VIDEHA — Issue 127 / अंक १२७

Publication: VIDEHA · Issue: 127
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ISSN 2229-547X VIDEHA ‘विदेह'१२७ म अंक ०१ अप्रैल २०१३ (वर्ष ६ मास ६४ अंक १२७) ऐ अंकमे अछि:- १. संपादकीय संदेश २. गद्य २.१.हम आन्हर रही तइसँ प्रैक्टिस खूब केलौं: राजकुमार झा (विनीत उत्पल संग अन्तर्वार्ता) २.२.ज्योति चौधरी-एक युग: टच वुड -भाग-३ २.३.शारदानन्द दास परिमल- राजनन्दनक आत्मालाप २.४.सुमित आनन्द- रिपोर्ट २.५.जगदानन्द झा ‘मनु’- दूटा विहनि कथा ३. पद्य ३.१.जगदीश चन्द्र ठाकुर ‘अनिल’-गजल १-२ ३.२.प्रदीप पुष्प- गजल ३.३.बिन्देश्वर ठाकुर-हिसाब जिनगीक ३.४.रमा कान्त झा, होलीक हुरदंग ३.५.इरा मल्लिक-कविता/ होलीक एक दूटा पाँति/ गजल ३.६.१.जगदीश प्रसाद मण्‍डलक गीत २.मनोज कुमार मण्‍डल- ४ गोट कविता ३.७.१.राजदेव मण्‍डल- रूचि‍गर/ बजैत एकान्‍त २.रामवि‍लास साहु- सुखल खेत आ भूखल पेट ३.८.मुन्नी कामत फगुआ/ आनहर कानुन ४. मिथिला कला-संगीत १. ज्योति झा चौधरी २.राजनाथ मिश्र (चित्रमय मिथिला) ३. उमेश मण्डल (मिथिलाक वनस्पति/ मिथिलाक जीव-जन्तु/ मिथिलाक जिनगी) ५.गद्य-पद्य भारती:मन्त्रद्रष्टा ऋष्यश्रृङ्ग- हरिशंकर श्रीवास्तव “शलभ"- (हिन्दीसँ मैथिली अनुवाद विनीत उत्पल) ६.बालानां कृते-जगदीश प्रसाद मण्डल- बाल उपन्यास- नै धाड़ैए विदेह मैथिली पोथी डाउनलोड साइट VIDEHA MAITHILI BOOKS FREE DOWNLOAD SITE विदेह ई-पत्रिकाक सभटा पुरान अंक ( ब्रेल, तिरहुता आ देवनागरी मे ) पी.डी.एफ. डाउनलोडक लेल नीचाँक लिंकपर उपलब्ध अछि। All the old issues of Videha e journal ( in Braille, Tirhuta and Devanagari versions ) are available for pdf download at the following link. विदेह ई-पत्रिकाक सभटा पुरान अंक ब्रेल, तिरहुता आ देवनागरी रूपमे Videha e journal's all old issues in Braille Tirhuta and Devanagari versions विदेह ई-पत्रिकाक पहिल ५० अंक

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(मैथिलीक सभसँ लोकप्रिय जालवृत्त) पर जाउ। संपादकीय १ गुणाढ्यक पैशाची भाषाक वृहत् कथाक क्षेमेन्द्रक कथा मंजरी वा सोमदेवक कथासरित्सागरक अनुवाद होएबाक कथा कथा कहबाक शैली सेहो भऽ सकैए मुदा ई अनुवादक कथाक प्रारम्भ तँ कहिते अछि। अनुवादक इतिहास बड्ड पुरान छै। कोनो प्राचीन भाषा जेना संस्कृत, अवेस्ता, ग्रीक आ लैटिनक कोनो कालजयी कृति जखन दुरूह हेबऽ लागल तँ ओइपर चाहे तँ भाष्य लिखबाक खगताक अनुभव भेल आ कनेक आर आगाँ ओकरा दोसर भाषामे अनुवाद कऽ बुझबाक खगताक अनुभव भेल। प्राचीन मौर्य साम्राज्यक सम्राट अशोकक पाथरपर कीलित शिलालेख सभ, कएकटा लिपि आ भाषामे, राज्यक आदेशकेँ विभिन्न प्रान्तमे प्रसारित केलक। भाष्य पहिने मूल भाषामे लिखल जाइत छल आ बादमे दोसर भाषामे लिखल जाए लागल। मैथिलीसँ दोसर भाषा आ दोसर भाषासँ मैथिलीमे अनुवाद लेल सिद्धान्त: मैथिलीसँ सोझे दोसर भाषामे अनुवाद अखन धरि संस्कृत, बांग्ला, नेपाली, हिन्दी आ अंग्रेजी धरि सीमित अछि। तहिना ऐ पाँचू भाषाक सोझ अनुवाद मैथिलीमे होइत अछि। ऐ पाँच भाषाक अतिरिक्त मराठी, मलयालम आदि भाषासँ सेहो सोझ मैथिली अनुवाद भेल अछि मुदा से नगण्य अछि। मैथिलीमे अनुवाद आ मैथिलीसँ अन्य भाषामे अनुवाद ऐ पाँचू भाषाकेँ मध्यस्थ भाषाक रूपमे लऽ कऽ होइत अछि। अहू पाँच भाषामे हिन्दी, नेपाली आ अंग्रेजीक अतिरिक्त आन दू भाषाक मध्यस्थ भाषाक रूपमे प्रयोग सीमित अछि। अनुवादसँ कने भिन्न अछि रूपान्तरण, जेना कथाक नाट्य रूपान्तरण वा गद्यक पद्यमे पद्यक गद्यमे रूपान्तरण। ऐ मे मैथिलीसँ मैथिलीमे विधाक रूपान्तरण होइत अछि आ अनुवाद सिद्धान्तक ज्ञान नै रहने रूपान्तरकार अर्थ आ भावक अनर्थ कऽ दैत अछि। मैथिलीमे आ मैथिलीसँ अनुवादमे तँ ई समस्या आर विकट अछि। उत्तम अनुवाद लेल किछु आवश्यक तत्त्व: शब्दशः अनुवाद करबा काल ध्यान राखू जे कहबी आ सन्दर्भक मूल भाव आबि रहल अछि आकि नै। श्ब्द, वाक्य आ भाषाक गढ़नि अक्षुण्ण रहए से ध्यानमे राखू। मूल भाषाक शब्द सभ जँ प्राचीन अछि तँ अनूदित भाषाक शब्द सभकेँ सेहो पुरान आ खाँटी राखू। मूल आ अनूदित भाषाक व्याकरण आ शब्द भण्डारक वृहत् ज्ञान एतए आवश्यक भऽ जाइत अछि। मूल भाषामे मुँह कोचिया कऽ बाजल रामनाथ, उमेशक प्रति सम्बोधनकेँ रामनाथो, उमेशोक बदलामे रामनाथहुँ, उमेशहुँ कऽ अनुवाद कएल जाएब उचित हएत मुदा सामान्य परिस्थितिमे से उचित नै हएत। से शब्द, भाव, प्रारूपमे सेहो आ मूल कृतिक देश-कालक भाषामे सेहो समानता चाही। अनुवादककेँ मूल आ अनूदित कएल जाएबला भाषाक ज्ञान तँ हेबाके चाही संगमे दुनू भाषा क्षेत्र इतिहास, भूगोल, लोककथा, कहबी आ ग्रम्य-वन्य आ नग्रक संस्कृतिक ज्ञान सेहो हेबाक चाही। ई मध्यस्थ भाषासँ अनुवाद करबा काल आर बेसी महत्वपूर्ण भऽ जाइत अछि। ऐ परिस्थितिमे “दुनू भाषा क्षेत्रक इतिहास, भूगोल, लोककथा, कहबी आ ग्रम्य-वन्य आ नग्रक संस्कृतिक ज्ञान” सँ तात्पर्य अनूदित आ मूल भाषा क्षेत्रसँ हएत मध्यस्थ भाषा क्षेत्रसँ नै। कखनो काल मूल भाषाक कोनो भाषासँ सम्बन्धित तत्त्व वा गएर भाषिक तत्व (सांस्कृतिक तत्त्व) क सही-सही उदाहरण अनूदित भाषामे नै भेटैत अछि आ तखन अनुवादक गपकेँ नमराबऽ लगैत छथि वा ओइ लेल एकटा सन्निकट शब्दावली (ओइ नै भेटल तत्त्वक) देमए लगैत छथि। ऐ परिस्थितिमे सन्निकट शब्दावली देबासँ नीक गपकेँ नमरा कऽ बुझाएब वा परिशिष्ट दऽ ओकरा स्पष्ट करब हएत। ऐ सँ मूल भाषासँ मध्यस्थ माषाक माध्यमसँ कएल अनुवादमे होइबला साहित्यिक घाटाकेँ न्यून कएल जा सकत। कथा, कविता, नाटक, उपन्यास, महाकाव्य (गीत-प्रबन्ध), निबन्ध, स्कूल-कॉलेजक पुस्तक, संगणक विज्ञान, समाजशास्त्र, समाज विज्ञान आ प्रकृति विज्ञानक पोथीक अनुवाद करबा काल किछु विशेष तकनीकक आवश्यकता पड़त। निबन्ध, स्कूल-कॉलेजक पुस्तक, संगणक विज्ञान, समाजशास्त्र, समाज विज्ञान आ प्रकृति विज्ञानक अनुवाद ऐ अर्थेँ सरल अछि जे ऐ सभमे विस्तारसँ विषयक चर्चा होइत अछि आ सर्जनात्मक साहित्य {कथा, कविता, नाटक, उपन्यास, महाकाव्य (गीत-प्रबन्ध)} क विपरीत भाव आ संस्कृतिक गुणांक नै रहैत अछि वा कम रहैत अछि। संगे एतए पाठक सेहो कक्षा/ विषयकक अनुसार सजाएल रहैत छथि। केमिकल नाम, बायोलोजिकल आ बोटेनिकल बाइनरी नाम आ आन सभ सिम्बल आदि जे विशिष्ट अन्तर्राष्ट्रीय संस्था सभ द्वारा स्वीकृत अछि तकर परिवर्तन वा अनुवाद अपेक्षित नै अछि। सर्जनात्मक साहित्यमे नाटक सभसँ कठिन अछि, फेर कविता अछि आ तखन कथा, जँ अनुवादकक दृष्टिकोणसँ देखी तखन। नाटकमे नाटकक पृष्ठभूमि आ परोक्ष निहितार्थकेँ चिन्हित करए पड़त संगहि पात्र सभक मनोविज्ञान बूझए पड़त। कवितामे कविताक विधासँ ओकर गढ़निसँ अनुवादकक परिचित भेनाइ आवश्यक, जेना हाइकूक मैथिलीसँ अंग्रेजी अनुवाद करै बेरमे मैथिलीक वार्णिक ५/७/५ क मेल जँ अंग्रेजीक अल्फाबेटसँ करेबै तँ अहाँक अनूदित हाइकू हास्यास्पद भऽ जाएत कारण अंग्रेजीमे ५/७/५ सिलेबलक हाइकू होइ छै आ मैथिलीमे जेना वर्ण आ सिलेबलक समानता होइ छै से अंग्रेजीमे नै होइ छै। ऐ सन्दर्भमे ज्योति सुनीत चौधरीक मैथिलीसँ अंग्रेजी अनुवाद एकटा प्रतिमान प्रस्तुत करैत अछि। कविताक लय, बिम्बपर विचार करए पड़त संगहि कविता खण्डक कविताक मुख्य शरीरसँ मिलान करए पड़त। कथामे कथाकारक आ कथाक पात्रक संग कथाक क्रम, बैकफ्लैशक समय-कालक ज्ञान आ वातावरणक ज्ञान आवश्यक भऽ जाइत अछि। आब महाकाव्यक अनुवाद देखू, रामलोचन शरणक मैथिली रामचरित मानस अवधीसँ मैथिलीमे अनुवाद अछि मुदा दोहा, चौपाइ, सोरठा सभ शास्त्रीय रूपेँ अनूदित भेल अछि। संस्कृत भाषाक अनुवादक माध्यमसँ पाठन आंग्ल शासक लोकनि द्वारा प्रारम्भ भेल। ऐ विधिसँ ने लैटिनक आ नहिये ग्रीकक अध्यापन कराओल गेल छल। ऐ विधिसँ जँ अहाँ संस्कत वा कोनो भाषा सीखब तँ आचार्य आ कोविद कऽ जाएब मुदा सम्भाषण नै कएल हएत। जँ कोनो भाषाकेँ अहाँ मातृभाषा रूपेँ सीखब तखने सम्भाषण कऽ सकब, संस्कृति आदिक परिचय पाठ्यक्रममे शब्दकोष; आ लोककथा आ इतिहास/ भूगोलक समावेश कऽ कएल जा सकैत अछि। संगणक द्वारा अनुवाद: सर्जनात्मक वा निबन्ध, स्कूल-कॉलेजक पुस्तक, संगणक विज्ञान, समाजशास्त्र, समाज विज्ञान आ प्रकृति विज्ञानक अनुवाद संगणक द्वारा प्रायोगिक रूपमे कएल जाइत अछि मुदा “कोल्ड ब्लडेड एनीमल” क अनुवाद हास्यास्पद रूपेँ “नृशंस जीव” कएल जाइत अछि। मुदा संगणकक द्वारा अनुवाद किछु क्षेत्रमे सफल रूपेँ भेल अछि, जेना विकीपीडियामे ५०० शब्दक एकटा “बेसी प्रयुक्त शब्दावली” आ २६०० शब्दक “शब्दावली”क अनुवाद केलासँ, गूगलक ट्रान्सलेशन अओजार आदिमे आधारभूत शब्दक अनुवाद केलासँ आ आन गवेषक जेना मोजिला फायरफॉक्स आदिमे अंग्रेजीक सभ पारिभाषिक संगणकीय शब्दक अनुवाद केलासँ त्रुटिविहीन स्वतः मैथिली अनुवाद भऽ जाइत अछि। गजेन्द्र ठाकुर ggajendra@videha.com अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। २. गद्य २.१.हम आन्हर रही तइसँ प्रैक्टिस खूब केलौं: राजकुमार झा (विनीत उत्पल संग अन्तर्वार्ता) २.२.ज्योति चौधरी-एक युग: टच वुड -भाग-३ २.३.शारदानन्द दास परिमल- राजनन्दनक आत्मालाप २.४.सुमित आनन्द- रिपोर्ट २.५.जगदानन्द झा ‘मनु’- दूटा विहनि कथा हम आन्हर रही तइसँ प्रैक्टिस खूब केलौं: राजकुमार झा (विनीत उत्पल संग अन्तर्वार्ता) इतिहासक पन्नामे सभ कलाकारकेँ ठाम नै भेटैत अछि। वएह कलाकारकेँ आइ धरि याद राखल गेल अछि जकरा सत्ता प्रश्रय देने अछि। अहाँ मिथिलाक कतेक ओहन कलाकारकेँ जानैत छी जे बिना किनको प्रश्रय पओने अप्पन साधनाकेँ जीवित राखयमे सक्षम भेल अछि या ओ इतिहासक पन्नामे दर्ज अछि। चाहे दरभंगा राज हुअए या बनैली स्टेट या सोनवर्षा राज, राजदरबारी कलाकारक इतिहास दर्ज अछि। ऐ दरबारी कलाकारसँ फराक कलाकार केँ लऽ कऽ नै तँ अप्पन समाज जागरूक अछि आ नहिये इतिहास लिखएबला। स्वतंत्रता प्राप्तिक बादसँ वएह कलाकार प्रतिष्ठित भेल अछि जे सत्ता प्रतिष्ठानसँ जुड़ल रहल। हुनके मान्यता भेटल जिनकर गीत दरभंगा आकाशवाणीसँ प्रसारित भेल। मुदा ऐ गपसँ इनकार नै कएल जा सकैत अछि जे आइ धरि मुट्ठी भरि लोकक बपौती आकाशवाणी दरभंगाक संगीत विभागमे छाएल अछि।  जखनकि संपूर्ण मिथिलामे अनेको एहन कलाकार अछि जिनका लग संगीत साधनाक नै तँ समुचित साधन अछि आ नहिये हुनकर कोनो लिखित इतिहास भावी पीढ़ीकेँ भेटत। एक दिस रेडियोसँ मैथिली गीत सुनए बला लोक नै भेटैत अछि, ओतए सच्चाई ई अछि जे मुख्यधारासँ बाहर ई कलाकार जखैन गाम-घरक मचानपर अप्पन कलाकेँ प्रदर्शित करैत अछि तँ दर्शकक थपड़ीक आवाजक दम रेडियो स्टेशनसँ भेटएबला चारि-पाँच सए टकाक दामसँ बेसी ताकत राखैत अछि। एहने एकटा कलाकार अछि राजकुमार झा। प्रकृतिक करिश्मा सँ भगवान हुनका आँखि नै देलक मुदा हुनर एहन गलामे सुर आ आंगुरमे थिरकन एहन देलक जे जखैन ओ  संगीत साधना करैत अछि तँ एहन लागत जे सरस्वती सौंसे आबि कऽ हुनका पर सवार अछि। संगीतक एकटा तपस्वी राजकुमार झासँ वरिष्ठ पत्रकार विनीत उत्पलक गपशप- विनीत उत्पल:अहाँक संगीत शिक्षा कोना भेल? राजकुमार झा: हम गामे मे रहैत रही। नेनेसँ हमरा लखाह नै दैत अछि, मुदा छाँहीसँ हम लोककेँ कनी चीन्ह जाइत छी। स्पष्ट किछु नहिये बुझाबैए। गाम-घरमे संगीत माने भजन-कीर्तनक, नाटक सभक माहौल छल तेँ हमहूँ गाबए-बजाबएमे लागि गेलौं। हमर पढ़ाइ सोलह बरखक उम्रमे शुरू भेल। हमर गामक भाय नारायण झाक ओइ बरख माय मरल रहथिन। ओइ श्राद्धमे बड़ रास लोक सभ आएल छल। ओइमे नारायण भायक माध्यमसँ हम दरभंगा गेलौं। दरभंगाक नेत्रहीन विद्यालय (श्री कामेश्वरी प्रिया पुअर होम) मने राजकीय नेत्रहीन उच्च विद्यालय, दरभंगामे टेस्ट भेल। संगीतक जाँच भेल आ केलौं। ओतए पाँच बरख रहलौं। पढ़ाइ केलौं। संगीत, अंग्रेजी ओतए पढ़ैत रही। वर्ग एक सँ वर्ग तीन, फेर सीधे पाँच आ तीन बरखमे सतमा पास केलौं। मात्र छह बरखमे। 1988 मे मैट्रिक पास केलौं। विनीत उत्पल: फेर दरभंगासँ इलाहाबाद कोना गेलौं? राजकुमार झा: संगीतसँ मैट्रिक केलाक बाद इलाहाबाद आबि गेलौं। प्रयाग संगीत समिति, इलाहाबादसँ एम.ए. केलौं। विनीत उत्पल: दरभंगा आ इलाहावादमे अहाँक संगीत गुरू के सभ छल? राजकुमार झा: दरभंगामे गौतम मिश्र, सुरेंद्र झा सँ संगीत सीखै छलौं। स्कूलमे तबलाक मास्टर कियो नै छल। हारमोनियम तँ हम अप्पन बाबूजी भुवनेश्वर झा सँ सिखलौं। इलाहाबादमे चंद्रभूषण पांडेय छल जे हमरा संगीतक पाठ पढ़एलक। हम गायन गौतम मिश्रसँ सिखलौं। चूंकि हम आन्हर छी तइसँ हम थ्योरी कतौ नै केलौं, प्रैक्टिकल बड़ केलौं। विनीत उत्पल:अहाँकेँ अप्पन कोनो संगी-साथीक ख्याल अछि? राजकुमार झा: हमरा संगे राम सागर पासवान, मोहन रावत बारीक, भगत झा, गंगा प्रसाद मेहता, रामवतार मंडल दरंभगामे पढ़ै छल। इलाहाबादमे भरत पांडेय, मक्खनलाल, अर्जुन पांडेय छल, मुदा सभ कियो कतए अछि, नै मालूम। विनीत उत्पल: अहाँ कोन सभ वाद्य बजा सकैत छी? राजकुमार झा: हारमोनियम, ढोलक, नाल, बांसुरी, कैसियो, गिटार, तानपुरा सभ किछु बजाबैक लेल जानैत छिऐ। हारमोनियम बजाएब तँ हम गाममे सिखलौं। विनीत उत्पल: अहाँकेँ संगीतक कोन राग बेसी पसीन अछि? राजकुमार झा: देखियौ, जे संगीतक आराधक अछि, हुनका कोन राग बेसी पसीन हएत या नै हएत, ई गप हेबाक नै चाही। किएकि राग एक तरहे तरकारीक मसाला छिऐ। जहिना नीक तरकारी बनाबैक लेल सभ मसाला चाही, ताहिना कोनो संगीत आराधककेँ सभ रागक जानकारी हेबाक चाही। मुदा यमन, राग भैरव, खवाज, राग देश, राग भोपाली, राग बिहाग, राग काफी बड़ पसीन अछि। यमनक उत्पति कल्याण ठाठ सँ भेल अछि। कोन मे कत्ते लय अछि, ई जानब आवश्यक अछि। विनीत उत्पल: अहाँकेँ कोन शास्त्रीय गायकक गायब पसीन अछि? राजकुमार झा: हमरा बैजू बावराक तान, भीमसेन जोशीक गायब बड़ पसीन अछि। विनीत उत्पल: संगीतक प्रोग्राम करए लेल या सुनए लेल जाइत छी? राजकुमार झा: जखन दरभंगामे पढ़ैत छलौं तँ दरभंगा टाऊन हॉलमे या फेर लहरियासरायमे प्रोग्राम सुनबाक लेल जाइत रही। जहियासँ गाममे रहए लगलौं तँ अपने पंचायतमे भजन-कीर्तन गाबै लेल जाइत छी। ओना बनमनखरी, बठैली, नोहर, दिग्घी (कटिहार), खारा, सिंगारपुर, आलमनगर, बुआरीमे कतेक बरख गाबैक लेल जाइत छी, जखन कियो बजाबैत अछि। विनीत उत्पल: कोनो नौकरी लेल गेलौं कि नै? राजकुमार झा: कस्तूरबा संगीत विद्यालय, नागपुर गेलौं तँ ओतए ओरिजनल मांगय लागल। कहलक जे डुप्लिेकट सँ काज नै चलत। हमरा पास डुप्लिकेट प्रमाणपत्र अहि कारण छल जे हम एम.ए. करहि कऽ बाद एक बेर फेर इलाहावाद गेल रही। ओतएसँ गाम घुरि रहल छलौं तँ इलाहाबादमे हमर ट्रेन रातिक दू बजे छल। हम इलाहाबाद स्टेशनपर आबि कऽ ओतए सुति गेलौं। दू बजे रातिमे ट्रेन आएल तँ एतेक धरफर भेल जे हमर सर्टिफिकेट सभटा कियो चोरा लेलक। एकर अलावा, नागपुरक भाषा दोसर छल, जकरा हम नै बुझि सकैत छलौं तइसँ गाम आबि गेलौं। विनीत उत्पल: अहाँकेँ संगीत साधनामे कोन तरहक दिक्कत आबैत अछि? राजकुमार झा: देखियौ, हम बेसी भजन गाबैत छी। ई साज-बाज बजायब सामूहिक काज अछि, कियो असगरे ई काज नै कऽ सकैत अछि। चूँकि हम आन्हर छी तेँ हमरा लोक सभ ठकि लैत अछि। तइसँ लोकपर विश्वास करब कठिन भऽ जाइत अछि। दोसर गप ई जे हमर कियो सहयोगी नै अछि। जौं केकरो राखै छिऐ तँ खच्चरपनी करए लागैत अछि। एनाउंस किछु सुनै छिऐ आ दै किछु आर छै। बाते करलकै एतबय टा मे, आ दै छै किछु अओर।  कतेक पैसा देब, ई कहि कऽ कियो नै लऽ जाइत अछि। विनीत उत्पल: गाबैक लेल सभसँ बेसी पाइ कतए भेटल? राजकुमार झा: एक बेर बठैली मे दू राति रहलौं आ 2200 रुपया देलक तँ खुशी भेल जे हमहूँ किछु कऽ सकैत छी। विनीत उत्पल: एखन अहाँ कोन काज करैत छी? राजकुमार झा: भैस चराबैत छी। विनीत उत्पल: गाममे संगीतक लेल कोनो समूह बनल कि नै? राजकुमार झा:-ठक्कन भाय, रतन भाय, गजो भाय, ठाकुर, बीजो से समूह बनल आरंभ भेल आ बनल रहल। हमरासँ पहिने भुवनेश्वर झा, हरिवल्लभ झा, उमाकांत झा, राधाकांत झा, लक्षो काका रहए। ओइ समयमे खूब चलै रहै। मुदा बादमे लोक सभकेँ घमंड भऽ गेलै। किछु गोटे गामसँ फिरार भऽ गेल, लोक कमाबै लागल आ बाहर चलि गेल। विनीत उत्पल: कोनो खिस्सा अहाँकेँ याद अछि, जखैन अहाँक योग्यताक मखौल उड़ाएल गेल? राजकुमार झा: एक बेर ग्वालपाड़ा गेलिऐ, राजपूतक प्रोग्राम छल। संजोगसँ हारमोनियम बजाबैबला कलाकार नै आएल। लोक सभ कहलक जे राजकुमार जी हारमोनियम नीक बजबै छथि। ऐपर हमरा कार्यक्रमक लेल तैयार कएल गेल। मुदा आर सभ कलाकार बाजल, 'ई तँ सूरदास छी, की बजाओत'। सभसँ सीनियर जे छल ओ पुछलक, -की बजबै छी, की गाबै छी। हम बाजलौं, -थोड़ बहुत बजबै छी। -हारमोनियम बजबै छी? की बुझल अछि? थोड़ो-मोर बुझल अछि ने? हम कहलौं- जे हारमोनियम बजबै छथि हुनकासँ कनी बेसी बजाबै छी। जे बेसी बजाबै छथि हुनकासँ थोड़े कम बजाबै छी। विनीत उत्पल: कोनो नशा करै छी कि नै? राजकुमार झा: नशा केलाक बाद किछु नै भऽ सकैत अछि। नशा करब गुनाह अछि। मुदा जखैन हम पढ़ाइ-लिखाइ छोड़लाक बाद तम्बाकू खाए लगलौं,  भैंसवार तँ हम रहबे करी, सुमन, बीजो, हम सभ कियो भैंसवार रहिऐ, बीजोक हाथसँ चुनौटी लऽ लेलौं, तइ दिनसँ खाइत छी। विनीत उत्पल: अहाँ बियाह किए नै केलौं? राजकुमार झा: कियो पिता लड़की दैक लेल तैयार नै भेल, तइसँ हमर ब्याह नै भेल। विनीत उत्पल: तखैन मनपर कंट्रोल कोना केलौं? राजकुमार झा: एखन हमर उमर 47 बरख भऽ रहल अछि। एकटा गप जानि लियौ जे ई मन केँ जतए दौड़ायब ओतए जाएत। मनकेँ कंट्रोल करहि सँ ओकर फाएदा होइत अछि। विनीत उत्पल: एखन अहाँ किछु सुना सकैत छी? राजकुमार झा: जब गाबैत छी तँ सभटा राग आगू आबि जाइत अछि। ओना एकटा यमन राग देखू, नीधागामापारेसा चले आना, घनश्याम चले आना, बस तू ही तो मेरे जीवन का आधार बने रहना मेरे श्याम चले आना। -जखन सुर मे रहैत छिऐ तँ सभ याद रहै छै। राग ठोर पर आबि जाइ छै। ओना नै फुराइ छै। विनीत उत्पल: अहाँ कोन तरहक गीत गाबै छिऐ? राजकुमार झा: जेहन समय तेहन गीत गाबै छिऐ। बसंत ऋतुक होलीक गीत गाबै छी। अरे मोरे भिनसरवा, कोयल कूकय छै, आमक मंजर पर मंजर गूंजय छै, जिनकर आदमी घरक मंुडेर पर, बैसल-बैसल काग कूकय छै। ई गीत बड़गांव (चंदा झा क मातृक) क चंदन क बनायल छै। हम सुनले गाबैत छी। विनीत उत्पल: अहाँ अप्पन गीत बनाबैत छिऐ? राजकुमार झा: हम गीत नै बनबैत छी। साज-बाज ठोर पर आबैत छै। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। ज्योति चौधरी एक युग: टच वुड: भाग ३ लोकल विडियो क्लबक मेम्बर बनल छलौं से जे सभसँ नब फिल्मक सी. डी. ओकरा लग रहैत छलै से दऽ जाइत छल। परिवारसँ बात केनाइ तँ टॉनिक छल हमरा लेल नब शहरमे। आ देर तक फिल्म देखैक परिणामस्वरूप रविदिन। सुतनाइ॥ सुतनाइ॥। आ सुतनाइ।।।। हलाँकि ई मात्र किछुए समयक आराम छल। विवाहक पहिल साल बीत गेल मुम्बइ-टाटा- भिलाइक यातायातमे। हम कुनो पाबनि नै छोड़ने रही से खुशी अछि हमरा, टच वुड। ऐमे हमर मौसीजीक बहुत कृपा रहनि। हमर विवाह एक साल पहिने तय भऽ गेल छल। हमरा मोन अछि जे हम कतेक उत्सुक रही विवाहक पहिने अपन पतिसँ बात करबाक लेल। कमसँ कम हमर नैहरमे तँ यएह चलन रहै जे लड़की-लड़काक बात विचार मिलबाक चाही। विवाहक पहिने पहचान बनबाक चाही। हम राखीमे अपन भैया भौजी लग भिलाइ गेलौंॅ। ओतए समस्त सासुर भेंट करए आएल मुदा पतिदेव गायब छलथि, कारण छुट्टीक अभाव छलनि। हमर भैंसुर सेहो ऑफिससँ सीधे एला मुदा बड्ड  देरसँ एला, कारण हुनका रस्ता बिसरा गेलनि। सभ हुनकर खूब मजाक उड़ेलकनि। वापस आबि कऽ हम बहुत दुःखी रहए लगलौं। तखन हमर मॉं कहलखिन जे ई तँ नै हेतै। हमर बेटी पढ़ल-लिखल अछि, ओकर विवाहमे जे सभ पुरान तरीका चलेथिन से कोना हेतै। तखन ओतएसँ ननदिकेँ सम्वाद आएल जे हुनका हम सभ बात कहबनि आ ओ हमर पतिकेँ कहथिन। हमरा सेहो मन्जूर नै छल। फेर हमरा फोनपर बात करबाक अवसर भेटल। भातक सिलसिला किछु बेसिये शुरू छल। मुदा एक दिन हम फोन केलियनि तँ कियो आन फोन उठेलक आ बड़ी भरिमगर आवाजमे पुछलक ‘आवाज नै नीक लागल की’? ई आवाज हम कखनो नै बिसरब। बादमे जखन कखनो ई आवाज हमर जिन्दगीमे दुहरायल, हम बढ़ियासँ चिन्हलिऐ मुदा पति देव कखनो नै कहला जे ई वएह व्यक्ति अछि। मुदा हम हमेशा यएह देखलिऐ जे ई व्यक्ति हमर वैवाहिक जीवनमे बहुत दखल दऽ रहल छल। ई एहेन व्यक्तित्व छल जकरा दोसराक निजी जिन्दगीकेँ अपन ढंगसँ ढालैक बहुत उत्सुकता छलै। हमर दृष्टिसँ एहेन विचार कखनो दोस्तीक प्रारूप नै भऽ सकैत छै मुदा अपन पतिकेँ कखनो हम ऐ लेल राजी नै कऽ सकलियनि। हँ तँ हम गाम गेलौं आ ओतए दुर्गापूजा देखलौं। बाबूजी अष्टमी दिन सिद्धान्त करेलाह। वापस आबि कऽ हमरा जन्मदिनमे एक उपहार भेटल। हमर भावी पति हमरासँ भेंट करए जमशेदपुर एला। हमरा बहुत खुशी भेल ऐ बातक, मुदा बादमे हम अपन मॉं बहिनकेँ कहलियनि जे हमरा तँ चेहरा मोने नै रहत, कतेक कम काल लेल भेंट भेल। दुनु बहुत खिसियेली तखन भौजी एकटा फोटो देली जे लिअ, अकरा देखैत रहू। फेर समय बितैत गेल। दिवाली मनेलौं। दिवालियेमे हमरा अपन कार्यमे पहिल दरमाहा भेटल छल। हम अपन विवाहमे अपन मॉं बाबूजीकेँ अपन पसन्दक कपड़ा खरीद कऽ देलियनि। काज केनाइ अतेक पसन्द छल जे ऑफिसमे अपन बॉसकेँ नै कहलियनि जे हमर बिआह ठीक भऽ गेल अछि। कुनो हँसी मजाक ऑफिसमे नै करै छलौं। बादमे बॉसकेँ जखन पता चललनि तँ ओ बजा कऽ पुछला जे की की तैयारी कऽ रहल छी बिआहक। हम अकचका गेलौं। हम कहलियनि जे हम साड़ी किनलौं अपन पसन्दसँ। फेर ओ पुछला जे ब्यूटी पार्लरपर नै मेहरबान भेल छी अखन तक। हम हँसए लगलौं। फेर सर केबिनसँ बाहर एला आ सभकेँ कहलखिन जे हुनकर पत्नी ब्युटी पार्लर गेल छलखिन। ओ जखन पत्नीकेँ घर आनऽ गेला तँ हुनका पार्लरक अन्दर बैसऽ पड़लनि। अन्दर तीन टा स्त्री फेस पैक लगेने रहै। हुनका बुझेबे नै केलनि जे के हुनकर पत्नी छलखिन। ओना ओ सर हमर वियाहमे सभसँ अमूल्य उपहार काजक अनुभवक प्रमाणपत्र देला जे अखन तक हमर संजीवनी अछि। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। शारदानन्द दास परिमल राजनन्दनक आत्मालाप एहि आत्मालाप  मे प्रथम पुरुष अपन दीर्घकालक यात्राक अनुभव कें अपना मुहें व्यक्त कए रहल अछि जे स्वानूभूत तथ्यक विश्वसनीयता कें गंभीरता  सँ प्रभावोत्पादक बनबैछ । एकरा लिखबाक पाछाँ हमर उद्देश्य कोनो व्यक्ति विशेषक प्रसंशा नहिं, मुख्यत: नवका पीढी(नव लोक) कें एहि वास्तविकताक प्रति सजग आ सचेष्ट करब अछि जे कोनो महान उपलब्धिक हेतु ककरो कोन तरहें दीर्घकालिक तपस्या करए पड़ैत छैक ।जेना अदनासन देखाइत छुद्र चूटी(पिपिलिका) सेहो डेगा-डेगी चलि पहाड़ कें टपि जाइछ । ताहि क्रमंे हमरा बुझाइछ जे कर्णगोष्ठीक संग कर्णामृतोक यात्रा सभ तरहें साधन-सम्पन्न नहिं रहितहुं ई विगत बत्तीस वर्ष सँ चलि आबि रहल निरन्तर तपस्याक प्रतिफलन थिक जे "मिथिला-मैथिलीक विकास में कर्णगोष्ठी एवं कर्णपामृतक योगदान(१९७४-२०११)" सकलनक रूप मे हमरालोकनिक सोझाँ प्रस्तुत अछि ।

