VIDEHA — Issue 125 / अंक १२५

Publication: VIDEHA · Issue: 125
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ISSN 2229-547X VIDEHA ‘विदेह' १२५ म अंक ०१ मार्च २०१३ (वर्ष ६ मास ६३ अंक १२५) ऐ अंकमे अछि:- १. संपादकीय संदेश २. गद्य २.१.उमेश मण्‍डल- जगदीश प्रसाद मण्‍डलक रचना संसार- संक्षि‍प्‍त परि‍चय २.२.जगदीश प्रसाद मण्‍डल-उपन्‍यास- बड़की बहि‍न (आगाँ..) २.३.साक्षात्‍कार श्री राजदेव मण्‍डलक संग २.४.जगदीश प्रसाद मण्डल-रत्नाकर डकैत (एकांकी) २.५.ओम प्रकाश- गजलक लेल (समीक्षा) २.६.१.जगदीश प्रसाद मण्‍डलक वि‍हनि‍ कथा- जनक हाथे खेती २.बिन्देश्वर ठाकुर- बिपतियाक विदेश [विहनि कथा] २.७.उमेश मण्‍डल- वि‍देह नाट्य उत्‍सव- २०१३ २.८.प्रो. हरिमोहन झाक पुण्यतिथि मनाओल गेल- संवाद- सुमित आनन्द ३. पद्य ३.१.१.रामवि‍लास साहुक दूटा कवि‍ता २.हेम नारायण साहु जीक कवि‍ता ३.२.१.आशीष अनचिन्हार-गजल२. डॉ. शि‍व कुमार प्रसादक दूटा गीत ३.३.१.जगदानन्द झा ‘मनु’ गजल १-४ 2.पंकज चौधरी "नवलश्री" भक्ति गजल/ भगवती गीत १-२/ कविता १-२/ गजल १-७ ३.४.१.आशीष अनचिन्हार गजल १-२ २.सुमित मिश्र  गजल १-३ ३.५.१.कामिनी कामायनी- आस्थाक पूर्ण कलश २.बिनीता झा- चैन ३.ज्योति झा चौधरी-पिया जल्दी सँ आउ ने (वैलेन्टाइन डे पर विशेष) ३.६.१.राजदेव मण्‍डलक दू गोट कवि‍ता २.जगदीश प्रसाद मण्‍डलक दू टा गीत ३.७.बाल मुकुन्द पाठक- गजल१-२ ३.८.१.बिन्देश्वर ठाकुर "नेपाली"- प्रेम / गजल २.सुमित मिश्र- गजल १-२ बालानां कृते-१.पंकज चौधरी "नवलश्री"- बाल गजल १-२ २.जगदानन्द झा 'मनु'- होएत जँ विदेह मैथिली पोथी डाउनलोड साइट VIDEHA MAITHILI BOOKS FREE DOWNLOAD SITE विदेह ई-पत्रिकाक सभटा पुरान अंक ( ब्रेल, तिरहुता आ देवनागरी मे ) पी.डी.एफ. डाउनलोडक लेल नीचाँक लिंकपर उपलब्ध अछि। All the old issues of Videha e journal ( in Braille, Tirhuta and Devanagari versions ) are available for pdf download at the following link. विदेह ई-पत्रिकाक सभटा पुरान अंक ब्रेल, तिरहुता आ देवनागरी रूपमे Videha e journal's all old issues in Braille Tirhuta and Devanagari versions विदेह ई-पत्रिकाक पहिल ५० अंक

