VIDEHA — Issue 126 / अंक १२६

Publication: VIDEHA · Issue: 126
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ISSN 2229-547X VIDEHA ‘विदेह'१२६ म अंक १५ मार्च २०१३ (वर्ष ६ मास ६३ अंक १२६) ऐ अंकमे अछि:- १. संपादकीय संदेश २. गद्य २.१.आशीष अनचिन्हार-भक्ति गजल २.२.१.ज्योति चौधरी-एक युग: टच वुड -भाग-२ २.अवनीश मण्‍डल- विहनि कथा- गप्‍पक खाैंइचा ३.मुन्नी कामत -एकांकी- पात-पातसँ बनल परिवार २.३.जगदीश प्रसाद मण्‍डल- चारि‍ गोट वि‍हनि‍ कथा २.४.जगदीश प्रसाद मण्डल-रत्नाकर डकैत (एकांकी) २.५.जगदानन्द झा ‘मनु’- दूटा विहनि कथा २.६.१.जगदीश प्रसाद मण्‍डल- लघुकथा- उलबा चाउर २.७.राम भरोस कापडि भ्रमर- यात्रा प्रसंग- रायपुरक मिथिला महोत्सबः उत्साहक बाढि आ मनीष झा २.८.रमेश रञ्जन- मैथिली बालनाटक सीमा विस्तार करैत — ‘चौआरि’ ३. पद्य ३.१.१.जगदीश चन्द्र ठाकुर ‘अनिल’-भक्ति गजल २.डाॅ. शि‍व कुमार प्रसाद केर तीन गोट कवि‍ता ३.२.अमित मिश्र- ६ टा भक्ति गजल ३.३.१.मिहिर झा-भक्ति गजल २.बिन्देश्वर ठाकुर-भक्ति गजल/ गजल१-२ ३.रामवि‍लास साहु जीक दूटा कवि‍ता ३.४.पंकज चौधरी (नवलश्री)- भक्ति गजल-१-३ ३.५.इरा मल्लिक-भक्ति गजल १-४ ३.६.१.राजदेव मण्‍डलक तीन गोट कवि‍ता २.जगदीश प्रसाद मण्‍डलक गीत ३.मनोज कुमार मण्‍डल- नहि त'अ ई बहि चलत ३.७.१.जगदानन्द झा 'मनु'- भक्ति गजल १-५ २.नवीन कुमार ‘आशा’- हनीमून ३.८.१.बृृषेश चन्द्र लाल- कहिआधरि ढुनैत रहब ! २.कामिनी कामायनी- ई केक्कर शोणित ?/खिड़की/भरोस ३.मुन्नी कामत जीक दू गोट कवि‍ता गद्य-पद्य भारती:मन्त्रद्रष्टा ऋष्यश्रृङ्ग- हरिशंकर श्रीवास्तव “शलभ"- (हिन्दीसँ मैथिली अनुवाद विनीत उत्पल) ६.बालानां कृते-किशन कारीगर- होरी मे मचाउ हुरदंग ७. भाषापाक रचना-लेखन -[मानक मैथिली] विदेह मैथिली पोथी डाउनलोड साइट VIDEHA MAITHILI BOOKS FREE DOWNLOAD SITE विदेह ई-पत्रिकाक सभटा पुरान अंक ( ब्रेल, तिरहुता आ देवनागरी मे ) पी.डी.एफ. डाउनलोडक लेल नीचाँक लिंकपर उपलब्ध अछि। All the old issues of Videha e journal ( in Braille, Tirhuta and Devanagari versions ) are available for pdf download at the following link. विदेह ई-पत्रिकाक सभटा पुरान अंक ब्रेल, तिरहुता आ देवनागरी रूपमे Videha e journal's all old issues in Braille Tirhuta and Devanagari versions विदेह ई-पत्रिकाक पहिल ५० अंक