एहि प्रसंग मे कर्णगोष्ठी मुम्बई आर्थिक सहयोगक अवदान कए यज्ञक पुरोधाक भाँति पूण्यक भागी छथि ।एखनुक जे समसामयिक लोकक(खास क नवका पीढीक) मानसिकता कनिएं क क बहुत हसोथि लेबाक अछि(जेना उगल चान कि लपकू पूआ),ताहि प्रवृतिक संदर्भ  मे कर्णामृतक साधना एवं उपलब्धि द्रष्टव्य अछि ।राज नन्दन बाबूक निष्ठा जे एहि व्याजें सुव्यक्त होइछ ,वोहि मे कोनो तरहक आत्मश्लाघा नहिं भ क मात्र वस्तुनिष्ठ निरपेक्ष प्रदर्शन अछि जे आत्मालापक रचयिता द्वारा कएल गेल अछि ।वो एहि रीतिएंँ  मिथिला मैथिलक कृतज्ञता विज्ञापित कए रहलाह अछि,संगहिं नवका पीढी कें ओकर कर्तव्यक दायित्वबोध करेबाक उपादान सेहो उपस्थित कएलनि अछि ।

एहि आत्मालाप मे एक व्यक्ति नहिं संस्था बाजि रहल अछि जाहि सँ मिथिलालोकक आशा, अभिलाषा आ आकांक्षा संलग्न अछि ,से बात बुझबाक चाही  ।साहित्य मे सत्यक अभिव्यंजना एहुना होइछ,पाठक कें अपन मानस क्षितिज उदार बनाक रखबाक चाही, सैह हमर अभ्यर्थना । आत्मालाप - राज नन्दनक

   हमरा नहिं किछु चाह, मैथिलीक परिप्लावन  लए हमजीबइ छी ।    सुधी पाठकक लेल पत्रिका कर्णामृत कें नित डेबइ छी ।    तीन दशक कए पार वयक्रम वृद्ध अपन होइतहु सेबइ छी ।    यदपि छोट डोंगी कें जलधि मे रहि जलपोत जकाँ  खेबइ छी ।

   नित्तहु प्राच्य क्षितिज सँ दिनकरक अभिवादन अरुणिमा पबइ छी ।    दिग-देशान्तर पार सँ अनिलक आनल सुखद समाद जे लई छी ।    बहुधा मेघाच्छन्न दिगन्तक रहनहुँ नभ निर्मेघ पबइ छी ।    पबइत पाणि-स्पर्श पयोदक संकेतल ,अभिराम रहइ छी ।

   लाभ ई नाम "राजनन्दन "भएने अछि एतवा जे हम ने थकइ छी ।    आधि-व्याधि बाधा कें पार नहिं जिजीविषा पर पाबै दइ छी ।   ओतबै नहिं हम व्यवधानहु सँ अभिनन्दित भए राज करइ छी ।   "मैथिलीक"आशीष अपरिमित मैथिलीक सेवा सँ पबइ छी ।

   "कर्णामृतक" अमिय संपोषित सेवा सँ जे अमृत  पबइ छी ।    बुन्न मात्र सँ परिप्लावित भए हम अजस्र सुखसिन्धु लहइ छी ।    "कर्मण्येवाधिकारस्ते" केर मिहिर- बलें घन तिमिर कटइ छी ।    की आश्चर्य  यदि भरि उड़ान हम सात समुद्रो पारक लइ छी ।

   मैथिली-साहित्यक मंजूषा मे स्वर्णिम संस्कृतिक धरोहर,    राखल रहए तेना जे भविष्यो पाबए संगति युगतक सुखकर ।    दिग-दिगन्त कें करति प्रहर्षित सुर-सरगम संगीतक फरहर,    शिवक नचारि-महेशवाणी सँ गूंजित जनकसुता केर नैहर ।

   गौरव सँ उच्छ्वसित बसातो सौरभ सुमनक सुखद पसारए ,    मार्तण्डक-ज्वाला प्रचण्ड सँ मैथिलीक हरियरी न हारए ।    आस्था तुंग हिमाद्रि-शृंग सन व्योम मध्य कीर्ति-ध्वज धारए,    जकर स्तवन मे आह्लादित मुग्ध भुवन आरती उतारए ।

   "कर्णामृत" सार्थक पीयूष जे अंजलि भरि-भरि जन तक आनए ,    गरिमा संग माधूर्य तिरहुतक बन्दनवार क्षितिज तक तानए ।    संभव तैं पुरि संग निसर्गो सुखद संयोग मुहूर्तक ठानए ,    बत्तिस ग्रं्थक भेल प्रकाशन हेतु प्राप्त अनुदान प्रमाणय ।

   लेसल  गेल "श्रीधरक" कर सौं "कर्णामृतक" जे टिम-टिम वाती ,    रहलहुँ  से उसकावति टेमी खरिका सँ, सेवति दिन-राती ।    निरवधि-काल विपुल पृथ्वी केर छुबइतक्षितिज रहत ई पाँती,    की न एहन सुधि-संरक्षण सँ होएत तृप्त मातु केर छाती ?

   की न मैथिलीक संतानहुँ कें पथ प्रशस्त होएत लेखा सँ ?    काल-भाल पर  कर्णामृत सँ टपकल स्मित बुन्न-रेखा सँ,    दूर अतीतक आँजुर सँ उठि अबइत सरगम अनदेखा सँ,    सहज सरल सम्बुद्धि सुपोषित प्रज्ञा केर उत्सुक पेखा सँ ।

   होइत रहल गुंजरित "सदुक्तिक" मंजुल स्वन अनवरत कान मे,    मधुर सारगर्भित प्रस्पन्दन उष्मा भरइत स्वत: प्राण मे ।    नौ सदीक विस्तार पार करि चलि अबइत उर्जा अम्लान मे,    कर्णामृतक सैह सुर-सरगम उर्मिल अछि एखनहुं उड़ान मे ।

   अमलिन स्मित-हरित सुधि-सुरभित भूमि ई यावतकाल रहए,    संस्कृतिक सुकुमार अरुणिमा-दीप्त मैथिलीक भाल रहए ।    तावत कर्णामृतो पसारति अविरत प्रीतिक ज्वाल रहए,    कर्णामृतक हिंडोल में झुलइत वृद्ध, वनिता आवाल रहए ।

   चाह हमर मैथिली-मानसक कर्णामृत ई मराल रहए ,    ताल दैत संतरण मे जकरा दत्त चित दिक् ओ काल रहए,    अमित उड़ान भरैत कल्पना जाहि छविक प्रतिपा़ल रहए,    होइत नित मैथिली-मनीषा जइ सँ सदति नेहाल रहए ।

   उत्पत्स्यति कोअपि समानधर्मा" भवभूतिक धार पकड़ने,    हम ने रहब त हमर तपस्या  धैर्यक पारावार पकड़ने,    दिवा-रात्रि केर चोरा-नुकी बिच प्रत्यूषक झंकार पकड़ने ,    बढ़त घार मे कालनिर्झरक ककरो शुभ अवतार पकड़ने ।

   नदी सदानीरा वसुन्धरा सरिताजल पटबैछ साल भरि  ,    धन्य होइछ आदित्य रश्मि-अभिषेकित भोरे जकर  भाल करि,    जतए उतरि नीरव-निरभ्र नभमे शरदक हो मुग्ध विभावरि,    रजनीगंधा केर  वितान मे थकए न मलयानिलो ताल  भरि ।

   नहिं विदेह नहिं सीरध्वज हम तदपि उर्वरा शक्ति उभारल,    नहिं नृप तइयो मिथिलामाटिक प्रतिभा कें दए  हाक उतारल ,    कृति कें भोला लाल दास केर दीपदान दए सुधि झंकारल,    मातृ-पितृ रृण भूमिक प्रति हम निज कृति सँ एहि भाँति उतारल ।

   प्रतिभापूंज मैथिली पुत्रक स्मृति मे जे अंक निकालल,    अर्घदान आलोकसुछन्दित अमरत्वक झंडा सन गाड़ल,    सारस्वत स्तंभ मेदिनीक व्योमक राखत छवि अजवारल,    रहत जाहि सँ लोक चेतना स्पर्शित भए सदति पखारल ।

   दीपशिखा केर रिजु कंपन सँ अट्टहास करि हँसत अमरता,    सतत सरस्वतिपुत्रक कर सँ उद्घाटित प्रातिभ उर्वरता,    अंगीभूत करत दर्शावोत मुड़ि इतिहास अपन तत्परता,    हरति  चलत जे दीर्घकाल तक सकल समाजक बौद्धिक जड़ता  ।

   पालन, पोषणआ विकास मे जतवा किछु पावोल समाज सँ,    तकर करति प्रतिपूर्ति किंचितो द क जाइ सुख अपन काज सँ,    सैह यत्न होइत आएल अछि सेवा में रहि "नन्दन राज" सँ,    कर्णामृत  कें लेल जुटाबति संगीतक हित साज-वाज सँ ।

   आसक, अभिलाषक,उल्लासक बनि पतंग नभ मे कर्णामृत,    दैत रहल आश्रय उमेद कें कते भविष्णु लेखकक,उड़ि नित,    प्रोत्साहन सँ नव प्रतिभा केर सुुष्ठु विकासो कएल सुनिश्चित,    कर्मनिष्ठ अविरत सेवा सँ अछि गौरवास्पद यशक सुअर्हित ।

   नहिं टिटही टेकल पर्बत सन,हमर भूमिका मैथिलीक प्रति,    हम होइत अभिसार तकै छी गगनक पार गगन तक उन्नति,    मैथिली संस्कृति-साहित्यक सम्मान करए उठि विश्वक सम्मति,    सफल अपन साधना तखन हम बूझि सकब जे पओलक सद् गति ।

   नगर-नगर हम छानति फिरलहुँ लेने कर मे लोटा-डोरी,    डगर-डगर पानिक तलाश मे कनहा लटकल  बोझने झोरी,    जते भए सकए लोकक मन सँ भावक संवेदना निचोड़ी,    किय न चेतना जगबइ खातिर भावक जल मे मधुरस घोरी?

   चलति बाट एकसरो हमेशा हमर इएह पाथेय रहल अछि,    मातृ-मंदिरक आराधन मे सेवा एहि विधि धेय रहल अछि,    राग जे कंठ सम्हारि सकए नहिं गीत हमर से गेय रहल अछि,    वाणी चिरकल्याणी बनि विचरए जन-जन मे श्रेय रहल अछि ।

   यदि नहिं मान बूझत मैथिल चलि जाए न जेना गेलीह वैदेही,    भेलीह भूमिगत लोकक रहितहु सुधि संवेदनशील,सुगेही,    ओ छलि मैथिली,इहो मैथिली शंका मन मे उठइछ मेहीं,    किए कि नवका लोक लगैत अछिमातृ-साहित्यक प्रति नहिं स्नेही ।

   लजविज्जी सुकुमार सदृश अनुराग होइत अछि साहित्यक प्रति,    से न प्रवाहित हो यदि सहजहिं होइछ संस्कृति कें बड़का क्षति,    जेना-जेना नव शहरी सभ्यता नवका लोकक मारि रहल मति,    भौतिक होइत विकासक सोझाँ संस्कृतिक झलकैत अछि अवनति ।

   अन्देसा मांत्सर्य सँ उपगत होइछ क्षितिज पर हमर चेतनक,    जखन तकै छी गगन भविष्यक एहि संध्या मे अपन जीवनक,    भेल जा रहल सिमटि संकुचित आपकतामय शील जन-जनक,    शहरक आकर्षण मे लुब्धल विसरि पुरातन मान साधनक ।

   शारदानन्द दास परिमल    ४ अगस्त २०१२,नई दिल्ली ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। सुमित आनन्द- रिपोर्ट ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। जगदानन्द झा ‘मनु’- दूटा विहनि कथा ग्राम पोस्ट – हरिपुर डीहटोल, मधुबनी १.नेनाक सनेस “साँझकेँ छह बाजि गेलहि एखन धरि बौआ नहि आएल | भगवानपुर बालीक सेहो अता पता नहि | जा कए भगवानपुर बालीक अँगना देखै छी कि भेलहि |” ई द्वंद अछि एक गोट माएक मनक जीनक दस बरखक नेना दिनक एगारह बजे अपन काकी भगवानपुर बालीक संगे काली पूजाक मेला देखै लेल गेल छल मुदा साँझ परि गेला बादो एखन धरि नहि आएल छल | नेनाकेँ अपनासँ दूर केखनो छोरैक लेल ओ तैयार नहि मुदा नेनाक मेला देखैक लौलसाकेँ देखि ओकरा नहि रोकि पएलिह | जँ अपने जाइतथि तँ बोनिक हर्जाना आ ओहिपर सँ बेसी खर्चाक डर सेहो, कोनो ना पच्चीस रुपैयाक इन्तजाम कए नेनाकेँ काकी संगे पठा देने रहथि | की भेलै किएक देरी भेलहि एहि उधेरबुनमे रहथि की भगवानपुर बालीक शव्द हुनका कानमे कतौसँ परलनि | देखलनि तँ भगवानपुर बालीक आ हुनक नेनाक संगे संग गामक आओर लोकसभ हँसैत बजैत हाथमे माथपर झोड़ा मोटरी नेने आबैत | माए झटसँ आगू बढ़ि अपन नेना लग जा ओकर दाढ़ी छुबि, “ऐना मुँह किएक सुखएल छौ, किछु खेलएँ पीलएँ नहि? पाइ हएरा गेलौ की ?” मुदा नेना चूपचाप ठार | भगवानपुर बाली, “हे बहिन तोहर ई नेना, नेना नै बूढ़बा छौ |” माए, “किएक की भेलै |” भगवानपुर बाली, “सगरो मेला घूमक बादो किएक एक्को पाइ खर्च करत, नै खिलौना, नै मिठाइ, नै कोनो खाए पीबक चीज, भरि मेला पाइकेँ मुठ्ठीमे दबने चूपचाप सभ वस्तुकेँ देखैत रहेए |” माए, “किएक बौआ, किछु खेलएँ पीलएँ किए नै |” नेना चूपचाप अपन हाथ पाछू केने ठार | माएकेँ चूप भेला बाद अपन हाथकेँ पाछुसँ आगू अनि, हाथमे राखल डिब्बा माएकेँ दैत, “ई” माए डिब्बाकेँ देख कए, “ई चप्पल, केकरा लेल ?” नेना, “तोहर लेल, तुँ खाली पेएरे चलैत छलेँ ने |” माए झट नेनाकेँ अपन करेजसँ लगा सिनेह करैत, “हमर सोन सन नेना, भरि दिन भूखे पियासे अपन सभटा सऽखकेँ मारि कए हमर चिन्ता कएलक, हमरो औरदा लए कऽ जीबए हमर लाल|” २.बाबाक हाथी दिल्लीक कनाट प्लेशक प्रशिद्ध कॉफी हॉउसक आँगन | लूकझिक साँझ मुदा महानगरीय बिजलीक दूधसन इजोतसँ कॉफी हॉउसक आँगन चकमकाइत | एकटा गोल टेबुलक चारू कात रखल चारिटा कुर्सीमे सँ तीनटापर ‘अ’, ‘ब’ आ ‘स’ बैसल गप्प करैत संगे कॉफीक चुस्कीक आनन्द सेहो लैत | ‘अ’ आ ‘ब’केँ बिचक बात-चितमे गरमाहट आबि गेलै | ‘अ’, “रहए दियौ अहाँक बूते नहि होएत |” ‘ब’, “हाँ ई की कहलीयै हमरा बूते नहि  होएत, अहाँ बुझिते कि छियै हमरा बारेमे |” ‘अ’, “हम अहाँक बारेमे बेसी नहि बुझै छी परञ्च ई नै .......” ‘ब’, “हे आगु जुनि किछु बाजु, अहाँकेँ नहि बुझल जे अहाँक सोंझा के बैसल अछि ? हमर बाबाकेँ नअटा बखाड़ी रहनि, दलानपर सदिखन एकटा हाथी बान्हल रहैत छलनि | हमर परबाबाकेँ चालीस गामक मौजे छलनि | हमर मामा एखनो बिहारक राजदरवारमे तैनात छथि | हम स्वम एहिठाम योगाक क्लास रास्त्रपतिकेँ दै छीयनि |” ‘अ’ आ ‘ब’क गप्प बहुते देरीसँ चुपचाप सुनैत ‘स’ अपन कॉफीक घूंट खत्म कएला बाद खाली कपकेँ टेबुलपर रखैत, “यौ हम आब चली, अहाँक दुनूकेँ हाइक्लासक गप्प हमरा नहि पचि रहल अछि, हम तँ बस एतबे बुझै छी जे हमर अहाँक बाबू-बाबा आ स्वयं हमरा सभमे एतेक बूता होइत तँ हम सभ एना दिल्लीमे १५-२० हजारक नोकरी कए क’ आ भराक मकानमे जीवन बिता क’ अपन-अपन जिनगीकेँ नरकमय नहि बनाबितहुँ | ओनाहितो आजुक समयमे हाथी भिखमंगा रखै छैक आ दोसर राजमे पेट ओ पोसैत अछि जेकरा अपन घरमे पेट नहि भरि रहल छैक |” ‘स’केँ एकटुक तित मुदा सत्य गप्प सुनि दुनूक मुँह चूप | ‘स’ सेहो ई गप्प बजैत हिलैत डुलैत निसाक सरूरमे ओतएसँ बिदा भए गेल | मुदा ओकर बगलक टेबुलपर बैसल हमरा ‘स’क गप्प सए टका सत्य लागल | ***** ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। ३. पद्य ३.१.जगदीश चन्द्र ठाकुर ‘अनिल’-गजल १-२ ३.२.प्रदीप पुष्प- गजल ३.३.बिन्देश्वर ठाकुर-हिसाब जिनगीक ३.४.रमा कान्त झा, होलीक हुरदंग ३.५.इरा मल्लिक-कविता/ होलीक एक दूटा पाँति/ गजल ३.६.१.जगदीश प्रसाद मण्‍डलक गीत २.मनोज कुमार मण्‍डल- ४ गोट कविता ३.७.१.राजदेव मण्‍डल- रूचि‍गर/ बजैत एकान्‍त २.रामवि‍लास साहु- सुखल खेत आ भूखल पेट ३.८.मुन्नी कामत फगुआ/ आनहर कानुन जगदीश चन्द्र ठाकुर ‘अनिल’ गजल १ अपन-अपन हम प्रणमे छी महाभारतक रणमे छी अहाँ अधर्मक संग ठाढ़ छी बुझू अंतिम क्षणमे छी धरतीमे छी अम्बरमे छी हम सृष्टिक कण-कणमे छी अपने लगमे ताकू हमरा ह’म अहाँक नयनमे छी नीक लगैए चान-तरेगन शब्दक नीलगगनमे छी सुखमे छी हम दुखमे छी जा मोहक बन्धनमे छी हमर अज्ञान हरू हे माता ह’म अहींक शरणमे छी २ बीतल दुख के बात करै छी भोरे-भोरे पाप करै छी संग अहाँ के किछु नै जाएत हमर-हमर की जाप करै छी शब्दक लागल तीर हृदयमे किए एना आघात करै छी अहाँ की बुझबै कष्ट अभावक कोना साँझसँ प्रात करै छी पहिने मैल केलौं उज्जरकेँ आब मैलकेँ साफ करै छी दुख आएल सुख आबि रहल अछि किएक  बाप रे बाप  करै छी भरिसक हमरे कर्मक फल थिक जाउ अहाँकेँ माफ करै छी ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। प्रदीप पुष्प गजल

दोसरक गीत उगबै अछि चान मीता  हमर गजलो गबै भूखक गान मीता

आब रूदल ब'नब ने हम ग'छब कहियो जरल पेटसँ उठै ने सुर तान मीता

भेल बटुआसँ तगमाकें नीक दोस्ती बिन टका छी सभा मध्यें आन मीता

जैह देबै अहाँ हम रखबै हुलसिकेँ  गाय बूढो खपै विप्र दान मीता

पाँतमे हम अछोपक छी भोज खाइत 'पुष्प'कें नइ फिकर आ ने मान मीता 2122 1222 2122 सब पाँतिमे ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। बिन्देश्वर ठाकुर हिसाब जिनगीक मार्च महिनाक उत्तरार्द्धमे आइ हम मृत्युकेँ देखलौं सुनने छलौं/ सोचने छलौं मृत्यु अत्यन्त सुन्दर होइ छै सरल होइ छै मुदा यथार्थ बिल्कुल फरक बिल्कुल अलग पैलौं। भयानक आ बिकराल रुप देखि हम डरसँ पानि-पानि भऽ गेलौं। आब ऐठाम- मृत्युक कटघेरामे हम अपन भूत, वर्तमान आ भविष्य स्पष्ट देख रहल छी । एखन धरि अनुमानित हम ५ लाखक दारु पीने हएब २ लाख ५० हजार ७०० क माउस खेने हएब कतौ अपने लुटैलौं/ कतौ दोसरकेँ लुटलौं एनामे बर्बाद भेल हएत हमर जम्मा ३ लाख ७५ हजार। आइ हम सोचैत छी- ऐ रकममे सँ किछु पढ़ाइमे लगैने रहितौं तँ आइ हमरा पास कोनो बिषयक डिग्री रहितए किछु पैसा स्वास्थ्यमे खर्चने रहितौं तँ हमर शरीर कोनो बीमारीक घर नै रहितए अथवा ओ रुपैया बचल रहितए तँ अपन देशक कोनो नीक शहरमे आलीशान महल बनल रहितए मुदा दुर्भाग्यक गप्प, एहन किछु नै भेल फलत: हम नर्कक चक्कर काटि रहल छी आ एखनो राति-राति भरि सादा पन्नापर कलमक नोखसँ जिनगीक हिसाब करैत छी बस हिसाब करैत छी। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। रमा कान्त झा, सौराठ होलीक हुरदंग थाक गे हमर मन नाचए भौजीक बहीन हमरा संग। बजए पायल छमा छम छोड़ाक मन पनियाइ छै रसगुल्ला सन! पहिरने चश्मा ठोढ़ रंगने जमुनी छौड़ा सभकेँ देखाबए दुनियाँ! की कमाल केली हमर नवकी कनियाँ!! थाक गे हमर मन ओढ़नी लहरा कए ठोढ़ पटपटा कए! मारैए कनखी मटकी हाय रे केहेन कनियाँ लटकी।। थाक गे हमर मन ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। इरा मल्लिक कविता/ होलीक एक दूटा पाँति/ गजल १ कविता -------- लऽ चलू नदीक पार सखी, ओइ पार हमर प्रियतम छथि। हम केश सजेलौँ गजरासँ, नयन लगेलौँ कजरा तँ, लै अधरकली कऽ लाली सँ, भेल लाजसँ गाल गुलाबी तँ, अहाँ धरू एखन पतवार सखी, लऽ चलू प्रियतमक गाम सखी। सजि-धजि कऽ नयन बिछौने छलहुँ, नयनन मे सपन सजौने छलहुँ, तड़पैत अछि आकुल व्याकुल मन, इहो पीर नै सहत हमर तन मन, अहाँ करु किछु जतन उपाय सखी, लऽ चलू प्रियतमक ठाम सखी। प्रियतम जोहै छथि बाट हमर, बैरिन भेल रैन, नदीक लहर, तरिणी तट नौका बन्हल पड़ल, नाविक सुतल निसभेर बनल। अहाँ करु नै एको छन देर सखी, नाविककेँ तुरत जगाउ सखी। लऽ चलू नदीक पार सखी, ओइ पार हमर प्रियतम छथि। २ होलीक एक दूटा पाँति ---------------------- रंगक हुड़दंग मचल पिया बसंती होरीमे, सबहक मोनमे उमंग भरल पिया बसंती होरीमे। छै भंगक तरंग मचल पिया बसंती होरीमे, बुढ़बो दिअर लागै पिया बसंती होरीमे! राधा छथि जीवन आ मेहनति छथि श्याम यौ, सभ हाथकेँ काज दियौ हएत जीवन आसान यौ। हिंसा आ द्वेष दंभक होलिका जरा दियौ, कटुताकेँ छोड़ि रंग दोस्तीमे रंगाउ यौ। नारी नारायणी थिकी, हुनका मान सम्मान दियौ, जिनकासँ ई सृष्टि छै, हुनक शक्ति जगाउ यौ। ३ गजल ------- गमाउ नै गोरी ई छन बाते बेबातमे हमर हृदयसँ फूल पराग झरैए। देखू लाजसँ गालक गुलाब खिल गेल लोगक नैनाक काँट बेहिसाब गरैए। नैना चितवन अल्हड़पन देखैत छी कोना मुस्की मिसरियापर जान जरैए। अधर कोमलकली छै रस सँ भरल मन भँवरा बौरायल से जानि पड़ैए। मोन फागुनी बयार बनि मस्त मगन सिनुर लाजसँ मुखरा गुलाल भरैए। रूप चर्चा पसरि गेल गामहि गाममे कोना चलतै लोग दिनेमे बाट हेरैए। आखर-15 ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। १.जगदीश प्रसाद मण्‍डलक गीत २.मनोज कुमार मण्‍डल- ४ गोट कविता १ जगदीश प्रसाद मण्‍डल जगदीश प्रसाद मण्‍डलक गीत- समए केर...... समए केर भूचालिमे जिनगी बोहिया गेल। जी-वन वन जीवन बीच बोहिआएल बाट बटिया गेल। समए केर......। सजल-बसल मन मुनिक विष-विसाइन बनैत गेल। उजड़ि-उपटि झाड़-झंकार सखुआ शंख रोपा गेल। समए केर......। घुमि‍-ताकि जखन पाछू मड़िआएल मेघ पकड़ा गेल। हरल-मरल बाट-घाट घटिया घाट घटा गेल। समए केर......। पकड़ि पएर चारिम पहर अस्ति-चल-अस्ति भेटैत गेल। घेरि‍-घेरि‍ घेँट घेँघिया दुखरा-दुख कहैत गेल। समए केर......। २ मनोज कुमार मण्‍डल चारि‍ गोट कवि‍ता- रे मन! कऽ ले कनी विश्राम