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(मैथिलीक सभसँ लोकप्रिय जालवृत्त) पर जाउ। १. संपादकीय विदेह: लोगो:: विद्यापति:उगना:मिथिला:मैथिली I. महाभारतमे उल्लेख अछि, जे इन्द्र-ध्वजा गाढ़ नील रंगक होइत छल। रामक ध्वजा लाल-गेरुआ रंगक छलन्हि आ’ एहि पर कुलदेवता सूर्यक चित्र अंकित छल। महाभारतमे अर्जुनक ध्वजा पर वानरराजक चित्र छल। नकुलक ध्वजा पर सरभ पशुक चित्र छल। अथर्ववेदक अनुसार सरभ पशु दू माथक , दूट सुन्दर पंख बला, एकटा नमगर पुछी बला आ’ सिंहक समान आठ नोकगर पैरक आँगुर युक्त्त होइत छल।अभिमन्युक द्वजा पर सारंग पक्षी छल। दुर्योधनक ध्वजा सर्पध्वजा छल। द्रोणक ध्वजा पर मृगछाल आ’ कमण्डल छल।कर्णक ध्वजा पर हाथीक पैरक जिंजीर छल, आ’ सूर्य सेहो छलाह। भगवान विष्णुक ध्वजा पर गरुड़ अंकित अछि। शिवक ध्वजा पर नंदी वृषभ अंकित अछि। दुर्गा मण्डपमे शस्त्र,ट्क्का,पटह,मृदंग, कांस्यताल(बाँसुरीकेँ छोड़ि), वाद्य ध्वज,कवच आ’ धनुष केर पूजन होइत अछि। एहिमे सर्वप्रथम खड्गक पूजा होयबाक चाही। तकरा बाद चुरिका, कट्टारक, धनुष, कुन्त आ’ कवच केर पूजा आ’ फेर चामर,छत्र,ध्वज,पताका,दुन्दुभि,शंख, सिंहासन आ’ अश्व केर पूजा होइत अछि। हमरा हिसाबे मिथिलाक कोनो झंडा बिना एहि सभक सम्मिलनक संपूर्ण नहि होयत। I. इन्द्रस्येव शची समुज्जवलगुणा गौरीव गौरीपतेः कामस्येव रतिः स्वभावमधुरा सीतेव रामस्य या। विष्णोः श्रीरिव पद्मसिंहनृपतेरेषा परा प्रेयसी विश्वख्यातनया द्विजेन्द्रतनया जागर्ति भूमण्डले॥9॥ उपर्युक्त पद्य विद्यापतिकृत शैवसर्वस्वसारक प्रारम्भक नवम श्लोक छी। एकर अर्थ अछि- उत्कृष्ट गुणवती, मधुर स्वभाववाली, ब्राह्मण-वंशजा, नीति-कौशलमे विश्वविख्यातओ’ महारानी विश्वासदेवी सम्प्रति संसारमे सुशोभित छथि, जे पृथ्वी-पति पद्मसिंहकेँ तहिना प्रिय छलीह जहिना इन्द्रकेँ शची, शिवकेँ गौरी, कामकेँ रति , रामकेँ सीता ओ’ विष्णुकेँ लक्ष्मी॥9॥ II. मधुबनी जिला मुख्यालयसँ दक्षिण पण्डौल रेलवे-स्टेशनक निकट भवानीपुर ग्राम बसल अछि। एहि गामक निकट छह फीट नीचाँ जमीनमे एकटा शिव-लिंग अछि, जे उग्रनाथ महादेवक नामसँ प्रसिद्ध अछि। एहन विश्वास लोकमे छैक जे पन्द्रहम शाब्दीक आरंभमे हुनकर सहचर उगना, जखन महाकवि प्यासे अप्स्याँत छलाह, हुनका अपन जटासँ गंगाजल निकालि कय पियओने रहथि। एहि पर कविकेँ शंका भेलन्हि, आ’ ओ’ कविसँ असली परिचय पुछलन्हि। तकर बाद एहि स्थान पर शिव हुनका अपन असली रूपक दर्शन देलन्हि। एहि कथा पर विश्वास तखने भ’ सकैत अछि, जखन तर्क आ’ विज्ञानक संग श्रद्धाक मिश्रण होय। शंकराचार्यक विष्यमे कहल गेल जे ओ’ अपन कमंडलमे धार भरि लेलन्हि। भेल ई जे बाढ़िमे बेचेमे पहाड़ रहलाक कारण एक दिशि बाढ़ि अबैत छल आ’ एक दिशि दाही। बीचक गुफाकेँ शंकर अपन शिष्यक सहयोगसँ तोड़ि जखन कमण्डल लेने बहरओलाह तँ लोक देखलक जे दोसर कात पानि आबि रहल अछि। सभ शंकराचार्यक स्तुति कएलन्हि, जे अहाँ अपन कम्मंडलमे धार आनि हमरा सभकेँ दाही सँ आ’ दोसर कातक लोककेँ बाढ़िसँ मुक्त्त कराओल। अहाँ कमण्डलमे पानि आ’ धार अनलहुँ। बादमे अवसरवादी लोकनि एकरा क्मत्कारसँ जोड़ि देलक। आशा अछि जे अहाँ सेहो अपन लेखमे उगनाक कथाक तर्क आ’ श्रद्धासँ विवेचना करब। बीस मार्चकेँ १४ दिनुका मिथिला क्षेत्रक गृही परिक्रमा, आइ काल्हि जनकपुरक, दू टा डालाक संग- १.मिथिला बिहारी जी आ किशोरीजी आ आर मारिते रास ढेर मन्दिरक/ भक्तक डाला सभक संग कुआ रामपुर दऽ कऽ जनकपुरमे प्रवेश करैत छथि। कतेक भक्त तँ अपन पशुक संगे परिक्रमा करैत छथि। ई परिक्रमा कचुरी मठ, धनुषासँ शुरू होइत अछि आ अमावस्याक रातिमे पहिल विश्राम हनुमान नगर आ चतुर्दशी दिन पन्द्रहम विश्राम जनकपुरमे होइत अछि। २१ मार्चकेँ फागुन परिक्रमा दिन ई यात्रा जनकपुर नगरपालिकाक परिक्रमाक अंतरगृह परिक्रमा (लगभग 8 किलोमीटर) क संग होइत अछि। २२ मार्चकेँ जनकपुर आ आसपासमे होली मनाओल जाइत अछि। जनकपुर मध्य परिक्रमाक १५ स्थल आऽ ओतुक्का मुख्य देवता १. हनुमाननगर- हनुमानजी २.कल्याणेश्वर- शिवलिंग ३.गिरिजा-स्थान- शक्ति ४.मटिहानी- विष्णु मन्दिर ५.जालेश्वर- शिवलिंग ६.मनाई- माण्डव ऋषि ७. श्रुव कुण्ड- ध्रुव मन्दिर ८.कंचन वन- कोनो मन्दिर नञि मात्र मनोरम दृश्य ९.पर्वत- पाँच टा पर्वत १०.धनुषा- शिवधनुषक टुकड़ी ११.सतोखड़ी- सप्तर्षिक सात टा कुण्ड १२.हरुषाहा- विमलागंगा १३. करुणा- कोनो मन्दिर नहि मात्र मनोरम दृश्य १४. बिसौल- विश्वामित्र मन्दिर १५.जनकपुर। अन्तमे फेर जनकपुरमे खतम भऽ जाइत अछि। भक्त सभ बारहबीघा मैदान आ धर्मशाला सभमे ठहरैत छथि। लघु परिक्रमा आठ कि.मी. , मध्य परिक्रमा 40 कोसक (128 कि.मी.) आ वृहत परिक्रमा 268 कि.मी. होइत अछि। १.उग्रतारा स्थान- मण्डन मिश्रक कुलदेवी/ गोसाउनी महिष मर्दिनी भगवती, महिष्माती। १४म शताब्दीमे राजा शिव सिंहक ज्येष्ठ रानी पद्मावती एतए एकटा मन्दिर बनबेलन्हि। खण्डवला राजवंश कालमे सेहो एतए मन्दिरक रख-रखाव होइत छल आ राजा आसिन नवरात्रमे एतए पूजा आ रहबाक लेल अबैत रहथि। तारा भक्त लोकनि दुर्गापूजाक समयमे एतए खूब मात्रामे अबैत छथि ! २.कपिलेश्वर स्थान- मधुबनीसँ पाँच किलोमीटर पश्चिम माधव मन्दिर आ पुरान शिवलिंग, सांख्य दर्शनक जनक कपिल एतए मन्दिरक स्थापना करबओलन्हि। एखुनका मन्दिर दरभंगा महाराज राघव सिंह द्वारा २५० वर्ष पहिने बनबाओल गेल। प्राचीन कालमे समुद्र हिमालय धरि पसरल छल आ फेर जमीन पसरल। जखन बंगालक खाड़ीक निकट गंगासागर तीर्थ लग कपिल सगरक ६०००० पुत्र / सैनिककेँ जरा देलन्हि तखन ओ कपिलेश्वर अएलाह। एखन गंगासागर सेहो समुद्रसँ कनेक हटि कए अछि। जानकी नवमी- वैशाख शुक्ल नवमी- मानुषी। रामनवमी- चैत्र शुक्ल नवमी। विद्यापतिक मृत्यु तिथि कार्तिक धवल त्रयोदशी-देसिल बयना । विवाह पंचमी- अगहन शुक्ल पंचमी। शतानन्द पुरहित-राम सीताक विवाह। मरवापर मिथिला चित्रकला आ परिचन, गोसाउन गीत आ नैना जोगिन ओहिना जेना जुगल सरकारक विवाहमे भेल रहए, आइयो। मिथिला प्राचीन कालमे मैथिलक भूमि विदेहक नामसँ- जकर राजधानी मिथिला रहए- स्थापना मिथी (भविष्य पुराण) द्वारा। दोसर नाम विदेह, मिथिला, तीरभुक्ति, तिरहुत, तपोभूमि, साम्भवी, सुवर्णकानन, मँतिली। मिथिला माहात्म्य (वृहद विष्णु पुराण)- वृहद परिक्रमा- सम्पूर्ण मिथिलाक परिक्रमा एक सालमे। 268 कि.मी.। कौशिकीसँ शुरू भए सिघेश्वर स्थान, ओतएसँ सिमरियाघाट, फेर हिमालयक फुटहिल्स, फेर कौशिकी होइत सिँघेश्वरस्थान। मध्य परिक्रमा- 40 कोस (128 कि.मी) 5 दिनमे, मुदा आइ-काल्हि 15 दिनमे। फाल्गुन शुक्ल पक्षक पहिल तिथिकेँ (अमावस्या) दिन शुरू होइत अछि आ पूर्णिमा दिन खतम होइत अछि। फागुनक परिक्रमा सभसँ बेशी प्रसिद्ध अछि मुदा परिक्रमा कातिक आ बैशाखमे सेहो कएल जा सकैत अछि। पाणिनी- मिथिला ओ नगरी छी जतए शत्रुक मर्दन कएल जाइत अछि। जनक- जन (विश)सँ व्युत्पत्ति। निमी द्वारा वैजयंती (जनकपुर) आ मिथी द्वारा मिथिला नगरक स्थापना। शरभ नकुलक झंडापर रहए, मिथिकल जानवर जकरा दू टा माथ, दू टा पाँखि, एकटा नमगर पुच्छी, आ सिँह जकाँ 8 टा नह होइत अछि। जखन भगवन विष्णु नरसिंह अवतार लेलन्हि तखन हुनका प्रसन्न करबाक लेल शिव शरभक रूपमे जन्म लेलन्हि। मिथिला चित्रकलाक पाँच रंग- क्षिति, जल, पावक, गगन, समीरक द्योतक। अंकुश- दू फेँरक बरछा- स्पीयर जाहिसँ हाथीकेँ नियंत्रित करैत छी, गणेश जीक अंकुश मूसकेँ नियंत्रित करैत अछि। यूनीकोड- 1200 साल पुरान फिगराइन आ 500 साल पुरान पाण्डुलिपि। संयुक्ताक्षर- कोष्ठकक संख्या जे बंगालीमे नहि अछि वा बिल्कुल अलग अछि- कवर्ग (10), खवर्ग (4), गवर्ग (8), घवर्ग (4), ङ वर्ग (4) चवर्ग (6), ज वर्ग (5), झ वर्ग (4) ट वर्ग (3), ठ वर्ग (2), ड वर्ग ( 2), ढ वर्ग (3), ण वर्ग (6), त वर्ग (6) , थ वर्ग (3), द वर्ग (8), ध वर्ग (3), न वर्ग (6) प वर्ग (8), फ वर्ग (2), ब वर्ग (4), भ वर्ग (3), म वर्ग (11) अंत-संयुक्ताक्षर य वर्ग (2), र वर्ग (2), ल वर्ग (4), व वर्ग (4), श वर्ग (9), ष वर्ग (8), स वर्ग (8), ह वर्ग (8) तीन वर्णक संयुक्ताक्षर- (49) चारि वर्णक संयुक्ताक्षर (1) बिकारी (1), ग्वंग ह्रस्व-दीर्घ (2), अंजी एक टाइप अंशुमन पाण्डे द्वारा वर्णित (5) प्रकार आर। संस्कृत-अवह्ठक विद्यापतिक नेपाल लखिमाक संग पलायन- घुरलाक बाद अंतिम रचना दुर्गा भक्ति तरंगिणी ज्योतिरीश्वर पूर्व विद्यापति झूमर, नचारी, महेशवाणी, जोग उचिती, बटगवनी, परिछनि, कोबर, पराती, बारहमासा, मान, तिरहुत, दृश्यकूट, शिव, भगवती आ गंगा, विष्णु, शक्ति, हर-गौरीक विषयमे गीत लिखलनि| गजेन्द्र ठाकुर ggajendra@videha.com अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। २. गद्य २.१.उमेश मण्‍डल- जगदीश प्रसाद मण्‍डलक रचना संसार- संक्षि‍प्‍त परि‍चय २.२.जगदीश प्रसाद मण्‍डल-उपन्‍यास- बड़की बहि‍न (आगाँ..) २.३.साक्षात्‍कार श्री राजदेव मण्‍डलक संग २.४.जगदीश प्रसाद मण्डल-रत्नाकर डकैत (एकांकी) २.५.ओम प्रकाश- गजलक लेल (समीक्षा) २.६.१.जगदीश प्रसाद मण्‍डलक वि‍हनि‍ कथा- जनक हाथे खेती २.बिन्देश्वर ठाकुर- बिपतियाक विदेश [विहनि कथा] २.७.उमेश मण्‍डल- वि‍देह नाट्य उत्‍सव- २०१३ २.८.प्रो. हरिमोहन झाक पुण्यतिथि मनाओल गेल- संवाद- सुमित आनन्द उमेश मण्‍डल जगदीश प्रसाद मण्‍डलक रचना संसार- संक्षि‍प्‍त परि‍चय जगदीश प्रसाद मण्‍डल जीक जन्‍म 05 जुलाई 1947 ई.केँ मधुबनी जि‍लाक लखनौर ब्‍लौकक बेरमा गाममे भेलन्‍हि‍। साहित्‍य लेखन 2000 ई.क पछाति‍सँ करए लगलाह। शि‍क्षा- एम.ए. (राजनीति‍ शास्‍त्र आ हि‍न्‍दी)। जीवि‍कोपार्जन- कृर्षि। बेरमा गामक कृर्षि-कार्यमे, सामाजि‍क आन्‍दोलनमे बढ़ि‍-चढ़ि‍ कऽ भाग लऽ अपन एक गोट वि‍शि‍ष्‍ट ओ फराक छवि‍ बनौने छथि‍। जगदीश प्रसाद मण्‍डलक साहि‍त्‍य वि‍धाक वि‍वि‍ध क्षेत्रमे योगदान छन्‍हि‍। हि‍नक गद्य एवं पद्यमे प्रकाशि‍त ि‍नम्नांकि‍त रचना अछि‍- गद्य साहि‍त्‍य- कथा संग्रह- “गामक जि‍नगी”, “सतभैंया पोखरि”, “तरेगन”, “बजन्‍ता-बुझन्‍ता”, “उलबा चाउर”, “शम्‍भु दास” एवं “अर्द्धांगि‍नी..., सरोजनी..., सुभद्र...., भाइक सि‍नेह.... इत्‍यादि‍...”, उपन्‍यास- “मौलाइल गाछक फूल”, “उत्‍थान-पतन”, “जि‍नगीक जीत”, “जीवन-मरण”, “जीवन-सघर्ष” “सधवा-वि‍धवा” तथा “बड़की बहि‍न” नाटक- “मि‍थि‍लाक बेटी”, “कम्‍प्रोमाइज” आ “झमेलि‍या बि‍आह” एकांकी- “पंचबटी” पद्य साहि‍त्‍य- कवि‍ता संग्रह- “इन्‍द्रधनुषी अकास”, “राति‍-दि‍न” और “सतबेध” गीत संग्रह- “गीतांजलि‍”, “तीन जेठ एगारहम माघ”, आ “सरि‍ता” समाजक कल्‍याणमे अपन कल्‍याण देखब, बूझब आ वि‍श्वास करब तथा ओइ पथपर सतत् डेगे-डेग, समए परि‍स्‍थि‍तकेँ धि‍यानमे राखि‍ आगू मुहेँ चलब, चलैत रहब जगदीश जीक अपन सर्ववि‍दि‍त पहि‍चान रहल छन्‍हि‍। काज (शारीरि‍क श्रम), भोजन आ आरामकेँ एक सहतपर लऽ कऽ चलब, हि‍नक जीवनक क्रि‍या-कलापक महत्‍वपूर्ण हि‍स्‍सा रहल अछि‍। ओना सामाजि‍क आन्‍दोलनक परि‍पेक्ष्‍यमे कतेको बेर जेल-यात्रा सेहो करए पड़लन्‍हि‍‍। हि‍नकर साहित्‍यमे ग्राम्‍य लोकक जि‍जीवि‍षाक वर्णन आ नव दृष्‍टि‍कोण दृष्‍टि‍गोचार होइत अछि‍। हि‍नक रचना करबाक कला-कौशल मैथि‍ली साहि‍त्‍यमे फराक स्‍थान रखैए। हि‍नका वि‍षयमे प्रख्‍यात साहि‍त्‍यकार श्री गजेन्‍द्र ठाकुर लि‍खै छथि‍- “जगदीश प्रसाद मण्‍डल शि‍ल्‍पी छथि‍, कथ्‍यकेँ तेना समेटि‍ लैत छथि‍ जे पाठक वि‍स्‍मि‍त रहि‍ जाइत अछि‍। मुदा हि‍नका द्वारा कथ्‍यकेँ (कथा, उपन्‍यास, नाटक, वि‍हनि‍ कथा, प्रेरक-कथा, कवि‍ता सभमे) उद्देश्‍यपूर्ण बनेबाक आग्रह आ क्षमता हि‍नका मैथि‍ली साहि‍त्‍यमे ओहि‍ स्‍थानपर स्‍थापि‍त करैत अछि‍, जतएसँ मैथि‍ली साहि‍त्‍यक इति‍हास “जगदीश प्रसाद मण्‍डलसँ पूर्व” आ “जगदीश प्रसाद मण्‍डलसँ” एहि‍ दू खण्‍डमे पाठि‍त होएत। समाजक सभ वर्ग हि‍नकर कथ्‍यमे भेटैत अछि‍ आ से अलंकारि‍क रूपमे नहि‍ वरन् अनायास, जे मैथि‍ली साहि‍त्‍य लेल एकटा हि‍लकोर अएबाक समान अछि‍। हि‍नकर कथ्‍यमे कतहु अभाव-भाषण नहि‍ भेटत, सभ वर्गक लोकक जीवन शैलीक प्रति‍ जे आदर आ गौरव ओ अपन कथ्‍यमे रखैत छथि‍ से अद्भुत। हि‍नकर कथ्‍यमे नोकरी आ पलायनक वि‍रूद्ध पारम्‍परि‍क आजीवि‍काक गौरव महि‍मा मंडि‍त भेटैत अछि‍। आ से प्रभावकारी होइत अछि‍ हि‍नकर कथ्‍य आ कर्मक प्रति‍ समान दृष्‍टि‍कोणक कारणसँ आ से अछि‍ हि‍नकर व्‍यक्‍ति‍गत आ सामाजि‍क जीवनक श्रेष्‍ठताक कारणसँ। जे सोचैत छी, जे करैत छी सहए लि‍खैत छी- ताहि‍ कारणसँ। यात्री आ धूमकेतु सन उपन्‍यासकार आ कुमार पवन आ धूमकेतु सन कथा-शि‍ल्‍पीक अछैत मैथि‍‍ली भाषा जनसामान्‍यसँ दूर रहल। मैथि‍ली भाषाक आरोह-अवरोह मि‍थि‍लाक बाहरक लोककेँ सेहो आकर्षित करैत रहल अा ओही भाषाक आरोह-अवरोहमे समाज-संस्‍कृति‍ भाषासँ देखाओल जगदीशजीक सरोकारी साहि‍त्‍य मि‍थि‍लाक सामाजि‍के क्षेत्र टामे नहि‍ वरन् आर्थिक क्षेत्रमे सेहो क्रान्‍ति‍ आनत।”[1] “हि‍नक गामक जि‍नगीक सभटा कथा उत्‍कृष्‍ट अछि‍, रि‍क्‍त स्‍थानक पूर्ति करैत अछि‍ आ मैथि‍ली साहि‍त्‍यक पुनर्जागरणक प्रमाण उपलब्‍ध करबैत अछि‍।”[2] गामक जि‍नगी- (लघुकथा संग्रह) प्रकाशन वर्ष- 2009, ISBN- 978-81-90772-94-5. ऐ कथा संग्रहमे मि‍थि‍लाक ग्राम्‍य जीवनक मौलि‍क आ अकृत्रि‍म छवि‍ अभि‍व्‍यक्‍त भेल अछि‍। आजुक संक्रमणकालि‍क युगमे मिथि‍लाक गाम कोन तरहेँ परम्‍परि‍त जीवन पद्धति‍, आस्‍था एवं वि‍श्वासक संग प्रबल जि‍जीवि‍षाक बलेँ संघर्ष पथपर आरूढ़ अछि‍ तेकर सूक्ष्‍म विश्लेषण भेल अछि‍। श्रमपर वि‍श्वास, इमानदारी प्रयास, कर्मण्‍यता एवं चातुर्यक संबलसँ वि‍पन्नतापर वि‍जयक ई गाथा सभ मिथि‍लाक जन-जीवनमे व्‍याप्‍त उत्‍साह ओ संघर्षक मर्मस्‍पर्शी चि‍त्र प्रस्‍तुत करैत अछि‍। उन्नैस गोट कथाक ई संकलन अछि‍। कथाक शीर्षके बहुत कि‍छु स्‍पष्‍ट करैत अछि‍- “भैंटक लावा”, “िबसाँढ़”, “पीरारक फड़”, “अनेरुआ बेटा”, “दूटा पाइ”, “बोिनहािरन मरनी”, “हािर-जीत”, “ठेलाबला”, “जीिवका”, “िरक्साबला”, “चुनवाली”, “डीहक बटबारा”, “भैयारी”, “बहीन”, “घरदेिखया”, “पछताबा”, “डाक्टर हेमन्त”, “बाबी” एवं “कािमनी”। अर्द्धांगि‍नी..., सरोजनी..., सुभद्र...., भाइक सि‍नेह.... इत्‍यादि‍... (लघुकथा संग्रह) प्रकाशन वर्ष- 2012, ISBN : 978-93-80538-42-6. ऐ संग्रह कथा सभमे नोकरि‍हाराक संत्रास, नारी वि‍मर्श, दलि‍त वि‍मर्श, परि‍श्रमी कृषकक उल्‍लास, पावनि‍‍-ति‍हारमे पैसल अन्‍धवि‍श्वास, ग्राम जीवनमे जातीय व्‍यवसाय केर महत्‍व, टुटैत सम्‍बन्‍ध-बन्‍ध, मि‍थि‍लाक सामाजि‍क आर्थिक ओ राजनीति‍क जीवनमे होइत परि‍वर्त्तन, सामाजि‍क आर्थिक धार्मिक शोषण, नागर जीवनक चाक चि‍क्‍य, जीवनक सौहार्दपूर्ण वातावरणक प्रति‍ आकर्षन इत्‍यादि‍ बि‍न्‍दु सभपर अति‍ सूक्ष्‍म वि‍श्लेषण भेल अछि‍। 20 गोट कथाक ई संग्रह अछि‍ यथा- “दोहरी मारि”, “केना जीब?”, “नवान”, “तिलासंक्रान्तिक लाइ”, “भाइक ि‍सनेह”, “प्रेमी”, “बपौती सम्‍पति”, “डंका”, “संगी”, “ठकहरबा”, “अतहतह”, “अर्द्धांगि‍नी”, “ऑपरेशन”, “धर्मनाथ”, “सरोजि‍नी”, “सुभद्रा”, “सोनमा काका”, “दोती बि‍आह”, “पड़ाइन” और “कतौ नै”। सतभैंया पोखरि‍- (लघुकथा संग्रह) प्रकाशन वर्ष- 2012, ISBN : 978-93-80538-80-8. ऐ संग्रह कथाक शीर्षक अछि‍- ‍“बि‍हरन”, “मायराम”, “गोहि‍क शि‍कार”, “मातृभूमि”, “भबडाह”, “परि‍वारक प्रति‍ष्‍ठा”, “फागु”, “लफक साग”, “ति‍लकोरक तरूआ”, “एकोटा ने”, “धोतीक मान”, “साझी”, “सतभैंया पोखरि”, “न्‍याय चाही”, “पनि‍याहा दूध”, “कर्ज”, “परदेशी बेटी”, “मान” आ “मनोरथ” कथाक एक अनुपम संग्रह थि‍क। एे संग्रहमे उन्नैस गोट कथा संग्रहि‍त अछि‍। श्रद्धा, भक्‍ति‍, बन्‍धुत्‍व, अन्‍धवि‍श्वास, समाजमे मनुखक खरीद-वि‍क्री, गाए-महिंस, खेत-पथार, समाजक बुुनाबटि‍पर वैदि‍क प्रभाव, नीक तँ कि‍एक, अधला तँ कि‍एक आ केहेन इत्‍यादि‍ वि‍भि‍न्न वि‍षयपर लि‍खल कथा-कृर्ति अछि‍। तरेगन- (बाल प्रेरक वि‍हनि‍ कथा संग्रह) पहि‍ल प्रकाशन- 2009 आ दोसर- 2012 ई.मे। ISBN : 978-93-80538-25-9. 110 गोट बाल प्रेरक वि‍हनि‍ कथाक संग्रह थि‍क तरेगन। जहि‍ना मेघमे तरेगन अपन-अपन चमकसँ सम्‍पूर्ण आकासकेँ जगमगेने रहैत तहि‍ना ऐ संग्रहक छोट-छोट कथा सम्‍पूर्ण संग्रहकेँ जगमगा देने अछि‍। अनेक वि‍षयकेँ समेटने अछि‍ ई संग्रह। एकर शीर्षकहि‍सँ बहुत कि‍छु बूझल-परखल जा सकैए- “उत्थान-पतन”, “प्रतिभा”, “मर्म”, “अधखड़ुआ”, “समैक बरबादी”, “पहिने तप तखन ढलिहेँ”, “खलीफा उमरक सि‍नेह”, “जखने जागी तखने परात”, “अस्तित्वक समाप्ति”, “खजाना”, “उग्रघारा”, “जाति नै पानि”, “ऊँच-नीच”, “पागलखाना” इत्‍यादि-इत्‍यादि‍‍। बजन्‍ता-बुझन्‍ता- (वि‍हनि‍ कथा संग्रह) ISBN : 978-93-80538-89-1. प्रकाशन- 2012 ई.मे। 67 गोट वि‍हनि‍ कथाक ई संग्रह थि‍क। अहू संग्रहक कथा सभ अनेकानेक वि‍षय-बि‍म्‍बपर लि‍खल अछि‍। जइमे नारी वि‍मर्श, दलि‍त वि‍मर्श, साम्‍प्रदायि‍क सौहार्द, महि‍ला सशक्‍तीकरण, प्रकृति‍ वर्णन इत्‍यादि‍ वि‍षय-वस्‍तु सहजाक संग रूपायि‍त भेल अछि‍।  67 गोट महत्‍वपूर्ण वि‍हनि‍ कथाक ई संग्रह अछि‍। एक नजरि‍ कि‍छु शीर्षकपर देल जाए- “बुधनी दादी”, “अकास दीप”, “खि‍लतोड़”, “मुँह-कान”, “अनदि‍ना”, “अपन काज”, “पुरनी भौजी”, “छूटि‍ गेल”, “अप्‍पन हारि”, “कनफुसकी”, “मुँहक बात मुँहेमे”, “गति‍-गुद्दा”, “बि‍सवास”, “कचहरि‍या-भाय”, “गुहारि”, “पनचैती”, “कचोट”, “अजाति”‍, “चौकीदारी”, “मुसाइ पंडि‍त”, “भरमे-सरम”, “देखल दि‍न”, “पहाड़क बेथा”, “उमकी”, “बजन्‍ता-बुझन्‍ता”, “चर्मरोग”, “शंका”, “ओसार”, “रमैत जोगी बहैत पानि”, “कोसलि‍या”, “हूसि‍ गेल”, “पोखला कटहर”, “सरही सौबजा”, “तेरहो करम”, “डुमैत ि‍जनगी”, “चोर-सि‍पाही”, “दूधबला”, “समदाही”, “बुढ़ि‍या दादी” इत्‍यादि‍। उलबा चाउर- (लघुकथा संग्रह) ISBN : 978-93-80538-95-6. सामंती संस्‍कार, सभ्‍य समाज, शुद्धतावादी सोच, प्रगति‍शील चेतना, वि‍लुप्‍त होइत मि‍थि‍लाक व्‍यंजन, हहरैत वैदि‍क परम्‍परा, शब्‍दजाल, सुतर्कक वैशि‍ष्‍टय, पूजीवादी होरमे भँसि‍आइत लोक इत्‍यादि‍ अनेक वि‍षय-वस्‍तु ऐ संग्रहक कथा सभमे सहजता पूर्वक देखल गेल अछि‍। कि‍छु महत्‍वपूर्ण शीर्षकपर दृष्‍टि‍पात कएल जाए- “सूदि‍ भरना”, “जन्‍मति‍थि”, “इमानदार घूसखोर”, “पटि‍याबला”, “सनेस”, “उलबा चाउर”, “कलंक”, बलजोर”, “दोस्‍ती नै धारैए” इत्‍यादि‍। शंभुदास- (दीर्घ कथा संग्रह) ISBN : 978-93-80538-74-7. पहि‍ल प्रकाशन- 2012 ई.मे। तीन गोट दीर्घकथाक संग्रह अछि‍। “शंभुदास”, “मइटुग्गर” एवं “फाँसी” शीर्षक अछि‍। शंभुदास- कथाक वि‍षय-वस्‍तु बड़ व्‍यापक अछि‍। मि‍थि‍लाक गाम-गाममे पसरल कला-प्रेमीक, कलाकारक खि‍स्‍सा ऐ कथा मध्‍य कहल गेल अछि‍। मइटुग्‍गर- मइटुग्‍गर अर्थात जन्‍महि‍ काल धीरज आ घुरनीक जौआँ बच्‍चाक माए मरि‍ जाइ छथि‍न। पि‍ता तपेसर आ दादी संग पल्हलनि‍क बदौलति‍ बच्‍चाक पालन-पोसन होइ छैक। क्रमश: दुनू बच्‍चाक जीवन-लीलाक प्रारम्‍भ होइत छै आ कथा सेहो आगू बढ़ैत अछि‍। फाँसी- संग्रह तेसर दीर्घकथा छी। मनुखमे अपराध वृत्ति‍ केना पनपैत अछि‍ आ तकर प्राय: छोट-छोट अनेक कारकक छोट-छोट तन्‍तुपर वि‍चार करैत बहुत दूर धरि‍ कथा-यात्रा होइत अछि‍। मौलाइल गाछक फूल- (उपन्‍यास) ISBN : 978-93-80538-02-0. प्रकाशन- 2009 ई.मे। लेखकक ई पहि‍ल उपन्‍यास छि‍यन्‍हि‍। आदर्शवादी वि‍चारधारासँ ओतप्रोत ऐ उपन्‍यासमे हि‍नक उदात्त सामाजि‍क चि‍न्‍तनक प्रक्षेपण भेल अछि‍। उपन्‍यासक केन्‍द्रि‍य पात्र रमाकान्‍तक ई अवधारणा छन्‍हि‍ जे संसारक सभ मनुक्‍खकेँ जीबाक अधि‍कार छै। सभकेँ सभसँ सि‍नेह हेबाक चाहि‍ऐक। सि‍नेह, ति‍याग, संघर्ष, प्रकृति‍क वि‍पदा, खेत-पथार, पोखरि‍-झाखरि‍ इत्‍यादि‍क संग मि‍थि‍लाक वि‍भि‍न्न पहलूपर नजरि‍ दैत मद्रासक सेहो बहुत अद्भुत चि‍त्रण भेल अछि‍। द्वैतवाद, धर्म, सम्‍प्रदाय, अध्‍यात्‍म इत्‍यादि‍ वि‍षयक चि‍न्‍तन अति‍ सूक्ष्‍मताक संग ऐ उपन्‍यासमे ठाम-ठाम सरल-भाषा आ हल्‍लुक बि‍म्‍बमे परि‍णति‍ कएल गेल अछि‍। उत्‍थान-पतन- (उपन्‍यास) ISBN : 978-93-80538-11-2. प्रकाशन- 2009 ई.मे। श्री राजदेव मण्‍डल ऐ उपन्‍यासक आमुखकार छथि‍। ओ लि‍खै छथि‍- “गामक जड़ता, रीति‍-रि‍वाज, पावनि‍-ति‍हार, मूर्खता, वि‍द्वता, अड़ि‍ जाइबला भाव आ सहज स्‍वभाव आदि सहज रूपमे ऐ उपन्‍यासमे आएल अछि‍। कथावस्‍तुमे बि‍च्‍छि‍न्न होइत गाम-घर आ टुटैत परि‍वार, सबहक समस्‍याक मार्मिक ढंगसँ अभि‍व्‍यक्‍ति‍ कएल गेल अछि‍। उपन्‍यासक प्रारम्‍भ होइत अछि‍- ‘गामे-गाम, कतौ अष्‍टयाम-कीर्तन तँ कतौ नवाह, कतौ चण्‍डी यज्ञ तँ कतौ सहस्‍त्र   चण्‍डी यज्ञ होइत। जइठाम एगारहटा ग्रह एकत्रि‍त भऽ गेल अछि‍। तइठाम तँ अनुमानो कम्मे हएत। परोपट्टा भगवानक नामसँ गदमि‍सान होइत। जाधरि‍ लोक कीर्तन मंडलीक संग मंडपमे कीर्तन करैत ताधरि‍ घरक सभ सुधि‍-बुधि‍ बि‍सरि‍ मस्‍त भऽ रहैत। मुदा घरपर अबि‍तहि‍... बच्‍चाकेँ बाइस-बेरहट लेल ठुनकब सुनि‍ व्‍यथाकेँ दबैत सभ आँखि‍र नोर होइत बहबैत।’ सामाजि‍क उत्‍थान करऽ बला बेकतीकेँ गामक एहि‍ परम्‍परा आ धार्मिक आडम्‍बरसँ संघर्ष करऽ पड़ैत अछि‍। लेखक अपना पात्रक द्वारा अंधवि‍श्वासकेँ तोड़ि‍ परि‍वर्त्तन अनबाक प्रयास कएने छथि‍।”[3] ऐ उपन्‍यासक भाषा गाम-घरक बोल-चालक भाषा अछि‍। साधारण जनक बोली आ नूतन शब्‍दक प्रयोग ऐ उपन्‍यासमे प्रचुरताक संग देखल जा सकैत अछि‍। जि‍नगीक जीत- (उपन्‍यास) ISBN : 978-93-80538-10-5. प्रकाशन- 2009 ई.मे। अदौसँ मि‍थि‍ला श्रमजीवी, ति‍यागी महापुरुषक राज रहल अछि‍। व्‍यक्‍ति‍क वि‍कास समाजक मौलि‍क काजक श्रेणीमे अबैत अछि‍। एकर चि‍त्रण लेल उपन्‍यासकार देवन नामक पात्रक अवतारणा करैत अछि‍। सोन तँ कान नै..., बला संकटपर सजग ि‍मथि‍लानी सुमि‍त्राक बेवहार आ वि‍चार सहजताक संग सहज बनबैत अछि‍। जेकर चि‍त्रण अत्‍यन्‍त रोचक आ मार्मिक ढंगे प्रस्‍तुत कएल गेल अछि‍, जे उपन्‍यासमे पठनीयताक स्‍तर बढ़बैत अछि‍। सुमि‍त्रा आ हुनक पुत्र बच्‍चे लाल जे शि‍क्षक छथि‍ ति‍नका संग अच्‍छेलाल जे बोनि‍हार रहै छथि‍, दुनू परि‍वारक सम्‍बन्‍ध ऐ तरहेँ स्‍थापि‍त होइए जेकर एकटा नव आधार-आर्थिक आधार-क परि‍कल्‍पना सुमि‍त्रा द्वारा कएल गेल। तकर सफलता उपन्‍यासकार ऐ तरहेँ देखौलनि‍ जे आजुक वि‍चारणीय बि‍न्‍दु अछि‍। जीवन-मरण- (उपन्‍यास) ISBN : 978-93-80538-26-6. पहि‍ल प्रकाशन- 2009 आ द्वि‍तीय- 2012 ई.मे। चि‍ड़ै सदृश जीवन-पद्धति‍ संयुक्‍त परिवारक महत्‍वकेँ तहस-नहस कऽ देने अछि‍। उपन्‍यासक पात्र डॉ. देवनन्‍दन जे मि‍थि‍लासँ बाहर रहै छथि‍, माए-पि‍ताजीकेँ सेहो ओतहि‍ रखने छथि‍। पि‍ता-रघुनंदनक मृत्‍यु भऽ जाइ छन्‍हि‍। मेडि‍कलमे पढ़ैत दुनू पुत्र सलाह दइ छन्‍हि‍ ओही शवदाह गृहमे दाह-संस्‍कार होन्‍हि‍। गाम जेबाक कोनो प्रयोजन नै! मुदा डाक्‍टर देवनंदन कहै छथि‍न- “बच्चा, सभ जीव-जंतुकेँ अपन-अपन जिनगी होइत अछि। जे जइ जिनगीमे जीबैत अछि ओकरा लेल वएह जिनगी आनन्ददायक होइत अछि....।”[4] पिताक बात सुनि दयानन्द पुछलखिन- “ई तँ बड़ आश्चर्यक बात कहै छी, बाबू?” दयानन्दक जिज्ञासा देखि‍ देवनन्दन कहलखिन- “कोनो आश्चर्य नै। गामक दोसर नाओं समाजो छिऐ। जे शहर-बजारमे नै अछि। समाजमे बंधन अछि जइ अनुकूल लोक चलैत अछि जेकरा सामाजिक बंधन कहल जाइत छै। एे बंधनक भीतर धर्मक काज छिपल अछि जेकरा सभ मिलि निमाहैत अछि। मुदा शहरमे से नै छै। कानून-कायदाक हिसाबसँ चलैत अछि जइमे दया-प्रेम नै अछि। प्रतिदिन बुढ़ाकेँ दस गोटेक जिनगीक बात सुनब आ दस मिनट बजैक जे अभ्यास लगि गेल छन्हि से एेठाम केना हेतनि। सभ अपने पाछू बेहाल रहैए। के केकर सुख-दुख, जीवन-मरण सुनत। भरि पेट नीक अन्ने-तीमन खुऔने लोकक मन अस्‍थि‍र थोड़े रहि सकैए। जाधरि आत्माक संतुष्‍टि‍ नै हेतैक?”[5] अही तरहेँ उपन्‍यासक आरम्‍भ होइत अछि‍। ऐ उपन्‍यासक केन्‍द्रि‍य पात्र रघुनंदन छथि‍। जि‍नकर कथा-व्‍यथा आदि‍क शुरूआत हुनक मृत्‍यु दि‍नसँ शुरू होइत अछि‍। जीवन-संघर्ष- (उपन्‍यास) ISBN : 978-93-80538-27-3. पहि‍ल प्रकाशन- 2009 ई. आ दोसर 2012 ई.मे। ऐ उपन्‍यासमे ग्रामीण समाजक एक-एक तन्‍तुकेँ दृष्‍टि‍पात करैत वि‍कासक बाधक ओझरीकेँ सोझरेबाक सफल प्रयास भेल अछि‍। सामाजि‍कताकेँ कमजोर करबाक जे कोनो कारक अछि‍ तकर चि‍त्रण करैत यथोचि‍त नव बाट देखेबाक सफल प्रयत्न उपन्‍यासकार केलन्‍हि‍ अछि‍। “सभ गाममे दस-बीसटा लुच्‍चा-लम्‍पट रहि‍ते अछि‍। जे सदि‍‍काल ि‍कछु ने ि‍कछु उकठ समाजमे करि‍ते रहैत अछि ताड़ी-दारू पीब अनेरे ककरो गरि‍यबैत रहैत अछि। माए-बहि‍नकेँ देखि‍ पीहकारी भरैत रहैत अछि‍। झुठ-फुस‍ ि‍सखा लकठी लगबैत रहैत अछि ओहन-ओहन वृत्ति‍ केनि‍हारक वृत्ति‍केँ रोकब समाजक दायि‍त्‍व बनि‍ जाइत अछि हमहूँ सएह ने केलौं जँ दुर्गा-पूजामे रामेश्वरम् नै गेल रहि‍तौं तँ एहेन घटना थोड़े गाममे होइत...।”[6] “...बैसारेमे ि‍कछु चक-चुक भऽ गेलै। समाजोकेँ धन्‍यवाद दी जे गलत काजक ि‍वरोधमे एकजुट भऽ ठाढ़ भेल। मुदा गलति‍यो केनि‍हार तँ बेवस्‍थेक फूल-फड़ छी, तँए ओहो कमजोर नहि‍ये अछि‍।”[7] प्रो. दयानन्‍दक बात सुि‍न प्रो. कमलनाथ कहलखि‍न- “देखि‍यौ, कोनो स्‍थानपर पहुँचैले रस्‍तो अनेक आ सबारि‍यो अनेक तरहक होइ छै मुदा चलनि‍हार जँ यएह सोचैत रहि‍ जाए जे ई नीक ि‍क ओ, तहन ओ पहुँचि‍ केना सकैत अछि अपना इलाकाक दुर्भाग्‍य रहल अछि‍ जे िवचारक क्षेत्रमे पैघ-पैघ वि‍चार कऽ लइ छी मुदा कर्मक बेर‍मे शि‍थि‍ल भऽ जाइ छी। कोनो िवचार ताधरि‍ महत्‍वक नै बनैत जाधरि‍ कर्मरूपमे नै अाओत...।”[8] वि‍कासवादी प्रक्रि‍यामे प्रगति‍शील चेतनाकेँ जोड़ि‍ ओइमे नव गति‍ आनि‍ मि‍थि‍लाक सुदूर गाम सि‍सौनी आ बँसपुराक जनजीवनक अत्‍यंत मार्मिक चि‍त्र प्रस्‍तुत भेल अछि‍। महि‍ला संग होइत अन्‍यायक चि‍त्रण, बाढ़ि‍-रौदीसँ त्रस्‍त जन-जीवन, धर्मभि‍रू लोकक कारनामा, प्राकृति‍क वि‍पदा, इत्‍यादि‍ अनेक वि‍षयक दृष्‍यावलोकन करैत उपन्‍यासकार सुन्‍दर चि‍त्रण कलन्‍हि‍ अछि‍। सधबा-वि‍धबा- (उपन्‍यास) ISBN : 978-93-80538-92-8. नव युग नारीक नव-नव सन्‍दर्भक संधान केलक अछि‍। आधुनि‍क चकाचौंधसँ अपरि‍चि‍त महि‍ला, गरीबीक जालमे फँसल महि‍ला, पलायनसँ टुटैत सम्‍बन्‍धक सुन्न भेल कोठरीमे औनाइत महि‍ला, वि‍धवा आ सधवा नारीक समस्‍या इत्‍यादि‍-इत्‍यादि‍ प्रकारक नारीक बुनि‍यादी समस्‍या सबहक चि‍त्रण कएल गेल अछि‍। सरोजनी-मैयाँ आ रूक्‍मि‍णीक कि‍छु कथोप-कथनपर नजरि‍ देल जाए- “रूक्‍मि‍णी, मनमे उठि‍ गेल छल जे पेंइतीसे बर्खक अवस्‍थामे वि‍धवा भेल रही आ अहँूकेँ देखै छी जे अही उमेरमे पति‍सँ सम्‍बन्‍ध वि‍च्‍छेद भेल।” मैयाँक बात सुनि‍ते रूक्‍मि‍णी चमकि‍ कऽ चमचमेली- “मैयाँ, हि‍नकर अखन कते उमेर छन्‍हि‍?” “सत्तरि‍म छी।” “परि‍वारमे के सभ छन्‍हि‍?” “कि‍यो ने। असकरे।” मैयाँक असकर सुनि‍ रूक्‍मि‍‍णीक मनमे ठहकल अपनो जि‍नगी तँ भरि‍सक तहि‍ना अछि‍। बाजलि‍- “असकर लेल लोक घर-दुआर बना कि‍अए रहत, ओ परि‍वार केना भेल?”[9] बड़की बहि‍न- (उपन्‍यास) ISBN : 978-93-80538-93-5. मनोवि‍ज्ञानक घात-परि‍घात और अन्‍तर्विरोधमे कुहाइत-पि‍साइत नारीक अत्‍यन्‍त संवेदनशीलताक वर्णन ऐ उपन्‍यासक मध्‍य भेल अछि‍। नारीक ओहन-ओहन समस्‍या जे प्राय: चि‍न्‍हि‍त नै भेल अछि‍। तकर सबहक चि‍त्रण ऐ उपन्‍यासमे देखल जा रहल अछि‍। बसमति‍या दीदी आ सुलोचना बहि‍न जे दुनू एक उमेरि‍ये छथि‍। बसमति‍या दीदीकेँ देखि‍ते सुलोचना बहि‍न पुछै छथि‍न- “साले भरि‍मे एते लटैक गेलैं?” दुनूक जि‍नगी बच्‍चेसँ एकठाम बीतने बजैमे कोनो कमी रहबे ने करए। नि‍धोक भऽ बसमति‍या दीदी बजली- “तूँ ने भाए-भाति‍जक कमेलहा खा कऽ गेंड़ा बनि‍ गेलैं, हमरा के देत?” सुलोचना- “कि‍अए भगवान तोरा थोड़े बेपाट छथुन जे नै देनि‍हार छौ?” बसमति‍या- “हँ से तँ अछि‍ये, मुदा जएह कमाएत तेहीमे ने देत। अच्‍छा, कह जे टुटलाहा लग कज्‍जी ने तँ रहलौं। नीक जकाँ हड्डी जूटि‍ गेलौं कि‍ने?” “हँ। आब तँ बाल्‍टीनो उठबै छी, पोतोकेँ कोरो-काँखमे लऽ कऽ खेलबै छि‍ऐ। अपने गाड़ि‍यो छी, आब गामेमे रहब।” “ऐ उमेरमे असकरे रहि‍ हेतौ?”[10] इन्‍द्रधनुषी अकास- (कवि‍ता संग्रह) ISBN : 978-93-80538-46-4. प्रकाशन 2012 ई.। लोक मि‍थि‍लासँ बाहर पलायन करैत छथि‍ तँ मण्डलजीकेँ कचोट होइत छन्हि। मुदा जखन लोक मि‍थि‍लासँ साफे रि‍श्ता-नाता समाप्त कऽ आनठाम बैसि‍ जाइ छथि‍ तँ मण्डल जीक हृदए जेना भोकारि‍‍ पाड़ि‍-पाड़ि‍ कानए लगैत छन्हि। ऐ बातक सहज अनुभूति‍ उड़ि‍आएल चि‍ड़ैमे परि‍लक्षि‍त होइत अछि‍ : “उड़ि‍आएल चि‍ड़ैक ठेकाने कोन उड़ि‍ कतऽ जा बास करत। भरि‍ पोख घोघ भरतै जतऽ दि‍न-राति‍ जा रास करत। ओहन चि‍ड़ैक आशे कोन जे बि‍सरि‍ जाएत डीहो-डावर।”[11] “देखू! देस परदेस कतौ जाऊ मुदा अपन माटि‍ आ अपन संस्कृति‍सँ अपनाकेँ बि‍मुख नै करू। शायद यएह बात थि‍क ऐ कवि‍ताक मूल। अगर आँखि‍ मूनि‍ पलायन करैत रहब आ अवसर एवं सफलता मात्र पेबाक कारणे अपन डीह-डावर सदाक लेल त्यागि‍ लेब तँ भला अहाँ केहेन मनुक्ख! अहाँक केहेन संस्कार? छोट कवि‍ताक माध्यमसँ कतेक पैघ आ   मर्मक बात बजैत अछि‍ जगदीश प्रसाद मण्डल केर कवि‍ मोन! समाजशास्त्रक push आ pull factor अतए स्वत: आबि जाइत अछि। एक आर कवि‍ता- “चल रे जीवन” अहाँकेँ रोकि‍ लेत। कवि‍ता पढ़ु, ओकर शब्दक युग्मकेँ देखू आ कवि‍ताक संग अपने-अापकेँ गति‍मान बना लीअ। ने कवि‍ता रूकत आ ने अहाँ। कविता पढ़ैत जाऊ कल्पना संसारक दुनियामे घुमैत जाऊ। अलंकारसँ मतभि‍न्नता भऽ सकैत अछि मुदा कविताक प्रवाहमे तँ प्रवाहित भइये टा जाएब। वाह रे वाह! एहेन आसाधारन सम्बन्ध कवि‍ता आ पाठकक बीच! जीवन गति‍शील थि‍क। ई बात अनेको कवि‍ अनेको भाषा आ कालमे अपना-अपना ढंगसँ कवि‍ताक माध्यमे कहने छथि‍। मुदा अही बातकेँ सर्वहाराक शब्दावलीसँ कहब। कहब की चलैत पहि‍यापर एना बैसाएब कि‍ पाठककेँ जोश आबि‍ जाइक। ई कला मण्‍डल जीमे छन्हि‍। कवि‍ताक कि‍छु अंश देखू : ‘कि‍छु दैतो चल कि‍छु लैतो चल कि‍छु कहि‍तो चल कि‍छु सुनि‍तो चल कि‍छु समेटतो चल कि‍छु बटि‍तो चल कि‍छु रखि‍तो चल कि‍छु फेकि‍तो चल बि‍चो-बीच तँू चलि‍ते चल। चल रे जीवन चलि‍ते चल। समए संग चल ऋृतु संग चल गति‍ संग चल मति‍ संग चल। गति‍-मति‍ संग चलि‍ते चल। चल रे जीवन चलि‍ते चल।”[12] “हँ, कवि‍ केवल गति‍मान होमाक प्रेरणा टा नै दैत छथि‍। ओ कहैत छथि‍ जे जोश संगे होशमे रहू : गति‍ संग चल/ मति‍ संग चल/ गति‍-मति‍ संग चलि‍ते चल। अही तरहेँ जाल आ गालक उपमा लऽ कवि‍ लोककेँ अगाह करै छथि‍ : जहि‍ना जाल सभ तरहक माँछकेँ पकड़ैत अछि‍, परन्तु अगर मल्लाह जालकेँ ठीकसँ नै ओछेलक आ काबूमे नै केलक तँ जाल फाटि‍ जाइत छैक, माँछ भागि‍यो जाइत छैक। तहि‍ना मनुष्यकेँ अपन बोलीपर संयम करक चाही- शब्दजाल छी महाजाल जइमे समटल महाकाल देखैमे जहि‍ना वि‍कराल तहि‍ना अछि‍यो महाकाल। सभ कि‍छु भेटत आँखि‍येमे सभ लटकल अछि‍ जालेमे सभ कि‍छु छै गालेमे...।”[13] जाल कविता छायावाद आ याथार्थवादक बीचक कविता अछि। जालक अनेक यंत्र तथा जालसँ माँछ मारबाक प्रक्रियाकेँ मूल मानि एक देसी कविताक विन्यास करबाक अनुपम क्षमता कवि‍मे छन्‍हि‍। राति‍-दि‍न- (कवि‍ता संग्रह) ISBN : 978-93-80538-73-0. पहि‍ल प्रकाशन 2012 ई.मे। मैथि‍लीक नव कवि‍ताक नि‍रन्‍तर वि‍कासमे श्री जगदीश प्रसाद मण्‍डल पूर्ण नि‍ष्‍ठा आ तल्‍लीनताक संग ऐ वि‍कास कर्ममे संलग्‍न छथि‍। दोसर कवि‍ता संग्रह ‘राति‍-दि‍न’ थि‍क। ऐ पोथीमे 52 गोट कवि‍ता संकलि‍त अछि‍। कवि‍ता भाव, बुधि‍ कल्‍पना आर शैलीक समन्‍वि‍त परि‍णाम थीक। ऐ गुण आदि‍सँ अलंकृत मानस सृजनक गम्‍भीर, सचेत प्रक्रि‍यासँ संचालि‍त भऽ सकैत अछि‍। तइ कारणे कवि‍ अत्‍यधि‍क सवेंदनशील होइत अछि‍। हरेक कालावधि‍मे मनुखक अन्‍तस मनमे अभीप्‍सा पालि‍त-पोषि‍त होइत रहै छै आ ओइपर जखन तुषारापात होइ छै तँ जन मानस आन्‍तरि‍क वेदनासँ भरि‍ जाइत छै। मोह भंग भऽ जाइत छै। व्‍यक्‍ति‍क अन्‍तसँ उपजै छै। वि‍द्रोह, कंुठा, आक्रोश, संत्रास, क्षुब्‍धता, आत्‍म रक्षाक सबालादि‍। अही सबहक अभि‍व्‍यक्‍ति‍ मैथि‍लीक नव कवि‍ता थीक। मण्‍डलजी सन सवेंदनशील कवि‍ जे ऐ यथार्थकेँ भोगने छथि‍ से केना चुप्‍प रहि‍ सकैत छथि‍। हुनका लेखनीसँ तँ संघर्षक स्‍वर नि‍कलबे करतैक। “जि‍नगीक होइत संघर्ष। सीमा बीच जखन अबैत मचबए लगैत दुर-घर्ष...।”[14] मनुखक रीत-नीत आ बेवहारमे कतेक परि‍वर्त्तन भऽ गेलैक अछि‍। बदलैत जुग-जमानापर हि‍नकर कहब छन्‍हि‍- “जुग बदलल जमाना बदलल बदलि‍ गेल सभ रीति‍-बेवहार। चालि‍-ढालि‍ सेहो बदलि‍ गेल बदलि‍ गेल सभ आचार-वि‍चार...”[15] अंग्रेजी भाषापर शब्‍दक प्रहार करैत कहैत छथि‍- “अंग्रेजी पढ़ि‍ अंग्रेजि‍या बनि‍-बनि‍ पप्‍पा-मम्मी आनत घर। बाप-दादाक कि‍ भेद ओ बुझत अड़ि‍-अड़ि‍ बाजत नि‍डर।”[16] सतबेध- (कवि‍ता संग्रह) ISBN : 978-93-80538-94-2. पहि‍ल संस्‍करण- 2012 ई.मे। मण्‍डलजीक अनेक कवि‍ता संग्रह मध्‍य सतबेध कवि‍ता संग्रह सेहो एक अनुपम काव्‍य संग्रह अछि‍। मनुक्‍खक ई स्‍वभाव रहलैक अछि‍ जे नीकक जि‍म्‍मा लेइमे तैयार रहत मुदा अधलाक भार से चाहे ओकरे केलहा कि‍एक ने होउ, ओइसँ कात भऽ जाएब पसन्‍द करैत अछि‍। ऐ परि‍पेक्ष्‍यमे कवि‍ कहैत छथि‍न- “अपने हाथक खेल मीत यौ अपने हाथ खेल। संगे-संग दुनू चलैए। इजोत-अन्‍हार बनैत रहैए। हँसि‍-हँसि‍ कानि‍-कानि‍ पटका-पटकी करैत रहैए।”