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(मैथिलीक सभसँ लोकप्रिय जालवृत्त) पर जाउ। संपादकीय १ मैथिलीमे गजल भैये नै सकैए, कहले नै जा सकैए, से गप आब कियो नै बजै छथि। कारण गजल, बहर युक्य आ आजाद, दुनू मैथिलीक पाठककेँ हिलोरि देने छै। मुदा भक्ति गजल, बाल गजल आदिक सन्दर्भमे किछु गोटेक मत छन्हि जे गजल गजल छिऐ, से ओकर विभाजन नै कएल जाए। मुदा भक्ति गजल आकि बाल गजल गजलक विभाजन नै, गजलक स्पेसिअलाइजेशन छी। हाइकूक निअमक पालन करितो जँ प्रकृतिपर नै लिखलौं तँ ओ भेल शेनर्यू। कबीरक उलटबासीक प्रभाव अछि आकि ई गजलक स्वभाव अछि जे एतऽ प्रेमक महत्व छै, भक्ति प्रेमक संगे अबै छै, आ कने उलटबासीक संग जेना प्रेम अबै छै तहिना भक्ति। मुदा ई भक्ति झझा दैत अछि। अमित मिश्र लिखै छथि:- विषकें पी नीलकण्ठी छी बनल यौ होश दैवक उड़ल से जीयेलौं अहाँ तखने जगदीश चन्द्र ठाकुर "अनिल लिखै छथि:- तों विपत्तिमे दौगल अएलें हम तोरे हनुमान बुझै छी २ वीणा ठाकुर जीक साहित्य अकादेमी दिल्लीक मैथिली परामर्शदात्री समिति- (धूर्त-समागम वर्सन २०१३-१७) ऐमेसँ असाइनमेण्ट बला साहित्यकार, रिपीटेड आ साहित्य दुनियाँ सँ कोनो सरोकार नै रखनिहार सभ शामिल छथि, जेना कामदेव झा, कुलानंद झा, नरेश मोहन झा, रवीन्द्रनाथ झा आदिक नाम ब्राह्मणवादी पत्रिका टा पढ़निहार सेहो नै सुनने हेता।) -पूर्ण लिस्ट अछि:- कामदेव झा, ललिता झा, अशोक कुमार झा, शंकरदेव झा, कुलानंद झा, नरेश मोहन झा, खुशीलाल झा, रवीन्द्रनाथ झा आ गलतीसँ झा-झाएक्सप्रेसमे डा॰ शिव प्रसाद यादव सेहो चढ़ि गेला। गजेन्द्र ठाकुर ggajendra@videha.com अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। २. गद्य २.१.आशीष अनचिन्हार-भक्ति गजल २.२.१.ज्योति चौधरी-एक युग: टच वुड -भाग-२ २.अवनीश मण्‍डल- विहनि कथा- गप्‍पक खाैंइचा ३.मुन्नी कामत -एकांकी- पात-पातसँ बनल परिवार २.३.जगदीश प्रसाद मण्‍डल- चारि‍ गोट वि‍हनि‍ कथा २.४.जगदीश प्रसाद मण्डल-रत्नाकर डकैत (एकांकी) २.५.जगदानन्द झा ‘मनु’- दूटा विहनि कथा २.६.१.जगदीश प्रसाद मण्‍डल- लघुकथा- उलबा चाउर २.७.राम भरोस कापडि भ्रमर- यात्रा प्रसंग- रायपुरक मिथिला महोत्सबः उत्साहक बाढि आ मनीष झा २.८.रमेश रञ्जन- मैथिली बालनाटक सीमा विस्तार करैत — ‘चौआरि’ आशीष अनचिन्हार भक्ति गजल जखन विदेह द्वारा बाल गजल विशेषांक निकलल रहए तखन केओ नै सोचने रहए जे एतेक जल्दिए गजलक नव प्रारूप " भक्ति गजल " विकिसित भए जाएत। मुदा से भेल आ ताहि लेल सभसँ बेसी धन्यवादक पात्र छथि ओ लोक सभ जे की गजलक निंदा करैत छथि। कारण जँ ओ सभ नै रहितथि तँ आइ गजले नै रहितै.. बाल आ भक्ति गजलक तँ बाते छोड़ू। की थिक भक्ति गजल-- जहाँ धरि भक्ति गजलक विषय चयन केर बात थिक तँ नामेसँ बुझा जाइत अछि ऐ गजलमे भक्ति केर वर्णन रहैत छै। तथापि एकटा परिभाषा हमरा दिससँ ----" एकटा एहन गजल जाहि महँक हरेक शेर भक्ति मनोविज्ञानसँ बनल हो आ गजलक हरेक नियमकेँ पूर्ववत् पालन करैत हो ओ भक्ति  गजल कहेबाक अधिकारी अछि"। जँ एकरा दोसर शब्दमे कही तँ ई कहि सकैत छी जे भक्ति गजल लेल नियम सभ वएह रहतै जे गजल लेल होइत छै बस खाली विषय बदलि जेतै। मे भक्ति गजल बाल गजले जकाँ छै। की भक्ति गजल लेल नियम बदलि जेतैः जेना की उपरमे कहल गेल अछि जे भक्ति गजल लेल सभ नियम गजले बला रहतै बस खाली एकटा नियमसँ समझौता करए पड़त। माने जे बहर-काफिया-रदीफ आ आर-आर नियम सभ तँ गजले जकाँ रहतै मुदा गजलमे जेना हरेक शेर अलग-अलग भावकेँ रहैत अछि तेना भक्ति गजलमे कठिन बुझाइए। तँए हमरा हिसाबेँ ऐठाम ई नियम टूटत मुदा तैओ कोनो दिक्कत नै कारण मुस्लसल गजल तँ होइते छै। अर्थात भक्ति गजल एक तरहेँ " मुस्लसल गजल " भेल। किछु लोक आपत्ति कए सकै छथि जे गजल तँ दार्शनिक रहिते छै तखन ई भक्ति गजल किएक ? उचित प्रश्न मुदा हम कहब जे दर्शन आ भक्ति दूनूमे बहुत अंतर छै जकर चर्चा विद्वान सभ करिते रहै छथि तँए ई भक्ति गजल दर्शन बलासँ अलग भेल। तारीखक हिसाबें भक्ति गजलक उत्पति केँ मानल जाएत जनवरी 2012केँ मानल जाएत जाहिमे जगदानंद झा मनु जीक भक्ति गजल आएल। मुदा ओहूसँ पहिने मिहिर झा द्वारा एकटा आएल जे ताहि समयकेँ हिसाबसँ ठीक छल मुदा बढ़ैत ज्ञानक सङ्ग ओहिमे काफिया आदिक दोष बुझना गेल। मुदा  भक्ति गजल  स्वरूप मैथिलीमे पहिनेहें फड़िच्छ भए चुकल छल।  मैथिलीक प्रारंभिके दौरमे भक्ति गजल शुरुआत भए चुल छल कविवर सीताराम झा आ मधुप जीक गजलसँ सेहो शुद्ध अरबी बहरमे। मने 1928 धरि भक्ति गजल पूर्ण रूपेण स्थापित भए गेल छल मैथिलीमे। तँ एतेक देखलाक पछाति आउ देखी कविवर सीता राम झा आ ओहि समयक किछु भक्ति गजल---तँ आउ देखी 1928मे प्रकाशित कविवर सीताराम झा जीक " सूक्ति सुधा ( प्रथम बिंदु )मे संग्रहीत एकटा गजलकेँ जे की वस्तुतः " भक्ति गजल " अछि--- जगत मे थाकि जगदम्बे अहिंक पथ आबि बैसल छी हमर क्यौ ने सुनैये हम सभक गुन गाबि बैसल छी न कैलों धर्म सेवा वा न देवाराधने कौखन कुटेबा में छलौं लागल तकर फल पाबि बैसल छी दया स्वातीक घनमाला जकाँ अपनेक भूतल में लगौने आस हम चातक जकां मुँह बाबि बैसल छी कहू की अम्ब अपने सँ फुरैये बात ने किछुओ अपन अपराध सँ चुपकी लगा जी दाबि बैसल छी करै यदि दोष बालक तँ न हो मन रोख माता कैं अहीं विश्वास कैँ केवल हृदय में लाबि बैसल छी एकर बहर अछि-1222-1222-1222-122 मने बहरे हजज नोट--१) कविक मूल वर्तनीकेँ राखल गेल गेल अछि। विभक्ति सभ अलग-अलग अछि जे की गलत अछि। २) कवि द्वारा चंद्र बिंदु युक्त सेहो दीर्घ मानल गेल अछि जे की गलत अछि। प्रसंग वश ईहो कहब बेजाए नै जे कविवर अपन गजल समेत सभ कवितामे चंद्रबिंदुकेँ दीर्घ मानि लेने छथि। शायद तँए पं गोविन्द झा जी सेहो चंद्र बिंदुकेँ दीर्घ मानै छलाह आ जकर खंडन भए चुकल अछि। ऐकेँ अलावे मधुप जीक भक्ति गजल अछि। विजय नाथ झा जीक भक्ति गजल अछि। कहबाक मतलब जे अनचिन्हार आखरक आगमनसँ पहिनेहे भक्ति गजल छल मुदा ओकर नामाकरण ( पहिल रूपमे जगदानंद झा मनु ) अनचिन्हार आखरक पछाति भेल। वर्तमान समयमे हमरा छोड़ि लगभग सभ गजलकार भक्ति गजल लीखि रहल छथि जेना , जगदानंद झा मनु, चंदन झा, अमित मिश्र, पंकज चौधरी नवल श्री, बिंदेश्वर नेपाली, सुमित मिश्र, श्रीमती शांति लक्ष्मी चौधरी, श्रीमती इरा मल्लिक, ओम प्रकाश, बाल मुकुन्द पाठक, जगदीश चंद्र ठाकुर अनिल, मिहिर झा, प्रदीप पुष्प, अनिल मल्लिक, राजीव रंजन मिश्र इत्यादि-इत्यादि। ऐ विषयमे आर अनुसंधानक जरूरति अछि ऐ छोट आलेख आ हमर छोट बुद्धिमे भक्ति गजल एहन विस्तृत वस्तु ओतेक नै आएल जतेक एबाक चाही। ओना हम फेर विदेहकेँ ऐ विशेषांक लेल धन्यवाद नै देबै कारण हमहूँ विदेह छी आ लोक अपना आपकेँ धन्यवाद कोना देत। १.ज्योति चौधरी-एक युग: टच वुड -भाग-२ २.अवनीश मण्‍डल- विहनि कथा- गप्‍पक खाैंइचा ३.मुन्नी कामत -एकांकी- पात-पातसँ बनल परिवार १ ज्योति चौधरी एक युग: टच वुड - भाग २ हम कहैत छी लगभग, कारण हमर जखन ब्याह भेल हमर पतिक उम्र 30 साल रहनि आ हमरा सभ लग समय नै छल जे हम सभ ८-१० साल प्रतीक्षा करितौं बच्चाक लेल, से स्वभाविक छल जे हमर सबहक विवाहक बड्ड विशेष स्वप्न छल अपन बच्चा। अपन नैहरमे हम बहुत बच्चा जकॉं रहैत रही तैं हमर पतिदेवकेँ विश्वासे नै छलनि जे हम कोनो मुश्किल समयमे हुनकर संग देबनि। हम हुनका लग नाटक करियनि जे हम छोट छी तइ कारणे ओ हमरापर विश्वास नै कऽ रहल छथि। हमर ऐ नाटकक असर ई छल जे हुनका दस साल लागि गेलनि ई कहैमे, जे सच्चे अहॉंक कद छोट अछि। हम अपन चलाकी मात्र अपन मॉंकेँ कहने रहियनि। सासुरमे बजितौं तँ सभ तुरन्त खुलाशा कऽ दितथि। परिणामस्वरूप हमर पतिदेवक व्यवहार सेहो बदलि जैतनि। मुदा हम बुझैत रहिऐ जे ई हुनकर डर बा अज्ञानता नै छलनि बल्कि बढ़िया शिष्टाचार छलनि जे ब्याहमे कतेक दिन चलि सकैत छै। हमर मानब अछि जे ब्याहक किछु साल बाद पति-पत्नीमे औपचारिकता नै रहि जाइ छै आ तकरे बाद ई परख होइत छै जे के बेसी नीक इन्सान छथि। नीक मतलब व्यवहार आ विचार सँ नीक भेनाइ जे सर्वप्रथम परिवार, दोसर पाठशाला आ तेसर कार्यक्षेत्र, ऐ तीनूक असर होइ छै। आर्थिक परिस्थितिसँ मूल सिद्धान्तपर असर नै एबाक चाही। हमर पतिदेवक आदर्श बड़ ऊँच छलनि। हुनकर ई असर छलनि जे दियादनी सभकेँ चपटने रहै छलखिन मुदा हम सासुरमे हमेशा डेरायले रहै छलौं। आ वापस अपन घर लौटलापर एको बेर परिवार बा संगीक कुनो चर्चा केनाइ सम्भव नै छल। जहिया चर्चा करी तँ अगिला दिन खाना बना कऽ बैसल बाट ताकैत रही आ ओ जरूरी काजमे फँसल रहै छलथि। बहुत बेर हमर बहस भेल जे अकरा तँ जिम्मेवारीसँ भागनाइ कहैत छै मुदा हुनका लग कुनो जवाब नै रहनि। परिवारमे छोट हेबाक सभ्यता आ काजमे नब होइक बहाना। ओना हम मानैत छी जे एक मध्यवर्गीय परिवारक होइतो हमर पतिदेव कम उम्रमे एक बहुराष्ट्रीय कम्पनीमे कार्यरत छलथि आ बहुत संगी साथीसँ घिरल रहै छलथि। संगी सबहक पत्नी सभ हुनका बड्ड पसन्द करैत छलनि। देखैमे तँ नीक रहैथे, संगे घरक खर्चा सम्हारैमे तँ बेसीये सक्कत हाथ रहनि। हम कहियो हुनकर बिल नै सम्हारलौं। बस हमरा ई बुझल रहए जे हमरा कारणे कोन बिल बेकारमे बढ़ि रहै छै। हुनकर बहुत संगी सभ छलनि आ अपन अविवाहित जीवनमे ओ पार्टी सभमे व्यस्त रहैत छलथि। जौं हम ओहेन स्वतंत्र आ रंगीन जीवन बितेने रहितौं आ पुरूष रहितौं तँ मुम्बइ कखनो नै छोड़ितौं। ओहुना जौं मात्र हम अपने दऽ सोची तैयो हमरा मुम्बइक बड्ड मोन पड़ैत अछि। सते ओ स्वप्न नगरी छै। हमर हृदय आ आत्मा बेर-बेर ओतै घूमैत रहैत अछि। चारकोपक ९० फीट रोड, मन्दिर, पेण्टिंगक दोकान, रासनक दोकान, माछक बजार, पानीपुरीक ठेला, हरियर भाजीक दोकान, गोविन्दाक खेल, घर-घरमे गणपति विराजित करैक प्रथा, दुर्गापूजाक दाण्डिया आ आरो मारिते याद जे ऑंखिमे पानि आनि दैत अछि। ई बम्बइ शहर छल जतए हम सॉंझमे भगवानक पूजा केनाइ शुरू केने रही। कारण ओतए सॉंझमे घरपर फूल बेचए आबै छलै आ हमरा फ्रीजमे फूल राखि कऽ भोरे भगवानकेँ चढ़ेनाइ नै पसन्द छल। आ बीच-बीचमे हम भोरे-भोर काजपर सेहो भागैत रही। सब्जी भाजीक खरीदारीमे हम बहुत गुजराती आ मराठी सेहो सीख गेलौं। जेना ओतए चाउरक चोखा, आलूक बटाटा, मटरक बटाटा, प्याजक कान्दा, धनिया पत्ताक कोतमीर आदि होइत छलै। हमर पतिदेव ऐमे बेसी जानकार छलथि जेनाकि हमर पिताजी बंगाली आ उड़िया बड्ड बढ़ियासँ बाजि आ बुझि लैत छलथि। हमरा मोन अछि जे जखन हम बाबुजी संगे बजार जाइ तँ हुनका बेसी काल देखियनि मिरचाइवालीसँ पुछथिन- “लंका मिष्टी होबे की नाई?” मिरचाई मीठ अछि की नै? आ ओ खिसियाइ- “लंका केमोन कऽरे मिष्टी होबे?” मिरचाइ कोना मीठ हेतै। हमर सभसँ बढ़िया समय बियाहक बादक छल जखन सप्ताह भरिक काजक बाद हम दुनु सप्ताहान्तमे घरमे शान्तिसँ समय बिताबै छलौं। नौकरानीकेँ सेहो सप्ताहान्तमे नै काज रहैत छलै कारण हमरा घरक काज अपने केनाइ पसन्द छल। हम सभ शनि दिन साईंधाम मन्दिर जाइत छलौं आ घुरती काल खरीदारी करैत बाहर खा कऽ घर लौटैत छलौं। घर आबि कऽ तरकारी काटि कऽ सप्ताह भरिक खानाक तैयारी करै छलौं फेर पूरा परिवारसँ बात करैत छलौं आ फेर देर राति तक बॉलीवुडक फिल्म देखैत छलौं। लोकल विडियो क्लबक मेम्बर बनल छलौं से जे सभसँ नब फिल्मक सी. डी. ओकरा लग रहैत छलै से दऽ जाइत छल। परिवारसँ बात केनाइ तँ टॉनिक छल हमरा लेल, नब शहरमे। आ देर तक फिल्म देखैक परिणामस्वरूप रविदिन सुतनाइ। सुतनाइ।। आ सुतनाइ।।। २ अवनीश मण्‍डल विहनि कथा गप्‍पक खाैंइचा- स्‍कूलमे सरजी सँ पुछलि‍यनि‍- “सरजी, खोंइचा छोड़ाएल गप केहेन होइ छै?” सरजी कहला- “हौ बौआ, गपे तीन रंगक होइ छै। एकटामे खोंइचा होइते ने छै, दाेसरमे गुड़मी-खीरा जकाँ पातर होइ छै आ तेसरमे बेल जकाँ तेहेन सक्कत होइ छै जे ओ सोहेबे ने करैए।” ३. मुन्नी कामत -एकांकी- पात-पातसँ बनल परिवार प्रथम-दृश्य- (बड़की भौजी असगरे तामशसँ लाले-लाल अछि, जेना लगैत अछि जे ओकरा देह मे आ बोलमे कोइ लुंगिया मेरचाय रगड़ि‍ देने हुअए।) बड़की भौजी-    उंउ कइर-झुमरि, कइर-लुठबी बुझै कि छै अपनाकेँ? हमरासँ मुँह लगाओत। नमहर छोटक लि‍हाज नै, बाप रो बाप मुँहमे मेचो नै परै छै बजैत कला। आय अबए दै छि‍ऐ टुनमा बाबूकेँ, कहबै नै बनत हमरा एे मोगिया संगे हमरा भीन करि‍ दिअए। (शंकर कअ प्रवेश) शंकर-        टुनमा माए, हे यैयय टुनमा माए, कि भेल? एना किआ तिलमिला रहल छी! असगरे केकरा संगे बात करै छि‍ऐ। बड़की भौजी-    ओइ ऊपरबला सँ, जे नमहर बना कऽ तँ पठेलक ऐ घरमे पर भैलू कुत्तो जकाँ नै यऽ। आब तँ छोटकीकेँ बोल फुटए लगलैए। अपन बेज्जति‍ करबैसँ नीक यऽ कि पहिले सर्तक भऽ जाइ। हम भीन हइ लऽ चाहै छी। शंकर-        धुर्रर, बताह भेलिऐ कि! लोग कि कहत चुप रहू। चलु हम हाथ-पएर धोने अबै छी जल्दि खेनाइ लगाउ बड़ जोड़ भुख लगल अछि आ अहूँ कनी संगे खा लिअ तामश हटि‍ जएत। (पटाक्षेप।) दोसर-दृश्य- पंकज-        छोटकी कि भेलै यइ? आय भौजी पुरे घरकेँ अपना माथपर उठेने छै। छोटकी-       अहाँकेँ भौजी बेसी बलगर अछि तइ खातिर छोट-मोट बातपर हंगामा खड़ा केने रहैए। असल बात तँ ई छै कि दुनू पावर मिलल छै ने, साउसोकेँ आ जेठानियोकेँ तँइ मति‍ छिन्नु भऽ गेल छै। पंकज-        (तमसा कऽ कहै।) अहाँकेँ बजैक तमीज नै अछि। अहाँ अपन माइयो संगे अहिना बजैत रहिऐ आकि अतए सठि‍येलियइ हेँ। ठीके भौजी कहै छै अहाँकेँ जुवान नै रेती छी रेती। खब्बरदार जे हमरा माए सनक भौजीक विरूध एको गो अनरगल शब्द बजलौं तँ जीह घीचि‍ लेब। धनि‍ ई भौजी जे हम जिंदा छी। बिनु माएक तँ हम अनाथे भऽ गेल रही, यएह भौजी जे माए बनि‍ हमरा सहारा देलक। आइ ओकर एगो बात अहाँकेँ घोंटल नै जाइए। छोटकी-       हम छोट छी तँ अकर मतलब कि बड़काकेँ एड़ी तर मसलैत रही। हम आगू भऽ कऽ लड़ैले नै जाइ छी, मुदा एगो बात बूझि‍ लिअ कोइ आगु भऽ कऽ जे हमरा बात कहत तँ पाछु सँ हम छोड़ब नै। नमहर लोककेँ अपन बेवहारसँ छोटक आगु नमहर भऽ कऽ रहए पड़ै छै तबे उ नमहर कहाइ छै। (दूरेसँ शंकरक अवाज सुनाइत अछि) शंकर-        बौआ पंकज हौ कथीकेँ बहस करै छहक दुनू गोरे। आबा घरसँ बाहर आबह। जेना छोट बच्चा लड़ाइ-झगड़ा कऽ फेर एक्केठीम आ ओकरे संगे हसए-खलए लगैत अछि तहिना एकरा दुनूकेँ झगरा छै। तूँ आब एना बात नै बढ़ाबह। पंकज-        अबै छी भैया। (पटाक्षेप।) तेसर दृश्य- (3-4टा बच्चाक संगे पायल आ काजल घरक बाहर खेलाइत अछि‍। खेल-खेलमे दुनू बहिन आपसमे लड़ए लगैए, तखने बड़की भौजी बच्चाकेँ चि‍ख-पुकार सुनि‍ घरसँ बाहर अबैए आ एक थप्पर अपन बेटी पायलकेँ आ एक थप्पर छोटकीकेँ बेटी-काजलकेँ मारैत अछि। (थप्पर लगैत पाँच सालक काजल मुँह भरे खसि‍ पड़ैत अछि। तखने छोटकियो दौगल अबैए।) छोटकि-       बाप रे बाप, मारि‍ देलक हमरा बेटीकेँ। मुँहसँ खुन बोकड़ैत अछि। कोइ दौगू डॉक्टरकेँ बजेने आउ। काजल... बेटी काजल....! (जहिना छोटकी काजलकेँ कोरामे उठाबैत अछि सभ अबाक् रहि‍ जाइत अछि। काजलकेँ मुँहसँ खुनक पमारा निकलैत अछि। काजल मुर्छित भऽ जाइत अछि। बड़की भौजी दौग कऽ एक लोटा पानि‍ अनैए आ काजलक मुँह पर पानि‍ छिटैए।) बड़की भौजी-    बुच्‍ची काजल, बाबू कि भेल आँखि‍ खोलू। छोटकी-       ई मगरमछक नोर लऽ कऽ सहानुभूति‍ देखबै लऽ अतए नै आउ। हमरा बेटीकेँ ऐ अवस्थामे पहुँचा कऽ आब हमदर्दी देखबै छी! अगर अहाँ एक बापक बेटी छी तँ हमरा नजरि‍सँ दूर भऽ जाउ। हम अहाँक मुँह देखए नै चाहै छी। (बड़की भौजी कनैत घर चलि‍ जाइत अछि। पंकज डॉक्टरकेँ संगे दौगैत अबैत अछि।) डॉक्टर-       (काजलकेँ देखि‍ ओकर खुन सब पोछैत) चिंताक कोनो बात नै छै, अगुलका दाँत ठोरमे कनियेँ गरि‍ गेल रहै आ छोट बच्चा छै तँइ मुर्छित भऽ गेलै। हम किछु दवाइ लिखि‍ दै छी। मंगबा लिअ तीन दिनक खोराक अछि आ घबरा नै किच्‍छो नै भेलै। बच्चाकेँ अहिना छोट-मोट चोट लगि‍ते रहै छै। पंकज-        चलु डॉक्टर सहाएब, हम अहाँकेँ छोड़ि‍ अबै छी। (पटाक्षेप।) चारि‍म दृश्य- (बड़की भौजी आ शंकर दुनूक बीच ऐ प्रसंग पर चर्चा होइत अछि।) शंकर-        पायल माए, अहाँ ई ठीक नै केलौं। घरक झगड़ाकेँ तामशसँ अहाँ छोट बच्चापर निकालि‍ लेलौं। बड़की भौजी-    छोटकी आ बौआ तँ यएह सोचै छै कम-सँ-कम अहाँ तँ हमरा समझू, हम तँ झगड़ा छोड़बै खातिर दुनूकेँ कनिकबे जोरसँ मारलिऐ, हमरा कपारमे दोष लिखल छेलै तँइ ई घटना घटलै। छोटकी-             घटना घटलै कि घटना घटेलिऐ। हमरासँ लड़ि‍ कऽ मन नै शांत भेल तँ हमरा बच्चोकेँ नै छोड़लौं। (पंकज दिश ताकैत) सुनै छि‍ऐ आय अखने भीन होउ नै तँ हम अपना देहपर मटिया तेल छीट कऽ आगि‍ लगा लेब। पंकज-        अच्छा शान्‍त रहू, हमहुँ नै आब जड़ि‍मे रहब। ऐ खुनक खेल खेलाइ सँ तँ नीक रहत जे अलगे रहू मुदा शांतिसँ रहू। शंकर-        बौआ कि बजै छहक तूँ। एकरा सभकेँ बातमे आबि‍ कऽ तुहों अहिना बजए लगलहक। खबरदार जे फेरसँ भीनक नाओं लेलहक। पंकज-        भैया, ई हमर आखि‍री फेसला छी। आब हम जड़मे नै रहब। शंकर-        बौआ, लोक कि कहतह, एना नै करह। जल्दि‍बाजीमे कोनो फेसला नै करल जाइ छै। पंकज-        हमरा लोकक परबाह नै छै अगर परवाह छै तँ अपन बच्चा आ परिवारक। जखनि हमर बच्चा लहु-लोहान छल तखनियेँ हमर मन तोरासँ भीन भऽ गेलौ। (सभ मुँह लटका अपना-अपना कमरामे चलि‍ जाइत अछि।) (पटाक्षेप।) अंतिम दृश्य- (घरक सभ सदस एक संगे एकट्ठा होइत अछि।) राधेश्याम-      बौआ पंकज, कि भेलै जे बात भीन-भि‍नाओज पर चलि‍ एलै। पंकज-        बाबु हम कोनो तर्क-वितर्क करैले नै चाहै छी, हमरा जड़मे नै बनैए तँइ हम भीन हएब। राधेश्याम-      छोट-मोट बातपर घबड़ेनाइ आ जि‍नगीक संघर्षसँ मुकरनाइ ई इंसानक काज नै भगोराक काज छी। पंकज-        बाबू, आय हमर बेटीकेँ ई हाल भेल काल्हि‍ किछु और हएत। अतेक दिनसँ काजलक माए संगे होइत रहै तँ हम किछो नै कहैत रहिऐ, आब हमरा बच्चा संगे करए लागल अखनो जे हम किछो नै बजब तँ कहीं काल्हि‍ अंजाम ईहोसँ बूड़ा नै हुअए। राधेश्याम-      बौआ, काजल संगे जे भेलै उ संयोग मात्र रहै। एनाहियो तँ भऽ सकैए कि काल्हि‍ आइयोसँ नीक होय। बौआ भिन्न भेनेसँ खाली अंगना नै मनो बटाइत अछि। सम्मलित परिवार एक शरीर जकाँ होइत अछि। जेना शरीरक कोनो अंगमे एगो काँट गड़ैसँ ओकर दरदक लहरि‍ पुरे शरीरमे दौगैत अछि तहिना सम्मलित परिवारमे कोनो एक व्यक्तिकेँ किछो हो छै तँ ओकर दरदक एहसास पुरे परिवारक हर सदस्यकेँ होय छै। असगर रहनेसँ इंसान स्वार्थी भऽ जाइत अछि। जेना शरीरक कोनो अंगमे घाव भऽ गेलापर ओकरा काटि‍ कऽ अलग करि‍ कऽ बजैए मलहम लगा कऽ ठीक करल जाइत अछि, तहिना परिवारक बीच बरहल मन-मोटओकेँ प्यारक मलहमसँ आ आपसी समझौतासँ दूर करैत अछि। आय बड़की कनियाँकेँ एक थप्पर तोरा नजरि‍ एलह आ ओकर अतेक सालक दुलार बिसरि‍ गेलहक। जे भौजी माए बनि‍ हरि‍दम तोरा आगु ठाढ़ रहह उ अगर तोरा बेटीकेँ एक थप्पर माइरे देलकह तँ कि गुनाह केलकह। छोटकि कनिया हमर एगो बात सुनह, सासुरमे सासु माएक रूप आ दियादिनी बहिनक रूप होइत अछि। अोकरा जाबे तक जि‍नगीमे उतारबहक नै घर स्वर्ग नै बनतह बस मकान बनि‍ कऽ रहि‍ जेतह। जतए रहै आ खाइक सुविधा होय छै और किछो नै। (सब एक संगे हाथ जोड़ि‍ कऽ) बाबु हमरा सभकेँ माफ करि‍ दिअ, हम सभकेँ सभ गुनेहगार छी। जँए अहाँकेँ मन दुखेलौं। हम आपसमे कहियो नै लड़ब ने कहियो भीन हएब। (पटाक्षेप।) इति। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। जगदीश प्रसाद मण्‍डल- चारि‍ गोट वि‍हनि‍ कथा- बच्‍चा गेने दूधो गेल जहि‍ना कि‍यो धन-धरमकँ संगे जाइत देखि‍ बि‍लखि‍‍-बि‍लखि‍ तड़सैए तहिना सुखलाही दीदी टुटैत जि‍नगीक बाट देखि‍ कानि‍ रहल छथि‍। ‘सुखलाही’ तेसर नाओं छि‍यनि‍। पहि‍ने समाजोक लोक सुखि‍या रखलकनि‍। पति‍क सम्‍बन्‍धक पछाति‍ सुखली कहए लगलनि‍। सासुरसँ नैहर आबि‍ जहि‍यासँ बसली तहि‍यासँ सुखलाही दीदी सभ कहए लगलनि‍। बड़ धुमधामसँ माए-बाप सुखि‍याक बि‍आह केलखि‍न। पढ़ल-लि‍खल बरक संग। मुदा भाग्‍यकेँ दोषी बना समाजमे दीदीक रूपमे जीब रहल छथि‍। कि‍छु दि‍न पूर्व धरि‍ परि‍वारोकेँ संग रखबाक परि‍पाटी नहि‍येँ जकाँ छल मुदा आब तँ सोझे अछि‍। पति‍ सुशील दि‍ल्लीयेमे दोसर बि‍आह कऽ लेलखि‍न। मुदा मि‍थि‍लांगना सुखि‍या, शुभ-कामना देलखि‍न- “दुनि‍याँमे कतौ रहू, सुखसँ रहू, अहींक सुख ने हमरो सुख छी।” परि‍वारक बि‍गड़ल दशासँ हटि‍ सुखि‍या नैहर आबि‍ बसि‍ गेलीह। दस कट्ठा जमीन पि‍ता भायसँ अलग कऽ देलखि‍न। सझि‍या परि‍वार रहि‍तो हि‍साब-कि‍ताब समगम छलनि‍। पि‍ताक मुइला पछाति‍ भायसँ अलग भेली। गाममे इन्‍दि‍रा आवाशक कोठा देखि‍ सुखलाही दीदीकेँ सेहो मन जगलनि‍। मुदा कि‍ कहि‍ घर मंगबै! जेकर पति‍ पचास हजार महि‍ना कमाइ छै, से पचास हजार ले कहबै जे वि‍धवा छी! कथमपि‍ नै। होलीक धुमसाहीमे सुशील पाँचो तूर गाम एलखि‍न। अपन तँ डीहो-डावर नै, सासुरक गाम। फुगुआक पीहकारीमे सौतीन फँसि‍ गेली। चालीस हजारमे एकटा जर्सी गाए कीनि‍ कऽ खूटापर बान्‍हि‍, चल गेली। पनरहि‍ये बच्‍चा, मास पुरबो ने कएल आकि‍ मरि‍ गेलै। सुखलाहीक जि‍नगीक सपना- ‘र्इटाक अपन घर हएत, गाए भाइये गेल, जारनो-काठी आ खाइयोक उपाए भइये गेल..।’ मुइल बच्‍चा देखि‍ सुखलाही दीदी कानि‍-कानि‍ कहै छथि‍न- “बच्‍चा गेने दूधो गेल।” दूधे पीब लि‍अ कुम्‍भ मेलासँ दुनू बेकती, बस स्‍टैण्‍डसँ पएरे अबैत रही। सीमा कातेमे रामधन नजरि‍ पड़ल। रामधन दबाइ आनए झंझारपुर जाइत रहए। नजरि‍ मि‍लि‍ते गप करैक जि‍ज्ञसा जागल। पुछलि‍ऐ- “रामधन, गामक की हाल-चाल अछि‍?” अपन काज बि‍सरि‍ रामधन बाजल- “कनी बैस लि‍अ, जखन गामक हाल-चाल पुछलौं तँ कहि‍ये दइ छी।” अपनोसँ बेसी जि‍ज्ञासा पत्नीकेँ भेलनि‍। अह्लादि‍ बजली- “कनी हाथो-पएर जि‍रा जाएत आ समाचारो बूझि‍ लेब।” जेबीसँ तमाकुलक डि‍ब्‍बी नि‍कालि‍ रामधन बाजल- “भने अहूँ कखैन खेने हएब कखैन ने, तमाकुलो खाइये लेब।” रस्‍ताक झमारल रहने हुअए जे जल्‍दी स्‍नान भोजन कऽ ओछाइन पकड़ी। मुदा तीन गोटेमे दू गोटे एक दि‍स अनेरे हल्‍लुक होइतौं। तइसँ नीक अपन गरमी दाबि‍ लेलौं। तहूमे सौभरी महात्‍म्‍य कथा पढ़ैक मौका भेटल। अगुतबैत कहलि‍ऐ- “तमाकुलोमे लाड़नि‍ चलाबह आ मुहोँ चलाबह। ठेहि‍आएल छी, बेसी काल अँटकि‍ नै हेतह।” रामधन बाजल- “अहीं दुआरे तीन दि‍नसँ एकटा पनचैती अँटकल अछि‍।” “कथीक पनचैती?” “सुरति‍या घरपर गीध बैस गेलौं, तेकरे तेहेन घमरथन गाममे होइ छै जे की कहूँ। थनो-पुलि‍स भऽ गेलै।” जि‍ज्ञासु होइत पुछलि‍ऐ- “थाना-पुलि‍स कि‍अए भेल?” बाजल- “ढोढ़बा-मंगला चाहे दोकानपर बैस चीलमो पीबैत रहए आ गपो करैत रहए। ढोढ़बा कहलकै सुरति‍याकेँ पति‍या-प्राश्चि‍त लगतौ। तइपर मंगला कहलकै, जे पति‍या-प्राश्चि‍त लेत तेकर मोछ उखाड़ि‍ लेबै।” रामधनक बात सुनि‍ कऽ हँसी लागल, पुछलि‍ऐ- “तब की भेल?” “दुनू गोटे पटका-पटकी कऽ थाना गेल।” थानाक नाओं सुनि‍ते चकि‍त भऽ गेलौं, कहलि‍ऐ- “आब तोहीं कहह जे जखन थाना गेल तखन की पनचैती हेतै। अच्‍छा एकटा बात कहअ तँ, सुरति‍या ओ घर छोड़ि‍ देलक आकि‍ उठि‍ते-बैसतै, खाइते-पीबि‍ते अछि‍।” “ओ तँ कहै छै जे सोझामे बाजत तेकर जीह काटि‍ लेबै। चि‍ड़ै छलै, सबहक घरपर बैसै छै, हमरो घरपर बैसल।” कहलि‍ऐ- “तब तँ फड़ि‍आएले अछि‍, झंझट कहाँ देखै छि‍ऐ कि‍छु जे पनचैती करबै।” जि‍ज्ञासा करैत रामधन पुछलक- “केहेन पनचैती हेबाक चाही।” कहलि‍ऐ- “अनेरे कोन धो-धामे दूधकेँ दूरि‍ कऽ धोर-मट्ठा दही बना खेबह, तइसँ नीक जे दूधे पीब लैह।” बाम-दहि‍न रतुका खर्चा अनैले कनीयेँ दि‍नमे चौकपर जाइ छलौं। ओना अगुआएल छलौं मुदा पाछूसँ एकटा मोटर साइकि‍लबला हमरासँ अगुआ गेल। अध बाट लग जखन एलौं तँ, दू लग्गा आगू मोटर साइकि‍ल एकाएक रूकए लगल आकि‍ नजरि‍ बढ़ल। एकटा चि‍त्रकबरा बि‍लाइ पच्‍छि‍मसँ पूब मुहेँ अपन रस्‍ता धेने, पहि‍ने असथि‍रेसँ मुदा मोटर साइकि‍लकेँ अबैत देखि‍ दौग कऽ टपि‍ गेल। गामेमे घरसँ उत्तर बीघा डेढ़ेक हटि‍ चौक अछि‍। चौक कि‍ आन गामक चौक जकाँ तँ नहि‍येँ अछि‍ तँए कि‍ कनहा मामाकेँ मामा नै कहबै। हँ एते जरूर अछि‍ जे आन गामक चौकमे ताड़ि‍यो-दारू बि‍काइ छै हमरा गामक चौकपर से नै अछि‍। महज आठ-नौटा दोकान छै, जइमे एकटा कि‍ताबक, एकटा दवाइ, एकटा साइकि‍ल तीनटा नोन-तेलक सँ लऽ कऽ बेसाह धरि‍क, दूटा चाहक आ एक्केटा पानक अछि‍। आगूमे मोटर साइकि‍लकेँ रूकैत देखि‍ हमहूँ अनमेना केलौं। पेशाब करए बैस गेलौं। से नै करि‍तो तँ एक्कैसमी शदीक मनुखसँ भेँट केना होइतए। मोटर साइकि‍ल लऽ स्‍टार्ट केनहि‍ पएर रोपि‍ ठाढ़ भेल बेचारा ऐ आशामे जे कि‍यो आगू बढ़त तखन ने बढ़ब, बि‍लाइक बाट काटब बड़ खराप होइ छै, काल्हि‍यो गुरुदेवक मुहेँ सुनलौं। तइ बीच एकटा छह-सात बर्खक छौड़ा बि‍स्‍कुट कीनए दौगल टपि‍ गेल। ने बि‍लाइये देखलक आ ने बि‍लाइक बाट काटब देखलक। पेशाबे करै काल दूटा बातमे उठल। एकटा ई जे जखन तेल-पेट्रोलपर चलैबला इंजनकेँ बि‍लाइ रोकि‍ सकैए तखन पएरे चलनि‍हारकेँ तँ ससरए नै देत। दोसर बात उठल जे ने मोटर-साइकि‍लबला एकटा अछि‍ आ ने बि‍लाइ एक्केटा छै, नै कि‍छु तँ दसो-बीस करोड़ हेबे करतै। तखन ई बट-कट्टा बि‍लाइ मोटर-साइकि‍ल रोकि‍ कते तेल पीबैत हएत!! मोटर-साइकि‍ल आगू बढ़ि‍ते चाहक दोकानक आगूमे ठाढ़ भेल जे रहए से देखने छल। लग अबि‍ते पूछि‍ देलक- “भाय, ओतए कि‍अए अँटकल छेलि‍ऐ, कि‍नकासँ काज छलए?” मोटर साइकि‍ल रोकि‍ सोल्हम शताब्‍दीक जेठजन जकाँ बाजल- “बि‍लाइ बाट काटि‍ देने छल।” एतबे बजि‍ते छल आकि‍ चाहक दोकानपर घौंचाल भेल। एक गोटे पूछलक- “बाम-सँ-दहि‍न गेल अाकि‍ दहि‍न-सँ-बाम।” “बाम-सँ-दहि‍न।” दोसर बाजल- “बूड़ि‍ कहीं कऽ दहि‍न-सँ-बाम कटै छै आकि‍ बाम-सँ-दहि‍न।” तेसर बाजल- “एकरा सबहक खच्‍चरपन्नी तोंही सभ बुझबहक, हौ मोटगरहा कीलबला, बाजह तँ जखन तोरा कोनो काज घरवैयासँ नै छेलह तखन तूँ ओकरा घर लग कि‍अए साइकि‍ल लगा ठाढ़ छेलहक?” चारि‍म बाजल- “एतबो नइ तोरा अखैन धरि‍ अकीलसँ भेँट भेलह जे कि‍सान परि‍वारक माए-बहि‍नसँ लऽ कऽ पुरुष-पात्र धरि‍ अर्ध नग्‍न भऽ अपन काज करैत अछि‍। तखन तूँ कि‍अए ठाढ़ भेलहक।” ताबे हमहूँ चौकपर गेलौं। गरदम-गोल होइत देखि‍ मन भेल जे जा कऽ देखि‍ऐ, मुदा फेर भेल जे आन-गामबलासँ एक्के गोटेकेँ गप करक चाही। जखने बेसी मुँह एक दि‍स हेतै आकि‍...। मुदा बि‍नु बुझनहि‍ कहलि‍ऐ- “अनेरे तूँ सभ अनगौंआँकेँ बाट रोकै छहक। जाउ, जाउ भाय सहाएब।” छातीक बीख- साइठ बर्खक जि‍नगीमे समए, जुन्ना एेँठल बाँसक खुट्टा जकाँ बना देलक। अपनो छगुन्‍ता लगैत रहए जे ऑल-रौनडर कलाकार जकाँ ओहन कलाकार ने तँ छी जे सभ पार्ट असकरो खेलि‍ सकै छी। आकि‍ सभ पार्ट खेलेनि‍हार लेबड़ा छी। दर्जनो नाओं आ दर्जनो उपनाओंसँ भरि‍ दि‍न काज चलैए। जँ पैघ पार्ट खेलेनि‍हार हीरो छथि‍ आ फगुआमे भाव-प्रदर्शन मने-मन करैत रहता तँ कि‍ होली खेलब भेल। होली तँ सतरंगा रंगक पावनि‍ छी। जे जीबए से खेलए फागु। खैर जे होउ, अनेरे दुनि‍याँ लए मगर-मारी कि‍अए करब। हम चटवाहो छी। केहनो-केहनो नागक डँसल बीखकेँ उतारि‍‍ दइ छि‍ऐ। चरि‍-कोसीक लोक जनै छथि‍ ओहि‍ना नै छी। जि‍नका पुछबनि‍ ओ कहि‍ देता जे छाती बीख उतारैबला चटबाह फल्लाँ। सोलहे-सतरह बर्खक रही तहि‍ये चनौरा गहबर जा चाटीक सीख लेलौं। तहि‍येसँ गामक चटवाहमे बहाली भऽ गेल। मुदा समैक चालि‍मे पड़ि‍ ऐ बुढ़ाड़ीमे छातीक चटवाह बनि‍ गुनधुनमे पड़ल छी। भेल एना जे सौंसे गाममे चारि‍येटा चटवाह छलौं, भदवारि‍ आ जेठमे बेसी सँपकटि‍या भेने रेजानि‍स-रेजानि‍स भऽ जाइ छलौं। तखन अपनामे सीनि‍यर-जुनि‍यर कऽ कऽ बँटबारा कऽ लेलौं। जखन कतौसँ कि‍यो बजबए आबए तँ‍ पहि‍ने पूछि‍ लि‍ऐ जे कोनठाम बीख छै। ठेहुनसँ नि‍च्‍चाँ एक गोटेक भाँजमे, जाँघसँ डाँढ़ धरि‍ दू गोटेक भाँजमे आ सीनि‍यर जानि‍ हमरा छातीक भार भेटल। से करीब बीस बर्खसँ खुब नाआें कमेलौं। खूब जसो परोपट्टामे अछि‍। बीच्‍चेमे रमेश बाजल- “आब की करै छी?” “एकटा छुटि‍ गेल। जखन गाममे जेठुआ अमार परदेश जाइक उठल, तखन हमरो मन डोलल। मुदा हमरा मनमे उठल जे रोजगार गाममे करै छी, सएह ओतौ करब आकि‍ दोसर? जँ अपन रोजगार रहत तँ अबै-जाइमे नीक रहत। मुदा बदलने जि‍नगी बदलि‍ जाइ छै। तखन तँ पहपटि‍मे पड़ि‍ जाएब। नै गेलौं।” रमेश पुछलक- “अखन?” बुढ़ाड़ीमे ज्ञान भेल, से खुशी अछि‍। जे नामी मनतरि‍या छला, जे केहनो-केहनो साँपक बीच उतारै छला आ जखन बुढ़ाड़ीमे अपने कटलकनि‍ तँ कहलखि‍न जे डाक्‍टर लग लऽ चलू। सुनि‍ हमरो भक खुजल मुदा लोको-लाजक परीछा तँ काजेमे होइ छै। तँए कहै छि‍ऐ जे साइठ बर्खमे सरकारो घरसँ लोक रि‍टायर होइए, हमहूँ साइठ टपि‍ गेलौं। तँए सेवा नि‍वृत्ति‍ भऽ गेल छी। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। जगदीश प्रसाद मण्डल रत्नाकर डकैत (एकांकी नाटक) जगदीश प्रसाद मंडल पुरुष पात्र- रत्नाकर-        60 बर्ख। महेश-          55 बर्ख। सुरेश-         55 बर्ख। गणेश-         25 बर्ख। भजन लाल-     48 बर्ख। मि‍सर लाल-     48 बर्ख। रमण लाल-      48 बर्ख। मोजे लाल-      60 बर्ख। बर्वरी-          25 बर्ख। सुग्रीव-         35 बर्ख। हनुमान-        25 बर्ख। नारी पात्र- शबरी-         60 बर्ख। हरेलही-        40 बर्ख। बि‍सरलीही-      45 बर्ख। पहि‍ल दृश्‍य- (मोजेलाल गरदनि‍मे ढोल, हाथमे लकड़ीक बजौना, नेने आगू-अागू आ भजन लाल पाछू-पाछू।) मोजे लाल-     (डंका जकाँ बजबैत, कनी काल ढोल बजा, बन्न करैत) नगर-नगर, डगर-डगरसँ गाम-गामक, समाज-समाजक भाए-बहि‍न, काका-काकी, दादा-दादी‍ सभसँ कहै छी, सुनै- जाउ। भजन भाय अहाँ सबहक सोझहामे छथि‍ ओ कहता। भजन लाल-    गाम-समाजक जे भाए-बहि‍न छी कान खोलि‍ सुनू। जँ नै सुनब आ पछाति‍ कहब जे तेना कान गुजि‍या गेल जे से सुनबे ने केलौं। से नै हुअए। मोजे लाल-     (पुन: जागब ध्‍वनि‍मे ढोल बजा) भजन भाय, अपन वि‍चार कहि‍यौ। भजन लाल-    काल्हि‍ भाेरेसँ रत्नाकर भैया ऐठाम पुण्‍योत्‍सव छि‍यनि‍, सएह कहए एलौं अछि‍। छपुआ कार्डक आशा नै करब। मोजे लाल-     भाय सहाएब, छपुआ कार्ड कि‍ कहलि‍ऐ? भजन लाल-    आब देखै छी जे गामसँ, परि‍वारसँ एते तक कि‍ बाप-माएसँ करोड़ो योजन दूर छी मुदा बेटा-बेटीक जन्‍मोत्‍सव मना हजारो-लाखाे कार्ड जतए-ततए बि‍लहि‍ दइ छि‍ऐ। मुदा...। मोजे लाल-     मुदा कि‍? भजन लाल-    यएह जे पहि‍ने छँटि‍आबए पड़त जे कोन कार्ड हकार सदृश अछि‍ आ कोन भारक संग भोजनक अछि‍। ई तँ नै जे ‘जान ने पहचान, हम तोहर मेहमान’। मोजे लाल-     (एक धुन ढोल बजबैत नचबो करैत आ गेबो करैत) नोत एलै हौ भैया, हकार एलै हौ बेन डोलबैत बेना एलै, पीपहीक मुस्‍कान एलै हौ। फड़-अहि‍वर फड़ बि‍लहि‍ बाँटि-बाँटि‍‍ ज्ञानी-जोगी, डकैत भैया रत्नाकर हौ। (दोहरा-तेहरा, ढोलो बजबैत आ गेबो करैत।) असथि‍र होइत- भजन भाय, नोत-हकारक ढोलहो छी, तँए दोहरा-तेहरा कऽ कहि‍यौ? भजन लाल-    से की? मोजे लाल-     जहि‍ना सोना भेटनौं आ हरेनौं प्राश्चि‍त करबए पड़ै छै तहि‍ना ने नतो-हकार छी। सरही आमक पीपही नीक-नीक कलमी डारि‍क जोड़ पाबि‍ नाता जोड़ि‍ सरही-सँ-कलमी बनि‍ जाइत अछि‍ तहि‍ना ने नतो जोड़ल जाइत अछि‍। ई तँ नै ने जे फुर्सत दुआरे ए.टी.एम.क माध्‍यमसँ नोत पूड़ि‍ लेब। भजन लाल-    से की? मोजे लाल-     यएह जे कोनो बि‍आह छै आकि‍ मूड़न आकि‍ कोनो आन छोट-पैघ जज्ञ, जखने काज परि‍वारसँ ऊपर उठैत अछि‍ तखने ने परि‍वारसँ उठल सोच-वि‍चारक जरूरत पड़ैत अछि‍, जौं अहाँकेँ अपनेसँ छुट्टी नै हएत तँ केना पछुआएल लोक अहाँ संग सम्‍बन्‍ध बना सकत। भजन लाल-    जहि‍ना तूँ मोजे लाल बि‍नु खति‍आनक मालि‍क तहि‍ना हम भजना। हरक लागनि‍सँ लऽ कऽ खौजरा-खौजरी चटकबैत वीणाक ओहन स्‍वर समुद्रमे पहुँच जाइ छी जे घंटाे भरि‍ लाड़नि‍ चलौलो पछाति‍ अन्नक लाबा चमकि‍-चमकि‍ खापड़ि‍सँ कूदि‍ माटि‍पर अबैत अछि‍। मोजे लाल-     भाय सहाएब, अहाँक बात सभ नै बूझत? भजन लाल-    जहि‍ना भाँटा गाछमे लटकि‍ जीवन यात्रा करैत तहि‍ना मुड़ै माटि‍क तरेमे जीवन यात्रा करैत अछि‍, तँए ओकर जि‍नगीक कोनो महत नै? की ओ जीवनदाता नै छी? मोजे लाल-     भाय सहाएब, बूढ़ भेने अहाँ भँसि‍या जाइ छी? भजन लाल-    से केना? मोजे लाल-     हम तँ गाम-घरसँ शहर बजार धरि‍ ने घुमै छी। जाबे बजार नै बनत ताबे चौकीदार केना फड़त। देखै छि‍ऐ बड़का-बड़का बरि‍आतीमे इंजन गाड़ीक पति‍आनी लगल, तइमे छौड़ा-छौड़ी सभ अपन गाड़ी जोड़ि‍ देत आ भरि‍ राति‍ खा-पी उमैक लइत। (ढोलक अवाज सुनि‍ गामक मि‍सर लाल आ रमण लाल अबैत, दुनूकेँ देखि‍ते पाशा बदलैत) नोत एलै हो भैया, हकार एलै हो.... (मोजे लालकेँ चुप होइते भजन लाल मि‍सर लाल दि‍स तकलक। भावात्‍मक दृश्‍य। केना मि‍सर लालक थरथर कँपैत मन कि‍छु बाजए चाहैत, तहि‍ना भजन लालक पि‍यासल पथि‍कक दृश्‍य इत्‍यादि‍...।) भजन लाल-    (मि‍सर लालसँ, आेंगरी तानि‍ बाँहि‍ उठा) अहाँ कि‍छु बाजए चाहै छी? मि‍सर लाल-    हँ। भजन लाल-    तखन मुँह कि‍अए चोरौने छी। अपना वि‍चारकेँ काज रूपमे दुनि‍याँक बीच नै राखब तँ के केकर कि‍ नीक केलकै तइ आशामे अपनाकेँ राखब। मन असथि‍र कऽ बाजू। ओना अखन उत्‍सवक समए लगि‍चाएल अछि‍ तँए नीक हएत जे अहूँ सभ कपड़ा-लत्ता साफ कऽ ली, केश-दाढ़ी, जुत्ता-चप्‍पल ठीक-ठाक करैमे जते समए लागत तइसँ बेसी समए आब थोड़े अछि‍। मि‍सर लाल-    (कँपैत) भाय-सहाएब, उत्‍सवमे एहेन तँ ने मंच बनत जे श्रीमान्-श्रीमती होइत-होइत बजैक समैये ओरा जाएत तखन तँ जहि‍ना भोजमे सभ दि‍न धकि‍आइत-धकि‍आइत एेँठार लग पहुँच जाइ छी तहि‍ना। (बि‍च्चेमे मोजे लाल डि‍गरी चालि‍मे ढोल बजबए लगैए) भजन लाल-    भाय सहाएब, ने अहाँक बात हमरा धऽ लेत आ ने धड़ैक डर होइए मुदा पैघ काजक आगू छोट काजकेँ कि‍छु वि‍लमा देब नीक होइ छै। नइ, जँ अहाँ बड़ धड़फड़ाएल छी तँ चलू रस्‍ता पकड़ि‍ संगे-संग। काजो चलतै आ भजनो-कीर्तन चलतै। (तइ बीच रमण लाल मि‍सर लालकेँ डपटैत बाजल) रमण लाल-     बजैले जे सतमसुआ बच्‍चा जकाँ पेटमे उधकै छौ से दाबि‍ कऽ राख नै तँ कहि‍ दइ छि‍औ। मि‍सर लाल-    कि‍ कहमे, जे कहैक छौ से भने तेहल्‍लाक बीच छँहेँ बाज? रमण लाल-     अपन बाप-पुरखाक नाआें बूझल छौ? अपन कि‍छु बुझले ने छौ तँ दस गोरेमे की बजबीही। मि‍सर लाल-    जखन दुनू गोरे संगे रहै छी तखन तूँ पहि‍ने ने कि‍अए चेता देने छेलेँ? रमण लाल-     तूँ पुछलेँ कहि‍या? मि‍सर लाल-    अँइ रौ, बि‍नु पुछनहि‍ भरि‍ दि‍न संगे रहै छी। तहूमे जे नजरि‍पर चढ़बे ने कएल से केना पुछबो। रमण लाल-     अँइ रौ, कि‍ तोरा बूझि‍ पड़ै छौ जे जहि‍ना आरती घुमा लोक भगवानकेँ ठकि‍ भरि‍ राति‍ इजोत मि‍झा अन्‍हारेमे रखै छन्‍हि‍, हम तेना तोरा केलि‍औ। भजन लाल-    देखू, अहाँ सभ अनेरे अनघोल करै छी। कौल्हुका काज कि‍ सभ अछि‍ से मन पाड़ए दि‍अ। (सभ जाइत अछि‍) पटाक्षेप। दोसर दृश्‍य- (भजन लाल, मि‍सर लाल आ रमण लाल आ सुरेश अबैत अछि‍।) भजन लाल-    भाय, दुनि‍याँक खेल अजीब छै। जेना समुद्रमे जाइठ‍-सीमा नै होइ छै तहि‍ना ने अछि‍। ऐ अथाह माटि‍-पानि‍ बीच टपैक तीनू बाट तेहेन भऽ गेल जे...? मि‍सर लाल-    भाय, चुप कि‍अए भेलौं? रमण लाल-     भजन भाय, दि‍लेरक संग दि‍लक जखन भेँट होइ छै तखन एकटा नव अएनाक रंग चढ़ै छै। तँए मुँहक बात घोँटी नै, नइ पचए तँ उगलि‍ दि‍ऐ। भजन लाल-    (वि‍स्‍मि‍त होइत) भाय, एकटा बाट, तेना बनरा गेल जेना गाछ-वि‍रीछमे होइ छै जे कोढ़ि‍यो-बाती देब छोड़ि‍ दैत अछि‍। दोसर दोगलाइये गेल। तेसर बेटाक रगड़ामे बुढ़ाड़ी धरि‍ वस्‍त्रधारि‍ये रहला सुखदेव जकाँ आड़वन-कोपीन नै लेलन्‍हि‍‍। खएर, जे होउ...। पहि‍ने बैसैक ओरि‍यान करू। (मि‍सर लाल सतरंजी मोटरी खोलि‍ पसारए लगैत, तीनू गोटे तीन काेण पकड़ि‍ बीछा, जाजीम बि‍छबैत अछि‍। बि‍छान तैयार होइते रत्नाकर मंचपर अबैत अछि‍। माथमे तीन भीरी केश बान्हल, चानि‍पर तीन लकीर, दुनू दि‍स उजड़ा बीचमे लाल। दाढ़ी-मोछ भयंकर। बाँहि‍ गरदनि‍मे रूद्राक्षक माला, दहि‍ना हाथमे कमंडल, पीढ़ीपर लंगोटामे बान्‍हल पुरान कमलक मोटरी। (रत्नाकरक प्रवेश।) (मंचपर रत्नाकरकेँ अबि‍ते तीन गोटे पाछू-पाछू सेहो नारा लगबैत) “रत्नाकर भैया, जि‍न्‍दावाद। रत्नाकर भैया जि‍न्‍दावाद।” रत्नाकर-       (पाछू घुमि‍) सोझे हल्‍ला केने आ नारा लगौने नै हएत। चुप-चाप सभ भऽ जाउ। बेरा-बेरी अपन-अपन जि‍नगीक बात-वि‍चार समाजकेँ सुना दि‍यनु। धर्मराजक न्‍याय भेटत, नै कि‍ यमराजक। महेश-        भाय सहाएब, अपनेक जीवन यात्रा बहुत नमहर अछि‍ ओते सुनैले ओतेक नि‍चेनि‍योँ चाही ने, से भूखल पेट कतेकाल सुनि‍ अमल करत। जइ इलाकामे साले-साल रौदी, दाहीक संग उपजाउ माटि‍ नष्‍ट भऽ गेल अछि‍ तइ इलाकाक यात्री कते दूर जीवन यात्रा कऽ सकैए? रत्नाकर-       कि‍ मतलब? महेश-        भूखे भजन ने होइ गोपाला। लि‍अ राखि‍ गुरु कण्‍ठी माला। रत्नाकर-       महेश, अहाँक प्रश्न जेहने सुन्‍दर अछि‍ तेहने कठि‍न। मुदा समुद्रसँ रत्न नि‍कालब आ जंगलसँ सि‍र-शि‍रोमणि‍ आनब, दुनू दू दि‍शा छी। गणेश-        एना नै हएत, कनी ओंगरीपर (ओंगरीपर जेना हि‍साब जोड़ल जाइत) हि‍साब बैसा कऽ बुझा दि‍अ। रत्नाकर-       गणेश बाउ, कान खोलि‍ सुनि‍ लि‍अ। ई धरती वि‍शाल रंगमंच छी। माटि‍-पानि‍क बीच रंगमंच सजल अछि‍। जे जेहेन यात्री छथि‍ ओ ओहेन अपन बाट पकड़ि‍ पाड़ करै छथि‍। गणेश-        कि‍ मतलब? रत्नाकर-       मतलब यएह जे कि‍यो अपन जि‍नगी हवन दैत छथि‍‍ तँ कि‍यो दोसराक हवन लैत अछि‍। खएर, जे होउ...। (बि‍‍च्चेमे, मि‍सर लाल अपन बात उठबए चाहलक आकि‍ सुरेश ललकि‍ बाजल) सुरेश-        अनेरे...। रत्नाकर-       तखन पहि‍ने फरि‍छा लि‍अ पड़त जे खाइले जीबै छी आकि‍ जीबैले खाइ छी। दान देब नीक आकि‍ लेब नीक। आकि‍ लेब-देब नीक। आकि‍ देब-देब नीक। गणेश-        लेब-देब नीक छी। दुनू नीक छी। कोनो ने नीक ने अधला छी। भजन लाल-    तखन? गणेश-        बेवहारि‍क धरातलपर जे अधि‍क नीक हुअए? भजन लाल-    अधि‍कोक दू दि‍शा छै? गणेश-        से की? भजन लाल-    अधि‍क लोकक शाब्‍दि‍क वि‍चार आकि‍ अधि‍क लोकक जि‍नगीक वि‍चार। रत्नाकर-       भजन जेहने तूँ साँझ भोर राति‍-दि‍न लय-धुन बदलि‍-बदलि‍ एके बातकेँ औंटै-पौड़ै छह तेहने गणेश छथि‍‍। भारी देखि‍ हाथी चढ़ब नीक बुझलन्‍हि‍‍, मुदा हाथी केना पोसाइत अछि‍ से लूरि‍ये ने भेलन्‍हि‍। गणेश-        (खि‍सि‍या कऽ, दहि‍ना हाथ ऊपर घुमबैत) तीन लकीर हम दइ छी, ताधरि‍ हम नै मानब जाधरि ओहन भोगी नै आनि‍ देखा देब। रत्नाकर-       हकार दि‍अए तोहीं ने भजन गेल छेलह, तँए तोरे ने ओहेन हकरि‍यासँ भेँट भेल हेतह? भजन लाल-    भैया, बुढ़ोमे अहाँ ओहने अगुताह रहि‍ गेलौं जेहने समरथाइमे छेलौं। रत्नाकर-       (मुस्‍की दैत) हे बुड़ि‍वक, केतबो धड़फड़ा कऽ काज करबह, तँए कि‍ काज पहि‍ने थोड़े भऽ जेतह। काजक जे अपन समए छै ओइ अनुकूल जे करैत अछि‍, ओ कुशल भेल। मुदा...। सुरेश-        मुदा की? रत्नाकर-       यएह जे जँ धड़फड़ा कऽ करब तैयो आ अलुरि‍ये करब तैयो या तँ आरो गजपटा जाएत वा उबाणि‍ भऽ जाएत। सुरेश-        सु-वाणि‍योँ तँ भऽ सकै छै कि‍ने? रत्नाकर-       संयोगवश, नि‍श्चि‍त नै। भजन लाल-    (धड़फड़ाइत) भैया, अहाँ अनेरे कोन घंघौजमे लगि‍ गेलौं, मोतीबला सि‍तुआ दोसर होइ छै भलहिं नाओं कि‍यो रखि‍ लि‍अए। (भाव दृश्‍य) ने कि‍छु रत्नाकर बजैत, मुदा चेहरा कहैत समुद्रक सि‍तुआ आ बरसाती डबराक सि‍तुआ एक वि‍यान केना करत। एक अजर-अमर बीच जीवन-यापन केनि‍हार, दोसर तीन मास ढेनुआर तीन मास रखलाहा, मि‍ला छह मास। (भजनलाल हराएल मुद्रामे बड़बड़ाइत) ‘मनमे रहि‍तो साँझ-भाेर ओहए गबै छी।’ (सबहक मुद्रा अपन-अपन वि‍चारानुकूल। सभसँ भि‍न्न मि‍सरलालक। जेना कि‍छु बजैले मुँह लुस-फुस करैत, तहि‍ना।) (मि‍सर लालकेँ लुस-फुसाइत देखि‍ सुरेश बजलाह) सुरेश-        मि‍सर लाल अहाँ कि‍छु बाजए चाहै छी? मि‍सर लाल-    (दुनू हाथ जोड़ि‍) हँ, भाय सहाएब। हमरा सन लोककेँ बजैक एहेन समए कहि‍या भेटत? गणेश-        (बिगड़ि‍ कऽ) मि‍सर लाल जौं तोरा बजैक छह तँ जल्‍दी बाजह, अखन धरि‍ चाहो ने भेल अछि‍। तेलि‍या-फुलि‍या लगा-लगा नै बजीहह, घोंच-घाँचमे दू-चारि‍ कड़ी दबि‍ जाइ छै। जइमे अमीन चाेर फड़ि‍ जाइ छै। भजन लाल-    माने? गणेश-        माने यएह जे जखन बाँसक सोझका लग्‍गा छलै, मोट-पातर रहि‍तौ लग्‍गी लग्‍गीये छलै तखनो धूर कट्ठा नम्‍हरे छलै। चास-बास घटने तखन इंच-फीटमे पहुँचल। मुदा नपैक यंत्र तेहेन स्‍प्रींगदार भऽ गेल जे केमहर कि‍ भऽ जाइ छै जे थाहे ने पबै छी। रत्नाकर-       समैपर धि‍यान रखू। भजन देरी कि‍अए होइ छह? मि‍सर लाल-    भाय सहाएब, दुनि‍याँक रीति‍क अनुसार दुरागमनक अपनो कर्तव्‍य बुझलि‍ऐ। तीनि‍येँ सालमे दूटा बेेटी भऽ गेल। गणेश-        अपरेशन कि‍अए ने करा लेलौं, जखन दुइये बच्‍चाक कोटा छै? मि‍सर लाल-    भाय सहाएब, सुनै छि‍ऐ समलौंगि‍क सम्‍बन्‍ध। ओइ कटौतीसँ कोटा नै पुरतै? रत्नाकर-       आगू बाजू? मि‍सर लाल-    भाय सहाएब, मन अपनो दुनू परानीक सएह भेल। देखै छी जे एकटा बेटी-बि‍अाहमे जि‍नगी भरि‍क कमाइसँ पारो नै लगै छै, तइठाम दूटाक भार तँ बेसी भेबे कएल। रत्नाकर-       (मुड़ी डोलबैत) हँ से तँ भेल। तखन...। मि‍सर लाल-    (अठन्नी हँसी हँसैत) दूटा ओही बीच भऽ गेल, जइ बीच फड़ि‍छेबे ने कएल जे दुनूमे के अपरेशन करबी। भजन लाल-    तखन...? मि‍सर लाल-    ओही झंझटि‍क समए दूटा आरो भऽ गेल। भजन लाल-    एक गण्‍डा भेल? मि‍सर लाल-    गाहीमे एक कमे अछि‍। रत्नाकर-       पछाति‍? मि‍सर लाल-    माइक कानमे अपरेशनक समाचार पहुँचते मधुमाछीक गीत जकाँ गबैत दि‍न-राति‍ एके सोखर गबैत हमरा मौसीकेँ तेरहटा बेटी रहै से पार-घाट लगबे केलै आ एकरा सभकेँ चारि‍ये टामे ढट्ठा ढील होइ छै। सुरेश-        (मुस्‍की दैत) से तँ ठीके। पछाति‍ की भेल? मि‍सर लाल-    तत्‍काल भाइक बात मानि‍ गेलौं। अपनो दुनू परानी वि‍चारलौं जे जँ कहीं माइयो-बापक असीरवादसँ आगू बेटे बेटा हुअए। गणेश-        (खि‍सि‍या कऽ) ईह बूड़ि कहीं केँ, हम एते दि‍न-राति‍ तबाह रहै छी से धि‍या-पुता डरे बि‍आहो ने केलौं आ हि‍नका मुनहरक मुँह खुजि‍ गेलन्‍हि‍‍‍। (गणेशकेँ क्रोधि‍त देखि‍ मि‍सर लाल ठहाका दैत) मि‍सर लाल-    (धुनधुना कऽ) बपजेठ जकाँ केहेन गरमी छन्‍हि‍। मुदा जोरसँ कि‍छु नै बजलाह। भजन लाल-    मि‍सर भाय, एना जे ि‍तलकेँ तार बनेबह तते समए नै अछि‍। जल्‍दीमे अपन बात अन्‍त करह? ि‍मसर लाल-    हकार दइले जे गेल छेलह से कहने छेलह जे अपन बात धड़फड़ा कऽ बाजि‍ दि‍हक। रत्नाकर-       देखू वि‍चार दू ढंगे लोक करैए, औपचारि‍क आ अनौपचारि‍क। अनौपचारि‍यो औपचारी बनैए मुदा बीचमे शासकीय सूत्र आबि‍ जाइत अछि‍। अच्‍छा आगू...। मि‍सर लाल-    हि‍साब जोड़ि‍ लेलि‍ऐ किने। दूटा दुनि‍याँ रीति‍क अनुसार, दूटा दुनू परानीक झगड़ा-मि‍लान, मि‍लान-झगड़ामे। गणेश-        जते कुल-खनदानक खति‍आन-बही छह से अखने उन्‍टा दहक। रसगुल्‍लाक आसामे कचौरि‍यो सुखि‍ कऽ टाँट भऽ गेल हएत। मि‍सर लाल-    गणेश बाबू, अपने लग नै बाजब तँ बाजि‍ कतए पाएब। कनी धि‍यानसँ सुनि‍ दृष्‍टि‍-कूट खोलि‍यौ। तखन ने भाँज पेबै। भजन लाल-    मि‍सर भाय, तों तते ने मेठनि‍ करै छह जे कुशि‍यारो रसकेँ मि‍सरी बनाइये कऽ छोड़बहक। मि‍सर लाल-    अच्‍छा हुनडे भेल। अखन धरि‍ सात बेटी बला सत बेटि‍या नाओं ग्रहण कऽ नेने छलौं। रत्नाकर-       पछाति‍? मि‍सर लाल-    (जेना बि‍ढ़नी कटलापर छटपटाहि‍ होइत) एह भाय सहाएब, की कहब। (दुनू हाथ माथपर लैत) भोरे-भोर एकटा एकरंगा आएल। भजन लाल-    के रहए? मि‍सर लाल-    कहलक जे घर तँ अही इलाका अछि‍ मुदा कामाख्‍या सीख छी। हमहूँ एक बेर कामाख्‍या गेल छी। रूपैया हाथे महरानीक दर्शन होइ छै ओतए। रत्नाकर-       आगू बढ़ू। मि‍सर लाल-    भाय सहाएब, सबा सए रूपैयाक रसीद काटि‍ हाथमे थमहा देलन्‍हि‍‍‍। हाथमे एकोटा पाइ नै। बि‍नु खेवाक यात्री जकाँ घटवार लग वि‍नती केलौं। गणेश-        (झोकमे) कि‍ वि‍नती केलौं? मि‍सर लाल-    कहलि‍यनि‍, बाबा महराज, बेटीक मारि‍सँ मरि‍ गेल छी केना अहाँकेँ खुश कऽ कऽ दरबज्जापरसँ वि‍दा करब। गणेश-        तखन कि‍ भेलह? मि‍सर लाल-    ओ जेना बूझि‍ गेला। लगले आँखि‍-ताँखि‍ उनटबैत-पुनटबैत कहलन्‍हि‍‍। जते तोरा बेटी छह तते तोरा एक्केबेर बेटा देबह, बाजह मंजूर छह? गणेश-        पछाति‍ कि‍ केलह? मि‍सर लाल-    मन पघि‍ल कऽ राँग-राँग भऽ गेल। मुदा घरवाली धरि‍ कहि‍ देलक जे ई ठकहरबा छी। गणेश-        पछाति‍ कि‍ भेलह? मि‍सर लाल-    जे तकदीरमे लि‍खि‍ देने छेलि‍ऐ, से भेल। गणेश-        हमहीं लि‍खि‍ देने छेलि‍यह। मि‍सर लाल-    सभ दि‍न भागवत बचै छी अहाँ आ नाओं लगेबे दोसरकेँ। भजन लाल-    उत्‍सव शुरू होइक समए करीब आबि‍ गेल। जाबे तैयार हएब ताबे समैओ आबि‍ जाएत। पटाक्षेप। तेसर दृश्‍य (मंच। सतरंजी-जाजीमक ऊपर मसलन। रत्नाकर, भजन लाल, मोजे लाल, मि‍सर लाल, रमण लाल, गणेश, सुरेश, सभ बैस उत्‍सवक चर्च करैक वि‍चार करि‍ते रहथि‍ आकि‍ बर्वरीक प्रवेश।) बर्वरी-        (मंचपर ठाढ़ भऽ) भाय-लोकनि‍, ई बात बि‍ल्‍कुल झूठ छी जे जइपर बि‍सवास करब से फल भेटबे करत? (बीचमे गणेश ठाढ़ भऽ) गणेश-        (खि‍सि‍या कऽ) ईह, बूड़ि‍ कहीं कऽ, हि‍नका कतौ खच्‍चरपन्नीक गर नै लगलन्‍हि‍‍‍ तँ हहाएल-फुहाएल एतै चल एलथि‍। बर्वरी-        हाथीक बगए बना लेलह तँ की बूझि‍ पड़ै छह जे हम बड़ बुतगर छी। तोहँए ने ओइ दि‍नसँ मंचपर कहैत एलह जे जेकरा मनमे जेहेन बि‍सवास रहत ओ ओहन फल खाएत। बड़ मने-मन फल खेनि‍हार भेला अछि‍! बूड़ि‍ कहीं कऽ!! गणेश-        मुँह समेटि‍ कऽ बाजह जे कहलि‍ऐ से कहि‍ते रहबै। से तहि‍यो कहलि‍ऐ आ अखनो कहै छि‍ऐ। बर्वरी-        पहि‍ने एकटा बात कहि‍ दाए जे केकरो हाइ-ब्‍लड-पेसर होइ छै आ केकरो लो-ब्‍लड-पेसर होइ छै, दुनूक एक्के कारण हेतै। तोरे सनक पट्टा पेटबला ने एक्के कहतै। गणेश-        (शर्टक बहुँआँ समटैत) तखन फरि‍छाइये लैह। (भजन लाल गणेशकेँ पकड़ि‍ बैसौलक। मुदा बर्वरी बड़वड़ाइत रहल..) बर्वरी-        जेकरा बीत-बीत भरि‍क हाथ-पएर छै आ पट्टा सन पेट आ हाथी सन मुँह रखने अछि‍, से केना भऽ गेलै आ अपन पेट काटि‍...। भजन लाल-    (बर्वरीक दुनू हाथ पकड़ैत) वि‍धि‍वत उत्‍सवक श्रीगणेश हुअ दहक। रत्नाकर-       आश्वासन दहुन? भजन लाल-    वि‍धि‍वत उद्घाटनक पछाति‍ पहि‍ल वक्ता अहाँ हएब। बर्वरी-        (वि‍स्‍मि‍त होइत) जइ बातक बि‍सवास पुस-पुसतानि‍सँ करैत एलौं, अखन धरि‍ कहाँ भेल! (ललकि‍ कऽ) आइ हम ओइ भवि‍ष्‍यवक्‍ता लोकनि‍सँ पुछै छि‍यनि‍, कि‍अए ने भेल? रत्नाकर-       (हाथक इशारा दैत) हमरा लग आउ। कि‍यो ने सुनताह तँ हम सुनब। जोरसँ बाजऽ अबैए ि‍कने? (रत्नाकरक बात सुनि‍ बर्वरी सहमि‍ गेल।) बर्वरी-        जोरसँ बाजब धि‍या-पुताक खेल छी। (तइ बीच, एक गोटे गि‍लासमे पानि‍, एक गोटे लड्डू नेने गणेशक आगू पहुँच गेल।) गणेश-        (खि‍सि‍या कऽ) ऐ पानि‍ आ लड्डूसँ थोड़े मन थीर हएत। तेहेन छुछुनरि‍ ने बाट कटलक जे...। बर्वरी-        ईह, बूड़ि‍ कहीं कऽ, गोलका लड्डू देखि‍-देखि‍ सनकी केहेन चढ़ल जाइ छन्‍हि‍। (कार्यक्रमक प्रारंम्‍भ। अध्‍यक्षक प्रस्‍ताव। बहुसंख्‍यक समर्थक।) अध्‍यक्ष-       स-बन्‍धु–बान्‍धब, छि‍ड़ि‍आएल दुनि‍याँ एक मंच छी। जे कि‍यो ऐ धरतीपर जन्‍म लेलौं, सबहक अधि‍कार बनैत अछि‍ जे ऐ मंचपर सबमानि‍त कलाकार बनि‍ अपन अधि‍कारक रक्‍छाक संग शान्‍त भऽ शान्‍ति‍सँ शक्‍ति‍ भरि‍ दोसरोक जि‍नगीकेँ तकति‍यान करबै? तइले वक्‍ताक बजला पछाति‍ प्रश्नो ने पुछब उचि‍त हएत। बर्वरी-        नै अध्‍यक्ष महोदय, अखन धरि‍क मंचक मंचन जे ऐ तरहेँ होइत आएल अछि‍ जे श्रीमान्, श्रीमती करैत-करैत कार्यक्रमक समैये समाप्‍त भऽ जाइए, तँए...। गणेश-        (बैसले-बैसल ओंगरी देखबैत) बीचमे कतएसँ एहेन अकलहूथ चल आएल हौ? बर्वरी-        (दोसर दि‍स घूमि‍ कऽ) हाथीक कपार हि‍नकर आ अकलहूथ हम। बड़का डारि खाइबला मुँह हि‍नकर आ अकलहूथ हम। बूड़ि‍ कहीं कऽ, पहि‍ने अपन बात बाजह जे कोन गामक छह। दुनू हाथसँ दुनू गोटेकेँ शान्‍त करैत अध्‍यक्ष- अध्‍यक्ष-       रत्नाकर भैयाक वि‍चार छन्‍हि‍ जे गामक तेहेन दशा भऽ गेल अछि‍ जे एको दि‍न चैनसँ रहब कठि‍न भऽ गेल अछि‍, तँए एहेन गाममे नहि‍येँ रहब नीक। महेश-        महजालक गीरह बनौने काज नै चलत। कनी सोझरा कऽ कहि‍यौ। भजन लाल-    भाय, सोझराएले तँ अछि‍ जे जेकरा महजालक कोन खोलैक लूरि‍ भऽ जेतै ओ सौंसे महजाल खोलि‍ लेत। बर्वरी-        कार्यक्रम शुरू होइसँ पहि‍ने आश्वासन भेटल छल जे पहि‍ल वक्‍ता अहाँ हएब। तइ बीच अहाँ सभ ओझरी लगा समए ससारए चाहै छी, से नै चलत। गणेश-        बजाओल आएल छह आकि‍ बि‍नु बजाओल हौ? बर्वरी-        से तोरा पुछैक कोन दरकार छह। हकरि‍याकेँ पुछहक जे केना आएल छी। गणेश-        (माथपर हाथ मारैत) जेकरा जे मन फूड़ै छै से करैए। आब बुझथुन जे सहरगंजा केहेन होइए। रहड़ि‍या जकाँ दालि‍क बीच राहरि‍ बग-बग करैए कि‍ने। अध्‍यक्ष-       अहूँ बड़ रगड़ी छी गणेश। जानि‍येँ कऽ तँ बुझै छी जे बर्वरी बोनैया जकाँ गमैया लोक छि‍या, एते तँ वि‍चार करए पड़त कि‍ने? मि‍सर लाल-    अनौपचारि‍क ढंगे हमर सबाल पेश भऽ गेल तँए पहि‍ने ओकर ि‍नर्णए भऽ जाए तखन दोसरपर वि‍चार कएल जाए। अध्‍यक्ष-       पहि‍ल आश्वासन मि‍सर लालक छन्‍हि‍। एकर लगले पछाति‍ बर्वरी अहाँकेँ समए भेटत। महेश-        मि‍सर भाय, एकटा बात नै बूझि‍ पेलौं जे बेटी एते भारी बनि‍ केना गेल जे परि‍वारे सभ उजड़ैए? सुरेश-        एकटा बात कहू जे गाममे सभसँ पहिने बि‍आह पद्धति‍पर कुड़हरि‍ के मारलन्‍हि‍‍‍! मि‍सर लाल-    (ओंगरीपर हि‍साब जोड़ैत) ओइ टोलमे फल्लाँ एक लाख बेटा बि‍आहमे लेलक आ फल्लाँ दू लाख आ फल्लाँ पनरह लाख आ फल्लाँ पचास लाख, दू करोड़क गप तँ महि‍ना दि‍न पहि‍ने फल्लाँ केलक। बर्वरी-        मि‍सर लाल भायक प्रश्न समसामयि‍क छन्‍हि‍, जरूर पहि‍ने वि‍चार हेबाक चाही। महेश-        बाउ, बर्वरी, बालु परक अल्हुआ खेती नै बुझू। हँ, तखन वि‍चारणीय प्रश्न जरूर अछि‍। बर्वरी-        आजुक दि‍न जे वि‍चार नै हएत तँ कहि‍या भेलै जे फेर हेतै। महेश-        (रत्नाकर दि‍स इशारा करैत) भाय सहाएब, जखन अपने मौजूद छथि‍, अध्‍यक्षजी आगूमे छथि, तइठाम पहि‍ल ि‍नर्णायक हम केना हएब। सामूहि‍क ि‍नर्णए हेतै। बेसी-सँ-बेसी, खण्‍डन-मण्‍डनमे अपन वि‍चार राखि‍ सकै छी। अध्‍यक्ष-       मि‍सर भाय, अहाँक प्रश्नपर कि‍छु आरो वि‍चारक खगता रहि गेल अछि‍, से भेला पछाति‍ जबाव भेटत। बर्वरी-        अध्‍यक्षजी, पछि‍ला बैसारमे हम नै रही, हमरा कि‍छु ने बूझल अछि‍, हम केना अपन वि‍चार राखब। अध्‍यक्ष-       बर्वरी, संक्षेपमे पछि‍ला सुना देल जाएत। बर्वरी-        जे बि‍न्‍दु वि‍चार करैले रहि‍ गेल, बि‍नु बुझने तइ सम्‍बन्‍धमे कथी‍ सोचब। हरबड़ी बि‍आह‍ कनपटी सि‍नूर हएत, जहि‍यासँ शुरू भेल, तहि‍येसँ लोक रस्‍ते-पेरे घटकैती करए लगल। अध्‍यक्ष-       वि‍चारणीय प्रश्न अछि‍, जइ समाजमे कर्म-धर्म रूपमे छल, ओइ समाजमे कर्मक स्‍थान धन केना लऽ लेलक। प्रति‍ष्‍ठा प्राप्‍त करबाक जे कसौटी छल, तइठाम बि‍आहमे दहेजक आगमन केना प्रति‍ष्‍ठा बनि‍ स्‍थापि‍त भेल। बर्वरी-        एकटा प्रश्न हमरो अछि‍? गणेश-        जेकरा जे मन फुड़तै से बाजि‍ देत, दरबारक बैसककेँ रण्‍डीखाना बना देत? बर्बरी-        (बौहुँआँ समटैत) हौ गणेश, जइ धरतीपर प्रकृति‍ पुरुष-नारीक संयोग सथापि‍त कऽ सृष्‍टि‍क दि‍शा पौलन्‍हि‍‍‍, तइ संग छेड़-छाड़ कतए सँ शुरू भेल? भजन लाल-    देखू अनेरे अहाँ दुनू गोरे बखेरा ठाढ़ करै छी, एके भगवान भूखल-पेट आ भरल पेटमे बँटाएल छथि‍। गणेशजी केँ ईहो नै पता छन्‍हि‍ जे थारी-थारी मोती-चूरक गोलका लड्डू, तहूमे आब मनही सेहो बनए लागल अछि‍ से तँ राता-राती सठि‍ जाइ छन्‍हि‍ जे प्रात भने टटके चाही। अध्‍यक्ष-       एना जे इनारेमे भाँग घोड़ि‍ देबे भजन भाय, तखन तँ भेल। भजन लाल-    भाय, अपने अध्‍यक्ष छि‍ऐ, हम तँए छगुन्‍तामे पड़ल छी जे अखन तक ईहो नै बूझि‍ पेलौं जे के सुतले सूतल सूर-ताल मि‍ला भजैए आ के बोनैया नढ़ि‍या जकाँ बोनेमे भजैए। अध्‍यक्ष-       सभ प्रश्न वि‍चारणीय अछि‍। बैसारकेँ ताधरि‍ बढाओल जाएत जाधरि‍ सबहक ि‍वचार नै हेतै। चाह-पानक समए भऽ गेल। रत्नाकर भाय, अगि‍ला सत्रक आवाहन करताह। रत्नाकर-       जहि‍ना माटि‍-पानि‍ मि‍लि‍ ई दुनि‍याँ ठाढ़ केने अछि‍, देखते छि‍ऐ कतौ माटि‍ बेसी तँ केतौ पानि‍ बेसी। मुदा तइ संग ईहो अछि‍ जे माटि‍क सतहे-सतह सेहो पानि‍ मि‍लल अछि‍ आ कतौ पानि‍क समुद्रकेँ अपना छातीपर रखने सेहो अछि‍। बर्वरी-        भाय सहाएब, केना-केना परत बनल छै से कनी फरि‍छा दि‍औ नै तँ देव बनत कि‍ पाथर आकि‍ पाथरेक देब, ई कठि‍न भऽ जाएत। रत्नाकर-       अहाँ अपन प्रस्‍ताव दि‍औ? बर्वरी-        जहि‍या बेटा भेल रहए तहि‍या तते खुशी भेल जे दशरथे जकाँ हुअ लगल जे सभ कि‍छु बाँटि‍ दि‍ऐ। मुदा...। गणेश-        एना घोंच-घोंचा लगा बाजब, तँ हम उठि‍ कऽ चलि‍ जाएब। बर्वरी-        कतए जाएब औतै ने महाभारतक सौवा श्‍लोकपर? ओतए तक रबाड़ि‍ कऽ जाएब। हँ भाय-सहाएब, कहै छलौं, ओही घुमशाहीमे एकटा पंडा एला। बच्‍चोक हाथ देखलन्‍हि‍ आ अपनो दुनू परानीक। सुरेश-        कनी असथि‍रसँ बाजू जे कि‍ कहलन्‍हि‍ ओ पंडा? बर्वरी-        (वि‍ह्वल होइत) ओ तँ मनेमे सड़ैए। जइ बेटाक खाति‍र एतै केलौं, कतए गेल ओ सेवा? भाय सहाएब कते कहब। जइ बेटा पाछू पमरि‍या, हि‍जरा, बकुनि‍याँ..., कि‍-कि‍ ने नचेलौं, कते कबुला-पाती आ कि‍-कि‍ ने केलौं...। (बजैत-बजैत कानए लगैत) आइ ओ अबंड, महा अबंड, ि‍दन-राति‍ शि‍खर-पान, ताड़ी-दारू कि‍-ि‍क ने खाइए आ करैए। हमर बुढ़ाड़ी केना कटत? रत्नाकर-             अखन खाइ-पीबैक समए भऽ गेल। काल्हि‍ रहलै काल्हि‍ आरो बेसी गप-सप हेतै। पटाक्षेप। चारि‍म दृश्‍य- (बैरक डरि‍सँ सजल। वन सदृश मंच। शबरीक घर। मुसहरनीक बगएमे शबरी। बाढ़नि‍सँ आंगन बहारि‍, बाढ़नि‍ राखि‍ एकटा बर्तनसँ चाउर नि‍कालि‍ सूपमे लऽ शबरी आँकर बीछैत।) शबरी-        केहेन जुग-जमाना आबि‍ गेल, एक तँ महगक चाउर कीन कऽ लाउ, तइमे तते उजड़ा पत्‍थरबला आँकर रहै छै जे एको कौर घोटब पहाड़ भऽ जाइ छै। (गणेश आ भजन लालक प्रवेश। एक भाग शबरी अपना आंगनमे सूपक चाउरमे आँकर बीछैत। दोसर दि‍स गणेश-भजनलाल) गणेश-        भजन भाय, अहीं कहू जे बड़बड़ि‍या जे लप-लप बजै छलए से उचि‍त भेल? भजन लाल-    गणेश भाय, की उचि‍त आ की अनुचि‍त! से ऐ दुनि‍याँमे ताकब कठि‍न अछि‍। तँए अनेरे अहूँ कि‍अए मत्‍थापचीमे लागल छी, जखन-जहि‍या जे भेल ओ तँ भूतक गर्भमे चलि‍ गेल, तइले अनेरे...। गणेश-        नै भजन भाय, आदमीकेँ अपनो सीमा-सड़हद, आड़ि‍-धूरक होश रहबाक चाही, जँ से नै भेल तखन ओ मनुक्‍ख केना भेल। भजन लाल-    गणेश भाय, कि‍ करबै, जँ कि‍यो अपना महींसकेँ कुरहैरि‍येसँ नाथत तेकर सुख-दुख तेकरे हेतै ने। तइले अनका कि‍? गणेश-        कहलौं तँ बड़ सनगर बात मुदा जँ मनुष्‍य सएह बूझि‍ दोसरसँ सम्‍बन्‍ध हटबए लगत तखन दुनि‍याँमे रहि‍ये कथी जाएत। भजन लाल-    गणेश भाय, जहि‍ना पोखरि‍-धार, समुद्र पानि‍क भंडार छी मुदा ओहूमे कि‍ सगतरि‍ एके रंग पानि‍ रहै छै। तहि‍ना ने मनुक्‍खोक बीच छै। (तइ बीच बर्वरीक प्रवेश। बर्वरीकेँ देखि‍ते गणेश बजैए) गणेश-        भजन भाय, जाधरि‍ ई दुनि‍याँ रहत ताधरि‍ अपना सबहक सम्‍बन्‍ध अहि‍ना बनले रहत। देखते तँ छि‍ऐ जे एक्के भगवानक हजार नाओं अछि‍। जेकरा जे मन फुड़ै छै से कहै छै। तइले भगवानकेँ कि‍ बि‍गड़लन्‍हि‍। बर्वरी-        गणेश बाबू, अपन बात बूझल अछि‍ जे अनका कहै छि‍ऐ? भजन लाल-    बर्वरी, जँ तात्वि‍क दृष्‍टि‍सँ गप-सप्‍प करी तँ यएह धरती स्‍वर्गोसँ ऊपर उठि‍ सतलोक, वैकुण्‍ठ, सूर-लोक बनि‍ सकैए आ ओहनो बनि‍ सकैए जे नर्क, धोर नर्क, वेश्‍यालय इत्‍यादि‍ सेहो बनि‍ जाइत अछि‍। तँए...। गणेश-        बर्वरी, सुनू अहाँसँ कोनो देहा-देही दुश्‍मनी नै अछि‍। मुदा भवि‍ष्‍यक लेल नीक हएत, जे पछि‍ला सभ कि‍छु जानि‍, अाड़ि‍ बान्‍हि‍ भवि‍ष्‍य दि‍स संगे-संग चली। भजन लाल-    तखन, पछि‍ला फरि‍च्‍छोट कइये लि‍अ। मुदा फरि‍च्‍छोट हएत केना गणेश भाय। अहीं कहू जे सोरहा बि‍आन करैबला मूस केना हाथी सनक देहक सवारी भेल। तालमेल केना बैसाएब। बर्वरी-        अहाँ तँ भजन भाय अनेरे बौआइ छी। हि‍नका पुछि‍यनु जे कतौ अहाँकेँ महादेवक बेटा लोक बुझैए आ कतौ अहाँक पूजा महादेव पार्वतीक बि‍आहमे होइए। भजन लाल-    बर्वरी भाय, गणेश भाइक कान हाथीक कान छि‍यनि‍, बड़का कोठामे जहि‍ना कनि‍योँ जोरसँ बजलापर गनगना उठै छै तहि‍ना कानमे झड़ पड़ए लगै छन्‍हि‍। तँए जे कि‍छु बजैक हुअए कम जोरसँ बाजू। गणेश-        अच्‍छा छोड़ि‍ दइ छि‍ऐ। एक तँ गमैआ लोक भेल दोसर कहुना भेल तँ बाले-बोध भेल कि‍ने। बर्वरी-        गणेश भाय, जे कि‍छु जोरसँ बजलौं ओ आवेशमे बजा गेल। अहाँ सन आवेशीकेँ जँ आवेश नै करी तँ केकर करी। भजन लाल-    (ओंगरीसँ देखबैत) गणेश भाय, ई बोन कथीक छि‍ऐ? गणेश-        बोन तँ बोन छि‍ऐ। तइमे तोहर की‍ कहब छह? भजन लाल-    बैरक बोन छि‍ऐ। लगसँ देखलापर बूझि‍ पड़त जे एकरा तोड़ैमे कते भीर होइ छै। तहूमे नमहर गाछमे। गणेश-        बर्वरी बाउ, सुनू। पहि‍ने ई कहू जे बेलक कते गाछ लगौने छी। बर्वरी-        (मजबुरीक अवस्‍थामे) भाय-सहाएब, अपना गाछी-बि‍रछी लगाएब से जगहो रहए तब ने। भजन लाल-    गणेश भाय, सवाल बहकि‍ गेल फलपर-सँ-माटि‍पर चलि‍ एलौं। पहि‍ने फलक बात फड़ि‍छा लि‍अ तखन आगू बढ़ब। गणेश-        भजन भाय, मि‍थि‍लांचलक हस्‍त–रेखा बेलक संग मेटाएल जा रहल अछि‍। बर्वरी-        अहाँकेँ एते दया कि‍अए लगैए, बेलपाते ने जाएत फूल-अच्‍छत तँ रहबे करत? गणेश-        नीक सुझाओ देलौं बर्वरी। बेल सन फलक महात्‍म्‍य गबै-बजबैले ने अखबारबलाकेँ समै छै आ ने रेडि‍यो स्‍टेशनकेँ। वैज्ञानि‍क लोकनि‍ सहजे वैज्ञानि‍के छथि‍, रौकेटसँ नि‍च्‍चा देखबे ने करै छथि‍। जे बेल, दुनि‍याँक उच्‍च कोटि‍क फलमे अग्रि‍म स्‍थान रखनि‍हार छी, ओकर कि‍ स्‍थि‍ति‍ अछि‍...। (बजैत-बजैत गणेश आँखि‍ मूनि‍ लेलन्‍हि‍।) बर्वरी-        गणेशजी, अलि‍सा रहला अछि‍। कतौ ठौर घड़ू। (चारो दि‍स, दुनू गोरे -बर्वरीओ आ भजन लालो- तकैत) भजन लाल-    गणेश भाय, एकटा खोपड़ी आगू देखै छी, चलू ओहीठाम आरामो करब आ गपो-सप्‍प हेतै। (तीनू आगू बढ़ैत...) भजन लाल-    मायराम, हम सब कि‍छु समए वि‍श्राम करब। तइले जगह भेटितए? शबरी-        (वि‍स्‍मि‍त होइत) अहाँ सभ के छी, कतऽसँ एलौं। गणेश-        अभ्‍यागत छी, गाम-ठेकानक कोन जरूरत अछि‍। शबरी-        अभि‍यागती नै धाड़ैए। गणेश-        कि‍अए? शबरी-        सैह नै बूझि‍ पाबि‍ रहल छी। गणेश-        हाथ बढ़ाउ, हस्‍त रेखा देखए दि‍अ। शबरी-        जारन काटैमे टेंगारीक बेंट सभटा हस्‍त–रेखा चाटि‍ गेल तखन कि‍ देखबै। गणेश-        मुहेँसँ कहू? शबरी-        हमर पानि‍ छुबाएल अछि‍, हमर सि‍द्ध अन्न छुबाएल अछि‍, हमर-घर-आंगन छुबाएल अछि‍। छुबाएल अछि‍ इनार-पोखरि‍ आ चापाकल। गणेश-        ठहरू, अपन इनार-पोखरि‍ छुबाएल अछि‍ आकि‍ छुबाएल अछि‍ समाजक इनार-पोखरि‍। शबरी-        सभटा छुबाएल अछि‍। अपन छुबाएल अछि‍ एना जे आन-आन पानि‍ नै पीबै छथि‍, समाजक छुबाएल अछि‍ एना जे या तँ घाट फुटा देल गेल अछि‍ वा आगू-पाछूक प्रक्रि‍या अछि‍। गणेश-        भजन भाय, अहाँ गुबदी मारि‍ घी पीबए चाहै छी। हमर छाती छि‍ड़ि‍आएल जाइए आ अहाँ अनठौने छी। भजन भाय-     सभ तँ सुनि‍ते छी, तखन अपनेकेँ शंका कि‍अए भेल? गणेश-        एकटा बातक वि‍चार दि‍अ तँ...। भजन लाल-    कथी‍? गणेश-        जइठाम अन्ने-पानि‍ छुबा जेतै, तइठाम अति‍थि‍ सेवा लोक केना करत? जँ अति‍थे सेवा नै करत तँ मि‍थि‍लाक धरोहर की छी? भजन लाल-    गणेश भाय, अहूँ बड़ औगताह छी, लगले खि‍सि‍या जाइ छि‍ऐ। अहि‍ना अहाँ व्‍यासजीकेँ कहने रहि‍यनि‍ जे जखने अहाँक मुँह बन्न हएत तखने कलम रखि‍ चलि‍ जाएब। गणेश-        ऐमे हमर गल्‍ती कि‍ भेल? भजन लाल-    जहि‍ना सभ अपन गल्‍तीकेँ चलाकी कहै छै तहि‍ना अहूँ कहै छि‍ऐ। गणेश-        से कि‍ यौ? भजन लाल-    जँ अहाँ अधडरेड़ेपर लि‍खब छोड़ि‍ चलि‍ जैति‍ऐ तखन महाभारत केना लि‍खाइत? गणेश-        उपाए? भजन लाल-    अइले हमरा दुखे ने होइए आ अहाँ कि‍अए चि‍न्‍ता करै छी। गणेश-        केना ि‍चन्‍ता मेटाएत? भजन लाल-    दूटा प्रश्नक जबाव हम देब। बर्वरी अहूँ सभ बात सुनलि‍ऐ। पहि‍ने अहाँ अपन ि‍वचार दि‍अ। बर्वरी-        पूर्वाग्रहसँ हम ग्रसि‍त छी। गणेश देवता छथि‍ हि‍नका लग केना कोन बातकेँ घटी-बढी हएत। भजन लाल-    गणेश भाय, अहाँ नाशी पुरुष नै छी जे नाश हएब मुदा आध्‍यात्‍मि‍क चि‍न्‍तनक जे बानर-बाट अछि‍ तइसँ चि‍न्‍ति‍त भऽ जाइ छी। गणेश-        कहलौं तँ बेस बात, मुदा...। भजन लाल-    मुदा-तुदा कि‍छु नै। हमरा एहेन दशा लोक करैए जे गुड़क मारि‍ धोकरे जनै छी। बरहमासा कहि‍ छमासा बना दइए, परातीकेँ साँझ आ साँझकेँ पराती बना दइए तइले दुखे ने होइए आ अहाँ एतबेमे हदि‍आइ छी। ऊपर मुड़ि‍ये अछि‍ आ‍ नि‍च्‍चाँ पेटे, तँ छाती रहत कतऽ सँ। (रत्नाकरक प्रवेश) रत्नाकर अबि‍ते शबरीपर नजरि‍ देलन्‍हि‍। जहि‍ना शि‍कारी अपन शि‍कार देखि‍ नजरि‍ दैत अछि‍। अजगर साँपक आँखि‍पर पड़ि‍ते जहि‍ना आकर्षित भऽ जाइत तहि‍ना सबरीक नजरि‍।) रत्नाकर-       (बड़बड़ाइत-हाथक इशारा, जहि‍ना तीर चलैत) ई शबरी, कुरुपक रानी, बंधन मुक्‍त शबरी...। शबरी-        (हाथ थड़थराइत, ओंगरी उठा रत्नाकर दि‍स देखबैत) रामक रत्नाकर..., रामक रत्नाकर..., अयोघि‍या...., दशरथ...., दशरथ...., सरजुग नदी.....!! (धीरे-धीरे दुनूक डेग आगू बढ़ैत एकठाम होइते पटाक्षेप।) पटाक्षेप। पाँचम दृश्‍य- (मच। बड़का भायक आगूमे। छोटका तीनटा पाछू। एक रत्नाकरक आगू, दोसर गणेश आ तेसर भजन लालक आगू। रत्नाकर बीचमे, बामा भाग- भजन लाल, बर्वरी, मि‍सर लाल, मोजे लाल, दहि‍ना भाग गणेश, महेश आ सुरेश।) अध्‍यक्ष-       उत्‍सवक अंति‍म पहरमे पहुँच गेल छी। राति‍क अंत दि‍नक शुरूआतक समए उदीयमान अछि‍। आइ अंति‍म दि‍नक अंति‍म बैसार छी। ऐमे तीन बि‍न्‍दुपर वि‍चार-वि‍मर्शक संग समापन हएत। सभसँ पहि‍ने मान्‍यवर रत्नाकर भायसँ आग्रह जे बैसारक सम्‍बन्‍धमे अपन वि‍चार राखथि‍। आगूक सुझाउ सेहो रखताह। (सभ थोपड़ी बजबैत अछि‍) बर्वरी-        गणेश भाय, आब कहू मन केहेन लगैए? अध्‍यक्ष-       बड्ड बूड़ि‍ लेकि‍न अहूँ छी बर्वरी। बर्वरी-        से केना? अध्‍यक्ष-       एक तँ अहूँ बूड़ि‍ छी, तइपर अपना लागल हमरो बनबए चाहै छी। आबो चुप रहू। बर्वरी-        अँइ यौ अध्‍यक्ष भाय, बच्‍चेसँ सभ थोपड़ी बजा भजन करैत आएल छी, ततबे नै गुरुओजी वि‍द्यालयमे हाथमे माटि‍क ढेप लऽ लि‍खनाइयो सि‍खौलन्‍हि‍‍ आ जोर-जोरसँ पढ़नाइयो। ओ अभ्‍यास अखनो धरि‍ अछि‍ये, तइमे बूड़ि‍पन कि‍ भेल? भजन लाल-    एक तँ हम अपने बूड़ी छी जे सुखेलहाक माने नै बूझि‍ सभकेँ बड़-बढ़ि‍या कहि‍ दइ छि‍ऐ, तइपर तहूँ कम नहि‍येँ छह। कि‍अए गणेश भायकेँ टोकै छुहुन। अखन मंचपर सभ छथि‍ये। गणेश-        बड़बड़ि‍या आम जकाँ हवा सि‍हकि‍ते भरभरा जाइए, (बहुँआ समटैत) तँए आइ ओकरा मरदसँ भेँट हेतै। अध्‍यक्ष-       गणेशजी, अपने सभ गणक ईष छि‍ऐ। बर्वरीक मुँह बन्न कऽ दि‍औ। अपन गुर-चाउर खाइत रहत, अपना सभ बैसारक कार्यक्रम दि‍स बढ़ब। गणेश-        बौआ बर्वरी, तों कि‍अए एना बजै छह, से हमहूँ बुझै छी। एक दि‍स पावनि‍क उपासक फलहार अल्हुआ-सुथनीसँ होइत अछि‍ तँ दोसर दि‍स सेव-अंगूरसँ। तों जे कहै छह से तँ लोक हमरा अपने नाचक लेबड़ा बना नचबैए। बर्वरी-        (दुनू हाथ जोड़ि‍ कऽ) भाय, कहल-सुनल सभ माफ कऽ ि‍दअ। गणेश-        अबैत-जाइत रहि‍हह। हमर घर कि‍ कतौ हराएल अछि‍। मूसोकेँ कहबहक तँ पहुँचा देतह। बर्वरी-        केना बुझबै जे राजक मूस छी आकि‍ मुसरी-टुसरी वंशक झरहा? रत्नाकर-       बर्वरी, ई अखण्‍ड वि‍चारक मंच छी। तेकरा मर्यादि‍त करू। अध्‍यक्ष-       हाथमे तँ मैक भाय सहाएबकेँ छन्‍हि‍येँ...। रत्नाकर-       अखन धरि‍क वि‍चार-ि‍वमर्शसँ सूर्य वंशीय हरि‍श्चन्‍द्रक वंशक बदलाव दशरथ लग आबि‍ गेलन्‍हि‍‍...। (तइ बीच एक भाग सुग्रीव आ हनुमान, दोसर दि‍स हरेलही आ बि‍सरलीही महि‍लाक प्रवेश। नव लोकक प्रवेशसँ रत्नाकर चुप भऽ गेलाह।) सुग्रीव-        हमर कि‍छु अर्ज अछि‍। रत्नाकर-       ताबे हम बैसै छी, हि‍नकर अर्जीपर वि‍चार करि‍अनु। आइ समापन छी तँए समापनक अंति‍मो समए धरि‍ जँ कोनो अर्ज पहुँचैए तँ ओकर अपन अधि‍कार बनै छै। अध्‍यक्ष-       गणेशजी आ भजन लाल, दुनू गोटे अपनामे वि‍चारि‍ लि‍अ जे काजक संचालन केना करब? बर्वरी-        भाय, हमरा मनक खुट-खुट्टी ताबे धरि‍ नै मेटाएत जाबे अपना लेल हम उत्‍सवक महत नै बूझब। भजन लाल-    बर्वरी, तहूँ बड़ फुलौड़ी-ति‍लौड़ी जकाँ चि‍रौड़ी करै छेँ- बड़बड़ि‍या। बाज जल्‍दी। बर्वरी-        भाय, अहाँ बि‍गड़ि‍ जाइ छी। खुटखुट्टी अछि‍ जे हरि‍श्चन्‍द्र सभ कि‍छु दान कऽ देलखि‍न। केकरा लेल? भजन लाल-    अध्‍यक्षजी, बर्वरीक प्रश्नपर आगू वि‍चार हएत। अध्‍यक्ष-       आगत लोकनि‍, चाह-पान भेलै। आब अपने लोकनि‍क आगमनपर वि‍चार कएल जाएत। क्रमश: अपन-अपन दुखरा रक्‍खू। सुग्रीव-        बजलोरी हमर पत्नी कब्‍जा कऽ लेल गेल छथि‍...। गणेश-        वि‍चारणीय प्रश्न अछि‍। बर्वरी-        बि‍ना सुनने केना बुझबै जे वि‍चारबै। अहाँकेँ हाथी सन कान अछि‍ कि‍म्‍हरो-ने-कि‍म्‍हरोसँ सुनियेँ जेबै मुदा हमरा सन-सन गुजि‍एलहा कानमे फड़ केना लगतै। भजन लाल-    गणेश भाय, अहूँ जेहने झगड़ी छी तेहने रगड़ी। रि‍धि‍-सि‍धि‍ लि‍खैक अधि‍कार अछि‍ अहाँकेँ आ छुच्‍छे मुहेँ बाजि‍ दि‍ऐ हम सभ। गणेश-        सुग्रीवक प्रश्न छन्‍हि‍ पत्नीक हरण। मुदा हरण आकि‍ हराएल ई तँ बीचमे अछि‍ये। से केना बुझबै? पछाति‍ बुझैत रहबै। जेहेन खगता बुझौनि‍हारकेँ हेतनि‍ तेहेन काज हेतनि‍। भजन लाल-    ठीके गणेश भाय, अहूँ मोका-मोकी नै बुझै ि‍छऐ, अनेरे सोरैहि‍या सवारी बना नेने छी। गणेश-        भजन भाय, कतौ कि‍छु होउ, अपना सबहक संग-साथ थोड़े छुटत। भजन लाल-    जाबे अहाँ रहब, हमरा भजै पड़त। संगी तँ रहबे करब। गणेश-        देखि‍यौ भजन भाय, गणना कहै छै धन, जन, मन नै जानि‍ कते रंगक बनल छै। आब कोन बलजोरी भेल से बि‍ना गणना केने हेतै। अध्‍यक्ष-       बड़बढ़ि‍या, अगि‍ला बैसार धरि‍ ऐ प्रश्नकेँ वि‍चारणीय राखल जाइत अछि‍। गणेश-        अँए हौ हनुमान, तहूँ सुग्रीवे संग छेलहुन? बर्वरी-        गणेश भाय-सहाएब, अपने कने चुप रहि‍यौ। पहि‍ने एकटा प्रश्न पुछए दि‍अ। भजन लाल-    जल्‍दी बाजब बर्वरी भाय, आकि‍ अहूँ पहि‍ने मुँहमे औंट-पौड़ करै छी। तैयार भइये कऽ तप्पत भोजन कराएब। बर्वरी-        बच्‍चेमे सूर्यकेँ गीर गेलखि‍न, से भेलन्‍हि‍‍ मुदा वि‍पति‍क काल सुझलन्‍हि‍ ने केलन्‍हि‍। अनके भरोसे डारि‍ कऽ बनरा-बनरा बाँझ-बाँझि‍न बनौलखि‍न। अध्‍यक्ष-       दोसर प्रस्‍तावपर ि‍वचार कएल जाए? हरेलही-       हम दुनू सहोदरे बहि‍न छी। बच्‍चेमे हरा गेलौं। संजोगसँ भेँट भेल...। गणेश-        एते लट-पटा कऽ गीरह बान्‍हब से पार लागत, जल्‍दी कि‍अए ने केबाड़ खोलै छी। बि‍सरलि‍ही-     अहींकेँ गणेशजी हम पंच मानै छी, अहीं कहू जे ई कहैए सहोदरे बहि‍न छि‍औ, से मुँह-कान ि‍मलैए। भजन लाल-    गणेश भाय, कनी चश्‍मा लगा लेब। रत्नाकर-       रोग-बि‍याधि‍सँ धरती आक्रान्‍त अछि‍। सभ आक्रान्‍त अछि‍। यएह आक्रान्‍त अंधकार छी। अही लेल प्रकाश चाही। मुदा...। बर्वरी-        मुदा की? रत्नाकर-       देखि‍यौ, अपना ऐठाम जे पावनि‍-ति‍हार होइत आबि‍ रहल अछि‍, ओकर मूल तत्वकेँ तेना ने ओझरा देने अछि‍ जे पार पएब कठि‍न भऽ गेल अछि‍। एकटा उदाहरण- बर्वरी-        (बि‍च्‍चेमे) भाय, कनी सोझरा कऽ कहबै। रत्नाकर-       साले-साल नि‍श्चि‍त मास, नि‍श्चि‍त ति‍थि‍केँ पावनि‍ अबैत अछि‍। गुण-अवगुण-गुणवेत्ता गुणता मुदा कि‍ एकरा नकारल जा सकैए जे पछि‍ला सालक जि‍नगीक नापक नवीकरणक रूपमे सेहो भऽ रहल अछि‍। अपन समर्पण अहाँक नजरि‍। अध्‍यक्षजी...। अध्‍यक्ष-       हँ, हँ, भाय सहाएब...। रत्नाकर-       समापनक जेहन वातावरण रहक चाही से नै रहल। रंग-बि‍रंगक नव-नव समस्‍या आबि‍ गेल अछि‍। अध्‍यक्ष-       एक घंटा लेल बैसार उसारि‍ दइ छी। पटाक्षेप। छठम दृश्‍य- (बैसार शुरू होइत) रत्नाकर-       बैसारक महमही कहैत अछि‍ जे जेना वसंत हुअए। कि‍अए लोक जुआनी जि‍नगी चाहैए, बुढ़ाड़ी कि‍यो पसन्‍द कि‍अए नै करैए। अजीव तँ ई अछि‍ जे बूढ़ सम्मानि‍त शब्‍द छी, मुदा ओल जकाँ लगै कि‍अए छै। बर्वरी-        भाय सहाएब, भाय सहाएब, (ओंगरीक इशारा करैत)..। अध्‍यक्ष-       बर्वरी, जहि‍ना जीवन धार छी तहि‍ना सभ कथूक धार सेहो बहै छै। एके धार पहाड़सँ नि‍कलि‍ समुद्र पहुँचैत-पहुँचैत गामे-गाम नाओं बदलैत पहुँचैए। रत्नाकर-       समाजक प्रवुद्ध लोकनि‍क बैसार छी। तँए अपन पछि‍लाक नीक-बेजाए देखैत आगूक लेल संकल्‍पि‍त होइ। अध्‍यक्ष-       गणेश भाय, पहि‍ने अपनहि‍ अपन वि‍चार दि‍औ। गणेश-        देखू दस-आना, छह-आना जि‍नगीमे बहुत केलौं। जेकर फल भेल कि‍सान घर छोड़ि‍ बनि‍याँ घर गेलौं। मुदा आबो नै चेतब तँ वंश कलंकि‍त हएत। बर्वरी-        कनी सोझरा-सोझरा कहबै गणेश बाबू। मि‍सर लाल-    बड़ बूड़ि‍ छेँ बड़बड़ि‍या तूँ। कनी चुप भऽ कऽ सुनही ने। गणेश-        (वि‍ह्वल होइत) मजाकोसँ नमहर मजाक लोक बना देलक अछि‍। कतौ दूध पीया बोकड़बैत अछि‍ तँ कतौ मोतीचूर लड्डू खुआ। बर्वरी-        खोंइचा कनी मोटगर अछि‍, छील दि‍औ? गणेश-        बाउ बर्वरी, की कहब, तेहेन-तेहेन उकट्ठी सभ भऽ गेल अछि‍ जे घरसँ नि‍कलैकाल भूलि‍ जाइ छि‍ऐ। कतौ वाम-दहि‍न भेने जे दुर्घटना होइ छै तँ ओतैसँ गरियबैत रहैए जे सार गणेशबाक मुँह देखि‍ चलल छलौं। भजन लाल-    (मुड़ी डोलबैत) भाय, दुखरा गौने हेतह। चालनि‍ दुसलक सूपकेँ जेकरा अपने हजारो छेद छै। अनके खचरपनीसँ हमर एहेन गति‍ अछि‍। अध्‍यक्ष-       गणेशजी, सोझ डारि‍ये कि‍अए ने बजै छी जे एना घुमा-फि‍रा दइ छि‍ऐ। गणेश-        सएह ने तारीफ अछि‍, अध्‍यक्षजी हमरामे। (रत्नाकरकेँ मुस्‍की दैते सभ जोरसँ ठहाका मारलक) गणेश-        देखि‍यौ नै तँ सुनि‍यौ, दुनियाँ गोल छै। सोझो डाँढ़ि‍ ति‍रछि‍आ कऽ हटि‍ते टेढ़ भऽ जाइत अछि‍। जइसँ सामने-सामनी नै देखि‍ पड़ैत अछि‍। पटाक्षेप (((समाप्‍त))) ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। जगदानन्द झा ‘मनु’- दूटा विहनि कथा ग्राम पोस्ट – हरिपुर डीहटोल, मधुबनी १.आस्था डोकहर राजराजेश्वर गौरी शंकरक प्राचीन आ प्रशिद्ध मंदिर | मंदिरक मुख्यद्वारकेँ आगू एकगोट अस्सी-पच्चासी बरखक वृद्धा, सोन सन उज्जर केश, शरीरक नामपर हड्डीक ढांचा, डाँर झुकि गेल | मुख्यद्वारक आँगाक धरतीकेँ बाहरनिसँ पएर तक झुकि कए बहारैत | ‘अ’ आ ‘ब’ दुनू परम मित्र, एक दोसरक गुण दोषसँ परिचीत, दुनू संगे मंदिरक आँगासँ कतौसँ कतौ जा रहल छलथि | मंदिरक सोंझाँ अबिते देरी ‘अ’ दुनू हाथ जोड़ि प्रणाम कएलनि | ‘ब’ सेहो तुरंते दुनू हाथ जोड़ि, झुकि कए मोने-मोन स्तुति करैत ओतुका धरतीकेँ छुबि माँथसँ लगा ओहि ठामसँ आगू बिदा भेला | ओतएसँ दस डेग आगू गेलाक बाद ‘ब’, ‘अ’सँ – “हे यौ अहाँ कहियासँ एतेक आस्तिक भऽ गेलहुँ, जे मंदिरक सामने जाइत मातर कल जोड़ि लेलहुँ ओहो हमरासँ पहिले |” आगू आरो चुटकी लैत – “भगवानो देख कए हँसैत हेता जे देखू ई महापातकी आइ आस्तिक भऽ गेल |” ‘अ’ शांतिकेँ तोरैत – “पहिले तँ ई अहाँकेँ के कहि देलक जे हम नास्तिक छी, हमहूँ आस्तिक छी, हमहूँ देवता पितरकेँ मानैत छी परञ्च अहाँक जकाँ पाखण्डी नै छी |  अंतर एतवे अछि जे अहाँ मंदिर मंदिर भगवानकेँ तकैत रहै छी, हम हुनका अपन मोनमे तकैत छी आ अपन करेजामे बसेने छी | आ रहल एखनका गप जे हम मंदिरकेँ सामने हाथ जोड़लहुँ, ओ तँ हम सदिखन अपन मोनमे बसेने हुनका हाथ जोड़ैत रहैत छी मुदा एखुनका हाथ जोड़ब हमर भगवानकेँ नहि, भगवानक ओहि भक्तकेँ छल, ओहि बृद्धाकेँ जिनक बएसकेँ कारने डाँर झुकि गेल रहनि मुदा एतेक अवस्थोमे भगवानक प्रति एतेक अपार श्रधा भक्ति, कतेक प्रेमसँ मंदिरक मुख्यद्वार बहारि रहल छली | हम ओहि भक्तक भक्तिकेँ, हुनक भगवानक प्रति आस्थाकेँ, हुनक बएसकेँ नमन केने रही |” ***** २.तरेगन इजोरिया राति, चन्द्रमाक दूध सन इजोतसँ राइतो दिन जँका बुझाइत | माँझ आँगनमे पटीयापर, अपन बाबीक पाँजरमे सुतलसँ जागि कए तीन बरखक नेना एकटक मेघक तरेगन दिस टकटकी लगोने ताकैत | आँखिक पपनी एकदम स्थीर, उपरकेँ उपर आ निँचाकेँ निँचा, जेना की कोनो हराएल प्रिय वस्तुकेँ ताकि रहल हुए | किछु घड़ीबाद नेनाक बाबीक निन टूटल तँ नेनाकेँ बैसल देख ओहो हरबड़ा कए उठैत, “की बौआ किएक बैसल छ, आ ई मेघमे की देखै छ |” नेना धनसन बाबीक बोल ओकर कान तक तँ जाइ मुदा दिमाग तक नहि जाइ | ओ तरेगन दिस एतेक तन्मयतासँ देखेए जे ध्यान उम्हरे एकाग्र | नेनाक बाबी दुनू हाथसँ नेनाकेँ हिलाबैत, “बौआ की भेल, की देखै छी |” “तरेगन गनैछी |” “किएक |” “काइल्ह सरजू कहलक जे मुइलाबाद लोक तरेगन बनि जाइ छै तैँ हम तरेगन गानि कए देखै छी जे कोन कोन तरेगन बेसी अछि ओहिमे सँ अवस्य एकटा हमर माए हेती |” बाबी, नेनाकेँ दुनू हाथसँ अपन पाँजमे भरैत, “हमर नेना कतेक बुधियार भऽ गेलै, केकरो नजरि नै लगेए | अहाँक माए कोनो आजी गुजी थोरे रहथि जे ओ आजी गुजी तरेगन बनति, ओ देखू ओ—ओ सभसँ बेसी चमचमाइत तरेगन, ओ अहींक माए छथि |" ***** ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। जगदीश प्रसाद मण्‍डल लघुकथा- उलबा चाउर अगहनक पूर्णिमाक दि‍न। काल्हि‍ पूस चढ़त। अधा-अधीपर जाड़ आऔत। महि‍ना दि‍नक पछाति‍ पूर्णिमा आऔत। संक्रान्‍ति‍केँ पूर्णिमासँ कोनो सरोकार नै छै। सरोकारो केना रहतै, एकटा दि‍नक हि‍साबे चलै छै दोसर मासक हि‍साबे। ओना  दुनू दि‍न-राति‍ संगे चलै छै, संगे रहै छै मुदा कखन के अगुआ जाइ छै आकि‍ पछुआ जाइ छै से ओ जानए। मुदा आब अगहनुआँ जाड़ थोड़े रहल, तहूमे ऐबेरक अगहनमे तेहेन शीतलहरी भेल जे माघोक कान काटए लगल। जहि‍ना कोनो खेल आकि‍ काजमे हानि‍-लाभ संगे चलै छै मुदा के कखन अगुआइ छै आ के कखन पछुआ जाइ छै से जानब सबहक काज थोड़े छी। जँ से रहैत तँ एके भैयारीमे कि‍यो बर-बेमारीक तर पड़ि‍ तरोटा बनि‍ जाइ छै आ कि‍यो बेटाक दहेज लऽ कऽ उपरोटा बनि‍ जाइ छै। एक कील रहने कि‍ हेतै। तरोटा ने सधाएल रहत उपरौटा तँ छुट्टे रहत। तहि‍ना जाड़ोक भेल। अगहनक शीतलहरी, समैसँ पूर्वहि‍ माघकेँ बजा अनलक। पूस तँ बि‍चहि‍मे रहि‍ गेल। अगहन-माघकेँ भेँट भेने पूस हरा गेल। कि‍एक तँ जहि‍ना गोटे-गोटे गाइयो महींसकेँ आ मनुखोकेँ समए पूर्वहि‍ जुआनीक सभ वयकरन अपने आबि‍ जाइ छै तहि‍ना जाड़ोक भेल। पल-पल ओस पला पाला बनबै करत। लतड़ि‍-लतड़ि‍ गोरा रोपि‍ लतड़बे करत। अनुकूल अवसरो भेटलै। कश्मीरी वर्फ-वारी संगबे भऽ गेलै। समैसँ पूर्व भेनौं आम जकाँ ने कोलि‍-फट्टू भेल ने रस-फट्टू आ चोकरेबो नहि‍येँ कएल। मुदा एते तँ भेबे कएल जे पछि‍या अगते पकड़ने ओसो मोटा-मोटा पाला बनि‍ पलड़बे‍ करत। जे हवा संग चलैत छल ओ ओसक बून बनि‍ टप-टप नाकपर होइत खसबे करत। मेघौन नै रहि‍तो सूर्य तेना झपाएल रहैत जे दि‍नो राति‍ये जकाँ भऽ गेल। भरि‍सक दशतारक ने तँ छी!! जाड़क बैसारी भेने घूरोक चलती आएल आ गपो-शपक, पोथि‍यो-पुरानक। पुरुखे जकाँ स्‍त्रीगणोक बीच शास्‍त्रार्थ चलए लगल। कि‍यो ग्रह कहैत तँ कि‍यो ग्रहक करतूत। मुदा गपक गरमी ओतए मद्धि‍म पड़ि‍ जाइत, जतए ि‍नर्णए होइत, जौं अपना बड़दकेँ कुड़हरि‍येसँ कि‍यो नाथत तँ अनका की। तइले हम सभ अनेरे मुँहा-ठुठी कऽ कऽ फूला-फुली कि‍अए करब। जाड़ेक मसि‍म छि‍ऐ ओकरो ति‍हाइ हि‍स्‍सा तँ छइहे। ओकरा जे मन फुरतै, जेना मन हेतै तेना अपन करत। अपने केने ने कि‍यो जीबैए‍। ओहि‍ना तँ नै कहल गेल अछि‍ जे अपने मुइने जग मरए। बुढ़-बुढ़ानुसक बीच तेसरे झमेल ठाढ़ भेल। कि‍यो कहैत जे पूस-माघमे शीतलहरी तँ देखैत एलौं, अगहनमे तँ नै देखने छलौं। मुदा हि‍नको सबहक गप ओइठाम जा अॅटकि जान्हि‍ जतए जुग-जमानाक चर्च उठि‍ जाइत। बापेक-बेटाक सम्‍बन्‍ध जे बनि‍ गेल ओ कते उचित‍ छै, जखन जुगे बदलि‍ गेल तखन कि‍ बदलत आ कते बदलत तेकर काेनो ठेकान छै। समुद्रक भॅसि‍आएल नाव, लहड़ि‍क धक्का सहत तखन ने कि‍नछरि‍ धड़त। नै तँ केकर मजाल छी जे नावकेँ बचा लेत। मुदा गाम-घरक बात उठि‍ते सभ गप तर पड़ि‍ जाइत। समस्‍या ठाढ़ भऽ कहैत जे केना बाधक लक्ष्‍मी एहेन समैमे घर औती। नै औती तँ उसनि‍याँ केना हएत आ के करतीह। उसनि‍याँ नै हएत तँ उसना चाउर केना बनत। नै बनत तँ सुपच्‍च खेनाइ केना हएत। अरबा-अरवानि‍ तँ राजा-महाराजाक छि‍ऐ, कि‍सान परि‍वारक तँ उसने छि‍ऐ ने। भलहिं नोकरि‍या-चकरि‍या अपना लेने हुअए। परि‍वारक ओ औरत जे जते परि‍वारक लेल करैत ओ ओते आेइ घरक गि‍रथानि‍ होइए कि‍ने। जहि‍ना खेतक धान, पानि‍क संग चुल्हि‍पर चढ़ि‍ अपन व्‍याकरण बदलि‍ उसनल धानसँ उसना चाउर बनि‍ उसना भात बनैत जे सुस्‍वादुक संग सुपाच्‍चो होइत अछि‍, तहि‍ना ने घरक लछमि‍यो होइ छथि‍। पनरह-बीस दि‍नक शीतलहरि‍ भरि‍सक छँटत। पौ फटि‍ते रवि‍या एकचारि‍क घूर लग बैस पीढ़ि‍येपर खुरपी लऽ कऽ तमाकुल मि‍लौल गांजा कटैत। पनरह-बीस दि‍नक परता भेने खुरपि‍यो अधवि‍ज्‍झू भऽ गेल। जहि‍ना चालि‍ कमने पएरक होइ छै। तँए धार मोटा गेल। खुरपीक बेंटकेँ जोरसँ लेटाओल गांजापर दबि‍ते मनमे उठलै। बुदबुदाएल- “कते दि‍नसँ नि‍आरै छी जे गुलाब-तख्‍ती आ प्रेमकटारी लेब से तेहेन ने समए भऽ जाइ छै जे कि‍ लेब। बुझै छि‍ऐ जे अपन प्रेमकटारी आ गुलाब-तख्‍ती खुरपि‍ये-पीढ़ि‍या छी।” घूरसँ खड़ौआ जौड़क गूल नि‍कालि‍ चीलममे चढ़ा भोग लगबैत मंत्र पढ़लक- “जीवैत-मरैत जे जतए छह आबि‍ जाह।” कहि‍ दमसा कऽ दम मारलक। जहि‍ना चारक वा भीतक दाबसँ घरक मुँहक चौकठि‍क केवाड़ कसकसा कऽ बन्न रहैत मुदा जोरसँ धक्का पाबि‍ खुजि‍ जाइत तहि‍ना रवि‍याक कपाट खुजल। बाजल- “दि‍लरामक माए, कनी एमहर आउ?” जड़ाएल पति‍क अवाज सुनि‍ रूपनी सि‍ड़सि‍ड़ाइत आबि‍ आगूमे ठाढ़ भऽ गेली। ने दोहरा कऽ रवि‍या कि‍छु बजैत आ ने रूपनी। एक रंगक रोगी दोसराक कि‍ हाल-चाल पूछत। मुदा नहि‍योँ पुछने तँ नहि‍येँ हेतै। मुँहक काजे कि‍ छि‍ऐ। खाइये कालमे ने कनी, वाकी तँ वैसारि‍ये रहै छै कि‍ने। तहूमे वैसारि‍यो कि‍ एक रंगक होइ छै केतौ खेलहा तँ केतौ बि‍नु खेलहा सेहो होइ छै। तइ बीच तँ बीचमानि‍ तखने चलत कि‍ ने जखन दुनूकेँ नीके कहत। जँ से नै कहत तँ मुँहक मानि‍येँ कि‍ भेल? मुदा वि‍हंगरो कम रहै तखन ने जे दुनूकेँ अगल-बगल जोड़ि‍यो कऽ  चलत। जइठाम अकासे फाटल छै तइठाम दरजि‍ये बेचारा कि‍ करत, कते करत। कि‍यो खाइक रोगसँ पीड़ि‍त भऽ सुखाइत तँ कि‍यो भूखल रोगसँ। मुदा तहूसँ नमहर बि‍हंगरा तँ ओतए उठैत जतए भुखेलहासँ बेसी भुखाएल-खेलहाक खेल चलैत छै। दुनू परानी, रवि‍या-रूपनी एक दोसरपर आँखि‍ अँटकौने जेना आगू-पाछू दुनू दि‍स दुनू दुनूकेँ देखैत। मुदा गांजाक चढ़ल मन रवि‍या अपन मौन तौड़ैत बाजल- “बुझलौं कि‍, से कि‍ने से, आइ खि‍चड़ी खाइक मन होइए। ति‍लासंकान्‍ति‍क भरोसे कि‍ रहब।” पति‍क बात सुनि‍ रूपनी कि‍छु बाजल नै। मुदा रूपनीकेँ अनसोहाँत जकाँ रीब-रीब लागल। रीबरीबाइत बाजलि‍- “एना कि‍अए अहाँ ति‍ला-सकराँइतक खिंधाँश करै छी। सोझ मुहेँ कहू जे खि‍चड़ी खाएब।” पत्नि‍क बात रवि‍याक कंठक नि‍च्‍चा नै उतरल। गल-गलबैत बाजल- “एगो खि‍स्‍सा कहै छी। एगो रहै अन्‍हरा एगो रहै डि‍ठरा। दुनू मि‍लि‍ काति‍कमे एकटा खत्ता उपछलक। तइमे फँसल एकटा अन्‍है। डि‍ठरा कि‍ केलक जे नांगरि‍ दि‍ससँ अन्‍हराकेँ पकड़बैत जहाँ उधडरेड़पर आएल आकि‍ जोरसँ कहलकै। छोड़-छोड़ ने तँ धाए लेतौ साँप छि‍ऐ। ओ छोड़ि‍ देलकै। से हम थोड़े छी। अहीं कहू जे आब लोक दुरागमन करैए आकि‍ माल-जाल फड़ि‍छबै छै। हे मानि‍ लेलौं जे वर-कनि‍याँक दुरागमन भेल। मुदा बेटा-बेटीक की हएत। घरेक काजमे एना दू रंग कि‍अए भेल जाइ छै।” रवि‍याक बात सुनि‍ रूपनी पघि‍ल गेलीह। वि‍स्‍मि‍त होइत बजलीह- “उसना चाउर ऐछे कनी नून दऽ कऽ टभका लेब। कचका मि‍रचाइ चीर कऽ दऽ देबै। तइले अहाँ कि‍अए लल-वेकल छी।” जहि‍ना ठीकेदारकेँ बि‍ल-भुगतानक ि‍दन होइत जे रोहू लेब कि‍ मंुगरी, तहि‍ना रवि‍याकेँ भेल। गरीबक गोनरि‍ जहि‍ना दुनू कात चि‍कने होइ छै तहि‍ना दुनू परानीक भेल। रवि‍या बाजल- “अरबा चाउरक प्रेमी छि‍ऐ दूध-चीनी आकि‍ नून छि‍ऐ। मुदा अपन सबहक तँ नूने छि‍ऐ कि‍ने? जखन खि‍चड़ि‍ये भेल तखन चाउर, पानि‍, नून-मि‍रचाइ पड़बे कएल, एते जइमे पड़त से खि‍चड़ी केना नै भेल।” खाइक ओरियान देखि‍ रवि‍याक मन घुमल, गंभीरता देखबैत मि‍ड़मि‍ड़ाइते बाजल- “बाध गेना बीस दि‍नसँ ऊपर भऽ गेल। बाधमे कि‍ भेल हएत कि‍ नै। तहूमे तेहेन ने सि‍ल्‍लीक उजैहि‍या आएल अछि‍ जे सभटा धान चाभि‍ देने हेतै।” पति‍क बात सुनि‍ रूपनी अगुअबैत बाजलि‍- “पैछला बेर देखलि‍ऐ जे बीघा भरि‍ सोनाइ काकाक सूर्यमुखी फूलकेँ सुग्‍गे खा गेलै। बेचारे कते आशा लगा खेती केने छेलखि‍न।” पत्नीकेँ भँसि‍आइत देखि‍ रवि‍या लोहछैत बाजल- “हमरा एते सौंसे गामक हि‍साब-बारी जोड़ैक काज नइए। हम माल-जालक ओगरवाही करै छि‍ऐ आकि‍ चि‍ड़ैयो-चुनमुनीक। खेलकै तँ गि‍रहतक खेलकै। हमर बड़ खेलक तँ राखी।” साक्षात् वैरागी बनि‍ रवि‍या ि‍नर्विकार भऽ पत्नीकेँ कहलक। ि‍नर्विकार पति‍केँ देखि‍ रूपनी सूर्यक धाही देखि‍ते चड़ि‍अबैत बाजलि‍- “हम चुल्हि‍क ओरि‍यानमे जाइ छी। अहाँ झब दे बाध चलि‍ जाउ। नै तँ गि‍रहत अबलट जोड़त। जँ पहि‍ने चलि‍ जाएब आ गि‍रहतकेँ देखब तँ अगुआइये कऽ कहबै जे तते ने सि‍ल्‍ली आबि‍ गेल छै जे एको कनमा धान नै होइबला अछि‍।” पत्नीक ि‍वचार रवि‍याकेँ जँचल, मुदा भरल पेट जहि‍ना ओछाइन दि‍स तकैत तहि‍ना एक तँ घूरक अगि‍यासीक ताउ तइपर गांजाक रंग, उठैक मन नै भेलइ। मुदा अगि‍योक तँ अपन गुण होइ छै, चाहे तँ उपयोग करू नै तँ घर जराऔत। मुदा से रवि‍याकेँ नै भेल। मन छड़पलै। फुसफुसाएल- “कोनो गामक नइँर-गइँर नीक नै छै। कहू जे जखन एके नाओं सबहक छै माने गाम- तखन कि‍अए कोनो गामक बाधक रखवारि‍ बीघामे दस धूर छै तँ कोनो गामक पाँच धूर। कोनो गामक चारि‍ धूर छै तँ कोनो गामक दू धूर। मन ठमकलै। अनेरे कोन चक्करमे चकराइ छी। ई तँ रखवारि‍क भेल। जेकरा ने माए छै आ ने बाप। मुदा माइयो-बापबला केँ तँ देखते छि‍ऐ जे कोनो गामक लग्‍गी (खेत नपेबला लग्‍गा) साढ़े छह हाथक छै तँ कोनो गामक पौने सात हाथक। कोनो गामक साढ़े सात हाथक छै तँ कोनो गामक नअ हाथक। धूउ अनेरे अनकर रोग अपना सि‍र सि‍रजै छी। साबे बोझ जकाँ सदि‍काल गँड़ि‍मुराहे होइत रहैए तखन तँ कहुना कऽ सम्‍हारि‍ खरि‍हान पहुँचू जे पसारि‍ कऽ सुखा लेब। बड़-बड़ लीला सभ छै। कते देखब। जखन एके गामक एके आड़ि‍क खेतक मलगुजारी बढ़मोत्तर कहि‍ रेन्‍ट मुक्‍त अछि‍ तँ बगले बलाक ओते अछि‍ जे मलगुजारी भुगतानपर बटाइ खेत रहै छै।” अगि‍ला बात मनमे अबैसँ पहि‍ने रवि‍या फुड़फुड़ा कऽ उठल। शीतलहरीक चलैत अगते कुतरूमोमे फूलक कोढ़ी आबि‍ गेल, से रवि‍या देखने। पत्नीकेँ कहलक- “बाड़ीसँ कुतरूमो आनि‍ लेब। बाध दि‍ससँ भेल अबै छी।” कहि‍ रवि‍या बाधक रस्‍ता धेलक। करीब अस्‍सी बीघाक दछि‍नवरि‍या बाध। जेकर रखवारि‍ रवि‍या करैत। संयोग नीक भेल जे तीन साल पूर्व पैछला रखवार पंजाब गेल जे रवि‍याकेँ बाधक भार देने गेल। पचास बीघासँ ऊपर जमीन नि‍च्‍चाँ आ पच्‍चीस-तीस बीघा ऊपरक बाध रहए। तइमे बीघा पाँचेक उस्‍सर, जइमे भरि‍-भरि‍ जाँघक कुश उपजैत। परदेशि‍या सबहक कि‍रदानीसँ पान-सात बीघा छाहेँ भऽ गेल। तइपर रौदी भेने उपराड़ि‍ खेत अबादे नै भेल। खोपड़ी लग पहुँचि‍ते रवि‍याक मनमे उठल- अनेरे एहेन ठंढ़ामे पएरमे बेमाए कि‍अए फटाएब। तइसँ नीक जे खोपड़ी अपन छि‍हे। आगि‍ सुनगा घूरे तापब। उपराड़ि‍ चौरक बीच परतीपर रवि‍याक रखवारि‍क खोपड़ी। घूर पजारि‍ रवि‍या बैस गेल हाथ-पएरक कन-कनी कमि‍ते रवि‍याक मनमे उठल। अनका जे होउ, मुदा भगवान पक्षक काज केलनि‍। उपराड़ि‍ नै उपजल तँ नै उपजल, नि‍चला तँ उपजल अछि‍। नै साल भरि‍ तँ छबो मासक बुतात तँ हेबे करत। मुदा गामेमे देखै छी जे अही चौरी-टामे नहर नै भेनौं नहरक पानि‍ एलै। बाकी गाम तँ रौदि‍याहे भऽ गेल अछि‍। सि‍ताएल नढ़ि‍या जकाँ सूर्य तँ उगल मुदा सि‍रसि‍राइत। नव वि‍हान देखि‍ गि‍रहस्‍तक बीच चलमली आएल। धान (पानि‍क धान)मे कनी ठंढ़े ने लागत मुदा सूर्योक तँ धाही छइहे। हो-न-हो कहीं पूस-माघ अगुआएल अछि‍ आ जौं कहीं पैछला डेग नपलक तँ फेर ओहि‍ना भऽ जाएत। एक तँ रौदि‍याह समैक अन्न, तेकरो जँ जानि‍ कऽ छि‍जानैत करब तखन तँ आरो केतौ भऽ कऽ नै रहब। कि‍सानक चलमली देखि‍ रूपनी हाँइ-हाँइ कऽ भानस केलक। आठ बजैत-बजैत हँसुआ नेने सभ नि‍कलि‍ गेल। जन-गि‍रहतसँ बाध भरि‍ गेल। अपने रूपनी दि‍लरामक संग खा पति‍-ले बाधे खाएक लऽ वि‍दा भेल। सात बर्खक बेटा दि‍लराम अंगनासँ नि‍कलि‍ते रूपनी बेटा-दि‍लरामकेँ कहलक- “बौआ, आइ उलबा चाउर खाएब।” आगू-आगू दि‍लराम आ पाछू-पाछू रूपनी बाध दि‍स वि‍दा भेल। कि‍छु दूर गेलापर रूपनीक मनमे उठल। भगवान कूह फेड़लनि‍। नै तँ कोनो दशा बाकी नै रहि‍तए। जहि‍ना अन्नक गति‍ होइत तहि‍ना जरनाक। ओहो तँ माघ ले रखने छलौं जे पार लागल। नै तँ कठुआ कऽ मरैमे कोनो भांगठ छलए। गांजा पीबैत रवि‍या आगू-आगू बेटा आ पाछू-पाछू पत्नीकेँ अबैत देखि‍, बुदबुदाएल- “जे जीबए से खेलए फागु। हमरा सबहक जि‍नगि‍ये कि‍ अछि‍ जे अगि‍ला आशापर जीब। जहि‍या हेतै ति‍ला-सकराँइत तहि‍या होउ। अपन तँ आइये छी।” मुदा लगले मन ठमकि‍ गेलै। आन पावनि‍ खीरक होइ छै आ ति‍लासंक्रान्‍ति‍ कि‍अए खि‍चड़ीक होइ छै। तहूमे उजरा अरबा चाउरक संग करि‍या ति‍ल-गुड़-पानि‍क संग परसाद कि‍अए बनै छै...? आँखि‍ मूनि‍ रवि‍या वि‍चारि‍ते छल कि‍ रूपनी लगमे आबि‍ बाजल- “जहि‍ना गामपर रहै छी तहि‍ना बाधोमे भकुआएले रहै छी।” रवि‍याक बनल मन बाजल- “गामपर तँ अहाँ देखि‍ भकुआ जाइ छी मुदा बाधमे तँ अपने देखै छी कि‍ने।” तहि‍ बीच बीघा दुइये हटि‍ धानक खेतमे कटनि‍हार सबहक बीच हल्‍ला  भेल। हल्लाक कारण रहै एक भाग सि‍ल्‍ली धान चाभि‍ देने रहै। धान नै देखि‍ जन-सबहक बीच पाहि‍ धड़ैक हल्‍ला रहए। हल्‍ला देखि‍ रूपनी पति‍केँ कहलक- “कनी जा कऽ देखि‍यौ, जे कि‍अए झगड़ा होइ छै।” गांजाक असकताएल मन रवि‍याक, बाजल- “हम बाधक रखवार छि‍ऐ कि‍ गामक पंच छी। अपन गि‍रहत फड़ि‍याबह...।” रवि‍याक बात रूपनीकेँ जँचल। आगूमे थारी बढ़बैत बाजल- “बेटाकेँ आइ उलबा चाउर खुआइयो देबै आ मोटरि‍यो बान्हि‍ देबइ।” उलबा चाउर सुनि‍ रवि‍या वि‍स्‍मि‍त भऽ गेल। मन पड़लै अपन माए। माए मन पड़ि‍ते मनमे उठलै ओ दि‍न, जइ दि‍न दि‍आरी पावनि‍ रहै। धान अधपक्कू भऽ गेल रहै, मुदा सुभ्भर नै पाकल रहै। लछमी पूजा दि‍न रहने ओहए अधपक्कू धान काटि‍, पएरसँ मीड़ि‍ खापड़ि‍मे भूजि‍ चाउर कूटि‍ खेने रही। हाथ-मुँह धोय रवि‍या दि‍लरामकेँ कहलक- “बौआ, अहूँ कनी खा लि‍अ।” भरल पेट दि‍लराम नकारैत बाजल- “नै खि‍चड़ी नै खाएब, उलबा चाउर खाएब।” उलबा चाउर सुनि‍ रवि‍याक मनमे खीझ उठल। बाजल- “उलबा चाउर लगले कतए सँ औतै। बड़ अगुताएल छेँ। के तोरा मन पाड़ि‍ देलकौ।” नि‍ष्‍कपट दि‍लराम बाजल- “माए कहलक।” माइक नाओं सुनि‍ रवि‍या ठमकि‍ गेल। जहि‍ना मंदि‍र जाइसँ पहि‍ने ने भगवान आबि‍ राशि‍ लगा लऽ जाइ छथि‍न, तहि‍ना ने गाछोक पीपही रोपि‍ते-काल पाकल आम आगूमे आबि‍ जाइ छै। फेर दोसर खेतमे हल्‍ला उठल। पानि‍क तरमे आड़ि‍ डूमल। खाली आड़ि‍क खरही टि‍क-टि‍क करैत। मुदा सभ ठामक ओगरवाहि‍ कि‍ बन्‍दूके हाथे होइ छै। खरहोरि‍क कड़ची केना ओगरवाहि‍ करैत अछि‍। झगड़ाक कारण रहै एकटा खेतक धान चतड़ि‍-लतड़ि‍ दाेसरा खेतमे चलि‍ गेल। पहि‍ने तँ रवि‍याकेँ सोझ-साझ बात बूझि‍ पड़लै, मुदा लगले मन ठमकि‍ गेलै। पानि‍क संग माटि‍क प्रश्न उठि‍ गेलै। ई केहेन होइ छै जे लोक कलम-गाछी लगबै-काल आड़ि‍क कातमे झमटगरहा गाछ लगा दइ छै जे नमड़ि‍ कऽ दोसरा खेतक उपजा खा जाइ छै। बुढ़-बुढ़ानुसक सेहो कहब छन्‍हि‍ जे घर लग बँसबारि‍ नै लगाबी, एक तँ लत्ती-गाछक सीमापर बसल अछि‍ दाेसर तेहेन सि‍राह होइ छै जे जते दूर ओकर छाँह जाइ छै तते दूर ओकर सीरो जाइ छै। जँ जेबे टा करि‍तै तखन तँ नै कोनो मुदा तरे-तर तेहेन खच्‍चरपनी करै छै जे जते दूर जाइ छै दोसराक बास नै हुअए दि‍अए चाहै छै। खि‍चड़ीसँ मन भरि‍ते रवि‍या पत्नीकेँ कहलक- “हमरा अङौस-मङौस करैके मन होइए, अहाँ बाध घुमने आउ।” पति‍क समर्पण देखि‍ रूपनी बाजलि‍- “थाल-पानि‍मे बौआकेँ केना लऽ जेबै। एतै छोड़ि‍ दइ छि‍ऐ।” खेते-खेत रूपनी टहलि‍ घूमि‍ कऽ आबि पति‍केँ कहलक- “बलौकि‍या धान छोड़ि‍ सभ ऊपरा-ऊपरी छै।” बजैत-बजैत मनमे उठलै, घरमे कोठी-भरली तँ नहि‍येँ अछि‍ एते धान राखब कतए। सोगसँ सोगाइत स‍ँठलक- “आब कि‍ धान-चाउरक चोर रहल जे कि‍यो चोरा लेत। आब तँ हि‍स्‍सा-बखराक चोरि‍ देखाइयो आ छि‍पाइयो कऽ होइ छै।” रवि‍या पुआरक ओछाइन सरि‍अबैत नि‍नि‍या देवीक स्‍तुति‍ करि‍ते छल कि‍ पत्नीक बुदबुदाएल बात सुनि‍ गेल। मन मुरुछि‍ कऽ तुरुछि‍ गेलै- “बड़ लाल बुज्‍झकर बनै छथि‍, अच्‍छा एकटा कहू जे जइ गाममे सभटा चाेरे रहत ओइ गाममे चोर के भेल?” पति‍क बि‍गड़ैक कारण बूझि‍ रूपनी नहाएल आ बि‍नु नहाएल अवस्‍थामे पड़ल जकाँ बाजलि‍- “पड़ू-पड़ू। लाउ घुट्ठी दाबि‍ दइ छी।” पि‍याससँ पहि‍ने पानि,‍ भूखसँ पहि‍ने अन्न आगू एलासँ क्षुधाक धार रोकाइ छै। दू-अढ़ाइ बजि‍ते धान कटनि‍हार सबहक शक्ति‍ सि‍हरए‍ लगल। एक तँ मड़ि‍आएल रौद तइपर जट्ठर पानिक संग पछबाक लहकी। एक्के-दुइये धानक बोझ लऽ लऽ खेतसँ नि‍कलए लगल। बोझ देखि‍ रूपनी बाजलि‍- “हम राखी कटने अबै छी।” पेमेंट, बेतन, महि‍ना, पगार, तलब, तनखा आकि‍ दरमाहा उठैकाल जहि‍ना नोकरि‍याक मनमे तरंग उठै छै तहि‍ना रूपनीक मनमे उठए लगल। तते खेत कटाएल जे एते राखी काटब पार लागत। तहूमे बेरो खसल आ जाड़ो बेसि‍येबे करत। लगले मन मानि‍ गेलै जे कोनो कि‍ जमा-जि‍गि‍र अछि‍ जे एते पुरेबे करत। जेतबे सम्‍हरत तेतबे काटब। बाकी आन दि‍न काटब। एते दि‍न कि‍यो चोरेबे ने केलकै आ एक-दू दि‍नमे कि‍ उनटन भऽ जाएत। सोचि‍ते-वि‍चारि‍ते पहि‍ल खेत रूपनी पहुँचि‍ गेल। आँखि‍ उठा हि‍या कऽ देखलक (पानि‍क दुआरे) जे कोन कोणमे राखी अछि‍। दुइये धूर हएत तइसँ की,‍ हएत तँ कोनो कोणेपर। मुदा नमहर खेत रहने अधोसँ कम खेतक धान कटाएल, तखन राखी केना बनत? दोसर-तेसर-चारि‍मो खेत तहि‍ना। पाँचम-टामे राखी बेराएल। काम-धान देखि‍ रूपनीक मनमे सबुरक सबुरदाना छि‍ड़ि‍या गेल। पाँजो भरि‍ धानक आँटी बान्‍हि‍ माथपर उठौने धानक गदाएल पानि‍ देहपर टघरैत खोपड़ी लग रूपनी पहुँचल। अारामसँ पति‍-पुत्र देखि‍ वि‍भोरसँ वि‍सरभोर भऽ गेल। मोने ने रहलै जे माथपर धानक भारी आँटी अछि‍। धानक आँटी देखि‍ रवि‍या मुस्‍की दैत बाजल- “एहेन जे अहाँ छी जे बेटा-दि‍लरामकेँ बाधे अबैकाल उलबा चाउर गछि‍ लेलि‍ऐ आ अखैनसँ जे छाल-छोड़ाओत से केहेन लगत।” वि‍हुँसि‍ कऽ रूपनी बाजलि‍- “जइ बेटाकेँ गछलि‍ऐ तेकरा पूराकऽ छोड़बै। ऐठामसँ जाएब, एक पाट हएत मलि‍ लेब। चुल्हि‍ पजारि‍ गरमा लेब। साँझे परतै तँ कि‍ हेतै, कोनो कि‍ अनका आंगना जाएब जे भरली साँझ नै कुटए देत। अपन ढेकी अछि‍ जखैन पलखति‍ भेटत तखैन कुटब। तँए कि‍ बेटाकेँ....” ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। राम भरोस कापडि भ्रमर, सदस्यः नेपाल प्रज्ञा प्रतिष्ठान,काठमाण्डू यात्रा प्रसंग- रायपुरक मिथिला महोत्सबः उत्साहक बाढि आ मनीष झा