रे मन! कऽ ले कनी विश्राम चलए पड़तौ दूर छै अप्पन गाम रुकमे तूँ जेते काल दौड़ए पड़तौ तते काल जन्मेसँ चलैत साँस बन्न हएत तेकरो नै छै तय काल रे मन! कऽ ले कनी विश्राम चलए पड़तौ दूर छै अप्पन गाम।

चलैत चल आ रचैत चल भऽ जेतौ कएक टा काज मेघ लगल छै कखन बरसत कमे भऽ जेतौ काज चलए पड़तौ दूर छै अप्पन गाम।

अखन-तखनक फेड़ा छोड़ जखने अलसेमे रुकतौ काज बाटेमे दिवस कटऔ जेमे कखन गाम। रे मन! कऽ ले कनी विश्राम चलए पड़तौ दूर छै अप्पन गाम जेमे कखन गाम...।

अपन नै छै मलाल रुकमे अतए सदि‍काल जेतबा दौग सकै छेँ दौग नै तँ नेहुँए-नेहुँए चल रे मन! कऽ ले कनी विश्राम चलए पड़तौ दूर छै अप्पन गाम जेमे कखन गाम...। भाव भरल अछि मनमे

भाव भरल अछि मनमे केवल एतबा अछि लाचारी हाथ हमर अछि खाली आंगनमे अछि बखारी पर नीज अधिकारसँ छी न्यारी।

चंद हाथमे फँसल अछि सम्पति सारी छाँह सदि‍खन जे रहै तिनका चाही बड़का सबारी समता ममतामे फँसल लागल अछि दुनियाँ दारी।

प्रकृति सदासँ सम छै तखनो बिसम हम छी मेघक बून्न आ सूरुजक किरि‍ण मिलैत सभके समान छै तखन कि‍एक एहेन समाज छै?

उपजेलक जे किओ अन्न सभ लऽ ओ अप्पने शोणित चूसि भूख मिटाबै छै गौ सेवासँ संचित पुण्य छिलैत घास बितबैत जीवन दूध लऽ जी जरल छै। के छथि धर्मात्मा

केहन सुन्दर केहेन निर्मल दीन रहितो उपासनामे लागल अपन सासक आसमे ओ सबहक प्राणक अभय दान दऽ रहल छथि खेतिहर किसान कहू एहेन के छथि धर्मात्मा?

लाख जरुरति‍ रहितो ओ मुँहपर मुस्की रखने छथि अपन पीड़ा छोरि ओ पर पीड़ा अपनौने छथि धूप छाँहक कोन परवाह मेघ बरसै आ माघक जाड़ सतत उपासनामे लागल किसान कहू एहेन के छथि धर्मात्मा?

ओ कर्मवीर ओ धर्मवीर जे करए सएह बनए धर्मक लीक भलहिं ओ अपने रहैत फकीर कर्म पथपर अपन जीवन अपनेहिसँ होम कऽ रहल छथि समए-कु-समय नव-नव अन्न सभकेँ भोग लगा रहल छथि कहू एहेन के छथि धर्मात्मा ?

कतए भेटत एहेन ति‍याग बिनु ति‍यागे प्रीति‍ कोन हएत कवि ताकि रहल छथि ई ति‍याग गली-गली भेटलनि‍ भलहिं केतौ भली बिनु कविक कविता बनल छै जीवन हँसी गाबि रहल छै कहू एहेन के छथि धर्मात्मा?

नै जीवनमे कोनो छंद नै छथि कोनो महंत बिनु झाइल मिरदंग हार नीकलि‍ रहल छै अभय ताल जे सुनत से भऽ जाएत मालोमाल कहू एहेन के छथि धर्मात्मा? बचपन

बचपन ओ सुखद पल जतए नै कोनो दुखक दल घत-घटमे भरल ओज बल ने दुबिधा आ ने चिंता छल खुगल हवामे स्वतंत्र जीवन ओ सि‍नेह भरल स्वछंद पल फँसल केना कतए दल-दल

बचपनक ओ साफ मन उज्जर धप-धप कऽ रहल छल ने राग आ ने द्वेष जगल छल ि‍सनेह पाबि‍ उमंग उमरै छल अपन परार नै लगि रहल छल बहति‍ पानि चलैत जीवन सुन्दर मन फारीछ जीवन छल

खेल-खेल हरिदम खेल खेल तँ जीवन बनल छल बनाबी केतेको दिन कागजक नाव जे पानिमे हेलैत छल  बैस काठ ओ गाड़ी बनैत छल बिनु बाटे सरपट दौगै छल कोनोटा खतरा नै जानि‍ परै छल