[17] मनुक्‍खक जि‍नगीमे व्‍याप्‍त जे कोनो नीक-बेजाए होइछ तकर जि‍म्‍मा कवि‍ स्‍वयं मानवपर केन्‍दि‍त करैत छथि‍न्‍ह। आगू ईहो कहैत छथि‍न जे- “के केकर हि‍त के केकर मुद्दै दि‍न-राति‍ देखैत रहै छी। गरदनि‍ पकड़ि‍ जे कानए कलपए पकड़ि‍ गरदनि‍ तोड़ैत देखै छी...।”[18] यथार्थवादी चि‍त्रणमे ओ कतेक सजग इमानदार छथि‍ तेकर उदाहरण स्‍पष्‍टत: करैत कहै छथि‍- “हि‍त बनि‍ मि‍लि‍ संग चलैए मुद्दै बनि‍-बनि‍ लड़ैत रहैए। सोझमति‍या चालि‍ पकड़ि‍-पकड़ि‍ झाँखुर-बोन ओझराइत रहैए...।”[19] गीतांजलि‍- (गीत संग्रह) ISBN : 978-93-80538-72-3, पहि‍ल संस्‍करण- 2012 ई.। 51 गोट गीतक संचयन थि‍क गीतांजलि‍। गीतांजलि‍क एक-एक गोट गीतमे भेल शब्‍दक प्रयोगसँ सहजहि‍ बुझाइत अछि‍ जे एक गोट वि‍शि‍ष्‍ठ शब्‍द-साधक रूपमे श्री मण्‍डलजी स्‍थापि‍त भेल छथि‍। वि‍षय-बि‍म्‍ब तँ बेस सम्‍हरि‍ कऽ अख्‍ति‍यार करै छथि‍ जेना- “डगडगाएल हाल पाबि‍ उस्‍सर फूल उस्‍सर सि‍रजैत रहै छै। घूरि‍ ताकि‍ नै भरमए भौरा दि‍वा रसराज कहबैत रहै छै। हाल-बेहाल देखि‍ राग-रागनि‍क कुशल फूल........।”[20] तीन जेठ एगारहम माघ- (गीत संग्रह) ISBN : 978-93-80538-88-4, पहि‍ल संस्‍करण- 2012 ई.मे। 74 गोट गीत-काव्‍यक समायोजन “तीन जेठ एगारहम माघ” पोथीमे केने छथि‍। ऐ पोथीक समर्पणकेँ देखल जाए- “मि‍थि‍लाक वृन्‍दावनसँ लऽ कऽ बालुक ढेरपर बैसल फुलवाड़ी लगौनि‍हारकेँ एवं नव वि‍हान अननि‍हारकेँ समर्पित।”[21] समर्पणक भावसँ सेहो बहुत कि‍छु स्‍पष्‍ट सहजे भऽ जाइत अछि‍। प्राकृति‍ वर्णनमे हि‍नक नव प्रतीक एवं बि‍म्‍ब द्रष्‍टव्‍य अछि‍- “थल-कमल जकाँ कहि‍यो गाढ़-लाल-उज्‍जर बनै छै। तहि‍ना फूल-फल कोढ़ि‍ जकाँ झरि-झरि‍ कोनो फलो बनै छै‍। गाछक रंग बदलि‍ रहल छै मौसम संग...। ” “...बि‍नु तनने घोकचि‍-मोकचि‍ जौं जाड़ माघ अबैत रहै छै। चैतक चेत चेतौनी ओहि‍ना‍ सि‍र जेठ धड़ैत रहै छै। दीनक दि‍न केना...।”[22] सरि‍ता- (गीत संग्रह) ISBN : 978-93-80538-94-9. पहि‍ल संस्‍करण- 2013 ई.। ऐ पोथीमे 51 गोट गीत संकलि‍त अछि‍। संकलि‍त गीतमे “आजादी”, “समाज”, “अबि‍ते अगहन”, “मोनेमन”, “अबि‍ते आंगन”, “चालनि‍-सूप” इत्‍यादि‍ गीतमे श्री जगदीश प्रसाद मण्‍डलक रचना-वैवि‍ध्‍य सहज द्रष्‍टव्‍य होइत अछि‍। आजादि‍क गरमाहटि‍, सामाजि‍क वि‍द्रुपता, प्रकृति‍ सौन्‍दर्य, मानवीय मनोवि‍ज्ञानक संग-संग मानवीय त्रासदीक रूप-वैवि‍घ्‍य ऐ संग्रहक वि‍शि‍ष्‍टता अछि‍। अगहनक सुषमा द्रष्‍टव्‍य अछि‍- “अबि‍ते‍ अगहन ओस ओसा धड़ धरती धड़ए लगै छै। चर-चाँचर आँचर पकड़ि‍ उजाहि‍ सि‍ल्‍ली चरए लगै छै।”[23] मि‍थि‍लाक बेटी- (नाटक) ISBN : 978-93-80538-03-7 पहि‍ल संस्‍करण- 2009 ई.मे। “मि‍थि‍लाक बेटी नाट्क ‘कर्म प्रधान वि‍श्‍व करि‍ राखा’ सि‍द्धान्‍तक आधारपर लि‍खल गेल अछि‍। एकटा कर्मठ आ इमानदार व्‍यक्‍ति‍केँ समाजमे की-की सहय पड़ैत अछि‍, ओइ‍‍ परि‍पेक्ष्‍यक मार्मि‍क चि‍त्रण कएल गेल अछि‍। कथाक मूलमे कर्मनाथक वि‍आह क्रममे आएल एकटा गरीब (चमेलीक पि‍ता) व्‍यक्‍ति‍क मनोदशाक प्रस्‍तुति‍ नीक अछि‍। ओ व्‍यक्‍ति‍ गरीब छथि‍ मुदा ‘चार्वाक दर्शन’क पालक। ‘पेटमे खढ़ नै‍‍ सि‍ंहमे तेल’ जेबीमे कैंचा नै‍‍ मुदा नअ हन्नाक बटुआ जइ‍मे भोगक वस्‍तु छलि‍या सुपारी पान आ तमाकू। हमरा सबहक गाममे एे‍‍ना होइत अछि‍, भोजन नै‍‍ मुदा, पान अवश्‍य। पग-पग पोखरि‍ माछ मखान... मधुर बोल मुस्‍की मुख पान... नेना पढ़लक, नै‍‍ पता, कनि‍याकेँ पथ्‍य भेटल नै‍‍ जनै छी, बेटीक लेल दूध अछि‍... नै‍‍। मुदा! पान अति‍आवश्‍यक, हाथी मरि‍ गेल, सि‍क्करि‍ लऽ कऽ बौआ रहल छी। कर्मनाथक अपन पत्नी चमेलीक संग वार्तालापमे ‘खट्टर ककाक तरंग’क दर्शन होइत अछि‍। गाममे प्रचलि‍त लोकोक्‍ति‍क हास्‍य मुदा, सत्‍य प्रस्‍तुति‍।” “रामवि‍लास जीवनक अंति‍म पड़ावमे माधुरीसँ माने अपन पत्नीसँ अपन जीवन-यात्राक व्‍याख्‍यान करैत छथि‍, आश्‍चर्यमे पड़ि गेलहुँ। जि‍नका संग चालीस बर्खक यात्रा कएलनि‍ ओ हि‍नक जीवन दर्शन नै‍‍ जनैत छलीह। हमरा सबहक समाजमे एे‍‍ प्रकारक घटना होइते अछि‍। गरीव नेनपनक बाद सोझे प्रोढ़ भऽ जाइत छथि‍। जे कर्मवादी छथि‍ हुनक अंति‍म अवस्‍था सुखमय नै‍‍ तँ......। अपन कर्मक नावकेँ कलकत्तामे मजगूत कऽ सोझे गाम आबि‍ जाइत छथि‍। मातृभूमि‍क प्रति‍ सि‍नेह, गामेमे गैरेज खोलवाक योजना अछि‍। चौघारा घर बनाएव, दलान अवश्‍य रहत, कि‍एक तँ दलान समाजक मर्यादा थि‍क गामक जीवन शहरसँ सुखमयी अछि‍। एे‍‍ पोथीमे पलायनवादक वि‍रोध कएल गेल अछि‍।”[24] कम्‍प्रोमाइज- (नाटक) ISBN : 978-93-80538-44-0 पहि‍ल संस्‍करण- 2012 ई.मे। अंक वि‍हि‍न 13 दृश्‍यमे वि‍भक्‍त ई नाटक अछि‍। ऐ नाटकमे बेस सम्‍हरि‍ कऽ नाट्य-कथाक समायोजन केलन्‍हि‍ अछि‍। पलायनसँ भेल मि‍थि‍लांचलक कृषि‍-कार्यक मध्‍य बाधापर नव चेतनाक संग नव बाट अख्‍ति‍यार केलन्‍हि‍ अछि‍। ऐ नाटकक पात्र छथि‍ नसीवलाल- कि‍सानक अगुआ, सुकदेव, मनचन, सोमन आ रामरुप- बटेदार, कर्मदेव- बी.ए. पास युवक, प्रो. कृष्‍णदेव, ि‍दनेश- मैट्रि‍कक छात्र, शि‍वशंकर- बोरि‍ंग-दमकल एजेंट, घनश्‍याम- बैंक मैनेजर, बहादुर- नौकर, मनमोहन- इंजीनि‍यर, संतोष- एग्रीकल्‍चर ग्रेजुएट, डाॅ. रघुनाथ- सेवा नि‍वृत डाॅक्‍टर। नारी पात्र- अनुराधा- डाॅ. रघुनाथक पत्नी, सुधा- कृष्‍णदेवक बेटी, शान्‍ती- पंचायत मुखि‍या, आभा- शि‍क्षि‍का एवं सोनि‍या- सुकदेवक पत्नी। झमेलि‍या बि‍आह- (नाटक) ISBN : 978-93-80538-45-7, पहि‍ल संस्‍करण- 2012 ई.। झमेलिया बि‍आह’क झमेला जिनगीक स्‍वाभाविक रंग परिवर्तनसँ उद्भूत अछि, तँए जीवनक सामान्‍य गतिविधिक चित्रण चलि रहल अछि कथाकेँ बिना नीरस बनेने। नाटकक कथा विकास बिना कोनो बिहाड़ि‍क आगू बढ़ैत अछि, मुदा लेखकीय कौशल सामान्‍य कथोपकथनकेँ विशिष्‍ट बनबैत अछि। “नाटकक सातम दृश्‍य सभसँ नमहर अछि, मुदा बि‍आह पूर्व वर आ कन्‍यागतक झीका-तीरी आ घटकभाय द्वारा बरियाती गमनक विभिन्‍न रसगर प्रसंगसँ नाटक बोझिल नै होइत छैक। आ घटक भायपर धि‍यान देबै, पूरा नाटकमे सभसँ बेशी मुहावरा, लोकोक्ति, कहबैकाक प्रयोग वएह करैत छथिन। मात्र सातमे दृश्‍यकेँ देखल जाए- “खरमास (बैसाख जेठ) मे आगि-छाइक डर रहै छै।” (अनुभव के बहाने बात मनेनइ).....।” “पुरूष नारीक संयोगसँ सृष्टिक निर्माण होइए।” (सिद्धांतक तरे धि‍यान मूलबि‍ंदुसँ हटेनइ)......। “आगूक विचार बढ़बैसँ पहिने एक बेर चाह-पान भऽ जाए।” (भोगी आ लालुप समाजक प्रतिनिधि)......। “जइ काजमे हाथ दइ छी ओइ काजकेँ कइये कऽ छोड़ै छी।” (गर्वोक्ति)....... “जिनगीमे पहिल बेर एहेन फेरा लागल।” (कथा कहबासँ पहिले धि‍यान आकर्षित करबाक सफल प्रयास)....। “खाइ पीबैक बेरो भऽ गेल आ देहो हाथ अकड़ि‍ गेल......”[25] पंचवटी- (एकांकी संचयन) ISBN : 978-93-80538-41-9 पहि‍ल संस्‍करण- 2012 ई.मे। पाँचटा एकांकी संग्रह थि‍क। संभवत: तँए पंचवटी नाओं राखल गेल अछि‍। सतमाए, कल्‍याणी, समझौता, तामक तमघैल आ बि‍रांगना नामक एकांकीक संचयन अछि‍। सतमाए शब्‍दसँ सामान्‍य जनमे जइ भावनाक रेखांकन होइत अछि‍ तइसँ भि‍न्न ओकर वि‍शेषतापर दृष्‍टि‍पात “सतमाए” एकांकीमे कएल गेल अछि‍। “तामक तमघैल” प्राचीन एवं नवीन नारी जीवनक दस्‍तावेज अछि‍। पति‍क मृत्‍युक पश्चात अपन एवं सन्‍तानक जीवन हेतु संघर्षरत पत्नी तथा मैथि‍ल समाजमे वि‍धवा एवं सासु-पुतोहुक बीचक खाधि‍ अादि‍क मर्मस्‍पर्शी चि‍त्र ऐ एकांकीमे चि‍त्रि‍त अछि‍। पंचवटी वास्‍तवमे मैथि‍ली एकांकी वि‍धाक अवि‍स्‍मरणीय संग्रह अछि‍। संक्षिप्‍त परि‍चयक क्रममे हमरा लोकनि‍ हि‍नक अखन तकक सृजि‍त-प्रकाशि‍त साहि‍त्‍यपर दृष्‍टि‍पात कएल। लक्षि‍त भेल जे श्री मण्‍डल जीक अखन तकक गद्य-एवं-पद्य साहि‍त्‍यक श्रीवृद्धि‍मे अहम याेगदान छन्‍हि‍। गद्य साहि‍त्‍यमे, लगभग सात दर्जन लघुकथा, लगभग पन्‍द्रह दर्जन वि‍हनि‍ कथा तीन गोट दीर्घ कथा, सात गोट उपन्‍यास, तीनटा नाटक तथा पाँचटा एकांकी अखन तक प्रकाशमे अछि‍। तहि‍ना पद्य साहि‍त्‍यमे सेहो बेस योगदान छन्‍हि‍। “इन्‍द्रधनुषी अकास”, “राति‍-दि‍न”, “सतबेध”, “गीतांजलि‍”, “तीन जेठ एगारहम माघ” तथा “सरि‍ता” नामक पद्य संग्रहमे 31 दर्जन कवि‍ता तथा गीत संग्रहि‍त अछि‍। एकर अति‍रि‍क्‍त  उत्‍कृष्‍ट वि‍षय जेना “अवतारवाद”, “संस्‍कार गीत”, “उपन्‍यास साहि‍त्‍यमे गामीण चि‍त्रण” पर‍ कएक गोट नि‍बंध सेहो प्रकाशि‍त छन्‍हि‍। श्री मण्‍डल जीक धारणा छन्‍हि‍ जे जाबे धरि‍ मनुक्‍ख सुपत कमाइ कमा अपन जीवन ि‍नर्धारि‍त नै करता ताबे धरि‍ हवा-विहाड़ि‍मे भँसबे करता जइसँ जि‍नगी पूर्णतासँ हटि‍ते रहतैक। तँए अपन जि‍नगीकेँ अपना हाथमे लऽ कऽ जे जीवन-यात्रा करता वएह जि‍नगीक सही रस पीब वि‍हारी बनि‍ कुन्‍ज वि‍हार करता। “वि‍देह प्रथम पाक्षि‍क मैथि‍ली ई-पत्रि‍का (www.videha.co.in)” पर हि‍नक सभ रचना श्री गजेन्‍द्र  ठाकुर जीक बाएबे होइत रहल अछि‍, तही आशाक संग हम सभ आशान्‍वि‍त छी जे अही गति‍सँ श्री जगदीश प्रसाद मण्‍डल, जे हमरा सबहक बीच जाज्‍वल्‍यमान नक्षत्रक रूपमे छथि‍, आगूओ अहि‍ना रचनारत् रहता तथा श्रुति‍ प्रकाशन, नई दि‍ल्‍ली, अहि‍ना हि‍नक रचना सभकेँ सोझा अनैत रहए। सम्‍पर्क- ग्राम-पोस्‍ट- ि‍नर्मली, वार्ड- नं. 06 जि‍ला- सुपौल मोवार्इल- 8539043668 [1]  मौलाइल गाछक फूल उपन्‍यासक पछि‍ला कवर पृष्‍ठ- अति‍म [2]  गामक जि‍नगी कथा संग्रहक पछि‍ला कवर पृष्‍ठ- अति‍म [3]  उत्‍थान-पतन उपन्‍यासक आमुख, पृष्‍ठ- 5 [4]  जीवन-मरण उपन्‍यास, पृष्‍ठ- 7 [5]  जीवन-मरण (उपन्‍यास), पृष्‍ठ- 07 [6]  जीवन-संघर्ष उपन्‍यास, पृष्‍ठ- 48 [7]  जीवन-संघर्ष उपन्‍यास, पृष्‍ठ- 48 [8]  जीवन-संघर्ष उपन्‍यास, पृष्‍ठ- 48 [9]  सधबा-वि‍धबा, उपन्‍यास, पृष्‍ठ- 05 [10]  बड़की बहि‍न- उपन्‍यास, पृष्‍ठ-05 [11]  इन्‍द्र धनुषी अकास (कवि‍ता संग्रह), पृष्‍ठ- 30 [12]  इन्‍द्रधनुषी अकास (कवि‍ता संग्रह) आमुख डॉ. कैलाश कुमार मि‍श्र, पेज- 07 [13]  इन्‍द्रधनुषी अकास (कवि‍ता संग्रह) आमुख डॉ. कैलाश कुमार मि‍श्र, पेज- 08 [14]  राति‍-ि‍दन (कवि‍ता संग्रह), “कवि‍ता-संघर्ष”, पृष्‍ठ-11 [15]  राति‍-ि‍दन (कवि‍ता संग्रह), “जुग बदलल जमाना बदलल”, पृष्‍ठ-12 [16]  राति‍-ि‍दन (कवि‍ता संग्रह, कवि‍ता- “घरक लोटि‍या बुड़ले अछि”, पृष्‍ठ-13 [17]  सतबेध कवि‍ता संग्रह, “अपने हाथक खेल मीत यौ”, कवि‍तासँ, पृष्‍ठ- 13 [18]  सतबेध कवि‍ता संग्रह, “कि‍छु ने बूझै छी” कवि‍तासँ, पृष्‍ठ- 7 [19]  सतबेध कवि‍ता संग्रह, “कि‍छु ने बूझै छी” कवि‍तासँ, पृष्‍ठ- 8 [20]  गीतांजलि‍ गीत संग्रह, पृष्‍ठ- 08 [21]  तीन जेठ एगारहम माघ (गीत संग्रह), पृष्‍ठ- 05 [22]  तीन जेठ एगारहम माघ (गीत संग्रह), पृष्‍ठ- 11 [23]  सरि‍ता गीत संग्रह, गीत- अबि‍ते अगहन, पृष्‍ठ- 15 [24]  “अंशु” (प्रबन्‍ध संग्रह) शि‍वकुमार झा टि‍ल्‍लू, पृष्‍ठ- 53 [25]  झमेलि‍या बि‍आह (नाटक) आमुखकार श्री रवि‍ भूषण पाठक, पृष्‍ठ- 5 ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। जगदीश प्रसाद मण्‍डल बड़की बहि‍न (उपन्‍यास) आगाँ... साल भरि‍ पछाति‍ मुनेसरक दुरागमन भेल। दुरागमन भेला पछाति‍ साधना सासुर एली। सासुरक रहन-सहन, घर-दुआर देखि‍ मनमे जबरदस धक्का लगलन्‍हि‍। जे स्‍वाभावि‍को छलै। कतए अफसरक परि‍वार आ कतए एकटा छोट-छीन गामक कि‍सान परि‍वार। मुदा एहेन खाली साधनेक भेलन्‍हि‍ से नै, धनेरोकेँ भेलो छन्‍हि‍ आ होइतो छन्‍हि‍। ओना साधनाक अपनो (नैहर) परि‍वार गामेक छलन्‍हि‍ मुदा नोकरी भेने परि‍वारकेँ संगे राँचीमे रखैत छला। राँचीयेमे जमीन कीन मकानो बना नेने छथि‍। अफसर-एस.डी.ओ रहने दोसो-महि‍म आ सरो-सम्‍बन्‍धी अगुआएल तँ छन्‍हि‍हेँ। ओना परि‍वारमे तीन भाए-बहि‍नक बीच साधना सभसँ जेठ (पहि‍ल संतान) रहने दोसर-तेसरक लेल अभि‍भावके सदृश रहथि‍न। मुदा बेटी तँ बेटी होइत, बि‍आह-दुरागमनसँ पहि‍ले धरि‍ माए-बापक घरकेँ अपन घर बुझैत। अपना गामसँ श्‍यामानन्‍द (साधनाक पि‍ता) सम्‍बन्‍ध तोड़ि‍ये जकाँ लेलन्‍हि‍। कहैले तँ घर-घराड़ी छन्‍हि‍हेँ मुदा रहैक घर नै। साधारण घर छलन्‍हि‍ जे कि‍छु दि‍न पछाति‍ गि‍र पड़लन्‍हि‍, दोहरा कऽ बनबैक खगता नहि‍येँ बुझलन्‍हि‍। दुरागमनसँ पूर्व धरि‍ मुनेसर परि‍वारक भारक बीच नै पड़ल छला, मुदा पछाति‍ पत्नी एने कि‍छु जबावदेही तँ भइये गेलन्‍हि‍। अपना ओते खेत-पथार नै जे गि‍रहस्‍तीसँ जीवि‍कोपार्जन कऽ सकैत छला, तइ संग समाजमे पढ़ल-लि‍खल संग हँसैक जबरदस समस्‍या तँ जन्‍म लइये नेने छल जे जँ पढ़ल-लि‍खलकेँ नोकरी नै भेलन्‍हि‍ तँ समाजमे पीहकारीक पात्र बनि‍येँ जाइत छथि‍। गाम-घरमे प्रचलि‍त अछि‍ ‘पढ़ए फारसी, बेचए तेल देखू भाइ करमक खेल’ बि‍नु खेतबला जँ गि‍रहस्‍त बनि‍ गि‍रहस्‍ती अपना लेत सेहो बात नहि‍येँ छै। जीवि‍कोपार्जन लेल केहेन गि‍रहस्‍ती चाही ओ तँ सबहक लेल संभव नै। खेतक खरीद-वि‍करी होइ छै; सम्‍पति‍ छि‍ऐ। ओना जेठ भाय जुगेसर नोकरी करैत छेलखि‍न। लोअर प्राइमरीक शि‍क्षक छला, मुदा अखुनका जकाँ ने सरकारी छल आ ने तेहेन वेतन। दुनू भाँइ मि‍ला परि‍वार नमहर छेलन्‍हि‍हेँ। जहि‍ना सभ पढ़ल-लि‍खल वेरोजगारकेँ होइ छै तहि‍ना मुनेसरकेँ सेहो होइत छलन्‍हि‍ जे एतए नोकरीक आवेदन करू, ओतए नोकरीक इन्‍टरभ्‍यू दि‍औकक स्‍थि‍ति‍ तँ रहबे करन्‍हि‍। ओना समाजमे (ग्रामीण इलाका) गनल-गूथल पढ़ल-लि‍खलक संख्‍या मुदा जतबो छल ओकरो नोकरीक अाशा तँ नहि‍येँ छलै। आ ने अखुनका जकाँ सरकारी कार्यालय छलै। ओना अखनो कम अछि‍। नमहर-नमहर पंचायत छल, चालीस-चालीस, पचास-पचास पंचायतक बीच ब्‍लौक थाना छलै। तइ संग सरकारी कामो-काज कम छल जइसँ सरकारी काजमे प्रवेश करब कठि‍न तँ छेलैहे। ब्‍लौकमे अफसरक नाओंपर एकटा बी.डी.ओ. रहैत छला। काजो कम, अन्नक अभाव रहने खैरातक बॅटवारा आ कोटाक माध्‍यमसँ अमेरि‍कन गहुमक वि‍क्री। चीनीक कोटा नै बनल छल। एक तँ चीनीक उत्पादन नीक, दोसर खेनि‍हार कम। तहि‍ना स्‍कूलो-कओलेजक संस्‍था सएह, ‘गनल कुटि‍या नापल झोर’ सदृश छल। जे शि‍क्षक काज करैत छला ओ सेवा-नि‍वृत्त हेता तेकर पछाति‍ये नव चेहराक प्रवेश हेतन्‍हि‍। बैंकक लोक नाओंएँ टा सुनैत छल जे ओइमे रूपैआक लेल-देन होइ छै। दुरागमनक कि‍छुए-दि‍न पछाति‍ साधना नैहर गेली। अखन धरि‍ पि‍ता-श्‍यामानन्‍द बेटी-जमाइक घर-दुआर नै देखने। बी.एस.सी. लड़का, शरीरसँ स्‍वस्‍थ सुनि‍ बेटीक बि‍आह केलन्‍हि‍। तइ समए बेटि‍ओ (साधना) मैट्रीक पास केनहि‍ रहन्‍हि‍। बि‍आहो समैसँ भेल छलन्‍हि‍। नैहर आपसीक पछाति‍ साधना जखन सासुरक सभ हाल माए-पि‍ताकेँ कहलन्‍हि‍ तखन पि‍ताक मनमे जमाइक नोकरीक प्रश्न उठलन्‍हि‍। मुनेसरकेँ राँचीये बजा लेलन्‍हि‍। जमाइक नोकरीक चर्च संगि‍यो-साथी आ सरो-सम्‍बन्‍धीक बीच गप-सपक क्रममे करए लगला। राँची वि‍श्ववि‍द्यालयक केमेस्‍ट्रीक हेडक सोझा सेहो चर्च केलन्‍हि‍। दुनूक बीच घनि‍ष्‍ठ दोस्‍ती। डेरो अगले-बगलमे रहन्‍हि‍। हुनकर (हेडक) ससुर हाइ स्‍कूल पलामूमे बनौने छथि‍। ओना जंगल-झाड़क इलाका पलामू, मुदा छोट-मोट कसबा जकाँ तँ छेलैहे। हुनका बूझल छलन्‍हि‍ जे स्‍कूलमे जे साइंस-टीचर छला, ओ छोड़ि‍ कऽ दोसर नोकरी करए चलि‍ गेला जइसँ साइंस टीचरक अभाव छै। ओ फोन कऽ ससुरकेँ पुछलखि‍न। वि‍द्यालयमे शि‍क्षकक अभाव रहबे करै, मुनेसरकेँ नोकरी भऽ गेलन्‍हि‍। दि‍नांक 1-10-1969 ई.केँ ि‍नयुक्‍ति‍ भेलन्‍हि‍। वि‍द्यालयो सरकारी नहि‍येँ भेल छल, मुदा कोठारी कमीशनक मंजूरी तँ भइये गेल छलै। एक सए पाँच रूपैआक महीनाक नोकरी मुनेसरकेँ भऽ गेलन्‍हि‍। नोकरीक समए पत्नी कओलेजमे पढ़ैत रहथिन, तँए पि‍ते ऐठाम रहि‍तो छेलखि‍न। अपने असगरे पलामूमे रहैत छला आ छुट्टीमे राँची अबै-जाइ छला। ओना साइंस शि‍क्षककेँ सभठाम ट्यूशन चलि‍ते अछि‍ जे मौका मुनेसरोकेँ भेटलन्‍हि‍। एक तँ ग्रामीण जि‍नगीक जीवन स्‍तर, तइपर अवि‍कसि‍त इलाकाक नोकरी, बचत नीक होइत छलन्‍हि‍। कि‍छुएँ दि‍न पछाति‍ राँि‍चयेमे जमीन कीन अपन घर सेहो बना लेलन्‍हि‍। मकानसँ कि‍छु कि‍रायो आबए लगलन्‍हि‍। अपन पैतृक गाम मुनेसर छोड़ि‍ये जकाँ देलन्‍हि‍। कहि‍यो काल बहि‍न-सुलोचनाकेँ कपड़ो आ रूपैओ पठा दइ छेलखि‍न मुदा आबा-जाही नहि‍येँ जकाँ छलन्‍हि‍। हाइ स्‍कूल शि‍क्षकक लेल ट्रेनि‍ंग करब जरूरी छल। ट्रेंड-आ-अनट्रेंड शि‍क्षकक बीच वेतनोक अंतर छलै आ बि‍ना ट्रेंड शि‍क्षककेँ स्‍थायी हेबामे सेहो बाधा छलै। मुनेसरक नि‍युक्‍ति‍क दू साल पछाति मारवाड़ी कओलेज‍ दरभंगामे ट्रेनि‍ंगक पढ़ाइ शुरू भेल। दसे मासक कोर्स। डोनेशनपर एडमीशन होइत। जे पढ़ाइक समए (सेशन शुरू भेला बादो छह मास धरि‍ एडमीशन होइते रहल।) चारि‍ मास पछाति‍ मुनेसरो एडमीशन लेलन्‍हि‍। छबे मासमे ट्रेंड भऽ पुन: पलामू ज्‍वाइन कऽ लेलन्‍हि‍। ओना ओइ समए झारखंड लगा बि‍हार छल। राज्‍योक स्‍थि‍ति‍ दू भागमे वि‍भाजि‍त। उत्तर-बि‍हार आ दछि‍न बि‍हारक स्‍पष्‍ट अन्‍तर अछि‍। दछि‍न-बि‍हार (झारखंड) मे खेती-पथारी कम होइ छै। खेती जोकर माटि‍यो कम छै। कम क्षेत्र उपजाऊ अछि‍। पहाड़ी-जंगलक इलाका। ओना खनि‍ज सम्‍पदा प्रचूर मात्रामे अछि‍। कोयलासँ लऽ कऽ अबरख धरिक खान अछि‍। जखन कि‍ उत्तर बि‍हार गंगा-ब्रह्मपुत्रक तलहटी मैदान छी। पहाड़ जंगल नहि‍येँ जकाँ छैक। ओना गाछी-बि‍रछी पर्याप्‍त अछि‍ मुदा पहाड़ी लकड़ीक नै। खनि‍ज सम्‍पदा रहने दछि‍न बि‍हारमे देशी वि‍देशी पूँजीपति‍ आ सरकारि‍यो कारोबार पर्याप्‍त मात्रामे छै। रंग-रंगक खनि‍ज-सम्‍पदा, तँए वि‍स्‍तृत रूपमे कारोबार चलैत अछि‍। देशी-वि‍देशी पूँजीपति‍ आ सार्वजनि‍क (सरकारी) कारोबार रहने रोजगारो बहुतायत अछि‍। मुदा जंगली-पहाड़ी इलाका रहने स्‍थानीय मूल वासीक बीच शि‍क्षाक प्रचार-प्रसार कम भेल अछि‍। साधारण-सँ-कुशल श्रमि‍कक सृजन नहि‍येँ जकाँ अछि‍। साधारण मजदूरक रूपमे रहल अछि‍। मुदा उत्तर बि‍हार पढ़ै-लि‍खैमे अगुआएल। जइसँ कुशल श्रमि‍कोक संख्‍या बेसी। तँए उत्तर-बि‍हारक पढ़ल-लि‍खल लोक दछि‍न बि‍हार जा नोकरी करए लगला आ घरो-दुआर बना बसि‍ गेल छथि‍। अगि‍लो पीढ़ीक लेल जीवि‍कोपार्जनक उपाए बनि‍येँ गेल छन्‍हि‍। उत्तर बि‍हारक अर्थात् मि‍थि‍लांचलक ईहो दुर्भाग्‍य रहल जे कृषि‍ प्रधान क्षेत्र होइतो पहाड़ी नदी ततेक अछि‍ जे क्षेत्रकेँ नष्‍ट कऽ देने अछि‍। ओना तीन रूपमे धार प्रवाहि‍त होइत अछि‍। कि‍छु धार एहेन अछि जे मात्र बरसातक मौसममे प्रवाहि‍त होइत अछि‍ आ पछाति‍ सूखि‍ जाइत अछि‍। प्रवाहि‍त होइत कि‍छु धार एहेन अछि‍ जे असथि‍रसँ बहैत अछि‍, काट-छाँट नहि‍येँ जकाँ करैत अछि‍। हजारो बर्खसँ एके स्‍थानपर बहैत अछि‍। कि‍छु धार एहनो अछि‍ जे काटो-छाँट बेसी करैए आ उपजाऊ माटि‍केँ बालुसँ भरि‍ नष्‍टो करैत अछि‍। जइसँ गाम-गामक खेति‍ओ नष्‍ट होइ छै आ घरो-दुआर नष्‍ट होइ छै। जीवन-यापनक मूल आवश्‍यकता उत्‍पादि‍त पूँजी नष्‍ट भेने पड़ाइन तँ लगले छल आ लगले रहत। ओना मि‍थि‍लांचलक माटि‍-पानि‍, हवाकेँ अनुकूल रहने उर्वर शक्‍ति‍ तँ छइहे। जइसँ केतबो लोक गामसँ पड़ा देश-वि‍देशक कोण-कोणमे बसला मुदा अखनो गाम-घरक आवादी सघन तँ अछि‍ये। गामसँ तीन कोस हटि‍ जुगेसरो नोकरी करैत छला आ डेराे बाहरे रखने छला। कारणो छल जे ने अखुनका जकाँ गाड़ी-सवारी छलै आ ने बान्‍ह-सड़कक दशा नीक छलै। शहर-बजार छोड़ि‍ ने पीच (पक्की सड़क) गाम दि‍स बढ़ल छल आ ने बि‍जली। मुदा तैयो 1947 इस्‍वीक अंग्रेज भगा अपन स्‍वतंत्र देश बनेबाक वि‍चार तँ जन-जनक मनमे छलन्‍हि‍हेँ। गुलामीक शोषणसँ देशक स्‍थि‍ति‍ बि‍गड़ि‍ गेल अछि‍, जइसँ देशक वि‍कास अवरूद्ध भऽ गेल अछि‍। स्‍वतंत्र भेला पछाति‍ वि‍कासक रास्‍ता देश जरूर पकड़लक। मुदा तते असथि‍रसँ जे आजादीक साठि‍-पँइसठि‍ बर्ख पछाति‍यो, जनकेक हरसँ खेति‍यो होइत अछि‍ आ करीने-ढोसि‍सँ पटौनी। कृषि‍-प्रधान देश (जइ देशमे अस्‍सी प्रति‍शतसँ ऊपर आवादी कृषि‍ आधारि‍त अछि‍) रहि‍तो पाछू पड़ि‍ गेल। कि‍छु पूँजीपति‍ सत्ता हथि‍या शहरे-बजारक वि‍कास धरि‍ देशक अर्थ-बेवस्‍थाकेँ समेटि‍ लेलक। तइ संग ईहो नै नकारल जा सकैत अछि‍ जे जे मि‍थि‍लांचलवासी आन-आन देशक उन्नति‍मे अपन शक्‍ति‍ बेचि‍ सेवा करै छथि‍ ओ मि‍थि‍लांचलसँ, अपन मातृभूमि‍सँ आँखि‍ सेहो मूनि‍ लेलन्‍हि‍। देशक सत्ता कि‍सानक समस्‍यासँ हटि‍ जाति‍-धर्मक एहेन वातावरण बना देने अछि‍ जे वास्‍तवि‍क वि‍कासकेँ अवरूद्ध कऽ देने अछि‍। मि‍थि‍लांचलक पानि‍-माटि‍ आ मौसममे एहेन अनुकूलता अछि‍ जे साइयो रंगक अन्न, फल, तरकारी संग साइयो रंगक चि‍ड़ै, पशु लेल अनुकूल अछि‍। मुदा सभ कि‍छु रहि‍तो कि‍ अछि‍ से सबहक सोझे अछि‍! ओना अठबारे (शनि‍-रवि‍) जुगेसर गाम अबि‍ते छला तइ संग पावनि‍क छुट्टी आ अनदि‍नोक छुट्टीमे सेहो अबि‍ते छला। स्‍थि‍ति‍यो एहेन नै छलन्‍हि‍ जे साइकि‍लो कीन सकि‍तथि‍। ओना परि‍वारो तेहेन नमहर नहि‍येँ छलन्‍हि‍। तहूमे अपने अन्‍तै रहै छला। जइठाम डेरा रखने छला ओइ परि‍वारक बच्‍चा सभकेँ पढ़बैत छला। बदलामे भोजन आ रहैक बेवस्‍था छलन्‍हि‍। ने बाइली ट्यूशन छलन्‍हि‍ आ ने दरमाहा छोड़ि‍ दोसर आमदनी। शनि‍चरा प्रथा समाप्‍त भऽ गेल छल। जुगेसरक सासुर मुंगेर जि‍ला। गंगा दि‍याराक गाम। तीन भाँइक भैयारीमे ससुर जेठ रहथिन। संयोग एहेन भेलन्‍हि‍‍ जे छोट दुनू भाएकेँ बेटो भेलन्‍हि‍, हि‍नका (जुगेसरक ससुरकेँ) दूटा बेटि‍येटा। बहुत बेसी जमीनबला परि‍वार तँ नहि‍येँ छलन्‍हि‍ मुदा पच्‍चीस-तीस बीघा तँ छलन्‍हि‍हेँ। भैयारीक सम्‍पति‍क प्रश्न भैयारीमे टकराएल। दुनू छोट भाएक कहब छलन्‍हि‍ सभ दि‍न अबैत-जाइत रहती। मुदा से जेठ भाय रमानन्‍दकेँ मान्‍य नै। रमानन्‍दक वि‍चार छलन्‍हि‍ जे हम अपन हि‍स्‍सा बेटि‍येकेँ देबै। भैयारीमे जमीन लऽ कऽ वि‍वाद ठाढ़ भेल। छोट दुनू भाँइ वि‍चार केलन्‍हि‍ जे कि‍छु होउ, जमीन तँ गामेमे रहत। ओ तँ ससरि‍ कऽ नै जाएत। तखन गामक लोक कीन लेत आ रूपैया उठा कऽ दऽ औथि‍न्‍ह। गामे-गाम तँ तीन तसि‍यो चालि‍क लोक अपन चाि‍ल चलैबते छै। मुदा कि‍छु होशि‍यारी भेल। दुनू भाँइ साैंसे गामक लोककेँ खास कऽ तीन तसि‍याबलाक बैसार केलन्‍हि‍। बैसारमे अपन प्रस्‍ताव देलखि‍न जे जखन भैयाकेँ बेटा नै छन्‍हि तखन‍ बुढ़ाड़ीक सेवा भेलन्‍हि‍ से भातीजे सभ करतथि‍, जइसँ कुलो-खनदानक इज्‍जत‍ बचल रहल आ सेवो हेतन्‍हि‍। कि‍अए अनेरे बुढ़ाड़ीमे ऐगाम-सँ-ओइगाम बौएता। समाजोकेँ जँचल। मुदा रमानन्‍द सेहो अपने मनक लोक। परि‍वारसँ समाज धरि‍क कि‍नको बात सुनैले तैयारे नै। अकछि‍ कऽ समाजक सभ दुनू भाँइकेँ कहि‍ देलखि‍न जे भैयारीक झंझट अछि‍ समाज ऐमे नै पड़त। मौका पाबि‍ दुनू भाँइ पूछि‍ देलखि‍न- “जँ कि‍यो चोर-नुकबा लि‍खा लथि‍, तखन?” जते गोटे बैसल रहथि‍ पंच-परमेश्वरक रूपमे रहथि‍, अनुकूल वि‍चार देखि‍ अनुकूलतामे भँसि‍ हरे-हरे एक्के शब्‍दमे बाजि‍ उठला- “जे समाजसँ बाहर हएत, ओ बेटीचोद हएत।” बजैकाल तँ सभ बाजि‍ गेला मुदा पछाति‍ अपनेपर तामस उठए लगलन्‍हि‍ जे सस्‍त चीज हाथसँ नि‍कलि‍ गेल। जहि‍ना आगि‍क ताउपर लोहि‍याक जि‍लेबी, कचड़ी पेनीसँ उठि ऊपर अलगि‍ जाइत तहि‍ना रमानन्‍दकेँ भेलन्‍हि‍। गंगाकातक गाम जकाँ गामक लोक सोझे-सोझी रमानन्‍दकेँ दुतकारए लगलन्‍हि‍। अखन धरि‍ समाजमे अहाँकेँ लोक कोन नजरि‍ये देखैत रहल आ अहाँ कि‍ करैपर उताहुल छी। मुदा तेकर कोनो असरि‍ रमानन्‍दकेँ नै भेलन्‍हि‍। 1940 ई.क लगाति‍मे रमानन्‍द मैट्रि‍क पास केने छला। जइ समए हजारो वि‍द्यार्थी स्‍कूल-कओलेज छोड़ि‍ आजादीक आन्‍दोलनमे कूदि‍ अपन सर्वस्‍व नास केलन्‍हि‍। ओइ समैक उत्‍पादि‍त मनुख रमानन्‍द सेहो छथि‍, अंग्रेजी धुर-झार बजै छला। रेल-तार इत्‍यादि‍ सरकारी सेवाक कतेको गोटे नोकरी छोड़ि‍ अपन आहुत देलन्‍हि‍। मध्‍यम कि‍सान परि‍वारक रमानन्‍द। पि‍ताक देख-रेखमे परि‍वार चलैत, तँए घरक छुट्टा आदमी। एतए-ओतए घुमनाइ आ गुलछर्ड़ा छोड़नाइ जि‍नगीक काज छलन्‍हि‍। मुदा जहि‍ना शरीरमे रोगक आगमसँ धीरे-धीरे शरीरक शक्ति‍ ग्रसि‍त हुअए लगैत तहि‍ना रमानन्‍दकेँ परि‍वारसँ समाज धरि‍मे हुअए लगलन्‍हि‍। जे भातीज बड़का बाबू कहै छलन्‍हि‍ ओ मुँहपर गारि‍ पढ़ए लगलन्‍हि‍। मनुष्‍योक तँ अजीव स्‍वभाव होइ छै। घनि‍ष्‍ठ-सँ-घनि‍ष्‍ठ मि‍त्र जँ कोनो अधला वृत्ति‍मे फॅसि‍ जाइत अछि‍ तखन जे स्‍थि‍ति‍ पैदा लैत सएह रमानन्‍दोकेँ भेलन्‍हि‍। समाजक लोक ने कि‍यो दरबज्जापर बैसए कहन्‍हि‍ आ ने गप-सप करैले तैयार। जहि‍ना खुला जहल होइत, तहि‍ना रमानन्‍दकेँ भेलन्‍हि‍। भैयारीमे वि‍वाद उठने मुकदमाबाजी सेहो उठल। समांगसँ पातर रहने रमानन्‍द कमजोर पड़ए लगला। सोझेमे भाए सभ खेतक जजाति‍, गाछ-बाँस उजाड़ए-काटए लगलन्‍हि‍। दुनू भाँइ अबधारि‍ लेलन्‍हि‍ जे जते मुकदमा करता करथु। थानो आमदनी बुझलक, तँए हि‍साब मि‍ला कऽ चलैत। दुनू बेटी-जमाएकेँ बजा अपन सभ दुखरा सुनबैत रमानन्‍द कहलखि‍न- “जहि‍ना, हम अपन सभ सम्‍पति‍ अहाँ सभकेँ दि‍अए चहै छी तहि‍ना तँ अहूँ सभकेँ चाही जे ओकरा बँचा कऽ लऽ जाइ।” दुनू बेटी-जमाएक बल जहि‍ना रमानन्‍दकेँ भेटलन्‍हि‍ तहि‍ना ओहू दुनू भाँइकेँ समाजक लोक मुकदमामे संग दि‍अए लगलन्‍हि‍। धीरे-धीरे रमानन्‍दक मन टुटए लगलन्‍हि‍। एक तँ साठि‍ बर्खक उमेर टपि‍ गेेल तइपर कोट-कचहरीक दौड़सँ लऽ कऽ बेटी-जमाए ओइठामक दौड़-बरहा तते बढ़ि‍ गेलन्‍हि‍ जे गामसँ बेसी अन्‍तै गुजरए लगलन्‍हि‍। असगरे पत्नी घरमे सकपंज भेल छलन्‍हि‍ आ अपने बौआइत-बौआइत फि‍रि‍सान। कि‍छु दि‍न पछाति‍ पत्नी अस्‍सक पड़लखि‍न। ने दि‍यादवाद आ ने गामक कि‍यो एको बेर पुछाड़ि‍ करए आबनि‍ दुनू बेटि‍ओ-जमाए लगमे नै, मधुबनी जि‍लाक गाममे। ने उचि‍त समैपर डॉक्‍टरी देख-भाल होन्‍हि‍ आ ने दवाइ-दारू। कि‍छु दि‍न पछाति‍ मरि‍ गेलखि‍न। पत्नीक मुइला पछाति‍ रमानन्‍दक जि‍नगी आरो जटि‍ल भऽ गेेलन्‍हि‍। गाममे जखन रहथि‍ तखन भानसो-भातक ओरि‍यान अपने करए पड़न्‍हि‍। आमदनी सेहो भाए सभ रोकि‍ देलखि‍न। अन्ना-गाँहि‍स देखि‍ दुनू जमाइयो हाथ-मुट्ठी सक्कत केलन्‍हि‍। फटो-फनमे रमानन्‍द पड़ि‍ गेला। जि‍नगीक कोनो सोझराएल बाट देखबे ने करथि‍। जि‍नगीक अंति‍म पाँच बर्ख रमानन्‍दक एहेन बि‍तलन्‍हि‍ जेकरा लोक नरकक बास कहै छै। हारि‍-थाकि‍ कि‍छु दि‍न बाद अपनो (रमानन्‍द) मरि‍ गेला। जमाइयो सभ आवाजाहीक संग केसो-मुकदमा देखब छोड़ि‍ देलन्‍हि‍। अंत-अंत एकतरफा केस भऽ गेल। जुगेसरक गाममे दि‍यादि‍क दोसर परि‍वारमे वेमात्रेय भैयारीक बीच वि‍वाद उठल। एक भाएकेँ एक बेटा आ दोसरकेँ चारि‍टा। चारू भैयारी मि‍लि‍ पाँचम भाएकेँ (वेमात्रेय) उपद्रव कऽ गामसँ भगा देलकन्‍हि‍‍। कि‍छु दि‍न तँ ओ (पाँचम भाए) सर-सम्‍बन्‍धीसँ लऽ कऽ समाजक बीच चक्कर लगौलन्‍हि‍, मुदा कि‍छु हाथ नै लगलन्‍हि‍। अन्‍तमे खि‍सि‍या कऽ पि‍ताक सम्‍पति‍क (जमीनक) कागज-पत्तर कलक्‍ट्रीएटसँ नि‍कालि‍ कहि‍ देलखि‍न जे अपन हि‍स्‍सा घराड़ी तक बेचि‍ लेब। बीघाक लगभग हि‍स्‍सा पड़ैत रहन्‍हि‍‍। मुफ्तक माल खाइबला सभ समाजमे रहि‍ते अछि‍। तीन-चारि‍टा परि‍वार खेत लि‍खबैक वि‍चार कऽ लेलन्‍हि‍। मुदा वि‍वाद तँ बीचमे छेलैहे। लेबालक बीच प्रश्न उठैत जे जमीन-जयदादक वि‍वाद छी, मारि‍यो हेबे करत आ थाना-फौदारी सेहो हेबे करत। ने मारि‍क ठेकान अछि‍ आ ने कते दि‍न झंझट रहत तकर ठेकान। तँए दुनूकेँ नजरि‍मे रखि‍ लेन-देन करब। तहि‍ना जमीनबलाक (पाँचम भाय) बीच प्रश्न उठल जे जँ सस्‍तमे लि‍खि‍ देबै, तइसँ लाभ कि‍ हएत? तखन तँ नीक अछि‍ जे अपने भैयारी सभ खाथि‍। कम-सँ-कम एक परि‍वारक तँ छथि‍। मुदा चालि‍यो देनि‍हारक तँ कमी नहि‍येँ अछि‍। उनटा-सीधा मंत्रक तते डाकनि‍ पड़ल जे बैहरा करकरेतक बीख जकाँ नि‍च्‍चा मुहेँ ससरल। अन्‍तमे फड़ि‍आएल जे अधि‍या (खेत लि‍खौनि‍हार) तैयार भेला। बेचि‍नि‍हारकेँ (पाँचम भाएकेँ) तते चारू भाँइ गंजन केने जे तामस कमबे ने करैत। होइत-हबाइत अधि‍या दाममे जमीनक लेन-देन भऽ गेल। ओही लेबालमे एकटा जुगेसरो। मुदा संयोग नीक रहलन्‍हि‍ जे जुगेसर अपने स्‍कूलक नौकरी दुआरे बाहरे रहथि तही बीचमे गाममे दाेसर लेबालक संग मारि‍ भऽ गेल। जबरदस मारि‍ भेल। दुनू दि‍स कपार फुटल‍, बाँहि‍ टुटल। सौंसे गाम सना-सनी पसरि‍ गेल। अनेको भागमे समाज वि‍भाजि‍त भऽ गेल। कि‍छु गोटे खुलि‍ कऽ दुनू गोटेक (दुनू पार्टीकेँ) केसमे गवाही दइले तैयार भऽ गेला। कि‍छु गोटे मारि‍योमे संग देलकन्‍हि‍‍। कि‍छु गोटे व्‍यक्‍ति‍गत पूँजी देखि‍ अपनाकेँ दुनूसँ अलग रखलन्‍हि‍। मुदा समाजोक लत्ती तँ एहेन सकबेधने अछि‍ जे नहि‍योँ वि‍चार भेने परि‍स्‍थि‍ति‍‍वश मजबूरीमे ‘हँ’ कहए पड़ै छै। सेहो भेल। ततबे नै लत्तीक सोर एहेन अछि‍ जे गामेमे लोक सासुर-मातृक सेहो ठाढ़ कऽ लइए। ओही झंझटमे जुगेसर आठ कट्ठा जमीन कीनैक वि‍चार केलन्‍हि‍। ओना दुनू परानीक वि‍चार जे मुनेसरकेँ ऐ जमीनमे संग नै करब। मुदा परि‍वारक तँ वि‍धि‍वत् बटबारा भेल नै अछि‍ तखन जेठ भाय छि‍ऐ, छोट भाएक हि‍स्‍सा तँ भइये जाएत। तँए कहि‍ देब जरूरी अछि‍। जँ अाधा खर्च देत तँ ठीके छै नइ तँ अपन दोख तँ मेटा लेब। वि‍चारक पाछू पेटमे रहन्‍हि‍ जे मुनेसरक आमदनी ततबे छै जे कहुना कऽ परि‍वार चलै छै। तखन रूपैया कतए सँ आनत? तइ बीच मनमे ईहो जे गुप-चुप दाम भेल अछि‍ कि‍ने, बढ़ा देबै। कहुना (अधि‍या दाम भेने) चारि‍ कट्ठा तेफैसला (तीन फसि‍ला) खेतक भैलू कम नै भेल। पोस्‍ट कार्डक माध्‍यमसँ जुगेसर मुनेसरकेँ जनतब देलखि‍न। स्‍कूलक दरमाहा तँ जुगेसरकेँ बूझल, मुदा ट्यूशनक आमदनी तँ नै बूझल। तइ संग पत्नि‍यो (मुनेसरक) वि‍चार देलखि‍न जे नैहरमे देल बरतन-वासन जे अछि‍ ओ अनेरे घरमे ढनमनाइत रहैए, ओकरा बेचि‍ कऽ जमीन कीन लि‍अ। अखन धरि‍ दुनू भाँइ -जुगेसर-मुनेसरक- बीच पहि‍लुके सम्‍बन्‍ध जीवि‍त छल। मुनेसर आधा खर्च दइले तैयार भऽ गेला। जमीनक रजि‍ष्‍ट्री जुगेसर दुनू भाँइक नाओंसँ करा लेता। अपन कमजोर पाशा देखि‍ जुगेसर दुनू परानी वि‍चार केलन्‍हि‍ जे नीक हएत बेटा नाओंसँ जमीन लि‍खौल जाए। मुनेसरकेँ कोनो पता नै। तइ समए रजि‍ष्‍ट्रि‍यो आॅफि‍समे अखुनका जकाँ नै छल जे लि‍खौनि‍हारोकेँ उपस्‍थि‍त रहए पड़ैत। कि‍यो केकराे नाओंसँ जमीन लि‍खा सकैए। तइ संग पान-सात बर्ख पछाति‍ दस्‍ताबेज भेटै छै, ताबे बातो पुरना जाइत। तहूमे कागजक खोज जखन हएत तखन ने जँ नै हएत तँ के बूझत? ने भि‍नौज भेल अछि‍ आ ने खेती-पथारी बँटल अछि‍। तखन तँ गाममे रहै छी जेना-तेना जनक हाथे खेती कऽ लइ छी। बात खुजबे ने करत, तँ मुहाँ-ठुट्ठी आकि‍ हल्‍ला-फसाद हएत कि‍अए। जहि‍या भीन हएब तहि‍या बूझल जेतै। अनुकूल वि‍चार बूझि‍ जुगेसर अपना बेटाक नाओंसँ आठो कट्ठा जमीन लि‍खा देलन्‍हि‍। जे पछाति‍ दुनू भाँइक बीच वि‍स्‍फोटक भऽ गेल। कि‍छु साल पछाति‍ रजि‍ष्‍ट्रीक भेद खूगल। भेद खूगि‍‍ते दुनू परि‍वारमे अनोन-वि‍सनोन शुरू भेल। दू तरहक अनोन-वि‍सनोन उठल। एक तरहक भेल जे मुनेसर दुनू बेकतीक बीच आ दोसर तरहक भेल जुगेसरक बीच। जुगेसरक पत्नी पि‍ताक सम्‍पति‍क खेल देखि‍ चुकल छली जे अछैते हि‍स्‍से हि‍स्‍सा नै भेल। तँए पति‍पर दबाव बनौने जे जे भेल माने बेटा नामे रजि‍ष्‍ट्रीसँ नीक भेल। मुदा जुगेसरकेँ सद्य: भाइक संग बेइमानी आ समाजक बीच दोखी हेबाक डर मनमे नचैत रहन्‍हि‍। मुदा बेटो जुआन भऽ गेल रहन्‍हि‍। अपन खास हि‍स्‍सा बूझि‍ ओहो माइयेक पीठपोहू बनल। तहि‍ना दोसर दि‍स मुनेसर अपन आमदनी देखि‍ सबुर करैत। आमदनि‍योँ नीक बनि‍ गेल रहन्‍हि‍। सरकारीकरण भेने नीक दरमाहा, तइ संग ट्यूशनो फीस बढ़ने अधि‍क आमदनी, राँचीक मकान भाड़ा सेहो जोर दैत। मुदा साधनाक भूख (सम्‍पति‍क भूख) आरो उग्र भऽ गेलन्‍हि‍। तहूमे अपन बाप-माइक देल बरतन-बासन बि‍काएल रहन्‍हि‍। दुनू परानीक बीच खुलि‍ कऽ मतभेद शुरू भऽ गेल। गप-सपक क्रम एना भेलन्‍हि‍। मुनेसर पत्नीकेँ बुझबैत कहलखि‍न- “देखि‍यौ, राँची सन शहरमे अपन मकान भऽ गेल, गाममे रहैक कोनो प्रश्ने ने अछि‍। तखन तँ ओहए (भैया) खेति‍यो करै छथि‍, खेबो करता।” मुनेसरक वि‍चारकेँ कटैत साधना अपन अर्थशास्त्रीय तर्क देलखि‍न- “जखन गाममे नै रहब तखन गामक पूँजीकेँ मार पूँजी कि‍अए बनौने रहब। ओकरा बेचि‍ कऽ बैंकमे जमा कऽ लेब तैयो सूदि‍ आओत। नै जँ घरे आरो बना लेब तैयो भाड़ा एबे करत।” पाशा बदलैत मुनेसर तर्क देलखि‍न- “बाप-पुरखाक जँ घराड़ि‍ये बेचि‍ लेब तखन कोन मुँह लऽ कऽ जि‍नगी जीब। कोनो कि‍ पेट जरैए जे बेचब।” होइत-हबाइत ई भेल जे गामक खेत भरना लगा बैंकमे जमा कऽ लेब। मुदा वि‍वाद तँ बीचमे भैयारीक रहबे करन्‍हि‍। कि‍छु दि‍न पछाति‍ दुनू बेकती (मुनेसर-साधना) गाम आबि‍ अपन डीह-डावरसँ लऽ कऽ बाध धरि‍क बँटबारा करैक वि‍चार जुगेसरक सोझामे रखलन्‍हि‍। वि‍वादी जमीन (जे रजि‍ष्‍ट्री भेल रहए) छोड़ि‍ सभ कि‍छु बँटैले तैयार भऽ गेला। नइ मामासँ कनहा मामा नीक। वि‍वादी जमीन छोड़ि‍ बाकि‍ बाँटि‍ लेलन्‍हि‍। हरि‍हरक भैयारीमे अढ़ाइ कट्ठा घराड़ी। जे बँटाइत पाँच धूरपर आबि‍ गेल। जइ समए सुलोचना सासुरसँ नैहर आएल छली ओ समए देशक आन्‍दोलनक तूफानी दौड़ छल। सन् 1942क दमनचक्र प्रारम्‍भ भऽ गेल छल। परोपट्टाक (झंझारपुर इलाकाक) लोक अंग्रेजी हुकुमतक खि‍लाफ सड़कपर उतरि‍ गेल छल। गोरा-पलटनक उड्डा झंझारपुर बनल छल। कतेको गाममे आगि‍ लगाओल गेल। कतेको गोटे गुप्‍तवासमे काज करैत छला। कतेको गोटे मारि‍ खा-खा जहलमे बन्न छला। मुदा लाजि‍मी बात ईहो रहल जे ऐठामक कतेको परि‍वार गोरा सरकारक संग देलक। रहै-खाइक बेवस्‍थाक संग-संग सम्‍पति‍क लूट सेहो केलक। ओना गाममे सुलोचना बहि‍न सन कतेको गोटे छथि‍ जे सासुरसँ भगाओल छथि‍। अपन माए-बाप, भाए-भाैजाइक संग सेहो रहै छथि‍ आ असगरो बोनि‍-बुत्ता