हम दू मास पूर्व इन्टरनेटपर रायपुर (छतिसगढ़, भारत)क मैथिली प्रवाहिका (मासिक पत्रिका)क आयोजनमे होबयबला अखिल भारतीय मिथिला महोत्सवक सूचना पढने रही । हिन्दीमे । किछु अनसोहाँत लागल रहय । किछु गोटे अपन प्रतिक्रियामे ई बात लिखबो कएने रहथि । जे से हम एकरा बिसरि गेल रही । मुदा एक दिन जखन दरभंगासँ गप्प करैत काल भाई चन्द्रेशक हडबडी शैलीमे ई सूचना भेटल जे हमरा रायपुर जएबाक अछि आ ओत्तय ओसभ हमरा सम्मानित करता तऽ जिज्ञाशा बढल । चिट्ठीक खोजबिन कएल । चिट्ठी राजविराज चल गेल बताओल गेल । जे सत्य नहि छल । तखन हम जिज्ञाशा कएल तऽ ओम्हरसँ एकटा हडबडाएल सन अध खिच्चडि भाषा मैथिली आ हिन्दीमे एकटा स्वर सुनि पडल –‘हम पठा देने छी, नहि भेटल अछि तऽ तुरन्त पठा रहलल छी ।’ कहबाक जरुरति नहि ई श्वर महोत्सवक संयोजक मनीष कुमार झाक रहनि , मैथिली प्रवाहिकाक सम्पादक । स्वरसं किछु बेशी व्यस्त, धडफडाएल आ उत्साही लोक लागल छलाह । एहिसं बेसी हमरा किछु जानल बुझल नहि छल । हम जाएब तएँ पटनामे जमायकेँ कहि दू गोट थर्ड एसीक टिकट बनबा लेने रही । अन्ततः पत्र हमरा मेलमे आएल आ हम सभ औपचारिकता पूरा कऽ रायपुर गेलहुँ । रायपुरमे होइत कार्यक्रम हमर जिज्ञाशा केन्द्रमे तऽ रहबे करे , एहि प्रवासमे जाहि उत्साहसँ एतेक भव्य आ पैघ कार्यक्रम करबाक साहस कएनिहार ई मनिष जी के छथि , ई हमर सभसँ बेसी जिज्ञाशाक विषय रहय । चौबीस घण्टाक रेल यात्रामे भागलपुरक डा. केष्कर ठाकुर जीक सानिध्यमे किछु बात बुझबो कएने रही जकरा आओर फरिछौलनि भाई योगानन्द झा जी । ई लोकनि रायपुर घुरि आएल रहथि वा मनिषसँ सम्पर्कमे रहथि । ओना तऽ डा. बुचरु बाबु सेहो मनीषक मनुसत्वक दर्शन कऽ चुकल रहथि आ ओहो हमर आगमनक समाद निरन्तर मनीष जी लग प्रवाहित करैत छलाह । जे से फागनु ११ गते (फरवरी २२ तारिख कऽ) ८ बजे राति कऽ जखन रायपुर रेलवे स्टेशनपर उतरलहुँ आ आन सहयात्री मित्र सभक प्रतिक्षा करैत छलहुँ तऽ डा. केष्कर ठाकुर जी हमरा दिश संकेत करैत एकटा पुष्ट देहयष्टिक छोटेकाँट–छाँटक व्यक्तिकेँ देखौलकनि–इएह छथि कापडि जी ! हम पलटलहुँ, आँखि मिलल , ओ व्यक्ति हाथमे राखल बडका बुकी( गुलदस्ता) हमरा दैत लगभग पैरपर झुकैत प्रमाण कएलक । डा. ठाकुरकेँ हुनक परिचय देबासँ पहिने हम बुझि गेलहुँ , ई हो न हो, मनीषेजी हएताह । बातो सएह रहैक । मनीष जी अपन दुलकी चालिमे अगिला डिब्बा दिस बढलाह आ एकटा छोटछिन गुलदस्ता एकटा महिलाकेँ धरबैत हमरा सभ लग आनि परिचय करौलनि । ओ जमशेदपुरसँ आएल रहथि । तखन हमरा सभकेँ स्टेसनसँ बाहर लऽ गेलाह आ सभकेँ गाडीसँ होटल पहुँचाओल गेल । हमराले छतिसगढ प्रशासनक न्यू सर्किट हाँउसमे आवासक व्यवस्था कएल गेल रहय । बीस पचिस मिनट पैदल आ १० मिनेट गाडीसँ जएबाक ठाममे । ई हमरा लेल दोसर सम्मान छल । एक मन भेल संगीसभक संग होटलमे बैसी, मुदा मनीष जीक आग्रह जे राज्य सरकारसँ हमरा लेल छुटिआयोल गेल आवासमे जाएब जरुरी । हमर खानपीनक व्यवस्था सभ ओतहि छल । मुदा हमर ई शर्त रहए , हम दिन भरि खानपीनक संग संगीसभक संग होटेलेमे बिताएब । सुविधा इहो जे ओतहि खानपीन आ कार्यक्रम स्थल सेहो । हम सर्किट हाउसमे गेला पर देखलहुँ –पाँच सितारा होटलक सभ सुविधा ओतय रहैक । मनीष जीक इन्तजाम पर हम फेर मुग्ध भेलहुँ । चारि दिन चारि राति हम ओत्तय बितौलहुँ । एकोरति आन ठामक आभास नहि भेल । कार्यक्रमसँ आयोजन धरि मनीष जी मात्र मनीष जी । एकटा बात खटकल–( ई एसगरिए किए कऽ रहल छथि । फेर भेल अपने दिल से जानीए पराए दिलका हाल , काज करैत काल एहिना काज कर पडैत छैक । मुदा से सभ क्षेत्रमे एहि तरहे दृष्टि दौडबैत हिनक सामथ्र्यपर हमरो मन हारि मानि लैत अछि । सभक ख्याल, सभक चिन्ता । वाह मनीष जी । हमरा लेल तेसर सम्मानकेँ अवसर तखन आएल जखन १२ गते कऽ अर्थात २३ तारिख कऽ भिन्सर ११ः३० बजे उदघाटन सत्र प्रारम्भ भेल । रायपुर क्षेत्रक संगहि मध्य प्रदेश, विहार, झारखण्डसँ एक सँ एक विद्वान, भाषा सेवी, मैथिल सभक वृहत उपस्थितिमे जखन कार्यक्रम शुरु भेल तऽ मंच संचालक डा. अशोक अबिचल हमरा अध्यक्षता करबाक लेल बजौलनि । मंचपर विहार सरकारक पूर्व संयुक्त सचिव डा. विद्यानन्द झा, विहार सरकारक बाल संरक्षण आयोगक अध्यक्ष श्रीमती निशा झा, मैथिली हिन्दी सुप्रसिद्ध गीतकार डा. बुद्धिनाथ मिश्र, टाटा मोटरक पूर्व वरिष्ठ सहायक मैनेजर , सेवानिवृत प्रो. चन्द्रशेखर खान , अन्तर्राष्टिूय मैथिली परिषद, उत्तर प्रदेशक प्रान्तिय अध्यक्ष पं. जगदिश चन्द्र शर्मा , मिश्र इस्पात प्रालिक अध्यक्ष राजेश्वर मिश्र,छत्तीसगढ पर्जटन मंडलके अध्यक्ष कृष्ण कुमार राय,विख्यात शिक्षा शास्त्री व इतिहासविद् डा.कृष्ण कुमार झा,ईन्दिरा गांधी राष्टीय कला केन्द्र नई दिल्लीके साउथ–ईस्ट एशिया हेड डा. वच्चन कुमार,बख्शी सृजन पीठ छत्तीसगढके अध्यक्ष डा. रमेन्द्रनाथ मिश्र सन सन दिग्गज व्यक्तित्व विराजमान छलाह । हम तखन आओर अचम्भित भऽ गेलहुँ जखन ओहि महत्ता समारोहक उदघाटन करबाक लेल हमरा आग्रह कएल गेल । ई सभ कार्यक्रम पूर्व निर्धारित छल , ई बात एकटा स्थानीय दैनिकमे छपल विज्ञापन देखलाक बाद ज्ञात भेल छल । मनीष लोककेँ बजबऽ मात्र नहि जनैत छथि । ओकर सम्मान करय सेहो जनैत छथि ई बात सभकेँ बुझयमे आबि गेल छलै । दरभंगाक डा. बैजु चौधरी सेहो एहने सन आयोजन करैत छथि मुदा गुणवत्तामे एकर चारियो अना नहि भऽ पबैत अछि । एसकरे ओहो , एसकरे इहो । दूनुमे बहुत अन्तर छैक । राजनीतिसँ बेसी विद्वतजनकेँ सम्मान रायपुरमे होइत देखल गेल यद्यपि मनीष जी सेहो राजनीतिक लोक छथि । छतिसगढक मुख्यमन्त्री डा. रमण सिंह लग पहुँच छनि । इहो कार्यक्रम छत्तिसगढ शासनक संस्कृत मन्त्रालयक सहकार्यमे भऽ रहल छनि । सभ किछु व्यवस्थित–आवास भोजन, आ कार्यक्रम स्थल । हँ कनेक त्रुटि कएलनि कार्यक्रमक रुपरेखा निर्धारित करैत काल समयक ठेकान नहि रखलनि । सम्मान करबाक क्रम निरन्तर जारी रहने निर्धारित कार्यक्रम बाधित होइत रहल । आ पहिल दिनक कार्यक्रम तऽ जेना तेना ठिके रहल । दोसर दिनक कार्यक्रममे बेसी कठिनाई भऽ गेलै । बारह घण्टाक बैसार । विचार गोष्ठी आ कार्यपत्रक बीच सम्मानक कार्यक्रम । डा. बुद्धिनाथ मिश्र खिसिआ गेलाह –एहना स्थितिमे हम नहि आएब । मनीष जी चुपचाप सहैत रहला , निर्मिमेष भावें । उदघाटनक बाद सम्मानक अवसर आएल । आयोजनक दोसर स्तम्भ अशोक चौधरीक हाथें मिथिला विभूति सम्मानसँ हमरा सम्मानित कएल गेल । निरन्तर फोनपर बनल मनीष जी एको क्षण मञ्चपर नहि बसि पौलाह । एम्हर सँ ओम्हर दौडैत । सभकेँ चित्त भरैत । आ से आबहु कालमे ककरो दुखी नहि कएलखिन्ह । आन कार्यक्रमसभ जकाँ अतिथिकेँ विदाई काल हर हर खट खट नहि भेल । सभ प्रसन्न भऽ घुरलाह – मनीष जीक सक्रियता, व्यवस्था आ उदार हृदयक प्रशंसा करैत । हुनक आग्रह जे काठमाण्डूमे हम हुनका अएबाक संयोग जुड़बियनि, हमरा पर भार अछि , देखी कहिया ई अवसर अबैत अछि । ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। रमेश रञ्जन