नीक अधलाह किछु नै सभके सभ एक्के रंग लगै छल छल नै प्रपंच केतौ चानी सन जीवन चमकै छल ओ बचपनक सि‍नेहील पल कि‍छु यादि‍ अछि कि‍छु भुला गेल जानि‍ नै कतए बिला गेल। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। १.राजदेव मण्‍डल- रूचि‍गर/ बजैत एकान्‍त २.रामवि‍लास साहु- सुखल खेत आ भूखल पेट १.राजदेव मण्‍डल दूटा कवि‍ता रूचि‍गर केहेन चीज अहाँक लगत नीक हमरा भेटत ओहीसँ सीख दौगैत रहैत अछि‍ तन अन्वेषण करैत मन वि‍चरण करैत धरासँ गगन पैघ पहाड़ आ कण-कण कतेक बहैत अछि‍ नोर राति‍-दि‍न आ साँझ-भोर डुमैत रहै छी अपने भूख तब देखबै छी अहाँक दुख कल्पनामे देखैत छी भऽ कऽ मूक परोसैत छी अहाँ लग सुख तैयो भऽ जाइत अछि‍ चूक कहाँ बदलैत अछि‍ अहाँक रूख आब देखेबाक अछि‍ मृत्यु-चि‍त्र ओ हएत केहेन वि‍चि‍त्र ऐ देहकेँ छोड़ए पड़त यौ मि‍त्र तब बना सकब ओ चि‍त्र घेरने अछि‍ मोहक कड़ी बि‍तल जाइत घड़ी-पर-घड़ी अहीं छी असल प्रहरी तोड़ू कड़ी तोड़ू कड़ी। बजैत एकान्‍त बजैत अछि‍ सुन-मसान कि‍यो ने दैत अछि‍ कान गबैत रहैत अछि‍ अनवरत गान जुग-जुगसँ संचि‍त ज्ञान चारू भर स्‍वरक घमासान सुनहट ठाढ़ अपनहि‍ शान हरक्षण दैत अनुपम दान बि‍नु शब्‍दक बजैत ज्ञान स्‍वर सुनैत छी कि‍न्‍तु अछि‍ चुप केहेन हएत स्‍वरूप वाणी अछि‍ एतेक मधुर तँ रूप हेतै केहेन अनूप बैसल छी एकान्‍तक कोड़मे भऽ रहल सर्जना मनक पोर-पोरमे यादि‍ अबैत अछि‍ करम टूटि‍ रहल बहुतो भरम सुनि‍ रहल अछि‍ हमर कान शान्‍ति‍क गुन-गुन गान बरि‍स रहल सुन-मसान कऽ रहल छी पावन स्‍नान। २. रामवि‍लास साहु जीक कवि‍ता सुखल खेत आ भूखल पेट सुखल खेत जरैत जजाति‍ खेतक दाररि‍ देख-देख दरकि‍ करेजा जरैत रहलै पानि‍ बि‍नु खेत बज्‍जर भेलै कि‍सानक तकदीर जरलै की खाए बचैते परान महगीयो तेतबे छै पंूजी पतीक हाथे सरकार वि‍कल छै छि‍यासठि‍ बर्ख अजादीक भेल देशक कि‍सान कंगाले अछि‍ भरल नदी पानि‍ बहति‍ रहलै नै बनलै बान्‍ह सुलीस गेट केना जेतै खेतमे पानि‍ नै बनलै अखनि‍ धरि‍ नहर केना उपजतै खेतमे धान झुट्ठे वयान सरकार करै छै नै भेलै खेत-वि‍कासक काम देशक लेल सभ दि‍न दैत रहलै कि‍सान अपन खून-परान मुदा आइ धरि‍ नै सरकार कहि‍यो देलकै धि‍यान केना हेतै देशक कल्याण सुखल खेत भूखल पेट केना बँचतै गरीबक परान। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। मुन्नी कामत फगुआ/ आनहर कानुन १ फगुआ सब मिलि‍ करैए हमजोली कान्ह संग गोपिया खेल रहल अछि होली। निला पिला लाल हरा अछि सभ रंग सुनेहरा आइ बेरंग नै रहैए कोय चाहे धोती होय या घाघड़ा। दादी चाउरक पुआ बनेतै माय दही आ खीर खियेतै बाबू देतै आशिष रंगा-रंग होय सबहक जिनगी जिबैए सभ लाख बरिस। ई अवसर नित अबैत रहैए ई मेल-मिलाप बनल रहैए नै हइय केकरोसँ झगड़ा सभकेँ मुबारक ई दिन प्यारा। २ आनहर कानुन देश-देशसँ एलै अवाज तैयो नै बदलल हमर समाज। नै होइए एकरा दरद कोनो नै देखैए ई कोनो पाप किएक तँ बानहल अछि एकरा आँखि‍पर कारी साँप। जे डसि‍ रहल अछि हमर संस्कारकेँ हमर अच्‍छाइकेँ आ करा रहल अछि हमरासँ नीत पाप। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। विदेह नूतन अंक मिथिला कला संगीत १. ज्योति झा चौधरी २.राजनाथ मिश्र (चित्रमय मिथिला) ३. उमेश मण्डल (मिथिलाक वनस्पति/ मिथिलाक जीव-जन्तु/ मिथिलाक जिनगी) १. ज्योति झा चौधरी २. राजनाथ मिश्र चित्रमय मिथिला स्लाइड शो चित्रमय मिथिला (https://sites.google.com/a/videha.com/videha-paintings-photos/ ) ३. उमेश मण्डल मिथिलाक वनस्पति स्लाइड शो मिथिलाक जीव-जन्तु स्लाइड शो मिथिलाक जिनगी स्लाइड शो मिथिलाक वनस्पति/ मिथिलाक जीव जन्तु/ मिथिलाक जिनगी  (https://sites.google.com/a/videha.com/videha-paintings-photos/ ) ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। विदेह नूतन अंक गद्य-पद्य भारती १. मोहनदास (दीर्घकथा):लेखक: उदय प्रकाश (मूल हिन्दीसँ मैथिलीमे अनुवाद विनीत उत्पल) मोहनदास (मैथिली-देवनागरी) मोहनदास (मैथिली-मिथिलाक्षर) मोहनदास (मैथिली-ब्रेल) २.छिन्नमस्ता- प्रभा खेतानक हिन्दी उपन्यासक सुशीला झा द्वारा मैथिली अनुवाद छिन्नमस्ता ३.कनकमणि दीक्षित (मूल नेपालीसँ मैथिली अनुवाद श्रीमती रूपा धीरू आ श्री धीरेन्द्र प्रेमर्षि) भगता बेङक देश-भ्रमण मन्त्रद्रष्टा ऋष्यश्रृङ्ग- हरिशंकर श्रीवास्तव “शलभ"- (हिन्दीसँ मैथिली अनुवाद विनीत उत्पल) ऐपर गुरु वशिष्ठ गंभीर भऽ कऽ बाजल, -हे राजन! पुत्रेष्ठि यज्ञ कोनो साधारण यज्ञ नै अछि। ई यज्ञ वएह करा सकैत अछि जे ब्रह्मचर्य अवस्थामे शास्त्रमे कहल गेल आठ तरहक मिथुनक दृढ़तासँ त्याग केने हएत। स्त्रीक स्मरण, स्त्रीकेँ लऽ कऽ गप, स्त्रीक संग क्रीड़ा करब, स्त्रीकेँ देखब, स्त्रीसँ नुका कऽ गप करब, स्त्रीसँ भेँट करबाक निश्चय आ संकल्प करब आ स्त्री प्रसंगक गप  करब।4 ऐ आठ तरहक अवगुणसँ जे पूर्णत: रहित हुअए, निष्ठावान ब्रह्मचारी हुअए, ओ अप्पन ब्रह्मचर्य कालमे कोनो गृहस्थक अन्न नै खेने हुअए, वएह ऐ पुत्रेष्ठि यज्ञ करबाबएमे सक्षम अछि। हम अहाँक वंशक राजाक कतेक तरहक अन्न खेने छी। तइसँ ऐ यज्ञक संपादन हम नै कऽ सकैत छी। महर्षि वशिष्ठ ध्यान लगौलक, फेर आँखि खोललक आ बाजल, पुण्याश्रममे महर्षि कश्यपक पुत्र विभाण्डक ऋषि अछि आ हुनकर पुत्र ऋष्यश्रृंग अप्पन पिताक संग रहि रहल अछि। ओ सभ तरहेँ पुत्रेष्ठि यज्ञ करबाबएमे सक्षम अछि। ओ उक्त शास्त्रोक्त कठोर ब्रह्मचर्यक पालन केने छल। ओ ब्रह्मचर्य कालमे ई जानबे नै केलक जे स्त्री की होइत अछि। ऐ यज्ञक संपादनार्थ अंग नरेश राजा रोमपादक जमाए ऋष्यश्रृंगकेँ सादर आमंत्रित करबाक निश्चय कएल गेल। रोमपाद राजा दशरथक अभिन्न मित्र छल। ओ नीक कालमे मंत्री आ रानीक संग अप्पन मित्र अंग नरेशक एतए प्रस्थान केलक, जतए ऋष्यश्रृंग अप्पन स्त्री शान्ताक संग निवास करैत छल। प्रज्ज्वलित अग्निक संग तेजस्वी ऋष्यश्रृंग राजा रोमपाद लग विराजमान छल। गहींर मित्रताक कारण रोमपाद अप्पन मित्रक विधिवत सत्कार केलक आ शास्त्रोक्त विधिक अनुसार पूजन केलक। संगे-संग अप्पन विद्वान जमाएसँ अप्पन अभिन्न मित्रक परिचय करेलक। ऋष्यश्रृंग सेहो राजा दशरथक बड़ सम्मान देलक। राजा दशरथ अंग नरेशक एतए सात-आठ दिन धरि मित्र पाहुन तरहेँ रहि गेल। एकर बाद राजा दशरथ राजा रोमपादकेँ अश्वमेध अनुष्ठान केँ लऽ कऽ अप्पन मनक इच्छा बतौलखिन आ एकर निअमसँ संपादनार्थ ऋष्यश्रृंग आ शान्ताकेँ अयोध्या लऽ जाए लेल अनुमति मांगलक। रोमपाद दुनू गोटेकेँ सहर्ष अयोध्या जेबाक अनुमति दऽ देलक। रामायणकारक अनुसार, रोमपादक अनुमति लऽ कऽ ऋष्यश्रृंग आ शान्ता महाराज दशरथक संग अयोध्याक लेल प्रस्थान केलक।5 राजा दशरथकेँ विदा करैत काल रोमपाद बड़ भावुक भऽ गेल। दुनू गोटे हाथ जोड़ि कऽ एक-दोसराकेँ छातीसँ लगा कऽ अभिनंदन केलक। दशरथ अप्पन द्रुतगामी दूतकेँ अप्पन नगरवासी सभकेँ समाद भेजि कऽ सूचित केलक जे विभाण्डक तनय ऋष्यश्रृंग अयोध्या आबि रहल अछि। नगरमे तोरण द्वार बनाओल जाए, एकरा सजाओल जाए। सभ ठाम अगरू धूमक सुवास हेबाक चाही। नगरक सभटा बाट बहारल जाए आ ओकरापर पाइन छींटल जाए, जइसँ ओकरापर कनियोटा गरदा नै रहै। पूरा नगरकेँ ध्वज पताकासँ अलंकृत कऽ देल जाए। राजाक आदेशक पालन भेल। नगरमे शंख, दुन्दुभि आ दोसर वाद्ययंत्र बाजए लागल। बाटक सभटा कठिनाइ केँ बिसुरि कऽ राजा स-दलबल प्रफुल्लित छल। राजा ऋष्यश्रृंगकेँ आगू कऽ नगरमे आएल। ऐ द्विजकुमारक दर्शन कऽ नगरक लोग, कृतार्थ भऽ उठल। सभ कियो पराक्रमी महाराज दशरथक संग ऋष्यश्रृंगकेँ अयोध्यामे आबैत पुष्पवृष्टिसँ स्वागत केलक। राजा अप्पन महान पाहुनकेँ अंत:पुरमे आनि कऽ शास्त्रोक्त विधिसँ पूजा-अर्चना केलक। ओतुक्का स्त्री सभ देवी शान्ताकेँ अप्पन बीच पाबि बड़ खुश छल।6 वाल्मीकीय रामायणक बालकांडक द्वादश सर्गक अनुसार, अंत:पुरमे ऋष्यश्रृंग सपत्नीक रहए लागल। बड़ काल बीत गेल। वसंत ऋतुक आगमन भेल। दशरथ एहन कालमे यज्ञ प्रारंभ करबाक लेल विचार केलक। एकर बाद देवता सन सुकान्ति बला ऋष्यश्रृंगकेँ आगू कर जोड़ि कऽ दशरथ प्रणाम केलक आ अप्पन विमल वंशक परंपराक रक्षाक लेल पुत्र पाबैक निमित्त यज्ञ करबाक लेल हुनका वरण केलक। ऋष्यश्रृंग तथास्तु कहि हुनकर प्रार्थना स्वीकार केलक। ऋषिक आदेशक मुताबिक, यज्ञ सामग्री जमा हुअए लागल, भूमंडलमे भ्रमण करबाक लेल महाराज दशरथक अश्वकेँ छोड़बाक व्यवस्था हुअए लागल, पारंगत आ ब्रह्मवादी ऋषि आ पंडितकेँ बजैलक। सुयज्ञ, वामदेव, जावलि, काश्यप आ वशिष्ठ संग दोसर पंडित सेहो आएल। दशरथ सभ लोकक विधिवत पूजन केलक। पुत्र प्राप्तिक लेल अश्वमेघ यज्ञक अनुष्ठानक गप दोहराएल गेल आ विश्वास व्यक्त कएल गेल जे ऋष्यश्रृंगक प्रभावसँ हुनकर सभटा कामना पूर्ण हएत। ऋषि सभ राजाक ऐ महान संकल्पक लेल साधुवाद देलक। ऋष्यश्रृंग आ दोसर ब्राह्मण  भविष्यवाणी केलक जे ऐ यज्ञसँ चारिटा पराक्रमी पुत्र प्राप्त हएत। राजा प्रसन्न भेल। मंत्रीकेँ आदेश भेटल जे गुरुजनक आदेशानुसार यज्ञक सामग्री जुटाओल  जाए आ शक्तिशाली वीरक संरक्षणमे यज्ञक अश्वकेँ छोड़ल जाए। अश्वक संग प्रधान ऋत्विज सेहो रहता। सरयूक उत्तर दिसक तटपर यज्ञशालाक निर्माण भेल आ शास्त्रोक्त विधिक अनुसार क्रमश: शांतिकर्म पुण्याह वाचन आदिक विस्तारपूर्वक अनुष्ठान कएल जाए, जइसँ विघ्नक निवारण हुअए। अहाँ सभ कियो एहन साधन प्रस्तुत करू जइसँ ई यज्ञ निर्विघ्न विधिपूर्वक संपन्न भऽ जाए। मंत्री सभ राजाक आदेशक पालन केलक आ ओइ मुताबिक व्यवस्था सेहो केलक। ऐ तरहेँ एक वर्ष बीत गेल। दोसर वर्ष वसन्तागमन भेल। अयोध्याक आमक गाछी कोइलीक कूँक सँ गूँजि उठल। राजा अश्वमेधक दीक्षा लै लेल गुरु वशिष्ठ कतए पहुँचल। ओ न्यायत: गुरुक अर्चना केलक आ अनुरोध केलक जे शास्त्रविधिसँ ओ ऐ यज्ञकेँ संपन्न कराबथि आ एहन व्यवस्था करथि जे कोनो ब्रह्म राक्षस ऐ मे विघ्न नै उत्पन्न कऽ सकए। दशरथ कहलखिन, -अहाँक बड़ स्नेह हमरापर अछि, अहाँ हमर सुहृदए, हितैषी, गुरु आ परम महान छी। ऐ महान यज्ञक भार अहीं वहन करू। पुलकित भऽ कऽ गुरु वशिष्ठ अप्पन स्वीकृति देलखिन आ कहलखिन, -हे नरोत्तम! हम वएह सभ काज करब जइ लेल अहाँ प्रार्थना केने छी। तकर बाद, गुरु वशिष्ठ यज्ञ काजमे निपुण आ यज्ञ विषयक शिल्प काजमे कुशल, परम धर्मात्मा, वृद्ध ब्राह्मण, यज्ञ काज खत्म हुअए धरि ओइमे सेवा करए बला सेवक, शिल्पकार, कमार, खधाइ खोदएबला, ज्योतिषी, कारीगर, नट, नचनियाँ, विशुद्ध शास्त्र वेत्ता आ बहुश्रुत पुरुख सभकेँ बजा कऽ हुनका सभसँ कहलक, -अहाँ सभ महाराजाक आज्ञासँ यज्ञकाजक लेल आवश्यक प्रबन्ध करु। जल्दीसँ हजार ईंटा मंगाबियौ। बजाओल गेल राजाक रहैक लेल, हुनका भोजन योग्य आ पीबए आदिक उपकरण युक्त कतेक रास महल बनाओल जाए। ब्राह्मणक लेल आन्हर-पाइनक निवारणमे समर्थ सैकड़ो आवास बनाओल जाए। ऐ तरहेँ पुरवासीक लेल घर आ दूर ठामसँ आएल भूपालक लेल सभ सुविधासँ युक्त महल तैयार कएल जाए। हाथीक लेल हथसाल आ घोड़ा लेल घुड़साल, सामान्य लोकक विश्राम करबाक लेल रैन बसेरा आ दोसर देशक सैनिक लेल छावनी बनाओल जाए। बड़ रास मेहनत करए बला सेवक आ शिल्पी केँ धन आ अन्न दऽ कऽ सम्मानित कएल जाए। सभ अप्पन-अप्पन काजमे लागि गेल। तकर बाद वशिष्ठ मंत्री सुमंतकेँ आदेश देलक जे ऐ धरतीक सभटा धार्मिक राजा आ चारू वर्णक सभटा लोककेँ ऐ यज्ञमे भाग लेबाक लेल आमंत्रित कएल जाए। मिथिलाक नरेश शूरवीर सत्यवादी जनक, देवता सन सुकांतिबला काशी नरेश, महाराज दशरथक ससुर वृद्ध केकेय नरेश, अंग देशक महाधनुर्धर राजा रोमपादक पुत्र सहित कौशल राज भानुमान, मगध राज प्राप्तिज्ञ आदि केँ अपनेसँ जा कऽ सादर सत्कारपूर्वक बजओने आएल। महाराजक आदेश लऽ कऽ पूब देशक नरेश, सिंधु सौवीर आ सुराष्ट्र देश व दक्षिणक नरेशक विशेष दूतसँ निमंत्रण भेजल जाए। निर्धारित दिन विभिन्न राज्यक नरेश महाराज दशरथक लेल बहुमूल्य रत्न भेंट लऽ कऽ अयोध्या जाए लागल। वांछनीय वस्तुक संग सरयूक उत्तरबरिया कातपर यज्ञशालाक तुरंत निर्माण भऽ गेल। लागल एना जे मनक संकल्पसँ ई बनि गेल। मुनिवर वशिष्ठ आ ऋष्यश्रृंगक आदेशसँ शुभ नक्षत्र बला दिन राजा दशरथ यज्ञक लेल राजम वनसँ निकलल। एकर बाद वशिष्ठ जेहन श्रेष्ठ द्विजवर ऋष्यश्रृंगक नेतृत्वमे यज्ञकार्य शुरू केलक आ तखने राजा दशरथ अप्पन स्त्रीक संग ऋष्यश्रृंगसँ यज्ञक दीक्षा लेलक।7 इम्हर वर्ष पूर्ण होइक संग अश्व भूमंडलक परिक्रमा कऽ वापस घुरि आएल। अश्वमेध यज्ञ शुरू भेल। ऋष्यश्रृंग आदि महर्षि अप्पन अभ्यास कालमे सीखल अक्षर संयुक्त स्वर अ वर्ण सँ संपन्न मंत्रसँ इंद्र आदि श्रेेष्ठ देवता सबहक आह्वान केलक। सभ हुनकर योग्य हविष्यक भाग समर्पित केलक। यज्ञशालामे तीन सए पशु बान्हल गेल छल आ दशरथक ओइ अश्वरत्न केँ सेहो ओतए बान्हल गेल छल। रानी कौशल्या ओइ अश्वक संस्कार कऽ ओकरा तलवारसँ तीन बेर स्पर्श केलक आ धर्म पालन करबाक इच्छासँ ओइ अश्व लग एक राति निवास केलक। सभटा वर्ण द्वारा अश्वक स्पर्शक पश्चात चतुर जितेंद्रिय ऋत्विक विधिसँ अश्वकंदक गूदा निकालि शास्त्रोक्त विधिसँ पकौलक। ओइ गूदाक आहुति सेहो देल गेल। राजा दशरथ अप्पन पापकेँ दूर करबाक लेल ओकर धुआँ सूंघलक। अश्वमेध यज्ञक अंगभूत जे हवनीय पदार्थ छल, ओइ सभक संग सोलह ऋत्विक अग्निमे विधिवत आहुति दिअए लागल। अश्वमेध यज्ञ पूर्ण भेल। ऋत्विककेँ जे धन दक्षिणामे भेटल, ओ सभटा ओ मुनिवर वशिष्ठ आ ऋष्यश्रृंगकेँ सौंपि देलक। ई दूनू महर्षि न्यायपूर्वक बँटवारा कऽ सभ ब्राह्मणकेँ संतुष्ट केलक। एम्हर दशरथ ऐ उत्तम यज्ञक पुण्यफल प्राप्त कऽ मने मन प्रसन्न भेल। ओ ऋष्यश्रृंगसँ बाजल, -उत्तम व्रतक पालन करएबला मुनीश्वर! आब जे कर्म हमर कुलक परंपराकेँ बढ़बै बला हुअए, ओकर संपादन कएल जाए। ऋष्यश्रृंग राजाक चारिटा यशस्वी पुत्र हेबाक भविष्यवाणी केलक। राजा प्रसन्न भेल आ ऋष्यश्रृंगसँ एकरा लेल पुत्रेष्ठि यज्ञ प्रारंभ करबाक लेल अनुरोध केलक।8 ओ कनी कालक लेल ध्यान लगा अप्पन भावी कर्तव्यक निश्चय केलक। फेर ध्यान भंग भेलापर दशरथसँ बाजल, -राजन! हम अहाँकेँ पुत्र प्राप्तिक लेल अर्थवेदक मंत्रसँ पुत्रेष्ठि यज्ञ करब। वेदोक्ति विधिक अनुसार, अनुष्ठान केलापर ई यज्ञ अवश्य सफल हएत। ऋष्यश्रृंग अप्पन जुगक महान चिकित्साशास्त्री छल आ शरीर विज्ञानमे हुनकर गहींर पइठ छल। ओ दीर्घकाल धरि आयुर्वेदक सेहो अध्ययन केने छल आ ओइमे अर्हत्व प्राप्त केने छल। ओ राजा दशरथ आ हुनकर तीनू रानीक चिकित्सा शास्त्रीय परीक्षण केलक। ओ ओकरे मुताबिक जड़ी-बूटी आ आयुर्वेदिक गुण संयुक्त समिधा सेहो इकट्ठा केलक।10 परम तेजस्वी ऋष्यश्रृंग पुत्र भेटबाक उद्देश्यसँ पुत्रेष्ठि यज्ञ प्रारंभ केलक। ओ श्रौत विधिक अनुसार, चिकित्सीय गुण युक्त समिधा सभक आहुति अग्निमे देब शुरू केलक। ऐ महान यज्ञमे देवता, सिद्ध, गंधर्व आ महर्षिगण अप्पन अप्पन भाग लै लेल पहुँचल। पापी सभक विनाश आ संतक कल्याणक लेल सभटा देवता यज्ञस्थल पर उपस्थित भेल आ अप्पन भाग प्राप्त कऽ यथेष्ट आशीर्वाद देलक। यज्ञकुंडक आैषधि तैयार भऽ गेल। ई खीरक रूपमे तैयार कएल गेल। प्रज्ज्वलित अग्निक समान ई दिव्यौषधि दैदीप्यमान भऽ रहल छल। ई जम्बूनद नामक सुवर्णसँ बनल बड़ पैघ रास परातमे चांदीक ढक्कनसँ झाँपल छल। आैषषि तैयार हेबाक संग एकर सुगंध सभ दिशामे पसरि गेल। ऋष्यश्रृंग अप्पन सफलतासँ प्रफुल्लित छल। ओ यज्ञाग्निसँ ओइ अमोघ आैषधिसँ भरल पात्रकेँ निकालि महाराज दशरथकेँ देलक आ कहलक, -राजन! अहाँ एकरा ग्रहण करू। राजाक अंत:पुरक स्त्री सभमे हर्षोल्लास भरि गेल, जेना निर्धनकेँ कुबेरक खजाना भेट गेल। राजा ओइ खीरक आधा हिस्सा महारानी कौशल्याकेँ देलक। फेर बचल आध हिस्सा रानी सुमित्राकेँ। फेर दुनूकेँ देलाक बाद जतेक खीर बचल छल ओकर आध हिस्सा रानी कैकेयीकेँ आ हुनका देलाक बाद जे खीरक अवशिष्ट भाग बचल, से चतुर नरेश किछु सोचि-समझ कऽ फेर सुमित्राकेँ दऽ देलक। रानी श्रद्धा आ विश्वासपूर्वक ऐ आैषधि युक्त खीरक सेवन केलक। जल्दीये ओ अलग-अलग गर्भधारण केलक। (देखू परिशिष्ट क) (क्रमश:) ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। बालानां कृते जगदीश प्रसाद मण्डल बाल उपन्यास नै धाड़ैए १ मैट्रीक परीक्षासँ तीन मास पूब कोठरीमे बैस राधामोहन अपन दिन-दुनियाँक सम्बन्धमे सोचैत रहए। ओना परीक्षाक तैयारी लेल बैस पढ़ैत रहए मुदा किछु समए पछाति जखन पढैसँ मन उचटि गेलै तखन जिनगीक बात उठलै। परीक्षाक फारम भरला पछाति स्कूल आएब-जाएब बन्न भऽ गेल छलै। रंग-रंगक विचार मनमे उठए लगलै मुदा बरखा पानिक बुलबुला जकाँ विचार उठै आ फूटि जाइ। कोनो असथिर विचार ने मनमे उठै आ ने अॅटकैत रहै। कोनो विचारकेँ ने ठीकसँ पकड़ि पबैत आ ने सोचि पबैत। किछु समए पछाति असथिर कऽ अपन भूत-भविष्यपर नजरि अॅटका गौर करए लगल तँ तीन तरहक विचार अभरलै। ओ ई जे अखन धरि साले-साल स्कूल परीक्षा स्कूलेमे होइतो रहल आ आगूओ बढ़ैत गेलै। मुदा आब तँ से नै हएत। सरकारी देखा-रेखमे परीक्षो हएत आ रिजल्टो निकलत। जँ फेल करब तँ दोहरा कऽ फेर अगिला साल परीक्षा दिअ पड़त आ जँ पास करब तँ आगू...? आगू तँ पढ़ि नै पएब। जँ पढ़ि नै पएब तखान की करब? साधारण चारि बीघा जमीनबला परिवारक राधामोहन। चारि बीघा माने अस्सी कट्ठा। अस्सी कट्ठा माने सोलह सए धूर। दुनियाँ मानचित्रमे भिन्न-भिन्न देश आ भिन्न-भिन्न जमीनक महत। जँ जापानक बेस किमती तँ साइबेरियाक से नै। मुदा मनुष्य तँ दुनूठाम अछिये आ रहबे करत। खैर जे होउ, ने जापानक चर्च भऽ रहल अछि आ ने साइबेरियाक। चर्च तँ मिथिलांचलक भऽ रहल अछि तँए मिथिलांचलक जमीन देखए पड़त। सबहक जिनगियो सभ रंगक। पेइतालीस बर्ख अबिते-अबिते राधामोहनक पिता नन्दलाल पूर्ण रोगी बनि चुकल छला। तीन बर्ख पूर्व धड़िक जिनगी जखन नन्दलालक मनमे आबनि तँ अपनो नै बिसवास होन्हि जे हमहूँ जोड़ा बरदबला किसान छलौं, आ मस्तीक किसानी जिनगी बितबै छलौं जइ साल सुभ्यस्त समए होइ छलै तइ साल जेहने घरक कोठी भरैत छल तेहने पोखरिक महारपर नारक टाल लगबै छलौं। मुदा आब ओहन दिन-दुनियाँ थोड़े देखब। अछैते खेते थोड़े हएत। करबो के करत, जखन केनिहारे नै तखन हएत केना। दुनियाँक माटि-पानि तँ सभ दिनसँ रहलै आ सभ दिन रहत। मुदा जइ समए जेहेन मनुष्य रहत तइ समए दुनियाँक रंगो-रूप तँ ओहने रहत किने। जाधरि नन्दलालक शरीरमे रोगक आगमन नै भेल छलनि तइसँ पूर्व दुनू परानी अपन खेत-पथारमे, कहियो गरदामे तँ कहियो थालमे लेटाइत रहैत छला। काजक एहेन सूत्र बनल छलनि जे आगू-पाछू सोचै-विचारैक बात मनमे उठबे ने करनि। ओना साले-साल ब्रह्मस्थानक भागवतमे कातिक मास सुनैत छला जे जिनगी क्षणभंगुर छी, तँए समैकेँ बिना गमौने समर्पित भऽ किछु कऽ ली, मुदा से भागवते धरि मन रहैत छलनि। भरि पेट भोजन भेटिये जाइत छलनि तँए ने घटवी बाट मनमे उठैत छलनि आ ने दुआर-दरबज्जा भरल देखैत छलाह जइसँ बढ़ती बात उठैत छलनि। भागवतोकेँ धार्मस्थानक धर्मक बात बूझि घर्मस्थानमे सुनि लइत छलाह। गामपर अबिते घरक चक्कीमे जुइट जाइत छला। अपन खेत, अपने केनिहार तँए अपना मनोनुकूल खेती-गिरहस्ती करैत छला। जइ वस्तुक जते जरुरति अछि, पहिने ओते पुरा लेब तखने ने अनका दिस तकबै। जँ से नै ताकब तँ आँखिक खच्चरपन्नीसँ अनके सभ किछु देखैत रहब आ अपन देखबे ने करब। नन्दलालक विशाल रूप जहिना बुधनी देखैत तहिना बुधनीक विशाल रूप नन्दलाल देखैत। कोठरीक राधा-रानीक जिनगी नै विशाल दुनियाँक मंचपर नट-नटी बनि दुनू-परानी कखनो खेतक गोला कोदारिसँ फोड़ैत, तँ कखनो संग मिलि धान रोपैत। कखनो माल-जालक थइर-गोबर करैत, तँ कखनो इच्छानुसार खाइ-पीऐक ओरियान करैत। जिनगीक लीला तँए लजाइ-धकाइक प्रश्ने नै। तीन सालक बीच नन्दलाल तेना-रोगा गेला जे मन मानि लेलकनि जे आब नै जीब। चल-चलौक बाटपर आबि गेलौं। मुदा एते दिन तँ अही समाजमे समाज बनि जिनगी गुदस केलौं, नै किछु अनकर केलिऐ, तँ  केकरो भारो तँ नै बनलिऐ। मेहक बड़द जकाँ किसानक संग खेत-पथारमे बहबे केलिऐ। तइ बीच ठेहुनक गीरह कचकि उठलनि। कचकि एतेक जोरसँ गेलनि जे बूझि पड़लनि सौंसे देहक शाक्तिकेँ छिन्न-भिन्न कऽ देत। मुदा ई तँ भेल देहक रोग, मनकेँ तइसँ कोन मतलब। ओकर तँ अपन सभ किछु छै। मुदा शरीरक दर्दक पीड़ाक कष्ट तँ प्रभावित कइये देने रहै। पीड़ाएल मन, शरीरक बेथा देखि हाँइ-हाँइ अपन बोरिया-विस्तर समेटैत बुद-बुदाएल- “जखन दुनियाँ छोड़िये रहल छी तखन किअए ने अंतिम बात कहिये दिऐ जे, भाय जे केलियह से खेलियह, किछु जमा तँ रहल नै जे देने जेबह। एकरा गल्ती बूझि छोड़ि दाए आकि जवाबदेही बूझि दोरिका छाप दऽ दाए।” नन्दलाल ऐठाम पंडाक बगे बनौने एक गोटे एला। बम्बैया सम्पन्न मंचक कलाकार जकाँ बनल-ठनल चेहरा रहनि। नन्दलालक दरबज्जापर अबिते कामरूप कामाख्याक शंख फूकि घरवारीकेँ सूचना देलखिन। दरबज्जापर आएल अभ्यागतक आगमन बूझि बाड़ीसँ नन्दलाल आ आंगनसँ बुधनी पंडाजीक आगूमे उपस्थित भेला। देव रूप देखि नन्दलाल ओसारक चौकीकेँ देह परक तौनीसँ झाड़ि-झूड़ि बैसैक आग्रह केलखिन। दरबज्जापर आएल अभ्यागतक सेवा करब किसानी संस्कारक मुख्य अंग अदौसँ रहल अछि। बैसिते पंडाजी जोगी-फकीर जकाँ अपने बड़बड़ाए लगलाह- “ऐ जमीनक भाग कहै छै जे साक्षात लछमीक बास छी, जे दोबर-चारिबर गतिये परिवार आगू मुहेँ बढ़त, मुदा?” लछमीक बास सुनि दुनू परानी नन्दलालक मनमे खुशीक ज्वार उठलनि। मुदा एकभग्गू बोल पंडाजीक रहनि। ओ ई जे जते प्रशंसा बुधनीक केने रहथिन तते नन्दलालक नै। जइसँ नन्दलालक मनमे किछु अनोन-विसनोन जरूर भेलनि, मुदा पत्नियोँ तँ आन नहियेँ छथि, विचारकेँ दबलनि। पंडाजी हाथक रेखा देखबाक विचार व्यक्त केलनि। हाथक रेखा सुनि दुनू परानी अपन-अपन हाथ आगू बढ़ौलनि। चलाक खेलाड़ी जकाँ, जे पहिने दोसरकेँ खेलबैत पछाति सवारी कसैत तहिना पंडाजी सेहो केलनि। हाथ देखबैसँ पहिने बुधनीक मनमे उठलनि जे जौं पतिक अछैत मृत्यु भऽ जाइत तँ ओ पत्नी...? मुदा परोछ भेने...? पत्नीक मन पतिपर एकाग्र भऽ गेलनि। शुभ समाचार सुनै लेल बुधनी विहुँसैत पंडाजीक आगू हाथ पसारि कहलखिन- “ई हमर पति छथि, जाबे जीबै छथि ताबे हमहूँ जीबै छी, तँए जौं केतौ कोनो गड़बड़ होइ से कहि दिअ। समए अछैत ओकर प्रतिकार करब।” बुधनीक बात सुनि पंडाजीक मन चपचपा गेलनि। गोटी सुतरैत देखि, चौकीक निच्चा लटकल पएरकेँ समेटि पल्था मारि ऊपर बैसला। बुधनीक हाथ देखि खुजल आँखि बन्न करैत ठोर पटपटबैत पंडाजी बुदबुदेला। फेर आँखि खोलि चारू दिशा दिस देखि ऊपर तकलनि। जेना कियो किछु बजैक उत्साहित केलकनि। बजला- “परिवारक पछुलका गति तँ नीक छल मुदा बीचमे ग्रहक आगमनसँ गड़बड़ा गेल अछि। ओना अखन धरि तेहेन गड़बड़ नै भेल अछि, जे बूझि पड़त मुदा आगू जखन जुआ जाएत तखन बुझबै कि देखबो करबै। ओना ऐ घरक साक्षात लछमी अहीं छिऐ, जइपर अखनो घर ठाढ़ अछि, मुद...?” आगूमे बैसल नन्दलालक मनमे उठैत जे परिवारक गार्जन हम छी, जौं हमर हस्त-रेखा नीक रहत तँ अनकर अधलो भेने कि हेतै। फेर लगले विचार बदलए लगलनि जे पत्नियोँ तँ अर्द्धांगिनियेँ होइत छथि तँए हुनको छोड़ब नीक नहियेँ हएत। पत्नीकेँ कहलखिन- “पहिने पंडाजी केँ चाह पिअबिअनु। पछाति सभ गप हेतै।” पतिक बात सुनि बुधनी चाह बनबए गेली। तइ बीच पंडाजी नन्दलालकेँ पुछलखिन- “ऐ गाममे देवस्थान कते अछि?” पंडाजीक प्रश्न नन्दलाल नीक जकाँ नै बूझि सकला। दोहरबैत पुछलखिन- “की देवस्थान?” नन्दलालकेँ अनाड़ी बूझि पंडाजी बजला- “ब्रह्मस्थान तँ हेबे करत। तेकर बादो महावीरजी, शिवजी, धर्मराज इत्यादि-इत्यादि आरो कते स्थान हएत किने?” नन्दलाल- “हँ, से तँ अछिये। तीनटा महादेव मंदिर अछि, दूटा महावीरजी स्थान अछि, एकटा धर्मराज, एकटा सलहेस, एकटा ठकुरवाड़ी सेहो अछि।” तही बीच बुधनी चाह नेने आबि पंडाजीकेँ आ नन्दलालोकेँ देलखिन एक घोंट चाह पीविते पंडाजी बजला- “चाह तँ चाहे अछि। बड़ सुन्नर चाह पिएलौं।” चाह पीब हाथ धोय पंडाजी नन्दलालक दहिना हाथ देखि बजलाह- “अहाँकेँ तीनटा बिआह आ सातटा सन्तान लिखैए। काएम बिआह छी?” तीनटा बिआह सुनि बुधनीक मनमे जलनि उठलनि। मुदा किछु बजली नै। नन्दलाल कहलखिन- पहिल जे बिआह भेल सएह छी। सन्तानो एकेटा बेटा अछि।” पाशा पलटैत देखि पंडाजी पुनः हाथक रेखापर अपन आंगुर दैत बजलाह- “ई रेखा ऐठामसँ आबि, एकरा काटि देलक। जइसँ दूटा पत्नियोँ कटि गेल आ छहटा सन्तानो।” पुनः नन्दलालक हाथ छोड़ि बुधनीक हाथ देखए लगलाह। बुधनीक हाथक रेखा देखैत बजला- “पति सुख अहाँकेँ पूर भऽ रहल अछि। किछु दिन आरो अछि। मुदा....?” पंडाजीक बात सुनि नन्दलालक मनमे उठलनि, भरिसक ई मौगियाहा पंडा छी। मुदा, खएर अखन तँ दरबज्जापर छथि किछु बाजब उचित नै हएत। पंडाजी आगू बजला- “अहाँ पतिकेँ शनिक ग्रहक आगमन भऽ गेल छन्हि, जे अहूँक रेखा इशारा करैए।” बुधनीक हाथ छोड़ि पुनः नन्दलालक हाथ देखैत बजला- “अहाँकेँ शनिक ग्रहक आगमन भऽ गेल अछि। अखन तँ शुरूआतीक अवस्थामे अछि तँए किछु नै बूझि पड़ैए मुदा तीन मास बीतैत-बीतैत उपद्रव शुरू हएत।” पतिक ग्रह सुनि बुधनी ओहिना तड़पली जहिना कोनो औरत अपन निर्दोष पतिकेँ सिपाही हाथे जहल जाइत देखैए। तरसैत-तलपैत बुधनी पंडाजीकेँ कहलखिन- “अपने साक्षात देवता छिऐ। जे चाहबै से हेतै। कोनो धड़ानी हिनका ग्रहसँ छुटकारा करा दिअनु।” गोटी लाल होइत देखि पंडाजी बजला- “केहेन-केहेन राहू-केतुकेँ तँ जिनगीमे भगा चुकल छी आ ई कोन माल-मे-माल अछि। एकरा तँ छन-पलकमे कतए-सँ-कतए दऽ आएब तेकर ठीक नै।” पंडाजीक बात सुनि दुनू परानी बुधनी-नन्दलालकेँ जान-मे-जान आएल। बुधनी बाजलि- “खर्च-बर्चक चिन्ता नै, मुदा काज पक्का होय।” घूसक मोट रकम देखि जहिना घूसखोरक मन चपचपा जाइत तहिना पंडा जीक भेलनि। बजला- “देखियौ, ऐ काजक लेल अनुष्ठान करए पड़ै छैक तँए सभठाम करब आकि कराएब संभव नै अछि।” बुधनी- “तखन?” पंडाजी- “तइले चिन्ता किअए करै छी। हाकिमक दसखत जेहने आँफिसमे तेहने डेरापर। तखन तँ आँफिसमे अनचोकमे आबि कियो देखि ने लिअए तेकर कनी..., जे डेरामे नै होइत अछि।” नन्दलाल- “नै बुझलौं अहाँक बात पंडाजी।” कबुला छागर जकाँ नन्दलालक मन कॅपैत। तँए आँखिक सोझमे अपन अनुष्ठान देखए चाहैत। पंडाजी- “देखियौ, हिमालयसँ लऽ कऽ समुद्र धरिक वस्तुक जरूरति अनुष्ठानमे पड़ै छै। ओते लऽ कऽ चलब संभव अछि? ऐठाम सभ वस्तु उपलब्ध नै हएत। अहाँ सन-सन कते भक्त ने छथि। हमरा लिए तँ सभ बराबरि।” नन्दलाल- “तखन?” पंडाजी- “विधिवत सभ खर्चक मूल्य दऽ दिऔ। जहिना अनन्त पावनि माने अनन्तक पूजामे एक गोटे पूजा करै छथि आ टोल-पड़ोसक लोक अपन-अपन अनन्द-फनन्दक पूजा करा लइ छथि, तँए कि ओ अशुद्ध भेल। अशुद्ध तँ होइत अछि फनन्द जेकर गीरह-बनहनक गिनती कम होइ छै।” हिमालयसँ लऽ कऽ समुद्र धरिक बात सुनि बुधनीक मन चकभौर काटए लगलनि। बाप रे, कतए हिमालय अछि आ कतए समुद्र। तइसँ नीक जे जे कहता सएह करब असान हएत। देववाणी कोनो कि नूनछड़ाह होइ छै, उनटा होउ कि सुनटा, कहुना हेतै तैयो तँ मधुरे-मधुर हेतै किने। बाजलि- “केना कि खर्च-बर्च पड़त?” पंडाजी- “खर्च-बर्च कि हाथी-घोड़ाक पड़त, तखन तँ अनुष्ठाने छी कनियोँ-कनियोँ कऽ करब तैयो तँ...।” कनियोँ-कनियोँ सुनि बुधनी बाजलि- “नै पान तँ पानक डंटियोसँ काज चला लिअ।” पंडाजी आ बुधनी दुनू गोरेक बात सुनि नन्दलाल परीक्षा लेल कबुलाक छागड़ जकाँ थर-थर कॅपैत। मुदा एक दिस जिनगी तँ दोसर दिस मृत्यु सेहो देखैत। ग्रह-नक्षत्रक किरदानीकेँ कि मनुख रोकि सकैए, फेर मनमे उठैत जे, जे मनुष्य माटियोकेँ देवता बना सकैए ओ तँ किछु कऽ सकैए। मुदा दुनू गोटेक अनुकूल विचार सुनि चुपे रहला। हुन्डे अनुष्ठानक खर्ख लऽ पंडाजी सगुनियाँ डेग दैत विदा भेला। मनमे ईहो बात उठैत जे जौं चारियो-पाँच एहेन सुतरल तँ साल-माल लगिये जाएत। मुदा जे होउ, यात्रा नीक रहल। तीन मास बीत गेल। ने पंडाजी अपन परीक्षाक रिजल्ट बुझए घुमि कऽ एला आ ने दुनू परानी नन्दलालकेँ मनमे कोनो तरहक आशंका भेलनि जे पंडाजी कि केलनि कि नै। तीन मासक पछाति जइ दिन शनिक ग्रहक आगमनक नाओं कहने रहनि ओ दिन नन्दलालकेँ मने रहनि। साओनक पूर्णिमाक दिन।  पूर्णिमा मन पड़िते महिनाक हिसाब जोड़लनि तँ जोड़ा गेलनि जे आइये पूर्णिमा छी। हौआइत हाथकेँ कुड़ियबैत मनमे उठिते, पोखरिक माछ सदृश मनमे चाल देलकनि। ओह, भरिसक हाथ हौआएब शुरू भऽ गेल। बामा हाथक हौआएब छोड़ि दहिना हाथसँ तरबा कुरिऔलनि तँ सुआस पड़लनि। ओह, जाबे ग्रहक आगमन नै भेल, ताबे पएर-हाथक कुड़िऔनी किअए मंगैए। पत्नीकेँ कहलखिन- “राधामोहनक माए, भरिसक ग्रहक आगमन भऽ गेल।” ग्रहक आगमन सुनि बुधनीक मनमे उठलनि जे बहुत रोगी ओहनो होइए जे रोगकेँ देहमे रखनौं रहैए आ दवाइयो खाइत रहैए। काजो करिते रहैए। मुदा रोगीकेँ ओछाइन धड़ा आराम देब सेहो तँ होइए। तहूमे सर्दी-बोखार नै छी जे नूनपनियाँ पीब लेब आ भानसो-भात करब। देवलोकक ग्रहक आगमन छी, ऐ श्रेणीक रोग..., कहुना भेल तँ राजे रोग भेल किने। नन्दलाल बाजला- “हाथो हौआइए आ पएरो, तखन चलब केना आ काज केना करब। दुनू दिससँ तँ रोग आबिये गेल अछि।” बजिते बुधनीक मनमे उठलनि, पथ-परहेज कि सभ करए पड़त। सर्दी-बोखारक तँ बुझल अछि जे पोड़ो साग नै खाएत मुदा एहेन रोगसँ तँ पहिले-पहिल भेँट भेल। खौंझाइत बड़बड़ेली- “जे भगवान सभकेँ बुधि देलखिन ओ एक-रंग कऽ कऽ किअए ने देलखिन जे रोगमे पड़ल छी आ पथ-परहेज बुझले ने अछि। एहेन रोगीसँ कि लोक हाथ धोइ लिअ।” “हाथ धोइ लिअ।” मुँहसँ निकलिते चमकैत शीशा जकाँ मन चनकि उठलनि। जौं रोगीसँ हाथ धोइ लेब तँ माथक सिनूरक की हएत। असोथकित जकाँ बुधनी थकमका गेली। जइ जिनगीकेँ खेल बुझै छी ओ खेल नै छी जौं खेल रहैत तँ अमेरिकासँ कते ऊपर रहितौं। ओछाइन पकड़िते नन्दलाल रोगाए लगलाह। श्रम नै केने अरुचि, पड़ल रहने देहक अकड़नसँ जोड़-जोड़क दर्द बढ़ैत-बढ़ैत छह मास पुरैत-पुरैत नन्दलाल भिनसुरका नटुआ जकाँ मोटरी माथपर नेने चल-चलाउ बनि गेला। असगरे बुधनी काजमे तेना ओझरा गेली जे काजे मानव काजे दानव बनि गेली। काज तते छिड़िया गेलनि जे जहिना उड़ैत फनिगाकेँ गिरगिट पकड़ै छै तहिना भऽ गेलनि। काजे काजकेँ खेबो करैत आ गीरबो करैत। साँझू पहर जखन काजसँ निचेन भऽ पएर मोड़थि आ भरि दिनक काजक हिसाब मनमे अबनि तँ मानि लथि जे सभटा कर्मक खेल छी। कियो खेल खेलि खेलाड़ी बनि जाइत तँ कियो खेल बनि खेलाएल जाइत। डाॅक्टर ऐठाम जखन पतिकेँ लऽ जाइ छियनि तँ सभ रोगक जड़ि भरि दिन पड़ल रहब छन्हि। जइसँ सौंसे देहक जोड़ पकड़ि लेलकनि। फेर जिनगी ठाढ़ हेतनि एकर कोन भरोस। तखन तँ माइयो-बापक लिलसा पूरा कइये देलियनि जे एकक नाति दोसराक पोता बना ठाढ़ कइये देलियनि, कि पतिधर्ममे कमी रहल? जौं नै तँ पति-विहिन नारीकेँ समाज किअए कलंकित केने छथि। पतिपर सँ बुधनीक नजरि उतरि बेटा-राधामोहनपर एलनि। लोकक धिया-पुता शहर-बजारमे जा रहबो करैए, सिनेमो देखैए आ पढ़बो करैए। से गरदनिकट्टी हमरा सेने सेहो भेलै। मुदा हमहीं कि करबै जइ घरमे एकटा विद्यार्थी आ एकटा रोगी रहत ओइ परिवारक गाड़ी खिंचब महिला लेल सचमुच चुनौती अछि। किस्सा-पिहानी ढेरो कहै छिऐ, मुदा पतिव्रता परिवारक लेल केहेन समर्पित छलथि, ऐ दिस सेहो देखक चाही। ई नै जे टीक एक बोझ रखनै छी आ पनरह-पनरह दिनक बिनु धुअल पेन्ट पहिर प्रवचन करै छी। राधामोहनपर नजरि पड़िते वेचारी विस्मित भऽ गेली। भगवान सभटा विपति ओही छौड़ाकेँ देलखिन। मुदा ओकरा तँ कहुना कऽ गोठ-गो धरि बनेलौं अछि। आब कि ओ धीरग-पुतगर नै भेल। जँ धीगर-पुतगर भेल ओकरा बुते घर चलाओल नै हेतै। बुधनीक मनमे सवुर भेलनि। भगवान पति हरने जा रहल छथि मुदा जुआन बेटा तँ सोझमे अछिये। फेर मन उनटि राधामोहनपर एलनि, जेतबो सुख माए-बापक घर केलिऐ तेतबो उमेर तक हम कहाँ दऽ सकलिऐ। ओही वेचाराकेँ धन्यवाद दी जे खेने-बिनु-खेने पढ़बो करैए आ संग-साथ दऽ काजो करैए। संग साथ मनमे उठिते बुधनी विह्वल भऽ गेली। संगे-साथ ने सभ किछु छी। मनुख तँ अबैत-जाइत रहत मुदा परिवार जे संग-साथ अछि वएह ने जिनगी छी। २ देखले दिनमे नन्दलालक परिवार कतए-सँ-कतए पाछू ससरि गेल, यएह छी जिनगी। समए आगू मुहेँ ससरैत आ जिनगी पाछू मुहेँ, तखन समए संग केना चलब। समाजक बीच नन्दलाल परिवारक चर्च अहू रूपमे होइत। प्रश्न उठैत जे समाजक कते लोकक बीच एहेन विचार उठैए। परीक्षामे एक शब्दक भूलसँ प्रश्नोत्तर गलत भऽ जाइत जेकर परिणाम होइत असफल। मुदा ओहए एक शब्द भेटने परीक्षार्थी सफलो तँ होइते अछि। की तहिना जिनगियोक शूत्र शब्द अछि। ओना समाज तँ समाज छी, अथाह समुद्र कहियौ आकि सघन बोन। कियो नून घोड़ि नून-पनियाँ बना रोग भगबैत अछि तँ कियो नूनाएल पानिकेँ नूनगरी हटा स्वच्छ बना पीबा जोग बनबैए। कियो दुर्गंधकेँ सुगंधक आड़ि दऽ लक्ष्मणा रेखा खींचि जीवन-यात्रा करैए। तँ कियो नरकोमे ढाही मारि-मारि आरो गर्त दिस बढ़ैत अछि। समाजमे एहनो कम लोक बजनिहार नै जे बुधनीक दशा-दशा देखि चाबस्सीयो दैत आ हँसबो करैत। मुदा केहेन चाबस्सी आ केहेन हँसी। खुशीसँ जौं हँसी अबैत तँ केकरो दीन-दशापर किअए अबैत। मुदा तइ संग समाजमे एहनो कहनिहार तँ अछिये जे कहैत अछि जे धन्यवाद ओही वेचारीकेँ दियनि जे एक संग पतिसँ पुत्र धरिक सेवा अपना बाँहु-बलसँ कऽ रहल छथि। एक परिवारक खेती-पथारीसँ लऽ कऽ पढ़ाइ-लिखाइ, बर-बेमारीक सामना असगरे करैत, कि हुनका जिनगीक चक्की उनटौनिहार नै कहबनि। जे मिथिलांचलक गौरव-गाथाक इतिहास रहल अछि। मुदा तइ संग ईहो कम दुर्भाग्यक बात नै जे जिनगीकेँ सामाजिक जालमे ओझरा अपन करम-भागकेँ दोषी बनबैत। एहनो कहनिहारक कमी नै जे कहैत पीसलक मड़ुआ तँ उठओत गहुमक चिक्कस। प्रश्न उठैत जे बुधनीक कि दोख जे एहेन शब्दसँ वेचारीकेँ दागल जाइत? मुदा एहनो शब्द तँ ओही समाजमे फड़ैत-फुलाइत अछि जे कहैत वेचारी बुधनीक अखन उमेरे कते भेल अछि। अधोसँ कम जिनगी टपल हएत, बेसी वाॅकिये हेतै। ई केहेन निसाफ भगवानक भेलनि जे सौंसे जिनगी नै दऽ अधोसँ कमेपर अधसुखू बना देलखिन। पति-पत्नीक बीच जे रहैए तेकर तँ ओ गति छैक जेकरा मनुखक श्रेणीसँ निच्चा बूझल जाइत छै आ जेकरा नै छैक ओकर गति की हएत? कियो रााँड़ कहि राँड़िन बनाओत तँ कियो यात्राक भदवा कहि दुतकारत। ओना एहेन गति अखन धरि बुधनीकेँ नै भेल छलनि, कारण जे रोगाएलो छलनि तँ पति जीवैत छलनि। भलहिं परिवारक गाड़ीक जुआ असगरे किअए ने खिंचैत होथि। मुदा जहिना समाजक बीच, मकानक इटा जकाँ एक-एक परिवारक ऊपर समाजक भारो रहैत आ जीवैक आजादियो रहैत तहिना परिवारक बीच एक-एक व्यक्तिक सेहो होइत अछि। शरीर अलग-अलग रहनौं, पानिक बीच जेहेन सम्बन्ध रहैत, से तँ रहिते अछि। मुदा बुधनी तँ जालमे ओझराएल छथि। दस बजे जे बेटा स्कूल जाइत छन्हि ओ चारि-पाँच बजे अपराहनमे घूमि कऽ घरपर अबैत छन्हि, तइ बीच रोगाएल पतिकेँ छोड़ि बुधनीकेँ कतौ बाहर जाएब उचित हएत? मुदा बाधो-बोन नै जाएत से हेतै? तँए कि बुधनीक विचारक सागर सूखि गेलै जे एक-बोल पतिसँ नै बाजि पाबए। जँ एक दिस गाछक डारि टूटि  रहल अछि तँ दोसर दिस राधामोहन सन, अनपढ़  पतिक जगह पढ़ल-लिखल बेटा तँ भेटिये रहल छै। उत्साहमे मिसियो भरि कमी बुधनीमे नै आएल छलनि, जहाँ धरि काजक सफलता (दिनक काज) पछाति जे मन खुशिआइन तँ अनेरे बमकए लगनि। सौंसे गामक लोक बताह भऽ गेल, बाप बेटाकेँ दोखी बना भरि दिन गरियबैत रहैए तँ बेटा बापकेँ गरियबैत रहैए, साला बुढ़ाढ़ीमे घी ढारी करैए। सासु-पुतोहुकेँ दोख दैत जे अवढंगहीं घर आएल, तँ पुतोहु बापकेँ गरियबैत जे कोन नटिनियाँ घरमे बोड़ि देलक। मुदा अनेरे अनकर गाछी देखने कि फेदा कियो तेतरिक बोन लगौने अछि तँ कियो बगुरक, केकरो गाछीमे तुइन फुलाइ छै तँ केकरोमे आम। अनेरे भरि दुनियाँ बौआइक कोन काज अछि। अपन धंधाक दुखक भागी ने छी आकि अनेरो हमर माए मरल तँ अहाँ बुझबो ने केलिऐ आ अहाँक माए मरत तेकर जिगेसा करब हमर दायित्व बनल। मन ठमकि गेलनि। जिनगीक दशा-दिशा देखि बुधनी ठकुआ गेली। जहिना धारक वेगमे कियो भॅसि जान गमबैत, तँ कियो गाछपर सँ खसि जान गमबैत, कियो घरमे लगल आगि मिझबैमे जान गमबैत तँ कियो ओछाइनपर पड़ल इछानिक गंध बीच जान गमबैत, तँ कियो कन्हापर घैलिक भार उठा फुलवारी पटबैत जान गमबैत तँ कि सभ एक्के भेल। एक नै भेनौं एक्के भेल? केना भेल? लत्ती जकाँ लतरल अछि सभ किछु समाजमे मुदा जहिना लत्तीक गिरहपर फूलो फुलाइ छै आ फड़ो फड़ै छै, जे ओइ लत्तीक फूल फल भेल। तहिना हर मनुष्यकेँ अपन-अपन जिनगीक समस्या ताधरि उठैत रहत जाधरि जिनगी जीबै छी। एहेन स्थितिमे कि हएत, ओ हएत जिनगीक हर समस्याकेँ अपन तालाक कुंजी बना खोली। रहल बात जे सभ जौं सएह करत तँ मनुखक समाज केना बनत। समाज बनैक अपन सूत्र अछि जइसँ बनैत अछि। ऐठाम प्रश्न व्यक्तिगत अछि, सभकेँ अपन-अपन बुधि-विवेक छन्हि, कि नीक कि अधलाक विचार तँ अपने करए पड़तनि। वएह भेला पछाति स्वतंत्र जिनगीक रस भेटैत अछि। बेटा राधामोहनपर नजरि गड़ा बुधनी देखए लगली। वेचाराकेँ गरदनिकट्टी करै छिऐ। अनका-अनका देखै छिऐ बड़का-बड़का शहर-बजारक स्कूलमे बेटाकेँ पढ़बैए आ...? मुदा हमरा सन लोककेँ संभव अछि। जइठामक शिक्षा गलत दिशा पकड़ि झकझोड़ि रहल अछि तइठाम कि कएल जाए, ई तँ नान्हिटा प्रश्न नै अछि। मुदा ओही वेचाराकेँ धन्यवाद दिऐ जे खेने-बिनु-खेने स्कूल नै छोड़ैए। बेटाक धर्म-कर्म देखि बुधनीक मन तड़पल। आब छौड़ा गोठ-गो भऽ गेल। भगवान एत्ते रच्छ रखलनि जे आब जे अपनो (पति) मरबो करता तँ एकटा खुट्टा देने जेता। मुदा जइ वेचाराकेँ बच्चेमे माए-बाप छोड़ि दैत, भगवान ओइ बच्चाकेँ केना ठाढ़ करै छथिन। सभ कि ठाढ़े भऽ जाइए। किछु ठाढ़ो होइए आ किछु नहियोँ होइए। आगू आब राधामोहनकेँ नै पढ़ा पएब। तखन तँ जौं अपने अपन पढ़ैक भार उठा लिअए तँ रोकबो नै करबै। यएह ने जे नै पढ़त तँ काजमे मददि करत, पढ़त तँ से नै हएत। नै हएत तँ नै हएत, जँए एते दुख कटै छी तँ किछु दिन आरो काटब। मेघक तरेगन जहिना अपन-अपन जगहसँ टक लगौने देखैत रहैए तहिना राधामोहन जिनगीक बाट दिस देखए चाहैत मुदा बेँतक बोन जकाँ तते-ओझरी लगल देखैत जे अन्हार छोड़ि इजोत भेटबे ने करै। मुदा मूल प्रश्न तँ मनमे उठिये जाय। तीन मास पछाति परीक्षा हएत, तेकर पछाति? कि आजुक जे शिक्षा-पद्धति बनि रहल अछि तइमे आगू बढ़ि पएब। स्कूल लगमे अछि, गामेपर सँ जाइ-अबै छी। मुदा घरसँ बाहर भऽ शहर-बजारक खर्च जुटा पएब। जौं से नै तँ मैट्रिक पासकेँ के पुछै छै, आँफिसो आ करखन्नोक चौकीदारी बी.