कऽ जीवन-यापन सेहो करैत छथि‍। कि‍छु गोटेकेँ सन्‍तानो छन्‍हि‍ आ कि‍छु गोटेकेँ नहि‍योँ छन्‍हि‍। अदौसँ एक पुरुष एक नारी सम्‍बन्‍धक वि‍धानो आ बेवहारो तँ बनल रहल मुदा परि‍वारकेँ आगू बढ़ैक लेल कि‍छु कमी तँ छेलैहे। ओ कमी अछि‍ जे मनुष्‍यक शरीरक बनाबटि‍ समान नै होइत अछि‍। बहुलांशमे सन्‍तानोत्‍पत्तिक शक्‍ति‍ समान रहैत आएल अछि‍ तँ तइ संग कमी-बेसी सेहो रहल अछि‍। कतौ कोनो पुरुखमे शक्‍ति‍क कमी तँ कतौ कोनो महि‍लामे। तहि‍ना कतौ कोनो पुरुखमे बेसी रहल अछि‍ तँ कतौ कोनो महि‍लामे। शक्‍ति‍हीन पुरुख रहने क्षेत्रज सन्‍तानक चलनि‍ सेहो रहल अछि‍। मुदा शक्‍ति‍हीन नारी भेने तँ परि‍वारकेँ आगू बढ़ैमे बाधा उपस्‍थि‍त भाइये जाइत अछि‍। तइठाम दोसर नारीक सहारा जरूरी भऽ जाइत अछि‍। जँ से नै हएत तँ परि‍वारक अन्‍त हएत। अन्‍ते नै हएत बुढ़ाड़ी आ बीमारीक अवस्‍था सेहो कष्‍टकर हएत। मुदा आवश्‍यक-आवश्‍यकता तखन आराम आ वि‍लास दि‍स बढ़ैत अछि‍ जखन भो-वि‍लासक मनोवृत्ति‍ जोर मारैत अछि‍। जइक चलैत समाज-परि‍वारमे ि‍वकृतताक रूप पकड़ैत अछि‍। से भेल। समाजक अगुआएल (खास कऽ आर्थिक रूपे) आ मध्‍य वर्गीयो परि‍वारमे एक-सँ-अधि‍क बि‍आह करब नीके जकाँ चलनि‍मे आबि‍ गेल। जइसँ एक पुरुख एक नारीक प्रथापर जबरदस चोट पड़ल। मुदा केतबो जबरदस चोट कि‍अए ने पड़ल, तैयो सोलहन्नी नष्‍ट नै भेल। ओना नि‍म्न वर्गमे सेहो बीमारी पैसल मुदा दोसर रूपमे। ओना राजशाही बेवस्‍थामे ऊपर-सँ-नीचाँ धरि‍क कि‍छु परि‍वार जोड़ाएल छल, तइ परि‍वारक बीच भोगी-वि‍लासी मनोवृत्ति‍क परि‍णाम छल, जखनकि‍ गरीबमे पेटक दर्द कारण भेल। एहेन पुरुखोक संख्‍या कम नै जे कामचोर, आलसी, नशाखोर इत्‍यादि‍क कारणे पत्नीकेँ नै राखि‍ पबैत छल। नै रखैक माने ई जे पत्नीक भरण-पोषण नै कऽ पबैत छल। मुदा सेहो सोलहनी नै भेल। एहेन बहुतो महि‍ला छली जे पुरुखे जकाँ श्रम करैत छली। जि‍नका मनमे पति‍क प्रति‍ असीम श्रद्धा आ मजगूत संकल्‍प छलन्‍हि‍। अपन जि‍नगीक सभ सुख पति‍मे अरोपि‍ नेने छली। एकसँ अधि‍क बि‍आह करैक रूप दि‍नानुदि‍न बदतर होइत गेल। अनेको रंगक कुत्‍सि‍त रोगक जन्‍म होइत गेल। पुरुखोक वि‍चार एते घि‍नौना रूप पकड़ि‍ लेलक जे दर्जनक-दर्जन बि‍आह करए लगला। तइ संग ईहो भेल जे पुरुखक उमेरोक ठेकान नै रहल। जे उमेर बि‍आहक नहि‍यो छल तहू उमेरमे बि‍आह करए लगला। जइसँ अपने कि‍छुए दि‍न पछाति‍ मरि‍ जाइत छला आ जुआनि‍येँसँ महि‍ला वैधव्‍य रूपमे बदलि‍ जाइ छली। वि‍धवा जि‍नगीक बीच एहेन परि‍स्‍थि‍ति‍ पैदा लऽ लैत छल जे समाजमे रोग बनि‍ गेल। ओना नारीक प्रति‍ पुरुख सोलहो आना अन्‍याइये केलन्‍हि‍ सेहो नै। लड़का-लड़कीक (पुरुख-नारी) बीच दुनू तरहेँ रोगक प्रवेश भेल। कतौ बलक प्रयोग भेल तँ कतौ पुरुख-नारीक बीचक आंगि‍क सम्‍बन्‍ध सेहो भेल। प्रश्न उठैत जे अदौक परम्‍परा (वैदि‍क परम्‍परा) पर एते भारी चोट पड़ल आ सभ पुरुख-महि‍लाक मुँह देखैत रहि‍ गेला। नै, ऐठाम ईहो बात देखए पड़त जे ने सभ गामक एक रंग चालि‍-ढालि‍, खान-पान, बात-वि‍चार अछि‍ आ ने सामाजि‍क वि‍कासक प्रक्रि‍या एक रंग अछि‍। एक रंग नै होइक अनेको कारण अछि‍। एक तँ छोट-छोट राज्‍यमे वि‍भाजि‍त छल। जइ तरहक राज्‍य छल ओइ तरहक रजो छला। ओना मि‍थि‍लांचल सेहो कतेको जमीन्‍दारीक संग राज्‍योमे वि‍भाजि‍त छल। सभकेँ अपन-अपन शासनक संग सामाजि‍क बेवस्‍थाे संचालि‍त करैक अलग-अलग ढर्ड़ा छल। ओना क्षेत्रक हि‍साबसँ सेहो अंतर छेलैहे। खान-पानक संग उपारजन करैक सि‍स्‍टमोमे अंतर पहि‍नौं छल अखनौं अछि‍। अखनो एहेन क्षेत्र अछि‍ जइठाम ने बाढ़ि‍क कोनो प्रभाव (धारक काट-छाँट) तेहेन पड़ल जइसँ ओइठामक खेत-पथार, वास भूमि‍ प्रभावि‍त भेल। मुदा एहनो क्षेत्रक कमी नै जइठाम उपजाऊ भूमि‍ धारो बनि‍ गेल आ बालुओसँ भरि‍ गेल अछि‍। जे कहि‍यो सुन्‍दर गाम (वासक हि‍साबे) छल ओ उजड़ि‍ गेल। बि‍नु अन्न-पानि‍सँ मनुख जीब केना सकैए? ई तँ प्रश्न तहि‍यो छल आ अखनो अछि‍ये। एकटा आरो भेल। ओ ई जे जइठाम पुरुख-नारीक बीच परि‍वार ठाढ़ भेल ओइठाम पुरुख प्रधान बेवस्‍था रहने अनेको तरहक अबलट लगा नारीकेँ घरसँ भगाएब। केकरो सन्‍तानोत्‍पत्ति‍ शक्ति‍ नै रहने, तँ केकरो चरि‍त्रहीन कहि‍ इत्‍यादि‍-इत्‍यादि‍, लट जोड़ि‍ घरसँ अलग कऽ देल जाइत छल अखनो कऽ देल जाइए। गामक समस्‍या (भाइक बेवहार) दुनू परानी मुनेसरक सम्‍बन्‍धमे खाधि‍ बनैत गेल। दुनू भाँइक भि‍नौजी सुलोचनाकेँ सेहो बाँटि‍ देलकन्‍हि‍। एते दि‍न सुलोचना दुनू भाँइक बीच छली मुदा भीन भेने जुगेसरसँ हटि‍ मुनेसरक संग भेली। जुगेसर मुनेसरक खेती छोड़ि‍ देलकन्‍हि‍। भाइक खेती छोड़ने खेतीक समस्‍या मुनेसरकेँ उठलन्‍हि। कारणो स्‍पष्‍टे  अछि‍। अपने दुनू परानी बाहरे रहि‍तो छला आ गामक आवाजाही सेहो नहि‍येँ जकाँ छलन्‍हि‍। गाममे नै रहने माले-जाल केना पोसि‍ सकै छला, जइसँ खेती करि‍तथि‍। ओना बाहरोमे दुनू बेकती मुनेसर एकठाम नहि‍येँ रहैत छला। बाल-बच्‍चाक संग पत्नी-साधना राँचीमे रहि‍तो छली आ हाइ-स्‍कूलमे नोकरि‍यो करैत छली जखन कि‍ मुनेसर पलामूमे रहैत छला। एक तँ दुनूक दूरी अधि‍क अछि‍ दोसर जँ स्‍कूलमे छुट्टि‍यो होइत छलन्‍हि‍ तैयो ट्यूशन रहि‍ये जाइत छलन्‍हि‍। तँए राँचीयोक आबा-जाही कमे-सम रहैत छलन्‍हि‍। जि‍नगीक दूरी वि‍चारोक दूरी बनौने रहलन्‍हि‍। जइठाम साधनाकेँ अपन परि‍वारक चि‍न्‍ह-पहचि‍न्‍हमे कमी छलन्‍हि‍ तइठाम मुनेसर भाइक आगू सम्‍पति‍-जमीनकेँ गौण बुझैत छला। स्‍पष्‍ट दुनूक मतभेद होइत गेलन्‍हि‍। अपन हक-हि‍स्‍सापर साधना अड़ली तँ मुनेसर आगू बढ़ैसँ हि‍चकि‍चाइ छला। होइत-हबाइत भेल ई जे दुनू गोटे एक दि‍न ि‍नर्णयक लेल तैयार भेला। दुनूक बीच प्रश्न-उत्तर एना भेलन्‍हि‍। साधना- “जखन खेत कीनैमे आधा खर्च भैयाकेँ देलि‍यनि‍ तखन ओ कि‍अए अपना बेटा नामे लि‍खा बेइमानी केलन्‍हि‍?” साधनाक मजगूत तर्कसँ मुनेसर सहमि‍ गेला। मुदा अपनाकेँ उदार बनबैत उत्तर देलखि‍न- “ओ (भैया) जँ बेइमाि‍नयेँ केलन्‍हि‍ तइसँ हमर की बि‍गड़ल?” (क्रमश: जारी...) ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। साक्षात्‍कार श्री राजदेव मण्‍डलक संग- उमेश मण्‍डल- सभसँ पहि‍ने वि‍देह साहि‍त्‍य सम्‍मान लेल अपनेकेँ बहुत-बहुत बधाइ...। राजदेव मण्‍डल- धन्‍यवाद। उमेश मण्‍डल-   अहाँक नजरि‍मे साहि‍त्‍यक उद्देश्‍य की अछि‍? राजदेव मण्‍डल- साहि‍त्‍यक उद्देश्‍य होइत अछि‍- लोक कल्‍याणक भावना। समाजक कल्‍याण करब साहि‍त्‍यक परम अभीष्‍ट अछि‍। मात्र अभि‍व्‍यक्‍ति‍ नै जेकर सम्‍बन्‍ध जि‍नगीसँ हुअए सहए सुच्‍चा साहि‍त्‍य अछि‍। उमेश मण्‍डल-   अहाँक साहि‍त्‍यमे इति‍हास/संस्‍कृति‍ (खास कऽ मि‍थि‍लाक) केना वर्णित होइत अछि‍? राजदेव मण्‍डल- सामाजि‍क यर्थाथक अभि‍व्‍यक्‍ति‍ जँ हेतै तँ इति‍हास आ संस्‍कृति‍क समावेश भ’ जेनाइ स्‍वाभावि‍के छै। जि‍नगीकेँ जनबाक लेल युगक चि‍त्र आवश्‍यक अछि‍, सँगहि‍ प्राचीण आ नवीन संस्‍कृति‍ आ संस्‍कारक समावेश होइते रहै छै। उमेश मण्‍डल-   दि‍नानुदि‍नक अनुभवक अहाँक साहि‍त्‍यमे कोन तरहेँ वि‍वेचन होइत अछि‍? राजदेव मण्‍डल-  यएह अनुभव तँ काव्‍यक हेतुमे मदति‍ करै छै। जगतकेँ अनुभव आ अध्‍ययनसँ अनुभवक प्राप्‍ति‍ होइ छै आ रचना करैत काल ओकर रूप प्रगट होइ छै। उमेश मण्‍डल-   साहि‍त्‍यक शक्‍ति‍क वि‍षएमे अपनेक की कहब अछि‍? राजदेव मण्‍डल- साहि‍त्‍यक शक्‍ति‍ तँ असीम अछि‍। एक दि‍स क्रान्‍ति‍क चि‍नगी अछि‍ तँ दोसर दि‍स शान्‍ति‍क बीज अछि‍। सामाजि‍क परि‍वर्त्तनमे ऐ शक्‍ति‍क अहम भूमि‍का रहैत अछि‍। उमेश मण्‍डल-   अहाँक साहि‍त्‍यमे पाप-पुण्‍यक विश्लेषण केना होइत अछि‍? राजदेव मण्‍डल- मानव हर क्षण परि‍स्‍थि‍ति‍क कड़ीसँ बान्‍हल रहैत अछि‍। परि‍स्‍थि‍ति‍ वश नीक-अधलाह, पाप-पुण्‍य होइत रहै छै। ओना ऐ शब्‍दक सम्‍बन्‍ध साहि‍त्‍यक अपेक्षा धर्मसँ बेसी अछि‍। उमेश मण्‍डल-   कल्‍पना आ यथार्थक समन्‍वय अहाँ अपन साहि‍त्‍यमे केना करैत छी? राजदेव मण्‍डल- तीव्रगति‍सँ बढ़ैत कालचक्र। आइ जेकरा कल्‍पना कहैत छी काल्हि‍ यर्थाथ बनि‍ जाइत अछि‍। साहि‍त्‍य लेल कल्‍पना आ यर्थाथक सम्मि‍लन आवश्‍यक होइते छै। उमेश मण्‍डल-   अहाँक साहि‍त्‍यमे पात्र जीवन्‍त भऽ उठैत अछि‍, तेकर की‍ रहस्य? राजदेव मण्‍डल- पात्र तँ समाजेसँ बि‍छल जाइत अछि‍। ओकरा सँगे जीअब, जाँचब, परखब आवश्‍यक अछि‍। पश्चात जँ ओकरा अभि‍व्‍यक्‍त करब तँ ओ जीवन्‍त हेबे करतै। उमेश मण्‍डल-   साहि‍त्‍य लेखन, वि‍शेष कऽ मैथि‍ली साहि‍त्य लेखन अहाँ लेल कोन तरहेँ वि‍शि‍ष्‍ट अछि आ एकर प्राथमि‍कताकेँ अहाँ कोन तरहेँ देखै छी? राजदेव मण्‍डल- ऐठाम आमजनक भाषा अछि‍ मैथि‍ली। जन-जन तक अपन अभि‍व्‍यक्‍ति‍केँ संप्रेषण करबाक लेल ऐ भाषाकेँ प्राथमि‍कता देमहि‍ पड़त। उमेश मण्‍डल-   की अहाँ कोनो तथ्‍यक झँपलाहा भाग उघारैत छि‍ऐक? अगर हँ तँ केना आ नै तँ किएक? राजदेव मण्‍डल- कोनो भाग ने उघड़ल अछि‍ आ ने झाँपल। सभटा सोझेमे अछि‍। लि‍खबाक आ देखबाक अपन-अपन दृष्‍टि‍कोण अछि‍। उमेश मण्‍डल-  अहाँ कहि‍यासँ लेखन प्रारम्‍भ केलौं, केकरा लेल लि‍खलौं, आइ-काल्हि‍ केकरा लेल लि‍ख रहल छी? राजदेव मण्‍डल- बून-बूनसँ सरोवर भरि‍ जाइ छै। दीर्घ काल तक अभ्‍यास अनवरत चलैत रहल। कल्‍पनाक मुरुत तँ पहि‍ने मनेमे बनै छै। पुरान छि‍टफुट पाण्‍डुलि‍पि‍ सभमे 1986 ई. तथा कोनोमे 1987 ई. अंकि‍त अछि‍। समाजक लेल लि‍खलौं आ आइयो हुनके लेल लि‍ख रहल छी। उमेश मण्‍डल-  की अहाँकेँ ई लगैत रहल अछि‍ जे मुख्‍य धारासँ अहाँ कति‍याएल गेल छी? अहाँक रचनामे समाजकेँ बाहरसँ देखबाक प्रवृति‍क की कारण? राजदेव मण्‍डल- धारा तँ अन्‍तरसँ फुटैत छै। अपन-अपन धारा होइ छै। मुख्‍य आ कति‍आएल कहि‍ की ओकरा रोकि‍ देब संभव छै? समाजकेँ मात्र बाहरसँ देख गंभीर रचना केना भ’ सकैत अछि‍। एक हृदए दोसरसँ नि‍वेदन केना करतै। ि‍वदेह-        अपन साहि‍त्‍य आ रचनामे की स्‍वयंकेँ पूर्णरूपसँ इमानदार राखब आवश्‍यक छै? राजदेव मण्‍डल- साहि‍त्‍य आ रचनामे जँ इमानदारी सुरक्षि‍त नै रहतै तँ फेर ओ कतए आ केना बँचतै। उमेश मण्‍डल-   मैथि‍ली साहि‍त्‍य आइक दि‍नमे की ई सभ (साहि‍त्‍यकार)क सामुहि‍क दोष स्‍वीकृति‍क रूप नै बुझना जाइत अछि‍?- राजदेव मण्‍डल- आइक दि‍नमे जे मैथि‍ली साहि‍त्‍यक स्‍थि‍ति‍ छै तेकरा लेल जे सभ दोषी छथि‍ हुनका सभकेँ स्‍वीकार करबाक चाहि‍यनि‍। पैघ लोकक तँ यएह पहि‍चान अछि‍ जे अपन दोषपर स्‍वीकारोक्‍ति‍क भाव प्रदर्शनमे कोनोटा झि‍झक नै देखबए। हमहूँ ओही श्रेणीमे आइक साहि‍त्‍यकार छी। तँए कि‍ हमहूँ दोषी नै छी? उमेश मण्‍डल-   की अहाँकेँ लगैत अछि‍ जे अहाँक पोथीकेँ हि‍न्‍दी, बंग्‍ला, नेपाली, अंग्रजी आदि‍ भाषामे अनुवाद कएल जाएत? तइ स्‍थि‍ति‍मे ओतए एकर कोन रूपेँ स्‍वागत हेतैक? की अहाँक साहि‍त्‍य ओइ भाषा आ संस्‍कृति‍ सभ लेल ओतबे महत्‍वपूर्ण रहतै जते ओ मैथि‍ली भाषा आ संस्‍कृति‍ लेल छै? अहाँक लेखन भाषा-संस्‍कृति‍ नि‍र्पेक्ष कि‍अए नै भऽ सकल? राजदेव मण्‍डल- दीर्घ काल तक प्रतीक्षाक उपरान्‍त तँ कहुना पाथी प्रकाशि‍त भेल। भाषांतर वा अनुवादक वि‍षएमे कि‍ सोचब। ओना हृदएस्‍पर्शी, सुच्‍चा साहि‍त्‍य सभ भाषाक लेल महत्‍वपूर्ण होइ अछि‍ आ सभठाम आदृत होइत अछि‍। भाषा-संस्‍कृति‍सँ ि‍नरपेक्ष भ’ रचना केना होएत। उमेश मण्‍डल-   अहाँक भाषा तँ मैथि‍ली अछि‍ मुदा अहाँक लेखनपर बाहरी भाषा, संस्‍कृति‍, वि‍चारधाराक प्रभाव पड़ल अछि‍, कतौ-कतौ ई स्‍पष्‍ट अछि‍ मुदा बेसी ठाम नै, एकर की कारण? राजदेव मण्‍डल- भाषा तँ बहैत नीर अछि‍। एकरा बान्‍हसँ घेरि‍ क’ राखब ठीन नै। बेकती आ स्‍थान सभमे परि‍वर्त्तन भ’ रहल छै आ हेबक सोहो चाही। परि‍वर्त्तन आ नि‍त-नूतनता आवश्‍यक छै। उमेश मण्‍डल-   अहाँक रचनाक प्रचार ऐ पुरस्‍कारक बाद भयंकर रूपसँ भेल अछि‍, अहाँकेँ ऐसँ केहेन अनुभव भऽ रहल अछि‍? राजदेव मण्‍डल- प्रसन्न छी ऐ बातसँ जे समाज आ खास क’ वुद्धि‍जीवी पाठक वर्ग हमरापर अनुग्रह केलथि‍। सभकेँ हृदएसँ नमन। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। जगदीश प्रसाद मण्डल रत्नाकर डकैत (एकांकी) पहि‍ल दृश्‍य- (मोजेलाल गरदनि‍मे ढोल, हाथमे लकड़ीक बजौना नेने आगू-अागू आ भजन लाल पाछू-पाछू।) मोजे लाल-     (डंका जकाँ बजबैत, कनी काल ढोल बजा, बन्न करैत) नगर-नगर, डगर-डगरसँ गाम-गामक, समाज-समाजक भाए-बहि‍न, काका-काकी, दादा-दादी इत्‍यादि‍ सभसँ कहै छी, सुनै- जाउ। भजन-लाल भाय बीच छथि‍ ओ कहता। भजन लाल-    गाम-समाजक जे भाए-बहि‍न छी कान खोलि‍ सुनू। जँ नै सुनब आ पछाति‍ कहब जे तेना कान गुजि‍या गेल जे से सुनबे ने केलौं। से नै हुअए। मोजे लाल-     (पुन: जागब ध्‍वनि‍मे ढोल बजा) भजन भाय, अपन वि‍चार कहि‍यौ। भजन लाल-    काल्हि‍ भाेरेसँ रत्नाकर भैया ऐठाम पुण्‍योत्‍सव छि‍यनि‍ छपुआ कार्डक आशा नै करब। मोजे लाल-     भाय सहाएब, छपुआ कार्ड कि‍ कहलि‍ऐ? भजन लाल-    आब देखै छी जे गामसँ, परि‍वारसँ एते तक कि‍ बाप-माएसँ करोड़ो योजन दूर छी मुदा बेटा-बेटीक जन्‍मोत्‍सव मना हजारो-लाखाे कार्ड जतए-तजए बि‍लहि‍ दइ छि‍ऐ। मुदा...। मोजे लाल-     मुदा कि‍? भजन लाल-    यएह जे पहि‍ने छँटि‍आबए पड़त जे कोन काड हकार सदृश अछि‍ आ कोन भारक संग भोजनक अछि‍। ई तँ नै जे ‘जान ने पहचान, हमर तोहर मेहमान’। मोजे लाल-     (एक धुन ढोल बजबैत नचबो करैत आ गेबो करैत) नोत एलै हौ भैया, हकार एलै हौ बेन डोलबैत बेना एलै, पीपहीक मुस्‍कान हौ। फड़-अहि‍वर फड़ बि‍लहि‍ बाँटि‍ जोगी-ज्ञानी रत्नाकर डकैत भैया हौ। (दोहरा-तेहरा, ढोलो बजबैत आ गेबो करैत।) असथि‍र होइत- भजन भाय, नोत-हकारक ढोलहो छी, तँए दोहरा-तेहरा कऽ कहि‍यौ? भजन लाल-    से की? मोजे लाल-     जहि‍ना सोना भेटनौं आ हरेनौं प्राश्चि‍त करबए पड़ै छै तहि‍ना ने नतो-हकार छी। सरही आमक पीपही नीक-नीक कलमी जौड़क जोड़ पाबि‍ नाता जोड़ि‍ सरही-सँ-कलमी बनि‍ जाइत अछि‍ तहि‍ना ने नतो जोड़ल जाइत अछि‍। ई तँ नै ने जे फुर्सत दुआरे ए.टी.एम.क माध्‍यमसँ सम्‍बन्‍ध जोड़ि‍ लेब। भजन लाल-    से की? मोजे लाल-     यएह जे कोनो बि‍आह छै आकि‍ मूड़न आकि‍ कोनो आन छोट-पैघ काज, जखने काज परि‍वारसँ ऊपर उठैत अछि‍ तखने ने परि‍वारसँ उठल सोच-बुधि‍क जरूरत पड़ैत अछि‍, तखन अहाँकेँ अपनेसँ छुट्टी नै अछि‍, केना पछुआएल लोक अहाँ संग सम्‍बन्‍ध बना रहत। भजन लाल-    जहि‍ना तूँ मोजे लाल, बि‍नु खति‍आनक मालि‍क तहि‍ना हम भजना हरक लागनि‍सँ लऽ कऽ खौजरा-खैजरी चटकबैत वीणाक ओहन स्‍वर समुद्रमे पहुँच जाइ छी जे घंटा भरि‍ पटरी दबने एकटा मकै फुटि‍ कऽ खापड़ि‍सँ कूदि‍ माटि‍पर अबैत अछि‍। मोजे लाल-     भाय सहाएब, अहाँक बात नै बुझलौं? भजन लाल-    जहि‍ना भट्टा गाछमे लटकि‍ जीवन यात्रा करैत तहि‍ना मुड़ै माटि‍क तरेमे जीवन यात्रा करैत अछि‍, तँए ओकर जि‍नगीक कोनो महत नै? की ओ जीवनदाता नै छी? मोजे लाल-     भाय सहाएब, बूढ़ भेने अहाँ भँसि‍या जाइ छी? भजन लाल-    से केना? मोजे लाल-     हम तँ गाम-देहातसँ शहर बजार धरि‍ ने घुमै छी। जाबे बजार नै बनत ताबे चौकीदार केना फड़त। देखै छि‍ऐ बड़का-बड़का बरि‍आतीमे इंजन गाड़ीक पति‍आनी लगल, तइमे छौड़ा-छौड़ी सभ अपन गाड़ी सटा देत आ भरि‍ राति‍ खा-पी उमैक लेत। (ढोलक अवाज सुनि‍ गामक मि‍सर लाल आ रमण लाल अबैत, दुनूकेँ देखि‍ते पाशा बदलैत) नोत एलै हो भैया, हकार एलै हो.... (मोजे लालकेँ चुप होइते भजन लाल मि‍सर लाल दि‍स तकलक। भावात्‍मक दृश्‍य। केना मि‍सर लालक थरथर कपैत मन कि‍छु बाजए चाहैत, तहि‍ना भजन लालक पि‍यासल पथि‍कक दृश्‍य इत्‍यादि‍...।) भजन लाल-    (मि‍सर लालसँ, आेंगरी तानि‍ बाँहि‍ उठा) अहाँ कि‍छु बाजए चाहै छी? मि‍सर लाल-    हँ। भजन लाल-    तखन मुँह कि‍अए चोरौने छी। जाबे अपन बात काज रूपमे दुनि‍याँक बीच नै राखब तँ के केकर कि‍ केलकै से तँ बुझए पड़त। मन असथि‍र कऽ बाजू। ओना अखन उत्‍सवक समए लगि‍चाएल अछि‍ तँए नीक हएत जे अहूँ सभ कपड़ा-लत्ता साफ कऽ ली, केश-दाढ़ी, जुत्ता-चप्‍पल ठीक-ठाक करैमे जते समए लागत तइसँ बेसी समए नै अछि‍। मि‍सर लाल-    (कँपैत) भाय-सहाएब, अहाँक उत्‍सवमे तेहेन मंच बनत जे श्रीमान्-श्रीमती होइत-होइत बजैक समैये ओरा जाएत तखन तँ जहि‍ना भोजमे सभ दि‍न धकि‍आइत-धकि‍आइत एेँठार लग पहुँच गेलौं। (बि‍च्चेमे मोजे लाल डि‍गरी चालि‍मे ढोल बजबए लगैए) भजन लाल-    भाय, ने तोहर बात हमरा धऽ लेत आ ने धड़ैक डर होइए मुदा पैघ काजक आगू छोट काजकेँ कि‍छु वि‍लमा देब नीक होइ छै। नइ, जँ तूँ बड़ धड़फड़ाएल छह तँ चलह रस्‍ता पकड़ि‍ संगे-संग। काजो चलतै आ भजनो-कीर्तन चलतै। (तइ बीच रमण लाल मि‍सर लालकेँ डपटैत बाजल) बजैले जे सतमसुआ बच्‍चा जकाँ पेटमे उधकै छौ से दाबि‍ कऽ राख नै तँ कहि‍ दइ छि‍औ। मि‍सर लाल-    कि‍ कहमे, जे कहैक छौ से भने तेहल्‍लाक बीच छँहेँ बाज? रमण लाल-     अपन बाप-पुरखाक नाआें बूझल छौ? अपन कि‍छु बुझले ने छौ तँ दस गोरेमे की बजबीही। मि‍सर लाल-    जखन दुनू गोरे संगे रहै छी तखन तूँ पहि‍ने ने कि‍अए चेता देने छेलेँ? रमण लाल-     तूँ पुछलेँ कहि‍या? मि‍सर लाल-    अँइ रौ, बि‍नु पुछनहि‍ भरि‍ दि‍न संगे रहै छी। तहूमे जे नजरि‍पर चढ़बे ने कएल से केना पुछबो। रमण लाल-     अँइ रौ, कि‍ तोरा बूझि‍ पड़ै छौ जे जहि‍ना आरती घुमा लोक भगवानकेँ ठकि‍ भरि‍ राति‍ अन्‍हरेमे रखै छन्‍हि‍, से हम तोरा केलि‍औ। भजन लाल-    देखू, अहाँ सभ बड़ अल्ला करै छी। कौल्हुका काज कि‍ सभ अछि‍ से मन पाड़ए दि‍अ। (सभ जाइत अछि‍) दोसर दृश्‍य- (भजन लाल, मि‍सर लाल आ रमण लाल अबैत अछि‍।) भजन लाल-    भाय, दुनि‍याँक खेल अजीब छै। जेना समुद्रमे जाइठ‍-सीमा नै होइ छै तहि‍ना ने अछि‍। ऐ अथाह माटि‍-पानि‍ बीच टपैक तीनू बाट तेहेन भऽ गेल जे...? मि‍सर लाल-    भाय, चुप कि‍अए भेलह? रमण लाल-     भजन भाय, दि‍लेरक संग दि‍लाक जखन भेँट होइ छै तखन एकटा नव अएनाक रंग चढ़ै छै। तँए मुँहक बात घोँटी नै, नइ पचए तँ उगलि‍ दि‍ऐ। भजन लाल-    (वि‍स्‍मि‍त होइत) भाय, एकटा बाट, तेना बनरा गेल जहि‍ना गाछ-वि‍रीछमे होइ छै जे कोढ़ि‍यो-बाती देब बन्न भऽ गेल। दोसर दोगलाइये गेल। तेसर बेटाक रगड़ामे बुढ़ाड़ी धरि‍ वस्‍त्रधारि‍ये रहला सुखदेव जकाँ आड़वन-कोपीन नै लेलनि‍। खएर, जे होउ...। पहि‍ने बैसैक ओरि‍यान करू। (मि‍सर लाल सतरंजी मोटरी खोलि‍ पसारए लगैत, तीनू गोटे तीन काेण पकड़ि‍ बीछा, जाजीम बि‍छबैत अछि‍। बि‍छान तैयार होइते रत्नाकर मंचपर अबैत अछि‍। माथमे तीन भीरी केश बान्हल, चानि‍पर तीन लकीर, दुनू दि‍स उजड़ा बीचमे लाल। दाढ़ी-मोछ भयंकर। बाँहि‍ गरदनि‍मे रूद्राक्षक माला, दहि‍ना हाथमे कमंडल, पीढ़ीपर लंगोटामे बान्‍हल पुरान कमलक मोटरी। मंचपर रत्नाकरकेँ अबि‍ते तीन गोटे पाछू-पाछू सेहो नारा लगबैत- “रत्नाकर भैया, जि‍न्‍दावाद। रत्नाकर भैया जि‍न्‍दावाद।” रत्नाकर-       (पाछू घुमि‍) सोझे हल्‍ला केने आ नारा लगौने नै हेतह। चुप-चाप सभ भऽ जाह। बेरा-बेरी अपन-अपन जि‍नगीक बात-वि‍चार समाजकेँ सुना दहुन। धर्मराजक न्‍याय भेटत, नै कि‍ यमराजक। महेश-        भाय सहाएब, अपनेक जीवन यात्रा बहुत नमहर अछि‍ ओते सुनैले ओते नि‍चेनि‍योँ चाही ने, से भूखल पेट कतेकाल सुनि‍ अमल करत। जइ इलाकामे साले-साल रौदी, दाहीक संग उपजाउ माटि‍ नष्‍ट भऽ गेल अछि‍ तइ इलाकाक यात्री कते दूर जीवन यात्रा कऽ सकैए? रत्नाकर-       कि‍ मतलब? महेश-        भूखे भजन ने होइ गोपाला। लि‍अ रखि‍ गुरु कण्‍ठी माला। रत्नाकर-       महेश, अहाँक प्रश्न जेहने सुन्‍दर अछि‍ तेहने कठि‍न। मुदा समुद्रसँ रत्न नि‍कालब आ जंगलसँ सि‍र-शि‍रोमणि‍ आनब, दुनू दू दि‍शा छी। गणेश-        एना नै हएत, कनी ओंगरीपर (ओंगरीपर जेना हि‍साब जोड़ल जाइत) हि‍साब बैसा कऽ बुझा दि‍अ। रत्नाकर-       गणेश बाउ, कान खोलि‍ सुनि‍ लि‍अ। ई धरती वि‍शाल रंगमंच छी। माटि‍-पानि‍क बीच रंगमंच सजल अछि‍। जे जेहेन यात्री छथि‍ ओ ओहेन अपन बाट पकड़ि‍ पाड़ करै छथि‍। गणेश-        कि‍ मतलब? रत्नाकर-       मतलब यएह जे कि‍यो अपन जि‍नगी हवन दैत अछि‍ तँ कि‍यो दोसराक हवन लैत अछि‍। खएर, जे होउ...। (बि‍‍च्चेमे, मि‍सर लाल अपन बात उठबए चाहलक आकि‍ सुरेसर ललकि‍ बाजल) अनेरे...। रत्नाकर-       तखन पहि‍ने फरि‍या लि‍अ पड़त जे खाइले जीबै छी आकि‍ जीबैले खाइ छी। दान देब नीक आकि‍ लेब नीक। आकि‍ लेब-देब नीक। आकि‍ देब-देब नीक। गणेश-        लेब-देब नीक छी। दुनू नीक छी कोनो ने नीक ने अधला छी। भजन लाल-    तखन? गणेश-        बेवहारि‍क धरातलपर जे अधि‍क नीक हुअए? भजन लाल-    अधि‍कोक दू दि‍शा छै? गणेश-        से की? भजन लाल-    अधि‍क लोकक शब्‍दि‍क वि‍चार आ अधि‍क लोकक जि‍नगीक वि‍चार। रत्नाकर-       भजन जेहने तूँ साँझ भोर राति‍-दि‍न लय-धुन बदलि‍-बदलि‍ एके बातकेँ औंटै-पौड़ै छह तेहने गणेश अछि‍। भारी देखि‍ हाथी चढ़ब नीक बुझलनि‍, मुदा हाथी केना पोसाइत अछि‍ से लूरि‍ये ने भेलनि‍। गणेश-        (खि‍सि‍या कऽ, दहि‍ना हाथ ऊपर घुमबैत) तीन लकीर हम दइ छी, ताधरि‍ हम नै मानब जाधरि ओहन भोगी नै आनि‍ देखा देब। रत्नाकर-       हकार दि‍अए तोहीं ने गेल छेलह, तँए तोरे ने ओहेन हकरि‍यासँ भेँट भेल हेतह? भजन लाल-    भैया, बुढ़ोमे अहाँ ओहने अगुताह रहि‍ गेलौं जेहने समरथाइमे छेलौं। रत्नाकर-       (मुस्‍की दैत) हे बुड़ि‍वक, केतबो धड़फड़ा कऽ काज करबह, तँए कि‍ काज पहि‍ने थोड़े भऽ जाइए। काजक जे अपन समए छै ओइ अनुकूल जे करैत अछि‍, ओ कुशल भेल। मुदा...। सुरेसर-       मुदा की? रत्नाकर-       यएह जे जँ धड़फड़ा कऽ करब तैयो आ अलुरि‍ये करब तैयो या तँ आरो गजपटा जाएत वा उबाणि‍ भऽ जाएत। सुरेसर-       सुवाणि‍यो तँ भऽ सकैए कि‍ने? रत्नाकर-       संयोगवश, नि‍श्चि‍त नै। भजन लाल-    (धड़फड़ाइत) भैया, अहाँ अनेरे कोन घंघौजमे लगि‍ गेलौं, मोतीबला सि‍तुआ दोसर होइ छै भलहिं नाओं कि‍यो रखि‍ लि‍अए। (भाव दृश्‍य) ने कि‍छु रत्नाकर बजैत, मुदा चेहरा कहैत समुद्रक सि‍तुआ आ बरसाती डबराक सि‍तुआ एक वि‍यान केना करत। एक अजर-अमर बीच जीवन-यापन केनि‍हार, दोसर तीन मास ढेनुआर तीन मास रखलाहा, मि‍ला छह मास। (भजनलाल हराएल मुद्रामे बड़बड़ाइत) ‘मनमे रहि‍तो साँझ-भाेर ओहए गबै छी।’ (सबहक मुद्रा अपन-अपन वि‍चारानुकूल। सभसँ भि‍न्न मि‍सरलालक। जेना कि‍छु बजैले मुँह लुस-फुस करैत, तहि‍ना।) मि‍सर लालकेँ लुस-फुसाइत देखि‍ सुरेसर बजलाह- मि‍सर लाल अहाँ कि‍छु बाजए चाहै छी? मि‍सर लाल-    (दुनू हाथ जोड़ि‍) हँ, भाय सहाएब। हमरा सन लोककेँ बजैक एहेन समए कहि‍या भेटत? गणेश-        (बिगड़ि‍ कऽ) मि‍सर लाल बजैक छह तँ जल्‍दी बाजह, अखन धरि‍ चाहो ने भेल अछि‍। एना जे तेलि‍या-फुलि‍या लगेबह तँ घोंच-घाँचमे दू-चारि‍ कड़ी अमीन खाइये जाइ छै। भजन लाल-    माने? गणेश-        माने यएह जे जखन बाँसक सोझका लग्‍गा छलै तखन नमहर धुर-कट्ठा छलै। जखन चास-बास घटलै तखन इंच-फीटमे पहुँच गेल। मुदा नपैक यंत्र तेहेन स्‍प्रींगदार भऽ गेल जे केमहर कि‍ भऽ जाएत जे...। रत्नाकर-       समैपर धि‍यान रखू। भजन देरी कि‍अए होइ छह? मि‍सर लाल-    भाय सहाएब, दुनि‍याँक रीति‍क अनुसार दुरागमनक अपनो कर्तव्‍य बुझलि‍ऐ। तीनि‍येँ सालमे दूटा बेेटी भऽ गेल। गणेश-        अपरेशन कि‍अए ने करा लेलौं, जखन दुइये बच्‍चाक कोटा छै? मि‍सर लाल-    भाय सहाएब, सुनै छि‍ऐ समलौंगि‍क सम्‍बन्‍ध। ओइ कटौतीसँ कोटा नै पुरतै? रत्नाकर-       आगू बाजू? मि‍सर लाल-    भाय सहाएब, मन अपनो दुनू परानीक सएह भेल। देखै छी जे एकटा बेटी-बि‍अाहमे जि‍नगी भरि‍क कमाइसँ पारो नै लगै छै, तइठाम दूटाक भार तँ बेसी भेबे कएल। रत्नाकर-       (मुड़ी डोलबैत) हँ से तँ भेल। तखन...। मि‍सर लाल-    (अठन्नी हँसी हँसैत) दूटा ओही बीच भऽ गेल, जइ बीच फड़ि‍एबे ने कएल जे दुनूमे के अपरेशन करबी। भजन लाल-    एक गण्‍डा भेल? मि‍सर लाल-    गाहीमे एक कमे अछि‍। रत्नाकर-       पछाति‍? मि‍सर लाल-    माएक कानमे अपरेशनक समाचार पहुँचते मधुमाछीक गीत जकाँ गबैत दि‍न-राति‍ एके सोखर गबैत हमरा मौसीकेँ तेरहटा बेटी रहै से पार-घाट लगबे केलै आ एकरा सभकेँ चारि‍ये टामे ढट्ठा ढील होइ छै। सुरेसर-       (मुस्‍की दैत) से तँ ठीके। पछाति‍ की भेल? मि‍सर लाल-    तत्‍काल भाइक बात मानि‍ गेलौं। अपनो दुनू परानी वि‍चारलौं जे जँ कहीं माइयो-बापक असीरवादसँ आगू बेटे बेटा हुअए। गणेश-        (खि‍सि‍या कऽ) ईह बूड़ि कहीं केँ, हम एते दि‍न-राति‍ तबाह रहै छी से धि‍या-पुता डरे बि‍आहो ने केलौं आ हि‍नका मुनहरक मुँह खुजि‍ गेलनि‍। (गणेशीकेँ क्रोधि‍त देखि‍ मि‍सर लाल ठहाका दैत) मि‍सर लाल-    (धुनधुना कऽ) बपजेठ जकाँ केहेन गरमी छन्‍हि‍। मुदा जोरसँ कि‍छु नै बजलाह। भजन लाल-    मि‍सर भाय, एना जे ि‍तलकेँ तार बनेबह तते समए नै छल। जल्‍दीमे अपन बात अन्‍त करह? ि‍मसर लाल-    हकार दइले जे गेल छेलह से कहने छेलह जे अपन बात धड़फड़ा कऽ बाजी। रत्नाकर-       देखू वि‍चार दू ढंगे लोक करैए, औपचारि‍क आ अनौपचारि‍क। अनौपचारि‍यो औपचारी बनैए मुदा बीचमे शासकीय सूत्र आबि‍ जाइत अछि‍। अच्‍छा आगू...। मि‍सर लाल-    हि‍साब जोड़ि‍ लेलि‍ऐ किने। दूटा दुनि‍याँ रीति‍क अनुसार, दूटा दुनू परानीक झगड़ा-मि‍लान, मि‍लान-झगड़ामे। गणेश-        जते कुल-खनदानक खति‍आन-बही छह से अखने उन्‍टा दहक। रसगुल्‍लाक आसामे कचौरि‍यो सुखि‍ कऽ टाँट भऽ गेल हएत। मि‍सर लाल-    गणेश बाबू, अपने लग नै बाजब तँ बाजि‍ कतए पाएब। कनी धि‍यानसँ सुनि‍ दृष्‍टि‍-कूट खोलि‍यौ। तखन ने भाँज पेबै। भजन लाल-    मि‍सर भाय, तों तते ने मेठनि‍ करै छह जे कुशि‍यारो रसकेँ मि‍सरी बनाइये कऽ छोड़बहक। मि‍सर लाल-    अच्‍छा हुनडे भेल। अखन धरि‍ सात बेटी बला सत बेटि‍या नाओं ग्रहण कऽ नेने छलौं। रत्नाकर-       पछाति‍? मि‍सर लाल-    (जेना बि‍ढ़नी कटलापर छटपटाहि‍ होइत) एह भाय सहाएब, की कहब। (दुनू हाथ माथपर लैत) भोरे-भोर एकटा एकरंगा आएल। भजन लाल-    के रहए? मि‍सर लाल-    कहलक जे घर तँ अही इलाका अछि‍ मुदा कामाख्‍या सीख छी। हमहूँ एक बेर कामाख्‍या गेल छी। रूपैया हाथे महरानीक दर्शन होइ छै ओतए। रत्नाकर-       आगू बढ़ू। मि‍सर लाल-    भाय सहाएब, सबा सए रूपैयाक रसीद काटि‍ हाथमे थमहा देलनि‍। हाथमे एकोटा पाइ नै। बि‍नु खेवाक यात्री जकाँ घरवार लग वि‍नती केलौं। गणेश-        (झोकमे) कि‍ वि‍नती केलौं? मि‍सर लाल-    कहलि‍यनि‍, बाबा महराज, बेटीक मारि‍सँ मरि‍ गेल छी केना अहाँकेँ खुश कऽ कऽ दरबज्जापरसँ वि‍दा करब। गणेश-        तखन कि‍ केलौं? मि‍सर लाल-    ओ जेना बूझि‍ गेला। लगले आँखि‍-ताँखि‍ उनटबैत-पुनटबैत कहलनि‍। जते तोरा बेटी छह तते तोरा एक्केबेर बेटा देबह, बाजह मंजूर छह? गणेश-        पछाति‍ कि‍ केलह? मि‍सर लाल-    मन पघि‍ल कऽ राँग-राँग भऽ गेल। मुदा घरवाली धरि‍ कहि‍ देलक जे ई ठकहरबा छी। गणेश-        पछाति‍ कि‍ भेल? मि‍सर लाल-    जे तकदीरमे लि‍खि‍ देने छेलि‍ऐ, से भेल। गणेश-        हमहीं लि‍खि‍ देने छेलि‍यह। मि‍सर लाल-    सभ दि‍न भागवत बचै छी अहाँ आ नाओं लगेबे दोसरकेँ। भजन लाल-    उत्‍सव शुरू होइक समए करीब आबि‍ गेल। जाबे तैयार हएब ताबे समैओ आबि‍ जाएत। क्रमश: जारी... ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। ओम प्रकाश गजलक लेल (समीक्षा) श्री विजय नाथ झाजीक गीत-गजल संग्रहक पोथीक नाम अछि "अहींक लेल"। ऐ पोथीमे गीत आ गजलक फराक-फराक दूटा प्रभाग छै। हम ऐ पोथीक गजल प्रभागक संबंधमे ऐठाँ किछु चर्चा करऽ चाहब। ऐ पोथीमे गजलकार श्री विजय नाथ झाजीक अठहतरिटा गजल प्रकाशित भेल अछि। पोथीक गजल पढलासँ ई पता चलैत अछि जे किछु गजल केँ छोडिकऽ बेसी ठाँ काफिया आ रदीफक निअमक पालन कएल गेल अछि। पृष्ठ संख्या ४७, ५०, ५४, ५५, ५६, ६७, ७१, ७४, ७५, ८२, ९४, १०१, ११०, ११४ पर छपल गजलमे काफिया गडबडाएल अछि। ऐठाँ ई धेआनमे राखबाक चाही जे बिना दुरुस्त काफियाक रचना गजल नै भऽ सकैए। तखनो अधिकांश गजलक काफिया दुरुस्त अछि, जे गजलक विकास यात्राक हिसाबेँ एकटा नीक लक्षण अछि। काफिया, रदीफ आ गजलक व्याकरणक निअम पालन करबाक हिसाबेँ गजलकार ओहि गजलकार सभसँ फराक श्रेणीमे छथि जे गजलक व्याकरणकेँ नै मानबाक सप्पत खएने छथि। ऐ गजल संग्रहक गजल सब कोन बहरमे लीखल गेल अछि, ऐ पर गजलकार मौन छथि। गजलक नीचाँमे बहरक नाम जरूर लीखल जएबाक चाही। बहरक ज्ञान नब पीढीक गजलकार सभमे बढेबामे ई महत्वपूर्ण डेग हएत। ओना तँ गजलकार कोनो गजलक नीचाँमे बहरक नाम नै लीखने छथि, मुदा गजल सभकेँ पढलासँ ई पता चलैत छै जे ऐ संग्रहक ढेरी गजल एहन अछि जाहिमे अरबी बहरक निअमक पालन करबाक नीक प्रयास कएल गेल अछि। ई स्वागत योग्य गप अछि। ऐसँ इहो पता चलैत अछि जे गजलकार अरबी बहरसँ नीक जकाँ परिचित छथि आ जँ ई बात अछि तँ हुनका बहरक नाम गजलक नीचाँमे फरिछाकेँ लीखबाक चाही। ऐ संदर्भमे हम पोथीक सबसँ पहिलुक गजलक (पृष्ठ संख्या ४५) मतलाकेँ उद्धृत करऽ चाहै छी- हमर पूजा, हमर परिचय, हमर शृंगार छी अपने सकल सौभाग्य, मन, काया, रुधिर-संचार छी अपने आब एकर मात्रा संरचना पर धेआन दिऔ, तँ पता चलै छै जे ऐमे मूल ध्वनि मफाईलुन माने "ह्रस्व-दीर्घ-दीर्घ-दीर्घ" सब पाँतिमे चारि बेर प्रयोग कएल गेल अछि। माने ई शेर बहरे-हजजमे कहल गेल छै। ऐ गजलक आनो शेरमे मोटामोटी किछु गलतीकेँ छोडि बहरे-हजजक प्रयोग अछि आ किछुठाँ वर्ण दुरुस्त कऽ देला पर ई गजल अरबी बहर बहरे-हजजमे अछि। ई एकटा उदाहरण अछि, एहन आरो गजल ऐ संग्रहमे छै जे वर्ण आ मात्रामे किछु परिवर्तन भेला पर अरबी बहरमे कहल मानल जाएत। हमरा ई आस अछि जे गजलकार अपन अगिला गजल संग्रहमे ऐ बातक धेआन राखताह आ अरबी बहर युक्त गजल कहिकऽ मैथिली गजलकेँ समृद्ध करताह। शेरक पाँतिक अंतमे पूर्ण विराम वा कोनो विराम चिन्ह नै लगेबाक निअम अछि, मुदा पोथीक गजलक शेर सभक पाँतिक अंतमे पूर्ण विराम लगाओल गेल अछि, जे निअमानुकूल नै अछि आ एकर धेआन राखल जएबाक चाही छल। संवेदनाक स्तरपर ई गजल संग्रह बड्ड नीक अछि आ गजलकारक विद्वताकेँ प्रकट करैत अछि। मुदा कएकठाँ भारी भरकम तत्सम आ संस्कृतक शब्दक प्रयोग गजलकेँ बूझबामे भारी बनबैत छै, जाहिसँ बचल जा सकैत छल। गजलमे क्लासिकल भाषाक प्रयोग नहिए हेबाक चाही, अपितु आम प्रयोगक भाषाक प्रयोग गजलक लेल बेसी नीक होइत छै। शेरमे एहन शब्दक प्रयोग जे आम बेबहारमे नै छै, गजलकारक शब्द सामर्थ्यकेँ तँ जरूर देखाबैत छै, मुदा शेरकेँ आम जनसँ दूर सेहो करैत छै। तैं शेर कहबाक काल हमरा हिसाबेँ बेसी क्लिष्ट भाषाक प्रयोगसँ बचबाक चाही। अंतमे ई कहल जा सकैए जे "अहींक लेल" पोथीक गजल प्रभाग मैथिली गजलक विकसित होइत रूपकेँ अस्पष्टे रूपेँ, मुदा देखबैत जरूर अछि। ई पोथी गजलक व्याकरणक हिसाबेँ किछु गलतीकेँ छोडिकऽ नीक प्रयास अछि। ऐ संग्रहक कएकटा शेरमे अरबी बहरक पालनक प्रयास महत्वपूर्ण आ नोटिस करबाक जोग अछि। कएकठाँ क्लिष्ट आ संस्कृतनिष्ठ शब्दक प्रयोगकेँ जँ कात कए कऽ देखल जाइ तँ संवेदनात्मक स्तरपर सेहो ई संग्रह नीक अछि। मैथिली गजलक विकास यात्रामे ई पोथी गजलक भविष्यक लेल नीक डेग अछि। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। १.जगदीश प्रसाद मण्‍डलक वि‍हनि‍ कथा- जनक हाथे खेती २.बिन्देश्वर ठाकुर- बिपतियाक विदेश [विहनि कथा ] १ जगदीश प्रसाद मण्‍डलक वि‍हनि‍ कथा जनक हाथे खेती दतमनि‍ काटए भैयाकाका हँसुआ नेने धड़फड़ाएल बॅसबि‍टी दि‍स जाइत छलाह आकि‍ रस्‍तेमे नुनुआँ पुछलकनि‍- “भैयाकाका, सरोसती पूजा कहि‍या छि‍ऐ?” काजमे वि‍लम होइ दुआरे भैयाकाकाक मनमे उठलनि‍, जखन पुछलक आ नै कहबै ई उचि‍त नै। जखन काका बुझैए तखन अपनो तँ दायि‍त्‍व बनैए। मुदा लगले मनमे उठलनि‍, आठ दि‍नसँ पतरो नै उनटेलौं तखन ओहि‍ना केना कहि‍ देबै। आब कि‍ ओ समए रहल जे श्राद्ध कर्म करबै काल एक गोटे करबै छलाह आ दोसर गोटे वि‍धि-वि‍धान देखैत छलाह। मुदा जतए जे होउ से होउ। अपना मनक मौजी बहुकेँ कहलौं भौजी जे कहतै से कहौ मुदा हूसल बात नै बाजब। नुनुआँकेँ कहलखि‍न- “बौआ, आठ िदन पतरा देखना भऽ गेल, देखि‍ कऽ कहबौ। अखन दतमनि‍ काटए जाइ छी, नइ बरदेबौ।” जहि‍ना गामक सभ भैयाकाकाक बात मानै छन्‍हि‍, तहि‍ना नुनुआँ सेहो मानि‍ गेल। मुदा दोहरा देलकनि‍- “काल्हि‍ दुपहरमे आबि‍ कऽ बूझब।” भैयाकाका बजला कि‍छु नै, कि‍एक तँ वि‍राम दइक जगह बूझि‍ पड़लनि‍। मुदा मनमे उठलनि‍ बड़ खच्‍चर छौड़ा अछि‍। कहू जे बारह बर्खसँ ऊपरेक उमेर हेतै, सौंसे गाममे टोले-टोल घरे-घर पूजा होइते छै, से नै देखै सुनैए जे पुछलक। मुदा मन ठमकि‍ गेलनि‍। मन पड़ि‍ गेलनि‍ पत्नीक बात जे कहने छेलखि‍न- “तीन कट्ठामे जते गहुमक लगता लागल छल दामक भाउवे ततबे भेल।” करि‍आइत मन कड़ेलनि‍। मुदा कहबे केकरा करि‍तथि‍न। बॅसबि‍‍टीमे हँसुआ नेने आँखि‍ नवका कड़ची तकैत रहनि‍ मुदा मन जनक हाथे खेती करबामे बौआए लगलनि‍। सोझेमे कड़ची रहै मुदा नजरि‍पर चढ़बे ने करनि‍। नमहर-नमहर बाँसक बॅसबि‍टीमे ठाढ़ छी मुदा दतमनि‍ नै भेट रहल अछि‍। वि‍ह्वल होइत मुँह पटपटेलनि‍- “जनक हाथे खेती।” वएह जनक ने जे बारह बर्खक रौदीमे हर जोति‍ मि‍थि‍लांचलक धरतीकेँ असथि‍र केलनि‍। एक हाथ पत्नीक करेजपर तँ दोसर हवनमे आहूत दैत छलाह। वएह मि‍थि‍ला राज छी ने जइठाम पढ़ब, अध्‍ययन करब पूजा नै! असल सरस्‍वतीक पूजा तँ देखि‍ते छी!! २ बिन्देश्वर ठाकुर, धनुषा, नेपाल। हाल-कतार। बिपतियाक विदेश [विहनि कथा ]