मैथिली बालनाटक सीमा विस्तार करैत — ‘चौआरि’ प्राध्यापक परमेश्वर कापड़िक चौआरि नाटक सङ्ग्रह उत्कृष्ट पाण्डुलिपीक रुपमे विद्यापति पुरस्कार कोषसँ पुरस्कृत भऽ चुकल अछि । विद्यापति पुरुस्कार कोष वर्ष ०६८क प्रतिस्पर्धामे आएल विभिन्न विधाक पाण्डुलिपीमेसँ चौआरिकेँ पुरस्कृत करबाक निर्णय कएने छल । पुरस्कृत नाट्य सङ्ग्रह प्रकाशित भऽ रहल अछि । ई प्रसन्नताक विषय अछि ।

मैथिलीक यशस्वी प्राध्यापक तथा त्रिभुवन विश्वविधालय मैथिली विभागाध्यक्ष परमेश्वर कापड़िक रचनामे बाल आकर्षण रहलन्हिें । ओ बालमन आ बालपनसँ रचनाक जटिलतम प्रक्रियासँ यात्रा करैत छथि । तें स्वाभाविक आ यथार्थ घटनाक्रम सहितक रचना करबाक हुनका लग दक्षता छन्हि ।

वस्तुतः नेपालक मैथिली साहित्यक अवस्था देखल जाए तँ बाल साहित्यक अवस्था सन्तोषजनक नइ मानल जा सकैए । ताहूमे बाल नाटक लेखन तँ नहिए जकाँ भेलैए । एहनमे निरन्तर बाल नाटक लेखन कऽ कऽ ओ मैथिली साहित्यक दुर्वल पक्षकेँ सवल बनएबाक प्रयत्न कऽ रहल छथि । ताहू दृष्टिए ई कृति महत्वपूर्ण अछि ।

बहुतरास विद्वान कहलन्हिें आ हमहूँ कहैत छी जे कोनो नाटकक पूर्णता रङ्गमञ्चपर गेलाक बादे होइत छै । अर्थात नाटकक कसौटी छै मञ्च । एहि नाटकक मादे हमरा लग जे सूचना अछि ताहि आधारपर ई नाटक रङ्गमञ्चपर अखनिधरि नइ चढ़ल अछि । अर्थात प्रर्दशन पक्षकेँ परिक्षण होएब बाँकी छै । मुदा ई सर्वमान्य सत्य छै जे कोनो नाटकक सिर्जनक बहुआयामिक रुपके आरम्भ लेखन कार्यसँ होइत छै तें अहि नाटकक ताहि रुपमे विवेचना होएबाक चाही ।

जखन बाल नाटकक हमसभ बात करै छी तँ स्वाभाबिक रुपें ई प्रश्न जनमैत छै जे सामान्य रंङ्गमञ्च आ बच्चाक हेतु रंङ्गमञ्चमे की अन्तर छै ? एकर सौन्दर्यक स्तरपर विवेचना करबाक प्रयत्न होइत रहल अछि । मुदा सौन्दर्यात्मक स्तरपर रंङ्गमञ्चकेँ पृथक–पृथक आयुवर्गक लेल पृथक–पृथक रंङ्ग व्याख्या नइ कएल जा सकैए । कलाक दृष्टिए ई विभाजन असंभव छै । बच्चाक हेतु तैयार हुअऽवला प्रर्दशनमे ओहने शोध, कल्पना आ सौन्दर्यक आवश्यकता होइत छै । कोनो प्रकारक सिमीतता वा वाध्यात्मकता बाल रंङ्गमञ्चकेँ कमजोर बनौतै । एहनसन अवस्थामे रंङ्गप्रेक्षककेँ भूमिका महत्वपूर्ण भऽ जाइत छै । बाल दर्शक बिनु आग्रह आ वयस्क दर्शक पर्याप्त पूर्वाग्रहसँग नाटक देखबाक लेल अबैत अछि । कापड़िजीक ई नाटक बच्चाद्वारा मात्र प्रर्दशन होमए जोग नाटक अछि ? अथवा बच्चाद्वारा अभिनित बच्चा दर्शक हेतु ? अथवा सभ उमेर समूहक लेल ओतबे उपयोगी अछि ? निश्चये एहि आधारपर विवेचन अत्यन्त दुरुह छै , मुदा समान्यतः ई कहल जा सकैए जे बच्चाक हेतु नाटक रचना कएनिहारक आत्मा बच्चासन होएब अनिवार्य अछि । ओ लेखक बच्चासँ प्रेम करैत होइक आ बाल प्रतिक्रियाकेँ आदर ।

कोनो लेखककेँ अपन जीवन अनुभव आ अनुभूति लेखनकर्मकेँ दिशा प्रदान करैत छै । जाहि परिवेशमे पलैत–बढैत अछि तकर सौन्दर्य आ कुरुपताकेँ सुक्षम विशलेषण रचनाकेँ सहो अर्थवान बनबैत छै । परमेश्वर कापड़ि मिथिलाक सुच्चा ग्रम्य जीवनक अनुभूतिज्ञ छथि । हुनक अनुभूति मिथिलाक गामक सीमाकेँ अतिक्रमण नइ करैत छै । ओहि चौहद्दीक अन्तर विशिष्टताक सँग ओ रचै–बसै छथि ।

अहि नाटक सङग्रहमे ‘ले बलैया हिलोरि कऽ’ बच्चा सभ घोंघाँउज आ झगडादनसँ नाटक आरम्भ होइत अछि । पढ़ाइ ग्रामिण मिथिलाक कोनो ने कोनो रुपमे सभ वर्गक हेतु अनिवार्य भेल जा रहल छै । मुदा विधालयीय संस्कार आओर पारिवारिक संस्कारक बिचमे एकटा पैघ विषमता छै । जीवनक यथार्थ परिवशकेँ अस्वीकार कऽ कऽ कोनो तरहक औपचारिक शिक्षा पूर्णता दिस नइ जा सकैए । जीवन सुन्दर होइ छै, ओ कखनो अपरोजक आ अभद्र लागि सकै छै मुदा ओकर अन्तर सुन्दरता ओतबे निर्मल आ पवित्र होइ छै । अपना परिवेशगत यथार्थकेँ अस्वीकार कऽ कऽ कोनो विकासक्रम आगू नइ बढलैए । एहने कथावस्तुपर नाट्य सिर्जन कएल गेल अछि । हमरा बुझने नाट्यकार कने बेसिए वाल विधार्थीक हेतु शैक्षिक सामग्रीक प्रयोग कऽ देने छथिन । भाषाक स्तरपर सेहो अत्यन्त अस्वभाविक संवाद छै । मुदा नाटकियता बेजोड़ छै ।

चोआरि नाटक सङ्ग्रहमे नाटक ‘एलौ परिक्षा’ क पात्र, परिवेश आ कथ्य कोनो स्तरपर ग्राम्य सीमाक भंजन नइ करैत छै । मुदा लेखक अपन वौद्घिकता जतऽ–जतऽ प्रयोग करै छथि नाटकक गतिमे अवरोध अबै छै । परीक्षाक समयमे मात्र गम्भिर होएबाक वा परीक्षाकेँ भयावह अतंक जकाँ प्रस्तुत करबाक आम मनोविज्ञानकेँ नाट्य रुप देबाक क्रममे नाटक सम्प्रेषणक आधार संवाद बनैत अछि । कथाक सहज प्रवाहमे आरोपित सन्देश देबाक प्रयत्न सेहो छै । यथार्थवादी शैलीक ई नाटक रोचक छै, मुदा कथा, घटनाक्रम आ कथोपकथनमे विश्वासक संकट सेहो छै । बच्चाक बोलीमे प्रौढ़ताक प्रक्षेपण भेल छै । संवाद पात्रक उमेर आ परिपक्वतासँ बेसी प्रौढ़ भेलाक कारण अस्वाभाविक सेहो बुझाइत छै । जे नाटकक शौष्ठवकेँ क्षति करैत छै । अंग्रजी भाषाक अनावश्यक मोहसँ बचब जरुरी छलै । ग्राम्य भाषाक प्रयोगमे एकरुपता अहि नाटककेँ अओर शक्तिशाली बना सकै छलै ।

अहि सङ्ग्रहक दोसर नाटक छै ‘बोनिपर’ । किछु वर्ष पहिनेक नेपालक मिथिला क्षेत्र अभाव, गरिवी आ प्राकृतिक विपदाक संगम स्थल छल । सामन्तवादी चेतना, राज्य व्यवस्थामे एक जातीय वर्चस्व आ छुआछुत, भेदभावक चरम रुप भयावह छलै । निम्नवर्ग हिनतावोधमे जिबैत छल । ओ वर्ग ने सपना देखै छल आ ने सपनाकेँ सकार होएबाक कोनो आधार छलै । नियतवादी चेतना मिथिलाक श्रमिक वर्गक मूल चरित्र बनि गेल छलै । नाटककार परमेश्वर कापड़ि बोनिपर नाटकक माध्यमसँ ओहि वर्गक अवस्था चित्रण मात्र नइ केलन्हि अछि । आोहि वर्गमे भऽ रहल परिवर्तन संकेतकेँ सेहो चिन्हित केलन्हि अछि । ओकर सपना आ यथार्थकेँ सुन्दर नाट्य रुप । खास कए ओहि वाल पात्रक माध्मसँ मिथिलाक श्रमिक वर्गक आङ्गनक यथार्थ त्रासदीकेँ स्थापित करब निश्चये विलक्षण अछि । अपना आङ्गनक पीड़ासँ परिचित ओ बालचरित्र सामाजिक अवस्था आ परिवर्तनक अपेक्षाकेँ सहज आ प्रवृतिगत अभिव्यक्ति दैत अछि । बच्चामे अनुकरणक बेजोड़ क्षमताक सेहो ई नाटक एकटा वानगी बनि गेल अछि । जाहि विषयकेँ अत्यन्त गम्भिर आ जटील संरचनाक माध्यमसँ नइ कहल जा सकै छलै ओ बातकेँ खेल–खेलमे बच्चा कहि दैत छै । कखनो बुझाइत छै, सामाजिक परिवर्तन, सत्तामे सहभागिता आ स्वयंकेँ भागिदार बनएबाक प्रक्रियाक अते विशिष्ट विचार अहि बालपात्रक माध्यमसँ कहाएब अनुचित तँ नइ छै । मुदा ओ पात्र अपना इर्दगिर्दक सुगबुगाहटकेँ अकानै छै, सामाजिक उथल–पुथलकेँ प्रत्यक्षदर्शी बनै छै आ खेलक माध्यमसँ ओहिकेँ सिर्जनात्मक साँचामे ढालै छै । मने बच्चाक मनोचेतनाक अन्तर यात्रा नइ कएनिहार एहन नाट्य सिर्जना नइ कऽ सकैए । प्राध्यापक परमेश्वर कापड़िक ई कृति हुनक परिवेशगत विशिष्टता आ बालचेतनाक अन्तर अध्येताक सिर्जन प्रतिफल मानल जएतनि ।

तेसर नाटक ‘लील्लामे गील्ला काण्ड’ । मिथिलाक पारम्परिक खेलमे धार्मिक मीथक अद्भूत प्रयोग भेल अछि । राम, सीता वा रावणसन चरित्रकेँ बालमन बुझैत अछि लीलाक माध्यमसँ । लीलामे वर्णित पात्रकेँ अनुकरण करबाक क्रममे नाट्यरुप ग्रहण करैत अछि । आ ओ पात्रसभ समाजक समकालीन चरित्रकेँ स्थापित करैत अछि । समाजिक अवस्थिति, विद्रुपता, आ विडम्वनापर बाल नाटकक माध्यमसँ मारुक प्रहार होइत अछि । विकृतिजन्य विषयकेँ सेहो अत्यन्त सहजताक सँग प्रक्षेपित करैत अछि आ समाज गलत परम्परापर व्यंग्य करैत अछि । धार्मिक मीथक सजीव, सहज आ नव भावभूमिमे व्याख्या भेल अछि अहि नाटकमे । अहि बालनाटकमे स्त्री विमर्शक बात हएब चकित करै छै । अपना आङ्नमे महिला हिंसा अनेको रुप देखैए बच्चासभ । पुरुष आ महिलाप्रतिक सामाजिक आ पारिवारक दृष्टिकोणक ओ प्रत्यक्ष अनुभूति करैए । ओकरा सभमे अक्रमकता आ सहनशीलताक मनोविज्ञान ओहि तरहें निमार्ण होइ छै अथवा विद्रोह सेहो ओएह रुप छै जे सामान्यतः पुरुषवादी समाज निर्धारण कएने छै । करुण आ छटपटी छै जाहिमे संधर्षसँ बेसी निरिहता छै । इएह छै मिथिलाक नारीक अवस्था । ताहूमे निम्नवर्गिय परिवारक नारी तँ आओर ही्रसक पुरुषक सामना करक लेल वाध्य अछि । अहि यथार्थकेँ अत्यन्त सहजताक सँग धार्मिक मीथ आर आम प्रर्दशनक माध्यमकेँ नाट्य अर्थात लीलाक माध्यमे प्रकटीकरण भेल अछि ।

प्रा. परमेश्वर कापड़िक साहित्यकेँ बुझबाक लेल आवश्यक भऽ जाइत छै जे पाठक आ कि दर्शक लोक मर्मज्ञ हुअए । लोक आचार–विचार आ कि संहिता नइ बुझनिहारक हेतु हुनक साहित्य बुझबामे दुरुहता अनुभूति हेतै । मिथिलाक बच्चाक बात करी तँ खेल, गीत, फकड़ा आ कथा–पिहानीसँ सीधा संगति होइत छै । आधुनिक जीवनक सांस्कृतिक प्रदुषणक प्रभाव किछु वर्ष पहिने धरि मिथिलाक निम्न वर्गिय समुदायक आङ्गनमे प्रवेश नइ कएने छलै । एहनमे ओहि आयुमे प्रविष्ट कएल विषय–प्रसंङ्ग सदैवक लेल मनोमष्तिष्कमे सुरक्षित रहि जाइत छै । बालमनकेँ अत्यन्त जिज्ञासु कहल गेलैए । ओ सम्पूर्ण कथापात्रकेँ बुझबाक आ अपनहिं ढंगसँ विशलेषण् करबाक हेतु प्रवृति रहैए । अहि नाटकमे ओहि समयकेँ ओ यथार्थपरक ढंगसँ पकड़लनि अछि । बच्चाक सिर्जन संसारकेँ बुझबाक आ ओहिकेँ गहींरगर अन्वेषण माध्यमसँ नाट्य सिर्जन करबामे ओ सफल भेलाह अछि ।

अहि सङ्ग्रहक चारि गोट नाटकक परिवेश, पात्र, चरित्र, आ कथोपकथन, दृश्यवन्धमे खास नविनता आ विविधता नइ अछि । नाटककार नाटक अन्त करबाक हड़बड़ीमे छथि । विषय क्रम अहिं तरहें अबै छैक जेना एक्के नाटकक चारि टा दृश्य होइक । नाटक संरचनाक स्तथर परम्परासँ पृथक तँ नइ अछि मुदा समाजिक मूल्य आ विघटनक अवस्थाकेँ नव अर्थ जरुर प्रदान करैए ।

कोनो नाटककेँ सम्प्रेषणीयताक हेतु विभिन्न नाट्य तत्वक प्रयोग होइत छैक । मुदा नाटककार कथ्यकेँ नाट्य रुप देबाक क्रममे संवादकेँ आधार बनौलन्हि अछि । बच्चा शरीर क्रियाक माध्यमसँ बहुतरास अभिव्यक्ति देबऽमे सक्षम रहैत अछि । बहुतो खेलमे शरीर भाषाक उन्नत रुप देखल जा सकै छै । अहि नाटकसभमे खेलक मौलिक रुपकेँ भितरमे नाट्य अवस्थितिक निमार्ण आ कथ्यकेँ संयोजित करबाक प्रयत्न होएबाक चाही छलै जे नाटककेँ अओर कलात्मक, प्रभावकारी आ शिल्पगत नविनता दिस लऽ जइतै।

नाटकमे सभसँ बेसी बहश हुअऽवला पक्ष अछि संवाद । संवाद कहबाक नाट्यकारक अपन विशिष्टता छन्हि । अहि परिवेशक ओ मात्र अवलोकनकर्ता नहि भोक्ता छथि । तें भाषाक स्तरपर ई नाटक मैथिलीक सुच्चा नाटक बनल अछि । कोनो बातक ग्रहण करबाक आ प्रक्षेपण करबाक मौलिक रुप आ भाषा छै । प्रशिद्व नाटककार महेन्द्र मलंगिया छोट–छोट संवाद आ शक्तितशाली पात्रोचित भाषा गढ़िकऽ मैथिली नाटककेँ उच्चता प्रदान केलन्हि । ई कहब अनुचित नइ जे हुनक परवर्ती बहुतरास नाटककारपर मलंगियाक संवादशैलीक प्रभाव छै । कापड़िजीक पात्र ओहिना छोट–छोट मुदा शक्तिशाली संवादक माध्यमसँ नाटककेँ प्रभावकारी बनबैत छथि ।

नाटकक संवादकेँ रुपमे किछु एहन शव्दकेँ प्रयोग भेलैए जकरा गाड़ि कहल जाइ छै । मैथिली समाज आ शव्दकोषमे ओ शव्द गाड़िक रुपमे चिन्हित अछि । मुदा ई पहिल बेर नाट्यकार परमेश्वर कापड़ि मात्र प्रयोग केलन्हि से बात नइ छै । सभ्य समाज आ ऐ समाजक रुचि– अरुचि साहित्यक मापदण्ड एकटा खास खण्डमे निर्धाित करैत रहलै । मुदा साहित्यक मर्यादाक नामपर ओहि परम्पराकेँ ढोइत रहबाक प्रयोजन समाप्त भऽ गेल छै । तखन प्रशन ई जरुर छै जे पात्र, परवेश, कथ्य आ घटनाक्रम नाट्यभाषाक निमार्ण कऽ रहल छै कि नाट्यकार । जे नाटककार कथित अपशव्द बलात नाटकमे लएबाक प्रयत्न करै छै तँ ओ दोष जरुर छै । मुदा विशिष्ट नाटकीय अवस्थामे विशिष्ट नाटकीय भाषा मात्र नाटककेँ मुखर आ सान्दर्भिक बनौतै । अहि नाटकक पाठक आ नाट्यदर्शक भाषाक समूचित कि अनुचित ? अहि पर वहश विवेचन करए ।

नेपालक समकालीन मैथिली साहित्यमे लेखन गति अत्यन्त सुस्त अछि । तेहनसन अवस्थामे कापड़िजीक नाट्य सङ्ग्रह अहि भाषाक नाट्य परम्परा आ विकासक्रमक एकटा कड़ीक रुपमे खास महत्व राखत । अहि नाटकक मञ्चन अखनधरि नइ भऽ सकब निश्चित रुपें दुर्भाग्य अछि । मैथिली भाषी क्षेत्रमे बहुतरास नाट्य संस्था सक्रिय अछि, जाहि संस्था सभक लेल ई नाटक अत्यन्त उपयोगी भऽ सकै छलै । आबहु संस्था सभकेँ प्रर्दशन दिस आकृष्ट होएबाक चाही खास कए बहुतरास निजी आ सरकारी विधालय सभ अखनो शिक्षाक नामपर अत्यन्त धोकन्त विद्या दिस उन्मुख अछि । विद्यार्थीक समग्र वौद्विक विकासक हेतु सिर्जनात्मक चेतनाक विकास कतेक अपरिहार्य छै से बुझि अहि नाटक सभकेँ विधालय सभमे प्रर्दशनक उचित व्यवस्थापन कएल जा सकैत अछि । प्रर्दशन नाटककेँ पूर्णता प्रदान करै छै मुदा प्रर्दशनक मुहतक्कीमे नाटक लेखनपर विराम नइ देल जा सकै छै । नाट्यपाठ सेहो साहित्यक अन्य कोनो विधासँ प्रभावकारी आ संवेदनशील सिर्जन भऽ सकै छै । तें नाट्य लेखनक कोनो तरहक अवरोधकेँ अस्वीकार करैत सिर्जनशील सक्रियताकेँ स्वीकारल जाए । हम नाट्यकारक नाट्य विधामे निरन्तर सक्रिय लेखनक अपेक्षा रखैत मैथिली बाल नाट्य साहित्यकेँ श्रीवृद्विमे हुनक योगदान होइत रहए से कमना सेहो करब ।

अन्तमे महाकवि विद्यापति पाण्डुलिपी पुरस्कारसँ पुरस्कृत चौआरि नाटक सङ्ग्रहक पाण्डुलिपीक हेतु हार्दिक वधाइ । ई पोथी मैथिली नाट्य संसारमे जरुर आदर पाओत ताहि अपेक्षाक सँग ।

[रमेश रञ्जन नेपाल सङ्गीत तथा नाट्य प्रज्ञा–प्रतिष्ठान, कठमाण्डूक प्राज्ञ परिषद सदस्य छथि । ] ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com  पर पठाउ। ३. पद्य ३.१.१.जगदीश चन्द्र ठाकुर ‘अनिल’-भक्ति गजल २.डाॅ. शि‍व कुमार प्रसाद केर तीन गोट कवि‍ता ३.२.अमित मिश्र- ६ टा भक्ति गजल ३.३.१.मिहिर झा-भक्ति गजल २.बिन्देश्वर ठाकुर-भक्ति गजल/ गजल१-२ ३.रामवि‍लास साहु जीक दूटा कवि‍ता ३.४.पंकज चौधरी (नवलश्री)- भक्ति गजल-१-३ ३.५.इरा मल्लिक-भक्ति गजल १-४ ३.६.१.राजदेव मण्‍डलक तीन गोट कवि‍ता २.जगदीश प्रसाद मण्‍डलक गीत ३.मनोज कुमार मण्‍डल- नहि त'अ ई बहि चलत ३.७.१.जगदानन्द झा 'मनु'- भक्ति गजल १-५ २.नवीन कुमार ‘आशा’- हनीमून ३.८.१.बृृषेश चन्द्र लाल- कहिआधरि ढुनैत रहब ! २.कामिनी कामायनी- ई केक्कर शोणित ?/खिड़की/भरोस ३.मुन्नी कामत जीक दू गोट कवि‍ता १.जगदीश चन्द्र ठाकुर ‘अनिल’-भक्ति गजल २.डाॅ. शि‍व कुमार प्रसाद केर तीन गोट कवि‍ता १ जगदीश चन्द्र ठाकुर ‘अनिल’ भक्ति गजल गीता वेद पुराण बुझै छी कण कणमे भगवान बुझै छी तों विपत्तिमे दौगल अएलें हम तोरे हनुमान बुझै छी जकरा ल’ग विवेकक धन छै हम तकरे धनवान बुझै छी सभ नारीकें नमन करी हम परधन बालु समान बुझै छी घूस लेब आ देब कथू ले’ हम अपनहि अपमान बुझै छी सत्यक खातिर लडय स्वयंसं हम ओकरे संतान बुझै छी २ डाॅ. शि‍व कुमार प्रसाद केर तीन गोट कवि‍ता- खेबैया सबहक नाॅकेँ भेटल खेबैया बि‍नु खेबैया हमरे नाॅ अछि देखू पार आब केना लगैत अछि‍ बि‍नु खेबैया हमरे नाॅ अछि। कि‍नको टाका पार लगौतन्‍हि‍ कि‍नको नेता पार लगौतन्‍हि‍ अपन-अपन बाँस भि‍रौने बहुतो पार उतरलौ जाइ छथि‍ बि‍नु खेबैया हमरे नाॅ अछि‍। दूर-दूर धरि‍ नजरि‍ खि‍रौने ताकि‍ रहल छी आँकि‍ रहल छी कि‍नका पछुऔने पार लगत नाॅ कि‍यो संगी नै भेटि‍ रहल अछि‍ बि‍नु खेबैया हमरे नाॅ अछि‍। कि‍नको बड़का पैघ हबेली कि‍नको बड़का पागक डौड़ही कि‍नको सार कि‍नको मामा धोती जि‍नक अकास सुखाइत अछि‍ बि‍नु खेबैया हमरे नाॅ अछि‍। माय हमर नव कुम्‍भ नहेली माय हमर नव कुम्‍भ नहेली नै हुनका मन पापक गेठरी नै हुनका मन बाँझक धोकरी नैना-भुटुकाक साँस हास सन जि‍नगी भरि‍ ओ खूब नहेली माय हमर नव कुम्‍भ नहेली। नै कहि‍यो ओ चानन केली नै कहि‍यो संन्‍यासि‍न भेली गि‍रहस्‍थीकेँ स्‍वर्ग बूझि‍ ओ कर्मक संग प्रभु गुण गेली माय हमर नव कुम्‍भ नहेली। नै ओ ि‍वदुषी नै ओ सुन्नरि‍ नै आडम्‍वरी नै कनसोही बाट-बटोही सभ जन हि‍नका मनुक्‍ख रूपमे भेटल सि‍नेही माय हमर नव कुम्‍भ नहेली। मन प्रयागमे त्रि‍वि‍ध तापकेँ कर्मक हूलासमे अपन गर्वकेँ अपन मनोरथ परक दुखमे आजीवन ओ डुमौने रहली माय हमर नव कुम्‍भ नहेली। देख एलौ हम पटना हलसल-फुलसल बसमे बैस कऽ पहुँचि‍ गेलौं हम पटना देख एलौं हम पटना। भरि‍ रस्‍ता हम उड़ि‍ते गेलौं राति‍क नीन भेल सपना केतबो गुहारि‍ देव-गोसाओनकेँ मन पड़ैत छल फेकना देख एलौं हम पटना। बाप जनम नै देखने छलौं एहेन मनुक्‍ख जंगल भोजे बेरमे पहुँचि‍ गेल ओ पपि‍आहा घर-घुसना देख एलौं हम पटना। चोर-उच्चका डेग-डेगपर भीड़ देखि‍ कऽ जी उड़ैत छल बाहर-भीतर जाएब कठीन छल बेथाक नाओं अछि‍ पटना देख एलौं हम पटना। हुनकर बात काटि‍ हम एलौं बाल-बोधकेँ छोड़ि‍ कऽ एलौं नेताजी कि‍ बात बनौता मोन रहत ई घटना देख एलौं हम पटना। मन होइत अछि‍ उड़ि‍ कऽ पहुँचि‍ जाइ अपन सोहागक अंगना। मेटा रहल अछि‍ झँपा रहल अछि‍ अपन परि‍चि‍ति‍ देख एलौं हम पटना। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। अमित मिश्र ६ टा भक्ति गजल 1

भाँग खा कोना नशेरी भेलौं अहाँ भूत सन तन अपन कोना केलौं अहाँ

साँप माला साजि बसहा बुढ़बा लऽ यौ तीन लोकक नाँप कोना लेलौं अहाँ

विषकें पी नीलकण्ठी छी बनल यौ होश दैवक उड़ल से जीयेलौं अहाँ

तीन नैनक वाण खा जे जरि जरि मरल ओकरो सीधे तँ मोक्षे देलौं अहाँ

दानमे आगू अहाँ छी निर्धन बनल "अमित"कें शिव बिसरि कोना गेलौं अहाँ

फाइलातुन-फाइलातुन-मुस्तफइलुन 2122-2122-2212 बहरे-जदीद

2.

सजल दरबार छै जननी भगत भरमार छै जननी

किओ नै हमर छै संगी खसल आधार छै जननी

भटकि रहलौं जगत भरिमे सगर अन्हार छै जननी

दुखक सागर बनल छी हम सड़ल पतवार छै जननी

दबल छी बोझ तऽर मैया अहींपर भार छै जननी

मफाईलुन 1222 दू बेर सब पाँतिमे बहरे-हजज

3.

लिख रहल छथि पत्र सीता सुकुमारि यौ अपन पाहुन लेल नेहक रस ढारि यौ

उपरमे छै लिखल शादर अछि नमन यौ गामपर हेतै कुशल पूछै छथि सारि यौ

छी अयोध्यामे अहाँ हम जनकपुरमे सहल नै जेतै विरहकें ई मारि यौ

गाम जा गेलौं बिसरि निज पति धर्म यौ जोहि रहलौं बाट डिबिया बारि यौ

सून लागै घर बगैचा काटैत अछि प्राण बिनु तन हमर गेलै हारि यौ

हमर बहिनक हाल सेहो बेहाल अछि भाइ संगे आबि जैयौ दिअ तारि यौ

फाइलातुन-फाइलातुन-मुस्तफइलुन 2122-2122-2212 बहरे-जदीद

4.

डूबि रहलै नैया बीच भँवर मैया काँपि रहलै छाती फेर हमर मैया

थाकि गेलौं तोहर घरक बाटपर माँ तन सकै नै चलबै कोन डगर मैया

तारि देलौं सबकें चरणमे बजा माँ बाज एतै बारी कखन हमर मैया

दानवक दलपर बनि काल टूटि पड़लें थम्हतै कहिया संकटक लहर मैया

जोड़ि कर विनति बस एतबे करब हम "अमित" दिश दे एक्को बेर नजर मैया

फाइलातुन-मफऊलातु-फाइलातुन 2122-2221-2122

5.

लाल रंगक मोहमे फँसलनि हनुमान ते तँ लाले रंग सन बनलनि हनुमान

पवनपुत्रक नाम के नै जानै एतऽ सूर्यकें जहियासँ मुँह रखलनि हनुमान

काँपि रहलै राक्षसी सेना रण बीच प्रेत भूतक काल बनि हँसलनि हनुमान

राम सेवकमे सबसँ आगू हनुमान सुनि कऽ आज्ञा सिन्धुपर उड़लनि हनुमान

जपब चलिसा शुद्ध मोनसँ सब दिन भोर "अमित"पर तखनेसँ बड ढरलनि हनुमान

फाइलातुन-फाइलातुन-मफ ऊलातु 2122-2122-2221

6.