ए, एम.ए. करै छै। काँच मन राधामोहनक पिघलए लगलै। बाप-माएक दशा देखि मन बेकाबू भऽ गेलै। तीन मास जइ आशा (परीक्षाक आशा) मे बैसल रहब से अनेरे। जते पढ़ने छी ततबेकेँ ने घोकैत रहब। किछु करक चाही। मुदा कतए करक चाही? शहर-बजार जा नोकरी करी आकि परिवारक संग गाममे किछु करी। जौं शहर-बजार जाएब तँ माता-पिताकेँ के देखिनिहार हएत। सभकेँ अपने अछि। तखन? तखन तँ दुइयेटा उपाइ अछि जे या तँ परिवारकेँ सुधारि माने परिवारक काजकेँ सुधारि कऽ चली आकि परिवारकेँ तोड़ि कऽ। विचारमे राधामोहनकेँ डुमल देखि बुधनी बजली- “बौआ, अखैन खुट्टा बनि ठाढ़ छिअह, तूँ चिन्ता किअए करै छह?” आशु-तोष दैत बुधनी राधामोहनकेँ कहलनि। मुदा मनमे अपन खुशी ई रहनि जे जौं पति मरिये जेताह तैयो एकटा खुट्टा तँ गारनहि जेता। मुदा मनमे ईहो उठैत जे किछु अछि तैयो पुरुख कहुना पुरुखे भेल, मौगी कहुना मौगिये भेल। मुदा तेसरो तँ होइते अछि जे पुरुखो मैगियाह होइए आ मौगियो पुरुखाह। हँ से तँ होइते अछि। माइयक बोल-भरोससँ राधामोहनक मनमे किछु आशा जरूर जगल मुदा जतेक जरूरति छल तते नै जगल। ठमकैत मनमे उठलै, गामेमे देखै छी जे पनरह-सोलह बर्खबला सभकेँ केरा-पौंच जकाँ पौंच निकलै निकलए लगै छै। तखन हमहीं कि जुआन नै भेलौं। मनुख बाँस थोड़े छी जे समाइये पाबि कोंपर देत। माए-बापक सेवा बेटा-बेटीक पुनीत कर्तव्य छी। पुनीते काज ने धर्म छी। पानिक टघार जकाँ राधामोहनक मनक विचार आगू मुहेँ ससरल। कि हमरे भरोसे दुनू गोटे बैसल रहता। तहूमे पिताक एहेन स्थिति छन्हि जे सालक कोन बात जे महीना-दिन गनि रहला अछि। परीक्षा देने एतबे ने हएत जे मैट्रिक पासक सर्टिफिकेट भेट जाएत। सर्टिफिकेट लऽ कऽ कि धोइ-धोइ चाटब। सर्टिफिकेटक जरूरति ओकरा होइ छै जे नोकरी करए चाहैत अछि। जिनगीक लेल तँ ज्ञान चाही। माने काजक लूरि। तत्-मत् करैत राधामोहनक मनमे उठल, परिवारमे जौं किछु करए चाहै छी तँ हुनको (माता-पिता) सबहक विचार सुनि लेब नीक हएत। जौं एहेन काज होइ जेकर जड़ि हुनका सबहक जिनगीमे रोपा गेल होइ, मुदा कोनो कारणवश ओ सूखि गेल होय। ई तँ नै जे बाधक एक-गच्छा जकाँ कोनो एहेन काज करए लगी जे जते हवा-विहारि, ठनका-पाथर आकि झाँट-पानि हेतै, सभटा ऊपरे खसत। ठमकिते मनमे उठलै जखने इच्छकेँ अनुभवसँ भेँट होइ छै तखन जे बाट भेटै छै ओ जिनगीमे बेसी नीक होइ छै। से नै तँ दुनू गोटेक बीच अपन विचार राखब। हुनका सबहक कि विचार होइ छन्हि सेहो तँ सोँझा आबिये जाएत। संगे माए-बाबूक मनमे सेहो हेतनि जे बेटा आज्ञाकारी अछि, एहनो दशामे बिना पुछने, आगू डेग नै बढ़बए चहैए।  अपनाकेँ पुछै जोगर जिनगी बना लेब,  सफलताक मुख्य सोपान छी। रावणक दरबारमे हनुमानक आसन नमहर (ऊँच) हेबाक कारण भरिसक सएह रहै। माता-पितासँ पुछि लेब राधामोहन जरूरी नै अनिवार्य बुझलक। अनिवार्यक कारणे छाप मनमे पड़ैत रहै। ओ ई जे किछु-ने-किछु जिनगीक सच्चाइ जरूर भेटत। मालीक श्रम सिर्फ ओतबे नै होइत जते गाछ फूल दैत। बल्कि ओहो होइत जे गाछ फुलाइसँ पहिने कोनो कारणे सूखि गेल होइ। प्रश्न उठैत जे कि ओइ गाछकेँ ठाढ़ करैमे बिआसँ गाछ बनबैमे ओकर श्रम नै लगलैक। श्रमक उचित श्रमिक श्रम केनिहारकेँ जखन भेटै छै तखन मनमे खुशीक अंकुर उठै छै अपन कर्मक फल भेटल। राधामोहनक मनमे एकटा नव प्रश्न उठि गेल। ओ ई जे दुनू गोटे (माता-पिता) सँ फुट-फुट विचार करब नीक हएत कि एकठाम। नीक-अधला जे हुअए मुदा एकटा तँ हेबे करत जे काजक गवाह एक गोटे हेबे करता। जाधरि काजक जानकारी दोसरकेँ नै रहत ताधरि काजक महतमे कमी-बेसी रहबे करत। गोसाँइ डूमि गेल, मुदा अन्हार नै भेल छल। बाहरक सभ काज सम्हारि बुधनी गठुलासँ जारन आनि चुल्हि लग रखली। रतुका भानस करैक ओरियानमे जुटैक सुर-सार करए लगली। तइ बीच दिनक काजक हिसाबपर मन गेलनि। कोन काज सभ छलै आ कोन-कोन भेल। ओसारेपर बैस हिसाब जोड़ैक विचार केलनि। नन्दलाल ओछाइनेपर सँ देखैत जे जखन भानसक ओरियान भैये रहल अछि तखन रातियो ठीके-ठाक रहत। भगवानकेँ मने-मन गोर लागि कहलखिन- “भगवान, जहिना राति अराम करैले बनेलौं मुदा जौं खाइक ओरियान भेल रहए, तखन ठीके बनेलौं। मुदा अहींसँ पुछै छी जे बिनु पाइक सरलाहियो वेश्या केकरो पुछे छै।” नीन तँ नीने छी, खाउ-पीबू निनियाँ देवीक पूजा करू। मुदा कि ओहो भुखाएल पेटकेँ पुछै आकि छोड़ि कऽ पड़ा जाइ छै। खएर जेतए जे होउ, मरितो-मरितो तँ सुख भोगाइये जाएत। अनुकूल समए देखि राधामोहन माए लग आबि पुछलक- “माए, किछु करैक मन होइए। घरक जे दशा देखि रहल छी, ओ निच्चाँ दिस ढड़कि रहल अछि। आइ करी-कि-काल्हि करी करए तँ हमरे पड़त। तइसँ नीक जे बँचल समैकेँ हथासँ नै जाए दी।” बेटाक बात सुनि जहिना बुधनीक मनमे आशाक बीआ खसल तहिना नन्दलालक मनमे। मुदा लगले नन्दलालक मन विसाइन हुअए लगलनि। ओह, वेचाराकेँ जखन पढ़ैक बेर एलै, भगवान हाथ-पएर तोड़ि घरमे बैसा देलनि। जौं अनके जकाँ हमहू पढ़ा सकितिऐ तँ कि राधामोहन बड़का लोक (डाॅक्टर-इंजीनियर) नै बनैत, कि ओ इटाक बड़का घर बना रहैक ओरियान नै करैत। एते तँ दोखी बेटा लग छीहे। मुदा से केना? जौं निरोग रहितौं तखन जे काजसँ देह चोरबितौं तखन ने, से तँ अपना नै मन अछि जे जानि कऽ कहियो काजसँ देह चोरौने हेबै। मुदा तैयो ओकरे दुनू माए-बेटाकेँ धन्यावाद दिऐ जे तीन सालसँ ओछाइन धेने छी आ सभ नेकरम करैए। भगवान अहीले ने परिवार दइ छथिन जे असगरे लोक अपन जिनगी जानवर जकाँ नै जीब सकैए। जौं से होइ आ असगरे कियो हुअए आ ओकर माए मरि जाइ तँ असगरे बेचारा कि करत। काज तँ तीन गोटेक छै। एक गोटे बजारसँ कफनक कपड़ा आनत, दोसर गोरे जरबैक ओरियान करत तँ तेसर गोटे कनबो करत किने। राधामोहनक प्रश्न सुनि नन्दलालो ओछाइनेपर उठि कऽ बैसैत बजला- “बौआ, आब कि तोहू कोनो नान्हिटा बच्चा थोड़े छह जे नै किछु कएल हेतह। तूँ तँ कहुना चफलगरो भऽ गेलह, जे चरि-चरि पँच-पँच बर्खक बेदरा सभ गाए-महिसक चरवाहि करैए। ओते पैघ जानवरक चरवाहि करैबला रहै छै। मैट्रिक पास करैमे तोरा कोनो भांगठ छह, मरियो जाएब तँ तोरा माइयेकेँ चावस्सी दी जे कहुना-कहुना परिवारकेँ ठाढ़ केने रहलह। आब तहूँ जुआन भेलह। नहियोँ कहुना तँ कतेको विषयक बात पढ़नहि हेबह। आइ एते संतोष अवस्से मनमे भेल अछि जे मरितो काल पुछै जोगर रहलौं आ बेटाकेँ अगिला जिनगीक बाट हम नै घेड़बै। बेटा धन छी, एतेटा दुनियाँमे जिनगी नै बिताओल हेतै।” नन्दलालक विचारसँ राधामोहनक मन फरीच नै भेल जे बाबू कि कहलनि। मुदा दोहरा कऽ पूछब, घेथारब हएत। एक तँ ओहन रोगसँ (दर्द) पीड़ित छथि तइपर बेसी बजविअनि से नीक नै। मुदा अपना जनैत प्रश्नक उत्तर तँ दैये देलनि। भलहिं बुझैमे नै आएल। बुझैमे नै आएल, ई कमजोरी केकर भेल? बजनिहारक आकि सुनिनिहारक। एते बात राधामोहनक मनमे अबिते नव-पुरानक बीचक दूरीपर नजरि गेल। नव केकरा कहबै आ पुरान केकरा कहबै वा पुरान कि भेल? देखै छी जे किशोरी बाबाक गाछी तीन-चारि पुस्त पहिलुका लगाओल छियनि। गाछीक आड़ापर जे शीशोक गाछ लगौलनि, माटि भलहिं ढहि कऽ सहीट किअए ने बनि गेल, मुदा एक-दोसराक गाछक दाम तीस-हजार, चालिस हजार होइ छै। से कि कोनो शीशोए टाक अछि आकि आमो गाछ सभ एहेन-एहेन अजोधो भऽ गेल अछि आ फड़बो एते करैए जे परिवारमे अपूछ बनौने रहैए। मुदा तैयो तँ एकटा प्रश्न उठबे करत जे तइ बीच (गाछीक जिनगी) कि गाछक डारि नै सुखलै आकि शीशोक पङिया नै भेलै। जरूर भेलै। अकासक चिड़ै सभ सेहो बाँझीक लस्सा लोलमे लगौने आबि-आबि डारिपर बैसी लोल रगड़ि लस्सा लगा बाँझियोक गाछ रोपिते रहल। आइयो ओ गाछी ओहिना लहलहाइत अछि, जहिना शुरुक जुआनीमे लहलहाइत छल। भलहिं गहुमन साँपक लहलही नै होइ पनिया दरादक तँ अछिये। मुदा ओकर भय कहाँ केकरो होइ छै, होइ छै गाम-घरक गहुमक। जे जमीन आम शीशोक कोन बात जे चन्दन सन वस्तु दैत रहल अछि, तेकरा छोड़ि जौं कियो मरूभूमिमे बसि खुशी मनबै छथि ओ भलहिं देहक मना लथि मनसँ नै मना सकै छथि। किशोरी बाबापर सँ राधामोहनक नजरि अपना परिवारपर उतरल। खेत सभ समुचित करै दुआरे परती भेल जाइए। परतियो कि कोनो एके रंगक अछि। कतौ उपजबैक शक्ति क्षीण अछि तँ कतौ शक्तिक अभाव बनाओल जाइए। बिनु पानियेक खेत केते दिन अपन सेवा दऽ सकत। रौद-जाड़सँ तपैत कहुना अपन अस्तित्व बना रखने अछि। मुदा मूल प्रश्न ऐठाम अछि जे जइ समैमे हम सभ जीब रहल छी, समयानुसार कृषि केना औद्योगिक कृषि बनत, मूल प्रश्न ई अछि। अंकुरक रूपमे राधामोहनक विचार जे जे पूजी अछि ओइमे पशुपालन करी। मुदा पशुओ तँ कते रंगक अछि। हाथियो अछि बकरियो अछि। हाथी तँ उत्पादित (दूध) छी वा नै, तहिना घोड़ो अछि। तँए दुनू सवारी बनि गेल। जइठाम पेटक समस्या अछि ओ थोड़े ऐसँ चलत? महिस भेल तँ ओ मरदा-मरदी भेल। अखनो गाम-घरमे तीन-तीन दिन लोक वौआ-वौआ  बाह (पाल) कराबैए। तइसँ नीक गाए। जे किछु थोड़-थाड़ विकास भेल ओइमे गाएक पाल सेहो समायानुकूल भेल अछि। ततबे नै जौं गाए-महिस पोसब तँ ओकर चाराक (भोजन) ओरियान सेहो करए पड़त। जे सबहक साधक बात नै अछि। जइ जोगर जिनका छन्हि ओ ओइ जोगर काज सम्हारि सकै छथि। तँए भीतरे-भीतर राधामोहन ऐ भाँजमे जे जौं घासक लूरि माएकेँ हएत तँ एते तँ उपकारे भेल। तइ बीच बुधनी आ नन्दलालक बीच कहा-कही हुअए लगल। खिसिया कऽ बुधनी पति नन्दलालकेँ कहि देलखिन- “बड़ बुधियार छलौं तँ ओ पंडावा केना रुपैइयो ठकि लेलक आ देहमे रोगो पैसा देकल?” बुधनीक बात नन्लालकेँ लगलनि नै। पत्निक गुरु स्वरूपा रुप सोँझा पड़लनि। तीन सालक कष्ट नन्दलालकेँ जिनगीक बहुत अनुभव करा देने छलनि। अनुभव ईहो करा देने छलनि जे अखन उमेरे कि भेल। लोक सए-सए बर्ख जीबैए हम अधोसँ कमेमे जा रहल छी। जइ स्त्री आ बेटाक सेवा हम करितिऐ से दिन-राति हमरे पाछू हरान रहैए। जे हमरा पाछू हरान रहत ओ अपना ले कि करत आकि सोचत। सबहक जिनगी हम तोड़ि देने छिऐ। जइ चलैत परिवारक गाड़ी पाछू मुहेँ ढरकि रहल अछि। अपन हारि कबूल करैत नन्दलाल पत्नीकेँ कहलखिन- “राधामोहनक माए, अहाँ ठीके कहलौं जे पंडावा ठकि लेलक। दोख तँ हमरे भेल। पुरुख भऽ कऽ घरक खुट्टा तँ हमहीं भेलिऐ। मुदा एहेन ठकेनिहार हमहीं टा छी आकि आरो लोक छै। परिवारमे एते गल्ती जरूर भेल अछि मुदा...।” पिता मुँहक इमानदारीक बोल राधामोहनक हृदैकेँ हिलोरि देलक। बच्चा मन सूप जकाँ फटकि तँ नै पेलक मुदा हिलोरमे सबहक (नीक-अधलाक) सीमा जरूर बना देलक। बाजल- “माए, हम तँ स्कूले धेने छी, बाबू बेमारे छथि, तइ बीच तूँ कते दिन बगियाक बग्गी बना दौगा पेमे।” बेटाक बात सुनि बुधनी लजवीजी जकाँ आँखि मूनि वह्वल होइत बजली- “बौआ, कोनो कि लिखए-पढ़ए अबैए जे लिखि-लिखि रखितौं। मुदा एते मन जरूर गवाही दइए जे जे बनि पौलक से करैत रहलौ। नीक-अधला तँ उपरबलाक छी।” माइक विचारकेँ पकड़ि राधामोहन लत्ती जकाँ ऊपर मुहेँ उठए चहैत मुदा एहेन कोनो-गीट्ठह कि अखुँए ने पकड़ि पबैत जइठाम सँ सोंगर पकड़ैत। नजरि उठा देखैत तँ समुद्र जकाँ झलकैत सभ किछु देखैत मुदा नहेबाक गर कतौ भेटबे ने करैत। गुरुक आगू जहिना शिष्य सिर-सिरा जानैक प्रश्न पुछैत तहिना राधामोहन पुछलखिन- “माए, किछुओ तँ फरिछा कऽ कह?” राधामोहनक प्रश्नक कारक अपन रहै मुदा बुधनी अपना कारके बूझि बाजलि- “बौआ अनकर घर-दुआर छी जे बाजब, अपन छी, अपन केलौं, तइले तोरा सभकेँ उपराग देब नीक हएत? अपन पति, बेटा, समाज, देश-दुनियाँ सभ किछु तँ अपने छी तखन कि कियो ऐसँ अलग भऽ करैए जे दोसराकेँ कहत। जइ करैले धरतीपर एलौं, जहाँ धरि सक लागल तहाँ धरि करै छी। नीक-अधला देखिनिहार कियो आरो छथि, तखन कि करबह।” माइक बात सुनि राधामोहनक मनमे उठल, ओह गड़बड़ भऽ गेल। तेहेन लार-झाड़मे पड़ि गेलौं जे अपन बाटे बटिया गेल। भरियो दिन जौं बाट तकैत रहब तैयो ऐ डगरमे थोड़े डगहरि सकब। से नै तँ ठिकिया कऽ वएह प्रश्न राखी जइठाम बौआइतो बटोही किछु-ने-किछु कालक लेल अँटकैत अछि। बाजल- “माए, अखन दुनू गोटे -बाबूओ आ अहूँ- विर्तमान छी, तँए एहेन रास्ता देखा दिअ जइ पकड़ि हमहूँ ताधरि चलैत रहब जाधरि ओइसँ नीक आ सक्कत रस्ता नै भेट जाएत। आँखिक सोझमे यज्ञक संकल्प सबहक माए-बापक इच्छा रहैत तँए...?” राधामोहनक प्रश्न जहिना पिता-नन्दलाल-केँ तहिना माए-बुधनी-केँ आरो भँसिया देलकनि। नन्दलालक मनमे उठैत जे जौं बेटा उठि जिनगी उठबए चहैए, तइमे हम कहाँ छुटि जाइ छी, जे बापक सेवा नै करत, किछु करैक मन होइ छै, किछु माने की? सभ किछु आकि किछु नै। मुदा किछु विचार जौं बेटाकेँ नै देव, सेहो हीक लगले मरब। मनक बात कहि दइ छिऐ। बाजल- “बौआ, दुनियाँमे कियो ने अपना ले करैए आ ने अनका ले, हथियार बनि धरतीपर आएल अछि, ओकर उपयोग कते के केलक ओकरे लेखा-जोखा धर्मराजक घर होइ छै। कियो धर्मराजक घर बास करैए कियो यमराजक। बेटा बनि धरतीपर जनम लेलह तँए केना कहबह मरदक बेटा मुदा एते तँ कहबे करबह जे मरद बनि मरदक बेटा कहबैत रही।” पिताक बात राधामोहनक मनकेँ ओहेन बना देलक जेहेन बकरीक काँच दूधमे साहोरक दूध देला पछाति लगले दही बनि जाइत। मने-मन राधामोहन चौकन्ना होइत चारू दिस तकए लगल। गुमा-गुमी देखि बुधनी अगुताइत बाजलि- “बौआ, भानसक अबेर भऽ जाएत। तहूमे पथ-पानिक ओरियान तँ अपना सभसँ फुट करए पड़ैए। केना बापकेँ पटुआ-झोर पथमे दिअनि। तखन तोड़े बड़ जिद लगल छह तँ माए भऽ कऽ कि कहबह। यएह ने हाथ-पएर भगवान दुरुस देने रहथुन जे दनदनाइत आगू मुहेँ दौगैत जेबह।” कहि झपटल उठि भानस करए चुल्हि दिस बढ़ली। ३ रातिक पौने नअ बजैत। गामक शिवालयोक आ ठकुरवाड़ियोक साँझुक शंख आ डमड़ूओ बाजि गेल। जारन नीक रहने बुधनीक भानसो आन दिनसँ किछु पहिने भऽ गेलनि। मुदा तँए कि गामक देवालयक धूप-आरतीसँ पहिने लोक खाए केना लैत? आ जौं खाइये लेत तँ कि भऽ जाएत। ऐ विचारमे चुल्हिये लग बैस खोरनाक जराएल मुँह दिससँ चुल्हिये आगू लिखए लगली। लिखल-पढ़ल तँ बुधनीकेँ नै होइत मुदा सभ दिनक आरतीक स्तुति सुनि पढ़ै-गुणैक लूरि तँ भइये गेल छलनि। कियो अपन अक्षर चित्रे खिंच बनाओत तइसँ अनका की। तइ बीच ठकुरवाड़ीक स्तुति शुरु भेल- “भये प्रगट किरपाला दीन दयाला...।” ओना बुधनी सभ दिन स्तुति सुनैत, मुदा खोरना हाथमे रहने चुल्हिये आगू लिखौ लगली। स्तुति कतौ बतिआइत, बुधनीक कान कतौ सुनैत आ हाथक खोरनी कतौ चलैत। एक बाट नै रहितो धारक धारा जकाँ अपना-अपनीकेँ सभ दौगैत। स्तुति समाप्त होइते जना बिजलीबला इंजन बिजली लाइन कटने जे जतए गेल रहल ओ ओतै रुकि जाइत तहिना बुधनीक भेल। दुनू हाथो-कानो अपने रुकि गेल। रुकिते मन औनाए लगलनि। मुदा आगूमे भानसक बर्तनआ खाइक समए तँए मन परिवारे दिस समटा कऽ घेरा गेलनि। मन पउ़लनि राधामोहनक प्रश्न। ओह, बेचाराकेँ कहाँ किछु उत्तर देलिऐ। कहुना तँ माए-बाप अखन हमहीं ने छिऐ, सोझे असिरवाद देने थोड़े होइ छै आ असीरवादी सेहो दिअए पड़ै छै। अपसोच करैत मन ठमकलनि। ठमकिते उठलनि जे नै किछु विलगा कऽ कहलिऐ तँ मनाहियोँ तँ नहियेँ किछु केलिऐ। एतबे कालमे भूमकमो तँ नहियेँ भऽ गेल जे उनटन भऽ गेल। कि भेलै, खाइये काल बौआकेँ बुझ-बुझ कहबै। नअ बजिते बुधनी पतिकेँ भोजन करौलनि। पछाति बुधनी अपनो आ राधामोहनो खाइले बैसल। मुँहक अन्न मुहेँमे बुधनीकेँ घुरिआइते रहनि कि मनमे अपन जिनगी मन पड़लनि। कतए जनम भेल, माए-बाप ऐठाम कते दिन रहलौं, पछाति दुनू गोरे नव लोककेँ पति बना हाथ पकड़ा देलनि। पतिक संग जिनगी भरिक शर्त्त छल, से भगवान कलछप्पन केलनि। जे अखन देखैबला छलाह तिनके तेना कऽ मचोड़ि देलकनि जे देखनिहारकेँ स्वयं देखिनिहारक आशा भऽ गेलनि। मुदा तँए कि दाम्पत्य जीवन नै रहल। माइयो-बाप आ साउसो-ससुरक इच्छा तँ पुराइये देलियनि। आब कि राधामोहन बच्चा अछि। ओ कि घरक मोटरी उठा नै चलि सकैए। जहिना पतिक आशा तहिना ने बेटोक। बाजलि- “बौआ, तखन केना पुरुखक सोझ अपन विचार कहितिअ। कहुना भेला तँ स्वामिये भेला किने। जाबे आँखि तकै छथि ताबे आँखि उठाएब नीक हएत। तँए तखन किछु ने कहलिअह।” जिज्ञासा भरल माइक बात सुनि राधामोहन चित्त असथिर करैत बाजल- “कोन बात माए, बिसरि गेलौं।” मुँह-कान चमका जहिना माए बच्चाकेँ चमकब सिखबैत अछि तहिना बुधनी मुँह चमकबैत बाजलि- “तोहूँ बाले-बोध जकाँ बुधिबिसरू छह। आब धीगर-पुतगर होइमे बाँकी छह।” बिनु नाविकक नाव जहिना झीलमे हवा संग अपने झिलहोरि खेलाइत तहिना बुधनीक मन सेहो खेलए लगलनि। विस्मित होइत माएकेँ देखि राधामोहन बाजल- “माए, तते ने कहै छेँ जे एकोटा मन रहत। सभटा बिसरैयेबला कहै छेँ। कोन बात तखुनका कहए लगलेँ से ने कह?” राधामोहनक प्रश्न सुनि बुधनी बाजलि- “बौआ, तखन जे कहने छेलह जे किछु करैक मन होइए। से करैसँ मनाही करबह। बड़ करबह तँ अपन कएल सुना देबह।” माइक बातमे राधामोहनकेँ आशाक अंकुरक संभावना बूझि पड़ल। पियासल बटोही जकाँ माइक अागू राधामोहन चुपचाप भऽ गेल। बुधनी बाजलि- “बौआ, जुग-जमाना तेहेन आबि गेल जे...?” कहि बुधनी चुप भऽ गेली। माइक बात सुनिते राधामोहनक मनमे उठल जे फेर दोसर बात भरिसक मन पड़ि गेलनि। ओना नै हएत, अपन कएल काजक बड़ाइ सभकेँ नीक लगै छै, तँए प्रश्नकेँ सोझरा कऽ राखब नीक हएत। बाजल- “माए, एहेन कोनो काज कह जे खुशी मनसँ कएल हौ?” राधामोहनक प्रश्न सुनि बुधनी ठकुएली। ठोर पटपटेली- “केकरा खुशीक कहब आ केकरा नै कहब। एके काज केकरो लिए खुशीक होइत केकरो लिए नाखुशीक होइत। भानस करेक लूरि माए सिखौलक केना अधला भेल। मुदा ओकर जरुरति तँ बेटीकेँ होइ छै, राधामोहन तँ बेटा छी। भाए-बाबू गाए पोसै छलाह। गिरहत तँ नमहर नहियेँ छला मुदा सूर्यवंशी दिलीपक बाट जरूर पकड़ने छला। गाए तँ देशिये पोसै छलाह मुदा जेहने गाएक रंग-रूप तेहने दूधो छलैक। बजैत-बजैत जेना भक खुजलनि। मुँह खोलि बजली॒ “बौआ, तहू जमानामे बाबूक खुट्टापर तेहन-तेहने गाए रहै छलनि, जेहने-जेहने अखनो छन्हि।” कहि बुधनी चुप भऽ गेली। जेना किछु मन पड़लनि। मुदा तुक नै बैसिने ठमकि गेली। बुधनीकेँ चुप देखि राधामोहन बाजल- “माए, गाएकेँ की सभ करै छेलही?” अपन काजक चर्च सुनि बुधनीक वृत्ति चित्त जगलनि। जहिना कोठीक निच्चाँ मुहे खुजिते अन भुभुआए लगै छै तहिना बुधनीक जिनगीक मुँह खुजिते भुभुएली- “बौआ, माए-बापक घर बड़ सुख केलिऐ, जेतबो उमेर धरि सुख केलिऐ तेतबो तोरा कहाँ देल भेल। तखन तँ अनेर गाइक धरम रखबार। माइये-बापक धर्मे अखनो ठाढ़ छी।” बुधनीकेँ फेर धारमे भँसिआइत देखि राधामोहन जालक जौड़ फेक बाजल- “माए, सएह ने पुछै छिऔ जे माए-बाप कोन धरम देलखुन जे अखनो ठाढ़ छेँ?” अपनाकेँ हिलोरैत बुधनी बजली- “बौआ, बिआह होइसँ पहिने माइयक संग भानसो-भात सिखलौं, खेतियो-पथारीक काज सिखबो केलौं आ करबो करै छलौं। माल-जालक घास-भूसा सेहो करै छलौं। ऐठाम तँ ओ काजे बिसरि गेलौं।” राधामोहन- “ऐठाम (नैहर-सँ-सासुर) कि सभ सीखलीही?” राधामोहनक प्रश्न सुनि बुधनी लजाए लगली। मनमे उठए लगलनि जे केना बेटकेँ कहब जे बौआ स्त्रीगणो भऽ कऽ कोदारि पाड़ब, धान रोपब एतइ सीखलौं। कि कहत? ओना, करैत तँ देखबे करैए मुदा नैहरसँ सासुरकेँ केना दुसि देब। कहुना भेल तँ (नैहर) पराये घर भेल किने। माएकेँ तत्-मत् करैत देखि राधामोहन पुछलक- “माए, गाइयक की सभ करै छेलँह?” बुधनी- “माइयक संगे घासो अनै छेलिऐ, कुट्टियो कटै छेलिऐ। गोबर-हटौनाइ, थइर खड़रनाइ, खेनाइ-पीनाइ देनाइ सभ करै छेलिऐ।” राधामोहन- “गाएकेँ दुहबो करै छेलही।” दुहब सुनि बुधनी चमकि बाजलि- “से कि भाए-बाप नै छलए जे दुहितौ। कतए-कहाँ सुनै छी जे पंजाबमे मौगियो गाए दुहैए।” राधामोहन- “जखन गाए पोसैक लूरि तोरा छौ, तखन खुट्टापर गाए कहियो कहाँ देखलिऔ। नाना-नानी नइ देने छेलखुन?” राधामोहनक प्रश्न सुनि बुधनीक मन नाचि उठल। आइ जौं खुट्टापर गाए रहैत तँ यएह दिन-दुनियाँ रहैत। भगवानकेँ मन्जूर नै भेलनि। जेहो छल सेहो हेरि लेलनि। बाजलि- “बौआ, बिआहमे तेहेन गाए बाप-माए देलक जे ओकरा जरहकेँ सम्हारि नै पबितौं, मुदा दैवक डाँग लागि गेल।” राधामोहन- “कि दैवक डाँग लगलौ?” बुधनी- “पहिलोठ गाए, बच्छा तरे बाबू देने रहथि। जाबे लगैत रहल दूध-दही परिवारमे चलैत रहल, मुदा दोसर बेर जखन गाए उठल तखन तेहेन खुनियाँ साँढ़क भाँजमे पड़ि गेल जे गाइयक टाँगे टुटि गेल।” राधामोहन- “जखन टाँग टुटि गेलौ तँ ओकरा डाॅक्टरसँ नै देखौलही?” बुधनी- बौआ, लोक सभ कहलक जे बलियारिमे एकटा लत्ती होइ छै, उ आनि कऽ बान्हि दिऔ। छुटि जेतइ। सएह केलौं मुदा नै सम्हरल गाए। खुटे उसरि गेल।” राधामोहन- “माए, मन होइए जे गाइये पोसितौं?” विस्मित होइत बुधनी- “बौआ, अपना परिवारमे गाए कहाँ धाड़ैए।” राधामोहन- “माए, फेर दोहरा कऽ गाए नै भेलौ?” धड़फड़ा कऽ बुधनी बाजलि- “बौआ, जइ काजमे खौटक लगि गेल से केना करितौं?” धड़फड़ा कऽ बाजि तँ गेली, मुदा मनमे उठलनि जे दोहरा कऽ करबो तँ नै केलौं। करबो केना करितौं? सोझा-सोझी दुनू तरहक विचार मनमे दुनू दिससँ ठाढ़ भऽ गेलनि। बीचमे ठाढ़ बुधनी छटपटाए लगली। बुधनीक छटपटाइत नजरि देखि राधामोहन प्रश्नकेँ मोड़ैत बाजल- “एके बेर एहेन विचार किअए भेलौ जे खटुका लगि गेल तँ दोहरा कऽ नै पोसब। बेटा प्रश्नक निरुत्तर होइत बुधनी बाजलि- “से कि अपने दुनू परानीक विचार भेल आ कि...?” राधामोहन- “की, आ कि?” बुधनी- “बौआ, अपना तँ देखल रहए जे नैहर अही परसादे गाममे ओहन परिवारक रूपमे अछि जे अपन परिवारक गाड़ी (भोजन, वस्त्र, आवासक संग दवाइयो-दारू आ पढ़ाइयो-लिखाइ) दनदनाइत चलैए। मौका-कुमौका दोसरोकेँ उपकार होइ छै। मुदा...। मुइलाक पछातियो नै उतरल अपना चित्तसँ। मुदा अपने (पति) मुँहमारि लेलनि। एक्केठाम मनमे रोपि लेलथि जे आब नहियेँ पोसब।” राधामोहन- “बाबू मुँह मोड़ि लेलखुन तँ दोसर-तेसर लगबा कऽ किअए ने कहबौलहुन?” जहिना पँकाएल धारमे टपैकाल कतौ-कतौ हराएल चिक्कनि माटि भेट जाइत जइसँ किछु बिलमैक आश जगैत तहिना जोरसँ ठेलैत बुधनी बजली- “बौआ, एक मुँहकेँ के कहए जे साइयो मुँह रोकि देलक।” माइयक स्पष्ट विचार राधामोहन नै बूझि सकल। मनमे हौंरए लगलै जे ओ सए मुँह कतएसँ आबि गेल। बाजल- “ई नै बुझलिऐ जे सए मुँह...।” जहिना थकान भेला पछाति नाकक संग मुहोँसँ साँस लेला उत्तर लगले थकान हटि जाइत तहिना बुधनियोँकेँ भेलनि। राधामोहनक प्रश्न समाप्तो ने भेल छलनि तइ बिच्चेमे टप-टप बुधनीक मन चुबए लगलनि- “बौआ, एक तँ अप्पन (पतिक) विचार रहबे करनि तइपर एकोरत्ती सह पाबि जाथि तँ आरो मन सकता जाइन। जखने मन सकताइन आकि झिझकि कऽ कहैत छलाह जे आब गाए नै पोसब।” राधामोहन- “केकर सह पबैत छलाह?” बुधनी- “अड़ोसिया-पड़ोसियाकेँ के कहए जे समाजोक लोक कहनि जे तोरा खुट्टापर गाए नै धाड़ै छह, अनेरे कोन फेड़मे पड़ए चाहै छह।।” राधामोहन- “जेकरा खुट्टापर गाए छलै तेकरासँ नै पुछैत छेलखिन। किएक तँ हुनका एहेन तीत-मीठ घटनासँ भेँटो तँ भेले हेतनि।” बुधनी- “से कि संगे जाइ छलौं जे देखितिऐ। हँ एक दिनक सोझहाक बात कहै छिअ। एकटा पंडा आएल। ओकरा जेना कियो कहि देने होइ तहिना दरबज्जापर अबिते अपने फुड़ने बजए लगल जे ऐ डीहपर ग्रहक चढ़ाइ भऽ गेल अछि। सम्पतिक क्षय हएत। सम्पत्तिक क्षय सुनि आँखि ढबढ़बा गेल। केना जीब। जखन पेटे ने भरत तँ भुखले केत्ते दिन जीब। केना बाल-बच्चा हएत आ केना पतिपाल हएत? अपने तँ ढबकल आँखिक नोरकेँ, ब्लौटिन पेपरसँ सोखबो करैत रही मुदा हुनका (पति) नै सम्हार रहलनि। दहो-बहो नोर गालपर देने टघरि-टघरि निच्चाँ खसए लगलनि...।” बजैत-बजैत बुधनीक आँखि सेहो नोरा गेलनि। बोली भरभराइत देखि खखासए लगली। राधामोहनक आँखिमे सेहो नोर आबि गेल। मुदा आँखिक अश्रुकण रहितो सुषुमाएल छल। जहिना दर्दक निवारण सुषुम पानि करैए तहिना परिवारक दर्दक निवारण राधामोहनक मनमे जगलनि। मने-मन राधामोहनकेँ संकल्प उठलै जे जीवनोपयोगी कोनो काजक जौं सर्वांगीन लूरि भऽ जाए तँ ओही काजक सम्पादन परिवारक अंग बनैत छै तँए...? राधामोहनकेँ चुप देखि बुधनी आँचरसँ आँखि पोछि बाजलि- “बौआ, गाइयक संग पगहो गेल। पंडावा ठकिये कऽ लऽ गेल।” बुधनीक टुटैत मन देखि राधामोहन बाजल- “गामक लोक सभकेँ किअए ने खुट्टापर गाए छन्हि?” अपनाकेँ पुछै जोकर पाबि बुधनीक मनमे खुशी आएल। जहिना हरिमुनियाँक पुरने पटरी चैताबरक टाँहि दैत तहिना बुधनी टाँहि देलनि- “बौआ, बड़-बड़ लीला छै। कते कहबह। एक-बेर की नै कि सरकारकेँ फुड़लै, गामे-गाम बड़का जरसी साँढ़ देलकै। सेहेन्ते लोक पाल खुआबए लगल, किछु तँ जरूर सुतरलै मुदा बेसी गाइयक डाँड़े-टाँग टुटलै। जइसँ उपटनियाँ लागि गेल।” बातक रस पबैत राधामोहन बाजल- “की कहलिही बड़-बड़ लीला...?” बुधनी- “सरधुआ साँढ़ तेहेन भऽ गेल जे गाए सभ बकड़ी भऽ गेल। गरीब पोसिनदारकेँ तेहेन गरदनिकट्टी भेल जे पोसनाइये छोड़ि देलक।” ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। बच्चा लोकनि द्वारा स्मरणीय श्लोक १.प्रातः काल ब्रह्ममुहूर्त्त (सूर्योदयक एक घंटा पहिने) सर्वप्रथम अपन दुनू हाथ देखबाक चाही, आ’ ई श्लोक बजबाक चाही। कराग्रे वसते लक्ष्मीः करमध्ये सरस्वती। करमूले स्थितो ब्रह्मा प्रभाते करदर्शनम्॥ करक आगाँ लक्ष्मी बसैत छथि, करक मध्यमे सरस्वती, करक मूलमे ब्रह्मा स्थित छथि। भोरमे ताहि द्वारे करक दर्शन करबाक थीक। २.संध्या काल दीप लेसबाक काल- दीपमूले स्थितो ब्रह्मा दीपमध्ये जनार्दनः। दीपाग्रे शङ्करः प्रोक्त्तः सन्ध्याज्योतिर्नमोऽस्तुते॥ दीपक मूल भागमे ब्रह्मा, दीपक मध्यभागमे जनार्दन (विष्णु) आऽ दीपक अग्र भागमे शङ्कर स्थित छथि। हे संध्याज्योति! अहाँकेँ नमस्कार। ३.सुतबाक काल- रामं स्कन्दं हनूमन्तं वैनतेयं वृकोदरम्। शयने यः स्मरेन्नित्यं दुःस्वप्नस्तस्य नश्यति॥ जे सभ दिन सुतबासँ पहिने राम, कुमारस्वामी, हनूमान्, गरुड़ आऽ भीमक स्मरण करैत छथि, हुनकर दुःस्वप्न नष्ट भऽ जाइत छन्हि। ४. नहेबाक समय- गङ्गे च यमुने चैव गोदावरि सरस्वति। नर्मदे सिन्धु कावेरि जलेऽस्मिन् सन्निधिं कुरू॥ हे गंगा, यमुना, गोदावरी, सरस्वती, नर्मदा, सिन्धु आऽ कावेरी  धार। एहि जलमे अपन सान्निध्य दिअ। ५.उत्तरं यत्समुद्रस्य हिमाद्रेश्चैव दक्षिणम्। वर्षं तत् भारतं नाम भारती यत्र सन्ततिः॥ समुद्रक उत्तरमे आऽ हिमालयक दक्षिणमे भारत अछि आऽ ओतुका सन्तति भारती कहबैत छथि। ६.अहल्या द्रौपदी सीता तारा मण्डोदरी तथा। पञ्चकं ना स्मरेन्नित्यं महापातकनाशकम्॥ जे सभ दिन अहल्या, द्रौपदी, सीता, तारा आऽ मण्दोदरी, एहि पाँच साध्वी-स्त्रीक स्मरण करैत छथि, हुनकर सभ पाप नष्ट भऽ जाइत छन्हि। ७.अश्वत्थामा बलिर्व्यासो हनूमांश्च विभीषणः। कृपः परशुरामश्च सप्तैते चिरञ्जीविनः॥ अश्वत्थामा, बलि, व्यास, हनूमान्, विभीषण, कृपाचार्य आऽ परशुराम- ई सात टा चिरञ्जीवी कहबैत छथि। ८.साते भवतु सुप्रीता देवी शिखर वासिनी उग्रेन तपसा लब्धो यया पशुपतिः पतिः। सिद्धिः साध्ये सतामस्तु प्रसादान्तस्य धूर्जटेः जाह्नवीफेनलेखेव यन्यूधि शशिनः कला॥ ९. बालोऽहं जगदानन्द न मे बाला सरस्वती। अपूर्णे पंचमे वर्षे वर्णयामि जगत्त्रयम् ॥ १०. दूर्वाक्षत मंत्र(शुक्ल यजुर्वेद अध्याय २२, मंत्र २२) आ ब्रह्मन्नित्यस्य प्रजापतिर्ॠषिः। लिंभोक्त्ता देवताः। स्वराडुत्कृतिश्छन्दः। षड्जः स्वरः॥ आ ब्रह्म॑न् ब्राह्म॒णो ब्र॑ह्मवर्च॒सी जा॑यता॒मा रा॒ष्ट्रे रा॑ज॒न्यः शुरे॑ऽइषव्यो॒ऽतिव्या॒धी म॑हार॒थो जा॑यतां॒ दोग्ध्रीं धे॒नुर्वोढा॑न॒ड्वाना॒शुः सप्तिः॒ पुर॑न्धि॒र्योवा॑ जि॒ष्णू र॑थे॒ष्ठाः स॒भेयो॒ युवास्य यज॑मानस्य वी॒रो जा॒यतां निका॒मे-नि॑कामे नः प॒र्जन्यों वर्षतु॒ फल॑वत्यो न॒ऽओष॑धयः पच्यन्तां योगेक्ष॒मो नः॑ कल्पताम्॥२२॥ मन्त्रार्थाः सिद्धयः सन्तु पूर्णाः सन्तु मनोरथाः। शत्रूणां बुद्धिनाशोऽस्तु मित्राणामुदयस्तव। ॐ दीर्घायुर्भव। ॐ सौभाग्यवती भव। हे भगवान्। अपन देशमे सुयोग्य आ’ सर्वज्ञ विद्यार्थी उत्पन्न होथि, आ’ शुत्रुकेँ नाश कएनिहार सैनिक उत्पन्न होथि। अपन देशक गाय खूब दूध दय बाली, बरद भार वहन करएमे सक्षम होथि आ’ घोड़ा त्वरित रूपेँ दौगय बला होए। स्त्रीगण नगरक नेतृत्व करबामे सक्षम होथि आ’ युवक सभामे ओजपूर्ण भाषण देबयबला आ’ नेतृत्व देबामे सक्षम होथि। अपन देशमे जखन आवश्यक होय वर्षा होए आ’ औषधिक-बूटी सर्वदा परिपक्व होइत रहए। एवं क्रमे सभ तरहेँ हमरा सभक कल्याण होए। शत्रुक बुद्धिक नाश होए आ’ मित्रक उदय होए॥ मनुष्यकें कोन वस्तुक इच्छा करबाक चाही तकर वर्णन एहि मंत्रमे कएल गेल अछि। एहिमे वाचकलुप्तोपमालड़्कार अछि। अन्वय- ब्रह्म॑न् - विद्या आदि गुणसँ परिपूर्ण ब्रह्म रा॒ष्ट्रे - देशमे ब्र॑ह्मवर्च॒सी-ब्रह्म विद्याक तेजसँ युक्त्त आ जा॑यतां॒- उत्पन्न होए रा॑ज॒न्यः-राजा शुरे॑ऽ–बिना डर बला इषव्यो॒- बाण चलेबामे निपुण ऽतिव्या॒धी-शत्रुकेँ तारण दय बला म॑हार॒थो-पैघ रथ बला वीर दोग्ध्रीं-कामना(दूध पूर्ण करए बाली) धे॒नुर्वोढा॑न॒ड्वाना॒शुः धे॒नु-गौ वा वाणी र्वोढा॑न॒ड्वा- पैघ बरद ना॒शुः-आशुः-त्वरित सप्तिः॒-घोड़ा पुर॑न्धि॒र्योवा॑- पुर॑न्धि॒- व्यवहारकेँ धारण करए बाली र्योवा॑-स्त्री जि॒ष्णू-शत्रुकेँ जीतए बला र॑थे॒ष्ठाः-रथ पर स्थिर स॒भेयो॒-उत्तम सभामे युवास्य-युवा जेहन यज॑मानस्य-राजाक राज्यमे वी॒रो-शत्रुकेँ पराजित करएबला निका॒मे-नि॑कामे-निश्चययुक्त्त कार्यमे नः-हमर सभक प॒र्जन्यों-मेघ वर्षतु॒-वर्षा होए फल॑वत्यो-उत्तम फल बला ओष॑धयः-औषधिः पच्यन्तां- पाकए योगेक्ष॒मो-अलभ्य लभ्य करेबाक हेतु कएल गेल योगक रक्षा नः॑-हमरा सभक हेतु कल्पताम्-समर्थ होए ग्रिफिथक अनुवाद- हे ब्रह्मण, हमर राज्यमे ब्राह्मण नीक धार्मिक विद्या बला, राजन्य-वीर,तीरंदाज, दूध दए बाली गाय, दौगय बला जन्तु, उद्यमी नारी होथि। पार्जन्य आवश्यकता पड़ला पर वर्षा देथि, फल देय बला गाछ पाकए, हम सभ संपत्ति अर्जित/संरक्षित करी। 8.VIDEHA FOR NON RESIDENTS 8.1 to 8.3 MAITHILI LITERATURE IN ENGLISH 8.1.1.The Comet   -GAJENDRA THAKUR translated by Jyoti Jha chaudhary 8.1.2.The_Science_of_Words- GAJENDRA THAKUR translated by the author himself 8.1.3.On_the_dice-board_of_the_millennium- GAJENDRA THAKUR translated by Jyoti Jha chaudhary 8.1.4.NAAGPHANS (IN ENGLISH)- SHEFALIKA VERMA translated by Dr. Rajiv Kumar Verma and Dr. Jaya Verma Send your comments to ggajendra@videha.com विदेह नूतन अंक भाषापाक रचना-लेखन इंग्लिश-मैथिली-कोष / मैथिली-इंग्लिश-कोष  प्रोजेक्टकेँ आगू बढ़ाऊ, अपन सुझाव आ योगदान ई-मेल द्वारा ggajendra@videha.com पर पठाऊ। Top of Form १.भारत आ नेपालक मैथिली भाषा-वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक शैली आ २.मैथिलीमे भाषा सम्पादन पाठ्यक्रम १.नेपाल आ भारतक मैथिली भाषा-वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक शैली