कतेको दिनसँ मुह घोकचौने बिपतियाक ओठपर आइ भरल मुस्कान अछि। कारण तीन महिनाक बाद पश्चिम दिससँ चान्द उगल। माने कम्पनी आइ तलब देबाक लेल राजी भेल। तीन महिना धरि विभिन्न बहाना बनाकऽ टारैत छल। अगला महिना, अगला महिना, अगला महिना..... । मुदा तीन महिना बाद कामदार सभ जब उखड़ल तँ कम्पनी सेहो विवश भऽ गेल सेलरी देबाक लेल। मुदा ओतेक सोझिया नै रहैक कम्पनीक मनेजर। लेबर सभकेँ ठकि फुसला कऽ एक महिनाक तलब देलक आ २ महिनाक राखिए लेलक। अन्तत: जे हुअए, सभ कामदार खुश भेल। बिपतिया सेहो खुश भेल।  सेलरी लऽ पैसा गनैत अछि तँ मात्र पाँच गोट नमरी। पहिनेसँ आएल मुस्कान बिपतियाक मुहसँ बिला गेलैक। ओ चिन्तित भऽ गेल। कारण खानाक पैसा बङ्गालीकेँ उधारिए छलै। चुल्हा चौका चलाएब हेतु घरमे पठाबै पड़तनि। ओतबे कहाँ, महन्थास लेल ढौवा नै बुझैताह तँ ५०००० क सुइद-सुइद जोड़ि कऽ २ लाख बनाइए देतै। आब की करत, बिपतिया गम्भीर सोचमे पड़ि गेल। "घर परिवार छोड़ि कऽ सात समुन्द्र पार अएली पत्थर फोड़ऽ मुदा तैयो घर नै चलल आ पेटो नै चलल, धिकार अछि हमर मेहनेत आ हमर कामकेँ "बरबड़ाइत आ लथरैत जेक्रीत ZEKREET क ट्रस्ट एक्सचेन्ज trust exchange मे जा प्रभु मनी ट्रान्सफर द्वारा पत्नीक नामसँ खाना पैसा बाहेक सभ पठा देलक। आरो नै किछु तँ ओइ महन्था धनिककेँ कर्जा तँ सधतै। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। उमेश मण्‍डल वि‍देह नाट्य उत्‍सव- 2013 मधुबनी जि‍लान्‍तर्गत चनौरागंजमे, राष्‍ट्रीय राजमार्ग-57क सटले उत्तरबारि‍ कात त्रि‍दि‍वसीय आयोजन जे “वि‍देह नाट्य उत्‍सव”क रूपेँ प्रसि‍द्ध अछि‍ आयोजि‍त भेल। आयोजन दि‍वस छल वि‍गत 15-सँ-17 फरवरी। वि‍देह प्रथम मैथि‍ली पाक्षि‍क ई-पत्रि‍काक नाट्य-रंगमंच-फि‍ल्‍म वि‍भागक संपादक श्री बेचन ठाकुरक संयोजकत्‍वमे ऐ आयोजनक सफल समापन भेल। दूटा नाटक, दूटा एकांकी नाटक, नुक्कड़, जट-जटीन, होली, झड़नी, गंगा झाँकी, ग्‍वाल-बाल झाँकी, बाल लीला झाँकी, लोक समूह गीत, स्‍वागत गीत, समूह नृत्‍य, हास्‍य-चटनी, महादेव-नचारी, राष्‍ट्रीय एवं भक्‍ति‍ परक झाँकी इत्‍यादि‍-इत्‍यादि‍ अनेक कार्यक्रमक प्रस्‍तुति‍क संग कवि‍ सम्‍मेलन तथा कला एवं साहि‍त्‍य क्षेत्रमे “वि‍देह सम्मान समारोह”क आयोजन सेहो कएल गेल। परोपट्टाक लोकक उपस्‍थि‍ति‍क अलाबे कवि‍-सम्मेलनमे तथा सम्मान समारोहमे आएल समस्‍तीपुर, दरभंगा, सुपौल तथा मधुबनी जि‍लाक वि‍शि‍ष्‍ट व्‍यक्‍ति‍क उपस्‍थि‍ति‍ ऐ वार्षिक कार्यक्रमकेँ अह्लादकारी ओ स्‍मरणीय बनौलक। पहि‍ल दि‍न अर्थात् 15 फरवरीकेँ दि‍नक 11 बजेसँ रात्रीक 10 बजे धरि‍, दोसर दि‍न माने 16 फरवरीकेँ मौसम खराप रहलाक कारणेँ दि‍नक 3 बजेसँ 11:30 बजे राति‍ धरि‍ तथा तेसर दि‍न 2 बजेसँ राति‍क 12 बजे धरि ‍उपरोक्‍त‍ वि‍भि‍न्न कार्यक्रमक प्रस्‍तुति‍क रूपरेखा रहल। ऐ सम्‍पूर्ण कार्यक्रमक वि‍डि‍यो रि‍काॅडि‍ंग सेहो कएल गेल अछि‍। प्राप्‍त सूचनाक आधारपर ऐ त्रि‍दि‍वसीय कार्यक्रमक सम्‍पूर्ण वि‍डि‍यो शीघ्रहि यू-ट्यूबपर सम्‍पूर्ण वि‍श्वमे पसरल वि‍देह-श्रोता-दर्शक तथा अन्‍य लेल उपलब्‍ध कराओल जाएत। भाषा सम्‍मान, मूल साहि‍त्‍य सम्‍मान, समग्र योगदान सम्मन, मांगनि‍ खबास सम्मन, आत्‍म ि‍नर्भर संस्‍कृति‍ संरक्षण सम्मन तथा अनुवाद पुरस्‍कार एवं “मानद् महत्तर सदस्‍यता” सम्मानक ऐ कड़ीमे 47 गोट सम्मानि‍त व्‍यक्‍ति‍क अह्लादकारी उपस्‍थि‍ति एे सम्मान समारोहकेँ सफलता प्रदान कएल। हलाँकि‍ मैथि‍ली पत्रकारि‍ता सम्मान तथा उपरोक्‍त वर्णित सम्मानक अनेक सूचीमे कि‍छु व्‍यक्‍ति‍ उपस्‍थि‍त नै भऽ सकलाह ति‍नका सभ लेल वि‍देह द्वारा पुन: दोसर सत्रक सम्मान समारोह अगामी मार्च माहमे, सुपौल जि‍ला अन्‍तर्गत ि‍नर्मलीमे आयोजि‍त हएत तेकरो उद्घोषणा मंचसँ कएल गेल। सम्मान समारोह, नाटक मंचन, एकांकी मंचन तथा कवि‍ सम्‍मेलनक समाचार वि‍स्‍तारसँ नि‍म्न अछि‍- वि‍देह सम्‍मान समारोह- उद्घाटन- कुमार रामेश्वरम् अध्‍यक्ष- डॉ. शि‍वकुमार प्रसाद। मंच संचालक- उमेश मण्‍डल। ‍ 1. श्री राजदेव मण्‍डल सुपुत्र स्‍व. सोने लाल मण्‍डल उर्फ सोनाई मण्‍डल, उमेर- 52, “अम्‍बरा” कवि‍ता संग्रह लेल वि‍देह मूल साहि‍त्‍य सम्‍मान-2012 सम्‍पर्क- गाम- मुसहरनि‍याँ, पोस्‍ट- रतनसारा, भाया- ि‍नर्मली, जि‍ला- मधुबनी, पि‍न- 847452 2. डॉ. नरेश कुमार वि‍कल “ययाति‍” (वि‍. स. खाण्‍डेकर, मराठी)क अनुवाद लेल 2013क वि‍देह अनुवाद पुरस्‍कार। सम्‍पर्क- भगवानपुर, देसुआ समस्‍तीपुर बि‍हार। 3. श्री जगदीश प्रसाद मण्‍डल सुपुत्र स्‍व. दल्‍लू मण्‍डल “तरेगन (बाल प्रेरक वि‍हनि‍ कथा संग्रह” लेल 2012क “वि‍देह बाल साहि‍त्‍य सम्‍मान” सम्‍पर्क- गाम+पोस्‍ट- बेरमा, भाया- तमुरि‍या, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) पि‍न- 847410 4. श्री राजनन्‍दन लाल दास (प्रति‍नि‍धि‍- डॉ. बुचरू पासवान) मैथि‍लीमे समग्र योगदान लेल “मानद् महत्तर सदस्‍यता” प्रदान कएल जा रहल अछि‍ 5. नृत्‍य अभि‍नय लेल वि‍देह “समग्र योगदान सम्‍मान” सुश्री संगीता कुमारी सुपुत्री श्री रामदेव पासवान, उमेर- १६, पता- गाम+पोस्‍ट- चनौरागंज, भाया- झंझारपुर, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) 6. चि‍त्रकला लेल वि‍देह “समग्र योगदान सम्‍मान” श्री जय प्रकाश मण्‍डल सुपुत्र- श्री कुशेश्वर मण्‍डल, उमेर- ३५, पता- गाम- सनपतहा, पोस्‍ट– बौरहा, भाया- सरायगढ़, जि‍ला- सुपौल (बि‍हार) 7. चि‍त्रकला लेल वि‍देह “समग्र योगदान सम्‍मान” श्री चन्‍दन कुमार मण्‍डल सुपुत्र श्री भोला मण्‍डल, पता- गाम- खड़गपुर, पोस्‍ट- बेलही, भाया- नरहि‍या, थाना- लौकही, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) संप्रति‍, छात्र स्‍नातक अंति‍म वर्ष, कला एवं शि‍ल्‍प महावि‍द्यालय- पटना। 8. हरि‍मुनि‍याँ वाद्य लेल वि‍देह “समग्र योगदान सम्‍मान” श्री जागेश्वर प्रसाद राउत सुपुत्र स्‍व. रामस्‍वरूप राउत, उमेर ६०, पता- गाम+पोस्‍ट- बेरमा, भाया- तमुरि‍या, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शि‍वि‍र), जि‍ला- मधुबनी पि‍न- ८४७४१० (बि‍हार) 9. ढोलक-ठेकैता लेल वि‍देह “समग्र योगदान सम्‍मान” श्री कल्‍लर राम सुपुत्र स्‍व. खट्टर राम, उमेर- ५०, गाम- लक्ष्‍मि‍नि‍याँ, पोस्‍ट- छजना, भाया- नरहि‍या, थाना- लौकही, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) 10. शि‍ल्‍प-वास्‍तुकला लेल वि‍देह “समग्र योगदान सम्‍मान” श्री राम वि‍लास धरि‍कार सुपुत्र स्‍व. ठोढ़ाइ धरि‍कार, उमेर- ४०, पता- गाम+पोस्‍ट- चनौरागंज, भाया- तमुरि‍या, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) 11. मूर्तिकला लेल वि‍देह “समग्र योगदान सम्‍मान” घूरन पंडि‍त सुपुत्र- श्री मोलहू पंडि‍त, पता- गाम+पोस्‍ट– बेरमा, भाया- तमुरि‍या, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शि‍वि‍र), जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) 12. काष्‍ट कला लेल वि‍देह “समग्र योगदान सम्‍मान” श्री योगेन्‍द्र ठाकुर सुपुत्र स्‍व. बुद्धू ठाकुर उमेर- ४५, पता- गाम+पोस्‍ट- बेरमा, भाया- तमुरि‍या, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शि‍वि‍र), जि‍ला- मधुबनी पि‍न- ८४७४१० (बि‍हार) 13. किसानी आत्मनिर्भर संस्कृतिक संरक्षण लेल वि‍देह “समग्र योगदान सम्‍मान” श्री राम अवतार राउत सुपुत्र स्‍व. सुबध राउत, उमेर- ६६, पता- गाम+पोस्‍ट- बेरमा, भाया- तमुरि‍या, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शि‍वि‍र), जि‍ला- मधुबनी पि‍न- ८४७४१० (बि‍हार) 14. किसानी आत्मनिर्भर संस्कृतिक संरक्षण लेल वि‍देह “समग्र योगदान सम्‍मान” श्री रौशन यादव सुपुत्र स्‍व. कपि‍लेश्वर यादव, उमेर- ३५, गाम+पोस्‍ट– बनगामा, भाया- नरहि‍या, थाना- लौकही, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) 15. अल्हा/महराइ लेल वि‍देह “समग्र योगदान सम्‍मान” मो. जीबछ सुपुत्र मो. बि‍लट मरहूम, उमेर- ६५, पता- गाम- बसहा, पोस्‍ट- बड़हारा, भाया- अन्‍धराठाढ़ी, जि‍ला- मधुबनी, पि‍न- ८४७४०१ 16. जोगि‍रा गायन लेल वि‍देह “समग्र योगदान सम्‍मान” श्री बच्‍चन मण्‍डल सुपुत्र स्‍व. सीताराम मण्‍डल, उमेर- ६०, पता- गाम+पोस्‍ट- बेरमा, भाया- तमुरि‍या, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शि‍वि‍र), जि‍ला- मधुबनी पि‍न- ८४७४१० (बि‍हार) 17. जोगीरा गायन लेल वि‍देह “समग्र योगदान सम्‍मान” श्री रामदेव ठाकुर सुपुत्र स्‍व. जागेश्वर ठाकुर, उमेर- ५०, पता- गाम+पोस्‍ट- बेरमा, भाया- तमुरि‍या, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शि‍वि‍र), जि‍ला- मधुबनी पि‍न- ८४७४१० (बि‍हार) 18. पराती गायन लेल वि‍देह “समग्र योगदान सम्‍मान” श्री लेल्हु दास सुपुत्र स्‍व. सनक मण्‍डल पता- गाम+पोस्‍ट- बेरमा, भाया- तमुरि‍या, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शि‍वि‍र), जि‍ला- मधुबनी पि‍न- ८४७४१० (बि‍हार) 19. झरनी लेल वि‍देह “समग्र योगदान सम्‍मान” मो. गुल हसन सुपुत्र अब्‍दुल रसीद मरहूम, पता- गाम+पोस्‍ट- बेरमा, भाया- तमुरि‍या, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शि‍वि‍र), जि‍ला- मधुबनी पि‍न- ८४७४१० (बि‍हार) 20. नाल वादन लेल वि‍देह “समग्र योगदान सम्‍मान” श्री देव नारायण यादव सुपुत्र श्री कुशुमलाल यादव, पता- गाम- बनरझूला, पोस्‍ट- अमही, थाना- घोघड़डीहा, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) 21. मैथि‍ली लोकगीत लेल वि‍देह “समग्र योगदान सम्‍मान” श्रीमती फुदनी देवी पत्नी श्री रामफल मण्‍डल, पता- गाम+पोस्‍ट- बेरमा, भाया- तमुरि‍या, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शि‍वि‍र), जि‍ला- मधुबनी पि‍न- ८४७४१० (बि‍हार) 22. मैथि‍ली लोकगीत लेल वि‍देह “समग्र योगदान सम्‍मान” सुश्री सुवि‍ता कुमारी सुपुत्री श्री गंगाराम मण्‍डल, उमेर- १८, पता- गाम- मछधी, पोस्‍ट- बलि‍यारि‍, भाया- झंझारपुर, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) 23. खुरदक वादन लेल वि‍देह “समग्र योगदान सम्‍मान” श्री सीताराम राम सुपुत्र स्‍व. जंगल राम, उमेर- ६२, पता- गाम- लक्ष्‍मि‍नि‍याँ, पोस्‍ट- छजना, भाया- नरहि‍या, थाना- लौकही, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) 24. खुरदक वादन लेल वि‍देह “समग्र योगदान सम्‍मान” श्री लक्ष्‍मी राम सुपुत्र स्‍व. पंचू मोची, उमेर- ७०, पता- गाम+पोस्‍ट- बेरमा, भाया- तमुरि‍या, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शि‍वि‍र), जि‍ला- मधुबनी पि‍न- ८४७४१० (बि‍हार) 25. कॉरनेट वादन लेल वि‍देह “समग्र योगदान सम्‍मान” मो. सुभान, उमेर- ५०, पता- गाम+पोस्‍ट- चनौरागंज, भाया- तमुरि‍या, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) 26. लोक संस्‍कृति‍क संलक्षण लेल वि‍देह “मांगनि‍ खबास सम्‍मान” श्री राम लखन साहु पे. स्‍व. खुशीलाल साहु, उमेर- ६५, पता, गाम- पकड़ि‍या, पोस्‍ट- रतनसारा, अनुमंडल- फुलपरास (मधुबनी) 27. मि‍थि‍ला चि‍त्रकला लेल वि‍देह “समग्र योगदान सम्‍मान” श्रीमती वीणा देवी पत्नी श्री दि‍लि‍प झा, उमेर- ३५, पता- गाम+पोस्‍ट- बेरमा, भाया- तमुरि‍या, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शि‍वि‍र), जि‍ला- मधुबनी पि‍न- ८४७४१० (बि‍हार) 28. तबला वादन लेल वि‍देह “समग्र योगदान सम्‍मान” श्री उपेन्‍द्र चौधरी सुपुत्र स्‍व. महावीर दास, उमेर- ५५, पता- गाम+पोस्‍ट- बेरमा, भाया- तमुरि‍या, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शि‍वि‍र), जि‍ला- मधुबनी पि‍न- ८४७४१० (बि‍हार) 29. तबला वादन लेल वि‍देह “समग्र योगदान सम्‍मान” श्री देवनाथ यादव सुपुत्र स्‍व. सर्वजीत यादव, उमेर- ५०, गाम- झाँझपट्टी, पोस्‍ट- पीपराही, भाया- लदनि‍याँ, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) 30. झालि‍ वादन लेल लेल वि‍देह “समग्र योगदान सम्‍मान” श्री कुन्‍दन कुमार कर्ण सुपुत्र श्री इन्‍द्र कुमार कर्ण पता- गाम- रेबाड़ी, पोस्‍ट- चौरामहरैल, थाना- झंझारपुर, जि‍ला- मधुबनी, पि‍न- ८४७४०४ 32. झालि‍ वादन लेल वि‍देह “समग्र योगदान सम्‍मान” श्री राम खेलावन राउत सुपुत्र स्‍व. कैलू राउत, उमेर- ६०, पता- गाम+पोस्‍ट- बेरमा, भाया- तमुरि‍या, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शि‍वि‍र), जि‍ला- मधुबनी पि‍न- ८४७४१० (बि‍हार) 33. मैथि‍ली लोकगाथा गायन लेल वि‍देह “समग्र योगदान सम्‍मान” श्री रवि‍न्‍द्र यादव सुपुत्र सीताराम यादव, पता- गाम- तुलसि‍याही, पोस्‍ट- मनोहर पट्टी, थाना- मरौना, जि‍ला- सुपौल (बि‍हार) 34. मैथि‍ली लोकगाथा गायन लेल वि‍देह “समग्र योगदान सम्‍मान” श्री पि‍चकुन सदाय सुपुत्र स्‍व. मेथर सदाय, उमेर- ५०, पता- गाम+पोस्‍ट- बेरमा, भाया- तमुरि‍या, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शि‍वि‍र), जि‍ला- मधुबनी पि‍न- ८४७४१० (बि‍हार) 35. शास्‍त्रीय संगीत आ तानपुरा वाद्य लेल वि‍देह “मांगनि‍ खबास सम्‍मान” श्री रामवृक्ष सि‍ंह सुपुत्र श्री अनि‍रूद्ध सि‍ंह, उमेर- ५६, गाम- फुलवरि‍या, पोस्‍ट- बाबूबरही, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) 36. मृदन वादन लेल वि‍देह “समग्र योगदान सम्‍मान” श्री खखर सदाय सुपुत्र स्‍व. बंठा सदाय, उमेर- ६०, पता- गाम+पोस्‍ट- बेरमा, भाया- तमुरि‍या, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शि‍वि‍र), जि‍ला- मधुबनी पि‍न- ८४७४१० (बि‍हार) 37. तरसा/तासा वादन लेल वि‍देह “समग्र योगदान सम्‍मान” श्री जोगेन्‍द्र राम सुपुत्र स्‍व. बि‍ल्‍टू राम, उमेर- ५०, पता- गाम+पोस्‍ट- बेरमा, भाया- तमुरि‍या, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शि‍वि‍र), जि‍ला- मधुबनी पि‍न- ८४७४१० (बि‍हार) 38. रमझालि‍/ कठझालि‍/ करताल वादन लेल वि‍देह “समग्र योगदान सम्‍मान” श्री सैनी राम सुपुत्र स्‍व. ललि‍त राम, उमेर- ५०, पता- गाम+पोस्‍ट- बेरमा, भाया- तमुरि‍या, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शि‍वि‍र), जि‍ला- मधुबनी पि‍न- ८४७४१० (बि‍हार) 39. गुमगुमि‍याँ वादन लेल वि‍देह “समग्र योगदान सम्‍मान” श्री जुगाय साफी सुपुत्र स्‍व. श्री श्रीचन्‍द्र साफी, उमेर- ७५, पता- गाम+पोस्‍ट- बेरमा, भाया- तमुरि‍या, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शि‍वि‍र), जि‍ला- मधुबनी पि‍न- ८४७४१० (बि‍हार) 40. डंका/ढोल वादन लेल वि‍देह “समग्र योगदान सम्‍मान” श्री योगेन्‍द्र राम सुपुत्र स्‍व. बि‍ल्‍टू राम, उमेर- ५५, पता- गाम+पोस्‍ट- बेरमा, भाया- तमुरि‍या, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शि‍वि‍र), जि‍ला- मधुबनी पि‍न- ८४७४१० (बि‍हार) 41. डंफा वादन लेल वि‍देह “समग्र योगदान सम्‍मान” श्री जग्रनाथ चौधरी उर्फ धि‍यानी दास सुपुत्र स्‍व. महावीर दास, उमेर- ६५, पता- गाम+पोस्‍ट- बेरमा, भाया- तमुरि‍या, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शि‍वि‍र), जि‍ला- मधुबनी पि‍न- ८४७४१० (बि‍हार) 42. डंफा वादन लेल वि‍देह “समग्र योगदान सम्‍मान” श्री महेन्‍द्र पोद्दार, उमेर- ६५, पता- गाम+पोस्‍ट- चनौरागंज, भाया- तमुरि‍या, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) 43. नङेरा/डि‍गरी वादन लेल वि‍देह “समग्र योगदान सम्‍मान” श्री राम प्रसाद राम सुपुत्र स्‍व. सरयुग मोची, उमेर- ५२, पता- गाम+पोस्‍ट- बेरमा, भाया- तमुरि‍या, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शि‍वि‍र), जि‍ला- मधुबनी पि‍न- ८४७४१० (बि‍हार) 44. रंगमंच अभि‍नय लेल वि‍देह “समग्र योगदान सम्‍मान” सुश्री आशा कुमारी सुपुत्री श्री रामावतार यादव, उमेर- १८, पता- गाम+पोस्‍ट- चनौरागंज, भाया- तमुरि‍या, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) 45. रंगमंच अभि‍नय लेल वि‍देह “समग्र योगदान सम्‍मान” मो. समसाद आलम सुपुत्र मो. ईषा आलम, पता- गाम+पोस्‍ट- चनौरागंज, भाया- तमुरि‍या, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) 46. रंगमंच अभि‍नय लेल वि‍देह “समग्र योगदान सम्‍मान” सुश्री अपर्णा कुमारी सुपुत्री श्री मनोज कुमार साहु, जन्‍म ति‍थि‍- १८-२-१९९८, पता- गाम- लक्ष्‍मि‍नि‍याँ, पोस्‍ट- छजना, भाया- नरहि‍या, थाना- लौकही, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) 47. रंगमंच हास्‍य अभि‍नय लेल वि‍देह “समग्र योगदान सम्‍मान” टाॅसि‍फ आलम सुपुत्र मो. मुस्‍ताक आलम, पता- गाम+पोस्‍ट- चनौरागंज, भाया- झंझारपुर, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार)। कवि‍ सम्मेलन- अध्‍यक्ष- श्री जगदीश प्रसाद मण्‍डल। मंच संचालक- उमेश मण्‍डल। समीक्षक- डॉ. योगानन्‍द झा तथा कुमार रामेश्वरम् एवं डाॅ. शि‍वकुमार प्रसाद। धन्‍यवाद ज्ञापन- श्री बेचन ठाकुर। कवि‍गण तथा कवि‍ताक नाओं- (1)  श्री शम्‍भु सौरभ- सुरूज मारए हुलकी (2)  श्री उमेश पासवान- कागज (3)  श्री रामविलास साहु- केना कहब भारत महान् (4)  श्री नन्‍द वि‍लास राय- मि‍थि‍ला वर्णन (5)  श्री श्री हेमनाराण साहु- हम छी मैथि‍ल (6)  श्री परमान्‍द प्रभाकर- खखनुआँ भुखल सुतलैए (7)  डॉ. योगानन्‍द झा (8)  मो. गुल हसन- कि‍सानक खरि‍हान (9)  श्री राजदेव मण्‍डल- जय हे कि‍सान (10) श्री उपेन्‍द्र नारायण अनुपम- गेल चौवन्नी (11) श्री कपि‍लेश्वर राउत- हमरा कि‍छु ने फुराइए (12) शशि‍कान्‍त झा- एतबे आंगन (13) श्री वि‍पीन कुमार कर्ण- व्‍यवस्‍थाक जाति‍-पाति‍ (14) गौरी शंकर साह- वि‍वाह वि‍वाद होइत (15) शि‍व कुमार मि‍श्र- मान (16) लक्ष्‍मी दास- हर जोति‍ हरबाह (17) डॉ. शि‍वकुमार प्रसाद- कजरौटी केर काजर संग (18) श्री जगदीश प्रसाद मण्‍डल- दि‍न राति‍क खेल। एकांकी नाटक “सतमाए” नाटककार- श्री जगदीश प्रसाद मण्‍डल नि‍र्देशक- श्री बेचन ठाकुर पात्र- परि‍चय- (1)  बुद्धि‍धारी बाबू-  हाई स्‍कूलक प्रधानाध्‍यापक,             भूमि‍कामे- सुश्री पूजा कुमारी (2)  वि‍पति‍बाबू-      हाई स्‍कूलक एक गोट सहायक शि‍क्षक,    भूमि‍कामे- सुश्री सरस्‍वती कुमारी (3)  पुलकि‍त-       हाई स्‍कुलक चपरासी,                भूमि‍कामे- सुश्री संगीता कुमारी (4)  सुलक्षणी-      वि‍पति‍ बाबूक माए                   भूमि‍कामे- सुश्री ललि‍ता कुमारी (5)  शि‍वकुमार-     वि‍पति‍ बाबूक बटा-                  भूमि‍कामे- सुश्री ज्‍योति‍ कुमारी (6)  खजूरि‍या-      एक गोट ग्रामीण महि‍ला,               भूमि‍कामे- सुश्री सुलेखा कुमारी (7)  तेतरी-        दोसर ग्रामीण महि‍ला,                 भूमि‍कामे- सुश्री पुनम कुमारी (8)  चि‍न्‍तामणी-      एक गोट साधारण कि‍सान,             भूमि‍कामे- सुश्री रोशनी कुमारी (9)  सावि‍त्री-             चि‍न्‍तामणि‍क पत्नी,                   भूमि‍कामे- सुश्री रागि‍नी कुमारी (10) गीता-        चि‍न्‍तामणि‍क बेटी,                   भूमि‍कामे- सुश्री माला कुमारी (11) पुरोहि‍त-      गामक पंडीजी,                     भूमि‍कामे- सुश्री राधा कुमारी (12) जय मालाक कालाकार-        भूमि‍कामे- सुश्री खुशबू, पुनम, सुलेखा, रागि‍नी, सोनी कुमारी। (13) परि‍छन गीत-               भूमि‍कामे- सुश्री सुलेखा आ पुनम कुमारी मैथि‍ली नाटक “गंगा ब्रि‍ज” नाटककार- श्री गजेन्‍द्र ठाकुर ि‍नर्देशक- श्री बेचन ठाकुर पात्र-परि‍चय- (1)  बच्‍चा-1             मि‍थि‍लेश कुमार यादव (2)  बच्‍चा-2             आनन्‍द मोहन कुमार यादव (3)  बच्‍चा-3             कुणाल कि‍शोर ‘धीरज’ (4)  मुख्‍यमंत्री-            देवन कुमार मण्‍डल (5)  मीत-               बैद्यनाथ कुमार ठाकुर (6)  बाउ-               सोनू कुमार (7)  लाला-              गणेश कुमार (8)  दादा-               वलराम कुमार यादव (9)  बि‍लट-              अमि‍त आनन्‍द ·        अभि‍यंता-            कृष्‍ण कुमार यादव ·        अभि‍यंताक पत्नी-        रंजीत कुमार राम ·        अभि‍यंताक बेटी-        कणाद कि‍शोर ‘नीरज’ ·        अभि‍यंताक बेटा-        शुभम शंकर गुप्‍ता ·        ठीकेदार-             सूरज कुमार ·        पहि‍ल मजदूर-         ब्रह्मानंद कुमार यादव ·        दोसर मजदूर-         शि‍वकुमार यादव ·        तेसर मजदूर-          संतीत कुमार यादव ·        पहि‍ल शि‍क्षक-         कि‍शोर कुमार ठाकुर ·        दोसर शि‍क्षक-         अभि‍नाश कुमार साह ·        ढोलहो देनीहार-        राजेश कुमार महतो ·        पहि‍ल डंका बजेनि‍हार-    कमल कि‍शोर पंकज ·        दोसर डंका बजेनि‍हार-    कि‍शोर कुमार यादव ·        बतही माए-           उमेश कुमार राम ·        पैघ भाय-            सुभाष कुमार ·        अभि‍यंताक मि‍त्र-        सुनील कुमार महतो ·        कनि‍याँ काकी-         रामबाबू भारती ·        पुरान अभि‍यंता-        सि‍कन्‍दर कुमार यादव ·        पहि‍ल प्रोफेसर-         रमेश कुमार ·        दोसर प्रोफेसर-         मो. कलामुद्दीन अंसारी ·        इसकुल छात्र-         प्रभाष कुमार, शि‍वकुमार मुखि‍या, प्रशांत कुमार आ संजन कुमार ·        कॉलेजक छाद्ध-        कृष्‍णानंद कुमार, शि‍वजी मण्‍डल, गंुजन कुमार, अजीत कुमार मण्‍डल, रंजीत कुमार मण्‍डल, मि‍थि‍लेश कुमार राम, मो. इरफान अंसारी जट-जटीन- “जब-जब पढ़ए कहलि‍औ रे जटा.....” गीत प्रस्‍तुति‍- सुश्री ज्‍योति‍ कुमारी आ सुश्री बबि‍ता कुमारी। जटीन पक्ष- सुश्री दुर्गी कुमारी, श्वेता कुमारी, सीता कुमारी आ संगीता कुमारी। जटा पक्ष- सुश्री रीना कुमारी, पूजा कुमारी, कंचन कुमारी तथा पूर्णिमा कुमारी। एकांकी- “जजाति”‍ नाटककार- श्री नंद वि‍लास राय नि‍र्देशक- श्री बेचन ठाकुर पत्र-परि‍चय- (1)  फूलचन्‍द-      गामक एकटा खलीफा-    भूमि‍कामे- मो. नौशाद आलम (2)  वनवाली-       फूलचन्‍दक पि‍ता-       भूमि‍कामे- राम बाबू भारती (3)  मैलामवाली-                       भूमि‍कामे- अमि‍त आनन्‍द- (4)  गामवाली-                        भूमि‍कामे- वि‍क्की कुमार कर्ण (5)  ति‍लाठवाली-     फूलचन्‍दक पत्नी-        भूमि‍कामे- मि‍थि‍लेश कुमार यादव (5) महान सामाजि‍क मैथि‍ली नाटक- “ऊँच-नीच” नाटककार- श्री बेचन ठाकुर ि‍नर्देशक- श्री बेचन ठाकुर पात्र परि‍चय- (1)  मंगल मल्लि‍क-         रामनगर गामक डोम-           भूमि‍कामे- सुश्री राधा कुमारी। (2)  मरनी-              मंगल केर पत्नी-              सुश्री आशा कुमार। (3)  दुखन-              मंगल केर पुत्र मैट्रीक पास-      सुश्री श्वेता कुमारी। (4)  बुधन-               एकटा ग्रामीण-               सुश्री रीना कुमारी। (5)  चन्‍द्रेश झा-           एकटा सुखी सम्‍पन्न, कंजूश ब्राह्मण‍- सुश्री वीभा कुमारी। (6)  मनीषा-              चन्‍द्रेशक पत्नी-               सुश्री सुवि‍ता कुमारी। (7)  चन्‍द्रप्रभा-             चन्‍द्रशक इकलौती बेटी-         सुश्री ज्‍योति‍ कुमारी। (8)  रबीया-              मंगल केर दि‍याद भाय-         सुश्री बबि‍ता कुमारी। (9)  शशि‍कांत-            दारू दोकानदार-              सुश्री रोशनी कुमारी। ·        सीताराम-            एकटा गरीब आदमी-           सुश्री आरती कुमारी। ·        शीला-              ताड़ीवाली-                  सुश्री शगुफता परवीण। ·        देबन-               एकटा ताडी पि‍याक-           सुश्री दुर्गा कुमारी। ·        सुकराती-            दोसर ताड़ी पि‍याक-           सुश्री संगीता कुमारी। ·        छट्टू-               तेसर ताड़ी पि‍याक-           सुश्री प्रीति‍ कुमारी। ·        झि‍ंगूर-              एकटा नामी-गामी चाहबला-       सुश्री रानी कुमारी। ·        संजीत-              मैट्रीकक वि‍द्यार्थी-             सुश्री कंचन कुमारी। ·        हरीश-              मैट्रीकक वि‍द्यार्थी-             सुश्री पूर्णिमा कुमारी। ·        भोलू-               मैट्रीकक वि‍द्यार्थी-             सुश्री चाँदनी कुमारी। ·        गौरी-               पेपरबला-                  सुश्री पूजा कुमारी। ·        राम प्रवेश-           एकटा ग्रामीण-               सुश्री सरस्‍वती कुमारी। ·        इंजीनि‍यर-            मंगलक बेटा-                सुश्री प्रीति‍ कुमारी। ·        डाॅक्‍टर-             चन्‍द्रेशक बेटी-               सुश्री पूजा कुमारी। ·        लक्ष्‍मण-             लड़ि‍की छात्रावासक मालि‍क-      सुश्री आरती कुमारी। ·        ब्रह्मानंद-             वकि‍ल, चन्‍द्रेशक मि‍त्र-         सुश्री आरती कुमारी। ·        मणि‍कांत-            वुजुर्ग कायस्‍त-               सुश्री सोनम कुमारी। ·        शांति‍-              डॉक्‍टरक सहेली-                   सुश्री नीतू कुमारी। ·        नि‍त्‍यानंद मि‍श्र-         रेलमंत्री-                   सुश्री सीता  कुमारी। ·        वरूण झा-            ि‍नत्‍यानंद मि‍श्रक अंगरक्षक-       सुश्री सबि‍ता कुमारी। ·        ओपीनदर-            मंगलक पि‍ति‍औत सार-         सुश्री चि‍न्‍तामणि‍ कुमारी। ·        परमानन्‍द-            चन्‍द्रेशक पड़ोसी-             सुश्री दि‍व्‍या कुमारी। ·        कृष्‍णानन्‍द-            चन्‍द्रेशक पड़ोसी-             सुश्री राधा कुमारी। ·        उमा-               ब्रह्मानंदक बेटीक सहेली-        सुश्री सोनल कुमारी। ·        मोतीलाल-            पंचायतक सरपंच-             सुश्री सुधा कुमारी। ·        रामानंद-                   चन्‍द्रेशक अप्‍पन लोक-          सुश्री खुशबू कुमारी। ·        चन्‍द्रकांत-            चन्‍देशक अप्‍पन लोक-          सुश्री ज्‍योति‍ कुमारी। ·        उमाकान्‍त-            चन्‍द्रेशक अप्‍पन लोक-          सुश्री नि‍क्की कुमारी। ·        शोभाकान्‍त-           चन्‍द्रेशक अप्‍पन लोक-          सुश्री मानसी कुमारी। ·        इन्‍द्र नारायण-          चन्‍द्रेशक अप्‍पन लोक-          सुश्री सत्‍यम कुमारी। ·        लूटन-              दोसर पेपरबला-              सुश्री संगीता कुमारी। ·        नरेश-               पहि‍ल गुंडा-                 सुश्री खुशबू कुमारी। ·        भद्रेश-              दोसर गुंडा-                 सुश्री द्रोपदी कुमारी। ·        उग्रेश-              तेसर गुंडा-                 सुश्री सुषमा कुमारी। ·        सुरेश-              चारि‍म गुंडा-                सुश्री रंजीता कुमारी। ·        महेश-              पाँचि‍म गुंडा-                सुश्री बबली कुमारी। ·        जयमाला हेतु दाय-माय-   गीतहारि‍ सभ-               ....................... सुश्री सरस्‍वती कुमारी। सुश्री पुनम कुमारी। सुश्री सुलेखा कुमारी। सुश्री रागनी कुमारी। सुश्री खुसबू कुमारी। सुश्री उजाला कुमारी। सुश्री पूष्‍पा कुमारी। सुश्री सबि‍ता कुमारी। नुक्कर- “साइकि‍लक पाय” नुक्करकार- श्री बेचन ठाकुर प्रस्‍तुति‍- (1)  ि‍वपीन-        हेड मास्‍टर-          श्री कि‍शोर कुमार ठाकुर (2)  राम सेवक-     कि‍रानी-                   श्री अवि‍नाश कुमार साह (3)  वि‍द्यार्थी-                         श्री चन्‍दन कुमार, कुंदन कुमार, सोनी कुमारी, (4)  प्रभाष-                          प्रभाष कुमार, (5)  वि‍नय-                          वि‍नय कुमार (6)  वीरेन्‍द्रक पि‍ता-                     चंदन कुमार (7)  शालि‍नी-                         .............. (8)  मधुकर-                         चंदन कुमार महादेव गीत- “अब ने चढ़ब बरदपर हौ बाबा......” प्रस्‍तुति‍- श्री कि‍शोर कुमार यादव। स्‍वागत गीत-1 “स्‍वागत की लए करब अहाँक......” गीतकार- श्री जगदीश प्रसाद मण्‍डल प्रस्‍तुति‍- सुश्री पुनम कुमारी आ सुलेखा कुमारी। स्‍वागत गीत-2 “अति‍थि‍ स्‍वागतम् अति‍थि‍ स्‍वागतम्.....” गीतकार- श्री बेचन ठाकुर प्रस्‍तुति‍- श्री अमीत रंजन। स्‍वागत गीत-3 “प्रि‍य पाहुन स्‍वागत स्‍वीकार करू......” गीतकार- श्री बेचन ठाकुर प्रस्‍तुति‍- श्री मनोज कुमार महतो। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। प्रो. हरिमोहन झाक पुण्यतिथि मनाओल गेल- संवाद- सुमित आनन्द २३ फरवरी २०१३ केँ  विश्वविद्यालय मैथिली विभाग, ल. ना. मि. वि., दरभंगाक मैथिली सााहित्य परिषद्  द्वारा प्रो. हरिमोहन झाक २९म पुण्यतिथिक अवसरपर एक गोष्ठीक आयोजन कएल गेल। ऐ अवसरपर विभिन्न वक्ता लोकनि हुनक व्यक्तित्व एवं कृतित्वपर चर्चा करैत हुनका कालजयी रचनाकार कहलनि। गोष्ठीक अध्यक्षता करैत डा. धीरेन्द्र नाथ मिश्र कहलनि जे प्रो. हरिमोहन झा हास्य रसक सिद्धहस्त लेखक रहितो करुणासँ भरल साहित्यकार छलाह। डा. रमण झा हुनक कृतित्वपर विस्तारसँ चर्चा करैत कहलनि जे प्रो. झाक रचनामे जे ज्योतिष  तत्व भेटैत अछि से पैघसँ  पैघ पंडितोक हेतु ग्राह्य अछि। विभूति आनन्दक कहब छलनि जे हरिमोहन बाबू सदिखन पाठककेँ हँसबैत गुदगुदबैत रहलाह मुदा अन्त हुनक नोरमे डुबल रहल। ऐ अवसरपर श्यामानन्द शाण्डिल्य, किरण मिश्र एवं अर्चना कुमारी सेहो अपन अपन विचार व्यक्त केलनि। सुरेन्द्र भारद्वाजक धन्यवाद ज्ञापनसँ कार्यक्रमक समाप्ति भेल। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com  पर पठाउ। ३. पद्य ३.१.रामचन्‍द्र प्रसाद जीक दूटा कवि‍ता ३.२.बेचन ठाकुर जीक दूटा स्‍वागत गीत ३.३.१.जगदानन्द झा ‘मनु’ गजल रुबाइ १-१२ २.पंकज चौधरी "नवलश्री" (गजल १-४) ३.४.१.आशीष अनचिन्हार-गजल २.क्रान्ति कुमार सुदर्शन-प्रेम शब्द ३.५.१.कामिनी कामायनी- पुष्पांजलि २.ज्योति झा चौधरी-जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी ३.६.१.राजदेव मण्‍डलक दू गोट कवि‍ता २.जगदीश प्रसाद मण्‍डलक सातटा गीत ३.७.ओम प्रकाश- गजल १-२ ३.८.१.बिन्देश्वर ठाकुर "नेपाली"- खूनक ढेला संग नव पुस्तक पतन रामचन्‍द्र प्रसाद जीक दूटा कवि‍ता- प्रदूषण सुनह हौ भैया सुनू हे बहि‍नी आब केना कऽ बचतै प्राण हे। प्रदूषणक समस्‍या एलै लऽ लेतै जान हे। गाछ काटि‍ जंगल उजाड़ि‍ अपन बढ़बै छी शान हे। अगि‍ला पीढ़ीले कि‍छु ने सोचै छी एकर समस्‍या महान हे। वायुमण्‍डलक सन्‍तुलन बि‍गड़ि‍ गेल मानुष करैए त्राहि‍माम हे। कखनो ठंढी कखनो गरमी बाढ़ि‍क ताण्‍डव महान हे। गन्‍दीक जाला नदीमे खसैत अछि‍ जलमे भरल वि‍षाणु हे। नव-नव बेमारी उमड़ल अछि‍ जीवनक काेनो ने ठेकान हे। बम बारूद मि‍साइल बनबैत अछि‍ शानेमे होइत अछि‍ हानि‍ हे। खुला मैदानमे शौच करैत अछि‍ शौचालयपर नै अछि‍ धि‍यान हे। प्रदूषण ि‍नयंत्रण कानून बना कऽ मानव केर करि‍यो कल्‍याण हे। कवि‍ करजोरि‍ कहैए सभ कि‍यो रखि‍यो धि‍यान हे। सुनह हौ भैया सुनू हे बहि‍नी केना कऽ बँचतै प्राण हे। कि‍सानक हाल कि‍सानक छाती वि‍हुँसि‍ रहल अछि‍ बेटा बेटी नै पढ़ि‍ रहल अछि‍। अकालक गालमे कि‍सान समाएल हि‍नकापर संकट छन्‍हि‍ आएल। महगाइ चरम सीमा छुबैत अछि‍ चौका छक्का मजदूर मारैत अछि‍। कि‍सानक हाल भेल बेहाल बि‍ना जमीन बेचने नै होइत अछि‍ बेटी बि‍आह। खाद-बीजमे महगाइ भरल अछि‍ कि‍सानक दि‍लमे लहरि‍ उठल अछि‍ अन्नदाता कि‍सान कहबैत अछि‍ अन्नक मूल्‍य बेपारी रखैत अछि‍ यएह वि‍डम्‍बनाक तर पड़ल कि‍सान अहाँ समानक दाम रखैए आन। खाद बि‍ज फैक्‍ट्रीसँ अबैत अछि‍ ओकर मूल्‍य ओहए रखैत अछि‍ एक दि‍न पृथ्‍वीपर मचत हाहाकार अन्न देवता अन्न दइसँ लचार खेती लागतमे बढ़ल तूफान आब कि‍नको नै बचतै प्राण। बि‍नु घूस अफसर नै सुनैत अछि‍ एलेक्‍शनक खर्चा फैक्‍ट्री-मालि‍क उठबैत अछि‍। मनमाना वस्‍तुपर दाम एकर मारि‍ झेलैए कि‍सान। नेताजी सभ मोछ पि‍जबै अछि‍ कि‍सानक हाल कि‍यो नै पुछैत अछि‍। भगवानोकेँ ने रहलनि‍ धि‍यान ऐ धरतीपर कि‍एक बनौलनि‍ कि‍सान। सम्‍पर्क- सुपुत्र स्‍व. मि‍श्री लाल साह गाम- उढ़वा (बड़ा), पोस्‍ट- खुटौना थाना- लौकहा, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। बेचन ठाकुर जीक दूटा स्‍वागत गीत प्रि‍य पाहुन...... प्रि‍य पाहुन, स्‍वागत स्‍वीकार करू स्‍वीकार करू, यौ साकार करू प्रि‍य पाहुन......। (कथीसँ स्‍वागत करब, नै वि‍ध-वि‍धान अछि‍ पूजाक कि‍छु, नै आेरि‍यान अछि‍) अबोध केर, पि‍यार करू यौ पि‍यार करू, हे यौ पि‍यार करू। प्रि‍य पाहुन......। (साहि‍त्‍य संगीत, कला वि‍हीन सभ्‍यता, संस्‍कृति‍ दीन) रक्षकगण, तैयार करू यौ तैयार करू, हे यौ तैयार करू। ्प्रि‍य पाहुन......। (दर्शन ले, पि‍आसल छेलौं प्रेम श्रद्धाक, रकटल छेलौं) अभि‍मत, बहार भरू यौ बहार भरू, हे यौ बहार भरू प्रि‍य पाहुन......। अति‍थि‍गण स्‍वागतम्...... अति‍थि‍गण स्‍वागतम्, ति‍थि‍गण स्‍वागतम्। दर्शन पाबि‍ गदगद, पाहुन स्‍वागतम् अति‍थि‍गण......। (नै पान प्रसाद, नै चाहक बेवस्‍था। बैसक नै बेवहार, कलामे पूर्ण आस्‍था।) सभ्‍यता संस्‍कृति‍केँ, हार्दिक स्‍वागतम्। पाहुन स्‍वागम। अति‍थि‍गण......। (नै संगीत साहि‍त्‍य, नै कला शि‍ष्‍टाचार। शुभ असीरवादसँ, हटत सभ अन्‍हार।) राम रहीम कृष्‍ण कबीर, टेरेसा शरमणम् पाहुन स्‍वागतम् अति‍थि‍गण......। (धन्‍य भल कोचिंग, धन्‍य पूजा समि‍ति‍। धन्‍य वि‍देह परि‍वार, चनौरागंज बस्‍ती) गुरुजन वि‍द्वतगण, सज्‍जन बुद्धम। पाहुन स्‍वागत् अति‍थि‍गण......। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। १.जगदानन्द झा ‘मनु’ गजल रुबाइ १-१२ २.पंकज चौधरी "नवलश्री" (गजल १-४) १ जगदानन्द झा ‘मनु’ ग्राम पोस्ट- हरिपुर डीहटोल, मधुबनी रुबाइ-१ कर्जा कए कऽ हम जीवन जीव रहल छी फाटल अपनकेँ कहुना सीब रहल छी सभ किछु गवा कए ‘मनु’अपन जीवनकेँ निर्लज भए हम ताड़ी पीब रहल छी ************************************* रुबाइ-२ नैन्हेटा हाथमे केहन लकीड़ छै नै माय बाप ई केहन तकदीर छै धो धो कऽ ऐँठ कप लकीड़ो खीएलै नै सुनै कियो ई दुनियाँ बहीर छै ************************************* रुबाइ -३ गोड़ी तोर मुस्कीमे छौ जहर भरल नै एना मुँह खोल कते घायल परल जँ निकैल गएलौ फूलझड़ी सन हँसी बाटपर भेटत कतेको छौंड़ा मरल ***************************************** रुबाइ -४ साँवरिया पिया अहाँ ई की कएलहुँ साउन चढ़ल छोड़ि चलि कोना गएलहुँ बहए हवा शितल सिहरैए हमर तन कोना रहब बिनु अहाँ बुझि नै पएलहुँ *************************************** रुबाइ-५  