आइ नाँचल मधुवन झूमि राधा संग प्रेममे नाँचल गोपी तँ कान्हा संग

खा कऽ मक्खन खेलथि खेल नटखट चोर साँझ धरि जंगलमे रहि कऽ मीता संग

नाथि देलनि नागक नाँक यमुना जा कऽ माँथपर चढ़ि केलनि नाँच यमुना संग

फोड़ि देलनि चूड़ी तोड़ि देलनि हार जखन रचलनि मोनक रास राधा संग

गायपर बैसल बजबैथ वंशी मधुर कान्हपर चढ़ि घूमथि गाम बाबा संग

फाइलातुन-मफऊलातु-मफऊलातु 2122-2221-2221 ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। १.मिहिर झा-भक्ति गजल २.बिन्देश्वर ठाकुर-भक्ति गजल/ गजल१-२ ३.रामवि‍लास साहु जीक दूटा कवि‍ता १ मिहिर झा भक्ति गजल जटाधारी मनोहारी रमाजोगी  लगैए ई शक्तीधारी गंगाधारी महादेवा  लगैए ई

वरोदाता विषोधाता नटोराजा लगैए ई ब्रिखारूढ़ा गणोराजा भस्माभूता लगैए ई

सदोध्याना हिमोवासा कलाधारी लगैए ई हतोकामा नितोयोगी सदाचारी लगैए ई

महाबाधा महापीडा महातृष्णा हरैए ई मनोलोका अधोलोका नभोलोका लगैए ई

रक्षपूज्या मोक्षदाता गौरीप्रिया लगैए ई दंभविघ्ना शांतकारा ध्यानमग्ना लगैए ई २ बिन्देश्वर ठाकुर भक्ति गजल 

अहीं छी हमर भवानी मैया हम अहाँकेँ मानै छी  करब सभ दिन पूजा पाठ मनसँ हम ई ठानै छी

उजड़ल घर बसाबू माँ एना किए फटकारै छी  राति भरि निन्द नै आबे सदिखन अहाँ लऽ कानै छी

क्षमा करु या सजा दिअ हम तँ अहिंक सन्तान छी अज्ञानी हम पुत्र अहाँके बिधान ने किछु जानै छी 

चिनी लैताह,दूध लैताह कही ने माइ गै बाबूकेँ लड्डु आ पेड़ा हमहुँ बनेबै तै तँ चिक्कस सानै छी 

अहीं जननी, दुख हरनी करु हमर उद्धार हे  शक्ति स्वरुपा जगदम्बे हम अहाँकेँ पहचानै छी

सरल बार्णिक  आखर:१९ गजल १ सब खुशी भेटत बस मन होबाक चाही  सरकारी नोकरी लेल धन होबाक चाही 

जङ्गल उजड़लासँ रोग सभ बढ़लै स्वस्थ रहबाक लेल वन होबाक चाही 

दानव चपेटामे पिसा रहल लोक एतऽ  रावन ला रामक आगमन होबाक चाही

बात बनौलासँ केवल काम कोना चलतै घर सुद्धी करब तँ हवन होबाक चाही

जनताक खुन चुसने नेता जी कहै छथि चुनावमे उपरका सदन होबाक चाही 

सरल बार्णिक  आखर:१६ २

पानसन पातर ई ठोर अहाँके  अहाँ छी चान्द हम चकोर अहाँके 

जुनि घबराउ सभ नीक भऽ जेतै  अहाँ छी राति हम भोर अहाँके 

संसारक गति बदलि जाए मुदा  अमर रहए प्रेमक डोर अहाँके 

समय पैघ बलवान छै अपने  नै चलत ओइ आगू जोर अहाँके 

नै बहाउ नयनसँ आँसू कनियो  मोती सन मोल अछि नोर अहाँके 

सरल बार्णिक  आखर=१३ ३ रामवि‍लास साहु जीक दूटा कवि‍ता- मि‍थि‍लाक पि‍यास मि‍थि‍लाक पि‍यास नै मुझा सकल कोइ जे मुझबैक प्रयासो केलन्‍हि‍ ओ सभ दि‍न ठकि‍ते रहलै मि‍थि‍लाक पि‍यास बढ़ैत गेलै अपन अश्रुकेँ पीबैत गेलै पि‍याससँ मन व्‍याकुल भेलै मि‍थि‍ला तँ मैथि‍ली लेल पि‍यासल मैथि‍ली-रस पीबए चहै छलै से रस कड़ुआएले छलै पि‍यासल मि‍थि‍ला तड़ैप-तड़ैप मैथि‍ली लेल मड़ैत रहलै कहैले मैथि‍ली भाषा सभ जनक भाषा छी मुदा सभ दि‍न अपनेमे झगड़ैत रहलै एक दोसरसँ छुबाइत रहलै तँए मैथि‍लीक वि‍कास नै भेलै मकड़जालमे फँसल रहलै तॅए आइ धरि‍ नै मि‍थि‍लाक पि‍यास मुझलै जाधरि‍ मि‍थि‍लामे मैथि‍ली सभ जनक भाषा नै बनतै ताधरि‍ नै मि‍थि‍लाक पि‍यास मुझतै। कि‍अए छुबाइ छी छुबैसँ जखन छुबाइ छी तँए कि‍ परि‍वर्त्तन देखै छी काज जखन नै छुबाइए देहक लहू पानि‍ नै बनैए नै कि‍नको लकबा मारैए तँ केना छुबाइ छी? पानि‍ छुबाइए मुदा दूध नै पान-मखनसँ मान बढ़ैए चुड़ा-दहीक भोग लगैए भात देखि‍ मुदा मन ओकि‍ऐ भेद-भावक जाल बना मनुक्‍खकेँ मनुक्‍ख नै बुझै छी समाजकेँ कमजोर केना छी एतेक धि‍नौना कुकर्म करै छी तैयो अपनाकेँ पैघ बुझै छी गंगा नहाए पूजा करै छी उन्‍टे कहै छी छुबाइ छी। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। पंकज चौधरी (नवलश्री) भक्ति गजल-१ माय हम आराधक बनल छी सुनु याचना याचक बनल छी बस साधन भेटए आशीष के करी साधना साधक बनल छी सुर-तान के अवगति ने किछु वरदानसँ वादक बनल छी नौग्रहसँ लड़ैत नवरातिमे सप्त्शतिक पाठक बनल छी ममता भरल आँचरि भेटल "नवल" हम बालक बनल छी *आखर-१२ भक्ति गजल-२ श्वेत अछि परिधान माँ हे ठोढ़ पर मुस्कान माँ हे हाथ पुस्तक कमल आसन सजल वीणा तान माँ हे भारती जय माँ भवानी जग करै गुणगान माँ हे बुधि बिना बकलेल सन हम माँगि रहलौं ज्ञान माँ हे क्रोध आलस लोभ भागय दूर हो अभिमान माँ हे "नवल" माँगत आर नै किछु पाबि ई वरदान माँ हे *बहरे रमल / मात्राक्रम-२१२२ भक्ति गजल-३ हम दान मँगै छी माँ निज-मान मँगै छी माँ बस चानक किछु गुण दे नै चान मँगै छी माँ बकलेल बिना ज्ञानक बस ज्ञान मँगै छी माँ हम बेसुर बिनु रागक सुर-तान मँगै छी माँ सुन कोखि हमर जननी संतान मँगै छी माँ बड़ आश "नवल" रखने वरदान मँगै छी माँ मात्रा  क्रम : २२१+१२२२ ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। इरा मल्लिक भक्ति गजल- 1 राखु लाज हमर जगजननी शरण मेँ एलौँ माँ जगतारिणी कानि व्यथा किनका सौँ कहबय दुख हरहु माँ दुखनिवारिणी दृग सौँ झहरै नीर दर्श बिन सुधि लीजै हे माँशोकनिवारिणी नित पूजा नहिँ ध्यान धरय छी चित्त नै थिर हे माँ सुखकारिणी बीच भँवर मेँ डूबि रहल छी धरू पतवार माँ भवतारिणी वर्ण- 12 भक्ति गजल- 2 अहाँ प्रभू केखनो मोहिनी बनलियै तँ केखनो नारद जीकेँ श्राप देलियै अहाँके महिमा अछि अगम अपार केहेन रचना जगत के रचलियै जग के कण-कण मेँ व्यापित अहीँ छी केहन अनुपम इ सृष्टि गढ़लियै गँध मादक मनोरम वन सँपदा तृण सँ सुरभित धरा के सजलियै ऊँच पर्वत नदियाँ समुद्र झरना सत्य शिव रूप सुँदर कहलियै बाल वृध्द जवानी सँ गृहस्थी बसल ममता प्यार सँग करुणा जगलियै आखर-14 भक्ति गजल- 3 माटि तोहर हम लगायब माँ आ टहल-टिकोरा उठायब माँ सुँदर सबरँग फूल तोड़बै ग्रीमहार गूँथि पहिरायब माँ अर्हुल कमल फूल सँ अगबे अहाँक वेणीसाज सजायब माँ चुनि गेँदा चँपा बेलि भरि डालि अँचरी मेँ मुनरी टँकायब माँ जूही गुलाबक मुकुट बनेबै जगजननी दर्शन पायब माँ माँ के अनुपम रूप निहारब रचि गीत मधुर सुनायब माँ आखर- 12 भक्ति गजल- 4 हम किछु नै अहीँ अधार हमर छी अहीँ तँ माए मार-सम्हार हमर छी थिकौँ हम नीच पतित पातकी सुत यै जननी अहीँ रखबार हमर छी अहि दुनियाँक मायाजाल मेँ फसलौँ जानि गेलौँ अहीँ माँ उबार हमर छी बीतल वयस नाम सुमिरन बिन हे करुणामयी माँ पुकार हमर छी मझधार मेँ डूबि रहल मोर नैया उबार करहु पतवार हमर छी तन थाकल मन थाकि रहल अछि तमस भरल मोनक उजियार हमर छी जखन शरण हम अहाँके धेलहुँ सबसे पैघ माँ सरकार हमर छी आखर-14 ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। १.राजदेव मण्‍डलक तीन गोट कवि‍ता २.जगदीश प्रसाद मण्‍डलक गीत ३.मनोज कुमार मण्‍डल- नहि त'अ ई बहि चलत १ राजदेव मण्‍डल जीक तीनटा कवि‍ता- स्‍वरक चेन्‍ह स्‍वर आबि‍ रहल आकाशक कोनो छोरसँ दरद उठि‍ रहल देहक पोरे-पोरसँ अहाँक सोर पाड़ब हम सुनि‍ रहल छी असंख्‍यमे सँ अहाँक स्‍वर चुनि‍ रहल छी टपब खेत-खरि‍हान देश-कोस मनमे अछि‍ मि‍लन केर जोश बि‍यावान झाड़-पहाड़ नदी-नालाकेँ करैत पार पहुँचब एक दि‍न अहाँक पास लगौने छी मनमे आस स्‍वरक चेन्‍ह अछि‍ ठामे-ठाम नै बि‍सरब आब अहाँक गाम कि‍एक भऽ रहल छी अधीर मनमे उठैए रहि-रहि‍ पीर हएत शुभ मि‍लन रहू थीर बरसत एक दि‍न शान्‍ति‍क नीर।‍ सुखक भाय तोड़ि‍ रहल छी फूल गड़ि‍ गेल हाथमे शूल भऽ रहल केहेन स्‍पर्शक सुख हाथमे गड़ल काँटक दुख नै छोड़ि‍ सकैत छी आ ने तोड़ि‍ सकैत छी चलैत जि‍नगीकेँ नै मोड़ि‍ सकैत छी वि‍चारक क्रमकेँ जोड़ि‍ सकैत छी फड़तै अलग-अलग फल कि‍न्‍तु एकेटा उद्गम स्‍थल सुख आ दुख दुनू छी भाय रहत सँगे नै छै उपाय। हएत अगारी सभ खेलै छलै अपन-अपन खेल नै छलै केकरो आपसी मेल सभ चलैत छल अपन-अपन चाल अपने समांगपर फूटै छलै गाल लोकक सिखऔलपर तोड़ैत छल गाल सबहक भेल छलै हाल-बेहाल कतेक प्रयास कतेक नोकसान तब देलक हमरा गप्‍पपर धि‍यान बनल एकता कतेक छान-बान्‍ह बालुक बान्‍ह कोन ठेकान खुश भऽ सभ ठोकए लगल ताल चुप्‍प नेता भऽ गेल वाचाल ओझरा कऽ फँसल ओ लोभक जाल ठाढ़ भऽ गेल कठि‍न सवाल फेर बनलौं एकबेर बकलेल जखैन नेते स्‍वार्थी भऽ गेल पुन: ताकबै खेल रहतै जारी जे नै भेलै से हेतै अगारी। २ जगदीश प्रसाद मण्‍डल वृद्ध केना...... वृद्ध केना भेलि‍ऐ आँइ यौ बौआ वृद्ध केना भेलि‍ऐ। बाटे बहकि‍-बहकि‍ धक बाढ़ि‍ हेललि‍ऐ। वाम-दहि‍न भाँज बि‍नु बूझि‍ सूर भड़लि‍ऐ। वृद्ध केना......। बसि‍ बास पीपही गछि‍या रि‍आइते खि‍या खि‍औलि‍ऐ ि‍नमोछा-नि‍मोछी कहि‍ सुनि‍ आम-कटहर भेलि‍ऐ। बौआ, आम-कटहर......। सात दि‍न सातो जनम बुझि‍यो नै पेलि‍ऐ। तेहने आसो आस पाबि‍-पाबि‍ झखौलि‍ऐ। वृद्ध केना......। वृद्ध-सँ-समृद्ध कहबए समृद्ध समाज सेज सजैए साज श्रंृगार सोल्हो कला वसन्‍त रीति‍ सजबैए। बौआ......। सभ चाहए वसन्‍ती-वसन्‍त धक्का बुढ़ाढ़ी खाइत एलि‍ऐ। गजुआ-बँझि‍या बाँझ-बाँझीन लस-लस्‍सा बनैत रहलि‍ऐ। बौआ, लस-लस्‍सा बनैत रहलि‍ऐ वृद्ध केना......। ३ मनोज कुमार मण्‍डलक कवि‍ता नहि त'अ ई बहि चलत

सुख -दुखक बीच बहैत कर्म सरिता'क नीर जीवनक ई छै सुधा छुधा मेटा लिअ वीर नहि त'अ ई बहि चलत

धारा गतिक अप्पन चाल बदलैत पाबि पवनक आस स्वकर्म सं होएत छै भूचाल लहड़ लहडा लिअ वीर नहि त'अ ई बहि चलत

कर्मवीरक जीवन अमृत कायरक विष पहाड़ कोन ठेकान ई भेटत जीवन लगा लिअ डुबकी अहिमे एकबेर नहि त'अ ई बहि चलत

अनंत फूल सं शोभाए मान महकैत मह -मह हर पल खेलैत काया -कामनिक बेर -बेर अप्पन नयन जुरा लिअ वीर नहि त'अ इ बहि चलत

काल गति एक रंग कर्म -अकर्मक संगे -संग शरीरक श्रम सामान बनल श्रमसाध्य सँ सर्व कल्याण करू वीर नहि त'अ ई बहि चलत ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। १.जगदानन्द झा 'मनु'- भक्ति गजल १-५ २.नवीन कुमार ‘आशा’- हनीमून जगदानन्द झा 'मनु' ग्राम पोस्ट- हरिपुर डीहटोल, मधुबनी भक्ति गजल १.गजल चलि अहाँ कतए किए गेलहुँ मुरारी एहि दुखियाकेँ हरत के कष्ट भारी   तान ओ मुरलीक फेरसँ आबि टारू बिकल भेलहुँ एतए एसगर नारी   द्रोपतीकेँ लाज बचबै लेल एलहुँ नित्य सय सय बहिनकेँ कोना बिसारी

बनि कऽ फेरसँ सारथी भारत बचाबू सभक रक्षक हे मधुसुदन चक्रधारी  

वचन जे रक्षाक देलहुँ ओ निभाबू कहत कोना ‘मनु’ अहाँकेँ हे बिहारी

(बहरे रमल, वज्न – २१२२-२१२२-२१२२)   

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२.गजल

  हे राम बसु मनमे हमर ई प्राण धरि तनमे हमर

सदिखन अहीँक ध्यानमे नै मन बसै धनमे हमर

प्रभु दरसकेँ आशासँ ई भटकैट मन बनमे हमर

एतेक मन चंचल किए प्रभु रहथि कण कणमे हमर

हे राम ‘मनु’पर करु दया नै मन बहै छनमे हमर

(बहरे रजज, मात्रा क्रम २२१२-२२१२)     

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  ३. गजल

अहाँ तँ सभटा बुझैत छी हे माता सुमरि अहाँकेँ कनैत छी हे माता 

दीन हीन हम नेना बड़ अज्ञानी आँखि किए अहाँ मुनैत छी हे माता

अहाँ तँ  जगत जननी छी भवानी तैयो नहि किछु सुनैत  छी हे माता 

श्रधाभाव किछु देलौं अहीँ  हमरा अर्पित ओकरे करैत छी हे माता

नहि हम जानी किछु पूजा-अर्चना जप तप नहि  जनैत छी हे माता

जगमे आबि    ओझरेलहुँ एहेन अहाँकेँ नहि सुमरैत छी हे माता

छी मैया हमर हम पुत्र अहीँकेँ एतबे तँ हम बजैत छी हे माता

(सरल वार्णिक बहर, वर्ण-१३)

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४.गजल

धूप आरती हम अनलहुँ नहि  जप-तप करब सिखलहुँ नहि 

सदिखन कर्तव्यक बोझ उठोने अहाँक ध्यान किछु धरलहुँ नहि 

की होइत अछि माए पुत्रक नाता एखन तक हम बुझलहुँ नहि

हम बिसरलहुँ अहाँकेँ जननी  अहुँ एखन तक सुनलहुँ नहि

अपन शरणमे लऽ लिअ हे माता ममता अहाँक तँ जनलहुँ नहि

(सरल वार्णिक बहर, वर्ण-१३ )

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५.गजल  

निर्धन जानि कऽ छोरि गेलहुँ  माँ      कोन अपराध हम केलहुँ माँ

केहनो छी तँ हम पुत्र अहींकेँ सभ सनेश अहींसँ पेलहुँ माँ  

मूल्यक तराजुमे नै एना जोखू  ममताकेँ  पियासल भेलहुँ माँ

दर-दर भटकि खाक छनै छी दर्शन अपन नै दखेलहुँ माँ

‘मनु’केँ अपन सिनेह नै देलहुँ सोंझाँ सँ दूर आब भगेलहुँ माँ

  (सरल वार्णिक बहर, वर्ण-१२)

२ नवीन कुमार ‘आशा’ हनीमून स्वामी पाओल पुरुषोत्तम राम हुनक हृदये मे बसैत अछि प्राण । विवाहक रातिये सँ हुनक अछि संग ओ छथि कृष्ण आ हम राधा । प्रियतम कहलथि नहि गढ़ेलौंह गलाक हार नहि बढ़ेलौंह अहाँक श्रृंगार नैना-भुटका मे उलझि कय रहलौंह नहि अहाँकेँ विदेश घुमेलौंह हे प्रियतमा--- बाजि उठलाह अनचौके प्रियतम कनी भऽ आबी कहलथि हमरा सँ विआहक पुरे पचासम साल हनीमून पर चलब गोवा ऐ साल किछु तँ बाजु यै प्राण एक बेर तँ खोलू अपन जुआन । तड़प हुनक हृदयक कचोट करि गेल नहि चाहैत आँखि मे नोर भरि गेल । अजबारि देलक ई जीवन जग सँ मोन करैए बाँहि मे समेटी लड़खड़ाइत पग सँ क्षण-क्षण मृत्यु नजदीक देखै छी तइयो ने जानि मोह मे फँसे छी पड़ल छी मृत्यु सज्जा पर हम तखनो नै जानि कविता गढ़ै छी । ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। १.बृृषेश चन्द्र लाल- कहिआधरि ढुनैत रहब ! २.कामिनी कामायनी- ई केक्कर शोणित ?/खिड़की/भरोस ३.मुन्नी कामत जीक दू गोट कवि‍ता १ बृृषेश चन्द्र लाल कहिआधरि ढुनैत रहब !

छोडू कमला आ कोशी कतेक बाढ़िक कथा कहैत रहब, कटान, ढ़हैत मकान आ वएह बलानक कथा  कहिआधरि ढ़ुनैत रहब ?!

बनल नहि बरक्कत एतेक दिनसँ प्रकोप आ प्रताड़नाक बादो बाढ़िमे कहुना जीअलहुँ  बहलहुँ , बढ़लहुँ नहि ! उप्लाकए उढ़रैत माछ खएलहुँ बाढ़ि बान्हि , पकड़लहुँ नहि !! चुप्पे टोलाइत देखैत रहलहुँ बहतैक कखनधरि ,  मुदा, सम्हरलहुँ नहि !!! माथपर हाथ धए  कथा रचलहुँ कटानपर श्लोकपर श्लोक  दहाएल माछक तरानपर लए कोदारि आ बेल्चा  कोशी–कमलासँ न्यायहेतु लड़ए निकलहुँ नहि !!!!

हम महान छी कथामे अपने जगतमे  जनकमे जानकीमे मण्डन आ विद्यापतिमे शंकर आ गंग बजबैत छी बेसाहल पीडाकेँ तप कहि चौपेटि सैंतिकए खूब सजबैत छी नव त्वरित गतिक बदला इतिहासक गतिसँ  हाट–बजार चौक चौबटियामे चिचिआ–चिचिआकए अपनाकेँ भजबैत छी ! लोककेँ मसल्ला भेटि जाइत छैक भुजिभाजिकए खाऽ लैत अछि हमरेसभकेँ आ हमसभ, तैयो ढोल फेर वएह बजबैत छी !!