१.१. नेपालक मैथिली भाषा वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक  उच्चारण आ लेखन शैली (भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक धारणाकेँ पूर्ण रूपसँ सङ्ग लऽ निर्धारित) मैथिलीमे उच्चारण तथा लेखन १.पञ्चमाक्षर आ अनुस्वार: पञ्चमाक्षरान्तर्गत ङ, ञ, ण, न एवं म अबैत अछि। संस्कृत भाषाक अनुसार शब्दक अन्तमे जाहि वर्गक अक्षर रहैत अछि ओही वर्गक पञ्चमाक्षर अबैत अछि। जेना- अङ्क (क वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ङ् आएल अछि।) पञ्च (च वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ञ् आएल अछि।) खण्ड (ट वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ण् आएल अछि।) सन्धि (त वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे न् आएल अछि।) खम्भ (प वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे म् आएल अछि।) उपर्युक्त बात मैथिलीमे कम देखल जाइत अछि। पञ्चमाक्षरक बदलामे अधिकांश जगहपर अनुस्वारक प्रयोग देखल जाइछ। जेना- अंक, पंच, खंड, संधि, खंभ आदि। व्याकरणविद पण्डित गोविन्द झाक कहब छनि जे कवर्ग, चवर्ग आ टवर्गसँ पूर्व अनुस्वार लिखल जाए तथा तवर्ग आ पवर्गसँ पूर्व पञ्चमाक्षरे लिखल जाए। जेना- अंक, चंचल, अंडा, अन्त तथा कम्पन। मुदा हिन्दीक निकट रहल आधुनिक लेखक एहि बातकेँ नहि मानैत छथि। ओ लोकनि अन्त आ कम्पनक जगहपर सेहो अंत आ कंपन लिखैत देखल जाइत छथि। नवीन पद्धति किछु सुविधाजनक अवश्य छैक। किएक तँ एहिमे समय आ स्थानक बचत होइत छैक। मुदा कतोक बेर हस्तलेखन वा मुद्रणमे अनुस्वारक छोट सन बिन्दु स्पष्ट नहि भेलासँ अर्थक अनर्थ होइत सेहो देखल जाइत अछि। अनुस्वारक प्रयोगमे उच्चारण-दोषक सम्भावना सेहो ततबए देखल जाइत अछि। एतदर्थ कसँ लऽ कऽ पवर्ग धरि पञ्चमाक्षरेक प्रयोग करब उचित अछि। यसँ लऽ कऽ ज्ञ धरिक अक्षरक सङ्ग अनुस्वारक प्रयोग करबामे कतहु कोनो विवाद नहि देखल जाइछ। २.ढ आ ढ़ : ढ़क उच्चारण “र् ह”जकाँ होइत अछि। अतः जतऽ “र् ह”क उच्चारण हो ओतऽ मात्र ढ़ लिखल जाए। आन ठाम खाली ढ लिखल जएबाक चाही। जेना- ढ = ढाकी, ढेकी, ढीठ, ढेउआ, ढङ्ग, ढेरी, ढाकनि, ढाठ आदि। ढ़ = पढ़ाइ, बढ़ब, गढ़ब, मढ़ब, बुढ़बा, साँढ़, गाढ़, रीढ़, चाँढ़, सीढ़ी, पीढ़ी आदि। उपर्युक्त शब्द सभकेँ देखलासँ ई स्पष्ट होइत अछि जे साधारणतया शब्दक शुरूमे ढ आ मध्य तथा अन्तमे ढ़ अबैत अछि। इएह नियम ड आ ड़क सन्दर्भ सेहो लागू होइत अछि। ३.व आ ब : मैथिलीमे “व”क उच्चारण ब कएल जाइत अछि, मुदा ओकरा ब रूपमे नहि लिखल जएबाक चाही। जेना- उच्चारण : बैद्यनाथ, बिद्या, नब, देबता, बिष्णु, बंश, बन्दना आदि। एहि सभक स्थानपर क्रमशः वैद्यनाथ, विद्या, नव, देवता, विष्णु, वंश, वन्दना लिखबाक चाही। सामान्यतया व उच्चारणक लेल ओ प्रयोग कएल जाइत अछि। जेना- ओकील, ओजह आदि। ४.य आ ज : कतहु-कतहु “य”क उच्चारण “ज”जकाँ करैत देखल जाइत अछि, मुदा ओकरा ज नहि लिखबाक चाही। उच्चारणमे यज्ञ, जदि, जमुना, जुग, जाबत, जोगी, जदु, जम आदि कहल जाएबला शब्द सभकेँ क्रमशः यज्ञ, यदि, यमुना, युग, यावत, योगी, यदु, यम लिखबाक चाही। ५.ए आ य : मैथिलीक वर्तनीमे ए आ य दुनू लिखल जाइत अछि। प्राचीन वर्तनी- कएल, जाए, होएत, माए, भाए, गाए आदि। नवीन वर्तनी- कयल, जाय, होयत, माय, भाय, गाय आदि। सामान्यतया शब्दक शुरूमे ए मात्र अबैत अछि। जेना एहि, एना, एकर, एहन आदि। एहि शब्द सभक स्थानपर यहि, यना, यकर, यहन आदिक प्रयोग नहि करबाक चाही। यद्यपि मैथिलीभाषी थारू सहित किछु जातिमे शब्दक आरम्भोमे “ए”केँ य कहि उच्चारण कएल जाइत अछि। ए आ “य”क प्रयोगक सन्दर्भमे प्राचीने पद्धतिक अनुसरण करब उपयुक्त मानि एहि पुस्तकमे ओकरे प्रयोग कएल गेल अछि। किएक तँ दुनूक लेखनमे कोनो सहजता आ दुरूहताक बात नहि अछि। आ मैथिलीक सर्वसाधारणक उच्चारण-शैली यक अपेक्षा एसँ बेसी निकट छैक। खास कऽ कएल, हएब आदि कतिपय शब्दकेँ कैल, हैब आदि रूपमे कतहु-कतहु लिखल जाएब सेहो “ए”क प्रयोगकेँ बेसी समीचीन प्रमाणित करैत अछि। ६.हि, हु तथा एकार, ओकार : मैथिलीक प्राचीन लेखन-परम्परामे कोनो बातपर बल दैत काल शब्दक पाछाँ हि, हु लगाओल जाइत छैक। जेना- हुनकहि, अपनहु, ओकरहु, तत्कालहि, चोट्टहि, आनहु आदि। मुदा आधुनिक लेखनमे हिक स्थानपर एकार एवं हुक स्थानपर ओकारक प्रयोग करैत देखल जाइत अछि। जेना- हुनके, अपनो, तत्काले, चोट्टे, आनो आदि। ७.ष तथा ख : मैथिली भाषामे अधिकांशतः षक उच्चारण ख होइत अछि। जेना- षड्यन्त्र (खड़यन्त्र), षोडशी (खोड़शी), षट्कोण (खटकोण), वृषेश (वृखेश), सन्तोष (सन्तोख) आदि। ८.ध्वनि-लोप : निम्नलिखित अवस्थामे शब्दसँ ध्वनि-लोप भऽ जाइत अछि: (क) क्रियान्वयी प्रत्यय अयमे य वा ए लुप्त भऽ जाइत अछि। ओहिमे सँ पहिने अक उच्चारण दीर्घ भऽ जाइत अछि। ओकर आगाँ लोप-सूचक चिह्न वा विकारी (’ / ऽ) लगाओल जाइछ। जेना- पूर्ण रूप : पढ़ए (पढ़य) गेलाह, कए (कय) लेल, उठए (उठय) पड़तौक। अपूर्ण रूप : पढ़’ गेलाह, क’ लेल, उठ’ पड़तौक। पढ़ऽ गेलाह, कऽ लेल, उठऽ पड़तौक। (ख) पूर्वकालिक कृत आय (आए) प्रत्ययमे य (ए) लुप्त भऽ जाइछ, मुदा लोप-सूचक विकारी नहि लगाओल जाइछ। जेना- पूर्ण रूप : खाए (य) गेल, पठाय (ए) देब, नहाए (य) अएलाह। अपूर्ण रूप : खा गेल, पठा देब, नहा अएलाह। (ग) स्त्री प्रत्यय इक उच्चारण क्रियापद, संज्ञा, ओ विशेषण तीनूमे लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना- पूर्ण रूप : दोसरि मालिनि चलि गेलि। अपूर्ण रूप : दोसर मालिन चलि गेल। (घ) वर्तमान कृदन्तक अन्तिम त लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना- पूर्ण रूप : पढ़ैत अछि, बजैत अछि, गबैत अछि। अपूर्ण रूप : पढ़ै अछि, बजै अछि, गबै अछि। (ङ) क्रियापदक अवसान इक, उक, ऐक तथा हीकमे लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना- पूर्ण रूप: छियौक, छियैक, छहीक, छौक, छैक, अबितैक, होइक। अपूर्ण रूप : छियौ, छियै, छही, छौ, छै, अबितै, होइ। (च) क्रियापदीय प्रत्यय न्ह, हु तथा हकारक लोप भऽ जाइछ। जेना- पूर्ण रूप : छन्हि, कहलन्हि, कहलहुँ, गेलह, नहि। अपूर्ण रूप : छनि, कहलनि, कहलौँ, गेलऽ, नइ, नञि, नै। ९.ध्वनि स्थानान्तरण : कोनो-कोनो स्वर-ध्वनि अपना जगहसँ हटि कऽ दोसर ठाम चलि जाइत अछि। खास कऽ ह्रस्व इ आ उक सम्बन्धमे ई बात लागू होइत अछि। मैथिलीकरण भऽ गेल शब्दक मध्य वा अन्तमे जँ ह्रस्व इ वा उ आबए तँ ओकर ध्वनि स्थानान्तरित भऽ एक अक्षर आगाँ आबि जाइत अछि। जेना- शनि (शइन), पानि (पाइन), दालि ( दाइल), माटि (माइट), काछु (काउछ), मासु (माउस) आदि। मुदा तत्सम शब्द सभमे ई निअम लागू नहि होइत अछि। जेना- रश्मिकेँ रइश्म आ सुधांशुकेँ सुधाउंस नहि कहल जा सकैत अछि। १०.हलन्त(्)क प्रयोग : मैथिली भाषामे सामान्यतया हलन्त (्)क आवश्यकता नहि होइत अछि। कारण जे शब्दक अन्तमे अ उच्चारण नहि होइत अछि। मुदा संस्कृत भाषासँ जहिनाक तहिना मैथिलीमे आएल (तत्सम) शब्द सभमे हलन्त प्रयोग कएल जाइत अछि। एहि पोथीमे सामान्यतया सम्पूर्ण शब्दकेँ मैथिली भाषा सम्बन्धी निअम अनुसार हलन्तविहीन राखल गेल अछि। मुदा व्याकरण सम्बन्धी प्रयोजनक लेल अत्यावश्यक स्थानपर कतहु-कतहु हलन्त देल गेल अछि। प्रस्तुत पोथीमे मथिली लेखनक प्राचीन आ नवीन दुनू शैलीक सरल आ समीचीन पक्ष सभकेँ समेटि कऽ वर्ण-विन्यास कएल गेल अछि। स्थान आ समयमे बचतक सङ्गहि हस्त-लेखन तथा तकनीकी दृष्टिसँ सेहो सरल होबऽबला हिसाबसँ वर्ण-विन्यास मिलाओल गेल अछि। वर्तमान समयमे मैथिली मातृभाषी पर्यन्तकेँ आन भाषाक माध्यमसँ मैथिलीक ज्ञान लेबऽ पड़ि रहल परिप्रेक्ष्यमे लेखनमे सहजता तथा एकरूपतापर ध्यान देल गेल अछि। तखन मैथिली भाषाक मूल विशेषता सभ कुण्ठित नहि होइक, ताहू दिस लेखक-मण्डल सचेत अछि। प्रसिद्ध भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक कहब छनि जे सरलताक अनुसन्धानमे एहन अवस्था किन्नहु ने आबऽ देबाक चाही जे भाषाक विशेषता छाँहमे पडि जाए। -(भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक धारणाकेँ पूर्ण रूपसँ सङ्ग लऽ निर्धारित) १.२. मैथिली अकादमी, पटना द्वारा निर्धारित मैथिली लेखन-शैली