सिस्टम आइकेँ किए बबाल बनल अछि  नेता सभ तँ  एकटा जपाल बनल अछि  बड़का बड़का बागर सभ राज चलबैए जनताक प्राणेपर सबाल बनल अछि  

************************************** रुबाइ-६  

गामक अधिकारी भेला सैयाँ हमर  कोना क पकड़तै कियोक बैयाँ हमर  सभक पेटीक माल आब हमरे छैक  सैयाँ लएथिन सभटा बलैयाँ हमर  ******************************** रुबाइ -७ 

मैथिली साहित्यक आँच सुनगैत अछि  सगरो नव विधाक ज्वला पजरैत अछि  कोटी नमन जिनकर बिछल जारैन अछि  विदेहक बारल आगि 'मनु' लहकैत अछि  ********************************* रुबाइ-८ बाबूजीक करेजमे  सदिखन रहलहुँ नै अपन मोनमे हुनका हम रखलहुँ   छाहैर रौद पानिसँ सदिखन बचेलन्हि सेबाक बेड़मे हम बहाना रचलहुँ ************************************ रुबाइ-९  

देह प्राण सबटा बाबूजी देलन्हि  जे किछु छी एखन बाबूजी केलन्हि अपने रहि भूखे हमर पेट भरलन्हि सुधि अपन बिसरि हमरा मनुख बनेलन्हि **************************************** रुबाइ-१० जे जन्म देलन्हि  ओ कहलन्हि गदहा  जे पोसलन्हि ओ  मानलन्हि गदहा  गदहा जँका जीन्दगी अपन बितेलहुँ जिनका बियाहलहुँ ओ बुझलन्हि गदहा ************************************ रुबाइ-११ घाट-घाट पर सूतल कतेक गोहि अछि  साउध लोककेँ सबतरि लेने मोहि अछि  धर्मक नाम पर खूजल कतेक दुकान  टाका लs कs छनमे सभटा पाप धोहि अछि 

**************************************** रुबाइ-१२ कोन बिधि मरि कs हम रुपैया कमेलहुँ सुख चेन निन्न रातिकेँ अपन हरेलहुँ जन्मक अपन सभ सम्बन्ध तियागि बिन कसुरे बाहर    वनवास बितेलहुँ २ पंकज चौधरी "नवलश्री" (गजल १-४) गजल-१ मिथिलोमे रहल नै बास मैथिलीकें टूटल जा रहल छै आश मैथिलीकें कहियो मैथिली नै हिचकि-हिचकि कानल देखू पलटि सभ इतिहास मैथिलीकें चन्दा अमर यात्री सदति सभ शरणमे विद्यापति सनक छल दास मैथिलीकें सभके ठाम देलौं भेल मान सभके भेटल अछि किए वनवास मैथिलीकें बाजब-पढ़ब सदिखन मैथिली लिखब हम जागत "नवल" पुनि विश्वास मैथिलीकें >मफऊलातु+मफऊलातु+फाइलातुन / मात्रा क्रम : २२२१+२२२१+२१२२ गजल-२ जे बुड़िबक छल अलबत यौ तकरे भेटल बहुमत यौ जनता फेर ठकेलै सभ गेलै व्यर्थहि जनमत यौ धन जनताक लुटा रहलै जनतो छै चुप सहमत यौ शोषण पाँच बरख चलतै जनता कानत कलपत यौ धर्मक दैत दुहाई ओ जे नहि धर्मसँ अवगत यौ नेता बनल कतेको कहि दुर्दिन देशक बदलत यौ लागै गप्प "नवल" एहन टिटही टेकल पर्वत यौ *मफऊलातु + मफाईलुन / मात्राक्रम-२२२१+१२२२ गजल-३ अनकर कहल मानब कते खा-खा ठेस कानब कते बस किछु दिनक जिनगी त' नै दिन जिनगीक गानब कते छोडू पुरनका राग सभ ऐ सिट्ठीसँ र'स छानब कते बिनु साधनक की साधना थूकसँ सातु सानब कते चाही अपन अधिकार जे माँगू "नवल' ठानब कते गजल-४ माथसँ घोघ ससरल जाए चन्ना लाजहि सकुचल जाए कजरायल नैना मधुशाला मातल मोन बह्सल जाए रूपक जालमे ओझराएल बाट बटोही बिसरल जाए माथक टिकुली ठोढ़क लाली देखि अयना चनकल जाए हाथक चूड़ी कंगना खनकै सौंस करेजा दरकल जाए आंखिसँ पीलौं "नवल" नेह जे सगरो देह पसरल जाए >आखर-११ ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। १.आशीष अनचिन्हार-गजल २.क्रान्ति कुमार सुदर्शन-प्रेम शब्द १ आशीष अनचिन्हार गजल लिखबाक छल गरीबक लचारी गजल देखू मुदा लिखल हम सुतारी गजल हम आब बेचि लेलहुँ हँसी ओ खुशी बाँचत कते समय धरि उधारी गजल अन्हार आब भगबे करत घरसँ यौ भगजोगनीक संगे दिबारी गजल सभ चप उलारकेँ खेलमे मग्न अछि जनताक टूटि रहलै दिहाड़ी गजल फरि गेल छै कबइ कवि अपन देशमे सौंसे सुना रहल बेभिचारी गजल दीर्घ-दीर्घ-ह्रस्व-दीर्घ + ह्रस्व-दीर्घ-दीर्घ + ह्रस्व-दीर्घ-दीर्घ + ह्रस्व-दीर्घ २ क्रान्ति कुमार सुदर्शन प्रेम शब्द नोरक धार अछि गालपर दिलक वार अछि हालपर की हाल कहू हृदयात्म केर दोलन करैत अछि ठामपर! ठुठायल कपकप करैत हार हड्डी गलने बिनु बजैल जाड़ की कहू आब विचार मोन केर छिछिआइत छी बड्ड ओइ पार फाटल बेमाय घिनाएल पएर बनल जाइत छी काल्हि राड़ की आबो सुनब व्यथा स्नेह केर छी पागल जाए बीयर आ बार

३ मनोज कुमार मण्डलक कवि‍ता- हम छी पागल हम छी पागल तँए घरसँ छी भागल उदरक निमित्ते बनल छी अभागल।

मन अखनो रहैत अछि लागल हुनको जी हेतनि‍ हमरेपर लागल। परधीन रहि सपना अछि लागल गाम छोरबाक मोहर अछि लागल।

माइक ममता बर छन्‍हि‍ जागल बाबूक मन मिलबाक छन्‍हि‍ लागल। हम छी पागल तँए घरसँ छी भागल उदरक निमित्ते बनल छी अभागल। सम्‍पर्क- बेरमा, तमुरि‍या, मधुबनी। सम्‍प्रति‍- मुम्‍बई। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। १.कामिनी कामायनी- पुष्पांजलि २.ज्योति झा चौधरी-जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी १ कामिनी कामायनी पुष्पांजलि पुष्पांजलि । आजुर मे भरने / लाल /पीयर/हरियर / नारंगी /बैंगनी /भांति भांति के / रंग /गंध /रूप /आकार / स सज्जित /पुष्प दल / स्वास मे भरने /मलयानिल मादक / मद्धिम मद्धिम आंच प/ नहु नहु गर्माबईत हवा मे / नब नब तरु पल्लव के अड़ स/ झाकैत धरा सुन्नरी / करि रहल अछि / उन्मादित प्रेमी सन / भावविभोर भ’/ऋतु राज क/ आराधना मे/ अवरूद्ध गरा आ’ मूंद्ल आंखि से / पुष्पांजलि / रूपसी के सौन्दर्य स चकित / अनंग सेहो शंख नाद करि देल/ सजी रहल अछि रंगमंच / प्रेमोत्सव के /मुट्ठी मे आबि गेले / सभ हक /उड़बए लेल  अबीर /गुलाल उतरि गेला नर नारी मे/फेर स/नवल भेस मे / खेलय लेल फागुन के / कृष्ण आ’ राधा । २ ज्योति झा चौधरी जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी “जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी” पढ़ि-पढ़ि कऽ भने पैघ भेल छी आइ अपन रोजी रोटी लेल पलायित दूर सँ देशक दुर्दशा पर लज्जित छी॥ अछि हाल धोबीक कुक्कुड़ जकॉं देशमे महिलाक दुर्गतिसँ व्यथित अतए कुनो सम्मान वा सुविधा लैत अनकर जानि लागैत अछि अनुचित ॥ पार्वती-दुर्गा-लक्ष्मी-सरस्वती सन अनेको देवी जतए पूजित कोना एहेन पशुवत मानसिकता रहि सकैत अछि जीवित॥ महिलाक सम्मान हएत ग्राह्य माताक प्रति सम्मान जौं सिखाबी ममता आ स्नेहसँ पूरित पुत्रकेँ शिष्ट मनुष्य बनाबी ॥ ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। १.राजदेव मण्‍डलक दू गोट कवि‍ता २.जगदीश प्रसाद मण्‍डलक सातटा गीत १ राजदेव मण्‍डल जीक दूटा अनुपम कवि‍ता- मनुखदेवा सभ मनहि‍-मन पूजि‍ रहल अछि‍ एक-दोसराक गप्‍प बूझि‍ रहल अछि‍ मनक केना बूझत सभ बात कहए चहैत अछि‍ छूबि‍ कऽ गात पकड़लक पएर भऽ कऽ कात हमरो दुख सुनि‍ लि‍अ तात जखैने देवक देहमे भि‍रल ठामहि‍ ओ ओंघरा कऽ गि‍रल जेकरा कहै छलौं महान से अपनहि‍ अछि‍ बेजान आब के देत सुन्नर काया सम्‍पति‍, यश, सम्मान खूजि‍ गेल सभटा राज तैयो भीतरसँ नि‍कलए आवाज- “छलै जे पावन बना देलि‍ऐ अपावन भऽ गेलै नि‍ष्‍प्राण छुबलासँ घटि‍ गेलै मान पहि‍ने बनल छल देवा आब भेल मनुखदेवा देह चढ़ि‍ करत सेवा भेट सभकेँ मनक मेवा नै डेराउ सभ कि‍छो देत मानत नै पूजा अखनो लेत।” अप्‍पन हारि‍ गाम-घरसँ मंत्री दरबार कि‍यो नै पाबि‍ सकैत छल पार के बजत सोझा फोड़ि‍ देति‍ऐ कपार डरे कनैत कते जार-बेजार जीतने छलौं सकल समाज उठि‍ते आवाज गि‍रबै छलौं गाज बड़का-बड़का केलौं काज बजि‍तो होइत अछि‍ लाज सभ दुसमनकेँ मारि‍ देलौं कतेकेँ माटि‍ तर गाड़ि‍ देलौं घर-परि‍वारकेँ तारि‍ देलौं तैयो अपनासँ हारि‍ गेलौं। अपन उजाड़ि‍ काटए बपहारि‍ के बजैत अछि‍ अप्पन हारि‍? २ जगदीश प्रसाद मण्‍डल जीक सात गोट गीत- वेद-भेद...... वेद-भेद रंग रहस्‍य पबि‍ते रस रहस्‍य भरै छै। भेद भेदि‍या भेदि‍-भेदि‍ तल-ऊपर चक्की गढ़ै छै। वेद-भेद रंग रहस्‍य पबि‍ते रस रहस्‍य भरै छै। भेदि‍ भेद भेदि‍या भभा हँसि‍-हँसि‍ सूरतान भरै छै। शून-सुि‍न कुभेद-भेद मने-मन सि‍रजैत रहै छै। वेद-भेद रंग रहस्‍य पबि‍ते रस रहस्‍य भरै छै। मन-मन्‍वतर वि‍चारि‍ कुचाड़ि‍ भेदि‍ भेद भेदैत रहै छै। वि‍चारि‍ बीच कुचाड़ि‍-सुचाड़ि‍ शक्‍ति‍ शि‍व सुरतानि‍ कहै छै। वेद-भेद रंग रहस्‍य पबि‍ते रस रहस्‍य भरै छै। करम-धरम आकि‍ धरम करम वेद-भेद भेदि‍आए कहै छै। तत्व हीन उकटि‍-पलटि‍ शूरधाम सूर-सुर चढ़ै छै। वेद-भेद रंग रहस्‍य पबि‍ते रस रहस्‍य भरै छै। भक-इजोतमे...... भक-इजोतमे पड़ल छी भयार यौ, मीत यौ, भाय यौ भक इजोतमे पड़ल छी। खेती मुँहक सुख-सुहनगर साड़ी अरि‍अर आस चढ़ै छै। उक्‍खरि‍ बीट समाठ सीस बनि‍ गर्भ संक्रान्‍ति‍ भरै छै। भक-इजोत......। भुक-भुक भुकजोगनी टहलि‍ इजोत-अन्‍हार करै छै। थाहि‍-थाहि‍ थोपड़ी थपथपा टाहि‍ टहाका मारि‍ कहै छै। भक-इजोत......। काति‍क कंत देखैले कलहंत कण्‍ठ कलपि‍ कहै छै। कोकि‍ल कंठ तानि‍ मधु काग-कागा सि‍र चढै छै। भक-इजोत......। जेकरा लूरि‍ छै घर बनबए चाहे घास चाहे ठौहरी। बोली-वाणी कुसि‍ फुसि‍या अपन वंश धड़ैत रहै छै। भक-इजोत......। जेठुआ गरे...... जेठुआ गरे गर लगि‍ते बनि‍ अन्‍हर-बि‍हाड़ि‍ धड़ै छै। चैत-बैशाख जेहन तपस्‍या हलचला धड़ती सिंचै छै। सम-समए समेटि‍ सि‍जति‍ हाले हल युग-धर्म कहै छै। जेठुआ गरे......। जन-जनक जेना जनक मि‍थि‍ला काम-धाम कहबै छै। देश-देशान्‍तर रथी महा सि‍ख सि‍र सजबैत रहै छै। जेठुआ गरे......। बट-कट कटि‍ बट वृक्ष जि‍नगी बाट धड़ैत रहै छै। राग-वि‍राग तजि‍ ति‍यागि‍ हंस चोंच भरैत रहै छै। जेठुआ गरे......। सर-नर रस्‍ता पकड़ि‍ श्रृंग-श्रंृगी श्रृंगार करै छै। रथी-महारथी रज्ञमे पुत्र-यज्ञ श्रृंगी करबै छै। जेठुआ गरे......। ि‍नर्जन वन...... ि‍नर्जन वन ि‍नर्जल पक्षी गुड़-गृह गुरु गुहारि‍ रहल छै। सतरंगी सतसंगी कहि‍-सुनि‍ अप्‍पन पएर पखारि‍ रहल छै। ि‍नर्जन वन......। एक सूर्य धरति‍यो एक अग्‍नि‍-वासु जल सि‍क्‍त करै छै। तूर-तूर तोड़ि‍ तुरि‍या तूर तक-तक तकली काटि‍ रहल छै। तक-तक......। जइसन जतए जल-थलि‍क गति‍ सि‍रजन सि‍र ततए तेहन चलै छै। तन-मन-धन धरम ततए हँसि‍-हँसि‍ पक्षी हंस हँसै छै। ि‍नर्जन वन......। हंसा बनि‍-हंस हँसि‍-हँसि‍ सत साखी मंगल रचै छै। ि‍नर्जन वन ि‍नर्जल पक्षी गुड़-गृह गुरु गुहारि‍ रहल छै। गुड़-गृह......। छगुन्‍तामे पड़ल छी..... छगुन्‍तामे पड़ल छी भाय यौ, छगुन्‍तामे पड़ल छी। छग-छगा, छक-छका-छक-छका चालि‍ कुबुधि‍ सुबुधि‍ देखै छै। छक-छका मेरि‍चाइ जेना ड़ब-ड़बा जीह-ठार लगै छै। भाय यौ, ड़ब-ड़बा......। सि‍ख-सीखि‍ सि‍खा-सि‍खा सजि‍ सि‍र सि‍रि‍स कहै छै। कर्ता-धर्ता-भर्ता भजार सीस चढ़ि‍ दुरमति‍या कहै छै। देखि‍ कलपि‍ कलपै छी छगुन्‍तामे पड़ल छी। भरनी-तानी भरि‍ ताना दि‍न-राति‍ मखड़ैत रहै छै। सुता सुत तानि‍-तना लट्टा-कट्टा सजैत रहै छै। लट्टा-कट्टा......। सूत फेकि‍ सुति‍यार बनि‍ रंग-बि‍रंग जाल बुनैत रहै छै। इचना-पोठी संग रहु-भाकुर ग्राह-गोहि‍ बनैत रहै छै। ग्राह-गोहि‍......। स्‍वागत गीत (सम्‍मान समारोह) सुआगत की लए करब अहाँक सुआगत की लए करब अहाँक। नै अछि‍ एको वि‍धि‍ बेवहार धएल धर्मक चरचे की करब। सर-समांग एको ने देखै छी तइओ सुआगत करबे-करब। असे नै बि‍सवास कहै छी की लए सुआगत करब अहाँक सुआगत की लए करब अहाँक। हेरल-हेराएल भोथि‍आएल बोन चीन-पहचीन उड़ि‍या गेलै कीच कमल कोशि‍या कुरबा जोति‍ जल जोति‍या गेलै। आसा-आस असि‍या अलि‍सा जुड़ा-जुड़ा कहै छी सुआगत की लए करब अहाँक। इच्‍छा–आशा सखी-सहेली सजि‍ फुलडाली संग-सुसंग आस मारि‍ बेआस मरि‍-मरि‍ छी समर्पित अंग-प्रत्‍यंग। भव-भार भरि‍-भरि‍ भरै छी सुआगत की लए करब अहाँक। सुआगत की लए......। गीत (नाट्य मंच, चनौरागंज) सुआगत अपनेक करै छी अभि‍गत अपने सुआगत करै छी। गुरु-गरु बड़ सि‍र सि‍रजन बर हारि‍-हीय हि‍हि‍या कहै छी सुआगत अपनेक करै छी। नैन-बैन संग, बैन-चैन संग चैन-मैन संग, मानि‍ सानि‍ कहै छी तथागत, अपनेक सुआगत करै छी। असि‍ आस ि‍नरास संग बास बसि‍ बि‍सवास कहै छी। हम-अहाँ, अहाँ हम गोप-गोपाल गोपी कहै छी। सुआगत अपनेक करै छी अभि‍मत, सुआगत अपनेक करै छी सुआगत......। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। ओम प्रकाश गजल १ तीतल हमर मोन हुनकर सिनेहसँ भेलौं हम सदेह देखू विदेहसँ के छै अपन, आन के, बूझलौं नै लडिते रहल मोन मोनक उछेहसँ नाचै छी सदिखन आनक इशारे करतै आर की बडद बन्हिकऽ मेहसँ छोडत संग एक दिन हमर काया तखनो प्रेम बड्ड अछि अपन देहसँ काजक बेर मोन सबकेँ पडै छी "ओम"क भरल घर सभक एहि नेहसँ मफऊलातु-फाइलातुन-फऊलुन (प्रत्येक पाँतिमे एक बेर) २ अहाँ हमरासँ एना नै रूसल करू कनी प्रेमक सनेसाकेँ बूझल करू हमर जिनगीक बाटक छी संगी अहीं करेजक बाट कखनो नै छोडल करू बहन्ना फुरसतिक करिते रहलौं अहाँ अहाँ कखनो तँ हमरो लग बैसल करू बहुत मारूक अछि नैनक भाषा प्रिये अपन नैनक कटारी नै भोंकल करू करेजा हमर फुलवारी प्रेमक बनल सिनेहक फूल ई सदिखन लोढल करू अहीं जिनगी, अहीं साँसक डोरी हमर करेजक आस नै "ओम"क तोडल करू (मफाईलुन-मफाईलुन-मुस्तफइलुन)- प्रत्येक पाँतिमे एक बेर ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। बिन्देश्वर ठाकुर "नेपाली" धनुषा नेपाल , हाल:कतार खूनक ढेला संग नव पुस्तक पतन 