छोडू कमला आ कोशी कतेक बाढ़िक कथा कहैत रहब, कटान, ढहैत मकान आ वएह बलानक कथा  कहिआधरि ढुनैत रहब ?! २ कामिनी कामायनी- ई केक्कर शोणित ?/खिड़की/भरोस ई केक्कर शोणित ? माझ आँगन मे / बइसल/ सिलबट्टा पर /पिसा रहल छल भांग / हाँकी रहल छलथि गाछी पप्प क/दलान पर/ तापि रहल छथि पतौह जरा क /जुटल नीफिकिर लोग । उमहर /नहू नहू /करिक /समुच्चा खेत खरिहान / कनैत रहल हकन्न /पड़ाईत रहल नवतुरिया / जिल्ला के जिल्ला पा र /समुद्र क पार / नेने माथ पर अपन /स्वप्नक पोटरी/ आ पेट मे /संग्राम करैत /बयालीस हाथ क’ अंतड़ी । टमाटरक चटनी संग /गिड़इत सोहारी / करैत रहले करेज शीतल / भ जाए कीछु पाय /नई रहब परदेश तखन / सपना के महल बनबए ले/ पठबइत रहल /मनियाडर/कटैत रहले  दिवस / बग्गे बानी  /हुलिया /बिगाड़ि /सर्कस क जोकर बनि / करैत रहल/ मनोरंजन सबहक /मुदा असगर मे / बहैत रहलै नॉर के कात करि/शोणित सदिखन / मोंन  पड़े जखन जख़न गाम । ओ हेराइल /भोथियाइल लोक के निर्दोख आंखि स  / झकेत सपना पर /लागि गेल रहैक/ड्कूबा सब हक नजरि/ ओहि पान /मखानक  / जनक/जानकी / गौतम /याज्ञवल्यक / गंडक /बागमती स’ सिंचित /तपोमय /यज्ञ भूमि पर / लागय लागले / कलंकक कारी टीका   / वीभत्स आरोपक /लिखाए लागले /करिया सियाही स/ मिथिला के आजम गढ़ / तखन चित्कार कयने छल मों न / सियासत क शतरंजी चालि/ के बली चढि गेले /ओ सुतल / बिरहा  /नचारी  गबईत/संतोषी मनुख क भूखेल ,पिछड़ल प्रदेश । नब त’ आकाश कुसुम /पुरनको बंद पड़ल/ कल कारख़ाना /मिल /फैक्ट्री / अनेकों आश्वाशनक बादो खुजले नहिं जखन / तखन परदेश मे चिचियाति अरमान / कोन कोन राकस् क /हाथि लागि / बोकरए लागले शोणित / अपराधी ओ युवा / वा हमर घिनौन राजनीति / खेलईत रहल गोटरस/नुकेने मुंह बाउल मे / शूतरमुरगक जका/संकीर्ण /गर्हित जातिवाद्क अड़ मे / जरेत रहलै कुसियारक मधुर खेत । कलपति छथि महाकाल / ने जनम लेबे दिओ / वेद, सांख्यक भूमि पर आतंक्क ज्वालामुखी / हमहू छी गवाह  अप्पन भूमि के / लाल ;पियर धोती / पा ग आ टोपी /दिवाली आ दाहा/ लोटा आ’ बदना /कीर्तन आ अजान / बला माटि पा नि मे / पिछला कतेक दशक स/ विदेशी  आसुरी  शक्ति / किएक बारूद सानि रहल छै/ कराबिओ जांच शीघ्र एकर / दूर फेंकू पोखरी स/सड़ल माछ / महकइत  पानिओ  के सफाई के समय आबि गेलै / जागु सरकार /जागु /बड्ड कष्टकर छै / आतंकवाद के पट्टी माथ पर/ बान्ही क /जीनाए / समय के तकाजा अछि / एहु क्षेत्र के इंसाफ चाहि आब । 2 खिड़की । दिन मे तीन बेर / भिनसर ,दुपहरिआ’ सांझ / खोलि क खिड़की / हेरय छी हमहू दुनिया जहांन के / के कत्त स’ आबि रहल अछि/ के किमहर जा रहल अछि / ओकरा हाथ मे ओ की ? एकरा माथ पर’ ई की ? सूंघय छी हमहू हवा के / पाथने रहेत छी कान / अहि बदलति समय के / बड्ड लग स देखबा के उत्कंठा मे / चाहेत छी जाई /बाहर दूर धरि/ छूबी/ दसो आंगुर स / महसूस करि अहि बदलाव के / मुदा समय एकर अनुमति नहीं दैतै/ बुझल अछि खूब हमारा / मात्र एक गवाह क ‘रूप मे / ठाढ़ छी पल्ला पकड़ने / समय के संग हम / समय के कैद मे । 3 भरोस । बेकल /विह्वल  भरोस / अपना स हारल /समय स मारल / लज्जित /संकुचित /निराशा के गर्त मे धसल / पाबि नहि रहल अछि /जिबा के कोनो ठेकान । केकरा कहतै/आ पतियेते त के / की कहिओ ओकरो पुरखा के जमींदारी छल/ बिन लिखा पढ़ी /कलम दवात् क /बही खाता के / चलैत छलई/कारोबार /खेत स खरिहान  / आ गाछी स बथान धरि के /सोन ,चानी,रूपा / स ऊपर बइसल ईमान /एकरे अग्रज / धेने  अपन पिता  धर्मक ध्वजा दुनु हाथे / क ल जोड़ने लोक चा रहु दिस / निर्बल आ सबल् क मध्य एक गोट मजगुत कड़ी / मुदा हे लॉर्ड मेकाले /ई संताप अहि के देल / हमरा सन मंद बुद्धि वला /दोषी अहीके मानैत छी/ तेहेन शिक्षा के चलन / तार तार भेल हमर आवरण / जे नहीं लिखल गेल बही मे / हेतय कोना सही ? रोमन लिपि मे दस्तखत करे लेल / फड़केत आंगुर / गुरेर क ताकने छल ईमान के जाही दिन / पेटकुनिया देने कोठी के दोग मे धर्म अपन / ध्वजा समेटने /ओसारा पर/बइसल /कल्पैत कुहरेत / भरोस के देखि /शोक स आंखि सदा के लेल बन्न / करि/नब भविष्य के /नब मुहावरा गढ़वा लेल छोड़ि देने छल। ३ मुन्नी कामत जीक दू गोट कवि‍ता- किअए बेटी बनेलहक विधाता? पजेब अछि पएरमे जेकर घ्वनि मघुर अछि मुदा पकर बहुत मजगुत कहैत अछि कि तूँ अजाद छेँ मुदा अछि सीमा कदम-कदमपर। एगो एहेन दिवारक जे बनल अछि; बनु बालु-सिमेंटसँ सोचक दिवार! चाहे आसमानमे उड़ी हम मुदा ओइ दिवारक ऊंचाइ नै खतम होइत अछि आखिर कतेक जनम तक पाछाँ करत ई दिवार! आ कखैन तक हम कहब किअए बेटी बनेलहक विधाता!!! दुनियाँ तबाह भऽ गेल! बाबू किअए एहेन समैक घारा बदललैए सच्चे कहैए छेलैए मुसहरु कक्का “दू हजार बारहमे दुनियाँ तबाह भऽ गेलै! नित अतए अन्याय होइ छै” मनुख-मनुखकेँ मारने फिरै छै आन गोरेक कअ बात छोरह भाय-भाय आ बेटा बापकेँ कोदाइरसँ काटने फिरै छै। अपने घरमे सभ हराएल रहै छै पड़ोसी जकाँ सभ घोसि‍आएल रहै छै नै छै केकरोसँ मेल-मिलान घर-घर नचि‍ रहल छै कोन अभिशाप। अंगनामे तुलसी सुखाएल जाइ छै नारीक लक्ष्‍मी रुप हराएल जाइ छै नै डरै छैय कोइ भगवानसँ नित गिरै छै अपने इमानसँ। ईमानदारी लुप्त भऽ बेइमानी उजागर भेलै झूठक खेती पनपति‍ गेलै मनसँ मन दूर भेलै सच देखहक बाबू यएह छि‍ऐ ठीके दुनियाँ तबाह भऽ गेलै। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। विदेह नूतन अंक गद्य-पद्य भारती १. मोहनदास (दीर्घकथा):लेखक: उदय प्रकाश (मूल हिन्दीसँ मैथिलीमे अनुवाद विनीत उत्पल) मोहनदास (मैथिली-देवनागरी) मोहनदास (मैथिली-मिथिलाक्षर) मोहनदास (मैथिली-ब्रेल) २.छिन्नमस्ता- प्रभा खेतानक हिन्दी उपन्यासक सुशीला झा द्वारा मैथिली अनुवाद छिन्नमस्ता ३.कनकमणि दीक्षित (मूल नेपालीसँ मैथिली अनुवाद श्रीमती रूपा धीरू आ श्री धीरेन्द्र प्रेमर्षि) भगता बेङक देश-भ्रमण मन्त्रद्रष्टा ऋष्यश्रृङ्ग- हरिशंकर श्रीवास्तव “शलभ"- (हिन्दीसँ मैथिली अनुवाद विनीत उत्पल) ऋषि कुमारक पूजा आ फलक उपहार स्वीकार कऽ वनिता हुनका पर्याप्त आत्मसंतुष्ट केलक। संगे-संग अप्पन संग आनल मिष्ठान आ फल सेहो ऋषिकुमारकेँ भेंट केलक। ओ जल्दीसँ ओकरा खाइ लेल अनुरोध केलक। ऋषि ऐ पदार्थ आ फलकेँ खा कऽ अपूर्व सुखक अनुभव केलक। किछु कालक लेल ओ स्वर्गिक आनंदमे डूमि गेल। वनिता सभ हर्षसँ भरि हुनकर आलिंगन केलक आ कतेक रास फल आ भांति-भांतिक मधुर देलक। ऋषि कुमार मधुरकेँ फल बुझि कऽ खा लेलक। किएकि ओ वनमे रहैत कहियो मधुर नै खेने छल, तइसँ ओ ओकर रसास्वादनसँ अनजान छल। भला सदिखन वनमे रहएबला लोककेँ एहन पदार्थक स्वाद लेबाक अवसर कतए अछि। एकर बाद महर्षि विभाण्डकेँ एबाक आशंकासँ डरल वनिता व्रत आ अनुष्ठानक बहाना बना कऽ अप्पन वेड्रापर घुरि गेल। मुदा ऋषि कुमारकेँ गाढ़ालिंगनमे भरि चतुर वनिता हुनका मनमे कामदेवक विजयी दुन्दुभिकेँ बजा देलक। चिरकालसँ सुप्त भावना एक-एक कऽ जागए लागल। ऋषि ओइ वनिता सभक जाइक पश्चात दुखमे डूमि गेल आ इम्हर-उम्हर टहलय लागल। नै नीन, नै चैन, ऋषि कुमार ओइ कमलमुखी वनिताक चिंतनमे डूमल रहल। दोसर दिन शक्तिसंपन्न ऋष्यश्रृंग बेर-बेर ओइ वनिताक संबंधमे सोचैत-विचारैत अपनेसँ ओइ बेड़ा लग पहुँचल जतए वेश्या हुनकर प्रतीक्षा कऽ रहल छल। ऋषि कुमार आकर्षक डोरमे बन्हि अपनेसँ उपस्थित भऽ गेल। वेश्या पहिनेसँ तैयार छल। ऋषिकुमार हुनकर रूपाकर्षणक जालमे फँसि चुकल छल। वनिता सभ अप्पन स्वरमे रस घोरैत बाजल- सौम्य! हमर आश्रमपर चलू। एतए कतेक रास फल-फूल अछि, मुदा ओतए सेहो ऐ पदार्थक कोनो अभाव नै अछि। ई कहि वनिता हुनका अप्पन बेड़ामे बैसा लेलक आ भरि बाट ऋषिकुमारक मनोविनोद करैत अंगक राजधानी मालिनी लऽ आनलक। जीवनमे पहिल बेर ऋष्यश्रृंग कोनो नगरकेँ देखलक। हुनक नगरमे प्रवेश करते इंद्र पूरा जगतकेँ प्रसन्न करैत पानि बरसाएब शुरू कऽ देलक। ऋष्यश्रृंग जेहन विद्वान ऋषि कुमारकेँ वेश्या मालिनी लऽ आनएमे सफल भऽ गेल। हुनका ई सफलता एक-दू दिनमे नै भेटल हएत। एकर एकटा दोसर वृत्तान्त स्वामी अद्वैतानन्दपुरी प्रवचन संग्रह  सच्चिदानन्द प्रकाश (पृष्ठ सं. ३१८) मे भेटैत अछि। रोमपादक माँजल चतुर वनिता कोशीक धारक कात अप्पन शिविर लगा आ पुण्याश्रमसँ किछु दूर रहि ऋषिकुमारक दिनचर्याक सूक्ष्म निरीक्षण करए लागल। ऐ काजमे महीनो लागि गेल। वनिता सभ अप्पन गहन अध्ययनमे देखलक जे तपस्तयारत ऋषिकुमारकेँ जखन भूख लागैत अछि तँ ओ विशेष जातिक गाछक तनामे अप्पन मुँह सटाबैत अछि आ भरपेट ओकर रस चुसि कऽ वापस तपस्यामे बैसि जाइत अछि। वेश्या सभ एकांत पाबि ओइ विशेष गाछ आ रस चूसए कऽ ठाम पर चिन्ह लगा देलक। संगे-संग ओइपर मीठ तरल पदार्थ (संभवत: गुड़) लेप देलक। फेर दूर ठाम ठाढ़ भऽ कऽ ऋषिकुमारक गतिविधिकेँ देखैत रहल। ऋष्यश्रृंग गाछक रसमे किछु दोसरे स्वाद पेलक। ओ अतृप्त भावसँ ऐ तरल पदार्थकेँ चाटए लागल। ई क्रम चलैत रहल। वेश्या आब ऐ तरहक स्वादिष्ट मधुर ऋष्यश्रृंगकेँ खुआबए लागल। आब हुनका पूर्ण विश्वास भऽ गेल जे ऋषिकुमारकेँ स्वादिष्ट मधुरमे आनंद आबए लागल अछि, तखन ओ ऐ क्रमकेँ एकाएक रोकि देलक। ऋष्यश्रृंगकेँ पुछलापर वेश्या बाजल जे ऐ तरहक स्वादिष्ट भोजन बनाबैमे धन लागैत अछि आ ओ धन राजाकेँ एतएसँ आबैत अछि। राजा आब धन नै दऽ रहल अछि। जौं अहाँ राजा लग जाइ तँ धन भेटि सकैत अछि। अप्पन इच्छा पूर्तिक लेल ऋष्यश्रृंग वनिता सभक संग राजा एतए जाइ लेल तैयार भऽ गेल। राजा रोमपाद राजप्रसादसँ बाहर आबि कऽ ऐ महान तपस्वीक अगवान केलक आ पृथ्वीपर माथ टेक कऽ हुनका साष्टांग प्रणाम केलक। फेर एकाग्रचित भऽ ऋषिसँ वरदान मांगलक जे हुनका ऋष्यश्रृंग आ हुनकर पिताश्री महर्षि विभाण्डक असीम कृपाक प्रसाद भेटए। राजाकेँ शंका सताबए लागल जे कपटसँ ऋषिश्रृंगकेँ मालिनी आनए लेल जौं महर्षि विभाण्डक हुनकापर रूष्ट भऽ जाएत तँ राजाक कल्याण नै अछि। फेर ऋषिकुमारकेँ अप्पन अंत:पुरमे आनि कऽ अप्पन पालिता कन्या शान्तासँ हुनकर बियाह कऽ देलक। ऐ शुभ काजसँ राजपरिवार आ प्रजामे प्रसन्नता पसरि गेल। इम्हर जखन महर्षि विभाण्डक अप्पन आश्रम घुरल तँ अप्पन पुत्रकेँ ओतए नै देखि बेचैन भऽ गेल। हवन सामग्री इम्हर-उम्हर पसरल छल। आश्रममे बाढ़नि धरि नै लागल छल। लता आ गाछ टूटल छल आ पात सभ इम्हर-उम्हर बिखरल छल। आश्रमक मृग शावक आब उछलि नै रहल छल। ओ पूरा जंगल ताकि लेलक मुदा ऋषिकुमारक कोनो पता नै चलल। की कोनो राक्षसक माया छी। ओ तपस्यामे विघ्न-बाधा दैक ताकमे रहैत अछि। महर्षि दुख आ क्रोधसँ भरि उठल। ओ ध्यानस्थ भऽ बैसि गेल आ ध्यानमे सभटा चित्र आबैत गेल। अंग नरेशकेँ दंडित करै लेल ओ मालिनी दिस प्रस्थान केलक। ओ नदी आ गाम-घर पार करैत आगू बढ़ल जा रहल छल। उम्हर राजा रोमपाद सेहो शंकित छल जे पुत्रकेँ नै देखि महर्षि विभाण्डक क्रोधक अग्नि जौं धधकि उठल तँ अनर्थ भऽ जाएत। मंत्रीसँ सलाह कऽ राजा ई प्रबंध केलक जइसँ महर्षिक क्रोध शांत भऽ जाए। एकरा लेल राजा जंगलसँ लऽ कऽ राजधानी धरि सभटा बाटपर एक सएसँ बेसी दुधारू गायक संग ओकर ग्वालकेँ सेहो ठहरा देलक। ग्वालसँ कहल गेल जे महर्षि विभाण्डक ऐ बाट देने आबैबला अछि। हुनकर भरपूर स्वागत-सत्कार करब आ कहब जे ई खेत, ई गाय-बड़द सभटा अहाँक पुत्रक संपत्ति अछि। हम सभ अहाँक अनुचर छी, हमरा आदेश दियौ जे हम सभ अहाँक लेल की करी। एहन कहि-सुनि सभ तरहसँ मुनि विभाण्डक क्रोधकेँ शांत करबाक प्रयास कएल गेल। रोमपाद अप्पन योजनामे सफल रहल। क्रोधसँ मुनिक आँखि लाल भऽ रहल छल, एना लागैल छल जे ओ रोमपादकेँ जरा कऽ भस्म कऽ देथिन। मुदा बाट भरि ग्वाल सभ हुनका दूध आ दोसर दुग्ध पदार्थ (दही, घी, पायस, तक्र आदि) सँ खूब स्वागत केलक आ सभटा गोधन आ खेतकेँ हुनकर पुत्रक संपदा बता कऽ हुनकर क्रोधकेँ शांत कऽ देलक। रोमपादकेँ राजभवन पहुँचैत विभाण्डक ऋषिक क्रोधाग्नि ममता आ प्रेममे बढ़ि गेल छल। राजाक अपूर्व सत्कारसँ ओ धन्य भऽ चुकल छल। ओ देखलक जे हुनकर पुत्र ऋष्यश्रृंग राजभवनमे ओना विद्यमान अछि, जेना अमरावतीमे इंद्र। हुनका बगलमे राजा रोमपादक राजकुमारी शान्ता ऋष्यश्रृंगक स्त्री विराजल छल, जेना इंद्रक संग शची। ऐ शोभाकेँ देखि विभाण्डक रोम-रोम पुलकित भऽ उठल। ओ राजा रोमपादकेँ आशीर्वाद देलक आ राजाक इच्छाकेँ पूर्ण करबाक आदेश अप्पन पुत्रकेँ देलक। संग-संग इहो कहलक जे एकटा पुत्रक प्राप्तिक बाद वन घुरि आएब। ऋषिश्रृंगक ई कथा महाभारत वनपर्वमे लोमश ऋषि सुनौने छल। 5 अप्पन पुत्र ऋष्यश्रृंग लग पहुँचि विभाण्डक बड़ प्रसन्न छल आ हुनकर उत्कर्ष  देखि कऽ हर्षोत्फुल छल। राजा सेहो हुनकर सत्कारमे कमी नै केलक। मुदा महर्षि राजमहल परिसरमे रहबाकेँ उचित नै बुझलक। हुनका सघन वन आ गुफा चाही जतए ओ निर्विघ्न ध्यान, तप, व्रत, अनुष्ठान आदि कऽ सकए। राजा रोमपाद हुनकर इच्छाक सम्मान करैत मालिनसँ पश्चिम मेरूक पर्वतपर हुनकर आश्रम बना कऽ हुनकर रहैक व्यवस्था कऽ देलक। ई महर्षि विभाण्डक अस्थायी आश्रम छल। ई स्थल वर्तमान भागलपुरसँ ४२ किलोमीटर पश्चिम आ वरियारपुरसँ छह किलोमीटर दक्षिण-पश्चिम कोनपर छल। ई ऋषिकुंड वा ऋष्यश्रृंग आश्रमक नामसँ प्रसिद्ध मरूक पर्वत या भैरा पहाड़ीसँ बनल गोलकार घाटीमे स्थित छल। ऐ आश्रमक लग एकटा पोखरि छल जे ठार आ धीपल रुाोतक एकटा समवाचित जलराशि छल। ओइ पोखरिक उत्तर दिस ध्यान स्थली अछि जतए ऋषि ध्यान लगाबैत छल। कजरा रेलवे स्टेशनसँ बारह कि.मी. दक्षिण स्थित ई पहाड़ ऋष्यश्रृंग पर्वतक नामसँ प्रसिद्ध अछि। एखन ई ठाम पर्यटकक लेल आकर्षणक केंद्र अछि। मालिनीमे वृष्टि यज्ञ आ पुत्रेष्ठि यज्ञ मालिनीमे रहि कऽ ऋष्यश्रृंग राजा रोमपाद आ हुनक विद्वान मंत्रीसँ अंग देशमे अनावृष्टि आ सूखासँ प्रजाकेँ बचाबैक लेल उपायपर विचार-विमर्श केलक। एकर संगे ऐ देशमे उपलब्ध जल-संसाधनक समुचित उपयोगक संबंधमे सेहो मंत्रणा केलक। ओ मालिनीमे वृष्टि यज्ञ केलक जइसँ राज्यमे दीर्घकाल धरि अकाल नै पड़ए। आजुक चम्पानाला ओइ ऋषिश्रृंगक गहन पर्यवेक्षणमे तैयार कएल गेल हएत जकर उपयोगिता साढ़े सात हजार बरख बादो सिद्ध अछि। काल बितैत गेल। राज्यमे वर्षा हुअए लागल। प्रजा धन-धान्यसँ संपन्न हुअए लागल। आब शान्ता एकटा सुनर आ स्वस्थ पुत्रक जन्म देलक, जकर नाम सारंग राखल गेल। संपूर्ण राज्यमे आनंदक लहरि छा गेल। एक दिन शान्ता अप्पन पतिदेव ऋष्यश्रृंगसँ सविनय अप्पन मनोरथ कहलक। ओ बाजल जे हुनका कोनो भाय नै अछि, तइसँ हुनकर माता-पिता बड़ दुखी रहैत छन्हि। हुनकर दुखसँ हम बेचैन रहैत छी। शान्ता साग्रह केलक जे अहाँ एहन कोनो उपाय करू जे हमरा एकटा भाय भऽ जाए। विद्वान ऋष्यश्रृंग चिंतन कऽ कहलक जे ओ विधिपूर्वक ब्रह्मचर्य व्रतक पालन कऽ वेदक अध्ययन केने अछि। ओ पुत्रक  निमित्त अप्पन ससुर महाराज रोमापादक पुत्रेष्ठि यज्ञ कराएत। ऐ यज्ञक प्रधान देवता इंद्र रहत। ओ महाराजकेँ यशस्वी पुत्र प्रदान करत। शान्ता हर्षोत्फुल भऽ उठल। ओ यज्ञ संपादनक सूचना अप्पन माता-पिताकेँ देलक। राजा रोमपाद कतेक रास वेदज्ञ पंडितकेँ बजा यज्ञक संपूर्ण तैयारी केलक। कतेक रास राजा-महाराजा आमंत्रित कएल गेल। ऐ मे राजा रोमपादक परम मित्र अयोध्या नरेश दशरथ सेहो हएत। बड़ धूमधामसँ यज्ञ संपन्न भेल। एकर तत्काल फल सेहो भेट गेल, इंद्र प्रसन्न भऽ राजाकेँ पुत्रवान हेबाक वरदान देलक। रानी गर्भवती भेल आ समय एलापर एकटा पुत्रकेँ जन्म देलक। माता-पिता ओइ शिशुक नाम चतुरंग राखलक। अंग देशक राजाक वंशावली, जे चतुरंगसँ शुरू भऽ महाभारत कालक कर्ण धरि जाइत अछि, ओ निम्नलिखित अछि- रोमपादक पुत्र चतुरंग, चतुरंगक पुत्र पृथुलाक्ष आ पृथुलाक्षक चम्पा नामक पुत्र भेल, जे चम्पानगरी बसौने छल। चम्पाकेँ हर्यंग नामक पुत्र आ हुनकर पुत्र भेल भद्ररथ, भद्ररथकेँ वृहद्रथ आ वृहद्रथकेँ वृहत्कर्मा नामक पुत्र भेल। वृहत्कर्माकेँ वृहदभानु, वृहदभानुकेँ वृहन्मना आ वृहन्मना संजयद्रथक जन्म भेल। जयद्रथकेँ ब्राह्मण आ त्रिय संयोगसँ उत्पन्न भेल स्त्रीक गर्भसँ विजय नामक पुत्रक जन्म भेल। विजयकेँ धृति, धृतिकेँ धृतव्रत, धृतव्रतकेँ सत्कर्मा आ सत्कर्माकेँ अधीरथ नामक पुत्र भेल। यएह अधीरथ नहाइ लेल गंगा तटपर गेल रहथि जिनका पिटारमे सुरक्षित राखल एकटा बालक  भेटल छल। ऐ बालककेँ पृथा (कुंती) जन्म देलाक बाद गंगामे बहा देने छल, जेकरा अधीरथ पुत्रक रूपमे ग्रहण केने छल। ई बालक कर्ण भेल जे महाभारतक सुप्रसिद्ध महारथी छल। कर्णक पुत्र वृषसेन। १७ अंग नरेशक एतबेटा वंशावली पुराणमे उपलब्ध अछि। -------------- तृतीय परिच्छेद अयोध्यामे अश्वमेध आ पुत्रेष्ठि यज्ञ अवध नरेश राजा दशरथक राजधानी अयोध्या छल। ई नगरी सरयू धारक कातमे बसल अछि। ई प्रचुर धन-धान्यसँ संपन्न, सुखी आ बड़ समृद्धशाली छल। अयोध्या सभ लोकमे विख्यात छल। एकरा महाराज वैवश्वत मनु बसौने छल। हुनके पुत्र छल इक्ष्वाकु, जिनकर तीन शक्तिशाली पुत्र (विकुक्षि, निमि आ दण्डक) मे विकुक्षिक वंशमे दशरथ एकटा चक्रवर्ती सम्राट छल।1 वाल्मीकीय रामायणक अनुसार, ई महापुरी बारह योजन नम्हर आ तीन योजन चौड़ा छल। अयोध्यासँ दोसर जनपदमे जाइ लेल जे बड़ प्रशस्त आ चौड़ा राजमार्ग छल, ओकर दूनू कात कतेक रास सघन गाछसँ आच्छादित हेबाक कारण ओइ कालक दोसर मार्गसँ अप्पन फराक पहचान बना रहल छल। अयोध्यामे कतेक रास बाजार छल। ई सभ तरहक यंत्र आ अस्त्र-शस्त्रसँ संचित छल। अप्पन नामक अनुसार ई युद्धमे पराजित होइबला नगरी नै छल। एतए ऊँच-नीच अट्टालिका छल, जकर ऊपर ध्वज लहरा रहल छल आ गुंबदपर शतध्नि (तोप) लागल छल। सुरक्षाक दृष्टिसँ अयोध्या अजेय छल। ओकर चारू कात गहींर खधाइ छल, जेकरा लांघब बा पार करब कठिन छल। नगरमे कतेक रास सांस्कृतिक कार्यक्रम लेल नाटक मंडल छल। ओकरामे स्त्रिये टा नृत्य आ अभिनय करैत छल। चारू कात आमक गाछ छल। नगरमे कतेक रास कूटागार (नुकायल घर आ स्त्री क्रीड़ा घर) छल। राजा दशरथ ऐ संपन्न नगरमे रहि कऽ अप्पन प्रजाक पालन करैत छल। रामायणमे अयोध्यापुरीक वर्णन आ राजा दशरथक शासनकालमे अयोध्या लोकक उत्तम स्थिति अवलोकन करैमे आदि कवि वाल्मीकि कोनो तरहे कृपणता नै कएने अछि।2 रामायणक अनुसार अयोध्यामे कत्तौ कामी, कृपण, क्रूर, मूर्ख आ नास्तिक मनुख देखबामे नै भेटैत अछि। सभ लोक धर्मशील, संयमी, प्रसन्न, शीलवान आ सदाचारी छल। सभ लोक कुंडल, मुकुट आ पुष्पहार धारण करैत छल आ हुनकर अंग चंदनक लेप आ सुगंधी संयुक्त छल। एतुक्का सभ लोक श्री संपन्न, रूपवान आ राजभक्त छल। इंद्रक अश्व उच्चैश्रवाक तरहे काम्वोज आ वाह्लीलक देशमे उत्पन्न भेल शक्तिशाली अश्व आ सिंधुनदमे पालल दरियाइ घोड़ा अयोध्यामे भरल छल। विन्ध आ हिमालय पर्वतमे जन्मल मत्त गजराज सेहो बड़ संख्यामे अयोध्याक शौर्यक अनवरत वृद्धि करैत छल। अयोध्या सभ तरहेँ सुरक्षित छल। एतए आबि कऽ केकरो लेल युद्ध करब असंभव छल, तइसँ ई पुरी अयोध्या सत्य आ सार्थक नामसँ प्रकाशित होइत छल। ऐ यशस्वी राजा दशरथक राजकीय काजक संपादन लेल मंत्री-परिषदमे आठ मंत्री छल, धृष्टि, जयंत, विजय, सुराष्ट्र, राष्ट्रवर्धन, अकोप, धर्मपाल आ सुमन्त। सुमन्त अर्थशास्त्र उद्भट विद्वान छल। एकरा संगे महर्षि वशिष्ठ आ वामदेव, महाराज दशरथक दूटा विद्वान ऋत्विज (पुरोहित) छल। एकर अलावा, सुयश, जावलि, काश्यप, गौतम, दीघार्य, मार्कण्डेय आ कात्यायन जेहन तपायल ऋषिक दरबारमे मंत्रीपद प्राप्त छल।3 ऐ महर्षिक संग कौशल नरेशक पहिलुका परंपरागत ऋत्विज सेहो मंत्रीक कार्य करैत छल। सभ तरहेँ ताकत भेलाक बादो राजा पुत्र विहीन छल। हुनकर तीनटा रानी छल। मुदा, सूर्यवंशकेँ चलाबै बला कोनो पुत्र नै छल। राजा मंत्रसँ मंत्रणा कऽ पुत्र प्राप्तिक लेल अश्वमेघ यज्ञक अनुष्ठान करबाक विचार केलक। वेद विद्याक पारंगत विद्वान ऋषिमे श्रेष्ठ सुयश, वामदेव, जावलि, काश्यप, वशिष्ठ सभकेँ ससम्मान बजा कऽ नरेश अप्पन मंतव्य देलक। दशरथ अप्पन इच्छा व्यक्त केलक जे शास्त्रोक्त विधिसँ पुत्र प्राप्तिक लेल अश्वमेघ यज्ञसँ भगवानक भजन करब हुनका लेल एकमात्र उपाय अछि। वेदज्ञ पंडित एकर अनुमोदन केलक। राजा दशरथ व्याकुल भऽ कऽ महर्षि वशिष्ठसँ ऐ फलदायक पुत्रेष्ठि यज्ञ अपनेसँ कराबैक अनुरोध केलक। ओ कनमुँह भऽ अप्पन कुल पुरोहित वशिष्ठसँ बाजल जे  हुनकामे तपस्याक एतेक विपुल शक्ति अछि जे हुनके लऽ कऽ ब्रह्मा युगमे परिवर्तन कऽ देने अछि। फेर एकटा साधारण पुत्रेष्ठि यज्ञ ओ किअए नै कऽ सकैत अछि? (क्रमश:) ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। बालानां कृते किशन कारीगर, आकाशवाणी दिल्ली होरी मे मचाउ हुरदंग (हास्य कविता) होरी मे मचाउ कनी हुरदंग खुशी सँ जिनगी हुए रंग-बिरंग “कारीगर” दैत अछि शुभकामना खूम होरी खेलाउ दोस महीमक संग। उज्जर मुहँ लाल-पीअर करू खुशी मनाउ कनियो ने डरू बुढ़बा बाबा मना करैथ त’ हुनका माथ पर रंग-बिरंग बैलून फोरू। रस्ता पेरा रंगीन भ’ गेल डंफा बजाउ फगुआ गाउ अहाँ अपने मने झुमू आई सभ मिली रंग घोरू। मलपुआ खाउ अबीर उड़ाउ आई केकरो नहि अहाँ छोड़ू पिचकारी मे रंग भरि ओकरा रंग-बिरंग क’ छोड़ू। कि बुढ़-पुरान कि छौंड़ा मारेर धियो पूताक मोन भेल रंगीन अबीर उड़ाउ खुशी मनाउ अंगने-अंगने होरी खूलाउ। आई कियो नहि मना करत सभ नाचै अपना ताले डंफा डूगडूगाउ ढ़ोलक बजाउ नाचू अहाँ अपना ताले। होरी आबि गेल औ भाई रंग घोरै मे जुनि पछुआउ हरमोनियावला हे यौ पिपहीवला आउ-आउ सभ मिली जोगीरा गाउ। कक्का औ बेसी नहि छिड़िआउ आई नहि मानब एक्को टा बात बाल्टी मे अछि रंग घोरल उज्जर मुह करब कारी सियाह। हँसी खुशी सँ होरी खेलाउ आ खा लियअ देसी भंग जिनगी होएत रंग-बिरंग होरी मे मचाउ कनी हुरदंग ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। बच्चा लोकनि द्वारा स्मरणीय श्लोक १.प्रातः काल ब्रह्ममुहूर्त्त (सूर्योदयक एक घंटा पहिने) सर्वप्रथम अपन दुनू हाथ देखबाक चाही, आ’ ई श्लोक बजबाक चाही। कराग्रे वसते लक्ष्मीः करमध्ये सरस्वती। करमूले स्थितो ब्रह्मा प्रभाते करदर्शनम्॥ करक आगाँ लक्ष्मी बसैत छथि, करक मध्यमे सरस्वती, करक मूलमे ब्रह्मा स्थित छथि। भोरमे ताहि द्वारे करक दर्शन करबाक थीक। २.संध्या काल दीप लेसबाक काल- दीपमूले स्थितो ब्रह्मा दीपमध्ये जनार्दनः। दीपाग्रे शङ्करः प्रोक्त्तः सन्ध्याज्योतिर्नमोऽस्तुते॥ दीपक मूल भागमे ब्रह्मा, दीपक मध्यभागमे जनार्दन (विष्णु) आऽ दीपक अग्र भागमे शङ्कर स्थित छथि। हे संध्याज्योति! अहाँकेँ नमस्कार। ३.सुतबाक काल- रामं स्कन्दं हनूमन्तं वैनतेयं वृकोदरम्। शयने यः स्मरेन्नित्यं दुःस्वप्नस्तस्य नश्यति॥ जे सभ दिन सुतबासँ पहिने राम, कुमारस्वामी, हनूमान्, गरुड़ आऽ भीमक स्मरण करैत छथि, हुनकर दुःस्वप्न नष्ट भऽ जाइत छन्हि। ४. नहेबाक समय- गङ्गे च यमुने चैव गोदावरि सरस्वति। नर्मदे सिन्धु कावेरि जलेऽस्मिन् सन्निधिं कुरू॥ हे गंगा, यमुना, गोदावरी, सरस्वती, नर्मदा, सिन्धु आऽ कावेरी  धार। एहि जलमे अपन सान्निध्य दिअ। ५.उत्तरं यत्समुद्रस्य हिमाद्रेश्चैव दक्षिणम्। वर्षं तत् भारतं नाम भारती यत्र सन्ततिः॥ समुद्रक उत्तरमे आऽ हिमालयक दक्षिणमे भारत अछि आऽ ओतुका सन्तति भारती कहबैत छथि। ६.अहल्या द्रौपदी सीता तारा मण्डोदरी तथा। पञ्चकं ना स्मरेन्नित्यं महापातकनाशकम्॥ जे सभ दिन अहल्या, द्रौपदी, सीता, तारा आऽ मण्दोदरी, एहि पाँच साध्वी-स्त्रीक स्मरण करैत छथि, हुनकर सभ पाप नष्ट भऽ जाइत छन्हि। ७.अश्वत्थामा बलिर्व्यासो हनूमांश्च विभीषणः। कृपः परशुरामश्च सप्तैते चिरञ्जीविनः॥ अश्वत्थामा, बलि, व्यास, हनूमान्, विभीषण, कृपाचार्य आऽ परशुराम- ई सात टा चिरञ्जीवी कहबैत छथि। ८.साते भवतु सुप्रीता देवी शिखर वासिनी उग्रेन तपसा लब्धो यया पशुपतिः पतिः। सिद्धिः साध्ये सतामस्तु प्रसादान्तस्य धूर्जटेः जाह्नवीफेनलेखेव यन्यूधि शशिनः कला॥ ९. बालोऽहं जगदानन्द न मे बाला सरस्वती। अपूर्णे पंचमे वर्षे वर्णयामि जगत्त्रयम् ॥ १०. दूर्वाक्षत मंत्र(शुक्ल यजुर्वेद अध्याय २२, मंत्र २२) आ ब्रह्मन्नित्यस्य प्रजापतिर्ॠषिः। लिंभोक्त्ता देवताः। स्वराडुत्कृतिश्छन्दः। षड्जः स्वरः॥ आ ब्रह्म॑न् ब्राह्म॒णो ब्र॑ह्मवर्च॒सी जा॑यता॒मा रा॒ष्ट्रे रा॑ज॒न्यः शुरे॑ऽइषव्यो॒ऽतिव्या॒धी म॑हार॒थो जा॑यतां॒ दोग्ध्रीं धे॒नुर्वोढा॑न॒ड्वाना॒शुः सप्तिः॒ पुर॑न्धि॒र्योवा॑ जि॒ष्णू र॑थे॒ष्ठाः स॒भेयो॒ युवास्य यज॑मानस्य वी॒रो जा॒यतां निका॒मे-नि॑कामे नः प॒र्जन्यों वर्षतु॒ फल॑वत्यो न॒ऽओष॑धयः पच्यन्तां योगेक्ष॒मो नः॑ कल्पताम्॥२२॥ मन्त्रार्थाः सिद्धयः सन्तु पूर्णाः सन्तु मनोरथाः। शत्रूणां बुद्धिनाशोऽस्तु मित्राणामुदयस्तव। ॐ दीर्घायुर्भव। ॐ सौभाग्यवती भव। हे भगवान्। अपन देशमे सुयोग्य आ’ सर्वज्ञ विद्यार्थी उत्पन्न होथि, आ’ शुत्रुकेँ नाश कएनिहार सैनिक उत्पन्न होथि। अपन देशक गाय खूब दूध दय बाली, बरद भार वहन करएमे सक्षम होथि आ’ घोड़ा त्वरित रूपेँ दौगय बला होए। स्त्रीगण नगरक नेतृत्व करबामे सक्षम होथि आ’ युवक सभामे ओजपूर्ण भाषण देबयबला आ’ नेतृत्व देबामे सक्षम होथि। अपन देशमे जखन आवश्यक होय वर्षा होए आ’ औषधिक-बूटी सर्वदा परिपक्व होइत रहए। एवं क्रमे सभ तरहेँ हमरा सभक कल्याण होए। शत्रुक बुद्धिक नाश होए आ’ मित्रक उदय होए॥ मनुष्यकें कोन वस्तुक इच्छा करबाक चाही तकर वर्णन एहि मंत्रमे कएल गेल अछि। एहिमे वाचकलुप्तोपमालड़्कार अछि। अन्वय- ब्रह्म॑न् - विद्या आदि गुणसँ परिपूर्ण ब्रह्म रा॒ष्ट्रे - देशमे ब्र॑ह्मवर्च॒सी-ब्रह्म विद्याक तेजसँ युक्त्त आ जा॑यतां॒- उत्पन्न होए रा॑ज॒न्यः-राजा शुरे॑ऽ–बिना डर बला इषव्यो॒- बाण चलेबामे निपुण ऽतिव्या॒धी-शत्रुकेँ तारण दय बला म॑हार॒थो-पैघ रथ बला वीर दोग्ध्रीं-कामना(दूध पूर्ण करए बाली) धे॒नुर्वोढा॑न॒ड्वाना॒शुः धे॒नु-गौ वा वाणी र्वोढा॑न॒ड्वा- पैघ बरद ना॒शुः-आशुः-त्वरित सप्तिः॒-घोड़ा पुर॑न्धि॒र्योवा॑- पुर॑न्धि॒- व्यवहारकेँ धारण करए बाली र्योवा॑-स्त्री जि॒ष्णू-शत्रुकेँ जीतए बला र॑थे॒ष्ठाः-रथ पर स्थिर स॒भेयो॒-उत्तम सभामे युवास्य-युवा जेहन यज॑मानस्य-राजाक राज्यमे वी॒रो-शत्रुकेँ पराजित करएबला निका॒मे-नि॑कामे-निश्चययुक्त्त कार्यमे नः-हमर सभक प॒र्जन्यों-मेघ वर्षतु॒-वर्षा होए फल॑वत्यो-उत्तम फल बला ओष॑धयः-औषधिः पच्यन्तां- पाकए योगेक्ष॒मो-अलभ्य लभ्य करेबाक हेतु कएल गेल योगक रक्षा नः॑-हमरा सभक हेतु कल्पताम्-समर्थ होए ग्रिफिथक अनुवाद- हे ब्रह्मण, हमर राज्यमे ब्राह्मण नीक धार्मिक विद्या बला, राजन्य-वीर,तीरंदाज, दूध दए बाली गाय, दौगय बला जन्तु, उद्यमी नारी होथि। पार्जन्य आवश्यकता पड़ला पर वर्षा देथि, फल देय बला गाछ पाकए, हम सभ संपत्ति अर्जित/संरक्षित करी। 8.VIDEHA FOR NON RESIDENTS 8.1 to 8.3 MAITHILI LITERATURE IN ENGLISH 8.1.1.The Comet   -GAJENDRA THAKUR translated by Jyoti Jha chaudhary 8.1.2.The_Science_of_Words- GAJENDRA THAKUR translated by the author himself 8.1.3.On_the_dice-board_of_the_millennium- GAJENDRA THAKUR translated by Jyoti Jha chaudhary 8.1.4.NAAGPHANS (IN ENGLISH)- SHEFALIKA VERMA translated by Dr. Rajiv Kumar Verma and Dr. Jaya Verma Send your comments to ggajendra@videha.com विदेह नूतन अंक भाषापाक रचना-लेखन इंग्लिश-मैथिली-कोष / मैथिली-इंग्लिश-कोष  प्रोजेक्टकेँ आगू बढ़ाऊ, अपन सुझाव आ योगदान ई-मेल द्वारा ggajendra@videha.com पर पठाऊ। Top of Form १.भारत आ नेपालक मैथिली भाषा-वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक शैली आ २.मैथिलीमे भाषा सम्पादन पाठ्यक्रम १.नेपाल आ भारतक मैथिली भाषा-वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक शैली

१.१. नेपालक मैथिली भाषा वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक  उच्चारण आ लेखन शैली (भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक धारणाकेँ पूर्ण रूपसँ सङ्ग लऽ निर्धारित) मैथिलीमे उच्चारण तथा लेखन १.पञ्चमाक्षर आ अनुस्वार: पञ्चमाक्षरान्तर्गत ङ, ञ, ण, न एवं म अबैत अछि। संस्कृत भाषाक अनुसार शब्दक अन्तमे जाहि वर्गक अक्षर रहैत अछि ओही वर्गक पञ्चमाक्षर अबैत अछि। जेना- अङ्क (क वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ङ् आएल अछि।) पञ्च (च वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ञ् आएल अछि।) खण्ड (ट वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ण् आएल अछि।) सन्धि (त वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे न् आएल अछि।) खम्भ (प वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे म् आएल अछि।) उपर्युक्त बात मैथिलीमे कम देखल जाइत अछि। पञ्चमाक्षरक बदलामे अधिकांश जगहपर अनुस्वारक प्रयोग देखल जाइछ। जेना- अंक, पंच, खंड, संधि, खंभ आदि। व्याकरणविद पण्डित गोविन्द झाक कहब छनि जे कवर्ग, चवर्ग आ टवर्गसँ पूर्व अनुस्वार लिखल जाए तथा तवर्ग आ पवर्गसँ पूर्व पञ्चमाक्षरे लिखल जाए। जेना- अंक, चंचल, अंडा, अन्त तथा कम्पन। मुदा हिन्दीक निकट रहल आधुनिक लेखक एहि बातकेँ नहि मानैत छथि। ओ लोकनि अन्त आ कम्पनक जगहपर सेहो अंत आ कंपन लिखैत देखल जाइत छथि। नवीन पद्धति किछु सुविधाजनक अवश्य छैक। किएक तँ एहिमे समय आ स्थानक बचत होइत छैक। मुदा कतोक बेर हस्तलेखन वा मुद्रणमे अनुस्वारक छोट सन बिन्दु स्पष्ट नहि भेलासँ अर्थक अनर्थ होइत सेहो देखल जाइत अछि। अनुस्वारक प्रयोगमे उच्चारण-दोषक सम्भावना सेहो ततबए देखल जाइत अछि। एतदर्थ कसँ लऽ कऽ पवर्ग धरि पञ्चमाक्षरेक प्रयोग करब उचित अछि। यसँ लऽ कऽ ज्ञ धरिक अक्षरक सङ्ग अनुस्वारक प्रयोग करबामे कतहु कोनो विवाद नहि देखल जाइछ। २.ढ आ ढ़ : ढ़क उच्चारण “र् ह”जकाँ होइत अछि। अतः जतऽ “र् ह”क उच्चारण हो ओतऽ मात्र ढ़ लिखल जाए। आन ठाम खाली ढ लिखल जएबाक चाही। जेना- ढ = ढाकी, ढेकी, ढीठ, ढेउआ, ढङ्ग, ढेरी, ढाकनि, ढाठ आदि। ढ़ = पढ़ाइ, बढ़ब, गढ़ब, मढ़ब, बुढ़बा, साँढ़, गाढ़, रीढ़, चाँढ़, सीढ़ी, पीढ़ी आदि। उपर्युक्त शब्द सभकेँ देखलासँ ई स्पष्ट होइत अछि जे साधारणतया शब्दक शुरूमे ढ आ मध्य तथा अन्तमे ढ़ अबैत अछि। इएह नियम ड आ ड़क सन्दर्भ सेहो लागू होइत अछि। ३.व आ ब : मैथिलीमे “व”क उच्चारण ब कएल जाइत अछि, मुदा ओकरा ब रूपमे नहि लिखल जएबाक चाही। जेना- उच्चारण : बैद्यनाथ, बिद्या, नब, देबता, बिष्णु, बंश, बन्दना आदि। एहि सभक स्थानपर क्रमशः वैद्यनाथ, विद्या, नव, देवता, विष्णु, वंश, वन्दना लिखबाक चाही। सामान्यतया व उच्चारणक लेल ओ प्रयोग कएल जाइत अछि। जेना- ओकील, ओजह आदि। ४.य आ ज : कतहु-कतहु “य”क उच्चारण “ज”जकाँ करैत देखल जाइत अछि, मुदा ओकरा ज नहि लिखबाक चाही। उच्चारणमे यज्ञ, जदि, जमुना, जुग, जाबत, जोगी, जदु, जम आदि कहल जाएबला शब्द सभकेँ क्रमशः यज्ञ, यदि, यमुना, युग, यावत, योगी, यदु, यम लिखबाक चाही। ५.ए आ य : मैथिलीक वर्तनीमे ए आ य दुनू लिखल जाइत अछि। प्राचीन वर्तनी- कएल, जाए, होएत, माए, भाए, गाए आदि। नवीन वर्तनी- कयल, जाय, होयत, माय, भाय, गाय आदि। सामान्यतया शब्दक शुरूमे ए मात्र अबैत अछि। जेना एहि, एना, एकर, एहन आदि। एहि शब्द सभक स्थानपर यहि, यना, यकर, यहन आदिक प्रयोग नहि करबाक चाही। यद्यपि मैथिलीभाषी थारू सहित किछु जातिमे शब्दक आरम्भोमे “ए”केँ य कहि उच्चारण कएल जाइत अछि। ए आ “य”क प्रयोगक सन्दर्भमे प्राचीने पद्धतिक अनुसरण करब उपयुक्त मानि एहि पुस्तकमे ओकरे प्रयोग कएल गेल अछि। किएक तँ दुनूक लेखनमे कोनो सहजता आ दुरूहताक बात नहि अछि। आ मैथिलीक सर्वसाधारणक उच्चारण-शैली यक अपेक्षा एसँ बेसी निकट छैक। खास कऽ कएल, हएब आदि कतिपय शब्दकेँ कैल, हैब आदि रूपमे कतहु-कतहु लिखल जाएब सेहो “ए”क प्रयोगकेँ बेसी समीचीन प्रमाणित करैत अछि। ६.हि, हु तथा एकार, ओकार : मैथिलीक प्राचीन लेखन-परम्परामे कोनो बातपर बल दैत काल शब्दक पाछाँ हि, हु लगाओल जाइत छैक। जेना- हुनकहि, अपनहु, ओकरहु, तत्कालहि, चोट्टहि, आनहु आदि। मुदा आधुनिक लेखनमे हिक स्थानपर एकार एवं हुक स्थानपर ओकारक प्रयोग करैत देखल जाइत अछि। जेना- हुनके, अपनो, तत्काले, चोट्टे, आनो आदि। ७.ष तथा ख : मैथिली भाषामे अधिकांशतः षक उच्चारण ख होइत अछि। जेना- षड्यन्त्र (खड़यन्त्र), षोडशी (खोड़शी), षट्कोण (खटकोण), वृषेश (वृखेश), सन्तोष (सन्तोख) आदि। ८.ध्वनि-लोप : निम्नलिखित अवस्थामे शब्दसँ ध्वनि-लोप भऽ जाइत अछि: (क) क्रियान्वयी प्रत्यय अयमे य वा ए लुप्त भऽ जाइत अछि। ओहिमे सँ पहिने अक उच्चारण दीर्घ भऽ जाइत अछि। ओकर आगाँ लोप-सूचक चिह्न वा विकारी (’ / ऽ) लगाओल जाइछ। जेना- पूर्ण रूप : पढ़ए (पढ़य) गेलाह, कए (कय) लेल, उठए (उठय) पड़तौक। अपूर्ण रूप : पढ़’ गेलाह, क’ लेल, उठ’ पड़तौक। पढ़ऽ गेलाह, कऽ लेल, उठऽ पड़तौक। (ख) पूर्वकालिक कृत आय (आए) प्रत्ययमे य (ए) लुप्त भऽ जाइछ, मुदा लोप-सूचक विकारी नहि लगाओल जाइछ। जेना- पूर्ण रूप : खाए (य) गेल, पठाय (ए) देब, नहाए (य) अएलाह। अपूर्ण रूप : खा गेल, पठा देब, नहा अएलाह। (ग) स्त्री प्रत्यय इक उच्चारण क्रियापद, संज्ञा, ओ विशेषण तीनूमे लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना- पूर्ण रूप : दोसरि मालिनि चलि गेलि। अपूर्ण रूप : दोसर मालिन चलि गेल। (घ) वर्तमान कृदन्तक अन्तिम त लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना- पूर्ण रूप : पढ़ैत अछि, बजैत अछि, गबैत अछि। अपूर्ण रूप : पढ़ै अछि, बजै अछि, गबै अछि। (ङ) क्रियापदक अवसान इक, उक, ऐक तथा हीकमे लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना- पूर्ण रूप: छियौक, छियैक, छहीक, छौक, छैक, अबितैक, होइक। अपूर्ण रूप : छियौ, छियै, छही, छौ, छै, अबितै, होइ। (च) क्रियापदीय प्रत्यय न्ह, हु तथा हकारक लोप भऽ जाइछ। जेना- पूर्ण रूप : छन्हि, कहलन्हि, कहलहुँ, गेलह, नहि। अपूर्ण रूप : छनि, कहलनि, कहलौँ, गेलऽ, नइ, नञि, नै। ९.ध्वनि स्थानान्तरण : कोनो-कोनो स्वर-ध्वनि अपना जगहसँ हटि कऽ दोसर ठाम चलि जाइत अछि। खास कऽ ह्रस्व इ आ उक सम्बन्धमे ई बात लागू होइत अछि। मैथिलीकरण भऽ गेल शब्दक मध्य वा अन्तमे जँ ह्रस्व इ वा उ आबए तँ ओकर ध्वनि स्थानान्तरित भऽ एक अक्षर आगाँ आबि जाइत अछि। जेना- शनि (शइन), पानि (पाइन), दालि ( दाइल), माटि (माइट), काछु (काउछ), मासु (माउस) आदि। मुदा तत्सम शब्द सभमे ई निअम लागू नहि होइत अछि। जेना- रश्मिकेँ रइश्म आ सुधांशुकेँ सुधाउंस नहि कहल जा सकैत अछि। १०.हलन्त(्)क प्रयोग : मैथिली भाषामे सामान्यतया हलन्त (्)क आवश्यकता नहि होइत अछि। कारण जे शब्दक अन्तमे अ उच्चारण नहि होइत अछि। मुदा संस्कृत भाषासँ जहिनाक तहिना मैथिलीमे आएल (तत्सम) शब्द सभमे हलन्त प्रयोग कएल जाइत अछि। एहि पोथीमे सामान्यतया सम्पूर्ण शब्दकेँ मैथिली भाषा सम्बन्धी निअम अनुसार हलन्तविहीन राखल गेल अछि। मुदा व्याकरण सम्बन्धी प्रयोजनक लेल अत्यावश्यक स्थानपर कतहु-कतहु हलन्त देल गेल अछि। प्रस्तुत पोथीमे मथिली लेखनक प्राचीन आ नवीन दुनू शैलीक सरल आ समीचीन पक्ष सभकेँ समेटि कऽ वर्ण-विन्यास कएल गेल अछि। स्थान आ समयमे बचतक सङ्गहि हस्त-लेखन तथा तकनीकी दृष्टिसँ सेहो सरल होबऽबला हिसाबसँ वर्ण-विन्यास मिलाओल गेल अछि। वर्तमान समयमे मैथिली मातृभाषी पर्यन्तकेँ आन भाषाक माध्यमसँ मैथिलीक ज्ञान लेबऽ पड़ि रहल परिप्रेक्ष्यमे लेखनमे सहजता तथा एकरूपतापर ध्यान देल गेल अछि। तखन मैथिली भाषाक मूल विशेषता सभ कुण्ठित नहि होइक, ताहू दिस लेखक-मण्डल सचेत अछि। प्रसिद्ध भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक कहब छनि जे सरलताक अनुसन्धानमे एहन अवस्था किन्नहु ने आबऽ देबाक चाही जे भाषाक विशेषता छाँहमे पडि जाए। -(भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक धारणाकेँ पूर्ण रूपसँ सङ्ग लऽ निर्धारित) १.२. मैथिली अकादमी, पटना द्वारा निर्धारित मैथिली लेखन-शैली

१. जे शब्द मैथिली-साहित्यक प्राचीन कालसँ आइ धरि जाहि वर्त्तनीमे प्रचलित अछि, से सामान्यतः ताहि वर्त्तनीमे लिखल जाय- उदाहरणार्थ-

ग्राह्य

एखन ठाम जकर, तकर तनिकर अछि

अग्राह्य अखन, अखनि, एखेन, अखनी ठिमा, ठिना, ठमा जेकर, तेकर तिनकर। (वैकल्पिक रूपेँ ग्राह्य) ऐछ, अहि, ए।

२. निम्नलिखित तीन प्रकारक रूप वैकल्पिकतया अपनाओल जाय: भऽ गेल, भय गेल वा भए गेल। जा रहल अछि, जाय रहल अछि, जाए रहल अछि। कर’ गेलाह, वा करय गेलाह वा करए गेलाह।

३. प्राचीन मैथिलीक ‘न्ह’ ध्वनिक स्थानमे ‘न’ लिखल जाय सकैत अछि यथा कहलनि वा कहलन्हि।

४. ‘ऐ’ तथा ‘औ’ ततय लिखल जाय जत’ स्पष्टतः ‘अइ’ तथा ‘अउ’ सदृश उच्चारण इष्ट हो। यथा- देखैत, छलैक, बौआ, छौक इत्यादि।

५. मैथिलीक निम्नलिखित शब्द एहि रूपे प्रयुक्त होयत: जैह, सैह, इएह, ओऐह, लैह तथा दैह।

६. ह्र्स्व इकारांत शब्दमे ‘इ’ के लुप्त करब सामान्यतः अग्राह्य थिक। यथा- ग्राह्य देखि आबह, मालिनि गेलि (मनुष्य मात्रमे)।

७. स्वतंत्र ह्रस्व ‘ए’ वा ‘य’ प्राचीन मैथिलीक उद्धरण आदिमे तँ यथावत राखल जाय, किंतु आधुनिक प्रयोगमे वैकल्पिक रूपेँ ‘ए’ वा ‘य’ लिखल जाय। यथा:- कयल वा कएल, अयलाह वा अएलाह, जाय वा जाए इत्यादि।

८. उच्चारणमे दू स्वरक बीच जे ‘य’ ध्वनि स्वतः आबि जाइत अछि तकरा लेखमे स्थान वैकल्पिक रूपेँ देल जाय। यथा- धीआ, अढ़ैआ, विआह, वा धीया, अढ़ैया, बियाह।

९. सानुनासिक स्वतंत्र स्वरक स्थान यथासंभव ‘ञ’ लिखल जाय वा सानुनासिक स्वर। यथा:- मैञा, कनिञा, किरतनिञा वा मैआँ, कनिआँ, किरतनिआँ।

१०. कारकक विभक्त्तिक निम्नलिखित रूप ग्राह्य:- हाथकेँ, हाथसँ, हाथेँ, हाथक, हाथमे। ’मे’ मे अनुस्वार सर्वथा त्याज्य थिक। ‘क’ क वैकल्पिक रूप ‘केर’ राखल जा सकैत अछि।

११. पूर्वकालिक क्रियापदक बाद ‘कय’ वा ‘कए’ अव्यय वैकल्पिक रूपेँ लगाओल जा सकैत अछि। यथा:- देखि कय वा देखि कए।

१२. माँग, भाँग आदिक स्थानमे माङ, भाङ इत्यादि लिखल जाय।

१३. अर्द्ध ‘न’ ओ अर्द्ध ‘म’ क बदला अनुसार नहि लिखल जाय, किंतु छापाक सुविधार्थ अर्द्ध ‘ङ’ , ‘ञ’, तथा ‘ण’ क बदला अनुस्वारो लिखल जा सकैत अछि। यथा:- अङ्क, वा अंक, अञ्चल वा अंचल, कण्ठ वा कंठ।

१४. हलंत चिह्न निअमतः लगाओल जाय, किंतु विभक्तिक संग अकारांत प्रयोग कएल जाय। यथा:- श्रीमान्, किंतु श्रीमानक।

१५. सभ एकल कारक चिह्न शब्दमे सटा क’ लिखल जाय, हटा क’ नहि, संयुक्त विभक्तिक हेतु फराक लिखल जाय, यथा घर परक।

१६. अनुनासिककेँ चन्द्रबिन्दु द्वारा व्यक्त कयल जाय। परंतु मुद्रणक सुविधार्थ हि समान जटिल मात्रापर अनुस्वारक प्रयोग चन्द्रबिन्दुक बदला कयल जा सकैत अछि। यथा- हिँ केर बदला हिं।

१७. पूर्ण विराम पासीसँ ( । ) सूचित कयल जाय।

१८. समस्त पद सटा क’ लिखल जाय, वा हाइफेनसँ जोड़ि क’ ,  हटा क’ नहि।

१९. लिअ तथा दिअ शब्दमे बिकारी (ऽ) नहि लगाओल जाय।

२०. अंक देवनागरी रूपमे राखल जाय।

२१.किछु ध्वनिक लेल नवीन चिन्ह बनबाओल जाय। जा' ई नहि बनल अछि ताबत एहि दुनू ध्वनिक बदला पूर्ववत् अय/ आय/ अए/ आए/ आओ/ अओ लिखल जाय। आकि ऎ वा ऒ सँ व्यक्त कएल जाय।