१. जे शब्द मैथिली-साहित्यक प्राचीन कालसँ आइ धरि जाहि वर्त्तनीमे प्रचलित अछि, से सामान्यतः ताहि वर्त्तनीमे लिखल जाय- उदाहरणार्थ-

ग्राह्य

एखन ठाम जकर, तकर तनिकर अछि

अग्राह्य अखन, अखनि, एखेन, अखनी ठिमा, ठिना, ठमा जेकर, तेकर तिनकर। (वैकल्पिक रूपेँ ग्राह्य) ऐछ, अहि, ए।

२. निम्नलिखित तीन प्रकारक रूप वैकल्पिकतया अपनाओल जाय: भऽ गेल, भय गेल वा भए गेल। जा रहल अछि, जाय रहल अछि, जाए रहल अछि। कर’ गेलाह, वा करय गेलाह वा करए गेलाह।

३. प्राचीन मैथिलीक ‘न्ह’ ध्वनिक स्थानमे ‘न’ लिखल जाय सकैत अछि यथा कहलनि वा कहलन्हि।

४. ‘ऐ’ तथा ‘औ’ ततय लिखल जाय जत’ स्पष्टतः ‘अइ’ तथा ‘अउ’ सदृश उच्चारण इष्ट हो। यथा- देखैत, छलैक, बौआ, छौक इत्यादि।

५. मैथिलीक निम्नलिखित शब्द एहि रूपे प्रयुक्त होयत: जैह, सैह, इएह, ओऐह, लैह तथा दैह।

६. ह्र्स्व इकारांत शब्दमे ‘इ’ के लुप्त करब सामान्यतः अग्राह्य थिक। यथा- ग्राह्य देखि आबह, मालिनि गेलि (मनुष्य मात्रमे)।

७. स्वतंत्र ह्रस्व ‘ए’ वा ‘य’ प्राचीन मैथिलीक उद्धरण आदिमे तँ यथावत राखल जाय, किंतु आधुनिक प्रयोगमे वैकल्पिक रूपेँ ‘ए’ वा ‘य’ लिखल जाय। यथा:- कयल वा कएल, अयलाह वा अएलाह, जाय वा जाए इत्यादि।

८. उच्चारणमे दू स्वरक बीच जे ‘य’ ध्वनि स्वतः आबि जाइत अछि तकरा लेखमे स्थान वैकल्पिक रूपेँ देल जाय। यथा- धीआ, अढ़ैआ, विआह, वा धीया, अढ़ैया, बियाह।

९. सानुनासिक स्वतंत्र स्वरक स्थान यथासंभव ‘ञ’ लिखल जाय वा सानुनासिक स्वर। यथा:- मैञा, कनिञा, किरतनिञा वा मैआँ, कनिआँ, किरतनिआँ।

१०. कारकक विभक्त्तिक निम्नलिखित रूप ग्राह्य:- हाथकेँ, हाथसँ, हाथेँ, हाथक, हाथमे। ’मे’ मे अनुस्वार सर्वथा त्याज्य थिक। ‘क’ क वैकल्पिक रूप ‘केर’ राखल जा सकैत अछि।

११. पूर्वकालिक क्रियापदक बाद ‘कय’ वा ‘कए’ अव्यय वैकल्पिक रूपेँ लगाओल जा सकैत अछि। यथा:- देखि कय वा देखि कए।

१२. माँग, भाँग आदिक स्थानमे माङ, भाङ इत्यादि लिखल जाय।

१३. अर्द्ध ‘न’ ओ अर्द्ध ‘म’ क बदला अनुसार नहि लिखल जाय, किंतु छापाक सुविधार्थ अर्द्ध ‘ङ’ , ‘ञ’, तथा ‘ण’ क बदला अनुस्वारो लिखल जा सकैत अछि। यथा:- अङ्क, वा अंक, अञ्चल वा अंचल, कण्ठ वा कंठ।

१४. हलंत चिह्न निअमतः लगाओल जाय, किंतु विभक्तिक संग अकारांत प्रयोग कएल जाय। यथा:- श्रीमान्, किंतु श्रीमानक।

१५. सभ एकल कारक चिह्न शब्दमे सटा क’ लिखल जाय, हटा क’ नहि, संयुक्त विभक्तिक हेतु फराक लिखल जाय, यथा घर परक।

१६. अनुनासिककेँ चन्द्रबिन्दु द्वारा व्यक्त कयल जाय। परंतु मुद्रणक सुविधार्थ हि समान जटिल मात्रापर अनुस्वारक प्रयोग चन्द्रबिन्दुक बदला कयल जा सकैत अछि। यथा- हिँ केर बदला हिं।

१७. पूर्ण विराम पासीसँ ( । ) सूचित कयल जाय।

१८. समस्त पद सटा क’ लिखल जाय, वा हाइफेनसँ जोड़ि क’ ,  हटा क’ नहि।

१९. लिअ तथा दिअ शब्दमे बिकारी (ऽ) नहि लगाओल जाय।

२०. अंक देवनागरी रूपमे राखल जाय।

२१.किछु ध्वनिक लेल नवीन चिन्ह बनबाओल जाय। जा' ई नहि बनल अछि ताबत एहि दुनू ध्वनिक बदला पूर्ववत् अय/ आय/ अए/ आए/ आओ/ अओ लिखल जाय। आकि ऎ वा ऒ सँ व्यक्त कएल जाय।