सुन सुन हौ भैया सभ  आगिक चिन्गारीसँ पसाही लागि देश भरि तबाही मचि गेलौ।  जन्मदाता सभ पृथ्वीपर अवतरण  कराबऽ सँ पहिनहि अपन-अपन कोखिकेँ सुडाह करऽ लगलौ।

भविष्यक कर्णधार छै बच्चा  काल्हि धरि उपमा देनिहार सभ दाम्पत्यक सुखमे लिप्त भऽ  अधर्मी, राक्षस आ नरपिशाच भऽ गेलौ।

सृष्टिक फूल बनि सुन्दर जिनगी लऽ  अनुपम ब्रह्माण्डक अवलोकन करब,  एहन पुनीत आ परम उद्देश्य खूनक ढेला संग बेकार भऽ गेलौ।

के दोषी, ककर अछि दोष  ककरा अछि होस, के अछि बेहोस लोभी, लालची, महत्वाकांक्षी सन  मात-पितासँ मनो घबराए लगलौ।

दोसर दिस रोगी लेल भगवान कहेनिहार  समाजसेवी नामसँ प्रख्यात भेनिहार  आ स्वार्थक विषपान केनिहार आला-सिरिन्जबला सभ  भौतिकवादक चपेटामे पड़ि पथभ्रष्ट भऽ गेलौ। मच्छर आ खन्चुवा जकाँ रस चुसऽ लगलौ। 

पता नै ई रावणराज कहिया धरि चलत  लैङ्गिक असमानतामे गर्भ कहिया धरि उजड़त  भगवान सबुद्धि दैथि ऐ दुरात्मा सभकेँ  कारण पिताक आगू माइयो लाचार भऽ गेलौ माने खूनक ढेला संग जिनगी बेकार भऽ गेलौ। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। बालानां कृते १.पंकज चौधरी "नवलश्री"- बाल गजल १-२ २.जगदानन्द झा 'मनु'- होएत जँ १ पंकज चौधरी "नवलश्री" बाल गजल-१ दीदी जँ चढ़ि गेल कनहा-गाछी चट द' रूसल कोरा लए चुल्लरि भेटिते दोसर बहन्ना कानल आब कटोरा लए झिल्ली-कचरी घिरनी-फुकना बाबू गेलनि हाटसँ आनए साइकिलक घंटी बजिते दौगल दलान पर झोड़ा लए बैसल सभ झोड़ा घेरने अपन-अपन अनमाना लेल जे अनूप से बाँटि क' खेलक बँझि गेल मारि अंगोरा लए आँगन नीपल अरिपन पाड़ल आइ फेर छै पूजामानी आसन परमे त' पंडितजी बैसल ओ औनेलै बोरा लए घड़िघंटा आ शंख बाजि गेल चौरठ आ परसादी भेटतै "नवल" नञि लेतै एकटा लड्डू मुँह फुलेलक जोड़ा लए *आखर-२२ बाल गजल-२ दू टा बस सोहारी चाही माँ कम्मे तरकारी चाही पुरना छिपलीमे नै खेबौ हमरो नवका थारी चाही हमहूँ जेबै इसकुल बाबू पूरा सभ तैयारी चाही हाटसँ आनू पोथी-बस्ता मौजा-जूता कारी चाही इसकूलक जलखैमे हलुआ पूरी आ तरकारी चाही छीटब बीया गाछो रोपब आँगन लग फुलवारी चाही "नवल"सँ नै हम लट्टू माँगब हमरो कठही गाड़ी चाही >मात्रा क्रम : आठ टा दीर्घ सभ पांतिमे २ जगदानन्द झा 'मनु' हरिपुर डीहटोल, मधुबनी बाल कविता होएत जँ हाथक मुरली हमर खुरपी बनल गोबरधन बनल अछि ढाकी, प्रजा हमर सभ हराए गेल माए बनल अछि बूढ़ीया काकी | गाए एखनो हम चरबै छी प्रिय नहि लम्पट कहबै छी, इस्कूलक फीस दए नहि सकलहुँ तैँ हम चरवाहा कहबै छी | हमर गीतक स्वर महीसे बुझैत अछि, वा खेतक हरियर मज्जर सुनि झुमैत अछि | हमर बालिंग नै कियो देखने अछि गाछीक एक एक आमक मुँहपर लिखल अछि, चौक्का छक्काक नाम नहि सुनलहुँ हमर पुल्लीसँ गाम भरिक बासन टूटल अछि | के लऽ गेल यमुनाकेँ एतेक दूर जँ कनिको नाम हुनक जनितहुँ हम, हाथ जोड़ि दुनू विनती करितहुँ यमुनाकेँ हुनकासँ माँगितहुँ हम | हमरो गाममे जँ यमुना बहैत विषधर कलियाकेँ नथितहुँ हम, मुरली बजा कए गैया चरबितहुँ यमुना कातमे नचितहुँ हम | होएत जँ  हमरो माए यशोदा सभक प्रिय बनितहुँ हम, होएत जँ दाऊ भाइ हमर कतेक बलशाली रहितहुँ हम | ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। बच्चा लोकनि द्वारा स्मरणीय श्लोक १.प्रातः काल ब्रह्ममुहूर्त्त (सूर्योदयक एक घंटा पहिने) सर्वप्रथम अपन दुनू हाथ देखबाक चाही, आ’ ई श्लोक बजबाक चाही। कराग्रे वसते लक्ष्मीः करमध्ये सरस्वती। करमूले स्थितो ब्रह्मा प्रभाते करदर्शनम्॥ करक आगाँ लक्ष्मी बसैत छथि, करक मध्यमे सरस्वती, करक मूलमे ब्रह्मा स्थित छथि। भोरमे ताहि द्वारे करक दर्शन करबाक थीक। २.संध्या काल दीप लेसबाक काल- दीपमूले स्थितो ब्रह्मा दीपमध्ये जनार्दनः। दीपाग्रे शङ्करः प्रोक्त्तः सन्ध्याज्योतिर्नमोऽस्तुते॥ दीपक मूल भागमे ब्रह्मा, दीपक मध्यभागमे जनार्दन (विष्णु) आऽ दीपक अग्र भागमे शङ्कर स्थित छथि। हे संध्याज्योति! अहाँकेँ नमस्कार। ३.सुतबाक काल- रामं स्कन्दं हनूमन्तं वैनतेयं वृकोदरम्। शयने यः स्मरेन्नित्यं दुःस्वप्नस्तस्य नश्यति॥ जे सभ दिन सुतबासँ पहिने राम, कुमारस्वामी, हनूमान्, गरुड़ आऽ भीमक स्मरण करैत छथि, हुनकर दुःस्वप्न नष्ट भऽ जाइत छन्हि। ४. नहेबाक समय- गङ्गे च यमुने चैव गोदावरि सरस्वति। नर्मदे सिन्धु कावेरि जलेऽस्मिन् सन्निधिं कुरू॥ हे गंगा, यमुना, गोदावरी, सरस्वती, नर्मदा, सिन्धु आऽ कावेरी  धार। एहि जलमे अपन सान्निध्य दिअ। ५.उत्तरं यत्समुद्रस्य हिमाद्रेश्चैव दक्षिणम्। वर्षं तत् भारतं नाम भारती यत्र सन्ततिः॥ समुद्रक उत्तरमे आऽ हिमालयक दक्षिणमे भारत अछि आऽ ओतुका सन्तति भारती कहबैत छथि। ६.अहल्या द्रौपदी सीता तारा मण्डोदरी तथा। पञ्चकं ना स्मरेन्नित्यं महापातकनाशकम्॥ जे सभ दिन अहल्या, द्रौपदी, सीता, तारा आऽ मण्दोदरी, एहि पाँच साध्वी-स्त्रीक स्मरण करैत छथि, हुनकर सभ पाप नष्ट भऽ जाइत छन्हि। ७.अश्वत्थामा बलिर्व्यासो हनूमांश्च विभीषणः। कृपः परशुरामश्च सप्तैते चिरञ्जीविनः॥ अश्वत्थामा, बलि, व्यास, हनूमान्, विभीषण, कृपाचार्य आऽ परशुराम- ई सात टा चिरञ्जीवी कहबैत छथि। ८.साते भवतु सुप्रीता देवी शिखर वासिनी उग्रेन तपसा लब्धो यया पशुपतिः पतिः। सिद्धिः साध्ये सतामस्तु प्रसादान्तस्य धूर्जटेः जाह्नवीफेनलेखेव यन्यूधि शशिनः कला॥ ९. बालोऽहं जगदानन्द न मे बाला सरस्वती। अपूर्णे पंचमे वर्षे वर्णयामि जगत्त्रयम् ॥ १०. दूर्वाक्षत मंत्र(शुक्ल यजुर्वेद अध्याय २२, मंत्र २२) आ ब्रह्मन्नित्यस्य प्रजापतिर्ॠषिः। लिंभोक्त्ता देवताः। स्वराडुत्कृतिश्छन्दः। षड्जः स्वरः॥ आ ब्रह्म॑न् ब्राह्म॒णो ब्र॑ह्मवर्च॒सी जा॑यता॒मा रा॒ष्ट्रे रा॑ज॒न्यः शुरे॑ऽइषव्यो॒ऽतिव्या॒धी म॑हार॒थो जा॑यतां॒ दोग्ध्रीं धे॒नुर्वोढा॑न॒ड्वाना॒शुः सप्तिः॒ पुर॑न्धि॒र्योवा॑ जि॒ष्णू र॑थे॒ष्ठाः स॒भेयो॒ युवास्य यज॑मानस्य वी॒रो जा॒यतां निका॒मे-नि॑कामे नः प॒र्जन्यों वर्षतु॒ फल॑वत्यो न॒ऽओष॑धयः पच्यन्तां योगेक्ष॒मो नः॑ कल्पताम्॥२२॥ मन्त्रार्थाः सिद्धयः सन्तु पूर्णाः सन्तु मनोरथाः। शत्रूणां बुद्धिनाशोऽस्तु मित्राणामुदयस्तव। ॐ दीर्घायुर्भव। ॐ सौभाग्यवती भव। हे भगवान्। अपन देशमे सुयोग्य आ’ सर्वज्ञ विद्यार्थी उत्पन्न होथि, आ’ शुत्रुकेँ नाश कएनिहार सैनिक उत्पन्न होथि। अपन देशक गाय खूब दूध दय बाली, बरद भार वहन करएमे सक्षम होथि आ’ घोड़ा त्वरित रूपेँ दौगय बला होए। स्त्रीगण नगरक नेतृत्व करबामे सक्षम होथि आ’ युवक सभामे ओजपूर्ण भाषण देबयबला आ’ नेतृत्व देबामे सक्षम होथि। अपन देशमे जखन आवश्यक होय वर्षा होए आ’ औषधिक-बूटी सर्वदा परिपक्व होइत रहए। एवं क्रमे सभ तरहेँ हमरा सभक कल्याण होए। शत्रुक बुद्धिक नाश होए आ’ मित्रक उदय होए॥ मनुष्यकें कोन वस्तुक इच्छा करबाक चाही तकर वर्णन एहि मंत्रमे कएल गेल अछि। एहिमे वाचकलुप्तोपमालड़्कार अछि। अन्वय- ब्रह्म॑न् - विद्या आदि गुणसँ परिपूर्ण ब्रह्म रा॒ष्ट्रे - देशमे ब्र॑ह्मवर्च॒सी-ब्रह्म विद्याक तेजसँ युक्त्त आ जा॑यतां॒- उत्पन्न होए रा॑ज॒न्यः-राजा शुरे॑ऽ–बिना डर बला इषव्यो॒- बाण चलेबामे निपुण ऽतिव्या॒धी-शत्रुकेँ तारण दय बला म॑हार॒थो-पैघ रथ बला वीर दोग्ध्रीं-कामना(दूध पूर्ण करए बाली) धे॒नुर्वोढा॑न॒ड्वाना॒शुः धे॒नु-गौ वा वाणी र्वोढा॑न॒ड्वा- पैघ बरद ना॒शुः-आशुः-त्वरित सप्तिः॒-घोड़ा पुर॑न्धि॒र्योवा॑- पुर॑न्धि॒- व्यवहारकेँ धारण करए बाली र्योवा॑-स्त्री जि॒ष्णू-शत्रुकेँ जीतए बला र॑थे॒ष्ठाः-रथ पर स्थिर स॒भेयो॒-उत्तम सभामे युवास्य-युवा जेहन यज॑मानस्य-राजाक राज्यमे वी॒रो-शत्रुकेँ पराजित करएबला निका॒मे-नि॑कामे-निश्चययुक्त्त कार्यमे नः-हमर सभक प॒र्जन्यों-मेघ वर्षतु॒-वर्षा होए फल॑वत्यो-उत्तम फल बला ओष॑धयः-औषधिः पच्यन्तां- पाकए योगेक्ष॒मो-अलभ्य लभ्य करेबाक हेतु कएल गेल योगक रक्षा नः॑-हमरा सभक हेतु कल्पताम्-समर्थ होए ग्रिफिथक अनुवाद- हे ब्रह्मण, हमर राज्यमे ब्राह्मण नीक धार्मिक विद्या बला, राजन्य-वीर,तीरंदाज, दूध दए बाली गाय, दौगय बला जन्तु, उद्यमी नारी होथि। पार्जन्य आवश्यकता पड़ला पर वर्षा देथि, फल देय बला गाछ पाकए, हम सभ संपत्ति अर्जित/संरक्षित करी। 8.VIDEHA FOR NON RESIDENTS 8.1 to 8.3 MAITHILI LITERATURE IN ENGLISH 8.1.1.The Comet   -GAJENDRA THAKUR translated by Jyoti Jha chaudhary 8.1.2.The_Science_of_Words- GAJENDRA THAKUR translated by the author himself 8.1.3.On_the_dice-board_of_the_millennium- GAJENDRA THAKUR translated by Jyoti Jha chaudhary 8.1.4.NAAGPHANS (IN ENGLISH)- SHEFALIKA VERMA translated by Dr. Rajiv Kumar Verma and Dr. Jaya Verma Send your comments to ggajendra@videha.com विदेह नूतन अंक भाषापाक रचना-लेखन इंग्लिश-मैथिली-कोष / मैथिली-इंग्लिश-कोष  प्रोजेक्टकेँ आगू बढ़ाऊ, अपन सुझाव आ योगदान ई-मेल द्वारा ggajendra@videha.com पर पठाऊ। Top of Form १.भारत आ नेपालक मैथिली भाषा-वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक शैली आ २.मैथिलीमे भाषा सम्पादन पाठ्यक्रम १.नेपाल आ भारतक मैथिली भाषा-वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक शैली

१.१. नेपालक मैथिली भाषा वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक  उच्चारण आ लेखन शैली (भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक धारणाकेँ पूर्ण रूपसँ सङ्ग लऽ निर्धारित) मैथिलीमे उच्चारण तथा लेखन १.पञ्चमाक्षर आ अनुस्वार: पञ्चमाक्षरान्तर्गत ङ, ञ, ण, न एवं म अबैत अछि। संस्कृत भाषाक अनुसार शब्दक अन्तमे जाहि वर्गक अक्षर रहैत अछि ओही वर्गक पञ्चमाक्षर अबैत अछि। जेना- अङ्क (क वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ङ् आएल अछि।) पञ्च (च वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ञ् आएल अछि।) खण्ड (ट वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ण् आएल अछि।) सन्धि (त वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे न् आएल अछि।) खम्भ (प वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे म् आएल अछि।) उपर्युक्त बात मैथिलीमे कम देखल जाइत अछि। पञ्चमाक्षरक बदलामे अधिकांश जगहपर अनुस्वारक प्रयोग देखल जाइछ। जेना- अंक, पंच, खंड, संधि, खंभ आदि। व्याकरणविद पण्डित गोविन्द झाक कहब छनि जे कवर्ग, चवर्ग आ टवर्गसँ पूर्व अनुस्वार लिखल जाए तथा तवर्ग आ पवर्गसँ पूर्व पञ्चमाक्षरे लिखल जाए। जेना- अंक, चंचल, अंडा, अन्त तथा कम्पन। मुदा हिन्दीक निकट रहल आधुनिक लेखक एहि बातकेँ नहि मानैत छथि। ओ लोकनि अन्त आ कम्पनक जगहपर सेहो अंत आ कंपन लिखैत देखल जाइत छथि। नवीन पद्धति किछु सुविधाजनक अवश्य छैक। किएक तँ एहिमे समय आ स्थानक बचत होइत छैक। मुदा कतोक बेर हस्तलेखन वा मुद्रणमे अनुस्वारक छोट सन बिन्दु स्पष्ट नहि भेलासँ अर्थक अनर्थ होइत सेहो देखल जाइत अछि। अनुस्वारक प्रयोगमे उच्चारण-दोषक सम्भावना सेहो ततबए देखल जाइत अछि। एतदर्थ कसँ लऽ कऽ पवर्ग धरि पञ्चमाक्षरेक प्रयोग करब उचित अछि। यसँ लऽ कऽ ज्ञ धरिक अक्षरक सङ्ग अनुस्वारक प्रयोग करबामे कतहु कोनो विवाद नहि देखल जाइछ। २.ढ आ ढ़ : ढ़क उच्चारण “र् ह”जकाँ होइत अछि। अतः जतऽ “र् ह”क उच्चारण हो ओतऽ मात्र ढ़ लिखल जाए। आन ठाम खाली ढ लिखल जएबाक चाही। जेना- ढ = ढाकी, ढेकी, ढीठ, ढेउआ, ढङ्ग, ढेरी, ढाकनि, ढाठ आदि। ढ़ = पढ़ाइ, बढ़ब, गढ़ब, मढ़ब, बुढ़बा, साँढ़, गाढ़, रीढ़, चाँढ़, सीढ़ी, पीढ़ी आदि। उपर्युक्त शब्द सभकेँ देखलासँ ई स्पष्ट होइत अछि जे साधारणतया शब्दक शुरूमे ढ आ मध्य तथा अन्तमे ढ़ अबैत अछि। इएह नियम ड आ ड़क सन्दर्भ सेहो लागू होइत अछि। ३.व आ ब : मैथिलीमे “व”क उच्चारण ब कएल जाइत अछि, मुदा ओकरा ब रूपमे नहि लिखल जएबाक चाही। जेना- उच्चारण : बैद्यनाथ, बिद्या, नब, देबता, बिष्णु, बंश, बन्दना आदि। एहि सभक स्थानपर क्रमशः वैद्यनाथ, विद्या, नव, देवता, विष्णु, वंश, वन्दना लिखबाक चाही। सामान्यतया व उच्चारणक लेल ओ प्रयोग कएल जाइत अछि। जेना- ओकील, ओजह आदि। ४.य आ ज : कतहु-कतहु “य”क उच्चारण “ज”जकाँ करैत देखल जाइत अछि, मुदा ओकरा ज नहि लिखबाक चाही। उच्चारणमे यज्ञ, जदि, जमुना, जुग, जाबत, जोगी, जदु, जम आदि कहल जाएबला शब्द सभकेँ क्रमशः यज्ञ, यदि, यमुना, युग, यावत, योगी, यदु, यम लिखबाक चाही। ५.ए आ य : मैथिलीक वर्तनीमे ए आ य दुनू लिखल जाइत अछि। प्राचीन वर्तनी- कएल, जाए, होएत, माए, भाए, गाए आदि। नवीन वर्तनी- कयल, जाय, होयत, माय, भाय, गाय आदि। सामान्यतया शब्दक शुरूमे ए मात्र अबैत अछि। जेना एहि, एना, एकर, एहन आदि। एहि शब्द सभक स्थानपर यहि, यना, यकर, यहन आदिक प्रयोग नहि करबाक चाही। यद्यपि मैथिलीभाषी थारू सहित किछु जातिमे शब्दक आरम्भोमे “ए”केँ य कहि उच्चारण कएल जाइत अछि। ए आ “य”क प्रयोगक सन्दर्भमे प्राचीने पद्धतिक अनुसरण करब उपयुक्त मानि एहि पुस्तकमे ओकरे प्रयोग कएल गेल अछि। किएक तँ दुनूक लेखनमे कोनो सहजता आ दुरूहताक बात नहि अछि। आ मैथिलीक सर्वसाधारणक उच्चारण-शैली यक अपेक्षा एसँ बेसी निकट छैक। खास कऽ कएल, हएब आदि कतिपय शब्दकेँ कैल, हैब आदि रूपमे कतहु-कतहु लिखल जाएब सेहो “ए”क प्रयोगकेँ बेसी समीचीन प्रमाणित करैत अछि। ६.हि, हु तथा एकार, ओकार : मैथिलीक प्राचीन लेखन-परम्परामे कोनो बातपर बल दैत काल शब्दक पाछाँ हि, हु लगाओल जाइत छैक। जेना- हुनकहि, अपनहु, ओकरहु, तत्कालहि, चोट्टहि, आनहु आदि। मुदा आधुनिक लेखनमे हिक स्थानपर एकार एवं हुक स्थानपर ओकारक प्रयोग करैत देखल जाइत अछि। जेना- हुनके, अपनो, तत्काले, चोट्टे, आनो आदि। ७.ष तथा ख : मैथिली भाषामे अधिकांशतः षक उच्चारण ख होइत अछि। जेना- षड्यन्त्र (खड़यन्त्र), षोडशी (खोड़शी), षट्कोण (खटकोण), वृषेश (वृखेश), सन्तोष (सन्तोख) आदि। ८.ध्वनि-लोप : निम्नलिखित अवस्थामे शब्दसँ ध्वनि-लोप भऽ जाइत अछि: (क) क्रियान्वयी प्रत्यय अयमे य वा ए लुप्त भऽ जाइत अछि। ओहिमे सँ पहिने अक उच्चारण दीर्घ भऽ जाइत अछि। ओकर आगाँ लोप-सूचक चिह्न वा विकारी (’ / ऽ) लगाओल जाइछ। जेना- पूर्ण रूप : पढ़ए (पढ़य) गेलाह, कए (कय) लेल, उठए (उठय) पड़तौक। अपूर्ण रूप : पढ़’ गेलाह, क’ लेल, उठ’ पड़तौक। पढ़ऽ गेलाह, कऽ लेल, उठऽ पड़तौक। (ख) पूर्वकालिक कृत आय (आए) प्रत्ययमे य (ए) लुप्त भऽ जाइछ, मुदा लोप-सूचक विकारी नहि लगाओल जाइछ। जेना- पूर्ण रूप : खाए (य) गेल, पठाय (ए) देब, नहाए (य) अएलाह। अपूर्ण रूप : खा गेल, पठा देब, नहा अएलाह। (ग) स्त्री प्रत्यय इक उच्चारण क्रियापद, संज्ञा, ओ विशेषण तीनूमे लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना- पूर्ण रूप : दोसरि मालिनि चलि गेलि। अपूर्ण रूप : दोसर मालिन चलि गेल। (घ) वर्तमान कृदन्तक अन्तिम त लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना- पूर्ण रूप : पढ़ैत अछि, बजैत अछि, गबैत अछि। अपूर्ण रूप : पढ़ै अछि, बजै अछि, गबै अछि। (ङ) क्रियापदक अवसान इक, उक, ऐक तथा हीकमे लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना- पूर्ण रूप: छियौक, छियैक, छहीक, छौक, छैक, अबितैक, होइक। अपूर्ण रूप : छियौ, छियै, छही, छौ, छै, अबितै, होइ। (च) क्रियापदीय प्रत्यय न्ह, हु तथा हकारक लोप भऽ जाइछ। जेना- पूर्ण रूप : छन्हि, कहलन्हि, कहलहुँ, गेलह, नहि। अपूर्ण रूप : छनि, कहलनि, कहलौँ, गेलऽ, नइ, नञि, नै। ९.ध्वनि स्थानान्तरण : कोनो-कोनो स्वर-ध्वनि अपना जगहसँ हटि कऽ दोसर ठाम चलि जाइत अछि। खास कऽ ह्रस्व इ आ उक सम्बन्धमे ई बात लागू होइत अछि। मैथिलीकरण भऽ गेल शब्दक मध्य वा अन्तमे जँ ह्रस्व इ वा उ आबए तँ ओकर ध्वनि स्थानान्तरित भऽ एक अक्षर आगाँ आबि जाइत अछि। जेना- शनि (शइन), पानि (पाइन), दालि ( दाइल), माटि (माइट), काछु (काउछ), मासु (माउस) आदि। मुदा तत्सम शब्द सभमे ई निअम लागू नहि होइत अछि। जेना- रश्मिकेँ रइश्म आ सुधांशुकेँ सुधाउंस नहि कहल जा सकैत अछि। १०.हलन्त(्)क प्रयोग : मैथिली भाषामे सामान्यतया हलन्त (्)क आवश्यकता नहि होइत अछि। कारण जे शब्दक अन्तमे अ उच्चारण नहि होइत अछि। मुदा संस्कृत भाषासँ जहिनाक तहिना मैथिलीमे आएल (तत्सम) शब्द सभमे हलन्त प्रयोग कएल जाइत अछि। एहि पोथीमे सामान्यतया सम्पूर्ण शब्दकेँ मैथिली भाषा सम्बन्धी निअम अनुसार हलन्तविहीन राखल गेल अछि। मुदा व्याकरण सम्बन्धी प्रयोजनक लेल अत्यावश्यक स्थानपर कतहु-कतहु हलन्त देल गेल अछि। प्रस्तुत पोथीमे मथिली लेखनक प्राचीन आ नवीन दुनू शैलीक सरल आ समीचीन पक्ष सभकेँ समेटि कऽ वर्ण-विन्यास कएल गेल अछि। स्थान आ समयमे बचतक सङ्गहि हस्त-लेखन तथा तकनीकी दृष्टिसँ सेहो सरल होबऽबला हिसाबसँ वर्ण-विन्यास मिलाओल गेल अछि। वर्तमान समयमे मैथिली मातृभाषी पर्यन्तकेँ आन भाषाक माध्यमसँ मैथिलीक ज्ञान लेबऽ पड़ि रहल परिप्रेक्ष्यमे लेखनमे सहजता तथा एकरूपतापर ध्यान देल गेल अछि। तखन मैथिली भाषाक मूल विशेषता सभ कुण्ठित नहि होइक, ताहू दिस लेखक-मण्डल सचेत अछि। प्रसिद्ध भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक कहब छनि जे सरलताक अनुसन्धानमे एहन अवस्था किन्नहु ने आबऽ देबाक चाही जे भाषाक विशेषता छाँहमे पडि जाए। -(भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक धारणाकेँ पूर्ण रूपसँ सङ्ग लऽ निर्धारित) १.२. मैथिली अकादमी, पटना द्वारा निर्धारित मैथिली लेखन-शैली

१. जे शब्द मैथिली-साहित्यक प्राचीन कालसँ आइ धरि जाहि वर्त्तनीमे प्रचलित अछि, से सामान्यतः ताहि वर्त्तनीमे लिखल जाय- उदाहरणार्थ-

ग्राह्य

एखन ठाम जकर, तकर तनिकर अछि

अग्राह्य अखन, अखनि, एखेन, अखनी ठिमा, ठिना, ठमा जेकर, तेकर तिनकर। (वैकल्पिक रूपेँ ग्राह्य) ऐछ, अहि, ए।

२. निम्नलिखित तीन प्रकारक रूप वैकल्पिकतया अपनाओल जाय: भऽ गेल, भय गेल वा भए गेल। जा रहल अछि, जाय रहल अछि, जाए रहल अछि। कर’ गेलाह, वा करय गेलाह वा करए गेलाह।

३. प्राचीन मैथिलीक ‘न्ह’ ध्वनिक स्थानमे ‘न’ लिखल जाय सकैत अछि यथा कहलनि वा कहलन्हि।

४. ‘ऐ’ तथा ‘औ’ ततय लिखल जाय जत’ स्पष्टतः ‘अइ’ तथा ‘अउ’ सदृश उच्चारण इष्ट हो। यथा- देखैत, छलैक, बौआ, छौक इत्यादि।

५. मैथिलीक निम्नलिखित शब्द एहि रूपे प्रयुक्त होयत: जैह, सैह, इएह, ओऐह, लैह तथा दैह।

६. ह्र्स्व इकारांत शब्दमे ‘इ’ के लुप्त करब सामान्यतः अग्राह्य थिक। यथा- ग्राह्य देखि आबह, मालिनि गेलि (मनुष्य मात्रमे)।

७. स्वतंत्र ह्रस्व ‘ए’ वा ‘य’ प्राचीन मैथिलीक उद्धरण आदिमे तँ यथावत राखल जाय, किंतु आधुनिक प्रयोगमे वैकल्पिक रूपेँ ‘ए’ वा ‘य’ लिखल जाय। यथा:- कयल वा कएल, अयलाह वा अएलाह, जाय वा जाए इत्यादि।

८. उच्चारणमे दू स्वरक बीच जे ‘य’ ध्वनि स्वतः आबि जाइत अछि तकरा लेखमे स्थान वैकल्पिक रूपेँ देल जाय। यथा- धीआ, अढ़ैआ, विआह, वा धीया, अढ़ैया, बियाह।

९. सानुनासिक स्वतंत्र स्वरक स्थान यथासंभव ‘ञ’ लिखल जाय वा सानुनासिक स्वर। यथा:- मैञा, कनिञा, किरतनिञा वा मैआँ, कनिआँ, किरतनिआँ।

१०. कारकक विभक्त्तिक निम्नलिखित रूप ग्राह्य:- हाथकेँ, हाथसँ, हाथेँ, हाथक, हाथमे। ’मे’ मे अनुस्वार सर्वथा त्याज्य थिक। ‘क’ क वैकल्पिक रूप ‘केर’ राखल जा सकैत अछि।

११. पूर्वकालिक क्रियापदक बाद ‘कय’ वा ‘कए’ अव्यय वैकल्पिक रूपेँ लगाओल जा सकैत अछि। यथा:- देखि कय वा देखि कए।

१२. माँग, भाँग आदिक स्थानमे माङ, भाङ इत्यादि लिखल जाय।

१३. अर्द्ध ‘न’ ओ अर्द्ध ‘म’ क बदला अनुसार नहि लिखल जाय, किंतु छापाक सुविधार्थ अर्द्ध ‘ङ’ , ‘ञ’, तथा ‘ण’ क बदला अनुस्वारो लिखल जा सकैत अछि। यथा:- अङ्क, वा अंक, अञ्चल वा अंचल, कण्ठ वा कंठ।

१४. हलंत चिह्न निअमतः लगाओल जाय, किंतु विभक्तिक संग अकारांत प्रयोग कएल जाय। यथा:- श्रीमान्, किंतु श्रीमानक।

१५. सभ एकल कारक चिह्न शब्दमे सटा क’ लिखल जाय, हटा क’ नहि, संयुक्त विभक्तिक हेतु फराक लिखल जाय, यथा घर परक।

१६. अनुनासिककेँ चन्द्रबिन्दु द्वारा व्यक्त कयल जाय। परंतु मुद्रणक सुविधार्थ हि समान जटिल मात्रापर अनुस्वारक प्रयोग चन्द्रबिन्दुक बदला कयल जा सकैत अछि। यथा- हिँ केर बदला हिं।

१७. पूर्ण विराम पासीसँ ( । ) सूचित कयल जाय।

१८. समस्त पद सटा क’ लिखल जाय, वा हाइफेनसँ जोड़ि क’ ,  हटा क’ नहि।

१९. लिअ तथा दिअ शब्दमे बिकारी (ऽ) नहि लगाओल जाय।

२०. अंक देवनागरी रूपमे राखल जाय।

२१.किछु ध्वनिक लेल नवीन चिन्ह बनबाओल जाय। जा' ई नहि बनल अछि ताबत एहि दुनू ध्वनिक बदला पूर्ववत् अय/ आय/ अए/ आए/ आओ/ अओ लिखल जाय। आकि ऎ वा ऒ सँ व्यक्त कएल जाय।