ह./- गोविन्द झा ११/८/७६ श्रीकान्त ठाकुर ११/८/७६ सुरेन्द्र झा "सुमन" ११/०८/७६

  २. मैथिलीमे भाषा सम्पादन पाठ्यक्रम २.१. उच्चारण निर्देश: (बोल्ड कएल रूप ग्राह्य):- दन्त न क उच्चारणमे दाँतमे जीह सटत- जेना बाजू नाम , मुदा ण क उच्चारणमे जीह मूर्धामे सटत (नै सटैए तँ उच्चारण दोष अछि)- जेना बाजू गणेश। तालव्य शमे जीह तालुसँ , षमे मूर्धासँ आ दन्त समे दाँतसँ सटत। निशाँ, सभ आ शोषण बाजि कऽ देखू। मैथिलीमे ष केँ वैदिक संस्कृत जकाँ ख सेहो उच्चरित कएल जाइत अछि, जेना वर्षा, दोष। य अनेको स्थानपर ज जकाँ उच्चरित होइत अछि आ ण ड़ जकाँ (यथा संयोग आ गणेश संजोग आ गड़ेस उच्चरित होइत अछि)। मैथिलीमे व क उच्चारण ब, श क उच्चारण स आ य क उच्चारण ज सेहो होइत अछि। ओहिना ह्रस्व इ बेशीकाल मैथिलीमे पहिने बाजल जाइत अछि कारण देवनागरीमे आ मिथिलाक्षरमे ह्रस्व इ अक्षरक पहिने लिखलो जाइत आ बाजलो जएबाक चाही। कारण जे हिन्दीमे एकर दोषपूर्ण उच्चारण होइत अछि (लिखल तँ पहिने जाइत अछि मुदा बाजल बादमे जाइत अछि), से शिक्षा पद्धतिक दोषक कारण हम सभ ओकर उच्चारण दोषपूर्ण ढंगसँ कऽ रहल छी। अछि- अ इ छ  ऐछ (उच्चारण) छथि- छ इ थ  – छैथ (उच्चारण) पहुँचि- प हुँ इ च (उच्चारण) आब अ आ इ ई ए ऐ ओ औ अं अः ऋ ऐ सभ लेल मात्रा सेहो अछि, मुदा ऐमे ई ऐ ओ औ अं अः ऋ केँ संयुक्ताक्षर रूपमे गलत रूपमे प्रयुक्त आ उच्चरित कएल जाइत अछि। जेना ऋ केँ री  रूपमे उच्चरित करब। आ देखियौ- ऐ लेल देखिऔ क प्रयोग अनुचित। मुदा देखिऐ लेल देखियै अनुचित। क् सँ ह् धरि अ सम्मिलित भेलासँ क सँ ह बनैत अछि, मुदा उच्चारण काल हलन्त युक्त शब्दक अन्तक उच्चारणक प्रवृत्ति बढ़ल अछि, मुदा हम जखन मनोजमे ज् अन्तमे बजैत छी, तखनो पुरनका लोककेँ बजैत सुनबन्हि- मनोजऽ, वास्तवमे ओ अ युक्त ज् = ज बजै छथि। फेर ज्ञ अछि ज् आ ञ क संयुक्त मुदा गलत उच्चारण होइत अछि- ग्य। ओहिना क्ष अछि क् आ ष क संयुक्त मुदा उच्चारण होइत अछि छ। फेर श् आ र क संयुक्त अछि श्र ( जेना श्रमिक) आ स् आ र क संयुक्त अछि स्र (जेना मिस्र)। त्र भेल त+र । उच्चारणक ऑडियो फाइल विदेह आर्काइव  http://www.videha.co.in/ पर उपलब्ध अछि। फेर केँ / सँ / पर पूर्व अक्षरसँ सटा कऽ लिखू मुदा तँ / कऽ हटा कऽ। ऐमे सँ मे पहिल सटा कऽ लिखू आ बादबला हटा कऽ। अंकक बाद टा लिखू सटा कऽ मुदा अन्य ठाम टा लिखू हटा कऽ– जेना छहटा मुदा सभ टा। फेर ६अ म सातम लिखू- छठम सातम नै। घरबलामे बला मुदा घरवालीमे वाली प्रयुक्त करू। रहए- रहै मुदा सकैए (उच्चारण सकै-ए)। मुदा कखनो काल रहए आ रहै मे अर्थ भिन्नता सेहो, जेना से कम्मो जगहमे पार्किंग करबाक अभ्यास रहै ओकरा। पुछलापर पता लागल जे ढुनढुन नाम्ना ई ड्राइवर कनाट प्लेसक पार्किंगमे काज करैत रहए। छलै, छलए मे सेहो ऐ तरहक भेल। छलए क उच्चारण छल-ए सेहो। संयोगने- (उच्चारण संजोगने) केँ/  कऽ केर- क ( केर क प्रयोग गद्यमे नै करू , पद्यमे कऽ सकै छी। ) क (जेना रामक) –रामक आ संगे (उच्चारण राम के /  राम कऽ सेहो) सँ- सऽ (उच्चारण) चन्द्रबिन्दु आ अनुस्वार- अनुस्वारमे कंठ धरिक प्रयोग होइत अछि मुदा चन्द्रबिन्दुमे नै। चन्द्रबिन्दुमे कनेक एकारक सेहो उच्चारण होइत अछि- जेना रामसँ- (उच्चारण राम सऽ)  रामकेँ- (उच्चारण राम कऽ/ राम के सेहो)। केँ जेना रामकेँ भेल हिन्दीक को (राम को)- राम को= रामकेँ क जेना रामक भेल हिन्दीक का ( राम का) राम का= रामक कऽ जेना जा कऽ भेल हिन्दीक कर ( जा कर) जा कर= जा कऽ सँ भेल हिन्दीक से (राम से) राम से= रामसँ सऽ , तऽ , त , केर (गद्यमे) एे चारू शब्द सबहक प्रयोग अवांछित। के दोसर अर्थेँ प्रयुक्त भऽ सकैए- जेना, के कहलक? विभक्ति “क”क बदला एकर प्रयोग अवांछित। नञि, नहि, नै, नइ, नँइ, नइँ, नइं ऐ सभक उच्चारण आ लेखन - नै त्त्व क बदलामे त्व जेना महत्वपूर्ण (महत्त्वपूर्ण नै) जतए अर्थ बदलि जाए ओतहि मात्र तीन अक्षरक संयुक्ताक्षरक प्रयोग उचित। सम्पति- उच्चारण स म्प इ त (सम्पत्ति नै- कारण सही उच्चारण आसानीसँ सम्भव नै)। मुदा सर्वोत्तम (सर्वोतम नै)। राष्ट्रिय (राष्ट्रीय नै) सकैए/ सकै (अर्थ परिवर्तन) पोछैले/ पोछै लेल/ पोछए लेल पोछैए/ पोछए/ (अर्थ परिवर्तन) पोछए/ पोछै ओ लोकनि ( हटा कऽ, ओ मे बिकारी नै) ओइ/ ओहि ओहिले/ ओहि लेल/ ओही लऽ जएबेँ/ बैसबेँ पँचभइयाँ देखियौक/ (देखिऔक नै- तहिना अ मे ह्रस्व आ दीर्घक मात्राक प्रयोग अनुचित) जकाँ / जेकाँ तँइ/ तैँ/ होएत / हएत नञि/ नहि/ नँइ/ नइँ/ नै सौँसे/ सौंसे बड़ / बड़ी (झोराओल) गाए (गाइ नहि), मुदा गाइक दूध (गाएक दूध नै।) रहलेँ/ पहिरतैँ हमहीं/ अहीं सब - सभ सबहक - सभहक धरि - तक गप- बात बूझब - समझब बुझलौं/ समझलौं/ बुझलहुँ - समझलहुँ हमरा आर - हम सभ आकि- आ कि सकैछ/ करैछ (गद्यमे प्रयोगक आवश्यकता नै) होइन/ होनि जाइन (जानि नै, जेना देल जाइन) मुदा जानि-बूझि (अर्थ परिव्र्तन) पइठ/ जाइठ आउ/ जाउ/ आऊ/ जाऊ मे, केँ, सँ, पर (शब्दसँ सटा कऽ) तँ कऽ धऽ दऽ (शब्दसँ हटा कऽ) मुदा दूटा वा बेसी विभक्ति संग रहलापर पहिल विभक्ति टाकेँ सटाऊ। जेना ऐमे सँ । एकटा , दूटा (मुदा कए टा) बिकारीक प्रयोग शब्दक अन्तमे, बीचमे अनावश्यक रूपेँ नै। आकारान्त आ अन्तमे अ क बाद बिकारीक प्रयोग नै (जेना दिअ , आ/ दिय’ , आ’, आ नै ) अपोस्ट्रोफीक प्रयोग बिकारीक बदलामे करब अनुचित आ मात्र फॉन्टक तकनीकी न्यूनताक परिचायक)- ओना बिकारीक संस्कृत रूप ऽ अवग्रह कहल जाइत अछि आ वर्तनी आ उच्चारण दुनू ठाम एकर लोप रहैत अछि/ रहि सकैत अछि (उच्चारणमे लोप रहिते अछि)। मुदा अपोस्ट्रोफी सेहो अंग्रेजीमे पसेसिव केसमे होइत अछि आ फ्रेंचमे शब्दमे जतए एकर प्रयोग होइत अछि जेना raison d’etre एतए सेहो एकर उच्चारण रैजौन डेटर होइत अछि, माने अपोस्ट्रॉफी अवकाश नै दैत अछि वरन जोड़ैत अछि, से एकर प्रयोग बिकारीक बदला देनाइ तकनीकी रूपेँ सेहो अनुचित)। अइमे, एहिमे/ ऐमे जइमे, जाहिमे एखन/ अखन/ अइखन केँ (के नहि) मे (अनुस्वार रहित) भऽ मे दऽ तँ (तऽ, त नै) सँ ( सऽ स नै) गाछ तर गाछ लग साँझ खन जो (जो go, करै जो do) तै/तइ जेना- तै दुआरे/ तइमे/ तइले जै/जइ जेना- जै कारण/ जइसँ/ जइले ऐ/अइ जेना- ऐ कारण/ ऐसँ/ अइले/ मुदा एकर एकटा खास प्रयोग- लालति‍ कतेक दि‍नसँ कहैत रहैत अइ लै/लइ जेना लैसँ/ लइले/ लै दुआरे लहँ/ लौं गेलौं/ लेलौं/ लेलँह/ गेलहुँ/ लेलहुँ/ लेलँ जइ/ जाहि‍/ जै जहि‍ठाम/ जाहि‍ठाम/ जइठाम/ जैठाम एहि‍/ अहि‍/ अइ (वाक्यक अंतमे ग्राह्य) / ऐ अइछ/ अछि‍/ ऐछ तइ/ तहि‍/ तै/ ताहि‍ ओहि‍/ ओइ सीखि‍/ सीख जीवि‍/ जीवी/ जीब भलेहीं/ भलहि‍ं तैं/ तँइ/ तँए जाएब/ जएब लइ/ लै छइ/ छै नहि‍/ नै/ नइ गइ/ गै छनि‍/ छन्‍हि‍  ... समए शब्‍दक संग जखन कोनो वि‍भक्‍ति‍ जुटै छै तखन समै जना समैपर इत्‍यादि‍। असगरमे हृदए आ वि‍भक्‍ति‍ जुटने हृदे जना हृदेसँ, हृदेमे इत्‍यादि‍। जइ/ जाहि‍/ जै जहि‍ठाम/ जाहि‍ठाम/ जइठाम/ जैठाम एहि‍/ अहि‍/ अइ/ ऐ अइछ/ अछि‍/ ऐछ तइ/ तहि‍/ तै/ ताहि‍ ओहि‍/ ओइ सीखि‍/ सीख जीवि‍/ जीवी/ जीब भले/ भलेहीं/ भलहि‍ं तैं/ तँइ/ तँए जाएब/ जएब लइ/ लै छइ/ छै नहि‍/ नै/ नइ गइ/ गै छनि‍/ छन्‍हि‍ चुकल अछि/ गेल गछि २.२. मैथिलीमे भाषा सम्पादन पाठ्यक्रम नीचाँक सूचीमे देल विकल्पमेसँ लैंगुएज एडीटर द्वारा कोन रूप चुनल जेबाक चाही: बोल्ड कएल रूप ग्राह्य: १.होयबला/ होबयबला/ होमयबला/ हेब’बला, हेम’बला/ होयबाक/होबएबला /होएबाक २. आ’/आऽ आ ३. क’ लेने/कऽ लेने/कए लेने/कय लेने/ल’/लऽ/लय/लए ४. भ’ गेल/भऽ गेल/भय गेल/भए गेल ५. कर’ गेलाह/करऽ गेलह/करए गेलाह/करय गेलाह ६. लिअ/दिअ लिय’,दिय’,लिअ’,दिय’/ ७. कर’ बला/करऽ बला/ करय बला करैबला/क’र’ बला / करैवाली ८. बला वला (पुरूष), वाली (स्‍त्री) ९ . आङ्ल आंग्ल १०. प्रायः प्रायह ११. दुःख दुख १ २. चलि गेल चल गेल/चैल गेल १३. देलखिन्ह देलकिन्ह, देलखिन १४. देखलन्हि देखलनि/ देखलैन्ह १५. छथिन्ह/ छलन्हि छथिन/ छलैन/ छलनि १६. चलैत/दैत चलति/दैति १७. एखनो अखनो १८. बढ़नि‍ बढ़इन बढ़न्हि १९. ओ’/ओऽ(सर्वनाम) ओ २० . ओ (संयोजक) ओ’/ओऽ २१. फाँगि/फाङ्गि फाइंग/फाइङ २२. जे जे’/जेऽ २३. ना-नुकुर ना-नुकर २४. केलन्हि/केलनि‍/कयलन्हि २५. तखनतँ/ तखन तँ २६. जा रहल/जाय रहल/जाए रहल २७. निकलय/निकलए लागल/ लगल बहराय/ बहराए लागल/ लगल निकल’/बहरै लागल २८. ओतय/ जतय जत’/ ओत’/ जतए/ ओतए २९. की फूरल जे कि फूरल जे ३०. जे जे’/जेऽ ३१. कूदि / यादि(मोन पारब) कूइद/याइद/कूद/याद/ यादि (मोन) ३२. इहो/ ओहो ३३. हँसए/ हँसय हँसऽ ३४. नौ आकि दस/नौ किंवा दस/ नौ वा दस ३५. सासु-ससुर सास-ससुर ३६. छह/ सात छ/छः/सात ३७. की  की’/ कीऽ (दीर्घीकारान्तमे ऽ वर्जित) ३८. जबाब जवाब ३९. करएताह/ करेताह करयताह ४०. दलान दिशि दलान दिश/दलान दिस ४१ . गेलाह गएलाह/गयलाह ४२. किछु आर/ किछु और/ किछ आर ४३. जाइ छल/ जाइत छल जाति छल/जैत छल ४४. पहुँचि/ भेट जाइत छल/ भेट जाइ छलए पहुँच/ भेटि‍ जाइत छल ४५. जबान (युवा)/ जवान(फौजी) ४६. लय/ लए क’/ कऽ/ लए कए / लऽ कऽ/ लऽ कए ४७. ल’/लऽ कय/ कए ४८. एखन / एखने / अखन / अखने ४९. अहींकेँ अहीँकेँ ५०. गहींर गहीँर ५१. धार पार केनाइ धार पार केनाय/केनाए ५२. जेकाँ जेँकाँ/ जकाँ ५३. तहिना तेहिना ५४. एकर अकर ५५. बहिनउ बहनोइ ५६. बहिन बहिनि ५७. बहिन-बहिनोइ बहिन-बहनउ ५८. नहि/ नै ५९. करबा / करबाय/ करबाए ६०. तँ/ त ऽ तय/तए ६१. भैयारी मे छोट-भाए/भै/, जेठ-भाय/भाइ, ६२. गि‍नतीमे दू भाइ/भाए/भाँइ ६३. ई पोथी दू भाइक/ भाँइ/ भाए/ लेल। यावत जावत ६४. माय मै / माए मुदा माइक ममता ६५. देन्हि/ दइन दनि‍/ दएन्हि/ दयन्हि दन्हि/ दैन्हि ६६. द’/ दऽ/ दए ६७. ओ (संयोजक) ओऽ (सर्वनाम) ६८. तका कए तकाय तकाए ६९. पैरे (on foot) पएरे  कएक/ कैक ७०. ताहुमे/ ताहूमे ७१. पुत्रीक ७२. बजा कय/ कए / कऽ ७३. बननाय/बननाइ ७४. कोला ७५. दिनुका दिनका ७६. ततहिसँ ७७. गरबओलन्हि/ गरबौलनि‍/ गरबेलन्हि/ गरबेलनि‍ ७८. बालु बालू ७९. चेन्ह चिन्ह(अशुद्ध) ८०. जे जे’ ८१ . से/ के से’/के’ ८२. एखुनका अखनुका ८३. भुमिहार भूमिहार ८४. सुग्गर / सुगरक/ सूगर ८५. झठहाक झटहाक ८६. छूबि ८७. करइयो/ओ करैयो ने देलक /करियौ-करइयौ ८८. पुबारि पुबाइ ८९. झगड़ा-झाँटी झगड़ा-झाँटि ९०. पएरे-पएरे पैरे-पैरे ९१. खेलएबाक ९२. खेलेबाक ९३. लगा ९४. होए- हो – होअए ९५. बुझल बूझल ९६. बूझल (संबोधन अर्थमे) ९७. यैह यएह / इएह/ सैह/ सएह ९८. तातिल ९९. अयनाय- अयनाइ/ अएनाइ/ एनाइ १००. निन्न- निन्द १०१. बिनु बिन १०२. जाए जाइ १०३. जाइ (in different sense)-last word of sentence १०४. छत पर आबि जाइ १०५. ने १०६. खेलाए (play) –खेलाइ १०७. शिकाइत- शिकायत १०८. ढप- ढ़प १०९ . पढ़- पढ ११०. कनिए/ कनिये कनिञे १११. राकस- राकश ११२. होए/ होय होइ ११३. अउरदा- औरदा ११४. बुझेलन्हि (different meaning- got understand) ११५. बुझएलन्हि/बुझेलनि‍/ बुझयलन्हि (understood himself) ११६. चलि- चल/ चलि‍ गेल ११७. खधाइ- खधाय ११८. मोन पाड़लखिन्ह/ मोन पाड़लखि‍न/ मोन पारलखिन्ह ११९. कैक- कएक- कइएक १२०. लग ल’ग १२१. जरेनाइ १२२. जरौनाइ जरओनाइ- जरएनाइ/ जरेनाइ १२३. होइत १२४. गरबेलन्हि/ गरबेलनि‍ गरबौलन्हि/ गरबौलनि‍ १२५. चिखैत- (to test)चिखइत १२६. करइयो (willing to do) करैयो १२७. जेकरा- जकरा १२८. तकरा- तेकरा १२९. बिदेसर स्थानेमे/ बिदेसरे स्थानमे १३०. करबयलहुँ/ करबएलहुँ/ करबेलहुँ करबेलौं १३१. हारिक (उच्चारण हाइरक) १३२. ओजन वजन आफसोच/ अफसोस कागत/ कागच/ कागज १३३. आधे भाग/ आध-भागे १३४. पिचा / पिचाय/पिचाए १३५. नञ/ ने १३६. बच्चा नञ (ने) पिचा जाय १३७. तखन ने (नञ) कहैत अछि। कहै/ सुनै/ देखै छल मुदा कहैत-कहैत/ सुनैत-सुनैत/ देखैत-देखैत १३८. कतेक गोटे/ कताक गोटे १३९. कमाइ-धमाइ/ कमाई- धमाई १४० . लग ल’ग १४१. खेलाइ (for playing) १४२. छथिन्ह/ छथिन १४३. होइत होइ १४४. क्यो कियो / केओ १४५. केश (hair) १४६. केस (court-case) १४७ . बननाइ/ बननाय/ बननाए १४८. जरेनाइ १४९. कुरसी कुर्सी १५०. चरचा चर्चा १५१. कर्म करम १५२. डुबाबए/ डुबाबै/ डुमाबै डुमाबय/ डुमाबए १५३. एखुनका/ अखुनका १५४. लए/ लिअए (वाक्यक अंतिम शब्द)- लऽ १५५. कएलक/ केलक १५६. गरमी गर्मी १५७ . वरदी वर्दी १५८. सुना गेलाह सुना’/सुनाऽ १५९. एनाइ-गेनाइ १६०. तेना ने घेरलन्हि/ तेना ने घेरलनि‍ १६१. नञि / नै १६२. डरो ड’रो १६३. कतहु/ कतौ कहीं १६४. उमरिगर-उमेरगर उमरगर १६५. भरिगर १६६. धोल/धोअल धोएल १६७. गप/गप्प १६८. के के’ १६९. दरबज्जा/ दरबजा १७०. ठाम १७१. धरि तक १७२. घूरि लौटि १७३. थोरबेक १७४. बड्ड १७५. तोँ/ तूँ १७६. तोँहि( पद्यमे ग्राह्य) १७७. तोँही / तोँहि १७८. करबाइए करबाइये १७९. एकेटा १८०. करितथि /करतथि १८१. पहुँचि/ पहुँच १८२. राखलन्हि रखलन्हि/ रखलनि‍ १८३. लगलन्हि/ लगलनि‍ लागलन्हि १८४. सुनि (उच्चारण सुइन) १८५. अछि (उच्चारण अइछ) १८६. एलथि गेलथि १८७. बितओने/ बि‍तौने/ बितेने १८८. करबओलन्हि/ करबौलनि‍/ करेलखिन्ह/ करेलखि‍न १८९. करएलन्हि/ करेलनि‍ १९०. आकि/ कि १९१. पहुँचि/ पहुँच १९२. बत्ती जराय/ जराए जरा (आगि लगा) १९३. से से’ १९४. हाँ मे हाँ (हाँमे हाँ विभक्त्तिमे हटा कए) १९५. फेल फैल १९६. फइल(spacious) फैल १९७. होयतन्हि/ होएतन्हि/ होएतनि‍/हेतनि‍/ हेतन्हि १९८. हाथ मटिआएब/ हाथ मटियाबय/हाथ मटियाएब १९९. फेका फेंका २००. देखाए देखा २०१. देखाबए २०२. सत्तरि सत्तर २०३. साहेब साहब २०४.गेलैन्ह/ गेलन्हि/ गेलनि‍ २०५. हेबाक/ होएबाक २०६.केलो/ कएलहुँ/केलौं/ केलुँ २०७. किछु न किछु/ किछु ने किछु २०८.घुमेलहुँ/ घुमओलहुँ/ घुमेलौं २०९. एलाक/ अएलाक २१०. अः/ अह २११.लय/ लए (अर्थ-परिवर्त्तन) २१२.कनीक/ कनेक २१३.सबहक/ सभक २१४.मिलाऽ/ मिला २१५.कऽ/ क २१६.जाऽ/ जा २१७.आऽ/ आ २१८.भऽ /भ’ (’ फॉन्टक कमीक द्योतक) २१९.निअम/ नियम २२० .हेक्टेअर/ हेक्टेयर २२१.पहिल अक्षर ढ/ बादक/ बीचक ढ़ २२२.तहिं/तहिँ/ तञि/ तैं २२३.कहिं/ कहीं २२४.तँइ/ तैं / तइँ २२५.नँइ/ नइँ/  नञि/ नहि/नै २२६.है/ हए / एलीहेँ/ २२७.छञि/ छै/ छैक /छइ २२८.दृष्टिएँ/ दृष्टियेँ २२९.आ (come)/ आऽ(conjunction) २३०. आ (conjunction)/ आऽ(come) २३१.कुनो/ कोनो, कोना/केना २३२.गेलैन्ह-गेलन्हि-गेलनि‍ २३३.हेबाक- होएबाक २३४.केलौँ- कएलौँ-कएलहुँ/केलौं २३५.किछु न किछ- किछु ने किछु २३६.केहेन- केहन २३७.आऽ (come)-आ (conjunction-and)/आ। आब'-आब' /आबह-आबह २३८. हएत-हैत २३९.घुमेलहुँ-घुमएलहुँ- घुमेलाें २४०.एलाक- अएलाक २४१.होनि- होइन/ होन्हि/ २४२.ओ-राम ओ श्यामक बीच(conjunction), ओऽ कहलक (he said)/ओ २४३.की हए/ कोसी अएली हए/ की है। की हइ २४४.दृष्टिएँ/ दृष्टियेँ २४५ .शामिल/ सामेल २४६.तैँ / तँए/ तञि/ तहिं २४७.जौं / ज्योँ/ जँ/ २४८.सभ/ सब २४९.सभक/ सबहक २५०.कहिं/ कहीं २५१.कुनो/ कोनो/ कोनहुँ/ २५२.फारकती भऽ गेल/ भए गेल/ भय गेल २५३.कोना/ केना/ कन्‍ना/कना २५४.अः/ अह २५५.जनै/ जनञ २५६.गेलनि‍/ गेलाह (अर्थ परिवर्तन) २५७.केलन्हि/ कएलन्हि/ केलनि‍/ २५८.लय/ लए/ लएह (अर्थ परिवर्तन) २५९.कनीक/ कनेक/कनी-मनी २६०.पठेलन्हि‍ पठेलनि‍/ पठेलइन/ पपठओलन्हि/ पठबौलनि‍/ २६१.निअम/ नियम २६२.हेक्टेअर/ हेक्टेयर २६३.पहिल अक्षर रहने ढ/ बीचमे रहने ढ़ २६४.आकारान्तमे बिकारीक प्रयोग उचित नै/ अपोस्ट्रोफीक प्रयोग फान्टक तकनीकी न्यूनताक परिचायक ओकर बदला अवग्रह (बिकारी) क प्रयोग उचित २६५.केर (पद्यमे ग्राह्य) / -क/ कऽ/ के २६६.छैन्हि- छन्हि २६७.लगैए/ लगैये २६८.होएत/ हएत २६९.जाएत/ जएत/ २७०.आएत/ अएत/ आओत २७१ .खाएत/ खएत/ खैत २७२.पिअएबाक/ पिएबाक/पि‍येबाक २७३.शुरु/ शुरुह २७४.शुरुहे/ शुरुए २७५.अएताह/अओताह/ एताह/ औताह २७६.जाहि/ जाइ/ जइ/ जै/ २७७.जाइत/ जैतए/ जइतए २७८.आएल/ अएल २७९.कैक/ कएक २८०.आयल/ अएल/ आएल २८१. जाए/ जअए/ जए (लालति‍ जाए लगलीह।) २८२. नुकएल/ नुकाएल २८३. कठुआएल/ कठुअएल २८४. ताहि/ तै/ तइ २८५. गायब/ गाएब/ गएब २८६. सकै/ सकए/ सकय २८७.सेरा/सरा/ सराए (भात सरा गेल) २८८.कहैत रही/देखैत रही/ कहैत छलौं/ कहै छलौं- अहिना चलैत/ पढ़ैत (पढ़ै-पढ़ैत अर्थ कखनो काल परिवर्तित) - आर बुझै/ बुझैत (बुझै/ बुझै छी, मुदा बुझैत-बुझैत)/ सकैत/ सकै। करैत/ करै। दै/ दैत। छैक/ छै। बचलै/ बचलैक। रखबा/ रखबाक । बिनु/ बिन। रातिक/ रातुक बुझै आ बुझैत केर अपन-अपन जगहपर प्रयोग समीचीन अछि‍। बुझैत-बुझैत आब बुझलि‍ऐ। हमहूँ बुझै छी। २८९. दुआरे/ द्वारे २९०.भेटि/ भेट/ भेँट २९१. खन/ खीन/  खुना (भोर खन/ भोर खीन) २९२.तक/ धरि २९३.गऽ/ गै (meaning different-जनबै गऽ) २९४.सऽ/ सँ (मुदा दऽ, लऽ) २९५.त्त्व,(तीन अक्षरक मेल बदला पुनरुक्तिक एक आ एकटा दोसरक उपयोग) आदिक बदला त्व आदि। महत्त्व/ महत्व/ कर्ता/ कर्त्ता आदिमे त्त संयुक्तक कोनो आवश्यकता मैथिलीमे नै अछि। वक्तव्य २९६.बेसी/ बेशी २९७.बाला/वाला बला/ वला (रहैबला) २९८ .वाली/ (बदलैवाली) २९९.वार्त्ता/ वार्ता ३००. अन्तर्राष्ट्रिय/ अन्तर्राष्ट्रीय ३०१. लेमए/ लेबए ३०२.लमछुरका, नमछुरका ३०२.लागै/ लगै ( भेटैत/ भेटै) ३०३.लागल/ लगल ३०४.हबा/ हवा ३०५.राखलक/ रखलक ३०६.आ (come)/ आ (and) ३०७. पश्चाताप/ पश्चात्ताप ३०८. ऽ केर व्यवहार शब्दक अन्तमे मात्र, यथासंभव बीचमे नै। ३०९.कहैत/ कहै ३१०. रहए (छल)/ रहै (छलै) (meaning different) ३११.तागति/ ताकति ३१२.खराप/ खराब ३१३.बोइन/ बोनि/ बोइनि ३१४.जाठि/ जाइठ ३१५.कागज/ कागच/ कागत ३१६.गिरै (meaning different- swallow)/ गिरए (खसए) ३१७.राष्ट्रिय/ राष्ट्रीय DATE-LIST (year- 2012-13) (१४२० फसली साल) Marriage Days: Nov.2012- 25, 26, 28, 29, 30 Dec.2012- 5,9, 10, 13, 14 January 2013- 16, 17, 18, 23, 24, 31 Feb.2013- 1, 3, 4, 6, 8, 10, 14, 15, 18, 20, 24, 25 April 2013- 21, 22, 24, 26, 29 May 2013- 1,2,3,5,6,9,12,13,17,19,20,22,23,24,26,27,29,30,31 June 2013- 2,3 July 2013- 11, 14, 15 Upanayana Days: January 2013- 16 February 2013- 14, 15, 20, 21 April 2013- 22 May 2013- 20, 21 Dviragaman Din: November 2012- 25, 26, 28, 29 December 2012- 2, 3, 14 February 2013- 14, 15, 18, 20, 21, 22, 27, 28 March 2013- 1 April 2013- 18, 22, 24, 26, 28, 29 May 2013- 12, 13 Mundan Din: November 2012- 26, 30 December 2012- 3 January 2013- 18, 24 February 2013- 1, 14, 15, 20, 28 April 2013- 17 May 2013- 13, 23, 29 June 2013- 13, 19, 26, 27, 28 July 2013- 10, 15 FESTIVALS OF MITHILA (2012-13) Mauna Panchami-08 July Madhushravani- 22 July Nag Panchami- 24 July Raksha Bandhan- 02 Aug Krishnastami- 10 August Kushi Amavasya / Somvari Vrat- 17 August Vishwakarma Pooja- 17 September Hartalika Teej- 18 September ChauthChandra-19 September Karma Dharma Ekadashi-26 September Indra Pooja Aarambh- 27 September Anant Caturdashi- 29 Sep Agastyarghadaan- 30 Sep Pitri Paksha begins- 30 Sep Jimootavahan Vrata/ Jitia-08 October Matri Navami- 09 October SomvatiAmavasya Vrat- 15 October Kalashsthapan- 16 October Belnauti- 20 October Patrika Pravesh- 21 October Mahastami- 22 October Maha Navami - 23 October Vijaya Dashami- 24 October Kojagara- 29 Oct Dhanteras- 11 November Diyabati, shyama pooja-13 November Annakoota/ Govardhana Pooja-14 November Bhratridwitiya/ Chitragupta Pooja- 15 November Chhathi -19 November Devotthan Ekadashi- 24 November ravivratarambh- 25 November Navanna parvan- 25 November KartikPoornima- Sama Visarjan- 28 November Vivaha Panchmi- 17 December Makara/ Teela Sankranti-14 Jan Naraknivaran chaturdashi- 08 February Basant Panchami/ Saraswati Pooja- 15 February Achla Saptmi- 17 February Mahashivaratri-10 March Holikadahan-Fagua-26 March Holi- 28 March Varuni Trayodashi-07 April Chaiti  navaratrarambh- 11 April Jurishital-15 April Chaiti Chhathi vrata-16 April Ram Navami- 19 April Ravi Brat Ant- 12 May Akshaya Tritiya-13 May Janaki Navami- 19 May Vat Savitri-barasait- 08 June Ganga Dashhara-18 June Somavati Amavasya Vrata- 08 July Jagannath Rath Yatra- 10 July Hari Sayan Ekadashi- 19 July Aashadhi Guru Poornima-22 Jul VIDEHA ARCHIVE १.विदेह ई-पत्रिकाक सभटा पुरान अंक ब्रेल, तिरहुता आ देवनागरी रूपमे Videha e journal's all old issues in Braille Tirhuta and Devanagari versions विदेह ई-पत्रिकाक पहिल ५० अंक

विदेह ई-पत्रिकाक ५०म सँ आगाँक अंक  http://sites.google.com/a/videha.com/videha/ https://sites.google.com/a/videha.com/videha-archive-part-i/ https://sites.google.com/a/videha.com/videha-archive-part-ii/ २.मैथिली पोथी डाउनलोड Maithili Books Download http://sites.google.com/a/videha.com/videha-pothi ३.मैथिली ऑडियो संकलन Maithili Audio Downloads http://sites.google.com/a/videha.com/videha-audio ४.मैथिली वीडियोक संकलन Maithili Videos http://sites.google.com/a/videha.com/videha-video ५.मिथिला चित्रकला/ आधुनिक चित्रकला आ चित्र Mithila Painting/ Modern Art and Photos http://sites.google.com/a/videha.com/videha-paintings-photos/ "विदेह"क एहि सभ सहयोगी लिंकपर सेहो एक बेर जाउ। ६.विदेह मैथिली क्विज  :  http://videhaquiz.blogspot.com/ ७.विदेह मैथिली जालवृत्त एग्रीगेटर : http://videha-aggregator.blogspot.com/ ८.विदेह मैथिली साहित्य अंग्रेजीमे अनूदित http://madhubani-art.blogspot.com/ ९.विदेहक पूर्व-रूप "भालसरिक गाछ"  : http://gajendrathakur.blogspot.com/ १०.विदेह इंडेक्स  : http://videha123.blogspot.com/ ११.विदेह फाइल : http://videha123.wordpress.com/ १२. विदेह: सदेह : पहिल तिरहुता (मिथिला़क्षर) जालवृत्त (ब्लॉग) http://videha-sadeha.blogspot.com/ १३. विदेह:ब्रेल: मैथिली ब्रेलमे: पहिल बेर विदेह द्वारा http://videha-braille.blogspot.com/ १४.VIDEHA IST MAITHILI  FORTNIGHTLY EJOURNAL ARCHIVE http://videha-archive.blogspot.com/ १५. विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका मैथिली पोथीक आर्काइव http://videha-pothi.blogspot.com/ १६. विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका ऑडियो आर्काइव http://videha-audio.blogspot.com/ १७. विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका वीडियो आर्काइव http://videha-video.blogspot.com/ १८. विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका मिथिला चित्रकला, आधुनिक कला आ चित्रकला http://videha-paintings-photos.blogspot.com/ १९. मैथिल आर मिथिला (मैथिलीक सभसँ लोकप्रिय जालवृत्त) http://maithilaurmithila.blogspot.com/ २०.श्रुति प्रकाशन http://www.shruti-publication.com/ २१.http://groups.google.com/group/videha २२.http://groups.yahoo.com/group/VIDEHA/ २३.गजेन्द्र ठाकुर इ‍डेक्स http://gajendrathakur123.blogspot.com २४. नेना भुटका http://mangan-khabas.blogspot.com/ २५.विदेह रेडियो:मैथिली कथा-कविता आदिक पहिल पोडकास्ट साइट http://videha123radio.wordpress.com/ २६.Videha Radio २७. Join official Videha facebook group. २८. विदेह मैथिली नाट्य उत्सव http://maithili-drama.blogspot.com/ २९.समदिया http://esamaad.blogspot.com/ ३०. मैथिली फिल्म्स http://maithilifilms.blogspot.com/ ३१.अनचिन्हार आखर http://anchinharakharkolkata.blogspot.com/ ३२. मैथिली हाइकू http://maithili-haiku.blogspot.com/ ३३. मानक मैथिली http://manak-maithili.blogspot.com/ ३४. विहनि कथा http://vihanikatha.blogspot.in/ ३५. मैथिली कविता http://maithili-kavita.blogspot.in/ ३६. मैथिली कथा http://maithili-katha.blogspot.in/ ३७.मैथिली समालोचना http://maithili-samalochna.blogspot.in/ महत्त्वपूर्ण सूचना: The Maithili pdf books are AVAILABLE FOR free PDF DOWNLOAD AT

https://sites.google.com/a/videha.com/videha/ http://videha123.wordpress.com/   http://videha123.wordpress.com/about/ विदेह:सदेह:१: २: ३: ४:५:६:७:८:९:१० "विदेह"क प्रिंट संस्करण: विदेह-ई-पत्रिका (http://www.videha.co.in/) क चुनल रचना सम्मिलित। सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। Details for purchase available at publishers's (print-version) site http://www.shruti-publication.com  or you may write to shruti.publication@shruti-publication.com विदेह मैथिली साहित्य आन्दोलन (c)२००४-१३. सर्वाधिकार लेखकाधीन आ जतए लेखकक नाम नहि अछि ततए संपादकाधीन। विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। सह-सम्पादक: उमेश मंडल। सहायक सम्पादक: शिव कुमार झा आ मुन्नाजी (मनोज कुमार कर्ण)। भाषा-सम्पादन: नागेन्द्र कुमार झा आ पञ्जीकार विद्यानन्द झा। कला-सम्पादन: ज्योति झा चौधरी आ रश्मि रेखा सिन्हा। सम्पादक-शोध-अन्वेषण: डॉ. जया वर्मा आ डॉ. राजीव कुमार वर्मा। सम्पादक- नाटक-रंगमंच-चलचित्र- बेचन ठाकुर। सम्पादक- सूचना-सम्पर्क-समाद- पूनम मंडल आ प्रियंका झा। सम्पादक- अनुवाद विभाग- विनीत उत्पल। रचनाकार अपन मौलिक आ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि) ggajendra@videha.com केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx, .rtf वा .txt फॉर्मेटमे पठा सकैत छथि। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेताह, से आशा करैत छी। रचनाक अंतमे टाइप रहय, जे ई रचना मौलिक अछि, आ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। मेल प्राप्त होयबाक बाद यथासंभव शीघ्र ( सात दिनक भीतर) एकर प्रकाशनक अंकक सूचना देल जायत। ’विदेह' प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका अछि आ ऐमे मैथिली, संस्कृत आ अंग्रेजीमे मिथिला आ मैथिलीसँ संबंधित रचना प्रकाशित कएल जाइत अछि। एहि ई पत्रिकाकेँ श्रीमति लक्ष्मी ठाकुर द्वारा मासक ०१ आ १५ तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि। (c) 2004-13 सर्वाधिकार सुरक्षित। विदेहमे प्रकाशित सभटा रचना आ आर्काइवक सर्वाधिकार रचनाकार आ संग्रहकर्त्ताक लगमे छन्हि। रचनाक अनुवाद आ पुनः प्रकाशन किंवा आर्काइवक उपयोगक अधिकार किनबाक हेतु ggajendra@videha.com पर संपर्क करू। एहि साइटकेँ प्रीति झा ठाकुर, मधूलिका चौधरी आ रश्मि प्रिया द्वारा डिजाइन कएल गेल। सिद्धिरस्तु 168 वि दे ह विदेह Videha বিদেহ  www.videha.co.in विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका www.videha.com Videha Ist Maithili Fortnightly ejournal  विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका 'विदेह' १२६ म अंक १५ मार्च २०१३ (वर्ष ६ मास ६३ अंक १२६) मानुषीमिह संस्कृताम् ISSN 2229-547X VIDEHA

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