ह./- गोविन्द झा ११/८/७६ श्रीकान्त ठाकुर ११/८/७६ सुरेन्द्र झा "सुमन" ११/०८/७६

  २. मैथिलीमे भाषा सम्पादन पाठ्यक्रम २.१. उच्चारण निर्देश: (बोल्ड कएल रूप ग्राह्य):- दन्त न क उच्चारणमे दाँतमे जीह सटत- जेना बाजू नाम , मुदा ण क उच्चारणमे जीह मूर्धामे सटत (नै सटैए तँ उच्चारण दोष अछि)- जेना बाजू गणेश। तालव्य शमे जीह तालुसँ , षमे मूर्धासँ आ दन्त समे दाँतसँ सटत। निशाँ, सभ आ शोषण बाजि कऽ देखू। मैथिलीमे ष केँ वैदिक संस्कृत जकाँ ख सेहो उच्चरित कएल जाइत अछि, जेना वर्षा, दोष। य अनेको स्थानपर ज जकाँ उच्चरित होइत अछि आ ण ड़ जकाँ (यथा संयोग आ गणेश संजोग आ गड़ेस उच्चरित होइत अछि)। मैथिलीमे व क उच्चारण ब, श क उच्चारण स आ य क उच्चारण ज सेहो होइत अछि। ओहिना ह्रस्व इ बेशीकाल मैथिलीमे पहिने बाजल जाइत अछि कारण देवनागरीमे आ मिथिलाक्षरमे ह्रस्व इ अक्षरक पहिने लिखलो जाइत आ बाजलो जएबाक चाही। कारण जे हिन्दीमे एकर दोषपूर्ण उच्चारण होइत अछि (लिखल तँ पहिने जाइत अछि मुदा बाजल बादमे जाइत अछि), से शिक्षा पद्धतिक दोषक कारण हम सभ ओकर उच्चारण दोषपूर्ण ढंगसँ कऽ रहल छी। अछि- अ इ छ  ऐछ (उच्चारण) छथि- छ इ थ  – छैथ (उच्चारण) पहुँचि- प हुँ इ च (उच्चारण) आब अ आ इ ई ए ऐ ओ औ अं अः ऋ ऐ सभ लेल मात्रा सेहो अछि, मुदा ऐमे ई ऐ ओ औ अं अः ऋ केँ संयुक्ताक्षर रूपमे गलत रूपमे प्रयुक्त आ उच्चरित कएल जाइत अछि। जेना ऋ केँ री  रूपमे उच्चरित करब। आ देखियौ- ऐ लेल देखिऔ क प्रयोग अनुचित। मुदा देखिऐ लेल देखियै अनुचित। क् सँ ह् धरि अ सम्मिलित भेलासँ क सँ ह बनैत अछि, मुदा उच्चारण काल हलन्त युक्त शब्दक अन्तक उच्चारणक प्रवृत्ति बढ़ल अछि, मुदा हम जखन मनोजमे ज् अन्तमे बजैत छी, तखनो पुरनका लोककेँ बजैत सुनबन्हि- मनोजऽ, वास्तवमे ओ अ युक्त ज् = ज बजै छथि। फेर ज्ञ अछि ज् आ ञ क संयुक्त मुदा गलत उच्चारण होइत अछि- ग्य। ओहिना क्ष अछि क् आ ष क संयुक्त मुदा उच्चारण होइत अछि छ। फेर श् आ र क संयुक्त अछि श्र ( जेना श्रमिक) आ स् आ र क संयुक्त अछि स्र (जेना मिस्र)। त्र भेल त+र । उच्चारणक ऑडियो फाइल विदेह आर्काइव  http://www.videha.co.in/ पर उपलब्ध अछि। फेर केँ / सँ / पर पूर्व अक्षरसँ सटा कऽ लिखू मुदा तँ / कऽ हटा कऽ। ऐमे सँ मे पहिल सटा कऽ लिखू आ बादबला हटा कऽ। अंकक बाद टा लिखू सटा कऽ मुदा अन्य ठाम टा लिखू हटा कऽ– जेना छहटा मुदा सभ टा। फेर ६अ म सातम लिखू- छठम सातम नै। घरबलामे बला मुदा घरवालीमे वाली प्रयुक्त करू। रहए- रहै मुदा सकैए (उच्चारण सकै-ए)। मुदा कखनो काल रहए आ रहै मे अर्थ भिन्नता सेहो, जेना से कम्मो जगहमे पार्किंग करबाक अभ्यास रहै ओकरा। पुछलापर पता लागल जे ढुनढुन नाम्ना ई ड्राइवर कनाट प्लेसक पार्किंगमे काज करैत रहए। छलै, छलए मे सेहो ऐ तरहक भेल। छलए क उच्चारण छल-ए सेहो। संयोगने- (उच्चारण संजोगने) केँ/  कऽ केर- क ( केर क प्रयोग गद्यमे नै करू , पद्यमे कऽ सकै छी। ) क (जेना रामक) –रामक आ संगे (उच्चारण राम के /  राम कऽ सेहो) सँ- सऽ (उच्चारण) चन्द्रबिन्दु आ अनुस्वार- अनुस्वारमे कंठ धरिक प्रयोग होइत अछि मुदा चन्द्रबिन्दुमे नै। चन्द्रबिन्दुमे कनेक एकारक सेहो उच्चारण होइत अछि- जेना रामसँ- (उच्चारण राम सऽ)  रामकेँ- (उच्चारण राम कऽ/ राम के सेहो)। केँ जेना रामकेँ भेल हिन्दीक को (राम को)- राम को= रामकेँ क जेना रामक भेल हिन्दीक का ( राम का) राम का= रामक कऽ जेना जा कऽ भेल हिन्दीक कर ( जा कर) जा कर= जा कऽ सँ भेल हिन्दीक से (राम से) राम से= रामसँ सऽ , तऽ , त , केर (गद्यमे) एे चारू शब्द सबहक प्रयोग अवांछित। के दोसर अर्थेँ प्रयुक्त भऽ सकैए- जेना, के कहलक? विभक्ति “क”क बदला एकर प्रयोग अवांछित। नञि, नहि, नै, नइ, नँइ, नइँ, नइं ऐ सभक उच्चारण आ लेखन - नै त्त्व क बदलामे त्व जेना महत्वपूर्ण (महत्त्वपूर्ण नै) जतए अर्थ बदलि जाए ओतहि मात्र तीन अक्षरक संयुक्ताक्षरक प्रयोग उचित। सम्पति- उच्चारण स म्प इ त (सम्पत्ति नै- कारण सही उच्चारण आसानीसँ सम्भव नै)। मुदा सर्वोत्तम (सर्वोतम नै)। राष्ट्रिय (राष्ट्रीय नै) सकैए/ सकै (अर्थ परिवर्तन) पोछैले/ पोछै लेल/ पोछए लेल पोछैए/ पोछए/ (अर्थ परिवर्तन) पोछए/ पोछै ओ लोकनि ( हटा कऽ, ओ मे बिकारी नै) ओइ/ ओहि ओहिले/ ओहि लेल/ ओही लऽ जएबेँ/ बैसबेँ पँचभइयाँ देखियौक/ (देखिऔक नै- तहिना अ मे ह्रस्व आ दीर्घक मात्राक प्रयोग अनुचित) जकाँ / जेकाँ तँइ/ तैँ/ होएत / हएत नञि/ नहि/ नँइ/ नइँ/ नै सौँसे/ सौंसे बड़ / बड़ी (झोराओल) गाए (गाइ नहि), मुदा गाइक दूध (गाएक दूध नै।) रहलेँ/ पहिरतैँ हमहीं/ अहीं सब - सभ सबहक - सभहक धरि - तक गप- बात बूझब - समझब बुझलौं/ समझलौं/ बुझलहुँ - समझलहुँ हमरा आर - हम सभ आकि- आ कि सकैछ/ करैछ (गद्यमे प्रयोगक आवश्यकता नै) होइन/ होनि जाइन (जानि नै, जेना देल जाइन) मुदा जानि-बूझि (अर्थ परिव्र्तन) पइठ/ जाइठ आउ/ जाउ/ आऊ/ जाऊ मे, केँ, सँ, पर (शब्दसँ सटा कऽ) तँ कऽ धऽ दऽ (शब्दसँ हटा कऽ) मुदा दूटा वा बेसी विभक्ति संग रहलापर पहिल विभक्ति टाकेँ सटाऊ। जेना ऐमे सँ । एकटा , दूटा (मुदा कए टा) बिकारीक प्रयोग शब्दक अन्तमे, बीचमे अनावश्यक रूपेँ नै। आकारान्त आ अन्तमे अ क बाद बिकारीक प्रयोग नै (जेना दिअ , आ/ दिय’ , आ’, आ नै ) अपोस्ट्रोफीक प्रयोग बिकारीक बदलामे करब अनुचित आ मात्र फॉन्टक तकनीकी न्यूनताक परिचायक)- ओना बिकारीक संस्कृत रूप ऽ अवग्रह कहल जाइत अछि आ वर्तनी आ उच्चारण दुनू ठाम एकर लोप रहैत अछि/ रहि सकैत अछि (उच्चारणमे लोप रहिते अछि)। मुदा अपोस्ट्रोफी सेहो अंग्रेजीमे पसेसिव केसमे होइत अछि आ फ्रेंचमे शब्दमे जतए एकर प्रयोग होइत अछि जेना raison d’etre एतए सेहो एकर उच्चारण रैजौन डेटर होइत अछि, माने अपोस्ट्रॉफी अवकाश नै दैत अछि वरन जोड़ैत अछि, से एकर प्रयोग बिकारीक बदला देनाइ तकनीकी रूपेँ सेहो अनुचित)। अइमे, एहिमे/ ऐमे जइमे, जाहिमे एखन/ अखन/ अइखन केँ (के नहि) मे (अनुस्वार रहित) भऽ मे दऽ तँ (तऽ, त नै) सँ ( सऽ स नै) गाछ तर गाछ लग साँझ खन जो (जो go, करै जो do) तै/तइ जेना- तै दुआरे/ तइमे/ तइले जै/जइ जेना- जै कारण/ जइसँ/ जइले ऐ/अइ जेना- ऐ कारण/ ऐसँ/ अइले/ मुदा एकर एकटा खास प्रयोग- लालति‍ कतेक दि‍नसँ कहैत रहैत अइ लै/लइ जेना लैसँ/ लइले/ लै दुआरे लहँ/ लौं गेलौं/ लेलौं/ लेलँह/ गेलहुँ/ लेलहुँ/ लेलँ जइ/ जाहि‍/ जै जहि‍ठाम/ जाहि‍ठाम/ जइठाम/ जैठाम एहि‍/ अहि‍/ अइ (वाक्यक अंतमे ग्राह्य) / ऐ अइछ/ अछि‍/ ऐछ तइ/ तहि‍/ तै/ ताहि‍ ओहि‍/ ओइ सीखि‍/ सीख जीवि‍/ जीवी/ जीब भलेहीं/ भलहि‍ं तैं/ तँइ/ तँए जाएब/ जएब लइ/ लै छइ/ छै नहि‍/ नै/ नइ गइ/ गै छनि‍/ छन्‍हि‍  ... समए शब्‍दक संग जखन कोनो वि‍भक्‍ति‍ जुटै छै तखन समै जना समैपर इत्‍यादि‍। असगरमे हृदए आ वि‍भक्‍ति‍ जुटने हृदे जना हृदेसँ, हृदेमे इत्‍यादि‍। जइ/ जाहि‍/ जै जहि‍ठाम/ जाहि‍ठाम/ जइठाम/ जैठाम एहि‍/ अहि‍/ अइ/ ऐ अइछ/ अछि‍/ ऐछ तइ/ तहि‍/ तै/ ताहि‍ ओहि‍/ ओइ सीखि‍/ सीख जीवि‍/ जीवी/ जीब भले/ भलेहीं/ भलहि‍ं तैं/ तँइ/ तँए जाएब/ जएब लइ/ लै छइ/ छै नहि‍/ नै/ नइ गइ/ गै छनि‍/ छन्‍हि‍ चुकल अछि/ गेल गछि २.२. मैथिलीमे भाषा सम्पादन पाठ्यक्रम नीचाँक सूचीमे देल विकल्पमेसँ लैंगुएज एडीटर द्वारा कोन रूप चुनल जेबाक चाही: बोल्ड कएल रूप ग्राह्य: १.होयबला/ होबयबला/ होमयबला/ हेब’बला, हेम’बला/ होयबाक/होबएबला /होएबाक २. आ’/आऽ आ ३. क’ लेने/कऽ लेने/कए लेने/कय लेने/ल’/लऽ/लय/लए ४. भ’ गेल/भऽ गेल/भय गेल/भए गेल ५. कर’ गेलाह/करऽ गेलह/करए गेलाह/करय गेलाह ६. लिअ/दिअ लिय’,दिय’,लिअ’,दिय’/ ७. कर’ बला/करऽ बला/ करय बला करैबला/क’र’ बला / करैवाली ८. बला वला (पुरूष), वाली (स्‍त्री) ९ . आङ्ल आंग्ल १०. प्रायः प्रायह ११. दुःख दुख १ २. चलि गेल चल गेल/चैल गेल १३. देलखिन्ह देलकिन्ह, देलखिन १४. देखलन्हि देखलनि/ देखलैन्ह १५. छथिन्ह/ छलन्हि छथिन/ छलैन/ छलनि १६. चलैत/दैत चलति/दैति १७. एखनो अखनो १८. बढ़नि‍ बढ़इन बढ़न्हि १९. ओ’/ओऽ(सर्वनाम) ओ २० . ओ (संयोजक) ओ’/ओऽ २१. फाँगि/फाङ्गि फाइंग/फाइङ २२. जे जे’/जेऽ २३. ना-नुकुर ना-नुकर २४. केलन्हि/केलनि‍/कयलन्हि २५. तखनतँ/ तखन तँ २६. जा रहल/जाय रहल/जाए रहल २७. निकलय/निकलए लागल/ लगल बहराय/ बहराए लागल/ लगल निकल’/बहरै लागल २८. ओतय/ जतय जत’/ ओत’/ जतए/ ओतए २९. की फूरल जे कि फूरल जे ३०. जे जे’/जेऽ ३१. कूदि / यादि(मोन पारब) कूइद/याइद/कूद/याद/ यादि (मोन) ३२. इहो/ ओहो ३३. हँसए/ हँसय हँसऽ ३४. नौ आकि दस/नौ किंवा दस/ नौ वा दस ३५. सासु-ससुर सास-ससुर ३६. छह/ सात छ/छः/सात ३७. की  की’/ कीऽ (दीर्घीकारान्तमे ऽ वर्जित) ३८. जबाब जवाब ३९. करएताह/ करेताह करयताह ४०. दलान दिशि दलान दिश/दलान दिस ४१ . गेलाह गएलाह/गयलाह ४२. किछु आर/ किछु और/ किछ आर ४३. जाइ छल/ जाइत छल जाति छल/जैत छल ४४. पहुँचि/ भेट जाइत छल/ भेट जाइ छलए पहुँच/ भेटि‍ जाइत छल ४५. जबान (युवा)/ जवान(फौजी) ४६. लय/ लए क’/ कऽ/ लए कए / लऽ कऽ/ लऽ कए ४७. ल’/लऽ कय/ कए ४८. एखन / एखने / अखन / अखने ४९. अहींकेँ अहीँकेँ ५०. गहींर गहीँर ५१. धार पार केनाइ धार पार केनाय/केनाए ५२. जेकाँ जेँकाँ/ जकाँ ५३. तहिना तेहिना ५४. एकर अकर ५५. बहिनउ बहनोइ ५६. बहिन बहिनि ५७. बहिन-बहिनोइ बहिन-बहनउ ५८. नहि/ नै ५९. करबा / करबाय/ करबाए ६०. तँ/ त ऽ तय/तए ६१. भैयारी मे छोट-भाए/भै/, जेठ-भाय/भाइ, ६२. गि‍नतीमे दू भाइ/भाए/भाँइ ६३. ई पोथी दू भाइक/ भाँइ/ भाए/ लेल। यावत जावत ६४. माय मै / माए मुदा माइक ममता ६५. देन्हि/ दइन दनि‍/ दएन्हि/ दयन्हि दन्हि/ दैन्हि ६६. द’/ दऽ/ दए ६७. ओ (संयोजक) ओऽ (सर्वनाम) ६८. तका कए तकाय तकाए ६९. पैरे (on foot) पएरे  कएक/ कैक ७०. ताहुमे/ ताहूमे ७१. पुत्रीक ७२. बजा कय/ कए / कऽ ७३. बननाय/बननाइ ७४. कोला ७५. दिनुका दिनका ७६. ततहिसँ ७७. गरबओलन्हि/ गरबौलनि‍/ गरबेलन्हि/ गरबेलनि‍ ७८. बालु बालू ७९. चेन्ह चिन्ह(अशुद्ध) ८०. जे जे’ ८१ . से/ के से’/के’ ८२. एखुनका अखनुका ८३. भुमिहार भूमिहार ८४. सुग्गर / सुगरक/ सूगर ८५. झठहाक झटहाक ८६. छूबि ८७. करइयो/ओ करैयो ने देलक /करियौ-करइयौ ८८. पुबारि पुबाइ ८९. झगड़ा-झाँटी झगड़ा-झाँटि ९०. पएरे-पएरे पैरे-पैरे ९१. खेलएबाक ९२. खेलेबाक ९३. लगा ९४. होए- हो – होअए ९५. बुझल बूझल ९६. बूझल (संबोधन अर्थमे) ९७. यैह यएह / इएह/ सैह/ सएह ९८. तातिल ९९. अयनाय- अयनाइ/ अएनाइ/ एनाइ १००. निन्न- निन्द १०१. बिनु बिन १०२. जाए जाइ १०३. जाइ (in different sense)-last word of sentence १०४. छत पर आबि जाइ १०५. ने १०६. खेलाए (play) –खेलाइ १०७. शिकाइत- शिकायत १०८. ढप- ढ़प १०९ . पढ़- पढ ११०. कनिए/ कनिये कनिञे १११. राकस- राकश ११२. होए/ होय होइ ११३. अउरदा- औरदा ११४. बुझेलन्हि (different meaning- got understand) ११५. बुझएलन्हि/बुझेलनि‍/ बुझयलन्हि (understood himself) ११६. चलि- चल/ चलि‍ गेल ११७. खधाइ- खधाय ११८. मोन पाड़लखिन्ह/ मोन पाड़लखि‍न/ मोन पारलखिन्ह ११९. कैक- कएक- कइएक १२०. लग ल’ग १२१. जरेनाइ १२२. जरौनाइ जरओनाइ- जरएनाइ/ जरेनाइ १२३. होइत १२४. गरबेलन्हि/ गरबेलनि‍ गरबौलन्हि/ गरबौलनि‍ १२५. चिखैत- (to test)चिखइत १२६. करइयो (willing to do) करैयो १२७. जेकरा- जकरा १२८. तकरा- तेकरा १२९. बिदेसर स्थानेमे/ बिदेसरे स्थानमे १३०. करबयलहुँ/ करबएलहुँ/ करबेलहुँ करबेलौं १३१. हारिक (उच्चारण हाइरक) १३२. ओजन वजन आफसोच/ अफसोस कागत/ कागच/ कागज १३३. आधे भाग/ आध-भागे १३४. पिचा / पिचाय/पिचाए १३५. नञ/ ने १३६. बच्चा नञ (ने) पिचा जाय १३७. तखन ने (नञ) कहैत अछि। कहै/ सुनै/ देखै छल मुदा कहैत-कहैत/ सुनैत-सुनैत/ देखैत-देखैत १३८. कतेक गोटे/ कताक गोटे १३९. कमाइ-धमाइ/ कमाई- धमाई १४० . लग ल’ग १४१. खेलाइ (for playing) १४२. छथिन्ह/ छथिन १४३. होइत होइ १४४. क्यो कियो / केओ १४५. केश (hair) १४६. केस (court-case) १४७ . बननाइ/ बननाय/ बननाए १४८. जरेनाइ १४९. कुरसी कुर्सी १५०. चरचा चर्चा १५१. कर्म करम १५२. डुबाबए/ डुबाबै/ डुमाबै डुमाबय/ डुमाबए १५३. एखुनका/ अखुनका १५४. लए/ लिअए (वाक्यक अंतिम शब्द)- लऽ १५५. कएलक/ केलक १५६. गरमी गर्मी १५७ . वरदी वर्दी १५८. सुना गेलाह सुना’/सुनाऽ १५९. एनाइ-गेनाइ १६०. तेना ने घेरलन्हि/ तेना ने घेरलनि‍ १६१. नञि / नै १६२. डरो ड’रो १६३. कतहु/ कतौ कहीं १६४. उमरिगर-उमेरगर उमरगर १६५. भरिगर १६६. धोल/धोअल धोएल १६७. गप/गप्प १६८. के के’ १६९. दरबज्जा/ दरबजा १७०. ठाम १७१. धरि तक १७२. घूरि लौटि १७३. थोरबेक १७४. बड्ड १७५. तोँ/ तूँ १७६. तोँहि( पद्यमे ग्राह्य) १७७. तोँही / तोँहि १७८. करबाइए करबाइये १७९. एकेटा १८०. करितथि /करतथि १८१. पहुँचि/ पहुँच १८२. राखलन्हि रखलन्हि/ रखलनि‍ १८३. लगलन्हि/ लगलनि‍ लागलन्हि १८४. सुनि (उच्चारण सुइन) १८५. अछि (उच्चारण अइछ) १८६. एलथि गेलथि १८७. बितओने/ बि‍तौने/ बितेने १८८. करबओलन्हि/ करबौलनि‍/ करेलखिन्ह/ करेलखि‍न १८९. करएलन्हि/ करेलनि‍ १९०. आकि/ कि १९१. पहुँचि/ पहुँच १९२. बत्ती जराय/ जराए जरा (आगि लगा) १९३. से से’ १९४. हाँ मे हाँ (हाँमे हाँ विभक्त्तिमे हटा कए) १९५. फेल फैल १९६. फइल(spacious) फैल १९७. होयतन्हि/ होएतन्हि/ होएतनि‍/हेतनि‍/ हेतन्हि १९८. हाथ मटिआएब/ हाथ मटियाबय/हाथ मटियाएब १९९. फेका फेंका २००. देखाए देखा २०१. देखाबए २०२. सत्तरि सत्तर २०३. साहेब साहब २०४.गेलैन्ह/ गेलन्हि/ गेलनि‍ २०५. हेबाक/ होएबाक २०६.केलो/ कएलहुँ/केलौं/ केलुँ २०७. किछु न किछु/ किछु ने किछु २०८.घुमेलहुँ/ घुमओलहुँ/ घुमेलौं २०९. एलाक/ अएलाक २१०. अः/ अह २११.लय/ लए (अर्थ-परिवर्त्तन) २१२.कनीक/ कनेक २१३.सबहक/ सभक २१४.मिलाऽ/ मिला २१५.कऽ/ क २१६.जाऽ/ जा २१७.आऽ/ आ २१८.भऽ /भ’ (’ फॉन्टक कमीक द्योतक) २१९.निअम/ नियम २२० .हेक्टेअर/ हेक्टेयर २२१.पहिल अक्षर ढ/ बादक/ बीचक ढ़ २२२.तहिं/तहिँ/ तञि/ तैं २२३.कहिं/ कहीं २२४.तँइ/ तैं / तइँ २२५.नँइ/ नइँ/  नञि/ नहि/नै २२६.है/ हए / एलीहेँ/ २२७.छञि/ छै/ छैक /छइ २२८.दृष्टिएँ/ दृष्टियेँ २२९.आ (come)/ आऽ(conjunction) २३०. आ (conjunction)/ आऽ(come) २३१.कुनो/ कोनो, कोना/केना २३२.गेलैन्ह-गेलन्हि-गेलनि‍ २३३.हेबाक- होएबाक २३४.केलौँ- कएलौँ-कएलहुँ/केलौं २३५.किछु न किछ- किछु ने किछु २३६.केहेन- केहन २३७.आऽ (come)-आ (conjunction-and)/आ। आब'-आब' /आबह-आबह २३८. हएत-हैत २३९.घुमेलहुँ-घुमएलहुँ- घुमेलाें २४०.एलाक- अएलाक २४१.होनि- होइन/ होन्हि/ २४२.ओ-राम ओ श्यामक बीच(conjunction), ओऽ कहलक (he said)/ओ २४३.की हए/ कोसी अएली हए/ की है। की हइ २४४.दृष्टिएँ/ दृष्टियेँ २४५ .शामिल/ सामेल २४६.तैँ / तँए/ तञि/ तहिं २४७.जौं / ज्योँ/ जँ/ २४८.सभ/ सब २४९.सभक/ सबहक २५०.कहिं/ कहीं २५१.कुनो/ कोनो/ कोनहुँ/ २५२.फारकती भऽ गेल/ भए गेल/ भय गेल २५३.कोना/ केना/ कन्‍ना/कना २५४.अः/ अह २५५.जनै/ जनञ २५६.गेलनि‍/ गेलाह (अर्थ परिवर्तन) २५७.केलन्हि/ कएलन्हि/ केलनि‍/ २५८.लय/ लए/ लएह (अर्थ परिवर्तन) २५९.कनीक/ कनेक/कनी-मनी २६०.पठेलन्हि‍ पठेलनि‍/ पठेलइन/ पपठओलन्हि/ पठबौलनि‍/ २६१.निअम/ नियम २६२.हेक्टेअर/ हेक्टेयर २६३.पहिल अक्षर रहने ढ/ बीचमे रहने ढ़ २६४.आकारान्तमे बिकारीक प्रयोग उचित नै/ अपोस्ट्रोफीक प्रयोग फान्टक तकनीकी न्यूनताक परिचायक ओकर बदला अवग्रह (बिकारी) क प्रयोग उचित २६५.केर (पद्यमे ग्राह्य) / -क/ कऽ/ के २६६.छैन्हि- छन्हि २६७.लगैए/ लगैये २६८.होएत/ हएत २६९.जाएत/ जएत/ २७०.आएत/ अएत/ आओत २७१ .खाएत/ खएत/ खैत २७२.पिअएबाक/ पिएबाक/पि‍येबाक २७३.शुरु/ शुरुह २७४.शुरुहे/ शुरुए २७५.अएताह/अओताह/ एताह/ औताह २७६.जाहि/ जाइ/ जइ/ जै/ २७७.जाइत/ जैतए/ जइतए २७८.आएल/ अएल २७९.कैक/ कएक २८०.आयल/ अएल/ आएल २८१. जाए/ जअए/ जए (लालति‍ जाए लगलीह।) २८२. नुकएल/ नुकाएल २८३. कठुआएल/ कठुअएल २८४. ताहि/ तै/ तइ २८५. गायब/ गाएब/ गएब २८६. सकै/ सकए/ सकय २८७.सेरा/सरा/ सराए (भात सरा गेल) २८८.कहैत रही/देखैत रही/ कहैत छलौं/ कहै छलौं- अहिना चलैत/ पढ़ैत (पढ़ै-पढ़ैत अर्थ कखनो काल परिवर्तित) - आर बुझै/ बुझैत (बुझै/ बुझै छी, मुदा बुझैत-बुझैत)/ सकैत/ सकै। करैत/ करै। दै/ दैत। छैक/ छै। बचलै/ बचलैक। रखबा/ रखबाक । बिनु/ बिन। रातिक/ रातुक बुझै आ बुझैत केर अपन-अपन जगहपर प्रयोग समीचीन अछि‍। बुझैत-बुझैत आब बुझलि‍ऐ। हमहूँ बुझै छी। २८९. दुआरे/ द्वारे २९०.भेटि/ भेट/ भेँट २९१. खन/ खीन/  खुना (भोर खन/ भोर खीन) २९२.तक/ धरि २९३.गऽ/ गै (meaning different-जनबै गऽ) २९४.सऽ/ सँ (मुदा दऽ, लऽ) २९५.त्त्व,(तीन अक्षरक मेल बदला पुनरुक्तिक एक आ एकटा दोसरक उपयोग) आदिक बदला त्व आदि। महत्त्व/ महत्व/ कर्ता/ कर्त्ता आदिमे त्त संयुक्तक कोनो आवश्यकता मैथिलीमे नै अछि। वक्तव्य २९६.बेसी/ बेशी २९७.बाला/वाला बला/ वला (रहैबला) २९८ .वाली/ (बदलैवाली) २९९.वार्त्ता/ वार्ता ३००. अन्तर्राष्ट्रिय/ अन्तर्राष्ट्रीय ३०१. लेमए/ लेबए ३०२.लमछुरका, नमछुरका ३०२.लागै/ लगै ( भेटैत/ भेटै) ३०३.लागल/ लगल ३०४.हबा/ हवा ३०५.राखलक/ रखलक ३०६.आ (come)/ आ (and) ३०७. पश्चाताप/ पश्चात्ताप ३०८. ऽ केर व्यवहार शब्दक अन्तमे मात्र, यथासंभव बीचमे नै। ३०९.कहैत/ कहै ३१०. रहए (छल)/ रहै (छलै) (meaning different) ३११.तागति/ ताकति ३१२.खराप/ खराब ३१३.बोइन/ बोनि/ बोइनि ३१४.जाठि/ जाइठ ३१५.कागज/ कागच/ कागत ३१६.गिरै (meaning different- swallow)/ गिरए (खसए) ३१७.राष्ट्रिय/ राष्ट्रीय DATE-LIST (year- 2012-13) (१४२० फसली साल) Marriage Days: Nov.2012- 25, 26, 28, 29, 30 Dec.2012- 5,9, 10, 13, 14 January 2013- 16, 17, 18, 23, 24, 31 Feb.2013- 1, 3, 4, 6, 8, 10, 14, 15, 18, 20, 24, 25 April 2013- 21, 22, 24, 26, 29 May 2013- 1,2,3,5,6,9,12,13,17,19,20,22,23,24,26,27,29,30,31 June 2013- 2,3 July 2013- 11, 14, 15 Upanayana Days: January 2013- 16 February 2013- 14, 15, 20, 21 April 2013- 22 May 2013- 20, 21 Dviragaman Din: November 2012- 25, 26, 28, 29 December 2012- 2, 3, 14 February 2013- 14, 15, 18, 20, 21, 22, 27, 28 March 2013- 1 April 2013- 18, 22, 24, 26, 28, 29 May 2013- 12, 13 Mundan Din: November 2012- 26, 30 December 2012- 3 January 2013- 18, 24 February 2013- 1, 14, 15, 20, 28 April 2013- 17 May 2013- 13, 23, 29 June 2013- 13, 19, 26, 27, 28 July 2013- 10, 15 FESTIVALS OF MITHILA (2012-13) Mauna Panchami-08 July Madhushravani- 22 July Nag Panchami- 24 July Raksha Bandhan- 02 Aug Krishnastami- 10 August Kushi Amavasya / Somvari Vrat- 17 August Vishwakarma Pooja- 17 September Hartalika Teej- 18 September ChauthChandra-19 September Karma Dharma Ekadashi-26 September Indra Pooja Aarambh- 27 September Anant Caturdashi- 29 Sep Agastyarghadaan- 30 Sep Pitri Paksha begins- 30 Sep Jimootavahan Vrata/ Jitia-08 October Matri Navami- 09 October SomvatiAmavasya Vrat- 15 October Kalashsthapan- 16 October Belnauti- 20 October Patrika Pravesh- 21 October Mahastami- 22 October Maha Navami - 23 October Vijaya Dashami- 24 October Kojagara- 29 Oct Dhanteras- 11 November Diyabati, shyama pooja-13 November Annakoota/ Govardhana Pooja-14 November Bhratridwitiya/ Chitragupta Pooja- 15 November Chhathi -19 November Devotthan Ekadashi- 24 November ravivratarambh- 25 November Navanna parvan- 25 November KartikPoornima- Sama Visarjan- 28 November Vivaha Panchmi- 17 December Makara/ Teela Sankranti-14 Jan Naraknivaran chaturdashi- 08 February Basant Panchami/ Saraswati Pooja- 15 February Achla Saptmi- 17 February Mahashivaratri-10 March Holikadahan-Fagua-26 March Holi- 28 March Varuni Trayodashi-07 April Chaiti  navaratrarambh- 11 April Jurishital-15 April Chaiti Chhathi vrata-16 April Ram Navami- 19 April Ravi Brat Ant- 12 May Akshaya Tritiya-13 May Janaki Navami- 19 May Vat Savitri-barasait- 08 June Ganga Dashhara-18 June Somavati Amavasya Vrata- 08 July Jagannath Rath Yatra- 10 July Hari Sayan Ekadashi- 19 July Aashadhi Guru Poornima-22 Jul VIDEHA ARCHIVE १.विदेह ई-पत्रिकाक सभटा पुरान अंक ब्रेल, तिरहुता आ देवनागरी रूपमे Videha e journal's all old issues in Braille Tirhuta and Devanagari versions विदेह ई-पत्रिकाक पहिल ५० अंक

विदेह ई-पत्रिकाक ५०म सँ आगाँक अंक  http://sites.google.com/a/videha.com/videha/ https://sites.google.com/a/videha.com/videha-archive-part-i/ https://sites.google.com/a/videha.com/videha-archive-part-ii/ २.मैथिली पोथी डाउनलोड Maithili Books Download http://sites.google.com/a/videha.com/videha-pothi ३.मैथिली ऑडियो संकलन Maithili Audio Downloads http://sites.google.com/a/videha.com/videha-audio ४.मैथिली वीडियोक संकलन Maithili Videos http://sites.google.com/a/videha.com/videha-video ५.मिथिला चित्रकला/ आधुनिक चित्रकला आ चित्र Mithila Painting/ Modern Art and Photos http://sites.google.com/a/videha.com/videha-paintings-photos/ "विदेह"क एहि सभ सहयोगी लिंकपर सेहो एक बेर जाउ। ६.विदेह मैथिली क्विज  :  http://videhaquiz.blogspot.com/ ७.विदेह मैथिली जालवृत्त एग्रीगेटर : http://videha-aggregator.blogspot.com/ ८.विदेह मैथिली साहित्य अंग्रेजीमे अनूदित http://madhubani-art.blogspot.com/ ९.विदेहक पूर्व-रूप "भालसरिक गाछ"  : http://gajendrathakur.blogspot.com/ १०.विदेह इंडेक्स  : http://videha123.blogspot.com/ ११.विदेह फाइल : http://videha123.wordpress.com/ १२. विदेह: सदेह : पहिल तिरहुता (मिथिला़क्षर) जालवृत्त (ब्लॉग) http://videha-sadeha.blogspot.com/ १३. विदेह:ब्रेल: मैथिली ब्रेलमे: पहिल बेर विदेह द्वारा http://videha-braille.blogspot.com/ १४.VIDEHA IST MAITHILI  FORTNIGHTLY EJOURNAL ARCHIVE http://videha-archive.blogspot.com/ १५. विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका मैथिली पोथीक आर्काइव http://videha-pothi.blogspot.com/ १६. विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका ऑडियो आर्काइव http://videha-audio.blogspot.com/ १७. विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका वीडियो आर्काइव http://videha-video.blogspot.com/ १८. विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका मिथिला चित्रकला, आधुनिक कला आ चित्रकला http://videha-paintings-photos.blogspot.com/ १९. मैथिल आर मिथिला (मैथिलीक सभसँ लोकप्रिय जालवृत्त) http://maithilaurmithila.blogspot.com/ २०.श्रुति प्रकाशन http://www.shruti-publication.com/ २१.http://groups.google.com/group/videha २२.http://groups.yahoo.com/group/VIDEHA/ २३.गजेन्द्र ठाकुर इ‍डेक्स http://gajendrathakur123.blogspot.com २४. नेना भुटका http://mangan-khabas.blogspot.com/ २५.विदेह रेडियो:मैथिली कथा-कविता आदिक पहिल पोडकास्ट साइट http://videha123radio.wordpress.com/ २६.Videha Radio २७. Join official Videha facebook group. २८. विदेह मैथिली नाट्य उत्सव http://maithili-drama.blogspot.com/ २९.समदिया http://esamaad.blogspot.com/ ३०. मैथिली फिल्म्स http://maithilifilms.blogspot.com/ ३१.अनचिन्हार आखर http://anchinharakharkolkata.blogspot.com/ ३२. मैथिली हाइकू http://maithili-haiku.blogspot.com/ ३३. मानक मैथिली http://manak-maithili.blogspot.com/ ३४. विहनि कथा http://vihanikatha.blogspot.in/ ३५. मैथिली कविता http://maithili-kavita.blogspot.in/ ३६. मैथिली कथा http://maithili-katha.blogspot.in/ ३७.मैथिली समालोचना http://maithili-samalochna.blogspot.in/ महत्त्वपूर्ण सूचना: The Maithili pdf books are AVAILABLE FOR free PDF DOWNLOAD AT

https://sites.google.com/a/videha.com/videha/ http://videha123.wordpress.com/   http://videha123.wordpress.com/about/ विदेह:सदेह:१: २: ३: ४:५:६:७:८:९:१० "विदेह"क प्रिंट संस्करण: विदेह-ई-पत्रिका (http://www.videha.co.in/) क चुनल रचना सम्मिलित। सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। Details for purchase available at publishers's (print-version) site http://www.shruti-publication.com  or you may write to shruti.publication@shruti-publication.com विदेह मैथिली साहित्य आन्दोलन (c)२००४-१३. सर्वाधिकार लेखकाधीन आ जतए लेखकक नाम नहि अछि ततए संपादकाधीन। विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। सह-सम्पादक: उमेश मंडल। सहायक सम्पादक: शिव कुमार झा आ मुन्नाजी (मनोज कुमार कर्ण)। भाषा-सम्पादन: नागेन्द्र कुमार झा आ पञ्जीकार विद्यानन्द झा। कला-सम्पादन: ज्योति झा चौधरी आ रश्मि रेखा सिन्हा। सम्पादक-शोध-अन्वेषण: डॉ. जया वर्मा आ डॉ. राजीव कुमार वर्मा। सम्पादक- नाटक-रंगमंच-चलचित्र- बेचन ठाकुर। सम्पादक- सूचना-सम्पर्क-समाद- पूनम मंडल आ प्रियंका झा। सम्पादक- अनुवाद विभाग- विनीत उत्पल। रचनाकार अपन मौलिक आ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि) ggajendra@videha.com केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx, .rtf वा .txt फॉर्मेटमे पठा सकैत छथि। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेताह, से आशा करैत छी। रचनाक अंतमे टाइप रहय, जे ई रचना मौलिक अछि, आ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। मेल प्राप्त होयबाक बाद यथासंभव शीघ्र ( सात दिनक भीतर) एकर प्रकाशनक अंकक सूचना देल जायत। ’विदेह' प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका अछि आ ऐमे मैथिली, संस्कृत आ अंग्रेजीमे मिथिला आ मैथिलीसँ संबंधित रचना प्रकाशित कएल जाइत अछि। एहि ई पत्रिकाकेँ श्रीमति लक्ष्मी ठाकुर द्वारा मासक ०१ आ १५ तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि। (c) 2004-13 सर्वाधिकार सुरक्षित। विदेहमे प्रकाशित सभटा रचना आ आर्काइवक सर्वाधिकार रचनाकार आ संग्रहकर्त्ताक लगमे छन्हि। रचनाक अनुवाद आ पुनः प्रकाशन किंवा आर्काइवक उपयोगक अधिकार किनबाक हेतु ggajendra@videha.com पर संपर्क करू। एहि साइटकेँ प्रीति झा ठाकुर, मधूलिका चौधरी आ रश्मि प्रिया द्वारा डिजाइन कएल गेल। सिद्धिरस्तु 1 वि दे ह विदेह Videha বিদেহ  www.videha.co.in विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका www.videha.com Videha Ist Maithili Fortnightly ejournal  विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका 'विदेह'१२७ म अंक ०१ अप्रैल २०१३ (वर्ष ६ मास ६४ अंक १२७) मानुषीमिह संस्कृताम् ISSN 2229-547X VIDEHA

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i a ४ a3 : : ie { ISSN 2278 - 3046 दे \\ Corporate Office: Flat No.|62/2, i i (@)) Ground Floor, VIP Nagar, Kolkata, | 3 ; ee West Bengal , Pin-700!00 Sa आना. q हर ही. मल UDBODHANA aio wal: paper@udbodhana.com a ee A Contemporary Research Journal of Humanities and Social Sciences : a ue Udbodhana is a portal of Sarasvat-N iketanam which is dedicated to uplitmentof Sani Se ees | Ref. No. aaah STRUT Date- ही. ae g -कोष्ध-पत्रिका' जूक नौका on दी ई-शोष्थ-पत्रिका Seema, Axa HHA Hang) Bae TN निष्यिला- | rach विष्वजिदत्नय WRT) विभाजने ETE, 24 -02-20/32 ATR a Drej-aBrenig, ern pha MraToMesy) डा. Mey, Tay ft कदइव्तनि जे वर्तमान _ | | ey आब्न-पत्िकाक अत बसी TEM Hoga उपभोग Bae RA शाथकरणा B rE Sra केले |ater ES जिगागाब->दत डा वीणा HL ase RTT _ l eal & 3rer-oGem PR aha aig & Wet aa aR] Shien PT oi a AD a \ asa HARM, LANA AXA दिलिाजका WHR डॉ. iL TAU oh FH APH Geese HFA [ARAN war ka RIM OT कि Sa धन Re, saat ies | पा aL _ IT उकड़ि, TR उकर soe! | GP cami “BSA wiles | SHY हाई HA NS) INH “Hl |) लाकनि <A SAB लिनाजक अचार ध्यल-व्यन्ना (अर नी सी की _ Ta FD GA GATS) HS SA SUA TTA, वक्त HUA AY ATA शा मानन्द्र ATEN , GE Re, ays Dna, Fara मास ही pa rat sang | SHA, hoy ने MAAS मड़लाव्यर्णस' IH aor कार्गेक्रममे मत | i झत्यालन Fs aaa, STO कमललि SR ASA Sa पयादिककारो ° Bia AAR Ta FeaGly zWIv SY. PSEA AR कब्यत्तनि | a ‘ BAZ - BAA Diag हा | ae | FOUNDERS: Chief Administrative Officer } कि Shri Bipin Kumar Jha Shri Sumit Anand |) | | I Cell for Indian Sciences and Technology in Sanskrit B.A. English (Hons.) . पे H&SS, Indian Institute of Gener Bombay, Mumbai < Sangeet Prabhakar a x Mukesh Kumar Jha wate #5] 9006896368 | udbodhana@gmail.com / j Sw +9] 97488-75-447/8627-93-83-98 fe ONG मातेव रक्षति पितेव हिते नियुंक्ते । कालेव चाभिरमयत्यपनीयखेदम्‌ ॥ ) as ae कीर्ति च दिक्षु विपलां वितनोति लक्ष्मी । किं किं न साधयति eer विद्या ॥ दि po