jul VIDEHA ARCHIVE १.विदेह ई-पत्रिकाक सभटा पुरान अंक ब्रेल, तिरहुता आ देवनागरी रूपमे Videha e journal's all old issues in Braille Tirhuta and Devanagari versions विदेह ई-पत्रिकाक पहिल ५० अंक
विदेह ई-पत्रिकाक ५०म सँ आगाँक अंक http://sites.google.com/a/videha.com/videha/ https://sites.google.com/a/videha.com/videha-archive-part-i/ https://sites.google.com/a/videha.com/videha-archive-part-ii/ २.मैथिली पोथी डाउनलोड Maithili Books Download http://sites.google.com/a/videha.com/videha-pothi ३.मैथिली ऑडियो संकलन Maithili Audio Downloads http://sites.google.com/a/videha.com/videha-audio ४.मैथिली वीडियोक संकलन Maithili Videos http://sites.google.com/a/videha.com/videha-video ५.मिथिला चित्रकला/ आधुनिक चित्रकला आ चित्र Mithila Painting/ Modern Art and Photos http://sites.google.com/a/videha.com/videha-paintings-photos/ "विदेह"क एहि सभ सहयोगी लिंकपर सेहो एक बेर जाउ। ६.विदेह मैथिली क्विज : http://videhaquiz.blogspot.com/ ७.विदेह मैथिली जालवृत्त एग्रीगेटर : http://videha-aggregator.blogspot.com/ ८.विदेह मैथिली साहित्य अंग्रेजीमे अनूदित http://madhubani-art.blogspot.com/ ९.विदेहक पूर्व-रूप "भालसरिक गाछ" : http://gajendrathakur.blogspot.com/ १०.विदेह इंडेक्स : http://videha123.blogspot.com/ ११.विदेह फाइल : http://videha123.wordpress.com/ १२. विदेह: सदेह : पहिल तिरहुता (मिथिला़क्षर) जालवृत्त (ब्लॉग) http://videha-sadeha.blogspot.com/ १३. विदेह:ब्रेल: मैथिली ब्रेलमे: पहिल बेर विदेह द्वारा http://videha-braille.blogspot.com/ १४.VIDEHA IST MAITHILI FORTNIGHTLY EJOURNAL ARCHIVE http://videha-archive.blogspot.com/ १५. विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका मैथिली पोथीक आर्काइव http://videha-pothi.blogspot.com/ १६. विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका ऑडियो आर्काइव http://videha-audio.blogspot.com/ १७. विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका वीडियो आर्काइव http://videha-video.blogspot.com/ १८. विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका मिथिला चित्रकला, आधुनिक कला आ चित्रकला http://videha-paintings-photos.blogspot.com/ १९. मैथिल आर मिथिला (मैथिलीक सभसँ लोकप्रिय जालवृत्त) http://maithilaurmithila.blogspot.com/ २०.श्रुति प्रकाशन http://www.shruti-publication.com/ २१.http://groups.google.com/group/videha २२.http://groups.yahoo.com/group/VIDEHA/ २३.गजेन्द्र ठाकुर इडेक्स http://gajendrathakur123.blogspot.com २४. नेना भुटका http://mangan-khabas.blogspot.com/ २५.विदेह रेडियो:मैथिली कथा-कविता आदिक पहिल पोडकास्ट साइट http://videha123radio.wordpress.com/ २६.Videha Radio २७. Join official Videha facebook group. २८. विदेह मैथिली नाट्य उत्सव http://maithili-drama.blogspot.com/ २९.समदिया http://esamaad.blogspot.com/ ३०. मैथिली फिल्म्स http://maithilifilms.blogspot.com/ ३१.अनचिन्हार आखर http://anchinharakharkolkata.blogspot.com/ ३२. मैथिली हाइकू http://maithili-haiku.blogspot.com/ ३३. मानक मैथिली http://manak-maithili.blogspot.com/ ३४. विहनि कथा http://vihanikatha.blogspot.in/ ३५. मैथिली कविता http://maithili-kavita.blogspot.in/ ३६. मैथिली कथा http://maithili-katha.blogspot.in/ ३७.मैथिली समालोचना http://maithili-samalochna.blogspot.in/ महत्त्वपूर्ण सूचना: The Maithili pdf books are AVAILABLE FOR free PDF DOWNLOAD AT
https://sites.google.com/a/videha.com/videha/ http://videha123.wordpress.com/ http://videha123.wordpress.com/about/ विदेह:सदेह:१: २: ३: ४:५:६:७:८:९:१० "विदेह"क प्रिंट संस्करण: विदेह-ई-पत्रिका (http://www.videha.co.in/) क चुनल रचना सम्मिलित। सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। Details for purchase available at publishers's (print-version) site http://www.shruti-publication.com or you may write to shruti.publication@shruti-publication.com विदेह मैथिली साहित्य आन्दोलन (c)२००४-१३. सर्वाधिकार लेखकाधीन आ जतए लेखकक नाम नहि अछि ततए संपादकाधीन। विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। सह-सम्पादक: उमेश मंडल। सहायक सम्पादक: शिव कुमार झा आ मुन्नाजी (मनोज कुमार कर्ण)। भाषा-सम्पादन: नागेन्द्र कुमार झा आ पञ्जीकार विद्यानन्द झा। कला-सम्पादन: ज्योति झा चौधरी आ रश्मि रेखा सिन्हा। सम्पादक-शोध-अन्वेषण: डॉ. जया वर्मा आ डॉ. राजीव कुमार वर्मा। सम्पादक- नाटक-रंगमंच-चलचित्र- बेचन ठाकुर। सम्पादक- सूचना-सम्पर्क-समाद- पूनम मंडल आ प्रियंका झा। सम्पादक- अनुवाद विभाग- विनीत उत्पल। रचनाकार अपन मौलिक आ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि) ggajendra@videha.com केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx, .rtf वा .txt फॉर्मेटमे पठा सकैत छथि। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेताह, से आशा करैत छी। रचनाक अंतमे टाइप रहय, जे ई रचना मौलिक अछि, आ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। मेल प्राप्त होयबाक बाद यथासंभव शीघ्र ( सात दिनक भीतर) एकर प्रकाशनक अंकक सूचना देल जायत। ’विदेह' प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका अछि आ ऐमे मैथिली, संस्कृत आ अंग्रेजीमे मिथिला आ मैथिलीसँ संबंधित रचना प्रकाशित कएल जाइत अछि। एहि ई पत्रिकाकेँ श्रीमति लक्ष्मी ठाकुर द्वारा मासक ०१ आ १५ तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि। (c) 2004-13 सर्वाधिकार सुरक्षित। विदेहमे प्रकाशित सभटा रचना आ आर्काइवक सर्वाधिकार रचनाकार आ संग्रहकर्त्ताक लगमे छन्हि। रचनाक अनुवाद आ पुनः प्रकाशन किंवा आर्काइवक उपयोगक अधिकार किनबाक हेतु ggajendra@videha.com पर संपर्क करू। एहि साइटकेँ प्रीति झा ठाकुर, मधूलिका चौधरी आ रश्मि प्रिया द्वारा डिजाइन कएल गेल। सिद्धिरस्तु 1 वि दे ह विदेह Videha বিদেহ www.videha.co.in विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका www.videha.com Videha Ist Maithili Fortnightly ejournal विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका''विदेह' १२४ म अंक १५ फरबरी २०१३ (वर्ष ६ मास ६२ अंक १२४) मानुषीमिह संस्कृताम् ISSN 2229-547X VIDEHA