ह./- गोविन्द झा ११/८/७६ श्रीकान्त ठाकुर ११/८/७६ सुरेन्द्र झा "सुमन" ११/०८/७६

  २. मैथिलीमे भाषा सम्पादन पाठ्यक्रम २.१. उच्चारण निर्देश: (बोल्ड कएल रूप ग्राह्य):- दन्त न क उच्चारणमे दाँतमे जीह सटत- जेना बाजू नाम , मुदा ण क उच्चारणमे जीह मूर्धामे सटत (नै सटैए तँ उच्चारण दोष अछि)- जेना बाजू गणेश। तालव्य शमे जीह तालुसँ , षमे मूर्धासँ आ दन्त समे दाँतसँ सटत। निशाँ, सभ आ शोषण बाजि कऽ देखू। मैथिलीमे ष केँ वैदिक संस्कृत जकाँ ख सेहो उच्चरित कएल जाइत अछि, जेना वर्षा, दोष। य अनेको स्थानपर ज जकाँ उच्चरित होइत अछि आ ण ड़ जकाँ (यथा संयोग आ गणेश संजोग आ गड़ेस उच्चरित होइत अछि)। मैथिलीमे व क उच्चारण ब, श क उच्चारण स आ य क उच्चारण ज सेहो होइत अछि। ओहिना ह्रस्व इ बेशीकाल मैथिलीमे पहिने बाजल जाइत अछि कारण देवनागरीमे आ मिथिलाक्षरमे ह्रस्व इ अक्षरक पहिने लिखलो जाइत आ बाजलो जएबाक चाही। कारण जे हिन्दीमे एकर दोषपूर्ण उच्चारण होइत अछि (लिखल तँ पहिने जाइत अछि मुदा बाजल बादमे जाइत अछि), से शिक्षा पद्धतिक दोषक कारण हम सभ ओकर उच्चारण दोषपूर्ण ढंगसँ कऽ रहल छी। अछि- अ इ छ  ऐछ (उच्चारण) छथि- छ इ थ  – छैथ (उच्चारण) पहुँचि- प हुँ इ च (उच्चारण) आब अ आ इ ई ए ऐ ओ औ अं अः ऋ ऐ सभ लेल मात्रा सेहो अछि, मुदा ऐमे ई ऐ ओ औ अं अः ऋ केँ संयुक्ताक्षर रूपमे गलत रूपमे प्रयुक्त आ उच्चरित कएल जाइत अछि। जेना ऋ केँ री  रूपमे उच्चरित करब। आ देखियौ- ऐ लेल देखिऔ क प्रयोग अनुचित। मुदा देखिऐ लेल देखियै अनुचित। क् सँ ह् धरि अ सम्मिलित भेलासँ क सँ ह बनैत अछि, मुदा उच्चारण काल हलन्त युक्त शब्दक अन्तक उच्चारणक प्रवृत्ति बढ़ल अछि, मुदा हम जखन मनोजमे ज् अन्तमे बजैत छी, तखनो पुरनका लोककेँ बजैत सुनबन्हि- मनोजऽ, वास्तवमे ओ अ युक्त ज् = ज बजै छथि। फेर ज्ञ अछि ज् आ ञ क संयुक्त मुदा गलत उच्चारण होइत अछि- ग्य। ओहिना क्ष अछि क् आ ष क संयुक्त मुदा उच्चारण होइत अछि छ। फेर श् आ र क संयुक्त अछि श्र ( जेना श्रमिक) आ स् आ र क संयुक्त अछि स्र (जेना मिस्र)। त्र भेल त+र । उच्चारणक ऑडियो फाइल विदेह आर्काइव  http://www.videha.co.in/ पर उपलब्ध अछि। फेर केँ / सँ / पर पूर्व अक्षरसँ सटा कऽ लिखू मुदा तँ / कऽ हटा कऽ। ऐमे सँ मे पहिल सटा कऽ लिखू आ बादबला हटा कऽ। अंकक बाद टा लिखू सटा कऽ मुदा अन्य ठाम टा लिखू हटा कऽ– जेना छहटा मुदा सभ टा। फेर ६अ म सातम लिखू- छठम सातम नै। घरबलामे बला मुदा घरवालीमे वाली प्रयुक्त करू। रहए- रहै मुदा सकैए (उच्चारण सकै-ए)। मुदा कखनो काल रहए आ रहै मे अर्थ भिन्नता सेहो, जेना से कम्मो जगहमे पार्किंग करबाक अभ्यास रहै ओकरा। पुछलापर पता लागल जे ढुनढुन नाम्ना ई ड्राइवर कनाट प्लेसक पार्किंगमे काज करैत रहए। छलै, छलए मे सेहो ऐ तरहक भेल। छलए क उच्चारण छल-ए सेहो। संयोगने- (उच्चारण संजोगने) केँ/  कऽ केर- क ( केर क प्रयोग गद्यमे नै करू , पद्यमे कऽ सकै छी। ) क (जेना रामक) –रामक आ संगे (उच्चारण राम के /  राम कऽ सेहो) सँ- सऽ (उच्चारण) चन्द्रबिन्दु आ अनुस्वार- अनुस्वारमे कंठ धरिक प्रयोग होइत अछि मुदा चन्द्रबिन्दुमे नै। चन्द्रबिन्दुमे कनेक एकारक सेहो उच्चारण होइत अछि- जेना रामसँ- (उच्चारण राम सऽ)  रामकेँ- (उच्चारण राम कऽ/ राम के सेहो)। केँ जेना रामकेँ भेल हिन्दीक को (राम को)- राम को= रामकेँ क जेना रामक भेल हिन्दीक का ( राम का) राम का= रामक कऽ जेना जा कऽ भेल हिन्दीक कर ( जा कर) जा कर= जा कऽ सँ भेल हिन्दीक से (राम से) राम से= रामसँ सऽ , तऽ , त , केर (गद्यमे) एे चारू शब्द सबहक प्रयोग अवांछित। के दोसर अर्थेँ प्रयुक्त भऽ सकैए- जेना, के कहलक? विभक्ति “क”क बदला एकर प्रयोग अवांछित। नञि, नहि, नै, नइ, नँइ, नइँ, नइं ऐ सभक उच्चारण आ लेखन - नै त्त्व क बदलामे त्व जेना महत्वपूर्ण (महत्त्वपूर्ण नै) जतए अर्थ बदलि जाए ओतहि मात्र तीन अक्षरक संयुक्ताक्षरक प्रयोग उचित। सम्पति- उच्चारण स म्प इ त (सम्पत्ति नै- कारण सही उच्चारण आसानीसँ सम्भव नै)। मुदा सर्वोत्तम (सर्वोतम नै)। राष्ट्रिय (राष्ट्रीय नै) सकैए/ सकै (अर्थ परिवर्तन) पोछैले/ पोछै लेल/ पोछए लेल पोछैए/ पोछए/ (अर्थ परिवर्तन) पोछए/ पोछै ओ लोकनि ( हटा कऽ, ओ मे बिकारी नै) ओइ/ ओहि ओहिले/ ओहि लेल/ ओही लऽ जएबेँ/ बैसबेँ पँचभइयाँ देखियौक/ (देखिऔक नै- तहिना अ मे ह्रस्व आ दीर्घक मात्राक प्रयोग अनुचित) जकाँ / जेकाँ तँइ/ तैँ/ होएत / हएत नञि/ नहि/ नँइ/ नइँ/ नै सौँसे/ सौंसे बड़ / बड़ी (झोराओल) गाए (गाइ नहि), मुदा गाइक दूध (गाएक दूध नै।) रहलेँ/ पहिरतैँ हमहीं/ अहीं सब - सभ सबहक - सभहक धरि - तक गप- बात बूझब - समझब बुझलौं/ समझलौं/ बुझलहुँ - समझलहुँ हमरा आर - हम सभ आकि- आ कि सकैछ/ करैछ (गद्यमे प्रयोगक आवश्यकता नै) होइन/ होनि जाइन (जानि नै, जेना देल जाइन) मुदा जानि-बूझि (अर्थ परिव्र्तन) पइठ/ जाइठ आउ/ जाउ/ आऊ/ जाऊ मे, केँ, सँ, पर (शब्दसँ सटा कऽ) तँ कऽ धऽ दऽ (शब्दसँ हटा कऽ) मुदा दूटा वा बेसी विभक्ति संग रहलापर पहिल विभक्ति टाकेँ सटाऊ। जेना ऐमे सँ । एकटा , दूटा (मुदा कए टा) बिकारीक प्रयोग शब्दक अन्तमे, बीचमे अनावश्यक रूपेँ नै। आकारान्त आ अन्तमे अ क बाद बिकारीक प्रयोग नै (जेना दिअ , आ/ दिय’ , आ’, आ नै ) अपोस्ट्रोफीक प्रयोग बिकारीक बदलामे करब अनुचित आ मात्र फॉन्टक तकनीकी न्यूनताक परिचायक)- ओना बिकारीक संस्कृत रूप ऽ अवग्रह कहल जाइत अछि आ वर्तनी आ उच्चारण दुनू ठाम एकर लोप रहैत अछि/ रहि सकैत अछि (उच्चारणमे लोप रहिते अछि)। मुदा अपोस्ट्रोफी सेहो अंग्रेजीमे पसेसिव केसमे होइत अछि आ फ्रेंचमे शब्दमे जतए एकर प्रयोग होइत अछि जेना raison d’etre एतए सेहो एकर उच्चारण रैजौन डेटर होइत अछि, माने अपोस्ट्रॉफी अवकाश नै दैत अछि वरन जोड़ैत अछि, से एकर प्रयोग बिकारीक बदला देनाइ तकनीकी रूपेँ सेहो अनुचित)। अइमे, एहिमे/ ऐमे जइमे, जाहिमे एखन/ अखन/ अइखन केँ (के नहि) मे (अनुस्वार रहित) भऽ मे दऽ तँ (तऽ, त नै) सँ ( सऽ स नै) गाछ तर गाछ लग साँझ खन जो (जो go, करै जो do) तै/तइ जेना- तै दुआरे/ तइमे/ तइले जै/जइ जेना- जै कारण/ जइसँ/ जइले ऐ/अइ जेना- ऐ कारण/ ऐसँ/ अइले/ मुदा एकर एकटा खास प्रयोग- लालति‍ कतेक दि‍नसँ कहैत रहैत अइ लै/लइ जेना लैसँ/ लइले/ लै दुआरे लहँ/ लौं गेलौं/ लेलौं/ लेलँह/ गेलहुँ/ लेलहुँ/ लेलँ जइ/ जाहि‍/ जै जहि‍ठाम/ जाहि‍ठाम/ जइठाम/ जैठाम एहि‍/ अहि‍/ अइ (वाक्यक अंतमे ग्राह्य) / ऐ अइछ/ अछि‍/ ऐछ तइ/ तहि‍/ तै/ ताहि‍ ओहि‍/ ओइ सीखि‍/ सीख जीवि‍/ जीवी/ जीब भलेहीं/ भलहि‍ं तैं/ तँइ/ तँए जाएब/ जएब लइ/ लै छइ/ छै नहि‍/ नै/ नइ गइ/ गै छनि‍/ छन्‍हि‍  ... समए शब्‍दक संग जखन कोनो वि‍भक्‍ति‍ जुटै छै तखन समै जना समैपर इत्‍यादि‍। असगरमे हृदए आ वि‍भक्‍ति‍ जुटने हृदे जना हृदेसँ, हृदेमे इत्‍यादि‍। जइ/ जाहि‍/ जै जहि‍ठाम/ जाहि‍ठाम/ जइठाम/ जैठाम एहि‍/ अहि‍/ अइ/ ऐ अइछ/ अछि‍/ ऐछ तइ/ तहि‍/ तै/ ताहि‍ ओहि‍/ ओइ सीखि‍/ सीख जीवि‍/ जीवी/ जीब भले/ भलेहीं/ भलहि‍ं तैं/ तँइ/ तँए जाएब/ जएब लइ/ लै छइ/ छै नहि‍/ नै/ नइ गइ/ गै छनि‍/ छन्‍हि‍ चुकल अछि/ गेल गछि २.२. मैथिलीमे भाषा सम्पादन पाठ्यक्रम नीचाँक सूचीमे देल विकल्पमेसँ लैंगुएज एडीटर द्वारा कोन रूप चुनल जेबाक चाही: बोल्ड कएल रूप ग्राह्य: १.होयबला/ होबयबला/ होमयबला/ हेब’बला, हेम’बला/ होयबाक/होबएबला /होएबाक २. आ’/आऽ आ ३. क’ लेने/कऽ लेने/कए लेने/कय लेने/ल’/लऽ/लय/लए ४. भ’ गेल/भऽ गेल/भय गेल/भए गेल ५. कर’ गेलाह/करऽ गेलह/करए गेलाह/करय गेलाह ६. लिअ/दिअ लिय’,दिय’,लिअ’,दिय’/ ७. कर’ बला/करऽ बला/ करय बला करैबला/क’र’ बला / करैवाली ८. बला वला (पुरूष), वाली (स्‍त्री) ९ . आङ्ल आंग्ल १०. प्रायः प्रायह ११. दुःख दुख १ २. चलि गेल चल गेल/चैल गेल १३. देलखिन्ह देलकिन्ह, देलखिन १४. देखलन्हि देखलनि/ देखलैन्ह १५. छथिन्ह/ छलन्हि छथिन/ छलैन/ छलनि १६. चलैत/दैत चलति/दैति १७. एखनो अखनो १८. बढ़नि‍ बढ़इन बढ़न्हि १९. ओ’/ओऽ(सर्वनाम) ओ २० . ओ (संयोजक) ओ’/ओऽ २१. फाँगि/फाङ्गि फाइंग/फाइङ २२. जे जे’/जेऽ २३. ना-नुकुर ना-नुकर २४. केलन्हि/केलनि‍/कयलन्हि २५. तखनतँ/ तखन तँ २६. जा रहल/जाय रहल/जाए रहल २७. निकलय/निकलए लागल/ लगल बहराय/ बहराए लागल/ लगल निकल’/बहरै लागल २८. ओतय/ जतय जत’/ ओत’/ जतए/ ओतए २९. की फूरल जे कि फूरल जे ३०. जे जे’/जेऽ ३१. कूदि / यादि(मोन पारब) कूइद/याइद/कूद/याद/ यादि (मोन) ३२. इहो/ ओहो ३३. हँसए/ हँसय हँसऽ ३४. नौ आकि दस/नौ किंवा दस/ नौ वा दस ३५. सासु-ससुर सास-ससुर ३६. छह/ सात छ/छः/सात ३७. की  की’/ कीऽ (दीर्घीकारान्तमे ऽ वर्जित) ३८. जबाब जवाब ३९. करएताह/ करेताह करयताह ४०. दलान दिशि दलान दिश/दलान दिस ४१ . गेलाह गएलाह/गयलाह ४२. किछु आर/ किछु और/ किछ आर ४३. जाइ छल/ जाइत छल जाति छल/जैत छल ४४. पहुँचि/ भेट जाइत छल/ भेट जाइ छलए पहुँच/ भेटि‍ जाइत छल ४५. जबान (युवा)/ जवान(फौजी) ४६. लय/ लए क’/ कऽ/ लए कए / लऽ कऽ/ लऽ कए ४७. ल’/लऽ कय/ कए ४८. एखन / एखने / अखन / अखने ४९. अहींकेँ अहीँकेँ ५०. गहींर गहीँर ५१. धार पार केनाइ धार पार केनाय/केनाए ५२. जेकाँ जेँकाँ/ जकाँ ५३. तहिना तेहिना ५४. एकर अकर ५५. बहिनउ बहनोइ ५६. बहिन बहिनि ५७. बहिन-बहिनोइ बहिन-बहनउ ५८. नहि/ नै ५९. करबा / करबाय/ करबाए ६०. तँ/ त ऽ तय/तए ६१. भैयारी मे छोट-भाए/भै/, जेठ-भाय/भाइ, ६२. गि‍नतीमे दू भाइ/भाए/भाँइ ६३. ई पोथी दू भाइक/ भाँइ/ भाए/ लेल। यावत जावत ६४. माय मै / माए मुदा माइक ममता ६५. देन्हि/ दइन दनि‍/ दएन्हि/ दयन्हि दन्हि/ दैन्हि ६६. द’/ दऽ/ दए ६७. ओ (संयोजक) ओऽ (सर्वनाम) ६८. तका कए तकाय तकाए ६९. पैरे (on foot) पएरे  कएक/ कैक ७०. ताहुमे/ ताहूमे ७१. पुत्रीक ७२. बजा कय/ कए / कऽ ७३. बननाय/बननाइ ७४. कोला ७५. दिनुका दिनका ७६. ततहिसँ ७७. गरबओलन्हि/ गरबौलनि‍/ गरबेलन्हि/ गरबेलनि‍ ७८. बालु बालू ७९. चेन्ह चिन्ह(अशुद्ध) ८०. जे जे’ ८१ . से/ के से’/के’ ८२. एखुनका अखनुका ८३. भुमिहार भूमिहार ८४. सुग्गर / सुगरक/ सूगर ८५. झठहाक झटहाक ८६. छूबि ८७. करइयो/ओ करैयो ने देलक /करियौ-करइयौ ८८. पुबारि पुबाइ ८९. झगड़ा-झाँटी झगड़ा-झाँटि ९०. पएरे-पएरे पैरे-पैरे ९१. खेलएबाक ९२. खेलेबाक ९३. लगा ९४. होए- हो – होअए ९५. बुझल बूझल ९६. बूझल (संबोधन अर्थमे) ९७. यैह यएह / इएह/ सैह/ सएह ९८. तातिल ९९. अयनाय- अयनाइ/ अएनाइ/ एनाइ १००. निन्न- निन्द १०१. बिनु बिन १०२. जाए जाइ १०३. जाइ (in different sense)-last word of sentence १०४. छत पर आबि जाइ १०५. ने १०६. खेलाए (play) –खेलाइ १०७. शिकाइत- शिकायत १०८. ढप- ढ़प १०९ . पढ़- पढ ११०. कनिए/ कनिये कनिञे १११. राकस- राकश ११२. होए/ होय होइ ११३. अउरदा- औरदा ११४. बुझेलन्हि (different meaning- got understand) ११५. बुझएलन्हि/बुझेलनि‍/ बुझयलन्हि (understood himself) ११६. चलि- चल/ चलि‍ गेल ११७. खधाइ- खधाय ११८. मोन पाड़लखिन्ह/ मोन पाड़लखि‍न/ मोन पारलखिन्ह ११९. कैक- कएक- कइएक १२०. लग ल’ग १२१. जरेनाइ १२२. जरौनाइ जरओनाइ- जरएनाइ/ जरेनाइ १२३. होइत १२४. गरबेलन्हि/ गरबेलनि‍ गरबौलन्हि/ गरबौलनि‍ १२५. चिखैत- (to test)चिखइत १२६. करइयो (willing to do) करैयो १२७. जेकरा- जकरा १२८. तकरा- तेकरा १२९. बिदेसर स्थानेमे/ बिदेसरे स्थानमे १३०. करबयलहुँ/ करबएलहुँ/ करबेलहुँ करबेलौं १३१. हारिक (उच्चारण हाइरक) १३२. ओजन वजन आफसोच/ अफसोस कागत/ कागच/ कागज १३३. आधे भाग/ आध-भागे १३४. पिचा / पिचाय/पिचाए १३५. नञ/ ने १३६. बच्चा नञ (ने) पिचा जाय १३७. तखन ने (नञ) कहैत अछि। कहै/ सुनै/ देखै छल मुदा कहैत-कहैत/ सुनैत-सुनैत/ देखैत-देखैत १३८. कतेक गोटे/ कताक गोटे १३९. कमाइ-धमाइ/ कमाई- धमाई १४० . लग ल’ग १४१. खेलाइ (for playing) १४२. छथिन्ह/ छथिन १४३. होइत होइ १४४. क्यो कियो / केओ १४५. केश (hair) १४६. केस (court-case) १४७ . बननाइ/ बननाय/ बननाए १४८. जरेनाइ १४९. कुरसी कुर्सी १५०. चरचा चर्चा १५१. कर्म करम १५२. डुबाबए/ डुबाबै/ डुमाबै डुमाबय/ डुमाबए १५३. एखुनका/ अखुनका १५४. लए/ लिअए (वाक्यक अंतिम शब्द)- लऽ १५५. कएलक/ केलक १५६. गरमी गर्मी १५७ . वरदी वर्दी १५८. सुना गेलाह सुना’/सुनाऽ १५९. एनाइ-गेनाइ १६०. तेना ने घेरलन्हि/ तेना ने घेरलनि‍ १६१. नञि / नै १६२. डरो ड’रो १६३. कतहु/ कतौ कहीं १६४. उमरिगर-उमेरगर उमरगर १६५. भरिगर १६६. धोल/धोअल धोएल १६७. गप/गप्प १६८. के के’ १६९. दरबज्जा/ दरबजा १७०. ठाम १७१. धरि तक १७२. घूरि लौटि १७३. थोरबेक १७४. बड्ड १७५. तोँ/ तूँ १७६. तोँहि( पद्यमे ग्राह्य) १७७. तोँही / तोँहि १७८. करबाइए करबाइये १७९. एकेटा १८०. करितथि /करतथि १८१. पहुँचि/ पहुँच १८२. राखलन्हि रखलन्हि/ रखलनि‍ १८३. लगलन्हि/ लगलनि‍ लागलन्हि १८४. सुनि (उच्चारण सुइन) १८५. अछि (उच्चारण अइछ) १८६. एलथि गेलथि १८७. बितओने/ बि‍तौने/ बितेने १८८. करबओलन्हि/ करबौलनि‍/ करेलखिन्ह/ करेलखि‍न १८९. करएलन्हि/ करेलनि‍ १९०. आकि/ कि १९१. पहुँचि/ पहुँच १९२. बत्ती जराय/ जराए जरा (आगि लगा) १९३. से से’ १९४. हाँ मे हाँ (हाँमे हाँ विभक्त्तिमे हटा कए) १९५. फेल फैल १९६. फइल(spacious) फैल १९७. होयतन्हि/ होएतन्हि/ होएतनि‍/हेतनि‍/ हेतन्हि १९८. हाथ मटिआएब/ हाथ मटियाबय/हाथ मटियाएब १९९. फेका फेंका २००. देखाए देखा २०१. देखाबए २०२. सत्तरि सत्तर २०३. साहेब साहब २०४.गेलैन्ह/ गेलन्हि/ गेलनि‍ २०५. हेबाक/ होएबाक २०६.केलो/ कएलहुँ/केलौं/ केलुँ २०७. किछु न किछु/ किछु ने किछु २०८.घुमेलहुँ/ घुमओलहुँ/ घुमेलौं २०९. एलाक/ अएलाक २१०. अः/ अह २११.लय/ लए (अर्थ-परिवर्त्तन) २१२.कनीक/ कनेक २१३.सबहक/ सभक २१४.मिलाऽ/ मिला २१५.कऽ/ क २१६.जाऽ/ जा २१७.आऽ/ आ २१८.भऽ /भ’ (’ फॉन्टक कमीक द्योतक) २१९.निअम/ नियम २२० .हेक्टेअर/ हेक्टेयर २२१.पहिल अक्षर ढ/ बादक/ बीचक ढ़ २२२.तहिं/तहिँ/ तञि/ तैं २२३.कहिं/ कहीं २२४.तँइ/ तैं / तइँ २२५.नँइ/ नइँ/  नञि/ नहि/नै २२६.है/ हए / एलीहेँ/ २२७.छञि/ छै/ छैक /छइ २२८.दृष्टिएँ/ दृष्टियेँ २२९.आ (come)/ आऽ(conjunction) २३०. आ (conjunction)/ आऽ(come) २३१.कुनो/ कोनो, कोना/केना २३२.गेलैन्ह-गेलन्हि-गेलनि‍ २३३.हेबाक- होएबाक २३४.केलौँ- कएलौँ-कएलहुँ/केलौं २३५.किछु न किछ- किछु ने किछु २३६.केहेन- केहन २३७.आऽ (come)-आ (conjunction-and)/आ। आब'-आब' /आबह-आबह २३८. हएत-हैत २३९.घुमेलहुँ-घुमएलहुँ- घुमेलाें २४०.एलाक- अएलाक २४१.होनि- होइन/ होन्हि/ २४२.ओ-राम ओ श्यामक बीच(conjunction), ओऽ कहलक (he said)/ओ २४३.की हए/ कोसी अएली हए/ की है। की हइ २४४.दृष्टिएँ/ दृष्टियेँ २४५ .शामिल/ सामेल २४६.तैँ / तँए/ तञि/ तहिं २४७.जौं / ज्योँ/ जँ/ २४८.सभ/ सब २४९.सभक/ सबहक २५०.कहिं/ कहीं २५१.कुनो/ कोनो/ कोनहुँ/ २५२.फारकती भऽ गेल/ भए गेल/ भय गेल २५३.कोना/ केना/ कन्‍ना/कना २५४.अः/ अह २५५.जनै/ जनञ २५६.गेलनि‍/ गेलाह (अर्थ परिवर्तन) २५७.केलन्हि/ कएलन्हि/ केलनि‍/ २५८.लय/ लए/ लएह (अर्थ परिवर्तन) २५९.कनीक/ कनेक/कनी-मनी २६०.पठेलन्हि‍ पठेलनि‍/ पठेलइन/ पपठओलन्हि/ पठबौलनि‍/ २६१.निअम/ नियम २६२.हेक्टेअर/ हेक्टेयर २६३.पहिल अक्षर रहने ढ/ बीचमे रहने ढ़ २६४.आकारान्तमे बिकारीक प्रयोग उचित नै/ अपोस्ट्रोफीक प्रयोग फान्टक तकनीकी न्यूनताक परिचायक ओकर बदला अवग्रह (बिकारी) क प्रयोग उचित २६५.केर (पद्यमे ग्राह्य) / -क/ कऽ/ के २६६.छैन्हि- छन्हि २६७.लगैए/ लगैये २६८.होएत/ हएत २६९.जाएत/ जएत/ २७०.आएत/ अएत/ आओत २७१ .खाएत/ खएत/ खैत २७२.पिअएबाक/ पिएबाक/पि‍येबाक २७३.शुरु/ शुरुह २७४.शुरुहे/ शुरुए २७५.अएताह/अओताह/ एताह/ औताह २७६.जाहि/ जाइ/ जइ/ जै/ २७७.जाइत/ जैतए/ जइतए २७८.आएल/ अएल २७९.कैक/ कएक २८०.आयल/ अएल/ आएल २८१. जाए/ जअए/ जए (लालति‍ जाए लगलीह।) २८२. नुकएल/ नुकाएल २८३. कठुआएल/ कठुअएल २८४. ताहि/ तै/ तइ २८५. गायब/ गाएब/ गएब २८६. सकै/ सकए/ सकय २८७.सेरा/सरा/ सराए (भात सरा गेल) २८८.कहैत रही/देखैत रही/ कहैत छलौं/ कहै छलौं- अहिना चलैत/ पढ़ैत (पढ़ै-पढ़ैत अर्थ कखनो काल परिवर्तित) - आर बुझै/ बुझैत (बुझै/ बुझै छी, मुदा बुझैत-बुझैत)/ सकैत/ सकै। करैत/ करै। दै/ दैत। छैक/ छै। बचलै/ बचलैक। रखबा/ रखबाक । बिनु/ बिन। रातिक/ रातुक बुझै आ बुझैत केर अपन-अपन जगहपर प्रयोग समीचीन अछि‍। बुझैत-बुझैत आब बुझलि‍ऐ। हमहूँ बुझै छी। २८९. दुआरे/ द्वारे २९०.भेटि/ भेट/ भेँट २९१. खन/ खीन/  खुना (भोर खन/ भोर खीन) २९२.तक/ धरि २९३.गऽ/ गै (meaning different-जनबै गऽ) २९४.सऽ/ सँ (मुदा दऽ, लऽ) २९५.त्त्व,(तीन अक्षरक मेल बदला पुनरुक्तिक एक आ एकटा दोसरक उपयोग) आदिक बदला त्व आदि। महत्त्व/ महत्व/ कर्ता/ कर्त्ता आदिमे त्त संयुक्तक कोनो आवश्यकता मैथिलीमे नै अछि। वक्तव्य २९६.बेसी/ बेशी २९७.बाला/वाला बला/ वला (रहैबला) २९८ .वाली/ (बदलैवाली) २९९.वार्त्ता/ वार्ता ३००. अन्तर्राष्ट्रिय/ अन्तर्राष्ट्रीय ३०१. लेमए/ लेबए ३०२.लमछुरका, नमछुरका ३०२.लागै/ लगै ( भेटैत/ भेटै) ३०३.लागल/ लगल ३०४.हबा/ हवा ३०५.राखलक/ रखलक ३०६.आ (come)/ आ (and) ३०७. पश्चाताप/ पश्चात्ताप ३०८. ऽ केर व्यवहार शब्दक अन्तमे मात्र, यथासंभव बीचमे नै। ३०९.कहैत/ कहै ३१०. रहए (छल)/ रहै (छलै) (meaning different) ३११.तागति/ ताकति ३१२.खराप/ खराब ३१३.बोइन/ बोनि/ बोइनि ३१४.जाठि/ जाइठ ३१५.कागज/ कागच/ कागत ३१६.गिरै (meaning different- swallow)/ गिरए (खसए) ३१७.राष्ट्रिय/ राष्ट्रीय DATE-LIST (year- 2012-13) (१४२० फसली साल) Marriage Days: Nov.2012- 25, 26, 28, 29, 30 Dec.2012- 5,9, 10, 13, 14 January 2013- 16, 17, 18, 23, 24, 31 Feb.2013- 1, 3, 4, 6, 8, 10, 14, 15, 18, 20, 24, 25 April 2013- 21, 22, 24, 26, 29 May 2013- 1,2,3,5,6,9,12,13,17,19,20,22,23,24,26,27,29,30,31 June 2013- 2,3 July 2013- 11, 14, 15 Upanayana Days: January 2013- 16 February 2013- 14, 15, 20, 21 April 2013- 22 May 2013- 20, 21 Dviragaman Din: November 2012- 25, 26, 28, 29 December 2012- 2, 3, 14 February 2013- 14, 15, 18, 20, 21, 22, 27, 28 March 2013- 1 April 2013- 18, 22, 24, 26, 28, 29 May 2013- 12, 13 Mundan Din: November 2012- 26, 30 December 2012- 3 January 2013- 18, 24 February 2013- 1, 14, 15, 20, 28 April 2013- 17 May 2013- 13, 23, 29 June 2013- 13, 19, 26, 27, 28 July 2013- 10, 15 FESTIVALS OF MITHILA (2012-13) Mauna Panchami-08 July Madhushravani- 22 July Nag Panchami- 24 July Raksha Bandhan- 02 Aug Krishnastami- 10 August Kushi Amavasya / Somvari Vrat- 17 August Vishwakarma Pooja- 17 September Hartalika Teej- 18 September ChauthChandra-19 September Karma Dharma Ekadashi-26 September Indra Pooja Aarambh- 27 September Anant Caturdashi- 29 Sep Agastyarghadaan- 30 Sep Pitri Paksha begins- 30 Sep Jimootavahan Vrata/ Jitia-08 October Matri Navami- 09 October SomvatiAmavasya Vrat- 15 October Kalashsthapan- 16 October Belnauti- 20 October Patrika Pravesh- 21 October Mahastami- 22 October Maha Navami - 23 October Vijaya Dashami- 24 October Kojagara- 29 Oct Dhanteras- 11 November Diyabati, shyama pooja-13 November Annakoota/ Govardhana Pooja-14 November Bhratridwitiya/ Chitragupta Pooja- 15 November Chhathi -19 November Devotthan Ekadashi- 24 November ravivratarambh- 25 November Navanna parvan- 25 November KartikPoornima- Sama Visarjan- 28 November Vivaha Panchmi- 17 December Makara/ Teela Sankranti-14 Jan Naraknivaran chaturdashi- 08 February Basant Panchami/ Saraswati Pooja- 15 February Achla Saptmi- 17 February Mahashivaratri-10 March Holikadahan-Fagua-26 March Holi- 28 March Varuni Trayodashi-07 April Chaiti  navaratrarambh- 11 April Jurishital-15 April Chaiti Chhathi vrata-16 April Ram Navami- 19 April Ravi Brat Ant- 12 May Akshaya Tritiya-13 May Janaki Navami- 19 May Vat Savitri-barasait- 08 June Ganga Dashhara-18 June Somavati Amavasya Vrata- 08 July Jagannath Rath Yatra- 10 July Hari Sayan Ekadashi- 19 July Aashadhi Guru Poornima-22 Jul VIDEHA ARCHIVE १.विदेह ई-पत्रिकाक सभटा पुरान अंक ब्रेल, तिरहुता आ देवनागरी रूपमे Videha e journal's all old issues in Braille Tirhuta and Devanagari versions विदेह ई-पत्रिकाक पहिल ५० अंक

विदेह ई-पत्रिकाक ५०म सँ आगाँक अंक  http://sites.google.com/a/videha.com/videha/ https://sites.google.com/a/videha.com/videha-archive-part-i/ https://sites.google.com/a/videha.com/videha-archive-part-ii/ २.मैथिली पोथी डाउनलोड Maithili Books Download http://sites.google.com/a/videha.com/videha-pothi ३.मैथिली ऑडियो संकलन Maithili Audio Downloads http://sites.google.com/a/videha.com/videha-audio ४.मैथिली वीडियोक संकलन Maithili Videos http://sites.google.com/a/videha.com/videha-video ५.मिथिला चित्रकला/ आधुनिक चित्रकला आ चित्र Mithila Painting/ Modern Art and Photos http://sites.google.com/a/videha.com/videha-paintings-photos/ "विदेह"क एहि सभ सहयोगी लिंकपर सेहो एक बेर जाउ। ६.विदेह मैथिली क्विज  :  http://videhaquiz.blogspot.com/ ७.विदेह मैथिली जालवृत्त एग्रीगेटर : http://videha-aggregator.blogspot.com/ ८.विदेह मैथिली साहित्य अंग्रेजीमे अनूदित http://madhubani-art.blogspot.com/ ९.विदेहक पूर्व-रूप "भालसरिक गाछ"  : http://gajendrathakur.blogspot.com/ १०.विदेह इंडेक्स  : http://videha123.blogspot.com/ ११.विदेह फाइल : http://videha123.wordpress.com/ १२. विदेह: सदेह : पहिल तिरहुता (मिथिला़क्षर) जालवृत्त (ब्लॉग) http://videha-sadeha.blogspot.com/ १३. विदेह:ब्रेल: मैथिली ब्रेलमे: पहिल बेर विदेह द्वारा http://videha-braille.blogspot.com/ १४.VIDEHA IST MAITHILI  FORTNIGHTLY EJOURNAL ARCHIVE http://videha-archive.blogspot.com/ १५. विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका मैथिली पोथीक आर्काइव http://videha-pothi.blogspot.com/ १६. विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका ऑडियो आर्काइव http://videha-audio.blogspot.com/ १७. विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका वीडियो आर्काइव http://videha-video.blogspot.com/ १८. विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका मिथिला चित्रकला, आधुनिक कला आ चित्रकला http://videha-paintings-photos.blogspot.com/ १९. मैथिल आर मिथिला (मैथिलीक सभसँ लोकप्रिय जालवृत्त) http://maithilaurmithila.blogspot.com/ २०.श्रुति प्रकाशन http://www.shruti-publication.com/ २१.http://groups.google.com/group/videha २२.http://groups.yahoo.com/group/VIDEHA/ २३.गजेन्द्र ठाकुर इ‍डेक्स http://gajendrathakur123.blogspot.com २४. नेना भुटका http://mangan-khabas.blogspot.com/ २५.विदेह रेडियो:मैथिली कथा-कविता आदिक पहिल पोडकास्ट साइट http://videha123radio.wordpress.com/ २६.Videha Radio २७. Join official Videha facebook group. २८. विदेह मैथिली नाट्य उत्सव http://maithili-drama.blogspot.com/ २९.समदिया http://esamaad.blogspot.com/ ३०. मैथिली फिल्म्स http://maithilifilms.blogspot.com/ ३१.अनचिन्हार आखर http://anchinharakharkolkata.blogspot.com/ ३२. मैथिली हाइकू http://maithili-haiku.blogspot.com/ ३३. मानक मैथिली http://manak-maithili.blogspot.com/ ३४. विहनि कथा http://vihanikatha.blogspot.in/ ३५. मैथिली कविता http://maithili-kavita.blogspot.in/ ३६. मैथिली कथा http://maithili-katha.blogspot.in/ ३७.मैथिली समालोचना http://maithili-samalochna.blogspot.in/ महत्त्वपूर्ण सूचना: The Maithili pdf books are AVAILABLE FOR free PDF DOWNLOAD AT

https://sites.google.com/a/videha.com/videha/ http://videha123.wordpress.com/   http://videha123.wordpress.com/about/ विदेह:सदेह:१: २: ३: ४:५:६:७:८:९:१० "विदेह"क प्रिंट संस्करण: विदेह-ई-पत्रिका (http://www.videha.co.in/) क चुनल रचना सम्मिलित। सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। Details for purchase available at publishers's (print-version) site http://www.shruti-publication.com  or you may write to shruti.publication@shruti-publication.com विदेह मैथिली साहित्य आन्दोलन (c)२००४-१३. सर्वाधिकार लेखकाधीन आ जतए लेखकक नाम नहि अछि ततए संपादकाधीन। विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। सह-सम्पादक: उमेश मंडल। सहायक सम्पादक: शिव कुमार झा आ मुन्नाजी (मनोज कुमार कर्ण)। भाषा-सम्पादन: नागेन्द्र कुमार झा आ पञ्जीकार विद्यानन्द झा। कला-सम्पादन: ज्योति झा चौधरी आ रश्मि रेखा सिन्हा। सम्पादक-शोध-अन्वेषण: डॉ. जया वर्मा आ डॉ. राजीव कुमार वर्मा। सम्पादक- नाटक-रंगमंच-चलचित्र- बेचन ठाकुर। सम्पादक- सूचना-सम्पर्क-समाद- पूनम मंडल आ प्रियंका झा। सम्पादक- अनुवाद विभाग- विनीत उत्पल। रचनाकार अपन मौलिक आ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि) ggajendra@videha.com केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx, .rtf वा .txt फॉर्मेटमे पठा सकैत छथि। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेताह, से आशा करैत छी। रचनाक अंतमे टाइप रहय, जे ई रचना मौलिक अछि, आ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। मेल प्राप्त होयबाक बाद यथासंभव शीघ्र ( सात दिनक भीतर) एकर प्रकाशनक अंकक सूचना देल जायत। ’विदेह' प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका अछि आ ऐमे मैथिली, संस्कृत आ अंग्रेजीमे मिथिला आ मैथिलीसँ संबंधित रचना प्रकाशित कएल जाइत अछि। एहि ई पत्रिकाकेँ श्रीमति लक्ष्मी ठाकुर द्वारा मासक ०१ आ १५ तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि। (c) 2004-13 सर्वाधिकार सुरक्षित। विदेहमे प्रकाशित सभटा रचना आ आर्काइवक सर्वाधिकार रचनाकार आ संग्रहकर्त्ताक लगमे छन्हि। रचनाक अनुवाद आ पुनः प्रकाशन किंवा आर्काइवक उपयोगक अधिकार किनबाक हेतु ggajendra@videha.com पर संपर्क करू। एहि साइटकेँ प्रीति झा ठाकुर, मधूलिका चौधरी आ रश्मि प्रिया द्वारा डिजाइन कएल गेल। सिद्धिरस्तु 174 वि दे ह विदेह Videha বিদেহ  www.videha.co.in विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका www.videha.com Videha Ist Maithili Fortnightly ejournal  विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका''विदेह' १२५ म अंक ०१ मार्च २०१३ (वर्ष ६ मास ६३ अंक १२५) मानुषीमिह संस्कृताम् ISSN 2229-547X VIDEHA